Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Vyavaharik Sanskritprabodh Pratham Dittiyo Bhag

Tripathi., Sukhanand Pandit · 2012/08

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प्रमादि शोधन करने कराने में अनवकाश होने पर भी बड़ी सहायता दी है । तथापि,भूल रह जाना मनुष्य की स्वभावही है अस्तु पुस्तक के अन्त में शुद्धाशुद्धपत्र भी लगवा दिया है। पादकों को उचित है कि पढ़ने से पहले उसके अनुसार शुद्ध करलें । इति शिवम् । मुखानन्द पिपाठी। व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोध की विषयानुक्रमणिका । . . . . . ४० " " अथ प्रथमोभागः। अ. विषय. अ. विपय. पृष्ठ. २३ अनेक प्रकार के अनोम्ने घाफ्य १ देहापयवविशेष प मशहरफहारते इत्यादि १५५ २ पनविशेष. २४ अभिनन्दनपत्र, अर्जी, चिट्ठी ३ आभूषणविशेष. पहेलियां, छन्द इत्यादि १८७ ४ गृहस्थवस्तु २५ दिनचर्या च रानिचो. २०४ ५ पाप्रविशेष, २४ ६ चतुष्पाद यथानविशेष. २८ अथ द्वितीयो भागः। ७ पक्षिविशेष. ३३ ८ दुखदायीजीवविशेष १ सन्धि विषय वर्णन ९ वन जन्तुविशेष. २ पलिहरूप. १० जलजन्तुविशेष જર ३ अन्ययार्थ ११ छात्रोपयोगीपाठशालासम्ब ४ स्त्रीप्रत्यय न्धी यस्तु, ५ कारक १२ भोजनपदार्थविशेष ६ समास - १३ सम्बन्धद्योतकशब्द ७२ ७ तद्धित ३० १४ जातिविशेष ८ धातुरूप. ३२ १५ वृक्ष, पुष्प व सख्याविशेष . ९० ९णिजन्त प्रक्रिया वर्णन १६ आकाशपदार्थ, यहोरात्रा १० सनन्त प्रक्रिया वर्णन दिभाग ९९ ११ यन्त प्रक्रिया वर्णन ६० १७ सर्गीयवृत्तान्त, धर्मसम्बन्धी १२ यङलुगन्त वर्णन अनेक विषय १०४ । १३ नाम धातु वर्णन ६२ १८ रोगविशेष १२२ २४ आत्मनेपद वर्णन १९ औषधि, घ उनकी तील १२५ १५ परसैपद वर्णन २० विशेषण शब्द. १३१ । १६ याच्य वर्णन , २१ व्याकरपा की परिभाषा १७ लकापर्थ वर्णन, २२ अवशिए किया विशेष १५० १८ दन्त वर्णन, . " " . . . . " . . . . . . . . . .

...ah LIBRARY PREFACE. The practice of speaking Sanskrit in India gradually declinei luring the Afolamadan rule until it became a dead language. Our lamble thanks for its revival are specially due to our late lamented Queen-Express as well as to tlie present King-Emperor, wliose reigns have been inarked with the resuscitation of this Aryan language. Now it would be well if every Indian who has any knowledge of Hindi acquired a practical knowledge of Sanskrit himself and teach it to his children before they join an English school. The profoundness of the Sanskrit language is 'generally admitted. Practical proficiency in Sanskrit is rather difficult to acquirc. To supply this long-fell want is the object of the present work. It consits of two parts, I and II of 23 and 18 chapters respectively a brief sketch of which is giron below. The plan arlopted is as follows :- First, the leading denotes the subjet matter. Secondly, important words of daily use are given. Lastly come the illustrations of Hindi and Sanskrit sentences in common use. Thic healings will, it is hoped, give the reader an adequate iden of the work. Great pains have been taken to collect and classify, as far as possible, all the important words in daily use with tlicir Sanskrit equivalents. The substantives are put in the singular nominative to show their genders, as it is very difficult to determine gender in Sanskrit. In the samc way the roots are given in the present tense () third person singular (aragon 499) to show their conjugation etc. (TUTTE FRA). Tliere are already sercral Sanskrit translation books in the market, In niy humble opinion, lorerer, they are not I 1 of much help to a student who wishes to cure a priclical kuowledge of Sanskrit within a short period It is loped that tlic student, who rends this work with 1 Guru' or studıcs it lumself carefully, will hequre some hnonlede of colloqurul Sanskrit Sanskrit proverbs letter writing religious principles and dutics 95 ucll is the mode of Sanskrit tris Intron togellier with thic pcculiautics of Sunakut Groniniu No other Sunsl rit tr ınslation book will be required upto the Vatriculation und T A atinduds by 7 student who 119 thoroughly gone through this book after a preliminary study of my · A GUIDS 10 ANGLO SANSKRIT Convriks.1110V 101 BEGINNERS At first I intended writing this work in Anglo Sanskrit 13 Ile done with my book for beginners referied to above, but considering that it would then be uscful to Lnglıslı 1 nosing sluients only, I have witten it in thic prcscnt form so that it may be useful to all I offer a fer lunts for tie benefit of teachers Tlac chapters in tlıc second part dealing withi grammatical con structions should be one through before thing up the book rc, ularls from the beginnm; and in the first part the worls with their synons ins in each chajter should be carefully nastered before using them in sentences I conclude thcsc renirhs with a list of the chapters in both the parts The nines of the chiaptere in the fir t piirt ?rc 19 ſol lons --(1) Timbe parts ctc of tlıolunun body (2) Clothies of ciery kind (3) Ornaments (1) House hold thus (5) Ic scls and the chref parts of a liousc () Crlilo and conses Inces (7) Birds (8) 1'oisonous animals und insects (9) Animals of the forest (10) Ammuls living in water (11) Things reguured for students in school aulcy (13) Words showing family relationslupa (12) Int (11) 1 iji Caste and occupation of Indians. (15) Certain trees and flowers and Sanskrit numeration. (16) IIeavenly bodies and divisions of day and night. (17) IIeavenly beings and things and some mysteries of our religion. (18) Kinds of disease. (10) Medicines and weights, (20) Alljeetives. (21) Remaining verbs. (22) Definitions of Sanskrit Grammar with English equivalents. (23) Miscellaneous sentences, idiomatic scntences, famous Sanskrit proverbs, shlokas for entertainment on occasions of marriage gatherings. (2-1) Addresses, letters, applications etc. and the important Sanskrit Iletres. (25) The duties to be performed by a man during day and night. The names of the chapters of the Second part are ag follos :- (1) The rules and examples of the Conjunction of Sanskrit letters (Ama). (2) Declension of great many words in cominon use in all the cases with their derivations (yeni). (3) Indeclinables with their nieanings (paquief). () Temininc affixes (FATECU). (5) Cases of nouns and pronouns with their uses (sit]. (0) Rulcs, uses and cxamples of compounds (BI). (7) Rules for nominal affixes (area). (8) Conjugation [117] of many important rerbs with all constructions [9] required. (9) Causative verbs [rūsa]. (10) Desiclerative verbs (a), (11) Frequen- Latinc rerls [794]. (12) Frequentativo verbs rejecting (tegra). (13) Nominal veris (7117917]. (1.1) Rules for the use of Parasmaipada [97EREZ ). (15) Rules for the use of (HIFRÀGaſtat), (10) Rules of intransitivo passive [ 3777**] and Passive and actirc voices [OST] (17) Rulcs for the use of Tense and Wood (Fire Sit). (18) Verbal allires (2T). ALIGANI, Sept. 1907. S. N. TRIPATHI.

विद्यार्थियों को परमोपयोगी पुस्तकें। सदाचार सोपान-इसमें लड़कों को माता, पिता और गुरु की भक्ति करने के लाभ और प्रातःकाल से लेकर सोने तक के धर्म कर्म घड़ी उत्तमता से बताये गये है। मूल्य ) धर्मसोपान-इस्मै धर्म के समस्त तत्व घेदादि धर्मग्रन्थों के अनुकूल ऐसीसु. गमता से लिखे गये हैं कि थोड़ेही काल में धर्म का पूर्ण ज्ञान हो जाताई मूल्य ।) ब्रह्मचर्याश्रम-ब्रह्मचर्य की विद्यार्थियों का बड़ाही आवश्यकता है। इसी पर संसार फेधर्मादि और परलोक की उन्नति निर्भर है। इसके पढ़ने से विद्या. र्थियों का यहुत उपकार होगा। मूल्य।) मात्र चाणक्यनीतिदर्पण-यह नीति का सर्घात्तम प्रन्य है। आजकल भारत- वासी मात्र को इसका पढ़ना आवश्यक है इसीसे इस्को एक विद्वान पण्डित के द्वारा सुन्दर हिन्दी टोका बनवा कर प्रकाशित कराई है। मूल लोक भाटे अक्षरों में और उन पर अन्वयाङ्क लिख फर नीचे पहले फेवल अन्वयात के अनुसार संम्मत हिन्दी में शब्दार्थ और फिर भावार्थ लिया गया है। इससे संस्कृतश और नागरी जाननेघाले दोनों का विशेष उपकार सम्भव है ।एक भाषा जान कर दूसरीभापाभीसरलतासे आसक्ती है। लगभग डेढ़ सौ पृष्ठ की सजिल्द पुस्तक का मूल्य केवल :-) मात्र रखा है। धर्मसङ्गीत-भारतवर्ष भर के सुप्रसिद्ध विद्वान् कविराजों के धर्मरस चुतचुहाते सगीतों का संग्रह घड़ीही उत्तमता से किया गया है । इसके सहीत श्रवण करतेही चित्त आनन्द मग्न हो जाता है । और धर्म की जागृति हो आती है। मूल्य ) माग्न आइले सरन प्रदीपिका-इसके द्वारा घोड़ी सी हिन्दी जाननेवाला भी थोड़ेही समय में नित्त प्रति व्यवहार में आनेवाली अप्रेजी और संस्कृत घोलना, लिखना और पढ़ना सीख सत्ता है। क्योंकि इसमें फ्रम यहुत सुन्दर रक्सा गया है। पहले बहुत से छोटे २ माद और फिर उनका व्ययहार यामयों द्वारा दिखाया गया है। इसमें १० अध्याय हैं उनके नाम यहां लिख देते है कि जिनसे इसका उपयोगी होना स्वयं ज्ञात हो जायगा। व्यवहारिक शन्द, २ मैं समय सख्या शब्द, ३-स्कूल सम्बन्धी ४ देहक अङ्गों के नाम, रिश्तेदारी के शब्द, ६ सब प्रकार के कपड़ों के नाम, ७ भोजन के पदार्थ, ८ घर सम्बन्धी सम्द, ९ घर पी वस्तुओं के नामादि, १० पशुपक्षी और धर्म सम्बन्धी पाते। इस्पर भी दाम फेवल 1) मात्र । न्यायादर्श-न्याय के अति पटिन तर्कसग्रह ग्रन्थ को कि जिस्वी प्रत्येक बात कण्ठस्थ करना होती है विद्यार्थियों के हितार्थ यह परिश्रम से चित्रपर [नक] के रूप में प्रकाशित कराया है। जिसके द्वारा न्यायशास्त्र हस्तामल- क्वत् प्रतीत होने लगता है। दाम-) मात्र । मिलने का पता:- १ अध्याय में बहुत से श्री सरस्वतीभण्डार काशी।

B8 श्रीगणेशायनमः। LIBRART. व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । गोत्राधिराजतनयातनयः सहितः श्रियां । पायात्मत्यूहसन्दोहवारणो वारणाननः ॥१॥ अनङ्गशरखिन्नाङ्गीमालिङ्गन्गोपभामिनीम् । जायतां श्रेयसे वोऽद्य कृष्णः कलितकौस्तुभः ॥२॥ अधीतविधानधुनातनॉस्तान् विलोक्य तान्तान् व्यवहारिकोक्ती शिप्यान् विनेतुं व्यवहारवाण्यामभाणि वाणी किलदेवतानाम् ॥३॥ यधत्र स्खलितं भवेन्मम कृतौ शोध्यं बुधरेव तत् । प्रायासः प्रथमः प्रकल्पित इति ज्ञात्वा दयासागरैः ।। इत्येवं विनतो निवेदयति वो डिम्भः मुखानन्दको । वालानां किल चेष्टितं गुरुजनानन्दाय सञ्जायते ॥४॥ प्रथमोऽध्यायः । देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन~-देहावयवविशेपाः । हिन्दी संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। पुरुषापूरला जर मया साल बालक वाल, शिशुः, अर्भकः। रोमा रोमन् , लोमन् (न)तनूरुहः- स्त्री नारी, अगना, अयला, घामा, मूंछ - गण्डलोमन्, (न०) गुम्फा. योपित् , (स्त्री)। डाढी श्मश्रु, (म०) कूर्चम्, मुस- घशा, चन्श्या. रोमन् (न०). चोटी शिरा, वेणिः (णी),धम्मिलः सिर शिरः (म०), शीर्षम्, मूर्धा (पुं०),मौलि, मस्तका-यम् १। शोमया। २शान्तान् । चूडा, कवरी.

. दांत [ २ ] प्रथमोऽध्यायः। देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन देहावयवविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। खोपडी कपाल: (लम्), कर्परः, धूत नितम्बः रोस्थि (न०). दोः, [पु.] वाहुः, भुजा माथा ललाटम् मस्तिष्कम्,माल-नाड़ी स्नायुः (स्त्री०)शिरा,धमनिः पटम्,पटलम् मांसपेशी. भी भ्रमलता. हाथ हस्तः,पाणिः, कर,पञ्चशाखः आँख यक्षुः, (न०) नेत्रम्, नयनम्, कोहनी पर, कफ फो] णिः अक्षि (न०). उँगली अङ्गुलि-ली। नाक नासिका,घोणा,गन्धज्ञानासा अंगठा अङ्गुष्ठः। वक्रम्,आमनम्, मुखम्, चारउँगलितर्जनी,मध्यमा, अनामिका, यों के मामः कनिष्ठिका, तुण्डम्, दन्तः रदः, दशनादंदाजम्भः हथेली-करतलः लम्. मसूरे दन्तमांसम् . नाह सम् कररहनसररम्] जीम जिला, रसना, रसशा. शरीर काया, देहः, शरीरम्, पपुः तालुआ तालु (न०)काकुदम् . फेफडा फुप्फुसम्. चर्म (10) त्वक् (स्त्री) दिंष्ट्रा. कीफसम् कुल्यम्,अस्थि(न०) पिशितम्, मांसम्, पललम्, कण्ठ, जपान कन्यम्. युवा (पु.)तरुणः. चरबी खः, स्पविर. मेदः (न०) षसा, धपा. कर्णः, धोत्रम्. हडोकेभीत मजा, सार रकोघरी कानका मैल कर्णकिम्, फर्णमलम्. ठोड़ी चिबुकम्, हनुः (पु० स्त्री०)/ग्न. गर्दन रक्तम्- पौधागला,कन्धरम,शिरोधिः- कलेगा.. युकम् (का), अग्रमासम्. स्कन्धः, अंस -णिका, स्थन्दिनी, लाला. पीठ पृष्ठम, पृष्ठदेश: कमर करि, भौणिः(जी), (स्त्री)| घुठी. धुटिके, गुल्फी. ('न.) गात्रम्. एका, निगरणः, मांस रुधिरम,मसूक् (न०) भन्नम्, परकी " व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन देहावयवविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । जकाकाऊन ऊना, सक्थि (न०) हिनार कुलटा, पुंश्चली, पन्धकी. परीहिस्सा विधवा विश्वस्ता, विधवा,रण्डा. मूत. मूत्रम्, मस्रायः सपी आलिः,पयस्या. मल. पुरीषम् , गूधम् , विष्ठा, सुहागिन |पतिपत्नी,सभर्तृका. शत्, (स्त्री). दूती दूतिः, सञ्चारिका. पुरुष का गुफा, [.] पार्यम्, रेतः, वेश्या धारस्त्री, वारांगना, गणिका. धीर्य पीजम् . खाविन्द धयः, पतिः, मर्ताः खीका रजः, पुष्पम् , आर्तवम्. जारलवार जार, उपपतिः. अंडकोश मुश्का, वृषण जर उल्वम्, जरायुः, गर्भाशयः. कुचा सोबर कुचा, स्तन सूतिगृहम् . दिल. मना,(न०)मानसम्,चित्तम् गर्भ गर्भः,मूणः (कुक्षिस्थस्यमा- हृदयम् इत् , चेतः (न०) णिनः नाम). मानना मूत्राशय. वस्तिः. मन्यसे. गुदा. गुदम्, अपानम्, | आनयति,हरति,आयहति पायुः, (पुं०) मबद्वारम्. प्रापयति। बुद्धि. बुद्धिः, मनीपा, धिपणा, फजावं निदधाति, नियोजय- लगाना ति, अनक्ति. प्रशा, शेमुपी, धीः। ঘিনা पेट. उदरम्, अठरम् तुन्दम् कुक्षि थूकना पीव्यति, निष्ठीयति । नाभिः (भी),उदरावर्तः निगलना असते, निगिरति. भाँते. अन्त्राणि । डकारना उदिति। लिंग, लिंगम्, उपस्था, शिश्नः, मेढ़ छींकना क्षौति, क्षयधुं करोति ।- योनी. योनिः, भगः-(गम् ). के करना वमति, उद्धमति। पादः,पदम् धरणा-णम्,अंघ्रि नाक साफ नसःमलं त्यजति । (पस्से प्रसूतिः. करना चुटकी छोटिका खकारना कासते, क्षौति । मुक्का, मुठी मुएिका.. खाँसना लाना काजल जिघ्रति, 30 तम् करोति। [४] प्रथमोऽध्यायः। देह के कुल आ इत्यादि का वर्णन- देहावयनविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। छना स्पृशति। सीदो बजा- शीश्शन्द करोति.. हंसना स्मयते, पिवसति,मन्दस्मि भारना हन्ति,महति,ताडयति, चिपटना आश्लिप्यति,मालिकनं करो- भिहन्ति. ति, सजति । लातमुक्षा- लसया-पादेन,मुटिना-हन्ति, पेशाय क० मेहति, मूत्रयति-ते। मारना ताडयति, युध्यते,प्रहाते. विशाजाना पुरीयमुत्सृजति, इंदते। खोदना खनति, [भूमि] अपदारयति, स्त्री प्रसङ्ग अभिगच्छति, संगच्छते, भिनत्ति करना मैथुनकरोति, मरना नियत, प्राणांस्त्यजति भोजन बास्त,प्रसत,खादति,अनानि पहरना परिशसे भक्षयति,भुत,थभ्यपहरति उतारना थवतारयति, अपनयति. नहाना स्नाति, मजति, गाहते करना करोति, विदधाति कुला फागण्ट्रपं करोति गालोदेनाशपति-ते, अभिशंसति, शा. चखना मास्वादते, लेदि. घ युराक- पं ददाति,आक्रोशति, ग- पकड़ना गृह्णाति,गृहीते,धरति,धारयः, हना ईयति. ति, घनशांत. आशीर्वाद आशास्ते, आशिष ददाति- स्पी-अही-करोति, गृमाति. देना ते, अभिनन्दति. उपटन पा० उद्धर्तनम् उत्सादनम् इयना निमजति, मजयति [अ०] करोति-ते, अभ्यनक्ति अभिमान विकत्यते, प्यक्ति. कररराफ यायच्छति. कुस्ती.५० मापुसकरोति पाहवाह. नगकरना तर्पयनि. यि युध्यति. हयनकरना जुहोति. पल-रति,बजशि,प्रफमातन्त रोकना अवरुणद्धि. यागम्छात, आपाति जप करना जपति, स्वपत्ति, पोत, निद्राति, काना सा कणे जपति. जागना जागर्ति,प्रविष्यते,निद्रा त्पति. शुरू करना प्रारभते, उरमामते, प्रकामते. करना आना करना प्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः । [ ५ ] देह के कुल अन इत्यादि का वर्णन- देहावयवविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। रोना रोदिति, पिलपति, आक्रन्द-काँपना कम्पते, वेपते. ति, अणि पातयति. नाचना नृत्यति, नटति. हँसीकरना उपहासं करोति, उपहंसति. इरना विभेति, संवि-यस्यति आशाफरना आशापयति आदिशति. उद्विजते. आशा देना अनुमन्यते, अनुजानाति, घयदाना मुहाति. अनुमोदन, यनुजानीते, साफ करना शोधयति,माष्टि,मायति प्रे० घूमना परिभ्रमति, पर्यटति. तलाफदेना त्यजति, निराकरोति. घुमाना भ्रामयति. डाहकरना असूयति, ईयति, [चतुर्थ्या- बहसकरना वियदते. सह] परोक न सहते, भागना पलायते, धापति-ते, अपक्र- मृप्यति. दौड़ना मति-ते,फ्राम्यति,विद्रवति, परैति, अपधावति, सरति- पहिला पाट-प्रथमः पाठः। हिन्दी। संस्कृत। पुरुष अपनी बुद्धि से अत्यन्त बलवान् | पुरुषः स्वबुद्ध्याऽतीय यलवतोऽपि सिंहादिजीवों को भी वश कर लेता है. सिंहादीन् जीयान् वशमानयति. सो को चाहिये कि पति की सेवा योपित्पतिभक्ता भवेत् तमेव चेश्वरतु. करनेवालीहोये और उसकोही ईश्वर ल्यं मन्यत. तुल्य माने. माधव के बड़ी भारी चोटी है तू भी अस्त्यतीय दीघों धम्मिल्ला माधवस्य ऐसी ही रख. त्वमप्येताहशं स्थापय. कृष्णदत्त के पास मुलायम कृष्णदत्तस्य केशाः सुकोमलास्सन्ति, भोजदेव के याल कड़े हैं. भोजदेवस्य चिकुरास्त्यतीव प्रखर प्रथमोऽध्यायः। देह के कुल अन इत्यादि का वर्णन देहावयबविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत । तुम्हारे देह के धाल और डाड़ी | सन्ति लोहितवर्णानि तव देहलोमानि लोहरी है. श्मभणि च. त्रियों के मुह पर मूछ नहीं होती. स्त्रीणां गण्डस्थले गण्डलोमानि न भवन्ति. पटुत से गोरे डादी मूंछ नहीं रखते. यहवा गुरण्डाः श्मश्रुगुम्फो न दधते. गोविन्ददेव काशिर बुढ़ापे से कांपता है. गोविन्ददेवस्य शिरः वार्धक्यारकम्पते. कृष्णदत्त ने रामदास के सिर में ऐसी कृष्णदत्तेन रामदासमूर्ध्नि ईग्यष्ठिम- लाठी मारी जिससे उसकी खोपड़ी हारः कृतःथेन तत्कपालो भन्नः। फट गई. एवं सधनाव्य. नारायण का माथा बड़ा चौड़ा है इस नारायणस्य मस्तिष्कमाव पिपुलमत लिये यह धनवान है. केशवदत्त का भी चलाना तो देखो. केशवदत्तस्य भूचालनन्तु पश्य । आँखो के बिना जीने से क्या ? बिनाक्षिभ्यो (णी)कि जीवितेन! माधय की नाक तोते की सी दिखाईमाधषस्य नासिफा(घोणा) गुफनासा. देती है. पदृश्यते। उसके मुँह में यहुत से छाले है. सस्य मुसे यहयो विस्फोटका विद्यन्ते. गोविन्द रोजमर्रा दाँतन करता है इसी | गोपिन्दः प्रत्यहं पन्तधायनं करोति लिये उसकी दांतों की कतार बड़ी अत एप तस्य दन्तपंकिरतीव शुभ्रा, उजली है. जीवों को जीम से ही रस का ज्ञान | मिहयैष रसशानं भवति जीयानाम् । होता है. देवदत्त ! आँखों में कजल लगालो. देवदत्त ! अक्ष्णोः कन्जलं निधेदि। कृष्ण अपनी नाक से फूल पता है. कृष्णः स्थनसा पुष्पाणि मिति. देयो सांप आपके सामने मुसे को सर्पो भयताम् समक्ष म्पकं प्रसत निगलता है. खुए नाक क्यों नहीं साफ करता. दुध नसःमलं कमलजसिक्षालयसि इति पश्पत घ्यावहारिकसंस्कृतमबोधः। देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन- देहावयव विशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। तालुए से पोले जानेयाले अक्षर ता-| तालुना मोच्यमाना वास्तालच्या लव्य होते हैं. भवन्ति. हिंस्रक जीयों की डाइ यही मजबूत श्वापदानां दंष्ट्रा अतीव दा निशिता- और पैनी होती है. श्व मपन्ति. नाका बेहलक होता है यह सुना जाता नकः निर्गलो भवतीति श्रूयत यतः स है क्योंकि यह जीवों को पकड़ के | जीवानाफम्य (धृत्वा) युगपदेव नि- पक साथ निगल जाता है. गिलति. माज तू बहुतही खांसता है इसमें भघ त्वमतीय काससे (क्षौलि) इत्यत्र क्या समय है. फिकारणम् ? फल मैंने दही खाया था यही सपय घो मया दधि भक्षितमतद्धि कारणं होगा. भवेत् . देवदत्त कानों से ठीकर नहीं सुनता, देवदत्तः कर्णाभ्यां यथावन्न शृणोति, तो क्या यह यहिरा है? और क्या. तर्हि स कि यधिरः? आम्, (अथ किं) [पादन] हनुमान की ठोड़ी बड़ी लम्बी चौड़ी थी. हनुमतधियुकमत्यायतमासीत् . गोवर्धन की गर्दन यहुत यड़ी और गोयर्धनस्य कन्धरातीय दीर्घा शङ्खाय- शहू कीसी है. तिश्च विद्यते. शूरवारों के कन्धे बड़े ऊंचे होते हैं. शूराणां स्कन्धावत्युन्नती भवतः, भीमसेन कुन्ती सहित चारों भाइयों ? भीमसेनः कुन्त्या सह चनुरोऽपि भ्रा. को अपनी पीठ पर चढ़ा कर सुरक्षा तन् स्वपृष्ठमारोप्य सुरगया लाक्षा- द्वारा लाखा भवन से याहर निकल भवनाद्वहिनिस्सृतः . गया. नयकैया अपनी कमर में (चूतरों के नर्तकः स्वकटयां (नितम्यस्योपरि) ऊपर)ोधनी बांध कर नाचता है, क्षुद्रघण्टिकां बद्ध्या नृत्यति. स्त्री का रज और पुरुप का वीर्य मिल / स्त्रिया रजः पुरुषस्य गुको मिलित्या कर सन्तति उत्पन्न होती है, सन्ततिद्भवति.

[८] प्रथमोऽध्यायः देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन देहाक्यवविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। श्रीराम के भुज दण्ड के प्रताप से दुष्ट | श्रीरामस्य दोर्दण्डप्रतापेन दुष्टास्त्र. डरते हैं. स्यन्ति. वह हाथ से मुझे छूता है। स हस्तेन मां स्पृशति हकीमजी मेरे देह में कुछ हडचल है भिषग्वर! मम देहस्यास्वास्थ्यं वर्तते. रुपा कर नाही तो देखिये. कृपया नाडिन्तु परीक्षस्व. जय उसने मुझ घेकसूर को भी कोहनी | यदा स मां निर्दोपमपि परेणाताड- से मारा तय मैंने उसके लात मारी. यत् तदाहं त लत्तया प्राहरम्. क्या तुम अंगुलियों के नाम भी जान- किं त्वमङ्गुलौनां नामान्यपि चेत्सि ? ते हो. जानता तुम भी सुनो । पहिला तो घेद्यहं स्वमपि शृणु प्रथमस्त्वगुष्टः अंगूठा, दूसरी तर्जनी, तीसरी मध्य द्वितीया तर्जनी तृतीया मध्यमा चतु- मा (पीच फी) चौथी अनामिका अनामिका पश्चमी कनिष्ठिकेति. और पांचवी कनिष्ठिका (कनी). भाग्य उलटा होने पर हाथ में आई | देवमातिकूल्ये करतलगतमपि पस्तु हुई चीज़ भी नए हो जाती है. नश्यति. मनुष्य अपने देहों की रक्षा करे क्यों मनुष्याः स्थवपि रक्षेयुःयत पतान्ये कि यही धर्म कर्म के हेतु है, प धर्मकर्महेतूनि सन्ति. उसकी खाल घड़ी कड़ी हैं हिंस्रक | तस्य स्वगतीय कठिना श्वापदेरपि जीचा से भी फारी नहीं जा सकी. भेत्तुं न शक्यते. लोह, माँस, चरबी, हार, मज्जा रसायमांसमेदोऽस्थिमजानफ्राणि, और धीर्य ये सात देह की धातु है. इति सप्त देहस्था धातयः. लाई को शुला कर श्स मालक के नोह नापितमाझ्यास्य बालस्य फररुहानकर्तय कतरवाभो. रसा इसका हिम्मत बहादुर दिल दुःख की अस्प साहसिकं मनः विषमावस्थाया. दशा में भी नहीं घबराता है. मपि न मुमति.

ध्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन- देहावयवविशेषाः । खाता. हिन्दी। संस्कृत। दामोदरदास की बुद्धि सराहनीय है मुलाच्या प्रक्षा दामोदरदासस्य य: जो सोलहवें वर्ष में एम.ए. परीक्षा पोडशतमेऽन्दे मास्टर आफ आर्टसेति में पास हुए. परीक्षायामुत्तीणों ऽभवत् शकरदत्त का पेट तो वहा है परच शङ्करदत्तस्योदरन्तु पृथु परश्चाधिकंन ज्यादह भुक्त गोपीवलभ की ढूंडी बड़ी गहरी है / गोपीवल्लभस्य नाभिरतीय गम्भीरा यह हररोज प्रातकाल ही न्हाता है. धर्त्तते, म प्रत्यहं प्रत्यूर पव स्नाति. मनुष्य भोजन के पीछे १६ कुल्ले करे. जनः भोजनान्ते पोडशगंडपाम्कुर्यात्. कृपा करो और यहां से जल्दी जाओ. कृपां कुरु अतःशीघ्रं गच्छ च. यह शहद हथेली पर रख कर उंगली स सारघं करतले धृत्वाऽगुल्या लेदि. से चाटता है. मनुष्य पाखाना फिरने के बाद ढेले जनो मलत्यागानन्तरं लोष्ठादिना गुदं गरः से गुदा साफ करे और फिर परिमार्जयेत् ततो जलेन च. यड़े जोर से न पादे और न रोके. नोचरपानवायुं मुञ्चत् नचावरुध्यात्. उसके मुंह पर बहुत सी फुन्सी है. तस्य मुख्ने यहवः पिटिका विद्यन्ते. श्रीराम का शरीरसर्ष लक्षण सम्पन्न है. श्रीरामस्य शरीरं सलक्षणसम्पन्नमाति, उसकी जायें केले के संभों की नाई है. तस्याः उक कदलीस्तम्भवस्तः. मेरी परिया में बैल ने लात मारी. मम गुल्फे वृषभेणपादमहारः कृतः श्रीमान गुरुजी के चरण कमलों को नमोनमः श्रीमद्गुरुचरणकमलेभ्यः. नमस्कार हो. मित्र! बहुत दिनों में देखा है गामो मुझसे मिलो. 'मित्र! वियदृष्टोऽसि एहि मामालिप्य. एस धो को पकड़ो नहीं तो जमीन में इमं घट गृहाण मोचेदयं पृथिव्यां पति- गिर पड़ेगा. ध्यति. इस बालक के मुख से बड़ी लार बहती है. अस्य चालस्यमुखाद महतोलाला बहति: जल से.

प्रथमोऽध्ययः। देह के कुल अन इत्यादि का वर्णन- देहावयवविशेषाः। मल और हिन्दी। संस्कृत। इस सॉक को लाकर मेरे कान का | इमां शलाकामादाय मम कर्णांकह मेल निकालो. निफाशय. हकोम रोग को जांच के लिये नाडी | वैद्याः रम्परिक्षार्थ नाड़ों मलभूनच मूत्र की जांच करते है. परीक्षन्त. मनुष्य को चाहिये कि घाय को बड़े जनः शुक्रं यतेन परिरक्षेत. जतन से रक्षा करे. विना अण्डकोशो के घाई अरता वाह- अवृषणा सभ्या अख्तति कथ्यन्त. मोहनी नाम की स्त्री अपने जाल्ला को | मोहिनी नानोस्त्रों स्वयमजी कुचाभ्यां द्वाद्धयों से दूध पिलाता है. स्तन्य पाययति. उसके वस्ति (ढूंडा से नीचे का हिं- तस्य वस्तिप्रदेश महतो वेदना यतते । स्सा) प्रदेश में वहाँ तकलीफ है। यैद्य प्रदर्शय. डाक्टर को दिखाओ. माता व्याह के वक्त येटेका उबटन माता विवाहसमये पुषस्योद्वतंने करती है. फरोात. गोविन्द ध्याफरण पढ़कर अय का- | गोविन्दी व्याकरणमधोत्याधुना का व्यादि पढ़ता है. व्यादपिठति. उसने अजीण में पा लिया इसीलिये फे कर दी. सोऽजीणेऽभुक्त अत पवादवमत्. जो रोज़ मरह कसरत करता है वह यो नित्यं व्यायच्छति (व्यायाम करो. हमेशा चंगा रहता है. ति) स सदैव स्पस्थो वर्तते (आस्त) (भवति). आज मेले में यहुत से मल्ह कुश्ती अद्य महोत्सवे यहयो मल्लाः मयुद्ध लगे सो ज़रूर हो देखना चाहिये. घोड़ा अच्छा चलता है. साधु विफमते चासी. जो मेरेसाथ चले घर आओ. करिष्यन्ति तदवश्यमेय द्रष्टव्यम् . यो मया सह चलनु स आगच्छतु.

व्यावहारिकसरहतप्रयोधः। [११] देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन-देहावयवचिशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। आज कलके घहुत से लोग अपनी आधुनिका यहयो जनाः स्वक्षुद्रयुद्धि- तुच्छ बुद्धि की युक्तियों से भूपों के युक्तीः पुरस्रुत्यापण्डितः सह साथ यहस करते हैं. वियदन्ते. जहां इनकी असलियत को जानने वाले यत्र तन्मर्मज्ञाः पण्डिता विद्यन्ते ततस्तु पण्डित हैं तहां से तो भाग जाते हैं, परिद्रयन्ति. क्या यह मदन मोहन सोता है ? किमयं मदनमोहनःस्वपिति (शेते) ? नहीं अभीतो जागता है. न, आद्यापितु जागति. यहां सीटी कौन धजाता है. उसे यहां कस्तन शाश् शब्दकरोति । तमप्रानय लाओ मैं मारूंगा. ताइयिष्याम्यहम्. भाई। देवदत्त ने मुझको मुछसे मारा भ्रातः । देवदत्तो मां मुष्टिनाताइयत्, और मने उसको लातसे मारा. अहश्च तं लत्तया प्रादरम्. रास्ते में गढ़ा कभी न गोदो । जो मार्ग कदापि गत नखन । यः पनति स योदता है वही गिरता है यह मदा- एव पततीराि प्रसिद्धम्. अक्सर जीवों के फलेजे और हृदय में प्रायो जीवानां घुधायां हृदय चाधिका ज्यादह चरबी होती है. वसा भवति. प्यारे ! आज नये कपड़े पहिनो. प्रिय अद्य नूतनानि वस्त्राणि परिधत्स्य. आपापकल कीमत भपतंगामे बोनिपात? एक बूदा कुम्हार मरगया यह मुना है./एको वृद्धफुलालः प्राणामत्यजदितिश्रुतं सोयर में मत जाओ. सूतिगृहे मागच्छ. यह कौन कता है? यह नारायण है | फोऽयं शाति?नारायणोऽयं न कोऽप्य. और फोई दूसरा नहीं है. यह घोड़ा बहुत से योझमे लदाहुआ यहुभाराल्लान्तीयमश्वो दृश्यते, अम्य दिपाई देता है इसका बोझ उतारो. भारमवतारय. रोटी बियां अपने पुरुषों को छोड़कर पुंश्चल्या स्थपतीनहित्या जागन् भजन्ते. जागेस स्नेह रखती है.

जाता है. पुष्ट होता है. [१२] प्रथमोऽयायः देह के कुल अन इत्यादि का वर्णन-देहावयव विशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। देखो बन्दर तालाब में कैसे तैरते है. वानरास्तडागे कथं प्रपन्त इति पश्य. जो मनुष्य जल में तैरना नहीं जानता योजनी जलपवनं न जानाति स ग. यह गहरे पानी में जहर ही इवं म्भीरजलेऽवश्यमेव निममति. जेर में लिपटा हुआ गर्भ पेट में ही माता के साये हुए अन्न के रस से| उल्वेनावृतो गर्मः जठर पय मातृना- दितनानरसन पुष्यति. देवदत्त देवताओं के लिये रोज हपन देवदत्तो देवानुदिश्य नित्यं जुहोति. करता है. आज कल के महाशय इस हवन को आधुनिका महाशया एतसवनं पवन. पयन शोधन केलियेही कहते हैं परन्तु शोधनार्थमेव पदन्ति नतु पूर्व पश्यत पहिले लोग नहीं उनका भापस का तेषां परस्परभेदम् भेद तो देखो. जो हवा शुद्ध करनेदी के लिये हवन | यदि पवनशुद्ध्यर्थमेष इयनं स्यात् होय तो अपने कपोल कल्पित अन्यों तर्हि स्वकपोलकल्पितयेषु हषन हवन मन्त्रों से क्या ? मन्त्रः किम्?. यह खयाल करने की बात है. पतबिम्त्यम् । यह कौन है ? यह मेरी हदोली है। | केये? इय ममालि। किमियं पतिषन्ती क्या यह सुहागिन है वा विधवा. विषयावा. आस्तिक लोग देवता और पित लोगों आस्तिका देषान् पिन तर्पयन्ति. को तर्पण करते है. गणेशदत्त को बुलाओ. गणेशदत्तमाकारय. पाहतो साया करता है. स तु सल्यामुपास्ते. सिर्फ अपने शालों के न जाननेवाले केवलमविदितस्वसामालिशपार- अंग्रेजी पारसी जवान के जानमेवाले फिजूल बकवाद करते है. स्थन्ते. सिकभाषावेत्तार एष वृथा विक- व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोधः । [१३] देह के कुल अङ्ग इत्यादि का वर्णन---देहावयवविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। इसको आदत यहुत खराब है यह हम- । अस्य प्रकृतिस्त्यतीव दुधाऽयं सर्वदा शा दूसरों को बुराइयों को दूसरों के परदोषान् परेषां फर्णे जपति. कानों में कहा करता है. क्या वेश्या भी गर्भधारण करतो है? किं वारास्त्रियोऽपि गर्भधारयन्ति. वह मृत्युअय का जाप अरिष्ट निवारण | स मृत्युअयस्य जापमरिटनिवृत्तय- करने के लिये शुरु करता है। आरभते. दूतियों का क्या लक्षण हे ? न मालूम. दूतीनां किं लक्षणं? न जाने. यह आपमा सेवक मौजूद है मुझे एषोऽहं तव सेवकः आशापय मां कि हुक्म दौजिये में क्या करूं. महं फरामीति. यह कोन रोती है? कोई भूखी भि- 1 फेयं रोदिति ? अस्ति काचिक्षुधार्ता कारिन है. भिक्षुकी. चालक उसकी हँसी करते हैं. बालकास्तामुएहसन्ति. बहुत से भिखारी एकही दिन में बहुत | बहवो भिक्षुका एकस्मिन्नेव दिने यापु से गायों में भीख के लिये घूमते हैं. प्रामेषु भिक्षार्थम्पयंदान्ति. मैलनिकाला कानका मैल निफालता कर्णमलनिस्सारयिता कर्णकिह नि. काशयति. भन्दुल्लाखां मुसल्मान ने कल अपनी अब्दुल्लाखाँभिधो यवनः हास्यनियं सीको तलाक देदी निराफरोह पाँच महायज्ञ नीचे के श्लोक में दि- पञ्च महायज्ञा निम्नलोके प्रदर्शिता.. खाये है. अध्यापन (पढ़ाना) ब्रह्मर्यश, तर्पण अध्यापनं ग्रह्मयज्ञः पित्यसंस्तु तपर्णम् पितृयह होम दैवयने, पलि भौतयज्ञ, होमो दैः लिभीतो नेयशो ऽतिथि अभ्यागत पूजन नृयो. पूजनं. है तो परन्तु यह साफ नहीं है महर- अस्ति तु परषान स्पया कृपया स्प. मानी करसको माप खुलासा करो टीकुर्वन्तु भवन्त इति कस्यचिरिछ- यह किसी शिष्य की किन्हीं गुरुओं प्यस्य फाँश्चिद्गुरुन्मत्युक्तिरियम् । . .

vrrA [१४] द्वितीयोऽध्यायः देह के कुल अन इत्यादि का वर्णन-हावययविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। के लिये कहन है। गुम-सुनो, गुरु-श्रुयतां शिप्या-मृणामि. चला-सुनता ह. अध्यापन अर्थात् वेदादि का गढ़ाना | अध्यापनं कोऽर्थः घेदादः पाठनम् म. पहिला यश है; अन्नजल इत्यादि से थमायशः: अमोदकादिनापितॄणांतएं- पितृतर्पण करना दूसरा यज्ञ है। णद्वितीयः; होम पैश्यदेवहमश्वर- हयन ओर चलिचपदव यह तोमरा तीयः; बलिहरणं चतुर्थः; अतिथी- था है। बलि (मॅट) देना यह चौथा नां गृहागनानामनादिना सपया यश है; घर आये हुए थतिथियों को पशमइति. अन्नजल से पूजा करना पाँचयाँ - यश है. दूसरा अध्याय-द्वितीयोऽध्यायः । चत्र इत्यादि का वर्णन - वस्त्रविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत । कपास पिचुः, (पुं) तूलः, कार्पासः |अगरया अहरक्षणी.. पसनम, अंशुकम्, वासः धोती अधोवस्त्रम्. कपड़ा (न०) चलम्. पाजामा पगड़ी उष्णीयम्. जङ्घात्राणम्, जहावस्त्रम्. पतलून शिरस्त्राणम्, शिरस्कम्, कमरयन्द | कटिसूत्रम्-रशना. टोपी शिरोवेष्टनम्. पादघाणम्. उत्तरीय'. नौशारः. गलंयन्द गलबन्धनांनुकम्. चादरजीन उत्तरच्छदः, शय्याच्छादः मिजई नम्, प्रच्छद.. कुती,कोट फटा परिकरः, रज़ाई वा पन्चुरु, निचोला. पोश दड़ी व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। AAAAAAJI घन इत्यादि का वर्णन-वस्त्रविशेपाः। - हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। उपवहणम्, उपचहः, उप- नारंगी पिच्छिला, कौसुम्भी-भः. तकिया धानम्. प्याजू पलाण्डुवर्णः रूमाल करवस्त्रम् हरित्, हरिद्वर्णः, जाँधिया जहावस्त्रम्. केशारया | केशरवर्णः, कुंकुमवर्णः, लोई,कंचल रल्लका, कम्बलः. करिया | कपूरवर्णः. लहंगा चण्डातकम्-फः घुसना प्रविशति. ऑगी चोल: साना विनिसीब्यति (सिव्). ओदना शाटिका. उठना, उत्तिष्ठति, अयतिष्ठति. साड़ी पड़ाहोना फौशिफम् , क्षोमम्, दुक- बिछाना । सं+आ+परिस्तृणाति. रेशमीयरल लम्, कौशाम्परम्. (खरोदना फ्रीणाति, क्रोणीते. पड़दा जयनिका, तिरस्करिणी. वेचना विक्रोणाति, विक्रीणोते. चर्णः, रागा, रङ्ग:- कतति, कतयति, (६०) नीला नीलः, श्याम कातना तन्तून् करोति काला कृष्णः, काला, असितः, सृजति. पीला पीतः, पीतल, हरिद्राभः. ययतिते, चयतिते,गुम्फति, लोहितः, शोणः. चुनना विरचयति. भूरा सपेद श्वेतः,शुलः,धवलः,सितः. तिष्ठत्ति, आस्ते, निपीदति, घंजनी धूम्रः, धूमला, नीललोहितः. उपविशति. गुलायो पाटलः, जपासवर्णः. रंजना रञ्जयति. हिन्दी। संस्कृत। जैसे मनुष्य पुराने घस्त्रों को छोड़कर | यथा नरो जीणानि वासांसि विहाय नये पस्त्रों को पहनता है सेसही यह नवान्यं शुकनि परिधत्ते, तथैवाय प्राणो पुराने देह को छोड़ कर नये देही पुराणं देहं परित्याय, नूतनं को लेता है। गृह्णाति. वयति, रक्त वैठना [१६] द्वितीयोऽध्यायः। बस इत्यादि का वर्णन-वसविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। कचहरी में विना पगड़ी फा कोई भी अधिकरणे ऽनुष्णोपः कश्चिदपि जनो आदमी नहीं घुसता है. न प्रविशति. मेरी टोपी कहां गई उसे ढूंद कर यहां मम शिरस्त्राणां कुत्र गर्त तदन्विभ्या- लाओ. प्रान ये. मेरा दुपट्टा तो खूटी से उतार दो. ममौत्तरीयन्तु नागदन्तादयतारय. जाई के मौसम में गुल्वन्द यहुत | शीतती शिरोधांशुकमतीव सुखप्रदं भवति. कल में दो कुर्ते सिख्याऊंगा. वोऽहं द्वौकञ्चुको सेवयितालि. क्या आपके पास मेरी धोती है? नहीं कि तय सनिधी ममाधोपनमस्ति? तो कैसे न्हाऊ. न तहिं कथं स्नायाम् . तुम्हारे पाजामे में तो कमरयन्द भी तब जात्राणे तु काटेसूत्रमपि नास्ति. सुखदायक होता है. नहीं है. लो. यह लो, मैं देता हूं। मोजे भी पहन | अहं ददामीर्द गृहाण । पादत्राणअपि परिधत्स्य. शूर वीर लोग फैटा घांधकर लड़ाई शराः परिकर बध्या युद्धार्थमुत्तियन्ति. के लिये खड़े होते है. रात में ओढ़ने के लिये चादरा लागो. रात्री परिधानार्थमुत्तरीयमानय. खाट पर बिछौना विछाओ. शय्योपरि शय्याच्छादनं प्रस्तारय. भर रज़ाई की जरूरत नहीं है, नास्त्यावश्यकताधुना नौशारस्य. जो कोई तकिया हो तो देभो. यद्यस्ति किश्चिदुपवर्हण तहिं देहि. कल मैंने पांच रूमाल खरीदे. ह्योऽहं पञ्चकरवस्त्राण्यकोणाम् . कम्पल सब मौसम में सुखदायक है. सर्वर्तुषु कम्बलः मुखमरः, धीकानेर को लाई घात अच्छी होती है. घीकानेरस्य राषम् प्रशस्यतरंभषति वह स्त्रीसाड़ी उतार लहँगा पहनती है. | सा सी शाटिकामवतार्य घातक परिधते. अक्सर लिया जाड़े के मौसम में दुलाइयां ओढ़ती है. प्रायःलियाशीतर्ती नौशारान्परिवधते.

[१७] व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोधः। घंस्त्र इत्यादि का वर्णन-वस्त्रविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत । उसकी अँगिया कहाँ है? तस्याश्चोला कुन वर्तते? वह तो धोती ही में लिपट रही है. स तु शाटिकायामेवालग्नः, रेशमी और ऊनी कपड़ा भजन पूजा क्षौमं और्णश्च वसनं भजनपूजादिपु प्र. में अच्छा होता है.. शस्तं भवति. यह पड़दा यहां क्यों लगाया है ? किमर्थमारोपितैपा जवनिकाऽन्न ? कास से रूई निकलवा कर और उसे कार्यासातूलं शोधयित्वा तत्कर्तयित्वा कतवा कर बहुत तरह के कपड़े च यहुविधानि वस्त्राणि विरच्यन्ते, बनाये जाते है. (निर्मीयन्ते). कोई रँगरेज़ बुला कर ग्यारह ओढ़ने कञ्चिद्रअकमायैकादशशाटिकापृथ. अलग २ रंग के रंगने के लिये दो. क्पृथक् वारक्षनार्थ प्रयच्छ. आप कौन २ से रंग चाहते हैं सिर्फ भवान् काँस्कान्वानभिलपति तेषां उनके नामही ले दीजिये वे उसी नामान्येव केवलं ब्रवीतु तास्तु त- रंग के हो जायेंगे। यहुत अच्छा. द्वर्णा एव भविष्यन्ति । घरम्. एका नीला, द्वितीया कृष्णा, तृतीया एक नीली, दूसरी काली, तीसरी पीली,चौथी लाल, पाँचौं बैंजनी, पीता, चतुर्थी रक्ता, पञ्चमी नील- छठी गुलावी, सातवीं नारंगी, आ- लोहिता, पष्ठी पाटला, सप्तमी को- ठवीं प्याजू, नौपी हरी, दसवीं के सुम्भी, अष्टमी पलाण्डुवर्णा, नवमी सरिया, ग्यारहवीं कयूरिया वगैरह. हरिद्वणी, दशमी केशरवर्णा, एका. दशी कपूरवर्णा चेति. समल की गई और आक की रुई से शाल्मलितूलेनार्फतूलेन भृतमुपवईण- भरा हुआ तफिया या बिछौना गरम मास्तरणम्बोणं फोमलचभवति. और मुलायम होता है.

[१८] तृतीयोऽध्यायः! तीसरा अध्याय-तृतीयोऽध्यायः गहने इत्यादि का वर्णन-आभूपणविशेपाः उपाभरणाश्च । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। गहने अलकारः,आभरणम्, परि-विडिया नूपुरम् रम्, मञ्जीरम्. कार: जीर टबला, हल.. तोड़ा, कठन कण्ठिका, कण्ठाभरणम् नासाभरणम्- ला,कण्ठा अल्मारी काष्ठफलकम्. अंगूठी,छल्ले अङ्गुलीयकम्, ऊर्मिका. प्रसाधनी, कङ्कतः-तिका, काँधनी मेखला, काञ्चिः-ची. कंघी फेशमार्जनी. दान्तकुरे- दनी सुई आकर्षणी, लोममयी मा. दन्तशोधनी सूचिः. तुश जनी चा शोधनी. योल्ला यालपाश्या, पारितथ्या. दर्पण बन्दी, ना स्त्रीमस्तकाभरणम्. मुकुरः, दर्पणः, आदर्शः. सुर्मा, का- चम्पाकली अअनं, फजलं प्रेयकम्, कण्ठभूपा. गुलीयन्द हार, माला लम्बनम्, ललान्तका, हार:. फेनिलः,मार्जनलेपः, पल्यू: सायन | कमफूल ताटक, कर्णिका, फर्णभू- पणम्, कुण्डलम्, कर्ण तेल,फुलेल गन्तलम्, पुष्पवासितम्. घटनम्. पिन्दी विन्दुः (j) वाजूधन्द, जोशन"] फेयरम्, अङ्गदम्. शोभित मठिया शोभते, राजति-ते. होना करणम्, फरभूषणम्. पहुंची आपापका, फटका, चलयः निर्मापयति, निर्माति, नि- बनवाना मोतो मुक्ता, मुक्काफलम्, शुक्ति- बनाना पिरचयति. पारसी अस्गुष्ठाभरणम्. धारणफना धारयति. चूड़ी कावधलयम्. (पाल) पायजेय (केशान्) प्रसाधयति. पादभूपणम्. फाढमा धोना प्रक्षालयति. . मिमीते, फरोति, विधने, लगाना खाना व्यावहारिकसंस्कृतप्रधोधः । [१९] गहने इत्यादि का वर्णन-आभूपणविशेषाः उपाभरणाश्च । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत संयोजयति, निवेशयति. सौगन्ध शपति, शपथं करोति. चोरयति, मुष्णाति, अप- चुराना हरति. 'हिन्दी। संस्कृत। देखो गोविन्द की गर्दन में तोड़ा कैसा पश्य गोविन्दस्य कण्ठ स्वर्णकण्ठिका सोहता है. कथं शोभते. स्त्रियों का चूड़ी पहननाही अक्सर स्त्रीणां फाचयलयधारणं हि प्रायः सौ. सुहाग का चिन्ह माना जाता है. भाग्यलक्षणं मन्यते. उस औरत की उंगलियाँ अगूंठी छल्लों से और अगूंठा आरसी से अच्छा संस्थाः स्त्रिया अगुल्यः अगुलीयकैः राजन्ते, अङ्गुष्ठोगुष्ठभूपणेन च. यह आदमो सोने को काँधनो मार । अयंजनो हैमी मेसला हैमंगलभूपणञ्च सोने को जऔर पहनता है. परिधत्ते. फल में सुनार से चाँदी को दान्तकुरे- | भ्योऽहं स्वर्णकारात् राजती दन्त- दनी सुई धनवाऊंगा. शोधनी सूची निर्मापयिताऽसि. स्त्रीलोग सिर में चोल्ला, बन्दी वैना | स्त्रीयो चालपाश्यां शीर्षे, स्त्रीमस्तका- माथे पर, कर्णफूल कानों में, चम्पा. भरणञ्च मस्तके, ताटको कर्णयोः,प्रै- फलो व हार गर्दन में, धेयकं लम्बनञ्च ग्रीवायां, केयूरे में, मठिया और पहुँची पहुँचे में, वाहोर, कङ्कणे घलयौ च प्रकोष्ठे, नथ नाक में, पायजेय लच्छ पाओं नासाभूपणं घोणायां, पादभूषणानि में, विछिया पैरों को उंगलियों में, पादयोः, नूपुरान् पादाङ्गुलीपु, फोधनी कमर में पहनती हैं. मेखलाच फट्यां धारयन्ति. धनवानलोग अक्सर सोने की जऔर स्वर्णगृहलां प्रायोधनिनः कण्टे (गले) गले में पहना करते हैं. धारयन्ति. गोपीनाथ आँखों में अञ्जन लगाता है. गोपीनाथो नेत्रयोरञ्जनमनात. लगता है. चाजू याहाँ आज दुकान से [२०] तृतीयोऽध्यायः। गहने इत्यादि का वर्णन-आभूषणविशेषाः उपाभरणाश्च । हिन्दी। संस्कृत। यह खो माथे में सिन्दूर का धैदा और सा स्त्रीमस्त के सिन्दूरस्य विन्दु दन्तेषु दान्तों में मान लगाती हे. मसनच सयोजयति (निवेशयति). काष्ठफलकात् कतिकामादाय फैशान् थालमारी से कंधो लेकर बाल फाढलो. प्रसाध्य. क्या अभी तक मुँह नहीं धोया अपना फिमद्यावधि मुनप्रक्षालिनं स्ववस्त्र- मुह तो शीशे में देय. न्तु मुकुर पश्य. में तुश और सावन | अघाहं विपणितः लोममयीं मानी भोट लूंगा. फेनिल कप्यामि. 'चन्दनं चन्दनचर्पणवपडच मदर्थम- चन्दन ओर हुसा मेरे लिये भी लाना. गन्धलविताऽयं पुष्पधासितं तेलं यह गन्धी अतर पेचता है. विक्रोणोते. यह भमार मोतियों को माला पहनता है. धनादयोऽयं मुक्ताफलम्मजं धारयति. यह ओरत मेरी ओरत का गुलीवाद सा स्त्री मम मिशः वेयकमपहरत्. उसको अकेले में बुलासर पूछो. नामकान्त थाहय पृच्छ. जब उससे पूछा तय सोगन्ध सा गई 'यदा सा पृष्टा तदा मया न किमपि कि मैंने कुछ नहीं चुराया. चोरितमिति शपथमकरोत. गोहनी नाम को खी गुलीपन्दही पहनती हुई देखी है कि कानफुल मोहनी नाशो नी ययकमेय दधाना एशन फर्णियां सलादिकाश. और घनी येना. प्यानथ. चुरा लेगई.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोधः। [२१] चौथा अध्याय - चतुर्थोऽध्यायः । गृहस्थी के वस्तु इत्यादि का वर्णन--गृहस्थवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । मूढ़ा,कुसी खड़ाऊं पादुका. घड़ा घटा, कलश.. বা उपान(स्त्री)चरणपादुका. ईंढरी घटाधारयन्त्रम्. पादु चलनी चालनी, तितउः (पुं) चौकी, मन्थः, मन्थदण्डका काठपीठ.. चुहारी संमार्जनी, शोधनो. मिज़ फलक-कम्,मञ्च आधारः कुढारी कुदारी, कुटारी, कुठार.. आराम. फावड़ा कुद्दालम्, अवदारणम्. चौकी सुखासनम्. दीया- दीपशलाका. विष्टरः, आसनम्, पीठम् , | सलाई आसन्दी. पन्हिसञ्जननमावा (पुं) तिपाइवेंच निपादिका. पत्थर नलिका. छत्रम्, आतपत्रम्, धर्म-क्रनी छाता धारणम्. चक्छुरी छुरिका. लठिया लटिका,यष्टिंका,यष्टिः (स्त्री) छींका शिक्यम्. चो- जूना यूनम्. पेपणी,पेपणयन्त्रम्,अरघट्टः रस्सी रज्जा, (स्त्री) | पनचकी मलचाल्यचकम् जलयन्त्रम् भूतलास्तरणम्, भूतटसं. चूल्हा चुल्लिः, चुल्ली, अधिथयणी. स्तरः अंगीठी अङ्गाराधानिका, अङ्गारश- सन्दूक- पेटिका, समुद्याः, सम्पुटः फटी, इसन्तिका. पिटारी पिटका, मन्जूपा. मूसल मुशलालम्. चा तान्तययन्त्रम् - पाट राया. तलुआ त (स्त्री). पलंग कशिपुः, पल्यदः, मशः लाइलम्, हलम्, फाल: ओपली उदयलम्, उदूरालम्. 'गोदारणम्, सीरः. साज सूपम्. कूँचा चिका MAN [२२] चतुधाऽध्यायः। गृहस्थी के वस्तु इत्यादि का वर्णन--गृहस्थवस्तृनि । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । हरोस पा लाहसदण्डः. पंपा घोजनम्, व्यजनम्. शिल लोदी, शिला, शिलासुतः (पस का उशीरवीजनम्. जोत आवन्धः,योक्त्रम्,योत्रम्, | पंखा) पासना मजूपा, पिटक, फरण्डा, पिनष्टि, क्षुणत्ति, चूर्णयति. टोकरा कण्डोलः. दलना दलयात. ताला,तालो तालकम्, कुञ्चिका, तालो मष्टि, समाजयति. अप. युद्दारना नयति. हिन्दी। संस्कृत । मेरा छाता ओरलाठी लेफर यहांआओ. मदाय छवं लाटकाश्चादायात्रागच्छ. सदाऊपहन हुए एक साधु यहां आया. काठपादुफै धारयकस्साधुरत्रागच्छत् में फराकत जाता मेरो जूता लाओ. शौचाधम गच्छामि मदुपानहावानय. इस चीकाही पर जल का घड़ा रसदा. अस्य काठपाठस्योपयवधारिघट स्थापय मैं यहां ही न्हालूगा. अहमय स्नास्यामि. ये आरामचीको है इस पर बैठिये और | सुखासमामेदं स्थायतामस्योपरि महा- मेरी यात सुनिये. तो शृयताम्. इस मूढ़े और इस तिपाई को उठाकर इमं विटामिमां त्रिपादिकाञ्चात उत्था- उस मेज़ के पास रख दो. प्य तत्फलकसमीप स्थापय. मेरी दपाल में तो एक स्टूल है जो मम कक्षायान्त्वकः काष्ठपाठो वर्नते आप हुक्स दें तो लाऊं. मानयामि चंदाज्ञापययुभवन्तः. मेरे घर दा चला है. मम गृह द्व पंपणयन्त्र स्तः. ब्याह के लिये अपने गहु तो मैं पन- विवाहाथै स्वगोमांसवई ज्ञापन चको में पिसवाऊगा. पंपायप्यामि. चकला यहां ले आओ में पांच सेर | पेषणयात्रमत्रानयाहं पञ्च सेटकान् च. चन दलँगा. णकान्दलयिष्यामि. इस घर में दो चूल्हे है. अस्मिन्गृह द्वे चुल्ल्यो स्त व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [२३] गृहस्थी के बस्तु इत्यादि का वर्णन-गृहस्थवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत । एक मूशल को बड़ी ज़रूरत है इस- अस्त्यतीवावश्यकतैकस्य मुशलस्यातः लिये अपने गाँव के बदई से बनवा स्वग्रामतक्षकानिमापयित्वाऽन प्रेपय. फर भेजो. और भी गृहस्थ की बहुतसी सामग्री सम्त्यन्या अपि वह्वधः सामग्रयो गृ- हैं उनको भी सुनो. हस्थस्य ता अपि शृणुं. खट्वा, पल्यङ्क, काष्ठफलका, उल्लू- खाट, पलङ्ग, मेज़, ओखली, छींका, खलम्, शिक्यम्, सूर्पम्, चालनी, छाज, चलनी,बुहारी,चर्या,तकुआ, संमार्जनो, तान्तवयन्त्रं,तः, अङ्गा. अंगीठी, कुदारी, टोकरा, फँचा. राधानिका, कुदारी, करण्डः, फू. चिंका. आँच निकालने का पत्थर, वह्निसंजननमाया, दीपशलाका, शिला, दीयासलाई. सिल, लोदी, फूकनी, चाकू, ताला, शिलासुता, नलिका, छुरिका, ताल. कुजी, घड़ा, रस्सी, सन्दूक, खस कम्, कुञ्चिका, घटो, रज्जुः, पेटिका, (मञ्जूपा) उशीरवीजनम्, भूतला. का पता, फ़र्श वगैरह. स्तरणमित्यादयः. वह स्त्री अपने घरको बुहारी से यु- सा स्त्री स्वगृहं शोधन्या संमार्जयति. हारती है. यह लकड़हारा जूने में ईधन याँधकर स काठक्रेता यूने इन्धनं यद्ध्वाऽऽपणे बाजार में येचने को लाता है. विक्रतुमानयति. यह फोन युढ़िया है जो तकुआसे सूत फेयं वृद्धा या तर्कुणा सूत्रं कर्तयति. फातती है. .

[२४] पञ्चमोऽध्याय । MM पांचवां अध्याय - पञ्चमोऽध्यायः । गृहस्थ और वर्तन इत्यादि का वर्णन-गृहस्थानांविशेपाः पात्रविशेपाश्च। सस्कृत 1 . हिन्दी। हिन्दी। संस्कृत । राजमहल प्रासाद सुरङ्गा, गूढमार्ग. धनिकों क खुण्टी मागदन्त, भारयष्टि हर्म्यम्. सूटा शिवक कोलक झापडी, उरज -जम्, कुटीर , पर्ण |भीत कुड्यम्, भित्ति कुटी दशाला अट्टा यह , अट्टारकम् रसोईघर | पाकशाला, महानसम् छप्पर तृणपटलम्, तृणच्छदि न्हाने की कुआ कूप, , उद पानम्, अन्धु [] जगह स्नानागारम्. वावड़ी वापिका, दाधिका. जाना सोपानम् आरोहणम्. नाताव तटाक , सर [न०] हद नसनी नियणि , आधराहिणी ईट [पका पाग्वाना शौचागारम् फश्चा] इटमा, पधेटका. आमेटका अधिवेशनस्थानम, सत्का देहली सहायग्रहणी, देहली चटर सुधा आँगन अहणम छदि स्त्री] पदलम् चौतरा चत्वरम् पतनाला मारास यातायनम्, गयाक्ष. मौरी जलनिगम, जरोच्यास पमराया फथ क्षा,पोष्ठ ,शारागृहम पढ़ेढी जलस्थानम्. फोटरी सोठ मञ्च [व०प०] मञ्चसनाथ छले तुग, स्पृणा गृह ग्यम्भे दाजा द्वा, स्त्रिी] द्वारम् . किवाड़ पारम् अररम्. यर गृहम्, गेहम् , पेश्मन् न. टहलालम्, निगड'. पात्रविशषा । पिडकी प्रच्छन्नम्, अन्तरिम् थाली पात्रम्, भाजनम् सोने यी शयनयानम् परशा परश-शम् घट, उदय घड़ारोटा पात्रम् प्रणाल व्यावहारिकसस्कृतप्रबोध । [२५] गृहस्थ और वर्तन इत्यादि का वर्णन-गृहस्थानांनिगपाः पात्रविशेपाथ। - हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। स्थाली, उखा, रिखी] पिठरः | श्मसारः, अयः [न.] टोकनी लोहा पिटपचनम्. लोह.. हिम्, कालायसम्. चमचा चमसः-सम्, दर्चिः वी [स्त्री साया न मम् गुल्यम्, उदुम्यरम्. यतन अमत्रम्, पात्रम् . ग्वर्णम्, सुवर्णम्, कनकम्, पली कंचिः-धी, दर्विः, प्रसाफा. सोना रमम्, जाम्बूनदम्, चा कुणी कुतू [स्त्री०] माकरम्, काञ्चनम्, हेमन् चीमा कंकमुखम् . [न०] हिरण्यम्. संडासी संदंशा-कर. सोसा सीसम्, नागम्, यप्रम्. गिलास पानपात्रम्, शरायः, - चान्दी रजतम् , रूप्यम् . कटोरा चपका कम्, काचपात्रम् . काच क्षारः,फाचा. अश्मपात्रम्, लगुगः, यष्टिः कुंडी,सोंटा मैलाकरना कलुपयति, आयिली मलि [स्त्री] नी फरोति. मधानी मन्थनी, गगरी. छचाना आच्छादयति. परात वृहभाजनम् . चाहना अभिलपति, इच्छति,रोचते विलोट फंकना प्रास्यति, आपातयति. कड़ाही फटाहका, वृहत्कटाए'. डालना प्रक्षिपति. घटी, हांडी हण्डी लिप्पी. लेपयति. प्रोणि.-णी [स्त्री कराना तपा पाजीपम, पिएपचनम्. जलाना दाहयति,ज्यलयति,तापयति. पित्तलम्, आरकूटः टम्, पीतल ददति, ज्यलति, तपति, अलना रीतिः. प्लुम्यति. कोसी फांस्यम्. कुठरः, विष्कम्भः. ४ [२६] पञ्चमोऽध्यायः । गृहस्थ और धर्तन इत्यादि का वर्णन-गृहस्थानांविशेपाः पानविशेषाश्च । के घर " हिन्दी। संस्कृत। राजाओं के घर "मासाद" धनवानों | राजां गृहं प्रासादः, धनिनां गृहं हम्या, हर्म्य" और ऋपियों का ऋषीणामुटज इति कथ्यते. "उटज" कहलाता है. आप के घर में कोई अलग रसोई घर भयतः घेनमनि काचित्पृथक पाकाण- भी है. लाप्यस्ति. नहीं, तो धुंधा गृहम्प की चीजों को नहि, तर्हि धूमः गृहस्थानां यस्तूनि काला करही देगा. मलिनी करिष्यत्येव. शादी धगैरह में भट्टी से काम चलता विवाहादी गृहदाधिथयण्या कार्य भ- है मामूली चूल्हे से नहीं. वति नतु सामान्यचुलिभिः, मेरे घर में तो बैठक रसोई घर गुस-! ममगृहेतु सत्कारालयःपाकशाला स्ना- लघर और पालना अलग है. नगृहम् शौचागारं च पृथक्पृथगस्ति तुम्हारे घर में आँगन कैसा है. नय गृहे कीगङ्गणमस्ति. न बहुत लम्बा चौड़ा न छोटा हो. नातिविस्तीर्ण न सकीर्णमेच. इस घर में यहुत से झरोखे, चार फोठे, | अस्मिन्गृहे याहयः गयाक्षाः, चत्वारः चौसठ शीशम की कड़िया, नीम कक्षाः, चतुःपछि.शिशिपाया स्थूणा के किया, फितनीही खिरकियां निम्बस्य फपारानि अनकान्यन्त- मौजूद है. राण्युपस्थितानिसन्ति. क्या सय किवाड़े बाहर भीतर की पाखस्याभ्यन्तरस्य किं साण्यरराणि जंजीर खाली है? कलामयानि सन्ति । हो। सोने के कमरे में जाकर मेरा ओम् । शयनागारे गत्वा ममास्तरण बिछौना बिछादो। तू कहां सोता है. मास्तारय स्वकुत्र स्थपिपि. गरमियों में और यति में अट्टे पर प्राप्मे वर्पर्ती चाहाल केन्यस्मिनृती. और दूसरे मौसम में घर के भीतर. गृहाभ्यन्तरे. क्या यहां पंखा भी है ? है तो. कि तय व्यजनमप्यस्ति । अस्तितु. फल में छप्पर वादों से एप्पर छया भ्योऽहं तृणपटलकारेभ्यस्तृणपटलमा. ऊँगा. उछादयितालि. " व्यावहारिकसरहतप्रयोधः। [२७] गृहस्थ और वर्तन इत्यादि का वर्णन-गृहस्थानांविशेपाः पागविशेपाथ । हिन्दी। संस्कृत। तुम्हारे घर की घष्ठी ऊंची हवा रोकने नव वेश्मनो ऽत्युन्नता वायुरोधका भि- वाली भीतियाँ है. त्तयस्सन्ति. पिना पानी की जगह में मैं एक कूमा निजलभूमौ निमीपयेयमेकं कूपमित्य- यनवाऊं यह चाहता हूँ भिलपामि. मैं भी अव्यलतो फश्ची ईटों का, हाथ अहमपि प्रथमन्तु आमेटफानां, सति चलने पर पकोही ईटो का घर वैभये पकएकानामेव गृह निर्मापयि- एनयाऊंगा. ज्यामि. घर में सोढ़ी ज़रूर रखना चाहिये. येश्मनि सोपानमवश्यं निर्मातव्यम् . तुम्हारे शहर में कोई तलाय या बा- | अस्ति कश्चित्तड़ागो यापिका था तय नगरे. घर को देपली पर यैठ कर कभी मत | गृहावग्रहण्यां स्थित्या कदापि मा खाओ. भुव. छत के ऊपर चिफनी मिट्टी डाल दो. पटलस्योपरि स्निग्धां मृत्तिकामापातय. पतनाला तो पशो ईटों से धनवा कर प्रणालन्तु पकेटकाभिनिर्माय्य चूर्णेन घूना से लिप्पी करा दो. सुधया या लेपय. बलदेव के घर में मोरी यड़ी छोटी है घलदेवस्य गृहे जलनिगमोऽतीवसूक्ष्मः और पलैदी यान ऊँची है. जलस्थाने यातीवोनतमस्ति. मेरे घर में चार दाजे है दो पुरुषों सन्ति चत्वारि द्वाराणि मम धेश्मनि फे और दो त्रियों के. द्वे पुरुषाणां वे स्त्रीणाञ्च. हमारे घर में छजे नहीं है इसी से भस्मद्गृहे गोधानसी मास्ति भत एय बौछार घर में भीतर घुस जाती है. धारासम्पातोऽन्तहे प्रविशति. गृहस्थ के पर्तन ययान करो. गृहस्थपात्राणि वर्णय. घर्तन जैसे घा, दौफनी, चमचा, पाप्राणि, यटः, स्थाली, चीमटा या संडासो, सोने के पतन, दर्षिः, फरमुखं, स्वर्णपामाणि, यांदी के बर्तन, पत्थर के यतन, सतपात्राणि, अमरामाणि, फूड़ियाँ, सोटा परास, गिलास, लगुडः, धृहाजन, पानपा, यथा VAR [२८] पष्ठोऽध्यायः गृहस्थ और पर्तन इत्यादि का वर्णन-गृहस्थानांविशेषाः पाविशेषाश्च । हिन्दी। संस्कृत। कड़ाही, हांडी, कड़ाह, कुष्पी, तना कटाहिका, हण्डी, बृहत्कटाहा, इत्यादि अनेक होत है. कुतः, कजीपमिस्यादीन्यनकानि सन्ति। हफोम लोग सोसा जला कर नागेद्याः सासं दाहायवा नागभ्यरं नि. श्वर बनाते हैं. मीपयन्ति. राजा दशरथ बेटे के रंज म भरने के राजा दशरथःपुधशाकन मरणानन्तरं पछि तेल की नौद में भरत के आने तैलदोण्यामाभरतागमनात्स्थापितः. तक रक्खा गया. पह स्त्री पिल्लोट के पास दही की क मा सो कुटरसमीप दधिभाण्डं मन्थ- मोरी लाकर रई से दही विलोती है नीम्याऽऽदाय मन्ना दधि मनाति और मक्खन येटे को देती जाती है. हैयहचीनञ्च पुत्राय मयच्छति. छठवौं अध्याय-पष्टोऽध्यायः मनुप्योपयोगिनचतुष्पादविशेपा यानविशपाच । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । गो गौर, धेनु:- घोसी घोपः, आभीरः, गोपःगी. गौ के गले ग्याला सास्ना, गलफम्पल'. का चमड़ा, पतीपदः, षः उक्षन् (०) अश्वः, तुरगा, हयः,पाजी, घोड़ा घोटकर पछरा गोयरसा. अपाल भैस मदिपी, महिषः, घु सपार अभ्यारोहः, सादिन (पु). ऊधः (न) भापीगम् . ঘা सरः रासभा गर्दभः. कम, विषाणः-णम् . घुसाल अश्वशाला, मन्दुरा. गोयर गोमयः-यम्, गोषिद् . विधर घेसर.. पशाष गोमूत्रः. दरापी मश्वतरपाला, फसरा, सर. अश्वतरा, ऊँट - करना करना लूमम्, यालधिः. व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः । [२९] मनुष्योपयोगिनश्चतुष्पादविशेषा यानविशेषाश्च । हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत। बकरी दहमदर्दा अजा, छागी. दशयानम् . उष्ट्रः, मेलफः, मयः. कपहे. वासः परिधते. नाथ,नकल नस्योता. पहरना गजः, हस्ती, फरिन् (पुं०) नालबन्दी खुग्नं बध्नाति, खुरत्रेण स. हाथी नाधीकरोति. माता फीलयान | आधोरणः, हस्तिपः, मुकापला प्रतियोधयति, वि-प्रति स. हाधीशाल घारी, गजयन्धनो. णद्धि, प्रतिकरोति, प्रत्य- लालम्, पुच्छः च्छम् , वतिष्ठते. पूछ चरति, भक्षयति, अति. पुरीपम्, घिष्ठा, गूथम् , मलना घंपति, मर्दयति. लीद शकर. अनः (न०) शकट-टम् , छकड़ा चाहनम् , प्रवहणम् . खुर खुरः, शफा-फम् . सूअर क्रोडः, चराहः, फिरिः,कोलः, यहली कर्णीरथम् , लघुशकटः-टम्. आनंकण्डे फरीपम्. विमानः-नम्, व्योमयानम्, विटौरा करीपराशिः. बुलाना आकारयति, आह्वयति,हयते सिखाना अयकरनिचया. शिक्षयति. धूरा भेड चढ़ाना एडका, मेपी, ऊणायुः. आरोहयति. भूसी चढ़ना घुशः. आरोहति. तोड़ना भिनत्ति. यानविशेषाः। तुड़वाना भेदयति. रथा, स्यन्दनम्. युद्धयति-ते, योधयति, पि. गृह्णाति, संप्रहरति. रथयान सारथिः, सूतः, सव्येष्ट(पुं०) वाहयति, नोदयति, चाल. लघुयानम्, रथः. हांकना यति, प्रेरयति. सिद्ध कर्ना सानोति, साधयति, राध. पालफी नरयानम्, शिविका, याप्य घा काम यति. तामझाम यानम्, चतुरघयानम्. निकालना विमान रथ युद्ध करना चलाना घग्घी टम- रम [३०] पठोऽध्यायः। मनुष्योपयोगिनश्चतुष्पादविशेषायानविशेषाश्च । विहारकनी | कोशिश विहरति, क्रीडति. यतते, उद्यच्छते, प्रवर्तते, खेलना व्यवस्यति. अवरोहति, अवतरति. करना उनरना हिन्दी। संस्कृत। तुम्हारे पास जो घोसी रहता है उस | युप्माकं समीपे यो घोषो वसति तस्य की गोशाला में कितनीगाय कितने गोशालायां फति धेनवः करयुक्षाणः यैल है. सन्ति. पाँच गाय, सात पैल. पञ्च गायः सप्त वृषभापति. घोसीलोगों से गौओं का दूध और गयां पयः गोमयचापि यिफ्रीयते भा- गोवर येचा जाता है. भोरैः. भैंसी का सींग गयल उनका दूध मा. | महिषीणां शू गयलं तासां पयो मा- हिप ऐसा कहलाता है. हिपश्चेत्यभिधीयते. गौओं के गले में जो वाल लटकती है गवां गले यात्या प्रलम्यते तो सास्ना उसे मनुष्य "सास्ता" कहा करते हैं. मिति प्रचक्षते जनाः गोविन्द को घुड़साल में पाँच पोहे हैं, गोविन्दस्याश्यशालायां पञ्च तुरका उनमै एक घोड़ा अशिक्षित है उस विद्यन्ते, तेप्वेकस्तुरगो ऽशिक्षितो. फो किसी चाबुकसवार को पुला ऽस्ति सं कमप्ययोयनेतारमाका कर सिखवाओ. र्य शिक्षय. चौमासे में तो गोपर पूरे पर ही फेंफ | पातुर्मास्य तु गोमयमयकरनिचय एप दिया जाता है. प्रक्षिप्पते. यह ग्वाला जल पीना चाहता है इसे | पिपासत्ययं गोधुगेनं जलं पायय. जल पिलामओ. भरसने बैल नाप से ही बस में लापे दुष्टपुषमा नस्योतेनेष शाक्रियन्ते. आते है. श्रीमान गोपालदेय के राज्य में कितने | श्रीमहोपालदेवराज्ये करयवसादिना पासवार हैं। बेशुमार। सन्ति। असलया। ट व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोधः । [३१] मनुष्योपयोगिनश्चतुष्पादविशेषायानविशेषाश्च । हिन्दी। संस्कृत। घोड़े और सिंहों के अयाल होते हैं. अश्वानां सिंहानाच केशरा भवन्ति. गधा घड़ा गरीब जानवर है. अतिदोनपशूरासभोऽस्ति. इसका मुह काला करके गधे पर चढ़ा अस्य मुखं श्याच कृत्वा गर्दभस्योपरि कर शहर के चारों ओर घुमाओ. आरोप्य नगरमभितः परिभ्रामयत. ये दरायी मञ्चरों को लेजाफर लड़ाई । एतेऽश्यतरपालासरानीत्या युद्धार्थ को जाते है. गच्छन्ति. धफरी का दूध भी पथ्य होता है. अजादुग्धमाप पथ्यं भवति. क्या फौजों में ऊँट और हाथी भी किं पृतनासूष्ट्रा गजाश्चापि रक्ष्यन्ते. रकरने जाते हैं? ऊँट घोझा लेजाने के लिये हाथी तोपों उष्ट्रीः भारोतुइनार्थ गजाः शतनाना- के लेजाने के लिये रक्खे जाते हैं. मुमहनार्थ रक्ष्यन्ते. घोड़े की पूछ में बहुत बाल होते है. | हयपुन्छ यहूनि लोमानि भवन्ति. गायों या गोपर गोमय घोला जाता है. गयां पुरीपं गोमयमिति शब्धते. और संग साथ में भैस का भी. प्रसमान्महिषीणामपि. गौओं के खुर फटे और घोड़े घगैरह गयादीनां खुरा युक्ता अश्वादीनाम- के समूचे होते है. दो सूअरों के बीच में सिंह भी पानी | योर्वराहयोर्मध्ये सिंहोऽपि पानीयं नहीं पीसका लेकिन दो सिंहों के पातुं न क्षमः परश्च द्वयोः सिंहयो- योच में एक सूअर ज़रूरही जल पी मध्ये एकः किरिः जलमवश्यं पिय. आता है यह मशहूर है. त्येवेति प्रसिद्धम् . पहिले जमाने में रथी लोग रथों से ही पूर्वदा मृधे थिनः स्थैरेय युध्यन्ति लड़ाई में लड़ते थे. और सारथी लोगही रथ के घोड़ों को सूताश्चैध रथयाहान् याहयन्ति स. जोतते थे. गाय घरह चौपाये अक्सर घास गवादयश्चतुष्पदाः प्रायशो घासं (श- साते है. पं)चरन्ति. युक्ता भवन्ति.

चढ़ कर जाते है. लेते है. [३२] पष्ठोऽध्यायः। मनुष्योपयोगिनश्चतुप्पादविशेषायानविशेषाश्च । हिन्दी। संस्कृत। सईस घोड़ा खुजाता है. अश्वपालोऽश्व मर्दयति. अम तो यहुन से धनवान् और यड़े । इदानीन्तु वहयो धनाढ्या उच्चपदस्या ओहदेदार अहल्कार लोग पग्घियाँ यिनो राजसवकाच विचकाहषु में इधर उधर जाया करते है. लघुयानेप्चितस्ततो गच्छन्ति, घटुन से धनवान् अब भी पालको पर | यहयो धनिनोऽद्यापि शिविकामारक्षा गच्छन्ति. बौच के दजे के लोग छकड़े मझोलो मध्यमणिजना अनाभिः (शकरः) या टमटमास भपने काम निकाल लघुशकटैः लघुयानयों स्वकार्याणि साधयन्ति. सय सवारेयों में रेलगाड़ी पहुन हो | सपेंषु यानेपु रेलाय. शकटोऽसाथ आराम देनेवालो और धोरे खर्च सुखप्रदोऽल्पव्ययध. की है. पहिले देवतालोग यिमानों में पिहार पुरा ऐया व्योमयानेषु विहरन्ति स्म. करते थे. अय महरेजलोग पिमान के रिवाज के | अधुनाङ्गलदेशयासिनोऽऽफाधिमानः लिये अफ्सर कोशिश कर रहे हैं. प्रचारार्थ प्रायो यतन्ते. लेषिन उनसे अभी तक कोई ठोक २ परञ्च न प्राप्ता यपोचिता रोहणायरो- घदने उतरने को तरकोष नहींमिलो. हणफियाऽधायधि. मुल्क काल में उस मुल्क के रहने- | कायुलाएये देशे तद्देशनियासिनो पक्ष- घाले मुसल्मानलोग मे का मांस नाः ऊर्णायोमौसमयन्ति तरबषय साते है और उसकी साल का परख यासः परिदधते. पहरते है. रथपान अपने घोड़े के नालधयाताहै. सय्येष्टा स्याश्वस्य खुरनं बन्धयन्ति. भेटी भेड़िये का तर मुकापला फरती मेपी तदा वृकंप्रति योधयति है जब इसका मेमना पास होता है. 'यवास्था शापकस्समीपस्यो मपति.

व्यावहारिकसंस्कतप्रबोधः । [३३] सातवाँ अध्याय-~-ससमोऽध्यायः। पक्षी इत्यादि का वर्णन-पक्षिविशेपाः । धूकः, दिवान्धः. मयूरः, शिखी. हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। 'संस्कृत । पक्षी पतमिन् (पुं०) विहगा, खे-नीलकंट चापः सः, फिौदिविः. टटीरी टिभिः चाँच चञ्चुः-चूः, (पुं० स्त्री०) चहगादर जतुका, अजिनपत्रा. प्रोटिः (सी०), तुण्डम्. उल्लू कौशिका, पेचक पंगा पिच्छम्, पक्षः, गरुत् (६०) घुप्पू चिड़िया चटका, कलविका हंस मराला, राजहंसा. कौआ काका, वायसः, ध्वाक्षः. ग्युटपावरी दाीघाटः, शतपत्रमा पंडक छिद्रगला. मोर तोता शुकः, कीरः, चमतुण्डः. मोरपंच घई ईम्, चन्द्रका, मेचकः. मैना सारिका. मोरयाणी फेका, मयूरवाणी, चिहा-ला, आतापिन् (०) पक्षियों की चील्ह रखा, रायः, कलकल.. आवाज फबूतर कपोतः, पारावतः, कलरयः घोंसला फुलाया, नोटः-- कुक्कुटः, ताम्रचूड़ा, नखा- परवीजना पद्योतः, ज्योतिरिक्षणः. मुर्गा युधः. तीनर तित्तिर. गिद्ध बटेर गृधः, दाक्षाय्यः यातिरः सारसः, कहा, वका, पुष्क-लचा उत्क्रोशः, कुरर. याज चकचा चका, चक्रयाला, कोका. श्येनः, शशादन,पत्रिन् (पुं) शिकरा बोलना फूजति, रीति. याजपालने হানছীনা সন্ধাহার, श्येनपालका वाले यसेरालेंना विधाम्यति. फोयल फोफिलः, परभृत् (पुं०) द्योतते, शोभने, विद्योतते, चमकना पपीहा चापः, पिका, चातका. प्रकाशते. . सारस सप्तमोऽध्यायः। पक्षी इत्यादि का वर्णन-पक्षिविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। देखो आसमान में पपेरू उड़ रहे हैं. पश्याफाशे पक्षिण उडीयन्ते. खास र पखेरुओं के अलग २ नाम लो. मुख्यधिहगानां पृथक् पृथक् नामानि पूर्णयतु. चिरोटा, कौआ, तोता, मैना, चील्ह, चटकः, काका, शुकः, सारिका,चिल्ला, कबूतर, मुर्ग,गिद्ध, सारस,शिकरा, कपोतः, कुक्कुटा, गृधः, सारसा, फोयल, पपीहा, चामचिर, उल्लू, श्येनः कोकिला, चापः, जतुका, घुघू, हंस, खुटकबया, मोर, उलूका, घूका, मरालः, दावाघाटा, तीतर, बटेर, लया, धगैरह परन्द मयूरः, तित्तिरः, चार्तिरः, लाव अफ्सर मांस साने वाले होते हैं. इत्यादयः पक्षिणःमायोमासाशिनो- भवन्ति. पपेरू अपनी चोंचों सेही हाथ का | पक्षिणः स्वचचुभिरेव हस्तफार्य काम निकालते हैं. पाहपन्ति. पटयोजने अफ्सर जलचाली जगहों | खद्योताः प्रायशो जलसनाथेषु स्थलेषु में रात में चमकते है. रात्री धोतन्ते. परन्दों की आवाज़ "रव" या फलफल | पक्षिणां शब्दो रयः फलफलो घेत्यभि- कहलाती है. धीयते. मोर की पूंछ घई और उसकी पाणी | मयूरपिच्छं पहस्ताककेत्यभिधीयते. फेका कहलाती है. मोर चौमासे में नीले यादलों को देख | मयूराधानुमास्ये नीलपलाहकान्दृष्ट्वा- कर बहुत खुश होते है. ऽतीय दृष्यन्ति. फ्या सूरज का भी नाम सघोत है? | किं सूर्यस्यापि नाम सघोतोऽस्ति? है तो. बगीचे में इधर उधर पक्षी योलते है. उद्यान इतस्ततो सगाः फूजन्ति. शाम को परग्द अपने २ घौसलों में सायंकाले पतषिणः स्वेषु स्पेषु नीडेषु बसेरा लेते है. मिश्राम्यन्ति. अस्ति सु.

[३५] व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। पक्षी इत्यादि का वर्णन-पक्षिविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। संबरे उट कर उनकी मनचाही जग कल्यमुत्थाय तेषां स्वेष्टदेशेषु जिगमि. हाँ में जाने की इच्छा होगी. पा भविष्यति. कबूतरवाज़ अपनी छत्री पर आये हुए कपोतपालका स्वछत्र आगतानन्येषां दूसरों के फवूतरों को पकड़ कर पारावतान्धृत्वा तत्पक्षान्लुनन्ति. उनके पर फेंच कर देते हैं. आठवाँ अध्याय-अष्टमोऽध्यायः। दुःख देने वाले जीव इत्यादि का वर्णन-दुःखदायिनोजीवविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। चीटी पिपीलिका, पिपीलकः. छांह अनातपः, टोडी शरभः, शलभः सर्पः, अहिः, दन्दशूफा, सांप क्षेत्रम्, घर:-प्रम्, भूमिः सरीसृपः. (सी). "काफन फणा, स्फटा. अजदहा थजगर: ,,, विय स्वेडः, गरलम्, यिपम् . मक्षिका, सरघा (मधुम- सपेरा आहितुण्डिका मपपी क्षिका). विपवैद्य जागुलिकः, मॉम, मधूच्छिष्टम् ,शि (सि) क्यम्. विच्छ वृश्चिकः, द्रोणः. मधुकोपः, चपाला, फर-डंक लूमम्. शतपदी, दीमक श्वेतपिपीलिका. कालसलाई कर्णशलाका. बमई घल्मीफा-कम्, चामलूरः. अण्डा सिम्बः. परे बरटा, गन्धोली. गोह गोधा भौंरा भ्रमरः,पद्पदः, अलिः,भृतः छिपकली पली. -मरकुणा, उहंशः, खट्वामल्लः मच्छर दंशः, मश:-का, बनम- धूप आतपः डाँस क्षिका. खित पडका. कातर - M " कपास रखना . [३६] अष्टमोऽध्यायः। दुःख देने वाले जीव इत्यादि का वर्णन-दुःखदायिनोजीवविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। भीगर युऋति. शोरका, झिरिका, झिल्लिका. मजीरा काटना मूपका, उन्दुरररुः, याखुः. दशति, व्यथयति. डंकमारना आतुः, विडाला, मार्जारः, नाश करना नाशयति, बिलाव आतुभुक्. होना| नश्यति. कुत्ता श्या, कुषकुरः,सारमेयः खींचना आफपति,कृपति,समाकर्षति गिलहरी | काठमाआरत, चमरपुच्छ.. रहना वा वसति, नि-प्रति-चसति घ. कासः, तूलः, तंते, तिष्ठति, अध्यास्ते. वानरः, कपिः, मर्कटः, शा. मस्त होना माद्यति. वन्दर सामृगं जिंदारहना, जीयति, प्राणान्धारयनि. कपिा, सवङ्गः, मर्कटः, दी. संलग्नीकरोति,निषेशयति, लंगूर घेलाइग़लः. चुभाना संश्लेषयति. चीचरी चर्चिका. संश्लिप्यान, संनिविशते, चुभना कलीला सलगति, संलशोभयति. पतन पतक, शलभः आश्लिप्यति, आलिङ्गति, यूका (पुं० खी). चिपटना सजति,लगति,आ-अव+ लीक लिक्षा (स्त्री०). संवते अनुवन ति. धूंस घृहन्मूषकः. कृन्तति, लुनाति, छिनत्ति, कतरना गौला आवापयति नकुलः, यभ्रः, अड़गूप. फाड़ना करकंटा विदारयति, विहणाति, उ फकलासा, सरट. चीरना ल्लुश्चति. यग्गी दशका, गोमक्षिया रणाति, छुछुन्दरी, गन्धमुखी, दी. जहाति,त्यजति, उत्सृजति, तुण्डी, निवाधिका. छोड़ना उज्झति. हिमुसा. टुकड़े रफ खण्डयति, सण्डशः करोति. मकड़ी तन्तुवाया तन्तुनाभालता फैलाना सनुत, तनोति, विस्तारयति. मर्षटका, ऊर्णनाभः, पीना पियति, धयति. ,, जाला जालं, तन्तुसन्ततिः. रंगना संपति, मन्दंमसर्पति.

व्यावहारिकसंम्मृतप्राधः । [३७] दुःस देने वाले जीव इत्यादि का वर्णन-दुःसदायिनोजीवविशेषाः। संस्कृत। यह देपो लाल चींटी ने मुझे काट राया. रक्तपिलिफेयं मामदशदिति पश्य. टीडी जिस पेत में गिरती है उसको शलभा यस्मिन क्षेत्र पतन्ति तत्समूलं जह से उड़ा देती हैं. नाशयन्ति. कभी तूने अजगर भी देखा है ? नहीं. इष्टम्त्वया फदाप्यजगरः ? न. लेफिन सुना है कि यह अन्दाज में यौन परश्च श्रुतं ममाने विशति सेटकमित- सर या इससे कम ज्यादह होता है. नन्यूनाधिको या भवति. यह पास आये हुए जीवों को स्वास स समीपागताीयान् श्चासेनचाफष्य सेहीयोंच कर मुंह से निगल जाता है। मुग्लेन निगिलति. मौहार की मपणी फूलों से रस खींच | सरयाः पुष्पेभ्यो रसमाकृष्य मधुको फर उसे में रसती हैं. निदधते. ये दीमक इस फियाई को मागई. श्वेतपिपीलिका इमे पतरफपाटमखादन. अर्धताम्रसण्वस्य (पणाधस्य) मधू. धेले का मोम लाभो. च्छिष्टमानय. मपसी अक्सर मैली चीजों पर बैठती है. माक्षिकाःमायोमलिनेपु वस्तुपु तिष्ठन्ति. चमई में सांप रहते हैं। सांप आहिस्ते पल्मीकेषु सर्पा नियसन्ति। सो मन्दं चला करता है। यही न समझोसांप प्रसर्यति । एतदेय नावयुध्यस्वसो तेजी में घोड़े को भी मात देता है. जवे घोटफमप्यतिमामति. ततैये ने मुझे काट साया जल्दी रिया- रक्तपरटा मामदशत्तूर्णं दीपशलाफा. सलाई या आफ का दूध लाओ. मदुग्धं धानय. फूलफी खुशबू सूंघ फर भौरा मस्त होता है. पुष्पगन्धमानाय अमरो मायति. इस यार मैं यड़े स्पटमल हैं इस मो अस्यां सट्वायां वहयो मत्कुणास्सन्ति धूप में डालदो. एनामात (धर्मे) निक्षिप. सपेरा बमई से सांप पकड़ कर अपनी आहितुण्डिकोचामलूरात्सरीसृपं धृत्या जीविका के लिये लाता है. स्वजीविकाधमानयति.

[३८] अष्टमोऽध्यायः। दुःख देने वाले जीव इत्यादि का वर्णन-दुःखदायिनोनीवविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। सांप के जहर का हकीम (गायडी) विषयेद्यो जांगुलिक इत्यभिधीयते. आंगुलिक कहलाता है. फाले सांप का बड़ा फण होता है उस कृष्णमर्पस्य महती फणा वर्तते तहटो. फा काटा हुभा जीय अफसर नहीं जीवः प्रायो न जावति. जीता. धोडू ने अपना डंक मेरे पाँव फे अंगूठे | पृश्चिका स्पलूमं मम पादांगुष्ठे सम. में चुमो दिया. श्लेपयत्. मेरे कन्धे पर छपकली गिर पड़ी इस मम स्कन्धेऽपतत्पल्ली फलमस्य विचा. का फल विचारिये. येताम्. कातर जहां कहीं चिपट जाती है यहीं | शतपदी यत्र कुत्राप्याश्लिष्यति तय अपने पैरों को गाड़ देनी है. स्वपादान् संलग्नीकरोति. चोरलोग गोह के महारे महलों पर ! चौरा गोधायाः सकाशादर्येप्यारोह- चढ़ जाते हैं यह सुना है. म्तीति भुतं इस घास में यहुत से डांस हैं. अस्मिन्घासे बहवो दंशा विद्यन्ते. हींगर अक्सर रात में झीमी शब्द शोरुकाः प्रायो रात्री झीझीतिशद किया करते है. कुर्वन्ति. इस घर में बहुत से चूहे हैं उन्हों ने | अस्मिन्गृहे यहयो मूषकारसन्ति ते मेरी पहुतसी चीजें काट डाली. उनके दूर करने के लिये क्या करना चाहिये. ममानेकानि यस्तून्यकृन्तन्. किं कर्तव्यं तेषां निवृत्त्यर्यम्.

ध्येण भाग्यम्. व्यावहारिफसंस्कृतप्रयोधः । [३९] दुःख देने वाले जीव इत्यादि का वर्णन-दुःखदायिनोजीयविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। कुत्ता भोंकता है . यहां जरूर कोई कुक्कुरो युकति अधायक्ष्य केनचिमनु. आदमी है. यह कुत्ता सामने रोरहा है यह खोटा भ्यायमभिरीतितिदुशकुनोऽयं दृश्यते, शकुन दिखाई पड़ता है. यह गिलहरी मुह में रूई लेफर पेड़पर काठमाजारोऽयं चपत्रे तूलमादाय वृक्ष- चढ़ती है. मारोहति. घन्दर जो कुछ चीज़ याहर देखते हैं | वानरा यत्किञ्चिद्वस्तु वहिः पश्यन्ति उसोको लेकर फाड़ डालते हैं. तदेयनीत्वा दारयन्ति. मर्पटाः वृफेभ्यो दीर्घलांगुलेभ्यश्च घि धन्दर भेड़ियों और लंगूरो से उरते हैं. भ्यति. चीचरी अक्सर गी और भैसों के थनों | चर्चिकाः प्रायो गवां महिपीणाञ्च स्तने में चिपटी रहती है. प्वयलम्वन्ते. पतन दीये पर माफर अपनी ज़िन्दगी | पतगाः दीपं प्रत्यागत्य स्पजविनान्यपि से भी हाथ धो बैठते हैं. त्यजन्ति. घूस घरोफी दीवारों को भी सय. और | गृहन्मूपफा गृहभित्तीरपि सर्वतः प. से खोद डालती है. नन्ति. न्यौले लड़ाई में सांपों को टुफ २ नकुला युद्ध सोनवण्डयन्ति, खण्डशा कर डालते है. पुर्घन्तीति घा. छिपकली का गिरना और फरकंटे का पल्लीपतनम् कफलासारोहणश्चापि श- चढ़ना भी शकुन होता है. फुगम्भवति. इस गौकी यग्घी को पकड़ कर और अस्या धेनोः गोमक्षिकां धृत्या गोमये गोयर में रख दूर फैक दो. च निधाय दूरे प्रक्षिप. यहां यले मच्छर है इसलिये मसहरी लाओ. अनघहवामशफाअतोमशहरीमानय, -- तीति भुतमः [४०] नयमोऽध्यायः। दुःख देने वाले जीर इत्यादि का वर्णन--दुःखदायिनोजीवविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। बिल्ली छछून्दर फो चूहे के भोरे मार | मार्जारी दोर्प्रतुण्डीम् मूपफषुद्धचा हति तो देती है लेकिन घमय पदवू परञ्च तां गन्धयशान्न खादति. खाती महीं. छन्दर जय मुंह से कृच् २ मा शब्द | गन्धमुपी यदा कृषकम् इति शम्द करती है तभी उसके मुह से बदबू करोति तदैव तमुखाद्न्धो- निकलती है. निस्सरति. दुगुही छ महीने तक एकमुह से और | द्विमुखा पण्मासपर्यन्तमेकमुखात् प. छ, महीने दूसरे मुंह से खाती है पमासपर्यन्तञ्च द्वितीयमुखात् खाद- यह मुना मकाही जाला पूरती है. कर्णनाभस्तन्तुसन्तति तनुते. कुत्ता सूखे हाड़ के जरिये से निकले ज्या गुप्फास्थिनिसृतं स्वमुखरक्तमेष हुए अपने मुह केही खून को खून रमन्यमानः पिश मोदतेश्यमेय मानता हुआ और उसे पीता हुआ दशा सांसारिकाणां संग्रति दुःख- खुश होता है यही दशा दुनिया के मेव सुरपंमन्यमानानाम्. दु.खों को सुख माननेवालों की है. नवा अध्याय-नवमोऽध्यायः । बन फे जीव इत्यादि का वर्णन-वनजन्तुविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। मृगेन्द्र, पञ्चाननः, हरिः, मिडिया वृका, कोका, हामृगः सिंह फसरी (पु.). गोमायुः, जम्यूका, कोटा, गिहा गीदड़ गरका,प,गण्डया, सही भ्याधिय, (पुं०) शाल्या. ध्यामः, चित्रका छोपी (पुंगालोमपी भरिमायः, किखिः. मसः, मल्टूका, भालुका सिरहा शा-का, - रोश गयया. याघ व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोधः। [१] चन के जीव इत्यादि का वर्णन-वनजन्तुविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत। भोतुः, वनपिडाला, अर-संगोलमा बनविलाच एयमाजीरः. बिलाजा घनमांनुप अरण्यमानुपः, या विध. गाहते. हिरन हरिणः, पुरङ्गः, मृगः, पणः, हिरन का शिकार- बच्चा भामिपतांयाति, भक्ष्यभवति' होगा चारहसिंगा द्वादशमः। , फरणामृगयां करोति, मृगयते. बनगाय वनधेनुः, गवयः. आ-वि-नमत्ति, आवृजति, झुकना घरहेलू धक्रीभवति. बनाकरः. नामयति, नम्रीकरोति, आ- गोरखर चनरासभ:-गर्दभा. गुकाना घर्जयति, वक्रोकुरते. मृगशाप: पोतः. हिन्दी। संस्कृत। शेर वन के जीवों का मालिया है परन्तु सिंहो हि वनजन्तूनामधिपतिः परञ्च जहां आग जलती है वहां वह नहीं यत्रानिचलति तत्र स न गच्छति. जाता. क्या तुमने गंडा भी देया है ? हां किं त्वमा गण्डङ्गोऽपि दृष्टः ? चाढम् सम्बत् १९५२ में मैंने जयपुर के एकोनविंशत्युत्तरतिपञ्चाशत्तमे थि- अजायवखाने में देखा था. फमाब्दे मया जयपुरस्य कौतुका. गारे सही फांटी से अपने से बलवान् जीवा शल्यः स्वकण्टकैः स्वस्मादलवतोऽपि से मुकाबला करता है. जीकान् प्रतियोधयति. सिंह ज्यादह बलवान होने की वजह सिंहोऽत्तीव चलयवादारीलं चन से सय यन को छान डालता है. गाहते. छोटे जीय डर सही सिंह के शिकार | क्षुद्रजन्तवो - भियैव सिंहस्यामिपतां हो जाते है. यान्ति.

[४२] दशमोऽध्यायः। वन के जीय इत्यादि का वर्णन-चनजन्तुविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। वाघ या चीता सिंहही की एक किस्म है. व्याघ्रश्चिनको वा सिंहस्यैव भेदा. जाम्बवान रीछ ने वामन अवतार में जाम्बवता ऋक्षेण वामनावतार विग- विराट रूप भगवान् को दो घड़ी में द् सपिणो भगवतः द्विघटिकाभ्याम् तीन परिक्रमा की. तिस्त्रः परिनामाः कृता. और भी बन के जीयों के नाम लिसो. अन्येपामपि धनजन्तूनां नामानि लिव. सुनिये, भेड़िया, गीदड़ गयय, लोमड़ी, | श्रूयन्ताम् , घृका, गोमायुः, गवयः, सरदा, बनविलाव, वनमानुस, हि. भूप्रिमायः, शशा, अरण्यमाजीरो रन, योजू, वारहसिंहा, गोरखर, ऽरण्यमानुषः, हरिणः, (वीनू),दा- घरेला सूअर, यनगाय वगैरह होते हैं. दशहः, घनगर्दभ', यनशूकरः, बनधेनुरित्यादीनि सन्ति. हिरन का यञ्चाही मृगशाव कहलाता है. मृगशिशुरेव मृगशाब इत्युच्यते. सूअर अपनी गर्दन इधर उधर मोड़ फोड़ः स्वकन्धरामितस्ततो नामयितुं नहीं सका है. न शोति. बनविलाव अक्सर पेड़ों की सोला में | अरण्यमाजीराः प्रायस्तरकोटरेषु नि. रहते हैं. घसन्ति. सयही हिंस्रक जीव घिर सहित सर्वे यापदाः सरुधिरं पिशितममन्ति. मांस पाते हैं. - दसवाँ अध्याय-दगमोऽध्यायः । जल के जीव इत्यादि का वर्णन-जलजन्तुविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। समुद्गः,सरित्पतिःअब्धिः, किनारा फूलम् ,रोधः (न०) तीरम्। समुद्र अर्णवर, जलनिधिः तटम्, (नि०). नदी सरित, (श्री) नदी. कृपः, उपानम्, (स्त्री) प्रहिः अंधु (पुं०). फुगा नाच जलौकसः [०] ज- कूप की मन . व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ ४३] जल के जीव इत्यादि का वर्णन जलजन्तुविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । नहर यम्ये कुल्या, प्रणालो. नौः, तरणिः, तरिः [स्त्री०] आहायः, निपानम्. (छोटी) उडपम् , हवः, कोला. जीवोंकी नौफा दंड क्षेपणी. प्याऊ प्रया, पानीयशालिका. यूका, चावड़ी जौक यापी, दीर्विका. लौकस् स्त्रिी०]. पापर तटाका, तटाग, जलाशयःJशंस शहः, कम्युः • तालाव सीप शुक्तिः [खी०]. अम्भः [न०] तोयम्, पानी- यम्, नीरम् , अम्बु [न०] वीनाहः, तरङ्गः, ऊर्मिः, पीचिः, आ. मंडक मण्डूका,मेका,शालूर,दर्दुरः चतः भिंवर] आलवालम्, आवालम् , मत्स्यः, मीना, डापः थामला वयूले बुद्बुदा. जलव्याल अलगर्दः. धीवराः, फेवाः मत्स्योप- मछुए जीविनः. ऊदबिलाव उद्रः, जलमाजार:. कंचुए गण्डूपदः, किन्चुलफा. मछली पडिशम्. खाई रोयम्, परिखा. का कांट गाह,नाय नमः, गुम्भीरः,मकरःमाह कीच कर्दमः पङ्कः पकिला [की- बैंकदा अलीरः, कर्कटका. चदार]. कच्छपः, कूर्मः, कमटः. काई कछवा निपटरा, जम्बाला. चर्तिका,कादम्बः,कलहंसः जलकुक्कुट. मुर्गवी वर्तका. घलाका, चिसफण्टिका तामरसम्, पधेरहम्, क- यगला वलाका, यका, फह्वः. मलम्, सहस्रपत्रम् . जलमानुष जलमानुपा. घिसम्. तिमिः, तिमिहिला. नाय(घड़ी) पोतः, यानम्. करहाटा, शिफाकन्दः आवरप.. जल- यतक कमल कमल की टण्डी मृणालम्, Porrner [४५] दशमोऽध्यायः। जल के जीव इत्यादि का वर्णन-जलजन्तुविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। मिलना मिलति. कमल की किअल्का, केशरः. केसर उछलना उत्पतति, उन्हवते । अत्ये. प्रास कयलयति [ना०धा०] प्र.| छलांग. ति, लवते. करना सति. भरना नुस होना मीणाति, मोदते, हप्यति. सकुञ्च्यते,आकुज्यते, चैठाना. सिकुड़ना संहियते, सङ्कोचर्यान, सं- स्थापयति. रखयाना सिकोड़ना हरति, आकुञ्चयति, नि- योतयति, प्रकाशयति द. मौलनि. जाहिर शेयति, सूचयति, ध्या- करना यति, प्रकटीकरोति, आ- विष्करोति,व्यक्तीकरोति. हिन्दी। संस्कृत । समुद्र भी पूरे चान्द को देख कर खुश समुद्रोऽपि पूर्णचन्द्रं दृष्ट्वा प्रोणाति होता है और बढ़ता है मनुप्य तो वर्धते च किमुतान्ये जनाः. कहां रहे. मछुए लोग कॉट के जरिये से या जाल मरस्योपजीविनो पडिशद्वारा जालेन से मछलियों को खींच कर बाज़ार घा झपानारूप्य हाटके विक्रेतुमा- में बेचने को लाते हैं. नयन्ति. इस नदी में बड़े भयङ्कर नाके हैं, इस अस्यां नद्यामतीव भयङ्करा घहयो न- के किनारे पर भी न जाओ. फ्रास्सन्ति, अस्यास्तीरेऽपि मागच्छ. क्या तुमने कभी नाके की दाँतों की किं त्वया कदापि मकरस्य दन्तपंक्ति- रही भी देसी है. यह आदमियों को बिना टुफडेही किये अयं मनुष्यान्खण्डमकृत्वैव कवलयति निगल जाताहै पेहलक होनीपजह से निर्गलस्वात. फ्या नहर, यम्यों में भी नाके होते हैं? किंकुल्यामु प्रणाली'चापि माहाभवन्ति रपि हा.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः । [४५] जल के जीव इत्यादि का वर्णन-जलजन्तुविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत । नहीं। फभी बड़ी नदियों से कोई न । कदाचिद् वृहनदेभ्यः कश्चिदाग- आभी जाता है. च्छत्यपि। इस यम्ब के दोनों किनारों पर बड़ो | अस्याः प्रणाल्याः यो रोधसोः महती पेड़ों की छाया है यहां छाते की वृक्षच्छाया चर्तते नास्त्यनावश्य. जरूरत नहीं. फता छत्रस्य. इस कूप पर पफी मन और जीवों को अस्य कृपस्योपरि पकवीनाहो निपा- प्याऊ नहीं है. नञ्च न वर्तते. गरमियों में बहुत से लोग प्याऊ रस- ग्रीमतों यहयो जनाः प्रपां स्थापय. पाते हैं. न्ति. अब तो चावड़ी नहीं बनवाई जाती. इदानीन्तु चाप्योन निर्माप्यन्ते. इस बड़े नलाव में जो जलजन्तु हैं उनके अस्मिन्वृहत्तडागे ये जलजन्तवस्तषां नाम बताओ । सुनिये-कैकड़ा, नामानि यहि । थ्रयन्ताम् कुलीरका, कछवा, जलमुगीवी, बैंक, अलमा कूर्मः, जलकुक्कुटा, पलाका, जल- नुस, चकवा, यतक, यगला, जोंक, मानुपः, चक्र, वर्तकः, पका, यूका, मैडक, जल का साँप वगैरह । गि भेका,अलगर्द इत्यादीनि गण्डूपदाः डाये अफ्सर चौमासे में पैदा होते प्रायश्चातुर्मास्ये जायन्ते, ते देहंजले है वे कभी देह को जल में सकोड़ कदापि सहोचयन्ति कदापि विस्ता- लेते हैं कभी फैला देते हैं. रयन्ति. हवा के जोर से पानी में लहरें पैदा | चायुवेगाजले तरङ्गा उत्पद्यन्ते. हो जाती है. अथाह (गहरे) पानी में ही भमर अगाधजल एवायर्ताः पतन्ति. पढ़ते है. उनमें नावों का चलानाही मल्लाहों की तेपुतरणानां प्रचालनमेघ कर्णधाराणां होशियारी जाहिर करता है. कौशल्यं द्योतयति. शल और सिप्पी भी अक्सर समुद्रो शताः शुक्तयश्चापि नदीशेष्येव प्रायो में ही मिलती है. मिलन्ति.

[४६] दशमोऽध्यायः- जल के जीव इत्यादि का वर्णन-जलजन्तुविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत । (घड़े खंद की बात है) कि जहाज का अहो, पोताध्यक्षोऽपि बहुभिजनस्सह कप्तान (मालिक) भी बहुत आद तिमिद्वारा यानभङ्गेन सागरे न्य- मियों के साथ हल के जरिये ज- मजत., हाज टूटने से समुद्र में डूब गया. मलाह लोग नदियों में भी पतवार के नायिका नदीप्वपि क्षेपणीद्वारोदुपानि जरिये स नाचों को चलाते हैं. चालयन्ति. | यह तालाय घड़ी कीचड़बाला है इसमें अतीव पड्किलमिदं सरः मास्मिन्प्र. मत घुसो. विश. इस तालाब में बहुत से कमल है. अरिमन्तडागे पनि तामरसानि सन्ति. फिले की खाईयों में अक्सर पहुन फोट[दुर्ग]परिसासु प्रायो महजल- पानी होता है. म्भवति. इस थामले में तुलसी का पौधा लगादो. अस्सिनावाले तुलस्या वृक्ष स्थापय. बहुत सी मछलियां खाई के पानी से पहचो मत्स्याः परिखासलादुत्पतन्त्य- उछल जाती है और डूब जाती हैं. कमल की जा का साग बहुत अच्छा | करहाटस्यापि शाकमतीय शोभन भ. होता है. यति. इम्साल सूपा से पञ्जाय में रय्यत पेपमः पञ्चालेप्यवग्रहेण पीडिताना दुखी है. जास्ति, पारसाल बगाली लोग तौरससाल परद्वद्गदेशवासिनः पराश्चिमध्यदेश- मध्य देश के रहने वाले अंग से वास्तव्या महामारीरोगेण पीडिता पंड़ित थे। अब ईश्वर सय जगह भासन अधुनेश्वरः सर्वत्र विद. ध्यात्. घपतन्ति च. . पुशल फरे.

व्यावहारिकामस्थतप्रबोधः। [४७ ] । ग्यारहवां अध्याय-एकादशोऽध्यायः। छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । संस्कृत। संस्कृत। हिन्दी। -- किताच पुस्तकम्. तर्जुमा अनुवाद: जुगराफ़ियः भूगोलविद्याशाखम. अश्मपट्टिका, काष्ठपट्टिका. तस्ती तारीप इतिहासः. कागज़ पत्रम् पदार्थविज्ञान, विज्ञानशा- साइन्स पलम लेपनी. खम्. दवाव मसोपानम्-- आकर्षः, आपणं, चित्र ड्राइंग स्याही मसिा-सी [स्त्री०]. आलेरयम्. तूलिका, पर्तिका, शीशक न्याय तर्कशास्त्रम्. पेन्सिल झालाका. घेदान्त दर्शनशास्त्रम्. कलमदान लेवनीपात्रम्. मालियाना यार्षिकपरीक्षा. बोर्ड फलफा-कम् , काष्ठमण्डम्. इम्तहान सड़िया खटिका, कठिनी. इनाम पारितोषिका. नक्शा देशालेख्यम्, भालेरयपत्रम् मदी पाठशाला, विद्यालयः. गुजराती | गुर्जरभापा. रबर घर्षका, मार्जर उर्दू जवान उर्दूभापा. चिट्ठी पत्रम्, सन्देशपत्रम्. अंग्रेजी आङ्ग्लभापा. घनमापा. मामुद्दिश्य, दत्तमहाधनाम. फारसी पारसीकभाषा अक्षर हिसाय अङ्कगणितः, लेस लेपनम् , लेयः. अयर बोर्डिगहोस छात्रालयः मठः. वीजगणितः. मुकाबला मर्यादा, सीमन् [पुं०] अब- अहाता বাবা धिः प्रान्त'. रेसागणितः ज्यामितिः. गणित निरीक्षणम्, अवेक्षणम् , स्पेक्शन मसाहत मापनम् , मितिः स्त्रिी०] निरूपणम्, दर्शनम्. अक्षरम्, वर्णः.

च [४८ ] एकादशोऽध्यायः। छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । -उपचारः, परिचर्या, आ-चालचलन वृत्तम्, आचार' नौकरी संधियः. फोस, तन- | शुल्कःल्कम्, घेतनम्, मा- नतीजा फलम्, उदकः, परिणामः. रवाह सिकम्, भृतिः [स्त्री०]. प्रणेता, [.] कार्याध्यक्षः | जुर्माना धन-अर्ध-दण्डः. मैनेजर अधिपतिः सम्पादका. सिफर शून्यम् , विन्दुः. इन्स्पेक्टर निरीक्षका, अध्यक्षा. स्पेसिमेन | आदर्श,प्रतिमा, प्रतिरूपम् डाइरेक्टर शासिता, अधिष्ठाता. अंशदानम् , उद्धारदानम्. उस्ताद गुरुः, अध्यापकः, आचार्यःटूनामेन्ट - सादिकोडा युखम्. तालिव | विद्यार्थी [पुं०] छात्रा, अ-रेजिष्टर लेख्यम् , लिसनस्थानम्. ध्येता पठिता. कालेज वृहद्विद्यालयः-यम्. मजमून चिपयः. प्रोफेसर अध्यापका, गुरः,जाचार्यः. दिनपत्रिका, दैनिकवृत्त- इन्स्टालमैट भागः, अंशः डायरी पुस्तकम्. सनद प्रमाण निर्णय-पत्रम् दिली मानसी, मानसिकी. हमउमर ययस्यः, मित्रम्, सुहृद्[पुं०], रेजर जल्दी तूर्णम्, शीघ्रम, झटिति. दर्जा कक्षा, श्रेणिः-णी. |बुलाना आहूयति ते, आकारयति. सास फेलो सहाध्यायी [पुं०]. निर्भर्सयते; तर्जयते; नि- पाठशालाध्यायी[सतीर्थ्य:]- झिडकारना प्ठुरममि-धा; निन्दति अ. | जमना. धिक्षिपति. मलकीड़ा. व्यायाम, वि-उत्-एजति, परित्यज- मुस्तदो आरब्धा [पुं०], नवच्छात्रः, सचकरमा घियुक्त, कन्दुकः, गेन्दुका. क्षपयति, गमयति, याप- यल्ला यष्टिः, स्ना०] लगुड. विकेट्स फ्रीडायधिकाष्ठानि. घुपचाप-निभृतं अलक्षितं अपयाति, लैक्चर व्याख्यानम् , शासनम्. चलेजाना अपगच्छति. ति, नियुक्त, यति [0].

[४९ व्यावहारिकसंस्टतप्रबोधः। छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तुनि । Lavray ~-~- हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। पठति, अध्यात, याचयति, दिना(अदा / ददाति दत्ते, भर्पयति. पढ़ना अधिगच्छति. फरना) नियटनानियतत. अध्यापयति, शिक्षयति, पढ़ाना गल्ली भ्रमति, माम्यति, मुह्यति, पाठयति, उपदिशति. प्रमाद्यति अपराध्यति. अपलपति-पदति, नस्वीपर- दर करना विग्यति (ना० धा०). मना करना रोति, निषेधति, प्रत्या- बताना ख्याति, अपनि न्हते. पढ़ना प्रवर्धते,प्रचीयते, उपचीयते फराना निकलना उदेति, उत्तिष्ठनि, उत्पद्यते. यथाक्षरंसग्याति - पटति, हिजेफरना लिखति. गरना मालग विज्ञापयति. हिन्दी। संस्कृत। ऐप्यार उठी। सूरज निकल आया उत्तिष्ठ यत्म । सूर्य उदतियत् मातः और सवेरा हो गया. कालो जातश्च. सुनो मुर्ग यांग दे रहे है ओर पसेरू मी शृणु कुफ्फुटसो रैति पक्षिणश्चापि शपने घासली को छोड़ कर आ स्थनीजानुत्सृज्याम्बरे विहरन्ति. स्मान में विहार फार रहे हैं. पायाना इत्यादि कामों से निबट फरशोचादिकृत्येभ्यो नित्य पाठशाला मदर्स जाओ. गच्छ. अच्छा। अभी जातात. बादम् । गच्छाम्यहमधुनैव. गोपालदत्त ! क्यों देर करते हो क्या गोपालदत्त! कथ चिरयास किमर्थ- जुर्माने से नहीं डरते हो. दोस्त ! टरता तोह लेकिन अभी देर । विभमि त्यहं मित्र! परवाच नाति- नहीं है. काल: अच्छा, भाभो २ देखो ये हमारे अंग्रेजी घरम्, आगच्छागच्छ, पश्यते ऽस्माक- के उस्ताद जा रहे है. माइग्लभाषाध्यापफा गच्छन्ति. दण्यान विभपि? ७ कारणं सातम् [५] एकादशोऽध्यायः । छात्रोपयोगीनिपाउशालासम्बन्धीनिषवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। तो देर नहीं है होले २ चला. तदाहि नातिकालः, शनः शनश्चल. मङ्गलदत्त ! तुम्हारा फल्याण हो बहुत मालदत्त ! भदन्त, बहुभिर्दिवसैः दिनों से पाटशाला में तुम्हारी गैर पाठशालायां तबानुपस्थितः किं हाजिरी का फ्या सवय हुआ. मित्र श्यामलाल ! मेरी माता पद्भुत घयम्य श्यामलाल! ज्घरग्रस्तासीन्म- दिनों से चुग्यार से पीड़ित थी यही दीया माता बहुभिरहोभिः, पतद्धि मेर न आने का कारण था. ममानागमनकारणम्. क्या कोई और सबरगीरा न था ? किं कश्चिदन्यो निरीक्षको नासीत् ? नहीं मेरे पिता तो काशी गये और बड़े न, मम पितरस्तु फाशी गताः ज्येष्ठ- भाई फुरुक्षेत्र की यात्रा में. म्रातरश्च कुरुक्षेत्रयात्रायाम्. तुम्हारा एक छोटा भाई भी तो है. एका फनीयाम्भ्रातापि तव घिद्यते. हां, यह तो यालक होने से निगहबानी | पाढम्, सतु वाल्यत्वानिरीक्षणाक्षमः. फरन में असमर्थ है. अब तुम्हारी पालिदह (माता) फैसे हैं. ! अधुना तपाम्याः कथं विद्यन्ते ? अय तो ईश्वर (खुदा) की कृपा(जल) है. | अस्लीश्वरानुकम्पा विदानीम्. आज हमारे मदसे में यह यया भीड़ | अद्याम्माकं पाठशालायां कोऽयं महा- है यह पूछ कर जल्दी मुझको अनसम्मद इति पृष्ट्वा वर्णम् विक्षा पय माम्. पया तुम नहीं जानते कि आज कालेज किं त्यं न जानास्यद्य आङ्ग्लविद्या फा हर्नामेन्ट होगा. लयस्य सादिक्रीड़ा भविष्यति. इसका मुन्तजिम कौन है? कोऽयमस्य निरीक्षकः? हमारे मदर्स के हेडमास्टर श्रीमान् । असत्पाठशालाध्यक्षः श्रीमन्महामहि- महामहिममहोदय अपने अनुचर ममहोदयः स्वानुचरानुमोदप्रदा लोगों को खुश रखने पाले श्रीमान श्रीमत् कृपराभिधोमहाशयः, फूपरसाहिय है. निश्चयही इनका इन्तज़ाम तारीफ़ के खलु प्रशंसनायोऽस्य प्रयन्धः. स्यक है. पबर टो.

[१] व्यावहारिकसस्मृानप्रयोध। छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत । इनफ घक्त में हमारी पाठशाला सय अम्प समये नापाठशाला सर्वथोन्नति तरह से पहबूदी को प्राप्त हुई. गता. ऐसे हेडमास्टर जिनके वक्त में हम चिरसीवत्वे ताशोऽध्यक्षोयस्य समये तालियइल्म और उस्ताद लोग धयमध्यापका विद्यार्थिनश्च स्व- पने कामों को होशियारी से करते स्यानि सावधानतया कुर्वाणा नि. हुए निउर रहते है, चिरजीव रहे. भीफाः (अफुतोभयाः) मः ! अब यहुत यातें होली जमनास्टिक का अलम्बाभापणेन; व्यायामसमयों घक्त हो गया. जातः. पहां जाफर पहिले तो एक कतार में तन गत्या पूर्वन्त्वेकस्यामेव पन्या- पड़े हो. मपतिष्ठभ्यम् तय दिलमास्टर के हुक्म से हरेक | ततोव्यायामाध्यक्षानुशातःप्रत्येका क- दफा फतार में ही अपने२पहने के क्षा (श्रेणिः) पत्यामेव म्वे स्चे स्थानों में बायो. अध्ययनालये गच्छतु. इसके बाद विद्यार्थियों से पटना गुरु ततो अध्ययनमारभ्यते छानः किया जाता है. यह अंग्रेजी का घण्टा है इसलिये हेस अस्त्येषा घटिकादृग्लभाषाया अतः प्र. मास्टर साहिब के पास चलें. थमाध्यापकसमीपे चलत. फल संस्कृत और हिसाय में हमारा वो भविता संस्कृते गणिते चास्माक- इम्तहान होगा. परीक्षा.. देसिये फोन पास होता है कौन फेल. पश्यन्तु के उत्तीणः कोऽनुत्तीणीमवेत्. जो विद्यार्थी अपने मुफरिर किये हुए | ये विद्यार्थिनः स्पनियतपाठान् नियत- सपी को मुफरिरहही घक्त पर समय एव न स्मरन्ति (फंठस्थान- नहीं याद कर लेते है । उनका पास कुर्वन्ति) तेपामुत्तीर्णता, दुस्सा- होना मुश्किल है. ध्या, (कठिना वा). इसीने अलमन्द तालिय इल्म को चा अत एव विचक्षणश्छायानियतपाठान् हिये कि दिये हुए सबको को मुक नियतसमय पवानुस्मरेत्. रिरहही वक्त पर याद कर ले.

[१२] एकादशोऽध्यायः । छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि ! . हिन्दी। संस्कृत। समामन्द लोगया तालिवहल्म आज के | धुद्धिमन्तो जनाइछात्रा वाघतनं कार्य काम को दूसरे दिन के लिये नहीं द्वितीयदियसाथ न परित्यजन्ति. छोडते. उस्लाद आते है बये हो जाओ. अध्यापका आगच्छन्ति अभ्युत्थानमै भ्यो दीयताम्. खच एक घारगाही सष्टे होते हैं और | सर्ये युगपदेयोतिष्ठन्ति गुरुषमस्कुर्व- गुरु को नमस्कार (प्रणाम)फरते हैं. न्ति च. उस्ताद लोग अपने विद्यार्थियों को आ. अध्यापका: स्वच्छावानभिनन्य प्रथम शीर्वाद देकर पहिले तालिपल्मों छात्राणां समुपस्थिति गृक्षन्ति. की हाजिरी लेते हैं. दमके याव पहिले दिन पढ़ाये हुए स- सदनन्तरं पूर्यदिवसाध्यातिपाठान् घको को सुनते हैं. शृण्वन्ति. ओर लड़के अलग२ सुनाते है. छानाध पृथक् पृथर धारयन्ति जोफ २ सयक नहीं सुनाता पह | यो यथावत्पाट न नापयति ल देहदण्ड पिटता और जुर्माना किया जाता है, मर्थदण्डञ्च लभते (देहाथदण्डमा भनति). भाजका उच्छेदस का सयफ यहुत मु· | अद्यतनो रेखागणितपाठो प्रतीय कांठ- शिफल है युदाही सैर करे. नः ईश्वर एव फुलं विदध्यात. मणिधर ने फल मेरी पुस्तक चुराली. मणिधरो छो मदीयम्पुस्तकममुष्णात्. हेडमास्टरमाइघ ने सहकीकात करके मुख्याध्यक्षो निर्णयानन्तरं तं भृशं उसको पेसा मारा जिससे यह ये. तथासास्पद्यया स निधेतनो भूत्वा होश होकर जमीन पर गिर पड़ा. भूमावपत. यह हेडमास्टर साहब ने यहूत भच्छा शोभनं घिहितमेतन्मुण्याभ्यः. किया. यह फिर कुछ भी न चुरायेगा. स पुनः न किमपि चोरयिष्यति. कृपा और दण्ड दो धर्मही मालिकों के अनुप्रहो निग्रहच द्वौ धर्मायेव प्रभूर्णा होते हैं. भयत'.

wom h व्यावहारिकग्नस्शतप्रयोधः। [५३ ] छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। सालियाने इम्तहान में पाम हुए विद्या- यार्षिकपरीक्षायामुणेषु विद्यार्थिषु धियों में से पहिले दूसरे इनाम पायेंग. प्रथमद्वितीय पारितोपिक लप्स्येत्ते. मेरा तो तीसरा नम्बर है नहीं तो मैं | मदीया तु तृतीया संख्या नौदहमषि भी इनाम पाना. पारितोषियमलपस्ये, मित्र तुम्हाग कौन सा नम्बर है. मित्र तव फतमा मंख्या ? मालूम, मगर भाज में 8 से न जाने, परचाहम लिंशिका (ले- पूछंगा. नफ) प्रक्ष्यामि. तुम्हारे मदसे में कितने उस्ताद है और तय पाठशालायां फतिपया अध्यापका ये फिस २ जाति के. स्सन्ति कि कि आतीयाश्च ते. हेडमास्टर साहप तो यूरप देश के मुख्याध्यक्षस्तु यूरुपदेशीयो एक एच. एकही है. उनकी क्या तमगवाह है? ४०० रुपये, नम्य किं घेतनम् ? मुद्राणां चतुःशतम्. सकिण्ड मास्टर कोन है? एक ईसाई | द्वितीयाध्यक्षः कः? सीमतानुयायी महाशय एका उनकी सौ रुपये सनख्याह है. तस्य भृतिमुद्राणां शतमस्ति. थई, फोर्थ, फिफ्थमास्टर फायस्थ है। तृतीयचतुर्थपञ्चमाः कायस्थजातीया: येभी क्रम सं सत्तर, पचास, चा. तेऽपि कमात्सप्ततिपञ्चाशयत्यारि- लीस रुपये पाते है. सिक्स्थ मास्टर साहब गौड़ ब्राह्मण | पष्ठो ऽध्यापको गोमवंशीयो महाशयः मुसम्मी ज्वालाप्रसाद है यह भी ४० ज्वालाप्रसादनामा सोऽपिचत्यारि- रूपये मदर्से से और पचास रुपये शन्मुद्राः पाठशालातः पञ्चविंशति- योर्डिहौस सुपरिटेण्डेण्टी के इस मुद्राश्छानिरीक्षकपदव्या इत्येवं तरह मिला कर ५५ रपये पाते है. मिलित्वा पञ्चपञ्चाशन्मुद्रा लभते. इसी तरह अपनी अह से वना ले. इत्यमेव स्वचुध्या परिकल्पयेत्. संस्रुत फारसी पढ़ानेवाले कितने हैं | संस्कृतपारसीकभापाध्यापकाः कति- उनकी तलप (तनरधाह) भी बताओ पया तपां घेतनान्यपि विज्ञापय. सादर ६. शन्मुद्रा लभन्ते.

[५४] एकादशोऽध्यायः। nars छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धी निचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत । सस्कृत और हिन्दी के पढ़ाने वाले दो अमरमयवाण्योरध्यापको द्वी, प्रथम- है पदिल ३० रुपये और दूसरे २० स्तु त्रिंशन्मुद्राः द्वितीयश्च विंशति- रूपय पाते हैं. रूपकाणि लभते. अरबी फारमी के पढ़ानेवाले दो हैं ये अरवपारसीकभापाध्यापकी छौ तापि भीमाम से३० और पीस रुपया पाते हैं. मामात् शिदिशतिमुद्दाश्च लभेते. में पायाने जाना चाहता हूं महरयानी अहं शौचार्थ जिगमिषामि रूपयाऽनु- कर मुझे हुक्म दीजिये । जाभी देर आपयन्तु भवन्तः । गच्छ.मा चि- नफरो. रय। ल दो. यह अहाते में कौन पेशाय फरता है फोऽयं परिसरभूमी (प्र.गणे घा) मे. इसे पकड़ कर यहां लाभो. हति इमं धृत्वाऽधानय. कोई गाय का नावाकिफ आदमी है। अस्ति फश्चिग्रामीणो उनभिक्षावरम् अच्छा इससे आठ आने जुर्माने से. अस्मादष्टाणकान् अर्धदण्डस्यादाया- लेकर और गर्दन पकड़ कर निफा. र्धचन्द्रं दत्वा च निष्काशय (नि. स्सारय). इतनीही सजा फाफ़ी है. एतायानेय दण्डः पर्याप्त क्या तू इस येत से नहीं डरता जो अपना कि त्वं न विभेष्यरसादेवाचस्वपाई सब याद नहीं करता. नानुसरसि. लायक तालिवाल्म उस्ताद के फहने | सुयोग्याछाना गुरूणां कथनमेव पहु- फोही यहुन समरते हैं. मन्यते. खोट तालियइल्म गुग के वचनों फोन | बुशिप्यास्तु गुरुवास्यनाइत्याध्यय. मान कर पढ़ने से विमुख हुए अनेक नात् पराङ्मुखाःसन्तानानाविधेषु तरह फे पोट मागों में पड़ कर पुमागेपु पतित्याऽऽजन्मायसीदन्ति: जिन्दगी भर दु.स पाते हैं. अच्छे शिप्य अमृत नुल्य गुरु का यचन | सच्छिप्या अमृतफल्म गुरुवचो मत्या मान उनको माता पिता से भी त पितृम्यामपि सविशेष मन्यमाना ज्यादह मानने हुए आदर करने है. आद्रियन्ते.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [५५] छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। अपनी सिलेट निकाल फर हिमाय और स्पाइमपहिसां निष्काश्याङ्कगणितयाज- जघरमुकाबले के सवाल लिपो. गणितमणान् लिपत. मेरे पास तो फलम कागज है. मत्समीपे तु लेरानीपञ्च विद्यते. फ्या में इसी पर लिरा लं. किमहमस्योपय॑व लिपानि ? है तो यह हमार हेडमास्टर साहय के | अम्त्येपल्याशाभहोऽम्मा पाटशाला- हुक्म फेशिलाफ़, मगर आज तेरा ध्यक्षस्य परश्चाद्य तत्र दोपं क्षमे फ्सूर माफ करता ह. (उपेशे). फल जरूर सिलेट हो नहीं तो सज़ा- श्वो ऽवश्यमेवाश्मपट्टिकास्थानाचेह- चार होगा. पड्या भविष्यसि. बहुत अच्छा । गुरूजी ! दफ्तरी से घरम् । गुरवः ! मसीपात्राध्यक्षायसी- दयात ले आऊ. प.प्रमानयानि. यहां परही दवात है इसे ललो. अत्रैव ममिपानं वर्तते गृहाणनत्. इसमें स्याही नहीं है, तो क्या करूं? मसिरसिम पर्तते, तहकिकरवाणि? गंगाराम भी स्याही देने को मना करता है गहरामोऽपि मसि दातुं प्रत्याख्याति. अच्छा, पेन्सिल सेही जल्द लिपो. यरम्, तूलिकयव तूर्ण लिस. लड़कों किताब बन्द करो यह फिताच पुस्तकानि पिवत्त छालाः नास्त्ययं पु- देपने का समय नहीं है. स्तफावलोकनममयः. किंतवासिला प्रणा उपपन्नाः (तथ्याः, क्या तुम्हारे मय सवाल टीक है. अषितथाः) सन्ति. हां, तो धीजगणित के सवाल को योई । ओम्, तर्हि घीजगणितमष्णं फलके पर लिसकर अपने दर्जे के लड़कों (काष्ठखण्डे) लिखित्वासिलान्स्व. को दिसला दो। जो आगा. वर्गच्छाधान प्रदर्शय । यथाशा. तुम मेंसे नक्शे में फौन ज्यादह होशि- युप्माकं मध्ये देशालग्ये कतमोऽतीय यार है । कृष्णदत्तशर्मा. निपुणः ? कृष्णदत्तशर्मा. इस दफा में कितने तालियइल्म संस्कृत ! अस्मिन्य यातिपया विद्यार्थिनः संस्था- फारसी के है और कितने साईस तपारसीकभापयोः सन्ति कतिपथा- और दाइन के. श्चार्य (चिनिधा)पदार्थविज्ञानयोः [६] एकादशोऽध्यायः। छारोपयोगीनिपाउशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । . हिन्दी। संस्कृत। ग्यारह सस्कृत क चौदह फारसी के | रुद्रसंख्याकाः संस्कृते चतुर्दश पारस्या और पांच २ साइन्स ड्राइल के है. पञ्च पञ्चाफपपदाविज्ञानयो . क्या भाटी दफा में मसाहत है. किमटमकक्षायां मापन विद्यते. नहीं, पह नी दाअ से शुरु पराई न, नत्तु नवमकक्षात आरभ्यते. माती है. अबके सालियाने इम्तहान में तर्जुमा इदानीन्तनायां धार्षिकारीक्षायाममुबा बहुत कठिन था, दो ऽनीच हिट (पठिन.) आसीत्. पिछले एन्टम्स इम्तहान में शिवलाल गत देन्सपरीक्षायां शिवलालशति- शर्मा तवारीय जुगराफियह में हासभूगोलशास्त्रयोरपतत्. फर होगया था. क्या तुम न्याय शारम भी जानते हो? | किं रं तर्फशारणमपि जानासिनो। नहीं । विद्या तो पढ़ाने से यदती है विद्यात्यायापनात्प्रवर्धनान्यधा. और तरह से नहीं मैंने तो दर्शन शास्त्र पढ़ा है. मया तु दर्शनशास्त्रमधीनम्. यहां ककार ज्यादह है इसको रघर से कारोऽयमत्राधिक. एमं घर्षण मिटा दो. शोधय. जिन लड़कों का अंग्रेजी और दूसरी येषां छात्राणामाइग्लभाषालिपिचिती- जयान का लिखना अच्छा है घे यभापलिपिश्च मनोहरा ते याद्ध- प्लाम से बाहर निकल आये. हिरागच्छन्तु. उनका लगलिग्वा फरमाइन्दह महीने तेषां लेख लेखयित्वाऽऽगामिनोमास- फी पहिली तारीन को इन्स्पेक्टर स्य प्रथमतियायध्यक्षमहाशयस. साय के पास भेजा जायगा. निधी प्रेपयिष्यते. पिछले पंक्शन का क्या नतीजा | गतनिरीक्षणस्य का परिणामा जाता मा! अभी तक कुछ नहीं मालूम नाज्ञायत पश्चिदद्यावधि. पगा.

च्यावहारिकसंस्सनप्रबोधः। [५७] छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। बटुन से मदसे है जिनका य दोयस्त ययः पाठशालाः सन्ति यासां प्रणय- मैनेजर द्वारा होता है. नम् (अधिष्ठान । व्यवस्थापनं । प्र. वर्तन) प्रणेतृशारा भवति. भय हमारे डाइरेक्टर कौन है. प्रदानी (सम्मति) कोऽस्माकमधिष्ठाता [शासिता या]. श्रीमान् महोदय लूइस साहव. श्रीमन्महोदया लूइसमहाराया. उस्तादों के लिये शिष्य का क्या फर्म है. गुरुन्मति शिष्यस्य किं कर्तव्यमस्ति. जो मन से याणी से फर्म से गुणों के ये मनसा याचा फर्मणा गुरूणां गताः भक्त है येही अच्छे शिष्य है औरनहीं. त एव सच्छिप्या नेतरे. गुरु भी पं.से साजिन अच्छे शिष्य को गुरप्पनाशं धिनयोपेतं सच्छिप्यम् घेटे मगरला जान कर हमेशा उस पुषयज्ज्ञात्या सदैव तस्मै सुशिक्षा को अच्छी नसीहत दे और हित दद्यात् हितकरं वश्च ययात. फारी वचन बोले, थी. ए. इम्तहान में 2 मजमून है ? छै. सन्ति कति विषयाची.ए.परीक्षायाम् पट, माजकल के घमंडी तालियइल्म धोदी माधुनिफाः सदपीरछात्रा अत्यल्पाम भी विद्या पढ़ कर गुरुओं को कुछ पि घिद्यामधीत्य गुरुनयमन्यन्ते. नहीं समझते. ऐनों का क्या नतीजा होता है? का परिणामी भवत्येतारशाम् ? दुनिया में सुख न मिलना और भग्वीर संसार सुम्वानुपलब्धिरन्तै निरयपा. में नरफ में पढ़ना. इन्द्र पढ़नेवाला और वृहस्पतिजी पढ़ा-इन्द्रध्धाभ्येता वृहस्पतिश्च प्रवक्ता दि- नेवाले और हजार दिव्य घर्ष तो भी न्य घर्पसहनं तदापि नान्तं जगाम घिया की थाह न पाई। विद्या सो विपाया। विद्या स्वतारशी. तध. जो थोड़ी भी विद्या पदकर अभिमान ये स्वल्पामपि विद्यामधीत्याभिमन्यन्ते करते हैं ये मूर्य है. ते मूर्या. ८ [५८] एकादशोऽध्यायः छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। तुम्हारी बैठक में यहुत सी तस्वीरें है युग्माकं सत्कारालये पनि आलेल्या घे तुमने कहां से पाई. नि सन्ति कुतस्त्ययातानि लब्धानि. क्या तुम्हारे पास डायरी है. किमस्ति तघ सन्निधौ दैनिकषत्तपुस्त- फम्. है सो, परन्तु मैं उसे काम में नहीं लाता. | भस्तितु परश्चाई तन प्रयुनरिम. घाफ लाने के लिये किसी नौकर को पुरानयनाथै कश्चिभृत्यमाशापय. हम दो. अन्जा नये तालिपल्मा (मुप्तथियों) | परम्, नपच्छात्रेभ्यो मानसिकोऽवग- के लिये पिली हिसाय यहुत फायदे णितो ऽतीयोपयोगी भवति. मन्द होता है. तुम भीथपने छोटे भाई फोरसे पढ़ाओ. | त्वमपि स्थकनिष्ठभ्रासरमेममध्यापय. घमसयकों के साथ हमेशा मेल से स्याध्यायिभिः सह संदेष सम्मेलनेन रहो. पर्तध्यम्. हमारे मदसे में हर रोज शाम पो गैद ! अस्माकं पाठशालायां प्रतिदिन सायं. का रोल चोर कसरत होती है, - काले फन्दुफफ्रीडा व्यायामथ भ. च्छा, कसरत की जगह मुझे भी यनि । वरम्, व्यायामभूमि मामपि दिखाओ. प्रदर्शय. यहां कितने विद्यार्थी जमनास्टिफया | तत्र कति च्छात्राध्यायामशीलिना (से- ले ११ चचालीस लड़के. यिन.)सन्ति चतुश्चत्वारिंशच्छात्रा'. क्या ये सयही पोर्डिहोस में रहने-किमपिला पप ते छात्रालयनिवासि- घाले है ? नहीं. शहरी और घोर्डर दोनों की ये तादा- नागराणां छात्रालयाध्येतृणाञ्चोभयोरे- पा संख्या. तू पोट होगया वह मुझे दे. त्वं पाहोऽभय कन्दुकयदि मां प्रयच्छ. फ्यान गुजराती और यहाली भी कि त्य गुर्जरभाषां याभाषाश्चापि जानता है.

ध्यावहारिकसंस्कृतमयोधः। । ५९ ] छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। पहिली तो जानता हूं दूसरी नहीं. प्रथमान्तु जानामि न चोसराम. यहाली जयान तो संस्कृत जाननेयाले | पतभापा तु संस्कृतस्यातीय सुलभा, को बहुत भासान है क्योंकि उसमें पतस्तस्यां प्राय: संस्कृतशम्दा एप अक्सर संस्कृत शब्दही इस्तेमाल प्रयुज्यन्ते केवलं भेदस्तूवारणे. किये जाते है सिर्फ घोलने में फर्क है. क्या तुम्हारे मदसे में भी कभी प्या- किम् युष्मदीयायां पाठशालायामपि ख्यान होता है. कपि ग्याख्यानम्मपति. होता है शनैश्वर को. भवति तु शनिपासरे. व्याख्यान देनेयाले कौन है ? हमारे | म्याण्यानदाता कः? संस्कृतप्रथमाध्या- हर पण्डित. इन लैक्चरों का फुछ नतीजा भी है. अस्तिकचिरपरिणाम एषां व्याख्याना- पको न ठीक २ नहीं क्योंकि आज कल के नास्ति याथातथ्येन, पत आधुनिको यात से मन्दयुदि धर्मपियन यहयः क्षुद्रयधयो धर्मधिरधानु- सपदेशों को तो अन्दीही अपने मन पवेशास्तु टिश्येष स्थममस्म में रख लेते है न कि धर्म युक्त उप धारयन्ति न च धर्मोपेतान, “देशों को. यह ठीक है। पह महाराज फलियुग सत्यमेतत् । अस्त्येषः प्रमावः महारा- का प्रभाव है. विद्यार्थी दशा में हमेशा अपने बेटे छात्रायस्थायां स्थपुत्रादिवृत्तं संदेय इत्यादिक के सदाचार की रक्षा गोपायेत् यत एपा उपफायस्था. करे क्योंकि यह फछी हालत है.' इस उम्र में सीखे हुए सदाचार था | अस्थामथस्थायां शिक्षितानि सद्यूता- दुराचार जीयन पर्यन्त सुख दुःख नि असद्वृत्तानि या यावजीर्घ सु- सदुःचे प्रयच्छन्ति. जस्य फले.

[६.] एकादशोऽध्यायः। छात्रोपयोगीनिपावशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । छप जाते है. हिन्दी। संस्कृत। जैसे फची रफड़ी इधर उधर नवाई यथाऽपकः काष्ठ तस्ततो नम्रीक्रियते जाता है और सूखी लकड़ी नहीं (नाम्यते) नच शुककाष्ठस्तधेय ऐसेहो हालत चालकों को होती है. दशा यालानाम्. तुम्हारी दफ़म की क्या फीस है. किमस्ति शुल्कं तय कक्षायाः. ढाई रुपया. सार्धरूपफद्वयम्. इम्तहान के पर्चे छपाई के लिये धन | परीक्षापत्राणां मुद्रणार्थ व्ययः शुत फहां से आता है। लड़कों के चंदे से. आयाति ? छात्राणामशदानात्, तुम्हारे मदर्से में इम्तहान के पर्चों का परीक्षापत्राणां का प्रवन्धस्तव पाट- पया इन्तजाम है. शालायाम्. घे हाथ फे छापे (हैड प्रेस) से यहीं | तानि तु हस्तमुद्रणयम्प्रादय मुद्रि- तानि भवन्ति. क्या तुम्हार मदर्स में उस्ताद लोग | किमध्यापकास्तव पाटशालायां स्यम- अपने फ्लास रजिस्टर अलग२ रखते गलेण्यानि पृथा पृथक् रक्षन्त्यथ- है या कुल मदर्से का एफही रजि- घा एकमेय लिखनस्थानं समनायाः पाठशालाया. तुम्हारे शहर में कोई कालिज है ! अस्ति फश्चिद्विद्यालयस्तष पत्तने ? है तो एक मुसल्मानों फा. अस्ति त्वेको यवनानाम्. यहां फौन प्रिन्सिपिल, साहय, धौर | कस्तन प्रिन्सिपलमहाशयो गणिता. कौनरिपाली (हिसाय) के प्रोफेसर हैं. अंग्रेजी विचारूपी समुद्र के पारगत | अस्त्याग्लविद्यापारावारपारीणो द. दयालु मिस्टर मारिसन नामक सा यालुमिस्टरमापिसनाभिधीमहाशा इय प्रिन्सिपिल है. यः प्रिन्सिपिला, हिसाय के प्रोफेसर तो श्रीमान् महा गणिताध्यापकस्तु श्रीमन्महामहिमम- मतापी, करणा-चित्त, कोमलवाणी होदयः फरणाचताः फोमलवाफ पाले गणित विद्यारूपी समुद्र के गणितविद्यापारपारङ्गता श्रीमद्या पारंगत, श्रीमान् यादवचन्द्र चना दवचन्द्चकवारण्यो घडदेशीयो पी नामक पाताली महाशय है. महाशया, एर है, ध्यापकध. 1 * व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। [१] जालोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत । ऐसहो और भी उस्ताद लोग यहां इस्थमन्ये ऽप्यध्यापकास्तन सुयोग्याः। लायफ यच्छा. घरम्. संस्कृत के प्रोफेसर का क्या नाम है? संस्कृताध्यापकस्य किं नाम ? संस्कृत विद्या रूपी समुद्र के पारगा- | अमरवाग्विद्यार्णवपारङ्गता पहार्मदत्त. मी पट्कर्म सावधान, इलाहायाद चेताः प्रयाग श्रीमत् परम- निवासी श्रीमान् परम विद्वान् शि वियतयः शिवाशफर इति. वाशंकरजी हैं. तुम्हारे मदसे में माहधारी फीस एक तब पाठशालायां मामिकशुल्कमेकदैय ही पाने में भेजी जाती है अथवा कोप मेप्यते ऽधवा योरंशयो. दो इन्स्टालमेण्ट [हिस्सों में. एफ चारही। मोहनदप्त अपने दर्जे का एकदैव । मोहनदस्त स्वयर्गलख्यं तू- रजिएर जल्दी लाओ. णमानय. घह कहां है। गंगाराम को पूछो या तरतु कुत्र वर्तते । गङ्गारामं पृच्छाथ- नन्हे खाँ चपरासी को. या नन्हेलाँभिधं भृत्यम्. घे दोनोंदी नहीं मिलते है। ये दोनों ताय न मिलतः । ती गती कहां गये पहिले उन्हीं को ढूंढो. में तापन्धिप्य. हमेशा मेरे पते से चिट्ठी भेजो. सदैव मामुद्दिश्य (दत्तमहाहानाम) पत्रं प्रेषय (प्रहिणु). यह लड़का आठवी पाटा में भी छरोडरममकक्षावासप्रविविक्षति. प्रथ- होना चाहता है. . इससे फीस लेकर इसका नाम अपने | अस्माच्छुल्कमावायास्याभिधे स्यवर्ग- क्लास रजिस्टर में लियलो. लेख्ये लिख. यह हिसाय और अंग्रेजी में इस दफम एपस्त्वयोग्योऽस्य वर्गस्य गणिता- फे नाकाबिल है. ग्लभापयोः. अगरच यह नाफाविल है तो भी इस- यदि चायमयोग्यस्तथाप्यस्यायोग्यता की कमज़ोरी योर्डिङ्गहोस में रहने छापालयनिवासादरीभविष्यति., से दूर हो जायगी.

[२] एकादशोऽध्यायः। छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिववस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत । यह तालियाल्म किस नाम का है। किनामायंछानः। यद्रीप्रसाद इति. बद्रीप्रसाद. इसके पाप का पपा नाम और फ्या फिनामास्य पितुःकाच पत्तिः? पेशा है? माप का नाम गोपालदत्त, और सूद | गोपालवत्तः पितुर्नाम, सयाजीधि- की जीधिका है. त्य (कुसीदत्य) वृत्तिः । पहिले इसने किसी सर्कारी मदर्स में पूर्वमनेन कस्यामपि राजकीयपाठशा- भी पढ़ा है. लायामधीतम्. किसी भी सर्कारी मदसे में नहीं मगर न कस्यामपि राजीयपाठशालायाम् थक्षा परही एक पम्लिक नाम के परम पब्लिकनामन्यामराजकीयपाठ माइयेट मदर्स में. शालायामप्रैव.. तो इसका दाखिला आँच के याद होगा. तर्यस्य प्रवेश परीक्षानन्तरं भविष्यति. चोर्डिङ्गहौस कामाहवारीपर्च यनाभो. छात्रालयस्य मासिकन्यय उच्यताम्. ३) रु. तो भाने में ४) २० फु?ल तिनो मुद्रास्नु भोजने चतनो मुदा म्वर्य में पढ़ते हैं । यह तो मामूली स्त्वतिरिक्तव्यये वियन्ति । एप तु खर्च है. साधारणो व्ययः चौथी दफस के पास हुए यिना सकी- | चतुर्थ कक्षोत्तीर्णतां विना राजकीय- री मदसे में दाखिला नहीं होता पाठशालायामप्रवेशति नियमो. यह कायदा अब भी है या नहीं. ऽपापि पर्तते न वा. स नियमो निरस्त खण्डित्तो वा. यह कायदा टूट गया. तुम्हारा मदर्सा कय खुलेगा. युग्माकं पाठशाला कदापापरिप्यते (उद्धटिस्यनि)? इस हफ्ते के अखीर में। तवही अपने अस्य.समाहरुपावसाने। तदेय स्यमा भाई को लाऊंगा. तरमानण्यामि. इम्तहान का घर बान करीब है इस | परीक्षासमयस्त्यतीव समीपो ऽतःस. लिये इन दिनों में पूर्व पो. भ्य अधाग्वैषु दियसेपु. प प्यति नया.. व्यावहारिकसंस्तप्रबोधः । [६३] छात्रोपयोगीनिपाठशालासम्बन्धीनिचवस्तूनि । हिन्दी। संस्कृत। दिये हुए इम्तहान में तुम पास होगे दत्तायाम्परीक्षायां तयोत्तीर्णता भयि- या नहीं. आशा तो है परश्च नतीजा तो ईयरा- माशासे त्यहं परञ्च फलन्तु देयाधीन- धीन दी है. मेय. योनिदोस में खाने का इन्तजाम अ. छात्रालय भोजनप्रवन्धो न प्रशंस- च्छा नही है. नीया. कभी दालही स्थान नहीं होती कभी कदापि हिदलैघ सुस्याही न भवति रोटीही मोटी और कमी होती है. कदापि करपट्टिका एव स्थूला अपकाश्च भवन्ति. यदां कोई अचम्भा नहीं है सभी घो. न किश्चिदत्राद्भुतं प्रायशः सप्रेय र्डिनदीसों में मैंने ऐसाही साने का छापालयेप्चेताहश पर भोजनम- इन्तज़ाम देना है. घन्धो मया प्र. चाहे जैसा हो तो भी यहां खाने का यथाकथयित्स्यात्तथाप्यष भोजनमय- इन्तजाम और बोर्डिलहौसी से य. न्धोऽन्येभ्यश्छापालयेभ्यः भैया- च्छादी है. नेव. आज यहुत से नये तालिवाल्म दाविले ( अद्य वयो नन्याछानाः प्रपेशाधमा- के लिये आरहे है. गच्छन्ति. हो। जैसे थारहे हैं सेही यहुतों के भोम् । यथागच्छन्ति तथा पानां ना- नाम भी खारिज,होंगे. मान्यपि पृथग्भषिष्यन्ति. तुम्हारा निवास स्थान दिौलतखाना] तव निवासस्थानं कुत्रास्ति ? .. फहां है. विजयपुर नाम के गाँव में । अपना भी | विजयपुराभिधै प्रामे । स्यनियासमपि निवास स्थान बताया कधय. मैं तो अलीगढ़ शहर में रहता है. महन्तु अलीगढ़ाभिधे नगरे (पत्तने) यसामि. आज बहुत से बादल आस्मानको धेरै हुप है। अद्ययहयो मेघा आकाशमाच्छावयस्ति- H कार तो [६४ एकादशोऽध्यायः । छानोपयोगीनिपाठशालासम्पयानिचवस्तुनि । हिन्दी। "संस्कृत। फल मेह बहुत उपयोगी परसा. हो मेघस्त्वतीवोपयोगी पृष्टः. यह स्टूल यहां लाओ। लाताई भाई./ काप्टपीरमदोऽत्रानयानयामि भ्रातः. फ्यों चयर खाना है इस सबाल का | किमर्थ धाम्यसि भस्य प्रष्णस्यान्या भौर कायदा है. रीतिः जो तालियइल्म कल देर काफे आये | ये विद्यार्थिनी घो घेलानिक्रम विधा- थे उनको गाज हेडमास्टर धुला यागनास्तामुख्याध्यक्षो ऽघांकाय अलखपते. गोविन्द जितना धन कमाता है उतना गोविन्दो यावरनमैजति तायनमयति. सो देता है. हमरो यह तोहारों की छुट्टियां खेल | अनध्यामहोत्सवं खेलन्तः सम्भाय- में ही गुजरतो मालूम होतो है- फोई मुझे जगह दीजिये यह मेरी प्रा. चित्संध्रयो मद्य शेयतामित्यभ्यर्थना ना है और यह मैरी सनद देपिये. मदीया। इदचप्रमाणपत्रमपिदृश्यताम् हमारे दर्जे में तो कृष्णदत्त अच्छे अक्षर | कृष्णदत्तोस्माक श्रेण्यान्तु समीचीना- लिपता है. न्यक्षराणि लिपति. छात्री से अपना पाठ रोज पढ़ लेना छानः स्वाप्यायो नित्यमध्यतव्यो नो- चाहिय नहीं तो भूल दिया जाता है. चेद्विमार्यते. गोपालदत्त मदर्भ में याकर और छुट्टी | गोपाल पाठशालामागत्यावफाश- न लेकरही चला गया था इसीसे 'मगृहत्यिय गतोऽत एपास्मायक्षण हमारे 'हेडमास्टर साहय ने यह स त्रस्ताहिता. येता से मारा. - याम'. 48 यवः, यवेटः.. व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [६५ ] वारहवां अध्याय-द्वादशोऽध्यायः । भोजन इत्यादि का वर्णन-भोजनपदार्थविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत ...'. हिन्दी) संस्कृत) नाज धान्यम् शस्यः, प्रीहिः (पुं०) लोभिया शिविका गेंहू गोधूमः, सुमनः (पुं०) तिल तिलम्. | जो जई यवभेदः चना चणका, पाजिमन्या. भाना, रसाला-लम् ,चूत. तुवरी, पर्तुला, फलायः, नीबू. जम्बीरः, दन्तशठ.. हरेणुः त्रिपुटः. मेर कर्कन्धः, यदरीफलम्. अरहर आदफी. विजोरानी- यीमपूर: ममूर मसूर, माल्यका चकोतरा धोवा राजिका. खूपः, काञ्चनसूप.. अम्लता,थम्लरस: वाल द्विदला. शहतूतं . तमः उरद माप.. करौंदा फरमर्दकम्, मूंग मुद्रका मोठ मकुए. कदलीफलम्, फली फोदा फोद्रयः परचर पटोलकम्. चावल अक्षतम्, नण्डल:. अमरूद अमृतफलम्, भक्तम्, आदनानम्. खीरा नपुसम्. इम्ली यम्लिका, चिञ्चा, तिन्तिही. मण्डम. दादिमफलम् , दष्टिमम् सरसों सर्पपः, तन्तुमा नारंगी नारङ्गः, नागरगः, नादेयी, शस्यम्. नारङ्गफलम्, भूमिजम्बुका ज्वार जुर्णली. लोकाट वारा अणुः, प्रियाः अगर काँगनी पिन्नी फ क्षीरिकाफलम् . केला की . भात मायार,, - माद अनार मका लवकटम्, कोमलवलकला. द्राक्षा, मृद्धीका.

[६] द्वादशोऽध्यायः। भोजन इत्यादि का वर्णन-भाजनपदार्थविशेषाः । खरबूजे Re- सरयूज हिन्दी। संस्कृत । " संस्कृत। आलू मूली मलिका, काथली. आलुका-कम. रताल्लू यगन वृन्ताकम् . फसेरू फमेगा. गाजर गृजमम् . ककड़ी कर्फटिफा. | मिर्च मरांवम् , फलकम्. बनकरले धिर्मतिका. ककोई, ककॉटकम् , कुहमला, सरम्बुजम्, कालिकम् ,क-कचनार काञ्चनारोद्भवाः फलिफा. लिङ्गकम्. की कली फाशीफल कप्माण्डम्, ककार: जमीकन्द सूरणकम् . फालसे । करेले कारयेल्लम् . कद्दू तुम्थी. तोरी कोशातकी, दोघफला. मेथी का मेधिका शाकम्. थुआ धास्तुका. साग भिंडी नारी का घड़हल नाड़िकाशाकम्. लकुचा-चम्. साग घुय्या आरपीफा: पाल्फ पालफ्या. सिम्विः. चालाई । मेघनाद. गोभी गोजिहा. कुलथी. जंभौरानीबू अम्योरम्. सन्द चित्रफलम्. | फड़ी काथली, कथिता. कपित्थः, दधिस्थः दधिफल पड़ी माधवटी. सिंघाड़े काटा. मंगौरी मुनयटी, मापरली. प्याज पलाण्डः, सुकन्दका. घटकाः लहसन कॉजी के टिण्डे डिण्डिसम् . फाञ्जिकवटकाः. फर्मरक्ष:-क्षम् . गुफखजूरः. जम्धुः-यु (सो)जम्बुफलम्। जामुन जाम्वधम् . धादाम वादामम्. भिण्डिका. M . य लगुनम्, रसोनका. छुहारे व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [६] भोजन इत्यादि का वर्णन-भोजनपदार्थविशपः । हिन्दी संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। अखरोट अोट-टम्. मुरव्या रागसाण्डव'. दाख शुष्कद्राक्षा, गौस्तनी. चिलुआ चिदम्. गोला नारिकेलफलम. सन्धितम्, सन्धानम्, स आचार चिरौंजी सरस्कन्धा. न्धितद्रव्यम्. चिलगोजा पद्मवीजाभम् पानीयफलम् चटनी अवलेहः, मखाने निकुचः-चम्. शकरपारे शरा-पाल.-पालिका. मसाले वेसवार.. मठरी मण्ठः. पापट पर्पटा. सैमई सयिकाः मती भरता. भाँग मातुलानी, भङ्गा. परामठा पोलिफा. दुग्धम्, पयः [न क्षारम् पूरी पूलिका, गुप्फुली.. खीर पायसम्. रोटी करपट्टिका. दही दधि [न०] बाटी अङ्गारकर्कटी. तक्रम्. घेढ़ई घेढमिका; मापगर्भा. घी सर्पिः [न०] भाज्यम्, घृतम्। पन्ना पानकम्. तेल तला, अनाज्यम. सिखरन | शिखरणी. पेड़ा पेडा, पीडिका. लोनी, बरफी, चक्रिका. नवनीतम् , हेयायीनम् -- बरफी मक्खन मोदक सत्तू सफ्तु'. फैिनी फेनिका. बोहरी धाना. अलेयी चिरचा पृथुका कुण्डलिका. इमरती खीले लाजा, भर्जितघ्रोहयः खजला साजा. होरा होलका घालूसाई । मिष्टमण्ठ . गरम सौरभम्.. लपसी मसाला लप्सिका. साठी हलुआ पछिका. चावल मालपूआ | मलपूपः, पूषसम्. ५ ArA-NAMA मन [१८] द्वादशोऽयायः। भोजन इत्यादि का वर्णन भोजनपदार्थविधपः । दिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्छत । गंझा संयायकमः रसोईया सूद, पाचका, सूपकारः अचार उपसणाति-णीने, गुलायजा दुग्धपपिका. सालना सं-पधाति, धने. घघर घृतपूरः राधना रण्यति. रायता दाधेयम्. उचालना उत्फथति, पचनि, भाति. ताहरी तापहरी. सूसना, गुप्यति, शोपंयाति, खिचड़ी एशरा. मुपाना शोषयति. तोड़ना भनक्ति, सण्डयति. पोदीना अजगन्धः लिसमा लिग्पति. दाकार, पार्करा, सिता, समषि. यि स्मरति, स्मृतेः पराते, भूलना बूरा कार.. प्रापयति. गप्ता पशुकाण्डम्, भु, रसालापफना पचति. अँदरसे इन्दुरसा पकाना पाचयति. शहद मधु नि.] शौद्रम् सारयम्, हिन्दी। संस्कृत। अन्नही मनुष्यों का ज्यादह भोजन का धान्यमयाधिको भोजनांशी मनुष्या- हिस्सा है. णाम्. अलों को सुनो-गह, जौ, चना, मटर, | धान्यानि शृणु-गोधूमो यपधणको ब- साठी चापल, चावल, मका, ज्वार, तुलः [कलाय:] पष्ठिका, अक्षतः पाजरा, लोभिया, फांगनी वगैरह शस्यं जुर्णली, प्रियगुः शिविका होते हैं। इनमें चापल और करित्यादीनि सन्ति । एयक्ष अक्सर धनधानों का भोजन है तगाधूमी प्रायो धनिनां भोजनमा और सय साधारण लोगों का. जिनको दाल स्नाई जाती हैं उन माजों येषां द्विदला खाद्यते तेषां धान्यानो के नाम भी कृपा कर आप कई, नामान्यपि कृपया हृषन्तु भवन्तः न्यदखिलं सामान्यानाम् ।

व्यावहारिफसस्कृतप्रयोधः। ww भोजन इत्यादि का वर्णन--भोजनपदार्थविशेषः । 1 . हिन्दी। संस्कृत। मटर, अरहर, मसूर, उरद, मूंग, मोट, तुघरी, माढको, मसूगेमापो मुझकोम. चना धगैरह की घुली दाल और सतू फुधश्चणक इत्यादीनां काञ्चनसूपं म. री दाल भी अफ्सर मनुष्य खाते है. तुपांदिलाचापि प्रायोजना सार्वति. फ्या फोदी भी मनुष्य साते हैं 1 नहीं. किं फोद्रवमपि मनुष्याः नादन्ति । म. तिल.का जाड़ों में सरसों फा| तिलस्य तैलं शिशिरे, सपंपस्य प्रीष्म गरमी में हितकारी होता है, पथ्यम्भवति. शाग कितनी तरह हैं उनके नामभी फतिविधाः शाकास्नेपां नामान्यपि- पर्णन फरो. यर्णयतु. भालू, अरची, ककड़ी, काशीफल कद्दू, आलुका,मारवीकाः,कर्कटिका, कूष्मा- मेथी, नारी फासाग, पालक, चौ ण्ड,तुम्बी,मेथिका,नाडिका,पालफ्या, .लाई, कुलफा, परवर, प्याज, टिण्डे मेघनादः, फुलथी, पटोलकं, पलाप मूली, बैंगन गाजर, ककोड़ा वधुया डिण्डिसं, मूलिका, वृन्ताकं, गृअनं, कचनारकी कली, जमीकन्द, करेले फफाँटक, पास्तुका फाञ्चनारोद्भवाः तोरई, गोभी इत्यादि बहुतसे शाग फलिका,सूरणफं,फारवेलं,कोशातकी गोजिहत्यादयो बहवः शाकाः सन्ति. हरी मिर्च और करीदों में राई जरूर हरिन्मरीचपु फरमर्दकेषु च राजिकाम- डालो. घश्यं प्रक्षिप। दो पैसे का आचार ले आमो. द्वयोस्ताम्रखण्डयो सन्धितद्रव्यमानय! इस साल तुमने भाम का अचार डा. अस्मिन्य त्वयानस्य सन्धित सन्धाले ला या नहीं। डाला तो है. (उपस्कृतं ) नवा । सन्धातन्तु. अब आप फलों को बयान करें. अधुना फलान्याख्यान्तु भवन्तः । अच्छा। गिनो, आम, जंभीरा, पैर, वरम् । गणय, आम्रो जम्बीरः कर्फन्धू- सैद, पिजीरा, शदत्त, फेला, कैत, धित्रफलं, योजप्रस्तूतं कदली. अनार, नारंगी, इम्ली, अंगूर, कसे फलं, कपित्थोदाडिमो, नारङ्गः अ. स, खिन्नी, फूट, तरबूज, खीरा, म्लिकाफलं द्राक्षा कसेरा,क्षीरिया सिंघाड़े जामन इत्यादि यहुत से चिटिका,तरम्बुजं, पुसं,झाटो होते हैं. जम्बूफलमित्यादीनि बहनि सन्ति। होते है.

[७] द्वादशोऽध्यायः। भोजन इत्यादि का वर्णन-भोजनपदार्थविशेषः । K हिन्दी। संस्कृत। हे रसोईये जी आज तो कहीं से तोड़ सूपकाराध दिने तु कुतोऽपि समस्त सहित दही या मटठा लाकर करें। दधि तक्रं चानीय कधितां कुरु । करो। अच्छा. चरम. कल तने षया रांधा था ? ह्यः (गतेहि) त्वया कि रविधतम् ? मंगोगे और उरदी. मुद्घटयो मापरङ्ग्यश्च. कल तो दही के बड़े और कांजी के वस्तु दधिवट कान् काक्षिकवटका यड़े करो। जो आज्ञा. न्युरु। यथाशा. धोया दाल और शाग के लिये मसा- सूपार्थ शाकार्थञ्च चेसवारे पिण्ढोत्या. ला पीसो पेसी आशा नीकर को ज्ञापयति भृत्य सूद:- रसोईया देता है. दो आने के पापड लाओ. द्वयोराणकयोः पटानानय, अंगन का भी अच्छा. हितकारी और यन्ताकस्य भारताशोभन (सुस्वादु) पथ्यं शीतलच भवति. और भी खाने की चीजों के नाम ] अन्येपामपि भोज्यपदार्थानां नामानि धताओ. महि. परामठे, पूरी, रोटी, पाटी, मठरी ता- | पोलिका, शुप्पली, करपट्टिका अङ्ग- हरी, खिचड़ी कचौड़ी इत्यादि. गारकर्फटो, मण्ठः, तापहरी, शरा, घेढामफेत्यादीनि. भय मिशानों को भी कहो. अधुना मिष्ठान्नान्यपि फधय, कैनी, अन्दरसे, अलेयो इमती, | मोदकः फोनका, इन्दुरसाः, कुण्डलि. खीर, लप्सी [हलुभा], मालपुआ, काः पायस, खाजा, लप्सिका,माल. झा, गुलायजामन, घेवर, शकर, पूपः, संयावः दुग्धपिकाः, घृत. पूरा गुड पड़ा यरफी इत्यादि पदा. पूरः, शर्करागुडः पीडिकाचकिके. त्यादिपदार्थाः सन्ति. शकर वगैरह ख के गनों से पैदा शरादय रक्षुफाडम्य उत्पद्यन्ते. होती है. उण्डा होता है.

[७२] व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः । भोजन इत्यादि का वर्णन-भोजनपदार्थविशेपः । हिन्दी। संस्कृत। सैमई घी और शकर से होगरिष्ट नहीं सेविकाः सपिपाशरेवागरिठा. होतो इनके पिना गरिए होती है. भ्यथा गरिष्ठाः. हे मा! इस फटोरे में मुझको कुछ अस्मिश्चपके मां फिश्चिदुग्धं देहि दूध दे । देती घेटा. मातः । ददामि बरस. अब दिये जाने वाले पदार्थ सुनो।पना, पेयपदार्थान् शृणु। पानकं, सफ्तुः, सत्तू, शिखरन, दूध वगैरहः. शिखरिणी दुग्धमित्यादयः. दो पैसे का दूध मोटा लामो. सरार्फरंदुग्धमानय द्वयोस्ताम्रखण्डयो लौनी, शहद, चटनी बगेरह लेध प-नवनीतं, क्षाद, अवलेह इत्यादयो- .दार्थ है. लेह्यां. चायने योग्य पदार्थ जैसे वोहरी, खील घायथा धानाः, लाजाः, पृथुकाः, चिस्या, होले, भुनेचने, चिलया होलकाः, भ्रष्टचणकाः, चिर्भटपभृ- इत्यादि है. तय सन्ति. अब सूपे फलों को वर्णन करूंगा. अथ चनानि फोऽर्थः शुष्कफलानि पर्णयिन्ये, छुहारे, पादाम, अखरोट, किशमिश, शुष्कसर्जूरः, बादाम, अक्षौर गोस्तनी गोला, धगरह होते है. नारिकेलफलमित्यादीनि सन्ति. ऊपर काही चीज़ा मैसे आधा २ सेर उपरोक्तवर्धमध सेटकं विधाहप्रद. संजोये के लिये खरीद लो. शिन्यै फ्रीणीहि. यह फल कन्या है इसको न तोड़ो. शलाद्विदं फलं मामिभ्येनत्. आज फल कौन २ से शाक बाज़ार में अपत्ये कनिकानि शाकानि विपणी- मिलते है । धैगन गैरह बहुत से. मिलन्ति । वृत्ताकादीनिवहनि । इन फलों के नाम किसी कागज पर पतेषां फलानां नामानि फमिश्चित्पन. लिख कर मुझे दे दो नहीं तो मैं लिखित्यामां देवन्यथाहं विसरि- ध्यामि। । भूल जाऊंगा.

+MANAJI NAN याप याया मा प्रयोदशोऽध्यायः। तेरहवां अध्याय--प्रयोदशोऽध्यायः । सम्बन्ध जनानेवाले शब्दों का वर्णन-सम्बन्धयोतकाः शब्दाः । हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृन । पिता, जनका. पितामहः. माता, जननी, अम्या. परवाया प्रपितामहः. बेटा पुषः, सूनुः, आत्मनः वृद्ध पर- वृयमपितामह घटी पुत्री, आत्मजा, दुहिता. घाया भाई माता, सहोदरः, अग्रजः- साडू पत्नीभगिनीपतिः. अनुजा. धचता दौहित्रः. भतीजा भ्रातृजाम्रातृव्या. जमाई जामाता, दुहितृपतिः. यहिन भगिनी, स्यसा. यहनाई भगिनीपतिः, आबुला. फआ पितृस्पसा. देघर देघर, देघा (देव) (पुं०). काटा । पैतृप्यनेयः. धौरानी मामा मातुला, मामा. जिठानी यात (स्त्री) कावेटा मातुलेया. जेठ ज्येष्ठः, परमजा. भानजा भागिनेय, स्वनेया. पितृष्यः. भाया, पक्षी, जाया, यधूः नाऊ कलत्रम्. पिसृतः, ज्येष्ठपिता. पनि पतिः, भर्ता, धधः, कान्सः. सान्दान बंशः, अन्वयः, गो- 'श्रम्, सन्ततिः, अन्ययायः साला याला. पुषयधू पुत्रवधूः, स्नुपा. पोता, गाती नशा, पौन. ससुर श्वसुरः परनाती मौसी मासूयसा. परपाता मनसा, प्रपौत्रा. फापेटामायनेया. सगाई चारपदानविधिः मातामहः प्रमातामहः. विधाहः, उदाहः, परिणया. वृउपर द्रव्य, सामग्री, घस्नान पृर ममाताम: असयाथ गृहोपस्कर, चाचा - " 14 सास A श्यतः (स्मो). नाना परनाना ध्याह योझा, व्यायहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [७३ सम्बन्ध जनानेवाले शब्दों का वर्णन-सम्बन्धद्योतकाः शब्दाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी संस्कृत। व्याक- परिणयति, उद्वहति, उप. बोझाला. भारन्यस्यति, निदधाति,भा. यच्छते. रेणपाडयति, भारमारो- दना पयति भाराकान्तंकरोति. भजना,से- भजति-ते घनफरना ਨੋਦ शेते, अभ्यास्ते. रना हिन्दी। संस्कृत। तुम्हारे पिता कहां है? तय पिता कुत्रास्ति? चतो लाहौर ई. ते तु लयपुरे वतन्ते. तुम भाई हो ? पाँच कति भ्रातरी यूयम् ? पञ्च. तुम्हारी यहन कासम्बन्ध फहां हुआ? तय भगिन्या: सम्पन्धः कुत्राभूत् ? पटना शहर मे. पाटलिपुभनाम्नि नगरे. मेरे भाईके तीन पेटी हैं उनमें से एक मम भ्रातः तिनः पुत्र्याः सन्ति ता- तो लपनऊ व्याही है दूसरी अ. सामेका तु लक्ष्मणपुरे परिणीता ल्मोड़ा शहर में और तीसरी की द्वितीया स्वल्मोड़नगरे तृतीयाया सगाई काशी में हुई है. पाक्प्रदानविधिाराणस्यामभूत्. मा प्यूचियों से पुध को दूध पिलाती है । माता स्तनाभ्यां पुत्रं दुग्धं पाययति. मेरी एक फूमा, पांच फुफेरे भाई मौका पितृवसा पञ्चपैतृष्वज्ञेयाश्च. और चार भानजे दिल्ली में रहते हैं. स्वागेभागिनेयाश्वेन्द्रप्रस्थे निवसान्त. तुम्हारा मामा फिसनाम फा है? श. किन्नामा तव मातुलः शम्भुदत्तः. मुदत्त. मेरे दो मामाके लड़के लक्ष्मी प्रमाद मम छौ मातुलेया लक्ष्मीप्रसादयुगल- और जुगल किशोर है. किशोराविति. तुम्हारी स्त्री का कैसा सभाव है ? कीहशी प्रतिस्तच भार्यायाः ? सु- यहुत तारीफकलायक. लाध्या. रामसेवक की स्त्रीतोकुलदा है ऐसा रामसेवकस्य आया तु कुलटेति श्रूयते. मुना गया है.

खुलासा कहिये. लटा. खत. मौसी, [७४] प्रयोदशोऽध्यायः। सम्बन्ध जाननेवाले शब्दों का वर्णन–सम्बन्धद्योतका शब्दाः । कुलटा शब्दको मने नहीं जाना इससे कुलटाशन्दमहं नाशासिपमतो, जो अपने पति को छोड़ जारको भजे. या पति हित्वा जारम्भजति सैव कु- घही फुलटा है. तुम्हारे कोई साला है? कोई भी नहीं अस्ति फश्चिच्छयालस्तव । न कोऽपि, सुसरके सान्वान में तो बहुत है परन्तु श्वसुरान्वयाये तु वहवस्सन्ति पर कोई पास अपना नहीं है। मेरी न फोपि स्वकीयः । मम भ्यश्रस्तु सासतो जीती हैं. जीवति. अन्येषा सम्बन्धानां नामान्यपि लि- और भी रिश्तों के नाम लिखिये. अच्छा सुनो. वरम् रणु. मातृप्यसा, मातृप्वस्नेयः पत्नीभगिनी- मौसेराभाई, साडू, धेयता, पतिः दोहित्रः जामाता, भगिनी- जाई, यहनाई, देवर, पतोह वी- पतिः, देवरः स्नुषा, याता, ज्येष्ठः, रानी चाजिठानी, जेठ, चाची ताऊ, पितृव्यः, ज्येष्टपिसा, नमान्दा पौत्रः ननद, पोता, परपोता नाती, नाना, प्रपौत्रःमता मातामहः प्रमातामहः परनाना, पृय परनाना, याबा, पर- चप्रमातामहः पितामहः प्रपिता. धावा, वृय परवाया, गैरद है. महःखप्रपितामह इत्यादीनि सन्ति। स्त्री पुरुष "दम्पती" और "जम्पती" कहलाते हैं. स्त्रीपुरपी दम्पती जम्पतीति शम्ोते. दमदोनों जीले भाई हैं. मायां यमजी म्रातरी. मम पिताधुना द्वितीयांत्रियमुद्रक्ष्यति मेरेपिता अय दूसरी स्त्री व्याहंगे. (परिणेष्यति.) पहा आपकी पतोह है इसलिये यहां | तत्र भवदीया स्नुपाध्यास्ते ऽतस्तनमा न जाइये. व्यादों में सरचीने उकष्टों या ऊँटों में | विवाहसमये परतुजानं शकटेषु उट्रेषु लादी जाती है. या भारत्वेन न्यस्यते. उसका घेटा, भतीजा और ममेराभाई तस्य पुत्रा, भातृजः, मातुलेपश्च लष- लाहौर कालेज में अपनी पढ़ते हैं. पुराविद्यालयेऽऽङ्गलभाषामधीते. गच्छतु. - अर्यः. व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [७५] चौदहवां अध्याय-चतुर्दशोऽध्यायः । जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत हिन्दी संस्कृत। भूसुर,वाडवः, विप्रः, अन- यशकते. प्राह्मण जन्मा (पुं०) द्विजः. यायका. वाला क्षमी क्षत्रियः साफल्य वैश्यः, विट (पुं०) ऊरजः, देवान्न घेश्य हव्यम् . पिच्यन्न कन्यम् . शुद्रः, यूपलः, पादज, जा राजन्यः, मण्डलेश्वरः, स- घन्यजः, अन्त्यजा, महाराजा नाट्. विपश्चित् , कोविदः, घुधः, विद्यान्न पण्डितः. मन्त्री [पुं०], सचिवः अ- दीवान मात्यः वेदाध्यायी, थोत्रियः, छा- चौड़ी- प्रतिहारः, द्वारपालः चेत्र- प्रेदपाठी न्दूस:- घान् पञ्चुकी. उपाध्यायः,अध्यापका, था. पढ़ानेपाला खोजा पण्ड, शण्ढः. चार्य: रिपुः, वैरी, (पुं०] अरिः, दुश्मन मतु, मसः यशा, सपा, रानुः, छिट् या अध्वर:. चयस्या, स्निग्धः, मित्रम्, मित्र पुरोदित पुरोधाः [२] पुरोहितः. सुहृत् . शाचमन उपस्पर्शः आचमनम् . दूत दूत, सन्देशहर: पूजा पूजा, सपर्या अर्चा, नमस्या. गुप्तत चर, स्पशा गुप्तदूतः, समज्या, संसत्, सभा, रस्तेगीर पान्धः, पधिका. सभा गोष्ठी, परिपत् [स्त्री]. भेट उपायनम् , बलिः, उपहारः. सदस्या, सभ्याः, सामा- परिणयः, उदाहः, पाणि- सभासद जिफा. विवाह पीडनम्. ज्योतिषी देवशः, गणकः, ज्योतिर्विद दहेज योतकम्, यौतुकम्. उपवासः, उपोषणम्,मतम् स्त्रीप्रसंग व्यवाया, प्राम्यधर्मः, मैथु. नियमः -नम्. घर, मत [७६ AN चतुर्दशोऽध्यायः। जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत। शूरः पारस घूस उरकोचा, उपायनम. चौर चमरम्, चामरम् .. फौज सेना, पृतना, चम्बलम् । राजासन नपासनम्, सिंहासनम्. कुणपशयम. सोने की मरघटा दमशानम् , पितृधनम् . भृङ्गारः, कनफालुका. शारी छुरी छुरी, छुरिका. युवम्, यायोधनम्, समरः, मोगरा सुदर संग्राम मृधः डिरा, छा. निवेश, शिविरम् . किला दुर्गम्, कोटः, फोरि. पनो पहरा सजनम्, उपरक्षणम् . दाधीका. मदः, दानम्. तलवार असिः, खड्गः मद चर्म न०) हाथी फो. फुयम् (भियु). घव,[roJधापा, शराशन पन्द्रका घिघाट चिरफार:. घहियन्त्रम् नालिफायन्त्रम्.., गले । गण्ड', फटा, कपोलः, तोप भारम्,इपुन, मागंणा हथिनी फरिणी, धनुषा, शा. तरफस पुथिः, तूणीरः, निप, भाषाश अकुवा सृणिः पन्दीगृह, फारागृहमार. पाजी, [.) पाहा, हयः, घोडा सामा प्रप्रहः. अश्या मौत मृत्युः, निघता, पञ्चरयम्, घोड़ी अश्या, षड्या, घामो. मरणम्, घोड़ी की हषा, पा. जनुः नि०] जननम् , जन्म हिनदिनार (म03 फोड़ा धर्म [न. कपाशिरस्त्रम् लगाम फयिका, सलीना इस्त्री. परतर शीपंण्यम् . रथा, स्पन्दना, शतमः, कूपर युगन्धर याण जन्म भाटा पत्तिः, पदातिः पदमः, , साहूकार | उत्तमणः. घसूली व्यावहारिकसंस्हतग्रयोधः। [७७] जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। उधार उद्धार,ऋणम्, पर्युदञ्चनम् स्वर्णकार, फलादः रुक्म- मुनार । यदला परिवर्तः, चिनिमयः. फारकः. जिस याचितकम्. कसोटी शाणः, निफपः, कपः भूग [सोना पकाने का पात्र]. फर्जदार अघमर्ण:. लुहार लोहकारः अयम्कार. रोजगार जीपिका, वृत्तिः आजीवः धोकनी भस्त्रा, चर्मप्रसेविका इतिः ध्यापार याणिज्यम्, [पु.]. वित्तम्, क्यम्, घसु, राज लेपका,सुधाजीवी,पलगण्ड द्रविणम् , अर्थः. टक, पापाणदारणः, धरोहर . उपनिधिः, न्यासः. घोवी रजक, निर्णजया. परप्यूनिया पूर्णविता (पु०) इस्त्री अयायन्नम्. प्रसवः म्यूत कुम्मकार, कुलाल.. योरा चाफ चक्रम्. मुतली सूत्रम्, तन्तु पाकपुटी, आपाका हलवाई आपूपिका, भक्ष्यकारः चितेरे काम शिल्पी. यस्त्रधिकेता-विकी [०] माली पजाज मालाकारः मालफा. अत्तार औपधिधिफ्रेता-घिसायी मनिहार | पाचककणयिफ्रेता. अर्धप्रयोगः, कुसीदम्, पृ. चूड़ी फाचवलयम् फरणम् कट- व्याज दिजीयिका. कम्. पैसा पण, तानपण्डम् न्यारिया द्रावकः रूपया रूपका रजतमुद्रा, হাদী स्वर्णमुद्रा, दीनार: भार भजनयन्यम् अठनी रुपकार्धम् रंगरेज रसका यस्नरागसत् [पुं०] चौगनी चमार चतुराणकर चर्मकार: पादूकत् पुं० दुअनी आणफयम् रापी भारा, धर्मप्रमदिफा. फायस्थः. पटीफ शाकधिोता गान्ह शाणपुरः गोणी. अधा , भरभूजा / भर्जकः कायध 1 सृट, तपः,पिपासा. कान का [७८] चतुर्दशोऽध्यायः । जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेषाः।. हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। कंपावना- सरोता सकुला. कङ्कतकृत् नवाला तमोली ताम्बूलिका शिकलगर शस्त्रमार्जकः,असिधायकः कहार जलवाद, उदाहः पखवाजी | मादनिकाः, मौरजिफाः पहगी जलानयनयन्त्रम् कत्थक चारणः, कुशीलयः प्याऊ पानीयशालिका, प्रपा. सितारिया घोणावादाः, चैणिकाः प्यास याजा वादनम्, वाघम् तृपितः पिपासितः सितार वीणा, चल्लकी, चिपश्ची तली तैलिफः तैली [पुं०] चांसरी घंशी घेणुः फोल्ह तैलपेपणी मृदग मृदा मुरजा दोल आनका, पटह: मैलनि- कर्णमल निस्सारयिता नगारा दुन्दुभिः फालन- डॉडी डिण्डिमः घाला तुर तूपम्, तूरी. शॉण्डी, मण्डहारकः सुरा फलाल मांसविक्रेता, मासिका,धै- जीवी, शौण्डिका कसाई तसिफा मदिरा, मुरा, मधम्. धुना तूलमार्जकः शरायघर | गुण्डापानम्, मदस्यानम् ज्याला यहुरूपिया यहुरूपधारी-धारका चपका पानपानम् सूचिकः सौचिकः सूचि- छपी घरममुद्रका फर्मा [पुं०] मल्लाह नाविकः कर्णधार फतरी-रिका, छेदनी आरा प्राकचा, करपत्रम् जुलाया तक्षकासुत्रधारः, रथकार। तन्तुवापः, पटकार: (कोली) स्थपतिः, चकित, नापितः, क्षारिका, मेड़ नाई मुण्डी फिसान कृपकः कृषीवला, हालिका पती कृपी. शराव दर्जी पढई मेधिः मेथिः [पुन उस्तरा व्यावहारिकसंस्कृतमयोधः। [७९] जाति इत्यादि का वर्णन-ज्ञातिविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। कैतवम्, करना . सत वमः, केदारः, क्षेत्र. जूआ पण, अक्षवती. पैना तोदनम्, प्राजनम्, तोत्रम्, नचर्कया नर्तकः, लासका टोकराव. घूरा अवकरनिकरः चैणवः, चैदलकार: नानेवाला कृढ़ा अबकरः, सकरः महतर ध्यपच, संमार्जका यशकरना यजति नटः, शैलाली,शलूपः, जा- पूजाको अचयति, पूजयति. याजीयः आचमन- उपस्पृशति, आचामति, कंजर अन्त्यजा: ठण्डाहोना शाम्यति इत्यादि गवारया भूनना भर्जयति. अजाजीव: जावाला, आये- चिडीमार | जीवान्तकः, शाकुनिकः दीव्यति लना जालिया पागरिका, जालिका पैनाना, नीफर पैनवाना उत्तजयति. | होशियार चतुरः,पेशलः, पटुः, दक्षः बजाना वादयति-ते मृगयुःलुब्धका मृगवधा-घजना रणति, फणति, विरोति. व्याघ जीयः गायति । फूजति, रीति शिकारी [पक्षिणां] विश्वकट्ठः, फोलेयका हजामत- फुत्ता, मुण्डयति, आयपति घर घनाना शियार डीडी मृगव्यम्। आपेटः मृगया घोषयति. चोर स्तेना,दस्युः,तस्करः,मोपयः पिटना चोरी स्तैन्यम्, स्नेयम् चौर्यम् योना यपति--ते प्रतिमानम्, प्रतिविम्यम् , प्रतियच्छति, यिनि-मे-ते। प्रतिमा सौचना प्रतिशतिः, प्रतिनिधिः पाइल कर्पति ज्यारी फितयः, भक्षतः पास अक्षा, देयन', पाशकः जोतना भृतका, भृत्यः, वैतनिकः . गाना पकरा [७८ ] चतुर्दशोऽध्यायः जाति इत्यादि का वर्णन-ज्ञातिविशेपाः!. सुट्, तपः,पिपासा. दोल हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। कघाचना- सरीता सकुला. कङ्कतहत् नेवाला तमोली ताम्बूलिका शिकलगर शस्त्रमार्जकः, असिधावकः कहार जलवाह, उदवाहा पखवाजी | मादनिकाः, मौरजिकाः Jहगी जलानयनयन्त्रम् कत्थक चारणा, कुशीलयः प्याऊ पानोयशालिका, प्रपा. सितारिया घोणावादार, पणिकाः प्यास याजा घादनम्, बाधम् प्यासा तृपितः पिपासितः सितार चीणा, चल्लकी, विपञ्ची तेली तलिफा तेली [] घांसरी घंशी घेणुः कोल्ह तेलपेषणी मृदग मृदह मुरजः कानफा आनफा, मैलनि-कर्णमल निस्सारयिता नगारा दुन्दुभिः फालन- डॉडी डिण्डिमः घाला तूर्यम्, तूरी. शॉण्डो, मण्डहारफः सुरा फलाल मांसपिता, मांसिका, धै. जीवो, शौण्डिका फसाई तसिकः शराव मादरा, सुरा, मघम्. धुना तूलमार्जरुः शरायचर शुण्डापानम् , मदस्यानम् प्याला यहुरूपिया बहुरूपधारी-धारका चपफा पानपावम् सूचिकः साचिकः सूचि- छपी घस्त्रमुद्रका दर्जी फर्मा [पुं०] मल्लाह नाविफः कंधारा बैंची कतरी-रिका, छेदनी भारा कचः, करपत्रम् जुलाया- तक्षका सूत्रधार, स्थकारः (काली) तन्तुचापः, पटकार: स्थपतिः, कि, नाई नापिता, क्षारिषः, क्षुरिः, मेढ़ मुण्डी किसान एपका रुपीवल:, हालिका उस्तरा क्षुर कृपी. तुरी यई मेधिः मेधिः पुं०] रोती [७] व्यावहारिफसंस्कृतप्रबोधः । जाति इत्यादि का वर्णन-ज्ञातिविशेपाः । ज्वपचर 4 हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत सेत चमः, केदारः, क्षेत्रं. जूआ कैतवम्, पणः, भक्षवती. (पैना तोदनम्, प्राजनम्, तोत्रम्, नचकैया नर्तकः, लासकः टोकरावा अवकरनिकरः নানা श्रेणया, चैदलकार कूड़ा अवकरः, सकर: महतर संमार्जका यज्ञकरना यजति नटः, शैलाली, शलूपः,जा- पूजाफर्ना अचयति, पूजयति. याजीवः आचमन- उपस्पृशति, आचामति, (कंजर फरना अन्त्यजा: इत्यादि उण्डाहोना शाम्यति गड़रिया जावाला, अजाजीचः भूनना भर्जयति. चिडीमार जीयान्तकः, शाकुनिका गंगाखे- दीव्यति जालिया यागुरिका, जालिका पैनाना, - भूतकः, भृत्यः, वैतनिका होशियार चतुर, पेशलः, पटुः, वक्षः बजाना वादयति-ते मृगयुः लुब्धकः मृगवधा-धजना घ्याध रणति, फणति, विरोति. जीप: गायति । कूजति, रीति शिफारी [पक्षिण] विश्वकद्रुः, फौलेयक हजामत- मुण्दयत्ति, आवपति वर्करः यनाना शिकार मृगव्यम् ,आपेटः मृगया डीडी घोषयति. चौर रोग दस्युः तस्करः,मोप- पिटना चोरां स्तैन्यम्, स्तेयम् चौर्यम् योना घपति--ते प्रतिमानम्, प्रतिविम्यम् , यदलना प्रतियच्छति, विनि-मे-ते । प्रतिमा प्रतिकतिः, प्रतिनिधिः सोचना उपारी फितवः, अक्षतः याद्दल फर्पति पासे अक्षा, देवनः, पाराका जोतना पैनवाना उत्जयति. . यकरा [८०] चतुर्दशोऽध्यायः। जाति इत्यादि का वर्णन - ज्ञातिविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। काटना धात, छिनत्ति, धन्तलि, लु. रूप-आकार-रिदधाति । बनाना नाति-ते गोली आग्नेयास्त्रमुशांत, शरंमु.दरांत से दानण छिनत्ति मारना शांत अस्थांता काटना घिराना विगांत, विरापयति , ओर से प्रकचेन-करपत्रण-पृणाति पालासे पभ्या-पाडयात-शामार- चोरना दाग्यति पाटपति,छिनत्ति कुचलना भ्यते, मर्दयनि हस्तरी चिकणयति । याक समापतिति, उपांतष्ठति फरना देना तं, घटते, सम्पद्यते हिन्दी। संस्कृत। चार जानि ग्रामण, क्षत्री, वैश्य और चत्वारोवणीः वाहणः क्षत्रियः पश्यः प्रस्थ सन्यासधा - चार आश्रम हैं ब्रह्मचर्य, गृहरण, पान- | आश्रमाक्षयारो बचोगाईस्यावान नथ और सन्यास. न्यायज्ञाननेवाला नैयायिक, मीमांसा न्यायवेसा नैयायिका मोमानांशोमीमा जाननेवाला मीमान्मस, वेदान्त न्सकावेदान्तवायेदान्ती, घंदाध्यायी जाननेवालाघेदान्तो, वेद पढ़नेवाला श्रोत्रियः साङ्ख्यझा कापिल इत्यु थोत्रिय सांस्य जाननेयालाकापिल च्यते. ऐसा कहा जाता है. गंगा जमनाक घोच मधीमान् श्रीधर- | धीमच्ट्रोधराभिधेयाण्डितोऽतीयवि. माम के पण्डित अत्यन्ताद्वान् है. मान् गगायमुनयोमध्ये वर्तते. ग्राहप्पो छः फर्म सुनेजातहैं ये कान ! विप्राणां पदकमाणि धूयन्ते तानिकानि सन्ति. याईफरना, पढ़ना, दानदेना, यज्ञकराना ज्याध्ययनदानानि यार्जना पदोना और तसही दानलेना इन प्रतिग्रहश्य तैयुक्तः पटकविप्रः- धर्मोम युक्त छः फर्मघाला ब्राह्मण च्यते. कहलाता ६.

[८१ ]. व्यापारिकसंस्कृतमयोधः। जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेषाः । यज. हिन्दी। संस्कृत। जिस तरह यह यज्ञकरनेवाला पत्र यथायं पायजूकोयजति तथा त्वमपि करता तैसे तुम भी यज्ञकरो. पेववत देवताओं की पूजा करता है. घेवदत्तो ऐचानचंयति. मकलोग अपने इएदेवों की पूजाक- भकाः खेएवेचानो सपया कुर्वन्ति । रते है. पांच महायह कौन से हैं? पच महायशाः। उनको ती पहिले अध्याय में देखलो. तोस्तु प्रथमेऽध्याये पक्ष्य. जगत् का कारण शून्य है ऐसा मान- जगत्कारणं शून्यमिति मन्तारोनास्तिका नेवाले मास्तिक होते है. सभा काही दूसरा नाम गोष्ठी है. सभाया पव द्वितीयं नाम गोष्ठी. जो तुम व्याकरण जानते हो तो इसका यदित्य चैयाकरणोऽसितहास्याक्षरार्थ अक्षरार्धकरो. कुरु. अच्छा ! गो अर्थात् अमेक पाणी जहां ! घरम् ! गायोऽनेफावाचस्तिष्ठन्त्यस्यां पर हो यह गोष्ठी है. सा गोष्टी. अग्निद्वारा देवताओंके लिये जो अन्न- अग्निमुखेन देवेभ्यायदसंदीयतेतन्यम्, दिया जाता है यह हव्य होता है. ब्राह्मण मुरा से पितृलोकों को दिया- विममुखेन पितृभ्योधीयमानमकन्य- हुआ अन्न कव्य ऐसा फहाजाता है. मित्युच्यते. हे रोक लिये और गुरु के लिये धन्योलल्य सस्था देखि. पमेशा अभ्युत्थान दो. न्हानेसे पहिले और भोजन से पीछे । स्तानात्मार भोजनान्तरञ्चोपस्पृशेर आचमन फरे. पाने के वक्त चुप होकर रहे. भोजनावसरे मौनमेवासिष्टत. उपवास और दूसरे प्रत भी बालक उपोपणमन्यान्यपि प्रतानि चालवृद्धा- बूढ़े और आतुर मुसीयत जिदा] तुरान्विनोक्तानि. फो छोड़फर कहे हैं.

[२] चतुर्दशोऽध्यायः। जाति इत्यादि का वर्णन-ज्ञातिविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। राजन्य और पाहुज,क्षत्रिय के हीपर्याय | राजन्यबाहुजी क्षत्रियस्यैव पर्यायौ. [हममानी ] है. मामूली राजाओं के नाम भूप, स्माभृत् | सामान्यराजानां नामानिभूपक्ष्माभून्न- नृप घगैरह है. पाइस्यादयस्सन्ति. मण्टरार्धात् यदुतसे देशोका गालिक मण्डलेश्वरः सम्राडितिकथ्यते. सना कहलाता है. उस राजराजेश्वर का दीवान पीरासिंह | तस्य सम्राजोऽमात्यो चीरसिंहः आ- पुरोहित आदित्यशर्मा, धौर शंकर- | दित्यशर्मा पुरोधाः, शदरनाथः प्रती- नाथ ड्यौदीवान है. राजाओं के महलोके दाने पर पाँच पक्षामन्तःपुरद्वारि पश्च पण्दा विद्यन्ते खोजे ई. उस प्रतापी राजाके शत्रु अपने मापही | तस्य प्रतापिनो राशो रिपयः स्वयमेव शाम्त होजाते है. शाम्यन्ति. यामदेव उस राजाका लंगोटिया मित्र है. यामदेघस्तस्यनृपस्य पयस्यः मुहृत्. मेरेगाँव में एक मशहूर ज्योतिषी है. मम प्रामेऽस्त्येकः प्रसिद्धो देवशः. जो राजाही घूस लेतो इन्साफ फौन । यदि राजानएवोरकोचं गृहीयुस्तदा न्यायं फः कुर्यात्. राजाओं के बहुत से मुफ़िया पलची राज्ञां यहयो गुमदूताः पर्यटन्ति. घूमा करते हैं. राजाओं के सुलहनामे दूत लोग ले. राक्ष सोन्या सन्देशहनायत. जाते है. राज्य के सात मत कहो । राज्यस्य सप्ताहानि अन. स्थामी, मंत्री, राज्य, किला, सजाना स्वाम्यमात्यच राष्ट्रञ्च दुगै फोशो चलं. सेना, और आपस में मदद देनेवाले सुहत् । परस्परोपकारीदं सप्लाई मित्र, ये सात अगवाला राज्य राज्य मुच्यते. कहलाता है.

[३] व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। जाति इत्यादि का वर्णन-झातिविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत।। साम, दान, भेद, और दण्ड ये राजा सामदानच भेदश्च दण्डश्चेत्युपायच. बाकेचार उपाय है. तुष्टयं राधाम. इसका भी थाप खुलासाफरें । अच्छा एतदपि स्पष्टीकुर्वन्तु भवन्तः । परम्, सामथात् मीठा बोलना, दान अर्थात् साम प्रियवचनादि दान धनादेः सम- धनका देना, भेद अर्यात फूट उल पणं, भेदः (उपआपः) संहतयो- का का मिलेजोकर अलग कर धीकरणमित्यर्थः दण्डनंदण्ड इति. देना गौर एण्ड अर्थात् सज़ा देना. दो तीन रोज़ में हमारे शाहंशाह महा-द्विपु दिनेषु राजराजेश्वरोमार्फ स. राज अपने चरण पधारकर इस म्राट् पादार्पणेन इमां राजधानीमल राजधानी को सुशोभित करेंगे यह फरिप्यतीति किम्बदन्ती श्रोत्राधी- अफुमा फानोकान सवनगर में फैल निअखिलेनगरेप्रथिताऽभवत्. गया. छोटे राजा मण्डलेश्वर अर्थात् चक्रवती झुद्वराजानो मण्डलेश्वराय चलि प्रय- राजाके लिये भेंट देते हैं. च्छन्ति. राजा भोजदेव अपनी लड़की के व्याह राजा भोजदेयः स्थकन्योहायौतुके के दहेज़ में एक अक्षौहिणी सेना, एकामक्षौहिणी सेनामेकं भृङ्गारं एक सोने की सारी फीलयानों और साधोरणान्सस्याङ्कुशान्पश्चाश- सोनेफे अंकुशीसहित पचास हाथी, द्विपान, सलादिनः शतं चाहान, घुड़ सवार सहित सी घोड़े, साठ पष्ठि स्यन्दनानि, शतत्रयमनांसि, रथ, तीनसी छकड़े, दो सौ पाल शतद्वयं शिविकाः, दे चमरे, पकं कियाँ, दो चमर, एक तस्तशाही सिंहासनं, एकमसिं, सतूणीरमेकं एफ तलवार, तरकस सहित एक धनुः, युद्धसमये धारणार्थमेकं धर्म, धनुप लड़ाई के वक्त में पहरनेके शिरसञ्चैकं परj दो भल्लो एकां लिये एक जिरह बस्तर (कवच), छुरिकां मुद्गरञ्चैक स्नजामाने ददौ. शिरटोप, एक फरसा, दोभाले,पक छुरी, और एक मुद्गर अपने जमाई - के लिये देता हुआ.

[८४] चतुर्दशोऽध्यायः। जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। अक्षौहिणी का अन्दाज़ भी छपाकर कहो. अक्षौहिण्याः प्रमाणमपि कृपया वदतु, अक्षौहिणी का अन्दाज़ तो यह है कि | अक्षाहिण्याः प्रमाणन्तु खाँगीएकद्वि के २१८७० हाथी, इतनेही रथ, इससे गंजेः रथैरतेयैखिनः पञ्चमैश्य तिमुने घोर और पचगुने पैदल. पदातिभिरिति. राजा भोजके समधी ने भी व्याह की | भोजस्य सम्बन्धिनापि विचाहह खुशी में १५० फेदी सपन जलगने साधशतम्यन्दिनःस्वकारागृहान्मो. से छोड़ दिये. चिता:. राजाओं के हरेक डेरेमें पहरा रहता है. | राज्ञा प्रत्येकशिघिरे उपरक्षणं पर्तते. फौजके. जो वहादुर मरे (फौतहुग) घे पृतनाया ये धीराः पयमागता स्ते मरघटो में लेजाकर सिपाहियोने पितृवने नीत्वा राजपुरष दहिताः. जलादिये. न जलाई हुई लाशें पशु पक्षियों ने | अमादितानि सवानि पशुपक्षिभिः या साझाली. दितानि. व्यूद शब्दका क्या अर्थ है ? व्यूहशम्दस्य फोऽर्थ.? फौज का तरतीय से रसना व्यूद फाह- सैन्यस्य रचनाविशेपेण स्थापनं व्यूहः लाता है. कश्यते. से किसीने कदा है. यथा फेनापि भणितम्. मुदपर रख, पीछे घोर, उसके पीछे मुग रया हयाः पृछे तस्थे च पदा. पैदल, और इधर उधर यगलों में तयः पाययोध गजाः फार्या: प्यू हाथी करने चादियें यह प्यूह कहा- होऽयम्परिकीर्तिता गया है. लड़ाई के लिये जाते हुए फौजी लोग युगार्श गच्छन्तः सनिका मार्ग पवन रास्त पगुप्त से छोटेजाची कोपरी क्षुद्रजीयान् परभ्यामाशाम्यन्ति, से कुचलडालते है. किन्दी हाधियों को गले फुगों से मन पाश्चिमस्तिनां गण्डेभ्यो पानं अन्न- पहा परता. यति.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [८५] जाति इत्यादि का वर्णन-जातिविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। हाथीसाल पारी कहलाती है. गजशाला वारीत्युच्यने. ये हधिनियाँ अपने बच्चों सहित जातीहै. इमाः फरिण्यः सकरभा गच्छन्ति. इस घोड़े की लगाम कहाँ है ? अस्याश्वस्य कविका कुन घर्तते? यह तो तेरे साहीही नगीन पर रपणे सा तु तव सम्मुरा पर पृथिव्यां धृता है मेरी भासा से ता देय. मदीयाक्षिभ्यां तु पश्य. इस घोटो को पूंछ फैसो उम्दा मा- कथं शोभते लूममस्या बड़वायाः. लूम होती है. . रथवान् इन दोनों घाटों को चावुक सारथिरेतायश्वी कंशया तादयित्वा से मार कर जूए में जोड़ता है. युगन्धरे योजयति. अय घेश्यों के रोज़गारों को बताओ. अथ वैश्यानां वृत्तीनहि. रोत, व्योहार उधार, घ्याज लेगा, एपिः, वाणिज्य, उद्धारदानं कुसीद- चीजों का अदल बदल करना, और महणं पस्तूनां विनिमयः अन्येभ्यो गरीय किसानों के लिये साद (जिस) निर्धनेभ्यो सपीवलेभ्यो याचितक- देना धरह जीविका है. स्य दानमित्यादयो जीविकाः सन्ति. तुम्हारे गांव में फोन २ साहुकार है तब मामे के के उत्तमः, न फेऽपि. कोई नही. ये साहव मेरे ५०० रुपये फे फर्जदार अधमर्णोऽयं महाशयो मे पञ्चशतमु. द्राणाम् एप महाशयः मथं पञ्चशतं धारयति. अय तो सवाही जाति खेती करते हैं. इदानान्तु सर्वेशातय एव शर्षि कुर्वन्ति. मोहनसिंह हल कन्धे पर रा, बैलप ! मोहनसिंहो लागलं स्थन्धे कृत्वा धृपा में जोड़ और मागे फर. सीधे हाथ यो नियुज्य पुरतध कृत्या सव्य. में पैना ले, खेत जोतने के लिये हस्ते तोरचय गृहीत्या क्षेत्रकर्पणा. जा रहा है. यं गच्छति. उसका बेटा फावड़ा और कुदारी ले तत्पुत्रः कुद्दालं कुठारीच नीत्वा पृष्ठनो पीछे से जाता है. याति. अथचा चतुर्दशोऽज्यायः1 जाति इत्यादि का वर्णन - प्रातिविशेषा। । हिन्दी। संस्कृत। हिसपा कहलाती है. लागलदण्ड पति कथ्यते. अनाज और भुस अलग करने के लिये धान्यं पुशश्च पृथकरणार्थ या वृषसं. जो बहुत से घल एक लकड़ी में हति रेकस्मिन्काष्ठे निषध्यते सा मे- बांधे जाते हैं यह मेद कहलाता है. धिरिति कथ्यते. इम धनों को धोरे में भर कर सूए से एताचणकान्प्रसेवे भृत्वा वृहत्सूचिक- और सुतली से सोम दो. या सूत्रेण च सौम्य. बहुत से पनिये परचूनिया, हलपा, पदयो पैश्याचूर्णविक्रेतार, मापूपि- दूध दही बेचनेवाले, पजाज, फया. काः, पयोदधिविक्रेतारः बनविक्रे. हो, लोहिपा, कसेरे, अचार, घी तारः, मुनशणरज्जुधिमयिणः, - तेल येचनेवाले और आदतिये (नाज योपस्तु विक्रयिणः, ताम्रकाँस्यपि वनपाले) होते है. पलविक्रायण, श्रीपधिविकयिणः आज्यानाज्यविकतारः धान्यधिका- तारब्ध भयन्ति. इस जिले में पहुन से कायस्थ कचहरी पहयोऽत्र मण्डले कायस्था राज्यमा- में नौकर है. रे नियुताः किसी पास के परचूनिये से दो आने | फरमाथित्समीपपर्तिगर्णविफेनुराण- का गेंहका आरा भाध आने की कश्यस्य गोधूमचूर्णमणिकस्य जरद की दाल डेढ़ आने का घी एक मापद्विदला सार्धाणकस्य घृतमेफ- पैसे का मसाला जल्दी लामो. स्य पणस्य (ताम्रखंडस्य) पेसवा- रश्च शीघ्रमानय. अच्छा सवा चार आने मुझे दो. घरम् सपादचतुराणकान मां देहि. लो। गोगलदत्त! क्या थाजार जारी | गृहाण । गोपालमत्त । किं पण्यपीधि- हो? हो जाता तो है. कामजसि ओम् । गच्छामि तावत्. मुना! मेहरबानी कर मेरे लिये भी भद्र! कृपया मदर्थमपि पणत्रयस्थ तीन पैसे का दूध पूरा और धेले के दुग्धशर्करा, पणार्थस्य ताम्बूलना पान ले आना. नय.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । जाति इत्यादि का वर्णन---ज्ञातिविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। और भी जातियों को ययान करो।सुनो. मन्या अपि शातीर्पर्णय । श्रयन्ताम् . सुनार, लुहार, राज, घई, धोबी, फु- स्वर्णकारोऽयस्कार सुधाजीवी, तक्ष- भार, भरभूजा, रंगरेज, चमार, का रजका कुम्भकारः, मर्जकार. फौजड़ा, धुना, फाड़ी बनानेवाले, सकाचर्मकारः, शाकविक्रेता, वल- दर्जी, जुलाया, गाई, फहार, तेली, मार्जका, फतरत्, सूचिकः, तन्तु- फलाल, माहार, छपी, घोसी, चायः, गापितः, जलवाहः, तैलिका, माली, भही गैरद जाति होती हैं. शौण्डिका, काचकवणविक्रेता, घ स्त्रमुद्रया, गोपः, मालाकारः, श्य- पच इत्यादयो शातयः सन्ति. सुनार चान्दी के गहने आम की खटाई | स्वर्णकारो राजतान्याभूपणानि आम्रा. और चालू से साफ करता है. म्लेग सियतया च धवलीकरोति (स्वच्छीकरोति). लुहार धौफनी से लोहा आगमैतपाकर अयस्कारो भत्रया लोहमग्नो मात्वा आहरन के ऊपर रस फर पीटता है. धनोपरि निक्षिप्य ताड़यति. न्यारिया मिलाच की चांदी को मूसे द्रावकोऽसंस्कृतं रजतं मूपायां धृत्वा में रख कर गाग में सोधता है. उनी शोधपति. सोने की जाँचतो कसौटी परही होती है. स्वपरीक्षा तु शाण एव भवति. राजयसूली के जरिये इंट साफ कर लेपका रकबारेएकाः संशोध्य भित्ति भीत यनाता है. निर्मिमीते. धोयी पस्त धोता है और इस्त्री से रजको यस्राणि प्रक्षालयति अयोयन्त्रे- इस्त्री करता है. णच चिकणयति. कुंभार चाफ पर मिट्टी के पतन घना कुम्भकारश्यफे मृभाण्डानि निर्माया पार भये में पकाता है. पाक पाचयति. भरभूजा भार में जो भून कर दुकान मर्जको मननयन्ने मीहीनभृष्ट्वापणे वि- पर पेचता है. मीणाति. रंगरेज सलग २ रंग के कपड़े रंगता रखकः पृथग्वर्णानि यस्त्राणि रअयति और मुखाता है. शोषयति च.

[८] www चनुदंशोऽध्यायः जाति इत्यादि का वर्णन-जातिविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। मोची रोपीसे स्वाल साफ़ कर जूतियां पादूछदारया चर्म संशोम्योपानहः क- पनाता है. ज्वारी पासों से जुआ खेलता है। कितयो ऽक्षींव्यति । शास्त्रेषु केत शास्त्रों में जूआ मना है. निखिम्. यह जयपुर की धनी हुई अत्यन्त मुन्दर अतीवसुन्दरयं जयपुरनिर्मिता स्फटिक संगमर्मर को गणेशजी की मूर्ति है प्रतिमा गणेशस्य, गृहाणनाम्, इस लो. जुलाया तुरीयेमादि से कपड़ा घुनता है. तन्तुवायस्तुरोयेमादिना वस्त्रं घयति. नाई उस्तरे और फैची से पाल कत० नापितः क्षुरण कर्तर्या च कचान कर्त- ता और धनाता है. यति मुण्डयति च. यह नाई अपने उस्तरे को सिलीगर | नापितोऽयं स्वचरं शस्त्रमाजकादुत्ते. सपनाता जयति. पदई आर से लकड़ी चोरता है. घका ककचेन काष्ठं दारयति. आज एक मेलाई सोधीवरलोग प्याऊ ! अघको महोत्सवः धीवराः पानीयशा- के लिये जल लाते है. लिफाथै जलमानयन्ति. तेली कोल्हू में सरसों पेल कर तेल | तैलिकस्तलपेपयां सपंपं संपाय तैलं और यल बाजार में घेचता है. पिण्याकचापणे विक्रोणात्ति. और भी शुदजातियों को बतायो. अन्या अपि शूद्रजातीस्सूचय, चितो, शिकलगर, गड़रिया, पपाध पारपः,शस्त्रमार्जकार,अजाजीवाः,मा. जी, नट, कत्थक,सितारिया, कसाई दैनिका, नटा, चारणाः, धणिकाः, चिड़ीमार, जालिया, चहलिया योग चैतसिकार, जीधान्तका,धागुरिका, मृगयय इत्यादया. यह सितारिया सिर्फ सितारही नहीं एप घेणिका फेवलं घोणामेव न घाद- घजाना घरन सय याजों के बजाने यति परशासिलवाघानां चादने में दोशियार है. प्रवीणः. इसकी उगली में क्या है ! मिजराय. । अस्याङ्गुली किम् ? कोण.

[८९] व्यावहारिकसंस्शतप्रवोधा। जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेपाः। .हिन्दी। संस्कृत। बाजे घयान करो. वाद्यानि धर्णय. वांसुरी, मृदङ्गा, ढोल, नकार, वगैरह है. वंशी, मृदङ्ग आनको दुन्दुभिरित्यादीनिः इस प्याह में तुरई कौग पाता है. अस्मिन्विवाहे तूरी फो पादयति. देगा एक मुसलमान. अत्येको यवनः यहफ्यामगादी है थाहर जाफर तो पूछो. फेयं घोषणा पहिर्गत्वा तु पृच्छ. आज बहुत से हवा से गिराये हुए अद्य दिने वहनां पवनपातितवृक्षाणाम् दररती का नीलाम हमारे गदसे घोषणापूर्वको द्रव्यविनायोऽस्माकं में होगा. पाठशालायाम्भविष्यति. ये होशियार शिकारी, शिकारी कुत्तों | एते दक्षा मृगययः कौलेयस्सह शू- के साथ सूभर की शिकार के लिये पररय मृगयार्थ बहुभिर्भूत्यैस्सह यस से नौकरों के साथ जाते है. गच्छन्ति. एक भूसा अपने आपही सांप की पि. एको मृपया स्वयमेव सर्पपेटकम्भित्या दारी को कतर कर सांप के मुंह में सर्पमुख प्रविष्टो मृतध. घुसा और मर गया. यह किसका धफरा है इसको चोरों कस्यायं वरः एनं दस्युभ्यो रक्षय. रो पचाना. जोआदमी चोरी करते हैं ये राजपुरुपों ये जना स्स्तैन्यं कुर्वन्ति ते राजपुरुपै. से सजा दिये जाते है. दण्ड्यन्ते. कोई आदमी शरावधर में जाकर क. कधिजना गुण्डायाने गत्वा मण्डहार- लाल सराय प्याले में लेकर पीताहै. यामधं चषक आदाय पियति. चये शरमीले नहीं होते. नर्तका हीमन्तो न भवन्ति. टीक, सोये शर्मीलेही हो तो उनका सत्यम् , यदि ते प्रपार्वन्त एय भवेगु- नाचना भी अच्छा न होवे. स्तर्हि तेपां ताण्डवमपि शोभनं न स्यात् यह यही सभा है इस जगह यहुन से महतीयं समज्याऽत्र वहयो राजानः राजा और सभासद जेघर पहने हुए सदस्याश्च सालझारा घश्यन्ते. दिखाई देते है.

[९०] पञ्चदशोऽध्यायः। जाति इत्यादि का वर्णन-शातिविशेपाः । संस्कृत । ताराचन्द्र के पास तो बहुत धन है ताराचन्द्रसमीपे तु विपुलं अक्थं परञ्च वह अपने पास नहीं रखता परश्च स स्वसमीपे न ग्यस्यति त- उसको धरोहर बहुत से धनवानों स्योपनिधिर्वहुषु धनिपु वर्तते. पर रहती है. चौमासे से पहलेही.मार्ने उपलों के चातुर्मास्यात्मागेध कर्राषाणां दशशा- दस धोरे सरीदूंगा. मा यह देवदत्त मुझे बिराता है. मातदेवदत्तोऽयं मो विरौति. लावा पेस दरान्त से फाटता है. लावकः क्षेत्रं दात्रेण छिनत्ति. पन्द्रहवां अध्याय--पञ्चदशोऽध्यायः । णपुगः केप्यामि. पेड़, फूल, गिनती का वर्णन-वृक्षविशेपाः पुप्पविशेषाः संख्याविशेषाच । हिन्दी) संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। पेड़ तर, पादपः, वृक्षा. पीपल अभ्यस्था, पिप्पला. लाक्षा, जतुः (न) धड़ प्रकाण्ड, स्कन्धः, घड़ यदुपाई घटा, भ्यग्रोधः. गुद्दे शासा, लता. पना, उदुम्पर: घल्कला-लम्, त्या स्त्रिी.टाक किंशुका, पलाशवृक्षा पते पयम्, पर्णम्, उदम्,दलम् भाक अमवृक्षा गुच्छा शुन्छकः गांद निर्यास , रस. आनः, रसाला, चूत. कंजा फर, घगीचा उद्यानम् ,उपवनम् वाटिका,कीकर फण्टपवृक्षः, पर्नुरः जामन जम्घुवृक्षः. अम्लिका, चिश्चाक्ष.. शहतूत नतक्ष पिसरान अनार दाडिमीम मदुआ मधुकर आम व्यावहारिकसंस्थतप्रयोधः । [९१] पेट, फल, गिनती का वर्णन-वृक्षविशेपाः पुप्पविशेपाः संख्याविशेपाथ । हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत। संजना | शिनः अरंड परण्डः, चित्रका, चञ्चुः. नारंगी नारगः, भूमिजम्युका. छोकरा शमी. येल घिल्वः शाण्टिल्या. पुष्पम्फुसुमम् ,सुमनः (न.) सदिरः. गुलाव पाटलम्. फदली, रम्भा. ओदहुल जपापुष्पम् , ओरपुष्पम्. नारियर नारिफेलः, फोशिफफलम्. चम्बेली जातांपुष्पम्, मल्ली, नर- येर घदरीवृक्षा. मलिका. नीम निग्यः, पारिभवः येला चला. कनेर यफायन मदानिम्या. कणार. अमरूद अमृतफलम. यूधिका. फमल कचनारा फाश्यनार:. सहस्रपतम्, उत्पलम् , पीलू पीलुः शतपत्रम्. मौरसिरी नीयू पकुलम् पुष्पम्. दन्तशटः,जम्बीरः. टेसू शीसम शिशिपा. किंशुकः चम्पा चम्पकम. कदम कदम्ब नारंगी का सिरस कपीतनः, शिरीपम्. जाम्भजम्. फरील फरीर, प्राफरः. चन्दन का धतूर:- फुल श्रीखण्डम्. शाल्मलि. गुल्लाला गौलालम्. पेड़ मरुआ मण्यम्. खिन्नी क्षीरिका. नीला फमला नीलोत्पलम्. खजूर खजूरम्. कमोदनी । कुमुदत ताडू केतकी फैतकम् फन्दग कदम्बः सिला फूल विकचम् स्फुटम् प्रफुलम्, औगा अपामार्ग.. विकसितम्. T समर का [१२] पञ्चदशोऽन्यायः। पेड़, फूल, गिनती का वर्णन-पृक्षविशेपाः पुप्पविशेषाः संख्याविशेपाम! हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी, संस्कृत । चन्द फूल मुकुचितम्-पुणम्. इतना इयत्. मुरमाया जितना यावान्. म्लालम्. दुधा तिनना | तापान. पुप्परस मकरन्द: उतना पताचा पुप्पफोधूल परांग:. एकप्रकार एकधा,द्विधा, निधा इत्यादि पहिला प्रथमः, आदिमा, अग्निमः.सं इत्यादि दूसरा द्वितीया, अपर: | गूजना गुमति, चिरीति. तीसरा तृतीयः, नौतना मामन्त्रयत. चौथा चनुर्थः, तुर्यः, तुगेयः. मस्तहोना माधति. पाँच पशुमा লিনা गणयनि. हठी पछ. मात्तर- अनुवासात. सानयाँ सामः आटयां अएमा, दिलना प्रकम्पते, वेपते, धुनोति. नयां नचमा धुनाति. दसवां दशमः हिलाना घपयति, मचालयति, पर- ग्यारहवां एकादश म्पयति. वासर्वा निशा, विशतितमः. एक एका एका, पकम्. तोला विशः, शित्तमः. दो दो, हे,हे. सौवां तीन शततमः इत्यादि. प्रयः, निम्नः, प्रीणि. चार एक चार सहात पत्यारस, चतघः, चत्वारि, दो द्विः. पाँच पञ्च. तीन पट्. सत चतु पाँच पञ्चरुन्यः (s), आट आष्टी, थर. पत्या इत्यादि (s). मी नव कितना कियन् । कवि (फिनने). दश दश " चार. सात . " , व्यावदारिकसंस्कृतप्रबोधः। [९३] पेड़, फूल, गिनती का वर्णन वृक्षविशेपाः पुप्पविशेषाः संख्याविशेपाथ। हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । ग्यारह एकादश संतीस सप्तत्रिंशत्. घारह अड़तीस अष्टाविंशत्. तेरह प्रयोदशः उन्तालीस एकोनचत्वारिंशत्. चौदर चतुर्दशः. चालीस चत्वारिंशत्. पञ्चदशः इकतालीस एकचत्वारिंशत्. सोलह पोडशः. व्यालीसद्विचत्वारिंशत्, वाचत्वा- सत्रह सप्तदशः रिंशत्. अठारह अष्टादशा. तालीस | त्रिचत्वारिंशत्, सयश्चत्वा- उन्नीस पकानावशतिः. रिंशत्- बीस विशतिः चौवालीस चतुश्चत्वारिंशत्. इयोस एकविंशतिः. पिंतालीस | पञ्चचत्वारिंशत्. चाईस विशतिः, ध्यालीस पचावारिंशत्. तेईस योविंशतिः. संतालीस सप्तचत्वारिंशत्, चौवीस चतुर्विंशतिः. आदतालीस अष्टचत्वारिंशत्-अशाचत्वा- पञ्चीस पञ्चविंशतिः रिशत्. छन्चीस पदविंशतिः उनचास एकोनपञ्चाशत्. सत्ताइस सप्तविंशतिः. पञ्चास पञ्चाशत्. अट्ठाइस अष्टाविंशतिः. इक्यावन एकपञ्चाशत् उन्तीस एयोनत्रिंशत् / चावन द्विपञ्चाशत्. तीस त्रिंशत्. वेपन निपञ्चाशत्. इकतीस एफलिंशत्. चौअन चतुःपञ्चाशत्. बत्तीस निशत्. पञ्चपञ्चाशत्. तेतीस प्रयविंशत्. छप्पन पट्पश्चाशत्. चोतीस चतुरिंशत्. सप्तपश्चाशत्, पतीस पञ्चविंशत्. अठ्ठावन अष्टपञ्चाशत्, छत्तीस पशित. एकोनपष्टिः. . पचपन सत्तावन उनसठ [९] पत्रदशोऽध्यायः। पैद, फल, गिनती का वर्णन-गृतविशेपाः घुप्परिशेपाः संन्याविपाश्च । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृन । पष्ठिर इकसठ एकपष्ठिः. पछि प्रेस विष्ठिः चौसठ चतुःषष्ठिः पंसठ पञ्चपाठः. ज्यासठ | पट्पष्ठिः सरसठ सनपछि: अरसठ अपांष्ठः. उनसर एकोनसप्ततिः. सत्तर सप्ततिः इकहत्तर एकसप्ततिः यहत्तर हिससतिः. तिहत्तर विसप्ततिः. चौहत्तर चतु-सप्ततिः. पिचत्तर | पञ्चसप्ततिः. छियत्तरपट्सप्ततिः. सतत्तर सप्तसमतिः. अठत्तर आएसप्ततिः, उनासी एकोनाशीतिः. अस्सी अशीतिः, पन्यासी, प्रकाशीतिः व्यासी द्वन्यशीतिः. तिरासी । ध्यशीतिः. चौरासी | चतुरशीतिः. पिचासी | पञ्चाशीतिः. उपासी पडशीतिः. मतासी ससाशीतिः, अठासी अतिः नवासी एकोननवतिः नव्य नवतिः. क्यान एकनवतिः, थानये बिनपतिः. पानये त्रिनपतिः चौरानये । चतुर्नयतिः पिथामय | पञ्चनधतिः. ज्यान पपणवतिः. सत्तान सप्तनयतिः. अठ्ठानये अटनयति. निन्यानषे पफोनशतम्, सौ शतम्. एकसौएक एकोत्तरशतम्, डेढ़ सौ सार्धशसम्. दो सौ दिशतम्. तीन सौ | त्रिशतम्. चतुरशतम्. हजार सहस्रम्. दस हज़ार / अयुतम् लाख दिस लाख प्रयुतम्। करोड़ कोटि. दस करोड़। दशकोटिः. चार सौ अरय दस नील पर्य दस पर्य व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [९५] पेड़, फूल, गिनती का वर्णन-वृक्षविशेपाः पुप्पविशेपाः संख्याविशेपाश्च । संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत । अर्युवम्. दशनिणर्यः. दस अरव दशावुदम्. पदम खया दस पदम दशपमः दशपर्यः सह नील निख: दस सह दशशशम्. हिन्दी। संस्कृत। हवा से पेट हिला करते है. वातेन वृक्षाः प्रकम्पन्ते. फरील के पेड़ जोरप पत्ते नहीं आते | फरीरवृक्षे पप्राणि चेन्नागच्छन्ति तर्हि तो यसन्त था क्या दोष है. वसन्तस्य को दोपः पीपल के पेड़ में से यन्दा उसाट दो. अश्वत्यवृक्षावृन्दाकमुत्पाटय. कीकर और ढाक का गौद प्रायः स्त्री कण्टकवृक्षाणां पलाशवृक्षाणां च नि- लोग साती है. सिं प्रायस्त्रियः खादन्ति. पीपल की लाख भी बड़े काम की अश्वत्थस्य लाक्षापि महदुपयोगिनी होती है. भवति. अमलतास का गूदा दस्त कराने को (अमलतास) मस्तिष्क गार्दै वा विरे. दिया जाता है. चनार्थ प्रयुज्यते. आक के पेड़ अपने आपदी पैदा हो अर्कवृक्षास्तु स्वयमेयोत्पद्यन्ते. क्या अमरूद के पेट तुम्हारे घगीचे किं (अमरूद) वृक्षास्तच घाटिकायांन में नहीं है. सन्ति. महदी के पत्तों से स्त्रियां अपने हाथ (महदी) पत्रैः स्त्रियः स्वहस्तौ रस- रचाती है. यन्ति. औगा कोलफीभी हवन में लीजाती है. अपामार्गस्यापि समिद्धपने गृहाते. और भी बहुत सी समिध है. अन्या अपि समिधो वहयः सन्ति. .. जाते हैं.

यथा-- पञ्चदशोऽध्यायः। पेड़, फूल, गिनती का वर्णन-वृक्षविशेपाः पुप्पविशेपाः संख्याविशेपाथ । हिन्दी। संस्कृत। जैसे-आफ, ढाफ, सैर योगा, पीपल, --अपलाशसदिरः अपामार्गो- गूलर, छोंकर, दुख भार कुशा या ऽथपिप्पलः उदुम्मरशमीपूर्वा कु- नौ तरह की समिध होती है. शेति नयधा समित्. इस पेड़ का मोटा घट्ट नरम पत्ते और अस्य वृक्षस्य स्थूलः प्रकाण्डः कोम- कड़ी छाल है. लानि पानि कठिना त्याच वर्तते. मेरे बगीचे में एक बडका पेड़ दो पी- ममोद्यान एको घटतरह पिप्पलक्षी पल के, तीन पाहतूत के, चार घपस्तूतवृक्षाचत्यारोदाउिमीवृक्षा' अनार फे, पांच गूलर के,छः इम्ली पचोदुम्बराः पडम्लिकारक्षाः सस के, सात जामुन के, भाउ पिलपन जम्वृक्षाः अष्टाक्षाः नव पलारा- के,नी दाक के दल आम के, ग्यारह वृक्षाः दशानवृक्षा एकादशमधूकाः भदुए के, बारह फों के, तेरह सेजने द्वादशकरसवृक्षारत्रयोदश शिम. को, चौदह वेल फे, पन्द्रह सैर के, क्षाश्चतुर्दशयिल्पवृक्षाः पञ्चदश- सोलह नारियल के, सत्रह फेले के, सदिरवृक्षाः पोडशनारिकेलवृक्षाः अठारह नारी के, उन्नीस येर के, सप्तशरम्भावृक्षा, अष्टादशभूमि- थीस नाम के, इकीस कचनार के, जम्पुकाः, एकोनविंशतिः घरी. घाईस पीलू फे तेईस सैमल के, क्षा विभाति पारिभद्रा एकविंशतिः चौबीस मिनी के,पचीस खजूर फे, फाञ्चनारवृक्षा, साविशतिः पीलयः, छधीस ताद के, सत्ताईस कदम्ध प्रयोविंशतिः शाल्मलिवृक्षाः, चतु- के, अट्ठाईस सिरस फे, उन्तीस विशतिःसारिकावृक्षाः पञ्चविंशतिः नीबू यहाँ के, तीस शीशम के, राजूरवृक्षाः पविशतिस्ताला सप्त- इकत्तीस कैत के, बत्तीस छोकरेके, विंशतिः कदम्वाः, भष्टाविंशतिः तेतीस चारों और यथल के है. कपीतनाः, एकोनत्रिंशत् अन्तशठ- वृक्षाः त्रिंशत् शिशिपायुक्षा, पक- त्रिंशत् कपित्थाः, दात्रिंशत् (छो. फरा) वृक्षाः प्रयस्त्रिंशत् परितः कण्टवावृक्षाव सन्ति. - ~~~~ व्यावहारिकसंस्हत्तप्रबोधः। [ ९७ ] पेट, फूल, गिनती का वर्णन-वृक्षविशेषाः पुष्पविशेषाः संख्याविशेषाश्च । दिन्दी। संस्कृत। जैसे एक चन्दन का वृक्ष फुल यनको यधैकश्चन्दनवृक्षो ऽपिलमरण्यमनुया- सुगन्धित कर देता है तैसेही सत्पुन सयति तथैव सत्पुत्रः स्वकुलमगु- अपने सान्दान फो शामित कर भूपयति. देता है.. है ज्योतिषी हिसार की गिन्ती काम गणितज्ञ गणिरागहयानमःलोकन उ. लोक से फाहिये. च्यतां घरम् . दात १०० सहस्त्र १००० अयुत २0000 लक्ष १०0000 एकम्, दश, शतम् (त्रैव) सहस्रम् प्रयुत १००0000 फोटि १००00000 अयुतं (तथा); लक्षच प्रयुतश्चय अर्बुद १00000000 कोटिरषदमेव च । दृन्दै पर्यो नि- वृन्द १००0000000 सर्वश्च शहं पद्यध सागरः; अनत्यं पर्व १००00000000 निसर्य १००000000000 মti বাধয় যথা- २०00000000000. मम्. पमा १0000000000000 सागर १००000000000000 अनन्त्य २000000000000000 मध्य १०000000000000000 पराध १00000000000000000 आप की बगीची में कितनी तरह के } भवदीय पाटिकायां कतिविधानि पु- पाणि सन्ति. सुगो, गुलाय, फनेर, चमेली, येला, शृणु, जपापुष्पम् , फर्णर ,जातीपुष्पम्, जूही, मौरसिरी, नारङ्गी फा फूल, घेला, यूधिका, वकुलपुष्प, जाम्भज चम्पा, गुल्लाला, चन्दन का फूल, चम्पक, गीलालं, श्रीखण्ड, मस्य मरा, फेतकी का फुल वगैरह [गुलाय], केतक मित्यादीनि पुष्पा णि सन्ति. फल है. १३ , ५ [२८] पञ्चदशोऽध्यायः । पेड़, फूल, गिनती का वर्णन-वृक्षविशेपाः पुष्पविशेषाः संख्याविषाथ । हिन्दी। संस्कृत। कमल, नील कमल, कीदनी वगैरह सहनपत्रं, नीलोत्पलं, कुमुद्रादित्यादीनि फूल अक्सर बड़े तालायों में पाये पुष्पाणि प्रायः घृहत् कासारेषु जाते हैं. लम्पन्त. खुरजमुपी फूल तोफसर जैसे सूरज सूर्यमुग्वाभिधं पुष्पं तु प्रायो यथा सूयाँ घूमता है पैसेही घूमता है. परिप्रमति तथैव भ्राम्यति. जिसने वर्तन मिल सके उतने प्राह्मणों यावन्तोऽममाणि सम्भवन्ति तावन्ती को न्योता दो. भाह्मणानामन्त्रयस्थ. यह लड़का शिलुमाही इम्तिहान में पाण्मासिकपरीक्षायामप्टमो ऽयंछात्रः अपने दज में आठचां है. स्खकक्षायाम्. तुम दोनों में से कौन नैयायिक है. कतरो भवतो नैयायिकः. तुम सबमें कौन व्याकरण जाननेवाला है। फतमो भवतां चैयाकरणः. परशुराम बोस यार पृथ्वी को क्ष. परशुराम एकविंशतिकरयो निःक्षत्रियां वियरहित करते हुए. महीञ्चकार, इस दफ़भ में कितने लड़के है. अस्मिन्वर्ग कतिच्छाधास्मन्ति, सौसक मी तुमगिन सके होया नहीं? यावच्छतमपि गणयितु शक्रोपि नवा. हां गिन सका हूं। यह कितनी पिनसी | ओम् शामि। एषां सत्या तु कियती। है। मै कुल गिनती गिर दूं. अहमखिला संख्यां गणयेयम् . रसिकारे फूलों से रस लेकर मस्त | रसिका प्रमराः पुणेभ्यो रसमाकप्य होते हैं. माधन्ति. रुद्रदत्त बीस घ्रालयों के लिये रोज वाह्मणानां विशतये रुद्रदत्तः प्रत्याह अन्न देता है. मन्नं प्रयच्छति. बीस क्षत्रिय सौशदों से मुकाबलाफर | विंशतिः क्षत्रियाः शतशूद्वेभ्य. प्रति- सके हैं. योद्धं क्षमा. तेतीस करोड़ देवता, आठ बसु, ग्यारह प्रयस्त्रिशत्कोटिदेवा अधौ धसव एका. रुत्र, बारह सूर्य है. दश सदा द्वादशादिन्यास्सन्ति. शहद की मक्खी फलों पर गँजती है. सरघाः पुष्पेषु गुअन्ति.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [९९] सोलहवां अध्याय-पोडशोऽध्यायः। आकाश के वस्तु दिन रात का वर्णन-आकाशपदार्था अहोराअदिविभागाश्च - हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। आकाश नमः, वियत्, व्योम, गगनं, कोम्हरा पूर्वाह्न, प्रा. खम्. यादल मेह मेघा,चारिवाहः,अभ्रम् ,धन पहर यामा,प्रहरः, चन्द्रमा चन्द्रमा,चन्द्र, ग्लोः, मृतीसराय- अपराड.. गादः, कलानिधिः पर ग्रहण माँग उपरागा, प्रद.. सायम्, सन्ध्या. सूर्य सूरयः, अर्यमा, आदित्यः. आधीरात अर्धरामिः, निशीथः. तारे नक्षत्रम्, कक्षम्भम् ,ताराः, विन गत अहोरात्रः, नकन्दिधम् , वारका, उडुगा गतंदिवा. पिजली गाड़ित, विद्युत्, चपला. रात निशा, रात्रिः, नियामा, र. ओला पीपलः, करकाः. जनी, क्षपा. इन्द्रधनुष इन्द्रधनुः, चापम्. घले कालः, दिष्टः समयः. पारस परियेशः, परिधिः गुडू मोनिंग शुभस्तेपातम्यालोभूयात्.- बरफ "तुपारः, तुहिनम्, हिमम्. सबरे का प्रातरुपासना. ध्रुव भजन औत्तानपादिः. धुबा, लालटेन प्रच्छन्नदीपः,मावृतदीपिका.) शीकरः, अम्बुकणा. यौछार अफुआ किम्बदन्ती, जनश्रुतिः झड़ी आसार, धारासम्पात. अद्यदिने. कल [घीता अहोरात्रादिविभागाः। ह. हुआ] दिन घनः, दिनम्, अहः, (न०) परसों घी दिवसः. ताहुआ] सवेरे प्रभात, प्रत्यूप कल [आने दुपहर मध्याहः. घाला] मह की परखा. a [१०] पोडशोऽध्यायः। आकाग के वस्तु दिन रात का वर्णन-आकाशपदार्थी अहोरात्रादिविभागाश्च ------ हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । .. : परसों [भा परश्वः. २पाख एकोमासः. नेवाल १२महीना = एकासम्पत्सरः,मत्सरा, चार यासरस. अन्दः, घर्पः, हायना. अंधेरी रात तमिना. इस साल ऐषमः (s). उजेलीरात ज्योत्स्ना. पार साल, परन् (5). उजाला चन्द्रिका, फौमुदी, ज्योत्स्ना. त्यारस परारि (s). १८पलक फाटा. टहरने की विरतिः, विरामः, यतिः. ३० काठा एकाकला. जगह ३० कला एकाक्षणा. वरसना रपति. १२क्षण मुहूर्त (दो घड़ी) पका. आवृणाति-ते. ३० मुहूर्त | अहोरात्र एकः, जमना श्यायते, शिली-धनी-भवति. १५ अहो. एकापक्षा " घेरना हिन्दी। संस्कृत । देसो बादलों से घिरा हुआ यह आकाश पश्य मेघेरावृतमिदं नभः कथं शोभते. कैसा अच्छा लगता है. शीघही मेह बरसेगा मौली घटाओं से | सद्य एव वारियषिध्यतीति सम्भाव्यते यह अनुमान होता है. नीलघटाभिः. कभी पूर्व में कभी दक्षिण में कभी कदाचित्माच्यां कदाचिदयाच्यां कदा. पश्चिम में कभी उत्तर में विजलियाँ चित्मतीच्या कदाचिदुदीच्यां विद्यु-' भी चमकती है। तार भी तो अय तोऽपि चकासन्ते; नक्षत्राण्यपि तु -अच्छी तरह नहीं चमकते. यथायन घोतन्तेऽधुना. चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण पर बहुत से | चन्द्रसूर्योपरागे वह्यो यात्रिणः पुरु- यामी कुरुक्षेत्र घरह पवित्र स्थानों क्षेत्रादिपुण्यस्थलेषु गत्वा तत्र स्ना- में जाकर और यहां नहाकर दीन त्या च यथाशक्ति दीनेभ्यो माह्मणे- मानणों पे लिये वित्तानुसार दान भ्यो दानम्प्रयच्छन्ति.

व्यावहारिकसरहतप्रयोधः। [११] आकाश के वस्तु दिन रात का वर्णन-आकाशपदार्था अहोरात्रादिविभागाश्च हिन्दी। संस्कृत। यहां कौओं की तरह अपनाही पेट नात्र काकपदुदरम्भरीणां नास्तिकाना. पालनेवाले नास्तिक आजकल के माधुनिकमतावलम्धिनामेपा चाता. नवीन मतों को ग्रहण करनेवालों की यह बात नहीं है. मेह की बौछार ओलों के साथ तिरछो मेघासाराः सफरफास्तिर्यम् एतन्ति, पड़ रही है. ध्रुव रहता है. तो उत्तर दिशा में ही हमेशा ध्रुयस्तदीच्यामेव दिशि सदा धनते. कल मैने चन्द्रमा के मण्डल में पारस ह्यो मया चन्द्रमण्डले परिधिष्ट अत देखाथा इसी से यह मेह बरसता है. एवायं मेघो वर्षति. जल के आने का यह एक सगुन है. जलागमनस्यय शकुनः जलके फिनके ही शीकर कहलाते हैं. अम्बुकणा एच शीकरा इत्युच्यन्ते, आज ज्यादह जाड़ा है इसी से आज अद्याधिका शीनो वर्तते इतपवाद्य- रात को ज़रूर ही पाला जमेगा. राप्रावयश्यमेव हिम श्यामिप्यते. ৫৫ যকীযষ্ক ফলা; ২০ গাজী। আgয় নিমবায় (বালা) মান্ধা का एफ क्षण; १२ क्षण का एक त्रिंशत्कलानामेका क्षणा, द्वादशक्ष गुनि ३० मुहर्त का एक दिनरात, मानाको मुहूर्त, निशमुहानामे- १५ दिन रात का एक पाप; २ कोऽहोरात्रः, पञ्चदशाहोरात्राणामे- पास का एक महीना, १२ महीनों फा पक्षा, द्वयोः पक्षयोरेको मासः, .का एक वर्ष; मनुप्या के एक म द्वादशमासानामेको वर्षः, मनुष्य- हीने का पित्रीश्वरों का दिनरात; मासेनेकोऽहोरात्रः पितॄणां, मनुष्य मनुष्यों के एक बरस का देवताओं चर्पण देवानामहोरानः स्यात्. का दिनरात होता है. तहां उत्तरायण देवताओं का दिन और तत्रोत्तरायणं दिन, दक्षिणायनं रानि- दक्षिणायन गत होती है. देवानाम् . - 00762- - लयकाला. [१०२] पोडशोऽध्यायः आकाश के वस्तु दिन रात का वर्णन आकाशपदार्था अहोरात्रादिविभागान हिन्दी। संस्कृत। देयताओं के ६५ दिनरात का एक देवाहोरायाणां पष्ठधधिकशतत्रयेण दिदय वर्ष होता है. दिव्यं पर्पम्. देवताओं के १२ हजार यषों के मनुष्यों दिग्यदिशभिर्धर्षसहस्रर्मानुषचतुर्युग के चार युग होते हैं, और यही म्भवति, तश्चैव देवानामेकं युगं ए- देवताओं का एक युग होता है, ऐसे तारशानां देषयुगानां सहस्य - देवताओं के हजार युग का ब्रह्मा हमण एक दिनम् तत्तु भूतानां पि- का एक दिन होता है यही प्राणियों तिकाल. तावत्येव रानिर्भूतानां प्र. का स्थितिकाल है, और उतनाही रात्रि प्राणियों का प्रलयकाल है. इसही क्रम से सौ वर्ष की ब्रह्मा फी | अनेनैव क्रमेण पाणां शतस्य परमा परमायु है उसके बाद महाप्रलय युम्रह्मणस्तदनन्तरं महाप्रलयो य- होती है जिसमें चौदह लोकों का स्मिश्चतुर्दशलोकानां परिसमाप्ति- खातिमा होजाता है. भवति. ब्रह्मा के रोज मरे को प्रलय में तो तीन | दैनन्दिनप्रलये तु प्रयो लोका एव न. लोकही नष्ट होते है. श्यन्ति. अथवा, देवताओं के ७१ युगों का एक अथवा, दिव्यानां युगानां येकसप्तति- मन्वन्तर होता है, एक मन्वन्तर में स्तन्मन्वन्तरम्। एकस्मिन्मन्वन्तरे चौदह इन्द्र राज्य भोगते हैं ऐसे चतुर्दशेन्द्राः राज्यं भुजते; तैश्चतु- चौदह मन्वन्तरों का ब्रह्मा का एक देशमन्यन्तरेह्मणो दिनम्भवति. दिन होता है. मरने के बाद जीव के साथ पुण्य पार मरणानन्तरं जीवेन सह पुण्यपाप एव ही जाते हैं. गच्छत मोक्ष में रोक लगानेवाले काम क्रोध | मुक्तो प्रतिबन्धका कामोधलोभमोहा- लोभ मोह चार ही है. अमानही संसारकी पैदायश का समय है, अविद्येय जगदुत्पत्तेः कारणम्। किस्मतही प्राणियों का कल्याण और | भाग्यमेव जीवानां मङ्गलवामङ्गलं विद- अकल्याण करती है. धाति. चत्वार एव.

रात में भी. घ्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ १०३] आकाश के वस्तु दिन रात का वर्णन-आकाशपदार्या अहोरात्रादिविभागाच हिन्दी। संस्कृत। यह मेरा कहना पण्डितों की खुशी के एपा मदीयोक्तिर्विदुषां मुद्देऽविदुपाञ्च लिये और मूखों के घमण्ड दुर दीपहाराय भवतु. करने के लिये हो. हमार हेडमास्टर जल्दही इन्स्पेक्टर अस्मद्धेडमास्टरः सद्य पवन्स्पेक्टरी होंगे यह अफुआ मैने माताकद भविष्यतीति किम्बदन्ती मया वि. आदमियों से सुना है. ध्यासपात्रेभ्यः पुरुषेभ्यः श्रुता. जैसे दिन में चार पहर होते हैं तैसे | यथा दिने चत्वारो यामास्तथा रामा- यपि भवन्ति. (गुरमीनिंग) तुम्हारे लिये सयेरा शुभस्ते प्रातःकालो भूयात. मालदाता हो. कृष्णदत सपेरे की संध्या करता है.. कृष्णदत्तः प्रातरूपासना फरोति. आज मैं दुपहर को, फल तीसरे पहर अद्य दिनेऽहं मध्यान्हे श्वो ऽपराहे पर. को, परसों कोम्हरे दुपहर अपनी श्वः पूर्वा स्ववृत्तितो नियतिष्ये । नौकरी से लौटूंगा। अच्छा. घरम्. कल शाम को और परसों आधी रात हा सन्ध्यायां परह्योऽधरानी च ममा- को मेरी भी वारी थी. पिवार आसीत. आजकल तो अंधेरी रात है और शुक्र | अपत्व तु तमिस्रा रानिःशुक्राच ज्यो. से चांदनी आवेगी. त्स्ना आगमिष्यतिः यह रात तो उजाली है यहां लालदैन | ए राघिस्तु चन्द्रिकयान्विता धर्तते की जरूरत नहीं मास्त्यावश्यकतान प्रच्छन्नदीपस्य. समय का इतनाही घिमाग मैने दि. एतावानेच कालविभागो मया प्रदर्शितः, खाया.* महरबानी करके आप घिराम फी नि-विरतेचिन्हान्यपि कृपया वर्णयतु भ. शानियां भी वर्णन करें. घान्.

, . . . " [१०४] सनदशोऽध्यायः। आकाश के वस्तु दिन रात का वर्णन-आकाशपदार्था अहोरागादिविभागाश्च हिन्दी। संस्कृत। , यह निशान अल्पविराम का है, यह एनचिह्नमल्पविरामस्य, एतचिह्न चित अर्ध विगम का है, : यह मधविरामस्य, : एतश्चिह्नमपूर्ण चिह्न अपूर्ण विराम का है, . या। बिरामस्य, वा,। पताश्चसम्पूर्ण यह चिह्न पूर्ण विराम का है, विरामस्य, पतचिदम्परोक्तः, यह चिह्न दूसरे के फथन का है, ? एनश्चिह्नमप्णस्य, ! पतचिहचि- ? यह चिह्न सवाल का है, यह स्मयसम्बोधनयोः, () एतचित्र- चिह्न विस्मयबोधक व सम्बोधन कोप्टनामान्तरितवाक्यस्य इत्या- का है, () यह चिह्न कोष्ठ अथवा दीनि. अन्तरित वाक्य का है, यगैरह. इम्साल जैटकी सय तपा सण्डित हो । एपमो ज्येष्ठस्य वीप्रतिवन्धकानि न. गई इससे ऐसा भान होता है कि क्षत्राणि पण्डितानि अतो दृष्टिन भविष्यतीति सम्भाव्यते. पारसाल और त्योरस साल दुनियाँ फे परुत्परिवर्षी प्रजाभ्य आनन्ददायि- लिये मानन्ददायक थे. नावास्ताम्. सत्रहवां अध्याय-सप्तदशोऽध्यायः। खीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाथ। सूखा पड़ेगा. संस्कृत । . परमेश्वर विष्णुः, नारायणः, कृष्णा, गोविन्दः, इत्यादि. लक्ष्मी पद्मालया, पद्मा, श्री, हरिमिया, कमला, इत्यादि. हरियान गरुड़ः, तायः, चैनतेयः, खगेश्वरः, इत्यादि... हरि गदा, शंग, सद्ग, चक्र कौमोदकी, पाञ्चजन्यः, नन्दक, सुदर्शनम्, और मणि. कौस्तुभ- स्रष्टा, प्रजापतिः, पेधा, विधाता, विधि इत्यादि. ब्रह्मा की स्त्री सरस्वती, घाग्देवी, इत्यादि. ब्रह्मा .

[१०५] व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपया । हिन्दी। संस्कृत। महादेव महादेव की स्त्री . . . इन्द्र की स्त्री इन्द्र का लोक इन्द्र का हथियार খ্যহা देव सेनापति देवताओं के मजानची सजाना अनि अग्निको चिनगारी धर्मराज जलदेवता पवन देव भोजन . शिवः, शहर, उनः, श्रीकण्ठः, हरः इत्यादि. सती, दाक्षायणी, अपर्णा, पार्वती, दुगी, उमा इत्यादि. मघवा, पुरन्दरः, शक्रा, शचीपतिः, वासवः, इत्यादि. शची, इन्द्राणी, पुलोमजा इत्यादि. स्वर(s) स्वर्गः, नाका, त्रिदशालयः, प्रिदिच इत्यादि यन्नम् , कुलिशम् , सिदुरम् , पविः इत्यादि. घिनायकः, गणाधिपः, लम्बोदर, गजानना, इत्यादि कार्तिकेयः, पठाननः स्कन्दः, गुहः, इत्यादि. कुवरः, यम्घकसराः, यक्षराट् , पोलस्त्यः इत्यादि. निधिः (पु.), शेवधिः (पु.) इत्यादि. चैश्वानरः, चलिः, ज्वलना, सशानुः, अनलः इत्यादि. स्फुलिङ्गः, अग्निकणः. इनान्तः, यमः, दशमनः, पितृपतिः, काल, इत्यादि. प्रचताः, चरुणः, पाशी, यावसांपतिः पतिः इत्यादि समीरः, मारुतः, गन्धघदः, वायुः, अनिलः, इत्यादि. पीयूपम् , अमृनम् , सुधा इत्यादि. मन्दारः, पारिजातका सन्तान , फल्पवृक्षः, हरि- चन्दन-ना. प्राणः, अपानः, समान., उदानः, व्यान'. अमरा', निजंगा, देवा, , सुराः, आदितयाः इत्यादि. अमुगाः, दनुजा, दाना, गुफशिप्या. इत्यादि. कोणपाः, प्राण्याद, अम्रपाः इत्यादि. पुप्पधन्वा, रतिपतिः, मकरध्वज', कामा, सर, इत्यादि. सूरः, सूर्यः, आदित्यः, दिवायरस मयूगः, उम्रः, अंशुः देव वृक्ष . देहस्थ पधा देवता . राक्षस শামশ रवि, फिरण १४ [१०४ सादशोऽध्यायः । आकाश के वस्तु दिनं रात का वर्णन-आकाशपदार्था अहोरागादिविभागाय हिन्दी। संस्कृत । यह निशान अल्पविराम का है, यह · एनश्चितमल्पविरामस्थ, ; एनश्चित चित अर्ध विगम का है, : यह मधविरामस्य, : एतचितमपूर्ण- चिह्न अपूर्ण विराम का है, • या। चिरामल्य, घा ! एताश्चिदम्पूर्ण- यह चिह्न पूर्ण विराम का है, चिरामस्य, "" एतचिह्नम्परोक्ता, यह चिह्न दूसरे के कथन का है, ? एनश्चिप्रष्णस्य, ! एतचिहषि- ? यह चिह सवाल का है, ! यह स्मयसम्बोधनयोः, () एनचिह- चिह्न विस्मयवोधक घ सम्बोधन कोछनामान्तरितवाझ्यस्थ इत्या- का है, () यह चिह्न फोष्ट अथवा दीनि. अन्तरित घास्य का है, वगैरह. इम्साल जेठकी सब तपा सण्डित हो एपमा ज्येष्ठस्य वांप्रतिवन्धकानि न- गई इससे ऐसा भान होता है कि क्षत्राणि खण्डितानि अतो दृष्टिन भविष्यतीति सम्भाव्यते. पारसाल और त्योरस साल दुनियाँ फे| परुत्परिवर्षी प्रजाभ्य आनन्ददायि- लिये आनन्ददायक थे. मावास्तीम्. सत्रहवां अध्याय--सप्तदशोऽध्यायः । स्वर्गीयदृचान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोज्ने कविपयाथ । हिन्दी। संस्कृत। परमेश्वर विष्णु', नारायणः, कृष्णा, गोविन्दः, इत्यादि. लक्ष्मी पद्मालया, पद्मा, श्री., हरिप्रिया, कमला, इत्यादि. हरियाहन गरुड़ः, तायः, चैनतेयः, खगेश्यरः, इत्यादि.... दरि गदा, शंप, खड्ग, चक्र | कौमोदकी, पाञ्चजन्यः, नन्दकः, सुदर्शनम्, और मजि. कौस्तुमः. स्रष्टा, प्रजापतिः, षेधाः, विधाता, विधि: इत्यादि. ब्रह्मा की स्त्री सरस्वती, घाग्देवी, इत्यादि. . सूखा पड़ेगा. . प्रमा [१०] घ्यावहारिकसंस्थतप्रवोधः । स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाश्च । Wwron. हिन्दी। महादेव महादेव की स्त्री इन्द्र की स्त्री इन्द्र का लोक इन्द्र का हथियार गणेश देव सेनापति देवताओं के खजानची गजाना अनि अग्नि को चिनगारी धर्मराज जलंदवता पवन देव भोजन संस्कृत। शिवः, शङ्करः, उग्रः, श्रीकण्ठः, हरः इत्यादि. सती, दाक्षायणी, अपर्णा, पार्वती, दुगी, उमा इत्यादि. मघया, पुरन्दरः, शक्रा, शचीपतिः, पासवः, इत्यादि. शची, इन्द्राणी, पुलोमजा इत्यादि. स्थर (5) स्वर्गः, नाका, त्रिदशालयः, प्रिदिच इत्यादि. घनम् , कुलिशम् , सिदुरम् , पविः इत्यादि. पिनायफः,गणाधिपः, लम्बोदरः, गजाननः, इत्यादि. कार्तिकेयः, पदाननः, स्कन्दः, गुहः, इत्यादि. फुवरः, त्र्यम्बकससः, यक्षराट् , पौलस्त्यः इत्यादि. निधिः (पु.), शेयधिः (पु.) इत्यादि. चैश्यानरः, वलिः, ज्वलना, कृशानुः, अनलः इत्यादि. म्फुलिङ्गः, अग्निकाण. तान्तः, यमः, शमनः, पितृपतिः, काल, इत्यादि. प्रचेताः, चरणः, पाशी,यादसांपतिः अप्पतिः इन्यादि। समीर,मारतः, गन्धवहः, वायुः, अनिलः, इत्यादि. पीयूपम् , अमृतम् , सुधा इत्यादि. मन्दारः, पारिजातका, सन्तानः, कल्पवृक्षः, हरि. चन्दनं-न. प्राणा, अपाना, समाना, उदाना, व्यान, अमगः निर्जराः, देवाः, सुराः, आदितेयाः इत्यादि. अमुगः, दनुजाः, दानवाः, शुक्रशिष्याः इत्यादि. कोणपाः, कन्यादः, अत्रपाः इत्यादि. पुष्पधन्या, रतिपतिः, मकरध्वजः, कामः, सारः इत्यादि. सूरः, सूर्यः, आदित्यः, दिवाकरः. मयूपः, उसः, अंशुः देव वृक्ष देहस्थ पवन देवता दैत्य राक्षस कामदन रवि, किरण १४ [१०] सप्तदशोऽध्यायः। स्वर्गायचान्ताः धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाश्रा, हिन्दी। संस्कृत। रवि सारथी चन्द्र चुध बृहस्पति गुरुः, इत्यादि. . शनिश्वर सूरसूतः, अरुणः, अनूरु हिमांशुः, चन्द्रमा, चन्द्रः, ग्लाः,मृगाः, इत्यादि. अङ्गारका, कुजा, भौमः, महीसुतः, इत्यादि- रोहिणेयः, बुधः, सौम्या, इत्यादि. गीपतिः, सुराचार्य उशना भार्गवः दैत्यगुरुः इत्यादि. शौरिः, शनैश्वरः इत्यादि. तमः, (ऽखी) सर्भानु, सहिकेयः, विधुन्तुदः इत्यादि. मार्गः, मार्गशीर्षः, सहाः (पुं०) पौषः, तैपः, सहस्य.. तपाः, पुं०] माघः. तपस्यः, फाल्गुनिकः, फाल्गुनः. चैत्रः मधुः चैत्रिका शापः, माधवः राधः राहु, केतु . अगहन. . माह फागुन चन धैसाख जेठ ज्येष्ठ शुमा . आपाट सायन भादी . फातिक दिशाएँ जीतना, जयना पैदाहीना, करना मुचिः, आपाढ. श्रावणा, नभा [पु.] भावणिका. मभस्या, भाद्र ग्रीष्ठपदः. आस्विनः, इप:, पाश्वयुजा. घादलः ऊर्जः, कातिकिकः, दिशः, ककुभः काष्ठा, आशा, हरितः, इत्यादयः, जयति, विजयते. उत्पधत, जायत, रोहति, स्फायते, सजनयति-ते, उत्पादयति. गच्छति, प्रजति, चलति, यानि, पति, सरति, काम्यति. . जाना च्यावहारिकसंस्स्तमयोधः। [१०७] स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाश्च । . संस्कृत। নাৰাকলা स्तौति, श्लाघते, प्रशंसति, विफत्थते. माप्तकरना लभते,आप्नोति, अधिगच्छति, अर्जति,विन्दति-ते उपासनाकरना उपासते. गिरना पतति, च्यवते, बंसते, भ्रंशते, भ्रश्यति, गलति, तरना, धारक सामने तैरना तरति, यते । प्रतीपंतरति. बयानकरना वर्णयति, फथयति, आच पदति, ब्रवीति, मते, वक्ति, व्याख्याति, मणति. नामलेना अभिदधाति, नामगृहाति, कराजाना उच्यते शब्द्यते, निगद्यते, अभिधीयते. होना अस्नि, भवति, वर्तते, विद्यते, सम्पद्यते. सुनना शृणोति [प्रे०] श्रावयति । आकर्णयति, निशाम्य- ति [40] निशामयति. जानना त्ति, जानाति, अवगच्छति. खुलासाकरना विवृणोति-ते. समाना माति. डीयते, उद्धयते, उत्पतति, आकाशेनयाति, खे वि- सर्पति. देग्पना चा टुंढना पश्यति, ईक्षते, आ-अवलोकते । निरूपयति, नि- चर्णयति, लक्षयति, अन्धिप्यति, मृगयति. रक्षाकरताचा रखना रक्षति, पाति, प्रायते, निदधाति, स्थापयति, न्य- स्थति-ते. शिक्षते, यधीते, पठति, अधिगच्छति । घाचयति, अध्यति. निकालना निष्काशयति, अपचायति, नि.सारयति. पढ़ना, सीखना [१०६ ] ससदशोऽध्यायः स्वायत्तान्ताः धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाश्च । हिन्दी। संस्कृत। रवि सारथी चन्द् मगळ . , बृहस्पति शुकः शनिश्चर सूरसूतः, अरुणा, अनूसा हिमांशुः, चन्द्रमाः, चन्दः, ग्लोः,मृगाः, प्रत्यादि. अनारकः, पुजः, भौमः, महीसुतः, इत्यादि. रोहिणेयः, बुधः, सौम्यः, इत्यादि. गीपतिः, सुराचार्यः, गुरु, इत्यादि. उशना भार्गवः दैत्यगुरुः इत्यादि. शरिर, शनैश्वरः इत्यादि. तमः, (ऽस्त्री) स्वभीनु, सैहिकेयः, विधुन्तुदः इत्यादि मार्गः, मार्गशीर्षः, सहाः (पुं०) पोषः, तैपः, सहस्यः तपाः, पुं०] माघः. तपस्या, फाल्गुनिका, फाल्गुनः. चैत्रः मधुः चैत्रिका वैशाखा, माधकः राधः, राहु, केतु अगहन. . भाह फागुन चत पैसाख . ज्येष्ठः शुक्र आषाढ . सावन . . कातिक दिशाएँ जीनना, जयहोना मुचिः, आषाढः. थापणा, नभा [०] श्रावणिका. नभस्या, भाद्रः, मौष्ठपदः, आस्विना, इषः, श्ययुज चाहलः ऊर्जा, फार्तिकिया, दिशा, ककुभः काष्ठा, आशा, हरितः, इत्यादया. जयति, विजयते. उत्पद्यते, जायते, रोहति, स्फायते, सञ्जनयनि-ते, उत्पादयति. गच्छति, प्रजति, चलति, याति, एति, सरति, साम्यति. पैदाहांना, करना जाना . व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१०७] स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाश्च । हिन्दी। संस्कृत। तारीफ़करना स्तौति, श्लाघते, प्रशंसति, विफत्थते. प्रासकरना लभते,आप्नोति, अधिगच्छति, अर्जति, विन्दति-ते उपासनाकरना उपासते. गिरना पतति, च्यवते, नसते, भ्रंशते, भ्रश्यति, गलति, तरना, धारफे सामने तैरना तरति, प्लवते । प्रतीपतरति. बयानकरना वर्णयति, कथयति, आचष्टे चदति, प्रवीति, यते, यक्ति, व्याख्याति, भणति. नामलेना अभिदधाति, नामगृहाति. कहाजाना उच्यते शब्द्यते, निगद्यते, अभिधीयते. होना अस्ति, भवति, वर्तते, विद्यते, सम्पद्यते. सुनना शृणोति [प्रे०] श्रावयति । आकर्णयति, निशाम्य- ति [क] निशामयति. जानना येत्ति, जानाति, अवगच्छति. खुलासाफरजा विवृणोति-ते. समाना माति. उड़ना डीयते, उड्डयते, उत्पतति, आकाशेनयाति, खे वि- सर्पति. देखना वा ढूंढना पश्यति, ईक्षते, आ-अपलोकते । निरूपयति, नि- वर्णयति, लक्षयति, आन्वयति, मृगयति. रक्षाकरनावा रखना रक्षति, पाति, प्रायते, निद्धाति, स्थापयति, न्य- स्यति-ते. शिक्षते, अधीते, पठति, अधिगच्छति । पाचयति, अध्येति. निकालना निष्काशयति, अपवाहयति, निःसारयति. . पढ़ना, सीखना [१०८] सप्तदशोऽध्यायः। स्वर्गीयत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाश्च । हिन्दी। संस्कृत। राधामाधवको जयहो। राधामाधवा विजयताम् । परमेश्वर ही जगत्का कारण है उसही परमेश्वरोहि जगतां कारणं तस्मादेव से स्थावरजगमरुपसृष्टि उत्पन्नहीं स्थावरजङ्गमरूप जगती उत्पद्यते तौहै और उसही में लयको प्रास तारमनव लयं गच्छतच. होती हैं. भना उसको "हरि कृष्ण, गोविन्द मारा- भक्तास्त हरि कृष्ण गोविन्द नारायण यण, वासुदेव" इत्यादि नामों से यासुदेवत्यादिनामभिः स्तुवन्ति. स्नुनि करते हैं. ईश्वरपान कलिये दोही मार्ग पहिले | ईश्वर प्रामये दावेव मार्गों पुराणाचा- आचार्यों ने कहहे पहिला प्रवृत्ति यः प्रोक्तो प्रथमः प्रवृत्तिमार्गः द्वि- मार्ग और दूसग निवृत्ति मार्ग. तीयो निवृत्तिमार्गश्च. गरी नष्ट हुए है सम्पूर्ण पाप जिनके | अतापिलकल्मपाः विदितवेदितन्या और जानना रहाहै जाननेयोग्य प. अल्पशा भुंग्यादिप्रदर्शितप्रवृत्ति- दार्थ जिनको ऐस अपन, भृगु इ. मार्गेणैव श्रीकृष्णभक्तितत्परास्स त्यादि महर्पियो से दिखाया हुआजो न्तः तमीभ्यां लभन्ते. प्रवृत्तिमार्ग तिससेही श्रीकृष्ण की भक्ति में तत्पर हुए उस ईश्वरको प्राप्त करते है. नष्टहोगये है सम्पूर्ण पाप जिन और निघूनापिलकल्मषाः रागद्वेषादिदोष रागपादि दोपरहित महात्मालोग शून्या यतयः सनकादिप्रदर्शित सनकादि महर्पियों से दिसाये हुए मार्गणैय योगादिद्वारा तत्लचिदा. रास्त सहीयोगादि के जरिये से उस नन्दस्वरूपं ग्रह्माधिगच्छन्ति, सचिदानन्द स्वरूप ब्रह्मको प्राप्त करते है. अपने धर्म में मौतभी अच्छी है और स्वधर्म मृत्युरपि थेयान् परधर्मश्च भ. दूसरों का धर्म गरा दायक होता है. यमद्रा व्यावहारिकसंस्थतप्रयोधः। [ १०० स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाश्च । हिन्दी। संस्कृत। जो पुरुष चित्तको सफाई और गगळे- ये जनाः चित्तशुद्धिं रागोगदिदोष पादि रहित हुरविना निवृत्ति मार्ग राहित्यश्च विनानिवृत्तिमार्गमुपासते को ग्रहण करने हैं वे अनधिकारी तेऽनधिकारिणोघाचकनिन उभ- कहेन मात्र के ज्ञानी दोनों ओर से यतो भ्रष्टा निरय पचाय पति- (इसलोक व परलोक से) भ्रष्ट हुए प्यन्ति तेपु पाण्डित्याभावात् . नरक मेही अवश्य पड़ेगे (फ्याकि) उनम पाण्डित्यका अभाव होने से. इससे संसार समुद्र को तरने की इच्छा अतः संसारार्णवं तितीवुद्धिमान् जनः करता हुआ मनुष्य हमेशा आस्ति सदास्तिको भूत्वा सनातनधर्मपात फ होकर सनातनधर्मरूपीनौका को मेवायलम्ब्य भाक्तक्षेपर्णाद्वारा तं आश्रय ले कर भक्ति रूपी डाँड़े के तरेत्. ज़रिये से संसार समुद्र कोतरजाय. चतुर्भुज रूप विष्णु के हथियार वर्णन-चतुर्भुजरूपिणः विष्णोगयुधानि वर्णय करो कौमोदकी नाम गदा, नन्दक- कौमोदकी गदा, नन्दकः खड्गः, नाम तलवार पाञ्चजन्यनाम शंस, पाञ्चजन्यः शहः चक्र सुदर्शनमिति. सुदर्शन नाम चक्र. भगवान् की सवारी कौन है ? गगढ़. हरिवाहनः कः? गण्डः. भगवान् की पत्नी का क्या नाम है ? | तत्पल्याः किं नाम ? श्री लक्ष्मी श्री लक्ष्मी चंगरह. रित्यादि. रुद्र और प्रजापति की स्त्रियों का क्या रुद्रप्रजापत्योः स्त्रियोः किं नाम ? नाम है. उमा, और सरस्वती. उमा सरस्वतीच. (१)-विद्याचिनय संम्पन्न ब्राह्मण में (१)-विद्याविनयसम्पन्न ब्राह्मणे गाव. गौमें और हाथी में फुत्ते में और हस्तिनि मुनि चैव श्वपाके च चाण्डाल में पण्डित समदर्शी पण्डिताः समदर्शिनः । १ । इति होते हैं। यह गीताकाचाफ्य है। गीता वाक्यात्.

[११०] सप्तदशोऽध्यायः। स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाय । . हिन्दी। संस्कृत। घही भगवान मष्टि के उत्पन्न करने के म एष भगवान् सप्टेयत्पादनसमये समय मष्टा, प्रजापति इत्यादि नामों स्रष्टा प्रजापति रिस्यादिनामभिः, स, ओर पालन समय में विष्णु इ. पालनसमये विष्णुरियादिनामभिः त्यादिनामा से, और प्रलय समय में प्रलयसमये रुद्र इत्यादिनामभिः रुद्र इत्यादि नामो से चोल जात ह. शब्द्यने (अभिधीयते निगद्यते घा). देवताओं का राजा कौन है ? और उस देवराजः का?तस्पनी च का? की पत्नी कौन है? इन्द्र । शची. इन्द्रः। शची. गणेशजी की पूजा सयही सनातन धर्म गणेशम्य पूजा सर्वेषामेव सनातनधर्म- फो मानने वालों के घर सपही अच्छे मतावलम्बिनां गृहे सर्येपुशुभकार्यधु फामों में विघ्न दूर करने के लिये विनविघाताय प्रथममेव भवति. पहिलेही होती है. देवताओं के सेनापति और खजानची का क्या नाम है? देवसेनान्यः,धनाध्यक्षस्य च किं नाम? कार्तिकेय और कुवेर. कार्तिकेयः कुवेरश्य. धन पाने के दोनाम निधि और द्रव्यसमूहस्य निधिः शेवधिश्च द्वे शेवधि है. नाम्नी स्त- आंच के धौंकने सेचिनगारां उड़ती हैं. अग्नेः प्रध्यापनात्स्फुलिङ्गाः उत्पतन्ति. धर्मराज के नाम भी कृपा करसुनाओ. धर्मराजनामान्यपि रुपया श्रावयतु. कृतान्त, पम, शमन वगैरह. कृतान्तः यमः शमनः, इत्यादीनि. जलके अधिष्ठाता देयके नाम अब कृपा | विज्ञापयाधुना रुपया जलाधिष्ठातृदे- फर जताऔ. घस्य नामानि. प्रचंता और अप्पति वगैरह. परुणः प्रचेता, अप्पतिः, इत्यादीनि. हया के नाम भी कहो. पायोनामधेयान्यपि अहि. समोर, भारत और अनिल वगैरह. समीर, भारतः, अनिलः, इत्यादीनि. बाण, व्यावहारिकमस्टन प्रबोधः। स्वर्गीयदृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाश्च । हिन्दी। संस्कृत। भण. . देहकी वायु कितनी हैं उनके स्थान | कतिसंख्याका देहस्यवायवः तेषां स्था- भी अलग २ वर्णन करो। सुनो. नान्यपि पृथक्तया व्याख्याहि गृणु. हृदय में प्राण, गुदा में अपान, ढूंडी में हृदि प्राणः, गुदेऽपानः, नाभा समानः समान, कण्ठ में उदान, सबदेह में फण्ठं उदानः अपिलशरीरे व्यान. व्योन इस प्रकार पाच देहफी वायु हैं. इत्थं पञ्च देहस्था वायवः सन्ति. संसार को वश करने वाले कामदेव के जगद्वशकर्तुः कामदेयस्य नामान्यपि नाम भी कहो. काम, पर, कन्दर्प वगैरह जानो. फामा, सरः, कंदर्पः इत्यादीनि विद्धि. स्वर्ग में देवता और दानवों के नाम भी त्रिदिवे सुरासुराणामारया अप्याख्याहि बताशो. देवता तो देव, निर्जर, अमर वगैरह सुरास्तु देवाः, अमरा, निर्जरा इत्यादि नामों से और असुर दैत्य, दनुज, नामभिः, असुगश्च दैत्या, दनुजा, दानय चंगरद नामों से मशहर है. दानवा इत्यादिनामभिः प्रसिद्धाः. आठसिद्धि जो सुनीजाती है उन्है खु.! अष्टसिद्धयो याः श्यन्ते ताः समासेन लासा कहो. अणिमातो पहिलोसिद्धि है दूसरी म- मणिमातुप्रथमासिद्धिः हिनीया महि- हिमा कहलाती है, तीसरी गरिमा मांच्यते तृतीया गरिमा प्रोक्ता फही है चौथी लधिमा, तेसही चतुर्थी लधिमा तथा पञ्चमी १ अणिमा-सूक्ष्म शरीर धारण करना. १अणोभावा अणिमा कोऽर्थः सूक्ष्म शरीरचारित्वम् . २ महिमा-जिससे ब्रह्माण्ड मेंनसमाय.२ महतोभायः महिमा कोऽर्थः येन - झापडे न माति. ३ गरिमा-इतना भारी होजाय किवडे | ३ गरिमा-गुगभावः कोऽर्थः येनोल्क चलयानों से भी न लजाया जा सके. एबलवद्भिपि अनुद्यः स्यात् ४ लघिमा-जिससे रई के तुल्य होकर ४ लघोर्भावः-लघिमा कोऽर्थः येन जहां मन में आयवहां उड़जाय. तूलसएशो भूत्वा यथेष्टगुहीयेत्, ग्रहि.

[११२] सप्तदशोऽध्यायः। स्वर्गीयनान्नाः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाच । म्य, पंधो मताः. हिन्दी। संस्कृत ! पाचवी माप्ति नाम की है छठी प्राको प्राप्तिनाम्नीस्यास्पष्ठी प्राकाम्य मित्यता यहां से आगे सातवीं इशित्व रशियं सप्तमी प्रोकावशित्वं चाए- और सही आटवी पशित्व कही है. मी तथा. इनके अर्थ भी क्रममे टिप्पणी में देनी पनासामर्थानपि टिप्पण्या क्रमतः पश्य नवग्रहों के प्रसिद्धपीयों कोभी नवग्रहाणां प्रसिद्धपर्यायानपि पृथ. अलग २ इसी पाठको लफ्जों की क्तयास्यैव पाठस्य शन्दश्रेण्यांपश्य. श्रेणी में दवा. सप्तर्षि कौनहें उनके नाम लोक पद्ध- सप्तर्षयः तन्नामानि लोकवद्धानिवद. कहा. सुनिये, श्रूयन्ताम्. मांच, अगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलद, मरीचि रहिरा अत्रिः पुलस्थः पुलह प्रातु और शिष्टये सात बुद्धिमानों मातुःवशिष्ठश्यति सतत प्रानेस्सत- ने सप्तर्षि मान है. चादह लोक कौन से हैं? चतुर्दशलोकाः के ? भूः भुष, स्वर, जन, तप, मह और भूः, भुवः, स्था, जनः, तपः,महः सत्यः सत्य ये मान ऊपरके लोग है. एते मतोपरिस्था लोका.. नल, चितल सुतल,महानल,तलातल तलः,पितला, सुवला, महातला,तला. रसानल, पाताल ये सात नीचे के तला, रसातलः, पातान्दः एते सप्ता- लोक जानने, धास्था लोकाया: १ प्राप्ति-उगली की नीक से चन्द्रमा प्राप्तिः कोऽयः अंगुल्यग्नेण चन्द्रा- आदि अलभ्य चीजोंका जिससे लाभ हो. दानामलभ्यवस्तूनां येन लाभः. २प्राकाम्य इच्छान मारी जाय. २ प्रकामस्य भाषा प्राकाम्यं कोऽर्थ: इच्छानभिघातः. ३ ईशिव-जिससे स्थावर भी आज्ञा ३ इशिनो भायः इशिन्यं कोऽधी येन कागहो. स्थावरा अपि आशाकारिणः स्युः. ४ वशित्व-जिससे पृथ्वीमें भी उन्मजन ४ घशिनाभावावशित्वं फोऽधः येन निमज्जन होजाय. भूमापि उन्माननिमजने स्याताम व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ ११३ ] स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाथ। ranto हिन्दी। संस्कृत। साल के दो अयन होते हैं दक्षिणायन पर्पस्य छेअयने स्तः दक्षिणायनमुत्तराय- और उत्तरायण, णञ्च. एक साल में छः ऋतु नीचे लिपी एकस्मिन् वत्सरे पड्कातवोनिम्न मामेण तरतीच से होती है. भवन्ति. अगहन और पूस में हेमन्त; माह और मागेपोषेच हेमन्तः अंदी (शिशिर) फागुन मैं शिशिरवाजड़ चैत्र और माघे च फाल्गुन चैत्रेराधे (वैशाय) वैशाय में वसन्त; जेट और असाद वसन्तः स्यात्, शुचौथुके (आपाड़े) में ग्रीष्म, सावन और भादों में वर्षा चग्रीष्मका, वपतुःश्रावणेभाद्र; आ. चामायूट: धार ओर कातिक में शग्द धिने कार्तिक शरद् इति. पूर्वदिशा प्राची, पश्चिमदिशा प्रतीनी पूर्वादिक् प्राची, पश्चिमा दिन प्रतीची, दक्षिणदिशा अवाची और उत्तर दक्षिणा दिगवाची उत्तरादिगुदी दिशा उदीची कहलाती है. चीति मण्यते. साहित्य सम्बन्धी आठ रस धयान क- साहित्यविषयकाः अौरसाःवर्णनीया ग्ने चाहिये. झार, धीर करण, अदभुत, हाम्य, शृगारः, चीरः फरुणः, अद्भुना, भयानक, वीभत्स, रौद्र ये आठ ग्म हास्यः, भयानकः, वीभत्सः, रोद्रः जानने. इस्योरसा शेयाः. पाम, साल, नेत्र, जीभ और नाक ये धोत्रं, त्वक, चक्षुः, रसमा, प्राणमिनि पाँच शानेन्द्रिय प्राणी, हाथ, पाँच, पञ्चशानेन्द्रियाणि,वाक् पाणिः पादः, गुदा और लिग ये पाँच कर्मेन्द्रिय पायुः, उयस्थः, इति पश्न कमेन्द्रिया- है इस प्रकार मिलकर दस इन्द्रिय णि एवं मिलित्वा दशन्द्रियाणि हैं। और दिल दांनी तरह का है. सन्ति. उभयात्मक मनः गन्ध ये पाँच राक्षः, स्पा, रूपम्, रसा, गन्धः तरतीय घार ज्ञानेन्द्रियोक विषय है. इत्येने पञ्च प्रामशो मानन्द्रियाणां विषया. स्पर्श, रूप, रस, [११२ ] सप्तदशोऽध्यायः। स्वर्गीयवृत्तान्नाः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाथ। यो मताः. हिन्दी। संस्कृत । पाचवी प्राप्त नाम की है छठी प्राको प्राप्तिनाम्नीस्यात्यष्ठी प्राकाम्य मित्यन म्य, यहां मे आगे साती रशित्व ईशित्वं सप्तमी प्रोक्तावशित्वं चाट- और तैसही आठवीं पशिस्य कही है. मी तथा. इनके अर्थ भी क्रमसे टिपणी में देपो एनासामधानपि टिप्पण्या क्रमतः पश्य नवग्रहों के प्रसिद्धपायों कोभी नवग्नहाणां प्रसिद्धपर्यायानपि पृथ. अलग २ इनो पाटो लफ्जों की तयास्यैव पाठस्य शब्दश्रेण्या पक्ष्य. श्रेणी में देखो. सप्तर्षि कानहें उनके नाम श्लोक पद्ध- सप्तर्पयः के तन्नामानि लोकवद्भानियद. कहो. सुनिये. भूयन्ताम्. माँच, अगिर, अनि, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि रङ्गिरा अत्रिः पुलस्न्यः पुलहः और बांशष्टय सात बुद्धिमानों मायशिष्ठश्चेति सतत प्राशस्सा- अतु ने सापि माने है. चौदह लोक कौन से है? चतुर्दशलोकाः फे? भूः भुव, स्वर, जन, तप, मह और भूः भुषः, स्वः, जना, तपः,महः सत्यः सत्य ये सात ऊपरफे लोक है. एते मप्तोपरिस्था लोका.. क्तिल, नुतल, महातल, तलानल तलः, वितला, सुनलः, महातलः, तला- रसानल, पाताल ये सात नीचे के तला, रसातला, पाताल पते सप्ता- लोक जानने. धास्था लोका ज्ञयाः. १ प्राप्ति-उंगली की नीक से चन्द्रमा प्राप्तिः कोऽर्थः अगुल्यग्नेण चन्द्रा- शादि अलभ्य चीजोंका जिममे लाभ हो. दानामलभ्यवस्तृनां येन लाभ:. २प्राकाम्य इच्छान मारी जाय. २ प्रकामस्य भावः प्राकाम्यं कोऽर्थ: इच्छानभिघानः. ३ रशिय-जिससेस्थावर भी आशा- ३ इशिनो भाचा इशित्वं कोऽर्थः येन कार्ग हो. स्थावरा अपि आशाकारिणः स्युः. ४ शिव-जिससेश्याम भी उन्मजन ४ घशिनोभायः वशित्वं फोऽर्थः यन भूमावपि उन्मजननिमजने म्यानाम तल, निमज्जन होजाय. -- व्यावहारिकसम्मृतमयोधः। [ ११३ ] स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाश्च । हिन्दी। संस्कृत। साल के दो अयन होते हैं दक्षिणायन यम्य छेअयने स्तः दक्षिणायनमुत्तराय- और उत्तरायण. . एक साल में छ. म नीचे लिगी पकरिमन वत्सरे पायोनिम्न प्रमेण तरतीच से होती है. भवन्ति. अगहन और पूस में हेमन्त; माह और मार्गशीरच हेमन्तः जंडो (शिशिरः) फागुन में शिशिरवाजहचैत्र और माघे च फाल्गुन चैराधे (पेशाग्य) वैशाय में वसन्त जेठ और असाढ़ वसन्तः स्यात्,गुचौथुन (आपाड़े) में प्रीप्म; सायन और भादों में वर्षा चीनका पतुःश्रावणभाद्रे आ- चामाद कार और कातिया में भाग्द श्चिने कार्तिक शरद इनि. पूर्वदिशा प्राची, पश्चिमदिना प्रतानी पूर्वादिक् प्राची, पशिमा दिर प्रतीची, दक्षिणदिशा अवाची और उसर दक्षिणा दिगपाची उत्तरादिगुदी दिशा उदीची कहलाती है. चीति भण्यते. साहित्य सम्बन्धी माठ रस बयान कसाहित्यविषयकाः अष्टौ रसाःवर्णनीया रने चाहिये. हार, धीर करण, अनुभुत, हाम्य, हारः, चीरः. फराणा, अभुनः भयानक, यीभत्स, गैर ये माठ ग्स हास्यः, भयानकः,, बीभत्सः, रोदः जानने. इत्यौरसा शया:. काम, साल, नेत्र, जीम और नाक ये धोत्रं, त्वक, नभु', रसना, प्राणमिनि पाँन मानेन्द्रिय, घाणी, हाथ, गाँव, पञ्चशानेन्द्रियाणि,नाक, पाणिः पादः, गुदा और लिंग ये पाँच फगन्द्रिय पायुः, उपम्या, इति पक्ष कमेन्द्रिया है इस प्रकार मिलकर इस इन्द्रिय णि एवं मिलित्या दर्शन्द्रियाणि और दिल दोनी नरह का है. सन्ति. उभयात्मकं मनः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये पाँच शब्दः, मगदीः, रुपम्. रमः, गन्धः नरतीय वार झानेन्द्रियाक विषय है. इत्येते पञ्च प्रमशो शानेन्द्रियाणां विषया: - [ ११४] सप्तदशोऽध्यायः। स्वायत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाश्व-। हिन्दी। संस्कृत। जीभ से अनुभव फिये हुए छः रसा जिहानुभूतान् परमान कुत्र कुत्र का को कौन २ रस कहां २ हैं इस प्र. का रसः इति समासेन व्याख्यादि. कार खुलासा वर्णन करा. पहिला मोटो जलम; दूसरा लषण ला. प्रथमो मधुरः जले, द्वितीयो लयणः हौरी नमक में तीसराफेडआमिर्च सेन्धवादी, तृतीयः कटुः मरीचादी, इत्यादि में, चौथा तीयानीमधगैरह चतुस्तिक्तःनिम्बादा, पञ्चमोऽम्ल: म पाँचवा खेटा इम्ली इत्यादि में तित्तिज्यादा, पष्ठः कपायः हरीत- छटवाँ फसला हरड इत्यादि में यह फ्यादा इतिपद रसाः शेयाः, छ. रस जानने. माने यजाने की विद्या में सात स्वर! गानवाधविद्यायां सप्त स्वराः कुत्र पुत्र कहां और कैसे २ है अलग २ च कीदृशाः इतिपृथक्त्या वर्णय. वर्णन फरो. पहिला निषाद (हाथी फेनाद सरीसा). प्रथमो निपादः (गजनादयन्), दि. दुसरा अपमे (गाओं के नाद तुल्य), तोयो अपभ (गवांनादपत्) तृ- तीसरा गान्धारे (यकरियों के नाद तीयो गान्धार (अजादीनांनादवत्), तुल्य), चौथा पड्ज (मोरों फै नाद चतुर्थः पजः (मयूरनादचत्), प. तुल्य), पांचया मध्यमें (मोच ञ्चमोमध्य में (मौञ्चनादधत्), पष्ठो नाद तुल्य), छठा धैयर्त (घोडे धवतः (अश्यनादवत्), सप्तमः प- नाद तुल्य), सातवां पञ्चम (कोइल अमः (काकिलनादबत्) इति सप्त फे नाद तुल्य) ये सात स्वर वाणा तन्त्रीकण्ठात्थिता स्वराः शेयाः. के कण्ठ से निकलते हुए जानने. चौदा विद्या कोन हैं? चतुर्दश विद्याः का? ग्रामदान, रसायन, भुनिकथा, वैद्यफ, प्राममान, रसायन, श्रुतिकथा, घेचकं, ज्योतिष, ध्याकरण, धनुर्विद्या, ज्योतिष, व्याकरण, प्रसुधरत्वं,जल- रना, गाना, नाचना, घोड़े पर तरत्वं, सङ्गीत, नाटयां, अश्वारोहणं, चढ़ना, कोकशास्त्र, चारी में हो. कोकशास्त्रं, स्तेयप्रागल्भ्यं, चातु- शियारी, चतुराई य १४ विद्या है. यमनाचतुर्दशविचा.

व्यावहारिसंस्थतप्रवोधः। [ ११५] स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाश्च । हिन्दी। संस्कृत। जीव की चार अवस्था कौन है ? चतनोऽवस्था जीवस्य का? जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीया ये चार जामत्स्यासुपुतितुरीया इत्यवस्थाश्च- अवस्था है. तन्नः रूपाफर नौ प्रकार की भक्ति भी बयान रुपया नवधा भक्तिमपि वर्णयतु.. फरो. भगवान् का स्मरण, कीर्तन, कथा स्मरणं फीर्तनं विष्णोः; श्रवणं पादसे- श्रवणे, पाद सेवन, पूजन, वन्दना, वन, अर्चनं चन्दनं दास्यं सरयमा- दास्य, और सपर्य और अपने आपे स्मनिवेदनमिति नवधा. का निवेदन कराना इस प्रकार नौ प्रकार का है. पृथ्वी, आप, अशि, घायु, आकाश आदि पृथिव्यतेजोबाय्याकाशानि पञ्च त. पांच तत्य . स्वानि. छ दर्शन शास्त्र उन २ के आचार्यों पदर्शनानि तत्तदाचार्यसहितानि सहित वर्णन करो. वर्णय. गौत्तम का किया हुआ न्यार्य, कणाद गौतमरतो न्यायः, कणादकतं वैशेषि- फा किया हुआ वैशेषिक, कपिल फर्म, कपिलकृतं सायम्, यत. फा किया हुआ सांख्य, पतञ्जलि का अलिकतो योगः, व्यासकृतं वेदान्त किया हुआ योग, व्यास का किया दर्शनम्, जैमिनिरतं मीमांसादर्शन- हुआ पेदान्तदर्शन, जैमिनि का मिति पड़ दर्शनानि सन्ति. किया हुआ मीमांसादर्शन ये छः दर्शन है. ६४ कला जो भक्तवत्सल श्रीकृष्ण भग- चतुःषष्ठिः कलायाभक्तवत्सलेनोह- वान् ने ६४ दिन में श्रीसान्दीपन पणेन भगवताचतु-पष्टिदिवसपुधी- गुरु से पड़ी उन को स्पष्ट सान्दीपनाभिधाद्गुरोरीताः ताः रीति से सुनो. नाम के समासेन थूयन्ताम्.

- [११] सादशोऽध्यायः। स्वायत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाथ। हिन्दी। संस्कृत। गाना, वाजा, नाच (गात्रविक्षेप), नाटक | गीतं, वाय, नृत्य, नाट्य, भालस्य, वि. (भाषप्रदर्शन), तस्वीर, अति सूक्ष्म शेरकच्छेद्यम्, तण्डुलकुमुमवलि. यस्तु का छिधा फरना, तण्डुलासु प्रकाराः,पुष्पास्तरणं, दशनयसना. मवाल प्रकार, फूलों का विछीना, गरागाः, मणिभूमिकाकर्म, शयन- दाँत वस्त्र और शरीर का रंगना, एजन, उदकवायं, उदकधातः, चित्र. मणियों की भूमि (फर्श) धनाना, योगाः, माल्यग्रन्धनविकल्पाः, शेख. शय्या का रचना, जल का याजा, रापीदयोजनं, नेपथ्ययोगाः, फर्ण उदकघात, चित्रों का योग करना, पनमा, सुगन्धयुनिः, भूपणयो- फूलों का गूंथना, मुकुट यमाना, जनं, पेन्द्रनालं, कौतुमारयोगाः, नेपथ्ययोग (अलहार धारण) कर्णः हरतलाघवं, चित्रशाकापमक्षयि- भूपण रचना, अतर निकालना, भू. कारनियाः, पानकरसरागासवयो वों की योजना, इन्द्रजाल, कामो. जनं, सूचीकर्म, सूत्रकोड़ा, प्रहेलिका, हीपन करना, हाथ की फुर्ती, घि प्रतिमाला, दुर्घचकांगा, पुस्तक चिन शाक पूआ इत्यादि भक्ष्य पाचनं, नाटकाख्यायिफादर्शनं, का- पदार्थों की किया, टंडाईरस अनेक व्यसमम्यापूरणं, पट्टिकार्यवाण- प्रकार के रङ्गयुक्त आसय बनाना, विकल्पाः, तर्ककर्माणि, तक्षणं, वा. दर्जी का काम, सूत्रकीड़ा, पहेली स्तुविद्या, रूप्यरतपरीक्षा, धातु. घनाना व जानना, माला समतुल्य वादा, मणिरामझानं, याकरशान, कुछ बनाना, दुर्वचफयोग, पुस्तक वृक्षायुर्वेदयोगाः,मेषकुक्कुटलायक- चाचन, नाटक की कथा का दिखाना युद्धविधिः, गुफसारिकाप्रलापन, काच्य समस्या पूर्ति, पट्टी बेत और उत्सादनं, केशमार्जनकौशलं, अक्षर- थाण इनकी रचना, तर्फकर्म, वदई मुष्टिकाफथनं, प्लैच्छितकुतर्कषिक- फा फर्म, घर यनाना, रुपारत्न ल्पा, देशमाषाज्ञानं, पुप्पशकटिका. परीक्षा, धातुओं का कहना, मणि निमित्तमान, यन्त्रमातृका, धारण- रंगशान, सानो का झान, वृक्षों मातृका, संवाच्यं, मानसीकाव्य- आयुर्वेद का योग, मैदा, मौतर, मिया, अभिधानकोशः, छन्दोज्ञानं, व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१७] स्वर्गीयवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाश्च । हिन्दी। संस्कृत । मुगी इत्यादि लढाने की रीति, तोता कियाविकल्पा, छलितकयोगाः, च. मैना का धुलावना, पानान्तर दुर्ग स्त्रगोपनानि, शुनविशेषः, आकर्प- फरण, केश मार्जनकी चतुराई, मोड़ा, बालमोहन कानि, वैनायिका. अक्षरों से और मुटिका से कथन गां चैतालिफानाञ्चविद्यानांशामिल अशुद्ध तर्क रचना, देशभाषा शान, तिचतुःपष्ठिः फला.. फूलों की गाड़ी बनाने की क्रिया, यन्त्रों के निर्माण की विधि, धारण करने की विधि, समय की कहना मानसी काव्यक्रिया, अभिधानकोष छन्दशान, अनेक क्रियाओं का करना छलने के उपाय, धस्त्र रक्षण, जूआ विशेष, भाकर (सींचनेकी) फ्रीड़ा पालको केसिलोने धनाना, वैनायक (विभक्ती) और वैतालों की विद्या का सान ये चौसठ कला ई. जो इन ऊपर की कही हुई कलाओं य पता उपरोक्ताकलाश्चतुःपछिदिघसे को ६४ दिन में पदलेते हुए और जो प्येवाधिजगे, यः पञ्चहायनागोवर्द्ध- पांचवर्ष के गोवर्धन पहाड़ को उ. नगिरिमुत्पाटय फनिधिकयासादि- सादकर कानी उंगली की नौक पर यसपर्यन्तं दधारग्रजवासिनश्चन्द्र- धारण करते हुए और इन्द्रके डर प्रासाद ररक्ष तमाधुनिका शुद्रम- से प्रजवासियों को बचातेहुए उन तयः मनुष्यं मन्यन्त इतितेपांमति. को आजकल केमन्दमति "मनुप्य" नमः मानते हैं यह उनकी भूल है. तीन ताप -माध्यात्मिक, आधिभौतापायः आध्यात्मिकः, आधिभौति- तिक, और आधिदैविक. फः, याधिदैविक इति.

[११८] AA -~- सादशोऽध्यायः । सायवृत्तान्ताः, धर्मसम्बन्धिनाइनेविषयाश्र। हिन्दी। संस्कृत । नीन प्रकारके यम है-सञ्चित,प्रारब्ध, निविधंकर्म-सश्चितं, मारब्धं, क्रिय- और क्रियमाण. माणञ्चति. नान अवग्या दहको चाल, युवा और अवस्थास्तिम्रोदेहस्य-वाल्यं यौवन, धा- धन्यवेति. वृद्ध . चारवंद , यजु', साम और अथ- चत्वारो वेदाः यजुःसामाधति. च है. उपवेद भी चार है ऋग्वेदका आयु- उपदा अपि चत्वारः -ऋग्वेदृस्यायुर्वेदः चंद, यजुर्वेदया धनुर्वेद, (शस्त्र यजुर्वेदस्य धनुर्वेदः (शस्त्रविद्या) विद्या) सामवेद का गान्धर्य (गान सामवेदस्य गान्धर्वः [गानविद्या] विद्या) अथर्य या स्थापत्य (शिल्प अथर्वणवस्थापत्यः [शिल्प] , विद्या.) दश उपनिपन कौन से है? दशोपनिषदः के? ईश केन, कठ, मण, मुंडक, मांडूक्य, | ईशकेनगठमष्णमुण्डकमाण्डूक्यतत्ति- तैत्तिरीय ऐतरेय, छान्दोग्य, वृहदा रोयैतरेयछान्दोग्यवृहदारण्यका द. रण्य, दश उपनिषद् हैं. शोपनिपदः. अठारह स्मृतिया के नाम लिसो. अष्टादशस्मृतीनां नामानि लिख. मनु, अत्रि, विष्णु, हारीन,, मनु, अनिः, विष्णु, हारीतः, याशय- उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्च, स्पया, उशना, अहिराः, यम', आ मवर्त, कात्यायन, वृहस्पति, परा पस्तम्ब', सपर्तः, कात्यायना, वृह- शर, व्यास शस, लिखित, दक्ष, स्पतिः, पाराशर, व्यासः, नासा, गौतम, शातातप, वशिष्ठ इन २ लिपिता, दक्षः, गौतमः,शातातप., नामक ऋपियों से बनाई हुई स्मृ. घशिष्टः, इत्येतनामभिः ऋपिभिः ति जाननी. प्रणीता स्मृनयो शेयाः. द्विजातियों के १६ सस्वार वर्णनकरो. द्विजातीनां पोडश संस्कार वर्ण्यन्ताम्. याक्षघल्क .

[१९] व्यावहारिकसस्कृतप्रबोधः। स्वर्गीयचान्ताः, धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविपयाश्च । हिन्दी। संस्कृत । गंभीधान, पुंसवन, सीमन्त, जातकर्म, | गर्भाधान, पुंसवनं सीमन्तो जातकर्मच, नाम क्रिया, निक्रम, अन्नप्राशन, प. नामक्रिया निष्क्रमोऽन्नप्राशन पवन- वनक्रिया कर्णयध, व्रतादेश, वेदा किया। कार्णवधानतादेशो वेदार- रम्भ क्रियाविधि फेशान्तःस्तान, म्मक्रियाविधिः केशान्तःस्मानमु- उद्वाह, विवाहाग्निपरिग्रह, प्रेता बाहो विवाहाग्निपारग्रहः प्रेतासि- अग्नि सत्रह ये १६ संस्कार हैं. संग्रहथेव सस्कारापोडशस्मृताः. अठारह। पुराणों के नाम सुनो. अष्टादशपुराणानां नामानि शुणुन. ग्रह्यपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण शि- महापुराण, पद्मपुराणं, विष्णुपुराण वपुराण, श्रीमद्भागवत या देवी शिवपुराण, श्रीमद्भागवतं देवोभाग- भागवत, प नारद पुराण, मार्कण्डे चतं वा, नारदपुराणं, मार्कण्डेयपु यं पुराण अग्नि पुराण, भविष्यपुराण, राणं, अग्निपुराणं, भविष्यपुराणं, प्र. चलतपुराण, लिंगपुराण, पारीह प्रवैवर्तपुराणं, लिङ्गपुराणं चाराह- पुराण, स्कन्दपुराण, धामनपुराण पुगणं, स्कन्दपुराणं वामनपुराणं । पूर्मपुराण, मत्स्यपुरीण, गपुरीण कूर्मपुराणं, मत्स्यपुराणं, गरद्दपुराणं और ब्रह्माण्डपुराण ये अठारह पु. ब्रह्माण्डपुराणञ्चैतान्यष्टादशपुराणा' नि. साने की चीजें के प्रकार की है ? भोजनपदार्थाः कतिधाः? चाटे जाने योग्य, चौंपने योग्य, पीने लेहां, चोप्य, पेय, भक्ष्यं, भोज्यं, चऱ्या- योग्य, साने योग्य, चायने योग्य ये मिति पधा. छः तरह की है. नौ रत्न सुनिये. नवरतानि थ्यन्ताम्. मोती, सुवर्ण, धैर्य, पराग, पुष्पराग मुक्ताफलं हिरण्यञ्च, वैदूर्य, पद्मराग, और गोमेद, नीलम, गायत्मत तस- पुष्परागञ्च गोमेद, नील, गरुत्मतं, ही प्रचालये नौ रल फह है. तथा प्रवालयुक्तान्युक्तानि महारता नि नय. राण हैं.

व्यावहारिकसंस्थतप्रबोधः । [ १२१ ] स्वीयवृत्तान्ताः धर्मसम्बन्धिनोऽनेकविषयाश्च । गग', हिन्दी। संस्कृत्त। मांग में सिंदूर, भाल में तिलक, सीमन्तका(शिरसि सिन्दूरधारणम्) ठादी में निलक लगाना, मेहदी भालतिलक', चिलुकतिलक, हस्त. लगाना, आभूषण पहरना, पुष्पधा रअनम्, आभरणधारणम्, पुष्पधा रण, सुगन्ध लगाना, मुखराग, अ. रणम्, सुगन्धलेपनम् , मुखरागः, धरराग, चन्दन अंग में लगाना, ओठरागः, चन्दनलेपनम्, दशन दान्त रंगना, काजल लगाना. कजलनिवेशनमित्यायः घेद के अंग ६ ६-१ शिक्षा में वर्णस्या- वेदस्याङ्गानिषट्-प्रथम शिक्षा यस्या नोशार वर्णन, २ कल्प में कर्म करने वर्णस्थानोचारवर्णनम् । द्वितीय की रीति, ३ व्याकरण में शब्द कल्प. यस्मिन् कर्मकाण्डरीतिः, १. सिद्धि और शुद्धता का वर्णन, ४ तीयं व्याकरणम् यस्मिन्शब्दसिद्धि. निरक्त में घेद के कठिन शब्दों का शुद्धतापर्णन, चतुर्थम् निरुत य मर्थ वर्णन, ५ छन्द में अक्षर और स्मिन्यदस्य गूदशब्दार्थाविवर्णनम् मात्रा के वृत्तों का वर्णन, ६ ज्यो. पञ्चमं छन्दः यस्मिन्नक्षरमात्रावृत्त. निष में गणितादि वर्णन, घर्णन पष्ठं ज्योतिष यास्मिन्गणिता. दिवर्णनम् . योनि चौरासी लाख है-जिनमै जलचर चतुरशीनिलक्ष योनयः, यासु जलचरा. मौ लाख, मनुष्य चार लाख, स्था- नवलक्ष, मनुष्याः चतुर्लक्ष, स्था. पर सत्ताईसलाख, कृमि ग्यारह घरा' सप्तविंशतिलक्ष, कमय एका लाख, पक्षी यश लाय, चौपाये दशलक्ष, पक्षिणो दशलक्ष, चतुष्पा तेईस लाख दाप्रयोविंशतिलक्षमिति.

दवाखाना औषधालयः. [ १२२] अष्टादशोऽध्यायः। अठारहवां अध्याय-अष्टादशोऽध्यायः। रोग इत्यादि का वर्णन-रोगविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। 1 हिन्दी। संस्कृत। रोग रुक, रोगः, गदा, मामयः. | कोड़ कुष्ठः-छम् , श्वित्रम् ,मण्ड- शफामाना चिकित्सालया. लकम् लकुआ घातरोगः, अर्धा पुषार ज्वर:. विचिका. जाड़ा शीतज्वर.. जिरियान | प्रमेहः, मेहः: - दधा अगदः, भेषजम् , भौषधम् पेरजारी कफ प्रदरः [स्त्रीरोगः]. कफा, श्लेष्मन् पु.] होना मायुः, पित्तम्. घाघ प्रणः, इमम् , भकः. घात यात. आतशक, विस्फोटका, शीतला, म. सूजाक उपदंशः शीतला सूरी-रिफा. खदुखना अक्षिशूलम् , चक्षुःपीड़ा. खांसी कासः क्षयधु.. अफ़रा यानाः. सङ्ग्रहणी, प्रवाहिका. क प्रच्छर्दिका, पमिः, वमथु.. शिरकादर्द शिरोदना. पनाफेसार रक्तविकारः. दतिकादर्द पन्तयेदना. पदमी मन्दाग्निः कानकादर्द कर्णधेदना. खुजली फणः, खन्न पथरी अश्मरी. दा मुनकच्छम. शूलका दर्द शुलम्. मृगी भपस्मार, पीनस मतिश्यायः, पीनस: फीलपाया सीपदम् , पादचल्मीफम्, -राजन शोधः शोफा. हकीम वैधः, भिषा, चिकित्सकः, फोदा फुसी, विस्फोटकः, पिटका. हुचकी हिक्का. पियार पादस्फोटः, विपादिका. ठीक छिका. वत कोद। रिलासम्, मिम्मम्. प्रण.,क्षतः , घघासीर अशी. - व्यावहारिकंसंस्कृतप्रबोधः! [ १२३] रोग इत्यादि का वर्णन रोगविशेषाः। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। शिरामोक्षः मालूम भोगना उपभुक्त, विहसते, क्लिश्यते होना (दुख) पाड्यते, तप्यते. फूटना घढ़ना वर्धते, एधते. फोड़ना মানো विदारयति. भा-प्रति-भाति, श्यते ल. श्यते. स्फुटति, दलति, स्फोटयति दलयति. हिन्दी। संस्कृत। कोई दयावाना और शफारनाना तुम्हारे स्तः कौविदोषधालयचिकित्सालयौ शहर में है. बहुत है. भवदीयपत्तने.पहवस्सन्ति. यह रोजमर्रह कमजोर होता जाता है प्रतिदिनमयं निर्वलो जायते ऽस्य रजः इसके रोग का किसी होशियार केनापि सुशिक्षितेन पधेन चिकि- हकीम से इलाज करामो और मा सांकारयानुकुलामौषधिशापय. क्ल दवाइयां दिलाओ. यात पिस का इनके ज़ोर होनेपर जय यातपित्तकफानां घेगे साते यदा स- सन्निपात हो जाताहै तभी हकीम निपातो जायते तदैव वैद्यस्य बुद्धि- की अल्लामन्दी देखी जाती है. कौशलं दृश्यते. मैं एक हफ्ते से जाड़े बुखार में मुस्ति- अहमेफसप्ताहाच्छीतज्वेरण क्लिश्ये. क्या तुम्हारा येटाभी शिरमें फोड़ो से कि तय पुत्रोऽपि शिरसि विस्फोटकैः पीड़ित है. परिपात्यते. पांचदिन से देवदत्त को खांसी और भापञ्चदिवसेभ्यःक्षवद्युमन्दासिन्य दे. मन्दाग्निदिक कर रही है. घदत्तम्बाधते. कमज़ोर आदमी की फस्त कभी न खोले. दुर्वलस्य शिरामोक्षो कदापिन कुर्वीत. यह विचारा मुसल्मान दस्त, खून फि- ययनोऽय घराकः संग्रहण्या, घमधुना, साद और खुजली से दुसी है. रक्तविकारेण केल्याच परितप्यते.

[ १२४ ] मटायशोऽध्यायः। रोग इत्यादि का वर्णन-रोगविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। इसने ज्वर में बटाई खाकर सय श- मनन ज्वरम्लतामस्वा सर्व शोधः रोर में सूजन करली. हमारा कमलसिंह भी शल, जुकाम असरकमलसिंहोऽपि, शूलेन,प्रतिश्या. गौर प्रमेह से दुखी है इसको रोग येन, महेनच परािलश्यतेऽस्थरोग. शान्ति डाक्टरी इलाज सेहो दोगी शान्ति रालोचकित्सयप भविष्य. पैसा मालूम होता है. तांत प्रतिभाति. रामदत्त के पानी में बड़ी पिपाई है. रामदत्तस्य पादयो महस्या विपाविका- स्सान्त. इस सालतो खुदाके फ़जल से हैज़ा | अस्मिन्यवांश्वरकृपया पिसावकारा- और मरीरोग नाम कोभी नहीं सुना. गोमदामारोशंगधनाम्नाऽस्पेन भुत रामसिंह के शिर में पड़े फाड़े है इन- रामसिंहस्य शिरासमहान्त [अधिकाः] को शफाखान में जाकर चिरयाओ. पिटकास्सन्ति एमांचिकत्सालय. गत्या विदारय. मेरा फोड़ा रात में फूटगया. मम स्फोटको रात्री अस्फुटत्. क्या इस बीमारी का कोई इलाज है. [ भास्त काचिचिकित्साऽस्य रोगस्यो देवदत्त फ़ोतो की सूजन व हिचकी की यदसो पृषणशाधन हिफारोगेण च बीमारी से पीड़ित है। लीलावती योडिसोस्ति । लीलावती वातरोगण पायरोग से और पैर रोग से प्रदररोगणच परितप्यते. यह मनुष्य सफेद कोढ़ में मुसिला है. किलासमस्तोऽयअनः. किलास क्या कोदकाहीयइएक भेद है, किलास फिम् । कुष्ठरवायमेको भेद मेरी बाँह में एक धाव है. महाहावको प्रणः वर्तते. ग्यारह दिनों में मैं नेत्र पीड़ा और दाँत | एकादशंभ्यो दिनभ्योऽयमशिलन्द का दर्द भोग रहाह. न्तपदनाचोपभुजे. मेरा दुश्मन सूजाक जलधर और मग मम शत्रुरुपदंशजलन्धरभगन्दगोदाम न्दर धारद रोगों स पीड़ित है. गः पीडितोऽस्ति. pdf ध्यापहारिफसंस्कृतमयोधः । [ १२५ ] रोग इत्यादि का वर्णन-रोगविशपाः। हिन्दी। संस्कृत। फेदारसिंह जाट सिरके दर्द और पवा- केदागसिंहोजः शिरोवेदनयारोगेण सीर से दुखी है. च.परितप्यते. अंग्रेजी डाक्टर ने कल कृष्णसिंह की ! आङ्गलबद्या स्यः कृष्णसिंहस्यापमरी पथरी निकाली. निरकाशयत् . भूगी का रोग बड़ा भयङ्कर होता है | अपस्माररांगो महन्द्रयङ्करो भवति सो- यह आरा और पानी को देखकर ऽग्निजलचराष्ट्रधत इतिश्रुनमसामिः पढ़ता है यह हमने सुना है. पादवल्मीकवालारोगी भाषामें फोल- पादवल्मीकयान् रोगी फीलपाय इति पाँव कहलाता है. भाषायां कथ्यत. और भी बहुत से रोग हैं अन्य पड़ने सन्त्यन्येऽपि बहवो रोगाप्रस्थभूयस्थ केरसे नहीं लिखे. भयान लिखिताः. उनीसवां अध्याय-एकोनविंशोऽध्यायः। औषधि के तौल और औषधि का वर्णन-औषधिविशेषास्तन्मानविशेषणश्च । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। लयम्, देवकुसुमम्. मनिहारी सौघर्चल. सौट शुण्ठिः-पठी, विश्वा-श्वम्. मिर्च मरीचम् , कालकम् रक- सेंधानमक सैन्धयः-धम् . यावा भेदी अस्य] सांभर रोमकम्, वसुकम्. पीपर पिप्पली, कणा, घेलजम् फाला पाक्यः, विडम्, सारम् जीरा जीरक:-कम्, जरणः, स- [धारी. सफेद जाजी. हिगुन] अतुकम, राम- काला सुपवी, कारवी, उपकुचिका. उम्, पालिकम्.. साफ शताहिका. हरीतकी.. " [ १२६ ] एकोनविंशोऽपयायः। औषधि के ताल और औधि का वर्णन-आधिविशेषास्तन्मानविशेपाश्चा हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत। " छोटी , १ मामल शिया. घनिया छत्रा,धान्याकम्, धन्याकम्। यहड़ा यभीतका. चलगिरी विल्यमजकः, आधिजाफ- लम्. मांग | मजकः. अवाखार यवक्षारः ययजा. घड़ी पला, निकुटि:. हलदी हरिद्रा, काञ्चनी, पीता. इलायची चाला पयोनाद: त्रिपुटा, तुत्था. पान ताम्वूलम्. अद्रक आद्रकम्, मयेरम्, गु- चूना चूर्णकम्. ल्ममूलम्. कत्था खदिरम्. भाद्रम्, माक्षिकम्, मधु मुपारी [न०] पूगम्-पूगीफलम्. मधुकोपः, करण्डः. कमलगट्टा अरविन्दवाजकम्, सिरका सालेयः, मधुरिका. शुक्तम्, शौक्तिकम्. अजमाइन, यक्षधूपः, राला. भांग जया, भाता. कस्तूरी आम्रचूना-ण मृगमदः, कस्तूरिका. अमचूर गावजचा गोजिह्वा. गिलोय अमृता, गुइची. अगर अरक रसा, द्रयः, आसव:. असगंध अश्वगन्धा. काढ़ा काथा, कपाया, खसखस खाखसम्. चटनी अवलेहः केशर घुरणम्, कुडकुमम्. मिश्री सिताखण्डः, खण्डमोदका. कर्पूरम्, घनसार.. दारचीनी त्वचा. चन्दन मलयजा, भद्रश्रीः, चन्दनः, यत्रा स्यक्क्षीरी, घंशरो [लो]- लाल पत्राहम्। । रक्तचन्दनम्. लोचन चना. अफीम मदिनम्, अफैनम्. नागरमोथ, मुस्ताभम्. जथासा यासः,पवास, धन्वयासः. मुनका शुष्कद्राक्षा, गोस्तनी. फिटकरी स्फटी, तुवरी, सौराष्ट्री. जायफल जातिफलम्, जातीफलम् .चौटनी गुजा, कृष्णला. - अगरु. - कपूर .

व्यावहारिकसस्कृतप्रयाधः । [१२७] MK-4 औषधि के तौल और औषधि का वर्णन-औषधिविशेषास्तन्मानविशेगश्च। संस्कृत। कुडव:- प्रस्थ तुत्थम्. शगयफम्. गन्धक जस्तका- तुला. हिन्दी) संस्कृत। हिन्दी। । पारा सूता, पारदः चपल.. १६ तोलें- अभ्रक अम्रजम् गिरिजामलम्. (आवसेर सुरमा स्रोतोजनम्, सौवीरम्, ६४ तोला यामुनम्, थानम्. १ सेर तूतिया ३२ नोला गन्धाश्मा, गन्धि-(ध)कः, सर १०० पल रीतिपुष्पम्, कुसुमाञ्जनम् . सुर्मा हरताल पिअरम्, पीतनम्, ताल- रुपया म्, हरितालम्. पैसा शिला शिलाजतु, गैरेयम्, अश्म- ५ प्रस्थ जीत जम्. सिन्दूर । सिन्दुरम्, नागसम्भयम्, धारमन मनसिल मनःशिला, नागजितिका. २ द्रोण चा सजी सर्जिकाक्षार', सुजिका. क्षार:. ३मनसा २० तुला कापीपणः, कार्पिक.. पणः, ताम्रखण्डम्. आदकम् (५ सेटक.) ८आटक द्रोणः. २मन खार खारी., मानचिशपाः, २शूर्पवा द्रोणी या भार.. ४मन घाइ:. ८मन कांटा एपणी, पपणिका, नाराची. ४भारघर तोल मानम्, भार, तोला परि- माणम्. बाट तुला, घट: तुलायन्त्रम् . तोलना १ तोला फर्षः, तोला इकट्ठा क- टद. रना घण्टक'. तोलयति. सचिनोनि. ४ तोले - [१२८ ] एकोनविंशोऽध्यायः औधि के ताल और औषधि का वर्णन-औषधिविशेषणस्तन्यानविशेषणश्च । हिन्दी। संस्कृत। गरम मसाले के लिये लौंग कालीमिर्च ऊष्णयसबारा लवानि कृष्णमरी- जीरा और इलायची लामो. चानि जीरकमलाश्चानय. सौंठ, मिर्च, पीपल, दोनोरे, सधा नमक शुण्ठि, मरीच, पिप्पली जीरके तु से. अजमोद और हांग इकट्ठाकर हिंग्या न्धवमजमादं हिगुच पिण्डीकृत्य एक चूर्ण बनता है। हिड्ग्यष्टकाभिधचूर्ण सम्पद्यते. सौफ विना पूपअच्छे और स्वाद नहीं | शताहिकाम्चिना पूपाः शामना सुम्वा होते. दवो या न भवन्ति. शहद के साथ अदरक मोसो दूर कर सक्षादमादक फासहरम् . नघाला है. बड़ी हर, बहेड़ा मामल मिलाकर भिवृहरीतकी विभीतका मामलकाः फला और मोठाम गोपल मिला. पिण्डोकल्य त्रिफलेति शुण्ठिमरीच- कर त्रिकुटा कहलाती है. पिप्पल्यः त्रिकुदति शायते. पांच नमक सेंधा, सांभर, काला,मांना पालपणानि सैन्ध्रवं,रोमक, विडं, सौ हारी, खारो धरह होते हैं, क्षारमित्यादीनि सन्ति. मिश्री, पशलोचन, छोटी इलायचो | सिता स्वक्षीरी, त्रिपुटा, पिप्पली, पोपर [छोटो] दालचीनी, गिलोय. दारचीनी अमृतासार पता पिण्डी- सत ये काही करके हलके दुखार हत्य मन्दज्यरान धुभुक्षावर्घनश्च के दूर करने वाला, भूत्र बढाने सितोपलादिचूर्णम्भवति. पाला सितोपलादि चूरन होता है. धैगन के शाग केलिये एक पैमेकी ल- वृन्ताकशाकार्थमेकस्य पणस्यानचूर्ण- टाई लामो.. नमक के साथ अनारका बोरटा, या सलधणः दाडिमन्य सालेयोऽपि था अजमान भी सांसो दूर करने- क्षवथुरा वाली है. इस छसे में शहर है या नहीं, अस्मिन्मधुकोप मध्यस्ति न वा. क्या गांग भी भूखलगानेवाली है। किजयापि बुभुक्षा दायिका. घचल, मानय.

~ Ana" व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ १२९ ] औषधि के तौल और औषधि का वर्णन-औषधिविशेषास्तन्मानविशेषाश्च। हिन्दी। संस्कृत। है ना मगर अकल को गुम करने अस्ति तु परञ्च बुद्धिहरा. वाली है. पञ्चभद्र गिलोय, पित्तपापड़ा, सौंठ, पञ्चभद्रस्य काधोऽखिलज्वरहरी भ. नागर माथा चिरायता) का काढ़ा वति. मय युगारों को दूर करनेवाला है. सिरफे की चटनी दीपन और पाचन है. शुक्तस्यापलेहो दीपकः पाचनया आलूबुखारा और मुनका प्यामबुझाने बौखागलुका गोस्तनो च तृशान्त्यर्थः कालय दियाजाता है. दीयते. चलगिरी दस्तों में हित होती है. चिल्वमन्जक सग्रहण्यां हिनम् . कोरे के काटन पर सिरके का लेप फौटक्षते शुक्तम्य लेपो युक्तः याग्य है. पेशाब बन्द होनेपर मिश्री सहित ध. मूत्रावरोधे ससित धान्याक जले पिट्टा निया जल में पामफर भार कपड़े पटे गावयित्वा पिबेत् . में छानकर पीये. सुपारो चून कत्था सहित पान मनुष्य स गचूर्णरादिर ताम्बूलं जन साधते. पाते है. फ्या चौलाई भी प्रत में हे? तो. किं पयोमाटोऽपि मतेऽस्ति अम्तितु. फ्या कमल गट्टा भी कोई दवा है ? अस्ति काचिदापधिररविन्दवीजक न मालूम. मपि न जाने. और दवाओं के भी नाम पताओ. अन्यासामप्योषधीनां नामानि कथय, राल, कम्तरी, जायफल, अगर, अस. यक्षधूपः, मृगमद., जातीफल, अगरु, गन्ध, सिर, पनयम, फेसर, म अश्वगन्धा. सिन्दूरं, सायस, ए- निसल, फिटकरी, कपूर, गिरंटी. कुम, मन शिला, तुरी. कापूर, पुन- सुर्मा, जस्तका सुमां, मिलाजीत, नेवा, स्रोतासन, रोतिपुष्प शिला. जयासा,चन्दन,लाद चन्दन,गाय जतु, यत्रास., मलयज', पत्राई, गो- जया, सल्लीसार, अफीम नॉटनी जिहा, सनिकासास, अहिफेनं गु. घगरह है. म्जेत्याटीनि सन्ति. - [१३० ] एकोनविंशोऽस्यामः। औषधि के तौल और औषधि का वर्णन-औषधिविशेपास्तन्मानविशेषाय। हिन्दी संस्कृत। इसी सिल्सिले में तोल भी मुनो. प्रसङ्गवशात् मानमपि शृणु. ६४ तोलों का एक प्रस्थ या सेर तालकानांचतु पष्ठेरक प्रस्थासेटको वा. १६ तोलों का एक कुड्य या पाघसेर. पोडशतोलकानामेकः कुडव [पावसेर]. ४ तोलों का एक पल. चतुणों तोलकानामेकः पला. तोले का चौथाहिस्सा टंक होता है. कर्षस्य चतुर्थांशएकः स्यात्. १ तोले का एकर्ष होता है. एकस्य तालकस्य एकः कर्षः स्यात् . ३२ तालोका एक शरायक होता है. द्वात्रिंशतोलकानामेकं शरायफम्. १०० पलों की एक तुला होती है. पलानां शतस्यैका तुला स्यात्. २० तुला का एक भार होता है. तुलाया विशतेरेको भारः. ८चावलौकी पफ रत्ती होती है. अराक्षतानामेका रक्तिका भवति. ८ रत्तियोंका एक मासा. अपरक्तिकानां (गुजाना) एको माप:. १२ मासों का एक तोला, पांच तोला- | शादशमापानामेकस्तोलका, पञ्चतोल- की एक टोंक, सोलह छटाँको का कानामेक छटका, पोडशच्छटका. एक सर, ४० सेर का एक मन. नामकस्सेटफा, चत्वारिंशत्लेटका- नामेको मण. यह आजकल की तोल है. एतत्याधुनिकम्मानम्. उपधातु भी दशाओं में इस्तमाल की- उपधातयोऽपि भोरभिषु प्रयुज्यन्ते. जाती है. चान्दी, सोना, पीतल, तामा, लोहा रजतं, रुम, पित्तलं, ता, लोह काँसा,सीसा, पारा, भुराभुत्तिा कास्य, सीसं,स्तं, अभ्रक, तुरधे, ग. या, गन्धक, हरताल घगरह जला न्धकं, पिअरमित्यादीन् , दगघेतेषां कर इनकी खाक मुख्तलिफ रोगों में भल घिविधेषु गदेषु प्रयुअन्ति हकीम काम में लाते है. वैद्या. यह पुरुष अफारे से पीड़ित है इसे मानाहेन पीडितोऽयजन एनं भिषज हकीम को दिललाभो. प्रदर्शय. .

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ १३१] औगध के तौल और औषधि का वर्णन-औषधिविशेषास्तन्मानविशेषाश्च । हिन्दी। संस्कृत। जस्त कासुमा आंखों के लिये घड़ालाम रीतिपुष्पमाक्षिभ्यां महदुपयोगिभवति. दायक होता है. लगूर शिलाजीत खाता है इसी सवय दीर्घलाइगूलः शिलाजत्वत्ति अत पव बहुत दूर कूदजाता है और जो स महदन्तरमुत्प्लवते यद्यशक्तभि- अपनी चाहीहुई जगह को पाने में दिएस्थानमाधिगन्तुं तर्हि पूर्वस्थान नाकाबिल होता है तो पहिली ही एव पुनरावर्तते इति श्रुतं. जगह पर फिर लौट आता है यह सुना है. शहद की मक्खी फूलों से शहद बटो- सरयाः पुष्पेभ्यो मधु सञ्चिन्चन्ति. चीसवां अध्याय-विंशोऽध्यायः । , धन्यः -- विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन-विशेषणशब्दाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। भाग्यवान् | सुरुती (पुं०) पुण्ययान्, दाता दानशौण्डः, षदान्यः खुशदिल हर्षमाणः, प्रमनाः (पुं०) फैय्याज़ हटमानसः. मदेच्छा, महाशयः. उदार व्याकुल- विमनाः, दुर्मना.. साफदिल दियालुः, सुहृदयः, महो. चित्त त्साहा, महोद्यमः उत्कण्ठित उत्का, उन्मना. दक्षिणः, सरल, प्रवीण हो. निपुणः, ममिशः, विज्ञः,नि- सीधा शियार योग्य समर्थः, क्षमा, शक:- षणातः. फ़िकरमन्द सांशयिका, संशयापनमा- मशहूर प्रतीतः, प्रार्थता, ख्यातः, विश्रुतः. य . [१३२] दिशोऽध्यायः विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन-विशेषणशब्दाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । धनी इम्यः, आळ्या, धनवान्, पहरावा दीपमूत्री -प्रः, विलम्ची, सधन.. मन्दः, मन्थर गरीब निर्धना, दरिद्रः, दीन:. गजा गल्लाट. मालिक नायका, पतिः, अधिपतिः, कुचड़ा फुजा, न्युजः. नकटा विग्न', घिनुः, विनामिका दयावान् ! दयालुः, कृपालु,कारुणिका घौना खर्वः, द्वस्वः, यामन.. स्वाधीन स्वतन्त्रः, अपावृता. घपटी-ना अघटस्टः, नवनासिका, पराधीन परतन्नः, परायत्तः, कवाला आधान अधीनः, आयत्ता. लोभी गृनु' लुब्धः, अभिलाषुकः. अन्धा अन्धा, नेमविकलः, अदृक्. अति लोभी लोलुपः, लोलुभः. बहरा यधिरः,श्रोत्रयिफल',एडा, ढीठ धृष्टः, अविनीतः, समुद्धतः. काना चलिरः, फेफरः, काणः. यातहजीय | साम्या, प्रधितः, सुशीला, सुविनीतः. जसः लंगणा मतवाला मत्तः, शौण्डः, क्षीका, हफलागूगा थवार, मूकः. कामी कामुफा कम्रः, कमन का मयिता. आलसी मन्दः, अलसा, वश में रहने भूरा युभुक्षितः, क्षुधातः, क्षुधि- बश्या प्रणयः. घाला त', बुभुक्षुः. नम्रतायुनः निभृतः, प्रथितः. प्यासा पिपासितः,पिपासातः,पि. शरमिन्दा सलजा, मनीड़ा, सत्रपा, पासु. पिटमरू आत्मम्भरित लजालु. आम्तिक । श्रद्धालु आस्तिस्य. रानाला अार, भक्षका, घस्मर (श्रद्धावान्), द्धिमान, यदादुर घयड़ाया डरपाक प्रस्तः, भीगकः, भीतः, अधीरः, कातरः घदमाश शठ,, धूर्तः, कितवः. गुस्सेवर मोधी (पुं०) कोपी, क्रोधनः लुटेरा लुण्टाकः अमर्पणः. . . शूरः, यार.. १ ww व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः । [१३३] विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन-विशेषणशब्दाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। बहुम यो- वाचदृकः, अतिवत्ता. म. , , - जागनेवाला जागरूका. दिलपसद अभीष्टम्, अभीप्सितम् , सोनवाला निद्रालु, शयालुः, सुतः, हृद्यम, प्रियम् . शयितः, स्वराच निकृष्टः, प्रतिकृष्टः विमुर पराङ्मुखः, पराचीनः. གིས अधमा, कुत्सितः अवद्य.. गद्यः, लने वाला मैला मलीमसम्, फश्चरम्, निन्द्यवचन लिनम. वाचाल, चाचाट:, घोलीचाला पचित्र पृतम्, पवित्रम, मेध्यम. अंडवंड ब- रीता मुखरः दुर्मुखः अवमुखः. शून्यम, रिक्तकम, तुच्छम्. फनेवाला प्रधान प्रधानम्, प्रमुखः, उत्तमः, अतिमूढ़ अक्षा, जड़ा. वरेण्यः, चयः घुपचाप । तूष्णींशीलः, तूष्णीका. मामूली | अप्राग्रयम् . उपसर्जनम्, नंगा नग्नः, अवासाः (पुं०) दि. बड़ा पृथु (न०) विशालम्, वृह- गस्वर:. त्, महन् , विपुलम्, ठगा हुआ घञ्चितः, विमलब्धः. मोटा पीनम् , पीवरम, पीवन (10) ठग धूर्तः, वञ्चका, प्रतारका. स्तोकः, अल्पः, क्षुल्लका, चुगल पिगुना, दुर्जनः, यल: सूक्ष्म सूक्ष्मम्, लक्षणम्, कृशम्, मंगिता मार्गणः, यात्रा, यर्थी (पु०), तनु, अणुः, घमंडी अहंयुः, अहङ्कारवान्, बहुत प्रचुरम्, प्रभूतम्, अभ्रम्, मनोहर सुन्दरम्, रम्यम्, कचि. बहुलम्. रम्,मनाशम् , मञ्जुलम् |सघ विश्वम् करस्नम्,समस्तम्। कठोर नृशंसः, करा. अखिलम्, पूर्णम्. गाढायना धनम्, निरन्तरम्, सान्दम्, वस्तुविशेषणानि । पासका समीपः, भासन्नः, निकट:, दिलचस्प सुन्दरम्, रचिरम्, चार, यभ्यास-दशा, उपकण्ठः, मनोरमम. अन्तिकः.

-- -~- . फा टेका अकरा [१३४ ] पिंशोऽध्यायः विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन--विशेषणशब्दाः। हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत । नया बहुम पास प्रत्यप्रा, अभिनवः, नव्या, नेदिष्टम्, अन्तिकनमम्. नवः, नूतनः. विप्रायम्. मुलायम कोमलम् , मृदुलम्, मृतु. वाहून दूर वीयः, दपिष्टम्, मुरम्. फिल ध्यर्थम्, निरर्थकम्, मोघम्, दीघ,चौरा दाघम्, आपतम्. साफ स्पटम्,स्फुटम्,प्रव्यक्तम्, गोल वर्तुलम्, निस्तलम् . वृत्तम्. स्वच्छम्, निर्मलम्, उलटा ऊंचा उधः,मांशुः, उन्नतः, तुः प्रसव्यम्, प्रतिकूलम्, अ. छोटा वामनः, सर्वः, इस्व. पसव्यम्. अल्पार्थः,अल्पमूल्या,मुलभः मरालम्, जिनम्, जिह्मम् सस्ता कुटिलम, यक्रम. महर्षः, दुर्लभः. नित्य शाश्वतः, धुवा, सनातनः, पोटना महरति. मांगना प्राधियते,अभ्यर्थयते, याचते कठिनम्, रम, निष्ठुरम्, छलकाना- कठिन गिराना अधः क्षिपति, अवपात् यति. पुराना पुराणम्, प्रतनम्, प्रत्नम्, इदना अन्विप्यति, मृगयते, निरू- पुरातनम् , चिरन्तनम्. पयति, विचिनोति. हिन्दी। संस्कृत। सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रयोण महर्षि वशिष्ठ अखिलशास्त्रप्रवीणो महर्पिवैशिष्ठः व. अतिदानी परम पुन्यात्मा, उदार, दान्याय परमसुकृतिने, महेच्छाय, साफ़ दिल, भनवत्पल श्री रामजी भक्तवरसलाय श्रीरामाय शत्रुविजया- को दुश्मन की विजय रूप आशी मिकामाशिष दी. र्वाद देतेहुए. मैंने गोविन्द को हमेशा खुशदिल और मया गोविन्दः सदैव टमानसः सर्व. सब कामों में समर्थ देखा. कार्येषु क्षमन रष्टः मारना स्थास्नुः, स्थिरतरः. हदम्, कशः.

ww व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१३५ ] विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन-विशेषणशब्दाः । हिन्दी। संस्कृत। यह आदमी भूखा और प्यासा है इसो बुभुक्षितः पिपासितश्चायं जनः अत से घबड़ाया हुआ दिखाई पड़ता है. एव विमना इव लक्ष्यते. माजकल के बहुत से पिटभरू लोभी आधुनिका वहव उदरम्भरयो लालुपाः रात को फिजूल मानते हैं. पुण्यं व्यर्थ मन्यन्ते. यह तो पापियों की बात है. एपातु पापघस्सराणां वाना. मेरे काम की सिद्धि होगी या नहीं यों | मत्कायसिद्धिर्भविष्यति नवेति सांश- फिकमन्द ई. मैं आपके दर्शन के लिये यड़ा उत्क | अहमतीवोन्ममा आसं श्रीमतां दर्शना- ण्ठित था अव ईश्वर ने मेरी उम्मेद याधुनश्वरण ममाशा पूरिसा. पूरी की. यह मशहूर धनवान् बड़ा लोभी सुना- | विश्रुतो धनधानयं महगृनु श्रूयते. जाता है. रहीम मालिफ लोग गरीयों पर भी दयालवःप्रभो निधनप्वपिदयां कुर्वन्ति दया करते हैं. मैं तो खुद मुख्तार हूं और तुम परा- अहन्तु स्वतन्त्रस्त्वञ्च परायत पतावा- धीन हो इतनाही तुम्हारे मेरे में नेव हि रचयि मयि च भेदः. यिको ऽहम् . यहराधा और आलसी मत बने. दीर्घसूश्यलसश्च मा भय. गूंगे भी कलकत्ता राजधानी में पढ़ाये मुफा अपि कलिकातायां राजधान्यां जाते है. पाठ्यन्ते (म्फान् पाठयन्ति पा). यह यहाभला आदमी है इसको मत गो अतीव सज्जनोऽयजनो मैन प्रतारय. यातहजीव तालिवइल्म ही विद्या प्रश्रिता विद्यार्थिन एप विधां शिक्षन्ते सीखते हैं नकि बदतहजीय. श्रद्धालुही ज्ञान प्राप्त करता है दूसरानहीं, श्लद्धालुरेव शान लभते नेतरः. शरायो आर कामी यह आदमी रण्डी मत्तो कामुकश्चायञ्जनी घेश्यासमीप के पास बैठा है. तिष्ठति. न धृष्टाः विशाऽध्यायः। विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन-विशेषणशब्दाः। हिन्दी। संस्कृत। अधृष्टा धीग चेय स्त्रीपनांग्यश्वासय. यह ग्यो भलीमानल और घयहाई हुर है इसको तमाला दा. डरपोकही संग्राम से भागन है मकि यहादुर. दवदत्त का बेटा शरमाला और सते भीमका एच सनामाग्पलायन्ते नगरा:. देवदत्तस्य पुनो यस्यो कोधनध. गुणी है. सम्हार घरमें फोन जागने याला और न्हाय. तय गृहे को जागरूकः कश्चाऽतीय फोन ज्यादह सानवाला है. निद्रालु लजागम अपन मा चाप से धरापलाफ ! लज्जारामः पितृभ्यां पराङ्मु पा. निन्य वचन योलनेवाला और कटोर चालो नृशंसश्चास्ति मारय सहति है इसकी मगति न करो. मदं था औरत कोई भी जल में नंगान पुरुपो ऽथरा स्त्री न कोपि नसो जले स्नायात् टग ठगे हुओं को भी फिर उगते हैं. धूर्ता चिप्रलब्धानपि पुनर्यश्चयन्ति. यह आदमी युगल और अंडचंड घरुन पिशुनो ऽघद्धमुपश्वायजनः मैनं विश्व- पाला है इसका यकीन न करो. सिदि. गोविन्दगमशा यादह बोलनेवाला सभायोग्यो गोविन्दरामशर्मा धायक- और होशियार होनक कारण सपा स्वासिष्णातत्याय. के योग्य है. घमडी धार मैंगता सरकार नहीं किये अहंयया मागणाधन सस्तियन्त. जाते. || यह वाना चपटी नाफयाला है इस पर अवटीटोऽयं पामना मनमुपदस. न इसो. नाटे, बादरे, कुयड़े, लूले, काणे, गजे विमान्, यधिरान, फुलान्, राज्ञान, आर अन्धा फोदेसकरकभान हँसे. फाणान् खल्याटानन्य घना कदाप्युपहसेत् .

~- पय. मास. व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [१३७ ] विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन-विशेषणशब्दाः । हिन्दी। संस्कृत। यह खुशनुमा शेयर हं इसे अपनी औरत रम्यमाभूपणमिदमेतत्स्यस्त्रियं परिधा. को पहिगो. घुगल का कोई भी यकीन नहीं करता. पिशुनान्न कोऽपि प्रत्येति. लुटेरों ने अलीगढ़ मे लौटते वक्त मेरा लण्टाफा अलीगढ़ात्परिवर्तनकाले मम रास्ता रोयलिया. मार्गमवारन्धन. रामफे दूत हनुमान् रामके आने का रामदृतो हनुमान रामागमनस्याभीप्सितं अभीष्ट वृत्तान्त भरत के पास आ वृत्तं भग्तान्तिक आगस्य श्रावया- कर सुनाते हुए. तू सूना घर छोड़ कहां गया था? स्वं शून्यं गृहं मुफ्त्या कुन गतः? कही भी नहीं सिर्फ पानी लाने को. न पुत्रापि केवलं जलमानेतुम् . यह आदमी नीच है इसकी आदत बड़ी अधमोऽयअनोऽभ्य प्रकृतिरतीय नि. ग्वराय है ओर दिल भी बहुत मैला है. कृपा मान समप्यतीवमलोमसमस्ति. देखकर पाँव रक्स. छानकर जलपीये | दृष्टिपूतं न्यसेत्पाद घनपूताम्पवेजलम्। सत्य वचन घोले और मन साफ़ सत्यपृतम्बदेवाक्यं मनःपूतं समा. रफ्पे. चरेत्. सब व्याकरणों में सिद्धान्तकौमुदी अखिलेषु व्याकरणेषु प्रधानमिदं व्या- नाम व्याकरण मुख्य करणं सिद्धान्तकौमुदीनाम. आज गाढ़े यादल बहुत जल वर्षायेंगे, अद्य सान्द्रामेघाप्रभूतं वारि मोक्ष्यन्ति, दाजे पर एक भिखारी है उसको दाय्यका भिक्षुकोपर्तते तेस्ताकम्भोजन थोड़ा खागादो, उसके पास एकल प्रयच्छ, तन्समोरे चैका मनोरमा क्ष्मी की सुन्दर मूर्ति है उसे लेलो. मृर्तियततेना गृहाण. इस राजा फी यमो कीर्ति,मोटा शरीर अस्य रामो विपुलं यशः पानं शरीरं गोल मुँह चौड़े नेत्र ऊँचे फाधे है. पर्तुलं यनं, आयत में उन्ननायनी सन्ति. इसका थोडा हाल भी कहो. अम्ग मूक्ष्मं पृनर्माप यणय, [ १३८] विशोऽध्यायः विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णन-विशेषणशब्दाः। हिन्दी। संस्कृत। इसकी जगह से मरी जगह दूर है। अस्य स्थानान्मम स्थान दुरं, गोविन्दस्य गोविन्द की ज्यादह दूर है और रा दवीयो, रामसिंहस्य दविष्टमस्ति. मसिंह की बहुनही ज्यादह दूर है. जीव दो तरह के हैं स्थावर और जङ्गम. | जीया द्विप्रकारा म्यास्नयश्चरिष्णयक्ष. इस सवाल को तरकीय सहल है और अस्य प्राणस्य प्रक्रिया ऋज्वी नस्य च उसकी टेढ़ी है. मानी कर अपना पुराना और नयाँ कृपया स्वपुराणमभिनवञ्च वृतं स्पष्टं हाल साफ कहिये. कथयन्तु भयन्तः पहिले तो ब्राह्मणों की घाणी सफल | पूर्वदा तु विप्राणां चाचो ऽमांधा आस- थी आजकल तो उलटी होती है. निदानान्तु प्रतिकूला भन्ति. तप का प्रभाव नष्ट होगया यही का. तपःप्रभावों नष्ट इत्येव हेतु:. वका वर्तते, बंगन मुलायम पथ्य होते है और का वृन्तार्क कोमलं पथ्य कूष्माण्ड कोमल शी फल मुलायम जहर होता है. विषम्. क्या यह भैंस खल्लर (घांझ) है. किमेपा महिपी वशा. इसका ऐन बड़ा है इसको खूटे में अस्या ऊधस्तु विपुलमेनांशियफे वधान. बॉधो. गुरुओं की पूजा, साँझ और दिन में गुरूणां सपर्या, सायंकालेहच स्वापो मोना और स्त्रीप्रमंग, याने के आदि नाम्यधनिषेधश्च भोजनादावन्ते और अपार में आचमन और एका. चौपस्पर्श एकादश्यामन्नत्याग एप दशी को अन्नत्याग यह सदा का नियमः सनातनः फायदा है. सिपाही (अलाद) लोग उस ठग को राजपुस्था तं भूत धेरैः प्रहरन्ति. खेतों से पीटते है. गरीय लोगधनधानासनाज मागते हैं. दरिद्रा धनिकाननं याचन्ते, व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१३९ ] विशेषण शब्द इत्यादि का वर्णम-विशेषणशब्दाः। हिन्दी। संस्कृत । इस घोषी की लड़की ने दूधगिरादिया. पपा ऽऽभीरकन्या दुग्धमध्यक्षिपत्. देवदत्त उदासीन है न उसका किसी उदासीनो देवदत्तः नतम्य केनापि सह के साथ विरोध है न मित्रता. विरोधो न मैत्री. जो हुआ सो हुआ इसमै पछतावा फ्या. यजातं तजातं कोऽज पश्चात्तापा. दुनियाँ फे पाराण्ड और तमाशों को सांसारिकान्दम्भान्कौतूहलाँश्च हित्या छोड़ कर ईश्वर की शरण में जाऊं ईश्वरशरणे यायां नो निरयपातो नहीं तो नरक में गिरना होगा. भविष्यति. इस अफुगा पहेली और अकाल की इमां किम्बदन्ती प्रहलिकां दुर्भिक्षय- सवर को सुनकर मेरे देह मे शरीर त्तान्तञ्च श्रुत्वा मम शरीरे वेपथु- कम्पा होती है. र्जायते. तू कहां से आया तेरे कपड़ पसीनों कुत आगतोऽसि तव वस्त्राणि स्वेदै- से बहुत तर दिखाई देते हैं. रतीचार्टीभूतानि दृश्यन्ते. आज यहां ढोल बजते है यह क्या उ. अत्राद्य परहा वाद्यन्ते कोऽयमुत्सवः त्सव है न मालूम. न जाने. इकीसवां अध्याय-एकविंशतितमोऽध्यायः । व्याकरण के संज्ञा शब्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभापाः । अंग्रेजी। संस्कृत। अंग्रेजी। संस्कृत । Vonel Consonant Sliort Vonel - स्वरः, अच् Lengthened - व्यञ्जनम्, हल. Orthography लघुः,हस्वः, एक- Letter मात्रिका. Alphabet द्वि-ord मात्रका Noun निमात्रिका. वर्णविचार: वर्णः, अक्षरम् . वर्णमाला. Long Vonel दीर्घः, गुरु, 2 संज्ञा, नाम.

-~- %E [१४] एकविंशतितमोऽध्यायः। व्याकरण के संज्ञा शब्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभाषाः । अंग्रेजी। संस्कृत । अंग्रेजी। संस्कृत। Proper noun = व्यनिवाचका. 8 Interjection= विलापनादियो- Common Do जातिवाचकः, धकमव्ययम्: Abstract = भाववाचका, Gender लिगम्. Collective - समूहवाचका. M. Do. पुलिङ्गम् . Material पदार्थवाचका. F. Do. स्त्रीलिङ्गम्. Adjective = गुणवाचकः. N. Do. = लोयम्,नपुंमकम, Primitive word रूढिसशा. Com. Do. मंयुक्तलिङ्गम् Derivative यौगिका. उभयलिङ्गम् Compound योगरूढिः. Number = वयनम्. Tord Conjunction Singular = कवचनम. = सन्धिः, संहिता. Dual of letters द्विवचनम्. Do. Yowels स्वर(अ)सन्धिः.j Plural पटुवचनम्. Do.consonant= हल्(व्यजन)सन्धि- Case = कारकम् विभक्तिः Do. visarga - यिसर्गसन्धिः. Nominative कर्ता. Etymology शब्दविचारः Accusative कर्म. शब्दसाधनम्. Instrumental Inflection or करणम्. declension = शब्दरूपम्. Dative - सम्प्रदानम्. Derivative Ablative व्युत्पत्तिः, अपादानम्. Part of speech= शब्दभेदा. Genetive - सम्यन्धा. 1 Youn संहा, विशेष्यः, Locatite अधिकरणम्. 2 Adjectire विशेषणः गुणया- Vocative सम्बोधनम् . l'arying = पदसाधनम्, पद- 3 Pronoun = सर्यनाम. च्छेदः. +Verb = मिया. Person J Asli erb क्रियाविशेषणा. = उसमः (अहम्, GPreposition = उपलगः, अव्ययम्, आयाम्, पर्यम्). 7Conjunction = समुथायकम् यव्य 2nd = मध्यमः (त्यम्, यम्. युयाम्, यूयम्). %3D 34 %3D - 32 = पुरुप 1 st . " व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। १४१ ] व्याकरण के संज्ञा शब्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभाषाः । अंग्रेजी। संस्कृत। अंग्रेजी संस्कृत। 32 %3D %D Sid Person अन्यपुरुषः (सा, 3rd Preterite == लुङ(सामान्यभूतः) तो, ते इत्यादयः). Potential विधिलिङ् Transativo सफर्मका क्रिया. Bencdielive आशीर्लिङ् Intransitive अकर्मका क्रिया. 1st Future Verb haimg = द्विकर्मका:क्रिया:. लुट् (आसन्न two objects भविष्यत्) Causative प्रेरणार्थफाक्रिया, 2 nd Do. = लट् (सामान्य णिजन्ता. भविष्यत्) Desederative = इच्छार्थकाः, Conditional = लङ् (हेतुहेतुमन्द- समन्ताः. विष्यत्) Frequentative यङन्ता, ga:gImperative लोट् ( आशा). verbs न्यद्योतकाःक्रिया:. Direct = स्पष्टोक्तिः Nominal = नामधातवः. Indirect - वमोतिः. Yerbs Verbal Explanation - व्याख्या, यिवृत्तिः, affircs कृदन्ताल्प्रत्यया:. विवरणम् Nominal - तद्वितप्रत्ययाः. Abhreviation = संक्षिप्तरूपम् . affixes Root Llample रटान्तःउदाहरण Pronounciation उच्चारण:. Conjugation धातुरूपाणि. Voice Synonyms पर्यायः समाना. - याच्या, र्थवाची. Active फर्तृवाच्यः Passive कर्म Autonyms - विपरीतार्थयाची. Intransative Homonyms पर्थक Pasgive Compound -समास:- Tense - काल.. Indeclinable Present tense - घर्तमाना, लद. - अव्ययीभावः, compound Past % भूत. Subordinate Future भविष्यत्. compound * सरपुरुपः २ 1st Preterite = लङ् (आसन्नभूतः) Relative 2nd Do. लिए (पूर्णभूतः) compound यहुमीहिः३ = धातु " भाध" " D [ १४२] एकविंशतितमोऽध्यायः। व्याकरण के संझी गब्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभाषाः। y अंग्रजी । संस्कृत। अंग्रेजी। संस्कृत। C - गद्यम्. न Appositional Proody छन्दोनिरूपणम्. कर्मधारयः४ compounel Prose Numeral हिगुः५ Verse, poetry= पद्यम् compound Metre, stanza = वृत्त,छन्दोजातिः Coupulative compound = द्वन्द्वः६ Tect = चरणः, पाद: Poem Syntas वाक्याविचार:. काव्यम् Short syllable= ag:. Prose order = अन्ययः, Analysis = घाश्यविभागः. Long Do SSS - मगणः Sentence 3 चाक्या, पद- = नगणः Figures of %= अलङ्कारः SI specchi Do. words = शब्दासकार ISS - यगणः ISI -जगणः Do. thought= अर्थालङ्कारः, SIS = रगणः Siinile = दृष्टान्तः, उपमाल 15 मगण: द्वारः. SSI - तगणः Metaphor '- रूपकालकारा. विरामः Syneendochee= उपलक्षणः. डिविरामः iTyperbole = अत्युक्त्यलकार:. त्रिविरामः Analogy 3 सादृश्यालङ्कार. पूर्णविरामः Auictlıcsis = विरोधाभात. प्रष्णचिह्नम् Allegory उद्देशः सम्बोधनचिह्नम् Irony व्यङ्गानि फोष्ठः Personification पुरुषभाषारोपपाम्, ' परोक्तिचिन्हम् %3D .. 3 ? - व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [१४३] व्याकरण के संज्ञा शब्दों का वर्णन - व्याकरणपरिभापाः । हिन्दी। संस्कृत। इस अध्याय में संस्कृत के व्याकरण अस्मिन्नध्याये व्याकरणसाम्माङ्ग्लभा सारको अंग्रेजी भाषाके पढ़नेवाले पाध्यतॄणां छात्राणामुपकारार्थम्प्रा- विद्यार्थियों के उपकारार्थ प्रायःकुछ योऽनुसरामि. लिखता है. संस्कृत वैयाकरणतो अच्छी तरह जा- संस्कृतवैयाकरणास्तु समीचीनतया नतेही है. जानन्त्येव. वर्णमाला में कितने अक्षर है ? वर्णमालायांकत्यक्षराणि सन्ति. अकार से लेकर चौदहस्यर, ककार से | अकारादयःचतुर्दशस्वराः ककारादय- ले तेतीस व्यअन इस प्रकार मिला स्त्रयस्त्रिंशद्वयञ्जनानीत्येचं पिण्डी. कर ४७ अक्षर है. कृत्य सप्तचत्वारिंशद्वर्णाः. स्वर, इस्व दीर्घ प्लुत भेद से तीन स्वरा हस्वदौघप्लुनभदेन विधाः, व्य- प्रफारके और व्यअन भी स्पर्श, अनान्यपि स्पर्शान्तस्थोप्मभेदन अन्तस्थ और अम भेद से तीन म. निविधानि. कार के है. शब्द दो प्रकार का है सार्थक और शब्दो द्विविधः सार्थको निरर्थकच. निरर्थक. सार्थक शब्द संशा, क्रिया, अव्यय, भेद सार्थका शब्दाःसंहाक्रियाऽव्ययभेदेन से तीन प्रकार का है. त्रिधाः. चीज़का नाम मात्र बतानेवाला शब्द वस्तुनो नाममात्रप्रवक्ता शब्दः संप्रेत्य- संज्ञा कहलाता है. भिधीयते. वह छः प्रकार की है जाति वाचक जैसे सा पविधा, जानिवाचिका [यथाम- आदमी; व्यक्तिवाचक जैसे कृष्ण गुप्यः] व्यनियाचिका[यथा कृष्णः] भाव वाचक जैसे लघुना; समूह भायाचिका [यथालघुत्वम् ], स. याचक जैसे सेना पदार्थ याचिका मूहयाचिका [यथा सेना] पदार्थवा जैसे जल; गुणवाचिका जैसे सुन्दर. चिका [यथा जलम्], गुणयाचिका [यथासुन्दरः.]

[१४२] एकविंशतितमोऽध्यायः। व्याकरण के संज्ञी शब्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभापाः । अंग्रेजी। %3D %- अंग्रेजी। संस्कृत। संस्कृत। Appositional Prosods छन्दोनिरूपणम्. = कर्मधारयः ४ compound Prose = गद्यम्. Numeral द्विगुः ५ Verse, poetry= पद्यम् Compound Complaine fetre, stanza = वृत्तः,छन्दोजातिः - इन्द्रः ६ Fect l'ompound = चरण, पाद- Syntax वाफ्याविचारः, Poem काध्यम् Short syllable= लघुः- Prose order = अन्षयः, Analysis याफ्यविभागः. Long Do Sentence SSS -मगणः वाक्या, पदः. नगण: Figures of = अलङ्कारः s speech - भगणः ISS Do. words - यगणः शब्दालकारः 131 ='जगणः Do. thought= अर्थालङ्कारः. SIS %= रगणा Simile = दृष्टान्त, उपमाल IIS = संगणः कार: SSI - तगणः Atetaphor = रूपकालङ्कारः, विरामः Synechdochcc= उपलक्षणः. शिविरामः Ityperbole अत्युक्त्यसकारः, = विधिरामः Analogy 3 सादृश्यालङ्कार. पूर्णविरामः Anictliesig विरोधाभासः. प्रपाचिहम् Allegory उद्देशः? सम्योधनचिह्नम् Irony व्यशनि. कोठ Personification पुरुषमावारोपणम्. परीक्तिचिन्हम् %3D % 3D ! .

. व्यावहारिकसंस्कृतप्रवांधः। [१४३] व्याकरण के संज्ञा शब्दों का वर्णन - व्याकरणपरिभापाः । हिन्दी। संस्कृत। इस अध्याय में मस्रात के व्याकरण | अस्मिन्नध्याये व्याकरणमाग्माइग्लभा सारको अंग्रेजी भाषाके पढ़नेवाले पाध्यतृणां छात्राणामुपकारार्थम्प्रा- विधियों के उपकारार्थ प्रायः कुछ योऽनुसरामि. लिगता है. संस्कृत वैयाकरणतो अच्छी तरह जा- संस्कृतचयाकरणास्तु समीचीनतया नतेही है. जानन्त्येव. वर्णमाला में कितने अक्षर हैं ? वर्णमालायांकत्यक्षराणि सन्ति. अफार से लेकर चौदहम्घर, ककार मे अकारादयः चतुर्दशस्थराः ककारादय- ले तेतीस व्यअन इस प्रकार मिला. स्त्रयस्त्रिंशद्वथअनानीत्येवं पिण्डी फर ४७ अक्षर है. कृत्य मनचत्वारिंशवर्णाः. स्वर, इस्व दीर्घ प्लुन भेद से तीन स्वरा हस्वपिप्लुतमेदेन विधा, व्य- प्रकारके और व्यअन भी म्पर्श, अनायाप स्पर्शान्तस्थोप्मभेदन अन्नस्थ और ऊष्म भेद से तीन प्र. त्रिविधानि. फार के हैं. शब्द दो प्रकार का है सार्थक और शब्दो द्विविधः सार्थको निरर्थकश्च. निरर्धक. सार्थक शब्द संशा,क्रिया, अव्यय, भेद सार्थकाः शब्दाः संशाकियाऽव्ययभेदेन से तीन प्रकार का है. विधाः. चीज़का नाम मात्र बतानेवाला शब्द वस्तुनो नाममात्रप्रवक्ता शब्दः संज्ञेत्य. संज्ञा कहलाता है. भिधीयते. यह छः प्रकार की है जातिवाचक जैसे सा पविधा, जानिचाचिका [यथाम- आदमी; व्यक्तिवाचक जैसे कृष्ण गुप्यः],व्यक्तिवाचका[यथा कृष्णः] भाये याचक जैसे लघुना; समूह भायाचिका [यथालघुत्वम् ], स वाचक जैसे सेना; पदार्थ वाचिका मूहवाचिका [यथा सेना] पदार्थयों जैसे जल, गुणवाचिकाजसे सुन्दर. चिका [यथा जलम्], गुणवाचिका [यथासुन्दरः.]

HAJAN .. [ १४४ ] एकविंशतितमोऽध्यायः । व्याकरण के संज्ञा शब्दों का वर्णन - व्याकरणपरिभाषाः । हिन्दी। संस्कृत। फिर वह साढे, योगिक, योगरूढि भेद | पुनः सा रूढियोगिकयोगदिभेदन से तीन प्रकारको है. विधा. रूडिजैम (घा) यौगिक जैसे (पाचक) रूदियथा [घटः ] यौगिको यशा योगदि जम (पङ्कज). [पाचक.] योगरूढियथा (एकजः), स्वर, प्यजन और विसर्ग भेद से सन्धि भज्झलपिमर्गभेदन संहिता स्तिनः तीन प्रकार की है.. स्थर महिता जैसे सुधी+उपास्या सुभसंहिता यथा सुधी+उपास्यः-सु युपास्यः. भ्युपास्या घ्यजन सन्धि जैसे फाश्यां मरणात्+ हलसहिता यथा काश्यांमरणास्+मु. मुक्ति काश्यां मरणान्मुक्तिः, ति-मरणान्मुक्तिः विसर्ग सन्धि जसे देवः+यातिन्दयो- पिसर्गसंहिता यधा देयः+यातिन्देवा- याति. याति. जहां सन्धि का निमित्त होने परभी यत्र सन्धिनिमित्तेऽपि संहिता न स्यात् संहिता न होयह प्रकृतिभाव सन्धि सा महतिभावसहितेत्युच्यते यथा कहलाती है जैसे माले + भानय माले+आनय इत्यादि. माले आनय घगरह. शब्दों के भेद भी अंग्रेजी में आठ है. शब्दभेदा अपि आलभाषायामष्ट, पाहेला भेद सझा है जैसे पड़ा दूसरा प्रथमो भेदः संझा यथा वृक्षः द्वितीयो विशेषण या गुणयाचक संज्ञा जैसे विशेषणः गुणयाचिका संशा था मनोहर तीसरा सर्वनाम संज्ञा जैसे यथा-मनादरः; पतीयःसर्वनाम: अपि चौथा फिया जैसे जाता है। ससा-यधा-भवान्। चतुर्थः कि- पाचपर्ण क्रियाविशेषण जैसे भली या-यथा गच्छति पञ्चमः मिया. प्रकार, एटा उपसर्गवा अव्यय असे विशेषणः यथा-मुष्ट्र प्रकाशते; पास, भी, नी धगैरहा सातवाँ पठः उपसगाअध्ययं वा यथा-उप, * नोट-इनका विशेषवर्णन दूसरे भाग * एषां विशेषवर्णनं द्वितीयमागस्य फे पहिले तरंग में दो. मधमे तर पश्यत.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१४५] व्याकरण के संज्ञाशन्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभाषाः । हिन्दी। संस्कृत। जोड़नेवाला या अलग पानियोला अपि, न इत्यादि सप्तमः समुशायक भव्यय जैसे और, या पगैरदा आ पृथक्त्ववोधकञ्चाव्ययं यथा च, ठयां आश्चर्यादि प्रोतक अध्यय या इत्यादिः अष्टमः चिसापनादियो- जैसे-माः, हा, हहो. धफमव्ययं यथा-आ, हा, हेहो. लिग तीन प्रकारके हैं पुल्लिंग जैसे मलिझं विविधम् पुं० ( यथा नरः ):स्त्री नुष्य स्त्रीलिंग असे स्त्री; नपुसक (पधा-नारी)नपुंसकं (यथामित्रम्). जसे मित्र. संस्थान में लिंग व्यवहार प्रत्यय और मस्यते तुलितट्यवहारः प्रत्ययकोषा- डिक्सनरी द्वारा असा होता है अं. दिद्वारा यथाभवति गतु तथा डाल ग्रेजी में वैसा नहीं. भाषायाम्. वचन भी तीन तरह का है अंग्रेजी में वचनं चापि प्रिविधमाइग्लभाषाया. तो दाही तरह का है. न्तु द्विविधर्मय. एक पचन जैसे रामः, द्विवचन जैसे एकपचन यथा रामः; द्विवचन यथा रामा बहुवचन रामा, यदुवचनं यथा रामाः. फारफ (फेस) भी अंग्रेजी जापान के | फार फाण्यप्याग्लभाषानुसारण भ. माफिक भाठ है पहिला कर्ता (ना. ट, प्रथमंकी-यथा रामः द्वितीयं मिनेटिय) जैसे राम दूसरा कर्म कर्म यथा रामं; तृतीयं करणम् यथा (अजक्टिव) जैसे रामको, तीसरा रामेण; चतुर्थ सम्प्रदानम् यथा रा करण (रस्टूमन्टेल) जैसे रामने पञ्चमं अपादानम् यथा रामा- चौथा सम्प्रदान(युटिक)जैसे रामके त्; पष्ठं सम्बन्धकारकम् यथा रा. लिय; पांचयां अपादान (एप्लेदिव) मम्य; सप्तममधिकरणम् यथा रामे; जैसे रामसे, छठा सभ्यन्ध (जैनि अपमं सम्योधनम् यथा हे राम. टिव) जैसे रामका; सातवां अधि. करण [लौफेटिव जैसे राम में आ. ठयां सम्बोधन घाफेटिव जैसे हे जैसे रामा. माय;

[१४६] एकविंशतितमोऽध्यायः । व्याकरण के संज्ञाशब्दों का वर्णन - व्याकरणपरिभाषाः। हिन्दी। संस्कृत। इस फ़िकरे में रक्खे हुए पदोका पद, अस्मिन् धोक्य स्थितानां पदानां पदसा साधन [पासिंग] फरो. तीन पुरुष पर्सन] है सृतीय या भन्य, पुरुषालयः तृतीयोऽन्यो घा, द्वितीयो दूसरा चा मध्यम, पहिलाचा उत्तम मध्यमाचा, प्रथम उत्समो पति. धनं कुक्त. इसप्रकार. अकर्मक धातुगण को खुलासा रीति | अकर्मकं धातुगणं संक्षिप्तरीत्या शृणुत. से सुनो. लजाना, रहना या होना, ठहरना, जा- लजासत्तास्थितिजागरणं वृद्धिक्षयभय गना यदना, नएहोना, डरना, जीना, जीवितमरणम् । शयनाडाकाचे मरना, सोना, क्रीड़ा फरना, नीति दीप्त्यर्थ धातुगणं तमफर्मफमाहु करना, दीप्तहोना [जलना शोभित होना] इत्यादिधातुगण अकर्मक कहा है. क्रियापं तीन प्रकारकी है अफर्मफ जैसे क्रियास्त्रिविधा, अकर्मका यथा स्वपि. सोता है, सकर्मक जैसे खाता है ति, सकर्मका यथाभुङ्क्तेहिकर्मफा द्विकर्मक जैसे मांगता है. यथा याचते. देवदत्त घंटेको सुलाता है यहां प्रेरणा देवदत्तः पुत्रं शाययतीत्यत्र प्रेरणार्थका धेक क्रिया है. किया. कृष्णदत्त व्याकरण पदना चाहता है | कृष्णदत्तो व्याकरणं पिपठिपतीत्यत्र इस पाक्य में इच्छाधक. समन्ता क्रिया. आज जाड़ा बहुतही है और हवा घटु अवशीघरीपर्तिसरीसति समारणा. तही चरती है. यहां दोनों मियाही अतिशयार्थ घो. अत्र किया इयमेव पौनापुम्योतकं. तक है. क्यों गधेको तरह करता है यह नाम किमर्थ "रासभायसे" इति नामधातुः. धातु है.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। [१४७] व्याकरण के संज्ञाशब्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभापाः । हिन्दी। संस्कृत। फ्रियाओं में जो प्रत्यय लगाई जाती है तिड्व्यतिरिक्ता, धातुभ्यः कर्माधर्धे ये ये यात्प्रत्यय है जैसे द्रष्टुम् । शब्दों प्रत्ययाः प्रयुज्यन्ते ते कृत्प्रत्यया:* में जो प्रत्यय लगाई जाती है ये त. फथ्यन्ते यथा द्रष्टा, द्रष्टुम् शव्देषु ये द्वित प्रत्यय होती है जैसे राघव. प्रत्ययाः प्रयुज्यन्ते ते तद्धिता:* प्रत्ययाः यथा राघवः. तिङ् प्रत्ययान्त धातु कियापद औरसुप् तिड्प्रत्ययान्तो धातुः क्रियापदमिति, प्रत्ययान्त शब्द संशा पद ये कहा सुप्यत्ययान्तः शब्दः संशा पदमि. लाते है. त्यभिधीयते. पाच्य (चएस) भी तीन है, कर्तृवाच्य, याच्या अपि त्रयः कर्तृवाच्यः, कर्मवा. फर्मवाच्य, भायवाच्य. च्या भाववाच्यः. मैं पुस्तक पढ़ता हुं यह कर्तृवाच्य है. अहं पुस्तकं पठामीति कर्तृवाच्यः. पुस्तक मुझ से पढ़ी जाती है यह कर्म पुस्तकं मया पक्ष्यते इति कर्मयाच्या, वाच्य है. मुझ से बैठा जाता है यह भाववाच्य है. मया स्थीयते एप भाववाच्यः. भाववाच्य तो अकर्मकही क्रिया से भाववाच्यस्तु अकर्मिफयय क्रियया भयति. काल या लकार दस है- काला लकारा घा दश. पहिला वर्तमान या लट्-जैसे भवति प्रथमः पर्तमानो लट् वा यथा भवति. (होता है) दूसरा अनद्यतनभूत वा लड् जैसे अ. द्वितीयः अनघतभूतःलड् चा यथा अ. भवत्. भयत्. तीसरा परीक्षभूत वालिट्-जैसे यभ्व. / तृतीयः परोक्षभूतो लिवा-वभूच. चौथा विधि वा लिङ्-जैसे भवेत्. चतुर्थः विधिः लिड्या-भषेत्. पांचवां आशी:-लिड्-जैसे भूयात्. पञ्चमः आशीः लिड्वा-भूयात्. छठा अनधननभविष्य था लुट्-जैसे पष्ठःअनद्यतनभविष्यालुवा-भविता. भविता. बनता है.

-~- [१४८ ] एकविंशतितमोऽध्यायः । व्याकरण के संज्ञाशब्दों का वर्णन-च्याकरणपरिभाषाः । हिन्दी। संस्कृत। सातयां मामान्यभयिप्य घा लट् जसं सप्तमः सामान्यभविष्यः लूट घा-यथा भविष्यति. भविष्यति. आठयां कियातिपत्ति वा लड् जैसे अष्टमः क्रियातिपत्तिः-लट् यथा अभ- अभविप्यत्. विष्यन्. नयां सामान्यभूत वा लुइ जैसे अभूत. नवमः सामान्यभूतः-लु-अभूत्. यशयां आशा या लोर-जैसे भवतु. दशमः आशा -लोट- -पया भयतु. इस लोक की व्याख्या करो. अन्य लोकस्य व्याख्यां कुय. अंग्रेजी ज़बान में बहुत से शब्दों के आइग्लभापायां पानांशदानां संक्षिप्त मुफिक (सक्षिप्त) रूपहोते है. रूपाणि भवन्ति. यड़े शर्मको यात है कि तुम इस शब्द अस्य शब्दस्योचारणमपि कर्तुं न श. का उच्चारण भी नहीं करसके. मोपीति घातयं महत्याःलजाया. गूढ शब्द का हम मानी ओर विरुद्धा. गुढशदस्य पर्यायार्थविपरीतार्थवा- धावाची शब्द लियो. चको शब्दी लिखत. ममास छः है. समाराः पद्. पहिला अध्ययीभाव जैसे उपकूलम्. प्रथम अव्ययोभायः यथा फलम्य स. मोपे उपकूलम् . दुरारा तत्पुरुष " राजपुत्रः द्वितीयःतापुरुषा-राज्ञःपुनः राजपुत्रः मीसरा बहुमोहि तृतीयः यहुपीहिः यथा लम्यो कणी यस्य स लम्बफर्णः. चोथा कर्मधारय चतुर्थः कर्मधारय यथा रक्ताचासौ. लता रतलना. पॉधयाँ द्विगु [संख्या चाची शब्द पूर्व पञ्चमः द्विगु संख्यापूर्व:] प्रयाणां जसे त्रिलोकी. लोकानां समाहारः त्रिलोकी. * एनका स्पष्ट विवरण दूसरे भाग में * अस्य विधरपो द्वितीय भाग क्रमशः कामश. मिलगा. स्पएनया मिलिष्यति. . %23 " लम्यकर्ण.

M व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। [ १४९] व्याकरण के संज्ञाशब्दों का वर्णन-व्याकरणपरिभाषाः। हिन्दी। संस्कृत। छठा हुन्छ [चार्थक] जैसे हरिहरी. पाठः इन्द्रः [चार्थक) यथा हरिश्चहरश्च हरिहरी. नीचे लिखहुए लोक का अन्वय वर्णन निम्नश्लोकस्यात्ययो वर्णनीयः. करो. या मूकं वाचालंकरोति पदगिरि मूकं करोति वाचालं पड़गुंलमयते लहन्यते तम् परमानन्दमाधवम अहंपन्दे गिरिम् । यत्रूपा तमहं वन्दे पग्मा- नन्दमाधवम्. अन्यय दो प्रकार का है खण्डान्वय अन्ययो द्विविधा राण्डान्वयो दण्डान्य- और दण्डास्यय, यश्च. जहां श्लोक का टुकडे २ व्याख्यान है या श्लोकस्य खण्डशः व्याय्यानं स यह पण्डान्यय है. खण्डान्ययः. जहांलाफ फी एक साथही व्याख्या यत्र श्लोकस्य युगपदेव व्याख्या स हो यह दण्डान्यय है. दण्डान्ययः. तो कहो किसरीति से अन्यय फलं.. तहिं कथय फतरयारीत्याऽन्वयं करोमि. दण्डान्यय से। अच्छा. दण्डान्वयेन । घरम् . अन्वय-जिसकी रुपा गूंगे को बोलने अन्वयः-यत्कृपा मूकं वाचालं करोति घाला बनाती है और पंगे को पहाड़ पगुं गिरि लक्षयते तं परमानन्द लैंघाती है उसपरमानन्द माधवफो माधयं अहं वन्दे. मैं यन्दना करता है. तुम पनेलिसिस भी जानते हो या वाक्ययिभागमपित्वं वेत्सि नचा। मि. नहीं । जानताहं. कान्य अलङ्कारों के बिना ऐसे नहीं | काव्योऽलकारान्धिना तथा न शोभते अच्छा लगता जैसे बिना नमक शाक. यथा लवणं विना व्यञ्जनम् . ' तीन गुरुका मगण, और तीन लघु का मस्त्रिगुरुनिलघुश्च नकारो भादिगुमः नगण, आदिगुरु भगण और फिर पुनरादिलघुर्यः जो गुरुमध्यगतो र घुस्त । [ १५० ] द्वाविंशोऽध्यायः। व्याकरण के संज्ञा शब्दों का चर्णन-च्याकरणपरिभाषाः । हिन्दी। संस्कृत। आदि लघु यगण, गुरुमध्य जगण लमध्यः सोन्तगुरुः कधितोऽन्तल- और लघु मध्य रगण, अन्तगुर स. गण और अन्त लघु तगण होता है. उपसर्ग से धातुका अर्थ जवर्दन्ती दू- | उपसर्गेण धात्वों चलादन्यत्र नीयते सरी जगह ले जायाजाता है जैसे प्रहाराहारसंहारविहारपरिवारवत्. प्रहार (चोट) आहार [खाना] महार, [नाश] विहार[फ्रीड़ा और पारहार [त्याग.] अगला अध्याय देखो। अग्रिम अध्यायं पश्य । बाईसवां अध्याय-द्वाविंशोऽध्यायः। बाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत । हिन्दी। संस्कृत। इरफरना स्थानान्तरनयति, अपसा- फिसलना | च्यवते, स्पलति, भ्रंशते, हटाना रयति विचालयति, दूरी- भ्रश्यति. क, निर्वासयति निष्का- मुलम्मा- स्वर्णेन रअयति, हेमरसेन सयति. हेमद्रवेण लिम्पति. मरोड़ना सं निष्पीड़यति, (वलपत्) लपेटना परि-अधि वेष्टयति, परिभू निचोड़- आकुञ्चयति शोधयति, यांधना आयध्नाति, परिधत्ते,नि- नाछानना सावयति [पटात निर्ग: संन्यच्छति. लयति. उधार देमा अविहितकालात्दा, ऋणं छिपाना प्रच्छादयति, गोपायति- अन्तः-तिरः-धा, अप. दा; निक्षिपति, न्यस्यति, धारयत्ति. समर्पयति. करना व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ १५१ ] वाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः । . हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। खोना त्यजत्ति, जहाति, हापयति. लटकाना निदधाति,उद्वध्नाति, आज 'दीला होना लथते, स्नंसते. फांसीदेना अव-लम्बयति, व्यापाद- " करना शिथिलयति, श्लथयति. यति. भेजना पहिणोति,प्रेरयति पयति. लटकना प्र. अव-लम्बते, दोलायत. निश्चय सं-व्यव-स्थापयति, व्यव- झूलना आन्दोलयति, प्रेशति, मे फरना स्थति निर-अय-धारयति. होलयति, दोलायते. पोछना प्रमाष्टि, परिमार्जयति, खिलाना भोजयति, आशयति, परि प्रक्षालयति. चराना पोषयति-पुष्णाति. स्वाव दे. स्वप्नपश्यति. मिलना समेति, सङ्गच्छते, सम्मि- सना लति, समागच्छति. सलूककनी आचरति, वर्तते,व्यवहरति. जल्दी च. शीघ्र-सवेगं- गच्छति मालूम अनुभवति, विभावयति, उपलभते त्वरयति, त्वरते. चधर दे-जिहां-कुटिलं गच्छति- महरूम वियोजयति, विमा कृ०, नाघुमाना सर्पति, परि-आवर्तयति. इल्तजा वसति, तिष्ठति, वर्तते, प्र. कनी अनुनयति, प्रार्थयते. तीक्षते. नुक्सान | क्षिणोति, तुदति, अर्दति. लजित लज्जते, जिहेति. पहुंचाना याधते, व्यथयति. होना उखाहना उन्मूलयति. , करना हेपयति, लज्जयति पयति. नाद कर्ना, उद्भावयति. कमहोना । हस्यति, न्यूनीभवति. काम की कार्य करोति. करना ) इसयति, लघयति, न्यूनी- खयाल चिन्तयति, ध्यायति, वि. करोति. करना, आ-पर्या-लोचयति वाज रहना विरमति, निवर्तते परिहर- जोर से सहासा घलेन क्षिपति,पा. | ति, सहते, क्षमते. तयति, अस्यति. " करना चूमना | चुम्वति. करना यसना " मृशति, [१५] द्वारिंशोऽध्यायः। वाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन--अवशिष्टक्रियाविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। हिन्दी। संस्कृत। हिम्मत शृणोति, उत्सहते साहस याद करना स्मरति. करना फरोति. भूलना विस्मरति. फैलना प्रवि सपंति, विस्तारयति, স্কুলঙ্গা प्रसारयति, अनुष्ठा प्रतिष्ठते, अनुतिष्ठति. पसिने प्रस्चिात, परिधाम्यति, नकरना निकल। स्वेदयति. पिनगति. नफरत. ठहरना विरमति. देटि, अति, स्पर्धते. ढूढना गम्पियति हिप दियादि होना, भाति. धारणक- दधाति, धत्ते अनुभव नी अनुभवनि. फरगा फरना विदधाति. हारना परिभात. कहना अभिधत्ते. उत्पन्न पहिरना परिधत्त. उदयनि. दोना लेना आदते. समर्थ पागा [मु. प्रभयति. याददाति. होना पादिका जीतना जयति. गच्छति. हराना पराजयति. जानना | अयगच्छति. हिन्दी। संस्कृत। यह चीज यहां अच्छी नहीं लगती इस घस्पतदत्र न शोभते पनदत. स्थाना- लिप इसको दूसरी जगह लेजामो न्तरं नय. देवदन ने मेरी याँह मरोपदी तो भी | देवदत्तो महादु बलपासमपीडयत्तदा- मन कुछन पछा. पि गया किश्चिनम्, मच्छरोग दमरों के दोषों और अपने सजना. परां दोषान्स्यगुणांश्च प्रच्छा । गुणों को दवाया करते है. दयन्ति.

41 . व्यावहारिफसंस्थतप्रयोधः । [ १५३ ] चाकी किया इत्यादि का वर्णन--अवशिष्टक्रियाविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत महल की चोटी पर मत जाओ यहां प्रासादशिखरस्योपरि मागच्छ ततोऽ- से ज़रूरही फिसल जाओगे. घश्य घ्यविष्यसे. माजकल बहुत से मुलम्मेसान ऐसे अद्यत्ये यत्यः स्वर्णरअका ईदृश्याभूष. गहने सोने चाँदी से मुल्लम्मा कर णानि वर्णन रजतेन वा रक्षयन्ति यनाते हैं कि बहुत से अल्लामन्द भी यायो पुद्धिमन्तोऽपि धूतः प्रता- ठगी से धोगा खाजाते हैं. यन्ते. भाज शीत यातही ज्यादह है और अधशीतंचरीपर्ति सरीसति समीरणो- हया भी तेज घटती है इसलिये ऽतस्पं गलबन्धनं शिरस्यधिवे- तुम गुलूयन्द सिरपर लपेटलो.. किसी आदमी को फर्जन दो पॉफि फमैचित्पुरुषाय धनं मानिक्षिप यतोऽ. फर्जदार देते बत्ता दुश्मन होजाता धमणः प्रतिसमर्पणसमय शत्रुर्म- यह निश्चय है. यतीति निश्चयः, इस काच केही वर्तन में मेरे पास श- अस्मिन् फाचपात्र हि मत्सनिधी मधु हद भेजा मैं उसको अपने पर्तन में अंपय अहं तत्स्वपाने त्या प्रमाज्य करके और साफकर तुम्हारे घर्तन च तत्र पानं पुनरावर्तयिष्यामि. फो फिर लौटा दूंगा. मा बेटेका मुंह चूमती और लड़ाती है. माना पुत्रस्य मुखं चुम्वति लालयति च. मुझे आप इनाम से क्यों महरूम क- कथं मां पारितोपिकण वियोजयन्ति. य. भवन्त: यह भिखारी रोटी फलिये प्रार्थना एप भिक्षुफा करपट्टिकार्थमनयति. [इल्तजा] करता है. किसी जीव को कभीमत सतामो. कमपि ओचं कदापि मा व्यथय. आनेवालेचैतफेमहीन भूकम्पहोगा. आगामिनि चैत्रे मासि भूकम्पो भवि- प्यति. तेज हवा यन्हे दरख्तों को भी उखाड़ प्रकम्पनो महतो वृक्षानपि उन्मूलयति. देती है. २० द्वारिंशोऽध्यायः। पाकी किया इत्यादि का वर्णन अवशिष्टक्रियाविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। इसचीज़ को जोर से न फैका क्योंकि एतद्धस्तु सहसा माक्षिप यतः प्र. शायद यिसर जायगी. फिरेत् - अक्सर त्रियां साँपन के महीने में झू- प्रायः खियः थावण मासि दोलायं ला झूलती है. प्रेशान्ति. फभी ऐसा मत सोचा मैं कभी तुम्हारे | कदापीटग्मा पिशाहं तव विरद्धं खिलाफ न करूंगा. माचरिष्यामि. जल्लाद ने जज साहब के हुक्म से उस | घातको न्यायाधीशाशया तं पाल. थालफ के मारने वाले को फांसी दी. घातिनमवालम्ययत्. में आज सौ बाह्मणी को खिलाऊंगा. अहमद्य शतं यालणान्भोजयिष्यामि. यह पुस्तक कहां से मिलती है । य- | तत्पुस्तकं कुतस्सम्मिलति। मुम्बापुरीतः बई से. महर्बानी कर जल्दी कीजिये यह बह कृपया त्यरय नास्त्ययं समयो दीर्घसू- राने का घवत नहीं है. चाँद अँधेर पास में रोजाना घटता है चन्दमा कृष्णपक्षे प्रतिदिनं इस्यति और उजाल.पात्र में बढ़ता है. श्रु पक्षे वर्धते. इन भनुम भाचरण सेसू मुझको फ्यों फथ मा हेपयसि एतेनानुभाचरणेन. लक्षित करता है. यह पालक यही हिम्मत करता है जो अतीयोत्सहतेऽयं चाली यदेकाफी निर्ज- अकेला चियापान में रात को फि ने नतं परिभ्रमति. प्रतायाः, रता है. तथायशः. जैसे बुराई जल्दीही आदमियों में फैल यथाऽपयशस्तूर्णमेय जनेषु मसरति न जाती है तसे भलाई नहीं. भाज धड़ी धूप है इसो से मेरे देह में | अद्याधिको घोऽत पर मम गात्राणि पसीने आते है. प्रविधन्ति. यहुत से मुसल्मान थार्याओं से नफरत | घहयो यवना आर्येभ्यो द्विपन्ति. Ja व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१५५ ] चाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन अवशिष्टक्रियाविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत । अर्जुन ने कहा कि गाण्डीय हाथ से अर्जुननोक्तं गाण्डीवं नंसते हस्तात्त्वा निकला जाता है और साल जली चच परिदाते. जाती है. यह फोन आदमी है जो बाहर दर्याजेपर है। कोऽयं जनो योवहिद्वारि वर्तते ? है कोई फकार नहीं यह फकीर नहीं है. अस्ति कश्चित् फकीरःनो नायं फाकीरः, फकोर का लक्षण तो सुनो. फकीरलक्षणं तु णु. शिवजी के चरणों में दिया है चित्त फणीशभूषांनिनिविष्टचेताः कीटादिषु जिसने और कोडे आदि में ब्रह्मवु ब्रह्ममतिप्रकाशी । रक्षार्थभिक्षार्थ दि देसनेवाला, रक्षा के लिये और विधर्णवासा निगद्यतेऽसी कविभिः भिक्षा केलिये अल्ले मल्ले वस्त्र जि फकीर:. सके घह कवियों ने फकीर कहा है. अनेक प्रकार के,व अनोखे यापय और विविधयफ्यानि, विशिष्टस्वरूपाणि घा- २८ मशहर सांसारिक कहावते. फ्यानि, अष्टचत्वारिंशत्प्रसिद्धलो- किकन्यायानि च. आपका दौलतखाना कहां है और इ. कुप्रत्या भयन्तः किमभिधानं किमर्थ. समुयारिक क्या है और किसलिये मिहायाताच. आप यहां आये है? मैं बंगाल देश में रहनेवाला कृष्णदत्त चनदेशयास्तभ्योऽतिथिः कृष्णदत्तना- नाम अतिथी हूँ रात को ठहरने की माहं रात्रिवासगृहमन्यिष्यमाणो जगह ढूँढता हुआ आपको कुछ भयते परिथमं दातुमागतः. परिथम देने के लिये यहां आया हूं. यहुत अच्छा इस आसन पर तशरीफ़ | घरम्, इदमासनमलङ्करोतु भवान् (अ. रखिये और अपने घर से ज्यादह प्रास्य॑नाम्बा स्वगृहनिर्विशे यथा सुखपूर्वक रहिये. सुखमुप्यताम्, मुझे अपने यापकी कसम है कि मैं कभी कदापि तव विपद्धं नाचरिष्यामीत्ययं तुम्हारे खिलाफ न करूंगा. शपथस्तातपादानाम्.

द्वाविंशोऽध्यायः याकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। हाथ धोने फलिये मिट्टी तो लामो. हस्तप्रक्षालनार्थ मुत्तिका त्यानय. ऊसर धरती की मिट्टी नाज के लिये ऊपरभूमेमृत्स्नानादिभ्यो न घरा. अच्छी नहीं होती. लेकिन यमई को मिट्टी लिपाई केलिये | परञ्च वामलूरस्य मृत्तिका लेपाथपका. पकी होती है. यह रास्ता तो बड़ा रेतीला है तो और | शर्फरासनाधोऽयम्मार्गस्तदन्येन पथा रास्ते से जायेंग. गमिप्यावः. पटना मामक शहर यहां से दो कोश है. पाटलिपुत्रं नाम नगरमतः क्रोशयुग घर्तते. इस गाँव में सिर्फ पांच दुकान है या- अस्मिन्नाम केवलं पापणा विद्यन्ते नच पण्यपीधिका. इस गली में एक घरकी दीवार गिरने | पिपतिपत्यका गृहभित्तिरस्यांप्रताल्पा- वाली है इसलिये होशियारी से मतस्सावधानतया गच्छ क्षत्रियरा- जाना क्षत्री लोगों के और मुसल्मा. ज्ये यवनराज्येच नगराणाम्माकारा नों के राज्य में शहरों के परकोटे थे. आसन्. यह फिसका. सापा है ? ब्रह्मानन्द कस्य एप उदः ? मानन्दनामः स- नाम सन्यासी का. न्यासिना. यह पत्थर की प्याऊ तुम्हारी घुड़साल पाषाणप्रपेयं तव मन्दुरासमीपे फैन के नजदीक किसकीयनवाई हुई है. निर्मापिता वर्तते । गोविन्देन. गोबिन्द की. पन्धर यहां कहां से आते है ? प्रस्तरा अत्र कुत आगच्छन्ति ? पहाड़ों से. महाँधेभ्यः पहाड़ के पास को भूमि उपत्यका और उपत्यकानेरासन्ना, मयोभूमिरधित्यका. नीचे की अधित्यका होती है. पहाड़ों में मस्नुई जगह कन्दरा और पर्यतेषु रत्रिमं स्थान कन्दराऽहनिमं और मनुई गुफा फद्दलाती है. गुहेति कथ्यते. बार नहीं. -- हिन्दी। - जाता है. व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। [ १५७ ] पाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन -अवशिष्टमियाविशेपाः। संस्कृत। चलों से ढंका हुआ म्यान कुञ्ज पेड़ों की लतादिपिहितं स्थानं कुञ्जः महीमहा- पत्ति आराम धीचा कहलाता है. चलिः आराम इति भण्यते. इस घर की छतएर यहा फूढ़ा है इस अभ्य गृहस्य पटले महानवकरः अतो लिये यहां नसेनी लाकर एसको ऽधाधिरोहिणीमानीय एनं शोधय. साफ करो. इस पेड़ की खोड़र में बहुत साँप है. अस्य दुमस्य निकुहे वहवस्सी- स्सन्ति. यन में तो ईधन थोड़े से माल से मिल अरण्ये विन्धनमल्पीयसा मूल्येन ल- भ्यते. इस पेड़ की फलियाँ, गुच्छ और फल अस्य वृक्षस्य कलिकाः स्तवकाः पुष्पा कैसे अच्छे लगते है. णि च कथं शोभन्ते. जो तुम मेरा पचन ठीक मानते होतो | यदि मद्वचः श्रद्धेयं मन्यसे तयं प. यह छः महीने के भीतर राजा होगा. ण्मासाभ्यन्तरे राजा भविष्यति. फंटा याँधफर राम त्रिलोकी फेभी मु- घरपरिकरो रामप्रैलोक्यमपि प्रत्यव- काबला करने को समर्थ है. स्थातुं क्षमः, श्री कृष्ण महाराज के दर्शन के अन- श्रीकृष्णदर्शगानन्तरं ने किमपि तस्य न्तर उसको कुछ भी अभीप्सित स्पृहणीयमासीत्. नथा. बहुत से मनुष्य बहुत जगहों पर शा- निरुत्तरीता बहवो जना पहुषु स्थ. रदापीठाधीश्वर शंफर स्वामी लेषु शारदापीठाधीश्वरेण शङ्कर- ने लाजधाय करदिये परन्तु वे ऐसे स्थामिना परश्चैतादशा निर्लज्जास्ते निर्लज्ज हैं कि हारे हुए भी नहीं यत् पराजिता अपि न लजन्ते. शरमाते. मैने एक हाथी बनके यीच में देखा, दृष्टो मर्यको गजः कान्तारमध्यवर्ती. ईश्वर इच्छा बलवान होती है. ईश्वरेच्छा चलीयसी वा प्रभवति भग- वान् विधिः.

[१५८ ] हाविंशोऽध्यायः। चाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः1 . . हिन्दी। संस्कृत । दोस्त । तुम्हारे मुकदमे में कितने ग मित्र तवाभियो कति साक्षिणः कत. घाह है और कौन तारीख है? किस माग्लतिथिः कस्य न्यायाधीशस्य हाकिम फी कचहरी में तुम्हारा न्यायालये तवाभियोगोऽस्तीति मां मुरुहमा है ? मेरी रायमें तो मुद्दई 'पूर्वमेव सूचय मम सम्मतीत्यधि- मुद्दाइलह मिलकर राजीनामा फरलो प्रत्यधिनी मिलित्या सन्धि कुरुतम् नहीं तो दोनों का बड़ा सर्च पड़ेगा. नोचेद्भयोरपि महान्व्ययो भविष्यति चाहे जिस पुरुष के लिये यह अन्न देदो. | यसै कसैचित्पुरुषायेदमन्नं देहि. उस यंचन के समाप्त होनेपर बलराम | पचस्यावसिते तस्मिन् बलरामोऽयवी- जी योले. दिदम् क्रोध भरफर तू क्यों पुरे मार्ग में क्रोधेद्धो भूत्वा त्वं किमर्थमपथे पदम- पैर भड़ाता है. पंयसि. तैने उस मुसीयत जदद को समझा प्रत्यासनापदं तं त्वं प्रावोधय इति म- दिया यह बड़ा उपकार किया. हानुपशास्रात युछ देर इन्तजार करिये. फालः कश्चित्प्रतीक्ष्यताम्. तुम्हारा दुश्मन दुश्मनी निकालना धैरनिर्यातनोत्सुकस्ते शत्रुस्तस्मात्समय- चाहता है उससे होशियार रहो. हितो भय. उपकार प्रत्युपकार से पलटा देना उपकारः प्रत्युपकारेण निर्यातयितव्यः. चाहिये. ईश्वर की प्याहृतियाँ पाभी लोक में ध्यरय्यानयः कदाचिल्लोफे विपरी- विपरीत अर्थ नहीं बनाती. तमर्थ म पुग्णन्ति. उन में से एक पैरो से कुचल कर मर | तेपामेकतमः पादाक्रान्तोऽनियत. गया. पकड़ने घालों से चोर, माल और सोज ग्राहगाते चौरो लोकप्प्रेणार्थपदेनया, से पकड़ा गया है. * लोप्नं स्नेयधनम् व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [ १५९] वाकी किया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः । . हिन्दी। संस्कृत। तू तो सब तरह से घरवाली के कहने स्वन्तु सर्वथा गेहिन्याज्ञानुवर्ती तेन में है इसलिये यन्त्र की तरह च. यन्त्रवच्चाल्यसे. लायाजाता है. दाँत निकलने और डाढ़ी मूंछ निकल दन्तो दे श्मथद्गमे च चालस्सुतराम् ने पर यालक अच्छीतरह रक्षा क. रक्षणीयः, रनी चाहिये. वह जल्दीही आरोग्य होगया इससे । सोऽचिरात्मुस्थोऽभवद्येनाई प्रमुदि- मैं खुश हुआ. तोऽभवम् . उठो, यह पता नहाने और सगने का है. | उत्तिष्ठत, समयोऽयं स्नानभोजन से. वितुम्. जैसे २ जवानी ढलती गई तैसे २ यथा यथा यौवनमतिचक्राम तथा तथा सन्सान न होने का दुसबढ़ता गया. ऽनपत्यताजन्मा अवधतास्य सन्ताप. गरीय ने रक्षाफरने वाले से कहाकि भघतानुगृहीतोस्मीति रक्षितारमुवाच मापसे में अनुग्रहीत हुआ. दीना. जिनके चित्त आपत्तियों में भी नहीं आपत्तिप्पपि येषां चेतांसि चिकि- विगढ़ते ही धीर है. यन्ते त पय धीराः. मारने में यह भी मददगार था इसीसे | विशेसनेऽयमेय सहायो बभूवात एव सजावार है. दण्डयः. बहुत से हमारे चैभव में सुखी होते हैं. यत्वोऽस्मदभ्युदये सुरसभाजो भवन्ति [मोदन्ते प्रीयन्ते] यद यही धार्मिषा है उस दु.स पाती | सातीय धार्मिका सीदत्याः तस्याः स्वर्ग हुई फा स्वर्गवास निश्चयदी है. चासोऽयस्थित एच. चाहत काल सोचते हुए मेरे यह उपाय चिराच्छोचतो मेऽयमुपायोमनसि प्रा. मन में पैदा हुमा. दुभव. दुति करतो दुष्ट और फल भोगेसजन. सलः करोति दुवृत्ति नूनं फलति साधुपु. . .

१ [१६०] ফাঘিয়ায়। चाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। मुहा भय यो तृप्ति के लिये यह अन्न मम क्षषितस्य तृप्त्य इदमानम (प. यो । मंचय क्या करूं मेरी सब कोशिश फिकिकरांम्यद्य मम सप्रयता ममफला निपना] अभवन्. मृग सिंह की गर्जना सुनतेही बेहोश मृगाः सिंहनादभवणे व मूळन्ति. हो जाते हैं.. यह अजीब मामला सुन मेरे दिल में | एतदभुतं वृत्तमार्य विस्मयों में अचम्भा होगया. रायस्पृशत् महल की शिपर की शोभा को देख में | प्रासारङ्गशोभा दृष्वाऽहं विस्मयमा अचस्से से भरपया. पत्रः मामनी ने कहा कि जितनी धरती मैं यायती भूमि त्रिपदेनाहं व्याप्नुयाम् [आ- तीन पैर से नापलूं उतनी मुझदो. मामेयं तापती में देही युवाच वा- . घक्त पर को हुई थोड़ोसी भी कोशिश | स्वल्पोऽपि कालरतोयनो महान्तमुत्त. पीछे की जानेवाली यही कोशिश की रकरणीय यले च्यापर्तयति. दर देवी यह युक्ति भी बहुत देर ठहरेगी. इयमीन्युनिन चिरस्थास्यति (यर्थिरा- रखंडयिष्यते), यह सबके ऊपर है इसीलिये उसका स संपां मूर्ध्नि तिष्ठति अत एव तस्य. पचन सयुकिक और सोपपत्तिक पवासयुक्तिक सोपपनिक भात्ति. भाम होता है. यह या बुद्धिमान है मेरे भाशय को महान पुद्धिमान् मदावार्थमेव मंदी- ही लेकर उसने मेरी थाना करदी. त्या ममाझामनीष्ठतमा. इस दुःखको आप से कहना मुझे बहुत अस्य दुःखस्य भवते निवेदनं मे मददुः- दुःख देता है. खभाषहति. यह कहना सहल है करना सहल नही. / वस्तुं सुफरमिदं न तु कर्तुम्..

व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। [१६१] बाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत । यह पराभव (हार) मेरे दिल में लगे हुए पराभवोऽयं मम हृदि प्रत्युतं शस्यमि- चाणकी नाई हुई. घाभवत्. मुझसे भी इस मामले में चुप चाप नहीं | मयाप्यस्मिन्विषयेन शयानेन स्थीयते. रहा साता. रामासिंह को तप तपते हुए कितने वर्ष रामसिंहस्य कतिपये चत्सरास्तपस्त पताऽभयन्. गोविन्द ने अपने पुत्रको आँखा के इशारे गोविन्दः स्वपुत्रं नेत्रसंशयाऽऽह्वयत् . सेबलाया. यह विषय तो दूर रहे. आस्तां तिष्ठतु] तावरे स विषयः. विनाश धर्म चाले विषयों में मनमत दो। विनाशधर्मेषु विषयेपु मनोमा संनिवे. शय. आप चाहे जैसे इस दास को काम में भवद्भिर्यथेच्छं नियुज्यतामयं दासः, लगाइये. देवदत्त ने अपने मालिक का नमक सफलीरातभर्तृपिण्डो देवदत्तो यत् स्व. हलाल किया जो अपने मालिक के स्वामिशग्रुभिस्सह युद्धानिधनं गतः, दुश्मनों से लड़कर मारागया. वह ओरत वाँए हाथ पर मुँह रक्से हुए | सा स्त्री वामहस्तोपहितपदना तिष्ठति. सजन लोग दूसरों के दोषों को भी गुण सजनाः परदोपमपि गुणपक्षे समारो- पक्ष में लगाते है. पयन्ति. मित्र मेरी अर्ज तुमको टालना नचाहिये. मित्र नाहसि त्वं मे प्रणय विहन्तुम्. यह उसके गुण और दोपों को छिपातस्यायं गुणान्दोपांच प्रमार्टि (लोप- यति). हाथों से गिराई हुई गैद भी ऊपर को पातितोऽपि कराधातरुत्पतत्येय क- उछलतीही है. न्दुका. मरना भला अपमान नहीं. चरं मृत्युन पुनरपमानः [१२] द्वाविंशोऽध्यायः। चाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत । चाँई आँख फड़कने से मेरा मन कुछ घामाक्षिस्फुरणाफिमप्यनिष्टमाशङ्कते अनिष्ट की शदा करता है. मे मनः. यह चोर लानत देकर शहर से नि- | एष चौरः सनिकारं नगरानिवारयते. काला जाता है. उपाय सफल हो यह अनुमान तो उपायस्सफलो भवेदित्यनुमीयते तु. किया जाता है. श्रीमान् विद्वद्वर्य यालशास्त्री सव श्रीमद्विवद्वा वालशारित्रणः सर्वेषु शास्त्रों में परम प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए. शाखेपु परां प्रतिष्ठां गताः- तेरे दुःप का क्या कारण है यह मुझ | किं निमित्तं ते सन्ताप इति मां कथय. से कह. ति भवान्. -- पयों कीच में ईट डालीऔरछींटसाई मक्षालनाद्धि पकस्य दूरमस्पर्शनं कोच को धोने से न छूनाही अच्छा है. घरम्. यहां आप तशरीफ़ रखिये आप की अनोपविशत्वार्यः को वृत्तिमुपजीव. फ्या जीविका है. इस काम के फरने में उसने पुण्य को | एतत्कार्यकरणे 'तेन सुरतमन्तरे बीच रफ्खा. धृतम् मेरी भेटौंफो उसने पड़े प्रसन्न मन से ममोपायनानि स सुप्रीतमनसा (सु. रीकार किया. प्रसन्नं) स्वीचकार. यह धूर्त अपने को पण्डित मानता है. पण्डितम्मन्योऽसौ धूर्तः. यह पया, अक्सर सयही समाजी ऐसे सकिम् प्रायोऽपिल पव सामाजिकाः ही होते है. तादृशाः भवन्ति. बाँझ, यश्चे होने की घड़ी भारी तलीफ नहि बन्ध्या विजानाति गुी प्रसववे- फो क्या जाने. दनाम्. यह दुःन समाचार तो हो लिया भय आस्तां तापदयं दुःखवृत्तान्तः, अधुना अपने धेटों की राजी खुशी कहो. स्वशिशूनां कुशलं कथय.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१६३ ] बाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिएक्रियाविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। यह पिना सगमा लिये क्यों फौज से किमर्थमगृहीतमुद्रः कटकान्निष्कामति. निकलता है. अपने आदमी के भागे दुखि खुले हुए स्वजनस्य हि दुःखममतो विवृतद्वार दर्याजे की तरह हो जाता है। मियोपजायते. आपकी जो मी हो सो कीजिये. स्वरुच्या वर्ततां भवान्. इस जगह से भागजाओ नहीं तो तू अपसरास्मात्स्थानान्नाचेत्यं जीवितेन- मार दिया जायगा. चियोक्ष्यसे. पहिले उसकी अक्ल में यह बात नहीं | इति तस्य बुद्धौ पूर्व न सातम्. आई थी. दुष्ट सरसों सरीसे दूसरों के ऐवों को खलः सर्पपमात्राणि परच्छिद्राणि प- देखता है और अपने येल सरीखेऐचों श्यति,आत्मनो विल्वमात्राणि पश्य- को देखता हुमा भी नहीं देखता है. पिन पश्यति. अच्छा मौका तूने सोदिया. शोभनापसरस्त्वयाक्षिप्तः (त्यक्तः). राजा लोग तो सेवापर दूर रहो खु-तिष्ठन्तु तावत्सेवापरा राजानः, प्रजा शामदी प्रजामी तो पोछेही लगी अपि तु चाटुपरा पृष्ठतो लगति. चली जाती है. तुम्हारी कृपा से में कृतार्थ होऊं. कृतार्थो भूयासं तथानुकम्पया. उसने जल्दीही सब का सार लेलिया. अचिरादेव तेन सर्वस्य सारो गृहीतः. ससार में बड़प्पन या नीचपन मनुष्य लोके गुरुत्वं विपरीताम्बा स्वचेष्टिता- को अपनेही कर्तव्य प्राप्त कराते हैं. ग्येव नरं नयन्ति. पि लोग और वनवासीयन के फलो ऋपयो वनवासिनश्च घन्यफलैः शरी- से अपनी शरीर वृत्ति करते है. रवृत्ति निर्वर्तयन्ति. तू यद्भुतही झूठ बोलता है सय तरह त्वं नितान्तमनृतं वदास सर्वथा तवै- से तेराही कसूर है. घाय दोपः विषय के मुसों में लगे हुए राजा ने विषयसुपनिरतो राजा जीवितमत्य- अपना जीवन बिताया. घाहयत्.

[ १६४ ] द्वाविंशोऽध्यायः। वाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। 4 मूखों के लिये उपदेश करना गुस्से का उपदेशो हि मूर्माणां प्रकोपाय न शा. कारण होता है शान्ति कलियनहीं. न्तये. देवदत्त मारेज्यर के उठ नहीं सता. देवदत्तो ज्वरणोत्थातुमक्षम चित्रकूट को ज्ञानेवाले रास्ते में मैंने चित्रकूटयायिनि धमनि स्वमित्रमहम- अपना मित्र देखा. पश्यम्. अपने घर की तरह यहां रहिये. स्वगृहनिर्विशेषमन्न वस. मेरे आगे उनकी क्या असल है. कियती (फा) मात्रा तेषां मत्पुरत: माग्य अपने आप नहीं देता पुरुषार्थ की न स्वयं देघमादत्त पुरुषार्थमपेक्षते. अपेक्षा करता है. वह दिलोजान से उस काम में लगा स सर्वात्मना तस्मिन्कर्मणि व्याप्तः. उसने गंगा में यहुत पुत्र पैदा किया. स गङ्गायां चाहन्पुधानुदपादयत्. अनुकूल अवसर पर इष्टसिद्धि करो. अनुकूले यसरे इष्टसिद्धिं कुरु. यह ही मेरा बड़ा भाग्य है कि मेरा पुत्र । इदमेव तायनमम परमभाग्यं यन्मत्पुत्रो इस छकड़े से बच गया. ऽस्माच्छकटान्मुक्त जो धन जाता जानिये आधादोजेवाँट. सर्वनाशे समुत्पन्ऽधैं त्यजति पण्डितः. उस की तो मेरे दर्शन सेही आँखों से तस्यास्तु महीनादेव आयधारमश्व भासुओं की धार यहने लगी. मावर्तत, इस हालत में मैं तुझ फो देख कर पतदयस्थं त्यां वीक्ष्य दुःग्नितोऽस्मि. दुरपी हूँ. यह कीताय तो मेरे पास है. तरपुस्तकन्तु मत्सकाशे वर्तते.. पीछे आकर यह इस हाल को सुनाता पञ्चादेत्य स एतद्वृत्तं श्रावयामास. हुआ. उसको मैंने अपनी युक्तियों से निस्स- तं निर्मुक्तसंदेहमफरवम् स्वयुक्तिभिः न्देद्द कर दिया. इस किताय का मोल सपा रुपया है. ! सपादरूपकं मूल्यमस्य पुस्तकस्य.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। [१६५ ] चाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। के वर्ष वनमें रहे । चौदह वर्ष. कियन्ति वर्षाणि वनेऽचसद्रामः । च. तुर्दशसमाः. मैं तुम्हारे लिये दुःखी हूं तू अपने अहं तव कृते दुःसाकुलोस्मि त्य स्थ- आचरण को क्यों नहीं बदलते. वृत्तं कथं न परिवर्तयसि. मैं तुम्हारेही पक्ष को पुष्ट करता हूं." | अहं त्वत्पदं समर्थये. ऐसे कष्टों को भी कुछ न समझ कर पचंविधान्यपि कृच्छ्रान्यविगणय्य ह- हरिश्चन्द्र सत्यही में रहा. रिश्चन्द्रः सत्य एव स्थितः. इस काम को सिद्ध करने को वह । तत्कार्य साधयितुं सोऽलम्, समर्थ है. यहादुरी में कोई भी मेरे समान नहीं है. न कोऽपि शौर्येण मम समानः. आप मेरी प्रार्थना मंजूर कीजिये. मम प्रार्थनामनुमन्तुं प्रसीदतु भवान्. औरों के अभ्युदय से हमेशा खुश हो । अन्येषामभ्युदयेन सर्वदा मोदस्व न न कि जलो. तु स्पर्धस्थ. तुम्हारे दर्शन के लिये मेरा दिल चा- उत्ताम्यति में हृदयं तव दर्शनाय. कैसा उद्यम. मनुष्यों में पक्षियों से ज्ञानही विशेष है. नरेषु तिर्यग्भ्यः प्रयोध एव विशेषः, बहुतसेधनसे यह दाप दूर हो सकता है. भूरिद्रव्येणायं दोषः प्रमा? शक्यः. घर के जलने पर कूँगा खोदना यह प्रोहीते भवने तु फूषषननं प्रत्युधमः कीडशः, यह अर्थ विचार के योग्य है, अयमोऽवक्षामहति. मेरे पिता अब घड़ी हो रहे हैं. मम पिता जीवितसंशये वर्तते. राम ज्वर के दूर होने से नीरोग हो रामो ज्वरोपशमनानीरोगः (प्रकृति- स्था) सातः. इसकी सय कोशिश फामयाब हुई. सर्वेऽस्य प्रयताः सफलतां ययुः (फा- लिताः).

द्वाविंशोऽध्यायः। याकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। हजार रुपये में यह घर मैंने परीदा है. | सहस्ररूपणेदं गृहं मया फ्रोतम्. बहुत मे धन से विवाह की विधि की. | यधनव्ययेन निष्पादितो वियाहविधिः. इसका मुख सौता के मुख को यरायरी अस्य मुएं सोताया मुपेन सम्बदति. फरता है. अपनाही भला मत चाही मनुप्यों का | स्वहितपरायणों माभूः जनहितमपि हित भी तो तुमको अपने मन में तायस्यया मनसि धार्य-(अवेक्षणी- धारण करना चाहिय. यं) मेच. यह पद इस तरह नहीं बनता है. इदं पदमयं न सम्बध्नाति. ज्योतिषी जन्मपत्री में शुभ, अशुभ ज्योतिर्विजन्मपत्रिकायां शुभाशुभं ए- विचारता है. यालाचयति. जज साहय ने हुक्म दिया कि यह मूलमारोप्यतामसी चौर इतिदण्ड: चौर. शूली पर चढ़ाना चाहिये. समादियो न्यायकारिणा. च्यवनजी के लिये मेरी नमस्कार च्यवनाय मदायो नमस्कारो घाच्या कहना प्रणिपरतय. कृष्णदत्त ने भाई के अचिनय आचरण कृष्णदत्तो मातुरविनयाचरणं पिने न्य- फो पिता से निवेदन किया. घेदयत. रामदत्त जबर्दस्ती मुझ नचाहते हुए | घलादनिच्छन्तमपि मां प्राणयाण फो भी पूछने के काम में लगाता है. नियोजयति रामदत्त. इसी युक्ति से तूला जयाय किया. अनया युक्त्यैष निगृहीत (निरुत्तरी- कृतः) सत्यम्. जो करना है यह विचार कर फरी. यत्कर्तयं तद्विमृश्य (समीक्ष्य) कुरुत. राज (राजा का नाम) के मार्ग को आवृत्य पन्धानमजस्य तस्थी. रोक कर सड़ा हो गया. में इन तरीकों से पाचन्द नहीं हूं. नामभिविधिभिनियन्त्रितास्मि. तुमको युटुम्ब पालन जरूरही करना त्वया फुद्धम्पपोपणमयश्यमेव फतव्यम् चादिय.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ १६७ ] पाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। 4 हिन्दी। संस्कृत। कौए की तरह पिटभरूनहोनाचाहिये. काकवदुदरम्भरिण मा भवितव्यम्. घह फिर भी अपने काम में मन लगा. स पुनरपि स्वकार्ये मनो न्यदधात् ता हुआ. (न्यवेशयत्). भक्त गोविन्दराम कृष्ण की कथाओं, गोविन्दरामो भक्तः कृष्णकथाभिर्दिव- से दिन को विताता है. समतियाहयति. जव परशुराम की बहुत इलाज करने यदा परशुरामस्य वहुचिकित्सानन्तर- पर भी रोग शान्ति न हुई तब जा मपि रोगशान्ति भूत्तदा यदावि होनहार है सो होउ ऐसा कह कर तद्भवतु इत्युक्त्वा स परित्यक्तः यह भाग्य पर छोड़ दिया. (दैवाधीन कृत.). सय गुणों को छोड़ कर स्वभाव सिर | गुणाकृत्स्नान्परित्यज्य स्वभावो मूर्ति पर रहता है. चर्तते. शिवकी सती की परित्याग रूप दारुण शिवस्य सतीपरित्यागरूपा दारुणा प्रतिज्ञा संसार में प्रसिद्ध हुई. प्रतिज्ञा लोके प्रसिद्धाऽभूत् (लोके प्रकाशतां गता). सम्पत्तियाँ आपत्तियों का स्थान है. सम्पदः पदमापदाम्. प्रमाण का भोजन ही उस का हेतु है. मितभोजनं हि सुखहेतुः. तेजस्चियों की अवस्था नहीं देसी तेजस्विनां न चयः समीक्ष्यते. जाती है. वे अपने काम को भली प्रकार करत | ते स्वकर्म साधु निरवाहयन्. यह दूसरा गंडस्थल पर फोडा हुआ, , अयमपरो गण्डस्योपरि विस्फोटः. (फोदमें पाज का होना) तुम्हारा वचन विलास कय शुके हे. तय वचनं न सन्देहास्पदम्. भाई से बैर रखने वाले उसकी मदद फरो. मातरि वरपरस्य तस्य साहाय्यं कुरु. यम्बई में मेरा रहना तन्दुरुस्तीदह मुम्बापुरनियासो ममारोग्याय नहीं है. कल्पते.

[१६८] छात्रिंशोऽध्यायः । बाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः। ArA हिन्दी। संस्कृत। खयाली पुलाव मत पकाओ. गगनपुष्पाणि मा चिनुहि, आकाशे मन्दिर न निर्मापय. यस इतनी ही खातिर मुझसे आपकी प्तायाम्मे विभवो भवन्तं सेवितुम्. होसक्ती है, यस मरी तो इतनी ही सामर्थ्य है. एक रूपया घी का पांच पुस्तकों के एको रूपको घृतस्य पञ्च पुस्तकानां और चौदह तनरवाह के ऐसे मि चतुर्दशचेतनस्येत्थं पिण्डीकृत्य महा लाकर मुझे २०) रुपये दो। विशतिं रूपकान्देहि. दया के वेग से लाई हुई मिट्टी पुलिन | नदीरयसमाहृता मृत्तिका पुलिनमित्य- कहलाती है. भिधीयते. तुम्हारा उद्योग मेरे उद्योग का सौयाँ तव व्यवसायो ममोद्योगस्य शततमी. हिस्सा भी नहीं है. मपि कलां न स्पृशति. मेरे लिखे का जवाब भेजो. मम लेखस्योत्तरं प्रहिणु (प्रेपय.) यह मेरी इष्ट सिद्धि के लिये हो. इदं म एसिद्धये कल्पेत. इस मामले में आप को मुन्सिफ बनाता हूं. अन विपये भवन्तं प्रमाणीकरोमि. रामदत्त अपने मुकदमे में अपील चा. रामदत्तः स्वविषये पुनर्विचारं प्रार्थयते हता है मगर कोई गवाह नहीं है. परञ्च न कोऽपि साक्ष्युपतिष्ठति. श्रोतागणों की प्रशंसा की याणी कहने । उच्चैः प्रशंसाचाच उदीरयत्सु धोत्पु पर भाई के कन्धे पर हाथ रप कर स्वभ्रातुरंशे हस्तनिवेश्य स वक्तुमुद कहने को उठ खड़ा हुआ. तिष्ठत्. यह उद्योग ठीक नहीं कोई दूसरी तरः | अनेनोयोगेनालं कोऽपरो नियोगोऽनु कीर करनी चाहिये. छत्यताम् इन दोनों का झगड़ाही मुझे अच्छा एतयोर्विवाद् एव मेन रोचते,न चापि- नहीं लगता और न तेरे पचन की ते यचोऽभिनन्दामि. तादि करता हूं. आलसीयालकअपसरदुराचार्य होत. अलसा यालका प्रायोदुर्वृत्ता भयन्ति.

Pr व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोषः। [१६९ ] घाफी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत । उसका मण कसे अदा करना चाहिये तस्य प्राणं कथं प्रतिदेयमित्यापितु वि. यह भी तो सांच. चिन्तय. सब बाकी वाण को निपटा दृगा. सर्व मवशिष्टयं परिशोधयिष्यामि. जीवधारियों को विपत्ति मौजूद है. विपदुत्पत्तिमतामुपस्थिता. अथ "लोकिकन्यायसंग्रह" से निकाले अथ लोकिकन्यायसङ्ग्रहादुकृतानि हुए लीफियान्याय वर्णन किये जाते है लोकमान्यायानि वपर्यन्ते. पहिली-अन्धे और हाथी की कहायत. १प्रथम, अन्धाजन्यायः अस्लियत से नहीं जाना है शास्त्र का याथायना विदितशास्त्राभिप्राया वादि. अभिप्राय जिन्होंने ऐसे वादी लोग न', स्पसवुद्धिकल्पितानानव सि. अपनी२ अल से फल्पना की दुई धान्त मन्यमानाः परस्पर विवदन्ते चाता को ही सिद्धान्त मानते हुए तत्रान्धगजन्यायः प्रवर्तते यथा चि. आपस में झगड़ा करते हैं वहां अन्ध जन्मान्धाः कश्चिदनन्धं पुस्पमूचु- गजन्याय प्रगृत्त होता है। जैसे रस्मान्गजं प्रदर्शयति । अनन्धस्तान कितने पफ जन्मांध किमी सूझते गजशालायां नीत्वा प्रत्यकं गजाय. हुए पुरुप से बोले कि हमको हाथी यचं तेन तेन ग्राहयित्वोवाचार्य गज दिपाओ। सूझता आदमी उनको इति ततस्ते तं तंगजावयचमेव गज हाथीपाने में ले जाकर हरेक हाथी निश्चित्य स्वस्थानमागत्य सूर्पसदृशो के अंग को हरेक से पकड़वा कर गज प्रति कर्णस्पी, मुशलसदृशो. चोला कि यह हाथी है तब ये लोग गज इति शुण्डास्पर्शी, स्तम्भतुल्यो उसी२ गज के अरु को ही हाथी गज इति जहानाही करीपराशिसमो निश्चय कर अपनी२ जगह आकर गजइति पृष्ठस्सी स्थूलरन्तुतुल्यो सूग यो वरावर गज होता है ऐसा गज इति पुच्चमाहीति मिथः कलह कान फानने वाला, मूसल सा हार्थी चक्रुः होता है पेसा सूड का छूनेवाला, खम्भे सा हाथी होता है ऐसाजांध पकड़ने वाला और विटरिसाहाथी २२ [ १७० द्वात्रिंशोऽध्यायः । वाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टत्रियाविशंपाः । हिन्दी। संस्कृत । होता है ऐसा पीठ छुन घाला, मोटी रस्सी सा हाथी होता है ऐसा पूंछ पकड़ने घाला, आपस में झगड़ा करत हुए. दूसरी-"कृप के मैडक को कहावत" द्वितीयः कूपमण्डकन्यायः दूसरे के मजहब के न जानने वाले और अन्यमतानामशास्तहपजपरा: कूपमण्डू उस में दोष निकालेन वाले कूप के कायोपहासास्पदा भयन्ति. भंडक के नाई इसी के पात्र होस है. असे कोई समुद्र का मैड़क किसी प्र. यथा फश्चित्समुद्रमण्डूकाकञ्चित् त. कार उस के किनारे के कूप में घुस सोरस्य प्रविष्टस्तत्रतमपूर्व मत्या आया, तहां उसको अजनधी मान. कूपमण्डूकोऽपृच्छत् फुत मागतो कर कूप के मैडक ने पूछा कि आप भयान् इति. समुद्रादिति वचनं कहाँ से आये हैं। 'समुद्र से यह श्रुत्वा विधान् स इति पृष्टयान महा. बचन सुनकर उसने पूछा कि यह निति तेन प्रत्युक्ताः तईि कूपमण्डूक कितना होता है उस (समुद्रमण्डू: स्वजा प्रसार्योवाच किमेताया- क) ने जचाच दिया कि 'बड़ा हो. न्सा, नहि महत्तमः,तच्छुत्या द्विती- ता है' तो फूर के मडक ने अपनी यामपि जहां प्रसायं तहातावान् जाँघ फैलाकर कहा कि क्या यह भविष्यतीत्युवाच पुनर्राप तेन निरा. इतना है, 'मरी घटुनही बड़ा' यह कृतः, ततस्तृतीयां तुरीयां जांच सुन फर दूसरी जांध भी फैलाफर प्रसार्योदात्य प्रादेशपितत्तिहस्तप- चौला कि तो इतना होगा फिर भी रिमितं देश किमतावानिति पृच्छं- उसने मनायिया तव तीसरा और स्तन निरस्तः तर्हि कूपसदृशो चौथा जांध फैलाकर बोरडेढ़ हाथ भविष्यतीत्युषाच, न हि भ्रातः सहि उछल कर पूछता हुआ क्या इतना सरितांपतिरनवगाधगाम्भीर्योऽस- होता है, तभी उसने मना किया तो यपारामारोऽतीचमहत्तमः इतितेन फिर बोला कि हद्दई फुए सा होगा प्रत्युक्त, तहि नास्त्येव स यःपा.

व्यावहारिकसंस्थतप्रबोधः। [१७१] बाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः । संस्कृत। दपि महत्तमस्त्वं तु मिथ्येव प्रलप- सीति तं निराचनं तच्छुत्या समुद्र मण्डूकः स्वमनसि तं हसितवा- निति. हिन्दी। तो उसने फिर जवाय दिया" कि नहीं भाई वह नदियों का स्वामी गहराई को थाह न देनेवाला यार पारन दिपाई देनेवाला बहुत ही घड़ा है, तो वाह कुछ नहीं है जो कूए से भी बड़ा है तूतो झुठही योलता है इस प्रकार उसको झूठा बनाता हुआ इसे सुनकर समुद्र का मंडक अपने मन में उसपर हंसा. ३"राजा और नाई के येटे की कहावत. अन्धा यांटे रेवड़ी फिर २ घरको कोही देय. घा कुकरी को कूकर प्यारा शुकरी को ३ तृतीयः नृपनापितपुत्रन्यायः. पूर्व जन्म के संस्कार जन्य प्रेम के अ- जन्मान्तरीयसंस्कारजन्यरागातिशय- धिक होने से अति तुच्छ भीदेवना घशात् अतिक्षुद्रेऽपि देवे, हरि- में हरिहर आदिको को छोड़ कर हरादीपरित्यज्य सर्वोत्तमत्वधी- सर्वोत्तमत्व धुद्धि होती है जैसे कोई वति यथा कश्चिन्नापितः प्रातः सर्च नाई 'प्रातःकाल सय नगर में दूढ पुरमन्विष्यातीवरम्यो पालो मे दर्श- कर यहुतही सुन्दर यालक मेरे दर्शन नाय त्वयात्रानेयः इति नृपणासप्तः । के लिये लाओ' राजा से यह आशा सनापित' प्रातरात्यायापिल पुरमा दिया गया। वह नाई सवेरे उठकर विष्य दृष्ट्वापि च तत्र तत्रातिरम्या. सय नगर में तलाश कर और यहां न्वालान्स्वसुतसमानानमत्या तमेव यहे सुन्दर बालकों को देयकर भी राजवेश्मनि नात्वाराशे निवेदयामा- अपने बेटे के बराबर न मान कर स स्वामिन्नानीतोऽयं रम्यतमो वाल उसी को राजा के घर ले जाकर इति।

[१७२ ] द्वाविंशोऽध्यायः । वाफी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। राजा से निवेदन करने लगा कि स्वामी सब से सुन्दर ये बालक ले आया. गजा उस लड़के को बुने हुए अंगारे | राजा च तमुपशान्तानलाद्वारा काणं के समान, काणा, गजा, लटी हुई खल्वाटे शहस्ववादुजई स्थूलल- यांह और जघा वाला और घड़े और मोदरं दृष्ट्वीपहासमयं पलः कृत- लम्व पेटवाला देस फर 'यह दुष्ट धान्मयोति मरया चुकोप, उवाच मेरी हसा करता हुआ' ऐसा मान चरे जाल्म किमिदमिति।नापितश्च कर गुस्सा होगया और कहने लगा कुपितं नृपं झात्वा कृतालिभूत्वो- कि अर पाजी यह क्या है । नाई धाच राजेन्द्रमाले! तव चरणमुपा- राजा को शुद्ध देख कर हाथ जोड लभे नायमुपहासः किन्तु मे मनसी- कर बोला । हे राजाधिराज ! मैं रथमय निश्चयो यन्नास्तीत्रिलो आपका चरण पकड़ता यह हंसा पयां तव पुर्यास्तु का कंधा। राजा नहीं है बल्कि मेरे दिल में यही नि च सत्यमोहदयेव रागग्रहगृहीतचि. श्चय है कि ऐसा [सुन्दर बालक] त्तदशेति मत्या कोपं तस्याति त्रिलोकी में नहीं है आपकी नगरी लौकिको गाथा. की तो क्या बात है। राजा, माह रूपी ग्रह से पकड़े हुए चिसवालों की यही हालत होती है यह मान कर कोप त्यागता हुआ यह दुनिया की कहावत है चौधी-अधे के साथ वटेर 'कापत है. ४ चतुर्थः अन्धचटकन्यायः. जैसे अचानक अंधे के हाथ आई हुई। यथाऽकलादन्यस्य हस्ते पतितश्चट- चिडिया अंधे ने पफड़ली यह लोक फोऽन्धेन गृहीत इति लोके प्रसिद्धि- में मशहर होगई तैसेही भाग्य न मगात् तथा चालव्धमभीष्टं स्वष्ट- प्राप्त किया जो अभीष्ट है उसेअपने देवादिदत्तं मन्यन्तेऽयुधाः. .

व्यावहारिकसंस्कृतमयोधः। [ १७३ ] बाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-~अवशिष्टक्रियाविशपाः। हिन्दी। संस्कृत। इष्ट देवादि से दिया हुआ अशाना मानते है. पाँचवां 'घुणाक्षरन्याय' है. ५ पञ्चमो घुणाक्षरन्यायः. जमे धुन [कोई] मे गाये हुए काष्ठदि यथा घुणेन भक्षित काठादायकम्मा में अचानकही ककारादितुल्य छि त्ककारादिसशच्छिद्रेषु सत्तु घुणे हो जाने पर धुनने अक्षर बनाये नाक्षगणि निर्मिनानीति फलप्यतेऽ- है ऐसा मशानी लोगांसे मान लिया जाता है. छटा-मंडफ के तोलने की कहावत पठः मण्डूकतोलगन्यायः (स्पष्टः) साफ है. सातवां-'छेइवाले घड़े में जल की क संतमः सच्छिद्रयटाम्युन्यायः (स्पष्टः) हावत' साफ है. जहां फिजूल ही परिश्रम हो और कुछ यत्र वृधवपरिधम: स्यात् नकाचिदी- मतलय न सिद्ध हो यहां ये दोनों एसिद्धिस्तनोपरोक्तौ द्वोन्यायाप्रव- न्याय प्रवृत्त होते हैं. तते. असे कुछ तोलने के लिये कुछ मैंडकों यथा केपुत्रिदुरेप्वभीष्टमानपूर्त्यर्थ को तराजू में रक्खा तो दूसरे उ- नुलायामारोपितेप्यन्ये उत्सृत्य ग. छल फर चले गये, तसेही और च्छन्ति तथा प्रकृतऽपि. २ जगह भी जानना. ८"वृद्धी कारी के वाक्य की कहावत,, अष्टमः वृद्धकुमारीवाक्यस्यायः. जहां एकड़ी बात या काम से सब मनो- यत्रकयैव प्रिययाखिलाभीष्टसिद्धिः र की सिद्धि होजाय वहां ऊपर स्थात् तनोपरोकोन्यायःप्रयुज्यते । कही हुई कहावत काम में आती है। यथा काचिद्धकुमारी इन्द्रेणोक्ता जैसे किसी बूढ़ी अनव्याही स्त्री से चरं घृणीव सा च धरमवृणीत इन्द्र ने कहा कि वरमांगा उसनेवर "पुत्रा मे पहुक्षीरघृतमोदनं कांस्य- [१७२ ] द्वाविंशोऽध्यायः। वाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। राजा से निवेदन करने लगा कि स्वामी सब से सुन्दर ये यालक ले व्याया. गशा उस लड़के को बुझे हुए अंगारे राजा च तमुपशान्तानलागारामं कार्ण के समान, काणा, गजा, लटी हुई खल्लाटं यशहस्यवाहुजई स्थलल- यांह और जघा वाला और यह और मोदरं दृष्ट्वीपहासमयं खलः कृत. लम्व पटचाला देस कर 'यह दुष्ट वान्मयीति मत्या चुकोग, उवाच मेरी हसी करता हुआ' ऐसा मान च रे जाल्म किमिदमिति । नापितश्च कर गुस्सा होगया ओर कहने लगा फुपितं नृपं झात्वा रानातलि त्यो- कि मेरे पाजी यह पया है । नाई याच राजेन्द्रमौले! तव चरणमुपा राजा को शुद्ध देख कर हाथ जोड़ लभे नायमुपहासः किन्तु मे मनसी- कर बोला । हे राजाधिराज ! में त्वमेव निधयो यनास्ताविलो आपका चरण पकड़ताई यह हंसी क्यां तच पुर्यास्तु का कथा । राजा नहीं है बल्कि मेरे दिल में यही नि च सत्यमोहदयेव रागाहगृहीतचि- चय है कि ऐसा [सुन्दर बालक] त्तदोनि मरवा कोपं तत्याजेति त्रिलोकी में नहीं है आपकी नगरी लौकिकी गाथा. पी तो क्या बात है। राजा, मोह मापी ग्रह से पड़े हुए चित्सवालों की यही हालत होती है यह मान कर कोप स्वागता हुआ यह दुनिया की कहावत है. चौधरी-अधे के हाथ बटेर फहापन है. ४ चतुर्थः अन्धचटकन्यायः, जैसे अचानक अंधे के हाध आई हुई यथाऽकरलादन्धस्य हस्ते पतितश्चट- चिडिया अधे ने पकडलीयह लोक कोऽन्धेन गृहीन इति लोके प्रसिद्धि- में मशहूर होगई तैसेही भाग्य ने मगात् तथा देवाहन्धमभीष्टं स्वष्टः प्राप्त विपा जो अभीष्ट है उसे अपने देवादिदत्तं मन्यन्तेऽबुधाः.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [१७३ ] चाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेपाः । ww हिन्दी। इष्ट देवादि से दिया हुआ अमानो मानते हैं. पाँचयां 'धुणाक्षग्न्याय' है. ५ पञ्चमो धुणाक्षरन्यायः. जैसे घुन [कौड़े से साये हुए काष्ठादि ! यथा घुणेन भक्षित काष्ठादायकस्मा में अचानकही ककारादितुल्य छि. स्ककारादिसशन्छिन्द्रेषु सत्तु घुणे ग्रहो जाने पर घुनने अक्षर बनाये नाक्षगणि निर्मितानीति करप्यते- है ऐसा अज्ञानी लोगों से मान लिया युधः जाता है. 'मैंडक के तोलने की कहावत' पष्ठः मण्डूकतोलनन्यायः (स्पष्टः) साफ है. सातयां-'छेदनाले घड़े में जल की क संतमः सच्छिद्रपटाम्बुन्यायः (स्पष्टः) हायत' साफ है. जहां फिजूलही परिश्रम हो और कुछ यत्र थेवपरिध्रमः स्यात् नकाचिदभी. मतलय न सिद्ध हो यहां ये दोनों एसिद्धिस्तत्रोपरोक्तौ द्वौ न्यायौ प्रव. न्याय प्रवृत्त होते हैं. जैसे कुछ तोलने के लिये कुछ मैंडकों यथा फेचिद्दरेवभीष्टमानपूर्त्यर्थ को तराजू में रक्सा तो दूसरे 3. नुलायामारोपितेप्यन्ये उत्त्य ग- छल कर चले गये, तसेही और च्छन्ति तथा प्रकृतेऽपि. २ जगह भी जानना. ८ "यूढी कारी के वाक्य की कहावत, अपमः वृद्धकुमारीवाक्यन्यायः. जहां एकही बात या काम से सय मनोयनकयैव क्रिययासिलामीसिद्धिः रयों की सिद्धि होजाय.वहां ऊपर स्यात् तमोपरोक्तो न्यायः प्रयुज्यते । कही हुई कहावत फाम में आती है। यथा काचिद्धकुमारी इन्द्रेणोक्ता जैसे किसी बूढ़ी अनन्याही स्त्री से वरं वृणीष्व सा च वरमवृणीत इन्द्र ने कहा कि वर मांगासनेयर 'पुत्रा में बहुक्षीरघृतमोदनं कांस्य- AnanRAr-W-1 । . [ १७४ ] द्वाविंशोऽध्यायः। बाकी क्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। मांगाकि "मेरे पुत्र बहुतसा दूध पाध्यां भुखीरनिति अनया एकैनैव घी भात कांसे के बर्तनों में साया घाक्येन पतिः पुत्राः गावो धनं करें" इसने एकही चाक्य से पति, धान्यं सर्वमेव संगृहीतम्भवति इत्य पुत्र, गो, धन और धान्य सवही मां- प्रकृतेऽपि. गलिये ऐसही और जगह भी. ९"कौड़े और घिरोरी की कहावत" नवमः कीटभृङ्गन्यायः जैसे कीड़ा घिरोरी से पकड़ा हुआ उसी यथा कौटो भृझेण गृहीतस्तमेव प्रति- को हरवक्त ध्यान करता हुआ उस क्षणमभिध्यायन तत्स्वरूपतामति फोही शकल बन जाता है वैसेही तथाहरिभलार प्रेम्णा पेपा बात. हरिभक्त प्रेम से वाद्वेप से उस ईश्वर मीश्वरं ध्यायन्तस्तत्स्वरूपतां गता को ध्यान करते हुए उसी के रूप में यास्यन्तिचेति. लीन हुए और आरो होंगे. १०"वेल और गले की कहायत". दशमः विस्वस्खल्वाटन्याया. कमवक्त सब जगह ही दुःख पाते हैं हतभाग्यास्सर्वत्रच दुःखमनुभयन्तीति यह जहां जाहिर किया जाता है वहां यत्र सूच्यते तत्रायं न्यायः प्रवर्तते यह कहायत होती है भर्तृहरि राजा भर्तृहरक्तिरेनं न्यायं निम्नपधेन को नीचे लिपी फहन इस कहायत साकरोति. को स्पष्ट करती है. "सूर्य की किरणों से सिर में सत्तापित | खल्याटो दिवसेश्वरस्य किरणःसन्ता दुआ कोई गंजा छायाकी जगह चा पितो मस्तके, वाम्छन्देशमनात हता हुआ भाग्यवश ताड़ के नीचे विधिवशात्तालस्य मूलं गतः तत्रा- गया यहां भी शीग्रही एक गिरे हुए प्याशुमहाफलेन पतता भानं सशब्द यो फल से आवाज के साथ खोपड़ी शिप्रायो गच्छति यत्र भाग्यर पिल गई, अम्लर जहां मन्दमागी हितस्तत्रैव यान्त्यापदः. जाता है वहीं आपत्ति जाती है, ११ध कंगन को भारसी क्या? एकादशः नहि करकङ्कणदर्शनायाद- शापेक्षा न्याय.

• व्यावहारिकसंस्कृतम्बोधः। १५५ घाकी किया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। प्रत्यक्ष प्रमाण मै यह कहावत हस्तमाल प्रत्यक्षप्रमाणे उपरोक्तो न्यायः प्रयुज्यते. होता है. १२ मरे कोमारना. द्वादशः मृतमारणन्यायः १३ पानी को मथना. प्रयोदशः जलमन्थनन्यायः. १४ कौए के दान्त जाँचना. चतुर्दशः काकदन्तपरीक्षान्यायः. १५ गधे के रोम गिनना पञ्चदशः गदर्भरोमगणनन्यायः. १६ रस्सी और साँप की कहावत. पोडशः रज्जुसपन्यायः. भ्रम से जहां उलटा दिखलाई देखा है | यत्र विपरीताभासो भवति तत्राय यहां यह कहावत होती है ! जैसे न्यायः प्रवर्तते । यथा सर्प रज्जु- सांप में रस्सी का भ्रम और रस्सी मान्तिः रजौ सर्पभ्रान्तिस्तथा- में सांप का भ्रम । ऐसेही और ज. प्रकृतेऽपि. यह चारों कहा- वत फिजूलपन जाहिर की है. चैयर्थ्यद्योतकमिदं न्यायचतुष्टयम्, गह भी. १७"कौए की आंख की कहावत" सप्तदशः काकाक्षिन्यायः. जैसे फौए की एकही आँख दोनों आँखों काकस्यैकमेव चक्षुरिन्द्रियं गोलकद्वये से सम्बन्ध रखती है तैसे और जगह यथा सम्बध्यते तथा प्रकृतेऽपि. भी जानना. २८ जो अपिर में रण्डा का वियाह हो अष्टादशः अन्त्ये रण्डाधिवाहश्चेदादा- तो पहिलेही क्यों नहो । जो करना घेय कुतो न सः यत्कर्तव्यं तत्पूर्व- यह पहिलेही करना चाहिये इसम मेव करणीयमित्यभिमायेऽयं न्यायः तलब में यह कहावत होती है. प्रवर्तते. १९जितनी सम्पत्ति उतनी विपत्ति. एकोनविंशः यावच्छिरस्तायती शिरी- या जितना सिर उतनी तल्लीफ़E घेदनान्यायः स्पष्टः. २० "सुई और कड़ाह फी कहावत" विंशः सूचीकटाहन्यायः. अनेक व्यारयेय वाक्य और पदों में प० । अनेकेषु वाक्येषु पदेषु वा व्याख्ययेपु हिले पदाहुआ वाक्य या पद जिस प्रथमपठितमपि वाक्यं पदम्वा यहुः द्वाविंशोऽध्यायः। वाको त्रिया इत्यादि का वर्णन-अवशिष्टक्रियाविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। मे बहुत देर लगै उस चंदकर वौच वत्ताम्य पारत्यज्य मध्येऽन्ते पाप- मया भोर में पढ़ा हुआ थोड़ी देर टितं म्वल्परक्तव्यं पूर्वम्याख्याय- में व्याख्या किय जानवाला वाक्य तेऽत्राय न्यायः प्रयुज्यते. या पदहा पहिले कहाजाता है यहां यह कहावन है. जैसे लुहार के पास पहिले कोई काह यथा लौहकारम्पनि पूर्व कश्चित् काटा- बनवान घाला आया पछि मुई यन होत्पादनार्थी आगतः पश्चात्सूच्यु- चाने वाला आ मौजूद हुआ, तहाँ स्पादनार्थी प्राप्तः, तत्र यथा लोह- जैस टुहार पहिले बनाने योग्य क कारः प्रथम कर्तव्यत्वेन प्रातमपि डाह को बहुत देर में यनने के का फटाहं थहुकालसाध्यत्वात्परित्यज्य रण, छोड़ कर पीछे बनाने को आई पधारकर्तव्यतया प्राप्तामपि स्वल्प. हुई थोडे काल में बनाने योग्य सुई कालसाध्या सूची पूर्वमुत्पादयति फो पहिले यनाता है तैसही और २ तथा प्रहत्तेऽपि. याता में समाना. इसीसवाँ ऊँट और लठिया की कहावत है एकविंशः उष्ट्रलगुडन्याय.. अपने मत में दूसरे से भारोपण किये | स्वमते परेणोद्भाव्यमानानां दूपणानां. हुए पण उसीके मत में डाल दिये तन्मत एच पातनेऽयं न्याय: प्रव- जांप वहां यह कहावत होती है. तते. जैसे कंट से लेजाई हुई लटियों से यथोष्ट्रेणोधमानेनैव लगुडेन तत्प्रहारः ऊंटही स्वयं पिटता है। तैसे नया- नियत तथा तार्फिकोत्थापितदूपणे- यिका के उठाये हुप. दोषों से उन स्तन्मतमेव वेदान्तिभिर्निराक्रियते. का मतही घेदान्तियों से काट दिया जाता है. वाईसी मुर्दे के उपटने की कहावत. झाधिशावोद्वर्तनन्यामः. तेईसवी अन्धे को दर्पण की , प्रयोविंशः अन्धदर्पणन्यायः, चौबीसवीं कुत्ते की पूंछ को सीधा कानाः चतुर्विशः श्यपुच्छोलामनन्यायः. ।

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [१७७] कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत । पशीसी वन में रोने की कहायत. पञ्चविंशः अरण्यरोदनन्यायः. छन्चीसंवी बहिरे के कान में जप की पविंशः चधिरकर्णजापन्यायः, फहाघत. यह पाचौ न्याय कहावत फिजूलपन पसन्यायपञ्चकं चैययद्योतकं. जाहिर फरता है. सत्ताईसवी मक्खी और जोक की सप्तविंशः मक्षिकाजलौकान्यायः. कहावत. स्वभाव से सब आदमी अपनी इए प्रत्याखिलो जनः स्पेष्टं वस्त्येव गृक्षा- वस्तुही को लेता है जैसे मक्सी ति यथा मक्षिका सबै देहं परित्यज्य सब देह को छोड़ कर घाव परही व्रणमेचावलम्बते, जलौकाऽपि बैठती है और स्त्री के दुद्धी पर स्त्रीस्तनाग्रे लग्ना क्षीरं त्यक्त्वा रख- लगाई हुई जोंक दुध छोड़ खून को धिरं पियति तथा प्रकृतेऽपि. पीती है तैसेही और २ जगह भी. २८ हंस दूध की कहावत और सूप की अष्टाविंशः हंसक्षीरन्यायः, शुपन्या कहावत है जहां सार मात्रही ग्रहण यश्च यत्र सारमाश्रमेव गृहाते तमे. किया जाता है वहां ये दोनों कहा तो न्यायो प्रचतेते. यत होती है. जैसे हंस जल को छोड़ कर दूध को यथा सः जलं त्यक्त्या क्षीरमेघ गृ. ही लेता है जैसे छाज भुस वगैरह हाति यथा शूर्पः शाद्ययकर स्प- फूढ़े को छोड़ कर शुद्ध अन्न का ही पत्या शुद्धमन्नमवशेषयति तथा या रख लेता है तेसही जो पुरुप इन एताभ्यां न्यायाभ्यां सतां गुणानेव दोनों न्यायों से सजनों के गुणों को गृहात्तिसपर शिष्यत्वेन स्वीकार्यः, ही ग्रहण करता है यही शिप्य भाष से अङ्गीकार करना चाहिये.. २९ पाये पीछे जात पूछना, या व्याह एकोनप्रिंशः विवाहानन्तरंपरपरीक्षा. पछियरकी जांच करने की कहावत है न्याया. . २३ [१७८] हाविशोऽध्यायः! कहावत इत्यादि का वर्णन लोकोक्तिविशेपाः । हिन्दी संस्कृत। शिष्य और पैराग्य चारह की परीक्षा शिष्यवराग्यादिपरीक्षा प्रादायव कर्त- अब्बल ही करना चाहिये क्योंकि च्या यतः महि यियाहानन्तरं घरप. विवाह के पीछे दुलह की जांच रीक्षा भवतीति. नहीं होती. आज कर यह कहा- निशा श्वः पतन्यमय कुर न्यायः पत साफ़ है. ३१ जूओं के डर से फथरी छोड़ना | एकविशायूकाभिया कन्धात्यागन्यायः साफ है. ३२ फैमुतिकन्यायः द्वानिशा कैमुतिकन्यायः जय सदाशिय सम्पूर्ण पापयुक्त शर- | यदि सदाशियोऽसिलपापयुतानपि णागतों को भी पन्धन से छुड़ाते हैं शरणागतान् यन्मनान मोचयति तो शरणागत घोड़े पापियों या तदाल्पपापान्वितान्माधुन्वा शर. साधुओं को छुड़ा दें इस में तो जागतान मोचयतातिक्रिमुवतव्यं. कहनादी क्या है. शिष्य जरूर जांचलेना चाहिये फ्याकि | अयभ्यं परीश्यश्च शिष्यः यतो महि कुने ही साल में रक्खा हुआ गी पवित्रं म्यादोक्षीरं भ्वद्दती धृतमिति का दूध इस कहावत से असत्पात्र ग्यायेनसरपात्रेसदुपदेशोप्यपवि. में अच्छा उपदेश भी अपवित्र हो. प्रतां याति. जाता है. इसी प्रकार शिष्य से भी शास्त्र जांच एवं शिष्येणापि यथाशास्त्रं परीक्ष्यच करकही परम शाल सम्पन्न दयालु, परमशीलसम्पन्नोऽनृशंसः श्रोत्रि- शास्त्र चत्ता, अद्वत निष्ठ गुरु करना योऽवतनिष्ठा गुरुराश्रयणीयः. चाहिये. ३३ टटीरी की कहावत. ३३ अयरिंशः दिहिनन्यायः. रद निश्चय वाले फी ईश्वर की कृपा सढाध्यवसायिन ईशानुमहात् काय- से कार्य मिद्धि होती है. सिद्धि भवतीति.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। [ १७९] कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत । जैसे किसी टिभि नाम के पक्षी के यथा फस्यचिद्दिट्टिमाख्यस्य पक्षिणः किनारे पर रक्खे हुए अण्डों को तीरस्थान्यण्डानि समुद्र सेकेना- समुद्र अपने लहरोसे यहा लेगया। एजहार स च पक्षी एनं शोपया. यह पक्षी इस को सुखा दूंगा इस मीति प्रवृत्तः भार्यादिमिर्चहुधा वा. प्रकार प्रवृत्त हुआ उसकी स्त्री आदि र्यमाणापि नोपरराम । प्रत्युत ता. से बहुत प्रकार से रोका हुआ भी मपि सहकारिगो बने।तांश्च पतना- न माना वरन उनको भी सहायक स्पतनाभ्यां बहुधा क्लिशतः सर्वान- होने के लिये बुलाया । उनको उड़ने चलोक्य कृपालुनारदः तत्समीपे ग- और फिर नीचे आने से यहुधाक्लेश रुई प्रेषयामास ततस्तत्पक्षवातेन पाते हुए सब को देख कर दयालु गुष्यन् समुद्रो भीतोऽण्डान्यानीय नारद उस के पास गरुड़ को भेजते पक्षिणे ददा. हुए, तब उनके पंखों की दवा से सूराता हुआसमुद्र डरा हुआ अण्डे लाफर पक्षी को देता हुआ. ३४ अहल्कार (राज पुरुप) सेपन क. ३४ चक्र सेव्यं नृपः सेन्यो न सेव्यः रने चाहिये और राजा भी सेवन केवलो नृपः न्यायः स्पष्टः. करना चाहिये सिर्फ राजाही नहीं यह कहावत साफ़ है. तत्व जानने की इच्छा वाले पुरुष से तत्वयुभुत्सुना फेवलं श्रवणमेवन सेव्यं फेवल श्रयणही नहीं सेवन करना किन्तु तदङ्गभूताः शमादयो मनना चाहिये बल्कि उसके अङ्ग रूप शम दयश्च सेव्याः इत्यमेवराजानं सिपेच दमाद और मननादि सेवन करने यिपुस्तन्मन्त्र्यादीनपि सेवेत. चाहिये इसी प्रकार राजा को सेवन करने की इच्छा पाला पुरुष उसके मंत्री वगैरह की भी सेवा करे.

{१७८] द्वाविंशोभायायः। कहावत इत्यादि का वर्णन लोकोक्तिविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। शिष्य और धैराग्य घरह की परीक्षा शिप्यराग्याविपरीक्षा चादविय कर्त- अपल ही करना चाहिये क्योंकि व्या यतः नदि विवाहानन्तर धरप. विवाह के पीछे दुलह की जांच रीक्षा भयनीति. नहीं होती. ३० कल कर सो आज कर यह त्रिंशः यः कर्तव्यमय कुर न्यायः चत साफ है. ३१ जूमों के पुर से फधरी छोड़ना एकत्रिंशःयूकामिया कल्यात्यागन्यायः स्पट ३२ फैमुतिकन्यायः द्वात्रिंशः फेमुतिकन्यायः. जय सदाशिव सम्पूर्ण पापयुक्त नगर- | यदि सदाशिवोऽसिलपापयुतानपि णागतों को भी धन्धन से छुड़ाते हैं शरणागतान् बन्धनान् मोचयति तो शरणागत थोड़े पापियों या तदाल्पपापान्विनानमाधून्या शरः साधुशी को छुड़ा दें इस में तो जागतान् मोचयसीतिकिमुवतस्पं. कहनाही क्या है. शिष्य जरूर जांचलनाचाहिये क्योंकि । अवश्य परीश्यश्च शिप्यः यतो नहि कुत्ते को साल में रक्षा हुआ गी पवित्र स्थागोक्षीरं यती धृतमिनि का दृध इस कहावत से असरपात्र न्यायेन यसत्पात्रे सदुपदेशोप्यपवि- में अच्छा उपदेश भी अपवित्र हो. प्रतां याति. साफ है. जाता है. इसी प्रकार शिष्य से भी शाख जांच पवे शिष्येणापि यथाशासं परीक्ष्यव करकेही परम शील सम्पन्न दयालु, परमशीलसम्पनोऽनृशसः शानि- शारत्र वेत्ता, अद्वत निष्ठ गुरु करना योऽद्वैतमिष्टा गुरुराश्रयणीयः. चीहय. ३२ टटीरी को कदाचत. ३३ त्रयस्त्रिंशः विभिन्यायः. दृढ़ निश्चय वाले की ईश्वर की कृपा हदाभ्यवसायिन ईशानुमहात् कार्य- से कार्य सिद्धि होती है. सिद्धि भवतीति.

[ १७९ ] व्यावहारिकसंस्थतप्रयोधः । कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। जैसे किसी टिहिम नाम के पक्षी के | यथा फस्यचिहिट्टिभारयस्य पक्षिणः किनारे पर रक्से हुए अण्डॉ को तीरस्थान्यण्डानि समुद्र उत्सेकेना- समुद्र अपने लहरोसे यहा लेगया। पजहार स च पक्षी एनं शोपया- वह पक्षी इस को सुखा दूंगा इस मोति प्रवृत्तः भार्यादिभिर्वहुधा वा- प्रकार प्रवृत्त हुथा उसकी स्त्री आदि यमाणापि नोपरराम । प्रत्युत ता. से बहुत प्रकार से रोका हुआ भी मपि सहकारिणोधव्रतांश्च पतनो. न माना वरन उनको भी सहायक स्पतनाभ्यां यहुधा क्लिशतः सर्वान- होन के लिये बुलाया।उनको उढ़ने घलोक्य कृपालुनारदः तत्समीपे ग. और फिर नीचे आने से बहुधाझंश रुई मेषयामास ततस्तत्पक्षपातेन पाते हुए सय को देख कर दयालु गुप्यन् समुद्रो भीतोऽण्डान्यानीय नारद उस के पास गरुड़ को भेजते पक्षिणे ददा. हुए, तब उनके पंखों की हवा से सूसताहासमुद्र डरा हुआ अण्डे लाकर पक्षी को देता हुआ. ३४ अहल्कार (राज पुरुष) सेवन क. ३४ चक्रं सेव्यं नृपः सेव्यो न सेव्यः रने चाहिये और राजा भी सेवन फेवलो नृपः न्यायः स्पष्टः. करना चाहिये सिर्फ राजाही नहीं यह कहायत साफ़ है. तत्व जानने की इच्छा चाले पुरुष से तत्वधुभुत्सुना केवलं श्रवणमेवन सेव्यं कवल श्रयणही नहीं सेवन करना किन्तु तदङ्गभूताः शमादयो मनना चाहिये यल्कि उसके अग रूप शम दयश्च सेन्याः इत्थमेव राजानसिपव दमादि और मननादि सेवन करने यिपुस्तन्मन्त्र्यादीनपि सेवेत. चाहिये इसी प्रकार राजाको सेवन करने की इच्छा वाला पुरुष उसके मंत्री वगैरह की भी सेवा करे.

[१८] द्वाविशोऽध्यायः कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। ३५ सांप छडून्दर की कहायत. ३५ पञ्चप्रिंशः सर्पछुन्दरीन्यायः. ३६ छुरी राजे की कहावत. ३६ पत्रिंशः क्षुरिकाभिटिकान्यायः, जहां सब तरह से एकही चीज़ का यत्र सर्वथा एकस्य वस्तुन एव हानिः नुक्सान हो वहां यह दोना कहा. सम्भाव्यते तन इमो न्यायो प्रय- चते इस्तेमाल होती है. तते। जैसे किसी साँपने मूस के धोखे छ यथा केनचित्सण मूपकममाद्दीर्घ इन्दर पकडली अब उसकी वू से तुण्डिफा कवलिता अधुना तगन्धा जान कर उसको उगलना चाहता त्तामुजिगोपुरपि कुष्ठभयानोद्विरति हुआ भी कोढ़ के डर से नहीं उग अन्धत्वभयान्न गिलस्यवानः महत्स- लता और अन्धे पनके डरसन कटे पतितः क्षुरिफा यदि चिटि निगलताही है इसी से बड़े संकट कामुपरिपतेत्तदापि चिटिकाया में पड़ा हुआ है (अर्थात् दोनों तरह एव हानिः यदि चिमटका क्षुरि- से सांपही की हानि है) छुरी जय कामुपरि पतेत्तदापि चिटिकाया खबूजे पर गिरे तो भी सबूजे काही एव हानिः. सुपसान और जो पर्दूजा छुरी पर गिरे तो भी सबूजे काही नुक्सान होता है. ३७ घंटे के भीतर दीपक की कहावत. ३७ घटप्रदीपन्याया, जहां फहन मात्रही किया जाय अपनी यत्र फथनमात्रमेव नियते नतु न्यूनाधि- अक्षा से कुछ कम ज्यादा नहीं यहां, क्यं खवुया, तपाथवा विद्यार्थिनः अधया तालिवल्म को केवल कि. पुस्तकमा एम योधः नत्यन्यत्र स. ताय में ही बोध हो और जगह नहीं घायं न्यायः प्रवर्तत. यहां यह न्याय प्रवृत्त होता है. मे घड़े में रक्षा हुआ दीपक घड़े के | यथा घनिष्ठो दीपो घटस्योदरमात्र उदर मान को ही प्रकाशित करता मेव भासयति तथा मरतेऽपि. तसली और भी जानो.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोधः। [१८१ ] कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेपाः। हिन्दी। संस्कृत। ३८ पोस्ती और मल्लाह की कहावत ३८ अहिभुधावर्तन्यायः. इस कहावत से तादात्म्य (अपने आ. एनेन न्यायेन तादात्म्याध्यासएव ज्ञेयः पेका) अध्यास (भ्रम) जानना। यथा फश्चिदहि (पोस्ती) भुग्नायमा- जैसे कोई पोस्ती नाच पर चढ़ा यह रोह सचतत्र बहुजनसमुदाय दृष्ट्वा यहां यहुत से आदमियों को देखकर केनचिन्म विनिमयो न स्यादिति किसी से मैं यदल न जाऊं इस अ. धिया स्वपादे रज्जु पद्ध्या तन्द्रां फल से अपने पांव में रस्सी बांध प्राप कैवर्तश्चापहासाथै तत्पादात्तां कर पीनक में आगया मल्लाह ने मोचयित्वा स्वपादेववन्ध. हंसी के लिये उसके पाँव से उस रस्सी को सोल फर अपने पाँव में बाँध लिया. नाव के पार जाने पर उतरते वक्त वह नायि पारंगतायामवरोहणसमयेऽहि- पोस्ती अपने पाँच में रस्सी न देस भुक् स्वपादे रज्जुमदृष्ट्वा कैवर्तपादे फर और मल्लाह के पांच में उसे देश च तांदृष्ट्वाऽहमयमयमहीमीत स्व. पर यह मैं और मैं यह है यह हदि निश्चित्यारे कैवर्त त्वमह महञ्च अपने दिल में निश्चय कर यह झ. त्वमिति तेन विवादं कृतवान् इति. गडा करने लगा फि अरे मल्लाह तू म और मैं तू ह. ३९ रीता घड़ा योले घना. ३९रिक्तो घट एवाधिकं शब्दायते न्यायः मूर्ग लोगही अक्सर इधर उधर यका अपण्डिता एव बहुधा इतस्ततो विक- फरत है पण्डित नहीं. स्थन्ते नतु पण्डिताः. ४० चाँझ क्या जाने प्रसूता की पीर ४० प्रसूतैय हि जानाति पुत्रप्रसयवेद- जिस के लगे सोई जाने. नामितिन्यायः स्पष्टः ४१ अन्धों में फाणा सरदार जहां पेड़ ४१ निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपिटुमा- नहीं वहां अण्डही रूग्य. यते. ४२ जितने मुंह उतनी बात. ४२ यावन्ति मुसानि तावतीः वार्ताः, द्वाविंशोऽध्यायः ।। फहावत इत्यादि का वर्णन लोकोक्तिविशेषाः। हिन्दी। संस्कृत। ४३ जेसा देव चैसी पूजा. ४३ यादृशो यक्षस्ताइसो वाली. ४४ गय शीय होने यहां दुयेही रह गये. | ४४ वृद्धि मिश्वतो मूलं विनष्टम् . ४५ नई नाइन पांस का नहता. ४५ नूनना नापिती काचित् तस्या न पछिदियेणुका, ४६ नये सायाजी गाजर को संख,कज्यौ ४६ विरागी नूतनो गृञ्जनस्य शपः तो यज्यौ नहीं कुतरसायो. यदि मातस्तहि मातीनाचश्चर्वितः ४७ नाच न जाने आंगन टेढा. ४७ अङ्गणं शंसते वक्र नर्तनाकुशलो जना. ४८ किसी का घर जले कोई तापे. ४८ कस्यचित्तुदद्वेश्म कश्चिद्धस्तो न. तापयेत्. जमाई, उदर, स्त्री, अग्नि, और तालाय जामाता जठरं जाया जातवेदा जला- ये पाँच जफार मुश्किल से भरे शयः पिता नैव पूर्य जकाराः जाते हैं. पञ्च दुर्भराः।१ माता पैदाइरा की जगह, गंगाजी, म. |जननी जन्मभूमिश्च जाहवी च जना- गवान और पिता ये पांच जकार दनः जनकः पञ्चमश्चैध जकारा मुश्किल से मिलते हैं। पञ्च दुलमीः।२ --अब हंसी के श्लोक है- -अथ हास्यरस दलोकाः- १ दो त्रियोंवाला मनु विलक या- विलादहि विलस्यान्नः सितमार्जारस. हर और विल के भीतर बैठे हुए पयो मध्ये चाखुरिवाभाति पत्नीद- दिल्ली और साँप के बीच में भूसे ययुतो नरः ११ फे नाई भान हुआ करता है. २ विष्णु का आगमन सुन जल्दी से विष्णोश्चागमनं निशम्प सहसा त्या सर्पकी रस्सी पना हाथी के चर्म फणीन्द्र गुण, फोपीनं परिधाय च का कोपीन पहन शिप जीआगदौड़े, मेकरिणः शंभुः पुरो धावति, दृष्ट्वा सय सांप गपड़ जी को देख कर विष्णुरथं सकम्पहदयः सोऽपत. कम्पित चित्त हुआ पृथ्यो पर गिर अनले, रत्तियिस्पलिता हिया न.

[ १८३] व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। पड़ा और गज चर्म फिसल पड़ी तमुसो नग्नो हरः पातु ः।२॥ अब लज्जा से नीचे को हुआ है मुख जिनका ऐसे नग्नहर हमारी रक्षा करो. ३ दूसरों का अन्न पाकर हे मूर्ख अपने पराभं प्राप्य दुर्बुद्ध मा प्राणेषु दयां फुरु प्राणों पर दया मत फर, दूसरों का परानं दुर्लभं लोके प्राणा जन्मनि अन्न इस लोक में दुर्लभ है और जन्मनि ।३। प्राण तो हर जन्म में मिलते हैं. ४ हे असंख्य मनुष्यों की सफाई करने वैद्यराज नमस्तुभ्यं क्षपिताशेपमानव वाले हकीम जी तुम्हारे लिये नम- त्वयि विन्यस्तभारोऽयं शतान्तः सु- स्कार है यमराज तुम पर अपना पमेधते ।४। भार रस आप मौज करता है. ५ गणेशजी के वाहन मूषक को भूपा | अत्तुं वाञ्छति वाहनं गणपते राखुं सर्प साना चाहता है उस सर्प को क्षुधातःफणी, तञ्चक्रौञ्चपतेः शिनी स्वामकार्तिक का मोर खाना चाह च गिरिजासिंहों ऽपि नागाननम्, ता है और पार्वती का सिंह गो गौरी अन्हुमुत्तामसूयति फलानाथं शजी को पाना चाहता है पार्वती कपालानलो, निर्विणः स पपौ कु गंगाजी से द्वेप करती है और शि ठुम्बफलहादीशोऽपि हालाहलम्।३।। घके मस्तक की अक्षि चन्द्रमा से ईर्षा करता है इस लिये कुटुम्ब के कलह से दुखी हुए महादेव जी भी जहर पीगए. अब विवाहों में निमन्त्रणी के श्लोक छ. अथोद्वाहामन्त्रणलोकाः पट. { आप सजनों के सम्बन्ध से मुझ जातं जन्म कृतार्थतां विकसितं पुण्या- को क्या२न लाम हुआ। बरन सव म्वुजानां धनं छिन्ना संप्रति सर्व- ही लाभ हुमा, प्रथम जन्म सफल पापपटलिई सान्धकारो गतः, आ.

[ १८४] हुआ, पुण्य रूपी कमला के धन द्वाविंशोऽध्यायः। कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। नन्दाइपुरकोटया प्रकटिता विमा- सिल, सम्पूर्ण पाप रूपी वृक्ष अब रवी पाटिता, सम्बन्ध भवतां ने काटा, दु.य रूपी अन्धकार गया सुमतिना कि किन लब्धं मया ॥१॥ आनन्द रूपी अङ्कुर कोटि प्रगट दुई, और विन कपी बन दूर हुआ इत्यादि।१। हे द्विजेन्द्र शिर्यमणे ! तीनो जगत के न कम्पयन्ति नायक यशो निशम्य के बोच में भाप के दूध के समुद्र तुल्य शिरः पयः पयोधिनिमलं द्विजेन्द्र निर्मल यशको सुनकर कौन से पुरुष जिलगत्रये । अतः पितामहो विभुः शिर नहीं कपात हैं। परन सपही भुजङ्गमेश्वरस्य नी चकार शन्धा- शिरकपाते हैं। इसी लिये भगवान् रकान्धपपिघातराया । २१ ब्रह्माजी ने पृथ्वी के नाश होने की भासे शेषजी के कान नहीं बनाया आपकी कीर्ति रूपी लता ने, हवा के वकीर्तिदतनिस्समीरपदयामासाथ- आश्रय को लेकर तीनों लोक रूपी लेकिरये, मञ्च व्याप्य चिरम्बभार मांचे को पाकर नक्षत्र रूपीकलियां कलिकाः नक्षत्ररूपेण याः तासांप्र. धारण की तिन में से एक चन्द्रमा स्फुटमकमिन्दुकुसुमं त्रैलोक्यमादी. रूपी कली मिली जिसने त्रिलोकी को दौत किया। अब मैं नहीं जानता विता सासु कौर फलम् । ३। कि उन सब कलियों के सिलने पर कैसा फल होगा।३। --पर की और का- घर पसे। हमने आप के यहां, घरों में जो भलम्प) अस्माभिर्यदीजि गेहविरलं शातं स्तु. सुखभागा है सोउसकी कैसे प्रशंसा यामः कपम् । कन्यारस्नादायथल- करें मरे संसार में प्राणों सभी इस्तमिदं नाणारपीट स्नोर याव- प्यारा अलात यह कन्या रूपी द्वित्तमकारि. मित्र भवतासवान्नश- पयन्, लो जाने विक्रयासु तासु - व्यावहारिकसम्कृतप्रयोधः। [ १८५] कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेपाः । हिन्दी। संस्कृत। रत्न दिया । और हे मित्र ! वित्ता नादिभिः श्रीकृष्णो जयताद्धि यस्य नुसार आपने अन्न जलादि से से- कृपया सम्बन्धिना स्मो घयम् । १ । घाभी की। भय उन श्री कृष्ण महा- राज की जय हो जिनकी कृपा से हम और भाप सम्बन्धी हुए. ---दोनों और की- उभय पक्षा हे प्रभो ! जो अभिलापा हमारी आपके | यदीत्कण्ट्यं चिरादासादर्शने भयता दर्शनो कीबहुत दिनोंसे थी यह भाज प्रभो । तदद्य पूरितं येन स कृष्णः जिसने पूर्ण की यह श्रीकृष्ण महाराज शन्तनोतु वः।२। आपका (हमारा) फल्याण करे ।२। -कन्या पक्षवालों की- कन्या पक्षे। प्रियवर। जिस समय से आपका द- कालादारभ्य यस्सात्प्रियपर भवतां द. शन इस जगह हुआ तभी से हमारे शंनं नोऽध जातम्। दुःसाधा नोधि. दुरा समूह आप की कृपा से नष्ट नष्टःप्रभुपर कृपया नास्ति हर्षस्थ पा. हुए और हर्पका पार नहीं है । और २: दासीकल्पाच फन्या घशनवसु- दासी तुल्य कन्या, भोजनविधि में | विधी शाफपूगीफलादि यद्यन्नक्तया- शाक और द्रव्यविधि में सुपारी जोर पितं यो नियतिरियमहो स्वीकृत भक्तिस आपको समर्पण किया वही२ तत्सहर्पम् । ३। हर्ष पूर्वक आपने स्वीकार किया यह एक हमारा यहाही भाग्य है।३ । पक्षियों का राजा गरुष्ट उनका राजा अथाशीर्वादात्मकाः श्लोकाः विष्णु उनका पुत्र मदन तिनके शत्रु पिराजगजपुत्रारेर्यन्नामचतुरक्षरम्भ- शिव उनके चार अक्षर का नाम धं वसतु शत्रूणामुत्तरं तव मन्दिरे१ मृत्युञ्जय सो इसका पहला भाधा आप के शत्रुओं के यहां और पिछ. ला आधा आप के यहां रहे।१। मृत्युञ्जयः [१८६ द्वाविंशोऽध्यायः कहावत इत्यादि का वर्णन-लोकोक्तिविशेषाः । हिन्दी। संस्कृत। १ आकाश कौन भोभित होते हैं-कः खे भाति हतो निशाचरपतिः के- (महेश)२राक्षसपति किसनेमारा नाम्खुधौ मञनि का कारक तरुणी (रामेण) ३ समुद्र में कौन इयता है विलासगमनं कि कार्यते सजनैः। (मैनाक:) ४ तरणियों का विलास पत्रं किं नृपतेः किम नयनः को कैसा है (मंथर) ५ सञ्जनी से क्या মোঃ মন্নজ্জামা- किया जाता है (चिर) ६शजाका क्षरपर्दयतत्तवाशीर्वचः।२। • पत्र क्या है (सारगः) ७ अर्जुन का धनुप कौन है (गांडांच) ८ राम को स्त्री का हरने वाला कौन (रावणः) मेर के उत्तर का जो मध्यमा क्षर पद है यह तुम्हारे लिये आशी. र्वाद है। १ सियों की लावण्यता कहां है-(यपुषि) } लावण्यं के नु योषितां नभसि के म. आकाश कौन विचरते हैं-(अण्डजाः) वाग्मातन्यतेवियागुतराभवन्ति सबसे ऊंची आवाज़ किनकी होती है- निसदा घाइतो दम्पती। कंपु (भगणां) स्त्री पुरुष कहां बिहार स्थ प्रकटीचकार भगवान् सीता. फते है-(एकान्त) भगवान सीना पतिः पारुषम् तत्यप्णोत्तरमध्ययंग- पति ने किन में अपना पाप दि. घटिता देयोऽस्नु यः श्रेयसे । ३ । पाया-(पासु) इनमणों के उत्तर या आधीच कभक्षर घोरन देव है यह नुम्हारे कल्याण के लिय हो।

व्यावहारिकसंस्थानप्रबोधः। [१८७ ] तेईसवां अध्याय-त्रयोविंशोऽध्यायः । अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोवोधः, प्रहेलिकाथ । श्रीपच्छारदापीठाधीश्वरश्री जगद्गुरुशङ्कराश्रमाचार्यभ्यो निवेदितं प्रशंसापत्रम्मयपुरवासिभिः । प्रशंसापत्रम् । श्रीशः पायात् । श्रीमत्परमहंसपरिग्राजकाचार्यवयंपदयाक्यप्रमाणपारावारपारीण, यमनि. यमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाध्यष्टागयोगानुष्ठाननिष्ठ, तपशर्या- चरणचझयायनाद्यविच्छिन्नगुरुपरम्पगमाप्तपण्मतस्थापनाचार्य, सायंचय- प्रतिपादकवैदिकमार्गप्रवर्तक, निखिलनिगमागमसारहृदयधीमत्सुधन्वनः सा- म्राज्यप्रतिष्ठायनाचार्यश्रीमद्राजाधिराजगुरुभूमण्डलाचार्यचातुर्य शिक्षकगोन:: तीतीरवासश्रीमद्वारकापुरवराधीश्वरपश्चिमाम्नायधीमच्छारदापीठाधीश्वर- मत्केशयाश्रमस्वामिदेशिकवरकरकमलसातश्रीशारदापीठाधीश्वरमीनदाड- राजेश्वरशङ्कराश्रमस्वामिनांपदारविन्देषु मयराष्ट्रनगरीनिवासिना र दीनां प्रणतिपुरस्सरा विज्ञप्तयरसमुल्लसन्तुतराम् । भगयतामेतद्देशे श्रीमच्छारदापीटपूर्वाचार्यपारम्परामांगनुमानाचं मधुपुरीप्रमुखभ्यः प्रस्थानेभ्यः एतच्चातुर्मास्यप्रकाहि मदिरा र (मेरठ)पत्तने समासीनन्याप्रौप्ठपद्याः यथैवदान जानुस्म इलो जम्मनगरभावनगरबडोदोदयपुरेन्द्रका पर सरकार अहमदावादसूरतसिद्धपुरोज्जैन्यागगमान्नु पनिटांगरेषु वैदिकसिद्धान्तान्तहदयप्रधानपदार्थाः सनासु मन्यपिटास प्रम- प्रादिकाः स्वस्चनियतधर्मानुवर्तिन्यः सारनासो नर्थवेहमद द्वयावधि मयपत्तने (मयराष्ट्र) श्रुतिस्मृतीनिहामगाशवानन प्रमाणगणैदानां परमेश्वरकनिर्मात्यत्वतः मानान्स यत्वप्रतिमाराधनस्योपासनान्तर्गननया यादरिनामनिमन्माला- दिप्रक्रियायाः पुनः श्रुतिमननविमानस्वागम्युलानिमावि घयोनिशोऽध्यायः। अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपपाणि, पत्राणि, छन्दोबोधः, प्रहेलिकाश्च । धत्वतीर्थादिसयनप्रमाणमानसचारितत्यादयो धर्माः तत ऊर्ध्व योगशानयोस्त- प्रदेव सपरिफरनिरूपणं चात्युचरादरभरादभ्यध्यापि । पतायता सर्वे चात्र सदसद्विचारचातुरीधुरीणापगतशवाकलसामान्याश्चालितः प्रसन्नात्मानोऽ जायन्त यथावत् येच तर विप्रतिपनमानसाः प्रमादिजनाः तेऽपि चात्यर्थ नि- जमतिफदमेभ्यो यथोदाहतप्रयोधवारिधाराभिः प्रविमुक्ततराः भवन्त्येव तत्वतः इस्थमनसचं वयं ब्रहाक्षत्रर्यश्पादयो जगद्गुरुभितितरां कृतार्थीहताश्चानन्दिता भवामः शिष्यगणाः। इत्थश्च जगद्गुरुचरणेधस्मकर्तव्यतानुरूपञ्च श्रद्धाभ- तिभ्यां यथोचितः सरकारः प्रयुक्तःप्रेम्णा परं सोशताऽयं गुरुभिरितिमहलमेव सर्वशो नः सर्वेषाम् । सदेव वयमेयमेव विजययात्रया कृतार्थी कर्तव्याः शिष्य. जना: श्रीममिर्जगद्गुरुभिरिति महताहायमस्माकमभ्यर्थना । भवदीयकृपाभिलापिणो मयराष्ट्रनियासिनो शिष्पजनाः । हिन्दी। संस्कृत । गुरु के लिये चिट्टी। गुरून्मतिपत्रमिदम् । श्रीमान् रुष्णमहाराज के लिये नमस्कार श्रीमते रामानुजाय नमः। श्रीमान विद्वानों में अति श्रेष्ठ, सम्पूर्ण श्रीमत्परमपिदाखिलगुणिगुणगणा- गुणी लोगों के गुण समूहाँ से सु. लड्ताविद्याजाध्यान्धकारापहा- शोभित, अविधा और जड़तारूपी मिनप्रभायासिलपिधापारावारपा- अन्धेरे के दूर करने वाले, अमित रोणानिसौजन्यायधिदयौदार्यदा- प्रभाव चाल, सम्पूर्ण विद्यारूपी स. क्षिपयनिधिविनया वक्यिकनिलये- मुद्र के पारगत, अत्यन्त सजनता- पुश्रीमलक्ष्मीनारायणशर्मसु विमा- की मैं दया उदारता और चतुई ग्यवायांनिपङ्कजसयिसुपानन्दति- कोयान, विनय सीधापन और शा- पाठिशता यनशो नतयः समुल्ल- नके स्थान श्रीमान् लक्ष्मीनारायण सन्तुतराम्. भी को वाह्मण धंश के चरण पंकज सेवक सुनानन्द त्रिपाठी की अनेक नमस्कार वचनां.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः । [१८९ अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपवाणि, पगाणि, छन्दोवोधः, प्रहेलिकाश्य । हिन्दी। संस्कृत। ईश्वर कृपा मे दोनोजगह कल्याण हो| भव्यं स्तादुभयत्र श्रीशानुकम्पया उ- आगे हाल यह है कि कार के महीने दन्तोऽयमने वाच्यः यत् आश्विन- से लेकर अबतक कोई पत्र आपने मासादारभ्याधायधि भवद्भिन कि- मेरे पास नहीं भेजा इस लिये में मपि दलम्प्रपितं मम सन्निधावतो. आपकी राजी खुशी जानने को यात ऽतीयोरकाण्ठतोऽसि श्रीमतां श्रेयो फ़िकर मन्द हूँ भयं आशा है कि आप हातुमधुना त्वरिष्यन्ति भवन्तः पत्र. चिट्ठी मेजन में जल्दी करेंगे. प्रेषण इत्याशासे. यहां प्लेग रोग भादों से यहुत ज्यादह अत्र महामारीरोगो घरीवति नन्वाभा- है हजारों मनुष्य और स्त्री इसके द्रपदात् सहस्रशो नराश्चास्य कवल- प्रास होगये जीते हुए भी और म त्वङ्गताः जीवन्तश्चाप्यन्येऽस्वस्थ. नुष्यों के होश फारता है ईश्वर अव चित्तास्सन्ति ईश्वरोऽधुनातु शमे. तो कल्याणंही करे। और कोई नया व विध्यात् । नचान्यद्भूतन वृत्तं हाल नहीं है जिस को लिखू. यलियम्. सव्यत १९६१ चम- सम्वत् १९६१ वैक्रमी आएका छपापान भवदीयः पापाम मीयः आश्विनकृष्ण येदे बाश्विनेऽसिते पारविवार गुपानन्दत्रिपाठी ने द्वितीयारवियुता सुसानन्दत्रिपाठी २शिष्य के लिये चिट्ठी । शिष्यम्प्रतिपत्रमिदम् । श्रीशः पायात् । स्वस्ति श्री विनयाजय आदि सम्पूर्ण स्वस्तिश्रीमद्विनयार्जवाद्यखिलगुणस .. गुण सम्पन्न, विद्यारूपी कमल के म्पन्नयिद्याकुशेशयचञ्चरीकस्वकुल- भ्रमर, अपने कुलके गुण रूपी भूप गुणभूपणभूपित परमश्रद्धालुगुरुशु. णों से भूपित परम श्रद्धालुगुरु ः थूपणतत्परद्वारकाप्रसादाख्ये गुस्से थूपा में तत्पर द्वारकाप्रसाद गुप्त सदैव सच्छिप्यकुशलाभिलापिण को हमेशा अपने अच्छे शियों की स्सुखानन्दत्रिपाठिनोऽनेका आशिप कुशल चाहने वाले सुखानन्द त्रि. चाच्या, पाठी की अनेक आशीर्वाद घञ्चना.

[१९. ] प्रयाविशोऽध्यायः। अभिनन्दनपनगणि, निवेदनपत्राणि, पप्राणि, छन्दोवोधः, मटेलिशाच । हिन्दी। संस्कृत। यहां कुशल है तुम्हारे यहां भी कुशल अत्र शंतवास्तु महोघहन्यहानि ध्य- रहे । प्रिंय ? यहुन दिन बीते तुमने तातील त्ययानकिमपि परम्प्रेरित कोई भी चिट्ठी नहीं भेजी यह बड़ा मितिमदाश्चर्यम् यनस्तव पूर्व प्रनि- अचम्भा है क्योकि पहिले हर महीने मासं कुशलपत्रपणे साधारणोनि- राजी खुशी की चिट्ठी भेजने फा यम आसीदधुना किंजातमिति न तुम्हारा एक मामूली कायदा था जाने. अब न मालूम क्या हुआ. वैर तुम्हारा सव और से कल्याण हो | वरं कुशलमस्तु सर्वनस्त विद्यायाञ्च और विद्या में ज्योकोयामहनतक- यथाविधि परिश्रमं एत्याऽस्मदा- रफ हम गुरुजन लोगों के आनन्द दीनां गुरुमनानामानन्दथप्रदो भव. देने वाले हो यह मेरा आशीचीद है. तादितीयम्मदीयाशी:- तुम्हारे संस्कृत पढ़ाने वाले यहां कौन | तय संस्कृताध्यापकास्तत्र प इत्याप हैं यह भी खबर देना और फोई सूचनीयमन्यचापि नन्यं धृत्तमिति । नया हाल हो यह भी। मिती पीप एकपष्टपत्तरकोनविंशतितमे दि- कृष्णापढ़या शुक्रबार सम्वत् १९६४ मामेऽन्द पोपकृष्णप्रतिपच्छुप्रयुता- पैमी. पत्रलेखतिथि। तुम्हारा कुशलेच्छक, युप्मत्कुशलाभिलारी, मुखानन्द त्रिपाटी। सुषानन्दस्त्रिपाटी। वृन्दावन निवासी गौराणिक पं० प्यारे वृन्दावननिवासिन पुराणाचार्य प्यारे- लालजी मित्र कालये छन्दो पद्ध लालशर्माणम् सुहदम्मतिपत्रमि- चिट्ठी सौ. चिट्टी पाई काल, तुम्हरे कर कम-(पत्रिका घामपा प्राप्ता युष्मदस्ताञ्जलि लन लिया। जिनपर दशा सँभाल, द्विसा! यया ज्यरदशा मेऽपिछता मोहि स्वस्थता देदई। विगतज्वरा ।१॥ सो समहु मोर अपराध, पत्र न भेजन | सभ्यतामपराधो मे, पत्रापणदेतुकः कर जो कारण देह असाध, अनून कारणं देहपैलव्यं, नास्यतथ्यं वचो- नहीं कछु या विधे। . . दम् पयः ऽत्रमे ।२॥

घ्यावहारियासंम्रुतमयोधः । [१९.१ ] अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोयोधः, प्रहेलिकाश्च । हिन्दी। संस्कृत। दो० स्मरण योग्य है आप के, सुसानन्द सर्वदा स्मरणीयोऽयं, सुसानन्दाख्य सेवक सदाति अनुशासन योग्य है, संबकः।सदवाशापनीयश्च, मद्योग्यः योग्य कार्य होचहि यदा. कार्यग्रामकैः। ३। दो प्रामहि जयहीं जादही, पन तुम्हार ग्रामं यदा गमिष्यामि, श्राययिष्यामि सुनाँउ । घर जैसी फोई कह, पुनि ते छदः। पुनस्ते सूचयिष्यामि, अनु प्रिय तुमहिं जनाउँ. शास्ति यथा प्रभोः॥४॥ दो० जो कछु उत्तमजीविका, मम भ्राता यदि स्यादुत्तमावृत्तिाने मे मृगयन्तु को जोय। तातिहिको भेजी तभी, ताम्। तदेय प्रेपयिष्यामि यदानुशाऽ जय अनुशासन होय । प्रलप्स्यते । ५। सात पांच नघ एक युत, वर्ष मास नगपाणारभूवर्षे आश्विनस्य परे दले। आसोज। शुक्ल पक्ष दुतिया लिखी, लिसितेयं द्वितीयायां सुखानन्दनि- सुसानन्द निज भोज । एतम गुद पाठिना।६। इत्यलम् और भी मिन कलिये- अन्यश्च मिग्रम्प्रति- श्री शङ्करजी कल्याण करें २८११००४ श्रीशकरः शकरोतु २८।११।०४ कानपुर कर्णपुरम् मिग्रयर्य सुसानन्द त्रिपाठीजी नमस्कार मित्रय मुसानन्दनिपाठिन् । नमोनमः ईश्वर की पा से अभी तक हम लोग | विश्वेशपयाद्य यावत्युशलिनो घयं फुशल हैं और भाप की कुशल भयतां कुशलं चाशंसामहे । चिरा- चाहते हैं। यहुत दिन से आप की भवताम् कृपापत्रमलब्ध्वा चिन्ता- चिट्ठी न मिलने से में फिकर मन्द मारतोस्मीति शीघ्र स्वकुशलप्रवृ. इसलिये जल्दी अपने राजी पुशी त्यानन्दयितन्योऽयं मित्रजनः ।मास- केसमाचार से यह मित्र खुश करना प्रयादत्र महामारीरोगोऽपि प्रत्यहम- चाहिये। तीन महीने से यहां मंग संख्यजनान् घलयति । सम्प्रत्यह की बीमारी भी रोग मरह वेशुमार सपरिवारो गङ्गातटेगङ्गामन्दिर नि- मनुष्यों को नास करती जाती है। यसामि । गृह पुत्रादयः सर्वे ज्वर- अब मैं कुटुम्य सहित गङ्गा किनारे पीडिता आसन्नतः स्वकुशलवृत्तान्ते.

[१९२] प्रयोविंशोऽध्यायः अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोयोधः, प्रहेलिकाध । हिन्दी। संस्कृत। गङ्गा मन्दिर में रहता हैं घर में नधीमन्तं मोदयितुं माशयमित्य- लस्के चारह सघनर से पीड़ितथे धगम्य क्षन्तव्योऽयं वयस्यः। सर्वे इसलिये अपनी राजी खुशी के भ्योऽध्यापक मो मदीया यचितं समाचार से बाप को खुश न कर प्रणामा आशिषो वा धत्ताव्याः ।त. सफारसा जान कर यह मित्र क्षमा भारिप महामारीरोगो धर्तते दामा योग्य है। सय उस्तादों से मेरी मिति चयतेऽतः कृपया तप्राय सर्व यथायोग्य प्रणाम आशीवाद कहना। वृत्तं लण्यमितिशम्. यहां भी लेग रोग अव है यह सुना जाता है इसलिये यहां कासय हाल लिखना. पुराने विद्यार्थियों को मेरी भाशीर्वाद प्राचीनछानेषु मदीया जाशियोपाध्याः भगहन आएका मित्र मार्गशीष । भवदीयो घपस्या चदिद रामचन्द्र शास्त्री | कृष्णपष्ठी रामचन्द्रशास्त्री और दूसरी मित्र के लिये चिट्टी अन्यच मित्रम्मतिपत्रम् . भी राधा माधव की जय हो. धीराधामाधयी विजयतेतराम् अलीगढ़तः श्रीमान् सम्पूर्ण गुणसमूहयुक्त, विया श्रीमदीमालगुणाधाविद्यापारावार- समुद्रपारगामी, भ्रमरूपी अन्धकार पारीणभ्रमतिमिरोच्छेदकमार्तण्डन्य को दूर करने वाले सूर्यरूप, अपनी फतवाग्जालकालिदासादिवश,नूतन याणी समूह से तिरस्कृत किया है किंजल्कषितपूज्यपादपकजेषु सु फालिदासादि पण्डित. को जिन्होने, हरेपित्तो विधालकापलतप्र. नधीन केशर से शोभित है पूज्य परमतिभृत्यभृस्पषिद्वयंचरणसरो- चरणकमल जिनके, मित्र शिरोमणि, जपरपदसंसारसरित्तुद्धलगर्दवंद- हरपात्री जी को यहां सविधा अयमानगृहमेधीयमारभरालांतसुखा- रूपी भूषणों से भूषित जो भयरमति । नन्दत्रिपाठिनः कृता अनेकशी नतयः व्यावहारिकसंस्टतप्रवोधः। [ १९३ ] अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोयोधः, प्रहेलिकाश्च । हिन्दी। संस्कृत । (पडित ) उनके सेवको का सेवक, परम विद्वानों के चरण कमलों का भ्रमररूप, संसाररूपी नद में तृष्णा. रूपी जल के सर्प से उसाहुआ गृह- स्थ के भार से थके हुए सुसानन्द त्रिपाठी की अनेक नमस्कार प्रणाम पहुच । भागे दाल यह है कि मेरे - धैर्य रूपी वृक्ष को काटनेवाले, अ. नोनी और रसीली काव्य केसे पदों की लावण्यता को जाहिर करते हुए, आपके करकमल से लिपे हुए पत्र से जो अपूर्व आनन्द प्रकट हुआ सो कहने तथा लिसने से बाहर है । वसन्त भगवान् वृक्षों के पत्तों की नाई हमारी और आप कोथमि- लापा को सफल करेगा इस प्रकार आप के वाक्य में आपही प्रमाण हैं जो यह दोभी जाय तोभी आपकाही भाग्य है मुझ सरोगों का नहीं। शरीर के अखास्थ्य से मैंने यह चिट्ठी देर से भेजी है सो आपक्षमा समुल्लसन्तुतराम् वृत्तमिदमने घा- च्यम् ममाधयमलोलूयमानेनादःशु- तरलिककाव्यपदच्छटासासूच्यमाने नश्रीमत्करकुमलाद्वितदलेन यो नि- रतिशयानन्दः सूचितः सोऽगोचरः। भगवान्पुष्पसमयः तरुपत्राणि इच मामिलायां सफला विधास्यतीति श्रीमहास्य श्रीमन्त एव प्रमाणम् यदि म्यात्तीपि श्रीमतामेव दिष्टं नच माशानां । शरीरास्वास्थ्या- न्मया चिराददिम्पतं प्रपितमितिक्ष- म्त्यन्यं भवद्भिः धीमनिरिति. करना. आपका मिति पोप गुदी ५ शुक्रवार सं.१९५९ वि० दर्शनाभिलायी सुसानन्द त्रिपाठी पौषशुक्ला पञ्चमी भवता दर्शनेच्छु: गुयुता सुरानन्द- स्त्रिपाठी २५ यह भी है शियाः! [१९४] प्रयोनिशोऽध्यायः। अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, उन्दोघोषः, महेलिकाश्च । हिन्दी। संस्कृत। अलीगढ़। निषेदनपतमिदम् अलीगढ़ता श्रीमन्महोदय हेडमास्टर साइप श्रीमन्महामहिममहोदयानां मुख्याध्या. (घागरीयपरयर सलामत)सलामत पक (हेडमास्टर) महाशयानाम्पु. रतः सविनयं निषेदनमिदम्. महाशय! पिछले शुक्रवार से मेरी माना जाई । गत शुक्रवासरान्मदीया माता शीतज्व. धुखार से पीड़ित है और उसका रातास्तिनकोऽप्यन तस्या निरीक्षक यहां फाई निरीक्षक नहीं है इसलिये अतो ममोपस्थितिरत्रात्यावश्यका मेरी हाजिरी यहां ज़रूरी है इसीलिये ऽत एय मां सप्ताहभ्य कस्यायकाश आपसे प्रार्थना की जाती है कि मुझे मनुमन्तुं प्राप्यन्ते भवन्तो ऽस्यों एक हफ्ते की छुट्टी मजूर करें। दशाया मयत्यमेय स्पीकरिष्यन्ती- भाप ऐसी हालत में अपश्याही म. त्याशापि मदीया पूर्णा. जूर करेंगे यह मेरी पूरी उमेद है. ईश्वर आप सरीखे अनुग्रह शील स्वा.परः कुशलं विदयाभयञ्चवर्धयेत मियों की सकुटुम्ब कुशल करे और सपरिपारेषु युग्मविधेधनुग्रहशी. वैभव बढ़ाये यह हमारी प्रार्थना है. लिपु स्वामिश्वितीयमलाकमभ्य. धना. श्रीमसामति- अंग्रेजीमारीव माक्षाकारी सेवक (आइग्लतिच्यादि घश्योनुचरः ૧૮ારા ૪ श्रीकृष्णदास गुप्त ૨૮ર૦૪ सप्तमकक्षाध्यता श्रीकृष्णदासोगुमः आपका लड़के का यह प्रयान ठीक है (कैफियत | सत्योऽयलसछात्रस्येति (ध्यपण्याखा लड़प के उस्मादकी) मणिराम उ. प्राध्यापकस्य) मणिरामोऽभ्यापकः, व्यावहारिकसंस्कृतभयोधः। [१९५] अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोबोधः, प्रहेलिकाथ । हिन्दी। संस्कृत। लाहौर लवपुरम् १९।५।०४ १९८५१०४ श्रीरामः सर्घमङ्गलम् - पादप्रणामानन्तर निवेदन. पादप्रणामोत्तरं निवेदनम् . आप की चिट्ठी के माफिक प्राग्वेद भयतां पत्रानुसारेण ऋग्वेदप्रथम- के प्रथम मण्डल का सूक्तसंग्रह इम्त- मण्डलीयसूक्तसंग्रहःपरीक्षोपयोगी- हान के उपयोगी डॉक महसूल न देकर पितो डाकन्ययमदत्येतिडाकव्ययो भ- भेजा है डाँक महसूल आपही देदना. पद्भिव देयः. आप कौन जाति है और मुझ को अप- किं जातीया भयस्तो मां कथं स्था- ना आशा पालक घना कैसे कृतकृत्य- झापालकं हत्या कृतकृत्यं रतवन्तः. किया? अपको परीक्षा के समय में अपने देश अश्रत्यपरीक्षाकालेऽहं म्यजनपदे को गया थी इसी से मेरे पास प्रण गतवानतो मत्समीपे प्रष्णपत्राणि ना. पत्र नहीं आये, कोशिश करने पर गतानि यले कृते आगमिप्यन्ति चेन्प्रे- ओ आजायंगे तो भिजवादूंगा. पयिष्ये. भयदाशापालकः पण्डितशिवदत्तो पण्डित शिवदत्तदाधीच हेडपण्डित दधीचः लवपुरीयविश्वविद्याल- (मोफेसर) साहार कालेज. यस्य प्रधानसंस्कृताध्यापका. आपका आज्ञापालक श्रीशः पायात भ्यररक्षा करे अलीगढ़ अलीगढ़ता २२॥५/०४ ૨૨ાબાજ श्रीमान् पं.शियदत्तदाधीचजी के- नमोनमः श्रीमच्छियदत्तदाधीच- चरणकमलों में नमस्कार, चरणपरजेभ्यः सेवक की प्रार्थनानुसार आपने जो सेवकाभ्यर्थनानुसारेण श्रीमद्धि- ऋग्वेद मूक्तसंग्रह भेजा सो मिला। अंग्वेदसूक्तसंग्रहः प्रेषितःस लन्थःध. आप से महात्माओं को परोपकार न्यय परोपकारशीलता भयाशा महा- স্বার্থান্যাথা। अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोबोधः, महेलियाच! हिन्दी। संस्कृत। शीलता धन्य है जो मुझ न जानते हुए । त्मनाम् यन्मामपरिचितस्यापर्याप्य. पर भी कृपा कर के मुझे शतयत्य करने नुकम्पा विधाय रनरुत्यं कृतवन्ता हुए। बहुत कहने से क्या है विद्वान् भवन्तः । किम्यहुना प्रातिसिद्धाण महात्माओं का परोपकार करना स्वभाव । परोपरतिबिंदुषां महात्मनाम् । शत. सिद्ध होता है। आप को रूपा के देयेशः सहस्रशो धन्यवादा अपि न्यूनत. सैकड़ों हजारों धन्यवाद भी धोड़े हैं. राश्रिीमदनुकम्पापेक्षया. यह सेयक धशिष्ठ गोनी गौदयंशीय वशिष्टगानजो गोदवंशीयोऽयं से- है दिल्ली में अमृतसर निवासी पण्डित ] धकः इन्द्रप्रस्थऽमृतसरनिवासी पण्डि- चुनीलाल शर्मा से आप का गुणानुवाद तचुनीलालशर्मणः सकाशाद्भुताच्या सहित नाम सुना था. सगुणानुवादा श्रीमतां भवताम्. गुरुजी! मेरे एक भजनलाल शर्मा गुरुवः! ममेकन भजनलालशर्मणा विद्यार्थी ने पिछली संस्थत परीक्षा | विद्यार्थिना गतसंस्कृनपरीक्षायां वि- में विशारद इम्तहान दिया था और शारदपरीक्षा दत्ता तन परीक्षदेपु तस्य इम्तहान देनेवालों में उसका रोलगणना (गेलनम्बर) सतिशतमा- नम्बर ३७ था। इम्तहान का नतीजा उसीत । परीक्षाफलं तु तेनाद्यावधि अबतक उसको नहीं मिला इसी से | नलब्धमत एचातीवोत्कण्टितोऽस्ति उसका नतीजा जानने के लिये वगुतही | तत्फलपरिज्ञानाय। वे पत्रेऽपिनन उत्कण्ठित है। दो चिट्ठी भी उसने | रजिस्टरारसन्निधौ प्रेपिते परञ्च न रजिष्टरार के पास भेजी मगर किसी | कस्याप्युत्तरं लग्नं । अतएवास्त्यभ्य- का उत्तर न मिला। इसी से सेधक धनपासवकस्य यदा मम दल धीमत्र की यह प्रार्थना है कि जय मेरी चिट्ठी करकमलगतं भवेत् तत्क्षणमेव समा- आप के फर कमल में पहुंचे तभी य.चारपत्रानिश्चित्स परीक्षाफलं देखनी- प्यार (गज़ट) से निश्चय कर इम्तहान यम् अनुत्तीर्णदशायां कलिन्विपये का नतीजा लिसना चाहिये। फेल होने पतित इत्यपि सूचनीयं श्रीमाद्भिः परो- की हालत में किस मनमून में गिरा पारिभिर्गुरुजनैः यापच्छस्य शीन- - , व्यावहारिकसंस्टतप्रवोधः । [१९७] अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोवोधः, प्रहेलिकाच । हिन्दी। संस्कृत । यह भी श्रीमान् परोपकारी गुरजन | मेवोत्तरं लप्स्यते ऽयमनुचरइतिमन्यते. सूचित करें। जहां तक हो सकेगा शीघ्रही उत्तर इस सेवक को मिले- गा यह मानाजाता है. भचतामनुचरः सुगानन्द त्रिपाठी. आप का सेवक सुग्नानन्द त्रिपाठी दिल्ली इन्द्रप्रस्थ ६।१२।०३ ६६१२१०३ 'आय को प्रणाम करके. तत्रभवत्सुमणस्य. अमृतसर निवासी चुन्नीलाल प्रगटयति खसम्मतिममृतसरनि- शर्मा अपनी राय प्रकाश करता है कि घासी चुन्नीलालशा, तथाहि, श्री- है श्रीमान् अब संस्कृत भाषा निस्सार मन्तः! निःसारा साम्प्रतं संस्कृतभापा- है इससे अहरेजी भाषाही फंटा बांध ऽतइङ्गलिशभाषेव वद्धपरिकरै रनभव- फर आप को यदानी चाहिये उसी से निः संवर्द्धनीया तयव सेत्स्यन्ति सर्वे आप के सब मनोरथ सिद्ध होंगे परन वो मनोरथाः किञ्च विशारदपरीक्षा- विशारद परीक्षा पास करके भी मुना मुनी-पि नानुकूलस्थानप्राप्तिसम्म- सिय जगह का मिलना नामुम्कन है, वः, सम्भवेऽपि पञ्चाशतरधिफस्या- मुम्किन भी हुआ तो २५) से अधिक ] जन्मासम्भवः । यदि संस्कृतेऽतीवान- जन्म भर मुम्झिन नहीं । जो संस्कृत ! हो भवतां तदा शास्निपरीक्षायां यति. मैं आप का यहुतही आग्रह है तो शा. तव्यं साच दृढोद्योगः श्रीमद्भिः पञ्च- स्त्रीपरीक्षा में यत्न करना चाहिये। यह रेवमासैमत्तीर्णाभविष्यवि दास्यामिच- परीक्षा हद उद्योगी आप से पांच छः तत्राहमीपसाहाय्यमिति । अवकाशदि- महीने मेंही पस करली जायगी और नेषु कयास्यामीति न निश्चयः. मैं भी उसमेंमदद दूंगा। छुट्टी के दिनों में में यहां जाऊंगा यह निश्चय नहीं. भापका मित्र पुन्नीलाल शास्त्री भवदीयो वयस्यः चुनीलालशाखी (मिशनस्कूल देहली) (मिशनस्कूल देहली) [१९८) अधोपिशोडयाया! अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, चन्दाबोधः, प्रालिकाश्च । हिन्दी। संस्कृत। दूसरी भजी हेडमास्टर साहय लिय। अन्यनिषेदनपत्रमिदं पाठशालाध्यक्ष श्रीमन परमदयालु हमारे हेडमास्टर श्रीमत्परमदयालूनामस्मरपाटसासाध्य मदाशय चिरझायरहो. क्षमहाशयानामप्रेऽभ्यर्थनयम्. प्रभा। प्रभो! गुजारिश यह है कि पिछली अस्ति सपिनयनिवेदनमेतरादई आधारात से पैर में शूल के दर्द और गाधीत उदरालपस्त शिरोवे. शिर के दर्द में मुस्लिला हूं इसलिय । दनया च पीडितोऽस्म्यतः पावशाली मदसे में जाने और यहां धैठने के लिय गन्तुं तत्र सातुश्च न रामोमिकृपया- समर्थ नहीं है । मानी कर भाजस्व दिवसस्थावकाशं खीफर्तुमर्ह कोही छुट्टी मजूर फरिये यह मेरी ति भवन्त इतीयमस्माकमभ्यर्थना आप के सामने प्रार्थमा है. श्रीमहामने. मेरे घरे का यह लिसना रोक है (यह सत्येपमुक्तिर्मम प्रतिछापितुर्य- लड़के के पिता को कैफियत है) द. घस्या हस्ताक्षराणि रामचन्द्रशम्म:. स्तखत गमप्रसाद शर्मा. आएका सेवक गोपाल प्रसाद शर्मा রেলমন্ত মায়ে १५।११०५ पेन्ट्स ग्लास, १५॥११०५ गोपालप्रसादशमी. कारनामा प्रतिज्ञापत्रमिदम्। मैं मुसम्मी हरदत्त शमी पल पण्डित श्रीमद्विपयशाचतंस अलोगया. दुर्गादत कोम ग्राह्मण शाकिन मस्तव्यदुर्गादत्तस्नुहरिदत्तशम्महिं स्व. लोगढ़ काई अपने घंटे की शादी के पुभविवाहायें मुद्राणां परशन यद लिये १५० रुपये जिन के आधे ७५ पञ्चसप्ततिर्मुद्रा भवन्ति मय राष्ट्रनगर। रुपये होते हैं लाला रामचन्द्र पद निवासियश्यवस्पिलगोपालदाससून- गोपाल दास औम पनिया साकिन ये रामचन्द्रायोपरोक्तं दव्यं धारयामि मेरठ से कर्ज लेता हू और पारदा । प्रतिज्ञाने चैकस्य वत्सरस्थान्ते शतम्प्र.

व्यावहारिफसस्सत्तमयोधः। [ १९९] अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोबोधः, प्रहेलिकाश्च । हिन्दी। संस्कृत। . कता हूं कि एक साल के अखीर में ! ति सार्धवयरूपण कुसीदेन सहाखि- ढाईरुपये सैफड़े के सूद के साथ कुल लं रिफ्थ प्रतिदास्यामि अनर्पणदशायां धन दे दूंगा न देने की हालत में मैं मम गेहमेव पणत्येन धृतमिति भतिक्षा अपना घरही आई किये देता है। पत्रीलखितं प्रमाणत्वेनदम् . लिहाजा यह इकरारनामा लिख दिया ताकि सनद रहे. दस्तखत गयाह हरिदत्त शर्मा श्रीकृष्णदत्तः हस्ताक्षराणि- थीकृष्णदत्त चकलम खुद (साक्षी) हरिदत्त शर्मणः(स्वयं) अब मशहर छन्दों का लक्षण फहता हूं. अथ प्रसिद्धवृत्तानां लक्षणं मचीमि. मानावाला-आर्या छन्द है. मात्रात्मक-आर्या छन्दः, जिसके पहिले चरण में तैसेही तीसरे | यस्याः पादे प्रथमे, द्वादशमात्रास्तथा में१२माना हो और दूसरे में अठारह तृतीयेऽपि अष्टादश द्वितीये चतुर्थ- और चौथे चरण में १५ हों यह के पञ्चदश सार्या. भार्या छन्द होता है. भय अक्षरात्मक छन्द ययान किये जाते हैं अक्षरात्मकानि छन्दांसि थर्ण्यन्तेऽधुना. ८ अक्षर का अनुष्टुप् छन्द है उसका ८ अष्टाक्षराणामनुष्टुन्छन्दः तलक्षणम् लक्षण, श्लोक में छठा गुरु, पाँचया मोके पष्ठं गुरुशेयं सर्वत्र लघुपञ्च- सय जगह लघु,, दूसरे और चौथे मम् द्विचतुष्पादयोईस्वं सप्तमं दी. चरणों में सातवां हस्व और पहिले चमन्ययोः तीसरे में सातवां दीर्घ जानना. ११ अक्षरों के इन्द्रयता घगैरह पांच ११ एकादशाक्षराणां पशछन्दांसि र. न्द्रवज्रादीनि. इन्द्रयना-दो तगण, एक जगण, दो "इन्द्रवमा-स्यादिन्द्रवजा यदि तो गुरू, जिसके एक चरण में हो. जगौ गा.

[२००] प्रयाविशोऽध्यायः। अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपवाणि, पाणि, छन्दोवोध:, मलिकाम। " " हिन्दी। संस्कृन । उपेन्द्रवजा-ज, त,ज,ग,गजहां हा- उपन्द्रवज्ञा-उपेन्द्रवज्रानतजाल. तो गा. ,, उपजाति-जिसमें इन्द्रवज्रा और उपजाति:-अनन्तरोदीरितलहममा- उपेन्द्रपन्ना के ग्राम से लक्षण हो. जीपादी यदीयाबुपजातयस्ता रथोद्धता-र, न, र, ल, ग जिसके १ रथोद्धता-रानगयिह रथाचता पाद में हो. 'लगो. " स्वागतार, न,भ, ग, ग जिसके ,, स्वागता-स्वागतेति रनभाइगुरु- युग्मम्. १२ अक्षरों के पादयाला एक छन्द ! २२ द्वादशाक्षराणामेकं छन्दः वंशस्थ- पंशस्थ नाम है- नाम. यशस्थ-ज, त, ज, र जिसके एक वंशस्थम्जतौतुघास्थमुदीरितंजरी. " पाद में हो. पाद में हो. पाद पारह तेरह अक्षरों का मिला हुआ) बादशनयोदशाक्षराणां मिश्रीभूत पु. पुपितामा छन्द है. पिताग्रावृत्तम. जिसके पहिले तीसरे १२) पुस्पितामा में न, नरय हो १२ / पुष्पितामा ( अयुजि नगरेफतो ३ छन्द और दूसरेचौधे में न, १३, वृत्तम् यकारीयुजि च नजी ज, जरग हो. जरगाश्च पुप्पितामा. तेरह यक्षर के पादयाले दो उन्द - त्रयोदशाक्षराणां हे वृत्त-चिग प्र. चिरा और प्रदर्पिणी है. इपिणीति. १३ रुचिरा-जिसमें ज, म, स, ज, ग ! १३ सचिरा-चतुर्मवैरिह रुचिराम्भी हा और चार और ना अक्षरों पर विराम हो. १३ महर्षिणी-जिसमें मान,स, र, ग ,, महर्पिणीको जो गखिदशयतिः हो और ३ और १० पर विराम हो. महर्षिणीयम् चौदह अक्षरा का चसन्ततिलक नाम चतुर्दशाक्षराणामे वृत्त-यसन्ततिः एक छन्दहे. लकायं. सजी गा.

व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । [२०१] अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोवोधः, प्रहेलिकाश्च । हिन्दी। संस्कृत। १४ वसन्ततिलक-त, भ, ज, ज,ग,ग १४ वसन्ततिलका-उक्ता घसन्तति जिसमें हो. लका तमगा जगौगा. पन्द्रह अक्षरों का एक छन्द मालिनी. पञ्चदशवर्णाना मेकं वृत्त-मालिनी. १५ मालिनी-न, न, म, य, य जिसमें १५ मालिनी-गनमयययुतंयं मालिनी हो और ट और७ पर विराम हो. भोगिलाकै. सोलह अक्षरों का है तो लेफिम अ- पोडशाक्षराणामस्ति तु परश्चाप्रसिद्धम्. प्रसिद्ध है. सत्रह अक्षरों के तीन है हरिणी, शि- सप्तदशाक्षराणां त्रीणि हरिणी, शिख- खरिणी और मन्दामान्ता. रिणीमन्दाक्रान्तेति. १७ हरिणी-जिसमें न, स, म, र, स, १७ हरिणी-रसयुगहयैन्सौम्रो स्लौ ल, ग हो और छः चार और दस गो यदा हरिणी तदा. अक्षर पर विराम हो. १७ शिखरिणी-जिसमें६और ११ पर शिखरिणी-रसै सवैश्छिन्ना यम- विराम और य,म,न, स, भ, ल, ग हो. नसभलाग. शिखरिणी. , मन्दाकान्ता-जिसमें ४६ और पर , मन्दाक्रान्ता-मन्दाक्रान्तजलधिपड विराम हो और म,भ,न,त,त,ग,गहो. गैम्भी नतीताद्गुरुचेत्. अठारह अक्षरों का अक्सर अप्रसिद्ध है. अष्टादशाक्षराणां प्रायोऽमसिद्धम्. उन्नीस अक्षर का एक शार्दूल विकी- एकोनविंशत्यक्षराणामेक शार्दूलविक्री- डित होता है. डितम्. १९ शार्दूलविक्रीडित-जहां १२ आर १९ सूर्याचमसजस्तता सगुरयः शा- सात पर विराम हो औरम, स, ज, र्दूलविक्रीडितम्. स, त, त, ग जिसमें हो. बीस अक्षर का एक छन्द हे सुवदना. विंशत्यक्षराणामेकं वृत्तंसुवदना. २० सुयदना-म,र, भ, न, य, भ, ल, ग। २० मुबदना-ज्ञेया सप्ताश्वपभिमर- जिसमें हो और७,८और६पर विरामही भनययुता भ्लोगः सुवदना. इस अक्षर का नग्धरा छन्द है. एकशित्यक्षरात्मकं नम्धरावृत्तम् " हिन्दी [२०२] योपिशोऽध्यायः अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पाणि, छन्दोयोधः, महेलिकाश्च । संस्कृत। २१ प्राधरा-जिसमें ७, ७, ७ पर वि.२१ मधीयानांत्रयण त्रिमुनिपत्तियुना राम हो औरम, र, भ, न य,य,यय हो. स्रग्धराकीर्तितयम. अपरवा- अपवरम् जिसके विषम अर्थात् पहिले तीसरे अयुजि.मनरलागुरुः समन्जमपर घर- पाद में न, न, र, ल,ग हों और सम मिदं जन्तेजरो. अर्थात् दूसर चौधे मैन, ज, ज, र हो. (अव समस्या का पूरण करना) (अथ समस्यापूरणम्) धीरामचन्द्र महाराज के अभिषेक में मद / रामाभिपके मदविहलाया हस्तायुतो से विल हुई (किसी) वरणी के हाथ हमघटस्तरुण्या सोपानमा प्रक- से गिरा हुआ स्वर्ण घट सोपान (जीना) रोति शब्दं ठठंठटटटटटटटठः। मार्ग में उठ इत्यादि शब्द करता है. यह चौधे पाद की समस्यापूर्ति है. अत्रचतुर्थपादसमस्या पूर्तिः * (सबके दौ) मुमति और कुमति स. * सर्वस्थ सुमतिकुमती सम्पदाप. म्पत्ति और आपत्ति का कारण होती है। तिहेत. * (एकही गोत्र में) समर्थ पुरप होता * एको गोत्र प्रभवति पुमान् य. कुटुम्य है जो पुटुम्य को पालता है. *(बूढ़ा, जयान के) माथ परिचय से * वृद्धो यूना सह परिचयात् त्यज्यते त्रियों से त्याग दिया जाता है. कामिनीभिः. स्त्री, पुरुष की तुल्य जय प्रभु हो जाय *खी पुवश्च प्रभवति यदा तद्धि गहें तभी यह घर नष्ट जानो. (पहेलियां) (प्रहेलिकाश्च) दूर जाय पर पग नहीं, साक्षर पण्डित अपदो दूरगामी च सासरोनच पण्डि नाहि । मुम स्फुट योले नदा जान तः अमुग्यास्फुटयका चयोजानाति मो पण्डित माहि ॥ (विटी). *य चार पाणिनि महागज के सूत्र है इन सूत्रों को दी अबलम्बन कर किमी कायन ममस्या पूरण की है, विभति. विनम् । सपाण्डितः। २ (पत्रम्। इमानि चत्वार पाणिनः सूत्राणि, एतान्येचायलम्य कमचित्कधिना समस्यापूर्ति शता.

ध्यापहारिकसस्कृतप्रबोधः। [२०३] अभिनन्दनपत्राणि, निवेदनपत्राणि, पत्राणि, छन्दोबोधः, प्रहेलिकाश्च । . हिन्दी) संस्कृत। एक आंग्य पर काक नाहि, चिल चाहे पकक्षुर्न काकोऽयं बिलमिच्छन्न नहिं सर्प । घटे बंद जलधी न ग्लो पन्नग' क्षीयते वर्धते चैवनममुद्रो 'कहो जो रागी दर्प। (सुई) न चन्द्रमाः। ३ ( सूचिका) वृक्ष अग्रवासी न खग, तीन नेत्र नहिं । वृक्षाप्रवासी नच पक्षिराजरित्रनेत्रधारी शर्य। वल्कल धारी सिद्ध नहिं, जल नच शूलपाणिः त्वग्वस्त्रधारी नच धारी नहिं राम्र॥ (नारियल.) सिद्धयोगी जलं च विभ्रन्न "घटो नमेघः ॥ (नारिकेलफल) अस्थि नहीं और मिर नहीं, वे अगुलि अस्थि नस्ति शिरो नास्ति बाहुरस्ति की बाँह । नहिं पदयुग पर आपही तिरहुलिः नास्ति पादद्वयं गाढमह- रढ़ चिपटे यपुमांहि ॥ (अंगरखा.) मालिङ्गति स्वयम् (५) (कंचुकः) आदि नहीं जेहि अन्त नहि, वीच में न तस्यादिनतस्थान्तो मध्ये यस्तस्य ठहरे जोय! है तेरे मेरे भी वह, कह तिष्ठति तवाप्यस्तिममाप्यस्ति यदि सुनाय जो होय ॥ (आंख.) जानासि तद६ (नयनम्.) पैदा हुई नरनारि से, देह रहित वह नरनारी समुत्पन्ना सा खी देहविवर्जि- नारि वेमुन पर बोले अधिक, आत ता। अमुपी पुरुते शब्दं जासमात्रा मात्र बिनशाहि । (चुटकी.) विनश्यति छोटिका (चुटकी.), काली क्या है (कौओं की पंक्ति); मीठी काकाली, का मधुरा काशीतलवाहिनी या प्रियक्या है (स्त्री); शीतल यह गङ्गा । कसंजधान कृष्णः कपलचन्तं नेवाली गहा कोन सी है (काशी म. वाधत शीतः ।। फे नीचे यहवाली);किसफो कृष्ण ने मारा ( फंसको); किसको शीत नहीं सताता (कम्बल चालेको)। इसी लोक में सवाल जवाब है अलिन् श्लोक पर प्रणोत्तर स्तः किम् शब्दको अलग करके पढ़ने में प्रश्न किम् शब्दस्य-पृथरपठने प्रष्णः नत्सं- है और उसे मिलाकर पदन में उत्तर है- योज्यपठने उत्तरम् .

[२०४] चतुर्दिशोऽध्यायः। चौबीसवां अध्याय-चतुर्दिशोऽध्यायः । गृहचर्याचन्द्रोदयादुद्धृता दिनचर्यारात्रिचर्याच । - में हिन्दी। संस्कृत। अब प्रातःकाल सही दिन का श. अथ प्रातःकालादेव दिनकृत्यमाह. त्य कहते हैं. सम्पूर्ण पापों की शांति चाहने वाला सर्वाधशान्त्यर्थी, आयुपोरक्षार्थी च और भायु को रक्षा चाहने वाला मनुष्यो मारी मुहूर्त उत्थाय स्वेटदेवं मनुष्य चार घड़ी के तड़के उठ कर स्मरेत् तत श्रीमद्वेदव्यासकृतं महा- अपने उपदेय का स्मरण करे सय भारतान्तर्गत प्रातःस्मरणीय "मह- महाभारत, श्रीमद्वेदव्यासकृत निर्भगयान्व्यासः कृत्वमा संहिता प्रात स्मरणीय स्तोत्र को पढ़मीप पुरासिकिधतुभिधर्मात्मा पुत्रमभ्या- 'महर्पि भगवान वेदव्यासधर्मात्मा प्रयच्छुकम् ।।मातापितृसहस्राणि चार लोका से इस संहिना को प- पुत्रदारशनानि चासंसारेप्यनुभूता- हिले बनाकर अपने पुत्र शुकदेव को नि यान्ति यास्यन्ति चापरे ।२। शो- पढ़ाते हुए ।११ हजारों माता पिता फस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि और सैकड़ों पुत्र और स्त्री संमार च । दिवसे दिवसे मूढमानिशान्ति में देखेगये देवजाते हैं और देखे न पण्डिनम् अऊयार्पिराभ्येष जायगे । हजारों शोक की जगह नच कश्चिच्छुणोतु मे धर्मादर्थश्च का सेकड़ो भय की जगह हर रोज मूद मश्च स किमर्थन सेव्यते । न को मालूम होती है पण्डित को नहीं जातु कामान भयान्न लोभादम्म | ३ | भुजा उठाकर में चिलाताई त्यजेजीवितस्यापि हेतो धर्मा और कोई मेरी नहीं सुनता धर्म से नित्यः सुखदुःखत्वनित्ये जीवो अर्थ और काम होते हैं यह फिस. लिये गवन नहीं कियाजाता ४ाम. मुष्य न कभी कामना सेन भय से न लाम से जीवन के लिये भी धर्म नित्यो हेतुरस्य त्यनित्यः। ५। एमां भारतसावित्री प्रातः प्रातः पठेत्तु यः स भारतफलं प्राप्य परं प्रधा. धिगच्छति"१६। पटेत् । तदनन्तरं -- - व्यावहारिकृसंस्कृतप्रवोधः। [२०५] यहचर्याचन्द्रोदयादुद्धृता दिनचर्यारात्रिचर्याच । हिन्दी। -संस्कृत। फो न छोड़े क्योंकि धर्म नित्य है "पुण्यश्लोको नोराजा पुण्यश्लोको और सुख दुख्य अनित्य है तैसही युधिष्ठिरः पुण्यश्लोका च वैदेही जीव नित्य है और इस का हेतु अ पुण्यश्लोको जनार्दनः" अश्वत्थामा नित्य है।५। हररोज़ सबेरे जो म चलियासो हनूमॉश्च विभीषणः । नुष्य भारतसावित्री को पढ़ेगा वह कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीवि- महाभारत का फल प्राप्त करके पर न॥ सप्तैतान्सस्मरेन्नित्यं मार्कण्डे.. ब्रह्म को प्राप्त होगा। इस के अनन्तर 'यमथाटमम् । जीवेद्वर्षशतं सोऽपि " पवित्रकीर्ति राजानल, - पवित्र सर्वव्याधिविवर्जितः । पुनः, अह- कीर्ति राजा युधिष्ठिर और पवित्र ल्याद्रौपदी सीता, कुन्ती मन्दोदरी कीर्ति श्रीजानकीजी और पवित्र तथा पञ्चकन्या स्मरेन्नित्यं, महा- कीर्ति श्रीभगवान" स्मरण करे फिर पातकनाशनम् "अश्वत्थामा, यलि, व्यास, हनूमान् और विभीषण कृपाचार्य और परशु राम ये सात चिरंजीवी हैं इन सातों को तथा आठर्थे मार्कण्डेय ऋषि को जो स्मरण करता है यह सम्पूर्ण व्या- धियों से रहित हुआ सौ यर्प जीता है"। फिर "अहल्या द्रौपदी,सीता, पुन्ती तथामन्दोदरी इन पांचों को जो नित्य स्मरण करना है महापातक कानाश करने वाला है." " फिर खोटे स्वप्न के फल को दूर करने पुनः दुःस्वप्ननाशनमिमं लोक पटेन, पाला यह श्लोक पढ़े- फाशी की उत्तर दिशा में कुक्कुर नाम | काशीत उत्तरे भागे, कुकटी नाम फा एक द्विज है उसके स्मरण सेही द्विजः। तस्य स्मरणमात्रेण, दुःम्पन्नः सुम्बप्नो भवेत्. दुःस्वप्न सुस्वप्न होजाता है.

चतुधिशोऽध्यायः। वृहचर्याचन्द्रोदयादुधृता दिनचर्यारात्रिचयांच। M 4-~-- हिन्दी। संस्कृत। नयं मनुष्य सवेरे उठ कर दही, घी नतो जनः प्रातमत्थाय भधि, आज्य, दर्पण, सफेद सरसों, बेल, मोना, मुकुरं मिद्धार्ग (ऽयंनसर्प) दिव्यं, माला घोड़ा हाथी, गो ब्राह्मण हल म्वर्णम् म्रज. अश्य गज, गां.चित्रं, दी, दूद इनको या इन में से किमी हरिदां, दूर्वामनप्यन्यतमं या पयत् को देखे । नकिधर्मी,कुत्ता, बिल्ली नत्वमिण श्यानं माजारादिकं यो. “इत्यादि को, यदि ये चीज पास में नानि वस्नून्यभ्याशथानि नस्युस्त. नहाँ तो अपनही हार्थ देव ले. दावास्वहस्तायेयावलोकयन्. इसके बाद गांव से या नगर से याहर तदनन्तरं मामानगराठा वहिनस्यां भैरत दिशा में शूरवीर के घाण वीरपुक्षेपात्यय शुद्धमृदं वारिपात्र जॉन की दृरतक (कमासकम ५००० चादाय कीटादिशून्यम्थलं गत्या कदम) शुद्ध मिट्टी और जल पात्र मृत्तिकां जलपात्रं च निधायायशियः लेकर कीड़े मकोड़े मे रहित जगह कस्तुणधरामाच्छाद्यमावृतशिराः में शाफर मिट्टी और जल का चर्नन कण्ठलम्वितयमोपचीत तूणी प्रा. रख कर यज्ञ में काम न आनवाले णास्येपिधाय दिवोदडूमुखी नक्तं द. सूखे निनको से जमीन को ढककर क्षिणामुखो मूत्रपुरीप उसज्य लो. कर्ण या कंठ में यज्ञोपवीत लटका छादिना गुदं परिमृज्योत्थाय पूर्वगृ- चुप चाप नाक और मुंह मूंद कर होनमूजलपात्र गृहीत्वादीमलक- दिन में उत्तर को मुंह कर रात में मालमृजलौवारं शिश्नशौचं शरया दक्षिण की ओर मुंह फर पाखाना पुनमजलैत्रिवारमपानं संशोध्य पु. पेशाय फिर, देले इत्यादि से गुदा नर्जलनव लिङ्गगुदे प्रक्षाल्य शुद्ध- साफ कर और वहां से उठकर पहि- मृसिकयैकवार हस्त प्रक्षान्य शुद्ध ले लाये हुए मिट्टी और जल पात्र भूमिमागस्यान्यमृजलेन दशयारंवा लेकर गील आमले के वरापर मिट्टी मकरं प्रक्षाल्य ततः करद्वयं ससवार ले जल से दोबार इन्द्रिय को साफ मृजलैः प्रक्षाल्य पादायपि अनयैय कर फिर मिट्टी और जल से तीन रीत्या निः प्रक्षाल्यान्यजलेन द्वाद.

, घ्यावहारिकसंस्कृतमयोधः। [२०७] वृहचर्याचन्द्रोदयादुद्धृता दिनचर्यारात्रिचर्याच । हिन्दी। संस्कृत । बार गुदा को शुद्ध कर फिर जल शगडूपान्यामभागे इत्या जलपात्रं सेही लिंग और गुदा प्रोकर शुद्ध पि-पर्युक्ष्य उपवीती द्विराचामत् . मिट्टी से एक बार हाथ धो और शुद्ध जगह पर आ दूसरी मिट्टी और जल से दस बार वाम हाथ को धो और फिर दोनों हाथों को सात चार मिट्टी और जल से धो, पाचों को भी इसी रीति से तीन चार धो, दूसरे पानी से बारह कुले बाई तरफ़ कर जल के पात्र को तीन बार माँज अनेऊ ठीक कर दोवार आचमन करे. अब दाँतन करना-दाँतन, चारह अंगुल । अथ दन्तधावन-भक्षयेद्दन्तपवनं द्वा- चौड़ी और कनी उंगली के नोंक की दशाङ्गुलमायतं कनिष्ठिकानयत् स्थू यरावर मोटी, सीधी, विना गांठ लमृज्यग्रन्धितथावणं एकैकंघर्पयद्द- या खखोडर की करनी चाहिये। न्तं मृदुना कुर्चक्रन च, दन्तशोध. एक २ दांत को मुलायम कुंची से नचूर्णेन दन्तमांसान्ययाधयन्. या दातों को शुद्ध करने वाले मञ्जन स मसूड़ों पर जोर न देता हुआ, घिस. त्रिकुटा में शहद मिलाकर या तेल और क्षौद्रीत्रकटुकासन तैलसिन्धुभवन घा संधा नमक मिलाकर या तेजोवती चूर्णन तेजोचल्याश्च दन्तोनित्य वि. यूर्ण से दांत नित्य साफ फरे. शोधयेत् . अब दांतन के योग्य लकड़ी यर्णन क अथ दन्तधावनाहाणि काष्ठान्याह. आक की लकड़ी में पार्य, यष्ट्र में दीप्ति, अके वीर्य घंटे दीप्तिः करले विजयो फा में बिजव, पिलखन में धन भवेत् पक्ष चैचार्यसम्पत्तिर्वदाम- [२०८ ] चतुर्षिशोऽध्यायः। वृहचर्याचन्द्रोदयादुद्धता दिनचर्यारापिचर्याच । हिन्दी। संस्कृत। दौलत, घर में भाठी आयाज, सैर धुरो चीनः बदिर मुखसागनध्य में मुख की सुगन्ध, येल में बहुत चिल्वे तु विपुलं धनं उदुम्बर तु साधन, गूलर में याणी की सिद्धि, वासिद्धिरानं त्यारोग्यसेव च क. आम में भागेग्यता, कदम में धैर्य दम्ब तु धृतिर्मेधा, चम्पक तु दृढा और बुद्धि और चम्पा में दृढ मति, ‘मतिः शिरीष कीर्तिसामाग्यमायु- सिरस में फीति, सौभाग्य, उम्र, राराग्यमैच च अपामार्गधृतिर्मेधा और आरोग्यता औगा में धैर्य, प्रज्ञा शनिस्तथा निः दादियां घुद्धि, प्रज्ञा शक्तित्तसही आवाज़ में. सुन्दरकारः ककुभे कुटजे तथा, नारमै सुन्दर आकार, ककुम(अर्जुन) जातीतगरमन्दारदुःखप्नश्च विन. कुहा में तैसेही, जाती, तगर और श्यति, मन्दार इन से खोटा स्वप्न नाश होता है. और लकड़ी निषिद्ध हैं। अब भन्दाज निषिद्धान्यन्यानि काष्ठानि । अध. सुनो. ब्राह्मणों की दोतन १२ अंगुल की, और बादशाङ्गुलं विप्राणांक्षत्रियाणदशा- क्षत्रियों की १० अंगुल की, येश्यों हुलं अष्टाङ्गुलञ्च वैश्याणां शूद्राणा- को १८ अगुल को और दो की ६ नुपडडुलम्. अंगुल की होती है, लियों की दासन उससे चौधार अंगु- दन्तकाप्ठन्तु गृढीयात् त्रीणां तनुः ल लेनी चाहिये. भय कुल्ला करने की तरफोर लिखी | अथ गपडूपविधिलिख्यते. जानी है. मारह शांचानन्तर, और पेशाय जाने कुर्याद्वादशगण्डूपान् पुरीपोत्सर्जन पीछे चार और भोजन के पीछे १६ ततः मूनोत्सर्गेचचतुरा भोजनान्ते कुले पारे. तु घोडा. माणे शृणु.

व्यावहारिकसंस्कृतभबोधः। [ २०९] वृहचर्याचन्द्रोदयादुद्धृता दिनचर्यारात्रिचर्याच । हिन्दी। संस्कृत। तय मनुष्य स्नान, स्नान के पीछे स-ततो जनः स्नानं, स्नानानन्तरं सन्ध्य- भ्यावन्दुन और अपने इष्ट देव का चन्दनं स्पेष्टदेवार्चनं तत्पश्चादायाधी पूजन उसके पीछे यथाशक्तिगायत्री जापं * पञ्चमहायज्ञश्च समाचरेत्. का जाप और पांच महायश करे, तय भोजन के आदि में मंगलीक वस्तु ततो भोजनादी मानल्यवस्तूनां यथा मो का जैसे अग्नि,गी,जल, ग्राह्मण बग्निगोजलमायणस्वर्णघृतादित्य- सोना, घी, सूर्य, और राजा इन का राज्ञां दर्शन प्रदक्षिणञ्च पुर्यात् ततो दर्शन और परिक्रमा करे तव वलि बलिवैश्वदेव भोजनस्वभ्वपिणच वैश्वदेय और भोजन का ईश्वरार्पण "ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्त्रहारनी ग्रह्मणा "ब्रह्मार्पणं ग्राहविर्यशाग्नौ ग्रहाणा द्रुतं यहव तेन गन्तव्यं ग्रहकर्म हुतं रमेव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म स. समाधिना सनं चतुर्विध स्वादु माधिना अन्नं चतुर्विध स्वादु रसैः रसः पभिः समन्वितं भक्ष्यभोज्यं- पभिः समन्धितं भक्ष्यभोज्यत्वया त्वया नित्यं नैवेध प्रतिगृह्यता, पत्रं नित्यं नैवेद्यं प्रतिधतापत्रं पुष्पं फलं पुष्पं फलं तोय यो मे भक्त्या प्रय. तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति तदह छति, तदहं भक्त्युपहतमशामि भक्त्युपतमश्नामि प्रयतात्मनः प्रयतात्मनः"विश्वारमामीयतामित्य- "विश्वात्मानीयतां" इत्यादि पाक्यों दियाफ्यैः कुर्यात् ततो भोजनं मि- से फरना। इसके अनन्तर भोजन प. टवस्तूनां प्रथमं तदनन्तरमन्यपाम् । हिले मोठीचाजांका उसके बाद औरों भुफ्त्या शतपदं गच्छेत् पुनः शय्या. फा,खाकर सौपेड़ चल ले फिरपाट यां श्यासानटी समुत्तानस्तान द्वि:- पर सीधा लेटा हुआ आठ उसास पार्चेतुदक्षिणेततस्तद्विगुणान्या- ले और उनके दुगुने दाहिनी फरपट मे पश्चात्सुप्याद्यथा सुसंग्रीष्मर्ती तु में और उनके दुगुने या कारयट में दिवाशयनं सुपपदं प्रायशः पित्त. " * पहिले अध्याय में स्पष्टरीति से देखो. * नोट प्रथमे ऽध्याये फुट पश्यत . २७ [२१० ]. चतुर्दिशोऽध्यायः। वृहचर्याचन्द्रोदयादुद्धृता दिनचर्या रात्रिचर्याच । हिन्दी। संस्कृत। पछि चाह जैस सचि। ग्रीष्म ऋतु प्रस्तानाश्चात्यावश्यकमन्यतुषु च में दिन को सोना सुख दंन वाला है दिवास्वापोनिषिद्धः और अक्सर पित्त मिजान वालों को बहुत ज़रूरी है और दूसपेजतु भओं में दिनका सोना मना है. निस के बाद घर के काम और उनके तदनन्तरं गृहस्त्यान् नदभाव भक्तिर- अभाव में भक्ति रस में पगेहुए पार सातापारमार्थिकान्मन्थान् याव- मार्थिक प्रन्यों को शाम तक पढ़ेया सन्ध्यासमय पठेतृणुयाहर. सुना करे. फिर पहिलाही तरकीब से शोचादि । ततः पूर्पणव विधिनाशाचादिकं करवा काम करके सायकाल को सन्ध्या सायं सन्ध्यामुपासीत । सायं काले फरे सध्या समय भोजन, स्त्रीप्र. आहार मैथुनं निद्रा सम्पाटं मागंग- संग, सोना पढना, तिसना, रास्ता मनमेनानि कर्माणि पर्जयेस् । दीपा घलना ये काम छोड़ दे। दीये जलने फवलदानन्तरं कानिचिधर्मपुस्त- के पीछे कोई धर्म पुस्तक धगैरह फानि पठित्वैश्वरगुणानुवादांश्व गा. पढ़ कर और ईश्वर के गुणानुवाद स्था श्रुत्वा या लघु भोजनं कुयात. गोकर यासुन कर सूक्ष्म भोजन पर. तय दूसरे पहर के आने पर कार्मशास्त्र तो द्वितीय प्रहरीगर्म कामशास्त्रा मैं कह दुप दिनों में ही फ्रोडाघर में तेप्येय दिवसपुरतिमन्दिर मजेद । जाय यहाँ पहिले पाँव धोकर बाट तत्र पूर्व पादौ प्रक्षाल्य शय्यांपैदिक यो पैदिक गारदी मन्त्रों से अभि गौरई मन्नरभिमन्य चेणुदण्डमा मन्त्रित फर सठिया, जल का पात्र म्धुपाञ्चाम्पानि पुणादीनि रम्या- १ नोट अमावस पून्यौ को छह मातु १ नोट पक्षयपूर्णिमां हित्या ऋतुतः स समतिधि ४,६ इत्यादि में रवि, समासु तिथिपुरवि कुजगुरुवारषु, मगल, गुरुवार को चार पुरुष 'नक्षत्रेषु च प्राम्यधर्मः प्रास्ता. नक्षता में ग्राम्यधर्म श्रेष्ठ है।

व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। [२११] सहचर्याचन्द्रोदयादुद्धृता दिनचर्यारात्रिचर्याच । हिन्दी। संस्कृत। ओर भी पुष्प वगैरह रमणीय चीजें णि वस्तूनि शिरस्थाने निधाय स्व- सिरहाने रख कर सोये इस प्रकार पेदिति दिनचयी रात्रिचर्या च दिन के काम और रात के काम संतम हुए. गौड़ वंश उत्पन्न कृष्ण पादपङ्कज भ्रमर | गौडान्वधायजाता गोविन्दांनिसरोजप. श्रीदुर्गाप्रसाद पुत्र सुपानन्दनाम ट्पदोऽयम् दुर्गाप्रसादसूनुः सुखा- भयो । नन्दाख्यत्रिपाठीति ॥१॥ उग्निस सो इकसठ बरश पुरुषोत्तम रसारसाइभूमिते, हायने मासि तु स- तह मास शुक्ल चतुर्थी शुक्र को हस्यनाम के उशनति गुल्लचतुर्थ्या शिवह समयो दास ॥२॥ कृत्वा पूर्णमथापयच्छिवाय ॥२॥ समाप्ता. इति श्रीसुखानन्दनिपाठिविरचितेव्यावहारिकसंस्कृतमयोधे प्रथमो भागः। प्रथमो भागः समाप्तः।

श्रीगणेशायनमः। अथ व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधे । द्वितीयो भागः। यशोदानन्दनं नत्या बालकाय भूरिश: सारमुद्धृत्य कौमुद्या वर्ण्यते नरभापया ॥१॥ अथ सन्धिप्रक्रियामदर्शका प्रथमोऽध्यायः । Lजपदो अक्षर निकट होकर परस्पर मिल जाते है और उनके मिलने से जो विकार होता है यह सन्धि कहाता है) सन्धि मुख्य तीन प्रकारकी है १ स्वर- सन्धि २ व्यअनसन्धि ३ विसर्गसन्धि ) जहां सन्धि होसकी हो और यहां न हो यह एक चाधी प्रतिमाच सन्धि कहलाती है, क्रमसे प्रत्येक का विवरण देगी। जब स्वरके साथ स्वरका सयोग होता है उसे सरसन्धि कहते है और वह ५ प्रकार की है, १ यण, २ दीर्घ, ३ गुण, ५ वृद्धि और ५ अयादि चतुष्टय । १ य-यदि हस्थ या दीर्घ इ, उ, ऋ, लइनसे परे अपने सवर्ण स्वरको छोड़ कोई स्वर परे हो तो फ्रमसे उपरोक्त घणों के स्थान में य, व, र,ल्होजाते है (इकोयणचि) जैसे सुधी+उपास्यः सुभ्युपास्या, मधु + मन मभ्यन, पि. तृ+आशा पित्राशा, ल+अनुबन्धः लनुथन्धः २ दीर्घ-हस्वधा दीर्घ , 13, , ल से परे इनके सवर्णी अक्षर परे हो तो दोनों मिलकर एक दीर्घ स्वर होजाता है। (गफः सणेदीर्घः) जैसे तव आदर तबादर, दधिहि वाद, साधु + उक्तिः साधूक्तिः, पितृ ऋणम् पितृणम् ।

www [२] प्यावहारिकसरहतप्रयोधः। ३ गुण-यदि अ, या से परे इम्ब या दीर्घ इ, उ, हो तो क्रम से ए, ओ, थर होजाता है (आद्गुणः) जैसे देय इन्द्रादेयंदानील+उत्पलं नोदोत्पलं, देव+ऋषिः दयपिः। ४ वृद्धि-यदि अ वा भा से परे ए, ऐ, ओ, औ या मरण होतो दोनों मिलकर कम से पे, औऔर आरहोजाते है (वृद्धिराच) जैसे एक एकम् एककम् जल + आधः जलाया, शीतशितः शीनातः । ५ अयादिचतुपय-यदि ए, ऐ, ओ, औ से परे अपने मवणी स्परवर्ण को छोद और कोई स्वर होतो कम से अम्, आम्, अन् , आयू, हो जाने हैं (एची। यवायायः) मे शे+अनम् शयनम्, विन+शः विनायक, मा+अनं भरनम्, पर+अकः पावकः। ६ यदि पदान्त के प. चा ओ से परे अ आये तो उस आकार का लोप करके उसकी जगह (5) यह चिन्ह कर देते हे (एइः पदान्तादति) जैसे क+ अपहि क्वेऽहि, पटो+भत्र पटोऽत्र । ७ यदि पदान्त के ए या भो से परे प्रकार को छोड़ कोई स्वर पूर्ण रहे तो 'विकल्प से अय, भव के य् और म् का लोप हो जाना है दूसरे पक्ष में अय् और अव् ही बने रहते हे (लोप शाकल्यस्य) सखे+आगच्छ सग आगच्छ, पयागच्छ, प्रभो+पहि प्रभपहि, प्रभवेहि । ८ यदि किसी उपसर्ग के यवा से परे पम् और इण् धातुओं के 'ए' को छोड़ और कोई ५ या ओ होतो दोनों मिल कर ए और ओ ही रहता है ऐ ओर जानहीं (पडिपर रूपम्) जैसे म+एपयति प्रेषयति, उप+औपति उपोषति, पराएधते परेधते । ९. यदि वा ओ से परे भोष्ट और मौत हो और समास किये जायतो विफरए से औ होजाता है यदि समास न हो तो ओ ही होता है (ओत्वोष्ठयो. समासेवा) जैसे विम्य+भोट विम्वोष्ठ,विम्वौष्ठ स्थूल ओतु:स्थुलोतुः स्थूलौतु, तप+ ओघतची अयमकृतिभावसन्धिः। १ऐसी अन्यय जो एक स्वरवाली हो या जिन के अन्त में ओहो तो वहां सन्धि, योग होने पर भी नहीं होती (निपात एकाजनाइ, योत्) जैसे आ+एवम् अहो+अपेहि । १ , ..

प्रथमोऽध्यायः। है . २ यदि द्विवचन के ई, ऊ या ए हो तो ये भी सन्धि योग होने पर सन्धि को मास नहीं होते (ईदूदेद्विवचन मगृहाम्) जस कची इमो, साधू+आगता, लते एते। ३ अदम् शब्द के भी ईकार ऊकार सन्धि को प्राप्त नहीं होते (अदसोगात् ) जसे अमी+अश्वाः, अमू+अर्भको। अथ व्यञ्चन सन्धिः। अब ध्यान के साथ व्यञ्जन का या स्पर का सयोग होता है तो उसे व्यञ्जन (हल) सन्धि कहते है। सकार पा तवर्ग यो शफार धो चर्चा का योग हो तो क्रमसे शकार चवर्ग रोजाते हैं (स्तोः चुना श्चुः जैसे हरि +शेते हरि शेते, सत्+चित् सञ्चित् । २सकार वा तपर्ग फो पकार घाटवर्ग का योग होतो कमसे पकार या वर्ग होजाते है (टनाप्लु ) जसे राम +पप्ठ रामप्पष्ट , तत्+टीका तटीका ३ पदान्त के जो पट् त् क् प् सो ग्रामसे ज्, ड्, द्, ग, होजॉय यदि कोई स्वर या ह य प र ल या किसी घर्गका तृतीय चतुर्थ अक्षर परे हो परञ्च पञ्चम अक्षर परे होने विकल्प से अनुनासिक अक्षर भी होजायेंगे (मला जशोऽन्ते, यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ) जैसे यार+ईश घागीश , चित्+रूपम् चिद्रूपम्, एतत् + मुरारि एनमुरारि.एनन्मुरारि । ४ तवर्ग से परे लकार हो तो तयर्ग के स्थान में भी लकीर होजाता है परन्तु ने के स्थान में अनुनासिफ ही लें होता हे (तोलि) तत्+लुमाति तलनानि, भवान् + लिगति भवॉल्लियत्ति । ५ च दत् क् र के उत्तर हकार हो तो उनके स्थान में कम से यू, ढ् , ५ ५ ५ अर्थात् जिसघर्गफे वे अक्षर हो उसी का चौथा अक्षर ईस ""के स्थान मैं विकल्प से होजाता है और पहिले ब्यादि अक्षरों को उसी वर्गश तीसरा अक्षर होजाता है ( झयोहोऽन्यतरस्याम् ) जैसे, दिक्+हस्ती दिग्धस्ती दिग्हस्ती। ६ चट् त् क् प् के उत्तर जो शकार उसको विकल्प से "छ" हो यदि कोई म्बर या ह य च र वर्ण परे होवे (शश्छोऽटि ) जैसे तत्+शिष. तच्छिन', तशिव।

1 . [४] न्यावहारिकसंस्कृतमबोधः । ७ इस्व से परे जो पदान्त के न् ड् चे स्वर परे होने पर द्विस्व हो जॉय (उमो हस्वादचिउमुण् नित्यम् ) जैसे राजन्ह राजनिह, प्रत्यङ्मात्मा प्रत्यड्डात्मा, सुगम् +ह सुगणिह । ८ यदि नकारान्त पद से परे छ् द्ध, धू, त् होतो सकार का आगम और 'नकार को अनुस्वार होजाता है (नव्यप्रशान) जैसे नृत्यन् +चकोर नृत्यधकारः। २ अनुस्वार से ऊप्मवर्ण छोड़ कोई प्यजन परे होतो उस ध्यान का सवीं पञ्चमाक्षर होजायगा। परश्च यदि अनुस्वार पदान्त का होता विकल्प से उत्तर वर्ण का पञ्चमाक्षर होगा (भनुस्वारस्यययि परसवर्णः । घापदान्तस्य) जैसे भ+कित. अङ्कित , पं+चित', यश्चित ,R+फरोपि त्वङ् फरोपि, त्वकरोपि। १० पदि हस्व स्वर से '' परे होतो 'छ' होजाता है, और कहीं दघि स्वर के 'अनन्तर भी होता है (छच, दीर्धात् ) परन्तु पदान्त दीर्घ के अनन्तर विकल्प से 'छ' होता है (पदान्तावा) जैसे तय+छत्र, तवच्छत्र, ग्ले+छ म्लेच्छ , लक्ष्मी+छाया लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया। अथ पिसर्गसन्धिः। १ जय विसर्ग के साथ स्वर या व्यञ्जन का सयोग होता है तो उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं । विसर्ग से परे सकार या तथर्ग होतो सवार और शकार या चर्ग हातो शकार और पकार चा वर्ग हो तो पकार हो जाता है (विसर्जनीयस्यस.) विष्णु+माता विष्णुस्त्राता, पूर्ण.+चन्द्रः पूर्णचन्द्रः, धनु टेकार. धनुष्टङ्कारः।. २ यदि विसर्ग से पर" हो तो विसर्ग का 'भो हो जाता है और अ' कालोप हो जाता है और यदि किसी वर्ग का तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम या य र लव्ह परे हो तो भी विसर्ग का 'ओ' हो जाता है (मतोरोर प्लुतादप्लुते) (हशिय) जैसे शिव +भच्य. शिवोऽच्या, शिष.+बन्धः शिवौवन्य। ३ यदि भो , भगो, अघोः और अकार से परे पिसर्ग हो और उनसे परेको छोड़ और कोई स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है। और यदि .

प्रथमोऽध्यायः। आकार से परे विसर्ग हो और उसके पर किसी वर्ग फा तृतीय चतुर्थ पञ्चम वर्ण या य र ल वह परे हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है और फिर सन्धि नहीं होती (भोभगो भयो अपूर्वस्ययोऽशि) असे चन्द्रः। उदेति चन्द्रउदेति, भाषा+भी गश्वाश्रमी। ४गा को छोद किसी स्पर से परमिसर्ग हो और उससे पर कोई स्पर या किसी वर्ग का तृतीय चतुर्थ पश्चम अक्षर या य र ल च परे हो सो वि. सर्ग का रफार हो जाता है (नामिनारः चं०पू०) जैसे कविः+अय कविरयम्, शिशुः+ हसति शिशुहसति । ५ यदि प्रकार के अनन्तर रफार का पिसम हो और उससे परे कोई स्वर, किसी घर्ग का तृतीय चतुर्थ पशम अक्षर या ह य य र ल परे हो तो विसर्ग का फिर रफार हो जाता है (र च० पू०) जैसे पुनः अपि पुन- रपि, मातः+देहि मातदोह। ६ यदि रकार से परे रकार हो तो पहिला र लोप हो जाता है और उसका •पूर्व सस्य स्थर दीर्घ हो जाता है (रोरि । एलोपेपूर्वस्यदोघोडणः) जसे : पुनः+रमते पुनारमते पिंधुः राजते विधूराजते । ७ सः और एपशद की विसर्ग को छोड़ और कोई चर्ण परे रहते लोग हो जाती है (पतत्तदोः मुलोपोऽकारनभूसमासेहलि) जैसे सा+ हसति सहसति, पप:+आगतः एपागतः। न् का ण् होना। ८ मारपसे परे न हो तो ग्रह प में यदल जाता है और यदि इनके चाच में फोई स्वर, फर्ग, पयर्ग और य ब ह और अनुस्वार, एक या अमेक आप तोभी कुछ ण के बदलने में बाधा नहीं हो। (रपाभ्यांनाणा समानपदे, अघाड्नुम् व्यवायेऽपि) जैसे चतुणीम्, मस्रणा, हणम् । म् का प् होना। ९कवर्ग, और सभा को छोड़ शेष स्वर, और ह य य र ल इनसे पर किसी सूत्र का किया स् या किसी प्रत्यय का अवयव स् हो तो प में यदल जाता है (मादेशप्रत्यययोः) जैसे सुपाय, नदीपु, संपाम् । २८ ܐܕ ܢ पं. हरे रम्.+ प्र. . द्वि. रामम् ४. रामेण प. सख्या रामा: [६] व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । पलिङ्गरूपप्रदर्शको द्वितीयोऽध्यायः। (पुं) अकारान्त राम (ईश्वर) रमन्ते (पं. हरे हरिभ्यां हरिभ्यः योगिनो भूतानि या यस्मिन्, हरीणाम् धन् । स. हरी हयों हरिपु रामो रामाः सं. हे हरे रामो रामान इ-सखि (मिन) सहसमानं स्यायत रामाभ्याम् रामैः इति, सह + ख्या + इन् । च, रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः म. ससा ससायी सखायः रामात रामाभ्याम् रामेभ्यः | द्वि. ससायम् सपायो सखीन् रामस्य रामयोः रामाणाम् त. सरिभ्याम् सपिभिः स. राम रामयोः रामेषु च. सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः सं. हे राम रामा |पं. सप्युः ससिभ्याम् सखिभ्यः आ० विश्वपा (विश्व का रक्षक) विश्वं प. सख्युः सस्यो सखीनाम् पातोति, विश्व + पा+छि। स. सस्यो संख्या प्र. विश्वपा. विश्वपो विश्वपाः सं. ईससे सखाया ससाय: हि. विश्वपाम् विश्वौ विधपः -पपी (सूर्य) गतिलोकमिति पा+ई 7. विश्वपा विश्वपाभ्यां विश्वपाभिः प्र. पी. पायी च. विश्व विश्याम्यः द्वि. पपीम् पायो पप्यः पं. विश्वपः सू. पप्या पपीभ्याम् पपभिः प. विश्वपः विचपोः पिश्यपाम् |च. पप्य पपीश्याम् पपीभ्यः स. विश्यपि विश्यपासु पं. पप्यः पपीभ्याम् पपीभ्यः सं. विश्वपाः यिश्चपी विश्वपाः पप्योः पप्याम् रहीरः (ईश्वर) हरति पापानिति, स. पपी' पप्योः g+इन् । सं. हपी पन्यो प्र. दीर हरी हरयः हि. हरिम् हरी - हरीन् ए. हरिणा हरिभ्यां दरिभिः प्र. मुधीः सुधिया च. हर लुधियः हरिभ्यां द्वि. सुधियम् मुधियो मुधियः सखिपु पप्यः " पपीपु पन्या १-सुधी (अच्छी बुद्धिवाला) मुटु शोमनापीयस्य सः, सु+ ध्या+ई द्वितीयोऽध्यायः। " " " दि. भानुम Tv तु. सुधिया सुधीभ्याम् सुधीभिः तृ. स्थयम्भुवा स्वयंभूभ्यां स्वयम्भूमिः च. सुधिये सुधीभ्याम मुधीभ्यः च. स्वयम्भुये स्ययम्भूभ्या पं. सुधियः सुधीभ्याम् सुधीभ्यः, प. ' स्वयम्भुषः प. सुचियः सुधियोः सुधियाम् प. स्वयम्भुवः स्वयम्भूवो स्वयंभुवाम् स. सुधियि सुधियोः सुधीपु स. स्वयम्भुवि स्वयम्भूयु सं. हे सुधीः सुधियो सुचियः सं. हे स्वयम्भूः स्वयम्भुवी स्वयम्भुवः उ+ भानु (सूर्य) भातीति भा + नुक् वर-पितृ (पिता) पातिरक्षतीति प्र. भानु भानू भानवः पा+तच् भानू भानुन् म. पिता पितरी पितरः तृ. भानुना भानुभ्याम् भानुभिः द्वि. पितरम् पितरी पितृन् च. भान भानुभ्याम् भानुभ्यः तुं. पित्रा पितृभ्याम् पितृभिः पं. भात भानुभ्याम् भानुभ्यः च. पित्रे -पितृभ्याम् पितृभ्यः प. भानो भान्यो भानूनम्म् पं. पितुः पितृभ्याम् पितृभ्यः स: भानो भान्धो भानुयु प. पितु: पित्तो पितृणाम् सं. हेभानो . भानू "भानयः स. पितरि पितृपु -वर्षाभू (मंडक) वर्षायाम्भव- सं. हेपितः मिनरी पितर: तीति भू+ किम् । ऐ-रे (धन) ऐत्याददाति जनोवस्तू म. वर्षाभूः वर्गभ्यो पर्यायः न्यनेन रा+डे हि. पर्पाभ्वम् वर्षाभ्यो वर्गभ्वः रायो .राया तृ. पर्याभ्या वर्षाभूभ्याम् अभूभिः दि. रायम् रायो च. वर्षाव वर्षाभूभ्यः त. राया राभ्याम् राभिः पं. पात्रः वर्षाभूभ्यः च, राये राभ्याम् प. याभ्यः चपीभ्योः वर्याभ्याम् पं. रायः राभ्याम् राभ्यः स. चाचि वर्षाभ्योः यीभूषु पं. राया रायो • रायाम् सं. हे घाभूः पाचौः वीभ्यः स, रायि रायोः ऊ-स्वयम्भू (ब्रह्मा) स्वयंभवतीति स. हेराः रायौ ओ-गो (गाय) गच्छत्तीति गम् +ो प्र. स्वयम्भूः स्वयम्भुधौ स्वयम्भुवः प्र. गौः गाची द्वि. स्ययम्भुवम् स्वयम्भुवो स्वयम्भुवः द्वि. गाम् गावो - रायः रायः भू + कि गावः गाः च. गवे स. पवि म. ग्लोः च, लाये [८] स्यावहारिय संस्थतनयांधः। द्वि. मतिम् गोभ्याम् गोभिः मती मती त. गवा गोभ्याम् गोभ्यः 1. मस्या मतिभ्याम् मतिभिः पं. गा गोभ्याम् गोभ्यः च. मत्यै, मतये मतिभ्याम मतिभ्यः प. गो गयो गयाम् |प. मत्या,मनेः मतिभ्याम् मतिरा गयो: गोधु प. मत्याः,मतःमत्यो मतीनाम् सं. हेगी नायौ गावः स. मस्याम्,मती मति औ-ाली (चन्द्रमा) ग्लायतीति सं. हेमते मसी मतया ई-नदी (दया) नदरित जलजन्त. पलायो पोयस्या, नद + अच् +8 द्वि., ग्लायम् ग्लावा ग्लाया प्र. मी नधी १. ग्लाषा लोभ्याम् ग्लौभिः दि. नदीम् नधी नदीः ग्लोभ्याम् ग्लोभ्या तु. गधा नदोभ्याम् नदीभिः पं. टायर ग्लोभ्याम् ग्लोभ्या च. नद्य मदीभ्याम् नदीभ्यः लाचा ग्लायो। ग्लायाम् पं. नद्या मदोभ्याम् नदीभ्यः स, ग्लावि ग्लावो ग्लीपु नयो नदीनाम् सं. ग्लो गलाषा पलायन स.: धाम् नयोः नदीषु अजन्त स्त्रीलिङ्ग भा-रमा (लक्ष्मी) सं. हे नदि नयो रमपति लोकान् , एम् + अ + आ उ--धेनु (गो) धयसिसुनानिति प्र. रमा रमे रमा द्वि. रमाम रमे रमा ឡូរ धेनू धेनक तू. रमया रमाभ्याम् रमाभिः द्वि. धेनुम् धेनू च, रमायै रमाभ्याम् रमाभ्यः धेनुभ्याम् धनुभिः प, रमाया: रमाभ्याम् रमाभ्यः घ, धन्यै,धेनवे धेनुभ्याम् धेनुभ्यः रमायाः रमयो रमाणाम्पं, धन्याम्धेनो। धनुभ्या स. रमायाम् रमयोः रमा धेयोः धेनूना सं, हेरम रमे स. धेश्याम्धनी धेनुषु R-मति (घुद्धि) मन्यते ज्ञायतेऽनया, सं. हे धेनो धेनू घेतवः मन् + तिन् म. मति मती भ्रवः मचः धेनु ६..धेन्या " ११ रमा: . (भौ) भ्राम्यतीति, भ्रम् +डू मतयः .

द्वि. ध्वम् १ . " " " नाव: . प्र. माता - द्वि. झानम् त. ज्ञानेन द्वितीयोऽध्यायः। [९] प्र. नौ नायो नायः त. या भूभ्याम् भूमिः द्वि. नायम् , नायौ नावः बुबै, भ्रये भूभ्यः तृ. नावा नोभ्याम् नाभिः पं, सुवाः, भूयः च. नाये नीभ्याम् नोभ्यः प. भुयोः पं. भृयाम् भूणाम नाव: नाभ्याम् नोभ्यः स. भ्रयाम् ,भुधि ५. नायः नायो नावाम्- स. हे भूः भुर्या भुवः स. नावि नायोः नापु नाचा मन्मात (माता) मीयते भाद्रियते सं. हे नौः या मातृ (अ. नपुं.) अ-शान (समर) ज्ञायते. मातरी ऽनेनेति, शा+ ल्युट् मातरः दि. मातरम् मातरी मात प्र. शानम्, शाने झानानि ४. माना मातृभ्याम् मातृभिः शाने झानानि च. मांग मातृभ्याम् मातृभ्यः शानाभ्यां शानः मातृभ्याम् मातृभ्यः च. शानाय शानाभ्यां ज्ञानरः प, मातुः मात्रो पं. मातृणाम् शानात् झानाभ्यां ज्ञानेभ्यः स. मातरि मात्रो मातृपु प, झानस्य ज्ञानयोः ज्ञानानाम् सं. हे मातः मातरौ मातरः स. ज्ञाने ज्ञानयोः झानेपु ऐ-मुरे (अच्छे धनवाली) मुष्ठ सं. हे ज्ञान झाने ज्ञानानि शोभनोरायस्यः सा --वारि (जल ) वार्यतेऽनेनेति, मुरायो सुरायः वृ+ इन् दि. मुरायम् सुरायो सरायः म. वारि वारिणी वारीणि तू. सुगया सुराभ्याम् सुराभिः द्वि. पारि घारिणी वारीणि मुराये सुराभ्याम् सुराभ्यः तृ. घारिणा चारिभ्यां वारिभिः सुराभ्याम् सुराभ्यः च. वारिणे पारिभ्यां धारिभ्यः प. मुराया सुरायोः सुरायाम् पं. यारिणः पारिभ्यां चारिभ्यः स. सुरायि सुरायोः सुरामु प, चारिणः वारिणोः पारीणां स. हे सुराः सुरायौः सुरायः स. वारिणि चारिणोः वारिषु औ-जौ (नाव) नोद्यते यासा, नुद्+डो सं. हेवारि चारे चारिणी चाणि पं. मातुः . पं. सुराया MAA Audhvurna " शप पुम्वत् - . प " चोप पुम्यत् " " [१०] व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । इ-अक्षि (नेत्र) अश्यन्ते च्याप्यन्ते ए-पर (कीमती सुप्ठ गयम्य तन् रूपादिपदार्था येन, अश्++सि प्र. प्ररि परिणी परीणि प्र. अक्षि अक्षिणी अक्षीणि दि. हि. अक्षि अक्षिणी अक्षाणि सू. अक्षणा अविभ्यां अश्चिभिः गो-प्रया (आकाश) प्रकर्षण- च. अक्षणे अक्षिभ्यां यक्षिभ्यः दीव्यतीति तत् अक्षिभ्यां अक्षिभ्यः प्र. प्रा प्रधुनी अक्षण. मनि अक्षतः अस्जो दि. अश्णाम् स. अणि अक्षणि अक्ष्णोः अक्षिा म. हे अक्षे अक्षि इत्यादि औ-सुनी (अच्छी नायवाला) सुष्छु शोभनानौर्यत्र तत् उ-मधु (शाहद)मन् + उनस्य धः प्र. मधु मधुनी मधूनि प्र. सुनु सुनुनी सुनूनि द्वि. तू, मधुना मधुभ्यां मधुभिः त. सुनुना सुनुभ्यां सुनुभिः च. मधुने मधुभ्यः च. सुनने सुनुभ्यां सुनुभ्यः प. सुनना सुनुभ्यां सुनुभ्यः मधुनोः मधूनां प. सुनुनः सुनुनोः सुनुनाम् म. मधुनि स. सुनुनि सुनुनो सुनुयु स. हेमधोमधु इत्यादि सं. हेसुनु इत्यादि म-धातू (धाय) दधातीनि, हलन्त पुल्लिङ्ग च-जलमुच् (यादल) धा+हच जलंमुञ्चतीति, मुच् + किए भात धातृणी धावृणि [प्र. जलमुक् ग् जलमुची। जलमुचः दि. द्वि. जलमुचं तृ. धाना धातृभ्यां धाभिः त. जलमुचा जलमुग्भ्वां जलमुग्भि. धाराभ्यां धातृभ्यः च. जलमुचे जलमुग्भ्यां जलमुग्भ्यः घातृभ्यां धातृभ्य [पं: जलमुचः जलमुग्भ्यां धानो. धातृणाम् प. जलमुचः जलमुचोः जलमुचां स. धारि অামা धपु स. अलमुचि स. धान धात जलमुक्षु इस्पादि इत्यादि पं. मधुनः " " " च. धात्र पं. धातु प. धातुः सं. हेजल मुक द्वितीयोऽध्यायः॥ " सं. हे धानन् छि. सम्राजम् सम्राजी ज्-पणिज् (पनिया) पणायते व्यव. त्-भावत् (चौड़ता हुआ) धान- हरतीति पण + इन पस्यवत्वम् नीनि, याच शत् प्र. वणिक यणिजा এলেন। म. धाघन् धावन्ती भावन्त: द्वि. वाणिजे यणिजी वणिजः हि. धायन्तम् धावती धावत: त. चणिजा घणिग्भ्यां चणिग्भिःत धावता धावभ्याम् धापतिः च. पणिजे चणिग्भ्यो पणिग्भ्यः च. धावते धावभ्यः पं. वणिजः पणिभ्यां पणिग्भ्य: पं. धावत: धावद्भ्यः प. पणिजः धणिजोः घणिजाम् प. धावत: धावतो. धावताम् स. चणिजि चणिजोः चणिक्षु स. धावति धावतो. धावत्सु सं. हे वणिक इत्यादि इत्यादि ज्-(सम्राज्) मण्डलेश्वरराजा त्-श्रीमत् (लक्ष्मीवान.) सम्यक्रराजते, राज+विप् श्रीविद्यतेऽस्य, धी+मतुप् प्र. सम्राट सम्राजी सम्राजा प्र. श्रीमान् श्रीमन्तो श्रीमन्तः सम्राजा द्वि. धीमन्तम् भीमन्तो धीमतः त. समाजा सम्राभ्याम् सम्राभिः तृ. श्रीमता श्रीमद्भ्यां श्रीमद्भिः च. सम्राजे सम्रायः घ. थीमते श्रीमद्भ्यां श्रीमद्भ्यः पं. समाज सम्राइभ्यः पं. श्रीमता भीमदभ्यां श्रीमद्भ्यः सम्राजः सम्राजोः सम्राजाम् प. श्रीमतः श्रीमतोः धीमताम् स. सन्नाजि सनाजोः सनात् स. श्रीमति श्रीमतोः श्रीमत्र सं. हे सनाद् सं. श्रीमन् त्-भूभृत् (पहाइ वा राजा) भुयं स्-महत् (यहा) महाते पूज्यते विभीति, भू+ भृ+किप या सः, मह+अति भूभृतो भूभृतः महान् महान्ती महान्तः द्वि. भूभृतम् भूभूती भूभृतः द्वि. महान्तम् महान्ती महतः ह. भूभृता भूभृद्भ्यां भूभृद्भिः तु. महता महद्भ्याम् महद्भिः च. भूभृते. भूभृद्भ्यां भूभृद्भ्यः च. महते महद्भ्याम् महद्भ्यः भूभृद्भ्यां भूभृद्भ्यः- पं. महतः महद्भ्याम् मद्भ्यः प. भूभृतः भूभृतोः भूभृताम् महतः महतोः महताम् स. भूभृति भूभृतोः भूभूत्सु स. महति महतो महत्सु सं. हे भूभृत इत्यादि सं. हेमहन् इत्यादि " प. प्र. भूभृत् पं. भूभृतः पं. सुहद प. शुनः सं. हे सुहत् म. युषा प्र. युत् द्वि. युभम् च्यावहारिकसरहतप्रयोधः । द्-सुहृद् (मित्र ) सुष्ठुशोभनंहृद्य. न्-श्वन् (कुत्ता) शिव+कनिन् स्य स',सु+ह+हिप् तुक्च था दिन सुहृदो सुहद श्वानी श्याना द्वि. सुहृदम् सुहृदौ द्वि. श्वानम् श्यानी गुना ४. सुहदा सुहृद्भ्यां सुहन्द्रिः |त. शुना श्वभ्याम् श्यभिः च. सुहृद मुहद्भ्यां सुहद्भ्यः च. सुने स्वभ्याम् श्यभ्या सुभ्यां सुहृद्भ्यः पं. शुनः नभ्याम् नभ्यः सुहृदोः सुहृदाम् शुनोः शुनाम् स. सुहृदि मुहदो सुहत्सु स. शुनि शुनो। श्यतु न्-युवन् (जवान) यु+कनिन, ध्-युध् (लदाई) युभ्यस्यसि युमिश्रणामिश्रणयोः निति, युभ् +किप युधी युवानी युपानः युधा युधौ युधा द्वि. युवानम् युवानी यूनः ४. युधा युद्भ्याम् युद्भिः तु. यूना युवम्यां युवभिः च. युधे युद्भ्याम् युझ्या |च. यूने युयभ्यां युयभ्यः प. युधः युम्याम् युधभ्यां युवभ्यः युधोः युधाम् यनोः यूनाम् स, युधि युधोः युत्म स. यूनि यूमोः युवसु सं. हेयुत् न्-आरमन् (चित्त) भतति सततं म्-गुणिन् (गुणवान् ) गुणाः गच्छति, अत् + मनि सन्त्यस्य, गुण+नि प्र. आत्मा मारमानी भारमाना प्र. गुणी गुणिनी गुणिनः दि. आरमानं मारमानी भारमनः द्वि. गुणिनं गुणिनी गुणिनः तृ. भारमना आत्मभ्यो भात्मभिः त. गुणिना गुणिभ्यां गुणिभिः च. आत्मने भारमभ्यां आत्मभ्यः गुणिने गुणिभ्या. गुणिभ्यः पं. मात्मनः आत्मभ्यां पं. गुणिनः गुणिभ्यां गुणिभ्यः मात्मनः घ. गुणिनः गुणिनोः गुणिनां स. भात्मनि आत्मनोः मारमा स. गुणिनि गुणिनोः गुणिषु सं. हेभारमन् सं. हेगुपिन् " पं. गून प. यूना प. युधः सं. हे युधन आत्मनः आरमनाम पधः " " पं. पथ: " " " द्वितीयोऽध्यायः। [१३] न-पधिन (रास्ता) पथगती+इनि दुषिप् (यैरी) वेष्टीति विपनकि पन्थानी प्र. दुषिद् दुधिपी पन्धाः विपः पन्थानः दि. पन्धानं पन्थानी दि. दुयियम् विषः तृ. पथा पथिभ्यां पथिभिः १. दूविपा दुविभ्यां वृधिभिः च. पथे पधिभ्यां पथिभ्यः च. दुविधे पिदभ्यः पथिभ्यां पथिभ्यः पं. दुधिपः पधाः वियोः यिषाम् पधाम् स. पथि पो पथिसु स. विधि द्विसु छिट्स सं. हे पन्थाः सं. हे ट्विट स्-चन्द्रमस् (चन्द्रमा) चन्द्रमा- र-घिर (धेश्य) विशति विर+कि छार्दमिमीते, मा+अस् प्र. विट विशी विशः प्र. चन्द्रमाः चन्द्रमसौ चन्द्रमसः छि. विशम् पिशी विशः दि. चन्द्रमसं चन्द्रमसौ चन्द्रमसः विभ्यां पिभिः ४. चन्द्रमसा चन्द्रमोभ्यां चन्द्रमोभिः च. विशे विभ्यां पिभ्यः च. चन्द्रमसे चन्द्रमोभ्यः पं. विशः विभ्यां विभ्यः पं. चन्द्रमसः प. विशः विशोः विशाम् प. चन्द्रमसः चन्द्रमसोः चन्द्रमसाम् स. विशि विशो घि स. चन्द्रमसि चन्द्रमसो चन्द्रमस्सु सं. हे पिट सं. चन्द्रमः श्-तार (तैसा) तस्यदृश्यते+किप स-विष्यस् (विद्वान् ) येत्तीति, निः + फसु प्र. ताड ताहशी तादृशः प्र. विद्वान् पिलांसो विद्वांसः द्वि. ताशम् ताशी तादृशः द्वि. घियांसम् विदुषः ४ ताशा तादग्भ्यां ताग्भिः तृ. विदुपा यियभ्यां विद्भिः च. तारशे तारग्भ्यां ताहरभ्यः च. पिदुषे विपद्भ्यः पं. तारशः तारम्भ्यां तादग्भ्यः पं. विदुपः प. ताशा तारशोः तादृशाम् प. विदुषः विदुपोः बिदुपाम् स. ताशशि स, विदुषि वियत्सु सं. देविदुरन् तू. विशा " " " " ताडशो ताउक्षु " सं. हे ताइक् २९ पुग्भ्यां पुंसोः घाचः [१४] ध्यावहारिकसंस्कृतमयोधः। स्-पुम्स् (मनुध्य) पातीति हलन्त स्त्रीलिङ्ग। पा+दुम्सुन् -चाच (वाणी) उच्यतेऽनयासा, प्र. पुमान् पुमांसो पुमांसा यन्+लिए द्वि. धुमांसम् पुमांसौ पुंसः प्र. वाक् याची घाचा ४. पुंसा पुम्भ्यां पुम्भिः द्वि. याचम् याची वाचः च. पुसे पुम्भ्या ४. वाचा चारभ्याम् वाग्भिः पं. पुंसः पुम्भ्यां पुग्भ्यः च, पाच वाग्भ्याम् वाग्भ्यः प. पुंसः पुंसोः पुंसाम् पं. याचा घारभ्याम् वाग्भ्यः स. पुसि पुस्सु चाचो चाचाम् सं. हे पुमन् स. चाचि पाचो घाक्षु --मधुलिक (भौरा) मधुलेढीति, लिह+हिप् |सं. हे वाक् प्र. मधुलिय् मधुलिहौ मधुलिहः ध्-योरुभ् (वृक्ष) पिशेषणरुणद्धि दि. मधुलिहम् स्थानं या सा विरुध् +फिप् ४. मधुलिहा मधुलिड्भ्यां मधुलिभि. प्र. पोयत् चारधी चीरधः च. मधुलिहे मधुलिदभ्यः द्वि. धीरुधम् धीरधी चीरधः पं. मलिदः त. धीरुधा धीरुभ्याम्चीसद्भिः प. मधुलिहा मधुलिहोः मधुलिहाम् च. धीरुधे चीरुभ्यः स. मधुलिहि मधुलिट्सु-सुपं. परिधः सं. मधुलिद प. चोरधः वीरुधौर वीरधाम् अनहुइ (बैल) अनःशफर स. धीरधि चीरधाः वीरुनु यहतीति, यह +फि सं. हे पोहत् प्र. अनश्याम् अनचाही अनचाहः द्वि. अनवाहम् प्-अप् (जल) आप्यन्ते यास्ता, तु. अनइहा अगदुद्भ्यां अमद्भिः आप+क्किप् च, अनहुद अनभ्यः प. शनहुदा अनभ्यः प. मनहः अनडुहोः अगडहाम् स, अनहि अनहुहोः अनन्म 1 " " " " अपर बहुवचनान्त / मं. देखनावन् . " " गापु सं. हे उपानत् द्वितीयोऽध्यायः [१] र--गिर् (वाणी) गृणाति तत्व ६--उपान (सूना) उपानह्यते या मनया, गृ+फिप् सा, उप+आना कि प्र. गीः गिरी गिरः प्र. उपानत् उपानही उपानहः द्वि. गिरम् गिरी गिर द्वि. उगानहम् उपानही उपानहः तृ. गिरा गाभ्या॑म् गोभिः त. उपानहा उपानभ्यां उपानन्दिः च. गिरे गीाम् गीर्यः घ. उपानहे उपानद्भ्यः पं. गिरः गोभ्याम् गीभ्यः पं. उपानहः उपरानभ्यः प. गिरः गिरोः गिराम् प. उपानहः उपामहोः उपानहाम् स. गिरि गिराः स. उपानहि उपानहो: उपानत्सु स. हे गी: -दिव (स्वर्ग) दीव्यन्ति देवा हलन्त नपुंसक। यन, दिव+डिषि प्र. धोः दिया दियः ज्-असम् (लोह) न सज्यते इति द्वि. दिवम् दियौ दियः न+र+कि २. दिया असजी असद्धि धुभ्याम् घुभिः च. दिवे अमृजी अनि युभ्यः पं. दिघः त. असूजा असृग्भ्याम् असृम्भिः च, असृज प. दिवः दिवोः दिवाम् असग्भ्य: स. दिवि दिवोः धुपु प. असूजा असृजोः असूआम् सं. हे धोः ~आशिप (आशीर्वाद) स. असृजि असृजोः असूक्षु आ+शास्+ किए प्र. याशी आशिपौ आशिप: अस्यतेरोणादिके ऋ या। তি, হিন্দু রান্নাঘী ওহাবঃ त्-श्रीमत् (शोभावान्) श्रीः तू. आशिया आशीभ्याम् आशीभिः शोभास्त्यस्य तत्, श्री+मतुप् च. आशिष भाशीभ्यः प्र. श्रीमत् श्रीमती श्रीमन्ति प. माशिपः आशीर्व्यः द्वि. श्रीमत श्रीमती श्रीमन्ति প, ব্যাবহ: গানঃ অাহাবা शेपम्पुम्वत् । स. नाशिपि आशिपोः माशी.यु आशीप्यु त्महत् (यहा) महाते. यत्तत् सं. हे आशी महती महान्ति प्र. असा द्वि. असूक् " " " " पं. शसस सं. हे असृक १ द्वि. महत् दि. नाम पं. नाना " घ्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । महती महान्ति स्-पयस् (जल व दूध) पीयते शेपम्पुम्यत् । यत्तद, पा+अमुन् प्र. पयः पयसी पांसि न्-नामम् (नाम) नाम्यतेऽभिधी- यतेऽथाऽनेन, नम्+अनम् दि. पयः पयमी पासि नानी नामनी नामानि ४. पयसा पोभ्याम् पयोमिः नामानि च. पयसे पयोभ्याम् पयोभ्यः पं. पयसा पयोभ्याम् पयोभ्यः ह. नाना नामभ्याम् मामभिः पयसः पपसोः च. नाने पयसाम् नामभ्याम् नामभ्यः पयसो नामभ्याम् नामभ्यः स. पयसि पयस्म नाम्नो नानाम् स. हेपयः स. नामिनामनि नामसु प-हविष हिवन पदार्थ) इयत यत्तत्, हु+इन् सं. नाम, नामन् इत्यादि प्र. हविः हचिपी हवीपि न्-अहन् (दिन) न जहातीति, द्वि. हविः हरिपो हधीपि न+हा+कनिन् . हपिपा हविाम् हविर्मिः प्र. अहः अहनी,अही महानि च. हषिर्ष हविाम् हविर्यः महानि पं. हयिपः हविया॑म् हविभ्यः स. महा अहोभ्याम् अहोभिः ५. हधिपः इविषोः हधिपाम् च. अह अहोभ्याम् अहोभ्यः स. इपिषि हरिपोः हविष्णु অযামু অষ্টম सं. हे हपिः अह. अहो अहाम् ५-धनुष (कमान) धन+उसि स. अहनि,अहि धनुषी धपि सं. हे अहः धनुषी धनूंषि सू. धनुषा श्-तार (तैसा) तस्येव धनुषाम् धनुभिः दृश्यत इति तत् च. धनुष .धनुषाम् धनुर्व्यः धनुाम् धनुर्यः ताशि धनुषोः दि. ताहा तारशी धनुपाम् ताशि स. धनुपि धनुषोः धनुप्यु शेपम्पुम्यत् द्वि. अहः " . अह . अहम प्र. धनु जि. धनुः प्र. साह तारशी पं. धनुषा प. धनुषा सं. ६धनुः च, फस्म त. सण च. सर्यसै फनि इपि.फाम् द्वितीयोऽध्यायः [१७] सर्यादिप्रिलिगीशम्द। काभ्याम् भ्यः अ-सर्य (सब) सर्यसपणे+अच् प. कस्मात् काभ्याम् फभ्य पुल्लिङ्ग कया केपाम् प्र. सर्यः सी सयें स. फस्मिन् फया केषु द्वि. सर्यम् सयौं सर्यान् (त्यदादिकों में सम्बोधन नहीं होता) सर्याभ्याम् सर्वः (नपुमक) फिम् सर्याभ्याम् सर्वेभ्यः प्र. किम् फे कानि पं. सर्यस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः वि. फिम् प. सर्यस्थ सर्पयोः सपाम् शेपम्पुम्वत् स. सर्यस्मिन् सर्वयोः सवधु (स्त्रीलिङ्ग) किम् सं. सर्व म. का का नपुंसक। के काः प्र. सर्यम् सप सवाणि तृ. फया काभ्याम् कामिः छि. सर्पम् सर्प सर्याणि काभ्याम् काभ्यः शेपम्पुम्यत् पं. फस्याः काभ्याम् काभ्यः सोलिन। प. कस्याः फयो कासाम् प्र. सी सर्ये सर्याः स. कस्याम् कयोः छि. सयें सर्वाः पुल्लिङ्ग-द् यद् या+अदि डिश स. सया सर्याभ्याम् सर्याभिः यो ये घ. सर्यस्यै सर्याभ्याम् सर्वाभ्यः यि.यम् यो यान् पं. सर्यस्याः सर्याभ्याम् सर्याभ्यः तृ. येन याभ्याम् प. सर्यस्याः सर्ययोः सर्यासाम् च. यस्मै स. सर्वस्याम् सर्पयोः सामु याभ्याम् येभ्यः सं. हे सर्षे प. यस्य ययोः येषाम् म्-किम् (कौन) कै शब्दे+डिमु |स. यस्मिन् ययोः येषु पुल्लिा नपुंसक-यद् के ये यानि कान ये यानि शेषम्पुम्वत् च. फस्यै कासु याभ्याम् येभ्यः पं. यस्मात् . प्र. यत् द्वि, कम् द्वि. यत् काभ्याम् कैः -पर- प्र. या द्वि. याम् च. पतस्मै एताभ्याम् पतेभ्यः भ दि. तम् 7. तेन [१८] व्यावहारिकसंस्कृतप्राधः । (स्रोलिङ्ग) यदू (जो) द-एतद् यिह] इण+आदितुर च याः प्र. पपः पतौ ये याः द्वि. पतम्पनम् एतौएनौ एतान् एनान् तृ. यया याभ्याम् यामिः त. एतेन एनेन एताभ्याम् एतैः च. यस्यै याभ्याम् याभ्या पं. यस्या. याभ्याम् याभ्यः पं. एतस्मात् एताभ्याम् एतेभ्यः यस्या ययोः यासाम् प. एतस्य एतयोपनयोः एतेपाम् स. यस्याम् ययोः । थालु सं. एतस्मिन् एतयोःएनया एतेषु दु-तद् (यह) तन्+भदि डिच्च (नपुंसक) एर [पुष्टिा] प्र. एतम् पने पतानि प्र. सः तो द्वि. एतत् एनत् पते पन एतानि एनानि, तो ताम् शेपम्पुम्बत् नाभ्याम् ः (स्त्रीलिङ्ग) तङ्क च. तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः पता: ताभ्याम् तेभ्यः पते प. तस्य तयो. तेराम् पनाम् पने पना: स. तस्मिन् तयोः तेपु पतया एसाभ्यां पताभिः [नपुंसक] पनया ते च. एतस्यै एताभ्यां एताभ्यः ते प. पतस्याः एताभ्यां पताभ्यः शेपम्पुम्वत् एतयोःएनयोः एतासाम् [प्रालि स. पतसाम् पतासु सा ते ताः म् इदम्, इदिपरमैश्वर्य, कमिनलोपश्च ते पुलिह-(यह) 7. तश ताभ्याम् तामिः प्र. अयम् । इमी च. तस्ये ताभ्याम् ताभ्यः द्वि. इमम् एनम् एमी पनी इमान्एनान् | ताभ्याम् ताभ्य: त. अनेनपनेन आभ्याम् पभिः तयोः तासाम् च, अस्मै आभ्याम् एन्यः स. तस्याम् तयोः तालु आभ्याम् एभ्यः पं. तस्मात् दि. पताम् तानि तानि दि. तदू " - दि. ताम् पं. तस्याः पं. अस्मात् प्र. असो दि. अमूम् " द्वि. इदम् " पं. अमुप्यार " - प. " द्वि, इमाम् च. यस्यै " " द्वितीयोऽध्यायः। प. अस्य अनयोः पनयोः एपाम् रोषम्पुम्यत् स. सस्मिन् स्त्रिीलिङ्ग नपुंसक-इदम् अम् अमूः श्मे इमानि इमे इमानि ४. अमुया अमूभ्यो अमूभिः शेपम्पुम्वत् च, अमुष्य भसूभ्या स्त्रीलिङ्ग-इदम् । प्र. इयम् अमुयो भम्पाम् स. अमुष्याम् इमे एने अमूयु इमाः एना पनाम् द युप्मद [तू] युपभजने+मदिक् नया आभ्याम् आभिः [प्र. त्वम् युवाम् यूयन् एनया त्वाम् द्वि युयाम् युष्मान् आभ्या त्वा घाम् चः पं. अस्याः तृ. त्यया युवाभ्याम् युष्माभिः अनयोः यासाम् एनयोः तुभ्यम् युग्मभ्यम् याम् चः स. अस्याम् मासु युवाभ्यां युप्मत् स्-दस् [वह] नवस्यते उत्क्षि- तव युययोः युप्माकम् प्यतेऽङ्गुछिर्यत्र, न+दस+फिप् वाम् घः -पुल्लिक- स. त्वयि युवयोः युप्मासु प्र. असी अम् अमी दु-असद मि) असूक्षेपण+मदिक् यम् अमून प्र. अहम् भावाम् चयम् त. अमुना माम् अस्मान च. अमुष्मै अमीभ्यः तृ० मया पं. अमुप्मात् भावाभ्याम् अस्माभिः अस्मभ्यम् अमुयोः अमीषाम् च० मह्यम् मे स. भमुस्मिन् अमीपु भावाभ्याम् अस्मत् नपुंसकलिङ्ग मम अस्माकम् प्र. सदर अम् अमूनि नी द्वि. स. मथि आवयोः अस्मासु पं. स्वत् द्वि. अमुम् अमूभ्याम् अमाभिः द्वि. " ना नः " प. समुप्य " पं. मत् माययोः " " तिभिः शेषपुम्बन् 1 [२०] व्यावहारिकसस्कृतप्रयोधः । सख्यायाचकशब्द पुं०-स्त्री-पुंसक अ-एक + कन् एकवचन तिनः श्रीणि [] -- [स्त्री] [नपुंमक] द्वि. श्रीन् एम् ४. त्रिभिः एकम् एकाम् च. विभ्यः त्रिचभ्यः ग पकन चयपुम्बत् प. प. प्रयाणाम् तिमणाम् प. पकस्मात् एकस्याः स. त्रिषु तिसषु पकस्य हेतिक सं. इत्रयः स. एकस्मिन् एकस्याम् -चतुर् (चार) ५०व० ई-दि दो] मि०प०सम्वरणे+डि अते याचनेउरम् पु०-स्त्री--नपुंसक पु-स्त्री०-नपुसक म. खो चत्वार चत्वारि द्वि. चतुरः वि. वाभ्याम् स्वाभ्याम् शेषपुंवत् ४. चतुर्भिः चतभिः शेपम्पुम्यत् च. चतुभ्यः चतभ्यः पं. पं. प. यो ययोः प. चतुर्णाम् चतरणाम् स. चतुषु -त्रि (तीन) बहु० ० तु+ट्रि स. हेचत्वारः हेचतवः तीनीलियोंमतुल्यः। | दि. " 11 " " " " " " पस्या न्ससन् (७) सप+तनिन् - प्र० प्र० सप्त न-पञ्च (५) स०पश्चल पचिपिस्तार+भनि सं० हेपन ए-षष्(६) पो+भमुकि १० पञ्चभिः प्र० पद चट च० पचभ्यः द्विक पश्चानाम् पभिः पष्णाम् पहसु द्वि० ." १. सप्तभिः " स. हेपर प. प० 1 स. सप्त तृतीयोऽध्यायः। [२१] प. सप्तानाम् पं. च, नयभ्य: तृ. दशभिः स. सप्तसु प. अष्टानाम् च. दशभ्यः स. अष्टसु अटासु प. नवानाम् पं. नभएन ८ अश्या.सं. अष्टी भए स. नवसु प. दशानाम सो+कनिन् +तु -नवम् (९) नु+ सं. हेनय स. दास म. अष्टी, अष्ट अनि . -दशन् १०/सं. हेदश छि. नय दंश+कनिन् त. अभिः अष्टाभिः वि.. च. अपभ्यः अष्टाभ्यः तू. नवभिः द्वि. 1 अव्ययार्थमदर्शकस्तृतीयोऽध्यायः । अध्यय। अर्थ। अव्यय। अर्थ। अव्यय । अर्थ। हेतौ निमित्ते সদ্ধাহই अद्धा स्फुटावधारणयाः सामि अर्धजुगुप्सितयोः यत् तुल्ये सना, मना, सनत्, नित्य स्वर स्वर्गेपरलोकच दिवा दिवसे अन्तर मध्ये रात्री निशि प्रातर् प्रत्यूपे सायम् निशामुखे पुनर् अपथमेविशेपेच चिरम् बहुकाले सन्तर अन्तर्धाने उडुस् महति अल्प ईपत् नीचस् अल्पे जोपम् सुलेमौनेच शनैस् क्रियामान्धे तूष्णीम् मौने अधक् सत्यवियोगशी- चहिस्, घसामीप्यलाघवेषु अवस् ऋते वर्जने समया समीपे मध्येच युगपत् एफफाले निकपा अस्तिके आरात् दूरसमीपयोः स्वयम् आत्मना पृथक् भिन्ने वृथा व्यर्थ अतीतेऽन्हि नक्तम् रा? भ्यस् , अनागतेऽन्हि नन् निषेधे पाछ सनात् उपधा भेदे तिरस् अन्ती,तिर्यगर्थे परिभवे च अन्तरा मध्ये, विनार्थेच अन्तरेण वर्जने ज्योक् कालभूयस्त्वे, प्राणेशोधार्थ सम्प्रत्यर्थेच अर्थ। भुयः [२२] व्यायहारिकसंस्कृतप्रायः। अव्यय। बर्षा अव्यय। अर्थ। अध्यय। कम् धारिमूर्धनिन्दा- मियो, संयत् व सुपेषु मिथम् रहासहार्थयोः अयश्यं निधये शम् सुखे प्रायम् याहुल्ये रात्री सहसा आकरिसका मुहुस् पुनरर्थे ओम् अङ्गीकारे घिमर्शयोः प्रधाइफम् समानकाले नमणि च विना वर्जने प्रघाहिका ऊर्धाधे च मू पृथिव्याम् नाना बनेकविनायो: आर्यहलम् बलात्कारे अन्तरिक्ष स्वस्ति मङ्गले मभीक्ष्णम् पौन:पुन्ये सुष्टु प्रशंसायाम् स्वधा पितृदान साकंसासहाथै दुष्टु निरुटे थलं भूषणपस्याप्ति नमस् नतो पूजायाम् शक्तियारण हिरुक् वर्जन कुत्सितपदाच निपेधेपु धिक् निन्दाभसनयो अअसा तत्वशीघ्रार्थयोः घपद, भम् शैयेऽल्पे च यरम् ईपदुत्व औपट्, इविदर्दाने आम् अङ्गीकार सुदि शुक्लपक्ष धौपट प्रताम् ग्लानी कृष्णपक्ष अन्यत् अन्याय मशान् समानार्थे अस्त विनाश मस्ति प्रसिद्धी प्रतान् विस्तार स्थान युके सत्तायाम् च मा,माइ निषेधाशङ्कयोः मिथु द्वावित्यर्थ उपांशु अप्रकाशोधार- फोमम् स्थाच्छन् चं. समुथयान्यांचं परहस्ययो प्रकामम् अतिशय येतरेतरयोग क्षमा क्षान्ती भूयः पुनरर्थे समाहारेषु विहायता वियदर्थे साम्प्रत ज्याय्य विकल्प दोपा - रात्री परम् किन्त्यर्थे प्रसिद्धी मृपा, साक्षात् प्रत्यक्ष अह पितथे पूजायाम् मिथ्या साचि तिर्यगर्थे अवधारणे मुधा व्यर्थ मड्क्षु. एवम् उक्तपरामर्श अविरते, चिरा भा नूनम् निश्चये तकेंच तीत भविष्यदामनेच ति,नरसा शश्वत् पौनःपुन्य नित्यसहाथैच चांद . घा पव मरि(गि) शै अव्यय अतीते पाद चतुर्थोऽध्यायः [२३] अव्यय अर्थ अर्थ अव्यय अर्थ कृपत् प्रणेप्रशंपायर्याच सलु निषेधयाफ्यालं. यथा अनादरे कुचित भूर्य/प्रशंसायांच कारनिश्चयेषु कथाच नेत् शहायां,प्रतिष-किल घार्ताया. पाट्याट धविचार मलीकेच अङ्ग हे सम्बोधन समुद्ययेषुच अयो,अथ महलानन्तरा-भोःअये चेत् चण यद्यर्थे हिंसामातिलो. कथित् इष्टपणे स्याधिकार म्यपादपूरणेषु नह प्रत्यारम्भे प्रतिहासमु (विपु नानायें हन्त हर्षे, विषादे, चयपु एकपदे अकस्मात् चाक्यारम्भ- कुरसायाम् ऽनुकम्पायाश्च पूरणेच आत: तोप माफिर, अह अहंकारे माकी, वर्जने संयोधनेऽधि- आहो- विकलो नकिम् वित् क्षेपेनिषेधेच सीम यावत् ..साकल्यावधि सतोभावे याक्यस्मरणयोः तापत् मानावधारणेपु सम्बोधनजुगु- गुकं अतिशय त्व विशेषवितर्कयो प्साविस्मयपु है,न्यै पित पादपूरणेयार्थच उऊए रे दाने अनादरेय सम्योधने -दिष्ट्या आनन्द तुम्हम् तुफारे, हुंकारे, पशु सम्यगर्थे भसेनेच इति साश्ये तधादि निदर्शने शुक: शैघ्ये अपत्ये इदानीमित्यर्थे स्त्रीमत्ययमदर्शफचतुर्थोऽध्यायः । यत्तद् तो अ आ अनुकं वित चटुवाद प्रियवाक्ये १ मायः विशेषण अकारान्त शन्दोका खोलिस यनाने केलिये 'आ'लगा देते है जैसे यशा, दीना, मलिना, चतुरा, चपला, प्रिया, पूर्या, अनुफला, म. मोहरा इत्यादि। (१) अज्ञापता ।

. । [२४] व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। प्रथम अवस्था पाल शब्दों से और गौर आदि शन्दी से"" प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिङ्ग बनता है जैसे कुमारी, किशोरी, तरणी इत्यादि गौरी, नदी, तटो, कदली, बदली, इत्यादि । ३ जाति वाचक शब्दों से, अजादि शब्दों को छोड़ "ई" प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिङ्ग यनता है जैसे सिंही, व्याघ्री, मृगो, हंसी, पी, पाह्मणी, रा- क्षसी, अजादि शब्द जैसे अजा पडका, मछिका, यतिका, शहा, अश्वा इत्यादि। ४ प्रकारान्त शन्दों से, स्वए, मात, दुहित, यातू, ननान्ड, लिए और चतर शन्दों को छोड़ " ६" प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिक यनता है जैसे दात्री, धात्री, की, हन्त्री, प्रसविधी इत्यादि । ५ नकारान्त संख्यावाचक शब्दों को छोड़ इन् प्रत्ययान्त शब्दों से "ई" लगाकर स्लीलिङ्ग यनता है जैसे कामिनी, भामिनी, मयापिनी, तपस्वि. मी इत्यादि । ६ अन् प्रत्ययान्त शब्दों से"ई" प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिङ्ग बमता है और उपधाफे अकालोप होजाता है जैसे राजन्-राशी, मनवन्-मघोनी इ०॥ ७ मत्, यत्, तयत्, यस् ईयस् प्रत्ययान्त शब्दोका स्त्रीलिङ्ग "ई" प्रत्य- 'य से बनता है जैसे धुद्धिमपी, दृश्वती, विदुषी, मेयसी ३० । ८ भघ, शर्य, रुद्र, मृड, इन्द्र, यरुण, ब्रह्मन् मातुल, क्षत्रिय, अर्थ, उपा- ध्याय, आचार्य शुदो से "धानी" लगाकर स्त्रीलिङ्ग बनता है जैसे भवानी इत्यादि । और कोष्ठान्तर्गत शन्दों का विकएप से "आ" प्रत्यय लगाकर भी स्त्रीलिङ्ग होता है जैसे क्षत्रियाणी क्षत्रिया। ९ भ्वादि. दिवादि, चुरादि गणी धातुओं के अनन्तर मत् (शह) प्रत्यय लगे शब्दों का स्त्रीलिङ्ग " लगाकर बनता है और त्, स्त, में जाता है जैसे भू-भवन्ती दिध-दीयन्ती, चुर-चोरयन्ती परन्तु तुदादि, कपादि, और अदादि गणी धातुओं के अनन्तर ह विकल्प में (२) “पयसि प्रथमे" .. पिगौरादिभ्यश्च (३) जातरस्त्रीविषयादयोप- भात् । (४) अन्नेभ्योङी । (५) अनेभ्योडी । (६) अनउपधालापिनोऽन्यत. रस्याम् । (७) उगितश्च । (८) इन्द्रवरुणमयशवंरुदमृडहिमारण्ययषययनमा- तुलाचार्याणामागुन । (२) उगितश्च । Arr V r " - पञ्चमोऽध्यायः । [२५] न्वं में बदल जाता है जैसे तुइ-तुदती, तुदन्ती फ्री-ग्रोणती, कोणन्ती, भी-भाती, भान्ती, । स्वत प्रत्ययान्त शन्दों में भी विकल्प से रूपहोते है जैसे करिष्यती, करिष्यन्ती। १० देहाइवाची शब्दों के साथ जय बहुप्रीहि समास हो तो विकल्प से प्रत्यय लगता है जैसे चन्द्रमुखी-खा, कृशाही-हा, कोफिलक- ण्ठी-ण्ठा इत्यादि परन्तु नख, मुख शब्दको लगाकर जहांव्यक्तिवाचक संक्षा बनती है या जहां अनवाची शब्दकी उपधा में संयुक्तवर्ण होता है, अथवा जिन अङ्गवाची शब्दों में दोसे अधिक स्वर हो वहां "" नहीं लगता जैसे शूर्पणखा, गौरमुखा; मृगनेत्रा, चारदशना । ११ इकारान्त शब्द विकल्प से "ई" प्रत्यय लगाकर स्त्रीलिङ्ग बनते है जैसे थेणि, श्रेणी, रजनिः-नी, कपिः-पी, मुनिःनी इत्यादि। १२ क्ति प्रत्ययान्त शब्द प्रायः भाययाचक संशा य स्त्रीलिक होते है जैसे मंतिः, गतिः स्थितिः। १३ उकारान्त संशा विशेषण शब्द विकल्प से "" लगकर स्त्रीलिङ्ग यनने है जैसे मृदुः सुट्टी, बहुः वहीं इत्यादि । १४ श्वशुर शब्द से श्वथू, युवन् से युधतिः, पति से पनी, सखि से सखी और समस्तपद में ऊरु शब्द को जहां किस से तुलना दी जाती है या जहां याम सहशफादि शब्द ऊरुसे पहिले होते हैं यहां स्त्रीलिङ्ग में दीर्घ ऊफार होजाता है जैसे रम्भोका, पामोरूः, शफोकः। अथ कारकमकरणप्रदर्शकः पञ्चमोऽध्यायः । . . बहवः १ प्रथमाविभाक्ति मोचे लिखे योगों में होती है क्रमानुसार उदारण देखो- १लिङ्ग में जैसे तटा, सटो, तटमा २ यचन में जैसे एकः द्वौ, परिमाण में जैसे द्रोणः भादकम् ४ सम्बोधन में जैसे हे कृष्णाइति, (१०) स्थानाचोपसर्जनादसंयोगोपधात्। (११) एदिकारादतिनः । (१३) पोतोगुणवचनात् " यदादिभ्यश्च । (१४) श्यारस्योकाराकारलोपथ" यूनस्तिः" सख्यशिश्वीति भापायाम्" अरुत्तरपदादीपम्ये' संहितशफलक्षण घामादेव। १ प्रातिपदिकार्थ लिङ्गवचनपरिमाणमात्रेमधमा ! (४) सम्योधनेच ।

[२६] व्यावहारिकसंस्थतप्रबोधः। साम्यतम् इत्यादि अन्ययों के योग में जैसे मनुष्याश्चन्द्र हिमांशुरिति घदन्ति, दुधात्मनां सङ्गः परित्यरतुं साम्प्रतम्। ६ जहां कातिड्प्रत्यय से उक्त हो जैसे रामोवदति: ७जहां कर्तृवाच्यका कर्म "च प्रत्यय से उक्त होये जैसे कृष्णन कसो हतः॥ २ द्वितीया विभक्ति नीचे लिखे योगों में होती है:- १ काल य मार्ग के अत्यन्त अर्थात निरवच्छिन्न (लगातार) संयोग में जैसे मासं व्याकरणमीतम् क्रोशं पर्वतः (मासंग्रोब्याप्य इत्यर्थः) २ धिक्, प्रति, अनु, अन्तरा, अन्तरेण, यावत्, मभितः, परितः, मर्यतः उभयतः, समया (पास या योच,) निकपा (पास) हा, ऋते, विनाके पोगों में जैसे देवदसंधि, दीनं प्रति दयोचिता सामिनमनुसरति भृत्या, अन्तरा त्यां मां हरिः, अन्तरेणाक्षिणी किंजीवितेन; पनं यावत्म- विशनि; अमितः, उभयतः प्रामनदी बहति, समया, निकण प्रामम् । हा. कृष्णामकम् । ऋते, पिना झानं न मुकिः ३ स्मृ धातुके योग में जैसे मातर स्मरति शिशुः ४ कर्मउत (जिसका असर फियापर पड़े वह उक्त होता है) न होने से जैसे कृष्णोयज मजति ५ उपरि जब दोबार आवे जैसे क्षेत्र मुपरि उपरि शलभाडयन्ते । ३ तृतीया विभक्ति नीचे लिखे योगों में होती है:-- सह, भरकम् , साईम्, समम्, (साथ) के योग में जैसे शिष्येण सहा- गतो गुरुः ॥२-सम, तुल्य, समान, सहा (यराघर) के योग में जैसे शिष्यं पुत्रेण सम पश्यति । ३ अलं, किम् , अर्थ, प्रयोजन ऊन, हीन, शम्य, विना, पृथक् के योग में जैसे अलंविधादेन, विरोधेनकिम्, अधः पालहेल घनेन प्रयोजन नास्ति, एकेन ऊनोविसः, विद्ययाहीन'; अहङ्कारण शून्यः, रागेण विनाधर । ४ हेत्यर्थ में जैसे कार्यत्येनशब्दो २कालाधनारत्यन्तसंयोग । उभसरंतसो कार्याधिगुपर्या दिपु निपु द्वितीया. नंडितान्त'ततोऽन्यत्रापि सश्यते' अभितःपरितःसमयानिकपाहाप्रति योगेऽपि । अन्तराऽन्तरणयुन्ने 1 अत्यारादितरदिशन्दाञ्चूत्तरपदाजा- हिंयुक्त । पृधविनानानाभिस्तृतीयान्यतरस्याम् ३१ सहयुक्त प्रधाने २ पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्या, ४ हतोयनायिकारः। फर्वकरणयोस्तृतीया । ८प्रमादिभ्य उपसंपानम् ।

Fr पञ्चमोऽध्यायः [२७] नित्यः ५ जिस अङ्गसे प्राणीक अङ्गका अङ्गविकार लखजाय उस अङ्ग में जैसे अक्ष्णाकाणः कर्णेनवधिरः ६ कर्ता और करण जव उक्त नहीं जैसे रामेणयाणेन रावणाहतः ७ तृप्त्यर्थक शब्दों के योग में जैसे भोजनन तृप्तः ८ प्रकृति इत्यादि शब्दोंके योग में जैसे प्रत्या चारः जात्यावा- मणः ९ तव्य' अनीय, यत् के योग में (यष्टीभीहोतीहै) जैसे चन्द्र- स्वया (तय) द्रष्टव्यः । ४ चतुर्थी विभक्ति नीचे लिसे योगों में होती है:- १ दानपात्र में जैसे राजा विनायधनंददाति; २ तादी (उसी अर्थ) में जसे गोविन्दलदा कथनाय प्रवृत्तोऽभूत् ३ नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, 'अलम्, घपट् के योग में जैसे गुरुभ्योनमः, राशेस्वस्ति, रुद्राय स्वाहा, पितृभ्यःस्वधा, अलं मल्लोमल्लाय, इन्द्रायवपद् ४ निमित्त अर्थ सूचन फरने में जैसे अध्ययन शानाय भयति; ५ हित, सुख प्रभवति और सम- के योग में जैसे पुत्रायहितम्, शिष्यायसुखम्, शूरःसमर्थः प्रभवति वा समामाय ६ तुम् प्रत्यय के अर्थ में द्वितीयाकी जगह चतुर्थी होती है जैसे जलाय नदीं गच्छति जलमानेतुमित्यर्थः; ७ फूध दुइ ईर्षा, असूया. र्थक धातुओं के योग में जैसे फराय कुध्यति, गुणवते असूयति; ८ रु व्यर्थक धातु के योग में जैसे हरयेरोचते भक्तिः ९ धारयतिके प्रयोग में उत्तमर्ण (साहकार) में देघदत्तः रुद्रदत्ताय शतं धारयति । ५ पञ्चमी विभक्ति नीचे लिखे योगों में होती है:--. १ विश्लेष (विभाग) की अवधि में जैसे वृक्षात्पत्राणिपतन्ति; २ ल्यप् प्रत्ययका जहां लुस अर्थ हो जैसे आसनात्प्रेक्षते (आसने उपविश्येत्यर्थः) ३ तुलना में धनाद्विघागरीयसी । भय और प्राणार्थक धातुओं के भय ४१ दानस्य कर्मणा यमभिप्रेति स संमदानम्।२तायें चतुर्थी ३ नमः स्वस्ति- स्वाहास्वधाऽलंवपट्योगाच।४ ५हितयोगे च, ६क्लपिसम्पद्यमाने च ७ ६ फियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिमः। ७ मधदुहेप्यासूयार्थीनां यं प्रतिकोपः ८रुच्यर्थानां प्रीयमाणः ९धारेरुत्तमणः ५ १ धुवमपायेऽपादानम् २ ल्यम्लोपे कर्मण्याधिकरणेच ४भीत्रार्थानां भयहेतुः५ घारणार्थानां प्रीयमाणःस्पृहेरीप्सितः७अन्यारा- दितरतैदिक् सम्दामचूत्तरपदाजाहियुक्ते AnnArnm- - . - [२८] 'व्यावहारिकसंस्कृतप्राधः । हेतु में जैसे व्याघ्रायम्यति ५धारणार्थक धातुओं के योग में जैसे क्षेत्रा. द्रांवारयति स्पृह धानुकै योग में जैसे पुणेभ्यः स्पृहयति ७ अन्य, भि- घ, यहि आरात्,प्रभृति आरभ्य, इतर, पूर्वः, उत्तरः, प्राक्, अनन्तरम् ऋते, चिना, पृथा और हेतु में जैसे मिनाइन्य. भिन्नः प्रामादहिःआ. रावनात्। तहिनादारभ्य, प्रभृति घा, तमादितरोनकश्चित् नगरात्पूर्वः उत्तरोग, भोजनात्मा शयनादनन्तरम्। तेशानाभमुक्तिः, श्रमाद्विना नफिीचरफलति पुवारपृथक् भयारकम्पते । ६ पष्ठीनिम्नलिखित योगों में होती है:- १ सम्बन्ध में जैसे विन्दस्य पुस्तकम् २ हेतु शब्दके प्रयोग में जैसे फस्यहतारिद भोजनम् ; ३ स्मृ धातु के भी योग में से मातुः सरति; ४सम, तुल्य, समान, सदश एनके भी योग में जैसे किम् तव समो न कोऽस्ति; ५ तृप्त्यर्थक शब्दों के भी योग में जैसे अपांतृप्त. ६ मित्र - रण अर्थात् पहुनसी वस्तुओं में से एक के अलग करने में पष्ठी सप्तमी दोनों होती है जैसे कधीनांकयिषु या कालिदासः श्रेष्ठ: ७ स्वाम्यादि अर्थात् स्वामी, घर, अधिपति, दायाद साक्षी, प्रतिभू और प्रसूत इन फे योग में जैसे नराणां स्यामी इत्यादि ८ अनादर में पष्ठी सप्तमी दोनों होती है जैसे माता पित्रो रुरतोः प्रायाजोत्पुत्रा, ९ भदः, कुशल, आ. युष्य सुसहित इत्यादि शब्दों के योग में जैसे तव भद्र स्यात् । ७नीचे लिख योगों में सप्तमी विमति होती है। १ अधिकरण अर्थात् आधार में; वह आधार चार प्रकार का है भोप- पिक, सामापिक, अभिव्यापक, वैषयिक जैसे कटे शेते कुमारोसी, घटेगावः सुरते, तिलेपुविद्यते तैलं दिमहामृतंपरम् । २ निमित्ता- धाचफ शम्द से जैसे चम्मणिद्वीपिनहन्ति (चर्मनिमित्तमित्यर्थः), ३ सत्यर्थक अर्यात् जा एक क्रिया के काल से दूसरी क्रिया का समय लक्षित होता हो जैसे रवायत्तते स भागतः। ६१ पष्ठीरोपे २ षष्ठीहेतु प्रयोगे ३ षष्ठीरोपे ४ तुल्याँधेरतुलापमाभ्यां तृतीया ऽन्यतरस्थाम् ४ यतश्च निर्धारणम् ५स्वामीश्वराधिपति दापादसाक्षिप्रतिभूः प्रसूतेश्च ८पष्ठी घानादरे ९ चतुर्थी चाशिप्यायुज्यमनभद्रकुशलमुखाहितः ७ १माधायेऽधिकरणम् २ निमित्तात्फर्मयोगे ३ यस्य च भावन भावलक्षणम् [२९] पठोऽध्यायः। अथ समासमकरणमदर्शकपष्ठोऽध्यायः। समास छः प्रकार के हैं, १ तत्पुरुष, २ कर्मधारय, ३ पहुषीहि, ४ द्विगु, ५बन्छ, ६ अव्ययीभाव । अब प्रत्येक के लक्षण सोदाहरण और सघिप्रह (समास के अर्थ का जतानेघाला याक्य घिमह कहलाता है) लिखते हैं: १ तत्पुरुष उत्तरपदार्थ प्रधान, और आठ प्रकार का होता है जैसे प्रथमात- रपुरुप जैसे अर्ध पिप्पल्याः अर्धपिप्पली; द्वितीया त० जैसे प्रोमंगतः प्राम- गतः, तृतीया तक जैसे शड्युलयाखण्डः शकुलाखण्डः, चतुर्थी तक गुरदक्षिणा गुरुदक्षिणा; पञ्चमी त जैसे सिंहाभयं सिंहभयम् पठी त. जैसे कृष्णस्य भक्तः कृष्णभक्ता, सप्तमी त० जैसे फर्मणिकुंशलः फर्मपुश- ला;नन् त. जैसे न ब्राह्मणः अवाक्षणः, न अश्वः अनश्वः । २ फर्मधारय सात प्रकार का है जैसे १ विशेषण पूर्वपद जैसे रुष्णः चासो सर्पः रुष्णसर्पः, २ विशेष्य पूर्वपद जैसे गोपालवासीयाल: गोपालया- लः ३ विशेषणोभयपद जैसे शीतं च तदुष्णं च शीतोपणम् ४ उपमान- पूर्वपद जैसे मेधे इयश्यामः मेघश्यामः, ५ उपमानोत्तरपद जैसे पुरुषः ध्याप्रय पुरुषव्याघ्र सम्भावना पूर्वपद जैसे गुण इति धुद्धिः गुणयुधिः ७ अयधारण पूर्वपद जैसे अविद्येय शृखला अयिद्याला मायमपर लोपी जैसे शार्कप्रियः पाधियः शाकपार्थिवः । ३ याबोधि मन्य पदार्थ प्रधान होता है. यह सान प्रकार का है ! विपद जैसे चित्रोगाचो यस्यसः विगु गोपः मुक्त ओदनोयेसः भुकोदनोभूपः, २ पापद से अधिक उमतः अंसोयस्य सः, अधिकोनतांसः, ३ सहपूर्व पद जैसे सह पुत्रेण पर्वते इति सपुर ५ संख्योलर पर जैसे दर्शन - मीपे ये सन्ति ते उपदशा; ५ संख्योभय पद जैसे दो या त्रयो या मित्राः; (१) अर्द्ध नसकम् । (२) द्वितीया त्रित तीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापनः। (३) तृतीया सत्यतार्थन गुणयचनेन। (४) चतुर्थी तदर्थपलिहितसुसरक्षितः (५) पक्षमी भये । (६) पष्टी। (७) सप्तमी शौण्ड। (८) नम्। (१) विशेषणं विशेष्येण पालम् । (१०) उपमानानि सामान्यवंचनैः। (११) उपमितं व्यामा. दिभिः सामान्याप्रयोग। (१२) शाकपार्थिवादीनां सिमये उत्सरपदलोपस्योप- संख्यानम् । (१३) अनेकमन्यपदायें। (१४)तेनसहेतितुल्पयोगे । (१५)संरपयाड व्ययासन्नादूराधिफसंख्याः संण्येये। ३१ पदसमाहारे च । (४) चाथै छन् । [५] पितामात्रा ६भ्यगुर श्वधया। [३०] व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। ध्यत्तिहारलक्षण जैसे केरोप फेशेपुगृहीत्याइदं युद्धप्रवर्तते इति केशाशि ७ दिगन्तपललक्षण जैसे दक्षिणस्योः पूर्वस्याच दिशायदन्तरालं सा दक्षिणपूयी। ५ संख्यावाचफ-सान्द पूर्वक समास निगु.कहलाता है वह दो प्रकार का है १ एक यद्भायों जैसे प्रयाणां शहाणां समाहार: निश्कम, २ अनेकयगा- ची जैसे.सप्त च ते करयच सतपयः। ५ चाक द्वन्द्र उभयपदार्थ प्रधान होता है और यह तीन प्रकार का है इतरेतर द्वन्य जैसे राम कृष्णध रामकृष्णी, २. समादार दुग्द्ध जैसे हरि हरश्च गुरुथ हरिहरगुरु, पाणी व पादौ च पाणिपादम्। ३ एफ शेप मन्द्र जैसे माता च पिता च पितरी, धन गुरश्च यजुरी। ६ अव्यय पूर्यपद और पूर्वपदार्थप्रधान अध्ययीभाव होता है जैसे तट सटे प्रति अनुनटम् , क्रममनतिकम्य पतंते प्रतियथाफमम्। कुम्मस्यसमीप धतते इति उपकुम्भम् वस्तु ।' अर्थतद्धितःकरणपदकः सप्तमोऽध्यायः । १ अश, यण, आयनम् , इण, इकण, ईकण, ईयण, रायण, फा, फन् इत्यादि प्रत्यय " तस्यापत्यं", "तप्रभवः", "तस्पेदम्", "अस्यदेवता", "तं. तिमधीते घा","तेनप्रोक्तम्","तेनरुतम्","तप्रसाधुः","तत्रदेयम्', "तसादागतं", तमहति “अस्थपण्यम्","अस्य प्रहरणम्", "प्रयोजनमस्य , 'अस्य शीलं", "तं भधिहस्यकृतं", "तेनजीवति", "तस्य भावः' स्वार्थ में', "इस्चार्य में होते हैं क्रम से सविग्रह उदाहरण देखो जैसे रपणस्यापरयंपुमान रोपण प्राममयः प्राम्यः चन्द्रस्य इदं चान्द्रमा विष्णु रस्यदेवतायैष्णया व्याकरण घेति मधीते या चैयाकरणः प्रापिणा प्रोक आपम् मनसाशतमानसिकम् सभायांसाधुः सभ्यः, मासेदेयमासिकम्, पितुरागतं पैतृकम्। छेदमर्हतिछया, लयणमस्यपण्यं लायणिका, धनुरस्स प्रहरणं धानुकः यशः प्रयोजनमस्य यशस्यम्, तपोऽस्यशीलं तापस (२) तत्र तेनेदमिति सरूप। (२) दिड्नामान्यन्तराले । (३)तद्धितात्तिर- - - . . - ।

सप्तमोऽध्यायः [३१] राममधिकृत्यरुतं रामायणं; व्यवहारेणाजीवति व्यावहारिका, शिशोभीवः शैशयम्; चोरएघचौर, हस्योवृक्षः वृक्षकः । २ भावयाचफ संशा बनाने के लिये संशा व विशेषण शब्दों से त और स्व प्रत्यय लगाई जाती है जिनमें तान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग और त्यान्त नपुंसक होते हैं जैसे अमरस्य भावः अमरता, अमरत्वम्, लघुता, लघुत्वम् । ३ तुल्यार्थद्योतन करने के लिये संज्ञा शब्दों से यत् प्रत्यय लगाते हैं और घे शब्द अव्ययों में गणना किये जाते हैं जैसे चन्द्रेण तुल्यं (इय) चन्द्रवत् । ४ अस्त्यर्थ में 'मत' प्रत्यय होता है परन्तु जिन शब्दों के अन्त में, अन्तिम अ,आ या छ, अ, ण न को छोड़ कोई स्पर्स वर्ण हो या उपधाभूत अ, आ या म होवे तो मत् के स्थान में वत् हो जाता है जैसे मतिर्विद्यतेऽस्य सः मतिमान, अंशुमान; शानयत्, दयावत्, विद्युत्यत् आत्मयत्, भास्वत्, लक्ष्मीयत् । ५ कहीं२ऐसी संभा जिनके अन्त में भया आ हो और जिनमें एक से भ. धिक स्थर हो तो यहां विकल्प से यत् और इन भी होते है जैसे शान से ज्ञानवत्, शानिन् : मालावत, मालिन् । ६ अस् प्रत्ययान्त शब्द और सर, मेधा, माया शब्दों में उपरोक्त अर्थ में विन् और पत् दोनों प्रत्यय विकल्प से होते है जैसे तेजस्-तेजस्विन् , तेज- स्वत्नज-स्त्रग्बन् , नग्यत । ७ जातार्थ में संशा शब्द से इतन् प्रत्यय होता है जैसे पिपासा जाता अस्य सापिपासितः क्षुधितः फलितः पुष्पितः । - उत्कर्ष वा प्रफपधद्योतन करने के लिये विशेषण शब्दों से तर, तम, ईय- स्, इष्ट प्रत्यय लगाई जाती हैं जैसे गुरु-गुरुतरः, गुरुतमा गुरु-गरीयान् , गरिधान प्रत्ययों के साथ बहुधा प्रकृति के रूप में बहुत भेद हो जाता है इस लिये दूसरे व्याकरणों से पूरा २ अभ्यास कर लेना चाहिये जैसे गतिशयेन प्रशस्थः श्रेयान, श्रेष्ठः, वृद्धा, ज्यायान् , ज्येष्ठः इत्यादि । ९ भायवाचक संज्ञा पनाने के लिये विशेषण शब्दों स.इमम् प्रत्यय लगता है- और इमन् प्रत्ययान्त शव शयः पुंलिग होते हैं जैसे गुरोभायः गरिमा, लघिमा, यहु-भूमा प्रिय से मेमा इत्यादि । १० संख्यावाचक शब्दों से मकारार्थ.मे.धा प्रत्यय, और कुछ सर्व नाम M [३२] व्यावहारिकसंस्कृतमयोधः। शादी से इसी अध में "पा प्रापय लगाते हैं और दोनों प्रकार के सिर शम्द अध्यय होते है जस एकाविधा एकधा, निधा, विधा इस्यापि भार भन्येन प्रकारण अन्यथा, उभयथा, सर्वथा इत्यादि। १५ पञ्चमी अर्थ में तस और सप्तमो अर्थ में "प्रत्यय लगकर तदन्त शस्द. मव्यय होते हैं जैसे प्रामादितिमामतः सस्मिन्निति सर्वत्र, करिमत्रिति- कुत्रत्यादि। १२ पूर्व, अर्म, उपरि, अधम् और समय सूचक भव्ययों से भवार्य में "सन प्रत्यय होता है जैसे पूर्व भवः पूर्वतनः अद्यभवः अपतनः इत्यादि । १३ किम शाद के सिद्ध रूपों में अनिश्चयत्व दिखाने के लिये "चित्" और धन प्रस्थय लगाते हैं अस कश्चित् कौचित् कचित् फधन, कौचन केवन इत्यादि भी अभ्यपही है। १४ अधीन भारतस्य (सम्पूर्णता) अर्थ में "सात् प्रत्यय होता है जमे राशः अधीने राजसात्। सबै भस्म भस्मसात् इत्यादि । १५ किम् , यत् और तत् शब्दों से दो में से एक के निधारण करने में उतर और यहुनों में से एक के निर्धारण करने में "एतम” प्रत्यय लगाते हैं जैसे पतग भवत: नैयापिका, फतमो भवतां पयाकरणः। अप धातुरूपमदर्शकोऽयमोऽध्यायः । अत्यरत (यादिगणः) धातुसार। (धातु)भूसत्तायाम् (होना) खनु अवदारण मित्यरासंम्रम जपजापव्यक्तायांवाचि (खोदना) (जल्दी क.) (चौलना) लट् (वर्तमान) भवति खनति स्वरते जपनि, जलपति लइ (अनयतनभूत) अभयत् अखनत् अजपत, अजलपत् लिद (विधि) भवेन् खनत चौत जपेत्, जपत् लिङ् (माशी) भूयात् खायात्, खन्यात स्वारपोष्ट लिए (परोक्षभून) वभूष चखान तत्वरे अजाप, जमल्प जुद् (अन.भविष्य) भविता खनिता स्वरिता जपिता, जल्पिता ३ (सामान्यभूत) अभूत् अपानात्, अत्यरिए अजापीत्, अजल्पीत् भखनीत् अष्टमोऽध्यायः [३३] ल(फियातिपत्ति) असनियत् अत्वरिप्यत अज्ञपिण्यस् , अभविष्यत् अजल्पिश्यत् लद (सामान्यमविप्य) सनियति त्वरिप्यतेजपिप्यति,जमिप्यति भविष्यति लोट् (माक्षा) भवतु ग्गनतु त्वरताम् जपतु, जल्पतु गिजन्त (प्रेरणार्थक) खानयति स्वरयति-ते जापयति, जल्पयति माययति * सनन्त (इच्छार्थक) पुभूपत्ति चिनिपति तित्यरिपति जिनपिपति,जिजल्पिपति यडन्त (अतिशयार्थक) चाम्यते तात्ययते जसप्यते, जाजलप्यते घोभूयते कर्मवाच्य घामाययाच्य सायते,सन्यते त्वर्यते जप्यते, जरप्यते भूयते दात शान भयन् खनन् स्वरमाण जपन्, जल्पन् ता, क्तवतु भूतः भूतवान् तूर्ण:तूपवान् जपिता,जल्पित अपि- सातवान् वरित त्वरि तवान् ,जल्पितवान् तसन् स्फा (पूर्वकालिका भूत्वा खात्या,खनित्या त्वरित्या जपित्या, जल्पित्या संज्ञा भावः भवनम् भूतिः खननम् त्वरणम् जपा,जपनम, जल्पनम् (धातु) जिजये क्षिक्षये चर (लागति, दंशदशने (जीतना) (नाशहा) भक्षणयोः (काटना) राजुदासा (शोभितही) जयति क्षयति चरति दशति লাব, লর अजयत् अक्षयत् अचरत् अदशत् अराजत्, अराजत लिङ्ग जयेत् क्षयेत् चरेत् दशेत् राजेन्, राजत लिङ्ग जीयात् क्षीयात् चर्यात् दश्यात् राज्यात्, राजिपीट लिट् जिगाय चिक्षाय चचार ददंश यातम् , रराज, रेजे * प्रायः सय धातु प्रेणार्थंक में उभयपदी होती हैं। परस्मैपदी धातुर से शत और भात्मनेपदी धातुओं से शान होता है। * सकर्मक धातुओं से कमवाय असे भाषयाच्य बनता है।

. स्काच जित्वा चरित्या दष्ट्वा जयः [३४] व्यावदारिफसंस्कृतमयोधः। जेता क्षता चरिता दष्टा राजितासिं,पराजिताल, अपीत् थापीत् अचारीत् अदक्षिीत् थराजीत्, अराजिष्ट अजयत् अक्षयत् अचरिष्यत् यदक्ष्य राजिप्यत् अराजिप्यत अप्यति क्षिष्यति चरिप्यांत दक्ष्यति राजिप्यति, राजिष्यते लोद जयतु क्षयतु घरतु दशतु राजतु, राजक्षाम् णिजन्त जाययत्ति क्षाययति चारयति दिदायति राजयत्ति, राजयते सनन्त जिगीषति चिक्षीपति चिचरिपति दिदक्षति रिराषिपति,रिराजिपत यडन्त जेजीयत वक्षोयते चन्चूयंत दंदश्यते सराप्यते कर्मधाच्य जीयते क्षीयते चर्यते दक्ष्यते राज्यते जयन् क्षयन् चरन् दशन् राजमानः जितः क्षीणः चरितः दः क्त चावतु जितवान् । क्षीणवान् चरितवान् दएचान् राजितः, राजितवान् क्षित्वा राजित्या सहा क्षयः चरणम् दशनम् राजनम् चलनम् इशिरप्रेक्षण पत्र पतन मिक्षयाचने याच यामायां (देखेना) (गिरना) (मांगना) (मांगना) पत्यति पतति भिक्षते याचीत, याचते लड् थपश्यत् अपतत् यभिक्षत अयचित् अयाचत लिङ् पश्येत् पतत् मिक्षत याचेत्, याचेत लिङ दृश्यात् पस्यात् भिक्षिपीए याध्यात्, याचिपोष्ट पपात सिमिक्ष ययाच, ययाचे पतिता भिक्षिता याचितासि,याचितास। अद्राक्षीत् | अपतत् अभिक्षिष्ठ थयाचीत्. भयाचिष्ट अद्रक्ष्यत् । अपतिप्यत् अभिक्षिप्यत ययाचियत् अया. चिायत द्रस्यति पतिष्यति भिक्षिप्यते । याचियति-ते लोट पश्यतु पततु मिक्षताम् याचतु, याचताम् णिजन्त दर्शयति पातयति भिक्षयति याचयति-ते सप्तन्त दिक्षति | पिम्मति विभिक्षिपते यियाचिपति-ते इस कार में प्रायः सब उमय पदी भातुओं में रूप भेद दिखाने के लिये मध्यम पुरुष एक यचन प्रयोग किया है।

अष्टमोऽध्यायः। [३५] यडन्त दरीहश्यते । पनीपत्यते बभिक्ष्यते यायाच्यते फर्मवाच्य दृश्यते पत्यते भिक्ष्यते याच्यते शत० पश्यन् पतन् भिक्षमानः याचन्याचमानः तक्तवतु, ६, पतितः-घान् भिक्षितः-तवान् याचितः, तयान् हटवान् स्काच दृष्ट्या पतित्वा भिक्षित्वा याचित्या संज्ञा दृष्टिः,दर्शनम् | पतनम् भिक्षणं, भिक्षा याचनम्, यात्रा पद् व्यक्तायाम्बाचि मार दीप्ती यती प्रयो पढ़ना (रोशन हो०) (फोशिश करना) रमुफ्रोडायाम् (खेलना) पठति भासते यतते रमते अपठत् अभासत अयतत भरमत लिङ् पठेत् भासत यतेत रमेत लिडू पट्यास् मासिपीट यतिपात रंसी लिद पपाठ वभासे येते पठिता भासिता यतिता अपाठीत् अभासिए अयतिए भरस्त अपठिप्यत् अभासियत् अयतिप्यत अरन्स्यत पठिष्यति भासिष्यते यतिप्यते रंस्यते लो पठतु भासताम् यतताम् रमताम् णिअन्त पाठयति भासयति-ते यातयति रमयति सन्नन्त पिपठिपति घिमासते यियतिपते रिरंसति यडन्त पापव्यते घामास्यते यायत्यते रंरम्यते कर्मयाच्य पठ्यते भास्यते यत्यते रम्यते शत पठन् भासमानः यतमानः रममाणः ता,क्तियतु पठितः भासितः, तवान् यत्तः, यत्तवान् । रतः, रतवान् पठितवान स्काथ् पठित्या भासित्या यतित्या रस्त्या संशा पठनम् भासनम्, भासः यतनम् , यन: रमणम्, रतिः लिड् थलब्ध [३६] ग्यायहारिकसंस्थतप्राधा । हुलभषप्राप्ती यदग्यक्तायां दृय कम्पने शमु स्तुती म्याद आम्पादन [पानो] . याचियोलना) [कांपना] [तारीफकरना] मे वचनो लभते घदति यंपते सति स्वादते अलभत भयदत् अयेपत अशंसत् अस्वादत लभेत यदेत् घेपेत शंसत् स्वादेत लिङ् लप्सीए उचात् पिपोष्ट शंस्यात् स्थापिष्ट लिट् लेम उचाद विषेप शशंस सस्वादे चदिता पपिता पाभिता स्वादिता अय[वादीस् भयपिष्ट अशंसीद अस्वादिष्ट अलप्स्यत अयदिग्यत् अपिण्यत अशंसिप्यत् अस्यादिप्यत लप्स्यते पदिष्यति पिज्यते सिष्यति । स्वादिष्यते लोट् लभताम् घदतु पताम् शंसतु स्यादताम् णिजन्त लाभयति घादयति घेपयति शंसयति स्यादपति सषन्त लिप्तते वियदिपत्ति | विपिपते शिशसिपति सिस्थादिपते पडन्त लालभ्यते यावयते येप्यते शाशस्यते सास्वायते कर्मवाच्य लभ्यते उद्यते प्यते হত্যের स्थाधते मातृ लभमान. वदन् घेपमान शंसन् स्वादमानः सक्तयतु, लब्धा, घान् ] उदितः यान् पित' यान शस्त शस्त- स्वादितः घान् स्वादितवान् उदित्वा, चा-पित्या शसित्वा,गस्या स्वादिरवा दित्वा संझा लाभ: लन्धिः यदनम् ,याद वेपनम्, थेपथु शसनम्, स्वादन स्वाद लभनम् शस्ताशस्ति पस निवासे गद् अध्यक्त |शप आक्रोश छागातनिवृत्ती स्मृस्मरणे [रहना] शिन्दे] दुराकहना [ठहरना]पाद करना) चसति मदति शपति तिष्ठति स्मरति अवसत् अनदत् अशपत् अतिष्ठत् लिड् पसेत् अस्मात् नदेत् पत् स्मरेत् उपयार नद्यात् राप्यात् स्थयात स्मात् ननाद शशाप सस्मार नदिता स्थाता स्मता स्का लम्ध्या तिष्ठे लिए उवास तस्थौ घस्ता नदत अएमोऽध्यायः! [३७] यवात्सीत् अननिादीत् अशाप्सीत् | अस्थात् अस्मार्षीत् अवत्स्यत् अनदिप्यत् | अशप्स्यत् अस्थास्यत् अमरिष्यत् वत्स्यति नदिप्यति शप्स्यति स्थास्थति स्मरिष्यति लोट घसतु शपतु तिष्ठतु स्मरतु णिजन्त चासयति नादयति शापयति स्थापयति स्मरयति सनन्त विवत्सति निनदिपति शिशप्सति तिष्ठासति सुस्म्र्पते यडन्त वावस्यते नानद्यते शाशप्यते तेष्ठीयते सास्मयते फ०या० उप्यते नद्यते शप्यते स्थीयते स्मयते शत० घसन् नदन् तिष्ठन् स्मरन् क्तकपतु उपितः, धान् नदितः वान् शप्तशतवान् स्थितः, घान् स्मृतः, वान पत्वाच् । उपित्वा नदित्वा शप्त्या स्थित्वा स्मृत्वा संज्ञा उष्टि', वासः नदतम् नादः शपनम् शाप स्थानम्, स्मृतिः स्म घसनम् स्थितिः रणम् गुपू रक्षणे घ्रागन्धोपा डीड्वहाय (सहना) रिक्षाक०] दने[सूधना]] [जाना] सांगतो लट् सहते गोपायति जिति गच्छति जयते अाहत अगोपायत् | अजिघ्रत् अगच्छत् अडयत लिङ् सहेत गोपायेत् जित् गच्छेत् डयेत सहिपोष्ट गुण्यात् गो- घायात्, प्रे गम्यात् इयिपीट पाप्यात् यात् गोपाया- जनौ जगाम डिच्च पह मर्पणे गम्लु गतौ लिडू कार ई. प्यत् ई. सहिता,सोड़ा गोपायिता, ध्राता गन्ता डयिता गोता. असहिष्ट अगोप्सीत्, अघ्रासीत्- | अगमत् अडयिष्ठ अगोपीत्, अप्रात् असहिष्यत अगोपायि अघ्रास्यत्यगमिप्यत् 1 अडयिष्यत सहिष्यते गोपायिव्यतिई प्रास्यति गमिष्यति अयिप्यते लोद सहताम् गोपायतु जितु गच्छतु डयताम् णिजन्त) साहयते गोपाययतिघ्रापयति गमयति डाययति सन्नन्त सिसहिपते जुगोपायिपति जिघ्रासति जिगमिपति | डियियते यडन्त सासद्यते लेघीयते जङ्गम्यते डेडीयते कर्मयाच्य सघते गोपाय्यते गम्यते डीयते *"यास मोर वभूव भीचकार के तुल्य लग सक्ता है परतु फेवल पर-सीपद में। ३२ , क्षायां। [३८] व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोधः। शत गोपायन् गच्छन् सहमान: जिघ्रन् डयमानः डीना, वान् क्त,कवतु सोढः, धान् । गुप्तः, गोपा- प्रातः,मात गतः, धान् यितःई. वान् गोपायित्वाई प्रात्वा गत्वा क्वान् सहित्वा डायित्वा सहनम् गोपायनम्, घ्राणम् गमनम्, गतिः डयनम् गोपनम् इसे इसने माशब्दाग्निसं पा-पाने | नयनसन्त शिक्षशि. हिंसना] योगयो धोकना [पीना] "[रणयो] हसति धमति पिवति तरति शिक्षते अहसत् अधमत् अपिवत् अतरत् अशिक्षत लिङ् हसत् धमेत् पित् तरेत् शिक्षेत हस्यात् ध्मेयात्मा-पैयात् तीर्यात् शिक्षिपीट यात् जहास दध्मौ पपी ततार शिशिक्षे हसिता माता पाता तरि []ता शिक्षिता भहसीत् अमासीत् अपात् अतारीत् अशिक्षित महसिष्यत् । अध्मास्यत् अपास्यत् । अतरिरी अशिक्षिप्यत प्यत् हसिष्यति ध्मास्यति पास्यति तरि[रीज्यति शिक्षिप्यते धमतु पिवतु शिक्षताम् णिजन्त हासयति एमापयति पाययति तारयति शिक्षयति सन्नन्त | जिहसिषति | दिध्मासतिपिपासति | तितार्पति ई. शिशिक्षिपते यड़न्त जाहस्यते देध्मीयते पेपीयते तेतीयते शेशिश्यते क०चा हस्यते ध्मायते पीयते तीर्यते शिक्ष्यते हसन् धमन् पिधन् शिक्षमाणः तितपत हसितःचान् ! ध्माता, पान् पीतः,पान् तीर्ण:-धान् शिक्षितवान् पत्याच् । हसित्वा ध्मारवा पीत्या तात्वी शिक्षित्वा संज्ञा इसनम्, हासा ध्मानम् पानम् तरणम् शिक्षा यमुजदिरणे| ह हरणे धावगत्ति शुद्ध्योः [मोकना हे-आकारणे (दीदना) (घुलाना) घमनि हरति-ते धावति, धावते इयति, यते थचमत् थहरत्-त अधावत् अधावत | अह्वयत्, अह्वयत लि चमेन् हरेत् त धोयत्, धायेत हयेत्, हयेत शिक्षणम्, कधा० यम्यते अष्टमोऽध्यायः। [३९] चम्यात् हियात् हपीट धाव्यात् धाविषीष्ट यार, हासीष्ट चवाम जहार-जहे दधाव, दधाये जुहाव जुहुचे घमिता हासि-से धाषितासि, से हातासि, हातासे अवमीत् अहापात्, अधावीत्, विष्ट अहत,अद्वत, अह्वास्त अहत अवमिष्यत् | अहरिष्यत् त अधावियत्, त अहास्यत्,त घमिप्यति हरिष्यति-ते । धाविष्यति, ते हास्यति, ते लोद घमतु हरतु-ताम् धावतु, ताम् इयतु, हयताम् णिजन्त घा[व]मयति हारयति इ० धावयति, ते हाययति, ते सनन्त विवामिपति | जिहीपति दिधाविपति, जुलपति यडन्त | चंचम्यते जेहीयते दाधाव्यते आह्वायते द्वियते धाव्यते हूयते शत० घमन् हरन्, माण: धावन्, मानः हृयन्-मान: क्त,क्तवतु पान्तः, वान् हतः, हृतवान् धापिताधावितयान इतः, तवान् पत्वा यांत्वा,यमित्या हत्या धायित्वा हत्वा संज्ञा घमनम् हरणम् धावनम् आह्वानम् मिह सेचनेणी प्रापणे टुवा पीजतन्तु- [पेशावक.] पञ् (पाके) पकाना (पाना) सन्ताने (योना) मेहति नयति-त वपति-ते पचति-ते अमेहत् अनयत्-त अवपत्-त अपचत्-त लिङ् मेहेत् नयेत्, त अपेत्-त पचेत्-त लिङ् मिहात् नीयात्,नेपीष्ट उपयात्, चप्सीप्ट पच्यात्, पक्षाट लिट् मिमेह निनाय,निन्ये उवाप, ऊपे पपाच, पेच मेढा नेतासि से यतासि-से पक्कासि से अमिक्षत् अनपीत् अनेष्ट अवाप्सीत् , अवप्त अपाक्षीत् , अपक्त अमेष्यत् अनेष्यत्-त अवप्स्यत्त अपक्ष्यत्-त मेश्यति नेष्यति-ते चप्स्यति-ते पक्ष्यति-ते लोद नयतु, ताम् । वपतु-ताम् पचतु-ताम् णिजन्त मेहयति नाययति-ते यापयति-ते पाचयति-ते सनन्त मिमिक्षति निनीपति ते वियप्सति-ते पिपक्षति-ते यडन्त मेमियते नेनीयते पाचप्यते पापच्यते क.चा० मिझते मीयते उपयते पच्यते शतू० मेहन् नयन्-मानः वपन्,वपमानः पचन, पचमानः तक्तवतु मीढा, पान् नीतः चान् उत, वान् पक्का, पक्तवान् कत्याच मावा + . लिडू [४०] प्यावहारिकसस्टतप्रयोधः। नात्या उप्त्या पपत्या संज्ञा मेहनम् नयन, नीतिः | घपनम् पचनम्, पाका से सेवायाम् पदि मभिवादन यज देवपूजादी लन लमायां (सवा करना) स्तुत्यो यजति, ते सवते लज्जत यन्दते लडू अलजत श्रयजत्-त असेयत अपन्दत लिड् यजेत्-त सेवेत लजत चन्दत ज्यात्-यक्षीष्ट सेपिषीष्ट लजिपीट घन्दिपीए याज, जे सिपेच ललजे क्वन्द यथासि-से सचिता लजिता धन्दिता भयाक्षीत्, अयष्ट असेविट अलीजष्ट थवन्दिर अयक्ष्यत्-त अमेवियत चलमिप्यत अयन्दिप्यत यक्ष्यति-ते सविष्यते लाजप्यते घन्दिप्यते लोर यजतु-ताम् सेवताम् लज्जताम् यन्दताम् णिजन्त याजयति-त सवयति-ते | लजयति वन्दयति-ते सन्नन्त थियक्षति-ते सिविपते लिलजिपते विघन्दिपते यडन्त | यायज्यते सेसेन्यते लालज्यते चावन्द्यते | कन्चाइज्यते सेव्यते लज्जयते धन्यते शत् यजन्, मानः सेवमानः लजमानः चन्दमान: क्त,क्तवत, इए', यान् सेवितः-धान् लग्जितः, घान् घन्दिता, वान् पत्याच्या सवित्वा लज्जित्वा चन्दित्या यजनम्, सेवनम्, सेवा लज्जा चन्दनम् धूंवर्धने (बढ़ना) | गैशब्दे(गाना) | शकि शहायां (साझा करना) (खुदाहोना) वर्धते गायति शहते मोदते अयर्धत अगायत् अशङ्कत यमोदत लिडू घर्धेत गायेत् शहेत मोदेत पधिपोष्ट गेयात् शविपरीट मोदिषीष्ट लिट् चवृधे मुमुदे घर्धिता गाता शविता मोदिता भवृधत्, अवर्धिष्ट अगासीत् অয়ার্ক भवस्य॑त, अवृधि अगास्यत् अशविष्यत अमोदिष्यत पर्यते, घधिप्यते । गास्यति शङ्किप्यते मोदिभ्यते जगी রাষ্ট্র अमोदिष्ट मा माने अष्टमोऽध्यायः। ६४१ ] लोट वर्धताम् गायतु शङ्कताम् मोदताम् णिजन्त धर्धयति-ते गापयति-ते । शवयति-ते मोदयति समन्त घियर्धिपते विवृत्सते जिगासति शिशङ्कपते मुमु (मो)दिपते यङन्त | परीवृध्यते जेगीयते शाशझ्यते मोमुद्यते कन्वा वृध्यते गीयते शक्यते मुद्यत शत० वर्धमानः गायन् शङ्कमानः मोदमानः तक्तवतु वृद्धा, वान् गीतम् शङ्किता, चान् मु(मोदितम् वान् पत्याच धर्धित्वा, वृद्ध्या गारवा शावित्वा मु (मो) दित्वा संशा वर्धनम्, वृद्धिः गानम् शङ्का मोदनम्, मोदः |णिदि कुत्सायाम् वृतु पर्तने अदादिगणः अद (निन्दाक०) (वर्तना) भक्षणे (समाना) निन्दति धर्तते अत्ति माति अनिन्दत् अवर्तत आदत् अमात् लिङ् नन्देत् चर्तत अधात् मायात् लिंङ् निन्द्यात् घर्तिपीट अद्यात् मेयात् लिट् निनिन्द यवृते आद, जयास ममी लुर निन्दिता वर्तिता अत्ता माता अनिन्दीत् अवर्तिष्ट अवृतत, अघसत् अमासीत् अनिन्दिप्यत अवर्ति(स्य)प्यत आत्स्यत् अमास्यत् निन्दिष्यति वर्ति (स्य)प्यते । अत्स्यति मास्यति लोट चर्ततात् अत्तु [णिजन्त निन्दयति धर्तयते-ति आदयति मापयति समन्त निनिन्दिपति विवर्तिपते विजियत्सति मित्सति गृत्सते यडन्त | नेनिन्धते घरीवृत्यते ममीयते कर्म० निन्धते घृत्यते अद्यते मीयते शसू० निन्दन वर्तमानः अदन् ततवनु, निन्दितः, वान् | वृतः, वान् जग्ध, वान् मीता, तवान् पत्या निन्दित्वा घर्ति (घृ) त्वा जग्ध्या मात्वा संझा निन्दा घर्तनम्, वृत्तिः । अदनम् मानम् णमुअभिवादने जीव प्राणधारणे | जागृ निद्राक्षये मृजूप शुद्धी (नमस्कारक०) (जीना) (जागना) (मांगना)। नमति जीवति जागर्ति मार्षि लङ् अनमत् अजीवत् अजागः अमार्द 4 पचनम् , पाक: स्तुत्यो यजति, ते लड् [४०] व्यावहारिकसस्कृतप्रबोधः। नात्वा उप्चा पत्याच् । माया पत्त्या संशा मेहनम नयन, नीतिः चपनम् से सेवायाम् यज देवपूजादी यदि भिवादन लज लज्जायां (सेवा करना) सेवते लज्जते लंद चन्दते अयजत्-त असेचत अलजजत अवन्दत लिडू यजेत्-त सेवेत लजेत धन्देत लिङ् ज्यात्-पक्षीष्ट सेविधि लजिपीट चन्दिपोष्ट लिट् ईयाज, ईजे सिव ललजे यवन्दे ययासि-से सविता लज्जिता यन्दिता अयाक्षीत् अयष्ट असविष्ट अलजिए यवन्दिष्ट लङ् अपक्ष्यत्-त अमेवियत अलजिष्यत अघन्दियत यक्ष्यति-ते सेविष्यते लाजप्यते घन्दिप्यते लो यजतु-ताम् सैघताम् लज्जताम् चन्दताम् णिजन्त याजयति-ते सेवयति-ते| लज्जयति चन्दयति-ते सन्नन्त ! यियक्षति-ते सिविपते लिलाजपते विवन्दिपते यडन्त यायज्यते सेसव्यते लालज्यते यावन्द्यते कचा० इज्यते सेव्यते लज्ज्यते धन्यते शतक यजन्, मानः सेचमानः लज्जमानः चन्दमानः फक्तचए,यान् सवितः-धान् | लज्जिता, धान् घन्दितः, वान् पचाप | वा सवित्या लज्जित्या घन्दित्वा सज्ञा यजनम्यागः संघनम्, सेवा लज्जा बन्दनम् घृधूपर्धने (बदना) गैशन्दे (गाना) शकि शकायां (राका करना) (खुशहोना) लट् पर्धते गायति शकते लड् যখন अगायत् अशकत अमोदत लिड् पर्धेत गायत् शङ्केत मोदेत लिड् पधिपोष्ट गेयात् আg मोदिपीष्ट लिट् पवृधे शराके घर्धिता मुमुदे गाता शविता मोदिता अवृधत्, গাছ अवयत, अधि । यगास्यत् अमोदिष्ट अशकिप्यत अमोदिप्यत पर्यते, पर्धियते | गास्यति शातिप्यते मोदिप्यते मुद हर्षे मोदते अवर्धिष्ट अगासीत् गीतम् , मा माने अटमोऽध्यायः। [१] लोट वर्धताम् गायतु शकताम् मोदताम् पिजन्त | घर्धयति-ते गापयति-ते शकयति-ते मोदयति सन्नन्त विवाधिपते, विवरसते जिगासति शिशविपते मुमु (मो)दिपते यडन्त परीवृध्यते जेगीयते शाशक्यते मामुद्यते क० या वृध्यते गीयते शक्यते मुद्यत शतृ० वर्धमानः गायन् शकमानः मोदमानः तक्तवतु | वृद्ध, धान् शक्षितः, वान् मु(मोदितम्यान पत्याच् । पर्धित्वा, वृद्ध्या गात्वा शविरवा मु (मो) दित्या संशा घर्धनम्, वृद्धिः गानम् शङ्का मोदनम्, मोदः णिदिकुत्सायाम् वृतु घर्तने अदादिगणः अद (निन्दाक०) (चर्तना) भक्षणे (समाना) निन्दति वर्तते अत्ति माति अनिन्दत् अवर्तत आदत अमात् नन्देत् वतेत अद्यात् मायात् निन्द्यात् पर्तिपीट अधात् मेयात् निनिन्द ववृते आद, जघास ममी निन्दिता चर्तिता अत्ता भाता अनिन्दीत् अवर्तिप्ट अवृतत अघसत् अमासीत् अनिन्दिष्यत अधर्ति(W)प्यत आत्स्यत् अमास्यत् निन्दिप्यति वर्ति (स्य)प्यते | अत्स्यति मास्यति लोट निन्दतु धर्ततात् अस्तु णिजन्त निन्दयति वर्तयते-ति आदयति मापयति समन्त | निनिन्दिपति विवर्तिपते वि. जियत्सति मित्सति पृत्सते नेनिन्द्यते घरीवृत्यते ममीयते कर्म० । निन्द्यते वृत्यते अद्यते मीयते शत निन्दन वर्तमानः अदन मान् तक्तवतु निन्दितः, वान् | वृतः, धान् जाधवान् मीता, तवान् पत्याच निन्दित्या घर्ति (वृ) त्या जग्ध्या मारवा निन्दा वर्तनम्, वृत्तिः । अदनम् मानम् णमुअभिवादने जीय प्राणधारणे जागृ निद्राक्षये (नमस्कारक०) (जीना) (जागना) मांगना)। नमति जीपति जागर्ति मार्टि लडूं अनमत् अजीवत् अजागः अमा मातु . यडन्त मृजूष शुद्धी मार्जन, [१२] व्यावहारिफसम्झनमयोधः। लिडू ममत् जीवत् जागृयात् मृन्या नभ्यात् जांच्यात् जागयां मृज्यान् लिट् ननाम जिजांच ममाज उजागारजाग- राकार नन्ना जीविता जागरिता मार्य, गाजिता अनसीत् अजीपीत् बजागरीत् समास (जी) अनस्यत् मजीविष्यत् यजागरीप्यत् अमान्य (जिष्योत् नंत्यति जीविष्यति जागरिप्यति माय (जिप्यति जीयतु जागर्नु मार णिजेन्त न (ना) मयति जोग्यति जागरयति माजयति | सन्नन्त निनंसनि जिजीविपति जिजागरिपति मिमा जिपति, यडन्त । ननम्यते जजीव्यते मरीमृज्यते कल्यानम्यत जीन्यते जागर्यते मृज्यते बात नमन्. जीवन् जाग्रन् मृजन क्त,क्तयतु नतः-यान जीवितः, वान् | जागरिता, वान् मृष्ट', वान् पत्याच नत्वा जीवित्वा जागरित्या सक्षा नमनम्, नतिः | जीवनम् जागरणम् मार्जनम् इति भ्वादिः बच परिमापणे (बोलना) (तारीफ करना) [सांना पत्ति स्तौति, स्तवीतिस्तुते, पाति सपिति स्तवीत अवर यस्तोत्, अस्तवीत अ- | अपात स्तुत, अलवीत घच्यात् स्तीयात् स्तुयात्,स्तुचीत पायात सप्यात् उच्यात् स्तूयात्, स्तोपीट पायात सुप्यात् लि उवाच तुष्टाय; तुष्टुवे पपी सुप्याप स्तोतासि-से पाता अवोचत् अस्तावीत् अस्तोष्ट अपासीत् | अस्वासीत् सृड् अवश्यत् भस्तोम्यत, अस्तोष्पत अपास्यत् अस्वप्स्यत् घश्यति स्तोष्यति, स्तोप्यते पास्यति स्वपस्थति लोट वतु स्तोतु, स्तचीतु। स्तुतां पातु स्वपितु स्तुर्वाताम् णिजम्त याचयति स्तावयति-ते पालयति स्वापयति सन्नन्त विपक्षति तुष्टूपति पृष्ट्वा मारिया टुम् स्तुती पारक्षणे | निवप्शये अस्थप[पीत् लिङ् लिङ्क घक्ता पिपासति । सुपुत्सति शासु अनुशिष्टा . अष्टमोऽध्यायः। [४३ ] यडन्त चावच्यते तोप्यते पेपीयते सास्वप्यते क०या० उच्यते स्तूयते पीयते सुप्यते दातृ धचन् स्तुवन, स्तवमानः | বা स्थपन् तक्तवतु उक्तम्। यान् स्तुतः, तवान पाता, यान सुप्ता, वान् परवाच | उक्त्वा स्तुत्या पीत्वा सुप्त्या संहा वचनम् स्तुतिः, स्तवनम पानम् स्वपनं.सुपप्ति णुस्तुती अस् भुवि विद् शाने তা মাপ্ত (हुक्म द०) (तारीफकरना) [होना] जानना] / [न्हाना] शास्ति मोति अस्ति वित्ति वेद] स्नाति প্রহার अनीत् आसीत् अवत् अस्नात् शिप्यात् नुयात् स्यात् विद्यात् स्नायात् বিশ্বাণু नूयात् भूयात विद्यात् यात् राशास नुनाय पभूव विवेद विदा सस्नो चकार शासिता नविता भविता वेदिता (स्नाता अशिपत् अनावीत् अमूत् अवेदीत् अस्नासीत् अशासियत अनविष्यत् अभविष्यत् अवेदिप्यत् अस्नास्यत् शासिष्यति नयिष्यति भविष्यति यदिष्यति स्नास्यति लोट शास्तु नौतु अस्तु घेतु विदा- स्नातु इयतु णिजन्त शासयति नापयति भावयति विदयात स्नापयति सन्नन्त शिशासिपत्ति नुनविपति भूपति विविदिपति सिस्नासति यडन्त शोशिष्यते नोन्यते घोभूयते वविद्यते सास्नायते क०या० शिष्यते नूयते भूयते विद्यते स्वायते शत शासन् नवम् सन् विदन् स्नान तक्तयतु शिष्टः, वान् नुतः,धान् भूतः, यान् विदितावान् स्नातवान पत्वाच शिष्ट्वा, शासित्वा नुत्या भूत्या विदित्वा स्नात्या संशा शासनन् नवनम्, नुतिः भवनमभूतिः वेदनम् स्नानम् लिहास्वादने रादिरश्रुवि द्विप अप्रीती (चाटना) मोचन (द्वेष फरना) (जाना) लेदि, लीद रोदिति द्वेष्टि, द्विष्ट पति अलेद्, अलीढ अरोद (दी) अद्वे, अद्विए । पेन् लि लिधात,लिहीता रद्यात् द्विप्यात् द्विपीत इयात् इण गती सशा [४४] घ्यावहारिकसस्कृतमयोधः। लिङ् लिहात्,लिसाट यात् द्विप्यात्,द्विक्षीट ईयात् लिट् लिलेह, लिलिह] रोद दिद्वेष, दिद्विप इयाय. लदासि-से रोदिता द्वेष्टासिसे पता अलिक्षतन्त अरोदी (रुद) अद्विक्षत्-त भगातू अलीट अलेक्ष्यत् त अरोदिष्यत् अवश्यत्त ऐप्यत् लक्ष्यति ते रादिप्यति देश्यति-ते पप्यति लोट लेदु, लीदाम् रोदितु द्वेष्टु, विटाम् णिजन्त लहयति ते रोदयति द्वेषयति-ते गमयति सन्नन्त | लिलिक्षति ते रदिपति दिद्विक्षति-ते जिगमिपति यडन्त | लेलिहाते रोरुपते देद्विष्यते कवा लियते पद्यते द्विप्यते यते लिहन, लिहान रुदन द्विपन्-पाणः यन् ककवतु लीद, लीढयान (रो)दितः यान् द्विष्टः, वान् इत, पान् पत्याच लोया रादित्वा इत्वा लेहनम् रोदनम् द्वेषणम्, देयः अयनम् इन हिंसागत्यो रुवादे शी स्वप्ने मारना) (रोना) (सोना) (दुहना) हन्ति रोति, रीति शेते दोग्धि, गुग्धे महन् अरोत्, अरवीत् अर्शत अधोक्, अदुग्ध लिङ्ग हन्यात रुयात् , रबीयात् शयीत् दुयात्। दुद्दीत लिए धन्यात् रूयात् शयिपीट दुधात्, धुक्षीष्ट जधान हराव शिश्ये दुदोह, दुदुहे रपिता शयिता दोग्धासि-से अयधीत् मरावीत अशयिए अधुक्षत्त अदुग्ध अहनिष्यत् अरविप्यत् अशामिप्यत अघोरयत्त हनिष्यति रविष्यति दायिष्यते धोक्ष्यतिते लोट रौतु, रपीनु মানা दोग्धु, दुरधाम पिजन्त यातपति सयपति शाययति सत्रात जिघांसति दोहयति ते যথার शिवपिपत यडन्त जान्यत दुधुक्षति ते रोकयते. शाशप्पते जमीयते दोदुखते कन्धा हन्यते रूयते शय्यते दुराते दुह प्रपूरणे लिट . अष्टमोऽध्यायः। [३५] शत० नन् रुवन् शयानः दुहन्-हाना तक्तवतु हतः, वान् रुवा, वान् : -शयिता, धान् दुग्धः, वान् पत्याच हत्या रुत्वा 'शयित्वा दुग्ध्या हननम् रवणं, राव: शंयनम् दोहनम् मम् व्यक्ताया प्रिभी भये डभृभू धारणपोप- १ म्वाचि (डरना) णयोः (पालना) डधान् धारणे अधीति, व्रते विमेति विमर्ति, विभृते धाति धत्त अवचीत्, अव्रत अविभेद अविभः,अविभृत अदधात् अधत्त व्यात्, वीत विभीयात् बिभृयात्,विभ्रीत दध्यात् दधीत उच्यात्, चक्षीष्ट भीयात् नियात्, भृषीष्ट धेयात्-धासीष्ठ उचाच, ऊचे विभाय, विभयां यभार, विभरा- दधौ दधे इत्यादि ञ्चकार घने वक्तासि-से भेता भासि-से धातासि-से अवोचत्-त अभैपीत अभापीत्, अभृत अधात् अधित अवक्ष्यत्-त अभेप्यत् अभरिप्यत्-त अधास्यत्-त चक्ष्यति-ते भेष्यति भरिष्यति ते धास्यति-ते लोट प्रवीतु, ताम् विमेतु बिभर्तु,विभृताम् दधातु-धत्ताम् णिजन्त चाचयति-ते भापयते,भापयते भारयति-ते धापयति ते सन्नन्त | विवक्षति ते विमीपति वुभूति-ते धित्सति-ते यडन्त वावच्यते वेभीयते वेमीयते देघीयते कर्म० उच्यते भीयते भ्रियते धीयते शत० नुवन् , चाण: विभ्यन् विभ्रन विभ्राणः । दधन-दधानः कक्तवतु उक्कम्, यान् भीतः, वान् भृतः, वान् हिता, वान् पत्याच उक्त्वा भीत्वा भृत्वा हित्वा संशावचनम् भयम्, भीतिः भरणम्, भृतिः आधानम् इत्यदादिः अथजुहोत्यादिः। अथदिवादिः। 'दानादनयोः ओहाक् त्यागे डुदान दाने दिवुक्रीडाविजगी (देना खाना) (देना) पादौ (खेलना) जुहोति जहाति ददाति दत्ते दीव्यति अजुहोत अजदात् अददात् अदत्त अदीव्यत् जुहुयात् जह्यात् दद्यात-ददीत दीन्येत् लिड् हयाद हेयात् देयात् दासीष्ट दीन्यात् जुहाव जही ददौ-ददे दिदेव - लिङ्क विपित्या, पुरवा असुक्षेपणे [४६] व्यापारिकसंसलमबांधः। दाता दातासिस देविता अदापीत् ভাষা मदान-मदित बदधीत् महोम्यत् अंदास्यम् अदास्पात अपिम्पन् दोपति दास्यति दास्पति-ते देबिप्पति लोद গুছার जहाद पदातु-पत्ताम् दीप्यतु |णिअन्त दापयति दापयति-ते दापयतिते दंषयति-ते सपन्त ज्ञापति जिदासति दिरसति-ते विदेषि (दुपापति यान्त जोहयते लेदीयते देवीयते देवीप्यते कन्या यंत हायत दीयते दाम्पते शत जहन् ददन्-वदानः दीव्यन् क्त,त्तयतु हुतःधान् हीन, वान् दत्ता,यान् पता,धान् पत्याच हुवा दित्या वनम् हानि दानम् पुतिः मन शाने । नृती गानचिक्षेप र यवरांने [मानना नाचना [फकना] [नाशाहो मन्यते नृत्यति अस्थति नश्यति अमन्यत अनृत्यत् भास्यत् धमाश्यत् मम्येत मृत्येत् भस्येत् नस्येत् लिह मंसीट नृत्यान् अस्यात् नस्यात् ननत थास ननाश मन्ता मर्तिता असिता नशिता, नश अर्मस्त अनीत् आम्पत् अनशन अमस्थत अनति [स्य] प्यत वासिष्यत् अनशिप्प[नपत भंस्थते चय [तिप्य ति असिष्यति नंश्यनिशिघ्य] ति लोट मन्यताम् नृत्यतु अस्यतु नश्यतु पिजन्त मानयति नर्तयति भासयति माशयति सनन्त मिमसते निनतिपतिमिनृत्सति मासिसिपति निनक्ष[निनशिय]ति यडन्त मम्मन्यते | नरीनृत्यते मानश्यते कण्या० मन्यते नृत्यते अस्यते नश्यते शत० नृत्यन् अस्यन् नश्यन् क्त,त्तयतु मत, षान् । नर्तितः, धान् अस्तः, यान् नए,धान् पत्वा मत्या नर्तित्वा असित्या, स्वा नशित्वा, नंष्वा | मनमम्मति ननिम् नाशनम्, नाशा सज्ञा असनम् मुह वैचित्ये मुतपसि अष्टमोऽध्यायः। [४७] युधसमहारे रथ हिंसासराभ्यो [घवड़ाना] खदेच [रांधना] युध्यते मुह्यति श्राम्यति रध्यति अयुध्यत अमुह्यत् अश्राम्यत् अरभ्यत् लिड् युध्येत मुह्येत् श्राम्यत् रध्येत् लिड् युत्सीष्ट मुपात् थम्यात् रध्यात् मुमोह लिट् युयुधे राधाम ररन्ध योद्धा मोग्धा, ढा, हिता अमिता रधिता [रद्वा] अयुब अमुहत् अधमत्. अरधत अयोत्स्थत अमोक्ष्य हिप्यात अधमिष्यत् अरत्स्य धिप्यत् योत्स्यते मोक्ष्य हिय] ति | श्रमिप्यति रस्य [धिप्य] ति युध्यताम् मुद्यतु. श्राम्यतु रख्यतु णिजन्त योधयति मोहयति श्रमयति रन्धयति सनन्त युयुत्सते मुमुहिप [क्ष] ति शिश्रमिपते रिरत्स(धिपति यडन्त योयुध्यते । मोमुह्यते शंधम्यते रारध्यते क० या युध्यते मुह्यते श्रभ्यते. रध्यते शत० युध्यमानः । मुह्यन् श्राम्यन् रयन. कवकत युयः, चान् मुद मुग्धः धान श्रान्तः, धान रद्धावान कत्वाचू युध्या मोहित्या, मुग्ध्या मित्वा,श्रान्त्या रधित्वा, वृध्वा संशा योधनम् मोहनम् , मोहः श्रमः, शान्तिः संघमा विदसत्तायां पुषपुरी (सूखना] [होना] पुिएहोना) शुष्यति विद्यते तुप्यति पुप्यति अशुप्यत् अविद्यत अतुष्यत् अपुष्यत् लिङ्ग शुप्येत् विधेत तुप्येत् पुष्येत् लिङ् शुष्यात् विसीट तुष्यात् पुष्यात लिट् शुशोप विधिदे तुनोर पुपोप शोटा वेत्ता तोटा पोष्ट अशुपत् अवित्त अतुपत् अपुपन् अशोक्ष्यत् भवेत्स्यत अतोक्ष्यत् अपक्ष्यत् शोक्ष्यति येत्स्यते तोक्ष्यति पोष्यति लोद् शुप्यतु विद्यताम् तुप्यतु पुप्यतु णिजन्त शोपयति चेदयति तोपयति पोषयति सनन्त गुशुक्षति विवित्सते पुपुक्षति सुप शोपणे तुप भीती R तुतुक्षति तुए, वान् लिए [१८] व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः । तोतुप्यते यङन्त शोशुप्पते | विद्यते पोपुप्यते क०या त्रुप्यते विद्यते तुप्यते पुष्यते शत गुप्यन् विद्यमानः तुप्यन् पुष्यन् ति,कवतु शुष्का, वान विना, वान् पुष्टः, वान् पत्वा शुष्ट्वा विरमा तुष्ट्या पुष्ट्वा संज्ञा शोषणम् । घेदनम् तोपणम् तुष्टिः पोपणं, पुरिः शमु उपशमे] जनी प्रादुर्भाव निलप आलिङ्गने दुश, फूध फोधे (शान्तहोम [चिपटना शाम्यति जायते कुप्यति लिप्यात अकुप्यत् अश्लिप्यत् अशाम्यत् । अजायत लिङ्क. शाम्येन जायेत कुप्येत् लिप्येत लिए शम्यात् जनिपोष्ट युप्यात् सिध्यात् राशाम खुकोप शिलप शमिता जनिता कोपिता श्लेष्टा शमत्' अजनिट भवपत् । 'अस्लिक्ष चित् अशीमप्यत् अजनियत अकोपिप्यत् अश्लेष्यत् शमिप्यति जनिप्यते फोपियति श्यति शाम्यतु जायताम् कुप्यत लिप्यत णिजन्ती शाशाम | जनयति कोपयति लेपयति | समन्त शिशामिपा जिजनिपते चुकु [फो। पिपति शिक्षिक्षति यडन्त शशम्यते जअन्यतेजाजायते चोपुप्यते शेलिप्यते पन्चार्गशम्यते जन्यते इप्यते । लिभ्यते ০ शाम्यन् जायमान. कुप्यन् लिप्यन् तजन्यनुनान्त,पान जात', यान कुपित', वान् लिष्ट, पान जनित्या यो] पित्वा लिवा शान्त्या शान्ति, जननम्, जनु. दोपन, कोप. पण, हेपः । दामनम दुह जिघांलायाम् | प्रियु निरसने (घूमना) (पुशहाना) (परकरना) (थपना) रद म्राम्यति, नमी हप्यति दुष्पति हाय (घ)ति भमाभ्यन,भ. पहप्यत् चादरात् मष्टोव्यत् मत् वाभ्यास, मत् । हुप्यत् दुरोत् प्टीन्यत् लोद पत्वात शमित्या, प्रमु अनचल्याने हए तुष्टी 17 । अष्टमोऽध्यायः। [४९] भ्रम्यात् हप्यात् दुहाद छोव्यात् चम्राम सहर्ष दुद्रोह ति (टि) हेच भ्रमिता हर्पिता द्रोहिता दोढा,दोग्धा, छेविता अभ्रमत् अहपत् अद्रुहत् अष्ठेवीत् अभ्रमिष्यत् अहर्पियत् । अद्रोहिप्य (अधो- अष्ठेविष्यत् क्ष्य)त् अमिप्यति हर्षिष्यति द्रोहिण्य(धोक्ष्य) ति ठविष्यति लोट भ्राम्यतु, भूमतु हृप्यतु प्ठोव्यतु णिजन्त भूमयति हर्पयति द्रोहयति 'प्ठेवयति सम्भन्त विभूमिपति जिहर्षिपति । दुद्रो (दु) हिप ति (टि)छविपति (दुधक्ष)ति यङन्त वभूम्यते जरीप्यते दोगुहते ते (३)छोभ्यते क०चा भूम्यते हप्यते दुयते ष्ठीव्यते शत० भाम्यन् छीव्यन् तक्तवतु भान्तः, वान् हए, चान् दुग्धः, दूढः,वान् । प्य्यता, वान् परवाच भान्त्या, भूमित्या दृष्ट्या दुग्ध्वा, द्रा (दु)हित्वा छवि (प्ट्य) त्या संशा भूमणम् भान्तिः हर्पणम् दृष्टिः द्रोहः छेवनम्, प्ठ्यतिः पिवु तन्तुस. अथ स्वादिः। राधसाधसंसिद्धी न्तान(साना) (कापना) (सिद्ध करना) सीव्यति सुनोति, सुनुते ५ (धु) नोति,धूनुते रा [सा] भौति असीव्यत् असुनोत् ,असुनुत अधूनोत् , अधूनुस अरा[सा भोत् साव्यत् सुनुयात्, सुन्वीत धुनुयात्,धून्धीत | रा(सा)नुयात् लिङ्सोव्यात् सूयाद, सोपीष्ठ धूयात् धोपीट- रासा ध्यान धविपीट लिट् सिपेष सुपाया सुपुत्र दुधाव, दुधुये रराध, ससाध. सविता सोतास धोपति)वासितासेरा (सर) या असेवीत् असावीत् असोट अधावीत्, अधोष्ट अरा(असा त्सीत् अधषिष्ट असेविष्यत् । असोप्यत्त अधोप्यत् अप्रोष्यत् (असात्स्यत् संधिप्यति सोप्यति-ते धोप्यति,धोप्यते रा (सा) त्स्यति लोट सीच्यतु सुनातु, मुनुताम् धूनोतु, धूनुताम् रा (सा)नोतु गिजेन्त सेवयति साययति:-ते धावयति, ते रासां] धयति समन्त सिंपधिपति । सुम्पति-ते रियमिसाओत्सति यडन्त । सेपीव्यते सोप्यते दोधूयते रारा[सासाध्यते करवा० सीच्यते स्यते धूयत रासा ध्यते धू कम्पने पूर्वा अभिपये दुपति-ते श्रु श्रवणे दशशता अभिदत अभित्त [५] व्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः। सीव्यन् सुन्वन्-सुन्वानः धन्वन् , धन्वानः रा(सा)नुवन् कानपतु, स्यूनः, घान् सुतः-धान् धूतः-धान् साइवान सवाए । संवि(स्यूत्वा सुस्था धूत्वा राध्या,सावा संशा | सेवन, स्यूतिः | अभिपका धधनम् भाराधनं साधनम् चियू धयने भिदिरविदारणे [घटोरना] [सुनना] (सकना) (फाड़ना तोड़ना) चिनोति, चिनुते । शृणोति রাকাবি मिनति, मिन्ते लई अचिनोत् अचिनुत अणोत् । भशमोत् अभिनत्, अभिन्त लिङ्क । चिनुयात् , चिन्धीत शृणुयात् शक्नुयात् भिन्धात, मिन्दीत लिङ्ग चीयात् चेपीट श्रूयात् शक्यात् भिधात्, मिसीए निनाय चिच्ये लिट् चिकाय चिपये सुधाव शाक विभेद, विभिदे चेतासि-से श्रोता शक्का भत्तालि-स अपीत्, अचेट । अनौषीत् । अशकत अभत्सीत् अचेत्स्यत्त अधीप्यत् । अशक्य अभेत्स्यत्त चेष्यति-ते भोप्यति शक्ष्यति भेत्स्यति-ते लोद चिनोतु नुताम् | गृणोतु शकोतु भिनत्तु-मिन्ताम् (मिजेत चायपति, ते श्रावयति-ते. शाकयति भेदयति-ते सनन्त चिों की] पति, ते शुशूपते शिशक्षति विभित्सति-ते शांभूयते | शाशक्यते भिद्यते शफ्यते भिद्यते शृण्वन् शक्नुवन् मिन्दन भिन्दानः धिक्कयतु चितः-वान् श्रुतापवान् शंक्ता, घान् भिन्न भिन्नधान् पत्याच चित्षा श्रुत्वा शक्त्वा भिषा संक्षा धयनमा चितिः श्रवणम् शकि भदनं, भेदः अर्थ रुधादिः छिदिग्द्वैधीकरणे (टकनारोकना) (कारना) गुणोति, पृणुते मानोति | रुणद्धि, रुन्धे छिनत्ति, छिन्त मवृणोत्, अकृणुत | आप्नोत् अरुणत्, अरुन्ध मच्छिनत् अच्छिन्त वृणुयात्, घृण्वीत | आप्नुयात् रुग्यात्, रुन्धीत चिस्यात् छिन्दीत लिङ व्यात्, चार गोष्ट आप्यात् रुध्यात्, रुसीट छिपात्, छिस्सी | लिट घवार घने शरोध, वरु विच्छेद,चिच्छिद यडन्त चेचीयते कल्याचीयते रात / चिन्वन् भयते म् सम्बरणे [यरना) मांगनामाप्तृव्यासी, राधिरावरण भाप आप्नुवन् । रुभ्यते भाभले अष्टमोऽध्यायः। [५१] घरिरी] तासि-से आप्ता रोद्धासि-से छत्तासि-से अधारीत्, अवृत आपत् अरुधुत्, अराद्ध अछिदत अछित्त अपरिट अरौत्सीत अच्छत्सीत् अवरि (री) प्यत्-तो आप्स्यत् । अरोत्स्यत्-त अच्छत्स्यत्-त यरी(रि)प्यति-त आप्स्यति रोत्स्थति, ते छत्स्यति-ते लोट घृणोतु, वृणुताम् । भामोतु रुणद्ध, रुन्धाम् | छिनरतु, छिन्ताम् णिजन्त यारयति-ते आपयति । रोधयति-ते छेदयति-ते सनन्त विधरि री] पति, ईसति रुरुत्सति-ते । चिच्छित्सति-ते युवूर्पति, यडन्त धीयते माप्यते रोरुभ्यते चेच्छिद्यते क०या० मियते छिद्यत शत० घृण्यन् ,पयानः आप्तः-वान् रुन्धन, रुन्धान: छिन्दन, छिन्दानः क्त,क्तवतु पृतः-चान् आप्त्या रुख, वान् छिन्नः, उिन्नवान् पत्वाच् घृत्वा प्रापणम्, रुध्या छित्वा संशा वरणम् प्रातिः रोधनम् छेदनम् युजिर योगे कृतीछेदने क्षिप प्रेरणे (तोड़ना) [शामिल करना] (कतरना) फिफना) मनक्ति युनक्ति,युक्त कृन्तति क्षिपति-ते अमन भयुना, अयुक्त अछन्तत् अक्षिपस्- भज्यात् युज्यात्, युञ्जीत (फन्तेत् क्षिपेत्-त युज्यात, युक्षीट कृत्यात् क्षिप्यात् ,क्षिप्सीष्ट घभ युयोज,युयुजे चर्त चिक्षेप, चिक्षिप योकासि-से कर्तिता क्षमासि-से अभाहीत अयुजत्, अयुक्त अकर्तीत् अक्षप्सीत्, अक्षिप्त अभक्ष्यत् । अयोध्यत्-त अकर्तिप्यत् अक्षेप्स्यत्-त अकरस्य॑त् भक्ष्यति योश्यति-ते करय॑ति, क्षेप्स्यति-ते कर्तिप्यति लोट भनत्तु युनपतु, युष्ताम् इन्ततु क्षिपतु [णिजन्त भञ्जयति-ते योजयति-ते कर्तयति-से क्षेपयति-ते सन्नन्त विभक्षति,ते युयुक्षति-ते चिकर्तिपति चिक्षिप्सति-ते यडन्त घम्भज्यते योयुज्यते चरीरुत्यते चक्षिप्यते रुत्यते क्षिप्यते शार भअन् युअन्, युआनः कृन्तन् क्षिपन्,माणः लाक्तयतु भक्ता, पान् । युक्तः, धान् कृत्ता, घान् क्षिप्तः, क्षिप्तयान् - M क०या० भज्यते युज्यते मुच्च मोक्षणे " [१२] व्यावहारिकसम्हतप्रबोधः । परवाच भत्ता,मसत्या युक्त्या फर्तित्वा क्षिप्त्या संज्ञा भजनम् योजनम्, युक्तिः फर्तनम् क्षेपणम् अथ तुदादिः। पिष्टसचूनने तुदव्यश्रने प्रच्छन्नीप्सा. पीसना]] दुि.ख देना] या पूछना [छोडना] पिनष्ठि तुदति-ते पृच्छति मुञ्चति-ते अपिन यतुदत्त अपृच्छत् अमुञ्चन्त लिइ पिंप्यात् तुदत्-त पृच्छेत् मुश्चेत्त लिङ् पिप्यात् तुद्यात्तुन्सीष्ट धृच्छयाद मुच्यात्, मुक्षीष्ट लिट् पिपेप तुतोद, तुतुदे मुमोच, मुमुचे पेठा तोत्तासि-से मष्टा मोक्तासि से अपिपत् अतात्सीत् , अनुत्त अप्राक्षीत् समुचत्,अमुक अपेक्ष्यत् अतोत्स्यत्, त अप्रक्ष्यत् अमोश्यत्-त पेक्ष्यति तोत्स्यति-ते प्रक्ष्यति मोक्ष्यति--ते लोट पिनष्टु तुदतु, तुदताम् पृच्छतु मुश्चतु, ताम् णिजन्त पेपयति-ते तोदयति-ते प्रच्छयति-ते/ मोचयति-ते सनन्त ! पिपिक्षति, ते तुतुत्सति-ते पिच्छिपति मुमुक्षति तोतुद्यते परीपृच्छयते मोमुच्यते कर्मवाच्य पिप्यते तुद्यते पृच्च्यते गुदयते शत पिंपन् तुदन्-मानः पृच्छन् मुश्चन्, मानः तक्तवतु पिटा, वान् तुम्नः, वान् पृष्ठा, घान् मुत्ता, चान् पत्याच | पिष्ठा तुत्वा । मुक्त्वा पेषणम् तोदनम् प्रच्छनम्प्रष्णः मोचनम्, मुक्तिः सृज विसर्ग कृप विलेखने विशप्रवेशने गृ. निगरणे । [रचना {जोतना] [धुसना] [निगलना] सजवि पति-ते विशति गिर [ल] ति अराजत् अरुपत्त अविशत् 'अगिरत् लिड् ! सजेत् रुपेत्-त विशेत् लिड् एग्यात् कृप्यात्, कक्षीट पिश्यात् । गीर्यान् लिर्ससर्ज चकप, चप : पियेश जगार नश क्रया (फष्टी)सि,से पेष्टा अनाक्षीत् अप्राक्षीत् अक्षत्, अविक्षत् अगारीत् अरुक्षत् अकए * रस धातु के रूपों में प्रायः "र" की जगह "ल" भी होता है। | यडन्त | पोपण्यते . सज्ञा। 1 गिरेत् . गरीरि)ता पिएः, धान् लिख अक्षर " मष्टमोऽध्यायः। [५३ ] अनश्यत् अफ्रक्ष्यत्त भवेक्ष्यत् बगरि(री)प्यत् सक्ष्यति कस्यति, कर्यत वेश्यति गरि(रीपति लोद सअतु कृषतु विशतु गिरतु ििणजन्त सर्जयति-ते कर्षयति-ते येशयति ते गारयति सनन्त सिरक्षति चिकृक्षति-ते विविक्षति जिंगरिपति यडन्त सरीयज्यते चरीरुप्यते विश्यते जेगिल्यते फवासज्यते कृप्यते विश्यते ग्रीयंते एजन् कृपन्, पमाण: विशन् गिरने कतपतु सर, घान् करवान् गीण, पोन् करवा सुष्टा राष्टवा पिष्टता गौरी संशा सर्जनम् ,सष्टिः कर्षण, कृषिः घेशनम् निगरणम् स्पृशसंस्पर्शन विदलामे पाना) मु.प्राणत्यागे [छूना] विन्यास लिखना [मरना] स्पृशति विन्दति-ते लिखति प्रियते अस्पृशत् अपिन्दन-त अलिखत् अम्रियत लिइस्पृशेत विन्देत--त लिपत् नियेत वित्सीष्ट स्पृश्यात् लिख्यात् सुपाएं पस्पर्श विषेद, पिविदे लिलन ममार स्प्रया, स्पीत्तासि, दिसासे लेखिता मती अस्माक्षीत् अवेदिए अस्पृक्षत् अमृत अस्प्रत्यत् अयेत्स्यत् अवैदिप्यत अलेमिप्यत् भमरिष्यत् स्पृश्यति, घेदियति, घेत्स्यते लेखिप्यति मरिष्यति स्पयति लोट शतु विन्दतु लिखतु । नियताम् णिजन्त स्पर्शयति-ते घेदयति-ते लेखयति मारयति समन्त पिस्पृक्षति वियित्सति लिलिमिपति । मुमूर्पति विवेदिषति लिलखिपति यस परीस्पृश्यते विपते ललिख्यते मेनीयते कल्याण स्पृश्यते विधते लिख्यते नियते शत 'स्पृशन् चिन्दन लिखन् नियमाणः कफपण स्पृए पान् विदितः पान् लिखित, पान् | मृता, चान् विदित्वा, पित्या लिमित्याँ मृत्या संक्षा स्पर्शनम् वेदनम् लेखनम् लिङ् चिंचात दिपीए अघिदत् अपि भलेशोत् मरण मृत्यु ३४ + ततान, तेने [१४] व्यावहारिकसंस्कृतमयोधः। अथ तनादिः अथ क्रयादि। तनुविस्तार डुक्रोवू न्यविमि मन्य विलोडने वश भक्षण (फैलाना) मये (सरोदना) (मथना) (खाना) तनोति, तनुते लट्र क्रोणाठि, कोणीते मनाति अनाति सतनोत्, असनुत मक्रोणात् अक्राणीत ममनात् थाभात् तनुयात, तन्वीत कोणीयात्, कोणीत् मनीयात् अभायात् तन्यात्, तनिपीट कीयात्, क्रीपोष्ट मध्यात् अश्यात् लिट चिकाय, चिक्रिय ममन्य वनितासि-से क्रेतासि-से. मन्धिता সাৱাৰ अत (ता)नीत्यतत अपीत्, मक्रेट अमन्धीत् আহা अतानिष्ट भतनिप्पत्त यष्यत्-त समन्धियत् आशिष्यत् तनिष्यति-ते फेण्यति-तं मन्धियति शशिप्यति लोट तनोतु, तनुताम् क्रीणातु, कोणीताम् | मनातु अयातु णिअन्त तानपति-ते माययति-ते मन्थयति आशयति समस्त तितरता सति चिक्रीपति-ते मिमाथिपति अशिशिपति तितनिपति यस्त | तन्तन्यते चक्रीयते मामध्यते भशाश्यते काधा तन्यते क्रीयते मध्यते अश्यते दातू तम्घन्, तन्वानः फ्रीणन् ,कोणानः मन्नन् नन् तक्तयत् तत्तः, ततवान् मधितः,पान्| अशितः,धान फ्वाच्तनित्या फ्रीत्या मथित्वा, म अशित्वा न्धित्या संशा तननम्, ततिः क्रयणम्, क्रयः मन्धनम् अशनम् प्रीतपणेफा-ताच |शा अवयोधने इ विदारणे (करना) (खुशफरना) (जानना) (फाइना) लट करोति, पुरुते. मीणाति, प्रीणीते जानाति रणाति अकरोत्, अकुरुत अमीणात, अप्राणांत अज्ञानात्, लिङ दुर्यात्. कुर्षीत प्रोणीया, पीणीत | जानीयात् हपणीयात् नियास्, पोष्ट प्रीयात, भीपीए चकार,चम पिप्राप, पिमिय दार कर्तासि-से प्रेतासि-से भकापात्, अकृत' अप्रैपीत्, अमेष्ट दरि[री] ता भकरिष्यत्-त अप्रेष्यत् त अदारीत् करिष्यति-ते प्रेप्यात ते ज्ञास्थति दरिरी]प्यति . झोत, पान् . इक करणे अरणात् लिन लिट शा)यात् । दोर्यात् थशासीत् अशास्यत् अदररीिय अष्टमोऽध्यायः [५५.] लोट , करोतु, कुरताम् प्रीणातु, प्राणीताम् | जानातु সার णिजन्त कारयति-ते प्राययति, ते शापयति दारयति सनन्त चिकीर्पति-ते पिनीयति-ते जिशासति दिदीपति दिदरिहरी पति यङन्त चंमीयते प्रीयते ताशायते देद्रीयते कल्या मियते प्रीयते शायते दीर्यते शत० कुर्वन् , कुर्याणः प्रीणन् , प्राणान: जानन्, रणन नक्तवतु कृत, घान् प्रीतः, प्रीतवान् शातः, धान् । दीर्णः, यान् पत्वाच त्या प्रीत्वा झात्या दरिरीत्या संज्ञा करणं, कृतिः प्रेम, प्रीतिः शानम् दरण, दीणि लून छेदने गुलाव, सुएये पपार मुपस्तये प्रद उपादाने । पालने पूर्वीच [चुराना] [काटना (लेना) (पालनापूराकरना मुष्णाति खुनाति, लुनीते | गृहाति, गृहोते पृणाति अमुष्णात् मल्नात् अनति अगृहात्, अगृहीत अपृणात् मुष्णीयात् खुनीयात् , लुनीत झोयात् गृहीत पृणीयास् मुण्यात् लूयात् लविपीए गृयात् ,महीपीए पूर्यात् मुमोष जग्राह, जगृहे मोपिता लवितासि, से प्रहीतासि-से परि(स)ता अमोपीत् अलावीत, अ- अप्रहीत अग्राहीए अपारीत् लपिष्ट अमोपिण्यत् अलपिप्यत्, त अनहोप्यत्-तभपार(रा)न्यत् माथिष्यति लयिष्यति-ते प्रहाप्यति-ते परि (रो)प्यात लोट मुष्णातु सुनातु,सुनीताम् गृहातु गृहीताम् पृणातु णिजात मोपयति सावयति प्राइयति-ते पारयति समन्त मुमुषिपति खुलूपतिले जिघृक्षति-ते पिपरि(ग) पति पुपूर्वति यहन्त मोमुप्प लोदयते अरीगृखते पंप्रीपते कर्मवाच्य, मुण्णते ल्पते गृह्यते दातू० मुष्णन् सुगन् ,गुनाना गृदन् ,गृवानः पृणन् प्रतापत भुपिता, पान दा, पान् गृहीतापान पूर्णः, पान् पत्याए मु(मा) पिस्या लापता नधीत्या परिसि] स्या मोपणम् लयनम् , लूनि । ग्रहणम्, पूर्तिः, पूर्णि पूर्यते प्रभू पवने | लिज लिए पुपाष, पुपुये , [५६] म्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। अथ खुरादिः । घर पन्धने हिशुविधाधने चुरस्तेय (साधना) (पवित्रकरना) (केशपामा) [घुरामा धधाति रूट पुनाति, पुनीते लिभाति चोरयति-ते लक अचौरयत्-त अधानात् अपुनाव, अपुनीत अलिशात लिम् पानीयात् पुनीयाव, पुनीत टिभीयात् घोरयत्-त यध्यात् पूयात्, पविषीष्ट हिश्यात् घोर्याद, चार- यिपीए पवन्ध विश चरियावकारी चक्र पपितासि-से क्लोशताकथा | घोरयितासि से मभानसीत् अपावीत अपविष्ट बलशीत्, मल्लि अचूचुरत्-त क्षत् लह अभास्यत् अपविष्पत्त । अक्लेशियद, मचोरयिभ्यत्-ता अक्लेस्यत् भरस्थति पपिप्यति-ते लेशियति,ल-बोरयिष्यति ते क्ष्यति लोद पधातु पुनातु पुनाताम् | क्लिभातु णिजन्त पन्धयति पापयति लेशयति चोरयति-ते समन्त | विमरसति पुपूपति-ते चिल्ल(क्लिोशिप पुरोरधिपति ते ति, चिक्लिक्षति यङग्त पाषभ्यते पोपपते चैक्लिश्यते क०या० वष्यते पूर्यते क्लिश्यते चोपते शतक बन् पुनन्,नानः लिमन् घोरपन्-माणः तवक्त पदा,यान् पूत, धान् क्लिटा, धान् चोरित', वान् पत्या पद्ध्या पयित्वा लिशिरषा, क्लिष्टग चौरयित्वा संशा घरधनम् पवन, पूतिः घोरणम् चौरस एत संशरदने गण सण्याने मक्ष बदने [तारीफ पना] [गिनना [सोना] कौतयति-ते गणयति-ते भक्षयति-ते लडू अशोर्तयत्त अगणयन्त अभक्षयत्-त लिन फोर्तयत्-त गणयेत्त रेड कास्कीत विपीर | गण्यात्, गणयिपीए भाशत् भक्षायपोष्ट पुरवगण से यान्त के रूप नहीं होते। +भार रूपों पे लिये भ्यादिगण का “गुप्' धातु देखो। धोरया लद् भक्षयेस्-त तुल उन्माने चिति स्मृस्याम् भएमोऽध्यायः। [५] कीर्तयाधकार-धक गणयाञ्चकार, चक्रं भक्षयाञ्चकार-चके कीर्तयितासि से गणयितासि-से भक्षायितासि-से अधिकर्तित्, अची- अजी जि! गणद, त भवनक्षत्-त मकीर्तयिष्यत्त अगणयिष्यत्-त अमक्षयिष्यत-त कीर्तयिष्यति-ते गणयिष्यति-ते मक्षयिष्यति-ते लोट कीर्तयतु गणयतु, ताम् भक्षयतु-ताम् णिजेन्त कीर्तयति-ते गणपति-ते भक्षयति-ते सन्नन्त चिकीर्तयिपति जिगणयिपति-ते विभक्षयिषति, ते क०या० कीर्यते गण्यते भश्यते বান্ত कीर्तयन्-मान: गणयन्-मानः भक्षयन्-माजः क्त,कपतु कीर्तितः-धान् गणितः-घान् भक्षितः, यान् पित्वा कीर्तयित्या गणयित्वा भक्षयित्या कीर्तिः कीर्तनम् गणनम्, गणना भक्षणम् मषि गुप्तभाषणे सिलाह करना [तोलना] [सोचना] मन्त्रयते तोलपति-ते चिन्तयति-ते अमन्वयत अतोलयत्-त अचिन्तयत्-त मन्त्रयेत' तोलयेत्-त चिन्तयेत्-त मन्त्रपिपीट तोल्यात्, तोलयिपीट चिन्त्यात्, चिन्तायवाट लिए मन्प्रयास तोलयानकार चक्र चिन्तयाञ्चकार, चके चिचिन्त मन्त्रयिता तोलयितासि-से चिन्तयितासि-से अममन्त्रत अतूतुलत्-त मचिचिन्तत्-त अधिन्तीत् अमत्रयिष्यत अतोलयिष्यत्-त अचिन्तयिष्यत्-त मन्त्रयिष्यते तोलयिष्यति-ते चिन्तयिष्यति-से लोट मन्त्रयताम् तोलयतु ताम् चिन्तयतु-ताम् [णिजन्त मन्त्रयति-ते तोलयत्ति, ते चिन्तयति-ते सत्रन्त मिमन्त्रयिपते तुतोलयिपति-से चिचिन्तीयपनि ते तोल्यते चिन्त्यते शत मन्त्रयमाणः तोयलन्, मानः चिन्तयन् मानः क्त,कवत मन्धिता, धान् तोलितः, धान् चिन्तितः वान् परयाथ् मात्रपित्या तोलायत्वा चिन्तयित्या मन्नणं, मन्त्रा तोलनम् तुला चिन्तनम् चिन्ता कपा० मन्यते [५८] व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोध । पीड अवगाहने स्पृह ईसायाम् तजमरर्स तने [पीड़ा देना] (चाहना। (डांटना) पीडयति ते स्पृहयति-ते तर्जयते, भर्सयते अपीडयत्त अस्पृहयत्-त अतर्जयत, अभर्मयत लिड् । पीडयेत् त स्पृहयत्-त तर्जयत, भर्सयत रिड्पीड्यात्-पीड- स्पृह्यात्, स्पृहयिषीष्ट तयिपीरमर्क्सपिपीट पिपोष्ट लिट् पौडयाञ्चकारचके स्पृहयाञ्चकार, चक्रे तर्जयाश्चोभर्सयाश्चके पीडयितासि से | स्पृहयितासि-से तजयिता, भसयिता अपीपिडत्त अपस्पृहत्-त अततर्जत,अवभसत अपीडयिष्यत् त अस्पृहयिष्यत्-त अतर्जयिष्यत,अभसमिप्यत पाडयिष्यति ने | स्पृहायभ्यति-से तर्जयिष्यते,भसमिप्यते रोट् पीश्यतु ताम् स्पृहयतु-ताम् तयताम् भर्मयताम् णिजन्त पीडयति-ते स्पृहयति-ते तर्जयति तैमर्सयति ते महान्त पिपीयिपति ते पिस्पृहयिषति-ते तितर्जयिषत, विभसयिपते पचा पायते स्पृह्यते तिज्यंते, भस्य॑ते पीउयन् मान. स्पृहयन्माणा तर्जयमान.,भसयमानः तसयत पीडित , पान् स्पृहितः, पान् तर्जितावान् भत्सितः, वान् | परवा पीडयिन्या स्पृहयित्वा तयित्वा, भर्सयित्या पोडमम्, घोडा | स्पृहणम् स्पृहा तर्जनम्-तर्जनाभर्सनम्भर्त्सना सान्त्य सामप्रयोग तडि आपाते अर्थउपयाच्या शान्त करना] (पीटना) यां(मांगना)| पूरी करना) सान्स्ययति ते ताडयति-ते अर्धयते पारयति-ते। असान्त्घयत्त अताडयत्-त आर्धयत अपारयत्-त सारपयेस्त ताडयत्-न अर्धयेत पारयेत् त सारथ्यात्, सातास्यात् ताऽविषीय अर्थयिपीट पायर्यात् पारपिट निपचिए सिर सान्त्ययाश्चवार ताडयाचवार,चो अर्थयाञ्चक पारयाशकार,चत्रे चक सान्रचयितासि-से, ताडयितासि-स अधयिता पारपितासि-से अससानयत् त अनीताइस्-त आतिपत अपीपरत्त असारयपिण्यत् भताडमिप्यत्त मानस्पयिष्यति ते तारयिष्यति-त अर्थयिप्यते. पारयिष्यति है लाट साम्स्यपतु ताम् ताश्यतुन्ताम् - पृ पूरणे - . लिइ भार्थयिप्पत | अपारविष्यत् त अर्धयताम् पारयतु ताम् नयमोऽध्याय । [१९] णिजन्त सान्त्वयति ते ताड़यति-ते भर्थयति ते पारयति ते समन्त सिसान्त्वयिपतित तिताइयिपति-ते अतिधयिपत पिपारयिषति ते २०वा० सालयत तायत अय्यत पाय्यते নু सान्चयन् मान ताडयन्-मान' अथंयमान पारयन् माण तसयतु सान्वित -धान् । साडित बान् अर्थितवान् पारित यान् पत्याप/ सान्त्वयिाया ताडयित्या अयित्वा पारयित्वा सान्त्वनम् ताडनम् ताडना यर्थतम् पारणम् परणा जिस प्रकार दश गण है उसी प्रकार १णिजन्त, २ सन्न-त, ३ यन्त, ४ या मुन्न्त ५ मामधातु ६मात्मनेपद, ७ घरलैपद, ८ भावकर्म, ९ कर्मक्तूं, १० लफारार्थ इन नामों की दश प्रमिया भी हैं जिनका एफ सक्षिप्त विवरण उदाहरण सहित आगे किया जाता है। अथ णिजन्त [ण्यन्त प्रप्रियामद नामोऽध्यायः । णिजन्त, प्यन्त या प्रेरणार्थक (Causatye terbs) प्रक्रिया वह है जिसमें क्रिया द्वारा किसी को प्रेरणाच माशा पाई जाव, इस प्रप्रिया में अवर्मक प्रिया भी सफर्मक यन जाती है। इन क्रियाओं के रूप प्राय चुरादिगणी धातुओं के से होते है । उभयपदी अष्टमअध्याय मे आये हुए सभी धातुओं का प्यन्तरूप घहीं पर दिया गया है परन्तु यहा पर थोडा उदाहरणार्थ दिसलात है बुद्धिमान इसी विधि से सय लयारों में रूपल्लें देवदत्त गणाति त अन्य प्रेरपति यावयति से, श्रापयेत् त, श्रापयतु शाम् , अश्रापयत्त, श्रावयामास- चक्रे, धाव्यात् श्रावयिपीट, थावयिताखि-से शाययिष्यतिते, अशाययिष्यत् त, अशि()धवत् न। भू भावयति-अशेभयत् टा स्थापपति अतिष्टिपत्, शीशाययति, अशी शयत् गम् गमयति, अजीगमत् पारयति, अचीवरत् दादापयति, अदीद पत, पून पावयति अपीपषत् रुरापयति भरीरयत्, लू लावयति, अलीर वत्, सु स्नाययति, असि(मोस्रवत्, स्वर स्वापयति असूघुपत्, पापाययति, अपापयत घ्रा घ्रापयति अजिघ्रिपत्, अधि+ अध्यापयति, अध्यजीगपत् , अध्यापिपत् ।

[१०] न्यायद्वारिकसंस्कृतप्राधा। अथ अन्तक्रियापदर्षको दशमोऽअध्यायः । समस्त पा इच्छार्थक (Desiderative verbs) प्रकिया वह जिसमें पिया द्वाराही कर्ता की एल्छा प्रकट हो जाय इस प्रक्रिया में क्रियामा केप अपनी धातु के हो अनुसार होते हैं और धातु को द्वित्व हो जाता है और "स.पीच में आ जाता है फिर परस्मैपदी धातुओं के कप पर धातुक समान और आरमनेपदी धातुओं के लम् धातु के समान रूप दशौ कारों में चलते है जैसे पद-पठितुमिच्छति पिपठिपति पिपठिपतु, पिपदिषेत्, अपि. पाठरत, पिपठिपांवकार, पिपठिप्यार, पिपठिपिता, पिपडिपिप्पति, अपिपडि. विष्यत, भपिपदिपोत् । पातुमिच्छति पिपासति, पिपासतु पिपासत् , पिपा. सत्, पिपासांचकार, पिपास्यात्, पिपासिता, पिशासिप्पत्ति, अपिपासिम्परा, मपिपासीत् । मारमने पद में जैसे लम्-सम्भुमिच्छति लिप्सते लिप्सताम् लि. प्सेत, मलिप्सत, लिप्साय, लिप्सीर, लिप्सिता, लिप्स्यते मलिप्स्यत, मलि- सिरहामातुमिच्छति-जिहासते, जिहासताम, जिज्ञासत मजिज्ञासत, जिहा. सांचोर, निवासिपीट, शिशासिता, जिहासिम्यते, अजिहासिप्यत, बजिहासिध। इसी प्रकार आठ अन्याय में आये हुए सप धातुओं के समस्त रूप ललकार के यहां दिखाये हैं शेष उपरोक क्रमानुसार अपनोपूरिसे लेजाओ। परन्तु यह यानरहे किसा, भु, स्म, ए धातुओं के समान पारमनेपदी में होते हैं। अथ यहन्तमक्रियापदर्शक एकादशोऽध्यायः । पास्त प्रक्रिया, (Frequeutative verbs) भ्रम् मौर करकोछोड़कर हमादि और एक खरयाली धातुसे पोनः पुम्च (पारम्बार) या अतिराया (अधिकता) पोतन करने के लिये धातुको हित्यकर और या प्रत्ययलगाकर बनाते हैं इनके का दशौं लकारों में आत्मनेपदीही इस प्रकार चलते हैं जैसे पुनः पुनः भतिशपेन षा भवतीति चोभूपते घोभूयता, बोभ्येत, अपोभूपत, पोभ्यासके, घोभापपोष्ट. धोभायता, पोभूयिश्यते यचोभूपिम्पत, अषोभूपिर भतिशयेन वर्तते इति परीवृत्पते, परीवृतांचक्रे, परीवृतिता अपरीतितर) विशेष धातुओं के यात कपातकरने केलिये अएम आयाय देशोषहां पर यह भी पास होजायगा कि, फिन २ घातुओं के रूपस प्रक्रिया में नहीं होते [६] द्वादशोऽध्यायः। अथ * यलुगन्तमक्रियामदर्शको द्वादशोऽध्यायः । यह लुगन्त (Frequentative verbs rejecting यह प्रक्रिया उप- रोक्त अध्याय केही अर्थ घ नियमों परं बनती है, केवल भेद इतनाही है कि रूप परस्मैपदीही होते हैं और य फालुक् हो फर ईद विकल्प होजाता है जैसे अति शयेन पुनः पुनर्वा भवतीति योभवीति, योभोति, घोभूतः योभुवति, योभूयात्, घामधीतु चोभातु: धोभषाञ्चकार-मास; लहि अवोभवीत् अवोभोत्; योभूयात्, चोभविता, घोभविष्यति, अवीभविष्यत्, अवोभूवीत, अवोभोत् । स्पर्ध सङ्घ-पास्पर्धाति पास्पर्धि, पास्पर्धः, पास्पर्धति, पास्पर्सि इत्या- दिलहि अपास्पत् अपारपर्द, अपास्पाः, पास्पर्धाशकार, पास्पर्धिता, पास्पर्धि- प्यति, पास्पर्धातु पास्पर्धालु अपास्पर्धात् अपास्पर्धिधाम् , अपास्पर्धियत् १०१ गाधू प्रतिष्टादी. जागाद्धि जागाधीति जागाधीतु जागाधु, लहि अजागाधीत् अजाधात् अजागादाम् लुरि अजागाधीत् अजागाधिष्टाम् । नाथ ना याच्मादी नानाति नानाथीति नानात्तः ३० दध धारणे दादा दादधीति, लुहि भदादा (द) धीत् । मुदह मोमोत्ति मोमुदीति, मोमोदाञ्चकार, मोमादिता, लहि अ- मोमुदीत् अमोमोत् अमोमुताम् अमेोमुदुः लुङि अमोमादीत् । गम्लगती जा मोति जङ्गन्ति, लकि अजगमीत् अजगताम्, अजनमुः लुडि अजङ्गमीत् अजङ्ग- मिष्टाम् इ० चरगतिभक्षणयोः चन्चुरीति चञ्चूर्ति, अचञ्चुरीत् । खनु अब. दारणे खिोदनाचहनोति चहन्ति चहात चङ्ख्नति लकि अचानीत खुडि अवध (ला) नीत् जिस्वप्शये सापपीति सास्वप्ति, लडि असास्वपत् सास्वप्यात आशिषि सामुन्यात लुधि असास्चिस्थापीत् ऋतुपर्तने पतीति, परिवृतीति, घरीघृताति, वर्वति, चरियर्ति, वरीयर्ति, यवृतःवर्वर्तामासवर्वर्तिता, पर्वतिप्यति, अवर्वर्तीत् अपतीत् अवर्चत । डुछ करणे चर्करीति धर्कति चरिफर्ति, चरी- कति चतः चर्फति, चर्फराञ्चकार, चर्करिता, अचर्करीव, चर्षयात् आशिषि चर्कियात् कि अचारीत् विक्षेपे धाकर्ति चाफरीति लकि अचाकरीत् अचाकः अचाफातीम्, अचाकरः लुडि अचाकरीत् एवं तृप्लवनसन्तरणयोः तातर्ति, तातरीति, तातीतः तातिरति लहि अतातरीत् लुछि अतातारीत् मह उपादाने जाग्रहीति जाग्रादि, जागृढः, जागृति, अजामदीत्। प्रच्छशीप्सायाम् पाम विद्यार्थियों को विदित हो कि यह प्रक्रिया रूपभेद, और रूप विलक्षण होने के कारण और प्रक्रियाओं से कुछ लिए है अतएव साधारण रीति से इस अध्याय फी रूप प्रक्रिया को समझ लें इसमें अधिक अपनी शुद्धि को भ्रमित करना आवश्यक नहीं क्योंकि संस्थत घोलने तथा शाखादि समझने के लिये इन रूपों की कुछ अधिक अपेक्षा नहीं है।

[२] व्यावहारिकसंस्कृतप्रवाधः। च्छीति पायष्टि पाप्रष्टः पामच्छति, प्रामश्मि प्रामच्छ पानमः लोटि पानच्छतु पाप्रष्ट पामयाम् पाप्रच्छतु पाप्रति लङि अपापट् अपाप्रच्छीः अपाप्रष्टम् । मूी मोहसमुच्छाययोः मोमछाति मोमेतिमोमूतः मोमच्छति मोमुच्छाशकार मोमूर्षियता, मोमच्छीतु मोमोतुं लछि अमोमूच्डीत् मोमूप चीन, हाडे अमोमोच्छीत्, अमोमूस्टिाम् अमोमूच्छिप्यत् इत्यादि । अथ नामधातुप्रक्रियामदर्शकस्त्रयोदशोऽध्यायः । संशा घ अव्ययों से क्यच्, फ्यड्, काम्यच, णिच् और क्षिप् प्रत्यय लगा कर कती की इच्छा, यतीय आचरण, करना आदि थर्थ चोधन करने के लिये जो धातु यनाई जाये वह नाम धातु कहलाती है विशेषता यह है कि जो नाम धातु काम्यन् (काम्य ) क्यचू (य) और किम् (०) प्रत्यय लगाकर बनती हैं ये परस्मैपदी और क्यडू (य) प्रत्ययवाली आत्मनेपदी और णिच् (इ) प्रत्यययाली उभयपदी होती है कम से उदाहरण देखो जैसे आत्मनः पुत्रमिच्छति (इच्छा) पुत्रीयति (क्यच्) पुत्रकाम्यति (काम्यच्), नमः करोतीति नमस्पति (क्य) चिरंकरोतीति चिरयति (णिच् ) शब्दं फरीतीति शब्दायते क्यइ! प्रणं फरोतीति प्रणयति-ते [णिच् ] रासम इव आचरतीति रासमायते [क्यह विष्णुमिवाचरतीति विष्णूयति द्विजम् (फ्यच्), कृष्ण इव भाचरति कृष्णति (कि। ध्यान रहे कि उपरोक धातुओं के रूप मायः भ्वादिगण फे से होते है। जैसे तपः करोतीति तपस्यति, तपस्येत्, तपस्यतु, अतपस्यत्, तपसा- म्यभूय इत्यादि, तपस्यात्, तपसिता, वपसिप्यति, अतपसिष्यत्, अतपसीत् , अतपसिष्याम् । अथात्मनेपदप्रक्रियामदर्शकचतुर्दशोऽध्यायः । इस प्रक्रिया में यह दिखाया है कि धातु चाहे जिस पद की हो परन्तु युछ उपसर्गों के लगने से चाहे उसका अर्थ यदले या नहीं सदेव आत्मनेपदी ही रहेंगी। जैसे नि+विश् (आई हुई सेना का उहरना); वि, पार, अव+ो (पंचना, धात्यर्थ, मोल चुकाना), वि, परा+जि (जीतना, हारना); मा+दा दिना परन्तु जहां फैलाना चीरना प अपना मुखादि वाना अर्थ हो वहां परस्मैपट होता है जैसे सिंहोमुखव्याददाति वैद्यास्फोटकं ध्याददाति; अगु, परि, भा और सम्+की [धात्यर्थ] परन्तु कुजनार्थ में सम्+ो परस्मैपद होता है जैसे संमीदति चकम् । आ+नु प्रच्छ [धात्वर्थ] में; सम्, अय, म, . चतुर्दशोऽध्यायः। [३] वि+स्था रहना, ठहरना, इज्जत पाना १०} उत्+स्था प्रयत्न करना जैसे मुक्ता बुत्तिष्ठते-यततेइत्यर्थः; परन्तु जहां उठना अर्थ है वहां परस्मैपद होता है जैसे शासनादुत्तिष्ठति विरतप[दीप्त होना चितपते; उप+स्था [देवपूजन, मिलन या मैत्रीकरण] अर्थ में जैसे विष्णुमुपतिष्ठतेवैष्णवः, यमुनामुपत्तिष्ठते गङ्गा, -साधुमुपतिष्ठतेसाधुः, और जहां कुछ धन लाभेच्छा प्रकट हो यहां विकल्प से आत्मनेपद होता है जैसे धनिनमुपतिष्ठते [ति भिक्षुः धनलाभे. च्छया धनिसमीपंगच्छतीत्यर्थः । आ+हन और यम् { अकर्मकार्थ में ] परन्तु सकर्मकार्य में परस्मैपद होता है जैसे कूपाद्रजमायच्छति [खींचना फैलाना), आहन्तिशत्रुम् । परन्तु जहां स्वागही फर्म हो वहां आत्मनेपद होता है जैसे यायच्छते पाणिमात्मीयम् , आहतेस्वीयं शिरः १०७ अप+ { किसी चतुष्पा- दादि जीवों का यातो प्रसन्न होकर या भोजन की तलाश में या लेटने के लिये पृथ्वी का खोदना इस अर्थ में ] जैसे अप्रस्किरतेपोहएः, कुक्कुटोभक्ष्यार्थी, भ्या आश्रयार्थीचः सम् + गम् और श्रु साथ आना, ध्यान देना [अकर्मकार्थमें) परन्तु सकर्मकार्य में परस्मै० होता है जैसे सङ्गच्छति मित्रम् , संशृणोति शा- खम + हे (स्पर्धा करना) जैसे मल्लमायतेमालः, और किसी अर्थ में परस्मैपद होता है जैसे पिता पुत्रमाह्वयति; केबल फ्रम् धातु और उप, परा उपसर्ग के साथ (वृद्धि, उत्साह और अप्रतिवन्ध अर्थ में) जैसे सतां श्रीः कमते, वर्धतइत्यर्थः अध्ययनाय प्रमतेछात्रः ( उत्सहने ), शास्त्रेपुकमतयुद्धिः (न प्रतिहन्यते); आ+ क्रम् (उदय होने अर्थ में ) जैसे आक्रमते सूर्यः (उद- यतइत्यर्थः); यि+क्रम् (पादविक्षेपार्थ में) जैसे साधु विक्रमतेघाजी (वल्ग- तात्यर्थः यलाप्लुतगती) विकामति सन्धिः (द्विधाभवतीत्यर्थः) , उप+फम् (भारम्भा में) जैसे प्रकमते उपक्रमते या भोक्तुम् (आरभतात्यर्थः), अप+ शा (मना करना) उक्तमपज्ञानीते; सम्, प्रति+शा (स्मरणार्थ छोड़) जैसे शतं संजानीते (अपेक्षते), शतप्रतिजानौते [अहीकरोनि ], स्मरण में जैसे पुत्रं सं. जानाति, प्रतिजानाति या स्मरतीत्यर्थः पद धातु (भासन, सान्त्वन, शान, गज, विमति, गर्धना और मनुष्यों के एकत्रित होकर उच्चारणा करने में) जैसे शास्त्रेवदते (भासमानामचीति) भृत्यानुपपदने (सान्त्वयति) शायदते (जानाति), क्षेमेवदते (यतते) क्षेत्रेवियदन्ते, उपघदते (मार्थयते) संघवदन्ते बाह्मणः सम् +7 (प्रतिमार्थ में) जैसे शतं सङ्गिरते (प्रतिजानीत); उन्+चर (सकर्मक) या सम्+चर (तृतीया के साथ) जसे गुस्यवनमुधरते उलंघय. तीत्यर्थः], रथेनरचरते; अकर्मक से जैसे उभरतिधूमः । उप+यम् [विवाहा- र्थ में] मुलक्षणांकन्यामुपयच्छते; युज् धातु निर, दुर, सम् उपसर्गों को छोड़ प्रत्येक उपसर्ग के साथ में जैसे प्रयुक्तो उयुटते इत्यादि परन्तु जहां यम, पात्रों के साथ इनका प्रयोग हो यहां परस्मैपद होगा जैसे यज्ञपात्राणि प्रयुनक्ति।

[४] म्यावहारिकसंस्थतप्रबोधः। अथ परस्मैपदमक्रियापदर्शकः पश्चदशोऽध्यायः । - परस्मैपद प्रक्रिया में यह दिखायागया है कि धातुचाहे जिसपद की हो फुच उपसर्गों के लगने से संदेय परस्मैपदीही झगी असे अनु, पराकृन् (नकल करना, रद करना) प्र+यह (तेज पहना), अभि, प्रति; अति+ क्षि (किसी ओरफैकना; रदकरना निकालदेना, तिरस्कार करना,परेकना)। परि +मृपपरिमृष्य (मर्प)ति: (खफाहोना, डाहकरना) यि,मा, परि+रम्टहरना, आरामलेगा, खुशहोना] उप+रम [अकर्मकार्य अर्थात् निवृत्त होना अर्थ में विकल्प से] : बुध युध् नर जन् और अधि+t, म, हु, सुमिरणार्थक मै] जैसे योधयति-भावयति [भापयति], द्रावयति [विलापयति] सापयति शिन्दयति] अधातु छोद घेधातु जो निगलना और चलना अर्थदिस्नाती है प्रेरणार्थक मैं परमपद होती है। . 54 अय वाच्यमदर्शकः पोदशाऽध्यायः । १ जिन चाक्ष्यों में कर्ता प्रथमान्त और कर्म द्वितीयान्त भौर किया दशों गणों में कोई सी, फतानुसार पचनादि में होवे कर्तृवाच्य (active roice) कहलाते हैं जैसे देवदत्तः मातरं स्मरति, घय माभगच्छामः । कुछ धातु द्विकर्मक होती है जिनके दोकर्म होते हैं उनमें जोकर्म कि क्रिया से टोफ सम्यरध रखता है [मुख्य वा प्रधान Direot] भौर दुसरा [भ- प्रधान या गौण Indircet] कहलाता है जैसे गोपोगा [गौण] दुग्धं [मुख्य] दोग्ध दरिदो रामान गोपा] धनं मुख्य यात्रते, दुखावपन्दीपच्छि चियशामुजिगभुपाम् नी हवह इत्येते धातवःस्युर्विकर्मकाः १ कर्मवाच्य प्रयोगों में द्विकर्मक धातुओं के दोनोकर्म इस प्रकार विभक्ति पाम है गौणे कमणि दुधादेः प्रधाने नीष्टकवहाम् विभक्तिःप्रथमा क्षेया द्वि- तीच तदन्यता।। जैसे द्विकर्मक कर्तृवाच्य प्रयोग गोपोगांदुग्धंदोग्धि इसकाकर्मपाश्य गोपनगोदुग्धं दुहाते बजाजीय. अजांनाम नर्यात इसका कर्मवाच्य अजाजीवेन भजामामनीयत सारांश यह है फि दुहादि धानुओं के गौणक मैं और न्यादि धातुओं के प्रधान कर्म में प्रथमाधिभक्ति होती है और तदिर कर्म में द्वितीया किमान झाती है पोडशोऽध्यायः [५] कर्मवाच्य [Pauive voice] प्रयोग सकर्मकधातुओं से यनते हैं कर्तृ- पाच्य प्रयोग में जोकर्ता होता है यह कर्मवाच्य में सविशेपण तृतीयान्त हो- जाता है और कर्म सविशेषण प्रथमान्त और इसीके अनुसार क्रिया के वचना- दिहोते हैं और पाक्य में इनफे सिवाय कोई शब्द नहीं बदलता। जैसे धीमान देवदत्तः सदैव पुस्तकं [वि.] पठति [कर्तृवाच्य], धीमता देवदत्तन सदैव पुस्तकं [प्र०] पठ्यते (कर्मवाच्य) कर्मवाच्य क्रियाओं के रूप प्रायः आत्मनेपदी दिवादि गणीधातुओं के से प्रथम चारलकारों में, औरलुङ् लकार के प्र. पु.प. य. को छोड़ शेष ५ लकारों में अपने गुणानुसारही आत्मनेपद में, होते हैं लुङ् लकार का प्रयोग आगे दियाजाता है। जैसे पठ्-~-पठ्यते, पठ्यतां, पठ्येत, अपयन, पेठे, पठिता, पठिप्यते, अपठिप्यत, पठिपोष्ट लुङि अपाठि अपठियाताम् शेषं पूर्ववत् । विशेषकर्मवाच्य धातुरूप जानने के लिये अप्पम अध्याय देयो कुछ धातुओं के अभ्यासाथ लुङ्ग लकार के प्र० पु० एक व० फे-रूप दियेजाते है। स्तु-अस्ताविस्मृ-अस्मारि दा-'अदायिनी-अनायि; ग्रह ~अनादि, दृश्-अदार्श हन-अघानि, अवधि जन-अजनि; लम्-अलामि, अलम्भि गम्-अगमि, क-अकारि इत्यादि । ३ भाव वाच्य (Hatransitive Passive voice) प्रयोग अकर्मक धातु ओं से यनते हैं। अकर्मक क्रियावाले कर्तृवाच्य प्रयोग के जव भाववाव्य में थदलते है तब फर्तासविशेषण तृतीयान्त होता है परन्तु क्रियाकेवल अन्यपुरुष एफ वचन कीही सर्वनरहती है जैसे बालकाः शरते [फर्तृवाच्य), वालको शय्यते; अहं शये मया शय्यते भू-भूयते, भूयताम् . भूयेत, अभूयत, बभूवं, भविता, भविपीट, भविष्यते, अभविध्यत, अमाघि म्य-स्थीयते लुछि अस्थायि इत्यादि केवल अ० पु० एक० वचन में ही रूप चलते हैं। सपितृको देवदत्तो. प्रतिष्ठति [फर्तृवाच्य सपित्केण देवदत्तेनात्र सोयते । इत्यादि जानो। अथ लकारार्थप्रक्रियामदर्शकः सप्तदशोऽध्यायः । यह पहमकिया है जिससे पाक्यों में लकारोंका प्रयोग करना दिखाया गया है। सामान्य रीति से धर्तमानकाल धोतन करने कोलिये लद, और भू तकाल घोतन करने के लिये लट् लिट् और और भविष्यकाल घोनन करने के लिये लद और लट् लकार प्रयोग किये जाते हैं निम्न लिपित विशेषनियम यह यह है १ जय लट् लकार के साथ "स्म का प्रयोग होता है तय भूनकाल चोतन फरता है जैसे सविप्रेभ्यः प्रचुर धनं ददातिल अदात् ||२"माल केसाथल या लुद् लकार तीनों काल घोतन करते है जैसे कन्यं मारनगमः पार्थ । ३"मा" फे साथ विकल्प से लुड् लकार का प्रयोग ताना काल घोलन करना है जमे व्यावहारिकसंस्कृतप्रबोधः। माभूत् शोकः । ४ यावत्, पुरा अध्ययोंके साथ लट् लकार भविष्यार्थ घोतन करता है सः पुगगच्छति [अचिराद्गमिष्यतीत्यर्थः) । ५ कदा, कर्हि के योग में लट् लकार विकल्प से भाविष्यार्थ द्योतन करता है जैसे कदा कर्हिवा आगच्छा मोति नजाने [आगमिष्यामि । ६ यदा, यदि अव्ययोंके योग में विधिलिङ् भविष्यार्थ द्योतन करता है जैसे वक्ष्यामि यदास आगच्छत् [आगमिष्यति। आशीर्वादार्थ में भाशीलिङ् चालोट् लाते हैं जैसे तवसुखं भूयात् भवतुवा । ८ कर्तव्यार्थका जहां उपदेश हो या सम्भावनाहो वहां विधिलिड् लाते हैं जैसे सत्यं घदेत् ९ यदि एक वाक्य में दो मिया एक दुसरी परनिर्भरहों तो दोनों क्रिया भविष्यार्थ दिसाने कलिये विधिलिङ् में प्रयोग की जायगी जैसे यदि प्रियं पदेत् सर्वस प्रियोभवेत् । १० कर्ता की सामय दिखाने के लिये लोट् या विधिलिङ् कोईसा लकार प्रयोग कर सतह से मिन्धुमाप शोपयाणि शोपर्ययथा। ११ दो भूतकाल जो एक दूमेरे पर निर्भग्दों और क्रियाकी अनिष्पनि [असिद्धि] दिसाते हों वहां लङ् लकार प्रयोग होता है जैसे यदि मुहारभविष्यत्तदामुभिक्षप्रभविष्यत् । १२जहां पानः पुन्य वा अनिशायार्थ द्योतन करना होता है यहां केवल लोट् लकार के मध्यम पुरुष एक यचन यहुवचन के प्रयोग [हि. त, स्त्र, ध्वम् ] तीनो कालों तीनों पु. रुपा च तीनों घचनों में किये जाते हैं जैसे पुरीमयस्कन्दलुनीहि नन्दनं मुषाण रक्षानिहरामरामाः। - अथ कृत्मस्पयमदर्शकोऽष्टादशोऽध्यायः । धातुओं में जिन प्रत्ययों के लगाने से संशादि शब्द बनते हैं ये रुन् प्रत्यय और नदन्त सन्द रदन्त कहलाते हैं । १ निमित्ताधं [injcuclinc] पोध कराने के लिये धातु के उत्तर तुमुन् [नुम] प्रत्यय लगा देते हैं जैसे "जि" जेतुम् , भु-भोफ्तुम् , दा-दातुम् , गम गातुम् , परन्तु रूप धनाने में यह ध्यान रहे कि सेट धानुओं के बीच में "" लग जाता है जैसे भू-भवितुम्, कार धितुम् स्पादि। २ पूर्वकाल योध [ पूर्वकालक फराने के लिये अर्थात् जहां एकही कर्ता को दो प्रिया घतलाती हो यहां पूर्व क्रिया के उत्तर "त्या" प्रत्यय लगा देते है परन्तु "नम समान छोड़ और फाई उपसम धातु से पहिले आप तो 'या''ल्य] में यदल जाता है और जहां अमीण और नित्यधीप्सा दिखाई जाती है यहां पहिली क्रिया में 'त्या' की जगह 'अम्' णमुल] भी होता है प्राम में उदाहरण देना जैसे दा-दत्या. स्था-स्थिाया, वच- . अष्टादशोऽध्यायः। [६७] उक्त्वा, गम्-गत्या, नमू समास जैसे अगत्वा, आ+गम्-~-भागस्य आग- स्य, प्रणम्-प्रणम्य । सेट, अनिट का उपरोक्त ध्यान यहां भी रहना चाहिये जैसे वस्-उपित्या, शी-शयित्वा इत्यादि । अभीषण या नित्य घोप्सार्थ में स्मारंमारंनमति शिवें [स्मृत्वास्मृत्वा इत्यर्थः । ३ धातुयों से भूतकाल चोधन कराने के लिये फर्म तथा भाव अर्थ में 'त' प्रत्यय, और कर्ता अर्थ में तवत् ' प्रत्यय होता है जैसे रामेण रावणोहतः, त्ययास्नातम् ; मष्टाविश्वरचितवान् शृ-शीर्णः, भिद्-भिन्न, शुप-शुपका, पच-पक्का, धा-हितम् इत्यादि ४ योग्यता अर्थ बोधन करने के लिये और क्रिया का कर्म बतलाने के लिये धातु के उत्तर 'तव्य', 'अनीय' और 'य' प्रत्यय लगाते हैं जैसे ग्रह- ग्रहीतव्यं, ग्रहणीयं, ग्राह्य धनमेतत् । कर्तृवाच्य प्रयोग में विशेषण [Present particeple] बनाने के लिये परसैपदी धातुओं से अत् [शत], और आत्मनेपदी धातुओं से 'भान' [शान] लगाते हैं इनका लिङ्ग वचन अपने विशेष्यानुसार होता है। यह ध्यान रहे कि इनके रूप धातु के गणानुसार पहिले 'शप' आदि चिकरण लगा कर बनाये जाते है और वर्तमान काल द्योतन करते है जैसे गम् गच्छत् [जाता हुभा] भुज भुअद-भुजानः; दा-ददत् ददान दृश्- पश्यत्, चुर-चोरयत् इत्यादि । कर्तृवाच्य प्रयोग में भूतकाल द्योतन करने वाले विशेषण शब्द Past, Participle बनाने के लिये परस्मैपदी धातुओं से घर (कसु) और आत्मनेपदी धातुओं से 'आन' (कान) लगाते है जैसे श्रु-शुश्रुवम्, भू- घभूधर, घस्-जक्षियर, स्था-तस्थिवम्, गम् जग्मियम और रुच रुरुचाना, युध्-युयुधानः, शिक्ष-शिशिक्षाणः इत्यादि । सगानं शुश्रुवान जगाम । ७ कर्तृवाच्य प्रयोग में भविष्यकाल द्योतन करने के लिये परस्मैपदी धातुओं से 'स्यत्' और आत्मनेपदी धातुओं से स्यमान' प्रत्यय लगाकर विशेषण शब्द Future Participle बनाते हैं जैसे गम-गमिष्यत् , दर-द्रक्ष्यत् , स्था स्थास्यत्, वृत्-वर्तिप्यमाणः, जन्-जनिप्यमाणः, सेक्-सविष्यमाणः । ८ कर्तृवाच्य प्रयोग में कर्थद्योतन करने के लिये धातुओं के उत्तर 'त' (तन) 'अक' (णक) और 'इन्' (णिन्) प्रत्यय लगाते हैं जैसे दा-दात, छ-कत, इन्- हन्त, नी-नायकः -कारकः, पच-पाचकः, जिन्-बद-वादिन् , चस्-चालिन् , दुह-द्रोहिन् । कहीं २ शील अर्थ में भी 'णिन् ' प्रत्यय होता है जैसे त्यक्तुंशीलमस्य स त्यागिन् , भज्-भागिन्, गम्-गामिन् । किसी प्रकार का कार्य अर्थात् धात्यर्थ बनाने के लिये धातु से उत्तर 'म' (घ) 'अ'(अल्) प्रत्यय लगा कर प्रायः पुल्लिह संशा बनाते हैं जैसे - २ به یوي رہے ہیں۔ . [१८] घ्यावहारिकसंस्कृतप्रयोधः । घञ्-पथ-पाकः, त्यन्-त्यागजापः अल्-जि-जयः, स्तु-स्तवः, मो-भयम् इत्यादि। १. किसी प्रकार का कार्य अर्थात् धात्वर्थ करण (ज़रिया) और ओर(तरफ) चोतन करने के लिये धातु से उत्तर 'अन' प्रत्यय लगा कर संझा यनात है भौर ये संज्ञा प्रायः नपुंसक होती है जैसे कार्य में-गम्-गमनम,-भुज्- भोजनम् । करण में नी-नयनम्, श्रु-श्रयणम्। चार भोर में शीशयनम्- भू-भवनम् । ११ कर्म उपपद होने से धातु के उत्तर 'अण' प्रत्यय लगा कर संज्ञा यनाते हैं जैसे कुम्भ करोतीति कुम्भकारस। १२ इच्छार्थक धातु, आइपर्चक शंस, और भिक्ष धातु इनसे 'उ' प्रत्यय होता है जैसे जिगमिपुर, आशंमः, भिक्षुः । १३ भाववाचक संज्ञा यनाने के लिये धातु के उत्तर 'ति' प्रत्यय लगाते हैं जैसे गम्-गतिः, मन्-मतिः, मुम्-मुक्तिः इस्यादि । १४ (अ) जल्प, भिक्ष, कहा लुण्ट, ओर धृड् धातुओं से 'पाक' प्रत्यय होता है जैसे जल्पतीतिमल्पाका, भिक्षाका, लुण्टाका, कुटाका, वराका। (घ) हलन्त शब्द प्रायः किप् प्रत्ययान्त होते हैं क्योंकि उक्त प्रत्यय लोप होनेसे केपल धातुमान सा रूप रहजाता है जैसे चित्रमा विशेषण माजते इति] विमार, भास-भाः, यि पुत्-विद्युत्, प्रच्छ-माद, पत्र-वाफ, परि + मज परिमात् । (स) करण अर्थ में दा, नी, शस, यु. युज, स्तु, तुद्, सि, सिच, मिङ्, पत्, दंश, और नह धातुओं से "प्रन्" प्रत्यय होता है और अर्ति, लू, धू, स. खन, सा, घर, और पून धातुओं से "" प्रत्यय होता है। जैसे दात्यनेनीत दाप्रम्, नेत्रम्, शास्त्रम् , योत्रम्, योक्रम, स्तोत्रम् , तोत्रम् , सेन्नम् , सत्रम्, मदम् पत्रम्, दंष्ट्रा, नधी, और मरित्रम् , लवित्रम्, पवित्रम्, सवित्रम् , खनित्रम्, सहिषम् , चरित्रम्, पवित्रम इत्यादि। १५ यज, याच, यत, विच्छ, प्रच्छ, रक्ष इनसे नड् प्रत्यय और स्थप धातु से नन् प्रत्यय होता है जैसे यज्ञः, यात्रा, यतः विश्नः (प्रतापा) रक्षण और स्पतः।। गौडान्यवायजातः गोविन्दांनिसरोजपटपदोऽयम् । दुर्गाप्रसादसूनुः मुखानन्दायत्रिपाठीति ॥१॥. रसारसाइभूमित, हायने मासितु सहम्यनामके। उशनशि शुक्लचतुर्यो हत्या पूर्णमधार्पयच्छिवाय ॥२॥ समस्तु . .

व्यावहारिकसंस्कृतप्रवोध की शुद्धाशुद्धपत्रसूची । पृष्ठ का समाने समान रोतिति ६५ रुपये " " " " शलादि अशुद्धि. शुद्धि. पृष्ठ का अशुद्धि शुद्धि. ३/२ फुक्षि कुक्षिः ३३१३ चादर चमगादर ४ मन्यते मन्यते ३५.२ फल्यमुत्थाय फल्य उत्थाय मार्टि भाष्टि ४२ स्वपति स्वपिति रौतीति क्षालयसि (क्षालयसि) ४० श्वाविघ श्वाविध रुक्यरिक्षा रुक्परीक्षा ५३/१/५५ रुपये ११ पुरस्कृत्या पुरस्कृत्या- २ पञ्चपञ्चाश- पञ्चपछिमुद्राः पण्डितः पण्डितैः न्मुद्राः आद्यापितु अद्यापितु आधुनिको आधुनिकाः शब्दकरोति शब्दकरोति ६६, जम्बु:-यु जम्बु:-वू पारसिक पारसीक ४ मूलिका,काथली मूलिका १४ श्रुयताम् थ्यताम् ६८/२/पार्करा शर्करा ४शययाच्छादानम् शय्याच्छादन ७० समस्त समस्तु घयति ते घपति-ते, शर्करैरेवा शकरयाचवा वयति ते चयति-ते लेशा लेह्या. २ नवान्यंशुकनि नवान्यंशुकानि शलाद्विद शिरस्त्राणां शिरस्त्राणम् ७२ पितृस्वसा पितृप्यसा तदन्यियात्रा- तदन्यियात्रामय भागिनय भागिनेयः नयं ७३ पुच्या पुध्या १७,तूलेन भृत तूलेन च भृत ७६४ चित्कार चीत्कारः निर्मापयिता निर्मापयितास्मि । पलगण्ड पलगण्ड: ऽस्मि चर्मप्रमेदिका चर्म प्रभेदिकाः स्त्रीयो स्त्रियो रुपीः कपिः २० अपहरत् अपाहरत् विनि मेते विनिमयते २१॥ अरधदः अरघहः ८०२ समापतिति सम् +आ+पतति २३ शृणं ८१ स्तानात् स्नानात् गृहस्थ के स्थान घर्तन ओरवर्तन (सर्वत्र ८३, क्षुद्रराजानः श्रुद्राराजानः कणेरः ४मश्चः ९१४ फोरः मश्वाः ९२ गृहस्थानां गृहस्थानां स्थान दो विशेषाः विशेपाः (सर्वध)[९५/२/ (अमरूद) अमृतफल २६/२पाकाणला पाकशाला इन्तशटवृक्षा दन्तशठवृक्षाः * प्रत्येफ धातु का गण पद दिखाने के लिये सर्वत्र वर्तमान कालिक रूप दिपाये हैं। ::::::: N " " " ७७ ७८ " " " २४/१ गृहम्य और २५॥

. २ - 11 " १ . " [४] पृष्ठ का अशुद्धि. शुद्धि. पृष्ठ का अशुद्धि शुद्धि भीपयत ३०परायण एयम् ४५/प्रे.भापयते ३१५० स्पर्स হণ ४६.५ त्या धत्वा स ९.स ४९/४ अधोध्यत अधा (वि) ५० घृयात् घियात् ३३ नो प्रणार्थक | এখ अएमोऽध्याय अटमोऽध्यायः वनीयते वित्रीयते चहम्यते चहन्यते ४. कुन्तेत् कृन्तत् ३६४ विचेप विचपे भक्ता ५]शसनम् शसनम् तनुयात ,तनुयात् शस्था, शस्ति शंसा, शस्ति, ५५४ जिज्ञासति जिशासते ३७ अराहत असहत ३अलूनात् अलुनात् सर्वघ उडादाजे ५६ तोयलन् तोलयन् . ४.अनात् |आमात् ५९ होते है। उभयपदी उभयपदी होते हैं ईयाज प्याज शुभ और सच् भृशार्थमे मुम् ४१ नन्द निन्दित् ४ घर्ततात् पतताम् . ६५ Pauiro "५ ममीयते ममीयते "गुणानुसार गणानुसार ४४.अजागरीप्यत् थजागरिप्यस् अभ्यासाथ अभ्यासार्थ ४२ पोपते पायते Iatrausitive Intrausitive ४४ शयात् शयीत "गुग्धे दुग्धे ६६ Injeuetiro Infiuitive ६७ | Parteceple | Pariceple " " ६० और रूप " Passive " " " " ब्रम्

Vyavaharik Sanskritprabodh Pratham Dittiyo Bhag

Author
Tripathi., Sukhanand Pandit
Title
Vyavaharik Sanskritprabodh Pratham Dittiyo Bhag
File name
Vyavaharik Sanskritprabodh Pratham Dittiyo Bhag
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2012/08
Publisher
Banaras., Kashi Press
Language
Sanskrit
Pages
301
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312071
Barcode
99999990320895.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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