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Mansa Vadhu
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मानसवधू
मौलिक कहानिया
रामकृष्ण शर्मा
नालन्दा प्रकाशन,
नई दिल्ली -११००३०
प्रथम सस्करण १९९०
प्रकाशक
नालन्दा प्रकाशन
३३/१ महरौली, नई दिल्ली-३०
हिन्दुस्तान प्रिटर्स बाबरपुर रोड दिल्ली
मूल्य
पचास रुपये मात्र
मानस-वडू 20 कहानी का गाडी क्यो स्की सेठ गिरधारी दास भूखे भेडिये नसीरन का बेटा बेटी का बाप पराया धन एक खत एक कहानी १६ २३ ૨૭ ३० ४३ ४९ ५४ ६० ६९ बुखार चाहिए ७४ ८० दान का पात्र सिगरेट की गए बिचौलिया प्रेमिका कहानिया लिखा करता हूँ धन तेरस का दिन सावन पहचान ९५ १०३ ११० प्रश्न १११ ये सभी इन्सान है १२६ छपर फट गया था १३७ गाड़ी क्यो रुकी बेवकूफो के कोई सोंग नहीं होते। यह भी सही है नि मेरे जैसे बेवकूफ हर निगह नहीं मिलते, यानी काठमाई से मिलते हैं । उदाहरण के लिए यही देख लीजिए कि इससे बडी बेवकूफी और क्या होगी कि पादमी भपने को ही बेवकूफ बताए। बात यह थी कि दम्बई एक्सप्रेस, जिससे मैं बबई जाने का विचार कर रहा पा एकदम झटका खाकर खड़ी हो गई । ठीक भाषी रात का समय था, जबकि चलती हुई गाडी में भी डाकुमो के चढ भाने का भय बना रहता है । गाड़ी का किसी सुनसान स्थान में जाना किसी भी भले भादमी के लिए चिंता का विषय हो जाता है और उस व्यक्ति के लिए तो और भी अधिक, जो किसी बैंक मानि के ड्राफ्ट पर विश्वास न करके अपने कोट की जेब मे मच्छी खासी रकम लेकर पलाहो। मामला क्या है यह देखने के लिए मैंने डरते-डरते अपने प्रथम श्रेणी के कपाटमेट के दरवाजे को खोला मोर बाहर को मोर झांककर देखने लगा । एजिन फो भोर कुछ लोग रेलवे को लालटेन लिए हुए फिरते दिखाई दिये। 'खुट-खुट' कापुछ खटका भी मेरे कानो में भा रहा था। जल्दी ही यह बात समझ में भा गई कि गाडी के अगले भाग में पावर हा गया है। प्रत किसी भादमी से पूछार पूरा बेवकूफ बनने की बात मुझे नहीं बची। रेलगाडियो की यह माम मादत है, और इसके विषय मे किसी तरह के शक की कोई गुजाइश जैसाकि मैं ऊपर मज कर पाया हूँ, अपनी कुछ विलक्षण प्रादतों से मैं बहुत परेशान हूँ। पता नहीं, मेरो इन भादतों का प्रभाव मेरे सपक मे पाने वाले लोगों पर क्या पडता होगा, मगर मेरे जीवन क्रम पर सामा पहता रहता है । उन विलक्षण मादतों मे से एक यह भी है कि जहाँ गाडी रुकी, भोर मेरे लिए हिम्मे नहीं है।
६ मानस-वधू के भीतर बैठे रहना मुहाल हो जाता है वास्तविक बात का अनुमान लगा लेने के बाद में इत्मीनान से गाड़ी से उतर पडा। जिधर से 'खुट खुट का शब्द पा रहा था, उघर पहुँच कर देखा । मालूम हमा कि रेल की पटरियो की मरम्मत हो रही है और कुछ मजदूर उस पर जुटे हुए हैं । माह घटो का काम है । इतनी देर मे तो मेरे जैसा भ्रमणाी यहां के मास पास के इलाके मे घूमकर चारो मोर के चार कोस की खबर ला सकता है। माह ! क्या ठडी हवा चल रही है, और सामने का बाग तो चांदनी रात म मानो मुझे बुला हो रहा है मैं बारा में पहुंच गया और देखा कि बीच बागम एक झोपडी है-शायद माली के लिए बनी हुई है। मैंने उससे पूछा- 'कहो जी, क्या-क्या है, तुम्हारे वागम" वह उठकर पहले तो मुझे घूर घूर कर देखने लगा । फिर बोला -"लीची है, माम है, जामुन है बताइए हुजूर को क्या चाहिए ?" मैंने कहा--'मोह | तो सब फल एक एक ले मामो। मैं इस बात की खोज करना चाहता हूँ कि इस बाग मे सबसे मोठा फ्ल कौन-सा है, और तुम्हें इस साल कितना लाभ होगा? उसने परी मोर पाश्चय से देखा, फिर गरदन मटकासा हुमा एक भोर चला गया । मैं उसकी छोडी हुई खटिया पर जाकर इट गया। सामने ही उसना हुक्का रखा था। एक बार मन म विचार माया कि इस हुपके का 'टेस्ट' भी किया जाए मगर पिर विचार माया कि यह अनुचित बात है। हमारे भारत मे जाति गत विधारो का वैसे ही काफी बोलवाला है। यह बात नहीं, कि मुझे यह ख्याल भाषा हो नि माली कुछ नीची जाति का होगा, स्वाल यह था कि माली यह पक्षी मामानी से स्थाल कर सकता है दिवाबू साहब ही कहो हरिजन न हों। यद्यपि मुझे हरिजन कहलाने म कोई प्रापति नही, पात कि उनकी तरह कोई विशेष साम ममें कहीं पर प्राप्त होने लगे। पोही देर बाद फल मा गए और मैंने पहले सीची चली। घखने बाद मैं माली से लीची रे जम मरण स्वाद सरीतारी के भाव, विक्री के माय मादि के बारे में चर्चा करने लगा मौर जब इस बात के बारे में पूर्ण सतोप कर लिया रि मारत में बनने वाले विश्वकप म लीची के सवध मे मेरी जानकारी पाभारत मानस वधू - सरकार अवश्य लाभ उठाएगो, तो मैंने जामुन छाई ही इसी प्रवल पर एक तीखी-सी चीख, जो निश्चय ही रैन कारजित दो। मैंने फलो को जहां का-तहा छोड़ा मोर खडा होते ही एकदम घूम कर अपन उस मम्पास का लाम उठाया, जो मैं दौड प्रतियोगिता के लिए मिडिल के दरजे में किया करता था। पोछे से माली के कुछ विशेष शब्द सुनाई दिये, जिनका प्रय यह था कि यह मुझमे कुछ पैसे चाहता था, लेकिन मुझे अब इतनी फुरसत कहाँ थी। दूर से ही मैंने देखा कि गाही खिसक रही थी मेरे पहुचते पहुचते कम्बरन तेज हो गई और जब मैं बिलकुल पास पहुच गया, तो इतनी तेज हो गई कि यदि मैं उस पर चढने की चेष्टा करता, तो जरूर गाडी को फिर रुकने के लिए मजबूर होना पडता। मैं खडा खडा ताकता रहा और एक एक करके गाडी के सब डिब्बे मुझे छोडकर चले गये। मैंने चिल्ला कर ड्राइवर को अपनी उपस्थिति की सूचना देनी चाही यानी मापने ध्यान दिया---चिल्ला कर। "मोह । मैं भी कितना बड़ा बेवकूफ हूँ" कहकर भी मेरी तसल्ली नहीं हो पाई। मय जाता कहाँ ? क्या करूं? मेरे उस सामान का क्या होगा, जो गाडी म ही रह गया है ? भनेर प्रश्न मेरे मस्तिष्क मे भाय भोर पले गये, ठीक उसी तरह, जैसे किसी लापरवाह बेटे के काना म उसके मकलमद बाप के शिक्षात्मक शब्द पाते हैं और दूसरे कान से निकल जाते है। मचाना जेवो पर हाप गया। वहां पर मरा पस तपा रपम सुरक्षित थी। सोचा--'चलो, यह भी सैरियत हुई । सामान तो गया, मगर सामान खरीदने की । पाक्ति नहीं गई ! फिर विचार भाया कि क्यो न पटरी-पटरी चला जाए हो सकता है बल्कि अवश्य ही कोई न कोई स्टेशन इम पटरी पर पलार मिलेगा ही। वहाँ से कोई दूमरी गाडी पकही जा सकती है मौर अगले स्टेशन पर अपने सामान के लिए | फोन किया जा सकता है या तार दिया जा सकता है। अपना क्त्तय स्पिर पर । मैं गाडी ये भागते हुए मस्तित्व के पीछे सतोपर साथ चलने लगा। ४ दोनों तरफ पहाडिया मा गइ । घरे म पहाडिया बसवर भूतों की छापा की साह दिसाई पहने नगे।भी भी कोई कोई झाडौं मर मामन सिो भया- - ५ मानस-या " ना जातु का रूप धारण करके दांत निपोरने लगती। में थोड़ी देर सहम कर खड़ा हो जाता तो मानो वह हंस कर कहने लगती-"जाइए, तशरीफ ले आए। पाप तो बहे डरपोक हैं।" इसी तरह रुकता ठहरता, मैं माखिर एक स्टेशन पर पहुंचने में सफल हो हो गया। मालूम होता था कि वह कोई गांव का स्टेशन है, क्योकि सारे प्लेटफार्म पर केवल एक ही बत्ती टिमटिमा रही थी। जब मैं उसके माफिस मे घुसा, तो देखा वहाँ पर एक वयोवद्ध नाटे से स्टेशन मास्टर बैठे थे। मैंने सकोच के साथ कहा- देखिए, मैं शरीफ प्रादमी है।" स्टेशन मास्टर ने गौर से मेरे चेहरे की तरफ देखा भौर बोले-"फिर' "फिर निवेदन यह है कि यहां कुछ मील पर गाठी प्रधानक ठहर गई थी। मैं उससे उतर पड़ा था और " 'एक ही सांस मे मैं सारा किस्सा उनके सामने सुना गया। सुनने के बाद उहोंने फिर ध्यान से मेरा चेहरा देखा मौर बोले- "पबराइए नहीं मैं टेलोग्राम किए देता हूँ, आपका सामान जहाँ भी गाडी रुकेगी, वहीं पर उतार लिया जाएगा। मुझे आपके साथ पूरी हमदर्दी है । आप यह मागम से रह सकते हैं। अगली गाडी क्स इसी वक्त रकने की सभावना है "रक्ने की सभावना है, ' मैंने पाश्चय से कहा- तो क्या कभी कभी गाड़ी रुपती भी नही ?" स्टेशन मास्टर में कहा-'जी हा यह भी कभी साल मे एकाध बार हो जाता है। एक मील पर ही अगला स्टेशन है इसलिए कभी कभी खिसक्ती हुई वहाँ तक पहुंच जाती है।" अपने पापो स्टेगन की च पर डाला मोर लेटकर स्वयं अपनी भालोधना करन लगा। बहुत देर तकनीत नहीं भाई भौर जब पाई तो ऐसा सोया कि सुबह दस यने प्रांखें खुली । प्रांग खुलत ही देखा कि स्टेशन मास्टर साहब मेरे चेहरे को तरफ गौर से देख रहे हैं। मैंने नमस्कार करने के बाद पूछा- भाप क्या देग रहे ये" स्टेशन मास्टर ने लापरवाही से उतर दिया-"कुछ नही, मैं यह देख रहा पाकि देयू, सोए हुए मादमी पर देखने का कोई प्रसर होता है या नहीं। अब मैंने स्टेशन मास्टर साहब के चेहरे की तरफ गौर से देखा। वहाँ कोई मसापारण बात नजर नहीं पाई। उहाने नाय को पूछा और हम दोनों स्टेशन मानस-यधू 8 ?" माफिस में बैठ गए। एक कुली पाय लेकर माया मोर जब मैंने एक धूट लिया, तो कुछ ताजगी का अनुभव हुपा ! मैंने पूछा-हां, मासपास घूम माने में तो कोई हरज नहीं है "कुछ नही," वह मुस्करा कर बोले-"यह जगह भाप जैसे भादमियो के लिए बहुत उपयुक्त है।" "मेरे-जैसे भादमी के लिए " मैंने घबरा वर प्रश्न क्यिा-क्या आपने मेरी कुछ विशेषता नोट की है?" 'जी नहीं," स्टेशन मास्टर ने कहा-"माप मे यही विशेषता है कि माप कोई विशेष प्रादमी नहीं हैं। इस इलाके में इस तरह के लोगो को बहुत पूछ होती है।" में यह स्वीकार करता हूँ कि स्टेशन मास्टर की बात मेरी समझ में उस समय तक ठीक तीर से नही माई, जब तक कि मैं उनकी बात को पूरी तरह समझन योग्य नहीं हो गया । यह भी बताना प्रासगिक न होगा कि जब में उनकी बात समझने के योग्य हुपा, तो मैं उनसे बहुत दूर था । चाय पीकर घूमने चला । यह मेरी मादत है जैसाकि मैं पीछे कह पाया , कि मैं पैरों को बराबर हरकत देते रहने के पक्ष मे हू । स्टेशन के उस पार की एक छोटी-सी पहाड़ी पगडडी से निकल कर मैंने देखा कि दूर से एक युवती अपने बगल मे घरा दवाए हुए चली भा रही है। उसे पास से देखने का कुतूहल मेरे मन में उठा और मैं उसे चेष्टा करने पर भी दवा नही सका। मैं कुछ ही देर मे छलांग भरना हुपा उसके पास जा पहुंचा। उसके घुटनो तक गई हुई घोती की सोध पीछे की भोर गई हुई थी मोर वक्ष ढाकने के लिए उसने एक कपडे को पट्टी यथष्ट समझी थी। मुझे देखकर वह मटकी मोर लजायी। फिर इस प्रकार मानो उसने कुछ देखा ही नहीं, वह अपने रास्ते पर चल पड़ी। मैं ठहर गया पा मोर हाफ रहा था। इसी अवस्था म मैंने उस मप्रनिम सौदय को निरसा जिसे मैं यदि कोगित करता, ना सपने म भी नहीं देख सकता पा। इस पहाडी और जगली प्रदेश में भी एसी सुदरता निवास करती होगी, यह कभी कल्पना में भी न प्राया था। मैंने उसके पग से पग मिलाते हुए पूछा--'कौन हो तुम ?' यह फिर रुकी। एक बार मेरी मोर देखकर वह मुस्कराई और फिर अपने ।
१० मारस-वधु राम्ते पर बढ चली। मैं समझा शिशायद मेरी बात उमके पल्ले नहीं पहो। उसकी पतली पतली लबी उगलिया तथा श्याम सलोना मुह रह रह कर मुझे माकर्षित करने लगा और मैं उसके साथ साथ ही पाता रहा। लेकिन उसने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया। एक बार यह देखकर कि मैं उसके साथ साथ चल रहा है वह निश्चित हो गयी और इस तरह निभय होकर चलने लगी, मानो चौकीदार साप चल रहा हो। एक पेडो के झुरमुट को पार करके मैंने देखा कि एक छोटी सी बस्ती है, जिसम कुछ गिनी चुनी झोपडिया है । उही मे एक झोपड़ी के दरवाजे पर पहुचे पर उसने फिर नजर फेरकर मेरी पोर देखा मुस्कराई और भीतर चली गई। माप स्वय सोच सकते हैं कि मेरी हालत उस समय कैसी हो गई होगी। इस बात का पूरा अनुमान उस समय तक नहीं हो सकता जब तक कि स्वय माप पर यह कष्ट कभी न पडा हो- जाके पांव न पटी विवाई, सो क्या जान पीर पराई। 7 मन ही मन में कल्पना करता रहा कि यह शहरी लिबास मे कैसी लगेगी। क्या इसकी इस मुस्कराहट में मेरे लिए मोन निमंत्रण है ? क्या मैं सुदरता को इस देवी को अपनी बना सकता है। मगर इस देश में नरबलि होती हो, तो मैं इस देवी के मम्मुख प्रपना शोश तक बलिदान देने मे न हिचकू । विचारा के इसी ऊहापोह मे मैंने उस बस्ती मे प्रवेश किया। कहने को तो यह वस्ती पो किन्तु वहाँ की झोपडियो की कुल संख्या माठ थी। भ्रम न हो इसलिए मैंन सूम प्रच्छी तरह मांखें पाड कर देख लिया कि उनमें मुश्किल से पच्चीम-तीस प्रादमी हागे । बस्नी के बीचो बीच ककड पत्थर जोडकर एक चा-नीचा-सा चबूतरा बनाया गया था ! उसपर कुछ व्यक्ति बैठे हुक्का गुडगुजा रहे ५। मुझे देसकर वे लोग सहसा उठ खडे हुए और मैंने देखा कि उन सबकी पाने मुभम कुछ पूछ रही थी। शायद व जानना चाहते थे कि मैं कौन ह। मैने माग बढकर कहा- मैं एक परदेसी हूँ मोर भाप लोगो से कुछ बात परना चाहता हूँ रहाने अपनी भाषा म मुझे अभिवादन दिया। फिर उनम से एक व्यक्ति, जा टूटी फूटी हि दी बाल लेता या पास प्रारर बोला- हुज़र वहां से भापती 1" मानस वधू ?" मैंने उसे बता दिया और एक गिलास पानी लाने के लिए कहा । इस पर वह उसी झोपडी की पोर चिल्ला कर पुकारने लगा-"बिटिया ।" 'बिटिया वही भाषण थी, जो मुझे वहाँ तक खींच लाई थी। तब तक वहाँ कुछ बच्चे और कुछ स्त्रियां भी मा जुटीं। वे सब उस चबूतरे के तीन पोर खडी हो गई, वह "बिटिया' भी (मेरी नही) भीतर से निकल पाई और न जाने किस तरह वह मेरे दिल का भाव समझ गई थी, क्योकि उसके हाथ में एक कटोरा पानी का भरा हुमा था। मैंने उसके सौंदर्य के प्रभाव से कापते हुए उस कटोरे का उसके हाथ से लिया भोर दिल को ठडा करने के लिए उसका शीतल जल एक ही सास मे चढा गया। इसके बाद मैं उस चारपाई पर बैठ गया, जो उस युवती का पिता मेरे लिए लाया था। मैं सच कहता हूँ कि मगर 'लव एट फस्ट साइट' कोई चीज है, तो वह यही है, जो उसकी उस प्यारी-प्यारी 'बिटिया' को देखकर मेरे दिल के भीतर की परतो मे उस समय पैदा हो गयी थी, जबकि मैंने पहले-पहल उसे देखा था। मैंने उस पादमी से पूछा-"माप लोग यहा पर गुजारा से करते हैं उसने बताया---'भाप जैसे साहब लोग यहा कभी-कभी शिकार के लिए माते हैं मोर हर तरह का शिकार करते हैं। हम लोग उनको सहायता पहुचाते हैं। मोर वे हमे इसके बदले में कुछ दे जाते हैं। या फिर हम स्वय भी कोई एकाध जानवर मार लाते हैं और हिंसक पशुपों की खाल रेल पर जाकर बेच देते हैं मैंने उसे बताया कि मैं काफी प्रमोर मादमी हू मोर मुझे कोई शिकार वगैरह तो नहीं करना, मगर यदिधे मपनी लड़की को शहर में भेजना चाहें तो मैं ले जा सकता हूँ और उसके लिए उन लोगो को मच्छी रस्म भी दे सकता है। उसने कहा-"मला जी, यह कौन नहीं चाहेगा कि उसकी लडकी शहर पली जाए। पर आप इसके लिए क्तिना दे सकते हैं?" मैंने सिर सुजलाते हुए उस लड़की की पोर एक नजर डाली पोर यह पम्बस्त फिर मुस्कराई । मैंने कहा-'पांच सौ।' यह बोला-'भाबू जी, भाप भी क्या बात कहते हैं ! पाप सो?" मैंने कहा-'अच्छा तो छ सौ सही । बस, मेरे पास इतने ही हैं।" वह पोर भी प्रत न होता हुमा बोला-"प्रव, वापू जी, हम मापसे इनकार रिस तरह कर सकते है । हम तो पैदा हो पाप लोगो की सेवा करन के लिए हुए १२ मानसन्य , हैं। हमारी हर चीज मापरी है, हम भी प्रापके हैं, लरकी मापकी हुई।" इसके बाद उन लोगो मे मापस मे अपनी भाषा मे न जाने कितनी देर तक वाद विवाद होता रहा और वे लोग मेरी मार इशारा करते हुए जोर-जोर से बातें करते रहे। फिर वही पादमी जो मेरे पास से उठकर गया था, मेरे पास माया भोर बोला-"याबू जी, सब मामला पक्का हो गया है। पाप छ सौ रुपण देंगे और हम आपके साथ अपनी बेटी का ध्याह मार देंगे।" मैंन प्रसनता थे वेग को छिपा कर पूछा--"कब?" "जब आप कहें । माप तो परदेसी है और दूर देश के रहने वाले है । किर कब-कब यहा पाते हैं। प्राप ममी रुपया भर दें, तो अभी से शादी का काम मारम किया जा सकता है।" मैंने खबरदारी बरतते हुए कहा-"देखो ता, में कोई पागल नही है, न ही उसना बेवकूफ है, जितना कि लोग मुझे समझते हैं। पहले शादी, फिर रुपया। हा, रुपया मेरे पास है और वह आपको तुरत मिल जाएगा।" उन लोगों में फिर कुछ गरमागरमी की बातें हुइ मोर वह मादमी मेरे पास भाकर बोला-"अच्छी बात है तो पहले शादी ही सही। भापतैयार हो जाइए. मैंने कहा-"मुझे क्या मालूम, आप लोग यह रस्म किस तरह करते हैं। मैं तो तयार ही हू।" अब मैं उन लोगो को उस घुन पुक के बारे में क्या बताता, जो मेरे दिल में उस समय हो रही थी। मैं देर वहाँ बैठा रहा और उहोने इतनी देर मे मगल-गान जसे गाने मारभ कर दिए और हर भोपडी मे गाजे-बाजे बजने लगे। फिर लगभग एक घटे मे वे दुल्हन समार लाये, जिसका घूघट फ्म-से-कम एक गज लमा तो होगा ही। मोह ! मेरा दिल वल्लियौं उछलने लगा। प्रत मे वह स्वप्न मुदरी मेरी होने जा ही रही है, जिसके लिए मैंने इतनी सी देर म म जाने स्तिने कितम स्वप्न देख लिए थे। एक पादमी, जो बल एव लगोटो पहने हुए था मोर वदन पर जगह जगह निलकों से भरा हुमा मा देवने भालने में पडिन सा लगता था पाया और उमौ चबूतरे पर भाग जलाई गई। भौरतें उस चबूतरे के चारो तरफ बैठ गयीं मोर ढोल बना-बनाकर अपनी भाषा क वे मनोये गीत गाने तगी जिनका एक मक्षर भी मेरे पस्ले नहीं पहा । मगर मेरे मन को मान करने वाली तो वह स्वप्न मानसन्यपू सुदरी थी, जो इस समय घूघट के भीत्र बंद हो चुकी थी। प्रत मै उन लोगो ने मुझे बुलाया, माग के पास बैठाया. मेरे सिर पर एक घटा रखा और फिर उसे उतार कर फोड दिया। यही हरकत उन्होंने मेरी मार वधू के साथ की और हम दोनों को माग के सामने लोवर प्रणाम कराया फिर नौ फेरे फिराये और इसके बाद रोना शुरू कर दिया । औरतो ने ढोल मलग रख दिये भोर छाती पीट पीट कर उस लड़की की भोर शिकायत भरे स्वर म न जाने क्या-क्या सकेत करके रोने वाले गीत गाने लगी। मरदो ने भी अपनी भाखो मे पल्ले दे दे कर पोंछा, जिस से प्रतीत हो रहा था कि उन लोगो को अपनी लड़की के बिछुडने का थोडा गम नहीं था। जहा तक मेरा प्रश्न है मैं तो मन के मोदक फोड ही रहा था। माखिर उन लोगो ने लड़की के पल्ले की गाठ मेरे कोट के साथ बाधी। मैंने नकद छ सौ गिने । फिर वे हम लोगो को उस बस्ती के बाहर तक छोडने भाये, जिसे गाव कहना गलती ही होगी। मैंने रास्ते मे मावर घूघट मे लिपटी अपनी वधू की मोर देख कर कहा- "अब तो धूघट खोल दो। तुम नहीं जानती कि किस तरह मेरा दिल तुम्हारा चांद-सा मुखडा देखने के लिए तरस रहा है।" मगर मेरे बढ़े हुए हाय को उसने बीच म झट दिपा ! वह तो इस समय लाज से ऐसी छुई मुई हो जा रही थी कि एक उंगली भी उस बही चादर के बाहर दिखाई नही पड़ रही थी, जो उसने अपने उस कलेवर को छिपाने के लिए भोट रखी थी। जब हम लोग स्टेशन पर पहुंचे, तो मुझे यह सोच कर वही धरम सी लगी कि स्टेशन मास्टर साहब को किस तरह इस विचित्र घटना की बात समझायो जाए। लेकिन जब वह स्वय ही टहलते हुए मा गये, तो उस वयू की मोर देख फर झट से बोले--"मच्छा तो ब्याह कर लाये हा, हा, हा,माप तो बडे चतुर निकले ! महोभाग्य हैं मापके । अजी प्रसस चीज तो सयोग होता है । जहाँ के लिए बदा रहता है वही होता है अब वो मापको मालूम हो गया होगा कि भारत की रेलगाडी कितनी बढ़िया है जहां रुकती है, मोके से रुकती है।" मैंने हामी भरी। यास्तव में भगवान जब सयोग मिहाता है तो उसे हो उसके निमित्त भी बनाता है।
१४ मानस वधु बहना न होगा कि वह समय भी भा गया, जब गाडी पानी थी भौर मैंने स्टेशन मास्टर साहब को असीम घयवाद देकर उमसे विदा ली। अपनी साथिन के लिए भी मैंने फस्ट क्लास का एक पास बनवा लिया था मोर मन हम दोनो एक मारामदेह हिन्जे मे उस रोमास का मानद लेने के लिए अकेले थे, जिसकी मल्पना से ही मैं विभोर हुमा जा रहा था। लेकिन जब भी मैं बात करने की चेष्टा करता वह मुह फेर कर बैठ जाती, जब भी छूने के लिए हाथ बढाता, वह फुदक जाती। दिल ही दिल में मैंने कहा कि शायद इनके देश की यही प्रथा हो क्योकि हमारे देश मे भी तो स्त्रियों की हालत इससे कुछ अधिक मच्छी नहीं है। मैं कहना चाहता था कि देखो जितना सुदर, शात मोर नीरव वातावरण भपने हृदय के प्रेम को प्रकट व सायक करने के लिए यहां इस प्रथम श्रेणी के डिब्बे में है, उतना दुनिया के परदे पर फही नहीं मिल सकता। मगर कह किस तरह वह तो मेरी भाषा को समझती ही मालूम नहीं होती । भव मेरे दिमाग में यह बात भायो कि भाषा भी कितना बड़ा महत्व रखती है। गाडी एक्सप्रेस थी और बड़ी तेजी से हम दोनों को उस देश की तरफ लिए जा रही थी, जहाँ मैं जाना चाहता पा-यानी बम्बई । सोचा कि कुछ दिनों बबई की सैर करेंगे और हो सका तो इसे कहीं पर मभिनेत्री बनवा दूगा फिर सारी उमर मौज ही मोज रह आएगी। स्त्रियों की लज्जा के विषय में मेरे विचार कुछ अधिक अच्छे नहीं हैं। यह यहाँ की तुफ है कि एक प्रादमी तो मापके लिए जान दिये जा रहा हो, भोर प्राप सज्जा की पुणित सस्था से ही चिपटी बैठी रहें। फिर यह भी एक तथ्य ही है कि हमने सात के बजाय नी फेरे फेरे थे और घडा भी फोडा था। हमने इन बातों को लाख मपनी भाषा मे कहना चाहा, पर उसके कानों पर जू भी न रेंगी। हमने अच्छे पतियो की तरह सतीष किया। माखिर अब वह सदा के लिए हमारी हो गयी थी और हम उसके हो गये थे, और ऐसा हो ही नहीं सकता था कि वह हमेशा हमारे साथ यही बरताव रखती जो कि इस समय रख रही थी। हमने भाखिर उन तमाम कोशिशो को भले मादमी की तरह विलाजलि दे दी मोर धुपचाप लेट रहे। स्टेशन मास्टर से हमने अपने सामान के विषय में एक मेटर सिखा ही लिया था, इसलिए भगने स्टेशन पर यह भी मिल गया। हमारी मामस वधू १५ । ववधू उसी तरह गुमसुम बैठी रही, जैसी बैठी थी। न तनिक भी हिली और न डुली। हमने भी यह निश्चय कर लिया कि अब जब तक वह हम से न बोलेंगी, हम भी रूठे ही रहेंगे। हमने अपना सामान प्रादि लाकर रखा । गाडी फिर चली और हमने माराम से लबी तानी । कई स्टेशन गुजर गये, तब जाकर हमारी नींद खुली। भास खोलते ही जो कुछ देखा उससे जी धक्क-से रह गया। हाय, यह क्या हुआ डिब्बे भर में श्रीमती जी का कही पता नहीं था। सोचा, शायद शौचालय मे हो मगर जब काफी देर तक श्रीमती जी न निकली तो उठ कर माहिस्ता से शौचा- लय का द्वार खोला। पर यह क्या, वह तो एकदम खाली था। हमारी पायें फटी की फटी रह गयी। दिल धक-धर करने लगा और शरीर से पसीना छूट निकला। हमने झट गाडी की जजीर खींची। गाड आया और उसने जो हमारे हाल सुना, तो हंसते हँसते बोला-"महाशय पो पाप सो गये पोर मापको श्रीमती जी मार रास्ते में किसी स्टेशन पर उतर गयीं, तो इसमे हम कर ही क्या सकते हैं। वह कोई बच्ची तो थी नहीं, जो कोई रह चुपचाप फुसला ले जाता । र, भाप मगले स्टेशन पर उतर जाइयेगा। पचास रुपये जुर्माना भाप पर नहीं कर रहे हैं इतना ही बहुत समझिए।" अगले स्टेशन पर उतर कर हमने सामान को स्टेशन मास्टर के सुपुर्द किया भोर स्वय दूसरी गाडी से फिर उसी स्टेशन की तरफ लौटे । रास्ते मे हर स्टसन पर पूछते माये पर किसी ने न बताया कि कोई नववधू उस स्टेदान पर उतरी यो। पाखिरकार जब हम फिर उसी स्टेशन पर पहुंचे जहां से श्रीमती जी में साय गाडी पर चढ़े थे, तो वहाँ के स्टेशन म -र ने हमे देखते ही कहा-"माइए जनाब माप भी वापस मा ही गये। और भी बहुत-से लोग इसी तरह यहाँ वापस मा चुके हैं । जाइए, देख माइए भपनी ससुराल को।" मैं सीधा उस स्थान की मोर गया जहाँ हमारी ससुराल थी। पर मर रस स्थान पर न कोई गाद शेष रह गया था, न बस्ती। केवल उस टूटी फूटी सी भोपाल का पबूतरा भर वहाँ पाको था, जिस पर पड़ी हुई कुछ राख मेरे विधुरत्व की कहानी कह रही थी। - सेठ गिरधारीदास - सेठ गिरधारीदास माज ससार म नहीं हैं, मगर उनरा नाम ससार मे उस ममय तक रहेगा, जब तक चाँद को चांदनी मोर सूरज की घूप है । मैं उन्हें बहुत हीमच्छी तरह जानता था। वह मेरे पडोसी रहे हैं 1 पडोसी भी बहुत से तग करके ही नाम पैदा कर लेते हैं, किन्तु सेठ गिरधारीदास की बात ही मोर थी। वह सूदखोर होने के लिए बदनाम थे पोर सचमुच लोगो से बही सख्ती से सूद वसूल करत थे। मगर मुझे वह हमेशा बिना सूद वे रुपया देते थे। इतना ही नहीं, कभी उहोंने मुझसे कहा तकाजा भी नही किया। वह जानते थे कि मैं एक कहानी कार हूँ। कहानीकार का दरजा उनकी निगाह में ऊंचा था, इसलिए यह मेरी इज्जत किया करते थे । मेरी गरीबी के प्रति उन्हें सहानुभूति थी और वह उसे जब-तब शन्दो मे प्रक्ट भी किया करते थे। उनकी कहानी लिखी जाए, ऐसा वह पई पार मुझसे कह चुके थे, मगर उनके जीते जी उनकी इच्छा पूरी न हो सकी। पाज मैं सोचता हूँ कि उनके ऋण को इसी रूप में चुका दू। हो, तो सेठ गिरधारीदास बल्द वल्लभदास का जन्म १ जनवरी १८९० ईवी को इसी कस्बे में हुमाया। इनके पिता वल्लभदास जी की एक छोटी सी दुवान मनाज मण्डो में थी-जिसम यह जाहे ये दिना मे मूगफली, सिंघाडे और नारदजसी चीजें रख कर बेचते थे। धीरे धीरे तसा करके उ होने कम्पी माइत की एक दुकान खोल ली थी। बहुत से लोगो का खयाल है कि उनको सट्टा खेलने की पादत पी मोर उसमें उहें बहुत-सा रूपया मिल गया था । बात सही पापी यह मुझे नहीं मालूम । मेरा परिचय उनसे तय हुमा जब मेरी चादी हो चुकी थी और मुझे उनसे छ फज मेने की जरूरत महसूस हुई। मने जाकर नमस्कार दिया तो सठ साहब गद्दा ये उठ गये पोर पर छूने के लिए मागे बढ़े। मैंने कहा-"सेठ जी, यहा रत है माप ?'
मास मधू १७ वह बोले-"महाराज जी, सम (सुम) म्हार क्यू माग (माने) लगे मला? सम तो बड़े मादमी हो । सुणा है कि हम तो अखबारों में लिखो हो । फिर तम त बहा कोण (कोन) है कोण है।" फिर मुनीम जी की भोर देख कर बोले- "क्यों मुनीम जी, ठीक है न?" "बिलकुल ठीक ।" मुनीम जी ने फरमाया--"सवा सोलह आने । पावूजी हमारे मुहल्ले में एक ही मादमो हैं-~-वस, हीरा सममिए-हीरा!" मुनीम जी के उत्तर मे में कुछ कहू इससे पहले ही सेठ जी बोले-"देख स्यो देख ल्यो बाबूजी म्हारे मुनीम जी को भी यो ही रुखाल है।" "मेहरबानी है मापकी मार मापके मुनीम जी की।" मैंने कहा। सेठ जी ने मेरी प्रासा करके इस लायक छोहा तो नहीं था कि मैं अपनी मावश्यकता उनके सामने रखू फिर भी मुझे थोडा ढीठ बनकर कहना पसा- "मगर मैं तो बहुत ही गरीब जोय हूँ, सेठ जी! आज कुछ रुपये की जरूरत मा पही तो पापको तग करने चला माया ।" "कोई बात हीं, कोई बात नहीं, बाबूजी," सेठ जी बोले-"ऐसा हो ही जाता है कमी। मुनीम जी, मुनीम जी, याबू जी को नाम पतो लिख के इहें रुपये देदो-जितने ये मांगें।" मैंने जेब मे से दो तोले का लॉकेट निकाल कर यहा-"यह तो कुल दो सोले का है, सेठ जी, इस पर प्राप चाहे जितमा रुपया कैसे दे देंगे!" "बा बाबू जी, तम म्हारा मन खटटा जरूर करोगे !" सेठ जी ने ऐनक के ऊपर से झांक कर कहा-"तुम जरूर म्हारा जी दुखी करके जामोगे। पर सोच लो कि गिरधारीदास इतना बुरा नहीं है जितना लोग उसे कहे हैं।" मैंने कहा-"मगर भापको बुरा कहता कौन है ? और इसमे बुराई की बात क्या है ? माप रुपया देते हैं तो विश्वास के लिए गिरवी रख लेते हैं । इसमे बुराई क्या हुई ?" "पर बाबू जी, थारे (मापसे) ते (मे) म्हारी ना पटगी," सेठ जी बोले- 'क्यों भला ? वे मी सुणते जानो। तम ने सेठ गिरधारीदास को कोरा बेपारी समझा है । पर मैं बता देता हूँ कि भी इसान है। उसके भी दिल है, समझे ? तम किसी दिन उसकी कहानी सुगो तो सारी कहाणी लिखणा छोड के उसकी लिम्षण लगो-हो ।"
मानस-वधु - "अच्छा वो तो फिर कभी सुनगा, माज भाम सौ रुपये दिलाकर छुटटी वीजिए और बताइए कि सूद क्या लेंगे।' मैंने पीछा-सा छुहा कर कहा । 'देख त्यो, देख ल्यो, बाद जो, तम म्हारा मन खट्टा जरूर करोगे । मैंने कह दिया कि मैं न पारी चीज पर न तम से सूद लू', न कभी तकाजा कई । चाह ल्यो चाहे न ल्यो।' कह कर सेठ जी एक प्रकार से रुमासे हो गये। पह एक ऐसी बात थी जिसे उनके इतिहास में एक नया मोर कहना चाहिए। वास्तविकता यह है कि यदि उस जमान म यजूसी की कोई प्रतियोगिता होतो, तो उसम सेठ गिरधारीदास अवश्य प्रथम पाते। मैंने तो उनके बारे में यहा तक सुना था कि वह भूखे मर मर के अमीर हुए हैं। अपने खाने पर भी सब करना उहें एसा ही लगता था जसे वह पैसे की बरबादी कर रहे हो। जो भी हो, उहोंने मुझे रपये दे दिये थे। श्रीमती जी अक्सर मुझ से कहा करती थी- 'पाप बहुत सच करते हैं। जरा गिरधारीदास को देखिए---कोही कोडी जोट कर लखपति बन बैठा है प्राज। श्रीमतीजी के इन सानो से खीझ कर एक दिन मैं सेठ जी के पास पहुंचा भोर बोला-'सेठ जी,माज में भाप का चेला बनने माया हूँ। "तम ? ' सेठ जी ने माश्चयभरी आवाज से अपनी उही ऐनको मे झोक कर रहा -"तम म्हारे चेले बणोग ? भला क्यू मजाक करो हो म्हारा !" मैंने कहा-'सेठ जी, मजाक नहीं, यह सच है। मुझ प्रपने आप से यह शिकायत है कि प्रामदनी से पहले ही सब खच कर देता हूँ। कोई ऐसा गुर बताइए कि पसा वचे।' सेठ जी ने मनमने भाव से दूसरी मोर देख कर कहा-'बाबू जी, का मरोगे पूछ कर? पैसा यू ही नहीं बनता। इसके लिए भी तपस्या करनी पड़ती है। तम यकीन न करना पर तमें मपणे उस्ताद को एक बात बताता है।" 'ठो क्या मापके भी उस्ताद हैं कोई ?" मैंने पूछा। है तो नहीं, पर ये जहर' होने कहा-' उनका नाम पा च दण । पाणी में रहते थे। मैंने सुना कि वह बहन से बचा देते हैं। तब मैं उसके पास गया । जाने पर उन्होंने ममम पाणी को भी बात नहीं पूछी। प्रकले रहत थे। भैरी तरह उनके तो मनीम मी नहीं पा।'
मानस-यभू था- " "प्रच्छा !"मैंने मचरज प्रक भौर इसके बाद उन्होने एर लम्बी कहानी शह कर दी। मगरम कहानी को ध्यान से नहीं सुना। जितना सुनायो उसका सार कुछ प्रस प्रकार एक साता थे-बड़े कजूस। ऐसे कि जूते भी. उनके परी को जगह बगल की शोभा बढाते थे। पेट भर कर खाते भी नहीं थे। बेफिक्री से सोते भी नहीं थे। उमर भर उहोने साप बनकर दौलत की रक्षा की भोर मरने के बाद सरकार ने सब पर कब्जा कर लिया। वारिस संकदो पैदा हुए लेकिन मिला किसी को कुछ भी नहीं। यह कहानी सुन कर मैंने एक प्रश्न किया-"फिर माप इस दौलत को क्या करेंगे ? कुछ खाइए, मोर कुछ खिलाइए न?" 'सोचता हूँ।" सेठ जी ने लम्बी सांस लेकर कहा-"मुनीम बी, भो मुनीम जी उत्तर न मिल सका । क्योकि मुनीम जो यहाँ ये ही मही । मैंने पूछा-"क्या सोच रहे थे माप" "सोच रहा था-" सेठ जी बोले-"कि पाज बायू जी को जसेबी मंगवा कर खिलाऊँ गरम गरम ।" सो तो पापकी मेहरबानी है, सेठ जो," मैंने कहा मैं अपने विषय म कुछ भी कहना नहीं चाहता था। मैं तो सिफ यह चाहता था कि माप कुछ करें-- ऐसा कोई काम जिससे अाप मर कर भी भमर बने रहे। कोई धमाला बनवा 4 या स्कूल खुलवा दें। मनाथालय खुलवा दें। और प्राप चाहे तो सब कुछ करा सकते हैं। और फिर मापको कहानी में लिखूगा।" "सच ?" सेठ जो उछल कर बोले-"क्या सचमुच तम मेरी कहानी लिखोगे?" "जरूर लिसं गा। एसी लिखूगा कि मखबारो के पहले पृष्ठ पर मय आपके पोटो के छपे । मगर माप कुछ ऐसा करें तो सही।" मैंने कहा। सेठ जी इस प्रकार चिल्ला उठ जैसे वह माज ही किसी धमशाला या स्कूल की नींव रखने वाले है ---"मुनीम जो मुनीम जी ।" पौर सामने से मनीम जी पाते हुए दिखाई दिये। लाला जी त्योरी चढा पर मानस-वई बोले--कहां गये थे माप?" "घोस वल्द बुद्धन के यहाँ," मुनीम जी ने हरते हुए कहा। यह उस समय पाप रहे थे और कांपते-कापते उनकी ऐनक जमीन पर गिर पड़ी। "कुछ वसूल हुमा ?" सेठ जी फिर गरजे। मुनीम जी ने उत्तर मे नकारात्मक सिर हिला दिया। इसके बाद तो माना प्रलय ही भा गया। सेठ जी मगे पांव उठ कर चल दिये । उनके पीछे पीछे मैं था। सठ जो ताबड-सोड मागे जा रहे थे। उनकी चाल मे क्रोध और जल्दी के भाव थ। चेहरा तो उनका जरूर देखने लायक रहा होगा । मैंने देखा कि सेठ जी उस मुहल्ले मे घुस गये हैं जिसमे कुछ नीचे तबके के लोग रहते थे। थोडा बढ कर, एक घर के बाहर खडे होकर वह चीखने लगे- "पीसू, भो घीसू के बच्चे । जरा याहर पा | फिर देखें गा तुझे ! तू कैसे नहीं देता है वह रुपये ' इसके बाद कुछ ऐसी गालियां शुरू हुई जिहे यहाँ लिसा नहीं जा सकता। घीसू धीमी भावाज में गिडगिडा रहा था, सेठ जी उतनी ही तेज भावाज में विधात रहे थे। मौर मैं दूर सहा सोच रहा पा~-'समरथ को नही दोष सेठ के प्रति मेरे मन मे घृणा पनप रही थी। मगर मैं खुद उनका कर्जदार था। मेरे बस की बात होती तो में जरूर अपना मोर घीसू का दोनों का कज़ देकर इस मगरमच्छ के चगुल से बच जाता । मगर अब ए हो सूरत थी। मैं यहाँ से भागा तो घर जाफर सांस ली। सबसे अधिक क्षोम इस बात काया कि मेरे लेक्चर को प्रभाव एकदम उलटा पहा । पर माकर श्रीमती जो वो यह किस्सा सुनाऊँ, इससे पहले उहाने हाक की गड्डो मेरे सामने रख दी। मैं उसमें तमय हो गया। यहां तक कि मुझे यह भी ध्यान न रहा कि मुझे महाना या साना भी है। भमरता इन पत्रो के कपर कभी मुझे सेठ गिरपारीदास की सौफनाक सूरत दिखाई देने लगती थी भोर कभी गिग गिहाते हुए घीसू की। मैं अपनी हार भो न देख पाया पारि घबराये हुए मनीम जी ने प्रावान - सेठ जी बुला रहे हैं मापको।" मैंने पूछा-'क्या बात है ? संरियत तो है ?" 'मत्री पारसरियत कहाँ ?" मुनीम बी बोने-'सेठ जी मा मि उसर दासदी मशा मानस-पघू रहा है। भगवान हो जाने । पाप को मुलायहि । तो लगता है कि पाक सठ भी फा पाखिरी वक्त मा गया है। उन्होने बोलको वलवाया या सि कुछ लिखवाते हुए छोह माया हूं--प्रब मापको सो लिए लाो वाले हैं। "क्या कह रहे है-माप?" मैंने मुनीम जी से कहा- "ऐसा कभी हो सकता है। लाला जी अपना सबकुछ मुझे देकर ससार से विदा लेंगे। ऐसा भी मुम किन है कही? नामुमविन | मेरा उनका वास्ता ही क्या है ? कभी कभी जा बैठना था। वह नीमपने मतलब से । फिर मुनीम जी ने कहा- "प्राप जल्दी चलें। यह सोचने का समय नहीं है।" मैंने कहा-"अच्छा, चलिए।" सेठ जी का घर दूर नहीं था । जाकर देखा तो सेठ जी पलामूदे मचेत पडे थे। उनके सिरहाने वकील साहब बैठे थे। मैंने दूर से ही कहा-"मैं आ गया हू, सेठ जी कहिए या माना?" मेरी ही भाषाज उस हवेली में गज कर लोट मायी-कितनी खामोशी के साथ मुझे इतना मवरण हुमा इस खामोशी पर कि स्वय मुझे भी खामोश रह जाना ?" पहा। वकील साहब ने पास लगने पर मुझ से पूछा-"क्या मापका नाम डी० कुमार है?" "जी, हाँ," मैंने कहा-"सठ जी का क्या नीद पा रही है ? सेठ जा, मा गया है।" "मगर देर से," वकील साहब ने कुछ कागज मेरी मोर बढात हुए कहा- "यह वसीयतनामा है आपके नाम । सेठ जी मापको अपना उत्तराधिकारी बना गये हैं।" मुझे?" मैंन उनके शगेपर अविश्वास करके पूछ। "जी हाँ, डी० कुमार जी वो।' वकील साहब ने कहा-"साथ म कुछ हिदायतें भी है । पढ लीजिएगा।' यह कह कर कोल साहब खिमक गय । मैंने सठ जी की नन देवी। धीरे धीर चर रही थी। मैंन मुशीम नी का बताया और कहा- 'जल्दी से डाक्टर का बुलाया। सेठ जी पर भी शायद व जाएँ ।हुमा क्या था इह ?'
२२
मानस-वपू
'यह कह कर उन्होंने मुझसे
"
'हरे राम !" कह कर सेठ जी एकदम उठ खडे हुए। बोले-"मेरे रुपयों
को तुम डाक्टरों को देना चाहते हो? लामो कागज
वसीयतनामा छोन लिया मैंने इसमें लिखा था एक स्कूल बनामो, एर
पमशाला बानो
पहते हुए लाला जी एकदम लुढक गये और फिर कभी
नहीं उठे।
यहां यह उल्लेखनीय है कि उस दिन दिसम्बर को ३१ तारीख थी। पहली
जनवरी में स्थानीय प्रसबारा में लाला जीवा फोटो छपापा। मैंने उसी दिन
उनकी सक्षिप्त जीवनी लिम्बर प्रकाशित बरामी पी।
भूखे भेडिये मेरा अतर मुझसे विद्रोह कर रहा था। मैं गांव म रहता था, पिता जी शहर मैं नौकर थे। गाव में शिक्षा की कोई व्यवस्था न थी, इसीलिये सारा समय गाव को मादारागर्दी मे बिताता अवश्य था वितु हृदय किसी पाठशाला मे पढ़ने वाले विद्यार्यों के स्वप्न देखा करता था। पिता जी प्राय मुझसे शहर चलने के लिये कहा करते थे, किन्तु मैं इकार भर देता था। इस बार जब पिता जी गांव पाए तो मैंने उनके साथ चलने का भाग्रह किया। उन्होंने तक नहीं किया, व मेरी विवशता को समझ गये। मुझे अपने साथ तो न ले गये, कितु उहोंने मेरा प्रय घ एक गुरुकुल मे कर दिया। वहां का वातावरण मितना पवित्र या उसे देख कर मैं भात्म विभोर हो उठा। वह मध्य गाव मे न होकर जगल मे या, यहा एक छोटा-सा बगीचा था, जिसमे गेंदा, मरूमा तथा केले के वक्ष थे। दोछायादार माम के पेड भी थे। बगीच के बीचोंबीच एक छोटी सी कुझ्या थी, जिसमे ढेकुली लगी हुई थी। गुरुकुल की बिल्डिग कच्ची दीवारों पर पड़े हुए छप्पर की थी, जिसमे तीन भाग ये। एक पावशाता, दूसरा पाठशाला, तीसरा शयनकक्ष । विद्याथियो की सख्या मुझ मिला कर पाच पो। छठे थे गुरु जी-एक्दम वृद्ध जिहें देख कर मुझे देहली के पुराने किले की याद मा गई थी, जो इतना पुराना होने पर भी अपने तेज से यात्रियो को अपनी पोर माकृष्ट करता रहता है। महा जब मैं माया था तो माठ वप का था। भाते ही यज्ञोपवीत कराया गया यो। सध्या हवन-पद्धति रटाई गई थी। मोर फिर दोनो समय सध्या करने को कहा गया था। उस नीरस और सात्विक जीवन के मैने ३ वष और समाप्त कर दिये । प्रत्येर वप एक परीक्षा भी देता रहा था जिसम मुझे गुरु जी के मागीर्वाद से निरतर सफलता प्राप्त होती रही। दुर्भाग्यवश गुरुत्री पल बसे, और उस गुरुकुल का मन हो गया। इस बीच - २४ मानस यथ मुझे यापीपनुभव हो गया थामिने काशी म, जहा में परीक्षा देने जाता था, वहां के गोपदका एग्लो सस्कृत पामिज में ऐडमिशन ले लिया। यहा मैंने माठ वप को घोर तपस्या के उपरान्त एम० ए० व्याकरणापाय की उपाधि प्राप्त कर ली। बीच में क्या पीता यह सब साधारण बातें हैं, जिनके बताये जाने को प्रावश्यकता नहीं है। इतना अवश्य है कि मेरे सम्पन मे रहने वाले लोग मुझे रामचरित मानते थे । जिस दिन मैं घर वापिस जा रहा था, तो मैंने रेलवे स्टेशन पर एक बच्चा जिसको मामु लगभग छ बप को होगी रोता हुमा देखा। उसका परेशान चेहरा पह बता रहा था कि यह स्वजनों से विछुडा हुमा है । मैं उसे उठा कर अपने पास लेप्राया। बहुत देर पुचकारी के बाद उसने अपना नाम पता बतलाया । मैंने उसे हृदय स लगा कर पाश्वासन दिया कि मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड दूगा । मोर वह मेरे साथ हो लिया। सौभाग्य की बात यह थी, उस बच्चे का गाव उसी लाइन पर पा जिस पर में स्थम ना रहा था। गाडी में बैठ पर मैंने पूछा-यहा कैसे पाए थे । बच्चा बोला, "मैं खुद नहीं माया, मुझे कुछ पादमी जबरदस्ती लाये थे, बिन्होंने काफी दिन अपने पास रखने के बाद माज यहा छोड़ दिया था।" मैंगन मे मादमी। बच्चा-डाका में था तुम्हारे घर पर डाका पड़ा था बच्चा-हा। फिर से नीद भा गई। मैं उसका सिर अपनी जान पर रखे बैठा रहा। निरतर मठारह घटे गाडी चलने के पद मलीगढ़ पहुंचे। सुबह के पाठ बजे थे। बच्चा भी उठ चुका था। प्रायु कम होते हुए भी वह काफी चतुर था । महा से उसका गाव तीन मीस से कम नहीं था फिर भी वह अपने माप जाने को कह रहा था। मैंने कहा--नही, मैं गुद तुम्हे छोड के पाऊगा। में सामान क्ला रूम मे रख कर उसके साथ चल दिया । कैलाशपुर गाव के एव भील इषर ही उसने कहा-बाबूजी, देखो वही हमारी हवेली दीस रही है । सगभग दस बजे हम दोनों उसके घर पहुच गए ।
मानस्र-वधू घर में घुसे, तो देखा सन्नाटा-सा छाया हुमा है । एव पोडशी वाना जिसने गोरे शरीर पर नीले रग की सारी पहन रखी थी,माई। दूर से ही दौडकर उसने शिशु को गोद मे उठा लिया और उसके ऊपर घुम्बनों की बौछार शुरू कर दी। में केवल देखता ही रहा। उसकी प्रांखों में हर्ष मिथित मधुकण दिखाई देते थे। हप व विपाद का कितना सुदर मिलन पा! बच्चे ने महा-दीदी, ये बाबूजी मुझे काशी से लाए हैं। मैं समझ गया कि यह इसकी बडी वहिन है। मैंने कहा--देवी जी, मब मुझे माना दीजिए, में जाता हूँ। "जी नहीं, प्राप अभी नहीं जा सकते । मैं भोजन बना रही है, भाप कुछ पल पान करके ही जा सकते हैं।"मह बह कर वह रसोई में चली गई। बच्चे ने मुझे एक धोती लाकर दो पौर मुझे कुएँ के पास ले गया जो उही के घर म था । ममी तक मैं उसके प्रकले होने के माश्चय में था। जब मैं भोजन करने बैठा तो पूछा, घर के मोर लोग कहाँ गए हैं? तब उसने अपनी राम-कहानी सुनाई। धोनी,"मेरे पिता जी यहा के सम्मानित व्यक्ति पे जो भाज से बीस दिन हले डाकुमो द्वारा मारे गए । डाकू माल का पता चाहते थे, उहोंने प्राण त्याग कर दिया पर माल न बताया, यही दशा मेरी मां की हुई। जो कुछ पल्ले पठा उसे मोर बच्चे को उठा कर ले गए। मैं उस दिन यहा नहीं थी। मलीगढ मे अपने मामा के साथ रहती थी, वही पढ़ती थी। घटना के भगले दिन मपने मामा के साथ पहा पाई थी, इस बच्चे के गुम होने की बात मैं अखबार मे निक्लया सूको है। पाच सौ रुपये पुरस्कार भी नियत है शायद तुमने पढा भी हो ।" मैंने नकारात्मक सिर हिला दिया। फिर कहने लगी, भामा जी उसी दिन से यहीं हैं । वे गैहू को कटवा रहे हैं । मैं वास्तविकता से बहुत दूर हूँ। हो सकता है कि गलत हू, लगता है कि इस साके मे मामा जी का भी कोई हाय हो । रिश्तेदार सब भूखे भेहिये हैं। मुझे तो ऐसा जान पडता है, कि जैस 'मपना' शब्द किसो स्वार्थी जगत को उत्पत्ति हो। इन स्वजना मोर भूखे भेहिया के सचिस्पल मे पड़ी हुई मैं अपने भावी जीवन की मपानक कल्पना कर रही है। दूर-दूर तक कोई सहायक नही, जो येथे छोड गए। यह कह कर वह रोने लगी। मुझे लगा जैसे जीवन की गति यहा पोडी देर मामस-वधू लिए रुन गई थी। एक अपरिपिता अपने जीवन की सम्पूर्ण गहराइयों से परिचय दे रही थी। अपने और पराये के बौन की झीनी परत भावुकता की हल्की सी ठेसने समाप्त कर दी थी। मैं बोला-कौन जानता है, अचानक फूट पडने वाला सोता अपनी गति कहाँ ले जाएगा? मैंने अपने जीवन में कुछ निश्चय किए थे जिसे मैं माज बदलता हुमा देख रहा हू । एक बात पूछू, मुझपर विश्वास कर सकोगी। उत्तर में उसकी सिसक्यिा और बढ गई। मैंने फिर कहना शुरू किया, "विश्वास दिलाने के लिए लम्बे घोडे वाक्य नहीं चाहिएँ । कभी कभी के कहे जाने पाले दो शब्द भी हृदय की पूर्णता का परिचय दे देते हैं ।" उसने धीरे से केवल इतना कहा-मेरी और पापकी सहानुभूति देख कर मामा मापके भी शत्रु बन जाएगे। "महा कोई अपना नहीं, वह अपना देश पराये से भी कष्टदायर होता है। अपनी इस बची-खुधी सम्पत्ति से भूखे भेडियो का पैट मरने दो। मैं एक मपरिचित खोए हुए बालक को उसके घर पहुचाने पला था, पर स्वयं को खो बैठा। प्रयल करूगा कि तुम्हे माजीवन सहामता दे सकू । उत्तर तुम्हारे विश्वास पर छोड़ता हूँ।" वह बहुत देर तक सोचती रही, फिर एक कमरे में जाकर अपने मा बाप का चित्र उठा लाई। एक बार सम्पूण घर पर दष्टि डाली। भौर अपने छोटे भाई की उगली पपकर मेरे साथ हो ली।
नसारन का बुढा नसोरन के बेटे इलियास को दूसरे मुहल्ली में भी लोग अच्छी तरह जान गये थे। अपने मुहल्ले मे तो उसकी एक तरह हकूमत-सी थी। मुहल्ले की औरतें उसके पीछे गाली देकर अक्सर कहा करती थीं-"राड का साड है। कमाये तो अपने पाप को भारी पोर न कमाये तो मुहल्ले वालो को।" इलियास के प्रति मुहल्ले वालियो को यह मालोचना बहुत तथ्यपूण पी। क्योंकि इलियास को जिन दिनो काम मिल जाता या तो वह शराब के नशे में धुत होकर प्रौधी-सोपी वका करता था और जब काम नहीं मिलता था तो नकब तक लगाने से नहीं चूकता था। रमजान के दिन थे। नसीरन रोजा रख कर भी हामिद हसन के यहा काम पर जाती थी। मपनी कोख से ऐसा बेटा होने का उसे मलाल था। मगर वह अपनी जवान से कमो इलियास की दुराई न करती यो। उसके मुह पर यदि कोई इलियास के खिलाफ कहता तो वह उसकी जान का मा जाती पी-भले ही इलियास के मुह पर वह खुद उसे कोसती थी, उसका जनाजा निकालती या उसको कच्चा थवा जाने की तमना जाहिर करती थी। नसीरन का यह साठवा साल था। रमजान के दिनो में उसे ऐसा लगने लगा जैसे उसके घुटने थक गये हों। हामिद हसन के यहाँ से शाम को वह लौटती तो उसनी मालो के सामने तिसमिले माने लगते थे। इतनी कमजोरी उसने कभी महसूस न की थी। उस का सिर चकरा पर दद करने लगता तो उसके मुह से निकल जाता-"या मल्लाह 'तू मुझे बुला ले।" मगर दूसरे ही क्षण वह इस मार्ग को अपनी भूल समझ बैठती। क्योकि मरने से पहिले वह इलियास की वह वा मुह देखना चाहती थी । वास्तव न उसे इलियास से उतनी ही महन्धत यो जितनी एक मा को अपन बेटे के लिए हो सस्ती पी। उसे सव से सम्माल यही पाकिमेरे बाद भी इलियास को को मानस वधू अपना कहने लायक तो हो । इलियास की शादी काफी पहले ही हो जाती, क्योकि नसीरन के प्रति लोगों का ख्याल था कि उसके पास पैसा है । पहले इलियास बदनाम भी नहीं था । अब तो बात ही दूसरी थी। नसीरन जानती थी कि उसका बटा मसगरी को चाहता है। वह यह भी जानती थी कि असगरी भी उसे चाहती है मगर असमरी का बाप शायद यह नही चाहता था और उसका न चाहना कोई गलत भी तो नहीं था। कोइ शरीफ बाप अपनी फूल सी बेटी का हाथ क्सिी चार मौर शराबी के हाथ म इस खयाल के पाते ही नसीरन के हौसले पस्त होने लगते मगर उसका मन यही कहता था कि अगर मेरे वेट को असगरी मिल गई तो वह बुत नही रहेगा। वह चक्लो म जाता है " ऐसा लोग कहते है । मगर चकला मे असगरी से खूब मूरत और कौन होगी? नसीरन क यह सोच कर कुछ दिलासा होता । मगर इलियास के जेल मे होने वा स्याल उसे परेशान कर देता। उस दिन वह बहुत देर तक ऐसे ही ख्यालो म डूबनी उतराती रही। तभी रोजा अरतयार करने का वक्त हुमा। पास वाली मस्जिद में अजान होने लगी और नसीरन भी शाम की नमाज के बहान पलकें मूकर पिदा से कुछ फरमाइशें करने लगी। वह पत्र खोल भी न पाइ थी कि पीछे से किसी ने पुकारा--'मम्मी।" और नसीरन को एक बार भी उस मावाज पर विश्वास न हुमा। उसने पाछे घूम पर पाना उसका पाच हाथ का लाडला इलियास खहा था। कुछ क्षणो के लिये उसकी आखें खुली की खुली रह गई। क्या माग रही थी मम्मी, खुदा से?" इलियास ने व्यग्य से पूछा--'क्या गुदा भी किसी की मुराद पूरी करता है ? मुझे तो इसमे ही गक है कि खुदा नाम का कोई जानवर भी दुनिया में है।' ।' अपने होठा पर उगली रख कर नमीरन कहने लगी बटा, खुदा की शान म एसे लफ्ज नहीं बोलने चाहिये। देख, इस वक्त मैंने सुदा रा तुझे मागा पा पोर तू मा गया। जा इसी बात पर मस्जिद मचिराग्र जलावर प्रा! 'चिराग' हा हा मस्जिद मे' इलियास हमा-~तू वा पिरान कहती दा ग T मानस-वधू २६ है, मैं वहा हहे मोर बिजली के बड़े बडे बल्ब भी जला सकता हू बशर्ते कि खुदा मुझे वहा मिले। मगर मिलेगा कैसे 1 मैं कहता हूं कि वह कही मुझे मिला तो पहला कान मेरा यह होगा कि उसको बोटी-बोटी नोच डालूगा । फिर उसे खिला कर अपनी मम्मी का पेट भर दूगा। उसने मेरी मम्मी को बडा दुख दिया है। पौर मम्मी, मैं कहता हूँ, तू तो पगसो है, पगत्तौ । खा म-खा उसका महसान मानती है जिसका नाम है मगर निशान नही । मेरे तो दिन पूरे हो गये थे जेल में सो आ गया। इसमे खुदा का क्या इजरा है।" नहीं समझेगा", नसीरम ने प्यार से कहा, "मच्छा तुझे भूख लगो होगी । मैंने ग्राम की चटनी बनाई है । इससे खा लेगा या दही मगाऊ?" "मगायेगी किससे? ला, मैं ले पाता हूँ।" नसीरन ने पल्ले मे बधे हुए पैसो को खोला और फिर टटोल कर देखती हुई बोली-"देख, दुमनी है न ? जा, दो गाने को ले मा।" इलियास के चले जाने के बाद नसीरन फिर खुदा को याद करके सोचने लगी "या भल्लाह, तू तो सब का रहबर है। मेरे बेटे को भी सही रास्ता "मरे, दिखा" उसकी पलकें मुद गइ । दोनो हाथ जुड कर फैल गये। पडोस मे खाने-पीने का जो कोलाहल हो रहा था वह उसे सुनाई न दे सका। तभी उसने किसी के पदचाप अदर भाते हुए सुने । यह सोचकर कि शायद इलियास मा गया है, उसने माखें खोली लेकिन सामने मसगरी सही थी। सहसा नसीरन को अपनी बूढी भाखो पर विश्वास न हुमा । बोली-"कोन मसगरी । तू !" "हा, बफ लेकर लौटी थी, मुझे कुछ ऐसा लगा " यह मागे न बोल सकी। । जैसे इलियास पाया हो यो यही कहने वाली थी न " बुढिया ने उसकी बात पूरी की। उत्तर मे मसगरी शम से घूमकर खड़ी हो गई। वह क्या स्तर देती भला । उत्सुकता से उसका मन भरा हुमा था। सभो नसीरत बोलो-"वह पाया है दही लेने गया है। मगर तेरा बफ तो गल जायेगा। तू जा, तेरे मन्या नाराज होंगे। भाज तुझे रात में भेज कैसे दिया ?" "माज तो भेज दिया है, मगर कल से नहीं भेजेंगे चाची, मोरा मिला तो में मानस-व फिर माऊगी। अब तो घसी।" योडी देर में ही प्रसगरी चली गई। नसीरन सोचने लगी-"या मल्लाह ! तू बहा रहमदिल है, मुझ गरीव पर रहम पर, मेरे मौला! मैं अपने बेटे के लिए पसगरी को मागती हूँ। तू इनकी गाठ बाघ दे।" वमी इलियास भा गया "ला, जल्दी से रोटी दे, मुझे कहीं माना है फिर ।" "माया है नही, जाने की पह गई" नसीरम बोली, "जरा में भी तो मुनू कि कहा जाना है तुझे ?" इलियास सिटपिटाया-"कहीं सास नहीं, यो हो जरा टहलने जाना है, थोडी सी देर मे मा जाऊगा।" "परे मैं जानती हूँ तेरी थोडी-सी देर को।" नसीरन बोली-"अब निकलेगा तो तू सहर मे ही घुसेगा। झम्मन की दुकाा से दही लाया है न । वह जरा बडा पालाक है । मधेड हो गया है मगर मय भी उसको निगाह तेरी पसगरी पर है । मुझे शम माती है सुझे बताते हुए। पर क्या करू, तेरी मांखों पर तो परदा पहा है।" "क्या कहती हो मम्मी ।" इलियास चोंका। 'जो पुछ कहूगी, तेरे भले को होगी। त मान या न मान मोर यह जानती हू कि तू करेगा भी अपने मन की। पर सब कहना, क्या तू रडियों में नहीं भी जाता है ?" इलियास चुप रहा। "जो लोग तुझे यहा ले जाते हैं वे ही प्रसगरी के बाप के कान भरते हैं, नहीं तो कभी को तेरी हो जाती वह । मभी भी भाई थी। पर जल्दी मे थी फिर माने को कह गई है। क्या तू नहीं मिलेगा उससे" कह कर नसीरन चुप हो गई। पहते-कहते उसने खाने के लिये चपातिया तश्तरी में रख दी थी। लोटे में पानी भी रखापा ! बोली-खा ले।" 'तू भी तो खा," इलियास बोला। 'मेरा पेट तो तुझे देख कर ही भर गया।' नसीरन घोली, 'हां, प्यास लगी है। ' कह कर उसने पास में रखालीटा उठाया और गट-गट परके खाली कर दिया । इलियास सारी रोटिया खा गया।
मानस-वधू जय इलियास का पेट भर गया तो वह तारो की छाह में एक टूटी-सी खाट बिछाकर लेट गया। भोर बीही सुलगा कर उसका घुमा उडाने लगा। उसके पास हो नसीरन पीठा डालकर बैठ गई। "मच्छा मम्मी", इलियास बोला-'तुझे कैसे पता कि ये मम्मन का बच्चा भसगरी पो बुरी निगाह से देखता है ?" "क्यों, क्पा मारेगा उसे ?" मसीरन बोली-"ये दुनिया है । यहा हर जबर- दस्त मादमी दूसरो की कमजोरी से फायदा उठाना चाहता है । मैंने तो यहा तक भी सुना है कि पसगरी का बाप भी रजामद होता जा रहा है।" "मच्छा, तो बात यहा तक पहुच गई है," इलियास बोला,"मैं साले का मुह पीट दूगा । दगा और वह भी इलियास से वह शायद जानता नही, इलियास को दगाबाजों से सख्त नफरत है।" "चुप कर तू," नसीरन बोली--"आज तो माया ह, और माज ही गाने का सामान करने लगा। विसी बात को जरा धीरज से भी तो सुन लिया कर। तेरे से तो बात करना भी गुनाह है।" "नहीं मम्मी, तुम कहो," इलियास बोला-"मैं तेरी जान की कसम खाकर कहता हूँ कि अब कोई ऐसा काम न करूगा जिससे मुझे वापस वहीं जाना पड़े जहा से माया ह।" धीमी आवाज मे नसीरन बोली-"प्रसगरी पहती थी कि उसका बाप झम्मन का कजदार है । जब से झम्मन की वीसरी बहू मर गई है तब से वह मसगरी के पीछे पड़ा रहता है। प्रसगरी इसलिए दुकान पर भी जाना नहीं चाहती । मगर उसका बाप है कि उसे रोजाना जान-बूझ कर वहां भेजता है। मुझे तो असगरो के वापसी नीयत पर शक होने लगा है और तूपूछ लीजो उससे। अभी पायेगी, मसारी। तरेमाने से पहले होकर गई है। तेरे माने का भी उसे पता चल गया है।" "र, तू छोड इस बात को, मैं पूछ लगा," इलियास बीडी का धुमा उडाता हुमा योला-"मोर किसी ने तुझे मेरे पीछे तग तो नही किया?" "मुझे तग करने की मला किसे मजाल है!" नसीरन ने उत्तर दिया, "अच्छा में चली, जय तमीजन ने बुलाया था, हो पाऊ। वहा पर मसगरी माई ती मैं भेज दूंगी। दरवाजा खुला रखना।" . - मानस-यध इलियास का मन अपनी माता के प्रति श्रद्धा से भर गया। वह स्तिनी मच्छी है ! और वह खुद? यह सोचकर वह रुक गया। फिर मम्मन के स्याल ने उसे परेशान कर दिया। वह सोचने लगा, कसे उस नीच से बदला लिया जाये ? तभी भसगरी मा गई । इलियास ने उठ र कुण्डी बाद कर सो मोर असगरी को अपनी बाहो मे छिपा कर बोला-"जामतो हो असगरी, मैं तरे पिक मे आधा हो गया है।" "मरे, जा!" मसगरी ने झूठी डाट पिला कर उत्तर दिमा-'तू सो मौर भी मोटा हो गया है।" फिर इलियास को याहों के बन्धन को वीसा करके कहने लगी- 'मैं बहुत देर नहीं ठहरूगी, मना को पता चल गया तो जान ही लेकर छोड़ेंगे।" "मगर मसगरी, अव तो भन्या जान को पता पल हो जाना चाहिये । तुम भाज रात यही रहो। सुबह को पूछे तो कह देना वहा थी।" इलियास ने सुमाया। "अरे, तोबा करो, मैं पूछती हू तुम्हारा दिमाग तो सही है ?" "दिल के बिना दिमाग क्या परेगा। शायद तुम जानती नहीं, मुहल्यत के मुमामलो मे दिल से ही सब काम किये जाते है क्योंकि दिमाग तो ऐसे वक्त पर धुप होकर बैठ जाता है । खैर, छाड इस बात को। ये बता कि झम्मन के बच्चे को मया सलाह है? और तेरे अम्मा ने उस कमीन मा पा लेकर खा लिया है। मुझे लगता है कि दोना के ही दिमाग ठिकाने लगाने पड़ेंगे।' "अरे वाह ! पहले अपना दिमाग तो सही करो, पले मेरे मन्या को फोसने । सच कहती है कि जान को भा जाऊगी तुम्हारी।" प्रच्छा, तुम सिफारिश करती हो तो उहे बख्श देंगे। वरना हमारे पास तो एक ही मौजार है, तुम जानती ही हो।' इलियास ने अपना चाकू खोल कर दिखाते हुए कहना जारी रखा, "जो भी रास्ते मे माएगा, तेरी जान की कसम, खैर नहीं उस साले को। तुझे कुछ तो पता होगा, क्या लालच दिया है उस हराम जादे ने तेरे बाप को। या पिसी घाँस मे ही भा गया है उस कमीन को ?' पसगरी बोलो- 'मम्मी कहती थी कि झम्मन से ब्याह हुमा तो मौज-हो- मौज होमी। उसके पास माफी जेपर है, रुपया भी, और दुकान भी उसकी सूब चलती है।"
मानस-वधू "बस या भोर फूछ?" इलियास ने पूछा। "भोर तो मुझे कुछ पता नहीं, तीस राखीसही उसका की होगी शा क्या" " "झम्मन का बच्चा तुझ से कभी कुछ रहता है क्या "जब वह अकेला होता है दूकान पर तो मैं जाती ही नहीं। सबके सामने कुछ कहै भी तो क्या ? मैं तो उसे पाचा कहती है । हो, इससे वह मास तो दिखाता है कभी-भी।" "शाबास, तू बडी होशियार है। प्रच्छा, तू जा, मैं सब ठीक कर लूगा, पौर हा, जरा मास को तो हो जा, देख तुझे मेरी जान की कसम लेकिन मसगरी नहीं रुकी। इलिमास उसकी पीठ पर ताक्ता रह गया। मगर भविष्य को मयुर वल्पनामो के लिए उसे बहुत बड़ा सम्बल मिल गया था जिस पर वह अपने भागामी जीवन की दीवार एदी कर सकता था। भोर सचमुच उसने महल बनाने शुरू कर दिये । पहली रात से लेकर बच्चे होने भौर बुढ़ापे तक की वह सोच गया। मगर इस महल की बुनियाद कच्ची पी इसलिए ढह गया। नसीरन बाहर से लौटी तो इलियास को वहा नहीं पाया । कुछ दुखी भी हुई मगर ऐसा होने की वह काफी प्रभ्यस्त हो चुकी थी। इसलिए उसके भाने की प्रतीक्षा में कुण्डी खुली छोड कर सो गई। दूसरे दिन दिन पढ़ने से पहले मुहल्ले-भर को पता चल गया कि मम्मन के चोरी हो गई। मकान के पीछे से नकब लगा कर चोर सबकुछ ले गये। मम्मन तो दुखी पा ही, साथ में मुहल्ले वाले भी दुखो कोई कह रहा था, "कमाल को बात है "और कोई इसे दुख की बात कह रहा था। मगर वास्तव में इसमें दोनों ही बातें शामिल थीं। तमाशगीरी मे नसोरन भी एक थी। झम्मन ने एक तरफ लेजाकर पूछा- "ताई जो, बुरा न मानो तो एक बात पूछू ?" "तू जो पूछेगा मैं जानती हू, मगर यह समझ ले कि मुझ से पूछना है बेकार ही। क्योकि मैं बरीक नहीं हू ऐसे काम मे । कहीं मुझे पता चला तो मैं जरूर लौटदा दूगी मार शर्त यही होगी, तू उसका नाम न लेगा कही भी।" "अल्लाह तेरा भला करे, ताई," झम्मन गिडगिडाया--"ह जानती है कि मैं । -- मानस-पयू गिता परीफ है। फिर जो कुछ है खुदा का है। मुझे इसका परना क्या है । मैं तो मन सबकुछ मस्जिद पे नाम करने वाला हूँ।" "मरे, तू मस्जिद के नाम परियो या किसी रही है, मुझे क्या मेनाह उससे? मैंने जो वह दिया है उस पर यकीन करना है पर, न करना है न ।" 'ताई, मुझे पूरा यकीन है तुम पर। सुदा की कसम, मैं तो मुहल्ले मे तुझे होरा महता इ, चाहे कहीं भी सुन लीजो पौर मी मौ। मैं तेरे हर वक्त पर माम भाऊगा पौर तेरा महसान भी न भूलगा।" नसीरा का सिर शम मे मुक-सा गया। मगर वह जबरदस्ती शेरनी बनी रही । घरमाकर उसने इलियास से पूछा- तूपहा गया था रात" "मसगरी के यहाँ ।" इलियास का उत्तर था। "क्यो मला ?" "या ही," इलियास धीरे से बोला। "यों ही या पोरी करने, ऍ?" मसीरन पोमेसे पीसी, "नालायका तू मर क्यो नहीं जाता। तूने मेरी कोख लजाई है । बेशरम ! इससे अच्छा होता कि तु होते ही मर जाता। इतना कहकर नसीरन फफक फफक कर रोने लगी। मगर इलियास ने कभी कवी गोलिया नहीं खेली थी। अपनी मा की प्रारत को पानता था। उसने हमेशा उससे पूछना चाहा है और चोरी का मान वापस करने को कहा है। मगर इलियास के पास इसका एक ही रास्ता होता है कि ऐसी हालत मे यह नसीरन के सामने से हट जाता है । उस दिन भी उसने यही किया। नसीरन के दुख की सीमा मही यो। वह बार बार रोती है और प्रासू बहाती है मगर उसके मासू उसके बेटे का दिन नहीं पिघला पाते हैं । इसका खेदमाज परम सीमा पर पहुच गया। यह सोचने लगी, मुझे मगर अपनो मा कभी याद मा जाती है तो मेरा कलेजा भर भाता है। मगर मह कसा बेटा ह जिसे अपनी मां की ममता नहीं। उसके पासुमो की जरा भी कीमत नहीं समझता। इलियास के चले जाने के बाद भी वह रोती रही। इस रोने से वह एक नतीजे पर पहुच गई पोर जो कुछ उसने सोचा, उस वह तुरत ही क्रियावित के लिए भसगरी के पहा को पन पडगे। रास्ते मे उसके मन मे एक ही बात मानस-यधू . पी कि जवान उमर में मावमी मा फी नहीं, बहू की मानता है । इलियास की पाादी हो गई तो बहू उसे ठीक कर देगी। मसगरी का बाप करामत बैठक में हुक्का पी रहा था। नसीरन को माता देख कर बोला-"मामो इलियास की मा, कैसी हो?" "जिन्दी हु और तुम्हें देखकर तो समझो बहुत खुश हू।" नसीरन ने पकाम- भरे स्वर में जपाल दिया। "चली जामो, मादर चली जामो, मसगरी की मम्मी है।" 'प्रनी होगी, मुझे उससे क्या, मैं तो तुम्हारे पास माई है। एक भीख भागने । यह पल्ला है और तुम्हारी जवान " नसीरन ने पल्ला फैला कर अपने स्वर को यथाशक्ति करण बनाफर कहा--"खुदा गवाह है कि जिन्दगी में पहला मौका है ये गिडगिडाने का । भगर मैं यहा से खाली लौटी तो मेरा मल्ला हो मालिक होगा।" "मैं समझ गया इलियास की मा मगर करामत भटका। "मैं जानती हू, तुम पया कहोगे?" नसीरन न बात मागे पलाई । "मगर मैं यकीन से कहती है कि इलियास जैसा लौहा मुहल्ले-मर में नहीं है । उसे तो उत्ते से पालाक लोग बिगाडते हैं। लोगों का मरों का जाता ही क्या है । सोचो तो प्रसगरी के मन्बा ! क्या तुम्हें उस पर योड़ा भी यकीन नहीं है ?" यह बात सीरन ने कुछ ऐसे भादाज से कही कि करामत मपनी बेटी देने को रशामद हो गया। तुरन्त ही नसीरन का मुह मीठा करा दिया गया। कहना न होगा उस मिठाई से नसीरन की जिदगी भर की कडवाहट खत्म हो गई। फिर एक दिन इलियास की शादी हो गई । असगरी का गोल चेहरा, बड़ी पाखें, गोरा रग, सुडोल बदन सबकुछ नसीरन को उसके बेटे की बहू के रूप में मिल गया। उसके मन को भारी सकून था। शादी के कुछ दिनों बाद झम्मन ने नसीरन को बुलाया। कहने लगा-"चाची, मपना काम तो बना लिया तूने पर मेरा कुछ न सोचा?" 'तू जानता है, मेरा नाम नसीरन है।" वह दढ़ता से बोली-"पौर नसीरन ने जो कहा है वह पूरा किया है। मैं कसम मल्ला मियां और कुरान पाक की खाकर कहती है कि अगर तेरी चोरी इलियास ने की होगी तो मैं पाई. पाई लौटा दूगी। तू भूल गया उस दिम की बात?"
भानस-वपू "नहीं पायी, मैं तो नहीं भूला पा, पर सोपा शिशायद तुम भूल गई हो इसलिए तकलीफदी। माप करना।" 'कोई बात नही बेटा, मरे लिए जैसा इलियास येसा तू।' यह पह पर यह पल पड़ी। पीछे से टोव पर मम्मन म पूछा- 'मगर चाची, कय तब बाट देखनी पडेगो मुझे ?" 'बहुत दिन नहीं ! 'मह पर वह चली पाई। घर प्राकर नमौरन वा जसे जी नहीं लग रहा था। झम्मन ने उसके दक्ष हुए घावा पुछ युरेद मा दिया था। बस कुछ दुखो सी होकर मसगरी से बोली- "इलियास कहा गया है " "वो ता सुबह से मडी गये हैं । लौटे नहीं," असगरी का जवाब था। "खैर, एक बात बता, तुम दोनो खुश तो हो?" ममगरी कुछ चौकी । सोयने लगी, माज यह पेतुका-सा मवाल क्यो ? बुढिया कहती रही 'मेरा खयाल है, तुम दोनों खुश हो । मोर मुझे भी इसी में खुशी है । मैं यह इसलिए कह रही है कि इलियास को पा इस घर को छोड कर में मुद्दत से कही जा नहीं पाई थी। माज मेरा मन शाहजहापुर जाने को करता है।" शाहजहापुर मे नसीराबामायका है-यह मसगरी जानती थी। इसलिए उसने उसके जाने की तैयारी शुरू कर दी। वह जगह कुछ दूर भी नहीं थी। मोटर का रास्ता था और वह भी एक घण्टे का। असगरी ने सिफ इतना कहा- "अल्दी पा जाना, मेरा मन शायद न बगे तुम्हारे बिना।" "हा, हा मैं जल्दी हो लोटूगी।' शाम को इलियास ने नसीरन को मोटर म बिठा दिया। विदा करते हुए वह कह रहा था 'पहुचने पर खत लिखवा दीजो, यहा फिकर रहेगी तेरी।" 'भरे, जा, माया फिकर करने वाला। कब से फिकर रहने लगी है तुझे नसीरन ने हस कर टाला। 'सच कहता हूँ मम्मी, तेरी जान की कसम तेरे सिवा मुझे किसी को "सर, देखी जायगी ।" इहौं शब्दों के साथ मोटर नसीरन को खींच ले चली। , मुहब्बत ।
मानस-वधू तीसरे दिन एक सत माया जिसने इलियास के सुशी भरे घर में कुहराम-सा मचा दिया। पहले मसगरी रोई फिर इलियार मोर उसके बाद तो पडौसी भी नसीरन को याद करके रोने लगे। खत कुछ ऐसा था भौर इलियास के मामा के हाय का लिखा हुमा बेटा इलियास, मेरा कलेजा फटा जाता है यह लिखते हुए कि बहन नसीरन को रास्ते मे ही हैजा हो गया था और यहां घर में घुसते ही उसने दम तोड़ दिया। मुझे तो इस बात का ही मलाल है कि मैं उनके लिए कुछ भी न कर सका। मरने से पहले वह चद मल्फाज तुम्हारे लिए लिखवा गई है, वह भी मैं इसो लिफाफे में रखे दे रहा है। -तुम्हारा मामा उसका खत इस प्रकार था- 'बेटे, मुझे मरने का उतना अफसोस नहीं है जितना तुम्हारे पास से माने का। मगर शायद खुदा को यही मजूर था कि मैं तुम्हारा कथा भी न पा सकू । र, मेरी एक माखिरी तमन्ना है बेटे, जिसे तू पूरा कर सकता है । वह यह कि तूने उस रात को झम्मन की चोरी की थी। मैं चाहती हूं कि तू उसका माल लौटा दे। खुदा तुझे मार देगा। मब तू कमाने लगा है । ऐसा ही कमा कर खा, मेरे बेटे- मुझे इसी से सक्न होगा वरना मरने के बाद मुझे इसी बात का दु ख रहेगा कि मेरे बेटे ने मेरी एक बात न मानी । अगर तूने यह बात मान ली, तो तू समझ ले मेरी रूह भी खुश है । वरना, मैंने तो जिदगी मे भी पापड वेले हैं भोर मरने के बाद भी मुझे जो करना होगा क्रूगी। खैर, मैं चली। तुम्हारी मा, सीरन।" यकायक इबियास ने राना बद कर दिया। एक लम्बी सास लेकर वह उठा मोर मसगरी से तैयार होने के लिए पह कर बाहर को निकल गया । जाने से पहले वह अपनी मा के प्रति एक फज अदा कर देना चाहता था। लौट करमाया तो उसके चेहरे पर सतोष के भाव थे। एक लम्बी-सी सांस छोड पर उसने कहा-"चलो प्रसगरी, मान सही, उसकी कद्र ता देख हो लें"। - - ३८ मानस वधू मसगरी तैयार थी। कहने लगी-"कहाँ हो भाये" "झम्मन के यहा गया था।माज उसका पोरी का माल मैंने लौटा दिया है।" "चलो, मच्छा किया । जिन्दगी मे तो बुढिया को तुम्हारा सुख न मिला, मन उसकी रूह को माराम मिल सकेगा।" जैसे ही ये दोनों प्राणी घर से निकलने को ये तमी किसी ने बाहर से सूचना दी, नसीरन मा गई। इलियास को पसीना भा गया। दोनों ने दो कर बाहर झाक कर देखा ता सचमुच नसीरन लुट खुट लाठी टेकती मा रही थी। इलियास ने पास पाने पर वहा--"तू बडी पाला है री, मा।" "क्यो क्या हुमा' नसीरन ने हस कर कहा ।
वेटी का बाप नारायणसिंह मुक दलाल डी० एस०पी० के घनिष्ट मित्रो मे से थे। जव तब दोना मिल जुलकर अपने दुख-सुख की कहानी एक-दूसरे से कह सुन लेते थे। घोर डाकुमो के विस्सा, जमाने की रगत, तीसरा महायुद्ध सभी विषयो पर बातचीत चलती पी। मगर माघी बातचीत के बाद अक्सर ही माजकल की लडकियो का किस्सा छिड जाता था। खास तौर से मुक दलाल को माश्चय या विहिदुस्तान में अब तक लडकिया का राज्य क्या नही हो गया क्याकि कम-से कम उनके घर पर तो उनकी लडकी का ही राज्य चलता था। उसकी रोज रोज की हरकतो से वह परेशान थे। एक दिन जब दोनो दोस्त मिलकर बठे, तो नारायणसिंह ने उहे सुझाया, "तुमने तो खामख्वाह हत्या मोल ले रखी है परे लड़की के हाथ पीले करके छुट्टी पामो।" मुष दलाल ने कहा, "तो क्या माप समझते हैं कि मैंने अब तक इसकी कोशिश नहीं की ? प्रजी, हजरत, जरा उसके विचार भी तो सुनिए, वह वहती है कि मैं व्याह से नफरत करती हूँ। राम राम, क्या जमाना पा गया है । अब कोई हाथ पकडकर तो घर से बाहर धक्का दिया नहीं जाता।" नारायणसिंह चोंके, बोले "अरे लडको क्या माफत का परकाला है। भला, आपने पूछा भी कि व्याह नहीं करेगी, तो क्या पुलिस को इस्पक्टर जनरल बनेगी?' मुक दलाल बोले, 'अनी इस्पेक्टर जनरल तो वह मम भी हैं। पाप ऐमा समझ लीजिए कि मैं अपने महकमे मे अगर किसी से दबता है, तो वह इंस्पेक्टर जनरल है और घर पर अगर किसी से दवताहू, तो वह तडको है । कालिज के चार दरजे क्या पढ़ गई है दिमाग रोज नई-लइ गढता है। बात मुह से निकल नहीं पाती कि टका-सा जवाब पाडाती है। भाई साहब, वस, लडकी का वाप ४० मानस-वह ?" होना भी एक मुसीबत है। लड़की की जात है, इसलिए कुछ कह नहीं सकता नहीं तो रिवाल्वर के छ के छ पायर भव तक उस पर खाली कर चुका होता। "मालूम होता है कि यह प्रापके बचपन से ही सिर चढाने का नतीजा है, नारायणसिंह बोले । डी० एस० पी० साहब ने कहा, "मैंने सिर पढ़ा रहा है ? सिर तो उसे मा ने चढ़ा रखा है । अनाब, अब तो वह अपने को एडवास्ड कहती है। हमें पठाती है। कहती है कि मा-बाप को बच्चो के साथ दोस्तों जैसा बरताव करना चाहिए । माप जानते हैं, परसो क्या हुमा नारायणसिंह ने कहा, "क्या हुमा मुकन्दलाल बोले, "भाई साहब, परसो मैं माच के महीने की तनखा लेकर घर मे घुसा तो लड़की को मा ने दरवाजे के भीतर पर रखते ही माडे हायों लिया। 'तुम्हें कुछ घर की भी सुध है कि नहीं? यह नाक जो तुम्हारे चेहरे पर पी, तुम्हारी साडली ने कटवा दी है।" मैंने अपनी नाक को हाप लगाया। वह बिलकुल सही सालिम थीं। मैंने कहा, यह क्या बकती हो। मुक दलाल डी० एस० पी० की नाक काटने की हिम्मत अभी किसी में नहीं हुई।" नारायणसिंह ने कहा, "लडकी ने जरूर कोई तानी की होगी।" मुक दलाल बोले, "शैतानी । मजी, शैतान तो उसके यहा पानी भरते हैं। मैं तो यह समझा कि कहीं किसी ड्रामे द्रामे में नाचकूद कर माई होगी, जिस पर बात का बतगह बन रहा है क्योरि वह मजू को इन बातों को अच्छा नहीं समझती पो। मेरी बात सुनकर वह बोली, "पहले थोडी पोडी कटा करती थी, मब जह से पट गई है । ऐसा नाम उछाला है कि लपकते ही फिरोगे।" मैंने कहा, "मरे, कुछ कहोगी भी या यू ही कयास किए जामोगी" बोली, "कान खोत कर सुन लो तुम्हारी लाहसी ने तीन महीने घटा लिए है, पौर मपने ही महस बखान रही है।' नारायणसिंह ने काना पर हाथ रख लिए । "सम, राम, राम ।" मुक दलाल कहते रहे 'मेरा नीचे का दम नीचे मौर कपर का दम ऊपर ही रह गया। फिर भी प्रासिर दुनिया देसे हुए हू बोला, तो क्पा चिल्ला चिल्ला पर दुनिया को खबर करोगी? दीवारों ने भी मान होते हैं । मैं पूछता हू, कहाँ है वह सम्बन बुलामो तो उसे।'
मानस वधू नारायण सिंह को कनौतियां खही हो गई, "फिर क्या हुमा?" "मरे, साहय, सुमिए तो सही। मागे की बात तो सारी बात ही है।" अपनी बात जारी रखते हुए मुक दलाल ने कहा, "मजू मेरे सामने ऐसे भाई जैसे हरिकीतन मे से उठकर पली भा रही हो । मैंने अपनी कमर मे लटकी हुई पिस्तौल पर हाथ रखकर पूछा, यह मैं क्या सुन रहा है? क्या यही दिन दिखाने के लिए पैदा हुई पी? क्या दुनिया में कुए मोर बावलिया कम हो गई थी। इसीलिए कालिज जाती थी ? यही पट्टो पढ़कर माती थी वहा से चुप क्यो हो? क्या मय काठ मार गया है ?" "हरे, हरे," नारायण सिंह ने भगवान का स्मरण किया। "मजी, हजरत, जरा उसकी बात भी तो सुनिए। कहती है कुए पौर बावलिया टूटें मेरे दुश्मन । मैंने ऐसा किया ही क्या है? मैंने ऐसी मुह- जोर लडको आज तक नहीं देखी थी। माखो म मेरी खून उतर आया और हाप कापने लगे। मैंने चिल्लाकर कहा, सच बतामो, कौन है वह मभागा? नही ता इस रिवाल्वर मे दो गोलिया हैं, एक तुम्हारे लिए एक मेरे लिए ।' मेरी बात बीच में ही काट कर उसको मा बोली, "मोर मुझे वहा छोह जाते हो? एक मेरे लिए भी भर लो।" "हे नारायण, तू ही है," नारायण सिंह ने प्राकाश की भोर दोनो हाथ उठा कर मित्र के साथ सहानुभूति की। "जनाब, हद तो देखिए," मुक दलाल ने कहा, "लडकी कहती है, "पाप तो निशाना बहुत अच्छा लगाते हैं, पिताजी। माज मापको चादमारी देखी जाएगी।" "कलयुग है, कलयुग," नारायण सिंह ने एक सास छोडकर कहा । मुक दलाल बोले, 'भोर इससे पहले कि मैं रिवाल्वर निकाल कर उसे निशाना बनाता, वह हाथ मे एक गते का छोटा-सा टुकडा छिपाए हुए दीवार के पास गई और वहा गडी हुई एक छोटी मी कोल मे वह गत्ते का टुकडा खोस दिया ।" "हद हो गई, सचमुच, हद हो गई," नारायण सिंह बोले। "मजी, हद सभी कहा हुई मुक दलाल ने कहा, 'हद तो तब हुई, जब मैंने उस गत्ते के टुकडे पर माने फाडकर निगाह डालो । उस पर कुछ लिखा हुमा था। उस पर लिखा था 'एप्रिल फूल।' 7
मानस-वधू
"एँ।" नारायणसिंह गरदन ऊपर उठाकर मह बाते हुए बोले।
मुक दलाल ने कहा, "और पिस्तौल मेरे हाथ से छूटकर जमीन पर गिर
पही। मुझे इतना भी याद नहीं रहा था कि उस दिन पहली अप्रेल पी मौर में
माच की तनखा जेब म डालकर घर भाया था। भगवान पहली अप्रैल की तरह
इन शैतान लड़कियो का मुह भी काला करें।"
परायाधन गया, जुम्मन मिया मगर भव साट मे पड़े-पडे सुदा को कोसते हों तो इसमें उनका कसूर हो गया है। आखिर उहें शिकायत हो भी सिरो। उनके दो लडके हैं, भस्तर मोर इस्लामू । मस्तर पढ़ लिखकर कमाने लगा तो बीवी का गुलाम हो पौर इस्लामू का कहना ही क्या ! यह तो शुरू से ही मावारा मोर उचक्का है । इसलिए जुम्मन मिया मपने बुढ़ापे म रातदिन खुदा से मौत की फरमाइश परते हैं पोर खुदा है कि उनकी कुछ सुनता ही नहीं। सब जुम्मन मिया गालियों से पेश माते हैं और कहते हैं, "या मल्लाह | तेरा नाश हो। तू अपनी कुदरत में पतझर के बाय बहार लाता है मगर मैंने जिन्दगी में कभी बहार नहीं देखी। भोर अबको वह मौसम कभी पाएगा ही हीं। या मल्लाह इस बात को जुम्मन मिया कभी मन मे कहते हैं और कभी जोर से। इससे एक लाम रहें जरूर होता है कि वह अपने मतीत मे झांककर यह खोजने की चेष्टा करते हैं कि कहीं उहोंने खुदा को कोई झूठा इल्जाम तो नहीं दे दिया। उहें अपनी जिन्दगी का एक-एक दिन याद माने लगता है । उहें अपनी मा याद माती है। भब्दा जान को उहोने कभी देखा ही नहीं था। इसलिए याद माने का प्रश्न ही नहीं उठता। घर से जुम्मन मिया की मम्मी मार-पीट कर मौलवी साहब के मश्वव की मोर धकेला करती थीं मोर जम्मन मिया थे कि कही रास्ते में कचे खेला करते थे या फभी कभी मक्तव मे पहुच भी जाते थे तो मौलवी साहब के पोपले मुह और धनी दाढी को देखते ही भाग खड़े होते थे। उस दाढी को सहलाते हुए अपने पोपले मुह से खो गालिया मौलवी साहब सुनाते थे, वे उन्हें पाज तक भी याद थीं। मौलवी साहब के बेंत के निशान माज उनकी कमर पर नहीं हैं मगर दिल पर उनको अमिट छाप है जो शायद उनकी जिन्दगी के साथ ही छूट सकेंगे। ऐसी परिस्थितियो मे जुम्मन मिया पदते भी तो कैसे पौर क्या ?
४४ मानस-वधु मोर एक बिना पढ़ा लिखा कसाई का लडका गोश्त की भल्ली होने के मतिरिक्त भोर करे भी तो क्या ! क्योंकि धीरे धीरे उनकी मम्मी भी जिन्दगी से पककर मजबूर होने लगी। पहले वह किसी तरह कात कर या पीस कर अपने भाषो ये तारे जुम्मन का पेट भर देती थी, मगर मन, जबकि जुम्मन ही तेरह चौदह साल का हो गया तो उसे ही कुछ करना था। पौर उसने जो-तोड मेहनत शुरू की। उस मेहनत का भी पूरा पूरा फल उहें मिला हो, ऐसा याद नहीं पाता । मगर एक दिन भी उसके बाद ऐसा नहीं माया, जबकि उहें फाका करना पड़ा हो। मजदूर वग मे ऐसी हालत बहुत अच्छी मानी जाती है। शायद इसीलिए जुम्मन मियां एक दिन चौपाए हो गए। जुम्मन मिया को बीवो मिली बड़ी खूबसूरत भौर फरमाबरदार । भगर मा बिछुड गई मोर उसके सर से मासिरी साया भी उतर गया। जुम्मन मिया मजदूरी करते थे और उनकी बेगम ने कुछ मुगिया पाल ली थी। इससे उनकी हालत सुधरी। क्योकि प्रडे मोर मुर्गो भच्चे मोल मे विक जाते थे। इसके बाद कुछ दिन सुख से बीते मगर उन दिनो की याद माते ही जुम्मन मिया को नीद मा जाती है मोर इससे मागे वे तमो याद कर पाते हैं जब वह एक खूबसूरत सपना देख लेते है । उस रात उहोने देखा कि उनके घर के ही एक कोने में कोई साप घूम रहा है। जम्मन मिया उसे मारने को होते हैं तभी साप प्रादमा की शक्ल में होकर कहता है, 'ऐ जुम्मन ' तू मुझे पहचान, मैं साप नहीं, फरिश्ता ए खुदा हू । तेरे घर के इसी कोने में एक बड़ा खजाना दवा पडा है। मगर तू ने मुझे करल किया सो सारा खजाना जलकर खाक हो जाएगा। मैं तो सिफ इसका रखवाला है। माल तो तुम्हे ही मिलेगा।" जुम्मन मिया सपने में भी एकबारगी काप-से गए। लेकिन हिम्मत करक बोले-'ए फरिश्ता ए खुदा ' जम्मन मिया को धन का लालच कभी नही रहा है । तू मगर साप बनकर घर मे रहेगा तो मुझे जरूर तेरा सर कलम करना पडेगा। हा, मगर वह मान मेरा ही है तो तू हट जा यहा से ताकि मैं उसे खोद मूं।" 'मच्छी बात है, मलविदा ! खुदा हाफिज", कहकर वह फरिश्ता साप बना मानस-वधू भोर फिर न जाने कहा लोप हो गया। जम्मन मियां नींद में डर गए पौर चौक कर जाग गए। उनके बराबर वाली खटिया पर उनकी बेगम वहीदन सो रही थी। मस्तर और उसकी बहू कपर सोए थे और इस्लाम पिछले कई महीनो से जेल में चक्की पोस रहा था। जुम्मन मिया बड़ी धीमी भावाज से वहीदन को जगाने लगे-- "सुनती हा, प्रस्तर को भम्मा, जरा सुनो तो!" वहीदन [-~-क्या है, किसी और को तो सोने दो खुदा के वास्ते जुम्मन-~-भरी नेकबख्त, मैंने अभी सपने में वहीदन--सपने, सपने, सपने 1 खुदा जाने ये सपने कर खत्म होगे तुम्हारे । लाख बार कहा है कि माखिरी वक्त मे तो खुदा का नाम लिया करो। काम पर हैं मोर सपने देखते हैं ऊट पटाग! जुम्मन मिया-धोरे बालो बेगम, तेरी जान की कसम, मैंने खुदा का फरि- श्ता ही देखा है ख्वाब मे। वहीदन-ऐं? क्या सच ? जरा फिर तो कहना। जुम्मन-एक बार नहीं लाख बार सुनो । मैंने मभी-अभी सपने मे खुदा का फरिश्ता देखा है। वहीदन-मच्छा, तुम्हारे लिये कब तक जगह बन रही है वहा जुम्मन-पत्तैरे की! तू भी रही निरी गंवार हो। पूरी बात कभी नही सुनेगी।मलीमानस, उसने जो कुछ कहा है, वह सच हुआ तो हमे जीते जी बहिश्त हो जायेगी। कहता है, हमारे घर के इस कोने में कोई बड़ा खजाना है । पहले मैंने उसे साप की शक्ल म देखा मौर जब उसे मारने गया तो वह साप फरिश्ता बन गया। मैंने उसे जाने को कहा तो वह गायब हो गया ! अव समझो कि नहीं ? वहीदन -समझ गई इस्लामू के मब्बा, मगर सपने भी कही सच होते हैं। जुम्मन-होते भी हैं और नही भी। मगर में जरूर देखूगा उस जगह की खोद कर । तुम लालटेन तो जलाभो। वहीदन उठी और लालटेन जलाने लगी। उसके बाद धीमे से जुम्मन मिया उठे और उस कोन की मोर धीमे धीमे बढ़े । उह डर लग रहा था कहीं वह साप अब भी वही छुपा न बैठा हो। मगर बुढ़ापे मे मौत भी भा गई तो क्या होगा? ?
४६ मानस वधू यह सोच कर वह बढे और धीरे धीरे उस कोने को खुरपी से खोदने लगे। उह ज्यादा खोदना नही पडा तभी एक हाडी से उनकी खुरपी टकरा गई। इसके बाद उन्होंने और भी सावधानी से खुरपी वलाई। कुछ ही देर म हाडी बाहर थी। उसमे ऊपर कुछ नोट थे मोर नीचे गिलट पौर चादी के रुपये । कुल मिलाकर कोई पद्रह हजार होगे । सिक्के पुराने नहीं थे, नये थे, जो उन दिनों पलते थे। जुम्मन मिया ने हाडी सम्हाल कर वहीदन से कह दिया-"तुम इस जगह को ममी ऐसा बना दो कि खोदी हुई मालूम ही न हो।" पौर जब वहीदन उस काम से निपट कर माई तो बोली-यो जी, पर इन रुपयो का क्या करना है जुम्मन मिया ने लम्बी सास लेकर कहा-"मेरा खयाल है कि रुपया हमारा है ही नहीं।" "रे ही नहीं, क्या मतलब ?" वहीदन ने चौंक कर पूछा, "तुम्हारा दिमाग तो सही है ?" "बिलकुल सही है', जुम्मन मियां ने जवाब दिया--"खुदा के यहां ये सिक्के वहा चलते तो हम इसानों मौर फरिश्तो में फर्क ही क्या होता ? मुझे तो सोलह पाने ऐसा लगता है कि इस्लाम का बच्चा किसी गरीब को चित करके माया है इहें । मौर मैं इसे वापस करा दूगा।" वहीदन ने कहा, "सुदा के लिए ऐसा मत करना । नहीं तो तुम्हारा भी गला घोंट देगा। जानते नहीं हो तुम उसे।" "अच्छी तरह जानता हूँ", जुम्मन ने कहा-"मैं उसका बाप है। मेरे सून सा कुछ प्रसर उसमें जरूर कहीं बाकी होगा। मुझे यकीन है कि अगर मैं रहता तो यह जरूर मान जायेगा।" 'पन्छा भो, जसा तुम्हारा मन करेगरना । मैं क्या जानू ।" बहार वहीन ने करवट बदली पौर सो गई। वास्तव में यह रुपये पैसे की मोर से पो ही मुण विरक्ता-सी। इसके बाद जुम्मन मियां रात भर न सो सरे । उनके मन में मने विचार मान सगे। उनमे कुछ विधार ऐमे थे जो उनके लिए एक मुसद महल पुन रहे इसी जिदगी म मोर दूसरे कुछ ऐसे विचार पे जो ठोर इसके विरोपीय।
मानस-वधू X - मितु भव तक भी कोई लौकिक सुख उहें विपलित नही कर सका। x एक दिन जब इस्लामू तौटा तो उसने सबसे पहले अपन अन्दाजान को सलाम की। जुम्मन ने उसे दुमाए देते हुए कहा~-वेट, खुदा तुझे मच्छी मक्ल द। जिससे तेरी गिदगी सुघरे। मुझे तेरा महा खयाल है वटा, सर्व मानो, सुम्हारे सिवा कुछ भी तो फिकर नहीं है मुझे। मौर मगर तेरा फिकर न होता तो शायद मैं यहा से पभी का चला जाता। मगर मेरा दम उस वक्त तक नहीं निकलेगा जब वक तू कुछ करने साने नहीं लगेगा।" इस्लामू हसा पोर कहने लगा, "मब्बा, अब मैं एक दुकान खोल लगा। मुझे मन किसी की चोरी करने की जरूरत नहीं है।" मोर फिर इस तरह वठकर चला गया जैसे वह जेल से नहीं बल्कि नाम से माया हो कोई भारी काम करके। बूढ़ा जुम्मन उसकी पीठ दाता रह गया। पोडी देर बाद जब वह मन्दर से माया तो उसका मुह लाल था। पसीनो में वह सर था । बोला-"अब्बा, तुम कहते हो कि मादमी को ईमानदारी से रहना चाहिये । पब की बार मैं जेल से माया मा तो मैं दरवाजे पर जेलको मलविदा कह कर ही लौटा था। मगर खुदा को शायद यह मजूर नहीं। क्योकि मैं कुछ रुपया अपने उस कोने मे दवाकर रख गया था लेकिन वह नहीं सकता कि कसाई का माल कोई फ्टरा कैसे डकार गया । वह रुपया पहा नहीं है। रुपये के बिना दुकान नहीं हो सकती। दूकान के बिना रोजी नही चल सकती । मुझे रुपया चाहिये। उसके लिये मैं चोरी करूगा, माके डालूगा और काल मी करूगा।" "कितना रुपया था बेटे ! तुम्हारा," जुम्मन ने प्यार से पूछा। "पद्रह हजार पापबा,पूरा।" "वहा से माया था ?" "कहीं से भी सही, मगर था तो "तुम बुरा क्यों मानते हो, मैं समझता हू किसी को चोरी को होगी। क्यो ठीक है न?" इस्लामू चुप रहा। जुम्मन मिया कहते रहे--"अब बेटे, एक बात और भी सोचो, क्या उस मादमी के पास भी वह रुपया चोरी का ही होगा, जहा से तुम लाये थे।" " ४० कि कुछ क्षणो तक दोनाप रहे। जुम्मन मिया मामे ले–“बेटे, शायद इसका जवाब तुम "" में देना चाहते हो । बेटे, जरा सोच सोने की कमाई का कितना नम होगा ! देख यह कर देखो, तुम्हें चोरी करने के बाद मिले धन के पले जाने का मलाल है तो उसे रुपया मेरे पास है मौर तेरी छूट है, तू चाहे इसे उहा या इससे व्यापार कर । मगर मैं तुझे सलाह दूगा तू स रुपये को इसके मालिक को लौटाकर महद से कि कभी बुरा काम न करूगा भगर तूने वैसा किया, तो मैं यकीन दिलाता हूँ तुझे खुदा देगा, उससे पहले कुछ मैं भी दूगा जिससे तू छोटा-मोटा कारोबार शुरू कर सकता है।' जुम्मन मिया की बाट पूरी भी न हो पाई थी कि इस्लाम् ने झपट कर वा हाडी अपने मब्बा के हाप से छीन ली । वहीं जल्दीसे उसने उसका मुह सोता और कई क्षणो तक उसे ताकता रहा। जैसे उसे देखने के लिए वह काफी से ज्यादा बेताब था। बूढा जुम्मन उसकी सब हरकतों को देखता रहा।। वह देख रहा था इस्लामू की दृष्टि शून्य मे । एक हाथ हांडी मे कभी घूमने लगता मोर कमी रुक जाता था। दूसरे हाथ पर हाडी रखी थी। जो धीरे-धीरे काप रहा था। "क्यो बेटे, क्या सोचा है तुमने जुम्मन मिया ने पूछा। ताम् धीरे-से चिल्लाया। हाडो उसके हाथ से गिरकर फूट गई पौर वह जुम्मन बारी ही बात मानेगा।" जुम्मन मिया ने उसकी मयां से चिपटकर फूट फूटकर रोने लगा। 'मैं जानता था, मेरा कहा कमर पर हाथ फेरते हुए -"ौर पर तो पाप की हाही भी फूट गई। यह यही मच्छी बात है।" "तुम समझते हो मैं प्रधाइ । मुझे यह पता नहीं है। क्या मैं जानता नहीं कि यह रुपया क्सिका है तुम्हें भूला मरने की इजाजत दे सकता हूं। मैं दर-दर ठोकरें खाने लिये छ और सकता हू। फरजन्द, मैं तुम्हें बेस में भेवना भी पस कर सकता है। लेकिन यह नहीं कि तुम पारिफ का, जो तुम्हारे भी वर्ष हैं रुपया इस प्रकार रामाभो और हजम कर जामो । यदि तुम मेरे बेटे हते हो तो उसका रुपया वापस करने चलो। पौरपरीफ यह हम लोगों का दाइली एक होता है सो, उठो, वापस करने मो।" यी "मब्बामम .९ रहना च एक खत-एक कहानी मैं कहानिया लिखता हू । कहानी लिखना मेरा पेशा है। मैं प्राय ही कहा- नियों के प्लाट खोजा करता हूँ। होटल मे, सडको पर, अखबार मे, सिनेमा मे, ट्रेन में-गरज यह कि दुनिया का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहाँ मेरी गिद्ध-दृष्ट्रि नहीं लगी रहती है। मैंने कभी प्रेम की कहानिया नहीं लिवी। वास्तव मे मुझे प्रेम का विषय पागलपन के अतिरिक्त भोर कुछ नहीं लगता। मेरा विचार है कि प्रेम केवल युवक और युवतियो के दिल बहलाने की वस्तु है । मुझे विश्वास है कि प्रेम केवल किस्से कहानियो तक ही सीमित है, इससे मागे कुछ नहीं है। लेकिन एक दिन मेरा यह विश्वास चूर चूर हो गया। इसका ठोस प्रमाण मुझे एक पत्र के रूप में मिला। उसे मेरे एक कहानीकार मित्र मेरे घर पर उस दिन भूल गए थे, जिस दिन मैंने उहें चाय पिलाई थी। अब मापसे छिपाना क्या - मैंने उसे चुपके-से उनकी उस कापी में से निकाल लिया था, जिसे वह हर समय अपनी बगल मे दबाए घूमा करते हैं। मुझे बहुत दिनो सेशक था कि उन्द्र जसा खनी किस्म का साहित्यिक जरूर किसी न किसी को प्रेमपत्र लिखा करता होगा। उनकी प्रकृति ही ऐसी होती है। हर वक्त एक न एक प्रेमिका उनके दिमाग पर छाई रहती है। उहोने पत्र को बहुत सुदर प्रपरो मे बनाकर लिखा था। मैंने उसे सूध कर यह भी जानने की कोशिश की कि उसमे सुगध भी है या नहीं। मगर इतने पैसे उसके पास कहा से पाए होगे कि बाजार से एक बढिया-सा सेंट खरीद लेते ? साहित्यकार वो दूध पीने वाले मजनू होते हैं, खून देने वाले कोई और होते होंगे। मैं जानता है कि प्रापको उस पत्र की उत्सुकता सता रही होगी। भाप यह जानने के लिए उत्सुक होंगे कि साहित्यकार कैसे-कैसे प्रेम पत्र लिखा करते मानस-वधू मगर उस पत्र में कोई ऐसी उपमा अथवा मलकार मुझे दिखाई न दिया, जिससे पापको भूख शांत हो सके। बिलकुल रोजमर्रा का कामकानो प्रेम-पत्र है । फिर माप कहगे कि कामकामी प्रेम पत्र हो तो वास्तव मे पत्र होते हैं। खैर, मापकी दिल-जमई के लिए मैं उसे यहां पर भविश्ल रूप म दे रहा हूँ शिवपुरी, मेरठ। ता०४ सितम्बर'५५ प्रिय मृदुला, तुम्हारा पत्र मिला। माया से भी अधिक मीठे मीठे सन्द पढ़ने को मिले। तुमने लिखा है 'मैं तुम्हें भुलाना चाह कर भी नहीं भुला सी हूँ।' भला क्या? क्या मुझ दीन दुखो के जीवन मे माई थी भोर क्यो प्रब मुलाना चाहती हो, पूछू तो सही? मैंने सुना है कि जद कोई तुम्हारी जैसी किसी लड़की को याद करता है, तो जार जार मासू बहाता है, रोता है मौर परेशान होता है। सच पूछो तो मुझे जव तुम्हारी याद आती है, तो हृदय मे प्रसनता वा सोता उमडने लगता है। मैं मन-ही मन कल्पनामो मे खो जाता है। मुझे प्रारम्भिक मिलन से लेकर अब तक की सारी घटनाए याद मा जाती हैं। बार-बार जी चाहता है कि मैं वही स्वप्न देखता रहू। तुम्ह लेकर कभी किसी प्रकार के शोक सताप को काली छाया मेरे मन पर पडना तो बहुत दूर की बात है। जानती हो मैंने इस प्राकस्मिक मिलन को पर्चा अपने मित्रा में किस तरह रग-रगा कर की है ? सिफ तुम्हारा नाम नहीं बताया । सब मुझे झूठा बताते हैं। मगर क्या तुम भी झूठी हो, तुम भी काल्पनिक हो? अच्छा, सच बताना क्या सचमुच ऐसा ही है ? उहे तो मेरा विश्वास होता नहीं। कहने लगे कि कहीं 'यसो' या 'ट्रेनो म भी इस तरह से मेंट होती है ! भला तुम्ही बतामो। तुम मुझे 'बस मे ही तो मिली थी न ? वहा भीड के कारण तुम्हें जगह नहीं मिल पाई पो भौर मैं अपनी सीट पर अधिकार जमाए गया। किसी खड़ी हुई महिला के लिए सीट छोड देना हर पुरुष का कत्तव्य है। इससे अधिक मैंने कुछ दिया भी नहीं था। फिर तुम मुस्कुराती हुई बैठ गई थीं। पता नहीं तुम्ह इमी बीच मुझमे ऐतो क्या सूबी दिखाई दे गई उस मुलाकात म हमारा परिचय तो फिर माज तक चला भा रहा है। उसी परिचय के प्राधार पर तुम मुझे अपने पिता के पास मे गइ। तुमने जो हुमा, मानस धू से बात पसाए। उनके सारे प्रेम का नक्शा खींचना शुरू किया और दिमागी घोटे दौडाने लगा। अपने मुख से शायद यह कहना ठीक नहीं समझा मोर अपने पिता से कहलवा दिया। खैर, कोई बात नहीं । मुझे ये बातें बही प्यारी लगती हैं । उहें याद करके ही मैं मन के लड्डू फोह लेता है। तुम्हारे पिता जी बडे सज्जन मोर अनुभवी व्यक्ति जान पड़ते हैं । मुझे बड़ा पाश्चय है कि उहोंने प्रथम दृष्टि मे ही मुझे कैसे तुम्हारे योग्य समझ लिया। तुमने अवश्य उनसे अपने दिल की बातें कही होगी। तुम एक लडकी होकर भी अपने पिता से सबकुछ कह सकी, मौर में पुरुष होकर भी मभी तक साहस न कर पाया, मौर थायद कर भी नहीं सकूगा। तुम्हारे पिताजी के पास मैंने कल एक पत्र लिखा था । उसमे जो कुछ लिखा ह उसे तुमने अवश्य ही पढ़ लिया होगा। कोई खास बात नहीं थी उसमे । मैंने केवल इतना ही लिखा था कि मैं साहस नही बटोर सका हू, माप स्वय ही पिताजी मृदुला, सभव है कि तुम मुझे कायर समझ लो, लेकिन मेरी जिंदादिली उस दिन मालूम होगी, जिस दिन पिता जी मना कर देंगे मोर मैं लेकिन तुम सातिर जमा रखो, ऐसा नहीं होगा। पिताजी कभी इस प्रस्ताव को नहीं ठुकराएगे। फिर हम क्यो उनकी भावनामो और इच्छाभो के विपरीत चलें? मोर हा, एक बात तो वतामो तुमने भी तो अपनी सहेलियों से चर्चा की होगी। भला, वे कैसे तुम्हारी चुटकिया लेती है ? तुम्ह क्या कहकर चिढाती हलिखना ज़रूर, तुम्हें मेरी कसम | मैं समझता हूँ कि तुम सब बातें समझ गई होगी। पत्र का उत्तर जल्द देना। वैस मैंने कोई खास बात पूछी नहीं ह लेकिन मुझे बडे डाक्खाने के चक्कर लगाने भी पादत पड़ गई है । तुम्हारी लेखनी से निक्ला हुमा एक एक शब्द मेरे दिल की धडकन है। बस, बाकी दूसरे पत्र मे लिखूगा। तुम्हारा मित्र ने दस्तखत करा की जगह छोड रखी थी। क्या सादगी से पत्र लिखा था। पर हम भा दूर की कोठी लान वाले है। अब घर जाकर कापी टटोलेंग और फौरन भागे पाएग। यह सोचकर मैंने जल्दी-जल्दी उस पत्र के प्राधार पर 1 ५२ मानस-वध कैसे वह 'बस' मे मिली होगी? कैसे परिचय हुमा होगा? वह कैसे मुस्करा होगी मौर हमारे बधु किस तरह उस मुस्कराहट पर हजार जान से निछावर हो गए होगे ? फिर 'बस' से उतरने पर किस तरह उसने उसे घर चलने का निमत्रण दिया होगा? वहा पहुचे होंगे, मिठाई खाई होगी, चाय पी होगी लीजिए वहानी बनते कुछ देर भी लगती है। मेरा विश्वास था कि कल्पना मे यथाथ का पुट यदि कुछ भी हो, तो अस्वाभाविकता के लिए स्थान नहीं के बराबर रह जाता है। मैंने जल्दी-जल्दी प्लाट की रूपरेखा बना ली। मृदुला के नाम की जगह प्रमिला रखा मोर मित्र महोदय के नाम के स्थान पर उमेश नाम रखा। इन दोनो के माता पिता के नाम म्युनिसिपैलिटी को इलेक्शन शीट मे से छाटे । शायद एक लाला मुकुदीराम पा मोर दूंगरा घसीटाराम । स्त्रियो के नाम भी शायद ऐसे ही कुछ गगादेई, जमुनादेई वगरह थे। प्रब बताइए, कहानी बनने मे कसर ही क्या रह गई थी। एक बात यह भी सोचने की थी कि कहानी को ट्रेजेडी (दुखात) रखा जाए या कामेडी (सुखात) बनाया जाए? भई, सच बात तो यह है कि अपने से तो किसी का दुख देखकर मासू रोके नहीं जाते। हमारी नायिका प्रमिलारानी इस तरह रोए, जैसे बरसात झरती है, और हमारे नायक महोदय हमारे मित्र को तरह लापरवाह भोर सनकी किस्म के हो च्च्च्च् । पाप ही बताइए, क्या पदर के कारण से पदरख को रुलाया जा सकता है । एक तीमरी समावना भी थी। कहानी को हास्यरस को बनाया जाए। मगर इससे शायद सारा ही गुरु गोबर हो जाता। हमारे मित्र महोदय को दस पर कोई हस भी तो नहीं सकता। सर, हमने यिना इस बात का विचार किए विहानी सुखान्त बनेगी या दुखान्त, जल्दी जल्दी पैड पर कलम चलानो गुरू को मार एक सुदर सरकारी 'वस के वातावरण मे पहुच गए। अपने को हमने 'वस के कहक्टर के स्थान पर रखा । नायक बनना खतरे से खाली नहीं था। कहीं हम किसी को प्रमिला समझ बैठे मोर वह निकल पाए गगादेई ? हरे, हरे? कुछ देर बाद नायक साहय भाते हैं पौर अपनी सीट पर विराज जाते हैं । भय इनका खारा खींचने के लिए मुछ इनका हुलिया भी तो बयान करना पाहिए। बड़ी-बडी पाखें उह बड़ी प्रासें तो नापिका की होनी चाहिएँ । नायिका मानस वधू ५३ भगले स्टेशन पर बैठाई जाएगी। प्रभी मैं यह सब नक्शे तैयार कर हो रहा था और मैं पापको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि अगर नीचे लिखी दुघटना न घट जाती, तो मैं मापको एक बहुत बढ़िया प्रेम कहानी पढने के लिए देता इन पक्तियो के स्थान पर भाप हसने के बजाए रोते भीक्ते, भौर मेरी जान को सौ सौ दुमाए देते खैर, जब मैं यह सब लिख लिखा रहा था, तो नीचे से अपने उही मित्र महोदय की भावाज सुनाई दी। सुनते ही मैंने पत्र को जल्दी से कापी के नीचे रखा और उनके स्वागत के लिए दरवाजा खोल दिया। वह भीतर पाए। चुपचाप चारा तरफ देखा। मेज पर निगाह गई। मागे बढे, मेरी कापी को उठा कर एक तरफ रखा और उसके नीचे से पत्र उठा कर जेब मे डालते हुए बोले- 'पागल हो यह तो मेरी कहानी का खाका है। मैं जानता था कि तुम जरूर कोई ऐसी ही हरकत कर रहे होगे। मगर अब नया प्लाट बनामो । नमस्कार !" मौर मैं मैं मैं अपन बारे में क्या पताक?
दुखार चाहिए मेरी डिस्पेंसरी शहर के ऐसे भाग मे है, जहा से होकर शहर का हर मादमी गुजरता है इस रास्ते का नाम पहले से ही कचहरी रोड है, कौन भाग्यवान ऐसा होगा जिसे भारत सरकार के न्याय विभाग स वास्ता न पडता हो? फिर यह सहक तो अनेक कालिजो के द्वार तक भी पहुचती है, शहर का सबसे बडा मदिर भी इसी भाग में स्थित है। वे सिनेमाघर, जहा नई-नई फिल्मे भाती रहती हैं, इसी माग पर हैं। कई प्रसिद्ध क्लव भी इसो सडक को सुशोभित करते हैं । इन सब बातो का ख्याल करके लोग प्राय अपने पदकमलो से इस सड़क की छाती को पवित्र करते रहते है। मुझे अपना प्रचार करने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं पडी। जिस दिन से डिस्पेंसरी खोली उसी दिन से मेरे यहा मरीजो का ताता लग गया। इसका कारण वह महाभाग्यशालिनी सडक थी, या मेरो विलायत की लम्बी चौडी डिग्री पी,या मेरी डिस्पेंसरी को मसाधारण सजावट थी, ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह बात ठीक तौर से कही जा सकती है कि मुझे वहा एक दिन भी निठल्ला नही बठना पडा, न किसी मरीज के प्राण गए न मुझे नकली मरीज बैठाने पडे और न ही मूनी घाखो से ताकना पड़ा। मेरी शानदार डिस्पेंसरी का साइन बोड भी शानदार ही था। उस पर मोटे प्रसरो मे लिखा हुना था डाक्टर प्रार० प्रकाश-हृदय विशेषन-" इस डिस्पेंसरी म माने वाले व्यक्ति भी कुछ विशेष ही प्रकार के होते थे। उनमे स कुछ तो राते झोक्त ही नजर आते थे कुछ रोनी सूरत बनाए रखते थे-पौर कुछ प्रेमी जन भी होते थे जिह यह माशा रहती थी कि उनके हृदय के रोगा का भी शहर भर म में ही एकमात्र विपिन । नगर के सिविल हास्पिटल को मैंने अपनी सवाए को दे रखी थी। वहीं पर मानस-वधू एक दिन रात की डयूटी पर था । नींद को न माने देने के लिए मैं दिन में ही योडा- सा सो लिया था। शाम को लगभग पाच बजे मैं अलसाया मदरसा अपनी डिस्पेंसरी मे भाकर बैठा ही था तभी एक युवक मुझे नमम्कोर कर करते हुए भीतर पाया । वह देखने में कोई विद्यार्थी जान पडता था। गौरा रग, इकहरी चंद्रन नाक नक्श से सुदर। इस युवक को देखते ही मैंने अपनी सामने वाली कुसी कार मोर इशारा किया और पूछा-"कहिए, मैं मापको क्या सेवा कर सकता हूँ?" युवक पहले से ही इस प्रश्न के लिए तैयार था। बोला, "डाक्टर साहब, मुझे कोई ऐसी दवा चाहिए जिससे बुखार मा जाए।" "बुखार आ जाए ?" मैंने पाश्चय से पूछा। "जी," उसने कहा। मैं अपनी हसी न रोक सवा और ठहाका मार कर हसने लगा। युवक गभीर बना मेरा मुह ताकता रहा। कुछ देर बाद बोला, "डाक्टर साहब, मैंने यह बात गम्भीरता से कही थी। आप इसे हसी मे क्यो टालना चाहते हैं ? मैंने कहा, "देखिए, महाशय, यहा बुखार भगाने की दवा मिल सकती है, बुखार हो जाने की नहीं।" उसने पूछा 'क्या ऐसी कोई दवा होती ही नही, जिससे बुखार हो जाए?" 'होती क्यों नही ?" मैंने कहा 'होती तो ऐसी भी है, जिससे बुखार तो बुखार मौत भी पा जाए। मगर ऐसी दवाए देने के लिए नहीं होती। हा, क्या मैं जान सकता हूं कि ऐसी क्या मुसीबत मा गई कि आपको बैठे बिठाए बुखार ले लेन की सूझी। वह बोला, "डाक्टर साहब जब भाप इस विषय में कोई सहायता हो करने के लिए तयार नहीं है तो पूछ कर ही क्या कोजियेगा?" उसके चेहरे से निराशा के भाव टपक रहे थे। मैंने कहा,"दोस्त मुझे आपके साथ पूरी हमदर्दी है, लेकिन मैं अपने कत्तव्यसे विवश हू । फिर भी मैं यह जानना चाहता हूँ कि वह क्या बात है, जो आपको इतना परेशान कर रही है। हो सकता है कि मैं प्रापको कोई अच्छी राय दे सकू उसने कहा, 'डाक्टर साहब, यह एक बहुत लम्बी कहानी है । मापको इतना समय कहा - मोर जव भाप दवाई ही नहीं दे सक्ते तो मौर भी आपसे क्या पाशा की जा सकती है ।" ॥
मानस-वधू "माप निराश क्यो होते हैं ?" मैंने उसे माश्वासन दिया,"माप कहिए तो सही।" मेरे पधिक माग्रह करने से उसने कहना शुरू किया 'मैं एक ऐसी लड़की से शादी करना चाहता हूं, जो हमारी जाति से कुछ नीची जाति की मानी जाती है। पिताजी रूढिवादी होने के नाते इसके लिए माशा नहीं देते । मैंने यह तरकीब सोची है कि यदि मुझे बुखार हो गया तो मैं बुखार में बडबडाऊगा। इससे पिताजी का दिल पसीज जाएगा और मेरा काम हो जायेगा।" मुझे और भी हतो पाने को हुई । लेकिन युवक को गभीरता देख कर मैं रुका रहा। ऐसे मे हसना एक प्रसम्यता समझी जाती । मैंने पूछा- क्या तुम्हारे पिताजी जो कर रहे हैं, वह तुम्हारे लिए ठीक नही है ?" यह बोला, "उनके दृष्टिकोण से तो ठीक ही होगा। वह जहा से मेरी शादी करना चाहते है, वहा से एक लम्बी चौडी दहेज की रवम भी मिलेगी। जहा से मैं करना चाहता हूँ वहा से कुछ नहीं मिलेगा। पिताजी ने यदि किसी गवार सहको को मेरे पल्ले बाघ दिया, तो मेरी उमर उसे पढाते ही बीत जायेगी। मैं बजाय एक पति के एक गुरु बन जाऊगा। भाप भली प्रकार मनुमान लगा सकते हैं कि उस समय मेरी क्या दशा होगी। मैंने जो लहकी पसद की है वह एक पढी लिखी मोर सभ्य परिवार की लड़की है । फिर, यह भी तो माप देखिये कि कोई बच्चा नहीं हू मैं भी तो अपना भला-बुरामाप सोच सकता है । इसके अलावा, मान वाली जिन्दगी मे जो भुगतना है, वह सब मुझे ही, मेरे पिता जी को नही।" मैंने कहा--"मुझे मापके साप पूरी सहानुभूति है। खेद है कि मैं मापको सेवा नहीं कर सकता । माप मोर जो सेवा कहें, मैं करने के लिए तैयार है लेकिन अपने ग्राहको को बुखार देने का काम मुझसे नही होगा।" भच्छा डाक्टर साहब कह कर उसने एक लम्बी सास ली भोर वहां से चला गया। मुझे सोचने के लिए वाफी सामग्री मिल गई घो। मेरे दिमाग में एक सयाल पा रहा या एक जा रहा था। इसी प्रकार विचारो का ताता लगा रहा। युवक दी शक्ल बार-बार मेरे मस्तिष्क मे घूमने लगी। मुझे अपना वह समय भी याद मानस-वधू माया, जब मैं भी उस अवस्था मे या। इग्लैंड मे ही मेरा एक लड़की से प्रेम हो गया था। मैंने अपने पिता जी को पत्र लिख कर मनुमति मागी थी । लेकिन उनका उत्तर कितना कठोर था। उन्होंने मुझे जायदाद से वषित करने के लिए धमकी दी थी। जाति बिरादरी से निकाल दिये जाने का भय दिखाया था। और भी न- जाने क्या-क्या लिखा था। विवश होकर मुझे अपनी प्रेयसी को वही पर छोहना पडा था। मब जो मुझे पली मिली है जिसके विषय में मैं कुछ कहना ही नहीं पाहता यद्यपि यह ठीक है कि यह डिस्पेंसरी, यह शान, यह सबकुछ श्रीमती जी की कृपा से प्राप्त हुए हैं, इस अहसान से मैं इतना दबा हुमा हूँ कि इसके बारे मे कुछ कहना नैतिकता के विरुद्ध है। वहीं विचारो मे मरीजो के माने का समय हो गया । रात के माठ बजे तक मैं व्यस्त रहा । फिर मैं सिविल अस्पताल में अपनी डयूटी पर भा गया । रात को लगभग एक बजे एक केस माया। मरीज को बुखार या । बेहोशी थी भोर वह बहबहा रहा था। उसके साथ कितने ही मादमी थे। मरीज की शक्ल देखते ही मैं पहचान गया। यह वही युवक था, जिससे मेरी बातें शाम के समय हुई थी। स्थिति मेरी जानी पहचानी थी। फिर भी मैंने पूछना ही ठीक समझा पोर पूछा 'कब से बुखार है इहे ?" उसके साथ माने वालो मे से एक ने उत्तर दिया, "डाक्टर साहब, शाम के वक्त तो घरसे बिल्कुल ठीक हालत मे यह कही घमने गया था। वहा से लगभग ग्यारह बजे इस स्थिति मे इसके कुछ मित्र लाए थे। उनका कहना है कि चायपर में यकायक दौरा पडा। फिर बुखार हो गया और फिर सन्निपात के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। इस समय और कहीं ले जाया नहीं जा सकता था, इसलिए यहा पर ले माये हैं।" मैंने एक गभीर सी 'हूं' को मोर अपना स्टेथेस्कोप कानो पर फिट किया। हाटगे की तरह मैंने उसकी देखभाल की । देखभाल के बाद मैं एकदम गोर हो गया। जबकि मैं भीतर से बड़े जोर से हस पडना चाह रहा था। मरीष के पास से एक मोर को हट कर मैंने उसके एक सापी को बुलाया मोर कहा, 'अच्छा हमा, तुम इसे यहाँ ले माये।" वह एकदम घबरा गया। चिता के स्वर मे जल्दी जल्दी बोला, "क्या बात है, साक्टर साहब खरियत तो है । मगर इसे कुछ हो गया-भगवान न करे- मानस-वधू तो घर का चिराग गुल हो जायगा।" मैंने सिर नीचा किये हुए ही कहा, "मालुम होता है कि इसके दिल पर कोई गहरा असर हो गया है। दिल और दिमाग की कशमकश में इसका दिल कुछ हार मान गया है । लेकिन अगर माप डाक्टरी पढे होते, तो आपको मालूम होता कि दिल कभी हार नहीं मानता। वह अपना रोष मय तरीका से प्रकट करता है । यह बुम्बार उसी का नतीजा है और बुखार भी बहुत विचित्र है--फिर भी मैं कोशिश कर सकता हू वह मादमी मेरा मुह ताकता रह गया । मैं बिना उत्तर को प्रतीक्षा किये ही एक पट्टी भिगो कर मरीज के माथे पर रखने लगा। उस समय मैंने उसे दाखिल कर लिया। एक मिक्श्चर पिला दिया और सब लोगो को इस बहाने बाहर निकाल दिया कि मरोन को शाति की मावश्यकता है । इसके बाद मैं उसके पास गया और बोला, 'मैं अकेला ही हू यहा पर।' युवक ने धीरे धीरे सावधानी के साथ पाखें खोली और अनुनय भरे स्वर मे बोला, "डाक्टर साहब वह तो न कर सके, मगर यह तो कर सकते हैं कि मैंने उसके मुह पर हाथ रख दिया भोर कहा, 'चुप लेटे रहो, मैं बाहर जा कर सम ठीक कर सूगा।" मैं उठकर बाहर मा गया। वहा हर एक की पाखो मे उत्सुक्ता झाक रही पी। सब यही जानना चाहते थे कि क्या हाल है, क्या उम्मीद है । मैंने कहा "इस रोग के पीछे कोई कहानी मालूम होती है। उसको विना जाने इलाज मुश्किल " " पहा एकदम सनाटा सा छाया रहा। मैंने पूछा-' इसक पिता कौन हैं एक प्रौढ़ सज्जन सामने भाये और रोते हुए बाले, 'साहब में ही बदकिस्मत इसका बाप है।" मैं उहें एक भोर को ले गया । धीरे में पूछा "सच बताइये क्या इस लड़के का किसी से लगाव तो नहीं है कुछ 'जी,"वह हिपकिवाते हुए से बोले, 'ए लहसो "बस, बस, मैंने गभीर बन कर कहा। "इतना हो मैं जानना चाहता था। अब एक ही इलाज रह गया है । ज्योही लहरे को होश माये, पाप उस सरकी के साप इसकी शादी का धुम समापार मुना . , .
मानस-वधू
५६
"मगर डाक्टर साहब उसका बाप माश्चर्य से बोला।
मैंने कधे मटका दिये, "मफसोस कि माप समझते नहीं।"
और उस बेचारे प्रौढ के पास कोई जवाब नहीं था।
इस घटना के लगभग माल भर बाद अचानक मैं देखता है कि मेरी डिस्में
सरी मे एक दम्पति माये। दोनो प्रसन्न थे, लेकिन लडकी के चेहरे पर कुछ
मलिनता जरूर थी। मैंने मुस्कराते हुए पूछा, "कहिए, मैं आपको क्या सेवा कर
सक्ता हू?"
युवक ने कहा, "डाक्टर साहब", फिर उसकी नजरें नीची हो गइ। धीमे
धोमे बोला, "डाक्टर साहब, अब फिर आपकी सहायता की जरूरत है
यह यह मा बनने वाली है।"
देखा मापने, डाक्टरो से बच कर कोई कहाँ जा सकता है ?
दान का पात्र म मालती पनी बाप की बेटी थी। सुदर थी, स्वस्थ घी, चचल थी। उसके पिता दिल्ली के प्रसिद्ध व्यापारियो में से एक थे। उनके पास सम्मान था, मपि कार था और क्या कुछ नहीं था। सुख और सौभाग्य के बीच पली हुई मालती म इसके कारण कुछ गव मा जाना स्वाभाविक ही था। वैस भी वह बी. पढ रही थी। कालिज म मात फीस का दिन या। प्रोफेसर साहब के सामने दो नोट रख कर वह चपचाप कमा से बाहर निकल पाई । जब वह कक्षा मे वापस जाएगी नो रमोद उमे मज पर रखी हुई मिल जाएगी। यही क्रम सदा से चला भा रहा या कक्षा में बाहर निकल कर सहसा उसे ध्यान पाया कि घास के मैदान में मिस्टर रमा जी चहलकदमी करते चल जा रहे है, उहोने अभी प्रोफेसर साहब के सामन नोट सरकाने का पष्ट नहीं क्यिा। परीक्षा भी निकट नहीं थी जिससे यह पनुमान लगाया जा सके कि घास के मैदान मे पढाई हो रही है और वह ना इतनी त मयता से हो रही है कि फीस देने का भी ध्यान नहीं रहा। रमेश की सीट उसके ठीर सामने पो पोर उसे मच्छी तरह याद था कि वह ममी कमा ममाया तक नहीं था। यहा तक कि जब दरवाजे पर खड़े-खडे उसने कुछ देर बाद प्रोफेसर साहब को रमेश का नाम बोलते सुना, तब तक भी रमेश बाबू को यह ख्याल नहीं हुभा कि उनका नम्बर मा गया होगा। उनका नम्बरमा गया है यह जता देने को मालती ने अपना कत्तव्य समझा। वह घास के मैदान में जाने के लिए दरवाजे का फैरन सार तार पर से उतर गई मोर जेब म हाप हाले टहलते हुए मिस्टर रमा से बोली मापका नम्मरमा गया है। जाइए पीस दे पाए।' रमे रहलते-रहनते राम हो गया-'जी, फीस? मोह भग्छा! फीस रमेश बाबू मानसन्वधू १ ठीक है, पायवाद।" वाह ! यह मच्छा उत्तर रहा । मगर मालती का कत्तव्य पूरा हो गया था। वह घास के मैदान में आगे बढ़ चली। फिर सहसा चलते चलते उसके पांव रुक गए। क्या ऐसा हो सकता है कि रमेश बाबू फीस देने मे मसमथ हो। मगर मालती किस प्रकार यह बात उनसे पूछ सकती है ? अगर उहोने इस सहानुभूति- प्रदशन के एवज में फिर एक करारा-सा घयवाद पकडा दिया, तो कोई बात नहीं। प्राज फीस न भी दी जाए, तो क्या होगा? मधिक से अधिक नाम-मात्र का जुरमाना हो जाएगा। अगले दिन रमेश बाबू भपनी सीट पर हाजिर थे। मगर जब प्रोफेसर साहब ने उनकी तरफ इशारा किया, तो वह उठकर उनके पास पहुचे और बहुत धीमे पान्दो मे उनसे कुछ कहा । प्रोफेसर साहब ने कहा-"अच्छा, भच्छा कोई बात नहीं। कल ले माइए।" मालती को उत्सुकता हुई। वह देखना चाहती थी कि रमेश बाबू कल अपनी फीस दे सकेंगे या नहीं मगर फिर वह सोचती कि उसे इसका अधिकार ही क्या है । इससे लाभ भी क्या हो सकता है ? कालिज में सैकड़ों ही लडके ऐसे होंगे, जो फीस देने मे असमय होंगे। उनमें एक रमेश बाबू की वृद्धि हो भी जाए तो क्या माश्चय है? अगला दिन माया पौर रमेश बाबू की सीट खाली थी। मालती के मुह पर हल्की सी मुस्कराहट माई । उन को खाली सीट बता रही थी कि रमेश बाबू रुपये मागने वाले प्रोफेसर साहब से फनी काट रहे हैं। यह बात तो निश्चित यो हो कि उहें माने वाल दो चार दिनों में या तो फीस का प्रयघ करना पड़ेगा या कालिज से अपना नाम कटा लेना पडेगा। मगर फिर मालती को ख्याल माता कि रमेश बाबू को क्या करना पड़ेगा और क्या नहीं, यह सोचने वाली वह कौन है? मगर रमेश बाबू हर महीने जो फीस लाते ये वह कहा से लाते थे? यह अवश्य एक ऐसी उत्सुकता का विषय था जिसे किसी निकटता का मधिकार न होने के बावजूद भी जानने का उहे हक था, क्योंकि उत्सुकता किसमें नहीं होती? चौथे दिन भी अब रमेश बाबू की सीट खाली रही, तो मालती सारे घण्टे में मानस-य केवल यही सोचती रही। लेक्चर की भोर उसका ध्यान नहीं रहा । रमेश बाबू पिछला साल फस्ट पोजीशन से पास करके भाए थे। इतना अच्छा लडका बिना फीस के पढ़ने से रह जाए, इससे ज्यादा प्रयाय भौर क्या हो सकता है ? मालवी ने भाज कुछ निश्चय किया। वही घास का मैदान था और रमेश बाबू एक पुस्तक सामने खोले बठ थे। मालती ने दूर से यह सब देखा पौर थोडी देर वह हिपकिघाती रही। फिर घास के मैदान में जाकर उसने रमेश बाबू से पूछा, "रमेश बाबू क्या पाप मुझे दा मिनट दे सकते हैं?" "जरूर जरूर" रमेश बाबू हडबडाहट के साप उठ कर खड़े हो गए "बताइए मैं पापकी क्या सेवा कर सकता हू?" मालती ने सलज्ज भाव से पूछा, "क्या माप बता सकते हैं कि पाप अब तक कालिज की फीस क्यो नहीं दे सके।" रमेश बाबू उसी दिन की भाति फिर हसे-"मोह फोस ? बात यह है कि फोस मे रुपये देने होते हैं मोर सयोग से इस महीने के सरम होने से पहले ही मेरा ट्यूशन छूट गया है। कोई बात नहीं, कोई दूसरा ट्यूशन मग जाएगा मोर फीस के रुपए भाजायेंगे। मगर मापको यह पूछने की क्या भावश्यकता पढो, क्या मैं पूछ सकता हूँ मालती ने कहा, "जरूर । बात यह है कि मेरा टयूशन भी छूट गया है।" "प्रापका ट्यूशन छूट गया है," रमेश बाबू ने माश्चय से पूछा-"तो क्या पाप भी ट्यूशन पढाती थीं?" "जी नहीं," मालती ने मुह में उनसी दवाकर हसते हुए कहा, "मैं टयूशन पड़ा करती थी।" "मोह !" रमेश भी मुस्कराया, "तो वास्तव में मुझे मापके साथ बहुत सहानुभूति है।" "मगर मापको सहानुभूति है तो क्यों न माप ही मेरा ट्यूशन कर लीजिए" मालती ने प्रस्ताव रखा। रमेश में भापका टयूशन करूं?" क्यो?" मालठी ने कहा 'क्या मैं कोई जानवर हू "प्रोह माफ कीरिए," रमेश बोमा, 'अगर प्राप ऐसा सोचती हैं तो मुझे " हरवहा गया। " .
मानस-वधू मापका ट्यूशन करने मे कोई भापति नहीं है।" "तोमाज से ही माप शाम को ठीक छ बजे मेरे मकान पर मा जाया कीजिए । माली स्ट्रीट मे लाला श्यामनाथ के घर का पता मालूम करने पर हो जाएगा।" इतना कह पर मालती ने अधिक देर वहा ठहरना उचित नहीं समझा भोर वह कक्षा मे चली माई। मगर ताडने वाले कयामत की नजर रखते हैं। महाशय गिरीश भी उसी कक्षा के विद्यार्थी थे। वह अपनी उद्दण्डता के लिए प्रसिद्ध थे। उहोंने जो इस प्रकार मालती को रमेश से घुट-घटकर बातचीत करते देखा तो बिना मूछो क ही मुह पर ताव देने लगे। शाम के समय ठीक वक्त पर रमेश बाबू लाला श्याम नाथ के यहा पहुचे। अभी दरवाजे पर ही थे कि एक भोर से ताक मे उनके पीछे पीछे माए महाशय गिरीश उनके सामने पाए और पूडा, "हलो, मिस्टर रमेश यहा क्या हो रहा है ? मालती से क्या काम मा पडा पाएका?" रमेश बाबू ने कहा, "मापको इससे मतलब" "अच्छा जी,' गिरीश महाशय ने कहा, हमे कोई मतलब ही नहीं । आखिर हैं तो हम भी आपके सहपाठी ही।" रमेश बाबू बोले, "मैं मालती को ट्यूशन पढाने माया हू, माप को पढ़ना हो, तो पाप भी पढ लीजिए।" "जियो," गिरीश महाशय बोले-'पढाइए साहब, खूब पढाइए मालती देवी को । हम तो यह चले।" भौर गिरीश महाशय लम्बे पग रखते हुए यहा से नौ दो ग्यारह हो गए। जब रमेश बाबू भीतर पहुंचे तो लाला श्यामनाय ने बढे मादर से उन्हें अपने पास बैठाया मोर पूछा, 'कहो, बेटा, मालती को ट्यूशन पढाने आए हो?" "जी हा," रमेश बाबू ने कहा। "वडा मच्छा है," लाला श्यामनाय बोले," बच्ची ने मुझ से जिक्र किया पा।" इसके बाद होने अपनी सदूकची खोली भोर उसमें से पचास रुपये निकाल कर रमेश बाबू की मोर बढ़ाए। रमेश ने कहा, 'यह क्या ? कसे हैं ये रुपये ?" लाला श्यामनाथ हसकर बोले, बेटा हम बच्ची के मास्टर जी को हमेथा XER मानस-वधू पेशगी फीस देते हैं । हम बिना पचास रुपया ये महीना भर रह सकते हैं, मगर जो मेहनत करता है उसके लिए पहले पैसे की जरूरत होती है।" रमेश पूर्ण रूप से लज्जित होकर बोला, "यह तो माप मुझपर ज्यादती कर रहे हैं, लाला जी!" लाला श्यामनाय उसकी बात पर हो हो करके हसते हुए बोले, 'बेटा ले लो, ले लो हम दुनिया को तुमसे ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं।" रमेश बाबू ने रुपये ले तो लिए, मगर मन में ख्यान हमा कि मालती कहीं इस बहाने उसकी सहायता तो नहीं कर रही है। उसने एक-दो बार फीस के बारे मे पूछा भी था । फिर, न कुछ फोस के रुपये ही ठहराए, न यहां दिखाई ही दे रही है । उसने पूछा, "मालती देवी कहा हैं "बेटा, माज उसकी छुटटी कर दो। वह सिनेमा देखने गई है । कल से वह पढना मारम्म करेगी।" स्वय अपने पर ही अमलाता हुमा रमेश लाला श्यामनाय को नमस्कार करके उनके घर से बाहर मा गया । जेब मे उसकी पचास रुपये थे मोर मन पर से एक बडी चिता का दोभ हट गया था। मगर साथ ही साथ यह सोचकर उसे बडा क्षोभ हो रहा था कि जिस सहायता को यह यों ही स्वीकार न कर पाता उसे चतुराई से मालती ने इस प्रकार उसे लेने को बाध्य कर दिया था। अगले दिन क्लास रूम में मालती ठीक समय पर पहुंची और जब पहला घण्टा समाप्त हुमा, तो महाशय गिरीश जल्दी से बाहर भाए भोर दरवाजे से बाहर निकलती हुई मालती से बोले, "मिस मालती देवी, कोई टयूशन हमे भी दिलवा दीजिए।" मालती ने कहक कर कहा, "ना सेंस ! क्या तुमने मुझे कोई एम्प्लायमेंट माफीसर समझ रखा है ? शम नहीं भाती तुम्हें ऐसी बातें कहते हुए ?" बेना महाशय की सिटटी पिटटी गुम हा गई। अपना-सा मुह लेकर यह एक तरफ को सरक गए। घास के मैदान में पहुंचकर मालती इस माया से खडी हो गई कि सम्भव है रमेश बाबू उससे बात करने के लिए भायें । मगर जब बहुत देर तक भी वह नहीं भाए तो वह घुपपाप क्लास रूम की तरफ लौट गई। वहा देखा, रमेश बाबू सामने डस्क पर एक किताव रखे उसमे माखें गाए बैठे हैं। मालती ने मन-ही- - मानस वधू मन पंच-ताव सा खाकर उनकी तरफ देखा और फिर अपनी सीट की तरफ बढ़ गई। दिन भर मालती ने कई बार यह कोशिश की कि रमेश को इस विकृत मुद्रा का कारण पता लग जाए, मगर वह मसफल रही। रमेश को सिवा पढने के मौर कोई काम ही मानो इस संसार में नहीं रह गया था। मालती ने मन-ही मन सोचा कि शाम को सारा भेद खुलेगा। सध्या हो गई मोर मालती बेचनी के साथ रमेश बाबू का इतजार करने लगी । यद्यपि वह इसका कारण नहीं जान पा रही थी, फिर भी न जाने क्यो उसे रमेश बाबू के प्रति एक मनिवचनीय श्रद्धा हो गई यो। रमेश बाबू अपने नियत समय पर लाला श्यामनाथ के घर पर पहुचे । नौकर उहें मालतीदेवी के पढने के कमरे के सामने छोड़कर चला गया। मालती दरवाजे पर ही थी। वह भागे बढ़ी और बोली, “नमस्ते, रमेश बाबू रमेश ने कहा, "नमस्ते । चलिए, मापके क्या-क्या विषय कमजोर हैं ?" मालती कोई उत्तर न देकर उसे अपने पढ़ने के कमरे मे ले गई और एक कुरसी पर बैठाते हुए बोली, "कहिए, माप चाय पियेंगे या कॉफी ?" रमेश बाबू ने चिढ़े हुए से स्वर में कहा, "मैं न चाय पीना चाहता हू मौर न कॉफी । घयवाद | कृपा करके यह बताइए कि भाप मुझ से क्या क्या विषय पढना चाहती हैं ?" मालती ने कहा, "न चाय पियेंगे न कॉफी, तो फिर निश्चय ही माप दूध पियेंगे । ठहरिए, मैं उसका इन्तजाम कराए देती हू, इसके बाद बातें होंगी" और यह कहकर मानती कमरे से बाहर जाने लगी। रमेश ने कहा, "जी, मैं दूध भी नहीं पीता मोर पढने के मामले मे बातें करने को मादत मुझे नहीं है। पापने जिस चीज के लिए पचास रुपये खर्च किए हैं पहला फत्तव्य वह है।" "वाह !" मालती ने फिर हसकर कहा, "मैं मपन पैसे घाहे जिस मद मे करू, मुझे उसका अधिकार है। मगर मैं अपने पचास रुपए का समय मापको पाय पिलाने मे खच करना चाहती हू, तो इसमे मापको क्या ऐतराज है ?" रमेश उठ खडा हुपा--"माफ कीजिये, मैं जिससे रुपये लेता हू उसका वह काम करना अपना कत्तव्य समझता है जिसके लिए रुपये दिए गए हैं।"
मानस-वधू अपनी जेब में हाथ डाला और उसम से पचास रुपये निकाल कर मेज पर रख दिये-"ये रहे मापके पचास रुपए यदि माप मुझ से टयूशन पढना नहीं चाहती, तो ये रुपए मेरे लिए छूना भी पाप है।" मालती रमेश बाबू को सूरत देखती हा रह गई। वह मारचय से बोली, "तो क्या मापने ये रुपए माज फीस म नहीं दिए । "जी नहीं," रमेश बाटून कहा-"मैं इस बात को खूब मच्छी तरह जानता था कि मापने ये रुपए मुझे फीस देने में सहायता करने के लिए दिए थे, टयूशन पढने के लिए नहीं । लेकिन मैं इस तरह का दान नहीं लेता। मगर दान लेता होता तो प्राज कालिज के चौथे साल मे न पढ रहा होता। मालती रुपासी हो गई । वह हतप्रभ-सी होकर कुर्सी पर बैठ गई । रमेश एक क्षण तक खडा रहा । इसके बाद जब वह जाने को तैयार हुमा, तो मालती ने कहा, "मैंने मापको यह रुपए नहीं दिए थे। भाप इह लें या न लें। जिससे मापन लिए हैं उसे ही लोटा जाइए।" "बहुत अच्छा," यह कहकर रमेश बाबू ने रुपए उठाए मोर जीने से खटाखट नीचे उतर गए। लाला श्यामनाथ अपनी बैठक वद करने ही वाले थे, जिस समय रमेश यहाँ पहुचा । और उह नमस्ते करके उसने रुपए सदूक्ची पर रख दिए-'ये मापके पचास रुपये हैं लाला जी, मैं यह टयूशन नहीं पढ़ा सकूगा। "मरे, बेटा, यह क्या? क्या तुम लोगो में भी कुछ सटपट हो गई ? यह मालती हर किसी से सस्ती है । मगर तुम्ह इस तरह रुपयो के ऊपर गुस्सा नही उतारना चाहिए।' रमेश ने कहा, 'मैं हमेशा रुपए टयूशन का महीना खत्म होने पर लिया करता है । इसके अलावा मालती देवी को ट्यूशन पढ़ने की जरूरत ही नहीं है। नमस्ते में जा रहा है।" लाला श्यामनाप मह पाए उसको देखते ही रह गए पौर रमेश तेजी के साथ उनके घर से निकल गया। कुछ देर बाद साला श्यामनाय ने वे रुपये हाप मे उठाए मोर फिर गरन हितात हए वह मालती के कमरे की तरफ चले । मालती अभी हम उसी मुद्रा में बैठी यी जिस में रमे उसे छोरर गया था। जबमाला श्यामनाथ उसके मानस-वधू ६७ कमरे के दरवाजे पर पहुचे, तो वह चौक कर उठ खड़ी हुई। "क्या अपने मास्टर जी से लड बैठी, बेटी?" लाला श्यामनाथ ने पूछा। "उनको बहुत घमह है" मालतीने कहा, "मैंने पाय पीने को कहा, तो विगड बैठे।" "घमह उसे नहीं, बेटी, घमड तुम्हे है," लाला श्यामनाथ ने कहा, "ऐसा मादमी तो पैर पकड कर पूजने के लायक है। क्या तुम्ही ने कल मुझ से नही कहा था कि उहोने अभी तक अपनी फीस भीनहीं दी है और उहे पैसे को बहुत सख्त जरूरत है । इतनी सख्त जरूरत रहते हुए भी जो मादमी रुपए वापस करणे जा सकता है, वह घमही नहीं, सिद्धा त का मादमी है । उसने कहा कि तुम पढना नही चाहती मौर यह कह कर रुपए वापस कर गया।" मालती मन ही मन दुख का अनुभव करके रो पड़ी। लाला श्यामनाय ने उसके पास भाकर उसकी पीठ थपथपाई । 'दुख मत मनामो," उन्होने कहा- 'मैं उस पादमी को ऐसा बाघ दूगा वि मागे वह तुम्हारे हाप की चाय के अलावा किसी के हाथ की चाय ही न पियेगा।" अगले दिन बिलकुल सबेरे, जबकि रमेश बाबू अपने एकमात्र पढने, सोने, उठने-बैठने के कमरे में अध्ययन कर रहे थे, लाला श्यामनाथ उस कमरे में घुसे। उह यकायक अपने सामने इस तरह देखकर रमेश बाबू हरबहा कर उठे मोर नमस्ते की। लाला श्यामनाय ने कहा "जीते रहो, बेटा | क्या तुम यहा अकेले हो रहते हो? 'जी हां,' रमेश बाबू ने कहा 'मैं यही पर मकेला नहीं रहता, बल्कि इस ससार मे भी अकेला रहता हू बैठिए।" 'हां, जब पाया हू, तो बैठूगा ही', लाला श्यामनाथ ने कहा। पास ही विछी हुई चारपाई पर बैठ कर उहोने कहा--"बेटा, कल तुम मुझे पचास रुपए वापस कर पाए मगर मैं पाज जो सम्बध बांधने माया हू, मुझे उम्मीद है कि तुम उससे इनकार नहीं करोगे। तुम्हारे पिता जी होते, तो मैं उही से बातें करता, मगर चूकि तुम अकेले ही हो, तो तुम से हो बात करूगा । मैं मालती के लिए ऐसा वर खोजना चाहता था जो स्वाभिमानो हो, भास्मनिभर रहना जामता हो। मेरी एक
मानस-वधू
हो बेटी है । और बेटी के बाप की निगाह से मुझे तुम से मच्छा कोई घर नहीं
मिला। बोलो, क्या कहते हो?"
और रमेश माश्चय से उनको मोर देखता रह गया। एक ही क्षण मे न जान
कितनी भावनाएं उसके मन मे माई मोर चली गइ । उसके पास इकार करने
के लिए कोई उपयुक्त कारण नहीं था।
सिगरेट की गध बरात वापस लौटी। थपू के स्वागत के लिये उसको सास सुभद्रा पडोसी तथा रिश्तेदार स्त्रियो के साथ खही थी। कोठी रे द्वार पर लगा लाउडस्पीकर एक गीत मारिकार बना रहा था "घेलो फाग हमारे सग, मात्र दिन रगरगीला पाया।" वास्तव मे माज मया परिवारजन, क्या मतिषिगण सभी रगरेलियो मे व्यस्त थे, सबके चेहरो पर खुशी के बादल उमट रहे थे। घर को सुदर और शिक्षित वधू, पर के पिता को पर्याप्त मात्रा में दहेज, मोर बारात में गये हुए बरातियो को मच्छी खातिर मिली थी। राजेश ने अपनी वधू कमसा की एक झलक देख ली थी। तभी से उसके मन में मोदक फूट रहे थे। उसकी पत्नी पढ़ी लिखी होने के साथ-साय सुन्दर भी थी। ये दोनो वस्तुए साथ-साप मिल जायेंगी, इसकी माशा उसे बहुत कम थी। कैलाशचद बैठक मे मेहमानों के साथ हुक्का पी रहे थे। उनकी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था। केवल बी० ए० पास ही तो किया है उनके लाडले राजेश ने, उस पर पद्रह हजार कंश, मोर उससे मारी सामान, वह अपने भाग्य को मन ही मन सराह रहे थे। मेहमानों में से कोई मिठाई की तारीफ कर रहा था तो कोई कचोडियों की, कोई कह रहा था, "मसल में मादमी हो, तो ऐसे दिल का जो इस वनस्पति युग में भी देशी घी ही दे।" "मैंने तो कई साल बाद इसी बारात में देशी देखा है वरना तो देशी के नाम देशी भूते हो परते नजर माये हैं" एक दूसरे सज्जन ने अपना मत प्रकट किया। "माल के साथ-साप प्रवध क्तिना अच्छा पा!" तीसरे सज्जन ने कहा, "ठीक समय पर सारी चीजें तैयार रखना भी तो एक काम है ।" कैलाशचद इन बातो मे पर्याप्त रस ले रहे थे। सुमद्रा दहेज के बतनों, कपड़ों और जेवरों ७० मानस-धू की तारीफ पढोसियों से सुन रही थी। उनमें से एक कह रही थी, "बहन, तुम्हारे समधि तो बहे दिल वाले मालूम होते हैं। वरना कहो तो यह महगाई मोर कहा यह भारी दहेज । परतन भी सभी पोदार और साहियां भी मच्छो भारी है।" सुभद्रा प्रसनचित्त से दहेज का सामान दिखा रही थी। "देसो, बहन, यह चाय का सैट, यह पानी का सैट, यह खाने का सैट, यह रेडियो सेट, निरे सैट ही संट हैं। क्या क्या गिनाऊ? पलग है, यह भी है, यह भी है ।" राजेश की छोटी बहन मपनी सखियो को भाभी को सुदरता का वणन सुना रही पी। शायद उसे दहेज प्रादि मे विशेष रुचि नहीं थी। वधू की ननद ने कहा, "मजो, भाई साहब जब रेल के इजिन की तरह मुह से धुमा उडाते मामी के कमरे मे जाएगे तो वस भाभी को उसमे बैठते ही मजा मायेगा।" इस पर सब भौर भी खिलखिला कर हसीं दूसरी ने कहा, "देखना भगले साल तुम्हारी भाभी भी छिप छिप कर सिगरेट न पीना शुरू करदे। खरबूजे को देखकर खरबूजा रग पलटता है।" राजेश ममने मित्रो मे बैठा ससुराल को धचन लडकियों का वर्णन कर रहा था, मुह से घुप्रा छूट रहा पा मोर धुए के बादलो मे एक-दूसरे का चेहरा भी दिखाई देना मुश्किल हो गया था। राजेश को इस धुए के बीच में कमला का चेहरा दिखाई दे रहा था। मित्रो में से कोई कह रहा या, मियां राजेश, सुना है पार कि तुम्हारी घर वाली ने एम० एकर रखा है।" 'पोन कहता है ?" राजेश तमक कर बोला, "पिछले साल बी. ए. फैल दिया था।" मोर पास होने के लिए तुम्हारे गले पड गई, बच्चू" मित्र बोला, "जरा ध्यान से पढाना कही उल्टे ही न मुड जानो। मिली मिलाई डिग्री भी छिन ने जापा एक साहब बोले, राजेश बाबू तो उनमे से हैं जो सबसे पहले शेव ठते है मौर पहली ही रात मे तोते को गरदन मरोड कर सारी जिदगी भलिफ लला के देव बने रहते हैं।' राजेग को इसमे अधिक रस नहीं भा रहा था। वह जल्द से जल्दी कमता पे पास पहुचना चाहता था। माखिर देसे तो सही कि वह शिक्षित लडकी जो . 'मजी कहा मानस-वधू ७१ कालिज की मफासत दल कर उसकी चरणसेविका बनी है, कैसी है, कितने गहरे पानी में है। प्रतीक्षा का समय व्यतीत हो चुका था। मासिर राजेश को वह अवसर भी मिल ही गया। वह चुपके-से कमरे में पहुचा तो देखा कि कमला माराम की नींद सोई पड़ी है । करवट में एक पत्रिका खुली हुई पढी है । उसने सिगरेट मुह से निकाल कर मेज पर रखी रासदानी में रख दी और कोट उतार कर खूटी पर टांग दिया। लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा था कि कमला को किस प्रकार मपने मागमन कामाभास कराक। वह भागे बढ़ा मौर सोती हुई कमला को इस प्रकार देखने लगा, जसे कोई मनचला किसी अभिनेत्री की फोटो को देखता है। इतने में कमला पांखें मलती हुई उठ गई। मय सभी वघुमों के विपरीत उसने पाखें उठाकर राजेश को जी भर करके देखा पौर फिर बोली, 'माप खडे क्यों हैं ? बैठिए।' 'मैं ?' राजेश हसते हुए बोला, 'मैं तुम्हारे इस माये के चदन को चूम लेना चाहता हू, जिसमे से भीनी-भीनी सुगन्ध उठकर मुझे पागल बना रही है। कमला, क्या तुम्हें स्वय पता है कि तुम कितनी सुदर हो!'.- 'हटिये, कमला ने कहा, 'मैंने घूघट नहीं निकाला, तो माप हसी करने लगे।' राजेश की कल्पना थी कि कमला इतनी लजायेगी, इतनी लजायेगी कि सारा रोमांस ही फीका पड जायेगा, मगर अब उसके पर धरती पर नही टिक रहे थे। वह मागे बढा मोर उसने कमला को अपनी बाहो में भर लिया और सचमुच ही उस पदन को चूम लेना चाहा जो कमला के दोनो भौंहो के बीच में लगा हुमाया। लेकिन कमला छिटक कर अलग हो गई। बोली, "सुराही मे पानी है, पानी पी लीजिए।" 'मुझे प्यार नहीं है," राजेश ने कहा, "मला, जिसे किसी के मधुर रस की प्पाम हो उसकी प्यास पानी से कैसे बुझ सकती है ?" कमला ने सकोच किया, "बरा-सा पानी पी ही लेंगे तो क्या हो जाएगा? न हो कुल्ला ही कर लीजिए।" "नहीं," राजेश बोला-"विना तुम्हारे च दन की सुधि लिए मैं पानी मानस-वर नहीं पोकगा।' ' में भापको गिलास भर देती हू" कमला ने सुराही की भोर रहते हुए यहा। "यह भी नहीं," राजेश फिर बोला, "हा भार पानी में तुमने अपने माये का पदन छुमा दिया तो प्रवश्य पी सकता हू।" "मालूम होता है कि भाप बहुत जिद करते हैं," कमसा ने कहा, "कोई पुराने पमाने का राजा महाराजा होता तो यह समझतानि नई रानी साहिबा ने उसके लिए पानी मे विप पोल कर रखा है।" 'इसलिए पानी के लिए इतनी जिद हो रही है," राजेश ने हसते हुए कहा। कमला का भाव गभीर हो गया, "मापको ऐसे घुम दिन पर ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। मैं ता प्रापको केवल योडा-सा पानी पीने के लिए कह रही थी।" "क्यो?" राजेश ने गम्भीर होकर पूछा । फिर हस पहा, "भला क्यों ? तुमने तो परले ही दिन मुझे पहेली बुझवा दी।" मैं इस क्यो का जवाब नहीं दूगी।" 'लेकिन मैं तो सुनना चाहता है, तुम्हें मेरी क्सम, बतामो क्या बात है क्या प्राज पानी पीने का कोई विशेष महत्व है 'मैं कह दू ता पाप बुरा तो न मानेंगे, 'कमला ने कहा, "मुझे बचपन से ही सिगरेट से चिढ़ है इससे मेरी गुड़िया का घर चल गया था। तो मैं तुम्हे सिगरेट पीने के लिए तो नहीं कह रहा हू", राजेश ने कहा। मापके मुंह से सिगरेट की गध पा रही है 'कहने को तो कमलाकर गई मगर उसे लगा कि उसने यह क्या कह दिया। राजेश का मुह लाल हो गया। उसने तमक कर पहा, 'तुम मेरा अपमान कर रही हो, पढ़ी लिखी होने के यह माने नहीं कि पति का अनादर किया . " - , जाय।" . 'समा कीजिए' कमला ने कहा, 'मुझसे गलती हो गई मुझे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए पो।' राजेश का क्रोध विपक्षी को निवल पाकर मौर भी भडका, लेकिन यह वाहियात बात तुम्हारे दिमाग मे भाई ही क्यों ?" कमला ने सहन स्वर मे कहा, "मापने निद करके पूछा था तमी बताया। ।
मानस-वधू "नहीं," राजेश खूटी पर से कोट उतार करके दरवाजे की ओर बढते हुए बोला, "कल तुम मपने घर वापस जानोगी, अब मैं तुम्हे तब बुलाऊगा, जब सिगरेट पीना छोड दूगा।" कमला का प्रात्मसम्मान जाग उठा। उसने धीमे स्वर मे केवल इतना कहा, "हा, तभी बुलाइए, उससे पहले नहीं।" राजेश झपाटे से बाहर निकल गया। कमला अगले दिन मैके चली गई। छ महीने तक जब वर-पक्ष की ओर से कोई पत्र नहीं माया तो क या पक्ष के लोग घबराए । कमला से पूछा, तो वह चुप थी। उसकी ससुराल मे जाकर मालूम किया तो राजेश चुप था। मगर वह कमला को बुलाने के लिए पक्का न था। लेकिन राजेश के पिता इस हिमाकत को सहन न कर सके। उन्होंने कहा, "ध्यान रखना कि मैं भी अपना मान-सम्मान रखता हू, अगर तू बहू को न लाया तो खडे खडे घर से बाहर निकालकर खुद जहर खा लगा।" राजेश पपनी भूल पर पछता रहा था। कई बार उसने मन ही-मन तर्क करके यह नतीजा निकाला कि गलती उसकी थी। किसी की रुचि भरूचि के बारे में जिद करके नहीं पूछना चाहिए भौर मगर पूछा जाए, तो शाति से उस सुन लेना चाहिए । बार-बार कमला का सुदर मुख उसकी माखो के सामने धूम जाता। वह गया भोर कमला को उसके मैके से ले भाया। माज फिर वही कमरा था, वही समय था, राजेश ने सूटी पर कोट टागकर कहा, "मैंने मान लिया, मेरी भूल थी।" कमला सहमो-सी एक मोर को दुबकी-सी बैठी थी, राजेग उसके पास भाकर बोला, "सुना, मैंने सिगरेट पीनी छोड दी है।" लेकिन उसी समय उसको निगाह कमला के हाप को मोर गई, जिसकी दो उगलियों में एक मयजली सिगरेट जली हुई थी। उसने कहा, 'मोर मैंने 'छुपकर पीनी शुरू कर दी है।' दोनो एक-दूसरे को कुछ क्षणो तक पति-से देखत रहे । उसरे बाद दोना ही सिलसिलाकर हंस पड़े। पर विचौलिया उस दिन रेडियो पर मेरा कायक्रम था।मपना बढ़िया-सा सूट पहन कर में समय से पहले ही स्टेशन पर माकर पहलकदमी करने लगा। इसी बीच उषा गुप्ता के स्वर ने मेरा ध्यान अपनी मोर माकृष्ट किया। यह कह रही थी-"कहिए, विकल जी,माज किपर?" मैंने कारण मतलाया मोर पूछा-"मोर माप ?" उसने कहा-"कुछ ऐसा ही समझ लीजिए। माप कविता-पाठ करने का रहे हैं और मैं अपनी निबध पुस्तक के प्रकाशक के पास । वह उसकी भूमिका मादि के बारे में कुछ पूछना चाहते हैं। इसीलिए मुझे स्वय वहा जाना पड़ रहा है। पलिए, मच्छा ही हुमा, दिल्ली तक साप तो रहेगा। मैं घबरा रही थी कि भकेले समय कैसे कटेगा।' मैंने कहा-'समय तो अपने माप ही कटता रहता है। उसके लिए कुछ करने-घरने की जरूरत नहीं होती।" उपा गुप्ता इस पर हस दी। बोली-"मापने वही कौमती बात कही 'यद्यपि मुझे यह मालूम नहीं हो पाया कि इसमें खूबी की क्या रात पी मैंने उसको भोर यो ही देखा, और वह इस तरह शरमा कर मीची गरदन करके देखने लगी, जैसे मैं उसे देख रहा हूँ और उस देखने में कोई खास से भी यादा बात है। तभी गाडी मा गई और हम दोनों सेकह क्लास के एक खाली डिब्बे में बळ पए । इससे पहले कि हम जमकर बातचीत का कोई नया सिलसिला भारभ करते, एक पालिशवाले छोकरे ने मावाज लगाई लि मैंने एक बार मपने जूतों को देखा मोर सोया कि इन पर पालिश हो जाए, वो रेडियो स्टेशन का फश पवित्र हो जाएगा। लड़के की तरफ देखा। एक दुबला-पतला, छरहरे बदन का लडका, सांवला रग, गाल कुछ बठे हुए, मगर ७५ मानस-वधू नाक्नक्शे से दुरुस्त या। मुह पर चतुराई, चपलता मौर हसी के चिह्न थे । वदन पर मैली कमीज थी, जिस पर जगह जगह जूतो के रगडने के निशान थे, पोर बगल मे पालिश के सामान को पेटी। वह मेरी नजरें देखते ही मेरे पास पाकर खडा हो गया और मेरे जूतों की मोर इशारा करके बोला-'पालिश बाबूजी?" मैंने अपने जूते उतारे और उसकी मोर बढा दिए। उसने अपने कपे पर से अपनी पेटी का पट्टा उतारा मौर एक ही पल मे उसकी दूकान लग गई। एक जूता लेकर उसने तेजी से उस पर ब्रश फेरना शुरू किया। गाही चल दी। मैंने अव उपा की ओर ध्यान दिया। "कहिए, सरल जी का क्या हाल है "मैंने पूछा। सरल जी मेरे मित्र थे मोर उषा से उनकी घनिष्टता कुछ अधिक होने की समावना दी। दोनों के परिचय का माध्यम में ही था और दोनों ही मुझसे खुल पर अपनी अपनी बात कहते थे। उसने उत्तर दिया-"क्यो, भव वह मापसे नहीं मिलते क्या ?" "मिल तो जाते हैं कभी-कभी," मैंने कहा- 'मगर बस, कभी ही कभी।' वह फिर मेरी बात पर हसकर बोलो--"मुझसे तो उहोने कभी कभी मिलना भी छोड़ दिया है ।" "क्या मतलब?" मैंने कहा मोर लह की भोर देवा, जो एक जूते पर पालिश लगा कर दूसरे पर लगाने की तैयारी कर रहा था। "मतलब यह है कि कोई जान बझकर गढे मे गिरे, तो किसी को रोकने का क्या अधिकार है उषा ने सवाल के जवाब में सवाल करते हुए कहा। "यह मच्छी पहेली रही," मैंने कहा- 'क्या मैं यह समझू रिसरल जी गडे में गिरना चाहते हैं और भाप उन्हें रोकने का कोई अधिकार अपने पास नहीं पा रही हैं ?" 'जो हो,' उषा ने कहा-"यही समझ लीजिए। "उन्होंने तो मापके पिता जी से भी पर्षा को थी मोर नायद प्रापको भी पपन दिया पा कि यदि विवाह करेंग, तो माप से हो। फिर ऐगी क्या बात हो गई, जिसम मममी ने जोर दिया?' 'क्या कीजिएगा जानकर''उपा ने गभ र होकर वहा । "परे मई वाह !" मैंने पाश्चय प्रकट करते हुए कहा- 'कोई जानर " मानस-व करता ही क्या है ? यही दियोडे से लड्डू कचौरी रितद हो जात हैं और, भई, कुछ दिनो की मौज-बहार हो जाती है और ।" "जाने दीजिए उषा ने बात टालते हुए कहा-"प्रापको तो बस हर वस्त मिठाई मोर मौष-बहार याद भाती है । कभी मापने भी सिखलाई है ?" पोर यह सफलता के साथ पलट कर मुसकरा दी। जब कोई लडकी कोई बात न बताना चाहे, तो पूछने वाला नास झख मारे, मगर काम की बात एक नहीं मालूम कर सकता। पालिश वाला छोकरा मव तर पालिश कर चुका था और जूत मेरे पैरो को मोर बढा कर चुपचाप इतमोनान के साथ पंसे लेन के लिए खडा था। मैंने उसको पोर ध्यान दिया। मैला कुचला होते हुए भी उसमे व्यक्तित्व की कमी नहीं थी। निश्चय ही उसके चेहरे से एक ऐसी प्रतिभा का प्राभास मिलता था, जो पनपने के प्रभाव मे उजडती सी चली जा रही थी। इही विचारो मे उलझा मैं उसकी और देख रहा था कि वह मचाना बोला-"पालिश हो गया, बाबूजी ।" "अच्छी बात है," मैंने कहा और जेब से एक दुमनी निकाल कर उसको मोर फेंक दी। उसने अपनी जेब टटोल कर कुछ रेजगारी निकाली मोर उसे हथेली पर रखकर बोला-'बाबूजी, इक नी नहीं है।" मैं जूते पहन चुका था। उह निकाल कर मैंने फिर उसके सामने कर दिये मौर कहा-"कोई बात नहीं है, दुवारा करो।' लडका हक्का-वस्का सा मेरा मुह देखने लगा। उपा ने पहले तो माश्चय प्रकट किया और फिर जोर से खिलखिला कर हस पडी। बोली- 'मापी विमल जी, खूब हैं 'क्यो ?" मैंने पूछा। "इसीलिए कि यदि लडके के पास दुनना है की सरीज नहीं, तो ज्यादा से फ्यादा माप उसके पास दुमन्नी रहने देते या मगल स्टशन पर पहुंच कर दुमन्नी तुहा लेते । जूतो पर मभी मभी तो पालि हुमा है उन पर दोबारा पालिश पराने की क्या तुक है मगर उपा से पहले लहमा समझ गया था। वह बोला- 'बहन जी, में रिसी से भीख नहीं लेता।' - " मानस वधू वषाक्ति-सी उसकी भोर देखती रह गई। लड़का जोडा उठा कर उन पर रोवारा पानिव ममाने लगा था। मैंने कहा-"मौर, उषा जी, मापने मेरा तर महीं सुना। मैं किसी को भीख नहीं देता।" 'क्यों?" उषा ने सीधा प्रश्न किया। 'इसलिए कि जिस स्वाभिमान से यह लडका प्रपनी रोजी कमा रहा है, वह इसके बिना मेहनत किए ही दूसरी इकनी पा जाने से लुप्त हो जाता। अब यह उसी दुमन्नी को कमाएगा।" न जाने क्यो, उपा का चेहरा यह बात सुन कर उतर गया। मैंने पूछा, "क्यो, क्या बात हुई" उसने कुछ देर तक मेरे चेहरे को सीधी नजर से देखा, फिर नजर झुका कर बोली-'मापने पूछा या न, सरल जी के बारे मे कि क्या मक्खी ने छींक दिया ।" "हाँ," मैंने कहा-"पूछा तो पा । बता रही हैं क्या?" "हा," उपा बोली-"सरल जी चाहते हैं कि शादी के बाद मेहनत न करनी पड़े।" "मैं सममा नहीं," मैंने कहा। उपा हसी । बोली, "चाहते हैं कि दहेज के सबंध मे उनके पिताजी से बातें कोजायें मोर शादी के बारे मे उनसे।" "मोह!" मैंने पल भर में ही सारा मामला समझ कर कहा, "तो यह बात है। तब तो उनका माप से कभी-कभी ही मिलना उचित है। मुझे वास्तव मे सरल जी के साथ बहुत सहानुभूति है।" "वाह !" उपा ने कहा, "सहानुभूति तो मेरे साप होनी चाहिए, उनके साथ पसी?" "नहीं," मैंने मुसमरा कर कहा, 'सहानुभूति के पात्र वही हैं क्योकि उह पपू सो मिल सकती है लेकिन माप नहीं मिल सकती।" "जाने दीजिए, उपा ने कहा, "माप तो मजार करने लगे। भाप बनाइए माप पर शादी पर रहे हैं मौर हम सह-कचोरो पर खाने को मिलेंगे ?" "मजो, भला हम से गांठ बाघ पर कौन मपना भाग्य विगारेगी ?" मैंने कुछ । बनत हुए रहा।
७८ मानस- - उपा गुप्ता इसके उत्तर में कुछ कहने को हो पो कि पालिस वाला छोकर बोल पहा-"यापूजी, इनसे होकर लीजिए न" मैंने देखा, उपा का चेहरा ताल हो उठा। में एकदम क्रोधित हो उठा। फर एक भरारी चपत पालिश वाले छोकरे में मुह पर लगा दी। लहका महम गया। मेरी भोर से होने वाले इस पप्रत्याशित व्यवहार को वह मफ्नो पाखो से व्यक्त करने लगा। मैंने उसको माखोको पदा, मानो वे कह रही थी-"एक और मारिएगा, साहव ।" मुझे स्वय भपने इस कृत्य पर कुछ पछतावा हुमा । सहसा मेरे मानवहदय में एक वृद्ध उठ खडा हुमा । लडके की माखों में मासुमो के होरे पमक माये थे । में रह-रह कर पछताने लगा। माखिर उसने ऐसा कह ही क्या दिया था। उपा माश्चय से एक बार मेरी मोर और दूसरी बार उम लडके के मुह को देख रही थी। मुझे ऐसा अनुभव हमा, मानो मैंने किसी भनाथ बालक को ऐसी वाहना दे दी हो, जिसका मुझे मधिकार न था। मैंने एकाएक उस लड़के का हाम पकड़ा और दूसरे ही क्षण उसे खींच कर अपने पास बैठा लिया। अपने रूमाल से उसके पासू पोछते हुए मैंने कहा, "माफ करना, भाई । मैं पापे से बाहर हो गया था।" इतनी सहानुभूति पाने के बाद उसे सुकिया माने लगी ।कहना न होगा कि भैरी बाह उसके मासुमो से भीग गयी। उससे मेरे दिल के तार मोर भी मन झना उठे, माखें सहसा ही गीली हो गयों, गला इतना भर माया कि मैं उसे ढारस भी ठीक तरह से न बघा सका। मैंने उसके कंधे को और भी कस कर थाम लिया, मानो मेरा वह निर्दय अपराध कमी क्षमा करने के योग्य न हो। उषा भी भसमजस में पड़ गयी थी। यही उसके चेहरे से टपक रहा था। मत में मैंने फिर लडके से कहा, "क्षमा करना, मेरे नन्हे दोस्त !" इसी वाक्य के साथ स्टेशन मा गया । पालिश वाले लड़के ने दुबारा मेरे जूते धमका दिये थे। वह उहें ज्यो के-रयो छोड कर, अपनी पैठी सभात कर, हम दोनों को नमस्कार कर के उतर गया। मैं खिडकी से उसे मोक्ता रहा, भोर उस समय सक, जब तक कि वह मेरी दृष्टि से मोमल न हो गया, देखता ही रहा। फिर एक लबी सास के साथ अपनी बय पर मा बैठा। गाही बस दो। उस दिन के सफर के बारे मे मोर कुछ नहीं कहना है। लेकिन उसके पाठ मानस क्यु नहीं ले जामो, हम दोनों की शादी हो गयी है। तुम ही तो हमारे बीच में महोने के बार के बारे में बह रहना है। हम लोग उसी गाड़ी से मीनापरवान पर र भवर पा । उपा मानी दुसरी पुनस्रो देस रही पी, मनि मेरा रेडियो पर कोई प्रोगाम नहीं था। हिनुर उन्हें और में रहने में पक्षिक लगाव था। मब हम एक-दूसरे को पोर देवकर पिकरियामरामै थे। वह सामने की सीट पर मेरे पासननिरमपन रही थो मोर हम दोनों भाषी बातें मुह सरहद में, दो पापी माशों से बह मैठे थे। इतनी बातों के बाद मौ क्या मार का यह पाने की बार है हम लोग पापस में एक ऐसे बधन में बप पुरु दे, रिमहा टूटने का विधान नहीं है ? यही भावान फिर सुनाई दी-५ा नि !" "घर" मैने सहसा घोरपर रोज मावाज में रमे पुकारा। लड़का हमारे निकट मा गया और हम दोनों को फिर एक बार साय देस कर वह मुस्कराया बोला-"रादू जी, सैडिनों पर भी होगी ?" उसके लिए स्थाय काफी मा। उत्साह के साथ लग गया। जब वह अपना काम कर चुका, तो मैंने अपनी जेब से पाच रूपये का नोट निकासा, और उसकी घेब में ठूस दिया। उसने प्राय HTRIAN बोला-"बाबूजी, जैन नहीं है। प्रब बताइए, कितनी बार जूतों पर पालिश करू ?" हम दोना इस पहे। मैंने कहा--"नहीं, माज इतनी मेहनत करने को पहात विचौलिया (दो पक्षों में शादी कराने वाला बीच का व्यक्ति) येन !" उसने हसकर एक फौजी सलाम ठोंका। "हा," मैंने कहा।
प्रेमिका "हाय री, शालिम दुनिया हम जिस पर मरे, यही हम से मुह फिराए। वाह यह खूब दस्तूर है तेरा । लीजिए साहब, जरा इसाफ तो करत बाइए। बचपन से अधीरतापूर्वक जिसको प्रतीक्षा को पर छोडा, सुली हवाए, मस्तोमरी फिजाए सब-कुछ छोड कर बदबूदार गली में, बिना हया के मकान में रहना शुरू किया, उसी की ऐसी बेवफाई क्या सहन की जा सकती है ?" वह विल्ला रिल्ला कर रास्ते पर लोगो की भी इकटठी कर रहा था। किसी ने कहा-"मामो वो यार, देखें, कोई पागल मालूम होता है।" "मुझे तो हिंदुस्तानी मजनू मासूम होता है।" लेकिन वह बराबर मपनी गाया कहता जा रहा था-"नहीं, कभी नहीं, में मर सकता हूँ, पर उसके निना बिदा रहना मुझे मजूर नहीं है। लेकिन, साहबो, बताइए, मैं क्या करू ? उसके बिना मरना भी मुहात है। मच्छी सना है किन मरने ,न जीने दे" धीरे पोरे एक मजमा यही इकट्ठा होता जा रहा था और लोग उस देश- देख कर हसने मगे थे। उसके कपडे वास्तव में कई जगह से फट गये थे और चेहरे पर दोनता का भाव झलक रहा था। उसने फिर कहा-“शायद माप जानना चाह रहे होंगे कि यह मैं किसके पिनवे शिकामतें कर रहा हूँ। वह जालिम कौन है, मोर कहा रहती है, ताकि उसे मेरे हजूर पेश किया जा सके । ठहरिए, सुनिए, मैं सब बतलाऊँगा, उसका नाम, उसनी बल्दियत, उसके रहने की जगह मोर उसके काम ! उसकी बेवफ़ाइयां इतनी है जितने भासमान में तारे हैं। लेनिन उसको सही असलत समझने के लिए मापको मेरा परिषय भी मालूम होना चाहिए। मैं जानता हूँ कि भाप मेरा हात जरूर जानना चाहते होंगे। तो मुनिए - -बचपन में मेरे मां-बाप मुझे 'परम्' कह कर पुकारते थे। मगर पब में कुछ यग हो गया हो मेरा नाम মাধব मातोपरपास हो गया। मैं पापो रियाल दिलाgir मौरहिए तो रसम भी खा सकता है कि एक ने गानिस निम्मा दिपा, पर्मा हम भी मामी में कामरेमेरे माप ने मुझे पहने भापौर में पुपपाप मा भी गया। पर उसकी पाहम होती, सोशियरी हिम्मत पनि पारस भैर देवा ? पर मन-मन में यह भी सोपा-"बेटा, यह तो रिसीप सिगे सो पाहती है। को, नहीं तो पने परावर पूछ भी नहीं होगी !" यो माहो, पड़ने पमा गया, सिर्फ उसकी साविर! दिलो जान से 'एजरेगन (शिक्षा) हासित रने में जुट गया। किसानों का कोम बनार उन्हें पाट गया, परयामों मोनोस्याहा कर दो [-किस सिए, सिफ उग घेवफा के लिए, उस हरजाई रेमिए! सोग रहा ते पे कि हमें बी०ए० को रिपो मिम गयो, हमें मासूम होता पारि हमारी सोपडी पिसीने पाटनी।" सागों को भीर पर साफी बढ़ गयी पी पोर हराना भी दुख सीमा हरबर हो गया था, क्योंकि पागलों-सी बात पर भी वह भादमी ऐसा मालूम नहीं होताया कि पागम है। बीच-बीच में यह मच्छे भने लोगों की तरह बातें परले सगता पा सभी लोग पापस में समुर पुमुर करणे उसमे सबंध में अपनी मपनी राप मायमरने पीपेष्टा कर रहे थे। मगर उसे इन बातों पीसोई पिता नहीं थी। वह कह पा रहा पा-"स तरह रे पोर परिश्रम सफल मुझे मिला भी श्या, छिर्फ एफ रिपी, रिप्लो. जिस पर पहद भगा र पाटने से वह भी रखी हो पाती है ! परेरे, पर यही नहीं, वो डिग्री का क्या करें? हम तो जिसे पाहते थे यह भगर मिल जाती, सो बदले में गिरी हम दे देते । परहमें कोई भलामानस ऐसा नहीं मिला, जो इस घोर सकट से हमारी सहायदा करता, हमारी गुरपी मुलझा देता।" उसके पास खड़े हुए लोग इतने समय हो पर उसकी बात सुन रहे पे fr सब ये सब उपरे साप सहानुभूति प्राट मरने लगे। उसने फिर महा-"भाइयो, जा वह पलो माती, वो घण्टों मुझ पर उसकी याद का नशा छापा रहतामिन में रह रह कर गुदपदी सी उठा करती ! जब भूख लगती, तो सारा ना हवा हो पाता और मैं उसे खोजता फिरापरता।" किसी मनचले ने सवाल क्यिा--"तो क्या उसकी याद में पीने मी सगे ८२ मानस-वधू "हाय, हाय, बिना उसके पीने का भी कहा ख्याल माता है ? मरे, यह नहीं तो उसकी झलक तो चाहिए ही।" किसी ने पूछा--"तो, माई मजन, वह फिर मिली भी या नहीं?" "मजी, वह मिले कहा से हम उसके पीछे दीवानों की तरह फिरते रह मोर वह हम से इस तरह दूर होती रही जैसे किसी नाटक की नायिका खलनायक से दूर भागा करती है। हम उसके लिए रोते मोर वह हमारे सामने से झलक दिखा कर निकल जाती ।" लोगो ने देखा कि उसकी माखो से भासू ढुलकने लगे। "बडी बेवफा निकली," किसी ने हमदर्दी से कहा। "उस पर भी तुर्रा यह कि हमे नखरे दिखाने माती है। संर, माती तो हमारे दिल को थोड़ी-सी वसल्ली मितवी। मगर माते हो रुकने को तो बात दूर, पाने के लिए मचलने लगती है । मजबूरन हमें उसका साथ छोड़ना पड़ता है । माह वह चली जाती है मौर मैं बेसहारा हो जाता है। मगर यह रुके भी तो क्यों ? उसके पार हैं बडे-बडे सेठ-साहूकार, राजे महाराजे, मिनिस्टर भोर बैरिस्टर-मुझ कगाल के पास वह भला क्यो रहती? उसकी पूजा तो बडे-बडे लोग करते हैं।' "वही बेहया है," एर साहब बोले । "न पूछो, मेरे दिल की कहानी, साहब ! क्यो जस्म को हरा करते हो। सुद ही मारते हो मोर खुद ही ताने कसते हो। मरे, साहब मैं जानता हूं कि वह मापको बगल में रहती है। खुद कन्जा जमाये बैठे हो, उस पर हमें धता बताते हो।" इस पर वह साहब बहुत बिगडे । सभी लोग उनका मुह देखने सगे भोर पूछने लगे-"क्यो, साहब, यह बात है ?" यह बोले-"क्या सकते हो?" "सरकार," उस पागलनुमा मादमी ने कहा-"वक नहीं रहा हूं, मज कर रहा है। मैं इसने मादमियों में यहीं सटे-सहे साबित कर दुगा कि मेरे घोर तुम हो। पर तुम्हें वचन देना होगा कि अगर मैं उसे तुम्हारे पास से खोज निकात तो मुझे देदोगे।" युवक ने रहा- में जवान देता हू-मोर मगर न खोज निकाल सके, तो यही सर-सरे तुम्हारा भुरता बना दगा ।"
मानस-वधू ८३ "मधुर," उसने कहा-"हिन्दू हो?" . "तो हमारे-तुम्हारे बीच में भगवान गवाह रहेगा कि जिसके विरह की कहानी में इतनी देर से सब लोगों को सुना रहा पा, वह भगर तुम्हारे पास निकली भोर हू-ब-हू मेरे बयान के मुताबिक निकली, तो तुम मुझे सोप दोगे !" लोगों की उत्सुकता बढ़ी क्योंकि किसी को भी गुमान नहीं था कि उस पागल का प्रलाप इस सीमा तक पहुच जाएगा।बई प्रादमियो ने कहा-"हां, हा, निकालो, हम भी गवाह रहेंगे । मगर यह नहीं देना चाहेंगे, वो हम तुम्हें दिलवा देंगे।" "साहप, मेहरबानी करके अपने हाय ऊपर उठाइए " भाश्चर्य चकित हो उस युवक ने अपने हाथ ऊपर उठा दिए । उघ पागल नुमा व्यक्ति ने युवक की जेब में हाय हाल कर कुछ रेजगारी भोर कुछ नोट मिला कर कुल दस रुपए के लगभग निकाल लिए मोर उनको हथेली पर रख कर सब लोगों मे घुमाता हुमा बोला-"बताइए सज्जनो, क्या यह वही बेवफा दौलत नहीं है, जिसके बारे मे मैं इतनी देर से प्राप लोगो के सामने बक रहा पा? क्या यह वही बाँकी भदा वाली छल-छबोली नहीं है, जिसके लिए मैंने अपनी सारी जिदगी खराब कर दी भौर जिसके बिना मेरी बी. ए. की डिग्री बेकार है ? क्या यह वही हरजाई नहीं है जो बार-बार मेरे पास माकर छिन- भर में मुझे छोड़ कर चली गई मोर सेठ-साहूकारो के बगलों मे जा कर निवास करने लगी? भगवान गवाह है, और उससे भी पहले भाप लोग गवाह है कि जोकुछ मैंने बयान किया था वह इस दौलत के बारे में एक एक शब्द सच है या नहीं ? मताइए, क्या प्रम में इसका हकदार नहीं हो गया?" वह युवक वहा पकराया और बोला-"यह क्या तमाशा बना रखा है जी" वह भादमी धूम कर बही विनम्रता से बोला-"हुजूर, मेरी कोई बात नागवार गुजरी हो, तो माफ कीजिएगा । लेकिन मेरी प्रेमिका तो यही है। इसी के मैं गीत गाता हूँ, इसी की कहानी कहता हूँ, इसी की फिराक में रात दिन रोता हू भोर पेट पकडे बैठा रहता है। या तो मेरी प्रेमिका मुझे दे दीजिए, नहीं तो मैं यहीं पर अपना गला घोंट कर भरता हू।"
मानस-वधू मोर लोगो मे बहाहो का बाजार गरम हो गया था। कुछ सज्जनो ने उस युवक को शरम दिलाते हुए कहा- 'ठीक तो कहता है बेचारा । जब 'हा की यो, चार बार सोचा क्यो नहीं पा? अब दो उसे वह चीज, जिसके लिए अपना हिदूपना भी बीच मे रख दिया। वह युवक बगलें झाकने लगा। फिर कुछ सिरा न पा कर बोला--"मला वेवकूफ बना रखा है लोगो को। मैं प्रभी इस ठगी की सूचना पुलिस को देता हूँ।" "सरकार," वह मादमी बोला-"मब तक इस मेरी दौलत को तग किया, मव उस पुलिस को तग करागे? कभी पौरत जात का पीछाभी छोडोग या नही ?" इस पर जो कहकहा लगा, तो उस युवक से वहा ठहरते नही बना और वह भुनभुनाता हुमा वहा से चला गया। धीरे धीरे भीड छटने लगी। वह प्रादमी झटपट भाग कर उसी युवक के पास पहुचा और बोला-'हुजूर, में कोई ठग नही है । यह तो बातों को एक कसा थी, जिसकी मापने कदर की। लोजिए, नाराज न होइए, माधी माप ले जाइए मौरमाधी मुझ गरीव के पेट के लिए छोर जाइए।" और उसने मापी दौलत उस युवक के हाथ पर रख दी। भौर लोगो ने भी उसके पास से गुजरते हुए उसे इक नी दुअनी देकर अपनी जेबों का भार हल्का किया।
कहानियाँ लिखा करता हू जिस दिन मैंने कहानिया लिखना भारभ किया था उस दिन सोचा था कि मुझे यश मिलेगा, ख्याति मिलेगी मोर पुरस्कार के रूप में धन मिलेगा, सापा- रण लोगो पर मेरा प्रभाव होगा, वे मुझे देख कर प्रसन्न होकर स्वागत किया करेंगे-लेग्नि पहली रचना ने ही कम से कम बारह सपादको के पास चक्कर लगवाए। मैंने और कहानी लिखी। वह भी न छपी, तो और लिखी। इसी प्रकार दसियो कहानिया लिखी, और भेजों। उनमे से कई तो पत्रिकामो के पेट मे ही खप गई और बाकी लौट कर वापस प्रा गई। लेकिन मेरा विश्वास था कि एक दिन प्रेमचद शरतचन्द्र जी कहानीकारों को लोग भूल जाएगे भोर मेरे नाम की माला जपा करेंगे। लिसी ने रिसी दिन सुझाया कि इन कहानियों के पीछे एक कुशल हाप की जरूरत है--विसी को गुरु बनामो तो नैया पार लगेगी। पर हमने गुरु के लिए पाख पसारी पोर गुरु मिल गए। उ होने बताया कि ये सभी कहानिया छा सकती हैं, लेकिन सभी में थोडे थोडे परिवतन की मावश्यक्ता है । उहोने उन लोटी हुई रहा. नियो मे जहा तहा स रद्दोबदल की, घटाई-बढाई प्रौर इसके बाद देखता क्या हरि जो कहानी जहा गई वहीं से पा रही है शीशे के भक्षरोमे दली हुई। वाह ! क्या कहने ये हमारे । हम भब कहानीकार हो गए थे। अपने मित्रों मे हमने अपने कहानियो का जी-तोड प्रचार किया । सपियों के नाम पत्र लिखे। सब वा एक मात्र विषय था हमारी कहानियो का ममुक प्रमुक पत्रा में छप जाना। लेकिन एक बात का बड़ा प्रफमोस या। अपने पड़ोस में कोई भी नहीं जानता था कि एक ऐसा मादमी, जिसका भारत भर म नाम होने जा रहा है यहीं इमो मुहल्ल मे रहता है। यद्यपि वे समो पत्र पत्रिकाए हमारे नगर में माते थे, जिन हमारी कहानियां सप रही थी पर कोई भी नागरिक मेरे यहां ऐसा न पापा बिसने - है मानस वर्ष कहानीकार कहकर पुकारा हो भौर प्रशसा में दो चार सन्द भूले-भटके भी कह दिए हो। सोचा कि शायद किसी को पता नहीं है, क्योकि न-जाने इन पत्र पत्रिका वालो को क्या सिरह है कि बहानीकार ये नाम के मासपास उसका पता नहीं छापते । इसलिए लोगो को यह पता कराने के लिए कि इतना बहा एक कहानीकार उनके ही नगर में रहता है, मैंने एक अच्छी खासी लबाई वोहाई का साइनबोड एक पेंटर को लिखने के लिए दे दिया, जिस पर मोटे मोटे अक्षरा में मेरा नाम, और उसके मागे लिसा या 'कहानीकार।' जब मैं साइनबोड लेने के लिए उक्त पेंटर की दूकान पर गया, तो उसने पछा, 'क्या माप कहानिया लिखते हैं ?" लीजिए, जिस पर सब से पहले रोव पहा वह वही था, जिसने साइनबोड लिखा था। माखिर यही सवाल वह उस समय भी तो पूछ सकता था, जब हम उसे लिखने के लिए दे गए थे। लेकिन मैंने उस छोटे-से मादमी के मुह लगना उचित नही सममा। 'हा की मोर उसके हाप पर सिखाई के धाम रख कर मैं साइनबोट लेकर घर पला माया। मुझे ठीक ध्यान है कि वह मेरा उत्तर सुन कर मुम्कराया था। एक ऐसी जगह चुन कर, जहा से सब माने जाने वाले मेरे साइनबोड को देख सकें मैंने उसे सहक की भोर मुह करके टाग दिया। अगले ही दिन, जब मैं एक कहानी लिखने में मग्न या, किसी ने मेरा दर वाजा खटखटाया। मैंने झट से दरवाजा खोला। देखा कि एक युवक खना है, जिसे माज से पहले मैंने कभी नहीं देखा था। उसने बडे मादर भाव से नमस्कार किया। मैंने जरा सी गरदन मटका कर बडे भादमियो की तरह उसके नमस्कार का उत्तर दिया। इससे पहले कि मैं पूछू कैसे माना हुआ, वह बोला माप कहानिया लिखते हैं, जी ?" 'लिखता तो हू" मैंने कहा, 'क्यों।" "मभी बताता हू." उसने कहा, 'जरा देर बैठकर सुनिए।" "माइए" मैंने कहा और उसे भीतर लिवा ले गमा। अपनी शानदार मेज को बरावर वाली कुरसी पर बैठाते हुए मैंने फिर पूछा, 'मब कहिए भाप क्या कहना चाहते थे?' वह कुछ सकोच प्रदर्शित करते हुए बोला, 'माप तो हर तरह की कहानियां मानस-बघू ८७ 20 " लिखते हैं न "हाँ, हो, मगर बात क्या है, माप जल्दी से बताए---मैं एक कहानी लिख रहा था। उसका प्रसग टूट गया तो "मेरा मतलब है कि " उसने फिर कुछ हिचकिचाते हुए कहा, "मैं प्राप से एक ऐसी कहानी लिखाना चाहता था, कि जिससे मेरी प्रेमिका मुझे चाहने लगे माप समझ गए न?" "समझ तो गया," मैंने कहा, 'लेकिन यह भाप से किसने कह दिया कि मैं माहर पर कहानिया लिखा करता हू।" मैंने कुछ नाराज सा होते हुए कहा। वह बोला, "क्यो, जिस तरह दुकानो पर लिखा रहता है, लौहकार स्वणकार मादि मादि, उसी तरह भापके दरवाजे पर एक साइनबोड लटक रहा है 'कहानीकार', जिसके माने हैं कहानिया बनानेवाला क्षमा कीजिए। में तो इसीलिए मापके पास पाया था।" भौर वह उठकर चलने के लिए तत्पर हो गया। 7 भव मैंने कुछ सोचा । भाखिर पूछा तो जाए कि पूरा मामला क्या है । क्या पता किसी कहानी का मसाला ही मिल जाए । मैंने कहा, "वैठिए तो सही, माप तो रस्सा तोड़ के मागे जा रहे हैं। कुछ मालूम तो हो कि पूरा मामला क्या है हो सकता है कि मैं किसी काम मा हो जाऊ मापके ?" वह फिर बैठ गया और बोला, "पहले यह बताइए कि पाप कहानी लिख देंगे या नहीं ?" मैंने कहा, "मच्छी बात है, लिख दूगा-पर यह वादा कैसे कर सकता हूँ कि उसे पढकर भापको प्रेमिका मापको चाहने ही लगेगी।" "पाह, साहब, मापकी कहानिया कितने ही पत्रो में मैंने पढ़ी हैं। कहानियों में गुण ही ऐसा होता है कि कहानीकार जिस पर नो प्रभाव डालने का विनार करे, यही प्रभाव पड़ जाता है । ऐसा नहीं तो फिर पाप कहानीकार कैसे ?" मुझे यह मपनी हेठो लगी कि मैं इससे इनकार कर सकू । मैंने कहा, बात है, ऐसी ही कहानी लिख दूगा। पर मापको मालूम है कि एक कहानी का मिलता क्या है मुझे?" उसने धीरज के साय कहा, "मिलता क्या होगा, यही दो सौ, चार सौ रुपए। सोतीन सो रुपए तो मैं मापको दे सकता हूं।" "अच्छी मानस-या मैं उसका मुह देख रहा था । यहा दस-बारह कहानिया लिखकर भी ढग से तीन सौ नहीं पाते, पौर यहा एक माडर को कहानी पर तीन सौ मिले जा रहे थे। मैंने कहा, "पेशगी ?" उसने खट से पचास रुपये के नोट निकाल कर मेरे सामने रखे । फिर बोला यह तो रही मापको पेगी। अगर काम हो गया, तो ढाई सौ भापको और मिलेंगे चाहे मुझम लिखवा लीजिए। अगर काम न हुमा तो मैं पाप से पचास रुपये वापस नहीं मागूगा, क्योंकि कहानीकार से कभी पैसा वापस नहीं मिलता ऐसा मैंने सुना है । वह तो तत्ता तवा है जहा पैसा पानी के छींटे को तरह पह जाता है।' मैं उसकी इस सूझ पर हसा पौर पचास रुपये जेब मे रखे । लेकिन रुपये जेय मे रखने के बाद मुझे यह मालूम हुमा कि काम जितना भासान मैं समझता था, उतना या नहीं। भला, कोन सहक ऐसी होगी, जो एक कहानी पढ़कर ही अपने प्रेमी के पास दो चली माएगी वह नाला, तो, माहन, कब हो जाएगा काम?" मैंने वहा, भई, तुम तो ऐसे पूछ रहे हो, जैसे मैं ही उस लडकी का वार होऊ और तुमने रुपये दिए नही कि हो गया काम । पहले तुम्हें कुछ बातें बतलानी होगी इसके बाद उन बातो पर प्लाट रचा जाएगा, फिर प्लाट की लिपी पवाई जाएगी फिर उसे क्या किया जाएगा फिर उसका परिणाम और कहानी की खीर पकेगी वह मह बनाउर मेरा मह देख रहा था। मवरचा कर मैंने भी उसका मह देखा क्योकि मैं बात ही बात म क्या क्या सिद्धात कह गया था यह मुझे मालूम नही था। खैर, मैंने उसी समम एक कागज उठाया और पूछा 'सडको रोता" उसन कहा, ' बस गाती ऐसा है, मानो भगवान कृष्ण गोता बोल ? का नाम ?" लरकी के बाप का नाम ? मैंन पूछा। भगवतीप्रसाद" वह चोला प्रजी बस पूरा अफसर है। बडा मादी है। छोटा मादमी तो मेरा वार भी नहीं है साहब पर यह समझिए कि वह तो पसाई सा सगता ।
मानस वधू " " ?" "प्रेमी का नाम" मैंने बीच में ही टोका। "जो मेरा नाम कुजबिहारीलाल है। मैं कलाकार वलाकार कुछ नहीं हू बस मैं तो पैसा कमाने की क्ला जानता हू और "प्रेमी के बाप का नाम?" मैंने पूछा। "चचल प्रसाद," वह बोला, 'मेरी एक नही सुनते, कितनी हो बार कह चुका हू कि उस लड़की के बाप के पास चले जाइए 'खर, अब यह बतामो कि प्रेम कैसे हुमा "मजी, मेगे किस्मत फूट गई थी, उस रात को कालिज वीक के ड्रामे मे चला गया था। उसने जो कोयल की तरह गाना शुरू किया, तो मुझे गा माने लगा," और एक लबो साप छोडकर वह फिर कहने लगा, “वस तभी तो समझिए मुझे बरावर सास मा रही है। क्यो साहब, क्या ऐसा भी हो सकता है कि वह मेरी तरफ खिची हो खिची तो होगी, कहते हैं कि दिल को दिल से राहत होती है।" मैंने उसे धीरज देते हुए कहा "हा, होना तो चाहिए उसे भी कुछ फिर तुमने कुछ किया?' "मजी, कहाँ, साहब । मैंने कई बार साहस किया, लेकिन उसके घर तक जाते जाते साहस खो बैठता, एक दिन तो रास्ते में ही उससे एक्सीडेंट हो गया था, भोर में थोडा पोडा चेतन सा थोडा थोडा देवता सा, पोडा पोडा मनदेखता सा वह मुझे अस्पताल ने गई। मैंने समझा कि चसो उसने हापो का पुछ तो पीने को मिलेगा चाहे दवाई ही सही मगर साहब, वह तो सहक के कुत्ते की तरह मुझे प्रस्पताल मे हानवर साईकिल को घटी बातो हुई चली गई।" 'मन्या पब माप जा सकते हैं। इतना मौर बताते जाइए कि पाप क्या काम करते हैं "जी, मैं भी तो पढ़ता हूँ।" फिर पसाबमाने की क्ला कैसे जानते है? पुतनी पधा है । सूद पर रुपया पमता है' उमने कहा । 'मब वह हो गाती है पौर गाल बनाती है, मैं कम से कम अपने को एक कहानी लिखने वाला सिट कर सक, तो कुछ मेल बैठे। इसीलिए मापने पास "लेकिन कहानी पर तो मेरा नाम होगा", मैंने बोंक पर रहा। १॥ .
६० मानस-यडू अब शायद वह समझा कि कहानियों पर कहानीकारो का ही नाम छपता है, बोला, "देखिए, साहब, कहानी तो मेरे नाम से ही जाएगी। पर भाप कहेंग, तो सो-पचास रुपये और दे दूगा।" "खर, चलो", मैंने कहा, "पौर देने की जरूरत नहीं है। बस, हम तो विवाह के लडडू खाएंगे।" वह उछल पडा, "लहड़ एक नही, जी, दो-दो। एक इस गाल में मोर एक उसमे । मच्छा, तो माज्ञा दीजिए।" 'जामो," मैंने कहा, "परसो भाकर कहानी ले जाना।" मैंने उसी समय से एक नई कहानी का ताना-बाना सुनना शुरू किया । दो दिन मगजपच्ची करने के बाद जो कपाना बना, वह निम्नलिखित है- जिस दिन से मैंने रीता को देखा था मैं उसका दीवाना हो गया था। दीवाने के बारे में कहा जाता है कि उसे किसी को सुध नहीं रहती। मगर मुझे रोता को सुघ हर वक्त रहती थी। उसके गाए हुए गीत मेरे होंठो से अपने ही माप निकलते रहते थे। कभी थक जाता, तो मेरे मस्तिष्क में वे गीत इस तरह गूजते रहते थे, जैसे किसी कदरा में कोई भटकती हुई प्रास्मा गूज रही हो। इधर मेरे मित्रो को हसी का मसाला मिल गया था। साथ में मुझे मजनू की उपाधि मिल गई थी। प्राय ही मित्र लोग पूछा करते थे “क्या हाल है तुम्हारी लला का?" मच्छी खासी "गुनाह वेलज्जत' वाली बात थी। मजनू के साथ इतनी खर तो यो कि उसकी लला से चाहती थी, पर हमारे साप यह कम्बस्ती थी कि वह हमारी तरफ भांख उठाकर भी देखना गवारा न करती थी। उस दिन जब मुलाकात हुए बिना पूरा एक महीना गुजर गया था हमारी भावी श्रीमती जी हम से इस तरह मखि फेर कर चली जाती थी, जसे उनके सामने कद्र से उठकर फरहाद मा गया हो और वह डर गई हो, तब हम एक कालेज जाते हुए बाजीगर का तमाशा देखने नगे । उसने कैसे-कसे कमाल दिसार मोगो का मनोरजन किया था, यह हमारी पहानी की बात नहीं है । लेकिन वह माजीगर हमे बतला गया कि हमें अपनी भावी श्रीमती जी के दान क्सि सरह हो सकते हैं। पपने भनेर कमालों मे से उसका एक कमाल यह या fr भपने बाहरे के मानस-यघू मुह में से उसने बिना छुरी के ही सून निकाल दिया था। लोगों के दिल में दया भरकर उसने पैसा बटोरने का एक सेल रचा था और वास्तव मे कुछ कच्चे गिन के लोगों ने यह समझा कि बेचारा लडका बुरी तरह जख्मी हो गया है। मगर मैं विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाने जानता था कि ये सब लोगो पर रोब देने की बातें हैं, शेष कुछ नहीं। लेकिन यह मैं भी नहीं जानता था कि यह दवा है क्या, जो सचमुच खून सा लगता है। वहीं बहे खडे मैंने एक योजना बनाई। मैंने बाजीगर से उस दवाई का नाम पूछा। वह मुझे घूरने लगा, मैंने पांच का नोट दिखाया, उसने बात उगल दी। दवा पूछकर मैं घर मा गया। अगले दिन ही, जब मैं कालिज से लौट रहा था, तो मैंने देखा कि रीता की साइकिल मेरी साइकिल के प्रागे भागे चली जा रही है। उसने मुझे पीछे से पाता देखकर साइकिल लेज की। मैंने भी तेज की। उसने हाथ दबाकर पंडिल मारे, मैंने दोनों हाथ छोडकर साइकिल दवाई पोर माखिर मेरी साइकिल उसकी साइकिल से जा टकराई। सहक पर हम दोनों घूल में जा पहे। साइकिलें एक-दूसरी से रूठी हुई सखियो की तरह एक सहक के इस पार और दूसरी उस पार जा पहीं। लेकिन रोता तो तत्काल उछल कर खड़ी हो गई और जब तक मैंने ज्यों त्यो उठकर अपने पैरों पर खड़े होने की चेष्टा की, उसने तडाक से एक जोर का थप्पड मेरे मुह पर रसीद किया । उस दिन मेरा यह भ्रम दूर हुमा कि उसके हाथ पैर बहुत कोमल थे। लेकिन उसी समय मुझे ईश्वर प्रेरणा महात्मा गांधी की याद पाई, ईसामसीह का वह वाक्य मेरी नजरो के सामने घूम गया "यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर चाटा मारे, तो दूसरा उसके भागे कर दो।" मैंने झट अपने पैरों से भपना नया बूट उतारा मौर रीता के हाथों में देते हुए निवेदन किया "कृपा करके इससे मारिए भापके हाथ दुल जाएगे।" माह । माखिर भ्रम कब तक दूर होते रहेंगे। रीता ने तुरत जूता मेरे हाथ से झपट लिया और प्रौर इसके बाद मेरा सिर. एक हाथ से पकड कर दूसरे से उस पर जूते का सोल बजाने लगी। बुद्धि प्रगर हाजिर हो तो भादमी बड़ी से बड़ी कठिनाई से गुजर जाता है । उसी समय मैंने वह बाजीगर वाली दवा अपनी कोट की जेब से निकाली १२ मानस वधू पौर नीचे झुके झुके हो (जबकि ऊपर से जूते बरस रहे थे) गोली मुह में द ली। बस, अब क्या था, मेरे मारे कपडे खून में तरबतर ये और मुह सारा मान हो गया था। अब मैंने मुह ऊपर उठाकर मा फाड दी और जमीन पर लबा लेट गया। इसके साथ ही रीता जोर से चीख पड़ी। जूता जमीन पर फेंका । कुछ सोग इक्टठे हो गए । मुझे उठाया गया, अस्पताल में ले जाया गया मोर वहा वह मुझे भरे हुए कुत्ते की तरह डालकर फिर अपनी साइकिल की घटी बजाता हुई चल दी। मो चिल्ला कर कहा 'रीता, मैं मर जाऊगा, सच कहता हू, मैं मर जाऊगा--अगर तुम चली गई तो, रीता हाय, रीता।" + + + बस, कहानी यही थी। तीसरे रोज ही जब वह मिस्टर कुजविहारीलाल ता मैंने गर्व के साथ उनके हाथो म कहानी थमा दो। उहोंने उसे वहीं बैठ कर पढा पोर बोले 'वाह साहब, यह तो आपने मेरा जूता भौर मेरा ही सिर कर दिया । अगर उसने मेरी मक्कारी की बात पढी, तो जल भुन कर कबाब हो जाएगी।" मैंने दिलासा दिया, 'पापको ग्राम खाने कि पेड गिनने ?" "जी, माम खाने हैं' वह बोला। "तो, बस, यह कहानी अप रीता के पास भेज दें। दूसरी नकल जो इसके साप है, पाप रख लें। फिर जो कुछ परिणाम निक्ले उसको मेरे पास पहचा दें। तीसरी नकल मेरे पास है।' यह भक्तिभाव से सिर झुका कर चला गया। तीसरे दिन ही फिर मा हाजिर हुमा । दरवाजे से ही बोला "प्रजो मापने तो माखिर मरवा ही दिया न। देखिए तो, उसने क्या लिखा है "और यह कहकर उसने एक पत्र मेरे हाप में दिया। मैंने पत्र खोला मोर पढ़ा, लिखा पा मिस्टर लोफर बिहारी, मैंने पापको उस दिन पुलिस में दिए बिना छोड़ दिया तो पाप सिर पर बढने लगे । अनाव यह कहानीवारिता माप किसी पौर को दिखाए । समझे ? मैं मापको भतिम बार यह बताती है कि यदि भाप इन बेहूदी हरकतो से बाउने भाए, सो मैं पुलिस मे प्रापको शिकायत दे दूंगी, और उसके बाद, उस दिन तो मानस वधू ६३ क्या मापके मुह से खून निकला था, जो अबके निकलेगा। रीता। मैंने कहा, "शाबास 1 मार लिया दांव । भजी, कहानी तो पद बन रही है । लाइए अपनी दूसरी प्रति।" उसने दूसरी प्रति मुझे देदी। मैंने झट उसी दिन रीता के पत्र को कहानी के प्रतिम भाग के साथ जोहकर टाईप कराया, पौर मगले दिन उनके हाजिर होने पर कहा, 'अब भाप इस कहानी को रीता के पास भेज दीजिए।" उसने उस जुड़े भाग को देखा और बोला, "तब तो वह जरूर पुलिस मे केस दे देगी 'इनमे कही मापके दस्तखत तो नहीं हैं, दे कैसे देगी?" मैंने कहा। वह सतुष्ट होकर चला गया। मगर जब चौथे दिन वह माया, तो इस बार उसको हालत दया के योग्य थी, क्योकि उसका मुह सुजा हुमा था। मैंने कहा, "यह मापने क्या हुलिया बना , रखा है। वह मेरी तरफ पाखें निकाल कर बोला, "सब भापकी मेहरबानी है। मैं मापसे भर गया । उसने पिताजी को खबर पर दी भौर पिताजी ने अपनी छडी तोड दी कलाई म मोच मा गई उनको।" मैंने हसी को मन ही मन दवाकर कहा, "कोई बात नहीं। यह तो प्रेम का ससार है । यहा पर मार तो फूलो की बौछार समझ कर खातो चाहिए । माखिर मापको तो माम खाने हैं पेड पोहे ही गिनने हैं । अब पाप एक काम कीजिए। कल तक अपना एक चित्र खिंचवाइए इसी पोज में।" यह समझा कि मैं मजाक कर रहा हू । वह बुदबुदाता हुमा चला गया। अगले दिन तक मैंने भी तीसरी प्रति मे कुछ बताया। बढाया क्या, बेचारे नायक को सुझाकर मोटा कर दिया। मगले दिन प्रेमी सज्जन मेरे पास पाए, मैंने यह तीसरी प्रति उनके हाथ पर रखी पौर कहा, "भव भाप मय अपने फोटो के इस कहानी को फिर रजिस्टरी से भेज दीजिए।" वह लेकर चला गया। इसके बाद वह हफ्तों तक मेरे पास नही पाया। जिस दिन भाया, उस दिन उसका चेहरा सिला हुमा था, तबीयत प्रसन्न पो, बल्लियो उछल रहा था।
मानस-य " पिवार पुसते ही मुझ से लिपट गया और बोला, "वाकई माप हिन्दुस्तान के सबसे बडे बहानीकार है । मैं मापको बधाई देता है। ये लीजिए तीन सौ रुपये मैंने कहा, "मरे, मरे, यतामोगे भी हि क्या बात है ? क्या बात हो गई। पया फिर कोई?" "मजी, नसने मजूर कर लिया पिपल गई, बहानीकार साहर, इस तरह पिघल गई जैसे गरमी से यरफ पिपल जाती है । यह देखिए उसका खत ।" मैंने खत लेबर पड़ा। सिखा था प्रिय कुजविहारीलाल जी, मापकी सारी रस्तानियां मिलीं। मापको मुझमें ऐसी क्या खूबी दिखाई दे रही है कि भाप मेरे पीछे इस बुरी तरह पड़ गए हैं। मापको तो एक से एक सुदर सहकी मिल सकती पी। मापने मेरे सिए इतने कष्ट सहे, इतना स्याग किया फिर भी मेरे प्रेम का दम भरते रहे। मक्ष किस तरह कह सकू कि मैं मापसे विवाह नहीं करूगी । मेरे पिताजी मापरे पिताजी से बातें कर लेंगे । मैं बताक कि मुझे माप म क्या खास बात नजर पाई। बात यह है कि मापके फोटो में जो भापका सूजा हुमा मुह है वह मुझे बहुत ही सुदर जथा। मैंने पक्का इरादा कर लिया है कि विवाह के बाद मापके मुह को स्थायी रूप से ऐसा ही बनादू पीट कर नही, सेवा करके। पर भाप मपने इस बाने को बदल न दीजिएगा, नहीं तो मैं बहर खाकर मर जाकगी। रीता। मैंने पत्र समाप्त किया और उसने उसे छीनकर बहुत सावधानी से एक सुदर लिफाफे में रखा भोर छाती के पास वाली जेट में डाल लिया । फिर तीन सौ रुपए मेरी तरफ बढाए । मैंने कहा, “पचास तो मा चुके थे। ढाई सौ रह गए थे बस।" वह बोला, "जो रखिए। इससे उस वक्त तक लाडू खाइए, जब तक असली तयार नहीं होते। मैं चला। बधाई, सौ सौ बधाई मगर किसी को अपनी प्रेमिका का रिझाना हो तो भाप जैसा कहानीकार ढूढे-" उसके जाते जाते मैने चिल्लाकर पहा मौर भगर किसी कहानीकार को अपनी नायिका के लिए नायक ढूढना हा तो भाप जैसा दूं।" मापकी रानी, - धन-तेरस का दिन -- मुझ से हर काई नाराज है। पिताजी इसलिए नाराज थे कि मैं अपनी इच्छा से शादी करके बिरादरी में उनकी नाक काटनी। दफ्तर के मालिक इसलिए नाराज थे कि मैं 'जी हजूरी न करके उनकी 'इनसल्ट' करता था। तो पर छूट गया मौर नौकरी भी। पब दोस्त भी नाराज हो गए-इसलिए कि मैं उहें पाय नहीं पिला सकता और थीमती जी इसलिए नाराज हैं कि मैं उहें साडी नहीं दिला सकता। महे पप्पू मोर गुडिया को भी यही राय है कि पापा पच्छे नहीं हैं । मैं जानता हूं कि उनकी राय भी सही है क्योंकि भौर बच्चो की तरह उहें 'टाफी' और बिस्कुट के डिब्बों की जरूरत है, मगर मैं पूरी नहीं कर सुकता मगर मैं रिसी से नाराज नहीं है। यदि मुझे कभी क्रोध माता भी है तो अपने पाप पर और किसी पर नहीं। किसी और का कसूर भी क्या है ? सबका कारण ठोस है, मगर मेरे पास दो कारण है ही नहीं। धन तेरस के दिन इसी बात पर खाट छोड़ने से पहले कुछ सोच ही रहा था कि सामने से माती हुई श्रीमती जी को देखकर रुक गया, मानो मैं कुछ चुरा रहा था। सकपका कर बोला-"मोह, चाय बना ली। बडी जल्दी बन गयी? लाभो।"ौर में बैठकर चाय पीने लगा। श्रीमती जी मानो सचमुच नाराज थी। बिना कुछ बोले ही प्याला थमाकर चली गयी। में मन-ही-मन हसता हुमा चाय पीने लगा। तभी देखता क्या है कि गुडिया रोनी सूरत बनाए चली पा रही है। उसको माखो वे दोनों पासू स्पष्ट मोस की बूद की तरह चमक रहे थे। मैं लपक कर पूछा-"क्यों मई, क्या हुमा?" वह फिर सुवको, मगर चिल्लायी नहीं। मैंने फिर पूछा--"क्या मम्मा ने मारा है ?" उसने सिर हिलाकर मौन उत्तर दिया, मतलब था- हा।"
मानस-वपू साथ "क्यो ? पिसलिए मारा है ? भई वाह ! संर, कोई बात नहीं। मैं ममा को मारगा," कहपर मैंने उसे अपने पास बिठा लिया। यह चुप हो गई। मगर उसकी मांस साफ कह रही थी- 'पम्मा को मत मारना, वरना फजीहत हो जाएगी।" मैंने गुड्डी को बहलाना शुरू किया--"क्यों गुही, बाजार घलगी हमारे तब श्रीमती जी फिर मा धमकीं। वह पप्पू का एक हाथ पकडे पी। कह रही 'पप्पू को मना कर लो हां, परना "मरना क्या ?" मैंने महज भाव से पूछा। इस 'खरना' का कोई उत्तर उसके पास नहीं था। मगर हम समझ गए कि क्या हो सकता है । पप्पू हमारे सामने खसापा, मैंने कहा "क्यों भाई, मम्मा को तग क्यो करते हो? क्या बात थी?" वह चुप रहा। मैंने जरा सा डाटवर पूछा 'पया बात फूलझडी," उसने मिना कर कहा "दीवालो हैन।" 'मोह ! मुझे तो याद ही नहीं थी कि दीवाली है। अच्छा फुल झही शाम को मैं लाऊगा। जामो, मम्मा को तग मत करना ।" पप्पू इस तरह वहा से चला गया, मानो उसने कभी तग न करने की प्रतिज्ञा मन ही मन कर ली हो। अदर नाकर मैंने श्रीमती जो से कहा "देवी जो, भापका दिमाग के खराब हो रहा है उहोंने कुछ उत्तर न दिया। मैंने ही वहा "श्रीमती जी, मैंने कुछ पूछा है " मापसे" "क्या है ?" वह मुमला उठी। मैं डर गया । वह कहती रहीं 'तुम्हें कुछ पता भी है ? घर में पैसा नहीं है और दीवाली भा रही है। मेरा क्या है, मैं तो भयरे म बठी रहगी । सुम पैसे मत ताना किसी से भो। काम करते रहो, बच्चो के पास चाहे कपड़े न हो और घर मे चाहे दाना न रहे, मगर तुम किसी से कुछ लाना मत। मोह यह बात है। नाराज क्यो होनी हो, में भी लाया पैसे । तुमने ।
७ मानस-व) भली फिकर की " मानो मुझे बैंक से निकाल कर ही साने थे। हाथ मह घोकर और बाल सवार कर तलवार साहब के घर की मोर पल दिया। उनकी भोर मेरे दो-सौ रुपये का हिसाव था, मगर मागते शरम लगती थी। माज घर में तगी देखकर चलने का साहस कर बैठा। रास्ते मे अनेक बातें दिमाग मे मा जा रही पी। हो सकता है न ही दें! मगर न देने का सवाल ही क्या है ? काम किया है, पैसे लेने हैं। तलवार साहब के दरवाजे पर जाकर दस्तक दी, तो तलवार साहब ने "हल्लो" कहकर स्वागत किया। फिर बोले "कहिए शर्मा जी, काम कसा चल रहा है। राष्ट्रपति की जीवनी का मसाला मिल गया न?" "हा वह तो पूरी होकर टाइप पर भी दे चुका है। अब तो महात्मा गांधी शुरू होने वाली है," मैंन कहा। "किए जाइए," तलवार साहब बोने "बस, मार्केट मे ऐसी हालत पैदा करनी है कि किसी महापुरुष की जीवनी बिना लिखी न रह जाए।" 'मजी, माप छापने वाले सलामत रहे हम तो मापके कुत्ते की जीवनी लिख मार।" मैंने उत्तर दिया। तलवार साहन हसे । मैंने 'मूडे भच्छा देखकर पंसो की चर्चा को-"माज भाप कुछ रुपया दिलवा दें तो 'भाज' तलवार साहब को जैसे साप न काट लिया। चोककर बोले- "माज-धनतेरस के दिन । कल क्यों न कहा मापने ? प्राज, पल मौर परसो तक तो हम मजबूर है जनाब । इन दिनो म पैसा देना एक प्रकार से लक्ष्मी को धक्का देना माना जाता है। भापको कल कहना चाहिए था।' मैंने अपनी गरीबी के भावों को छिपाते हुए कहा- 'खैर, कोई बात नहीं, खलवार साहब, मैं बाद मे ते लगा। मैं भी इस बात को भूल हो गया था कि दीवाली मा रही है । माज श्रीमती जी ने याद दिनामी थी मच्छा, भव " कहकर मैं वहा से उठ माया । घर मामा तो घर मे घुसने का साहस न हुमा। मगर पारा ही क्या था श्रीमती जी हमारी रोनो सूरत नहीं ताड सकी। सबसे पहले उहोने हमारे लाला पा समेत दिया कि वह भाए थे और कह गए हैं दि साज हिंसाब साफ होना पाहिए । दीवाली से पहले वे साल भर का हिमाद साफ कर लेते हैं। बिल रख भाशा - ६८ मानस व गए थे । मैंने देखा, एक कागज पर हमारे दाल-पावस वगैरह का हिसाब था- साठ रुपये कुछ माने । मैं मिल को देखता रहा और सोधता रहा यदि यह बिल सचमुच का "बिल" होता तो मैं उसमे पुसकर मुह छिपा सेता, मगर श्रीमती जी ने कहा- 'लाला फिर माने को कह गए हैं । मच्छा यही रहेगा कि तुम जाकर उहें दे मामो।" 'दे भाऊ? ' मैंने कहा-"मगर मुझे तो पैसे नहीं मिले वहां से।" 'मिसे नहीं ?" श्रीमती जी बोलीं-"यह क्यों नहीं कहते कि मागे हो नहीं ! शहर मिया मुहल्लेदार, घर मे बीवी झोंके भार!" "मय बद भी करोगी कि मैं कहीं चला जाऊ ?" मैंने जरा घोंस से काम लिया। - " "चले जामो," श्रीमती जी उसी स्वर में उत्तर दिया-“मगर पप्पू और गुडिया को लेकर! ये मुए मेरी जान खाए जाते हैं।" भौर इसके बाद उन्होंने अपने अमोघ मात्र रुदन का प्रयोग किया- 'जब देखो, तब चले जाने की घौंस जैसे जैसे भापको पति ही न मिलेगा!" मैंने वात काट कर कहा--"क्यों ठीक हैन?" रोती हुई श्रीमती जी को हसी मा गई मोर बनती हुई लडाई का नाश हो गया। हम दोनों के कहकहो के बीच किसी ने दरवाजा खटखटाया। "लो, लाला मा गए हैं, भव समझामो," श्रीमती जी ने कहा। 'हां, हा, देखता हूँ, तुम बेफिक्र रहो" कहकर मैं बाहर माया । बाहर डाकिया खडा था। मुझे देखते ही बोला-"मापका मनी भाडर है, ३००) रुपये का "मोह, लाइए, पयवाद," कहकर मैंने दस्तखत किए। सम्हालने के लिए श्रीमती जी पीछे-पीछे चली माई थीं। हाकिये ने जेब का भार हल्का करके मेरी भोर देखा। मैंने श्रीमती जी क हाप से पांच रुपये का एक नोट छीन कर उसे देते हुए कहा-'दीवासी का इनाम हाकिये ने सलाम ठोंका प्रौर मागे निकल गया। श्रीमती जी मदर जाकर मानस-वधू बोली-"मुझे तुम्हारी यही मादत भच्छी नहीं लगती। पार रुपये को कुछ समझते हैं नहीं! "जब पैसे नहीं थे, तब भी झीकना भौर अब मा गए हैं तब भी भौंकना ! मुझे यह भन्छा नहीं लगता है। लामो, साठ रुपये मुझे दो, लाला को दे माता है।" 'हा मैं तब तक सामान की लिस्ट बना लेती हू-बाजार चलना है अभी। जल्दी लौटना," श्रीमती जी ने महा। जब मैं लाला के यहा से लोग तो श्रीमती जी एक साफ धोती पहने हुए पौर बच्चो को सजाये, बैठी प्रतीक्षा कर रही थीं। मैंने कहा-"देवी जी, दोपहरी तो टल जाने देती। और खाना?" "खाना तो कव की बना चुकी हूँ, और कोन जेठ की दुपहरी है ? जल्दी से खा लो, और चलो। भव से चलेंगे तो सारा सामान खरीद सकेंगे।" "बहुत अच्छा देवी जी ।" कहकर मैंने जल्दी-जल्दी खाना खाया। फिर हम सब बाजार की भोर रवाना हुए। पता नहीं श्रीमती जी मोर बच्चे क्या सोच रहे थे, मगर मैं तय कर चुका या कि आज सब भरमान निकाल कर ही दम लूगा। जब हम लोग पोपटलाल की दुकान पर पहुचे, तो वहा कुछ अधिक भीड नहीं थी। वैसे इस दुकान पर इतनी भीड होती है कि 'भटेंट' करने को 'सेल्समन' नहीं मिलता। माज हो लाला जी ने मुस्कराकर हमारा स्वागत किया भोर कहा-"माइए बाबूजी, बैठिए।" एक लम्बी सी बैंच पर मधिकारपूर्वक सपरिवार बैठते हुए मैंने कहा- "जरा कोटिंग तो दिखलाइए।" "ममी लीजिए," लाला जी मशीन की तरह बोले । भोर फिर उनका दुकान की भोर देखना ही इतना काफी हुमा कि कई समैन गरम कपड़ों के अनेक रग लेकर हमारी भाखों के सामने नाचने सगे। "हो जो, इसकी क्या दर है ?" एक को हाथो म लेकर मैंने पूछा। "पद्रह रुपये माठ माने।' मौर इसका?' "सनह रुपये।' -- मानस वर्ष " " "मीर इसका 'वनीस रुपये चौदह माने।" "मौर इसका?" "मजी भापको लेना किन दामों मे है "किन दामो मे, मतलव ?" "मतलय तो साफ है, बाबूजी।" लालाजी अपने स्वर को स्वाभाविक बनाते हुए बोले- "दस रुपये से लेकर तीस रुपये ग तक का कोटिंग हमारे यहा है- एक से एक बढिया डिजाइनो मे ," कहकर उहोंने प्रश्न-सूचक दृष्टि से मेरी पोर इस प्रकार देखा मानो वह मेरी मौत को मेरे चेहरे से भाप लेंगे। ऐसी जगह भी रोय न दिया, तो बागोरी पर लाख बार लानत है। मैंने मन ही मन सोचकर कहा-'तो वह तीस रुपये वाला पा मापने अपने लिए रख छोडा है। यह क्यो नहीं दिखाते?" वस, कहने की देर थी कि एक मोर भलमारी खुली भोर विलायती 'सज तथा गंवडी पान हमारे सामने थे। अब की बार दाम पूछना हिमावत था। मैंने अपनी पस की दाद लेने के लिए श्रीमती जी की मोर देखा-मगर वह मुझे इस प्रकार पर रही थीं मानो कच्चा हो चबाने पर तुली हों। मगर पर लाला ने पूछा- कितना?" तो "एक कोट का," अपने प्राप मुह से निकल गया भोर पान पर कैंची चलने लगी। श्रीमती जी ने अपनी पसद की साडी ली। दाम उसके भी नहीं पूछ। भर घटिंग और लटठा वगरह का काम रह गया था। लगे दापो वह भी निबटाया। दिल देखा १५०) रुपये। लेकिन इतजाम ऐसा हो गया कि रजाई गरे मतावा जाने-भर कपडों को जरूरत न परे। दुकान से उत्तरे तो और का बोझ काफी हल्ला था पोर हाथो कारोझ भारी। मन की दशा का मनुमान तो सहाही मग सकता है। क्यों बी, भब मौर क्या सेना है? मैन श्रीमती से दरे स्वर में पूछा। 'ममी लिया ही क्या है ? श्रीमती जो बोली-"मा पनतेरस है परतन सेने हैं भोर हाँ हा धनो, एमटी-सेट भी ल मेमा। वे प्याले सो बच्चों ने तोर दिए है अपनी बार जरमन सिलपरासेट से गामौर हो, क्यों न एर मगर .
मानस-वधू को साप ले लें। कई बहल तो कपड़ों के हो गए हैं और तभी एक मजदूर, जो शायद पीछे ही सहा था, मा गया भौर उसने अपने भापको प्रस्तुत कर दिया। यह लगभग तीस पैतीस साल का एक बूढ़ा-सा लगने वाला बदान था। काला रग, बढी दाढीपौर पीले दात मिलकर उसे स्रावना सा बना रहे थे। जरूर मेरे छोटे छोटे बच्चे उसे देखकर कुछ सहम गए होंगे। मगर मुझे कमर से लगे उसके पेट को देखकर उसको भूख का एहसास हुमा मौर मैंने भपो पहल उसकी टोकरी मे डालकर कहा-"चलो, अभी और सामान लेना है फिर घर तक चलना है।" बिना कुछ रहे पत्रवत् वह मेरे कहते ही उधर घूम गया मोर उस समय तक धूमता रहा जब तक मेरी जेब में पद नोट ही शेष रह गए। बतन खरीद कर हम लोग जनरल-मद की दुकान में घुस गए थे। वहां से मैंने अपने लिए होल्डाल और अटेवी सरोद लो। इस प्रकार वाम भले ही कुछ अधिक नहीं हुमा था लेकिन उसकी टोकरी भर गई। अब उसके चेहरे पर सतोष के भाव थे-मानो वह सामान उमी के घर जा रहा था। वह मागे-माग या पौर हम लोग पीछे-पोछे थे। तभी पडू का पैर किसी केले के छिलके पर पड़ गया। बस, एक तमाशा सा हो गया। हसने वाले हस रहे थे। श्रीमती जी सभाल रही थीं। इसी झमले मे हमारा मजदूर मय-सामान गायब हो गया। पप्पू की फिसलन और चोट कुछ भी तो याद नहीं रहा। हमारे मस्तिष्क मे एक ही प्रश्न या कि मजदूर कहां गया श्रीमती जी भोर बच्चो को छोहार में भागा। किनारी बाजार को नुक्कड पर भाकर यह समस्या हुई कि दरीबा की मोर जाऊ या मालीवाडा की भोर मैंने दोनो पोर निगाहें दोहाइ । मगर यह कहीं भी दिखाई न दिया। में वापस लौट भाया । देखा-श्रीमती जी के चेहरे का रंग उडाहमा था। मुझे देखते ही रोली-'मिला कही ?" "नहीं," मैंने कहा। 'मुझे तो मुमा शक्स से हो ऐसा लगता था। मैं तो " मना करने को थो," मैंने यात वाट कर यहा-"माप रंगीली गणी वैज्ञानिस है वि चेहरे देखकर परित्र मांप मेती हैं। अब पहेंगी भी frntl" १०२ मानस वर्ष कहा श्रीमती जी बोलीं-"घर" "पोर नही तो क्या जमुना मे चलने का इरादा है ?" मैंने मल्ला कर कहा। "मैं कहती हम पुलिस में रिपोट कर दो।" इससे पहले कि मैं इस बात का कुछ जवाब दू जो लोग इकटठा होकर तमाशे की तरह देख रह थे, बोले- 'ठीक है साहर, ऐसे बदमाश का मही इलाथ है, गवाही हम देंगे।" लोजिए साहब, वो मच्छो घडी मे घर से निकले थे कि गवाह भी बिना खोजे ही तैयार हैं ! उनको मात की मन ही मन उपेक्षा करके मैंने श्रीमती जी से कहा--"जो दस बीस बचे हैं अह भी पुलिस वालों को या गवाही को घटाना हो तो पुलिस स्टेशन चलें, वरना घर चलो। बेकार की बातो से कोई लाभ नही होता। और तुम ता ताटीर पर भरोसा करने वाली हो, समझना कि तुम्हारी तकदीर में ये चीजें नहीं थी।" 'और तुम क्या समझ कर सनोप करोगे तुम तो तकदीर को मानते ही मही।" श्रीमती मा लडते को तैयार थी। 'मेरी बात छोडो," मैंने कहा- 'भाई, मैं भी मजदूर है, यह भी मजदूर है। थोडा हो पर है । ले गया, सो ले गया। हो सकता है कि उसे इस सामान की मुझसे भी ज्यादा जरूरत हो।" श्रीमती जो मेरा मुह ताक रही थी और मैं पहे जा रहा था-"अब चलो कुछ मोर इ तजाम करेंगे।' ज्यो त्यों करके श्रीमती जी को समझाया और घर आ गए। घर प्राकर पहोसिया को और मित्रों को श्रीमती जो ने खूब रग लगाकर यह घटना सुनाई।
सावन - अबोध पम्मो ने बाहर किसी से सुन लिया था कि सावन भागया है, घर के भीतर घुसते ही वह मा के पैरो से चिपट गई मोर उमहा कर बोली मा, सावन मा गया?" 'हा, बेटी," पम्मो को मा न कहा-"हर साल ही माता है सावन, किसी की मांखों में, किमी के दिल मे हमे क्या लेना है सावन से !' फिर उसने अपने हाथा को कलाइयो को दया, जा चूड़ी रहित थी मोर पूणत चरखा चलाने मे व्यस्त हो गई। भोली पम्मो कुछ न समझ सकी, उसने देखा कि मा को आँखो मे पासू हैं वह अपनी रट लगाते हुये बोली, "मां, हम भी झूलेंगे, हमे भी झूला मगा दो, के ऊ के" पम्मो की मा ने उसे माश्वासन दिया, "मगा देंगे, बेटी ।' पम्मो ने जब बात आगे को टलती देखो, तो वोली, 'बाहर श्यामू चाचा के नाम पर झूला पहा है, मुहल्ले के सभी बच्चे झूल रहे हैं, मा, मैं वहा पली जाऊँ?" मा की भाखों से टप-टप प्रासू चूने लगे, वह भी कभी इस झूले पर झूलते हुए सावन के गीत गाया करती थी, पम्मो ने जब उतर म कुछ न सुना, तो वह बोली, 'मा तुम रोती क्यो हो?" 'कुछ नही, कुछ नहीं, बेटी," पम्मो को मा ने अपनी मावं पोछते हुए कहा, पम्मो को इतनी प्रसन्नता हुई, मानो उसे झूला मिल गया हो, वह झट अपनी भाखो को पोंछ कर बाहर भाग गई । श्यामू चाचा के नीम के पास पहुच कर देखा सोना, शान्ति मुले पर बैठी हैं, इसामू चाचा झोटे देकर झुला रहे हैं, वह भी ललचाई दष्टि झूले पर टिका "जा चली जा, भूलने।" - -- मा पानी भर रही थी, मारी भोरपी-पपनिहारिनोश, गीबीपोम पापगमें मीनपाराएगोमामलेगा। मायामागहीनागिरीपासागामोकामना नही?" "क्यो नहीं है ?" इन सब प्रश्नों ने उसे झूरे पर नहीं बिगि रस्सी भी नहीं है, फिर क्या था, वह कुए कीमोरदोरचमी। उसमयमा । मानो उसका हृदय उससे भी भागे दौड़ा पसा जा रहा है।"मेराrtar "' है भी या नहीं?" यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ? गहरे प्रदन उसकोमोसोरेप्राणभाकर उसके मागोवार-रभागनिrti यह दीदी जा रही थी पतहासा, बितनी उसमतिमा समय परामोगप्रपो पराको पानी पिला रहे थे। परहा रामे मामानों मागरम पार पन पदापागार और पारस मानम होमहापारिहीforr मानमा कर वहां खड़ी हो गई, श्यामू चाचा ने जब उसकी मोर देखा, तो वह सभी "छामू पावा, हमे भी मुला दो।" उस के चेहरे का भोलापन मौर बाल चितवन, उस पर सोतसो मधुर भार यह सर इतने प्रावक ये कि श्यामू चाचा क्या, कोई भी उसे गोनी में रहने को बेचन हो उठता। होने तुरत शाति के स्थान पर पम्मो को बसा पोर पहले की ही भाति झोटे देने लगे, यह तीनों मबोध कयाएँ टूटे फूरे से गाने का प्रयास करने लगी। सोना और शाति ने गाते हुए, पपने अपने भान पभो गाना भूल गई, उसके मन मे एक बार एक अभिमाया उठी और प्रश्न बन कर उसमा हृदय कचोटने लगी, मेरा भाई कौन है ?" सार। झूला रुकवा कर यह उतर पड़ी, दोहो-दौडी पर माई, घुसते हुए यह रिम कए गोली, मा मा।" उसकी सांस फूली जा रही थी, उसने देशा-मा पानी के पई अपने स्थान पर नहीं हैं, दीवार के सहारे टगे रहने वान होत । चली गई है, रहा गई है। वह सपने सगो, खोज करने पर उसने देगा. के नाम लिये। है? पे, 'वह सि नाम मेपर गाय' पों को। -- मानस वधू १०५ बैल लहते हुए लोटने लगे, रास्ता छोटा और तग पा, पम्मो चपेट में मा गई, एक चीख उसके मुह से निकली, चारों भोर से लोग दौड पदे, बैलों को धमराने के स्वर से भाकाश गज उठा लेकिन एक बैल का खुर पम्मो की कमर पर पह चुका था, वह वहीं पर मवेत होकर रह गई, खून से उसका मैला सा कुरता भीग कर तर हो गया और उसकी माखें बाद हो गई। उसको मा ने जब दूर से पम्मो की प्राकृति देखी, तो दोनो भरे हुए पडे बगल से छूट कर जमीन पर मा रहे। वह पम्मो पर छा सी गई। भोर पार्ने मार मारकर रोने लगी, तभी हरिया ने पम्मो को उससे लेते हुए कहा, 'यावली मत बन, रोने घोने से चोट मच्छी नहीं हो जाएगी, तू घर घर में इसे ले के घर चलता है उसके स्वर मे सहानुभूति थी-ममता थी। पम्मो के घर पर गांव भर इकटठा हो गया, हरिया बोला, ' हल्दी का छोंक लगा दे री जल्दी कमर पर लेप होगा, हाय-हाय, कितने दिन की बच्ची है, दुर्भाग्य इसी का नाम है।" वितु पम्मो की मा व्यथ ही घर मे भागती फिरी कैसे वह सब लोगों के सामने बताये कि मपनी प्यारी बच्ची की चोट पर लगाने के लिये उसके घर मे हल्दी भी नहीं है, किंतु हरिया शायद स्थिति को पहचान गया । वह तुरत अपने घर लौटा भौर थोडी देर मे ढेर सी हल्दी लेकर लौट पाया। पम्मो को मां ने जल्दी जल्दी कहे जला कर हल्दी का छोक लगाया। उसका कलेजा मुह को पा रहा था। बार बार उसे वे दिन याद आते थे, जब गाव वालो की निगाह में उसका भी एक रक्षक था। वह माा होता, तो क्या एक हल्दी की गाठ के लिये उसे पराये लोगो के सामने हाय फैलाना पडना, उनका मुह जोहना पडता। पम्मो बेसुध पड़ी थी। एक चौथाई पहर बीत गया । गाव के लोग अपने- अपने पर चले गये। रह गई थी पम्मो को मा पम्मो के तपते परीर को अपनी गोद मे लिये हुवे । बार बार वह गुदढी को पम्मो के चारो प्रोर कस कर लपेटने पल का करने लगी किन्तु वह मर इतनी जगहो से फट गई थी कि अब उसमे उन दो प्राणियों को जाडे से रक्षा करने की शक्ति नहीं रह गई थी। वह उन घटापों को और पुरवैया हवा के झोंको को मन-ही मन कोसने लगी जिहोने प्राज ही घरस कर ठड कर दी थी। कभी वह इसी बरसात की, न्हीं मोंको की प्रतीक्षा मानस-वधू किया करती थी। इसी प्रकार को ठह मे न जाने क्तिनी बार उसने अपने पति से उष्णता प्राप्त करके सतोष की सांसें ली पों। पाज उसके वक्ष से चिपकी हुई थीभूखी, पाहत और ताप ग्रस्त पम्मो। वह स्वय भी तो भूखी थी। लेकिन अपनी भूष को यह पम्मो के मुख को चूम फर बात कर रही थी। उसके ताप की उष्णता से यह गर्मी प्राप्त करने की चेष्टा करने लगी। उसे न मानी भूष की चिन्ता थी, न ठह लगने का भय था। उसने अपने की सभी का मत मान लिया था। पम्मो ही उसकी सब कुछ थी, वह उसी के लिये चूल्हे नाम के बाहर को जलाती थी, जिसमे मब इटो का ढेर हो बाकी रह गया था। लेटे लेटै उसे प्रतीत के वे धुधले दिन याद भाने लगे, जब वह पम्मो जितनी थी। उसी समय उसकी मां मर गई थी। फिर उसने दूसरी मा को देखा था। जब वह बड़ी हो गई, तो उसे इस गाव में ब्याह दिया गया था। उसका पति भारी डोलडोल का तगडा जवान था। गाय भर में उसकी पहलवानी की पाक थी। कुछ दिन बहे चैन से कटे थे। वह उस दिन को कोसने लगी, अब मभाव से भरे जीवन से ऊबकर उसने अपने पति के प्रति ताने कसने प्रारम्भ क्येि पे मौर वह फौज मे भरती हो गया था। तब पम्मो ही उसकी गोद मे यो । तिने ही दिनों तक उसके पति की तनख्वाह मनीमाडर के रूप में उसे मिलती रही। पादी के चमकीले रुपये। फिर धीरे धीरे उन रुपयो का मायण कम होने लगा। यहाँ तक कि मनीपाडर के साथ ही साथ एक ऐसा दद भी पाने लगा-जिसकी पीड़ा मसह्य हो उठती मौर टप टप मासू उसकी मांसों से गिरने लगते । 'हाय ! कह कर वह उन राजामों को कोसने लगी थी, जो अपने ऐश्वय के लिये दूसरों के खून से होली खेलते थे। वह पाहती कि उसका पति घर मा जाए उसे नहीं चाहिए यह पादी के टुबडे । उसे अपना पति चाहिए। कि तु सेना की नौकरी कोई इच्छित समय पर नहीं छोडी जा सकती थी। फिर युद्ध का काल था। रात दिन सेनामों के मागे बढ़ने के समाचारो से वह काफ्कार जाती पी। युद्ध के समाचारो को सुनकर उसका मन किसी भारी माशका से भर जाया करता पा। वह रातदिन मामा की पोर देखकर प्राथना किया करती पी कि उसका पति सलामत रहे। यह शत्रु के निशाने से बच जाए। मगर हाप! एक दिन प्राने वाले तार ने उसका पाशा-दीप बुझा दिया 1 मानस वधू १०७ था। उसने सरे पाम यह कहा-"भगवान कुछ नहीं है, वह पत्थर है, पत्थर को कोई मोम नहीं बना सकता।" लोगों ने समझा कि वह पागल हो गई है। उसे रोना नहीं पाया। माता भी कसे । भाखो में समुद्र तो नहीं था। वह पहले क्या कम रोई थी? उसने घबरा कर पम्मी को मोर भी कस लिया। पति की वह निशानी उसने अाज तक सजोकर रखी थी, कभी उसे यह विचार नहीं पाया था कि वह उससे विलग हो सकेगी।माज भी जब वह जीवन मरण के भने मे झूल रही थी, सो उसे यह विश्वास नहीं होता था कि पम्मो, उसको माशामो को दीप मालिका उसे मचानक ही छोड कर चली जाएगी। रात काफी जा चुकी थी, गरम पासुमो के स्पश से पम्मो की पाखें खुली, धीमे-से पराह कर वह बोली, “मा मुझे छूला मगामोगी न मा ?" "हा, मेटी, तेरे लिए एक नहीं दो झूले मगा दूगी, तू जल्दी से पच्छी हो जा। तेरे झूले पर पटरी लगवा दूगी। फिर श्यामू चाचा झोटे देंगे। हा।" "मा, कमर मे दद हो रहा है।" 'घबरा मत, बेटी," मा ने अपनी घबराहट छिपाकर कहा "तू मला कुए गई ही क्यो थी? बैल तो पशु है, वे कब देखते हैं कि कोई रास्ते में भी है या "मैं तो पूछने गई थी, मां, कि मेला बया कौन है ?" "भमा,' मा का कलेजा धक से रह गया। वह क्या कह कर बच्ची को ढाढस बघाये? "मा, मेला वैया यहा क्यो नही रहता? में उछका नाम लेकर गीत गाऊगी मा, सावन वा गीत बया के बिना अच्छा नहीं लगता मा, तुम चप क्या हो मा, तौन है मेला बया, पहा है वह क्या नाम है उनका वोत्रा, मा" क्या कहे मा? कलेजे पर पत्थर मा रखार बोनी "तेरे भया का नाम गोकुल है बेटा, मामा के घर गया है । कल को पन हात कर युग लेंग । तू मच्छी हो जा। पम्मो की माना मन चाही हो गई थी। उसे लगा कि भैया ममिर गया है। यह भया से मिलने चली । सपने म एक माकृति न अपना नाम गाल बतलाया मोर वह उसे पाकर निहाल हो गई थी।
মাঘবধু उसे डालने चला गया, दिन निकला, सपना तो चला हो गया था। साप ही गोकुल भी चला गया। लेकिन पम्मो वह भाकृति कभी नहीं भुला सकती थी। सबसे पहले जो काम उसने कराया, वह खत पा जो उसने गोकुल नाम के काल्पनिक भाई को लिसवाया था। खत हरिया न लिखा । जितनी देर वह पम्मो की बताई बातो को लिखता रहा, मा मुह फेर कर मासू पोछती रही। जव हरिया सत लेकर तो वह पीछे पीछे गई और सत को वापस लाकर उसने कहो की सुलगती माग म डाल दिया। लेकिन उस पत्र के मातर मे इतने मामू पे कि अनल भी उसे माघे से मधिक न जला सका। पम्मो को विश्वास हो गया था कि उसका गोकुल भाई भब भा हो जाएगा। उसे गीतों की तुकबन्दी के लिए 'गोकुल' का नाम तो मिल ही गया था इसलिए भाई की प्रतीक्षा में वह कई दिनों तक बहुत प्रसन्न रही । एक दिन पारपाई पर बैठी जब यह गीत गुनगुना रही थी तो मां घबराई । पूछा, "यह क्या करती है, बेटी?" पम्मो ने गाकर बताया, "मा, सावन माया है मैं गोकुन सग झूलूगी, मेरे घिरन को मोहिनी मूरत, कभी न भूलगी। मा, सावन माया है !" भोर वह गाती रही, उस समय तक भी उसने गाना नहीं छोड़ा जब तक कि यह बेहोश न हो गई। मा ने दघा, माज उसरा शरीर दुगना गरम हो गया है उसा मन क्सिी भावी मागास भयभीत हो उठा। पम्मो पडवहा रही थी मां, सावन मा गया है गीत गा रही हूँ गोकुल भैया के गीत में मूल रही हू मा श्यामू पापा से कर दो मा, ज्यादा जोर स झोटा न मेरा सिर चकरा रहा है मा श्यामू पाचा, मुमामो सूर अलामो मेरा गोकुल बैया मामा के घर से भा गया है, देसू तो क्या माया मरे, मुझ से बोलता नहीं मैं ही तो तेरी बहन पम्मू मोर उसकी जबान कुछ भी कहने में असमय रह गई, उसकी गरदन एम मोर को मुहकर सुदर गई। मां जोर-जोर से चिल्ला र मी पामों को नहीं पा सको, हरिया घोड़ा माया । परमों की नाही देशकर उसके जीवन से सोसरने मगा, " पनि मानस वधू उसका शरीर रूपी पिजडा खाली पाया । उपकी मां ने रोते हुए कहा, 'ममी तो गा रही थी, बोल रही थी, वा कर रही थी।" हरिया समझ गया कि सब समाप्त हो गया था वरना माज उसमें सामर्य नहीं थी कि मोल पाता। पात की बात मे लोग इकटे हुए मोर उस शरीर रूपी मिट्टी को भी ले गए मा ने पास खाकर अपना दुस दूर करना चाहा, वह गिरी भी ऐसी जगह जहा उसके हाथ मे माया, वही अधजला खत जो कमी काल्पनिक गोकुल के नाम लिखा गया था भोर कमी मामा के यहां नहीं पहुंचा था।
पहचान म्यूजियम के सामने पाकर ट्राम-गाडी रुक गई। दादर से लिया हुमा एक माने का टिकिट यहीं तक के लिए पा। लक्ष्मीपूजन का दिन या और चारो तरफ घहलपहल मिठाईया, गुब्बारे मादि दिखाई पर रहे थे। जब ट्राम रुक गई, सो मुझे विवश होकर उतरना ही पड़ा। पागल कुत्ते की तरह इधर से उपर घूमते हुए मैं इतना पक गया था कि पैर जमीन पर टिकना ही नहीं चाहते थे। "मोह" सहसा मेरे मुह से निकल गया और साथ में एक लबी सास भी। लोहे के बडे बडे सींखचो में से होकर म्यूजियम के लान मे पडे बडे बँध दिखाई पडे और मैं साहस करके उनकी मोर पल दिया। दरवाजे पर ही मुझे एक लडकी मिली। यह मप टुडेद थी। सिर से लेकर पर तक सजीधजी, बिलकुल माधुनिक फैशन की गुडिया मालूम होती थी। मह पर हल्का पाकर मोर गालों पर राऊस था। पांखों की पलकें पनी थी। हाप में एक वैनिटी बैग था। पहले तो उसने मुझे घूरकर देखा, फिर सहसा प्रसन्न होकर बोली, 'परे, राकेश, यह तुमने क्या हुलिया बना रखा है।" मैंने समझा कि शायद मेरे पीछे कोई राकेश साहब पा रहे हैं। उनका हुलिया देखने को उत्सुकता में मेरी गरदन भी पीछे की भोर धूम गई। मैंने देखा पि यहा मेरी परछाई के प्रतिरिमत पौर कोई नहीं था। मैं स्वय राकेश नहीं था, न प्रभी तक धन पाया है। फिर । मेरी समझ मे कुछ नहीं पाया। तब तक वह मेरे बिलकुल पास मा गई थी 'सरे दोनो हाथ मेरे कधो पर पहुंच चुके थे और वह कह रही थी 'कतराने की टाप है, राकेश साहब,माज तो पाप पकदाई मे मा ही गए।" मुझे पसीना मा गया। उसके हापो के बोझ से मैं अपने को दवा हुमा मानव करने लगा। उन हापों का हटाइए मैंने कहा, "मित साक्ष्वा, मेरा मामस-वधू नहीं है । वास्तव में माप भूल रही हैं।" "भूल रही हू । ह ह ह ह है," वह हसते हुए बोली, 'मैं भूल रही हू, पौर भाप भुला नहीं रहे हैं। वाह, वाह, खूब !" उसने दृढ़ता से कहा, "प्रापका दिमाग तो सही है " "जी हा, मैंने कहा, "मुझे पूरा विश्वास है कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह दिलकुल सही है । मैं वह भादमी नहीं है, जिसका नाम लेकर मापने पुकारा था।" "तो फिर पाप कौन हैं ?" वह मानो मेरी इनकारी का मजा लेते हुए बोली। "मैं राजेश हू," मैंने विस्मित भाव से उसको देखते हुए कहा। "मच्छा जी, तो पाप राकेश के बजाय राजेश बन गए । बहुत लगता बुझता- सा नाम छाटा । प्राखिर मक्ल भी कहां तक दौडती । रहने दो, मुझे बनाने की कोशिशमत करो। जिसके साथ बचपन में खेले हो बडे होकर पढे हो, और जीवन "भर साय देने को कहकर एक दिन लापता हो गए। पौर माज जो पचानक मिल गए, तो कहते हो कि मैं राकेश नहीं हू, राजेश हूँ।हुह ।" कहते कहते उसकी मुखाकृति विकृत सी हो गई। मैंने देखा, उसका क्षोभ वास्तविक या और उसकी पाखों के प्रश्रकण इसके प्रमाण थे । मैं भजीब मुसीबत मे फस गया था। सोचने लगा कि मैं कोई भी हू, कुछ भी हू, मगर राजेश तो कतई हू ही, हा प्रगर नहीं है, तो राकेश नहीं है । वह बोली, "कोई बहाना सोच रहे हो न? सोच लो, खूब सोच लो, मेरी ही गलती है। जो मैं तुम से इतना न घुलती मिलती, तो यह दिन देखना न पहता।" 'मिस साहबा, क्षमा कीजिए। मैं ज्यादा देर खड़ा नहीं रह सकता। इतना जरूर विश्वास कीजिए कि मैं भापका राकेमा नहीं , न कभी पिछले जमाने में रहा है।" इतना कहकर मैं झपटता हुपा लान मे जाफर बैंच पर बैठ गया। मेरे पास भाकर वह बोली, "प्राप मेरे हाल पर रहम खाइए । मेहरबानी करके घर चलिए। भापको क्या पता है कि इन दिनो मापके घर वाने रितने दुखी रहे है कितने परेशान हैं।" ' मैं कहता हूं कि मैं न राकेश हू, मोर न मेरा कोई धर-वर है। मेरे परो मे मैंने कहा मानस व्य इतना दम नहीं है कि मैं आपके साथ चक्कर काटता फिरू।" मैंने भुमलापर कहा। कुछ पकड कर वह बोली, "मापको पता होना चाहिए कि में पापको पुलिस की मदद से भी घर ले जा सकती है। समझे ? तुम्हें घर पहचाने वाला पाच हजार भो पाएगा और तुम्हारी माताजी का माशीर्वाद भी। बोलो, मेरे साथ चलते हो, तो तुम्हें ही पांच हजार की बचत भी है । नहीं तो कोई भी तुम्हें पकर कर ले जाएगा और पांच हजार ऐंठ लेगा।" भर तो मुझे भी शक होने लगा कि कहीं मैं सचमुच राकेश ही तो नहीं हू और गलती से अपने को राजेश कहकर पीछा छहाना पाहता होऊ । इस मामले या मत ही कर देना पच्छा है । फिर यह मुझसे कोई कुछ छीन तो लेगा नहीं, क्यों- कि मेरे पास कुछ है ही नहीं । जब मैं इसका राकेश ही हू तो कुछ खिला पिता फर ही छोडेंगी। मैंने कहा 'चलिए, कहा सै चलेंगी माप मुझे ?" उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और उसे दबाया। मेरे भूखे शरीर में भी विजली सी दौड गई । वह मुझे अपने साप लिए लाम के बाहर माई, जहा एक कार खड़ी थी। बहुत शानदार कार थी। उसके बाहर एक वर्दीधारी ड्राईवर सदा था। उसने मुझे देखते ही हसकर एक फौजी सलाम मुकाया और बोला, 'हुजूर, मच्छे तो हैं" फिर घूमकर उस लहरी से पूछा, "कहां मिले ?" "हा, हा, अप जल्दी करो," उसकी बात का विना कुछ उत्तर दिए सड़की ने कहा। हम दोनो कार मे बह गए। कार का इजिन स्टार हुमा भौर उसके साप ही साप मेरे दिल का इजिन भी ज्यादा तेजी से चलने लगा। कार जल्दी से मोह भूम कर भरे हुए यागरों में घमने लगी और कुछ देर बाद एक शानदार विगिरे सामने जाकर रुकी बहा दीवाली मनाने का इतनाम हो रहा था। बिजली का फिटिंग कराया जा रहा था । बार उस विलिग के भीतर घुस गई। कार से उतरकर वह भागती हुई चिल्लाई 'मम्मी, मम्मी ! सो तो कौन भाया है जरादेषोतो मैं पार में बैठा यंठा ही यह सब हरकत देख रहा था। हाईवर मेरे उतरने को प्रतीक्षा में कार को मिली पप सगपा। मैंने उतरते-उतरते ही देखा नि सामने के बड़े दरवाजे निस्तार इसी पोरकी दौड़ती हुई उस मारी के .
मानस-वधू साप एक प्रौढ महिला मा रही है। सांस फूल रहा है। मुह खुशी के मारे सात हो रहा है और पीछे-पीछे कई नौकर पाकर तथा परिवारजन इस तरह मा रहे है मानो किसी को कोई पहा मा राजाना मिल गया हो। उनत प्रौढ़ महिला की चाहे मुझे देखते ही इस तरह फैल गई, जैसे वह मुझे अपने मक मे लिपटा लेना चाहती हो। एक चोख उसके मुह से निकली मोर वह विभोर होकर योलो "राकेश, मेरा राकेश," मोर दूसरे ही क्षण उसको बांहे मेरे पारो मोर लिफ्ट गई थी। नौकर लोग चेहरे से प्रस्ट प्रसन्नता को बिलकुल भी छिपाने की पेष्टा मही कर रहे थे और परिवारजन इस तरह मुझे घेर कर रहे हो गए थे, जैसे पावले गाव मे कट मा गया हो। यह एक ही रही । कहाँ मभी तक मैं एक-एम एदाम के लिए तरस रहा था और सुबह से भूखा पा मोर यहाँ इस वपत पायेर का परिवार मुझे अपना बनाने पर तुला हुमा था । नस प्रोड़ महिला ने मुझे अपो से चिपटाए हुए ही कहा 'तू कहाँ चला गया पा रे, मुझे छोडसर । तुझे जरा सी भी ममता न भाई ? तेरे सिवा अब मेरी माखो का सारा पोर पोन रह गया या रे? तू इतना निदयो कैसे हो गया था, बता ? काश पोह, उन शब्दों में इतनी ममता पी पि मेरी माखो मे भी परबरा मासू उमड पडे। मेरी हिचको सी बघ गई मोर भारी कठ से रेयस इतमा पह सका "काश सहसा लहकी चिल्लाई 'देखा देखा, मम्मी, यह तो मुझे भी भुलाया दे रहे थे। पर फिर झूठ बोलेंगे। क्या मैं रहे पहपााने में गलती कर सती? चलो, ले चलो भीतर । ऐसी सजा दी जाएगी पिजम भर याद रखेंगे प्रोदा मलग होकर मेरा हाथ पकड़े परहे भीतर जासगी मी गुण 'घबराते हुए कहा, 'देखो, मा जी, मैं मसल मे मापा रामेशही तो इस बात पर सहसा प्रौढ़ा एकदम पूमपर खड़ी हो गई और गमता गरे गुस्से से धपत तानकर बोली, 'म प्रगर सो कोई महा। माया, सो गारंगी पपत । क्या सब पागल हैं और एक ही सा है? पस, सीप सीप पल भीतर को।" इस पर सब लोग छिपे छिपे हसने लगे मानो उगहरा प्यार मिाय में चहा भारी मजा मा रहा हो । मम मुझे पह निरुपम हो मुगा पा frif " " " मानस-वधू ही हू मौर यह मेरी गलती है कि मैं वार मार लोगो को मुठसाने की कोशिश कर रहा है। इसलिए मैंने अपने-मापको पूरी तरह उस प्रौढ़ा की दया पर छोड़ दिया। भीतर जाते ही प्रौढ़ा ने नौकरों को पुकारना शुरू किया "राम, देखो, छोटे साहब के लिए सूट निकालो। हरवा, गुसलखाने में पानी रस, जीता, कमरा ठीक से सजा।" इतने में वह युवती, जो मुझे खीपकर लाई थी, बोली, "ठहरो, जीता, मैं कमरा सजाती हूँ।" मोर वह मेरी मोर एक कटाक्ष फेंककर चली गई। घटे भर के भीतर भीतर मैं इस प्रकार सूटबूटपारी साहब बन गया कि मव यदि कोई मुझे राजेश कहता, तो मैं उसकी मोर भविश्वास की नजरो से देखने लगता । सध्या होने को भाई भोर सारी बिल्डिंग प्रकार से जगमगा उठी। मिठाई, पकवान, बिस्कुट, पाय और न जाने क्या अड़गम-शष्गम मेरे सामने लाकर रखे गए भोर सारा घर भर मुझे खिलाने पिलाने पर दल गया। दुनिया भी कितनी मजीय है। सुबह वो जहा मुझे कोई घेले को भी नहीं पूछ रहा था, शाम को सारा शहर जैसे मेरा पट पावश्यकता से अधिक भरने पर उतारू हो गया था। रात को बारह बजे मुझे सोने के लिए छुटटी मिली, तो वही युवती, जो मुझ साथ लिवा लाई था, मुझे लेकर मेरे कमरे मे छोडने गई। मैंने कमरे मे पहुचकर उससे कहा, "माखिर माप सब लोगों ने मुझे राकेश बना ही लिया।" "मब बनना छोड दो," वह युवती बोली "भगर ज्यादा कहोगे, तो मैं रो पडूगी।" यह एक ही रही। मैंने मब इस बारे मे किसी से कुछ कहने का विचार ही छोड़ दिया मोर अपने को पूरी तरह राकेश समझने लगा। मुबह को कोई मुझे उठाने नही पाया। पाराम से लबी तान कर सोया। दस बजे मासे खुली। कमरे में घुप मा गई थी। बाहर निकल कर देखा, नौकर- चाकर इधर-उधर दौड लगा रहे थे। मैंने एकाघ को रोककर भपने को गुसलखाने मे ले जाने के लिए कहा । 'मन्छा सा' कहकर यह खिसक जाता और फिर लौटकर दशन ही नहीं देता। मासिर जब मैं बहुत व्याकुल हो गया, तो मैंने चिल्लाना शुरू किया "सब मानस वधू " लोग हरामी हो गए हैं। किसीको मेरी परवाह नहीं है मैं फिर भाग गया, तो सब मागे फिरेंगे " वगैरह वगैरह। नोकर-चाकर यह पीस-चिल्लाहट सुनकर इकटठे हो गए। लेकिन रान मुझसे दो दो गज की दूरी पर ये । वे मुझे देख रहे थे भौर मापस में एक-दूसरे को भोर माश्चम से देख लेते थे। मैं क्रोध से पागल हुपा जा रहा था। कुछ देर बाद मैंने देखा कि वही माताजी, बिहे भने कल स्नेह से पागल देखा था, अपने साथ मेरी ही शक्ल के एक युवक को लिए हुए चली मा रही हैं । उनकी माखों मे भासू थे। उन्होंने भाकर मुझे अपनी गोदी मे भर लिया। बोली, "बेटा," उनके कठ में से मावाज नहीं निकली। फिर बोली, 'बेटा, यह मेरा एक रेटा है तू मेरा दूसरा बेटा है। जिसे एक बार गोदी में भरकर मैं रो चुकी हू, पब उसे अपने से अलग नहीं करूगी मैं पाश्चय से उस मा के कधे के पीछे से उस युवक को देख रहा था। उसकी भाई भी भीगी हुई थी। मगर सबसे अधिक इस बात से विस्मित मा कि मुझे ऐसा मालूम होता था मानो मैं अपने सामने शीशे में स्वय अपनी ही प्रतिमति देख रहा होक। जब प्रौटा के उदगार समाप्त हुए, तो युवक ने मागे बढ़ कर मुझे अपने • कंधे से लगा लिया, बोला, "तुम मेरे भाई हो, मुझे छोड़ कर न जाना, तुम्हारे साय मेरी तबीयत लगी रहेगी। नहीं तो मैं फिर चला जाऊगा, ससार नै मेरा जो कब गया है नौकरों के चेहरे पर भव भाइचय ये स्थान पर प्रसमता के भाव उदित हो गए । सबके सब तत्पर हो गए। मव पानो भा रहा है-~-हा मोर गम दोनो अब दूध पा रहा है। भव मुझसे गुसलखाने जाने की प्रार्थना हो रही है पर मोजन की मेज पर इन्तजार हो रही है । इन सब कामो के बीच मुझे पता चला कि वह युवक, जो उस घर-भर की भाखों का ताराश, कुछ निराशावादी प्रवृति का था। उसे सचमुच ही ससार अच्छा नही लगता था। इसी धुन में वह भाज से चार रोज पहले घर से निक्ल पडा या। सारा पर उसे ढूढने में परेशान या । जब दिमाग की झन कुछ कम हुई तो वह वापस घर लौट भाया, क्योंकि मख का भूषके साथ कोई मेत नहीं मानस-यधू Tना समाप्त कर चुके मोर सुसी के वातावरण में समानता पाई, तो उन रामा एक दूसरा कांड पटित हो गया। दरवाजे पर वही युवती, को रात के समय मुझे मेरे कमरे में छोड कर पते पर चली गई पो, उसी मनोहारिणी वशभूषा मे, हाय मे एक वैनिटी वैग लिए उपस्थित थी। यह बारीक 'हम दोनो को देख रही पी-मुझे मौर मेरे प्रतिरूप को। उस के होठ पाश्चय से फट गए ये पौर उसकी माये कुछ विस्फारित हो गई यी। राकेश ने उसके इस भाव को देखा। वह मागे वढ़ा और उसने उसका हाप अपने हाथ में लेने के लिए अपना हाथ मागे वढाया। युवती ने चित्रलिखित से भाव से अपना हाप उसरे हाथ मे दे दिया। उसकी पाखो से दो डोरे मासुमों के निकल कर च गए। मालूम नहीं कि वे भासू खुशी के थ या दुविधा को भो की राह बाहर निकाल देने में लिए। खाने पे बाद को चाय मे वह गरीक हुई । उस पर की प्रौढावामिनी उसके ऊपर भपने ला रिसर रही थी। जब तक वह पाय पीती रही, तब तष मुस्ती रही। राकेश से उसने बहुत भलसाग-से स्वर मे सारी बातें पूछौं । मेगे मोर बार बार चाय की प्याली पर से नजर हटा कर देखा । मत में वह अपना सिर पकड कर बैठ गई। राकेश ने पूछा, "क्यों, क्या बात हुई ?" युवती ने कहा, "कुछ नहीं। मेरे सिर में दद है।" कुछ देर बाद वह अपने घर चली गई। राकेश ने उससे हाप मिलाया । मैं ने भी अपना हाथ बढ़ाया। मगर मेरा हाथ वह कुछ अधिक देर तक मपने हाय लिए रही। मुझे अनुभव हुमा कि वह उसे कुछ मावश्यकता से अधिक दवा में उसके जाने के बाद में मोर राकेश उसी कमरे मे पाकर बठे,जहा में रात सोया था। कुछ देर की चुप्पी के बाद मैंने पूछ 'माप क्वमाए थे?" "मैं ?' यह योला में रात के एक बजे घर मे घुसा था। मालूम नहीं था कि यहा मैं पहले ही मा चुका था।" मोर उसने मुसकरा कर मुझे देखा। मैंने कहा 'यह मेरा कसूर नहीं था। मैंने अपने मुह से कम से कम एक हजार बार यह प्रकट क्यिा होगा कि मैं यह नहीं है जो समझा जा रहा हू ।
- मानस-वधू मगर यहा सब लोग प्राप के खो जाने से इतने अधिक चिंतित ये कि उन्हीं ने मुझे पर दबोचा भोर यह कहला कर ही माने कि मैं वही हू, जो हूँ नहीं।" इस बार वह खुलकर हसा। बोला, "माप बहुत जिंदादिल मालूम होते हैं । मेरे भीतर यह प्रभाव बहुत मधिक है कितने पाश्चय की बात है कि भापकी पौर मेरी शक्ल इस तरह एक-दूसरे से मिलती है, जैसे हम जुड़वा भाई हो।" मैंने कहा, "इस ससार में जो न हो जाए वह योहा है। मगर माप ने भय मेरे बारे में क्या निश्चय किया?" वह पाश्चय से मेरा मुह देखने लगा। बोला, "निश्चय क्या करना था? माप मेरे साप रहेंगे। इस घर पर जितना मेरा अधिकार है उतना ही भाप का रहेगा। मापने देखा नहीं कि माता जी ने क्या कहा था? उनका हृदय बहुत विशाल है । मेरा कोई भाई नहीं है। उ होने तुम्हें अपना पेटा कहा है, पस बात शय है, तुम उनके बेटे हो गए बिलकुम, एकदम सिर से लेकर पैर तक।" मैं उसकी बात सुनकर कुछ देर सोचता रहा। फिर बातो का सिलसिला जोडते हुए बोला, "माप खूब अच्छी तरह सोच लीजिए। कुछ दिन बाद हो सकता है कि भाप यह मावश्यकता महसूस करने लगें कि मैं यहा न रहू तो ठीक है । माज जाने में मुझे कोई दुख नहीं होगा। जिस चीज पर मेरा अधिकार नहीं है उसे पाने का मुझे कोई लोभ नहीं है। मैं इसे एक सपना समझ कर मासाली के साथ मुला सकता है। लेकिन कुछ दिनो यहां रहने के बाद यदि मुझे जाना पड़ा, सो मेरे जैसा प्रभागा भादमी कोई नहीं होगा।" वह बोला, 'पोर तुमने यह सोचा ही क्यो?" "भाप ने उस सडकोश व्यवहार देखा था?" मैंने पूछा। 'मैं उस लडकी का व्यवहार माज से नहीं, कई साल से दख रहा हू, राकेश ने उत्तर दिया। "वह माप को मगेतर है ?" मैंने पूछा। "नहीं" वह बोला, "लेकिन कुछ दिनो बाद उसकी शादी मुझसे होने की समावना थी।" पाप ने यह नोट नहीं किया कि यह मेरी मोरभावश्यकता से अधिक ध्यान दे रही थी ?" मैंने अपने नजरें उसके चेहरे पर गड़ा कर पूछा। नोट कर लिया था। फिर इससे स्थिति में क्या प्रतर पाता है " मानस-यद मोला। वह विचित्र पादमी लगा। न जाने उसके मन में क्या था। मैंने बात को सीमा तक पहुचा देने के लिए कहा, "मगर वह मुझ से प्रेम करने लगी, तो? मगर उसने माप के स्थान पर मुझ से शादी करनी चाही, तो?" "तो मापके साथ उसकी शादी हो जाएगी," वह बोला, लोट फिर कर यह पाएगी तो हमारे ही घर मे। पाप का क्या ख्याल है ? क्या प्राप उससे शादी करने के बाद मरी तरह कही भाग जाना चाहगे?" मैं जैसे प्रासमान से गिरा । वह तो इतना निरपेक्ष होकर बातें कर रहा था, जैसे किसी वधू के सबध मे नहीं, बल्कि एक साधारण वस्तु बातचीत का विषय हो। मैंने पूछा, "माप को इससे दुख नही होगा?" "क्यो होगा क्या तुम मेरे भाई नही बन गए हो?" "क्या माप उससे प्रेम नहीं करते ?" "करता हू," वह बोला, "इसी लिए तो कहता है कि वह हमारे ही घर में मानी चाहिए।' "लकिन मापके साथ उसका पति पत्नी का नाता नहीं होगा।" "न हो," वह बोला, "ससार मे प्रेम बनाए रखने के लिए यह नाता भाव श्यक नहीं है।" "फिर यह किस तरह का प्रेम होगा। मैंने विस्मित भाव से पूछा। "माप सब बातें मेरे मुह से कहलाना चाहते हैं" वह बोला, 'कुछ भविष्य पर भी तो छोडिए।" मुझे स्वयं अपने पर लज्जा आई । उस दिन को इस विषय की बातचीत वहीं पर खत्म हो गई। उस दिन वह युवती भी फिर नहीं भाई । अगले दिन भी उस के दर्शन नहीं हुए । मेरा दिमाग बोझ का अनुभव कर रहा था। मैं अपना कत्तव्य निश्चित नहीं कर पा रहा था। तीसरे दिन राकेश ने मुझ से कहा 'मेरा ख्याल है कि तुम्हारी तबीयत ठोक नहीं है। मैं बाजार मे कुछ शरूरी सामान खरीदने जा रहा है। तुम तब सक माराम करो। मैंने उसकी बात मान ली।
मानस वधू ११६ - उसके जाने के कुछ देर बाद मैं देखता हूँ कि एक कार कोठी के पोटिको में मावर रुखी। उसमे से वही लडको उतरी और सीधी मेरे कमरे की ओर बढी। मैंने बीमार बने रहना ही उचित समझा और पलग के पायताने रखी हुई चादर को खोल कर कमर तक प्रोढ लिया। कमरे के दरवाजे पर ही रुककर वह बोली, अरे, आप तो बीमार मालूम होते हैं राजेश बाबू।" "जी हा, माइए" मैंने कहा, 'कभी कभी बीमारी भी अच्छी लगती है।" वह मुस्करा कर पलग के बराबर रखी कुर्सी पर बैठ गई और बाली, 'कही उड खा गए क्या ?" "जो नहीं," मैं बोला, "कुछ गम खा गया है । प्राप तीन दिन से माई ही - नहीं।' उसकी सूरत गभीर हो गई । बोली, "न पाना हो ठीक था। मैं तीन दिन से स्वय बीमार थी।" 'सब?" मैंने जरा उठने की चेष्टा करके कहा, "कैसे ?" वह स्पष्ट रूप से बोली, "राजेश बाबू, पापने पाकर मेरी शाति मग कर दी है।" "मोह," मैं फिर लेट गया, "यह मेरा दुर्भाग्य है ।' "मोर मेरा सौभाग्य,' वह बोली, "मैं अब निश्चय नहीं कर पा रही है कि भाप भधिक अच्छे लगते हैं या राकेश।' माह !' मैं बोला, "यह तो बहुत सीधी-सादी सी बात है। मेरा और राकेश बाबू का क्या मुकावला?" 'यही तो," वह बोली, 'पाप का और राकेश बाबू की क्या मुकाबला उनके पास तो धन है, कोठी है, मिलें हैं, भारी सपत्ति है, लेकिन निराश भी है । आपके पास भाप की ईमानदारी है, मेहनत करने की शक्ति है, रहन के लिए सारा ससार है मोर उन सबने साथ-साथ सौ सपत्तियो को मपत्ति, माशा है।" 'माप मुझे कुछ गलत समझ रही हैं," मैंने कहा, "पाप की और राकेश बाबू को शादी होगी। पापको उनमे भोर किसी गैर प्रादमी मे इस दष्टि स मुका बला नही करना चाहिए।" 'मुकाबला मैं नहीं कर रही हू," वह विवशता का भाव प्रकट करत हुए १२० मानस-वर बोली, 'सेफिन वह मेरे मन के भीतर हो रहा है। मैं वेचन । मेरो रावों को नाद पौर दिन का माराम हवा हो गया है। मैं मर जाना चाहती है।" उसकी पापो से फिर मासुमों के दो बड़े-बडे दोरे छूट कर धरती पर गिर पहे। मेरे मन में स्वय उपसपुथल मच गई। "मैं मा जी के पास जा रही हूँ," वह बोली, "दे, शायद उनको स्नेहमयो गोदी मे मुझे चैन मिले।" वह चली गई 1 में सोचता रहा, सोचता रहा। क्या करू? क्या वास्तव में मेरे कारण इन सब लोगो की हरी-भरी प्राशामों पर पानी फिर जाएगा। ये लोग कितने विशाल हृदय में है। क्या मेरा यह कत्तव्य है कि मैं इनके भविष्य को इस प्रकार प्रकारमय बना कर छोड दकितनी भारी धनसपदा इन लोगों ने पपने सुष के लिए जोडी है। क्या सब इसलिए कि कोई लुरेस रिसीनि पाए और इन सब चीजो मे भाग लगा कर चला जाए? उसके ऊपर इन लोगो की मुसक्गहट, देन की भावना, यह सब मेरे दिल को कवोटने लगी। राकेश वापस मा गया। उसने मुझे देना । मुझे बुखार या। बोला, "क्या सोच रहे थे? बतामा । तुपने सोच सोच कर बुखार चढाया है । मेरी कसम, देखो, मपती पसम नेता हू बतामो क्या बात है?' सेकिन मैं उसे क्या बताता? वह सब-कुछ जानता था। उसने डाक्टर बुलाया । डाक्टर ने मेरी नज देखी योला "बहुत एहतियात करने की जरूरत है । हिलो उनने न देना। यह युवतो पिर पाई। वह मेरी हासत देखकर रोने लगी। उसके श” मरे सानो मे माए। मुबह तो ठीक थे। अब क्या हो गया। ऐसी बीमारी तो मालूम नहीं होती थी। बजे सब लोगो ने मुझे छोड़ा। बारह बजे कोठी में अपकार मोर मोरवता छा गई। मेरा बुखार हल्का था। मेरे दिमाग मे हल निकाल लिया था। मैं विस्तरे पर से उठा। बाहर निकल कर चारों तरफ देखा । बदर पर एक चादर कसकर लपेटो । जेब देखो, उसमे दस रुपए का नोट पा। कार लेकर मैं बोठी से बाहर निकल गया। यह बम्बई थी मोर बम्बई में हर या सवारी मिलती है। अब मैं तूफान एक्सप्रेस मे बैठाद मेरा युवार उतर गया है और वरई मुभस बहुत दूर है बहुत दूर रात ग्यारह प्रश्न मगर यह बात मैंने किसी कहानी मे पढी होती कि "रमा" प्रतिदिन "रमेश को बस स्टैण्ड के पास मिलती थी, तो मुझे विश्वास न भाता। लेकिन एक लहकी मुझ हानवी रोड पर नित्य मिलती थी। उसे लड़की न कहकर मौरत कहू तो अधिक उपयुक्त होगा क्योकि उसकी उम्र पच्चीस वष से भधिक होने पर भी वह काफी प्रौढ सी लगती थी। उसके चेहरे का रंग फीफा पड़ गया था, गाल पिवक गये थे, माखें गढे में फंस गई थी। अपने दुबले पतले शरीर पर उसने एक छपी हुई साडी पहन रखी थी जिसे पहनकर वह अवश्य ही अपने पाप को सुदर समझती होगी मगर मेरी निगाह प्राय उसके होठों पर पुती लिपस्टिक पर ही भटक जाती थी क्योंकि उसके शरीर में खून यदि कहीं लगता था या लग सकता था तो यही वह स्थान था जहां लाली की एक झलक मिल सकती थी। लेकिन मैं उसे देखा करता था-देखिए, पाप मुझे गलत न समझ-बह प्राय मुझे इस बाजार मे चक्कर काटती मिल ही जाती थी। क्यों मारतों की मोर देखा मैं कोई पाप नहीं समझता बल्कि यह तो अच्छी बात है क्योकि पौरतों की भोर देखने से बडे बडे सुन्दर विचार मन में माते हैं । मेरी मादत तो सुदर पादमियों को भी देखने को है पोंकि उहें देखने से मन को प्रसन्नता मिलती है भौर बुद्धि मे सुदर सुदर चीजें पर उभर भाती हैं जैसे बढ़िया बढिया कपडे, गहने, मजीबोगरीब किस्म के बाल, पूनम की रात, मुस्कराहटें गिरते हुए झरने, लजाई हुई पाखे, नोलामाकाश, मोर कभी कभी उपाकाल और उसमें होता हुमा प्रेमालाप इसी प्रकार से मनेक प्रकार के रगबिरगे चित्र मेरे मस्तिष्क में उभरकर मेरे हृदय के उस भाग को प्रकाशमान कर देते हैं जहा घोर प्रधेरा छाया रहता है। तो में इसलिए उसे देखा करता हू मगर उससे यह तस्वीर नहीं मिलती बकि मेरी तो पब यह धारणा उसके प्रति बन गई थी कि वह औरत "भीरत न होकर कुछ और ही बला है क्योकि यह भावारा छोकरो की तरह हर वक्त घूमती ही रहती थी। मैंने उसके विषय मे अपनी भनेक अजीबो-गरीव धारणाएँ बनाइ भोर मिटाइ मगर यह प्रश्न सदा मेरे मन में घूमता रहा कि वह क्यों उस बाजार मे भाती है यहां उसका काम ही क्या है ? क्योकि यह सब तो बहे १२२ मानस-व पादमियो वा बाजार है । यहा के दुकानदार अपने सामान को बडे-बडे शो-केसों मे सजाकर रखते हैं। उन चीजा को वह नहीं खरीद सकती। मैं भी नहीं खरीद सकता जबकि मेरी स्थिति उससे कही मच्छी होगी। उमको सूरत से तो ऐसा लगता है कि उसके घर कितने ही दिनों में अच्छा खाना भी न बना होगा। फिर वह क्यो यहा माती है ' मेरा मन हुमा वि उससे पूछू मगर व्यय को मी बात समझ कर छोड़ दिया। मुझे क्या मतलब ! मेरो बहुत-सी अभिलाषाएं मेरे सीने मे दबी हुई है बहुत-सी चुटकर मर भी चुकी हैं फिर भी मैं यहा इस बाजार का पक्कर काटता है। इससे मेरा दिल बहल जाता है और दिल बहलाने मे हज ही क्या है। मैं जानता हूं कि मैं इस बाजार से कुछ नहीं खरीद सकता, कोई भी नही सरीद सकता सिवाय उनके जिनके पास गोषण और ब्लेक माट से पैसा प्राता हो फिर भी मैं किसी न किसी वक्त उस बाजार मे जाता । उस सामान को देखता मोर खरीदने के प्रोग्राम बनाता मगर मेरे प्रोग्राम कभी पूरे नही हुए, शायद कमी होगे भी नही। क्योकि कई साल मे मैं अपनी तनम्याह से कुछ भी तो नही बना पाता है । पता नहीं वह कसे खच हो जाते है। एक दिन मुझे 'लच टाईम ही उघर जाने को सूझ पडी, यह जगह मेरे माफिस से दूर भी नहीं है। मैं उपर की ओर लपका । लौटना भी समय पर था इमलिए और तेज चल रहा था। सडक कारो यसो रिस्मो और दामों से भरी हुई थी मगर मैं पदल चलने पर ही विश्वास करता है। इसका मतलब यह नहीं कि मैं विनोबा भावे की तरह कोई नई त्राति लाना चाहता है बल्कि मेरे पास ऐसे कुछ साधन ही नहीं हैं। यह पहला अवसर था जबधि में दोपहर में उपर गया था, इस समय यहा कोलाहल मथित रहता है। एक उछटती-सी निगाह मपनी चहेतो चीजों पर फेंकर मैं जल्दी ही नोट पडा । मुझ लगा कि देर हो गई है। मैं जल्दी हो मपका मगर ट्राम के पडदे पर भाकर मेरे पैरा मागे धरने से मना कर दिया। लगा कि पर गया है-क्यो न ट्राम में बैठकर धतू एक इकनी ही की तो बात है। ट्राम मे बैठम हो मेरी निगाह उग औरत पर पड़ी। वह भी मुझे परिचितों को तरह देखने लगी। काफी देर तक वह इधर-उधर रहनती रही भोर मैं पहल की तरह ही उसके विषय मे सोचता रहा । मुझे सेद इस बार का रहा कि वह मानस-यघू १२३ सुन्दर नहीं थी। उसकी सुदरता को देख उस समय उसे कमस मुखी, मग-नयनी या धनुष की तरह तनी हुई मोहो वाली नहीं बता सकता। काश ! कि वह ऐसी होती, तो मुझे बहानी लिखने में मजा माता मोर पाठकों को पढ़ने में। दोपहर होने के कारण उस दिन तो वह मौर भी भद्दी लग रही थी। उसके भिवे हुए से गालों का पाउडर और लाली गड मड से हो गमे थे। इससे उसके चेहरे की माकृति भोर भी अजीब सी हो गई थी। कहना ५ चाहिए कि वह उस समय एक पुरानी कार की तरह थी जो लगातार इस्तेमाल से अपना रूप रग खो बैठी हो। मैं यह सब सोच हो रहा था कि मेरी दाम बढ़ चली। वह मोर उसकी बातें सब पोछे रह गई। अव मेरे सामने दफ्तर की फायलें नाच रही थीं। कई दिनो तक मैं ज्वर से पीडित रहा। उधर जाना ही नहीं हुमा । उसको बातें एक प्रकार से मेरे मन से निकलने लगीं। माखिर मैं उसके विषय मे सोचता भी क्यों ? मेरा उसका रिश्ता ही क्या है? वह गरीब है, उसे खाना नहीं मिलता, उसके पास कपड़े नहीं हैं, मुझे क्या उपकी कुरूपता लेना है मौर क्या गरीबी है। मैं स्वय कमजोर, भद्दा लगने वाला मोर गरीब हू । मैं ही क्या लाखों-करोडों लोग इस दुनिया मे इसी तरह के भरे पड़े हैं जो कुरूप हैं, गरीब हैं, मुखे रहते हैं, नगे रहते हैं । भला मैं कैसे उन सब वी मुफलिसी, मजबूरी भोर गरीबी को दूर कर सकता है १ इसके विपरीत मोर बहुत से ऐसे लोग भी इस दुनिया में हैं जिनके पास कारें हैं, बगले हैं वे भच्छा पहनते हैं, अच्छा खाते हैं, रेस खेलते हैं, "रखैल" रखते हैं और भी न जाने क्या-क्या करते हैं। मगर मुझे इन सबके क्या? मेरे पास इसकी कोई दवा भी तो नहीं। मेरे पास तो पपने बुखार के लिए कुनैन भी नहीं पी, बेशम बुखार मपने भाप माया भोर झेप कर चला गया। हमारे दफ्तर का मैनेजर काफी भला मादमी पा। भला में सिर्फ उसी भादमी को समझता हूँ जो मेरे समय पर काममा जाये। वह भी कभी जरूरत पड़ने पर मुझे "एडवोस" दिप्ता देता था। अबकी बार उसने बुखार की सुनकर मोर महीने का माखोर समझ कर चपरासी से घर ही रुपये भिजवा दिए। इससे भी ज्यादा भला आदमी इस दुनिया में कोई हो सकता है ? बुखार उतर गया था। पैसे मा गये थे। मुझे वह बाजार याद पाया। उसके साथ ही वह पोरत भी याद भाई। मैंने मन ही मन निश्चय किया कि मैं १२४ मानस वधू । माज जरूर उससे पूछूगा कि वह यहा क्यो पाती है ? माविर उसका काम क्या है ? नाम क्या है ? उसका रंग पीला क्यो है ? उसके गाल मिचे हुए क्यों हैं? उसकी माखें घसी हुई क्यो हैं और मैं चल दिया। प्राज इस बाजार मे विशेष रौनक थी।माज से पहले भी यहा इतनी रोनक नहीं देखी गई थी। लोगों में विशेष उत्साह और सजावट दिखाई दे रही पी। दीपमालाएं भी कुछ अधिक मोर रगदिरगी पौं। समझने में देर नहीं लगी कि माज दीपावली है। दीपावली के दिन मैंने बाजार, बाजार वालो मोर बाजार की चीजों को देखकर अपनी मोर देखा । मुझ पर एक प्रकार की मुदान-सी छाई हुई थी। कपडे मैली दशा में तो ये ही फट भी गये थे। जूतों पर एक पालिश की जगह गद जमी हुई थी। यह सब देखकर मुझे स्वय पर ही क्रोध पाया कि मैं क्यों आज पहा इस दशा में अपनी दरिद्रता लोगो को दिखाने चला मावा । मगर आज मेरी जेब में पैसे थे। इसलिए चेहरे पर रोब अवश्य प्रा गया होगा। सोचा, क्यो न "रेडीमेड" सूट खरीदकर पहना जाए। विचार मन में माना पा कि मैं एक ठाठदार दुकान में घुस गया। सबसे पहले मेरी निगाह उस नकली औरत पर पड़ी जिसे दुकानदार ने साडी पहना कर मौर कहना चाहिए सजाकर खडी कर रखी थी। मैं उसे ऐसे पूरने लगा जैसे यह मेरी मोर देखकर मुस्करा पडेगी और फिर पोडी देर बाद वहां से भागे वढा तो एक मेज पर मेरी निगाह पटी। मैं ललचाई निगाहो से उसे घूरता हुमा मागे बढ़ा। लेकिन "प्राइस कमीच टपटी फाईद" पर निगाह पडते ही ठिठक गया। सोचा यदि कमीज की कीमत पच्चीस रुपये है तो पेंट की जरूर पचास रुपये होगी पौर फिर कोट की तो इतनी होगी कि लेने के लिए जेब में पैसे ही न होंगे। मैं सौटने लगा। दरवाजे के शोकेस में से कमोजे, जुदि मौर पतलून मुझे देखकर मानो मुस्कराने लगी-बिस्कुस इसी तरह जैसे किसी चकले में बैठी हुई बेशर्म मौरत। मेरे मन में उनके प्रति सोम तो हुमा किन्तु मेरो दशा भी उसी ग्राहक-जैसी पी जिससे पैसे के प्रभाव में पाखें भी नहीं मिमाई जाती । गज यह कि मैं वहा से अपना-सा मुंह लेकर लौट । माया। बुखार के कारण स्वमावत उस दिन मेरी चाल में कुछ धीमापन पा। मुछ भी न परीर सरने का द गो पा और कुछ धर्म मी। इससे मेरी मानस-वधू यकावट और भी बढ़ गई पी।पात्र मैंने फिर निश्चय किया कि मैं दाम में बैठकर चले । तभी एकाएक मेरो निगाह विजली के खम्भे पर जाकर भटक गई। मेरी हैरानी का कोई मत न रहा क्योंकि वह मौरत बिजली के खम्भे से पीठ लगाये खड़ी थी। मैंने उसकी घोर देखा और उसने मेरी पोर । हम दोनों को पाखों में स्वाभाविक चमक पा गई होगी, उसको भाखों में मैंने खुद देखी थी मगर मैं तुरत ठिठक कर रह गया और एक तरफ को हो गया । मुझे लगा कि मैं डर गया हू । डरे हुए से मैंने एक बार पुन उसको पोर देखा। उसको भाखों से चमक गायब हो चुकी थी। बल्यि कहना चाहिए एक शाश्वत उदासी छा गई थी। उसकी निगाह ट्राम से उतरने चढ़ने वाले यात्रियों पर थी। उसे ऐसा करते देखकर मेरे मन मे फिर वही बेहूदा सवाल चक्कर काटने लगा। यह पयों उनकी पोर देखती है ? इस विचार के साथ यह इच्छा मी जिदा हो उठो कि उससे पूछू कि यह क्मा चाहती है वह इतनी उदास क्यों रहती है? फिर यकायक मानों मुझे उसका उतर मिलगया हो, मैंने सोचा हर बात की जहमें रुपया है और भाज रुपया मेरे पास भी है। मैं यह सम रपया उसे दे दूतो यह एक दूसरा सवाल था। इस सवाल का अवाम कुछ नहीं था। मैं भाणे दहा, यह सोच कर कि मैं उस कहगा--"तुम मह रुपये ले लो भौर किसी ग्राहक का इन्तजार न करो, किसी गद का मगर जब तक मैं भागे बडा वह किसी के साथ वहा से चल पड़ी थी। मन ही मन मुझे बड़ा कोष माया भपने माप पर मोर उन दोनो पर मी, मसर आज उन सैकड़ों भोर हबारों प्रश्नों ने मेरा दिमाग खराब नहीं किया। वरना मैं सोचता ही रहता, यह क्या सोच रही होगी ? उसकी निगाहों में क्या है। वह क्यो लोगों की पोर बार-बार देखती है ? उसकी चाल में फुर्ती क्यों नहीं है ? उस के मघरों पर मुस्कराहट क्यों नहीं है । वह हर समय यहो यो चकार काटती रहती है? पयोंकिन सब प्रश्नों का उत्तर मुझे मिल गया था। भगर नहीं ज्यादा अच्छा होता कि मुझे इन प्रश्नो का उत्तर न मिला होता। इस उत्तर बाद तो मेरो मारमा मुझे और भी कचाटने लगी। क्योंकि मुझे रखे चलाने का यह प्रक्सर नहीं मिला कि यह इन किटादो को पढे जिनमे मैंने पहा है कि ऐसे भी देश इस दुनिया में हैं और भव तो अपने देश में भी उनका पनुकरण किया जाने लगा है जहाँ पौरतों को अपना शरीर नहीं बेचना " १२४ मानस-पर मान जरूर उससे पूछूगा कि वह यहा क्यो माती है ' माबिर उसका काम का है ? नाम क्या है ? उसका रग पीला पयो है ? उसके गाल मिचे हुए क्यों है ? ससपी मा घसी हुई क्यों हैं? भोर में पल दिया। प्राज इस बाजार में विशेष रौनक थी।माज से पहले भी यहां इतनी रोलक नहीं देसी गई थी। लोगों में विशेष उत्साह और सजावट दिसाई दे रही पो। दीपमालाएं भी कुछ पधिक भौर रगरिगी पी। समझने में देर नहीं मपी किपाज दीपावली है। दीपावली के दिन मैंने बाजार, राजार वासो पोर बाजार की चीजों को देसार पपनी मोर देखा । मुझ पर एक प्रकार की मुदान-सी हा हो। कपडे मंसी दशा में दो थे ही फट भी गये थे। जूतों पर एर पामितको जगह गर जमी हुई थी। यह सब देखकर मुझे स्वयं पर ही क्रोय माया कि मैं मरों वाज यहां इस दशा में अपनी परिखता मोगों को दिखाने पसा पाया । मगर माम मैरी नेर में पैसे थे। इसलिए चेहरे पर रोग प्रवरप मा गया होगा। सोपा, बों न "रेडीमेड" सूट खरीदकर पहना पाए । विषार मन में पानापा हिमैं एस ठाठमार दुकान में पुस गया। सबसे पहले मेरीगाह उस नाती पौरत पर पड़ी गिरो दुरानदार ने साड़ी पहनाकरमौर कहना राहिए सराकर गोरगी पी। मैं उसे ऐसे पूरने सगाव यह मेरी भोर देसार महस परंगी पोर रिपोडी देर बाद वहां से भागे या तो एर मेज पर मेरी रिमार प। मसचाई निगाहों में उसे पूरता दुपा पागे सामग्नि "मारा मीय टपटी फाई" पर निगाह पाते ही ठिटा गया। शेषा परिकमीर की बीमा पच्चीस सये है तो टमायरा पर होगी पोरकिरकोटकोनी होगी रिमोमिए महीमहीने में मोटने मगाणारे पोरेशन से कमोने, चुरमौर पतपुम मुझे देकर मानो माराने मपी-fami दए रिमी पकने मेंटीहा बेगम मोमोमा में उसे मोग पाvिi मेरी भी उसी बाहरी दीपिमा पाय भीमही मिमाtnel पाहिमामा- गह मेरमार San समास पण ति मरीमा में श्रीमान ! पुरा भी था और गो २० मानस-वधू १२५ यकावट और भी बढ़ गई पी।माज मैंने फिर निश्चय किया कि मैं दाम में बैठकर चल । तभी एकाएक मेरी निगाह बिजली के खम्भे पर जाकर मटक गई। मेरी हैरानी का कोई मत न रहा भयोकि वह भारत बिजली के खम्भे से पीठ लगाये खड़ी थी। मैंने उसकी ओर देखा और उसने मेरी भोर । हम दोनों की भांखों मे स्वाभाविक धमक प्रा गई होगी, उसकी भाखो मे मैंने खुद देखी थी मगर मैं तुरत ठिठक कर रह गया और एक तरफ को हो गया । मुझे लगा कि मैं डर गया है। डरे हुए से मैंने एक बार पुन उसकी ओर देखा। उसकी माखों से चमक गायब हो चुकी थी । बलि कहना चाहिए एक शाश्वत उदासी छा गई थी। उसकी निगाह ट्राम से उतरने चढ़ने वाले यात्रियों पर थी। उसे ऐसा करते देखकर मेरे मन मे फिर वही बेहूदा सवाल धक्कर काटने लगा। यह क्यों उनकी मोर देखती है ? इस विचार के साग्र ग्रह इच्छा भी जिन्दा हो उठी कि उससे पूछू कि वह क्या चाहती है ? वह इतनी उदास क्यो रहती है? फिर यकायक मानों मुझे उसका उत्तर मिलगया हो, मैंने सोचा हर बात को जड मे रुपया है और माज रुपया मेरे पास भी है । मैं यह सय रुपया उसे दे दू तो ? यह एक दूसरा सवाल था। इस सवाल का जवाब कुछ नहीं था । मैं आगे बढ़ा, यह सोच कर कि मैं उससे कहूगा-"तुम यह रुपये ले लो और किसी ग्राहक का इन्तजार न करो, किसी गद का मगर जब तक में भागे बढा यह क्सिी के साथ वहा से चल पडी थी। मन ही मन मुझे बहा क्रोध माया अपने भाप पर मोर उन दोनो पर भी, मगर माज उन सैकड़ों मोर हजारो प्रश्नों ने मेरा दिमाग खराब नहीं किया। वरना मैं सोचता ही रहता, वह क्या सोच रही होगी? उसकी निगाहो मे क्या है वह क्यो लोगों की मोर बार-बार देखती है ? उसकी चाल मे फुर्ती क्यो नहीं है ? उस के घरों पर मुस्कराहट क्यों नहीं है ? यह हर समय यहाँ क्यो चक्कर काटती रहती है ? क्योकि इन सब प्रश्नो का उत्तर मुझे मिल गया था। मगर कही ज्यादा अच्छा होता कि मुझे इन प्रश्नों का उत्तर न मिला होता। इस उत्तर के बाद तो मेरी मात्मा मुझे भोर भी कचोटने लगी। क्योंकि मुझे उसे बतलाने का यह भवसर नही मिला कि यह इन किताबो को पढे जिनमे मैंने पढ़ा है कि ऐसे भी देश इस दुनिया में हैं--पौर अब तो अपने देश में भी उनका मनुकरण किया जाने लगा है-जहां मौरतों को प्रपना शरीर नही वेचना २२६ मानस-वधू पडता । वहाँ की पौरतें मनुष्यों की गुलाम नहीं होती। ये दफ्तरों में काम करती हैं, वे हवाई जहाज पलाती हैं, फौजों में काम करती हैं। उनका स्वास्थ्य अच्छा होता है। वे प्रेम भी करती हैं, बच्चे भी पैदा करती हैं मगर उन्हें दुनिया से निगाहे चुराने का अवसर नहीं मिलता। क्यों न वह भी उनकी तरह से कुछ काम करे। उसे मन ही मन यह उपदेश देकर मुझे काफी सतोष हपापौर फिर मैं उस बाजार मे अधिक नहीं ठहर सका। सोचते सोचते सिर में दद का भनुभव करता हमा में ट्राम मे बैठ गया मोर ट्राम मुझे खींच कर मेरे घर की भोर ले चलो। ये सभी इन्सान हैं बरसात के दिन । नहीं नहीं बूदें। दक्षिणी हवाके झोके । सहक प्राय सूनी । और पन्द्रह वर्षीय भूखा, बेकार, घर से हजारो मील की दूरी पर मैं । यह बम्बई पी। मेरी माखिरी पूजी इस समय कुल एक इकन्नी पी। इन बूदो से बचने के लिए मैं रेलवे स्टेशन की भोर भागा जा रहा था। रोटी के न मिलने पर पेट में जो हडकप शुरू होता है, उसे वही लोग जानते हैं जिहें कभी इसका मनुभव हुमा है। इसका अनुभव किसी न किसी रूप में समो को हो जाता है । हाँ, तो मैं कह रहा था कि भूख से व्याकुल मैं जल्दी जल्दी कदम बढाता हुमा चला जा रहा था। शाम होने मे मधिक देर नहीं थी और बादलो ने तो घिरकर एक प्रकार से शाम कर ही दी थी। घन गेट स्टेशन की सीढियों पर मैं चढा। दूसरी सीढ़ी से ही मेरा पैर फिसल गया। इससे चोट तो कुछ लगी ही, साथ ही मेरी पैट जो भीगने पर भी साफ ही पी कीचड़ मे सब सन गई थी। शारीरिक चोट से कपड़ों की पोट मधिक असा मालूम हुई मोर इमसे भी अधिक चोट मुझे तब लगी जब मैंने सुना- 'गिर पहा साला, हो हो हो मैंने निगाह उठाकर अावाज की दिशा मे देखा-कुछ छोकरे को देखने में मजदूर लग रहे थे मेरा मजार उह रहे थे। यह सभी एक ही उम्र मौर एक ही शक्ल के थे। काला रग, पिचके हुए गाल हंसने से निकले हुए पीले दांत मानस-वधू दिखाई देते थे। मुझे क्रोध भाया और मैंने अपनी मासो से उसे व्यक्त किया लेकिन तुरन्त ही यह क्रोध दया में परिवर्तित हो गया। मैंने अपना ध्यान उघर से हटाकर कपडो के संभालने में लगाया। छोकरे लोग सिमककर मेरे पास चले माये । मुझसे कुछ गजो पर ही खड़े होकर उन्होंने अपना सिलसिला फिर जोहा । एक ने कहा-'डर गया, साला हो हो हो हो !' मौरी ने भी उसमे योग दिया और 'हा हा ही ही वह स्थान एक बार फिर गूज गया । मैं फिर भी यात रहा । जानता था, कीचड़ में इट फेंकने पर क्या होता है। स्वभावत उहें भी शात हो जाना चाहिए था। मही पाशा थी। लेकिन उनमें से एक काफी हैस चुकने के बाद बोला-'दादा, कोई है बम्बई मे जो तुमसे न डरता हो जिस छोकरे को लक्ष्य करके यह बातें कही गई थी वह इन सबसे तगडा मालूम होता था। उसकी पोर पूसा तान कर बोला-~'चुप साले, खुशामदी । कहीं फा. वह डर कर पीछे को हट गया और लोग भी हंसते हँसते एकदम चुप हो गए। कुछ देर तक उनकी ओर से सनाटा मालूम हुमा । लेकिन तभी एक दम कुछ भगदड सी मची। भागने वाले यही छोकरे थे। उनका लक्ष्म एकटेक्सी की भोर पा। टैक्सी मे से एक साहब उतरे। उससे पहले यह वहा पहुच चुके थे। तीन चार मदद सामान था। इन सभी ने मिलकर उठाया भोर लौटकर फिर वहीं भाकर पसी का बटवारा करने लगे। बदवारे के समय भी गाली गलौज शुरू हो गई, तो वह छोकरा जिसे दादा कहा था-बोला, 'यह माठ पाने हैं घोर हम पाच हैं। चार होते तो दो-दो भाने मिलते। ठीक है न?" 'ठीक है। सबने एक स्वर से कहा। मगर भव दुमनी की कमी है। जामो सब लोग माग कर सामो। तब बटवारा होगा। समझे? यहा मुसाफिरखाने में पानी से बचने को काफी बाबू लोग खडा है। दो-दो पैसा भी लाएगा, तो काम बन जाएगा। एक एक चाय एक एक पाव, जामो, जल्दी जामो।'
१२८ मानस-ब माज्ञाकारी सैनिकों की वरह यारो पारो दिशामों में कटकर मागने लगे। देखा, मागते भी बडी चतुरता से हैं। मपी की तरह अपनी जिस पर डटे ही रहते हैं। मना करनेवाला भी कहा तक बेशर्मी करेगा। म निश्चय दिये खहा या fr कुछ भी हो, मैं अपनी वह इकन्नी नही दूगा जो मैंने सुबह से भूखो रहकर भी बचाकर रखी है। लेकिन मेरे पास भी सहमता सा, रता सा एक छोकरा भाया। बोला, 'बाबू पइशा बाबू "उसके पीले पीले दांत पूरे बत्तीस की सख्या म बाहर माकर उसको दरिद्रता की कहानी कह रहे थे। मौर हाथ सधै हुए अभिनेतामों की भाति, स्वाभाविकता के साथ मुह की पोर पहुचकर भूषा होने का सपेत करता था। प्रांसों की फीचर भी जोर से चिल्लाकर कह रही पो कि इसने महीनो से मुह भी नहीं धोया है। मेरा हृदय पिघल गया, हालाकि मैंने उसे पत्थर बनाने का यल किया था, भोर एक स्वचालित मशीन की भांति पैट की जेब में हाय पहचा कर इकन्नी मोर इफनी उसकी हो गई। मेरी वह योजना जो मैंने यहा खडे खडे ही बनाई थी कि कोई धनेवाला माएगा तो मैं पेट की माग शात करूंगा फेल हो गई थी। लेकिन साथ ही पेट की लपटें और भी तेज होती गई। मैंने इघर उपर देखा। एक मेम साहद मेला खाकर छिलका वही बेरहमी से पीछे की ओर फेंक दिया। मैं छिलके को मक्ष्य करके वढा गौर सोचा इसे एक मोर को फेंक दगा । मगर मुझसे पूर्व ही एक मिमारिन छोरी ने भाग कर वह छिलका उठा लिया और बिना साफ किए ही उसे खही-खो खा गई। मानो कोई चील अपने शिकार के इन्तजार में कहीं निकाल लाया, ने - बैठी थी। मैं रुका नहीं। सामने ही नल था, उसकी टोटी खोल कर मैंने पामी पिया। पानी मेरे भूखे कलेजे मे सिरके की तरह चोरा सा मगाता पट में पहूँच गया। छ ।ड भी महसूस हुई। लोटकर खिहा हाने के लिए चल पड़ा। चुकिंग विंडो पर जो रेखा, पहले कभी नहीं देखा था। उस छोकरे को ददिर एक साहब के पस पर थी और वह इस प्रकार ध्यान मगाए वहा पा जैसे कोई बगुला मछली के लिए तैयार बैठा रहता है। मैं सार गया कि यहां कुछ होने को है। पौर मेरे देखते न देखते जरूर उसने वही चालारी के साप घट्टका साफ कर दिया। राव साहब टिकट र गए। छोरा भी बडवे को छिपाठा भानस पू १२६ हुमा इधर उधर देखने लगा। तभी उसकी निगाह मुझ पर पड़ी। वह सहम कर खडा हो गया। मैं तब तक उसके पास पहुच चुका था। मैंने सकेत बटुवा भागा। बिना किसी हील-हुज्जत के ही उसने पस मुझे थमा दिया। मैंने पायाज दी-मिस्टर, जरा सुनिये । और उसकी भोर तेजी से लपका। वह सज्जन ठिठक कर रहे। मैंने उहैं पस देते हुए कहा-'यह टिकट- घर पर गिर गया था। लीजिये, मापका ही है न?' सहका चम्पत हो गया था। वह सज्जन मुझे इस प्रकार देखने लगे मानो में उनसे सरासर झूठ बोल रहा है। लेकिन बटुवा लेकर होने खोला। वह नोर्टी से ज्यो-का-त्यो मरा था। "मोह। मगर मगर गिर कैसे गया ? मजी साहब, गिर नहीं गया तो क्या मैंने निकाल लिया? देख लीजिए, मापके रुपये तो ठीक हैं ?' मेरे स्वर मे कुछ कठोरता थी। 'ठीक हैं ।' कह कर वह फिर वढ गए। उनके फूटे मुह से 'शुक्रिया तक न निकला। मैंने सोचा, बहुत बुरा हुमा। ऐसे कभबस्त मादमी को पस लौटा दिया, मैंने बहुत बुरा किया। इससे तो वह भूखा छोकरा कुछ दिन भोजन तो कर नेता, खैर। फिर उसी स्थान पर खड़ा होकर मैं बूदों के बद होने की प्रतीक्षा करन लगा। मगर मानो वूदों ने बद न होने की शपप ले रखी थी। और अविरल रूप पडे जा रही थी। शाम पूरी तरह हो चुकी थी। बत्तिया टिमटिमाकर पानी से भीगी सड़क पर अपना मुह देखने लगी थी। इससे प्रकाश की मात्रा कई गुनो हो उठी थी। दूर कही विद्युत शक्ति से धमकने वाले विज्ञापन बोड पढ़े जा सकते थे बैटर बाई कैप्सटन, डनलप रेड फोट भोर न जाने क्या-क्या। जिधर देखा यही बातें यही दृश्य, पास के ईरोजु' सिनेमा के बाहर भी वह लाइन मब दिखाई नहीं देती मी जो काफी देर से टिकट के इतजार मे अपने रेनकोट भोर छातो को भिगो रही थी। वह सभी लोग मदर जाकर फिल्म देखने लगे होंगे। वहीं मव दिसी मूरोपियन लडो का डास प्रोग्राम चल रहा होगा। और लोगा की निगाहों को वह अपनी मुद्रामो के साथ नवा रही होगी। मोटर-कारो की पक्तियों की चमक से सहक ऐसी लग रही थी जसे किसी ने पट्रोल छिहककर सहक में भाग लगा दी है। देर स भूखा होने पर भी मैं इन सब बातो को देखकर हो मुग्ध सा हुमा जा रहा था। कितनी ही देर तक मैं - मानस वा देखता रहा। फिर मालूम हुमा कि बूदें रक गई हैं। मैं पन पडा। रास्ते के होटलो म से जो खुशबू पा रही थी उसका जिक्र करना मेरे लिए असम्भव ही है। मुझे लगा कि यह गघ मुझे जबदस्ती अपनी मोर बुला रही है मोर कह रही है-'हिम्मत हो तो ग्रामो न!' मगर मुझमे हिम्मत कहा थी। बिना साहस डट जाना भला कहा तक ठोक था। मैं बढा जा रहा था। कुछ दूर चलकर मुझे मालूम हुमा, कोई मेरा पोसा पर रहा है। पीछे मुड़कर देखा, तीन चार छोकरो की टोली जल्दी-जल्दी मेरी मोर बढी मा रही है। मैं डर गया। मैंने भी कदम तेज किए। सामने मेरोन ड्राइव पोर स्टेशन के सिगनल दिखाई दे रहे थे। अभी तक एकात या मोर यह लोग मुझे चोट पहुचा कर भाग सकते थे। मैं भाग पडा । वे भी भागे। मुझे मब यकीन हो गया था कि यह अवश्य वे ही छोकरे हैं जिनसे पस छीनकर मैंने उस समीरमादमी को दे दिया था और ये प्रतिकार की भावना से दौड़े चले आ रहे हैं। हाफता हुमा मैं मेरीन ड्राइव के कासिंग विज तक पहुच गया। वहा एक पूणत जवान, किंतु उन छोकरो से मिलता जुलता ही एक मादमी मिला । मैंने डरे हुए बालक की तरह उससे निवेदन किया-भाई, देखो वे 'मौर इतना कहते-कहते ही सास फूल गया। मैं हाफ रहा था। वह बोला-वे कौन " मैंने उन लडको की मोर सकेत किया। अब वह ठिठक कर रुक गए थे, मोर मापस मे शायद कोई नई योजना बना रहे थे। 'पोह | समझा!' उस व्यक्ति ने कहा, मौर उनकी मोर बढ चला। मुझसे कहा-'भाम्रो, मेरे साप मैं?' 'हा, सरोमत, भामो मैं उनके साथ पल दिया पा, मोर लहके हमे अपनी मोर माते देखकर भाग गए थे। उस व्यक्ति के साकेतिक भाषा से बुलाने पर वह नहीं रुके। वह मुझसे बोला-'यात या पो" 'बात बात यह थी कि मैंने 'भौर सारी स्थिति समझा दो। यह पोला-'तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। पस लौटवाकर तुमने उस छोकरे का नुक्सान विया न?'
मानस-वधू
मैंने कहा-'नुकसान तो उस भादमो का भी था।'
'मादमी जाप भाड मे 'वह मल्लाया-'तुम गरीब प्रादमी हो। बोलो,
"फिर तुम्हें गरीब का पद लेना था।'
'मगर यह अपराध था। कानून के खिलाफ ।
'पासून गाय माह मे। यह कानून है कि हम भूखो मर जाए? यहा कानून
की माड में इन्साफ का गला घोंटा जाता है, सभो।'
मैं कुछ नहीं समझा था। फिर भी बोला-'समझा।'
यह कहता रहा---'तुम्हारी मांस कह रही हैं कि तुम भूखे हो। अब तुम उस
पादमी से दो रोटी तो ले लो। माग कर तो देखो। कैसी बढ़िया गालिया खाने
को मिलेंगी। साला, वटुवा लेकर चला गया। तुम्हें कुछ दिया उसने "
'नहीं। मैंने महा~-'म लेता भी नहीं। मेरे पास तो इकनी थी, वह भी
मैने नहीं छोकरों को दे दी थी।'
'दे दी होगी।' यह बोला-'मगर वह साला एक पाई देने वाला नहीं था,
तुम बुरा न मानना।
'मही नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।'
मैं चल दिया। सभी वह बोला--'जाते हो?'
"बहा?"
"कहीं भी
'परे सुनो, ठिकाना नहीं है पा?"
धोएको।'
मैं रुक गया। वह मेरे पास माया और बोला--'भाई, तुम पुरा मान
हो। देखो, यह बम्बई है। यहा कोशात निराली है। यहाँ के दादा लोग साले
मोहरामो हैं । बिसचुत मपनी मां के ससम फहना चाहिए। पर तुमने मुझसे
मदद मांगी थी। छोरा लोग साला सुद माग गया। मैं तुम्हें मदद करुगा
तुम भूया है खाना सिलानगा। हमारे भोपडे में सो रहनापहा पम्पस मिल
मान011 जाएगा। तुम्हारे कपड़े भीगे हुए हैं। रात को ठिठुर जामोगे। कहीं कोई घधा है" से मैंने नकारात्मक भाव से सिर हिलाया। "चचचच वह बोला-'कल मैं तुम्हें उस रगड वाले की नौकरी भी दिला दूगा । चलो, मेरे साथ मामो।' मेरे पास मना करने का कोई कारण नही था। चुपचाप उस फक्कड की बातो को सुनकर मैं उसके साथ हो लिया। रेलवे ब्रिज क्रास करने पर समुद्र पहले एक मैदान सा पा। उसमे कुछ झोंपड़ियां पड़ी थीं। मैंने सोचा-यह गला क्या खाता होगा और क्या मुझे खिलाएगा? इसके पहनने के कपडो मे से बदबू पा रही है। इसका कम्बल तो और भी अधिक गदा होगा। दस-बीस कम्वल तो इसके पास होगे नहीं । वह वेघारा क्या मोढ़ेगा। कहीं रात को पानी गिरने लगा तो मुसीबत ही हो जाएगी। लेकिन मैं यह सोचकर भी मना करने में असमय हो रहा । उसके साप पलता ही रहा । अपनी झोंपड़ी के मदर को मारकर उसने भावाज दी 'केली, मो रेली उत्तर कुछ नहीं मिला तो वह वडवहाया-साली, पता नहीं इतनी रात तक वहा पही रहती है। न जाने कौन पार पना लिया है, हूँ!' भोर घृणा से पमीन पर जोर से थूक दिया। मैंने पूछा- 'यह केली कौन है?' 'मरे मई है सुमरी, बदमास, साली, न जाने कहां पड़ी होगी!' यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं पा । फिर भी मैं चुप रह गया । वह मौट पर पा पोर मैं भी उसके साप हो पा । पम्भ की रोशनी में उसने अपनी साँग घोसी पौर एक दुपनी मुझे देकर कहा-'सामने पाय पी मामो । म तब तक यही बैठा है। मैंने सोचा मना परदू, मगर भूख से विवश होकर मैंने उसकी भोर देता मोर दुमन्नी मेवर कहा-'तुम भी पलो न, इसमें दो पाय मा पायेंगी, दोनों पियेंगे। यह बोमा- नहीं, तुम जामो, वह सासा पसरे उपार का वराम करेगा। लाममा गुम गपास होगा। मुझे दो पार हाप घर देने पड़ेंगे। फिर हरामगारी .
मानस-वधू के पाने का रास्ता यही है। मैंने पाय ममी पी थी। तुम तो वे पापो । मैं यही हूँ, समझे - चाय की बात को ऐसी स्थिति में में जल्दी ही समझ गया था। ए. पाव एक पाय का मूल्य मेरे पाम मा गया था। मैं नलगे से स्वीति सूर सिर हिला कर रेस्टोरेंट की मोर बढ़ा। बहा पाय पीकर कुछ ऐसा लगा, जैसे व दन हट गए हो, सूरज निकर पाया हो, मोर इतना भी नहीं तो कम से कम वल्लो को रोशी अवश्य दीगी। यही सोचता मैं उस देवता-सुल्य मानव की घोर बदा। मगर दूरस हो रे पर ठिठक गया। देखा कोई स्त्री उसकी छातीस सिर रसे बडी थी। मैंन 'नुमान लगाया यह फेली ही होगी। मगर कितना प्रेम करतो है व उसे । सुनह ही बिछुड कर गयो होगो भौर पर उस प्रेम को इस प्रा र रही है। उसको निगाह मुझपर पह चुकी थी। वोला~प्रामो हम तुम्हारा इतबार कर रहे हैं।' 'अच्छा' कहकर मैं उनके पास पापा। वे भागें, मैं पीछे-पीछे पर दिया। उनयी वाता का सार समझ में भा रहा था। वे गेना निसरोर रूप से प्रमा लाप कर रहे थे। उन शब्दों को दोहराना कठिन है। भोपडी मै रोशनी नहीं थी। रोशनी को यहां जरूरत गे थी मार TER पर सामने बिजली के पम्भ की मदद से यह लोग काम ले रहे। उसने अपनी दिन भर की भागी हुई गा मोली। रोशनी में मैंने देखा। उस जूट को मूमे टुक्डे । मुझे उपवाई होन को हुई। मगर जी कहा किया और मेरे रेखत पत यह दोनो खान लगे। मैंने उस औरत को देखकर या किया कि की इस पहले भी देखा है। याद आया, यह वही थी जिसने केले का छिलका उठाकर साया था। पाह! कितना प्रेम करती है इसे यर' खुद केलो के लिलकों पर दिन काटती है। मैं इस विचारा में दवा था कि वह प्रादभी वोला-'नो दावू, या, 'न, भूपनही है। "मोह समभा, केली ला पो। 'परीवहा हे र गरे पार' । खाग्रीन मानस-व 'मरी ला न, हरामजादी की बच्ची, ला! सारे दिन जाने किसको लिए पही रही होगी । कहती है पइशे कहा है। ला, जल्दी निकाल । देख, बाबू भूखा है, और हम खाते हैं। वह जूठन नही खाएगा। समझी ? नहीं समझी । ला निकाल। पौर दूसरे ही क्षण उसने अपनी गाठ उसके हवाले कर दी। उसमें पसे, मघ ने, इक नी से वहा कोई सिक्का नही था। मगर यह रकम रुपयों में बदल सकती पी। मैंने कहा-'रहने दो, मैं खा के माया हूँ । ममी तो दो माने दिए थे तुमने ।' 'वादू, सरम का जमाना नहीं है. समझे ? मरे नहीं समझे ? पलो मेरे साप उठो । केली, तुम मेरी प्यारी, यहीं बैठी रहना। देखो, कोई तुम्हें पटानले जाय ! मुझे यही डर बना रहता है। बस सारे दिन में पक जाता है । तुम्हारे इन्तजार मे षी खाक रहता है । समझी?" 'समझी ।' केली ने मुह विचकाकर कहा । 'साना, बनाता है । जसे में जानती ही नहीं कि सुजानी के पीछे कुत्ते की तरह लगा रहता है भोर वर कुतिया हुँह यू यू यू।" 'मरी चुप कर, बहन । लाट मे ही मा गयी!'मौर फिर मेरी भोर घूमकर देखा। मगर मैं उससे काफी दूर या मोर खाट को भाड मे होकर यह सब सुन रहा था। क्षणिक प्रेम क्षणिक क्रोध को ये सहर समुद्री लहरों से कम सुहानी नही थीं। मुझे लगा कि सचमुच भूख भाग गयो है। मैंने यहा से भाग जाना ठीक समझा । भाग जाने पर मुझे यह खेद बना हो रहा कि ऐसे सज्जन प्रकृति के प्रति दो शब्द भाभार प्रकट करने को भी न कह सका। मैं हानवी रोड के एक बड़े से होटल के सामने घूम रहा था। पाय और एक पान कभी के हस्म हो चुके थे। मैं भूखा था। मूसा रहना मेरे लिए दु सह मन गया। होटल से एक दूकान इधर भौर एक दूकान ग्घर तक मैं चक्कर काटठा रहा । सो चक्कर लगाते लगाते मैंने एक योजना बना ली और उसे कार्यादित करने के लिए मैं होटल में घुस गया। मैंने पान वाले के पाइने में अपना व्यक्तित्व देसापा। पर भी भर प्राय सूख चुके थे। मुझे देखकर कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि इससे पास पैसा नहीं है । टेबिल पर बरा माहर लेने माया मोर मैंने म रोग से बढ़िया बढ़िया चीजें मगायौं । हटकर खा चुका तो काऊटर पर जाकर कहा-मेरे पास ।
मानस वधू पसा नहीं है । मैं सुबह से भूखा था। क्ल से तुम्हारी नौकरी करूगा।' होटल मालिक नठ खडा हुमा । क्रोध से प्रार्खे निकालकर एक तमाचा दिया। मेरा मुह फिर गया। मैं यदि भूखा ही होता तो निश्चय ही वह थप्पड साकर हमेशा के लिए सुख की नोंद सो जाता। मगरपहले किसी ने ऐसा नहीं किया था। उसने दूसरा पप्पा ताना ही था, तभी एक टेबिल से एक व्यक्ति ने उठकर कहा-ठहरो।' उसका हाथ वहीं रुक गया। वह व्यक्ति पास ब्रावर बोला, 'मैं तुम्हें पैसे देता ह इसके।' दो।'होटल मालिक ने कहा। 'बैरा, इनका हमारा बिल साप करो।' दूसरे ही क्षण बिल चुका दिया गया। बिल चुदाने पर वह व्यक्ति दुकानदार से बोला-'कहिए । अब भाप इमस एक पप्पड खाने को तैयार है।' उसकी पलकें झुक गयी थी ।मि वह बेशर्मों से घर रहा था। वह पादमी लैक्चर सा देने लगा- -'दुनिया मे ईमान रहा ही नहीं है। मैंने इस भाई की ईमानदारी देखी थी। दूसरे की बेईमानी देखी थो। मह वह शरुत है जिसने मरे नोटो का पस प्राज भूल से एक रईस को थमा दिया था। वह लक्ष्मी को ठोकर मारता है । समझे ? तुम क्या समझोगे । पैसो के गुलाम जो हो! और उसके मुह पर थूककर मरा हाथ पकडकर बाहर ले माया। 'मेरे साथ चलो, मुझे तुम्हारे. जैसे नौजवान की ज़रूरत है। मामो सोच न करो।' वह मेरा हाथ पकडे खींचे लिए जा रहा था। एक शानदार चमकती कारकी मोर मैं खिचता जा रहा था और सोच रहा था उन छोकरो के विषय में, उस पस वाले व्यक्ति के विषय मे, उस मवाली के विषय मे, जो मरे लिए अपनी कलो को धमका रहा था और उस होटल वाले के विषय मे, मोर इन सबसे ऊपर उस व्यक्ति के विषय में जो मेरी बाह खींचे लिए जा रहा था। मैं केवल यह सोच रहा हू, यह सोच रहा हूँ कि ये सभी इसान हैं। छप्पर फट गया था उस दिन इटरव्यू देकर लौटा तो मैंने निश्चय कर लिया कि भाष मवश्य +TH मानसवधू प्रात्महत्या कर लूगा। निणय इस बात का करना या कि मरने में कम से कम कप्ट होना चाहिए । गहरे पानी मे डूब कर मरा जा सकता था, लेकिन ममीयत यह पी कि जाडे के दिन थे । रस्सी के फादे से भी मात्महत्या की जा सकती थी, परन्तु गले की सहन शक्ति तो एकदम सीमित यो मौर यदि मफीम खाने के लिए पैसे होते तो प्रात्महत्या की पावश्यकता हो न पडती। मुक्त भोगियो का कहना है कि प्रफीम खाने से दम घुटने लगता है और मैं घुट-घुटकर मरना कभी पस द नहीं करता । यही कारण था कि उस समय मैं एक महसान फरामोश मित्र के पास जा रहा था। मेरा यह मित्र कुछ दिनो पहले ही सब इसपेक्टर पुलिस हुमा पा । वह भरा हुमा एक रिवाल्वर हर समय अपने पास रखता था। मेरी योजना थी कि शीघ्रता से उसकी पिस्तौल उठाकर घोडा दवाऊगा मौर मित्र महोदय भौचक्के से देखते रह जामेंगे। उसी समय सडक पर 'खुल गया' खुल गया' का शोर मचाने वाले एक लडके ने मुझे पखवार थमा दिया। "से नहीं हैं ' कहकर जैसे ही मैं मागे बढा तो लडका बोला, फिर दे देना।" "मागे भी नहीं होगे।" "मत देना।" मैंने एक बार लड़के को गौर से देखा। फिर उसके हाथ से मखबार सेकर पढने नगा। ऊपर मोटे अक्षरो मे लिखा या "कल्याणकारी सप' भाइपो मोर बहनो प्रय पाप किमी तरह निराश न हों। देश मे फैली हुई प्रराजकता, मुषमरी प्रशान्ति, बेरोजगारी मादि समस्यामो का मत करने के लिए हमने कल्याणकारी सघ की स्थापना पापके शहर में की । यदि मापको सूची रोटी भी नसीब होती हो तो आपको सुबह-ही सुबह बादाम का हलगा गरमा गरम चाय, सस्ता-खस्ता नमकीन टोस्ट मक्खन मादि जो माप चाहेंगे मिलने लगेगा। दोपहर और नाम के भोजन को नियमित व्यवस्था की जाएगी। लीजिए मापनी पहली समस्या हल हुई। 'यदि पाप मान की हालत बहुत सस्ता हो गई है या मापको मान मानस-वधू १३७ मालिक पाये दिन किराये के लिए तग करता रहता है तो अापके लिए तुरत उम्दा मकान, या हो सका तो पोठी का प्रबन्ध किया जाएगा, जिसमे रहने के लिए पापको जल एव विद्युत की सुविधाए प्रदान की जायेंगी। आपकी सेवा के लिये नौकर भी मिलेगे। यदि माप बेकार हैं तो पापको नौकरी दी जाएगी और ऊचे अधिकारी के पद पर भी नियुक्त किया जा सकेगा, मोर यदि हम पापको नौकरी नहीं दिला पाये तो पापको मावश्यक्तानुसार तनख्वाह पर बैठे ही दे दी जाएगी। 'यदि भाप नेता हैं मोर मापको चुनाव मे बार बार मुंहकी खानी पड़ती है तो हम आपको माश्वासन दिलाते हैं कि निकट भविष्य मे ही माप सहायता से प्राइम मिनिस्टर या प्रेसीडेण्ट तक बन सकते हैं। यदि माप लेखक हैं तो १९७६ का नोबल पुरस्कार भाप ही को मिल सकता है । यदि माप वकील हैं तो सारी दुनिया के बड़े-बड़े मुकदमे मापकी क्दमबोसी वरने लगेंगे। यदि माप डाक्टर हैं तो प्रसाध्य रोगी मापके पास पहुचेंगे भोर पाप हे स्वस्थ करने की शक्ति अनुभव करेंगे। 'भाइयो,मापको शायद विश्वास न हो, लेकिन हम मापसे भाग्रह-पूर्वक कहना चाहेंगे कि यदि मापने हमे दशन न दिये तो पाप हमेशा दुखी रहेंगे। स्थाना भाव से पूरा विवरण यहा नही दिया जा सकता । लेकिन भापके लिए कल्याण- कारी सघ का द्वार हमेशा खुला है। भाप पधारें, हम प्रापकी हर सेवा करने के लिए सदा तत्पर रहेंगे। 'राम लुभावन माल', जनरल सेक्रेट्ररी' '१२ साऊथ हाइये (मेरठ केट) मषवार पढ़कर मुझे लगा कि चलते चलते किसी पल्प वृक्ष के नीचे मा खडा हुमा हू । वीरान-सी सडक पर रगीनिया मानो चहल कदमी कर रही थी। मैं कल्पना करने लगा कि भाज से मैं उस बदबूदार गली की अधेरी कोठरी को छोडकर क्सिी मालीशान कोठरी में रहने लगा है। सुबह के नाश्ते में दासी पानी के स्थान पर मय बादाम का हलुवा मोर गम-गम पाय मानो मेरे सामने रखे हैं मोर एक श्वेत वस्त्रावृत्त नव-यौवना मेरे बाल सहना रही है । पर मैं सब- इक्सपेक्टर की भोर भला क्यो जाने लगा था। सहसा ही मेरे पर कल्याणकारी भवदीय, মানববধু, . सघ की मोर मुठ गये। १२ साकप हाइवे परपहुच कर मैंने देखा कि कोठी के पागे संकटों व्यक्तियों की भीड लगी हुई है। उनके कपडे मैले मौर फटे हुए हैं किन्तु चेहरे पर उल्लास । वरस रहा है । मैं वहा जाकर चुपचाप खड़ा हो गया। मेरे मागे जो व्यक्नि खहा था वह मुझसे बोला, यहा पर भोजन की बहुत सुदर व्यवस्था है। पहले भोजन कर लीजिये। मुझे प्रस्ताव पसद गाया । भूख के मारे पेट के चूहे भी सुस्त हो गये थे। मौकरी देने वाले की मोर से खाने पीने की इस नि शुल्क व्यवस्था के लिए मैंने मन ही मन घयवाद दिया। शुद्ध देशी घी मे तले हुए काजू मौर चाप बट रही थी। मैं भी एक मेज के सामने बैठ गया और क्रमश कभी चाय, कभी काजू खाने लगा। खा पीकर शीघ्रता से श्रीयुत राम लुभावन लाल महोदय के पास पहुचा। मुझे देखते ही वह बोले, देखिये महोदय, माप मुझे एक योग्य व्यक्ति जान पह रहे हैं। हमे ऐसे ही प्रतिभाशाली व्यक्तियो को प्रावश्यक्ता है। हमें पूर्ण माया है कि भाप निरतर उनति के पथ पर अग्रसर होते जाएगे। शायद माज तक भाप की योग्यता को किसी ने परखा नहीं है । प्राप विज्ञान के क्षेत्र मे हाते तो 'माइस्टीन से टक्कर ले सकते थे । राजनीतिक क्षेत्र मे चचिल का मुकाबला करने की योग्यता भाप मे है, साहित्यिक क्षेत्र मे माप होते तो शा को बहुत पीछे छोड़ देते। लेक्नि उचित मवसर न मिलने के कारण माप की प्रतिमा रह गयी है । पत्र में मापको फिलहाल ३०० रुपये माहवार पर नियुक्त कर रहा है। मैंने एक बार माश्चय से अपने उस कदरदान को देखा और कहा "जी? तीन सौ रुपया माहवार ?" "जी, तीन सौ रुपया माहवार मौर काय कुछ भी नहीं । बस फक़त पोड़ा सा साहू शिवचरण जी का प्रोपेगे हा करना है-चनावका प्रोपेगेगा। वह इस बार मसेम्बली के लिए खडे हो रहे है। पौर यदि मापने योगयता से काय किया तो भापको विदेशों मे राजदूत बनाकर भेजा जा सकता है। मगर सर फिलहाल मापको तीन सौ रुपये महावार पर रखा जा सकता है। वेतन प्रत्येक पहली तारीख को प्राप्त हो जाया करेगा परतु एक शत है।" "क्या ?" मैंने पूछा। "रेलवे रोड़ पर एक नमा होटम खुमा है। भोजन मापको वहीं करना होगा। - मानस वधू एक साधारण सी शत है। दोनों समय का भोजन वहीं करना होगा। दो बार नाश्ता भी माप वही करेंगे। यदि किसी भी दिन माप वहा भोजन करने से चूक जायेंगे तो पापको उसी समय नौकरी से अलग कर दिया जायेगा। हमारे यही माघे या पोवाई वेतन मिलने की व्यवस्था नहीं है। या तो पूरे महीने का वेतन लीजिए, म यथा वेतन से ववित रह जाइयेगा।" मैं क्षण-भर के लिए स्तम्घ सा रह गया । फिर होश माने पर मैंने उसकी यह शत मान लो और बडी सक्रियता एव श्रद्धा से साहू शिवचरण जी के चुनाव- काय मे लग गया। सभी पार्टिया अपने पूर्ण प्रदर्शन में लगी हुई थीं, शिवचरण जी की बात ही कुछ और पी। चुनाव मे केवल बारह दिन थे। ज्यों ज्यों निश्चित दिन पास भाता गया, हम लोगों की सरगरमिया बढ़ती गयी। मुझे तो कई रात बिना सोये हो गये थे। प्रारम्भ मे मुझे यह सम्मावना लग रही थी कि चुनाव के बाद शायद मौकरी से अलग कर दिया जाऊ । परन्तु ज्ञात हुमा कि अच्छे कायकर्तामो को साहू साहब की मिल मे नौकर रख लिया जावेगा। यह जानकर मुझे बडी प्रसनता हई पौर मैं दुगने उत्साह से काम पर जुट गया । घर की भोजन-सम्बधी व्यवस्पा एक परचूनिये ने हल कर दी। माह के भत मे रुपया मिल जाने के विश्वास पर वह पाटा-दाल इत्यादि उधार देने पर रजाम द हो गया था। नौकरी से पहले इसी व्यक्ति ने एक रुपये के सामान के लिये भी मना कर दिया था। साहू साहब चुनाव मे जीत गये। इसकी हमे एक शानदार दावत दी गयी । बहुत खुशिया मनायी गयीं। मैंने काफी मेहनत की थी, इसलिए साहू साहब ने एक दिन मुझे बुलाकर कहा, "भाई हम तुम्हारे काम से बहुत प्रसन्न हैं। यदि चाहो तो पचास साठ हजार रुपया लगाकर कोई व्यापार फरादें या एक हजार रुपया माहवार की एक नौकरी खाली है, उसे चाहो तो कर लो। मैं पत्र लिख दूंगा, वे रख लेंगे। मजी व्यापार क्या होगा? मेरे लिए तो नौकरी हो ठीक रहेगी।प्राप लिख दीजिएगा।" मेरा छप्पर फट गया या मोर भगवान उसमें से धन बरसान ही वाला था।
१४०
मास-व
अपनी मात्महत्या वाली बात पर मुझे वही हसी माई।
पहली तारीख को मुझे तीन सौ रुपये मिल गये। उछलता कूटता में सबसे
पहले होटल वाले का रुपया देने को पहुचा । मैनेजर ने मुझे बिल पमा दिया।
देखा, इकत्तीस रपये।
जो कुछ मैंने खाया था उसके इकत्तीस रुपए उचित ही थे। मैंने दस दस
रुपए के तीन नोट और एव रपए का एक उनके काउटर पर रख दिए ।
"महाशय,
बिल को गौर से देखिए । तीन सौ दस रपए वाजिब है । एक दिन
का दो समय का भोजन मोर दो नाश्ते का हमारे यहा दस रुपया लिया जाता है।
यह महीना इकत्तीस दिन का है। इसलिए तीन सौ दस रुपए दीजिए।"
"तीसौ दस रुपए ?"
"जी हा, तीन सौ दस रुपए," मो र महोदय ने भा निकालपर विश्वास
करा दिया।
अपने वेतन के तीन सौ रुपए देता हुप्रा मैं बोला, "अच्छा दोस्त, ये तीन सौ
हैं । दस मैं शीघ्र ही कभी भेज दूगा।'
मैं फिर यहा न रुका । सारी स्पिनि मेरी समझ में मा गयी।
फिर जमीन पर मा गया। चेहरे पर हाइमा उड रही थी। केवल भोजन पर
मुझे एक माह इतना काम करना पड़ा था।
मैं फिर मात्महत्या करने के लिए चल दिया और निश्चय कर लिया कि
इस बार किसी प्रमवार वाले के प्रलोभन मे नही पाऊगा। मगर यह समस्या
अब भी उसी तरह विद्यमान थी कि मरा कैम जाएगा
मैं
एक बार
?
०००
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