Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Yuvak Pathpradarshak

Thakur Raibhadur Singh · 2011/03

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कलकला रिमालकलकाता युवक पथ-प्रदर्शक (विवाहितों और विवाहायीं युवकोंके लिये अनुपम पुस्तक ) लेखक- ठाकुर राजबहादुर सिंह CLEMEZ १ प्रथम वार ] भाद्रपद सम्बत १६६३ वि० [ मूल्य १) - प्रकाशक- कामता प्रसाद वर्मा कलकत्ता-पुस्तक-भण्डार १७१-ए, हरीसन रोड, कलकका। मुद्रक :- उमादत्त शर्मा रत्नाकर-प्रेस ११ ए, सैयदसाली लेन कलकत्ता ।

विपय सूकी पृष्ठ ... ६ ... १४ २१ ३० ३६ ४४ विपय परिचय १-किशोरावस्थाका अन्त २.---युवावस्थाका उदय ३-शिक्षा और उसका उपयोग ... ४-स्वास्थ्य और व्यायाम ... ५-प्रमचर्य • . ६-वीर्य सम्बन्धी रोग ७-व्यावहारिक ज्ञान और आजीविका ८-मितव्ययिता और स्वावलम्बन 8-विवाह १०-बीके प्रति कर्तव्य ११-इन्द्रिय-परायणता और सदाचार १२ --एक नयी समस्या १३---आदि रस (काम) शास्त्रकी जानकारी १४-सन्तति-नियमन १५-सन्तानके प्रति कर्तव्य १६-देश और समाज ४४ ६६ ७६ ८३ ६७ ११२ १२३ १२३

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प्रतिचय metawe Kannamruare संसारमें जीवन-यात्राको उचास रूपले तय करने के लिये पुरुषको गृटल्य बनने की आवश्यकता पड़ती है। यह लब कि अति प्राचीन काल में मनुष्य गार्मस्य अन्धनमें न पढ़कर स्वतन्त्र विचरण करता था और वह अधिक विकसित मस्तिष्क न रखने के कारण खाने पीने, रहने-सच्ने और इन्द्रिय परायणताके सम्बन्धमे पशुओंकी अपेक्षा बहुत अधिक सुधरा जीवन नहीं व्यतीत करता था; किन्तु मनुष्य ज्यों-ज्यों अपने आहार-विहार और रहन-सहनमं अपेक्षाकृत सुधार लानेका प्रयत्न करने लगा लो त्यों उसको पन्त्रिक प्रवृत्तियों में भी संयम और संस्कारकी मात्रा बढ़ने लगी। धीर- धोरे वह अवस्था आ गयी जब पातितकी भांति एक पली-त्रत सी आदर्श समझा जाने लगा और सभी धमाके अनुयायियोंने एक पनी-तको बहु व्याकी अपेक्षा अधिक उत्तम और प्रशंसनीय मानना शुरू कर दिया। इस प्रकार विकास-निमें एक लम्बा सफर तय पार चुकाने के बाद मनुष्य उस स्थितिमें आया है जब उसे अपना एक ऐसा ल्वाभाविक जोडा मिला जिसे उसने न केवल पन्द्रिका तृप्ति ही के लिये प्रत्युत खान-पोने, रहने- सहने, सुख-दुःख आदि सभी में समान भाग देने के लिये, प्रास किया। इस दशामें पलीका महत्व बहुत अधिक बढ़ गया और उसे 'अङ्ग तथा 'Better half' कहा जाने लगा। यही क्यों, हिन्दू समाजमें तो पत्नीको इतना अधिक महत्व दिया गया कि बिना उसके कोई भी शुभ काम, ( ख ) यज्ञ-योग और धर्मानुष्ठान पूर्ण ही नहीं माना जाता। न्यूनाधिक सभी धर्मों और सभी समाजों में स्त्रियोंको महत्त्व और आदरसे पूर्ण स्थान मिल गया। अन स्त्रियोंको घड़ेकी तरह बदल डालना या एकके रहते अनेकको घरमें ला बैठाना अवान्छनीय समझा जाने लगा। इस प्रकार जिस स्त्रीको अपनी चिरसंगिनी बनाकर सुख और दुःखमें सदा सर्वत्र अपनो बनाये रहने का सामाजिक विधान पुरुष-समाजको प्राप्त हुआ है, उसके प्रति सभी विषयों में समुचित व्यवहार करना उसका कर्त्तव्य हो जाता है। प्रस्तुत पुस्तक में इन्हीं विषयों पर प्रकाश डालते हुए स्वीके प्रति पुरुषके विभिन्न कर्त्तव्यों का दिग्दर्शन करानेकी चेष्टा की गई है। जमाना बदल गया है। जिस प्रकार अति प्राचीनकालकी प्रथाओंमें धीरे-धीरे आवश्यक सुधार करके समाजका वर्तमान रूप प्रादुर्भूत हुआ है उसी प्रकार समयको गति इतनी आगे बढ़ चुकी है कि हमें अपनी कतिपय रूढ़ियों और मूर्खताओंको दूर करनेका उपक्रम करना ही होगा-बिना इसके समाज 'सड़ा हुआ ही समझा जायगा । उदाहणरके लिये लैंगिक (Sexual) ज्ञानको ही लीजिए। मध्यकालसे अब तक इस विषयको परम गोपनीय बनाये रखनेके कारण वेश्यावृति और अनुचित सम्बन्ध आदिकी वृद्धि द्वारा समाजका जो अपकार हुआ है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। वर्तमान युग मनोविज्ञानका युग है। इसलिये सभी प्रकट और गुप्त बातोंकी छानबीन कर उसे सर्व साधारणके सम्मुख रखना विज्ञानका एक अङ्ग बन गया है। यही कारण है कि हमने प्रस्तुत पुस्तकमें लैंगिक Sexual) विषयोंकी चर्चा करने में हिचकिचाहट नहीं दिखलायो, क्योंकि वैसे चाहे कोई यह भले ही कह ले कि स्त्री-पुरुषका लम्बन्ध विषय- भोग और सन्तानोत्पत्तिके लिये नहीं है, किन्तु पूर्ण विचारके पश्चात् हमें यह मानना ही पड़ेगा कि दम्पतिका प्रधान उद्देश्य यही होता हैं। ऐसी ( ग ) अवस्थाम इल मुख्य विषयके ज्ञानले यंत्रित रहना मूर्खता नहीं तो क्या है ? हम यह भी मानते हैं कि स्त्री-पुरुषका संयोग आध्यात्मिक उन्नति के लिये भी है, किन्तु संसारमें रहकर कोई संसारकी माताको उपेक्षाकी दृष्टिले नहीं देख सकता। इसलिये काम-विज्ञान सम्बन्धी आधुनिक बातोंका समावेश इस पुस्तकम किया गया है। आशा है विवाहा और विवाहित युवक वृन्द इस पुस्तकसे यथेष्ट लाभ उठाकर हमारे परिश्रमको सफल बनायेंगे। दीपमालिका, १९९२ वि० श्रीयंकटेश्वर प्रेस, बम्ब राजबहादुर सिंह

ब्रह्मचर्य का महत्त्व
यह पुस्तक प्रत्येक बालक-बालिका तथा युवा-युवतीके लिये सखीवनी
बूटीका काम देती है। जिन्हें इस संसार-क्षेत्रमें अभी कुछ कर
गुजरना है और जो संसारके सच्चे सुखके लिये लालायित हैं,
उनके लिये यह कल्प वृक्ष है । जिसने अज्ञानवश या बुरी
संगतिमें पड़कर अपनेको बर्बाद कर डाला हो, जो बुरी
आदतोंका गुलाम बन गया, जिसकी आत्मापतित,
आचरण भ्रष्ट और शरीर दुर्बल हो गया हो; वह
इस पुस्तकको पढ़ कर नवजीवन प्राप्त कर
सकता है। तथा ब्रह्मचर्यके गुणोंको ग्रहण
कर जीवन का सच्चा सुख लूट
सकता है।
प्रत्येक विद्यार्थी, गृहस्थ तथा नौजवानको इस पुस्तकको
गलेहारकी तरह अपनाना और अपने पास
रखना चाहिये।
मूल्य केवल ।)
कलकत्ता-पुस्तक-भण्डार
१७२-ए, हरीसन रोड,
कलकत्ता।

युवक-पथ-प्रदर्शक किशोरावस्थाका अन्त खेलने-कूदने और वाल-सुलभ क्रीड़ा करनेके दिन जब व्यतीत हो चुकते हैं; एक लड़का जब ग्नाधारण पढ़ाई-लिखाईकी अवस्था पार कर चुकता है, तब उसे अपेक्षाचन निधन श्रेणीके माता-पिता कोई काम-धाम सीखनेके लिये बाध्य करते हैं और उन श्रेणीका सम्पन्न परिवार उसे आगे बढ़कर कालेज आदिमें पढ़ने या किसी कला-विशेपका अध्ययन करने के लिये प्रेरित करता है। यह वह अवस्था है जब लड़कोंको लड़कपन छोड़नेके लिये तैयार होना २ * युवक-पथ-प्रदर्शक * पड़ता है । अब तक माता-पिता और परिवारके लोग उसकी भूलों और गलतियोंपर विशेष लक्ष्य नहीं करते थे और उसकी छोटी- मोटी गलतियाँ लड़कपनमें गिनी जाती थीं; किन्तु अब चूंकि वह अपनी किशोरावस्थाको पार कर चुका है और ऐसा समझा जाता है कि अब उसे संसारमें भले-बुरेका कुछ ज्ञान हो चला है, अतः उसकी साधारण भूलें भी क्षम्य नहीं समझी जाती और उसकी बातोंका कुछ मूल्य समझा जाने लगता है। किशोरावस्थाका अन्त होते समय लड़कोंकी स्वाभाविक कोम- लता धीरे-धीरे दूर होने लगती हैं-उनके अङ्ग सुदृढ़ होने लगते हैं और कण्ठ-स्वर मोटा हो जाता है। इस उम्रमें लड़के स्वयं अपने अन्दर एक परिवर्तन अनुभव करते हैं-उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि वे एक नये युगमें प्रवेश कर रहे हैं। यद्यपि यह अवस्था लड़केमें पुरुषत्वके विकासका काल है; पर मूर्खतावश बहुत-से लड़के और उनके माँ-बाप यह समझ बैठते हैं कि इन दिनों लड़कोंमें स्त्री-जातिके प्रति साधारण आकर्षण उत्पन्न हो जाता है, अतः वे ऐन्द्रिक भोगके लिये योग्य हो जाते हैं। इस भारी भूलमें पड़कर कितने ही लड़के तो स्वयं अपना नाश कर लेते हैं और कितनोंहीके नाशका कारण उनके माता-पिता तथा परिजन बन जाते हैं। यद्यपि पन्द्रह-सोलह वर्षकी अवस्थासे ही लड़कोंमें उपर्युक्त प्रवृत्ति जागरित हो जाती है, किन्तु यह पुरुषत्वके विकासका श्रीगणेश होता है जो धीरे-धीरे वीस वर्षको अवस्थामें साधारणतः और चौवीस वर्षकी उनमें पूर्णतः परिपक्क होता है। जो लड़के इस पोडशवर्षीय प्रथम उमङ्गको * किशोरावस्थाका अन्त * वास्तविक प्रवृति समझ कर इसको और अधिक ध्यान देते हैं, वे अपने स्वास्थ्यको जन्म भरके लिये बिगाड़ लेते हैं और उन्हें अनेक बुरी आदतोंका शिकार बनना पड़ता है । जिस प्रकार दूधको पहले उफान में ही उनार लेनेपर उनमें पछो दूधका स्वाद और गुण नहीं आता, उसी प्रकार लड़कपनमें ही ऐन्त्रिक भोगमें पड़ जानेवाले लड़कंक जीवनमें कभी पुरुषोचित गुग और बास्तविक युवावस्था आ ही नहीं सकती। जिन मकानकी नींव ही कमजोर है उसका ऊपरी भाग केले सुदृढ़ हो सकता है। कभी न कभी एला मकान समयके पहले ही गिरेगा। इसी प्रकार लड़कपनमें कुसंगतिवश अथवा माता-पिताकी मूर्खतापूर्ण प्रेरणासे विवाह कर लेनेपर जो लड़के युवावस्था प्राप्त करने के पूर्व ही काम-वासनामें लिप हो जाते हैं, उनकी युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था ( यदि बुढ़ापे तक वे जीवित रह सके तो ) एक-सी ही व्यतीत होती है । जवानीका जोश क्या है, इसका अनुभव चे अपने जीवन में नहीं कर पात-न उनसे शारीरिक परिश्रम ही भली भाँति हो सकता है न मानलिक ही। इन तरह एक प्रकार वे टापने नाराका कारण बनकर जीवनको बोझकी तरह ढोते हुए उसका अन्त करते हैं। थोड़ी-सी भूलफे परिणामस्वरूप उनका मारा जीवन मिट्टीम मिल जाता है । इसलिये प्रत्येक समझदार लड़के और उनके माता-पिताको चाहिए कि इस अवस्था अत्यन्त सावधानीले काम लेकर अपने जीवनकी नींवको सुदृढ़ बनालें जिससे आगे चलकर उन्हें उक्त कष्ट न झेलने पड़े और वे अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्यका स्वाभाविक आनन्द प्राप्त कर सकें।

४ * युवक-पथ-प्रदर्शक * किशोरावस्थामें बालकका शारीरिक और मानसिक विकास होता है अतः वह प्रत्येक वातकी ओर बहुत जल्दी आकर्षित होता है-उसका मस्तिष्क उस अवस्थाको प्राप्त कर लेता है, जब उसमें खाभाविक उत्कण्ठा और ग्रहण-शक्तिका सुन्दर सुविकास हो उठता है। प्रत्येक बात जानने में वह स्वाभाविक तल्लीनता प्रकट करता है, ऐसी अवस्थामें उसे नाशकारी प्रवृत्तियोंका शिकार न होने देकर यदि पढ़ाने-लिखाने, नयी बातोंका ज्ञान प्राप्त करने में लगाया जाय तो उसका मन शीघ्र ही उसे ग्रहण कर लेगा और उसका शरीर भी तदनुरूप काम करने योग्य बन जायगा। युवावस्थाकी प्रौढ़ता प्राप्त करनेके पूर्व जो लड़के जिस क्षेत्रमें डाल दिये जाते हैं, वे निश्चय ही उसमें उन शिक्षार्थियोंकी अपेक्षा अधिक सुयोग्य होकर निकलते जो मानसिक एवं शारीरिक प्रौढ़ता प्राप्त करनेके बाद ऐसे क्षेत्रोंमें प्रविष्ट होते हैं। 'फिजिकल कलचर' नामक एक स्वास्थ्य-सम्बन्धी पत्रमें जर्मनीके यन्त्र-सम्बन्धी कार्य करनेवालोंके सम्बन्धमें जो आँकड़े प्रकाशित हुए थे, उनले मालूम होता है कि यन्त्रों (मशीनों) के कार्यमें ऐसे युवक अधिक संख्यामें सफल और सुदक्ष हुए जिन्होंने यह काम किशोरावस्थामें ही आरम्भ कर दिया था। इसी प्रकार भाषा-ज्ञान भी इसी अवस्थामें सर्वोत्तम रीतिसे होता है। रटने और ग्रहण करनेकी शक्ति इस अवस्थामें सबसे तोत्र होती है, इसीलिये प्राचीनकालसे ही हमारे ऋषि-महर्षियोंने इस अवस्थाको केवल विद्याध्ययन और खेल-कूदके लिये नियुक्त किया था और जब तक विद्याध्ययन पूरा न हो, तबतक किसी भी विद्यार्थीको विवाह *किशोरावस्थाका अन्त * करने या गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी आना नहीं थी। उन प्रणाली का लोप हो जाने के कारण आज हममें शारीरिक और मानग्निक हास इतना अधिक भागया है कि हमारा राष्ट्रका राष्ट्र ही नियाग हो चला है। प्रत्येक समझदार बालकको चाहिये कि वह अपने जीवनके इस अभ्युदय-कालका सदुपयोग करने के लिये कुसंगतोंसे बचे और यदि माता-पिता सूर्यतावश उसे इसी अवस्थामें विवाह- बन्धनमें जकड़ना चाहें तो उनसे साफ इन्कार कर दें। अपना समय केवल पढ़ने-लिखने खेलने-कूदने और नयी याने सीसनेमें लगाये । नफलतापूर्ण जीवन प्राप्त करने के लिये परे विवेकके साय बुराइयाँले बचते रहनेकी चेष्टा करें और क्षणिक उफानकी तरंगमें अपने धेयको न खाये। इस प्रकार के आचरण से बालक अपने जीवनकी पहली सीढ़ीको सफलतापूर्वक पारकर जायगा और वह व्यवस्था, जो सबसे नाजुक और सबसे महत्वपूर्ण है, सुखसे पूरी शार युवावस्थामें प्रवेश करेगा।

- - युवावस्थाका उदय -- युवावस्थाका उदय प्रायः अठारह वर्षके लगभग होता है और यदि संयम पूर्वक जीवन व्यतीत किया जाय, तो पैंतीस वर्ष तक उसमें अभिवृद्धि होती रहती है। शरीर-शास्त्र-विशारदों का कथन है कि इस अवस्थामें शरीरके प्रत्येक अवयवका विकास होता है- इसीलिये हमारे प्राचीन ऋपियोंने सर्वोत्तम ब्रह्मचर्य-पालनकी व्यवस्था अड़तालीस वर्षकी दी थी। आजकलकी स्थितिको देखते हुए तथा उत्तम शिक्षा, तपोभूमियोंके शुद्ध वातावरणके अभावमें उत्तम और मध्यम ब्रह्मचर्यका पालन तो इतना दुरूह हो गया है कि उसके पालन करने वाले कदाचित बन-उपवनोंमें भी बिरले ही मिलेंगे, *युवावस्थाका उदय * १७ फिर भी अच्छे माता-पिताका लड़का अपने घरमें रहते हुए भी धार्मिक शिक्षा और पारिवारिक नियंत्रणके बलपर साधारणतः चोचीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है। ब्रह्मचर्य-पालन पर अधिक जोर देनेका मतलब यह नहीं है कि विवाह करके गार्हस्थ्य जीवन व्यतीत करना कोई बुरी बात है। वास्तवमें प्रत्येक युवकका उद्देश्य तो यही होना चाहिए कि वह विवाह करके गृहस्थ बने और अपने पैरों पर खड़े होकर संयम पूर्वक जीवन व्यतीत करे, किन्तु परिपकावस्था प्राप्त करनेके पूर्व उन्हें विवाहसे परहेज ही करना चाहिए। वर्तमान परिस्थितिको देखते हुए और माँ-बापके अल्पावस्थामें ही विवाहित हो जानेके कारण सन्तानमें यकायक इतना संबल नहीं होता कि वे प्राप्तचयकी पूर्ण अवस्था तक संयम पूर्वक अपनेको संभाले रख सकें। इसलिये ऋषियों द्वारा उपर्युक्त अबस्था-क्रममें ढील देनेकी आवश्यकता पड़ गयी है और अब डाकर, वैद्य तथा हमारे समाजशास्त्री भी इस वातसं सहमत हो गये हैं कि देश काल और पात्रके अनुसार वैवाहिक क्रममें अन्तर पड़ जाना कोई अवाञ्छनीय वात नहीं है। ऐसे लोग विवाह के लिये छब्बीस वर्षकी अवस्थाको सर्वोत्तम, वाईस वर्षकी ववको मध्यम तथा अठारह वर्षको उम्रको निकृष्ट मानते हैं। हम भी वर्तमान कालमें इसीका समर्थन उचित समझते हैं, चचोंकि नगरों और कस्बोंके कृत्रिमतापूर्ण जीवनमें पड़कर तथा कुसंगतिके चकार में पड़कर भी कितने ही युवक विवाहके अभावमें प्राकृतिक और अप्रा- कृतिक व्यभिचारोंमें लित होकर अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं, * युवक-पथ-प्रदर्शक * इसलिये इससे उत्तम तो यही है कि ऐले युवक विवाहित हो जायें और अपेक्षाकृत कम खतरेका जीवन व्यतीत करें। यह तो हुई स्वास्थ्यरक्षा के लिये प्राचय-पालन की आवश्यकता । अब शिक्षा पर विचार करना आवश्यक है। जिस प्रकार किशोरा- वस्थामें बालक अपना समय आरम्भिक शिक्षा अर्थात् भाषा-ज्ञानको पूर्तिमें लगाता है, उसी भॉनि युवानन्या से विषय (Subjeet ) ज्ञानकी पूर्तिमें लगाना चाहिये। अपनी-अपनी मनोवृत्ति और शारीरिक एवं मानसिक क्षमताको अनुसार युवकों को शिक्षाका चुनाव करना उचित है। विश्वविद्यालयको आधुनिक कालेज-शिना-प्रगालो इतनी कृत्रिम, निकृष्ट और अनुपयोगी हो गयी है कि वह बहुत ही थोड़े विद्यार्थियोंके लिये थोड़े बहुत अंशों में कुछ काम की सिद्ध होती है.---वास्तविक बात तो यह है कि विदेशी भाषाके माध्यम द्वारा कोरी ज्ञान-प्रापिके लिये भी यह शिक्षा-प्रणाली उपयोगी नहीं सिद्ध हो सकती, क्योंकि प्रायः कालेजोंकी पढ़ाईमें भी किनी विषय को समझ कर हृदयंगम करनेकी अपेक्षा उसे स्टकर परीक्षाफे समय किसी प्रकार ज्योंका त्यों लिख देनकी क्षमता प्राप्त कर लेने पर ही अधिक जोर दिया जाता है। इसलिये सिवा ऐसे अमीर युवकोंके, जिन्हें थोड़ा-बहुत सैद्धान्तिक ज्ञान प्राप्त करना ही अभीष्ट होता है, मध्यम और निन्न श्रेणीके विद्यार्थियोंके लिये इस प्रकारकी शिक्षा अनुपयोगी ही नहीं, हानिकारक भी होती है, क्योंकि आर्थिक कठिनाइयोंके झेलते हुए भी वे जितने रुपये खर्च करके चार छ: वर्ष में बी० ए० या एम० ए० पास करते हैं, उतना रुपया पास करनेके KA युवावमा उदय बाद अपने जीवन भरने नहीं बचा नकद और प्रायः ऐसे अधिकांश लोगोको वकारीका शिकार बन दर-दर भटकना पड़ता है। उनकी विद्याका उपयोग दूसरे की दया पर निर्मर होता है और इस देश भवले पढ़े लिखें के लिये आजीविका कमाने का कोई भी मंत्र युन्ना नहीं है। इन बातों पर विचार करने हम हमें विवशतः यह काना पड़ता है कि इस प्रकारको नामधारी जमिदान वयानम्न वरना चाहिए और हाई स्यून्ट नक शिक्षा प्रान नारके ही कोई हाय काम करने का धन्धा नीचना चाहिए, जिनमें अवनी बोड़ी बहुत लाइन है। इस प्रकारका काम कली, कारन्यानों और दुकानों में तथा छोटे- मोटे बुनाई, सिलाई, कनाई, रंगाई आदिली व्यमिगत संस्थाओं में सीखे जा सकते हैं। यद्यपि आजको मैट्रिक नपाकी पढ़ाई कोई पढ़ाई नहीं है, क्योंकि उनले किनी विषयका क्रियात्मक नोल्या द्धान्तिक मान भी नहीं हो पाना, और विधार्थी इतना पढ़कर किसी प्रकार टूटी-फूटी भाषामें अपने विचार मात्र ज्या कर लेना है, किन्तु प्राय: यह देखने में आता है कितना पढ़कर ही अधिकांश विद्यार्थियों का दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ जाता है और यह हाथसे काम करना घृणाजनक समान लाने । संसारक दो लाश सभ्य और सुतस्पन्न देश अमेरिका और जापान निवासी शायले काम करनेको इतना गौरव प्रद समझते हैं कि इस समय नारे लार में उनका अनुकरण किया जा रहा है। अमेरिका गरीब विद्यार्थी तो होटलों में बर्तन मांज कर, बाजार में वृद्ध पालिश करके पुल्लक- पत्रिकाएँ और सावुन आदि नित्योपयोगी वस्तुओंकी फरी लगाकर - १० * युवक-पथ-प्रदर्शक धन कमाते और उसीसे विद्याध्ययनका खर्च चलाते हैं। एक ओर अमेरिका जैसे सुसम्पन्न देशकी ओर देखिये कि जिसकी प्रति व्यक्ति की प्रति दिनकी औसत आमदनी ८ डालकर प्रदि दिन है और एक ओर इस गरीव भारतकी तरफ दृष्टिपात कीजिए जिसकी प्रति व्यक्तिकी दैनिक आमदनीका औसत मुश्किलसे २१ पाई है ! अमे- रिकाका अमीर तो रेलगाड़ीसे उतर कर अपना सूटकेस अपने हाथसे ले चलनेमें नहीं हिचकिचाता और हिन्दुस्तानके अर्द्धशिक्षित और दरिद्र बाबू अपने छोटेसे हैण्डवेगके लिये भी कुलीकी तलाश करते हैं। पर हम लोगोंके कुसंस्कारका यह फल है और इसका कारण यह भी है कि हमें हाथसे काम करनेका महत्त्व नहीं बतलाया जाता और न कोई इसका आदर्श ही खड़ा करता है। हमारे उच्च श्रेणीके व्यक्ति यदि इस एक दिशामें ही कुछ आदर्श लोगोंके सम्मुख रखें तो उससे बहुत कुछ काम हो सकता है । गत भूकम्पमें पं० जवाहर- लालजी नेहरूने फावड़े चलाये थे उनकी देखा-देखी कितने ही अमीर विद्यार्थी और अन्य लोग फावड़े लेकर जुट पड़े थे। महात्मा गांधीका चर्खा चलानेका आदर्श भी इसी रूपमें व्यापक रूप प्राप्त करने लगा था। इस सिलसिलेमें यहां एक ऐसा उदाहरण देना भी अनुचित न होगा जो इन पंक्तियोंके लेखकसे सम्बन्ध रखता है। बारह वर्ष तक अमेरिका प्रवास करके लौटे हुए एक वंगाली ब्राह्मणसे भारतकी राजधानीमें मुझसे परिचय हुआ और धीरे-धीरे उनके सद्गुणोंके कारण इन पर अपार श्रद्धा हो गयी। वे मेरे पास आने-जाने लगे। उन दिनों वे सरकारी नौकरीमें एक उच्च a * युवावस्थाका नमत्र कोटिक अफसर थे। संयोगवश एक दिन मुझे दिल्टी प्रयाग ज्ञाना था। मेरे पास सामान अधिक था और एक बड़ा समुद्रफेस पुस्तकोसे ठसाटल भरा था। मेरा मकान गली-मुख्य सड़कन बहुत दर श्रा, इसलिये मैने बुल्ली बुलानेयः लिये एका लडकको बाजारमें भेज दिया । उनी लमय उपर्युक्त बंगाली बाबू बहा यायें और हम लोगोंद सामान पास रक्वं कुलीनी प्रतीक्षा करने देखाइम लोग चिन्तित हो रहे थे, क्योंकि गाडीका समय थोड़ा रह गया था और सामान चौराहे तक पहुंचा कर नांगा करना था। बंगाली बाचूने 'नत्र यह बान मालुम की तो आव देखा न ताव फौरन उठ खांदुए और पुस्तकांस भरा हुआ बड़ा सूटकस उठा कर चौराहे की ओर रवाना हो गये। उनको ऐसा करते देग्य पहले नो हम लोगोंने उन्हें ऐसा करनेसे मना किया; पर जब वे किनी नरहन मानेको बानी बचे हुए सामानको में और मेरे एक साथी लेकर उनके पीछे-पीछे चल पड़े । चौराहे पर पहुंच कर नुन्न्त ताँगा करके स्टेशन पर पहुंचे तो वहाँ गाड़ी अन्तिम नीटी दे चुकी थी-वर किसी तरह चलती गाड़ीमें सामान ढाल कर में गाड़ी में बैठ गया। यदि बंगाली बाबूने उस समय बह लटकस का कर हम लोगों को अपना सामान उठाने के लिये प्रोत्साहित न किया होता तो वा. गाड़ी न मिलनी और में जिस गुकदमेकी पेशीमें इलाहाबाद जा रहा था, उसमें उपस्थित न हो सकता । उपर्युन बंगाली बाबु कोई साधारण आदमी नहीं था। वे दर्शन विनान, मापा शान्त्र, इतिहास, नाट्यशाला. अर्धशाल, मनो- विज्ञानके पण्डित है और अनेक विषयों में आश्चर्यजनक अन्वेषण १२ * युवक-पद-प्रदर्शक कर चुके हैं। इन गहन विपयों पर आपने अमेरिकामें हजारों व्याख्यान दिये और अङ्ग्रेजीमें पुस्तकें लिखी हैं। एक ऐसे व्यक्ति का तीस सेरका बोझ उठाकर चल पड़ना, हम लोगोंके लिये कैसा लज्जास्पद मालूम हुआ होगा और हमें अपनी नज़ाकत पर कैसा परिताप हुआ होगा, इसका अनुमान सहज ही किया जा सकता है। पीछे मैंने बंगाली बाबूसे बातें की तो वे कहने लगे कि अमेरिका में गरीब और मध्यम श्रेणीके व्यक्ति ही नहीं, अमीर लोग भी अपने इतने सामानके लिये कुली नहीं खोजते, जितना वे स्वयं ले जा सकते हैं। युवकोंमें हाथसे काम करनेका गौरव बढ़ जाने पर देशका दुर्भाग्य बहुत कुछ दूर हो सकता है। प्रत्येक युवकको चाहिये कि वह अपने विकासको अवस्थामें जितने भी गुण सीख सकें सीख लें, क्योंकि इसी अवस्थाकी सीखी हुई विद्या और शिल्पकला जीवन- भर काम आती है। जीवन ऐसा अनिश्चित और विविध परिस्थि- तियोंसे पूर्ण है कि यह पता नहीं कि आज जो सम्पन्न है, कल वह दरिद्र नहीं हो जायगा। ऐसे दुर्दिनके समय कला-विधा-सम्पन्न- व्यक्ति कम कष्ट उठाता है, क्योंकि वह कोई न कोई काम करके अपनी आजीविका पैदा ही कर लेता है। विकासकी यह अवस्था चारित्रिक दृष्टिसे भी अत्यन्त महत्त्व- पूर्ण है । यह वह अवस्था है जब मनुष्यमें युवावस्थाके उदयके साथ- साथ वासनाओंका तूफान उठता है। विवाहित होकर भी जो लोग ऐसे समय पर संयमसे काम लेते हैं, वे आगे चलकर स्वास्थ्यकी ANTRA - न 4 प JAN + * युवानन्याका द्वन १६ दृष्टिले बहुन सुखी रहते हैं। वीरा मनाया गया स्त्री आने देती । संयमशील और मदाबारी शिवाजी अन्य शारीरिक अवयव नीश गिलिन लोग दीर्य रक्षाका ध्यान नहीं माने और अपने रख सकते, उनका शारीरिक हाल दायमा वे शीघ्र ही बुढ़ापे विकार बनाया लिये किसी विशेष नारी सरनमः । लोगोंको देग्विये मिलने पर नमी . ' ' अवश्य ही शारीरिक रोग : garni उत्पन्न होने वाले रोगों दिशा न आTE : दिया जायगा, अनः क बाद कि इन अवस्थाई तीन बार भर को एक प्रकारले सुनकर नमुन्थिन भोजन और पूरा ध्यानाम मीरा और तीसगी थिमा रमियानी प्रविधि :- कार्ग प्रान करना। जिन नाम: ग्रहण कर लिया है, उसी जीवाला इनमेसे एक की भी मेला कभी न कमी पश्चातापमाना। PUNE AL Sanee - . द * १ Air HT Kaa - 44 MA शिक्षा और उसका उपयोग आज कलके प्रायः सभी युवक यदि अधिक नहीं तो स्कूली शिक्षा तो प्राप्त करते ही हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें सौभाग्य या दुर्भाग्यसे कालेजोंमें पढ़नेका अवसर मिल जाता है। 'दुर्भाग्यसे' इसलिये कि एक तो उनकी कालेजकी शिक्षा प्रणाली ही ऐसी दोष- पूर्ण है कि वे ग्रेजुएट होकर यही नहीं जान पाते कि उन्होंने क्या पढ़ा है, और जो कुछ रट-रुट कर उन्होंने पढ़ा भी है उसका व्याव- हारिक ज्ञान तो वे कभी कुछ सोच ही नहीं पाते । 'सौभाग्यसे' इस- लिये कि हजारोंकी संख्यामें प्रतिवर्ष प्रत्येक विश्व-विद्यालयसे पास होने वाले ऐसे ग्रेजुएटोंमें से शायद सौ-पचास ही मुश्किलसे ऐसे मिलेंगे जिन्हें अपनी इच्छा और अभिलाषाके अनुसार कुछ काम करने या *शिक्षा और उसका उपयोग १५ या कहिये कि कुछ काम सीखनेका अवसर मिले और साथ ही उन्हें जीवन-यापनके लिये कुछ धन भी मिलता रहे । जिन युवकों के लिये यह परिच्छेद लिया जा रहा है-वे उपर्युक्त प्रकारक साधन-प्राप्त सौभाग्यशाली युवक नहीं है। यहाँ हम उन्हींके सम्बन्धमें कुछ लिनेगे जिन्हें या तो हाईस्कूल तक ही पढ़नेका मौका मिला है या जो कालेज तक पढ़ कर अपने मनमें दर-असल यह सोचते हैं कि उनकी शिक्षा अधूरी हुई है और नियात्मककी कौन कहे, संद्धा- न्तिक रूपमें भी उन्हें किसी विश्यका ज्ञान सम्यक् रूपेण नहीं हुआ है। शिक्षाक रूपके लम्बन्धमें कुछ लिखनेके पूर्व वह समझ लेना अधिक उपयोगी होगा कि शिक्षाका उद्देश्य क्या है। यह तो सभी मानेंगे कि शिक्षाका अन्तिम ध्येय सुख-प्राप्ति है, पर उसका प्रकट ध्येय है ज्ञान-प्राप्ति । किन्तु यापको सो में १० विद्यार्थी ऐसे मिलेंगे जो अपनी शिक्षाका ध्येय नौकरी तथा अर्थार्जन बतलायेंगे। ज्ञान- प्राप्तिके भी आधुनिक शिक्षा प्रणालीमें दो रूप हैं-एक सैद्धान्तिक और दूसरा व्यावहारिक । हमारे देशमें व्यावहारिक शिक्षाका एक प्रकारस अभाव ही है-इसीलिये विज्ञानादि व्यावहारिक विषयों की उच्चतम परीक्षा पास करके भी हमारे विद्यार्थी उले व्यवहारमें लानेमें कोरे ही रह जाते हैं और विशेष अध्ययन के लिये इसलेण्ड, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रिया, अमेरिका और जापान आदि देशों में जाकर उसकी पूर्ति करते हैं। इसका कारण यह है कि एक तो हमारे देशमें कला-कौशलका विकास नहीं हुआ है, और १६ * युवक-पथ-प्रदर्शक * आठ-आठ दूसरे जो कुछ हुआ है उसमें सुव्यवस्था और संगठनका अभाव है। यही कारण है कि हमारे उच्च शिक्षा-सम्पन्न लड़कोंको कहीं काम नहीं मिलता और वे मारे-मारे फिरते हैं। सरकारी नौकरियाँ थोड़ेसे विद्यार्थियोंको ही मिल सकती हैं, फिर इतने ढेरके ढेर विद्यार्थी इस उद्योग-धन्धेसे हीन खेतिहर देशमें जायँ तो कहाँ जायें। उनकी शिक्षा और कालेजका जीवन उनमें ऐसे संस्कार तो पैदा नहीं करता कि वे जितने भी साधन मिल सके, उनका उपयोग करके अपने ज्ञान द्वारा ग्रामों में काम करें, इसलिये वे कहींके नहीं रहते । फिर इसका उपाय क्या है ? इसका उपाय यही है कि यह नामधारी उच्च शिक्षा बन्द होनी चाहिए और इसमें चार-चार, छ:-छः और वर्ष लगाकर गरीब देशके हजारों रुपये फूंक कर उसमें लगे हुए रुपयेके सूदके बराबर भी वेतन न पा सकनेकी जो अक्ष- मता उनमें उत्पन्न कर दी जाती है, उसका पूर्णतः निषेध होना चाहिए । केवल उन्हीं गिने-चुने विद्यार्थियोंको कालेजकी महँगी और थोथी शिक्षा दी जानी चाहिए, जिन्हें पास फालतू पैसा हो, बर्बाद करनेके लिये पर्याप्त समय हो, और जिन्हें फैशनेबुल जीवन व्यतीत करते हुए केवल यत्र-तत्रका थोड़ा-बहुत सैद्धान्तिक क ज्ञान प्राप्त करना हो। कालेजकी शिक्षाके इन दोपोंके कारण क्या हैं ? इस पर यहाँ विस्तृत रूपसे विचार करना व्यर्थ है; किन्तु चूंकि प्रति वर्ष देशका कितना ही धन इस प्रणालीमें व्यर्थ व्यय हो रहा है, इसलिये इसके सम्बन्धमें कुछ संक्षिप्त रूपमें लिख देना नवयुवकोंके लिये बुरा नहीं * शिक्षा और उसका उपयोग १७ होगा। कालेजकी शिक्षाका सबने बड़ा और प्रधान दोष यह है कि उसका माध्यम विदेशी भाषा है, और उस भापामें जो पुस्तकें वहाँ पढ़ाई जाती हैं, उनका विपत्र समझना नो दूर रहा, उसकी भाषा नक वे नहीं समझ पाते और फलस्वरूप परीदगमें पास होने के लिये उन्हें रटना पड़ता है। कालेज प्रोकलाम से भी अधिकांशका यही हाल है कि उन्हें स्वयं उन विषयका पूर्ण ज्ञान नहीं होता, जिसकी शिक्षा देते हैं, इसलिये विद्यार्थियोंको मन्नोपजनक शिक्षा देनेक बदले में भी अपना औवा-ग्दीधा लेक्चर झाड़ते हैं-इस अटपट शिक्षा प्रणालीका फल यह होना है कि नामधारी विशेषज्ञों द्वारा प्रत्येक विषयको पुस्तकों पर कुंजियों और नोट्स लिखे जाते हैं और कितने ही विद्यार्थी उनकी सहायताले कुछ रट-स्ट कर पाय होनेकी तैयारी करते हैं। इतनी दिपन उठाकर तथा दिमाग पर अनावश्यक बोडर डालकर जो परीक्षा पान की जाती है. उसका परिणाम यदि छ लुम्बद हो तब नो कोई बात भी है.---परिणाम तो यह होना है कि पास होकर भी विद्यार्थियोंको दर-दर भटकना पड़ता है और उनके होशका पारावार नहीं रहता। इस पर भी लोग कालेजकी शिक्षा की ओर दौड़कर अपनी मूर्खताका जो प्रदर्शन करते हैं, वह वास्तवमें हास्यास्पद है। अब प्रश्न यह हो सकता है कि आखिर फिर शिक्षाका क्रम क्या हो और ज्ञान-पिपासु विद्यार्थी क्या करें। इसका उत्तर यही है कि हमारे यहाँक मध्यम श्रेणीके लोगों के लिये तो यह शिक्षा कौड़ी काम की है नहीं, क्योंकि प्रथम तो वचपनसे ही विदेशियों या विदेशी- २ * युवक-पथ-प्रदर्शक नुमा भारतीयोंमें न रहने-सकनेके कारण वे अंग्रेजी भापा, अंग्रेज़ी शिष्टाचार, अंग्रेज़ी रहन-सहन और अंग्रेज़ी वस्त्राभूपणको नहीं अपना सकते, दूसरे उन्हें अपने मध्यवित श्रेणीके नौकर या जमी- दार-किसानके गाढ़े परिश्रमकी कमायी कालेज रूपी महँगी सामा- जिक कुवोंमें नहीं गँवानी चाहिये और कालेजकी शिक्षा सामूहिक शिक्षा न रहने देकर केवल उन्हीं कतिपय भारतीयोंकी सन्तानों पर छोड़ देनी चाहिए जिनकी उच्च सरकारी नौकरियों तक पहुँच है, जो पाश्चात्य शिक्षा-प्रणालीसे रंगे हुए वातावरणमें रहते हैं और जिनके लिये वैसे क्षेत्रमें प्रविष्ट होनेकी सम्भावना है, जो असाधारण रूपसे मेधावी हों और केवल सामाजिक समूहके रूपमें कालेजमें प्रविष्ट हो अपने आप चमकने वाले हों, जिन्हें कोई बढ़ियां छात्र-वृति मिल रही हो या फिर जैसा कि ऊपर कहा गया, जिनके पास खर्च करनेके लिये पर्याप्त धन और खोनेके लिये पर्याप्त समय है। सारांश यह कि जिन्हें अपनी आजीविकाकी चिन्ता करनी हो, जिन्हें अपनी कमाईसे अपने परिवारको सुख पहुँचाना हो और जिनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति मध्यम और निम्न श्रेणीकी हो, वे कालेज की शिक्षा प्राप्त करके पीछे पछताये बिना न रहेंगे, क्योंकि इस शिक्षासे आजीविका तो मिलती नहीं और ज्ञान नाममात्रको प्राप्त होता है--फिर भला ऐसी शिक्षाके लिये घर-बार बेच कर, कर्ज उधार लेकर और अन्य आर्थिक तङ्गी उठाकर कालेजमें प्रविष्ट होना सूर्खता नहीं तो क्या है ? जिस नामधारी उच्च श्रेणीका वर्णन ऊपर किया गया है, उन्हें * शिक्षा और उसका उपयोग* १४ p+ M "r " " छोड़कर अन्य श्रेणीके युवकोंके लिये अनेक दोपयुक्त होते हुए भी बर्तमान हाई स्कूलकी शिक्षा ही पर्याप्त है। इसके बाद युवकोंको चाहिये कि वे अपनी प्रवृतिक अनुसार कोई न कोई काम सीखने में लग जाय । जिन्हें आर्थिक कठिनाईक कारण ज्ञान-प्राप्निमें सफलता न मिल रही हो और जो वास्तवमें जिज्ञासा रखते हो उन्हें अपने प्रिय विषयकी पुस्तकें बुनकर घर पर ही उसका अध्ययन करना चाहिए । अमेरिकामें मजदूर-पेशा लोगों के लिये वहाँके एक प्रका- शकने घरेलू विश्वविद्यालय ग्रन्थमाला ( Home University Series ) प्रकाशित की है, जिसमें कालेजों में पढ़ाये जानेवाले प्रत्येक विपयकी पुस्तकें उन विषयों के ऐसे-ऐसे आचार्यों द्वारा लिखाकर प्रकाशित की गयी है, जो उन विपयोंका वाससे चालिस वर्ष तक अध्यापन कर चुके हैं और जो अमेरिकाकी नवीनतम और वैज्ञा- निक शिक्षा-प्रणालीके जन्मदाता माने जाते हैं। ये पुस्तकें ऐसी सरल भाषामें लिखी गयी है कि हाईस्कूलकी शिक्षा समाप्त कर चुकने वाले विद्यार्थी उनकं नमझनेमें अधिक कठिनाईका अनुभव नहीं करेंगे, क्योंकि उनमें लाक्षणिक ( Technical ) शब्दोंका प्रयोग नहीं किया गया है। इन पंक्तियोंके लेखकाने साहित्य, इतिहास, प्रयोगात्मक, मनोविज्ञान और समाज-शास्त्रका अध्ययन उन्हीं पुस्तकांसे किया है और उसका दावा है कि वह उन विषयों में वर्त- मान भारतीय विश्वविद्यालयोंके औसत विद्यार्थियात कम ज्ञान नहीं रखता। अब रहा ऐसे विद्यार्थियोका प्रश्न जो आजिविकाके लिए किसी २० * युवक-पथ-प्रदर्शक विषयका ज्ञान प्राप्त करके शीघ्रातिशीघ्र कुछ आर्थिक सफलता प्राप्त करना चाहते हैं। वर्तमान अवस्थाको देखते हुए बिना पूंजीके युवकों के लिये यह तो सम्भव नहीं है कि वे कोई व्यापार या उद्योग-धन्धा कर सकें नौकरीके अतिरिक्त केवल कारीगरी और छोटे-मोटे कामों में लग जानेमें ही उनका आर्थिक कल्याण हो सकता है । जिन युवकोंको कल-कारखानोंमें घुस कर कुछ काम सीखनेकी सुविधा प्राप्त हो सके वे वैसा करें; पर जिन्हें ऐसी सुविधा नहीं है वे छोटे- मोटे काम अपना लें। अभी तक शिक्षित युवकोंने इन छोटे-मोटे कामोंमें हाथ नहीं डाला है। ये काम हैं-बूट पालिश, बर्तनों पर कलई, साबुन-तैल और अन्य हल्के दामोंकी चीज़ोंकी फेरी करके उन्हें बेचना। निस्सन्देह ऐसा काम करनेमें शिक्षित युवकोंमें कुछ संकोच और लज्जा उत्पन्न होगी; पर इससे हाथसे काम करनेका गौरव बढ़ेगा और इस प्रकार शिक्षितों द्वारा यह कार्य होते देख लोग उनसे काम करवाने और सौदा लेनेमें तरजीह भी देंगे। इस प्रकारके काम करनेमें थोड़ा साहसका काम अवश्य है; पर इसका परिणाम आशाजनक होगा, इसमें सन्देह नहीं ।

स्वास्थ्य और व्यायाम शरीरको मुविकासको अवस्था, यह आवश्यक ही नहीं अनि- वार्य होना चाहिये कि प्रत्येक युवक अपनी शारीरिक शानिरके अनु- मार व्यायाम करे । आज कल बहुतेरे युवक यह कह कर व्यायामसे पिण्ड छुड़ाते हैं कि उन्हें उसके लिये समय नहीं मिलना या आलस्यः बश वे उस ओर ध्यान नहीं देन है। इनमें पहली बात तो विलकुल गलत है, क्योंकि चौबीस घण्टे में केवल आधा घण्टा व्यायामके लिये न निकाल लकना व्यायाम न करनेका बहाना मात्र है। जिस शरीर पर संसारके सारे दुःख-सुख निर्भर हैं उसके स्वस्थ रखने के लिये थोड़ा सा व्यायाम भी न करना, कितने दुःख की बात है । यद्यपि युवावस्थामें बहुतोंको व्यायाम न करने पर भी शारीरिक हास २२ * युवक-पथ-प्रदर्शक * mah मालूम नहीं होता, परन्तु व्यायाम न करने वालोंका शरीर प्रौढ़ा- वस्थामें बेडौल और भद्दा होकर बलहीन हो जाता है। व्यायामसे जहाँ शारीरिक स्वास्थ्यका लाभ है, वहाँ इससे मान- सिक स्वास्थ्य पर भी प्रबल प्रभाव सिद्ध हो चुका है। नियमपूर्वक व्यायाम करने वाले व्यक्तिका मन अधिक चञ्चल नहीं होता और उनमें इन्द्रिय-निग्रहकी प्रवृत्ति स्वाभाविकतया उत्पन्न हो जाती है जो युवावस्थामें स्वास्थ्यकी कुंजी है। व्यायाम करने वाले युवक शीघ्र ही बीमार नहीं पड़ते, सर्दी-गर्मी का प्रभाव उन पर कम पड़ता है, क्योंकि उनकी सहन शक्ति बढ़ जाती है। यह कहनेकी तो आवश्य- कता ही नहीं है कि व्यायामके विना शारीरिक सौष्ठव और सुडौल- पन यथेष्ट रूपमें आ ही नहीं सकता। कसरती लोगों को अजीर्ण बदहजमीका रोग कभी नहीं होता और बदहजमी सारे रोगोंकी माता है । पूर्णत: रक्त प्रवाह होने और स्वेद-रंध्र खुले रहनेके कारण चर्म रोग भी कसरतीके पास नहीं फटकते। व्यायाम करते समय मुक्त श्वांस लेनेके कारण श्वांसे नलिका और फेफड़े ऐसे स्वच्छ रहते हैं कि खाँसी आदिसे लेकर आज कलके क्षय आदि तक कोई भी रोग पास नहीं आता। प्राचीन भारतमें व्यायामकी प्रथा इतनी अधिक प्रचलित थी कि गांव-गांवमें मल्ल शालाएं और अखाड़े खुले रहते थे और किशोरावस्थासे ही लड़कोंमें व्यायामकी आदत डाल दी जाती थी। मल्ल-युद्धकी प्रति स्पर्धा बड़े-बड़े राज-दरबारों में होती थी और सुन्दर शारीरिक कौशल दिखलाने वालोंको बड़े-बड़े पुरस्कार मिलते . थे। इस कलाको प्रोत्साहन इसलिये दिया जाता था कि इस पर * स्वास्थ्य और व्यायाम * २३ सारे राष्ट्र और सारे समाज का स्वास्थ्य निर्भर करता था। अब भी बडोदा आदि कई राज्यों में व्यायामको पर्याप्त प्रोत्साहन दिया जा रहा है। बड़ोदकी जुम्मा दादा व्यायामशाला भारतमें अद्वितीय संस्था है और उसके संचालक प्रोफेसर मानिक राव व्यायाम-प्रचारकी बैज्ञानिक प्रणाली काममें ला रहे हैं। यदि भारतके अन्य राजे- महागजे इसका अनुकरण करें, तो राष्ट्रका बड़ा कल्याण हो सकता है। संसारके राष्ट्रामें इस समय व्यायाममें जर्मनी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, यही कारण है कि मनोक स्त्री-पुरुपोंका कद, स्वास्थ्य और चल संसारके अन्य नभी राष्ट्रोंसे उच है। हम प्रत्यक्ष देव रहे है कि उत्तम खान और व्यायामक अभावसे हमारी प्रत्येक पीढ़ी पहलेकी अपेक्षा शारीरिक कद और बल दोनों ही में क्षीण होतो जा रही है और यदि यही क्रम रहा तो अनेक पोड़ियां बाद पांच फीट का भी आदमी खोजने पर न मिलेगा। स्वाय-पनार्थकी कमी तो सामू- हिक रूपसे दूर की जा नहीं सकनो, क्योंकि हम राजनीतिक दृष्टिले परनन्त्र है, पर जिन्हें खाद्य-पदार्थ पर्यात मिलना है, हमारे यहां के भी व्यायाम पर ध्यान नहीं देत-अतः कमले कम ऐसे व्यक्तियों को तो अवश्य हो संसारके लामने यह आदश रखना चाहिये कि व्यायाम पर स्वास्थ्य-सुधार कितनी अधिक मात्रा निर्भर है। अब हमें व्यायामक मंदापर विचार करना चाहिए। किस प्रकारका व्यायाम हमारे शिक्षित युवकोक लिये अधिक उपयोगी होगा नया किसमें थोड़ने थोड़ा नमय लगाकर सारे शरीर पर पूरा वल डाला जा सकता है, यह जान लेनेपर उनका अभ्यास सरलना- M २४ * युवक-पथ-प्रदर्शक पूर्वक किया जा सकेगा। साथ ही स्वप्नदोषादिसे भी विना औषधि आदिके सहज ही त्राण मिल जायगा। यहाँ केवल ऐसे ही व्यायाम दिये गये हैं, जिनका अभ्यास इन पंक्तियोंके लेखकने स्वयं किया है और उनसे इतना अधिक लाभान्वित हुआ है कि जिसका वर्णन यहां स्थान संकोचके कारण हो नहीं सकता। साधारणतः बदहजमी, मलबद्धता और स्वप्नदोष-जिनके शिकार आजकलके शिक्षित नवयुवकोंमें ८० प्रतिशत होते हैं में तो केवल पन्द्रह दिनके अभ्याससे आश्चर्यजनक लाभ दिखायी देगा। इन व्यायामोंमें कुछ खर्च नहीं करना पड़ता, न इनके लिये लम्बे-चौड़े मैदानको ही जरूरत पड़ती है, इसलिये इनके करने में किसी विशेष तैयारीकी जरूरत नहीं पड़ती। प्रासन-व्यायाम स्वास्थ्य तथा ब्रह्मचर्य कायम रखने के लिये जो आसन श्रीपाद- दामोदर सातवलेकर जी की कृपासे सारे देशमें विख्यात हो गये हैं, उनका संक्षिप्त वर्णन यहाँ दिया जाता है:- (१) शीर्षासन-मुलायम कपड़ेको लपेट कर बोंडा या फेटा-सा बनाकर रक्खे और उसपर सिर रखकर हाथोंका टेकाले, धोरे-धीरे पाँव ऊपर उठाये । आरम्भमें ऐसा न कर सके तो दीवारका सहारा ले ले या किसी मित्रसे कहे कि वह पैर पकड़ कर ऊपर उठाये रहे और धीरे-धीरे उसे थोड़ी देरको छोड़ दे। इस प्रकार १०-५ बारमें अभ्यासके बाद नवसिखुवे भी इसे कर लेंगे और बादमें अपने आप पैर ऊपर उठाने में समर्थ हो जायेंगे । इस प्रकारका A te म म V से में Train ke hy r wer -- Yy-hinata D न . an . -- * Y andereran by आसन गुना - मिनदसे अधिक की , अभ्यास हो जाने पर भी किट ::: चाहिये। इससे नेत्रीको कमजोगी. दि. :- वीयरोग दो-एक मास कन्यामर बाद मी. मयमें पकनेवाले बाल भी शर्म याने (२) सिंहासन-बानी ओर और दाहिने पैरणी धामी गर्न म दोनों हाथ फैलाकर मुटने पर लिया। पूरी लम्बाईक साथ बाहर अग्रभाग पर घिर पर नाना (३) पनामन-सी मार पर और भयको दाहिनी नगर : intra पहले नो कठिनाई अध्ययो । काम- इनमें मरलता जायगी ! RATAR दाहिने हायको पीट पीर में जाकर सर या पकड़िए, इसी प्रकार या नाय का ? लीजिए। इस प्रकार पांच मिन्ट मन पर लेना चाहिए। (४) वीरासन-दोनों पदों पर पानी निकाल यार वटना चाहिए। विवालियानो भी जमीन पर टंक रखनी चाहिये । तर करना चाहिए। A Y # . १. क 2 the other + AP . २८ * युवक-पथ-प्रदर्शक रक्षाका आदर्श रक्खा है। उन्होंने स्वास्थ्य रक्षाके लिये लाखों डालर खर्च करके संस्थाएँ कायम की जिनसे अमेरिकन जनता बहुत लास उठा रही है। भारतमें अभी अमीरों की प्रवृत्ति इधर नहीं गयी है कि वे स्वास्थ्य रक्षाके लिये बढ़िया-बढ़िया खेलोंका प्रचार करनेके लिये प्रचुर धन लगाकर ऐसो संस्थाएँ खोलें जिनसे सारे राष्ट्रके स्वास्थ्यपर प्रभाव पड़े। जमनी और रूसकी सरकारने तो अपने देशके स्त्री-पुरुष दोनोंहीके व्यायामके लिये समुचित व्यवस्था करदी है और इसके लिये उपयुक्त देशोंको सरकारें अपने बजटमेंसे काफी धन खर्च करती हैं यहाँ व्यायाम पर एक और अमेरिकन सज्जनके आश्चर्यजनक आदर्शका उल्लेख करके हम इस परिच्छेदको समाप्त करेंगे । इन सज्जनका नाम है सैनफोर्ड वैनेट । इन्होंने पचास वर्षकी अवस्थामें विस्तरेपर लेटे-लेटे व्यायाम करनेकी नवीन प्रणाली निकाल कर अपने स्वास्थ्यमें ऐसा चमत्कारपूर्ण परिवर्तन कर लिया कि देखने- वाले उन्हें पहचान नहीं पाते थे कि वह वही मि० वैनेट है या कोई दूसरे । अव बहत्तर वर्षकी अवस्थामें वह पचास वर्षकी अवस्थाकी अपेक्षा कहीं अधिक स्वस्थ और अल्पायु मालूम होते हैं। इनकी दोनों (पचास और बहत्तर वर्षकी) अवस्थाओंके फोटो देखकर हमें आश्चर्यसागरमें गोते लगाना पड़ता है। इनका दावा है कि यदि इनकी प्रणाली काममें लायी जाय तो युवक वृद्धावस्थाको इस रूपमें प्राप्त ही नहीं हो सकते जैसा अभी होते हैं और वृद्धोंको भी बुढ़ापेका कष्ट इस रूपमें नहीं उठाना पड़े जैसा अब उठाना पड़ता है।

* स्वास्थ्य और व्यायाम * २६ सैनफोर्डबनेट महोदयने अपने अनुभवोंक आधारपर "Old Age its causes and Prevention" * (वृद्धावस्था-'इसके कारण और रोकने के उपाय) नामक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी है, जिसमें उनके चमत्कार पूर्ण स्वास्थ्य-परिवर्तन और बिस्तर पर लेटे-लेटे की जाने- वाली कसरनोंका मनोरंजक और वैज्ञानिक वर्णन सरल भाषामें किया है। जो पाठक अंग्रेजी भाषाका पयाम ज्ञान और २० शिलिंग खर्च करने की क्षमता रखते हो, वे उक्त पुस्तकको अवश्य पढ़ें और पढ़कर उन व्यायामोंका अभ्यास करें जिनका उसमें वर्णन है। *इल पुस्तकका हिन्दी अनुवाद भी कलकत्तेके किसी प्रकागकने काया कल्प' नामले प्रकाशित किया है।

ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्यका अर्थ यद्यपि बहुत व्यापक है और उसकी पूर्ण साधना साधारण कोटिके मनुष्यके लिये कष्ट साध्य है; किन्तु आज- क प्रचलित साधारण अर्थमें ब्रह्मचर्यका जो आशय समझा जाता है, हम यहाँ केवल उसीपर विचार करना चाहते हैं । साधारणतः यह कहनेमें आता है कि काम-वासनाको संयम-पूर्वक रोक कर एक गृहस्थ भी ब्रह्मचर्यका पालन करता, या कमसे कम कर सकता, है। कठोर अर्थमें ब्रह्मचर्यका अभिप्राय तो यहांतक है कि स्त्रियोंका दर्शन ही नहीं स्मरण तक न किया जाय; किन्तु आजकल वनवासियोंके लिये भी स्त्री-दर्शनसे बचना सम्भव नहीं है और सच बात तो यह है कि इस जमानेमें स्त्री-दर्शन आदिसे बचनेकी अपेक्षा, परिवार में *ब्रह्मचर्य * ३१ जहाँ अपनी श्री न होते हुए भी अन्य स्त्रियां होती ही है, रहकर भी आत्म-दमन करनेवालोंको ही हम ब्रह्मचारी कहते हैं, या कमसे कम कहना चाहिये । जो पुरुप अपनी बीके साथ रहना हुआ भी इस प्रकार संयम-पालनमें सक्षम है, वही वास्तविक युवक और ब्रह्मचारी है । आजकलके युवकों में पाश्चात्य शिक्षा और रहन-सहनके संसर्गस कामुकता बढ़ती जा रही है और बहुत-से युवक तो पशु-पक्षियोंसे भी गये-बीते हैं, क्योंकि पा-आदि तो लालमें एक बार अपने केलि-काल पर ही मैथुन करते हैं और मादाले गर्भ धारण कर लेनेके बाद प्रथम तो नर उसके पास सहवासके लिये जाता ही नहीं और यदि जाता भी है तो मादाही उसे उचित दण्ड देनेको नैयार हो जाती है। मनुष्य जातिका यह घोर पतन कितना दुःखजनक है। इस प्रकारकी अतिशय कामुकताका परिणाम न केवल बी-पुरुषक स्वास्थ्यपर पड़ता है, प्रत्युत उनकी सन्तान भी वैसी ही दुर्वलन्द्रिय विकलांग और मृतप्राय-सी होकर जीवन व्यतीत करती है। स्त्री- • पुरुपके सहयोगका निश्चित काल तो होना ही चाहिये-साथ ही जिस दिनसे स्त्री गर्भ धारण करे तबस बच्चा पैदा होने तक ही नहीं वरन् जबतक बचा दूध पीना न छोड़ दे, स्त्री-सम्भोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब तक बचा छोटा होता है तबतक स्त्री-सम्भोग करनेपर उसका दूध खराब हो जाता है जिसका असर चक स्वा- स्थ्यपर बुरा पड़ता है। इसलिये कमसे कम जयतक बच्चेको दाँत न निकल आयें स्त्रीके पास नहीं जाना चाहिये । अब प्रश्न यह उठ सकता है कि इस प्रकारका आत्म-संयम किया ३२ * युवक-पथ-प्रदर्शक * किस प्रकार जा सकता है ? इसके अनुकूल मनोवृत्ति वनानेके लिये एक तो भोजन सादा-निरामिप होना चाहिये, दूसरे प्राणायाम और व्यायाम द्वारा मनो-निग्रह करना चाहिये। धार्मिक-विशेषतः दार्शनिक विषयोंके अध्ययनमें भी थोड़ा समय लगाना चाहिये । कामोत्तेजक बातों और प्रसंगोंसे बचते रहना चाहिये और जहाँ तक सम्भव है, सम्भोग-विषयक वातोंको सोचनेका अवसर ही मनको नहीं देना चाहिये । इसका सबसे सहज उपाय यह है कि आप जो काम करते हों उसमें अपनेको इतना तल्लीन करदें कि इस प्रकारकी बातें सोचनेका आपको अवकाश ही न मिले, क्योंकि प्रायः इस प्रकारकी बातें निठल्ले बैठनेपर ही अधिक याद आती हैं। दूसरा उपाय है अपनेसे श्रेष्ठ गुरुजनोंकी संगति और प्रभावमें रहना । चित्तको चंचल होनेसे रोकनेके लिये प्राणायाम वैज्ञानिक दृष्टिसे अभूतपूर्व उपाय सिद्ध हुआ है, इसलिये जो मनकी चंचलता रोकना चाहें उन्हें यह अभ्यास नित्य प्रात:-सायं या कमसे कम एकबार दस मिनट खर्च करके अवश्य करना चाहिये । विधि-प्रणायामकी सरलतम विधि इस प्रकार है। दाहिने हाथके अँगूठे और अनामिका उंगलीसे नासिकाको इस प्रकार पकड़िये कि दोनों छिद्र मुंद जायँ । अब अनामिका उठाकर बायें नासिका-रंध्रसे धीरे-धीरे साँस खींचकर भर लीजिये इसे पूरक कहते हैं। अब अनामिकासे खुला हुआ नासिका-छिद्र बन्द कर लीजिये और उसके चौगुने समय तक दोनों छिद्र बन्द करके स्थिर वैठे रहिये-इसे कुम्भक कहते हैं। फिर धीरे-धीरे दाहिने छिद्रसे *ब्रह्मचय * साँस बाहर निकाल दीजिये साँस निकालनेको रेचक कहते हैं, इसमें पूरकका दुगना समय लगना चाहिये जैल यदि यूरक १६ गिनने तक करें तो कुम्भक ६४ और रेचक ३२ गिनने तक इसी प्रकार दाहिने छिद्रसे वायु खींचकर मरिचे और फिर बन्द रखकर बाँचें छिद्रले छोड़ दीजिये इस प्रकार कमले कर नीन बार कीजिए । कंवल इतने ही प्राणायामका अभ्यान एक गृहल्यके लिये आवश्यक है। यद्यपि यह विषय इतना गम्भीर है और इसकी सीढ़ियाँ इतनी है कि वास्तविक जिनानु और शिक्षा के लिये इसकी शाग्याम्-प्रशाखाएँ बढ़ती ही जाती है और इनके द्वारा चित्तकी वृत्तियों का निरोध होकर मनुष्य योगी बन जाता है, किन्तु ऐसे पुत्र के लिये जो संसार में विवाह करके स्त्री-चयों में रहना चाहता है ये सब सोपान वाञ्छनीय नहीं है क्योंकि गृहस्थ पुरुपकं लिये ब्रह्मचर्य भी एक विशेष सीमा नक ही पालनीव होता है। जिस पुरुपका आहारादि ठीक समयपर उचित मात्रा में होता है और जो अपने आचार-व्यवहार की लगाम अपने हाथ में रखता है कोई कारण नहीं है कि पना आदनी एक सद्गृहस्थ होता हुआ आवश्यक घनचर्यका पालन न कर नके। मानस शास्त्रका यह सिद्धान्त है कि जिस विषयको जितना अपालनीच और दुर्धर्ष समझा जाता है, वह वास्तबमें वैसा ही हो जाता है, इसलिये यदि हम ब्रह्मचर्य अर्थात् सदाचार-पालनको सहज साध्य समझ कर नदनुसार कार्य करें तो कोई कारण नहीं है कि हम उनले विचलित हों। जीवन में ब्रह्मचर्य-पालनमें बाधा डालनवाली और भी अनेक बाते हैं, जिनपर ३ * युवक-पथ- थ-प्रदर्शक * विचार करके समुचित उपायोंका अवलम्बन करना आवश्यक है । ये बाधाएँ ऐसी नहीं हैं जो थोड़ेसे विचारपूर्ण व्यवहारसे दूर न की जा सकें। आप अपने भोजनके सम्बन्धमें अत्यन्त सावधानीसे काम लें। ( क ) भोजन अल्पमात्रामें करें, (ख) चाय, काफ़ी, कहवा, शराब आदि उत्तेजक पेय न पियें, (ग) गुह्योन्द्रियोंको ठंडे जलसे दिनमें दो बार धोयें, (घ) रात्रिको देरसे भोजन न करें, (ङ) कामो- तेजक पुस्तकें न पड़े, (च) सुन्दरी स्त्रियोंके चित्र न देखें, (छ) किसी भी स्त्रीके साथ एकान्तवास न करें, (ज) मनको एकाग्र करनेके लिये सदा सयत्न रहें। वीर्यरक्षाके जो सुपरिणाम होते हैं, उनसे कोई इनकार नहीं कर सकता। वीर्यरक्षाके प्रतापसे ही हनुमान और भीष्मका नाम इति- हासमें अमर हो गया। ब्रह्मचर्यव्रतके खण्डनके कारण ही अभिमन्यु, पृथ्वीराज और नेपोलियनको असफलताका सामना करना पड़ा। अधिक बतानेकी आवश्यकता नहीं-हिन्दुओंके धर्म ग्रन्थ और इतिहास इस बातके साक्षी हैं कि जिस किसीने वीर्यरक्षाका व्रत लिया उसने संसारमें महान कार्य कर दिखाया । ऐसी अवस्थामें जिस किसी युवकको वास्तवमें ब्रह्मचर्यका पालन करना हो वह निम्न बातोंका विशेष ध्यान रखें:- (१) तम्बाकू किसी भी रूपमें खायें, पियें या संघे नहीं। (२) किसी भी तरहकी नशेकी चीजें जैसे शराब, भाँग, गाँजा, चरस, आदिका सेवन न करें। - - ,

*ब्रह्मचय*
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(३) मलाला नया खड़ी गली चीजोंका लेवन न करें।
(४) माँस, अण्डा, मछली और इस प्रकार के अन्य पदार्थाका
सेवन न करें।
(५) नॅग पोशाक न पहनें । यथासम्भव दीले बन ही पहनें !
(६) मन और शरीरको सुस्त न होने दें।
(n) कामुक लोगोंकी सङ्गनले बचते रहें।
(८) मनको दृढ़ रखें।
(5.) शरीर को स्वच्छ रखें
(१०) दवाइयांक संवनसे यथासम्भव बचते रहें।
(११) कठबंधोंसे बचते रहें।
(१२) खट्टे, कड़वे ओर नेल में बने पदार्थाका सेवन यथासम्भव
कम करें।
(१३) भोजनके बीच में और कोई चीज खाकर पात्रन-शक्ति
को न बिगाड़ें।
(१४) यथासम्भव फलोंका व्यवहार करें।
तन्दुरुस्ती, सदाचार और सुन्नकी इच्छा हो तो प्रहरचर्वका
पालन अत्यावश्यक है। ब्रहाचयक बिना पवित्रता और स्वच्छता
असम्भव है । स्वास्थ्य-सुधार और आत्मोन्नतिके लिये हिन्दु-समाजमें
अनेक व्रत और त्योहार प्रचलित हैं। आजकल के युवक उनकी चर्चा-
मात्रले नाक-भौं सिकोड़त है, किन्तु वे इन प्रतों और त्योहारों के
मौलिक रहस्यको नहीं समझते । व्रतोंक रखनेसे शरीर स्वस्थ रहता
है और पाचन-क्रिया नहीं बिगड़ती। सप्ताह अथवा पक्षमें एकबार

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* युवक-पथ-प्रदर्शक *
(७) रहनेके लिये स्वच्छ, हवादार और प्रकाशयुक्त कमरा
होना चाहिए।
(८) विवाहित पति-पत्नी अलग-अलग शैय्या पर सोयें।
(8) प्रातःकाल स्नानके समय लिंगेन्द्रियका उपरका चमड़ा
हटाकर उसपर जलकी पतली धार डालें। इससे इन्द्रिय स्वच्छ रहती
है और नसोंमें उत्तेजना कम होती है ।
(१०) प्रातःकाल शीघ्र उठनेके लिये रात्रिको जल्दी ( १० बजे
तक) सो जायें।
(११) यथासम्भव खुली जगह और धूपमें कुछ देर टहलें ।
(१२) दिन-रात जब तक जागते रहें, मनको किसी न किसी
कार्यमें लगा रक्खें । खाली बैठकर व्यर्थके ख़याली पुलाव न पकायें।
(१३ ) कमसे कम ३ मील नित्य अवश्य चल फिर लें।
(१४) मानसिक शक्तिको घढ़ बनानेके लिये नित्य १० मिनट
यह सोचें कि मेरा शरीर स्वस्थ है और मैं दिन-पर-दिन हर प्रकारसे
उन्नति कर रहा हूँ। निराशाको पास न फटकने दें।
(१५) सायंकाल धार्मिक और दार्शनिक विषयोंका अध्ययन
करें।
उपर्युक्त नियमोंका मनसे पालन करनेवाला ब्रह्मचर्य-व्रत पालन
करनेमें सफल हो सकता है और वीर्यक्षयसे बचे रहनेके कारण
उसके शरीरकी कान्ति, ओर और सहन-शक्ति बढ़ सकती है ।
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वीर्य-सम्बन्धी रोग प्रायः किशोरावस्थामें कुसङ्गतिमें पड़कर या समुचित शिक्षा- दीक्षा और देख-रेखक अभावमें बहुत-से युवकोंको वीर्य-नाश सम्बन्धी खराब आदतें पड़ जाती हैं। यद्यपि साधारण अवस्थामें ये आदतं दूर नहीं हो सकतीं, किन्तु जिन्हें अपने जीवनका कुछ भी ख्याल है और जो संसारमें विवाह करके पति और गृहस्थ बननेकी इच्छा रखते हैं, उनका यह कर्तव्य है कि जब तक वे अपनी आदत न सुधार लें, तब तक विवाह करके एक अबोध लड़कीका भी जीवन नष्ट करनेकी योजना न करें । उनका कर्तव्य यह कि सबसे पहले वे अपने स्वास्थ्यको सुधारें, क्योंकि जब तक कोई युवक हस्तमैथुनादिका शिकार बना हुआ है, तबतक उसे अपनेको * युवक-पथ-प्रदर्शक * .... n स्वस्थ समझनेका कोई अधिकार नहीं है। इसी प्रकार जिन्हें स्वप्न- दोप अधिक होता है और जो प्रमेहादिसे पीड़ित हैं, उन्हें पहले इनसे छुटकारा पानेको चेष्टा करनी चाहिये । इसमें सन्देह नहीं कि साधारणतः स्वप्नदोप और धातुपतन आदि हल्के रूपमें होंगे तो वे सादे आहार, खटाई, मिठाई, तैल और लाल मिर्चा आदिके त्याग तथा पूर्व परिच्छेदमें लिखित आसन व्यायाम और प्राणायाम आदिसे अवश्य दूर हो जायेंगे; किन्तु जिनकी अवस्था अधिक भयंकर हो गयी हो उन्हें किसी योग्य वैद्य या डाकरकी शरण लेनी ही पड़ेगी, क्योंकि जो धातु-पतन या निरन्तर स्वप्नदोपसे अत्यन्त दुर्बल हो गये होंगे उनके लिये आसन व्यायाम उलटे हानिकारक सिद्ध होंगे-दुर्बल शरीर इन कसरतोंको सहन नहीं कर सकेगा। जब तक इस प्रकारके रोग अधिक प्रवल न हो जायँ तब तक आसन, व्यायाम, प्राणायाम तथा परहेजके साथ आहार इनकी जड़ उखाड़नेके लिये पर्याप्त हैं, किन्तु इनके अधिक प्रबल हो जानेको अवस्थामें पहले चिकित्सा द्वारा उनका बल घटाना चाहिये और फिर कुछ बल प्राप्त करलेनेपर रोगीको चाहिए कि वह नियमितरूपले स्वबलानुसार आसन, व्यायाम और प्राणायामका अभ्यास करे। जवानीके जोशमें अन्धे होकर परिणामों पर विचार किये बिना बहुत-से युवक विवाहके पूर्व या विवाह हो जाने पर भी वेश्याओंके पंजेमें फँस जाते हैं, और पीछे उनकी जो दुर्दशा होती है वह वर्णनातीत है। वेश्याएँ भयंकर रोगोंको भण्डार होती हैं और उनका * वीर्य-सम्बन्धी रोग* ४२ संसर्ग कर के युवकगण सी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं जो न केवल उनके ही जीवनका नाश कर देती है, प्रत्युन विवाहित होने की अवस्थामें उनकी बी और सन्तानोंको भी पीढ़ी दर-पीढ़ी पर कष्ट देती जानी है। वेश्यांक दिये हुए इस प्रकारके दो महाप्रसादामें गर्मी और सूजाक मुख्य हैं। ये ऐन्ने रोग हैं जिनकी अन्चक औषधि-विज्ञान की इतनी उन्नति हो जाने पर भी अभी तक नहीं निकल सकी । कुछ ऐसे रोगी, जिनका रोग अपेक्षाकृत कम भयंकर होता है और जो लज्जा संकोचमें न पड़कर शीवानिशीत इन रोगों के विपनासे चिकित्सा का लेते हैं. इन महाभयंकर रोगोंसे शायद पिण्ड छुड़ा नमें अन्यथा इनकी जड़ उचाइना कठिन ही है । इल- लिये प्रत्येक युवकको इन विषय में सदा सतर्क रहना चाहिये कि वह वेश्याओं और नन्दित्य, भ्रष्टा स्त्रियाले लदा बचते रहे और यथा- सम्भव व्यभिचारले बचते रहें, क्योंकि वासनामें जो युवक फॅन्स जाता है उसका जीवन सुन्बी नहीं हो सकना---एक न एक दिन वह इन रोगोंका शिकार बनेगा हो और इन रोगोंक चंगुलमें फंसकर वह संसार में किसी कार्यका नहीं रह जाता। लभी उनसे घृणा करने लगते हैं और वह जहाँ कहीं बैठना है, लोग उसके शोधले शीत वहाँसे हट जानेकी इच्छा करने लगते हैं। जिन युवकों को गर्मी और सूजाक आदिकी बीमारी हो गयी हो, उनके लिये संयम नियम विशेष लाभ नहीं पहुँचा सकते, क्योंकि इस प्रकार के रोग दूपिन त्रियां साथ व्यभिचार करनेक फल-स्वरूप होते हैं और इनके होने के मूल कारण एनं छोटे-छोटे रोगाणु हैं जो Tornar ४२ * युवक-पथ-प्रदर्शक इन्द्रियके रास्ते शरीरमें प्रविष्ट हो जाते हैं और जिन्हें विशेप चिकित्सा किये बिना नहीं मारा जा सकता है। प्रायः यह देखा गया है कि गर्मीका रोग भयंकर होने पर साल दो साल लगातार इस रोगके विशेषज्ञ वैद्य या डाकरसे चिकित्सा कराने पर ही आराम होता है, और सूजाकका रोग तो प्रायः जन्म भर अच्छा ही नहीं होता, इसलिये इन रोगोंके शिकार युवकोंका तो नैतिक दृष्टिसे यही कर्तव्य है कि वह विवाह करके एक दूसरे प्राणीका जीवन नष्ट न करें । ऐसे रोगों के रोगी-यदि स्त्री-पुरुपमें से कोई भी हुआ तो जो सन्तान होती है प्रायः देखने में आता है कि उस पर भी इस रोगकी छाप होती है, इसलिये इन रोगोंसे पीड़ित युवकको चाहिये कि पहले लगातार चिकित्सा करा कर अपनी डाकरी परीक्षा करायें और जब डाक्चर यह प्रमाणित कर दे कि अब उनके शरीरमें रोगाणु शेप नहीं है, तब विवाहादि करने और गृहस्थ वननेका नाम लें। इन रोगोंके अतिरिक्त किसी-किसी युवकको स्वप्नदोप और मधु- मेहकी भी शिकायत हो जाती है; किन्तु यह रोग साधारणतः आहार-विहारमें समुचित परिवर्तन करने और व्यायाम-प्राणायाम का अभ्यास करने पर दूर हो जाते हैं, क्योंकि इनकी उत्पत्ति प्रायः आहार-विहारकी खराबी से ही होती है । इनके लिये अधिक चिन्ता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि जिस तरह आहार-विहारके दूपित और मनोवृत्तिके चंचल हो जाने पर मासमें दो-एक वार स्वप्नदोष हो जाना किसी भी युवकके लिये अधिक चिन्ताका कारण नहीं होना चाहिये उसी तरह साधारण अवस्थामें मधुमेहादि हो जाने पर भी *वीच-सम्बन्धी रोग* Ver Aron.marrrrruper , युवकोंको चिन्तित न होकर जादे भोजन और प्राणायाम, व्यायामाता अभ्यास करना चाहिये । इनसे चदि महीने-पन्द्रह दिन में कोई लाम न हो तो किसी सद्वैद्य या मुयोग्य डाकर की शरण लेनी चाहिये । प्रमेहका वर्णन करते हुए जल-चिकित्साका नाम न लेना अन्याय होगा, क्योंकि इस स्वाभाविक उपचारले भी लेग्यकने दर्जनों पीड़ितों को स्वास्थ्य-लाम करते देखा है। यह प्रणाली विचल साल। नहानेके लिये एक बड़े टर ठण्डा जल भर कर उनमेंट जाय । जल बैठने पर नामिके ऊपर तक होना चाहिये । फिर एक स्वन्न और मोटे अंगोछे से पेड़, को धीरे-धीरे घिसना चाहिये---या किया १५ मिनटले आधे घण्टे तक नित्व सुबह शाम करनी चाहिये। इस क्रिया करने वाले प्रायः चा तो फलाहार करते हैं, ना बलियाका सेवन करके दिन व्यतीत करते हैं। बहुत-से लोग केवल दूध या दलिया और दूधका संयुक्त सेवन करके भी लाभान्विन हार है। इस उपचारसे स्वप्नदोप, धातु पनन और मधुमेहमें पूरा लान होते देण्या गया है, क्योंकि इसमें बढ़ाज़मी आदि नो पर ही नहीं सकती- फल और दालियाके सेवनले मल-भिप्यालन समुचिन रूप होता है । नानके बाद बलानुमार मील-आध माल चाटनेका विधान भी इन चिकित्साका एक अंग है। * जल-चिकित्सा वीर्य-रोगों पर ही नहीं, प्रायः सम सभीगा पर अप्रतिम गुण दिखझा चुकी है। जिन्हें इस विषय में विशेष माग प्राप्त करनेकी इच्छा हो, बाद इच्छा हो, ब 'कलकता पुस्तक माला -निकिता मंगाकर पढ़ें।

४६ * युवक-पथ-प्रदर्शक उस घटनाका उल्लेख कर देना अनुचित उदाहरण नहीं होगा, जब पढ़नेके लिये स्कूलकी गोरी अध्यापिकाके पास जाने पर उन्होंने पहले यह कहा कि अच्छा जरा इस कमरमें झाड़, तो लगा दो । अध्यापिकाका इतना ही कहना पर्याप्त हुआ और वे उठ कर कमरेमें से बाहर चली गयीं। वालक वाशिंगटनने तुरन्त झाड़ लेकर उस कमरेको ऐसी सुन्दरतासे साफ किया कि वैसा उसके पूर्व वह कभी भी नहीं हुआ था। मेज, कुर्सी और आलमारी आदि झाड़-पोंछ कर, इधर-उधर पड़ी हुई पुस्तकोंको मेजके कोने पर एक जगह लगा दिया। दरवाजे और खिड़कीके शीशे तक साफ कर दिये और यह सब काम करने में उसे केवल दस मिनट लगे। अध्यापिकाने लौट कर कमरेको देखा और मेजको अपने रूमालसे पोंछ कर देखा तो उसमें मैल या गर्दका नाम नहीं था। चारों तरफ कमरेका निरीक्षण करनेके बाद अध्यापिकाने कहा कि तुम वास्तवमें पढ़ोगे और उस निग्रो बालकको प्रसन्नता पूर्वक स्कूलमें भर्ती कर लिया । यही वालक आगे चलकर बुकर टी० वाशिंगटन नामसे विख्यात हुआ ओर इसीने अमे- रिकाके महान्ध गोरोंके दुर्व्यवहारके विरुद्ध निग्रो जातिका नेतृत्व ग्रहण करके उन्हें मनुष्यताकी श्रेणीमें ला खड़ा किया। इस दृष्टान्तका आशय यह है कि जो कार्य किया जाय वह ऐसे कौशल और खूबीके साथ किया जाय कि उसमें देखने वाला व्यक्ति कोई खराबी न निकाल सके । यही उन्नतिकी सीढ़ी है और यही है सफलताकी कुञ्जी। आजीविकामें सफलता दिलाने वाला दूसरा प्रधान गुण है व्याव- हारिक ज्ञान । कोई पढ़ा-लिखा युवक भी अगर व्यावहारिक ज्ञानसे * व्यावहारिक ज्ञान और आजीविका * शून्य है तो उसकी पढ़ाई-लिखाईका कुछ मूल्य नहीं। पढ़ाई-लिखाईका तभी कुछ मूल्यवान हो सकती है जब उसका कुछ सांसारिक उपयोग हो । यह उपयोग व्यावहारिक ज्ञान पर निर्भर होना है । मैट्रिक पास करके भी आजकलंक लड़के व्यापारियोंकी साधारण चिट्ठी लिखने या रेलवे, पोस्टआफिस आदिकी साधारण शिकायतोंकी चिट्ठियाँ तक लिखने योग्य नहीं होते। फिर व्यावहारिक दृष्टिसे उनकी शिक्षाका मूल्य ही क्या है ? स्कूलोंकी जैसी शिक्षा-प्रणाली है, उससे तो कोई व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर नहीं सकता, इसलिये प्रत्येक विद्यार्थीके लिये यह आवश्यक है, कि वह उपयोगिताकी दृष्टिस भी ज्ञान प्राप्त करता रहे और जो कुछ पढ़े उसमेंसे कितनका उपयोग क्रिम रूपमें हो सकता है, यह भी सोचता रहे। व्यावहारिक ज्ञान घर और समाजमें प्राप्त हो सकता है । सूक्ष्म बुद्धिका विद्यार्थी घर और बाहरकी प्रत्येक घटनाको देख और सुनकर उससे व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त कर सकता है । जीवन- यात्रामें यही ज्ञान युवकका सबसे अधिक सहायक होता है, इसलिये प्रत्येक युवकको इसका कुछ-न-कुछ मात्रामें ज्ञान होना आवश्यक है। व्यावहारिक ज्ञानके सम्बन्धमें लिखते हुए यहाँ शिष्टाचारक बारेमें कुछ लिखना आवश्यक है, क्योंकि शिष्टाचार व्यावहारिक ज्ञानका ही अंग है। घर आये हुए व्यक्तियों के साथ नम्रतासे पेश आना, उनकी खातिर करना, उनके खान-पान और आरामका ख्याल रखना भारतीय शिष्टाचारका महत् अङ्ग है। दूसरंके घर जाने पर भी मिष्ट भाषण द्वारा उसे प्रसन्न और परितृप्त करना, जहाँ तक हो सके दूसरेकी निन्दा न करना, दूसरेकी बात ध्यानले सुनना- ४८ * युवक-पथ-प्रदर्शक दो आदमी बात करते हो तो बीचमें न बोल उठना, बोलना आव- श्यक ही हो तो उनसे क्षमा माँग कर बोलना, वस्त्राच्छादनमें लोक- रुचिका ख्याल रखना, यथास्थान वैठना, मध्यम स्वरसे बोलना, खाँसने. खखारने, थूकने आदिके समय स्थानादिका ध्यान रखना शिष्टाचार है-जो व्यक्ति इन गुणोंसे शून्य है, वह सभ्य समाज में आदर नहीं प्राप्त कर सकता । प्रत्येक युवकके लिये यह आवश्यक है कि वह सभ्य समाजमें उठ-बैठ कर वहाँके उठने-बैठने, बोलने- चालने और रहन-सहन आदि की जानकारी प्राप्त करके उमका उपयोग करना सीखे, क्योंकि इसके बिना पढ़ने-लिखनेमें होशियार युवक भी लोगोंकी नज़रोंसे गिर जाता है। इस प्रकार हम देखेंगे कि वास्तवमें व्यावहारिक ज्ञान आजिविका प्राप्तिका एक साधन है। आजकल आजीविका-रोजगार और नौकरी प्रायः सभ्य सुशिक्षित और सम्पन्न लोगोंके हाथों में होती है, जो इन वाह्य शिष्टाचारोंकी ओर हार्दिक शिष्टाचारों की अपेक्षा अधिक ध्यान देते हैं। दया करके रोजगार-धन्धे और नौकरी दे देनेका युग चला गया-अब तो जो युवक भीतरी और बाहरी दोनों ही दृष्टिसे शिष्ट, सभ्य, सुसंस्कृत, ईमानदार और सुभापी होगा, वही ऐसी जगहोंमें बाजी मार ले जायगा । सभी दृष्टियोंसे अपनेको उत्तम सिद्ध करने वाले युवकोंके लिये आजकल संसारमें स्थान है; पढ़े-लिखे भोंदुओंके लिये नहीं। प्रत्येक उच्चाभिलापी युवकको चाहिये कि वह ऐसे लोगोंमें मिल-जुल कर उनके आचार-व्यवहारसे शीघ्रातिशीघ्र परिचय प्राप्त करले जो उच्च श्रेणी के लोगोंसे अधिक मिलते-जुलते और सामाजिक सम्पर्क रखते हैं। -- स , मितव्ययिता और स्वावलम्बन कोई भी युवक जब किसी रोजगार-धन्धे या नौकरीमें लग जाता है, तो उस जहाँ अपनी विद्या-बुद्धि और व्यावहारिक ज्ञानका उपयोग करके आगे बढ़नेका अवसर मिलता है, वहां उसे यह दिखाने का मौका भी मिलता कि वह आर्थिक प्रवन्ध कसी पटुता रखता है और आजीविका लिये प्राप्त धनका सदव्यच कर मे किस प्रकार भविष्य के लिये भी कुछ संग्रहीत करके स्वावलम्वी बनता है। मितव्ययिताके द्वारा संसारमें साधारण युवक कैले बड़े- बड़े व्यक्ति बन गये हैं, इसका उदाहरण देने व तो पनी एक और पुस्तक बन जायगी, किन्तु यहाँ उनना बनला देना तो अनिवार्य होगा कि अधिकस अधिक धन कमाने वालोंने जहाँ मितव्ययिता ५० * युवक-पथ-प्रदर्शक और किफायतशारीसे काम नहीं लिया, वहाँ अन्तमें उन्हें फटेहाल होकर इधर-उधर भटकते देखा गया है। फिजूलखर्चीने बड़े-बड़े रईसजादोंको टुकड़ोंका सुहताज बना दिया और बड़े-बड़े सेठ साहू- कारोंके लड़कोंको दर-दरका भिखारी बना दिया। नौकरी या धन्धे में हमें जो कुछ प्राप्त हो उसे बढ़ानेकी चेष्टा जारी रखते हुए भी हमें अपना खर्च इस प्रकार चलाना चाहिए कि बीमारी, शादी, गमी आदि भावी आवश्यकताओंके लिये कुछ वच रहे और जरूरत पड़ने पर किसीके सामने कर्ज के लिये हाथ न पसारना पड़े। यहाँ कर्ज या ऋणके सम्बन्धमें कुछ शब्द लिखना विषयान्तर नहीं होगा। कर्ज लेकर कोई भी नौकरी-पेशा या व्यापारी समृद्धि- शाली और चिन्तारहित नहीं हो सकता। जिसने कर्ज लेनेकी आदत डाल ली समझ लो कि उसका सर्वनाश निश्चित है। यहाँ कर्ज लेकर तबाह होनेवालोंकी सूची बनाकर हम पुस्तकका आकार बढ़ाना नहीं चाहते, पर प्रत्येक गाँव, कस्बे और नगरमें ऐसे लोगों की प्रचुर संख्या अनप्रयास जानी जा सकती है जो क़र्जके चंगुलमें फंसकर अपना सर्वनाश कर चुके हैं। ऐसी अवस्थामें प्रत्येक युवक का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह यथासम्भव क़र्जसे बचते रहनेका प्रण कर ले और जो कुछ अपनेको मिलता हो उसीमें से थोड़ी-बहुत रकम ऐसे अवसरोंके लिये एकत्रित करता रहे जिसके कारण उसे कर्ज लेनेके लिये वाध्य होनेकी सम्भावना हो । प्रत्येक युवक का यह सर्व प्रथम कर्तव्य है कि वह अन्य सभी बातोंके साथ आर्थिक दृष्टिसे भी स्वावलम्बी बने । स्वावलम्बी , मितव्ययिता और स्वावलम्बन * ५१ बनने लिये अपनी कमाईमें से कुछ-न-कुछ लगातार संग्रहीत करते रहना अनिवार्य है। बचतको रकमको जमा करनेके भी दो सर्वो- न्तम तरीके हैं-एक तो डाक-खानेका लेविंग बैंक और दूसरा मियादी बीमा । जिन लोगों की नौकरी या धन्धा स्थायी ढङ्गका है उनके लिये तो यह परम वांछनीय है कि वे अपनी आमदनीक अनु- सार एक खास रकम हज़ार-दो-हज़ार था पाँच दस हजार का मियादी बीमा करा लें। इसका मतलब यह होता है कि एक खास मियाद पाँच दल या वीस वर्षके बाद उस अनुक रकम दो-चार या छः हजार मिल जाय । इसके लिये उस मासिक, त्रैमासिक चा वार्पिक किस्तों में एक निश्चित रकम बीमा कम्पनी में जमा करानी पड़ती है। जिन गाँवों, कस्बों या शहरों में बीमा कम्पनियाँ नहीं हैं, वहाँक लोग अपने निकटवर्ती बड़े शहर की वीमा कम्पनियोंक एजेण्टोंके द्वारा बीमा करा लेते हैं और इस प्रकार किफायनशारीकी स्थायी आदत डाल देते हैं। जिनकी आमदनी स्थायी या निश्चित नहीं है, उन्हें चाहिये कि अपने पासक डाकखानेके सेविंग बैंकों अपना हिसाव खोल लें, जो चार थानेसे भी खुल सकता है, और उसमें अपनी आयकं अनुसार मासिक या साप्ताहिक कुछ-न-कुछ जमा करते रहें। इस जमा की हुई रकम पर. २) सैकड़ा सालाना व्याज भी मिलता है और मध्यम श्रेणीके लोगोंके लिये यह सबसे सुरक्षित बैंक है। इसमें एक विशेषता यह भी है कि आप छोटे कस्बों, बाजारों और गाँवोंमें, (जहाँ कहीं भी डाकखाना है ) यह हिसाब खोल सकते हैं और आवश्यकतानुसार यदि आप किसी ५२ * युवक-पथ-प्रदर्शक * या अन्यत्र जगहको स्थायी रूपसे जायँ तो वहाँके लिये परिवर्तित करा सकते हैं। बड़े बैंकोंमें रुपये जमा करानेमें यह सुविधा नहीं है कि आप अपने हिसाबको छोटे शहरों, कस्बों या गाँवोंमें परिवर्तित करा सकें, क्योंकि छोटी जगहों में ऐसे बैंकोंकी शाखाएँ होती ही नहीं। युवकोंके लिये यह भी आवश्यक है कि जब तक वह आर्थिक दृष्टिसे पूर्णतः स्वतन्त्र न हो जाये तब तक घरवालों या पिताके भरोसे पर विवाह न करें। इसका यह मतलब नहीं है कि वह अपने परि- वार वालों तथा पिता पर अविश्वास करें; किन्तु वास्तविक सुख तभी मिल सकता है जब आर्थिक दृष्टिसे परमुखापेक्षी न बनना पड़े। इसके लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक युवक विवाह करनेके पूर्व नौकरी या कोई व्यवसाय करके स्वतन्त्र रूपसे कुछ अर्जित करने लगे। पैतृक सम्पत्ति या परिवार वालोंकी सहायताके भरोसे विवाह करके कोई भी स्वतन्त्र प्रकृति का युवक सुख नहीं भोग सकता, क्योंकि मालूम नहीं कब परिवार वाले मदद देनेसे हाथ खींच लें या पिता अप्रसन्न होकर आर्थिक सहायता से वञ्चित रक्खें। ऐसी अवस्था आने पर विवाहित युवक विशेष कष्टका अनुभव न करके देश या विदेश जाकर किसी-न-किसी प्रकार अपना उदर- पोषण कर सकता है, किन्तु विवाहित होने पर उसके पैरमें बेड़ी पड़ जाती है, और हमारे देशका रिवाज तथा सामाजिक अवस्था ऐसी नहीं है कि हम स्त्रीको लिये शहर-शहर घूमें और रोजगार तलाश करें।

* मितव्ययिता और स्वावलम्बन * . .. युवावस्थाक आरम्भमें जवानीको तरङ्ग और ऐन्द्रिक भोगकी लालसासे प्रायः युवक विवाह करनेके लिये समुत्सुक दिखलायी देते हैं। यद्यपि हमारे देशकी प्रथा ऐसी है कि प्रायः माँ-बाप और परि- वारके बड़े-बूढ़े ही युवकोंक विवाहमें शीघ्रता करते हैं, किन्तु यदि युवक अपने माँ-बाप या परिवार वालों पर यह बात भली भाँति प्रकट कर दें कि वह जब तक आर्थिक दृष्टिम स्वतन्त्र नहीं हो लेता, अर्थात नौकरी या दुकानदारी आदिक धन्धेले कुछ कमाई नहीं करने लगता, तब तक वह विवाह नहीं करना चाहता, तो कोई भी समझ- दार माँ-बाप या परिजन इसका विरोध नहीं करेंगे। जैसा कि ऊपर बनलाया गया है, नौकरी या व्यवसाय करने पर शुरूसे ही किफायतशारीकी आदत डाल लेने पर अन्त में बड़ा सुख मिलता है और मतुप्यमें सदा स्वावलम्बन, आत्मनिष्ठा, निर्भयता, कुअवसर मा जाने पर उसका मुकाबला करनेका साहस रहता है। स्वार्जित धन थोड़े परिमाणमें जमा रहने पर भी मनुष्य अपने हृदय में एक प्रकार के आहाद और स्फूर्तिका अनुभव करता है । मितव्ययी युवकके मनमें भविष्यकी चिन्ता कभी चकार नहीं लगाती। प्रत्येक परिस्थितिका मुकाबला करनेके लिये वह तैयार मिलना है और घबराहट उसके पास नहीं फटकाती। कितायतशार या मितव्ययी युवकको अपनी इस आदनका सयले सुन्दर वदला इस प्रकार मिलता है कि उनका रहन-सहन, भोजन-छानन सादा और चरित्र निर्मल होता है । आरम्भसे ही इस प्रकारकी सादगीकी आदत पड़ जानेके कारण वह फिजूल खर्ची और चरित्र भ्रष्टताकी ओर क्रम * युवक-पथ-प्रदर्शक * झुकता है । प्रायः सभी शाहखर्च या उड़ाऊ युवक फैशनके भक्त और चारित्रिक दृष्टिसे पतित होते हैं, इसलिये यदि हम मितव्ययिताको चरित्र-निर्माणमें परम सहायक और युवकमात्रके लिये महाप्रसाद माने तो अनुचित न होगा। बहुतसे ऐसे युवक जिनके पास पर्याप्त पैतृक सम्पति है, दोस्त मित्रोंके चकमेमें आकर या समाजमें कंजूस कहे जानेके भयसे अपनी थैलीका मुंह खोल देते हैं। और कुछ दिन तक दोस्त-मित्रों और समाजवालों में उनकी वाह-वाही होती है, किन्तु जहाँ जरा परिस्थिति बदली कि दोस्त-मित्र सगे-सम्बन्धी सब हवा हो जाते हैं। यदि आरम्भसे ही मितव्ययिता और सादे जीवनका अभ्यास हो तो प्रथम तो दुर्दिन आनेकी नौबत ही नहीं आती और यदि आये भी तो सादे भोजन-छाजन और परिमित व्ययके कारण वैसे कष्टका अनुभव नहीं करना पड़ता, जैसा एक शाइखर्चको ऐसी अवस्थामें करना पड़ता है और शारीरिक तथा मानसिक वेदनाका शिकार बनना पड़ता है। इसलिये मितव्ययिता न केवल धन-संग्रहके लिये ही आवश्यक है, प्रत्युत इससे चरित्र- निर्माणमें भी सहायता मिलती है। मानव स्वभाव ऐसा है कि एक व्यक्तिको जितना ही मुक्तहस्त होकर धन खर्च करनेको मिले उतना ही वह उसके नये-नये साधन खोजता है और उसके गिर्द उन साधनोंके प्रस्तुत करनेवालोंका झुण्ड जमा होने लगता है, जो उसे पतनके गर्तमें ढकेलने में सहायक होता है। संगतिका प्रभाव मनुष्य पर पड़ता ही है और धीरे-धीरे फिसल कर पतनके इतने समीप जा पहुँचता है, जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। आर्थिक समितव्ययिता और स्वावलम्बन * हप्टिसे सम्पन्न होते हुए भी जो मितव्ययी होता है उसके पास इस प्रकार के अवाञ्छनीय स्वार्थियोंका झुण्ड नहीं आता, क्योंकि उसकी मितव्ययिता देखकर वह जानता है कि उस पर उसकी माया नहीं चल सकती। जिस युवकमें मितव्ययिताका गुण नहीं है, समझ लेना चाहिए कि वह कर्तव्यनिष्ठ नहीं है । जो व्यक्ति अपनी सारी कमाई उड़ा देता है, वह अपने पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्योंसे चूक जाता है। प्रत्येक युवकका संसार में कोई न कोई आश्रित होना है- माँ, बाप, भाई, बहन तथा अन्य परिजनोंके अतिरिक्त वह निकट भविष्यमें हो विवाह करके गृहस्थ बननेवाला होता है। ऐसी अवस्थामें उसका द्रव्य-संग्रह न करना सामाजिक पाप है। द्रव्य संग्रह न करने- वाला युवक अपने आपको ही नहीं बिगाड़ लेना, प्रत्युत वह अपने समस्त सगे-सम्बन्धियों तक-का भविष्य बिगाड़ने में सहायक होता है । भारतीय परिवार पद्धति ऐसी है कि एक होनहार युवकसे उसके सभी सम्पीय कुछ-न-कुछ सहायता पानेकी आशा रखते हैं। किन्तु जो युवक मितव्ययिता और संग्रहशीलताकी आदत नहीं डालता बह उन्हें अपनी सहायतासे वञ्चित ही नहीं करता, वरन् अपना भविष्य भी अन्धकारमय बना लेता है, क्योंकि ऐसे स्वार्थी व्यत्तिके पास कोई भी अपना-पराया नहीं फटकता, न कभी कोई उसकी सहायता करता है । सभी तरहके सुख-दुःखमें वह अकेला रहता है और कोई भी व्यक्ति उसे अच्छी दृष्टिसे नहीं देखता। क्षण भरके लिये यदि परिवार और समाजका ख्याल छोड़कर ५६ * युवक-पथ- -प्रदर्शक * , भी केवल स्वार्थकी त्रष्टिले विचार किया जाय तो भी मितव्ययिताका महत्व कम नहीं होता। यदि अपने आश्रितों और सम्बन्धियोंको किसी प्रकारकी सहायता देना अभीष्ट न हो तो भी अपने जीवन में सफलता प्राप्तिके लिये अर्थ-संग्रह आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति जो युवावस्थामें किफायत करके अर्थ-संग्रह नहीं करता, ढलती उम्रमें पछताये बिना नहीं रह सकता। अपने निजी सुखके लिये और बाल-बच्चे वाले बन जानेपर अपने निकटतम परिवारके लिये भी कुछ- न-कुछ संग्रह न कर रखनेवाला वास्तवमें पशु-पक्षियोंसे भी गया- बीता है, क्योंकि कुत्ते भी भविष्यके लिये फालतू रोटी छिपाकर रख दिया करते हैं; शहदकी मक्खियाँ एक-एक फूलसे मधु-संचय करके उसे भविष्यके लिये ही सिरजती हैं-फिर भला मनुष्य, जो अपनेको सृष्टिकी सर्वोत्तम रचना समझनेका गर्व करता है, संचयशीलता और भविष्यदर्शिताके सद्गुणोंसे वंचित हो तो कितने दुःखकी बात है । प्रत्येक उपार्जनशील युवकको चाहिए कि वह रुपयेके महत्त्वको समझे और रुपयेके बिना देशमें लोगोंकी जो दशा हो रही है, उसे समझनेका प्रयत्न करे । हमारे देशके प्राण-देहातोंमें जाकर देखिये, एक-एक पैसेके बिना लोगोंकी क्या दुर्दशा हो रही है। किसानोंकी यह अवस्था हो रही है कि दो-दो चार-चार रुपयेके बिना उनकी इज्जत उतर रही है-उनके फटे हुए मैले-कुचैले वस्त्र ही उनके जीवनकी कहानी कह रहे हैं। ऐसी दशामें केवल ऐशो-आरामके लिये पैसे फेंकना अपने इस दरिद्र देशके साथ अन्याय करना है। यह कहनेकी आवश्यकता नहीं कि जिस व्यक्तिके पास रुपये *मितव्ययिता और स्वावलम्बन * नहीं हैं, संसार में वह न तो अपना भला कर सकता है न दूसरेका । व्यय होने पर ही आदमीका कुछ मूल्य हो सकता है । रुपये पास न होनेपर बड़े-बड़े विद्वान् और गुणवान दर-दर ठोकर खाते फिरते है। जिस रूपयेके बिना ननन विद्वानोंकी यह दुर्दशा होती है, उसे बददीले खर्च कर देना और उनके संग्रहकी कुछ भी कोशिश न करना निरी मूर्खता नहीं तो और क्या है। अर्थोपार्जन ही स्वावलम्बनकी जड़ है और सारमें स्वावलम्बन और स्वतन्त्रतासे बढ़कर और कोई चीज नहीं है। एक स्वावलम्बी व्यक्ति ही अपनी इच्छानुसार खा-पी, बल-फिर और जाग-लो लकता है । जिसे आर्थिक स्वतन्त्रता नहीं है, वह संसारमें रहकर भौतिक सफलता नहीं प्राप्त कर सकता। आर्थिक स्वतन्त्रता न होने के कारण लोगों को अच्छे-बुरे सभी कर्म करने पड़ते हैं और परायी दासना-नोकरी-करनी पड़ती है, इसलिये प्रत्येक युवकके लिये यह परमवाञ्छनीय है कि वह पहले अर्थोपार्जन करे और उसके वाद कमाये हुए नपयेका नदुपयोग करते हुए भविश्यके लिये कुछ संचित कर रखे जिससे उने परतन्त्रताका दुख कभी न भोगना पड़े। इस बातको स्मरण रखना चाहिये कि रुपया कमाना जितना कठिन है उनका संग्रह करना उससे भी अधिक कठिन है, इसलिये खूब सोच-विचार कर पैले-पसेका सदुपयोग करते हुए रुपया खर्च करना चाहिए और भविष्यके लिये कुछ-न-कुछ संग्रह अवश्य कर लेना चाहिए।

विवाह सुहस्यमयी सृष्टिको समझनेके लिये हमें सबसे पहले मनुष्य- जातिकी उत्पत्तिका इतिहास जाननेकी आवश्यकता है, क्योंकि वास्तवमें मानव-जाति ही सृष्टिका प्रधान अङ्ग है । यदि मानव जातिका अस्तित्त्व न होता तो सृष्टिके अन्य सभी जीव-जन्तु व्यर्थ- से थे। मनुष्यने ही सृष्टिमें उपयोगितावादकी सृष्टि की और अपने प्रखर बुद्धि-बलसे उसके अन्तर्भूत तत्त्वोंके सिद्धान्त जाननेमें सफ- लता प्राप्त करनेकी चेष्टा की । सृष्टि के इस सर्वश्रेष्ठ रत्न-मानव समाज के दो भाग हैं, जो संसारके परिचालनमें सम्यकपसे हाथ बटाकर इसे स्वर्ग-तुल्य बना सकते हैं। इन दोनों भागोंका एक दूसरेसे ऐसा *विवाह - - अन्योन्याश्रितका सम्बन्ध है कि एक के बिना दूसरेके अस्तित्वपर विचार ही नहीं किया जा सकता। विज्ञान कितनी ही उन्ननि क्यों न करले; परन्तु एक भागके अभावमें दूसरेका अस्तित्व कायम करना उसके वशक बाहर की बात है। मानव समाजके ये दोनों भाग हैं स्त्री और पुरुष । जिस प्रकार पुरुषक बिना स्त्रीका अस्तित्व असम्भव है, वैसे ही स्त्री बिना पुरुपकी कल्पना सम्भव नहीं। मानवजातिक इल अङ्ग-द्वयक सामंजस्यले ही अतीतकालसे सृष्टिका विकास होते-होते मनुष्य जाति इतने विस्तृतरूपमें धरातल पर फैल पायी है । वास्तवमें ये दोनों अङ्ग पृथक होते हुए भी एक हैं; किन्तु जिस प्रकार किसी यन्त्रके पृथक्-पृथक् भाग अपने भिन्न- भिन्न कार्य करते हुए उसका संचालन करते हैं उसी भाँति उसी प्रकार मानव समाजके ये दोनों अङ्ग अपना-अपना कार्य करते हुए संसार-रूपी यन्त्रका संचालन सुचारुरूपसे करते हैं। दोनोंके लक्ष्य एक हैं, किन्तु क्रिया-कत्तव्य पृथक् पृथक् । यदि यन्त्रका एक पुर्जा अपना कार्य बन्द करदे तो दूसरा अङ्ग सम्यक् रूपेण कार्य नहीं कर सकता, इसी प्रकार यदि मानव समाजका कोई भी अस्त्री या पुरुष-अपना कर्तव्य-पालन न करे तो संसार-यात्रा सुगमतापूर्वक पूर्ण नहीं हो सकती। पुरुपकी प्रकृति बहिर्मुखी होती है अतः उसपर कर्त्तव्यका बोझ गुन्नर एवं अपेक्षाकृत अधिक उत्तरदायित्त्वपूर्ण होता है। स्त्रीकी प्रकृनि अन्तर्मुखी होनी है अतः उसे अन्तःपुर-घरका भीतरी कार्य-भोजन बनाना, बयाका पालन-पोपण, गृह-प्रवन्ध आदि दिया ६० * युवक-पथ-प्रदर्शक * गया है। जो युवक अविवाहित है उसका घर और बाहर दोनों सुचारुरूपसे नहीं संचालित हो सकता। आजकल विवाहको झंझट समझनेकी प्रथा यूरोप अमेरिकाकी भाँति भारतमें भी चल पड़ी हैं; किन्तु जो लोग ऐसा समझते हैं वे यदि विश्व-सेवा करना चाहते या ब्रह्मचर्यव्रत रख कर कोई आदर्श कायम करना चाहते हैं, तब तो और बात है; किन्तु जो विवाह न करके दाम्पत्यजीवनसे बचकर काम-लिप्सामें स्वतन्त्र विचरण करना चाहते हैं या कलियों- कलियोंका रस चखनेके गुप्ताभिलाषी हैं, उन्हें आगे चलकर कभी- न-कभी अपने निश्चयपर पछताना पड़ेगा। विवाह बन्धन नहीं; पर वह ऐसा बन्धन है जिसमें जकड़ कर मनुष्य संयम, वास्तविक प्रेम और सेवा सब कुछ सीखता है । वास्तवमें गृहस्थाश्रम विश्व सेवाका संक्षिप्ततम संस्करण या प्रारम्भिक पाठशाला है, जहाँ मनुष्य प्रेम, सेवा, सहानुभूति और तितिक्षाका पाठ पढ़कर तब विस्तृत संसारकी सेवा कर सकता है। कोई व्यक्ति यकायक संसार का सेवक नहीं बन सकता-इसकी सीढ़ियाँ होती हैं। हमारे प्राचीन ऋपियोंने जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, बाणप्रस्थ और संन्यास आश्र- मोंकी स्थापना की थी, उसके अन्दर यही गूढ़ रहस्य था। जब तक मनुष्य एक छोटे परिमाणमें कोई कार्य नहीं कर लेता तब तक वह किसी विशाल कार्यके करने योग्य नहीं माना जा सकता । संसारकी सेवा करनेके लिये उसके जिस क्षेत्रमें भी कार्य करनेकी अभिलाषा हो पहले उसका कुछ अनुभव अनिवार्य है। पहले वह एक छोटे संसार-परिवार में रहकर उसकी सेवा करके कुछ अनुभव प्राप्त 3 द विवाह के तभी वह सुविस्तृत संसारको सेवा करनेके योग्य हो सकता विवाह केवल काम-बासनाकी पूर्ति करके कौटुबिक विस्तार एनके उद्देश्यसे नहीं किया जाता । हिन्दू-संस्कृतिक अनुमार वाह शारीरिक के साथ-साथ अध्यात्मिक बन्धन भी है-स्त्रीक साथ आत्मिक संयोग भी होना आवश्यक है । यह सच है कि इसके छये स्त्रीके चुनाबमें सावधानी बननकी मात्रश्यकता है। हिन्दू- नातिम राशि-विचार की जो प्रथा रखी गयी है. वह पूर्णतः वैज्ञा- नेक है। किन-किन राशियों में, किन-किन नक्षत्रों में उत्पन्न स्त्री- पुरुषोंका स्वभाव और शारीरिक संयोजन परस्पर मिल सकता है, इसीको गणना-विचार कहते हैं। नक्षत्रोंका प्रभाव स्त्री-पुरुषके शारीरिक अंगोंपर पड़ता है, इसलिये गगनाके अनुसार दोनों के अंग-विस्तारका विचार भी हो जाता है। बहुत-से नयी रोशनी लोग इन बातोंको व्यर्थ समझकर इनसे घृणा करते हैं; फिन्तु म्य जब कि यूरोप और अमेरिकाके विख्यात बैतानिकोंने भी इस बालका समर्थन किया तो लोग मानने लगे हैं। हमारी ऋषिपान प्रथाओंमें यही विशेषता है कि उनमें मोटी दृष्टिले कोई विशेषता नहीं प्रतीत होती; किन्तु उनका आधार वैज्ञानिक होना है। विवाह के सम्बन्धमें निम्नलिखित शने प्रत्येक युवकके लिये विचारणीय है:- (१) लड़कीका रूप-रंग और स्वभाव, (२) उसकी अवस्था, ६२ * युवक-पथ-प्रदर्शक * (३) उसको पात्रता अर्थात् जाति-निर्णय, (४) उसकी शिक्षा-दीक्षा, (५) उसका स्वास्थ्य । यद्यपि आज कलके युवक अपनी भावी पत्नीको एक नजर देख लेने और यदि सम्पन्न हो तो उसके स्वभाव और विचारोंसे परि- चित हो जातेकी अभिलापा अवश्य रखते हैं, किन्तु कन्या पक्षके अधिकांश लोग प्राचीन रूढिके विरुद्ध ऐसा करना उचित नहीं सम- झते और सिवा थोड़ेसे उच्च अंग्रेजी शिक्षित नयी रोशनीके साहवों के और कोई इस बातको पसन्द नहीं करता कि उनकी बहन या कन्या अपने भावी पतिसे बात-चीत करे । इसके सम्बन्धमें सरल और सीधा उपाय यह है कि बर-पक्षकी कोई कुशल स्त्री ही कन्या को देख कर उसके गुण-अवगुणकी जाँच कर ले। इसमें कन्या पक्षवालोंको भी कोई आपत्ति न होगी और यदि इसमें भी आपत्ति हो तो समझ लेना चाहिये कि या तो उनकी कन्यामें कोई दोप है या फिर वे इतने दकियानूस हैं कि उनसे किसी भी ऐसे परिवारको सम्बन्ध नहीं करना चाहिये जो शिक्षित और सभ्य हो। वर-पक्ष से जानेवाली स्त्री लड़कीका रूप-रंग और स्वास्थ्य तो देख ही लेगी, साथ ही उससे बात-चीत करके उसका स्वभाव भी जान लेगी। साथ ही लड़कीकी अवस्था ( उम्र) भी, जो प्रायः कन्या पक्ष वाले वर-पक्षसे छिपाया करते हैं भाँप लेगी। इस प्रकार सहज ही कन्याके पक्षमें खासी जानकारी हो जायगी और इसके करने में किसीको विशेष आपत्ति भी नहीं होगी। , *विवाह ६३ आज कलंक कुछ शिक्षित युवकोंमें यह रोग भी चल गया है कि अन्य प्रान्तकी लड़कीसे शादी की जाय । यद्यपि स्थल दृष्टिसे और मनुष्यताक नाते इस बातका विशेष विरोध नामधारी शिक्षा सम्पन्न लोग नहीं करते, किन्तु ऐसा करने में एक बहुन बड़े वैज्ञानिक सिद्धान्तकी हत्या होती है। ब्राह्मणका प्रात्मण लड़कीले विवाह करना, कायस्थ-का-कायस्थ कन्या हीसे पाणि-ग्रहण करना और वैश्यका बनियेकी ही लड़कीसे परिणय करना स्वाभाविक और वैज्ञानिक दृष्टिले अनुकूल है। पीढ़ी-दर-पीढ़ीसे एक जानिशी सन्तान जो परम्परागत गुण ग्रहण करती है और उस पर अपने माना- पिताके जो संस्कार पड़ने हैं, उसकी उपेक्षा कोने की जा सकती है। एक नामणकी लड़की जो अपने शिक्षित माता-पिनाक अध्या- त्मिक वातावरण मय घर में रह चुकी है, एक बनियेक व्यापारिकता- मय घरमें आनन्दका अनुभव कैसे कर सकता है। सदियोंसे शिम जाति और जिस परिवार में एक विषयका प्राधान्य चला माना अकस्मात् उस परिवार के एक प्राणीको दूसरे गले परिवार में ला घुसेड़ना जहाँ उनसे नितान्त भिन्न वातावरण हो; अस्वाभाविक यह तो हुमा अन्तर्जातीय विवाह-निषेधका पहला और बाल फागण अब आन्तरिक और मनोविज्ञानत्मक कारण देखिये। बदनाम स्वीकार करेंगे कि प्रत्येक जातिमें नम्रता, सहनशीलता, मोध कंजूसी और 'उदारता आदि गुण विभिन्न परिमाणमें होते हैं। उदाह- रणार्थ औसत रूपमें एक वैश्यमें जितनी नन्नना और मान-शीलता होगी एक क्षत्रियमें उतनी नहीं हो सकती चाहे अविनय और अन्न- - - ६४ * युवक-पथ-प्रदर्शक * हिष्णुताके कारण उसे हानि ही उठानी पड़े। यह सच है कि इस नियमके अपवाद भी हैं और क्षत्रियोंमें भी सहनशील और विनम्र मिल सकते हैं तथा वैश्योंमें भी अविनयशील तथा असहिष्णु पाये जाते हैं, किन्तु यह नियम सामूहिक रूपमें देखा जाता है, व्यक्तिगत रूपमें नहीं, इसके कारणों पर विचार करते हुए हमें यह मानना पड़ता है कि बहुत कालसे ऐसी वृत्तिमें पड़े रहनेके कारण इन जातियोंके मन पर अपने-अपने पेशों-व्यवसायोंका गहरा प्रभाव पड़ा है । क्षत्रिय जाति सहस्रों-लाखों वर्षसे लड़ती झगड़ती और शासन करती आयी है अतः उसके पेशेका उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा है, इसी तरह वैश्य जाति सदासे व्यापार करके धन-रक्षामें दत्तचित्त रहती आयी है, अतः उसमें धन रक्षार्थ मितव्ययिता और आत्म रक्षार्थ शारीरिक शौर्य तथा युद्ध कलाके अभावमें नन्नता स्वाभाविक रूपमें आ गयी है। ऐसी अवस्थामें इन विभिन्न जातियों में वैवाहिक सम्बन्ध स्वाभाविक रूपमें अवाञ्छनीय हैं। हाँ, जो लोग इन जातियों के दायरेसे बाहर निकल आ गये हैं, वे यथेच्छाचार कर सकते हैं, यद्यपि उन पर से भी अपना पूर्व जातीय प्रभाव अर्से तक दूर नहीं हो सकता। अनेक शताब्दीसे उनके पूर्वज जिस ढङ्ग का जीवन व्यतीत कर चुके हैं, यह सम्भव नहीं है कि उसका प्रभाव यकायक दूर हो जाय। अब रही अन्तन्तिीय विवाहकी बात । सो इसका खण्डन तो सहज ही में हो जाता है । प्रायः एक प्रान्तका खान-पान, वस्त्रा- च्छादन, आचार-व्यवहार और भाषा दूसरे प्रान्तसे भिन्न है, इस- * विवाह ६५ लिये एक प्रान्तके युवक को दूसरे प्रान्तकी युवती यदि अपने सौन्दर्यसे आकर्पित भी कर ले तो उपर्युक्त बातोंमें समता न होने के कारण उसका मन कभी पूर्णत: मिल ही नहीं सकता। यह स्वाभा- विक है कि एक प्रान्तका निवासी अपने प्रान्तक रस्मोरिवाज, खान-पान नथा भाषाको दूसरे प्रान्तकी अपेक्षा अधिक पसन्द करता हैं, फिर भिन्न समोरिवाज, खान-पान तथा भाषा रखने वाली युवती उसके मनको पूर्णत: कैसे आकर्पित कर सकती है ? यह सच है कि कुछ ऐसे पथ-भ्रष्ट हिन्दुस्तानियोंने जिन्होंने अंग्रेज़ी भापाको अपनी मातृ-भाषा, अंग्रेजी पोशाकको अपना जातीय वाना, और अंग्रेजी भोजनको स्वीकार कर अपना खाद्य बना लिया है, अन्त- प्रान्तीय विवाह किये हार हैं और उन्होंने समझा है कि उन्होंने भापा, भय और भोजन सम्बन्धी एकता स्थापित करनेका आदर्श कायम किया है, किन्तु उनका वैवाहिक जीवन कभी भी सफल नहीं हुआ और दाम्पत्य प्रेम केवल कामामक्तिको हलकी जड़ पर ही अवल- म्बित नह गया सी अवस्थामें उनको पारिवारिक सुख कभी भी नसीव नहीं हो सकता। न उनकी सन्तान ही अपना विशेष जातीय गौरव रख सकती है। बझाली, पक्षावियों और बङ्गाली, मद्रालियोंमें जो इस प्रकार की शादियाँ हमारे देश में हुई है, उनका अन्तिम परि- णाम सुन्दर नहीं हुआ। अव कन्याकी शिक्षा-दीक्षा पर विचार कीजिये । साधारणतः पढ़-लिख लेना, भोजन बना लेना, अन्य गृह-का-में दक्ष होना तथा सीने-पिरोने तथा सङ्गीतमें अस्याल रखना होता है। गृहस्थके ५ ६८ * युवक-पथ-प्रदर्शक * धनायकी लड़की होनेके कारण ही विवाह-सम्बन्ध करनेको तैयार हो जायें; लड़कीके गुणावगुण, अवस्था और शक्ल-सूरतपर विचार न करें वहाँ युवकको इसका विरोध करना अनुचित नहीं है, क्योंकि अन्ततः युवकको ही उसके साथ सारा जीवन व्यतीत करना है, उसके माँ-बापको नहीं। माँ-बाप तो थोड़े समय तक ही जीवनमें साथ दे सकेंगे। ऐसी अवस्थामें सदोप लड़कीका परिणय युवकके लिये विष तुल्य हो जाता है और उसे पीछे पछताना पड़ता है। लड़कीके माँ-बाप भी फिर उसे विशेष सहायता नहीं देते-विवाह करके अपना पिण्ड छुड़ाते हैं । प्रत्येक युवकको विवाह करनेका अधिकार नैतिक दृष्टिसे तभी है जब उसकी शारीरिक अवस्था बिल्कुल दुरुस्त हो । वह रोगादिसे रहित हो और उसकी मानसिक अवस्था भी पूर्णतः दुरुस्त हो। इसके बाद उसमें शिक्षाके साथ आर्थिक दृष्टिसे भी स्वावलम्बन होना चाहिए। बिना इन दोनों ही दृष्टियोंसे सम्पन्न हुए विवाह करना नैतिक अपराध है, क्योंकि जिस प्रकार स्वस्थ पुरुप यह आशा करता है कि उसे स्वस्थ पत्नी मिले उसी तरह स्वस्थ स्त्री भी स्वस्थ पुरुषकी ही कामना करती है। क्योंकि रोगी पति भी स्त्रीके लिये भारस्वरूप हो जाता है, इसलिये प्रत्येक युवकको अपने स्वास्थ्यका विचार करते हुए ही वैवाहिक सम्बन्धकी आकाँक्षा करनी चाहिए।

स्त्रीके प्रति कर्तव्या यह कहने की आवश्यकता नहीं कि विवाह करते ही पुरुष एक प्रकारक कर्तव्य-वन्धनमें बँध जाता है और उनपर एक प्रकारकी विशेष जिम्मेदारी आ पड़ती है। पुरुष पर न केवल स्त्रीके भरण- पोपणका ही उत्तरदायित्व है; वरन् प्रत्येक दृष्टिले उसपर स्त्रीके प्रसन्न और सन्तुष्ट रखनका भार होता है। जो पुरुप अपने इस कर्त्तव्यमें सफल हो वही विवाहका आनन्द भी प्राप्त कर सकता है। वास्तवमें पुरुपको चाहिए कि वह स्त्रीको अपना ही एक अङ्ग समझे। इसी भावनासे हमारे पूर्व पुरुषांने स्त्रीको अर्धाङ्गिनी कहा है। स्त्रियोंका आदर करना भारतके लिये कोई नई बात नहीं है। मनुभगवान् कह गये हैं:

७० * युवक-पथ-प्रदर्शक * NMmmnxnnn. पार किया था, तब त्रिया यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता गोस्वामी तुलसीदासने भी स्त्रियोंके आदरकी परिपाटीका चित्रण रामचरितमानसमें अनेक स्थानोंपर किया है। भगवान् रामचन्द्रने जिस समय वन जाते समय गंगातटपर नौकामें बैठकर चढाइ चढ़े रघुराई का शिष्टजनो- चित व्यवहार प्रदर्शित किया था। स्त्रियोंके प्रति आदर-भाव तो रखना ही चाहिये, साथ ही उन पर पूर्ण विश्वास रखकर उनके गुणोंकी कद्र करनी चाहिए। संसारके सभी स्त्री-पुरुपोंमें कोई-न-कोई दोप मिलते ही हैं, किन्तु किसी दोपके कारण उसके गुणोंका आदर न करना अशिष्टता और असभ्यताका लक्षण है। स्त्रीमें यदि कोई स्वभाव जनित अथवा व्यावहारिक दोष हो तो उसपर खीजनेके बदले उसे सौम्य शब्दोंमें समझा देना अधिक प्रभावोत्पादक सिद्ध होगा। बहुत-से पुरुष स्त्रियोंको काम-वासनाकी पूर्तिका एक साधन- मात्र समझते हैं और इसलिये गृहस्थ सम्बन्धी अन्य गुणोंपर ध्यान न देकर उनके सौन्दर्यकी ही उपासना करते हैं। यह भारी भूल है, और कुछ ही दिनोंमें युवावस्थाका उफान शान्तक हो जानेपर पुरुषको अपनी भूल मालूम हो जाती है। पुरुषको चाहिए कि स्त्रीमें आचार- व्यवहार और सामाजिक मेलजोल सम्बन्धी जो त्रुटियाँ हों, गृहस्थी-सम्बन्धी जिन बातोंका ज्ञान उसे न हो, उसे सिखानेका प्रबन्ध कर दें। पाकविद्या, सीना-पिरोना, कसीदे-बूटे, मोजे गुलूबन्द और स्वेटर आदि बुनना स्त्रियोंको सहज ही सिखाया जा सकता *बी प्रति कर्तव्य * ७१ - है। बच्चे होनेके पूर्व स्त्रियाँ ये गुण भलीभाँति सीख जायें तो उन्हें अधिक सुविधा रहती है, क्योंकि बच्चे हो जानेपर उनका अधिकाँश समय उनके पालन-पोपणमें व्यतीत होने लगता है और फिर उनके लिये कोई नई विद्या मीखना कटकर हो जाता है । जिस स्त्रीने अपने नेहर (पितृगृह ) में विद्याभ्यास न किया हो उसे पतिगृहमें पढ़ाया जा सकता है और साल छ: मासमें ही उसे हिन्दी और हिमावका साधारण तान करा दिया जा सकता है, जिससे वह घरका हिसाब-किताब रखना, साधारण पुस्तक आदि पढ़ लेना सीख सकती है। बहुत-सी लड़कियों को माता-पिताके लाड़-प्यारके कारण नहरमें भोजन आदि बनानेकी सुविधा नहीं प्राप्त होती । ऐसी लड़कियोंपर पति या पतिगृहवालोंको अकारण कोप न करके उन्हें सीखने का अवसर देना चाहिए। पाश्चात्य देशों की देखा देखी इधर भारतमें भी स्त्रियों के समान मनाधिकारकी चर्चा चल पड़ी है। जहाँ तक स्त्रियोंके राजनीनिक और विचार-सम्बन्धी मताधिकारका सम्बन्ध है, वहाँ तक कोई भी निष्पक्ष विचारक इससे असहमत नहीं हो सकता; किन्तु जब यह समानताका रोग सामाजिक क्षेत्रमें प्रवेश करता है तो इसके साथ अनेक विषम समस्या और उपस्थित हो जाती है। प्रकृतिने स्त्रीको ऐसा बनाया है कि उसकी आवश्यकताएँ पुरूपसे भिन्न है अतः अनेक पारिवारिक और सामाजिक मामलों में पुल्स और स्त्रियांका हिस्सा विभिन्न होता है । घरेलु काम-काज सँभालने, बचोका पालन-पोपण करने और रसोई बनाने आदिमें यदि स्त्रियाँ पुष्पका मुकाबला ७२ * युवक-पथ-प्रदर्शक * करने लगे और चौकेसे परहेज तथा रसोईसे घृणा करके इन कामोंके लिये नौकर-नौकरानी नियुक्त करनेका आग्रह करें, तव तो यह समझना चाहिए कि वे उस स्वाभाविक नियमका उल्लङ्घन कर रही हैं, जिसके लिये परमात्माने उन्हें बनाया है । उपयुक्त महत्त्वपूर्ण कार्य समालनेकी स्त्रियोंमें स्वाभाविक क्षमता होती है और यह बात बिना विरोधके कही जा सकती है कि पुरुष औसतरूपसे इन कामोंमें कभी स्त्रियोंकी प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके हैं। विलायतमें स्त्रियोंका समानताधिकारका दावा जिस वेगसे चला था, वह अब प्रतिक्रियाकी अवस्थामें है । वहाँके बड़े-बड़े समाजशास्त्रवेत्ता अब यह कहने लगे हैं कि स्त्रियाँ प्रत्येक बातमें पुरुपोंकी बराबरीका दावा करके भयंकर भूल कर रही हैं और इसका मूल्य समाजको चुकाना पड़ेगा। भारत चूंकि नकल करनेमें बहुत पटु है, इसलिए वह विलायतके समाज-घातक रीति-रिवाजों तकको अपनानेके लिये इस समय बहुत सचेष्ट जान पड़ता है; किन्तु वह दिन दूर नहीं है जब वह अपनी भयंकर भूलका अनुभव करके अन्धानुकरणका परित्याग करेगा। समाजमें स्त्रियोंकी स्वच्छन्दता और बरावरीके अधिकारका दावा पुरुषके मस्तिष्ककी उपज है। इसीने इसे प्रोत्साहन दिया है और भारतमें भी विलायती साहबोंकी देखादेखी अपनी गृहिणीको भी सेम साहब जैसी स्वच्छन्दता प्रदान करनेका उद्योग किया जा रहा है। यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि विवाहित स्त्री-पुरुषोंको पूर्ण ब्रह्मचारी बनने की चेष्टा करनी चाहिए; किन्तु यह कहना भी उचित *खी प्रति कर्तव्य * ७३ MAA नहीं प्रतीत होना कि पुन्य, बासनाका शिकार बन कर लोक स्वास्थ्य पर कमी विचार ही न करे । पुन्यको यह भूल नहीं जाना चाहिये कि वीक प्रति उसके सांसारिक और आध्यात्मिक गर्तव्य है जिनका पालन थैर्व, सन्तोप, नन्नता और सत्यनिष्ठावं लाथ कर सकता है। जहाँ तक हो सके पतिको बीको अपने साहचर्यका आनन्द देना चाहिये । परिस्थिति अनुकूल हो तो दवा-विदेश, घर और प्रवास, यात्रा या तीर्थ-पर्यटनमें सदा सर्वत्र श्री को माथ रव, क्योंकि इन्सले शारीरिक और मानसिक दोनों ही सन्तुष्टि मिलती है। इससे अनप्रयास बीका अनुभव भी बढ़ जाता है और इस समय हमारा हिन्दू-समाज अपने अङ्गिको जिन कृष-मण्डूकतामें रखे हुए हैं, उनसे बाहर निकल कर हिन्दू विचाँ संसारको अधिक समझने लगंगी। प्रायः पुरुष अपनी थोड़ी सी सकीर्णता, थोड़से अनाड़ीपन या अनुभवहीनताकै कारण अपनी स्त्रीक प्रति अनुदार भाव रख लेने के कारण और उनसे अधिकाधिक खुला और स्पष्ट व्यवहान न रखनक कारण सन्दहका शिकार बन जाता है और इस प्रकार यह जन्दह और अविश्वासकी दीवार ऊँची होने लगती है । आरम्भमें ही इस वानकी सावधानी रखनी चाहिये कि इस प्रकारक प्रसंग न उठ सकें. क्योंकि इससे गार्हस्थ्य-जीवनका माधुर्य लुन हो जाता है। शान्ति, क्षमा और उदारता पुरुषकी शोभा है। इसोके बल पर वह स्त्रीकी बहुन-सी त्रुटियोंको दूर कर सकता है। सद्गुणोंका आंशिक अभाव प्रेस दूर कर देना है; किन्तु यदि सद्गुणों के साथ प्रेमका ७४ - * युवक-पथ-प्रदर्शक पूर्ण प्रभाव दम्पतिमें छा गया तब तो फिर परिवार स्वर्ग तुल्य हो जाता है। जिन नवयुवकोंका विवाह अभी हालमें ही हुआ है, उन्हें यह भूल नहीं जाना चाहिये कि उन्होंने विवाहके समय एक दूसरेसे किसी बातका दुराव या छिपाव न रखनेकी प्रतिज्ञा की है और जीवन-क्षेत्रमें उस प्रतिज्ञाको कार्यान्वित करनेकी आवश्यकता होती है। यह समझना भूल है कि स्त्रीसे सब बातें छिपा रखनी चाहिये। जीवनकी प्रत्येक समस्याके साथ स्त्री-पुरुषका समान सम्बन्ध होता है, इसलिये किसी बातको रहस्य बना कर स्त्रीसे छिपा रखना वाञ्छनीय नहीं। यदि कोई भूल हो गयी हो तो उसे स्वीकार कर लेनेमें ही बड़प्पन है। इससे घरमें सुख और शांति की वृद्धि होगी। यदि दम्पतिके बीचमें कोई तीसरा व्यक्ति पड़ कर इधरकी बात उधर लगाये या मनोमालिन्य उत्पन्न करनेका प्रयत्न करे तो उसे अपने मार्गले अलग कर देना ही श्रेयस्कर होगा। स्त्री-पुरुषके आचार-व्यवहार बोल-चाल, और धर्म-कर्ममें एकता और सामंजस्यका होना आवश्यक है, क्योंकि इन बातोंका वैपरीत्य दोनोंके जीवनको दुःखी बना देता है, यही कारण है कि जो लोग अन्ततीय या अन्तर्जातीय विवाह करके काम-वासना, आर्थिक लाभ या ख्यातिकी आडमें असंकुचिता और सुधार का आदर्श रखनेके लिये आगे बढ़े हैं, उनका वैवाहिक जीवन अस- फल रहा है । शारीरिक और आत्मिक साहचर्यके लिये यह आवश्यक है कि पतिकी भाषा ही पत्नीकी भाषा हो और उसका धर्म तथा *बीके प्रनि कत्र्तव्य * । उपर्युक्त 'उनका आचार-व्यवहार पन्नीक लिये आदर्श हो। ऐसा न होकर जहाँ एक बंगाली लड़की किमी पंजाबीसे ब्याही गयी है, या मद्रामी लड़की किसी बैंगाली से व्याही गयी है अथवा बंगाली लड़की किसी मद्रासीसे व्याही गयी है, वहाँ कुछ दिनों तक केवल कामोनज-जन्य प्रेम हो जाने के अतिरिक्त उनमें आत्मिक सान्निध्य नहीं बढ़ सकता, न उनके बाल-बचे ही आदर्श या एक प्रान्त या समाजके प्रतिनिधि स्वरूप हो सकते हैं। ऐसी अवस्थामें यदि भूलस या और किसी कारण या परिस्थितिवश किसी युवका विवाह इतर प्रान्त या अन्य भाषा-मापी प्रान्तकी लड़कीसे हो ही गया है, तो उसे यथासम्भव क्त अन्तर दूर कर देनका पूर्ण प्रयत्न करना चाहिये । स्त्रीमें यदि पुन्य महत्वाकांक्षा देखे तो उसे दवाना नहीं चाहिये, बल्कि उसकी प्रानिके लिये सचेष्ट होकर उसमें सहायक बनना चाहिये । प्रायः ऐसा हुआ है कि विवाहित लड़कियोंने श्वसुर- गृहमें जाकर ही कितने नवीन गुण सीवे हैं। यदि भी कोई नयी कला सीखनी चाहे तो पतिको भरसक उसका प्रबन्ध करने की चेष्टा करनी चाहिये । इससे दाम्पत्य-नेहकी वृद्धि होती है और पुगप सहज ही स्त्रीका अधिकाधिक शारीरिक एवं आत्मिक सहयोग प्राप्त कर सकना है। पुरुष जब स्त्री-सम्बन्धी किसी बात पर विचार करे तो उस स्त्रीक ही चष्टिकोणसे सोचना चाहिये । सम्भव है कि जो वान उसकी वृष्टिसे उपयोगी या उचित नहीं प्रतीत हो रही हो, वह स्त्रीक दृष्टि- कोणसे उपयोगी और उपयुक्त हो ।

इन्द्रिय परायणता और सदाचार भारतमें इस समय प्रत्येक विषयमें विचारोंका अद्भुत संघर्ष चल रहा है। काम विज्ञान और सदाचारके सम्बन्धमें भी यह मत- भेद बहुत विस्तृत हो चला है। पुरानी पीढ़ी के लोग जहाँ काम- विज्ञानकी बातोंसे नाक-भौं सिकोड़ते हैं और इस विषयको गुह्य और गोपनीय कह कर इस दिशामें नितान्त अनभिज्ञ रहना वाञ्छ- नीय समझते हैं, वहां नयी पीढ़ीके युवक ऐसे मनचले और अमर्यादित होते जा रहे हैं कि वे इस विषयको अधिकाधिक प्रकाशमें लाना चाहते हैं। वास्तवमें दोनों ही गलती पर हैं, क्योंकि काम- विज्ञानकी जानकारी आवश्यक होनेके कारण उसकी गोपनीयता सापेक्ष नहीं है । न यह प्रयोजनीय विषय ऐसा है जिसका प्रदर्शन .

* इन्द्रिय परायणता और सदाचार * इस रूपमें हो कि मर्यादा और सीमाका ध्यान ही न रक्खा जाय । ऐसी अवस्थामें वीचका मार्ग ही श्रेयस्कर है। जिस पर चल कर प्रत्येक युवकको कमसे कम इतना ज्ञान तो हो जाय कि जीवनकी इस महान् समस्याका तथ्य क्या है। यह वस्तु क्या है और इसकी प्रयोजनीयता और उपयोगिता कहाँ तक वाञ्छनीय है। संमार में जिस प्रकार धर्म वन्दनीय एवं आचरणीय और अर्थ उपार्जनीय है उसी प्रकार काम-विज्ञान सम्पादनीय है, क्योंकि इन तीनोंके सम्यक् लामंजस्य और पुष्टिसे ही मानवताका पूर्ण विकास हो सकता है। इनमें ले किसी एक पर जितना ही अनिरिक्त जोर दिया जायगा, दूसरे दो उतने ही अधिक कमजोर होंगे और मान- वता उतनी ही त्रुटि आजायगी । इन तीनोंकी सिद्धिले ही चौथे पदार्थ-मोक्षका साधन हो सकता है, इसलिये इन तीनोंमेले किती एक की कमी भी मोक्ष-साधनमें वाधक सिद्ध होती है । यहाँ हमें केवल काम-विज्ञानके सम्वन्धमें ही विचार करना है अतः इलीक सम्वन्धमें कुछ कहा जायगा । काम-विज्ञानका मतलब है पुरुप और स्त्रीके शारीरिक संयोग सम्बन्धी स्वाभाविक आकांक्षा और उसकी परितृप्ति की व्याख्या- एक खास अवस्था पर पहुंच कर प्रत्येक युवकमें काम-सम्बन्धी अभिलापाओंका उदय होता है। कुछ को उनके विकसित होनेका अवसर मिलता है और कुछ को नहीं । यही वह समय है जब काम विज्ञान सम्बन्धी बातोंकी जानकारी आवश्यक है, क्योंकि बिना इस विपयकी जानकारीकै सम्भोग करना पूर्णतः पाशविक है। , ७८ * युवक-पथ-प्रदर्शक * क्योंकि इससे स्त्री-पुरुपको परितृप्ति नहीं मिलती। इस विषयको जानकारी प्राप्त करने के लिये शारीरिक अवयवों का ज्ञान और मैथुन- प्रक्रियाका मनपर प्रभाव जानना आवश्यक है । वीर्यका विकास शारीरिक अवयवों में होता है। आहार-रससे रक्त, रक्तसे माँस, माँससे मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा, मज्जासे वीर्य और वीर्यसे ओजकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार वीर्य बननेमें ३० दिन लगते हैं। वीर्य-वाहिनी शिरा अण्डकोशमें है। अण्डकोशके उतर-चढ़ावसे वीर्यकी अवस्था आती जाती है। काम कला कोश गुह्य-द्वारके भीतर है और लिंग-मूल पर है। योग-शास्त्रमें इसका नाम स्वाधिष्टान चक्र रक्खा गया है । वीर्यमें जीवाणु होते हैं, जिन्हें अंग्रेज़ीमें स्परमेट्र ज़ कहते हैं। उन्हींसे सन्तानोत्पत्ति होती है। अण्डकोश और काम- कला कोशके दो कार्य हैं, एक अधोरेत और दूसरा ऊर्ध्वरेत । ऊर्ध्व- रेतका अर्थ है वीर्यको शरीरके रक्त-संचालनके साथ मिला देना, जिससे ओजकी उत्पत्ति होती है। ओजसे हृदयमें प्रेरणा उत्पन्न होती है और साथ ही व्यक्तित्व, कान्ति, सहनशक्ति तथा दृढ़ताकी वृद्धि होती है। साथ ही इसके परिणाम स्वरूप अवस्था स्थायी बनती है । इससे स्नायु और अवयवोंका स्वाभाविक उपचार होता रहता है । ओजका दूसरा कार्य वीर्यको शरीरके बाहर निकाल देना है। जिन नाड़ियों पर मस्तिष्कका नियंत्रण होता है वे आश्रित नाड़ियों और जिन पर नियंत्रण नहीं होता वे अनाश्रित नाड़ियाँ कहलाती हैं। मैथुनके समय आश्रित नाड़ियोंके कार्य करते हुए एक समय आता है जब कि अनाश्रित नाड़ियाँ काम करने लगती MA * इन्द्रिय परायणता योर सदाचार * है-इसी लमय बीर्यपात होता है । उस समय मनुष्य अपने आपको नहीं रोक सकता। अधिक बीर्य क्षय होने पर अनाश्रित नाड़ियाँ जल्दी काम करने लग जाती है यहाँ तक कि चरम अवस्थामें मैथुनकं स्मरण मात्रसे बीय-श्य हो जाता है। मनोवैज्ञानिक क्रिया अत्यधिक मैथुन इच्छाके ऊपर अधिकार नहीं रखता। जैसे नशवाज़ अनुत्तरदायित्त्वपूर्ण कार्य करता है वैसे ही अत्याधिक कामा- सक्त भी। किन्तु साथ ही कितने ही प्रकारके आनन्द ऐसे हैं जो बिना मैथुनके पूर्ण मात्रामें नहीं प्राप्त होने । हर्ष, सुख, न्नेह सब मैथुनके अन्तर्गत अपने पूर्ण विकासको प्राप्त होते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है मैथुन दो प्रकार के हैं एक अन्तस्य और दूसरा बहिरस्थ । अन्तस्थ मैथुन-जिस समय वीर्य रक्त-त्रोतके साथ मिलकर ओज की उत्पत्ति करता है, सारे शरीरमें, और विशेष करके मस्तिष्कके नायुओंमें एक प्रकारका रक्तप्रवाह होता है। इससे आनन्द उप- लब्ध करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है। इसीले चि, मानसिक या शारीरिक रसोंके आस्वादन करनेकी शक्ति, दसों इन्द्रियों के अधीन को में आसक्ति उत्पन्न होती है, जिसका कि चरम परिपाक मह- त्वाकांक्षाको उत्पन्न करता है। रोमाञ्च, विकसित हृदय, उत्फुल्लना, मनोनिवेश, दूसरोंकी प्रतिभाका आदर आदि गुण इसीसे उत्पन्न होते हैं। बहिरस्थ और अन्तरस्थ मैथुनमें एक अनुपातिक सम्बन्ध है; परन्तु इसका यथार्थ गणित-सम्बन्ध निकालना असम्भव है, ८० * युवक-पथ-प्रदर्शक क्योंकि प्रत्येक व्यक्तिका स्वभाव भिन्न होता है। इस अनुपातको न समझनेके कारण ही ब्रह्मचर्य और सदाचार पर जोर दिया जाता है। अन्तरस्थ मैथुनकी क्रिया-शक्ति वाह्य मैथुनके कम करनेसे ही बढ़ती है साथ ही ब्रह्मचर्य-पालन भी आवश्यक है। जव कभी मनुष्य वाह्य मैथुन-रत होता है तो कुछ तो वीर्यके पूर्ण परिपाक होने के कारण और कुछ अनाश्रित नाडीके देरसे कार्य करनेके कारण तथा आश्रित नाड़ीमें यथेष्ट शक्ति होनेके कारण मनुष्य पूर्ण सम्भोगका आस्वादन कर सकता है। वीर्य के बाहर निकलनेसे जो नुकसान पहुंचता है, उसकी पूर्ति अन्तरस्थ मैथुन की पूर्णता होनेके कारण उसकी पूर्ति होकर अनिर्वचनीय आनन्दकी प्राप्ति होती है साथ ही अन्तरस्थ मैथुनकी क्रियाकी द्रति बढ़ जाती है। दूसरी बात यह है कि स्त्रीको योनिमें जो रस-प्रवाह होता है उसका कुछ अंश पुरुपका लिंग सोख लेता है जिससे लिंगके स्नायुकी दुर्बलताकी पूर्ति हो जाती है । इस प्रकार वीर्य और ओजके साथ मनुष्यका चारित्रिक सम्वन्ध कितना घनिष्ट है, इसे सहज ही समझा जा सकता है । स्मरणशक्ति, बुद्धि, प्रेरणाशक्ति, स्वच्छ हृदय, करुणा, दया, क्षमा, उत्साह, महत्त्वाकांक्षा, सहानुभूति, सहनशक्ति, आपत्ति-कालमें विचलित न होनेकी शक्ति, तेज, दीप्ति, कान्ति, वयस्थापन और मौलिकता आदि सद्गुण वीर्य और ओज पर ही निर्भर करते हैं। असद् और अप्राकृतिक प्रकारसे इन्द्रिय-तृप्ति करनेके कारण तृप्तिकी पूर्ति नहीं होती और मनमें जो तृष्णा रह जाती है, उसके * इन्द्रिय परायणता और सदाचार * ८१ कारण कुछ मानसिक प्रन्थियाँ (Psychological complex) पड़ जाती हैं और वे वृत्तियाँ बन कर अद्ध सुपुत्र अवस्थामें बदल जाती हैं और उनके विषयमें मन, स्मृति आदिको ज्ञान नहीं रहता, बल्कि मन, बुद्धि, स्मृति आदि उन ग्रन्थियोंसे परिचालित होते रहते हैं। इन प्रन्धियोंके कारण मनुष्यमें छुटिलता आ जाती है; वह दूसरों पर अविश्वास और सन्देह करने लगता है-विशेषतः अपने प्रिय पात्रों पर पहले। एक तो तृष्णाकी अतृनिक कारण ऐसा होता है, दूसरे उस (तृष्णा) की पूनिके लिये अन्तरस्थ मैथुनका नाश होन पर मनुष्य बहिरस्थ मैथुनका सहारा लेता है कि शायद इस बार उसकी पूर्ति हो जाय । उनके बुद्धि, विवेक, विचार सभी लिंगोन्मुखी हो जाते हैं। इससे संकड़ों प्रकारक मानसिक विकार उत्पन्न होते ही वह वीसों रोगोंका बर बन जाता है। ऐसे लोग व्यभिचार विषयक वातं, अश्लील कहानियाँ, नन्न चित्र, अगस्य गमनको कथा और अप्राकृतिक मैथुनके किस्सोंकी और अधिक आकृष्ट होते रहते हैं और समाजके डरसे या यदि ने लोगों में धार्मिक पुरुप प्रसिद्ध हो तो ऐसे ऋषि-मुनियोंकी कथा शुरू करके उसके विरुद्ध तर्क-वितर्क करके आनन्दका अनुभव करते हैं, जिनकी कामुकता पुराण-प्रसिद्ध है। संसारमें ऐसे लोगांकी संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। बहुत-से सुधारक भी इस कोटिमें परिगणनीय हैं और बहुत-ले युद्ध-बुढ़ियाँ तक दूसरों के घरोंकी बुरी और गोपनीय वातांका भण्डाफोड़ करके आनन्द प्रात करते हैं। यह भी उपर्युक्त प्रकारकी मानसिक अन्धिका ही परिणाम है। सदाचारकी आड़में दुराचारका w

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* युवक-पथ-प्रदर्शक
भण्डाफोड़ करनेके बहाने उसमें रस लेने-लिबानेका यह रोग एक
प्रकारकी बीमारी है, जिसकी चिकित्सा मनोविज्ञानके आचार्याने
कठिन वतलाई है।

एक नई समस्या ब्रह्मचर्यकी महिमा सदाले सुनते-सुनते लोगोंके कान थक गये । इस पर ठीक तौरस विचार किया जाय तो ब्रह्मचर्य रखनेक उपाय अभी तक नहीं बतलाये जा सके । यदि बतलाये भो गये तो अम्न्यिा- त्मक, मूर्खतापूर्ण और सारहीन होने के कारण उन्हें न तो कोई युवक कर सकता है न स्वयं बतलानेवाले ही कर सकते हैं। धर्म और आदर्शकी आड़में व्यर्थ प्रपञ्च करके, किमीको लाभ हो या नहीं, नाम कमानेकी चेष्टा करते हैं। ब्रह्मचर्य-पालनमें सफल होने के लिये आजकल इस प्रकारकी जो विधियाँ बताई जाती हैं, वे निम्न- लिखित हैं (१) मनको शुद्ध रखना। --

* युवक-पथ-प्रदर्शक
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(२) जिस समय किसी असद भावनाकी ओर मन जाता हो,
उसे खींच कर सद्भावनाकी ओर ले जाना।
(३) लँगोट वाँधना।
(४) सिनेमा-नाटक न देखना, उपन्यास, नाटक शृङ्गारात्मक
काव्यादिका न पढ़ना।
(५) किसी जानवरका जोड़ा न पालना ।
(६) सदा धार्मिक ग्रन्थ पढ़ते रहना ।
(७) जननेन्द्रियकी ओर ध्यान ही न देना।
(८) गायन-वादन करने और सुननेसे भी बचते रहना।
(६) सुन्दरी स्त्री-यहाँ तक कि अपनी सुन्दरी कन्याके
साथ भी एकान्तमें न होना।
(१०) उपवास करना और कवाव चीनी तथा कपूर आदिका
सेवन करके काम-वासनाको रोकते रहनेकी चेष्टा करना।
(११) अत्यधिक व्यायाम करना और ऐसे कार्यों में लगे रहना
जिससे चुप रह कर कुछ सोचनेका अवसर ही न मिले ।
(१२) यथासम्भव बहुत कम सोना ।
इन उपायोंमें-से यदि सच पूछा जाय तो एक भी व्यावहारिक
नहीं है। इन पर क्रमशः विचार कीजिये :
(१) मनको शुद्ध रखना इतनी बड़ी बात है कि साधारण क्या,
बड़ेसे बड़े ऋषि-महर्षियोंको चक्कर में पड़ना पड़ा था। ऐसे असाध्य
उपायका परामर्श देना न देना बराबर है। जो लोग इस विषयमें
उपदेश देते हैं, वे स्वयं भी मन पर वश नहीं कर चुके होते ।

*एक नई समस्या * ८५ (२) असज्ञावनाके उठने पर अर्थात् जिम समय मनमें कोई कुकर्म करनेकी इच्छा उत्पन्न हो नो मनको उधर जाने ही न दे। किन्तु यह यान तो सभी जानते हैं कि कुकर्म नहीं करना चाहिये, पर मनको मोड़ लेना, मनको वश में करने कम कठिन नहीं है। गीतामें अर्जुनने यही प्रश्न किया था, किन्तु ऋगजोका उत्तर उतना महत्त्व-मण्डित नहीं हो सका, जितना अजुनका प्रश्न। इसी प्रकार एक बड़े महात्मानं लोगोंको उपदेश देते हुए कहा था कि जिस मनमें दुर्भावना उत्पन्न हो तो उसे ही अपनी मातृ-मूनिकी कल्पना कर ले। यदि किसीमें यही शक्ति हो कि वह प्रत्येक सुन्दरी स्त्रीको अपनी माता समझने लगे, यदि मनमें ऐसी भावना लाई जा सके कि जिसे चाहे माँ मान ले तो ऐसी कुभावना ऐसे ननमें उत्पन्न ही क्यों हो ? (३) लँगोट वाँध कर पशु-बलके द्वारा शरीरके एक अवयव को अवरुद्ध कर लेनेसे उस स्थानमें रक्त संचालन निया बन्द हो जाती है, किन्तु इन्द्रिय कामोद्दीपन, मनकी वासना ओर कामकला कोशसे सम्बन्ध रखती है, ऐसी अवस्थामै भीतरले उत्तेजना होती जाय और बाहरसे अवयव कसकर बंधा हो तो उसके फल-स्वरूप इन्द्रिय वायु-बद्ध होकर रोगका स्थल बनती है-विशेष कर वे नाड़ियां जिनके साथ अण्डकोश, कामकला कोश, नामि और सूत्र कोशका सम्बन्ध है, कुपित होकर नाना प्रकारके रोग उत्पन्न करती हैं। यदि मानसिक वासना इस ओर न हो तो लँगोटकी कोई आवश्यकता नहीं, और यदि मनोवृत्ति इस ओर हुई तो लँगोट अतिशय उपयोगसे कोई लाभ नहीं।

८६ * युवक-पथ-प्रदर्शक * . (४) सिनेमा, नाटक न देखना और उपन्यास, नाटक न पढ़ना आधुनिक युगके युवकोंके लिये असम्भव ही है-विशेष कर ऐसी अवस्थामें जब कि आज कलकी पाठ्य पुस्तकों तकमें शृङ्गार रसात्मक कविताएँ और कहानियाँ होती हैं। संसारके साहित्य में सर्वत्र शृङ्गार रसका स्थान है। धार्मिक ग्रन्थों में भी शृङ्गार रसकी कमी नहीं है। स्थान-स्थान पर अश्लीलता और वीभत्सता की कमी नहीं है । रसोंकी ओर मनुष्यकी जो स्वाभाविक प्रवृत्ति है उसे रोकना प्रकृतिकी वाढको रोकनेके समान है। सन्मार्ग पर चलना जितना कठिन है, संगी-साथियोंका उपहास सहना उससे भी कठिन है। जो नाटक-सिनेमा नहीं जाते और उपन्यास तथा काव्य नहीं पढ़ते, उनके मस्तिष्कमें किसी प्रकारके वर्तमान वाता- वरणमें रोग होनेकी अधिक सम्भावना होती है, क्योंकि आजकलके शुष्क जीवनमें प्रवृत्त रह कर मनोरञ्जनसे बिल्कुल मुंह मोड़ लेना मानो मानसिक अवसादको निमंत्रण देना है। इस तरहका वहिष्कार करने वालोंका बुद्धिसे सम्बन्ध रखना आश्चर्यजनक ही है। नका- रात्मक शिक्षा इस देशमें बहुत प्रचलित हो चली है। यदि नशा करनेकी ओर मन जाता हो तो नशा न मिले ऐसे स्थान पर रहो, यदि त्रियोंकी ओर मन आकर्षित होता हो तो स्त्री-शून्य स्थान पर रहो । गत सत्याग्रह संग्राममें भी ताड़ीकी रोकके लिये ताड़के वृक्ष काटे गये । यद्यपि बेचारे वृक्षोंने किसीका कुछ नहीं बिगाड़ा था और गुड़के लिये रस आदि लेकर उनका सदुपयोग भी होता था । इन सब कार्योकी जड़में अपने दोपको स्वीकार न करके दूसरों पर * एक नई समस्या * । दोपारोपण करनेकी प्रवृत्ति काम करती है जो यौवनहीन-बीर्यताका लक्षण है। (५) जानवरोंक जोडेको कौन कहे, प्रत्येक युवक मनुष्योंके जोड़ोंको पालना नहीं तो नित्य देखता अवश्य है। घरमें और बाहर चारों ओर शादी-ब्याह होते रहते हैं, वो भी पैदा होने रहते हैं—पति पन्नीके साथ जो सम्बन्ध होते हैं उन्हें भी सब जानते हैं, ऐसी अवस्थामें इस बातका ज्ञान कसे रोका जा सकता है। इस प्रकारका उपदेश देने वालोंको जानना चाहिये कि यान कल स्कूल कालेजो, शरीर शास्त्र और उत्पत्ति शान ( Biology) पनाये जाते हैं और इन्द्रिय विषयक गालियां बचे धोड़ी उम्रसे ही सुनते रहते हैं, फिर उन्हें इन विषयके ज्ञानसे वञ्चित कैसे रक्खा जा सकता है। (६) धार्मिक ग्रन्थ अवश्य पढ़े, पर चौबीसों घण्टे उसमें कैसे मन लगाया जा सकता है। आजकलके व्यस्त संसारमें लोगों को जीवन यापनके लिये और भी बहुतसे काम है, इसलिये धार्मिक ग्रंथ लिये बैठे रहनेसे कैसे काम चल सकता है। धार्मिक प्रवञ्चकांकी भी कमी नहीं है। जिस प्रकार किसी वस्तुको भूलनेकी जितनी ही चेष्टा की जाय उतना ही उसका स्मरण बढ़ता है, उसी प्रकार इन्द्रिय वृत्तिके विरुद्ध जितनी ही बात कही जायेंगी, इन्द्रिय-लोलुपता भी उतनो ही बढ़नी जायगी। ऐसे हजारों बगुला भगत देखे गये हैं जो या तो नामके न्डरसे या किसी संस्थाले सम्बद्ध होनेके कारण ब्रह्मचर्य-पालनकी चेष्टा करते हैं, परन्तु दुश्चरित्रतापूर्ण विषयोंको ८८ * युवक-पथ-प्रदर्शक * लेकर विशेष आलोचना किया करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि धार्मिकताके नाम पर भी धब्बा लगता है । (७) जननेन्द्रियकी ओर उपेक्षा-भाव रखना और उसके साफ आदि करनेमें बेपर्वाही करनेसे भी ब्रह्मचर्य-पालनमें बड़ी बाधा पड़ती है। खुले स्थानोंमें नहानेकी प्रथा भी इन्द्रिय-स्वच्छताकी बाधक है। लज्जाके कारण लोग गुप्तेन्द्रियोंको अच्छी तरह स्वच्छ नहीं कर सकते । दाद, पसीनेकी बदबू , खुजली आदि इसीके कुपरिणाम हैं। भारतमें धनकी दृष्टिसे उच्च श्रेणीके लोगोंमें भी इसके फल-स्वरूप एक आदत देखी जाती है और वह है सबके सामने हाथ डालकर गुप्तेन्द्रियका खुजलाना । सफाई न करने और गुप्तेन्द्रियको अवहेलना करनेसे ही इस आदत की जड़ जमती है। (८) जिस कलाको शास्त्रोंने 'न विद्या संगीतात्परा' कह कर उल्लेख किया है, उसको बुरा समझना और धिक्कारना मनुष्यताको तिलाञ्जलि देनेके समान है। सुरुचि-विरोधी गाने अवश्य ही वर्ज- नीय समझे जाय, क्योंकि यह तो साधारण शिष्टाचारसे ही सम्बन्ध रखता है, किन्तु सुरुचि पूर्ण गायन तो ब्रह्मचर्य-पालनमें सहायक ही होंगे। (६) सुन्दरो कन्या तकके साथ न बैठनेकी शिक्षा जिस समाज में होती है, उसका अधःपतन कितना हो चुका है, इसका अनुमान सहज ही में किया जा सकता है। अपने मनकी वृत्तियोंको न रोक दूसरेको रोकनेका प्रयत्न करना कितना गर्हित है। जिसका मन इतना जघन्य हो ऐसे मनुष्यके लिये समाजमें कोई स्थान होना भी *एक नई समस्या ८६ NA भवान्छनीय है । ऐसा उपदेश करने वालोंको निजनमें छोड़ देना ही (२०) उपवासक द्वारा शरीरको दुर्बल बनाकर फेवल इन्द्रिय ही को क्यों, जीवनकी गति भी रोकी जा सकती है। ऐले निजी मनुयाको संसार के किम कायमें प्रेरणा दी जा सकती है । अत्यधिक भोजन करने वालों के लिये कभी-कभी उपवान करना अच्छा ही होना है, परन्तु इन्द्रियको शनिको रोकने लिय यदि पंट पर झुठा- राधान किया जाय तो अन्यान्य अवयव-मस्तिष्क, बुद्धि, स्मरणशक्ति और धारणा मादि पर कुठाराघान हो जाना है। ५-६ इञ्चक चमदण्डको रोकने के लिये कितना तृल-नमाल ! फल कुछ भी नहीं। योपधि आदिके प्रयोग शेगदर करना नो सनममें भी या लकाना है, पर तिमी इन्द्रियका बंग और बल रोकना बिल्युल अप्राकृतिक है। (११) व्यायाम द्वारा शरीरको अत्यधिक धना देनेल मस्तिष्क और मन बुद्धि भी थक जाते है-इसरं नो निपुग डाक्टर ने साडलाश निकलवा कर अधिया बन जाना ही अच्छा है। धक भार भी मनुप्यो विचार निष्क्रिय नहीं होते। थक जाने पर सन्द्रिय लोलुपनाका नाश नहीं होना । किनी भी कार्य लग रहने पर भी कामोत्तेजना हो सकती है। (१२) कम लोनले भी कोई लाभ होने के बदले उलंटे हानि ही होती देखी गयी है। रसोग जीवनका सम्बन्ध रलोंका उपयोग मनुप्यमानय लिये एक काव्यमयी शक्ति प्रदान 80 * युवक-पथ-प्रदर्शक * , करता है जिससे जीवन-संग्रामके घात-प्रतिघात सहनेकी शक्ति बढ़ती है । ज्ञान, विज्ञान, आदर्श महत्त्वाकांक्षा, स्वर्ग, मुक्ति, समाज, धर्म, राजनीति ये सभी रसानुभूतिके दास हैं। जीवन-यौवन जरा-मरण काल पर नहीं, घटनाचक्रके ऊपर निर्भर करते हैं और यह वातावरण जीवमात्रकी रसानुभूतिसे सम्बन्ध रखता है। मनुष्यकी आवश्यकता-पूर्ति के लिये बुद्धि ही एक यंत्र है और बुद्धि रसोंसे सम्मिश्रित है। यदि बुद्धि नीरस हो तो जब तक वह अपने अहंकार का साथ न छोड़ देगी तब तक मनुष्यके हृदय-सिंहासन पर उसका कोई स्थान नहीं होगा। चीनी स्त्रियोंके लोहेमें जकड़े हुए पैरोंके समान अब तक लोकमत और समाज-बन्धनसे जकड़ी हुई लालसा- उद्दाम काम वासनाका विकास नहीं हो पाता था, परन्तु अब स्वाधीनता मेरीकी आवाज़ सुनकर असंख्य सुप्त लिप्साओंके साथ लालसा भी वयः प्राप्त हो चुकी है। निर्जीव, निश्चल, सदाचारके राजसिंहासन पर शक्तिशाली संचरणशील विधायक अनुभवका प्रजातंत्र राज्य स्थापित हो गया। वैयक्तिक रसोंके साथ सामाजिक संघर्षके परिणाम-स्वरूप मनुष्यके विचारोंमें एक सन्धि-स्थानकी उत्पत्ति हुई है। वह आँख खोलकर ज्ञान और बुद्धिको परिचालित करना चाहता है-वंश परम्परागत नकारात्मक निष्क्रिय बातों का अनुकरण करनेको अब वह प्रस्तुत नहीं हैं। वेश्यागमनकी प्रवृत्ति और कामाशक्ति वेश्यागमन कामवासनाकी तमसावृत कविता है। भूत कालका आदर्श या त्याग और वैराग्य, वर्तमान कालका आदर्श त्यागका * एक नई समस्या * ११ उपदेश देकर स्वयं आसक्तिमें लीन रहना हो चला है, किन्तु भविष्य का आदर्श है विवेचनापूर्ण विधायक आसक्तिका सदुपयोग-किमी महत्त्वाकांक्षाकी पूर्तिके लिये अनुपयोगी वस्तुओं और अड़चन डालने वाले विपयोंका त्याग । पुरुषमार्ग ही बीको एक ओर मातृरूपिणी जगन्माताके रूपमें आराधना करता है, दूसरी ओर काम वासनाको चरितार्थ करनेके लिये उसे यंत्र स्वरूप समझ कर लोलुप दृष्टिसे आलिंगन करनेको दौड़ता है। इन दोनों चरम विरोधी मूर्तियोंकी कल्पनाके बीचमें पड़ कर जो आत्म-संघर्ष प्रत्येक युवक अन्त:- करणमें उत्पन्न होता है, उसको समझनेके लिये चाहिये उद्धार हृदय, विशाल शक्ति, गम्भीर अनुभव, अदम्य उत्साह और अधक परिश्रम । उसको रास्ता बनाने के लिये शुष्क, नीरस, उपदंश नहीं, मृत्युके बाद नरक नहीं; परन्तु सहानुभूति पूर्ण परिचालन शक्ति है। उसके जीवन की सम्पूर्ण स्फूर्तियोंको एक अंग के पद-स्खलनके लिये कुचल देना महामूर्खता है। जिस संघपमें पड़ कर देवाधिदेव महादेव भी डावाँडोल हो गये थे, उसी संघर्षमें आजका कीटाणु- प्रमाण निर्जीव नवयुवक जा रहा है-उसके पास भगवान् शङ्करका योग-बल नहीं, कोई गुरु और पथ-प्रदर्शक नहीं, शक्ति और साधना नहीं तथा चरित्र निर्माण का कोई आधार नहीं है। माता-पिता तक इन्द्रिय-सम्वन्धी विषयों में न कोई उपदेश देते हैं न दे सकते हैं। उसके लिये एक ही उन्मुक्त द्वार खुला हुआ है और वह है असत्संग जहाँ वह यौवनके हिलोलोंके विषयमें हृदय खोल कर प्रकट कर सकता है उसके लिये यह एक नया और अद्भुत अनुभव है। यही कारण है . ६२ * युवक-पथ-प्रदर्शक कि वह हस्तमैथुनसे लेकर अप्राकृतिक मैथुन और फिर वहाँसे वेश्या के घर तक पहुंच जाता है। यदि इस दोपके लिये कोई अपराधी है तो वह हैं उसके पिता माता, शिक्षक, मात्मीय, स्वजन और समाज। "अच्छे बनो; शुद्ध वनो।" ये शब्द संसारमें आदि कालसे चले आ रहे हैं, परन्तु फिर भी सत्ययुगसे कलियुग आ ही गया, सदाचारियों से दुराचारियोंकी संख्या बढ़ती ही गयी। इसका कारण क्या है पाठक ही सोचें वीर्यका विकास जीवनकी धाराको किसी विशेष मार्गमें प्रेरित करनेकी शक्ति होनेपर जीवन-पुष्प गोवरके ढेरपर भी प्रस्फुटित हो सकता है । इसके लिये शरीरको पूर्ण सावधानीले काममें लाना चाहिए । शारीरिक अवयवोंमें वीर्यका विकास इस प्रकार होता है-आहारके रससे रक्त, रक्तसे माँस, माँससे सेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मन्ना, मज्जाले वीर्य और वीर्यसे मोजकी उत्पत्ति होती है-इस प्रकार वीर्य बननेमें तीस दिन लगते हैं। वीर्यवाहिनी शिरा अण्डकोशमें है। अण्डकोशके उतार-चढ़ावसे वीर्यकी अवस्था जानी जाती है । काम- कलाकोश गुह्यद्वाराके अन्दर और लिंगकी जड़में हैं। योगशास्त्र में इसीका नाम स्वाधिष्ठान चक्र रक्खा गया है। वीर्यके जीवाणुओंको अंग्रेजीमें स्परमेटू ज़ कहते हैं। उन्हींसे सन्तानोत्पत्ति होती है। अण्डकलाकोश और कामकलाकोशके दो कार्य हैं-अधोरेत और ऊर्ध्वरेत । ऊर्ध्वरेतका अर्थ है वीर्यको शरीरके रक्त-संचालनके साथ मिला देना जिससे ओजकी उत्पत्ति होती है। ओजसे हृदयमें प्रेरणा * एक नई समस्या * शाक्ति, व्यक्तिरव, कान्ति, सहनशक्ति और स्थापयिता शक्तिकी उत्पत्ति होती हैं तथा शारीरिक स्नायु और अवयवों का स्वाभाविक उपचार होता रहता है। रक्त और नाड़ियाँ रक्तसे वीर्य बनता है । इसका दूसरा कार्य शरीरकं बाहर वीर्यको निकाल देना है। नाड़ियाँ आश्रित (जिनपर मस्तिष्का अधिकार है ) और अनाधित दो प्रकार की होती है। मैथुनके समय आश्रित नाड़ियों के कार्य करते हुए एक समय आता है जबकि अनाश्रित नाड़ियाँ कार्य करने लगती है-उसी समय वीर्यपान होता है। उस समय मनुष्य अपने आपको नहीं रोक सकता। अधिक बोरक्षा होनेसे अनाधित नाड़ियाँ जल्दी काम करने लग जाती है, यहाँ तक कि चरम अवस्थामें मैथुनके स्मरणमात्रले वीयश्य हो जाता है। मैथुन और मनोवैज्ञानिक क्रिया अत्यधिक मैथुन करनेपर इच्छाके ऊपर अधिकार नहीं रहना जिस प्रकार नशेबाज अनुत्तरदायित्त्वपूर्ण कार्य करना है, उसी प्रकार अत्यधिक कामायक्त भी। जितने प्रकारचे आनन्द है, बिना मेनके प्राप्त नहीं होते । हप, सुग्य, स्नेह-सब मैथुनान्तर्गत सुख है। जैसा कि ऊपर कहा गया है मैथुन दो प्रकार के होते हैं. एक अन्नरस्थ दूनरा बहिरस्थ । जिस समय वीर्य रक्तस्त्रोनके साथ मिलकर ओजकी उत्पत्ति करता है और सारे शरीरने--विशेष करके मस्तिष्क के स्नायुओंमें एक प्रकारका रक्त प्रवाह होता है, तो उसने अन्नरस्थ मैथुन कहते हैं। इससे आनन्द उपलब्ध करनेकी शक्ति उत्पन्न होती ६४ * युवक-पथ-प्रदर्शक है । इसोसे रुचि,--मानसिक या शारीरिक रसोंके आस्वादनकी शक्ति और दसों इन्द्रियों के अधीन कर्मों में आसक्ति उत्पन्न होती है, जिसका चरम परिपाक महत्त्वाकाँक्षाको उत्पन्न करता है। रोमाँच, विकसित हृदय, उत्फुल्ता, मनोनिवेश दूसरोंकी प्रतिभा प्रति आदर-भाव आदि गुण इसीसे उत्पन्न होते रहते हैं। बहिरस्थ और अन्तरस्थ मैथुनोंमें एक आनुपातिक सम्बन्ध है; परन्तु इसका यथार्थ गणित-सम्बन्धी सम्बन्ध निकालना असम्भव है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्तिका स्वभाव भिन्न होता है। इस अनुपातको न समझनेके कारण ही ब्रह्मचर्य और सदाचार पर जोर दिया जाता है। मनो- विज्ञानके क्रियात्मक ज्ञान तथा पर्यवेक्षण शक्तिके द्वारा इस सम्बन्धमें लेखक एक नवीन दृष्टिकोण रखता है-वह यह है कि अन्त मैथुनकी क्रिया-शक्ति वाह्य मैथुनके कम करनेसे ही बढ़ती है साथ ही ब्रह्मचर्यके रखनेसे जब कभी मनुष्य बाह्य मैथुन-रत होता है तो कुन्छ तो वीरतापूर्ण परिपाक होनेके कारण और कुछ अनाश्रित नाड़ीके देरसे कार्य करने तथा आश्रित नाड़ीमें यथेष्ट शक्ति होनेके कारण मनुष्य पूर्ण सम्भोगका आखादन कर सकता है और वीर्यके बाहर निकलनेसे जो हानि पहुँचती है, उसकी पूर्ति अन्तमैथुनकी पूर्णता होनेके कारण एक अनिर्वचनीय सुखकी प्राप्तिके रूपमें होती है। साथ ही अन्तमैथुनकी क्रियाको द्रुति बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त स्त्रीकी योनिमें जो रस-प्रवाह होता है, उसका कुछ अंश पुरुषका लिंग सोख लेता है जिससे लिंगके स्नायुकी दुर्बलताकी पूर्ति हो जाती है। इस प्रकार वीर्य और ओजके साथ मनुष्यका चारि- ६५ * एक नई समस्या त्रिक सम्बन्ध-कितना घनिष्ट है, इसे लोग समझ सकते हैं । स्मरण- शक्ति, बुद्धि, प्रेरणाशक्ति, स्वच्छन्दय, करुणा, दया, क्षमा, उत्साह महत्त्वाकाँक्षा, सहानुभूति, सहनशक्ति, दुर्भाग्यपर विचलित न होना ये सब परिपक्क वीर्य और ओजपर निर्भर करते हैं। कामवासनाकी तृप्ति असद और अप्राकृतिक ढङ्गोंसे इन्द्रिय-तृप्ति पूर्णत: नहीं हो सकती और मनमें जो तृष्णा रह जाती है, उलके कारण कुछ मानसिक प्रन्थियाँ पड़ जाती हैं और वे ग्रंथियाँ वृत्तियाँ बनकर असुन अवस्थामें परि- णत हो जाती हैं तथा उनके विषय में मन, स्मृति आदिको ज्ञान नहीं रहना, बल्कि मन बुद्धि, स्मृति आदि उन वृत्तियोंसे परिचालित होती रहती है। इन ग्रन्थियांक कारण मनुप्यमें अटिलता आजाती है। वह दूसरोंपर अविश्वास और सन्देह करने लगता है विशेषतः अपने प्रिय पात्रोपर पहले । एक तो तृष्णाकी अतृनिक कारण ऐसा होता है.दूसरे उम्म तृष्णाकी पूर्तिके लिये आन्तरिक मैथुनका नाश करके वाम मैथुन का पुनः पुनः इस आशा सहारा लिया जाता है कि शायद इस बार उनकी पूर्ति हो जाय । ऐसा करनेवालोंके बुद्धि, विवेक, विचार लव लिंगोन्सुखी हो जाते हैं। इससे सैकड़ों प्रकार के मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं और एक दोष उत्पन्न होनेपर शरीर बीसों रोगोंका घर बन जाता है। ऐसे लोग व्यभिचार विषयक बातें,अश्लील कहानियाँ मंगचित्र, अगस्वगवनकी कथा और अप्राकृतिक मैथुनके किस्सोंकी ओर आकृष्ट होते रहते है और समाजके डरसे, या यदि वे लोगों में धार्मिक पुरुष प्रसिद्ध हुए तो ऐसे ऋषियोंकी कथाका ओट लेते हैं ६६ * युवक-पथ-प्रदर्शक और ऐसी-ऐसी कथाएँ कहना आरम्भ कर देते हैं जो काम-वासनाके शिकार हुए हैं। उनकी वासनाकी चर्चा कर करके उसके विरुद्ध तर्क वितर्क करके वह मानसिक सुखका अनुभव करते हैं। संसारमें ऐसे व्यक्तियोंकी अधिकता प्रतिदिन होती जा रही है। हमारे बहुतसे सुधारक तक इसी कोटिके हैं। गाँवोंका जिन्हें अनुभव है वे इस वातको जानते हैं कि वहाँ एक व्यक्ति दूसरेके घरकी चारित्रिक वातोंका भण्डाफोड़ करके अपने मनमें आनन्दका किस प्रकार अनुभव करता है। इस प्रकारकी बातें करनेवालोंकी मनोवृति ही इस बातकी सूचक है कि उनका चरित्र निम्नकोटिका है। उपयुक्त बातोंसे पाठक इस बातसे अवगत हो गये होंगे कि मनोविज्ञानने आज उन सभी बातोंको मनुष्यके मनका पर्दा फाश करके बाहर निकाल लिया है और आगतक समाजके जो व्यक्ति बाबरूपसे इन्द्रिय-परायणताको घृणाकी दृष्टिसे देखकर भीतर ही भीतर उसमें रत रहनेकी चोरी किया करते थे वे प्रकाशमें आ गये हैं और उनका वास्तविक रूप सुधी जनोंके समक्ष आगया-ऐसी अवस्थामें अब नवजागरित समाजकी भलाई इसीमें है कि वह अब इन्द्रिय-परायणताको परमगुह्य विषय कहकर उसपर नाक-भौं न सिकोड़े और उसकी आवश्यकता और उसके ज्ञानको उपयोगिता स्वीकार करते हुए उसके महत्त्वको समझे। इसीमें मनुष्य जातिका कल्याण है और इसीमें दाम्पत्य-सुखका सार । * * जिन्हें इस विषयको विस्तृतरूपसे जाननेकी इच्छा हो वे लेखकको 'आदि रसशास्त्र' नामक कामकला सम्बन्धी अभिनव और वैज्ञानिक तळयुक्त ग्रन्थ पढ़े जिसे, कलकत्ता पुस्तक भण्डार, शीघ्र ही प्रकाशित करेगा।

आदिरस (काम) शास्त्रकी जानकारी विद्यानोंने काम-विज्ञानको आदिरस माना है। इसका कारण यह है कि इसका ज्ञान हुए बिना सृष्टिकी वृद्धि हो ही नहीं सकती। प्रजननके बिना प्रना कहाँसे आ सकती है। ऐसे महत्त्वपूर्ण आदि रसको जनसाधारणने आज कल लज्जा और घृणाकी वस्तु समझ कर उसको पत्तित बना दिया है। जिस त्रिपयक सम्यक् ज्ञान विना न तो सृष्टि-संचालन ही हो सकता है, न सांसारिक सुख ही सम्पा- दित हो सकता है, उसकी इस प्रकारकी घोर उपेक्षा नितान्त अवा- ब्छनीय है। आदि रस शान्त्रको भो भारतवर्ष में संगीत-शास्त्रकी भाँनि बहुत काफी समयसे त्याच्य करार दे दिया है और ये विद्यार अब वेश्याओं ही में रह गयी हैं। सौभाग्यवश धीरे-धीरे संगीत-विद्या ६८ * युवक-पथ-प्रदर्शक का उद्धार करनेकी ओर लोगों का ध्यान गया है और अब धीरे-धीरे भद्र घरानेके लोग भी इन ओर रुचि प्रकट करते हुए लीखने-सिखाने की ओर प्रवृत्त होने लगे हैं। किन्तु आदि रस ( काम ) शास्त्रको अब भी घृणाका हो शिकार बनना पड़ रहा है। कितने परितापका विषय है कि जिस वस्तुके ज्ञान पर मनुष्य जातिका अस्तित्त्व निर्भर है उसीके प्रति वह ऐसे कुभावपूर्ण विचार रक्खे । संसारमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष साधन का मुख्य उद्देश्य माना गया है। उनमें मोक्ष-जैसे पारलौकिक विषयमें अनन्त काल से ज्ञानी जनोंने असंख्य वाक्-वितण्डा, आलोचनाएँ तथा प्रत्यालोच- नाएँ की हैं। इसी प्रकार धर्मके नाम पर विना उसके मूल तत्वको समझे अगणित यथेच्छाचार, अन्ध विश्वास और कुसंस्कार संसार में प्रचलित हो गये हैं। अर्थक नाम पर भी संसारमें सहला अनर्थ हम नित्य होते देख रहे हैं। लोग धर्म को आत्म-विकास और अर्थ को जीवन-यापनका साधन न मान कर उसकी मनमानी परिभाषा करने लगे हैं। मोक्षको भी आत्म-स्वतन्त्रता ही न मान कर उसको अधिकाधिक जटिल बनाने की कोशिश करते हैं। जिस प्रकार इन तीन विषयोंको लोग मनमाने ढङ्ग से समझने लगे हैं, उसी तरह आदि रस या काम शब्दका अर्थ भी आज कल केवल सम्भोग और शृङ्गार माना जाने लगा है, किन्तु यदि यथार्थ रूपमें विचार किया जाय तो मालूम होगा कि 'काम' का अर्थ 'सम्मोहन' है, क्योंकि तन्मयताकी अनुभूति ही 'काम' या 'आदि रस' का सार है । इस प्रकार हम किसी भी वस्तुके मूल और प्रकृत अर्थ को न समझ कर * आदिग्स (काम) शास्त्रकी जानकारी* 88 उसका वर्तमान विकृत रूप समझने लगे हैं और विचार-धाराओंकी शृङ्खला नष्ट हो जानेक कारण भावामें भी अधःपतन होने लगा है। इसी लिये हम किसी भी विषय पर अन्तः वष्टि न डाल कर केवल उनके बाह्य संगोंको ही महत्व देने लगे हैं। यदि मादक द्रव्य-सेवन से हानि होती है तो हम मदिरालयोंको नष्ट कर देने और ताड़के वृक्षों को काट देनका विचार तो करते हैं, पर मद्यसेवीकी विचार- धाराको बदल देने या मदिरा छुड़ानेले अन्य उपचारोंका अवलम्बन करनेकी चेष्टा नहीं करते । हम नगरोंके वश्यालयोंको नोड़ देने पर पहले विचार करते हैं, पर नयी पीढ़ीक युवकोंकी बढ़ती हुई कामु- कता के मूल कारणको दूर करने पर कभी विचार नहीं करते । इस वातको क्षण भर के लिये भी मनमें नहीं लातं कि हमारे युवकों में से धार्मिक भावना और उचित-अनुचितका ज्ञान क्यों मिटता जा रहा है। वह अपनी पत्नीसे सन्तुष्ट न हो कुत्सिन, घृणित, रोग कीटा- णुओंसे लदी हुई वेश्याओंके पास क्यों जाता है । यदि हम गम्भीर विचार पूर्वक इस पर ध्यान दें तो मालूम हो जायगा कि हमारे युवकों को काम-कलाका ज्ञान नहीं है और वे अज्ञात रूपले अपनी कुप्रवृत्तियोंके शिकार इसलिये बन जाते हैं कि उनके घरकी सी कामकला-शून्य होनेके कारण उन्हें यथेष्ट रूपमें मुग्ध, उदीप्त और आकर्पित नहीं कर सकनी। कामुकता दिन-प्रति-दिन बढ़ती जा रही है। उसकी सन्तुष्टिके लिये नयी-नयी पैशाचिक क्रीड़ाएँ भी आविष्कृत होती जा रही हैं। साथ ही नाना प्रकारकी संक्रामक व्याधियाँ उत्पन्न होकर हमारे जीवनको खोखला बना रही हैं; किन्तु १०० * युवक-पथ-प्रदर्शक नयी पीढ़ीकी इस भ्रष्टताकी ओर न तो हमारी विदेशी सरकारका ध्यान कभी जाता है, न माता-पिता और गुरु-शिक्षकका जाता है। विद्यालयोंमें कामशास्त्रकी चर्चा ही पाप है। जिस प्रकार अस्पृश्य जातिको नीच बना कर उन्हें चिरकाल से हम दूर रख रहे हैं और उन्हें वाध्यतः अपवित्र और अस्वास्थ्यकर स्थानों में रहना पड़ रहा है, उसी प्रकार बचपन से ही जननेन्द्रियको गोप्य और अपवित्र स्थान कह कर स्पर्श तक नहीं किया जाता । सारे शरीरको हम धोते स्वच्छ रखते हैं; पर उस अङ्गकी उपेक्षा कर उसे गन्दी अवस्थामें ही छोड़ देते हैं। परिणाम यह होता है कि प्रायः अधिकांश व्यक्तियोंके गुप्तांगोंमें और कोई पीड़ा न भी हो तो दाद, एक्ज़िमा तथा अन्य ऐसे चर्मरोग उत्पन्न हो जाते हैं जो अस्वच्छता कारण हुआ करते हैं। गुप्तांगोंकी तो यह अवहेलनाहोहो रही है और विषयेच्छाका यह हाल है कि जहाँ कहीं दो-चार युवक इकट्ठे हो जाते हैं, इन्द्रिय-परा- यणताकी चर्चा होती ही है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस विषयको अनुसन्धानेच्छा, इसकी गोपनीयताके कारण और होती है क्योंकि यह प्रकृतिका स्वाभाविक नियम है कि जिस विषयको जितना ही छिपाया जाता है उसे जाननेके लिये मानव स्वभाव उतना ही अधिक उत्सुक रहता है। ऐन्द्रिक विषयको गुह्य कह कर उसके बारेमें कुछ कहने-सुनने, शिक्षा देनेकी सख्त मनाही होते हुए भी आज हम देख रहे हैं कि प्रकृति अपना काम कर ही रही है। स्कूलों, कालेजों,बोर्डिंग हाउसों, आदिरस (काम) शासकी जानकारी* १०१ होस्टलों, नाटक-घरी, होटलों, रेस्टोरेण्टोंमें लड़के इस विषयका समुचित ज्ञान न प्राप्त कर सकनेके कारण अवाञ्छनीय जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। यह गुपचुपकी जानकारी उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिये इतनी हानिकर होती है कि इससे तोइस विषयको प्रकट और समुचित शिक्षा देना कहीं अधिक श्रेयस्कर होला । माता-पिता और बड़े-बूद आज कल कानोंमें तेल डाल लेते और यह लोचते हैं कि उनका बच्चा इन्द्रिय-परायणताको प्रकट चर्चा से बंचिन होने के कारण सीधा और भोला भाला है, किन्तु यदि उन्हें उसके वास्तविक रहस्यका पता लगे तो उनकी आंखें खुल जाय । यदि काम शास्त्रकी बात लड़कासे छिपाई न जाकर एक निश्चित अवस्था पर पहुंच जाने पर उन्हें शरीर-रचना और प्रजनन निया आदिका ज्ञान करा दिया जाय तो उनकी इस दिशा में स्वाभाविक जिज्ञासा कम हो जायगी। जो लोग यह समझते हैं कि काफी अवस्था तक लड़के एन्द्रिय और प्रजननके विषयोंका ज्ञान नहीं रखते ये भूलते हैं। क्या हम यह आशा करते हैं कि बचा जब अपनी माँ को और गर्भ धारण करते और सन्तान पैदा करते देखता है और वाय को 'पिता' कहने के लिये बाध्य किया जाता है तो वह यह नहीं सोचता होगा कि बच्चे केसे पैदा होते हैं ? आज कल नो चार-पाँच वर्षके बच्चे ही प्रजनन क्रिया सम्बन्धी थोड़ी-बहुत जानकारी रखते | अमेरिकाके जज लिएडसे माहब ने इस विपयकी बहुत खोज-त्रीन की है, और वे बाल-मनोविज्ञान के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने कहा है कि अधिकांश बच्चोंकी इन्द्रिय-परायणताका कारण यही है कि उन्हें इस १०२ * युवक-पथ-प्रदर्शक * विषयकी जानकारीसे दूर रक्खा जाता है और जिज्ञासा होने पर उन्हें उनका उत्तर वाह्य जगत् से नहीं मिलता । फलतः वे अपने ही शरीर पर उस जिज्ञासाका क्रियात्मक अनुसन्धान शुरू कर देते हैं। हस्त क्रिया आदिके कारणोंका यह भी एक मुख्य अङ्ग है। कहनेका मतलब यह है कि आप कितना ही छिपावें किन्तु लड़के तो इस विषयकी ओर स्वाभाविक रूपसे आकर्पित होकर कुछ जानकारी प्राप्त कर ही लेते हैं-ऐसी अवस्थामें यदि सुव्यवस्थित रूपसे शरीर शास्त्र के अन्तर्गत वालकोंको इस विषयकी मोटे रूपमें शिक्षा दे दी जाय और उन्हें उनके गुप्तांगोंकी खच्छता आदिका महत्त्व बतला दिया जाय तो इसमें उपर्युक्त गुप्त रूपमें या चोरीसे जानकारी प्राप्त करनेकी अपेक्षा कम खतरा है। यह तो हुआ आदि रस शास्त्रका महत्त्व और परिचय, अव हमें उसके क्रियात्मक पहलू पर विचार करना चाहिए । रसोदय यद्यपि युवावस्था और काम-चेतनाके प्रारम्भके अनेक लक्षण स्त्री-पुरुषोंमें प्रकट होते हैं; परन्तु साधारणतः स्त्रियोंकी अवस्था का प्रारम्भ उनके मासिक सावसे और पुरुषोंका पेडू पर बाल उगने से समझा जाता है। इस समय स्त्रियाँ प्रायः अपनी शारीरिक वृद्धि की सीमा पर पहुँच जाती हैं; किन्तु पुरुपकी वृद्धि इसके पश्चात् भी पर्याप्त रूपसे होती है। इस समय स्त्रीके शरीरकी चर्वी विशेप रूपसे बढ़ जाती है और उनके नितम्बके बढ़ जानेसे उनका शारी- रिक संगठन और सौष्ठव पुरुष से नितान्न भिन्न हो जाता * आदिरस (काम) शास्त्रकी जानकारी १०३ -- है ! मुंह पर मुंहासे निकलने और पसीनेसे उग्र गन्ध निकलनका समय भी यही है। ये सब चिह्न स्त्रियों में प्रायः १३-१४ वर्षकी अवस्था तथा पुरुषों में १६-१७ वर्षकी अवस्थामें प्रकट होते हैं। इसमें व्यक्तिगत, कौटुम्बिक नथा जलवायु आदिके कारण अन्तर भी पड़ सकता है । बहुत-सी लड़कियाँ इससे पूर्व भी योवनके उप- युक्त लक्षण प्राप्त कर सकती हैं, बहुत-सी बादमें भी। पुन्यों के लिये भी यही बात कही जा सकती है। इस अवस्थामै युवक युव- तियांकी आवाज़ोंमें भी अन्तर आ जाता है। ऋतु स्राव जिस समय स्त्रीको मासिक त्राव था मासिकधर्म होता है उस समय उसके स्तन बढ़ जाते हैं। जननेन्द्रियके निकट बाल प्रचुरताले निकलने लगते हैं। वृद्धि शीघ्रतापूर्वक होने लगती है और स्त्री अपने मनमें भी इस परिवर्तनका अनुभव करती है। कामेच्छा जाग्रत हो उठती है-नसें अधिक सञ्चालन शील हो उठती हैं। किन्तु ऋतुनाव होना आरम्भ होते ही ग्रह समझ लेना भूल है कि अब वी सम्भोग करनेके योग्य हो गयी है। गर्म देशोंमें १०-१२ वर्षमें और ठण्डे देशोंमें १५-१६ वर्ष तककी लड़कियोंको यह लक्षण प्रकट होते हैं। समुद्र के निकट रहनेवाली लड़कीकी अपेक्षा ऊँचे पहाड़ पर निवास करने बालीको भतु स्त्राव दरलें होता है; किन्तु इस नियमका अपवाद भी है। यह चाव लाल रक्तमा रङ्गना न होकर कुछ काला लिये हुए होता है । यह नाव मासमें तीन या चार दिन तक होता है-इसले अधिक होना रोग माना जाता है और कम होना भी स्वास्थ्य-विरुद्ध १०४ * युवक-पथ-प्रदर्शक समझा जाता है। इस स्त्रावके समय स्त्रीले संयोग करनेकी मनाही पुराने वैद्यों तथा नये डाक्टरों-सभीने की है। मासिक स्रावके पश्चात् १० से १५ दिन तक स्त्रियोंको काम-वासना अधिक रहती है और प्रायः इन्हीं दिनोंके सम्भोगसे वे गर्भ भी धारण करती हैं। काम-वासना और उसका उद्दीपन काम-वासनाका उद्दीपन यद्यपि स्वस्थ स्त्री-पुरुपों में स्वाभाविक होता है; किन्तु कृत्रिम रूपसे उसका उद्दीपन करना भी काम-कलाके अन्तर्गत माना गया है। यद्यपि इस विषयके प्राचीन पण्डित यही कहते हैं कि पुरुपकी अपेक्षा स्त्रीमें आठगुनी काम-वासना होती है, किन्तु आधुनिक काम विज्ञानके विशेपज्ञ-जिन्हें शरीर शास्त्रका ज्ञान प्राचीन कालके तद्विषयक आचार्यासे अधिक है-इससे सहमत नहीं हैं। फिर भी इस बात पर प्राचीन और नवीन सभी काम- कलाविद् एकमत हैं कि स्त्रियों में पुरुषांकी अपेक्षा मन्दकामता विशेप होती है और उन्हें सम्भोगके लिये पहले कृत्रिम उपायोंसे उदीप्त करके तैयार करना पड़ता है। काम-वासनाके उद्दीप्त होनेमें शरीरके जिन मुख्य-मुख्य अंगोंका साहाय्य लिया जाता है वे ये हैं-जिह्वा, नासिका, स्तन-विशेषतः उनका अग्र भाग, उँगलियां, जंघा, गर्दन, नाभि, आंखें, ओष्ठ और त्वचा आदि। इनके अतिरिक्त स्त्री और पुरुष दोनों ही में एक विशेष प्रकारकी गन्ध भी होती है जिसके द्वारा एकके प्रति दूसरेका आकर्षण हो जाता है किन्तु कभी-कभी ऐसा भी होता है कि इस गन्धके कारण स्त्रीको पुरुषसे या पुरुषको स्त्रीसे घृणा हो जाती है ।

* आदिरम (काम) शास्त्रकी जानकारी* यह गन्ध पसीने, श्वासोच्छवास, बगल और योनिस निकलनी है। इसीलिये प्राचीनकालने ही इत्र आदि लगाकर नया पूर्ण स्वच्छता रखकर चतुर स्त्रियाँ इसे छिपानका प्रयत्न करती आयी है, किन्नु इनमेल जननेन्द्रियमेन निकलती हुई गन्ध पहले घृणाजनक होते हुए भी शनैः शनः आकर्षक और हीपनका कारण बन जाती है । पुरुप के वीर्यमें भी इनी प्रकार की आकर्षणयुक्त गन्ध होती है जिनस चियाँ आकर्षित होती है; किन्तु किसी फिली दुरुपक शुक्रनगन्धले स्त्रियाँ घृणा भी करने लगती है। स्वच्छनाझी अवस्थामें जहाँ यह गन्ध खी-पुरुप लिये आकपंग और जहीयनका कारण होती है, वहाँ गन्दै रहने पर या ली या पुरुपक रोगी होनेक मन्वहमें यह गन्ध घृणाका कारण विशेष लयमें बननी है। इसीलिये सन्मोगर समय सुगन्धि नथा पान और गुलाबजल आदिका सेवन वान्छनीय बतलाया गया है । कस्तूरी और उनकी गन्ध युग, लावुन, पाउडर, सेण्ट, इत्र आदिसे स्त्रियाँ अधिक शीघ्रतापूर्वक आकर्षित और बीम होती हैं। किन्तु कस्तूसं शारीरिक गन्ध नहीं चटनी, उलटे बढ़ जरूर जाती है. हाँ, यदि शरीरकी गन्ध मारनी ही हो तो नीत्र गन्धवाले सेण्ट या इत्रका व्यवहार करना चाहिये। इस सिलसिनेमें यह विचार कर लेना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि स्त्री-पुरुपका प्रेमालाप भी उहीपन में शीतता और उग्रता उत्पन्न करनेमें सहायक होता है। अलंकार युक्त सन्वर संगीन भी इसमें वृद्धिका कारण बनता है। किन्तु उपर्युक्त सभी ज्ञानेन्द्रियों की अपेक्षा दृष्टिका महत्त्व आधुनिक काम-विज्ञान के विपज्ञाने विशेषरूपसे बतलाया है। पहले दर्शन भी १०६ * युवक-पथ-प्रदर्शक . आकर्षण और उद्दीपनका मुख्य कारण बनता है। इस दृष्टिगत उद्दी- पनका मुख्य रहस्य यह है कि स्त्रीके मुखकी शोभा और स्तनोंका आकार तथा वनावट पुरुपको शीघ्र आकर्पित और उद्दीप्त कर देती है। स्त्रियोंका दृष्टिकोण इस दिशा में भिन्न है-स्त्रियाँ विशेषत: हृष्ट- पुष्ट और सुडौल पुरुप पर ही मुग्ध होकर शीघ्र उद्दीप्त होती हैं। दृष्टिके बाद उद्दीपनका सबसे महत्त्वपूर्ण अङ्ग स्पर्श है। ऊपर कहा जा चुका है कि उँगलियों, ओठ, जीभ और जननेन्द्रियके ऊर्ध्व भागमें उभड़े हुए नाक-जैसी आकृति वाले अङ्गमें काम-चेतना अधिक होती है । यद्यपि स्पर्श द्वारा उद्दीपनका होना न होना स्त्री की तत्कालीन मन-स्थिति पर निर्भर है किन्तु विद्वानोंका मत है कि उँगलियोंसे स्तनकी फुण्डियों, ओठोंसे ओठों और लिंग्रेन्द्रियक अग्र भागसे स्त्रीकी योनिके उपर्युक्त ऊर्ध्व भागका स्पर्श करनेसे स्त्री उद्दीप्त होकर शीघ्र सम्भोगके लिए तैयार हो जाती है । यह तो हुआ शरीर और मनका उद्दीपन पर प्रभाव । अव कुछ ऐसे द्रव्योंकी जानकारी प्राप्त कर लेना भी आवश्यक होगा जो वास्तवमें कामोद्दीपनमें सहायक होते हैं। इस प्रसंगमें यहाँ यह बतला देना अनावश्यक नहीं होगा कि नवविवाहित युवकोंको अख- बारों में विज्ञापित दवाइयों के फेरमें पड़कर पैसे और शरीरको व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए। क्योंकि तीन और उत्तेजक औषधियोंके व्यवहारसे यद्यपि क्षणिक उत्तेजना हो जाती है; पर कुछ समय बाद स्वाभाविक उद्दीपन-शक्तिका हाल हो जाता है। उद्दीपनमें साधा- रणतः जिन वस्तुओंसे थोड़ी बहुत सहायता मिलती है वे हैं-केशर, * आदिरस (काम) शान्त्रकी जानकारी १०७ - जायफल, दालचीनी, अदरक, मिर्च, कंबोल, प्याज, लहसुन, जाल, अनन्नाल, पिपरमेन्ट, अंडे और मांस। इनके अतिरिक्त चाय, काफी आदि भी उत्तेजक मानी जाती हैं; किन्तु ये वस्तुएँ दबाक रूपमें वरावर न ली जाकर कभी कभी लेने पर भी उद्दीपनमें ल्बल्प सहायक होती हैं। अनाहार तथा खट्टे पदार्थाचे सेवन कामवेग और भी मन्द पड़ जाता है। कभी एकाध बार थोड़ी मात्रामें अफीम के संबनसे भी काम वासना बढ़ती है; परन्तु बराबर लेने वाले मन्द कामी हो जाते हैं। इस सम्बन्ध में 'फास फरस नामक अंग्रेजी दवा का नाम लिये बिना नहीं रहा जा सकता । यह शरीर और मस्तिष्क के पोपणके साथ ही कामोहोपनमें सहायक होता है। इसमें क्षुधा बढ़ानेका भी गुण है, किन्तु अधिक मात्रामें हानिकारक भी सिद्ध हो चुका है । इसके सेवनके पूर्व योग्य डाक्टरले परामर्श अवश्य ले लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त आजकल डाक्टरों ने कुछ जीवोंके बीज- कोपका चूर्ण और अर्क देना भी शुरू किया है। इसका इंजेक्शन देना भी शुरू हो गया है और उससे आशातीत लाभ होता देखा गया है; किन्तु यह सब खूराक न होकर औपधियाँ हैं अत: इनका सेवन विना सुचिकित्सककी सलाह लिये, नहीं करना चाहिए । चिकित्साके सम्बन्धमें कुछ लिख देने पर भी हम युवकांको यही राय दंगे कि वे दवाक फरमें न पड़ कर यदि वले ही समुचित आहार विहार के द्वारा शरीर नीरोग रक्खेंगे तो उन्हें अधिक और स्वाभाविक मुख मिलेगा। स्वास्थ्यक सामान्य नियमों पर चलना स्वच्छ वायु और समुचित आहार सेवनके साथ-साथ झुछ व्यायाम १०८ * युवक-पथ-प्रदर्शक और शारीरिक परिश्रमकी आदत डाल लेने पर प्रकृति स्वयं उनकी मदद करेगी। सम्भोग स्त्री-पुरुप संभोगमें जो सर्व-प्रथम विचारणीय बात है वह है उनकी आयुका अनुपात । पुरुषको अवस्था खोकी उम्रकी अपेक्षा हर हालतमें अधिक होनी चाहिये और दोनोंकी शारीरिक दशा ठीक होनी चाहिये । दोनोंमें से किसीको भी कोई रोग हुआ तो सम्भोग और दुखद सिद्ध होता है। केवल अवस्था और रोग ही विचार- णीय विषय नहीं है। काम-सुखका ध्येय यह है कि स्त्री-पुरुप दोनों में काम-चेतनाको क्रमिक वृद्धि हो और अन्तमें भोगका चरम-सुख सी एक साथ प्राप्त हो । मतलब यह कि स्त्री-पुरुष दोनोंका रज- वीर्य स्खलन साथ-ही-साथ हो। केवल गर्म-धारण करनेके लिये स्त्री-संभोग करे, यह आदर्श तो न पूर्व कालमें ही था और न अव है। किन्तु इतना तो मानना हो पड़ेगा कि वर्तमान पीढ़ीमें पहले की अपेक्षा काम-वृत्ति अधिक बढ़ गयी है और धार्मिक मर्यादा और लोक-भयका भी पहले जैसा प्रभाव अब समाज पर नहीं रहा है। ऐसी अवस्थामें यह आवश्यक हो गया है कि स्त्री-पुरुष कामकलाका इतना ज्ञान तो अवश्य रक्खें कि वे पारस्परिक परितुष्टि प्राप्त कर सकें। साधारणतः सम्भोगके तीन विभाग किये जा सकते हैं, जिनको सम्यक् रूपेण न करने पर परितुष्टि नहीं प्राप्त हो सकती । सम्भोगके ये तीनों अङ्ग हैं-भूमिका, इन्द्रिय सम्भोग और परिशिष्ट जिन पर यहाँ क्रमशः विचार किया जायगा ।

* आदिरस (काम) शासकी जानकारी* १०६ ramme -LAN"-- सम्भोगकी भूमिका काम-जाप्रतिकं बाद आरम्भ होती है और उसका श्रीगणेश चुम्बनसे होता है। चुम्बनका दीपनात्मक असर पुरुष की अपेक्षा स्त्री पर विशेष रूपल पड़ता है। यहाँ चुम्बनोंका विवरण शरीरके किन भागकं चुम्बनसे फैसा सुख है आदि-न देकर केवल स्त्रीके मुख-चुम्वनका ही जिक्र है। निहाको स्त्रीके मुख में प्रविष्ट कर उसकी जिह्वास संघर्पित करना भी चुम्बन का ही एक अंग माना गया है । प्रायः कामकला शून्य देहाती पुरुष और कुछ न कर कंवल इन्द्रिय-सम्भोग ही करनेमें प्रवृत हो जाते हैं तथा ज्यों-त्यों उसकी पूर्ति कर पशुओंकी भाँति अलग हो जाते हैं। इससे खीको शारी- रिक और मानसिक कष्ट होता है। इसी प्रकार चदि स्त्री-सम्भोग की भूमिकाके समय कुछ बनावटी मान या अनिच्छा न प्रकट कर तत्काल ग्नम्भोगार्थ तैयार हो जाती है तो पुरुषको भी आनन्द्र नहीं आता, किन्तु इस बनावटी अनिच्छा चा नखरे के लिये बहुत घोड़ा समय सापेक्ष है, अधिक विलम्ब तक ऐसा करना हानि कर सिद्ध हो सकता है। चुम्बनकी ही भाँति कामुकतापूर्ण सम्भाषण भी सम्भोगकी भूमिका है। इससे भी उद्दीपनकी पूर्ति होनी। भूमिका के समय स्त्रीकी भौं, आँख, कपोल, मोष्ट और स्नान का दर्शन भी आवश्यक है। हम यह पहले ही बतला आये हैं किन्त्रीका लनान- भाग (घुण्डी) और योनि-नासिकाका स्पर्श उहीपनकं प्रधान साधन हैं। कुछ युवक लजावश अँधेरे में ही ज्या त्या स्त्री-सम्भोग करके अलग हो जाते हैं। ऐसी अवस्थामें भूमिका और परिशिष्टके अभावमें सम्मिलन सुख की पूर्ति नहीं हो पाती।

t .... ११० * युवक-पथ-प्रदर्शक भूमिकाके पश्चात् जब स्त्रीकी चेष्टासे मालूम हो कि वह तैयार है-अर्थात् उसकी जननेन्द्रियकी पेशियोंमें रस-स्त्राव होनेके कारण वह हुमस कर स्वयं सम्भोगेच्छा के लिये व्याकुल है, तब पुरुप लिंग प्रवेश करे। यहाँ हम कामासनोंकी सूची और विधि देकर व्यर्थ पुस्तकका विस्तार करना आवश्यक नहीं समझते । इसका कारण एक तो यह है कि कामासन ऐसे हैं कि उनके सम्बन्धमें पढ़ कर कुछ क्रियात्मक रूपमें किया नहीं जा सकता, और सब आसन सब प्रकारके स्त्री- पुरुषोंके लिये सम्भव भी नहीं हैं। दूसरे आजकलके युवक इतने अल्पवीर्य और दुर्बलेन्द्रिय हैं कि विविधि आसनोंकी विधि लगाने तक तो वे अनेक वार स्खलित हो जा सकते हैं । इसलिये इस विषयमें विशेष कुछ न लिखकर केवल इतना बतला देना ही हम अलम् समझते हैं कि सहज आसन ही सबसे सरल और सुखद है। स्त्री अपनी जाँघे सीधी फैलाकर लेटे और घुटने समेट ले। पुरुप उसके ऊपर इस प्रकार रहे कि उसका भार स्त्रीपर न रहे और वह अपनी दोनों कुहनियों और घुटनों पर शरीरका बोझ रखे। वह अपने पैर और जंघे स्त्रीके दोनों जंघोंके बीचमें रख घुटनों और कुहनियोंको विस्तरपर टेक सम्भोग करें यद्यपि उपर्युक्त उद्दीप- नात्मक उपायोंसे स्त्रीकी योनिमें रस संचार हो उठता है, परन्तु बाज़ रियोंसे अभीष्ट सुख नहीं मिलता अतः इन्द्रियमें थूक या वैसलिन लगानेका विधान कामकलाके पुराने और नये जानकारोंने लिखा है।

* आदिरस (काम) शास्त्रकी जानकारी*
१११
जिस समय सम्भोगकी पूर्ति होती है और पुरुपका वीर्य
स्खलित होने लगता है तो फिर वह रोकने पर नहीं रुक सकता।
वीर्यक पूर्णत: स्खलित होते ही पुस्पकी उद्दीप्त अवस्था शीघ्र शान्त
हो जाती है किन्तु लीकी शीत्र नहीं शान्त होती। प्रायः स्त्रियां
पुरुपके पूर्व स्खलित हो चुकनेपर भी सस्भोगक अन्तमें फिर धीरे-
धीरे स्वलित होती है--अतः यह आवश्यक है कि स्खलिन हो
चुकने के बाद सी एकाध मिनट पुरुष स्त्रीसे पृथक् न हो-यही
सस्भोगका परिशिष्ट या उपसंहार है।
कई काम-विशेपज्ञाका कथन है कि शीत्र-स्खलनका समय
बढ़ाने के लिये कई-कृत्रिम उपाय भी हैं, किन्तु इससे कोई भी लाभ
नहीं होता। इससे उत्तम तो यही है कि स्त्रीक उद्दीपन में--रूपई
चुम्बन आदि द्वारा-अधिक समय लगा दिया जाय।
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सन्तति-नियमन विज्ञानके नये-नये आविष्कार और समयकी माँगने जहाँ मनुष्यके सुखके सभी बाह्म साधन उपस्थित कर दिये हैं, वहां अब उसने वह अवस्था भी ला उपस्थित की है जव स्त्री-पुरुष अपनी जननेन्द्रियोंमें कृत्रिम आवरण लगाकर और इस प्रकार रज-वीर्यके समुचित सम्भोगको रोक कर सन्तानोत्पत्तिको रोक सकते हैं। इस प्रकारकी क्रियामें यद्यपि दुरुपयोगका भय ऐसा है जिसके कारण बहुत-से लोग इसे अवाञ्छनीय बतलाते हैं और कहते हैं कि इससे कुमारियों और विधवाओंमें भी व्यभिचार फैल जायगा, किन्तु संसारकी सभी वस्तुओंका सदुपयोग और दुरुपयोग होता है-यह उपयोग करनेवालेकी बुद्धि और इच्छापर निर्भर है। जो लोग सन्तति नियमन * दुश्चरित्र है और केवल अपनी ही बी से सन्तुष्ट न होकर इधर-उधर शिकारकी तलाशमें रहते हैं, वे वैसे भी व्यभिचार करेंगे ही- सन्तति-निरोधकी विधि उन्हें मालूम हो या नहीं, वे अपनी ओरत बाज नहीं आयेंगे। ऐसी अवस्थामें ऐसे लोगोंक लिये जो अपनी स्त्री पर प्रयोग करके आर्थिक सङ्कट के कारण अधिक बच्चे पैदा करनेसे बचना चाहते हैं, यह विधि अवाञ्छनीय नहीं कही जा सकती। सन्तति-नियमनके प्रश्नको लेकर इस देशमें बहुत-कुछ लिखा जा चुका है ! महात्मा गाँधी तकने इसके सम्बन्धमें चर्चा की है। यद्यपि महात्माजीने सन्तति-नियमन (Birth control) की जगह लोगोंको आत्म-नियमन (Self-control ) का अभ्यास करनेका उपदेश दिया है, किन्तु वह उपदेश आदर्श होते हुए भी वर्तमान युगमें अक्रियात्मक हो चला है । आत्म-नियमनमें जो कठि- नाइयाँ है, उन्हें दूर करना साधारण व्यक्त्यिांका काम नहीं है । बड़े- बड़े योगी यति तक इसका पालन करनेमें असमर्थ सिद्ध हुए है। ऐलो अवस्थामें महात्माजीका यह उपदेश सर्वसाधारणकं लिये लागून होकर कंवल विशेष व्यक्तियों के लिये ही कुछ लाभदायक सिद्ध हो सकता है। सन्तति-नियमनका प्रचार फ्राँस, अमेरिका, जर्मनी, इङ्गलैण्ड और जापान में विशेष है। इसकी वैसे तो अनेक विधियाँ और ओपधियाँ बहुत कालले प्रचलिन किन्तु हालमें विज्ञानने इस सम्बन्ध जो आविष्कार किया है, वह अधिक सफल सिद्ध हुआ।

- ११४ * युवक-पथ-प्रदर्शक * यह विधि दो प्रकारकी है जिसमेंसे एक तो स्त्री काममें लाती है और दूसरी पुरुष । दोनोंमेंसे एक भी इसका प्रयोग करें तो गर्भ रहनेका भय नहीं रहता। स्त्रीके लिये जो विधान है, उसमें एक मुलायम रवड़की बारीक झिल्लीकी टोपी, जिसे पेसरी कहते हैं और जिसमें रेशमका बारीक . मुलायम धागा लगा रहता है, योनिके अन्दर गर्भाशयके मुखपर फिट करके लगानी पड़ती है । इससे स्त्री-पुरुष सम्भोगके बाद जो वीर्य गर्भाशयमें जानेवाला होता है वह इस प्रतिबन्धके कारण अन्दर नहीं जाता, इससे गर्भधारणका भय नहीं रहता। सम्भोगके पश्चात् यह टोपी निकाल कर पोटाशियम पर्सगनेट युक्त गर्म पानीमें धो ली जाती है । इस विधिसे सम्भोग-सुखमें भी बाधा नहीं पहुँचती और पुरुषको और कोई उपाय नहीं करना पड़ता। पुरुषके लिये वैज्ञानिकोंने जो झिल्लीकी टोपी लिंगपर पहनानेके लिये बनायी है, उसे फेंच लेदर या शीथ कहते हैं। यह दो प्रकारकी होती है—एक वह जो सिर्फ लिंगेन्द्रियके ऊपरी भागपर अर्थात् जहाँसे ऊपरी सुपारी शुरू होती है, फिट किया जाता है-दूसरा समूचे लिंगपर। पहला केवल ऐसी स्त्रीसे सम्भोग करते समय लगाया जाता है जिससे मैथुन करके छूतकी बीमारीका डर नहीं रहता । दूसरीसे छूतकी बीमारी-गर्मी सूज़ाकका भय नहीं रहता। इसे लिंगेन्द्रिय पर चढ़ाकर सम्भोगके पश्चात् जो वीर्यपात होता है, वह इसके नुकीले भागमें जमा होकर रह जाता है और इस प्रकार स्त्रीके गर्भाशयमें नहीं जाने पाता। सम्भोगके बाद इसे भी उतार - * सन्तति नियमन * ११५ कर पूर्ववन् गर्म पानीमें धो लेते हैं और इस प्रकार एक ही टोपीको अनेक बार काममें लाते हैं। इसके लगानेसे जननेन्द्रिय सम्बन्धी छुनके रोगों-गर्मों सूजाकसे भी बचाव रहना है; किन्तु यद्यपि बज्ञानिकाने इस झिल्लीको इतना बारीक और मुलायम बनाया है कि इस लिंगमें पहन कर सम्भोगके समय योनिके अन्दरकी गर्मी और आन्नाका आँशिक अनुभव करके सम्भोगका कुछ आनन्द प्राप्त हो सकता है किन्तु फिर भी कृत्रिम विधि कृत्रिम ही है और इससे सम्मो- राका पूरा आनन्द कदापि नहीं मिल सकता। दूसरे इसका पश्चात् परिणाम भी अच्छा नहीं होता, क्योंकि इससे स्त्री-पुरुपोंक स्नायु- त्रिक संघपमें बाधा पड़नेके कारण उन्हें मानसिक तुष्टि नहीं मिल सकती। सच पूछा जाय तो इस विधिसे करीब-करीव स्नायु-तन्तुओं को उतनी ही हानि पहुँच जाती है, जितनी हस्त-मैथुनसे, किन्तु चूंकि इससे गर्भ रहनेका भय नहीं रहता और पुरुषको स्त्रीके अन्य अङ्गाके स्पर्शका सुख मिल ही जाता है, इसलिये यह उननी मात्रामें अवाञ्छनीय नहीं है, जितने परिमाणमें हस्तमैथुन । दोनों विधियोंका अनुभव रखनेवालोंका मत है कि स्त्रियों द्वारा इस्तेमाल की जानेवाली विधि ही दम्पतिक लिये अधिक सुखकर और उपयोगी है। किन्तु यह याद रखना चाहिए कि क्रित्रिम उपा- योको भी अधिक काममें नहीं लाना चाहिए, क्योंकि अधिक उप- योगसे स्त्री पुरुप दोनों ही की जननेन्द्रियों में स्वाभाविक सम्भोग सुख अनुभव करनेकी शक्तिका ह्रास होने लगता है। इन कृत्रिम उपायोंका अवलम्वन भी अधिकले अधिक सप्ताहमें एक बार किया ११६ * युवक-पथ-प्रदर्शक * जा सकता है। जो लोग इसे गर्भ-निरोधके भयसे बचे रहनेका साधन समझ इसे अधिक उपयोग करेंगे, वे स्वयं देखेंगे कि कुछ काल बाद उनका स्वाभाविक सम्भोगका आनन्द लुप्त हो गया है । जो नवदम्पति सम्भोगमें अधिक लिप्त होकर वीर्यका व्यर्थ क्षय करते हैं, उन्हें यह जान रखना चाहिए कि जिस एकबारके वीर्य- स्खलनसे उनके शरीरसे लाखों स्वास्थ्यवर्द्धक कीटाणुओंका क्षय होता है, उन्हें बार-बार स्खलित करके वे बल-पराक्रम, शौर्य, बुद्धि और स्मरण शक्ति कैसे कायम रख सकते हैं। अधिक सम्भोग-रत रहनेवाले स्त्री-पुरुषोंके दाँत और आखें समयसे पहले ही जवाब दे जाती हैं। उनके शरीरमें जवानीमें ही बुढ़ापेके सभी लक्षण प्रकट होने लगते हैं और फिर ऐसी अवस्था आ जाती है कि वे इस आदतसे अपना नाश कर लेते हैं। इसका भी एक ऐसा नशा हो जाता है जिसे छोड़ना कठिन हो जाता है। जिस प्रकार नशाकी मात्रा बढ़ाकर उसे घटानेसे तकलीफ होती है, उसी तरह सम्भोगकी मात्रा अधिक बढ़ाकर उसे घटानेमें बहुत कष्टका अनुभव करना पड़ता है इसलिये बहुत सोच -समझकर अत्यन्त सावधानीके साथ यथासम्भव बहुत ही कम मात्रामें इस कृत्रिम उपायका अवलम्बन, करना चाहिए। है सन्तानके प्रति कर्तव्य प्रत्येक पिनाका कर्त्तव्य है कि वह अपनी सन्तानको सुयोग्य बनानेके लिये जो कुछ भी कर सके, करे । सर्वप्रथम पिताका कर्तव्य है कि वह अपने बच्चोंके पालन-पोषणका जहाँ तक हो सके समुन्त्रित प्रबन्ध करे, क्योंकि शैशवावस्थाका पालन-पोपण बोंक शारीरिक और मानसिक विकामकी प्रथम सीढ़ी है। जिस जाति या जिस राष्ट्र अथवा जिस व्यक्तिके बच्चोंका पालन-पोपण यथेष्ट रूपमें नहीं होता वह कभी उन्नति कर ही नहीं सकती। जिस प्रकार छोटे पौदों को सींचनेकी अधिक आवश्यकता होती है, उसी प्रकार छोटे बच्चों के पोपण की भी अत्यधिक आवश्यकता होती है। बचपनमें पर्याप्त दूध और अन्य खाद्य पदार्थ न पाने पर बच्चों का शरीर टूट-सा जाता है * युवक-पथ-प्रदर्शक * और फिर युवावस्था में समुचित आहार मिलने पर भी, उनको पूरा शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता । इसलिये यह आवश्यक है कि छोटे बच्चोंके पालन-पोषणका पूरा ध्यान रखा जाय और इस सम्बन्धमें उन्हें किसी प्रकारका कष्ट न होने पासे । पालन-पोषणके अतिरिक्त बच्चोंकी मानसिक प्रवृत्तिके अध्ययन करनेकी योग्यता भी पितामें होनी चाहिये । दुर्भाग्यवश अभी हमारे देशमें शिशु सम्बन्धी मनोविज्ञान (child psychology) का पूर्णतः अभाव है । इसलिये पिता अपने बच्चोंकी क्रमशः विकास पाती हुई मनोवृन्तिका पर्यवेक्षण नहीं कर पाता। शैशव कालमें बच्चा किस प्रकारकी वस्तुएँ देख कर प्रसन्न होता है--किससे दुःखी होता है, कैसी चीजें देख कर उनकी ओर हाथ बढ़ाता है और कैसी वस्तुओं से दूर भागता है, आदि बातोंका निरीक्षण और विश्लेषण करके उसे ऐसी ही वस्तुओंके निकट रखना और ऐसे ही वातावरणसे आवृत रखना माता-पिताका कर्तव्य है जिससे बच्चे प्रसन्न रहें और उनके स्वास्थ्य पर उसका अच्छा प्रभाव पड़े। जिस प्रकार यह आवश्यक है कि माताके दूधके पश्चात् बच्चोंकी खुराकका पूरा ध्यान रखते हुए उन्हें गो-दुग्धादि पोषक और शीघ्र पचने वाले पदार्थ दिये जायँ, जिससे उन्हें बदहज़मी न हो और उनके विकासमें किसी प्रकारकी वाधा न पड़े-उसी प्रकार उन्हें सुन्दर खिलौने देने और हर तरह उन्हें प्रसन्न रखनेकी व्यवस्था करके भी उनके विकासका मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। जिस प्रकार बच्चोंके कोमल अंगोंको स्वच्छ और स्वस्थ रखनेके लिये उन्हें उबटन लगाया जाता तथा नहला- *सन्तानके प्रति कत्र्तव्य * ११६ धुला कर साफ बारीक और लचीले कपड़े पहनाये जाते एवं आँखों- को रोगमुक्त रखने के लिये काजल-आँजन लगाया जाता है, उनी तरह उनके विनोदी, प्रसन्न और आहादमुक्त बनाये रखनेके लिये रंग-बिरंगे खिलौने, तसवीरें और नयनाभिराम वस्तुएँ दिखाते रहना चाहिये । इस बातका उद्योग करना चाहिये कि क्या खिलखिला कर हँसे । खुल कर और उच्च स्वरसे हँसने वाले बच्चों को उदर रोग नहीं हुआ करना । एक अमेरिकन लेखकका कथन है कि अट्टहास करके जो अपने व्यकी प्रसन्नता प्रकट करते हैं, वे मानो प्रत्येक खिल- खिलाहट के साथ पौष्टिक पदार्थकी एक खुराक लेते हैं। सारांश यह है कि स्वास्थ्यका प्रसन्नतासे घनिष्ट सम्बन्ध है और बचाको प्रसन्न रग्बनेका प्रयत्न उनको पौष्टिक खुराक पहुँचानेके सहा है। इसके अतिरिक्त बच्चोंको प्रसन्न रावनेका प्रवन इसलिये भी आवश्यक है कि वे अत्यन्त सरल और कोमल होने के कारण अनुकूल या प्रतिकूल वात आने पर प्रसन्न या दुःखी हो उठते हैं, ऐसी अवस्थामें यह आवश्यक है कि उन्हें सदा अनुकूल वातावरणमें रक्खा जाय, जहाँ उनकी प्रस- नताकी सामग्री प्रस्तुत रहे। किसी तरह भी वचाको डाँटना-पद- कारना या उनके सामने भयानक मुद्रा बनाना, उनके कानमें जोरकी 'कू' आदिकी आवाज़ करना मानसिक और शारीरिक दोनों ही दृष्टिसे उनके लिये हानिकारक है। पिताको चाहिये कि इन सभी वातास वोंकी रक्षा करे । प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा बच्चोंका प्यार किया जाना, उनका चुम्बन, आलिंगन आदि भी हानिकारक क्रियायें हैं। इसी प्रकार बच्चोंको बहुत अधिक गोदका आभ्यस्त भी नहीं बनाना चाहिये। ।

१२० *युवक-पथ-प्रदशक 17 दूसरी आवश्यक बात है बच्चों की शिक्षा । यह समस्या धीरे- धीरे इतनी जटिल होती जा रही है कि भारतमें अपनी अनेक त्रुटियोंके कारण शिक्षा एक अवाञ्छनीय वस्तु बनती जा रही है। इसका प्रधान कारण यह है कि उच्च शिक्षा इतनी व्यर्थ-सी हो गई है कि जिससे न जीवन-यापनमें कुछ मदद मिलती है, न ज्ञानवर्द्धन में। प्रारम्भिक शिक्षा भी इतनी त्रुटिपूर्ण हो गई है कि उसकी उपयोगिता के सम्बन्धमें समाज शास्त्रवेत्ता गम्भीर प्रश्न करने लगे हैं। आर- स्मिक शिक्षाके इस निकम्मेपनका कारण यह है कि इस देवाकी सरकार शिक्षाको अधिक वैज्ञानिक और त्रुटिहीन बनाने के लिये पर्याप्त धन नहीं व्यय करती। आरम्भिक शिक्षाको बालक-बालि- काआके मानसिक विकासका साधन न बना उसे एक सी चीज़ बना दी गई है, जिसके सहारे बालक लिवा बुछ बातें जबर्दस्ती रट लेनके, कोई मानसिक विकास नहीं कर पाते । यद्यपि इस देशमें भी नाम लेनेको चार-छः ऐसी संस्थाएँ खुल गई हैं जहाँ रटाईका पूर्ण बहिष्कार करके वैज्ञानिक ढङ्गसे किडंडरगार्टन शिक्षा-प्रणालीके द्वारा शिक्षा दी जाने लगी है; किन्तु यह शिक्षा-प्रणाली नैर-सरकारी प्रयत्नांका फल है और अभी इतनी महँगी है कि निन्न और मध्यम श्रेणीके लोग उससे लाभ नहीं उठा सकते । ऐसी अवस्था में सुधी लोगोंको केवल शिक्षा-संस्थाओं पर ही न निर्भर करके स्वयं भी अपने बच्चोंकी शिक्षाकी ओर विशेप मनोयोग देकर, कुछ समय इस ओर लगाना चाहिये। शिक्षाके सम्बन्धमें कुछ कहते समय हम अपने वर्तमान गुरुकुलों * सन्तानके प्रति कत्तव्य १२१ की शिक्षा-प्रणालीका ज़िक्र किये बिना नहीं रह सकते । शिक्षाके साथ सच्चरित्रनाका प्राचीन यादर्श स्थापित करनेकी दृष्टिले गुरुकुलोंकी स्थापना हुई है; किन्तु इस शिक्षा प्रणाली में एक बड़ी त्रुटि यह रह जाती है कि इसके स्नातक सांसारिकता और व्यवहार पटुतामें औसत दर्जे के कालेजके छात्रोंके मुकाबलेमें सच्चरित्रतामें अच्छे होते हुए भी, पीछे रह जाते हैं। एक बड़ी समस्या आज कल यह भी हो गयी है कि बच्चों को कुसंगतिसे कैसे बचाया जाय। स्कूल-कालेजोंका वगतावरण ऐसा दूपित हो चला है कि अधिकांश बुरे लड़कोंकी संगतिमें पड़ कर सीध-सादे, भोले-भाले और अच्छे लड़के भी दुष्ट और दुश्चरित्र बन जाते हैं। यद्यपि हमारे स्कूल-कालेज ऐसे खराब हो गये हैं; पर अवस्था ऐसी आ गयी है कि इस पर भी हम उनका बहिष्कार नहीं कर सकते और बाध्यतः हमें अपने बचोंको शिक्षा प्राप्त करने लिये वहीं भेजना पड़ना है, ऐसी अवस्थामें आवश्यकता इस बातकी है कि उनकी देख-रेख रक्खी जाय और उनके रंग-ढङ्ग से निरीक्षण कर लिया जाय कि स्कूलमें वह किस प्रकारकी बातें सीख रहा है । प्रायः घरक नौकर-नौकरानियाँ भी वचीको दुश्चरित्र बनानेकी ओर ले जाते देखी गयीं हैं, इसलिये बच्चोंकी ओर से माता-पिताको आँख मुंद कर नहीं रहना चाहिये। चरित्र-निर्माणके लिये बच्चों को सफाईका महत्व भलीभाँति समझा देना चाहिये । शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकारकी स्वच्छता सापेक्ष है। बच्चोंको नहाने-धोने और व्यायाम करनेकी शिक्षाके १२२ * युवक-पथ-प्रदर्शक * साथ-साथ उनके मानसिक विकास और सुधारके लिये भी यह आवश्यक है कि उन्हें स्कूलके बाहर भी ऐसी शिक्षा मिले जो उनके चरित्र-निर्माणमें सहायक हो। जिससे आगे चल कर वे देशके समुज्ज्वल रत्न बनें। बच्चोंकी मनोवृत्तिका अध्ययन उनकी शैशवावस्था से ही किया जाना चाहिए, जिससे यह मालूम हो जाय कि उनकी प्रवृत्ति किस ओर है और आरम्भ से ही उसके अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने की चेष्टा की जाय । इससे यह लाभ होगा कि पिताको यह जानने में कठिनाई नहीं पड़ेगी कि बच्चे को किस क्षेत्रमें डालने से अधिक सफ- लताकी आशा हो सकती है। जिस ओर वालकका स्वाभाविक झुकाव होगा, उस क्षेत्रमें जाकर उसकी उन्नति होनी भी निश्चित होगा।

देश और समाज प्रत्येक व्यक्ति--विशेषनः युवक और विवाहित युवक समाज के प्रति खास उत्तरदायित्व रखता है। युवक ही देश और समाज का प्राण होता है। जिस देशके युवक अपने समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यांको समझ कर उनका पालन नहीं करते उनका सर्वनाश निश्चित है। समाज और देशकी समष्टिकी कल्पना करते समय यदि हम उसकी तुलना एक यंत्रसे करें तो बात आसानीस समझमें आ सकती है । जिस प्रकार सभी यन्त्रोंके सुचारू रूप से कार्य न करने पर उसका कार्य अपूर्ण और त्रुटियुक्त होता है उसी प्रकार किसी समाज और देशके युवक जब अपने कर्तव्यका पालन समुचित रूपसे नहीं करते तो वह विटङ्कलित और त्रुटिपूर्ण हो १२४ * युवक-पथ-प्रदर्शक * जाता है। यही कारण है कि प्रत्येक देशके बुद्धिमानोंने अपने यहाँ सामाजिक और सार्वदेशिक संगठन करके कार्य करनेकी व्यवस्था की है। समाज और देशके प्रति अपने कर्तव्य-पालनके अनेक ढङ्ग है। जब हम समाज या देशकी भलाई के लिये चलते हैं तो हमें अपने क्षुद्र स्वार्थोका बलिदान करना पड़ता है और सामूहिक लाभोंका सबसे पहले खयाल रखना पड़ता है। मनुष्यको इस प्रकारके बन्धनमें इस- लिये पड़ना पड़ता है कि सृष्टिमें ऐसी विभिन्नता है कि कोई धनी है तो कोई गरीब; कोई बुद्धिमान है तो कोई बुद्धिहीन । ऐसी अवस्था में मनुष्यको एक परिवारकी भाँति समझ कर, जिसके कि सभी प्राणी विभिन्न योग्यताओं और अयोग्यताओंसे युक्त होते हैं, हमें मनुष्य मात्रसे व्यवहार करना पड़ता है। एकके वर्द्धित धन या बुद्धि से दूसरा, जो अपेक्षाकृत धनहीन और अल्पज्ञ है, इस प्रकार लाभा- न्वित होता है। वास्तवमें मनुष्य जातिने जिस समय सामाजिक और सार्व- देशिक सहयोगकी कल्पना की थी, वह स्वर्णयुग था; किन्तु समयके फेरसे मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया कि उसमें अपने स्वार्थोकी कुछ भी बलि करके दूसरेको लाभ पहुंचानेके भावनाकी कमी आ गयी। आज यद्यपि सहयोग और संगठनकी प्राचीन भावना लुप्त हो चुकी है; किन्तु चूंकि स्वार्थ-साधनके लिये भी सहयोग और संगठनकी आवश्यकता होती है अतः प्रत्येक अवस्थामें संसारमें इसकी आव- श्यकता बनी रहेगी। इस समय संसारके एक राष्ट्र संगठित रूपसे * देश और समाज * दूसरे ओर अपेक्षाकृत निर्वल राष्ट्र पर धावा करके उसे हड़प जाने की जो भावना रखते हैं उसकी सफलताके लिये भी उन्हें अपने देश के व्यक्तियों में सहयोग और संगठन करना पड़ता है। कहनेका आशय यह है कि चाहे सत्कर्मक लिये हो या दुष्कर्मकं निमित्त, मनुप्यको समष्टिका सहाग लेना ही पड़ता है---वह अकेला प्रत्येक कार्यको सम्पन्न नहीं कर सकता। प्रकृतिका नियम ही ऐसा है । मनुष्य अपूर्ण पैदा हुआ है और इसीलिये पैदा होते ही वह रोकर साथी ढूंढ़ता है उसे माता मिलती है जो उसे दूध पिलाकर सबल- पुष्ट और खेलने योग्य बना देती है। क्रीड़ा क्षेत्रमें भी बालक नाथी ढूंढ़ता है जिसके साथ खेलकर वह अपना मनोरञ्जन करता है। फिर शिक्षा-दीक्षामें भी उसे दूसरों पर निर्भर करना पड़ता है और अन्तमें तरुण होकर उसे अपनी जीवन-सहचरीकी खोज होनी है-फिर वह बाल-बच्चे पैदा कर के अपने दायरेको बढ़ाता है। इस प्रकार क्रमशः मनुप्य सहयोग और संगठनका आधार लेकर अपना क्षेत्र विस्तीर्ण करता है। बिना इसके उसका काम ही नहीं चल सकता । यहाँ तक कि जब मनुष्य बाल-बच्चे और घर-गृहस्थी छोड़कर संन्यासी हो जाता है उस समय भी उसे चेलों, शिष्यों, उपदेश सुनने वालों और अपने सिद्धान्तोंका प्रचार करने वालोंकी आवश्यकता होती है। मतलब यह है कि उसे प्रत्येक अवस्थामें सहायकों और सहयोगियोंकी आवश्यकता होती है। जब ऐसी स्थिति है तो मनुष्य सामाजिक और सार्वदेशिक सहयोग और संगठनकी भावनासे छुटकारा कैसे पा सकता है। उसकी इच्छा हो १२६ * युवक-पथ-प्रदर्शक * या न हो, उसे समाज और देशका एक अंग बनकर रहना ही पड़ेगा। आजकल बहुत-से मनचले युवक ऐसे मिलते हैं जो अपनेको देश और समाजके बन्धनोंसे मुक्त रखनेकी भ्रमयुक्त भावनाको स्वतन्त्रता समझने लगते हैं, परन्तु इसकी जड़में उनकी संकुचित दृष्टि ही काम करती है। वे अपने समाज या देश-वाशियोंकी त्रुटि देखकर ही उसका अंग बननेसे अस्वीकार करते हैं; पर अन्ततः उन्हें किसी ऐसे दलमें मिलने-जुलने, कुछ ऐसे व्यक्तियोंसे व्यवहार करनेके लिये वाध्य होना पड़ता है जो उसकेसे विचार रखता है। ऐसी अवस्थामें उसकी पहली धारणाका क्रियात्मक खण्डन हो जाता है और उसे सामाजिक जीव बनना हो पड़ता है चाहे उसके उस समाजका क्षेत्र संकीर्ण ही क्यों न हो। मनुष्य जातिके अन्दर स्नेह, सौजन्य, क्रोध, शोर्य, घृणा आदि विविध मनोवृत्तियोंका जो स्रोत अप्रकट रूपसे विद्यमान होता है, समाजमें हिलने मिलनेसे उनका विकास होता है। समाजमें हिलने- मिलनेसे एक ओर जहाँ मनुष्यको अपना कुछ समय और धन व्यय करना पड़ता है वहाँ उसे उससे लाभ भी होता है। वह लाभ आर्थिक भी होता है और मनुष्यके मानसिक विकास सम्बन्धी भी। समाजमें विविध प्रकारके लोग मिलते हैं-उनके स्वभाव, कार्य तथा शौकमें अन्तर होता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकारके लोगोंसे मिलकर मनुष्यका ज्ञान अपेक्षाकृत अधिक व्यापक हो जाता है और उसे व्यवहार-कुशलताकी शिक्षा अपने आप मिलती रहती है।

*देश और समाज १२७ रामाजिक जीवनले दृसरा बड़ा लाभ यह है कि मनुष्य अपने न्यत्तित्वकी विशिष्ट छाप अपन मिलने वालों पर डाल देता है जो उसके पेशे लिये भी लाभदायक होती है। इसके विपरीत जो सामाजिक जीवन में प्रविष्ट न हो एकाकी ज़िन्दगी बिताना अधिक पसन्द करना है 'उने न तो लोग चाहते हैं, न उसके पेशेमें भी कोई सहायक सिद्ध होता है। लोग उसे मनहूस कहते हैं। कोई उसके पास नहीं फटकता। इस प्रकार हम देखते है कि हमें प्रत्येक दृष्टिले समाज और देशक प्रति कुछ कर्तव्यों का पालन करना पड़ता और कई बानाम उस पर निर्भर करना पड़ता है। जो लोग इन बातों का ख्याल नहीं करते, उन्हें समाजमें कोई स्थान नहीं मिलता और न वे उन बातों ल लाभ उठा सकते हैं, जो सामाजिक संघपके फलस्वरूप मनुष्य उत्पन्न होती हैं। * समाप्त पत्नी-पथ-प्रदर्शक मोटे टाईपमें सुन्दर छपाई, बढ़िया कागज - सचित्र, सजिल्द पुस्तकका मूल्य केवल २) गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेवाली युवती पत्नियोंके लिये ज्ञातव्य वातोंसे परिपूर्ण अवश्य पठनीय पुस्तक । इस पुस्तकमें साधारण खाने- पीनेकी बातोंसे लेकर आचार-व्यवहार, रहन-सहन, सास- ननद, कुटुम्बी, परिजनों आदिसे कैसे व्यवहार करना चाहिये, स्वामीके साथ कैसे आदरणीय ढङ्गसे रहा जाय, आदि बातोंका वर्णन है। भाषा सरल, पढ़नेमें उपन्यासका-सा आनन्द आता है। इस पुस्तकको पढ़ कर पत्नियाँ अपने गृहस्थाश्रम को स्वर्ग बना सकती हैं। हिन्दीमें अव तक ऐसी उपयोगी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई। कलकत्ता-पुस्तक-भण्डार १७१-ए, हरिसन रोड, कलकत्ता।

Yuvak Pathpradarshak

Author
Thakur Raibhadur Singh
Title
Yuvak Pathpradarshak
File name
Yuvak Pathpradarshak
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2011/03
Publisher
Calcutta, Kamta Prasad Varma Pustak Bhandar
Language
Sanskrit
Pages
129
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550717
Barcode
4990010031530.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
vW18qR4jloY
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