Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shri Shri Vidagdhmadhav Natak
Front matter
दो शब्द- परम करुणामय कलियुग-पावनावतार श्रीश्रीकृष्णचैतन्यदेव को असीम अनुकम्पा से, उनके परम दयितस्वरूप, मनोभीष्ट- सस्थापक, भक्ति- रस-प्रस्थानाचार्य श्रीरूपगोस्वामि-प्रभुपाद की अनुपम रचना- "श्रीविदग्ध- माधव नाटक"सुधी पाठकवृन्द के हस्तकमलो मे समर्पण करते हुए मुझे अति हर्ष है । त्रैमासिक "श्रीहरिनाम" के साथ साथ वैसे तो छोटे-मोटे अनेक प्रकाशन श्रीहरिनाम सङ्कीर्तन मण्डल की ओर से वरावर प्रकाशित होते ही चले आ रहे हैं, किन्तु श्रीकृष्णदास कविराजकृत श्री चैतन्यचरितामृत तथा श्रीजीवगोस्वामिविरचित श्रीश्रीगोपालचम्पू जैसे विशाल ग्रन्थ-रत्नो के बाद मण्डल की ओर से यह एक तीसरी बहुमूल्य भेट है। यह वह अनवद्य ग्रन्थ-रत्न है जिसके विषय मे स्वय श्रीमन्महाप्रभु ने समस्त भक्तो के बीच स्पष्ट शब्दो मे कहा था- मधुर प्रसन्न ईहार काव्य सालङ्कार । ऐछे कवित्व बिनु नहे रसेर प्रचार ॥ थीचैतन्य चरितामृत ३-१-१४३ ।। -रूपगोस्वामि को यह रचना मधुर कवित्व से पूर्ण है, अलङ्कार- युक्त है एव चित्त को प्रसन्नता विधान करने वाली है। एसे कवित्व के बिना रस का प्रचार नही हो सकता है।" अर्थात् यह रचना अतिरसमय है । इसके अध्ययन मनन, से चिन्मय. रस का आस्वादन प्राप्त हो सकता है। सर्वरस-मुकुटमणि मधुररस दो प्रकार का है । स्वकीया-भावमय मधुररस तरा परिकीया-भावमय मधुर रस । परकीय-भावमय मधर रस मे ही सर्वाधिक रस का उल्लास है । उसी रस का अशेष-विशेष आस्वादन करने के लिये ही रसिक-चूडामणि भगवान् ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण श्रीवृन्दावन प्रकट-लोला को प्रकाशित करते हैं। इस - श्रीवृन्दावन प्रकट-लीला में चौसठकलान्वित, अतुलकेलि सौन्दर्य-माधुर्य- मूर्ति विदग्ध श्रीगोकुल-युवराज महाभावस्वरूपिणी श्रीवृषभानुनन्दनी के विच्छेदमय-उत्ताल तरङ्गराशि युक्त विलास महासागर में कैसे डुबकियां लेते हैं। इस समस्त का अपूर्व आस्वादन रसज्ञ पाठकवृन्द इस रचना में करेंगे। नाटकीय-पालो का परिचय एवं मम्पूर्ण ग्रन्थान्तर्गत वणित सात अङ्कों की संक्षिप्त विवरणसूची तथा स्वकीया भाव क्या है ? परकीया-भाव क्या है ? परकीया भाव का क्या वैशिष्टय है, ? ब्रज-प्रकटलीला का क्या विषय है ? श्रीकृष्ण चैतन्यदेव के मत में क्या क्या समधिक विशेषताएं हैं ? इन सब का अवतरणिका में विस्तृत वर्णन कर परमाभिवन्दनीय श्रीहरिदास जी महाराज(न्याय वैशेषिक शास्त्री, प्राचीन व नव्य न्यायाचार्य काव्य-व्याकरण सांख्य न्यायाचार्य, काव्य-व्याकरण सांख्य मीमांसा वेदान्त तक-तर्क तर्क वैष्णवदर्शन तीर्थ ) ने जहां रसिक पाठकों को ग्रन्थवणित गूढ विषयों को समझनेमें महान सुयोग प्रदान किया है,वहां मण्डल तथा सम्पादक को भी चिराभारी किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ दो प्रकार के संस्करणों में प्रकाशित किया गया है । एक तो संस्कृत मूल के साथ और दूसरा केवल हिन्दी अनुवाद । जो पाठक संस्कृत से अनभिज्ञ हैं, उन्हें केवल हिन्दी-संस्करण ही अनुकूल रहेगा। हिन्दी संस्करण में भी मूल ग्रन्थ की पद्य-गद्य श्लोक क्रमसंख्या के अनुसार संख्या दी गयी है। संस्कृत-संस्करण में क्रम संख्या के साथ-साथ श्लोकों की संख्या पृथक रूप मे दी गयी है एवं श्लोकों की वर्णानुक्रमणिकानुसार श्लोक सूची भी प्रकाशित की गई है। जीव-स्वभाववश प्रकाशन में त्रुटि-विध्युतिसमूह का रहना, विशेषतः मुझ जैसे शास्त्र-अनभिज्ञ, साधन रहित जीव के पक्ष मे स्वाभाविक है, अतः उदार पाठकवृन्द उसे सुधार लेने का अनुग्रह करेगे । वैष्णवदासानुदास श्यामलाल हकीम अवतरणिका * करुणामय भगवान् श्रीकृष्ण चतन्य देव की अनुकम्पा से श्री विदग्ध- माघन नामक नाटक का मनोरम सस्करण प्रकाशित हुआ। इस अनुपम अन्य के रचयिता भक्तिरस-प्रस्यानाचार्य सुप्रसिद्ध नामा श्रोरूप गोस्वामी है । आप श्री चैतन्यदेव के केवल परिकर ही नही थे किन्तु श्रीचैतन्य देव के अभीष्ट सस्थापक तो थे ही,साय ही श्रीचैतन्य देव के प्रिय स्वरूप, दयित- स्वरूप, प्रेमस्वरूप, सहजातिरूप, निजानुरूप, अभिन्नरूप, तथा स्वविलास रूप भी थे। श्रीचैतन्यदेव से उपदेश प्राप्त कर कालवश लुप्त हुई श्रीवृन्दावन को रसकेलि वार्ता का पुन प्रकाशन सवप्रथम आपने ही किया है । आपका चरित्न श्रीचैतन्य चन्द्रोदय नाटक, श्रीचैतन्य वरितामृत आदि ग्रन्थों मे सुविस्तृत रूप से वर्णित है। प्रस्तुत ग्रन्थ की रचना १५८० सम्वत् मे गोकुल मे हुई एव नाटक का नामकरण 'विदग्धमाधव" हुआ। विदग्ध शब्द का अर्थ रसिक, निपुण, पारङ्गत, सर्वमनोहर तो सुप्रसिद्ध है ही किन्नु विदग्ध शब्द का अर्थ ग्रन्यकार के मत मे चतु पष्टि कलान्वित है। सुरम्य मधुर सर्वसल्लक्षणान्वित, बलीयान् नवतारुण्य, वावदूक, प्रियवद, सुधी, सुप्रतिभ, धीर, विदग्ध, चतुर, सुखी, कृतज्ञ दक्षिण, प्रेमवश्य, गम्भीरताम्बुधि वरीयान्, कीर्तिमान्, नारीमोहन, नित्य- नूतन, अतुल्यकेलिसौंदर्य, प्रेष्ठ, वशीस्वनान्वित गुणयुक्त विशेप प्रेमानन्दरसो के उत्ताल तरङ्गमय महावारिधि श्रीराधाविनास विच्छेद चिह्नित-माधव हैं श्रीमान् गोकुल-युवराज । श्रव्य दृश्य भेद से काव्य दो प्रकार का है। प्रस्तुत ग्रन्य रङ्गालय मै अभिनय के योग्य दशविध रूपकमें प्रथम व प्रधानतम है ग्रन्थकार ने साहित्य दर्पण की प्रक्रिया के वर्जनपूर्वक श्रीभरतमुनि के मत से 'नाटक चन्द्रिका' नामक ग्रन्थ की रचना की है। उस लक्षण अन्य के दृष्टान्त रूप से विदग्ध- माधव, ललितमाधव नाटकद्वय का प्रणयन किया। इन ग्रन्थों में नाटक के लक्षण पूर्णरूप से रक्षित हुए हैं नायक भेद-दिव्य, दिव्यादिव्य,अदिव्य ख्यात- मिश्र, क्लुप्त, प्रस्तावना, आशीर्वाद, नमस्क्रिया, वस्तुनिर्देश,नान्दी, प्ररोचना, आमुख, कथोद्घात, प्रवर्तक, प्रयोगातिशय, उद्घात्यक, बवलम्बित, प्रकृति सन्धि, बीज, विन्दु, पताका, प्रकरो एवं प्रधान कार्य व अङ्ग कार्य अवस्था आरम्भ, यत्न, प्रत्याशा, नियताप्ति, फलागम, सन्ध्यङ्ग-मुख, प्रतिमुख, गर्भ विमर्श, उपसंहृति, द्वादश बीजभेद, प्रयोदश प्रतिमुख सन्धिभेद, चतुर्दश निर्वहण संधिभेद ३६ भूषण भेद, ४ पताका स्थान, विष्कम्भक, चुलिका, अङ्कास्य, अशावतार, प्रवेशकादि, अर्थोपक्षेप समूह, स्वगत, प्रकाश जना- न्तिक आदि नाट्योक्ति समूह, अवस्वरूप, गर्भावस्वरूप पसख्या नाटकीय रस, सस्कृत प्राकृत भाषा विधान, भारती प्रभृति वृत्ति चतुष्टय, नर्म, और उसके भेद प्रभृति लक्षण ग्रन्योक्त विषयों का निर्वाह इन नाटकद्वय में सुन्दर रूप से हुआ है। प्रस्तुत ग्रन्थ में धीरोदात्त व लालित्य गुण युक्त श्रीकृष्ण ही दिव्य नायक, एव रस, रसराज शृङ्गार है। सात अङ्क युक्त प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रत्येक अङ्क मे ही प्रत्यकार ने विविध कला कुशलता से दर्शकों तथा श्रोतृवर्ग के लिये आनन्दवर्धक सामग्री का पूर्णरूप से सन्निवेश किया है। + + नाटकीय पात्रों का विवरण इस प्रकार है- १ सूत्रधार- नाटक प्रस्तावनाकार। २ पारिपाश्विक- सूमधार सहचर। ३ श्रीकृष्ण सीयशोदानन्दन, नाटक-नायक विदग्ध-माधग, वजनागर। ४ बीनन्द- श्रीकृष्णपिता श्रीव्रजेश्वर । ५ धीमयुमङ्गल-- श्रीसान्दीपनिमुनिपुन, सान्दीपनिमुनि ने अपनी मैया पौर्णमासीको परिचर्या के लिये इसे गोकुल में भेजा था । पौर्णमासी ने इसको श्रीकृष्ण का सखा बनाया । श्रीकृष्ण का यह प्रिय क्यस्य विदूषक ।
. ६ श्रीराम- धोरोहिगोनन्दन, श्रीवनराम, श्रीकृष्ण के 'अत्यन्त प्रिय बड़े भाई। ७ धोदाम श्रीकृष्ण के घेर सखा. श्रीराधा के बड़े भाई। ८ श्रीसुवल श्रीकृष्ण के प्रिय नर्म सखा, परमप्रेष्ठ । ६ अभिमन्यु गोप, जटिलापुत्र, योराधा का मायाविवर्तित पति और चन्द्रावलि के मायाविवर्तित पति भारुण्डा पुर गोवर्धन मल्म का प्रिय सखा । १० घोपौर्णमासो- श्रोसान्दोपनि-जननो, श्रीनारद शिष्य, सब खा- वासियों को माननीया, श्रीगुरुदेव के आदेश से स्वमोष्ट श्रीकृष्णप्रेम मे व्यग्र-चिता होकर श्रीराधाकृष्ण लीलारस संभोग संघटन सहायक सेवा के लिये मोकुल में अवस्थित,सर्वसिद्धि विषा- यिनी, श्रीकृष्णदूती गणान्तभुक्ता। ११ श्रीनान्दोमुखी सान्दीपनि कन्या, जिसे पौर्णमासी ने श्रीराधा के साहचार्य में नियुक्त किया है। विविध सन्धान . कुशल सखो। १२ श्रीयशोदा- १३ श्रीराधा- १४ श्रीललिता- १५ श्रीविशाखा-- थीव्रजराज-प्रहिणी, श्रीकृष्णमाता। श्रीवृपभानु कन्या, गोपिका शिरोमणि श्रीकृष्ण वल्लभतमा । वृन्दावनेश्वरी, विन्ध्यपर्वत के सम्बन्ध से चन्द्रावली की कनिष्ठा, नाटक नायिका प्रधाना श्रीराधा-सखो, अष्टसखियों मे बन्यतमा, सर्वत्र परमाध्यक्षा। द्वितीया श्रीराधासखी, अष्टसखियों में अन्यतमा, आलेख्य-संगीत-विचक्षणा । यशोदा-घाती,वृषभानु को श्वश्रूश्रीराधा को माता मही, वृद्धा गोपी। अभिमन्यु गोप की जननी, श्रीराधा की सास गोवर्धन-जननो, भारुण्डा को सखी वृद्धा गोपी। [] १६ मुखरा- १७ बटिला- १८ श्रीपद्मा- प्रधाना चन्द्रावली-सखी, निकु ज-गृहिणी, नग्नजित कन्या। , १६ श्रीचन्द्रावली- चन्द्रभानु कन्या, बिन्ध्य-पर्वत के सम्बन्ध से श्रीराधा की ज्येष्ठा सोदरा, भारुण्डापुत्र गोवद्धन मल्ल की माया प्रत्यायिता पत्नी, करीला की नातिनी, राधा की प्रतिपक्षीया, राधा से किञ्चित न्यूना कृष्ण-वल्लभा, प्रतिनायिका, द्वितीया नायिका। -२० श्रीवृन्दा- श्रीवृन्दावन-वनदेवी, दूतीगणवर्या, श्रीराधा की कानन-सखी। २१ सारङ्गी जटिला की भगिनी पुत्री, विशाल को भगिनी। २३ घीशोन्या- चन्द्रावली-सखि। २३ कराला- चन्द्रावली की मातामही वृद्धागोपी। सप्ताङ्क-सम्बलित इस नाटक के प्रथम अङ्क मे वेणुनाद-विलास, द्वितीय मे मन्मथ-लेख, तृतीय मे श्रीराधा-सगम, चतुर्थ मे वेणुहरण पचम मे श्रीराधा प्रमादनम्, १४ में शारद विहार एव सप्तम में गौरीतीर्थ-विलास सुणित हैं। एकु और श्रीरूप गोस्वामी का कवित्व-माधुर्य, उसमें भी राधाकृष्ण क अनन्त सौदर्य माधुयं सय रससिन्धु की अनन्त तरङ्गराशि, सुतरा अनेकानेक अपूर्व चित्त चमत्कारी उपभोग्य वस्तु इस नाटक में सन्निविष्ट है । प्रथमाडु मे -नाटकीय लक्षण समूह के अनुसार यथारीति नान्दी, प्ररोचनादि, नान्दिमुखी व पौर्णमासी के कयोपक्थन में श्रीकृष्ण के प्रति श्रीराधा को प्रगाढ अनुराग-सूचना, श्रीकृष्णनाम का अपूर्व महिमा-उट्टकन तुण्डे ताण्डविनी) पद्मपलाश लोचन पीताम्बर धारी वनमाली श्यामसुन्दर को गोष्ठ-प्रदेश, नन्दयशोदा के वात्सल्यादि वर्णन पूर्वक अपरूप वृन्दावन का शोभा-समृद्ध दर्शन श्रीकृष्ण के वशी वादन से वस्तुनिचय का स्वभाव व्यत्यय (रुन्धनम्वुभृत ) जलघर का गतिरोध, तम्बुरु की चमत्कारिता, सनकादि का समाधिभङ्ग,ब्रह्म का विस्मयापादन, राजा बलि की अस्थिरता ३ नागराज का मस्तक घूर्णन एवं ब्रह्माण्डकटाह का आवरण भेद करके अपूर्व मुरली ध्वनि-नाद, वृन्दावन में वासन्ती सुषमा (क्वचिद् भृङ्गीगीतं) पौर्णमासी के द्वारा श्रीराधाकृष्ण की पूर्व-राग परीक्षा, राधा नाम के श्रवण से श्रीकृष्ण का भाव विकार, एक ओर सखोखण के साथ श्रीराधा का काननप्रवेश, इसोसमय मुरली-ध्वनि श्रवण से श्रीराधा की अपूर्व मानन्द देदना, विशाखा के हाय में चित्रपट देख कर उक्त वेदना की वृद्धि । द्वितीयाद्ध में- निदारुण चिन्ता देखकर विशाखा के प्रश्न के उत्तर में भानुनन्दिनी कहती हैं- वह मरकतमणिविनिन्दित शिखि शिखण्ड-धारी नवीन-युवा ने चित्रपट से बाहर निकल कर मुझे कटाक्ष-बाण से विद्ध किया है। श्रीराधा स्वप्न क्या जागरण, दिन क्या रात समस्त सुध-बुध खो कर कहती हैं- 'कदम्ब तरु मूल में उस कामुक चूडामणि ने आकर मना करने पर भी मेरा हस्त धारण किया है। उसके स्पर्श से मुझे महाविक्लता आई है । सखि ! अब मूर्छा ही मेरा दु.खमोचन करे । मुझे इस व्याधि से मुक्त करने के लिये तुम सब चेष्टा न करो। अब मृत्यु ही मेरा मङ्गल है। इसके बाद कहती हैं:- लज्जा की बात है, मेरी तीन पुरुपों में रति हुई- (एकस्य श्रुतमेव) 'कृष्ण' इस नामधारी में, दूसरे वशीवादन कारी में एवं तीसरे चित्रपट मे अङ्कित पुरुष में एकदा रति, क्या सर्वनाश !!! यह पुरुष लय एक श्रीकृष्ण ही हैं- यह वात सुनने के बाद श्रीराधा का स्वस्थता-लाभ नान्दोमुखी श्रीगंधा के अन्तर-भाव को देखकर पौर्णमासी को निवेदन करने के लिये जाती है। अनन्तर पौर्णमासी व मुखरा को वात-चीत श्रीराधा का पूर्वरागजनित हृदयभाव व दैहिक-चेष्टा स्पष्ट रूप से प्रकाशित होती हैं । वे दोनों देखती हैं कि श्रीराधा को चित्तभूमि में कोई एक नवीन ग्रह प्रविष्ट हुआ है । यह था नवानुराग वीर का अति दुर्गम गम्भीर-विक्रम वैचित्र्य । प्रगाढ अनुराग विवर्त सचमुच ही बुद्धि के अगोचर हैं, क्योकि (पीड़ाभिनव कालकूट) नन्दनन्दन-निष्ट प्रेम का ऐसा ही स्वभाव है जो एक साथ वक्र व मधुर है। श्रीराधा का उत्कट भाव देखकर पौर्णमासी अनंग लेख प्रस्तुत करने का निर्देश करती है। इसके बाद- श्रीकृष्ण का पूर्वराग श्रीराधारचित कणिका कुसुम कोरक पत्र का समर्पण, ललिता श्रीकृष्ण से श्रीराधा की अवस्था कहती है। परन्तु श्रीकृष्ण मे ब्रह्मचर्य का गर्व देख कर उदासीन होने पर, ललिता जब निराश होकर चली जाती है [ ५ ] ।
श्रीकृष्ण का पश्चाताप वर्णित हुआ है- (थु त्वा निष्ठुरता)। इसके बाद श्रीराधा की उत्कण्ठा व्याकुलता व निदारुण सेद, विशाखा- से विविध सान्त्वना सुनकर श्रीराधा कहती हैं (यत्सोत्सग सुखाशया) जिसकी सगप्राप्ति की कामना मे मैंने धर्मनाश करके भी गुरुजन-लज्जा आदि सबको त्याग दिया है वे श्रीकृष्ण जव निराश करते हैं तव भरण हो-~श्रेय है। यह कह कर श्रीराधा मूच्छित - हो जाती है, विशाखा श्रीकृष्ण-अस्पृष्ट विलेपन माल्यादि व श्रीकृष्ण-नाम के द्वारा चेतनता सम्पादन करती है । अनन्तर श्रीराधा कालियदह मे घुमकर प्राण त्याग करने का निश्चय करके विशाखा को लेकर द्वादशादित्य तीर्थ की ओर जाती हैं। इस समय श्रीकृष्ण भी मघुम गल के साथ भानुतीय में उपस्थित होकर देखते हैं कि प्राण-सर्वस्व श्रीराधा अपनी: सखी से चिर। विदा माग रही है (गृहान्त खेलन्त्यो) । श्रीकृष्ण को उद्देश्य करके श्रीराधा कहती हैं--' जिसके लिये हम सब गृह-धर्म छोडकर, कुपथ-चारिणी हुई हैं। अहो । अब उसका उदा- सीन होना क्या उचित है ? विशाखा बोली- (अकारुण्य कृष्ण ' यदि)। फिर श्रीराधा कहती हैं सखि । श्रीकृष्ण अकरुण हो इसमे कोई दोष नही हैं, परन्तु मेरे इस अन्तिम अनुरोध को रक्षाकरमा -वहायह कि, मेरे शरीर को,वृन्दावन के तमाल तर की शाखा मे बाधाकर रखना, श्रीराधा का यह अन्तिम भाव सबके लिये : मर्मान्तक होता है मरण निश्चय करके श्रीराधा विशाखा को बहाना बनाकर पुप्प चयन के लिये भेज कर सोचती हैं, मरूंगी निश्चित ही, किन्तु मरने के पहले और एक चार लोक्यमोहन मुख को देख कर ही मरूंगी। यह नोचकर विशाखा से कहती है--सखि!! उस चित्रपट,को और-एक वार अच्छी तरह दिखा दो । चित्र पट नहीं है- विशाखा से यह सुन कर राधा श्रीकृष्णमूर्ति के ध्यान मे मग्न हो जाती हैं । इस समय श्रीकृष्ण सामने उपस्थित हो जाते हैं और विशाखा कहती है- सखि । एक बार देखो, ध्यान का साक्षात् फल। श्रीराधा नेत्र उन्मीलन कर देखती हैं। उससे अपने को जाग्रत् स्वप्न के बीच अवस्थित पाती हैं। श्रीरूप अति निपुणता के साथ आसन्न-मृत्यु श्रीराधा को लौटा लाते हैं । किन्तु प्रेमलीला मे दुर्दैव रूपा बुड्ढी जटिला आ कर रोडा डालती है।। अमा प्रतिपदी चाद की रेखा उगकर ही डूब जाती है । तृतीयाड मे- खञ्जनाक्षी श्रीराधा को विलास-मञ्जरी के द्वारा श्रीकृष्ण चित भ्रमर को मुग्यता पादन को देखकर पौर्णमासी श्रीराधा विषयक कथा का उदृवन करती हैं। जिसमे श्रीकृष्ण की अवहित्या, मधुमङ्गल के मुख से श्रीकृष्ण के जागरण आदि अवस्थाओ को सुनकर पौर्ण- मासी आश्वात होती हैं एव श्रीराण के मून्ति विविध भाव विकार का विवरण देते हुये श्रीकृष्ण के अनुमति सूचक दक्षिण नयन निमीलन को देख कर सकेत स्थान का निर्देश करके प्रस्थान करती है । तब श्रीराधा विज्ञासा के साथ श्रीकृष्णमिलन की तीव्र उत्कण्ठा प्रकाश करती हैं पौर्ण- मासी श्रीकृष्ण के पास श्रीराधा की अनेकानेक चेष्टाओ के कहने से भी श्रीकृष्ण की उदासीनता दूर नहीं कर सकी- ऐसा श्रीराधा को कहती है और अतएव दूसरा उपाय ढूण्डने की बात कहती हैं । इस बात से श्रीराधा को उत्ताननयन देखकर पौणमासी पुनर्वार आश्वासन देकर श्रीकृष्ण के प्रौढ प्रेम की अभिव्यक्ति करके ललिता से कहती है। तुम सकेतित कणिकार कुज में श्रीराधा को अभिसार कराओ' अव श्रीकृष्ण-राधा-निर्दिष्ट माफन्द कुञ्ज मे आ कर विशाखा को न देख कर व्याकुल हो उठते हैं, कुछ ही क्षणो के बाद विशाखा आकर कहती है "अभिमन्यु ने श्रीराधा को मथुरा भेज दिया है " यह बात सुनकर श्रीकृष्ण 'मूच्छित हो जाते हैं। विशाखा पुनरि श्रीराधा का अपूर्व अनुराग "प्रकट करके (दूरादप्यनुसङ्गत श्रीकृष्ण को ' सान्त्वना देकर सकेत कुञ्ज की ओर ले जाती हैं । इस समय विशाखा के विलम्ब से श्रीराधा की विविध आराङ्का, उद्वेग, खेद आदि सर्वेत कुज में दोनो का मिलन, सखियो का रगारस, नवसगम मे श्री राधा को लज्जा भयादि निवारण के लिये सखियो की चष्टादि का वर्णन है । आगे इस समय मुखरा को देखकर श्रीकृष्ण का वना'तराल में प्रवेश, मुखरा का निद्रा के आवेश मे गृहमध्य में प्रवेश पुनर्वार श्रीकृष्ण का फुज मे आगमन पुष्प उतारने के छल से ललिता विशाखा का बाहेर गमन, निकुञ्ज कीचन्द्रशालिका मे श्रीराधा-कृष्ण का गमन आदि वणित है । चतुङ्गि मे- पूर्वराग व सम्भोगादि के द्वारा स्वपक्षीय रस विवृत किया गया है। फिर रस पुष्टि के लिये विपक्ष भद वणन मे प्रवृत्त होकर मन्थकार वैशाखी पूर्णिमा से लेकर चारो रात्रियों का बर्णन करते हैं। मान्दीमुखी के साथ विपक्षा पद्मा सखि की वातचीत से पता चलता है कि अब नागरीगुरु, नयनानन्द-श्रीनन्दनन्दन ने श्रीगोवद्धन कन्दरागृह में [] गमन किया है। सुवल के विकट कृष्ण की श्रीचन्द्रावली-दर्शन-लालसा का ज्ञापन,एवं मुरली-निनाद,मुरली सुनकर चन्द्रावलि का आक्षेप,चन्द्रावली को सामने देखकर स्तुति, भादि वर्णन किये गये हैं। यहां पर श्रीकृष्ण का प्रेम वहुनिष्ठ की भांति प्रकाशित होता है। श्रीराधा विषयक ऐसी प्रगाढ़ प्रेमोत्कण्ठा धारण करते हुये भी, श्रीकृष्ण चन्द्रावलो की कुंज में जाकर उसी प्रकार के भाव का प्रकाश किया करते हैं किन्तु यह शठता के सिवा और कुछ नही था क्योंकि- श्रीकृष्ण कहते हैं- हे लोचनेन्दीवरचन्द्रिका चन्द्रावलि ! तुम्हारे विरह में मैं अत्यन्त अवसन्न हो रहा था, अकस्मात् कानन में मधुर-रसा, शीतल. स्पर्शी अमृतमयी राधा ने मुझ से मिल कर मेरे संताप का निवारण किया है। यह बात कहते न कहते ही कह बैठे 'धारा धारा' गोल स्खलन को देखकर चन्द्रावली की असूया प्रकाशित होती है, कृष्ण के साथ चन्द्रावली पद्या का विदग्धतापूर्ण प्रणय-फलह, इसके बाद भद्रकाली दर्शन के बहाने श्रीकृष्ण का प्रस्थान, केशर-कुञ्ज में राधा को लाने के लिये सुबल को भेजना, श्रीराधा का केशर-कुञ्ज में आगमन, चतुरता से वन में श्रीकृष्ण का आत्मगोपन, क्रीड़ाकुञ में श्रीराधा का वासक सज्जा निर्माण, किन्तु क्रमशः रात अधिक हो जाने से श्रीराधा के हृदय में उत्कण्ठा का भी बढ़ना, युगपद निर्वेद, खेद, मूर्छा निःश्वास, त्याग आदि विप्रलब्धा नायिका का लक्षण श्रीराधा में प्रकाश होना वर्णन किया गया है। सोचती हैं- शायद पना ने श्रीकृष्ण का कही पर अवरोध कर लिया है । तब ललिता-विशाखा को साथ लेकर विरह-व्याकुल श्रीराधा श्रीकृष्ण को ढूंढने के लिये निकल कर कुछ ही दूर जाते ही श्रीकृष्ण को मिलती हैं, तब दोनों पक्ष मे परिहास वाक्य का आरम्म होता है, अनन्तर श्रीचन्द्रावली की बात उठाने से श्रीराधा की असूया किन्तु उनके कटाक्ष-बाण से मुग्ध होकर श्रीकृष्ण भूल कर अपनी मुरली को भी पुष्प पुठिका के साथ श्रीराधा के वस्त्रांचल मे दे देते हैं श्रीकृष्ण के अङ्ग में रतिचिह्न को देखकर श्रीराधा में खण्डिता भाव उदित होता है। उनके संतोष के लिये श्रीराधा के रूप-वर्णन के बहाने से दशावतार का सादृश्य दिखाया गया है। ललिता द्वारा प्रत्युत्तर प्रदान करने से श्रीकृष्ण मधुमङ्गल के हाथों से मल्ली माला को भ्रूसंकेत [ ८ با के साथ विशाखा को दिलाते हैं। जिससे विशाखा का मान तो हट जाता है किन्तु राधा का मान नही जाता । तव स्वयं मस्तकस्थित मयूर-पिच्छ चूडा को धूलि- धूसरित करते हुये प्रणाम करके श्रीकृष्ण श्रीराधा को कटाक्ष-माधुरी की भिक्षा करते है । इसी समय मुखरा माकर रसोल्लास में वाधा डालती है। श्रीकृष्ण वंशी अन्वेषण करते है, श्री राधा को चोरी का अपवाद देते हैं । तव मुखरा श्री राधा को लेकर चलो जाती है। पञ्चमाङ्क में- पौर्णमासी के मुख से श्रीराधाभाव का नैसर्गिक प्रेम लक्षण प्रकटित हुआ है (स्तोत्र यत्र तटस्थतां) यहां पर प्रशंसा से उदासीन होकर मनोदेदना, एवं निन्दा को परिहास मानकर, आनन्द उत्पादन होता है । अपरन्तु दोप में भी अल्पता नहीं होती है । गुण में भी वृद्धि नहीं है, वह ही नैसर्गिक प्रेम है। श्रीकृ ण को शठता से एवं ललिता की वचनभङ्गी से कुछ क्षण क लिये श्रीराधा के हृदय में मान का भाव आ जाता है, किन्तु प्रगट प्रेम की वन्या से वह ठहर नही सकता । श्रीराधाकलहान्तरिता भाव में विभोर हो जाती हैं । उनको कृष्ण-विभ्रम होने लगता है मन में ऐसे लगता है जैसे श्रीकृष्ण बलात्कार से उनको आलिंगन कर रहे हों नान्दीमुनी स्वभावतः मृदुला श्रीराधा से श्रीकृष्ण के प्रति काठिन्य प्रकाश का कारण पूछतो है । नान्दीसुखो के मुखमे श्रीकृष्ण की योगिवत् भोगविलास को वार्ता को मुन कर श्रीराघा सखियों से कारुण्य की भिक्षा मांगती हैं। इस समय श्रीराधा मुरली को हाथमे लेकर प्रशंसा व निन्दा करने लगती है। विशाखा कहती है- इसका आश्चर्य गुण यह है कि पवन की ओर धरने से यह अपने आप ही बज उठती है। श्रीराधा परीक्षा करते ही विपद को बुला लेती है वंशीनाद सुनकर जटिला आकर तर्जन , गर्जन करने लगती है । ललिता और सुवल की वान्-चातुरी से जटिला मुरली को फैक कर चली जाती है पौर्णमासी श्रीराधा को अभिसार कराती है। श्रीकृष्ण ध्यान की तीव्रता से सर्वत्र ही राधामय देखते हैं । जटिला की बहिन को पुती सारङ्गी अभिसारिका राधा को देख कर जटिला को कह देती है। जटिला भीषण क्रुद्ध होकर राभा को फटकारती हुई हाथ पकड कर खीच कर ले जाती है [६] 1 है । अभिमन्यु द्वारा श्रीराधा को विविध ताडना भत्संना होगी- यह सोच कर श्रीकृष्ण विषण्ण-चित्त से प्रतीक्षा करते हैं। इसी समय मधुमङ्गल आ कर कहता है "जब जटिला रात्रा को फटकार रही थी तब राधा धूघट पट को उतार वर सबके सामने सुबल बनगई, एव ललिता वृन्दा बन गयी और जटिला लज्जा से ग गई।" सखियो के वित-चमत्कारी नैपुण्य से व्रजलीला वास्तव मे समय समय पर इस प्रकार अद्भत रस को लीला-स्थली बनती रहती है । कुछ ही क्षणो के वाद ललिता व श्रीराधा के आने पर श्रीकृष्ण-मधुमङ्गल उन दोनो को वृन्दा व सुबल मान कर सम्बोधन करते है । पुन कुछ क्षणो के बाद प्रकृत वृन्दा के आने पर भी सबो का नम अपनोदन नही होता है यह देख कर वृन्दा कहती है- यह ही प्राकृत राधा है । श्रीकृष्ण का भ्रम मिटा। थी राधा मानिनी होकर रोने लगती है । कृष्ण कातरता प्रकाश करते हुये अनुनय-विनय करते हैं। ललिता कहती है,-(धारा वाप्पमयी न विरति) जो व्यक्ति नन्दनन्दननिष्ठ-प्रेम धारण करने का अभिलापी है उसको कभी भी अश्रु धारा वन्द नही होती । श्रीराधा के प्रसन्न होने पर जैसे भी मिलन की आनन्दोल्लासमय नबिहार की वात चीत होती है उसी समय फिर जटिला आ पहुचती है । देखकर श्रीरापा, ललिता, धृन्दा भय से भाग जाती हैं । कि तु जटिला राधा को सुवल ही मानती है । श्रीकृष्ण व मधुमङ्गल गोकुल को चले जाते है । पष्टाङ्क मे- श्रीरघा के अङ्ग मे पीत-वसन देखकर जटिला उत्त- जित हो उठती है । किन्तु विशाखा उसका समाधान कर देती है । ललिता विशाखा पद्मा का स्वीय स्वीय यूथेश्वरोद्वय के गौरव में कलह वृन्दावन मे प्रवेश करके श्रीकृष्ण की मुरलो ध्वनि सखोदय के साथ श्रीराधा का प्रवेश, एव अपाङ्ग भगिमाए श्रीकृष्ण का रूप माधुर्य पन, तथा यहा पर श्रीराधा- कृष्ण का कथोपकथन एव विलासादि ग्रन्थाकारने अति निपुणता से मङ्कित किया है। इसमे बात वात मे प्रणियिनी का अभिमान, बनान्तर मे भागना- श्रीकृष्ण के द्वारा अन्वेषण, ललिता-विशाखा का सुन्दर सरल सजीव व मधु- मय वागविन्यास एव स्वार्थ शून्य व्यवहार इत्यादि-इस अक्षु का वैशिक्ष्य है। सप्तमा मे-पौर्णमासी की बात से आश्वस्त होकर अभिमन्य श्री- राधा का मथुग गमन स्थगित कर देता है । सौभाग्य पूर्णिमा के अवसर पर [ १० ] 'गोपिया मानन्द उत्सव मे विभोर हो उठती है, चन्द्रावली के साथ कृष्ण, पद्या, शम्या की बात चीत हो रही है । इसो समय ललिता-वृन्दा की उप- स्थिति एवं उभय पक्ष मे वाक् कलह होने लगता है। हठात् वहा कराला आकर चन्द्रावली को लेकर चली जाती है । श्रीराधा अभिसारिता होती हैं। दोनो का मिलन होता है । श्रीकृष्ण के मुख से 'चन्द्र' सम्बोधन सुनकर श्रीराधा का कोप विशाखा-ललिता की आत्यन्तिक चेष्टा से मान का अनुप- शिम, श्रीकृष्ण का निकुलविद्या देवी का वेश धारण कर अवस्थान करना, ललिना-विशाखा को सहायता से श्रीराधा के साय निकुञ्जविद्या देवी का मिलन वर्णित है । हठात् गौरीगृह मे जटिला , अभिमन्यु प्रविष्ट होकर देखते हैं कि साक्षात् महेश महिपी को आराधना श्रीराधा कर रही है । अभि- मन्यु के जीवन सकट को सूचित करते हये गौरी व वृन्दा को वाक्चातुरी से श्रीराधा का मथुरा जाना स्थगित हो जाता है । पौर्णमासो का आगमन व अखण्ड निकुञ्ज विलास का इङ्गित के साथ प्रेमानन्द रस के उत्ताल तरङ्गमय महासागर मे यह "विदग्धमाधव" नाकट सम्पूर्ण होता है। श्री- राधा का विलास, विच्छेद से समलंकृत है । इस चौंसठ कलाधारी विदग्व- माधव नाटक का अनुशीलन सजनगण द्वारा ही सम्भव है । यह ग्रन्य भक्तिरस का उपजीव्य है। x श्रीचैतन्यदेव के मत से, उपास्य, उपासक एव , उपासना आदि का निर्णायक शास्त्र श्रीमद्भागवत होने के कारण तदीय अनुयायियो को इन सब विषयो का निर्णय करने मे विविध जटिल परिस्थितियो का अनुभव करना अपरिहार्य है । साथ ही इन सब विषयो का सुष्ठु समाधान होना भी आवश्यक है। मनोमूल ही ससार है । परमार्थिक वस्तु के स्मरण मे योग्यता और मनन अभिनिवेश के लिये साध्य, साधन, साधकगत, असम्भावना, विपरीत भावना, दूरीभूत होना भी आवश्यक है । श्रीमद्भागवत स्वरूप प्रमाण मे विचित्र प्रतिपाद्य विषयो का वैशिष्ट्य महावाक्य - श्रीनाम अद्वय तत्त्व, ब्रह्म, परमात्मा, भगवान श्रीकृष्ण, ऐश्वर्य, माधुर्य, धाम, परिकर,आदि की, व्यवस्था रस-उपासना भाव वैशिष्ट्य आदि का समाधान अति उपादेय रूप से हुआ है। [ ११ । - Tir - - अनेक प्रमाणों में थुति प्रमाण ही सर्वश्रेष्ठ है। कारण अन्य प्रमाण अतीन्द्रिय वस्तु के स्थापन में दोषमुक्त नही है । श्रुति-प्रमाण में भी श्री- मद्भागवत की सर्वश्रेष्ठता स्वीकृत हुई है। इसमें परतत्त्व विनिश्चायक "वदन्ति तत्तत्वविदं" जो यह श्लोक कहा गया है, उसमें एक स्वरूप का ही त्रिधा अविर्भाव सूचित हुआ है । ब्रह्म, परमात्मा, भगवान इस त्रितत्व मे स्फुरित स्वयं रूप ही साधक को दर्शनशक्ति के अनुसार अविर्भूत होता है । निर्धमक एवं अस्पष्ट विशेष रूप से अभिव्यक्ति होने से ब्रह्मतत्व कह- लाता है। सधर्मक होकर आंशिक शक्तिप्रकाशन विशिष्ठ स्वरूप ही पर- मात्मा एवं पूर्ण दर्शन में सम्पूर्ण स्वरूप शक्ति प्रकाशमय वस्तु ही भगवत्प- दवाच्य है । भगवत्ता में निरुपाधिक प्रीति पात्रत्व, गुण, 'माधुर्य" जितना अधिक प्रकाशित होता है, उतनी ही श्रेष्ठता जाननी होगी। अंशी भगवान श्रीकृष्ण में निरुपाधि प्रीति-पात्रता समधिक है। अतएव अंशी श्री कृष्ण की प्रतिपादक श्रीमद्भागवत ही अंश प्रतिपादक शास्त्र-समूह की शिरो- मणि है । अर्थात परतत्व वस्तु प्रतिपादक शास्त्र-समूह श्रीमद्भागवत के ही अन्तर्भूत है । "शास्त्र भागवतं पुराणममलं"। उपासना एश्वर्य व माधुर्यभाव से ही होती है । ऐश्वर्य भाव की उपासना में सतत परमेश्गर बुद्धि रहती है । इसलिये वहां निरुपाधि प्रीति का अवकाश भी नहीं है। किन्तु माधुर्यभाव की उपासना में कदाचित् पर- मेश्वरत्व प्रकट होने पर भी उससे संभ्रमव गौरव बुद्धि न होकर प्रियता की गाढ़ता होती है। माधुर्यभावे का चरमविकास है मधुरारति में । अन्यान्य रस मधुरा-रति में अन्तमुक्त हैं । अथवा इसके पोषण के लिये ही नियुक्त होते हैं । अनुकूल गाढ़ प्रेममयी तृष्णा के द्वारा ही श्रीकृष्ण सुख लाभ करते हैं एवं महत्कृपा से अथवा महत्सङ्ग से हो इस जातीय का दृढ भाव साधक के हृदय में संक्रमित होता है । इस सब विवरण का श्रीचैतन्य- मतीय ग्रन्थों में पुनः पुनः विचार विश्लेषण हुआ है । भगवत्प्राप्ति का सहज सुखकर उपाय निध-रण करने में चैतन्य मत का यह अवदान असमो- ध्वं है। विमुक्ति व प्रीति ही प्रयोजन तत्व परतत्व का ज्ञान, या अनुभव है । शन्द से परतत्व का साक्षात्कार होता है । साक्षात्कार शब्द से प्रियता ही ध्वनित होती है। प्रियता की वैचित्रो बहुनिष है। उसमें मुख्य हैं दास, [ १२ ] 1 , - AL - ससा, पुत्र, कान्तमाय । शान्तभाव में हो प्रोति को सर्वोपना आयशास्त्र में उद्घोषित हुई है। उग में श्रीगान्धर्वादयित (कृष्ण) जिस प्रीति के आधार या आश्रय (भी पा) के निकट म्वाधीनरूप से प्रकटित होते हैं, यह प्रीति हो को परापाछा है। स्वरूपानन्द य स्वरपशक्ति के साहचर्य से प्रकाशित आन दभेद से परतस्य का आनन्द भी द्विविध है- १. स्वरूपानन्द और २. शक्त्यानन्द अर्थात् आप्रय-तत्व से प्रीति का चिन्मय जो आनन्द प्राप्त होता है । स्वरूपा नन्द से शक्त्यानन्द की श्रेष्ठता है, उस मे भी, हादिनी शक्ति के द्वारा प्रकाशित आनन्द कोही आनन्दाधिक्य संवंमहजन ने स्वीकार किया है । उक्त दाक्ति उपास्य उपासेंक दोनोंकी ही आनन्दंदायिनी है ।लादिन शक्ति या सर्व- श्रप्रयाश श्रीराधा मे है । सुतरा श्रीराधा च तदनुगागण के सेवित परतत्व के प्रति आनुवल्यमयो प्रीतिविधान करना ही-प्रयोजनविचार में सर्वश्रेष्ठ है। सर्वत्र स्वीकृत है कि निज अपेक्षा श्रेष्ठजनो को पूजन एकान्त कर्तव्य है और यह पूजन क्रिया आनुगत्यमूलक ही है। कृतज्ञता हो वैष्णवधर्म में विशिष्ट लक्षण है। चैतन्यमतीय वैष्णवधर्म मे श्रीगुरुरूपा सखो के आनुगत्य से फुझासेवाधिकार लाभ करना ही अभीष्ठ वस्तु है। यह प्रथा अन्यत्र विरल है । महाप्रसाद, गोविन्द नाम, ब्रह्म व वैष्णव-मे सुदृढ विश्वास -ये सब इस धर्म मे परिस्फुट स्प से अभिव्यक्त हुए हैं। इस मत मे श्रीहरि- वैष्णव के अचिन्त्यभेदाभेद, प्रकाश हैं- श्रीगुरुदेव। अभेद विचार में आप उपास्य-पराकाष्ठा हैं । तथापि प्रोप्रमु-श्रीभगवान के नित्य प्रेष्ठ हैं। श्रीगुरु आश्रय जातीय तत्व हैं और श्रीकृष्ण विषय वस्तु । श्रीगुरुदेव भगवान होकर भी सेवक, मुकुन्द प्रेष्ट हैं, एव रागमार्गीय स्वरूपसिद्ध व्यक्ति की दृष्टि से अभिन्न वार्षमानवी प्रकाम है । श्रीतपन्थिगण ही केवल श्रीगुरुदेव की नित्यता स्वीकार करते है । ज्ञान- वाद, बौद्धवाद अहं तवाद यावकिवाद आदिके दार्शनिको के मतमे थीगुरुकी पारमार्थिक नित्यता स्वीकृत नहीं है । ज्ञानवाद मे निपुटोलय में गुरुशिष्य सम्बन्ध नहीं रहता है । योगसिद्धि मे सिद्धिलाम के पश्चात् गुरुसेवा की [ १३ ] - - 1 T आवश्यकता महीं है। सुतरां इस प्रकार क्षणिक गुरुवाद में पराभक्ति भी सुदुर पराहत होती है। जीवतत्व विचार में भी इस मत का वैशिष्ट्य हैं । मायाधीश भगवान व मायांवशवर्ती जीव, सुतरां उभय के बीच मे भेद अनिवार्य है। शक्ति शक्तिमत विचार में अभेद हैं। वास्तव वस्तु एक है । वस्तु का अंश जीव, वस्तु को शक्ति माया, वस्तु का कार्य जगद, यह ही अचिन्त्यभेदाभेद वाद है। उसमे शास्त्रीय निखिलवाद तथा समस्त श्रुति आदि शास्त्रों का मुख्य रूप से सुन्दर सामञ्जस्य विधान हुआ है। इस मत में उपास्यतत्व स्वयं भगवान् श्रीवजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं श्रीराधा-प्राणबन्धु की उपासना ही सर्वश्रेष्ठ है। यह मत असमोर्ध्व रूप से उद्घोपित हुआ है। निरुपाधि प्रीति पात्रता ही भगवत्ता का सर्वश्रेष्ठ लक्षण है। उस निरुपाधि प्रीतिपात्र के प्रति जिसकी जितनी अधिक प्रीति है, उसके निकट उतना ही अधिक रूप से प्रीति पात्रता गुण-माधुर्य प्रतिफलित होता है। सब अवतारों से थीगोकुलनाथ में वह प्रीतिपात्रता सर्वापेक्षा अधिक है । इसमे भी जो सर्वश्रेष्ठा श्रीकृष्ण-आराधिका श्रीराधिका के मानुगत्य से मधुर-रस की उपासना करते हैं उनके निकट श्रीगोकुलनाथ का माधुर्य ही सर्वापेक्षा अधिक है । मधुर-रस का वैशिष्टय बहुविध होने पर भी सर्वश्रेष्ठ श्रीराधिका के श्रीप्राणबन्धु ही उपास्य विचार में पराकाष्ठा स्वरूप है। श्रीनिम्बार्काचार्य पाद द्वारा श्रीराधा की उपासना-कथा कहने पर भी उसमें सुष्ठ ता प्रदर्शित नहीं हुई है; कारण कि उसमें स्वकीयावाद ही समुल्लसित हुआ है। श्रीविष्णुस्वामी के आनुगत्य से श्रीकृष्णकर्णामृत मधुर रसाश्रित लीलाकथा कीर्तन करने पर भी उसमें श्रीचैतन्यदेव प्रदत्त श्रीवृपमानुनन्दिनी को आनुगत्य मूलक चमत्कारिता का अभाव है। श्रीगीतगोविन्द में यह कीर्तित ही नहीं हुई है । सुतरां अनप्तिचरी उनतो. ज्ज्वलरस गर्मा आनुगत्यमयी स्वभक्तिश्री का समर्पण ही इस अवतार का प्रधानतम वैशिष्टय है। [ १४ ] श्रीरामानुजाचार्य के मत में वैकुण्ठ ही परम धाम है । श्रीमध्व के मत में श्रीकृष्ण के पञ्चस्थान- भूर्लोक, सूर्यमण्डल, ब्रह्मलोक या सत्यलोक रुद्रलोक एवं वैकुण्ठ, का उल्लेख है महामारत तात्पर्य निर्णय में एवं श्रीमद्वादश स्तोत्र के ६/५ स्तोत्र में गोकुलस्य श्रीकृष्णलीला का भो वर्णन है। श्रीनिम्वर्काचार्य ने सविशेष निविशेष श्रीकृष्ण स्तव में श्रीकृष्णधाम को सर्वोपरि रूप से वर्णन किया है। श्रीपुरुषोतम आचार्य दश श्लोकी भाष्य में उस धाम को 'द्वारका' नाम से उल्लेख करते हैं । वेदान्तरत्न- मञ्जूपा ग्रन्थ में उन्होने कहा है- "हक्मिणी सत्यभामा बमस्त्री-विशिष्ठः श्रीभगवान्" इस वाक्य से द्वारका या गोलोक का बोध नही होता । सविशेष निविशेष श्रीकृष्णस्तव' फी टीका मे किन्तु गोलोक शब्द का उल्लेख हुआ है। गोपालतापनी में श्रीवृन्दावन एवं ब्रह्मगोपाल पुरी-मथुरा का उल्लेख है, किन्तु गोलोक का उल्लेख नहीं है। "श्रीहरिभक्तिविलास" ग्रन्य के मत में विधिमार्ग में श्रीकृष्णपूजा केलिये श्रीवृन्दावन में आवरण देवता केमध्य में वसुदेव-देवको एव रुक्मिणी आदि महिपीगण भी हैं। गौतमीय तन्त्र के ध्यान में- श्रीवृन्दावन में गोपी व महिषीगण का भी सस्थान है । इस घ्यान के अनुसार यदि कोई श्रीवृन्दावन में श्रीकान्ता होने की इच्छा करके भी महिपीयों का ध्यान करे तो उनको द्वारका में महिषो. स्वरूप ही प्राप्त होगा। (भक्तिरसामृत १/२/१५७) श्रीवल्लभाचार्य के मत में गोलोक में मधुरभाव की बात है। (अण्डभाष्य ३३३३१)। ईश्वर बुद्धि भी है। मधुर भाव तो है, किन्तु शुद्ध माधुर्य नहीं। श्रीचैतन्य मत में गोलोक देवलीला स्थान है । गोपियो के आनुगत्य को छोड़ कर ऐश्वर्य भाव से भजन करने पर भी श्रीवजेन्द्र- नन्दन की प्राप्ति नहीं होती। वैकुण्ठ से श्रेष्ठा मधुपुरो हैं, और फिर परम श्रेष्ठ है श्रीवृन्दावन । [ १५ ] T पूर्णता श्रीकृष्ण यहां पर पूर्णतमा स्वतन्त्रता से केनिमाधुरी, को प्रकट करते हैं। धाम के विचार से उसी को सर्वश्रोष्ठता है । सुतरां, गोलोक नामक स्थाना योकुल का ही संभव स्वरूप है । 'श्रीचैतन्य, मदीया शास्त्रा, नाम, मन्त्री, उपास्थ, साधन प्रयोजनादि- सवा ही पसत्तारः तत्वा है । आपका अनुमत, शास्त्र, 'श्रीमद्भागवत स्वय भगवान, पूर्णतमा श्रीकृष्ण का निर्णायक होने के कारण' पूर्णतम, तद्भिन्न, शास्त्र, आशिक है। मन्त्रों से जिसा माना प्राश, के साथ श्रीमूर्तियों का निवास है, वह एक 'श्रीराधाकृष्ण नाम है। पास्य मे ब्रह्म परमात्मा का आविर्भाव है। ऋशि-आराधिका श्रीराधिका मे, समस्त उपासक है। साधन में यावत्तीय साधन हैं, एव प्रयोजक-पराकाष्टा मे समस्त प्रयोजना ही अन्तर्भुत हुआ है । सुतरा इस सत के सस्पर्क से हो श्रीभक्तिरसामृत-सिन्धु का स्पर्शन, उसमे अवतरण,निमज्जन, अवगाहन सन्तरण औरउससे रत्न आहरणसम्भव है। सोडीय, वैष्णव - साहित्या ,सर्व-सकीर्णता-विमुक्त एवं सहारसभाव साधुरांचाही है । विशाल औदार्य व जगत् के प्रति प्रीतिमय व्यवहार मे यह अद्वितीय ही है। नम्रता, धीरता, गर्भ-स्वापकर्ष प्रदर्शन मे, औरो को मम्मान देने में भी अप्रतिम हैं । सस्कृत-साहित्य के रस वस्तु को आलोचना को सुविशद् व परिस्फुटतर रूप से जगत् के सामने श्रीमन्महाप्रभु ने प्रकट किया है। श्रीभगवान के सम्बन्ध में भगवद् विश्वासी जन गणो को जो धारणा है कि श्रीभगवान् पाप पुण्यी के विचारक व अनन्त ऐश्वर्यमय हैं । - इस धारणा के शिखर पर आरोहण करके थीचैतन्य ने भगवान् श्रीकृष्ण को प्राणाराम हृदयसखा कहा है। भगवान प्रेमास्पद' है- इस उक्ति के उध्वस्तर में आरोहण करके श्री भगवान को उपपति रूप से ग्रहण करने । का आदेश दिया है। यही परकीया साव को उपासना ही इनके मत का महान् वैशिष्टय है। ब्रजवधुभो मे यह भाव निस्सीम रूप में है । फिर धीराधाजी मे' ही इस भाव को अममोर्च पराकाष्ठा है । परिपूर्ण कृष्ण को प्राप्ति-इस प्रेम से ही होती है । और श्रीकृष्ण इसी प्रेम के वश हैं।
1 -- ... - स्वीया व परकीया ब्रज का औपपत्य एक असाधारण-भाव है । व्रजदेवीगण साक्षात् स्व. रूप शक्ति को चिन्मयो मूत्ति होकर भी नित्य परकोया रूप मे प्रतिष्ठिता हैं। स्वीया और परकीया यह दो शब्द यहां पर पारिभाषिक हैं । स्वीया शब्द का अर्थ बहिरङ्ग विधान-विप्राग्नि साक्षी करके आनुष्ठानिक रूप से सम्बध स्थापित करना ही है । द्वितीय पक्ष का अर्थ है-अन्तरङ्ग प्रेममय विधान के द्वारा परस्पर का स्वामाविक सम्बन्ध स्थापन । इस भोपपत्य मे तक का अस्पृश्यता युक्ति की अदृश्यता एव मन का लोकोतर सामान्य भाव विद्यमान है। प्रोभगवान् को किसो लीला का भी कोई नियामक नही है। वे कमारतन्त्र नहीं हैं। मानव समाज की भाति निर्दिष्ट समय में नियन्त्रित नही हैं । किन्तु रसोकपं वधन के लिये वे चिन्मय जगत के एक महाशक्ति- शाली इस भाव िशेप को ग्रहण करते है। जागतिक परकाया मे रसाभास कोष है। ब्रजगोपिया में उसको आशङ्का भी नही हो सकतो। क्यो नहो ? इसके उत्तर मे उपपति का लक्षण कहते हैं। परकीया रमणी के प्रति अनुराग से धर्म उल्लघन कर जो उस परकीया नारी का प्रेम-सर्वस्व होता है, उसको उपपति कहते हैं [ उज्वलनीलमणि | इस औपपत्य मे ही शृङ्गार रस को पराकाष्ठा प्रतिष्ठित होने के प्रधानत तीन हेतु है- बहुवार्यमानता, प्रच्छन्न कामुकता व परसर दुर्लभता। औपपत्य सम्बन्ध मे लघुत्व की जो वणना है वह प्राकृत नायक सम्बन्ध मे ही प्रयोज्य है, किन्तु मधुर रस आस्वादन के लिये हो जिनका अवतार हुआ और अवतरित प्रिया वर्ग भी जिनकी स्वरूप शक्ति नित्य प्रेयसी हैं-उन श्रीकृष्ण के, सम्बन्ध मे औपपत्य का लघुत्व या हेयत्व नही हो सकता। -- [ १७ इस विषय मे प्राचीनकाल से श्रीचैतन्यमत मे दो प्रकार की विचार- धारा विद्यमान है उसका विवरण इस प्रकार है- १. श्रीजीवगोस्वामी की विचारधारा मे साधारण उपपति का जो लक्षण निर्दिष्ट है,श्रीकृष्ण मे वह बिल्कुल ही प्रयोज्य नही हो सकता। नित्यलीला मे परकीया भाव नहीं होता । माया के द्वारा रसविशेष परि- पोपण के लिये औपपत्य की प्रतीति हो । है । ब्रह्ममोहन मे भो मायिक लीला देखी जातो है। शृङ्गार रस मे उपपत्य रसाभास जनक हैं श्रृंगार रस अति पवित्र है, यथा--शृङ्ग हि मन्मथो दस्तदागमन 'हेतुक , उत्तम प्रकृति प्रायो- रस शृङ्गार इण्यते । यहां पर उत्तम प्रकृति प्राय की व्याख्या मे आप कहते हैं-शृङ्गार शुचिरज्वल है। अमरकोप के इस पर्याय निरूपण मे शृङ्गार शुचि पर्याय मे सन्निविष्ट है । सुतरा यह शुचि उज्वल-रस मे अधर्ममय औपपत्य अङ्ग- रूप से गण्य नही हो सकता। त्रिकाण्ड के अन्त मे "आर" शब्द पापपति शब्द मे हो उक्त हुआ है। नाट्यालकार शास्त्र मे औपपत्य का निन्दागर्भ वाक्य देखने में आतr है । साहित्य दर्पण मे-उपनायक संस्थाया मुनिगुरुपत्नी गतायाञ्च । बहुनायक विषयाया रतौ च तथानुभवनिष्ठाया प्रतिनायक निष्ठत्वे सदू- दधम पास तियगिदिगत शृङ्गारे अनौचित्यमिति । श्रीकृष्ण ने स्वय ही औपपत्य का दोपोल्लेख किया है- अस्वयंमयशस्य च फल्गुकृच्छ भयावहम् । जुगुप्सित च सर्वत्र औपपत्य कुलस्चियो । श्रीपरोक्षित ने भी कहा- बाप्तकामो यदुपति कृतवान् वै जुगुप्सितम् । इन सब वचनों से मोपपत्य का जो दोष दिखाया गया है वह श्री- काम मिल अपर नायको मे मानना आवश्यक है। श्रीकृष्ण के सम्बन्ध मे उक्त दोप समूह की आशका नही है क्योकि मधुर-रस विशेप के मास्वादन के लिये ही आपका अवतार है। - 7 - । १८ ] विशेपत.-गोपियो के साथ श्रीकृष्ण का नित्य दाम्पत्य सम्बन्ध है। ग्रासहिता में "आनन्दचिन्मय रस प्रतिमा वताभि"-श्लोक में निज- रूपता का अर्थ है-स्वदारत्वेनैव न तु प्रकटलीलावत् परदारस्वव्यवहारे- नेत्ययं । अर्थात् प्रकटलीला में जैसे आनन्दचिन्मय रस प्रतिभावितागण परदारत्व रूप में लीला का पोपण करते हैं, नित्यलीला में वैसे नहीं है। परमलक्ष्मियो का नित्य-दाम्पत्य छोड और भाव नहीं है। अतएवं प्रापश्चिक प्रकटलीला में गोपियो का पर-दारत्व-माया विजृम्भित ही है । श्रीकृष्ण गोपियो के पति रूप से ही वर्णित हुए हैं । गौतमीय तन्त मे- अनेक जन्मसिद्धाना गोपीना पतिरेव वा। नन्दनन्दन इयुक्तम्प्रैलोक्यानन्दवर्धनम् ।। भागवत मे- गोपोना तत्सतीना च सर्वेपाञ्च व देहिनीम् । मोऽन्तश्चरति सोऽध्यक्ष एप क्रीडनदेहभाक् ॥ श्रीगोपाल तापनी में भी कृष्ण को प्रजगोपियो का स्वामी कहा गया है। लक्ष्मीगणो का परकीयात्व सम्भव नही है । श्रीकृष्ण वल्लभागण लक्ष्मी हैं-ब्रह्मसहिता में लक्ष्मी सहस्रशत शब्द से गोपिया ही अभिप्रेत हैं एव गोपीशब्द से लक्ष्मी का बोध होता है। सुतरा गोपियो का परवोयात्व असम्भव है। श्रीकृष्ण ने श्रीराधा को अखिल लोक लक्ष्मी शब्द से प्रकाश किया है । प्रकट लीला में उपपति की भाति प्रतीयमान होने के कारण ग्रन्थ में श्रीकृष्ण को उपपतिवत् वर्णन किया गया है । बहुवारणता, प्रच्छ- 'भकामुकता, परस्पर सङ्गम दुर्लभता-रतिसम्बन्ध में श्रेष्ठ रूप से उक्त होने पर भी लौविक रसशास्त्र सम्बन्ध मे ही यह बात जाननी चाहिए। समर्था रति में निवारणादि न रहने पर भी शृगार रस की पुष्टि होती है । उसमे भी मादनाख्य को पर काठा देखी जाती है। सुतरा औप- पत्य का सर्वथा ही अप्रयोजन है। प्रकलोला में औपपत्य की भाति प्रतीत होने पर भी वह मायिक है। - [१९] । उपसंहार में- स्वेच्छया लिखित किञ्चिदन परेच्छयाः। यत् पूर्वापर सम्बन्ध तत् तत् पूर्वमपरं परं ।। अर्थात् इस विचार मे स्वेच्छा कम से कुछ और परेच्छा से कुछ लिखा गया है । पूर्वापर सम्बन्ध युक्त अश ही स्वेच्छा क्रम का है । और वैसे सम्बन्ध होन अंश परेच्छा प्रणोदित है। यह जानना होगा । २. श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती की विचारधारा-श्रीमद्भागवतीय ब्रज- लीला की व्याख्या का स्वकीया पक्ष में थीजीवगोस्वामी का अभिप्रेत बिल- कुल ही नही हो सकता। वह परेच्छा से लिखित है और स्वयं ही उन्होने घ्याख्या के अवशेष में यह बात प्रकट भी की हैं । भिन्न रुचि के लोगों के पास जिससे यह दुर्जेय अचिन्त्य लीला निर्दोष रूप से प्रतिपन्न हो और वे सब ही इस लीला के अनुध्यान के लिये अपने को रुचिशील करें-यह सोचकर ही उन्होने स्वकीया पक्ष में व्याख्या की है, कारण श्रीचैतन्यदेव के चरणानु- यायो अन्तरङ्ग भक्तों के लिये स्वकीया पक्ष को व्याख्या युक्तियुक्त रूप से ग्राह्य नही हो सकती। औपपत्य अधर्मस्पर्श व नरक जनक है-यह बात प्राकृत नायक के लिए है। किन्तु धम धर्म के नियामक चूडामणोन्द्र श्रीकृष्ण के लिए वैसी आशंका का अवसर कहाँ ? प्राकृत नायक नायिका को अधर्म स्पर्श होता है, किन्तु जो अजम्भण मात्र से ही इस विश्व-ब्रह्माण्ड के सृष्टि, स्थिति. सहार में समर्थ हैं, ऐसे लीला पुरुषोतम श्रीकृष्ण मे उनकी महाशक्ति समूह के वीच मुख्यतमा अह्लादिनी शक्तिरूपा गोपियों में बिल्कुल ही यह दोष नही है। इसलिए नाटक चन्द्रिका मे श्रीरूप गोस्वामी ने लिखा है- परोढा औपपत्य गोण है-यह जो-पण्डितगण कहते हैं, वह श्रीकृष्ण व श्रीगोपीगणों को छोडकर ही समझना होगा । अलंकार कौस्तुभकार का भो यही मत है । अलौकिक सिद्ध श्रीकृष्ण के लिए यह औपपत्य एवं गोपियों का परकीत्व दूसरा न होकर भूषण स्वरूप है । श्रीकृष्ण की प्रकटलीला मायिक नहीं है। वस्तुतः प्रकटलीला व अप्रकट में स्वरूपतः कुछ भी भेद अथवा वैलक्षण्य नहीं है [ ब्रह्म संहिता . [ २० ॥
- की श्रीजीव गोस्वामीजी की टोका ५। ४३ ] मन्तव्य द्रष्टव्य का अनुध्येय-अपनी लीला-माधुर्य को जब कृपा करके प्रपंच जगद के गोचरीभूत कराते हैं। तब वह लीला प्रकट लोला नाम से कही जाती है । दूसरे पक्ष में यह लोला लोक चक्षु के अन्तहित होने मे ही अप्रवट आख्या में अभिहित होती है । लघु भागवतामृत १ । २४४ में वर्णित है- अनादिमेव जन्मादि लोलामेव तयाभूता। हेतुना के नचिव कृष्ण प्रादुष्कुर्याद कदाचन ॥ अप्रकट लीला नित्य दाम्पत्यमयी है एवं प्रकट लीला मायिक व उप- पत्य भावमयो है, ऐसी धारणा करना असङ्गत है, क्योंकि सर्वलोला मुकुट मणि रासलीला के आदि, अन्त व मध्य में परोढा उपपति भाव ही विराज- मान है । रासलीला को मायिक मानना भो निपिद्ध है, रास , पञ्चाघ्याय के प्रत्येक अध्याय मे ही परकीयात्व-उपपतित्व प्रतिपादक वचन हैं। "ता वार्यमाणा: पतिभिः २६ १८, भ्रातरः पतयश्य वः २६१ २०७, यत् पत्यपत्य सुदामनुवृत्तिरङ्ग २६ । ३२, तद् गुणानेव गायन्त्यो नात्मा- गाराणि ससारुः ३०। ४०, पति सुतान्वय भ्रातृ बान्धवान् ३१ । १६, एवं मययोज्झित लोक वेद स्वानां ३२ । २१, कृत्वा तावन्त मात्मानं यावती- गोपयोषितः ३३ । १६, मन्यमानाः स्व पार्श्वस्थान स्वान् स्वान् दारान व्रजोकसः ३३॥३७, श्रीशुकदेवजी ने स्वय एव श्रीकृष्ण-गोपियों के मुख से ही निःसृत इन सब वाक्यो से परोढा व उपपतित्व भाव स्पष्टतः प्रतिपादन किया है। रासलीलाम-यिकत्व विजृम्भित होने से लक्ष्मीगणों की तुलना से गोपियों का उत्कर्ष सामाणित कैसे होगा? श्रीभागवत-नायं धियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः । १० । ४७ । ६० ) इस वाक्य में लक्ष्मीगण से भी गोपियो का उत्कर्ष सूचित हो रहा है । रासलीला मायिक होने से यह उत्कर्ष स्थापन-अमूलक व अवास्तव ही जावेगा। किसी भी व्यक्ति ने कही पर भो दाम्पत्यमयी रासलीला का वर्णन नहीं किया है। --- [ २१ ] औपपत्य प्रतिपादक अश समूह को भ्रम विगत कहकर परित्याग करने से रामलीला का बिल्कुल हो कोई उपादेयत्व नहीं रहेगा । रासलीला मे श्रीकृष्ण के मुख-वचन है-"न पारयेऽह निरवद्य सयुजा स्वसायुकृत्य १० ॥ ३२॥ २२॥ रासलीला मायिक होने में इस वाक्य का परम प्रेमोत्कर्ष प्रमापकत्व अमूलक व अवास्तव हो जावेगा। उक्त वाक्य मे "या मामजन् दुर्जर गेहशृङ्खला." पद भी परोढात्व उपपतित्व प्रतिपादक है । गोपीगण ने दुर्जर गृह- शृंखला सच्छेदन करके श्रीकृष्ण का एक निष्ठ भाव से भजन किया हैइसके प्रतिदान मे श्रीकृष्ण असमर्थ हैं । अतएव गोपी प्रेम के वे वशीभूत हैं । यह नित्य मत्य है । रास. लीला मायिक होने से यह भी अवास्तव हो जावेगा। श्रीकृष्ण को परम मायावी मानकर गोपियो के प्रति उनके इस प्रकार के वाक्यो का प्रयोग करना, गोपियो का मनोरञ्जन यदि कहा जाय, तो परम साधुवर्ग-मुकुटमणि महाविज्ञ श्रीउद्धव ऐसे अवास्तव व अनित्य मायिक विषय में भजन के परम काष्टात्व का स्थापन क्यो करते ? उनके- "आसामहो चरणरेणु जुषामह स्याम, वृन्दावने किमपि गुल्मलनौषधोना" वाक्य मे--पट्ट महिषीयो से भो गोपियो का प्रेमोत्कर्ष ही स्वीकृत हुआ है। उस अतुलनीय प्रेमोत्कर्ष का कारण यह है कि गोपिया स्वजन व आर्यपथ परित्याग करके श्रीकृष्ण मे एकान्त अनुरागिणी हैं । स्वजन आर्यपथ त्याग, येदि मांयिक व्यापार ही हैं । तब प्रेमोत्कर्प का हेतु भी अवास्तव होगा। तब एकान्तभक्त उद्धव के वाक्य भी भ्रमपूर्ण हैं । अतएव कहना होगा कि आप्तवाक्य मे भी अनास्था दोप है। दशाक्षर व अष्टादशाक्षर मत्र का अर्थ भी परोढात्व-उपपतित्व भाव मय है । शब्द शक्ति को अद्भुत शक्ति के विषय मे जिनका ज्ञान है, वे इस रहस्य को अच्छी प्रकार जानते हैं। श्रीकृष्ण के विविध ध्यान एव मन्त्रो मे भी उक्त भाव ही प्रकटित है । साधकगण ध्यान की परिपाक दशा मे प्रकटलीला-भावसमूह की ही प्रत्यक्ष करते हैं। सुतरा प्रकट लीलान्मायिक अथवा अनित्य नही कही जा सकती। [ २२ ] "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति, तत्त्वत.", श्लोक व्याख्या में श्रीरामानुजाचार्यपाद-ने भगवद्-जन्म-कर्म एवं परिकरो का नित्यत्व स्या- पन किया है । श्रीमयुसूदन सरस्वती ने भी 'दिव्य' शब्द का अप्राकृत अर्थ किया है। ‘एको देवो नित्यलीलानुरक्तो मक्तव्यापी भक्तहृदयन्तरात्मा' इति पिप्पलादशाखीया पुरुष बोधिनी श्रुतिः) । श्रीविठ्ठलनाथ जो ने स्वरचित विद्वएमन्उन ग्रन्थ मे श्रीभगवान् के जन्म कर्म का नित्यत्व ही प्रतिपादन किया है। वृहदामन पुराण में भी प्रकट-लीला का नित्यत्व प्रकाश करते हुये भगवदुक्ति है- "जार धर्म में मेरे सम्बन्ध के सर्वतोभाव से अधिक सुदृढ सुम्नेह को प्राप्त होकर तुम सब हो पूर्ण मनोरथा हो जाओगी। श्रीभगवान् का नाम नित्य है । एक एक लीला में उनका एक एक नाम निर्दिष्ट है लीला अनित्य होने मे श्रीनाम भी अनित्य होगा। सुतरों भजन का जो सार है, वह भी मायिक जायेगा। नाम अनित्य है। यह सोचने से भी नामापराध होता है। श्रीजीवगोस्वामी ने श्रीभागवत सन्दर्भ में नाम जन्म, कर्म आदिकों का नित्यत्व ही प्रतिपन्न किया है। श्रीभगवान के आकार,प्रकाश,जन्म, कर्म लक्षण-लीला, एव उनके परिकर सब ही उनको स्वरूप शक्ति की अभिव्यक्ति है जीवशक्ति व मायाशक्ति के साथ उनकी कोई लीला नहीं होती। सुतरों ये सब ही नित्य हैं यही श्रीजीव गोस्वामी की उक्ति है, फिर परोढ़ा- उपपतिभावमय रासलीला मायिक कैसे हो सकती हैं ? व्रजसुन्दरीगण श्रीकृष्ण के साथ विप्र-अग्नि को साक्षी रखकर आनुष्टानिक रूप से परिणय सूत्र मे आबद्ध हुई , किसी भी पि शात्र में इस प्रकार का उल्लेख नहीं है । यदि कोई ऐसा मानता है तो क्या शुकदेव सम्मत होगा? परीक्षित के धर्म सस्थापकत्व आप्तकाम श्रीकृष्ण के औपपत्य मे सन्धिग्ध हो कर पूछने पर, इसके उत्तर में श्रीशुकदेव जी सुस्पष्ट कह सकते थे, कि सब गोपाङ्गनाएं श्री कृष्ण को विवाहित पत्नी हैं, परदार नहीं। . । २३ ] ऐसा सरल उत्तर न देकर श्रीशुकदेव को बहुत ही कष्टप्रद सिद्धान्त से परीक्षित को समझाना पड़ा, यह क्यो? कही कही पति शब्द का प्रयोग भी देखने में आता है। उसका अर्थ- गति समझना होगा। क्योकि श्रीजोवगोस्वामी ने भगवत् सन्दर्भ मे शक्ति शक्तिमान मे पति शब्द का गौणार्थ हो स्वीकार किया है। केवल विवाहित व्यक्ति ही नायिका का पति होता है यह बात नही है । नायिका प्रकरण मे परकीया मे स्वाधीन पतिका शब्द का प्रयोग भी दीखने मे आता है। फिर ऐसा भी हो सकता है कि श्रीकृष्ण किसी किसी गोपी के विवाहित पति हैं। अपरापर गोपियो के साथ श्रीकृष्ण का दाम्पत्य सम्बन्ध नहीं है। श्रीकृष्ण सब गोपियो के विवाहित पति होने से 'परदारा अभि- मर्षण' प्रश्न प्रसङ्ग ही नही उठना । गोपियो के अपने अपने पतियो की बात भी उल्लिखित है, यह भी लिखा हुआ है कि- "नजातु व्रजदेवीना पतिभि सह सङ्गम । गोपाल तापनी के- 'स वो हि स्वामी भवति –' इस वामय में 'स्वामी'शब्द परिणेतृ वाचक नही है। स्वामी ऐश्वर्य बोधक शब्द है पाणिनी कहते हैं- स्वामिन - ऐश्वर्ये । प्रयोग भी ऐसे ही दीखने में आता है। "लोके यस्य हि य स्वामी भवति, स तस्य भोक्ता भवतीति" । सुतरां स्वामी कहने से ही विवाहकर्ता का बोध नहीं होता। ग्यारहवर्ष पर्यन्त ही श्रीकृष्ण की-व्रजलीला का सवाद लिखित है। गोपियो के साथ श्रीकृष्ण का सम्बन्ध बचपन से ही दृढ हुआ। ६ वर्ष मे तो आनुष्ठानिक रासलीला हुई, उपनयन सस्कार मथुरा मे हुआ और इसके ही विवाह ही विवाह होने लगे। व्रज मे प्रवृत्तमार्ग प्रवर्तन का अवसर ही नही माया। ग्रज के समस्त सम्बन्ध ही चिन्मय हैं जहाँ जहा पर माया शब्द का प्रयोग है वहा योगमाया ही अर्थ समझना चाहिये । सुतरा अभिमन्यु के साथ धीराया का जो पतिभाव वणित है, वह चिन्मय समझना होगा । श्रीभगवान् के लीलातन्त्र मध्यवतित्व होने के धारण उक्त सम्बन्ध भी मायिक नहीं हैं । योगमाया ही उक्त सम्बन्ध का हेतु है। [ २४ ] स्वयं सिद्ध श्रुति सिद्ध परारया स्वरूप शक्ति विशिष्ट ही परतत्व है। यह परतत्व स्व प्राधान्य में स्फुरित होने से आप धर्मादि नाम ग्रहण करता है । जैसे स्वयं पराशक्ति ही ज्ञान, सुख,कारुण्य, माधुर्यादि आकार में स्फुरित होकर धर्म रूप में प्रकाशित होती है। शब्दकार में प्रकाशित होने पर श्रीभगवान् नाम व वाक्यादि रूपमें प्रकाशित होते हैं धरित्री के आकार में स्फुरित होने पर घाम-परिकर रूप में एवं लादिनीसार समवेत सम्विदात्मक युवती रल रूप में स्फुरित होने पर श्रीराधादि रूप में विभापित होते हैं। श्रीराधा श्रीकृष्ण की स्वरूप शक्तिभूता लादिनी शक्ति है, इसमे कोई सन्देह नहीं है । किन्तु बात यह है कि- लीला विशिष्ट श्रीकृष्ण श्रीरामा सम्बलित ही हमारे उपासनीय हैं। लीला विरहित धीराधा-कृष्ण हमारी पारणा व भजन के मतीत हैं। आपत्ति यह हो सकती है कि- गोपियों में जो दुर्यशः, मनोदुःख, व श्वस्र ननदादि का निवारण यातनादि हैं, वे रुक्मिणी आदि मे नहीं हैं। सुतरां आपात दृष्टि से यह बोध हो सकता है कि रुक्मिणी आदि की अपेक्षा सम्भवतः गोपियो का अपकर्ष है। किन्तु रागात्मिका महाभाव-वती गोपियों में ये सय दुख दीखते हुये भी उन का जो सुख आतिशय्य है, वह दूसरों की अपेक्षा अनेक अधिक है। अनुरागिणी महाभाववती श्रीग्रज-सुन्दरीयों का' श्रीकृष्ण के साथ जो सम्बन्ध हैं, वह अचिन्त्य अनुराग का ही फल है। इस सम्बन्ध स्थापन में उन सबों को स्वजन आदि का त्याग करना पड़ा, आर्यपथ से च्युत होना पड़ा। किन्तु इतने क्लेश, इतने दुख भी उन सबो के लिये सुखकर रूपसे बोध हुये। इसको डकर अनुराग के चरमोत्कर्ष का और दृष्टान्त कहां " महां भाववती गोपियों का अनन्य साधारण अलौकिक अनुराग हो श्रीजीव गोस्वामी का अभिप्रेत है। इस विषय मे कोई सन्देह नही है। यदि श्रीकृष्ण के साथ बनबालाओं का सम्बन्ध, गुरु- विप्र- मरिन साक्षी के माध्यम से विवाह रूप से होता, तो श्रीचैतन्यदेव का [२५] 1 - - . उपदेश , श्रीवेदव्यास जी को श्रीभागवत्, तथा श्रोरूपगोस्वामी के उज्ज्वल मीलमणि आदि ग्रन्थो की आवश्यकता ही नहीं रहती। सुतरा उमय मत का समाधान इस प्रकार है- प्रयम मत की उत्यिति इसलिए हुई हैकि-"स्वय भगवान् शक्तिमान हैं और सब उन की शक्ति हैं, इस तत्व को भूलकर अविन्त्य अप्राकृत औपपत्य के सरस अनन्तनिगूढ भाव को जो समझने में असमर्थ हैं उन लोगो के लिये और कोई उपचार न देखकर एव धर्म के नाम पर उन लोगो को जघन्य नरक 'प्राप्त न हो श्री जीव गोस्वामिपाद ने तात्त्विकाश को ही सम्सुख रखा। द्वियीय प्रक्ष मे लीलाश का ही विस्तार है । श्रीवनदेव विद्याभूषण के मत मे उक्तविषय इस प्रकार है। श्रीराधाकृष्ण की उपपति भावमयी लीला- परमेश्वरतत्व निवन्धन है । क्यो कि उन का कोई नियामक नहीं है, जिसके माय से वे दाम्पत्य मे अवस्थान किरेंगे मनुष्य की भाति उनकी लीला कर्म-परतन्त्र नहीं है । सब शास्त्र -उनको कर्म परतन्त्र से मुक्त वर्णन करते हैं । जन-मनोरञ्जन के लिये मी -यह लोला नहीं है। क्योकि उन का दिव्य सौंदर्य ही जन मनोनिवेश का । करणाहै 1 उत्कण्ठा पोषण के लिये भी यह लीला नही है । क्योकि उन की उत्कण्ठा नित्य नव नवायमान मावो से पुष्ट हैं । इन सब कारणो से एव परमेश्वरत्व निवन्वन शक्ति व शक्तिमान् श्री राधाकृष्ण के निर्गौणंदाम्पत्य उपपतिभा का सुधीगण को अति सावधानता से विचार करना है। आत्माराम, सर्वेश्वर शृङ्गारोत्कर्ष रसिक, एव सत्य सकल्प श्रीहरि को अनादि काल से ही परोढा उपपतिभाव मे आविर्भूत उनको ही आत्यधूताश्वरूप शक्ति, तदन्यास्पृष्ट, स्वकान्तिसमा गोपोगणो को साथ लेकर लीला विनोद करती है । उससे श्रीकृष्ण के आत्मारामत्व की हानि नही होती। सम्प्रदाय सम्प्रदाय शब्द का अर्थ गुरुपरम्परागत सदुपदेश है । भरत के मत में 'शिष्य' परम्परावर्तीणोपदेश, सम्प्रदाय । अमर के मतमे 'आम्नय.' सम्प्रदाय है। आदि गुरु ब्रह्मा से गुरु परम्परा प्रात है। ब्रह्मविद्या नाम्नी श्रुति हो आम्नाय है । यह माम्नाय वाक्य व शिष्य परम्परावतीणं उपदेश एकमात्र सत सम्प्र दाय से सुलभ है। माण्डुक्य उपनिषद (३१. २०१३)आदि मे गुरुपरम्परा. गतउपदेश व सद सम्प्रदाय स्वीकार को प्रयोजनीयता वर्णित है। उदय गोता + ! २६ ] मे (११-१४+३.८) श्रीभागवत सम्प्रदाय प्रवर्तक रूप में श्रीब्रह्माजी को ही सूचत किया गया है अतएव ब्रह्म सम्प्रदाय प्राचीन व वैदिक है। वैदिक सम्प्रदाय वह है जो वेद व वेदमूलक पुराणादि शास्त्रो का मनोरुपेयत्व स्वीकार करती है । एव उन २ शास्त्र वाक्यों में अचल विश्वास करती है। अलोकिक तत्व के स्वरूप निर्णय व उपासना विषय मे एकमात्र उक्त शास्त्र ही मुख्य प्रमाण हैं, यह मानती है । जो प्रत्यक्षादि प्रमाण निचय का अत्यन्त अविषय है, वह परतत्व ही जिसका आराध्य है । फर्म, ज्ञान, भक्ति, वैदिक तत्वत्रय मे अथवा उनके अन्यतमा में जो एकान्त परिनिष्ठित है, वैदिक आचार्य के चरणाश्रय को ही जो तत्वज्ञान प्राप्त करने का उपाय जानते हैं वे ही वैदिक सम्प्रदाय हैं । वैदिक सम्प्रदाय विशेष ही-श्री- चैतन्य सम्प्रदाय है । इसमे श्रीमध्व स्वीकृत प्रमेय समुदाय ही परिष्कृत हुए हैं । स्वय भगवान् श्री राधा सम्बलित श्रीगोविन्ददेव ही इसके आराध्य हैं। उनके ही अविर्भाव विशेष गौरागदेव ही इसके स्व - सम्प्रदाय सहस्राधिदेव हैं, अनादि वेदकल्पतरु से जिनका आविर्भाव हैं । श्रीशुक नारदादि परमहंस- गण इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक हैं । ब्रह्मा, शिष, ध्र व, प्रह्लादादि इसके पथप्र-दशक हैं एव श्रीरूप-सनातन गोस्वामीगण ही इस सम्प्रदाय के माचार्य हैं। इसलिये सागर मे नदी को गति को भाति इस सन्प्रदाय मे ही पाञ्च- राध व श्रीमद्भागवत् की गति है । इस सम्प्रदाय ने श्रीमद् भागवत व पाश्चरात्र मत कोही अवलम्बन करके अपने भक्ति सिद्धान्तो का स्थापन किया है । इसमे पाञ्चरात्र व भागवत- इन दोनो मतो की सामञ्जस्य रक्षा करते हुए अपूर्व सिद्धान्त स्थापना ईहु है । इम मत मे श्रीमद्भागवत एव तदनुगत शास्त्र ही एकत्र साहित्य, दर्शन, इतिहास एवं पारमहस सहिता हैं । इसमे ज्ञान, विराग-भक्ति सहित नैष्कर्म्य आविष्कृत हुआ है। यह एकमात्र रसिक व भावुक जन के ही सवे- दन व समास्वादनीय है। निविशेप ब्रह्म मे साहित्य का स्थान नहीं है । कारण वहाँ ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय रूप त्रिपुटी का लय हो जाता है एकक वासुदेव तत्व में विषय तत्व रहने पर भी आश्रय तत्व नायिके के अभाव से साहित्य की सकोणता T n । । । [ २७ ] । है । लक्ष्मीनारायण मे किञ्चित साहित्य प्राप्त होने पर भी ऐश्वयं प्रधान होने के कारण साहित्य की सम्यक् स्फूर्ति नहीं होती। श्रीसीताराम में तद- पेक्षा साहित्य विकसित होने पर भी मर्यादा पुरुषोतम के लोलाविलास में साहित्य किंचित् :संकुचित ही होता है। द्वारकाधीश एवं मथुराधोश में ऐश्वर्य की प्रबलता के कारण साहित्य पूर्णतम रूप से विकसित हो नही पाया, सौन्दर्य माधुपं निधान श्रीवृन्दावन मे ही लीला पुरुषोत्तम के सहचर्य में साहित्य की परम पराकाष्ठ विकसित होती है। क्योकि यहां पर ही श्री- अजेन्द्रनन्दन की क्रीडा-माधुरी, वेणुमाधुरो, विग्रह माधुरी व प्रेम माधुरी आदि सम्यक् प्रकाशित है। यहा के समस्त वस्तु समूह की सत्साहित्य का आकार है। सुतरा साहित्य की प्रगति भो निर्वाध व असमोल है । अतएव इस वृन्दावनीय काव्य रचना में ही चैतन्यमतोय साहित्य आत्मविनियोग करके महामहनीय हुआ है निविशेष ब्रह्म प्रतिपादक शास्त्रो से लेकर मथुरा- धीश के लोला प्रचारक ग्रन्थों पर्यन्त सब शास्त्र ही प्रकृति भूमा वस्तु के एक देशमात्र प्रतिपादक हैं। अभिल, रसामृत मूर्ति श्रीव्रजेन्द्रकन्दन हो इस सब साहित्य के नायक एवं महाभाग स्वरूपिणी श्रीवृपभानुनन्दिनी ही :नायिका हैं । अद्व ज्ञानतत्व रसराज सच्चिदानन्दघन स्वय भगवान-ही- श्रुति के-'एकमेवाद्वितीयं' 'रसो वै स' 'मधुब्रह्म' एवं 'आनन्दं ब्रह्म आदि वाक्यावलि के चरम पराकाष्ठा प्राप्त त सर्य हैं। श्रीभगवान के नाम, रूप, गुण, लोला, धाम, परिकर आदि कर्म जड़ निविषय ज्ञान वाद में गौण व अनित्य हैं, किन्तु वेद में सुस्पष्ट रूप से उन सब तत्वो का नित्यत्व प्रतिपादित हुआ है । फलतः अचिन्त्य भेदाभेद वाद भी वेद की परम मुख्या वृत्ति से ही समर्पित हुआ है। इस मत में नाम ही सर्वश्रेष्ठ साधन है। एव- प्रणवात्मक वर्णसमूह को नित्यता भी स्थापित है। प्रणव ही महावाक्य हैं, नाम व मन्त्र है । अभेद बुद्धि से शब्द ब्रह्म की नित्य माराधना ही इस मत की विशेषता है। 'नामात्मक शब्द में ही रूप, गुण, क्रिया व स्व-रूपादि अन्तर्मुक्त हैं। जिसके द्वारा ग्रह्मोतर विषय में आसक्तिनाश होता है। जिससे पापबीज, अविद्या, उन्मूलित होते हैं एवं जिससे नि.संशय रूप से ब्रह्म सामीप्य लाभ होता है । वह ही उपनिषद शब्द का अर्थ है। रूढ़ि, योग, , [ २८ ] योग रूढ़ि, महायोग, व विद्वद् दि इस पञ्चविद्य'मुस्य शब्द वृत्ति के बल से उस उपनिषद् शब्द के द्वारा ही-उपगम्य, उपगन्ता व उपंगमन-यह तीन प्रकार की वस्तु वश्यिा निदिष्ट होकर जीव ब्रह्म का नित्य अवस्थान व नित्य सम्बन्ध मूचित होता है । उपगन्ता जी की पगम्य भगवान के सभीप में उपगमन क्रिया भी, एक मात्र मंत. साहित्य अनुशीलन द्वारा हो साधित होती है। इस मंत में सर्वन आम्नायं वाक्ये ही प्रमाण रूप से गृहीत , 5. चिन्मय ब्रह्म के स्वामाविक आनन्द को अभिव्यक्ति होने से चमत्कार रस होता है । इसका अपरनाम, आनन्दातिरेक आस्वादन हैं। इस रस को आदध-विकार अहंकार है । उससे अभिमान होता है । रस के बाद रति का उद्रेक होता है। यह रति व्यभिचारी व अनुभाव आदि के द्वारा परि- पुष्टता प्राप्त होने से शृङ्गार रस को अभिव्यक्ति होती है । राग व रति से शृङ्गार, संक्षण्य से रौद्र, अवष्टम्भ से वीर, एवं संकोच से वीभत्स रस का उद्भव होता है, और शङ्गार से करुण, वीर से अद्भूव व वीभत्स से भयानक रस की सृष्टि होती है। रसास्वस्थ भाव का नाम ही स्थायीभाव है । यह मुख्य रूप से पांच, और गौण से सात प्रकार का है। संचारी तेतीस, व सात्विक :आठ प्रकार के हैं। यह भाव-विभाव, अनुभाव सात्विक, व्यभिचारी से मिलकर रस में परिणित होता है। इस रस का साक्षात्कार निम्नलिखित क्रम से होता है। पहले श्रवण कीतनादि भजन के पुनः पुनः अभ्यास से आनन्दरूपा रति का आविर्भाव होता है । इस के वाद विभाव आदि के साथं चित्त को संयोग होने से कृष्ण रति रस रूप में परिणत होती है। पश्चेति विभावादि के साहचर्य से रस साक्षात्कार का आस्वादन होता है । भक्ति रसास्वादन का सौभाग्य सव'का नहीहोता, 'रस ब्रह्मवत वाणी व मन के भगोचर होने पर भी जिसकी प्राक्तनी आधुनिकी सद्भक्ति वासना है, उस भाग्यवान् द्रष्टा, श्रोता अभिनेता के हृदय में इस भक्ति-रसका आस्वादन होता है। प्रस्तुत ग्रन्थ में नायक चूडामणि श्रीकृष्ण ही विषयालम्बन हैं। श्री . कृष्ण को छोड़कर और किसी मे इस सर्वोत्तम उज्वल रस के पूर्ण नायक होने की सम्भावना नहीं है । यह नायक प्रथमतः चार प्रकार है- धीरोदात्त, धीरललित, धीरोद्धत, व धीरशान्त, यह सब पूर्णतम, पूर्णतर, पूर्ण, भेद से द्वादश प्रकार के हैं। पुन: यह सब नायक पति व उपपति भेद से २४ प्रकार होते हैं। अनुकूल, दक्षिण, शठ, धृष्ट भेद से यह सब ९६ प्रकार हैं। . इन ६६ प्रकार के नायक गुण-श्रीकृष्ण की लीला में ही विराजमान हैं। रस के आलम्बन विभाव मे नायिका भेद भी इसी प्रकार हैं । पहले तो नायिका के दो भेद हैं- स्वकीया, व परकीया, । कात्यायनी-व्रतपरा- गोपकन्याओं के साथ श्रीकृष्ण विवाह, गान्धर्व रीति से होने के कारण वे सब स्वीकया है । इसके अतिरिक्त धन्यादि गोप-कन्यागण पितृ पालिता होने पर भी श्रीहरिवल्लभा ही हैं । परोढ़ा गोपीगण तीन प्रकार की हैं । साधनपरा, देवी, व नित्यप्रिया साधनपरा के दो प्रकार है- योथिको व आयोथिकी, यौथिकीगण-मुनिचरी व श्रुतिचरी रूप से द्विविध हैं, नित्य प्रियागण श्रीराधा, चन्द्रावली प्रभृति हैं- इस रेखा-चित्र से गोपीगण के विषय मे सहज में समझा जा सकता है। गोपीगण m.np स्वकीया परकीया .... साधनपरा देवी नित्यप्रिया मुख्या यौथिको अयौथिकी राधा चन्द्रावली मुनिचरी श्रुतिचरी प्राचीना नवीना ] ३०J चन्द्रावली से भी श्रीराधा की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित हुई हैं । कारण धी- राधा सर्वशक्ति वरीयसी व ह्लादिनी सार भावरूपा है एवं सुष्ठ. कान्त स्व- रूपा घृतपोड़श शृङ्गारा व द्वादशभरणाश्रिता व. मधुरा, नववया आदि प्रधान पचीस गुणयुक्ता हैं। प्राकृत परोढा भाव का हेयत्व है, किन्तु अप्राकृत कृष्ण सेवामयी गोपीगण का परोढा भाव श्रेष्ट है। द्विभुज मुरलीधारी ब्रजेन्द्रनन्दन को छोडकर अन्यत्र गोपियों का प्रेम सकुचित होता है । स्वीया, परकीया साधारणी भेद से तीन प्रकार की नायिकाएं रसशास्त्र में वर्णित होने पर भी साधारणी नायिका का बहुनायक निष्ठत्व होने के कारण रसामास प्रसङ्ग होता है । कुब्जा साधारणी होने पर भी अन्यनायक से प्रीतिसंचा- रित नहीं हुई थी । इसलिये वह भी परकीया मानी गई है। स्वीया व परकीया नायिकागण मुग्धा मध्या, प्रगल्भा भेद से विविध हैं। मध्या व प्रगल्भा प्रत्येक ही धीरा अघीरा, धीरा २ इन तीन प्रभेदों से यक्त हैं । मुग्धा का कोई भेद नहीं है। स्वीया परकीया भेद से नायिका कुल चौदह प्रकार की हैं एवं कन्या १ प्रकार को है यह जोडकर नायिका भेद१५ प्रकार का है। यह१५ प्रकार की नायिका अवस्था भेद से प्रत्येक ही ८ प्रकार की होती हैं-अभिसोरिका वास- कपज्जा, उत्कण्ठिता, रवण्डिता, विप्रलन्धा, कलहान्तरिता, प्रेपितभढे का, व स्वाधीनभढे का। सुतरा नायिकागण को सख्या १२० प्रकार को है । यह सब ब्रजेन्द्र- नन्दन में प्रेम के तारतम्य से उत्तमा, मध्यमा, कनिष्ठा भेद रो ३६० प्रकार की होती हैं । एकमात्र श्रीराधा मे ही इन ३६० प्रकार की नायकामो गुणों का सन्निवेश संभव है। प्रायिकी व कदाचित्की लोला के समावेश से एक नाटक ग्रन्थ रचना करने की इच्छा ग्रन्थकार श्रीरूप गोस्वामीपाद की थी। किन्तु श्रीसत्यभामा व श्रीमन् महाप्रभु के आदेश से उन्होंने विदग्धमाधच व ललित माधव नामक दो नाटको की पृथक पृयक रचना की है। प्रायिकी लीला मे ब्रज परिकर व पुरपरिकर अलग अलग है। परि- करगण भिन्न होने से जब श्रीकृष्ण ब्रज से पुर को जाते हैं तब ब्रजवासियों को जो विरह उत्पन्न होता है, उस विरह का अवसान होने से रस की [ ३१ ] - पुष्टो भो नही होतो। इसलिये ही भागवतगण मिद्धान्त करते है कि- भप्रकट प्रकाश मे श्रीकृष्ण वृन्दावन को न छोडकर सदा ही अज मे कीडा करते हैं, एवं प्रकट प्रकाश में श्रीवृन्दावन को छोडकर पुर-गमन एव पुर से ग्रज में प्रत्यागमम करते है। श्रीकृष्ण के बज से पुरगमन करने से व्रज मे तीन मास व्यापी विरह रहा था । उस विरह-जनित क्लान्ति के उद्रेक मे जब ब्रजवासियो का चित्त अत्यन्त अधीर हो उठा तब श्रीकृष्ण उद्धव आदि से अपना समाचार भेजने के साथ स्वय अज मे चले आये । उनका इस प्रकार आविर्भाव होने से प्रज- -यासीगण ने पुरगमन वृत्तात को स्वप्नवत् अनुभव किया। इसके बाद श्री- कृष्ण ने अज मे आकर दो मास प्रकट विहार पर रित्यलीला मे अवस्थान किया । उस समय अर्थात् जिस समय श्रीवृ दावन लीला अप्रकट होती है, पुरलीला प्रकट रहती है। किन्तु श्रीमद्भागवत में इस विषय का वर्णन सुस्पष्ट रूप से न होने के कारण प्रजोपासको को निरतिशय कष्ट होता है। उक्त कप्ट के निवारण के लिये ही रूपगोस्वामी जी कादिचिव की लीला का अवलम्बन कर एक नाटक की रचना कर रहे थे। फादाचित्की-लीला में ब्रजपरिषर व पुरपरिकर अभिन्न ही हैं। अतएव उक्त लीला में श्रीकृष्ण के व्रज से पुर में आने पर भी ग्रजवासीगण श्रीकृष्ण को पुर मे प्राप्त पर विरह संताप से मुक्त हो जाते । इस रीति से रस पी पुष्टि भी पूर्ण रूप स होती कि तु सत्यभामा देवी ने अज- सील को ग्रज मे एव पुरलीला को पुर मे ही परिसमाप्ति करो का आदेश किया। प्रायिकी लीला के अनुसरण को छोडकर प्रजलीला की वज़ में समाप्ति नही होती। इसलिए प्रायिकी लीला के अनुसार ही ब्रज लीलामय विदग्ध- मापद" नाटय व पादाचिस्पी लीला के अनुसार पुर लीला-मय ललित. मापेव" नाटय की रचना उन्हें परनी पंडी। मौर भी एक कारण यह है कि प्रेमाविशय्य-निवन्धन राजधाम में श्रीकृष्ण पूर्णतम और मयुरा म यासुदेव पूर्णतर एव द्वारका मे पूर्ण हैं । यदि विरहापनोदन के लिए नित्य वृन्दावन में श्रीकृष्ण का अवस्थान ही स्वो- पाय हो, उसमे मो सोला-शक्ति को अचिन्त्य शक्ति से विरह की सम्भावना 1 [ ३२ ] 7 होती है। किन्तु यदि यह कहा जाय कि श्रीव्रजेन्द्रनन्दन ही कार्य विशेष के लिये व लीला विशेप साधन के लिये मथुरादि स्थानो मे गये थे तो इससे भी हानि क्या है इस सम्बन्ध में नैष्ठिक भक्तगणो का विचिन सिद्धान्त यह है कि श्रोवृन्दावन मे ही प्रेम-मार्यमय श्रीभगवान का स्वय रूप नित्य विद्यमान हैं । अन्यत्र यह आकार, यह वेश, यह भाव अतीव आस्वाभाविक है । एक स्थान की वस्तु, दूसरे स्थान में रखकर चिन्तनरत होने से भाव-विरोध भी अनिवार्य होता है । इस उक्ति से ही नाटक वर्णन की घटना परिवर्तित हुई। ग्रन्थस्थ श्लोक समूह अपूर्व भाव-माधुर्य विमण्डित हैं, जिसका "तुण्डे ताण्डविनी" आदि श्लोको के आस्वादन से सपरिकर श्रीमन्महाप्रभु का जो आनन्दोच्छ वास हुआ, व परिकर वर्ग की इस अन्य को आस्वादन कराने की जो तीव्र वासना हुई एव यह कैसे फलवती हुई यह सब विशद विवरण "श्रीचैतन्यचरितामृत"अन्त्य खण्ड के प्रथम परिच्छेद मे वर्णित हैं । अन्त मे, मैं हकोमजी को आशीर्वाद देते हुए उनसे यह आशा करता हूँ कि वे श्री रूपगोस्वमीपाद की द्वितीय रचना "ललित-माधव" नाटक का भी हिन्दी अनुवाद कर शीघ्र प्रकाशित करेंगे। जिससे हिन्दी रसिक समाज श्रीकृष्ण की लीलाद्वय का परिपूर्ण आस्वादन कर सकें। धीरूगगोस्वामी तिरोभान तिथि ११.८-७३ धीगौरगदाघर, मन्दिर श्रीहरिदास शास्त्री कालियदह, वृन्दावन [ ३३ ]
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श्रीविदग्धमाधवीयश्लोकानुक्रमणिका oeagums- - पृष्ठ श्लोक २५३-६ .... . ... ... .... .... .... .... पृष्ठ श्लोक अकरुण मुक्किा चङ्ग २१५४ अयि सुधाकरमण्डलि अकलितपातस्तरणे २४१ ५ अरति मम निशि पश्य १६१-३० अकारुण्यः कृष्णो यः ५४४७ | अवि गरुडस्स सिाम- ११६३२ अक्षणोद्धन्द्व प्रसरति ६५ ४ | अविरलवनमाला १६६३६ अग्रे वीक्ष्य शिखण्ड ५७ १५ अष्टाभि: श्रुतिपुटक २६२८ अङ्गात्परित्यज पुरः २५६ १४ | असूया चण्डाली हृदि ३३३ ५२ अङ्गरागेण गौरागी ३४७ ५६ | असो दृग्भङ्गीभिः कु ८६४६ अङ्गोत्तीर्णविलेपनं ७८ ४२ | अस्मिन्ने कसरोजसव ७३ २६ अजडः कम्पसंपादी ४२ ३५ | अस्मिन्मदोयकर २२५.४३ अजनितशासन १५१ २ अहह कमलगन्धे .२३.२७ अजनि विमुखः शङ्के १६) १२ | अहीनो 5 गुच्छः १२४४२ अनायान्तं चलमपि २५८ १८ | अहो धन्या गोप्य. ११३.२८ अनपितचरी चिराव २ २ | आकृष्टानि कटाक्ष ८०५० अनुपरमति यामे ३२६ ५० | आडम्बरोज्ज्वलगति २६७ २१ अन्तः कन्दलितादर ३४६ ६२ | आलोना प्रतिहाररो १०११० अन्त.क्लेशकलङ्किता ७३ ३७ / आसङ्ग कुमुदाकरेपु. १५६२६ अपा,पत्युः पुष्टीकर १३६ ५३ | आहर गौरोतीर्थे म. ....२८८ अप्रेक्ष्य क्लममात्मनो. इय सखि सुदुःसाध्या" ५२ ८ अब्भलिहम्म डहणे १०४१४ | इयमतितृपितं वरा- २५७१५ अमिव्यक्ता मतः प्रकृति ८६ | उत्तीपरर्णा मभया ३४८६० अभि पिसि सुमहुरं २१२ २६ | उत्फुल्लमूर्तेः सम २८६ -६ अमितविभवा यस्य १०५ १७ उदासतां नाम रसा .... भयं नयनदण्डित १६ १७ / उदिते हरिवन्दी २६ २६ अयमत्र निसर्गशीतलः १२३ ४१ | उदोणरागण कर- अयमुमशिराः कदम्ब-"३०३ १६ उद्धरमरन्दमत्ता २३०५२ अयं पुरः स्मेरमुखार- २६८ ६ | उन्मदेन पुरतः शि- .... ४ ... .... .... .... .... .... ....
पृष्ठ शोक पृष्ठ लोक ne .... १९८८ ३२३ ४३ 4.. .... ... १६१२६. .... .... ... .... ६१२१ .... .... ३३४० .... .... ... ११८३४ .... .... उल्लराति फुल्लगामी ३११२७ , कृमिरपि नमितात्मा ए प्रयाति परिचर्य. १५४ २० । कृष्णाङ्गसंगममिल एकरय श्रुतीय ५३ ६ केनापि धूर्तपतिना एक धीमदि सेम्चे ३०८ २२ | केसरनिकुअकुहरे एप स्थर्यभुजगराध ४३ ३७ कमाकक्षामक्षणोः २७२ २४ एपा नान्तिकयतिनी कराणामलिनां कुल फला गुक्ता मुस्तायलि २०१४ मोशन्न्यां करपल्ल पालोरा यो पण २८१ ३५ पलान्तेन ते वदन फरम्पाली जुम्भापर "" २८३ १ क्वचिभृङ्गीत गोतं जानकादिमिरापोरा ६४१६१ क्व तपस्तगा ममा आरटीस लतापुटी १६०२७ अणमपि न सुहृद्धि १६२ १४ मारवाणि हन्त दिव्यं ३०७ २० क्षोणी पड्लियन्ति गरेणातरतुष्ट पा स... २०११६ गतानां राधामा: स्तन फर्णमिदं स्तरिह १२३ ४० गरअं रमई जहिं जो २७६३३ मार्गारो म एता प्रियो १८७ ६ गर्वोदग्राः फलमवि १६३ १६ मन्दिोलितमुग्ण ३१८ ३३ | गृहान्तः पेलन्त्यो नि... ८३ ४६ ব্যায়াম। ... ३२८ १२ गोकुलरामाप्रेयसि मोहसितरापरू २२५ ४४] गोपेम्बरस्य तनयो करारमणमण्डले ७२३५ / गोभ्यः पे किमपि करिशेप दुरवन्ध २२१ ३६ / ग्लपपति वप१ौलो १०६२२ माम गदगुणमाला चक्र वशीकृतवतः ३१६३५ कि रामेष पुरन्त मिसि६ ३ पञ्चमीनविलोच- स्विरमपिताणा" HE ञ्चलसंझापा वि २२२३७ कि गन्दनेन गयो १२६४ चन्द्रमव मुसदिम्ब निराकरी गुपतिमान २०६२२ चन्द्रायतों मामतुरुष्य ३११ २८ किमि सुपमा पर ३१८३१] दाइतीक्दन मुह मत कर्पोत्सा | चन्द्रिका चन्द्रलेसा गोरीपरिह २३ समजतदं मिनिट १०. पनरतबङ्गदड़ता २३११ १२९ २१ चिडया रह २३४ ३४०५६ .... ... २१२० ... .. ... W - पसोभरिकको हारा सोमसिन पृष्ठ श्लोक पृष्ठ श्लोक ... + .... .... .... ... .... .... .... चिन्तासंततिरद्य देरविचलितबाल्या चेतस्ताम्यति में भयो.. ११६ ३५ दरोन्मीलन्नीलोत्प .. ५ छिन्नप्रियो मणिसरः है।३ | दिव्यों रथाङ्गि सेमयः २४० जंगति किल विचिो. १८३ ३] दूरीदनुपगतः जरत्यास्वं नाप्नो स तु २०४१५ | हमीनां किमुप ११२ जलई सही मह राहा २१६२८ दृष्टं विम्बितधातु १३८ जोतस्तम्भतयों पयासि २५ २५ | देहं ते मुंबनान्तराल जिंतचन्द्रपरांगचन्द्रि. २३ २३ | देवतसेवा केवलमिह अणिऑरकुसुमें २२दोषोग्दौरं त्वमपिं कुरु १२० अपंउमिणीसहस्से ३४१.१३ | धन्यास्ता हरिणीदृशः १८७ नवं स्तवंकल्लरी २४६ ३ | धम्मिल्लोपरि नील १२६२३ तैवानुकारात्सुवलं २१५२७ | धरि पंडिच्छन्द ७०३ तस्य पोडशंकलस्यं १४६ ११ | धौरा वांप्पमयी न याति २१७ ३३ तस्याः कान्तिा तिनि ६७ ३१ धावत्याः श्रुतिशप्कुलो- १२२ ३९ तस्याः सखे मुर्खतुसार ६७३० धूलिधूसेरितचन्द्रका ..." १७३४६ तस्योरस्तटमण्डल. २४५ / घृतपमोत्सवसति १००१२ १६० २२| घ्यावी धर्म धृति 10 तिमिरमसिभिः सेंवीं .... १५७२] ध्येयेने मुंक्तवृन्दस्य ३२५ ४६ तुङ्गस्तीम्रोरुङ्ग २४८६|न काचिग्दोपीनां भवति १७५'४६ तुज्झ राहिआए ज्जेन्ब ९६ ६ | न जानीपे मूश्च्युत सुण्डे ताण्डविनि १७ १५ नन्दसिन्धुरवाणेन्दु ३५०"३ तुह संगमेण पूर्ण २४६ ५ न मुग्धे वैदग्धोगरि अपैया नितरां परा ६४ २ नम्रीकृत्य शिरो मुहु १११ २२ त्रपाभिचरणक्रमे २५४ ११ नवमनसिजलोला २५७१६ त्वद्वामिरगीत ". १०८ १८ । नवरसधारिणी मधुरे १६२३१ त्वन्मुखलक्ष्मोग्लपिता २२६४६ नवोनाग्रे नप्त्रों चटुल १७८५० त्वमुन्न राधास्त ११४ ३० न संतापे स्वान्ता त्वया नीतो वोमः ६२२२ नादः कदम्ब विटमा १२०३६ | नालोंकिनी निशि दधाना मध्याह्नज्वल "२२०२४ । निकुञ्ज सारेबंत १६८३७ .... . .... ताम्बूलें धनसारस .... ६६ २७ .... .... ५५११ .... .... .... .... १४०४ ... .... ४१३१ .... ... स्वयाहूतः पाव १०३१६ ...
४ पृष्ठ श्लोक THI ... H सोत ते पुनरुक्तता in ...३०९२५ . .IN ""१५२१७ पृष्ठ श्लोक द्वायमेऽपि साख १५३४ बलादक्षणोलक्ष्मीः कवल ३७३३ गोंदानां निखिल १०५३ | बलानुज कलापिना ""२६८२३ निष्ठुरा भव मृट्टी १०२१७३१ बल्लवोनवलनासु ३१५४८ बाई तत्वमविज्ञाय ३३८५४ नैरन्यमुषेयतुः ... ३१२४१ / वाले गोकुलयोचत :१६६३५ नैसर्गिकाम्यपि नि ॥ २४६३० | भक्तानामुदगादनर्गत ... स्यविशति नयनान्ते १४८ १३ भजन्त्याः सनोडं क- ५६१६ २५२६ मसरस्स ताव पविन्यास्ते सुमुखि "" १३५५५ भवदङ्गसङ्गविषये परतणुपवेसविज्जा १२0१0 भविता सविषेत्र परामृष्टांगुवनय १३ १ भूयो भूमः कलिवि १६२१४ বলিবর্মীগ "" २२६५० मद्भवस्तीको प्रति ६६२९ परीत शृगेण स्फुट "- २६० १६ भ्रमरेऽपि गुजति पिबन्तीनां वंशीरप "" २४८ ७ भेदः स्मितसंवृतो " ३२१ ३६ पोडाभिनवकालकट ६०१७ मधुपः कमलेन साई """ २२५ ४२ ६२.५६ / मधुराक्षि मुधाष २२६४५ ধীরনিম্নবিত্ত २३०५३ ) मनोहारी कोऽपि प्रति २५५ २४. पुरः फलायामाशा १५३ १८ मनोहारी हारबलित ३२३ ४२ प्रणयिषु मिनितेषु १०१०१११ मम राधा निसर्गस्थं ६६२८ प्रत्याहत्य मुनिः क्षण'" ५११७ मम वाहरेहि वृन्दे प्रत्यूहेन पराहता तु "" १९१२४ मम संगमामृतरस प्रथयन्गुणवृन्दमाधुरी" ३४८६३ ममास्मिन्संदर्भ यपि ४४ प्रपनमधुनोदयः ६.७ में परिहाइ मुडन्दो प्रमदरसतरङ्गस्मेर- ६५ ५१ मया ते नियंन्यान्मुर १०४ १६ प्रसरति यद्भूक "" १५७ १५ मिन्ने विचित्रमा "" ३०१ १४ प्रसूनरगुतः कान्ता २८ १ | मुक्तानामुपलभ्य प्रातिकूत्यमिव यदि ३१२ ४० | मुक्तान्तनिमिषं मदी- १७० ४० प्रारधे पुरतः परीक्ष- ११७३३ मुदा लिप्त : पदौनरल २३६१ प्रियसखि परिरम्मा " २७६ ३२ | मुद्रा धेर्षमयों क्षणं फुलप्रसूनपदले ३४२५] सुधा मानोन्नाहा- AN पीतं न वागमृतमान AR - 10 ३०६२३ ७.४३ 11 00१८०५१ 04 .
[५] पृष्ठ श्लोक पृष्ठ श्लोक .... ... .... .... .... १७४४७ ... २५८१७ ..." १६३ ३३ ... .... मुघा शङ्कामधे १३० ४६ / लोकोतरा गुणत्री: मृदुरपि निसर्गत १९२ १३ / वदनदीप्तीविधूत ११२२६ मेध्योऽपि माधविक १६० ११ वनासक्तं चेतः प्रणः यतिः प्रेमोदात्तः सुच-... ६०१६ | वन्यान्तर्गुरुचापलं १७१४२ यन प्रकृत्या रतिरुत्त ६८ ३२./ वशीकृतात्मास्मि वंशी ३८५५७ यथार्थेयं वाणी तव १४५ १०, वशीचक्रे कृष्णस्तव यदगलितमरन्दं वर्त "-२७५२८ वहन्ती कापायाम्बर-... २११२ यदर्थ संकीर्णे पतसि ८५४८: वहन्ती मञ्जिष्ठारुणित... ३२५ ४६ यदवधि तदकस्मादे ६३ २४ | काम्याद्भवेन्न विर- यमुनातीरकदम्बाः १८६ || वारिसहाणइ लच्छी २०३२१ यष्टि वष्टि न पाणिना . १८४ ५ वासन्तीभिरयंन में २२७ ४७ यस्मिन्ने त्रसरोरुहाग-... १७३ ४५: विक्रीडन्तु पटीरपर्व यस्योत्सङ्गसुखाशया ७८४१ | विघूर्णन्त: पौष्पं नम." २७५ २६ यस्योपलभ्य गन्धं ३०४ १६ विनोदन्ती राहा' ३१०२५ या निर्माति निकेतकर्म १६६ ३५ वितन्वानस्तन्वा मरकत-४६३ ये दण्डपाशभाज: २२१ ३५ | विदूरादालोक्य ११३ २६ रचय बकुलपुप्प १५८ २४/ विदूरान्नघ्राणं मद- रागिणमपि सुकठोरं ७५ ३६ | विघन कंसारिः सखि... १२५ ४३ राधा पुरः स्फुरति, २०० १८ | विधिः पझे पादौ नवकद ३३६ ५५ राधामाधवयोमध्यां ३२२ ४१३ विधुरेति दिवा विरूप २०३२० राधाविलास वीताई। ३४६ ' १ | विध्वंसयति हि पुसां ३४६५८ रुचिरसहचरीणां २६७ ५२ | विपिनान्तरे मिलन्ती" १४४ र रुद्धः क्वापि सखीहिता १५८ २५॥ विरतोमिरियं सुनीरजा २२५४० रुन्धनम्त्रुभृतश्चम २६ २७| विद्धि. कर्णान्ते तव २५४ १० रे ध्वान्तमण्डल सखे २७७३१६ विशालंर्गोशालबह २०१६ रोमाञ्चः परिचेष्यते ५५ १२। विसृमरा-परितो हरि रोलम्बीनिकुरम्य ३०७ २१. वृन्दावन दिव्यलतापरी रोहिण्यापरशोमया २१६२६ व्यक्ति गतामिरमितो ३२०३७ लब्धं मामवलोक्यात ... २६८ १० व्यक्ति गते मम रहस्य २०६ २३ ललिताजनि दुर्ललिता १७२४३ | शङ्ख विरात्किमपि .... .... .... १५७ २३ .... .... .... .... .... 15 . २४२४ .... .... .."
पृष्ठ श्लोक पृष्ठ श्लोक ... .... बलानुज कलापिना .... .. .... .... .... .... .... .... .... .... भ्रमभ्रूवल्लीको प्रति .... ... .... .... निद्रागमेऽपि सखि १६५ ३४ बलादक्ष्णोर्लक्ष्मीः कवल ३७ ३२ निर्घोतानां निखिल २६८२३ निष्ठुरा भव मृद्वी २१७ ३१ । बल्लवीनवलतासु १४१४ नीतं ते पुनरुक्तता ३१५४८ बाट तत्त्वमविज्ञाय ३३८५४ नैरश्चन्यमुपेयतुः ३२२४१ वाले गोकुलयोवत १६६३६ नैसर्गिकाप्यपि नि २७६ ३० । भक्तानामुदगादनगल स्यविशति नयनान्ते १४८ १३ | भजन्त्याः सव्रीड कथ. ५६ १६ पउरदरगलन्दच्छी २५ २६ भमरस्स ताव ३०६२५ पग्रिन्यास्ते सुमुखि १३५ ५१ / भवदङ्गसङ्गविषये १०३.१४ परतणुपवेसविज्जा १६०१० भविता सविधेऽत्र २५६१३ परामृष्टांगुष्ठत्रय २३ १ भूयो भूयः कलिवि १८२ १४ परिणतवरबीज २२६५० ६६२६ परीतं शृगेण स्फुट २६० १६ | भ्रमरेऽपि गुलति १५२१७ पिबन्तीनां वंशीरष २४८ ७ भ्रू भेदः स्मितसंवृतो ३२१३६ पीडाभिनंवकालकूट ६०१८ मधुपः कमलेन साधं २२५४२ पीत न वागमृतमन्न २५६ . मधुराक्षि मुघाय २२६ ४५ पीतातिसूक्ष्मशिखरा २३०५३ | मनोहारी कोऽपि प्रति २११ २५ पुरः फलायामाशा १५३ १८ मनोहारी हारस्खलित ३.३ ४२ प्रणयिषु मिलितेपु मम राधा निसर्गस्थं ६६२८ प्रत्याहत्य मुनिःक्षणं... ५६ १७ मम वाहरेहि वृन्दे ३०६ २३ प्रत्यूहेन पराहता १११२४ मम संगमामृतरसं २३१५४ प्रथयन्गुणवृन्दमाधुरी... ३४८६२ ममास्मिन्संदर्भ यदपि.. प्रपन्नमधुरोदय म परिहरइ मुउन्दो ७९४३ प्रमदरसतरङ्गस्मेर- मया ते निबंन्धान्मुर १.४१६ प्रसरति यद्भूचापे १५०१५ | मित्र विचित्रमनुरा ३०११४ प्रसूनरगुतः कान्ता २८६ ५ मुक्तानामुपलभ्य प्रातिमूल्यमिव यद्विवृ"" ३१२४० मुक्तास्तनिमिपं मदी... १७०४० प्रारब्धे पुरतः परोक्ष- ११७ ३३ मुदा क्षिप्त : पर्वोत्तरल २३६ १ प्रियसख परिरम्मा २७६ ३२ | मुद्रा धर्यमयी क्षणं फुल्लप्रसूनपटले. ६४ २५ मुथा मानोन्नाहा- २१७३० .... .... .... .... .... ५.. ... .... •om .
[ ५ ] पृष्ठ श्लोक पृष्ठ श्लोक .... .... .... १७४४७ .... ... ... २५८ १७ ... ... .... .... .... .... मुधा शङ्कामधे १३० ४६ ] लोकोतरा गुणश्रीः १३ १३ मृदुरपि निसर्गत १६२ १३ | वदनदीप्तीविधूत ११२२६ मेध्योऽपि माधविक १६० ११ बनासक्त चेतःप्रर्णः यतिः प्रेमोदात्तः सुच- ६० १६ | बन्यान्तगुरुचापलं १७१४२ यत्त प्रकृत्या रतिरत्त ६८ ३२ वशीकृतात्मास्मि वंशो ३८५ ५७ यथार्थेयं वाणी तव १४५ १० वशीचक्र कृष्णस्तव यदगलितमरन्दं वर्त २७५२८ | वहन्ती कापायाम्बरः..... २१११ यदथं सकीर्ण पतसि ८५४८.| वहन्ती मनिष्ठारुणित... ३५ ४६ यदवधि तदकस्मादे ६३ २४ | काम्याद्भवेन्न विर- यमुनातीरकदम्बाः १८६ ६ वारिसहाणइ लच्छी ... २०३२१ यष्टिं वष्टि न पाणिना १८४ ५ | वासन्तीमिरयन में १२७ ४७ यस्मिन्ने त्रसरोरुहाङ्ग- १७३ ४५ | विक्रीडन्तु पटीरपर्व यस्योत्सङ्गसुखाशया ७८४१ | विघूर्णन्त: पोप्पं न 'म" २७५ २६ यस्योपलभ्य गन्धं ३०४ १६ | विनोदन्ती राहा ३१०२५ या निर्माति निकेतकर्म १६६ ३५ | वितन्वानस्तन्वा मरकत '४६ ३ ये दण्डपाशभाजः २२१ ३५ ] विदूरादालोक्य । ११३२६ रचय बकुलपुष्प १५८ २४ | विदूराम्नप्राणं मद- रागिणमपि सुकठोर ७५ ३६ | विघने कसारिः सखि १२५ ४३ राधा पुरः स्फुरति, २००१८ | विधिः पद्मपादो नवकद ३३६ ५५ राधामाधवयोर्मेध्यां ३२२ ४१. विधुरेति रिवा विरूप २०३ २० राधाविलासं वीताई। ३४६ १ | विघ्वंसयति हि पुंसां .... ३४६ ५८ रुचिरसहचरीणा २६७ २२ विपिनान्तरे मिलन्ती... रुद्धः क्वापि सखीहिता १५८ २५५) विरतोमिरियं सुनीरजा २२५ ४० रुन्धनम्वुभृतनम २६ २७. | विद्भिः कर्णान्ते तव २५४ १० रेघ्वान्तमण्डल ससे २७७ ३१: विशालगोशालबहः रोमाचः परिचेप्यते २०१६ ५५ १२० विसृमरा परितो हरि ३२० ३६ रोलम्बोनिकुरम्य ३०७ २१. वृन्दावनं दिव्यलतापरी २४ २४ रोहिण्यापरशोभया २१६ २६ । व्यक्ति गतामिरभितो सब्ध मामवलोक्य त ३२०३७ २९८ १० व्यक्ति गते मम रहस्य २०६ २३ ललिताजनि दुर्ललिता १७२४३ राङ्क चिराकिमपि १३१४७ .... .... १५७ २३ .... .... .... .... .... ... .60 पृष्ठ श्लोक .... २५५ १२ ... .... २२३ ३६ .... .... पृष्ठ श्लोक शङ्खपङ्कजसंभवोऽपि ३१७ ३० सा मुखसुपमा निजित १५१ १६ ,शङ्क सकुलितान्तराद्य २७२ २५ सा सौरभोमिपरिदिग्ध ५४०१० शरदि मुखरिता ....२४० "४ सुगन्धो माकन्दप्रकर २४२३ शशी व्योमोत्संग ,": १३४ ५० सुधाना चान्द्रीणामपि शान्तश्रियः परमभागव ३५०.३|| सुन्दार विन्दुच्युतके १७५४८ शिशिरय दृशौ दृष्ट्वा ६२ २३, सूतिस्ते घनुपा - ....." श्रुत्वा निष्ठुरतां ममे-... ७७ ४०-सूराणुरहिआ: ३.६ १४ श्रेणीभूतवपुः श्रिया .... २०१८-से बन्ने तरूगेहिनः सखि कुण्डलीकृतशिखण्ड ३१६३४ -सोरकण्ठ मुरलोकला ३३०३० सखि जल्पितनारिकेल. १०२.१२ सोऽयं वसन्तसमयः ११० १० सखि निर्भरमनुरक्ताः २१२१ ३७ सौहरगपूपिणमाहे....'३९६८ सखि मुरलि विशाल "१४२ , ७ स्तोत्र यत्र तटस्थता। १५३४ सङ्गो मे मधुमङ्गलो ७३ ३६ स्निग्धंरेभिः सखिभिरखिले ७१ ३४ सद्यस्तप्तहिरण्यपिण्ड .".-१०७,१९,स्नेह. शोककृशानो १८१.१ सद्वशतस्तव-जनि.-", १९३,१७ स्पृशत्त योमेधानंघ ११५३१ सप्पो, सप्पइ भिग २२८४८:स्फुरति सरो दक्षिणतमा१४६७४ समजनि दवाद्विवस्ता--- २२७ ४६.स्मरक्रीडालुब्धः पशुपुर २६३३ समदमधुपलोल्यो ३०३ १५:स्मित बितनु माधवि ०२१६ ३४ समन्तात्मे कोतिर्मुख- १२१३८ स्मितरुचिविराजिनं ते २२४ ४१ समरोड रकामकामुक" ३२८५१ स्मेरा कपोलपाली ... ३३६ ५४ सभाव्यते फलमलम्भि-डा-१२ १२ सगिय मुरुगुणा ते : .. १७२४४ सर्वरवं प्रथमरसस्य, ८७२) स्वस्य प्रेममणीना। ...३०४ १७ सव्य गिरिः स्फुरति...३१२ २६ हरिणाभिलष्यमाणा १३०६ १६ सहचरि वृपभानुजया .... ३१० २६३ हरिणीविडम्बयसि F... २२३ ३६ शहरिति भवतीभिः २७५-२७ हरिणो समप्पिस तणु .११३३ ४६ सा कल्याणी कुल ५७ १४॥ हरिरेयन चेदवातरि .... २८८३ साचीकृताङ्गमिह -२६७. हित्वा दूरे पथि धव: १०० ह साध्वीना धुरि धार्या २६१ २० हृदि ताडितोऽपि दाडि- ११५५ सान्द्राः सुप्तकुमुदती"--१०० २० हृभृङ्गजङ्गमलता'. १५३ १६ or " - T * श्रीगोराङ्गविधुजयत श्रीश्रोलरूपगोस्वामि प्रभुपाद प्रणीतम् श्रीविदग्धमाधव-नाटकम् प्रथमोऽङ्कः सुधाना चान्द्रोणामपि मधुरिमोन्मावदमनी दघाना राधादिप्रणयघनसारै सुरभिताम् । समन्तात्सन्तापोद्गमविषमससारसरणि प्रणीता ते तृष्णा हरतु हरिलीला शिखरिणी ॥१॥१॥ अनुवादक-मंगलाचरण वन्देऽह श्रीगुरो धोयुतपदकमल श्रीगुरून घष्णवाश्च धीरूप सागजात सहगण रघुनाथान्वित त सजीवम् । सात सावधूत परिजनसहित कृष्णचंतन्यदेव श्रीराधाकृष्णपादान सहगण ललिता थीविशाखान्विताच॥ वाञ्छाल्पतरूभ्यश्च कृपासिन्धुभ्य एव च । पतिताना पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नम ॥ श्रीकृष्ण-लीला रूप शिखरिणी चन्द्र-सुधा के माधुर्य का मान खण्डन करने वाली है और श्रीराधा आदि व्रजगोपियो के प्रेमरूप कपूर से मुगन्धित है। वह श्रीकृष्ण-लीला, निरन्तर तीन-तापो को देने वाल मसार-पय में भटकने वाले तुम लोगो की तृष्णा को नाश करे ॥ १ ॥१॥ तात्पर्य-दही, दूध, चीनी, इलायची, लौंग, काली मिरच और कपूर मिलाकर बनाये जाने वाले पदार्य को शिखरिणी या मिपरन बढे हैं।
२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * अपि च। अनपितचरी चिरात्करुणयावतीर्णः कलो समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम् । पुरटसुन्दर तिकदम्बसंदीपितः सदा हृदयकन्दरे फुरतु वः शचीनन्दनः ॥२॥२॥ शिखरिणी अत्यन्त सुस्वादु, स्निग्ध, सुगन्धित और सुशीतल पदार्थ है जो ताप और प्यास को वुझाता है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण लीला को शिखरिणी की उपमा दी गई है। तेज धूप मे रेतीले मार्ग में चलने वाला व्यक्ति जब गर्मी से सतप्त और तृष्णातुर हो उठता है तब उसे ऐसा शीतल सुगन्धित पदार्थ ही सुख देता है। उसी प्रकार संसार में अनेक योनियों में भटकने वाला यह जीव भी आध्यात्मक (आधि-मन को चिन्ता और व्याधि-शरीर के रोग) आधिदैविक (भूत-प्रेत, ग्रहादिकों को पीटा) तथा आधिभौतिक (सिंह-साप आदिक का भय)-इन तीनों प्रकार के तापों से सन्तप्त हो रहा है और अनेक प्रकार की कामनाओं के वशीभूत होकर तृपात्त र मटकता है। इसके लिए श्रीकृष्ण लीला रूप शिखरिणी तीनों तापों को नाश कर नित्य सुख को प्रदान करने वाली है। इस श्लोक में श्रीरूपगोस्वामिपाद ने आशीर्वादात्मक मङ्गलाचरण किया है। मानो प्रत्येक संसारी जीव को वे कह रहे हैं--अरे त्रिताप-सन्तप्त जीव ! श्रीकृष्ण-लीला का नित्य श्रवण-कोत्तंन एवं मनन कर ससार ताप से छुटकारा पा एवं शाश्वत सुख-शाति को प्राप्त कर । अथवा श्रीकृष्ण-लीला से ही वे प्रार्थना कर रहे हैं-हे कृष्ण-लीले ! आप ही करुणा कर इस ससारी जीव के सब ताप-सन्ताप दूर करो॥१॥१॥ अनन्त काल से जिस को किसी ने प्रदान नहीं किया है, उस परम उज्ज्वल रसमयी अपनी भक्ति सम्पत्ति को देने के लिए जो अपनी करुणा से कलियुग में अवतीर्ण हुए हैं, स्वर्ण को कान्ति-राशि से देदेप्यमान वे श्रीगनीनन्दन-हरि अर्थात् श्रीकृष्णचैतन्य देव सदा तुम्हारी हृदय-कन्दरा मेरफुरित हो ॥२॥२॥ तात्पर्य-"श्रीराचीनन्दन-रि कृपापूर्वक सबके हृदय मे स्फुरित "-मह आशीर्वाद जगत् के प्रति श्रीरूपगोस्वामिपाद ने किया है।
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक * [ ३ - जिस परम उज्ज्वल रसमयी भक्ति-सम्पत्ति को दीर्घकाल से जगत् को प्रदान नहीं किया गया था, उस निज भक्ति-सम्पत्ति को देने के लिए स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपनी करुणा से कलियुग मे श्रीकृष्णचैतन्य रूप से अवतीर्ण हुए है। इस बात से यह पता लगता है कि बहुत पहले भी कभी इन्होंने उस निज भक्ति-सम्पत्ति को जगत् को अवश्य प्रदान किया था। शास्त्रों का निर्णय है कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा के एक दिन मे एक वार अवतीर्ण होते हैं। वैवस्वत मन्वन्तर की अठाईसवी चतुयुगी के द्वापर के शेप में ही वे स्वयं रूप से आविर्भूत होते है और वृन्दावन में रासलीलादि का विस्तार करते हैं। उस द्वापरके वाद आने वाले कलियुग में वे श्रीराधा की भाव-कान्ति को अङ्गीकार कर पीतवर्ण श्रीगौरसुन्दर- रूपसे नवद्वीपमें प्रकट होते है। तभी वे अपनी उज्ज्वल रसमयी भक्ति सम्पत्ति को जगत् के लिए प्रदान करते है । तात्पर्य यह है कि उस कलियुग से लेकर वर्तमान कलि तक के सुदीर्घ काल में उस उन्नत उज्ज्वल रसमयी भक्ति को कोई भी प्रदान नहीं करता है और वह सुदीर्घ काल-प्रभाव से प्रायः लुप्त हो जाती है । उसे ही पुनः प्रदान करने के लिए श्रीकृष्ण ही श्रीमन्महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य के रूप से अवतीर्ण होते हैं । वह उन्नत उज्ज्वल रसमयी स्व-भक्ति सम्पत्ति क्या है ?-स्व-भक्ति सम्पत्ति का अर्थ है-निज विषयक भक्ति सम्पत्ति । श्रीकृष्ण जिस भक्ति के विषय हैं या श्रीकृष्ण के प्रति जो भक्ति प्रयोजित है, वह है स्वभक्ति सम्पत्ति । सम्पत्ति उसे कहते हैं जिसमे व्यक्ति अपनी अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति करता है। श्रीकृष्ण की प्रीति विधानपूर्वक उनकी चरण-सेवा ही जीव को एकमात्र अभीष्ट वस्तु है। वह प्राप्त होती है केवल भक्ति से। इसलिए भक्ति को यहाँ 'सम्पत्ति' कहा गया है । उस भक्ति-सम्पत्ति को श्रीमन्महाप्रभु ने जगत को दान किया है। वह भक्ति है उन्नत-उज्ज्वल रसमयी। उन्नत का अर्थ है सर्वोपरि-जो सर्वश्रेष्ठ है एव जिससे ऊपर और कोई नही । वह उन्नत उज्ज्वल रस है-मधुर-रस । अर्थात् मधुर रसात्मिका-भक्ति को ही प्रदान करने के लिए श्रीकृष्ण करणा कर श्रीमन्महाप्रभु रूप से जगत् मे प्रकट होते हैं। ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ब्रज मे चार प्रकार के भक्तों का प्रेमरस आस्वादन करते हैं। दास्य, सस्य, वात्सल्य एवं मधुर । किन्तु मधुर-रस ४ । * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * 1 मे ही श्रीकृष्ण मे सर्वाधिक ममता बुद्धि है। जहां जितनी अधिक ममता बुद्धि होती है, वहां प्रीति विधान करने को उतनी अधिक तीव्र उत्कण्ठा हुआ करती है । चारों भावों के परिकर ही श्रीकृष्ण को अपना मानते है । क्योंकि मधुर भाव के परिकरों में उनके प्रति सर्वाधिक ममता बुद्धि है, इसलिए उनमे श्रीकृष्ण की प्रोति विधान करने की सर्वाधिक तीव्र उत्कण्ठा भी है और फिर ममता बुद्धि के अनुसार ही श्रीकृष्ण में भी उनके प्रेमरस आस्वादन करने की सर्वाधिक उत्कण्ठा है । उसके फलस्वरूप उनकी सर्वाधिक प्रेमवश्यता भी है। व्रज के दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा मधुर—ये चारों भाव ही निर्मल है, उज्ज्वल है-इनमे किसी में भी अपनी सुख-वासना की मलिनता नही है; परन्तु दास्य, सरय एवं वात्सल्य इन तीनों भावों में श्रीकृष्ण के साथ एक सम्बन्ध की अपेक्षा है। इनकी श्रीकृष्ण-सेवा इनके श्रीकृष्ण के साय सम्बन्ध को अनुगामिनी ही रहती है । परन्तु मधुर-भाव के परिकर श्रीराधादि का भाव विलक्षण है । प्रकट-लीला मे इनका श्रीकृष्ण के साथ ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया कि जिसके अनुरोध से वे श्रीकृष्ण-सेवा के लिए लालायित हो । तथापि वे श्रीकृष्ण- सेवा के लिए लालायित रहती हैं। उनकी सेवा-वासना स्वाभाविकी है । उनकी सेवा-उत्कण्ठा इतनी बलवती है कि वे वेदधर्म, लोकधर्म स्वजन एवं आर्यपथादि सब का परित्याग कर देती हैं। ऐसी कोई भी बाधा नहीं है जो उनकी कृष्ण सेवा-वासना को संकुचित कर सके । इसलिए वज मधुर भावात्मिका भक्ति को ही उन्नत-उज्ज्वल रसमयी भक्ति कहा गया है। तो क्या श्रीराधा-भाव की उज्ज्वल रसमयी भक्ति को ही जगत् को प्रदान करने के लिए श्रीमन्महाप्रभु प्रकट हुए हैं ?-श्रीराधा-भावमयी भक्ति में जीव का अधिकार नहीं है । वह तो महाभाव-स्वरूपा श्रीकृष्ण की ल्लादिनी शक्ति हैं। जीव तटम्या शक्ति है, उसका श्रीराधाभाव की आनुगत्यमयी भक्ति में ही अधिकार है। अतः श्रीराधा जी के परिकर के आनुगत्य मे रहकर मजरी स्वरूप से जो मधुर भाव की भक्ति है-श्रीकृष्ण मेवा विधान करना है-वही उन्नत उज्ज्वल रममयो भक्ति सम्पत्ति है जिसे श्री मन्महाप्रभु जी ने सर्व साधारण मे वितरण किया। हम उन्नत उज्ज्वल रसमयी भक्ति के सर्व साधारण में वितरण पारने को श्रीमन्महाप्रमु के अवतार का एक बहिरङ्ग कारण बताते हुए श्रीगोस्वामिपाद ने आगोर्यादात्मक मङ्गलाचरण इस श्लोप में किया है।
ध्यापकस्य *श्रीविदग्धमाधव-नाटक * [ ५ [नान्द्यन्ते] सूत्रधार--- अलमतिविस्तरेण। भो भोः ! समाकर्ण्यताम् । अद्याहं स्वप्नान्तरे समादियोऽस्मि भक्तावतारेण भगवता श्रीशंकरदेवेन, यथा-'अये ताण्डवकलापण्डित ! इह किल बल्लवीचक्रचेतोवृत्तिमक- रीविहारमकरालयस्य निरवद्यवेणु वादनविद्यास्वाध्यायसिद्धीनों प्रथमा. सुगन्धिपुष्पावलोसौन्दयंतुन्दिलायामरविन्दबान्धवनन्दिनी- तीरान्तकाननलेखायामयलम्बितमत्तस्कोकिललीलस्य परमानन्दवर्धनि गोवर्धननिसम्बे संभृतनवाम्बुदाउम्बरस्य किशोरशिरोमणेनन्दनन्दनस्य प्रेमभराकृष्टहृदयो नानादिग्देशत: सांप्रतं रसिकसंप्रदायो वृन्दावनवि- लोकनोत्कण्ठया केशितीर्थोपकण्ठे समोयिवान् । स च धन्य.- कृतं गोपीवृन्दरिहं भगवतों मार्गमभू- दिहासीत्कालिन्दीपुलिनवलये रासरभस: । । मङ्गलाचरण के बाद सूत्रधार' ने कहा- 'इतना ही ठीक है, अधिक विस्तार का क्या प्रयोजन ? आहा ' आप सब मुनिए-आज मुझे स्वप्न मे ब्रह्माकुण्ड तीर निवासी भक्तावतार भगवान् श्रीशङ्कर महादेव जी ने आदेश क्यिा है कि-"मो नृत्यकला-पण्डित | जो व्रज-गोपिणे वी चित्तवृत्ति-प मीन के विहार करने के लिए सागर के सदृश हैं, जो वेदवेत्ता सिद्ध पुरुषो को वैरगु अजाने की विद्या अध्ययन कराने मे प्रघ न अध्यापक है, जो सुगन्धित फूलो की सुन्दरता को आवार सूर्य कन्या विशाल श्रीयमुना के किनारे के सपनो मे उन्मत्त-कोकिला की तरह लीला-विहार करने वाले है और जो परमा- नन्द बढाने वाले गोवर्धन को तलहटी मे पूण नवीन मेघ को तरह मनोहर शोभा युक्त हैं, उन किशोर-शिरोमणि श्रीनन्दनन्दन के प्रेम मे आकृष्ट. चित्त होकर इस समय अनेक दिशाओ के देशो की रमित्र-मम्प्रदाय श्रीवृन्दावन के दर्शनों की उत्खण्ठा से पेशीतीर्थ के पाग आकर उपस्थित हुई है । धन्य है यह रसिक-सम्प्रदाय ।" १किमी नाटक के आरम्भ मै नाटक के लेखक का वेश धारण का जो एक अभिनेता रङ्गमञ्च पर सर्व प्रथम प्रवेश करता है और मनावरण आविता है-उसे सूत्रधार कहते हैं।
६ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * इति श्राव भाव चरितमसकृद्गोकुलपते- लुंठन द्वाष्पोऽयं कथमपि दिनानि क्षपयति ॥३३॥ तदिदानीमेतस्य भक्तवृन्दस्य मुकुन्द विश्लेषोद्दीपनेन बहिवन्तः प्राणाः कामपि तस्यैव केलिसुधाकल्लोलिनीमुल्लासयता परिरक्षणीया भयता । मत्कृतंव ते सामग्री समग्रमिष्यति' इति । तेनाध जगद्गुरोरस्य निदेशमेवानुवतिध्ये ॥४॥ (प्रविश्य) पारिपाश्विक:-भाव ! भवता निबद्धस्य विदग्धमाधवनाम्नो नवीननाटकस्य प्रयोगानुसारेण गृहोतभूमिकाः कुशीलवा रङ्गप्रवेशाय तत्रभवन्तमनुज्ञापयन्ति ॥५॥ (यहां क्यों उपस्थित हुई है ?)- "इसी स्थान पर ही तो ब्रजगोपियो ने श्रीकृष्ण को ढूंढा था और इसी यमुना के पुलिनों में तो हुआ था रास- महोत्सव । गोकुलपति श्रीनन्दनन्दन के इन समस्त चरित्रों को बारम्बार सुनकर यह रसिक-सम्प्रदाय उनके विरह मे पृथ्वी पर पछाड़ खा-खाकर, आँखो से अश्रुधारा बहाते हुए जैसे तैसे दिन गुजार रही है ॥ ३ ॥ ३ ॥ अब इन सब रसिक-भक्तों के प्राण श्रीकृष्ण-विरह के उमड़ उठने से बाहर निकलना चाहते हैं । इसलिए तुम उन श्रीमुकुन्द की लीलामृत- नदी का भाविर्भाव कर इन गत-प्राण भक्तो की रक्षा करो। ( मुझ से यह कैसे सम्भव होगा? )-मेरी कृपा से तुम्हें सब सामग्री की स्फूति हो उठेगी।" इसलिए आज जगद्-गुरु श्रीशङ्कर की इम आज्ञा का मैं पालन करता हूँ॥४॥ (पारिपाश्विक* प्रवेश करता है ) पारिपाश्यिक- हे मान्य माप के रचे हुए विदग्धमाधव नवीन नाटक का अभिनय करने के लिए नाटक के प्रयोगानुसार सब अभिनेता तगार हैं और रङ्ग-मन्च पर आने के लिए इन्तजार है आप का आमा की ॥५॥ * गूत्रधार वे शिप्य- नट यो पारिपाश्विक रहते है, जो मूत्रधार वाद मनपर थावर गेले जाने वाले माटर के सम्बन्ध में मूत्रधार के साथ बात पोर मरता है।
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक * [७ सूत्रधारः-मारिष; निर्मित: किमिति तन्नाटकपरिपाटीभिर्वाण- कापरिग्रहः ? (क्षणं विमृश्य।) भवतु, ममास्मिन् संदर्भ यदपि कविता नातिललिता मुदं घास्यन्त्यस्यां तदपि हरिगन्धाबुधगणाः । अप: शालग्रामाप्लवनगरमोद्गारसरसा: सुधीः को वा कोपीरपि नमितमूर्धा न पिबति ? ॥६॥४॥ पारिपाश्विक:-भाव, रङ्गलक्ष्मीकौशलस्तुतिभिरेव सभ्यानभ्य यामहे, यदमो विद्यादिभिर्देवानपि तानुपालन्धुमुत्सहन्ते, किमुत नटानस्मान् । ७॥ सूत्रधार:-मारिष ! कृतमेतया वृथोपचारचर्यया । यतः, अप्रेक्ष्य क्लममात्मनो विदधति प्रीत्या परेषां प्रियं लज्जन्ते दुरितोद्गमादिव निजस्तोत्रानुबन्धादपि । सूत्रधार-महाशय नाटक के याग्य उचित वेश-भूपा धारण कर ली है ? ( एक क्षण चुप रहकर ) बहुत ठीक । मेरे इस नाटक में,हो सकता है. कविता सव के मन को हरने वाली न हो, तथापि श्रीकृष्ण-सौरभ होने से यह बुद्धिमान पुरुषों को आनन्ददायक होगा। क्योकि शालग्राम शिला को कुए के जल से स्नान कराने पर कौन .ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति है जो मस्तक झुकाकर उसे पान नहीं करता ? ६||४॥ पारिपाश्चिक-हे मान्य । हम मे नृत्य की निपुणता नहीं है तो भी हम मृत्य की शोभा-कुशलता के लिए स्तुति द्वारा सम्यगण को प्रार्थना करते हैं, क्योकि सम्यगण विद्या के दाग देवताओं करते हैं, फिर हम नटो की क्या बात ? ७|| सूत्रधार-महाराय ' इस वृथा स्तुति का यया प्रयोजन ? (देवताओ को पराभव करने वाले अन्य धर्मो का रसिक भत्तो में आगे क्यो ।) वे अपने दुख वो न देखकर सदा दूमरो यी भाई करते हैं। परस्त्रीगमन आदि पाप कर्म करने से जमे लोगो का लग्जा होती है, सत्पुरगो यो उमी प्रकार अपनी प्रगमा मुनने मे लज्जा आती है। विद्या, धन एव कुन में वे कितने ही उत्कृष्ट क्यो न हों, उतने ही वै क्रमशः नम्र होने 7 भी जय प्राप्त ..
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक * मत्त विद्यावित्तकुलादिभिश्च यदमी यान्ति क्रमानम्रता रम्या कापि सतामियं विजयते नैसगिको प्रक्रिया ॥८॥५॥ (समन्तादवलोक्य सहर्पमुच्च) हहो बल्लवसिहप्रिया , भगवद्धर्मजगो- होगुरुणामपि युष्माक समक्ष किमप्येप विवक्षमाणस्ताण्डविको निर- पुनपाणां पदवीमारोदुमुपक्रमते । तविमा क्षमध्व चापलारभटोम् ।। (इति सप्रणाम पश्यन् ) अभिव्यक्ता प्रकृतिलघुरूपादपि बुधा विधात्री सिद्धार्थान हरिगुणमयो यः कृतिरियम् । पुलिन्देनाप्यग्मि• किमु समिधमुन्मथ्य जनितो हिरण्पणीनामपहरति मान्त कलुषताम् ॥१०॥६॥ तदिसानीमभीष्टदेव भगवन्तमनुस्मृत्य नृत्यमाधुरीमुल्लासयामि । (इत्यञ्जलि बद्धा) जाते हैं । इसलिए सत्पुरपो की इस म्वाभाविक परिपाटी की जय हो ॥८॥५॥ (चारो ओर देसवर सूत्रधार ने हपंपूर्वक आगे पहा-) अहो । श्रीकृष्ण के प्रिय भक्तगण | आप भगवद् धर्म के तत्व को जानन वाल गुगजन हैं फिर भी आपके सामने में एक नट कुछ कहने की इच्छा पर निलंग्ज-जना ये पथ का आसरण करने लगा हूँ इसलिए आर मेरी इस चपलता को क्षमा यीजिये ॥ (इतना कहकर प्रणाम पूर्वक सत्र को देगते हुए)- हे महतजन | में स्वाभाविक क्षुद्र व्यक्ति है परन्तु मेरे द्वारा रची हुई यह श्रीभगवद् गुणमयी रचना आप सब को अभीष्ट सिद्धि करगी। पयोति अति नीच जाति पुरिन्द व्यक्ति के द्वारा लकडियो यो सघर्पण कर उगन की हुई अग्नि क्या पण यो मैल को दूर नही परती ॥१०॥६॥ इसलिए अब परम इष्टदेव श्रीभगवान् का स्मरण कर मैं नृत्य- माधुरी या आनन्द प्रयागित करता हूँ। (इस प्रकार यहार गूत्रधार दोनो हाथ जोडपर इप्टदेय या ग्गरण 58866 मन्थर *श्रीविदग्धमाघव-नाटक* [१ प्रपन्नमपुरोदयः स्फुरदमन्दवृन्दाटवी- निकुन्जमयमण्डपप्रकरमध्यवद्धस्थितिः । निरङकुशकृपाम्बुधिवंजविहाररज्यन्मनाः सनातनतनु सदा मयि तनोतु तुष्टि प्रभुः ॥११।।७।। पारिपाश्चिक:-भाव, पश्य पश्य,- भक्तानामुदगादनगलधियां वर्गो निसर्गोज्ज्वल: शीलः पल्लवित सबल्लववधूवन्धो प्रबन्धोऽप्यसौ । लेभे चत्वरताञ्च ताण्डवविधवृन्दाटवीगर्भमू- मन्ये मद्विधपुण्यमण्डलपरीपाकोऽयमुन्मीति ||१|| तत्त्वरस्व रसमाधुरीपरिवेषणाय ॥१३॥ सूत्रधार-मारिप, नीरसावलीयमुस्पाद्विशङ्कमानो इवास्मि ॥४॥ पारिपाश्विक:-भाव, कृतमन शङ्कया। यत:, शरणागत-भक्तों के प्रति जिनका माधुर्य उदित होता है, जो अतिशय ज्योतिर्मय श्रीवृन्दावन के निकुञ्जमय मण्डपों में विराजमान हैं, जो निरंकुश कृपा के सागर है और जिनका मन सदा ब्रजविहार मे लगा रहता है, वे सर्व-रामर्थ नित्य-विग्रह श्रीकृष्ण मेरे ऊपर सन्तुष्ट हो ॥११।।७।। पारिपाश्विक-मान्यवर ! देखिये, देखिये- स्वभाव से ही सुन्दर, उज्ज्वल बुद्धि भक्तगण यहा उपस्थित हैं, व्रजगोपी वल्लभ श्रीकृष्ण का यह लीला-नाटक भी स्वाभावतः उज्वल है और श्रीवृन्दावन-भूमि की यह रासम्थली नृत्य-वैचिनी की निपुणता प्राम किये हुए है, कुछ भी हो, मैं तो यह समझता हूँ कि हम जैसे व्यक्तियों को | पुण्यराशि का फल आज उदित होने लगा है ।।१२।।८।। इसलिए अब शीघ्र ही रस माधुरी का परिवेषण कीजिये ॥१३॥ सूत्रधार-बन्धुवर । रस को न जानने वाले लोग इस नाटक में कही प्रतिबलता न कर बैठे, इसी गड़ा से मैं देर कर रहा हूँ ॥१४॥ पारिपाश्विक -मान्यवर वृथा है आपकी यह गड्डा । जो लोग रम को नहीं पहचानते, वे इम मे उदासीन ही रहेंगे किन्तु जो रमिक-मान
१० ]
*श्रीविदग्धमाधव नाटक *
उदासतां नाम रसानभिज्ञाः कृतौ तवामी रसिकाः स्फुरन्ति ।
वामेलकः काममुपेक्षितेऽपि पिका. सुखं यान्ति परं रसाले ॥१५॥६
तदारभ्यता सामाजिकचेतश्चमत्काराय गान्धर्षब्रह्मविद्या ॥१६॥
सूत्रधारः-मारिप, पश्य पश्य,
सोऽयं वसन्तसमयः समियाय यस्मिन् पूर्ण तमोश्वरमुपोढ़नवानुरागम् ।
गूढनहा रुचिरया सह राधयासौ रङ्गाय सगमयिता निशि पौर्णमासो।।१७।१०
(नेपथ्ये)
अये नतं कसामन्तसार्वभौम, ! कयं भवतः कर्णपूरीभूता बाढ़ निगूढ़ेयं
संदर्भमञ्जरी, यदह राधया साधमीश्वरं तं संगमयिष्यामीति ? । १८
मूत्रधार:- (सविस्मयं नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) अहो, कथमित
एव भगवती पौर्णमासी ? पश्य पश्य ।
है वे सब आनन्दित होगे। ( रस को न जानने वाले यदि उदासीन रहें तो
हमारी क्या हानि ?) ऊँट आन वृक्ष की उपेक्षा करता है परन्तु कोकिलाएं
तो उसमे परम सुख प्राप्त करती हैं ॥१शा॥
अतएव आरम्भ कीजिए, रसिक-जनों की चित्त आनन्दकारी सङ्गीत
रूप ब्रह्म विद्या का ॥१६॥
सूत्रधार-महाशय ! देखो, देखो-
यह वही वसन्त-काल है, जबकि रात्रि के समय पौर्णमासी तिथि,
जिसमे अन्यान्य सब नक्षत्र छिप गए है, नवीन उदित हुई रक्तिमा से
युक्त पूर्ण चन्द्र को राधा अर्थात् विशाखा नक्षत्र से सङ्गम द्वारा सुशोभित
करने के लिए उपस्थित हुई है।
[ पक्षान्तर में-यह वही वसन्त काल है, जबकि रात्रि के समय
भगवती पौर्णमासी नवीन अनुराग में रंगे हुए पूर्णतम ईश्वर श्रीकृष्ण के
माय कौतुक पूर्वक श्रीराधा का सङ्गम-आनन्द विधान करने के गूढ आग्रह
मे उपस्थित हुई है ] ||१७॥१०॥
[ वेश-भूपा गृह से आवाज आती है ]
हे नतंय-रोनाध्यक्ष ! यह निगूढ यात आपके कानों मे कैसे पड़ी कि
में श्रीराधा के साथ धीरण का मिलन कराऊंगी? ॥१८॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक *
[ ११
वहन्ती काषायाम्बरमुरसि सान्दीपनिमुने
सवित्री सावित्रीसमरुचिरलं पाण्डुरकचा ।
सुरष शिष्येय परिजनवती नन्दभवना-
दितो मन्द मन्द स्फुटमुटजवीथों प्रविशति ॥१६।११।।
तदाबामग्रत करणीय वणिकाङ्गीकारमालोचयाव ॥२०॥
(इति निष्क्रान्ती)
प्रस्तावना
(तत प्रविशति सपरिजना पौर्णमासी)
पौर्णमामी- ('अये नर्तकसामन्त-' इति पठित्वा ) हन्त वत्से
नान्दीमुखि, किमपि कमनीय गायता रफुटमानन्दितास्मि नटेन्द्र ण ॥२१॥
नान्दीमुखी-भअवदि, कि क्खु जहत्य एदम् । [ भगवति, कि सलु
यथार्थमेतत् ] ॥२२॥
सूत्रधार-(विस्मय पूर्वक वेशभूषा-गृह की ओर देखते हुए,आहा
भगवती पौर्णमासी यहा से आरही है । देखा, देखो-
यह पौर्णमासी देवर्षि की शिष्या, साविनी के राहश शोभा-शालिनी
और सान्दीपनि मुनि की माता है । वक्षस्थल पर गेरुवे रङ्ग का वस्त्र,
सिर पर सफेद बाल शोभित है। परिजन (दास-दासियो) के साथ धीरे-
धीरे यह नन्दभवन से पर्णकुटी की ओर जा रही है ॥१९॥११॥
इसलिए हम भी होने वाले नाटकाङ्ग की चलकर समालोचना
करते है ।। २०॥ [ इतना कहकर सूत्रधार तथा पारिपाश्विक-दोनो चल
जाते हैं। ]
प्रस्तावना-(प्रतिपाद्य विषय की सूचना)
[ तब पौर्णमासी परिजनो के साथ मच्च पर प्रवेश करती है ]
पौर्णमासी-(वाह रे नतंकनायक --यह कार ) आहा पृमि
नान्दीमुखि । इस नटेन्द्र ने कैसा मनोहर गान किया, मैं बडी प्रसन्न हू ।।२१
नान्दोमुखो-भगवति । क्या यह यथार्थ है ॥२२॥
१२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * पौर्णमासी- संभाव्यते फलमलम्भिलमूलपुष्टेस्तत्तादृशं व मम भाग्यतरोवरोरु । येनानयोः सुभगयोरुचिता भवेयं शृङ्गारमाङ्गलिकयोनवसंगमाय ॥२३।।१२। नान्दीमुखी-भअवदि, जइ विसहाणुणन्दिणी राहिआ तुए कण्हेण सगमणिज्जा, तदो संगमाणुऊलवासं गोउलं उज्झिम सन्तणुवाससणे भाणुतित्थे कित्ति एसा संगोविन रविखदा आसी। [ भगवति ! यदि वृपभानुनन्दिनी राधिका त्वया कृपणेन संगमनीया, तदा संगमानुकूल- वाम गोकुलमुज्झित्वा शान्तनुयाससंशे भानुतीर्थे किमित्येषा संगोप्य रक्षितासीत ] ॥२४॥ पौर्णमासी-वत्से, नृशंसतः कंसभूपतेः शङ्कया ॥२५॥ नान्दीमुखी-भअवदि, तहवि कहं रण्णा विण्णादा राहा ? [ भगवति ! तदपि कथं राज्ञा विज्ञाता राधा ? ] ॥२॥ .. पौर्णमासी-रापासौन्दर्यवृन्दमेव विज्ञापने निदानम्। यतः, पौर्णमासी-सुन्दरि ! हमारे भाग्य-वृक्ष का मूल अभी पुष्ट नही हुआ, इसलिए इस प्रकार फल की सम्भावना कहाँ ? (वह भाग्य कैसा?) -जिस शृङ्गार मङ्गल-स्वरूप श्रीराधा एवं श्रीकृष्ण दोनों के नव सङ्गम को करा पाऊंगी ।।२३।१२।। नान्दोमुखो-भगवति ! यदि आप वृषभानुनन्दिनी श्रीराधा का श्रीकृष्ण के साथ मिलन कराना चाहती हो, तो उस मिलन के अनुकूल गोकुल में वास न कर मार शान्तनुवास तीर्थ में किस लिए गुप्त भाव से रह रही हो? ॥२४॥ पौर्णमासो-पुनि ! जालिम कंस राजा के भय से ।।२।। मान्दोमुठी-मगयति ! यह राजा राधा को कैसे जानता है? ॥२६॥ पोएमासो-पोरापा को मौन्दर्य-गम्पत्ति ही उस को जानकारी पा कारण है, क्योंकि लोकातीत गुण-गम्पत्ति सब प्रकार से निगूढ यस्तु को * श्रोविदग्धमाधव नाटक* [ १३ लोकोत्तरा गुणधीः प्रथयति परितो निगूढमपि वस्तु । पिहितामपि प्रयत्नादव्यक्ति कस्तूरिका गन्ध ॥२७॥१३॥ नान्दोमुखी--मअवदि, जसोआघत्तीए मुहगए अत्तणो त्तिणी राहिआ गोउलमज्झे आणीअ जडिलापुत्तस्स अहिमण्गुणो हत्थे उव्वा- हिदा त्ति, तादिस जेव्व असमन्जस आपडिदम्, ज कण्हादो अण्गेण पुरिसेण तादिसोरण करप्फसण असज्जम्, तदो कध तुम मिचिन्दा विअ दीससि ? [ भगवति, यशोदाधात्र्या मुखरया आत्मनो नप्ती राधिका गोकुलमध्ये आनीय जटिलापुनस्याभिमन्योहस्ते उद्वाहितेति तादृशमेवासमञ्जसमाप- तितम् । यस्मात्कृपणतोऽन्येन पुरुपेण तादशीना करस्पर्शन असह्यम्, तस्मात्कथत्व निश्चिन्ता इव दृश्यसे ? ] ॥२८॥ पौर्णमासी-तस्यैव हेतो ॥२६| नान्दीमुखी-कह विज ? [ कथमिव ? ] । ३०॥ पौर्णमासी-(विहस्य) तद्विञ्चनाद्यर्थमेव स्वय योगमायया मिथ्यव प्रत्यायित तद्विधानामुद्वाहादिकम् । नित्यप्रेयस्य एव खलु ताः कृष्णस्य ॥३१॥ भी प्रकाशित कर दिया करती है। यत्न पूर्वक छिपाई हुई कस्तूरी को उस की गन्ध प्रकट कर देती है ॥२७ ११३।। नान्दोमुखी-भगवति । यशोदा को माता मुसरा अपनी दोहनी राधा को गोकुल मे लाकर जटिला के पुन अभिमन्यु के हाथ सौप देगी। यह बहुत वडी अडचन पैदा हो रही है। श्रीकृष्ण को छोडकर अन्य पुरप के हाथ का स्पर्श करना राधा जैसी कन्याओ के लिए असह्य है। इसलिए तुम कैसे निश्चिन्ता सी दीस रही हो ॥२८॥ पौर्णमासो-इस वा भी कारण है ? ॥२६॥ नान्दोमुखी-वह क्या ॥३०॥ पौर्णमासो-(मुम्बराते हुए) उसकी वन्चना के लिए स्वय योग- माया ने उनवे मिथ्या विवाहादिव को मत्य प्रतीति करादी है। वे सर कन्याए निश्चय ही नित्य प्रेयसी हैं श्रीकृष्ण को ॥३१॥ ?
१४ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक * नान्दीमुखी-(सहर्पम् ) ता पूण तुमं निच्चिन्दासि सवुत्ता, जं एसा अज्ज गोउलमज्झे आणोदा | [ तस्मात नून त्व निश्चिन्तासि सवृत्ता, यदेपाद्य गोकुलमध्य आनीता। ] ॥३२॥ पौर्णमासी-वत्से, सत्यं ब्रवीपि । कसतचित्ता में शैथिल्याम- वोपतधा, किंतु दुष्टामिमन्युत स्फुटमन्या सांप्रतमजनिष्ट ॥३३॥ नान्दीमुखी-केरिसी सा, ? [ कीदृशी सा? ] ॥३४॥ पौर्णमासो- वल्लयोनयलतासु रङ्गिण कृष्णभुङ्गमधिगत्य मत्सरी । राधिकापुरटपधिनीमयने तुमिच्छति पुनर्वनान्तरम् ॥३५॥१४॥ नान्दीमुखी-तत्यवि जोसमामा जेव्व समाहारणं करिस्सदि । [ तत्रापि योगमायव समाधान करिष्यति। ] ॥३६|| पौर्णमासी-पुत्रि, को जानाति स्वतन्त्रायास्तस्याश्चरित्रम्, यदी- होय सा तटस्यायते ? ॥३७॥ नान्दोमुग्री-(हपं पूर्वक) तभी तुम निश्चिन्त हो रही हो, क्योनि आज राधा यो गोकुल में लाया गया है ।।३२॥ पौर्णमासो-पुत्रि में सत्य कह रही हू । यस वा डर तो हलया पढ़ गया है, रिन्तु अब तो दुष्ट अभिमन्यु से मुझे और अधिक चिन्ता खडी हो गई है ॥३॥ नान्दोमणी-वह पसी? ॥३४॥ पौर्णमासो-वल्लवोम्पा नवीन लताओं के प्रति श्रीकृष्ण-मधुबर को अनुरत देशपर ई अभिमन्यु राधा स्पा स्वर्णवर्णा पधिनी को दूमर यन (मपुरा) में ले जाना चाहता है ॥२५॥१४॥ मानौमुधी-इसमें भी योगमाया ही समाधान करेगी ॥३६॥ पौर्णमासी-त्रि पर पता है. उसपे परित्र पो कौन जागे । यदि परम विषय में सदस्य रही आई तो?must *श्रीविदग्धमाधव-नाटक * [ १५ वसम्य नान्दीमुखी-अण्णो वा एल्थ कोवि उवाओ त्थि, जेण एसो पहिबद्धो भवे ? ! अन्यो वार कोऽप्युपायोऽस्ति येनंथ प्रतिबद्धो भवेत् ] ॥३८॥ पौर्णमासी-वत्से, तत्र मया प्रतिभुवा भवन्त्या युक्तिमाधुरी- मेदुरेण वागगलेन निसर्गादगम्भीरोऽय विकम्भितोऽस्ति ॥३६॥ नान्दीमुखी-(सहर्पम्) भअवदि. कसस्स गोमण्डलज्झगखो गोअडढणो कहाणुसारिणा चन्दाअलीचरित ग कुबो ण कुप्पइ? [ भगवति, गोमण्डलाध्यक्षो गोवर्धन कृष्णानुसारिणा चन्द्रावलीचरिनेण कुतो न कुप्यति ] 1800 पौर्णमासी-पुनि, राजकुलोपलब्धेन गौरवेण गवितोऽय व्यक्तमपि तन्न श्रद्दधाति ॥४॥ नन्दीमुखी-वह कण्हेण पटम से सङ्गमो सवृत्तो। [क्थ कृप्रोन प्रथमस्या सगम सवृत ? ] ॥४२॥ पौर्णमासी-पुनि सगमे खलु गाडानुरणितव दूतो बभूव । मदुद्यमाना केवलमजनिए पिष्टपेपिता ॥४३॥ नान्दीमुखी और फिर दूसरा उपाय ही क्या है? जिस से इसमे प्रति- बन्ध लगे ॥३८॥ पौर्णमासो-पुति । इसमे मैं जामिन हूँ, स्वभाव से गम्भीर एव स्निग्ध युक्ति-माधुरीमय मेरे वचन म्प अगल (अगडो-या सिटक्निी) द्वारा वह अगम्भीर अभिमन्यु रका हुआ है ॥३६|| नान्दोमुखी- (हर्ष पूर्वक) भगवति । स की गौओ का अध्यक्ष (रक्षक) जो गोवर्द्धन है, (अपनी स्त्री) चन्द्रावली के चरित्र को कृष्ण- अनुगत देसकर पुपित क्यो नहीं होता है पौरांमासी-पुनि । राजबुल से गौरव को प्राप्त करके वह स्पष्ट हो जाने पर भी इस बात को कुछ परवाह नहीं करता ॥४॥ नान्दीमुखी- कृष्ण के साथ इस चन्द्रावली का प्रथम मिलन ॥४२॥ पौर्णमासी-पुनि । इनके परम्पर मिलन मे गाढ अनुराग ही ने दूती का काम किया। मेरा उद्यम तो केवल पिसे का पीसना हो है ॥४॥ ॥४०॥ से हुआ 2
१६ ]
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक *
नान्दीमुखी- अज्जे, तुह कह एरिसी भाअविसेसमाविदा गाढागुरा.
इदा उप्पण्णा, ज अप्पणो अहिष्ठदेअम्हि अणुप्पणे कण्हे उज्जइणी उज्झिा
पढमं च्चेअ गोउलं लद्धासि । । आर्ये, तव कथमीदृशी भावविशेपभाविता
गाढानुरागितोत्पन्ना, यदात्मनोऽभीष्टदेवेनुत्पन्न कृष्णे उज्जयिनीमुज्झित्वा
प्रथममेव गोकुल लब्धासि ? ] 1॥४४॥
पोर्णमासी-पुत्रि, गुरुपादानामुपदेशप्रसादेन ॥५॥
नान्दीमुखी-एत्य वसन्ती तुमं महाभाओ संदीवणी कि पखु जाणादि ?
[ अल वसन्ती त्यो महाभागः सांदीपनिः किं खलु जानाति ?.] । ४६।।
पौर्णमासी-अथ किम् । यतस्तेन मधुमङ्गलाभिधः स्वपुत्रो ममात्र
परिचर्यार्थ प्रेषितः ।।४७।।
नान्दीमुखी-महुमङ्गलो तुए सुट्ठ अणुग्गहोदो जं एसो गन्दणअ-
गेन्दोअरवन्दस्स सहअरदामहूसवे णिउत्तो। [ मधुमङ्गलस्त्वमा सुन्छु
अनुगृहीतो यदेप नन्दनयनेन्दीवरचन्द्रस्य सहचरता महोत्सवे नियुक्तः ? ]॥४८
पौर्णमासी-पुत्रि, मम सर्वस्वरूपाया राधायाः कृष्णेऽनुरागविरताराय
स्वञ्च नियुज्यसे |
नान्दीमुखी--आर्य ! आप मे इस प्रकार का भाव विशेष जनित गाढ़
अनुराग कैसे उत्पन्न हुआ कि जिससे आप अपने अभीष्ट देव श्री कृष्ण के
जन्म से पहले ही उज्जयिनी नगरी को छोड़कर गोकुल में आ वसी ?॥४४।।
पौर्णमासी-बेटी | यह सव केवल गुरुचरण कमलों की उपदेश-कृपा
से ॥४५॥
नान्दोमुखो-तुम महाभागा यहा गोकुल में रह रही हो, इसे क्या
सान्दीपनि जानते हैं ? ॥४६||
पौर्णमासी-और क्या ! वह जानता है तभी तो उसने अपने पुत्र
मधुमङ्गल को मेरी सेवा के लिए यहां भेजा है ॥४७ ।
नान्दीमुखो-तुम ने मधुमङ्गल पर सुन्दर अनुग्रह किया है, जिससे
वह श्री नन्दमहाराज के नेत्र-कमलों के चन्द्रस्वरूप श्रीकृष्ण को सहचरता
का आनन्द ले रहा है ।।४६॥
पौर्णमासी--पुत्रि ! राधा मेरी सर्वस्व है, अतः मैं उसके अनुराग
को कृष्ण के प्रति बढ़ाने के लिए तुम्हें नियुक्त करती हूं ॥४६॥
*थोविदग्धमाधव-नाटक * [ १७ नान्दीमुखी-(सानन्दम्) भअवदि, अदिभूमि गदोसे कण्हे अणुराओ। [ भगवति, अतिभूमिं गतोऽस्या: कृष्णेऽनुराग. ] ॥१०॥ पौर्णमासी-कथमेतल्लक्षितम् ॥५१॥ नान्दीमुखी-जदा कहापसङ्ग एसा काहत्ति णामं सुणादि, ता रोमाञ्चिदा कपि भा बिन्दइ 1 [ यदा कथाप्रसङ्ग एपा कृष्णेति नाम शृणोति, तदा रोमाञ्चिता कमपि भाव विन्दति ] ॥५२।। पौर्णमासी-पुत्रि, युक्तमिदम् । तथाहि- तुण्डे ताण्डविनी रति वितनुते तुण्डावलीलब्धये करणक्रोडकडम्बिनी घटयते कर्णाबुदेभ्यः स्पृहाम् । चेत.प्राङ्गणसङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृति नो जाने जनिता कियद्भिरमृत कृष्णेति वर्णद्वयो ।५३।१५ ना-दीमुखी--अज्जे ! दोहि ललिदाविसाहाहि सहीहि सद्ध रा. सूर आराहेहि । चन्दाअली उण पउमासेम्बापहुदीहिं सद्ध चण्डिअम् । ता तक मि नान्दीमुखी-(आनन्द पूर्वक) भगवति ! श्री कृष्ण के प्रति श्रीराधा का अनुराग तो अतिशय बढ़ चुका है ।।५।। पौर्णमासो-तुम कैसे जानती हो ॥५१॥ नान्दोमुखी-जब कभी बात चीत मे वह श्री कृष्ण का नाम सुनती है, तो वह पुलक्ति हो एक अनिर्वचनीय भाव मे मग्न हो जाती है ।।५।। पौर्णमासो--पुत्रि । यह वात ठीक है, क्योकि-कृष्ण नाम के कृ और एण यह दो वण जब मुख मे नर्तकी की भान्ति नृत्य करते है, तो फिर अनेक मुखो की प्राप्ति की तीव्र लालसा जाग उठती है, कानो मे अकुरित होने पर दस कोटि कान प्राप्त करने को इच्छा होती है और जब चित्तरूपी प्राङ्गण मे पहुँचते हैं तो समस्त इन्द्रियो को चेष्टा रहित कर देते हैं। इसलिए हे नान्दीमुखि मैं यह नही जानती कि इन दो वर्गों में पैसा और कितना अमृत भरा हुआ है ? ॥५३||१५।। नान्दोमुखी-हे आयें ! ललिता और विशाखा इन दोनो मखियो के साथ श्रीराधा सूर्य देव की आराधना करती है और चन्द्रावली अपनी पद्मा
१८ ]
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक *
देअदापसाअणिमादिओ इमाणं ईरिसो कण्हे अणुराओ। [ आर्षे ' द्वाभ्या
ललिताविशाखाभ्या सखीभ्या सार्थ राया सूर्घमाराधयति । चन्द्रावती पुन
पद्माव्याप्रभृतिभि सार्ध चण्डिकाम् । तस्मात्तयामि देवताप्रसादनिष्पादित
आसामीश कृष्णेऽनुराग ] ॥५४||
पौर्णमासी-
देवतसेवा केवलमिह वनपात्रानुसारिणी मुद्रा ।
मजसुभ्र वां तु कृष्णे सहज. प्रेमा स जागति ।।५५११६।।
नान्दोमुखी-सच राहाए साहाविमचे पिम्म तत्थवि सहोणं
कोसलं उद्दौअणम् । [ सत्य राधाया स्वाभाविकमेव प्रेम तथापि सखीना
कौगलमुद्दीपनम् ] ॥५६॥
पौर्णमासी-पुनि ! मदिगरा संदिश्यतामालेविचक्षणा विशाखा
यथेपं स्वसखोनेधारविन्दयोरानन्दनाय नन्दसूनो. प्रतिच्छन्द निर्माति ॥५७।।
नान्दोमुसी-जह आणदि भअवदी। (यथाज्ञापयति भगवती ॥५८
इसलिये
और दोव्या आदि ससियो के साथ चण्डिका यो पूजा करती है ,
मैं अनुमान करती है कि इन देवताओ की कृपा से ही राधा और
पदानली में श्री कृष्ण के प्रति इस प्रकार का गाढ अनुराग पैदा हुआ
है ॥५॥
पौरमासो-इन दोनों की देव-यूगा तो एक बहाना मात्र है । ग्रज-
मुन्दग्यिों में श्रीकृष्ण के प्रति अनुराग स्वाभाविय ही जागरुक है ॥५१३१६
नान्दोमुगेश्रीराधा का स्वाभाविक अनुराग है यह सच है तथापि
मगियों को चतुगई है इसका उद्दीपन परमा या जगाना ॥५६॥
पौरामामो-त्रि । चित्र यनाने में विशागा बड़ी चतुर है, तू मेरी
और में उगे पद दे। वह अपनी गली रापा के नेत्र यमलो को आनन्द
देनेणियो पृष्नमा एनित्र तयार पर।५७॥
मानोपयो-मायनि जिमी माता ॥८॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक * अय पौर्णमासी-मयापि मोदकवृन्ददानापदेशावृन्दाटवीमध्यमासाद्य राधेति मङ्गलाक्षरमाधुर्येण माधवकर्ण योद्वन्द्वमानन्दनीयम् ॥ll नान्दीमुग्वी- अज्जे । पेक्ख एसो राममहुमङ्गलसिरिदामपहुदीहि सह- अरेहि सद्ध गोउलादो णिक्किमिअ वु दावनं गच्छन्तो कण्हो सिणिहि पिदरेहि जसोआनन्देहिं लालिज्जा । [ आर्ये । पश्यप राममधुमङ्गल श्रीदामप्रभृतिभि सहवरै सार्ध गोकुलानिष्क्रम्य वृन्दावन गच्छकृष्ण स्निग्धाभ्या पितृभ्या यशोदानन्दाभ्या लाल्यते 1 ॥६०॥ पोर्णमासी-(विलोक्य महर्षम्) नयनदण्डिनप्रवरपुण्डरीकप्रभः प्रभाति नवजागुडवजविडम्बिपीताम्बर. । अरण्यजपरिक्रियादमितदिन्यवेषादरो हरिन्मणिमनोहरा तिभिरुज्ज्वलाङ्गो हरि. । ६१।।१७।। तदहं मोदकसंपादनाय गच्छेयम् । त्व विशाखा याहि ॥६२।। पौर्णमासी- मैं लड्डू बाटने के बहाने वृन्दावन जाती है और वहा जाकर 'राधा'-इन दोनो मङ्गलमय अक्षरो के माधुर्य से कृष्ण के कानो को आनन्दित करु गी॥५६॥ पौर्णमासी -आर्य। देखो, देखो, श्री बलराम, मधुमङ्गल, श्रीदाम आदि सखाओ के साथ श्री कृष्ण गोकुल से निकल कर वृन्दावन जा रहे है और पिता-माना श्रीनन्द-यशोदा उनका स्नेहपूर्वक लालन कर रहे है ॥६॥ पौर्णमासी- देखकर आनन्दपूर्वक) जिनके नेनो की शोभा श्रेष्ठ नील कमल की प्रभा को निन्दित करने वाली है, जिनका पीताम्बर नवीन केसर की गोमा को लज्जित कर रहा है , जिन पुष्प-पनादि द्वारा रचित अलकार मणिरत्नादि से रचित दिव्य वेश को भी पराजित कर रहे है, मरक्तमणि की कान्तिराशि के समान उज्ज्वल अङ्ग वाले वे श्री कृष्ण यही हैं ।।६१॥१७॥ अन्छा मैं तो लड्डू बनाने जाती हूँ और तू विशाखा के पास चली जा ॥६२।। (ऐसा कहकर दोनो चली जाती हैं)। .
२० ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक *
(इति निष्क्रान्ते)
विष्कम्भकः।
(ततः प्रविशति यथानिर्दिष्ट कृष्ण.)
श्रीकृष्णः- (पुरस्तादवलोक्य सानन्दम्)
श्रेणीभूतवपु श्रियामभिमुखे गोमण्डलीनां क्रमा-
दासां स्फाटिकगपडशैलपटलीपाण्डुत्विषो व्याजत ।
शङ्क ज्ञातगुणा पुरंदरपुराच्चस्कन्द मन्दाकिनी
वृन्दारण्यविहारिधन्ययमुनासेवाप्रमोदायिनी ॥६३।१८।।
श्रीनन्द: वत्स
साधु वर्णितम् । कि तु गोष्ठलक्ष्मीरपि पृष्ठतः
प्रेक्ष्यतामिति ॥६॥ (परावृत्य)
विशालगोशालबहुशिखरशाखाविततिभि
परीत सवाधीकृतसविधमम्भोधिगहनम् ।
समृद्धामागोवर्धनकटकमाकालियहद
श्रियं बिभ्रद्गोष्ठ स्फुरति परितस्तावकमिदम् । ६५।१६।।
विष्कम्भक. (भविष्यत् नाटक की सूचना)
[ फिर निर्दिष्ट स्थान पर श्रीकृष्ण प्रवेश करते है ]
श्रीकृष्ण-(आगे की ओर देखकर आनन्दपूर्वक) स्फटिक मणिमय
पर्वत के सदृश कान्ति और श्रेणीभूत शरीर-शोभा से सुशोभित होकर गौ-
मण्डली के रूप मे, जान पडता है-आज इन्द्रपुरी से वृन्दावन विहारिणी
यमुना की सेवा के लिए गुणवत्ती मन्दाकिनी हो आनन्दपूर्वक चली आ
रही है ॥६३॥१८॥
श्रीनन्दराज-पुन ' तुम ने सुन्दर कहा, किन्तु पीछे की ओर गोष्ट-
शोभा को भी देखो ॥६४।।
(सोछे की ओर देखते हुए)-आहा गोठ की कसी आश्चर्यमय
शोमा है । अनेकानेक विशाल गौशालाओ की शिखरो से परिव्याप्त
होकर, गोवर्धन से लेकर कालियहद पर्यन्त चारो ओर घनीभूत एव सकीर्ण
होपर दुर्गम समुद्र की भाति यह गोष्ठ सब प्रकार से सुशोभित हो रहा
है ॥६५॥१६॥
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक * [ २१ श्रीकृष्ण -सखे मधुमङ्गल । दूरमनुयोतोऽस्मि तातेन । तदविलम्ब मम्बया साधं गेष्ठ प्रविश्यताम् ॥६६।। यशोदा-जाद । किति अवरहे वि गोठ्ठण सुमरसि ज परमादरेण मए रन्धिदाइ पच्चह सोअलीहोन्ति मिट्ठण्णाइ । [जात ! किमित्यपालऽपि गोप्ठ न स्मरसि ? यत्परमादरेण मया रन्धितानि प्रत्यह शीतलीभवन्ति मिष्टानानि ] ॥७॥ मधुमङ्गल -गोउलेरसरि, सुणाहि । (इति सस्कृतेन) [ गोकुलेश्वरि, शृणु ] गोभ्य शपे किमपि दूपणमस्प नास्ति (इति वागुपक्रमे कृष्ण सस्नेहमेन पश्यति) ताभियदेष रभसादभिकृष्यमाण । कुञ्ज विशत्यधिक लिकलोत्सुकाभि ॥६८|| (इति वागसमाप्ती) श्रीकृष्ण -(सापत्रपमात्मगतम्) व्यक्तमेप बालिशो बल्लवीभिरिति वक्ष्यति । तदेन सज्ञया निवारयामि । (इति शिरस्तिरोधूनयति) ॥६॥ श्रीकृष्ण-मिन मधुमङ्गल | पिताजी के साथ बहुत दूर चला आया हू, अब शीघ्र माता के पास गोष्ठ मे चलें ॥६६।। श्रीयशोदा -पुन | तीसरा पहर हो गया है, क्या अभी भी तुम्हें घर की याद नहीं आई। मै कितने प्रेम से मिष्ठान चना रखती हू परन्तु रोजाना ठण्डे हो जाते है ॥६७॥ मघुमङ्गल- गोकुलेश्वरि । सुनो, मैं गौओ की शपथ साता है। इस मे वृष्ण का कोई दोष नहीं है। (इतना कहते हो श्रीकृष्ण मधुमङ्गल को प्रेम पूर्वक दयने लगे) माता यह उन सब पेलि-समुल्मका (ग्रज गोपिया) द्वारा बलपूर्वक आर्पित होकर कुन्ज मे चले जाते हैं-॥६॥ [ अभी यह बात समाप्त नहीं हुई थी ] श्रीकृष्ण-(लज्जायुक्त मन मे)-यह मूर्य अब आग म्पष्ट कप से ही गोपियो के साथ ऐमी बात कह देगा। इसलिए इसे मवेत मे रा 1 ६॥
२२ ] * श्रीविदग्धमाधव नाटक * मधुमङ्गल --भो वअस्स । किति म निवासि ज णिच्चिद अज्ज अज्जाया अग्गदो एद विण्णविस्सम् । (भो वयस्य । किमिति मा निवारयसि यनिश्चितमद्य आर्याया अग्रत इद विज्ञापयिष्यामि ॥७॥ श्रीकृष्ण -(स्वगतम्)हन्त, लज्जाजाले जाल्मधियाह पातितोऽस्मिा७१ मधुमङ्गल पीताम्बरस्त्वरितमम्ब सुहद्धटाभि ७२॥२०॥ श्रीकृष्ण -(सानन्दमात्मगतम्) कथमन्यदेवास्य हृद्गतम् ॥७३॥ यशोदा-वच्छ महुमङ्गल। सच्च ललिदापहृदीओ ओववालिआओ अ मह इद कहेन्ति ता डिम्भए हदम्हि । [ वत्स मधुमङ्गल । सत्य ललिता- प्रभृतयो गोपवालियाश्च मम इद कथयन्ति, तड्डिम्भहतास्मि ] ॥७४॥ श्रीनन्द -कुटुम्बिनि । कच्चिदनुरूपा निरूपितास्ति गोकुले काचिद्- वालिका यामुढाहयामो वत्सम् ॥७५।। (यह सोचकर श्रीकृष्ण ने निषेध रूप में सिर हिला दिया ।) मधुमङ्गल-हे सखा ! रोक क्यो रहे हो मुझे । आज मैं निश्चय ही माता यशोदा के सामने सव बात स्पष्ट कहूगा 11७०।। श्रीकृष्ण-(मन-मन) मे हाय । हाय इस मूर्ख बुद्धि ने मुझे लज्जा- जाल मे पटक दिया ॥७॥ मधुमङ्गल-माता ! कृष्ण बडी जल्दी ही सुहृदगणो के साथ क्रीडा करता है ॥७२॥२०॥ श्रीकृष्ण-(आनन्दपूर्वक मन ही मन मे) अहो । इसका मनोभाव कैसे बदल गया ॥७३|| श्रीयशोदा-वेटा मधुमङ्गल । सत्य है सत्य । ललिता आदि गोप बालिकाए भी मुझे यही कहा करती है। मैं तो बालको से हद प्राय हो रही हू 11७४॥ श्रीनन्दराज-कुटुम्विनि । गोकुल मे कोई इसके अनुरूप वालिका दीसती है जिस से इसका विवाह परदू ॥७॥ 7 ?
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक * [ २३ ३ यशोदा-सज्ज, दुद्धमुहस्स बच्छरस दाणि को क्खु उद्वाहाओसरी। [ आर्य, दुग्धमुखस्य वत्सस्येदानी क खलु उद्वाहावसर ] ॥७६|| मधुमङ्ग ल-(अपवार्य) वअस्स, सच्च दुद्धमुहोऽसि जदुद्धलुद्धाइ गोवकिस रीसहस्साइ तुज्झ मुह पिअन्ति । [ वयस्य | सत्य दुग्धमुखोऽसि यह ग्धलुब्धानि गोपकिशोरीसहस्राणि तव मुख पिबन्ति ] ॥७॥ (कृष्ण स्मित करोति) श्रीनन्द-यत्स, पश्य पश्य- अहह कमलगन्धेरत्र सौन्दर्यवृन्दे विनिहितनयनेय त्वन्मुखेन्दोमुकुन्द । कुचकलशमुखाभ्यामम्बरक्नोपमम्बा तव मुहुतिहर्षाद्वर्षति क्षीरधागम् ॥७॥२१॥ (इति कृष्णमालिङ्गय सानन्दम्) जितचन्द्रपरागचन्द्रिकानलदेन्दीवरचन्दनश्रियम् । परितो मयि शैत्यमाधुरी वहति स्पर्शमहोत्सवस्तव ॥७॥२२॥ श्रीयशोदा-आर्य | इस दूध-पीते बालक के विवाह का समय हो गया है क्या ॥७६॥ मधुमङ्गल-(धीरे से) सखे । सचमुच तुम ता दुग्धमुख हो, इसलिए दुग्धमुग्ध हजारो गोपकिशोरिया तुम्हारे मुख का पान (चुम्बन) किया करता है।। ४७॥ (श्री कृष्ण मुस्करात है ) श्रीनन्दराज-बेटा । देखो, तुम्हारी माता तुम्हारे कमलगन्धभरे समस्त सौन्दर्यमय अङ्गो मे तुम्हारे मुखचन्द्र के प्रति हा अपने नयन लगाए हुए है । मुकुन्द । यह अतीव आनन्दित होकर कुच कलशो से वक्षस्थलक वस्त्र को भिगोती हुई निरन्तर दूध की धारा प्रवाहित कर रही है।।७मारा (श्री कृष्ण को हर्ष पूर्वक आलिंगन करते है ) है पुत्र तुम्हारा स्पर्श महोत्सव व' रचूर्ण, चान्दनी, खस कमल तथा चन्दन से भी सर्वाधिक मेरे लिए शीतल-माधुरी प्रदान करता है ।।७।।२२।। ।
२४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * श्रीकृष्ण -तात, बुभुक्षाकृष्टमपि मत्प्रतीक्षपा स्वप तस्तम्भे गो- कदम्बकम् । तन्निवतेता तत्रभवन्तौ 1150|| श्रीनन्द - ययाह वत्स 1 (इति सस्नेह कृष्णमवलोकयन्सभार्यो निष्क्रान्त ) | श्रीकृष्ण - (पुरोऽवलोक्य) सुगन्धौ माकन्दप्रकरमकरन्दस्य मधुरे विनिस्यन्दे बन्दीकृतमधुपवृन्द मुहुरिदम् । कृतान्दोल मन्दोनतिभिरनिलेश्चन्दनगिरे- ममानन्द वृन्दाविपिनमतुल तुन्दिलयति ॥२२॥२३॥ राम -श्रीदामन, पश्य पश्य- वृन्दावन दिव्यलतापरीत लतास्तु पुष्पस्फुरिताप्रभाजः । पुष्पाण्यपि स्फीतमधुप्रतानि मधुवताच श्र तिहारिगीता ॥८३||२४।। श्रीकृष्ण-पिता जी | भूख से स्वय व्याकुल होते हुएभी मेरी इन्त जार में समस्त गोए स्तम्भित हो रही हैं । अत आप दोनो घर जाइये।।८०॥ श्रीनन्दराज-पुस । जैसे तुम कहो । १८१|| [ यह यहार श्रीनन्दराज स्नेहपूर्वक श्रीकृष्ण को देखते हुए श्री यशोदा जो के साथ वहा से चले जाते हैं ।] श्रीकृष्ण-(सामने देरासर) अहो मधुमगल । देश, देख- यह श्री वृन्दावन आम ये वृक्षो के मुवुलो (गुञ्चों) से मधुर गुगन्ध यो प्रवाहित पर मुग्ध हुए मयुररा धो वारम्पार वशीभूत पर रहा है और मनपाचन पो मन्द मन्द समोर मे आन्दोनित होकर यह मुझ अतिगय आनन्दित पर रहा है ।।।२३।। श्रीवनराम । देगो, देगो- मह धीवृन्दावन दिव्यानतातो से परिवेष्टित हो रहा है, मताए अग्र- भाग से पुणो मे लदी हुई है. पुप्पी पर भवरे बेटे हैं तथा ये यातो को गुग्ध परा पाना गाा पर रहा२४॥
* श्रीविदग्धमाघवन्नाटक* [ २५ श्रीकृष्ण -सखे मधुमङ्गल, भवद्विधानामातत्तिशसिभिवंशीगोतरा. नन्दयामि वृन्दाटवीवास्तव्यान् । (इत्यघरे वेगु विन्यस्यति) ॥१४॥ राम -(साश्चर्यम्) हन्त, परस्परविपर्यस्तस्वभावानामपि भावाना धर्मविपर्यय पश्यत ।।५।। जातस्तम्भतया पयासि सरिता काठिन्यमापेदिरे ग्रावाणो द्रवभावसवलनत साक्षादमी मार्दवम् । स्थय वेपथुना जहुर्मुहुरगाज्जाड्य द्गति जङ्गमा वशी चुम्पति हन्त यामुनतटोकोडाकुटुम्बे हरौ ॥८६॥२५।। मधुमङ्गल-ही ही अच्चरिअम् । पउरदरगलन्दच्छीरकल्लोलिणोहि अकुसुमलदारण हन्त सेअ कुणन्ती। पिविध महुरवशीणादपोऊसपूर फुरइ गरुअसौक्खत्यम्भिदा घेणुपत्ती १८७॥२६॥ श्रीकृष्ण-मित्र मधुमङ्गल । अब मै तुम सब के आने की सूचना देने वाली वशीध्वनि के द्वारा सव वृन्दावन वासियो को आनन्दित करता हू। १४॥( यह कहकर वे वशी को अघर पर धारण कर वजाते हैं।) श्रीबलराम-(चकित होकर) अहो । परस्पर विरोधी स्वभाव के होते हुए भी ये सव अपने प्रतिकूल स्वभाव वालो मे अपने धर्म को समर्पण कर रहे है और उनके धर्म यो स्वय ग्रहण कर रहे हैं-देम्वो,देखो-६५।। आहा ! यमुना तट पर अनेक क्रीडा करते हुए श्रीकृष्ण वशी को चुम्बन कर रहे है-वशी ध्वनि को सुनते ही सब नदिया का जल स्तम्भित होकर कठिनता को प्राप्त हो गया है और पापाण द्रवित होकर सटत. कोमलता को प्राप्त हो रहे हैं। सव स्थावर वारम्बार पम्पित होकर चलायमान और जगम स्थावरो के धर्म को ग्रहण कर स्थिर हो रहे हैं। ८६॥२५॥ मधुमङ्गल-अहो आश्चर्य । मधुर वशी ध्वनि रूप अमृत या पान कर समस्त गौए महान मुष या अनुभव पर स्तम्भित हो रही है , इनले स्तनों से प्रचुर दूध की धारा नविन होयर, नवीन वुगुग लताओ को सिचित कर रही है ॥२६॥ महा मानयं॥ - २६ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक * [ हो ही आश्वयंम् । प्रचुरतरगलत्क्षीरकल्लोलिनोभि नवकुसुमलतानां हन्त सेकं कुर्वती। पीत्वा मधुरवंशीनादपीयूषपूरं स्फुरति गुरुसौरयस्तम्भिता धेनुपङ्क्तिः ॥ ] ॥७॥२६॥ (इति कृष्णं हस्तेन चालयन्) भो पिअवअस्स, फीस णिन्भरं गवाएसि । एदाए च्चे वेणुजादीए एसा उन्मादिआ पइदो । एत्य उण णिमित्तमेतं पषु तुमम् । [ भो प्रियवयस्य, कस्मानिर्भरं गर्वायसे । एतस्या एव देणुजातेरेपोन्मादिका प्रकृतिः । अब पुननिमित्तमात्रं खलु त्वम् ] ८il (आकाशे) रुन्धनम्बुभूतश्चमत्कृतिपरं कुर्वन्मुहुस्तुम्बुर ध्यानादन्तरयन्सनन्दनमुखान्विस्मापयन्वेघसम् । औत्सुक्यावलिभियलि चदुलपभोगीन्द्रमापूरणं म- भिन्दन्नडकटाहभितिमभितो बनाम वंशीध्वनिः ।।८६॥२७॥ रामः-(सहर्षम् ऊर्ध्वमवलोक्य स्वगतम्) कथं मेघान्तरितोऽयं सुरधिः परम्पयीणामास । ६०॥ (ऐसा कहकर श्रीकृष्ण को अपने हाथ से हिलाते हुए मधुमङ्गल फिर कहता है) हे प्रिय मिन ! तू किस लिए गर्व कर रहा है ? यह सब उन्मा- दिका शक्ति वेणुजानि की है, तू तो केवल निमित्त मात्र ही है ॥८॥ [आकाश में] वंगी ध्वनि से मेघ अवरत हो गये, स्वर्ग में रहने वाले गन्धर्व आश्चर्यचकित हो उठे, सनक सनन्दनादि मुनिजन का ध्यान टूट गया, ग्रह्मा विस्मित हो गए, बलिराज उत्सुकतावश अधीर हो उठा, भोगीन्द्र अनन्त देवतागण चकरा गए, इस प्रकार ब्रह्माण्ड को भेद कर यह बंशी- पनि मर्यमाव मे भ्रमण करने लगो ॥८६॥२७॥ श्रीयलराम-हिपंपूर्वक आर पी और देसफर मन ही मन मे)देवर्षि नारद मेषों में घिसकर से वीणा पर गान कर रहे है ? HEom * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * [ २७ (पुनराकाशे कलकल.) मधुमङ्गल.-(ऊर्ध्वमवलोक्य सभयम्) अब्बम्हण्णं अब्बम्हण्णम् । भो भो, पलाअम्ह पलाअम्ह । [ अब्रह्मण्यमब्रह्मण्यम् । भो भो, पलायामहे पलायामहे ] ॥६॥ श्रीदामा.- वाउल, किति गिरगलं पलवसि । [ वातुल, किमिति निरर्गल प्रलपसि ] 18२। मधुमङ्गल -(ऊर्ध्वमवलोक्य सभयम्) अरे मुक्ख गोआलिआ, कि ण पेक्खसि । एसो समारूढहंसो जग्गेण भुअद्भधारिणा केणवि वेदालेण सद्धं चउम्मूहो को वि जवखो रक्खसो वा आअच्छदि । (पुनर्वीक्ष्य सोत्कम्पम्) हो माणहे, एदे अ अच्छोहिं पूरिदसव्वङ्ग कपि दाणा अग्णेकदुअ अवरे असुरा गअरणं आवमन्दि । ता सकेमि हटकसस्स किकरा हुविस्सन्दि । [ अरे मूर्ख गोपाल, किं न पश्यसि । एप समारढहसो नग्नेन भुजङ्ग धारिणा पेनापि वेतालेन सार्ध चतुर्मुख कोऽपि यक्षो राक्षसो वागच्छति । ही मन्यामहे, एते चाक्षिभि पूरितसर्वाङ्ग कमपि दानवमग्रेकृत्य अपरेऽसुरा मगन- माक्रमन्ति । तच्छङ्के, हतकसस्य किंकरा भविष्यन्ति ] M६३॥ (इति सत्रास कृष्णकक्षान्तरे शिरस्तिरयति) [ आकाश में पुन कल-कल शब्द होता है । मधुमगन-(ऊपर की ओर देखते हुए भयभीत होकर) हम अवध्य है, हमे मत मारो, हम भाग जाते है भाग जाते है ।।१।। श्रीदाम-अरे वावरे ! क्यो अनर्गल प्रलाप कर रहा है ॥२॥ मधुमङ्गल-(ऊपर की ओर देखकर भय युक्त) अरे मूर्ख ग्वाल | तू क्या नहीं देखता है, हस पर चढा हुआ चार मुखो वाला जाने कोई यक्ष है या राक्षस , सर्पो को धारण करने वाले किसी न गे वेताल के साथ ना रहा है । (उस तरफ फिर देखकर वापते हुए ) अहो । मुझे ऐसा लगता है, सवं अगो मे जिस के नेत्र ही नेत्र लगे हुए है, ऐसे किसी दानव को आगे करके अन्यान्य असुरगण आकाश मे आक्रमण कर रहे है । मैं समझता हूँ परे क स के सेवक होगे ॥३॥ .
२८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक* कृष्ण - (स्वगतम्) कथमेते वेणुनादमाधुरीभिराटा पयोद- वीथोमवगान्ते दिशामधीशा १६४॥ (इति पुनर्वेणु क्यणयति) मधुमङ्गल -(वलोक्य सोच्छवासमात्मगतम्) एदे दुट्ठदाणआ वअस्सस्स वेणुसद्दमेत विम्हला भविअ सज्झसेण मुज्झन्ति । ता जीइदो म्हि । (इति साटोप परिक्रम्य प्रकाशम्) रे रे दुठा असुरा, चिठ्ठय चिठ्ठध। एसो ह सावेण चावेण वा तुम्हाण मुण्डाई खण्डेमि । [ एते दुष्टदानवा वयस्यस्य वेणुशब्दमावेण विह्वला भूत्वा साध्वसेन मुह्यन्ति । तज्जीवितोऽस्मि । रे रे दुष्टा असुरा । तिष्ठत तिष्ठत । एषोऽह शापेन चापेन वा युष्माक मुण्डानि खण्डयामि ] (इति दण्डमुद्यम्यमुहुरूज़ दति)। ६शा राम -(विहस्य) वयस्य, मैव प्रबो । एतो भगवन्तो हरहिर- ज्याभो । सम्यतश्चामो पुरदरादयो वृन्दारका ॥६६।। (यह कहार भयभीत होकर मधुमङ्गल अपना सिर श्रीकृष्ण की वगल मे छिपा लेता है) श्रीकृष्ण-(मन मे) क्या ये दिग्पाल ही वेणु की मधुर ध्वनि से खिचे हुए मेघ पथ से चले आ रहे है ? ||१४|| (यह कहकर फिर वशी बजाते हैं।) मधुमगन-(देखकर लम्बी सास छोडते हुए मन मे) ये सब दुष्ट दानव कृष्ण वी वशी ध्वनि मात्र से व्याकुन होकर भय से मुग्ध हो रहे है । चलो जान बची। (ऐसे कहकर दर्पण के साथ घूम वर प्रकाश करते हुए) अरे रे दुष्ट दानको रस जाओ, रष जाओ, मैं अभी शाप और चार से तुम्हारे मस्तव पाटे देता हूँ ॥६॥ (यह यहार लाठी यो ऊ चा उठावर मधुमङ्गल यार बार ऊ चा पूदने लगता है)। श्रीबलराम-(जोर मे हमने हुर) मिम । ऐमा मत यहो, ये तो दोनो भाशन महादेव और ब्रह्मा हैं और इनकी वाई तरफ इन्द्रादि देवता हैं ॥९ 1
*श्रीविदग्धमाघव-नाटक *
[ २६
मधुमङ्गलः-सुठ (समाश्वस्य) भो! जाणन्तेण च्चेअ मए एदं
पडिहसिदम् । तदो तुम्हेहिं खु रक्खसबुद्धीए भोलुएहि पलाहदु पउत्तम् ।
[ सुप्छु । भोः, जानतव मयेदं परिहसितम् । ततो युप्माभिः खलु राक्षस
वुद्धया भीरुभिः पलायितु प्रवृत्तम् ] ६७||
श्रीकृष्ण-(स्मित्वा) हहो देवानांप्रिय. निजामेव जाल्मतां तेषु
संक्रामयसि ॥६॥
रामः-पश्यत पश्यत।
अष्टाभिः श्रुतिपुट कैनववणवकाकली कलयन् ।
शतधृतिरपि धृतिमुक्तो मरालपृष्ठे मह ठति ॥६६॥२८
(आकाशे पुनर्बीणागीतिः)
उदिते हरिवन्दी वेणुनादसुधामुचि ।
हन्त रुद्रसमुद्रण स्वमर्यादा विलचिता ॥१००।२६।।
मधुमङ्गल-ठोक (ठण्डी सास लेकर) आहा ! मैंने ये सब जानते हुए
ही परिहास किया था। तुम सब भीरू भागना चाह रहे थे इन्हें राक्षस
समझकर ॥७॥
श्रीकृष्ण-(मुस्कराकर) वाह रे देवप्रिय ! (अर्थात् पशु) अपनी
मूर्खता हमारे पर थोप रहा है ? ॥८॥
श्रीवलराम-देखो, देयो-
आठों कानों से वेणु की नवीन-ध्वनि सुन ब्रह्मा जी अधीर होकर
हंस की पीठ पर वारम्बार लोट-पोट हो रहे हैं IIEIR८॥
[आकाश मे फिर श्री नारद जी वीणा वजाते है]
आहा ! वेणुनादरूप अमृत वर्पणकारी श्रीकृष्ण मुख-चन्द्र के सदित
होने पर श्री महादेव स्प समुद्र ने तो अपनी मर्यादा ही उलंघन कर डाली,
-नाचने लगे ॥१०॥२६॥
३० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * सोत्कण्ठ भरलीकलापरिमलानाकर्ण्य धुर्णत्तनो- रेतस्याक्षिसहस्रतः सुरपतेरश्रूणि सत्र भुवम् । चिन्न वारिधरात्विनापि तरसा परद्य धारामय- • रात्पश्यत देवमातृकमभूदृन्हाटवीमण्डलम् ।।१०१।३०।। श्रीकृष्णः-(स्वगतम्) पुराणानाममोपां पुरस्ताद्विहारे संकुचन्ति मे चैतोवृत्तयः । तदने यामि । (इति तरूणामन्तरमासाद्य प्रकाशम्) सखे मधमङ्गल, पश्य माधवीयां वनमाधुरीम् ॥१०२।। वचिद्भूगोगोतं क्वचिदनिलभङ्गाशिशिरता क्वचिद्वल्लीलास्यं क्वचिदमलमल्लीपरिमलः । क्वचिद्धाराशाली कनकफलपालोरसमरो हुपीकाणां वृन्दं प्रमदयति वृन्दावनमिदम् ॥ १०३॥३१॥ श्रीयलराम-देखो, उत्कण्ठा सहित मुरली की अमृतमय ध्वनि- क्लाप को सुन कर इन्द्र मुग्ध हो गया है । उसके सहस्र नेत्रों से अव धाराए पृथ्वी पर गिरने लगी हैं । कैसा आश्चर्य ! दूर से देसने से ऐसा लगता है कि मेघो के विना भी इस धारा प्रवाह से आज श्री वृन्दावन मण्डल वर्षा से प्लावित हो देवमातृक' प्रदेश होरहा है । १०१॥३०॥ श्रीकृष्ण-(मन मै) इन सब बड़े लोगों के आगे विहार करने मे मेरी मनोवृत्ति स कुचित हो रही है, इस लिए आगे चलता हूँ। (यह सोच कर वृक्षों के मध्य जाकर कहते है-) मित्र मधुमङ्गल! देस देस श्रीवृन्दावन की वमन्ती माधुरी को ॥१०२।। कही तो भवरे गुंजार रहे हैं, वही शीतन रामीर यह रही है, नाच रही हैं यही लताएं, छा रही है वही मोतिया की निर्मल सौरम । वही अनारी के फूटने से रस धारा प्रवाहित हो रही है, अहो ! यह श्रीवृन्दावन समस्त इन्द्रियों को आनन्दित कर रहा है ।।१०३१॥३१॥ - १. 'देवमाया' वह प्रदेश रहलाता है जो नदिरे बस पर नहीं वाक जस १५ ही निर्भर रहा-पानी बारानी इलारा।
52866 * श्रीविदग्धमाधव-नाटक* मधुमङ्गल-भो वअस्स, एका पदुमगम करिए कि मे कौदू- हलं तुज्झ वुन्दाटईए। अहं क्खु चउविहेहि अण्णेहि सब्धिन्दिअहारिणों गोउलेसरीए रसवई जेव्व दळूण रञ्जेमि। [ भो वयस्य, एतत्प्र- दुष्टभङ्गभयर्या किं मे कौतूहल तव वृन्दाटव्या । अह खलु चतुर्विधरन: सर्वेन्द्रियहारिणी गोकुलेश्वर्या रसवतीमेव दृष्टवा रज्यामि ॥१०४॥ श्रीकृष्ण -वयस्य, वन्दस्व वृन्दाटवीमेव। स्फुटमस्याः पुराणवल्लरी- भिरपि तवाभीष्ट फलमुल्लासयितुं समयंते ॥१०॥ मधुमङ्गल - भो पिअवअस्स ! तुम सच्चवादित्ति सव्वलोएहि झणिज्जसि । ता इमरस तुज्झ वअणास मए परीच्छा कादव्वा । (इत्यञ्जलि बघ्वा) भो वल्लरीओ, एसोहं वन्दामि। बुहुविखदो मे वअस्सो, ता देन्तु खण्डलड्डुआई ।। भो प्रियवयस्य । त्व सत्यवादीति सर्वलोकण्यसे, तदेतस्य तव वचनस्य मया परीक्षा कर्तव्या। भो वल्लर्य , एपोऽह वन्दे । वुभुक्षितो मे वयस्य , तद्दीयन्ता खण्दलड्डुकानि ] ॥१०६॥ (प्रविश्य मोदकपूर्णपानहन्ता पौर्णमासी) मधुमङ्गल-हे सखे' दुष्ट भ वरो से भयावनी इस तुम्हारी वृन्दाटवी से मेरे लिए क्या कुछ आनन्द मिल सकता है ?- मैं तो चतुर्विधर व्यजनो द्वारा समस्त इन्द्रियो को लुभाने वाली माता-यशोदा की पाक्शाला को देखते ही सुखी होता हू ।।१०४।। श्रीकृष्ण-मित्र | श्रीवृन्दावन की वन्दना कर । अपने मे प्रस्फुट होने वाली प्राचीन लताओ से भी यह श्रीवृन्दावन तुम्हारी मनोवान्छा को पूर्ण करने में समर्थ है ।।१०।। मधुमङ्गल-हे प्रिय मित्र ' सब लोग तुम को मत्यवादी कहते है, इसलिए आज मुझे तुम्हारे वचनो को परिक्षा करनी है । ( यह कहकर मधुमङ्गल दोनो हाथ जोडर रहता है-'हे लताओ मैं आपको बन्दना करता हू । मेरा मित्र कृष्ण भूख से आतुर हो रहा है । तुम इसे चीनी में लडडू प्रदान करो।।१०६॥ २- चय(चबाये जाने वाले) चोप्य (चूमे जाने वाले), सेह (नाटे जान वाले) एव पेय (पोये जाने वाले)-चतुर्विध प्यउन पहलाते हैं।
३२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * पौर्णमासी-चन्द्रानन कृष्ण! गृहाण रसज्ञामोदकानमन्मोदकात् ॥१०७॥ राम:-(सस्मितम्) वयस्य ! हटा जरवल्लरीवदान्यता ? ||१०|| पौर्णमासौ-संकर्षण! जरबल्लवीवदान्यतेति भण्यताम् ॥१०॥ श्रीकृष्ण:-आर्य ! केयं जरबल्लवी? ॥११०।। पौर्णमासी-चन्द्रमुख ! मुखरा ॥१११॥ श्रीकृष्ण:- 1:-तया किमकाण्डे खण्डलडडुकानि समपितानि ॥११२।। पौर्णमासी-नत्री तावदेतया अभिमन्यो. पाणी परिणायिता । तदुत्तवाभिरूप: समुदाचारोऽयमनुसतं ॥११३॥ श्रीकृष्ण:-केयं नत्री ॥११४।। पौर्णमासी-राघाभिधाना काचिदानन्दकौमुदी ॥११॥ [इतने में लड्डुओं का थाल हाथ में लेकर पौर्णमासी प्रवेश करती है ] पौर्णमासी-हे चन्द्रमुख कृष्ण ! रसना को तृप्त करने वाले इन लड्डुओं को ग्रहण करो ॥१०७॥ श्रीबलराम-(मुस्कराते हुए) सपे ! देखी है प्राचीन बल्लिरियों (लताओं) की वदान्यता ? ॥१०८।। पोएमासी-बलराम ! पराचीन वल्लवी ( गोपी ) की वदान्यता--- ऐमा कहो ॥१०॥ श्रीकृष्ण-आर्य ! कोन सो वह प्राचीन गोपी?॥११०॥ पौर्णमाप्ती- चन्द्रमुख ! मुगरा ।।१११॥ श्रीकृष्ण-उसने फैसे अचानक सण्ड के लड्डुओं को भेजा ? ॥११२॥ पौर्णमामी -उस मुगरा ने अपनी दोहनी का अभिमन्यु के साथ विवाह कर दिया है। उस आनन्द उत्मय के उपलक्ष्य में ये भेजे हैं ।।११३।। श्रीकृष्ण- उग को दोहनो कोन ? ॥११॥ पौर्णमासी-रामा नाम यामी, अनिर्वचनीय आनन्द ज्योलनारूप॥११५
*थोविदग्धमाघव-नाटक *
[ ३३
श्री कृष्ण -(सरोमाञ्चम् स्वगतम्। श्रुत नूनमम्चयो सवादे शक्ष-
दस्या सौष्ठवम् (इति कम्पमानो व्रीडा नाटयति) ॥११६।।
पौणमासी-(स्वगतम्) कृष्णं विलक्षमवेक्ष्य नूनं राम सव्याजमसौ
सव्यत प्रयाति ॥११७.
श्रीकृष्ण -(पुनरात्मगतम्) विक्रिया सगोपयितु प्रसङ्गान्तरमनीकु-
र्याम् । (प्रकाशम्) आयें । अद्य खलु मधुवासरे त्वयापि काचिन्महोत्सवलक्ष्मी-
रलक्रियताम् । पश्य जरदल्लीणोरिय फुल्ला पल्लविता च ।।१८।।
पौर्णमासी-(सम्मितम् नागर, तवैव महोत्सवानामवसरोऽय
सवृत्त । यदत्र पुष्पाणा पल्लवानाञ्च तृष्णया बल्लवाना विलासिन्य
समेष्यन्ति ।।११६॥
श्रीकृष्ण - (सस्मित तिर्यगवेक्ष्य) आर्ये, तत किम् ? ॥१०॥
श्रीकृष्ण-(रोमाचित होकर मन मे) निश्चय ही मैंने माता रोहिणी
और यशोदा की परम्पर बात-चीत मे निरन्तर उस राधा के सौन्दर्य की
चर्चा सुनी है (यह कहकर पुलक्ति हुए परन्तु शर्मा गए)। ॥११६।।
पौर्णमासी-(मन मे) कृष्ण को शर्माता हुआ देख बलराम छलपूर्वक
वाई और को जा रहा है ।।११७॥
श्रीकृष्ण-(फिर मन मे) राधा नाम कहने सुनने मे जो पुलक-विकार
उदय हो उठा है. इसे छिपाने के लिए दूसरी बात चलानी चाहिये । (स्पष्ट
बोले)-आयें । आज वसन्त के दिन तुम भी कोई महोत्सव-शोभा सम्पादन
परा। देसो,मब प्राचीन लताए भी पुष्पित और पल्लवित हो रही है।।११।।
पौर्णमासी-(मुस्कराते हुए) नागर । तुम्हारे ही महोत्मवो का अर
अवसर है। पुप्पो और फलो को लेने के लिए गोर-रमणिया अब यहा
आया करेंगी ॥११॥
श्रीकृष्ण-(मुम्बरा कर टंटी नजर मे देखते हुए) जायें। फिर क्या
होगा ॥१२०॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक * पौर्णमासी-(विहस्य) विलासिन्, स्ववासनानुसारतोऽयथा मा शद्धिष्ठा । परमेवमभिप्रायास्मि । ततस्तासा शून्येषु सम्मसु सखिभिस्ते सुखमपहर्तव्यानि गव्यानि ॥१२॥ श्रीकृष्ण - धूर्ते। कि परिहस्यते । पश्य, कोमलमञ्जरीमवचिन्वतीना बल्लवीना मण्डलेन खण्डितानि मे वृन्दाटवीशाखिविटपानि । तदेतास्ते निवारणीया ||१२२॥ पौर्णमासी-मोहन | नव्यस्तबकोत सिना भवतैव समुल्लासितोऽय कुसुमेपुरागो बल्लवीनाम् । ता कथमितो निवायन्ताम् ॥१२३।। श्रीकृष्ण -(स्मित्वा) अयि बलाकावलक्षवे शि | कथोपक्रमावर मेव पन्यानमधिरूढासि । यदपराधिकास्वपि बल्लवीषु पक्षपात न मुञ्चसि ॥१२४ पौर्णमासी-सुन्दर । सप्रति सराधिकाः खलु बल्लव्य कयमपरा. पौर्णमासो-(हमकर) विलासि। अपनी वासनानुसार और कोई आशङ्का मत कर । मेरा तो अभिप्राय यह है कि उनके यहा आजाने पर उनके सूने घरों में तुम्हारे मखा जाकर मुखपूर्वक दही माखन चुरा सकेंगे ॥१२१॥ श्रीकृष्ण धूर्ते ! क्या परिहास करती हो ? देखो, कोमल कोमल मजरियो को चुनने वाली गोपियो ने वृदावन के वृक्षो की शाखाओ को तोद डाला है, तुम को उन्हें रोक देना चाहिये ।। १२२॥ पौर्णमासी-मोहन ' तुम्हारे ही सिर पर नवीन पुष्प गुच्छो को देसकर अपने को भी उन्ही से सजाने के लिए गोपिया को पुष्पो मे अनुराग पैदा हुआ है । (पक्षान्तर मे-तुम्ह दसवर ही गोपियो मे वन्दपं. आवेता पैदा हुआ है। फिर उनका ऐसा करने मे तुम क्यो रोते हो।१२३॥ श्रीकृष्ण-(मुम्ब रात हुए)अरी वगलो की भाति सपेद वेगो वाली! बात वजारम्म मे हा वयो टड़ा दय अपना रहो हो ? वे गोपिकाए अपराधिया(अपराधी)है,(पक्षान्तर मे राधिका-रहित है-उनके साथ राधिका नहीं है) तो भो तू उनका पक्षपात नहीं छोडती ॥१२४।। पौर्णमाप्ती-मुन्दर ' अब वे गोपिकाए सराधिका (श्रीराघावे * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * [ ३५ धिका सन्तु । तेन ते प्रियस्य पुन्नागस्यापि सुमनःस्तेयं हठेन करिष्यन्ति ॥१२५ श्रीकृष्ण:--(स्वगतम्) हन्त, कथ मनोहारिणी संव देवात्पुनरावर्तते राधिकावार्ता ! ॥१२६ । मधुमङ्गल-(स्वगतम्) कहं राहीति णाममेत्तण उन्मणाएदि एमो ? (प्रकाशम्) भो वअस्स ! मा खु इमाए उवरि निर्भरं सतिष्णो होहि । [ कथ राधेति नाममात्रणोन्मनायते एप. ? भो वयस्य, मा सल्वेतम्या उपरि निर्भर सतृष्णो भव ] 1|१२७।। श्रीकृष्ण.-(सप्रणयरोपम्) धिग्वाचाल ! कुत्राहं सतृष्णः ॥१२८।। मधुमङ्गल -भो मा कुप्प । सरसाए, मनोहरालीए उवरित्ति भणामि । [ भो मा कुप्य, सरसाया मनोहगल्या उपरीति भणामि ] ।१२६॥ श्रीकृष्ण:~-सखे, भ्रान्तोऽसि । नेमानि मनोहराख्यानि, किंतु मौक्तिका. ख्यानि लड्डुकानि ।।१३०।। सहित) है, अपराधिका कैसे ? वे तुम्हारे प्रियतम पुन्नाग वृक्ष के फूलो का जबरदस्ती हरण करेंगी ॥१२।। श्रीकृष्ण-(मन मे) हाय । फिर कैसे अकस्मात् उस मनोहारिणी राधा की वात चल पडी ? ॥१२६॥ मधुमङ्गल-(मन मे) पता नही राधा के नाम लेने मात्र से क्यो यह उत्कण्ठित हो उठता है ? (स्पष्ट कहता है-) हे सखे ऊपर अतिशय लालायित मत होवो ॥१२७॥ श्रीकृष्ण-(प्रेमयुक्त क्रोध से) अरे वाचाल ! तुम्हे धिक्कार । मैं किस पर लालायित हो रहा हू ॥१२८11 मधुमङ्गल-मुझ पर क्रोध मत करो, मैं तो सरस मनोहर लड्डुओ के ऊपर कह रहा हू । (पक्षान्तर मे-सरस मनोहर रमणियो के ऊपर कह रहा हूँ) ॥१२॥ श्रीकृष्ण-मित्र | तू चक्कर में पड रहा है । ये मनोह रास्य (मनोहर नाम वाले) लड्डू नहीं है-ये हैं मौक्तिवात्य (मौक्तिक नाम वाले)॥१३०।। - तुम उस के * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * ? मधुमङ्गल:-(विहस्य) पिअवअस्स, ण क्खु अहं भमिसोले राहाचक्के वहामि, कुदो ममिस्सम् ? । प्रियवयस्य ! न खल्वह भ्रमिशीले राधाचन वत्त, कुतो भ्रमिष्यामि' ] ॥१३१|| पौर्णमासी-(स्वगतम्) सत्यं परिहस्यते बटुना, यदेष भावोद्व- त्वचेतोवृत्तितया वलक्ष्यभागभिलक्ष्यते तदद्य, पूर्णकामास्मि । (प्रकाशम्) सुन्दर | कृतमत्रोत्कण्ठया । सा विष्णुपदवीथीसचारिणी राधा नृलोके फेन लभ्यताम् ॥१३२॥ श्रीकृष्ण - (सम्मित विष्णुपदवीथीमवेक्ष्य राममनुसर्पन्) आर्य! य- तोतेयं मध्याह्नमर्यादा । तत कालिन्दीतीरेऽवतीर्य समापयन्तु भवन्तः पशूनां पानीपतृष्णाम् । स्वादयन्तु च स्वादूनि लड्डुकानि । मया तु सुहृतमाभ्यां श्रीदामसुबलाभ्यां सह मुहूर्त मनतो विश्रमितव्यम् । १३३॥ (रामः सखिभिः सह निष्क्रान्त.) पौर्णमासी-(स्वगतम्) मयापि प्रतिच्छन्दस्य सिद्धिमवधारयितु मधुमङ्गल-(हसकर)प्यारे मिन!मैं उस घुमा देने वाले राधा-चक्कर मे नही पडा हू, घूमूगा कहा ॥१३१॥ पौर्णमासी-(मन मे) यह मधुमङ्गल ठीक परिहास कर रहा है । क्योंकि राधा-भावोदय से श्रीकृष्ण के चित्त की वृत्तियो मे विलक्षणता दीखती है इसलिए आज मेरी कामना पूर्ण हो गई है। (स्पष्ट कहती है)- सुन्दर | इस विषय मे तुम उत्कण्ठित मत होओ, आकाश मे विचरने वाली रापा को नृलोक मे कौन प्राप्त कर सकता है?॥१३२।। श्रीकृष्ण-(मुस्कान पूर्वक आकाश की ओर देखकर श्रीवलराम के निकट जाते हुए) हे आर्य! मध्याह्न का समय हो गया है, इसलिए कालिन्दी के तट पर जाकर आप गौओ की प्यास बुझवाओ और इन मधुर लड्डओ पा भी भोजन वीजिए । मैं तो यहा पहले श्रीदाम एवं सुवल सखाओ के माय एक मुहर्त भर विथाम करना चाहता हू ॥१३३।। [श्री बलराम ममाओ के साय चले जाते हैं ] पौर्णमासो-(मन में ) मुझे भी चित्रपट की मिद्धि के लिए जाना चाहिये ॥१३४।। (यह गोचकर वह श्रीकृष्ण को आशीर्वाद देकर चली * श्रीविदग्धमाघव-नाटक * [ ३७ 1 - गन्तव्यम् । (इति कृष्णमभिनन्द्य परिकामति) ॥१३४॥ श्रीकृष्ण:-(पदान्तरे स्थित्वा) सखे धीदामन, कि हष्टपूर्वा तेज गदपूर्वा राघा? ||१३५। (श्रीदामा सलजस्मितं मुखमवाञ्चयति) सुबल:-वअस्स, दिठ्ठपूवेति किं एत्ति भणासि । रणं इमस्स वहिणी पखु एसा । [वयस्य, दृष्टपूर्वेति किमेतावद्भणसि । ननु एतस्य भगिनी खलु एपा ] ॥१३६॥ श्रीकृष्णः-तदेहि । क्षणमत्र कदम्बसंबाधे रोधसि निविश्य राधा- नुधावनादुद्वेगि चेतो वंशीवादनविनोदेनान्यतः क्षिपामि ॥१३७।। (इति निष्क्रान्तः) पौर्णमासी-(परिक्रम्य पुरः पश्यन्ती सानन्दम्) कथमित एव वयस्या विहस्यमाना विक्रीड़ति में वत्सेयं राधिका ? (इति लतान्तरे स्थित्वा) ॥१३॥ बलादक्षणोर्लक्ष्मीः कवलयति नव्यं कुवलयं मुखोल्लासः फुल्ल कमलबनमुल्लङ्घयति च । जाती है।) श्रीकृष्ण-(दूसरे स्थान पर जाकर) मित्र श्रीदाम ! तुमने कभी जगत् में अपूर्वरूपवती उस राधा को देखा है ? ॥१३५।। [श्रीदाम शर्माकर मुस्कराते हुए मुंह नीचे कर लेता है] सुबल-कृष्ण ! तुमने राधा को कभी देखा है-यह बात श्रीदामा से कैसे पूछ रहे हो? वह तो इसकी बहन है ॥१२६॥ श्रीकृष्ण-अच्छा आओ, इन कदम्वों की घनी छाया के नीचे बैठ- कर राधा-चिन्ता में उद्विग्न मन को वंशी वादन रूप आनन्द मे दूसरी ओर लगाता हूँ ? (यह कह कर चले जाते हैं) ॥१३७।। पौरम्मासी-(घूम कर आगे देखकर आनन्द सहित) आहा ! सखियो के साथ हंसती हुई मेरी बेटी राधा यहां कैसे खेल रही है ? (यह कह कर एक लता के नीचे बैठकर)॥१३८|| -
३८ ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक *
दशां कष्टामापदमपि नयत्याङ्गिकवि-
विचित्रं राधायाः किमपि किल रूपं विलसति ॥१३॥३२॥
तदेतयोनिमलनमंगोष्ठीप्रतिबन्धं परिहरन्ती वीरुन्निरुद्ध नावना विशाखां
यामि .१४०॥
(इति निष्क्रान्ता)
(ततः प्रविशति ललितयानुगम्यमाना राधिका)
श्रीराधिका-हला ललिदे, कि करेदि अज्जिा ? | हला ललिते कि
करोति आर्या? . ॥१४॥
ललिता--सहि ! तुह सुरदेअस आकिदे एसा तमालतले वेदि
णिम्मादि। [ सखि, तव सूर्यदेवस्य पूजाकृते एपा तमालतले वेदिवा
निर्माति ] ||१४२॥
श्रीराधिका-(पुगेऽवलोक्य) हला लालदे, सोमि साच्चेअ एसा
बुन्दाड़ई जाए माहुरी तुए पुगो पुणो मम वणीअदि । [ हला ललिते,
श, सवैषा वृन्दाटवी, यस्या माधुरी त्वया पुनः पुनर्मम वय॑ते ] ॥१४३।।
आहा ! श्री राधा के नेत्रो को शोभा नबीन कमल की शोभा को
वरवश ग्रास कर रही है, मुख की शोभा विवसित कमलवन का उल्लघन
कर रही है, अङ्गो की शोभा स्वर्ण छटा को भी लज्जित कर रही है, इस
राधा का विचिस्प सा अनिर्वचनीय विलास कर रहा है ।१३६॥३२॥
इस लिए राधा एवं कृष्ण ईन दोनो की निर्मल नम गोष्ठी मे ग्या-
घट न डालकर लताओं से आवृत मार्ग द्वारा विशासा के पास चलती
हू (यह पह कर पौर्णमासी चली जाती है) ॥१४॥
[इसके बाद ललिता के साथ उसके पीछे पीछे चलती हुई श्रीराधा
प्रवेश करती है]
धोराधिका-हे ललिते ! आर्या पोर्णमासी क्या कर रही है?|१४||
तसिता-सारा । तुम्हारी मूर्यदेव पी पूजा के लिए तमालपृक्ष के
नोचे येदिया बना रही है ।।१४२॥
श्रोतधिरा-(मागने दायर )दे मलिते ! मालूम होता है, यह वही
वृन्दावन है, जिगरा माधुर्य तुम मेरे यागे धार वार वर्णन किया तो
हा॥१४॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक * ललिता-हला ! सा ज्जेव्व एसा काहस लोलारक्खवाडिआ। [ हला, सा एव एषा कृष्णस्य लीलावृक्षवाटिका ] ॥१४४।। श्रीराधिका-(सौत्सुक्यमात्मगतम्। अहो महुरतणं दोणं अक्खराणम्। (प्रकाशम्) सहि, कस्स ति मणासि ! [ अहो मधुरत्व द्वयोरक्षरयो । ससि, क्स्येति भणसि ? ॥१४॥ ललिता- (सावृतास्मतम्) हला । भणामि कण्हरस ति हला, भणामि कृष्णस्येति ॥१४॥ थोराधिका-(पुन स्वगतम्) हन्त | जस्स णामावि रामाचित्तस्य मोहेदि, सो क्षु कोदिसो वा णामिति । (इति साहित्य प्रकाशम्) हला, इमाइणिउजावरि पुस्जिदाइ गुजाफलाइ बिइणिरसम् । [ हन्त, यस्य नामापि रामाचितमित्य मोहयति स सलु पोरशो या नामीति ? हला, इमानि नियुखोपरि पुञ्जितानि गुरफलानि विचेप्यामि ] ॥१७॥ ललिता--(सपरिहास सस्तेन) देह ते भुवनान्तरालविरलच्छायाविलासाम्पद मा कौतुहलचञ्चलाक्षि! लतिकाजाले प्रवेश पृथा । ललिता-हा ससि ! यह वही श्रीकृष्ण का सीला- कानन है ॥१४॥ श्रीराधिका-(उत्पण्या पूर्वक मन मे) अहो कैसा माधुर्य इन दोनो अक्षरो का? (म्पष्ट कहती हैं) ससि तू क्सि का नाम ले रही है ।।१४५॥ ललिता-(अभिप्राय सहित मुस्करा यर) राधे मैं कहती है कृष्ण मा नाम ॥१४६॥ श्रीराधिका-(फिर मन मे) अहो । जिम का नाम ही मुन्दरियों के चित यो इस प्रकार विमोहित करने वाला है, न जाने वह म्वय नामी क्तिना मुन्दर होगा? (भाय यो छिपाते हुए स्पष्ट कहती है)-ललित । पलो निकुन्जो में लग ममग्न गुच्छ पलो यो चयन पर गो ॥१४॥ ललिता-(परिहास करते हुए) है बाहर घ चलनयने । तुम्हारा शरीर त्रिभुवन में असभ्य शोभा पा विलास भवन है. इसलिए मुम लता जाल में प्रवेश मा परो । यहा बम्जनराति ये सहा मनोरर म्पमाली
४० ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक *
नव्यामजनपुञ्जलरुचिः कुञ्जचरी देवता
कान्तां कान्तिभिरङ्कितामिह वने निःशङ्कमाकर्षति ॥१४॥३३
श्रीराधिका-(किंचिद्भौतेव परावृत्य सनमस्मितम्) सहि ललिदे,
ताए देअदाए गणं तुमं आअड्ढिदासि, ज एवं जाणासि । [ सखि ललिते,
तया देवतया नून बमाकृप्टासि यदिदं त्व जानासि ] ॥१४६।।
ललिता-(विहस्य) हला! मं कोस एसा आअटठदु । ण क्यु
अह तुम विभ कन्तोहि अविदा । [ हना, मा कस्मादेपाकर्षतु ? न खल्वहं
स्वमिव कान्तिभिरविता ) ॥१५०।।
(नेपथ्ये वंशीध्वनिः)
श्रीराधिका-(निशम्य सचमत्कार स्वगतम्।अम्महे ! इमस्स मोहण:
तणं सदस्स । (इति वैवश्य नाटयति) [ अमम्हे अस्य मोहनत्वं
शब्दस्य ] ॥१५२॥
ललिता-(विलोक्य स्वगतम्) हुँ ! एसा कोमलाङ्गी कुरङ्गी पढम
जाले णिवडिदा । [ हुं, एषा कोमलाङ्गी कुरङ्गी प्रथम जाले निपतिता ]
॥१५२।।
कोई कुजविहारी देवता रहता है, जो नि.शङ्का होकर इस वन में शोम-
नाङ्गी नवीन कान्ता को आकर्पण कर लेता है ।।१४८॥३३॥
श्रीराधिका-(थोड़ी डर कर पीछे हटकर, परिहास युक्त मुस्कराते
हुए)-ससि ललिते | तुझ को उस देवता ने निश्चय हो आकर्षित किया
है, तभी तुम यह सब वात जानती हो ॥१४६।।
ललिता-(हस कर) मुझे क्यो देवता आकर्षण करेगा? मै तुम्हारी
तरह गुन्दरी थोडी हू ॥१५०।।
[पर्दे के पीछे वशीध्वनि होती है]
घोराधिका-(सुन फर चमत्कृत हो मन मे) आहा! इस धनि में
यह य गो मोहनी शक्ति ! (यह कहकर बेसुध हो जाती हैं) ॥१५॥
ललिता-(यह देखकर मन ही मन मे) हां यह कोमलाङ्गी हरिणी
पहनी ही पार जाल में फसी है ॥१५२॥
* श्रोविदग्धमाधव नाटक * [ - ? राधिका--(प्रयत्नेन धंयमालम्ब्य स्वगतम्) अवि गाम ण सहा मिअपूर उगिरन्त जण पेविखस्सम् ? [ अपि नाम एन शब्दामृतपूरमुगि- रन्त जन प्रेक्षिष्य ] ॥१५३।। ललिता--(उपसृत्य) हला राहे अत्यि मदुवरि तुह बीसद्धबुद्धी ? [हला राधे, अस्ति मदुपरि तव विश्रद्धवुद्धि ? ] ॥१५४।। राधिका-हला । कोस एव्व भणासि ? तुम जेब तत्थ पमाणम् । [हला, कस्मादेव भणसि । त्वमेव तत्र प्रमाणम् ] ॥१५५।। ललिता-कधेदु पिअसही किंत्ति अकाण्डे विवसा असि तुमम् । [ कथयतु प्रियसखी किमित्यकाण्डे विवशासि त्वम् ] ॥१५६।। राधिका-(सलञम् सस्कृतेन) नाद कदम्बविटपान्तरतो विसर्पन्- को नाम कर्णपदयीमविशन जाने। हा हा कुलीनगृहिणीगणगर्हणीया येनाद्य कामपि दशा सखि लम्भितास्मि ॥१५७॥३४॥ ललिता-हला । एसो मुरलीरओ। [हला, एप मुरलीरव ] ॥१५८ श्रीराधिका-(यत्न पूर्वक धीरज धारण कर मन ही मन म)- क्या मैं इस ध्वनि अमृतप्रवाहकारी व्यक्ति को देख सकू गी? ॥१५३।। ललिता-(निकट आकर) ओ राधे तुम्ह मुझ पर विश्वास है ॥१५४॥ श्रीराधिका-अहो । यह कैसे कह रही हो? तुम स्वय ही इसका प्रमाण हो ॥१५॥ ललिता-प्रिय ससि । वहा फिर, तुम विना वारण एसी विवश क्या हो रही हो ॥१५६।। पौराधिका-(शर्माती हुई) ललिते ' में कुछ कह नहीं मकती हू, कदम्ब वृक्ष से अचाना किसी एक ध्वनि ने मेरे वाना म प्रदेश कर लिया, हाय हाय, उससे मैं आज एव ऐसी विचित्र अवस्था का प्राम हो गई है, जो कुनोन स्त्रिया के लिए निन्दनीय है ॥१५॥३८ सतिता-ससि । यह तो मुरली-ध्वनि थी ॥१५॥ - 4 * श्रीविदग्धमाधव-नाटक * अजडः राधिका-(सव्यथं संस्कृतेन) कम्पसंपादी शस्नादन्यो निकृन्तनः । तापनोऽनुष्णताधारः को वाऽयं मुरलीरवः ? ॥१५॥३५।। (इत्युद्वे गं नाटयन्ती) हला! णाहं मुरलीणाअस्स अहिण्णा । ता अलं विप्पलम्भेण । फुड एसो केण वि महाणाअरेण कोवि मोहणमननो पढोअदि । [ हला, नाहं मुरलीनादस्यानभिज्ञा । तदलं विप्रलम्भेन । स्फुटमेप केनापि महानागरेण कोऽपि मोहनमन्त्रः पठ्यते ) ॥१६०॥ (प्रविश्य चित्रपटहस्ता विशाखा) विशाखा- (राधामवधारयन्ती स्वगतम्) दाणि अण्णादिसी एसा लक्खीअदि । ता णू ण कण्हस्स सिमाए इसिदा । होदु । पुच्छिस्सम् । [इदानीमन्याशी एपा लक्ष्यते । तघ्न नं कृष्णस्य वंशिकया वंशिता । भवतु, प्रक्ष्यामि ] (इत्युपसृत्य प्रकाशम् संस्कृतेन) ॥१६१।। क्षौणी पङ्किलयन्ति पङ्कजरचोरक्ष्णोः पयोबिन्दवः श्वासास्ताण्डवयन्ति पाण्डुवदनै दूरादुरोजांशुकम् । श्रीराधिका-(व्यथा पूर्वक) यह हिम तो थी नही परन्तु कम्पा देने वाली थी, शस्त्र के विना ही काट देने वाली ! आग के विना ही जला देने वाली ! यह कैसी मुरली-ध्वनि ? ||१५६॥३५॥ (उद्वेग प्रकाशित करते हुए) में मुरली-ध्वनि से अनभिज्ञ नही हू, मुझे धोखे में डालने का क्या प्रयोजन ? स्पष्ट है कि कोई महानागर पढ़ रहा है किसी मोहन-मन्त्र को ॥१६०।। [ इतने में चित्र पट्ट हाथ में लिए विज्ञासा प्रवेश करती है ] विशाखा-(श्रीराधाजी को ध्यान पूर्वक देखकर मन ही मन में) इरा की तो यह दूसरी दशा दोसती है, निश्चय ही यह श्रीकृष्ण की वंशी द्वारा इसी गई है । ठीर है, पूछती हूं [ यह सोचकर निकट आती है ] ॥१६॥ -हे पाण्डमुपी ! तुम्हारे कमल सदृश नेत्रों से अथ धारा बहकर पृषी को पकिल कर रही है, तुम्हारा श्वास दूर से ही वक्षस्थल के वस्त्र *श्रीविदग्धमाधव-नाटक * •[ ४३ दन्तुरयन्ति संततममी रोमाञ्चपुजाश्च ते मन्ये माधवमाधुरी श्रवणयोरभ्यासमभ्याययौ ॥१६॥३६।। राधिका-(अनाकणितकेनैव सोत्कम्पम्) ललिदे ! पुणो वि एसो सो जेव्व कोवि सदी विक्कमदा [ललिते, पुनरप्येप स एव कोऽपि शब्दो विक्रमते] ॥१६३।। ललिता-(संस्कृतेन) एष स्थैर्यभुजङ्गसद्धवमनासङ्ग विहङ्गश्वरो ब्रीडाव्याधिधुराविधूनन विधौ तन्वङ्गि धन्वन्तरिः । साध्योगर्वनराम्युराशिचुलुकारम्भे तु कुम्भोद्भवः कालिन्दीतटमण्डलेषु मुरलोतुण्डावनिर्धावति ।।१६४॥३७॥ राधिका-सहि ! जादा मह हिआए काबि गुरुई वेअणा । ता गदुआ सुविस्सम् । [ सखि, जाता मम हृदये कापि गुर्वी वेदना। तद्गत्वा स्वप्स्यामि ] ||१६५।। विशाखा-हला राहे, तुह वेअणाविद्धं सरणं किपि एवं ओसहं मह को नृत्य करा रहा है, पुलकावलि तुम्हारे शरीर को मानो कण्टकाकीर्ण बना रही है, हे राधे ! जान पड़ता है श्रीमाधव की माधुरी तुम्हारे कानों में पड़ गई है ।।१६२ ३६॥ श्रीराधिका-(अनसुनी सी करते हुए कांपती हुई) हे ललिते ! फिर कोई उसी प्रकार का शब्द सुनाई दे रहा है ॥१६३॥ ललिता-हे कृशाङ्गि ! (इस शब्द को साधारण मत समझो) यह रमणियों के धीरज रूप सर्प को शमन करने में गरुड़ के समान है, लज्जा- रूप व्याधि-भय नाश करने में धन्वन्तरि है, तथा माध्वी युवतियो के गर्व रूप समुद्र को शोषण करने में अगस्त्य के तुल्य होकर यमुना तट विहारी मुरलीवदनश्रीकृष्ण से हो आ रहा है ॥१६४॥३७॥ श्रीराधिका-सखि मेरे हृदय में बड़ी वेदना हो रही है, मैं तो जाकर सोती हूं ॥१६॥ विशासा-राधे ! तुम्हारो वेदना को मिटाने वाली औपघि, यह
४४ ]
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक *
हत्थे वदि । 'ता सेवेहि णम् [ हला राधे, तब वेदनाविध्वंसन किमप्ये-
तदीपध मम हस्ते वर्तते । तत्सेवस्वैनन् । ] ॥१६६।।
राधिका-विसाहे, एहि । अङ्गणोवकण्ठे फुल्लकण्णिआरमण्ड-
लोच्छाअ अज्झासिल पेक्खम्ह [ विशाखे ! एहि अङ्गनोपकण्ठे फुल्ल-
कणिकारमण्डलीच्छायामध्यास्य प्रेक्षोमहे । ] ॥१६७।।
(इति निप्कान्ताः सर्वे )
इति विदग्धमाधवे वेणुनादविलासो नाम प्रथमोऽङ्क:
देख, मेरे हाथ मे इसका सेवन कर ॥१६६।।
श्रीराधिका-विशाखे । आ, आङ्गग के समीपवर्ती पुष्प कणिकाओ
की छाया के नीचे बैठकर इसे देखे ॥१७॥
[ यह कहकर सब चली जाती है ]
इस प्रकार श्रीश्यामदास अनुवादित थीविदग्धमाधव नाटक का 'वेणुनाद
विलास' नामक प्रथम अंक समाप्त हुआ ॥१॥
द्वितीयोऽङ्क [ततः प्रविशति नान्दीमुखी] नान्दीमुखी-आदिम्हि तत्तहोदोए पौणमासीए, जधा-अइ मन्दी- मुहि, सुद मए णिभरा असुत्थसरोरा मे वच्छा राही। ता गदुअ जाणेहि से तत्तत्ति । तदो मुहराघरं गमिस्सम् । ( इति परिक्रम्य पुरः पश्यन्ती ) फधं इघ जेब कन्दन्ती मुहरा आअच्छइ ? [ आदिष्टास्मि तत्रभवत्या पौर्णमास्या, यथा-'अयि नान्दीमुखि ! श्रुत मया निर्भरा अस्वस्थशरीरा मे वत्सा राधा । तद्गत्वा जानीहि तस्यास्तत्त्वमिति । ततो मुख रागृहं गमिष्यामि कथमित एव क्रन्दन्ती मुखरा आगच्छति ? ] ॥१॥ (प्रविश्य ।) मुखरा-हद्धी हदी। हदम्हि मन्द माइणी? [ हा धिक् हा धिक्. हतास्मि मन्दभागिनी। ] ॥२॥ नान्दीमुखी-अज्जे मुहरे, कोस रोमसि ? [ आर्ये मुखरे ! कस्मात् रोदिपि? ] [३|| दूसरा-अङ्क [ नान्दीमुसो प्रवेश करती है ] नान्दोमुखी-मुझे देवी पौर्णमासी ने आज्ञा दी कि "हे नान्दीमुखि ! मैं ने सुना है कि-मेरी बेटी श्रीराधा का शरीर अस्वस्थ है, तू जाकर उसका हाल पता करके आ, उसके बाद मैं मुसरा के घर जाऊंगी ।" ( इतना कह घूमकर सामने देखती है ) यह रोती हुई मुसरा इधर आ रही है क्या? ॥१॥ [ मुखरा प्रवेश करती है] मुखरा-हाय ! हाय धिक् ! मैं मन्दमागिनी मारी गई ।। नान्दीमुखी-आयें मुसरा! क्यों रो रही हो? । ३॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक * मुखरा-(विलोक्य । ) वच्छे, राहीसंदावेण ? [ वत्से, राधा- संतापेण । ] ॥४॥ नान्दोमुखी-केरिसं चेट्टई राही? [ कीदृशं चेष्टते राधा ? ]॥५॥ मुखरा-वच्छे, वाउला विअ किपि पलवइ। [ वत्से, वातुला इव किमपि प्रलपति । ] ( इति संस्कृतेन । ) ॥६ कराणामलिना कुलमलिनया कृत्यं न मे मालया बालाहं किमु नर्मणस्तव पर्व दूरीभव प्राङ्गणात् । इत्यादीनि दुरक्षराणि परितः स्वप्ने तथा जागरे जल्पन्ती जलजेक्षणा क्षपति क्लेशेन रात्रिदिवम् ॥७॥१॥ नान्दीमुखी-(स्वगतम् ।) उपसग्गकिदा ण पखु एरिसी पलाव- मुद्दा । ता दिठुिआ विक्कमिदं एत्य कण्हविलासेण। [ उपसर्गकृता न खल्वीदृशी प्रलापमुद्रा । तद्दिष्टया विक्रान्तमत्र कृष्णविलासेन । ] ||4 मुखरा-वच्छे, अह गदुअ भअवदी विण्णविसम् । तुमं वेदसीकुडगं उपसप्पिस राहि पेच्छ ? [ वत्से, अहं गत्वा भगवती विज्ञापयिष्यामि । त्व वेतसीवुअमुपसर्प्य राधिका प्रेक्षस्व । ] ॥६॥ मुखरा-(देखकर) बेटी ! राधा के दु.ख में !४॥ नान्दीमुखी -क्या हाल है राधा का ॥५॥ मुखरा-बेटी ! पागल की तरह वह इस प्रकार प्रलाप कर रही है-॥६॥ "क्रू र भंवरो से छेदी और मलीन यह माला मुझे नहीं चाहिए मै वाला हूँ, तू क्या अपनी हंसी करायेगा ? इस प्राङ्गण से दूर चले जा।" इस प्रकार के दुर्वचन, वह ाधा, सोती हो या जागती, बोलती रहती है, बड़े कष्ट से दिन-रात काट रही है ॥७॥ नान्दीमुखी-(अपने मन में इस प्रकार का प्रलाप तो कोई उपद्रव नहीं है । सौभाग्य से कृष्ण-विलास के निमित्त ऐसा हो रहा है ।। मुखरा-पुत्री में पौर्णमासी के पास जाकर उसे सब हाल बताऊंगी, तू वेतसी-कुम्न में जाकर राधा को देख । (इतना कहकर दोनों चली जाती है, In ।
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक [ ४७ (इति निष्क्रान्ते) (तत प्रविशति सखीभ्यामुपास्यमाना राधा) राधा-(सोढग स्वगतम् ) हदहिअअ, जस्स पडिच्छन्दद सणमे- त्तादो ईरिसी दुरुसगमा उत्थिता दे अवस्था तत्य वि पुणो रा वहसि । [ हतहदय । यस्य प्रतिच्छन्ददर्शनमात्रत ईदृशी दुरूहस गमा उपस्थिता तेऽवस्था तत्रापि पुना राग वहसि ' ] ॥१०॥ उभे-हला राहिए, आमहिन्तो विलक्षणो दे वेसणाणुबन्धो रूपखोअदि । ता कोस अम्हेसु तत्त ण कधेसि ? [ हला राधिके, आमयभ्यो विलक्षणम्ते वेदनानुवन्यो लक्ष्यते । तत्कस्मादस्मासु तत्त्व न क्थयसि ?] ॥११॥ [ राधिका निश्वस्य वक्त व्यावर्तयति ] विशाखा-(पुराऽभिगम्य सस्कृतेन) चिन्तासततिरद्य कृन्तति सखि स्वान्तस्य कि ते धृति किवा सिञ्चति ताम्रमम्बरमतिस्वेदाम्भसा डम्बर ? [ तब ललिता और विशाखा दोनो सखियो द्वारा सेवित श्रीराधा प्रवेश करती हैं ] श्रीराधिका-(उद्वेग पूर्वक अपने मन मे) ओ मेर मन | जिसके चित्रपट को देखकर तेरी ऐसी दुर्दशा हुई, फिर भी तू उससे प्यार करता है ? ॥१०॥ ललिता-विशाखा- राधि | जिस रोग से तुम विलक्षण वेदना का अनुभव करती दीखती हो, फिर हमे तुम उसका निदान क्यो नहीं बताती ? ॥११॥ [ श्रीराधा जी लम्बी सास छोडकर मुख घुमा लेती हैं ] विशाखा-(सामने आवर) हे राघ । सन चिन्ताओ ने आकर तुम्हारे अन्त करण का धीरज तोड डाला है क्या जो पसीने से तुम्हारा लाल वस्त्र भीग रहा है । ह चम्पक-गौरी | क्या कम्प ने आकर तुम्हारे शरीर की स्थिरता को जबरदस्ती हिला डाला है ? हे सखि । जो कुछ भी हा
४८ ]
* श्रोविदग्धमाधव-नाटक *
कम्पश्चम्पकगौरि लुम्पति वपु स्थैयं कथ वा बलाद
तथ्य ब्रूहि न मङ्गना परिजने सगोपनाङ्गीकृति ॥१२।।२।।
राधिका-(सासूयम्) अइ निठुरे विसाहे, तुम एव पुच्छन्ती विण
लज्जसि ? [ अयि निष्ठुरे विशाखे, त्वमेव पृच्छन्त्यपि न लज्जसे ' ] ॥१३॥
विशाखा-(सशङ्कम्) हला, कहिपि अवरद्धम्हि ति ण सुमरामि ।
हला, कहिचिदप्यपराद्धास्मीति न स्मरामि । 1 ॥१४॥
राधिका-अइ णिक्किवे, कोप्स एव भगासि ? सुमरिअ पेक्ख ।
[ अयि निष्कृपे, कस्मादेव भणसि ? स्मृत्वा पश्य । ] ॥१५॥
एण वि पणिहारणेण ण मे मुमरणं होदि ।
[हला, गुरुणापि प्रणिधानेन न मे स्मरण भवति । ] ॥१६॥
राधिका-उम्मत, गहणे इस्सि अवाहिदाणलकुण्डे तुम जेव्व मह
पक्खेवणी
। [ उन्मत्ते, गहने एतस्मिन्नत्याहितानलकुण्डे त्वमेव मम प्रक्षेपणी
॥१७॥
विशाखा-हला ? कधं विस? [ हला । कथमिव ? ] ॥१८॥
विशाखा-हला,
?
तुम, हमारे सामने तथ्य को बताओ, आत्मीयजनो से अपने मन की बात
छिपाने से मङ्गल नहीं होता है ।।१२॥
पौराधिका-(निरादर पूर्वक) ओ निष्ठुर विशाखे । तुम्हे यह
पूछते हुए शर्म नहीं आती? ॥१३||
विशाखा-(शड्का सहित) अहो । मुझसे तुम्हारा क्या अपराध
हुआ मुझे तो याद नहीं ॥१४॥
श्रीराधिका-अरी निर्दयि । ऐसा क्यो कहती हो, देख याद करके
॥१५॥
विशाखा-राधे ! बहुत सोचने पर भी मुझे तो कुछ स्मरण नही
हो रहा ॥१६॥
घोराधिका-यावरि । यहा अति भयानक अग्निकुण्ड मे मुझे
फैक्ने वाली तू ही तो है ॥१७॥
पिशाखा-ओहो । वह वैसे ॥१८॥
। * श्रीविदग्धमाधव नाटक अंक-२ * [ ४६ राधिका-(सेयम् । अइ मिच्छासरले. आलेक्खगदभुअङ्गसङ्गिणि, चिठ्ठ चिठ्ठ । [ अयि मिथ्यासरले, आलेख्यगत भुजङ्गसगिनि । तिष्ठ तिष्ठ। ] (इति सवैवश्य सस्कृतेन) ॥१९॥ वितन्वानस्तन्वा मरकतरुचीनां रुचिरतां पटानिष्क्रान्तोऽभूद्ध तशिखिशिखण्डो नवयुवा। (इत्योक्त वाक्स्तम्भ नाटयति) (सख्यो सभ्रू भङ्गमन्योन्य पश्यत) राधिका- भ्रवं तेन क्षिप्त्वा किमपि हसतोन्मादितमते शशी वृत्तो वह्निः परमहह वह्निर्मम शशी ॥२०॥३॥ ललिता -हला, कि एसो सिविणस्स विलासो ? [ हला, किमेप स्वप्नस्य विलास ? ] ॥२॥ राधिका-(सस्कृतेन) कि स्वप्नस्य विलक्षणा गतिरिय कि जागरस्याय वा कि रात्ररुपसत्तिरेव रभसादह्नः किमलाय वा। श्रीराधिका-(ईर्ष्या पूर्वक) ओ झूठी चित्रपट स्थित सर्पो का सङ्ग करने वाली ' ठहर, ठहर,-(यह कहकर विवश होकर कहने लगी)- ॥१६॥ जो अपने शरीर से मरकत-मणि समूह को कान्ति विस्तार कर रहा था, मस्तक पर जिसके मोरपुच्छ था, वह नवयुवक जब चित्रपट से बाहर निकला ( इतना आधा वाक्य बोलते गला रुक जाता है ) [ ललिता-विशाखा भृकुटि का इशारा कर परस्पर देखती हैं ] -और मुसकराते हुए मेरी तरफ कुछ ऐसा अद्भुत कटाक्ष किया, तब से ही मेरी बुद्धि पागल हो गई है और मुझे चन्द्र अग्नि की तरह गरम और अग्नि चन्द्र की तरह शीतल लग रही है ॥२०॥३॥ ललिता-राधे ! कोई स्वप्न की बात है क्या ॥२१॥ थौराधिका-यह विलक्षण गति मैं ने स्वप्न मे देसी है या जागते 7 ५० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अंक-२ * श्यामलचन्द्रिकापरिचयस्पन्देन संतोपित- रन्तःक्षोभकुलैरहं परिवृता प्रजातुमनाभवम् ॥२२॥४॥ विशाखा-(साबूतस्मित) हला राहे, पूरणं एसो दे चित्तविन्भमो जेव्व क्वणिओ।। हला राधे ! नूनमेप ते चित्तविभ्रम एव क्षणिकः । ] ॥२३॥ राधिका-(साम्यसूयम्) अइ अवीसंद्ध, विरमेहि । कोस अपणो दोसं झम्पिदु पउत्तासि ? [ अयि अविश्रद्ध, विरम । कस्मादात्मनो दोपमाच्छादयितु प्रवृत्तासि ? ] (इति संस्कृतेन) ।।२४|| कृतां भक्तिच्छेदैघु सृणधनचर्चामधिवहन- पुनर्लधो लुब्धः प्रियकतरुमूले चटुलधी. । लपन्त्याः साक्षेपं न हि न हि न होति स्मितमुखो हठान्मे दुर्लीलः स किल भुजवल्लीदलमधात् ॥२५॥५।। ततश्च। दरोन्मीलनीलोत्पलदलरुचस्तस्य निबिड़ाद विरूदाना सद्यः करसरसिजस्पर्शकुतुकात् । मे, रात को देखी कि दिन में ही प्रत्यक्ष देखी है, मैं कुछ भी नही जानती हूं, मैं तो उस श्यामल चन्द्रिका की प्रबलधारा मे वही जा रही हूं ॥२२॥४॥ विशाखा-(अभिप्राययुक्त मुसकान पूर्वक) हे राधे ! निश्चय ही तुम्हारी यह चित्तभ्रान्ति क्षणकाल के लिए है ॥२३॥ श्रीराधिका-(ईर्ष्या सहित) ओ अविश्वासिनी! चुप रह । क्यों अपने दोपों को छिपा रही है ? ॥२४॥ -मैं कदम्ब वृक्ष के नीचे बैठी थी, वह चञ्चल-बुद्धि कामुक मेरी भुजा पर अपनी अंगुली से विचित्र रूप से कुङ्कम लेप करने लगा। फिर सुब्ध होकर मेरे पास आया और मैं आक्षेप करते हुए न न न करती रही फिर भी उस दुर्लील ने मुस्कराते हुए मेरी भुजाओं को पकड़ लिया ॥२५॥५॥ सखि ! उसके बाद अधखुले नीलकमल कान्ति वाले उस लम्पट के करकमल का स्पर्श होते ही मुझे अतिशय कौतुक हुआ और उसके लिए । मारता *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ [ ५१ वहन्ती क्षोभाणां निवहमिह नाजासिपमिदं क वाहं का वाहं चकर किमह वा सखि तदा ॥२६.६।। (इति वैवश्य नाटयली स्वगतम्) अइ दुहिअअ मक्कड | कण्हो वैविओ सामलकिसोरो ति तिरणेसु पुरिसेसु राअ वहन्तो वि तुम ण लज्जसि । ता दाणि अप्पारणं बावादिन पामर तुम हदासं करिस्सम् । [ अयि दुष्टहदय मर्कट, कृष्णो वैणविक श्यामलकिशोर इति निपु पुरुपेषु राग वहदपि त्व न लज्जसे । तदिदानीमात्मान व्यापाद्य पामर त्वा हताश करिष्ये।। ललिता-हन्त, हदमम्मसचिवस्स वसन्तस्स विप्फुज्जिदेण दूसिदा एदे परिसरा दोसन्ति । ता कि एत्य सरणम् ? [ हन्त, हतमन्मथसचिवस्य वसन्तस्य विस्फूजितेन दूपिता एते परिसरा दृश्यन्ते । तत्किमत्र शरणम् ? ] राधिका-(सस्कृतेन) बिक्रीडन्तु पटीरपर्वततटीसंसगिणो खेलन्त. कलयन्तु कोमलतरां पुंस्कोकिला काक्लीम् । सरम्मेण शिलीमुखा ध्वनिभूतो विघ्यन्तु मन्मानस हास्यन्त्या ससि मे व्यथां परममी कुर्वन्तु साहायकम् ।।२९७ अनेक क्षोभ करती हुई मैं वेसुध हो गई, फिर मै यह कुछ न जान सकी कि मैं कौन हू और हू कहा ॥२६॥ ६॥ (इतना कहकर व्याकुलतापूर्वय मनमे कहने लगी)-अरे मवंट सस दुष्ट हृदय कृष्ण, वेणु-वजया, तथा श्यामल-किशोर-इन तीनो पुस्पो से अनुराग करते हुए तू लज्जित नहीं होता। इसलिए मैं अपने गरीर को नष्ट कर तुझ पामर को हताश करूंगी ॥२७ । ललिता-हाय । हाय ॥ दुष्ट कन्दर्प के मन्त्री वसन्त के फूटने से ये सब मार्ग दूपित हो रहे दीख हैं, अब कहां जाए ॥२८॥ श्रीराधिका-ससि । मलयाचल स्पर्शी वायु विशेष रूप मे वहै, कोक्लिाए क्रीडारत होकर सुमधुर ध्वनि करें और मधुर मधुर ध्वनि गुजार करें-इस प्रकार मेरे मन को घायल कर शीघ्र ही मेरी इस परम वेदना का अन्त करने में ये सहायता करें, अर्थात् मेरी मृत्यु हो जाय तो इम वेदना से मेरा झुटकारा हो ) ॥२६॥ 7 ५२ ] * श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्ग-२* उभे-(सास्रम्) हला, एदाहिं घोरचिन्ताहि कोस किलिम्मसि ? अम्हेहि तकिदं अदिमेतदुल्लहो ण खु दे हिमट्टिदो अत्यो। [ हला, एताभि?रचिन्ताभि कस्मात्वलाम्यसि ? अस्माभिस्तकितमतिमात्रदुर्लभो न खलु ते हृदयस्थितोऽर्थ । ] ||३०|| राधिका-(निश्वस्य सस्कृतेन) इयं सखि सुदु साध्या राधाहदयवेदना । कृता यत्र चिकित्सापि कुत्साया पर्यवस्यति ।।३१।।८।। ता विण्णवेमि इमस्सि ओसरे जधा सुदिढ एक लदापास लहेमि तथा सिणेहस जिविकोंद करेघ । [ तद्विज्ञापयाम्येतस्मिन्नवसरे यथा सुदृढमेक लतापाश लभेय तथा स्नेहस्य निष्कृति कुरुय । ] ॥३२॥ उभे-(सव्यथम् । हला, एवं दारुण भणन्ती मा क्वु सहीण जीविद लुम्पेहि । ए एवं पञ्चासणा दे अहिठ्ठसिद्धी । [ हला, एव दारुण भणन्ती मा खलु सखोना जोवित लुम्प । नून प्रत्यासना तेऽभीष्टसिद्धि । ] ॥३३॥ राधिका-सहोओ, ण जाणीध इमाए हदराहीए हिअट्ठत्तणम् ललिता-विशाखा-( नेत्रो मे अश्रु भरकर) इस प्रकार की घोर चिन्ताओ से क्यो अपने दिल को दु खा रही हो? तुम विश्वास करो, तुम्हारे हृदय के भाव हमसे छिपे नहीं हैं ।।३०।। श्रीराधिका--(लम्बा श्वास छोडते हुए)-हे सखि | राधा की हृदय वेदना अत्यन्त दु साध्य है, जिसको चिकित्सा का भी केवल निन्दा मे ही पर्यवसान होगा (अर्यात् चिकित्सा से भो मेरा बवना कठिन है अत मेरी मृत्यु होने पर चिकित्सक की निन्दा ही होगी ॥३१॥८॥ इसलिए मैं कहती हूं कि इस समय यदि एक मजबूत लना-रज्नु मिल सके तो मुझ पर स्नेह पूर्वक एक उपकार करो। (उस लता रज्जु को गले में बांधकर मैं अपना जीवन समाप्त कर दूं)॥३२॥ ललिता विशाखा-(दुख पूर्वक) राधे | ऐसो दारुण बात कहकर अपनी सखियो का जीवन अन्त मत करो। हम तुम्हे विश्वास दिलाती हैं, तुम्हारी मनोवाञ्छा सिद्ध होगी ॥३३॥ श्रीराधिका-सखिओ। तुम हतमागिनी राधा के हृदय की दुष्टता *श्रोविदग्धमाधव-नाटक अंक-२* जे एवं मन्तेघ 1.[ संख्यः, न जानीथ. एतस्या' हतराधाया हृदयदुष्टत्वम्, यदेवं मंत्रयथ । ] ॥३४॥ उभे-कधिदं जेव्व सवं पिअसहीए । कथितमेव सर्व प्रियसरया । ] राधिका-गहु गहु, गुरुई लज्जा जेव्व णिवारेदि । [ न हि न हि, गुर्वी लज्जैव निवारयति । ] ॥३६।। सख्यो-हला, अप्पसमासदो वि गुरुओ अम्हेसु तुह सिणेहो लक्खी अदि । ता बहिरङ्गाए लज्जाए को एत्थ अणुराहो ? [ हला आत्मसका- शतोऽपि गुरुकोऽस्मासु एव स्नेहो लक्ष्यते । तद्वहिरङ्गाया लज्जायाः कोऽत्रा- नुरोधः? ] ॥३७॥ राधिका-(संस्कृतेन) एकस्य श्रुतमेव लुम्पति मति कृष्णेति नामाक्षर सान्द्रोन्मादपरम्परामुपनयत्यन्यस्य वंशीकलः । एष स्निग्धघना तिमनसि मे लग्न: सकृढीक्षणात् कष्ट धिक्पुरुपये रतिरभून्मन्ये मृतिः प्रेयसी ॥३॥९॥ को नही जानती हो, तभी ऐसी सलाह दे रहो हो ||३४|| ललिता-विशाखा-प्रिय राधा ! तुम अपने हृदय की सब बात कही न 1॥३५॥ श्रीराधिका-न, न, मुझे, लग्जा रोक रही है ।।३६।। सखीगण-हे राधे ! हम से भी अधिक स्नेह किसी में तुम्हारा है क्या ? फिर इस बाहरी लज्जा का अनुरोध क्यो ? ॥३७ । श्रीराधिका-सखिओ! एक पुरुष के "कृष्ण"-इस नामाक्षर ने मेरे कानों में घुसते ही मैरी बुद्धि लोप करदी और दूसरे एक पुरुप की वंशीध्वनि ने मुझ में प्रगाढ उन्माद पंदा कर दिया तथा तीसरे एक स्निग्ध घनश्याम कान्ति वाले पुरुष का चित्रपट देखते ही वह पुरप मेरे हृदय में लिपट गया, हाय ! धिक्कार है मुझे, एक तो परपुरुप में, उस पर भी तीन- तीन पुरुषों में मेरी प्रीति ! इससे तो मर जाना अच्छा है ॥३८॥l सा काम . ५४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अई-२* उभे-(सहर्षम्) हला, कधं तुम्हादिसणं गोउलसुन्दरीण गोउ- लिन्दन्णदण उज्झिम अवर्गरस अणुगमओ संभवदि ? ता, सुणाहि । एषको ज्जेव्व सो एसो महाणाअरो कण्हो। [ हला, कयं युप्मादृशीनां गोकुलसुन्दरी- णामेनं गोकुलेन्द्रनन्दनं उज्झित्वा अपरस्मिननुराग, सम्भवति ? तच्छणु । एक एव स एप महानागरः कृष्णः । ] ॥३६|| राधिका-(सोच्छवासमात्मगतम्) हिअअ, समस्सस - समस्सस । दाणि जादा तुह जोअलोअमिआसलालसा। [ हृदय, समाश्वसिहि समा- श्वसिहि । इदानी जाता तव जीवलोकनिवासलालसा। ] ॥४०॥ उभे-(संस्कृतेन), सौरभोमिपरिदिग्धदिगन्तरापि वन्ध्यं जनु. सुतनु गन्धफली विति । राधे न विभ्रमभरः क्रियते यद निपीतमधुना मधुसूदनेन ॥४१॥१० नान्दीमुखी--(परिक्रम्य) कधं अग्गदो जेव्व एंपा राही ? (इत्युपसृत्य) जअदु जअदु पिअसंही। [ कथमग्रत एवैषा राधा ? जयतु जयतु प्रियसखी । ललिता विशाखा-(हपं पूर्वक) राधे ! तुम जैसी गोकुल-सुन्दरियों का गोकुलराज नन्दनन्दन को छोड़कर और किस मे अनुराग सम्भव है ? सुनो, वह (कृष्ण नाम वाला, वंशी-बजैया तथा श्यामघन कान्ति वाला) एक ही महानागर पुरुष है कृष्ण ॥३६॥ श्रीराधिका-(उच्छवास पूर्वक मन मे) अरे हृदय ! आश्वस्त हो, आश्वस्त हो, तुम्हारी इस जीवलोक मे रहने की लालसा पुन: अंकुरित हो उठी है ॥४०॥ ललिता-विशाखा-हे शोभनाङ्गि ! मधुसूदन (भंवरा) मन भर कर मधुपान करते हुए जिसके अ क में विहार नही करता, वह चम्पक लता चाहे अपनी गन्ध से सब दिशाओ को क्यों न परिव्याप्त करे, तो भी उसका जन्म निष्फल है। (पक्षान्तर मे--मधुसूदन-श्रीकृष्ण के साथ विना विहार प्राप्त किए तुम्हाग यह सौन्दर्य निष्फल है।)॥४१॥१०॥ नान्दीमसो-घूमती हुई) यह क्या ? राधा मेरे सामने सड़ी है ! (निकट आकर) प्रिय ससी जय हो जय ॥४२॥ 7 . .
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अंक-२ * [ ५५ राधिका-(सावहित्थम्) सहि कुसलं भअवदोए। [ सखि, कुशल भवत्या ? ] ||४३॥ नान्दीमुखी-तुह उल्लाहत्तणे जादे (इति राधां निभाल्य स्वगतम्) अप्पेक्खिम च्चेअ मए पढ़मं निट्टद्धिदम् । तथावि पुच्छिस्सम् । [तव उल्लघत्वे जाते अप्रेक्ष्यैव मया प्रथम निष्टवितम् । तथापि प्रक्ष्यामि । ] ४४|| (प्रकाशम् संस्कृतेन) न मुग्धे वैदग्धीगरिमपरिदिग्धा तव मति- विरामो नेदानीमपि वपुषि बाल्यस्य वयसः। कमप्यन्त. क्षोभं प्रथयसि तथापि त्वमय वा सखि ज्ञातं वृन्दावनमदनविस्फूजितमिदम् ॥४५॥११॥ ललिता-अइ अलिआसद्धिणि,, सौदलद पखणाणितहेदुआ कम्प- पुलअपेविख कोस दूसहं परिवाद देसि ? [ अयि अलीकाशङ्किनि, शीतल- दक्षिणानिलहेतुकं कम्पपुलक प्रेक्ष्य क्रमाव दुसहं परिवादं ददासि ? ] ॥४६।। नान्दीमुखी-(सस्मितम् सस्कृतेन) रोमाञ्च. परिचेप्यते फथमयं नास्माभिरुकम्मवान् श्रीराधिका-(भाव छिपाते हुए ) सखि | तुम्हारा कुशल तो है ॥४३॥ नान्दीमुखी- आपकी कुशलता सुनकर। (इतना कह र मन ही मन मे) चाहे मैंने अपरोक्ष मे पहले ही जान लिया है, फिर भी तुमसे पूछनी हू (स्पष्ट रूप से)-1॥४४॥ हे मुग्धे तुम्हारी बुद्धि अभी रसिक्ता राशि में हूबी नही और नही अभी तुम्हारा वचपन समाप्त हुआ है, इस लिए हे सखि । फिर भी तू मनमे इतना क्षोभ क्यो वढा रही है ? मैं जानती हूँ यह वृन्दावन तो मदन द्वारा ही आक्रान्त है। ४५५११॥ ललिता-मिथ्या आराधना करने वाली! मलयाचल की शीतल वायु से ही राधा मे यह कम्प व पुलक दौस रहे हैं । मिस लिए तू असा वदनामी लगा रही है ? १४६॥ नान्दोमुसी-( मुसकराती हुई) ओ भोलीमाली । मलयाचल की
सुम्रवः
1.
५६ ]
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अंक-२ *
दुष्कोति न हि दक्षिणाय मरुते दाक्षिण्यन्ये वद । ।
एतन्मन्मयकोटिसंभ्रममरवन्नम्यते
स्वान्ते , नागरचक्रवर्तिनयनप्रान्तस्य लोलायितम् ॥8॥१२॥
ता सच्चं कहेहि । कदा एदाए पञ्चक्खोकिदो गोउलाणन्दो? [ तत्सत्यं कथय
कदा एतया प्रत्यक्षीकृतो गोकुलानन्दः ? ] ॥४८॥
विशाखा-एवं रणेदम् । [ एवमेतत् । ] ॥४॥
नान्दीमुखी-(संस्कृतेन)
दरविचलितबाल्या. वल्लभा बान्धवानां
विहरसि भुवने त्वं पत्युरामोदपात्री।
अहह पशुपरामाकामिनो . मोहनत्वं
त्वमपि यदमुनान्तर्बाढ़मुम्मारितासि ॥५०॥१३॥.
ता अहं भअवदों तुवरेदु गमि सम् । [तदहं भगवतो त्वरयितु
गमिष्यामि। (इति निष्क्रान्ता) ॥५१॥
वायु को बदनाम मत कर। क्या हम (वायु से होने वाले) पुलक-कम्प को
नही पहिचानते ? इस सुन्दरी के अन्तःकरण में नागर चक्रवर्ती के नेत्र
कटाक्ष-विलास को कोटि-कन्दर्प शोभा घूम रही है ॥४७॥१२॥
इसलिए तू सच बता इसने उस गोकुलानन्द--श्रीकृष्ण को कब
देखा है ? ॥४८॥
विशाखा--( नान्दोमुखी के कान में ) यह है सब बात ।।४।।
नान्दीमुखी-हे राधे ! तुम्हारा अभी थोड़ा सा वचपन दूर हुआ
है, (पूरा यौवन नही आया) तुम अपने बान्धवों की स्नेह पानी हो और
पति को आनन्द देने वाली होकर घर में विहार करती हो, इसलिए तुम्हारे
लिए आश्चर्य है और गोपी-वल्लभ श्रीकृष्ण की मोहिनी-शक्ति से
तुम्हारा हृदय इतना उन्माद-ग्रस्त हो रहा है ।।५०||१३||
अच्छा अब मैं भगवती पौर्णमासी के पास शीघ्रता करने के लिये
(तुम्हें श्रीकृष्ण से शीघ्र मिलाने के लिए) जाऊंगी (इतना कहकर नान्दोमुखी
चली जाती है)॥५१॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ *
[ ५७
राधिका-(विमृश्य संस्कृतेन)
सा कल्याणी कुलगुवतिभिः शीलिता धर्मशेली
दागस्माभिः कथमविनयोरफुल्लमुल्लङ्घनीया ? ॥
(इत्यर्थोक्त पुनः सोत्कण्ठम्)
हा दृग्भङ्गीपरिमलकलाकर्मठोऽय कथं वा
हातुं शक्यः पशुपनगरोनागरीनागरेन्द्रः ॥५२॥१४॥
(ततः प्रविशति नान्दीमुखीमुख राम्यामनुगम्यमाना पौर्णमासी)
पौर्णमासी-मुखरे, किमदु साधबाधा तकिता त्वया राधा ? ॥५३॥
मुखरा-भअवदि, सुणाहि । [ भगवति, शृणु । ] (संस्कृतेन)-
अग्ने वीक्ष्य शिखण्डखण्डमचिरादुरकम्पमालम्बते
गुञ्जानां च विलोकनान्मुहरसौ साल परिक्रोशति ।
जाने जनयन्नपूर्वनटनक्रोडाचमत्कारिता
बालायाः किल चित्तभूमिमविशत्कोऽयं नवीनो ग्रहः ॥५४।।१५
धीराधिका-(वितर्क करते हुए) कुलवती युवतियों द्वारा आचरित
जो कल्याणकारी धर्मशली है, हमसे भला उसका दृप्ठता पूर्वक कैसे उल्लंघन
हो जायेगा ? (इतना कहकर फिर उत्कण्ठा सहित कहती हैं-) परन्तु
हाय ! दृग-कटाक्ष विद्या-कला मे अति निपुण उस गोकुल नागरियो के
नागरेन्द्र को कैसे छोड़ सकूगी ? ॥५२॥१४॥
[ तव नान्दीमुखी व मुखरा के साथ पौर्णमासी पहुचती है ]
पौर्णमासी-ओ मुखरा ! वया राधा की दु.साध्य वाधा पर तुम ने
कुछ विचार किया है ? ॥५३॥
मुखरा-भगवति । सुनो-
यह राधा मोरपुच्छ को देखकर काम्पने लगती है और गुजाओ
को देखते ही बार बार नेत्रों में जलभरकर चीतकार करती है । इमलिये
न जाने इस राधा के हृदय-स्थल मे अपूर्व नृत्य क्रीड़ा को चमत्कारिता पैदा
करते हुए कोई नवीन ग्रह प्रवेश कर गया है ॥५४॥१॥
~ ५८ ] * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-२ * पौर्णमासी-(स्वगतम्) सोऽयमुद्दण्डस्य नवानुरागराशेः कोऽपि चण्डिमा । (प्रकाशम्) मुखरे, साधु विज्ञातम्, यदा दानवकुलावतंसाः फंसादयो राधामन्विष्यन्ति तेन कोऽप्ययमङ्गनाग्रहो बालामाविवेश ॥५५॥ मुखरा-भअवदि, को एत्थ पडिआरो? [भगवति, कोऽत्र प्रतीकारः ? पौर्णमासी-अपि दानवारे टिरेव ॥५७॥ मुसरा-भअवदि, कुड़िला पखु जडिला एदं णाहिणन्दिस्सदि । [ भगवति, कुटिला खलु जटिला इद नाभिनन्दिध्यति । ] ॥५८ । पौर्णमासी-मुखरे, सा खलु मद्गरा संदिश्यताम् यथा--- -'जटिले, मा धाः । कृष्णमात्मविद्ययैव संघटयिष्यामि' इति ॥५६ । (मुखरा नमस्कृत्य निष्क्रान्ता) पौर्णमासी-(उपसृत्य) वत्से, निजाभीष्टलामेन कृतार्थीभूया. ॥६०॥ ( राधा सावहित्थं प्रणमति ) पौर्णमासी--(अपने मन में) यह उसी मुकुन्द के नवीन अनुराग को ही अपूर्व चञ्चतता है । (स्पष्ट रूप से) मुखरा ! तुम ने ठीक ही समझा है, क्योंकि यहा दानवकुल भूपण कंस आदि राधा को तलाश में रहते है, इसलिए कोई स्त्रीग्रह इस मे आकर प्रवेश कर गया है ॥५५|| मुखरा-भगवति ! इसका फिर क्या इलाज ? ॥५६॥ पौर्णमासी-दानवरात्र कृष्ण की एक निगाह ही इसका इलाज है ।।५७ मुखरा-भगवति। युटिल जटिला तो यह बात स्वीकार नहीं परेगी ॥५॥ पौर्णमासो-मुसरा ! तुम जाफर उसे मेरो तरफ से यह दो "हे जटिने ! तुम किसी बात को सता मत करो, में आत्मविद्या द्वारा ही पृष्ण या मिलन यरादू गो" ॥५६॥ (मुपरा नमस्यार फर चली जाती है ) पौर्णमासो- (गधा ने निपट आपर) पुति ! अपने मनोमान्दिा को प्राप्त कर पृतार्य होयो॥६॥ [ श्रीरामा भाव गोपन पर हुए पोर्णमामी को प्रणाम करती है ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * [ ५६ पौर्णमासी-(स्वगतम्) भजन्त्याः सवीडं कथमपि तदाडम्बरघा. मपलोतु यत्रानभिनवमदामोदमधुरा । अधोरा कालिन्दीपुलिनकलभेन्द्रस्य विजय सरोजाक्ष्याः साक्षाद्वदति हृदि कुञ्ज तनुवनी ॥६॥१६॥ (पुननिरूप्य जनान्तिकम्) हन्त नान्दीमुखि, निर्भरगभीरप्रेमोमिनिमित- मन. क्षोभा किमप्येषा विचेखते । तदियमवधार्यतामनुरागवीरस्य कापि दुविबोधगभीरविक्रमवैचित्री ॥६२।। तथा हि,- प्रत्याहृत्य मुनिः क्षरणं विषयतो यस्मिन्मनो धित्सते वालासो विषयेषु धित्सति ततः प्रत्याहरन्ती मनः। पौर्णमासी-(मन मे) कमल-लोचना श्रीराधा के हृदय-कुञ्ज मे कालिन्दी-पुलिन विहारी उन्मत्त गजेन्द्र ने प्रवेश कर अपनी विजय को प्रकाशित किया है । यद्यपि यह लजा पूर्वक उसकी डका ध्वनि को छिपाने का बहुत यत्न कर रही है, तयापि इसकी अभिनव उन्माद जनित आनन्द माधुरी से चञ्चलतायुक्त शरीर स्प कानन ने उस विजय को साक्षात् प्रकट कर दिया है, अर्थात् हृदय मे उत्पन्न श्रीकृष्ण-अनुराग के विकार इसके शरीर पर स्पष्ट प्रकाशित हो रहे है । ६१॥१६॥ (फिर निरूपण पूर्वक हाथ की ओट करके कहती हैं) -हे नान्दीमुखी । निरतिशय गम्भीर प्रेम तरङ्गो से आन्दोलित होने के कारण ही मन में क्षुब्ध हुई इस राधा मे ये सब अनिर्वचनीय चेष्टाए है। इसलिये यह वात पकी समझ लो कि यह सब अनुगगवीर ( कृष्ण ) के हो अनूपम दुर्वोध गम्भीर पराक्रम की विचित्रता है ॥६२.। और एक आश्चर्य देस- मुनिगण विषयो से मन को हटा कर एक क्षण काल के लिए भी जिस कृष्ण मे इस मन को लगाने को सदा कामना करते है, यह भोली- भाली राधा उस कृष्ण से अपने मन को हटाकर दूसरे दूसरे विषयों में लगाना चाह रही है, हाय ' योगीगण अपने हृदय में जिन की थोड़ी सी स्फूर्ति के लिए अनेक यत्न करते है । नान्दीमुसी ! यह मुग्धा राधा उनको - सत्यमात्य ६० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * यस्य स्फूतिलवाय हन्त हृदये योगी समुत्कण्ठते मुग्धेयं वत पश्य तस्य हृदयानिष्कान्तिमाकाडक्षति ॥ ६२।१७ नान्दीमुखी-भभवदि, ईरिसस्स भाअस्स विण्णाणे मूढम्हि । [ भगवति, ईदृशस्य भावस्य विज्ञाने मूढ़ास्मि। ] ॥६४।। पौर्णमासी-वत्से. दुर्गमोऽयं गाढ़ानुरागविवत्तः। धू यताम् ॥६॥ पीड़ाभिनवकालकूटकटुतागर्वस्य निर्वासनो नि:स्पन्देन मुदा सुधामधुरिमाऽहंकारसंकोचनः । प्रेमा सुन्दरि नन्दनन्दनपरो जाति यस्यान्तरे जायन्ते स्फुटमस्य वक्रमधुरास्तेनैव विक्रान्तयः ॥६६॥१८॥ • तदेहि भावमस्याः परीक्षेवहि । (इत्युपसृत्य) वत्से, किमपि प्रष्टव्यासि ? ॥६७ पतिः प्रमोदात्तः सुचरितकथा गोकुलपुरे प्रसिद्धा ते शुद्ध जनिरपि च लक्ष्मीवति कुले । अपने हृदय से निकालने की इच्छा कर रही है ।।६३।।१७।। नान्दोमुखो भगवति ! इस प्रकार के भाव-विज्ञान को समझने में में तो मूर्ख हों ॥४॥ पौर्णमासी-बेटी ! तू सच कहती है, इस गाढ़ अनुराग के चक्कर को समझना बहुत कठिन है । सुनो--॥६॥ -हे मुन्दरि ! नन्दनन्दन का प्रेम जिस के हदय में पैदा होता है, उस प्रेम की पीड़ा और मधुरता को केवल वही ही व्यक्ति ठीक ठीक जान सकता है । उस प्रेम में ऐसी पीड़ा है कि वह नवीन सांप को जहर तीव्रता और अहंकार को चूर-चूर कर घर देती है तथा जब उस प्रेम की आनन्द धारा प्रवाहित होती है । तब वह अमृत के गर्व को खण्डन कर देती है। ( इस कृष्ण प्रेम में अतिशय दुख और सुस का एक साथ संमिश्रण है ) ॥६६॥१८॥ इसलिए आ हम इस राधा के अनुराग को परीक्षा करें। (इतना पाह कर घोरापा जी के निकट आती हैं )-पुत्री राधे ! में कुछ पूछना चाहती हूं ॥६॥ तुम्हारा पति अति प्रेमयान है, और तुम भी गोमुल में सुपरिमा * श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-२ * [ ६१ अपूर्वा कुर्वाणा मतिमिह महासाहसमयीं सुहृद्भ्यस्त्व लज्जामपि किमिव राधे न भजसि ॥८॥१६ (राधिका कातर्यमभिनीय सलज्ज ललितावर्णमूले लगति) ललिता-अज्जे, विष्णवेदि राहो। [ आर्य, विज्ञापयति राधा।] (इति सस्कृतेन)- दोषोद्गार त्वमपि कुरुषे हा मयि व्याकुलाया पादेभ्यस्ते भगवति शपे नापराध्यामि साध्वि । पर्ण कर्णोत्पलवलपिभिस्ताड्यमानोऽपि धूर्ती न श्यामात्मा मम तनुपरिष्वगरन जहाति ॥६६॥२०॥ पौर्णमासी-(सेष्यमिवालोक्य) मुग्धे किमन्या प्रौढमुद्रा नोद्दण्डयसि ? राधिका-(सरोपम् सस्कृतेन) क्रोशन्त्यां करपल्लवेन बलवान्सद्यः पिधत्ते मुख घावन्त्यां भयभाजि विस्तृतभुजो रुन्घे पुर पद्धतिम् । प्रसिद्ध हो, तुम्हारा जन्म लक्ष्मी-सम्पन निर्मल कुल मे हुआ है, इसलिए तुम्हारे कुल मे जिस काम को कभी भी किसी ने नहीं किया है, उसे करने का दुस्साहस तुम्हारी बुद्धि मे कैसे पैदा हुआ है राधे | क्या तुम अपने बन्गु-बान्धवो मे ललिता नही होवोगी ॥६८।।१९।। (यह सुनकर श्रीराधा भयभीत होकर लजासहित ललिता के कान मे कुछ कहती हैं) ललिता-भगवति । राधे कुछ आप को निवेदन करती है- हाय । एक तो मैं पहले ही व्याकुल हो रही है, उस पर आप भी मुझे दोष दे रही हैं। भगवति । मुझे तुम्हारे चरणो को शपथ है, इगमें मेरा कुछ दोप नहीं, मैं पतिव्रता ही हू, पत्र-निर्मित कर्णोत्पल द्वारा ताटना पर भी हाय ' वह दूतं श्याम-विग्रह मेरे मङ्गो को आलिगन पिए न छोडता ॥६॥२०॥ पौर्णमासी-(ईप्यासहित देखती हुई) कृष्ण को देखकर यो मुग्ध हो जाती हो ? उसे प्रौढा रमणी वन कर क्यो नही दण्ड देती हो ? 101 धोराधिका :--माता (मैं तुम से क्या पहू' ) में यदि चित्राती - " ६२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क २* पादान्ते ' विलुठत्यसौ मयि मुहुर्दष्टाधरायां रुषा मातश्चण्डि मया शिखण्डमकुटादात्माभिरक्ष्यः कथम् । ७१॥२॥ पौर्णमासी-(स्वगतम्) निष्कम्पता बद्धमूलोऽयं प्रेमपलाशी । ७२॥ (प्रकाशम्) त्वया नोतो वाम: फलकमिलदगो मधुरिपुः सुखाशाभिः क्रीडाकुतुकिनि कुत्तो नेत्रपदवीम् ? फकूलाग्निज्वालापटलकटुकेलिप॑दधुना दशेयं दन्त त्वां ज्वलयति हिमानीव नलिनीम् ॥७३॥२२॥ राधिका-(कृष्णमुद्दिश्य सोपालम्भमात्मगतम्) संस्कृतेन- शिशिरय दृशौ दृष्ट्वा दिव्यं किशोरमितीक्षितः परिजनगिरी विश्रम्भात्वं विलासफलाद्भुित. । ह तो वह बलवान झट अपने हस्त कमल से मेरे मुख को बन्द कर देता है । यदि मै भयभीत होकर भागना चाहती हूं तो वह अपनी भुजाओं को फैला कर मेरे आगे का रास्ता रोक लेता है, यदि मैं उसके चरणों मे वार वार पड़ती हूं तो वह मधुरिपु क्रोधित होकर मेरे अधरों का दंशन करता है । हे भगवति ! तुम ही बताओ मैं उस मोरमुकुटधारी से अपनी कसे रक्षा करूं? ॥७॥२१॥ पौण मासी-(मन मे) राधा के हृदय में निश्चय ही प्रेम-वृक्ष की जड़े पफी हो चुकी हैं ।।७२।। (स्पष्ट कहती है ) हे क्रीडा-कौतुकिनी ! तुमने सुख पाने की आशा से चित्रपट मे लिसे उस प्रतिकूल नायक को किस लिए नेत्रों से देसा? हाय ! हाय ! अ जो तुम्हारी दशा देख रही हूं, इससे ऐसा अनुमान होता है जैसे बर्फ से कमलनी जल जाती है, उसी प्रकार यह (प्रेम की तुपा- अग्नि भीतर ही भीतर तुम्हे जला रही है ॥७३।२२।। थोराधिका-(श्रीकृष्ण को उद्देश्य करते हुए तिरस्कार पूर्वक अपने मन ही मन मे) मैं ने परिवार के लोगों को इस बात पर विश्वास कर लिया कि उस दिप गिोर-मूर्ति को देखते हो तुम्हारा हृदय-ताप नष्ट हो जापगा एय सोचन गोतल होगे और शालिए में ने उमक विक्ष-पट को
*धाविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२*
[ ६३
शिय शिय. पायं जानीमात्वामयक्राधियो यचं
निविड़वड़वावह्निज्यालाफलापविकाशिनम् ॥७४२६॥
पौर्णमासी-(सस्नेहमालोक्य) वत्से, क्षणमेकान्ते निविश्य पुष्पेषु
लेखो निर्मीयताम, यथायं कृष्णाय स्यससोन्या समप्यते ॥७॥
( राधा ससीभ्यां सह निष्क्रान्ता)
पौर्णमासी-(परिक्रम्य) नान्दीमुखि, कृष्णेऽपि नातिदूरे भविष्यति,
यदा दक्षिणतो नैचिफोनिकुरम्यस्य हम्बारबारम्बरोऽयमम्बरमाकामति ।
तदहं स्नानापं प्रजामि । ७॥ (इति निष्क्रान्ते)
(ततः प्रविशति कृष्णः)
कृष्णः-(सोदे गम्)
यदधि तदकस्मादेव विरमापिताक्षं
नवतडिभिरामं धाम साक्षाढमूध ।
तदवधि चिरचिन्ताच सत्ता विरक्ति
मम मतिरुपभोगे योगिनीव प्रयाति ।।७७॥२४॥
देखा। शिव | शिव । मैं भोली-भाली यह कैसे जान पाती कि वह अतिशय
ज्वालाराशि को देने वाला है ।।७४॥२३॥
पौर्णमासी-स्नेह पूर्वक देखते हुए) बेटी । एक क्षण एकान्त मे
बैठ कर पुष्प दल पर एक पत्र लिखो, जिसे अपनी सखियो के हाथ कृष्ण
को भेज दो ॥७॥
( तब श्रीराधा ललिता-विशाखा सखियो के साथ चली जाती हैं )
पौर्णमासो-(घूमकर) हे नान्दीमुखी | कृष्ण भी अधिक दूर नही
होगे, क्योकि दक्षिण दिशा उत्तम गौओ के हम्बा-रव से आकाश मण्डल
पूरित हो रहा है । मैं तो अब स्नान करने जाती हू । (इतना कहकर दोनो
चली जाती है ) ॥७६॥
[ तदनन्तर श्रीकृष्ण प्रवेश करते है ]
श्रीकृष्ण-(उद्वेग पूर्वक) जब से अकस्मात् नेत्रो को चमत्कृत करने
वाले, विद्युत् के समान मनोरम उस राधे के रूप को मैंने देखा, तब से
मेरी बुद्धि चिरकाल के लिए चिन्ता-चक्न में फस गई और योगिनी की तरह
अन्य सब विपयो से विरक्त हो गई है ।।७७॥२४॥
६४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्ग-२* (पुरोऽनुसृत्य स्वगतम्) हन्त, रङ्गणमाल्यमुपनेतु प्रस्थितो वयस्यः कथं बिलम्बते ॥७॥ (प्रविश्य माल्पहस्तः) मधुमङ्गलः- कधं अज्ज दुम्मणाएदि पिसवअस्सो ? होदु । पसङ्गदो जाणिस्सम् । [ कथ- मद्य दुर्मनायते प्रियवयस्यः । भवतु । प्रसङ्गतो ज्ञास्यामि । ] ( इति परिक्रम्य कृष्णं पश्यन् स्वगतम् । संस्कृतेन )।७६॥ फुल्लप्रसूनपटलस्तपनीयवर्णा- मालोषध चम्पकलतां फिल कम्पतेऽसौ। शङ्क निरगुनयकुडकुमपङगौरी राधास्य चित्तफलके तिलकोबभूव ॥०॥२५॥ (इत्युपसत्य) भो, गेह । [ भोः, गृहाण 1 ] (इति माल्यं निवेदयति) १८१॥ कृष्ण:- (अनाकणितकेनेव) कनकादिनिकेतकेतकीकलिकाकल्पकलेवर तिः । हृदि सा मुदिरालिमेदुरे चपला मा किमलंकरिष्यति ॥२॥२६।। -( सामने देखकर मन-मन में ) ओहो ! मधुमङ्गल रंगण पुष्प माला लेने गया था, इतनी देर कहां लगा दी ? ॥७८।। [ इतने में माला हाथ में लेकर मधुमसल आता है ] मधुमङ्गल-(मन-मन में) प्रिय ससा कैसे अनमना हो रहा है ? अच्छा, प्रमाक्रम से पता लग जाएगा ॥७॥ ( यह कहते हुए घूमकर श्रीकृष्ण को देष मन ही मन में ) विकसित कुसुमों याली स्वर्णवर्ण को चम्पफलता को देसार प्रिय मित्र पुननित हो रहा है, जान पड़ता है निर्मल नवीन मुदकुम पक सय गौरवर्णा राधा इस के पित-पट पर तिलय स्वरूप बन गई है 1150|२५।। (आगे आकर ) प्रिय मित्र ! यह नो । (यह पह कर माला दे देना है ) 1m श्रीकृष्ण-(अनगुनी करते हुए ) मुवर्ण पर्वत जात पेतमी निरा मी भांति बान्ति युक्त यह रापा-विजनी मेरी नाय हृदय मेप मासा पर विराकमान है, भय और पपा पानु मुझे मतगत करेगी? 1८२२.२६।।
मया ? . * थोविदग्धमाघव-नाटक अव२* [ ६५ मधुमङ्गल:- (स्वगतम्) , फलिदं मे तपकेण । (प्रकारामुच्च :) भो पिअवस, समुहे वियकोसन्दं वि फोस म ण पेक्क्षसि ? [ फलितं मे तर्केण । भोः प्रियवयस्य, संमुखे विक्रोशन्तमपि कस्मान्मा न.प्रक्षसे-2 ] ॥३॥ कृष्ण:-(साहित्यम्) ससे, चम्पफलताया लावण्याकृष्टन नोपदृष्टोऽसि ॥४॥ मधुमङ्गलः-सचं जेव्य भगासि, किन्तु सचारिणीए चम्पालदाए [ सत्यमेव भणसि, किंतु संचारिण्याचम्पकलतायाः । ] ॥५॥ कृष्ण:-सखे, फाममसंभाव्यश्वम्पकलतायाः संचारः ।।६।। मधुमङ्गलः-वास, वर्ण विरमेदु रगतणन् । उज्जु कहेहि कहं सुण्णहिमओसि ति? [ वयस्य, क्षणं विरमतु वक्रत्वम् । नाजुकं कथय कथं शून्यहृदयोऽसीति । ] ८७|| कृष्णः-(सस्मितम्) ससे, मालां विना ॥८॥ मधुमङ्गलः-बाला ति भणाहि । [ वालामिति भण। Cl कृष्णः-मुधेयं ते विशङ्का॥ मधुमङ्गल:-(संस्कृतमाथित्य) मधुमगल-(मन में) मेरा अनुमान सच्चा ही निकला । (स्पष्ट रूप में ) हे प्रिय मित्र ! मैं तुम्हारे सामने चिल्ला रहा हूं फिर भी तुम मुझे क्यों नही देख रहे ? ||३|| श्रीकृष्ण-(भाव छिपाते हुए) मित्र ! चम्पकलता के लावण्य में आकृष्ट होने से मैं तुम्हें नही देख पाया हू ॥१४॥ मधुमङ्गल-सत्य कह रहे हो, परन्तु चलती-फिरती चम्पकलता के । श्रीकृष्ण-मित्र ! चलती-फिरती चम्पकलता मिलना तो असम्भव है। मधुमङ्गल-मित्र ! थोड़ी देर के लिए टेढापन छोड़ दो, सीधे बोलो, किस लिए निराश-हृदय हो रहे हो ? ५८७॥ श्रीकृष्ण-(मुस्कराते हुए) सम्बे ! माला के विना ॥८८|| मधुमङ्गल-वाला के विना कहो।।६।। श्रीकृष्ण-यह आशंका व्यर्थ है ।।६।।
*श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-२ * . - न जानी मूनश्च्युतमपि शिखण्डं यदखिलं न कण्ठे यन्माल्य कलयसि पुरस्तात्कृतमपि । तदुन्नोत वृन्दावनकुहरलीलाकलभ है राधानेत्रभ्रमरवरवीर्योन्नतिरियम् ॥११॥२७॥ कृष्ण – (स्वगतम्) कथ निखिलमेव तकित धूतन ? सदल प्रतार्य। (प्रकाशम्) सखे, यथार्थमात्य । तदाकर्ण्यताम् । ६२॥ मम राधा निसर्गस्थ प्रतोपमनयन्मन । महाज्येष्ठीव सहसा प्रवाह सौरसन्धवम् ॥६॥२॥ मधुमङ्गल -रण अच्छीश दे पञ्चषखोभूदा एसा । [ नूनमक्ष्णोस्ते प्रत्यक्षीभूतैपा। ] ॥४॥ कृष्ण -अथ किम् । सुवलत सा परिचिक्ये च (इत्यौत्सुक्यमभिनीय) भ्रमभ्रू वल्लीकं प्रतिदिशमपाङ्गस्य बलने कुरङ्गीम्यो भङ्गीमरमुपदिशन्तीमिव दृशो । तुम्हारे मस्तक से मोरपुच्छ पृथ्वी पर गिर गया है। तुम्हे उसका पता नहीं । तुम्हारे गले मे मैं ने माला डाल दी है, वह भी तुम नही जानते । हे वृन्दावन-कुन लीला विलासी मातग मैं ने निश्चय जान लिया है कि राधा के नेत्र युगल भ्रमरो का ही यह उन्नत प्रभाव है ।।६१.२७॥ श्रीकृष्ण-(मन मे) इस धूर्त ने सब बात कैसे जान ली है ? अब इस से अधिक विवाद परने का कुछ प्रभोजन नही है । (म्पष्ट कहते हैं) मित्र I मैं तुम्हें सच्ची बात बताता हू, उसे मुनो ॥२॥ -महा ज्येष्ठी पूर्णिमा के दिन समुद्र मे तूफान आने से जैसे उमा जल गगा की तरफ उलटा प्रवाहित होकर क्षोभ उत्पन्न कर देता है, उसी प्रकार रापा ने मेरे मन की स्वाभाविक गति को क्षुब्ध कर दिया है ॥२८॥ मपुमाल-निश्चय ही तुम्हारे नेलो ने उसे देखा है ॥४॥ श्रीकृष्ण-क्यो नहीं, सुबल द्वारा उसका परिचय मिला है || (यह पहार उत्सुक्ता प्रकाश घरते हुए)- मिस । यह राधा चारो दिशाओं में विलास विशिष्ट भूसता द्वारा । मधुमङ्गल-बन्धी - ६७ ? * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * ततस्तां बिम्बोष्ठी कलयति मयि क्रोधविकटो मनोजन्मा पौष्पं धनुरनुपमं सज्यमकरोत् ॥६६॥२६॥ मधुमङ्गल:-अपि णाम संयुत्त अण्णोण्णदंसणम् । [ अपि नाम संवृत्तमन्योऽन्यदर्शनम् । ] [६७ । कृष्णः-नहि नहि। तस्याः सखे मुखतुषारमयूखबिम्बे दूराममाक्षिपदवीमधिरूढमात्रे निवन्धत: शपथकोटिभिरम्बयाहं नीत. क्षणादहह सद्मनि भोजनाय ॥८॥३०॥ मधुमङ्गल:- :-अस्स, चिट्ठन्ति बहुलाओ बल्लवसुन्दरीओ, तहवि फीस तुमं एकाए राहीए णिन्भरं अणुरज्जसि ? [ वयस्य, तिष्ठन्ति बहुला बल्लवसुन्दर्यः, तदपि कस्मात्वमेकस्यां राधाया निर्भरमनुरज्यसि ? ] En कृष्ण.--सखे, राधायामसाधारणी कापि माधुरी। तथा हि । तस्याः कान्तिद्य तिनि वदने मञ्ज ले चाक्षियुग्मे तत्रास्माकं यदवधि सखे दृष्टिरेषा निविष्टा । हरिणियों को मानों उपदेश दे रही थी, मैं ने भी अपने दोनों नेत्रों को उस बिम्बोष्ठी के दर्शन में जब लगाया, तब कन्दर्प क्रोधित हो उठा और मेरे प्रति उसने अपना अनुपम पुष्प-धनु तान लिया ॥९॥२६॥ मधुमङ्गल-क्या तुम दोनों ने एक दूसरे को देखा है ? ॥६॥ श्रीकृष्ण-नही, नहीं, मित्र ! दूर से ही उस के मुखचन्द्र मण्डल पर मेरे नेत्र-युगल केवल पहुंचे ही थे कि उस समय माता आ गई और मुझे कोटि शपथ देकर भोजन कराने घर ले गई ॥६॥३०॥ मधुमङ्गल-सखे ! यह बता, अनेक सुन्दर सुन्दर गोपरमणियां मौजूद है, फिर भी तुम्हारा मन केवल उस श्रीराधा में ही क्यो अनुरक्त हो रहा है ? ६६ श्रीकृष्ण-मित्र | क्या कहूं, राधा में कुछ अनिर्वचनीय माधुरी है, सुन- आहा ! उस राधा के उज्ज्वल कान्तिमय मुख पर तथा मनोहर नेत्रो पर जब से मेरी दृष्टि गई, मैं तुम से सत्य कहता हूं, तब से चन्द्रमा ६८ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * सत्य यू मस्तदवधि भवेदिन्दुमिन्दीवरं वा स्मारं स्मार मुखकुटिलताकारिणीयं हृणोया ॥१००॥३१॥ मधुमङ्गलः-दसणदो पढम जेव्व तत्य तुज्झ रामो मए तक्किदो त्यि । ता कित्ति लावण्णोवाहियो ति भणासि । [ दर्शनत प्रथममेव तत्र तव रागो मया तकितोऽस्ति । तत्किमिति लावण्योपाधिक इति भणसि ? ] ॥१०॥ कृष्णः-सखे, सत्यमात्य । स्वचित्तामिनिवेशादेव तस्यां फोऽपि महिमोन्नाह प्रतीयते । तथा हि ॥१०२।। पन प्रकृत्या रतिस्त्तमाना, तत्रातुमेयः परमोऽनुभावः । नैसगिको कृष्णमृगानुवृत्तिदेशस्य विज्ञापयति प्रशस्तिम् ॥१०३ ३२ (नेपथ्ये) सहि सारिए, दिठ्ठो तुए एत्य वल्लविन्दणदणो। [ सखि सारि, दृष्टस्त्वयात्र बल्लवेन्द्रनन्दन 1 J॥१०४।। और कमलो को याद करके मुझे मुहँ विगाड देने वाली लज्जा और घृणा आती है ।।१००1३१॥ मधुमङ्गन-मैं समझ गया हूं, केवल पहली बार दर्शन मात्र से ही तुम्हारा ऐसा अनुराग राधा मे उत्पन हो उठा है, फिर क्या ? अव उसकी लावण्यता का वर्णन क्यो कर रहा है । ॥१०१॥ श्रीकृष्ण -मित्र ! मैं सत्य कहता हु, मैं ने अपने चित्त के अभिनिवेश गे ही राधा को अतिशय अनुपम महिमा का अनुवाद किया है, सुन--||१०२ थेष्ठ पुरुषो का जहा अपने आप अनुराग यह उठे, वहा पोई न कोई परम श्रेष्ठ पदार्थ या महत्व का अनुमान पर लेना चाहिये, क्योकि ग्यमायत कृष्णसार मृग जिस देश में विचरण पर, उस देश की अष्टना अयस्म अपने आप हो जात होती है ।।१०३॥३२॥ (पदें ये पीपे से आवाज आती है) मओ सगि साग्नि तुमने क्या यहां व्रजेन्द्रननद को देपा है ५१०४ .
*धीविदग्धमाघव-नाटक अङ्ग-२ * [ ६६ -- श्रीकृष्णः-सखे, नेदीयानयं सुकुमारीकण्ठ ध्वनिरुदश्चति । तदा तूष्णीमांस्वहे ॥१०॥ (ततः प्रविशतो ललिताविशाले) ललिता-पेयख, एसो दिद्विआ पुरदो कण्हो । ता उपसप्पम्ह । (इत्युभे तथा कृत्वा) जअदु जअदु गोउलाणन्दो। [प्रेक्षम्च, एप दिष्ट्या पुरतः कृष्ण तदुपसावः । जयतु जयतु गोकुलानन्दः । ] ॥१०६॥ श्रीकृष्णः-सखि ललिते, शङ्क. मनोहारिफुसुमपत्रमादातुमद्य वृन्दा- टवीमध्येऽवतीर्णासि ॥१०॥ ललिता-विण्णादं वि पूरणं आमआरेण संगोवेसि जं दादुति ण भणासि । ता येण्ह रणं कपिणारकोरअपत्तम् । [ विज्ञातमपि नूनमाकारेण संगोपयसि यद्दातुमिति न भणसि। तद्गृहाणनं कणिकारकोरकपनम् ।। (इत्यनङ्गलेख कृष्णकरेऽपयति ) ॥१०८।। श्रीकृष्णः-(स्वगतम्) चेतः, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । त्वद- भीष्टवीजस्याडकुरोऽयमिति शङ्क ।।१०।। श्रीकृष्ण-मिन ! यहा निकट ही किसी सुकुमारी की ध्वनि आ रही है, इस लिए हमे चुपचाप रहना चाहिये ॥१०॥ [ तदनन्तर ललिता-विशाखा प्रवेश करती है ] ललिता-सखि ! देखो, देखो, सौभाग्य वश श्रीकृष्ण सामने ही विद्यमान हैं, चलो इनके निवाट चलें। (इतना कहकर दोनों उनके पास माकर कहती हैं)-गोकुलानन्द की जय हो, जय हो ॥१०६॥ श्रीकृष्ण-सखि ललिते ! मैं समझता हू तुम मनोहारी पुष्प-पत्रों को लेने के लिए आज वृन्दावन मे पधारी हो ।।१०७॥ ललिता-जानी हुई बात को भी तुम दूसरे रूप मे छिपाते हो, यो क्यों नही कहते कि देने के लिए आई हो । यह लो कर्णका कुसुम के सुगन्धित पत्र । (इतना कहकर श्रीकृष्ण के हाथ मे अनङ्गलेख अर्पण करती है) ।।१०८ श्रीकृष्ण-(मन-मन मे) अरे मन ! आश्वस्त हो, तसल्ली कर, जान पड़ता है यही पत्र तुम्हारे मनोवाञ्छित वीज का अङकुर है ।।१०।
७० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * मधुमङ्गलः--भोदि ललिदे, कि इमिणा अक्खराणां पत्तेण? सरकरारण पत्त समप्पेहि । [ भवति ललिते, किमेतेनाक्षराणा पत्रण । शर्कराणा पत्र समर्पय । ] ॥११०॥ श्रीकृष्णः-सखे, वाचय पत्रम् । कदाचिदेतन्नः कर्णरसायनस्य 'पात्रीभवेत् ॥१११॥ मधुमङ्गल - भो वमस्स, विट्ठा तुम्ह गोमालजादीए वदाप्णदा। अम्हवम्हणजादि जेव्व गोरएण बन्दामि. ज तहि दिअहे जण्णिअवम्हणीहिं चउविहेण अपणेण भोइदम्ह । [भो वयस्य, दृष्टा युष्मद्गोपालजातेदान्यता। नन्वस्मबाह्मणजातिमेव गौरवेण वन्दे, यत्तस्मिन्दिवसे याज्ञिकब्राह्मणीमिश्च- 'तुविधेनानेन भोजिता: स्म.। ] (इति लेख वाचयति) ॥११२।। परिम पडिच्छन्दगुण सुन्दर मह मन्दिरे तुमं वससि ।' तह तह रुन्धसि वलि जह जह चइदा पलाएमि ।। [ धृत्वा प्रतिच्छ दगुण सुन्दर मम मन्दिरे व वससि । तथा तथा रुणसि वलितं यथा यथा चक्त्तिा पलाये] ॥११३॥३३॥ श्रीकृष्ण.-ससे, दुरधिगमार्था तावदियं गाया । तेन पुनमण्यताम् ॥११४ मधुमङ्गल-ललिते ' इस अक्षरो के पत्ते से क्या होगा, मिठाई का पत्ता समर्पण कर ॥११०॥ श्रीकृष्ण-मित्र | पढना इस पत्र यो, क्या यह हमारे कानो की रसायण का पात्र बनता है ? ॥११॥ मधुमङ्गल-हे समे | मैंने तुम्हारी गोपजाति की यही तो उदारता देशी है । गौरव पूर्वक हमारी ब्राह्मण जाति को वन्दना करते हो, क्योकि उस दिन भी यानिय ब्राह्मणियों ने हमे चतुर्नधि अग्न भोजन कराया पा ॥११॥ (यह पहकर पक्ष पढने लगता है ) -हे सुन्दर 'तुम निम-पट पेम्प मै मेरे भवन में निवास करते हो, जगे जैसे पवित होकर मैं इधर-उधर भागती है, यमे ही बसे उपर आपर तुम मुझे रोकसते हो ॥११३॥३३॥ योज-ग पत्र की यात या अभिप्राय मेरी समझ में नहीं मापा, इसलिए इसे फिर पदो ॥१४॥ - *थोविदग्धमाधव-नाटक अ-२* [ ७१ ( मधुमङ्गलस्तथा क्रोति) श्रीकृष्ण.-(सानन्द स्वगतम्) कुलस्त्रियो हि धर्मभोरवो भवन्ति । तदुपेक्षया भावनिष्ठां निष्टड्डयामि । (इति सरम्भमभिनीय प्रकाशम्) हहो, पश्य पश्य ॥११॥ , स्निग्धरेभि सखिभिरपिलर्धनुवृन्दानुसारो नारोवा-विमुखहृदय, काननान्ते चरामि । मां स्वैरिण्यस्तदपि यदिमा दूषयन्ति प्रकाम तद्विज्ञप्ति द्रुतमिह जरद्गोपगोष्ठ्यां करिष्ये ॥११६॥३४॥ (इति कृत्रिमामण द्रुत परिक्रामति ) मधुमङ्गल:-(स्मितमावृत्य) भो वम्हशारिसिहामरणे । पखरण णिव- ट्टिम इमाओ दुम्मुहगोइआओ पच्चुत्तरेण णिज्जित्तिअ विडावेहि । अह क्षु एद सव्व चिट्ठाण वृत्तन्त गोउलेसरीए विण्णविस्सम् । [ भो ब्रह्मचारि- शिखामणे क्षण निवर्त्य इमा दुर्मुखगोपिका प्रत्युत्तरेण निजित्य विद्रावय। (मधुमङ्गल फिर पढता है) श्रीकृष्ण-(आनन्द पूर्वक मन मे) कुलस्त्रिया निश्चय ही धर्म-भीरू होती है। इसलिए इनकी उपेक्षा करके इनके भावो को निष्ठा को जाचता हू । ( इतना कहकर शीघ्रता से दिखाते हुए ) सखा | ओहो । देखना देखना -1॥११५॥ मैं सब सखाओ के साथ गौए चराता हुआ वन मे ही विचरता हू, मेरा चित्त कभी भी स्त्रियो की वार्ता में नही जाता है, तो भी यदि ये समस्त स्वेच्छाचारिणी रमणिया आकर हमे वदनाम करती है, तो मैं शीघ्र जाकर वृद्ध गोपियो की गोष्ठी में यह सब बतलाऊ गा ॥११६. ३।। ( इतना कहकर वनावटी क्रोध दिखाते हुए चलने लगते है ) मधुमङ्गल~(हसी को रोकते हुए) हे ब्रह्मचारि शिरोमणि । जरा रुक जाओ, इन दुर्मुखा गोपियो को प्रत्युत्तर देकर पराजित करके अभी भगा देता है। परन्तु मैं भी मा-यशोदा के पास जाकर इन सब धृष्ट गोपियो का सब हाल सुनाऊगा । ( इतना कहकर श्रीकृष्ण का हाथ पकड कर ७२ ] * प्रोविदाधमाधव-नाटक अङ्क-२ * अहं खल्विदं सर्व धृष्टांना वृत्तान्तं गोकुलेश्वये विज्ञापयिप्यामि । ] ||११७॥ (इति पाणी धृत्वा व्यावतंयति) (इति परस्परमवेक्ष्य वैलक्ष्यं नादयतः) श्रीकृष्णः-सखि विशाखे, चातुरक्षिकं प्रेक्षणमपि नास्ति । कुत- स्तावत्परितो रोधनम् ? तदुनयामि । फेनाप्यपरेण नागरेण तस्या. स्वान्त- मुबालितम् ॥११॥ विशाखा-(संस्कृतमाश्रित्य) कस्तादृग्यजमण्डलेऽद्य बलते शक्य गरीयानसी येनोच्चालयितु बलात्कुलवतीचेतीगिरिग्रामणोः ? इत्यस्नाभिरयाधिक्रमलवादुरिक्षप्तगोवर्धनो हेतुस्त्वं पङ्कजाक्ष यदुमिस्तवासि मिष्टद्धितः ।।११६।।३५ मधुमङ्गल:-मइ वाआलिए, चिट्ठ चिट्ठ । दिटो मएं उविखत्तदण्ड- भण्डलेहि गोवेहि गोषढणो धरिदो। तुम कोस एक जेव पिअवमस्त वापस लाता है ) ॥११७॥ (ललिता-विशाखा दोनों एक दूसरे को देखकर विस्मय प्रकाश करती हैं) श्रीकृष्ण-सखि विशासा! मेरी और राधा की कभी चार आप ही नहीं हुई हैं-आंस से आस देसी भी नहीं है, फिर कहो फैरो में उसे चारों ओर से रोक सेता हूं ? मेरा अनुमान है, किसी दूसरे नागर ने उसके मन को पश्चल कर रखा है ।।११८॥ विशाणा-हे कमलनयन ! इस ग्रन मण्डल में दूसरा और फोन तुम्हारे गमान बलशाली श्रेष्ठ पुरुप है, जो बल पूर्वक फुलपतियों के वित्त रूप गिरिराग को विचलित करने में समर्थ है । तुम ने जब अपने स्वाभाविक यस से गोवर्धन को उठा लिया, तमो से सतो नारियों ने तुम्हें ही (युनत. तियों के मन को पचत करने का) मूल कारण निर्धारित पिया है ।।११६३१ मपुमङ्गम-भरी यापाल ! ठहर जा, टहर ना, मैं ने अपनी अायो से देशा६, सय गोषों ने माटो नगारर गोवर्धन मोपारण रिया पागू * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * [ ७३ , : । संभावेसि । [अयि वाचालिके, ति: तिष्ठ । दृष्टो मया उक्षिप्तदण्डमण्ड- लंगोंपैर्गोवर्धनो धृतः । त्यं फस्मादेकमेव प्रियवयस्यं संभावयसि । ] ॥१२०।। घीकृष्णः-ललिते, अलमतिप्रसङ्गन। तनिक्र्तस्व ॥१२१॥ ललिता--सुन्दर, सव्वगोउलसुहमारिणो वि तुअत्तो कधं सा एका जेव्व दुक्खं मरिहदि . वरिअसि ? [ सुन्दर, सर्वगोकुलसुखकारिणोऽपि त्वत्तः कथं सा एकंव दुःखमहंति वरीयसि ? ] ॥१२२॥ श्रीकृष्ण:- सङ्गी मे मधुमगनो न सहते धर्माध्वनो विच्युति श्रीदामा परिमार्गपन्मम न हि छिद्राणि निद्रायते। फंसः शास्ति खल. क्षिति कथिमतो मुग्धे विधेयं मया निःशङ्क कुलसुन्दरीपरिभवज्वालामहासाहसम् ? ॥१२३॥३६॥ ललिता-(सामर्षम् संस्कृतेन) अन्तः क्लेशकलडिता किल वय यामोऽद्य याम्यो पुरी नायं वञ्चनसंचयप्रणयिनं हास तथाप्युज्झति । । ३ किसलिए अकेले कृष्ण की प्रशंसां कर रही है ? ॥१२०॥ श्रीकृष्ण-ललिते ! इस बात का कोई प्रयोजन नही, इसे बन्द करो। ॥१२॥ ललिता-हे सुन्दर ! आप समस्त गोकुल को सुख देने वाले है, तो फिर अकेली वह श्रेष्ठ नारी श्रीराधा क्यो दुख भोग करती है । ॥१२२।। श्रीकृष्ण-हे ललिते ! मेरा साथी मधुमङ्गल धर्म-पथ से मेरे विच्युत होने को सहन नहीं कर सकता, श्रीदामा मेरे छिद्रों को ढूढने मे सदा जागरुक रहता है, और दुष्ट कस पृथ्वी मण्डल पर शासन करता है, हे मुग्धे ! तुम कहो, फिर मैं कैसे निशङ्क होकर कुल सुन्दरियो की अनादर रूप ज्वाला को प्रज्वलित करने का महा साहस कर सकता हूँ? ॥१२३॥३६॥ ललिता-(क्रोध सहित राधे! हम आन्तरिक क्लेश से कलङ्कित हैं, इसलिए यदि हम आज यमपुरी को भी चली जाएं, फिर भी यह कृष्ण वञ्चना रूप परिहास का परित्याग नहीं करेगा। हाय ! बुद्धिमति राधे ! इस ७४ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * अस्मिन्सपुटिते गभीरकपटैराभोरपल्लीविटे हा मेधाविनि राधिके तव कय प्रेमा गरोयानभूत् ? ॥१२४।।३७॥ (इति रोदिति) मधुमङ्गल -अइ मुद्ध, समलसत्यविसारो जस्स अम्हारिसो अमलो होइ सो वि कि एद धम्म अदिक्क मिस्सदि । ता अल वादिदेण। [ अयि मुग्धे, सकलशास्तविशारदो यस्यास्माशोऽमात्यो भवति, सोऽपि किमिद धर्ममतिक्रमिष्यति ? तदल वनरुदितेन । ] ॥१२॥ विशाखा-(स्वगतम्) रण राहीए गुञ्जाबलि कण्हस्स देती ह इङ्गिद लखेमि । [ एना राधाया गुञ्जावली कृष्णाय ददती अहमिङ्गित लक्षयामि । ] (प्रकाशम् सस्कृतेन) ॥१२६।। उदोगरागेण फरम्बितान्तरा परिस्फुरत्कृष्णमुखी गुणाश्चिता। गुञ्जावली मञ्जतरावलम्बता साराधिकेय तद कण्ठसगमम् ।।१२७॥३८ महान कपटी गोपिका कामुर कृष्ण मे तुम्हारा इतना अधिक प्रेम क्यो बढ गया है ? ॥१२४॥३७॥ ( इतना कहकर ललिता रोने लगी) मधुमङ्गल-अरी मुग्धे । हम जैसा समस्त शास्त्र विशारद जिसका मन्त्री है, वह (कृष्ण) से धम का त्याग कर सकता है ? इस लिए इस अरण्य-रोदन फो (जिसे सुनने वाला कोई नहीं है ) बन्द कर ॥१२५॥ विशाखा-(मन मे) श्रीराधा यी यह गुआमाला श्रीकृष्ण को देवर इनमा अभिप्राय देयती हू । (स्पष्ट म्प से)- ॥१२६॥ हे गृष्ण | जिस या सब भीतरी अङ्ग सान वर्ण या है और मुसभाग प्याग-गुणो से भूपित है, और जिसका गुम्पित करने वाला सूम अधिर सार विशिष्ट और मनोहर है, ऐगी गुलामाता यो तुम कण्ठ में धारण करो। [ पक्षान्तर मे-हे कृष्ण ! जिरामा चित्त गनुराग से परिपूर्ण है और मुग मे सदा कृष्ण-गृप्य पुरारती रहती है, जो भनेर गुणों से गुम्पति और मन को हरने वानी है, ऐसो श्रीराधिका को तुम गरे सगानो] ॥१२॥३॥ । ?
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२*
[ ७५
(इति कृष्ण कण्ठे स्वयमपंयति)
श्रीकृष्ण:-(स्मित्वा सकपटेयम्)
रागिणमपि सुफठोरं सुवृत्तमपि मुहुरुदौर्णमालिन्यम् ।
'युक्तोनामिय भाव त हि गुजाहारमिच्छामि ॥१२८॥ ३६॥
(इत्यजाननिव कण्ठादवतायं रङ्गणमालिकामपंयति)
विशासा-(स्वगतम्) इमस्स भमो वि अम्हारणं मङ्गलो संयुत्तो।
[ एतस्य भ्रमोऽप्यस्माकं मङ्गलः संवृत्तः । ] (इति वस्त्रण संवृणोति ) १२६
ललिता-हला, गोविआकोडिभुअगस्स इंमस्स अक्खलिदं अचरिअ
वम्हचरि दिट्टिा पअडीभूतम् । ता अम्हे वि गदुअ तं अत्थाणाणुराइणी
राहिम गिवट्टावेम्ह । । हला, गोपिका कोटिभुजङ्गस्य एतस्यास्वलित-
माश्चर्य ब्रह्मचर्य दिष्टया प्रकटीभूतम् । तदावामपि गत्वा तामस्थाना-
नुरागिणी राधिका निवत्तं यावः । ] ॥१३०॥
( यह कहकर उस माला को वह स्वयं श्रीकृष्ण के गले मे डालती है)
श्रीकृष्ण-(मुसकराते हुए कपट-ईर्ष्या सहित) लाल वर्ण होते हुए,
भी यह गुजामाला अति कठोर है, सुन्दर मालाकार में होते हुए भी अति
मालिन्ययुक्त है। इसलिए युवति-भावमयी माला को मै नही चाहता हूं।
(अभिप्राय यह है कि अनुरागवती होकर भी अपने अनुराग को भीतर
छिपाय रहती है, बाहर केवल कठोरता का ही प्रदर्शन करती है । इसलिए
मैं ऐसी श्रीराधा को नहीं चाहता हू) ॥१२८॥३६॥
( इतना कहकर अजान की भांति गले की उस माला को उतार
कर विशाखा के हाथ मे दे देते हैं)
विशाखा-(मन मे) इनका भ्रम भी हमारे मङ्गल के निमित्त है।
(यह कह कर माला को कपड़े से ढक लेती है ।।१२।।
ललिता-विशाखा ! कोटि गोपिका-कामुक का अस्खलित आश्चर्य-
मय ब्रह्मचर्य अव आखो के सामने है, चलो हम भी इसके प्रति अनुराग
करने वाली राधिका को रोक देवें ॥१३०॥
. ७६ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२* विशाखा-सहि, जुत्तं मन्तेसि । [ सखि, युक्त मन्त्रयसि । ] ॥१३१॥ (इत्युभे परिक्रामनः) ललिता-विशाहे, तुमं गदुअ इमाए, रङ्गणमालिआए पिअसही आसासेहि। अहं क्खु एवं वुत्तन्तं भअवदीए णिवेदिस्सम् । [ विशाखे, त्वं गत्वानया रङ्गणमालिकया प्रियसखीमाश्वसिहि । अहं खल्विद वृत्तान्त भगवत्यै निवेदिष्यामि । ] ॥१३२।। (इति निष्क्रान्ते) मधुमङ्गलः-भो, वअस्स आदरिज्जन्तं वि अप्पाणं कोस आदरावेसि । इदं एयु पच्चादायपव्वदाहिरोहणस्स अहिरोहिणीणिम्माणं दाव । [ भोः, वयस्य ! आद्रियमाणमप्यात्मानं कस्मादादरयसि ? इद खलु पश्चातापपर्वता- धिरोहणस्याधिरोहिणीनिर्माणं तावत् । ] ॥१३३ । श्रीकृष्ण:-सखे, सत्यं प्रवीपि । साहसिक्यं हसिनयानुष्ठितम् ॥१३४ मधुमङ्गलः-पेपण गोईजुमलं णेत्तपहं अदिवमिदम् । [ पश्य, गोपीयुगल नेत्रपथमतिक्रान्तम् । ] ॥१३५॥ विशाखा-सखि ! तुमने ठीक सलाह दी है । (यह कहकर दोनों चल पडती हैं) ॥१३॥ ललिता-विशाया ! तू तो जाकर इस कुसुममाला से प्रिय सखी श्रीराधा को आश्वासन दे और मैं जाकर इस वृत्तान्त को भगवती पौर्णमासी यो निवेदन करूंगी ॥३३२॥ [ दोनो चली जाती हैं ] मपुमङ्गत-हे समे ! आदर को प्राप्त हुए तुम फिर किस लिए अधिक आदर पाहते हो ? यह यात निश्चय ही बाद में तुम्हारे लिए पानाप के पवंत पर चढ़ने यो सीढ़ी के समान बनेगी, (याद में तुम्हें पश्चाताप करना होगा) ॥१३३।। श्रोष्ण-मित्र ! तू मच पड़ता है। मैंने हंगी हंसी में ऐसा माहम पिया है ॥१४॥ मधमान-देगा, दोनो गोपिराएं हमारी दृष्टि मे दूर निकल गई हैं। ।
*श्रीविदग्यमाधव-नाटक अङ्क-२* [ ७७ श्रीकृष्णः-(सानुतापम्) श्रुत्या निष्ठुरतां ममेन्दुवदना प्रेमाडकुरं भिन्दती स्वान्ते शान्तिधुरा विधाय विपुरे प्राय: पराश्विष्यति । फि वा पामरकामकाफपरिवस्ता विमोक्ष्यत्यसन् हा मौग्ध्यात्मलिनो मनोरथलता मृद्वी मपोन्मूलिता ।।१३६।।४० मधुमङ्गल:-दाणि कि एत्थ सरणम् ? [ इदानी किमान शरणम् ? ] ॥१३७॥ श्रीकृष्णः-ससे, प्रत्यनङ्गलेखं विना नान्यत्पश्यामि शरणम् ।।१३।। मधुमङ्गल:-कि एत्य लेहसाहणम् । [ किमत्र लेखसाधनम् । ] १३६ श्रीकृष्ण:-वशीकारक्रियाप्रशस्तो रागवान जवानिर्यासः ।.१४०।। मधुमङ्गल -एहि उड्डमहाडइमण्डिदं णादिदूरे पक्खन्दतित्थं गच्छेम्ह। [एहि, उड्रमहाटवीमण्डितं नातिदूरे प्रस्कन्दनतीर्थ गच्छावः । ] ॥१४१।। (इति निष्क्रान्ती) (ततः प्रविशति विशाखया प्रबोध्यमाना राधा) श्रीकृष्ण-(अनुताप पूर्वक) हाय ! वह चन्द्रमुखी राधा मेरी निष्ठुरता को सुनकर प्रेमाकुर को छेदन कर अपने हृदय में धीरज पूर्वक विरह में निश्चय ही दुखी होगी, अथवा पापी कामदेव की धनुष टंकोर से भयभीत होकर प्राणों को छोड देगी। हा ! हा ! मैंने मूर्खता से कोमन फलवती मनोरथ-लता को जड़ से उखाड़ डाला है ।।१३६।०४०।। मधुमङ्गल-अब उपाय ही क्या है ? ॥१३७।। श्रीकृष्ण-मित्र ! प्रेम-पत्र के प्रत्युत्तर देने के सिवा और कोई उपाय नही दीखता है ॥१३८|| मधुमङ्गल-यहां लिखने का क्या साधन है ? ॥१३६।। श्रीकृष्ण-वशीकरण कार्य में लोहित जवा पुष्प का रस प्रसिद्ध है ? मधुमङ्गल-आओ ! जवा पुष्पों से मण्डित प्रस्कन्दन तीर्थ नजदीक ही है, वहा चलते हैं ।।१४।। [ दोनों चले जाते हैं ] ७८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क२* राधिका-(सखेद सस्कृतेन) यस्योत्सङ्गसुखाशया शिथिलिता गुर्वो गुरुभ्यस्त्रपा प्रारणेभ्योऽपि मुहृत्तया सखि तथा यूय परिक्लेशिता । धर्म सोऽपि महान्मया न गणित. साध्वीमिरध्यासितो धिग्धेयं तदुपेक्षितापि यदह जीवामि पापोयसी ॥१४२।।४१ विशाखा-(ससभ्रमम्) सहि, समस्सस समस्सस । [ सखि, समा- श्वसिहि समाश्वसिहि । ] (इति रङ्गणमाला घ्राणेऽर्पयति) ॥१४३॥ राधिका-(सज्ञा लब्ध्वा) हला, कि एदै अचरिझं बं समोहण वि पवोदेहि । [हला, किमिदमाश्वयं यत्समोहनमपि प्रवोधयति । ] ॥१४४॥ विशाखा-(माल्य निवेद्य सस्कृतेन) । अङ्गोत्तीर्ण विलेपन सखि समाकृष्टिनियाया मणि- मन्त्रो हन्त मुहुर्वशीकृतिविधौ नामास्य वशीपते । ( इसके बाद विशाखा के द्वारा चेतना मे लाई हुई श्रीराधा प्रवेश करती हैं)- थीराधा--(खेद पूर्वक)-हे सखि | जिन श्रीकृष्ण ने आलिङ्गन- सुख की आशा मे मैं ने गुरुजनो की भारी लज्जा को भी त्याग कर दिया है, प्राणो से भी अधिक प्रिय तुम सखियो को जिनके लिए अत्यन्त कष्ट दिया है और साध्वी स्त्रियो से सेवित उस प्रसिद्ध पातिव्रत्य धर्म को भी जिनके लिए मैं ने कुछ भी नहीं गिना, उन्ही श्रीकृष्ण ने मेरी उपेक्षा कर दी है, फिर भी मैं पापिनी जीवित हू, मेरे ऐसे धैर्य को धिक्कार है । ( इतना कहकर मूर्छित हो जाती हैं ) ॥१४२॥४१५ विशाण-(सम्भालते हुए ) सखि धीरज धरो, स्थिर होओ।।१४३ (इस प्रकार कहते हुए विशाखा उस पुष्प माला को श्रीराधा की नासिका पे आगे धरती है। श्रोराधिका-(चेतना पाकर) हा ससि । यह कैसी आश्चर्यमय वस्तु । जो मूछिन यो भी चेतन कर रही है ॥१४॥ विगाणा-(माला यो देती हुई) राधे। वशीधारी श्रीकृष्ण ये मङ्गो से उत्तर पदन-येसर मायर्पण प्रिया में मणि मे सहा है, उनका * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * [ ७६ निर्माल्यस्रगियं महौषधिरिह स्वान्तस्य संमोहने नासां कस्तिसणां गृणाति परमाचिन्त्यां प्रभावावलीम् ।।१४५॥४२ राधिका - (स्वगतम्) एट्वंगुणेण इमिणा उवेक्खिदं विग हदसरीरं कधं अज्जवि णिल्लज्जाहं धारेमि। ता कालिमहदपवेसोवा अणुसरिस्सम् । (प्रकाशम्) विसाहे. पिण्णवेहि गुरुअण जं बारहाइच्चतित्यं गदुअ सूरं अबिदुकामम्हि । [ एव' गुणेनानेनोपेक्षितमपि इद हतशरीर कथमद्यापि निर्लज्जाहं धारयामि ? तत्कालियह्रदप्रवेशोपायमनुसरिप्यामि । विशाखे, विज्ञापय गुरुजन यद्द्वादशादित्यतीर्थ गत्वा सूर्यमर्चयितुकामास्मि । J॥१४६।। विशाखा-साहु सुमराइदं पिअसहीए जे अज्जाए जडिलाए वि इदं जेव्व दाणि आदिम्हि । ता एहि । [ साधु स्मारित प्रियसख्या यदा- र्यया जटिलयापि इदमेवेदानीमादिष्टास्मि । तदेहि। ] ॥१४७ । (इत्युभे परिक्रामत) राधिका-(सव्यामोहम्) म परिहर इ मुउन्दो तहवि दुरासा विरोहिणी रहई। मह सहिं गहीरणीरा सगण बहिणी किदन्तस्स ॥ नाम वशीभूत करने मे मन्त्र के समान है, और यह उनके गले की माला मन के मोहित हो जाने में महा औषधि स्वरूप है, इसलिए हे सखि मणि मन्त्र एव महौषधि-इन तीनो के परम आश्चर्यमय प्रभाव का तू क्यो नही गान करती है । ।।१४५६४२।। श्रीराधिका-(मन मे) ऐसे गुणवान द्वारा उपेक्षित् दुर्भागे शरीर को भी मैं आज तक कैसी निर्लज्ज होकर धारण कर रही हू ? अब मै कालिय- हद मे प्रवेश कर इस शरीर को त्यागने का उपाय करूंगी। (स्पष्ट कहती हैं )-विशाखा ! तुम गुरुजनो को जाकर जना दो कि मै द्वादश- मादित्य तीर्थ पर जाकर सूर्य की आराधना करना चाहती हू ॥१४६।। विशाखा-प्रिय सखि ' तुम ने अच्छा याद किया, क्योकि आर्या जटिला ने भी आज मुझे यही आदेश दिया, तब आओ चले ( इतना कह कर दोनो चल पडती है ) ॥१४७।। श्रीराधिका-(मोह सहित ! विशाखा । श्रीकृष्ण ने मुझे त्याग कर . 4 ८० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * [मा परिहरति मुकुन्दस्तथपि दुराशा विरोधिनी दहति । मम सखि गभीरनीरा शरणं भगिनी कृतान्तस्य ] ॥१४८॥४३॥ विशाग्वा-हला, पेक्ख पत्याणे मङ्गलसूअणाई सउणाई । ता एवं मा भपा । [ हला, पश्य प्रस्थाने मङ्गलसूचनानि शकुनानि । तदेवं मा भण ॥१४॥ राधिका--(पुरो दृष्ट्वा) हला, कयमेसा पुरवदिसामुहे आआलिआ 'शा दोसइ । [ हला, कथमेषा पूर्वदिशामुषे आकालिको सध्या दृश्यते। ] विशाखाप पखु संज्ञा । पेरुख पक्कन्दणे सूरस्स बल्लहा परिफुल्लिदा उडराइ रेहदि । ता इमस्स अग्धं कारण अवचिणम्ह । [न खलु सध्या पश्य प्रस्कन्दतीर्थे मूर्यस्य वल्लभा प्रफुल्लिता प्रफुल्लिता उड्डराजी राजति । तदस्या अध्यं कर्तुं मेतदवचिन्व. । ] ॥१५१।। (इत्युभे तथा कुरुत.) (तत. प्रविशति बटुना सह कृष्ण) श्रीकृष्णः-सखे, सेयं राधाघरकान्तितस्करी जवाराजि. ॥१५२।। दिया है, तो भी विरोधिनी दुराशा मुझे जला रही है। अब सखि गम्भीर जलशालिनी यम-भगिनी यमुना ही एक मात्र मेरा आश्रय है ॥१४८ विशाखा-है राधे ! ऐसी बात मत कहो, देखो तुम्हारे चलते मे मङ्गल सूचक शकुन हो रहे हैं ॥१४॥ श्रीराधिका-(सामने देखकर) सखि ! देखना, पूर्व दिशा मे यह फमे असमय में सन्ध्या दीस रही है ? ॥१५॥ विशाखा-राधे ! यह सन्ध्या नहीं है । देखो, प्रस्कन्द तीर्थ पर मूर्य-प्रिय जया युसुम ही प्रफुल्लित होकर शोभित हो रहे हैं । सूर्य देव के अध्यं के लिए इन्ही को चल का चयन करें। ( इतना कहकर दोनो युमुम चयन करने जाती हैं) ||५|| [तव मधुमङ्गल सहित यौवृष्ण वहा प्रवेश करते हैं ] धोरण-मित्र! रामा यो अघर कान्ति यो हरण करने वाली यही जया-मुमुमावली है ॥१५२ ।
52866 *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * [ १ मधुमङ्गल:- अदो रणं गिप्पोडिस णिम्माहि पक्षणङ्गनेहम् । [ अत एतग्निप्पीड्य निर्माहि प्रत्यनङ्गलेखम् । ] ॥१५३।। श्रीकृष्णः-(परिक्रम्य सविस्मयम्) एपा नान्तिकवतिनी सुरगिरेरैलावृती हात भू- रगे कि कलयामि काञ्चनरुचामुद्गारगौरीदिशः। मां ज्ञातं मणिनूपुरध्वनिमरादालीजनालंकृता कान्तीनां कुलदेवता विलसितुवृन्दाटवीं विन्दति ॥१५॥४४॥ मधुमङ्गल.-हन्त भो, मगिज्जन्तम्मि वाउरासाहणे कुरङ्गी स हत्यं गदा। [हन्त भो., मृग्यमाणे वागुरासाधने कुरङ्गी स्वय हस्त गता] १५५ श्रीकृष्ण:-(सानन्दम्) सखे, साधु विज्ञातम् । तदत्र वृक्षान्तरितो श्रणुवः किमसौ प्रस्तौति ।।१५६।। ( इति तथा स्थिती) राधिका-(विशाखामालम्ब्य सास्रम्) हला, एसो जणो कधापसङ्ग मधुमङ्गल- -अब इनको निचोड़ कर तुम प्रेम पत्र का प्रत्युत्तर तैयार करो ॥१५३॥ श्रीकृष्ण-(धूमकर विस्मय पूर्वक)-सखे | यह सुमेरु के निकटवर्ती इलावर्त्त वर्ष की भूमि नहीं है, फिर, यह सामने की दिशा में स्वर्ण कान्ति प्रकाशित करने वाला गौर वर्ण मैं कैसे देख रहा हूँ ? ओ मणिमय नूपुर ध्वनि आ रही है । मैं जान गया कि अलकृत सखियो के साथ समस्त कान्तियो के कुल देवता विलास करने के लिए यहा वृन्दावन मे पर्यटन कर रहे है ॥१५४॥४४॥ मधुमङ्गल--आहा मित्र ! अन्वेषण पूर्वक जाल बिछाकर जिस कुरङ्गी को फंसाने की इच्छा कर रहे थे, वह अपने आप ही हाथो मे पड़ गयी॥१५॥ श्रीकृष्ण-(आनन्द पूर्वक) सखे । ठीक कहा है । तब यहा वृक्ष की ओट मे हम दोनो चलकर सुनें, यह क्या कहती है । (यह कहकर दोनो वहा ठहर जाते हैं ) ॥१५६।। श्रीराधिका-(विशाखा के कन्धे पर हाथ रखकर नेत्रो से अश्रु ।
वन्दुः
८२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२*
समसुमरिदव्यो। [हला, एष जनः कथाप्रसङ्ग स्वयं स्मारितव्यः । ] १५७
विशाखा-(सवाप्पम्) सहि, अच्छोणधीरत्तणादिगुणा भणिज्जसि ।
ता किंति एवं उदिवग्गासि । [ सखि, अक्षीणधीरत्वादिगुणा भण्यसे ।
तत्किमित्येवमुद्विग्नासि । ] ॥१५८||
राधिका-सहि, णिगुणोकिदम्हि तेण धुत्तण। [ सखि, निर्गुणी-
कृतास्मि तेन धूर्तेन । ] (इति संस्कृतेन)।
तस्योरस्तटमण्डलं धृतिनदीरोधक्रियापण्डितं
कुलधर्मपङ्कजवनीसंकोचंदीक्षाव्रती ।
दोयू पौ नितरामुंदश्चितचिरीडाभिचाराध्वरी
हा कष्टं निखिलंगिला सखि दृशोमडोभुजङ्गी तु सा ॥१५६॥४५
श्रीकृष्णः-प्रिये, त्वन्माधुर्येण माधवश्च जडीकृत्य निर्गुणामयस्यां
नीतोऽयम् ॥१६०॥
प्रवाहित करती हुई) विशाखा ! कभी वार्तालाप में मुझे अभागिनी को भी
तुम याद कर लिया करना ॥१५७।।
विशाखा--(अश्रु वहाते हुए) सखि ! तुम्हे सब लोग अक्षुण्ण-धर्य-
गुण धारण करने वाली कहते है, फिर तुम इस प्रकार' क्यों परेशान हो
रही हो ? ॥१५८॥
श्रीराधिका--विशाखा ! उस धूत ने मुझे गुणहीन बार दिया है,
सपि । जिसका विशाल वक्षस्थल कुलीन स्त्रियों की धैर्यरूपी नदी
को रोकने में चतुर है, जिस के मुस चन्द्र ने कुल धर्मस्प यमलों के वन
को मंयुचित करने के लिए दीक्षा पूर्वक व्रत ले रखा है, और जिसकी
भुगा अतिशय चिर लता को विनष्ट करने के लिए अभिचार रूप यज्ञ के
यूप सहश है (यज्ञ पमु को वान्धने के सूटा विशेप को यूप कहते हैं। ) हाय
अति कष्ट ! हे विशासा ! उसको लोचन भङ्गी रूप सर्प ने युलीन स्त्रियों
के समस्त पो को निगल लिया है ॥१५६॥४॥
श्रीकृष्ण-हे प्रिये तुम्हारे माधुर्य ने माधव को भी नमीभूत कर
निगुंग अवस्था प्राप्त करा दी है ॥१६०॥
* श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-२ * [ १३ राधिका-(आकाशे अञ्जलिं बद्ध्वा । सस्कृतेन) हन्त भो वकीहत , गृहान्त खेलन्त्यो निजसहजवाल्यस्य वलना. दभद्रं भद्र वा किमपि नहि जानीमहि मना । वय नेतु युत्ता कयाशरणां कामपि दशा कथ वा न्याय्या ते प्रथयितुमुदासीनपदवीम् ।।१६१।।४।। श्रीकृष्ण -प्रिये, क खलु जिजीविपुर्जीवातुभताया सिद्धौषधि- लतायामुतास्ते ॥१६२|| गधिका-(नि श्वस्य) हला एसा पिआ मे एकाअली तुए अप्पणी कण्ठे धारणिज्जा । [ सखि, एपा प्रिया मे एकावली त्वया आत्मन कण्ठे धारणीया। ] (इति कण्ठादेकावलीमुत्तारयति) ॥१६३।। विशाखा-हठानिवार्य) हला, एव्व मणुचिट्ठन्तो किति म डहसि ज ललिद पडिक्खिा णिरुज्जमम्हि । [ हला, एव मनुतिष्ठन्ती विमिति मा दहसि यललिता प्रतीक्ष्य निरुद्यमास्मि । (इति रोदिति) ॥१६४।। श्रीराधिका-(आकाश की ओर हाथ जोडकर) हाय रे पूतना धाति । (बालक पन से ही स्त्रिो का सहार करने वाले ' ) हम तो अपने वाल्य स्वभाव से घरो मे ही खेलती रहती हैं, भला बुरा कुछ नही जानती । हमे इस प्रकार की आश्रय शुन्य अवस्था प्राप्त कराना-निराश्रय करना क्या तुम्हे उचित है और तुम्हारा हमारे प्रति इस प्रकार उदासीन भाव- उपेक्षा भाव दिखाना क्या न्याय सङ्गत है । ॥१६१।।४६।। श्रीकृष्ण-प्रिये । जीने की इच्छा करने वाला कोन व्यक्ति है जो सिद्ध जीवन-औषधि लता की उपेक्षा करेगा ? ॥१६२॥ श्रीराधिका-(लम्बी सास छोडकर) हे सखि ! मेरे इस प्रियमत मुक्ता हार को तुम अपने गले मे पहन लो । (इतना कहकर गते से मुक्ता हार को उतारती है) ॥१६३|| विशाखा-(बल पूर्वक रोकते हुए) राधे' तुम ऐसा काम कर मुझे क्या जलाती हो, मैं तो ललिता की इन्तजार मे ही निरद्युम (प्रयत्न हीन) हो रही हू । (इतना कहकर रोने लगती है) ॥१६४।।
८४ ॥ * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * राधिका-(सस्कृतेन) अकारण्य. कृष्णो यदि मयि तवाग. कथमिद मुधा मा रोदीम कुरु परमिमामुत्तरकृतिम् । तमालस्य स्कन्धे विनिहितभुजावल्लरिरिय यथा वृन्दारण्ये चिरमविचला तिष्ठति तनु ॥१६५।।४६।। श्रीकृष्ण -(सास्रम्) सखे, दृष्टानुरागस्य साधिष्ठता ॥१६६।। राधिका-(स्वगतम्) तुवरावेदि म कावि घणुक्कण्ठा । (प्रकाशम्) हला, सूरमच्चिा कि पि अन्भस्थिदुकामाम्हि । ता जाव सिणारण कदुभ णियुत्ता भये ताव तुम एत्थ पुप्फ अवचिणेहि । (इति तीर्थाभिमुख द्विप्राणि पदानि गत्वा पुनरात्मगतम्) हन्त, सो तिल्लोकमोहणो मुहचन्दो पुणो मए ण दिट्ठो। (इति सोत्कण्ठ निबृत्य प्रकाशम्) हला, पसोद पसीद, दसेहि त परिच्छन्दम् । [ त्वरयति मा कापि धनोत्वण्ठा । हला, सूर्य मर्चयित्वा किमप्यभ्यर्थयितुकामास्मि । तद्यावत्स्नान कृत्वा निवृत्ता भवेय तावत्त्वमत्र पुष्पमचिनु । हन्त, स प्रैलोक्यमोहनो मुखचन्द्र पुनर्मया न दृष्ट । हला, प्रसीद प्रसीद । दर्शय एन प्रतिच्छन्दम् । ] ॥१६७।। श्रीराधिका-ससि । श्रीकृष्ण यदि मेरे प्रति निष्ठुर हो रहे हैं तो तुम्हारा क्या दोष है ? अव वृथा रोवो मत। वस, तुम मेरो अन्त्येष्टि क्रिया इस प्रकार कर देना कि तमाल वृक्ष की शासा से मेरी भुजाओ को बाघ पर मुझे लटया देना, जिससे वृन्दावन मे ही अविचल भाव से मेरा यह शरीर घिर पाल पर्यन्त रहा आवे ।।१६५।। श्रीकृष्ण-(प्रश्र, वहाते हुए) मधुमङ्गल । देखी तुमने अनुराग यो पराकाष्टा ॥१६६।। श्रीराधिया-(मन मे) यमुना में प्रवेदा परने यो गाढ उत्खण्ठा मुझे उतावली पर रही है । (स्पष्ट कहती है) ससि । मूर्यदेव की पूजा बरसे जिस मनोवाच्छित पो यामना करनी है, उसरे लिए जब ता में रना मर न भाऊ, तब तर तुम फून चुननो । (इतना यहार यमुना की ओर दो तीन पदम जापर पिर मन में सोचती है) हाय ! हाय यह त्रिभुवन-मोहा मुस-पन्द्र में एक बार भी पिर न दंगसपी । (यह सोपपर उरप ण्ठा पूर्वप लोट पर पहती है)-रागि! प्रसन्न होयो, आनन्दित होयो, एप यार और मुभ उग चित्रगट पे दर्शन परादो ॥१६७।। ।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * [ ८५ विशाखा-सहि, त्यि एत्थ चित्तफलअम् । [ सखि, नास्त्यत्र चित्रफलकम् । ॥१६॥ राधिका-(सव्यथम्) तदो पणिहारणेण ण पञ्चक्खीकरिस्सम् । [तत प्रणिधानेनन प्रत्यक्षीकरिष्यामि । ] (इति ध्यान नाटयति ॥१६॥ श्रीकृष्ण -सखे, पीतमपीतपूर्वमुन्मादक श्रोत्रमाध्वीकम् । तद- ग्रतो गच्छाव ॥१७० । (इत्युभौ तथा कुरुत) विशाखा-(विलोक्य सानन्द ससभ्रमम्) सहि, दिहिमा तुज्ज्ञ सुहज्झारणेण फलिदम् । ता झत्ति उग्धाडेहि लोअणम् । [ सखि, दिष्टया तव सुखध्यानेन फलितम् । तज्झटिति उद्घाटय लोचनम् । ] ॥१७१।। ( राधिका दृश दरोन्मील्य चमत्कार नाटयति) विशाखा-सस्कृतेन) यदर्थ सकोगे पतसि हतकन्दपंकदने मृदु वा दुर्वारे ज्वलयसि तनु प्रेमदहने । अखण्डेनापीड सखि नवशिखण्डेन कलय- विलासी सोऽय ते स्फुरति पुरतो जीवितपति ॥१७२॥४८ विशाखा-राधे | वह चित्र यहा तो नही है ॥१६८।। धीराधिका-(दुख पूर्वक) तब तो उसका ध्यान कर उसे प्रत्यक्ष करू गी। (इतना कहकर ध्यान मुद्रा मे जुड़ जाती हैं) ॥१६६।। श्रीकृष्ण-सखे । अभूतपूर्व कर्ण रसायन सुधा का पान कर लिया है तो, आओ आगे चले ॥१७०।। (इतना कहकर दोनो आगे चलते है)। विशाखा-(दोनो को देखकर आनन्द उद्रेक के साथ) राधे ! कैसा सौभाग्य | तुम्हारा शुभ ध्यान सफल हुआ है, झट नेत्रो को खोलो ॥१७॥ (श्रीराधिका नेत्रो को थोडा सा खोलकर चमत्कृत हो उठती है। विशाखा-राधे। हाय । जिसके लिए तू अतिशय कन्दपं पीडा भोग रही थी, एव दुवार प्रेमाग्नि मे जिसके लिए तुम्हारा कोमल शरीर जला जा रहा था, वह अखण्ड नव मोर मुकुटधारी, वृन्दावन विहारी तुम्हारा प्राणनाथ तुम्हारे आगे खडा है ।।१७२॥४८॥ । . ।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ * राधिका-अम्महे सिविणस्स माहुरी । [अहो स्वप्नस्य माधुरी ।] १७३ विशाखा-अविसद्ध, एसो दे अपुटवो सिविणो जो गिद्दाए विणा विणिप्पण्णो। [अविश्रब्धे एप तेऽपूर्व स्वप्नो यो निद्रया विनापि निष्पन्न । ] श्रीकृष्ण- असौ दृग्भङ्गीभि कुसुमशरमङ्गीकृतशर सृजन्ती दन्तीन्द्रक्रमणकमनीयालसगति । अदूरे रम्भोरूरिह वदनबिम्बस्य सुपमा समारम्मादम्भोरुहमधुरिमाण दमयति ॥१७॥ ४६।। राधिका-(कृष्ण दृगन्त नर्तयन्ती स्वगतम् साहु रे हिजअ, साधु दिद्विआ महत्त विलम्बिदम् । [ साधु रे हृदय, साधु । दिष्ट्या मुहूर्त विल म्बितम् । ] ॥१७६।। श्रीकृष्ण --(स्मित्वा) धूर्ते विशाखिके, समन्तान्मृग्यमाणा दिष्टधा त्वमत्र हटासि । यदद्य भवत्या रूपसादृश्यादपाकिमगुञ्जाहारेण मा प्रताय दुर्लभा मे रङ्गणमालिकापनीता ।।१७।। मधुमङ्गल -भो, ण राहीए कण्ठादो दीसन्ती अप्पणो रङ्गणमालिअ श्रीराधिका-आहा | स्वप्न की क्या आश्चर्यमय माधुरी है । ॥१७३ विशाखा-अविश्वासिनि । यह तेरा कैसा अपूर्व स्वप्न है जो विना नीद के दीख रहा है । ॥१७४।। श्रीकृष्ण-अहो दूर से ही यह विशाल नितम्बिनी अपनी सुन्दर गति से मतवाले हाथी की गति को लजित करती हुई अपनी नयन भगी से कामदेव के वाणो को छोड रही है और अपने मुख की छटा शोभा द्वारा प्रफुल्लित कमल की मधुरिमा को निन्दित कर रही है ॥१७५।।४६।। श्रीराधिका-(श्रीकृष्ण पर दृगकटाक्ष करती हुई अपने मन ही मन म)-ठीक है रे हृदय । ठीक है, तू ने सौभाग्य वश क्षण भर की देर कर दी है ।।१७६॥ श्रीकृष्ण-(मुसकरा कर) मरी धूतं विशाखा ! चारो तरफ ढूढते हुए सौभाग्य वश तू यहा दीखी है। तू आज अपने रूप के सदृश अपक्ष गुञ्जाहार से मुझे ठगकर मेरी दुभ रङ्गण-माला को उठा लाई है ? ॥१७० मधुमङ्गल-ससे । तुम्हारी वह रङ्गण माला तो राधा के गले में
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२ *
[ ८७
स जेज्य आअडिअ गेण्ह । [ भो, एना राधायाः कण्ठतो दृश्यमानामात्मनो
रङ्गणमालिका स्वयमेवाकृप्य गृहाण।] ॥१७॥
श्रीकृष्ण--सखे, जानतापि भवता किमिदमन्याय्यमुपन्यस्तम् । न
खतु स्वप्नेऽपि मया कामिनीस्पर्श. स्मयंते ॥१७६।।
राधिका-(स्वगतम्) इमस्स परिहासो वि एसो संकिदाए मम
सम्बो पडिभादि। [एतस्य परिहासोऽप्येप शङ्किताया मम सत्य. प्रतिभाति ।]
विशाखा-(विहस्य) अयि वराङ्गणातरङ्गिणोण महासाअर, चिट्ठ
चिट्ठ । दाणि वि इमाई दोसन्ति तुज्ज मङ्गसु ताण चिहाई। [ अपि
वराङ्गनातरङ्गिणीना महासागर, तिष्ठ तिष्ठ । इदानीमपीमानि दृश्यन्ते
तव अङ्ग पु तासा चिह्नानि । [ (इति सस्कृतेन) ५१८१॥
आकृष्टानि कटाक्षभङ्गिभिरलं गोपाङ्ग नानां त्वया
रक्तान्यत्र मनांसि यानि निमिषोन्मुक्तानि नेत्राण्यपि ।
तान्येतानि भवानवाचनतनो गुजावलोनां छला-
रिपच्छानां च सदा प्रसाधनधिया सधारयन्नन्दसि ॥१८२॥१०
दीख रही है, तू स्वय खीचकर ले ले न ॥१७८||
श्रीकृष्ण-मित्र ! तू जान-भूझ कर भी क्यो ऐसा अन्याय करने की
बात कहता है ? मैं तो स्वप्न मे भी कभी कामिन के स्पर्श का स्मरण
नहीं करता हूँ ॥१७६।।
श्रीराधिका-(मन मे) इसका परिहास भी शङ्का के मारे मुझे तो
सच्चा लगता है ॥१८॥
विशाखा-(हस कर) अरी वराङ्गना-तरङ्गिणियो की महा सागर ।
जरा ठहर, अभी तुम्हारे अङ्गो मे उन कामिनियो के सब चिह्न दीखने
लगेगे ॥१८॥
-हे नवाजनगात । (नवीन काल
भाति श्यामवर्ण कृष्ण |)
तुमने नेत्र कटाक्ष भङ्गी से गोपाङ्गनाओ के अनुरक्त मन और पलकरहित
नेत्रो को आकर्षण कर लिया है और गुञ्जावली एव मोर पुच्छ को मन
एव नेत्रो के आकर्षण करने का साधन समझ कर तुम इन दोनो को धारण
करते हुए सुख पूर्वक विचरते हो ॥१८२६॥५०॥
८८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२*
श्रीकृष्णः-(सहर्पमात्मगतम्)
प्रमदरसतरङ्गस्मेरगण्डस्थलाया:
स्मरधनुरनुवन्धिघ्र लतालास्यभाजः ।
मदकलचलभृङ्गोभ्रान्तिभङ्गों दधानो
हृदयमिदमदाडक्षीत्पक्ष्मलाक्ष्याः कटाक्षः ॥१८॥५१॥
(नेपथ्ये)
पत्तिणि विसाहे । [ नत्रि विशाखे। ]
श्रीकृष्ण:-कथमकाण्डे जरापाण्डुरेयं जटिला ॥१४॥
(प्रविश्य)
जटिला-(पुरो दृष्ट्वा स्वगतम्) कहं एत्य कण्हो । (प्रकाशम्) विसाहे,
किति इमाई घूअगन्धरत्तचन्दनाई तुए विसुमरिदाई। [ कथमन कृष्णः ।
विशाखे, किमित्येतानि धूपगन्धरक्तचन्दनानि त्वया वि मृतानि । ] ॥१८५।।
थीकृष्णः-(स्वगतम्)
चन्द्रिका चन्द्रलेखायाश्चकोरे पातुमुद्यते ।
पिधानं विदधे हन्त शरदम्भोधरावली ॥१८६। ५२।।
श्रीकृष्ण--(आनन्द पूर्वक मन मे) आनन्द रस के कारण मुसकान
से जिसके गण्डस्थल प्रफुल्लित हो रहे है, जिसकी भृकुटि कन्दर्प धनुप के
समान नाच रही है, उन्मत्ततावश भंवरे की भ्रान्ति पैदा करने वाले
श्रीराधा के कटाक्षों ने मेरे हृदय को घायल कर दिया है ॥१८३।।५१॥
[ पर्दे के पीछे से आवाज आती है-हे नातिनी विशाखे ! ]
श्रीकृष्ण-यह जरापाण्डु वर्णा ( वृद्धावस्था के कारण पीले रंग
वाली ) जटिला असमय मे यहा कैसे ? ॥१८४।।
(जटिला प्रवेश करती है )
जटिला-(सामने देखकर मन ही मन मै) यहां कृष्ण कैसे ? (स्पष्ट
कहती है ) विशाखा ! यह धूप अग्रवत्ती और लाल चन्दन तुम कैसे भूल
आई ? ॥१८॥
श्रीकृष्ण-(मन मन में ) हाये चकोर के चन्द्र कला की चन्द्रका
पान करने लगते ही शरद ऋतु की सफेद मेघ माला ने आकर चन्द्र को
ढक दिया। (स्पष्ट कहते है)-मामी मां ! प्रणाम है ।।१८६॥५२॥
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*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२*
[ २६
(प्रकाशम्) मातुर्मातुलानि, प्रणमामि ।
जटिला-मोहण, बल्लमकिशोगेठले अवट्ठिी होहि । [ मोहन
वल्लवकिशोरीकुले अवक्रदृष्टिभंव। ] ॥१८॥
मधुमङ्गल.-(विहस्य) भो दघोचिहड्डफपासे, एसो सम्वदो उदारदिट्ठी
उचेअ मन्झ पिअवमस्सो । तुम क्षु केअरच्छी । ता अध्यायं आससेहि।
[ भो दधीच्यस्थिकरशे, एप सर्वदोदार प्टिरेव मम प्रियवयस्य । त्व
खलु केकराक्षी । तदा आत्मानमाशिपय । ] ॥१८॥
जटिला-मो किशोरी भुअङ्ग कोस तुम माअदोसि । [ भो किशोरी
भुजङ्ग, कस्मात्त्वमागतोऽसि । | ॥१८॥
श्रीकृष्ण -आयें, लोकोत्तरानुरागचमत्कारिणीयं सुजवालक्ष्मी के
वा नाकर्षति ।।१६०॥
जटिला--(स्वगतम्) ण ण भअवदोए विज्ञापहावसंमाविदा इमस्स
एत्य उत्सत्ती । (प्रकाशम्) मोहण, क्षत्ति इदो गच्छेहि ! [ नून भगवत्या
विद्याप्रमावसभाविता अरयात्रोपसति । मोहन, झटिति इतो गच्छ। ] १९१
जटिला-मोहन । गोपकिशोरियो को तरफ तुम्हारी सीधी निगाह हो
मधुमङ्गल-(हसकर) हे दधीची-अस्थी कर्कशे । ( दधीची ऋषि
की अस्थियो से भी अधिक कठोर ।) यह मेरा प्रिय सखा तो सदा उदार
दृष्टि है। तुम निश्चय ही वक्रदृष्टि हो, इसलिए अपने को हो ऐसा आशीर्वाद
करो ॥१८॥
जटिला हे किशोरी-कामुक ! तुम यहां किस लिए आए हो? ॥१८॥
श्रीकृष्ण-हे आयें। लोकातीत रक्त वर्णशाली जवा कुसुमो की
मनोहर शोमा किस व्यक्ति को नही आकर्षण करती है ?
(पक्षान्तर मे-लोकातीत अनुरागवती यश-प्रकाशक जव-चिह्न
धारण करने वाली लक्ष्मी स्वरूपा यह राधा किस को नही आकर्षण
करती है ? ) ॥१०॥
जटिला--(मन मे) निश्चय ही ऐसा ज्ञात होला है, कि भगवती पौर्ण-
मासी के विद्याप्रभाव से इसका यहा आना हुआ है । (स्पष्ट रूप मे) मोहन ।
शीघ्र यहा से तुम चले जाओ ॥१६॥
स्वच्छन्दतो -- +1 , ६० ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्ग-२ * श्रीकृष्ण:-अपि जल्पाकि वृद्ध, किमित्याकुलासि गच्छेयम् ॥१६॥ जटिला--(कुटिलं विलोक्य संस्कृतेन) निधोताना. निखिलधरणीमाधुरीणां' धुरीणा कल्याणी मे निवसति वधूः पश्य पाश्ये नवोढा अन्तगोष्ठे, चटुल . नटयनत्र नेत्रत्रिभाग 11 निःशङ्कस्त्वं भ्रमसि भविता नाकुलत्वं कुतो में ||१९३॥५३।। श्रीकृष्ण;-मृषाशङ्किनि वृद्ध, मा प्रलापं कृथाः । यावदेता ते वधू- माकर्णय तावन्मान्यां भावयामि ॥१४॥ जटिला-विसाहे. किं ति एत्तिा विलम्बिदासि । । विशाखे, किमित्येताद्विलम्बितासि ।.] ॥१५॥ विशाखा-(स्मित्वा) मज्जे,..रणं दुल्ललिदं कुरङ्ग, पैक्खन्ती विम्हि- दन्हि । [ आयें, एतं दुर्ललितं कुरङ्ग पश्यन्ती विस्मितास्मि । 1 ( इति सदृष्टिक्षेपम् ।।१९६॥--- श्रीकृष्ण-अरी वाचाल बूढ़ी! तू क्यों व्याकुल हैं रही हो, मैं अपनी इच्छा से जाऊंगा.॥१९२ जटिला---(टेढी, निगाह से देखती हुई) अरे कृष्ण ! देख, जिसके रूप माधुर्य ने त्रिभुवन की मधुरता को तिरस्कृत कर रखा है, वह नवविवा- हिता वधू मेरे पास खड़ी है और तुम भी इस गोकुल में मनोहर नेत्र प्रान्तों को नचाते हुए यहां निर्भय होकर घूम रहे हो, तो क्या मैं व्याकुल न होऊ ?.||१९३॥५३॥ श्रीकृष्ण-झूठी शङ्का करने वाली वृद्धो ! वृथा प्रलाप मत कर। जब से मैं ने सुना है कि यह तुम्हारी वधू है, तब से मैं इस ) का आदर करता हूं ॥१४॥ जटिला-विशाखा तू ने इतनी देर क्यों कर रखी है? ॥१५॥ विशाषा-(मुसकराते हुए) आर्य ! मैं दुर्दान्त कुरङ्ग.. को सामने देख कर विस्मित हो रही हूँ। (पक्षान्तर में-कुत्सित रङ्गशील कृष्ण को देखकर विस्मित हो रही हूं) ॥१६॥ . 't .
* श्रीविदग्धमाघव नाटक अङ्क-२ * [१ अकरुण मुक्किम चङ्ग फुरङ्ग पेम्मेण सगद हरिणीम् । विहल फूद्दणचधुलो तुम बणादो वर्ण भमसि ।। [अकरुण त्यक्त्वा चङ्ग कुरङ्ग प्रेम्णा सगता हरिणीम् । विफल कूदनचटुलस्त्वे वनाद्वन भ्रमसि ॥ ॥१६७।।५४।। जटिला-अइ अत्याणदुग्गहे, मञ्च कुरङ्गकोदूहलम् । [ अयि अस्थान दुर्ग है, मुञ्च कुरङ्गकौतुकम् । ॥१९॥ मधुमङ्गल -पिअवमस्स, पेक्ख । एसो सतिण्णो वि कोरजुआणो ण महर दाडिमी ण डिज्जइ । [ प्रियवयस्य, पश्य । एप सतृष्णोऽपि कोरयुवा इमा मधुरा दाडिमी न प्रतिपद्यते । ] ॥१६॥ श्रीकृष्ण - (स्मित्वा) हृदि तारितोऽपि दाडिमि सुमनोरोगेण ते रुचि यहता। परिमरसासि कि वो नेति शुक शैड़योदास्ते ।।२००। ५५।। (विशाखा सहरभङ्ग राधिकामवलोक्ते ) T (इतना कहकर दृष्टि निक्षेप करते हुए। अरे अकरुण कुरङ्ग ' प्रेम पूवक निकट आई हुई मनोहरा करङ्गी को त्याग कर तू वृथा ही मनोहर छलाग मारता हुआ वन वन मे भटक रहा है। (पक्षान्तर मे-- अरे करुणा-रहित, कृष्ण | अनुराग पूर्वक निकट आई हुई सुन्दरी श्रीराधा की उपेक्षा कर गमन भङ्गी दिखाते हुए तुम वृथा ही वन वन मे भ्रमण कर रहे हो। इसे अङ्गीकार करो। ) ॥१९७।। जहिला-अरी अनुचित बात मे आग्रहशीला विशाखे । कुरङ्ग के कौतूहल को तू अब छोड ||१६८|| मधुमङ्गल-प्रिय मित्र । देख तो, युवक शुक पक्षी तृष्णावन्त होकर भी इस मधुरा दाडिमी को ग्रहण नही कर रहा है ।। १६६ श्रीकृष्ण-मुसकरा कर) हे दाडिमी तुम्हारे मनोहर कान्ति युक्त कुसुमो के देखकर ही शुक का चित वशीभूत हो रहा है, किन्तु तुम्हारी रस परिपाक दशा प्राप्त हुई है कि नहीं, शुक इस की विवेचना मे उदासीन हो रहा है ॥२०॥ (विशाखा नेत्र भङ्गि सहित श्रीराधा को देखती है) प्रविशाम । २०३॥ प्रतिपद्य वहि ॥२०॥ १२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-२* राधिका-(स्वगतम्) हिमअ, समस्सस समस्सस । [ हृदय, समा- श्वसिहि समाश्वसिहि । ] (इति सखेदमपवार्य । सस्कृतेन) ॥२०१।। पोते न वागमृतमत्र हरेरशान्यस्तं मयास्य वदने न गचलं च। रम्ये चिरादवसरे सखि लब्धमात्र हा दुविधिररुधे जरतीच्छले न ॥२०२।१५६ जटिला-(स्वगतम्) अम्हहे काहदिगुणो माहम्म, जं बहुए सो उव- सगो तह गत्यि (प्रकाशम्) विसाहे, पेक्ख । अदिक्कमदि मज्झहो । ता तुरिद सूरमण्डवं पविसम्ह । [ अहो कृष्णदृष्ट मर्माहात्म्यम्, यद्वध्वाः स उपसर्गस्तथा नास्ति । विशाखे, पश्य । अतिक्रमते मध्याह्नः । तस्वरित सूर्यमण्डप (इति तिस्रो निष्क्रान्ता) श्रीकृष्ण:--सखे, कौमुदीयं पोर्णमासीमनुवर्तते । तदेहि । तामेव (इति निष्क्रान्ती) । इति मन्मथलेखो नाम द्वितीयोऽङ्क । श्रीराधिका--(मन मे) अरे मन बाश्वस्त हो, आश्वस्त हो । (इतना कहकर खेद पूर्वक हाथ का आवरण करके)-मैं ने कभी भी धीकृष्ण के वाक्य अमृत का कानभर कर पान नही किया है और न ही निश्सकोच मन से उनके मुख कमल को नेत्र भर कर देख पाई हूँ। हे सखि ! बहुत काल पीछे आज सुन्दर अवसर प्राप्त हुआ था। किन्तु हाय । अभागे विधाता ने वृद्वा के बहाने आकर रोडा अटका दिया ॥२०१।। जटिला-(मन मे) अहो । श्रीकृष्ण दर्शन को कैसी आश्चर्यमय महिमा है ? कि मेरी वधू उपस्थित विपत्ति को नहीं देख रही है । (स्पष्ट रूप से विशाखा । देख, दोपहर का समय निकल गया है इसलिए हम शीघ्र ही -सूर्य मण्डप मे चलें । (इतना कहकर तीनो चली जाती है ) ॥२०२॥५६॥ श्रीकृष्ण-यह कौमुदी (चान्दनी) पौर्णमासी का अनुगमन कर रही है, अतएव आओ हम उसके पीछे चलते हैं। (इतना कहकर वे भी चले [ इस प्रकार सब चले जाते हैं । इस प्रकार श्रीश्यामदासानुवादित श्रीविक्षाधमाधव नाटक का मन्मय लेख नामक द्वितीय अफ समाप्त हुमा ॥२॥ । जाते हैं ) ॥२०३।।
m तृतीयोऽङ्कः (तत प्रविशति ललितयानुगम्यमाना पौर्णमासी) पौर्णमासी-वत्से, नूनं मत्तत्रपमाणो नाभिनन्दति नन्दकुमारस्ते खोसंगमम् ॥१॥ ललिता-भअवदि, दुब्बोह पखु लोओतराणां चित्तं ण शत्ति विअ- सदि । [भगवति, दुर्बोध खलु लोकोत्तराणा चित्त न झटिति विकसति ।] ।२ पौर्णमासी-(पुरोऽवलोक्य) वत्से, पश्य कदम्बवाटिकायां मधुमङ्गलेन सार्ध समङ्गल वर्धते मधुमर्दन । (पुननिरूप्य) ॥३॥ परामृाडगुष्ठत्रयमसितरत्नरुभयतो वहन्ती सकोणों मणिभिररुणस्तस्परिसरौ। तृतीय अंक [ तव ललिता के बाद पौर्णमासी प्रवेश करती है ] पोर्णमासी ललिता | मैं कहते हुए लज्जा महमूस करती हू कि श्रीनन्दकुमार तुम्हारी सखी श्रीराधा के सङ्ग का अभिनन्दन नही करता है ॥१॥ ललिता-भगवति । लोकातीत व्यक्तियो के दिल की बात दुर्योध होती है, सहज में प्रकाशित नहीं होती ॥२॥ पौर्णमासी-(सामने देखकर) बेटी । देख, देख कदम्ब वाटिका मे मधुमङ्गल के साथ मधुसूदन आनन्द पूर्वक विचर रहे हैं ।।३।। ( फिर निरूपण करके कहती है )- कल्याणमय केलि मुरली श्रीकृष्ण के हाथो मे शोभित हो रही है, .
६४ ]
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ *
तयोमध्ये हीरोज्ज्वलविमलजाम्बूनदमयी
करे कल्याणीयं विहरति हरे: केलिमुरली ॥४॥
(ततः प्रविशति ययानिर्दिष्ट कृष्ण:)
कृष्णः-(सानुतापम्)
अपया नितरां पराड मुखो संहसा स्मेरसखीधृताञ्चला।
गमिताद्य हठेन राधिका न कथं हन्त मया भुजान्तरम् ।।२
(नि.श्वस्य) सखे मधुमङ्गल, खञ्जरीटशः सा वितासमञ्जरी चोरयति
मे चित्तचञ्चरोकम् ।।६।। (इत्यौत्सुक्यं नाटयन् ।)
छिन्नः प्रियो मणिसरः सखि मौक्तिकानि
वृत्तान्यह विचिनुयामिति केतवेन ।
मुग्धं विवृत्य मयि हन्त दृगन्तभङ्गों
राधा गुरोरपि पुरः- प्रणयाद्यतानीत ॥७॥३
पौर्णमासी-(दूरत एव कृष्णं निर्वर्ण्य साशङ्कम्)
उस मुरली के मुख की ओर का और पिछले सिरे का तीन तीन अगुल भाग
इन्द्रनीलमणि से खचित और लाल वर्ण की मणियो द्वारा चारों ओर से घिरा
हुआ है तथा दोनों भागों के बीच का भाग उज्ज्वल हीरे और निर्मल स्वर्ण
से सुशोभित हो रहा है ॥४॥१॥
(उस के बाद यथा निरूपित स्वरूप से श्रीकृष्ण वहां प्रवेश करते हैं )
श्रीकृष्ण-(अनुताप पूर्वक) श्रीराधा अत्यन्त शर्माते एवं मुसकराते
हुए हंसती हुई विशाखा का अञ्चल जब पकड़ रही थी, हाय ! आज मैं ने
उसे जबरदस्ती अपनी भुजाओं मे क्यो न भर लिया ? ॥५॥२॥
(लम्बी सांस छोड़कर) मित्र मधुमङ्गल ! खजनाक्षी वह विलास-
मन्जरी श्रीराधा मेरे चित्त भ्रमर को चुरा रही है ॥६॥
(इतना कहकर उत्सुकता दिखाते हुए)-"सखि ! मेरा प्रिय मणिहाय
टूट गया है, इसलिए पृथ्वी पर पड़े हुए मोतियों को चुने लेती हूँ"-ऐसा
कहकर छल पूर्वक श्रीराधा ने अपने गुरुजनों के सामने भी अनुराग वश
मेरे प्रति मनोहर कटाक्ष भङ्गि निक्षेप की थी ।।७॥३॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * अक्षणोद्वन्द्व प्रसरति दरोद्ध रगतारं मुरारे श्वासाः फ्लप्तां किल विचकिलर्मालिकां म्लापयन्ति। केयं धन्या वसति रमणी गोकुले क्षिप्रमेतां नीतस्तीवामयमपि यया कामपि ध्याननिष्ठाम् ॥ अयवा कृतं संदेहेन । वत्साः, राधिकव सल्वत्र कारणम् || श्रीकृष्णः-(पौर्णमासी पश्यन्न पसृत्य) भगवति, प्रणमामि ॥६ पोर्णमासी-नागर, गोपीरतनतटोयलंपटीभव ॥१०॥ श्रीकृष्णः-(किंचिहिहस्य) कृतं पिटविणीभिराशीभिर्यदहमेव गोपोति प्रसिद्धां श्यामां दल्लीमपि न पाणिपल्लवेन स्पृशामि ॥११॥ मधुमङ्गलः-(विहस्य) भोः, कि अम्हारणं सामए, गौरी जेव्व मग्गिज्जइ । भोः, किमस्माक श्यामया, गौर्येव मृग्यते । ] ॥१२॥ पौर्णमासा-(सनमस्मितम्) पौर्णमासी-(दूर से ही श्रीकृष्ण को देख शङ्का करते हुए) श्रीकृष्ण के दोनों नेत्र पूणिति से दीख रहे है और इसके लम्बे लम्वें सांस मल्लिका माला को मुरझाए दे रहे है । इस गोकुल मे ऐसी महाभागा कौन सी रमणी रहती है, जिसके गहरे ध्यान मे यह कृष्ण भी अतिशय मग्न हो रहे है ?-परन्तु इस मे कुछ सन्देह की बात नहीं है, ! निश्चय ही बेटी राधा इसका कारण है ।।८॥४॥ श्रीकृष्ण-(पौर्णमासी को देखकर उसके निकट जाकर) भगवति ! प्रणाम करता हू। पौर्णमासी-नागर ! गोपी-वक्षोंजो के लम्पट मत बनो ॥१०॥ श्रीकृष्ण-(कुछ हंसते हुए) यह पिष्टपेश आशीर्वाद निरर्थक है ( अर्थात एक ही बात को बार बार कहता वृथा है ) क्योकि मै लो गोपी नाम से प्रसिद्ध श्याम वर्ण की लता को भी हाथ से नहीं छूता हूं ॥१॥ मधुमङ्गल-(हंस कर) हमें श्यामा ( श्याम वर्ण वाली) से क्या प्रयोजन है, हम तो गोरी (गौर वर्ण वाली) को ढूण्ढ रहे है ।।१२।।
१६ ] * श्रीविदाधमाधव-नाटक अङ्क-३ * . गोपेश्वरस्य ,तनयोऽसि -नयोपपन्न: स्यातस्तथा व्रजकुले भुजयोबलेन । लोलाशतैस्तदपि कि कुलपोषितस्त्व- मुन्मादमुद्वहसि माधव राधिकायाः ॥१३॥५ मधुमङ्गलः-अइ विवरीदवादिणि बुट्टिए विट्ठ चिट्ठ । [ अयि विपरीतवादिनि वृद्ध तिष्ठ तिष्ठ। ] । तुज्झ राहिआए ज्जेब्ब एसो अम्ह पिअवअस्सो उम्मादिओ । जं सेहरसिङ्गवेत्ताइ दाणि कहि विभट्टाइति ण जाणादि । [ तव राधिकयैव एपोऽस्मत्प्रियवयस्य उन्मादित. । यस्माच्छेखरशृङ्गवेत्राणीदानी कस्मिन्विभ्रष्टानीति न जानाति]॥१४॥६ श्रीकृष्ण:--(सलनम्) आर्य, वाचाटोऽयं वटुर्मूषा ,जल्पति । किंतु निश्चितं ते व्याहरामि । न तासु मच्चित्तरागस्त्वद्गोपीषु ।' तदन तत्त्वत. पृच्छयतामयम् ॥१५ मधुमङ्गलः-अज्जें, सच्चं सचम् । अम्हपिअवअस्सहिअअस्स अज्जवि राओ तुम्हगोइआणं अङ्गसुषमए दिह्रोत्थि। पत्युद तारा - अङ्गराओ पौर्णमासी-(परिहास युक्त हसते हुए) हे माधव ! तुम गोपराज के पुत्र हो एवं न्याय परायण हो और शत शत लीलाओं का विस्तार कर अपनी भुजाओं के.बल में इस गोकुल मे मशहूर हो, फिर तुम कुल. रमणी श्रीराधा को क्यों उन्मादित कर रहे हो? ॥१३॥५॥ मघुमङ्गल-अरी विपरीतवादिनी वृद्ध ! ठहर जा, ठहर जा, तेरी श्रीराधिका ने ही मेरे प्रिय मित्र को उन्मत्त कर रखा है, इसके मुकुट, शृंग, वेन कहा गिर पड़े है, यह कुछ नहीं जानता ॥१४॥६॥ श्रीकृष्ण-(लज्जा के साथ) आर्ये ! यह वाचाल ब्राह्मण पुत्र मिथ्या कहता है, किन्तु मैं तुम से सच कहता हूं कि तुम्हारी गोपियों के प्रति मेरे चित का अनुराग नहीं है। इसलिए यह बात सत्य है या झूठ, तुम मधुमङ्गल से पूछो ॥१५॥ मधुमङ्गल-आयें ! यह बात सत्य है । मैं ने अपने प्रिय मित्र के हृदय का कस्तूरी-कुइमादि राग आज तक तुम्हारी गोपियों के मङ्गों मे * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अव-३ * [ ६७ जेय इमस्स हिमये दीसह । [आयें, सत्यं सत्यम् । अस्मप्रियवयस्यहृदयस्य अद्यापि रागो युप्पद्गोपिकानामङ्गपु न मया दृष्टोऽस्ति । प्रत्युत तासा- मङ्गराग एवास्य हृदये दृश्यते ॥१६ श्रीकृष्ण:-(सप्रगयरोपम्) पिडमूर्ख, विषम्मादातोपि जिम्हता न जहासि ॥१७॥ पौर्णमासी-सत्यमाह पटुः । तथाहि । फामं सद्गुणमण्डलाप्रयतया तन्वन्महिष्ठां रुचि वैचित्रीमरमायसदा शुमदशाणोधियामास्पदम् । यंशोहुंकृतिलोलया शिथिलतामेणोदृशां नीयते यास: कंसनिपूदनाय मयता देहेषु गेहेष्वपि ॥१८॥७ मधुमङ्गलः- अज्जे, कि वि जाणासि जं बंसी किदिलीलाएत्ति भणासि । दिटुं तहि दिअहे कपणारणं तीरठिदाई अम्बराई अपणो हत्येण उविवि इमिणा वसन्धे णिविपत्ताई।[ आयें, किमपि न जानासि + 7 कभी नही देया बल्कि उनका अङ्ग राग (कस्तूरी-केशरादि) ही इसके हृदय पर दीखता है ॥१६॥ श्रीकृष्ण-(प्रणय क्रोध के साथ) मूर्ख तुम्हें धिक्कार है, विश्वास पूर्वक आदर करने पर भी तू कुटिलता को नहीं छोडता ? ॥१७॥ पौर्णमासी-मधुमङ्गल ने ठीक कहा है, देख-- हे कंस नाशन ! जो समस्त मृगनैनी गोपियो के परिघेय वस्त्र शोभा गुणो के आथय रूप से महान कान्ति का विस्तार करने वाले थे, और जो भवन धन-धान्यादि सम्पत्ति व कुलीनतादि गुणो से शोभित हो रहे थे, तुमने आज अपनी वशीध्वनि से वे सव देहवास ( परिधान वमन ) तथा गृहबाम दोगे शिथिल कर दिये हैं अर्थात् तुम्हारी वशीध्वनि सुनकर कुलीन रमणियों के परिधान वस्त्र ढीले पड़ गये है और वह अब घरो में भी नहीं रह पाती हैं-उनके दोनो सुख शिथिल पड़ गए है ॥१८॥७ । मधुमङ्गल-- भगवति ! क्या तुम कुछ भी नही जानती हो? उस दिन मैं ने अपनी आखो से देखा है, कृष्ण ने व्रज कुमारियो के यमुना तट - मन्त्र वा। येन त्यया १८ ] *श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क ३ * यद्व शोहुकृतिलीला इति भणसि । दृष्ट तस्मिन्दिवसे कन्यकाता तीरस्थिता- न्यम्बराण्यात्मनो हस्तेनोक्षिप्यानेन स्कन्धे निक्षिप्तानि । ] ॥१६ श्रीकृष्ण -(सभ्रूभङ्ग बटुमावार्य) आयें, ह कारादपि तथाभावाद्भव द्गोपीनामभिव्यक्त साध्वीभावप्रभाव ॥२० ललिता--(संस्कृतेन) । फेनापि धूर्तपतिना खलु शिक्षितोऽसि वशीकरणफारणमौषध पुण्योज्ज्वलान्यखिलगोविलासिनीना गृहसुखानि विलुण्ठितानि ॥२१८ मधुमङ्गल -सच्च कहेदि ललिदा । अण्णधा मन्तादिमन्तरेण पव्वदुत्त झा महादाणआ विन्दीवरादोवि सोम्मसीअलपइदिणा कध इमिणा सहरिजन्ति। [ सत्य कथयति ललिता । अन्यथा मन्त्रादिमन्तरेण पर्वतोत्त झा महादानवा नवेन्दीवरादपि सौम्यशीतलप्रकृत्या क्थमनन सह्रियन्ते । ] ॥२२ ललिता-अज्ज जस्से सुमरण वि तथा संतावण त (द अपणो यअस्स मा क्षु सीअल भण । [ आर्य, यस्य स्मरणमपि तथा सतापन पर रखे हुए वस्त्र अपने हाथो से ही उठाकर कदम्बवृक्ष की शाखाओ पर फैक दिये थे ॥१६॥ श्रीकृष्ण-( नेत्रो के इशारे से मधुमङ्गल को रोकते हुए तुम्हारी हामी भरने से तुम्हारी गोपिकाओ के साध्वी भाव की महिमा ही प्रकट हो रही है ॥२०॥ ललिता-हे कृष्ण ! तुमने किस धूर्तनायक से वशीकरण कारक मन्त्र अथवा लोपधि की शिक्षा प्राप्त की है जिससे तुमने समस्त पुण्यवान निर्मल गोपियो के गृह सुख को मिट्टी में मिला दिया है ।।२१।।८।। मधुमङ्गल-ललिते । तू सच कहती है, नही तो मन्त्रादि के बल विना नवइन्दीवर से भी कोमल शीतल स्वभाव इस पृष्ण के द्वारा पर्वतो के समान महान दानवो का सहार कैसे सम्भव होता? ॥२२॥ ललिता-अरे मधुमङ्गल । जिसका स्मरण भी सन्ताप स्वरूप है, आर्गे .. --- ।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ ६९ तमेतमात्मनो वयस्यं मा खलु शीतलं भण। ] ॥२३ मधुमङ्गलः~-भो आस. पदिसीअलो वि तुमं गोइआहि उण्होक्ति भणिज्जसि । ता पंसिस जाणिासम् । (इति कृष्णवक्षसि हस्तं न्यस्य ससंभ्रमम् : अहो. सच्चं ज्जेय कहेदि ललिदा । (क्षणं विमृश्य) ललिदे, विष्णादं विण्णादम् । तुअ रामा च्चेअ ण ण उण्णा जाए हिअअवट्ठिणोए चन्दकोडिसीअलो वि एस उपणोकिदो। [ भो वयस्य, प्रकृतिशीतलोऽपि त्वं गोपिकाभिरुग इति भण्यसे । तत्स्पृष्ट्वा ज्ञास्यामि । अहो, सत्यमेव कथयति ललिता ललिते, विज्ञातं विज्ञातम् । तव राधिकव नूनमुष्णा यया हृदय- वर्तिन्या चन्द्रकोटिशीतलोऽप्येष उष्णीकृतः। ] ॥२४ ललिता-अज्ज, एत्थ राअपट्टपत्यरहिझए ताए दुरन्तपेम्मसौकु- मज्जहदाए महसहीए कुदो पवेसो संभावोदि । [ आर्य अत्र राजपट्टप्रस्तर- हृदये तस्या दुरन्तप्रेमसौकुमार्यहताया मत्सस्याः कुतः प्रवेश: संभाव्यते । ] २५ मधुमङ्गल.-(सरोपम्) चवले, अम्हवअस्सो तदो वि तुम्हसहोदो णिभरं सिरोहकोमलो ज एसो वञ्चिदनिन्दो जोइन्दो विअ एकगचित्तो ण ज्जेदव सव्वा चिन्तेइ । [ चपले. मम वयस्यस्ततोऽपि तव मखीतो निर्भर स्नेहकोमलो यस्मादेप वञ्चितनिद्रो योगीन्द्र इव एकाग्रचित्त एनामेव सर्वदा इस अपने प्रिय मित्र कृष्ण को शीतल मत कहो ॥२३॥ मधुमङ्गल-हे मिन्न तुम स्वभाव से शीतल हो, फिर भी सब गोपिकाएं तुम्हे गरम कहती है । इसलिए तुम्हे स्पर्श करके देखू। (इतना कहकर श्रीकृष्ण के वक्षस्थल पर हाथ धर कर सहसा वहता है) अहो ! ललिता सत्य ही कहती है । हे ललिते । मै जान गया, जान गया । तुम्हारी गधिका ही निश्चय बडी गरम है, जिसने हृदय में प्रवेश कर कोटि चन्द्रो के समान शीतल इस कृष्ण को भी उत्तप्त कर दिया है ॥२४॥ ललिता-आर्य । इस विराट-देशीय पत्थर के समान (विगट देश के हीरे के समान सुन्दर ) हदय मे दुरन्त प्रेम-सुकुमारिता से घायल हुई हमारी सखी का प्रवेश भला कैसे सम्भव हो सकता है | मधुमङ्गल-(क्रोध मे भर कर) अरी चपले ! मेरा सखा तुम्हारी सखी के स्नेह से भरा अतिशय सुकोमल है, क्योकि यह नीद को छोड़कर १०० ] *श्रीविदाधमाधव-नाटक अङ्क-३ * चिन्तयति । ] १२६ श्रीकृष्ण -(सापत्रपम्) धिग्वालिशा, कृतमलोकेन नर्मपुञ्जन ॥२७ ललिता--(स्वगतम्) दिट्ठिया वड्डदि पिअसही। [ दिष्टया वर्धते प्रियसखी। ] ॥२८॥ पौर्णमासी-सुन्दर, विश्राम्यतु नर्ममुद्रा ।समाकर्णय मद्विवक्षितम् ॥२६ हित्वा दूरे पथि धवतरोन्तिक धर्मसेनो- भगोदना गुरुशिखरिण रहता लद्धपाती। लेभे कृष्णार्णव नवरसा राधिकावाहिनी त्वां वाग्वीचोभि किमिव विमुखीभावमस्या करोषि ॥३०॥६॥ मधुमङ्गल-अइ, शुद्धबुद्धिए अजवि एव च्छा पुच्छसि । पेक्ख फूअताण' हदकोकिलाण वित्तासणस्थ मए एव पुप्फकोदण्ड णिम्मिदम् । योगेन्द्र को तरह एकाग्र चित्त होकर सदा श्रीराधा का ही चिन्तन किया करता है ॥२६॥ श्रीकृष्ण-(शर्माकर) मूर्ख धिक्कार है तुम्हे निराधार परिहासो का क्या प्रयोजन ? ॥२७॥ ललिता-मन-मन (मे) भाग्यवश प्रिय सखी राधा की बढोतरी हो रही है ॥२८॥ - पौर्णमासी-हे सुन्दर । अब परिहारा को बन्द रो, मैं जो कहती हूँगे सुनो- हे करुणासागर । धर्म सेतु को तोड़ने में समर्थ नवरस वाहिनी राधा-नदी धब * (पति रूप) वृक्ष को बडो दूर परित्याग कर अपने वेग से गुरुजन रूप पर्वत को लापकर तुम्हारे पास पहुची है, फिर तुम वयो वचन रूप तरङ्गो से उसे विमुखो कर रहे हो-अर्थात् उसे क्यो तुरा रहे हो? ॥३०॥ मधुमङ्गल-अरी शुद्ध बुद्धे । अभी तक तुम यही पूछ रही हो? देख महु-बहु शब्द करने वाली अभागिनी कोक्लिाओ को डराने के लिए * घय एक प्रकार का वृक्ष है, जहा वह रहता है, नदी उसके निकट कभी नहीं जाती, बल्कि उससे यहत हटवर बहा करती है।
* श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ १०१ [ अयि, शुद्धबुद्धयाद्यापीदमेव पृच्छसि । पश्य कूजता हतकोकिलानां विधास- नार्थ मयेदं पुष्पकोदण्डं निर्मितम् । ] ॥३१॥ पौर्णमासी-चन्द्रानन, सापि वत्सा- आलीनां प्रतिहाररोधनविधौ वीक्ष्य प्रयत्नावली बाला तकितमाधवीपदिमलस्फूतिर्मणद्वे पते । किचालोक्य सुधांशुकान्तसलिलस्पन्दामलिन्दे क्षणा- देणाडोदयशङ्किनी विकलतामातन्त्रती मूर्छति ॥३२॥१०॥ श्रीकृष्ण:-(स्वगतम्) हन्स, कठोरोऽयं दशाविवर्त: ॥३३॥ पौर्णमासी-सुन्दर, प्रणयिषु मिलितेषु प्रेमभाजामुपेक्षा घटयति फटुपाकान्युच्चकैपणानि । दिनमणिरनुरागी प्रोज्झ्य संध्यां हि रक्ता तमसि निखिलमुग्ने मज्जयत्येष लोकम् ॥३॥११॥ (कृष्णः सलज सानन्दं नम्रीभवति) पौर्णमासी-(पुनर्निभाल्य सानन्दं स्वगतम्) दिष्टचायं स्मितालि. मैं ने यह पुष्प धनुप बनाया है ॥३१॥ पौर्णमासी-चन्द्रबदन ! वह वत्सा है, सखियों के रास्ता रोकने में अतिशय यत्न को देखकर वह कलिका माधवी के प्रसरणशील सौरभ के मारे कम्पित होती है और चान्दनी को देखकर चन्द्रकान्त मणि से जल झरते हुए देखकर चन्द्रोदय की आशङ्का में व्याकुल होकर मूछित हो जाती है ॥३२॥१०॥ श्रीकृष्ण--(मन मे) हाय ! यह कठोरता की पराकाष्ठा है ॥३३॥ पौर्णमासी हे सुन्दर ! प्रेमियों के मिलने पर प्रेमी व्यक्ति की जो उपेक्षा है वह कठोरता की परम काष्ठा है, जो भारी दोपों को पैदा कर सकती है। देखो, सूर्य रक्त अनुरागिणी सन्ध्या को त्यागता है तो समस्त लोकों को घोर अन्धकार मे डाल देता है ॥३४॥११॥ (श्रीकृष्ण शर्माकर नीचा मुहें कर लेते हैं। पौरर्णमासी-( फिर देखकर आनन्द सहित अपने मन ही मन में) - १०२ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३* गितमङ्गोकुर्वन्दक्षिण न्यमीलयदीक्षणम् । (प्रवाशम) गोकुलानन्द, पुरस्तारिया माकन्दवेदो स्वयमल कर्तव्या निमोलति हेलिविम्बे सख्योरेकतरा स्वामभीष्ट, देश प्रापयति ।।३५॥ श्रीकृष्ण - (सापअपम्) यथाह भगवती । (इति सवयस्यो निष्क्रान्त ) पौर्णमासी-पुत्रि ललिते, काम निर्वृतास्मि । तदेहि । राधाम- नुसराव ॥३७॥ (इत्युभे परिकामत) (तत प्रविशति विशाखया सह सकथयन्ती राधा) राधिका-(संस्कृतेन) सखिल्पितनारिकेलनीर स्मितकरवृत हरेनि पीय । तनुसङ्गसुधा विना न तस्य एलपिताह गरलेन, जीवितामि ॥३८॥१२ विशाखा-अइ अविण्णादणिअमाहाम्फे, ताविसो तुह राअस्स गरिमा वडा सौभाग्य है कि इसने मुसकान भरे इशारे से दाय नयन को झपकाया है । ( स्पष्ट कहती है ) हे गोकुलानन्द | सामने वाली आम्रवेदिका को तुम अलकृत करो अर्थात् उस पर बैठो । सूर्य प्रकाश अस्त होने पर ललिता- विशाखा मे से कोई एक आकर तुम्हे अभीष्ट स्थान पर ले जाएगा ।।३५. श्रीकृष्ण-(लझा सहित ) भगवति, जो-आज्ञा । (इतना कहकर आग्न वेदिका की ओर मधुमङ्गल के साथ चल देते है) ॥३६ । पौर्णमासी-पुत्रि ललिते । यथेष्ठ रूप से निश्चिन्त हो गई है। आओ राधा के पास चल ॥३७ ( इस प्रकार कह दोनो चली जाती है)। [ तत्पश्चात् विशाखा वै साथ बात चीत करते करते श्रीराधा प्रवेश करती है ] श्रीराधिका-विशाखा श्रीकृष्ण वचन नारियल के जल के समान है और उसकी मुसकान कपूर सहश ! इन दोनो को एक साथ पानकर मैं अब विपकी ज्वाला म जली जा रही हू, अब उनके श्रीअङ्गसङ्ग-अमृत के विना यह जीवन नही वच सकता ॥३८॥१२॥ विशाखा-राधे । तू अपनी महिमा नहीं जानती है तुम्हारे .
4 * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क ३ * [॥ १०३ जेण सो क्षु सामसुन्दरो वि वाढ रत्तीकिदो तधा वि अप्पणो मालिण्ण सद्धसि । [ अय्यविज्ञातनिजमाहात्म्ये, ताशस्तव गारस्य गरिमा येन स खलु श्यामसुन्दराऽपि वाढ रक्तीकृतस्तथाप्यात्मनो मालिन्य शङ्कसे। ] । ३।। राधिका-(पुन सस्कृतेन) नालीकिनी निशि धनोत्कलिकामशङ्क:- क्षिप्त्वा वृतोरतनुवन्यगज क्षुणत्ति । अमानुरागिणि चिरादुदितेऽपि भानो हा हन्त कि सखि सुख नविता वरावया ॥४०॥१॥ पौणमासी-(पुरो राधा दृष्ट्वा) पुत्रि ललिते, सल्यास्तव प्रेमो क्तिमुद्रामुदायितुमुत्कण्ठितास्मि । तद्भवल्या तूष्णीमेव भवितव्यम् ||४|| ललिता-ज आणवेदि तत्थहोदु । [ यद्विज्ञापयति तद्भवतु । ] ॥४२ पौणमासी-(राधामुपेत्य । सक्तवविपादम्) भवदङ्गसङ्गविषये प्रियाक्तिभ महुरथितोऽपि मदिराक्ष माधव । अनुराग की ऐसी गरिमा है कि वह श्यामसुदर भी अतिशय अनुरक्त हा रहे हैं परन्तु फिर भी तुम अपने मे दोपो की आशका कर रही हो ॥३६ । धीराधिका-सखि | अघ प्रफुल्लित कमलिनी को रात्रि मे यदि उखाड कर वलवान हाथी निभय होकर चूण चूणकर डालता है तो कमलिनी वा अनुरागी सूय प्रभात मे उदित होकर उस अभागिनी कमलिनी को क्या सुख देगा' ॥४०॥१३॥ पौर्णमासो-(सामने श्रीराधा को देखकर) पुति ललिते । तुम्हारी सखी श्रीराधा के द्वारा प्रेमोक्ति मुद्रा को स्पष्ट कराने के लिए मैं उत्कण्ठित हो रही हू । अत तुम जरा चुप रहना । ४१ ललिता-जैसी आज्ञा वैसे ही क्रूगी ॥४२ पौर्णमासी-(श्रीराधा के निकट आकर छल पूवक दुख के साथ) हे खञ्जनाक्षि । तुम्हारे अङ्गसङ्ग के लिए मधुर मधुरवाणी से मैं ने श्रीमाधव को बहुत प्राथना की है, परन्तु वह ता जरा भी सहमत नहीं हुआ। इसलिए १०४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३* गनुते मनागपि न होति हृद्ख्या- प्रतिकारयुक्तिरपरा विधीयताम् ॥४३॥१४॥ राधिका-(सव्यामोहम्) मलं एत्य लज्जिदेण। [अलमत्र लजितेन ।] (इत्यञ्जलि वध्वा)। अब्भलिहम्हि डहणे णडहं रङ्गणलदं लिहन्तम्हि । फा पडिआरे जुति मुक्किम सामलघणुल्लासम् ॥ [ अभ्रालहे दहने कोमला रङ्गणलता लिहति । का प्रतिकारे युक्तिस्त्यक्त्वा श्यामलघनोल्लासम् ] ॥४४॥ पौर्णमासी- जरत्यास्त्वं नप्ती स तु कमलया लालितपदः कायकार तस्मै मुहुरसुलभाय स्पृहयसि । प्रसीद व्याहारे मम रचय चेतो दिविचर गृहीत पाणिभ्यां विघुमहह मा भत्कुकिनी ॥४५॥१५॥ राधिका-(सगद्गदम् सस्कृतेन) मया ते निधान्मुरजयिनि रागः परिहतो मयि स्निग्धे किंतु प्रयय परमाशोस्ततिमिमाम् । गपनी हृदय व्यया का कोई दूसरा इलाज सोचो॥४३॥१४॥ थोराधिका-(दुख पूर्वक) इस विषय मे लजित होने का कोई प्रयोजन नहीं है, (इतना कहते हुए हाथ जोड़कर) कोमल रगणलता यो जलाने के लिए यदि आश व्यापी अग्नि जल उठे तो पडे के पानी से पया उसे बुझाया जा सकता है ? श्याम-मेघ द्वारा भारी वर्षा के विना उसे वुझाने फा और कोई आय नहीं ॥४४ पौर्णमासी-राधे । तू मुझ युढ़िया की दोहरी है और लक्ष्मी उसके चरणो की सेवा परतो है। फिर तुम बसे उस दुलंम वस्तु (श्रीकृष्ण यो पाने की इच्छा मरती हो? इसलिए तुम मेरे वचनों को चित्त में प्रममता पूर्वक धारण फगे। आपाश ये चन्द्र को हाथो से परहने या कौतुर परने वानी मत बनो ॥४५॥१५॥ थोराधिपा-(गद्गद वापी से)-भगवति ! मैंने तुम्हारे आग्रह मे रण पे प्रति अनुराग पो घोर दिया। परन्तु तुम मेरे लिए यह स्था * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-३* [ १०५ मुखामोदोद्गार पहिलमतिराव हि यत प्रदोपारम्भ विमलवनमालामधुकरी ॥४६॥१६॥ (इति वैवश्य नाटयति) विशासा-भअवदि परित्ताहि परित्ताहि। इअ उ पणिदणेत्ता फपि दारुणं दसाबिसेस लहेदि राही । [ भगवति, परित्राहि परित्राहि । इयमुत्तानितनेत्रा कमपि दारुण दशाविशेष लभते राधा। ] ॥४७॥ पौर्णमासी-(सावेगम्) हा धिक् । केय बलादाकृष्टा महाविपत्काल- सपी । (इति सदय राधामालिङ्गय) वत्से, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । भावाभिव्यक्तये प्रोत्यापितासि । तदिद यथार्थमाकर्यताम् ॥४८।। अमितविभवा यस्य प्रेक्षालवाय भवादयो भुवनगुरवोऽप्युत्कण्ठाभिस्तपासि वितन्वते । अहह गहनादृष्टाना ते फल किमभिष्टुवे सुतनु स तनुज्ञ कृष्णस्तवेक्षणतृष्णया ॥४६॥१७॥ आशीर्वाद करो कि मैं आज सन्ध्या होते ही उनके वचनो मे मन लगाकर उन की निर्मल बनमाला की मधुकरी बन जाऊ--(अर्थात् इस शरीर को त्यागकर उनकी वनमाला की मधुकरी बन जाऊ) ॥४६॥१६॥ ( इतना कहकर वेसुध हो जाती है ) विशाखा-भगवति । रक्षा करो, रक्षा करो देखो राधा नेन ठहर गए है, कैसी इसको दारुण दशा हो रही है ? ॥४७ पौर्णमासी-(उद्वग पूर्वक)-हाय धिक्कार । मैं ने हठात् महा विपद रूप काल सर्पिणी को क्यो बुला लिया ( इतना कहकर दया पूर्वक श्रीराधा को आलिंगन करके) पुत्रि | धीरज धरो, धीरज घरो, मैं ने तुम्हारे भावो को जानने के लिए परिहास किया था, अब यथार्थ वात सुनो ॥४८ हे सुन्दरि | जिनके लेशमात्र दर्शन प्राप्त करने के लिए त्रिभुवन पति शकरादि भी उत्कण्ठा सहित तपस्या किया करते हैं वह श्रीकृष्ण तुम्हारे दर्शनो की लालसा से अति क्षीण हो रहे है । तुम्हारे महान भाग्यो की मैं और क्या सराहना करू ॥४६॥१७॥ ?
१०६ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३* ललिता-(संस्कृतेन) त्वद्वार्तोत्तरगीतगुम्फितमुखो वेणु: समन्तादभू- त्वद्व शोचितशिल्पकल्पनमयी सर्वा बभूव क्रिया। त्वन्नामानि बभूवुरस्य सुरभीवृन्दानि वृन्दाटवी राधे त्वन्मयवल्लिमण्डलघना जाताद्य कंसद्विषः ||१०||१|| राधिका-(समाश्वस्य स्वगतम्) चञ्चल हे चित्त, अज्जवि ण पत्तिआएसि । [चञ्चल हे चित्त, अद्यापि न प्रत्याययसि । ] ॥५१|| पौर्णमासी-पुत्रि ललिते. वाढं प्रगल्भासि । तद्विशाखा यावर माकन्दमूलान्मुकुन्देन सह प्रत्यावर्तते तावदत्र संकेतिते कणिकारकुञ्ज गोपय स्व गोपालिकाम्यो राधिकाम् । मया तु स्वकृत्याय गन्तव्यम् ॥५२॥ (इति तिस्रोऽपि निष्क्रान्ताः) विशाखा-(दूरं परिक्रम्य) सो माकन्दो एसो पुरो दोसइ जत्य कण्हो । [ स माकन्द एप पुरो दृश्यते यत्र कृष्णः । ] ॥५३॥ ललिता-हे राधे ! श्रीकृष्ण की वंशी सदा तुम्हारे ही चरित्र का गान करती रहती है, वे तुम्हारी वेश-रचना के योग्य ही समस्त शिल्प क्रिया करते रहते है, समस्त गौए तुम्हारे नाम की हो रही हैं अथात् गौओं को बुलाते समय वे राधे राधे ही उच्चारण करते है । हे सुन्दरि ! श्रीकृष्ण के लिए लतासमूह मण्डल यह श्रीवृन्दावन इस समय राधामय ही हो रहा है-सर्वत्र उन्हें तुम्हारा ही स्वरूप स्फुरित होता है ॥५०॥१८|| श्रीराधिका-(धैर्य पूर्वक मन-मन मे) अरे चञ्चल चित्त ! अब भी दू विश्वास नही करता है ॥५१ पौर्णमासो-पुति ललिते ! तू अति चतुर है, इसलिए जब तक विशासा आम वृक्ष के नीचे बैठे श्रीकृष्ण को लेकर लौट नही आती, तव तक तू इस निश्चित कणिका-कुञ्ज में राधा को गोपवधूओं से छिपा के रस । मैं अपने काम के लिए जा रही हूं ॥५२ ( इतना कहकर तीनों चली जाती हैं) विशाषा-(बुछ दूर जाकर) सामने यह वही आम वृक्ष दीसता है, जहा श्रीकृष्ण बैठे है ।।५३ .
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ १०७ (तत प्रविशति कृष्णः) श्रीकृष्णः-(सोत्कण्ठ प्रतीचीमवलोक्य) सद्याताहिरण्यपिण्डमधुरं चण्डविपो मण्डलं सद्भहन्त तरङ्गिणीरतिगुरोरगीचकाराम्भसि । द्रागेतान्यपि चूकनेत्रपटलीसिद्धाञ्जनक्षोदतां विभ्रन्ति द्विपविभ्रमाणि रुरुधुर्वातानि वृन्दावनम् ॥५४॥१६।। (सोत्सुक्य पन्थानमुद्रीक्ष्य) कथमद्यापि सखी काचिन बाध्वनि मे नावततार । (इति परावृत्य प्राची पश्यन्) । सान्द्रा सुप्तकुमुदतोकुलवधूनिद्राभिदाकोविदा: कुर्वाणा कलुपश्रियं परिभवातङ्कन पङ्कजिनीम् । सरम्मानिसारिकाभिरसकृद्याक प्यमाणाद्गमा- भास शीतकरस्य हन्त हरितं पूर्वा परिष्कुर्वते ॥५॥२०॥ (इति वैयग्रथ नाटयति) ध्यात्वा धर्म धृतिमुदायी कि बबन्धाद्य राधा तीवाक्षेपः किमुत गुरुभिर्लम्भिता वा निवृत्तिम् । (तब श्रीकृष्ण प्रवेश करते है) श्रीकृष्ण-(उत्कण्ठा सहित पश्चिम की ओर देखते हुए) हाय अव तो तप्त स्वर्णपिण्ड की तरह उज्ज्वल प्रचण्ड सूर्य मण्डल समुद्र जल से मिलने लगा है, इसलिए पेचक नेत्रो के सिद्ध अजन-चूर्ण को प्राप्तकर अन्धकार ने हाथियो के समूह का भ्रम पैदा करते हुए वृन्दावन को घेर लिया है ॥५४॥१६॥ (उत्कण्ठासहित रास्ते को देखते हुए) कोई भी सखी अभी तक आती दिखाई नही दे रही है । जाने क्यो ? (इतना कहकर पीछे घूमकर पूर्व दिशा की ओर देखते हुए) आहा । सोती हुई कुमुदिनी रूप कुलाङ्गनाओ की निद्रा भङ्ग करने मे चतुर यह चान्दनी, सूर्य अस्त होने के कारण सकुचित कमलिनियो की शोभा को मलिन करते हुए तथा क्रोधित अभि- सारिकाओ से तिरस्कृत हो पूर्व दिशा को अलकृत कर रही है ।।५।।२०।। (यह कहकर व्याकुलता दिखाते है) क्या राधा धर्म का विचार कर धीरज से बैठ गई है ? अथवा गुरु- । ।
१०८ ] * नीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * किं वा कष्टामभजत दशां तामविस्पन्दमन्दा- मिन्दौ विन्दत्युदयमपि पन्नाजगामाद्य दूती ॥५६॥२१॥ विशाखा-(लतान्तरे सोद्वीविकम्) एसो ण ण उक्कण्ठाए महज्जेव पअवौं विलोएदि कण्हो । ता क्खणं परिहसिस्तम् । [ एप. नूनमुत्कण्ठया ममैव पदवीं विलोकयति कृष्णः । तस्मात्सगं परिहास करिष्ये । ] ॥५७॥ श्रीकृष्णः-(सानन्दम्) इयं विशाखापि चञ्चलपञ्चशाखासखी मिलिता । (इत्युपसृत्य)- सखि, तवोपलम्भात्तामेव रम्भोर' लब्धाममि यद्विशाखाराधयोरद्वैतम् ॥५॥ (विशाखा मुखमानमय्य मौनमालम्बते) थीकृष्णः-सखि, किमय तूष्णीमसि ॥५६॥ विशाखा-चन्दमुह, मन्दभाइणी म्हि । ता कि विग्णविसम् । [ चन्द्रमुख, मन्दभागिन्यस्मि । तस्मारिक विज्ञापयिष्ये । ] 11६०॥ श्रीकृष्णः-(सशङ्कम्) किमर्थमिदम् ॥६१॥ जनों द्वारा कठोर आक्षेपों के भय से रुक गई हैं ? या वह अचेतन होकर किसी कष्ट अवस्या में पड़ी हुई है. कुछ भा हो, बाद तो उदित हो पाया है किन्तु अभी तक कोई दूती भी नहीं आई ॥५६॥२१॥ विशाखा-(लता के पीछे से गर्दन ऊंची करके उत्कण्ठा पूर्वक सोचती है। निश्चय ही यह श्रीकृष्ण मेरी राह देख रहे हैं, इसलिए एक क्षण काल के लिए इनसे परिहास करू ॥५७ थोपटण-(भानन्द पूर्वक) राधा को ससी ही विशासा हाथ हिलाती हुई आ रही है । (निकट जाकर) ससि ! मैं तुम्हारे आने को रम्भोरु राधा के आगमन समान समझता हूं, क्योंकि तुम में और राधा में कोई भेद नहीं है ॥१८॥ (विशासा मुम्प को नीचे भुका कर घुप पड़ी रहती है) धोरण--विशागे ! तुम कसे चुप पड़ी हो ? ॥५६॥ विशाता-हे पन्द्रवदन ! मैं मन्दमागिनो हं. इसलिए और गया यता॥६॥ घोग-(सा महिन) महा अभिप्राय ? ||१|| * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ १०६ विशाखा-सुन्दर, 'ण मे सरस्सई निस्संरदि । होदु । तधा वि संवरिण जुत्तमिदम् । ( इति मुखवंकृत्यमभिनीय) भो भट्टिदारस, सा पिअसही अहिमण्णुणा हदासेण महरापत्तणम्मि-[ सुन्दर, न मे सरस्वती नि.सरति । भवतु तथापि गोपायितुन युक्तमिदम् । भो भतॄदारक सा प्रियसखी अभिमन्युना हताशेन मथुरापत्तने-1] (इत्य/क्त शुष्क रोदिति ) ॥६२॥ - श्रीकृष्ण -(सव्यथम्) कदा नाम नीता ॥६३।। विशाखा--जदा भअवदी तुम्ह सआसं लद्धा। [ यदा भगवती तब सकाश लब्धा । ] ॥४॥ श्रीकृष्णः-(सखेदम्) विशाखे, कथकारं नीता ॥६५॥ विशाखा-तुअम्मि भातविकों। [ त्वयि भाव तर्कयित्वा।] ॥६६ श्रीकृष्ण.-कयं स तकितः ॥६७।। विशाखा- लोओतरीहोन्तो अत्यो ण कस्स तक्फणिज्जो होइ । [ लोकोत्तरोभवन्नर्थो न कस्य तर्कशीयो भवति । ] ॥६॥ श्रीकृष्ण -ग्लपति वपर्दुर्लोलो मे बलान्मलयानिलो विकिरति करैरिन्दु क्षोद तुषाग्निभवं रुपा। विशाखा-हे सुन्दर । मेरे मुहँ से बात नहीं निकल पा रही है फिर भी चुप रहना उचित नही है (इतना कहकर मुहँ बनाते हुए) हे राजकुमार अभिमन्यु हताश होकर राधा को मथुरा नगरी मे-(इतना आधा वाक्य कहकर विशाखा सूखा रोना रोती है) ॥२॥ श्रीकृष्ण-(दुख सहित) फव ले गया ? ॥६३।। विशाखा-जब पौर्णमासी तुम्हारे पास आई थी ॥६४॥ श्रीकृष्ण-(खेद सहित। क्यो ले गया है ? ॥६॥ विशाखा-तुम्हारे मे भाव की आशका करके ॥६६।। श्रीकृष्ण-(दुख पूर्वक) उसे कैसे शका पैदा हुई ।।६।। विशाखा-तुम्हारे लोकोत्तर भावो को देखकर क्सिको शका नही होती है ? ॥६॥ श्रीकृष्ण-एक तो दुशील मलयाचल की पवन बल पूर्वक मेरे शरीर म - ११० ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३* मदनहतकस्तर्जत्येप स्फुटरोलहुंकृत- स्त्रुटिरपि विना राधां नेतु मया न हि शक्यते ॥६६॥२२॥ (इति व्यामोह नाटयति ।) विशाखा-(सखेद ससभ्रमम्) गोउलानन्द, समासस्स समासस । मए क्षु परिहसिदम् । सा तस्सिणो ताए रङ्गणमालिआए रविखदपराणत्थिा [ गोकुलानन्द, समाश्वसिहि समाश्वसिहि । मया खलु परिहसितम् । सा तपस्विनी तया रङ्गणमालिकया रक्षितप्राणास्ति । ] ||७०) श्रीकृष्ण -(समाश्वस्य) धूर्ते, भद्रेण कथितोऽस्मि ।।७।। विशाखा-अप्पणो गुण ण सुमरसि। [ आत्मनो न स्मरसि }७२ श्रीकृष्ण -सखि, वयंता प्रेम्णामधे प्रियाया । ७३॥ विशाखा-(सस्कृतेन)। दूरादप्यनुपङ्गत अतिमिते त्वन्नामधेयाक्षरे सोमाद मदिरेक्षणा विरुवती पत्ते मुहुर्वेषयुम् । को मुरझाय दे रही है, दूसरे चन्द्र क्रोधित होकर अग्नि पूर्ण की तरह सुपार बरसा रहा है, और फिर नीच कामदेव भवरी के द्वारा स्पष्ट रूप से भर्त्सना कर रहा है हाय । मैं श्रीराधा के बिना एक क्षण भी नहीं रह सक्ताहू ॥६॥२२॥ (इतना कहकर अचेतन हो गिर पडते हैं) विशापा-(संद पूर्वर घबरा कर) हे गोकुलानन्द । धोरण घरो, धीरज धरों, मैंने परिहास किया है, वह तपस्विनो श्रीराधा तुम्हारी रगणमाला से अपनी प्राण रक्षा कर रही है ||७०11 श्रीप्ण-(धैर्य धारण कर) अरी पूर्त । तुमने अच्छी पीड़ा दो। ७१ विशाखा-~यपने गुणी यो माद नहीं करते हो ॥२॥ यकृष्ण-ससि । प्रिया के प्रेम-चिह्नो का तो वर्णन कर || fणा हे पृष्ण प्रसङ्गया दूर से ही तुम्हारे नामा गलों में पटते ही यह राजन नयनी राधा उन्मत्त होकर चोरमार परते 1 - नासाद्यते ॥७६।।२४॥ * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्ग-३ * [ १११ आः कि वा कथनीयमन्यदपि ते देवाराम्भोधरे दृष्ट तं परिरन्धुमत्सुकमति: पक्षद्वयोमिच्छति ॥२३॥ श्रीकृष्ण:-तदेहि । सत्यरमेय प्रेयसी प्रेक्षावहि ।।७।। (इति परिक्रामतः) (ततः प्रविशति ललितयाराध्यमाना राधा) राधा-(सम्वेदम् सस्कृतेन) प्रत्यू हेन पराहता न फिमभूद्गन्तु सखी न क्षमा तस्थाः किं तु निवेदितेन हि हरिविधम्भमन्याययो। हा हन्त प्रतिकूलतां मयि गतः किंवा विधिरुणो यद्दूराद्वनमालिकापरिमलोऽयद्यापि विशाखा-(पुगेऽनुसृत्य सस्कृतेन) नम्रीकृत्य शिरो मुहस्तरुवृतामालोकते वर्तनी- मुत्थाय क्षणमासनात्पुनरहो भ्राता निषीदत्यसो। करते कापने लगती है । हाय । और अधिक क्या बताऊँ देवयोग से यदि वह कृष्ण वर्ण नवीन मेघ को देख ले तो उत्कण्ठित चित्तं से उसे आलिगन करने के लिए पख लगाकर उड़ना चाहती है ॥७४।।२३।। श्रीकृष्ण-तब आओ शीघ्र चलकर श्रीराधा को देखे ॥७॥ (इतना कहकर दोनों लौट जाते है । तब ललिता द्वारा आराधित श्रीराधा प्रवेश करती है) श्रीराधा-(खेद पूर्वक) ऐसा लगता है कोई विघ्न पड जाने से विशाखा श्रीकृष्ण तक नहीं जा सकी है, अथवा उन्हे निवेदन करने पर उन्होने उस पर विश्वास नही किया है। हाय । या तो कठोर विधाता ही मेरे प्रतिकूल हो गया है, नही तो दूर से अभी तक वनमाला की सौरभ क्यो नही आ रही ? ॥६॥२४॥ विशाखा-(आगे बढ़कर) हे कृष्ण । देखो, सामने श्रीराधा मस्तक झुकाकर बारम्बार वृक्षो से घिरे मार्ग को देख रही है, भ्रान्त होकर एक क्षण मे आसन से उठ खडी होती है, दूसरे क्षण मे फिर बैठ जाती है एव दो ११२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * द्वित्राण्येत्य पदानि वीक्ष्य ललितां परावर्तते पश्याग्ने तव संगमोत्सुकतया राधा परिक्लाम्यति ।।७७॥२५॥ श्रीकृष्णः- वदनदोप्तिविधूतविधूदया कुमुदधामधुरामधुरस्मिता । नखजितोडुरियं हरिणेक्षणा तृणयति क्षणदामुखमाधुरीम् ।।७।२६ राधिका-(सकातर्यम् सस्कृतेन) दृग्भनीनां किमु परिमल.प्रेयसीमिनिरुद्धः किवा स्वरी मयि विहितवानुद्धतायामुपेक्षाम् हा चान्द्रीमितिभिरभितो अस्यमाणेऽपि लोके प्राप्तो नाय यदि हलतिकामन्दिरे नन्दसूनुः ॥७॥२७॥ श्रीकृष्ण.-(पुरोऽनुसृत्य) महो, साधीयान्प्रसादः पौर्णमास्या., यदियमामोदयति कौमुदी 110॥ तीन कदम चलकर फिर ललिता को देखकर वापस लौट जाती है । हाय ! आपके मिलने के लिए उत्कण्ठित होकर वह अतिशय कष्ट पा रही है ||७७in श्रीकृष्ण-आहा ! श्रीराधा के मुख को कान्ति देखकर चन्द्रोदय से भी घृणा होती है । इसकी मधुर मुमकान बुमोदनियो की शोभा का घर है एवं यह अपने नखों को कान्ति द्वारा तारागणो को पराजित कर रही है, मृग- नपनी इस श्रीराधा के आश्चर्यमय माधुर्य ने प्रदोष बालीन मधुरिमा को तिनके के समान कर डाला है ॥७॥२६॥ पौराधिका-(व्याकुलता सहित) हाय ! प्रेमसीगण ने क्या नेत्र भङ्गी से श्रीकृष्ण को रोक लिया है, किंवा वे स्वेच्छाचारी हैं, क्या उन्होंने मेरी उद्धता को देखकर मेरी उपेदा कर दी है ? हाय ! अब चन्द्र को पिरणों से गमस्त जगत् परिपूर्ण हो रहा है, परन्तु लता मन्दिर से अभी तक तो श्रीनन्दनन्दन नहीं आए ७६॥२७॥ श्रोष्ण-(आगे बढ़ार) आहा ! पौर्णमासी यो सो अति उत्सर प्रमग्नना है कि जिसरी कौमुदी अति मुग दे रही है। ( पक्षालर मे-पौनमागी देयी को यमो महान कृपा है कि जिससे यह पन्द्रन्ति धीगपा यति आनन्द प्रदान करने लगी है) 100 *श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-३ * [ ११३ राधिका-(चमत्कृतिमभिनीय स्वगतम्) हु, एत्तिा भाभधे- आरवि माअणं संयुत्तो एस जणो। [ अहो, एतांगद्भागधेयानां अपि भाजन संवृत्त एप जनः । ] (इति वैवश्यमालम्बते) 11 विशाखा-(संस्कृतेन) अहो धन्या गोप्य: कलितनवनाक्तिभिरलं विलासरानन्दं दधति मधुर मधुभिदः ।' धिगस्तु स्वं भाग्यं मम पदिह राधा प्रिमसखी पुरस्तस्मिन्प्राप्त निविडजडिमाङ्गी विलुठति ।सार । ललिता-अइ लज्जालुए राहिए, अगदो एसो दे माणसहसहरी मारो । तामा क्यु सतसेण विम्हला होहि. जं पगभदा जेब अज्ज कज्जसाहिणी । [ अयि लनालुके राधिके । अग्रत एप ते मानससहरो नागरः । तन्मा खलु साध्वसेन विह्वला भव। यस्मात्प्रगल्भतवाद्य कार्य- साधिनी। ] (इति राधिका वलादिवाकुप्य कृष्णान्तिकसामाद्य च सस्कृतेन)। विदूरादालोक्य प्रबलतरतष्णातरलितः सखीचेतोहंसस्तब बदनपा निपतितः । श्रीराधिका-(विस्मित होकर मन ही मन मे) आहा ! मुझ जैसो नारी का क्या ऐसा भाग्य उदय हुआ है ? (इतना कहकर वेसुध हो जाती हैं ),८१ विशाखा--आहा ! ये सब गोपीगण मधुर विलास युक्त नवीन नर्मोक्तियों द्वारा श्रीकृष्ण का अतिशय आनन्द- विधान कर रही है, ये धन्य हैं । किन्तु मेरे भाग्यों को धिक्कार है कि श्रीकृष्ण के सामने आते ही मेरी प्रिय सखी श्रीराधा बिल्कुल बेसुध होकर पृथ्वी पर गिर गई है ॥८२॥२८॥ ललिता-अरी ओ लज्जाशील राधे । देख, तेरे मानस हस को चुराने वाला नागर तेरे सामने उपस्थित है । इसलिए इसे देखकर अब तू भय से व्याकुल मत हो, चतुरवा ही आज कार्य साधित करेगी ॥३॥ ( इतना कहकर बल पूर्वक श्रीराधा को खीचकर श्रीकृष्ण के निकट लाकर कहती है)। हे कृष्ण ! दूर से ही तुम्हें देखकर हमारी प्रिय सखी राधा का चित्त रूपी हंस प्रबलतर तृष्णा से व्याकुल होकर तुम्हारे मुख कमल पर जा गिरा 7 ११४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * भ्रमद्भपाशाम्यां कितव तमबध्नादिह भवान किमस्मासु ज्याच्या व्यवसितिरियन्ते विसदृशी? ८४॥२६॥ श्रीकृष्णः-(स्मित्वा) ललिते, मद्विधा खल्ववलार्थहारिणो न भवन्ति ॥६५ विशाखा-घम्मिम, सच सच्चम् । , भद्दआलितोत्यकलम्बो ज्जेव अत्य पमाणम् । [ धार्मिक, सत्य सत्यम् । भद्रकालीतीर्थकदम्ब एवात्र प्रमाणम् । ] ॥६६॥ श्रीकृष्ण:- सखि ललिते, मद्विशुद्धी कयं वः प्रतीति. ? |८७|| ललिता-छइल्ल परिक्खाविहारणेण । [विदग्ध परीक्षाविधानेन ।]८८ श्रीकृष्णः-वामे, काम कय्यता परीक्षा । मम भ्राजिष्णुरयं कोति- शुभ्रांशुनं मृषा फलड्डीकतुं शक्यते ।।६।। ललिता-(सस्कृतेन) स्वमुद्धा राधास्तनकनककुम्भान्तरमिल- तनूजालीकालोरगयुवतिमूघप्रणयिनि । है । तुमने उसे अपनी भृकुटि-पाशो से नहीं वान्ध लिया ? हे कितव ! हमारे प्रति यह तुम्हारा उलटा भाव क्या न्याय संगत है ? ||८४॥२६॥ श्रीकृष्ण-(मुसकरा कर) ललिते ! मुझ जैसे व्यक्ति कभी भी अबला सम्पत्ति का हरण नहीं करते हैं १८॥ विशाखा-हे पामिक ! सत्य है सत्य, भद्रकाली तीर्थस्थ वदम्ब वृक्ष इस विषय मे साक्षी है (अर्थाद कात्यायनी पूजा स्थल पर जो कदम्य या वृक्ष है वह आपकी इस बात का साक्षी है । हम अवलाओ के चीर चुरा• पर आप हो तो उस दम्ब पर चढ गए थे।)|६|| भोकृष्ण-ससि ललिते । मेरी निर्दोषता मे आप को कैसे विश्वास हो ॥७॥ ललिता-है विदग्ध | परीक्षा करने पर १८८॥ घोषण-हे वचित्ते ! जो इच्छा हो वह परीक्षा यह दे। निर्मल यश रूपी चन्द्र को भूठा क्लवित नहीं कर पामोगी 11 मलिता-हे वृष्ण ! श्रीराधा-वक्षोज प पनप-युम्भो के मध्य स्थित उस को नाभि से उत्पन्न होने वाली लोमायली रुप जो काली नागिन ? ।
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * । ११५ यदि क्षोमोन्मुक्तः कलयसि कर नायकमणी ततस्ते ध्वस्ताङ्कः प्रचरति यशोमण्डलंशशी ॥०॥३०॥ श्रीकृष्ण:-(कृत्रिमत्रासमभिनीय) हन्त निष्ठरे, नाम्नैव ललितासि, पदल्पीयसिं तावदर्थे गरीयसी सर्पघटाख्या परीक्षामुपक्षिपसि ॥६१।। राधिका-सप्रणयेष्यम्) ललिदे, चिट्ठ चिट्ठ । [ललिते, तिष्ठ तिष्ठ । ) (इति सभ्र भङ्गमवलोकते) ॥२॥ ललिता-विसाहे, गट्ठघणुद्दे सआरिणी मं कोस - तज्जदि राहिमा ? [ विशाखे, नष्टयनोद्देशकारिणी मां कस्मात्तर्जयति राधिका?.] ॥३॥ विशाखा-ललिदे, इमाए हिमअदिदं आउदं मए जाणीअदि । [ ललिते, अस्या हस्थितमाकूत मया ज्ञायते । ] M६४|| विशाखा-तं कहि । सुणिस्सम् । [ तरकथय, पोष्यामि । ] ॥६५ विशाखा-(संस्कृतमाश्रित्य) स्पृशन्तं यो मेघानधमनघकर्मा तमवधी- द्विषज्वालाजालोन्मदमदमयत्कालियमहिम्। है उसके मस्तक मे जो नायक मणि विराजमान है, यदि तुम अक्षोभत्ति से उसमें हाथै लगा सको, तभी तुम्हारा यश चन्द्र अकलंक्ति विख्यात हो सकता है ।६०३०॥ श्रीकृष्ण-(बनावटी भय प्रकाश करते हुए) हाय ! तू बड़ी निठुर है । नाम से तू ललिता है। किन्तु अति छोटे से काम के लिए तू इतनी बड़ी सर्पघट नामक परीक्षा करना चाहती है ? ॥१॥ श्रीराधा-(प्रणय ईर्ष्या पूर्वक) ललिते । चुप रहो ।।६।। (इतना कहकर नेत्र कटाक्ष करते हुए देखने लगती है), ललिता-विशाखे । खोये हुए धनको प्राप्त करने का मैं यत्न कर रही हू फिर श्रीराधा मुझे क्यो फटकार रही हैं ? । १३॥ विशाखा-ललिते । मैं श्रीराधा के मन की बात को जान गई हू १९४ ललिता-बता वह क्या है ? मैं तो सुनूं ॥५॥ विशाखा-सखि ! जिसने गगन स्पर्शी अघासुर का सहार कर दिया एव विषज्वाला उगलते हुए कालियनाग का दमन कर दिया था, जिसके A- ११६ । *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * सकार्पोद्गोपेन्द्रद्र हमजगरं दिव्यपुरुषं भुजङ्गाचार्येऽस्मिन्किमिव घटते पन्नगघट: ?।६६॥३१॥ ललिता-(विहस्य) हला राहि, अप्पणो परिअरल्याए ण जाणासि माहप्पं इमाए रोमाअलोभुभगोएं। पेक्ख । तह हि ।.[ सखि राधे, आत्मन, परिकररूपाया न जानास माहात्म्यस्याः रोमावलीभुजग्या: ? पश्य, तथा हि ॥ अधि गरुडस्स सिंहामणिमुरगबहूगम्भहारिविरुदस्स । पहवइ सहि मोहे?" तुह अरोमाअलीभुअगो॥ [ अपि गरुडस्य शिखामणिमुरगवधूगर्भहारिविरुतस्य । प्रभवति सखि मोहयितु' तब नवरोमावलीभुजगी ] 11६७०३२।। राधिका-(सप्रणयरोपम्) अइ धिटु ललिवे ! एत्य आणावा में विडम्येसि । ता गदुअ बुड्डिाणं गोई वं विगविस्तम् । [अयि घृष्टे ललिते ! अथानीय मां विडम्बयसि । तद्गत्वा वृद्धानां गोपोनां विज्ञापयिष्यामि । ] (इति गन्तुमिच्छति) Ill ललिता-अइ मुद्धरणं साहु चोरं वा जाणि जाहि । [ अयि मुग्धे, एनं साधु चौरं वा ज्ञात्वा याहि । ] (इति पटान्चलमादधाति) ॥६॥ स्पर्श से नन्दराज को ग्रास करने वाला अजगर सुदर्शन नामक दिव्य पुरुष मे बदल गया था, उस भुजगाचार्य के लिए यह सर्पघट परीक्षा क्या करेगी। ललिता-(हमकर) राधे ! तू अपनी परिवर-स्वरूपा रोमावली नागिन की महिमा क्या नहीं जानती है ? देस, मैं तुम्हें बताऊं:- जिराको आयान से सपं बघूओं के गर्भ पात हो जाते हैं, उस गाह के शीश पर भी विराजमान होने वाले इन श्रीकृष्ण को तुम्हारी नवीन रोमायली हा नागिन मोहित कर देने वाली है ॥१७॥३२॥ धीराधिका-(प्रणय रोप सहित) मरी दीठ ललिते ! तू मुझे यहाँ माकर मेरा मगा उठाना चाहती है । मैं पर पल कर बड़ी-यूढ़ी गोपियो रोगय यतादूगी।" (तना कहकर जाना चाहती हैं। सविता-मरो मुग्धे! यह माधु है या पोर, यह तो पता लगाया जाना उचित है । ", - * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-३ * [११७ श्रीकृष्णः-चण्डि ललिते, यद्यतो दुराग्रहान विनोन्तासि, ततः करयाणि परीक्षाम् । (इति राधामनुमर्पति) ॥१०॥ ललिता-(विलोक्य) इल्ल, चिट्ठ चिट्ठ । विष्ण.दं विश्णाम् । [विदग्ध, तिष्ठ तिष्ठ । विज्ञातं विज्ञातम् । (इति संस्कृतेन)। प्रारब्धे पुरतः परीक्षणविधौ प्रासानुविद्धस्य ते खिन्नोऽयं करपल्लवस्तरलतां फम्पोद्गम:- पुष्यति। रोमाञ्चं शिखिपिछचूडनिविडं मूर्तिश्च ते ततो ज्ञातस्त्वं ननु पश्यतोहरपुरीसाम्राज्यधौरेयकः ।।१०१॥३३॥ श्रीकृष्णः-(सकुचन्नम्रीभूय) हन्त, धीगौरवं गौरीणां यदहमेव चौरीक्रतोऽस्मि ॥१०॥ ललिता-छइल्ल, दिष्टुिंआ अप्पणो मुहेण अङ्गीक्दिम् । [ विदग्ध ! दिष्ट्या आत्मनो मुखेनाङ्गीकृतम् ] ।।१०३। (यह कहकर श्रीरापा-का वस्त्राचल पकड़ लेती है).. श्रीकृष्ण-अरी प्रचण्डस्वभावा ललिते ! यदि अब भी तू अपने दुराग्रह को वन्द नहीं करती है तो परीक्षा कर ले ॥१०॥ (इतना कहकर श्रीराधा के निकट जाते है) ललिता-(यह देखकर) हुँ ओ नागर ! ठहर जा'। ठहर जा । जान गई मैं जान गई-- ओ मोर पुच्छधारि! परीक्षा आरम्भ करने से पहले ही डरके मारे तुम्हारे करपल्लव पसीना पसीना हो गए हैं और काम्पने लगे हैं । तुम्हारे सारे शरीर पर ही अतिशय रोमांच हो उठा है । इसलिये यह सब देखकर मैं जान गई हूँ कि तुम चोरो की नगरी के सम्राट-अधीश्वर हो ॥१०१॥३३॥ श्रीकृष्ण' (संकोच वश झुककर) अहो ! इन गौरानियों के गौरव हो तो देखो, 'इन्होने मुझे चोर ही ठहरा लिया है ।।१०२॥ ललिता-अरे विदग्ध ! बड़े सौभाग्य है, तुमने अपने मुख से यह स्वीकार किया है ।।१०३॥ - N -- - - ११८ ] * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-३ * श्रीकृष्ण ~सखि, सौहदेनोपदिश्यतां मे श्रेयस पाया, येनाह- मपराधीभवन्न प्रजामि ॥१०॥ ललिता-सस्कृतमाथित्य) गताना राधाया स्तनगिरिस्टे योगभितो विविक्त मुक्तानां त्वमिह तरलोभूय तरसा । विशुद्धानां मध्ये प्रविश शरणार्थी सहृदया भजन्ते सादगुण्यादपि पृथुलदोष हि पुरुषम् ।।१०५१॥३४॥ श्रीकृष्ण -सखि ! साधूपदिष्ट त्वया । ( इति सानन्दमुपसृत्य पाणी राधा दघाति) ॥१०६ । राधिका-(सगद्गदम् सुन्दर | अजुत तुज्न एदम् । [ सुन्दर अयुक्त तवे म् । ] (इति पाणिमाच्छिद्य शाखिना तिरोदधाति) । १०७॥ श्रीकृष्ण -(राधामप्रेक्ष्य सशङ्कम् हन्त । सख्यो । क्व वा प्रियसखी । उभे-मोहण । णिविस भणिस्सम्ह । (इति शाखिपृष्ठमासाद्य) हला राहि णम्मसील कण्ह परिहसिदु-लद्धो ओसरो। ता पखरण साहित्या श्रीकृष्ण-सखि । सुहृद-भाव से मुझे मङ्गल-पथ की राय दो जिससे मैं निरपराधी होकर चला जाऊ ॥१०४।। ललिता-कृष्ण ! जो समस्त विशुद्ध स्वभाव वाले मुक्तपुरुप श्रीराधा- स्तनगिरि के निर्जन प्रदेश मे सर्वभाव से योग में लीन होकर अवस्थान परते हैं, तुम शरणार्थी होकर शीघ्र उन्ही मे जाकर प्रवेश करो, तभी निर्दोषी होवोगे, क्योकि सहृदय व्यक्ति सद्गुणो को देखकर अत्यन्त दोष युक्त पुरुप को भी अङ्गीकार पर लेते हैं ।।१०५६३४ । श्रीकृष्ण-ललिते । तुमने ठीक कहा है ॥१०६॥ (इतना वर आनन्द पूर्वक जाकर श्रीराधा का हाथ पकडते हैं) धीराधा-(गद्गद स्वर मे) हे सुन्दर । यह तुम्हारी अयुक्त बात है। (ऐमे कहकर हाथ छुडावर श्रीराधा एक वृक्ष के पोछे छुप जाती हैं) धोरण-(श्रीराधा को न देखकर शका सहित) सखियो ! तुम्हारी प्रिय ससि पहा गई ? | १०८॥ मलिता-विशाखा-मोहन । देशकर बताती हैं । (इतना पहार J - * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-३ * [ ११६' होहि । [ मोहन । निरूप्य भणिप्याव । सखि राधे ! नर्मशील कृष्ण परि- हसितु लब्धोऽवसर , तत्क्षण सावहित्था भव । ] ॥१०६। राधिका-(सव्याज भ्रवौ विभुज्य) ललिदे, परिहसिदु ति कि भणासि । ज ईरिस ण साहस खु मारिसीए जुत्तम् । ता पत्थिदहिम्ह । [ ललिते । परिहसितुमिति वि भणसि ? यदीदृश साहस न खलु माश्या युक्तम् । तत्प्रस्थितास्मि । ] ॥११० । ललिता-(कृष्णमम्युपेत्य) चन्दाणण अम्हहिअसही किंपि विष्णविदुकामावि भाएदि। [ चन्द्रानन । अस्मत्प्रियसखो किमपि विज्ञाप- यितुकामापि विभेति । | ॥१११।। श्रीकृष्ण -सखि, न खल्वत्र शतिनि जने भौतिरवकाश लभते । तनिकाममाज्ञापयतु । ॥११२।। ललिता-(सस्कृतमाश्रित्य) चेतस्ताम्यति मे भयोमिभिरल पाणिद्वय कम्पते कण्ठ सज्जति हन्त पूर्णति शिर स्विद्यन्ति गानाण्यपि। वृक्ष के पीछे जाती हैं) हे राधे | नर्म-शील श्रीकृष्ण के साथ परिहास करने का यही अवसर है, इसलिए कुछ देर छिपी रही आवो।।१०।। श्रीराधिका-(छल पूर्वक भ्रवुटि टेढीवर) ललिते । परिहास करने की वात क्यो कहती हो? इस प्रकार का साहस मुझ जैसी के लिए उपयुक्त नहीं है, इसलिए मैं तो जा रही हूँ ॥११०॥ ललिता-(श्रीकृष्ण के निकट आकर) हे चन्द्रानन | हमारी प्रिय सखी कुछ वात बतलाने में डर रही है ॥१११।। श्रीकृष्ण-सखि | वशवर्ती व्यक्ति से डरने का कोई अवकाश नही, होता, अत इच्छानुरूप आज्ञा करें ।।११२।। ललिता- हे कृष्ण । अतिशय भय से मेरा चित्त स्तब्ध हो रहा है, दोनो हाथ काम्प रहे है, गला रुधा जाता है, सिर घूम रहा है सारा शरीर पसीना से तरबतर हो रहा है अत हे गोप्ठेन्द्र | मैं इस भारी साहस को करने में समर्थ नही हू, मैं ने रात्रि काल मे आप को जो इतनी दू से
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नाह क्षमा.
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१२० 1 * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३*
गोष्ठाखण्डल , चण्डसाहसविधौ तेनास्मि .
यदरादभिसारितो निशि ,भवानेतन्मम . क्षाम्यतु ।।११३॥३५॥
श्रीकृष्णः-(स्वगतम्) न जाने नर्मतो धर्मतो वायं गिरां गरिमा ११
राधिका-(किंचिदाविर्भूय) सहि ! तूण्ण पत्यावेहि णम् । जाव
कोविण पेक्खदि । [मखि ! तूर्ण प्रस्थापयनम् । यावत्कोऽपि न पश्यति ।११५
श्रीकृष्णः- (सखेदमात्मगतम्) चपलप्रेमाणो हि वाला रमण्यः ।
तरिकमिवासंभाव्यं नाम ? (प्रकाशम्) ॥११६।।
त्वयाहूतः पार्थो - प्रणयनिकुरम्बेण । रभसा-
दसिद्धार्थों राधे भवितुमिह युक्तः कथमहम्
श्रियाकृष्टः
कृष्णायसमणिरयरकान्तशिलया.
स्फुट-तामस्पृष्ट्वा भजति- किमदूरे स्थगितताम् ॥ ११७॥३६॥
ललिता-गोउलाणन्द ! राहिश्र कीस उवालहेसि ? एवं घम्मदर्श च्चेस ।
उवालहेहि. जो पषु हदासो दोण णिन्भराणुरताण-अन्तरे,पडिबन्धीहोदि ।
[ गोकुलानन्द ! राधिका कस्मादुपालम्भसे ? एन धर्महतकमेवोपालभस्व,
यः खलु हताशो द्वयोनिर्भरानुरक्तयोरन्तरे प्रतिबन्धीभवति । ] ॥११॥
अभिसार कराया है, मेरे इस अपराध को आप.क्षमा कीजिये ॥११३॥३५॥
श्रीकृष्ण-(मन मे) मैं नही जान सका हूं, परिहासमयी इस वाणी
की गम्भीरता को ।।११४
श्रीराधिका--(कुछ सामने आकर) ! शीघ्र ही यहा से चलो, कोई
हमे देख न ले ॥११॥
पीकृष्ण-(वेद पूर्वक मन मे) युवति रमणियों का प्रेम बड़ा चपल
होता है । उनके लिए-कुछ असम्भव नही है ॥११६॥
(स्पष्ट कहते हैं) हे राधे ! तुमने अतिशय अनुराग से मुझे अपने पास .
बुलाया है, फिर मेरी अर्थ सिद्धि न होना कैसे उचित है ? देखो, चुम्बक-
मणि अपने शोमन गुण से जब लोहमणि को आकृष्ट करती है, तब वह धया
उसे स्पर्श न करके दूर रह सकती है ॥११७॥३६॥
ललिता गोकुलानन्द ! तुम राधिका का चयों तिरस्कार कर रहे
हो ? उम अमागे धर्म का ही तिरस्कार करो, जो आशा-विरहित धर्म
निश्चय ही परस्पर गाड प्रेम करने वाले दो व्यक्तियों के बीच प्रतिबन्ध
पनता है ॥११॥
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-३ * [ १२१ श्रीकृष्णः-पश्य पश्य, सखि ! निर्मरमनुरक्ता: प्रणयिनमनुयान्ति धर्ममपि हित्वा । इयमतिराणा प्राची चुम्बति विधुमिन्द्र नायापि ॥११॥३७॥ ललिता-तुम्हाण उत्तरपउत्तरे को पाम पहवदि । ता इदो विजयेन्तु सामिपादाओ। [युष्माकमुत्तरप्रत्युत्तरे को नाम प्रभवति । तस्मादितो विजयन्ता स्वामिपादाः। ] ॥१२०॥ राधिका-(साकूतमनुसृत्य) ललिदे, अप्पणो मुहेण किंपि विण्णविम एं गिवट्ठावइस्सम् । [ ललिते, आत्मनो मुखेन किमपि विज्ञाप्यन निवर्त- यिष्ये । ] (इति ललितामवेक्ष्य संस्कृतेन) "१२१॥ समन्ताम्मे कोतिर्मुखरितसतीमण्डलमुखा कलङ्क नोन्मुक्त कुलमविकलश्रीरपि पति.। चलचिल्लीलोलाजितमदनधन्वोद्धतिरयं तदस्मिन्नारम्भ हृदयमफलं विक्लवयति । १२२॥३०॥ श्रीकृष्ण--(राधा निरूप्य सोच्छ्वासमात्मगतम्) श्रीकृष्ण-देखो, देखो-सखि । अनन्त प्रेमी जन धर्म को भी त्याग कर प्रेमासद के पीछे चले जाते हैं, जैसे पूर्वदिशा अपने पत्ति इन्द्र के रहते हुए भी चन्द्र का चुम्बन किया करती है ।।११६॥३७॥ ललिता-तुम्हारी बातों का प्रत्युत्तर देने में कौन समर्थ हो सकता है ? इसलिए अब आप दोनो पधारो ॥१२०।। श्रीराधिका-(अभिप्राय सहित निकट जाकर) ललिते ! तुम अपने वचनों से कुछ निवेदन कर इन्हे रवाना करो ॥१२॥ (इस प्रकार कह ललिता को देखते हुए) देखो सखि | समस्त सती- स्त्रीगण मेरी कौति गान करती रहती हैं, मेरे पितृकुल तथा पतिकुल दोनो निष्कलङ्क है, और पति भी मेरा सुन्दर है, फिर यह (श्रीकृष्ण) मेरे प्रति काम धनुप की चचलता को जय करने वाले अपने चचल कटाक्षों को, निक्षेप कर अपने को वृथा क्यो दुखी कर रहे है ? ॥१२२॥३८।। श्रीकृष्ण-(श्रीराधा को देखकर निश्वास छोड़ते हुए मन ही मन मे) ।
१२२ । *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ *
धावन्त्याः अतिशष्कुलीपरिसरं सगादपाङ्गथियो
धत्त हीरककुण्डलं मरकतोसंसद्य ति सुभ्र वः ।
वागन्त. स्मितभाग्विभाति तदिदं शङ्क सखीशिक्षया
वमुख्यं किल कृत्रिमं विलसति क्लान्ति मनो मा स्म गाः ।।१२३॥ ३ई
ललिता-(कृष्णमुखमालोक्य जनान्तिकम्) विसाहे ! इङ्गिदेण लक्खेमि
उण्णीद इमिणा अम्हाणं रहस्सम् । [ विशाखे ! इङ्गितेन लक्ष्यामि उन्नीतम-
नेनास्माक रहस्यम् । ] ॥१२४॥
विशाखा-अध इम् । [ अथ विम्। ] २२५॥
श्रीकृष्ख.-(सस्मितम्) ललिते, कृतमत्र वञ्चनचातुरीप्रपञ्चेन ।
नहि लूतया प्रसारितास्तन्तवो गन्धसिन्धुरस्य बन्धनाय प्रभवन्ति ।।१२६।।
विशाखा-सहि राहि ! णिप्फलं विलम्बसि । झत्ति किदत्थीकुण
अप्पणो पिअजणम् । [ सखि राधे, निष्फल विलम्बसे । झटिति कृतार्थी-
कुर्वात्मन. प्रियजनम् । ] ॥१२७।।
श्रीकृष्ण -(सानुरागम्)
आहा | श्रीराधा के कान पर्यन्त नेत्र कटाक्षी, की शोभा पाकर हीरे
के (स्फेद) कुण्डल मरकत मंणि रचित (काले) कर्ण भूपणो की कान्ति
धारण कर रहे हैं, इसके वचनों में भी मुसकरान भरी है, इसलिये जान
पडता है कि सखियो को सिखाई हुई यह प्रतिकूलता दिखा रही है । कुछ भी
हो, अरे मन ! तू अव वृथा दुख मत पा ।।१२३॥३९॥
ललिता-(श्रीकृष्ण मुख को देखकर हाथ की ओट करके) विशाखे !
इनके इशारो से लगता है कि ये हमारे रहस्य को समझ गए हैं ||१२४॥
विशाखा-वह क्या ? ॥१२॥
श्रीकृष्ण-(मुसकरा कर) ललिते ! यहा वचन-चातुरी
वृथा है । मछुवा (माहीगीर) का सूत जाल कभी उन्मत्त हाथी को नहीं बाघ
संक्ता है ।।१२६||
विशाखा-सखि राधे ! व्यर्थ समय गवा रही हो । शीघ्र ही अपने
का फैलाना
प्रेमीजन को कृतार्थ कर ॥१२॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ १२३ कर्ण द्वन्द्वमिद रुतैरिह कुहूकण्ठस्य कुण्ठीकृत सद्य कोमलभारतीपरिमलेनोल्लाघय श्लाघया। नि शङ्ककिल शीतलोकुरु परीरम्भेण रम्भोरु मे गम्भीरस्मरह्नितापलहरीपात्राणि गात्राण्यपि ।।१२८॥४०॥ विशाखा-सुन्दर ' एसा भभवदी, लज्जा ,ज्जेव्व राहिारूवेण उदिग्णा। ता जाव ण चाडबन्धेण समूहोकदुम समप्पेम्ह दाव भवन्तेण सोम्मसीअलवुत्तिणा होदध्वम् । [ सुन्दर, एपा भगवती लज्ज व राधिका- रूपेणावतोर्णा । तस्माद्यावदेना चाटुवन्धेन समुखोकृत्वा समर्पयामि, ताव- द्भवता सौम्यशीतलवृत्तिना भवितव्यम् । ] ||२६॥ श्रीकृष्ण -(सादरम्) अयमत्र निसर्गशीतल सखि | राधाकुचयोरवस्थितिम् । नवकाञ्चनम्म्मयोरह स्फुरदिन्दवीरदामवद्भजे ॥१३०॥४१ (इति मन्द मन्द राधामुपसर्पति) राधिका-(किंचिदपसृत्य) सहि विसाहे । सुट्ठ मोदम्हि, ता किंति म उधेषखसि ? [ सखि विशाखे । सुष्ठुभीतास्मि, तवकिमिति मामुपेक्षसे ?] श्रीकृष्ण-(अनुराग सहित) हे राधे | कोक्लिो के कूहू-कूहू शब्द से मेरे दोनो कान कुण्ठित हो गए है, अब तुम अपने कोमल वचनो के सौरभ से मेरे कानो की पीडा को दूर करो। मेरे समस्त अङ्ग गम्भीर कन्दोनल ताप की लपटो से जले जा रहे हैं । इसलिए हे रम्भोरु । तुम निशक होकर अपने आलिगन द्वारा इन्हे शीतल करो ॥१.८॥४०॥ विशाखा-हे सुन्दर | भगवती की लज्जा ही राधिका रूप से अवतीर्ण हुई है। अत जब तक मैं वचन रूपी बन्धन से इसको सम्मत कर तुम को समर्पण नही करती हू, तब तक तुम सौम्य-शीतल भाव धारण करो ॥१२६।। श्रीकृष्ण-(आदर सहित) सखि | मैं तो स्वभाव से ही शीतल है । इसलिए राधा के नवकाञ्चन सदृश कुच युगल मे कमल की नाल के समान मैं अवस्थित रहूगा ॥१३०॥४१॥ (इतना कहकर धीरे-धीरे श्रीराधा के निकट आते है) श्रीराधिका-(थोडी दूर होकर) सखि विशाखे । मैं अतिशय डर रही हू, तुम मेरी क्यो उपेक्षा कर रही हो ॥१३॥ - 1 -- - १२४ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * ललिता-राहे ! एसा विसाहेति विक्खीदा, कधं तुमं पच्छादिक्ष रक्सिदुपहबदु ? ता रखणखमणं ज्नेव भजेहि जं एसा आमडिदशिलीमुहा दोसइ । [ राधे, एषा विशाखेति विरयाता कथ त्वां प्रच्छाद्य रक्षितु प्रभ- वतु ? तद्रक्षणक्षमामेनां वनमालामेव भज, यदेपाकृष्टशिलीमुखा दृश्यते । १३२ राधिका-(सप्रणयरोपम्) अइ दुम्महि ललिदे ! सिद्धा च्चेअ तुम्ह मणोरहा, तथावि गणिवुत्तासि । [ अयि दुमुखि ललिते, सिद्धा एव तव मनोरथा. 1 तथापि न निवृत्तासि । ] ॥१३३।। विशाखा-हला राहि । सव्वाणं गोडलजणाणं अभअदाणसत्त दोक्खिदो कण्हो। ता इदो किति भाएसि । [हला राधे ! सर्वेषां गोकुलजनाना- मभयदानसः दीक्षितः कृष्णः, तस्मादितः किमिति भीतासि ? ] ||१३४।। श्रीकृष्णः-सुन्दरि राधे ! त्वमेव सुष्ठु पलिष्ठासि, ततः कथं मरास्तव भौतिः ? तथा हि साम्प्रतम्- अहीनो भू गुच्छ. फुटिलवलनश्यति मां खरस्ते नेप्रान्तो मयि वितनुते ताडनविधिम् । ललिना-राधे ! यह विशाखा. नाम से प्रसिद्ध है (अर्थात् यह शाखा रहित है) तव यह किस प्रकार तुम्हें आच्छादित कर तुम्हारी रक्षा कर सकेगी? इसलिए रक्षा करने में समर्थ इस वनमाली की ही शरण लो। यह भ्रमरगण को आकर्षण करते हुए दीख रहे हैं (पक्षान्तर में-हे राधे तुम बनमाली अर्थात् यनसमूह का आय करो। जिसमे भ्रमर गण आकृष्ट हो रहे हैं-वहा तुम्हें कोई देख नही पायेगा) ॥१३२।। पौराधिका-(प्रणयरोप सहित) अरी दुमुसि ललिते ! तुम्हारे राय मनोरय पूर्ण हो गए हैं फिर भी तू निवृत्त क्यो नहीं हो रही है ? ॥१३३।। विशाखा-हे राधे ! सब गोकुल वासियों को अभयदान देने के लिए यम में श्रीकृष्ण दीक्षित हुए हैं, फिर तू इनमे डर क्यों रही है ? ॥१३४ भोग-मुन्दरि रापे ! तुम तो मुझ से भी अधिक बलवती हो । फिर तुम्हें मुग से मपा डर है ? देगो न, जिन शत्रुनो को मैं ने पहले पराजित कर दिया था, वही अब तुम्हारे आश्रित होकर अपना यदसा से रहे हैं। मामिपनाग मुम्हारो भ्राटि गुन्ध र पटाशों द्वारा मुझे सपेट * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ १२५ प्रलम्बः केशान्नो हरति हठवृत्त्या मम बलं । भजस्त्विामेतेरहमिह जितरस्मि विजितः ॥१३५॥४२॥ ललिता-फण्ह, कुदो इमाए वलिद्वत्तण जे अर्पणो धणं तुअत्तो मोआविदुंण समत्या? [ कृष्ण ! कुत एतस्या बलिष्ठत्व, यदात्मनो धन त्वत्तो मोचयितुन समर्था ? ] ॥१३६।। विशाखा-(संस्कृतेन) विधत्ते कंसारिः सखि ! परमहंसालिषु रति मनोहसेन्द्र ते कथमपि न निर्मोक्ष्यति तल । बधानाम सद्यस्त्वमपि भुजवल्लोविलसितैः शठे कः क्षेमार्थी सुमुखि नहि शाठ्य घटयति ? ॥१३७॥४३ राधिका-(साम्यसूयम्) पावे विसाहिए । तुम वि ललिदाए विसल- दाए मारदेण दूसिदासि। [ पापे विशाखे ! त्वमपि ललिताया मारतेन दूपितासि । ] ॥१३८।। श्रीकृष्णः-सखि ललिते, स्वप्रसादामृते काममदत्तावगाहनया कयमद्यापि तटस्थीकृतोऽस्मि राघया ॥१३६।। रहा है, धेनुकासुर तुम्हारे नेत्रो के कोने मे रहकर मेरी ताडना कर रहा है एव प्रलम्बासुर तुम्हारे देशो मे स्थित होकर मेरे बल को हरण कर रहा है। अतएव हे राधे! तुम मुझ से अधिक बलवान हो ॥१३५॥ ४२।। यह तुम से अधिक बलवान कैसे है ? क्योकि यह तुम से अपना मन रूपी धन छुडा लेने मे समर्थ नहीं हो रही है ।।१३६॥ विशाखा-ललिते ! श्रीकृष्ण परम हस कुलो को भी रति देने वाले हैं, तव तुम्हारे मानस हस को कैसे न छोड़ेंगे ? तुम इन्हें अब अपनी भूज- वल्लियो के विलास द्वारा बाध लो । देखो, हे सखि ! अपना हित चाहने वाला कौन व्यक्ति है जो शठ के प्रति शठता का व्यवहार नही करता?॥१३७ श्रीराधिका-(असूया सहित) हे पापिनि विशाखे ! तू भी ललिता रूपी विपलता की वायू पाकर दुपित हो रही है ॥१३८।। श्रीकृष्ण-सखि ललिते । अपनी प्रसन्नता रूप अमृत मे यथेष्ट रूप से अवगाहन कराने से अभी तक राधा ने मुझे क्यो वन्चित कर रखा है ?।१३६ ललिता-कृष्ण र १२६ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * ललिता-कण्ह, मुञ्च वअण चातुरीवित्यारंण खु चन्दाअली विम झत्ति याअमेत्तएणे सुलहप्पसोदा अम्हपिअसही । [ कृष्ण । मुञ्च वचन चातुरी विस्तार, न खलु चन्द्रावलीव झटिति वाड मातकरण सुलभप्रसादा- स्मत्प्रियसखी। ] ॥१४०॥ श्रीकृष्ण -कथ सुलभस्ते सखोप्रसाद ? ||१४१।। ललिता-सेआसतारणेण । [ सेवासतानेन ] ||१४२।। श्रीकृष्ण ---(सानन्द राधा पश्यन्)। कि चन्दनेन फुचयो रचयामि चित्र- मुत्त सयामि कबरों तव कि प्रसूनै । अङ्गानि लङ्गिमतरानि करेण कि वा सवाह्याम्यतनुखेदफरम्बितानि ॥१४३॥४४॥ राधिका-(सलीलमपक्रम्य साहगुलितर्जनम्) पमिरि, गुमरिससि ओसरे । ता एसा घर गच्छन्ती जिम्हाण तुम्हाण हत्यादो अप्पारण मोआव इस्सम् । पामरि। स्मरिष्यस्यवसरे । तदेषागृह गच्छन्ती जिक्षाणा युष्माक हस्तादात्मान मोचयिष्यामि । ] ॥१४४।। ललिता-कृष्ण । वचन-चातुरी के विस्तार को छोडो, हमारी प्रिय सखि श्रीराधा की प्रसन्नता चन्द्रावली की तरह केवल वचन मात्र से सुलभ नही है।॥१४०॥ श्रीकृष्ण-तुम्हारी सखी की प्रसन्नता कैसे सुलभ है ? ॥१४१।। ललिता-निरन्तर सेवा करने से ॥१४२॥ श्रीकृष्ण-(आनन्द पूर्वक श्रीराधा को देखते हुए) हे अनुराग तरङ्गिणि राधे । मैं चन्दन से क्या तुम्हारे कुचयुगल पर चित्रकारी कर दू? या फूलो से तुम्हारी वेणी गू थ दू अथवा कन्दर्प पीडित तुम्हारे समस्त अगों को अपने हाथो से सम्वाहन कर ॥४३॥४४॥ (इतना कहकर श्रीकृष्ण आगे बढते हैं) श्रीराधिका- लीला प्रकाश पूर्वक अगुली से तर्जन करती हुई) अरी दुष्ट ललिते । यह अवसर याद रखना अब घर जाकर हो तुम जैसे मुटिल व्यक्तियो के हाथो से मैं छुटकारा पाऊ गी । १४४।।
T * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अंक-३ * t२७ ललिा-(पटाचलमाकृष्य सहि राहि, याहि न घरं, परहत्थे पस्थिदम्हि णिअहसे। बइ बहिरे, हिरण देसि कुदो अञ्चले गण्ठिम् ॥ [ सखि राधे, याहि न गृह परहस्ते प्रस्थितास्मि निजहसे। अयि बधिरे, हिरण्य ददासि कथमञ्चले ग्रन्थिम् ] ॥१४॥४५॥ राधिका-मञ्च मञ्चाञ्चलम, ईदो गदुअ अजिअ विग्णविस्समू। [ मुञ्च मुञ्चाञ्चलम्, इतो गत्वायां विज्ञापयिष्यामि । ] ॥१४६।। ( नेपथ्ये) हन्त पत्तिणि ललिदे, कहि दे पिअसही राहिमा' [ हन्त नत्रि ललिते । कुत्र ते प्रियसखी राधिका ? ] ॥१४७॥ ललिता-हन्त, एसा अज्जिआ मुहरी इधं जेव्व आअच्छदि । [ हन्त, एषा आर्या मुखरा इंत एव आगच्छति । ] ॥१४॥ श्रीकृष्ण -(सशङ्कम्) ततो दवीयान भवितास्मि (इति तथा स्थित ) । (प्रविश्य) मुखरा-(पुरो दृष्टि निक्षिप्य साशङ्कमात्मगतम्) जो पषु दूरदो कोवि गोलिमपुञ्जो मरेंगअत्यम्म यिसम्बन्तो दिदि मे आअड्डू, पूण सो ललिता-(वस्त्राचल पक्ड कर) सखि राधे। दूसरे के हाथ में अपना मानस-हस सौपकर घर मत जाओ। क्या आश्चर्य है । सोने को बाहिर फैक कर कपडे मे गाठ लगा रही हो ॥१४५।।४।। श्रीराधिका 1-छोड दो मेरे आचल को छोड दो, यहा से जाकर सब बात मैं आर्या (मुखरा) को बताऊ गी ॥१४६।। (पर्दे के पीछे से) हाय ! अरी नातिनि ललिते । तुम्हारी प्रिय सखि राधिका कहा गई है ? ||१४७ । ललि-हाय ! यह तो आर्या मुखरा ही यहा आ रही है ॥१४८।। श्रीकृष्ण-(शङ्का सहित) तब मैं तो दूर हो जाता हू ।१४६।। (इस प्रकार कहकर श्रीकृष्ण दूर खड़े हो जाते हैं) मुखरा-(प्रवेश करते हुए-सामने देखकर शङ्का पूर्वक अपने मन ही मन मे) यह दूर से नीलिमा पुञ मरकत मणि स्तम्भ की विडे- . १२८ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * एसो कम्हो भवे, जं अगर किपि सोरम पसप्पइ । [यः खलु दूरतः कोऽपि नीलिमपुञ्जो मरकतस्तम्भं विडम्वयन दृष्टि से आकर्षति, नूनं एष कृष्णो भवेत्, यदपूर्व किमपि सौरभ्यं प्रसपंति । ] (इति कृष्णान्तिकमनुसर्पति)॥१५० श्रीकृष्ण:-आर्ये ! (इत्य|क्त) ॥१५१।। मुखरा-(सकपटाक्रोशम्) को पषु मज्जे अज्जेति खुलखुलाएदि [ क: खल्वार्य आर्येत खुलखुलायते ? ] ॥१२॥ श्रीकृष्ण.-आर्ये मुखरे ! सुखं वधंसे ? ॥१५३।। मुखरा-मोण जाव तुह पंसिाए मुअत्तणं ण सुवुत्तं, ताव को अम्हाणं सुहम् ? [ मोहन ! यावत्तव वंशिकाया मूकत्वं न सवृत्त तावत्कुतो ऽस्माकं मुखम् ? ] ||१५४॥ श्रीकृष्णः-(सस्मितम) आर्ये ! कि तेऽपराध्यति घंशी ? ॥१५।। मुखरा-पुच्छ इमामो सत्वगोउलवालिआमो जाओ कण्णसीमें पविसत्तम्मि वसिआफुवकारारम्भे वारंवारं णिवारिज्जन्तीओ वि वणे धामन्ति। [पृच्छ इमाः सर्वगोकुलवालिका, याः कर्णसीमा प्रविशति वंशिका- फूत्कारारम्भे वारवारं निवार्यमाणा अपि बने धावन्ति । ] ॥१५६।। म्बना करते हुए कौन मेरी दृष्टि को आकर्षण कर रहा है ? निश्चय यह श्रीकृष्ण ही होगा, क्योंकि यहां अपूर्व सौरभ फैल रही है । (इतना कहकर श्रीकृष्ण के निकट माती है ) ॥१५॥ श्रीकृष्ण-हे आयें ! (इतना आघा वाक्य बोलने पर) ॥१५१।। मुखरा-(कपट-क्रोध सहित) कौन है मार्य, आर्य' कहकर खुट-खुट कर रहा है ? ॥१५२॥ श्रीकृष्ण-आर्ये मुखरे ! सुख पूर्वक हो न ? ॥१५३॥ मुखरा-मोहन | जय तक तुम्हारी वंशी मौन नहीं लेती है तब तक हमारा सुख कहा? ॥१५४।। श्रीकृष्ण-(मुसकरा कर) आयें ! वंशी ने तुम्हारा क्या अपराध किया है ? ॥१५शा मुखरा----यह बात तू इन समस्त गोकुल बालिकाओ से पूछ, कर्ण- छिद्रों मे वंशो की आवाज पहुचते ही वारंवार निवारण करने पर भी ये वन की ओर भाग खड़ी होती हैं ॥१५६।।
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३* [ १२६ श्रीकृष्ण:-विहस्य) मुखरे ! सत्यं पथार्थनामासि ।।१५७।। मुखरा-मोहण ! पदोसे तुज्म एत्य पवेसो में सडाउल फरेदि ! [ मोहन ! प्रदोपे तवात्र प्रवेशो मा शङ्काकुलां करोति । ] ॥१८॥ श्रीकृष्णः-मुसरे ! कृतमय शङ्कया, यदद्य पौर्णमास्या में वर्णित 'तवात्र चत्यरा चडक्रमीति फाप्यदुना हरिणीति' ॥१५८।। मुसरा~णार ! पहादे पेच्छिस्ससि , दाणि साहेहि । [ नागर ! प्रभाते प्रेक्षिष्यसे एनामिदानी साधय । ] ॥१६०।। श्रीकृष्णः-हन्त, वृद्ध गड्डरविषाणकठोरे ! विक्षन्धमास्यताम् । एषोऽहं प्रजामि । (इति शाखिनामन्तर्दधाति) ॥१६१।। मुखरा-ललिदे ! सच्चं गदो कण्हो? [ललिते, सत्यं गतः कृष्णः ], ललिता-अप इ । [ अय किम् । ] । श्रीकृष्ण:-(स्वगतम्) घूर्णाकुलेयं जरती, तदत्र तूष्णीमेत्य राधा- पटाञ्चलमाकर्षयामि । (इति तथा करोति) ॥१६४।। श्रीकृष्ण-(हस कर) मुखरे । सच मुच तुम्हारा मुखरा नाम यथार्थ है ॥१७॥ मुखरा-मोहन ! संध्या के समय तुम्हारा यहा आना मुझे शङ्का पैदा कर रहा है ॥१५॥ श्रीकृष्ण-मुखरे तुम्हारी शङ्का वृथा है, मुझे आज पौर्णमासी ने बताया कि तुम्हारे आङ्गन मे एक अनिर्वचनीय हरिणी भ्रमण कर रही है ॥१५॥ मुखरा-नागर | प्रभात मे आकर उसे देखना, अब जाओ॥१६॥ श्रीकृष्ण-हाय ओ मेषशृग से भी कठोर मुखरे ! तुम विश्वास करो । लो मैं जा रहा हू, ( इतना कहकर वृक्ष की ओट मे हो जाते है)१६१ मुखरा-ललिते ! क्या कृष्ण सचमुच चला गया है ? ॥१६॥ ललिता-और क्या ॥१६३॥ श्रीकृष्ण-(अपने मन मे) यह वृद्धा चक्करा रही है। मैं चुपचाप जाकर राधा के वस्त्राचल को खचू गा । (यह कह वैसा ही करते हैं) ॥१६॥ A १३० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * मुखरा-(चक्षुपी विकास्य साक्रोशम्) चिट्ठि ललिदे ! अगदो एसो दे पीदम्बरो कण्हो ,राहोसाडिसञ्चलं आअड्डन्तो विसं दोसइ, ता कीस तुम रेपदासि म ? [ धृष्टे ललिते ! अग्रत एप ते पीताम्बर: कृष्ण राधाशाटिका- ञ्चलमाकपंन्निव दृश्यते, तत्कस्मात् त्व प्रतारयसि माम् ? ] 1॥१६५।। कृष्पाः सराव किंचिदपसर्पति) ललिता-(स्वगतम्) रत्तिमन्यि बुट्टिों वञ्चेमि । [ राज्य घामेना वृद्धा वञ्चयामि । ] (प्रकाशम् संरम्ममभिनीय सस्कृतेन) । १६६ मुधा शडान्धे जरति कुरुपे यांमुनतटे तमालोऽयं चामीकरकलितमूलो निवसति । समीरपटोलादतिचंटुलंशांखाभुजतया घयस्याया येन स्तनवसनमास्फालितमभूत् ।।१६७१४६।। मुखरा-(स्वगतम्) असच्चण केहेईद, ललिदा । (प्रकाशम) धत्से, घुम्माउलम्हि, ता घरं गदुम सुविस्तम् । [ असत्यं न , कथयति ललिता । वत्से ! घूर्णाकुलास्मि, तस्माद्गृह गत्वा स्वप्स्यामि । (इति निष्क्रान्ता) ॥१६८ विशाखा-हता राहि ! फहस्स ' मुहमण्डलुम्मीलिदं धम्मजल- मखरा- (आख फारते हुए क्रोध सहित) अरी पृष्ट ललिते । देख सामने मुझे तो पीताम्बर पारी कृष्ण राधा का वस्साचल खीवता हुआ सा दीख रहा है, तू मुझे कैसे बहका रही है ? (कि कृष्ण चला गया है)॥१६५ (श्रीकृष्ण कुर्छ शकित होकर दूर चले जाते हैं ) ललिता--(मन में) रात मे न देख सकने वाली इस बूढी की वञ्चना करूंगी । (क्रोध में भर कर कहती है)-॥१६॥ है अन्धी वृद्ध । व्यर्थ शका कर रही है । यमुना तट पर यह तमाल वृक्ष सटा है, उसके मूल में स्वर्ण वेदिका सुशोभित हो रही है। वायु के वेग से उसपी दासाए हिली हैं, जिससे श्रीराधा का वस्त्राचल सिंचा है।१६७ मुसरा-(अपने मन मे) ललिता झूठ नहीं बोलती है । (सष्ट रहती है) येटी ! मुझे नीद आ रही है । मैं तो घर जाकर सोती हू। (इतना पहार पली जाती है।।१६।। विशाता-हे रापे ! श्रीकृष्ण का मुख मण्डल पसीना से तर-बतर ।
*श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-३ * [ १३१ बिन्दुमाल भिसाडिमलेण अवरणेहि । [ हला राधे । वृष्णस्य मुख- मण्ड लोन्मीलित घमंजलविन्दुजाल निजशाटिकाञ्चलेनापनय । ] ॥१६॥ राधिका-(सभ्रूभङ्गम्) विसाहे 'तुम जेव्व अयणेहि, जा फ्षु आफोमार इरिस स्वदे गहीददिषखासि । [ विशाखे, त्वमेवापनय, या खल्वाकौमारमस्मिन्द्रते गृहीतदीक्षांसि । ] ॥१७०॥ विशाखा-राधे कण्ठत्यिदा दे रङ्गणमालिआ भणादि । मा कुप्प, तुम वि तत्थ दिषखाविहाणे फॉरिजन्तसकल्पासि । [ राधे, कण्ठस्थिता ते रङ्गणमाला भणति । मा कुप्य, त्वमपि तत्र दीक्षाविधाने कार्यमाण- साल्पासि । ] ॥१७॥ श्रीकृष्ण -(रङ्गणमाला दृष्ट्वा सश्लाघम्) शडी चिरात्किमपि रङ्गणपुष्पसद्ध पुण्यं पुरा परमतीर्थवरे व्यधत्त । यस्मान्ममाप्यसुलभ मादराक्षि साक्षा- दगीचकार तव वक्षसि सङ्गसौख्यम् ।।१७२१ ४७।। राधिका-हला विसाहे ' जा क्खु मह, कण्ठादो बलेण माअड्ढिा णीदा तुए अणग्घा गुआअली सा दाणी समप्पोअदु । एसा सुक्खा अपणो रङ्गणमालिआ गेण्हीअदु । । हला विशाखे । या खलु मम कण्ठतो बलना- हो रहा है तुम अपनो साडी के आचल से पोछ दो न ॥१६६।। श्रीराधिका-(भ्रू-भङ्गी सहित) विशाखे । तुम ही पोछ दो न। वचपन से तुम ने इस व्रत की दीक्षा ले रखी हैं ॥१७॥ विशाखा-राधे तुम्हारे गले मे पड़ी हुई रगणमाला बता रही है, गुस्सा मत करो। तुम ने भी इस व्रत मे दीक्षा लेने का सङ्कल्प ले रखा है ।।१७१॥ श्रीकृष्ण-(रगण माला को देखकर प्रशसा करत हुए) हे खञ्जनाक्षिा मालूम होता है इन सब रगण पुप्पो ने पहले जन्म मे किसी प्रधान तीर्थ मे पुण्य उपाजन किया है तभी तो ये आपके वक्षस्थल के सङ्गसुख को प्राप्त कर रहे हैं, परन्तु मैं उसे प्राप्त नही कर सका ।।१७२१ ४७।। श्रीराधिका-है विशाखे । तू बलपूर्वक मेरे गले से जो अमूल्य गुआमाला उत्तार कर ले गई थी, उसे अब लौटा दे और इस अपनी सूखी विशाखा-हला राहि जलद्ध उक्कण्डेसि, तकि बखुलासा १३२ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३* कृष्य नीता स्वयानर्घा गुञ्जावली, सेदानी समप्यताम् । एपा शुष्का आत्मनो रङ्गगमालिका गृह्यताम् । ] ॥१७३॥ विशाखा-गोउलाणन्द ! गुजाहारकिदे मह कुपदि अपणो पिअसही । [ गोकुलानन्द 'गुअाहारकृते मह्य कुप्यति आत्मन प्रियसखी। श्रीकृष्ण - राधे । सन्निधेहि । तव कण्ठे गुजावलीमादधामि (इत्यु पसर्पति) ॥१७॥ ललिता-(सस्मितमात्मगतम्) गुजाहारसमप्पणमिसेण राहिक- चुअञ्चल पम्फपदि कहो। [ गुञ्जाहारसमर्पणमिपेण राधाकञ्च काञ्चल स्पृशति कृष्ण । ] ॥१७६॥ (राधिका सभ्रू विक्षेप परावर्तते) - [ हला राधे | य लव्युमुत्कण्ठितासि, त किं खलु लब्धासि ? ] ॥१७॥ राधिका-(विम्बाधर सदश्य) पिटु विसाहे । चिट्ठ चिट्ठ । [ घृष्टे विशाखे । तिष्ठ तिष्ठ। ] (इति लीलारविन्देन ताडयति) ॥१८॥ विशाखा-(विहस्य) समासद्धिगि! मा कुप्प । गुञ्जाहार पुच्छमि । रगणमाला को ले ले ।।१७३।। विशाखा-गोकुलानन्द । गुञ्जाहार के लिए मेरी प्रिय सखी मुझ पर कोप पर रही है ।।१७४॥ श्रीकृष्ण-राधे ' मेरे पास आओ, तुम्हारे गले मे गुजाहार पहिनाऊ । (इतना कहकर निकट जाते हैं) ॥१७५|| ललिता-(मुसकरा कर मन मे हो) गुवाहार पहराने के यहाने राधा की अगिया का स्मरा करना चाहते हैं श्रीकृष्ण ॥१७६१ (श्रीराधा ८ विक्षेप करते हुए पीछे हट जाती हैं) विशाखा- हे राधे । जिसे तू पाने के लिए उत्पण्ठित हो रही थी, पा लिया उसे क्या ॥१७॥ घोराधिका-(अधरा पो चबाती हुई) धृष्ट विशामे ठहर जा ठहर जा। (इतना कहकर लीला-कमल मारती हैं) ॥१७॥ विता--(हसार) अपने आप का करनेवाली | युपित मत हो, * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ १३३ [स्त्रयमातिनि । मा युप्य, गुञ्जाहार पृच्छामि । ] ||१७६।। श्रीकृष्ण व तपस्तथा ममास्ते लीलाम्बुजहतिमवाप्नुया येन । मां चञ्चलेन ताडय लोचनफमलाञ्चलेनापि ॥१८०॥१८॥ ललिता-हरिणो समप्पिा तणु फिविणासि पो दरावलोअम्मि ? दिपणे चिन्तारअणे ण सवुडम्मि आगहो जुत्तो। [ हरये समयं तनु, कृपणासि कथ दरावलोक? दत्तं चितारत्ने न सपुटे आग्रहो युक्तः ॥ ] ॥१८१।।४।। राधिका-ललिदे । एव जप्पन्ती गुरुलोएस मा पसु इम जरण अवरद्ध फरेहि । [ ललिते एव जल्पन्ती गुरुलोवेषु मा सल्विम जनम- पराद्ध कुरु । ] ॥१८२॥ विशाखा-सहि । कोस सङ्कसि ' ण भअवदी जेव्व एत्थ समाहाणे दावा । [सखि ' कस्मात् शङ्कसे ? नून भगवत्येवात्र समाधाने दक्षा 1] १८३ ललिता-(सहर्पमात्मगतम्) दिठिआ पिअसही हसिदापाङ्गतरण फण्हं आलिङ्गद। [ दिष्ट्या प्रियसखी हसितापाङ्गतरङ्गेण कृष्णमा- लिङ्गति । ] ॥१४॥ गुञ्जाहार का पूछ रही हूँ ॥१७६।। श्रीकृष्ण-मेरी ऐसी तपस्या कहा जो लीला-कमल की ताडना प्राप्त करू ? हे राधे । मुझे ही लीला कमल मार दो, नहीं तो नेत्र-कमल के कटाक्ष से ही ॥१८॥१८il ललिता-सखि श्रिीकृष्ण को शरीर अर्पण कर दे। थोडा देखने में क्यो कृपण हो रही है ? चिन्तारल का दान करते सम्पुट मे आग्रह करना उचित नहीं है ॥१८॥ श्रीराधिका-ललिते । ऐसा कहकर गुरुजनो मे मुझ को तू अपराधी मत ठहराना ॥१२॥ विशाखा-राधे। तुम शङ्का क्यो करती हो ? इस विषय मे समाधान करने को भगवती पौर्णमासी बडी चतुर है ११८३॥ ललिता-(हर्ष पूर्वक अपने मन मे) वडा सौभाग्य है कि प्रियसखी राधा मुसकान युक्त कुटिल कटाक्ष करते हुए श्रीकृष्ण को आलिगन कर *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * विशाखा--(सस्कृतेन) ललिते ! पश्य पश्य, । शशी व्योमोत्सङ्ग शशिनमभितः कान्तिलहरी पुरो वृन्दारण्यं सुमुखि सहसा कान्तिलहरोम् । हरिवृन्दारप्यं हरिमपि किलेयं तव सखी सख म्णिः पूरो निजसुषमयामण्डयदयम् ॥१८॥५०॥ ललिता-वृद्धी हो। विसाहे ! पेक्ख ससिकन्तमणिप्पसूदेहि जल- परेहि सूरपूअणवेईपुरदो किदाई विलुप्पोन्ति आलेवणमण्डलाइ । ता एहि, णं पुप्फकेआरिअं णेम्ह । [ हा धिक, हा विशाखे ! पश्य शशिकान्त- मणिप्रसूत लपूरैः सूर्यपूजनवेदीपुरत. कृतानि विलुप्यन्ते आलेपनमण्डलानि । तदेहि, एन पुष्पकेदारिका नयामः 1 ] ॥१६॥ [इत्युभे निष्क्रान्ते) श्रीकृष्ण.--प्रिये ! नेदानीमपि याम्याद्विरामस्ते ? (इत्यञ्चल गृह्णाति) रही है ।।१८४॥ -विशाखा-ललिते ! देख, देख- आकाश से चन्द्र ने और चन्द्र को चन्द्रिका ने भूपित किया हुआ है। चन्द्रिका यो फिर श्रीवृन्दावन ने, हे मुमुखि । शोभित कर रखा है। श्रीवृन्दावन श्रीकृष्ण से शोभित है और श्रीकृष्ण तुम्हारी प्रियसखी श्रीराधा से शोभित हो रहे हैं । श्रीराधा को प्रेमराशि ने अपनी शोभा से सुमण्डित पर दिया है ॥१८॥२०॥ ललिता-हाय धिक्कार है, धिक्कार है, विगाये ! देख तो सही चन्द्रकान्तमणि से जल प्रवाहित होने से हमने सूर्य पूजा के लिए जो समस्त मालेपन य भूषण प्रस्तुत पिए थे, विलुप्त हुए जा रहे हैं, इसलिए आओ इन्हे सेपर पुष्पवाटिका मे चले ॥१८॥ (इतना कहकर दोनों चली जाती हैं) श्रीकृष्ण-है प्रिये ! अब तक भी तुम्हारा वाम्य समाप्त नहीं हुआ है? (इतना पहार श्रीकृष्ण धीरापा वा आचल पाते हैं) |१८|| [ १३५ * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * राधिका-मुञ्चेहि मुञ्चे हि, सहीओ मं आआरेन्ति । [ मुञ्च मुञ्च, सख्यो मामाकारयन्ति । ] ॥१८॥ श्रीकृष्ण:-हन्त, कठोरे ! मय्यत्र नाङ्गीकुरु भडगुरताम् ॥१६॥ राधिका-(सस्मितम्) देई सरस्सइ ! बन्दिज्जसि जं सच जेव पअडासि । [ देवि सरस्वति ! वन्द्यसे, यत्सत्यमेव प्रकटयसि । ] ॥१६०।। श्रीकृष्णः--(किंचिद्विहस्य) पप्रिन्यास्ते सुमुखि ! परमप्रेमसौरम्यपूरो दूरोत्सो मवधि मुदा कृष्णमृगण भेजे । आकान्तोऽय तव नवमुखाम्भोजमाध्वीकपान- प्रत्याशाभिस्तदयधि रुवन्संभ्रमी बम्भ्रमीति ॥१६१।१५।। किंच-मुक्तानामुपलभ्यमेव कुचयोः सालोक्यमालोक्य ते हत्या संगमहं समस्तसुहृदां फेयल्यमासेदिवान् । श्रीराधिका-छोड़ो, छोड़ो, मुझे सखीगण बुला रही है ।।१८।। श्रीकृष्ण-अरी कठोर मेरे साथ तुम कुटिलता मत करो ॥१६॥ श्रीराधिका-(मुसकरा कर) देवि सरस्वति ! तुझे नमस्कार है, जो तुम ने सत्य को प्रकट किया है ।।१६०। (ऊपर श्रीकृष्ण ने कहा था "अरी कठोर मेरे साथ"-कठोर शब्द को मेरे शब्द के साथ जोड़ने से अर्थ होता है, "अरो! मुझ कठोर के साथ"-इसी अर्थ को लक्ष्य कर श्रीराधा जी ने कहा- सरस्वती देवी ने “तुम कठोर हो" इस सत्य को प्रकाशित कर दिया है।) श्रीकृष्ण-(कुछ मुसकरा कर) हे सुमुखि ! तुम पश्मिनी हो, तुम्हारी दूर देश पर्यन्त फैलने वाली अतिशय सौरभ को जब से कृष्ण-भ्रमर ने पाया है, तब से तुम्हारे मुख कमल की नवीन मकरन्द को पान करने की आशा से व्याकुल होकर गुजार करते हुए इधर-उधर भ्रमण कर रहा है ॥१९॥ हे राधे! मुक्ताओं को आपके वक्षस्थल के समीपवर्ती देखकर मैं ने भी उस की प्राप्ति की इच्छा से समस्त सुहृद गणों का त्याग कर एकान्त स्थान को प्राप्त किया है । आपके वक्षस्थल (उरोजद्वय) मे तिल मान भी विषमता नहीं है । अत: हे कृशाङ्गि! तुम उसके निविड़ अमृत स्राव रूप - - m . १३६ ] * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्ग-३ * वैषम्यं तिलमप्यनाश्रितवतो: सान्द्रामृतस्पन्दिभि- र्मा पूर्ण कुरु तन्दि !'तर्गमयो: सायुज्यदानोत्सवः ॥१६॥५२॥ (राधिका लमते) श्रीकृष्णः-प्रिये ! पश्य पश्य, अपां पत्यु पुटीकरणरसपाक. कुमुदिनी- कदम्बानामङ्गज्यरहरणशीतोषविघटः मगाडोऽयं कोकीपरिपदभिचाराध्वरधुरा- पुरोधाः कालिन्दीपरिमरपरिकारमकरोत् ॥१३॥५३॥ तदेतो वासन्तिककान्तिमण्डलमण्डितमण्डलस्य चन्द्रमसश्चन्द्रिका- चचुम्बितां विचरावो निफुअचन्द्रशालिकाम् । (इति निष्क्रान्तौ) ॥१६४|| • (इति निष्क्रान्ताः सर्वे) : इति श्रीविदग्धमाघवनाटके श्रीराधासङ्गमो नाम । तृतीयोऽङ्कः ॥३॥ 1 , . -- - सायुज्य (सङ्गम) दानोत्सव द्वारा मुझे पूर्ण करो ॥१२॥ (श्रीराधिका लज्जा प्रकाश करती हैं) श्रीकृष्ण-हे प्रिये ! देखो, देखो, समुद्र के पुष्टिकरण का रम परिपाक विशेष, कुमोदिनियों के अङ्गज्वर को हरण करने वाली पीतल नोपधि के कलश सहश तथा चोरी फो सभाके अभिचार यज्ञ का पुरोहित यह जो चन्द्र है, इसने यालिन्दी सट प्रदेश को उज्वल कर दिया है ॥१३॥ ~मलिए हम वसन्त की कान्ति राशि से मण्डित एवं चन्द्र मण्डल यो चन्द्रिका राशि से सुशोभित निकुन्न ये निभृत स्थान में विचरण करेंगे ॥१९॥ (इतना पहकर दोनों चले जाते हैं) घरा प्रकार सब प्रस्थान करते हैं। इस प्रकार श्रीश्यामदासानुगद सहित घोषिदाघमाघय मारक का राधासनम नामक सोसरा पर समाप्त हमा ।।३।।
चतुर्थोऽङ्कः (ततः प्रविशति नान्दीमुखी) नान्दीमुखी-भणिम्हि ललिदाए-'हला गान्दोमुहि ! गोमण्डले गो8 पइ8 एहि कण्ही तुवरन्तो गोअड्डणाहिमुहं हथिदो । ता तुमं तत्य गअ सुअलं विष्णवेहि, जघा एसो ओसरे णिअवस्सस्स राहि सुमरावेदि' त्ति । (परिक्रम्य) कधं एथ पउमा आअच्छदि ? [ भणितास्मि ललितया- 'सखि नान्दीमुखि ! गोमण्डले गोप्ठं प्रविष्टे इदानी कृष्णस्त्वरमाणो गोवर्धनाभिमुख प्रस्थितः । तत्त्वं तत्र गत्वा सुक्लं विज्ञापय, यथेषोऽवसरे निजवयस्यस्य राधिका स्मारयति' इति । कथमत्र पद्मा आगच्छति ? ] ॥१॥ (प्रविश्य) पद्मा-हला गान्दोमुहि ! कामं कुसलासि ? ता कंपि उवा कतेहि ॥ श्रीगौराङ्गविधुर्जयति ॥ चतुर्थ-अंक [ तत्पश्चात नान्दीमुखी प्रवेश करती है । नान्दोमुखी-मुझ से ललिता ने कहा है कि है सखि नान्दोमुखि । सब गौओं के गोष्ठ में चले जाने पर अब श्रीकृष्ण शीघ्रता से गोवर्धन की ओर चले गए है । अतः तू अब वहा जाकर सुबल को बता कि वह इस समय अपने मिन श्रीकृष्ण को श्रीराधिका की याद दिलाए । (घूमकर) पद्मा यहा किस लिए आ रही है ? ॥१॥ (प्रवेश कर) पद्मा-सखि नान्दीमुखि ! कुशल पूर्वक हो न? कोई एक ऐसा उपाय १३२ ] * श्रीविदघमाधव-नाटक अङ्क-४ * जेण उविगांचन्दाअली आसासेमि। [ सखि नान्दीमुखि ! कामं कुशलासि ? तत्वमप्युपायं कथय, येनोद्विग्नां चन्द्रावलीमाश्वासयामि 1 ] ॥२॥ नान्दोमुखी-कि से उव्वेअकालणम् ? (किमस्या उद्वेग कारणम् ? ] पद्मा-हला, जाणासि जेन्वं तुम, जधा पदोसे सव्वं बखु गोउलं विभमेण कण्हो पञ्चहं रजदि। [हला, जानास्येव त्वं, यथा प्रदोपे सर्व खलु गोकुल विभ्रमेण कृष्णः प्रत्यहं रञ्जयति । ] ॥४॥ नान्दीमुखी -अघ इम् । [ अथ किम् ] 1॥५॥ पना-संपदं दाव एत्य दक्षिणे गोदृढ इमस्स गन्धो वि दुलही। [ सांप्रतं तावदत्र दक्षिणे गोप्ठाधेऽस्य गन्धोऽपि दुर्लभः । ] ॥६॥ नान्दीमुखो-हला, मा दूणेहि । [हला, मा दूयस्व । ] (संस्कृतेन) । ह विम्बितधातुचित्ररचनं शव्या ललाटं मया श्यामाकुन्तलवामरं च विलुदद्वन्यस्रजोड्डामरम् । गुजाहारलतार्धमजुरधुना मद्राभुजान्तस्तथा तथ्यं विद्धि स नागरीगुरुरमदगोवर्धनस्यातिथिः ॥७॥१॥ (नेपथ्ये) यतामो, जिससे मैं उद्विग्ना चन्द्रावली को सान्त्वना दे सक् ।।२।। मान्दीमुखी-उसके उद्वेग का या कारण है ? ॥३॥ पद्या-तू जानतो तो है कि प्रतिदिन सन्ध्या रामय श्रीकृष्ण सारे गोकुल को विलासमय हाव-भावों से अनुरक्त करता है ॥४॥ नान्दोमुखी--वह कैसे ? ॥५॥ पमा-अब तो गोकुल की दक्षिण पल्ली में उसकी गन्ध भी दुर्लभ है। नान्दोमसो-दुस मत मानो-में ने व्या के माथे पर (प. राम्यधिनी) पातु-चिन रचना देयो है, यामा चामर सहा पेशों में (श्रीकृष्ण की) गुन्दर बनमाला और भद्रा मो गले में उनकी आधी गुलामाल फे चित दोष रहे हैं। इसलिए तुम मेरी बात को ययायं जानना कि अब वे नागरी गुरु श्रीगृष्ण गोवर्धन पे अतियि हो रहे हैं ||७|| [ पेशगृह से वृन्दा बी आयाज आती है ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्ग-४ * [ १३६ पद्मा- कृत्वा वंशीमखिलजगतोगीतसंगीतभङ्गी- साङ्गीमावप्रथमवसति सङ्गि! यामपाणौ। एप प्रेम्णा प्रजति नयनानन्दनो नन्दसूनु- मंन्दं गोवर्धनशिखरिण: कन्दरामन्दिराय ॥२॥ नान्दोमुखी-पउमे ! तुम इमिणा युत्तन्तेण चन्वाअलि सुहावेहि । अहं सुअलं अणुसरिस्सम् । [ पद्मे ! त्वमनेन वृत्तान्तेन चन्द्रावली सुखय । अह सुबलमनुसरिष्यामि । ] (इति निष्क्रान्ता) -(पुनः पश्यन्ती) एसा करालाए अज्जिाए चित्त अनुबट्टन्सी वणदेअदा खुन्दा चन्दाअलि सच्छलं णिवारेदि । [ एपा करालाया आर्यायाश्चित्तमनुवर्तमाना वनदेवता वृन्दा चन्द्रावली सच्छन्नं निवारयति । ] (नेपध्ये) कि राधेव दुरन्तमिच्छसि बलादुन्मादमालम्बित मुग्धे मा नय माननीयजरतीवाक्यं बहिर्मा मज । स्मेरविलोचनावलरुचा चापल्यमुल्लासय- मायाति राजसुन्दरीगणमनोमाणिक्यहारी हरिः ॥१॥३॥ जो वंशी समस्त जगत् की संगीत तरङ्गो का सर्व प्रथम आधार है, उसे बाये हाथ पर धारण कर वह नयनानन्द-दायी श्रीनन्दनन्दन प्रेम से मन्द मन्द चाल से गोवर्धनगिरि के कन्दरा-मन्दिर मे जा रहे हैं ।।८।। नान्दोमुखी-पद्मे ! तू यह समाचार चन्द्रावली को देकर सुखी कर । मैं सुबल के पास जाती हूं। (यह कहकर चली जाती है) ॥६॥ -(सामने देखती है) यह वन देवी वृन्दा कठोर आर्या (पौर्ण- मासी) के अभिप्राय अनुसार छल पूर्वक चन्द्रावली को रोक रही है ॥१०॥ [ वेशयह से आवाज आती है ] हे मुग्धे ! क्या तुम भी राधा की तरह जबरदस्ती दुरन्त उन्माद को ग्रहण करना चाहती हो ? 'ऐसा मत करना' । पूजनीया वृद्धा के वचन सुन । देख, ब्रजसुन्दरियों के मन-माणिक्य को हरन करने वाला श्रीकृष्ण मुसकराते हुए, नेत्र कटाक्षों से चञ्चलता का विस्तार करते हुए आ रहा है, इसलिए तू बाहर मत जा ॥११॥ पद्मा- १४० *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४* पद्मा- ? (प्रविश्य) चन्द्रावली-(सौत्सुक्यं समन्तादवलोक्य) कधं वुन्दाए अली विअ याहरोअदि. कुदो एत्य कण्हो ? [ कथं वृन्दयालीकमिव व्याह्रयते । कुतोऽत्र कृष्णः ? ] (इति खेदं नाटयति) ॥१२॥ -(उपसृत्य संस्कृतेन) न संतापं स्वान्तद्दवसि कयं दाविषम घनश्वासैः किंवा मलिनयसि विम्बाधरमपि ? वनान्तान्केकाभिः सखि ! शिखरिकक्ष मुखरयन सखोस्थल्या: कल्याण्यमजदुपशल्यं यदुपतिः ॥१३॥४॥ चन्द्रावली-(विलोक्य) कध पिअसही पउमा ? (इति गाढमालिङ्ग) हला! अवि णाम अक्खलिदं भणिदास ? [कथं प्रियसखी पद्मा ! हला, अपि नामास्खलितं भणितासि? ] ॥१४॥ पद्मा-अघ इम् । [ अथ किम् । ] ॥१५॥ (ततः प्रविशति सुबलेनानुगम्यमानः कृष्णः) श्रीकृष्ण:-सखे सुबल! पश्य पश्य, (प्रवेश कर) चन्द्रावली-(उत्कण्ठा पूर्वक चारों ओर देखकर) वृन्दा क्या भूठ बोलती है ? कहां है यहां कृष्ण ? (दुखी होती है) ॥१२॥ पद्मा-(निकट जाकर) सखि ! दावानल सम विषम सन्ताप को तुम ह्दय से क्यों नही दूर करती हो? लम्बे सास ले लेकर क्यों अपने पिम्बाघरों को मलिन कर रही हो ? श्रीकृष्ण मोरों के केकारव से गोवर्धन वन-प्रदेश फो मुखरित करते करते सखीस्थल (तुम्हारे निवास स्थान) के समीप आ गए हैं ।।१३।। चन्द्रायली-(देयकर) कौन ? प्रिय सखी पा ! (गाढ़ आलिंगन फरके) षया तू सच कह रही है ? ||१४|| पपा-और यपा? ॥१५॥ (तव सुयल के साथ श्रीकृष्ण प्रवेश करते है) घोष्ण-मित्र सुवल ! देसो, देसो- !
*श्रीविदग्धमाधवन्नाटक अङ्क-४ * [ १४१ अकलिततारस्तरणे रस्तशिरोवीयिभिस्तिरोधनात् । अस्कुटतिमिरविज़म्भ. प्रययति तोपं निशारम्भ ॥१६॥५॥ सुवल:- T:-~वअस्स ! अज्ज गोदोहण वि अणवेविखम सलालसो विकिति एत्य लदोसि ? [ वयस्य ! अद्य गोदोहनमप्यनपेक्ष्य सलालस इव किमित्यन लब्धोऽसि ? ] ॥१७॥ श्रीकृष्ण:-ससे, मयूरं वर्णयता केनचित्प्रियां चन्द्रावली स्मारि- तोऽस्मि ततस्तद्विलोकनाय लालसेयम् ॥१८॥ सुवल.-फेरिसं मोरवण्णणम् ? [ कीदृशं मयूरवर्णनन् ? ] ॥१६॥ श्रीकृष्णः-उन्मदेन पुरतः शिखण्डिना ताण्डवे पृथुनि मण्डलीकृताम् । पश्य निन्दितमहेन्द्रकामुकां कृष्णचन्द्रचलचन्द्रकावलीम् ॥२०॥६ सुवल:-तदो माअड्ढरणं वंशोकलं उल्लासेहि। [ तदाकर्षण वंशी- कनमुल्लासय । ] ॥२१॥ (कृष्णः वक्त्रे वेणु विन्यस्यति) अस्ताचल के शिखिरो मे क्रमशः छिपते जाने के कारण सूर्य का हलका ताप सन्ध्या के थोड़े थोड़े अन्धेरे को विस्तार करता हुआ सन्तोप प्रदान कर रहा है ॥१६।। सुबल-कृष्ण ! आज गो-दोहन की उपेक्षा कर लालायित हो यहा कैसे आये हो ? ॥१७॥ श्रीकृष्ण-सुबल | किसी व्यक्ति ने मयूर का वर्णन कर मुझे मेरी प्रिया चन्द्रावली की याद दिलाई है, इसलिए उसे देखने की इच्छा है ।।१८।। सुबल-मयूर वर्णन कैसा? ॥१६॥ श्रीकृष्ण-उसने कहा है-'हे कृष्ण चन्द्र ! मयूर उन्मत्त होकर सामने अतिशय नृत्य कर रहे हैं, उनकी इन्द्र धनुप-शोभा को निन्दित करने वाली चञ्चल चन्द्रावली का अवलोकन कर ।।२०।। सुबल-तब तो आकर्पणकारी वशी-ध्वनि प्रकाश कर ॥२१॥ (श्रीकृष्ण मुख पर वंशी घरते है) . " १४२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * चन्द्रावली-(निशम्य सघूर्णम्) सध्यदा सुव्वन्तो वि अस्सुदारी विअ बिम्हावेदि दुम्मही मुरली।। सर्वदा धूयमाणाप्यचतचरीव विमा- पयति दुर्मुखी मुरली। ] ॥२२॥ श्रीकृष्ण:-सखे सुबल ! अद्य चन्द्राक्लीप्रसादे त्वया ममानुकूलेन भवितव्यम् ॥२३॥ सुबलः-अघ इम् । [ अथ किम् । ] । २४॥ पद्मा-हला ! पेपख, एसो वेणुसणाए तुम सुवरावैदि गोउले. दणन्दणो। [ हला ! पश्य एष वेणुसंशया त्वां त्वरयति गोकुलेन्द्रनन्दनः । चन्द्रावली-(विलोक्य संस्कृतेन) मुरलि ! विशालच्छिद्रजालेन पूर्णा लपुरतिकठिना त्वं ग्रन्थिला नोरसासि । तदपि भजसि शश्वचुम्बनानन्दसान्द्र हरिफरपरिरम्भं केन पुण्योदयेन ? ॥२६}}७!! श्रीकृष्णः-(पुरी दृष्ट्वा सानन्दम्) सखे ! सेयं मम लोचनादोधर- चन्द्रिका चन्द्रावली । (इति सादरमुपेत्य) प्रिये, ॥२७॥ चन्द्रावली-(सुनकर मोहित होते हुए) इस दुर्मुखी बंशी को में हमेशा सुनती हूं, फिर भी यह ऐसे विस्मित कर देती है जैसे कभी न सुनो हो ॥२२॥ श्रीकृष्ण-ससे सुवल ! आज चन्द्रायली को प्रसन्न करने में तुम्हें मेरी सहायता करनी होगी ॥२३॥ सुयत-क्यो नहीं ॥२४॥ पना ये देश, चन्द्रालि ! गोकुलेन्द्रनन्दन यंशी ध्वनि के सेवेत से तुम्हें मातुर फर रहा है ॥२५॥ पन्द्रायली--(देसकर) असे सति मुरलि ! छिद्रों से भरी हुई है तो छोटी सी पर अति कठोर, गठीती तथा निरस है, तो भी न जाने दिम पुष्प 2. प्रमाय गे तू.निरन्तर प्रीकृष्ण के हाथों का आलिगन और उनके अधरों पर गुम्बन-गुण प्राप्त कर रही हो ? ॥२६॥ थोष्ण-(मामने देव हर्ष पूर्वगः) मित्र ! यह है मेरे नेत्र कमसी पान्दनी पादायमो ॥२७ श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-३ * [ १४३ चन्द्रस्तव मुखविम्यं चन्द्रा नखराणि कुण्डले चन्द्रौ । नयचन्द्रस्तु ललाटं सत्यं चन्द्रावली त्वमसि ।।२८।। (चन्द्रावली लन्नते) श्रीकृष्णः-प्रिये ! दुष्टदानवदमनाभिनिवेशात्त्यन्मुखचन्द्रमप्रेक्षमा- णस्य यातयामोमबत्योऽपि न यातयामा मयन्ति ममामूर्यामिन्यः ।।२।। चन्द्रावती-सुन्दर ! भमरस्स विअ णवणवाणुसारिणी दे पहदी कधं चिरासङ्गगोरसासु पउमिणीसु अहिरमदु ? [ सुन्दर ! भ्रमरस्येव नवनवानुसारिणी ते प्रकृतिः कथ चिरासङ्गनीरसासु पधिनीष्वभिरमताम् ? } श्रीकृष्ण:-प्रिये चन्द्रायलि । प्रतिपदालोके त्यं सर्वेषां नवनवासि, तदद्य निर्वापय विरहोत्तापं परिप्वङ्गरसेन ||३१।। पद्मा-पिअसहीविरहेण फुदो तुम्ह तावुप्पत्ती ? [ प्रियसखीविरहेण कुतस्तव तापोत्पत्तिः ? ] ॥३१॥ सुबल.-अइ ! मा क्यु एवं भण। एसो चन्दालविरहेण संततो (निकट जाकर) हे प्रिये ! तुम्हारा मुख मण्डल चन्द्र है, नखश्रेणी चन्द्र हैं, दोनो कुण्डल चन्द्र है, तुम्हारा ललाट चन्द्र है, सचमुच तुम चन्द्रावली हो ॥२८॥ (चन्द्रावलो शर्माती है) श्रीकृष्ण-प्रिये ! दुष्ट दानवो को दमन करते करते समस्त रात्रिया बीत गई है, परन्तु तुम्हारे मुख चन्द्र को विना देखे मेरे दुख की रात्रियों नही बीती है, वैसी ही अनबीती (नई) हो रही है । २९।। चन्द्रावली-सुन्दर ! तुम्हारा स्वभाव भ्रमर की तरह नित्य नये नये रस को लेने का है, किस लिए तुम चिर-सङ्गिनी नीरस पग्रिनियो के साथ रमण करोगे? ॥३०॥ श्रीकृष्ण-प्रिये चन्द्रावलि । (प्रतिपदा तिथि आने पर तुम सबके लिए नित नवीन हो) मैं तो प्रति मिलन मे तुम्हे नवीन देखता हूं, आओ ! आज आलिङ्गनरस से विरह ताप को नाश करो ॥३१॥ पद्मा-प्रिय सखी के विरह मे तुम्हे कैसे ताप हुआ ? ॥३२॥ सुबल-अरी पमा ! ऐसा मत कह। कृष्ण चन्द्रावली के विरह मे
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*श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-४*
सोअलाए जलधाराए फच्छे देहं णिक्विविअ सतिहण चरो विमरणं जेव्व
चन्दाअलि सव्वदो पेच्छइ वासस्सो। [ अयि ! मा खल्वेवं भण । एप
चन्द्रावलीविरहेण संतप्तः शीलाया जलधारायाः कच्छे देहं निक्षिप्य सतृष्ण-
चकोर इव एनामेव चन्द्रावली सर्वतः पश्यति वयस्यः। ] ॥३३॥
श्रीकृष्णः-प्रिये ! श्रू यताम्,
विपिनान्तरे मिलन्ती मधुररसा शीतलस्पर्शा ।
अमृतमयो त्वद्विरहे समजनि मम तापनुत्तये राधा।।
(इति ससंभ्रमम्) धारा धारा ॥३४॥६॥
चन्द्रावली-(साभ्यसूयम्) गच्छेहि, राहिम जेव्व सेवेहि । [ गच्छ,
राधामेव सेवस्व । ] ॥३५॥
श्रीकृष्ण:-प्रिये ! धारेत्यवदम् ॥३६॥
चन्द्रावली-जादं कधं दोणं वण्णाणं विवरीदत्तणम् ? [ जातं कथं
द्वयोर्वर्णयोविपरीतत्वम् ? ] ॥३७।।
श्रीकृष्णः-प्रिये ! द्वयोवर्णयोः कर्णयो विपरीतत्वमित्यस्मिन्नास्ति
विचार: ॥३८॥
सन्तप्त होकर शीतल जल धारा के निकट स्थित हो तृष्णात्त र चकोर की
भांति सर्वतो भाव से इसे देखता रहता है ।।३३।।
श्रीकृष्ण-प्रिय ! सुनो-
तुम्हारे विरह में व्याकुल हुए मुझ को वन मे मधुर रस शालिनी
शीतल स्पर्शी अमृतमयो राधा मिलकर उस विरह को शान्त करती रहती
है। (इस प्रकार कहकर भीत होकर) 'धारा' 'धारा' (राधा नहीं) ॥३४॥
चन्द्रावली-(ईर्ष्या-रोप युक्त) जाओ ! राधा की ही जाकर सेवा
करो ॥३॥
श्रीकृष्ण-प्रिये ! मैं ने 'धारा' कहा है । ३६।।
चन्द्रावली-दोनों वर्ण उल्टे कैसे हो गए ? ॥३७||
श्रीकृष्ण-दोनों वर्ण उल्टे हुए या दोनों कानों ने उलटा समझा है,
इस में कोई खास बात नहीं है ॥३८॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * [ १४५ चन्द्रावली-(रोपारुणं मुखमानमय्य) अइ दानसौण्ड ! अलं एदाए ओहित्याए । अज्ज अपणो मणहारिणो सुवण्णजुअलस्स विण्णांसादो साहु माहुरीपूरिदकण्णम्हि किदा । [ अयि दानशौण्ड ! अलमेतयावहित्यया । अद्यात्मनो मनोहारिणः सुवर्णयुगलस्य विन्यासात्साधुमाधुरीपूरितकर्णास्मि कृता।] ॥३६॥ श्रीकृष्ण:- यथायें वाणी तव चकितसारङ्गनयने सुवर्णालंकारो मधुरयति यत्ते श्रुतियुगम् । मुखेन्दोरन्तरते बहिरपि सुवर्णच्युतिरिय मम श्रोत्रद्वन्द्व नयनयुगलं चाकुलयति ।।४०॥१०॥ पद्मा-हला ! अप्पणो अदि8 सुमरन्तो मा खिजहि । जुत्ता राहाणु- रत्तस्स इमस्त राहाणाममयो संकधा । [ हला! आत्मनोऽदृष्ट स्मरन्ती मा खिद्यस्व । युक्ता राधानुरक्तस्यास्य राधानाममयी संकथा। ] ॥४१॥ चन्द्रावली-(निश्वस्य) सहि पउमे ! एवं रणेदम् [ सखि पद्म ! एव ग्विदम् ।] ॥४२॥ श्रीकृष्ण:--प्रिये । बाढमनाशङ्कनीयमेवेदम् यत.- चन्द्रावली-(क्रोध में लाल हए मुंह को नीचे कर) ओ दानवीर ! अब इस कपट को रहने दो। आज अपने मनोहर सुवर्णमय दोनों कुण्डलों की सुन्दर मधुरिमा से मेरे कान परिपूर्ण हुए है । (अर्थात् विरुद्ध-लक्षण से 'राधा' ये दोनों सुन्दर वर्ण मेरे कानो को जला रहे हैं )॥३॥ श्रीकृष्ण-हे चकित मृगननि ! सुवर्ण के अलकार तुम्हारे दोनों कानों को माधुर्यशाली कर रहे है-यह तुम्हारी बात यथार्थ है । तुम्हारे मुखचन्द्र के अन्दर और बाहर से भी सुवर्ण टपक कर (अर्थात् 'राधा' ये दोनो सुन्दर वर्ण स्फुरित होकर) मेरे दोनों नेत्रों एवं कानों को बेचैन कर रहे हैं ॥४०॥ पद्मा-सखि ! अपने दुर्भाग्य को स्मरण कर दुख मत पा । राधा में अनुरक्त इस श्रीकृष्ण की राधा नाम मय कथा-वार्ता उपयुक्त है ।।४।। चन्द्रावली-(सांस छोड़कर) सखि पझे! ऐसा ही है ।।४।।
१४६
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ *
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तस्य षोड़शकलस्य पोडशो वल्लभा स्फुरित या नभस्तले।
राधया सुक्दने कथं तया संगतिभुवि ममाय संभवेत् ।।४३॥११॥
पद्मा-चउस्सटिकलासालिणो दे ण पखु सा वि सोलहकलवल्लहा
दुल्लहा।[चतुःपष्टिकलाशालिनस्ते न खलु सापि षोडशकलवल्लभा दुर्लभा ।
श्रीकृष्ण:-(सप्रश्रयं पद्मामवलोक्य)
चन्द्रावलीवदनपुष्करसङ्गिगण्ड.
चन्द्रावलीकतरतर्फकलङ्कितागो ।
शङ्काकुलोऽत्र कलयन्कमलालताक्षिं
शं काफुलोलहृदयः प्रविशामि नाहम् ॥४५॥१२॥
चन्द्रावली-(सव्याजप्रसादम्) देअ ! एवं षषु गोउलजणजीअणभूदस्स
वे सव्यसुहआरिदागुणं का क्खु हदयुद्धिआ ण सहदि ? ता णिप्फलेण संकोएण
मा सादद्धो होहि ।। देव,नूनं खलु गोकुलजनजीवनभूतस्य तव सर्वशुभकारिता
गुणं का खलु हतबुद्धिका न सहते?तस्मानिष्फलेन संकोचेन मा सातको भव ।।
श्रीकृष्ण-प्रिये ! ऐसी शंका विल्कुल करने योग्य नहीं है, क्योकि
सोलह-कला पूर्ण चन्द्र की राधानाम की सोलह प्रेयसियां आकाश मे ही
प्रकाशित होती हैं । पृथ्वी मण्डल पर उस राधा के साथ, हे सुवदने ! आज
मेरा मिलन से सम्भव हो सकता है ? ॥४३॥११॥
पया-तुम तो चौसट कला पूर्ण हो, तुम्हारे लिए सोलह कला पूर्ण
चन्द्र की प्रेयसी प्राप्त करना कोई दुर्लभ नहीं है ।।४४॥
श्रीकृष्ण-(विन्य पूर्वक पद्मा को देखकर) हे प्रफुलित कमलने
पये ! चन्द्रावली के मुख रूप आकारा में उदित निराधार तक रो कलादित
कपोल रूप दो पन्द्रमाओं को देखकर मेरा हृदय शवा से आतुर व दीन:
वाणी मे चश्वल हो रहा है । अतः कैसे भी कल्याण प्राप्त नहीं कर सकता।
चन्द्रावली-(पट पूर्ण प्रमग्नता सहित) है देव ! तुम समरत गोल
वासियों के जीयन स्वरूप हो । तुम्हारे सवंगुभकारिता गुण यो कौन हत
बुद्धिरत्री महन नहीं करती है ? इमलिए व्ययं संकोच में पड़कर शामत
.
कारो॥४६॥
- * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४* १४७ श्रीकृष्ण.-(स्वगतम्) गरिठामपि मन्युमुद्रा धीरेयं मुखमाधुर्येण निह नुते !(प्रकाशम्)निये ! कृतमनेन गौरवविपोद्गारेण,रोपोक्तिमाध्वीकमेव घर वरिष्ठम् ॥४७॥ चन्द्रावली-गोउलाणन्द [ तुम्ह पुरदो महं दंसेदुण पहवामि । जं पगल्भं वाहरन्ती अवरद्धम्हि ता घरं गमिस्सम् । [ गोकुलानन्द ! तव पुरतो मुख दर्शयितु न प्रभवामि । यत्प्रगल्भ व्याहरन्त्यपराधास्मि, तद्गृह गमि- प्यामि। ] ॥४८॥ श्रीकृष्ण -(सानुनयम्) प्रिये | प्रसीद प्रसीद, बद्धोऽयमञ्जलि ४६|| चन्द्रावली-सुहा उज्जुअ वाहरन्ती कोस मा अलीअं सकसि ? ता अणुजाणेहि मं भद्दआलोदसणस्स।[सुभग ! ऋजुक व्याहरन्ती कस्मान्मा- मलीक शङ्कसे ? तदनुजानीहि मा भद्रकालीदर्शनाय । ] (इति पद्मया सह निष्क न्ता)।५011 श्रीकृष्णः-सखे । महानुभावामेता मञ्चित्तमहाकाशचन्द्रावली चन्द्रा- वलीमपि बलीयस्तमः कन्दलीभिरवस्कन्दितामालोक्य निरलोकोऽस्मि ॥५१॥ श्रीकृष्ण-(मन मे) यह चन्द्रावली धीरा (नायिका) है, अतएव मुख माधुरी से भारी क्रोध-मुद्रा को भी छिपाये हुए है। (स्पष्ट कहते है) प्रिये । गौरव विप को उगलना व्यर्थ है । इससे क्रोध युक्त वचन ही अच्छे है ।। ४७॥ चन्द्रावली-गोकुलानन्द वहुत वाचालता कर अपराध किया है, इसलिए तुम्हे मुहँ नहीं दिखा सक्ती हूँ। मैं घर जा रही हू ॥४॥ श्रीकृष्ण-(विनय पूर्वक) हे प्रिये । प्रसन्न होवो, प्रसन्न होवो, देखो, हाथ जोड रहा हू ॥४६॥ चन्द्रावली-हे सुन्दर । मैंने तो सहज वात कही है, फिर तुम मेरे प्रति खाहमखाह क्यो शङ्का कर रहे हो? अतः मुझे भद्रकाली के दर्शन हित जाने की अनुमति दो । (इतना कहकर पद्या के साथ चली जाती है)।५० श्रीकृष्ण-सखे । चन्द्र रूपिणी चन्द्रावली को क्रोध रूप राहू ने आच्छादन कर लिया है। इसलिए मेरे चित्त आकाश मे वह नही दीखती है और मुझे अधकार दीख रहा है ॥५१॥ ने तुम्हारा १४८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * सुबल:-पिअवस्स ! किति एवं भणासि ? सा खु अदक्षिणा ण दिट्ठा।। प्रियवयस्य ! किमित्येवं भणसि ? सा खल्वदक्षिणा न दृष्टा 11॥५२॥ श्रीकृष्ण:- सखे, बाढं दुरूहामहीयसीनां प्रकृतिः । तदिदानीम् - न्यविशत नयनान्ते कापि सारल्यनिष्ठर वचसि च विनयेन स्तोत्रमङ्गी न्यवात्सीत् । बजनि च मयि भूयान्संभ्रमस्तेन तस्या यवृणुत हदि मन्यु सुष्ठ दाक्षिण्यमेव ॥५३॥१३॥ र देहि मनोहारिणि ! तस्मिन्केशरकुञ्ज निविश्य चन्द्रावलीसंगमो- पायमङ्गीकरोमि । (इति परिक्रम्य) सखे ! सेयं बकुलावलिमञ्जला निकुञ्ज- वीपी। पाय पश्य, ॥५४॥ स्फुरति सरो दक्षिणतः सव्ये वापी समन्ततः कुल्याः । इति केशराटवीयं प्रमदं नौराधिका कुरुते ॥५।।१४।। मुवलः--(स्वगतम् ।) लो मए ओसरो। (प्रकाशम् ।) वअस्स! सुबल-प्रिये मित्र ! ऐसा क्यों कहते हो ? मुझे तो वह अदक्षिणा (वाम भावयुक्त या प्रतिकूल) नही दीखती है ॥५२|| श्रीकृष्ण -मित्र ! महत पुरुषों का स्वभाव अति दुज्ञेय होता है, वह इस प्रकार कि- चन्द्रापली के नेत्रों में कोई सरलता-भाव आया था, उसको विनय द्वारा सब याक्य स्तोत्र भङ्गी धारण कर रहे थे, मुझ में अतिशय भय-जात त्वरा उत्पन्न होने से उसके हृदय में जो दाक्षिण्य भाव दीखता था, वह अब क्रोध रूप में अनुभव हो रहा है ।।५३॥१३॥ आओ, उस मनोहर केशर कुञ्ज में प्रवेश कर चन्द्रावली के सङ्गम के लिए उपाय करता हूं। (यह कह घूमकर) हे सखे ! देखो, देखो, उस वकुसश्रेणो से सुशोभित निकुल-वीथी को ॥५४॥ इसको दक्षिण दिशा में तो सरोवर है, वाम दिशा में वापी (वावली) और सब दिशाओं में जल प्रणाली शोभित हो रही है। इसलिए यह नीराधिया--(अतिशय जलमयी) केशराटनी आनन्द प्रदान कर रही है ।।५।। सुवल- (नीराधिका शब्द सुनकर सुवल को श्रीराधिका का - 2 *श्रीविदग्धमाधव-नाटय अङ्क-४ * [ १४६ सराहिमा छम तुह पमद कुरइ, कि ति गोराहिमा ति भणामि [ लब्धो मयावसर । वयग्य ! सराधिकंव तव प्रमद करोति, विमिति नीराधिकेति भणसि ? ] 1५६॥ श्रीकृष्ण -(मुरलमालिङ्गय ।) सखे । सत्य प्रवीपि । तदद्य राधिका पथेमा केशरनिकुञ्जलक्ष्मीमलसरोति, तथा मद्गिरा सदिश्यता ललिता ॥५७ सुबन -जमाणवेदि पियअस्सो। [यदाज्ञापयति प्रिय व्यस्य 1] (इति निष्क्रान्त) १५॥ (तत प्रविशति पद्मा मधुमङ्गलश्च ।) मधुमङ्गल -पउमे । सुद मए अज वअस्सेण चाडुआरिणा अणुणीदा यि चन्दाअली पसणा। [ पद्म । श्रुत मयाअद्य, वयस्येन चाटुकारिणा अनुनीतापि चन्द्रावली न प्रसना। ] ॥५६॥ पद्मा-अघ इ 1 [ अथ किम् । ] 11६०॥ मधुमङ्गल-सूर्ण वअस्सो वि विसण्ण वट्टइ ता जुत्ता दोण सगमे अम्हाण सहआरिदा।[नून वयस्योऽपि विपण्णो वर्तते, तद्य क्ता द्वयो सगमेऽ स्मरण हो आया- अपने मन मे कहने लगा)-मुझे मौका मिल गया है। (स्पष्ट बोला) मित्र । राधिका ही तो तुम्हें आनन्दित करती है । तुम कैसे नीराधिका को सुख प्रदान करने वाली कह रहे हो अर्थात राधिका के विना कसे आन द अनुभव कर रहे हो ? ॥५६॥ श्रीकृष्ण-(सुवल को आलिङ्गन करते हुए) हे सखे । तुम सच कहते हो। आज राधिका जैसे आकर इस केसर निकुञ्ज को शोभित करें-ऐसा मेरा सन्देशा ललिता को पहुचा दे ॥१७] सुबल-बहुत अच्छा (कहकर चला जाता है) ॥५८।। [ तव पद्मा तथा मधुमङ्गल प्रवेश करते हैं ] मधुमङ्गल-हे पद्म ! मैं ने सुना है, आज कृष्ण के अनेक अनुनय विनय करने पर भी चन्द्रावली प्रसन्न नहीं हुई ॥५६॥ पद्मा-ऐसा ही है ॥६॥ मधुमङ्गल-निश्चय ही कृष्ण दुखी हो रहा है । इन दोनो के १५० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * स्माकं सहकारिता। ] ॥६॥ पद्मा-अज्ज ! अदो जेव तुम मए अणुसरिदोसि : [आर्य ! अत एव त्वं मयानुसृतोऽसि । ] ॥२॥ मधुमङ्गलः-(पुरो दृष्ट्वा) पउमे ! पेक्स एसो पिअवअस्सो छप्पदमे- तसहाओ केसरक डगे किपि मन्तेदि। [ पद्म ! पश्यप प्रियवयस्यः पट्पदमात्रसहायः केसरकुले किमपि मन्त्रयते । ॥६३।। पद्मा-अज्ज, लदाजालेहि अन्तरिदा भविअ सुणम्ह, कि एसो भणादिति । [आर्य ! लताजालेरन्तरितो भूत्वा शृणुवः किमेप भणतीति ।] ( इति तथा स्थिती।) श्रीकृष्णः-(राधा स्मरन् सोत्कण्ठम्) प्रसरति यद्धृ चापे श्लयज्यमकरोत्स्मरो धनुः पोटपम् । मधुरिमणिमञ्जूषा भूपाय मे प्रिया सास्तु ॥६५॥१५॥ मधुमङ्गलः-पउमे ! एसो उपकण्ठाए तुझ पिअसही जेव्ब वोदि । ता एहि, तुरिमं गदुम एवं समारणेम्ह । [पद्म ! एप उत्कण्ठया तब प्रियसखी. मेव वर्णयति । तदेहि, त्वरित गत्वना समानयावः । ॥६६॥ मिलन मे हमे सहायता करनी चाहिये ॥६१॥ पद्मा-आर्य ! इसलिए ही मैं तुम्हारे पास आई थी ॥२॥ मधुमङ्गल-(सामने देखकर) पद्म । देख, प्रिय कृष्ण केशर कुञ्ज मे भंवरो से ही केवल कुछ मन्त्रणा कर रहा है ॥६३॥ पना-आर्य ! लता-जाल में छिपकर सुनो यह क्या कह रहे है ।।६४ (मधुमङ्गल वैसे ही करता है) श्रीकृष्ण-(श्रीराधा का स्मरण करते हुए उत्कण्ठा सहित) जिसकी भृकुटि कमान को देखकर कामदेव अपने पुष्प धनुप को ढीला छोड़ देता है, यह माधुर्य-शानिनी मणि-पेटिका स्वरूप (राधिका) मुझे विभूषित करें ।।६५ मधुमङ्गल-पये। यह उत्कण्ठा सहित तुमारी प्रिय ससी चन्द्रावली पे गुण गारहै है, अतः तू जल्दी जाकर चन्द्रावली को ले मा ।।१६।।
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ *
[ १५१
मधुमङ्गल -पउमे ।
पद्मा- अज्ज ! सुठ्ठ णिविद सुणम्ह, ज बहुवल्लहो एसो। [ आय
मुप्छु निष्टवित शृणुव , यद्वहुवल्लभ एप । ] ॥६७।।
श्रीकृष्ण -(पुन सोत्सुक्यम्)
सा मुपसुषमानिज्जित-राकाचन्द्रा वलीलसन्मच्या ।
(इत्योक्त) ॥६॥
अल इमादो परेण सुदेण तुण्ण गच्छम्ह ।
[ पद्मे । अलमित परेण श्रुतेन तूर्ण गच्छाव । ] ॥६॥
पद्मा-जुत्त मधेसि । [ युक्त कथयसि । ] ॥७॥
(इत्युभौ जवेन दूर परिकामत)
श्रीकृष्ण - मुहुरा घास्यति राधा मदुरसि रसिका किमात्मानम् ? ॥७१।।१६
पद्मा-अज्ज ' एव्व भणामि, मागिणीए पिअसहीए सअ समाअमेण
लाहव होदि ता परावट्टिअ काह विष्णवेहि । [ आर्य । एव भणामि,
मानिन्या प्रियसख्या स्वय समागमेन लाघव भवति, तत्परावृत्त्य कृष्ण
विज्ञापया ।। ।७२।।
पमा-आय | अच्छी प्रकार सुनकर देख, किसका गुण गारहे हैं,
क्योकि यह वहु वल्लभ है ॥६७।।
श्रीकृष्ण-(पुन उत्कण्ठा सहित) आहा ! वह अपनी मुख सुपमा से
पूर्णिमा के चन्द्र को भी पराजित करने वाली है एव उसका कटिदेश त्रिवली
से सुशोभित है । (अभी अधूरा वाक्य ही वोल पाये थे) ॥६८।।
मधुमङ्गल-पद्म । इसके बाद और कुछ सुनने का प्रयोजन नही है,
आओ, शीघ्र चलते हैं ॥६६।।
पद्मा-ठीक कहते हो ||७०।।
(इतना कहकर दोनो दूर तक शीघ्रता से चले जाते है)
श्रीकृष्ण-क्या वह रसिका राधा फिर कभी अपने को मेरे वक्षस्थल
पर सस्थापन करेगी? ॥७॥१६॥
पद्मा-आर्य । मैं तो कहती हू, माननी चन्द्रावली के अपने आप आने
पर उसका निरादर होगा। इसलिए लौटकर जा और श्रीकृष्ण को सूचित
कर॥७२॥
१५२ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * मधुमङ्गल -सोहरणं मन्तेसि । (इति कृष्णान्तिमासाद्य) पिअव- अस्स, पच्छण्गेण भविअ सव्वं दे आअण्णिदं मए उपकण्ठायअणं; ता आणवेहि, तं जेव्व तुज्झ वल्लहं तुरिदं समामि । [ शोभन मन्त्रयसि । प्रियवयस्य, प्रच्छन्ने न भूत्वा सर्व ते आणित मयोत्कण्ठावत्र नम्, तदाज्ञापय । तामेव तव वल्लभा त्वरित समानयामि । ] ॥७३। श्रीकृष्ण -(सश्लाघमालिङ्गय) सखे । मदनुग्रहेण शोप्रमानय ७४॥ (मधुमङ्गल परिक्रम्य पद्मया सह निष्क्रान्त) श्रीकृष्ण - अहो । परमोत्कण्ठानां प्रेम्णामुत्कण्ठाकारित्वम् । भ्रमरेऽपि गुजति निकुञ्जकोटरे मनुते मनस्तु मणिनूपुरध्वनिम् । अनिलेन चञ्चति तृणाञ्चलेऽपि तां पुरत पियामुपगता विशद्धते ॥७॥१७॥ (तत प्रविशति पद्मामधुमङ्गलाभ्या सगता चन्द्रावली) चन्द्रावली-हला पउमे । कि एसो बउलकुड गो दीसइ ? । [हला पद्मे । किमेप बकुलकुञ्जो दृश्यते ? 1] ॥७६॥ मधुमङ्गल-सुन्दर सलाह दी है । (यह कहकर वह श्रीकृष्ण के पास आता है) प्रिये सखे । मैंने छिपकर तुम्हारे सव उत्कण्ठायुक्त वचन सुने है। इसलिए आज्ञा दो, उस तुम्हारी प्रिय वल्लभा (राधा) को शीघ्र ले आता हूँ ॥७३॥ श्रीकृष्ण-(प्रशसा करते हुए आलिङ्गन करके) मित्र । मेरे ऊपर अनुग्रह कर उसे शीघ्र ले आओ७४॥ (मधुमङ्गल लौटकर पद्मा के पास चला जाता है) श्रीकृष्ण-अहो । परम उत्कट प्रेमियो की कैसी प्रेम उत्कण्ठा- कारिता है ? कैसा आश्चय हैं । निकुञ्ज-कुटीर मे भ्रमर गुजार करे तो लगता है प्रिया के नूपुरो की ध्वनि आरही है। वायु से तृण आदि हिलते हैं तो हृदय मे आशा होती है कि प्रिया सामने आगई है ।।७।।१७॥ [तय पद्मा और मधुमङ्गल के साथ चन्द्रावली प्रवेश करती है] चन्द्रायली-सखि पो ! यही वयुल युन्ज है क्या जो सामने दीपरही है?
*श्रीविदग्यमाधव-नाटक अङ्क-४ * [ १५३ पद्मा--अप इम् । ता तूष्णं एहि । [ अथ किम् । तत् णंमेहि। ] (इति परिक्रामति) ॥७॥ श्रीकृष्ण:-(नूपुरध्वनिमकर्ण्य) हन्त, भूरिशो नामितोऽस्मि भ्रमरी- सङ्कारः, तदतं वृथा प्रत्युद्गमसंभ्रमेण । (इत्युगं नाटयन्) । पुरः फलायामाशापां जनः कामं विडम्यते । आसन्न हि घनारम्ने द्विगुणं रौति चातकः ।।७८॥१८॥ (पुनरुत्कों भवन्) कयमभ्यर्ण भूपञ्जितं थूयते ? (इत्युग्रीविका दत्वा ससंभ्रमम्) सत्यमसौ मिलिता मे प्रेयसी । (इति तरसा चन्द्रावली- पार्श्वमागत्य)। हद्भङ्गजगमलता, मङ्गलभा राधिका मयोन्मुदिता ७६ इत्यर्थोक्त) ( चन्द्रावली सेप्यं मधुमङ्गलमालोकते) मधुमङ्गल:-सहि चन्दाअलि! मङ्गलभारेण अधिआसि ति पिल पद्मा-हाँ, यह है, जल्दी चली आओ । (चली आती है) ।।७।। श्रीकृष्ण-(नूपुरों की आवाज सुनकर) हाय ! भ्रमरों की झंकारो से बहुत बार मैं भ्रम में पड़ा हूं। अब उठकर सत्कार करने मे जल्दवाजी करने का कोई प्रयोजन नहीं है । (यह कहकर उद्वेग प्रकाश करते है)- वादल को आया देखकर जैसे चातक दुगना शब्द करने लगता है,उसी प्रकार आशा का फल उपस्थित होने पर लोग अत्यन्त आग्रह प्रकाश करने लगते हैं ॥७॥१८॥ (फिर कानों को खड़ाकर) यह क्या सामने ही भूपणों की ध्वनि सुनाई दे रही है ! (यह कहकर गर्दन उठाकर उत्साह पूर्वक) सचमुच मेरी प्रिया ही आरही है । (यह कहकर शीघ्रता से चन्द्रावली के पास आकर) अरे हृद-मधुकर ! गति शालिनी मङ्गलभा (मङ्गलाभा) राधिका लता मुझ पर प्रसन्न होगई है ।। ७६।। (यह आघा वाक्य कहने पर) [चन्द्रावली ईर्ष्या सहित मधुमङ्गल की तरफ देखती है] मधुमङ्गल-सखि चन्द्रावलि ! मङ्गलभाराधिका (तुम मङ्गलभार १५४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * वअस्मो तुम जेव वण्णेदि। [ सखि चन्द्रावलि ! मङ्गलभारेणाधिकासीति प्रियवयस्यस्त्वामेव वर्णयति । ] Hol श्रीकृष्ण:-(सवैलक्ष्यमात्मगतम्) हन्त, कथमनेन चन्द्रावलिरेवा- भिंसारिता । भवतु, बटुनोक्तमेव निर्वाहयामि । (प्रकाशम्) । सुहृदनुरागवितन्द्रा चन्द्रावलिरलसालम्भि ॥१॥दी। ( चन्द्रायली सलज्ज कृष्णकण्ठे वैजयन्ती विन्यस्यति) श्रीकृष्णः-(सानन्दम्) एफ प्रयाति परिचर्य चकोरराजी चन्द्र प्रिये निजमनोरथपूरपूर्तिम् । चन्द्रावली किमु ममाक्षिचकोरयोस्त्वं प्रीति द्वयोरपि न धास्यसि सेव्यमाना ॥शा२०॥ मधुमङ्गल.-(सगर्वम्) भो वअस्स ! दिट्टा तुए मज्न यिल- पखणा विअक्खणदा? जो पखु अणन्तगुणसालिणा वि तुए मोआइदुण पारिदो सो पिअसहीए माणगण्ठी णभगुणधारिणा मए मोआविदो । [ भो वयस्य ! दृष्टा त्वया मम विलक्षणा विचक्षणता? यः खल्वनन्तगुण- से श्रेष्ठा होरही हो) श्रीकृष्ण तुम्हारी ऐसी स्तुति कर रहे हैं ।।८।। श्रीकृष्ण-(विस्मित होकर मन ही मन मे) ओहो ! मधुमङ्गल क्या चन्द्रावली को यहा ले आया है ? ठीक है जो हुआ । मधुमङ्गल की ही बात क निभाता हू । (स्पष्ट कहते हैं)बन्धुजन-अनुरागिनी चन्द्रावली को अनायास ही आज प्राप्त किया है ।।१।।१६।। (चन्द्रावलीलजा पूर्वक श्रीकृष्ण के गले मे वैजयन्ती माला डालतीहैं) थीकृष्ण-(आनन्द पूर्वक)हे प्रिये ! चकोर एक ही चन्द्र की आराधना कर अपनी अपनी अभिलापा पूर्ण किया करते हैं, किन्तु मेरे यह दोनो नेत्र रूपी चकोर चन्द्रावली (अनेक चन्द्रमयी तुम) को सेवन कर भी प्रेम को प्राप्त नहीं कर पा रहे है । गा२०॥ मधुमङ्गल-(गर्वपूर्वक) अहो मित्र ! देखो तुमने मेरी विलक्षण परता? अनन्त गुणशाली होकर भी तुम प्रिये सखी-चन्द्रावली की मान - *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * [ १५५ शालि नापि त्वया मोचयितुन पारितः, स प्रियसख्या मानग्रन्थिनंवगुणधा- रिणा मया मोचित..] ॥३॥ श्रीकृष्ण:-वयस्य ! त्वमुद्दण्उकुसुमकोदण्डविलासपाङ्गप्पे महासा- घियिहिकोऽसि ॥४॥ पद्मा-अज्ज ! पुरो पफुल्लाई मल्लोपुप्फाइ पप्फुरन्ति, ता एहि इमाई गेहम्ह । [ आर्य ! पुर. प्रफुल्लानि मल्लीपुष्पाणि प्रस्फुरन्ति, तदेहि इमानि गृह्णीव । ] ॥५॥ (इत्युभौ निष्क्रान्ती) श्रीकृष्ण:-(स्वगतम्) फुञ्जऽरिमन्नागतमात्रां राधां तकंयामि, तदन्यतः प्रस्थास्ये। (प्रकाशम्) प्रिये ! पुरस्तानातिदूरे नागररगोविता नागकेसराटवो, तदयानुसराव ॥८६॥ (इति निष्क्रान्ती) (ततः प्रविशति ललितया सह संकथयन्ती राधा) गाठ को नही खोल पाये और यज्ञोब्रवीत धारी (ब्रह्मचारी) मैंने उसे खोल डाला है ॥३॥ धोकृष्ण-मित्र | तुम उद्दण्ड कन्दर्प-विलास के छः गुणो मे सन्धि और विग्रह मे निपुण हो ॥२४॥ पना-आर्य ! तुम्हारे आगे मल्लिका पुष्प प्रफुल्लित हो शोभा दे रहे है, आओ, इनको वीने ।।५।। (यह कहकर दोनों चले जाते है) श्रीकृष्ण-(मनमे) मुझे ऐसा लगता है, इस कुञ्ज मे श्रीराधा आने वाली हैं, इसलिए अन्यत्र चलना चाहिये ।(स्पष्ट बोले)प्रिये । सामने नजदीक ही नागर-विलासोचित नाग केसर-वन है । आओ वहा चलते हैं । ८६॥ (यह कहकर दोनो चले जाते हैं। (तत्पश्चात् ललिता के साथ बाते करती श्रीराधा प्रवेश करती है) । १ कन्दपविलास के छ गुण हैं-सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैध एवं आश्रय ।
-. . १५६ ] * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-४ * राधा-हला ! पेक्ख पेक्ख, अन्यारेहिं घोलिदं सव्वं दिसामुहम् । [ हला ! पश्य पश्य, अन्धकार?रित सर्व दिइमुखम् ! ] ॥७॥ ललिता-पिअसहि ! तिमिराहिसारोचिदेहिं सालमप्पसाहणेहि मण्डिदो तुए कि क्खु अप्पा ? [ प्रियसखि ! तिमिराभिसारोचितः श्यामल- प्रसाधनमण्तिस्त्वया कि खल्वात्मा? 1 ] ||८|| राधिका-अघ इम् । [ अथ किम् । ] ॥९॥ ललिता-(विलोक्य सस्मितम् सस्कृतेन) धम्मिल्लोपरि नीलरत्नरचितो हारस्त्वया रोपितो वित्यस्तः फुचकुम्भयोः कुवलयभंणीकृतो गर्भगः । अङ्ग कल्पितमञ्जनं यिनिहिता कस्तूरिका नेत्रयोः फंसारेरभिसारसंभ्रमभरान्मन्ये जगद्विस्मृतम् ॥०॥२१॥ राधिका-हला ! मुश्चेहि परिहास, तुरिदं उद्देसेहि केसरकुडः गमग्गम् : [हला ! मुञ्च परिहासम्, त्वरितमुद्दिश केशरकुञ्जमार्गम् । ] Ic ललिता-इदो हदो, पिअसही ! [ इत इतः प्रियसखि ! ] (इति श्रीराधिका-ललिते ! देख तो, सव तरफ घोर अन्धकार छा गया है ॥७॥ ललिता-प्रिय सखि ! अन्धकार में अभिसार करने के उपयुक्त श्याम वर्ण के वसन-भूपणों से तो तुम्हारे अङ्ग भूपित है न ? ॥८॥ धीराधिका-हां ऐसे ही है ।।८।। ललिता--(देखकर मुस्कराती हुई) राधे ! नीलमणि विरचित हार जो वक्षस्थल मे धारण करने योग्य है, तुमने जूड़े में बाघ रक्सा है और पुप्प-गुच्छ को वक्षस्थल पर धारण कर रही हो, नेत्रो का अंजन जगह जगह शरीर पर और नेत्रों में कस्तूरी लगा रखी है। मैं समझती हूँ श्रीकृष्ण-अभिसार को हडबडो मे तुम जगत्-व्यवहार को भूल रही हो ॥६० घोराधिका-सखि ! छोड़ो परिहास को, जल्दी केशर कुन्ज की राह बताओ IIEI ललिता-प्रिय सखि ! यह इधर रही इघर (यह कहकर घूमती हुई कि तव *श्रीविदग्धमाधय-नाटक अङ्क-४ * [ १५७ परिझामन्ती सशसम सस्मृतेन)। तिमिरमसिमि संगीतालय कदम्बवन्तरे सखि मधुरिपु पुण्यात्मान सरन्यभिसारिका । तु परितो विद्य द्वर्णास्तनुध तिसूचयो हरि हरि घलध्यान्ता-येता स्ववैरिणि भिन्दते ॥६२।२२।। राधिका-अल इमिणा ज्वालम्भेण, पेवख पञ्चासप्णो वउलकुड ङ्गो। [ अलमनेनोपालम्भेन, पश्य प्रत्यासन्नो बकुलकुञ्ज । ] (इति सभ्रमा- दुपसृत्य सपरामपंम् सस्कृतन)। विदूरान प्राण मदयति मुरारे परिमलो न फुझोऽयं तस्य स्फुरति नखरद्योतनिकरै । तत शङ्क फस्मिन्नपि रहसि वल्लोवलयिते परोहासाकाडक्षी प्रियसखि निलीनस्तव सखा ॥३॥ २३॥ ललिता-हला! एहि वामदो कदम्बकुड ग विइणुम्ह । [ हला एहि वामत कदम्बकुञ्ज विचिनुम । ] ॥६४ राधिका-(तथा कुर्वती) अइ छइल्ल | दिट्ठोसि विट्ठोसि। बीस भय सहित) राधे | अन्धेरे की नोलमा मे छिपकर जो अभिसारि का रमणिया कदम्ब कानन मे श्रीकृष्ण के पास जाती हैं, वे बडी पुण्यात्मा हैं । तुम तो अपनी वैरिणी आप होरही हो। हरि । हरि ।। देखो तो तुम्हारी विद्युत वर्णा स्तनद्यति रूपी शलाका समस्त गाढ अन्धकार को छेदे दे रही है ।।२।। धोराधिका--अव इन तिरस्कार युक्त वचनो का कोई प्रयोजन नही है देखो,बकुल कुञ्ज निकट मागई है । (यह कहकर उत्कण्ठित होकर जाते हुए वितर्क सहित)- ललिते । मुझे तो यहा श्रीकृष्ण को अङ्ग-सौरभ नही आरही है वह तो दूर से उन्मत्त कर देती है , और न ही इस कुञ्ज को मैं उनकी नख- चन्द्र धुति से प्रकाशित ही देख रही हू । मैं समझती हू, तुम्हारा प्रिय सखा परिहास करने के लिए किसी घने लता-जाल मे छिपकर बैठ गया है ।।३ ललिता - राधे । आओ, बाई ओर की कदम्ब कुञ्ज मे उसे देखती है। श्रीराधिका-(उसी ओर जाकर एव अनुराग-वश सब बन को 1
रचय
!
१५८ ]
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ *
अङ्गहि अङ्गाई संगोयेसि ? [ अयि विदग्ध ! दृष्टोऽसि, दृष्टोऽसि, कस्माद-
गरगानि संगोपयसि ] (इति समन्तान्मृगयति ) ॥६५॥
ललिता-सहि ! मुञ्च मगणागहं । एहि, केलिकुडङ्गकपणं कुणम्ह ।
[ सखि ! मुञ्च मार्गणाग्रहम् । एहि केलिकुञ्जकल्पनं कुर्मः। ] ॥६६॥
राधिका-(सस्कृतेन)
वकुलपुष्पस्तोरणं केलिकुञ्ज
घरमरविन्देस्तल्पमिन्दीवराक्षि ।
उपनय शयनान्तं साधु माध्वीकपात्री
सहचरि हरिरध इलाघतां कौशलं ते॥७॥२४॥
ललिता--(तया कृत्वा। हला ! प्रफ्य, कण्हो विलम्बेदि । ता फुञ्ज
पविसिअ ण पडियालेन्ह । [ हला ! पश्य, कृष्णो विलम्वते । तस्कुश
प्रविश्यन प्रतिपालयावः। ||||
राधिका-(परिक्रम्योडे गं नाटयन्ती, संस्कृतेन)
रुद्धः फापि सखोहितार्थपरया शङ्क हरिः पद्मया
प्रातः फजगृहं यदेव ने तमीयामेऽप्यतिगामति ।
कृष्णमय देसकर) अरे नागर ! देस लिये, मैं ने तुम्हें देख लिया; अब
किस लिए अङ्गो से अङ्ग छिपा रहे हो ? (ऐसा कहकर राव यन को
सोजती हैं ) ॥६॥
सलिता-ससि ! छोड़ो उसे हूँण्डना, आओ हम क्रीड़ा-कुश की रचना
श्रीराधिका-हे नील कमलनयने ! तुम बकुल-पुष्पों द्वारा ग्रीड़ा
युश पा यहिार रचना करो और फमलो को थेक शय्या के पास सब
सुन्दर मधुपात्र लाकर रखो। हे सहपरि ! मह सब देखकर श्रीयन
तुम्हारे शिल्प-यौशल की प्रशसा करेंगे ।।६।२४॥
ललितायेगे हो करये) राधे ! देखो, श्रीकृष्ण देर कर रहे हैं ।
बाओ गुहा में चंटकर उनकी प्रतीक्षा करें ॥६८ll
घोराधिका-(पूमकर उद्वेग प्रकाश परती हुई) मुझे, तो ऐसा
लगता है मानो मी नन्दायली वा हित सापन में जुटी हुई पता ने
करें ॥६॥
श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-४ *
१५६
हन्त संतपंय-
पौलोमीरतिबन्धुदिडमुखमसो हा
नम्मीलस्यभिसारलुब्धरमणीगोत्रस्य शत्र: शशी ।।६।२५॥
(इत्युभे निष्क्रान्ते)
(ततः प्रविशति कृष्णः)
श्रीकृष्णः-(समन्तादवलोक्य)
आसङ्गः कुमुदाकरेषु
शिथिलो भूगावलीनाम-
द्वीक्षन्ते निजकोटराङ्कितममी क्षोणोरह कौशिकाः ।
संकोचोन्मुखतां प्रयाति शनरोत्तानपादेद्य तिः
भानुर्ननु पूर्वपर्वततटीमारोदुमत्कण्ठते ? ॥१०॥२६॥
(इति परिक्रम्य) न जाने नवीनविप्रलम्भेन समतनिर्भरसंरम्भा किं नाम
प्रतिपत्स्यतेऽद्य राधा । (विमृश्य) भवतु, केशरेण नागकेसरं प्रतिपादयिष्ये,
तदमूनि नागकेराराणि विचिनोमि । (इति तथा कृत्वा पुरोऽनुसर्पन्) ॥१०१।।
श्रीकृष्ण को कही रोक रखा है। तभी तो (वैशाख-पौर्णमासी के बाद की)
चतुर्थी-तिथि निकली जा रही है अर्थात् अन्धाकार-मय रात की पहली घड़ी
बीती जा रही है । और वह अभी तक कुञ्ज में नहीं आए है । हाय ! देखो
तो अभिसार करने वाली रमणियो का परम शत्रु चन्द्रमा पौलोमीरति
वन्धु अर्थात् इन्द्र की दिशा अर्थात् पूर्व दिशा के मुख को उज्ज्वल करते
हुए उदित होने लगा है ॥६६॥२५॥
(यह कहकर दोनों चली जाती हैं और तत्पश्चात् श्रीकृष्ण प्रवेश करते हैं)
श्रीकृष्ण-(चारो ओर देखकर) भ्रमर समूह की कुमुद के प्रति
आसक्ति शिथिन हो गई दोखती है, पेचक अपने अपने घौसलो के वृक्षों
को देखने लगे है और ध्र व-नक्षत्र की ज्योति भी धीरे धीरे प्रकाश हीन
होती जा रही है, तो क्या सूर्य ही उदयाचल पर उदित होना चाहता है ?
(धूमकर देखते हुए) हाय ! न जाने नवीन विच्छेद मे अतिशय
क्रोधत होकर राधा आज क्या करेगी ? (वितर्क कर) अच्छा, हुआ जो हुआ,
आज केसर के साथ नागकेसर पुष्प उसे प्रदान करूंगा, इसलिए इन नाग-
केसर के पुष्पो को चुनता हूं। (यह कहकर पुष्पो को चुनते हुए आगे बढ़ते
है और सोचते है-) ॥१०१॥
१६० ]
* श्रीविदाघमाधव-नाटक अङ्क-४ *
कपटी स लताकुटोमिमां सखि नागाधुनापि माधवः ।
इति जल्पपरीतया तया क्लमदीर्घा गमिता कथं तमी? ॥१०२।२७
(परिक्रम्य वकुलञ्जकु पश्यन् सविपादम्)
ताम्बूलं घनसारसंस्कृतमदः क्षिप्त पुरो राधया
हारो हन्त हरिन्मणिस्तबकितो हारोऽयमुत्सारितः ।
पौषो चेयमुदारसौ रभमयो चूठा नक्षः खण्डिता
तस्या शंसति विप्रलम्भननितं कुजोऽयमन्तः फ्लमम् ॥१.३।२८
(इत्यग्रतो गत्वा) इयमेव राधायाः सूर्याराधनवेदिका, तदस्याः पाय-
मासादयामि । (इति परिक्रामति) ॥१०४।।
(ततः प्रविशति सखीम्यामनुगम्यमाना राधा)
राधा-(पुरो विलोक्य) हला सलिदे ! पेयख, बेइमाणे दिट्ठो सो
तुज्क्ष छइल्लो। [हला ललिते ! पश्य वेदिकानेदिष्ठः स तव विदग्धः] ॥१०५
ललिता--सहि ! कञ्चणपडिमेट्य कठोरा होहि । [ ससि ! काश्चन-
प्रतिमेव कठोरा भव । ] १०६।।
'सखि ! माधव अत्यन्त कपटी है, वह अभी तक भी इस घुक्ष में
नही आये है-"यह कहार राधा दुसमयी दीर्घतम इस रात को पैसे
काटेगी? ।।१०।।२७॥
(फिर धूमकर यकुल कुश को देखते हुए दुस पूर्वक कहते हैं-)
देयो, राधा ने यह कपूर मिश्रित ताम्बूल पृथ्वी पर फेंक दिया है,
हाय । यह मनोहर नोल यान्ति मणि गुच्छहार भी पड़ा है। ओ ! यह
देगी, मनोहर सौरभमय पुषों से बना हुआ यूटा नसों से चिन-भिन्न हुभा
टूटा पड़ा है। यह यकुल पुज राधा को सब विरह-जनित अन्तवेदना को
ही प्रमाणित कर रहा है। ॥१०३।२६।।
(कुछ आगे चलकर ) यह तो राधा को सूर्य पूजा वेदी है । अप
दमो निाट हो चतकर बैठ जाता हूं (यह कहकर वहां जाते है) ॥१४॥
न तर मलिता और विगाया माय धीराधा प्रयेा बरती है ]
श्रीराधा-(सामने देशकर) सनिते ! देग, दिशा के पाम घंटा है
यह गानागर ॥१०॥
सरिता-रागि! स्यगं प्रतिमा की भाति पटोर हो जा ॥१०॥
धूततरण, नं * श्रीविदग्यमाघव-नाटक अङ्ग-४ * [ १६१ श्रीकृष्ण --पुरस्तादेपा सहपरिवारा प्रिया । तदिदमुट्टयामि । (इत्युपसृत्य) ललिते । साधु, साधु दृष्ट तव गरिष्ठमत्र दुमन्त्रतन्त्रचर्यायामा- चार्यत्वम् यदद्य भवत्या फेसरनिकुञ्जवेद्यामहमुज्जागरवतदीक्षापरि- ग्राहितोऽस्मि । १७ । ललिता-(ससरम्म सस् स्मृतेन) अहो वैपरीत्यम् । अहो वैप- रोत्यम् । केसरनिकुञ्जकुहरे कुहक बसन्ती सखी स्वया रहिते । श्रितनवपल्लवशयना त्रुटिमपि कल्पाधिका मेने ॥१०॥२६॥ श्रीकृष्ण -(कपटेनाटोप नाटयन्) अहो दम्भभरारम्भेपु गाम्भीर्य मस्याः । (इति नागकेसराण्युद्धाट्य दर्शयन्) । अरति मम निशि पश्यन्नक्लाम्यन्नागकेशरोऽप्यसकत । विगलन्मधुभि कुसुमैरेभिनेत्री रिवोदलं ॥१७॥३०॥ ललिता-अम्महे । बउलवाइणा केसरेण दाणि गाअकेसरो विश्खावीअदि। [ अहो । धूर्तत्वम्, यद्वकुलवाविना केशरेग्गेदानी नागकेशरो विख्याप्यते । ] ॥११०॥ श्रीकृष्ण-आहा ! सामने सखियो के सहित यह तो राधा आ रही हैं । तव तो इन्हे में ऐसा कहू (निकट आते हैं, ललिते । बहुत अच्छा, बहुत सुन्दर ।। देख लिया तुम्हारा दुष्ट मन्त्रणामय तन्नाचरण मे भारी आचार्यत्व । मैं ने आज तुम से केसर कुञ्ज की वेदिकापर जाग्रण-व्रत की दीक्षा ली है। ललिता-(क्रोध पूर्वक) ओहो । लसी उल्टी वात कैसी उल्टी चाल अरे जालसाज | राधा तो तुम्हारे विना केसर कुञ्ज मे नवीन पल्लव-शय्या पर सोते सोते एक एक क्षण को कल्प समान मानती रही है ।।१०८।२६।। श्रीकृष्ण-(कपट सहित अहकार करते हुए) ओहो । दम्भमरे कार्य मे कैसी गम्भीरता । (नाग केसर के पुष्पो को दिखलाते हुए) हाय कितने दुख की बात | रात मे जागने से मेरे अतिशय दुख को देखकर नागकेसर भी निरन्तर मधु-चुचाते अपने पुष्प रूप नेत्रो से आसू बहाते बहाते विगलित हो गया है ।।१०६॥३०॥ ललिता-ओह । कसी आश्चर्यमय धूर्तता। वकुल-केसर पुप्प को नागकेसर पुष्प बताकर व्यास्या कर रहे हो ॥११॥ ।
१६२ ] * श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-४ * - श्रीकृष्ण:-(सव्याजनिवेदम्) ललिते ! विश्राम्यतु तवेयं शब्दार्थ- स्यान्यथावल्पनेन वचनचञ्चुता, अथवा फस्ते दोषः ? दृष्टदोषाभिरपि गौराडीभिः सौहार्दमभिलप्यता मर्यवापराद्धम् ।।१११॥ विशाखा- को पषु गोरङ्गीणं दिवो तुए दोसो ? [ क. खलु गौरा- ङ्गीणा दृष्टस्त्वया दोप? ] ॥११२।। श्रीकृष्ण:-पश्य पश्य। नवरसधारिणि मधुरे धरणीसंतापहारिविस्फुरणे । विदधति न कृष्णमृदिरे गौर्य. क्षणरोचिषः स्थैर्यम् ॥११३॥३१॥ विशाखा--तस्सि पुलिसकूडकठोरचेट्ठिदे ताणं कोमलाणं जुत्ता ज्जेन तथा पउत्ती। [तस्मिन्कुलिशङ्कटकठोरचेष्टिते तासा कोमलाना युक्तं व तथा प्रवृत्तिः । ] ॥११४॥ श्रीकृष्ण-(छल पूर्वक अपने को कोसते हुए) ललिते ! शद्वार्थ मे अन्यथा कल्पना द्वारा अपनी वाय-पटुता को अब रहने दो। तुम्हारा क्या दोप है ? गौरागियो के दोप देखते हुए भी मैं ने उनसे मित्रता पी है, यह सब दोप मेरा ही है ॥१११॥ यिशासा-क्या देखे है आपने गौरानियो के दोप ? ॥११२॥ श्रीकृष्ण-देस, देस- पृथ्वी के सताप को हरने वाले नवीन जलधारी वृष्ण वर्ण मेघ के उरित होने पर गौरागी क्षण प्रभा विद्य त् कभी भी स्थिरता धारण नहीं परती॥ (पक्षान्तर मे-पृथ्वी सन्ताप हारीगंगारादि नवरा पारी मेघवर्ष गृष्ण के आने पर (तुम जैसी) गोराही रमणिया क्षणमात्र ये लिए भी गियरता धारण नहीं कर साती हैं। पट मानयुक्त होकर चिराग प्रपात परने लगती हैं ) ॥११३ १३१॥ पिशासा-पय से भी अगिर पटोर चेष्टागाली उसण ये प्रति गुटमारियों या ऐसा पाय उससुराही है।।१४।। ।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * [ १६३ ललिता-विसाहे ! सुणाहि कपि गाहम् । [ विशाख ! शृणु कामपि गाथाम् । ] (इति भृङ्गदर्शयन्ती)। चम्पअलद सिणिद्ध णअञ्चणकतिकुसुमगौरङ्गीम् । मुषिका धावइ भमरो चयला विअ सामला होन्ति ।। [चम्पकलता स्निग्धा नवकाञ्चनकान्तिकुसुमगौराङ्गीम् । मुक्त्वा धावत भ्रमरश्चपला इव श्यामला भवन्ति ॥] ॥११५॥३२ श्रीकृष्ण.-(स्मित्वा) सत्यं वाग्मिनामसि राजी ।।११६।। ललिता-(अपवार्य) हला सुट्ठ णीसङ्कण वअणाडोवेण अणवरद्ध जेव्य रणं तपकेमि। [मुष्टु नि शङ्केन वचनाटोपेनानपराद्धमेवन तर्कयामि।] श्रीकृष्ण. याम्याद्भवेन्न विरतिर्नवयौवनानां वामभ्रवामिति जनश्रु तिरव्यलोका । चाटूनि कतुं मुचितानि विमुच्य खिन्न मां प्रत्युताद्य यदमूरपरं जयन्ति ॥११॥३३॥ ललिता-(अपवार्य) हला ! सच्चं उज्जाअरखिन्नो कण्हो, ता प्रसीद ललिता-विशाखे । सुन एक बात सुन । (यह कहकर भ्रमर को दिखाती हुई- स्निग्ध स्वभावा नवीन कञ्चन की कान्ति धारण करने वाली कुसुम- गौरागी चम्पकलता को परित्याग कर यह भ्रमर भाग रहा है । चपल व्यक्ति सब ही काले होते है ॥११॥३२॥ श्रीकृष्ण- (मुस्कराते हुए) सचमुच तू वाचालो की रानी है ॥११६।। ललिता-(हाथ की ओट करके) सखि ! सुन्दर गर्वयुक्त वचनो से इसे निरपराधी ही समझ लेती हू ॥११७।। श्रीकृष्ण-"कुटिल भ्रकुटि वाली नवयौवन युक्त रमणिया कभी भी कुटिलता त्याग नही कर सकती"-यह जनश्रुति कभी झूठी नहीं है, क्योकि उचित मीठे वचनो को त्यागकर मुझे दुखित-चित्त करने के लिए यह उद्यत हो रही हैं ॥११८।।३३।। ललिता-(हाथ की ओट करके) सचमुच उजागर कृष्ण का चित्त -
१६४ ]
* श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-४ *
पसोद। [हला ! सत्यमुज्जागरखिन्नः कृष्णः, सत्प्रसीद प्रसीद 1 ] ||११||
श्रीराधिका-(कृष्णमपाङ्गनावलोक्य) मुद्धारणं वश्वणकलाविश्रद्धोसि ।
[ मुग्धाना वञ्चनकलाविदग्धोऽसि । ] ॥१२॥
श्रीकृष्ण:-(सानन्दम्) फुल्लकेशरकलापेनामुना घम्मिल्लधीस्तवाल-
क्रियताम, वाध्यता मा विन्दतु मम प्रयासः । (इति पुटिकामुद्धाट्य) प्रिये !
पश्यामूनि सुगन्धीनामग्रेसराणि नाग फेशराणि, यैरहं सद्यः सुवासि.
तोऽस्मि ॥१२॥
श्रीराधिका-(सनमस्मितम्) पूरणं चन्दाअलीपरिमलेण वासिदोसि
तुमम् । [ नूनं चन्द्रावलीपरिमलेन वासितोऽसि त्वम् ] ॥१२२।।
श्रीकृष्णा:-प्रिये ! पारिहासिकान्यपि ते वांसि न कदाचिदपि
ध्यभिचरन्ति, पदध मदङ्गतश्चन्द्रावलोसौरम्यमुञ्चति ॥१२३॥
श्रीराधिका-(सेप्यं परावृत्य) ललिदे ! कि मुद्दिदफण्णासि ?
[ ललिते ! कि मुद्रितकर्णसि ? ॥१२४॥
दुसी हो रहा है । इसलिए तुम प्रसन्न हो ओ, प्रसन्न हो ओ ॥११॥
श्रीराधिका-(नेत्रकोर से श्रीकृष्ण को देखते हुए) ओहो ! माप
तो मुग्धा-रमणियों की वञ्चना करने मे बड़े निपुण हैं ।।१२०।।
धोरण-(हर्ष पूर्वक) प्रफुल्लित केशर कुसुम द्वारा अपने जूड़े की
दशोमा को अलवृत कीजिए न, जिससे मेरा परियम असफल न हो। (यह
पहकर पुहिया सोलते हुए) प्रिये ! समस्त सुगन्धियों में श्रेष्ठ इस पेशर
पुगुम यो तो देखिये, इसी के द्वारा ही आज मैं सौरभशाली हो रहा हूं ॥१२१
घोराधिका-(परिहास युक्त मुस्कराते हुए) निश्चय ही तुम चन्द्रावली
सी सौरभ से सुवासित हो रहे हो ॥१२२॥
धोरण-प्रिये ! तुम्हारे परिहास युक्त वापप भी कमी भूठे नही
होते हैं. सभी तो आज मेरे अगों से तुम्हे पन्द्रायली को सौरभ भा रही
है ॥२६॥
घोराधिरा-(या सहित मुहोर पर) मलिते ! सेरे पान बन्द
हो रहे हैं पा? ॥१२४॥
[ १६५ * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * श्रीकृष्णः-(स्मित्वा) प्रिये ! कथमभरसाम्यादक्षमासि, यदहं करावली यरर्णयामि ? ॥१२॥ श्रीराधिका-(सस्मिनम्) रामप्पेहि पुष्फाई1 [ समर्पय पुष्पाणि । ] (इति पटाञ्चलं प्रसारयति) ॥१२॥ श्रीकृष्ण:-(राधामुखं प्रेक्ष्य स्वगतम्) हन्त, विभ्रममण्डितस्य चिल्लीकोदण्डस्य ताण्डवकला ! ॥१२७॥ विशाखा-(जनान्तिकम्) ललिदे ! पेख पेपख, संमोहण राहीए कडयखवारपेण लक्खोकिदो पुष्फपुडिआए सद्ध अञ्चले दिण्ण वि वेणु ण जाणादि फण्हो। [ ललिते ! पश्य पश्य, संमोहनेन राधायाः कटाक्षवाणेन लक्षीकृतः पुष्पपुटिकया सार्धमञ्चले दत्तमपि वेणु न जानाति कृष्णः । ] १२८ ललिता-सस्कृतेन) निद्रागमेऽपि सखि नन्दसुतस्य यां शक्नुवन्ति न पराः पशुपालबालः । धन्या कटाक्षकलया किल मोहयन्ती तां राधिकाद्य पुरतो मुरली जहार ।।१२६ ॥३४॥ श्रीकृष्ण-(मुस्कराकर) हे प्रिये ! समान अक्षरों के प्रयोग से क्यो असहनशीला हो रही हो? मैं तो क' रावली का वर्णन कर रहा हू ( न कि चन्द्रावली का। ।।१२५॥ श्रीराधिका-(मुस्कराकर) दीजिये पुष्पों को (यह कहकर अपना वस्त्रांचल फैलाती हैं) ।।१२।। श्रीकृष्ण - श्राराधा के मुख को देखकर अपने मन मे) हाय ! विभ्रम-भूपित भ्रकुटि-कमान को कैसी अद्भुत नृत्य कला ॥१२७॥ विशाखा-(हाथ की ओट कर) ललिते | देख देख, श्रीराधा के सम्मोहनकारी कटाक्ष वाणों से घायल हो श्रीकृष्ण पुप्प-पुड़िया के साथ अपनी मुरली भी आचल मे डाले दे रहे है, परन्तु उन्हे इस बात की पता नहीं है ॥१२॥ ललिता-सखि | अन्यान्य गोपवालिकाएं श्रीकृष्ण की निद्रावस्था में भी जिस मुरली को हरण करने में समर्थ नहीं हो पाती, धन्य है आज यह श्रीराधा, जिसने कटाक्ष वाणो से इन्हें विमोहित कर इनके सामने ही उस मुरली को हर लिया है ॥१२॥३४]] -' * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * श्रीराधिका-(अपवार्य संस्कृतेन) या निर्माप्ति निकेतकर्मबनारम्भे करसम्भ रात्रौ हन्त करोति फर्षणविधि या पत्युरडावपि । गौरीणां कुरुते गुरोरपि पुरो या नीविविध्वंसनं धूर्ता गोकुलमङ्गलस्य मुरली सेयं ममामुद्रशा ॥१३०॥३५॥ (नेपथ्ये) अरे कुरङ्गा ! दिट्टो तुम्हेहिं पिअवस्सो ? [ अरे कुरङ्गाः ! दृष्टो युष्माभिः प्रियवयस्यः ? ] ॥१३॥ श्रीकृष्णः कथं मिलत्येष मधुमङ्गलः ? ॥१३२॥ (प्रविश्य माल्यहस्तः) मधुमङ्गल,-सुदं मए सुवलमुहादो जं अज्ज णिउसमज्ञ राहिआ उजाअरिदा आसो, ता गदुअ रणं पोच्छाहइस्सम् । [ श्रुत सुबलमुखाद्य- दद्य निकुञ्जमध्ये राधिका जागरितासोत, तद्गत्वेनां प्रोत्सायिष्यामि] (इत्यु- पसृत्य सस्कृतेन) ११३३॥ अविरलवनमालालंकृतस्निग्धमूर्तिः स्फुरितकाटककान्तिर्घातुभिर्मण्डिताङ्ग । श्रीराधिका-(हाथ की ओट मे) सखि ! गृह-कार्य आरम्भ करते मे जो हाथों को चलने नहीं देती, जो रात्रि में पति-क्रोड़ में सोती हुई रमणियों को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती है तथा गुरुजनों के सामने ही जो सुन्दरियो की नीवि-वन्धन विमोचन कर देती है, गोकुलानन्द को वह धूर्ता मुरली आज मेरे वशीभूत हुई है ।।१३०॥३५॥ [ वेश-भूपा गृह से आवाज आती है ] 'अरे' मृगगणो | तुम ने मेरे प्रिय सखा को देखा है क्या ? ॥१३१॥ श्रीकृष्ण-मधुमङ्गल आ रहा है क्या ? ॥१३२।। [ माला हाथ में लिए मधुमङ्गल प्रवेश करता है ] मधुमङ्गल.-मैंने सुबल के मुख से सुना है, आज निकुञ्ज में श्रीराधा जागती रही है, वहा चलकर उसे उत्साहित करता हूं। (यह कहकर निकट आकर कहता है) ॥१३३।। ससि राधे ! जो निरन्तर वनमाला से अलकृत होकर स्निग्ध मूर्ति
श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ *
[ १६७
अखिलभुवनतुङ्गो नेप्रभङ्गवा विकृष्टः
कथमिव सखि राधे कृष्णशैलस्त्वयाभव ॥१३४.३६।।
(राधिका स्मयते)
श्रीकृष्णः-प्रिये ! वेत्ति मे तमस्तमीसंभवं घयस्योऽयम् ॥१३५।।
श्रीराधिका-अज्ज ! दंसिदं अज्ज सिणेहदपिखरणं, जं कन्तारसिन्धु-
संतारकोसलाई सिषधाविदम्हि । [ आर्य ! दर्शितमद्य स्नेहदाक्षिण्यं, यत्का-
तारसिन्धुसंतारकोशसनि शिक्षितास्मि । ] ॥१३६।।
मधुमङ्गलः-सहि ! साहु अम्हे उवालाहिजम्ह, जेहिं चलन्ती पि
घल्ली तुमं तक्किम वरणे यसन्तेहि सादडू जारिदम् । तुम्हे पखु सला-
हिज्झइ, जाहि पिअवअस्ससणाहं पि फुञ्ज अणिबन्धेण सुण्णं भणि घरे
पयिसन्तीहि णिरादङ्क सुत्तम् । [ सखि ! साधु वयमुपालभ्यामहै, यश्च-
लन्तीमपि वल्ली त्वा तर्कयित्वा वने वसद्भिः सात जागरितम् । यूयं खलु
श्लाघ्यध्वे, याभि. प्रियवयस्यसनाथमपि कुञ्जमनिवन्धेन शून्य मत्वा गृहे
प्रविशतीमिनिरातङ्क सुप्तम् । ] । १३७।।
धारण करते हैं, जिनसे कुण्डलो की कान्ति स्फुरित होती है, जो गैरिक
धातुओ से विभूपित रहते हैं, निखिल जगत् मे सर्वोपरि विराजमान उन
श्रीकृष्ण शैल को तुमने अपने कटाक्षो कैसे से आकर्षित कर लिया है ? ॥१३४
[ श्रीराधा हसती है ]
श्रीकृष्ण-हे प्रिये ! यही सखा जानता है, मुझे रात्रि को कितना
दुख हुआ है ॥१३५॥
श्रीराधिका-आर्य ! आज स्नेह की कुशलता प्रदर्शित हुई है,
क्योंकि वन-भ्रमणादि दुर्गम पथ जनित रूप दुख-समुद्र को पार करने की
कुशलता की, मैंने शिक्षा प्राप्त की है ।।१३६।।
मधुमङ्गल-सखि | तुम ने अच्छी हमारी वञ्चना की है। हम तो
वन मे रह कर वायु से हिलतो हुई लता को देख देख तुम्हारे आने का
अनुमान कर आतङ्क पूर्वक जागते रहे है और तुम्हारी यह खूबी है कि
प्रिय सखा कृष्ण के कुल मे रहते हुए भी कुञ्ज को शून्य मान कर तुम घर
मे जाकर बे-फिकर सोती रही हो ॥१३७॥
१६८ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * थीराधिका:-अज्ज ! कि एवं भणासिं? [मायं ! किमेवं भणप्ति ?] (इति संस्कृतेन) निकुञ्ज कंसारेवंत नखरचन्द्रावलिरुधि- छटाप्रस्तं नाग्ने मुहुरपि यदा प्रेक्षितमभूत् । तदा सद्यः प्रोद्यद्विधुतकविक्रान्तिहतया मया लब्धारण्ये क्लमनिवहपूर्णा परिणतिः ॥१३८॥३७॥ मधुमङ्गल:-(स्वगतं) अहो, कधं कुडङ्गसंगदा चन्द्राअली वि राहिआए दिट्ठत्यि ? ता वञ्चणं मुक्किा रणं उपफरिसइस्सम् । [ अहो, कर्ण कुञ्जसंगता चन्द्रावल्यपि राधिकया दृष्टास्ति ? तदन्चनं मुक्त्वा- एनामुत्कर्षयिष्यामि । १३६।। ] (प्रकाशम् संस्कृतेन)। पलान्तेन ते यदनचन्द्रमनाफलप्य फल्याणि गोकुलपुरंदरनन्दनेन । चन्द्रावली. ..(इत्यर्घोक्ते) ॥१४॥ (कृष्णो भ्रू संज्ञया निवारयति) (सर्वाः परस्परं सालतमवलोकयन्ति) ॥१४१ । मधुमङ्गल.-(स्वगतम्) हन्त हन्त, किदं मए बम्हणयोचिदं श्रीराधिका-आर्य ! ऐसा क्यों कहते हो? क्तिने दुख की बात है ? मैं जब बारम्बार ढूंढ चुकी और श्रीकृष्ण को नसचन्द्रावली की कान्ति से इस निकुञ्ज को प्रकाशित नही देखा, तभी हो इस नव-उदित अभागे चन्द्र की रदिमयों द्वारा घायल होकर इम वन में कोश फी चरम अवस्था को प्राप्त हुई हूं ॥१३८॥३७॥ मपुमङ्गल-(अपने मन में) अहो ! यही कृष्ण के साथ फुअ में मिलते हुए चन्द्रावली को श्रीरापा ने भी देख लिया है, इसलिए अब वपना त्यागकर उस की प्रदांमा करता हूं।।१३।। (स्पष्ट यहता है) हे यल्याणि ! गोपुगेन्द्र नन्दन तुम्हारे मुखपदको न देगकर पन्द्रायली "(इतना पहने पर श्रीकृष्ण आरा के इशारे में उरो रोरते हैं । मब अगतो यात जानने की इच्छा से एक दूगरे को देखने खगोह) ॥१४०॥१४॥ मपुमास-(मन में) हाय ! मैं ने तो ग्राह्मण वाफ थी सरह पपनता - * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४५ [ १६६ चावलम् । [ हन्त हन्त, कृत मया ब्राह्मणवटूकोचित चापलम् । ] ॥१४२ । श्रीकृष्ण – (विभाव्य) विसावरीभवं मे वरीय ६ष्ट बाप्परद्ध. कण्ठोऽय सवृत्त , तदहमेव वाक्य समापयामि । (इति ।स्मत्वा) ॥१४३॥ चन्द्रावलीननयनान्ततया किलास्य साहश्यत फयमपि क्षपिता क्षपेयम् ।।१४४॥३८॥ मधुमङ्गल -पिअवसस्स । सयप्णोसि, कि ति मह हिअद्विद पज्झद्ध ण जाणिस्ससि। [ प्रियवयस्य । सर्वज्ञोऽसि, किमिति मम हृदयस्थित पद्यार्ध न ज्ञास्यसि ? ] ॥१४॥ ललिता-राहे अज्ज धि सदिद्धासि ? पेघख पेघख रत्तिविलासपिसु- णाइ गाअरस्स चङ्गाइ अङ्गाई। [ राधे । अद्यापि सदिग्धासि ? पश्य, पश्य, रात्रिविलासपिशुनानि नागररस्य चङ्गान्यङ्गानि । ] ॥१४६।। (इति सेय॑म् सस्कृतेन) वाले गोकुलयौवतस्तनतटीदत्ता नेत्रादित फाम श्यामशिलाविलामिहृदयाच्चेत परावर्तय । कर डाली ॥१४२॥ श्रीकृष्ण-(सघ की इच्छा जानकर) रातभर के मेरे महान दुख को याद कर मधुमङ्गल का गला मासुमओ से रुक गया है । मैं ही उसके वाक्य को पूरा किए देता हू । (यह कहकर मुस्कराते हुए बोले)-॥१४३।। "चन्द्रावलीन नयन अर्थात् तुम्हारे मुख के समान चन्द्र में ही नेत्री को लगाए हुए मैं ने बड़े कष्ट से ज्यो त्यो रात काटी है ।१४४॥३८॥ मधुमङ्गल-प्रिय मित्र | तुम सर्वज्ञ हो, फिर मेरे हृदय के आधे थाक्य को क्यो न जान लोगे ॥१४॥ ललिता-राधे | अभी भी तुम्हे कुछ शव है ? देख, देख, नागर फे मनोहर अङ्गो पर सब रति विलास के चिह्न स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।।१४६ (फिर ईर्ष्या सहित कहती है-- हे बाले ! यह गोपयुवतियो के वक्षस्थल पर आधे नेत्रो से देखने वाला है और इसका हृदय श्याम शिला की भाति अत्यन्त कठिन है, इसलिए तू इससे अपना मन हटा ले। हम क्या जाननी नहीं हैं कि यह धूर्त क्रीड़ा १७० ] * श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-४ * विद्यः किं न हि यद्विकृष्य कुलजा: केलीभिरेष स्त्रियो धूतं. संकुलयन्कलकततिभिनि:शङ्कमन्मुञ्चति ॥१४७॥३६।। श्रीराधिका हद्धी हद्धी, सुठु विडम्बिदम्हि । [ हा धिक हा धिक, सुष्ठ विडम्बिताम्मि । ]॥१४८॥ श्रीकृष्ण:-प्रिये, मुघंध मां दूषयसि ।।१४६।। श्रीराधिका-(सोपालम्भम् संस्कृतेन) मुक्तानिमिषं मदीयपदवीमालोकमानस्य ते जाने केसररेणुभिनिपतितः शोणीकृते लोचने । शोत: काननवायुभिविरचितो बिम्बाधरे च प्रण: संकोचं त्यज देव दैवहतया न त्वं मया दूष्यसे ॥१५०॥४०॥ श्रीकृष्णः-प्रिये ! तवाधीनस्य मे संकोचोऽप्यलंकारायव ॥१५१।। थीराधिका-साहीणो सव्वलोअविषखादोसि । फधं ममाहीणो हविस्तसि? [ स्वाधीनः सर्वलोकविख्यातोऽसि । कथं ममाघीतो भविष्यसि ?] ||१५२।। के बहाने पहले सो कुल-कामनियों को अपनी ओर आकर्षित करता है और उन्हे कलङ्कित कर देता है, फिर प्याकुल करते हुए निशान होकर उनका परित्याग कर देता है ।।१४७॥३॥ धौराधिका-हाय धिक्कार ! हाय धिक्कार !! मैं अच्छी तरह ठगी गई ॥१४८॥ थोकृष्ण-हे प्रिये ! वृथा दोष मत दो ॥१४॥ श्रीराधिका-(तिरस्कार सहित) हे देव ! अनिमिप नेनों से मेरी बाट देखते ही देखते तुम्हारे नेत्रो मे पुष्प पराग पड़ गई है, जिससे ये लाल हो रहे हैं और वन में भ्रमण करते करते शोवल वायु लग सगकर आप के अपरो पर अण हो गए हैं । आप सब सोच छोड़ दीजिये, मैं मन्दभागिनी आप को कोई दोप मही दे रही हूं ॥१५०||४011 धोकृष्ण-हे प्रिये ! मैं तुम्हारे अधीन हूं इसलिए संकोच भी मेरा भूषण है ॥१५॥ घोराधिका-आप तो सर लोगो में स्वाधीन प्रसिद्ध हो, मेरे अधीन पयों होवोगे? ॥१५२।।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * [ १७१ कोडेन स्फुरता श्रीकृष्ण -राधे । तवाधीनो नाहमेव केवलोऽस्मि, किंतु ते मम दशावताराश्च । तथा हि- चश्चन्मीनविलोचनासि, कमठोत्कृष्टस्तनी सगता, तयायमधर, प्रह्लादसवर्धनः । मध्योऽसौ यलिबन्धनो, मुखरुचा रामास्त्वया निजिता, लेभे श्रीधनताद्य, मानिनि मनस्यङ्गीकृता कल्किता ॥१५॥४१॥ श्रीराधिका-हला ललिवे । आअप्णिद तुए ? [ हला ललिते, आकर्णित त्वया?] ॥१५॥ ललिता-फण्ह | तुह ओदारा तुअम्मि ज्जेध्व वसन्ति, ज एदारण चिन्हाई दीसन्ति । [ कृष्ण, तवावतारास्त्वय्येव वसन्ति, यदेतेपा चिह्नानि दृश्यन्ते। ] (सस्कृतेन) वन्यान्तगुरुचापल, कठिनता, गोसगति , पाणिजे क्रौर्य, दम्भरुचि , सुचण्डिमधुरा, लड्डू विध्वसनम् । श्रीकृष्ण-हे राधे | मैं ही केवल तुम्हारे अधीन नही है। मेरे शो अवतार ही तुम्हारे अधीन हैं, देखिये हे मानिनि । आप के चचल नेव मीन के सहश हैं-(मीन) । कच्छप पीठ से भी अधिक कठोर है आप का वक्षस्थल-कच्छप) आप दीप्तिशालि क्रोड (अर्थात् मध्य देश) से सुशोभित हैं--(क्रोड-वराह)। आप के अधर प्रह्लाद सवर्धन अर्थात् प्रकृष्टरूप से अह्लाद को बढ़ाने वाले हैं-(नृसिंह)। आप का कटिदेश बलि बन्धन कारी अर्याद त्रिवली रेखा से आवेष्ठित है- (वामन)। आप को मुख शोभा रामा अर्थात् रमणी गण को पराजित करने वाली है-(राम एव परशुराम) । आप श्रीधन अर्थात् शोभा को पनता या निविडता को प्रात हो रही हो-(श्रीफल बुद्ध) और इस समय आप मन में (कल्किता) अर्थात् प्रणय-कलह को धारण कर रही हैं--(कल्कि)॥१५३॥४१॥ धोराधिका-सखि ललिते सुन लिया तुम ने ॥१५॥ सलिता - हे कृष्ण तुम्हारे सब अवतार तुम मे ही रहते हैं और उन सब के लक्षण तुम मे ही दीखते हैं- देखो-वन में तुम्हारी चपलता (मीन), कठोरता (कच्छप), गो-सगति अर्थात् पृथ्वी सगति (वराह), नस-क्रूरता अर्थात् रमणियो के वक्षस्थल १७२ ] *श्रीविदग्धमाघवं-नाटक ब-४ * अश्रान्तोन्मदलोल्यमिष्टफवनं, निस्त्रिशलीलोप्रति- मीनेन्द्राययतारतः स्फुटममो भ्रान्ति भागास्त्वयि ॥१५॥४२॥ श्रीकृष्ण:- (सस्मितम्) सखे ! पश्य पश्य । ललिताजेंनि दुर्लसिता बभूव राधा दुराराधी । तप्ते मयि न छायां शशाफ फतुं विशारोयम् ।।१५६।।४३।। (इति वटोः करान्मल्लीदाम गृहीत्वा । सवादुप्रणामम्) संगियमुर्गुणा ते चितवीयोवं राधे शुचिरतिसुकुमारी फाममामोदनो छ । नखपदशशिरेखा धाम्नि पुष्णातुं फान्ति तयं फुचशिवमूनि स्वधू नीविभ्रमेण ॥१५७॥४४॥ (इति भ्र संज्ञया विशाखामनुकूलय माल्यमर्पयति) पर नखाघात (नृसिंह), कपटता में रुचि (वामन), प्रचण्ड-मधुरिमा (परशुराम); (रमणियों के) केशों का आकर्षण (राम); अविरत उत्कट उन्मादता (बलराम), (तम) सुहृद्धों को दुख देना अथवा यज्ञों का ध्वसं करना (बुद्ध) एवं तलवार जैसी तीक्ष्ण लीलोत्कपंता अर्थात् खड्ग धारत्व (कल्कि) ये सब दस अवतारों के अंश स्पष्ट रूप से तुम में विद्यमान हैं ॥१५५ श्रीकृष्ण-(मुस्कराकर) मित्र ! देखो, देखो- इस समय ललिता दुर्ललिता अर्थात् लालित्य रहित हो रही है और राधा दुराराधा अर्थात् क्रोधित, मुझ सन्तप्त को शाखा रहित विशाखा भी छाया प्रदान करने में समर्थ नहीं है ॥१५॥४३॥ (यह कहकर मधुमङ्गल के हाथ से मल्लिका-पुष्पमाला लेकर चापलूसी सहित प्रणाम करते हुए है)- हे राधे ! अतिशय गुण शालिनी यह माला तुम्हारी चित्त-वृत्ति की भाति निर्मल, सुकोमल एवं यथेष्ट रूप से आमोद प्रदायिनी है । इसलिए भाप के वक्षस्थल रूपी शंभु-सिर पर गङ्गा-धारा की तरह सुन्दर नल चिह्न रूप चन्द्र रेखा की लावण्यता के बीचो बीच तुम्हारी कान्ति को वृद्धि फरे (यह मेरी प्रार्थना है) ॥१५॥४४॥ [ यह वाहकर भ्रू के इशारे से विशाखा को अनुक्कल कर माला दे देते हैं।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * [ १७३ , विशाखा- (माल्यं निवेदयन्ती सस्कृतेन) यस्मिन्ने त्रसरोरुहाङ्गणभुव प्राप्ते विदूरं मना- कप्तधस्ते निमिषोऽपि याति तुलना तन्वङ्गि मन्वन्तरे । वृन्दारण्यकदम्बमण्डपतटक्रीडाभराखण्डले तस्मिन्काकुपरायणे तव फथ काम्यानि वाम्यान्यपि ।।१५८६४५।। श्रीराधिका-(साम्यसूयम्) अवेहि णिन्बुद्धिए ! भवेहि । [ अपेहि निवुद्धिके । अपेहि। J ॥१५॥ श्रीकृष्ण -धूलिध सरितचन्द्रकाश्लश्चन्द्रकान्तमुखि बल्लभो जन । अर्पयन्मुहरय नमस्क्रियां भिक्षते तव फटाक्षमाधुरीम् ।।१६०।४६।। ललिता-राहे प्रति कन्धर परावहि, पृट्ठदो माआरेदि भज्जिमा। [ राधे । झटिति कन्धरा परावतंय । पृष्ठत आकारयत्यार्या ] ॥१६॥ (राधिका तया करोति) (प्रविश्य) विशाखा-(माला भेंट करते हुए)-हे कृशाङ्गि ! तुम्हारे नेत्र. कमल रूप प्राङ्गण से जिनके जरा दूर जाने पर तुम निमेप काल को भी मन्वन्तर के ममान समझती हो, और जो वृन्दावन के कदम्ब मण्डपी में विहार करने मे इन्द्र के समान हैं, आज वही श्रीकृष्ण तुम्हारी विनम्र बचनो से स्तुति कर रहे हैं । अत हे सखि । उनके प्रति तुम्हारी स्वेच्या पूर्वक यह प्रतिकूलता कैसी ? (यह उचित नही है) ॥१५८॥४॥ थोराधिका-(असूपा सहित) दूर हो, अरी निवुदि दूर हो ।।१५६।। धोकृष्ण-हे चन्द्रकान्त-मुखि । तुम्हारा यह प्रिय जन सिर में धारण किए हुए मोर-चन्द्रवाचल को धूलि धूसरित करते हुए (पृथ्वी पर रखकर) प्रणाम करता है और तुम्हारी पटाक्षा-माधुरी को मिक्षा चाहता है ॥१६॥४६॥ पलिता-राधे। पीछे को सीन मुह जाओ, आर्या मुसरा पुला रही है ॥१६॥ [पोरापा पीछे को मुह जाती है ] (मुसरा प्रवेश करती है) १७४ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अझं-४ * मुखरा-(कृष्णं विलोक्य संस्कृतेन) वनासक्तं चेतः प्रणयति गृहाचो विरमय- स्वरेण्यं बन्धना प्रणयमपि विस्मारयति य. । महाणू तधेणीगुणगरिमविस्तारणपटो करोत्सङ्ग तस्यं त्वमपि सरले पुनि पतिता ।।१६२ ४७॥ मधुमङ्गलः-(जनान्तिकम्) भो यअस्स, मारुदामालीकिव ही तुज्म वंशोव्य एत्य बुड्डिा पत्ता, ता एत्य किं विलम्बेसि ? [ भो वयस्य मारुतवांचालीकृतमुखी तव वशीवात्र वृद्धा प्राप्ता । तदस किं विलम्बसे ? ] श्रीकृष्णः-सखे ! 5 मे पंशी? ॥१६४|| मधुमङ्गल:-~स जेव्य जाणासि कहि ति। [ स्वयमेव जानासि कुत्रेति । ] ॥१६॥ श्रीकृष्णः-स्फुटं राधिकरीव हृतेयम् । तदेनां विना कथं प्रस्थान मुचितम् ? ॥१६॥ मधुमङ्गल:-(सपरिहासम्) भो, इदं क्षु अम्हाणं गरज भाग- मुखरा-(श्रीकृष्ण को देखकर) जो घर से चित्त को हटाकर वन मे आसक्त करा देता है और बान्धवों के महान अनुराग को भुलवा देता है एव जो धूर्ती की महिमा विस्तार करने मे गुरु है, हे सरल स्वभावा पुनि ! तुम भी उसी कृष्ण के हाथों पड़ गई हो ॥१६२।।४७।। मधुमङ्गल-(कान मे धीरे से) हे मित्र! वायु की भाति तुम्हारी वशी की तरह वाचाल मुखी वृद्धा मुखरा आ गई है, अव यहा क्यो देर कर रहा है ? ||१६३॥ श्रीकृष्ण-सखा ! मेरी बंशी कहां है ? ||१६|| मधुमङ्गल-तुम्हें पता, कहां की है ॥१६५।। श्रीकृष्ण-निश्चय राधा ने ही हर ली है। वंशी के विना यहां से कैसे चलें? ॥१६६ मधुमङ्गल-(परिहास करते हुए) मित्र ! यह हमारा परम भाग्य *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * [ १७५ घेज इमाहि मोहिणोहि तुमं चोरिअ ण संगोविदोसि । ता चिट्ठदु वरागी मुरलिआ । अताणं घेतं ण पलाअम्ह । [ भोः ! इदं खल्वस्माक गुरुकं भागधेय, यदेताभिर्मोहिनीभिस्त्वं चोरयित्वा न संगोपितोऽमि । तत्तिष्ठतु वराकी मुरलिका, आत्मानं गृहीत्वा पलायामहे। ] ।।१६७।। श्रीकृष्ण:- (सस्मितम्) रे वाचाट ! तिष्ठतिष्ठं ॥ (इति परिक्रम्य) सुन्दरि बिन्दुच्युतके तव नैपुण्यं बभूय पुण्पेन । शशिमुखि वशीकृताभूशी मम यत्वया स्वरया ॥१६८ १४८।। श्रीराधिका-(सभ्रू भङ्गम्) मुञ्चेहि णं भङ्गिए कलङ्कारोवणम् । का जाणावि तुम्ह पंशिअम् ? [मुञ्चन भङ्गया कलशारोपणम्, का जानाति त्वद शिकाम् ? ] ॥१६॥ ललिता-(संस्कृतेन) न काचिद्गोपीनां भवति पर वित्तप्रणयिनी सतीनामस्माकं न वद परिवादं मनु मुथा ॥१७॥ (इस्योक्त) है कि इन मोहिनी रमणियों ने तुम्हे ही चुराकर कही नही छिपा दिया है । अब रहने दे अभागी वशी को । हम स्वय ही यहा से भाग चलते हैं ॥१६७।। श्रीकृष्ण-(मुसकराकर) अरे वाचाल । ठहर जा ! (यह बहकर पीछे घूमकर) हे मुन्दरि ! पुण्य के प्रभाव से बिन्दुच्युतक मे तुम्हारी विलक्षण निपुणता या अभ्यास है । हे चन्द्रमुखि ! जिमरो तुम ने अति मीघ्र मेरी बंशी चुरा ली है ॥१६॥ श्रीराधिका-(भकुटि टेढी करते हुए) बहाना बनाकर पलक लगाना छोड दो। रिस को पता है तुम्हारी वमी का ॥१६॥ सलिता-पृष्ण ! गोपियों में कोई भी पराया धन हरने यामी नहीं है, हम सत्ती नारियों को भूठा अपवाद मत दो ॥१७०॥ (इम अर्थोक्ति पर) १ बिन्दुमुतर-अलद्वार विशेष है।
१७६ ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ *
श्रीकृष्ण:-सखि ललिते ! प्रसीद प्रसीद । दर्शय सख्यो दाक्षिण्यम् ॥१७१
ललिता अलं जल्पैरेभिवज निजनिकेतं तमितो
वयं कि संवृत्तास्तव कितव वेणोः प्रतिभुवः ? ॥१७२।।४।।
श्रीराधिका-(वृद्धामासाद्य) अज्जे ! मिटुं तुए अप्पणो णत्तिणो
चरितम, जं एसो अम्हारणं चोरिआपरिवाद देदि। [आर्ये ! दृष्टं त्वयात्मनो
नप्तुश्चरित्रम्, यदेपोऽस्मभ्यं चोरिकापरिवादं ददाति । | ॥१७३।।
मुखरा-(ससंरम्भम्। रे कण्हडा ! सच्चमए विण्णादम, ज णतिर्भ
राहि मह तुमं विडम्बेदु लद्धो सि । [ रे कृष्ण ! सत्यं मया विज्ञातम्,
यन्नप्त्री राधिका ममत्वं विडम्बितुलब्धोऽसि । ] ॥१४॥
मधुमङ्गल:-अइ गिट्ठरसंसिणि ! णि+सिए ! वंसि हरिस तुझ
त्तिणी तुम दुग्गं लद्धा । [ अयि निष्ठुरशसिनि ! निर्वशिके ! वंशिका हृत्वा
तव नप्त्री त्वा दुर्ग लब्धा। ] ॥१७५।।
श्रीकृष्ण:-आर्ये मुखरे, सत्यमाह वयस्यः ॥१७६।।
-
श्रीकृष्ण-सखि ललिते ! प्रसन्न होवो, प्रसन्न होवो, बन्धुजनों के
प्रति सरलता प्रदर्शन करो॥१७॥
ललिता--इस प्रकार की अधिक बात करने का कोई प्रयोजन नहीं
है, तुम शीघ्र अपने घर को चले जाओ। हे धर्म ! हम तुम्हारी वशी की
जामन ठहरी थी क्या ? ||१७२।।४६।।
श्रीराधिया-(मुखरा के पास जाकर) आर्ये ! देखा है तुम ने अपने
नाती का चरित्र, हम को चोरी की वदेनामी देता है ॥१७३||
मुखरा-(क्रोध पूर्वक) क्यों रे कृष्ण ! मैं ने ठीक जान लिया है,
मेरी नातिनी राधा को तू कलडित करने आया है.? 11१७४||
मधुमङ्गल--अरो निष्ठुर भापिणि, निर्वशिके ! तुम्हारी नातिनी
ने वंशी हरण कर तुम्हे किले के समान प्राप्त कर लिया है-निडर हो
गई है ॥१७॥
योकृष्ण-आर्य मुखरे ! मधुमङ्गल सच कह रहा है ॥१७६॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४* [ १७७ स्तत सम्मिणी तुझ मुखरा-अइ राहिए । अवि कि सच्च एदम् ? [ अयि राधे । अपि किं सत्यमिदम् ? ] ॥१७७|| श्रीराधिका-अज्जिए | बुन्दावरणे इ.धणारण फि महग्यदा जावा, ज हस्थमेत्तावसकट्टिा अम्हेहि हरिदवा? [ थायें । वृन्दावन इन्धनाना कि भहर्षता जाता, यद्धम्तमाना वशवाष्ठिकास्माभिर्हर्तव्या। ] ॥१७॥ श्रीकृष्ण -(स्मित्वा) हे पोते प्रचण्डदेवि । यदि घेणु न जहा- पथ तद्वातया स्मितकुमलोल्लासादुरफुल्लफपोलान्दोलायितहग- न्तासि ॥१६॥ मुखरा-(साक्रोशम्) चवल । अहिमए जो वन्दणिज्जा तहवि परिहसज्जा ? [ चपल । अभिमन्यो समिणी तव वन्दनीया तदपि परिहस्यते ? } ॥१८॥ मधुमङ्गल - मुहरे । एसो ह जाणीववीअस्स सवामि। दिटु भए पुषीविलग्गसेहरेण अज्ज राहिआ वन्दिदा पिअयमस्सेण । [ मुखरे । एपोह यज्ञोपवीतस्य सपामि दृष्ट मया पृथ्वीविलग्नशेखरेणाद्य राधिका यन्दिता प्रियवयस्येन । ] ॥११॥ मुखरा-ओ राधे | यह क्या सच ही है ? ॥१७॥ श्रीराधिका-आर्ये । वृन्दावन म ईन्धन क्या वडा महगा हो गया है, जो एक हाथभर की वास की लकडी हम चुरा लेंगी ? ॥१७८।। श्रीकृष्ण-(मुस्कराकर) हे गौराङ्गि प्रचण्ड देवि । यदि तुम ने वशी हरण नहीं की है, तो वशी की बात करते ही किस लिए तुम मुस्करा रही हो? तुम्हारे कपोल उत्फुल्ल एव नेन कोर क्या चञ्चल हो रह है ' ५१७६।। मुखरा-(चिल्लाकर) अरे चपल | अभिमन्यु-पत्नी (यशोदा के मामा की पुत्र वधू) तुम्हारे बदन करने योग्य है, फिर क्यों परिहास पर रहा है ? ॥१८॥ मधुमङ्गल-मुसरे देस, में इस यज्ञोपवीत की शपथ खावर कहता हू, मैं ने अपनी आखो से देखा है-वृष्ण ने पृथ्वी पर मस्तव टेक्वर राधा यो प्रणाम किया है ।।१८॥ 7 १७८ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-४ * मुखरा-(सानन्दम्) तदो इमस्स धम्मो डिस्सदि । [ ततोऽस्य धर्मो वधिप्यते । ] ॥१२॥ (सर्वे स्मितं कुर्वन्ति) मुखरा-कण्हड ! इमिणा तुज्झ चावलेण खिजिससदि बल्लवइन्दी गन्दो। ता गदुअ गोमण्डलं संभालेहि । [ कृष्ण ! अनेन तव चापलेन खेत्स्यति बल्लवेन्द्रो नन्दः, तद्गत्वा गोमण्डल संभालय । ] ॥१३॥ श्रीकृष्ण:-आयें ! बिना घेणु विप्रकृष्टाया धवलावलेराकृष्टिदुर्घट। ललिता-फण्ह ! अबलावलीणो ति कीस उज्जुलं ग कति ? [ कृष्ण ! अबलावलीति कस्मात् ऋजुकं न कथयसि ?] ॥१५॥ श्रीकृष्णः-ललिते ! वृद्धयाध सबला यूयम्, ततः कथमिदं कथ- यिष्यामि ? ॥१८६॥ मुखरा-(सरोपम् संस्कृतेन) नवीनाग्ने नप्त्री चटुल नहि धर्मात्तय भयं न मे दृष्टिमध्येदिनमपि जरत्या पटुरियम् । मुखरा-(आनन्द पूर्वक) तब तो इसकी धर्म वृद्धि होगी ॥१८२।। । सव हस पड़ते है ] मखरा-कृष्ण ! तुम्हारी इस 'चपलता से गोपराज नन्द दुखी होते हैं। अत. घर जाकर गौओ को सम्भालो ॥१८३।। थीकृष्ण-आर्य ! वशी के विना तो इधर-उधर भागी हुई धवला- गौओं को एकत्रित करना बड़ा मुशकिल है ।।१८४॥ ललिता-कृष्ण ! व्रज गोपियों को आकर्षित करना बड़ा मुशकिल होगा, यह सरल बात क्यो नही कहते हो ? ॥१८॥ श्रीकृष्ण-ललिते ! आज मुखरा के सहित तुम बलवती हो उठी हो, ऐसी बात में कैसे कह सकता हू ? ॥१८६।। - मुखरा-(क्रोध सहित) है चञ्चल ! मेरे आगे नई नातिनी है और तुम्हे धर्म का भय नहीं है। मैं वृद्धा हूं, मुझे तो दोपहर में भी अच्छी तरह * श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क ४ * [ १७६ । अलिन्दात्त्य नन्दात्मज न यदि रे यासि तरसा ततोऽह निर्दोषा पथि कियति हहो मधुपुरो ॥१८७॥५०॥ मधुमङ्गल -(सरोपम्) दुम्मुहि बुटिए । तुज्झ कसादो कि अम्हे भाएम्ह, ज महुपुर आसन्न फहेसि ? | [ दुमुखि वृद्ध । तव सात्कि वय विभिम , यन्मधुपुरमासन्न क्थयसि ? ] ॥१८॥ मुखरा-(सव्याजम्) अरे । चिट्ठ चिट्ठ, एसाह पत्तिणि घेत ण राजसह पत्थिदम्हि । [ अरे, तिष्ठ तिष्ठ । एपाह नप्त्रीका गृहीत्वा राजसभा प्रस्थितास्मि ।] ॥१८।। (इति राधादिभिरनुगम्य माना निष्क्रान्ता) श्रीकृष्ण -ससे । समागच्छ, कालिन्दीकच्छमुपेत्य गवामुद्देमा करवाव ॥१६०॥ (इति परिक्रम्य वलितग्रीव पश्यन् सोच्छवासम्) 1 नही दीखता है । अत हे नन्दनन्दन | यदि तू मेरे घर के सामने से शीघ्र नही चला जाता, तो फिर मेरा कोई दोष नहीं होगा। मथुरा का रास्ता कितनी दूर है ? (अर्थात् मैं मथुरा जाकर कस राजा के पास ? तेरी करतूत कह सुनाऊ गो) ॥१८७॥ मधुमङ्गल-(शोध पूर्वक) अगै दुर्बुद्धि वृद्ध । हम क्या तेरे कस से डरते हैं ? जो तू हमे मथुरा निकट बता रही है ॥१८८|| मुखरा-(छन पूर्वक) अरे ठहर जा, अभी मैं राधा को लकर राज सभा मे जातो हूँ ॥१८॥ [ यह कहकर श्रीराधा आदिक को लेकर चली जाती है ] श्रीकृष्ण-मिन | आओ, कालिन्दी किनारे चलकर गोमो को देखें ।।१६०। (यह कहकर पीछे की आर गर्दन घुमाते हैं एव लम्बी श्वास लेकर कहते हैं)- माहो | श्रीराधा एक क्षण मे ता घोरजमयी मुद्रा और दूसरे क्षण म
१८० ] *श्रीविदग्धभाधव-नाटक अङ्क-४*
मुद्रा धर्यमयी क्षणं विवृणुते तारुण्यलक्ष्मी (ध्वों) क्षणं
सोपेक्षा. क्षणमातनोति भणितीरोत्सुक्यभाजः क्षणम् ।
शुद्धां दृष्टिमितः क्षरणं प्रणयते प्रेसत्कटाक्षां क्षरण
रोपेण प्रणयेन चाकुलितधी राधा द्विधा भिद्यते ॥११॥५१॥
(इति निष्क्रान्ताः सर्वे)
इति श्रीविदग्धमाधवनाटके वेणुहरण नाम चतुर्थोऽङ्कः ॥४॥
तरुणता से शोभित हो उठती हैं, फिर एक क्षण में उपेक्षा तो दूसरे क्षण
मे उत्कण्ठा पूर्वक वाणी बोलने लगती हैं । क्षण में विशुद्ध दृष्टि तो क्षण में
टेढी नजर कर क्रोध एव प्रणय के वशीभूत हो व्याकुल बुद्धि हो उठती
हैं-इस प्रकार श्रीराधा द्विधा (दो अवस्थाओ मे) प्रकाशित होती है) 1१६१॥
[ यह कहकर सब चले जाते है ]
इस प्रकार श्रीश्यामदासानुवादित श्रीविदग्धमाधव नाटक का
वेणुहरण-नामक चौथा अङ्क समाप्त हुआ ॥४॥
पञ्चमोऽङ्कः
(तत प्रविशति पौर्णमासी)
पौर्णमासी-
स्नेहः शो कृशानोविनोदसदनं सदेति नातथ्यम् ।
स्निग्याय राधिकायां यदहं तेनाशु बग्धास्मि ॥११॥
(पुरोऽवलोक्य) केयं मधुमङ्गलसङ्गिनी मामभिवर्तते । (पुननिभाल्य)
अजनितशासनभङ्गा स्थिरजङ्गममण्डलः स्वबने ।
निखिलप्राणिस्तज्ञा विन्दति पुरतः कथं वृन्दा ? ॥२॥२॥
(प्रविश्य)
वृन्दा मधुमङ्गलश्च-अम्ब | चन्दे ।।३।।
?
पञ्चम-अंक
[तत्पश्चात पौर्णमासी प्रवेश करती है ]
पौर्णमासी- 'अनुराग शोकाग्नि का विलास-भवन है-यह बात
मिथ्या नहीं है, क्योंकि मैं आज राषा मे अनुराग करने से ही जली जा
रही हूं ॥२॥१॥
(सामने देखकर) मधुमङ्गल के साथ कौन मेरी ओर भा रही है ?
(ध्यान पूर्वक देखकर) वृन्दावन में स्थावर-जङ्गम कोई भी जिसके शासन
को भङ्ग नहीं कर सकता है और जो सब प्राणियों की भाषा को जानती
है, क्या यही वृन्दा मेरी ओर आ रही है | ॥२॥२॥
( वृन्दा व मधुमङ्गल प्रवेश करते हैं)
वृन्दा व मधुमङ्गल-माता ! नमस्कार है ॥३॥
१८२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * पौर्णमासी-स्वस्ति युवाभ्याम् ।।४।। वृन्दा-भगवति ! कथं शोचन्त्यसि ? ॥५॥ पौर्णमासी-वत्से, विदग्धपुंगवस्याङ्गसगमलक्ष्माणि राधिका- यामभिलक्ष्य मन्युमानभिमन्युः संप्रति मधुपुर्या सफुटुम्बो वस्तुमुत्कण्ठते । तत्रापि तदम्वा तदीया जम्बालायलीज़म्भायां फादम्बिनीभावमालम्ब्य राधामरालोमुजयति, तेनाद्य शोचामि ॥६॥ वृन्दा-पौर्णमासोशुभाशीश्चन्द्रिय विमान्धकारसंहारिणी ॥७॥ मधुमङ्गल:- अग्जे । कहं राहोदरि तुज्स वरिट्ठ पेम्मम् ? [आर्ये ! वर्थ राधोपरि तव वरिष्ठं प्रेम ? ] ॥ll पौर्णमासी-यरस ! सत्यपि भूरिणि प्रेमोदयकारणे तस्थामनन्या- पेक्षि ममेदं प्रेम । वृन्दा-युक्तपिदम् । यत:- पौर्णमासी-तुम दोनों का मङ्गल हो ॥४॥ वृन्दा-भगवति । कैमे शोकाकुल हो रही हो ? ॥५॥ पोरांमासी-बेटी ! श्रीराधा में रसिक-नागर के सझम-चिन को देखकर प्रोधित हो अभिमन्यु अब अपने कुमुम्ब सहित मथुरा में जापर घराना चाहता है। और फिर उसकी माता जटिला कृष्ण-सम्भोग चिह्नों को देखकर ईया रूप पक्ष में मेघमाला का भाव धारण कर राधा रूपी दगी को रोग दे रही है। इसलिए आज मैं चिन्ता कर रही हूं ॥६॥ पृन्दा-पोर्ण भागी को शुभागीर्यादप चन्द्रिका ही विघ्न अन्ध- मारवाना करेगी ॥७॥ मघुमान-आयें ! तुम्हारा श्रीरापा पर इतना भारी प्रेम मयों है ? 10 पौर्णमासो-स्यमग श्रीराधा के प्रति मेरे प्रेम-उदय के अनेक पारण होनेहए भी, उगोप्रति यह प्रेम समन्याशि पृदा-गुराग यान टीर है, यांशि-
* श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क५-* [ १८३
जगति किलविचित्रे कुत्रचिनिश्चलात्मा
भवति निरभिसधि. कस्यचित्प्रेमबन्धः।
बिलसति समुदीर्णे .कुम्भजे खञ्जनाली
कलितति तथास्त हन्त नाशं प्रयाति ।।१०॥३
मधुमङ्गल.-फेरिसं णिरहिसंधिणो पेम्मस्स चिण्हम् ? [ कीदृशं
निरभिसन्धे प्रेम्णचिह्नम् ? ] ॥११॥
पौर्णमासी-
स्तोत्रं यत्र तटस्थतां प्रकटयचित्तस्य धत्त व्यथा
निन्दापि प्रमद प्रयच्छति परीहासश्रियं विझती।
दोषेण क्षयितां गुरणेन गुरुतां केनाप्यनातन्वती
प्रेम्ण स्वारसिकस्य कस्यचिदियं विक्रीडति प्रक्रिया ॥१२॥४॥
मधुमङ्गल -एब्द स्वं क्षु दोणं राहामाहवारणं पेम्म । [ एवं
स्प खलु तयो राधामाधवयो प्रेम । ] ॥१३॥
इस विचिन्न जगत् मे किसी किसी विषय मे किसी का विना कारण
प्रेम हुआ करता है । देखो न, अगस्त्य तारा के उदित होने पर सब जगह
सञ्जन पक्षी देखने में आता है, परन्तु उसके अस्त हो जाने पर हाय ! वह
सजन पक्षी फिर कही नही दीखता । (यह है खञ्जन का अगस्त्य के प्रति
विना कारण प्रेम) ॥१०॥३॥
मघुमङ्गल-कैसे होते है विनाकारण प्रेम के लक्षण ? ॥११॥
पोर्णमासी-देख, जिस में प्रशसा उदासीनता को प्रकाशित कर
चित्त मे वेदना उत्तन्न करती है (अर्थात् प्रेमास्पद यदि प्रदासा करें तो वह
उसकी उदासीनता को सूचित करती है, जिससे चित्त में दुख होता है)
और जिस मे (प्रेमाम्पद) यदि निन्दा करे तो उमे परिहास जान कर
आनन्द होता है, वह है विना कारण या सहन प्रेम । इस प्रेम की क्रिया
किसी दोप को देखकर ह्रास को प्राप्त नहीं होती और न किसी गुण को
देखकर वद्धित ही होती है ।।१२।।४।।
मधुमङ्गल-निश्चय ही राधा माधव का ऐसा ही प्रेम है ॥१३॥
१८४] '
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अ-५*
7
पौर्णमासी-वत्स । किमुच्यते ? माधुर्यससगिणो नैसगिकस्य
परस्परयल्लमानां विदग्धमियुनाना प्रेमशृङ्खलाबन्धस्य परमोत्कर्षरेखायां
दृष्टान्त फिल राधामाधवयोर्भावामृतभूमा ।।१४।।
वृन्दा-भगवति । श्रयताम्-
यटि वष्टि न पाणिना कयितु शृङ्ग न सङ्गाथित्ता
धत्ते धातुभिरङ्गमण्डनमयीं नाङ्गीकरोति क्रियाम् ।
पर्ण दादयते न पूणितमनास्तीरे कृतान्तस्वसु
किंतूस्यलाम्यति मुक्तविभ्रमगुणग्रामोऽद्य दामोदर ।१५।५।।
पौर्णमासी-(सवेदम्) किमिदम् ॥१५॥
मधुमङ्गल -ललिदाफोरिल्लेण । [ ललिताकौटिल्येन 1 ] ॥१७ ।
पौर्णमासी-नून ललितया हठानुवतितमाना वर्तते राधिका ॥१८॥
वृन्दा [---अथ मिम् ॥१६॥
7
परस्पर प्रिय रसिक
-
पौर्णमासी-वेटा तुम से अधिक क्या कहू
सब दम्पतियो के माधुर्य सम्बन्धी स्वाभाविक प्रेम का जो शृखला-धन्धन
है, उसका परम उत्कृष्ट दृष्टान्त-स्थल स्वरुप है राधा माधव का भावामृत-
समूह ११४॥
वृन्दा-भगवति सुनो-
-~आज दामोदर हाथ मे लाठी धारण करने की इच्छा नहीं करता
और न ही शृङ्ग-ध्वनि द्वारा किसी को सकेत करने की। गैरिक धातुओ
द्वारा न तो वह अपने अङ्गो को भूपित ही करना चाहता है और न ही
पन्न वाद्य करने को उसकी इच्छाहै । उसका मन घूम रहा है और यमुना
किनारे समस्त गुण विलासो को छोड कर वह केवल क्लान्त होकर बैठा है,
पोर्णमासी-(दुखपूर्वक) ऐसा क्यो ? ॥१६॥
मधुमङ्गल-ललिता की कुटिलता से ॥१७॥
पौर्णमासी-निश्चय ही ललिता की खोटी चालो पर चलती है राधा।
वृन्दा-और क्या ? ॥१६॥
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अर्द्ध-५ * . : १८५ पौर्णमासी -न जाने क खल्वद्य ललितादयः ॥२०॥ वृन्दा-तासामुद्दे शाय मया सुबल. प्रेषितोऽस्ति ॥२१॥ (प्रविश्य). सुबलः-अज्जे ! वन्देमि । [ बायें ! वन्दे । ] ॥२२॥ पौर्णमासी-सुबल ! क दृष्टा राधादयः ? ॥२३॥ सुवलः-महराघरोवन्तट्टिणो रसालस्स मूले। [ मुखरागृहोपान्त- वर्तिनो रसालस्य मूले । ] ॥२४॥ पौर्णमासी-वत्स मधुमङ्गल ! तूर्णमनुसृत्य राधिकामभिसारय- न्त्यस्मि, तदेतया सूक्तिचन्द्रिकया त्वमानन्दयम् कुन्दम् ॥२५॥ (मधुमङ्गल: सहर्प निष्क्रान्तः) वृन्दा-(जनान्तिकम्) सुबल । मया समर्पितं पद्यं त्वया कि नाम विशाखायां संचारितम् ? ॥२६॥ सुवलः-अघ 11 [ अथ किम् । ] ॥२७॥ पौर्णमासी वृन्दे । यावत्प्रसाद्य प्रसाध्य च राधां संचारयामि पौर्णमासी -न जाने ललितादि आज कहां हैं ? ॥२०॥ वृन्दा-उनको देखने के लिए भेज दिया है मैं ने सुवल को ॥२१॥ ( प्रवेश कर ) सुबल-आर्ये । प्रणाम करता हू ॥२२॥ पौर्णमासी-सुबल ! कहा देखी हैं राधादिक ? ॥२३॥ सुबल-मुखरा के घर के पास वाले आम वृक्ष के नीचे ॥२४॥ पौर्णमासी- बेटा मधुमङ्गल ! मैं तो शोघ्र जाकर राधा को अभि- सार कराती हू और तुम जाकर इस मपुर सन्देश-चन्द्रिका द्वारा कृष्ण को आनन्दित करो ॥२॥ मधुमङ्गल सहर्प चला जाता है। ] वृन्दा-(हाथ की ओट मे ) सुवल ! मैंने जो तुम्हे पत्र दिया था वह क्या तुमने विशाखा को दे दिया ॥२६॥ सुवल-हा-दे दिया ॥२७॥ पौर्णमासो-वृन्दे ! जब तक श्रीराधा को प्रसन्न कर एव अलकृत
--
?
,
१५६ [ . *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ *
तापदधुनायुवाम्या पुर कदम्बनिकुञ्ज विधाम्यताम् ।।२८।।
(बृन्दा सुबलेन सह निष्क्रान्ता)
पौणमासी-(परिक्रम्य) कथ ललितेतमायाति ॥२६॥
(प्रविश्य)
ललिता-भअवदि । तुम्ह सआस गच्छन्ती म्हि । [ भगवति ।
तव सकाश गच्छन्त्यस्मि। ॥३०॥
पौर्णमासी-किमर्थम् ॥३१॥
ललिता-अज्जे ' तिणा धुत्तण पुणो पुणो अवरञ्जिदावि पिअसही
लाहव अमणिम सुटठ्ठ उक्वण्ठेदि, ता कि करिस्सम् ? [ आयें । तेन धूतन
पुनः पुनरपरजातापि प्रियसखी लाधवममत्वा सुष्ठूत्कण्ठयति, सत्कि
करिस्यामि ? ] ॥३२॥
पौर्णमासी-वत्से ।
मुश्च मुधा कालुप्यम्, नापराध्यति माधव ,
किंतु मधुमङ्गलप्रमादितव व खेदाय बभूव ॥३३॥
ललिता-(स्वगतम्) गमावि एव णन्दोमुहीए कधिदम् । अज्जे
कर मैं यहा नहीं आती है, तब तक तुम सामने की कदम्ब कुल मे विश्राम
[ वृन्दा सुबल के साथ चली जाती है ]
पौर्णमासी-घूमकर) क्या यह ललिता आ रही है ? ॥२६॥
(प्रवेश कर)
ललिता-भगवति । मैं तो आपके पास जा रही थी ॥३०॥
पौर्णमासी-क्सि लिए ॥३१॥
ललिता-मायें । प्रिय सखी राधा उस धूतं से पुन पुन अपमानित
होकर भी भपना तिरस्कार नहीं मान रही है मोर फिर उसके लिए ही
उत्कण्ठिन हो रही है । अब मैं क्या करू ? ||३२||
सौर्णमासो-बेटी छोडो वृथा ग्लानि को। माधव का कुछ मपराष
नही है, किन्तु मधुमङ्गल को असावधानो हो तुम्हारे दुख का कारण है।।३३।।
ललिता-(मन में) हम नांदीमुखी ने भी यही बात कही थी।
(स्पष्ट कहती है ।) आयें ! देस तो आम वृक्ष के नीचे बैठी राधा कापते.
करो ॥२८॥
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-५ * [ १८७ पेपख एपा राही रसालस्य मूले कम्पन्ती किपि जप्पंदि। [ ममापि एवं नान्दोमुख्या कथितम्। आर्य ! पश्यैपा राधा रसालस्य मूले कम्पमाना किमपि जल्पति । ] (प्रकाशम्) ॥३४॥ (ततः प्रविशति राधा) राधा-- --(सानुतापं संस्कृतेन) कर्णान्ते न कृता प्रियोक्तिरचना क्षिप्त मया दूरतो मल्लीदाम निकामपय्यवचसे सख्य स्प. कल्पिताः । क्षोणीलग्नशिखण्डशेखरमसो नाभ्यर्थयनीक्षितः स्वा.तं हन्त ममाद्य तेन पदिराङ्गारेण दंदह्यते ।।३।।६।। पौर्णमासी-पुत्रि ! प्रच्छन्नमुपसृत्य शृणुवः प्रेमविलासम् ॥३६।। (इत्युभे तथा स्थिते) श्रीराधिका-(सचापलम् पुनः संस्कृतेन) धन्यास्ता हरिणीदृशः स रमते याभिनवीनो युवा (पुन. सशङ्कम्) स्वरं चापलमाकलय्य ललिता मां हन्त निन्दिप्यति । (पुनः सौत्सुक्यम्) कापते क्या कह रही है ॥३४॥ ( तब वहा अनुताप सहित श्रीरामा प्रवेश करती हैं) श्रीराधा-हाय ! मैंने हित की सब बातों पर कान नहीं दिया, मल्लिका माला को भी फेंक दिया है, मखोगण मुझे ठीक बात कह रहो थी, उन पर भी मैंने क्रोध किया। और तो क्या मोरमुकुटधारी श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर लुण्ठिन हो मेरी प्रार्थना की, तो भी मैं ने उनकी ओर नजर उठाकर नहीं देखा । अतः इस कारण आज मेरा अस्त करण खदिर-अङ्गारों में बार-बार जला जा रहा है ।।३।६।। पौर्णमासी-बेटी ललिते ! चल, छिप कर निकट से श्री राधा के प्रेमविलास को सुनें ॥३६।। (यह कहकर दोनों वैसा ही करती हैं) श्रीराधिका-(चपलता सहित) वे समस्त नवीन युवक पन्य हैं जो १८८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाट अङ्क-५ * - । शठस्य गोविन्द परिरन्धुमिन्दुघदनं हा चित्तमत्कण्ठते (पुनः सामर्षम्) धिग्वामं विधिमस्तु येन गरलं मानाभिघं निर्ममे ॥३७॥७॥ ललिता-(स्वगतम्) अदक्खिणे ! चिट्ठ चिट्ट स जेव्व फण्हं गिराकदुम भृङ्गीए में दूसेसि । [ अदक्षिणे ! तिष्ठ तिष्ठ स्वयमेव कृष्ण निराकृत्य भृगया मां दूपयसि । ] ॥३॥ श्रीराधिका-(भृङ्गीमवेक्ष्य संस्कृतेन) कृमिरपि नमितात्मा हन्त वृन्दावनेऽस्मिन् फलयति निजमौलो वहंमोलेनिदेशम् । अनुनयति महुर्मा नेतुकामालिनीय यदमलमधुरोक्तिस्तस्य दृष्टि ॥३६॥८॥ पौर्णमासी-(सनमस्मितम्) निखिलमेव वृन्दाटवीप्रायिवृन्दं दूतीभूतमियं मन्यते महामानिनी ॥४०॥ मृगनैनियों के साथ विहार करते हैं । (शंका सहितो हाय ! यदि ललिता मेरो इस चपलता को जानेगी तो मेरी निन्दा करेगी। (उत्साह सहित) आहा ! चन्द्रवदन गोविन्द को आलिंगन करने के लिए मेरा चित्त उत्कण्ठित हो रहा है । (क्रोध पूर्वक) जिसने मानरूप विप का निर्माण किया है, उस प्रतिकूलाचारी विधाता को धिक्कार है ॥३७।१७।। ललिता-(मन मे) हे वक्रे ! ठहर जा, स्वयं श्रीकृष्ण को परित्याग कर वहाना लगाफर मुझे दोप दे रही है ? ॥३८॥ धोराधिका-(भृङ्गीकोट को देखकर) हाय ! इस वृन्दावन में कृमि भो विनम्र चित होकर रहते हैं एवं मोर भो उस मोरपुच्चधारी के आदेश को सिर पर धारण करते हैं। यही कारण है कि यह भृङ्गो अपनी मधुर वाणी से मुझे उस राठ-कृष्ण के सामने जाने के लिए बार-बार अनुनय कर रहा है ॥३॥ पौर्णमासी-(परिहास सहित मुस्काते हुए) यह महामाननी राधा वृन्दावन के समस्त प्राणियों को अपनी दूती ही मानती है ।।१०।।
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* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * [ १८६
श्रीराधिका-(प्रेमावेश नाटयन्ती सचमत्कारम्) कधं एसो मं
मोट्टि परिरद्ध उबसण्गो कपहो? [ कथमेप मां बलात्कारेण परिरब्धु-
मुपसन्नः कृष्णः ? ] ॥१॥
पौर्णमासी-गम्भौरानुरागविवर्तोऽयम्, यदस्यां माधवस्य
विस्फुरणम् ॥४॥
श्रीराधिका-(सहुंकारं परावृत्य) हन्त भो वङ्ककलासालि चन्दास-
लीकोडचिरासङ्गभङ्ग.रफुरङ्ग ! अवेहि अवेहि । एसो तुमं परिहविज्जसि
मए । [ हल भो वक्र कलाशालिन् ! चन्द्रावतीक्रोडचिरासङ्गभङ्ग रकुरङ्ग !
अपेहि, अपेहि एप त्व परिभविष्यसि मया। ] 1॥४३॥
( इति कर्णोत्पल क्षिपन्ती संस्कृतेन
यमुनातीरफद्रम्बा. संप्रति मम हन्त साक्षिणो यूयम् ।
बलान्मामबलां गोकुलपूर्त. कदर्थयति ॥४४॥६।।
पौर्णमासी-ललिते | परां कोटिमधिरूढा राधिकोत्कण्ठा, तदियं
त्वरितमभिसार्यताम् । ४५।
ललिता-(परिक्रम्य) हला राहि ! एका जेव किं मन्तेसि ?
श्रीराधिका-(प्रेमावेश प्रकाशित करती हुई आश्चर्य सहित) क्या
यह कृष्ण बलपूर्वक मुझे आलिंगन करने के लिए आ गया है ? ॥४१॥
पौर्णमासी-यह गम्भीर अनुराग की पराकाष्ठा है, जो इसे श्रीकृष्ण
की स्फूर्ति हो रही है ।।४।।
श्रीराधिका-(हुँकार सहित घूमकर) अरी वकला-शालिनि ! तुम
बहुत देर तक चन्द्रावली की गोद की क्रीडामृग रही हो, दूर हो, मैं तुम्हारा
तिरस्कार करती हूं। (इस प्रकार कहकर कर्णोत्पल को फंक देती हैं और
फिर कहती हैं)॥४३॥
हे यमुना किनारे के समस्त वृक्षो । अव तुम मेरे साक्षी (गवाह)
रहना । यह गोकुलधूत जबरदस्ती मुझ अबला को कलसित कर रहा
है ॥४४॥
पौर्णमासी-ललिते ! श्रीराधा को उत्कण्ठा चरमसीमा तक पहुंच
चुकी है, इसलिए शीघ्र इसे अभिमार कराओ ॥४॥
१६० ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क५-* [ हला राधे ! एकव किं मन्त्रयसि ? ] ॥४६।। श्रीराधिका-(ललितामालोक्य स्वगतम्) मधं सच्चं जेव्व एषकम्हि, नं कण्हो " दोसइ ? हला ललिदे ! [ कथ सत्यमेवैकास्मि, यत्कृष्ण दृश्यते ? हला ललिते ! ] (इति प्रकाश सौत्सुक्यम्) । परतणुपवेसविज्जा कहमिह सामेण कामिणा पढ़िदा? मह हिभए माणग्गी पविसिअ णिवाविदो जेण ।। [परतनुप्रवेशविद्या कथमिह श्यामेन कामिना पठिता? मम हृदये मानाग्निः प्रविश्य निर्वापितो येन ॥1॥४७॥१०॥ (प्रविश्य) विशाखा-हला ! सुबलहत्यादो लद्धा इअं पतिआ । [ हला ! सुबलहस्ताल्लब्धेय पत्रिका । ] ॥४८॥ ललिता-(गृहीत्वा वाचयति) मेध्योऽपि माधविकया मधुपो यदेप, क्षिप्त. स्वयं प्रचलता नवपल्लधेन । खलु क्षतिरियं सुषमाक्षण ललिता-(सामने आकर) हे राधे ! अकेली बैठी क्या मन्मणा कर रही हो? ॥४६॥ श्रीराधिका- (ललिता को देखकर मन ही मन में) सच है, मैं अयेली ही है, कृष्ण तो दीसते नही हैं । (उत्सुकता पूर्वक) हे मलिते ! दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की विद्या क्या कामुक कृष्ण ने अध्ययन यो है ? क्योकि उसने मेरे हृदय में प्रवेशकर मान-अग्नि यो युसा दिया है ॥४७॥१०॥ [विशाखा प्रवेश करती है ] पिगाणा-गि ! मुबल के हाप से यह पत्र प्राप्त हुआ है intell ससिता-(पर हाथ में लेकर पढ़ती है) माषयी अपने स्वप्रयसित गयीन पल्लवरूपी हाप से निदोष मधुवर मो यदि दूर हटाती है, तो इसमें मापयो को ही हानि है, गोंमि मधुकर मे ही माषयी मी शोभा है।दनिए तस्याः
*श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-५*
नन्दत्ययं
तु विरुवन्नरविन्दिनीषु ॥४६॥११॥
श्रीराधिका-(सविषादम् संस्कृतेन)
अजनि विमुखः शङ्ख पड्करहाक्षि विपक्षणो
मयि मधुरिपुर्दोषश्रेणीविहारवनश्रियाम् ।
अकलितरसः सूचीविद्धो रज. प्रसरान्धधी-
नं मधुरयुवा कि केतक्या विरक्तिमुपैयत ॥५०॥१२॥
(इति वैक्लव्यं नाटयति)
पौर्णमासी-म हि दन्द्रेण चन्द्रि काया मोक्ष: कदापि संभवति ॥५॥
विशाखा-हला
समास्तस समास्सस, तुह उकप्ठिदं तक्रिअ मए
काहपत्ति विण्णादु गन्दोमुही पेसिदस्थि । [ सखि ! समाश्वसिहि ।
समाश्वसिहि तवोत्कण्ठित तकित्वा मया कृष्णप्रवृत्ति विज्ञातु नान्दीमुखी
प्रेपितास्ति । ] ॥५॥
(प्रविश्य)
शोभा रहित होने पर मधुकर भी उसे त्याग कर पनिमी के पास जाकर
आनन्द अनुभव करेगा 1॥४६॥११॥
श्रीराधिका-(दुग्वपूर्वक) हे कमलनयने ! मैं दोपों को विहार-भूमि
स्वरूपा हू। उस सर्व रसज्ञ कृष्ण ने क्या मुझसे मुंह फेर लिया है ? ( यह
उचित नहीं है ) देख, युवक मधुकर को यद्यपि केतिकी से रस नहीं मिलता
है बल्कि उसका कण्ठ उमसे घायल हो जाता है एवं उसकी पुष्परज से अन्धा
हो जाता है, फिर भी वह क्या कभी वेतिवी से विरक्ति प्रवास करता
है ? ॥५०॥१२॥
[ यह कहकर व्याकुल हो उठती है ]
पौर्णमासी-चन्द्र से चान्दनी का वियोग कभी सम्भव नहीं है । ५१॥
विशाखा--सखि ! धीरज धरो, धीरज धरो, तुम्हारी उत्कण्ठा को
जानकर मैं ने श्रीकृष्ण के ह्दय की बात जानने के लिए नान्दीमुसी को
भेजा है ॥५२॥
१६२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क ५* मान्दीमुखी-(सस्कृतेन) मृदुरपि निसर्गतस्त्वं कथमा माधवे कठोरासि । अथवा नवनीतपुटी हिमवे कपखटा प्रक्षि ॥५३।।१३।। श्रीराधिका-हला ! अवि णाम सुहं वदि माहतो? [ सखि ! अपि नाम सुखं वर्तते माधवः ? ] ॥५४।। नान्दीमुखी-(संस्कृतेन) क्षणमपि न सुहृद्भिर्नर्मगोष्ठी विधत्त रचयति न च चूडां चम्पकानां चयेन । रमिह मुरवैरी योगिवन्मुक्तभोग- स्तव सखि मुखचन्द्र चिन्तयनिर्वृणोति ॥५५॥ १४॥ श्रीराधिका-(विशाखां परिष्वज्य संस्कृतेन) भूयो भूयः फलिविलसित: सासराधापि राधा इलाध्येनाहं यदधरिपुणा बाढमजीकृतास्मि । तन क्षामोदर किमपरं कारणं वः सखीनां दत्तामोदा प्रगुणकरणामञ्जरीयन्तरेण ? ॥५६॥१५॥ [ नान्दीमुखी प्रवेश करती है ] नन्दीमुखो-राधे ! तुम तो स्वभाव से कोमल हो, फिर दीन-स्वभाव श्रीकृष्ण के प्रति क्यों कठोर हो रहो हो ? मैं समझती हूं तुम्हारा कोई दोष नहीं है। बर्फ की शीतलता से मक्खन में भी कठोरता देखी जाती है? ॥५३॥१३॥ घोराधिका-सखि ! माधव मुय पूर्वक तो हैं ? । ५४॥ मन्दोमुखी-राधे ! श्रोहण एक क्षण के लिए भी सराा-बन्धुओं के साथ परिहास नही करते एव न ही चम्पक पुष्प द्वारा यह अपना मूड़ा मान्यते हैं । यस योगियों को भाति भोगों को छोड कर तेरे मुखचन्द्र को चिन्ता करने मे ही मुरा अनुभव करते हैं ॥५॥१४॥ घोरापिका-(विशाता यो आलिंगन करते हुए) है गुमोदरी !.
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * I १६३ (नेपथ्ये) गर्योदना फलमविकल तन्वतामन्यपुष्टा निष्प्रत्यूह मृगयुवतय सस्यमास्वादयन्तु । सीमन्तिन्यो गृहनयमयों शोलयन्तु प्रणाली धूर्तो वेणुविहरति परे नाध पीताम्बरस्य ।।५७॥१६॥ श्रीगधिका-(वशीमुद्धाठ्य सोपालम्भम् सस्कृतेन)- सद्वशतस्तव जनि पुरुषोत्तमस्य पाणी स्थितिर्मुरलिके सरलासि जात्या। स्मारवया सखि गुरोचिषमा गृहीता गोपाङ्गनागणविमोहनमन्त्रदीक्षा ॥५८॥१७॥ विशाखा-हला । अचरिआ इअ वशी, ज मारुदाहिमहीकिदा यह राधा बहुत वार कलह-मान लीला कर वहुत अपराध करते हुए भी, उस प्रशसतोय श्रीकृष्ण के द्वारा जो अतिशय अगीकृत हो रही है, इसमे मुख प्रदायिनो तुम सपियो की असीम करुणा को छोडकर और कोई कारण है यया ? (तुम्हारी करुणा ही इसमे एकमात्र कारण है) ॥५६।। (वेश-भूपा गृह से) ओ मत्त को कलाओ ' तुम अब स्वच्छन्द होकर बह-बहू क्लव करो, हे मृगगण । तुम भी अव निविघ्न होकर तृणो का आस्वादन करो और ओ बुलरमणियो ' तुम भी अब गृहधर्म की नीतिपूर्ण प्रणाली का अनुशीलन करो, क्योकि आज श्रीकृष्ण के हाथ मे वह धूत्तं वेणु विहार नहीं कर रही है ।।५७॥१६॥ श्रीराधिका-(वशी को निकालकर तिरस्कार पूर्वक) हे मुरलिके ! तुम्हारा सवश मे जन्म हुआ है और सदा पुरुषोत्तम के हाथो मे तुम रहती हो तथा तुम्हारी जाति भी मूधी-सादो है । हाय सखि । तुमने फिर गोपियो को विमोहन करने वाली विषम मन्त्र-दीक्षा गुरु से विस लिए ग्रहण की है ? ॥५८॥१७॥ विशासा-हे ससि । इस बशी में यही बडा आश्चर्य मम गुण है कि ।
१६४ ] * श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्ग-५* स सहाएदि । [ सखि ! आश्चर्येयं वंशी, यन्मारुताभिमुखीता स्वयं शब्दायते । ] ॥५८।। श्रीराधिका-सहि ! परिपिखसम् । [ ससि ! परीक्षिप्य । ] (इति तथा करोति) ॥६॥ विशासा-सुणिज्जउ महुरा कामली। [ श्रूयतां मधुरा बाकली।] ललिता-सम्बरेहि. सम्परेहि मा सुणादु कण्हस परिवारः। [सम्बर सम्बर, मा गृणोतु कृष्णस्य परिवारः । } ॥६॥ (प्रविश्य) वृन्दा-(प्रच्छन्नम्) भगवति ! न पदापि वंशी देयेति श्रुतं मया ललितादुर्मन्त्रितम् । ॥६३।। पौर्णमासरे-वत्से ! भुक्तिमायत्या करिगयामि १६४॥ (प्रविश्य) जटिला-गुणं इदी कण्हेण मिलिदं जं मुरली वादिदा । (विलोक्य) अम्मो, फहं वारिसहाणवीहत्थे फहस्स बंसी ? ता णिहुदं गदुअरणं हवा के सामने रखते ही यह स्वय शब्द करने लगती है ॥५६॥ श्रीराधिका-सखि ! इसकी परीक्षा करती हूं । (यह कहकर वंशी को मुह के आगे रखती है) ।। ६०॥ विशाखा-कैसा मधुर शब्द सुनाई दे रहा है ॥६१॥ ललिता-बन्द करो, बन्द करो, कृष्ण के परिवार वर्ग न सुन लें।६२ [ वृन्दा प्रवेश करती है ] वृन्दा-(धीरे से) भगवति ! मैं ने ललिता की यह दुर्मन्त्रणा सुनी है कि वह कभी भी वंशी नही लौटाएगी ।।६३।। पौण मासी-पुत्रि ! बाद में मैं युक्ति करूंगी ॥४॥ [ जटिला प्रवेश करती है ] जटिला-वंशी का शब्द है तो यहां निश्चय ही कृष्ण मौजूद है । (ध्यान पूर्वक देखकर) ओ ! राधा के हाथ मे कृष्ण को वंशो कैसे ? (यह *श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-५ * [ १६५ - गहिरसम् । (इति सहसोपसृत्य सामर्षम्) अयि दुविणोदगोआलपुत्तिए मुञ्च मुरलिअम् । [ नूनमित कृष्णन मिलित, यन्मुरली वादिता । अहो । वध वार्षभान वीहस्ते कृष्णस्य वशी? तन्निभृत गत्वा एना ग्रहीप्यामि । अयि दुविनीतगोपालपुत्रिके । मुञ्च मुरलिकाम् । ] (इत्याकृष्य गृह्णाति)॥६५ ललिता--(अपवायं) हद्धी हवी यफ ६मादो पमादो । फ्ध बुडिआए अ विक्रद मुरली आअट्टिदा ? [ हा धिक् हा धिक, प्रमाद प्रमाद कथ वृद्धया अतक्ति मुरली आक्रप्टा ? ] ॥६६॥ जटिला-रण या भअवदीए पौर्णमासीए दसइस्सम, जा मज्ज भणिद ण पट्टिआएदि। [ एना खलु भगवत्यै पौर्णमास्य दर्शयिष्यामि, या मम भणित न प्रत्येति । ] ॥६७|| पौर्णमासी-पुत्रि वृन्दे, गहन कप्टमापतितम् । पश्य जटिला ममोट- जदिश प्रयाति ॥६॥ वृन्दा- भगवति । मा चिन्तय । क्षिप्रससो मुरली लुण्ठयामि । (इति निष्क्रान्ता) ॥६६॥ ललिता-(सभयमनुसृत्य) अज्जे । कोस अली सङ्कसि, ज एसा कालिन्दीकूलन्हि अम्हेहि लद्धा। [ आयें। कस्मादलीक शङ्कसे, यदेषा कहकर एकदम निकट जाकर क्रोवपूर्वक) अरी दुनीत गोपपुति ' छोड दे वशो को। (यह कहकर वशी को खीच लेती है) ॥६५।। ललिता-(ओट करके) हाय हाय कैसा प्रमाद इस जटिना ने आकर कैसे मुरली छुडा ली ? ॥६६।। जटिला-इस मुरली को मैं भगवती पौर्णमासी को दिखाउ गी, जो मेरी बात का विश्वास नहीं करती है ॥७॥ पौरांमासी-पुनि वृन्दे । महान विपत्ति मे पड गई हू, देख जटिला मेरी पर्णकुटि की आर जा रही है ॥६॥" वृन्दा-भगवति चिन्ता मत करो। मैं अभी मुग्नी छुडा लाती है। (यह कहकर चली जाती है) ॥६६॥ ललिता-(भयमहित जटिला के पास जाकर) आर्य | तुम बिना १६६ ] * श्रीविदाध माधव-नाटकअङ्क-५* . . कदम्ब- कालिन्दीकूलेऽस्माभिर्लब्धा। ] 11७०। जटिला--(सरोपम्) चवले टुम्हन्तिणि, चिट्ठ चिट्ठ । [ चपले दुर्मन्त्रिणि, तिप्ठ तिष्ठ। ] ॥७॥ (प्रविश्य) सुबल:-अज्जे जडिले, पेक्ख दहिलम्पडा मक्कडो तुझ घरं पविसइ । [ आर्य जटिले, पश्य दधिलम्पटा मर्कटी तत गृहं प्रविशति । ] |७२।। जटिला- (साचिनीदमालोक्य) सुदल, च बहेसि । मक्खन- चोरिणो एसा मकडो। सुबल, सत्य कथयसि । नवनीतचौरिण्येषा मर्कटी। (इति परावृत्य धावन्ती निष्क्रान्ता)।७३॥ पौर्णमासी-नूनं वृन्दया प्रेरितास्ति कमखटीयं नाम जरन्मर्फटी ।।७४ सुवन:-न्दीमहि । पेक्ख पक्टितण वेणुणा मूढजडिलाए] मक्कडी ताडिदा । [ नान्दीमुखि, पश्य ! प्रक्षिप्त न वेणुना मूढजटिलया मर्कटी ताडिता। ] ॥७५ पौर्णमासी-(सहर्पम्) दिष्ट्या मुरलीवादाय कपखटीयं बात क्यों शंका कर रही हो ? यह मुरनी है ॥५०॥ जटिला-(क्रोधपूर्वक) चपले दुमंन्त्रिगि ! चुप रहो ।७१।। [ सुवल प्रवेश करता है ] सुवल-आयं जटिले ! देख एक दधि-लम्पट बन्दरी तुम्हारे घर में घुस गई है ।।७२॥ जटिला-(गर्दन धुमाकर देखते हुए) मुवन ! तू सत्य कहता है, यह बन्दरी माखन सा जाया करतो है। (यह कहकर जटिला पीछे को ओर भाग कर चली जाती है) ।।३।। पोर्णमासो-निश्चय हो वृन्दा ने इम बन्दरी को भेजा है ।।७४।। सुरल-नान्दीमुम्बि ! देख, मूसं जटिला ने वंशी फेंक बन्दरी को भगा दिया है ।।७५॥ पौर्णमातो-(आनन्दपूर्वक सोभाग्यवश बन्दरी मुरली लेकर पादम्य हमें यमुना तट पड़ी पाई * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * [ १६५ मधिरूढा । ७६॥ (सर्वा. प्रहर्प नाटयन्ति) (प्रविश्य) जटिला-हती वच्छ सुबल, हत्थादो मे मुरली गदा । ता तुजा हिम्मरणं जामि । समप्पेहि मे वसिअम् ।। [ हा धिक् वत्स सुबल, हस्तान्मे मुरली गता । तस्मात्तव निमन्थन यामि । समय मे वशिकाम् । ] सुवल -भज्जे, जहत्यणामा एसा कवखटी केसलं सुज्झ बहिणी- पुत्तादो विसालादो भाएदि। ता गोवदसिङ्ग खेलन्त एं गदुअ अभ्यत्यहि । [ आर्ये, यथार्थनामा एषा कक्षटी केवल तव भगिनीपुत्राद्विशालाविभेति । तद्गोवर्धनशृङ्ग खेलन्तमेन गूत्वाभ्यर्थय । ] ७८|| (जटिला निक्रान्ता) पौर्णमासी-दिश्या व्याजेन जरतो दूरमपसार्य धूर्तोऽयं 5 वि- भ्रमेण ललिता स्वरयति ॥७॥ ललिता-(नेत्रप्रान्त व्रणयन्ती) हला राहि, एहि । वेणु मगम्हे। [ हला राधे, एहि । वेणु मार्गयाव । ] 100 पर चढ गई है ।।६।। (सव प्रसन्नता प्रकाश करते हैं) (जटिला प्रवेश करती है) जटिला-हाय हाय | अरे बेटा सुवल ।। मेरे हाथ से तो मुरली निकल गई । मैं तेरी बलिहारी, मुझे वशी लाकर दे दे ॥७७॥ सुवल-बायें । मैं तुम्हें यथार्थ बताता है । यह बन्दरी केवल तुम्हारे भाजे विशाल से डरती है (और किसी से नहीं) इस समय विशाल गोवर्धन पर खेल रहा है, उसे बुला ले ॥७॥ (जटिला चली जाती है) पौर्णमासी-क्या अच्छा हुआ ! बहाना बनाकर जटिला को इसने भगा दिया। अब यह धूर्त आख के इशारे से ललिता को जल्दी करने की कह रहा है ॥७॥ ललिता-(नेत्र प्रान्त को सकुचित करती हुई) सखि राधे ! आमो वशी को टूण्डे ।।८०॥ - १९६ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * श्रीराधिका-(स्वगतम्) दिद्विआ अहिसारेदि मम् । [ दिष्ट्या- भिसारयति माम् । ] ॥१॥ (प्रविश्यापटीक्षेपेण) मुखरा-विसाखे, अहिमग्गू संदिसइ-अज्ज जीइतिआणं उपदेसेण मए गोमङ्गला गाम चण्डी पूअणीज्जा । ता पूअणोपहारं घेतूण तुमं चेच्चरुक्खस्स तले राहिअ लम्भय ति। [ विशाखे, अभिमन्युः सदिशति- अद्य ज्योतिपिकानामुपदेशेन मया गोमङ्गला नाम चण्डी पूजनीया । तत्पूजनोपहारं गृहीत्वा त्वं चैत्यवृक्षस्य तले राधिका लम्भयेति । ] ॥२॥ श्रीराधिका-(सखेदमपवार्य) हन्त, दुद्दे अस्स पाडिउल्लम् । [ हन्त, दुर्दैवस्य प्रातिकूल्यम् । ] (इति ललितामुखमीभते) ॥३॥ ललिता-हला, सच्चणामा एसो अहिम । ता गदुअ पूअणो- वहारं संपादेम्ह । [हला, सत्यनामा एपोऽभिमन्युः । ततो गत्वा पूजनो- पहारं सपादयामः । ] 11८४॥ (इति सर्वा निष्क्रान्ताः) श्रीराधिका--(मन मन मे) मेरे सौभाग्य से मुझे यह अभिसार करा रही है ॥८॥ (अचानक मुखरा प्रवेश करती है) मुखरा-विशासे ! अभिमन्यु ने कहला भेजा है-आज ज्योतिपियो के आदेशानुसार मैं गो मङ्गला नाम की चण्डी की पूजा करूंगा। इसलिए तुम पूजा की सामग्री इकट्टी कर चैत्य वृक्ष के नीचे राधा को लेकर आ जाओ ।।८२॥ श्रीराधिका-(सेदपूर्वक घूघट करके) हाय ! दुर्दैव को कैसी प्रति- पूलता है ॥३॥ (यह कहकर ललिता के मुख की ओर देखती है) ललिता-राधे ! सचमुच इसका नाम अभिमन्यु (क्रोधमय) है । इसलिए हम जाकर पूजा को सामग्री इकट्ठी करती हैं ॥४॥ (यह कहकर सब चली जाती हैं) *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५* [ १९७ पौर्णमासी- (सुवलमनुसृत्य सव्यथम्) वत्स, दुःसमाधानेयं गति- रुपस्थिता । तदद्य वृन्दया सह गत्वा समाश्वस्यतां त्वया पाटवेन पुण्ड- रोकाक्षः । मया तु प्रामाणिकपुरंध्रीणां गोष्टीमासाद्य जटिलाकौटिल्य वर्णयिष्यते । (इति निष्क्रान्ता) ८५ सुवलः-(परिक्रम्य) एसा तमालतले डाहिणहत्थे गहीदवंसिआ वुन्दा चिट्ठइ। [ एपा तमालतले दक्षिणहस्ते गृहीतवंशिका वृन्दा तिष्ठति । ] (प्रविश्य) वृन्दा-भोः सुबल, विलोकितसर्वार्यास्मि । तदलं तद्वार्तया ॥७॥ सुबल:-बुन्दे, तुरिज एहि । वेणु जेव्व उवहरम्ह । [ वृन्दे, त्वरितमेहि । वेणुमेवोपहरावः 1] 1८८|| (इत्युभो परिकामतः) सुबल:-बुन्दे, महुमङ्गलेण वद्धिदुक्कण्ठो पिअवअस्सो माग्गं ज्जेस पेक्खन्तो चिइ । ताण जाणे अकिदत्यारणं अम्हारणं तत्थ गमणे का तस्स दसा भवे । [ वृन्दे, मधुमङ्गलेन वर्धितोत्कण्ठः प्रियवयस्यो मार्गमेव पश्य- पौर्णमासी-(सुवल के पास जाकर दुखपूर्वक) बेटा ! बड़ी पेचिदा अवस्था बन गई है। इसलिए तू वृन्दा के साथ जाकर श्रीकृष्ण को अपनी वाणी-कुशलता से आश्वस्त कर और मैं भी वृद्धा पुरस्त्रियों की समा में जाकर जटिला की कुटिलता बताऊँगी । (यह कहकर पौर्णमासी चली जाती है) ॥५॥ सुवल-(घूमकर) देखो, इस तमाल वृक्ष के नीचे दक्षिण हाथ में वंशी लिए वृन्दा बैठी है ।।६।। (वृन्दा प्रवेश करती है) वृन्दा-सुवल ! कुछ देर मैं ने स्वयं ही देखा है, फिर उसे कहने का क्या प्रयोजन ? ॥७॥ सुबल-वृन्दे ! जल्दी आओ, कृष्ण को यह वेणु उपहार में देंगे ॥८८ (यह कहकर दोनों लौट आते है) सुबल-वृन्दे ! मधुमङ्गल के साथ प्रिय सखा कृष्ण बैठे राह तक रहे हैं । इसलिए न जाने हमारे विना कार्य साधे वहा जाने पर उनको क्या .
1 १६८ [ *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * स्तिष्ठति । तन्न जानेऽकृतार्थानामस्माकं तत्र गमने का तस्य दशा भवेत् । ] वृन्दा-सुबल, सत्य ब्रवीपि । पश्यायं पुनागतरोरुपकण्ठे समु- कण्ठते फंसारिः 1800 सुबल:-बुन्दे, भणामि । चिन्तेहि जुत्तिम् । [ वृन्दे, भणामि । चिन्तय युक्तिम् । ] ॥६॥ वृन्दा-(विमृश्य) सुवल, गोविन्दस्य क्षणविनोदाय चिन्तितो- पायास्मि । तदेहि । तनिष्पत्तये वेशं भजावः ॥२॥ (इति निष्क्रान्ती) (तत. प्रविशति मधुमङ्गलेनोपास्यमानः कृष्णः) श्री कृष्णः (सौरसुवयम्) राधा पुरः स्फुरति पश्चिमतश्च राधा राधापिसव्यमिह दक्षिणतश्च राधा खलु क्षितितले गगने च राधा राधामयी मम वभूव कुतत्रिलोकी ॥६॥१८॥ राधा। दशा होती ? वृन्दा- सुबल ! तुम सच कहते हो, यह देसो पुनाग वृक्ष के नीचे कृष्ण उत्कण्ठा पूर्वक बैठे हैं ॥१०॥ सुबल-वृन्दे ! इसीलिए मैं कहता हूं कोई युक्ति सोचो ॥६॥ वृन्दा-(सोचकर) सुयल ! श्रीकृष्ण के थोड़ी देर के विनोद के लिये उपाय सोच लिया है । माओ उसके सम्पादन करने के लिए जल्दी करें ॥२॥ (यह कहकर दोनो चले जाते हैं ) (तव मधुमङ्गल द्वारा सेवित श्रीकृष्ण प्रवेश करते हैं) श्रीकृष्ण-(उत्सुयता पूर्वक) मेरे आगे राधा है, पीछे राधा है, दायें रापा और यायें राधा, पृथ्वी पर राधा, और आवाश में राधा ही मुझे दीराती है । अहोमेरे लिए यही तीनो लोक राधामय पयों हो रहे हैं?।।३।।
२०१ ] * श्रीविदग्धमारव-नाटक अङ्क ५ * । मधुमङ्गलः-पिअवमरस । मअवदोए अहिसारिद दाणि जेव्ध पेक्विस्मसि राहिनन् । [ प्रियवयस्य, भगवत्याभिसारितामिदानीमेव प्रेक्षिप्य राधिकाम् । ] ||४|| श्रीकृष्ण करेणान्तस्तुष्टचा सललितमदष्टन्य ललिता- फराज प्ट राधा भृशमभिसरन्तो सरभसम् । किमद्य स्मराक्षी स्मरपरिमलोल्लासिवलय- ध्वनि निर्मास्यत्यनुपमचनरकारचटुलम् ।।५।।१६।। मधुमगन - भो, पा उत्तम्मस्स। कङ्कणझणकारो सुबइ । ६।। (नेपथ्ये) हला ललिदे देक्छ । सो एसो पुष्णाअरक्खो दोसइ । (पुनस्तत्रैव) सहि राहे चिट्ठभमरजम्पिद पेक्ख णम् । ता क्खरग इध अव्व चिट्ठम्ह । [ हला ललिते, पश्य । स एप पु नागवृक्षो दृश्यते । सखि राधे, घृष्ट- भ्रमरजल्पति पश्यनम् । तत्क्षणमिहैव तिष्ठाव । ] १६७॥ मधुमङ्गल -(सचापलम्) भो पिअयअस्स, वामदो कि ण पेच्छसि । मघुमङ्गल-हे प्रिय सखे । भगवती पौर्णमासी अभी ही राधा को अभिसार करायेगी, तुम उसे देखागे ॥१४॥ श्रीकृष्ण-आहा श्रीराधा मन मे सन्तुष्ट होकर अपने हाथ से ललिता के सुन्दर अगूठे को पकडे हुए कोतुक पूर्वक अभिसार कर माद मुमकान युक्त नेत्रो से कन्दर्प सौरभ बखेरने वाली कङ्कणो की ध्वनि से क्या आज मे अतिशय चमत्कृत परेगो? ॥६॥ मधुम्गन-मिर | उत्तावले मत होवो । देखो, श्री राधा के कर- कङ्कणो की झकार सुनाई दे रही है ॥६६॥ (वेप भूपा घर से थावाज आती है) सखि ललिते । देख यह वही पुनाग वृक्ष दीख रहा है । (फिर वही से आवाज आती है ) ससि राधे ! दुष्ट भ्रमरो से आच्छादित इस पुन्नाग वृक्ष को देख। थोड़ी देर के लिए हम यहा ही ठहरती हैं ॥९॥ मधुमङ्गल-(चपलता पूर्वक) हे प्रिय मित्र यांई तरफ नही देख *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * [ २०२ जत्थ महं एसा ललिदाए सद्धराहिया समाप्रदा ! [ भो: प्रियवयस्य, वामत किन पश्यसि । एपा ललितया सार्थ राधिका समानता।] 111 श्रीकृष्णः- (मोत्कण्ठम्) विश्या साक्षादा मदीक्षणयो: सोल्य विस्तार्यते सस्था । मधुमङ्गग. (सगर्वम्) भो, कोस पवित्यारिदवं विमो दूदी हि। भी., कस्मान्न विस्तारयितव्य ययाह विदग्धो दूतो- ऽस्मि । १00 श्रीकृष्णः-ससे, पुर.स्थयोरपि मश्यियोरव्यलोक्ता नाधारयद- धारिता । यदाम्यां न संनिधीयते ॥१०१।। मधुमङ्गल:-पिअवअस्स, गुटटु पसरणं नहीं जानाहि । साभि- चलम्पिया मुरली झलपकइ । [ प्रियययस्य, सुष्ठ, प्रसन्ना राधां जानीहि । मरसाटिकाञ्चलाच्छादिता मुरली इलकति । ] ||१.२॥ श्रीकृष्ण:-(सस्नेहम्) रहे हो क्या? ललिता के साथ श्रीराधा आ रही है । ६८|| धौपुष्ण-(उरण्ठा सहिन) बाहा सा सौभाग्य ! आज राधा मेरे नेत्रों का आनन्द विस्तार कर रही है ICES मधुमशाल-(प्रयंपूर्वक) म । बयों न आनन्द विस्तार होगा ? जहा मुदा जमा परम चतुर दूत मौजूद है ॥१०॥ घोरण- मित्र ! सामने आ रही हैं, परन्तु अभी यह पूरा निश्चय नही है कि राधा और ललिता ही है, जब तक हमारे निबट नहीं मा जानी ॥१०॥ गमनस-प्रिय गणे! रापा बहुत प्राप्त हुई जानो, ययोपि उसमी माहीये अंगल में दिी हुई पनी पमक रही है। १०२॥ धीर - (जयंपा) गन्द्र दिन में विध्य हो जाता है और समान रात हो ही मंगगित हो जाता है, गव मेरी प्रिया गया। मुग जो मा शोभा २०३ ] * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-५* विधुरेति दिवा विरूपतां शतपत्र वत शर्वरीमखे। इति केन सदा श्रियोज्ज्वलं तुलनामहति मत्प्रियाननम् ॥१०३।२० (इति सकौतुकमनुसर्पति) (नेपथ्ये) वारिमहाणइ लच्छी इमं पुरी राइणी समुगमइ । चन्द्रामलीकुटुम्बअचओर मा धाअ सुप्पसहम् ॥ [ वापभानवी लक्ष्मीरिय पुरो रागिणी समुद्गच्छति । लन्दापतीकुटुम्बचकोर मा धाव सुप्रसभम् ॥ ] १०४।२१ मधुमङ्गल -ललिदे, भमिदासि । म श्खु चोरो । पेख एसो रहगोरमगो जेग वारिसाइ लच्छो कामिज्जइ। [ ललिते, भ्रान्तासि । न खलु चकोर । पश्यप रथाङ्गीरमण , येन वार्षभानवी लक्ष्मी. काम्यते।] (नेपथ्ये पुनरन्यत) सम्पन्न है, उसकी तुलना को कौन प्राप्त कर सकता है ? ॥१०३।। (इस प्रकार कहकर मन मे कौतुक मानते हैं) तब वेशभूषा-घर से आवाज आती है। वृप राशि-स्थिन मूर्य की शोभा रक्तवर्ण धारण कर आगे उदित हो रही है। जो च श्रेणी कुटुम्ब-चकोर । वल को प्रकाश करते हुए दौड मत पडना। {पक्षान्तर मे~अनुरागवती वृपभानुनन्दिनी को शोमा आगे उदित हो रही है चन्द्रावली-पुल के चकोर (हे कृष्ण) तुम बलात्कार करने के लिए मत दौड पडना) ॥१०४३२१॥ मधुमङ्गल-ललिते ' नुम भ्रम मे पड रही हो। यह चशेर नही है, देख यह चक्रवाक है । वृपराशि स्थित भानु को शोभा की कामना करने वाला है। [पक्षान्तर ने यह कृष्ण हैं वृषभानुनन्दिनी राधा की शोभा के इच्छुक हैं ] ॥१०॥ (वेशभूपा-घर के दूसरी ओर से आवाज आती है)
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ *
[२०४:
-
भो कण्ह, सुणाहि । [ भोः कृष्ण, शृणु । ]
मधुमङ्गल:- (विलोक्य सशङ्कम्) एपा डाहिणे विसालरस दहिणी
सारङ्गी णाम यालि। [ एपा दाक्षरणे विशालस्य भगिनी सारङ्गी नाम
बालिका । ] ॥१०॥
श्रीकृष्णः-ससे, मा डिमा: । सुष्टु बालिकेयम् । १०७॥
(प्रविश्य)
सारङ्गी-भो व ह. सुणाहि । वुट्टिा मुहला भगादि कीसहए
मम गतिणी अलोम सिन्ज । अं तुज्ज्ञ पंसिआ अम्हेहि पलि.आस्थे
दट्टा, ता मा गोहि रण ति। [ भोः कृष्ण, गृणु । वृद्धा मुखरा भणति-
कस्मात्त्वया मम नप्त्री मिथ्या दूप्यते । यत्तय वंशिकास्माभिः य दटिया-
हस्ते दृष्टा, तस्मान्मार्ग मेनामिति । ] ||१||
श्रीकृष्णः-सारङ्गिके, विज्ञापय मुखरा यदहं लब्धमुरलीकोरिम ॥१.६
(नेपथ्ये)
हला, पटना होहि । [ ससि, प्रच्छन्ना भव । ] ॥११०।।
:
-
मओ कृष्ण मुनो-
मधुमङ्गल- (देसकर सट्टा करते हुए) यह दक्षिण दिशा से विशाल
की वहन वालिया सारङ्गी आ रही है ।।१०६।।
श्रीकृष्ण-समे ! शसा मत करो। यह बालिका ही है ॥१७॥
(सारङ्गी प्रवेश करती है)
सारङ्गो-हे कृष्ण ! सुनो, वृद्धा गुगा ने यहा है कि तू मेरी
पोहतो रापा यो पयो भूटा दोप दे रहा है ? तुम्हरी वंशी हमने यमटि
बन्दरी के हाप में देनी है । इसलिए अपनी वशी को यहां जाकर दूण्ड।१८।।
धोरण-ओ मारङ्गि! तुम जाफर मुसरा को यतमा दो पि मुझे
मरी की मिल गई है ॥१०॥
(येगभूषा-पर में आवाज आती है)
गनि! पाजाभो ॥११॥
*श्रीविदग्धमाधव नाटक संङ्क-५ [ २०५ सारङ्गी-(नेपयाभिमुखमवलोक्य सेव्यम्) हला राहिए । चेश्वर- वखस्स तले तुम विदुदि आमालेदि मे भादुओ । ता तत्थ किति ण गदासि । [ हला राधिके, चैत्यवृक्षस्य तले त्वामाकारयति मे भ्राता। तत्तत्र किमिति न गतासि । ] ॥११॥ (नेपथ्पये) हदासे | साहासारङ्गमहि सारङ्गिए, तुम विदुर्दिा जटिला संवुत्ता। ता वुड्वसह लस्स तुण्डकोडरे पडेहि । [ हताशे शाखासारङ्गमुखि सारङ्गिके, स्वमपि द्वितीया जटिला सवृत्ता । तस्माद द्धशार्दूलस्य तुण्डकोटरे पत।। सारङ्गी-(सामपंम्) ललिदे । उल्लट्टिा म जैव तुम तेजसि । तामह गदुअ माउसिाए जडिलाए विण्णविस्सम् । [ ललिते । वैपरीत्येनं मामेव त्व तर्जजसि । तदह गत्वा मातृस्वस्त्र जटिलाय विज्ञापयिष्यामि । (इति निष्क्रान्ता)॥११३॥ मधुमङ्गल -(सावज्ञम्) जादु पाम, बालिआपलावे कस्स वीसम्भो? [ जातु नाम, बालिकाप्रलापे कस्य विधम्म ? ] ॥११४॥ (नेपथ्ये) सारङ्गी-(वेष-घर की ओर देखकर ईया सहित) ओ राधे । मेरा भाई अभिमन्यु चैत्य वृक्ष के नीचे बैठा तेरी इन्तजार कर रहा है, तू वहा क्यो नही गई ? ॥११॥ (वेशगृह से फिर आवाज आती है) ओ अभागिनी बन्दरमुखी सारङ्गिके तू भी दूसरी जटिला पैदा हुई है तू तो वृद्ध व्याघ्र के मुख मे जा पड ।।११२।। सारङ्गी-(क्रोध सहित) अरी ललिते ! तुम मुझे ही उल्टा धमका रही हो, अच्छा में जाकर मासी जटिला को बताऊगी। यह कहकर चली जाती है ) ॥११३॥ मधुमङ्गल-(अवज्ञा करते हुए) जाने दो, बालिका के प्रलाप का किसको विश्वास होगा। ॥११४|| (वेश-घर से आवाज आती है)
२०६ ]
* श्रीविदग्ध माधव-नाटकअङ्क-५ *
सखि राहे : मुञ्च मञ्च । [ सखि राधे ! मुन्च मुञ्च । ] 1।११।।
मधुमङ्गलः-भो! सुणाहि संफिदेण कि भणादि ललिदा । [भोः शूरम्
संस्कृतेन कि भगति ललिता।] ॥११६।।
(पुनर्नेपथ्ये)
कि तस्करी युवतिमानधनस्य वंशी-
मङ्क करोषि विकिर स्वरया विदूरे।
एषा प्रयातु
वनिताम्वरतस्कराय
योग्येन सङ्गमिह गच्छतु वस्तु योग्यम् ॥११७॥२२।।
श्रीकृष्ण:-(स्मित्वा) सखे ! पश्येयमचलाशी बलादिवाकृष्य पुर।
स्ताच्चिक्षेप । तदिमां गृहाण ॥११८।।
(मधुमङ्गलस्तपा करोति)
(नेपथ्ये दूरतः)
अन्मो! सारङ्गीए असचंण भणिदम् । [ मम्मो ! सारङ्गमा
असत्यं न भणितम् ] ||११६॥
श्रीकृष्णः-(सव्ययम्) सखे ! पश्य । पुरो निष्ठ रेयमुपस्थिता जरती।
सखि राधे ! छोड़ दे, छोड़ दे ।।११।।
मधुमगल-ओ! सुनना, नलिता क्या कह रही है ? ॥११६॥
(फिर वेश-घर से आवाज माती है)
युवतियों के मान रूपी धन को अपहरण करने वाली वंशो को गोद
में पयों लिये जा रहे हो ? झट इसे दूर फेंक दो । नारियों के यस्त्र पुराने
याले (कृष्ण) के पास जाओ । योग्य वस्तु योग्य वस्तु के साथ हो मिलित
हमा फरती है ।।११७॥२२॥
श्रीकृष्ण-(मुसकरा कर) समे। देखो, आँचल से जबरदस्ती वंशी को
पींचकर दूर फेर दिया है। तू जागर से आ ॥११॥
(मयुमङ्गस येसा ही करता है । वेगपर रो आवाज आती है)
ओ मा ! मारली असत्य नही पहा है ।।११।।
यौन-(दुगपूर्वक) मित्र ! देश, सागने निप्पुर मटिमा भा
रही है ॥१२०॥
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-५* [ २०७ मधुमङ्गलः-हन्त ! साअणकसणभुअनीव कूरमही एसा रोसा- वैसेण लट्ठि खिवन्तो परसं गज्जइ जडिला। [ हन्त ! श्रावणकृष्णभुजङ्गीव क्रू रमुख्येपा रोपावेशेन लकुटी क्षिपन्ती परुपं गर्जति जटिला। ] ॥१२॥ (नेपथ्ये) भो दुककुलङ्गारधूमलेहे ! पञ्चहं वञ्चसि दाणि का पउत्ती। [ भो दुष्कुलाङ्गारधूमलेखे, प्रत्यहं वञ्चपसे इदानी का प्रवृत्तिः ? ] ॥१२२।। मधुमङ्गलः-हद्धी, फअलीब्ब कम्पइ राहिआ। [हा धिक् । कदलीव कम्पते राधा। ] ॥१२३।। (नेपथ्ये) अज्जे ! पसोद, ण क्षु अम्हे अवरज्झम्ह । [ आर्य ! प्रसीद, प्रसीद न खलु वयमपराध्याम.। ] ॥१२४॥ मधुमङ्गल:-पेक्ख, राहि हत्ये घेत ण ललिदाए समं पत्थिदा बुदिआ। [ पश्य, राधिका हस्ते गृहीत्वा ललितया सम प्रस्थिता वृद्धा।] श्रीकृष्ण:-(सखेदम्) सखे ! न जाने किमद्य प्रतिपद्यते कठोरेयं मधुमङ्गल- हाय ! प्रावण के काले नाग की भांति कठोरमुखी जटिला क्रोधावेश में लाठी टेकते-टेकते जोर से गर्ज रही है ॥१२॥ (वेशधर से आवाज आती है) गरी दुष्ट कुलाङ्गार कलादिनि ! रोज तू मेरी वञ्चना करती है, यह कैसी करतूत ?॥१२२॥ मधुमङ्गल-हाय, हाय, राधा तो कदली वृक्ष की तरह काप रही है ॥१२॥ (पेशपर से) हे माय ! प्रसन्न होवो, हमने कोई अपराध नहीं किया है ।।१२४॥ मधुमङ्गन-कृष्ण ! देख, राधा का हाथ पकड़कर ललिता के साय वृद्धा जटिला चली जा रहीहै ।।१२।। धीकृष्ण-(दुःखपूर्वक) ससे ! न जाने यह कठोर जटिल। आज क्या २०८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५* जटिलो। तवपसृत्य तत्त्वमधार्यताम् ॥१२६।। (मधुमङ्गलो निष्क्रान्तः) श्रीकृष्णः-(निःश्वस्य) व्यक्ति गते मम रहस्यविनोदवृत्त रुष्टो लपिष्ठहृदयस्तरसागिमन्युः । राधां निरुध्य सदने विनिगहते वा हा हन्त लम्भयति वा यदुराजधानीम् ।।१२७॥२३॥ (प्रविश्य) मधुमङ्गलः-भो पिअवअस्स ! अच्चरिअम् अच्चरिमम् । पूरणं राहिआ फैपि पिज्जा जाणई । [ भोः प्रियवयस्य ! आश्चर्यम् आश्चर्यम् । नून राधिका कामपि विद्या जानाति । ] ॥१२८।। श्रीकृष्ण.-काश्यतां कीदृशी विद्या दृष्टा ? ॥१२॥ मधुमङ्गलः-भो ! कुलवुड्डाहोरीमण्डले णिविट्ठाए भभयदीए अग्गदो विषकोसन्तो जडिला राहिम गोदा। [ भो ! कुलवृद्धाभीरिमण्डले निवि: टाया भगवत्या अग्रतो विक्रोशन्ती जटिला राधिका नीता।] १३॥ (मधुमङ्गल चला जाता है) श्रीकृष्ण-(सम्यी सास छोड़कर) हाय ! मेरी रहस्य केलि को जान कर छोटे दिल वाला अभिमन्यु अति क्रोधित होकर, हो सकता है राधे को विसी गुप्त भवन मे बन्द फरादेगा या यदुराजधानी-मधुरापुरी में ही ले जाएगा ।।१२७॥२३॥ (मधुमङ्गल प्रवेश करता है) मधुमाल-हे प्रिय ससे ! बड़ा आश्चर्य है, निश्चय ही राधा कोई विद्या जानती है ।।१२।। धोकृष्ण-पहना, वैसी विद्या? ॥१२॥ मपुमङ्गल-बुस वृद्धा-गोपियों की मण्डली में जब भगवती पौणं- मासी पहुँधी ती जटिसा तिरम्पारपरते परते राधा को यहां से गई ॥१३० ॐ श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-५ * [ २०६ 7 धीकृष्ण:-ततस्तत ? ॥१३॥ मधुमङ्गल -तवो दिटुंमए सिरणेहेष विश्खुहिरासु तासु सम्घासु सा राहिबा ओग्गुष्ठरण उच्छारिन हसन्तो सुअलो सयुत्तो। [ ततो दृष्ट मया स्नेहेन विक्षुमितासु तासु सर्वासु सा राधिकावगुण्ठन मुत्सायं हसन्सुवल सवृत्त । ] ॥१३॥ श्रीकृष्ण.-(स्मिस्वा) तस्ततः ॥१३३॥ मधुमङ्गल - तदो हासकोलाहले उबरवे लाहिं सम्याहि निराम- छिछदा लज्जाए गदमही नटिसा पलाइदा! [ ततो हासकोलाहले उपरते रुष्टामि सर्वामिनिर्भत्सितालजया नतमुखी जटिला पलायिता । ] ॥१३४॥ श्रीकृष्ण -कथ्यताम्, तयोद्वितीया कपमभूत् २०१३।। मधुमङ्गलः-राहिलाए कपणे पहिदेग रेण वि मतेन पढम मेन्य सा दुन्दा फिदा। [ राधिकया फणे पठितेन पेशापि मन्त्रण प्रथममेव सा वृन्दा कृता।] 11१३६।। थीकृष्ण -ससे न राधिकाया चल्पिय विद्या, किंतु तामभि. मन्यना समाहृतामवधार्य महिनोदाय वृन्दया प्रणोतमिद कौतूहलम् ॥१३७॥ श्रीकृष्ण-फिर क्या हुआ॥१३१॥ मधुमङ्गल-मैंने फिर देखा कि स्नेह से सबवे शुभित होने पर राधा ने घूघट खोला और हसते हसते वह तो सुबल बन गई ।।१३२॥ धोकृष्ठ -(मुस्करा कर) फिर उसके बाद ॥१३३॥ मधुमङ्गल-फिर क्या था कि सव हसते हसते कोलाहल परने लगे क्रोध में आकर जटिला का तिरस्कार करने लग । जटिला अति लज्जित हो मुह नीचा कर वहां से भाग गई ॥१३॥ श्रीकृष्ण--यह तो बता दूसरी जो ललिता साय थी, उसका क्या हुआ ॥१३॥ मधुमहल-धीराधा ने उसके कान मे कोई मन्त्र पूरकर उसे पहले ही बना वृन्दा दिया था ।।१३६।। भोकृष्ण-मित्र । यह विद्या निश्चय ही राधिका की नहीं, रिन्तु २१० ॥ * श्रीविदग्ध माधव-नाटकअङ्क-५* मधुमङ्गल:-(साट्टहासम्) भो पिअवस्स ! समचं वित्र कहेसि; रिटु' भए पुगोवि युदाए णिम्मिदराहावेसो सुअलो मुहराघरे पविट्टो । [ भोः प्रिय वयस्य ! सत्यमिय कयसि; दृष्टं मया पुनरपि वृन्दया निर्मित- राधावेपः सुवलो मुख रागृहे प्रविष्टः। ] ॥१३॥ (नेपध्ये) मध्याह्नज्वलदरणकासप्रतिमया वपुस्तुलयं गडस्पलतुलितकारवचिः । शशाङ्गीयं निद्रापरिमलदरिद्राक्षिकमला ससो वाधां राधा हरिविरहाशिमा प्रययति ॥१३६॥२४॥ श्रीकृष्ण:-(सदृष्टिक्षेपम्) सधे दिया कोरणामुना समाश्वासि. दधाना तोऽस्मि ॥१४॥ अभिमन्यु उसे बुला रहा है । यह जानकर मेरे विनोद के लिए वृन्दा ने ही यह तमाशा रचा है 11१३३॥ मधुमङ्गल-(कहकहा लगा कर) ओ मिन्न ! तू सत्य ही कहता है । मैंने फिर देखा कि सुबल वृन्दा द्वारा बनाए गए राधावेश को धारण कर मुसरा के घर में प्रवेश कर गया ॥१३॥ (वेशधर से आवाज आती है) के कृशाङ्गी श्री राधा का शरीर श्री कृष्ण के विरह में व्याकुलता झारण मध्याह्न कालोन प्रज्ज्वलित मूर्यकान्त मणि की तरह लाल हो रहा है और उसका गण्डम्यल कारण्डय(वतस) की तरह पीला पड़ गया है । आवेश में उसके नेत्र पमल मुद्रित हो अतिशय दुस विस्तार कर रहे है ॥१३॥२४॥ धोरण-(ष्टि नीशप करते हुए) समे ! कैसे सौभाग्य को यात है कि इस शुक पक्षी द्वारा मैं आश्वस्त हो गया हूं ॥१४॥ मधुमास-नित्रय यह शुक वृन्दा के पापों का अनुकरण कर रहा है ॥१४॥ निद्रा
*श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-५
[ २११
मधुमङ्गल --पूण चुन्दाभासिद म फरेषि फोरो।। नून वृन्दा-
भाषित मनुकरोति कोर । ] ॥१४१॥
श्रीकृष्ण -सखे । द्रष्ठुमिच्छामि ताहो वृन्दासुवलो, ततस्त्वयंताम् ।
( मधुमङ्गलो वशी कृष्णकरे निक्षिप्य परिक्रामति )
श्रीकृष्ण -सुविच्युता परीमुपल्योऽस्मि, तदेना पूरयामि ।
(इति तथा करोति) ॥१४२।।
मधुमङ्गल - (क्षणमुत्वों भवन् सस्कृतेन)
मनोहारो कोऽपि प्रतिमुखविसारी मृदुतया
विरावोऽय वर्या श्रवणपरिचर्या रचयनि ।।
फर्णोत्त सीकृतचटुलवशी पतरुति-
निरातङ्का शङ्क मिलति फलविङ्कावलिरित ॥१४३॥ २५॥
(पुनविलोक्य) हो ही, सहसाघम्मेण पदारिदो म्हि ज, फणसिञ्जिद
पवु एवम् । [ ही हो, शब्दसाधम्र्पण प्रतारितोऽस्मि, यत् कणसिञ्जित
खल्वेतत् । ] ॥१४॥
तत
1
श्रीकृष्ण-मधुमङ्गल | मैं उसी रूप में वृन्दा और सुवल को देखना
चाहता है। इसलिए जल्दी करो।
(मधुमङ्गल श्रीकृष्ण के हाथ में वशो देकर लौट आता है)
श्रीकृष्ण-अनेक दिन की सोई हुई दशी वो आज मैंने 'फर प्राप्त
किया है । अत इसे बजाता हू । (ऐसा यह उमे जाने लगते है) ॥१४२।।
मामङ्गल(क्षणकाल के लिए वान ऊपर उठायर) सब दिशाओं
को पूरित करने वाले मनोहर अति मृदुस्वर से वागो का काई रस लावित
पर रहा है। इसलिए ऐमा जान पड़ता है कि मनोहर यशो यो मुन्दर
ध्वनि सुनव र समस्त ससीगण धान उठाए र यहाँ मा पहुचा हैं ।।१४३॥
(पिर ध्यानपूर्वच देशकर) ही ही एमा शम युनार मुझे धोका
हो गया। यह तो निश्चय ही पदणी को मपुर धान है ॥१८॥
ما
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ *
(ततः प्रशिति ललितयानुगम्यमाना राधा)
धीराधिका-
अमि पिअसि सुमहरं यमसि र विस्समोहणं विमम् ।
तुज्म ण दूसणमधवा मुरलि जदो दारुणासि किया।
[ अमृतं पिबसि सुमधुरं वमसि रुतं विश्वमोहनं विषमम् ।
तव न दूपणमथवा, मुरली! यतो दारुणासि कृता ॥] ॥१४५॥२६॥
ललिता-हसा! पुरवो पुण्णामस्स मूले कण्हो रेहदि । [ हला !
पुरत. पुन्नागस्य मुले कृष्णो राजते। | ॥१४६।।
मधुमङ्गल:-(विलोक्य सहपंम्) दूरे मागणिज्जो अत्यो कसम
जेध्य हत्थे उत्पिदो ? (इति परावृत्य) पिमयअस्स, पेषय, धुन्नाए सद्ध
सुअलो तुम संणिहि लद्धो। [ दूरे मार्गणीयोऽयः कथं स्वयमेव हस्त
उपस्थितः ? प्रियवयस्य ! पश्य, वृन्दया साधं सुबलस्तव सन्निधिं सब्धः। ]
कृष्ण:-(सस्नेहमालोक्य) हन्त ! प्रियसख्यौ प्रविष्टा मे दृष्टिः प्रका-
ममादते। ( इति परिकम्य ) मोः सखीनां शिखामणे ! तरसा नि.
धीयताम् ।।१४८॥
(तब ललिता के साथ श्रीराधा प्रवेश करती हैं)
श्रीराधा-अरी मुरलि ! तुम जो सुमधुर (कृष्णाघर!) अमृत पान
कर विश्य को विमोहित करने वाले विषम शब्दों को उगलती हो, इसमें
तुम्हारा कोई दोष नहीं है, क्योकि नुम कठोर काठ से ही तो बनी हो।१४५
सनिता-ससि ! सामने पुन्नाग वृक्ष के नीचे श्रीकृष्ण बैठे हैं.।१४६।।
मधुमाल-(देसफर आनन्द पूर्वक) यह फैसा आश्चर्य ! दूर में
'ट्रानने योग्य वस्तु अपने आप कसे हायों पड़ गई ? (इतना कह, लौट-
र)ह प्रिय मित्र कृष्ग ! देय वृन्दा के साथ मुवल तुम्हारे पास मा
रहा है ॥१७॥
पोष्ण-(नेह पूर्वक देखते हुए) आहा ! प्रिय ससा सुक्ल यो
देर मेरे नेत्र परम गुप का अनुभव कर रहे हैं । (पूमकर) अहो ! सपं
एमा शिरोमणि! गोननिस्ट आओ ॥१४॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * [ २१३ राधिका-(सम्मितमपवार्य) हला ललिदे । म पड सुअल जेव जाणादि दे वअस्सो। [ हला ललिते मा खलु सुबलमेव जानाति तव वयस्य ] ||१४६॥ श्रीकृष्ण - सखे मधुमङ्गल । पश्य सविधानकस्य किमपि सौष्ठवम् , यदसौ साक्षादग्रतो राधिका सवयस्या प्रतिभाति ॥१५०।। ललिता-हला राहिए। अपरिफुल्लो एसो सुरवल्लहो । [हला राधिक अपरिफुल्ल एप सुरवल्लभ । ] 10१५१।। मधुमङ्गल -(सेर्यम्)ठग्गिणि बुन्दे अज्ज वि कि ति अम्हारण पुरदो राही रहि ति भणासि ? सुअल ति उज्जुभ कहेहि । [उगिनि वृन्दे | अद्यापि किमित्यस्माक पुरत राधा राधेति भणसि ? सुबलेति ऋजुककथय ।।१५२।। श्रीकृष्ण - सखे मा त्वमेव खत्री प्रकाम राधाभिधान धिनोति माम, तदनेनाहमप्यामन्त्रयिष्ये। (इतिसन्निधाय) सखि राधे । परिष्वजस्य माम, क्षणमह तवेव प्रियाभिमशंसौख्यमनुभवामि ॥१५३।। ? श्रीराधिका-(मुस्कराते हुए हाथ की ओट मे) सखि ललिते । तुम्हारा सखा मुझको सुबल हो समझ रहा है ।।१४६।। श्रीकृष्ण-सखे मधुमङ्गल | देख तो, कारीगर का कैसा आश्चर्यमय सौष्ठव है, जो मुझे सामने आता हुआ यह सुबल साक्षात् सखि के सहित श्रीराधा की भाति लग रहा है ।।१५०॥ ललिता-सखि राधे । यह सुरवल्लभ अर्थात् पुन्नाग प्रफुल्लित नहीं हो रहा है ॥१५॥ मधुमङ्गल-(ईर्ष्या सहित) अरी ठगनी वृन्दे | अभी भी हमारे सामने 'राधा-राधा' ऐसे बोल रही है । यह सुबल है-ऐसो सीधी बात बोल ॥१५२॥ श्रीकृष्ण-ससे । तुम ऐसा मत कहो, राधा नाम मझे अतिशय सुख देता है. इसलिए मैं तो राधा-नाम से ही सम्बोधित करूंगा । (ऐसा कहकर निकट जाते हैं) सखि राधे । मुझे आलिंगन करो, क्षणकाल के लिए मैं उस प्रिया-आलिंगन के सुख को अनुभव कर सक्क् ।।१५३॥
२१४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक. अ५-* ललिता-(राधां पृष्ठतः कृत्वा ।) णामर ! तस्य गदुर सुअलं जेव्ध आलिङ्ग हि । अलं इमिणा दम्भमहापउएण। [नागर ! तत्र गत्वा सुवलमेवा. लिङ्गस्व । अलमनेन दम्भमुद्राप्रयोगेण । ] ॥१५४।। मधुमङ्गलः-(सरोषम् ।) बुन्दे, तुमं पइदिएवि पूर्ण ललिदा सयुत्ता, जं पज्जुस्सु पिअवअस्सं वारेसि । [ वृन्दे ! त्वं प्रकृतितोऽपि नूनं ललिता संवृत्ता, यत्पर्युत्सुकं प्रियवयस्य वारयसि । ] ॥१५।। : (प्रविश्य) वृन्दा-सखि राधे ! त्वद्भुजवल्लरीस्पर्शकामुकोऽयं पुरस्तात्तुं'नागः तदेनं दोहददानेनोत्फुल्लय ॥१५६।। मधुमङ्गलः-(सविस्मयम् ) वमस्स ! दि8 बुन्दाए इन्द्रजालम् ! (इति सकौतुकमवेक्ष्य ।) इन्द्रजालाणि पन्दे ! घणाइदी वि घूमलेहा विअद्ध- सारङ्ग आकर्णिादिहदि। [ वयस्य ! दृष्ट वृन्दाया इन्द्रजालम् । इन्द्र- जालानि वृन्दे ! घनाकृतिरपि धूमलेखा विदग्धसारङ्गमाक्रष्ट नाहति ।] ललिता-(श्रीराधा को पीछे करके) वहाँ जाकर सुवल को ही आलिंगन कर । यहा कपटपूर्ण चाल का कुछ भी प्रयोजन नहीं हैं ॥१५४॥ मधुमङ्गल-(क्रोध सहित) वृन्दे ! तू स्वभाव से ही निश्चय ललिता अर्थात् स्वेच्छाचारिणी नारी हो हो, जो उत्कण्ठित प्रिय सखा-कृष्ण को रोक रही हो ॥१५॥ (वृन्दा प्रवेश करती है) वृन्दा-सखि राधे ! भगवर्ती यह पुनाग तुम्हारी भुज-लताओं को मर्श करना चाहता है, इसलिए पुष्पोत्पत्ति को औपच विशेप द्वारा इसे प्रफुल्लित करो (पदान्तर में-ससि राधे ! अग्रवती यह पुरुप श्रेष्ठ श्रीकृष्ण तुम्हारी भुज-सताभो को स्पर्श करना चाहता है, अतएव उसको अभीष्ट त्ति करते हुए उगे आनन्दित मारो॥१५६।। मधमाल-(विस्मय मुक्त) मित्र ! देग रहे हो वृन्दा का इन्द्रजाल (ऐसा महकर पमित दृष्टि रो)अरी इन्द्रजालिनि वृन्दे ! तू पने घूए को मेष यताफर विदग्प मापन को आकर्षित नहीं कर पायेगी ।।१५।।
*श्रीविदग्घमाधव नाटक अङ्क-५५
[ २१५
वृन्दा-आर्य । तडिद्दामकण्ठीय कादम्बिनी प्रतीयताम् ॥१५॥
श्रीकृष्ण -(निभाल्य सविस्मयम्) कथ सत्यमेवानया रङ्गणमा-
लिकया दुस्स्पजकण्ठीय प्रिया मे वार्षभानवी ।।१५६॥
मधुमङ्गल-अइ देइ बुन्दे । पसीद पसीद, माखु बुद्धि मोहेहि ज
राहा चच्चरुक्खतले पत्थिदा । [अयि देवि वृन्दे प्रसीद, प्रसीद। मा खलु बुद्धि
मोहय । यद्राधा चैत्यवृक्षमूले प्रस्थिता।] ॥१६०।।
वृन्दा-आर्य । रङ्गणमालिकास्पर्शमानभिज्ञकण्ठी हनिमेव राधिका
विशाखा साद्ध तत्र गता ।।१६१॥
श्रीकृष्ण --- (राधामालोक्य) ।
तवानुकारात्सुबल दिक्षुणा मया त्वमाता पुरत सुदुर्लभा ।
सादृश्यत काचमिवाभिलष्यता प्रेमानभूमिर्वणिजा हरिन्मणि ॥१६॥२७
वृन्दा-आर्य । मेघमाला के कण्ठ मे यह विद्यु तमाला है ऐसा
विश्वास करो। (इसलिए अवश्य हो अकर्पण करने की शक्ति इस मे है ।
अर्थात् यह सुत्रल नहीं है, राधा हो है तडिद्दाम कण्ठी होने के असाधारण
लक्षण से कृष्ण ही इस तथ्य का परिचय पायेंगे) ११५८।।
श्रीकृष्ण-(देखकर विस्मय पूर्वक) सचमुच क्या यह रङ्गणमाला से
कण्ठ को विभूषित करते हुए मेरी प्रिया वृषभानुनन्दिनी आ रही है | ॥१५६।।
मधुमङ्गन-अरी देवि वृन्दे ' प्रसन्न होवो, कृपा करो, और अब
बुद्धि को विमोहित न करो । थोराया तो चैत्य वृक्ष के नीचे चली गई
हैं ॥१६०॥
वृन्दा--जिसके कण्ठ मे रङ्गण माला का स्पर्श नहीं हुआ है, यह
कृत्रिम राधा ही विशाम्वा के साथ चैत्य वृक्ष के नीचे चली गई है, वस्तुत
यही ही ययार्थ राधा है ।।१६१॥
श्रीकृष्ण-(श्रीराधा को देखकर) हे प्रिये । जैसे काच को दूण्ढने के
इच्छुक किसी वगिक को काच इण्डते टूण्डते आगे पृथ्वी पर पडी काच के
सदृश मरकट मणि प्राप्त हो जाए, उसी प्रकार मैं तो तुम्हारे समान वेशधारी
सुवल को देखने की इच्छा कर रहा था, किन्तु सदुर्लभ प्रेममयी तुम ही
मुझे प्राप्त हो गई हो ॥१६२॥२७॥
*श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-५ *
श्रीराधिका-चिट्ट, चिट्ठ, विण्णादोति । [तिष्ठ, तिष्ठ, विज्ञातोऽसि ।
ललिता-
जलइ सही मह राहो मन्दा जं होई पोलिणी-रामा ।
कण्ह तुमं पन्दसि न घण्णो हालिद्दराओ सि।
[ज्वलति सखी मम राधा मन्दा यद्भवति नीलिनीरागा।
कृष्ण त्वं नन्दसि यद्धन्यो हारिद्ररागोऽसि ॥१६४॥२८ ।]
श्रीकृष्ण:--
रोहिण्याघरशोमया विहरसे ज्येष्ठासि धाम यां
वाण्या राजसि चित्रया परिजनेप्यादा धियं यच्छसि ।
राध त्वं प्रयणोतरेति परितस्तारोदयोल्लासिनी
नाश्लेषापंणदीक्षिते मयि कथं दाक्षिण्यमातिष्ठसि? ॥१६५।२६
धीराधा-ठहरो, ठहरो, मैं जान गई ॥१६३।।
ललिता-हे कृष्ण ! हमारी प्रिय ससी राधा नील रागमयी होने से
मन्दमागिनी है, इसलिए निरन्तर जलती अर्थात् सतप्त होती रहती है । किन्तु
कृष्ण ! तुम हरिद्राराग मय होने से सदा आनन्द अनुभव करते रहते हो,इस-
लिए तुम धन्य हो ।।१६४॥२८॥
[ तात्पर्य यह है कि श्रीराधा का प्रेम नीले रंग की तरह पक्का है-
छुटाने से भी नहीं छूटता। इसलिए यह प्रेम में निरन्तर दुसी रहती हैं।
और श्रीरण या प्रेम हरिद्रा-पीले रंग की तरह कच्चा है-सहज मे एट
भी जाता है पर भी जाता है। इसलिए वे राषा के लिए अति कातर
नहीं रहत ]
श्रीकृष्ण-हे राधे ! तुम अरूण यणं अपरी की शोभा से सुशोभित
होने से समान गुन्दरियो ने प्रेम हो, विपित्र योनिनि होने के कारण
समात परिणरजना को गुपद बुद्धि प्रदान करने वाली हो। तुम्हारे समान
पान सो पिसी में ही नहीं। तुम मुतामाना से उल्लाग प्रयास करने
पापी हो। सर पिर भाना आलिंगन मुझे प्रदान पर तुम क्यों नहीं अनु
ममा विधान परतो हो? ॥१६॥२६॥
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * [ २१७ वृन्दा- मुघा मानोमाहादग्लपयपि किमङ्गानि कठिन रुषं घरसे किवा प्रियपरिजनापर्यन विघो। प्रकामं ते कुझालयगृहपतिस्ताम्यति पुर। कृपालक्ष्मीवन्तं चटुलय गन्तं क्षणमिह ॥१६॥३०॥ श्रीकृष्णः-- निष्ठुरा भव मृट्टी वा प्राणास्त्वमसि राधिके । अस्ति नान्या चकोरस्य चन्द्रलेखां बिना गतिः ॥१६॥३॥ श्रीराधिका-सच्छ माइणं वि तुम,मोहणोसि । सत्यम् ,मायिनामपि स्वं विमोहनोऽसि ।।१६।। (इति सशब्द कन्दति) ललिता-(संस्कृतेन।) धारा वाष्पमयीन याति विरति लोकस्य निमित्सत: प्रमास्मिन्निति नन्दनन्दनरतं लोभान्मनो मा कृथाः । वृन्दा-है कठोर चित्त राधे ! वृथा अभिमान में भरकर अपने अङ्गों को क्यों क्लेश दे रही हो ? और क्यों अपने प्रियजनों को प्रार्थना पर क्रोधित होती हो? देखो यह तुम्हारे मागे कुजालय गृहपति अर्थात् श्रीकृष्ण यथेष्टरूप से अधीन हो रहे हैं । अतः क्षण काल के लिए इन के प्रति कृपा शोभाशालिनि नेन-दृष्टि डालो ||१६६।। श्रीकृष्ण-राधिके ! तुम कठोर हो, या कोमल, किन्तु तुम ही मेरी प्राण-जीवन हो, जैसे चन्द्रकला,के बिना चकोर को और गति नहीं है । उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरो जीवन गति और नहीं है ।।१६७॥३१।। श्रीराधिका 1-सत्प हैं,आप मायावियों को भी विमोहित करने वाले हो। (ऐसा कहकर उच्च स्वर मे रोने लगती है) ॥१६॥ ललिता-सुन्दर ! मैं ने तो तुम्हें कहा था कि जो व्यक्ति नन्दनन्दन से प्रेम करता है, उमकी अपधारा कभी बन्द नहीं होती । इसलिए तु इन मे लोभवश मन न लगा। मैं ने तुम्हें कई बार रोका था, परन्तु है कोमल- २१८ ]. * श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-५ * इत्यं भूरि निवारितोपि तरले महाचि साचीकृत. ध्र द्वन्द्वा नहि गौरवं त्वमकरो कि नाद्य रोदिष्यसि ?।।१६९ (कृष्णः करारविन्देन राधिकाच विन्दुनपसारयति) श्रीराधिका~मुद्धजरणे वि वङ्क ववहरन्तो कोस ण लज्जसि ?[मुग्ध- जनेऽपि वक्र व्यवहरन् कस्मान लज्जते ? ] ॥१७०।। श्रीकृष्ण:- स्मरक्रीडालुब्धः पशुपरमगोपु स्फुटमहं तथाप्यक्ष्णोतिस्त्वमसि मम दिव्याञ्जनमयो । तपाद्याः किं भृङ्ग पृथुलमृतुलक्ष्मीनं भनते रसोल्लासादेनं तदपि हि मधुश्रीमंदयति ।।१७१।३३।। वृन्दा- सवि, यथा वक्ति वनमाली ॥१७२॥ श्रीकृष्णः-प्रिये, त्वया सहचर्या वनविहारचर्यामङ्गोकर्तुमिच्छामि । चित्त राधे ! तुमने मेरे वचनों का आदर नहीं किया बल्कि तेवड़ी चढ़ा ली थी। अव आज तू क्यों नहीं रोयगो ? ||१६६ ।। (श्रीकृष्ण अपने हस्तकमलों से श्रीराधा जी के अब बिन्दुओं को पोंछते हैं) धोराधिका-भोले-भाले व्यक्ति के प्रति टेढ़ा वर्ताव करने में क्या आप फोलना नहीं आती? ॥१७०।। थोकृष्ण-हे प्रिय ! यद्यपि में स्पष्ट रूप से समस्त गोपरमगियों के साप फन्दपंकेलि में लुब्ध रहता हूं, तयापि तुर हो मेरे नेत्रों के दिव्य मंजन फे समान हो । देसो ग्रोप्मादि सब ऋतुओं के पुषों पर क्पा मधुकर रमण नही करता? तथापि यसन्त अतिमाय शोभाशाली रसोल्लास से अमर को आमोदित किया ही करता है ॥११॥ पृन्दा-ससि ! वनवाली सच्ची बात कहते हैं ।।१७२।।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * वृन्दा-तेनाहं सखिवृन्दमवपधापयामि । (इति परितः पश्यन्ती।) स्मितं वितनु माववि प्रयय मल्लि हामोद्गम मुदा विकस पाटले पुरटयूथि निद्रां त्यज । प्रसीद शतपत्रिके भज लवङ्गवल्लि श्रियं बधार सह राषया हरिरपं विहारस्पृहाम् । १७४॥३४॥ मधुमङ्गल:-ही, ही कहं कतारजविखण्णीए वाआमेतएग उप्फुल्ली- फि वल्लीमण्डलम्! [ हो ही, कथं कान्तारयक्षिण्यो वाचामात्रेणोत्फुल्ली- कृतं वल्लीमण्डलम् !] ॥१७॥ श्रीकृष्णः-सखे ! चितमामोदयन्ति पुप्पामोदवत्यो मे वीरयः ।।१७६ मधुमङ्गलः-वअस्स ! तुम्हारा सम्बाओ चित्त मामोदेन्ति लदाओ, मम उण एक्का हेमजूही जेव, जा गोकुलेसरीए सक्कियं गवधि विस्थवा धारेइ ॥ [वयस्या युष्माकं सर्वाचितमामोदयन्ति लताः । मम पुनरेका हेम- श्रीकृष्ण-हे प्रिये ! तुम्हारे साथ वन-विहार आचरण करने की मेरी इच्छा है ।।१७३।। वृन्दा-तो मैं सब सखियों को सूचित किये देती हूँ। (यह कहकर चारों ओर देखने लगती है) ओ माय तू मुस्कान का विस्तार कर, ओ मल्लि के ! तू हास्योद्गम का प्रकाश कर, मरी पाटले ! आनन्द से तू प्रफुल्लित हो, हे स्वर्ण यूथिके तू नीद का त्याग कर, ओ शतपत्रिके ! तू प्रसन्न हो और हे लवङ्गवल्लि ! तू भाग्य मना, आज श्रीरापा के साथ श्री माधव विहार करने की इच्छा कर रहे हैं ॥१७४।। मधुमङ्गल-माहा, हा, कैसा आश्चयं । वनयक्षिणी इस वृन्दा ने कहने मात्र से ही सब लताओं को कैसे प्रफुल्लित कर दिया है ? ॥१७५।। श्रीकृष्ण-ससे ! ये पुणगन्धशालिनि लताए मेरे चित्त को आनन्दित कर रही है ।।१७६॥ मधुमङ्गल-मित्र ! तुम्हारे चित को ये सब लताएं आनन्दित कर रही हैं. यह बात ठीक है, परन्तु मुझे तो केवल एक यह स्वर्ण यूपी ही अच्छी लग रही है । जो गोकुलेश्वरी यशोदा के द्वारा निकाले हुए गोत २२० ]. * श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-५ * यथ्येव, या गोकुलेश्वर्या संस्कृतं गव्यधृततमिव स्तवकं धारयति । ] ॥१७७।। ललिता-(स्मित्वा) मज्ज! तदो क्खु पडदा दे रसाणदा । [ आर्य ! ततः खलु प्रकटा ते रसज्ञता ] ॥१७८|| मधुमङ्गलः-(सेप्यम्) वस्स ! पेपत्र पेक्ख, इमाओ रत्ताओवि वङ्कामो किसुअलिइआओ गोइआओ यि में ण सुहावेनि। [वयस्य! पश्य पश्य, एता रक्ता अपि चक्राकिंशुककलिका गोपिका इव मां न सुखयन्ति । ] ललिता-बुन्दे ! एदे वल्ला विम पेक्खीअन्तु जवात्थवा, जा क्यु लोअणलोहणिज्जा वि आमोदंण वित्यारेन्ति । [वृन्दे ! एते वल्लवा इव प्रेक्ष्यन्ता जवास्तवका., ये खलु लोचनलोभनीया अपि आमोदं न विस्तारयन्ति] मधुमङ्गल:-- (सरोपम्) जाणम्ह तुम्हारणं गोइआरणं कम्म जाओ रसकुम्भ दि दिदं णिम्मान्य सिणेहं कडन्ति । [ जानामि युग्माकं गोपि- काना कर्म, या रसकुम्भमपि दृढ निर्मथ्य स्नेहं कर्पन्ति । ] ॥१८॥ वृन्दा-(स्मित्वा ।) सखि ललिते ! की तरह स्तवक धारण कर रही ॥१७७॥ ललिता--(मुस्कराते हुए) आर्ये ! इसलिए तो तुम्हारी रसयज्ञा विरयात है ॥१७॥ मयमङ्गल-(ईया सहित) हे सखे ! देखो, देखो, ये सब रक्तवर्गा होते हुए भी वन पलास -की कलिया गोपिकाओ की तरह मुझे सुख प्रदान नही कर रही है ||१७६॥ ललिता- वृन्दे ! गोपगण की भांति इन सब स्तवकों को देख, ये देखने मात्र को ही सुन्दर है, किन्तु सुगन्ध द्वारा आनन्द विस्तार नहीं कर सकते हैं (अर्थात् ये श्रीकृष्ण देखने को सुन्दर है, इन में प्रेम की गन्ध नहीं है) ॥१०॥ मधुमङ्गल-(क्रोध सहित) मैं जानता हूं तुम सब गोपियों के कर्मों यो। तुम रस (दूध) कलशो को दृढता पूर्वक मकर स्नेह (मासन, पी) को निमाल लेने वाली हो- अर्थात दूध-दही को भी घी रहित कर देने वाली हो-तुम मे मना स्नेह सम्बन्ध कहाँ ? १८शा वृन्दा--(मुस्कराते हुए) ससि ललिते ! स्पष्ट रूप से जो पत्यर के
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक मङ्क-५ *
[ २२१
ये दण्डपाशभाजस्फुट वहन्तो मन शिलाकल्पमः।
कान्तारमाश्रयन्ते तेभ्यो व क्षेममुल्लसतु ॥१८२||३५।।
श्रीकृष्ण -(स्मित्वा) वृन्दे ! ज्ञात ज्ञातम् । बुद्धि मूच्र्छयता कूचि-
फालोमेन गोपिकाञ्चलग्राहिणी त्वं कृतासि ।।१८३॥
(नेपथ्ये)
कस्तूरिकेव दुरवच्छदसगमेयं
गोपीततिर्मदमयी किल पिच्छिला च ।
दाक्षिण्यतस्तनुभृतामनुरञ्जनोऽयं
वासन्नवायुरिव हन्त मुरान्तकारी ।।१८४ ॥३६ ।
श्रीकृष्ण --(पृष्ठतो दृष्टि क्षिपन् । साधु भो कोरराज | साधु ॥१८५
मधुमङ्गल -विहङ्गपुङ्ग' चउद्दहविज्जाविअक्खणो दोहाउ होहि ।।
[विहङ्गपुङ्गव । चतुर्दशविद्याविचक्षणो दीर्घायुभव ] ॥१८६ii
बने मन को लेकर दण्डा और रस्सी लिए दुर्गम वन मे डोलते हैं, ऐसे इन
लोगो से तुम्हारा कल्याण साधित हो, अर्थात् हमे इन से कुछ हित की
अभिलाषा नही दीखती) ॥१८२।।
श्रीकृष्ण-(मुस्कराकर) वृन्दे । मैं जान गया हू, जान गया हू, खुर-
चन के लोभ से तुम्हारी बुद्धि भ्रम मे पड रही है, तभी तू गोपियों का
पक्षपात कर रही है ॥१८॥
(पर्दे के पीछे से तोते की आवाज आती है)
गोपी मण्डली कस्तूरी की तरह दुर्लभ है-एव मादकता उत्पन्नकारी
तथा बडो चिकनी है। किन्तु अनुकूलता के कारण वसन्त की वायु की
भाति श्रीकृष्ण सबको सुलभ तथा सवको सुखप्रदान करने वाले
हैं ।।१८४॥
श्रीकृष्ण-(पीछे की ओर देखकर) ठीक है । शुक श्रेष्ठ । ठीक
है ॥१८॥
मधुमङ्गल-हे पक्षीराज तू चौदह विद्याओ मे विशारद हो, और
चिरजीव रह ॥१६॥
२२२ ] * श्रीविदग्धमाधव नाटक अ५-*
ललिता-हण्डे चण्डालकोर । पअण्डससाअणतुण्डराहणो पाहुणो होदु
दे पिण्डससी। हिण्डे चण्डालकीर । प्रचण्डशशादनतुण्डराहो प्राघुणो भवतु
ते पिण्डशशी ] ॥१७॥
यीकृष्ण-सखे । तूर्णमस्मै समपंय पाफिमानि दाडिमीबीजानि ॥
मधुमङ्गल -भो विन्दावणविहप्पए । दाडिमीवीमहिन्तो घि सुद्ध,
फन्त ललिदाए दन्तपत्ति दे दाइस्सम् । [ भो वृन्दावनवृहस्पते । दाडिमी-
बीजेभ्योऽपि सुष्ठु कान्ता ललिताया दन्तपक्ति ते दास्यामि । ] ॥१।।
(पुन पथ्ये)
चञ्चलसझाषण विभ मुहतराम तणोदि दे सामी ।
वहइ सिरणेह राही णवर अणोअपुत्तोव्व ।।
[ चञ्चलसध्यापन इव मुहूर्तराग तनोति ते स्वामी ।
वहति स्नेह राधा केवल नवनीतपुत्रोव ] ॥१६॥
ललिता-(सानन्दम्) सहि सारिये । सोहागवदी होहि, ज पच्चुत.
रेण णिज्जिदो तुए दुम्मूहो कारो। [ सखि सारिके । सौभाग्यवती भव,
यत्प्रत्युत्तरेण निजितस्त्वया दुर्मुस कीर ] ॥१६१।।
ललिता-अरे चाण्डाल भुव' | तुम्हारा यह शरीर, रूप, चन्द्रमा
प्रचण्ड वाजपक्षी की चोचरूप राहु का अतिथि जा बने । (अर्थात् तुम्हें वाज
पक्षी निगल जाए) ॥१७॥
धोकृष्ण-मधुमङ्गल । शोघ्र इस शुकपक्षो की पके हुए अनार के
दाने हाल दो॥१८॥
मधुमजल-हे वृन्दावन वृहस्पति । अनार ये दानो की अपेक्षा भी
मति सुन्दर यातिपाती मलिता के दान्त तुम्हे ला दू गा ॥१६॥
(पर्दे के पीछे से सारिका की आवाज आती है)
अरे पश्चल शुक्र । तुम्हारा स्वामी श्रीकृष्ण रक्त सध्या थी भाति
पण मान अनुराग प्रनारा दिया करता है, किन्तु श्रीराघा नयनीत की पुतली
मी माति सर्वदा म्नेह ही धारण करती है ॥१६०ll
मलिता-(आनन्द सहित) सगि सारिये । सौभाग्यवती हो, ययोंकि
तुमो आज प्रत्युत्तर देवर इस दुमुप शुक को पराजित कर दिया है॥१६॥
*श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-५ [ २२३ श्रीकृष्णः-(स्वगतम्) ध्रुवं वृन्दयेदमध्यापितकोशलं विहङ्गमयो- द्वन्द्वम् ॥१२॥ मधुमङ्गल - (सक्रोधम्)हञ्ज, भज्जैमि दे तिक्खजप्पिणं च पुष्टम् । [हण्जे, भनज्मि ते तीक्ष्णाल्पण चञ्चुपुटम् । ] ॥१३॥ (इति सव्याज दण्ड सिपति) श्रीराधिका-हन्त, कय उड्डोणं वायदा विहङ्गमिहुणम् । [ हन्त, कथमुडीन वावदूक विहङ्गमि युनम् । ] । १६४॥ श्रीकृष्ण -(राधामवेक्ष्य) सेवन्ते तरगेहिन सुमनसां वृन्दैमधुस्पन्दिमि- यंत्रोत्फुल्ललतावधूभिरभित सगत्य भृङ्गातिथीन् । सवीता पशुभिस्तथा खगकुले खेलद्भिरव्याहतं न स्पाकस्य सुकण्ठि सेयमधिकानन्दाय वृन्दाटबो' ।। १६५ अपवा- हरिणीविडम्बयसि नेप्रखेलया ललितलतापिककुलं फलोक्तिमि । श्रीकृष्ण-(अपने मन मे) निश्चय वृन्दा ने ही इन दोनो पक्षियो को इतनी निपुणता को शिक्षा दी है ॥१८ । मधुमङ्गल-(क्रोध सहित) अरी दासी । कटुवचन बोलने वाली तेरी चोच को अभी तोडे देता हू (यह कहकर छलपूर्वक अपनी लाठी को फैकता है) ॥१३॥ धीराधिका -हाय प्यारा वोलने वाले दोनो पक्षी क्यो उड गये? १९४ श्रीकृष्ण-(श्रीराधे को देखकर) हे सुकण्ठि | जिस वृन्दावन के वृक्षरूप ग्रहस्थजन लतारूपी बन्धुओ के साथ मिलकर पुप्पो मे चुचाने वाले मकरन्द से भवररूपी अतिथियों की सेवा किया करते हैं और जिन पर सर पशु-पक्षी स्वच्छन्द रूप से सर्वदा विहार करते हैं, वह बीवृन्दावन किस का आनन्द वर्घन नहीं करता है ? ॥१६॥ अथवा-तुम्हारे आगे इस श्रीवृन्दावन वो शोभा वर्णन करने का कोई प्रयोजन नहीं है, क्योकि तुम अपने नेत्रो द्वारा हरिणियों को लज्जित फरने वाली हो, तुम्हारे मनोहर अजी को देखकर ननाएं पराजित होती २२४ ] * श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-५" शिखिनश्च कुन्तलकलापविनमैरिति ते पुर किमिव मे वनश्रिया ॥१५ वृन्दा-पश्य पश्य, विरतोमिरिय सुनीरजा धृतशुद्धोज्ज्वलसत्त्वसतति । स्फुटकृष्णचिर्यमाहता मुनीगोप्ठोव चकास्ति भानुजा ॥१९७॥४० कृष्ण --प्रिये, पश्य पश्य, स्मितरचिविराजित ते मुखमिव नीराजयत्यधीराशि। नीरजबान्धवदुहितुनीरजराजो मरुद्भ्रमिता ॥१८॥४१॥ वृन्दा-( परिक्रम्य नीरजान्याहृत्य च । ) पुण्डरीकाक्ष | स्तोकोत्फु लमिद गृहाण लीलापुण्डरीकम् । तथावतसोचित कोकनदद्वन्द्वम् ।।१।। श्रीकृष्ण - (सहर्षमादाय ।) वृन्दे । रक्तोत्पले राधाकरर्णयोराधानेत श्रिय लभेताम् । (इति तथाकृत्वा सकौतुक म्) हन्त, पुण्डरीकको चञ्चरोको । घर्तते ॥२०॥ हैं तुम्हारी सुमधुर बोलिन कोकिलाओ के कुल को लज्जित करती है एव मोर केश-वलाप के सौष्ठव को देखकर अपने को तुच्छ ही मानते हैं । अतएव है रापे । तुम्हारे आगे क्सि की शोभा वर्णन की जा सकती है ।।१६६।। वृन्दा-देखो, देखो, यह सूर्य कन्या यमुना तरङ्गो से रहित हो रह है और कमलो से अतिशय शोभित होकर शुद्ध सत्योज्ज्वल श्री एव कृष्ण- वण कान्ति धारण करते हुए मुगियो की मण्डली की तरह विराज रही है ॥१७॥ धोकृष्ण-हे प्रिये देखो, देखो, अरविन्द बन्धु नन्दिनी (सूर्यकन्या- यमुना) की कमल श्रेणी वायु से आन्दोलित होकर तुम्हारे मुस्कान भरे मुग्न मण्डल वी आरती उतार रही है ॥१९८॥ वृन्दा-(जाफर कुछ कमल ले आकर) है कमलनयन । यह अधसुले श्वेतवर्ण के लीला कमल तया कर्णभूपण के योग्य ये दो लाल वमल ग्रहण कीजिए ॥१६॥ श्रीकृष्ण-(हर्ष सहित लेते हुए) वृन्दे ये लाल कमल तो राधे के पानो म विभूषित और विस्तार करें (ऐसा कहकर उन यमलो पो *श्रीविदग्धमाधव नाटक बङ्क-५ [ २२५ वृन्दा- मधुप कमलेन सार्धमुग्रन्मकरदन्देन मुकुन्दमासप्ताद । सरसेषु विनिमितो हि सङ्ग परमानन्वभरोतति तनोति ॥२०॥४२।। श्रीकृष्ण -प्रिय पश्य पश्य अस्मिन्मदीयकरसङ्गिनि पुण्डरीक-- कोशे क्षण किल बिलम्ब्य शिलीमुखोप्यम् । कर्णावलम्बि तब कोकनद प्रपेदे क वा बलान हि हरत्यनुरागलक्ष्मी ।।२.२॥४३॥ (राधिका सभ्रम नाटयन्ती मुजलता क्षिपति) श्रीकृष्ण -(स्फुट विहस्य) फर्णोत सितरक्तपङ्कजजुषो भृङ्गीपतेझनिया- भ्रान्तेनाद्य हगञ्चलेन दघती भृङ्गावलौविभ्रमम् । राधा के कानो मे अर्पण करते हुए आश्चर्य पूर्वक कहते है) आहा ! इस श्वेत कमल मे तो भ्रमर बैठा है ।।५००॥ वृन्दा-मकर-द युक्त कमल के साथ मधुकर आज मुकुन्द को प्राप्त हुआ है, क्योकि रसशालि वस्तु (श्रीराधा) के साथ मिलन हुआ है न । यह मिलन परमानन्द की आतिशयता की वुद्धि विस्तार करे ।।२०।। श्रीकृष्ण-हे प्रिय देखो, देखो-मेरे हाथ के श्वेतकमल मे यह मधु- कर कुछ क्षण रहकर अब तुम्हारे कर्णभूषण लाल कमलो पर जा बैठा है यत अनुराग लक्ष्मी बलपूर्वक क्सिको नही आरपंण करती? वरन् सवको ही अपनी ओर आकर्षित करती है । २०२।। (श्रीराधा सभ्रम पूर्वक भुजाओ को निक्षेप करने लगती है। श्रीकृष्ण-(जोर से हसते हुए) हे राधे । आज तुम कर्णभूषणो के स्प म धारण किये हुए लाल कमलो पर गुखार करते हुए भवरो की ध्वनि से नेत्राबलो को भात कर मधुकरवृन्द की भाति विभ्रम धारण कर रही हो, भयवश अपनी भुजलताओ को आन्दोलित करते हुए चूडियो को झकार २२६ * श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-५५ त्रासान्दोलितदोलतान्तविचलब डाझणत्कारिणी राधे घ्याकुलतां गतापि भवती मोदं ममावास्यति ॥२०३५१४४ श्रीराधिका-(सत्रासं चेलाञ्चलमुदञ्चयन्ती । ) कथं अज्जवि ण चलदि धिट्ठो? कथमद्यापि न चलति धृष्टः? ] ॥२०४॥ श्रीकृष्ण:- मधुराक्षि ! मुघाद्य संभ्रमेण क्षिप चेलाञ्चलमञ्जसा न भूयः । पिबतु श्रवणोत्पलोद्गतं ते मधुपोऽयं मधुमङ्गलं कृशाङ्गि ।।२०५॥४५॥ मधुमङ्गल:-भो वअस्स ! कोस बम्हरणं मं महुवेण पिवाएसि ? [ भो वयस्य ! कस्माद्ब्राह्मणं मा मधुपेन पाययसि ? ] (इति दण्डेन भ्रमरं साडयति ।) ॥२०॥ श्रीराधिका-(सश्लाघम् ।) अज्ज ! पिअंकरो ममासि संवुत्तो। [आर्य ! प्रियंकरो ममासि संवृत्तः । ] ॥२०७॥ मधुमङ्गलः-कहं महसूअणो तरकालं जेव्य तिरोहिदो, जं कुदो विण लक्खोअदि। [कथ मधुसूदनस्तकालमेव तिरोहितः, यत्कुतोऽपि न लक्ष्यते?] कर व्याकुलता को प्राप्त कर रही हो, तथापि मुझे अतिशय आनन्द प्रदान कर रही हो ॥२०॥ श्रीराधिका-(भयपूर्वक वस्त्रांचल को निक्षेप करते हुए) अभी भी यह दीठ भ्रमर क्यों नहीं जा रहा है ।।२०४॥ श्रीकृष्ण-हे मधुराक्षि आज भयभीत होकर तुम यार-बार अपने वस्त्रांचल को वृथा मत फको। हे कृशाङ्गि! इस मधुकर को स्वच्छन्दरूप से अपने कर्णोत्सल के मधु-मङ्गन को (मङ्गलमय मकरन्द को) पान करने दो ॥२०॥ मधुमङ्गल-हे सये ! किस लिए मुश ब्राह्मण को इस मधुप द्वारा पान (भोजन) करवाते हो ? (यह कहकर डण्डे द्वारा मधुकर फो प्रहार करता है) ॥२०६॥ घोराधिका-(प्रशंसा करते हुए) आयं ! आज तुम मुझे भी प्रिय लग रहे हो ॥२०॥ मधुमङ्गल-यह क्या ! मधुसूदन अति शीघ्र पहां छिप गया ? यह
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क- *
[
२२७
श्रीराधिको-(सव्यामोहम्) हद्धी हद्धी, कहिं गदो महुमहणो' [ हा
धिक् हा धिक् । कुत्र गतो मधुमथन ।]
(इति सस्कृतेन)
समजनि दवाद्विनस्ताना क्मिातरवो गवा
मयि भिमभवद्वैगुण्य वा निरङ्क शमोक्षितम् ।
व्यरचि निभृत किं वा हूति कयाचिदभीष्टया
यदिह सहसा मामत्याक्षीद्वने वनजेक्षण ॥२०६।४६
(कृष्ण सज्ञया सर्वानिवार्य स्मित करोति)
श्रीराधिका-हन्त हन्त, (सस्कृतेन ।)
वासन्तीभिरयन मे कचभर फसारिणोत्त सित-
स्तस्योरस्थलघुम्बिचम्पकमय गुम्फि माल्य मया।
मल्लीभिश्च निरर्गल परिहसन्नाय बलात्ताडित
प्रारम्भेऽद्य वनोत्सवस्य विरहच्छमादय प्रोगात ॥२१०॥४७॥
7
।
तो अब कही नही दीखता है ॥२०८।।
श्रीराधिका-(व्याकुल होकर) हाय ! हाय ।। कहा गये मधुसूदन ?
क्या दावानल के भय से व्याकुल होकर गौओ ने आत्तं ध्वनि की है ? या
मेरे ही किसी निरकुश दोष को उन्होंने देखा है । अथवा कोई प्रियतमा से
ही उन्हे सकेत देकर निभृत स्थान पर ल गई है वरना कमललोचन एक-
दम मुझे इस वन मे छोडकर क्यो चले गए हैं ? ॥२०६।४६
(श्रीकृष्ण इशारे से सबको अपने वताने का रोककर हसते है)
धीराधिका-हाय हाय श्यामसुन्दर ने माधवी पुप्पो से मेरे
केशपाशो को विभूपित न किया और न ही मैं चम्पक कलियो से उनके वक्ष-
स्थल को चुम्बन करने वाली माला ही गूथ सकी । और स्वच्छन्द रूप से
परिहास करते करते जोर से उनकी मल्लीपुष्प मे ताडना भी न कर पाई।
हाय | आज वन विहार आरम्भ होने से पहले ही विरह ये छल से दावानल
मा उपस्थित हुई। २१०॥४७॥
२२८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५ * वृन्दा- (अपवार्य।) काममन्धंकरणीयं प्रेमबन्धकन्दली या खलु विस्प- एमपि नानुसंधापयति ॥२११॥ थीराधिका--(पुरो विलोक्य) सहि बुन्दे ! रक्खेहि मम् । (इति त्रास नाटयन्ती।) सप्पी सप्पइ मिङ्गपत्तिमिसदो कालो रसालांकुरे रत्तासोअसिरे विरेहइ तधा पुप्फच्छलादो मिहीं । सिङ्गे केसुअसाहिणो अ फलियादम्मेण संभेदिणो में भे कुसुमाउहस्स वलइ पकूराद्धचन्दाअली ॥ [ सखि वृन्दे ! रक्ष माम् । सपी सर्पति भृङ्गपक्तिमिपतः काली रसालांकुरे रक्ताशोकशिरसि विराजति तथा पुष्पच्छलाच्छिखी। शृङ्ग किंशुकशाखिनश्च कलिकादम्भेन संभेदिनी मां भेत्तं कुसुमायुधस्य वलते क्रू राधचन्द्रावली। ] ॥२१२।१४८८ (इति वैवश्यं नाटयति) श्रीकृष्णः- (संभ्रमादभ्युपेत्य पाणि गृह्णन्न च।) सुशुमारि ! किम- काण्डे कातरासि ? यतः। वृन्दा-( हाथ की ओट में ) प्रेमवन्धन का अकुर अच्छी प्रकार अन्धा ही कर देता है, जिससे स्पष्ट रूप से दीखती हुई वस्तु को भी वह नहीं देखने देता ॥२११॥ श्रीराधिका-(सामने देखकर) हे सखिवृन्द ! मेरी रक्षा करो। (यह कहकर भय प्रकार करती हुई) यह देसो, कालरूपी कालीसर्पिणी मधुकर पक्ति के छल से आम्र मुकुल को ओर जा रही है, अग्नि पुष्प बनकर अशोक वृक्ष के नवीन पल्लवों पर बैठ रहा है, और पलाश वृक्ष की कलिका के रूप ने कंपं का मर्मभेदी क्रूर अद्धं चन्द्रावली नामक अस्त्र मुझे फाड़ने फे लिए दम्भपूर्वक जबरदस्ती कर रहा है ।।२१२।।८।। (यह कहकर वेसुध हो जाती है) पोष्ण-(तत्काल निकट आकर श्रीराधा का हाथ पकड़कर उच्च स्थर मे) है सुकुमारि ! तुम बिना कारण इतनी व्याकुल यों हो? जय *श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-५ [ २२६ ? त्वमुखलक्ष्मोग्लपिता चन्द्रावलिरिह विभेतिपूर्णापि । प्रणयान्धे तव क्तुं विमर्घ चन्द्रावलो क्षमते? ॥२१३।।४।। श्रीराधिका-( सधैर्य लज्जा नाटयन्ती स्वगतम् ! ) कचं अच्छिलाग चेअ हारिदं मणन्ती खिण्णन्हि । [ कथमक्षिलग्नमेव हारित मन्यमाना खिन्नस्मि ? ]॥२१४॥ श्रीकृष्ण -प्रिये । पश्य पश्य, परिणतयनीजस्पधिदन्तोरुमास कुसुममुपहसन्त्यास्तन्वि दन्तच्छदेन । फलविजयि कुचायास्त्वद्भयाद्दाडिमोय मृदुलपवनदोलादम्भत रम्पतेऽद्य १२१५॥५०॥ वृन्दा-सखि राधे निर्वर्णय तव कणिकोचितफोरक कणिकारममूम। श्रीराधिका- पणअकपिणारफुसुमे भसलो रसलोहणिच्चलो भोदि। [ नवकर्णिकारकुसुमे भसलो रसलोभनिश्चलो भवति ] ॥२१७॥ तुम्हारे मुख को शोमा को देखकर चन्द्रावलि भी भयभीत (ग्लानियुक्त) हो रही है. फिर हे प्रगग्रान्धे । अर्द्ध चन्द्रावलि तुम्हारा क्या कर सकेगो ॥२१३ श्रीराधिका-(धर्मपूर्वक लज्जित होकर अपने मन ही मन मे) हाय नेत्रो से लगो वस्तु को खोई हुई मानकर कैसे व्याकुल हो रही हूँ ? ॥२१४॥ श्रीकृष्ण-प्रिये देखो, देखो, तुम्हारे दांतों की पक्ति की शोभा को अपने पके हुए वीज या दानो की स्पर्धा-निन्दा करते हुए देखकर, एव तुम्हारे अधरोष्ठ द्वारा अपने फलो का परिहास होता जानकर तथा अपने फलो क शोभा को तुम्हारे उरोज युगल को शोभा द्वारा पराजित हुआ देखकर, हे कृशालि । आज यह दाडिमी (अनार का वृक्ष) कोमल पवन से आन्दोलित होने के चहाने भयभीत होकर मानो काप रही है ।।२१।। वृन्दा-सखि राधे । अपने कर्णभूपण योग्य कोरक (कलिका) श ली इस कलिका के वृक्ष को देखो ।।२१६।। धौराधिका-नवीन कगिका-पुष पर रसलोमी भ्रमर निश्चल रूप से शोभित हो रहा है ।।२१७॥
२३० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-* श्रीकृष्ण:- काञ्चनमञ्चनिविष्टो रसराजोऽयं शरीरोव ॥२८॥५१॥ श्रीराधिका-पेयख पेक्ख । [प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व ।] (संस्कृतेन) उद्धरमरन्दमत्ता रद्ध सारेण गन्धविसरेण । इह सुन्दर मल्लिगणे रोलम्बा हन्त गुञ्जन्ति ॥२१६॥५२॥ (कृष्णः 'उद्धरमरन्द-' इत्यादि पठति ।) वृन्दा- पीतातिसूक्ष्मशिखरा चम्पककलिकेयमायताभाति ॥२२०॥ श्रीकृष्णः- मानवतोहुन्मपनी हैमो कामस्य शक्तिरिव ।।२२।५३।। मधुमङ्गल:-भोवअस्स, एसा कामस्स सत्ती ण होइ । पेक्ख, जडिला. पिखत्ता सा हरिमालगोरो ल उडिआ। [ भो वयस्य ! एपा कामस्य शक्तिन भवति । पश्य, जटिलाक्षिप्तां सा हरितालगौरी लकुटिका 1 ] ॥२२२॥ (प्रविश्य) धोकृष्ण-स्वर्ण मंच पर बैठा हुआ यह रसराज हो मानो शरीर धारण कर रहा है ॥२२॥ श्रीराधिका--देखो-देखो, अतिशप सुगन्ध विस्तार से अवरुद्ध करने वाले मनोहर मल्लिपुष्प पर मकरन्द में मस्त हुए सब मधुकर गुंजार कर रहे हैं ।।२१६॥ (श्रीकृष्ण -"ऊद्ध र मरन्द"-अर्याद मकरन्द मत्त-इस पद को बार यार कहने लगते हैं।) वृन्दा-पीत एवं सूक्ष्माग्रमाग वाली यह चम्पक फलि अत्यधिक शोभा पा रही है ॥२२०॥ धोकृष्ण-मानयतो रमणी के हृदय को मन्यन कारी मान्दपं को शक्ति पी भांति-भोमा पा रही है) ॥२२॥ मयुमङ्गल हे मित्र! यह फन्दर्य को शक्ति नहीं है। देस, जटिला द्वारा फैली हुई वह पोलो-पोरी मयुटी है ।।२२२।।
* श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क ५* [ २३१
जटिला-अरे जिम्ह बह्मण, एत्य लगुडी मए विसुमरिदा ।
[ अरे कुटिल ब्राह्मण ! अन लगुडी मया विस्मृता।] ॥२२३॥
श्रीराधिका-(अपवार्य समयम् ) सहि परित्ताहि, परित्ताहि, एसा
कालरत्तीव्व दारुणा वुड्डोआ मं दिट्ठवदी। [ सखि ! परिवायस्व परिमायस्व।
एपा कालरात्रीव दारुणा वृद्धा मा दृष्टवती। ] ॥२२४।।
(इति ललितावृन्दाभ्यां सह निष्कान्ता)
श्रीकृष्ण.--( अपवार्य।)
मम संगमामृतरसं न जिघृक्षति न च जिहासति प्रकटम् ।
जटिलाव्याघ्रीचकिता तृपिता राधाकु ॥२२५॥५४॥
मधुमङ्गल ~भो सरमालाङ्ग लकुडिले । घेप्प अप्पणो जट्ठिम् ।
[ भो सरमालाङ्ग लकुटिले गृहाणात्मनो यष्टिम् ] ॥२२६॥
जटिला-(यष्टिमादाय । ) अरे सुअल | कोस तुम बहुडिावेसेण
में सदा विडम्बेसि ? [ अरे सुअल | कस्मात्त्व वधूटिकावेशेन मां सदा
विडम्बयसि ? ] ॥२२७॥
(जटिला प्रवेश करती है)
जटिला-अरे कुटिल ब्राह्मण ! मैं यहां लाठी भूल गई थी ।।२२३।।
श्रीराधिका-(कानाफूमी करती हुई भयभीत होकर) सखि ! मेरी
रक्षा करो, रक्षा करो। कालराति को भांति इस दारुण वृद्धा ने मुझे देख
लिया है ।।२२४॥
(ऐसा कहते हुए ललिता तया वृन्दा के साथ श्रीराधा चली जाती हैं)
श्रीकृष्ण-(हाथ की ओट कर) जटिला रूपिणी व्याघ्री के मय से
तृष्णाकुला गधारूपो हरिणी स्पष्ट रूप से मेरे सङ्गमरूप अमृत रस का न
तो आस्वादन कर पाती है और न त्याग हो कर सकती है ।।२२।।
मधुमङ्गल-अरी कुक्कुर-लागुलनुल्य बुटिले । यह ले अपनी लाठी।
जटिला--(लाठी लेकर) अरे सुवल' रिम लिए तू मुझे सदा वधू-वेध
धारण कर धोका देता है । ॥२२७॥
२३२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५* श्रीकृष्णः-(स्वगतम् । ) दिष्टया सुवलतया ज्ञातमभूत् । (प्रकाशम् सनर्मस्मितम् । ) जटिले ! गुरुभ्यः शपमानोऽस्मि, राधिर्फव साधयति, न सल्वसो सुबलः ॥२२॥ जटिला- रे धूत्त ! विअक्खणाहं सर्व परीक्खिदुखमम्हि । ता अलं एत्य ठग्गतऐण। [ अरे धूर्त ! विचक्षणाहं सर्व परीक्षितुं क्षमास्मि, तस्मा- दलमत्र ठगत्वेन ] ॥२२॥ (इति निष्क्रान्ता) श्रीकृष्णः-ससे ! समागच्छ, गोकुलमेव प्रविशावः ॥२३०॥ ( इति निष्क्रान्ती) 1 इति निष्क्रान्ताः सर्वे) इति श्रीविदग्धमाधव-नाटके श्रीराधाप्रसादनो नाम पञ्चमोऽङ्कः ॥५॥ श्रीकृष्ण-(मन में) वाह ! कैसा सौभाग्य ! अब भी इसे राधा सुबल ही दिसाई दी है । (स्पष्ट परिहास पूर्वक हंसी करते हुए) जटिले ! मैं गुरु- जनों की दशपथ खाता हूँ, यह राधा ही जा रही है, सुबल नही है ॥२२८॥ जटिला-अरे धूतं ! में चतुर हूँ, मैं सब की परीक्षा करना जानती हूं। वस मेरे सामने और धूतंता मत करना ॥२२६।। ( यह कहकर चली जाती है ) धोकृष्ण-मित्र मधुमङ्गल ! आओ, हम गोकुल चलते हैं ।।२३०॥ (यह कहकर चले जाते है) (इसके बाद सब चले जाते हैं) इस प्रकार श्रीश्यामदामानुयादित प्रोपिदग्धमाधव नाटक का 'राधाप्रसाद-गामर पाचया अंक समाप्त हुआ।।५।।
पाठोऽङ्कः। . (ततः प्रविशति जटिला) जटिला-सुदं मएनं अज्ज पोअपडेण विदुत्तरीआ वह घिरे चिट्ठइ । ता गदुइ जहत्यं णिद्वारइस्सम् । (इति परिक्रम्य पश्यन्ती) कधं एसाविसाहा घुम्मिा घुम्मिअ अलिन्दे पड़ई ? ता सद्दाइस्सम् । (इत्युपैमृत्य ।) विसाहे'! जादो एक्कपहरो, तहवि घुम्मसि ? [श्रुत मयाँ यदद्य पीतपट्ट न कृतोत्तरीया वधू हे तिष्ठति । तद्गत्वा यथार्थ, निर्धारयिष्यामि । क्यमेपा विशाखा पूर्णि- वा घणित्वा अलिन्दे पतति तच्छब्दायिष्ये । विशाखे ! जात एकप्रहरस्त- थापि पूर्णसे ? ॥१॥ (प्रविश्य) विशाखा-(स्वगतम्) संपदं रासमहूसयगम्भासु सव्वरीसु कूदो णिहा- गन्धोवि अम्हाणम् ? तो जुत्त जैव्व घुम्मणम् । (इति हटादहशी विकाश्य श्रीगौराङ्गविधुर्जयति ITRAT छठा अंक [तब जटिला प्रवेश करती है] जटिला-आज (पद्मा से) सुना है कि राधा पीतपट ओढकर घर में बैठी है, वहा जाकर सत्य झूठ का निर्णय करती हूँ। (धूमकर देखती है) यह क्या ? विशाखा धूम घूमकर द्वार-चौतरे पर पड़ी है । चलकर आवाज दू। निकट आकर) विशाखे ! एक पहर दिन चढ़ आया है, अभी तक तू सो रही है ? ॥१॥ (विशाखा प्रवेश करती है) । * २३४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५* प्रकाशम् ।) मज्जे, अज्ज भअवधोए णिदेसेण देअदाअदरों अम्हे दिण्णजाअ- रम्ह । [ सांप्रतं रासमहोत्सवगर्भासु शर्वरीपु कुतो निद्रागन्धोऽप्यस्माकम् । तयुक्तमेव भ्रमणम् । आर्ये ! अद्य भगवत्या निदेशेन देवतायतने वयं दत्त- जागराः स्मः । ] ॥२॥ जटिला-(स्वगतम् ।) अदो जेव्व पदोसे बहूए सेज्जा सुष्णामासि । (प्रकाशम् ।) विसाहे ! आआरेहि बहूमम् । [मत एवं प्रदोवे वध्वाः शम्या शून्यासीत् । विशाखे ! आकारय वधूम् । ] ॥३॥ विशाखा-हला राहे ! इको इदो। [हला राधे ! इत इतः ] (प्रविश्य) थोराधा-(चक्षुपी विमृज्य सजृम्भम् ।) विसाहे वाढं गिद्दाउलम्हि । (इति दृष्टि दरोद्घाटय सशङ्क स्वगतम्।) कधं इध उजेव मज्जा ।[विशाखे, बाढ़ निद्राकुलास्मि । कथमित एव आर्या ] ! जटिला--(राधां निवर्ण्य स्वगतम्) हटो, हट्टी सच्चं जेन्द एवं पीसम्ब विशाखा-(मन मन में) अब इन रासमहोत्सव प्रदान करने वाली रालियों में भला ही निद्रा को गन्ध ही कहां प्राप्त होती हैं ? इसलिए सोते रहना ही उपयुक्त है। (यह कहकर एकदम नेत्र खोलते हुए स्पष्ट कहती है ) हे आ ! आज भगवती पौर्णमासी के आदेशानुसार देव-मन्दिर मे मैंने जागरण किया है ॥२॥ जटिला-(मन में) इसीलिए ही माज संध्या के समय राधा की शरया सूनी पड़ी थी। (स्पष्ट कहती है) विशारो ! राधा को तो बुसा ॥३॥ विशाखा-हे राधे ! इधर (देख) इधर ॥ (श्रीराधा प्रवेश करती है) थोरायिका-( आँखो को मलती एवं जम्हाई लेती हुई ) विशागे! मुझे बहन नीद आ रही है । (यह कहते हुए जरा नेत्र सोलकर शेया सहित मन में महती है) झरे यहां आर्मा (जटिला) फसे ! ॥शा नटिला--(घोराया पो देशकर, मन ही मन में) हार पिशार!
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-५*
[ २३५
रम्। [ हा धिक् हा धिक्, सत्यमेवं पीताम्बरम् ।] ॥६॥
श्रीराधिको-(जनान्तिकम्) हला! सुदं मए सारङ्गीमुहादो, जं
णिसोधे वुडिआए तस्सि विलासपुलिणे गदं आसि । ता Yणंअम्हे तत्य
दिट्ठम्ह । [हला ! श्रुतं मया सारङ्गीमुखान्निशीथे वृद्धया तस्मिन्इदविला-
संपुलिने गतमासीत् । तन्न नं वयं तत्र दृष्टाः स्मः । ] ॥७॥
विशाखा-णहु गहु । जं कधिदं वुन्दाए तुम घेत ण तिरोहिदे कण्हे
तथा अम्हेसु दोसु सहोसु सपकं चुह उद्देसम्स गदातु एसा बुड्डो उपस्यिया।
[न खलु न खलु । यत् कथित वृन्दया त्वा गृहीत्वा तिरोहिते कृष्ण तया आ-
वयो यो. सख्योः सशङ्क तवोद्देशाय गतयोः एपा वृद्धा उपस्थिता] ॥८॥
श्रीराधिका-तदो कीस इअ कोअभअंकरीए दिौए मं पेक्खन्ती
चिट्ठदि ? [ततः कस्मादिय कोपभयकर्या दृष्टया मा पश्यन्ती तिष्ठति ] ।
जटिला--(सेय॑म्) मिच्छाजप्पिणि विसाहे ! किं णाम अन्धासि
तुमम् ? [ मिथ्याजल्पिनि विशाने । किं नामअन्धासि त्वम् ? ] ॥१०॥
धिक्कार ! यह तो सचमुच पीताम्वर ओढ़ रही है ॥६॥
श्रीराधिका-(कानाफूसी करते हुए ) सखि ! मैं ने सारङ्गी के मुह
से सुना है कि वृद्धा (जटिला) आधी रात को उसी क्रीडा-पुलिन मे गई थी।
इसलिए जान पड़ता है, उसने हमे निश्चय देख लिया है ॥७॥
विशाखा-न न ऐसी बात नहीं है, जैसा कि वृन्दा ने कहा है, तुम्हें
लेकर श्रीकृष्ण के अन्तर्धान होने पर हम दो जनी और सखियां जब शका.
कुल होकर तुम्हे टूण्ढने गई, उसके बाद वह वृद्धा वहा गई थी ।।८॥
पौराधिका-तब यह वृद्धा क्रोयपूर्वक आंखें फाडकर मेरो तरफ क्यों
देख रही है ? 1180
जटिला-(ईर्ष्या पूर्वक) अरी मिथ्यावादिनि विशाखे ! क्या तू अन्धी
हो रही है ? ॥१०॥
है
२३६ * श्रीविदग्धभाधव-नाटक अङ्क:५*
विशाखा-राघां विलोक्य सखेदं जानान्तिकम्) अइ विलासविम्हले!
कि पषु एदम् । (अयि विलासविह्वले ! कि खलु इदम् ? ] ॥शा
श्रीराधिका- (स्वं वक्षो निरीक्ष्य ससंभ्रमम् ।),हला ! तुम जेब सर-
'णम् । [हला त्वमेव शरणम् ] ॥१२॥
विशाखा-(जटिलामवेक्ष्य । संस्कृतेन)
मृदाक्षिप्त : पूर्वोत्तरलहृदयाभियुवतिभिः
पयः प्रैः पोतोकृतमतिहरिद्राद्रवमयः।
दुकूलं दो लोपरि परिदधानां प्रियसखी
पथ राधामार्ये कुटिलितहगन्तं प्रलयसि ।।१३।।१।।
जटिला- (सविधम्मम्) विसाहे ! तुए जेद्रव चञ्चलाए मम पुत्घरं
विपासिदम, जं जोवणधाणं गोदणे मंझे दहरिमा गिज्जई। [ विसाखे !
स्वयैव चञ्चलया-मम पुत्रगृह विनाशितम्, यौवनान्धानां गोपीनां मध्ये वधू-
टिकानीयते ।।].॥१४॥
विशाखा--(धीराधा, को देखती हुई,दुखपूर्वक कान में धीरे.) अरी
विलास-विह्वले ! यह क्या ? (पीताम्बर ओढ़ रही हैं ?) ॥११॥
"श्रीराधिका-(अपने. वक्षस्थल की ओर देखकर भयपूर्वक) खास !
अब तू ही मेरी रक्षा कर ।।१२।।
विशाखा-(जटिला की तरफ देखते हुए) आर्य ! उत्सव के उपलक्ष्य
‘में चंचल-चित्त रमणियों ने आनन्द में भरकर हल्दी आदि द्रव्य घुले जल को
'छिरका है, उसी से 'ही राधा के कन्धों पर पीला वस्त्र ओढ़े हुए तुम देख
रही हो अतः तुम किस लिए:प्रिय सखी राया के प्रति कुटिल दृष्टि से देख
रही हो? ॥१३॥
जटिला-(विश्वास करके) विशाखे ! तुम बड़ो चंचल हो। तुम
ने
-मेरे बेटे का घर बिगाड़ रखा है ।..यौवन-मद में अन्धो हुई गोपियों में
मेरी पुत्रवधू को क्यों ले जाती हो? ॥१४॥
* श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-६ * [ २३७ - विशाखा-अज्जे ! कि ति म उवालहेसि । ए उबसणं दीअमा-- लिआपब्बलच्छी उवालहेहि, जाए सव्व आवालवुड्ड गोउलं जेव्व उम्मादिदम् [मायें। किमिति मामुपानभसे । एनमुपसन्ना दीपमालिका-पर्वलक्ष्मीमपाल- भस्व, यया सर्वमाबालवृद्ध गोकुलमेवोन्मादितम् । ] ॥१५॥ जटिला-वच्छ, सच पहेसि । अज्ज रत्तिम्मि दिळू मए सव्वाओ गोउलकिसोरीओ तत्य पुलिणे उम्मत्तीभविअ किमि फिपि चेटुन्दि । [वसे। सत्य कथयसि । अद्य रात्रौ हप्ट मया सर्वा गोकुलकिशोर्यस्तत्र पुलिने उन्म तीभूय किमपि किमपि चेष्टन्ते । ] ॥१६॥ (विशाखा सदृग्भग राधिकामीक्षते) जटिला- (सदैन्यम्) अइ विसाहे ! पप्तीद पसीद । एसा मा.लिसि- हर मुहे णिपखविस अब्भत्थेपि । ता मइ एक्क अणुग्गह फरेहि । [ अयि विशाखे । प्रसीद प्रसीद । एपा अङ्गलिशिखर मुखे निक्षिप्य अभ्यर्थयामि । तन्मय्येकमनुग्रह कुरु । ] 1॥१७॥ विशाखा-(सप्रश्रयम् ।) अज्जे कि ति एव्व भणासि ? णिकाम आणवेहि । [ आयें। किमित्येव भणसि निकाममाज्ञापय ] ॥१८॥ विशाखा-आर्ये । मुझ क्यो दोष दे रही हो? इस निकटवर्ती दोप- राधिका उत्सव की शोभा की निदा कर, जिसके लिए वच्चे से लेकर बूढो तक सभी गोकुल ही उनमत हो रहा है ॥१५॥ जटिला-बेटी तू सत्य कहती है । मैं ने भी देखा, आज रात कर गोकुल की सब युवतियां उन्मत्त होकर पुलिन मे इधर उधर भ्रमण कर रही थी ॥१६॥ (विशाखा नेत्र-भङ्गी से राधिका की ओर देखती है। जटिला-(दोनतापूर्वक) विशासे प्रसन्न रहो, सुश रहो। देस में मुह मे म गुली डालकर तुम्हारे प्रति एक प्रार्थना करती है । तुम मुझ पर एक अनुग्रह करो ।।१७। विशासा-(मादरपूर्वक) आयें। ऐसा क्यों करती हो जो इच्छा हो भाज्ञा करोन ॥
२२८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अक.* जटिला-वच्छे ! तुम विसुद्धासि । ता कण्हस्सहत्यादो रक्खेहि यहू- डिअम् । [ वत्से ! त्वं विशुद्धासि । तत्कृष्णस्यहस्ताद रक्ष वधूटिकाम्]॥१६ विशाखा-अज्जे ! मिचिन्ता होहि, जं ललिदा पखु एत्य दक्खा विअक्खणा [आयें! निश्चिन्ता भव, यल्ललिता खल्वत्र दक्षा विचक्षणा वा] जटिला-कहिं गदा ललिवा ? [ कुत्र ग़ता ललिता? ] 1॥२१॥ विशाखा-पेक्ख पउमाए समं इदो जेव्व एसा आमच्छदि । [ प्रेक्ष्यस्व ! पद्मया सममित एवंपा आगच्छति ।] ॥२२।! जटिला-अहं उप्पलिभानिप्पादणस्स गमिस्सम् । [अहमुत्पलिकानि- प्पादनाय गमिप्यामि । ] ( इति निष्क्रान्ता।) ॥२३॥ (प्रविश्य पधया सह) ललिता-सहि पउमे! कुदो आअच्छसि [सखि पझे, कुत पद्मा-हृला! कण्हस्स समासादो। [हला कृष्णस्य सकाशात् । ] ॥२५ 'आगच्छसि? जटिला--देख बेटी ! तुम अति निर्मल-चरित्रा हो । इसलिए कृष्ण के हाथ से मेरी इस पुत्रवधू की तू रक्षा कर ॥१६॥ विशाखा-आयें ! तुम निश्चिन्त रहो। इस विषय में निश्चय ही ललिता बड़ी चतुर व होशियार है ॥२०॥ जटिला-ललिता कहां गई है ? ॥२१॥ विशाखा-देखो, पद्मा के साथ अभी ललिता आती होगी ॥२२॥ जटिला-अच्छा, मैं ऊपले थापने जा रही हूं ॥२३॥ (ललिता पद्मा के साथ प्रवेश करती है) ललिता--सखि पद्मा ! कहां से आ रहो हो? ॥२४॥ पना-सखि ! श्रीकृष्ण के पास से ।।२।।
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २३६ ? ललिता-कहिं कण्हो? [ कुन इदानी कृष्ण ] ॥२६॥ पद्मा-मालदीवाटिआपरन्ते ।। मालतीवाटिकाप्रान्ते ] ॥२७॥ ललिता-कि कुणदि। [किं करोति ? ॥२८॥ पद्मा-महमङ्गलदुदिओ विहरदि । [ मधुमङ्गलद्विनीयो विहरति] २६ ललिता-(सपरिहासस्मितम्) हला । किं णाम सपूरिदाहिहासि ? [ हला' किं नाम सपूरिताभीष्टासि ॥३०॥ -(विहस्य) मा अण्णधा सभावेहि । मए मालदीसेहरो एकको गण्ठि तस्स उबहारी किदो (स्मृतिमभिनीय ) ला, कधिद मे कण्हेण- 'पउमे | तुम जया सनद माल समप्पेसि, ए० ललिदावि मे विचित्ताढउ- लच्छीम् । ता एसा मे लेहपत्तिा तुए तिस्सा हत्थे देआ' ति। [ मा अन्यथा सभावय । मया मालतीशेखर एको ग्रथित्वा तस्योपहारीकृत हला । कतिथ मे कप्योन-पो त्व यथा सतत माला समर्पयसि, एव ललितापि में विचित्र- धातुलक्ष्मीम् । तदेपा मम लेखपनिका त्वया तस्या हस्ते देया' इति ] (इति पनिकामर्पयनि) ॥३१॥ पद्मा- । ललिता-कहा हैं श्रीकृष्ण अव ॥२६॥ पद्मा-मालती वन मे ॥२७॥ ललिता-क्या कर रहे हैं ? ॥२८॥ पद्मा-मधुमङ्गल के साथ खेल रहे हैं ।।२६॥ ललिता-(मुस्कान सहित दिल्लगी करते हुए) सखि तुम्हारी अभि- लापा पूर्ण हो गई है क्या? ॥३०॥ पद्मा-(हसकर)मन मे कुछ और मत लाना, मैं ने मालती की एक माला गूथकर उन्हे उपहार म दी है । (इतना कहकर स्मरण करते हुए) सखि । मुझे श्रीकृष्ण ने कहा-पो तुम जैसे मुझे नित्य माला अर्पण मरती हो, उसी प्रकार ललिवा भी गरिकादि धातुओ से मेरी चित्र-विचित्र 1 २४० ] *श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क- * ललिता- ( गृहीत्वा स्वगतम्। ) कदावि कण्हस्स मए ढाउराओण समपिदोस्थि । ता एध अवरेण केणावि रहस्सेण होदध्वम् । [ कदापि कृष्णस्य मया धातुरागो न ससपितोऽस्ति । तदापरेण केनापि रहस्येन भवि- तव्यम् । एवं सके तेनानेनाज्ञप्तम् । सखि, तथा करिष्यामि । तदनतो राधि- कामापृच्छय साधय । ] ॥३२॥ (इति प्रकाशं पत्रिका वाचयति ।) 'स्वया मुक्तगिरिः पाणौ ममातुन्छपदस्थितिः । निधीयतामधीराक्षि रागिधातुपरिच्छदः ॥३३॥॥२॥ इति क्षण विमृश्य स्वगतम् ) राधा मम पाणी निधीयाताम् - एवं संफेदेण इमिणा माणत्तम्। (प्रकाशम्) सहि तघा करिस्सम् । ता अगदो राहि आपुच्छिा साहेहि ॥३४ । शोभा सजाती है। इसलिए मेरी यह एक पत्रिका उसे दे देना।" (यह यह कर पमा ललिता के हाथ मे पत्रिका देती है) ॥३१॥ ललिता-(पत्रिका लेकर मन ही मन मे) मैं ने तो कभी श्रीकृष्ण के अङ्गो पर धातु-राग नहीं किया है, इस बात में कोई रहस्य जान पड़ता है ।। (यह सोचकर स्पष्टतः पत्रिका पढती है) हे चञ्चलनेत्रे (ललिते) मेरे हाथ में रागिपात-परिच्छद अर्थात् पर्वत के शिसिर पर स्थित लाल रंग की घातु से(रंगी) पोशाक समर्पण कर ॥३३ (पत्र को पढ़कर एक क्षण सोचने के बाद ललिता समझ गई कि) 'मेरे हाथ मे श्रीराधा को अर्पण कर? इस बात की सवेतपूर्वक मुझे आशा की है। (स्पष्टतः योली) सति! ऐसा ही करूंगी। पहले श्रीराधा को कर बंसा कहेंगी ॥१४॥ १. [ श्री कृष्ण ने पत्र में लिखा था- परमने ससित ! मेरे हाय राति. पातुरियाको अषण पर, रिन गिरि को पोडार सपा अतुन्धार की मर्याय जिसमें तुम्याद महीं है। यह है कि रामपातु परिन्दन राम में गि, रो, तु. प, प, इनको निराम देने में देवास पासद ही पद पाता है। २. पण में सिपामिरे राप में तु रापा दो अपंग कर]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ *
[ २४१
.
पमा-(राधिकामुपेत्य सनर्मस्मितम्) हला राहे! लिट्ठिआ णिविवादं
जादम् । लधा गोउलिन्दणदणेण अम्हारणं अंसुआई अवहरिदाई, तथा
अम्हेहि तस्स इदं पोदंसुअम् ।।३।।
ललिता-(स्मित्वा) अइ जिल्लज्जे ! कुङ्कमपद्धपिञ्जरिदं पिअसहीए
उत्तरीअं पेविखअंकि ति अणत्यं आसङ्कसि ? [अयि निर्लज्जे! कुङ्क मपङ्क-
पिञ्जरितं प्रियसख्या उत्तरीय प्रेक्ष्य किमित्यनर्थ आशङ्कसि ? ] ॥३६॥
पद्मा-(सस्मितम्) हला राहे ! अणुजाणेहि मम् । तुरिअं साहित्यलों
गदुभ कण्हस्स लील गाअन्ती पिअसहीं चन्दाअलिअं सुहावइस्सम् [हला राधे!'
अनुजानीहि माम्। स्वरितं सखीस्थली गत्वा कृष्णस्य लीलां गायन्ती प्रियसखी
चन्द्रावली सुखयिष्यामि ] ॥३७॥
विशाखा-(विहस्य) पउमे, धण्णाओ तुम्हे । जाहि अदंसरणे वि
कण्हस्य विलासगोदिहि पिअसही चन्दाअली सुहावीअदि [ प!ि पन्या
यूयम् । याभिरदर्शनेऽपि कृष्णस्य विलासगीतिभिः प्रियसखी चन्द्रावली सुखा-
!
प्यते । ] ॥३॥
पद्मा -(श्रीराधा के पास आकर दिल्लगीपूर्वक मुस्कराते हुए) सखि
राधे ! देवयोग से विवाद मिट गया है । गोकलेन्द्रनन्दन ने जैसे हमारे वस्त्र
हरण कर लिए थे, उसी प्रकार आज हमने भी उनका पीताम्बर हरण कर
लिया है ।।३।।
ललिता-अरी निर्लज्ज ! प्रिय सखी राधा के केसर रंजित पीत
वस्त्र को देखकर क्यों अनर्थ (अदि कृष्ण संगम चिह्न) की आशंका रहती
कर रही हो? ॥३६॥
पमा--(मुस्कराते हुए) हे राधे ! मुझे आज्ञा दो तो शीघ्र सखोस्थल
गांव में जाकर कृष्णलीला गान-परायण प्रिय सखी चन्द्रावली को सुपी
कर ॥३७॥
विशाखा-(हंसकर) हे पा ! तुम धन्य हो, जो श्रीकृष्ण के दर्शन
प्राप्त न होने पर भी तुम श्रीकृष्ण की लीला गान कर चन्द्रावली को सुखी
करती रहती हो ॥३॥
२४२ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * , पद्मा-विसाहे! तुम्हेहिं कीस तधा ण फिज्जइ? [विशाखे! युष्माभिः कस्मात्तथा न क्रियते ? ] ॥३६॥ विशाखा--अइ कुदो अम्हारणं इदिसंभाअधेयम् ' [अयि! कुतोऽस्माक- मीदृशं भागधेयम् ] ॥४०॥ पद्मा-हला कधं गस्थि [ हला! कथं नास्ति ? ] ॥४॥ विशाखा--मृद्ध, कण्हस्स णाममेले पत्युदे सही राहिला विक्षुब्मादि! [ मुग्धे ! कृष्णस्य नाममात्र प्रस्तुवे सखी राधिका विक्षुभ्यति ] ॥४२॥ पद्मा-(स्वगतम्) सपक्खे पेम्मुक्करिसो इमाए विवखाविदो होदु । (प्रकाशम् ।) विसाहे ! तुम्हे जेव्व सुट्ट, सुहिणोओ । अम्हारणं क्षु कावि दुक्खदसा अणुवढदि । स्वपक्षे प्रेमोत्कर्पोऽनया विख्यापितः । भवतु । विशाखे, यूयमेव सुष्छ, सुखिन्यः । अस्माकं खलु कापि दुःखदशा अनुवर्तते । ॥४३|| ललिता--पउमे प क्षु तुम्हाण किपि दुषखं संभावादि । [ प , न खलु युष्माकं किमपि दुःखं संभाव्यते । ] ॥४४॥ पद्मा-ललिदे ! मा एवं भण । जं हारगण्ठण-केसापसाहबिम्बा. पद्मा-विशाखे ! तुम भी ऐसा क्यों नही करती हो? ॥३॥ विशाखा-सखि ! हमारे ऐसे भाग्य कहाँ ? ॥४०॥ पना-अरी ! क्यों नहीं है ? ॥४१॥ विशाखा-बरी मुग्धे ! यहां तो कृष्ण का नाम मात्र लेने पर ही हमारी सखी राधा क्षुब्ध हो उठती है । ( लोलागान मुनना तो दूर रहा ) पद्या-(मन में) ये तो अपने पक्ष का प्रेमोत्कर्ष ही वर्णन करती हैं, ठोक है । (स्पष्ट कहती है) विशाखे ! तुम ही यथार्थ में सुपी हो । हमारे लिए न जाने कैसा दुख पैदा हुआ है। सलिता-प! तुम्हारे लिए तो हमें कोई भी दुख की सम्भावना नहीं दोसती है ।।४४॥ पमा-सलिते! ऐसा मत कहो । चन्द्रावली के लिए हर समय माला- !
* श्रीविदग्धमाधव नाटक अ६ [ २४३ हररक्षणपहुदीहिं चन्दाअलोए ऐवच्छई सव्वदा कुणन्तो अम्हारण दुक्ख- जालस्य अन्तो पत्यि [ललिते मैव भण। यत्हारग्रन्थन-केशप्रसायन-विम्वा. घर-रञ्जन प्रभृतिभिश्चन्द्रावल्या नेपथ्यानि सर्वदा कुर्वन्नीनामस्माक दुख- जालस्यान्तो नास्ति ] ॥४॥ विशाखा-(विहस्य ।) हला पउने, सच्च तुम्हाणं बहूई दुक्खाई। अम्हाण उण एक्क जेम्म [हला पद्मे । सत्य युष्माक बहूनि दु सानि । अस्माक पुनरेकमेव ।]॥४६॥ पद्मा-हला कि तम् [ हता' किं तत् ] ॥४॥ विशाखा-पउने ' जा कावि मबदुल्लहा मागासतारा पप्फुरदि, तत्य जादाहिलासस्य फस्त वि कालिन्दीकूलणन्दिणो समदस्स गन्धकल हिन्दस्स सव्वदा अन्भत्यगकदत्यणम् । [पद्मे । या कापि मयंदुर्लभा अकाशतारा गुन्यन, केश-सस्कार, बिम्बाधर-रजन इत्यादि करते करते तो हमारे दुख का कभी अन्त ही नही हो पाता । (अर्थात् चन्द्रावली तो इतनी सौभाग्य- शाली है कि एक दिन मे ही कई बार उसे श्रीकृष्ण-मिलन प्राप्त होता है। इसलिए हमे बारम्बार उसका शृ गार करना पड़ता है । किन्तु तुम्हारी सखी राधा को तो कभी कभी ऐसा सौभाग्य मिलता है, और तुमको भो कभी कभी ऐसा परिश्रम करना पडता है । अत हमारे दुख की क्या मीमा) विशाखा-(हसकर) ससि पने । सनमुच तुम्हे बहुत से कट है, हमे तो केवल एक दुख है ।।४।। पद्मा सखि । वह क्या 1॥४७॥ विशापा-पद्ये । इस जगत् में अति दुर्लभ अनिर्वचनीय आकाश का तारा स्कुरित हो रहा है। उसे प्राप्त करने के लिए कोई एक कानिन्दी कूल विहारो उन्मत हस्तिशावक लालायित होकर मदा सदा हमारी प्रार्थना करता रहता है, यह एक हमे यहा दुरा लगता है । ( अर्थात् तम्हारी प्रिय सखी चन्द्रावली से दिन में अनेक बार ही योकृष्ण का मिलन होता है, होता होगा, परन्तु हमारी प्रिय सखी श्रीरापा, तो श्रीकृष्ण के लिए एक आकाश के तारे की तरह सुदुर्लभ है, उससे साक्षात् मिलन को प्रार्थना पर 7
२४४ ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ *
प्रस्फुरति, तत्र जाताभिलापस्य कस्यापि कालिन्दीकुलनन्दिनः समदस्य गन्ध-
कलभेन्द्रस्य सर्वदाअभ्यर्थनकदर्थनम् ] ||४il
ललिता-(स्मित्वा ।) विसाहे अण्णं एक्कं गरुअं दुक्खं तुए कधं
विसुमरिदम् ? [ विशाखे ! अन्यदप्येकं गुरकं दुःखं त्वया कथं विस्मृतम् ? ]
विशाखा- ललिदे ! कि तं सुमरावेहि [ ललिते ! किं तत्स्मारया]
ललिता-अइ उज्जुए! राहाए पाअपल्लअम्मि जावअराअस्स वखरणे
कखणे विरमणम् [ अयि ऋजुके ! राधायाः पादपल्लवे यावकरागस्य क्षणे
विरचनम् । ] ॥५१॥
विशाखा--(सहासम्) अलिआसङ्किणि ललिदे ! विरमेहि विरमेहि ।
प.हस्य उत्तमङ्ग हाउणं राओ जेव्वं रेहदि, ण पखु जावआणम्। [ अलि.
काशङ्किनि ललिते! विरम विरम । कृष्णस्योत्तमाङ्ग धातुनांराग एव राजते,
न खलु यावकानाम् । ] ॥५२।।
-
भी श्रीकृष्ण के लिए दुर्लभ है । इसलिए हमे प्रिय राधा की सखी जानकर
बार बार श्रीकृष्ण जो हमें श्रीराधा को मिलाने की प्रार्थना करते रहते है,
यही हमे बहुत अखड़ता है और दुख देता है ॥४॥
ललिता- (हसते हुए) हे विशाखे ! और एक जो बहुत बड़ा दुख है,
उसे क्यों भूल रही हो? ॥४६॥
विशाखा-ललिते ! वह क्या ? मुझे.याद दिला दो न ॥५०॥
ललिता-अरी सरल स्वभावे ! राधा के चरण कमलों में बार-बार
अलक्तक (महावर) लगाना । (अर्थात हर समय श्रीकृप्य राधा को रिझाने
के लिए उसके चरणों में पड़ते हैं, उससे श्रीराधा के चरणों में लगी महावर
उत्तर जाती है और हमें ही उसे बार-बार लगाना पड़ता है इस दुख को तू
क्यों भूल रही है ? ॥५१॥
विशाखा-हिंमते हुए) अरी मिथ्यासिनि ललिते ! चुप रहो, चुप;
श्रीकृष्ण के सिर पर धातुराग लगा रहता है, महावर नहीं होती ॥५२॥
* श्रीविदग्धमाधव नाटक अ-६ * [ २४५ श्रीराधिका-(सलज्जम्) हला पउमे । इमाए दुम्मुहीरण पलायं अणाणि तुण्ण पिअसहीं चन्द्राअलिअ जेव जाहि । [हला पो ! आसा दुर्मुखीना प्रलापमनाकण्यं तूर्ण प्रियसखी चन्द्रावलीमेव याहि ] ॥५३॥ पना-जधा आदिसदि पिअसही। [यथा आदिशति प्रियसखी । (इति निष्क्रान्ता।)॥५४॥ ललिता-(स्वगतम् ।) एहि कण्हस्य आण्ण करिस्सम। (प्रकाशम् ।) हला राहे । एहि । पुष्फ अवचिणिअ भअवन्त सूर पूएम्ह । [ इदानी कृष्ण- स्याज्ञा करिष्यामि । हला राधे, एहि पुष्पमवचित्य भगवन्त सूर्य पूजयाम ] श्रीराधिका-(स्वगतम् ।) दिट्ठिा हिमअहिदो जेध मे कामो इमाए उवणीदो, ज कण्हस्य इसण एत्य समवे । (प्रकाशम् ।) जवाहिरोअदि पिझ- सहीए । [ दिष्टया हृदयस्थित एव मे कामोऽनयोपनीत यत्कृष्णस्य दर्शनमत्र सभवेत् । यथाभिरोचते प्रियसख्यै ] (इति निष्क्रान्ता) ॥५६॥ (तत प्रविशति मधुमङ्गलेनोपास्यमान कृष्ण) धौराधिका-(लज्जा सहित) सखि पझे तू इन दुर्मुखी सखियो के प्रलाप-वचनो को मत सुन । शीघ्र अपनी प्रिय सखी चन्द्रावली के पास चली जा ॥५३॥ पद्मा-हे प्रिय सखि जैसी आपकी आज्ञा ।। (इतना कहकर चली जाती है) ॥५४॥ ललिता-(अपने मन मे) अब श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन करती हूँ। (स्पष्ट कहती है) हे राधे | आओ, फूल चुन कर भगवान् सूर्य देव की पूजा करेंगी ॥५॥ श्रीराधिका-(मन मे) कसे सौभाग्य की बात है, ललिता ने मेरे मन के भाव को जान लिया है । वहा पर श्रीकृष्ण के दर्शन होगे। (स्पष्ट कहती है ) सखि ललिते । जैसे तुम्हारी इच्छा हो ॥ (ऐसा कहकर चली जाती है) [ तत्पश्चान मधुमङ्गल द्वारा उपास्यमान श्रीकृष्ण वहा प्रवेश करते हैं ] २४६ ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६* 1 श्रीकृष्णः- नवस्तवकवल्लरीचटुलगन्धबन्दीकृत- भ्रमभ्रमरझंकृतिप्लुतमुदग्रगुञ्जार्बुदम् । शरत्कृशकलिन्दजापुलिनवृन्दसंवधित, परिस्फुरति चन्द्रकस्थगितमद्य वृन्दावनम् ॥५७।३।। (पुननिरूप्य सानन्दम् ।) शरदि मुखरिताशास्तारनादावलीभि-- वलदविचलनेवाः पश्प वृन्दावनेऽछ । विदधनि रणरङ्ग वासितासङ्गहेतोः सरभसगुरु, सङ्गवे पुंगवेन्द्राः ॥५६॥४॥ मधुमङ्गल:-(सर्वतो विलोक्य ।) तुह संगमेण शूण, मुउन्द वुन्दाडई घणच्छामा। उअ दम्मेण फुरण्डुअ-भरस्त पोवम्बरं घरइ ॥ श्रीकृष्ण हे समे ! देखो तो आज मयूरपिच्छों से व्याप्त श्रीवृन्दावन को कसो शोभा है ! नवीन पुष्प गुच्चों सहित लताओं की मनोहर सौरभ छा रही है भ्रान्त भ्रमरगण स्थिर होकर गुजार कर रहे हैं, असंस्य पुष्प गुश प्रफुल्लित हो उठे हैं, शरद्काल को कृशता के कारण यमुना अपने पुलिनों की शोभा मम्वधंन कर रही है ॥५७।३।। (फिर देयकर मानन्द सहित पहते हैं) मएमङ्गल-देसो, शरद्काल के आज पूर्वाह्न समय में श्रीवृन्दावन के गव पलतान बैल उच्च म्पर करते हुए दिशाओं को पूरित कर रहे हैं। प्रात: मनी गोभों का सक्षम करने के लिए टिकटको योपकर केचे-ऊचे शृगों मे परम्पर युद्ध कर रहे हैं । ५८।४।। मपुमनस-(पारों ओर देगकर) हे मुन्द ! देगो, तुम्हारे सनम के लिए मेपलान्ति हो इस वृन्दाटयो मा एसप धारण कर बटसरंया
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ *
[ २४७
[ तव सगमेन नून, मुकुन्द वृन्दाटवी घनच्छाया।
पश्य दम्भेन कुरण्टकभरस्य पीताम्वर धरति ॥१५६||५||
कृष्ण - (स्वगतम्) किमद्य निष्टवितसकेतलेखार्यया पूर्णमनोरथी-
करिष्येऽह ललितया ? हन्त, शारदमाधुरीस दोहसन्दानितापि वृन्दाटवीकक्षा
खञ्जनाक्षीविप्रकर्षादानन्दविन्दुमपि न मे सन्दधाति। तद्वेणुसकेत सचारयामि।
(इति तथा कुर्वन्) ॥६०॥
दिव्यो रयाङ्गि समय सखि सगमस्य,
जज्ञे वरानि तरसा कुरु पक्षपातम् ।
अध्वानमधनयनेन विलोकमान,
शोकादय सहचरस्तव
रौरवीति ॥६॥६॥
मधुमङ्गल -(विहस्य) भो वअस्स If एवं अपूयं वादिदम्
[ भो वयस्य । शिमेदतपूर्व वादितम् ? ] ६२॥
श्रीकृष्ण –सखे । कुरङ्गोलोकनार्य ममायमुधम १६३।।
२
।
(सितिवार) के फूलों का मानो पीताम्बर ही ओढ रही है ॥५६५।।
श्रीकृष्ण -(मन-मन मे) ललिता क्या आज मेरै सकेतार्थ युक्त पत्र या
अभिप्राय जानकर मेरे मनोरथ को पूर्ण करेगी ? हाय । राजननयनी थी-
राधिका के विरह म यह शरद्वालीन माधुरी-समूह से परिपूर्ण वृन्दावन भी
मुझे एक विन्दु मान भी आनन्द प्रदान नहीं कर रहा है । इमलिए वशी के
द्वारा सकेत करता हू। (यह सोचकर वशी ध्वनि करते हैं। ॥६॥
हे सखि चक्रवादि । सङ्कम का यह समय उपस्थित है । हे वरानि।
शीघ्र अनुकूलता प्रदान कर । व्याकुल होकर तुम्हारा यह ससा अवसुते नेत्रो
से तुम्हारी वाट देखते हुए जोर से रा रहा है ।।६।।६।।
मधुमङ्गल-(हसकर) हे समे ! यह कैसी अपूर्व : नि यी है ॥६॥
थोडागहे मित्र । हरिणि को देयने के लिए मन यह उद्यम
दिया है ॥६॥
२४८ ॥ *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-* : मधुमङ्गल:--सक्खु कषिदम् । किंतु उक्कं अक्खरं अण्णधा किअम्। [ सत्यं कथितम् । किं त्वेकमक्षरमन्यथा कृतम् । ] ॥६॥ श्रीकृष्णः-ससे साधु विदितं कुरड्कीलोकनार्थमेव ॥६५॥ (नेपथ्ये) पिवन्तीनां वंशोरवमिह गवा कर्ण बुलुकैः, पयःपूरा दूरादिशि दिशि तथा शुश्र वुरमी। अकाले पुष्यद्भिस्तरुभिरभितः शोभितमिदं, यथा वृन्दारण्यं दधिमपनदोमातृकमभूत् ॥६६॥७॥ कृष्ण-ससे दक्षिणतः पश्य । तुङ्गस्ताम्रोरुशृङ्गः स्फुरदरुणखुरो रम्यपिङ्ग क्षणधीः कण्ठव्यालम्बिघण्टो धरणिविलुठितोचण्डलाङ्ग.लदण्डः । सोऽयं फैलासपाण्डुध तिरतुलकफन्मण्डलो मैचिफीनां चक्र भाति प्रियो मे परिमलतुलितोत्फुल्लपद्मः ककुमी ॥६७।८ मधुमङ्गल-सत्य कह रहे हो, किन्तु एक अक्षर रह गया है ।।६।। थोकृष्ण-मित्र ! तुमने ठीक समझा है-हरिणि-नयनी (धीराधा) पो देसने के लिए ही ॥६५॥ (वेशघर से आवाज वाती हैं) गौओं ने दूर से कानरूपी दोनों से जव मुरली ध्वनि का दान किया अवस्या में चारों दिशाओं में दूध प्रवाहित करने लगी। असमयरे समस्त वृक्ष पुष्पो से शोभित हो उठे। (दूध एवं पुष्पों के अम्लरस के पिराने से यह दूध दही में बदल गया) जिससे समस्त वृन्दावन दधिमय नदी की तरह गोभित होने लगा ॥६६॥७॥ श्रीकृष्ण हे ससे ! दक्षिण दिशा मे देयो- तांबे यो तरह केचे सोग एवं लाल गुरोंवाला और जिसके नेत्र ललाई लिए भूरे रंग को गोगा देते हैं, कण्ठ में जिसके विशाल पण्टा लटक रहा है, पृथ्वी तक जिसको लम्ची पूच एवं तास पर्वत के रामान विस्तृत पीने वर्ष पोनिमा नि है, का पर विशाल हिल्ला पीमित है, जो उत्तम गोत्रों पे यीप में अयस्थित है, यही मेरा प्रियतम पपगन्ध-नाम बन है ।।६।।
* श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-६ * [ २४६ (ततः प्रविशति सखीभ्यामनुगम्यमाना राधा ।) श्रीराधा-(स्वगतम्) जदो दिसादो वेणुसहो आअदो, सा दिसा मोहिदाए मए ण संभाविदा । [ यतो दिशातो वेणुशब्द जागतः, सा दिशा मोहितया मया न संभाविता । ॥६॥ ललिता-(सोत्प्रासस्मितम्) हला राहिए ! कोस अकण्डे हरिणकण्णी सुमं जादासि ? [ हता राधिके ! कस्मादकाण्डे हरिणकर्णी त्वं जातासि?] राधिका-ललिते कि ति अप्पणो धम्मं परस्स अपेसि ? सच तुम जेव्य हरिणी, जं फलसद्देण हरिज्जन्ती दीससि । [ललिते ! किमिति आत्मनो धर्म परस्यार्पयसि ? मत्य त्वमेव हरिणो, यत्कलशब्देन ह्रियमाणा दृश्यसे ] ललिता-राहे तुमं क्षु हरिणी, जं एसा रङ्गिणीणाम हरिणीतुम्ह सही [ राधे ! त्व खलु हरिणी, यदेषा रङ्गिणी नाम हरिणी तव सखी ] 11७१॥ श्रीराधिका~(स्वगतम्) दिद्विआ एसा फावि सोरमधारा पुरोवाडि- आयो दोव्व मं आअढदि। [दिष्टया एपा कापि सौरभ्यधारा पुरोवाटिकातो (तब ललिता-विशाखा दोनो सखियो के साथ श्रीराधा प्रवेश करती है) थोराधिका-(मन मे) जिस दिशा से वेणुध्वनि आई थी, मैं तो मोहित हो जाने के कारण उस दिशा को नही पहचान पा रही हूं ॥६८।। ललिता-( उत्कण्ठा सहित मुस्कराते हुए ) हे राधिके ! तुम किस लिए असमय मे मृगकर्णी-हरिणि के से कानो वाली हो उठी हो ? [१६|| श्रीराधिका-ललिते ' तू अपने स्वभाव को दूसरे पर क्यों थोप रही हो ? वास्तव मे तुम ही मृगकर्णी हो, क्योकि उस मधुर ध्वनि से तुम्हारा हृदय आनन्दित हुआ दीखता है ॥७॥ ललिता-राधे ! तुम ही यथार्थ हरिणी हो, क्योकि रङ्गिणी नाम की हरिणी के साथ तुम्हारी मित्रता है ।।७१॥ पोराधिका-(मन ने) कसा सौभाग्य है ! इस पुप्पोद्यान से अनि- २५. 1 * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क ६* दूतीव मामाकर्षति। ]१७२।। (इति सव्याज पुर प्रयाति) विशाखा-(स्मृत्वा । ) हला राहि । कोस तुम भिङ्गीव्व कपि गन्ध सप्पसि । [हला राधे, कस्मात्त्व भृङ्गीव कमपि गन्ध सर्पसि ] ॥७३॥ श्रीराधिका-विसाहे । अग्गदो फुल्लाइ कुसुमाई दोसन्ति । ता एदाइ घेत ण तम्मित्त पूअइस्सम् । [विशाखे । अग्नत फुल्लानि कुसुमानि दृश्यन्ते। तदेतानि गृहीत्वा तन्मित्र पूज्ययिष्यामि । ] 11७४।। ललिता~हला सच मित्तस्य अणुराओ तुम सरलेदि । सो दाव गहण- चरस्सजेव्व, ण क्षु गमणचरस्स । [हला! सत्य मित्रस्यानुरागस्त्वा तरलयति। स तावद्गहनचरस्येव न खलु गगनचरस्य । [ ॥७॥ श्रीराधिवा-(सप्रणयरोपम्) अइ अदक्खिणे । कमलबन्धु फर्धेमि । [ अयि अदक्षिणे। कमलवन्दु कथयामि । ] ७६ । ललिता-सहि कोस आमार सगोवेसि? [ सखि । कस्मादाकार सगोपसि । ] 11७७|| - वंचनीय सौरभ धारा दूती की तरह मुझे आकर्षण कर रही है । (यह कहकर छलपूर्वक आगे जाती है) ॥७२॥ विशारा-(मुस्कराते हुए) हे राधे | किसलिए तुम भृङ्गी की तरह बिसी सुगन्धी का पीछा कर रही हो ? ॥७३॥ धौराधिका-विशाखे । सामने सब प्रफुल्लित पुष्प दीप रहे हैं, इन को चुनफर इनके मित्र-सूर्यदेव को पूजा पहेगी 11७४।। सलिता-ससि । यह सच है, मित्र या अनुराग हो तुम्हें पचल पर रहा है वह यनविहारी मित्र है, गगनचारी (पं) नहीं ।।३।। पोराधिका-(प्रणय सहित) अरी मूर्ग। मैं कमल-बयु (सूर्य) 1 बात पह रही है ॥७६|| ललिता-सामि ! आपार पिरती हो ? अर्याद कमला-बायुपी वजाप कमसभ्यतु (गूर्य) ययो यह रही हो ? | *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २५१ विशाखा-ललिदे | सवत्तीभाएण ईसा छम सगोवेदि । ज खु उण पिअसही। [ललिते। सपत्नीभावेनेऐष्येव सगोपयति । न खलु पुन प्रियसखी।] श्रीराधिका--(सभ्रू भङ्गम्) अइ वामे । अत्तो हिअदिदं अत्थं पर- मुण्डे कीस पाड़ेसि ? ता तुवरेहि, जं णादिदूरे जेव्व सो तुम्हाण निम्बाहर- कण्डूखण्डणो। [अयि वामे। आत्मनो हृदयस्थितमर्थ परमुण्डे कस्मात्पातयसि? तत्त्वरय, यन्नातिदूरे एव स युष्माक बिम्बाधरकण्डूखण्डन । ] ॥७॥ ललिता-राहे । आकोमारं अम्हारण अक्खडिदं कुलङ्गणाव्वद वुन्दा वणलदाओ जेव्य जारणेन्ति । ता अत्तणो मुहेण कि फघइस्सम्ह ? [ राधे । आकोमारमस्माकमस्खत्रित कुलाङ्गनाव्रत वृन्दावनलता एव जानन्ति तदात्मनो मुखेन कि कथयिाम. ? ]||८|| श्रीराधिका-(विहस्य) अइ पइव्वदे 1 जाणेन्ति जाणेन्ति । तदो जेव्व कल्ले तुह भुअवल्लिगो अङ्क सकमिद दिठ्ठ मए मअरकुण्डललञ्छणं । तघा जेव्व विसाहाए तप्पतुलिओवरि फुडिद सिहण्डकिरीडम् । विशाखा-ललिते सपत्नि भाववश ईर्ष्या ही (आकार को) छिपा रही है, हमारी प्रिय सखि राधा उसे नहीं छिपा रही है । (अर्थात् कमला ( लक्ष्मी) श्रीराधा की सपत्नि है, इसलिए ईर्ष्यावश उसका नाम लेना नही चाहती है। इसलिए कमला की बजाए कमल कह रही है) ॥७॥ श्रीराधिका-(भृकुटी टेढी करते हुए) अरी कपटनि । अपने हृदय के अभिप्राय को दूसरे के माथे क्यो मढ रही हो ? अब जल्दी करो, तुम्हारे विम्वाघरो की खुजली मिटाने वाला (श्रीकृष्ण) अव दूर नही है, समीप ही ही मौजूद है ।।७६॥ ललिता-राधे कौमार काल से ही हमारा कुलाङ्गना-व्रत अखण्डित है, इस बात को वृन्दावन की समस्त लनाएं जानती हैं, इसलिए हम अपने मन से क्या कहे ? 100 धीराधिका-(हसकर) अरी पतिव्रते जानते हैं, जानते हैं । इस- लिए ही क्ल प्रात काल मैं ने तुम्हारी भुजाओ मे मकर-कुण्डल के चिन्ह देसे
२५२ ]
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ *
[अयि पतिव्रते ! जानन्ति जानन्ति तत एव कल्ये तव भुजवल्लया अङ्क संका
न्तं दृष्टं मया मकरकुण्डललाञ्छनम् । तथैव विसाखायास्तल्प तुलिकोपरि
स्फुटितं शिखण्ड-किरीटम् । ] ॥१॥
ललिता--(स्मित्वा) परपरिवादिणी ! अवेहि अवेहि। [ परपरि-
वादिनि ! अपेहि अपेहि । ] |२||
विशाखा- राहे! कित्तिसं झम्पिक्ससि? ण पषु चन्दालोए चन्दकन्त-
सिला अप्पसिया होई पहदि । [ राधे ! कियदाच्छादयसि ? न खलु
चन्द्रालोके चन्द्रकान्तशिला अप्रस्विन्ना भवितुं प्रभवति । ] ॥३॥
श्रीराधिका-(पुरो दृष्टवा सचमत्कारम्) ललिदे, तुण्णं अणुजाणेहि
पलाइसम् । [ ललिते ! तूर्ण मनुजानिहि । पलायिष्ये] (इत्युत्कम्पते) ॥४॥
ललिता--(सशङ्कम्) राहे ! कोस भाएसि ? [राधे ! कस्माद्विभेषि?]
श्रीराधिका-(साभ्यसूयम्) अइ वङ्क! अलं अलिएण इमिणा उज्जु-
अत्तरोण । शरणं इमस्स लम्पस्स हत्थे पक्खे में दूरे आणीदासि । [ अपि
वक्र ! अलमलीकेनानेन ऋजुकत्वेन । नूनमस्य लम्पटस्य हस्ते प्रक्षेप्त मां दूर
मानीतासि ॥६॥
थे और विशाखा की शय्या पर मयूरपुच्छ का किरीट पड़ा हुआ था॥१॥
ललिता-(मुस्कराकर) है परिनन्दा कारिणी ! जा, जा ॥२॥
विशाखा-राधे ! क्यों घृथा छिपा रही हो ? चन्दा
चांदनी में
क्या चन्द्रकान्त मणि विना द्रवीभूत हुए रह सकती है ? ॥३॥
श्रीराधिका-(सामने देखकर आश्चर्य सहित) ललिते ! तू कह तो मैं
तीन भाग जाऊँ । (ऐसा कहकर काम्पने लगती है} ॥४॥
ललिता-(सदा सहित) राधे पयों डर रही हो? ॥८॥
थोराधि- (असूया सहित। अरो पके ! इस भोले भाले स्वमाय
का ग समय कोई प्रयोजन नहीं है । निश्चय ही तुम मुझे इस लम्पट के
हापों में सौंपने के लिए यहां ले आई हो ॥८॥
*श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-६ * [ २५३ ललिता-(निपुणं निभाल्य स्वगतम्) पूर्ण दूरदो विलोइज्जन्तं तमालं जैव्व इ कण्हें मण्णेदि । (प्रकाशम्) हूँ, दाणि कधं फ्लाइस्ससि ? लद्धो मए ओसरो। [ नूनं दूरतो विलोक्यमानं तमालमेवेयं कृष्णं मन्यते । हुँ, इदानी कथं पलायिष्यसे ? लब्धो मयावसरः ] (इति राधिकामाकर्पति) ॥७॥ श्रीराधिका-(सकातर्यम् ) सहि विसाहे ! परित्ताहि परिताहि । सर- णामम्हि । सखि विशाखे। परित्रायस्व, परित्रायस्व। शरणागतास्मि] ॥८॥ विशाखा-अइ पेम्मुन्ममिदे ! कधं तिल्लोकं जेव्वे दे कण्हाएदि ? पेक्ख, एसो पसाली ण टुं तुज्झ विलासो। [ अयि प्रेमोद्धान्ते ! कथं त्रिलोक्यमेव ते कृष्णायते ? प्रेक्षस्व एप पलाशो न खलु तव विलासी ] [ICE श्रीकृष्ण,-कथं नेदानीमपि प्रत्यासना तन्वङ्गी ? तन्मुरलोमीर- यामि । (इति तथा कुर्वन्) 1800 अपि सुधाकरमण्डलि मण्डय, त्वमटवीं मृदुपादविसर्पगः । उदयशैलतटोनिहितेक्षणो ननु चकोरयुवा परितप्यते ॥१॥ी। ललिता-(ध्यान पूर्वक देखकर अपने मन मे) निश्चय ही यह दूर से तमाल वृक्ष को देखकर उसे कृष्ण मान रही है । (स्पष्ट कहती है) हा अव कहां भाग जाओगी? आज मुझे अवसर मिला है ।। (यह कहकर राधे को खोचत है) ॥८॥ धोराधिका-(कायर होकर) ससि विशामे ! मेरी रक्षा कर, रक्षा कर, मैं तेरी शरण हूँ ॥१८॥ विशाखा-अयि प्रेम-पगलि । क्यों तेरे लिए त्रिभुवन कृष्णमय हो रहा है ? देख यह वृक्ष है न कि विलासी कृष्ण III श्रीकृष्ण न जाने अभी तक वह कृपाङ्गी राधा मेरे निकट क्यों न आई ? एक बार और वंशी बजाता हूँ। (यह कहकर श्रीकृष्ण वंशी बजाते है) Mol -हे सुधाकर मण्डलि ! मृदु-मृदु चरण घरते हुए इस पनभूमि को अलंकृत कर । यह चकोर-युवा उदय पर्वत के किनारे दृष्टि लगाये हुए संतप्त हो रहा है l २५४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६* विशाखा-(स्वयं धैर्यमवष्टभ्य) हला राहि ! कीस तुमं भवन्ती कलम्बं मोलम्बेसि ? [हला राधे ! कस्मात्त्वं भ्रमन्ती कदम्बमवलम्बसे ?] ललिता-सहि वंसिए ! वारं वारं तुमं वन्देमि । जं उग्घाडिदरहस्सा तुए राही किदा। [ सखि वंशिके ! वारं वारं त्वां वन्दे यदुद्घाटित- रहस्या त्वया राधा कृता। ] ||३|| (राधिका सलज्जमवहित्यां नाटयति) ललिता-(संस्कृतेन) विद्भिः कर्णान्ते तव विसृमरैरद्य मुरली. कलैरुरुस्तम्भो गुरुरजनि रम्भोरु तरसा। विलुप्मानुदृष्टियनजलवृष्टिव्यतिकरैः प्रणीताभिर्यत्नात्तदलमवाहित्यालहरिभिः ॥६४।१०।। विशाखा-ललिदे ! को दाणि अवहित्याए ओसरो? [ ललिते क इदानीमवहित्थाया अवसरः ? ] (इति संस्कृतेन) त्रपाभिचरणक्रमे परमसिद्धिरायर्वणी स्मरानलसमिन्धने सपदि सामिधेनीध्वनिः । - विशाखा-(स्वयं धीरज धारण पूर्वक) सखि राधे ! क्यों तू भ्रमण करते करते कदम्ब वृक्ष का सहारा ले रही है ? ॥२॥ ललिता-सखि वंशि ! तुम्हें मैं बारम्बार प्रणाम करती हूँ । तुमने राधा के सव राज को खोल दिया है ॥३॥ [ श्रीराधा लज्जापूर्वक अपने भावों क । गोपन करती हैं ] ललिता-हे रम्भोरु ! आज तुम्हारे कानों में मधुर वंशी-ध्वनि के प्रवेश होने से तत्काल तुम्हारे उरु स्तम्भित हो उठे हैं, नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने के कारण तुम्हारी दृष्टि भी विलुप्त हो गई है। इसलिए अब यत्नपूर्वक अपने मनोभावों को छिपाने का प्रयोजन नहीं है ।।६४।१०।। विशाखा-ललिते ! अव भावों को छिपाने का अवसर ही कहां है ? हे राधे ! वंशोध्वनि तुम्हारी लज्जा को ध्वंस करने हेतु अभिचार या में अथवं वेदोक्त, मन्त्रों के समान हो रही है और कामाग्नि प्रज्ज्वलित * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २५५ तथात्मपरमात्मनोरुपनिपन्मयो सगमे विलासमुरलीभवा विरुतिरद्य वैरायते ॥६५॥११॥ श्रीराधिका-(सक्षोभम्) सहि सच्च कर्धेसि । अम्हारण वइरिणी सवुत्ता दाणि वसि । ता उबालहिस्सम् । [ सखि | सत्य कथयसि । अस्माक वैरिणी सवृत्ता दारुणा वशिका । तदुपालप्स्ये। ] (इति सस्कृतेन) सूतिस्ते धनुषश्च वशवरतो धन्दे तयोरन्तिम विद्धो येन जनस्तनु विरहयनान्तश्विर ताम्यति । . करने मे सामिधेनी मन्त्र के समान । आत्मा और परमात्मा के एकीकरण मे अर्थात् प्रेम मूर्छा उत्पन्न करने मे उपनिपदमयी अर्थात् तत्त्वमसि वाक्यमयी हो रही है । इसलिए यह वशी-ध्वनि आज तुम्हारे प्रति वैरता विधान कर रही है। [ इस श्लोक का तात्पर्य इस प्रकार है-मानो श्रीगधा जी की लज्जा को मारने या नाश करने के लिए एक अभिचार यज्ञ (तत्रोक्त मरण- मोहन-उच्चाटन करने का अनुष्ठान) वशी द्वारा अनुष्ठित किया जा रहा है। उस अनुष्ठान मे यह वशी-ध्वनि अथर्ववेद के मन्नो के समान है । (अथर्व- वेद मे प्राय अभिचार यज्ञो के मन्त्रो का उल्लेख है) और यज्ञो मे सामिधेनी मन्त्रो के द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है । उसी प्रकार श्रीराधा जी मे कामाग्नि उत्सत करने के लिए वशोधनि मानो सामिनी मत्र का काम कर रही है । और उपनिषत् मे 'तत्त्वमसि' वाक्य जैसे जीव के अस्तित्व को लोप करने वाला है, उसके स्वरूपानुवन्धिधर्म कृष्ण-सेवा को लुप्त कर देता है। उसी प्रकार मानो बशी-ध्वनि भी श्रीराधा को प्रेम-मूर्छा के द्वारा वेसुद्ध एव कर्त्तव्य शून्य कर रही है-इस प्रकार यह वशी मानो श्रीराधा से दुशमनी कर रही है ॥ ५॥११॥ श्रीराधिका-(क्षोभ सहित) सखि तू सच कह रही है, दारण वशी ही हमारी दुशमन है, तभी तो मैं उसकी निन्दा क्यिा करती हू- हे तर वशि ' तुम्हारा और धनुष का एक हो वश से जन्म हुआ है। परन्तु में धनुष को नमस्कार करती हूँ। क्योकि धनुप से जिस शरीर घायल होता है, उसे फिर शरीर त्यागने को दुख यातना नहीं भोगनी पडती- २५६ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * विद्धानां हृदि मारपत्रिविषमध्वनिपुभिर्नस्त्वया करे वशि न जीयनं न च मृतिर्घोराविरासीद्दशा ।।६६।।१२।। श्रीकृष्णः--(पुरो विलोक्य सानन्दम् ।) भविता सविधेऽत्र राधिका, यदियं रिङ्गति रङ्गिणी पुरः । मृगलाञ्छनलेखयेव या, मृगमूतिर्न तया वियुज्यते ॥६७||१३|| (पुनर्निरूप्य) सखे ! ज्ञात जातम् । नासौ राधिकान्यड्डू : यदये निरङ्को नेदीयानिन्दु. । (इति विस्मयमभिनीय) ॥६८।। अशात्परित्यज्य पुर कुरङ्ग, शङ्क सुधांशुभुवमाससाद । (पुननिभाल्य) आ शांतमुत्फुल्लविलासवृन्दैनन्दि राधावदनं चकास्ति । ॥४॥ (इत्यग्रे सरति) मधुमङ्गल:-(सपरिहासम्) भो बअस्स ! मा धाव । लतु लहु जाहि। वह तत्काल मर जाता है, किन्तु तुम्हारे ध्वनिरूप कामवाणो से घायल होकर हमारे हृदयो की जो घोर दुखमयो अवस्था हो रही है, न तो उससे हमारा मरण ही होता है और न हम जीवित रह सकती है ।।६।।१२।। श्रीकृष्ण-(सामने देखकर आनन्द पूर्वक) जब यह रङ्गिणी नामक हरिणी आगे आ रही है, तब निश्चय ही जान पडता है कि राधा भी अवश्य . यहाँ कही आस-पास घूम रही है । क्योकि मृग-मति के बिना जैसे मृग-छाया सम्भव नहीं है, उसी प्रकार यह रङ्गिणी हरिणी श्रीराधा के बिना नहीं रह सकती ॥७॥१३॥ (फिर देखकर) हे 'सखे । मैं जान गया, जान गया, यह राधिका की हरिणी नहीं है यह तो निष्कलङ्क चन्द्र ही है । ( इतना कहकर आश्चर्य प्रकट करते हैं) ॥६॥ यह तो ऐसा मालूम होता है, अपने अङ्ग से मृग को आगे छोडकर चन्द्रमा ही पृथ्वी पर आ रहा है । (फिर देखकर) ओ ठीक है, अब जान गया, विशाल विलास-राशि से परिपूर्ण राधा का ही मुख प्रकाशित हो रहा है। (इतना कहकर आगे बढते है) Hell मधुमङ्गल-(मुस्कराते हुए) है मित्र ! दौड मत, धीरे-धीरे चल ।
- *श्रीविदग्घमाधव-नाटक बड़.६ * [ २५७ अहवा तुम कि ति दूसिज्जसि, जं घुकिसोरिहि दुट्ठमन्तण उम्मादिदोसि । ता इमस्सि जोगे ओसरे तुम णिवारिस सिरणेहस्स गिक्किदि करिस्सम् । [ भी वयस्य ' मा घाव । लघु लघु याहि । अथवा त्व किमिति दृष्यसे, यद्- धूर्तकिशोरोभिदुप्टमन्वेणोन्नादितोऽसि । तदस्मिन्योन्येऽवसरे त्वा निवार्य स्नेहस्य निस्कृति करिष्यामि । (इति पाणिमाददाति) १००। श्रीकृष्ण --सखे । साधु चेष्ट से, यदद्य राधिकोपसर्परणे कम्पेन कृत- विघ्नस्य मे दत्तहस्तावलम्बोऽसि । (इति परिक्रम्य) ॥१०॥ इयमतितृपित्त वरानुरागोज्ज्वलसुमना कमनीयपत्रलेखा । मम बरतनुरावकर्ष विरा, मधुपमशोकलतेव पुष्पितामा ॥१०२॥१५॥ श्रीराधिका-(कृष्णमपाङ्गन विलोक्य स्वगतम् सस्कृतेन) नवमनसिजलीलाभ्रान्तनेत्रान्तभाज, स्फुटकिसलयभङ्गोसङ्गिवर्णाश्चलस्य । परन्तु तुम्हारा भी दोष क्या है ? इस पूत किशोरियो ने ही दुष्ट मन्त्र द्वारा तुम्हे पागल कर रखा है। इसलिए इस उपयुक्त अवसर पर तुम्हें रोककर प्रेम को ही तोड वैईगा। (यह कहकर श्रीकृष्ण का हाय पकडता है) ॥१०० श्रीकृष्ण-सखे । तुमने अच्छा किया है, आज राधा के पास जाते समय मुझे कम्प विघ्न कर रहा था, तुमने मुझे हाथ का सहारा दे दिया है। (यह कहकर पीछे मुडते हैं) ॥१०॥ --जैसे फूलो से सिली हुई अशोक-लता मयुक्र को आकर्षित करती है, उसी प्रकार उत्कृष्ट नवीन अनुराग से सुशोभित मन वाली एक चित्र- विचित्र पत्रावली से रजित उत्तमाङ्गी श्रीराधा आज अति तृपात्त र मेरे चित्त को आकर्षण कर रही है ॥१०॥१२॥ पोराधिका--(नेम-कोण से श्रीकृष्ण को देखकर मन ही मन में) नवीन कन्दर्प-लीला के कारण जिनके नेम-कोण भ्रान्त हो रहे हैं, जिनके कानो में सुन्दर गुन्चा की रचना सुशोभित है. तपा जिनके सिर पर मालती २५८ ] * श्रीविदग्धमाघवन्नाटक अङ्क-६* मिलितमृदुलमोलेर्मालया मालतीना, मदयति मम मेधा मांघुरो माधवस्य ॥१०॥१६॥ विशाखा-(विहस्य संस्कृतेन) वशीचक्र कृष्णस्तव परिमलैरेव वलिभि- विलासानां वृन्दं कथमिव मुधा कन्दलयसि ? जये पाणी दत्ते रणपटुभिरग्रेसरभटः स्वंय को विक्रान्ति पुनरिह जिगोपुः प्रणयति? ॥१०॥१७॥ श्रीराधिका-अइ दुम्मुहि' एत्तिम्मि संकडे में आरोविन अज्जवि ण विस्सन्तासि ? ता णिधिकवझिझं तुम उज्झिम अहं सिणिद्ध पिअसहीं ललिदं सरणं पविसामि । [ अयि दृमु खि । एतावति सकटे मामारोप्या- द्यापि न विश्रान्तासि ? तनिष्कृपहृदयों त्वामुज्झित्वाह स्निग्या प्रियसखी ललितां शरणं प्रविशामि। ] (इति तथा कृत्वा संस्कृतेन) ॥१०॥ अत्रायान्त चलमपि हरि लोकयन्ती बलिष्ठों त्वामालम्ब्य प्रियसखि घने नास्मि कुञ्ज नितीना। माला द्वारा मुकुट सजा हुआ है, उन श्रीमाधव की माधुरी मेरी बुद्धि को सरमत्त कर रही हैं ।।१०३॥१६॥ विशाखा-हंसकर) हे राधे ! तुम्हारौ अङ्ग सौरभ ने श्रीकृष्ण को वशीभूत कर लिया है, फिर तुम ध्यर्थ किस लिए विव्योक-विभ्रमादि वितासो सो प्रकाशित कर रही हो? रण मे आगे-आगे रहने वाले निमुरण योद्धागणो के हाथ मे जब शत्रु जय या आत्म समर्पण कर देता है, फिर ऐसा कौन जय धार्ने वाला योता है जो अपने आप पराक्रम दिखाता है ? ॥१०॥१७॥ श्रीराधिका-अरो दुमुसि ! मुझे आज सकट मे डालकर अभी भी (विधाम नहीं ले रही है । इसलिए तुझ निदंय हृदयवाली को छोडकर मैं गृपाल हृदयवाली अपनी प्रिय ससी ललिता की शरण लेती हू। (इतना बह- कर ललिता का आश्रय ग्रहण करते हुए कहती है) ॥१०॥ है प्रिय ससि! चशल हरि यहा मेरे पीछे आ रहे हैं, इसी आया तुम्हें बलवती जानवर तुम्हारा आश्रय लेकर इस पनी पुख में ट्रिप जाती हूँ। (आधा लोग पहने पर बीच में राधाजी बहती हैं)- *श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-६ * । २५६ ललिता-(सनमस्मितम् संस्कृतेन) अस्मान्मुग्धे हृदयनिहितादद्य पीताम्बरात शक्तो नान्यः कुचपरिचये गत्पुरो मा व्यथिष्ठाः ॥१६॥१८।। श्रीकृष्ण:-(सानन्दम्) कल्याणि! काले लब्धासि। (इति राधा- मनुसर्पति) ॥१०७॥ ललिता-(साटो परिक्रम्य कृष्णं वारयन्ती) छइल्ल ! ण हुण हु एसा तुम्ह परिहासजोग्गा अम्हारणं पिअसही। ता अवेहि अवेहि । [विदग्ध! न खलु न खल्वेपा तव परिहासयोग्या अस्माक प्रियसखो। तदपेहि अपेहि] श्रीकृष्णः-(सस्मितम्) ललिते नेद गोष्ठाङ्गनम् । पश्य वृन्दाटवो कुक्षिरसौ । तनह वः प्रभविष्णुता ॥१०।। ललिता-कण्ह ! अण्णाओ ताओ खु मुद्धिआओ जाओ तुअत्तो वि ललिता-(परिहास पूर्वक मुस्कराते हुए) हे मुग्धे ! आज तुम्हारे हृदय-स्थित पीताम्बर को छोड़कर और अन्य कोई भी व्यक्ति मेरे सामने तुम्हारे वक्षस्थल का परिचय प्राप्त करने में समर्थ नही होगा । इसलिए भय मत करो॥१०॥१८॥ (श्लेपार्थ-हे राधे ! आज तुम्हारे हृदय मे अवस्यान करने वाले श्रीकृष्ण को छोड़कर और अन्य कोई भी व्यक्ति मेरे सामने तुम्हारे वक्ष- स्थल का आलिंगन करने में समर्थ नहीं होगा, इसलिए तुम भय मत करो।) श्रीकृष्ण-(आनन्द पूर्वक) हे कल्याणि । ठीक समय पर मैं तुम्हें मिला हूँ। (यह कहकर श्रीराधा के निकट जाते हैं) ॥१०॥ ललिता-(पीछे हटकर, श्रीकृष्ण को गर्व के साथ रोते हुए) ओ नागर ! नहीं, नहीं, यह हमारी प्रिय सखी तुम्हारे परिहास करने योग्य नहीं है । अतः तुम यहा से हट जाओ, चले जाओ ॥१०॥ श्रीकृष्ण-(मुम्कराते हुए) ललिते ! यह गोप्ठांगन है, देस यह वृन्दा. वन का मध्य स्थान है, यहा तुम्हारो प्रभुताई नही है ॥१०॥ ललिता-कृष्ण 1 जो पो मुग्धा रमणी होगी, वहीं तुमसे भली २६० ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * सुट्ट. भाएन्ति । एसम्हि पसिद्धा ललिदा [ कृष्ण! अन्यास्ताः खलु मुग्धिकाः याः त्वत्तोऽपि सुष्ठु विम्यति। एपास्मि प्रसिद्धा ललिता] ॥११॥ (राधिका चलापाङ्गन कृष्णं विलोक्य कम्पं नाटयति) ललिता-राहे ! कीस सज्झसेण कम्पसि, जं एसा जोदि ललिदा ? [ राधे ! कस्मात्साध्वसेन कम्पसे, यदेपा जीवति ललिता? | ||१११॥ . श्रीराधिका-ललिदे ! गहीदाई बन्धूगपुप्फाई । ता एहि कालिन्दी- तीरं गच्छम्ह । [ ललिते ! गृहीतानि बन्धूकपुष्पाणि । तदेहि कालिन्दीतीरं गच्छामः ] ॥११२॥ श्रीकृष्ण:-कठोरे ! कथमाहृतबन्धुजीवा दूरं गन्तुमुद्य तासि ? (इति पन्यानमावृण्वन्) ॥११३।। परीतं शृगेण स्फुटतरशिलाश्यामलरुचं चलढे वंशव्यतिकरलसन्मेखलममुम् । प्रकार भयभीत होगी। देखो, मैं हूँ वह प्रसिद्ध ललिता ॥११०।। [ श्रीराधा चञ्चल नेत्र-कोणों से श्रीकृष्ण को देखकर कांपने लगती ललिता- राधे ! क्यों डर से कॉम्प रही हैं ? जब यह तुम्हारी ललिता जीवित है ॥१११॥ श्रीराधिका-ललिते! बन्धूक-पुष्प हमने सब ले लिए हैं । आओ, हम कालिन्दो तीर पर चलें ॥११२॥ श्रीकृष्ण-अरी कठोरे ! तुम बन्धु-जीवन को लेकर क्यों दूर जाने को चेष्टा कर रही हो ? (इतना कहकर रास्ता रोरते हैं) ॥११३।। -हे राध ! जो शृगों से आवृत है, जिसको उग्रवल शिलाओं की श्याम यान्ति है, जिसमे वेष चञ्चल हो रहे हैं, एवं यंश वृक्ष मेखला के रूप में गुशोभित हो रहे हैं, ऐगे सामने उपस्थित धरणीधर का उल्लंघन कर सुम से सूर्य कन्या कालिन्दी के किनारे जा सकती हो ? (पक्षातर मै-जिसके हाथ में गंग है और जिसमी उगवन शिला यो भाति दयाम-कासि है. जो येत को हाप में लिए पला आ रहा है एय
।
*श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क ६ * [ २६१
अतिक्रम्योत्त न धरणिधरमने कमित
स्त्वया गन्तु शक्या तरणि दुहितुस्तीरसरणिम् ॥११॥१८।।
श्रीराधिका-विक्र विलोक्य हु कुवती) णाअर मह दोसो गस्थि ।
दाणि एसा गोउलेसरि अणुसरिस्सम् । [ नागर । मम दोपो नास्ति । इदा-
नोमेपा गोकुलेश्वरीमनुसरिप्यामि । ] ११५॥
श्रीकृष्ण - राधे ! क विभीषिकया काम गम्यताम् । तद्भुजभू-
लस्थ पीतदुकूलमेव ममानुकूलम् । (इति राधा दिधीपति) ॥११॥
श्रीराधिका-(भ्र कुटीमाबध्य सस्कृतेन)
साध्वीना धुरि धार्या ललितासङ्गन गविता चास्मि ।
हितमालपामि माधव, पथि माद्य भुजङ्गता रचय ॥११७ ॥२०॥
श्रीकृष्ण - ललिता मिश्रावि वाग्भङ्गिरस्या? तदह नापराध्यामि ।
(इति भुजदण्डावुद्दण्डयति) ॥११६
२
वशी के सहित छोटी छोटी घण्टिकाओ से सुशोभित है ऐसे सामने खडे हुए
मुझ गोवधनधारी कृष्ण से बचकर तुम कैसे कालि दो तोर पर जा सकती
हो ? ॥११४॥१६॥
श्रीराधिका-(टेढी दृष्टि से देखकर अहकार करती हुई) हे नागर
मेरा कोई दोप नही है । अब मैं गोकुलेश्वरी-श्रीयशोदा के पास जाऊँगी।
श्रीकृष्ण-राध ' डराने की क्या बात है ? बडी खुशी से जा सकती
हो। तुम्हारी भुजाओ मे लिपटा पीताम्बर हो मेरी अनुकूलता करेगा (यह
कहकर श्रीराधा को पकड़ने लगते हैं। ॥११६॥
श्रीराधिका-(भृकुटी तानकर) हे. माघव ! मैं साध्वीगणो म अप्र-
गण्या हूँ और ललिता का साथ पाकर गर्व रखती है। इसलिए तुम्हारे हित
की बात कह रही है कि रास्ते मे तुम कामुकता मत करो-अथवा मुझे
भुजामो मे मत भरो ॥११७॥२०॥
श्रीकृष्ण-ललित । सुन रही हो तुम क्या इसको वागमगि ? अब
मेरा कोई असराय नही है (यह कहार भुजाओ को उठाते हैं) ॥११॥
२६२ ] *श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-६ * ललिता-(राधां पृष्ठतः कृत्वा) कण्ह ! सम्चलोअ सलाहणिज्जगुणोवि तुमं गोउलिन्दस्स गन्दणोसि । ता पेदं दे दुल्लोललणं अम्हेसु जोगम् । [ कृष्ण ! सर्वलोक-इलाघनीयगुणोऽपि त्वं गोकुलेन्द्रस्य नन्दतोऽसि । तन्नेदं ते दुर्लीलत्वमस्मासु योग्यम् ] ॥११।। मधुमङ्गल:-मइ गटिवदे ! कि ति वुन्दापणं विद्ध सिम तुम्हेहि अम्ह-पिअवअस्सस्स पुप्फाई हरिज्जन्ति ? [ अयि गविते ! किमिति वृन्दा- वनं विध्वंस्य युष्माभिरस्मत्प्रियवयस्यस्य पुष्पाणि ह्रियन्ते ? ] ||१२०।। श्रीकृष्णः-सखे ! तूणं गणयासां पुष्पाणि, यथा तत्संख्यया फण्ठतो हारमगीनाहरामि ।।१२१॥ मधुमङ्गलः-पिअवअस्स ! किद गणएं । ता रताणं पुष्फारणं परि- बट्ठण पउमरागाई गेह। पण्डुराहणं उग हारमोतिभाई। [ प्रिय वयस्य ! कृत गणनम् । तद्रक्ताना पुषाणा परिवर्तन पद्मरागाणि गृहाण । पाण्डुराणा पुनीरमौक्तिकानि । ] ॥१२२॥ श्रीकृष्ण.-सखे! पालोचयम् । नामूनि पुष्पमूल्यतुल्यानि रत्नानि, ततः कथमेभिरेव पर्याप्तिः? ॥१२३॥ ललिता-(श्रीराधा को पीछे करके) कृष्ण ! सब लोग ही तुम्हारे गुणो की प्रशंशा किया करते हैं और तुम गोकुलेन्द्र-नन्दराज के पुत्र हो इसलिए तुम्हारा हमारे प्रति इस प्रकार का दुनितिपूर्ण आचरण उपयुक्त नहीं है ।।११६॥ मधुमङ्गल-अरी अभिमाननी ! तुम वृन्दावन को बिगाड़ कर यो मेरे प्रिय मित्र के फूलो को चुरा रही हो? ॥१२०॥ धोकृष्ण-मित्र ! तुम शीन इनके चुराये हुए फूलों की गिनती करो। मैं उतनी ही मणिया इनके गले के हारो को छुडा लूगा ॥१२॥ मघुमनल-हे प्रिय ससे ! मैंने गिन लिये हैं । लाल रंग के पुप्पो के वदले पराग मणिया तथा पोले पुप्पो के बदले पोले रग के हीरा और मोती इनके सव छुड़ा लो ।। १२२।। धोकृष्ण-मित्र मैंने विचार किया है। इनकी मणिया और हीरे मेरे पृन्दावन के पूलो को समानता नही कर सकते, इनसे हमे क्या मिलेगा। - । * श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-६ * [ २६३ मधुमङ्गल -(सकाकुप्रपञ्चम्) अस्स | एसो अणुगदो बम्हणो अब्भ- त्येदि । ता इमेहिं जेव्व सतुट्ठो होहि । [ वयस्य । एपोऽनुगतो ब्राह्मणोऽभ्य- र्थयति ।तदेभिरेव सतुष्टो भव । ] ॥१२४।। श्रीकृष्ण -यथा प्रवीति वयस्य ॥१२॥ ललिता-(विहस्य) अज्ज | सामिणो जोग्गो जेन्च अमचोसि । [ आर्य । स्वामिनो योग्य एवामात्योऽसि ] ||१२६।। विशाखा-(सालीकसभ्रमम्) कण्ह । दूरे चिट्ठहि । [ कृष्ण । दूरे तिष्ठ ] ॥१२७॥ श्रीकृष्ण -फुटिले किमिति ? ॥१२८॥ विशाखा-पेक्ख, सरम्भेण सगर गमिदा चन्दहास उल्लासेदि अम्ह- पिअसही राहा [ प्रेक्षस्व । सरम्भेण सगर गमिता चन्द्रहासमुल्लासयत्य- स्मत्प्रियसखी राधा। 1 ।।१२।। मधुमङ्गल-(विनय-अनुनय करते हुए) मित्र ! यह तुम्हारा दास आह्मण प्रार्थना करता है । तुम इस मे ही सन्तोष कर लो ॥१२॥ श्रीकृष्ण-तू जैसे कह मित्र ॥१२५।। ललिता-(हसकर) आर्य | स्वामी के योग्य ही मन्त्री है ।।१२६।। विशाखा-(अकारण सम्भ्रम प्रकाश करते हुए) कृष्ण । तुम दूर रहो ॥१२७॥ श्रीकृष्ण-अरी कुटिले । ऐसा क्यो? ॥१२८।। विशाखा-देख, हमारी प्रिय सखी राधा क्रोध मे भरकर युद्ध करने के लिए चन्द्रहास(खडग) निकाल रही है। (पक्षान्नर ने-देख हमारी प्रिय सखी राधा रसावेश में तुम्हारे साथ सम्मिलित होने के लिए उत्कण्ठित होकर चन्द्र के समान हास्य प्रकाश कर रही है) ॥१२॥ धोकृष्ण-(मुस्कराकर) अरी मुग्धे । देख मैं भी विस्तृत रोमाञ्च- २६४ श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-६ श्रीकृष्ण-(स्मित्वा) मुग्धे ! पश्य । अहञ्च प्रपश्चितगाढरोमाञ्च- कञ्चकोऽस्मि । तयत्नं रामारत्नं हरिष्यामि । (इति राधामनुसर्पति) ॥१३०॥ ललिता-(सरम्भमभिनीय) कण्ह १ पेक्खामि दे साहसं । राहीए छाअं पि तुम फसेहि । [ कृष्ण ! पश्यामि ते साहसम् । राधायाश्छायामपि स्व स्पृश } ||१३१॥ श्रीकृष्ण --ससे नूनं ललितारूपेण महाभैरवीयं प्रादुता ।।१३२॥ धीराधिका-हला कल्लाणी होहि । [हला! कल्याणी भव । ] (इति ललिता साकुतमालिङ्गति)॥१३३।। श्रीकृष्णः- (जनान्तिकम्) ललिते ! विमुच्च फाठिन्यम् ।।१३।। ललिता-उक्को मे देहि । [ उत्कोचं मे देहि ] ॥१३५।। श्रीकृष्ण.-(स्मित्वा) ललिते, सत्यं प्रीमि ते राधामपि विप्रलम्य सायमनगसंगरे त्वामेव प्रतिरीरयिष्ये ॥१३६।। जाल रूपी कवच को धारण कर रहा हू । इसलिए विना यत्न मैं रामारन हरण करूंगा (यह कहकर श्रीराधा के निकट जाते हैं)॥१३॥ ललिता-(क्रोध प्रकाश करती हुई) कृष्णा में देसू तुम्हारा साहस । तुम एक बार तो राधा की छाया या स्पर्श करो ॥१३१ । घोकृष्ण-ससे ! निश्चय ही यह ललिता तो महा भैरवी उत्पन्न हुई है ।।१३२॥ घोराधा-ससि । तेरा पल्याण हो । (यह पहकर अमितापपूर्वक ललिता का मालिंगन करती है) ॥१३३॥ धोकृष्ण-(कान मे धीरे से) ललिते ! पटोरता पो छोड़ दे ॥१३४।। सलिता-मुझे दो युष रिश्वत ॥१३५।। चौपृष्ण-(मुम्फरार) लानते ! तुम्हें सत्य कहता हूँ, राधा को भी ना पर मैं गायाकारा में अनन-युर में तुम्हे ही अपना प्रतियोली घनाऊंगा ।।१३६॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २६५ ललिता--(सरोष परावृत्य) अवेहि, दिदूसअ मवेहि अपेहि, विद्रुपक! अपेहि। 1 ॥१३७॥ श्रीकृष्ण,- फथयोत्कोचं यत्र ते तुष्टि. ॥१३॥ ललिता-णाअर ! पुप्फमग्गणरङ्गण पुन्दावरणं मममन्ती दूएदि मे सही। ता दिव-पुष्फेहि स अलकदुअ सुहावेहि । [ नागर । पुष्पमार्गण- रङ्गण वृन्दावन भ्रामयन्ती दूयते मे सखी । तद्दिव्यपुष्परेनाम अलकृत्य सुखय । ] ॥१३॥ श्रीकृष्ण -(स्मित्वा) यथाभिरोचते तुभ्यम् । (इति परिक्रम्य दरि. भटी नाटयन्)ललिते, बाढं विन श्यताम्, न त्वां समाय मन्ये (इति राधिका- हारमाक्रप्टुकर प्रसारयति) ॥१४०।। ललिता-(नाम विलोक्य सस्मितम्) छइल्ल ! सूरदेअपूाकिटे किद- सिणारण पिअसही अकिदसिणाणो पखु तुम मा फसेहि। [विदग्ध! सूर्यदेव- पूजाकृते कृतस्नाना प्रियसखीमकृतस्नानः खलु व मा स्पृश ] ||१४१॥ श्रीकृष्ण:-अपि मदाधे ! समन्तादुल्लासिनि प्रस्वेदाम्बुपूरे मयि पर्य कृतमहाभिषेक न पश्यसि ॥१४२।। ललिता-(क्रोध मे पीछे हटकर) दूर रह रे कामुक ' दूर रह ॥१३७ भीकृष्ण-तुम ही बोलो, किस रिश्वत मे नुम सन्तुष्ट होओगी?" ललिता-नागर । फूल चुनने की अभिलाषा से वृन्दावन मे भ्रमण करते करते हमारी प्रिय सखी राधा थक गई है। इसलिए तुम दिव्य पुप्पो से इसको अलकृत कर इसे सुखी करो।।१३६॥ श्रीकृष्ण-(मुस्कराकर) जैसे तुम्हारी इच्छा हो। (यह कह पीछे हटकर और अति गर्व प्रकाशित करते हुए) ललिते 'सू बहुत भारी क्रोध करती है । परन्तु मैं तुम्हे तृण के समान भी नही समझता हू । (यह कह श्री राधा का हार खीचने के लिए हाथ बढाते हैं) ॥१४०॥ ललिता-(टेढी दृष्टिपूर्वक मुस्कराते हुए) नागर सूर्य देव की पूजा करने के लिए प्रियसखी राधा स्नान कर चुकी है, तुम अभी नहाए नही हो । अत. इसे मत छुओ ॥१४॥ थोवृष्ण-अरी मदान्धे ! मेरा तो मारा शरीर पसीने से तरबतर हो रहा है, मैं तो महाभिषेक किए हुए हू-तुम्हे नही दीखता है क्या ? ॥ ?
२६६ ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ *
ललिता-(राधामन्तरयन्ती समान्थर्यम्) हला । उद्दण्डकालतमाल.
मण्डलघोलेण वणखण्डेण इमस्त पअण्डदा दूसहा किदा । ता अम्हे हार
रविखद् खणं सोम्मा होम्ह । [ हला | उद्दण्डकालतमालमण्डलपोरेण
वनखण्डेनास्य प्रचण्डता दु सहा कृता।] ॥१४३॥
विशाखा-कीदिस सोम्मा होम्ह ? [ कीदृश सोम्या भ म ?] ।
मधुमङ्गल--हो, हो णिज्जिदाओ गम्विदगोविआओ। [ ही हो,
निज्जिता गवितगोपिका । ] (इति नृत्यति) ॥१४५।।
श्रीराधिका का-अइ मुट्ठ ललिदे । भअवन्तस्स उवासण तुए अज्न कि
विसुमरिदम् [ अयि मुग्धे ललिते । भगवत उपासन त्वयाद्य किं विस्मृतम्।]
मधुमङ्गल -देइ राहिए । केअलं तुम्हे जेव्ध उवासरण करेव त्ति
मा गवाएघ अम्हे वि उवासरण करेम्ह । [ देवि राधिके । केवल यूयमेव-
मुपासन कुरुथेति मा गर्वायध्वम्, यद्वयमप्युगसन कुर्मः] ॥१४७।।
विशाखा-अज्ज कोविस तम् आर्य । कीदृश तव ] ४८||
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ललिता-(श्रीराधा को छिपाते हुए धीमी आवाज मे) हे सखि ।
उद्दण्डकाल स्वरूप तमाल वृक्ष से ढके हुए इस घोर वन मे श्रीकृष्ण की
प्रचण्डता अतिशय असहय हो रही है, इसलिए हम हार को रक्षा के लिए
कुछ देर तक सौम्य-शान्त हो जाती हैं ॥१४३।।
विशाखा-से सौम्य हो सकती हैं ? ॥१४॥
मधुमङ्गल-ही-ही, अभिमान-भरी गोपिका हार गई (यह कहकर
नाचने लगता है) ।।१४।।
धोरापिका-अरी मुग्धे ललिते ! क्या तू आज भगवान सूर्यदेव की
उपासना भूल रही है ? ॥१४६ ।
मधुमङ्गल-देवि राधिरे तुम ही पेवन उपासना करती हो-इस
गर्व को छोड दो, हम भी उपासना करते हैं ॥१७॥
विशापा-आयं यह पैसे ॥१४८॥
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क ६ * [ २६७ । मधुमङ्गल-भोदि विसाहे | सुणाहि । गन्धपुष्फपुरस्सर पिउन वे- दिआमज्झे उज्जाअरणभूइट्ठ तदेकग्गचित्तदाए फङ्कणणेउराण सद्दोवासणम् । [ भवति विशाखे । शृणु । गन्धपुष्पपुर सर निकुञ्जवेदिकामध्ये उज्जागरण- भूयिष्ठ तदेकाग्रचित्ततया कङ्कण नूपुराणा शब्दोपापनम् । ] ॥१४६।। (सर्वा स्मयन्ते) मधुमङ्गल -(सश्लाघम् सस्कृतेन) आडम्बरोज्ज्वलगतिर्वरकुञ्जरक्त, स्वैरो परिस्फुरितपुष्करचारहस्न । घन्यासि सुन्दरि यया मृदुल हसन्त्या, बन्दीकृतस्तरलबब्लवकुञ्जरोऽयम् ॥१५०॥२१॥ श्रीकृष्ण --प्रिये । रुचिरसहचरीणा वीथिभि सेव्यमाना, मदमृदलमरालीरम्यलीलागतिश्री । , मधुमङ्गल-हे विशाखे | सुनो, गन्ध-पुप्पमयी निकुञ्ज वेदिको मे जाकर अतिशय जागरण करके वहा एकाग्रचित्त से पदण-नूपुरो की उपा- सना किया करते है ।।१४६।। (यह सुनकर सब हस पडते हैं। मघुमङ्गल-(प्रशसा सहित) घमण्ड से जिनकी गति उज्ज्वल है, जो कुञ्जगृह मे घिरी हुई हैं और स्वेछाचारी हैं एव जिनके हाथ में लीला कमल सुशोभित है, हे सुन्दरि । ऐसी आप धन्य हैं । क्योकि मृदुल हास्य द्वारा इस चञ्चल प्रियतम गजराज को तुमने बाघ लिया है अथवा इसे वन्दीजन-स्तुति करने वाला बना लिया है ।।१५०॥ घोकृष्ण-हे प्रिये' हे चन्द्रवदनि । तुम मनोहर सखियो के यूप मे सेवित होकर मतवाली हसी की भाति रमणीय लीला-गति की शोभा विस्तार कर रही हो । जिससे मेरी निद्रा उवाट हा चुकी है और तुम शरद् ऋतु की भाति सव लोको को अथवा नेत्रो की सम्पतिशोमा प्रसारित कर रही हो इस २६८ ] * श्रीविदग्धमाघव नाटक अङ्क-६ * शशिमुखि गनिद्रं कुर्वती मामिदानों, शरदिव भवतीयं लोकलक्ष्मी तनोति ॥२२॥ तदर्वाचोनेन हारिण वण्यशृंगारेण भवतोमलकुर्वाण: शारदीं श्रियम. वन्ध्ययामि ॥१५॥ मधुमङ्गल:-(संस्कृतेन) बलानुज कलापिनामवकलय्य कालज्ञतां, मनः किल बलीयसी मम विर्भात विस्मेरताम् । यदद्य शरदागमे तय विलोक्य लीलोकतां, किरन्ति चिमण्डलोजुषममी शिखण्डावलीम् ॥१५२।।२३॥ श्रीकृष्णः-ससे ! साधु लक्षितं तन्मौलिकल्पनाय चन्द्रकानाहरामि । (इति वटुना सह तथा करोति) ॥१५३।। श्रीराधिका-सहि ललिदे ! जत्थ दिण्णभारा अहं निश्चिन्तम्हि सा तुम जइ सोम्मासि, तदोबाय कण्हो दूरे गदो दाव फङ्कल्लिकुडङ्ग पवे- सिस्सम् । [ मखि ललिते ! यत्र दत्तभाराह निश्चिन्तास्मि, सा त्वं यदि सौम्यासि, ततो यावत्कृष्णो दूरे गतः, तावत्कलिकुञ्ज प्रवेक्ष्यामि । (इति तथा स्थिता) ॥१५॥ लिए नवीनतम मनोहर वन्य-वेश द्वारा तुम्हें अलंकृत कर मैं शरद कानीन शोभा की सफलता विधान करता हूँ ॥१५१॥ मधुमङ्गल-हे कृष्ण ! मोरों की समय के अनुसार कर्तव्य-बुद्धि को देखकर मेरे मन को वरवश अचम्भा हो रहा है । क्योकि आज शरद् ऋतु के आने पर तुम्हारी क्रीड़ा उत्सुकता देखकर इन समस्त मोरों ने परम शोमामय अपनी पुच्छ-श्रेणी को फेंक दिया है । १५२।। थोकृष्ण-मित्र तुमने ठोक देसा है, आओ चलें, मुकुट बनाने के लिए मौर-चन्द्रिकाओं को ले आयें। (यह यहार मधुमङ्गल के साय नोर. चन्द्रिका उनले लगते हैं) १५ श्रीराधिया-सति ललित ! मैं जिस पर भार अर्पण कर निश्चिन्त हो रही हूं। यह तुम यदि सौम्य हो रही हो तो पृष्ण जब तक दूर चले गए है तब तक पलो हम भी अशोक पुश में चलती हैं । (यह कहबर अशोक- कुछ में जाकर छिप जाती हैं।) ॥१५४ ।
* श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क ६* [ २६६ . श्रीकृष्ण -सखे । निमित प्रचलाफ शलाकामि किरीट सञ्जरोट- नेत्राया सीमान्तसोमनि विन्याससौभाग्यमालम्वताम् । ( इति परिक्रम्य ) ललिते क्व सा ते प्रियसखा? ॥१५५।। ललिता-अत्तणो घर गदा 1 (आत्मनो गृह गता) ॥१६॥ श्रीकृष्ण -निष्ठुरे । तिष्ठ निष्ठ, तूर्णममू ते धूर्ततागर्वमपहरामि । (इति समन्तात्पश्यन् सहर्षम्) ययस्य पश्य, सहसे यमवाता गौराङ्गी प्रिया । (इत्युपसर्पति) ॥१५७ ॥ मधुमङ्गल -(विहस्य) भो वअस्स चक्कवादेण तिणाव?ण भामि- दस्स दे अज्जवि पूर्ण भमो ण गदो। पेक्ख, एसा पोदपराअपुञ्जपिञ्जरिदा थलणनिणी। [भो वयस्य | चक्रवातेन तृणावर्तेन भ्रामितस्य तेऽद्यापि नून भ्रमो न गत । प्रेक्षस्व एपा पीतपरागपुञ्जपिरिता स्थलनलिनी।] श्रीकृष्ण -(निरुप्य) सखे। सत्य वीपि ।(इत्यग्रतो गत्या) भो सखे। - धोकृष्ण-ससे । मोर चन्द्रिकाओ से मुकुट तो मैन बना लिया है, अब तुम उस खञ्जनाक्षी राधा के सीमान्त मे इसे सजाकर शोभा सम्पादन करो। (यह कहकर लौट अते है) ललिने । तुम्हारी प्रिय सखो कहा है । ललिता-वह अपने घर चली गई है ॥१५॥ थोकृष्ण-अरी निष्ठुरे । ठहर जा, अभी तुम्हारी धूर्तता का अभि- मान चूर्ण करता हूँ। (यह कहकर चारो ओर दसकर आन द सहित) मा. मङ्गल । देख, यह मिल गई वह प्रिया गौरागी। (यह कहकर निकट जाते है) ॥१७॥ मधुमङ्गल-हंसकर) अरे मित्र । चक्रवात त तृणावर्त दैत्य ने जो तुम्हें चक्र दिया था, अभी तक वह चक्कर तेरा नष्ट नहीं हुआ है । देख तो सही, यह पीले रंग की पराग पुञ्ज से आवृत्त स्थन-नलिनी है. (नशि राधा) ॥१५॥ श्रीकृष्ण-(ध्यानपूर्वर देखर) सधे तू सत्य कहता है । (यह पह- कर भागे जाते हैं) है मित्र यह! देव, अब तो मैंने निश्चय ही राया को प्राप्त २७० ] *श्रीविदायमाधव नाटक अङ्क-६ * पश्य कुङ कुमाङ्गो निष्टातमिदानीमेव लब्धा। (इति दिधी : प्रवावति)। मधुमङ्गल:- (सहन्ततालमुच्चविहस्य) मो पिस वमस्स ! एत्म तुन्श अवराहो मस्थि । किंतु पेम्मलहरीए जेब्ब, जाए सवा वुनाड़ई राहिआ णिम्मिदा । [भो प्रिय वयस्य ! अत्र तवापराघो नास्ति, किंतु प्रेमलहर्या एव, यया सर्वा वृन्दाटवी राधिका निर्मिता।।१०।। श्रीकृष्णः-(सवैलक्ष्यं विलोक्य) कथमुत्फुल्लेयं सहचरी ? (पार्वतो- विलोक्य) ललिताङ्गि ललिते ! हतो वाम्यपर्वतादयरोहन्तो कान्तारमितस्य दवस्व मे हस्तावलम्बम् ॥१६१।। ललिता-(स्मित्वा) सुन्दर! विसाहं पुच्छेहि। एसा पषु णं जाणादि । [सुन्दर ! विशाखां पृच्छ । एषा सल्वेनां जानाति । (इति संगा नाट्यति) ॥ श्रीकृष्णः- (सहर्षमपवार्य) ससे ! पश्य विशाखाया: परोक्ष किंचि. तिरोऽवलन्ती ललिता भू संज्ञया फदम्बफुख सूचयति । तदत्र नास्ति मना• कर लिया है । (ऐसा कहकर पकड़ने के लिये दौड़ते हैं) ॥१५६॥ मधुमङ्गल(ताली बजाकर जोर से हेमते हुए) अरे प्रिय मित्र ! तुम्हारा इसमे कुछ दोष नहीं है, दोप है प्रेम को तरङ्गो का । जो यह समस्त वृन्दावन तुम्हें राधा का ही बना हुआ दोस रहा है-सर्वत्र राधा ही राधा दीस रही है ।।१६०॥ थोकृष्ण-विस्मयपूर्वक देखकर) यह यया ! सहचरी (पीली पट- सरया) प्रफुल्लित हो रही है ! (पास्यं में देखकर) हे मनोहराङ्गि ललिते ! तुम प्रतिकूलता स्त्री पर्वत से नीचे उतर आओ और मुझ प्रिया-विहीन का प्रिया यो सोजने में हाथ बटाओ ॥१६॥ सलिना- मुसकराकर ) हे सुन्दर ! विशाला से पूछो, यह वहीं जानती है (यह कहकर हाप का इशारा देती है। ॥१६२।। धोरण-(हपं पूर्वक हाथ यो ओट में ) मिस ! देश, विशाला में दिर सविता टेवी पाल मे भृटी के इशारे मे पदम्ब कुछ यता रही है। इगलिये इसमें जरा भी गन्देह नहीं है । (पूमकर गर्व सहित सुमाराते
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* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ *
[ २७१
-
गपि सदिग्धता । (इति परिक्रम्य सदस्मितम्) प्रिये । विलोकिताति निष्क-
म्यताम् । ( इत्युद्ग्रीविका कृत्वा सहासम् । ललिते | साधु साधु. जातं तय
धूर्तता-लतिकाया: साफल्यमिदम् ।।१६३।।
मधुमगन -अस्स! एसा मए जेन लद्धा तुह राहा । (क्यस्य! एषा
मयैव लव्या तव राधा) ॥१६४।।
श्रीकृष्ण.-(सकौतुक्म्) वयस्य । ललितेत्र कच्चिदवयम्भणीयभ.
णिति सि ॥१६॥
मधुमङ्गल:--गाअतीए सवामि । [गायत्र्यै शपामि] ॥१६६ ।
श्रीकृष्ण.-(सविश्रम्भम् ) सखे । वा सा व सा? दर्शव शीघ्रम् ॥
मधुमङ्गल.- तुम्ह हत्याद जेवर शं करोमि । ता देहि मे पारितोसि-
भम् । (तव हस्तगतामेवैना करोमि । तहि मे पारितोपिकम् | ॥१६॥
(कृष्ण सश्नाध मालतीमालया मण्डयति ।)
मधुमङ्गल -घेप्पिज्जउ एषा । ( गृह्यतामेपा) (इति राधा' इति
वर्णद्वयीभाज पत्रलेखामर्पयति) ॥१६६।।
हुए) प्रिये मैंने तुझे देख लिया है, बाहर निकल आओ। (यह कहकर गर्दन
ऊँची उठाकर हंसते हुए) ललिते । ठीक है, ठीक है, तुम्हारी धूर्ततावेलि मे
फल लगा है ॥१६३।।
मधुमङ्गल-मिष | यह ले मैंने तुम्हारो राधा को ढूण्ढ लिया है।
श्रीकृष्ण -(कौतुकपूर्वक) ससे 1 ललिता की तरह तू अविश्वस्त वादी
मत होना ॥१६॥
मधुमङ्गल-गायत्री की शपथ खाता हूँ ॥१६६।।
श्रीकृष्ण-(विश्वास सहित) मित्र कहा है, कहाँ है? जल्दी सिा।
मधुमङ्गल-तुम्हारे हाथो मे देता हू । ला कुछ पारितोषिक (इनाम)
६॥१६॥
(श्रीकृष्ण प्रशंसा करते हुए मालती माला से मधुमद्गल को सजाते है)
मधुमङ्गल-लो पकडो। (यह कहकर "रा घा' यह दो वर्ण लिखा
हुआ एक पत्र हाथ मे देता है) ॥१६॥
२७२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * श्रीकृष्ण –(स्मित्वा) सखे । सत्यमनेनापि भवपितेन तपितोऽस्मि । क्रमारक्षामक्ष्णो परिसरभुव या श्रवणयो- मनागध्यारूढ प्रणयिजन-नामाक्षरपदम् । कमप्यन्तस्तोष वितरदविलम्बादनुपद निसर्गाद्विश्वेषा हृदयपदवीमुत्सुकयति ॥१७०॥ (इति परावृत्य दक्षिणतो विकसन्तमशोकमवलोक्य सविस्मयम् )- शङ्क सकुलितान्तराद्य निबिडवोडानुबन्धेच्छया कुञ्ज वञ्ज लशाखिन शशिमुखी लीना वरीवत्ति सा । नो चेदेष तदडिघ्रसगमविनाभावादकाले फय पुप्पामोदनिनितालिपटलीस्तोत्रस्य पात्रीभवेत् ॥ इति परिक्रामन्नुद्ग्री विक् या राधा दृष्ट्वा सानन्दम् ) प्रिये । कथ्यतामिदानी का वार्ता ॥१७१॥२५॥ श्रीकृष्ण-(मुसकराकर) ठीक है तुम्हारे द्वारा दी हुई इस वस्तु से मैं परितृप्त हो गया है क्योकि- सखे प्रेमीजनो के नामाक्षर नेत्रो और कानो से देविने-सुनने से तत्क्षण किस की सन्तोष वृद्धि नही होती है ? अधिक क्या कहूँ, प्रेमीजनो के नामा- क्षर स्वभावत समस्त जगत् के हृदय स्थल को उत्सुकता प्रदान करते हैं ।। (यह कहकर घूमते हुए दक्षिण दिशा मे अशोक वृक्ष को प्रफुल्लित दखकर आश्चर्यपूर्वक कहते हैं)- मैं समझता हू आज चन्द्रवदनी श्रीराधा रहस्यमयी क्रीडा करने की इच्छा से व्याकुल चित्त होकर अशोक-कुञ्ज मे छिप रही हैं। यदि ऐसा न होता तो राधा के चरणो के स्पर्श के बिना यह अशोक वृक्ष कैसे अपनी पुष्प सौरभ के भ्रमरो के भुण्डो को आमन्त्रित कर रहा है और उनके द्वारा कैसे प्रशसनीय हो रहा है ।। (यह यह घूमकर और गर्दन को ऊँचा उठाकर श्रीराधा को देखत हुए मानन्दपूर्वक रहते है) हे प्रिय । कहो सब क्या बात है ।।१७१।। -
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ *
[ २७३
श्रीराधिका --(सप्रणयेप्यम्) तुअतो भएण जेव पलाईदन्हि । एत्थ
विम बिडम्बेदु सोसि ? [त्वत्तो भयेनैवपलायितास्मि। अनापि मा
विडम्बयितु लब्योऽमि ] ॥१७२।।
श्रीकृष्ण - (सात्मश्लाघम्) हा मे गोर पाटवारभटी। यतस्ति-
रोधानविद्यापहारेण निजिता यूयम् ।।१७३ ।
ललिता -(सस्क्रतेन) हन्त भो व डगानजितराशिन्'
अस्मिन्न कमरोजसमवकृतस्तोत्रोऽसि वृन्दावने
राधा भूरिहिरण्यगर्भरचितप्रत्यङ्गकान्तिस्तथा ।
हस्तोदस्तमहीधरस्त्वमसकन्ने त्रान्तभनिन्छटा-
कृष्टोधरणीघरा मम सखी तद्वोर माहकथा ॥१७४॥२६॥
श्रीकृष्ण -(सस्मित) ललिते । निलोने मयि विलोक्तेि नातथ्यमा
विफत्थन भवतीना विदाकरवाणि । १७॥
?
श्रीराधिका- (प्रणय ईO सहित) मैं तुम्हारे भय से ही भाग आई
थी तुम यहां भी मेरी विडम्बना करने आ गये हो । १७२।।
श्रीकृष्ण-अपनो प्रशमा सहिर) देखा है तुमने मेरो निपुणता का
गम्भीर बल, जिससे छिपने की विद्या को अपहरण कर मैं ने तुम्ह पराजित
कर दिया है ।।१७३।।
ललिता-ओहो ! तुम कथन मात्र से ही अपनी प्रशसा कर रहे हो-
देखो, इस वृन्दावन में केवल एक ब्रह्मा ने तुम्हारी स्तुति की है,
जिससे तुम्हे इतना अहकार हो रहा है । किन्तु अन अनेक ब्रह्मा हमारी
श्रीराधा के प्रति अङ्ग की वाति की स्तुति दिया करते है तुम एक
बार मात्र हाथ पर गोवधन धारण कर अभिमा कर रहे हो, परन्नु तुम
गोवर्धनधारी को हमारी ससी श्रीराधा ने अपने नत्र योग से कितने चार
थापित किया है । अतएव हे वीर और अधिक गवं न परो॥१४॥
थोकृष्ण-(मुमकराने हुए) ललिते ' मैं मर तुम्हारी दृष्टि से दूर हो
जाता है, और तुम्हारे सामने मिथ्या अहकार नहीं करता हू ॥१७॥
२७४ ] *श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-६ * सर्वा:-एव्वं होदु [एव भवतु । ॥१७६।। श्रीकृष्ण -(तिरोभवन् स्वगतम्) इयमुत्तरेतश्चश्वरीकसंचयरोचिरु- ल्लासि-गमलपलाशगुच्छा दूरतस्तापिच्छविच्छोलि । तदेषां सवर्णतया सखीनाबजाना मामत्र सगोपयिष्यति (इति सवयस्यो निष्क्रान्त. 1) ॥१७॥ रालिताः-हमा रहे! कण्हस्स अदसरणेण मा उत्तम्म । रणं दिटु जेव्य जाणेहि । ता विजुता अनहे आसम्पदो उपसम्ह । [हला राधे कृष्णस्यादर्श- नेन मोताम्य, एन दृष्टमेव जानोहि, तद्वियुक्ता वय सर्वत उपसमि] श्रीराधिका -जधा भणादि पिअसही। [यथा भणति प्रियसखी ॥ (इति तिस्रस्तथा कुर्वन्ति श्रीराधिका:- उत्तरा वनलेखामासाद्य सविमर्शम्)णूरणं कण्हो एस्थ पत्तो हुविस्सदि, जं जं पेवयन्तो दपिखणं पइटो। [नून कृष्णोऽत्र प्राप्तो भविष्यति, यन्मा प्रेक्षमाणो दक्षिण प्रविष्ट । ] (इति परिक्रम्य सस्कृतेन) ॥१८०॥ सब सखी कहती हैं-ठीक है ऐसा ।।१७६।। श्रीकृष्ण-(छिपकर मन ही मन मे) यह जो उत्तर दिशा मे भ्रमरो की कान्ति सदृश काले वर्ण के पत्रो वाले तमाल वृक्ष हैं, जिन्होने मेरी तरह काला वर्ण ग्रहण कर मानो मेरे साथ सस्य भाव प्राप्त किया है, ये मुझे छिपा सकते हैं । (यह कहकर मधुमङ्गल के साथ चले जाते है) ॥१७७।। ललिता-हे राधे ! श्रीकृष्ण को न देखकर आतुर मत हो, वह तो देम्वे हुये ही जान । इसलिए हम अभी जाकर वन मे चारो तरफ उन्हे ढूण्ढ लाती हैं ।।१७८॥ श्रीराधिका-जमे तू कहे प्रिय सखि ॥१७६।। (यह कहकर तीनो श्रीकृष्ण को गुण्ढने लगती है) श्रीराधिका-(उत्तर दिशा मे वन की ओर जाकर मन-मन मे सोचने लगती हैं) निश्चय ही श्रीकृष्ण यहा प्राप्त होगे, क्योकि मुझे देखकर वे दक्षिण दिशा को गये थे। (ऐसा कहकर लौटते हुए कहती है)--||१८०।।
*श्रीविदग्धमाधव नाटक अ६ *
[ २७५
स हरिति भवतीभि स्वा तहारी हरिण्यो
हरिरिह किमपाङ्गातिथ्यसङ्गी व्यधायि ।
यदनुरणितवशीकाफलोमिम खेभ्य
सुखणकवला व सामिलीडा स्खलन्ति ॥ १८॥ २७॥
(पुरोऽभ्युपेत्य समन्नावश्यन्ति सस्कृतेन)
यदलितमरन्द वर्तते शखिवृद
मिलति च यदलब्धप्रेमपूर्णा खगाली।
तविह न हि शिखण्डोत सिनी सा प्रविष्टा,
निखिलभुवनचेतोहारिणी कापि विद्या ॥२॥२८॥
(इति सव्यत परिक्रम्य सस्कृतन)
विधूर्णन्त पौप्य न मयु लिहतेऽमो मधुलिह
शुकोऽय नादसे कलितजडिमा दाडिमफलम् ।
विवर्णा पर्णाग्र चरित हरिणोय न हरित
पयानेन स्मामो तदिभवरगामी हरिरगात् ।।१८।।२।।
हे हरिणिगण | क्या आपने इस तरफ मनोहारि श्रीकृष्ण को अपने
नेत्रो का अतिथि किया है-अपने नेया से उहें देखा है ? क्याकि मनाहर बशी
ध्वनि से तुम्हारे मुह से तृण ग्रास अधूरे चवित होकर गिर पड हैं ।१८१ २७।
(आगे जाकर चारा आर देखते देखते)
जब इन समस्त वृक्षो से मकरन्द नही भर रहा है और पक्षीगग भी
प्रेमाविष्ट न होकर परस्पर मिल बैठे हैं तब निखिल विश्वमोहनकारिणी
मोरमुकुट धारिणी कोई एक अनिर्वचनीय विद्या (अर्यात कृष्ण) ने इस तरफ
प्रवेश नहीं किया है ।। (यह कहकर वाम दिशा मे घूम जाती हैं) ॥१८२-१८।
जब ये समस्त मधुकर घूणिन चित्त होकर पुप मर रन्द पान नही
कर रहे हैं और यह शुक पसी भात म्भत दशा को प्राप्त हो रहा है एव
दाहिम फल को नहीं खा रहा है तथा हरिणी विवर्ण हार इन हरी हरी
कोपला को नही भक्षण कर रही है, तब निश्चय ही मत्त गजेन्द्रगति
गामी मेरे स्वामो इमी मार्ग से गय हैं ।।१८३॥६॥
२७६ ] * श्रीविदाधमाधव-नाटक अङ्क-६ * (पुरो गत्वा) एसा वामदो कालो तमालाअली दोसइ [ एपा वामत. काली तमालाबलो दृश्यते ] (इति साचिकघर निभाल्य सस्कृतेन) नैसगिकाण्यपि निरर्गलचापलानि, हित्याद्य संकुलतनुः पुलकाङ्क रेण। हष्टि चिरेण परिरब्धतमालशाखा. शाखामृगीततिरियं किमधस्तनोति? ॥३०॥ ता एसा मञ्ज लाताविञ्चणिउञ्जसानिमा पेखिदम्वा । तदेपा माला तापिच्छनिकुशालिका प्रेक्षितव्या ॥१८४॥ (प्रविश्य ) श्रीकृष्णः- (स्वगतम् ) सत्यमस्याश्चित्तचत्वरसंगत्वरी प्रेमावलिरेव महुद्देशदूती, पदविलम्बितं विज्ञानभूयिष्ठोऽस्मि सवृत्त., ततः स्थाणुरिव निश्चल स्तिहामि । (इति तथा स्थितः) ।।१८।। श्रीराधिका:- (मूर्धानमानमय्य कृष्ण पश्यन्ती सव्याजम्। एत्य कण्हो णस्ति । { अत्र कृष्णो नास्ति ] ||१८६।। (आगे जाकर) वाई दिशा मे ये सब तमाल वृक्षावलि दीख रही है, (यह कहकर बाई ओर देखकर)--- बन्दर अपनी स्वाभाविक अखण्ड चपलता को छोडकर एव पुल. क्ति होकर तथा अपने अङ्गो को सकुचित कर तमाल की शाखाओ को आलिङ्गन करते हुए न जाने आज क्यो नीचे को नेत्र झुकाये हुए है ? इस मनाहारिणी तमाल कुञ्जशालिका को देखना चाहिये ॥१४॥३०॥ (श्री कृष्ण प्रवेश करते है) श्रीकृष्ण- (अपने मन मे) यह सत्य है कि श्रीराधा के अतिशय चातुर्य पूर्ण हृदय को मिलाने वाली प्रेमावली ही मेरे उद्देश्य की दूतो है, जिसके द्वारा शोघ्र हो मैंने बहुत कुछ चतुराई सीखी है । अब मैं शाखाहीन वृक्ष (ठोठ) की तरह निश्चल भाव से बैठ जाता हूँ ! (यह कहकर निश्चल भाव से अवस्थान करते है) ॥१८॥ श्रीराधिका-(श्रीकृष्ण को देखते हुए मस्त- झुकाकर छल सहित)- यहाँ तो कृष्ण नहीं हैं ।।१८६॥
*श्रोविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २७७ श्रीकृष्णः- (स्वगतम्) दिष्टया न दृष्टोऽस्मि ॥१७॥ धीराधिका:-(सस्मितम्) एसो गीलमणिकोलो जेध रेहदि । एप नीलमणिकील एव राजते ] ||१८|| श्रीकृष्ण:-नूनं घनान्धकारतो नाहं प्रत्यभिज्ञातः ॥१८८।। श्रीराधिका:-अम्महे. उज्जल्दा इन्दणोनकोलस्स ! [ अहो, उज्ज्वलतेन्द्र- नील कोलस्त्र! ] ॥१०॥ श्रीकृष्ण:-(सहर्पमपवार्य) रे ध्वान्तमण्डलससे शरणागतोऽस्मि विस्तारयस्व तरसा निजवैभवानि । अभ्यासमभ्युपगतापि महुर्यथासौ, नावति मा नषकुरगतरङ्गनेना ॥१६॥३१॥ श्रीराधिका -(स्मित्वा) अचरिअं अचरिअम् । इमस्त पोलोवलस्स अन्तराले पडिविम्बिदा चन्दाअली लक्खीअदि । [ आश्चर्यमाश्चर्यम् । अस्य नीलोरलस्यान्तर ले प्रतिबिम्बिता चन्द्रावली लक्ष्यते ] ॥१९२॥ ओकृष्ग-- मन मन मे) अच्छा हुआ रावा ने मुझे नहीं देखा ।।१८७ श्रीराधिका--(मुसकराते हुए) यह तो नीलमणि की लाठी पड़ी है। श्रीकृष्ण-निश्चय ही घोर अन्धकार के कारण मैं इसमे पहचाना नहीं गया हूं ॥१८॥ श्रीराधिका-अहो ! इन्द्रनीलमणि की लाठी को कैसी उज्ज्वलता है ? ॥१६॥ श्रीकृष्ण-(हर्ष सहित हाय की ओट में) हे अन्धकार मण्डल समे ! मैंने तुम्हारी पारण ली है । तुम अपने वैभव । गाढ अन्धकार ) का शीघ्र विस्तार करो। जिससे नवीन मृगलोचन राधा यारम्बार निकट मार भी मुझे पहचान न सके ।। १६शा थोराधिका-(मुसकराकर) यह पंमा थाम्चयं सा आश्चर्य !! इम नीलमणि मे चन्द्रावली प्रतिविम्बित हो रही है ॥१६॥ ।
२७०
श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क ६*
श्रीकृष्ण:-.( स्मितं कृत्वा स्वगतम् ) कथं संविदाना खलु नर्मात-
नोति ? (इत्युत्थाय प्रकाशम्) प्रिये, सत्यमाथ। यदयं त्यदास्पचन्द्रो मे
हु तितरङ्गषु बिम्बिाश्चन्द्रावली वमुत्र ॥१६३॥
श्रीराधिका:--अम्महे, कथं तुमं जेव्ध ? लदो रणेदं अचरिअम् ॥
[ अहो, कथं त्वमेव ? ततो नेदमाश्चर्यम् J॥१६४ ।
श्रीकृष्णः-विलासिनी! किमनेन विश्लेषसंपाद्यन केलिनर्मणा?
तदेहि, दानगन्धिना कुसुमवृन्देन पूर्णमूर्धनि सप्तपर्णकुञ्ज क्षणं विश्राम-
सौख्यमनुभवावः ॥१६॥
(इति तथा स्थिती)
ललिता-विसाहे ! पेपख, कण्हेण संगदा पिअसही, जं तस्स पदेहि
समिलिदाई एदाए पदाई दोसन्ति । विशाखे ! प्रेक्षस्व, कृप्रणेन संगता
प्रियसखी, यत्तस्य पदैः सम्मिलितान्येतस्याः पदानि दृश्यन्ते ॥१६॥
श्रीकृष्ण-( मुसकराते हुए मन ही मन में ) कैसे जान-बूझकर यह
परिहास कर रही है ? (यह, विचार खड़े होकर स्पष्ट बोले -हे प्रिये !
तुमने सच कहा है । तुम्हारा मुखचन्द्र हो मेरी चित्त-वृत्ति रूप तरङ्गो में
प्रतिविम्बित होकर चन्द्रावलो हो रहा है ।।१९३॥
श्रीराधिका-अहो ! क्या तुम हो ? फिर तो कोई आश्चर्य नहीं ।।
थोकृष्ण-हे विलासिनी ! इस विच्छेद-जनक केलिपरिहास का
क्या प्रयोजन ? आओ, हस्ति-मद सुगन्धि के समान सौरम-शाली, कुसुमों
से मुशोभित मस्तकवाली सप्तपणं कुज में चलकर थोड़ी देर सुसानुभव करं ।।
(यह कहकर दोनों वहां चले जाते हैं)
ललिता--विशारो ! देखो, प्रियससी श्रीराधा श्रीकृष्ण के साथ मिली
हैं, क्योंकि कृष्ण के पद चिन्हों के साथ साय प्रियससो के पदविह दोप
रहे हैं ॥१६॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २७६ विशाखा-(पदावाननुसृत्य सस्कृतेन) प्रियसखि परिरम्भानाभिनुरयानुबन्धा- दसहविनिवेशान्नमम्मलोल्योजितानि । इयमविपममन्दम्यासतो जल्पगोष्ठी, पदतिरिह राधाकृष्णयोरातनोनि ॥१६७॥ ३२॥ श्रीकृष्ण -प्रिये । नातिदूरे कोमलोऽय काञ्चीवनिरुदञ्चति, सत- स्तूष्णीं व ॥१६॥ विशाखा-हला । वित्यिण्णवल्लिमण्डलकुण्डलिदे वि वणखण्डे पिअ. सहीए कप कहो तुरिद लद्धो ? [ हला विस्तीर्णवल्लिमण्डलकुण्डलितेऽपि वनखण्डे प्रियसख्या कय कृष्णस्त्वरित लम ?] १el ललिता- गस्थ रमई जहिं जो, ण तस्स सो होइ बुल्लहो भुगो । मउलंतम्मिरसाले, क्लकण्ठी तवखरण मिलइ॥ [ गुरु रमते यन मो तस्य स भवति दुर्लभो भुवने । मुकुलायमानरसान कलकण्ठी तत्क्षण मिलति ] ॥२००॥३३॥ विशाखा-(पदचिन्हो का अनुसरण करत हुए) ह प्रिय सखि । इन पदचिन्हो से श्रीराधा-कृष्ण का आलिङ्गन सूचित हो रहा है । क्योकि ये पदचिन्ह एक दूसरे के आमने-सामने दिखाई दे रहे है । यहा नहीं दिखाई दे रहे हैं, इसलिये परिहाम चपलता द्वारा पराजय का ज्ञान होना है और यहाँ बिल्कुल स्पष्ट मन्द-मन्द पद-विन्यास हो रहा है जिसमे परस्पर कथोर- कथन प्रकाशित होता है ।।१९७॥३२॥ श्रीकृष्ण -हे प्रिये यहां देखो. पाम हो मन्द मन्द किङ्किगी को ध्वनि सुनाई दे रही है । अतः हम इमे चुपचाप होकर सुने ।।१६।। विशाखा-हे ललिते । यह यन-खण्ड विस्तीर्ण लता-गाल मे भावृत्त हो रहा है, त्रिय सलो सपा ने पंसे यहा श्रीकृष्ण को इसनी जल्दी का लिया है ? ॥१६॥ ललिता-ससि 1 जिस स्थान पर जो व्यक्ति अधिषरूप से विचरण करता है, वह स्थान जगत् मे उस व्यक्ति के लिये दुम नही हुआ करता। देखो, आम के मुरलित होते ही कोयलें वहां झट पहुँच जाती हैं ।।२८०१३३।। ।
२८० ]
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक अबु-६*
श्रीकृष्ण:-प्रिये ! प्रत्यासन्न तव सरयो । तदु परिहसिष्यन्नन्त-
रितो भवामि (इति तथा स्थितः) ।।२०।।
ललिता-(परिक्रम्य पुरो राधामालोक्य च सहर्षम्) हला! फुदो सो
णाअरो? [ हला! कुतः स नागर: ? ] ॥२०२।।
श्रीराधिका-( सस्मितम् ) फा क्खु तं जाणादि ? [ का खलु तं
जानाति ? ||२०३।।
ललिता-(सनमस्मितं संस्कृतेन)
कचा मुक्ता मुतावलिरपि ययौ निर्गुणदशा
विशुद्ध ते दन्तच्छदयुगमभूदान्तहृदये।
अबन्धासोत्काञ्ची तदिह सखि युक्तासि हरिणा
सतीनां वः कृत्यं किमुचितमिदं गोकुलभुवाम् ? ॥२०४-३४।।
श्रीकृष्ण:-(पुरोऽनुसृत्य) ललिते ! नाहमपराध्यामि सस्य । ते संगो-
पितोऽस्मि ॥२०॥
श्रीकृष्ण-प्रिये । देखो, तुम्हारी दोनों , सखियां निकट आ पहुंची
हैं अतः उनके साथ परिहास करने के लिये मैं छिप जाता है । (ऐसा कहकर
श्रीकृष्ण वहां छिपकर अवस्थान करते हैं) ॥२०॥
ललिता-घूमकर सामने श्रीराधा को देखकर आनन्दपूर्वक कहती
- हाँ है वह नागर ? ॥२०२॥
श्रीराधिका- (मुसकराकर) कौन जानता है, उसे ? ॥२०३।।
ललिता-(परिहास पूर्वक मुसकराते हुए) हे दान्तहृदये ! (गाढा-
लिंगन द्वारा समर्दन प्राप्त हृदये ! ) तुम्हारे सत्र केश खुन रहे हैं और मुक्ता-
वलि भी टूट रही है । तुम्हारे दोनो अघरोष्ट ताम्बूल को लाली से रहित
दीख रहे हैं एव कटि मे काञ्ची भो बन्धन रहित हो रही है इसलिए हे सखि!
मालूम होता है तुम श्रीकृष्ण से सम्मिलित हुई हो। कुछ भी हो, गोकुल-
वासिनी तुम जैसी सतो-स्त्रियों के लिए ऐसा करना उचित है क्या? २०४-३४
श्रीकृष्ण-(आगे आकर) ललिते ! मेरा कुछ दोप नहीं है, तुम्हारी
सखी ने ही मुझे छिपा रखा है ॥२०॥
* श्रीविदाधमाधव-नाटक अ-६ * [ २८१ २ " T -- ललिता-कित्ति पिअसहीए सगोवगिजो तुमम् ? [ किमित प्रिय- सख्या संगोपनीयस्त्वम् ? ] ॥२०॥ श्रीकृष्ण.-सुन्दरि । निजकन्दपंजला-प्रागल्भ्यस्थापलापाय । ( इत्य- ड.गुल्या दर्शयन् ) १श्य पश्य, कठोर मयो व्रणमजनयद्वक्षसि नखै- बलादाक्रामन्ती व्यकिरदपि मां पिछरचनाम् । 'विकृष्य च्छिन्नाङ्गीमकतवनमालां च रुचिरा. मिदानों जानीते न किमपि पुरस्ते प्रियसखी ।।२०७॥३५॥ श्रीराधा-(सापनपम्) हुँ, अप्पणा कदुअ परं दूसेदु पण्डिदोसि । [हुँ, आत्मना कृत्वा पर दूपयितु पण्डितोऽसि ॥२०॥ जडिला फुडमञ्जरीहि-[स्फुटमञ्जरीभिः] (इत्योक्त) ॥२०६।। श्रीराधिका-(सनासम्)लणिदे। अचाहिदं अबाहिदम्। भअकरी बुद्धिमा ता तुरिद पलाएम्ह । [ लालते ! अत्याहितमत्याहितम् । भयंकरो वृद्धा, ललिता-हमारी प्रिय राधा तुम्हें छिपायेगी क्यों ? ॥२०६॥ श्रीकृष्ण-सुन्दरि ! अपने कन्दर्प-बिलास को छिपाने के लिए। (यह कहकर अगुली से दिखाते हैं। देख,देख; तुम्हारी प्रिय सखी ने अपने कठोर नवानों से मेरे वक्षस्थल को अतिशय क्षत-विक्षत कर दिया है एव बलपूर्वक आक्रमण कर मेरा मोरपुच्छ-मुकुट दूर फेंक दिया है। मनोहर वनमाला खीचकर तोड डाली है । कैसा आश्चर्य है ? अभी तुम्हारे आगे तुम्हारी प्रिय सखी कह रही थी-"मैं कुछ जानती नहीं हूँ" ॥२०७॥३५ । श्रीराधिका-(निलंज होकर) अच्छा स्वय करके दूसरों को दोष लगाने मे चतुर बन रहे हो ॥२०॥ वेिशपर से आवाज आती है) प्रफुल्लित मारियो द्वारा जटिला-इतना आपा वचन सुनकर--1 श्रीराधिका-(भयभीत होकर) ललिते ! बहुत बुरा ! महा विपद ! भयंकरी वृद्धा भा रही है, शीघ्र भाग चलें । (यह बहार धीराधा ललिता- 7
२५२ ]
*श्रीविदग्घमाधव नाटक अङ्क-६ *
7
तत्त्वरितं पलायामः। 1(इति सखीभ्यां सह निष्क्रान्ता) ॥२१॥
(पुनर्नेपथ्ये )
"विहूदिमन्तो पराअपुञ्जण।
हरभत्ता विअ सरए प्फुरन्ति सत्तच्छदप्पारा।
विभूतिमन्त. परागपुञ्जेन ।
हरभक्ता इव शरदि स्फुरन्ति सप्तच्छन्दप्रवरा | ॥२११||३६।।
श्रीकृष्ण:-(सर्वलक्ष्यम्) हन्त हन्त, सप्तपणं वर्णयता जटिलेति कटू-
द्गारेण बटुना कथितोऽस्मि । तदने सुहृन्मण्डलमेव प्रयामि ।।२।२।।
( इति निष्क्रान्ता सर्वे)
इति श्री श्रीविदग्धमाधवनाटके शरद्विहारो नाम पष्ठोऽङ्कः ॥६॥
विशाखा के साथ भाग जाती हैं)॥२१॥
[ पुन वेशगृह से आवाज आती है ]
पराग-पुञ्ज से शोभायमान हर-भक्तो की भांति शरत् काल मे सप्त-
च्छद कुसुमो मे विराजमान हो रही है ॥२११॥३॥
श्रीकृष्ण-(विस्मित होकर ) हाय हाय
॥ जटिला ने सप्तपर्ण
वर्णक लाने को कहा था- मधुमङ्गल द्वारा इस कटु-वचन से मुझे धोका
लगा है। जो भी हो सामने मित्र मण्डली के पास चलता हू ॥२१२॥
[ यह कहकर सब चले जाते है ]
इस प्रकार श्रीश्यामदासानुवादित श्रीविदग्धमाधव नाटक का
'शरद-विहार' नामक छटा अङ्क समाप्त हुआ ॥६॥
सप्तमोऽङ्कः।
(ततः प्रविशति वृन्दा)
वृन्दा-(समन्तादवलोक्य)
कदम्बालोज़म्भाभरपरिमलोद्गरपवना
स्फुट थी यूथोकृतमधुएगानप्रणयिनी।
नटरकेकिस्तोमा मृदुलयवसश्यामलितमू-
स्तपान्तेऽद्य स्वान्तं मम रमयति द्वादशवनी :१॥१॥
(नेपथ्ये दृष्टि निक्षिप्य) कथमसौ पौर्णमासी निजपर्णकुटीरोपान्तवाटिकाया-
मभिमन्युना सह संकथयन्ती वर्तते ? तदहं क्षणमव तिष्ठेयम् ॥२॥
सातवां अङ्क
[छः ऋतुमो मे कामोद्दीपन करने मे घमन्त, शरद् तथा वर्षा की प्रसता
मानी गयी है । इनमें क्रमशः उत्कृष्टता होने के कारण पहले वसन्त, फिर घर का
सक्षेप से लीलोद्देश वर्णन किया जा चुका है । अब श्रावण को पूर्णिमादि की लीला
को प्रकाशित करने के लिए वर्षा का वर्णन करते हैं ]
[उसके वाद वृन्दा प्रवेश करती है।]
वृन्दा-(चारो तरफ देखकर) आहा ! पवन प्रवाहित होकर मानो
जम्हाई लेते हुए प्रफुल्लिा कदम्बो को सोरम उद्गारित कर रही है । प्रफु-
ल्लित जूही पक्तिबद्ध मधुकरों की प्रेम-पानी हो रही है । मोरवृन्द नृत्य कर
रहे हैं तथा कोमल कोमल नवीन तृणो से समस्त पृथ्वी हरित वर्षा हो
रही है। इस प्रकार ग्रीष्म ऋतु के बाद आज ये दादा बन मेरे हृदय
को सुख प्रदान कर रहे हैं ॥१॥
( वेसगृह की तरफ देखकर ]
--यह क्या ! पौर्णमासी अपनी पर्णकुटि के निकट उद्यान में अभिमन्यु
के साथ क्या यात कर रही है ?-योड़ी देर में यहा हो रहनी हूँ ॥२॥
२८४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * R (प्रविश्य तथाभूता पौर्णमासी) पौर्णमासी-वत्साभिमन्यो ! किमयं त्वया प्रातरेवाहमुपसादितास्मि? अभिमन्यु:-भअवदि । तुज्झं आणं गेण्हिदुम् [ भगवति ! तवाज्ञा ग्रहीतुम् ] ||४|| पौर्णमासो-कस्मिन्नर्थे ? ॥५|| अभिमन्यु:-वारिसहाणईए मयुरापाणे । [वापभानव्या मथुरा- T " प्रस्थाने JIN पौर्णमासी-(सव्यथम्)कस्तत्र हेतुः ? ७. - अभिमन्य-दोण्हं राहामाहवाण, चापलं जेव्व । [ द्वयो राधामाध- वयोश्चापलमेव (Jihell. - - - पौर्णमासी-वीर । केन तवेदं वणितम् ॥६ अभिमन्यु:-पिलवअस्सेण गोअंडणेण। [प्रियवयम्येन गोवर्धनेन] ।। पौर्णमासो---वत्साभिमन्यो । चतुरन्मन्योऽपि न त्वमार्यबुद्धिरसि, येन ( अभिमन्यु से बात करती हुई पौर्णमासी प्रवेश करती है ] पौर्णमासी–वेटा अभिमन्यु ! आज प्रातःकान मेरे पाप्त कैसे आए " T**T h हो ? ॥३॥ L-- r- ? ? r अभिमन्यु-भगवति ! तुम्हारी आज्ञा लेने के लिए 11611 पौर्णमासी–विस विषय में ' ' : FrI IIT-1 अभिमन्यु-वृषभानुनन्दिनी को मयुरा ले जाने के विषय में ॥६॥ पोर्णमासो--(दुखी होकर) किस लिये | TPTE IN अभिमन्यु-राधा एव'मावत्र दोनो को चपलता के कारण 101 पोर्णमासी-हे वीर ! तुमको किसने ऐसा कहाँ है ? ne' ' अभिमन्य-मेरे प्रिय सखा गोवर्धन ने l पौर मासी-बेटा अभिमन्यु ! तू अपने को बहुत, चतुर मानता है, * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २८५ भोजेन्द्रवल्लभस्य गोवर्धनमल्लस्य कौटिल्यचक्रण विभ्रम्यसे ||१|| अभिमन्यु:-असिपसिद्धा एसा पउत्ती केण वा ण कहिज्जइ ? [ अति प्रसिद्ध पा प्रवृत्तिः केन वा न कथ्यते ? ] ||१२|| पोर्णमासो-पुत्र ! नूनं कर्गजरानामुपजापन लुप्तविवेकोऽसि । तदा- कर्णय ॥१३॥ अभिमन्यु:-आणवेहि । [ भाज्ञापय ] ॥१४॥ पौर्णमासी-वत्स ! येन लावण्यगन्धलवलुब्धेन कंसशार्दूलेन स्वयमेव राधामृगो मुग्यते, तस्य दारुणस्य हस्तोपरि न्याटयः कथमस्याः प्रक्षेपः ।। अभिमन्युभअवदि ! तत्थ का चिन्ता? सो श्खु कुसलो हो सुहितमो मे गौअड्डगो, जेण विनामाहरोहिं महुरिन्दो वसोकिओ। [ भग- पति ! तत्र का चिन्ता ? स खलु कुशली भवतु सुहृत्तमो मे गोवर्धनः, येन विद्यामाधुरीभिर्मभुरेन्द्रो वशीकृतः ] ॥१६॥ परन्तु तुम में बुद्धि नहीं है, क्योंकि कस के प्रिय गोवर्धन की कुटिलता के चक्कर में घूमते हो ॥११॥ अभिमन्यु ---यह बात तो प्रसिद्ध हो चुकी है, यह कौन नहीं कहता?॥ पौर्णमासी-पुत्र ! निश्चय ही दुष्टों ने तुम्हारे कानों में यह बात भर कर तुम्हारे विवेक को लुप्त कर दिया है । इसलिए तू मेरी बात सुन ।। अभिमन्यु-भगवति ! आज्ञा कारो॥१४॥ पौर्णमासो-बेटा! जिसकी लावण्यता को गन्धमान में लुब्ध होकर कंस-व्याघ्र स्वयं उस राधा-हरिणी की खोज कर रहा है, उस अति निर्दयी के हाथों में श्रीराधा को डालना कैसे उपयुक्त है ? ॥१५॥ अभिमन्यु -भगवति ! इस बात को क्या चिन्ता है ? मेरा परम सुहृद गोवर्धन कुशलपूर्वक रहे । उसने अपने विद्या-माधुर्य से राजा कंस को वशीभूत कर रखा है ॥१६॥ !
२८६ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क ६ * पौर्णमासी-(सखेदम् क्षणमनुध्याय) हहो, धन्यानां मूर्धन्य ! गोविन्द- मातुर्मातुलेयोऽसि । कथमल्पायुषां गोकुलद्वेषिणां मण्डलपातितामालम्बसे ? तदद्य कयापि मर्यादया त्वां पर्यापयितुमिच्छामि ।।१७।। अभिमन्यु-आणवेदु तत्यहोदी । [ आज्ञापयतु तत्रभवती ] ॥१८॥ पौर्णमासी~-वत्स ! सा काचिन्मत्सरकल्पितापि किंवदन्ती यदि त्वया नातथ्यतया प्रतीयते, ततः स्वयमेव चक्षुषोरपरोक्षीकृत्य यथेष्टं चेष्टनीयम् ।। अभिमन्युः-(सप्रश्रयम्) भअवदि! सिरोगहीदं दे गिदेसकुसुमम् । [भगवति, शिरोगृहीत ते निदेशकुहुमम् ] ॥२०॥ पौर्णमासी--(सानन्दम्) सोमानन! गोपानत्र भूयाः ।।२१।। अभिमन्यु:-भअवदि ! अम्बा में पुणो पुणो भणादि-'पुत्स! चन्दा- अलीचण्डिअवणेण गोअड्डणो जहत्यणामा संयुत्तो, ता बहूडिआ वि तत्य पौर्णमासो-(खेद सहित कुछ देर तक सोचकर) अहा-हा ! समस्त धन्यपुरुषों में शिरोमणि ! गोविन्द की माता यशोदा के मामा का तू पुत्र है । किसलिए तू अल्पाय एवं गोकुल के विद्व पीजनों का पक्षपात कर रहा है ? मैं आज किसो मर्यादा द्वारा तुम्हें रोकना चाह रही हूँ ॥१७॥ अभिमन्यु-पूज्यतमे ! आज्ञा करो न ॥१८॥ पौर्णमासी-हे पुत्र ! (राधा-माधव को चपलता की जो बात तुमने कही है) वह किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति की बताई हुई बात है ! यदि तुम उसे सत्य ही जान रहे हो, तो तुम स्वय एक बार आनो आखों से देखो और फिर तुम्हारी जैसी इच्छा हो करो॥१९॥ मिमन्य-(विनयपूर्वक) भगवति ! मैं तुम्हारी आज्ञा को सिर पर धारण करता हूँ ॥२०॥ पौगं मासी-(आनन्दपूर्वक) चन्द्रमुख ! तुम्हारी गौ-वृद्धि हो । अभिमन्य-भगवति ! मेरी मां जटिला ने मुझे अनेक बार कहा है कि चन्द्रावली चण्डिका को पूजा करती है, इसलिए हो उसके पति का नाम * श्रोविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-६ * [ २८७ . दिक्खा किज्जउति। [ भगवति ! अम्वा मां पुन: पुनर्भणति–'पुत्र ! चन्द्रा- वलीचण्डिकार्चनेन गोवर्धनो यथार्थनामा संवृत्तः, तस्माद्वधरपि तत्र दीक्षा- क्रियेतामिति ] ॥२२॥ पौर्णमासी:- मङ्गलमते ! सर्वमङ्गलाराधने दीक्षितामविलम्बमेव वर्षमानवीं विद्धि ॥२३॥ अभिमन्यु:-भअवदि ! अणुकम्पिदो म्हि। [ भगवति ! अनुकम्पि तोऽस्मि ] (इति निष्कान्तः) ॥२४॥ वृन्दा--(परिक्रम्य) वन्दे भगवतीम् ॥२५॥ पौर्णमासी-( विलोक्य शुभाशोभिरभिनन्ध च ) वत्से! कामं कृता- सि । तदावेदय राधामाधवयोनिकुञ्जकेलिमाधुरीम् ॥२६॥ वृन्दा- सर्वस्वं प्रथमरसस्य यः प्रयोगन्किसारेरुत्यति राघया विलासः । वक्त को विरमति त जन. समन्तादानन्दस्तिरयति चेदिगरा न वृत्तिम्? ॥२७ गोवर्धन मल्ल सार्थक हुपा है (अर्यात् उसी पूजन से वह बड़ा भारी शुरवीर बन गया है) इसलिए आप मेरो बहू-रावा को भो ऐसी दोक्षा-सलाह प्रदान करो ॥२२॥ पौर्णमासो-हे शुभमते ! सर्व मङ्गलमय की आराधना मे वृपभानु- नन्दिनी को तुम शीघ्र ही दीक्षित हुआ जानो ॥२३॥ अभिमन्यु-भगवति ! अनुगृहीत हुआ आज मैं । (यह कहकर चला जाता है) ॥२४॥ वृन्दा-(पास आकर) भगवति! आपको प्रणाम है ॥२५॥ पौर्णमासो-(देखकर शुभाशीर्वाद से अभिनन्दन करते हुए पुनि ! तुम सर्वथा कृतार्थ हो । मुझे राधा-माधव की निकुंजकेलि-माधुरी तो सुनाओ ॥२६॥ वृन्दा-श्रीराधा के सहित श्रीकृष्ण का शृंगाररस विषयक जो समस्त विनास प्रकाशित हो रहा है. यदि आनन्द समस्त वाक्-वृत्ति को २८८ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ * पौर्णमासी--(सानन्दम्) पुत्रि वृन्दे ! हरिरेष न चेदवातरिष्यन्मयुरायां मधुराक्षि राधिका व ! अभविष्पदियं वृथा विसृष्टिमंकराद्वस्तु विशेषतस्तदात्र ॥३॥ तदद्य गोष्ठमध्ये तवोपसंतिम विस्मापयते ॥२८।। वृन्दा-भगवति ! त्वरते कोऽपि मां गरीयानार्यः । तदस ललिता- मपेक्षमाणास्मि ॥२॥ पौर्णमासी-कीदृशोऽयम् ? ॥३०॥ वृन्दा-पूर्वेद्य रदिष्टास्मि गोविन्देन । यथा- आहेर गौरोतीर्थे मधुरश्रियं तत्र रन्तुमिच्छामि । पद्मावलम्बिकरया प्रियया पद्मावतंसिकया ।।३१-४॥ पौर्णमासी -युक्तमादिष्टं, यदद्य सौभाग्यपूर्णिमा ; तथाहि--- - अवरुद्ध न करे तो कौन व्यक्ति है जो उसे वर्णन करने में पीछे हटेगा ॥२७॥ पौर्णमासी-(आनन्द सहित) पुत्रि वृन्दै ! श्रीहरि और मधुराक्षि श्रीराधिका, यदि ये दोनों मथुरा मण्डल मे अवतीर्ण न होते, तो विधाता की यह विश्वसृष्टि तथा विशेषतः इस वृन्दावन मे कन्दर्प की कुछ सार्थकता न रहती-॥३॥ कुछ भी हो. तुम्हारा यहा आना मुझे विस्मित कर रहा है ।। वृन्दा-भगवति ! मैं एक महान प्रयोजन के लिये जल्दी मे हूँ। इस लिए यहाँ ललिता की इन्तजार कर रही हू ॥२६॥ पौर्णमासी-वह क्या ? ॥३०॥ वृन्दा-कल श्री गोविन्द ने मुझे आदेश दिया था कि- तुम जाकर गौरीतीर्थ पर बसन्त-शोभा सम्पादन करो, वहां कमलों को हाथ एवं कानो मे धारण करने वाली ( पद्मा का हाथ पकडे हुए कानों मे कमल धारण करने वाली-चन्द्रावली ) प्रिय राधा के संग रमण करने को मेरी इच्छा है ।।३१।४। पौर्णमासी-ठीक कहा है उन्होने, क्योकि आज सौभाग्य पूर्णिमा है। 7-
* थोविदग्धमाधव नाटक अङ्क-७ *
[ २८६
प्रसूनैरद्भुतैः कान्ता कान्तेन श्रावणीदिने।
प्रसाधिता प्रसिद्धन सौभाग्येन विवर्धते ॥३२॥५॥
ततस्ततः?
वृन्दा-ततश्च तवृत्ते शारिकामुखतः सखीसंसदि संचारिते पद्यार्थ-
तकितराधार्थसिद्धिरपि पद्मा ललितां कटाक्षयन्ती.हठादवादोत्---
उत्फुल्लमूर्ते: सममुल्लसन्त्याश्चन्द्रावलेश्चन्द्रकमण्डलेन ।
म्लास्यन्ति सौभाग्यभरप्रभाभिर्गन्धिगोपोवदनाम्बुजानि ॥३३॥६॥
पौर्णमासी-(विहस्य) ततस्ततः ? ॥३४॥
वृन्दा-ततश्च स्मेरया दृष्टिमुन्यत्र वामधीरामवधीरयन्तो ललिता
मया सह राधामुपसाच. कल्ये प्रस्थानाय तामतिसंभ्रम लम्भयामास । पश्य
वृत्तेऽप्यद्य यामे सेय नाजगाम ॥३५॥
श्रावणी पूर्णिमा के दिन जो काता, अपने कान्त के साथ अद्भुतं
कुसुमो द्वारा विभूपित होती है, उसका सौभाग्य बढा करता है ।।३२५||
-फिर आगे ?
वृन्दा-उसके बाद सारिका के मुख से "आहर गौरीतीर्थ" श्लोक का
तात्पर्य अर्थात् “तुम जाकर गौरी तीर्थ पर वसन्त शोभा सम्पादन करो"-
इत्यादि की आलोचना सखो-सभा में होने लगी। पद्मा ने धीराधा की
अभीष्ट सिद्धि की विवेचना करते हुए एकदम ललिता के प्रति कटाक्ष करते
हुए कहा-
आज चन्द्र मण्डल द्वारा उल्लसित प्रफुल्लित मूत्ति चन्द्रावली की
सुशोभित प्रमा द्वारा गन्धि गोपियो के मुस को मलिन करूंगा-(ऐसा
श्रीकृष्ण ने कहा है) १३३.६॥
पौर्णमासी-हंसते हुए) फिर क्या हुआ ? ॥३४॥
वृन्दा-उसके बाद कुछ मुसकराते हुए नेत्रो द्वारा पपा को अघोर
हुआ जानकर ललिता ने मेरे साथ धीराधा के पाम चलकर प्रातः काल
माने की बात कही और पपा को सम्भ्रम में डाल दिया । परन्तु देखो, एक
पहर निकल गया है फिर भी ललिता अभी तक नहीं आई ॥३॥
२६० ]
* श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-७*
(प्रविश्य )
ललिता--सहि बुन्दे! जुतं गम्वाइदं पउमाए, दाणि जाणिदम् । तत्य
पत्याणे कुदो अम्हाणं जोग्गदा ? । [ सखि वृन्दे ! युक्त गर्वायितं पाया,
इदानी ज्ञातम् । तत्र प्रस्थाने कुतोऽस्माक योग्यता ? ||३||
पौर्णमासी-पुत्रि, कथमेवम् ? ॥३७॥
ललिता-भअवदि ! तुम्ह पुरदो अम्हाण तिणादोहागसल्लेण कि
उग्धाडिदेण? । [ भगवति ! तव पुरतोऽस्माकं तेन दौभाग्यशल्येन किमुद्घा
टितेन ? J॥३८॥
पौर्णमासी-वत्से ! शुश्रू पुरस्मि, वर्ण्यताम् ।।३।।
ललिता-(सास्रम्) अज्जे ! गोरपट्टसुत्तेण गण्ठिदा एक्का दिव्यमाला
पिअसहीए कण्हस्स दिण्णा, सा अम्मेहि पउमिआ धम्मिल्ले तफफालं जेव्व
दिट्ठा। [ आर्ये ! गौरपट्ठसूत्रेण ग्रथितं का दिव्यमाला प्रियंसख्या कृष्णाय
दता, सास्माभिः पद्मा घम्मिल्ले तत्कालमेव दृष्टा। ] ॥४०॥
पौर्णमामी--स्याने ग्लानिरियम्, बाढमसांप्रतमेतद्गोविन्दस्य ॥४१॥
[ ललिता प्रवेश करती है ]
ललिता-सखि वृन्दे ! मैं अब समझ पाई हूं, पद्मा का इतराना युक्त
ही था । वहां चलने की योग्यता हम में कहां है ? ॥३६॥
पोण मासी-बेटी ! ऐसा क्यो ? ॥३७॥
ललिता--भगवति ! आपके सामने अब अपनी दुर्भाग्यता को प्रकट
करने का प्रयोजन नहीं दीखता ॥३८॥
पौर्णमासी-पुत्रि ! मुझे सुनने की इच्छा है, कहो तो सही ]
ललिता-(आंसु बहाते हुए) आयें ! प्रिय सखी राधा ने सफेद वर्ण
के रेशमी तागे से एक अति सुन्दर माला बनाकर श्रीकृष्ण को प्रदान की
थी, उसी दिन ही हमने वही माला पद्मा के जूड़े में बंधी देखी ॥४०॥
पौर्णमासी-तुम्हारा दुख करना युक्त ही है और ऐसा करना गोविन्द
को ज्यादती है ॥४॥
*श्रोविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* [ २६१ वृन्दा-शान्तममङ्गलम् ॥४२॥ पौर्णमासी-वृन्दे । कथ्यता कि नामेदम् ।।४३॥ वृन्दा-वर्णित मे मनुष्यवाक्यया तया कक्खटिकया- 'कदम्बशाखायां मालामालम्ब्य कालिन्दीमवगाढे वनमालिनि, सप्रवृत्ते च केतकीपरागचक्रचण्डे मरुन्मण्डले पद्मा किलेमा जहार । मारुतस्तुमुधा कलङ्क जगामेति ॥४४॥ ललिता-धुत्त । मुश्च ण वश्वणम् । [ धूर्त । मुञ्चन वञ्चनम् ] ॥ वृन्दा-पुष्पमञ्जरीभ्य शपे ॥४६॥ ललिता-(विश्रम्य)हला' सबसचम् । ज अम्ह पुरदो अपणो सोहग्ग विवखेये ती पउमिया माल विवरे दि, कण्हमित्तारण अग्गदो उण ए सवरेदि । [ हला । सत्य सत्यम् । यदम्मत्पुरत आत्मन सौभाग्य विख्यापयन्ती पद्मा माला विवृणोति । कृष्णमित्राणामग्रत पुनरेना सवृणोति ] ||४|| वृन्दा--अमङ्गल शान्त हो॥४२॥ 1 पौर्णमासी-वृन्दे । कह तो सही यह हुआ कैसे 14|| वृन्दा-हमे तो यह बात कक्खटी बन्दरीने मनुष्यको बोलीमे यूं बताई कि-वनमाली कृष्ण उस माला को जब कदम्ब की डाली पर रखकर यमुना में स्नान करने गए तो उसी समय प्रवल आधी चल पडी। केतकी पुष्पो की पराग उडने लगी। उसी समय पद्मा ने वह माला चुरा ली, किन्तु पवन को मिथ्या बदनाम होना पडा ॥४॥ ललिता-धूर्ते । वस वञ्चना को छोड ।।४।। वृन्दा-मुझे पुष्प मञ्जरियो को शपथ, (मैं झूट नही कहती हू)। ललिता-(विश्वास पूर्वक) सखि सत्य है तू सत्य कहती है, अपने सौभाग्य को जनाते हुए पद्मा ने हमे माला दिखाई थी। किन्तु कृष्ण के ससामओ से वह माला को छिपाती है, अभी तक उसने उन्हें नहीं दिखाई।
२९२ ] * श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-७ * पौर्णमासी-पुत्रि ललिते ! स्फुटमत्र पूर्णिमायां युष्माकमनुमाय पाया तां छमचातुरों प्रसार्य गौरीतीर्थ चन्द्रावली लम्भिता ॥४॥ वृन्दा-युक्तमाह भगवती; तदद्य गौरीतीर्थे राधिकोपनोतिः कल्याणी न में प्रतिभाति ॥४६॥ (प्रविश्य ) विशाखा-बुन्दे ! 'कल्याणी पडिभावि' ति भणाहि। [ वृन्दे ! 'कल्याणी प्रतिभाति' इति भण ] ॥५॥ वृन्दा--कथमेवम् ॥५१॥ विशाखा-गोउलेसरीमहादो अब सोहग्गपुषिणमं सुणिअ करालाए चन्दामलो अप्पभत्तु णो मल्लस्स पासे पत्यावीअदि । [ गोकुलेश्वरीमुखतोऽद्य सौभाग्यपूर्णिमा श्रुत्वा करालया चन्द्रावली आत्मभतु मल्लस्य पावें प्रस्था. प्यते ].॥५२॥ ललिता--(सहर्पम्) विसाहे ! इट्ठदेओ सरोअणाहो दे पसीददु, ता तुवरोअदु ।..विशाखे! इष्टदेव. सरोजनाथस्ते प्रसीदतु, तत्त्वर्यताम् ]॥५३॥ - . पौर्णमासी-पुत्रि ललिते । यह बात स्पष्ट है कि इस सौभाग्य पूर्णिमा पर तुमको, उद्यमरहित करने के लिये पद्मा ने यह झूठी चतुरता फैलाई है और यह चन्द्रावली को गौरी तीर्थ पर ले जावेगी ।।४।। वृन्दा-भगवती ! ठीक कह रही हैं, इसलिए आज गोरी तीर्थ पर श्रीराधा को ले जाना मुझे मङ्गलमय नहीं लगता ||४|| विशाखा-वृन्दे । 'मङ्गलमय लगता है ऐसा कहो ॥५०॥ वृन्दा--यह कैसे! ॥५१॥ विशाखा-गोकुलेश्वरी के मुख से आज सौभाग्य पूर्णिमा है- यह बात सुनकर , कराला ने चन्द्रावली को अपने पति गोवर्धन मल्ल के पास भेज दिया है ॥५२॥ ललिता-(हपं सहित) विशाखे । इष्टदेव सूर्यदेव तुम पर प्रसन्न हो। अब जल्दी करो। ५३॥ -
*श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-७ *
[ २६३
पौर्णमासी-पुनि वृन्दे । कामप्यद्यतनीमभिमन्योर्दारुणा दुर्मन्वितमुद्रा
राधायामावेद्य मयाप्यस्था शङ्कापडावलो-सक्षालनाय गौरोतीर्थे भवितव्यम्।।
वृन्दा-भगवति । पूर्वेण गौरोतीयं लपङ्गकुडङ्गस्य प्राङ्गणे सवि-
शाखया राधया साधं साधयतु तन भवती । तावदावा माधवमासादयाव ॥५५
(पौर्णमासो विशाखया सह निष्क्रान्ता)
ललिता-(वृन्दया सह परिक्रम्य ) हला पेपखोअदु, डाहिरणे एसा
दूरदो सेप्याए सम जप्पन्तो पउमा । [हला | प्रेक्ष्यताम् दक्षिणे एपा दूरत.
शैव्यया सम जल्दन्ती पद्मा ] ॥५६||
वृन्दा-सखि । नासात व्याहरेद्विशार यग्रतो गत्वा सविमर्शम्)
सखि । परमोत्सुक्यसभूतेन भूरिणा सभ्रमेण सभेदिते राधिकाविनयमनि-
र्धार्य पूर्णमावा विदूरमागते । तदत्र मानस गङ्गापारे पौर्णमासी क्षण प्रति-
पालयाव (इति निष्फ्रान्ते) । ५७॥
1
।
पौर्णमासी-पुषि वृन्दे । अब मैं अभिमन्यु की कोई भयानक दुर्म-
न्त्रणा श्रीराधा को जताकर, एव उसकी शङ्का-मलिनता को धोने के लिए
गौरी तीर्ष पर जाऊँगो ॥५४॥
वृन्दा-भगवति । आप पहले विशाखा के साथ श्रीराधा को लेकर
गौरीनीर्य की निकटवर्ती लवङ्गकुल में चलो। मैं ललिता सहित धीमापर
को वहां से जाऊँगी ॥५५॥
[ पौर्णमासी विज्ञासा के साथ वहा से चली जानी हैं।
ललिता-(वृन्दा के साथ लौटकर) देखो दक्षिण दिशा की ओर दूर
से शव्या पे साथ पपा बातें करती आ रही है ॥५६॥
वृन्दा-सखि । विज्ञासा अयुक्त यात नही रहती थी। (यह पहार
मागे बड़सर परामद सहित ) हम परम उस्माह जन्य मारी सम्भ्रम सहित
श्रीरापाये जाने की बात पो समसपर जल्दी से दूर या गई हैं। इसलिए
इम मानसो गङ्गा के पार पतकर पौर्णमासी को पुछ देर इन्तजार करतो
हैं। , यह पहार सी जानी है ) ॥७॥
२६४ ]
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-७ *
।
(ततः प्रविशत पद्माशव्ये)
पद्मा-सहि सेव्वे । मा क्खु दुम्मणा होहि { सखि शैव्ये । मा खलु
दुर्मना भव ] ॥५॥
शैब्या-पउमे । परमाहिदुस्स अलाहेण सलाहय चित्त समाधादुण
खमम्हि। [ पद्म । परमाभीष्टस्यालाभेन सलाधव चित्त समाधातु ने
क्षमास्मि ॥५६॥
(नेपथ्ये)
चन्दाअली आणिज्जउ गोअट्टणस्स पासम्मि अत्ति ।
णिन्वट्टा बच्चा जह कुसुमेहि सुवेदच्छा ॥
[ पद्मे | चन्द्रावली अनीयता गोवर्धनस्य पाश्र्वे झटिति ।
निर्वर्त्तते वत्सा
यथा कुसुमै सुनेपथ्या ] ६७
शैव्या-पउने । सुदन अजिमा कराला त जेव्य जप्पगरल पुणो
उग्गिरदि। (पद्ये । श्रुत यदार्या कराला तमेव जल्पगरल पुनरुद्गिरति ] "
पद्मा-हला । अमिअ पषु एद, ज पिविअ उवलद्धबलम्हि जादा ।
[हला । अमृत खल्वेतत्, यतीत्वा उपलब्धबलास्मि जाता ] ॥६२॥
पउमे।
-
[ तब पद्मा व शैव्या प्रवेश करती हैं ]
पद्मा-सखि शैब्ये (चित्रा मे पेद मत करो ॥५८||
शंब्या-पने परम अभीष्ट को न पाने के कारण चित्त का शीघ्र
समाधान नहीं कर पा रही हूँ ॥५६॥
[ वेशगृह से आवाज आती है ]
पने शीघ्र ही चन्द्रावली को गोवर्धन के पास ने जाओ। वत्सा
का यथायोग्य कुसुमो द्वारा शृगार पूरा हो चुका है ॥६०॥७॥
शैब्या-पद्ये । सुन रही हो तो ? आर्या कराला फिर उसी वाक्यमय
विप को उगल रही है ॥६१॥
पदा-सखि ! यह विष नहीं है । अमृत है, जिसे पीकर में अतिशय
बलवती हो उठी हूँ ॥६२॥
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* | २६५
शव्या- (सवैलक्ष्यम्) हला! कधं विअ । [हना! कथमिव?] ॥६३।।
पद्मा-मुद्धिए ! गोअडणस्स गिरिणो पासे जेव्व तं गौरीतित्थम् ।
[ मुग्धे ! गोवर्धनस्य गिरेः पाश्र्व एव तद्गौरीतीर्थम् ] ||६||
शैव्या-(सहर्षम्) हला! सअलत्यपण्डिदासि । ता उहहि । चन्दा-
अलिअंतत्य ऐम्ह । [ हला ! सकलार्थपण्डितासि । तदुत्तिष्ठ। चन्द्रावनी
तत्र नयामः] ॥६५॥
पद्मा-पढमं ये चन्दाअली मए चालिदा । ता तुवरेहि । रणं अणु-
सरम्ह । [प्रथममेव चन्द्रावलो मा चालिता। तद वरस्व । एनामनु-
सरामः। ] ॥६६॥
(इत्युभे परिक्रमातः)
शैव्या-पउमे ! गौरीकिदे जो क्यु संपादिदो, सो फहिं उवहारो ?
[ पद्म ! गौरीकृते यः खलु सपादितः, स कुत्रोपहारः] ॥६७।
पमा-महुमङ्गलहत्ये समप्पिदोस्थि । [ मधुमङ्गल हस्ते समपितो-
ऽस्ति J॥६॥
।
शंब्या-(विम्मय सहित) वह कैसे ? ॥६॥
पद्मा-अरी मुग्धे । गोवर्धन गिरि के पास ही वह गौरीतीर्थ है ॥६४
शैव्या-(हर्ष सहित) सखि । सब विषय में बड़ी चतुर हो । उठ,
चन्द्रावली को वहां ले चलेंगी ॥६॥
पना- मैंने पहले ही चन्द्रावली को भेज दिया है । चलो जल्दी ही
उसका अनुगमन करती हैं ।।६।।
[दोनों पीछे लौटती हैं ]
ग्या-पये! गौरी के लिए जो सर उपहार सामग्री सजाई थी,
वह सब कहां है ? ॥६॥
पद्मा-मधुमङ्गल के हायों में देदी थी मैंने ॥६॥
२६६ ] *श्रीविदाधमाधव-नाटक अङ्क-७* शैव्या-विवक्खजलस्स उपकरिसं तविक उत्तम्मामि। [विपक्ष- कुलस्योत्कर्ष तकयित्वोत्ताम्यामि ] ॥६॥ पद्मा-मा पषु उत्तम्म । ज एताए मालाए दंसिदाए णिरज्झवसामो किदो मए विवक्खपक्खो । [ मा खलुताम्य । यदेतया मालया दर्शितया निरध्यवसायः कृतो मया विपक्षपक्षः। ] ॥७०॥ (शैव्या सहर्प पद्मामालिंगति) । पद्मा- ! सौहागपुणिमाहे, गौरीतित्यम्हि फुल्लिदे महुणा । अन्ज रमन्ती हरिणा, पुहेण चन्दाअली पेख ।। [ सौभाग्यपूर्णिमाहे गौरीतीर्थे फुल्लिते मधुना। अद्य रममाणां हरिणा सुखेन चन्द्रावली पश्य ॥ ] ७१।८। ( नेपथ्ये 'सौहग्गपुण्णिमाहे' इत्यादि पठ्यते ) शव्या-(साद्भुतं विलोक्य) हला! इमाए मुहं बद्धोकदुम बोहच्छ- सरेण पढ़न्तीए कक्खडिआए अम्हे उवहसिजम्ह । [हला ! एतया मुख वक्री- कृत्य वीभत्सस्वरेण पठन्त्या कक्खटिकया वयमुपहस्यामहे ] ॥७२॥ शैब्या-पद्म ! मैं विपक्ष कुल का उत्कर्ष विवेचना कर उत्कण्ठित हो रही हू ॥६६॥ पद्मा-उत्कण्ठित मत हो, मैने उसी माला को दिखाकर विपक्षियों को निरुत्साहित कर दिया है ॥७०॥ [ शैब्या हर्षपूर्वक पद्मा का आलिङ्गन करती है ] पद्मा-आज सौभाग्य पूगिमा का दिन है । इस वसन्तकाल मे गौरी- तीर्थ पर पुष्प प्रफुल्लित हो रहे हैं ।अत एव आज श्रीकृष्ण के साथ सुखपूर्वक बिहार करते हम चन्द्रावली के दर्शन करेगी ।।७।। [वेशगृह मे"आज सौभाग्य पूर्णिमा है"- इसका पाठ होने लगताहै] शव्या-( आश्चर्यपूर्वक देखकर ) सखि यह बन्दरी मुह बनाकर घृणित स्वर में आज "आज सौभाग्य पूर्णिमा है"-बोल बोल कर हमारा उपहास कर रही है ॥७॥ .
* विदग्धमाधव-नाटक अङ्क.७* [ રહ૭ पद्मा-(सस्मितम्) दु8 मकडि! तुण्डं दे डहिस्सम् । [ दुष्टे मर्कटि! तुण्डं ते धक्ष्यामि 1 ] ॥७३॥ (नेपथ्ये) पउमिए ! चिट्ठ चिट्ठ । सुण्णं तुज्झ घर गदुअ णअणीआईगिलिस्सम् । [ पद्म ! तिष्ठ तिष्ठ । शून्यं तव गृह गत्वा नवनीतानि गिलिष्यामि ] 11७४ शैव्या-हला ! सच गिलिस्सदि, जं एसा तं जेव पढ़न्ती धाइदा । [हला ! सत्यं गिलष्यति, यदेपा तदेव पठन्तो धाविता ] ॥७॥ पद्मा-मा चिन्तेहि । घरे अजिआ फराला चिट्टदि [ मा चन्तय, गृहे आर्या कराला तिष्ठति ] ( इति परिक्रम्य सस्कृतेन) पश्य पश्य ।। साचीकृताङ्गमिह सव्यकरण यष्टि, विष्टभ्य वृत्तसरलामुपकक्षकूपम् । तिष्ठन्नधो विटपिनः पशुवृन्दचारी, रोरोति गोतिमधुना सुबलस्तनोति ॥७६॥८॥ शव्या-(परिक्रम्य) हला पु-वेण संकरिसणकुण्ड चन्दाअली दीसइ । [ हला! पूर्वेण सकर्षणकुण्ड चन्द्रावली दृश्यते । ] ॥७॥ पमा- (मुस्करा कर) दुष्ट बन्दरी ! जला दूं तेरे मुह को ॥७३॥ [ वेशगृह से आवाज आती है ] पद्म ! ठहर जा, ठहर जा, तेरे सूने घर मे जाकर अभी तेरा सारा माखन खा जाती हूँ।७४॥ शैव्या-सखि ! सचमुच, सचमुच, यह तो खा जायेगी। देख, वह कहर मागी जा रही है ।।७।। पद्या-तू चिन्ता मत कर। घर में आर्या कराला बैठी हुई है। (यह कहकर घूमते हुए ) देख, देख- बाए हाथ में लाठी लिये कक्ष के पास वृक्ष के नीचे सहारा लिये बैठा हुआ गोचारणकारी सुवल रो-रो ध्वनि करते हुए गान कर रहा है ।।७।। शंन्या-(धूमकर) सखि ! सामने सङ्घर्पण कुण्ड पर चन्द्रावली दोस्त रही है 11७11 २९८ । * विदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ * पद्मा- - (सहर्ष संस्कृतेन) अयं पुरः स्मेरमुखारविन्दः, प्रयाणलीलाकृतकृम्भिनिन्दः । कलेवरद्योतिहताक्षितन्द्रश्चन्द्रावली विन्दति कृष्णचन्द्रः ॥७॥१०॥ (ततः प्रविशति कृष्णचन्द्रावली च) : श्रीकृष्ण-(वर्मावरुध्य ) प्रिये ! दिष्टयाद्य सौन्दर्यमकरन्दभृङ्गारा- यितासि ममाक्षिभृङ्गयोः ।।७।। चन्द्रावली-मुञ्च मग्गम् । नं गौरोतीत्यं गदुअ कच्चाअणि अधि- सम् । । मुञ्च मार्गम् । यद्गौरीतीथं गत्वा कात्यायनीमचिष्यामि । । श्रीकृष्ण-(सस्मितम्) लब्धं मामवलोक्य तन्वि पुरतो रोमालिरभ्युद्गता नेत्रे पाद्यविधि क्षरजलभरेः प्रोत्यार्पयश्चिक्रतुः । वक्षश्च स्खलदुत्तरीयमदिशद्दिव्यासनं संभ्रमाद्- वामायास्तव दक्षिण: परिफरो वियाध वृत्तो मयि |८११॥११॥ पद्मा-( हर्षपूर्वक मुमकगते हुए मुखकमल वाले, चलन से गजेन्द्र गति को भी निन्दित करने वाले एव जिनकी अङ्गकान्ति द्वारा नेत्रों में चका- चौंघ पड़ती है, सामने वही श्रीकृष्णचन्द्र चन्द्रावली से मिलित हो रहे हैं । [ तब वहाँ श्रीकृष्ण एवं चन्द्रावली प्रवेश करते हैं ] श्रीकृष्ण-( रास्ता रोककर ) प्रिये ! बड़े सौभाग्य की बात है कि आज मेरे नेत्र-मधुकरों के लिए सौन्दर्य-मकरन्द पान करने का तुम विशेष पास बनी हो ॥७॥ चन्द्रावलो-मेरा रास्ता छोड़ो, मैं गौरी-तीर्थ जाकर कात्यायिनी की अर्चना करू गो८० श्रीकृष्ण-(मुसकरा कर) हे कृशाङ्गि ! मुझे देखकर तुम्हारी समस्त रोमावली खड़ी हो रही है, तुम्हारे नेत्र आनन्द सहित प्रवाहित जलधारा द्वारा मुझे पाथ अर्पण कर रहे हैं एवं तुम्हारा वक्षस्थल उत्साहपूर्वक उत्तरीय वस्य को संचालित कर मुझे दिव्य आसन प्रदान कर रहा है। अतएव है प्रिय ! तुम्हारे प्रतिकूल होते हुए भी तुम्हारा सब परिकर सौभाग्यवश मेरे अनुकूल हो रहा है || * विदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ * [ २६९ सख्यो-(उपसृत्य) सहि ! सन्ति भूरिणो मगा। ता एकस्सि: णिरुद्ध णिरुद्धा न होम्ह। [ सखि ! सन्ति भरयो मार्गाः । तदेकस्मिनिरुद्ध निरुता न भवामः । ॥२॥ चन्द्रावली-(साचिग्रीवमवलोक्य) हला! दिट्ठिआतुम्मेहि सहिदम्हि संवुत्ता। [ हला ! दिष्ट्या युष्माभिः सहितास्मि संवृत्ता ] ॥३॥ श्रीकृष्ण-(स्वगतम्) कथमद्य राधामभिसिसारयियोर्ममान्तिके चन्द्रा- चलिरुपस्थिता? ॥४॥ पद्मा-(जनान्तिकम् ) चन्द्रमुह ! पउमावनबिकराए ति तुज्झ मणोरधं सुणिअ छलेण मए चन्दाअली लम्भिदा। [ चन्द्रमुख ! पद्मावलम्बि- करयेति तव मनोरथं श्रुत्वा छनेन मया चन्द्रावली लम्भिना । ५|| श्रीकृष्ण-(स्वगतम् ) आं ज्ञातम् । पद्ममण्डनमभिलष्यता मयेव दत्तान्तरासि, कि ते दूषणम् । (प्रकाश) सखि, प्रसिद्ध व पाया: पद्म- नाभपक्षपातिता ॥८६॥ शेव्या व पद्मा- -(निकट आकर) सखि ! अनेक रास्ते हैं, एक रास्ता वन्द होने पर हम रुक नही जायेंगी ॥२॥ चन्द्रावलो--(वायी ओर गर्दन फेर कर देखते हुए) सखियो ! बड़े सौभाग्य हैं, तुम्हारा जो मिलन हो गया ।।८३॥ श्रीकृष्ण-(मन मे) मैं तो आज श्रीराधा के अभिसार का अभिलापी या। चन्द्रावली कैसे आ उपस्थित हुई ? ||४॥ पद्या-(घोरे से कान ने) हे चन्द्रवदन ! "पद्मावलम्बि करया". (श्लोक-४) अर्थात् आपने कहा था ('कमलो को धारण करने वाली- पक्षान्तर में )पमा के हाथ का अवलम्बन लेकर आने वालो'-इम अकार के आपके मनोरय को सुनकर मैं ही चन्द्रावली को ले आई हूँ | श्रीकृष्ण-(मन ही मन मे) ठी, मैं समझ गया। पपद्वारा अलकृत प्रिय की इच्छा जनाकर मैंने ही इसे ऐसा अवसर दिया है। तुम्हारा क्या दोप है ? (स्पष्ट कहते हैं) सखि ! पद्मा का तो पृष्ण-पसपात प्रसिद्ध ही है (अदि लक्ष्मी तो सदा श्रीकृष्ण का ही पक्षात करती है |
* विदग्धमाधव-नाटक. अ-७*
पद्मा-अदो तुरिद गौरीतित्यं लम्भेहि चन्दाअलीअम् । [ अतस्त्व.
रितं गौरीतीर्थ लम्भय चन्दावलीम् ] 11८७॥
श्रीकृष्ण-(स्वगतम् ) चन्द्रायलेरागतिरेव राधिकोग्रमप्रतिबन्धिनी
धृत्ता । तदेनामेव नियंलोकभावां तावत्प्रमोदयनस्वं मनो विनोदयामि
(प्रकाशम्)
घृतपद्मोत्सवसंततिरसम्वदोपोदया सदा स्फुरती।
सखि कृष्णपक्षपूर्णा, चन्द्रावलिरद्भुता त्वमसि ।।१२॥
(इत्यग्रे परिक्रम्य) कुरङ्गाक्षि, पश्य काननस्य कमनीयताम् ।।
पमा-हला! एसो पुरदो सुरगणामा कण्हत्स कुरड्डो। जस्स
परिणी सा किदित्य रङ्गिणी णाम कुरगी। [ हला! एषः पुरतः सुरज
नामा कृष्णप्य कुरङ्गः। यस्य गृहणि सा कृतास्ति रङ्गिणी नाम कुरङ्गी ]n
श्रीकृष्ण--(सचकित नेपथ्ये कर्ण दत्त्वा स्वगतम्) नुनमागता राधा,
यदय रङ्गिणीकण्ठध्वनिदरोदश्चति ।।६१||
पद्या-इसलिए शीघ्र ले चलो गौरी तीर्थ पर चन्द्रावली को ।।७।।
श्रीकृष्ण-मन मे) चन्द्रावली का यहा आना ही राधा के उद्यम में
प्रतिबन्ध है-अर्थात् वह वहा नही आ पायेगी। इसलिए अकपट भाव से
चन्द्रावली को हर्षित करते हुए अपमे मन को आनन्दित करता हूँ ॥८||
(स्पष्ट कहते हैं)-हे सखि ! तुम पद्मा के सब आनन्द को धारण कर
दोष समूह से शून्य हो ओर मुझ कृष्ण के पक्ष मे सर्वदा पूर्णभाव से स्फुरित
होती हो । अतएव तुम अद्भुत चन्द्रावलो हो।
( यह कहते हुए आगे बढकर ) हे मृगाक्षि ! देखो तो कानन की
शोमा |
पद्या- सखि ! सामने देख, श्रीकृष्ण के सुरङ्ग नामक हरिण ने
राङ्गणी नाम्नी हरिणी को अपनी सहमिणो कर लिया है 10m
श्रीकृष्ण-(चकित होकर वेशगृह की ओर कान देकर मन ही मन
मे) निश्चय हो राधा आ गई है, क्योकि रङ्गिणा को कण्ठध्वनि सुनाई दे
रही है ॥६॥
*श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्ग-७ * । ३०१ ? पद्मा-कध एसो सुरङ्गो दक्खिणाहिम ह धाइदो? [ कथमेप सुरङ्गो दविखणाभिमुख घावित ] ॥२॥ श्रीकृष्ण- (पुनरात्मगतम् ) निष्टिङ्कितमेव, रङ्गिणीकण्ठशब्देनाय- माकृष्ट सुरङ्गो गौरीतीथं जगाम । तदस्यामेव समर्पणतीर्थतोरवनलेखापा बिलम्बमान क्षणमुदर्फ तर्कयामि ॥३॥ पष्मा- णअपमिणीसहस्स, अहमहण रसुत्तरङ्गवित्यारि । उअ गोउल विअ पुरो, सरोअर रेहई फारम् ।।' [ नवपमिनीसहस्रमघमयनरसोत्तरङ्गविस्तारि । पश्य गोकुलमिव पुर सरोवर राजने स्फारम् ] ॥१३॥ श्रीकृष्ण-प्रिये पश्य पश्य । मित्र विचित्रमनुरागमर घहन्ती सर्वाधतालिनिकरा स्वरसोदयेन । पमा-यह मुरङ्ग नामक कुरङ्ग दक्षिण की ओर क्यो भाग रहा है ? ॥२॥ श्रीकृष्ण( पुन अपने मन मे ) निश्चय ही रङ्गिणी को कण्ठध्वनि म आकर्षित होकर यह सुरङ्ग गौरीतीथ पर चला गया है । इसलिए इस सङ्क- पण तीर्थ को वनभूमि म थोडी देर ठहर कर देखता हूँ कि आगे क्या होता है ॥६॥ पपा-देखो, पाप विमोचनी जल तरङ्गो का विस्तार करने वाली नवीन सहस्र सहन पनियो से युक्त गोदुन की भाति सामने विशाल सरो. वर शोभित हो रहा है RE It घीकृष्ण-है प्रिय ! देखा दसो- यह सरोजनी अपनेमित्र सूप में विचित्र अनुराग परती हुई अपने मय. रन्द का विस्तार कररही है और मधुबरा को सम्मोहित करती हुई उसष्ट ३०२ ] *विदाधमाधव-नाटक अङ्क-७* सत्कणिकोज्ज्वलरुचिर्भुबने समन्तात- लक्ष्मी तनोति भवतीव सरोजिनीयम् ॥६५॥१४॥ शब्या-वं मणोहरं पउमिणों कोप्त कलाणिहि मलाणं करेदि ? ॥ [ एना मनोहरा पद्मिनी कस्मात्कलानिधिलाना करोति ?] || पद्मा-(चन्द्रमपदिश्य साकूतम्) सूराणुरत्तहिमा इ पउसिणी पसारिदामोआ। इह पा तुसंखणरामो ताराहीस विखवेहि करम् ॥ [ सूर्यानुरक्तहृदयेय पद्मिनी प्रसारितामोदा। इह न त्व क्षणरागस्ताराधीश क्षिप करम् ] ||७|१५ कणिका से उज्ज्वल शोभाशालिनी होकर सर्वतो भाव से तुम्हारी तरह जल मे शोभा विस्तार कर रही है। (पशान्तर मे)-यह पद्मनो रमणी मुझमे विचिन्न अनुराग करती हुई- शृगार रस का विस्तार कर रही है और सखी समूह को सम्बधित करती हुई- सुन्दर कलकारो से उज्ज्वल शोभाशालिनी होकर सर्वतोभाव से तुम्हारी तरह लोक मे शोभा विस्तार कर रही है ॥५॥ शंब्या-इस मतोहारिणी पपनी को कलानिधि (कृष्ण-चन्द्र) क्यो मलिन कर रहा है ( अर्याद श्रीराधा को प्रिय मानकर इसकी उपेक्षा क्यो कर रहे हैं ?) ॥६॥ पमा-(चन्द्र को उद्देश्य कर अभिलापा जनाते हुए) हे ताराघोश (चन्द्र) ! यह पधिनी सूर्य के प्रति अनुरक्त हृदय होकर सुन्धि विस्तार कर रही है । इसलिये क्षणमात्र को लाली युक्त अपनी किरणें तुम इस पर निक्षेप न करो। (पक्षान्तर-यह पधिनी सूर्य अर्थात गोवर्धन मल्ल के प्रति अनुराग युक्त हृदय होकर मानन्द विस्तार कर रही है ता राघोश) इसलिये हे राधापति ! इस चन्द्रावली को तुम हाय मत लगाओ क्योफि तुम तो कुछ क्षण के लिये इससे अनुराग करने वाले हो) Hun
-
* विदग्घमाधव-नाटक अङ्क ७* [ ३०३
श्रीकृष्ण-पने! नात्र तारापतिरपराध्यति। यदियं पमिनो चञ्च-
लया पाया सायं मुच्यमाना म्लायति ॥ll
चन्द्रावलो--(सस्मित पुरो विलोक्य संस्कृतेन)
समदमधुपलोल्पोत्सेकमालोक्य शङ्क,
विहसति लतिकाली पुष्पशोभामरेण ।
विसृजति मकरदन्छचना वाष्पविन्दू-
नियमतिमदुरेका स्नेहतः स्वर्णयूयो ॥१६॥
श्रीकृष्ण-(स्मित्वा) प्रिये. पश्य पश्य ।
अय मुञ्चशिराः कदम्बराज. स्फुटदिन्दिन्दिरवृन्दवन्दिगीतः ।
सुरभीकुलपुच्छचामरालीमरुवावीजितविग्रहश्चकास्ति ॥१000१७॥
चन्द्रावली-अम्महे, ललिदा वृन्दावणलच्छो। [ अहो । ललिता
वृन्दावनलक्ष्मीः ||१:१॥
धोकृष्ण-पद्ये । इस तारापति ( कृष्णचन्द्र ) का अपराध नहीं है।
क्योकि यह पधिनी सायकाल चञ्चल शोमा को त्यागकर मलिन हो जाती है।
(पक्षान्तर हे पो। इसमे राधापति-मेरा कुछ अपराध नहीं है।
क्योकि पद्मिनी (चन्द्रावली) चञ्चला पद्मा के साथ सायकाल को छोडकर
अर्थात् भागकर चली जाती है । अभिसार नहीं करती है) 150
चन्द्रावली-(मुसकराते हुए सामने देखकर) मैं समझती हूँ मदमत्त
मधुकर (श्रीकृष्ण) को अतिशय चञ्चलता को देखकर ये लगायें (सखीवृन्द)
पुष्पोके बहाने हँस रही हैं। किन्तु अति मृदुल यह एक स्वर्णमुखी(चन्द्रावली)
स्नेहवश मकरन्द के बहाने नेत्रो से आंसू बहा रही है अर्थात् अन्यान्य
गोपियों से मेरा श्रीकृष्ण मे अत्यधिक स्नेह है IMERII
धोधष्ण-(मुसकरा कर) प्रिय ! देखो, देखो-यह अति उच सिर
वाला कदम्बराज स्पष्टरूप से मधुकर रूप बन्दोमनी द्वारा स्तुत्य होने से
पया गौयो के पुन्धरूप चामरो को पवन से पराजित या वशीभूत हमा
दोसता है । अर्थात् में स्पष्ट रूप से तुम्हारे वशीभूत हो रहा हूं ॥१०॥
दावलो-आहा ! श्री वृन्दावन को कैसो सनिता-मनोहारिणी
पोमा है ॥१०॥
३०४ ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्ग-७*
(तत प्रविशति ललिता वृन्दा च)
ललिता-(पुरो दृष्टवा सव्यथम्) हला कक्खड पुरुदो सकड एदम् ।
[हला कक्खट पुरत सकटमेतत् । ] ॥१०२।।
वृन्दा-हन्त दुर्लङ्घयशासना किल कराला। तत्कथमद्य पद्मयात्र
चन्द्रावलिरुपनीता ॥१०३॥
ललिता-हला ! सअलविज्जाविअड्डासि । तो कद्देहि इदो कण्हम्
[हला | सकलविद्या विदग्धासि । तत्कषय इत कृष्णम् ] ॥१०४।।
वृन्दा--स्वस्य प्रेममणोना, गौरवभाजामिय वरा पात्री ।
हरिणा परिहरणीया कथ नु चन्द्रावलो भविता ॥१०५।१८।।
ललिता--(सस्कृतेन)
यस्मोपनम्य गध, गौवयफुलमाशु चौरपद्वति ।
उद्भटमनुरागभट, त रञ्जितनागर नौमि ॥१६॥१६॥
--
।
।
["उसी समय ललिता और वृन्दा प्रवेश करती हैं ]
ललिता-( सामने देखकर दुख पूर्वक ) सखि । सामने बडा भारी
सक्ट विद्यमान है ।।१०२॥
वृन्दा-हाय । कराला का शासन ही भारी जबरदस्त है । फिर भी
आज चन्द्रावली पद्मा के साथ यहा कैसे ? ॥१०॥
ललिता-सखि | तुम तो समस्त विद्याआ मे चतुर हो । श्रीकृष्ण
को इस ओर आकर्षित करो।।१०४॥
वृदा-चद्रावली श्रीकृष्ण के गौरवास्पद प्रेम-मणि की प्ठ पात्र
है। फिर श्रीकृष्ण इसे कैसे परित्याग कर सकते हैं ? ॥१०॥१८,
ललिता-श्रीराधा क मधुर स्नेहमय अनुराग योद्धा की गन्ध मात्र से
गुरुजना का पथ या मर्यादा चोर की तरह झट भाग जाती है और जिस
अनुराग योद्धा न श्रीकृष्ण को शोभित कर रखा है । उस (अनुराग योद्धा)
को में नमस्कार करती हूँ ॥१०॥१६॥
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ * [ ३०५
वृन्दा-सखि ! युक्त ब्रवीपि । किंतु दाक्षिण्यमुद्रयं चन्द्रावल्यां
कृष्णस्य, तता खल्वमुंदूराकर्ष कथयामि ॥१०७॥
ललिता-बुन्दे ! सच्चमणासि । ता इमरिस अचाहिंदे कि सरणम् ?
[ वृन्दे । सत्य भणसि । तदस्मिन्नत्याहिते किं शरणम् ] ॥१०॥
वृन्दा--प्रथमं गोष्ठीमाविश्य तत्त्वमवधारयाव. ॥१०६।।
( इत्युभे परिकामत.)
शव्या--(विलोक्य जनान्तिकम्) हला पउमे ' हन्त पूरणं गौरीतित्थे
राही सगदा । पेक्ख, तहिसादो ललिदा मिलदि। [हला पद्म । हन्त नून
गौरीतोर्थे राधा सगता । पश्य, तद्दिशातो ललिता मिलति ] ॥११०॥
पद्मा-का णो हाणी, ज हरिणा दुप्परिहरा पिअसहो ? [ का नो
हानियद् हरिणा दुप्परिहरा प्रियसखी ]॥१११||
वृन्दा-सखि ! तू ठीक कहती है। किन्तु श्रीराधा की इस प्रकार
चन्द्रावलो के प्रति आसक्ति को मैं निश्चय उसी का दुराकर्प ही कहती हूँ।
उसने इन्हें जबरदस्ती खीच रखा है ।।१०७।।
ललिता-वृन्दे ! तू सच कहती है । परन्तु अब इस ममगल से बचने
का क्या उपाय है।।1०८
वृन्दा-पहले आओ, गोष्ठी मे चलकर तत्व-तथ्य का निश्चय
फरेंगी॥१०
[ यह कहकर दोनो लौट जाती हैं ]
शव्या-(देखकर कान मे धीरे धीरे) सखि पा । हाय निश्चय ही
गौरीतीर्थ पर राधा आ चुकी है । यह देख ललिता उसी ओर जा रही है ।
पद्मा-हमारी इसमे क्या हानि है ? कृष्ण के लिये हमारी प्रिय सखी
पन्द्रावली को त्यागना मुश्किल है ॥११॥
३०६ ] *श्रीविदग्धमाघव-नाटकअ-७* ललिता--( उपसृत्य ) हला चन्दाअलि ! वल्लहासिणेहाणहिण्णस्स कुरगीसद्धभुअङ्गस्स फुरङ्गस्स घरे ण खु अन्हेहि रङ्गिगो वासणिज्जा। जं इमिणा मासम्मन्तरे वि स कालसारकुमारी ण सुमरोअदि, ता एत्थ तुमं सक्खिी का आअम्हि । [ हला! चन्द्रावलि ! वल्लभास्नेहानभिज्ञस्य कुरङ्गीसड्युजङ्गस्य कुरङ्गस्य गृहे न खल्बस्माभो रङ्गिणो वासनीया । यद- नेन मासाभ्यन्तरेऽपि सा कालपारकुमारो न स्मर्यते, तदन वा साक्षिणी कर्नु मागतास्मि । ] ॥११२॥ (चन्द्रावली स्मयते ) श्रीकृष्णः-(स्वगतम्)हन्त, मदर्थमागता लनिता चन्द्रावली विलोक्य छलमालम्बते । (प्रकाशम्) ललिते । हृदयेनिमविज्ञाय मुधा सुरङ्गमपाल- भसे। तदेय संदेशस्त्वया तस्यामावेद्यताम् ।।११३॥ हरिणाभिलष्यमाणा, सारङ्गरमणि सदा त्वमवासि । तदमुत्वद्रशहृदय, हृदयंगमलोचने विद्धि ॥११४।।२०।। पद्मा-(जनान्तिकम्) कण्ह सिप्पणो पिधजणं लद्धोसि । ता जुत्त ललिता-(निकट जाकर) हे चन्द्रावलो! प्रियतमा के स्नेह को न जानने वाले , कुरङ्गी-सङ्ग कामुक कुरङ्ग के घर मे हम रङ्गिणी कुरङ्गी को नही बसने दगी। क्योकि वह एक मास मे भी कृष्णसार कुमारी की याद नहीं करता है । इसलिए तुमको साक्षी करने के लिए मैं यहा आई हूँ। [ चन्द्रावली हँसने लगती है ] श्रीकृष्ण-(अपने मन मे) हाय ! ललिता तो मेरे लिए ही यहां भाई थी, किन्तु चन्द्रावली को देखकर वात को घुमा गई है । (स्पष्ट कहते हैं-) है ललिते । हृदय के भाव को न जानकर तू वृथा सुरङ्ग का तिरस्कार कर रही है। इसलिए तुम इस समय उसको इस प्रकार कहना-~||११३।। हे सारङ्गरमणि ! हरिण तो सदा तुम्हारी अभिलाषा किया करता है । इसलिये हे शोभनलोचने ! इस हरिण को तुम अपने वशीभूत-हृदय हुआ जानना ॥११॥ पना-( हाय की बोट मे ) कृष्ण ! तुम्हें अब अपने प्यारे जन मिल . * श्रीविदग्घमाधव-नाटकअङ्क-७ * [ ३०७ अजोग्गाणं अम्हारणं विसज्जणम् । [ कृष्ण ! आत्मनः प्रियननं लब्धोऽसि, तय क्तमयोग्यानामस्माकं विसर्जनम् । श्रीकृष्ण- करवाणि हन्त दिव्यं, दिव्यानि मदोन्नतासु ग पोपु । अनुरागिता सखि दधे राधागन्धिपुन वामासु । ११६॥२१॥ पद्मा-(सदर्पस्मितम्) सहि ललिदे ! अचारियं अचारिकं । तुम फुड अणुराहा भणिजसि । ता कोस अन्ज राहाए उअअ विणा उइदासि ? [ सखि ललिते ! आश्चर्यमाश्चर्यम् । वं खस्वनुराधा भण्यसे । तत्कस्मा- दद्य राधाया उदयं विनोदितासि ? ॥११७॥ ललिता-(संस्कृतेन) रोलम्बोनिकुरम्बं, चुम्बति गण्डं पिपासया यस्य । सरति तृपात्तः सरसों, स करोन्द्रस्तं पुनर्न हि सा ॥११८।२२।। गए है । इसलिए हम आयाग्य-पात्रों को त्याग देना हो तुम्हारे लिए उचित है ॥११॥ थोकृष्ण-आहा कसा आश्चर्य दिव्याङ्गि सखि ! मैं तुम्हारी प्रीति की शपथ खाकर कहता हूँ, परमाकर्पक मधुर स्नेहवती श्रीराधा- सौरम के प्रतिकूल चलने वाली समस्त गोपियों के प्रति मैं कभी भी प्रेम नही करता हूं ॥११॥ पमा - (गवं पूर्वक मुसकराते हुए) सखि ललिते ! आश्चर्य है ! अति आश्चर्य है !! तुम्हें तो सदा अनुराधा ( राधा के पीछे चलने वाली ) कहा जाता है, फिर आज तुम कैसे श्रीराधा के विना यहा उपस्थित हुई हो। ललिता-देखो समस्त प्रमरीवृन्द ( मकरन्द पान को) पिपासा से आतुर होकर हाथो के कपोनों का जाकर बार-बार चुम्बन करती हैं। (और वह हाथी उद्वेगपूर्वक अपने कानों से उमको ताहना करता रहता है) परन्तु जब हाथी प्यासा होता है तो यह स्वयं सरोवर पर भाग-भाग कर जाता है ( एवं वहा मुख प्राप्त करता है ) सरोवर कमो हायो के पास नहीं जाता।।
३०८ ] *विदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* पमा-एक्कं धीमदि सेटवे, पहेलिशं मे सहि जाणेहि । चित्तफलअम्मि लिहिदा, का रेहई माहवस्सदा ? [ एकां धीमति शंब्ये प्रहेलिकां मे सखि जानीहि । चित्तफलके लिखिता का राजते माधवस्य सदा ] ॥११६॥२३॥ शैव्या-सहि चन्दाअली [ सखि चन्द्रावली ] ॥१२०।। वृन्दा-(सस्मितम्) साघु विज्ञातम् । चन्द्रमण्डलालिमण्डनेन चित्रं खलु रमापतेः फलकं शतचन्द्रमाचक्षते ॥१२१।। श्रीकृष्णः-(स्वगनम्) अयदातंशीलेयम् ।।१२२।। (चन्द्रावली सलज्जमपसव्ये प्रयाति) . ( अर्थात्, तुम कामातुर होकर पुनः पुनः निराहत होकर भी श्री- कृष्ण के पास भाग-भागकर जाती हो जिससे श्रीकृष्ण को कुछ प्राप्त नहीं होता बल्कि उद्वेग ही होता है । परन्तु श्रीकृष्ण जव तृषातुर होते हैं तो वे स्वयं ही हमारी प्रिय सखी श्रीराधा के पास गमन करते हैं । जिससे श्रीकृष्ण का सर्वसुख सम्पादित होता है। अतः श्रीराधा के यहां आने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता) ॥११॥२२ पद्मा-हे बुद्धिमते शेव्ये ! मेरी एक प्रहेलिका है, उसका अर्थ तो वता । श्रीकृष्ण के हाथ में चित्तफलक पर लिखा हुया कौन सदा विराज- मान रहता है ।।१२।।२३ ग्या-सखि ! चन्द्रावली ॥१२०॥ वृन्दा-(मुसकरा कर ) ठीक पूना हैं तूने । जिस चन्द्रमण्डल- 'चन्द्रावली द्वारा लक्ष्मीपति का चिन-फलक बना हुआ है उसे शतचन्द्र अर्याद दाल पहते हैं ।।१२।। धीग- अपने मन में विमुख स्यमादा है यह ॥१२॥ [पन्द्रायनी मग्जित होकर दाई घोर चली जाती है ] 1 * विदग्घमाधव-नाटक अङ्क-७* [ ३०६ ललिता--मह वाहरेहि बुन्दे, पहेलिअं दिव्यपहेलिविण्णाणे । पियसहि किमिहिक्खाए, लक्खिज्जइ माहवो भुभणे?।। [ मम व्याहर वृन्दै प्रहेलिकां दिव्यप्रहेलिविज्ञाने । प्रियसछि किमभिस्यया लक्ष्यते माधवो भुवने ? ] ॥१२३।२४।। वृन्दा-सखि ! राधाभिख्यया ॥१४॥ श्रीकृष्ण:-युक्तमिदं यद्व शाखपर्यायो माधवराधौ ॥१२॥ पमा-सेटवे ! अलं पहेलिआपसङ्गण । सुहावेहि कमलिश्खणरसेहि अत्ताणअम् । [शैव्ये ! अल प्रहेलिकाप्रसङ्गन । सुखय कमलेक्षणरसरात्मा- नम् ] ॥१२॥ शैव्या-(कमलाकर विलोक्य) भमरस्स ताव पमदं, पदोसमुदिदा कुमुद्ददी कुणइ । नाव इस पउमाली, विन्दई नहु दिट्टिमेदस्स ।। ललिता-हे प्रेहिलकाओ को बूझने मे अति श्रेष्ठ वृन्दे ! बना किसके नाम से माधव (श्रीकृष्ण) सुशोभित होते हैं ॥१२३।। वृन्दा-सखि राधा नाम से । (राधया माधवो देवो..... वेद ॥) थोकृष्ण-ठीक कहा है, क्योकि वैशास मास के पर्याय भी माधव एव "राघ" हैं। (वैशाख के दूसरे नाम हैं माघव एव राध ) ॥१२५।। पना-दोव्ये ! अब प्रहेलिका का प्रसग बन्द करो। अव तो कमले- क्षण-कमलो का दर्शनरस आस्वादन करो। ( अथवा कमलेक्षण-श्री कृष्ण का दर्शन करो) ॥१२६।। शंध्या-(फमलो को देखकर ) अमरो को उसी समय सफ विर- सित कुमुदिनी प्रदोषकाल मे आनन्द प्रदान करती है, जब तक उनको दृष्टि कमल-श्रेणी पर नहीं जाती। (लेपार्थ मे-भ्रमर-यामुफ श्रीकृष्ायो रानि के काम मे मुदिता मर्याद प्रकृष्ट दोपयुक्ता कुमुद्रता-रिसत आनन्दशोला अर्याद रापा तब ३१. ] *विदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* [भ्रमरस्य तावत्प्रमद प्रदोषमुदिता कुमुद्धती कुरुते । यावदिय पद्माली विन्दति न हि दृष्टिमेतस्य ॥१२७॥२५॥ पद्मा-हला । सच्च भणासि । तथा हि। विजोदन्ति राहा पेक्खिनुइ ताव तारआलीहिम् । गअरणे तमालसामे, न जाव चन्दासली फुरइ॥ [ हला 1 सत्य भणसि । तथा हि । विद्योतमाना राधा प्रेक्ष्यते तावतारकालीभि । गगने तमालश्यामे न यावच्चन्द्रावलि स्फुरति ।। 1 ।।१२८ ॥२६ ललिता--(विहस्य सस्कृतेन) सहचरि वृषभानुजया प्रादुर्भाव वरवियोपगते । चन्द्रावलोशतान्यपि, भवन्ति निघूतकान्तीनि ॥१२॥२७॥ श्रीकृष्ण --(स्मित्वा) कि वाचाटतया? समिकृष्टस्य सुरने सौर- ज्यमनुभयताम् ।।१३०॥ तक आनन्द देती है, तब तक उस श्रीकृष्ण को दृष्टि पद्माली-जिस की पया सखी है अर्थात् चन्द्रावली पर नहीं पडतो ) ॥१२७|| पद्मा-सखि तूने सच कहा है, देख-तमाल को भाति श्याम वर्ण आकाश मे तारावली के साथ रावा नक्षत्र (वैसाखा) तभी तक प्रकाशित होता है, जब तक चन्द्रावली प्रकाशित नही होतो । ( श्लेपार्थ-तारावली अथात् विशाखादि सखियो के साथ श्रीराधा तब तक शोभित होती है जब तक चन्द्रावली नहीं आतो ॥१२८।२६।। ललिता-(हँसकर) हे सहचरि । वृषभानुजा अर्थात धृपराशि स्थित सूर्य जनित उत्कृष्ट कान्ति (श्रीराधा कान्ति ) से सौ-सौ तारागणो (चन्द्रावली ) को शोभा कान्ति मलिन हो जाती है ।।१२।। श्रीकृष्ण-(मुसकराकर ) अधिक वाचालता का क्या प्रयोजन है यहाँ उपस्थित वस त का सौरम का अनुभव करो ॥१३०।। १ *श्रोविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-७* [ ३११ वृन्दा-(सस्मितम्) उल्लसति फुल्लगात्रो, का वल्लो नात्र माधवेभ्युदिते ? तन्नामता: प्रसिद्धां, तथापि तां माधवीं नौमि ॥१३॥॥२८॥ श्रीकृष्णः-(सवैमनस्यं परिक्रम्योपै.) हला चन्दाअलि! धुतगोडी; रङ्के संगमिम विग्धेसजणणीपूअणे कोस सिढिनासि ? [ हला चन्द्रावलो! धूर्तगोष्ठीरङ्ग सगम्य विध्नेशजननीपूजने कस्माच्छिथिलासि ? ] ॥१३२।। श्रीकृष्णः-(सोपालम्भम्) चन्द्रावली मामनुरुध्यमानां रुणाद्धि पद्म भवती बलेन । मल्ली तमालाभिमुखं मिलती, हिरव वल्ली पुरतः कराला ॥ (प्रविश्य ) कराला-चिट्ठध रे, चिट्ठध, दिद्विआ मग्गे चेअ लद्धात्य । [ तिष्ठत, रे तिष्ठत । दिष्टया मार्ग एव लव्या. स्थ ॥१३४।। वृन्दा- ( मुसकान पूवक ) ( मा वसन्त व प्रोकृष्ण ) स्थित होने पर कोनसो लता ( रमणो ) है जिसके अग प्रफुल्लित नहीं हो उठते हैं ? अर्थात् सभी प्रफुल्लित हो उठनो हैं । तयापि माधव के नाम से प्रसिद्ध माधवी लता (श्रीराधा) को मैं प्रणाम करती हू ।।१३।।८।। पा-( लज्जा सहित घूमकर ऊंची आवाज मे ) सखि चन्द्रावनि ! धूर्त-गोष्ठी के सग मे पडकर गणेश-जननि (श्रीगोरो) के पूजन मे क्यो शिथिल हो रहो हो ? ॥१३२।। श्रीकृष्ण-( तिरस्कार सहित ) पद्म । जैसे तमाल वृक्ष (मृक्ष कृष्ण) को मिलाने के लिये उसको ओर जाने वाली मल्ली-लता को कराला हिरलता ( कडोर लता) रोक लेतो है, उसी प्रकार तू मेरे में अनुरक्त चन्द्रापलि का बलपूर्वक रोक रही है ।।१३३॥ [ कराला प्रवेश करती है ] कराला-ठहर जा रे, रहर जा, सौमाग्य से भाज तू रास्ते में ही मिल गया है ॥१३॥ उप- ३१२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* ( सर्वाः परावृत्य संभ्रमं नाटयन्ति ) शैब्या-(अपवाय) पउभे ! हद्धी हद्धी । फधं एत्थ अम्हे विवणादा मुट्टिाए ? [ पद्म ! हा धिक् हा धिक् । कयमत्र वयं विज्ञाता वृद्धया ] । कराला-अम्मो सई जे जप्पिदं ताए गवणोअलम्पडाए बुट्ट- मक्कडीए। [अम्मो! सत्यमेव जल्पितं तया नवनीत लम्पटया धमर्कटया]। (पद्मा सखेदं शैव्यामुखमीक्षते ) ललिता-(स्वगतम्) बुड्डसक्कडि कक्खडिए! सकारामक्खिदं मक्खरणं दे दाइस्सम् । [ वृद्धमकंटि कक्खटिके ! शर्कराम्रक्षितं नवनीतं ते दास्यामि] श्रीकृष्ण:-(अपवार्य) प्रिये तिरोधानाय स्थानमपि न ते पश्यामि । यतः १ सव्ये गिरिः स्फुरति दुर्गमतुगशृङ्गो, गा: पालयत्यहह दक्षिणतस्तथार्यः । [ सब घूमकर हड़बड़ी प्रकाशित करती हैं ] शैव्या-( हाथ की ओट करके ) पद्म ! हाय धिक्कार है घिवकार ! इस वृद्ध को कैसे पता लग गया कि हम यहां हैं ? ॥१३५।। कराला-ओ मां ! उस माखन चोरनी वृद्ध वानरी ने सत्य हो कहा था ।।१३६॥ [ पद्मा खेदपूर्वक शैव्या के मुंह की ओर देखती है ]. ललिला-(अपने मन में) हे वृद्धा बानरो कवखटिके ! तुमको मिश्री मिला माखन दूंगी ॥१३७॥ श्रीकृष्ण-(हाथ की ओट में) हे प्रिये ! तुम्हें छिपाने की भी तो कोई जगह नहीं देख पा रहा हूँ-- वायी ओर अत्युच्च चोटियों वाला गोवर्धन पर्वत है, दक्षिण में बड़े भाई श्रीवलदेव गौ-चारण कर रहे हैं, पीछे पी और कोई आवरण नही है * श्रोविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-७ * [ ३१३ भूः पृष्ठतो विरहिता वृतिमिः पुरस्तात- करा विवेष जरती फतमात्र पुक्ति ? ॥१३८॥३०॥ चन्द्रावली-(स्वगतम्) हन्त हन्त । अकण्डे कवकसाए भविवश्वदा चण्डालोए चण्डिमा। [ हन्त हन्त, अकाण्डे कर्कशाया भवितव्यता चण्डा- ल्याश्चण्डिमा ] ॥१३॥ कराला '-(सरम्भमभिनीय) पेच्छध भी पेच्छध, इमस्स कुसुम्मतेल्ल- फजलजालकालस्स कालभुमङ्गअंकभरलोअणञ्चलस्स'चञ्चलत्स भुअङ्गातणम्, नं चारहमॅग्गगमिदो इमिणा सअलाणं गोउलालगणारणं मङ्गलो कुलधम्मो- (इति सशिरः कम्पं दृशौ विस्फार्य) अरे सामलआ कस्स एसा जाआत्ति जाणसि ? सुणाहि रे, णीसङ्क सुणाहि, जो वलु भोइन्दस्स दुदिओ अप्पा तस्स महामल्लस्स । [ प्रेक्षध्व भो प्रेक्षध्व, अस्य कुसुम्भतलकज्जलजालका- लस्य काल मुजङ्गभयकरलोचनाञ्चलस्य चञ्चलस्य भुजङ्गत्वम्, यद्वादश- मार्ग गमितोऽनेन सकलाना गोकुलकलाङ्गनाना मङ्गल कुलधर्मः । अरे श्या. मल ! कस्यैपा जायेति जानासि । शृण रे, नि.शङ्क शृणु , य. खलु भोजे- न्द्रस्य द्वितीयात्मा तस्य महामल्लस्य । ] ॥१४०॥ श्रीकृष्ण.-करालिके । तत् किम् ।।१४।। और सामने कर स्वभावा वृद्धा कराला आ रही है । यहा क्या युक्ति हो सकतो है? ॥१३८॥३०॥ चन्द्रावली-(अपने मन मे) हाय ' हाय !! सम्पूर्ण कठोर स्वभावा पण्डालिन की कैसी प्रचण्ड भवितव्यता चण्डिमा है ।।१३६।। फराला-(क्रोध प्रकट करते हुए) देखो रे लोगो देखो, कोसुम्भ-तैल को जलाकर बनी काजल राशि की तरह काले सर्पवत् भयकर नेतो वाले इस चञ्चल कृष्ण के कामुकत्व को, जिसने समस्त गोकुल की कुलाङ्गनाओं के समस्त मङ्गल-कुलधर्म को वारहो द्वार बाहर निकाल फेका है। इतना कहते हुए सिर को कम्पाती हुई एव नेत्रो को फाडती हुई) अरे श्यामा ! जानता है तू यह किसको नारी है ? सुन रे सुन जरा निशक होकर । राजा कस की द्वितीयात्मा महा मल्ल गोवर्धन को पलि है यह ॥१४०।। श्रीकृष्ण हे करालिके | उससे क्या होगा ।।१४१॥
३१४ । *श्रीविदाघमाधव नाटक अङ्क-७ * कराला-(सक्रोषम् ) सच सच तुमं वणमझे अप्पाणं दुदिक्षं राआणं जाणसि । सोचे राउलगामी गोढणाही अप्पणी लनाडं ताडि. स्सादि । [ संत्यं सत्यम् त्वं वनमध्ये आत्मानं द्वितीय राजानं जानासि । स एव राजकुलगामी गोष्ठनाथ आत्मनो ललाटं ताड़यिष्यति-] ॥१४॥ श्रीकृष्णः-कराले ! तुभ्यं शपे। चन्द्रावलों विलोक्य साध्वसं गतो- ऽहमृगमासादयामि ॥१४३॥ कराला-(चन्द्रावली विलोक्य सामर्पम् ) हा गिउञ्ज ज्जाअरिणी ! आकोमारसिक्खिदकण्हहिसारफोसले ! संरम्भुण्णद्धगोविआसहस्सुच्छिट्ठाहर- विम्वतिहामेत्तविद्ध सिबकुलव्वदे! चिट्ठ चिट्ठ । कि दाणि भाएसि? [हा निकु- 'अोज्जागरिणि ! आकौमार-शिक्षित-कृष्णाभिसार-कौशले,! संरम्भोन्नद्ध- गोपिकासहस्रोच्छिष्टाघर-बिम्बतृष्णामात्रविध्वंसितकुलवते । तिष्ठ-तिष्ठ । किमदानी विभेपि ? ] ||१४॥ ... 71Y 1 वन में कराला-( क्रोधपूर्वक ) ठीक है, ठीक है, तू अपने को इस. दूसरा राजा समझता है । वह रोज-कुलगीमी गोप्ठनाथ नन्दराज ही अपना भाथा पीटेगे ।। ( अर्थात् राजा कंसको सभा में जब यह तुम्हारी करतूत कही जावेगी और कंस के कर्मचारी तुम्हें पकड़ने आवेंगे, तो-राजदण्ड के 'भय से तू तो वन में छिप जायेगा परन्तु तुम्हारे पिता नेम्दराज को पकड़- कर ले जाया जायगा । वहां नन्दराज -"हाय ! ऐसा पुत्र क्यों पैदा हुआ, कहकर माथा पीटेंगे)।१२।। श्रीकृष्ण-हे कराले ! मैं चन्द्रावली को देखकर भयभीत हो रहा हूं एवं बड़ा दुखी हो रहा हूं.॥१४३ फराला- ( चन्द्रावली को देखकर लोधपूर्वक ) हा निकुञ्जों की उज्जागरिणि ! कौमारवयस से ही शिक्षित कृष्णाभिसार-कौशले ! क्रोध पूरित सहस्र सहस्र गोपियों ने जिस कृष्ण के अधर बिम्ब को झूठा किया है केवल उसी को तृष्णा में ही अपने कुलवत को नाश करने वाली ! ठहर जा तू, ठहर, अब डर क्यों रही है ? ॥१४॥'
*प्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्ग-७ [ ३१५ ललिता-अजे । को क्लु दोसो जोमणणाहाणुगदाए पचिमदिसाए, को वा दोसावहारिणो सरस्स? किंतु एदाण आरूढराआण दोग राम उप्पादिअ संगमकारिणीए सझाकुडिपीएम पदोसाणुवन्धिदा। [मायें ! क खलु दोपो जीवननाथानुगताया पश्चिमदिश । को वा दोषापहारिणे. सूर्यस्य ? कित्तयोरारूढ रागयो यो रागमत्साद्य सगमकारिण्या. सध्या- कुट्टिन्या एव प्रदोपानुबन्धिता] ॥१४॥ कराला-जादे । मन्जु कधेसि ( इति प्रौढमाटोप नाटयन्ती) हले पउमिए' परघरविघट्टिणि कुट्टिणीकम्मलम्पडे धिट्टा मण्डलचक्कवट्टिणि मह हत्यादो कह मुक्किस्सति ? [ जाने । सत्य कथयसि हञ्ज पछिके परगृह- विघट्टिनि, कट्टिनीकर्मलम्पटे | धृष्टामण्डल चक्रवत्तिनि । मम हस्तात् कथ मोक्ष्यसि ? ] (इति यष्टिगुद्यच्छते) ॥१४६।। पधा-(परावृत्य) अद्ध ण जाणे कोस खिजसि । ज अम्हेहिं तुम सासरण च किज्जन्त अस्थि । आयें न जाने कस्मारिखद्यसे। यदस्माभिस्तव शासनमेव क्रियमाणमस्ति ] ||१४७॥ . 1 T ललिता-आर्य । जीवननाथ (वरुण ) का अनुगमन करने वाली पश्चिम दिशा का क्या दोप है ? और दोषापहारी-(रात्रि को नाश करने वाले ) सूर्य का ही क्या दोष है ? किन्तु परस्पर अनुरक्त इन दोनो का अनु- राग उदित कर सङ्गम कराने वाली राति से पहले आने वालो कुटिला सध्या का ही दोष है । ( अर्थात् इसमे न तो चन्द्रावली का दोप है न थी- कृष्ण, का दोष है इस पद्मा का जो इन दोनों को लाकर सगम कराती है । फराला-पुत्रि ' तूने सत्य कहा है। (यह कहकर अतिशय क्रोध दिखाते हुए ) अरी चेटकि पढ़ें । परगृह-नाशिनि ! स्त्री-कुल नाशकारिणि लम्पटे | धूर्तमण्डल चक्रवत्तिनि तू मेरे हाथ से कैसे बचेगी ? ( यह कह- कर मारने के लिये लाठी उठाती है)॥१४६।। पना-(पीछे हटकर ) आर्ये । न जाने आप इतना दुख क्यों मान रही हैं । हम तो आपकी आज्ञा के अनुसार ही सब कर रही हैं ।।१४॥
३१६ ॥ * श्रीविदग्धमाथव-नाटक अङ्क-७ -- १ । पद्मा- वृन्दा-(स्वगतम् ) नून धूर्त या शब्दच्छलमालम्बित पाया। (प्रकाशम् ) आर्ये, शेलमल्लयोनामातेन भ्रान्तेय मुग्धा बाला। तदद्य क्षम्यताम् ॥१४८॥ (गला यष्टि विमुञ्चति) -(स्वगतम्) ललिवे, चिठ्ठ चिठ्ठ। तुह गिविरुद कादं एसा बडिल गच्छन्ति म्हि [ ललिते, तिष्ठ तिष्ठ । तव निष्कृत कर्तु मेषा जटिला गच्छन्त्यास्मि ] (इति निष्क्रान्ता) ॥१४६।। कराला-(चन्द्रावलोमवलोक्५ ) एहि भो फुडुङ्गकुडुम्बिणी, एहि । [ एहि भो कुञ्जम्बकटुम्बिनि, एहि 1 ( इति चन्द्रावलीमादाय शव्यया सह निष्क्रान्ता)॥१५॥ श्रीकृष्णः-(सोच्छवासम्) वृन्दे नून साधितासि ॥१५१।। वृदा-(अपने मन मे ) निश्चय ही पद्मा ने धूर्तता से शब्द छल का अवलम्वन लिया है । ( स्पष्ट कहती है ) आयें । गोवर्धन शब्द पर्वत और तुम्हार पुत्र गोवर्धन मल्ल-इन दोनो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है-अत यह युवति भ्रम म पड गई है । चन्द्रावली को गोवद्धन मल्ल के पास ले जाने की बजाय यहा गोवर्द्धन के निपट ले आई है। इसलिये आज इसे क्षमा पर दो।।१४८। [पराला लाठी फेर देती है ] पा--(मन मे ) अरी ललिते । ठहर जा, ठहर जा, तेरे उपपार का बदला चुकाने के लिये में भी जटिला के पास जा रही है। (यह यहकर चली जाती है। ॥१४॥ परासा-( चन्द्रापली यो देसकर) अरी ओ पुअयुटुम्बिनि । मा। (यह पहमर पदायली और शव्या के साथ चली जाती है ) ॥१०॥ घोप्न-(आनन्द सहित ) वृन्दे । तूने निश्चय हो काम बना . दिया है ।।१५॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क- * वृन्दा-माधव ! रुपिणी माधवलक्ष्मीगौरीतीर्थे खेलति । तया चोप- ढोकितं सर्वस्वमिदं दरोन्मुद्रितं गन्धफलोद्वन्द्वम् ।।१५२।। श्रीकृष्णः-(सानन्दमादाय ) वृन्दे यावद्गवां चारणे वयस्यानव- धाप्य तत्रानुसरामि तावद्धवतीम्यामग्रतः प्रस्पीयताम् ( इति निष्क्रान्तः )। वृन्दा"( परिक्रम्य ) ललिते, पुरा संभावयकदम्बसमानम् । (इस्यु- पेत्य) हन्त हन्त । . । शङ्क पद्धजसंभवोऽपि भवतः सौभाग्यभङ्गीभर वक्त न क्षमते कदम्बनृपते वृन्दावोद्योतिनः । पुष्पर्यस्य - रमासहोदरतया युद्भासुरं कौस्तुभ दुर्लोलेरवहेलयद्भिरभित. शोरेशरश्छाद्यते ॥१५४॥३१॥ . वृन्दा-माधव ! माधव-लक्ष्मी रूपिणि ( आपको सम्पत्ति स्वरूपिणी -राधा) गौरी सीथं पर खेल रही है । उसने आपको अति प्यारी-ये दो अघ- खुली चम्पक कलियां उपहार मे भेजी हैं ।।१५२॥ श्रीकृष्ण-(आनन्दपूर्वक लेकर ) वृन्दे । जब तक मैं सखाओ को पोचारण में नियुक्त कर वहा आता हूं, जब तक तुम वहाँ चलो जाओ। (यह कहकर श्रीकृष्ण चले जाते हैं। ) ॥१५३।। वृन्दा-(लौटकर ) ललिते ! देख तो सामने कदम्ब साम्राज्य को। ( यह कहकर निकट आती है ) महा-हा ! हे श्रीवृन्दावन में उदयशील कदम्बराज । मैं समझती हूँ ब्रह्मा भी तुम्हारे सौभाग्य की उत्कृष्टता को वर्णन करने में समर्थ नहीं है। क्योकि धोकृष्ण के वक्ष स्थल पर विराजमान लक्ष्मी की सहोदरा अति ज्योतिर्मय कौस्तुभमणि को भी तुम्हारे अति चञ्चल पुष्प समूह उसकी अवहेलना करते हुए आच्छादित किए रहते हैं। अर्थात सदा तुम्हारे पुष्पो को माला वक्ष- स्थल पर धारण किये रहने से कौस्तुभ मणि भी उतनो शोभा प्रकाशित नही कर पाती ॥१५४॥३१ . -- . * श्रीविदग्यमाधव-नाटक अङ्क-७* ललिता-(पुरों विलोक्य) वुन्दे ! इअ विसाहादुदि भअवदी मा- न्दङ्ग पच्छन्न चिट्ठति। वृन्दे। इयं विशाखाद्वितिया भगवती माकन्दकुञ्ज प्रच्छन्न तिष्ठति ] ॥१५॥ वृन्दा-(लवङ्गलतान्ति के राधा विलोक्य ) ललिते, पश्य पश्य । किमिय सुपमा वपुष्मती किमभिव्यक्तिरल गुणप्रिय ? अथवा प्रणयाभिसपद किमिय मूर्तिरदेति राधिका ॥१५६॥३२॥ (पुननिर्वर्ण्य) कर्णालकृतकमला कुन्तलवैणीशिखाचलत्कमला । करकमलाधितकमला चिडम्बययलमसी कमलाम् ॥१५६।।३३।। (नेपथ्ये) कर्णान्योलितमुग्धगन्धफकलिकाद्वन्द्व कदम्बनजा सवीतो मुरलीकरम्यितकरश्च डाञ्चले चन्द्रिका । -~ । ललिता-(सामने देखकर ) वृन्दे | यह देख, विशामा के साथ भग- वती पौर्णमासी आम्रकुञ्ज मे किसी हुई है ।।१५।। वृन्दा-(लवगलता के निकट श्रीराधा को देखकर) ललिते देिखो, दखो- पया यह गुणलक्ष्मी को शोभा मूर्ति धारण कर प्रकाशित हो रही है, भयवा प्रणय सम्पद पी मूर्ति धारण कर यह श्रीराधा उदित हुई है । (फिर देसकर)-आहा ! कानो में पमल विभूपित, केश-वेगो के अग्रभाग में पमल आन्दोलित, एवं हाय मे कमल मुशोभित हैं, जिनसे यह धीराधा रमसा (लक्ष्मी) को अतिशय सम्मित पर रही है ।।१५७॥३३ [ वेशगृह रे आवाज याती है ] पानों में सुन्दर-पम्पक आन्दोनित, हॉप में मुरनी, नेपों में चादर पदम्प मामा से विमूपित, एव ललाट पर उम्पत मनगिन वा तिनक * श्रीविदग्घमाधव-नाटक अङ्क-७* दूरादेष मनः शिलातिलकिना भालेन विनय तिर: - मूर्तः खेलति हन्त नन्दगृहिणीवात्सल्यलक्ष्मीरसः ।।१५८॥३४ ललिता--पूण भावदोए दूरे दिट्रो कण्हो, ले वणीदि। [ नूनं भगवत्या दूरेः सृष्टः कृष्णः, यद्वयेते ] ॥१५॥ वृन्दा--ललितें, सत्यमविदूरवर्ती मुरवरी । तथा हि । सखि कुण्डलीकृतशिखण्डमण्डलो नंटलौह ताण्डविकतिरण्डजः। न कदापि कृष्ण मुदिरेक्षणं विना मुदिरेक्षणे क्षणमपि श्वसित्यसो ।।१६॥३५ ललिता-सहि, दक्षिण 'पुगोअसण्डे पेखें पुडमण्डवेयं । [ सखि, दक्षिरीन पूनागपण्डै पश्य पुण्डकमण्डपे एनम् ] १६१॥ न्दा--( विलोक्य सहपम् ) चक्र वशीकृतवतः किल नैचिकोनां बंशोनिनादमधुनों मधुसूदनस्य । N - - धारण किए, वह श्री यशोदा को वात्सल्य-लक्ष्मी मूर्तिमान रस-विग्रह होकर क्रीडा कर रही है ।।१५८॥३४ ललिता-वृन्दे ! भगवती जिस रूप का वर्णन कर रही है, उससे निश्चय होता है कि इसने दूर से श्रीमाधव-कृष्ण का दर्शन किया है ॥१५६।। वृन्दालोलते ! यह सत्य है, वह माधव निकट हो वर्तमान है, क्योंकि:- हे संक्षनलोचनें ! ताडविक मोर अपने पुच्छ-मण्डल को गोलाकृति में फैलाकर नृत्य कर रहा हैं। धन-श्याम के दर्शन विना वह कमो भी जीवन धारण नहीं कर सकता ।।१६०||३५ ललिता-सखि ! दक्षिण दिशा में माधवी लता मण्डप में पुना। वृक्ष को तो देख ।।१६१॥ वृन्दा-मदिखकर हर्षपूर्वक) जिनकी वंशी की मधुर ध्वनि के द्वारा ३२० ] *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* + , |" आभोरशेखरगति प्रतिपादयन्ती शोमा धभूब परमा परमस्य यष्टिः॥१६॥३६॥ ललिता-ण वृत्त दाणि पि दोषं अण्णणोष्णदसणम् । केअलं रङ्गि- णि पेक्खिम लअगाडङ्ग पवितदि कण्हो। [ न वृत्तमिदानीमपि द्वयो- रन्योन्यदर्शनम् । केवल रङ्गिणिका प्रेक्ष्य लवङ्गकुञ्ज प्रविशति कृष्णः ] ॥ वृन्दा-पश्य पश्य । विस्मरान्परितो हरिमूत्तितः परिमलानुपलभ्य कलावती। इयमितः सखि पुण्डकमण्डपे स्मितमुखी तनुवस्लिमपावृणोत् । १६४।३७ (पुननिरूप्य सकौतुकम् ) 1:-- व्यक्ति गताभिरभितो भुवि पांशुलायां सद्य: पदाद्भुततिभिः कथिताध्वनोऽयम् । पश्चादुपेत्य नयने फिल राधिकायाः कम्प्रेण पाणियुगलेन हरिदंघार ।।१६।३।। समस्त गोए वशीभूत हो जाती हैं, उन्ही सर्वोतम श्रीकृष्ण की पर मशोभा• शालिनी लाठी उनको गोपचूड़ामणियो की चाल प्रदर्शित कर रही है । 'ललिता अभी उन्होने एक दूसरे को साक्षात् देखा नहीं है, केवस रङ्गिणी-हरिणो को देखकर ही श्रीकृष्ण ने लवग-कुक्ष में गमन किया है ।।१६३॥ वृन्दा-देखो, देखो, सखि- श्रीकृष्ण अङ्ग से चारों ओर प्रसारित होने वाली जो सौरम निकल रही है, कलावती श्रीरापा ने उसे प्राप्त कर लिया है, और उप्तने मुस्कराते हुए नवग-कुन से माधवी-कुक्ष में जाकर अपनी शरीर रूपी लता को छिपा लिया है ॥१६४॥३७ (फिर देखकर कौतुव पूर्वक ) ससि, देश घूलियुक्त वन-भूमि पर थी रापा के जाने में उनके पचिह्न बन गए थे, श्रीकृष्ण ने श्रीराधा को जाते हए नहीं देखा परन्तु उन्ही पदचिह्नों ने हो श्रीराधा के जाने का रास्ता बता दिया। श्रीकृष्ण ने उसी रास्ते से जाकर श्रीराधा के दोनों नेन यन्द मार रिपे परतु उस समय उनके दोनों हाय कापने सगे ॥१६॥ FL *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* [ ३२१ ललिता-हन्त हन्त, एसा पुलइबङ्गी वामा लीलाफमलेग ताडेदि कमलियषणम् ।[ हन्त हन्त, एपा पुलकिताङ्गी वामा लीलाकमलेन ताडयति कमलेक्षणम् ] ॥१६६|| वृन्दा-पश्य पश्य । धू नेदः स्मितसंवृतो नहि गहीत्युक्तिमदेनाकुला विधान्तोद्धति पाणिरोघरचन शुष्कं तथा कन्दनम् । सृष्टो यः सखि राधया मुहरयं संगोपनोपक्रमो भावस्तेन हृदि स्थितो मुरमिदि व्यक्त समन्तादन ॥१६७।३६ ललिता-(सस्कृतेन) प्रातिकूल्यमिव यद्विवृण्यतो राधिका रदनखाणोधुरा । फेलिकमणि गता प्रगल्भतां तेन तुष्टिमतुला हरिययौ ॥१६८॥४०॥ ललिता-हाय | वह पुलकित-अङ्गी श्रीराधा वाम्य भाव मे आकर लीला कमल द्वारा कमल-लोचन ( श्रीकृष्ण) को ताडना कर रही है ।।१६६ वृन्दा-देखो, देखो-सखि | श्रीराधा श्रीकृष्ण से अपने हृदय भाव को बारम्बार छिपाने के लिए जितना उपक्रम करती है, उससे वह भाव छिपा न रहकर बल्कि और अधिक प्रकाशित हो रहा है। श्रीराधा भीकृष्ण के प्रति जो असम्मति सूचक भ्रकुटि टेढी कर रही है उसमे थोडी- थोड़ी मुसक्यान जो मिल रही है, उससे उसको परम सम्मति प्रकट होती है और न-न इस प्रकार की निषेधोक्ति के साथ साथ उन्मत्त-आकुल स्वर- भग स्वीकृति प्रकाशित कर रहा है। हाथ का रीकना अनिच्छा प्रकट करते हुए भी श्रीराधा के हाथो मे उद्धता या चञ्चल्लता का अभाव परम अभी- ष्टता को ही जाहिर कर रहा है । वह क्रन्दन कर दुख जता रहो है परन्तु सूखा-रोना दुख के अभाव को ही प्रकाशित कर रहा है ।। ६७॥३६ ललिता-श्रीराधा केलि-विलास में प्रगल्भता दिखाते हुए दन्त-नखा- घात से उद्धत होकर प्रतिकूलता का जो जो आचरण कर रही हैं, श्रीकृष्ण उसो मे ही अतिशय सन्तुष्ट हो रहे हैं ॥१६॥४० ३२२ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ * + वृन्दा-(विहस्य) नैरञ्जन्यमपेयतु परिगलन्मोदाथ जो लोचने स्वेदोद्ध तविलेपन फिल कुचद्वन्द्व जहाँ रागिताम् ? योगौत्सुषपमगादुर स्फुरदिति प्रेक्ष्योदय सङ्गिना राधे निविरिय तब लथगुणा शङ्ख मुमुझा दधे ॥१६॥४१॥ ललिता-कध एद विअडमिहुण माहवीकुडङ्गन्तरिद सवृत्तम् । [ कथमेतद् विदग्धमिथुन माधवीकुान्तरित सवृत्तम् ] ॥१७०॥ वृन्दा-राधामाधवयोर्मेध्या केलिमाध्वीफमाधुरीम् । धयन्नयनभृङ्गन कस्तृप्तिमधिगच्छति ॥१७१॥४॥ ललिता-हला, एदे गलन्तमरन्दपि माहवीपुप्फसदोह मुक्तिअ फोस भिङ्गा पुवाहिमूह धामन्ति ? [ सखि, एते गलन्मरन्दमपि माधवीपुष्प- सदोह मुक्त्वा कस्माभृङ्गा पूर्वाभिमुख धावन्ति ? ] ॥१७२॥ वृन्दा-सखि, विमुच्य माधवीमण्डप नागरमण्डलोसिौ प्रस्थितो , । वृन्दा-( हंसकर ) राधे । निरन्तर आनन्दाश्रुओ के बहने से तुम्हारे नेत्र अजनशून्य हो गए हैं एव स्वेद के द्वारा विलेपन धुल जाने से उरोजद्वय फुङ्ग म रहित हो गए हैं। तुम्हारा वक्ष स्थल योग (सङ्ग) के लिये उत्क- ण्ठित हो रहा है, अतएव हे सखि । ऐसा ज्ञात होता है योगसिद्धी देखकर स्खलितगुणा नीवि भी मुक्ति लाभ करने की इच्छा कर रही है ।१६६।४१ ललिता-यह विदग्ध-सम्पत्ति माधवी कुञ्ज मे क्यों चली गई है। वृन्दा-श्रीराधा माधव की विशुद्ध केलि माधुरी मास्वादन कर किसके नेत्र-मधुकर परितृप्त होते हैं । ॥१७॥४२ ललिता-हे सखि । गलित मकरन्दशाली माधवी पुष्पो को परि- स्यागकर मधुकरसमूह पूर्वदिशा म क्यो भाग रहे हैं? ॥१७२।। धृन्दा-सखि । नागरवृन्द-शिरोमणि श्री धीराधा-माधव माधवी मण्डप को छोडकर चल गये हैं, उनकी अङ्ग सौरम को प्राप्त कर भ्रमरगण *श्रीविदग्घमाधव नाटक अङ्क-७* [ ३२३ तयोरामोदमनुसपंन्ता पटूपदा घायर्यात, तदेहि, लतामदिरालोकनेन नन्द- यावश्चक्षुपी । (इति परिक्रम्य) ललिते पश्य पश्य ॥१७३।। मनोहारी हारस्वलितमणिभिस्तारतरल परिम्लायन्माल्यो मिलितपुरटालकृतिकण । अय कुञ्जस्तल्पोकृतकुसुमपुञ्जप्रणयवान् समन्तादुत्त ङ्ग पिशुनयनि रङ्ग मुरमिद ॥१७४।।४३॥ ललिता-(निपुण निरूप्य सस्कृतेन) कृष्णाङ्गसगममिल सृणाङ्गरागा राधापदस्खलदलतकरक्तपार्था । सिदूरबिन्दुचितधर्मजलोक्षितेय दूना धिनोति नयने मम पुष्पशय्या ।।१७।।४।। वृन्दा-( सविस्मयम् ) चिक्रीड या रजसि रञ्जितसूत्रनद्ध- गोकर्णमानचिकुरा नवविद्धकर्णा । भाग रहे हैं । यतएव आओ, लता मदिर को देखकर नेत्रो को आनन्दित कर । (यह कह घूम कर) ललिते देख, देख-॥१७३।। इस पुष्पराज की शय्या युक्त कुज मे हारो के मनोहर मुक्ता बिखरे पड हैं स्वण भुषणो के कगो के फैल जाने से पुष्प म्लान हो रहे हैं इससे जान पडता है श्रीमुरारि ने यहा अति उच्च विलास किया है ॥१७४।४५ तसिता--(ध्यानपूर्वक देखकर ) आहा । श्रीकृष्ण-अङ्ग सङ्गम में अङ्गराग कुसुमो से मिलित, श्रीराधा के चरण कमलो से छूटे अलता से रगो हई तथा स्वेद जल से गाढो हुई सिद्दर को देलियोयुक्त यह शप्या हमारे नेत्रो का सुख विधान कर रही है ।।१७।।४४ वृदा-(विस्मय सहित) माहा रशीन सूत्र से एक बालिश्त भर के केश वाध हुए जो अभी धूलि मे ही खेलती है जिसके कान अभी विधे गए 1 * श्रीविदग्यमाधव-नाटक अङ्क-७* सेयं कुतः प्रवरविभ्रमझौशलानि राघाध्यगोष्ट वत वैरनितं जिगाय ॥१७६॥४५।। ललिता-(पूर्वतः प्रेक्ष्य ) वुन्दे, पेक्ष, णादिदूरे सराहो माहयो । ! वृन्दे, पश्य नातिदूरे सराघो माधयः ] ॥१७७|| वृन्दा-शृणुवः किमाह ॥१७॥ ( नेपथ्ये) श्रीराधा-(संस्कृतेन) कुरु कुवलयं कर्णोत्सङ्ग लवङ्गममङ्ग र विकिर चिकरस्यान्तर्मल्लीस्रज क्षिप वक्षसि । अनघ जघने कादम्बी मे प्रलम्बय मेखला कलयतु न मामालीवृन्वं हरे निरलंकृतिम् ॥१७६।४६।। वृन्दा-(स्मितं कृत्वा) । हैं, उस श्रीराधा ने किससे यह उत्कृष्ट विभ्रम-कौशल सीखा है ? जिससे अजित श्रीकृष्ण को भी उसने आज पराजित कर दिया है ।।१७६।४५ ललिता-(पूर्व दिशा की ओर देखकर ) वृन्दे ! वे श्रीराधा-माधव निकट ही विद्यमान है ।।१७।। वृन्दा-आओ सुनें, क्या कह रहे हैं ।।१७८॥ [ वेशगृह में ] मीराधा-हे अनघ ! हे हरे ! मेरे कानों में कुण्डल सजा दो, केशों में बखण्डित लवंग, वक्षःस्थल में मोतियों की माला एवं कटि देश में कदाव पुष्पों को मेखला अर्पण कीजिए, ताकि ससिजन मुझे अलंकारों से रहित न देख पावें ॥१७६४६ वृन्दा-हिंसकर) आहा ! जिनके शरीर पर मंजीठ की तरह लाल रंग के अति सूक्ष्म सूत्राकार नख-चिन्ह स्पष्ट रूप से दीख रहे हैं, क्रीड़ा के [ ३२३ *श्रोविदग्पमाघव-नाटक अङ्क-७ * घहन्ती मञ्जिष्ठाणिततनुसूत्रोज्ज्वलरचो- नखाडाखेलोमिस्खलितशिखिपक्षावतिरियम् । स्फुरत्मक्तातुल्यरलघुघनधर्माम्बुभिरत समुद्धा मे मेघा मधुमथनमूर्तिमंदयति ॥१८०॥४७॥ (ततः प्रविशति कृष्णः, प्रसाधिताङ्गी राधा व ) श्रीकृष्ण:- नीत पुनरुततां भ्रमरकैः कस्तूरिकापत्रक नेत्राभ्यां विफलीकृत कुवलयद्वन्द्व च कर्णापितम् । हारश्च स्मितकान्तिभङ्गिभिरलं पिष्टानुपेषीकृत. किं राधे तव मण्डनेन नितरामङ्गरसि धोतिता ॥१८॥४८ उभे- उपमृत्य ) सुन्दर इद परममजुल वासन्तीकुसुममण्डनम् ॥ श्रीकृष्ण;-(स्तवकद्वन्द्वमादाय सहपंम् ) प्येवेन मुक्तवृन्दस्य काम्यमाना मुहमंया । मुक्ता त्वमतिमुक्तानां घेण्या सुश्रोणि सेषितुम् ॥१८३||४ कारण जिनका मोर-पुच्छ स्खलित हो गया है एव जिनके शरीर पर उज्ज्वल मोतियो को भाति अनेक स्वेद बिन्दु चमक रहे हैं, उन श्रीकृष्ण की मधुर- मूर्ति मेरी बुद्धि को मूचित कर रही है ।।१८०1४७ ( तब श्रीकृष्ण अलकृत श्रीराधा के सग प्रवेश करते हैं) धोकृष्ण-हे गधे । तुम्हारे मस्तक पूर अलकावली से तुम्हारी कस्तूरिका-विन्दु ढल जाने से व्यथ सी हो रही है, कानो मे पहिरे हुए कुण्डलो को तुम्हारे दोनो नेत्र विफल कर रहे हैं, आपकी मुस्कराहट रूपो मणि शोभा से गसे का हार चूर-चूर होकर निष्प्रभ सा हो रहा है । अतः हे प्रिये ( तुम्हारे इन अलकारों के धारण करने का क्या प्रयोजन -समस्त अङ्गो से ही आप बाश्चर्यमयी योमा विस्तार कर रही हैं ||१८॥४८ वृन्दा-ललिता-(निकट आकर ) हे सुन्दर | यह लो परम मनो- हर माधवो पुष्प गुच्छ को ॥१८२॥ धोकृष्ण-(स्तवको को ग्रहणपूर्वाक हर्ष सहित ) हे सुश्रीणि । सब मुक्तपुरुष मुझको सेवन करते हैं, वहो मैं बारम्बार प्रार्थना कर रहा हूँ कि
३२६ ।
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७
(इति राघामवतंसयति)
( नेपथ्ये)
अनुपरमति यामे काममहस्तृतीये
जलदसमयलक्ष्मीयौवनोज्जम्भरणेऽद्य ।
नवयवसकदम्बैस्तपितानां कदम्बं
फलयति सुरभीणां गोकुलायाभिमुख्यम् ।।१८४।५०'।
ललिता-राहे ! अगुजाणेहि। रत्तिमण्डनत्यं दुल्लहं बसन्तकुसुमं
गहिस्सम् । [ राधे, अनुजानीहि । रात्रिमण्डनार्थ दुर्लभं वसन्तकुसुमं ग्रहो-
ष्यामि ] ( इ'त निष्क्रान्ता ) ॥१८॥
श्रीकृष्ण:-(स्मित्वा जनान्तिकम् ) वृन्दे ! किचिद्विनोदं विधातु-
कामोऽस्मि , तदत्र प्रियायाः प्रत्यायितेयं पुरो द्रमाधिरूढा फक्खटा त्वया
मत्पक्षपाहिणि क्रियताम् ।।१८६।।
वृन्दा-भवतु । यतिष्ये ॥१८७॥
,
इस माधवी पुष्प-गुच्छ सनूह को आप सेवन करो। यह कहकर श्रीराधा के
कानों में उन्हें अर्पण कर देते है ) ॥१८॥४६॥
[ वेशगृह से आवाज आती है ]
आज अभी दिन का तृतीय प्रहर नही वोता है कि वर्षा ऋतु की
गाढ़ शोभा छा जाने से नवीन तृण समूह सुरभीगण तृप्त हो गई है और
गोकुल की ओर जा रही हैं ।।१८४॥५०॥
ललिता-राधे माज्ञा दीजिये, मैं रात्रि के अलंकारों के लिए सव
दुर्लभ वसन्त कुसुम अभी लाऊंगी। (यह कहकर चली जाती है ) ॥१८॥
श्रीकृष्ण-(मुस्कराते हुए हाथ की ओट में ) वृन्दे ! मैं किश्चित्
क्रीड़ा करना चाहता हूँ । इसलिये तुम आगे जाकर वृक्ष पर बैठी उस
कक्वटी वन्दरी को, जो प्रियतमा का पक्ष ले रही है, मेरी पक्षपातिनि
करो॥१८॥
वृन्दा -ऐसा ही होगा, मैं यत्न करूगी ॥१७॥
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७
[ ३२७
श्रीकृष्ण:-( राधामवेक्ष्य ) प्रिये चन्द्रा- ( इत्ययॊक्त कृत्रिमसंभ्रम
नाटयति ) ॥१८॥
श्रीराधिका:-( सखेदम् ) हद्धी हद्धी , कधं एवं सुणन्त विण मे
फुडिदं कण्णजुअलम् । । हा धिक् हा धिक् , कयमेवं शृण्वदपि न मे स्फु-
टितं कर्णयुगलम् ] ॥१८॥
वृन्दा-(स्वगतम् ) पिच्छिकाभ्रमणेन करखटिकामुन्माध हरेरभीष्टं
स्याहारयिष्ये । ( इत्यलक्षितं तया कृत्वा प्रकाशम् ) सखि, रङ्ग मा भज
मुख्यम् ॥१०॥
श्रीकृष्ण:-प्रिये चन्द्रानने, किमित्यकाण्डे विमनस्कासि? ॥१६॥
( नेपथ्ये )
सामिगो इनिणा तुज्य मुतणेग ललिदा ण जीविस्सदि[स्वामिनि!
अनेन तव मुग्धत्वेन ललिता न जीविष्यात 1 ॥१२॥
श्रीकृष्ण-(श्रीराधा को देखकर ) प्रिये चन्द्रा ( इतना
आधा वाक्य कहकर बनावटी भय प्रकाशित करते है ) ॥१८॥
श्रीराधिका-( दुख पूर्वक ) हाय धिक्कार ! धिक्कार । यह सुनकर
मेरे कान क्यों न फट गए ॥१८६।।
वृन्दा-(मन में ) मोरपुच्छ का चामर ढुलाकर इस बन्दरी को
मैं लुब्ध करूंगी और श्रीकृष्ण के अभीष्ट वचन कहूगी। ( यह कहकर छिप
कर वैसा करते हुए स्पष्ट कहती है ) सखि राधे ! रङ्ग में भङ्ग मत डालो ।।
श्रीकृष्ण-प्रिये चन्द्रानने ! बिना कारण खिन्न क्यों हो रही हो ॥१९१
( वेशगृह से यावाज आती है।
हे स्वामिनि ! तुम्हारे इस मुग्वत्व मे ललिता जीवित न रह
पायेगी ॥१९॥
३२८ ] * श्रीविदधमाधव नाटक अङ्क-७*
श्रीराधिका:--( अवमालोक्य स्वगतम् ) गोसंदेहम्हि किदा कक्स-
डिआए (प्रकाशम् ) पण्ड क्खु कुलिसविष्फूजिदं कधं डिण्डिमाडम्बरेण
सवरणिलं होदु ? [ निःसन्देहास्मि कृता कक्खटिकया। प्रचण्डं खलु कुलिश-
विस्फूजितं कथं डिण्डिमाहम्बरेण संवरणीयं भवतु ? ]. ( इति- परामुखी
भवति ) ॥१३॥
श्रीकृष्णः- (अपवार्य)
समरोद्धरकामका कश्रीविजयि युगमाकुलाक्षिपद्माम् ।,
विधुरोकृतमप्यतिक धाग्ने मम राधावदनं मनो धिनोति ॥५१॥
( इति राधापटाञ्चलमुचाय) सुन्दर! मधुरेण समाप्यतां मधुविहारको
तुकम् ॥१४॥
(पुनर्नेपथ्ये)
हद्धो हद्धी, भो पउमासिक्खे दुट्ठसारसि, तुमं पिमं कडरवति । ता
बोस पराणं धारेमि । [ हा धिक् हा धिक् । भो पाशिष्ये; दुष्टसारसि,
त्वमपि मा कटाक्षयसि । तत्कस्मात्प्राणं धारयामि ] ॥१६॥
श्रीरोधिका- ऊपर की ओर देखकर मन ही मन में ) संपर्खाट
ने मुझे निःसन्देह कर दिया है । ( स्पष्ट कहती है ) वज्जाधात का प्रचण्ड
राब्द क्या डुगडुगो से दबता है ? अर्यात् है चन्द्रा-यह अर्द्ध सम्बोधन-ध्वनि
(जो बजाघात के समान, है ) हे चन्द्रानने ! -इस स्पष्ट सम्बोधन-ध्वनि
से छिन सकती है ? ( यह कहकर मुह फेर लेती हैं ) ||१||
श्रीकृष्ण-( मन मे ) जिसकी भ्रकृटि चढ़ने से कन्दर्प के धनुप की
शोभा फीकी पड़ जातो है, एवं जिसके नेत्र युगल.कमलों की शोभा को
ध्याकुल करने वाले हैं, उस श्रीराधा का क्रोध लालिमायुक्त मुख मेरे मन को
अंतिदाय आनन्द प्रदान कर रहा है । ( यह कहकर श्रीराधा का पटांचल
पकड़ते हुए) हे सुन्दरि ! इस वसन्त-विहार लोला को मधुरता से ही सगा.
पन कीजिये ॥१४॥५१॥
फिर वैशगृह से आवाज आती है ।
-धिवकार है, ओ पया को. शिष्या! तुझे धिक्कार है, तू भी मेरे
पर कटाक्ष कर रही है । मैं फिर कैमे प्राण धारण करूं? ॥१६॥
* श्रीविदग्धमाघव-नाटक अङ्क-*
[ ३२६
घोराधिका-(निशम्य सरोपमपसपंन्ती) बुन्दे ! परं केति विड-
म्बिदम्हि । ता शत्ति पारेहि रणं फवडपरिवाडाअसूत्तधारं भुअणमाराम्भि-
मुरलीसिक्खणीसकरालिआणत्तिणो कोलाकुरङ्गम् । [ वृन्दे ! पर कियद्व-
डम्बितास्मि । तद्झटिति वारयनं कपटपरिपाटीनाटक्सूत्रधारं भुवनमारार-
म्भिमुरलीशिक्षानि.शङ्क करालि कानप्त्रीक्रीडाकुरङ्गम् ] ॥१६६।।
श्रीकृष्णः-(सानन्दस्मितम् ) सखि वृन्दे! प्रसादाय राधाम् ॥१६६॥
वृन्दा-प्रिय सखि राधे ! विदग्धवधूनां मूर्धन्यासि । तदकाण्डे कठोर-
मानकाण्डेन नापसारय बल्लभकृष्णसारम् ॥१६॥
श्रीराधिको:-(बाढमवज्ञामभिनीय ) एत्य अवत्यादुण जूतम्हि ।
[ अत्रावस्थातुन युक्तास्मि ] (इति निष्क्रान्ता) ॥१६॥
श्रीकृष्णः-वृन्दे! बलीयसि रोपानले साममाध्वीकमहोपनायव । तद-
लमत्रामुयात्रया ॥२०॥
धीराधिका-(सुनकर क्रोधपूर्वक जाते हुए ) वृन्दे ! कितनी बिड-
म्वना सहन करू मैं ? यह कपट परिपाटी मय नाटक का सूत्रधार है, चौदह
भुवन में कन्दपं भगा देने वाली मुरली शिक्षा में निशंक है । दूर कर इस
करालिका-नपनीवशवर्ती क्रीड़ा मृग को ।। १९६।।
श्रीकृष्ण-(आनन्द सहित मुसकराते हुए ) सखि वृन्दे ! श्रीराधा
को प्रसन्न करो ।।१९।।
वृन्दा-प्रिय सखि राधे ! रसिक-रमणियों की शिरोमणि है तू।
फिर बिना कारण कठोर मन धारण कर कृष्णसार प्रीयतम का तिरस्कार
मकर ।।१९।।
श्रीराधिका-( अतिशय अवज्ञा को प्रकाशित करती हुई ) मेरा यहाँ
रहना ही ठीक नही है। (यह कहकर चलो जाता हैं ) ॥१९॥
श्रीकृष्ण-वृन्दे ! वलवान क्रोधाग्नि में शान्ति के वाक्यरूप मधु का
डालना और भी उसे प्रज्ज्वलित करता है, अतएव तुम्हारा पीछे जाना
उचित नही है ॥२०॥
३३० ]
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७*
वृन्दा-किमत्र युक्तम् ॥२०१॥
श्रीकृष्णः-वृन्दे, वरवणिनोवेषेण राधां साधयितुमिच्छामि । सदा
भवत्या समाधीनमध्यवसीयताम् ।।२०२।।
( वृन्दा साङ्गीकार स्मित करोति )
श्रीकृष्ण.-सखि ! गोराङ्गरागसगत वराङ्गनावेएसाधन कथमत्रा-
भिलप्स्ये ॥२०॥
(प्रविश्य)
मधुमङ्गल:-पिअवस्म । अत्यि गौरीघने तहाविहवेससामग्गी जा
पउमाए मह हत्ये समप्पिदा । [ प्रियवयस्य । अस्ति गौरीगृहे तथाविधवेष-
सामग्रो या पाया मम हस्ते समपिता' २०४i
घोकृष्ण -(सहर्षम् । वृन्दे, गौरीगृहगम्भोरिकायां भविष्यामि ।
तवात्मभगिनीमावेन समायनोयोऽहम् । (इति सवयस्यो निष्क्रान्त ) ।२०५॥
पृन्दा- फिर क्या करना उचित है ? ॥२०१॥
श्रीकृष्ण-वृन्दे ! मैं चाहता हूँ उसे मे एक सुन्दरी का रमणी वेश
पारण पर प्रसन्न करूं । इसलिये तुम वेश-रचना को सामग्रो शीघ्र ले
आमो ॥२०॥
1
[ वृन्दा सहमत होते हुए मुसकराती है ]
पोषण-ससि अङ्गों को गोर रग
बदल देने वाली मुन्दर
रमणी घेश योग्य सामग्री यहा से प्राप्त होगी? ॥२०३।।
[ मधुमङ्गल प्रवेश परता है।
मधुमङ्गल-प्रिये गये। मुदा रमणो रे येश योग सामग्री गौरी
मन्दिर में मौजूद है, जो पपी ने मुंगेर्दो यो ॥२०॥
पोरग-(हपं सहित ) वृन्दे । मैं गौरी महिर को गम्मोरिरा
(निय रस) में रदंगा। न मुझमे अपनी मांगनी या भाव हो प्रगति
करना । (यह महार मधुमास साय पने जाते हैं)॥२०॥
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ [ ३३१ - अन्दा -(परिक्रम्य दूरे दृष्टि क्षिपन्ती) चम्पकलवनबकुलान्यचिन्यत्योवंयस्ययोरत्र । स्फुटमिदमेव सलज्जं राधावृत्त निवेदयति ।।२०६॥५॥ (प्रविश्य तथाविधा राधा) थोराधिका:-सहि तदो ! अहं अणुणेई पउत्तं एवं महोरिज एट्स पत्तन्हि ।। सखि! ततोऽहमनुनेतुं प्रवृतनमवोर्योग प्राप्तास्मि |||२०७ti सलिता-राहे ण पषु तुमम्हि कण्हस्म गोत्तक्सलिदं सिविणे नि संमाविअदि । ता पइदिपमत्तारणं पसरणं पलावे किदवोसम्भा तुम वश्विदासि । । राधे, न खलु त्वयि कृष्णस्य गोत्रस्खलितं स्वप्नेऽपि सभाव्यते । तत्प्रकृति- प्रमत्तानां पशूनां प्रलापे कृतविश्रम्भा व वञ्चितासि ] ॥२०८।। विशाखा-हदी हद्धी । ललिदे ! पेक्ख अन्ज सोहागपूण्णिमाहे आर- खसंघरिसा लिणो पडिवखा। ता विडम्बिदा म्ह देवेणा [ हा धिक हा धिक् । ललिते! पश्याद्य सौभाग्यपूर्णिमाहे आरब्धसघर्षा वलिनः प्रतिपक्षा । वस्माद्विडम्बिताः स्मो देवेन ] ॥२०६।। वृन्दा-(धूमकर दूर तक देखती है ) वहा श्रीराधा चम्पक, लवंग, बकुल पुष्प चुनती हुई ललिता-विशाखा इन अपनी दोनो सखियों को नज्जापूर्वक यह वृत्तान्त खोलकर कह रही है ।।२०६॥ [ उसी अवस्था मे श्रीराधा प्रवेश करती हैं ] धीराधिका-सखि ! उसके बाद श्रीकृष्ण मेरी बहुत अनुनय करने लगे, परन्तु मैं उनकी अवज्ञा कर यहा चली आई हूँ ॥२०७।। ललिता-राधे! तुम्हारे प्रति श्रीकृष्ण का गोतस्खलन (अन्य नामो. लेख से अाह्वान करना) स्वप्ने मे भी सम्भव नही है। इसलिये तुम स्वा- भाविक मत्त पशुओ के प्रलाप मे विश्वास कर वञ्चित हुई हो ॥२०॥ विशाखा-धिक्कार है, धिक्कार, ललिते ! देख बाज सौभाग्य पूर्णिमा के दिन विपक्षियो मे कृष्ण प्राप्ति का सौभाग्य उदय होने से ये बल- वान हो उठी हैं, इसलिए हम तो देव से ही वञ्चित की गई हैं ॥२०६।।
*श्रीविदग्घमाधव-नाटक अड्ड-७
ललिता-विसाहे. सई कहेसि । एत्य महसचे जइ अम्हाणं मुहमा-
तिसं सवत्तीओ पेक्सिस्सन्ति, तदो सोल्लुण्ठ कटखन्तीओ हस्सिस्सन्ति।
[विकासे सत्य कथयसि । अन्त महोत्सवे यद्यस्माकं मुन्वमालिन्यं सपल्यः
प्रेक्षिष्यन्ति, तदा सोल्लुण्ठं कटाक्षयन्त्यो हसिष्यन्ति ] ॥२१०॥
श्रीराधिका-(स्वगतम् ) साहु सहिओ मन्तैन्ति । ता कि एस्थ
सेरणम् । [ साधु सख्यो मन्त्रयन्ति । तकिमत्र शरणम्? J॥२११।।
वृन्दा-( उपसत्य ) ललिते ! रामानुजस्य निदेशेन राममुपनेतुं
स्थितास्मि ॥२१२॥
।
--
ललिता-विति। 1 किमिति ? ] ॥२१३।।
वृन्दा-वसन्तश्रीदर्शनाय ॥२१४॥
विशाखा-सहि बुन्दे ! वखरणं विलम्पिा कुण संधिम् । [ सखि वृन्द!
'क्षणं विलम्ब्य कुरु संघिम् ] ||२१५॥
वृन्दा-सत्य जानीहि मया दुष्करोऽद्य संधिः ॥२१॥
ललिता--विशासे ! सच कहती है तू। आज सौभाग्य पूर्णिमा क
महोत्सव पर यदि विपक्षिणी हमारे मुख मालिन्यको देखेंगो, तो ये भी हमारे
*कार परिहासपूर्वक कटाक्ष करते हुए मजाक उड़ायगो 1॥२१०।।
घोराधिका( मन ही मन मे ) ठीक कहती हैं ससीगण । पर अब
उराय यया है ? ॥२१॥
वृत्वा (निकट आयर ) ललित ! रामानुज ( श्रीकृष्ण ) को आशा
से राम को लेने जा रही हूं।२९२।।
मलिता-विरा लिए? ॥२१३।।
यदा-बसन्त गोमा देखने के लिये ॥२१॥
पिशासा-वोडो देर रसे, मिलाप करा दो ॥२१॥
पृन्दा-सरप समाना मेरे द्वारा आज यह मिलाप न होगा ।।२१६॥
विजापा-यह पयों? ॥२१॥
*श्रोविदग्घमाधव-नाटक अस्-७* विशाखा-फघं विम? [ कथमिव ? ] ॥२१॥ वृन्दा-पृच्छयतामात्मसखी! ययाद्य दुरुक्तिभिरपरञ्जित: कोंक्षणः ।। श्रीराधिका-(नि श्वस्य ) हला बुन्दे | तुम गदो। [हला वृन्दे। त्वमेव गतिः] ॥२१६।। वृन्दा--(सध्याजरोपम् ) असमा चण्डाली हृवि पदमिता चण्डि विविशु- नं याचस्ते पच्या. थुतिप्सरणिसोमाञ्चलमपि । इदानीमौदास्य यशगमदिराक्षीततिरगा- मुकुन्दो निर्द्वन्द्वोभव सखि मुधा नि श्वसिसि किम् ॥५३।। ललिता-हला ! कहि सो मखु मोहणो ? [हला ! कुत्र स खलु मोहन ? ] ॥२२॥ वृन्दा-गौरीसनि ॥२२२॥ ललिता—कि फरोदि ? [किं करोति ] ॥२२३।। वृन्दा-अपनी सखी से पूछ, जिसने आज कठोर शब्दो से कमल- लोचन (श्रीकृष्ण) का तिरस्कार किया है ।।२१८।। श्रीराधिका-(निश्वास छोडते हुए) सखि वृन्दे । तुम ही मेरा एक माय आसरा हो ॥२१॥ वृन्दा-(छल पूर्वक क्रोध सहित ) हे क्रोधनि । तुम्हारे हृदय मे असूया चण्डालिनी ने प्रवेश कर लिया है, हितकारी वचनो को कानो के अचल तक जाने ही नहीं देती हो । इस समय श्रीकृष्ण भी खञ्जनाक्षि (चन्द्रा- वली आदिक रमणियो के वशीभूत हो रहे है । अत उन्होने भी तुम्हारे प्रति उदसीनता (उपेक्षा) प्रकट की है। इसलिये हे राधे । अब लम्बे सांस छोडने से क्या होता है ? निविरोध होकर रही आओ ॥२२०॥ ललिता-ससि इस समय वे कहा है मोहन ? ॥२२॥ वृन्दा-गोरी मन्दिर मे।।२२२॥ ललिता-क्या कह रहे हैं ? ॥२२३।।
३३४ ] * श्रीविदधमाधव नाटक अक-७ * वृन्दा-निकुञ्जविद्यया साध गोष्ठी तनोति ॥२२४।। तिस्रः-सहि का क्खु णिउञ्जविज्जा । [ सखि ! का खलु निकुञ्ज- विद्या ] ||२२५॥ कथय वृन्दा-(स्फुटं विहस्य) अहो मौग्घ्यं किशोरीणां यदमूरतिप्रसिद्धामपि निकुजवियो न विदन्ति ।।२२६॥ तित्रा-(सलज्जम्) सहि, कधेहि सच । जाणीम्हें । [ सखि, सत्यम् । न जानीमः ] ||२२७॥ वृन्दा-हन्त भो विशुद्धाः, का नाम सा गोकुले बल्लववालिकास्ति या खलु स्वसारं मे भाण्डीरदेवता न जानीते ॥२ नलिता-वुये ! बेहि तुम मन्तं जेण एवं वैसम्म सुहोदक्क भवे। [ पृन्दे ! देहि त्वं मन्त्रं येनेदं वैषम्यं सुखोदकं भवेद | ॥२२ वृन्दा-सखि ! गोकुलानन्दनिगूढविनम्भमणिमञ्ज घेर्य निकुञ्जविधा। तदेना भजेम ॥२३०॥ वृन्दा-निकुञ्जविद्या के साथ बात-चीत कर रहे हैं ।।२२४॥ ललिता-विशाखा एवं राधा-सखि ! निकुञ्जविद्या कौन ? ॥२२५॥ वृन्दा-(जोर से हंसकर) अहो ! कैसी है इन शिरोमणियों की मुंग्यता? जो अति प्रसिद्ध निविद्या को नहीं जानतीं ॥२२६॥ तीनों-(ललित होकर ) सच कहा हम नहीं जानती हैं उसे ।। न्वा-सा आश्चर्य है, तुम सरल स्वभावा गोकुल-रमणियों पर ! जो तुम मेरी यन भाष्ठीरवन के देवता को नहीं जानती हो ।।२२८।। पसिता-वृन्दे ! तुम ही सलाह दी, जिससे हमारी यह विषमता मागे पल सुखदायी हो ॥२२६।। पृदा-राति ! यह निफुलविद्या गोकुलानन्द (कृष्ण) को विगूढ विश्वस्त मणि-पिटारी है, उसी का हम लॅगो मारारा ।।२३०॥ !
*श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्ग-७ * [ ३३५ ( इति सर्वाः परिकामन्ति) श्रीराधिका-बुन्दे ! एवं बे गौरीमण्डवम् । ता एत्य परिसिम सणाए कड्ड णिविज्जम् । [ वृन्दे ! इदमेव गौरीगण्डपम् । तदन प्रविश्यं सज्ञयाकर्ष निकुजविद्या ॥२३॥ वृन्दा--( कृतोग्द्रीविकमालोक्य स्वगतम् ) हन्त! गौरीमिव किशोरी द्वारि पश्यामि । (प्रकाशम् ) सख्यः केवलमेकात्र भाण्डीरदेवतंत्र शिखण्डेन कुण्डले कुर्वतो वर्तते ॥२३२।। तिस्रः-असञ्चससिणि ! चिट्ठ चिट्ठ । जे एसो ताण्डविअसिहण्डी पंगणे चिट्ठदि। ( असत्यशसिनि ! तिष्ठ तिष्ठ । यदेपस्ताण्डविकशिखण्डी प्राङ्गरो तिष्ठति ] ॥२३३।। वृन्दा-हन्त भो दाक्षिण्यशून्या:! स्वयमागत्य समीक्ष्यताम् । किमना- नुमानेन ॥२३॥ ललिता-हला ! फुड तन्द्राउलदा चन्दइणो जादा जं णिकमन्तो [ यह कहकर सब चली जाती हैं ] श्रीराधिका-वृन्दे ! यह रहा गौरी-मण्डप, इसमे जाकर इशारे से बुला ला निकुञ्जविद्या को ।।२३१।। वृन्दा-(गर्दन उठाकर देखती हुई मन ही मन मे) बाहा । गौरी को भाति ही श्रीकृष्ण को किशोरी देख रही हूँ। (स्पष्ट कहती है) हे सखियो। यहा तो केवल एक माण्डीर देवता हो मोरपुच्छ द्वारा अलकृत होकर विराज- मान है ॥२३२॥ तीनो-ओ मिथ्यावादिनि ! ठहर जा, ठहर, यह तो नृत्यकारी मोर प्राङ्गण मे बंठा है ।।२३३॥ वृन्दा-बड़ा आश्चर्य है ! ओहो, तुम में कुछ भी चतुरता या मनन पोलता नही है। स्वयं आकर देखोन, अनुमान मान करने का यहा पा प्रयोजन ? ॥२३४॥ ललिता-सखि ! यह स्पष्ट है कि यहा जव कृष्णचन्द्र गए हैं, तर ३३६ ] *श्रीविदाधमाधव-नाटक अङ्क-७ * चन्दअमउली इमिणा ण लपिवदो। [हला! स्फुटं तन्द्राकुलता चन्द्रकिणी जाता यनिष्क्रमन् चन्द्र कमोलिरनेन न लक्षितः। ] ॥२३॥ श्रीराधिका-हला! घरं पविसिम पिउजविज्ज पूछम्ह । [ हला गृहं प्रविश्य निकुंजविद्यां पृच्छामः ] ।।२३६॥ ( इति सर्वाः प्रवेशं नाटयन्ति ) (प्रविश्य) जटिला-भगिदम्हि पेम्मेण पउमाए-अन्ले जटिले, विट्ठिआ घडसि । गोड्डको विज तुम्ह पुत्तो वि गोकोडोसरो हुविस्सदि । जं दि8 मए अज गौरीतित्ये राहिए गोरो माराहीअदिति तागदुअ यहूडिह आसिसाहिं यह यिम्सम् । ( इति परिक्रम्य रङ्गणीमङ्गने दृष्ट्वा सानन्दम् । साहु पउमे, साहु । असञ्चभासिणी णासि । पुननिभाल्य सखेदए ) हद्धी हदी। कह गौरीसिंहस्स सिरे तण्डविओ चिट्ठा । हा परावटिम पुत्त माणिसम् । [ भणितास्मि प्रेम्णा पाया-'आर्य जटिले, दिप्ल्या वधंसे । गोवर्धन इव तय पुरोऽपि गोकोटीश्वरो भविष्यति । यदृष्टं मयाद्य गौरोतीर्थे राधया गोर्या- राध्यते' इति । तद्गत्वा वधूमाशोभिवंधयिष्यामि । साधु पये, साधु । असत्य- इस मोर को झपको लग रही थी, जिससे यह उन्हें नहीं देख पाया है ।।२३५ घोराधिका-ससि ! अन्दर चलकर निकुञ्जविद्या से पू । (इस कार कहकर सब अन्दर प्रवेश करती हैं ) ॥२३॥ (इतने में जटिला प्रवेश करती है ) जरिता-पमा ने प्रेमवा मुझसे कहा-बायें जटिले ! भाग्यवरा तुम ममृदियान हो गई हो । भर गोपन की भांति तुम्हारा पुत्र अभिमन्यु भी फोटि गोलो या अधिति बन जायेगा । ययोकि मैंने देखा है गौरोती पर श्रीराधा गौरी या आरापना कर रही है । तब पसी बहु-राधा को भाशोर्याद देकर मगृत करेंगी। (यह पहफार वहां पली जाती है। और यही रक्षिणी हरिणी यो देशपर आनन्दित होकर बहती है ) ठीक है पपे ! टोक महा है। तूने । तुमने नूठ नहीं महा । (फिर ध्यानपूर्वक देवार दुगराहिल) हाय ! पिसार ! गोरी-गिह में सिर पर नृलमारी मोर बैठा है प हो पारस *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* [३३७ मापिणी नाति । हा धिक् हा धिक् । कथं गौरीसिंहस्य शिरसि ताण्डविक- स्तिष्ठति ? तत्परावृत्य पुत्रमानेष्यामि ] ( इति पावन्ती निष्क्रान्ता)। श्रीराधिका-( जनान्तिकम् ) सहीओ ! पेक्खघ लोओत्तरं किंपि गौरीए सौन्दरिम् [ सस्यः ! प्रेक्षध्वं लोकोत्तर किमपि गोर्याः सौन्दर्यम् ।। सख्यो-हला ! सच सच्चम् । ठाणे कण्हस्स पेम्मवीसम्भसंभाविदा एसा । [हला! सत्यं सत्यम् । स्थाने कृष्णस्य प्रेमविधम्भसंभावितपा] ॥ श्रोराधिका-रणं अदिठ्ठपूव्वं संभासिद्ससंभमम्हि । [ एनामदृष्ट- पूर्वी संभापितु ससंभ्रमास्मि 1 ( इत्यपत्रपां नाटयति ) ॥२४०।। ( नेपथ्ये) पामि वृन्दे, नूनं राध्या नाहं परिचोये मया तु सहश्रधेयमनुनय- मानास्ति ॥२४१॥ वृन्दा-(स्वगतम् ) चित्रं चित्रम्, साक्षादङ्गनाकण्ठध्वनिरेवायम् ।। जाकर पुत अभिमन्यु को ले आती हूँ। कृष्ण सङ्गिनी वधू-राधा को उसे दिखाऊँगी । ( यह कहकर दौड़ी चली जाती है ) ॥२३॥ घोराधिका-(धीरे से कान मे) हे सखियो ! देखो तो गौरीतीर्थ का कैसा मलौकिक सौन्दर्य है ? ॥२३८।। सखीगण-राधे! सत्य है सत्य, कृष्ण-प्रेमका इस प्रकार सौन्दर्य उप- युक्त ही है ।।२३।। धीराधिका-इसे तो मैंने कमी नहीं देखा, अतः इसके साथ घोलने में शर्म सी बाती है। (इस प्रकार कहकर निर्लज्जता प्रकाश करती है ) ॥२४॥ [ वेशगृह से यावाज आतो है ] वृन्दे ! मैं तो जा रही हूं, धीराधा मुझे जानती ही नहीं है, किन्तु भने तो इसे हजारों वार देखा है ।।१४॥ वृन्दा-(मन में ) अति चमत्कार ! यह तो साक्षात् स्त्रियों की सी कण्ठ ध्वनि है ।।२४२॥
३३८ । * श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क श्रीराधिको -बुन्दे ण जाणे कोस पसह णिउविजाए सिणिज्झदि मे हिमअम् । [ वृन्दे, न जाने कस्मात्प्रसम निकुञ्जविद्यायो स्निह्यति मे हृदयम् ] ॥२४३॥ वृन्दा-सखि । तत्त्व जाने। न चित्रमिद पदसावपि चिर त्वय्यनुर- जयति ।।२४४॥ । श्रीराधिका-(सानन्दमनुसृत्य ) हला, गिउञ्जविज, कहि सो तुह णिउञ्जणाअरो' [ हला । निकुञ्जविद्य, कुत्र स तव निकुञ्जनागर ] ॥२४५ ( नेपथ्ये ) सखि । फस्त जनो जानाति । २५६।। ललिता-सहि णिउञ्जविज । म च परिहासच्छलम् । अप्पवग्गो दे अम्हारिसो जणो । [ सखि । निकुञ्जविद्य, मुञ्च परिहासच्छलम् । आत्म वर्गस्तेऽस्मादृशी जन j२४७।। ( नेपथ्ये) बाढ तस्वमविज्ञाय तप्यमान' कृशानुना। कथ शारदपद्याक्षि पारद परिलम्यते ॥२४८॥५४|| श्रीराधिका-वृन्दे। न जाने मेरा मन वरवश इस निकुञ्जविद्याके प्रति क्यों प्रेम से भरा जा रहा है ? ॥२४३।। वृन्दा-सखि । इसमें आश्चय नहीं है, मैं यथार्थ जानती हूँ कि यह निकुअविद्या भी तुमसे अनेक दिन से प्रेम करती है । २४४॥ थोराधिका-(आनन्दपूवक निकट जाकर ) ससि निकुञ्जविद्य । तुम्हारा निकुञ्ज-नागर कहा है ? ॥२४॥ [ वेशगृह से आवाज आती है ] -ससि । उसे कौन जानता है ? ॥२४॥ मलिता-रासि निकुञ्जविद्य ! परिहास-छन छोटो , हम सब तुम्हारी भपनी ही हैं ॥२४॥ [ वेशगृह से आवाज आती है । है शारदीय पमलनयने । तुम निगूढ तत्व को न जानार मान-अग्नि *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* २१ i .- वृन्दा-( जनान्तिकम्।) स्मेरा कपोलपाली शंसति दूत्यं निकुजविद्यायाः । राधे मृदुलय तदिमां स्नेहेनाम्यज्य भव्येन ॥२४६॥५५॥ श्रीराधिका-हला णिजदिज्जे । कोस वुन्देव 'गाणुबन्धसि सिणेहबन्धम् ? [ हेला निकै अविद्ये ! कस्मादन्व नानुबन्धासि स्नेह बन्धम् ] ॥२५॥ (नेपथ्ये ) विधिः पद्म पादौ नवकर्दलिंक सक्थियुगलं मृणाले दोर्द्वन्द्व तव शशिनमापाद्य वंदनम् । मृदूनामोंनां न फटिनमवष्टम्मकमृते स्थितिः स्यादित्यन्तयधित हृदयं नूनमशनिम् ।।२५११॥५६॥ श्रीरांधिका-बुन्दे ! ये माणुरामहासं परिहसिजामि पिउनयि- में दग्ध हो रही हो, पारद को क्यों उपलब्ध कर पाओगी। -अर्थात् उत्तम प्यक्ति को पारद (पारा) से लाभ नहीं होती ॥२४८॥५४॥ वृन्दा-(हाथ की ओट करके) मृदु-मुस्कानयुक्त कपोल स्थल निकुज विद्या के दूत्यकार्य को सूचना दे रहे हैं, अतएव हे राधे ! मङ्गलरूप स्नेह सहित प्रार्थना पूर्वक इसकी कोमलता सम्पादन कर ॥२४६॥५॥ श्रीराधिका-सखि निकुजविद्य! वृन्दा की तरह तू हमसे क्यों नहीं स्नेह-बन्धन जोड रही है ? ॥२oll [ वेशगृह से आवाज आती है ] हे राधे ! विधाता ने कमल द्वारा तुम्हारे चरण, नवीन कदली से तुम्हारे करुयुगल, मृणाल से दोनो मुबाएं समा चन्द्र से तुम्हारे मुख निर्माण करने के बाद यह अनुभव किया कि कोमल पदार्थ कठोर वस्तु या सहयोग लिये बिना स्थिर नहीं रह सकते, बतएव हे समि! जान पड़ता है उसने इसलिए तुम्हारे हाय को वब से ही निर्माण किया है 1-४६ थौराधिका-वृन्दै ! देस इसको सानुराग मुसकराहट । निक- ३४० ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क- * माए । ता गदुअमिलिस्सम् । [ द्वन्दे ! पश्य सानुरागहासं परिहस्ये निकु- अविद्यया । तद्गत्वा मिलिप्यामि ] ( इति निष्क्रान्ता) ॥२५२।। वृन्दा-गोकुलरामाप्रेयसि निकुजविद्य कठोरघोस्त्वमसि । यत्प्रवणामपि पुरतः परिरभ्य सखी न रंजयसि ॥२५॥५७|| विशाखा-~इसं राही णिउजविलं परिद्ध भुलवल्ली उल्लासेन्ती पैम्मवीसद्ध जप्पदि । । इय राधिका निकुञ्जविद्यां परिरब्धं भुजवल्ल मु- ल्लासयन्तो प्रेमविश्रब्ध जल्पति ] ( नेपथ्ये) हला माण्डीरदेअदे, पेश्ख । गोउलपवेमवेला पञ्चासीअदि , ता कारिजउ अम्हेसु लीलारङ्गसंगमिदो कण्हस्स पसाओ । [ हला भाण्डीरदेवते! पक्ष्य । गोकुलप्रवेशवेला प्रत्यासीदति, तत्कायंतातूर्णमस्मासु लीलारंगसङ्ग- मितः कृष्णस्य प्रसादः ] ॥२५४।। ललिता-बुन्दे ! एसा तुझ वहिणी राहिलं परिरम्भिा चुम्बदि । । वृन्दे ! एषा तव भगिनी राधिका परिरम्य चुम्बति ] ॥२५५।। विशाखा-( सशकम् ) दिट्ठा जिल्लजिआए तुम पिउजविजाए विद्या मेरा परिहास कर रही है। इसलिए अब इससे जाकर मिलती हूँ। (यह कहकर चली जाती हैं )।२५२।। वृन्दा-( हंसते हुए ) हे गोकुलरमणियों की प्रियेतमे निकुजविद्य! तू बड़ी कठोर युद्धि है । नम्र-स्वभावा राधा तुम्हें आलिंगन करने के लिए आ रही है, और तू इसे आलिंगन द्वारा सुखी नहीं कर रही है ? ॥२५३।।५७ विशाखा-यह श्रीराधा निकुजविद्या को मालिंगन करने के लिए अपनी मुचलताओ को बढ़ाकर प्रेममय विश्वास से कह रही है-“हे सखि प्राण्डोरदयत ! देस गोकुल में जाने का समय निकट आ गया है । हमारे साग लोला-रग मग शीघ्र ही सम्पन्न कर, जिससे श्रीकृष्ण प्रसन्न हो ॥२५४ सविता-वृन्दै! यह तुम्हारी वहन प्रीराधा को आलिंगन कर पुम्बन कर रही है ॥२५॥ विज्ञासा-(सद्धा सहित ) वृन्दे ! निसंज्जा निकुजविधा में सो में *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७* [ ३४१ पुरिसघम्मतुद्धदा । ज एसा राहावक्खोरुहे णहरडू, र अप्पैदि । [ दृष्टा निलं- ज्जया तव निकुञ्जविद्यया पुरुषधर्मलुब्धता । यदेपा राधावक्षोल्हे नखराकु- रानर्पयति ] ॥२५६॥ वृन्दा-( सस्मितम् ) सखि, मान्यसूयां कृथा.1 प्रेमोत्कर्षविला- सोऽयम् ॥२५॥ ...(प्रविश्य सोत्कम्पा) श्रीराधिका-(सभ्रू भङ्गम ) बुन्दे, जुत्त जुतं अम्हेसु तुम्ह जिम्ह- तणम् । [ वृन्दे । युक्त युक्तमस्मासु तव जिह्मत्वम् ] ॥२५८।। वृन्दा-(विहस्य ) सखि ! न वेद्मि कितवाकूतम् ॥२५८।। मस्यौ-( सस्मितम् ) वुन्दे । विण्णदा दे मोहिणीभूदा पिउञ्जविता। [ वृन्दे । विज्ञाता ते माहिनोभूता निकु जविद्या । ॥२६०।। (तत प्रविशति सपुत्रा जटिला ) जटिला-बच्छा हिमण्णो । पेक्ख पङ्गणे रङ्गिणी तह तण्डपिओ वि पुरुषो के धर्म उदित हुए देखती हूँ । देखो, यह श्रीराधा के उरोजद्वय मे नखाघात कर रही है ॥२५॥ वृन्दा-(मुसकराकर ) सखि ' बुरा मत मान, यह है प्रेमोत्कर्ष का विलास ॥२७॥ { कपकपी सहित प्रवेश कर ] घोराधिका-(भ्रकुट टेढी करते हुए ) वृन्दे । ठीक है, युक्त है तुम्हारी हमारे प्रति कुटिलता ।।२५८॥ वृन्दा-(हँसकर ) सखि । मैं तुम्हारा अभिप्राय नही समझी।।२५६ ललिता-विशाखा- मुसकरावे हुए) वृन्दे ! जान लिया हमने मोहिनी स्वरूपा तुम्हारी निकु जविद्या को ।।२६०॥ [ तव वहा अभिमन्यु के साथ जटिला आती है ] मटिला-पुत्र अभिमन्यो । देश, रङ्गिणी तथा ताण्डविक मोर प्रागप में बैठे हैं ।।२६॥
। । ३४२ ] *श्रीविद धमाधव नाटक अङ्क-७* सिंहण्डो चिदि । ' वत्साभिमन्यो । पश्य प्राङ्गणे रङ्गिणी तथा ताण्डवि कोऽपि शिखण्डी तिष्ठति ] ॥२६॥ अभिमन्यु - अम्व । सच कहेसि । ज विट्ठ मए गोगोषमण्डलेग सद्ध ऐयो ज्जेय रामी गौउले इटो।। अब सत्ये केयसि । यहष्ट मया गोगोपमण्डलेन सार्धमेक एव रामो गोकुल प्रविष्ट. ] ||२६२|| जटिला- यच्छ । एसा विसारिणी कावि सोरमधारा ज्जेव्ध त साह- सिमिण एत्य कहई ।। वत्स । एषा बिसारिणी कापि सौरभ्यघाव तत् साहसिकमिथुनमत कथयसि । 1 ॥२६३॥ अभिमन्य:- अम्ब भवदीए णिदेसो विमए पडियालिदो अन्न सवृत्ती ता दाणि राहिम महुर्रापुरे इस्सम् । [ अम्ब ! भगवत्या निदेशोऽपि मया प्रतिपालितोऽद्य सवृत्तः । तदिदानी राधिका मयुरापुरे नेप्यागि ] ॥२६४।। जला-पुत्त । दिदिया। एक्कादुआर घर । ता दुभारभित्तिए लगा भविअ सुहार, पत्यावः । । पुत्र 1 दिष्टया एक द्वार गृहम् । तद्वारः मित्या लग्ना भूत्वा शृणुम प्रस्तावम् ] ( इति तथा स्थिती) ॥२६|| {प्रविश्य) अभिमाय-मा | सच बह रही हो, तभी तो मैंने देखा कि गौओ तथा गोपवालको के साथ अकेले श्रीवलराम ही आज गोकुल मे आए थे। मटिला-पुर, यहा फैली हुई सौरम-धारा पिसो एक साहसिक दम्पत्ति मी सूचना देती है ।।२३।। मभिमन्यु-'मा! आज मैंने भगवती पौर्णमासी को आज्ञा का पालन रिया है" वय यहाँ मे राधा पो मैं मथुरा ले जाऊंगा ।।२६४।। मटिला-पुन ! सौभाग्य को मात है यि हमारे घर मा एक ही दर माना है। हम दीवार के सहारे बैठकर ना प्रस्ताव को मुनते हैं (यइ रह. पर दोनों यही बैठ जाते हैं ) । २६५॥ [पीकृष्ण (रमणीयेश में) प्रवेश करते हैं) L . * श्रीविदम्बमाधव-नाटक अङ्ग-७ * । ३४३ श्रीकृष्ण -( सस्मितम् ) राधे । मास्म कार्व्हरतिदुर्लभेऽस्मिन्न प्रार्थनाम् ॥२६॥ श्रीराधिका-(सनमस्तिमू) अइ देइ ! पसीद पसीव । अयि देवि । प्रसौद प्रसीद ] IR६७॥ - ! | (गृह प्रविश्य.) - अभिमन्य. हु.,साहसिणि !-पञ्चक्ख हत्याहत्यि गहींदासि । [ है साहसिन ! प्रत्यक्ष हस्ताहस्ति गृहीतास्मि,] ॥२६८॥ श्रीकृष्ण -(स्वगतम्) हन्त ! स्वरादभिमन्युमभिज्ञाय कातरेय प्रिया यष्टिवद्भूमौ निपपात ।।२६।। जटिला-( सविस्मयमगुल्या दर्शयन्ती) वच्छ । लोओत्तरेण लाअ-- ण्णभरेण का एसा गौरीघर उज्जालेइ ? [ वत्स । लोकोत्तरेण लावण्यभरेण कैया गौरी गृहमुज्ज्वलयति ? | ॥२७॥ अभिमन्यु – (विमृश्य ) अम्ब देइ पसीद पसीद, त्ति भणिा राहीए दण्डपणामो किदोयि । ता एसा दिन्वरूपा महेससहिसी फुड पादुम्भूदा । श्रीकृष्ण--(मुसकान सहित) राधे । इस दुर्लभ विषय की प्रार्थना मत करना ॥२६६।। श्रीराधिका-(परिहास पूर्वक मन्द मुसकाते हुए ) हे देवि । प्रसन होवो, प्रसन्न होवो ।।२६७॥ अभिमन्यु-( घर मे प्रवेश कर ) हे साहसिनी | आज तुम्हें हाथो हाय पकड लिया है ॥२६८।। श्रीकृष्ण-(अपने मन में ) हाय ! आवाज से अभिमन्य को पहि- चान कर प्रियतमी व्याकुल होकर लाठी की तरह पृथ्वी पर गिर गई है ।। जटिला-(विस्मयपूर्वक अंगुली से दिखाते हुए।) पुत्र । लोकातीत लावण्य प्रभा से गौरी-गृह को किसने उज्ज्वल कर रखा है ? ॥२७॥ अभिमन्यु-विवेचना कर ) मा "देवि, प्रसीद, देवि प्रसीद" ऐसा कहते हुए श्रीराधा ही दण्डवत प्रणाम कर रही हैं मत स्पष्ट दास .
३४४ ] * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क- * [अम्ब ! देवि, प्रसीद प्रसीदेति भणित्वा राधया दण्डवत्प्रणामः कृतोऽस्ति । तदेपा दिव्यरूपा महेषमहिषी स्फुट प्रादुर्भूता ] ॥२७॥ श्रीकृष्णः- ( सहर्षमात्मगतम् ) गौरीनेपथ्यं मम सुष्ठ पथ्यं बभूव ।। सख्यो- 1- सानन्दम् ) गोवुत्तम ! तुम्हाणं अम्बेडिदेण अम्हेंहिं आरा- हिजन्ती गोरी पडिमादो गिक्कमिदा। [ गोपोत्तम ! युष्माकमा डिते. नास्माभिराराध्यमाना गौरी प्रतिमातो निष्क्रान्ता ] 1२७३॥ अभिमन्यु:-विसाहे ! कि दाणि देईपादे सुदुल्लहं राहीए भन्म- स्थदम् ? [ विशाखे ! किमिदानी देवीपादे सुदुर्लभं राधयाम्यर्थितम् ? ]॥२७४ श्रीकृष्ण. वीराभिमन्यो ! दारुणं किमपि संकटं तवोपस्थितम् । समित्तिनिय यानते ।।२७५॥ अभिमन्यु:-(सशङ्कम भअवदि ! केरिसं तम् [ भगवति 1 कोश तत] ॥२७॥ श्रीकृष्ण - वृन्दे ! तदभिव्यक्तये सकुन्त मे बचनानि । ततस्त्वया फथ्यताम् ॥२७७॥ रहा हैं कि दिव्यरूपधारिणी महेश-महिपि-गौरी आविर्भूत हो गई है ।।२७१॥ . थोकृष्ण-( आनन्दपूर्वक मन मे ) गौरीवेश धारण मेरे लिये तो यथेष्ट उपकार जनक हुआ है ॥२७२।। ललिता-विशाखा (आनन्दपूर्वक ) हे गोपोत्तम अभिमन्यो ! तुम हमारे बारम्बार बुलाने पर गौरी पूजा करने आए हो. देखो, गोरी हमारो पूजा से प्रसन्न होकर प्रतिमा से बाहर प्रत्यक्ष हो गई है ।।२७३।। अभिमन्य-विशाखे ! राधा ने देवी के चरणो में पड़कर किस दुर्लभ पर की प्रार्थना की है? ॥२४॥ श्रीकृष्ण-वीर अभिमन्यो ! तुम्हारे ऊपर जो कोई दारुण सकट या उपस्थिति हुआ है । उसको निवृति के लिए राधा प्रार्थना कर रही है ॥२७५ अभिमन्यु-(पदा सहित ) मगवति संकट बीसा,? ॥२७६।। घोकृष्ण-पृन्दे ! यह बात कहने में मेरी पाणी संयुषित हो रही है। इसलिए तुम ही पह दो ॥२७॥ 1 -- * श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ * [ ३४५ वृन्दा-मानिन्नभिमन्यो ! परश्वस्त्वं भोजेश्वरेण भैरवाय सामुप- हारीकर्तव्योऽसि ॥२७॥ नटिला--( सवैषलव्यम् ) देइ ! पसोद यसोद । जोअयुत्ती म करेहि । [ देवि ! प्रसोद प्रसीद । जीवत्पुत्रिकां मां कुरु ] ॥२७॥ श्रीराधिका-( सहर्षमुत्थाय ) देइ ! पसीद यसोद। [ देवि ! प्रसीद प्रसीद ] ॥२०॥ श्रीकृष्ण:-(स्मित्वा) राधे ! वणितमेव ते यदद्य दुनिवारमिदम् ।। श्रीराधिका-(सकाकुभरं प्रगम्य ) हन्त बल्लवीउलदेअदे ! कि पि असपर्क दे गयि । ता तुए पाहेण अविप्पओझं पसादीकदुम अणुगेणहीअनु एसो जणो।। हन्त बल्लवोकुलदेवते ! किमप्यशक्यं ते नास्ति । तत्त्वया नाथेनाविप्रयोग प्रसादी कृत्यानुगृह्यतामेप जनः] ॥२८॥ श्रीकृष्ण:-(स्मित्वा) पशोकृतात्मास्मि वशीन्द्रदुष्करस्तवाद्य राधे नवभक्तिदाममिः । सदिष्टसिद्धि कृतगोकुलस्थितिः सदा मदाराधनतस्त्वमाप्स्यसि ॥२८॥५८।। वृन्दा-मान्यवर अभिमन्यो ! कंसराज परमू सन्ध्या समय उन्हें भैरव की बलि चढ़ायेगा ॥२७६।। जटिला--(व्याकुलता पूर्वक ) देवि! प्रसन्न हो, प्रसन्न हो, मेरा पुत्र जोता रहे ॥२७॥ थोराधिका-(आनन्दपूर्वक उठकर) देवि, प्रसन्न हो प्रसन्न हो ।। श्रीकृष्ण-(मुसकराकर ) राधे ! तुमने जो आज प्रार्थना की है वह संकट तो निवारण होगा नहीं ॥२८॥ पौराधिका-(विनयपूर्वक प्रणाम करते हुए ) हे गोपी कुलदेवते ! आप किसी विषय में असमर्थ नहीं है, अतएव मुझे स्वामी रहित न करके मुश दीनजन पर अनुग्रह कीजिए ॥२८॥ श्रीकृष्ण-(मुसकराकर ) हे राधे ! मैं मुनीवृन्द के द्वारा भी कमी वशीभूत नहीं होती है, किन्तु आज तुम्हारी नव भक्ति होरी में वध कर .
३४६ ] * श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क ७* अभिमन्यु -(सोच्छ्रवासम् ) अइ भत्तजणवेच्छले। कदावि महु राहिमुही मए ण राहिला कादम्वा । ता इह वसन्ती तुम एसा आराहेदु । | अयि भक्तजनवत्सले । कदापि मथुराभिमुखी मया न राधिका कतव्या । तदिह वसन्ती त्वामेपाराधयतु ॥२४॥ जटिला-( राधामालिङ्गय ) अइ गोउलान्दणि । रखिम्हि । [ अयि गोकुलनन्दिनि । रक्षितास्मि ] ॥२८॥ वृन्दा--(अभिमन्युमवेक्ष्य ) विध्वसयति हि पुसा साध्वी परिवादिताय सि । परदेवतात्र गौरी भावग्राहिण्यसौ वदतु ॥२८॥५६॥ श्रीकृष्ण -धन्याभिमन्यो। कल्याणसाधिका ते राधिका । तदस्या नाविषब्धेत भवितव्य भवता ।।२८७॥ अभिमन्यु -देइ । राहोवेस फटुअ सुअलेग अम्बा मे परिहसिजइ। पशीभूत हो गई हूँ। अत यदि तुम सदा के लिए गोकुल मे ही रहकर सर्वदा मेरी आराधना करती रहोगी तो तभी तुम्हारा मनोवाच्छित पूरण हो सकता है ॥२८॥५८॥ अभिमन्यु-( उत्कण्ठा सहित ) हे भक्तजन बत्सले । मैं कभी भी राधा को मथुरा नही ले जाऊंगा। आप सदा यहा उपस्थित रहो और यह राधा सदा आपकी आराधना करती रहेगी ।।२०४।। जटिला-(श्रीराधा को मालिंगन कर ) हे गोकुलनन्दिनि । तुमने बचा लिया हमे ॥२८॥ वृन्दा-( अभिमन्यु की तरफ देसर ) जो पुरुष साध्वोपतिग्रता का अपवाद करता है, वह अपवाद ही उस पुरुष या आयु यो नष्ट कर देता है। परमदेवता भक्तिग्राहिणी गौरो यही कह रही हैं ।।२८६।।५।। थोष्टप्ण-हे वहभागी अभिमन्यो । तुम्ह ग क याण साधन करने पाली है यह राधिका। इसलिये इसके प्रति कभी अविश्वास न करना ।। अभिमन्यु-देवि ! सुवल राधावेश धारण कर मेरी माता से परि- *श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-७ * [ ३४७ तं पेपिखअ मच्छरी अणहिष्णो,लोओ मिच्छाहिसत्ति उप्पादेदि । देवि! राधा- वेशं कृत्वा सुबलेनाम्वा मम परिहस्यते। तत्प्रेक्ष्य मत्सरी अनभिज्ञोलोको मिथ्या- भिसक्तिमुत्पादयति ] 1 २८८ । ललिता-अहिमण्णो ! दिदुआ सजव्व वीसत्थोसि ।[अभिमन्यो ! दिष्टया स्वयमेव विश्वस्तोऽसि ] ॥२८॥ अभिमन्युः-अम्ब! एहि मम घरंसव्वस्साई महरापुरे गेदु गिजुतं जणं णिवारेम्ह । [ अम्ब ! एहि मम गृहसव्वस्वानि मथुरापुरे नेतुं नियुक्त जनं निवारयाम: ] ( इत्यम्बया सह हरिं प्रणम्य निष्क्रात: ) ॥२६॥ सख्यौः-( राधामाश्लिष्य- सास्रम.) हा पिअसहि ! फधं पामरेहि तुम महुरापुरे रणेदु णिच्चिदासि ? [ हा प्रियसखि ! कथं पामरैस्त्वं मथुरा- पुरे नेतु निश्चितासि ? ] ॥२६॥ (प्रविश्य ) पौर्णमासी-(सानन्दस्मितम् ) अङ्गरागण गौरागी हिरण्यद्य तिहारिणी। मामने रञ्जयत्येषा निकुञ्जकुलदेवता ।।२६२॥६०।- हास करता हैं, उसे देखकर इस अनभिज्ञ मत्सर-परायणा ने लोक में झूठा कलङ्क फैला रखा है ॥२॥ ललिता-अभिमन्यो ! बड़ा सौभाग्य है तुम स्वयं यहां चले आए और तुम्हें विश्वास हो गया ।।२८६।। अभिमन्यु-मां ! आओ घर चलें, मैंने जिन लोगों को घर का सामान मथुरा ले जाने के लिये नियुक्त किया था, उन्हे रोक दें। यह कह अभिमन्यु श्रीराधा को प्रणाम कर माता-जटिला के साथ बाहर चला जाता है ) ॥२०॥ ललिता-विशाखा- श्रीरामा को आलिंगन पूर्वक अश्रु प्रवाहित करते हुए ) हाय प्रिय सखो ! इस पामर ने तुम्हें मथुरा ले जाने का निश्चय कर रखा था ॥२६॥ (पौर्णमासी प्रवेश करती है) पौर्णमासी-(आनन्दपूर्वक मन्द मुसकाते हुए) स्वर्ण को शु.वि -
३४८ ]
*श्रीविदग्धमाधव नाटक अङ्क-७*
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श्रीकृष्णः- (प्रणम्य ) भगवति ! वन्दे ॥२६॥
पौर्णमास-आशी.शतम् । हन्त यशोदामात: !दिष्टया भवताद्य सं.
पितास्मि, यदहं राधिकाविच्छेदवेदनानामनभिज्ञीकृता ॥४॥
श्रीकृष्णः-उत्तीर्णा परमभयाभूव राधा
निर्वाधाजनि भवती गताधिसूचिः ।
निःशङ्कप्रमदमितास्तथाद्य सत्यः
कर्तव्यं भगवति कि प्रियं तवास्ति? ॥५॥६॥
पौर्णमासी-(सानन्दासम) गोकुलबन्धो! बाठमवन्ध्यजन्मास्मि
ता, तथापि किचिदभ्यर्यये ॥६६।।
प्रथयन्गुणवृन्दमाधुरीमधिवृन्दावनकुञ्जकम्वरम् ।
सह राधिकाया भवान्सदा शुभमभ्यस्यतु केलिविघ्रमम् ॥२६७॥६२
फो हरने वाले अङ्गराग से यह गौराङ्गी निकुञ्जदेवता के सामने हमे सुख
प्रदान कर रही है ॥२६॥६॥
श्रीकृष्ण-घूमकर ) भगवति ! तुम्हें प्रणाम है ॥२६३।।
पौर्णमासी -शत-शत आशीर्वाद । हे यशोदा माता! भाग्यवश आज
मैं तुम्हारे द्वारा वृद्धि को प्राप्त हुई है, क्योकि राधिका के विरह की वेदना
सुमने मुला दी है ॥२६॥
श्रीकृष्ण-भगवति ! श्रीराधा परम भय से पार हो गई हैं, आपके
मन की वेदना दूर हो गई है एवं ससीगण भी आज निश्चित आनन्द यो
प्राप्त हुई है। अब आपको में क्या सेवा करूं, आज्ञा योजिए ॥२६॥६॥
पौर्णमासी--(आनन्दाय प्रवाहित करते हुए ) गोकुल बन्यो !
मुझे सापक जीवन कर दिया है, फिर भी कुछ प्रार्थना करती हूँ ॥२६॥
आप वृन्दावन यज कन्दरा में गुण समूह माधुरी का विस्तार करते
हुए श्रीराधा के शाप सदा मङ्गलमय पे लि-विलास करते रहो ॥२६॥२॥
* श्रीविदग्धमाधव-नाटक अङ्क-* । ३४६ : . पन्तःकन्दलितादरः अतिपुटीमुद्धाटयन्सेवते यस्ते गोकुलकेलिनिर्मलसुधासिन्धूत्यविन्दूनपि। राधामाधविकामयो मधुरिमस्वाराज्यपस्यार्जन- साधीयान्मवदोयपादकमले प्रेमोमिरुन्मीलतु ॥२॥३॥ श्रीकृष्णः-(स्मित्वा ) मगवति ! तथास्तु । तदेहि, गोदोहावसाने मामप्रेक्ष्य चिन्तयिष्यन्तो पितराबविलम्ब गोकुलं प्रविश्य नन्दयामः ! ( इति निष्क्रान्तः) IREEn (इति निष्क्रान्ता) इति श्री श्रीविदग्धमाधव-नाटके गौरीतीर्थ विहारो नाम सप्तपोङ्क ॥७॥ ग्रन्थसमाप्तिः। राधाविलासवीता चतुःषष्टिकलाघारम् । पिराधमाधवं साधु शोलपन्तु विचक्षणा: ॥१॥ और जो व्यक्ति अन्तःकरण में मादर सहित, कर्णपुटों को खोल कर आपके गोकुल-केलि रूप निर्मल सुधा-सिन्धु को एक बूंद का भी सेवन करे, वह श्रीराधामयी माधवी-मधुर-मधुरिमा रूप स्वराज्य को प्राप्त कराने वाली दृढतर प्रेमवरङ्ग के द्वारा आपके चरण कमलों को प्राप्त करे यही मेरी प्रार्थना है ॥२८॥३॥ पीकृष्ण-( मुसकरा कर ) भगवति ! ऐसा ही हो । अब आओ, गो-दोहन का समय हो गया है। मेरे माता-पिता मुझे न देखकर चिन्ता में पड़ जायेगे । अतः गोकुल चलकर उनको आनन्दित करें। (यह कहकर चले जाते हैं ) ॥२६॥ [ इसके बाद सब चले जाते हैं ] इस प्रकार श्यामदासानुवादित श्री श्रीविदग्धमाश्व नाटक का गौरीतीर्थ विहार नामक साता अदू समाप्त हुआ 11७॥ प्रन्य समाप्ति इस योविदग्ध मापद नाटक के सम्पूर्ण अद्रों में चौसठ लामय ३५० ] *श्रीविदग्धमाषव-नाटक अङ्क-७* मन्दसिन्धुरबारणेन्दु (१५८६) संख्ये संवत्सरे गते । विदग्घमाधवं नाम काटकं गोकुले कृतम् ॥२॥ शान्तश्रियः परमभागवताः समन्ताहण्यपि सद्गुणतां नयन्ति । दोषावलीमपरितापितया मृदूनि ज्यातोषि विष्णुपदभाजि विभूषन्ति ॥३॥ "समाप्तमिदं श्रीविदग्धमाधवानाम नाटकम् । E श्रीराधा-विलास पणित हुआ है । जो रस को जानने में चतुर महत मुरुष हैं, वे इसका अनुशीलन करें॥१॥ सम्वत् १५८६ में श्रीवृन्दावन में इस धीविदग्धमाघवनाटक की रचना ( श्रीपाद रूपगोस्वामी द्वारा की गई गरि।। दोपावली ( अर्थात् अनेकों दोपयुक्त )-रात्रि में शीतलतागुण रहने से उसे मृदु ज्योतिर्मय तारागण आकाश में जैसे विभूषित करते हैं, उसी प्रकार शीलस्वभाव-सम्पत्ति सम्पन्न परम भागवतजन भी हर प्रकार से दोप- समूह युक्त व्यक्ति को भी सद्गुणवान मानते हैं ॥३॥ इस प्रकार प्रोविदग्धमाघव नाटक का श्रीश्यामदास कृत अनुवाद 'वैशाख शुक्ला एकादशी सम्वत २०३० रविवार को समाप्त हुओ।।