Central Library, University Of Rajasthan
Swetasvataropnish
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मुहल नवा प्रकादाक
घनश्यामदास जालान
गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० १९९५ प्रयम संस्करण ३२५.
मृल्य III) चौदह आना
ॐ . प्रस्तावना श्वेताश्वतरोपनिषद् कृष्णयजुर्वेदके अन्तर्गत है । इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं । उन्होंने चतुर्थाश्रमियोंको इस विद्याका उपदेश किया था । यह वात इस उपनिपद्के पप्ठ अध्यायके इक्कीसवें मन्त्रसे विदित होती है । इस उपनिपदी विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है । इसमें साधन, साध्य, साधक और प्रति- पाद्य विषयके महत्त्वका बहुत स्पष्ट और मार्मिक भापामें निरूपण किया है। इसमें प्रसंगानुसार सांख्य, योग, सगुण, निर्गुण, हेत, अद्वैत आदि कई प्रकारके सिद्धान्तोंका उल्लेख हुआ है । अतः इसके वाक्योंके आधारसे सांख्यवादी और द्वैतमतावलम्बियोने भी बड़े समारोहसे अपने सिद्धान्तोंका समर्थन किया है। इसका आरम्भ जगत्के कारणकी मीमांसासे होता है । कुछ ब्रह्मवादी आपसमें मिलकर इस विषयमें विचार करते है कि जगत्का कारण क्या है ? हम कहाँसे उत्पन्न हुए ? किसके द्वारा हम जीवन' धारण करते हैं ? कौन हमारा आधार है ? और किसकी प्रेरणासे हम दुःख-सुख भोग करते हैं ? संसारके सम्पूर्ण दार्शनिक इन प्रश्नोंको हल करनेमें ही व्यस्त रहे है । और उन्होंने अपनी-अपनी अनुभूतिके आधारपर जो-जो निर्णय किये हैं वे ही विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तोंके रूपमें प्रसिद्ध हुए हैं । वस्तुतः इस प्रकारको जिज्ञासा ही सारे दर्शनशास्त्रका वीज है और यह जितनी तीव्र एवं निरपेक्ष होती है उतनी ही अधिक वास्तविकताके समीप ले जानेवाली होती है। अस्तु । ऋषियोंने जगत्के कारणकी मीमांसा करते हुए काल-स्वभावादि लोकप्रसिद्ध कारणोंपर विचार किया किन्तु उनमेंसे कोई भी उनकी जिज्ञासा शान्त करनेमें सफल न हुआ, उन्हें सभी अपूर्ण और अशाश्वत दिखायी दिये । अन्तमें उन्होंने ध्यानयोगके द्वारा यह अनुभव किया कि भगवान्की स्वरूपभूता माया ही जगत्का कारण है। उन्हें इस संसारसरिताका स्पष्ट दर्शन हुआ और उन्होंने देखा ?
(४) कि चेतन दोनाले परे इनका अधिष्ठाता और प्रेरक जो एक च है वही अपनी मायाशक्तिसे जगन्ना अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है और उसका साक्षात्कार होनेपर ही जीव मायाके चक्रसे मुक्त हो सकता है । उले कहीं अन्यत्र ढूँढ़नकी आवश्यकता नहीं है । वह सर्वदा अपने अन्तःकरणमे स्थित है । इस अपने अन्तरात्माले भिन्न काई और देव नहीं है तथा यही भोक्ता, भोग्य और प्रेरक भी कहा जाता है। इस प्रकार प्रथम अन्यायमं जगत्कारणका निर्णय कर प्रणवचिन्तन- पूर्वक ध्यानाभ्यासको ही उसके साक्षात्कारका साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण द्वितीय अध्यायम है। वहाँ ध्यानको विधि, 'ज्यानके योग्य स्यान, योगकी प्रथम प्रवृत्ति और उसके फलका बड़ा सुन्दर वर्णन किया गया है। इस तरह साधनका निरूपण कर फिर तृतीय अध्यायम साध्यका प्रनिपादन किया है। वहाँ उस एक ही तत्त्वका पहले सगुण साकाररूपसे, फिर अन्तर्यामी और विराट पसे नथा अन्तमे शुद्धन्पले निन्पण हुआ है । चतुर्थ अध्यायमें तत्त्वयोधकी प्राति और मायाले मुक्त होने के लिये उस देवकी न्तुति की गयी है नया अनेक प्रकारसे उसके स्वल्प और महत्त्वका वर्णन किया गया है। पञ्चम अध्यायमें अर. अक्षर और इन दोनोंक प्रेरक परमात्मा स्वन्पाका स्पष्टीकरण हुआ है। वहाँ अरका भाग्यन्य अक्षर (जीव) का भोक्तव्य और परमात्मामा नियन्तृत्व बतलाया गया है तथा यद भी प्रदर्शित किया है कि जीव अपने नंकरके अनुसार विभिन्न बानियाको प्रान होता है और परमात्माका जान होनेपर सर प्रकारके बन्धनासे मुक्त हो जाता है । इसके पश्चात् छ अन्यायमें भी परमात्माके न्वन्प और महत्त्वका ही प्रतिपादन करते हुए अन्नमें उन्नीक पानसे मारे दुवारी निवृत्ति यतलायी है बार यह का है कि उन देवको जान बिना ढापाका अन्त होना इसी प्रकार असम्भव हैन व्यापक और निरवयव नाकामा चमक समान लंपटना । इस प्रकार रम उपनिदमें मादिने मन्नतक केवल परमार्थतत्य काही निपज दुआ है। तिर अन्नमें एक मन्त्रद्वारा दम बियां : ( ५ ) सम्प्रदायका और दो मन्त्रोंसे इसके अधिकारीका वर्णन करके उप- संहार किया गया है। यही संक्षेपमें इस ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषयोंका विवेचन है। ऊपर कहा जा चुका है कि इस ग्रन्थके वाक्योंके आधारसे सांख्यवादी और द्वैतमतावलम्बियोंने भी अपने सिद्धान्तोंका समर्थन किया है। सांख्यवादियोंके लिये तो इस ग्रन्थके दो वाक्य ही परम प्रमाण हैं । उनमे एक चतुर्थ अध्यायका पञ्चम मन्त्र और दूसरा पञ्चम अध्यायका द्वितीय मन्त्र है। पहला मन्त्र इस प्रकार है- अजामेका लोहितशुक्लकृष्णा वह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येना भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ इस मन्त्रकी लोहितशुक्लकृष्णा अजा ही उनकी रजःसत्त्वतमो- मयी प्रकृति है । तथा उसे सेवन करनेवाला अज बद्ध पुरुष है और उसे त्याग देनेवाला दूसरा अज मुक्त पुरुप है। इस मन्त्रको यदि सांख्यवादका वीज कहें तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी । यही उनके प्रधानकी पोपक एकमात्र श्रुति है । किन्तु भगवान् शंकराचार्यने अपने शारीरकभाज्यमें इस मतका खण्डन करते हुए लोहितशुक्लकृष्णा अजासे त्रिगुणमयी प्रकृति न लेकर छान्दोग्योपनिषद्के छठे अध्यायमें वताये हुए पृथिवी, अप, तेज तीन सूक्ष्म भूत लिये हैं । उनमें पृथिवी कृष्णवर्ण, अप शुक्लवर्ण और तेज लोहितवर्ण है । इस प्रकार वहाँ आचार्यने अनेकों युक्तियोंसे प्रधानवादका खण्डन किया है । सांख्यसिद्धान्तका दूसरा मन्त्र इस प्रकार है- यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋपि प्रसूतं कपिलं यस्तमने ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ इस मन्त्रके आधारपर सांख्यवादियोंने परमर्षि कपिलकी प्राची- नता और प्रामाणिकता सिद्ध करके उनके उपदेश किये हुए सांख्य- सिद्धान्तकी पुष्टि की है। किन्तु आचार्य ने इस मतका इसी उपनिषद् के भाष्यमें खण्डन किया है और 'कपिल' शब्दको कनकवर्ण हिरण्य- गर्भका वाचक बताया है। .
। (६) इसी प्रकार द्वैतवादियोंने भी इस ग्रन्यके वाक्योंसे अपने सिद्धान्तको पुष्ट करनेका प्रयत्न किया है। यों तो अपने सिद्धान्तको पुष्टि के लिये वे इसके कई मन्त्र उद्धृत करते हैं; परन्तु उनमें प्रधान चतुर्थ अध्यायके छठे और सातवें मन्त्र ही हैं । वे इस प्रकार है- हा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिपत्त्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं खाहत्त्यनग्नन्नन्योऽभिचाकगीति ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमन्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्ट यदा पश्यत्यन्यमीशमत्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ इन मन्त्रोंके द्वारा द्वैतवादी आचार्याने जीव और ईश्वरका भेद सिद्ध करने की चेष्टा की है; परन्तु आचार्यने पूर्वमन्त्रके दो सखा सुवर्ण विज्ञानात्मा और परमात्मा तथा द्वितीय मन्त्रके पुल्प और इश अविद्याग्रस्त जीव और प्रत्यगात्मा बतलाकर उनका केवल औपा- धिक भेद प्रदर्शित करते हुए परमार्थतः एकत्व ही सिद्ध किया है। इस विषयमें शारीरकभाग्यम भी बढ़ा युक्तियुक्त विचार किया गया है। यह सब होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि अन्य मताव- दस्यियाक सिद्धान्त सर्वथा बलीक ही है । वन्तुनः परमप्रमाणभूता अति यौर उसके प्रमेय श्रीभगवान् दोनों ही बान्छाफरपतरु है । उन्हें जो जिस भावले भजता है उसे उनकी उसी रूपमें अनुभूति होती है। उनका परमार्थन्यरूप सर्वथा यनिर्वचनीय योर मन-युद्धि आदिका भविषय है। किन्तु जिस रूपमें उनकी अनुभूति होती है उससे मी उनका किसी प्रकारका भेद नहीं है। इसलिये उसके द्वारा भी उन्दी- की डॉकी होती है। वे सर्वल्प हैं, सर्वातीत हैं और मयके साक्षी है। बस, एकमात्र ये ही वे है । जिन हम उनसे भिन्न समझते है वह भी उन्हींकी प्रतिकृति है । वन्नुत. ऐसा कोई देश, काल या पदार्थ नहीं है जो उनमे मिन हो और या किसी भी देश, काल, या पदार्थक द्वारा उनका ग्रहण भी नहीं किया जा सकना सार मन उन्होंना प्रतिपादन करते मोर यन्तुनः ये रिमी भी मतंक विषय भी नहीं हो सकते। यह ।
हैं। (७) एक विचित्र पहेली है। व्यवहारमें किन्हीं भी दो विरुद्ध धर्मोंका सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता; परन्तु यहॉ सारे विरोधोंका समन्वय हो जाता है, क्योंकि वे सर्वाधिष्ठान है। यदि यहाँ भी सबका सामजस्य न हुआ तो और हो ही कहाँ सकता है ? अस्तु । इस प्रकार यह उपनिषद् परमार्थतत्त्वके जिज्ञासुओंके लिये बहुत ही उपयोगी है। इसपर शाङ्करभाष्यके अतिरिक्त श्रीशङ्करानन्दकृत दीपिका, श्रीनारायणविरचित दीपिका और श्रीविज्ञानभगवान्कृत विवरणनामक तीन टीकाएँ और है । भगवान् शङ्करकी विवेचनशैली वड़ी ही गम्भीर, प्रसादपूर्ण और युक्तियुक्त होती है। उनके पाण्डित्य और युक्तिकौशलको विपक्षी विद्वान् भी मुक्तकण्ठसे स्वीकार करते परन्तु प्रस्तुत भाष्यमे वह प्रतिभा नहीं देखी जाती। इसमें न वह गाम्भीर्य है, न प्रसाद है और न युक्तिकौशल ही है । इसीसे अधि- कांश विद्वानोंका ऐसा मत है कि यह आचार्यकी रचना नही है। किन्हीं अन्य मठस्थ शङ्कराचार्यने इसे लिखकर अपने भाष्यकी प्रतिष्ठा- के लिये भगवान् भाष्यकारके नामसे प्रसिद्ध कर दिया है। इसके आचार्यकृत न होनेमें और भी कई कारण बताये जाते है । परन्तु यहाँ उन्हें उद्धृत करनेका कोई विशेष प्रयोजन नहीं है । इस प्रकारको खोज ऐतिहासिक और साहित्यिक दृष्टिसे तो अवश्य वहुत आवश्यक हैपरन्तु जिज्ञासुओंका तो मुख्य लक्ष्य अपनी ज्ञानपिपासाकी शान्ति- पर ही होना चाहिये । इसकी रचना कैसी ही शिथिल और प्रसाद- शून्य हो, इसमें कल्याणकामियोंकी शान्तिके लिये पुष्कल सामग्री है। इसलिये इसका अनुशीलन उनके लिये किसी प्रकार अनुपयोगी नही हो सकता। इस उपनिषद्के प्रकाशनसे एक चिरकालिक अभिलाषाकी पूर्तिके कारण मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है । आजसे प्रायः सात वर्ष पूर्व इन एकादश उपनिषदोंके भाष्यका हिन्दी-अनुवाद करनेका संकल्प हुआ था । भगवत्कृपासे वह संकल्प पूरा हो गया । छान्दोग्यतक नौ उपनिषदोंको प्रकाशित हुए प्रायः दो वर्ष हो गये हैं। बृहदारण्यक (८) और श्वेताश्वतर गेप थे। इनका अनुवाद भी समाप्त हो गया। प्रचलित कामके अनुसार पहले बृहदारण्यक प्रकाशित होना चाहिये था. परन्तु छोटा होने कारण पहले श्वेताश्वतरका अनुवाद किया गया और वहीं पहले प्रकाशित भी हो रहा है। बृहदारण्यककी छपाई भी प्रारम्भ होगयी है. आशा है वह भी शीत ही प्रकाशित हो जायगा। इस प्रकार अनुवादके ही बहाने जो यत्किञ्चित् सत्पुरुपोंकी लेवा और सहन्याका मनन होता है, उससे किसी प्रकार भगवत्कृपाका पात्र बन सक-ऐसा प्रेमी पाठक आशीर्वाद देनेकी कृपा करे। विनीत अनुवादक श्रीहरिः . विषय-सूची विषय १. शान्तिपाठ १ प्रथम अध्याय २ :: ५६ ५९ ६२ ७४ ८३ ८५ ८८ १०१ २ सम्बन्ध-भाष्य ३. जगत्-कारण ब्रह्मके स्वरूपके विषयमें ब्रह्मवादी ऋषियोंका विचार ४ काल, स्वभाव आदिकी जगत्-कारणताका खण्डन ५. ध्यानके द्वारा ऋषियोंको कारणभूता ब्रह्मशक्तिका साक्षात्कार ६. कारण-ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन ७. कार्यब्रह्मका नदीरूपसे वर्णन ८. जीवके ससार-बन्धन और मोक्षके कारणका निर्देश ९. परब्रह्मकी प्राप्तिसे मुक्तिका वर्णन १०. व्यावहारिक भेद और ज्ञानद्वारा मोक्षका प्रदर्शन ११ ईश्वर, जीव और प्रकृतिकी विलक्षणता तथा उनके तत्त्व-ज्ञानसे मोक्षका कथन १२. प्रधान और परमेश्वरकी विलक्षणता तथा उनके तत्व-ज्ञानसे मोक्षका कथन १३. ब्रह्मके ज्ञान और ध्यान-जन्य फलों में भेद १४. ब्रझकी ज्ञातव्यता १५. प्रणव-चिन्तनसे ब्रह्म-साक्षात्कारका दृष्टान्तोंद्वारा समर्थन द्वितीय अध्याय १६ ध्यानकी सिद्धिके लिये सवितासे अनुज्ञा-प्रार्थना १७. सविताकी अनुज्ञाके विना हानि १८. सविताकी अनुज्ञासे लाभ १९. ध्यानयोगकी विधि और उसका महत्त्व २०. प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता २१. ध्यानके लिये उपयुक्त स्थानोंका निर्देश २२ योगसिद्धिके पूर्वलक्षण २३. रोग, जरा और अकाल मृत्युपर विजय पानेके चिह्न १०७ १०८ ११५ ११८ C :::: १२४ १३१ १३३ ... ... १३६ १४२ १४३ १४५ (१०) १४७ १४९ ... १५१ १५४ १५६ ... १६० १६५ १६७ ... ... १७० १७१ १७२ २४. योगसिद्धि या तत्त्वज्ञानका प्रभाव २५. योगसिद्ध या तत्त्वजकी स्थिति २६. परमात्मस्वरूपका वर्णन तृतीय अध्याय २७. एक ही परमात्मामें शासक और शासनीय भावका समर्थन २८. परमेश्वरसे जगत्की दृष्टिका प्रतिपादन २९. परमेश्वरका स्तवन ३०. परमात्मतत्त्वके ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति ३१. परमेश्वरके विषयमें जानीजनोके अनुभवका प्रदर्शन ३२. परमेश्वरके सर्वात्मभाव या विराट-स्वल्पका वर्णन ३३. आत्माके देहावस्थान और इन्द्रिय-सम्बन्धराहित्यका निरूपण ३४. ब्रह्मका निर्विशेष रूप ३५. आत्मनानसे गोकनिवृत्तिका निरूपण ३६. आत्मस्वरूपके विषयमें ब्रह्मवेत्ताका अनुभव चतुर्थ अध्याय ३७. परमेश्वरसे सद्बुद्धि के लिये प्रार्थना ३८. परमात्मा सर्वरूपता ३९. प्रकृति और जीवके सम्बन्धका विचार ४०. जीव और ईश्वरकी विलक्षणता ४१. ब्रह्मकी अधिष्टानल्पता और उसके भानसे कृतार्थता ४२. मागोपाधिक ईश्वर ही सबका स्रष्टा है ४३. प्रकृति और परमेश्वरका त्वर तथा उनकी सर्वव्यापकता ४४. कारण-ब्रह्मके साक्षात्कारसे परम धान्तिकी प्राप्ति ४५. अन्वण्टनानी सिद्धिके लिये परमात्माकी प्रार्थना ४६. परमात्मनानसे शान्ति प्राप्ति एवं वन्धननागका पुनः उपदेठा ४७. परमात्मसाक्षात्कारके साधन ४८. भान देन-निवृत्तिवा उपदेग ४९. ब्रहार अनुपम एवं इन्द्रियातीत स्वरुपरा वर्णन ५०. परमेश्वरकान्तवन २७४ १७५ १८२ १८३ १८५ १८६ १८८ १९६ पञ्चम अध्याय ५१. अगधित विद्या-अविधा और उनी यासक, परमेश्वरपे स्वरूप तथा महान्यतन (११) ५२. कर्तृत्वादि धर्मोसे युक्त जीवात्माके स्वरूपका वर्णन ५३. जीवको कर्मों के अनुसार विविध देहकी प्राप्तिका निर्देश ५४. परमात्मतत्त्वके जाननेसे जीवकी मुक्तिका कथन २१० २१४ २१६ . षष्ठ अध्याय ५५. परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रका सञ्चालन २१९ ५६. चिन्तनीय परमेश्वरका स्वरूप तथा उसकी महिमा २२० ५७. भगवदर्पण कर्मसे भगवत्प्राप्ति २२२ ५८. उपासनासे भगवत्प्राप्ति २२४ ५९. ज्ञानसे भगवत्प्राप्ति २२६ ६०. ज्ञानियोंके तत्त्वानुभवका उल्लेख २२७ ६१. परमेश्वरकी महत्ता २२८ ६२. ब्रह्मसायुज्यके लिये परमेश्वरसे प्रार्थना २३० ६३. परमेश्वरके स्वरूपका निर्देश २३० ६४. परमात्मज्ञानसे नित्यसुखकी प्राप्ति और मोक्ष २३२ ६५. ब्रह्मके प्रकाशसे ही सबको प्रकाशकी प्राप्ति •.. २३४ ६६. मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा अन्य हेतुओंका निषेध २३६ ६७. परमेश्वरके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन २३७ ६८. मुमुक्षुके लिये भगवच्छरणागतिका उपदेश २३९ ६९. परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता २४२ ७०. श्वेताश्वतर-विद्याका सम्प्रदाय तथा इसके अधिकारी २४४ ७१. अनधिकारीके प्रति विद्योपदेशका निषेध २४७ ७२. परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले शिष्यके प्रति किये गये उपदेशकी सफलता २४९
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५
जगत्कारणमीमांसा
[.
- तत्सद्ब्रह्मणे नमः श्वेताश्वतरोपनिषद् मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित नित्यानन्दं निराधारं निखिलाधारमव्ययम् । निगमाद्यगतं नित्यं नीलकण्ठं नमाम्यहम् ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! वह परमात्मा हम [ आचार्य और शिष्य ] दोनोंकी साथ-साथ रक्षा करें । हम दोनोंका साथ-साथ पालन करें । हम साथ-साथ विद्यासम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करे । हम दोनोंका पढा हुआ तेजस्वी हो। हम द्वेप न करें । त्रिविध तापको शान्ति हो । RRB- श्वे० उ०१-२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय গীত্ব प्रयोजनन् - उन सम्बन्ध-भाष्य वेताश्वतरोपनिपद इद विवरण ब्रह्मतत्त्वके जिज्ञासुओको सरलतामे मल्पग्रन्थं ब्रह्मजि- बोध करानेके लिये यह ट्वेताश्वतरी- ग्रन्यारन्म- पनिषद्की व्याख्या छोटे-से ग्रन्यत्र ज्ञामूनां मुखाव- रूपमे आरम्भ की जाती है । यद्यपि बोधायारभ्यते । चित्सदानन्दा- आत्मा सच्चिदानन्द अद्वितीय ब्रह्म- स्वल्प ही है, तथापि अपने ही आश्रित द्वितीयब्रह्मस्वरूपोऽप्यात्मा स्वा- रहनेवाली. अपनेहीको विषय करने- श्रयया स्वविपययाविद्यया स्वानु- वाला और [ मै अज्ञानी हूँ इस प्रकार अपने अनुभवने ही ज्ञात होनेवा भवगम्यया साभासया प्रति- चिदाभासयुक्त अविद्याने बम्वाभाविकागपपुरुषार्थः प्राप्ता- (जीवात्मा ) के मत्र प्रकारके न्वा- शेपानयोऽविद्यापरिकल्पितरेख सा- उसे सम्पूर्ण अनर्थको प्रामि दुर्ट है और भाविक पुरुषार्थका अवरोव हो जाने धनरिष्टप्राप्तिं चापुरुषार्थ पुरुषार्थ बह अज्ञानवा कल्पना किये हुए हो । माधनामे अपनी इष्टग्रामिप अपुरुषार्थ- मन्यमानी मोक्षार्थमलभमानो को ही पुरुषार्थ मानकर परमपुरुषार्थम्प मकरादिभिग्वि गगादिभिरितस्त- मोक्षपद प्राप्त न कर सकनेके कारण मकगदिक समान गगादि दोषान्न नः समाकृप्यमाणः मुग्नति- वर-उधर याचा जाकर देवना. यंगादिप्रभेदभेदितनानायोनियु मनुष्य एवं निर्यक् आदि विभिन्न भंडाने अनंको योनिम मंचरन्नापि मुकुनकर्मणा त्रा- विचन्ता रहता है । जय किसी पुष्य- मणाधिकारिगर्गरं प्राप्त ईश्वगर्य- कर्मके दाग वमप्रियाका अधिकारी वारणादि टागर प्रामक काग कमानुष्ठानेनापगनगगादिमला- मानुष्टान कानेरी गगादि । युक्त अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ३ - आत्मशानस्य नित्यत्वादिदर्शनेनोत्पन्नेहामु मुक्त और वस्तुओंका अनित्यत्वादि देखनेसे ऐहिक और पारलौकिक त्रार्थभोगविराग उपेत्याचार्यमा- भोगोसे विरक्त हो जाता है तब चार्यद्वारेण वेदान्तश्रवणादिनाहं आचार्यके पास जाकर उनके द्वारा वेदान्तश्रवणादि करके 'मैं ब्रह्म हूँ' ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्मतत्त्वमवगम्य इस प्रकार ब्रह्मात्मतत्त्वका साक्षात्कार निवृत्ताज्ञानतत्कार्यों वीतशोको कर वह अज्ञान और उसके कार्यकी निवृत्ति हो जानेके कारण शोकरहित भवति । अविद्यानिवृत्तिलक्षणस्य हो जाता है । क्योंकि अज्ञाननिवृत्ति- सोक्षस्य विद्याधीनत्वायुज्यते च रूप मोक्ष ज्ञानके अधीन है, इसलिये ज्ञान ही जिसका प्रयोजन है उस उप- तदर्थोपनिषदारम्भः । निपद्का आरम्भ करना उचित ही है। तथा तद्विज्ञानादमृतत्वम् । तथा उस (ब्रह्मात्मतत्त्व) के ज्ञानसे "तमेवं विद्वान- अमृतत्व प्राप्त होता है । "उसको माहात्म्यम् मृत इह भवति ।" जाननेवाला इस लोकमे अमृत (मुक्त) (नृसिंह पूर्व० १।६) "नान्यः हो जाता है', 'मोक्षप्राप्तिके लिये कोई पन्था विद्यतेऽयनाय" (श्वेता दूसरा मार्ग नहीं हैं", "यदि यहाँ ६ । १५) । "न चेदि- उसे न जाना तो बडी भारी हानि हावेदीन्महती विनष्टि" (के० उ०२ । ५)। “य एतद्विदुर- जाते है". [ यदि पुरुष 'यह है", "जो इसे जानते है अमर हो मृतास्ते भवन्ति" (वृ० उ०४ । मैं ही हूँ' ऐसा जान ले ४। १४) । "किमिच्छन्कस्य तो कामाय शरीरमनु संज्वरेत्" (वृ० वह ] क्या इच्छा करता हुआ उ०४ । ४।१२)। "तं विदि- किस कामके लिये शरीरके पोछे सन्तप्त त्वान लिप्यते कर्मणा पापकेन ।" : हो", "उसे जान लेनेपर जीव पाप- (वृ० उ० ४ । ४ । २३) कर्मसे लिप्त नहीं होता". ''आत्मज्ञानी "तरति शोकमात्मवित्" (छा० शोकके पार हो जाता है, उ० ७।१। ३)। "निचाय्य "उसका अनुभव कर लेनेपर मृत्युके तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ।" (क० मुखसे है.' से जो . परमात्मा श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ whol - - उ० १।३ । १५) "एतद्यो वुद्धिरूप गुहामे छिपा हुआ जानता वेद निहितं गुहायां सोवि- है, हे सोम्य ! वह अविद्यारूप ग्रन्थिको छिन्न-भिन्न कर देता है", द्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य" "उस परावर ( ब्रह्मादि देवताआसे (मु० उ० २। १ । १०)। भी उत्तम ) परमात्माका साक्षात्कार "भिद्यते हृदयग्रन्थि कर लेनेपर इसके हृदयकी ग्रन्थि ग्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। टूट जाती है, सारे सगय कट जाते श्रीयन्ते चास्य कर्माणि तथा समस्त कर्म क्षीण हो जाते तस्मिन्दृष्ट परावरे ।।" हैं", "जिस प्रकार नदियाँ बहती (मु० उ० २।२।८) हुई अपने नाम और रूपको छोडकर "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे- समुद्रमे लीन हो जाती हैं उसी ऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । प्रकार विद्वान् नाम और रूपसे मुक्त नथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः होकर परसे भी पर दिव्य पुरुपको परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।।" प्राप्त हो जाता है", "यह. जो कि (मु० उ०३१२१८) उस परब्रह्मको जानता है, ब्रह्म ही हो "म यो ह वै तत्परमं ब्रह्म जाता है", "हे सोम्य ! जो भी उस वेद ब्रह्मव भवति" (मु० उ० छापाहीन, अगरीर, अन्टोहित, शुद्ध ३।२।९) । "स यो ह वै अक्षर ब्रह्मको जानता है वह सर्वत्र हो तदच्छायमगरीग्मलोहितं शुभ्र- जाता है " "वह सब कुछ जानता मक्षरं बेदयते यस्तु सौम्य (प्र. उ० ४ । १०)। "म मई- है". "उम जाननेयोग्य पुरुषको मति। "तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा जान. जिनमे मृयु तुझे व्यथित न करें"."उस अवस्थाम एकत्ल देखने- मा यो मृत्युः परिव्यथाः' (प्र० उ०६१६)। "तत्र को मोहः वारे पुरुषको क्या मोह और क्या शः गोक. एकत्यमनुपश्यतः' , टोक हो माता है ?" "ज्ञानमे । ईशा०७॥"विद्ययामृतमन्नुने" अमर को होता है" हंगा० ११ )। "भृतेषु भूतेषु बुद्धिमानन्टीग उसे समन्न प्राणियोम - माम .
J अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ . - विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकाद- उपलब्धकर [ मृत्युके पश्चात् ] इस मृता भवन्ति।" (के० उ०२।५) लोकसे जाकर अमर हो जाते है", "अपहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे “[ जो परात्मविद्याको जानता है लोके ज्येये प्रतितिष्ठति" (के० वह ] पापको त्यागकर विनाशरहित उ०४।९)। "तन्मया अमृता वै सुखमय स्वयं-प्रकाश परम महान् ब्रह्ममें प्रतिष्ठित होता है", "वे । बभूवुः" (श्वेना० उ० ५।६)। ब्रह्मस्वरूप होकर निश्चय ही अमर "तद्वात्मतत्वं प्रसमीक्ष्य देही एक हो गये", "उस आत्मतत्त्वका कृतार्थों भवते वीतशोक" साक्षात्कार कर कोई देहधारी जीव (श्वेता० उ० २।१४) । “य कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति" (बृ० है", "जो इसे जानते है, अमर हो उ० ४ । ४ । १४)। "ईशं तं जाते है", "उस ईश्वरको जानकर ज्ञात्वामृता भवन्ति" (श्वेता० अमर हो जाते हैं", "उसीको प्राप्त उ० ३। ७)। "तदेवोपयन्ति"। होते हैं", "इसे अनुभव करके जीव "निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति" परमशान्ति प्राप्त करता है", "उसे इस (क० उ०१।१।१७)। "तमेवं प्रकार जानकर यह मृत्युके बन्धनोको काट देता है", "पूर्वकालमे ' जिन ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति" (श्वेता० उ० ४।१५)। "ये पूर्व देवता और ऋषियोने उसे जाना [ वे अमर हो गये ]" "[ अपनी देवा ऋषयश्च तं विदुः" (श्वेता० बुद्धिमें स्थित उन परमात्माको जो उ०५।६)। "तेषांशान्तिः शाश्वती देखते हैं ] उन्हे ही नित्य शान्ति नेतरेषाम्" (क०उ०२।२।१३)। प्राप्त होती है औरोंको नहीं।" "बुद्धियुक्तो जहातीह "समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त उभे सुकृतदुष्कृते ।" हुआ पुरुष [ ज्ञान-प्राप्तिके द्वारा ] (गीता २ । ५०) पुण्य और पाप दोनोंको इसी लोकमें "कर्मजं वुद्धियुक्ता हि त्याग देता है", "समत्वबुद्धिसे युक्त - , द श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय . फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। पुरुष कर्मजनित फल (इष्टानिष्ट जन्मबन्धविनिमुक्ताः देहकी प्रामि) को त्यागकर ज्ञानी पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥' हो जीते-जी जन्म-बन्धनसे मुक्त (नीता २ । ५१) होकर समन्त उपवासे रहित मोक्ष- "सर्व ज्ञानप्लवेनैव नामक परमपद प्राप्त करते हैं", जिनं संतरिप्यसि ।" "त. ज्ञानरूप नौकाके द्वारा ही "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि सम्पूर्ण पापोके पार हो जायगा". भस्मसात्कुरुते तथा ।" "उसी प्रकार "उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्नि (गीता ४ । ३६-३७) सम्पूर्ण कर्माको भस्म ( निर्बीज ) "एनबुद्ध्वा बुद्धिमान्स्या- कर देता है", "हे भारत ! इस त्कृतकृत्यश्व भारत " गुह्यतम शास्त्रको जानकर ही मनुष्य (गीता १५ । २०) "ततो मां तत्त्वतो जात्वा बुद्धिमान् और कृतकृत्य होता है", "फिर मुझे तत्त्वत. जानकर तत्काट विगते तदनन्तरम् (गीता १८ । ५५) मुझहीमें प्रवेश कर जाता है". "इन "सर्वपामपि चैतेपा सब मायनामे आत्मज्ञान ही उत्कृष्ट मात्मनानं परं स्मृतम् । माना गया है तथा सम्पूर्ण विद्याओंमे तद्धचनचं सर्वविद्यानां भी वही सबसे बढकर है, क्योंकि प्राप्यते एमृतं यतः। उससे अमृत की प्राप्ति होती है। प्राप्यतत्कृतकृत्यो हि इसे प्राप्त कर लेनेपर ही द्विज कृत- द्विजो भवति नान्यथा ॥ कृत्य होता है. अन्य किसी प्रकार एवं यः सर्वभूतेषु नहीं । इस प्रकार जो मन-ही-मन पश्यत्यान्मानमात्मना । सम्पूर्ण प्राणियों में आत्माको ही देखता स सर्वसमतामेत्य है वह नवम मान्यबुद्धिको प्राम करके ब्रह्माम्येति सनातनम् ॥ सनातन अवको ग्राम हो जाता है. नम्बदनसम्पन्नः नथा मन्यन्दटिने मापन होने कमभिर्न निवघ्यने । गान्ण बट कमाने बायनरी ग्राम अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ "कर्मणा बध्यते जन्तु- दर्शनेन विहीनस्तु नहीं होता । जो पुरुप इस दृष्टिसे संसारं प्रतिपद्यते ॥" रहित है वह संसारको प्राप्त होता है", "जीव कर्मसे वधता है और विद्यया च विमुच्यते । ज्ञानसे मुक्त हो जाता है, इसलिये तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते। आचार्योंने स्थिरबुद्धि प्राचीन यतयः पारदर्शिनः ॥ ज्ञानको ही मोक्षका साधन बतलाया है, ज्ञानं निःश्रेयसं प्राहु- वृद्धा निश्चयदर्शिनः । अत शुद्ध ज्ञानसे जीव सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है", "इस प्रकार तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मृत्युको अवश्य होनेवाली जानकर मुच्यते सर्वपातकैः॥" विद्वान् ज्ञानके द्वारा नित्य तेजः- "एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा स्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, इसके ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यम्। सिवा उसके लिये कोई और मार्ग न विद्यते ह्यन्यथा तस्य पन्था- नहीं है, उसे जान लेनेपर विद्वान् स्तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ॥" प्रसन्नचित्त हो जाता है", "क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञाना- "परमात्माके ज्ञानसे जीवकी आत्य- द्विशुद्धिः परमा मता ।" |न्तिकी शुद्धि मानी गयी है", "अयं तु परमो धर्मो "योगसाधनके द्वारा यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥" साक्षात्कार करना यही परमधर्म "आत्मज्ञः शोकसंतीर्णो है", "आत्मज्ञानी शोकसे पार न बिभेति कुतश्वन । होकर मृत्यु, मरण अथवा किसी मृत्योः सकाशान्मरणा- अन्य कारणसे होनेवाले भय- दथवान्यकृताद्भयात् ॥" | इनमेंसे किसीसे भी नहीं डरता", "न जायते न म्रियते "परमात्मा न उत्पन्न होता है, न न वध्यो न च घातकः। मरता है, न मारा जाता है और न न बध्यो बन्धकारीवा मारता है, वह न तो बाँधा जानेवाला न मुक्तो न च मोक्षदः॥ है और न बाँधनेवाला है तथा न मुक्त पुरुषः परमात्मा तु है और न मोक्षप्रद ही है, उससे यदतोऽन्यदसच्च तत् ।" | भिन्न जो कुछ है वह असत् ही है ।" आत्माका . ध्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ - एवं श्रुतिस्मृतीतिहासादिषु इस प्रकार श्रुति, स्मृति और इतिहासादिमे ज्ञान ही मोक्षका ज्ञानस्यैव मोक्षसाधनत्वावगमा- साधन जाना जाता है, अतः इस [ज्ञान-साधक] उपनिपदको आरम्भ युज्यत एवोपनिपदारम्भः। करना उचित ही है। किंचोपनिपत्समाख्ययैव ज्ञान इसके सिवा उपनिषद् नामसे उपनिषत्समाव- स्यैव परमपुरुपार्थ- भी ज्ञानका ही परमपुरुषार्थमे साधन होना जाना जाता है। जाननेका यापि शानस्य परम- साधनत्वमव- पुग्पार्थसाधनत्वन् गम्यते । तथा हि- | प्रकार यह है-'उपनिषद्'-यह उप और नि उपसर्गपूर्वक विशरण, उपनिपदित्युपनिपूर्वस्य सदेर्वि- विनाश, गति और अवसादन ( अन्त ) अर्थवाले सद् धानुका शरणगत्यवसादनार्थस्य रूपमा- रूप बतलाया जाता है । , उपनिषद चक्षते । उपनिपच्छन्दन व्याचि- शब्दसे, हम जिस ग्रन्यकी व्याख्या करना चाहते है उनके द्वारा प्रतिपाद्य ख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवस्तुविपया वस्तुको विषय करनेवाले ज्ञानका विद्योच्यते । तादाद्ग्रन्थोऽप्यु- कथन होता है । उस ज्ञानकी प्रामि ही इसका प्रयोजन है इसलिये यह पनिपत । ये मुमुक्षवो दृष्टानु- ग्रन्थ भी उपनिषद् कहा जाता है | अविकविपयवितृष्णाः सन्त उप- जो मोक्षकामी पुरुप दृष्ट और श्रुत विषयसे विरक्त हो उपनिषद् शब्दमे निपच्छब्दितविद्यां तनिष्टतया कही जानेवाली विद्याका निश्चयपूर्वक तत्परतासे अनुगाटन करते हैं निश्चयेन शीलयन्ति तेपाम- उनकी संसारकी बीजभूना अविद्यादि- विद्यादेः मंसाग्वीजस विशरणा- का विशरण-विनाय हो जाने कारण, उन्हें परब्रह्मक पास टे. द्विनागात्परब्रह्मगमयितृत्वाद- जानेके कारण और उनके जना- जन्मजगमग्णाद्युपट्यावसादायित- मरणादि उपयोका अयमादन (अन्न) अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ९ . त्वादुपनिषत्समाख्ययाप्यन्यकृता- | करनेके कारण यह उपनिषद् है; इस प्रकार नामसे भी अन्य सब त्परं श्रेय इति ब्रह्मविद्योपनिष- | साधनोकी अपेक्षा परम श्रेयस्कर होनेके कारण ब्रह्मविद्या 'उपनिषद्' दुच्यते । कही जाती है। ननु भवेदेवमुपनिषदारम्भो पूर्व०-यदि विज्ञान ही मोक्षका कर्मणामपि यदि विज्ञानस्यैव साधन होता तो इस प्रकार ( इस मोक्षसाधनत्व- मोक्षसाधनत्वं भवेत्। उद्देश्यसे ) उपनिषद्का आरम्भ मित्याक्षेतः किया जा सकता था, किन्तु ऐसी न चैतदस्ति । कर्म- बात है नहीं, क्योंकि "हमने णामपि मोक्षसाधनत्वावगमात्- सोमपान किया है, अत हम अमर "अपाम सोमममृता अभूम ।" | हो गये हैं", "चातुर्मास्ययाग करने- वालेका पुण्य अक्षय होता है" "अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिन इत्यादि बाक्योसे कमोंका भी सुकृतं भवति" इत्यादिना। मोक्षसाधनत्व स्वीकार किया गया है। न त्वेतदस्ति, श्रुतिस्मृतिविरो सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, धान्न्यायविरोधाच । क्योंकि इससे श्रुति-स्मृतियोंका उक्ताक्षेपनिरास विरोध है और यह युक्तिसे भी श्रुतिविरोधस्तावत्- विरुद्ध है । श्रुतिका विरोध तो। इस "तद्यथेह कर्मजितो लोकः प्रकार है-"जिस प्रकार यह कर्म- क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्य- द्वारा उपार्जित लोक क्षीण हो जाता जितो लोकः क्षीयते" (छा० उ० है उसी प्रकार वह पुण्यद्वारा प्राप्त ८।१।६)। "तमेवं विद्वान- लोक भी क्षीण हो जाता है", "उसीको जाननेवाला पुरुष इस मृत इह भवति" (नृसिंह पूर्व० लोकमे अमर हो जाता है", १।१६) नान्यः पन्था विद्यते- "मोक्षप्राप्तिके लिये कोई दूसरा मार्ग ऽयनाय" (श्वेता० उ०६।१५)। नहीं है", "कर्म, प्रजा अथवा धनसे .
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ "कर्मणा बध्यते जन्तु- "न कर्मणा न प्रजया धनेन नहीं, किन्हीं-किन्हीने त्यागसे ही त्यागेनके अमृतत्वमानशुः (कैव० अमरत्व प्राप्त किया है'. "जिनपर जानकी अपेक्षा निकृष्ट श्रेणीका कर्म ३)। "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञ- अवलम्बित कहा गया है वे [ सोलह रूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । ऋत्विक, यजमान और यजमानपत्नी-] एतच्छेयो येऽभिनन्दन्ति मृढा ये यज्ञके अठारह रूप अस्थिर एवं जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति" ऐसा मानकर प्रसन्न होते हैं वे फिर भी नाशवान् हैं; जो मूढ 'यही श्रेय है' (मु० उ०१।२ । ७)। "ना- जरा-मरणको प्राप्त होते हैं।" "इस संसारमें कोई नित्य पदार्थ नहीं है, स्त्यकृतः कृतेन" (मु० उ०११ अतः [अनित्य फलके साधक] २।१२)। कर्मसे हमें क्या प्रयोजन है ?" [अब स्मृतिका विरोध दिखलाते विद्यया च विमुच्यते । हैं-] "जीव कर्मसे बंधता है और तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति ज्ञानसे मुक्त हो जाता है; इसीसे पारदर्गी मुनिजन कर्म नहीं करते", यतयः पारदर्शिनः ॥ "अज्ञानरूपी मलसे पूर्ण होनेके "अनानमलपूर्णत्वात् कारण यह पुरातन जीव मलिन पुराणो मलिनः स्मृतः । माना जाता है, उस मलका क्षय नत्क्षयाह भवेन्मुक्ति- होनेसे ही इसको मुक्ति होती है, अन्यथा करोड़ो कोसे भी इसका नान्यथा कर्मकोटिभिः॥" छुटकारा नहीं हो सकता", "प्रजया कर्मणा मुक्ति "सत्पुरुषोंकी मुक्ति प्रजा, कर्म अथवा र्धनेन च मतां न हि । धनसे नहीं होती, एकमात्र त्यागमे न्यागेनकेन मुक्ति स्या ही होती है; त्याग न होनेपर तो वे भटकते ही रहते है", "कर्मका नदभावे भ्रमन्त्यहाँ ।" उदय होनेपर उसके फलमें अनुगग "कदिये कर्मफलानुगगा- होता है, अतः उमीका अनुगमन म्तयानुयन्ति न तरन्ति मृत्युम् ।” करते है. मृत्युको पार नहीं कर पाते,' - .
अध्याय १ 1 शाङ्करभाष्यार्थ "ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यं "ज्ञानके द्वारा विद्वान् नित्य न विद्यत ह्यन्यथा तस्य पन्थाः॥" प्रकाशको प्राप्त होता है, इसके सिवा उसका कोई और मार्ग नहीं "एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना है।" "इस प्रकार केवल त्रयीधर्म गतागतं कामकामा लभन्ते ।" (वैदिक कर्म ) में लगे रहनेवाले (गीता ९ । २१) सकाम पुरुष आवागमनको प्राप्त होते "श्रमार्थमाश्रमाश्चापि हैं", "वस्तुतः तो ब्राह्मणादि वणोंके वर्णानां परमार्थतः॥" ब्रह्मचर्यादि आश्रम भी केवल श्रमके "आश्रमैन च वेदैश्च ही लिये हैं", "आश्रमोंसे, वेदोंसे, यज्ञोंसे, साख्यसे, व्रतोंसे, नाना यज्ञैः सांख्यैव्रतैस्तथा। प्रकारकी भीपण तपस्याओंसे और उग्रैस्तपोभिर्विविधै- अनेकों प्रकारके दानोंसे लोग उस दर्दानैर्नानाविधैरपि । आत्माको प्राप्त नहीं कर सकते; न लभन्ते तमात्मानं किन्तु ज्ञानी उसे स्वतः प्राप्त कर लभन्ते ज्ञानिनः स्वयम् ॥" लेते हैं", "त्रयीधर्म अधर्मका ही "त्रयीधर्ममधर्मार्थ हेतु होता है, यह किपाक (सेमर) फलके समान है । हे तात ! सैकड़ों किंपाकफलसंनिभम् । दुःखोंसे पूर्ण इस कर्मकाण्डमें कुछ नास्ति तात सुखं किञ्चि- भी सुख नहीं है, अतः मोक्षके दत्र दुःखशताकुले ॥ लिये प्रयत्न करनेवाला मैं त्रयीधर्मका तस्मान्मोक्षाय यतता किस प्रकार सेवन कर सकता हूँ", कथं सेव्या मया त्रयी।" "अज्ञानरूपी बन्धनसे बँधा होनेके "अज्ञानपाशवद्धत्वा- कारण जोब अमुक्त माना गया है; दमुक्तः पुरुषः स्मृतः॥ उस बन्धनकी निवृत्ति ज्ञानसे हो ज्ञानात्तस्य निवृत्तिः स्या सकती है, जिस प्रकार कि प्रकाशसे १. यह फल देखनेमें बहुत सुन्दर होता है, परन्तु इसमें कोई सार नहीं होता। , ज्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय अज्ञानका . पदम् । प्रकाशात्तममो यथा । अन्धकारको । अन. तस्माज्ञानेन मुक्ति स्या- पूर्णतया क्षय होनेपर ज्ञानसे ही मुक्ति होती है." "त. दान, तप. दज्ञानस्य परिक्षयात् ॥ यज्ञ. सत्य, तीर्थ, आश्रम और "व्रतानि दानानि तपांसि यज्ञाः कमोग-ये सब के ही हेतु है. सत्यं च तीयांश्रमझमयोगाः। अत. अशुभ (अकल्याणकर । और अनित्य है। किन्तु ज्ञान निन्य, स्वर्गार्थमेवाशुभमधुवं च शान्तिकारक और परमार्थस्वरूप है" ब्रानं ध्रुवं शान्तिकरं महार्थम् ।।" "मनुष्य योंक द्वारा देवत्र प्राम "वर्देवत्वमामांति करता है. नपत्यासे ब्रह्मलोक , पाता तपोभिब्रह्मणः है. दानसे तरह-तरहके भोग प्राम करता है और ज्ञानसे मोक्षपद पाना दानेन विविधान्भोगा- है". "धर्मकी रल्लासे पुख्य ऊपरवा ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥' ओर जाता है और पापरज्जुसे अधो- "धर्मरचा ब्रजेध्वं गनिको प्राप्त होता है. परन्तु पापरवा बजेदधः। दोनोको ज्ञानरूप बङ्गने काट देना द्वयं ज्ञानामिना छित्त्वा है ग्रह देहाभिमानमे हित होकर शान्ति प्राम करना है". "धर्म-अधर्म विदेहः शान्तिमृच्छति ॥" दोनोका त्याग कगे नया सत्-अमन "त्यज धर्ममधर्म च दोनोहीमे मुन्न मोड लो. इस प्रकार उभे मन्यानृते त्यज। नत-असत् दोनोंकी आस्था लोडकर उभे मन्यानृते त्यक्त्वा जिन (न्यागाभिमान ) के द्वारा उनका येन त्यजमि तत्त्यज॥" त्याग करते हो उसे भी न्याग दो। एवं श्रुतिस्मृतिविगंधान्न कर्म दम प्रशार श्रुति और स्मृतियों विगंध होनेक कारणा तथा युक्ति माधनमतन्वं न्यायविगंधान । नी चिन्द्र होनेने अनन्य कर्मना नहीं है। यदि उसे कानमार माना कर्मनायनवे मोक्षम्य चतुर्विध भागा नो मोसन चार प्रकार जो टन ।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ १३ क्रियान्तर्भावादनित्यत्वं स्यात् । क्रियाओंके अन्तर्गत होनेसे अनित्य हो जायगा; क्योंकि 'जो क्रियासाध्य यत्कृतकं तदनित्यमिति कर्म- होता है वह अनित्य होता है' इस नियमके अनुसार क्रियासाध्य वस्तुकी नित्यत्वादर्शनात् । साध्यय नित्यता नहीं देखी जाती। किन्तु नित्यश्च मोक्षः सर्ववादिभिरभ्युप- मोक्षको तो सभी सिद्धान्तवालोंने नित्य माना है। चातुर्मास्ययागके गम्यते । तथा च श्रुतिश्चातुर्मा- प्रकरणमे ऐसी श्रुति भी है कि "हे मर्त्य | तू पुन. पुत्ररूपसे उत्पन्न स्यप्रकरणे प्रजामनु प्रजायसे होता है, यही तेरा अमरत्व है।" तदु, ते मामृतमिति किंच, तथा "सुकृतम्" ( अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिन. सुकृतं भवति) इस सुकृतमिति सुकृतस्याक्षयत्व- श्रुतिमे सुकृतका अक्षयत्व बतलाया गया है और 'सुकृत' शब्द कर्मके मुच्यते । सुकृतशब्दश्च कर्मणि । अर्थमे प्रयुक्त होता है। नन्वेवं तर्हि कर्मणां देवादि- इस प्रकार तो देवत्वादिकी प्राप्तिके हेतु होनेसे कर्म प्राप्तिहेतुत्वेन बन्धहेतुत्वमेव । बन्धनके ही कारण सिद्ध होते हैं ? सत्यम्, स्वतो वन्धहेतुत्व समाधान-सचमुच, वय तो वे बन्धनके ही कारण हैं। ऐसा ही मेव । तथा च श्रुतिः-"कर्मणा श्रुति भी कहती है "कर्मसे १. उत्पाद्य, विकार्य, सस्कार्य और प्राप्य-ये चार प्रकारके क्रियाफल हैं। जब कोई अविद्यमान वस्तु क्रियाद्वारा उत्पन्न की जाती है तो उसे उत्पाद्य कहते हैं, जैसे घट, पट आदि । एक वस्तुको दूसरे रूपमें परिणत करनेपर जो फल प्राप्त होता है उसे विकार्य कहते हैं जैसे हारको गलाकर उसका कङ्कण बना दिया जाय । दोषको हटाना और गुणको प्रकट कर देना संस्कार्य है जैसे किसी दर्पणको घिसकर उसका मैल हटा दिया जाय और उसमें चमक पैदा कर दी जाय । किसी अप्राप्य वस्तुको क्रियाद्वारा प्राप्त करना यह प्राप्य क्रियाफल है, जैसे गमनक्रियाके द्वारा किसी ग्रामविशेषमें पहुँचना । शका-तब
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अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ १५ . सङ्गत्यक्त्वा करोति यः। पूर्वक कर्म करता है वह जलसे लिप्यते न स पापेन कमलके पत्तेके समान [ उस कर्मके पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ शुभाशुभ फलरूप ] पापसे लिप्त कायेन मनसा बुद्धया नहीं होता", "योगीलोग फलविषयक केवलैरिन्द्रियैरपि । आसक्ति छोडकर केवल शरीर, मन, योगिनः कर्म कुर्वन्ति बुद्धि और इन्द्रियोंसे अन्तःकरणकी सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥" शुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं", "हे (गीता ५ । १०-११) कुन्तीनन्दन तुम जो कुछ भी कर्म करते "यत्करोषि यदश्नासि हो, जो कुछ खाते हो,जो कुछ [श्रौत यज्जुहोषि ददासि यत् । या स्मार्तयज्ञरूप] हवन करते हो, जो यत्तपस्यसि कौन्तेय कुछ तप करते हो और जो कुछ तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ दान देते हो वह सब मुझे अर्पण शुभाशुभफलैरेवं कर दो । ऐसा करनेसे तुम शुभाशुभ मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः। फलरूप कर्मके बन्धनसे छूट जाओगे संन्यासयोगयुक्तात्मा और संन्यासयोगसे युक्त हो जीते-जी विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥" ही कर्म-बन्धनसे मुक्त होकर देह- (गीता ९ । २७-२८) पात होनेके बाद मुझे ही प्राप्त इति । होगे', इत्यादि। तथा च मोक्षे क्रमं शुद्धयभावे इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तरपुराणमे मोक्षाभावं कर्मभिश्च तच्छुद्धिं भी मोक्षमे क्रम. चित्तशुद्धिके अभावमे मोक्ष न होना और कोंके द्वारा चित्तको दर्शयति श्रीविष्णुधर्मे- शुद्धि होना-ये सब दिखाये गये "अनूचानस्ततो यज्वा है- ''योगी पहले वेदाध्यायी, फिर यज्ञकर्ता, तत्पश्चात् कर्मसन्यासी और ततो ज्ञानित्वमभ्येति | फिर ज्ञानित्व प्राप्त करता है इस प्रकार योगीमुक्तिं क्रमाल्लभेत् ॥” • वह क्रमश मुक्तिलाभ करता है", कर्मन्यासी ततः परम् । - [ अध्याय १ श्वेताश्वतरोपनिपद् 'जबतक "अनेकजन्मसंसार- अनेकों जन्मके चिते पापसमुच्चये। सासारिक संसर्गसे सञ्चित हुआ नाक्षीणे जायते पुंसां पापपुञ्ज क्षीण नहीं होता तबतक गोविन्दाभिमुखी मतिः॥" , लोगोंकी बुद्धि भगवान्की ओर प्रवृत्त "जन्मान्तरसहस्रेषु नहीं होती।" "हजारों जन्मोंक तपोज्ञानसमाधिभिः । पीछे तपस्या. ज्ञान और समाविक नराणां क्षीणपापानां द्वारा जिनके पाप क्षीण हो गये है कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” उन्हीं लोगोंकी भगवान् कृष्णमें भक्ति "पापकर्माशयो ह्यत्र होती है। 'इस लोकमे पापकोंका संस्कार ही आत्यन्तिकी मुक्तिका महामुक्तिविरोधकृन । विरोधी है, अत. संसारसे डरनेवाले तस्यैव शमने यत्नः पुरुषको उसीके नाशका प्रयन्न कार्यः संसारभीरुणा ।।" करना चाहिये ।" "सुवर्णदानादि "सुवर्णादिमहादान- बड़े-बड़े दानोंसे, पवित्र तीथोंमे पुण्यतीर्थावगाहनः । लान करनेसे और शास्त्रानुकूल शारीरेश्च महाक्लेशैः शारीरिक महान् कप्टोके सहनसे शास्त्रोक्तैस्तच्छमो भवेत् ॥ उसका नाश हो सकता है।" "देवताश्रुतिसच्छास्त्र- "देवाराधन, श्रुति और सच्छास्त्रोके श्रवणः पुण्यदर्शनः । श्रवण, पवित्र तीर्थस्थानोंके दर्शन गुरुशुश्रूषणश्चैव और गुरुकी सेवा करनेसे भी पापका पापबन्धः प्रशाम्यति ॥" बन्धन निवृत्त हो जाता है।" याज्ञवल्क्योऽपि शुद्धयपेक्षा याज्ञवल्क्यजी भी ज्ञानमें चित्त- तत्साधनं च दर्शयति- शुद्धिकी अपेक्षा और उसके साधन "कर्तव्याशयशुद्विस्तु प्रदर्शित करते है-"ज्ञानोत्पतिकी भिक्षुकेण विशेपतः। ज्ञानोत्पत्तिनिमित्तत्वा- हेतु होनेसे भिक्षुको स्वतन्त्रता (मुक्ति) स्वतन्त्रीकरणाय च ॥ प्राप्त करनेके लिये विशेषल्पसे (याज० यतिधर्म० ६२) चित्तकी शुद्धि ही करनी चाहिये । मलिनो हि यथादर्शो जिस प्रकार मलिन दर्पणमें अपना रूपालोकस्य न क्षमः। रूप नहीं देखा जा सकता उसी अन्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ तथाविपक्वक्रण प्रकार जिसका अन्तःकरण परिपक्व आत्मज्ञानस्य न क्षमः ॥" | ( वासनारहित ) नहीं है वह आत्म- (याश० यतिधर्म० १४१) | ज्ञान प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं "आचार्योपासनं वेद रखता।” [ अब चित्तशुद्धिके साधन शास्त्रार्थस्य विवेकिता। बतलाते हैं-] "गुरुसेवा, वेद और सत्कर्मणामनुष्ठान शास्त्रके तात्पर्य का विवेचन, शुभकमों- सङ्गः सद्भिगिरः शुभाः॥ का आचरण, सत्पुरुषोंका सग, अच्छी वाणी बोलना, स्त्रीमात्रके दर्शन और स्च्यालोकालम्भविगमः स्पर्शका त्याग, समस्त प्राणियोंमे सर्वभूतात्मदर्शनम् । आत्मदृष्टि करना, परिग्रहका त्याग, त्यागः परिग्रहाणांच पुराने काषाय वस्त्र धारण करना, जीर्णकाषायधारणम् ॥ विषयोकी ओरसे इन्द्रियों को रोकना, विषयेन्द्रियसंरोध- तन्द्रा और आलस्यको त्यागना, स्तन्द्रालस्यविवर्जनम् । शरीरपरिसंख्यानं देहतत्त्वका विचार, प्रवृत्तिमें दोष- प्रवृत्तिष्वघदर्शनम् ।। दर्शन, रजोगुण और तमोगुणके नीरजस्तमसा सत्त्व- त्यागद्वारा सत्त्वगुणको बढ़ाना, किसी शुद्धिनिस्पृहता शमः । प्रकारकी इच्छा न करना और उपायोके एतैरुपायैः संशुद्ध- सत्त्वयोग्यमृती भवेत् ॥" | जिसका अन्तःकरण पवित्र हो गया (याश० यतिधर्म० १५६-१५९) है वह योगी अमृतत्व ( मोक्ष ) को "यतो वेदाः पुराणानि प्राप्त हो जाता है" "वेद, विद्योपनिषदस्तथा । पुराण, ज्ञानमय उपनिपद् , श्लोक, श्लोकाः सूत्राणि भाष्याणि सूत्र, भाष्य तथा और भी जहाँ-कहीं १. भाष्यका लक्षण इस प्रकार बताया गया है- सूत्रस्थं पदमादाय पदैः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः ।। जिसमें कि सूत्रके पदोंको लेकर तदनुकूल अन्य पद [ अर्थात् उनके पर्याय- श्वे० उ०३-४- मनोनिग्रह-इन द्वारा श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ x यच्चान्यद्वाङ्मयं कचित्॥ जो कुछ शान हैं वे सब एवं वेदानुवचनं यज्ञो वेदपाठ, यज्ञानुष्टान, ब्रह्मचर्य, तप, ब्रह्मचर्य तपो दमः। इन्द्रियदमन, श्रद्धा, उपवास और श्रद्धोपवासः स्वातन्त्र्य- स्वतन्त्रता ( दूसरे किसीकी आशा मात्मनो ज्ञानहेतवः ।।" न रखना) ये सब आत्मज्ञानके (याज्ञ० यति० १८९-१९०) साधन हैं।" तथा चाथर्वणे विशुद्धथपेक्ष इसी प्रकार अथर्ववेदीय उपनिषद्में मात्मज्ञानं दर्शयति- भी 'आत्मज्ञान चित्तशुद्धिकी अपेक्षा "जन्मान्तरसहस्रेषु रखनेवाला है' यह दिखलाते हैं- "जिस समय सहस्रोंजन्मोंके अनन्तर यदाक्षीणास्तु किल्विषाः॥ पाप क्षीण हो जाते हैं उसी समय तदा पश्यन्ति योगेन पुरुष योगके द्वारा संसारका उच्छेद संसारोच्छेदनं महत् ।।" करनेवाला [ज्ञानल्य] महान् (योगशिख०११ ७८-७९) साधन देख पाते हैं।" "जिस "यस्मिन्विशुद्धे विरजे च चित्तके शुद्ध और निर्मल हो जानेपर चित्ते य आत्मवत्पश्यन्ति यतयः जिनके दोप क्षीण हो गये हैं वे क्षीणदोषाः ।" "तमेतं वेदानु- यनिजन सम्पूर्ण भूतोंको आत्मस्वरूप वचनेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति ही देखते हैं ।" वृहदारण्यकमें भी "उस इस आत्माको ब्राह्मणगण वेद- यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन" पाठ, यज्ञ, दान, तप और उपवासके (वृ० उ०४ । ४ । २२) इति जाननेकी इच्छा करते हैं। इस बृहदारण्यके विविदिपाहेतुत्वं वाक्यद्वारा श्रुति यज्ञादिको जिज्ञासाका यज्ञादीनां दर्शयति । हेतु प्रदर्शित करती है। द्वारा वाचक शब्द ] और कुछ स्वाभिमत पद रहते हैं उसे भाष्यका लक्षण जाननेवाले 'भाष्य' मानते हैं।
अध्याय १7 शाङ्करभाष्यार्थ है ननु “विद्यां चाविद्यां च पूर्व०-किन्तु "जो विद्या (ज्ञान) कर्मणामप्य- यस्तद्वेदोभय सह" और अविद्या ( कर्म ) इन दोनोको मृतत्वहेतुत्वम् (ईशा० उ०११)। साथ-साथ जानता है", "तप और "तपो विद्या च विप्रस्य नैःश्रेय- ज्ञान ये ब्राह्मणके निःश्रेयसके उत्कृष्ट सकरं परम् ।” इत्यादिना कर्मणाम- कोंका भी अमृतत्वकी प्राप्तिमे हेतु साधन हैं" इत्यादि वाक्योसे तो प्यमृतत्वप्राप्तिहेतुत्वमवगम्यते । होना जान पड़ता सत्यम्, अवगम्यत एच तद- सिद्धान्ती-ठीक है, जान तो तच्च तदपे- पेक्षितशुद्धिद्वारेण न पडता ही है, परन्तु ज्ञानके लिये क्षितशुद्विद्वारेण च साक्षात् । तथा अपेक्षित चित्तशुद्धिके द्वारा ही कर्मका न साक्षात् हि-"विद्यां चाविद्यां अमृतत्वमे हेतुत्व है, साक्षात् नहीं । च" (ईशा० उ० ११)। "तपो इसीसे “विद्या चाविद्या च" तथा विद्या च विप्रस्य नैःश्रेयसकरं | "तपो विद्या च विप्रस्य नै.श्रेयसकर परम्।" इत्यादिनाज्ञानकर्मणोनिः- परम्" इत्यादि वाक्योंसे ज्ञान और श्रेयसहेतुत्वमभिधाय कथमनयो- | कर्मका निःश्रेयसमे हेतुत्व बतलाकर स्तद्धेतुत्वमित्याकालायां "तपसा ऐसी जिज्ञासा होनेपर कि ये किस कल्मषं हन्ति विद्ययामृतमश्नुते।" प्रकार उसके हेतु हैं-"तपसा कमपं "अविद्यया मृत्यु ती विद्यया- हन्ति विद्ययामृतमश्नुते"* और "अविद्यया मृत्युं तीर्ला विद्ययामृत- मृतमश्नुते" (ईशा० उ० ११) मश्नुते"। इन वाक्यशेपोसे कर्मका इतिवाक्यशेषेण कर्मणः कल्मष- पापक्षयमें कारणत्व और ज्ञानका क्षयहेतुत्वं विद्याया अमृतप्राप्ति- अमृतत्वप्राप्तिमें हेतुत्व प्रदर्शित किया हेतुत्वं प्रदर्शितम् । यत्र तु है । और भी जहाँ कहीं शुद्धि आदि शुद्धथाद्यवान्तरकार्यानुपदेशस्त- अन्य कर्मोका उपदेश दिखायी न त्रापि शाखान्तरोपसंहारन्यायेनो- दे वहाँ भी शाखान्तरोपसहारन्यायसे * तपसे पाप नष्ट करता है और ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता है । + कर्मसे [ संसाररूप ] मृत्युको पार करके ज्ञानसे अमृतत्व प्राप्त करता *जहाँ एक ही जातिके वर्म या उपासनाका वेदकी विभिन्न भाखाओंमें वर्णन है।
२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ . 3 । पसंहारः कर्तव्यः। उसका उपसंहार (संग्रह ) कर लेना चाहिये। ननु "कुर्वन्नेवेह कर्माणि पूर्व०-किन्तु "कर्म करते हुए विद्याया जिजीविपेच्छत ही सौ वर्पतक जीवित रहनेकी मोक्षसाधनत्व- इच्छा करें" ऐसा जीवनपर्यन्त माक्षिपति समा" (ईशा० उ० कर्मानुष्टानका नियम रहते हुए ज्ञान २) इति यावज्जीवकर्मानुष्ठाननियमे | मोक्षका साधन कैसे माना जा सतिकथं विद्याया मोक्षसाधनत्वम् ? सकता है ? उच्यते-कर्मण्यधिकृतस्यायं सिद्धान्ती-बतलाते हैं, यह नियम कर्माधिकारीके ही लिये है, आक्षेप नियमो नानधिकृत- परिहरति जो कर्मके अधिकार और शास्त्राज्ञासे स्यानियोज्यस्य ब्रह्मवादिनः। तथा बाहर है उस ब्रह्मवेत्ताके लिये नहीं च विदुपः कर्मानधिकारं दर्शयति है । इसी प्रकार श्रुति भी ब्रह्मवेत्ताको कर्मके अधिकारसे वाहर दिखाती है- श्रुतिः-'नैतद्विद्वानृषिणा विधेयो "यह ब्रह्मवेत्ता ऋपियोंकी आजाके न रुध्यते विधिना शब्दचारः।" अधीन नहीं है और न यह शास्त्रका "एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांसो- अनुयायी होकर उसकी आज्ञासे रुक ऽग्निहोत्रं न जुहवाञ्चक्रिरे।" "एतं ही सकता है," "इसीलिये पूर्ववर्ती वै तमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः विद्वान् अग्निहोत्र नहीं करते थे," "इस आत्मतत्त्वको जान लेनेपर पुत्रैपणायाश्च वित्तैपणायाश्च लोकै- ब्राह्मणलोग पुत्रैषणा, वित्तपणा और षणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्य लोकैपणाको छोडकर भिक्षाचर्या हो, किन्तु शास्त्रभेदसे उनके फल या अनुष्ठानकी शैलीमे भेद दिखायी दे वहाँ अन्य शाखामें आये हुए अधिक अंशको सम्मिलित करके न्यूनताकी पूर्ति कर लेनी चाहिये। इसे शाखान्तरोपसंहारन्याय कहते है। इसका विगढ वर्णन ब्रह्मसूत्रभाष्यके तृतीय अध्यायके तृतीय पादमें देखना चाहिये।
अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ २१ " चरन्ति" (बृ० उ०३।५।१) करते थे,' "ब्रह्मवेत्ता कावपेय "एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहु- ऋषियोंने भी यही कहा है हम किस प्रयोजनके लिये अध्ययन करें ऋषयः कावषेयाः किमर्था वय- और किस उद्देश्यकी पूर्ति के लिये यज्ञ मध्येण्यामहे किमर्था वयं यक्ष्यामहे | करें ? वह किस प्रकार ब्रह्मनिष्ठ हो स ब्राह्मणः केन स्यायेन स्यात्ते- सकता है, जिस प्रकार भी हो ऐसा ( सर्वत्यागी ) ही होगा।" जैसा नेश एवेति।"यथाह भगवान्- कि श्रीभगवान् भी कहते हैं- "यस्त्वात्मरतिरेव स्या- "जो पुरुष आत्मामे ही प्रेम दात्मतृप्तश्च मानवः । करनेवाला, आत्मामे ही तृप्त आत्मन्येव च संतुष्ट- और आत्मामे ही सन्तुष्ट है, उसके स्तस्य कार्य न विद्यते ॥ लिये कुछ भी कर्त्तव्य नहीं है । उस नैव तस्य कृतेनार्थों पुरुषका इस लोकमें कर्म करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है और कर्म न नाकृतेनेह कश्चन । करनेसे यहाँ उसे प्रत्यवाय आदि अनर्थकी भी प्राप्ति नहीं होती न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥" तथा सम्पूर्ण भूतोमे उसका कोई अर्थ- व्यपाश्रय ( अर्थसिद्धिका सहारा ) (गीता ३ । १७-१८) | भी नहीं है ।" तथा चाह भगवान्परमेश्वरो लिनपुराणमे कालकूटोपाख्यानमें लैङ्गे कालकूटोपाख्याने- ऐसा ही भगवान् महेश्वर भी कहते "ज्ञानेनतेन विप्रस्य हैं- "हे द्विजेन्द्रगण ! इस ज्ञानके त्यक्तसङ्गस्य देहिनः। द्वारा निःसंग हुए जीवको कोई कर्तव्यं नास्ति विप्रेन्द्रा कर्तव्य नहीं रहता, यदि रहता है अस्ति चेत्तत्त्वविन्न च ॥ तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है। उसे इस इह लोके परे चैव कर्तव्यं नास्ति तस्य वै। लोक और परलोकमें भी कोई कर्तव्य जीवन्मुक्तो यतस्तु स्या- नहीं है, क्योंकि वास्तवमें ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मवित्परमार्थतः तो जीते हुए ही मुक्त हो जाता है।
२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ तनुग्रहः॥ ज्ञानाभ्यासरतो नित्यं विरक्तो ह्यर्थवित्स्वयम् । कर्तव्यभावमुत्सृज्य ज्ञानमेवाधिगच्छति ॥ वर्णाश्रमाभिमानी य- स्त्यक्त्वा ज्ञानं द्विजोत्तमाः। अन्यत्र रमते मूढः सोऽज्ञानी नात्र संशयः॥ क्रोधी भयं तथा लोमो मोहो भेदो मदस्तमः । धर्माधमौ च तेषां हि तशाच शरीरे सति चै क्लेशः सोऽविद्यां संत्यजेत्ततः। अविद्यां विद्यया हित्वा स्थितस्येवेह योगिनः॥ क्रोधाद्या नाशमायान्ति धर्माधर्मों च नश्यतः। तत्क्षयाच शरीरेण न पुनः संप्रयुज्यते॥ स एव मुक्त संसारा- दुःखत्रयविवर्जितः" तथा . शिवधर्मोत्तरे- "ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः॥ नैवास्ति किञ्चित्कर्तव्य- मस्ति चेन्नस तत्ववित् परमार्थतत्वको जाननेवाला ज्ञाना- भ्यासमें तत्पर विरक्त पुश्य कर्तव्यकी चिन्ता छोड़कर केवल ज्ञानहीको प्राप्त करता है । हे द्विजश्रेष्ट ! जो वर्णाश्रमाभिमानी पुरुप ज्ञानदृष्टिको त्यागकर मोहवश कहीं अन्यत्र सुख मानता है वह अज्ञानी है, इसमें सन्देह नहीं । क्रोध, भय, लोभ, मोह, मेददृष्टि, मद, अज्ञान और धर्माधर्म-ये सब ऐसे लोगोको ही प्राप्त होते हैं और इनके अधीन होनेपर देह धारण करना पड़ता है । तया शरीरके रहते हुए क्लेश अवश्यम्भावी है। अतः जीवको अविद्याका त्याग करना चाहिये । जो योगी विद्याद्वारा अविद्याका त्याग करके स्थित है उसके क्रोधादि दोप तथा धर्म और अधर्म इस लोकमें रहते हुए ही नष्ट हो जाते हैं। उनका क्षय होनेपर उसका फिर शरीरसे संयोग नहीं होता, तथा वही त्रिविध तापसे छूटकर संसारसे मुक्त हो जाता है।" तथा शिवधर्मोत्तरमें कहा है- "जो योगी ज्ञानामृतसे तृप्त होकर कृतकृत्य हो गया है उसके लिये कोई कर्त्तव्य नहीं रहता, और यदि रहता है तो वह तत्त्ववेत्ता नहीं है।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ २३ लोकद्वयेऽपि कर्तव्यं उसे दोनों लोकोमें कोई कर्त्तव्य नहीं किञ्चिदस्य न विद्यते । रहता वह सर्वथा पूर्ण और समदर्शी इहैव स विमुक्तः स्या होनेके कारण इस लोकमे ही मुक्त सम्पूर्णः समदर्शनः॥" हो जाता है।" तस्माद्विदुषः कर्तव्याभावाद अतः विद्वान्के लिये कोई कर्तव्य न होनेके कारण 'कर्म विद्यावद्विषय एवायं कुर्वन्नेवे- करता हुआ ही सौ वर्ष जीनेकी त्यादिकर्मनियमः । कुर्वन्नेवेति इच्छा करे' इत्यादि रूपसे कर्म करनेका नियम केवल अज्ञानियोंके च नायं कर्मनियमः किन्तु विद्या- ही लिये है । अथवा यह समझना चाहिये कि 'कुर्वन्नेव' इत्यादि वाक्य माहात्म्यं दर्शयितुं यथाकामं कर्मका नियामक नहीं है, कर्मानुष्ठानमेव द्रष्टव्यम् । एतदुक्तं उद्देश्यसै [ज्ञानीके लिये] स्वेच्छानुसार अपि तु ज्ञानकी महिमा दिखानेके भवति-यावज्जीवं. यथाका कर्मानुष्ठान प्रदर्शित करनेके लिये ही है । इसके द्वारा यह बतलाया पुण्यपापादिकं कुर्वत्यपि विदुषि गया है कि विद्वान् स्वेच्छासे जीवन- नकलेपो भवति विद्यासामर्थ्या- पर्यन्त पुण्य-पापादिरूप कर्म करता भी रहे तो भी ज्ञानके सामर्थ्यसे उसे दिति । तथा हि-"ईशावास्य- उन कोका लेप नहीं होगा। तात्पर्य यह है कि 'ईशावास्यमिदर मिद सर्वम्" (ईशा० उ० १) सर्वम्' यहाँसे लेकर 'तेन त्यक्तेन इत्यारभ्यतेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः" भुञ्जीथाः' इस प्रथम मन्त्रसे सर्वकर्म- परित्यागपूर्वक आत्मरक्षाका प्रतिपादन (ईशा० उ० १) इति विदुषः करनेपर वेद यह देखकर कि जिसके सर्वकर्मत्यागेनात्मपालनमुक्त्वा- लिये कोई भी विधि नहीं की जा सकती ब्रह्मवेत्ताके लिये नियोज्ये ब्रह्मविदि त्यागकर्तव्य- सर्वकर्मपरित्यागका विधान करना भी उस श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ पापादि रूप वैठनेकी आवश्य- तोक्तिरप्ययुक्तवोक्तति मत्वा अनुचित ही है, चकित हुआ; अतः चकितः सन्वेदो विदुपस्त्याग- | यह दिखानेके लिये कि मैंने विद्वान्के कर्तव्यतामपि नोक्तवान् । कुर्व- लिये कर्मत्यागकी भी विधि नहीं की न्नेवेह लोके विद्यमानं है, यह कहा है कि ज्ञानी इस पुण्य- लोकमे आजीवन यथाप्राप्त पुण्य- पापादिकं कर्म यावज्जीवं जिजी- कर्म करता हुआ विषेत् । न पुण्यादिवन्धभयात्पु-जीनेकी इच्छा करे; उसे पुण्यादि ण्यादिकं त्यक्त्वा तूप्णीमवतिष्ठेत। फलके वन्धनके भयसे पुण्यादिको त्यागकर चुपचाप एवं तावत्कर्माणि कुर्वत्यपि कता नहीं है ।* क्योकि इस प्रकार विदुपि त्वयीतो यावजीवानुष्ठाना- यावज्जीवन कर्म करते रहनेपर भी दन्यथाभावः स्वरूपात्प्रच्युतिः | तुझ ब्रह्मवेत्ताका अन्यथाभाव- पुण्यादिनिमित्तसंसारान्वयो ना- खरूपच्युति अर्थात् पुण्यादिके कारण होनेवाला संसारका ससर्ग नहीं हो स्ति । अथवेतः कर्मानुष्ठानोत्तर- सकता । अथवा 'इत.' यानी कालभाव्यन्यथाभावः संसारान्वयो कर्मानुष्टानके पीछे होनेवाला अन्यथा- भाव-संसारका संसर्ग नहीं हो नास्ति । यस्मात्त्वयि विन्यस्तं सकता । क्योंकि तुझ ब्रह्मवेत्तामें न कर्म लिप्यते । तथा च श्रुत्य- स्थापित कर्म लिप्त (संपृक्त) नहीं न्तरम् - "न लिप्यते कर्मणा होता । ऐसी ही अन्य श्रुतियां भी पापकेन" (वृ० उ०४।४।२३)। हैं—'ज्ञानी पापकोंसे लिप्त नहीं * ज्ञानीमें कर्तृत्वाभिमान नहीं होता और न उसकी भोगदृष्टि ही होती है । इसलिये किसी भी प्रकारकी वासना न रहनेके कारण वह न तो पुण्यफलकी प्राप्तिके लिये पुग्यकोंमें ही प्रवृत्त होता है और न आसक्तिवश पापकर्म ही करता है। उसके प्रारब्धानुसार उससे जो कर्म होते हैं उनसे अन्य पुरुपोंका जो इष्ट या अनिष्ट होता है उसके कारण वे उनमें पुण्य या पापका आरोप कर लेते हैं । इसलिये उन्हींकी दृष्टिसे यहाँ ज्ञानीके कमाको पुण्य-पाप विगेपोंसे विशेषित किया है ! यदि अपने द्वारा होते हुए कमामें ज्ञानीकी पुण्य-पापदृष्टि रहेगी तो यह असम्भव है कि उसे उनका फल न भोगना पड़े । पुण्य-पापदृष्टि तो जीवक्री होती है और ज्ञानीमें जीवत्वका अत्यन्ताभाव होता है ।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ २५ "एवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते" होता" "इस प्रकार जाननेवालेको (छा० उ०४। १४ ३)। पापकर्मका संसर्ग नहीं होता", "उसे "नैनं कृताकृते तपतः” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) । “एवं पुण्य-पाप सन्ताप नहीं दे सकते', हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते" | "इसी प्रकार इसके समस्त पाप नष्ट (छा०उ०५।२४।३)। हो जाते हैं।" लैङ्गे- लिङ्गपुराणमें कहा है.-"इसी "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त कोको भस्म भस्मसात्कुरुते तथा ॥ कर देता है । इसमें सन्देह नहीं कि ज्ञानिनः सर्वकर्माणि ज्ञानीके समस्त कर्म जीर्ण हो जाते जीर्यन्ते नात्र संशयः। हैं, वह नाना प्रकारके पाप-पुण्यो से क्रीडन्नपि न लिप्येत क्रीडा करता हुआ भी उनसे लिप्त पापैर्नानाविधैरपि ।" नहीं होता।" शिवधर्मोत्तरेऽपि- शिवधर्मोत्तरमें भी कहा है- "तस्माज्ज्ञानासिना तूर्ण- "अतः वह तुरन्त ही सकाम या मशेष कर्मबन्धनम् । निष्कामभावसे किये हुए सम्पूर्ण कर्मबन्धनको ज्ञानरूप खड्गसे कामाकामकृतं छित्त्वा काटकर शुद्ध हो अपने आत्मामे शुद्धश्चात्मनि तिष्ठति ।। स्थित हो जाता है। जिस प्रकार यथा वह्निर्महान्दीप्तः अत्यन्त प्रज्वलित हुआ अग्नि सूखे और गीले सब प्रकारके इन्धनको शुष्कमाई च निर्दहेत् । जला डालता है उसी प्रकार ज्ञानाग्नि तथा शुभाशुभं कर्म एक क्षणमें ही समस्त शुभाशुभ ज्ञानाग्निर्दहते क्षणात् ।। कमोंको भस्म कर देता है। जिस पद्मपत्रं यथा तोयैः प्रकार कमलका पत्ता अपने ऊपर पड़े हुए जलसे भी लिप्त नहीं होता, स्वस्थैरपि न लिप्यते । उसी प्रकार ज्ञानी प्रारब्धवश अपनेको शब्दादिविषयाम्भोमि- प्राप्त हुए शब्दादि विपयरूप जलसे - [ अध्याय १ श्वेताश्वतरोपनिषद् २६ स्तद्वज्ज्ञानी न लिप्यते ॥ लिप्त नहीं होता। जिस प्रकार यद्वन्मन्त्रवलोपेतः मन्त्रवलसे सम्पन्न हुआ पुरुष सर्पोके क्रीडन्सन दश्यते। साथ खेलते रहनेपर भी उनके द्वारा क्रीडन्नपि न लिप्येत नहीं डसा जाता उसी प्रकार ज्ञानी तद्वदिन्द्रियपन्नगैः॥ इन्द्रियरूप सोंके साथ क्रीडा करते मन्त्रौषधिवलयद्व- रहनेपर भी उनसे लिप्त नहीं होता। जीर्यते भक्षितं विषम् । जिस प्रकार खाया हुआ विपं भी मन्त्र और ओपधिके सामर्थ्य से पच तद्वत्सर्वाणि पापानि जाता है उसी प्रकार ज्ञानीके सारे जीर्यन्ते ज्ञानिनः क्षणात् ।।" | पाप एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ।" तथा च सूत्रकारः-"पुरुषा तथा सूत्रकार भगवान् व्यासजीने स्वामिमतन्त्र- र्थोऽतः शब्दादिति भी "पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति कृन्मतोपन्यात. बादरायणः" (७० वादरायण.” इस सूत्रसे ज्ञानको ही ३ । ४ । १) इति सू० ज्ञानस्यैव परमपुरुषार्थहेतुत्वमभि- परमपुरुषार्थका हेतु बतलाकर फिर धाय 'शेषत्वात्पुरुषार्थवादो "शेयत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति १. स्वतन्त्र साधनभूत इस (औपनिषद आत्मज्ञान ) से मोक्षरूप पुरुषार्थ सिद्ध होता है, क्योंकि इसमें [ 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यादि ] श्रुति प्रमाण है- ऐसा वादरायणाचार्यका मत है। २. इस सूत्रका विशद अर्थ इस प्रकार है-जैसे 'व्रीहिभिर्यजेत' इस व्रीहियागमें करणभूत ब्रीहिके साथ ही उसका प्रोक्षण आदि भी यज्ञका अङ्ग माना जाता है उसी प्रकार आत्मा कर्तृल्पसे यज्ञ आदि कर्मका अंग होनेके कारण उसका ज्ञान भी उस कर्मका अङ्ग ही है । अतः आत्मज्ञानके महान् फलको बतानेवाली 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यादि श्रुति शेषत्वात्-यज्ञादि काँका अङ्ग होनेके कारण पुरुषार्थवाद है अर्थात् पुत्य [ आत्मा ] की प्रशंसाके लिये अर्थवाद- मात्र है। जिस प्रकार कि अन्यान्य द्रव्यसंस्कारसम्बन्धी कोमें फलश्रुति अर्यवाद मानी जाती है । उदाहरणके लिये निम्नाङ्कित्त श्रुति है-'यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति' (जिसकी पलाशकी 'जुहू' होती है वह कभी पापमय यगका श्रवण नहीं करता ) यह फलश्रुति यज्ञसम्बन्धिनी जुहूसे सम्बन्ध रखनेवाले पलाशकी प्रशंसा करनेसे यज्ञकी ही अद्भभूत है; अतः यज्ञशेष होनेसे अर्थवाद मानी अध्याय १1 शाङ्करभाष्यार्थ २७ यथा .” (ब्र० सू०३।४।२) जैमिनिः” इस सूत्रसे जैमिनिके इत्यादिना कर्मापेक्षितकर्तप्रति- मतानुसार कर्ममे अपेक्षित कर्ताका पादकत्वेन विद्यायाः कर्मशेषत्व- प्रतिपादन करनेवाली होनेसे विद्याके कर्मशेषत्वकी आशङ्का कर "अंधिको- माशङ्क्य "अधिकोपदेशात्तु बा- पदेशात्तु बादरायणस्यैवं तदर्शनात्" दरायणस्य.." (ब्र० सू० ३। इस सूत्रसे यह बतलाया है कि ४।८) इत्यादिना कर्तृत्वादि- | विद्या कर्तृत्वादि सासारिक धमोंसे रहित निष्पापादिरूप ब्रह्मका प्रतिपादन संसारधर्मरहितापहतपाप्मादिरूप- करती है, इसलिये जो पुरुष उसके ब्रह्मोपदेशात्तद्विज्ञानपूर्विकां तु ज्ञानपूर्वक कर्माधिकारकी सिद्धिकी कर्माधिकारसिद्धिं त्वाशासानस्थ आशा रखता है उसके कर्माधिकारके कर्माधिकारहेतोः क्रियाकारकफल- हेतुभूत अविद्याजनित क्रिया, कारक एवं फलरूप समस्त संसारके स्वरूपका लक्षणस्य समस्तस्य प्रपञ्चस्या- | विद्याके प्रभावसे विनाश देखा जानेके विद्याकृतस्य विद्यासामर्थ्यात्स्व- कारण कर्माधिकारके उच्छेदका रूपोपमर्ददर्शनात्कर्माधिकारोच्छि- प्रसग उपस्थित होनेसे तथा कर्म और ज्ञानके भिन्न-भिन्न प्रकरण त्तिप्रसङ्गाद्भिन्नप्रकरणत्वाद्भिन्न- और भिन्न-भिन्न कार्य देखे जानेके कार्यत्वाच परस्परविकल्पः समु- कारण उनका आपसमें विकल्प, गयी है । ऐसा जैमिनिका मत है । अभिप्राय यह कि यज्ञादिका कर्ता और भोक्ता ससारी जीव ही शरीर छूटनेपर आत्मा या परात्मा शब्दसे कहा गया है । जो संसारी जीव है उसीके ज्ञानका महत्त्व वेदान्तमें बताया गया है । इस मतमें ईश्वरका अस्तित्व नहीं स्वीकार किया गया है । १. जैमिनिके पूर्वोक्त मतका खण्डन करते हुए कहते हैं—'अधिकोपदेशात्तु' इत्यादि । यदि कर्ता भोक्ता संसारी जीवका ही उपनिषद्की श्रुतियोंमें उपदेश किया गया होता तो उक्तरूपसे की हुई फलश्रुति अवश्य ही अर्थवाद हो सकती थी किन्तु वहाँ तो संसारी जीवकी अपेक्षा बहुत ही उत्कृष्ट असंसारी परमेश्वरका वेद्यरूपसे उपदेश किया गया है, इसलिये मुझ बादरायणका [आत्मज्ञानसे मोक्षरूप पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इत्यादि ] पूर्वोक्त मत ज्यों-का-त्यों ठीक ही है, क्योंकि 'यः सर्वज्ञ सर्ववित्' इत्यादि श्रुतियोंमें उस उत्कृष्ट परमात्माके स्वरूपका उपदेश देखा जाता है ।
२८ श्वेताश्वतरोपनिपद [ अध्याय १ " चयोऽङ्गाङ्गिभावो वा नास्तीति समुच्चय अथवा अगाङ्गिभाव कुछ भी प्रतिपाद्य "अत एव चाग्नीन्धना- नहीं हो सकता *-ऐसा प्रतिपादन करके "अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा" धनपेक्षा" (७० सू० ३।४ । इस सूत्रसे 'विद्या ही परमपुरुषार्थकी हेतु २५) इति विद्याया एव परम- होनेके कारण वह अपने प्रयोजनकी पुरुषार्थहेतुत्वादग्नीन्धनाद्याश्रम- पूर्तिमें अग्नि-इन्धनादिसे निष्पन्न होने- वाले आश्रम-कर्माकी अपेक्षा नहीं कर्माणि विद्यायाः स्वार्थसिद्धौ रखती' इस प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके नापेक्षितव्यानीति पूर्वोक्तस्याधि- फलका उपसंहार कर ज्ञानप्राप्सिमें करणस्य फलमुपसंहृत्यात्यन्तमे- | कर्मकी अत्यन्त अनपेक्षा प्राप्त होनेपर वानपेक्षायां प्राप्तायां "सर्वापेक्षा "सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्" इस सूत्रसे यह बतलाया है कि च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्" (व० कर्मकी बिल्कुल ही अपेक्षा न हो- सू० ३।४ । २६) इति नात्य- ऐसी बात नहीं है, अपि तु विद्या उत्पन्न हो जानेपर ही अपने फलकी न्तमनपेक्षा । उत्पन्ना हि विद्या सिद्धिमे किसी वस्तुकी अपेक्षा नहीं फलसिद्धिं प्रति न किश्चिदन्यद- रखती, अपनी उत्पत्तिमें तो उसे पेक्षते । उत्पत्तिं प्रत्यपेक्षत एव । कर्मकी अपेक्षा है ही, क्योंकि * वेदमें कर्मकाण्ड और जानकाण्ड ये दोनों अलग-अलग हैं तथा ज्ञानसे मोक्ष और कर्मोंसे स्वर्गादिकी प्राप्ति होती है। इसलिये इनके फल भी अलग-अलग हैं । अतः इन दोनोंका परस्पर न तो विकल्प (एक ही प्रयोजनके लिये दोनों से किसी एकका अनुष्ठान ), न समुच्चय ( दोनोंका एक साथ अनुष्ठान ) और न अङ्गाङ्गिभाव (एकका दूसरेके अन्तर्गत होना) ही हो सकता है । १. [ क्योकि ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र पुरुषार्थरूप है ] इसीलिये उसमे अग्नि- इन्धन आदि [ आश्रमविहित कर्मों ] की अपेक्षा नहीं है। २. विद्या अपनी उत्पत्तिमें योग्यतावश सभी आश्रम-कर्मोकी अपेक्षा रखती है। जैसे योग्यतानुसार अश्वका उपयोग होता है । इस विषयमें 'तमेत वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति यज्ञेन' इत्यादि श्रुति प्रमाण है, [अर्थात् जैसे घोड़ा रथमें ही जोता जाता है हलमें नहीं उसी प्रकार विद्या अपनी उत्पत्तिमें कर्मोकी अपेक्षा रखती है;
२९ अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ "विविदिषन्ति यज्ञेन" इति “यज्ञके द्वारा आत्माको जानना चाहते है" इस श्रुतिसे वेदने श्रुतेरिति विविदिषासाधनत्वेन जिज्ञासाके साधनरूपसे कर्मोका कर्मणामुपयोगं दर्शितवान् । तथा उपयोग दिखलाया है। तथा इसके आगे "नाविशेषात्" और "स्तुतयेऽनु- च "नाविशेषात्" (ब्र० सू० ३। मतिर्वा" इन दो सूत्रोद्वारा "कुर्वन्नेवेह ४ । १३) "स्तुतयेऽनुमतिर्वा" कर्माणि" इस श्रुतिके दो प्रकारसे (ब्र० सू० ३।४।१४) इति- अर्थ दिखलाये हैं—पहला यह कि सूत्रद्वयेन कुर्वन्नेवेतिमन्त्रस्यावि- 'यह 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि मन्त्र अज्ञानी- के लिये है।' तथा दूसरा अर्थ यह है द्वद्विषयत्वेन विद्यास्तुतित्वेन कि यह मन्त्र विद्या ( ज्ञान ) की चार्थद्वयं दर्शितवान् । अत उक्तन स्तुतिके लिये है। इसलिये उक्त प्रकारेण ज्ञानस्यैव मोक्षसाधन- होने के कारण आगेकी उपनिषद्को प्रकारसे ज्ञान ही मोक्षका साधन त्वाद्युक्तः परोपनिषदारम्भः। आरम्भ करना उचित ही है । ननु बन्धस्य मिथ्यात्वे सति पूर्व०-यदि जीवका मिथ्या होता तो वह ज्ञानसे निवृत्त शानादमृत- ज्ञाननिवर्त्यत्वेन होनेयोग्य हो सकता था और त्वेऽनुपपत्ति- ऐसी अवस्थामें ज्ञानसे अमृतत्वकी दर्शनम् ज्ञानादमृतत्वं प्राप्ति हो सकती थी; किन्तु ऐसी बात है नहीं; क्योंकि बन्धन स्यात् । न त्वेतदस्तिः प्रति- प्रत्यक्षसिद्ध इसका नहीं होता और युष्मदस्मदादि पन्नत्वाद्वाधाभावाद्युष्मदादिस्वरू- ( तू-मैं आदि ) रूपसे प्रतीत मोक्षरूप फलकी सिद्धिमें नहीं । १. [ 'विद्वान्', ऐसा ] विशेषण न होनेके कारण 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि वाक्य तत्त्वज्ञविषयक नहीं है। २. अथवा तत्त्वज्ञके लिये जो कर्मानुना है वह ज्ञानकी स्तुतिके लिये है । अर्थात् तत्त्वज्ञ होनेपर जीवनपर्यन्त कर्म करनेपर भी कर्मका लेप नहीं होता-ऐसा कहकर तत्त्वज्ञानकी स्तुति की गयी है। बन्धन है, बाध श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय १ - . पत्वेनात्मनो विलक्षणत्वे साह- ' होनेके कारण आमाका स्वरूप सबसे विलक्षण है. अतः उससे किसीका श्याघमावाद ध्यासासम्भवाच । सादृश्य न होनेके कारण उसमें किसी अन्य वल्लुका अभ्यास होना भी सम्भव नहीं है। उच्यते-न तावत्प्रतिपन्नत्वेन सिद्धान्ती-अच्छा, बतलाते हैं उत्तानुप- सत्यत्वं वक्तुं शक्यते । सुनो-] प्रत्यक्षसिद्ध होनेके पत्तिपरिहारः प्रतिपत्तेः सत्यत्व- । कारण ही वन्धनकी सत्यता नहीं मिथ्यात्वयोः समानत्वात् बतलायी जा सकती, क्योंकि नापि बाधाभावात्सत्यत्वम् प्रत्यक्षता तो सत्य और असत्य विधिमुखेन कारणमुखेन च दोनों ही प्रकारकी वस्तुओमे समान- बाधसम्भवात् । तथाहि श्रुतिः- रूपसे देखी जाती है। बाध न प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं मायाकार- णत्वं च दर्शयति “न तु तद्- होनेके कारण भी इसकी सत्यता द्वितीयमस्ति" (वृ० उ०४ । सिद्ध नहीं होती, क्योकि शास्त्रविधि ३ १२३) “एकत्वम्" "नास्ति और कारणदृष्टिसे इसका वाघ होना द्वैतम् ।" "कुतो विदिते वेद्यं सम्भव है ही। जैसे कि “उसके सिवा नास्ति" " "एकत्र ही "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ०६।२।१) "वा- है." "द्वैत नहीं है," "क्योंकि ज्ञान हो जानेपर वेद्यका अभाव हो चारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ०६।१४)।“एकमेव जाता है," "एक ही अद्वितीय है, "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला " नेह नानास्ति किञ्चन" (वृ० उ०४।४।१९)। "एक- नाममात्र है,'' "एक ही सद्वस्तु है, "यहाँ नाना कुछ भी नहीं है, धैवानुद्रष्टव्यम्" (वृ० उ० "सबको एकरूप ही देखना चाहिये, ४।४।२०) । “मायां तु प्रकृति विद्यात्॥ (श्वेता० उ०४१ "प्रकृतिको माया समझो,” "मायावी १०) "मायी सृजते विश्व- ' परमात्मा इस सम्पूर्ण प्रपञ्चको रचता मेतत् (श्वेता० उ०४।९) "इन्द्रो है," "इन्द्र ( परमात्मा ) मायासे " दूसरा कोई नहीं हैं.' सत् + अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ , मायाभिः पुरुरूप ईयते" (बृ० | अनेक रूप होकर चेष्टा करता है" उ० २।५।१९) इत्यादिभि- इत्यादि वाक्योद्वारा श्रुति प्रपञ्चका मिथ्यात्व और मायामूलकत्व प्रदर्शित क्यैः। करती है । [ श्रीमद्भगवद्गीतामें "अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भगवान् भी कहते हैं-1 "मैं भूतानामीश्वरोऽपि सन् । अजन्मा, अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोका प्रभु हूँ, तथापि अपनी प्रकृति स्वामधिष्ठाय प्रकृतिका आश्रय लेकर अपनी संभवाम्यात्ममायया ॥" | मायासे ही जन्म लेता हूँ", "वह (गीता ४ । ६) ज्ञेय प्रत्येक शरीरमें आकाशके "अविभक्तं च भूतेषु समान अविभक्त एवं एक है तो भी विभक्तमिव च स्थितम् ।" समस्त प्राणियोंमें विभक्त हुआ-सा (गीता १३ । १६) | स्थित है।" तथा च ब्राह्मे पुराणे ब्रह्मपुराणमें भी कहा है-"धर्म- अधर्म, जन्म-मृत्यु, सुख-दुःखकी सुखदुःखेषु कल्पना। कल्पना, वर्णाश्रमविभाग तथा स्वर्ग वर्णाश्रमास्तथा वासः या नरकमें रहना ये सब परमार्थ- स्वर्गो नरक एव च। स्वरूप पुरुषमें कहीं भी नहीं हैं। पुरुषस्य न सन्त्येते जिस प्रकार मरुमरीचिकारूप मृग- परमार्थस्य कुत्रचित् । तृष्णा जलवत् प्रतीत होती है, उसी दृश्यते च जगद्रूप- मसत्यं सत्यवन्मृषा ॥ प्रकार इस जगत्का असत्य खरूप तोयवन्मृगतृष्णा तु ही व्यर्थ सत्य-सा दृष्टिगोचर हो रहा यथा मरुमरीचिका। है। वास्तविक शुक्ति शुक्तिरूप ही है, रौप्यवत्कीकसं भृतं किन्तु जैसे वह चाँदीके समान कीकसं शुक्तिरेव च ॥ भासने लगती है, घरमें पड़ा हुआ सर्पवद्रज्जुखण्डश्च रस्सीका टुकड़ा जैसे रात्रिके समय निशायां वेश्ममध्यगः। सर्पवत् दिखायी देने लगता है, "धर्माधौं जन्ममृत्यू ३२ श्वेताश्वतरोपनिपद [ अध्याय १ तिमिराहतचक्षुषः ।। एकच सूर्यो परमात्मापि एक एवेन्दुह्रौं व्योनि जिसके नेत्र तिमिररोगसे पीडित है उस पुरुषको जैसे आकाशमें एक ही चन्द्रमा दो-सा दिखायी देने लगता है और जिस प्रकार [ सर्वथा आकाशस्य घनीभावो शून्यस्वरूप] आकाशमें घनीभाव, नीलत्वं स्निग्धता तथा। नीलता और स्निग्धताकी प्रतीति होती है [उसी प्रकार जगत्का रूप बहुधा मिथ्या होनेपर भी सत्य-सा जान जलाधारेषु दृश्यते ।। पड़ता है ] । जैसे एक ही सूर्य जलके अनेक आधारोंमें अनेक-सा दिखायी आमाति देता है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमे सर्वोपाधिषु संस्थितः। स्थित परमात्मा ही [उन-उन रूपोंमे ] भास रहा है । यह द्वैतभ्रान्तिरविद्याख्या अविद्यासंज्ञक द्वैतभ्रान्ति विकल्प ही विकल्पो न च तत्तथा।। है, यह यथार्थ नहीं है। परत्र बन्धागार: स्या- "जो लोग भ्रान्तिवश सर्वदा तेषामात्माभिमानिनाम् । देहको ही आत्मा समझते है उन देहाभिमानियोंका वह देह मरनेके आत्मभावनया भ्रान्त्या पश्चात् परलोकमें वन्धनका स्थान देहं भावयतां सदा॥ होता है, [ अर्थात् उन्हें पुनः देह आप्रज्ञमादिमध्यान्तै धारण करना पड़ता है । आदि, मध्य भ्रमभृतैत्रिभिः सदा। और अन्तमें जो सर्वदा भ्रमरूप ही हैं उन जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति जाग्रत्स्वमसुपुप्तैस्तु तीन अवस्थाओंसे ही विश्व, तेजस च्छादितं विश्वतेजसम् ॥ और प्राज्ञ भी आच्छादित है। यह स्वमायया स्वमात्मानं जीव अपनी द्वैतरूप मायासे स्वयं ही १. जिससे केवल शब्दका ही ज्ञान हो, किसी वस्तुका नहीं, उसे विकल्प कहते हैं, जैसे-आकाशकुसुम, शमशृङ्ग, वन्ध्यापुत्र आदि । इसी आशयका यह योगसूत्र है-'शब्दनानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प.' (१९)। - ३३ अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ अपनेको मोहग्रस्त करता है और खयं ही अपने अन्तःकरणमें स्थित अपने आत्मभूत श्रीहरिको प्राप्त करता है । जिस प्रकार आकाशमे वज्राग्नि( विजली)की अनेक प्रकारकी लपटें दिखायी देती हैं उसी प्रकार भगवान् विष्णुका स्वभाव ही द्वैतविस्ताररूप सृष्टि होकर भास रहा है । सर्वत्र सर्वदा एकमात्र भगवान् ही शान्त ( सात्त्विक ) चित्तमें शान्तरूपसे और घोर (राजस) तथा मूढ ( तामस ) चित्तमें घोर और मूढरूपसे दिखायी दे रहे हैं । किन्तु तत्त्वतः वे वैसे नहीं हैं। मोहयेद्वैतरूपया। गुहागतं स्वमात्मानं लभते च स्वयं हरिम् ॥ व्योनि वज्रानलज्वाला- कलापो विविधाकृतिः। आभाति विष्णोः सृष्टिश्च स्वभावो द्वैतविस्तरः॥ शान्ते मनसि शान्तश्च घोरे मूढे च तादृशः। ईश्वरो दृश्यते नित्यं सर्वत्र न तु तत्त्वतः॥ लोहमृत्पिण्डहेम्नां च विकारो न च विद्यते । चराचराणां भूतानां द्वैतता न च सत्यतः॥ सर्वगे तु निराधारे चैतन्यात्मनि संस्थिता। अविद्या द्विगुणां सृष्टिं करोत्यात्मावलम्बनात् ॥ सर्पस्य रज्जुता नास्ति नास्ति रजौ भुजङ्गता। उत्पत्तिनाशयो स्ति कारणं जगतोऽपि च॥ लोकानां व्यवहारार्थ- मविद्येयं विनिर्मिता। श्वे० उ०५-६ "लोहा, मृत्पिण्ड और सुवर्ण इनका भी विकार नहीं होता । जितने चराचर भूत हैं उनका भेद वस्तुतः नहीं है । सर्वगत निराधार चैतन्यात्मामें स्थित अविद्या ही आत्माके आश्रयसे स्थूल-सूक्ष्म दोनों प्रकारकी सृष्टि रचती है। जिस प्रकार सर्पमें रज्जुत्व और रज्जुमें सर्पत्व नहीं है उसी प्रकार जगत्के उत्पत्ति और नाशका भी कोई कारण नहीं है। इस अविद्याकी रचना (कल्पना) लोकव्यवहारके लिये ही हुई है।
३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ॥ न विभेति कुतश्वन ।। एपा विमोहिनीत्युक्ता यह द्वैताद्वैतस्वरूपिणी है और द्वैताद्वैतस्वरूपिणी [ संसारको मोहित करनेवाली होनेसे ] 'विमोहिनी' कही गयी है। अद्वैत भावयेब्रह्म आत्मज्ञानीको चाहिये कि वह सर्वदा सकलं निष्कलं सदा। पूर्णपरब्रह्मका निष्कल और अद्वैतरूप- आत्मज्ञः शोकसंतीर्णो से चिन्तन करे । इससे वह शोकसे पार होकर किसीसे भय नहीं करता। उसे मृत्युको सन्निधिसे, मरनेसे मृत्योः सकाशान्मरणा- अथवा किसी अन्य कारणसे होनेवाले दथवान्यकृताइयात् । भयसे भी डर नहीं लगता। न जायते न म्रियते "परमपुरुष परमात्मा न जन्म न बध्यो न च घातकः॥ देता है, न मरता है. न मारा जा न बद्धो बन्धकारी वा सकता है, न मारनेवाला है, न वद्ध न मुक्तो न च मोक्षदः। है, न वन्धनमें डालनेवाला है, न मुक्त है और न मुक्ति देनेवाला है । पुरुषः परमात्मा तु यदतोऽन्यदसच तत् ।। उससे भिन्न जो कुछ है वह असत् है। एवं वुद्ध्वा जगद्रूपं इस प्रकार भगवान् विष्णुके विश्व- रूपको मायामय और मिथ्या समझकर विष्णोर्मायामयं मृषा। सब प्रकारकी कल्पनाको त्यागकर भोगासङ्गाद्भवेन्मुक्त- भोगोंकी आसक्तिसे मुक्त हो जाय । स्त्यक्त्वा सर्वविकल्पनाम् ।। इस प्रकार समस्त विकल्पोंसे छूटकर त्यक्तसर्वविकल्पश्च मनको आत्मस्थ, निश्चल और शान्त स्वात्मस्थं निश्चलं मनः । करके योगी जिसका इंधन जल कृत्वा शान्तो भवेद्योगी चुका है ऐसे [ धूमरहित ] अग्निके दग्धेन्वन इवानलः॥ समान हो जाता है। एपा चतुर्विंशतिभेदभिन्ना "यह चौवीस भेदोवाली माया १. मावाके चौबीस मेद इस प्रकार है-एक प्रकृति ( त्रिगुणान्मिका मूला प्रकृति ), सात प्रकृति-विकृति ( महत्तत्त्व, अहंकार और पॉच तन्मात्राएँ) और सोलह विकृति (दरा इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत)।
अध्याय १ १] शाङ्करभाष्यार्थ । माया परा प्रकृतिस्तत्समुत्थौ । जगत्की मूल कारण है। उसीसे कामक्रोधौ लोभमोहौ भयं च काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, विषाद, शोक तथा अन्य विकल्पजाल उत्पन्न हुए विषादशोकौ च विकल्पजालम्॥ हैं। और उसीसे धर्म-अधर्म, सुख-दुःख धर्माधौं सुखदुःखे च सृष्टि- और सृष्टि-विनाशरूप परिणाम,नरकमे जाना, स्वर्गमें रहना, जाति, आश्रम, विनाशपाको नरके गतिश्च राग, द्वेष, तरह-तरहकी व्याधियाँ, वासः स्वर्गे जातयश्चाश्रमाश्च कुमारावस्था, तरुणता, वृद्धावस्था, रागद्वेषौ विविधा व्याधयश्च ॥ वियोग, संयोग, भोग, उपवास और व्रत प्रकट हुए हैं। इन सबको कौमारतारुण्यजरावियोग- इस प्रकार [ प्रकृतिका ही विकार ] संयोगभोगानशनव्रतानि जाननेवाला पुरुष इन्हें प्रकृतिमे स्थापित कर मौनभावसे स्थित रहता इतीदमीग्विदयं निधाय है। उसे ही तुम शुभ मतिवाला तूष्णीमासीनःसुमतिं विविद्धि॥" जानो ।” तथा तथा च श्रीविष्णुधर्मे षड- श्रीविष्णुधर्मोत्तरपुराणके ध्याय्याम्- अन्तर्गत षडध्यायीमे भी कहा "अनादिसम्बन्धवत्या है-"यह क्षेत्रज्ञ अपनेमें क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया । अनादिकालसे सम्बद्ध हुई अविद्यासे युक्तः पश्यति भेदेन युक्त होकर अपने अन्तःकरणमें स्थित ब्रह्म तत्त्वात्मनि स्थितम्॥ ब्रह्मको भेदरूपसे देखता है। जबतक पश्यत्यात्मानमन्यच जीव परमात्मासे भिन्न अपनेको तथा याव? परमात्मनः। अन्य जीवोंको देखता है तबतक वह तावत्संभ्राम्यते जन्तु- अपने कोंद्वारा मोहित होकर संसारमें मोहितो निजकर्मणा॥ भटकाया जाता है। जब इसके सम्पूर्ण संक्षीणाशेषकर्मा कर्म क्षीण हो जाते हैं तो यह शुद्ध परं ब्रह्म प्रपश्यति । परब्रह्मको अपनेसे अभिन्नरूपसे तु श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ . अभेदेनात्मनः शुद्धं शुद्धत्वादक्षयो भवेत् ॥ अविद्या च क्रियाः सर्वा विद्या ज्ञानं प्रचक्षते । कर्मणा जायते जन्तु- विद्यया च विमुच्यते॥ अद्वैतं परमार्थो हि द्वैतं तद्भिन्न उच्यते । पशुतिर्यमनुष्याख्यं तथैव नृप नारकम् ॥ चतुर्विधोऽपि भेदोऽयं मिथ्याज्ञाननिवन्धनः । अहमन्योऽपरश्चाय- ममी चात्र तथापरे॥ अज्ञानमेतद्वैताख्य- मद्वैतं श्रूयतां परम् । मम त्वहमिति प्रज्ञा- वियुक्तमविकल्पबत् ॥ अविकार्यमनाख्येय- मद्वैतमनुभूयते । मनोवृत्तिमयं मतं परमार्थतः ।। मनसो वृत्तयस्तस्मा- द्धर्माधर्मनिमित्तजाः। निरोद्धव्यास्तनिरोधे द्वैतं नवोपपद्यते॥ मनादृष्टमिद सर्व यत्किञ्चित्सचराचरम् । देखता है, और शुद्ध हो जानेके कारण यह अक्षय हो जाता है। समस्त कर्म अविद्यारूप हैं और ज्ञान विद्या कहलाता है। कर्मसे जीवको जन्म लेना पड़ता है और ज्ञानसे वह मुक्त हो जाता है । अद्वैत ही परमार्य है और द्वैत उससे भिन्न (अपरमार्थ) कहा जाता है। हे राजन् ! पशु, तिर्यक्, मनुष्य और नारकी जीव- यह चार प्रकारका मेद मिथ्या ज्ञानके ही कारण है । मैं अन्य हूँ, यह अन्य है और ये सब अन्य हैं—यही द्वैत कहलानेवाला अज्ञान है । अब अद्वैतके विषयमें श्रवण करो। "अद्वैततत्त्व मैं-मेरा, तू-तेरा आदि बुद्धिसे रहित, निर्विकप, निर्विकार और अनिर्वचनीयरूपसे अनुभूत होता है । द्वैत मनोवृत्तिरूप है, परमार्थतः अद्वैत ही तो है; अतः धर्माधर्मरूप निमित्तके कारण उत्पन्न हुई मनकी वृत्तियोंका निरोध करना चाहिये । उनका निरोध हो जानेपर द्वैतकी सिद्धि नहीं होती । यह जो कुछ चराचर जगत् है सब मनका द्वैत- ܢܝ - दृश्यमात्र है।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ मनसो ह्यमनीभावे. ऽद्वैतभावं तदाप्नुयात् ॥ कर्मणां भावना येयं सा ब्रह्मपरिपन्थिनी। कर्मभावनया तुल्यं विज्ञानमुपजायते ॥ ताहरभवति विज्ञप्ति- र्याशी खलु भावना । क्षये तस्याः परं ब्रह्म स्वयमेव प्रकाशते॥ परात्मनोर्मनुष्येन्द्र विभागोऽज्ञानकल्पितः। क्षये तस्यात्मपरयो- रविभागोऽत एव हि ॥ आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञो हि संयुक्तः प्राकृतैर्गुणः। तैरेव विगतः शुद्धः परमात्मा निगद्यते ॥" तथा च श्रीविष्णुपुराणे- "परमात्मा त्वमेवैको नान्योऽस्ति जगतः पते । तवैष महिमा येन व्याप्तमेतच्चराचरम् ॥ यदेतदृश्यते मृर्त- मेतज्ज्ञानात्मनस्तव । भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति जगद्रूपमयोगिनः ॥ मनका अमनीभाव ( नाश) हो जानेपर यह अद्वैतभावको प्राप्त हो जाता है । यह जो कोंकी भावना है वह ब्रह्मानुभवमे विघ्नरूप है, क्योंकि कमोंकी भावनाके अनुकूल ही विज्ञान प्राप्त होता है। विज्ञान तो वैसा ही होता है जैसी कि भावना होती है। अतः भावनाका नाश हो जानेपर परब्रह्मका स्वयं ही अनुभव होने लगता है । हे राजन् ! आत्मा और परब्रह्मका जो विभाग है वह अज्ञानकल्पित ही है। इसीसे उसका क्षय हो जानेपर फिर आत्मा और परब्रह्मका अभेद ही निश्चित होता है । क्षेत्रज्ञसंज्ञक आत्मा प्रकृतिके गुणोंसे युक्त है, वही उनसे रहित होकर शुद्ध होनेपर परमात्मा कहलाता है।" ऐसा ही श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा है—'हे जगत्पते ! तुम्ही एकमात्र परमात्मा हो, तुमसे भिन्न और कुछ भी नहीं है । जिससे यह चराचर जगत् व्याप्त है वह यह तुम्हारी ही महिमा है । यह जो कुछ मूर्त जगत् दिखायी देता है ज्ञानस्वरूप आपका ही रूप है। असंयमी लोग अपने भ्रमपूर्ण ज्ञानके अनुसार इसे जगद्रूप देखते हैं।
३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ज्ञानस्वरूपमखिलं इस सम्पूर्ण ज्ञानस्वरूप जगत्को जगदेतदवुद्धयः । अर्थस्वरूप देखनेवाले बुद्धिहीन अर्थस्वरूपं पश्यन्तो पुरुपोंको मोहरूप महासागरमें भ्राम्यन्ते मोहसंप्लवे ॥ भटकना पड़ता है । किन्तु जो ये तु ज्ञानविदः शुद्ध शुद्धचित्त ज्ञानीलोग हैं वे इस चेतसस्तेऽखिलं जगत् । सम्पूर्ण जगत्को आप परमात्माका ज्ञानात्मक प्रपश्यन्ति ज्ञानमय स्वरूप ही देखते हैं।" त्वद्रूपं पारमेश्वरम् ॥" "जिसका ऐसा निश्चय है कि 'मैं (१।४ । ३८-४१) "अहं हरिः सर्वमिदं जनार्दनो तथा यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन श्रीहरि ही हैं उनसे भिन्न कोई भी नान्यत्ततः कारणकार्यजातम् । ईदृड्मनो यस्य न तस्य भूयो कार्य-कारणवर्ग नहीं है, उस पुरुषको भवोद्भवा द्वन्द्वगदा भवन्ति ॥ फिर सासारिक राग-द्वेपादि द्वन्द्वरूप (१ । २२ । ८७) रोग नहीं होते।" "ज्ञानस्वरूपमत्यन्तं "जो परमार्थतः ( वास्तवमें ) निर्मलं परमार्थतः । अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप परमात्मा है तदेवार्थस्वरूपेण वही अज्ञान-दृष्टिसे विभिन्न पदाथोंके भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम् ॥" | रूपमे प्रतीत हो रहा है ।" "वे विश्व- (१।२।६) मूर्ति भगवान् ज्ञानवरूप हैं, पदार्थाकार "ज्ञानस्वरूपो भगवान्यतोऽसा नहीं हैं, इसलिये इन पर्वत, समुद्र वशेषमूर्तिर्न तु वस्तुभूतः। और पृथिवी आदि विभिन्न पदार्थोको ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदा- तुम विज्ञानका ही विलास जानो।" ञ्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि।। "हे द्विज ! क्या घट-पटादि कोई भी (२ । १२ । ३९) ऐसी वस्तु है जो आदि, मध्य और वस्त्वस्ति किं कुत्रचिदादिमध्य- | अन्तसे रहित एवं सर्वदा एक रूपमें पर्यन्तहीनं सततैकरूपम् । ही रहनेवाली हो। पृथिवीपर जो यच्चान्यथात्वं द्विज याति भृमौ वस्तु वदलती रहती है, पूर्ववत् नहीं अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ३९ ? न तत्तथा तत्र कुतो हि तत्त्वम् ॥ रहती. उसमें वान्तविकता कैसे हो सकतीहै? देखो, मृत्तिका ही उठल्य मही घटत्वं घटतः कपालिका हो जती है. फिर व्ही वटसे कमाल, कपालिकाचूर्णरजस्ततोऽणुः । नगलसे चूर्ण रज और रजले अगु- जनैः स्वकर्मस्तिमितात्मनिश्चय- लय हो जाती है । फि बनाओ तो नही. अपने मांक वामृत हो रालभ्यते हि किमत्र वस्तु ॥ आननिश्चयो भूले हुन्नु इनमें तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चि- गैन नी सत्र बन्न देखते हैं ? अतः हे द्विजविज्ञानके निगन्नी नहीं त्वचित्कदाचिद्विज वस्तुजातम्। ई भी प्रदानन्ह नहीं है। विज्ञानमेकं निजकर्मभेद- अन्न-मन जि काग विन्ति विभिन्नचित्तवघांभ्युपेतम् ॥ विनिय युल उक न ही निकलने ग्रन्तव ज्ञानं विशुद्धं विमलं विनोक- ह है ! ग.दिन्न्ने हिल. मशेपलोभादिनिरस्तसङ्गम् । शून्य, द न्यून र एक सड़क परमः पनः मुद्रकिन्हीन्टन्या नवानुवो न योज्यन्ति ।। मुई है। उन्हें कि मैं कुछ सनार एवं नन्तो नयनती में नहीं है। --..- तुन्द्र ज्ञानं तया नयनसत्यनत्यन् । र निकाय एत यसंसहारभूत न्य है। उनम् तत्रापि वान वनागिनने हैन वन २१' ४५-. न के "अविचलंचित करें " -- * नवाद र मन्नुः ।। किन काम हुजोमानी * कृती है भन्न दु. का.
४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ प्रवृद्ध्यपचयौ न स्त सम्पूर्ण प्राणियों में विद्यमान उस एक एकस्याखिलजन्तुषु ॥" आत्माके वृद्धि और क्षय नहीं होते।" (२॥ १३ । ७०-७१) "यत्त कालान्तरेणापि हे राजन् ! जो कालान्तरमें भी नान्यसंज्ञामुपैति । परिणामादिके कारण होनेवाली किसी परिणामादिसंभूतां अन्य संज्ञाको प्राप्त नहीं होती वही तद्वस्तु नृप तच्च किम् ॥" परमार्थ वस्तु है । ऐसी वस्तु [आत्माके (२। १३ । १००) "यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि सिवा ] और क्या है ? हे नृपश्रेष्ठ ! पार्थिवसत्तम । यदि मुझसे भिन्न कोई और पदार्थ तदेषोऽहमयं चान्यो होता तो यह, मैं, अमुक, अन्य वक्तुमेवमपीष्यते ॥ आदि भी कहना ठीक हो सकता यदा समस्तदेहेषु पुमान्हयेको व्यवस्थितः। था। जव कि सम्पूर्ण शरीरोंमें एक तदा हि को भवान्सोऽह ही पुरुष स्थित है तो 'आप कौन हैं ?' मित्येतद्विप्रलम्भनम् ॥ 'मैं वह हूँ' इत्यादि वाक्य वञ्चनामात्र त्वं राजा शिविका चेयं हैं ! तुम राजा हो, यह पालकी है, वयं वाहाः पुरस्सराः। हम तुम्हारे सामने चलनेवाले वाहक अयं च भवतो लोको न सदेतत्त्वयोच्यते ॥" हैं और ये तुम्हारे परिजन हैं- (२ । १३ । ९०-९२) यह तुम ठीक नहीं कहते ।" "वस्तु राजेति यल्लोके "व्यवहारमें जो वस्तु राजा है, जो यञ्च राजभटात्मकम् । राजसेवकादि हैं और जिसे राजत्व तथान्ये च नृपत्वं च तत्तत्सङ्कल्पनामयम् ॥" कहते हैं तथा इनके सिवा जो अन्य (२ । १३ । ९९) पदार्थ हैं वे सब सङ्कल्पमय ही हैं।" "अनाशी परमार्थश्च "अविनाशी परमार्थतत्त्वकी उपलब्धि प्राज्ञैरभ्युपगम्यते " (२। १४ । २४) तो ज्ञानियोंको ही होती है।"
मध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ "परमार्थस्तु भूपाल "राजन् । तुम मुझसे सक्षेपमें संक्षेपाच्छ्रयतां मम ॥ परमार्थतत्त्व श्रवण करो । सर्वव्यापी, एको व्यापी समः शुद्धो सर्वत्र समभावसे स्थित, शुद्ध, निर्गुण, निर्गुणः प्रकृतेः परः। प्रकृतिसे अतीत, जन्म और वृद्धि जन्मवृद्धयादिरहित आदिसे रहित, सर्वगत एवं अविनाशी आत्मा सर्वगतोऽव्ययः॥ आत्मा एक है । वह परम ज्ञानमय परज्ञानमयः सद्धि- र्नामजात्यादिभिः प्रभुः। है । हे राजन् ! उस प्रभुका न योगवान्न युक्तोऽभू- वास्तविक नाम एव जाति आदि- नैव पार्थिव योक्ष्यते॥ से संयोग न तो है, न हुआ तस्यात्मपरदेहेपु है और न कभी होगा ही । संयोगो ह्येक एव यत् । उसका अपने और दूसरोंके देहों- विज्ञानं परमार्थोऽसौ के साथ एक ही संयोग है । द्वैतिनोऽतथ्यदर्शिनः ॥" इस प्रकारका जो विशेष ज्ञान (२। १४ । २८-३१) है वही परमार्थ है। द्वैतवादी तो "एवमेकमिदं विद्व- नभेदि सकलं जगत् । अपरमार्थदर्शी हैं । हे विद्वन् ! इस बासुदेवाभिधेयस्य प्रकार यह सारा जगत् वासुदेवसज्ञक स्वरूपं परमात्मनः॥" | परमात्माका एक अभिन्न स्वरूप (२ । १५ । ३५) ही है ।" "निदाघोऽप्युपदेशेन "[गुरुवर ऋभुके] इस उपदेशसे तेनाद्वैतपरोऽभवत् ॥ निदाघ भी अद्वैतपरायण हो गया; सर्वभूतान्यभेदेन और तब वह समस्त प्राणियोंको स ददर्श तदात्मनः। आत्माके साथ अमेदरूपसे देखने लगा तथा उसे ब्रह्मका साक्षात्कार हो तथा ब्रह्म ततो मुक्ति- गया। हे द्विज ! इससे उसने उत्कृष्ट मवाप परमां द्विजः॥ मोक्षपद प्राप्त कर लिया। जिस प्रकार सितनीलादिभेदेन एक ही आकाश सफेद और नीले आदि यथैकं दृश्यते नमः। भेदसे विभिन्न प्रकारका दिखायी उनसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। [अध्याय १ श्वेताश्वतरोपनिपद् भ्रान्तदृष्टिभिरात्मापि देता है उसी प्रकार जिनकी दृष्टि तथेकः सन्पृथक्पृथक् ॥" भ्रमग्रस्त है उन लोगोंको आत्मा एक (२ । १६ । १९-२०) होनेपर भी पृथक्-पृथक् दिखायी "एकः समस्तं यदिहास्ति किञ्चि- देता है।" "इस जगत्मे जो कुछ है यह सब एकमात्र श्रीहरि ही है; सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेत- वहीं मैं हूँ, वही तुम हो और यह दात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् ।। मारा जगत् भी आमत्वरूप श्रीहरि इतीरितस्तेन स . राजवर्य- ही है । तुम भेदभ्रमको छोड़ दो। स्तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः। उस ( अवधूत ) के ऐसा कहनेपर उस सौवीरनरेशने परमार्थदृष्टिसे स चापि जातिस्मरणाप्तबोध सम्पन्न हो भेदबुद्धि छोड़ दी. और स्तत्रैव जन्मन्यपवर्गमाप ॥” उस ब्राह्मणने भी पूर्वजन्मका स्मरण रहनेसे तत्वज्ञान प्राप्त कर उसी जन्ममे (२। १६ । २२-२४) ! मोक्षपद प्राप्त कर लिया।" तथा लैडे- तया लिगपुराणमे कहा है- "तस्मादज्ञानमूलो हि "अतः समस्त प्राणियोको यह संसार संसारः सर्वदेहिनाम् । अज्ञानके ही कारण प्राप्त हुआ है; क्योंकि विचार करनेर स्वतन्त्र परतन्त्रे स्वतन्त्रे च परमात्मा और परतन्त्र जीवमे कोई भिदाभावाद्विचारतः ॥ भेद नहीं है। अहो एकत्वमपि नास्त्येव एकत्र भी नहीं है तो दूंत कहाँसे द्वैतं तत्र कुतोऽस्त्वहो । हो सकता है? जब एक नहीं और कोई मन्ये (मरणवर्मा) भी नहीं तो एक नास्त्यथ मत्यं च मृत्यु कहाँसे हो सकती है? वह कुतो मृतसमुद्भवः॥ न अन्तःप्रज्ञ (भीतरको जाननेवाला) नान्त प्रज्ञो यहिजो है, न वहिप्पन ( बाहरकी जानने- न चोभयत एव च । वाला) है, न दोनों ओरकी जानने- 1 जब उसमें अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ प्रज्ञानघनस्त्वेवं वाला है और न प्रज्ञानघन है। इसीलिये वह न प्रज्ञ (प्रकृष्ट ज्ञानवान्) न प्रज्ञोऽप्रज्ञ एव सः॥ है और न अप्रज्ञ ( ज्ञानहीन ) ही विदिते नास्ति वेद्यं च है । ज्ञान हो जानेपर तो कोई ज्ञेय निर्वाणं परमार्थतः । ही नहीं रहता; अतः परमार्थतः निर्वाणस्वरूप ही है। सब कुछ अज्ञानतिमिरात्सर्व अज्ञानान्धकारके ही कारण है । इसमे नात्र कार्या विचारणा ॥ किसी प्रकारका विचार करनेकी ज्ञानं च बन्धनं चैव आवश्यकता नहीं है । हे द्विजगण | आत्माका न ज्ञान होता है, न बन्धन मोक्षोनाप्यात्मनो द्विजाः होता है और न मोक्ष ही होता है । न ह्येषा प्रकृतिर्जीवो जीव न तो यह प्रकृति है, न विकृति है और न इनका विकार ही विकृतिश्च विकारतः। है, क्योकि ये सब विकारी हैं । यह विकारो नैव मायैषा सव तो सत्-असत्से विलक्षण माया सदसद्व्यक्तिवर्जिता ॥" ही है।" तथाह भगवान्पराशरः तथा भगवान् पराशर कहते हैं- "अस्माद्धि जायते विश्व- "इसीसे विश्व उत्पन्न होता है और मत्रैव प्रविलीयते । इसीमें लीन हो जाता है। वह मायामय मायासे बँधकर स्वयं ही अनेक प्रकारके शरीर धारण कर करोति विविधास्तनूः॥ लेता है। किन्तु इस प्रकार न तो न चात्रैवं संसरति वह स्वयं ससारको प्राप्त होता है न च संसारयेत्परम् । और न किसी अन्यको ही ससारमे न कर्ता नैव भोक्ता च प्रवृत्त करता है क्योंकि वह न कर्ता न च प्रकृतिपूरुषो॥ है, न भोक्ता है, न प्रकृति या पुरुप न माया नैव च प्राण है, न माया है और न प्राण है; चैतन्यं परमार्थतः । वस्तुतः वह तो चैतन्य है। अतः समायी मायया बद्धः ।
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ तस्मादज्ञानमूलो हि समस्त प्राणियोंको अज्ञानके कारण संसारः सर्वदेहिनाम् ॥ ही संसारकी प्रासि हुई है। आत्मा नित्यः सर्वगतो हात्मा तो नित्य, सर्वगत, कूटस्थ और कूटस्थो दोपवर्जितः । निर्दोष है । वह एक अपनी एकः स भिद्यते शत्त्या मायाशक्तिके द्वारा ही भेटको प्राप्त मायया न स्वभावतः ।। होता है. स्वल्पतः नहीं। अतः तस्मादद्वैतमेवाह मुनियोंने परमार्थतः अद्वेतही बतलाया मुनयः परमार्थतः। है; विद्वानोंने इस जगत्को ज्ञानस्वरूप ज्ञानस्वरूपमेवाहु- जगदेतद्विचक्षणाः || वे अन्यलोग ही अज्ञानवश इसे ही कहा है । जिनकी दृष्टि दूषित है अर्थखरूपमनाना- परमार्यस्वरूप समझते हैं। चैतन्य त्पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः। कूटस्थो निर्गुणो व्यापी आत्मा तो स्वभावतः कूटस्थ. निर्गुण चैतत्यात्मा स्वभावतः॥ और सर्वव्यापक है। भ्रान्तिदर्शी दृश्यते ह्यर्थरूपेण लोगोंको ही वह पदार्याकार प्रतीत पुरुपैर्धान्तदृष्टिमिः । होता है । जिस समय पुरुष आत्माका यदा पश्यति चात्मानं परमार्यरूपसे साक्षात्कार करता है केवलं परमार्थतः॥ और इस दैतप्रपञ्चको मायामात्र मायामात्रमिदं द्वैतं तदा भवति निवृतः। समझता है उसी समय उसे शान्ति तस्माद्विन्जानमेवास्ति प्राप्त होती है। अत. केवल विज्ञान न प्रपञ्चो न संसृतिः॥" ही है, प्रपञ्च या संसार नहीं है ।" एवं श्रुत्यादिनानामादिकारणो इस प्रकार श्रुति आदिके द्वारा पन्यासमुखेन स्त्र-नामादिके कारणोंका दिग्दर्शन कराने- मिथ्यात्वन् रूपेण च बाधित-से तया स्वल्पतः बाधित होनेके त्वात्प्रपञ्चस्व मिथ्यात्वमवगम्यते । कारण प्रपञ्चका मिथ्यात्र जाना जाता अस्थूलादिलक्षणस्य ब्रह्मण- है। ब्रह्म अत्थूलादि लक्षणोंवाला है, स्तद्विपरीतस्थूलाकारो मिथ्या 'अत. उससे विपरीत त्यूलाकार अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ . स्तद्वत् । २ भवितुमर्हति यथैकस्य प्रपञ्च मिथ्या होना ही चाहिये । जिस चन्द्रमसस्तद्विपरीतद्वितीयाकार प्रकार एक चन्द्रमाका दूसरा आकार मिथ्या होता है उसी प्रकार इसे समझना चाहिये। तथा च सूत्रकारो "न स्थान इसी प्रकार सूत्रकार भगवान् सूत्रकृन्मतोपन्यास- तोऽपि परस्योभय- | व्यासने भी "न स्थानतोऽपि परस्यो- पूर्वक ब्रह्मणो लिङ्गं सर्वत्र हि" | भयलिङ्गं सर्वत्र हि'' इस सूत्रद्वारा स्त्र- निर्विशेषत्व- (ब्र० सू० ३ । रूपसे और उपाधिसे भी ब्रह्मक सविशेष समर्थनम् ११ ) और निर्विशेष ] दो परस्पर-विरुद्ध रूप इति स्वरूपत उपाधितश्च विरुद्ध- | सम्भव न होनेके कारण ब्रह्म निर्विशेष रूपद्वयासंभवानिर्विशेषमेव ब्रह्म- ही है ऐसा उपपादन कर [ फिर "न भेदादिति चेन्न प्रत्येकमतद्वचनात्" त्युपपाद्य "न भेदात्" (ब्र० इस सूत्रके ] 'नै भेदात्' इस सू० ३।२। १२) इति भेद- | अंशद्वारा ऐसी आशंका कर कि 'क्या श्रुतिबलात्किमिति सविशेषमपि मेदश्रुतिके सामर्थ्यसे ब्रह्मको सविशेष भी नहीं माना जा सकता' "ने ब्रह्म नाभ्युपगम्यत इत्याशङ्कय "न | प्रत्येकमतद्वचनात्" इस अशसे यह प्रत्येकमतद्वचनात्" इत्युपाधि- निश्चय किया है कि उपाधिजनित भेदस्य श्रुत्यैव बाधितत्वादभेद- भेद श्रुतिसे ही बाधित होनेके कारण अभेदश्रुतिके सामर्थ्यसे सविशेष श्रुतिबलात्सविशेषस्य ग्रहणायो- ब्रह्मका ग्रहण नहीं किया जा सकता, गानिर्विशेषमेवेत्युपपाद्य "अपि । इसलिये वह निर्विशेष ही है । इसके १. परब्रह्म उपाधिसे भी [ सविशेष-निर्विशेष ] उभयरूप नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वत्र उसका निर्विशेषरूपसे ही वर्णन किया गया है । २. [ यदि कहो] ऐसा नहीं है, क्योंकि ['चतुष्पाद ब्रह्म' 'पोडशकलं ब्रह्म' इत्यादि रूपसे ] प्रत्येक विद्यामे उसका भेदरूपसे वर्णन किया है । ३. तो ऐसा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक औपाधिक भेदमें [ 'अयमेव स योऽयमात्मा' इत्यादि श्रुतिके द्वारा ] उसका अभेद ही बतलाया गया है ।
४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ नानेव पश्यति" (वृ० उ०४ । “यहॉ जो अनेकवत् देखता है वह चैवमेके" (७० सू०३।२।१३) पश्चात् “अपि चैवमेके" इस सूत्रसे इति भेदनिन्दापूर्वकमभेदमेबैक यह निश्चय किया है कि कोई-कोई शाखिनः समामनन्ति--"मन- शाखावाले भेददृष्टिकी निन्दा करते सैवेदमाप्तव्यम्” (क० उ०४। हुए अभेदका ही प्रतिपादन करते ११) । "नेह नानास्ति किञ्चन" हैं। [ उनका कथन है कि ] "यह मनसे ही प्राप्त किया जा सकता है", मृत्योः स मृत्युमामोति य इह "यहाँ नाना कुछ नहीं है", ४ । १९)। "एकधैवानुद्रष्टव्य- मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है", मिति"(वृ० उ०४।४।२०)। "उसे एकरूप ही देखना चाहिये", "भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा तथा "भोक्ता, भोग्य और प्रेरक सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्" मानकर जिसे तीन प्रकारका कहा (श्वेता० उ० १। १२) इति गया है वह सव ब्रह्म ही है" सर्वभोग्यभोक्तनियन्तृलक्षणस्य इत्यादि श्रुतियोंसे भोक्ता, भोग्य और प्रपञ्चस्य ब्रह्मकस्वभावताभिधीयत प्रेरकरूप सम्पूर्ण प्रपञ्च एकमात्र इति । ब्रह्मखरूप ही कहा गया है। पुनरपि निर्विशेपपक्षे दृढीकृते इस प्रकार फिर भी निर्विशेष पक्षकी ही पुष्टि होनेपर 'एकवरूप सविशेषत्वमाशङ्कय किमित्येकवरूपस्य ब्रह्मका उभयरूप होना असम्भव तन्निरसन उभयस्वरूपासंभवे- श्रुतिविरोध- है, इसलिये ब्रह्मको निराकार ही परिहारश्च नाकारमेव ब्रह्माव- क्यो निश्चय किया जाता है उससे धार्यते न पुनर्विपरीतमित्याशङ्कय | विपरीत साकार क्यो नहीं माना जाता "अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात्" ऐसी आशंका कर "अरूपवदेव हि (व्र० सू०३।२।१४)इति रूपाद्या- तत्प्रधानत्वात्” इस सूत्रसे यह कहा १. अपि तु किसी-किसी शाखावाले इस प्रकार ही [अर्थात् भेदकी निन्दा पूर्वक अभेदका ही ] प्रतिपादन करते हैं। २. ब्रह्म स्परहित ही है, क्योंकि प्रधानतया ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली 'अस्थूलम्' इत्यादि श्रुति निर्गुणप्रधान ही है ।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ४७ ? काररहितमेव ब्रह्मावधारयितव्यम्। | है कि ब्रह्मको रूपादि आकारोसे रहित कस्मात् ? तत्प्रधानत्वात् । “अ- | ही निश्चय करना चाहिये । क्यों ? इसलिये कि निर्विशेष वाक्य ही ब्रह्मका स्थूलमनण्वहस्वमदीर्घम्" (बृ० प्रधानतया प्रतिपादन करते हैं। उ०३।८।८) "अशब्दमस्पर्श- | यथा--- "ब्रह्म न स्थूल है, न अणु मरूपमव्ययम्" (क० उ० ३ । है, न ह्रख है, न दीर्घ है,"ब्रह्मशब्द स्पर्श और रूपहीन तथा अविनाशी १५)। "आकाशो वै नाम नाम- है", "आकाश ( आकाशसंज्ञक रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्- | ब्रह्म ) ही नामरूपका निर्वाहक है, वे जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म ब्रह्म" (छा० उ०४।१४।७) है", "वह ब्रह्म कारण-कार्यसे "तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरम- रहित तथा अन्तर्बाह्यशून्य है यह आत्मा सबका अनुभव करनेवाला बाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्ये- ब्रह्म है-यही वेदकी आज्ञा हैं" तदनुशासनम्" (बृ० उ० २।५। इत्यादि वाक्य प्रधानतया निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मतत्त्वके ही प्रतिपादक है । * १९) इत्येवमादीनि निष्प्रपञ्च- अन्य जो कारणब्रह्मविषयक वाक्य ब्रह्मात्मतत्त्वप्रधानानि । इतराणि हैं उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्मतत्त्वके प्रतिपादनमें नहीं है। किसी भी कारणब्रह्मविषयाणि न तत्प्रधा- | ज्ञातव्य वस्तुके सम्बन्धमें अंतत्प्रधान वाक्योंकी अपेक्षा तत्प्रधान वाक्य ही नानि । तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बलवान होते हैं । अतः प्रधानतया वलीयांसि भवन्ति । अतस्तत्पर- | ब्रह्म-तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली * उनका मुख्य तात्पर्य प्रपञ्चको चेतनसे अभिन्न सिद्ध करनेमे ही है । १. जिन वाक्योमें ज्ञातव्य वस्तुकी चर्चा तो रहती है, पर उनका मुख्य तात्पर्य उस वस्तुके स्वरूपका प्रतिपादन करनेमे नहीं होता, वे 'अतत्प्रधान' कहलाते हैं । २. जो वाक्य मुख्यतया ज्ञातव्य 'वस्तु' के तत्त्वका ही प्रतिपादन करनेमें तात्पर्य रखते हैं, वे 'तत्प्रधान' कहे जाते हैं।
४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ . श्रुतिप्रतिपन्नत्वानिर्विशेषमेव श्रुतियोंसे ज्ञात होनेके कारण ब्रह्मको ब्रह्मावगन्तव्यं न पुनः सविशेष- निर्विशेप ही मानना चाहिये, मिति निर्विशेषपक्षमुपपाद्य का सविशेप नहीं । इस प्रकार निर्विशेष पक्षका समर्थन करनेपर ऐसी आशंका ताकारवद्विपयाणांश्रुतीनां गतिः? होनेपर कि 'फिर साकारब्रह्मपरा इत्याकाङ्क्षायां "प्रकाशवच्चा- श्रुतियोंकी क्या श्रुतिर्योकी क्या गति होगी ?' वैयर्थ्यात्" (७० सू० ३।२। "प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात्" इस सूत्रसे १५) इति चन्द्रसूर्यादीनां जला- यह बतलाया है कि जलादि उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले धुपाधिकृतनानात्ववच ब्रह्मणो- चन्द्र सूर्यादिके नानात्वके समान ऽप्युपाधिकृतनानात्वरूपस्य विद्य- ब्रह्मका भी उपाधिकृत नानात्वरूप मानत्वात्तदाकारवतो विद्यमान है । अतः उपासनाके लिये ब्रह्मण औपाधिक आकारवान् ब्रह्मके किसी आकारविशेषोपदेश उपासनार्थो आकारविशेषका उपदेश करनेमें भी न विरुध्यते । कोई विरोध नहीं है। एवमवैयर्थं नानाकारब्रह्म- इस प्रकार नानारूप ब्रह्मविषयक विषयाणां वाक्या- श्रुतिवाक्य भी व्यर्थ नहीं हैं। इस तरह निर्विशेषपक्ष- नामिति भेदश्रुती- औपाधिकब्रह्मविपयिणी होनेसे भेद- दृढीकरण नामोपाधिकब्रह्म- । श्रुतियोंकी अव्यर्थता बतलाकर फिर विषयत्वेनावैयर्थ्यमुक्त्वा पुनरपि भी यह दृढ करनेके लिये कि निर्विशेषमेव ब्रह्मेति द्रढयितुम् “आह'ब्रह्म निर्विशेष ही है' उन्होंने "आह च तन्मात्रम्" (७० सू० ३।२। च तन्मात्रम्” इस सूत्रको अवतारणा १६) इति । “स यथा सैन्ध- की है । इस सूत्रमें "जिस प्रकार वघनोऽनन्तरोऽवायः कृत्स्नो रस- नमकका डला बाहर-भीतरसे शून्य १.[भिन्न-भिन्न उपाधियोंमें तदनुरूप आकार धारण करनेवाले ] प्रकाशके समान उपाधिभेदसे सविशेष ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी व्यर्थ नहीं हैं। २. श्रुतिने ब्रह्मकी चिन्मात्रताका प्रतिपादन किया है।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ४९ घन एव । एवं वा अरेऽय- [ अर्थात् बाहर-भीतर एक समान मात्मानन्तरोऽवाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञा- केवल घनीभूत रस ही है] इसी प्रकार नघन एव" (वृ० उ० ४। यह आत्मा बाहर-भीतरके भेदसे ५। १३) इति श्रुत्युपन्यासेन रहित सब-का-सब घनीभूत प्रज्ञान विज्ञानव्यतिरिक्तरूपान्तराभावमु- ही है" इस श्रुतिकी व्याख्या करते पन्यस्य "दर्शयति चाथो अपि हुए उन्होंने यह दिखलाकर कि स्मर्यते" (ब्र० सू० ३।२।१७) | विज्ञानसे भिन्न और कोई रूप है ही इति । “अथात आदेशो नेति नहीं "दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते" नेति" (बृ० उ० २।३।६)। यह सूत्र कहा है। इसमें "इससे "अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- आगे श्रुतिका यही आदेश है—यह दितादधि" (के० उ०१। ३)। आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है", "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य "वह विदितसे अन्य है और अविदितसे मनसा सह" (तैत्ति० उ०२।४।१)। भी परे है", "जहाँसे मनके सहित "प्रत्यस्तमितभेदं यत् पाणी उसे न पाकर लौट आती है", सत्तामात्रमगोचरम् । "जो भेदसे रहित, सत्तामात्र, वाणीका वचसामात्मसंवेद्यं अविषय और स्वसवेद्य है वही ब्रह्म- तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ।" सज्ञक ज्ञान है", "सर्वरूपसे विलक्षण "विश्वस्वरूपवरूप्यं होना-यह परमात्माका लक्षण है" लक्षणं परमात्मनः" इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंका उल्लेख करके इत्यादिश्रुतिस्मृत्युपन्यासमु-ब्रह्म सर्वभेदशून्य ही है-ऐसा खेन प्रत्यस्तमितभेदमेव ब्रह्मेत्यु- प्रतिपादन कर उन्होने "अंतएव पपाद्य "अत एव चोपमा चोपमा सूर्यकादिवत्" यह सूत्र सूर्यकादिवत्" (७० सू० ३ । | कहा है। [ इसमें यह बतलाया है-] २।१८) इति । यत एव | क्योंकि परमात्मा चैतन्यमात्रस्वरूप, १. 'अथात आदेशो नेति-नेति' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको निर्विशेष प्रदर्शित करती है और 'अनादिमत्परं ब्रह्म' इत्यादि स्मृति भी ऐसा ही कहती है । २. इसीलिये [ सविशेष ब्रह्मके विषयमें ] जलप्रतिविम्बित सूर्यके समान उपमा दी जाती है। श्वे० उ० ७-८ ध्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ चैतन्यमात्ररूपो नेति नेत्यात्मको 'यह भी नहीं, यह भी नहीं' इत्यादि रूपसे उपलक्षित स्वरूपवाला, ज्ञात विदिताविदिताभ्यामन्यो वाचाम- और अज्ञातसे भिन्न, वाणीका अविषय, गोचरः प्रत्यस्तमितभेदो विश्व- सब प्रकारके मेदसे रहित और स्वरूपविलक्षणस्वरूपः परमात्मा- सम्पूर्ण रूपोंसे विलक्षण स्वरूपवाला है इसलिये भेद अविद्यारूप उपाधिके विद्योपाधिको भेदः । अत एव कारण है । इसीसे इसकी उपाधि- चास्योपाधिनिमित्तामपारमार्थिकी निमित्तक अपारमार्थिकी विशेषरूपता- विशेषवत्तामभिप्रेत्य जलसूर्यादि- के आशयसे ही मोक्षशास्त्रोंमे 'भेद जलमे प्रतिविम्बित मूर्याटिके समान रिवेत्युपमा दीयते मोक्षशास्त्रेषु। है ऐसी उपमा दी जाती है । "आकाशमेकं हि यथा "जिस प्रकार घटादि उपाधियोंमें घटादिषु पृथक्पृथक् । एक ही आकाश पृथक्-पृथक्-सा भासने लगता है उसी प्रकार विभिन्न तथात्मको ह्यनेकश्व जलागयोंमें प्रतिविम्बित हुए सूर्यके जलाधारेबिबांशुमान् ॥" समान एक ही आत्मा अनेक-सा (यान० ३ । १४४) जान पडता है ।" "विभिन्न भूतोंमें "एक एव तु भूतात्मा एक ही भूतात्मा स्थित है, जो जलमें भूते भूते व्यवस्थितः । दिखायी देते हुए चन्द्रमाओंके समान एक और अनेक रूपोंमें भी देखा एकधा बहुधा चैव जाता है।" "जिस प्रकार यह दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥" ज्योतिःस्वरूप एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न "यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वा- जलाशयोंका अनेक रूप होकर नपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । अनुगमन करता है उसी प्रकार विभिन्न क्षेत्रोंमें यह एक ही अजन्मा उपाधिना क्रियते भेदरूपो आत्मदेव उपाधिके द्वारा अनेक रूप देवःक्षेत्रेप्वेवमजोऽयमात्मा" कर दिया जाता है।"
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ इति दृष्टान्तवलेनापि निर्वि इस प्रकार दृष्टान्तके बलसे भी शेषमेव ब्रह्मेत्युपपाद्य “अम्बुवद- यही सिद्ध करके कि ब्रह्म निर्विशेष ही है "अम्बुवदग्रहणात्तु न तथा- ग्रहणात्" (ब्र० सू०३।२।१९) त्वम्' इस सूत्रसे यह आशंका की इत्यात्मनोऽमृतत्वेन सर्वगतत्वेन है कि आत्मा अमूर्त और सर्वगत है; जलसूर्यादिवन्मूर्तसंभिन्नदेशस्थि- अत. जल-सूर्यादिके समान उसका मूर्तरूपसे किसी देशविशेषमे स्थित तत्वाभावादृष्टान्तदान्तिकयोः । होना सम्भव न होनेके कारण इन सादृश्यं नास्तीत्याशङ्कय "वृद्धि- दृष्टान्त और दार्टान्तिकोंकी समता नहीं है । इसपर "वृद्धिहासभाक्त्व- हासभाक्त्वम्" (ब्र० सू० ३। मन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्" इस २ । २०) इति न हि दृष्टान्त- सूत्रसे यह दिखलाया है कि विवक्षित अंशको छोडकर दृष्टान्त और दार्शन्तिकयोर्विवक्षितांशमुक्त्वा दाान्तिककी सर्वाशमे समानता सर्वसारूप्यं केनचिद्दर्शयितुं श- कोई भी नहीं दिखला सकता । यदि क्यते । सर्वसारूप्ये दृष्टान्तदाी- सर्वांशमें समानता हो जायगी तो उनका दृष्टान्त-दार्टान्तिक भाव ही न्तिकभावोच्छेद एव स्यात् । नहीं रहेगा । यहाँ ( जलसूर्यादि वृद्धिहासभाक्त्वमत्र विवक्षितम् । दृष्टान्तमें ) तो उनका वृद्धिह्रासयुक्त होना ही विवक्षित है । जिस प्रकार जलगतसूर्यप्रतिविम्बं जलवृद्धौ जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब वर्धते जलहासे च हसति जल- जलके बढनेपर बढ़ता, जलके घटने- १. सूर्यसे भिन्न जलके समान सविशेष ब्रह्मकी उपाधि उससे भिन्न गृहीत न होनेके कारण सूर्यके प्रतिविम्बसे उसकी उपमा नहीं दी जा सकती। २. जिस प्रकार सूर्यप्रतिविम्ब जलकी वृद्धि और ह्रास होनेपर स्वयं भी वृद्धि और ह्रासका भागी होता है उसी प्रकार आत्मा वास्तवमें अविकारी और एकरूप होनेपर भी देहादि उपाधियोंके अन्तर्भूत होकर उनके वृद्धि और ह्रासका भागी होता है । इस प्रकार दृष्टान्त और दार्टान्त दोनोंमें सामञ्जस्य होनेके कारण कोई विरोध नहीं है ।
[ अध्याय १ श्वेताश्वतरोपनिषद् . चलने चलति जलभेदे भिद्यत पर घटता, जलके चलनेपर चलता इत्येवं जलधर्मानुविधायि भवति और जलका भेद होनेपर भिन्न सा न तु परमार्थतः सूर्यस्य तत्त्व- हो जाता है, इस प्रकार वह जल्के मस्ति । एवं परमार्थतोऽविकृत- ' वोका अनुकरण करता है. परमार्यत. मेकरूपमपि सद्ब्रह्म देहायुपाध्य- सूर्यमें वे विकार वास्तविक नहीं न्तर्भावाद्भजत एवोपाधिधर्मान्य होते, उसी प्रकार परमार्थत. अविकारी ओर एकरूप होनेपर भी द्विहासादीनिति विवक्षितांशप्रति- ब्रह्म देहादि उपाधियोंके अन्तर्गत पादनेन दृष्टान्तदान्तिकयोः रहनेसे उन उपाधियोंके वृद्धि-हासादि सामञ्जस्यमुक्त्वा "दर्शनाच वर्माको ग्रहण करता ही है-इस (७० सू० ३।२।२१) इति प्रकार विवक्षित अंशके प्रतिपादनसे "पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुप्पदः दृष्टान्त और दान्तिकका सामञ्जस्य पुरः स पक्षी भृत्वा पुरः पुरुष बतलाकर "दर्शनाच" इस सूत्राशसे आविशत्" (वृ० उ० २।५।। "परमपुरुषने दो चरणोंवाला पुर(शरीर) १८)। "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप बनाया. चार पैरोवाला पुर बनाया ईयते" (वृ० उ० २ । ५। और वह पक्षी होकर उन पुरोंमे १९) । "मायां तु प्रकृतिं प्रवेश कर गया", "इन्द्र मायाद्वारा विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" अनेक रूपवाला हो जाता है", (श्वेता० उ०४।१०)। "मायी "मायाको प्रकृति जानो और सृजते विश्वमेतत्(श्वेता० उ० मायावीको महेश्वर", "मायावी इस ४ । ९)। "एकस्तथा सर्वभूता- विश्वकी रचना करता है", "उसी न्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही बहिश्च" (क० उ० २।२।९। अन्तरामा भिन्न-भिन्न रूपोंके अनुरूप १०) । “एको देवः सर्वभूतेषु हो गया है", "समस्त भूतोंमें गूढ " (श्वेता० उ०६।११)। एक ही देव छिपा हुआ है", १. श्रुतियाँ भी देहादि उपाधियोंमें ब्रह्मका अनुप्रवेश दिखलाती हैं । ' अध्याय १] शाङ्करभाण्यार्थ ५३ . "स एतमेव सीमानं विदार्यैतया "इस मूर्धसीमाको ही विदीर्ण कर वह द्वारा प्रापद्यत" (ऐत० उ०१।३। इसीके द्वारा शरीरमें प्रवेश कर गया", १२) । “स एष इह प्रविष्ट आन- | "वह नखके अग्रभागसे लेकर शिखा- खाग्रेभ्यः" (बृ० उ० १।४। तक इस शरीरमें प्रवेश किये हुए है", ७)। "तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि- "उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट शत्" (तैत्ति० उ०२।६।१)| हो गया" इत्यादि श्रुतियोंद्वारा इत्यादिना परस्यैव ब्रह्मण उपा- परब्रह्मको ही उपाधिकी प्राप्ति धियोगं दर्शयित्वा निर्विशेषमेव दिखलाकर इस प्रकार उपसहार ब्रह्म । भेदस्तु जलसूर्यादिवदौ- किया है कि ब्रह्म निर्विशेष ही है; उसका जो मायाजनित भेद है वह पाधिको मायानिबन्धन इत्युप- जल-सूर्यादिके समान उपाधिके संहृतवान् । कारण है। किञ्च ब्रह्मविदामनुभवोऽपि इसके सिवा ब्रह्मवेत्ताओंका प्रपञ्चस्य बाधकः । अनुभव भी प्रपञ्चका बाधक है, तेषां निष्प्रपश्चात्म- क्योंकि उन्हे निष्प्रपञ्च आत्माका ब्रह्मविदनुभव- दर्शनस्य विद्यमान- अनुभव रहता है । ऐसा ही यह प्रदर्शनम् त्वात् । तथा हि श्रुति उनका अनुभव प्रदर्शित करती तेषामनुभवं दर्शयति । “यस्मिन् है-"जिस स्थितिमें ज्ञानीको सब सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभू- भूत आत्मा ही हो जाते हैं, उसमें द्विजानतः । तत्र को मोहः उस एकत्वदर्शीके लिये क्या शोक का शोक एकत्वमनुपश्यतः" और क्या मोह हो सकता है ?" ( ई० उ० ७)। "विदिते वेद्यं “बोध हो जानेपर कोई ज्ञेय नहीं नास्ति" इति । एवं निर्वाणमनु- रहता" इत्यादि । इसी प्रकार शासनम् । “यत्र वा अन्यदिव निर्वाणका भी उपदेश किया है- स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्" (वृ० "जहाँ अन्य-सा हो वहाँ अन्य उ० ४ । ३ । ३१)। “यत्र | अन्यको देखे,” किन्तु "जिस त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन के स्थितिमें इसे सब आत्मा ही हो गया पश्येत्” (वृ० उ०४।५।१५)। है उसमें किससे किसे देखे " प्रपञ्चस्य वाधितत्वे - श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ -- "यदेतदृश्यते मूर्त- "यह जो कुछ मूर्त जगत् मेतज्ज्ञानात्मनस्तब। दिखायी देता है कह ज्ञानस्वरूप भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति आपका ही रूप है। अज्ञानीलोग जगढूपमयोगिनः ॥ भ्रान्तिज्ञानके कारण इसे जगद्रूप ये तु ज्ञानविदः शुद्ध- चेतसस्तेऽखिलं जगत् । देखते हैं। किन्तु जो शुद्धचित्त ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति ज्ञानवान् पुरुष है वे इस सम्पूर्ण त्वद्रूपं पारमेश्वरम् ॥" जगत्को आप ज्ञानस्वरूप परमात्माका (विष्णुपु० १ । ४ । ३९, ४१) ही स्वरूप देखते है।" "ऋभुके उस "निदाघोऽप्युपदेशेन उपदेशसे निदाघ भी अद्वैतपरायण हो तेनाद्वैतपरोऽभवत् । गया और सब प्राणियोंको सर्वथा आत्म- सर्वभूतान्यशेपेन ददर्श स तदात्मनः॥ स्वरूप देखने लगा। तथा उसे तथा ब्रह्म ततो मुक्ति ब्रह्मसाक्षात्कार हो गया । हे द्विज ! मवाप परमां द्विजः" फिर उसे आत्यन्तिक मोक्षपद प्राप्त (विष्णुपु० २ । १६ । १९-२०) हो गया ।" "इस लोकमें जो पुरुष "अत्रात्मव्यतिरेकेण आत्मासे भिन्न अन्य कुछ नहीं द्वितीयं यो न पश्यति। देखता उसीको वेद और शास्त्रोंमें वेदशास्त्र उदाहृतः॥" · ब्रह्मभूत कहा है।" इत्येवं श्रुतिस्मृतियुक्तितोऽनु इस प्रकार श्रुति. स्मृति. युक्ति उपनिषदा- ! और अनुभवसे भी प्रपञ्च बाधित है, भवतश्व प्रपञ्चस्य रन्मप्रयोजनोप- बाधितत्वादत्यन्त- 'अत्यन्त विलक्षण और विभिन्नरूपवाले संहारः विलक्षणानामसदृश- मधुर-तिक एवं श्वेत-पीतादि पदार्योंका भी परस्पर अभ्यास देखा जाता है और रूपाणांमधुरतिक्तश्वेतपीतादीनामपि अमूर्त आकाशमे भी तलमलिनतादि- परस्पराध्यासदर्शनादमूर्तेऽप्याकाशे अव्यास देखा गया है. तलमलिनताद्यध्यासदर्शनादात्मा- इसलिये परस्पर अन्यन्त विलक्षण नात्मनोरत्यन्तविलक्षणयोर्मामू- मूर्तिमान् और मूर्तिहीन अनात्मा एवं ब्रह्मभृतः स एवेह -- का अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ भवात् । तयोरपि तथा संभवात्स्थूलोऽहं आत्माका भी अध्यास होना सम्भव है तथा 'मैं स्थूल हूँ' 'मै कृश हूँ' कृशोऽहमिति देहात्मनोरध्यासानु- इस प्रकार देह और आत्माके अध्यासका अनुभव भी होता ही है, "हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं एवं “यदि मारनेवाला होकर हतश्चेन्मन्यते हतम् । किसीको मारना चाहता है अथवा उभौ तौ न विजानीतो मारा जानेवाला होकर अपनेको मारा हुआ मानता है तो वे दोनों ही नायं हन्ति न हन्यते ॥" आत्माको नहीं जानते, क्योंकि यह (क० उ० १ । २ । ९) आत्मा तो न मारता है और न इत्यादिश्रुतिदर्शनाद् "य मारा जाता है" इत्यादि श्रुति एनं वेत्ति हन्तारम्" (गीता २। देखी जाती है तथा 'जो इसे मारनेवाला समझता है" "प्रकृतिके १९) "प्रकृतेः क्रियमाणानि" गुणोंसे किये जाते हुए कोको" (गीता ३ । २७) इतिस्मृति- इत्यादि स्मृति-वाक्य भी देखे जाते दर्शनाचाध्यासस्य प्रहाणाया- है; इसलिये इस अध्यासके नाश और आत्माकी एकताका बोध कराने- स्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तय उपनिषदा- वाले ज्ञानकी प्राप्तिके लिये यह रभ्यते । उपनिषद् आरम्भ की जाती है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ जगत्-कारण ब्रह्मके स्वरूपक विषयने ब्रह्मगदी अपियोंका विचार ब्रह्मवादिनो वदन्तीत्यादि 'ब्रह्मवादिनी दन्तिं ड्यानि नायतरशाखाको मन्त्रोपनियन है। श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषत् । उसी यह सक्षिप्त टीना आरम्भ की तस्या अल्पग्रन्था बृत्तिरारभ्यते-जाती है- हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति- किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन ब च संप्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १॥ ॐ ब्रह्मवेत्तालोग कहते हैं-जगत्का कारणभूत ह जैसा है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं ? किसके द्वारा जीवित रहते हैं ? कहाँ स्थित हैं ? और है ब्रहदिगण ! हम किसके द्वारा सुख-दुख्में प्रेरित होकर व्यवस्था (संसारयात्रा )ना अनुवर्तन करते हैं ? ॥१॥ ब्रह्मवादिनो बदन्तीत्यादि । 'ब्रगदिनो दन्ति' इत्यादि । जो ब्रह्मवादी थे अर्थात् जिनका ब्रह्मवादिनी ब्रह्मवदनशीलाः सवें लभा ब्रहर्चा करनेका था ऐसे लोग सब-के-सनिलकर चर्चा करने संभृय वदन्ति किं कारणं ब्रह्म , लगे-'किंगारणं ब्रह्म (जगत्का कारणभूत ब्रह केला है ? ) किन् किमिति स्वरूपविषयोज्यं प्रश्नः । ब्यादि वाक्यले ब्रहके हलके विन्य प्रान किया गया है । अयत्रा अथवा कारणं ब्रह्माहोस्वित्कालादि इस जगत्का कारण म्ह है ग 'काल, त्भार.' आदि गत्यसे आगे बताये 'काला स्वभाव इति वक्ष्यमाणम् ! जानेवाले काल आदि । अथवा ब्रह्म । ? ..- अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ यह अथवा किं कारणं ब्रह्म सिद्धिरूपम् | [ यदि कारण है तो वह उपादान आदि कारणोंमेसे] कौन-सा कारण है ? उपादानभूतं किमित्यर्थः । अथवा यानी स्वतःसिद्ध ब्रह्म क्या जगत्का वृंहति बृंहयति तस्मादुच्यते परं उपादान कारण है ? अथवा "बढा हुआ है तथा बढाता है इसलिये ब्रह्मेति श्रुत्यैव निर्वचनानिमित्तो- | परब्रह्म कहा जाता है" इस प्रकार पादानयोरुभयोर्वा प्रश्नः श्रुतिद्वारा ही ब्रह्मशब्दकी व्युत्पत्ति किं की जानेके कारण उसके निमित्त कारणं ब्रह्मेति । किं कारणं और उपादान दोनों ही प्रकारके कारण होनेके विषयमे 'ब्रह्म कौन कारण ब्रह्माहोखित्कालादि ! अथवा है' ऐसा यह प्रश्न है। [ तात्पर्य है कि ] क्या जगत्का कारण कारणमेव ? कारणत्वेऽपि कि ब्रह्म है अथवा कालादि ? या ब्रह्म निमित्तमुतोपादानम् ? अथवो- | कारण ही नहीं है ? यदि कारण है भी तो निमित्त कारण है या उपादान भयम् १ तद्वा किंलक्षणमिति अथवा दोनो और उसका लक्षण क्या है ? आगे इस प्रकार जो वक्ष्यमाणपरिहारानुरूपेण तन्त्रे- परिहार कहा गया है उसके अनुसार णावृत्त्या वा प्रश्नेऽपि संग्रह' | उन सब विषयोंका एक साथ अथवा अलग-अलग प्रश्नमें भी संग्रह कर कर्तव्यः प्रश्नापेक्षत्वात्परि- लेना चाहिये, क्योंकि परिहार तो प्रश्नकी अपेक्षा करके ही होता है। कुतः स्म जाताः कुतो वयं हम कहाँसे उत्पन्न हुए हैं- देह और इन्द्रियसम्पन्न हम लोगोकी कार्यकरणवन्तो जाताः ? स्वरूपेण किससे उत्पत्ति हुई है ? क्योकि जीवानामुत्पत्त्याद्यसंभवात् । तथा स्वरूपसे तो जीबोके जन्मादि होने सम्भव हैं नहीं । ऐसी ही ये च श्रुतिः-"न जायते म्रियते श्रुतियाँ भी हैं- "यह मेधावी आत्मा वा विपश्चिद्" (क० उ० १।२ । न उत्पन्न होता है, न मरता है", हारस्य ।
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ 2 १८) "जीवापेतं वाव किलेदं "जीवसे रहित होकर यह शरीर ही म्रियते न जीवो नियत इति" मरता है जीव नहीं मरता", "जरा- (छा० उ० ६ । ११ ।३)। मृत्यु ये शरीरके धर्म हैं", "हे "जरामृत्यू शरीरस्य" । "अवि- | मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी और नाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्ति- अनुच्छित्तिधर्मा ( कभी उच्छिन्न न होनेवाला ) है ।" ऐसा ही स्मृति धर्मा" (वृ० उ० ४।५।१४) इति। भी कहती है-"वह अजन्मा तथा च स्मृतिः- "अजः शरीर- शरीरग्रहण करनेसे 'जन्म लेता है' ग्रहणात्स जात इति कीर्त्यते" इति। ऐसा कहा जाता है ।" किं च, जीवाम केन-केन वा इसके सिवा [ एक प्रश्न यह है- हम किसके द्वारा जीवित रहते हैं? वयं सृष्टाः सन्तो जीवामेति अर्थात् उत्पन्न होनेपर हम किसके स्थितिविपयः प्रश्नः । क द्वारा जीवन धारण करते है ? इस क च प्रकार यह स्थितिविषयक प्रश्न है। संप्रतिष्ठाः प्रलयकाले स्थिताः ? तथा कहाँ प्रतिष्ठित होते हैं—प्रलय- कालमे किसमे स्थित रहते हैं ? और अधिष्ठिता नियमिताः केन सुखे- हे ब्रह्मविद्गण ! किसके द्वारा अधिष्ठित तरेषु सुखदुःखेषु वर्तामहे ब्रह्म- अर्थात् प्रेरित होकर सुखासुख यानी सुख-दुःखमें व्यवस्था (संसार-यात्रा) विदो व्यवस्थां हे ब्रह्मविदः को वर्तते हैं ? अर्थात् हे ब्रह्मवेत्ताओ । सुखदुःखेषु व्यवस्था केना- हम किसके द्वारा प्रेरित होकर सुख- दु.खमें व्यवस्था (लोक-यात्रा ) का धिष्ठिताः सन्तोऽनुवर्तामह इति अनुवर्तन करते हैं ? इस प्रकार किम् इत्यादि प्रश्नसमूह जगत्की सृष्टिस्थितिप्रलयनियमहेतुः कि- उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और नियमके मिति प्रश्नसंग्रहः ॥१॥ | हेतुके विषयमें है ॥१॥ ?
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ -- भूतानि योनिः काल, स्वभाव आदिकी जगत्-कारणताका खण्डन इदानीं कालादीनि ब्रह्मकारण- अब श्रुति ब्रह्मकारणवादके विरोधी वादप्रतिपक्षभूतानि विचारविषय- कालादिको विचारके विषयरूपसे त्वेन दर्शयति- प्रदर्शित करती है- कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा : पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावा- दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥२॥ काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत और पुरुष—ये कारण है [ या नहीं ] इसपर विचारना चाहिये । इनका संयोग भी [ अपने शेषी ] आत्माके अधीन होनेके कारण कारण नहीं हो सकता तथा जीवात्मा भी सुख-दुःखके हेतु [ पुण्यापुण्य कर्मों ] के अधीन है। [ इसलिये वह भी कारण नहीं हो सकता ] ॥ २ ॥ कालः स्वभाव इति । योनि 'कालः स्वभावः' इत्यादि । इन सबके साथ 'योनिः' शब्दका सम्बन्ध है। क्या शब्दः संवध्यते । कालो योनिः काल योनि कारण हो सकता है ? कारणं स्यात् ? कालो नाम सर्व- सम्पूर्ण भूतोंकी रूपान्तर-प्राप्तिमे जो हेतु हैं उसको काल कहते हैं । इसी भूतानां विपरिणामहेतुः। स्वभावः, प्रकार क्या स्वभाव कारण है ' पदार्थों- स्वभावो नाम पदार्थानां प्रति- | की नियत शक्तिका नाम स्वभाव है, नियता शक्तिः, अग्नेरीष्ण्यमिव । जैसे अग्निका स्वभाव उष्णता । अथवा क्या नियति कारण है ? पुण्य- नियतिरविषमपुण्यपापलक्षणं कर्म पापरूप जो अविपम कर्म हैं वे तद्वा कारणम् ? यदृच्छाकस्मिकी 'नियति' कहे जाते हैं ? या यदृच्छा- " १. जिनका फल कभी विपरीत नहीं होता।
६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ तत्र प्राप्तिः । भूतान्यानाशादीनि वा आकस्मिक घटना अथवा आकाशादि योनिः ? पुरुषो वा विज्ञानात्मा भूत कारण हैं ? या पुरुष यानी विज्ञानात्मा जगत्का कारण है ? इस योनिः ? इतीत्थमुक्तप्रकारेण किं प्रकार उपर्युक्त रीतिसे यह विचारना योनिरिति चिन्त्या चिन्त्यं यानी वतलाना चाहिये कि इसमें कौन कारण है ? कोई 'योनिः' निरूपणीयम् । केचिद्योनिशब्द शब्दका अर्थ प्रकृति वतलाते हैं ! प्रकृतिं वर्णयन्ति । तस्मिन्पक्षे उस अवस्थामें पूर्व मन्त्रमे 'किं कारणं ब्रह्म' इस प्रश्नमे आये हुए कारण- किं कारणं ब्रह्मेति पूर्वोक्तं कारण- पदकी यहा भी अनुवृत्ति कर लेनी पदमत्राप्यनुसंधेयम् । चाहिये। कालादीनामकारणत्वं इसपर श्रुति 'संयोग एपाम्' इत्यादि कालादीनाम् दर्शयति-संयोग वाक्यसे यह प्रदर्शित करती है कि अकारणत्वोप- एपामित्यादिना । काल आदि कारण नहीं है । इसका अयमर्थः-किंकाला- अभिप्राय यों समझना चाहिये क्या दीनि प्रत्येकं कारणमुत तेषां काल, स्वभाव आदिमेंसे प्रत्येक ही कारण है अथवा उन सबका समूहः । न च प्रत्येकं कालादीनां समूह ? कालादिमेंसे प्रत्येक तो कारणत्वं संभवति, दृष्टविरुद्ध- कारण हो नहीं सकता, क्योंकि त्वात् । देशकालनिमित्तानां संह- ऐसा मानना प्रत्यक्ष विरुद्ध है। लोकमें देश-कालादि निमित्तोंको परस्पर तानामेव लोके कार्यकरत्वदर्श- मिलकर ही कार्य करते देखा गया नात् । न चाप्येषां कालादीनां है । और इन कालादिका संयोग संयोगः यानी समूह भी कारण नहीं हो समूहः कारणम्, सकता है; क्योकि समूह यानी संहति समूहस्य संहतेः परार्थत्वेन परार्थ अर्थात् शेप है और उसका शेषी शेपत्वेन शेपिण आत्मनो विद्य- आत्मा विद्यमान है, अतः स्वतन्त्र न पादनम् अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ आत्मन. मानत्वादस्वातन्त्र्यात्सृष्टिस्थिति- | होनेके कारण वह सृष्टि, स्थिति, प्रलयनियमलक्षणकार्यकरणत्वा प्रलय और प्रेरणारूप कार्य करने में योगात् । समर्थ नहीं है। आत्मा तर्हि कारणं स्यादे तब तो आत्मा कारण हो ही वात आह-आत्मा- सकता है, इसपर कहते हैं- सृष्टिकारणत्व- प्यनीशः सुखदुःख- 'आत्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ।' निरास हेतोरिति । आत्मा | अर्थात् आत्मा यानी जीव भी अनीश- जीवोऽप्यनीशोऽस्वतन्त्रो न कार- अस्वतन्त्र है -वह भी सृष्टि आदिका कारण नहीं है । तात्पर्य यह है णम् , अस्वातन्त्र्यादेव चात्मनो- कि अस्वतन्त्रताके ही कारण आत्माका ऽपि सृष्ट्यादिहेतुत्वं न संभव- भी सृष्टि आदिमें हेतु होना सम्भव तीत्यर्थः । कथमनीशत्वम् ? सुख- नहीं है । इसकी अखतन्त्रता कैसे है। [ सो बताते हैं-] सुखदुःखहेतोः- दुःखहेतोः सुखदुःखहेतुभूतस्य सुख-दुःखके हेतुभूत पुण्यापुण्यरूप पुण्यापुण्यलक्षणस्य कर्मणो विद्य- कर्म विद्यमान हैं, अतः उन कमोंके मानत्वात्कर्मपरवशत्वेनास्वात अधीन होनेसे इसकी अस्वतन्त्रता है । न्त्र्याच । त्रैलोक्यसृष्टिस्थितिनियमे इसीसे त्रिलोकीकी सृष्टि, स्थिति और नियमनमे इसका सामर्थ्य नहीं ही सामर्थ्य न विद्यत एवेत्यर्थः । है--यही इसका अभिप्राय है । अथवा अथवा सुखदुःखादिहेतुभूतस्या- | [ यो समझना चाहिये कि ] आत्मा सुख-दुःखादिके हेतुभूत आध्यात्मि- ध्यात्मिकादिभेदभिन्नस्य जगतो- कादि भेदोंवाले जगत्का ईश- ऽनीशो न कारणम् ॥२॥ कारण नहीं है* ॥२॥ * क्योंकि जो आध्यात्मिकादि भेदोंवाला जगत् आत्माके बन्धन और दुःखका कारण है उसकी वह स्वतन्त्रतासे स्वय ही क्यों रचना करेगा?
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ - an ध्यानके द्वारा ऋषियोंको कारणभूता ब्रह्मशक्तिका साक्षात्कार एवं पक्षान्तराणि निराकृत्य इस प्रकार अन्य सब पक्षोंका निराकरण कर अव श्रुति यह बतलाती प्रमाणान्तरागोचरे वस्तुनि प्रका- है कि उन ब्रह्मवेत्ताओंने प्रमाणान्तरसे ज्ञात न होनेवाले उस मूलतत्त्वके रान्तरमपश्यन्तो ध्यानयोगानु- विषयमें अन्य किसी उपायकी गति न देखकर ध्यानयोगके अनुशीलन- गमेन परममूलकारणं स्वयमेव द्वारा उस परममूलकारणको स्वयं ही प्रतिपेदिर इत्याह- अनुभव कर लिया ध्यानयोगानुगता अपश्य- न्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥ उन्होंने ध्यानयोगका अनुवर्तन कर अपने गुणोंसे आच्छादित परमात्माकी शक्तिका साक्षात्कार किया; जो ( परमात्मा ) कि अकेले ही कालसे लेकर आत्मापर्यन्त समस्त कारणोंके अधिष्टान हैं ॥ ३ ॥ ते ध्यानयोगेति । ध्यानं नाम 'ते ध्यानयोगानुगताः' इत्यादि ध्यान चित्तकी एकाग्रताको कहते चित्तैकाग्रयं तदेव योगो युज्यते- हैं; वही योग है जिसके द्वारा चित्तको युक्त किया जाय इस ऽनेनेति ध्यातव्यस्वीकारोपायः, व्युत्पत्तिके अनुसार ध्येय वस्तुके ग्रहणका उपाय ही योग है । उसका तमनुगताः समाहिता अपश्यन् अनुगमन कर अर्थात् समाहित हो उन्होंने देवात्मशक्तिका दर्शन- दृष्टवन्तो देवात्मशक्तिमिति । साक्षात्कार किया।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ६३ पूर्वोक्तमेव प्रश्नसमुदायपरि प्रश्नसमुदाय और उसके समा- धानोंका जो सूत्र पहले कहा जा हाराणां सूत्रमुत्तरत्र प्रत्येकं प्रप- चुका है उसीको अब आगे प्रत्येकका श्चयिष्यते । तत्रायं प्रश्नसंग्रहः-किं विस्तार करके कहा जायगा । इनमें ब्रह्म कारणम् आहोखित्कालादि? प्रश्नसमुदाय तो इस प्रकार है- क्या ब्रह्म जगत्का कारण है अथवा तथा किं कारणं ब्रह्माहोस्वित्कार्य- कालादि तथा ब्रह्म कारण है या कार्य- कारणविलक्षणम् ? अथवा कारणं कारणसे अतीत ? अथवा ब्रह्म कारण है या नहीं ? यदि कारण है भी तो वाकारणं वा ? कारणत्वेऽपि उपादान कारण है या निमित्त किमुपादानमुत निमित्तम् ? अथ- कारण ? अथवा दोनों प्रकारका कारण होनेपर भी ब्रह्मका लक्षण क्या है ? वोभयकारणं ब्रह्म किंलक्षणम् ? और यदि वह कारण नहीं है तो अकारणं वा ब्रह्म किंलक्षणम् ? इति। | भी उसका क्या लक्षण है ? तत्रायं परिहारः-न कारणं इस प्रश्नसमुदायका यह उत्तर है—ब्रह्म न कारण है, न अकारण ? नाप्यकारणं न चोभयं नाप्यनु- है, न कारणाकारण उभयरूप है, न भयं न च निमित्तं न चोपादानं इन दोनोंसे भिन्न है, न निमित्त कारण है, न उपादान कारण है और न चोभयम् । एतदुक्तं भवति- न दोनों प्रकारका कारण है । यहाँ अद्वितीयस्य परमात्मनो न स्वतः कहना यह है कि अद्वितीय परमात्मा- का कारणत्व, उपादानत्व अथवा कारणत्वमुपादानत्वं निमित्तत्वं निमित्तत्व स्वतः कुछ भी नहीं है । च। यदुपाधिकमस्य कारणत्वादि जिस उपाधिके कारण इसका कारणत्वादि है उसी कारण यानी तदेव कारणं निमित्तमुपपाद्य तदेव प्रयोजकं निष्कृष्य दर्श- उसीको प्रयोजक निश्चित करके निमित्तमुपपाद्य निमित्तका उपपादन कर और श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ यति-देवात्मशक्तिमिति। देवस्य देवात्मशक्तिम्' इत्यादि वाक्यसे द्योतनादियुक्तस्य मायिनो महे- दिखाते हैं-उन्होंने देव- चोतनादियुक्त मायात्री महेश्वर--- श्वरस्य परमात्मन आत्मभृताम- परमात्माकी स्वरूपभूता-अस्वतन्त्रा स्वतन्त्रां न सांख्यपरिकल्पित-शक्तिको कारणरूपसे देखा, प्रधानादिवत्पृथग्भृतां स्वतन्त्रां माख्यमतद्वारा कल्पना किये हुए शक्तिं कारणमपश्यन् । दर्शयि- प्रधानादिके समान उससे भिन्न किसी प्यति च-"मायां तु प्रकृति स्वतन्त्रा शक्तिको नहीं । आगे श्रुति विद्यान्मायिनं तु यह दिखलावेगी भी-"मायाको तु महेश्वरम्" प्रकृति जानो और मायावीको (श्वेता० उ०४ । १०) इति । महेश्वर ।" तथा ब्राह्मे-"एपा चतुर्वि इसी प्रकार ब्रह्मपुराणमें कहा है- शतिभेदभिन्ना माया परा प्रकृति- "यह चौबीस प्रकारके भेदोंवाली माया परमात्मासे प्रकट हुई उसीकी परा- स्तत्समुत्था ।" तथा च-"मया- प्रकृति है।" तथा गीतामें कहा ध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचरा- है- "मुझ अधिष्ठानके द्वारा प्रकृति चरम् ।" (गीता ९।१०) इति । चराचरको उत्पन्न करती है ।" स्वगुण प्रकृतिकार्यभूतः पृथि [ कैसी शक्तिको देखा--] जो व्यादिभिश्च निगूढां संवृतां का- अपने गुणोंसे प्रकृतिके कार्यभूत कारण कारणाकारस्याभिभूत- पृथ्वी आदिसे निगूढ----आच्छादित थी । अर्थात् कारणका त्वत्प त्वात्कार्यात्पृथक्स्वरूपेणोपलब्धु- कार्यके स्वरूपसे ढव जानेके कारण, मयोग्यामित्यर्थः । तथा च प्रकृ- जो कार्यसे पृथक् अपने स्वरूपसे तिकार्यस्त्वं गुणानां दर्शयति उपलब्ध होनेयोग्य नहीं थी । गुण प्रकृतिके कार्य हैं- यह व्यास:-"सत्वं रजस्तम इति 'सत्त्व, रज और तम ये प्रकृतिसे गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।" (गीता उत्पन्न हुए गुण है ।" इस वाक्यसे १४ । ५) इति । व्यासजी भी दिखलाते हैं। वात अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ६५ कोऽसौ देवो यस्येयं विश्व यह विश्वको उत्पन्न करनेवाली जननी शक्तिरभ्युपगम्यत इत्य- शक्ति जिसकी समझी जाती है वह देव कौन है ? इसपर कहते त्राह-यः कारणानीति । यः हैं—'यः कारणानि' इत्यादि । जो कारणानि निखिलानि तानि पूर्वो- एक अद्वितीय परमात्मा पहले बतलाये तानि कालात्मयुक्तानि कालात्म- हुए कालात्मयुक्त समस्त कारणोंको- भ्यां युक्तानि कालपुरुषसंयुक्तानि काल और आत्मासे युक्त अर्थात् काल स्वभावादीनि 'कालः स्वभावः' और पुरुषसे संयुक्त स्वभावादिको, जो इति मन्त्रोक्तान्यधितिष्ठति नियम- कि 'कालः स्वभावः' इत्यादि मन्त्रमें यत्येको द्वितीयः परमात्मा तस्य बतलाये गये हैं, अधिष्ठित-नियमित शक्तिं कारणमपश्यन्निति वा- करता है, उसीकी शक्तिको जगत्के कारणरूपसे देखा-ऐसा इस वाक्यका क्यार्थः। तात्पर्य है। अथवा देवात्मशक्तिं देवा अथवा देवात्मशक्तिम्-देवात्मना त्मनेश्वररूपेणावस्थितां शक्तिम् । अर्थात् ईश्वररूपसे स्थित शक्तिको देखा, ऐसा ही यह वाक्य भी है- तथा च-- "हे सर्वात्मन् ! आपकी जो गुणोंकी "सर्वभूतेषु सर्वात्म- आश्रयभूता अपरा शक्ति समस्त न्या शक्तिरपरा तव । भूतोमें स्थित है, हे परमेश्वर ! उस नित्या शक्तिको नमस्कार है। जो शाश्वतायै परेश्वर ॥ वाणी तथा मनसे अतीत और अगोचर यातोतागोचरा वाचां एवं निर्विशेष है तथा ज्ञान और मनसां चाविशेषणा। ध्यानसे जिसका भलीभॉति विवेक ज्ञानध्यानपरिच्छेद्या हो सकता है उस परा देवताकी मैं तां वन्दे देवतां पराम्" इति वन्दना करता हूँ।" इसके अतिरिक्त प्रपञ्चयिष्यति स्वभावादीना- | श्रुति स्वभावादि जगत्के कारण नहीं हैं, श्वे० उ०९ गुणाश्रया नमस्तस्यै ६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ मकारणत्वमज्ञानस्यैव कारणत्वं अज्ञान ही कारण है-इस वातका आगे "स्वभावमेके कवयो वदन्ति" कोई विद्वान् स्वभावको ही जगत्का विस्तारपूर्वक वर्णन करेगी; यथा "कोई- (श्वेता० उ० ६ । १) इत्यादि। कारण बतलाते हैं" इत्यादि, "मायी परमेश्वर इस विश्वकी रचना करता "मायी सृजते विश्वमेतत्" हे", "एक रुद्र ही है, परमार्थदर्शी (श्वेता० उ० ४ । ९)। "एको ब्रह्मवेत्ता दूसरेकी अपेक्षा नहीं रखते", "वर्ण ( जाति ) आदि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः" विभेदोसे रहित जिन एकमात्र अद्वितीय परमात्माने अपनी नाना (श्वेता० उ०३।२)। "एकोऽ- प्रकारकी शक्तियोंके योगसे [अनेकों वर्णो बहुधा शक्तियोगात्" । वर्णोकी सृष्टि की है ]" इत्यादि । कैसी शक्तिको देखा ? ] अपने (श्वेता० उ० ४ । १) इत्यादि। गुणोसे यानी सर्वज्ञत्वादि ईश्वरीय स्वगुणैरीश्वरगुणैः सर्वज्ञत्वादि- गुणोंसे अथवा सत्त्वादि प्रकृतिके गुणोसे निगूढ देखा, अर्थात् जो भिर्वा सत्वादिभिर्निगूढां कार्य- कार्यकारणभावसे रहित पूर्णानन्दा- द्वितीय परब्रह्मसे अभिन्न होनेके कारणविनिर्मुक्तपूर्णानन्दाद्वितीय- कारण उपलब्ध नहीं हो सकती ब्रह्मात्मनेवानुपलभ्यमानाम् । [ ऐसी शक्तिको देखा ] । कोऽसौ देवः ? यः कारणा- वह देवकौन है ? इसका उत्तर देते हैं-]जोसबकारणोंका अधिष्ठान है- नीत्यादि पूर्ववत् । अथवा देवस्य इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये । परमेश्वरस्यात्मभूतां जगदुदय- अथवा देव यानी परमेश्वरकी स्वरूप- भूता अर्थात् जगत्को उत्पत्ति, स्थितिलयहेतुभूतां ब्रह्मविष्णु- स्थिति और लयकी हेतुभूता ब्रह्मा, शिवात्मिकां शक्तिमिति । तथा विष्णु और शिवरूपा शक्तिको चोक्तम्- देखा। ऐसा ही कहा भी है- - अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ "शक्तयो यस्य देवस्य "जिस देवकी ब्रह्मा, विष्णु और ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका" इति। | शिवरूपा शक्तियाँ है" इत्यादि तथा "ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्म- "हे ब्रह्मन् ! ब्रह्मा, विष्णु और शिव- प्रधाना ब्रह्मशक्तय" ये ब्रह्मकी प्रधान शक्तियाँ हैं।" इति च । इत्यादि । स्वगुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः । 'स्वगुणैः' अर्थात् सत्त्व, रज और सत्त्वेन विष्णू रजसा ब्रह्मा तमसा तमसे युक्त । सत्त्वादि गुणरूप महेश्वरः सत्वाद्युपाधिसंबन्धात्स्व- उपाधिके कारण ही वह सत्त्वसे विष्णु, रजसे ब्रह्मा और तमसे महादेव रूपेण निरुपाधिकपूर्णानन्दाद्वि- कहा जाता है, ये सब स्वतः निरु- तीयब्रह्मात्मनैवानुपलभ्यमानाः । पाधिक पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपसे परस्यैव ब्रह्मणः सृष्टयादिकार्य तो उपलब्ध हो ही नहीं सकते । कुर्वन्तोऽवस्थाभेदमाश्रित्य शक्ति- | ये परब्रह्मके ही सृष्टि आदि कार्य भेदव्यवहारो न पुनस्तत्त्वभेदमा- करते हैं, इसलिये अवस्थाभेदके श्रित्य । तथा चोक्तम्- आधारपर इनमे शक्तिमेदका व्यवहार होता है, तात्त्विकमेदके कारण नहीं । "सर्गस्थित्यन्तकरणी ऐसा ही कहा भी है-"वह एक ही ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम्। भगवान् जनार्दन उत्पत्ति, स्थिति स संज्ञां याति भगवा और सहारकारिणी ब्रह्मा, विष्णु और नेक एव जनार्दनः" इति । शिवरूप संज्ञाओंको (विष्णुपु० १ । २ । ६६) जाता है।" प्रथममीश्वरात्मना मायिरूपे परब्रह्म पहले तो ईश्वरस्वरूप मायामयरूपसे स्थित होता है । णावतिष्ठते ब्रह्म । स पुनर्मूर्ति- फिर वह मूर्तरूप होकर तीन रूपेण त्रिधा व्यवतिष्ठते । तेन प्रकारका हो जाता है । उस त्रिविधरूपसे वह जगत्की उत्पत्ति, च रूपेण सृष्टिस्थितिसंहाररूप- स्थिति, सहार और नियमनादि कार्य नियमनादिकार्य करोति । तथा करता है । इसी प्रकार श्रुति भी प्राप्त हो ६८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ च श्रुतिः परस्य शक्तिद्वारेण शक्तिके द्वारा परमात्माके नियमनादि कार्य प्रदर्शित करती है । “परमात्मा नियसनादिकार्य दर्शयति- अपनी ईशनी शक्तियोंसे लोकोंका "लोकानीशत ईशनीभिः प्रत्यङ्- शासन करता है, वह सभी प्राणियोंके भीतर विराजमान है । उसने समस्त जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले लोकोंकी सृष्टि करके उसकी रक्षा करते संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा" हुए प्रलयकाल आनेपर सबको अपनेमें लीन कर लिया” इत्यादि । (श्वेता० उ० ३। २) इति । यहाँ 'ईशनीभि.'---उत्पत्तिकारिणी परमशक्तियोसे ऐसा विशेषण दिया ईशनीभिर्जननीभिः परमशक्ति- है [ इससे जाना जाता है कि ब्रह्म भिरिति विशेषणात् । "ब्रह्म- ही अपनी शक्तियोंद्वारा सृष्टि आदि कार्य करता है ] । तथा "हे ब्रह्मन् ! विष्णुशिवा ब्रह्मन्प्रधाना ब्रह्म- ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ये ब्रह्मकी प्रधान शक्तियाँ हैं" इस स्मृतिके शक्तयः" इति स्मृतेः परमशक्ति- अनुसार 'परमशक्तिभिः' इस पदसे इन भिरिति परदेवतानां ग्रहणम् । परदेवताओंका ही ग्रहण होता है । अथवा देवात्मशक्तिमिति दे- अथवा 'देवात्मशक्तिम्'--देवता, वश्वात्मा च शक्तिश्च यस्य परस्य आत्मा और शक्ति ये जिस परब्रह्मके ब्रह्मणोऽवस्थाभेदास्तां प्रकृति- अवस्थाभेद है उस प्रकृति, पुरुष और ईश्वरकी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपसे स्थित पुरुपेश्वराणां स्वरूपभूतां ब्रह्म- परात्पर शक्तिको उन्होंने कारण- रूपेणावस्थितां परात्परतरां शक्तिं रूपसे देखा; ऐसा ही इन तीनोंके स्व- कारणमपश्यन्निति । तथा च रूपभूत ब्रह्मका 'भोक्ता (जीव),भोग्य त्रयाणां स्वरूपभूतं प्रदर्शयिष्य- (प्राकृत प्रपञ्च) और प्रेरक (अन्त- ति-"भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च र्यामी) परमात्मा इन तीनोंके स्वरूपको अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ६९ मत्वा सर्व प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममे- जानकर फिर तीन भेदोंमें बताये हुए तत्" (श्वेता० उ० १ । १२) "त्रयं समस्त तत्त्वोंको ब्रह्म ही समझे" तथा "जिस समय इन तीनोंको ब्रह्म- यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्" (श्वेता० रूपसे अनुभव करता है ।" इन उ० १।९) इति । स्वगुणैर्ब्रह्म- वाक्योसे श्रुति उल्लेख करेगी । परतन्त्रैः प्रकृत्यादिविशेषणैरुपा- | [ उस शक्तिको ] स्वगुणैः-ब्रह्मके आश्रित प्रकृति आदि विशेषणरूप धिमिनिगूढाम् । तथा च दर्श- उपाधियोंसे आच्छादित देखा । ऐसा यिष्यति-"एको देवः सर्व- ही "समस्त भूतोंमें छिपा हुआ एक भूतेषु गूढः" (श्वेता० उ०६। देव है" इत्यादि वाक्यसे श्रुति ११) इति । "तं दुर्दर्श गूढ- आगे दिखावेगी । तथा इसी अर्थमें "उस कठिनतासे दीखनेवाले प्रच्छन्न- मनुप्रविष्टम्" (क० उ०१ । २ । रूपसे अनुप्रविष्टको" "जो बुद्धिरूप १२) । “यो वेद निहितं गुहामें छिपे हुए उस देवको जानता गुहायाम्" (तै० उ०२।१।१)। है", "इसी देहके भीतर विद्यमान "इहैव सन्तं न विजानन्ति रहते हुए भी इन्द्रियाँ उसे नहीं जानतीं" इत्यादि अन्य श्रुतियाँ भी देवाः" इति श्रुत्यन्तरम् । यः हैं। 'यः कारणानि' इत्यादि वाक्य- कारणानीति पूर्ववत् । का अर्थ पूर्ववत् है। अथवा देवात्मनो द्योतना अथवा देवात्मा-द्योतनात्मक- त्मनः प्रकाशस्वरूपस्य ज्योतिषां प्रकाशखरूप अर्थात् समस्त तेजोंके ज्योतीरूपस्य प्रज्ञानघनस्वरूपस्य तेज प्रज्ञानघनमूर्ति परमात्माकी जगत्का सृजन, पालन, संहार और परमात्मनो जगदुदयस्थितिलय- नियन्त्रण करनेवाली शक्ति अर्थात् नियमनविषयां शक्तिं सामर्थ्य- सामर्थ्यको देखा, जो स्वगुण मपश्यन्निति स्वगुणैः स्वव्यष्टिभू- सर्वज्ञ-सर्वेशितृत्वादि अपने ही तैः सर्वज्ञसर्वेशितृत्वादिभिर्निगूढां अंशभूत गुणोसे आच्छादित श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय १ तत्तद्विशेषरूपेणावस्थितत्वात्स्व- होनेके कारण उन-उन विशेषल्पोंसे रूपेण शक्तिमात्रेणानुपलभ्यमा- स्थित रहनेके कारण अपने शक्ति- मात्र शुद्धल्पसे उपलब्ध नहीं हो नाम् । तथा च मानान्तरवेद्यां सकती । इसी प्रकार आगे चलकर शक्ति दर्शयिष्यति- श्रुति उस शक्तिको अन्य किन्हीं "न तस्य कार्य करणं च विद्यते प्रमाणोंसे अज्ञेय ही प्रदर्शित करेगी। "उस परमात्माका कोई कार्य न तत्समश्चास्यधिकश्व दृश्यते । ( देह ) या करण (उन्द्रिय ) नहीं परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते है; उसके समान या उससे अधिक स्वाभाविकी ज्ञानवलक्रिया च ॥" भी कोई नहीं है। उसकी नाना प्रकारकी पराशक्ति और स्वाभाविक (श्वेता० उ० ६१८) ज्ञानके प्रभावसे होनेवाली क्रिया सुनी इति । समानमन्यत् । जाती है।" शेप अर्थ पूर्ववत् है । कारणं देवात्मशक्तिमिति 'किं कारणम्' और 'देवात्म- शक्तिम्' इस प्रश्न और उत्तरमें प्रश्न परिहारे च ये ये पक्षभेदाः जो-जो पक्षभेद दिखाये गये है उन सबका यहाँ श्रुतिमे संक्षेपसे प्रदर्शितास्ते सर्वे संगृहीताः । संग्रह किया हुआ है; क्योंकि आगे इन सबका विस्तारसे निलपण उत्तरत्र सर्वेषां प्रपञ्चनादप्रस्तुतस्य किया गया है। तथा अप्रस्तुत विषय- प्रपञ्चनायोगात्प्रश्नोत्तरदर्शनाच । का विस्तार करना उचित नहीं होता और [इनके विषयमें तो प्रश्नोत्तर भी समासव्यासधारणस्य च विदुपा- देखे गये हैं। इनका संक्षेप और विस्तारसे जो वर्णन किया गया है * इससे भी सिद्ध होता है कि पूर्वोक्त पक्ष श्रुतिसम्मत ही है, क्योंकि यहाँ जितने पज्ञान्तर दिखाये गये हैं उन सबमें प्रमाणपूर्वक श्रुतिकी मी सहमति दिखारी ही गयी है।
अध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ मिष्टत्वात् । तथा चोक्तम्- "इष्टं | वह तो विद्वानोंको इष्ट होनेके कारण है। ऐसा ही कहा भी है- हि विदुषां लोके समासव्यास- 'लोकमे संक्षेप और विस्तारपूर्वक धारणम्" इति। तथा च श्रुत्यन्तरे विषयको अवधारण करना विद्वानोंको इष्ट ही है" इसी प्रकार एक दूसरी सकृच्छ्रुतस्य गोपामितिपदस्य श्रुतिमें एक बार आये हुए 'गोपाम्' व्याख्याभेदः श्रुत्यैव प्रदर्शितः- इस पदकी व्याख्याका भेद स्वय श्रुतिने ही दिखाया है । वहाँ 'अपश्यं गोपामित्याह प्राणा वै| अंपश्य गोपामित्याह प्राणा वै गोपाः' इति । 'अपश्यं गोपामित्याह गोपाः' ऐसा कहा है, और फिर दुबारा 'अपश्य गोपामित्याह असौ वा आदित्यो गोपाः' इति । असौ वा आदित्यो गोपाः' ऐसा कहा है । इसी प्रकार 'यह 'अथ कस्मादुच्यते ब्रह्म' इत्यारभ्य ब्रह्म क्यो कहा जाता है' ऐसा 'बृंहति बृहयति तस्मादुच्यते कहकर 'बढा हुआ है और बढाता है इसलिये यह परब्रह्म कहा जाता परं ब्रह्म' इति सकृच्छ्रुतस्य ब्रह्म- है' ऐसा कहकर श्रुतिमें एक बार आये पदस्य निमित्तोपादानरूपेणार्थ- हुए 'ब्रह्म' पदका स्वय श्रुतिने ही निमित्त और उपादानभेदसे अर्थ- भेदः श्रुत्यैव दर्शितः ॥३॥ भेद दिखलाया है ॥३॥ एवं तावद्'देवात्मशक्ति' 'यः इस प्रकार यहॉतक 'परमात्मा- की शक्तिको देखा' और 'जो १. मैंने गोपा (पालन करनेवाले) का दर्शन किया, प्राण ही गोपा हैं । २. मैंने गोपाका दर्शन किया वह सूर्य ही गोपा हैं ।
७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ से / गया अव कार्य कारणानि निखिलानि काला- अकेले ही काल और आत्माके सहित त्मना युक्तान्यधितिष्ठत्येक' इत्ये- सबका अधिष्ठान है' इन दो श्रुतिके अर्थोंसे एक ही परमात्माके स्वरूप कस्याद्वितीयस्य परमात्मनः स्व- और शक्तिरूपसे निमित्त और रूपेण शक्तिरूपेण च निमित्त- उपादान कारण होनेका, मायावी- कारणोपादानकारणत्वं मायित्वे- रूपसे ईश्वर, देवता और सर्वज्ञाडि नेश्वररूपत्वं देवतात्मत्वसर्वज्ञ- होनेका और अमायिकरूप- सत्यज्ञानानन्दस्वरूप एवं त्वादिरूपत्वममायित्वेन सत्य- अद्वितीय होनेका संक्षेपमें वर्णन ज्ञानानन्दाद्वितीयरूपत्वं च समा- किया सेन श्रुत्यर्थाभ्यामभिहितम् । और कारणकी अभिन्नताका इदानीं तमेव सर्वात्मानं दर्शयति प्रतिपादन करती हुई श्रुति उसीको कार्यकारणयोरनन्यत्वप्रतिपादनेन। सर्वरूप दिखलाती है। तथा “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र "वाचारम्भणं विकारो नाम- है, केवल मृत्तिका ही सत्य है" धेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्" (छा. इस दृष्टान्तके द्वारा समर्थित जो उ० ६।१।४) इति निदर्श- अद्वितीय, कार्यकारणभावशून्य, नाद्वितीयापूर्वानपरनेतिनेत्या- नेति-नेतिस्वरूप, वाणीका अविषय, मकवागगोचराशनायाद्यसंस्पृष्ट- क्षुधादि विकारोंसे असंस्पृष्ट, सर्वभेद- प्रत्यस्तमितभेदचित्सदानन्दब्रह्मा- रहित, सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्मतत्त्व है उसे प्रदर्शित करनेकी इच्छासे त्मत्वं प्रदर्शयितुमनाः प्रकृत्यैव स्वभावसे ही प्रपञ्चरूप भ्रान्ति- प्रपञ्चभ्रान्तामवस्यां प्राप्तस्य पर-मयी अवस्थाको प्राप्त हुए परब्रह्म- ब्रह्मण ईश्वरात्मना सर्वज्ञत्वाप- की जो सर्वज्ञत्व और पापशून्यत्वादि- हतपाप्मादिरूपेण देवतात्मना रूप ईश्वरभावसे, ब्रह्मादिरूप अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ तथा ब्रह्मादिरूपेण कार्यादिरूपेण देवभावसे, [आकाशादिरूप ] कार्य- वैश्वानरादिरूपेण च मोक्षापे- भावसे और वैश्वानरादिरूपसे मोक्षापेक्षित चित्तशुद्धि क्षितशुद्धयर्थाम् “स यदि पित- "यदि वह पितृलोककी कामनावाला लोककाम" (छा० उ० ८। होता है" इत्यादि श्रुतिके अनुसार २ । १) इति विश्वैश्वर्यार्थाम् "मां सम्पूर्ण ऐश्वर्यप्राप्ति, "वह सर्वदा वा नित्यं शङ्करं वा प्रयाति" मुझे या शकरको प्राप्त होता है" इत्यादि प्रमाणके अनुसार इष्टदेवसे इत्यादिदेवतासायुज्यप्राप्त्यर्थी सायुज्यप्राप्ति एवं वैश्वानरादि भावोकी वैश्वानरादिप्राप्त्यां चोपासना- प्राप्तिके लिये उपासना है उसको मशेषलौकिकवैदिककर्मप्रसिद्धिं तथा सम्पूर्ण लौकिक-वैदिक कर्म- च दर्शयति । यदि कार्यकारण- परम्पराको प्रदर्शित करती है। यदि रूपेण स्वरूपेण चित्सदानन्दा- परमात्मा कार्य-कारणरूपसे और स्वरूपतः सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूप- द्वितीयब्रह्मात्मना च व्यवस्थितं से स्थित न होता तो भोक्ता, भोग्य और न स्यात्तदा भोग्यभोक्तृनियन्त्र- नियन्ताका अभाव हो जानेसे संसार भावे संसारमोक्षयोरभाव एव और मोक्षका भी अभाव हो जाता स्यात् । अधिकारिणोऽभावेन क्योंकि अधिकारीके न रहनेसे न तो उसका साधनभूत प्रपञ्च रहता है और साधनभूतस्य प्रपञ्चस्याभावात् । न उसे साधनका फल देनेवाला ईश्वर तत्फलदातुश्चेश्वरस्याभावात् । ही। तथा “[ ईश्वर ही ] संसार, तथा संसारादिहेतुभूतमीश्वरं मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु है" दर्शयति-"संसारमोक्षस्थितिबन्ध- यह शास्त्रवाक्य ससारादिके हेतुभूत हेतुः" इति । तथा च संसारमोक्ष- | ईश्वरको सिद्ध करता है । और श्वे० उ० १०
श्वेताश्वतरोपनिपद्
[अध्याय १
-
योरभाव एव स्यात् । तत्सिद्धयर्थं ईबरले न रहनेपर तो संसार और
मोभका अभाव ही हो जाना चाहिये
अपञ्चाद्यवस्थानं दर्शयति-
या । अतः उसको सिद्धिक लिये
"एक पाई नाक्षिपति
सनन्सुजातजी भी "एक पाद
नाक्षिपति" इत्यादि वाच्यसे यह
सलिलाद्धंस उचरन् ।
बतलाते हुए कि "हंस (परमामा)
स चेदविन्ददानन्द जल (संसार ) से ऊपर रहते हुए
मी अपना एक पाद नहीं निकालता |
न सत्यं नानृतं भवेत् "
यदि वह [ स्वरूपभूत ] आनन्दका
इति सनत्सुजातोऽप्येक पादं अनुभव करने लगे तो न सत्य
(मोक्ष) ही रहे और न मिथ्या
नोरिक्षपतीत्यादि । तथा च (संसार ) ही" ईश्वरकी सिद्धिने
लिये प्रपत्रादिकी स्थिति दिखलते
श्रुतिः-“पादोऽस्य विश्वा भू- है। ऐसा ही "सम्पूर्ण भूत परमान्मा-
तानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छा० के एक पाद हैं और उसके अमृत-
मय तीन पाद चुलोको है"
उ०३।१२।६) इति । तत्र प्रथमेन यह श्रुति भी बतलाती है । यहाँ
मन्त्रेण सर्वात्मानं ब्रह्म चक्रं श्रुति पहले मन्त्रसे सर्वामा ब्रह्मको
चक्ररूपसे और दूसरे मन्त्रसे नदी-
दर्शयति द्वितीयेन नदीस्पेण- रूपसे प्रदर्शित करती है--
कारण-ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन
तमेकनेमि त्रिवृतं षोडशान्तं
शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षभिर्विश्वरूपैकपाशं
त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ उस एक नेमि, तीन वृत, सोलह अन्त, पचास अरों, बीस प्रत्यरों, छः अष्टको, विश्वरूप एकपाश, तीन मार्गों, तथा [ पाप-पुण्य ] दोनोंके निमित्तभूत एक मोहवाले कारणको [ उन्होंने देखा* ] ॥ ४ ॥ तमेकेति । य एक कारणानि 'तमेकनेमिम् 'इत्यादि । जो अकेला ही समस्त कारणोंमें अधिष्ठित निखिलान्यधितिष्ठति तमेकनेमिं है, उस एक नेमिवालेको [ उन्होंने योनिः कारणमव्याकृतमाकाशं देखा । ] जो योनि, कारण, अव्याकृत, परमव्योम माया प्रकृतिः शक्ति- | आकाश, परव्योम, माया, प्रकृति, शक्ति, तम, अविद्या, छाया, अज्ञान, स्तमोऽविद्या छायाज्ञानमनृतम- अनृत और अव्यक्त इत्यादि शब्दोसे व्यक्तमित्येवमादिशब्दैरभिलप्य- कही जाती है वह एक कारणावस्था ही जिस अधिष्ठाता अद्वितीय पर- मानका कारणावस्था नेमिरिव मात्माकी नेमिके समान नेमि अर्थात् नेमिः सर्वाधारो यस्याधिष्ठातुरद्वि- सम्पूर्ण कार्यवर्गका आधार है तीयस्य परमात्मनस्तमेकनेमिम् । ऐसे उस एक नेमिवाले और 'त्रिवृतम्'-सत्त्व, रज, त्रिवृतं त्रिभिः सत्त्वरजस्तमोभिः प्रकृतिके तीन गुणोंसे वृत ( घिरे प्रकृतिगुणैर्वृतम् । हुए ) परमात्माको [ कारणरूपसे तमरूप देखा ] । षोडशको विकारः पञ्च भूता- तथा सोलह विकार अर्थात् पाँच न्येकादशेन्द्रियाण्यन्तोऽवसानं भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ—ये जिस आत्माके अन्त-अवसान यानी विस्तारसमाप्तिर्यस्यात्मनस्तं षोड- | विस्तारकी समाप्ति हैं उस सोलह * अथवा अगले मन्त्र के क्रियापद 'अधीमः' का अध्याहार करके 'हम जानते हैं। ऐसा अर्थ करना चाहिये ।
[अध्याय १ बेताश्वतरोपनिषद् ७६ - देख। शान्तम् । अथवा प्रश्नोपनिषदि अन्तोंशले; अथवा प्रश्नोपनिषद् "यस्मिन्नताः पोडशकलाः प्रभ- "यलिन्ताः पोशकला. प्रभवन्ति" यहाँसे लेकर "स प्राणमसृजत् वन्ति' (६।२) इत्यारभ्य प्राणाद्धान्" इत्यादि मन्त्रसे कही "स प्राणमसृनत प्राणाच्झाम्" हुई जो [प्रणसे लेकर ] नामपर्यन्त सोलह कलाएं हैं वे ही जिसका (६।४) इत्यादिना प्रोक्ता अवसान हैं, [उस आत्माको कारण- नामान्ताः षोडशकला अवसानं रूपसे देल] अथवा 'एकनेमिम्' इस यस्येति । अथवैकनेमिमिति का- पदले कारणभूत अव्याकृतावस्थाका वर्णन किया गया है, उसके समष्टि- रणभृताच्याकृतावस्थाभिहिता । कार्यभूत विराट और सूत्रात्मा ये दो तत्कार्यसमष्टिभूतविराटन्त्रद्वयं । और व्यष्टिकार्यभूत भूः आदि तव्यष्टिभूतभृरादिचतुर्दश भुव- चौदह मुन्न ये सोलह जिस प्रपञ्च- रूपसे स्थित परमात्माके अन्त हैं नान्यन्तोऽवसानं यस्य प्रपञ्चात्म- णेशान्तको [कारणलपते नावस्थितस्य तं पोडशान्तम् । शतार्धारम् । पञ्चाशत्प्रत्यय- अरोगले-विपर्यय, भेदा विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्धया- अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि नामक ख्या अरा इव यस्य तं शता- । पचास प्रत्ययमेद जिसके अरोंके समान हैं उस पचास अरोंवालेको रिम् । पञ्च विपर्ययभेदाः [ देख] । तम, मोह. महामोह. तमो मोहा मोही महामोहस्तामिस्रो तामित्र और अन्धतामित्र वे पाँच बन्घतामिम्र इति । अशक्तिरष्टा- पियरके मेद हैं । अशक्ति अट्ठाईस १. प्रश्नोपनिने पष्ट प्रश्नमें निन्नलिखित सोलह कलाएँ बतलायी हैं- प्राग. द्धा, आश. वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, नत्र व लोक और नाम । यहाँ 'क्ल' शब्दका बर्थ इस प्रकार है- ब्रह्म लीने मान्छायवे यग, ता क्ल । अर्थात् जिसके द्वारा क (ब्रह्म) लीन (टन हुआ) है उसे क्ल न्इते हैं। इन्होंने ब्रह्मले पारमार्थिक वल्पको दक रहा है, इसलिये वे ग्लएँ हैं। पचास अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ७७ विंशतिधा । तुष्टिर्नवधा । अष्टधा प्रकारकी है, तुष्टि नौ प्रकारकी सिद्धिः । एते पश्चाशत्प्रत्यय और सिद्धि आठ प्रकारकी । ये ही पचास प्रत्ययमेद हैं । इनमें तमके भेदाः । तत्र तमसो भेदोऽष्ट- आठ भेद हैं-अनात्मभूत आठ विधः । अष्टसु प्रकृतिष्वनात्म प्रकृतियोंमें आत्मभाव होना यही स्वात्मप्रतिपत्तिविषयभेदेनाष्टविध- भावोंके विषयभेदके अनुसार आठ त्वप्रतिपत्तेः । मोहस्य चाष्ट- प्रकारका तम है। मोहका आठ प्रकारका भेद है, अणिमादि आठ विधो भेदः । अणिमादिशक्ति- शक्तियाँ ही मोह हैं । महामोह दश र्मोहः । दशविधो महामोहः । प्रकारका है; दृष्ट ( लौकिक ) और दृष्टानुश्रविकशब्दादिविषयेषु प- श्रुत ( पारलौकिक ) शब्दादि पॉच- पाँच विषयोंमें जो सत्यत्वबुद्धि है ञ्चसु पञ्चस्वभिनिवेशो महामोहः। वही महामोह है, दृष्ट और आनु- दृष्टानुश्रविकभेदेन तेषां दशवि- श्रविक भेदसे वे दश प्रकारके हैं। तामिस्र अठारह प्रकारका है । आठ धत्वम् । तामिस्रोऽष्टादशविधः । प्रकारके ऐश्वर्योद्वारा दश प्रकारके दृष्टानुश्रविकेषु दशसु विषयेष्वष्ट- | दृष्ट और आनुश्रविक विषयोके लिये विधेरैश्वर्यैः प्रयतमानस्य तदसिद्धौ प्रयत्न करते हुए उनकी प्राप्ति न होनेपर जो क्रोध होता है वह तामिस्र यः क्रोधःस तामिस्रोऽभिधीयते । कहलाता है । अन्धतामिस्र भी अन्धतामिस्रोऽप्यष्टादशविधः । अठारह प्रकारका है । आठ प्रकारके अष्टविधैश्वर्ये दशसु विषयेषु ऐश्वर्य और दशों प्रकारके विषय भोग्यरूपसे उपस्थित रहनेपर उन्हें भोग्यत्वेनोपस्थितेष्वर्धभुक्तेषु मृ- आधे भोगनेपर ही मृत्युके द्वारा त्युना ह्रियमाणस्य यः शोको उनसे छुडा दिये जानेपर जो ऐसा १. सांख्यशास्त्रानुसार प्रधान, महत्तत्त्व, अहकार और पञ्चतन्मात्रा-ये आठ प्रकृतियाँ हैं-इनमें भी प्रधान केवल प्रकृति है और महदादि सात प्रकृति-विकृति हैं । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें पृथिवी, जल, अमि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकारको भगवान्की अष्टधा प्रकृति कहा है । किन्तु आगे ये प्रकृतियाँ प्रकृत्यष्टकमें ली हैं, इसलिये यहाँ पूर्वोक्त साख्यसम्मत प्रकृतियाँ ही समझनी चाहिये ।
७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ जायते महता क्लेशे ते प्राप्ता न चैते । शोक होता है कि मैने इन्हे वडे कष्टसे मयोपभुक्ता प्रत्यासन्नश्वायं मरण- प्राप्त किया था, मै इन्हें भोग भी नहीं पाया कि यह मरणकाल उपस्थित हो काल इति सोऽन्धतामिस्र इत्युच्यते। गया—इसे अन्धतामिस्र कहते हैं । विपर्ययभेदा व्याख्याताः। इस प्रकार विपर्ययके मेदोकी तो अशक्तिरष्टाविंशतिधोच्यते-एका- व्याख्या हो गयी। अशक्ति अट्ठाईस प्रकारकी कही जाती है । मूकत्व, दशेन्द्रियाणामशक्तयो मूक- बधिरत्व, अन्धत्वादि ग्यारह बाह्य त्वबधिरत्वान्धत्वप्रभृतयो बाह्याः । अशक्तियॉ तो इन्द्रियोंकी हैं, पुरुपार्थ- अन्तःकरणस्य पुरुषार्थयोग्यता- की योग्यतारूप तुष्टियोंसे विपरीत नौ तुष्टीनां विपर्ययेण नवधाशक्तिः । अशक्तियाँ अन्तःकरणकी है, और सिद्धीनां विपर्ययेणाएवाशक्तिः । आठ अशक्तियॉ सिद्धियोसे विपरीत हैं। तुष्टिर्नवधा-प्रकृत्युपादान तुष्टि नौ प्रकारकी है-चार कालभाग्याख्याश्चतस्रः । विप- | तो प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य नामवाली तथा पाँच विषयोंसे योपरमात्पञ्च कश्चि- उपरति हो जानेसे होती हैं । (१) प्रकृतिपरिज्ञानात्कृतार्थोऽस्मीति कोई पुरुप प्रकृतिका ज्ञान होनेपर मन्यते । अन्यः पुनः पारि- ही यह मान लेता है कि मैं कृतार्थ हो गया । (२) कोई संन्यासके चिह व्राज्यलिङ्गं गृहीत्वा कृता- धारण करनेसे ही 'मै कृतार्थ हो गया' र्थोऽस्मीति मन्यते । अपरः पुनः ऐसा अपनेको मानने लगता ( ३ ) कोई प्रकृतिका ज्ञान होनेपर प्रकृतिपरिज्ञानेन किमाश्रमाद्युपा- मा मानका मन मो टा टि- है अध्याय १7 शाङ्करभाष्यार्थ ७९ भाग्येन न किञ्चिदपि प्राप्यते । लगता है कि बिना भाग्यके कुछ भी नहीं मिलता, यदि मेरा भाग्य होगा यदि मम भाग्यमस्ति ततो भवत्ये- तो मुझे अवश्य यहीं मोक्ष प्राप्त हो वात्रैव मोक्ष इति परितुष्यति । जायगा-ऐसा समझकर वह सन्तुष्ट विषयाणामार्जनमशक्यमित्युपरम्य हो जाता है । (५) कोई यह मान- कर कि विषयोंका उपार्जन करना तुष्यति । शक्यते द्रष्टुमार्जितु- असम्भव है, उपरत होकर सन्तुष्ट मार्जितस्य रक्षणमशक्यमित्युपरम्य हो जाता है । ( ६ ) कोई यह सोचकर कि विषयोंका दर्शन और परितुष्यति । सातिशयत्वादिदोष- उपार्जन तो सम्भव है, परन्तु उपार्जित दर्शनेनोपरम्य परस्तुष्यति । वि- विषयोंकी रक्षा करना सम्भव नहीं है, उनसे उपरत होकर सन्तोष कर षयाः सुतरामेवाभिलाषं जनयन्ति लेता है । (७) कोई विषयोंमें न च तद्भोगाभ्यासे तृप्तिरुप- न्यूनाधिकतादि दोष देखनेसे उनसे उपरत होकर सन्तुष्ट हो जाता है । जायते । (८) विषय तो तत्सम्बन्धी "न जातु कामः कामाना अभिलाषाको ही उत्पन्न करते हैं, मुपभोगेन शाम्यति । उनके पुनः-पुनः भोगसे कभी तृप्ति नहीं होती, "विषयोंकी इच्छा उनके हविषा कृष्णवर्मेव भोगसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु भूय एवाभिवर्धते ॥" घृतसे अग्निके समान वह और भी बढ (श्रीमद्भा० ९ । १९ । १४) जाती है।" अतः पुनः पुनः इति । तस्मादलमनेन पुनः पुन- | असन्तोषके हेतुभूत इन विषयोके भोग- रसन्तोषकारणेनोपभोगेनेत्येवंसङ्ग- को छोडो-इस प्रकार विषयासक्तिमें दोप । देखकर कोई उनसे उपरत होकर दोषदर्शनादुपरम्य कश्चित्तुष्यति । सन्तोप कर लेता है । (९) जीवों- नानुपहत्य भूतान्युपभोगः संभ- 1 की हिसा किये बिना भोग मिलना 20 श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ । वति । भूतोपघातभोगाचाधर्मः । | सम्भव नहीं है और जीवहिंसापूर्वक भोग भोगनेसे अधर्म होगा तथा अधर्मानरकादिप्राप्तिरिति हिंसा- अधर्मसे नरकादिकी प्राप्ति होगी। दोषदर्शनात्कश्चिदुपरम्य तुष्यति। कोई उनसे उपरत होकर सन्तोष इस प्रकार हिसारूप दोष देखकर कर लेता है । इस प्रकार प्रकृति, प्रकृत्युपादानकालभाग्याश्चतस्रः । उपादान, काल और भाग्यनामक विषयाणामार्जनरक्षणविषयदोष- चार एवं विषयोके उपार्जन, रक्षण, विपयतारतम्यरूप दोप, सग और सङ्गहिंसादोषात्पञ्च तुष्टय इति | हिंसा इन दोषों के कारण होनेवाली पॉच--ऐसी इन नौ तुष्टियोंकी नव तुष्टयो व्याख्याताः। व्याख्या कर दी गयी। सिद्धयोभिधीयन्ते-ऊहः श अब सिद्धियाँ बतलायी जाती हैं-तीन सिद्धियाँ तो ऊह, ब्दोऽध्ययनमिति तिस्रः सिद्धयः। शब्द और अध्ययन नामकी हैं, दुःखविघातास्तिस्रः । सुहृत्प्राप्ति- तीन दुःखविघात नामवाली हैं र्दानमिति सिद्धिद्वयम् । ऊहस्त- और दो सुहृत्प्राप्ति एवं दान हैं। त्वं जिज्ञासमानस्योपदेशमन्तरेण | ऊह-तत्त्वजिज्ञासुको उपदेशके जन्मान्तरसंस्कारवशात्प्रकृत्यादि- बिना ही जन्मान्तरके सस्कारसे जो प्रकृति आदिके विषयमें ज्ञान उत्पन्न विषयं ज्ञानमुत्पद्यते सेयमूहो हो जाता है वह ऊह नामकी पहली नाम प्रथमा सिद्धिः। शब्दो नामा- सिद्धि है । बिना अभ्यासके केवल भ्यासमन्तरेण श्रवणमात्राद्यज्ज्ञा- श्रवणमात्रसे ही जो ज्ञान उत्पन्न हो नमुत्पद्यते सा द्वितीया सिद्धिः । जाता है वह शब्द नामकी दूसरी सिद्धि है । शास्त्रके अभ्याससे जो ज्ञान अध्ययनं नाम शास्त्राभ्यासाद्य-! उत्पन्न हो जाता है उसे अध्ययन ज्ज्ञानमुत्पद्यते सा तृतीया सिद्धिः। कहते हैं, यह तीसरी सिद्धि है ।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ८१ आध्यात्मिकस्याधिभौतिकस्याधि- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और दैविकस्य त्रिविधदुःखस्य व्युदा- आधिदैविक इन त्रिविध दुःखोंकी उपेक्षा करनेसे शीतोष्णादिजनित साच्छीतोष्णादिजन्यदुःखसहिष्णोः दुःख सहन करनेवाले तितिक्षु पुरुष- तितिक्षोर्यज्ज्ञानमुत्पद्यते तस्य को जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह आध्यात्मिकादिभेदासिद्धेस्वैवि- | दुःखविघात नामकी सिद्धि है; आध्यात्मिकादि भेदके कारण इस ध्यम् । सुहृदं प्राप्य या सिद्धि- सिद्धिके भी तीन प्रकार हैं । किसी ऑनस्य सा सुहृत्प्राप्ति म | सुहृद्क प्राप्त होनेपर जो ज्ञानकी सिद्धिः । आचार्यहितवस्तुप्रदानेन सिद्धि होती है वह सुहृत्प्राप्ति नामकी सिद्धि है । आचार्यको उनकी प्रिय या सिद्धिविद्यायाः सा दानं नाम | वस्तु दान करनेसे जो ज्ञानकी प्राप्ति सिद्धिः । एवमष्टविधा सिद्धिा- होती है वह दान नामकी सिद्धि है। इस प्रकार आठ प्रकारकी सिद्धियों- ख्याता । की भी व्याख्या की गयी । एवं विपर्ययाशक्तितुष्टि इस तरह यह विपर्यय, अगक्ति, तुष्टि सिद्धयाख्याः पञ्चाशत्प्रत्यय- और सिद्धि नामक पचास प्रत्ययभेदोंकी भेदा व्याख्याताः । एवं ब्राह्म- व्याख्या हुई । ब्राह्मपुराणमें कल्पो- पनिषद्की व्याख्याके प्रसङ्गमें साठवे पुराणे कल्पोपनिषद्व्याख्यान- अध्यायमें पचास प्रत्ययभेदोकी इसी प्रदेशे पष्टितमाध्याये पञ्चाशत् प्रकार व्याख्या की गयी है । अथवा प्रत्ययभेदाः प्रतिपादिताः । अथवा “पञ्चाशच्छक्तिरूपिण.” इस पुराण- "पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः" इति परस्य वाक्यमें परमात्माकी जिन शक्तियोका उनके स्वरूपरूपसे वर्णन किया है याः शक्तयः पुराणे स्वरूपत्वेना- वे ही जिसके अरोके समान हैं उस भिमताः पञ्चाशच्छक्तय अरा इव शतार्धार ( पचास अरोवाले ) को यस्य तं शतार्धारम् । [कारणरूपसे देखा | श्वे० उ० ११-१२- [ अध्याय १ श्वेताश्वतरोपनिषद् आदान विंशतिप्रत्यराभिः। विंशति वीस प्रत्यरोंसे युक्त । दश इन्द्रियाँ प्रत्यरा दशेन्द्रियाणि तेषां च और उनके विषय शब्द, स्पर्श, विषयाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध- रूप, रस, गन्ध, वचन, वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाः । (ग्रहण ), गति, त्याग और आनन्द -ये वीस प्रत्यर है । जो पूर्वोक्त पूर्वोक्तानामराणां प्रत्यरा ये प्रति- विधीयन्ते कीलका अराणां दा- लिये जो शलाकाएँ लगायी जाती हैं अरोके प्रति अरे-अरोंकी दृढताके ाय ते प्रत्यरा इत्युच्यन्ते । वे प्रत्यर कहलाते हैं । उन प्रत्यरोंसे तैः प्रत्यरैर्युक्तम् । अष्टकै पड्मि- युक्त, तथा छः अष्टकोंसे युक्तको युक्तमिति योजनीयम् । [ कारणरूपसे देखा ]-ऐसी योजना "भूमिरापोऽनलो वायुः करनी चाहिये । "पृथिवी, जल, खं मनो वुद्धिरेव च । अग्नि, वायु, आकाश, मन, मन, बुद्धि अहंकार इतीयं मे और अहंकार-यह मेरी आठ भेदों- भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥" | वाली प्रकृति है" यह गीतोक्त (गीता ७ । ४) प्रकृत्यष्टक है; त्वचा, चर्म, मास, इति प्रकृत्यष्टकम् । त्वक्चर्म- रुधिर, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र मांसरुधिरमेदोऽस्थिमज्जाशुक्राणि यह धात्वष्टक है; अणिमादि ऐश्वर्याष्टक धात्वष्टकम् । अणिमाद्यैश्वर्या- है; धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, एकम् । धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्याधर्मा- | अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य-यह ज्ञानावैराग्यानैश्वर्याख्यभावाप्ट- भावाष्टक है; ब्रह्मा, प्रजापति, देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और कम् । ब्रह्मप्रजापतिदेवगन्धर्वयक्ष- पिशाच-यह देवाष्टक है; और आठ राक्षसपितृपिशाचा देवाष्टकम् । जिन्हें आत्माके गुण समझना चाहिये, अष्टावात्मगुणा ज्ञेयाः, दया वे समस्त प्राणियोंके प्रति दया, सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शोच- क्षमा, अनसूया ( निन्दा न करना ); १. अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व-ये आठ ऐश्वर्य हैं।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ८३ मनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहेति शौच, अनायास, मङ्गल, अकृपणता और अस्पृहा ये छठा गुणाष्टक हैं; गुणाष्टकं षष्ठम् । एतैः षड्भि- इन छः अष्टकोंसे युक्तको [ कारण- र्युक्तम् । रूपसे देखा ] । विश्वरूपैकपाशं स्वर्गपुत्रान्नाद्या विश्वरूप एक पाशबालेको- खर्ग,पुत्र एवं अन्नाद्य आदि विषयभेदसे दिविषयभेदाद्विश्वरूपं विश्वरूपो कामनामक एक ही विश्वरूप-अनेक नानारूप एकः कामाख्यः पाशो- ' प्रकारका पाश है जिसका उस ऽस्येति विश्वरूपैकपाशम् । धर्मा- विश्वरूप एक पाशवालेको; धर्म, अधर्म और ज्ञानरूप जिसके मार्गभेद धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति त्रि- हैं उस तीन मार्गभेदोंवालेको; तथा मार्गभेदम् । द्वयोः पुण्यपापयो- पाप-पुण्य इन दोनोंका एक ही निमित्त मोह यानी देह, इन्द्रिय, मन, निमित्तैकमोहो देहेन्द्रियमनोवुद्धि- बुद्धि एवं जाति आदि अनात्माओंमें जिसका आत्माभिमान है ऐसे उस जात्यादिष्वनात्मस्वात्माभिमानो- दोके [ मोहरूप ] एक ही निमित्त- ऽस्येति द्विनिमित्तैकमोहम् । अप- वालेको [उन्होंने कारणरूपसे देखा] यहाँ पूर्वमन्त्रकी श्यन्निति क्रियापदमनुवर्तते । क्रिया 'अपश्यन्' की अनुवृत्ति होती है, अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद अधीम इत्युत्तरमन्त्रसिद्धं वा 'अधीमः' ( जानते हैं) का क्रियापदम् ॥ ४॥ अध्याहार करना चाहिये ॥४॥ इस प्रकार कार्यब्रह्मका नदीरूपसे वर्णन पूर्व चक्ररूपेण दर्शितमिदानी पहले जिसे चक्ररूपसे प्रदर्शित किया है उसीको अब श्रुति नदी- नदीरूपेण दर्शयति- रूपसे दिखलाती है- ८४ श्वेताश्वतरोपनिपद् [अध्याय १ पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्रां पञ्चप्राणोमि पञ्चबुद्धयादिमूलाम् । पञ्चावता पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाशद्धदां पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥ पाँच स्रोत जिसमें जलकी धाराएँ हैं, पॉच उगमस्थानोके कारण जो बड़ी उग्र और वक्र ( टेढ़ी ) है, जिसमे पञ्चप्राणरूप तरंगें हैं, पाँच प्रकारके ज्ञानोंका मूल जिसका कारण है, जिसमें पॉच आवर्त ( भंवर ) हैं, जो पाँच प्रकारके दुखरूप ओघवेगवाली है और जो पाँच पावाली है उस पचास मेटोवाली [ नदी ] को हम जानते है ॥ ५॥ पश्चस्रोतोऽम्युमिति । पञ्च 'पञ्चस्रोतोऽत्रुम्' इत्यादि । पाँच स्रोतांसि चक्षुरादीनि ज्ञानेन्द्रि- त्रोतरूप चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही जिसके जलस्थान हैं उस पाँच याण्यम्बुस्थानानि यस्यास्तां नदी स्रोतरूप जलवाली नदीको हम जानते पञ्चस्रोतोऽम्बुम् । अधीम इति है ] । यहाँ 'अधीम' (जानते हैं) सर्वत्र संबध्यते । पञ्चयोनिभिः । क्रियापदका सबके साथ सम्बन्ध है। कारणभूतैः पञ्चभूतैरुयां वक्रां पाँच योनियों अर्थात् कारणभूत पाँच च पञ्चयोन्युग्रवक्राम् । पञ्च भूतोंसे जो उग्र और वक्र है उस प्राणाः कर्मेन्द्रियाणि वारपाण्या- पञ्चयोन्युग्रवक्राको, पाँच प्राण अथवा दयो वोर्मयो यस्यास्तां पञ्चप्राणो- वाक्. पाणि गटाढि पाँच कर्मेन्द्रियाँ जिसकी तरंगे है उस पञ्चप्राणोर्मि- मिम् । पञ्चबुद्धीनां चक्षुरादि- को. पांच बुद्धियों अर्थात् चक्षु आदिसे जन्यानां ज्ञानानामादिः कारणं होनेवाले पाँच ज्ञानोंका आदि यानी मनः । मनोवृत्तिरूपत्वात्सर्व- कारण मन है, क्योंकि समस्त ज्ञान ज्ञानानां मनो मूलं कारणं यस्याः । मनोवृत्तिरूप हैं; वह मन जिस संसारसरितस्ताम् । तथा च संसाररूप नदीका मूल कारण है अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ८५ मनसः सर्वहेतुत्वं दर्शयति- उसको । तथा मन ही सबका हेतु है-- "मनोविजम्भितं सर्व यह इस वाक्यसे दिखाते हैं- यत्किंचित्सचराचरम् । जितना कुछ स्थावर-जगम है वह सब मनका ही विलास है। मनके मनसो ह्यमनीभावे मननशून्य होनेपर द्वैतकी उपलब्धि द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥" ही नहीं होती ।” शब्दादि पाँच इति । पञ्च शब्दादयो विषया | विषय आवर्तरूप हैं, उन विषयोंमें आवर्तस्थानीयास्तेषु विषयेषु प्रा- प्राणी डूब जाते हैं, इसलिये वे जिसके आवर्त हैं उस पाँच आवर्त- णिनो निमजन्तीति यस्यास्तां वालीको, गर्भदुःख, जन्मदु ख, जरा- पञ्चावर्ताम् । पञ्च गर्भदुःखजन्म- दुःख व्याधिदु ख और मरणदु.ख ये दुःखजरादुःखव्याधिदुःखमरण- | पाँच जिसके ओघवेग (जलराशिके दुःखान्येवौघवेगो यस्यास्तां पञ्च- | प्रवाह ) हैं उस पाँच दुःखरूप ओघवेगवालीको; तथा अविद्या, दुःखौघवेगाम् । अविद्यास्मिता अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेश- ये पाँच क्लेश ही जिसके पाँच पर्व हैं भेदाः पञ्च पर्वाण्यस्यास्तां पञ्च- | उस पाँच पोवाली संसारनदीको पर्वामिति ॥५॥ [ हम जानते हैं ] ॥ ५॥ जीवके संसार-बन्धन और मोक्षके कारणका निर्देश एवं तावन्नदीरूपेण ब्रह्म इस प्रकार यहॉतक तो नदी- चक्ररूपेण च कार्यकारणात्मक रूपसे और ब्रह्मचक्ररूपसे प्रपञ्च- सहित कार्य-कारणरूप ब्रह्मका वर्णन ब्रह्म सप्रपञ्चमिहाभिहितम् । किया गया । अब, इस कार्य- इदानीमस्मिन्कार्यकारणात्मक- कारणात्मक ब्रह्मचक्रमें किस हेतुसे ब्रह्मचक्र केन वा संसरति केन जीवको संसारकी प्राप्ति होती है और ८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ वा मुच्यत इति संसारमोक्ष- किस साधनसे वह मुक्त होता है इस प्रकार संसार और मोक्षका हेतु हेतुप्रदर्शनायाह- दिखलानेके लिये श्रुति कहती है- सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचके। पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६॥ जीव अपनेको और सर्वनियन्ता परमात्माको अलग-अलग मानकर इस समस्त भूतोंके जीवननिर्वाहक ( भोगभूमि ) और सबके आश्रयभूत (प्रलयस्थान ) महान् ब्रह्मचक्रमें भ्रमता रहता है; और जव उससे अभिन्नरूपसे सेवित होता है तब अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ सजीव इति । सर्वेषामाजी 'सर्वाजीवे' इत्यादि । जिसमें समस्त भूतोंका जीवन है उस सर्वाजीव वनमस्मिन्निति सर्वाजीवे । सर्वेपां तया जिसमें सबकी संस्था-समाप्ति संस्था समाप्तिः प्रलयो यस्मि- यानी प्रलय होती है उस सर्वसंस्थ निति सर्वसंस्थे । बृहन्तेऽस्मि- बृहन्त ( महान् ) ब्रह्मचक्रमें हंस- जीव, संसारमार्गमें हनन-गमन न्हंसो जीवः । हन्ति गच्छत्यध्वा- करता है इसलिये जीव हंस कहा नमिति हंसः। भ्राम्यतेऽनात्म- जाता है, भ्रमता रहता है, अर्थात् अनात्मभूत देहादिको आत्मा मानता भृतदेहादिमात्मानं मन्यमानः हुआ देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादि सुरनरतिर्यगादिभेदभिन्ननानायो- मेदोवाली अनेकों योनियोंमें भ्रमण करता है। इसी प्रकार भ्रमण करता निपु । एवं भ्राम्यमाणः परिवर्तत हुआ सब ओर भटकता रहता है- इत्यर्थः । ऐसा इसका तात्पर्य है।
(अध्याय १7 शाङ्करभाष्यार्थ केन हेतुना नानायोनिषु किस कारणसे अनेकों योनियोंमें परिवर्तते ? इति तत्राह-पृथगा- घूमता है ? इसके उत्तरमें कहते हैं- 'पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा' इति । स्मानं प्रेरितारं च मत्वेति । आ- आत्मा अर्थात् जीवात्मा और प्रेरक- त्मानं जीवात्मानं प्रेरितारं चेश्वरं | ईश्वरको पृथक्-विभिन्नरूपसे मान- पृथग्भेदेन मत्वा ज्ञात्वा अन्योऽसा- कर; तात्पर्य यह है कि 'यह अन्य वन्योऽहमस्मि' इति जीवेश्वरभेद- है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार जीव और ईश्वरका भेद देखनेसे वह दर्शनेन संसारे परिवर्तत इत्यर्थः । संसारमें घूमता है। केन मुच्यते ? इत्याह-जुष्टः किस उपायसे वह मुक्त होता है, सेवितस्तेनेश्वरेण चित्सदानन्दा- सो बतलाते हैं उस ईश्वरसे जुष्ट- सेवित होनेपर अर्थात् सच्चिदानन्द- द्वितीयन्त्रमात्मनाई ब्रह्मास्मीति मय ब्रह्मसे अभिन्न ब्रह्मस्वरूपसे 'मैं समाधानं कृत्वेत्यर्थः । तेनेश्वर- ब्रह्म ही हूँ'-ऐसा समाधान (समाधि ) सेवनादमृतत्वमेति । यस्तु पूर्णा- करनेपर । इस समाधिद्वारा ईश्वरका सेवन करनेसे वह मुक्त हो जाता नन्दब्रह्मरूपेणात्मानमवगच्छतिस है। जो कोई भी अपनेको पूर्णानन्द अनुभव करता है वही मुच्यते । यस्तु परमात्मनोऽन्य- मुक्त होता है और जो अपनेको मात्मानं जानाति स बध्यत इति । परमात्मासे भिन्न जानता है वह बँधता है । इसी प्रकार बृहदारण्यक- तथा च बृहदारण्यके भेददर्श- में भी भेददृष्टिको संसारका हेतु नस्य संसारहेतुत्वं प्रदर्शितम्- दिखलाया है-"जो ऐसा जानता “य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स है कि मैं ब्रह्म हूँ वह सर्वरूप हो जाता है; देवगण भी उसके सर्वात्मक इदं सर्व भवतीति तस्य ह न ब्रह्मभावकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेको देवाश्च नाभूत्या ईशते । आत्मा | समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका ब्रह्मस्वरूपसे [ अध्याय १ वेताश्वतरोपनिषद् ८८ ह्येषां स भवत्यथ योऽन्यां आत्मा ही हो जाता है । किन्तु जो किसी अन्य देवताकी 'यह अन्य है देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहम- और मैं अन्य हूँ' ऐसे भावसे स्मीति न स वेद यथा पशुरेवं उपासना करता है वह नहीं जानता स देवानाम्" (बृह० उ०१॥ [अर्थात् वह अज्ञानी है ] वह पशु- ४।१०) इति । ओके समान देवताओंका पशु है ।" तथा च श्रीविष्णुधर्मे ऐसा ही विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें "पश्यत्यात्मानमन्यं तु भी कहा है-"जीव जबतक अपने- याबद्वै परमात्मनः। ! को परमात्मासे भिन्न देखता है तावत्संभ्राम्यते जन्तु- तबतक वह अपने कर्मोद्वारा मोहित माहितो निजकर्मणा ॥ करके भटकाया जाता है। किन्तु जब उसके समस्त कर्म क्षीण हो संक्षीणाशेपकर्मा तु जाते हैं तो उसे शुद्ध परब्रह्मका परं ब्रह्म प्रपश्यति । अपनेसे अभेदरूपसे साक्षात्कार अभेदेनात्मनः शुद्ध होता है, और शुद्धस्वरूप हो जानेके शुद्धत्वादक्षयो भवेन्"।६।। कारण वह अमर हो जाता है"॥६॥ जाना परब्रह्मकी प्राप्तिसे मुक्तिका वर्णन ननु तमेकनेमिमित्यादिना। 'तमेकनेमिम्' इत्यादि वाक्यसे - प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मका प्रतिपादन किया सप्रपञ्चं ब्रह्म प्रतिपादितम् । तथा गया है। ऐसी स्थितिमें 'मैं ब्रह्म हूँ' च सत्यहं ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्म- इस प्रकार ब्रह्मात्मभावकी प्राप्ति होनेपर भी प्रपञ्चयुक्त ब्रह्मको ही प्रतिपत्तावपि सप्रपञ्चस्यैव ब्रह्मण आत्मस्वरूपसे जायगा। आत्मत्वेनावगमात् "तं यथा इससे “उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है वैसा ही हो जाता यथोपासते तदेव भवति" इति है" इस सिद्धान्तके अनुसार सप्रपञ्च सप्रपञ्चब्रह्मप्राप्तिरेव स्यात् । ततश्च ब्रह्मकी ही प्राप्ति होगी । और तब अध्याय १ 1 शाङ्करभाष्यार्थ प्रपञ्चस्यापरित्यागान मोक्षसिद्धिः। | प्रपञ्चका त्याग न होनेसे मोक्षको भी प्राप्ति नहीं होगी। इसलिये 'उससे ततश्च जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेती- | अभिन्नरूपसे सेवित होनेपर अमरत्व प्राप्त करता है' इस प्रकार जो तिमोक्षोपदेशोऽनुपपन्न एवेत्या- | मोक्षका उपदेश किया है वह अनुपयुक्त ही है-ऐसी आशङ्का शङ्कयाह- करके श्रुति कहती है उद्गीतमेतत्परम ब्रह्मा (al तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च । अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः ॥ ७ ॥ प्रपञ्चसे पृथक्पसे वर्णन किया गया यह ब्रह्म सर्वोत्कृष्ट ही है । उसमें [ भोक्ता, भोग्य और नियन्ता—ये ] तीनों स्थित हैं। वह इनकी सुप्रतिष्ठा और अविनाशी है । इसमें प्रवेशद्वार पाकर ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममे लीन हो समाधिनिष्ठामें स्थित हुए जन्म-मरणसे मुक्त हो जाते है ॥ ७ ॥ उद्गीतमिति । सप्रपञ्चं ब्रह्म 'उद्गीतम्' इत्यादि । यदि ब्रह्म यदि स्यात्ततो भवत्येव मोक्षा- प्रपञ्चयुक्त होता तब तो [ उसकी प्राप्तिमें ] मोक्षका अभाव हो सकता भावः। न त्वेतदस्ति । कस्मात् ? | था | किन्तु ऐसी बात है नहीं । यत उगीतमुद्धृत्य गीतमुपदिष्टं कैसे नहीं है ? क्योंकि वेदान्तोंने इसका कार्य-कारणरूप प्रपञ्चसे कार्यकारणलक्षणात्प्रपञ्चाद्वेदान्तैः। अलग करके गान यानी उपदेश "अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- किया है । तात्पर्य यह है कि “वह दितादधि" (के० उ०१।३)।। विदितसे भिन्न है और अविदितसे श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय १ ९० , . , - . "तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदि- भी परे है", "तू उसीको ब्रह्म जान, दमुपासते" (के० उ०१।४)। जिसकी लोक इढभावसे उपासना "अस्थूलम्" (वृ० उ० ३ । करता है वह ब्रह्म नहीं है", "वह ८ । ८) अशब्दमस्पर्श' (क० स्थूल नहीं हैं", "शब्दरहित है उ० १ । ३ । १५) । “स एप और स्पर्शरहित है", "वह ब्रह्म यह नेति नेतीति ।" "ततो यदुत्तर- ( कारण ) नहीं है, यह (कार्य) तरम्" (श्वेता० उ०३ । १०)। नहीं है", "जो उससे भी आगे "अन्यत्र धर्मात्" (क० उ०१।२। १४)। "न सन्न चासच्छिव एव है", "वह धर्मसे परे है" "न केवल" (श्वेता० उ०४ । १८)। सत् है न असत्, वह शुद्ध- "तमसः परः ।" "यतो वाचो स्वभाव एवं अविद्याजनित विकल्पसे निवर्तन्ते ।" (तै० उ० २।४।१) शून्य है", "वह अज्ञानसे परे है", “यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छणोति "जहाँसे वाणी लौट आती है", नान्यद्विजानाति स भूमा" (छा० "जहाँ न अन्य कुछ देखता है, न उ० ७ । २४ । १)। “योऽश- अन्य कुछ जानता है वह भूमा है", नायापिपासे शोकं मोहं भयं जरा- "जो भूख-प्यास तथा शोक, मोह, मत्येति" (वृ० उ० ३।५। भय और वृद्धावस्थासे परे है", "जो १)। "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो प्राण और मनसे रहित, शुद्धस्वरूप ह्यक्षरात्परतः परः" (मु० उ०२। और पर अव्याकृतसे भी परे है", १२) । “एकमेवाद्वितीयम् ।" (छा० "ब्रह्म एकमात्र अद्वितीय है", ० उ०६।२। १) "वाचा- रम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० "विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला उ०६।१।४)। "नेह नानास्ति नाममात्र है", "यहाँ नाना कुछ किञ्चन" (वृ० उ० ४।४।१९)। नहीं है" तथा "उसे एकरूप ही "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (वृ० उ० देखना चाहिये' इत्यादि मन्त्रोंमें ४।४।२०)। इत्येवमादिषु प्रपञ्चा- ब्रह्म प्रपञ्चसे असङ्ग ही जाना स्पृष्टमेव ब्रह्मावगम्यत इत्यर्थः । जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है। यत एवं प्रपञ्चधर्मरहितं क्योंकि इस प्रकार ब्रह्म प्रपञ्चके ब्रह्मात एव परमं तु ब्रह्म। धमोंसे रहित है, इसलिये वह , अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ८१ आध्यात्मिकस्याधिभौतिकस्याधि- आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन त्रिविध दुःखोकी दैविकस्य त्रिविधदुःखस्ख व्युदा- उपेक्षा करनेसे गीतोष्णादिजनित साच्छीतोष्णादिजन्यदुःखसहिष्णोः दुःख सहन करनेवाले तितिक्षु पुरुष- तितिक्षोर्यज्ज्ञानमुत्पद्यते तस्य | को जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह दुःखविधात नामकी सिद्धि है; आध्यात्मिकादिभेदात्सिद्धेस्वैवि- आध्यात्मिकादि भेदके कारण इस ध्यम् । सुहृदं प्राप्य या सिद्धि- सिद्धिके भी तीन प्रकार है । किसी निस्य सा सुहृत्प्राप्ति म सुहृद्क प्राप्त होनेपर जो ज्ञानको सिद्धिः । आचार्यहितवस्तुप्रदानेन सिद्धि होती है वह सुहृत्प्राप्ति नामकी सिद्धि है । आचार्यको उनकी प्रिय या सिद्धिविद्यायाः सा दानं नाम वस्तु दान करनेसे जो ज्ञानकी प्राप्ति सिद्धिः । एवमप्टविधा सिद्धिा- होती है वह दान नामकी सिद्धि है । इस प्रकार आठ प्रकारकी सिद्धियों- ख्याता । की भी व्याख्या की गयी। एवं विपर्ययाशक्तितुष्टि इस तरह यह विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि सिद्धयाख्या पञ्चाशत्प्रत्यय- और सिद्धि नामक पचास प्रत्ययमेदोंकी भेदा व्याख्याताः । एवं ब्राह्म- व्याख्या हुई । ब्राह्मपुराणमें कल्पो- पनिषद्की व्याख्याके प्रसङ्गमें साठवे प्रदेशे षष्टितमाध्याये पञ्चाशत् प्रकार व्याख्या की गयी है । अथवा प्रत्ययभेदाः प्रतिपादिताः। अथवा “पञ्चाशच्छक्तिरूपिणः" इस पुराण- वाक्यमें परमात्माकी जिन शक्तियोंका उनके खरूपरूपसे वर्णन किया है पुराणे कल्पोपनिषद्व्याख्यान- अध्यायमे पचास प्रत्ययभेदोंकी इसी "पञ्चाशच्छत्तिरूपिणः" इति परस्य याः शक्तयः पुराणे स्वरूपत्वेना- वे ही जिसके अरोके समान हैं उस भिमताः पञ्चाशच्छत्तय अरा इव शतार्धार ( पचास अरोंवाले ) को यस्य तं शतार्धारम् । [ कारणरूपसे देखा ] । श्वे० उ० ११-१२- ९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ सारा वक्ष्यमाणं भोग्यभोक्तृनियन्त- | किया है वे भोक्ता, भोग्य और नियन्ता लक्षणम् । “अजा ह्येका भोक्त- | तीनों उस ब्रह्ममे ही स्थित है । भोग्यार्थयुक्ता" इति वक्ष्यमाणं भोक्तः युक्ता" इस वाक्यसे कहे जानेवाले अथवा "अजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थ- भोग्यार्थरूपं चान्यद्वेदं श्रुतिसिद्धं भोक्ता, भोग्य और भोग, किवा विराटसूत्राभ्यां कृतं नामरूपकर्म- श्रुति-प्रतिपादित विराट् और हिरण्य- विश्वतैजसप्राज्ञजाग्रत्स्वमसुषुप्ति- | गर्भद्वारा रचे हुए नाम, रूप और कर्म अथवा विश्व, तेजस, प्राज्ञ या रूपस्वरूपं प्रतिष्ठितं रज्ज्वामिव जाग्रत्, स्वप्न एवं सुपुप्ति ये तीनों सर्पः । यत एतस्मिन्सर्वं भो- उसमे रज्जुमे सर्पके समान प्रतिष्ठित कत्रादिलक्षणं प्रपञ्चरूपं प्रति- हैं । क्योंकि इसमे भोक्तादिरूप ष्ठितम् , अत एवास्य भोक्त्रादि- इसीसे ब्रह्म इस भोक्तादि त्रयरूप प्रतिष्ठित है, त्रयात्मकस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्म सुप्र- प्रपञ्चकी सुप्रतिष्ठा अर्थात् उत्तम तिष्ठा शोभनप्रतिष्ठा । ब्रह्मणो- आश्रयस्थान है । ब्रह्मसे भिन्न और ऽन्यस्य चलनात्मकत्वाच्चलप्रति- सब चलायमान (अस्थायी) हैं, इसलिये अन्य सब चलप्रतिष्ठा हैं; ष्ठान्यत्र । ब्रह्मणोऽचलत्वादत्रा- ब्रह्म अचल है, इसलिये इसमे उनकी चलप्रतिष्ठा । अचल प्रतिष्ठा है। नन्वेवं तर्हि विकारभूत- यदि ऐसा है तब तो विकारभूत प्रपञ्चका आश्रय होनेसे परिणामी होनेके कारण दधि आदिके समान णामित्वाद्दध्यादिव- ब्रह्म भी अनित्य सिद्ध होगा—ऐसी समर्थनम् दनित्यं स्यादि- आशङ्का करके श्रुति कहती है- त्याशङ्कयाह---अक्षरं चेति । अक्षरं चेति । 'अक्षरं च ।' यद्यपि आश्रय होना विकार है तथापि वह यद्यपि विकारः प्रपञ्चाश्रय- अक्षर है । जो स्वरूपसे च्युत नहीं स्तथाप्यक्षरं न क्षरतीत्यक्षरम् ।। होता उसे अक्षर कहते हैं । ब्राह्मण प्रपञ्चा- प्रपञ्चाश्रयत्वेन परि- श्रयत्वेऽपि नित्यत्व- प्रपञ्चका अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ९३ त्यर्थः। चशब्दोऽवधारणे, अविनाश्येव यहाँ 'च' शब्द निश्चयार्थक है अर्थात् ब्रह्म, मायात्मकत्वाद्विकारस्य । ब्रह्म अविनाशी ही है, क्योकि विकार मायिक है। अभिप्राय यह है कि विकाराश्रयत्वेऽप्यविनाश्येव कूट- विकारका आश्रय होनेपर भी कूटस्थ स्थं ब्रह्मावतिष्ठत इत्यभिप्रायः। ब्रह्म अविनाशी ही रहता है । मायात्मकत्वं च प्रपञ्चस्य पूर्वमेव प्रपञ्चका मायामय होना तो पहले ही विस्तारसे बतला दिया गया है। प्रपश्चितम् । तस्मात्सर्वात्मक- अतः तात्पर्य यह है कि ब्रह्म यद्यपि त्वेऽपि ब्रह्मणः प्रपश्वस्य मिथ्या- | सर्वरूप है तथापि प्रपञ्च मिथ्या त्मकत्वेन ब्रह्मणः प्रपञ्चासंसर्गा- होनेसे ब्रह्मसे प्रपञ्चका कोई सम्बन्ध स्पूर्णानन्दब्रह्मात्मानं पश्यतो नहीं है। अत. पूर्णानन्दस्वरूप मोक्षाख्यः परमपुरुषार्थों भवती- ब्रह्मात्मभावका दर्शन करनेवाले पुरुषको मोक्षरूप परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। कथं तस्यात्मानं पश्यतो अब श्रुति यह बतलाती है कि उस आत्मदर्शीको किस प्रकार मोक्ष- पूर्णानन्द- मोक्षसिद्धिरित्यत की प्राप्ति होती है ? यहाँ--अन्नमय पश्क्तो मोक्ष- आह–अत्रास्मिन्न- कोशसे लेकर आनन्दमय कोशपर्यन्त न्नमयाद्यानन्दमया- न्ते देहे विराडाद्यव्याकृतान्ते वा इस देहमें अथवा विराटसे लेकर अव्याकृतपर्यन्त प्रपञ्चमें पूर्व-पूर्व प्रपञ्चे पूर्वपूर्वोपाधिप्रविलयेनोत्त- उपाधिका लय करते हुए उत्तरोत्तर रोत्तरमप्यशनायाद्यसंस्पृष्टं वाचा- क्षुधादिके ससर्गसे शून्य वाणी- मगोचरं ब्रह्मविदो विदित्वा के अविषयभूत ब्रह्मको जानकर ब्रह्मवेत्तालोग ब्रह्ममें लीन हो- लीना ब्रह्मणि विश्वायुप- विश्वादिका उपसहार करते हुए ब्रह्ममें संहारमुखेन लयं गता अहं ही लयको प्राप्त हो 'मै ब्रह्म है' ब्रह्मास्मीति ब्रह्मरूपेणैव स्थिता । इस प्रकार ब्रह्मरूपसे ही स्थित हो ब्रह्मात्मान सिद्धिप्रकार.
श्वेताश्वतरोपनिषद्
[ अध्याय १
इत्यर्थः । तत्पराः समाधिपराः किं । जाते है । और तत्पर अर्थात्
कुर्वन्ति योनिमुक्ता भवन्ति गर्भ- समाधिपरायण होकर क्या करते
जन्मजरामरणसंसारभयान्मुक्ता
है?—योनिमुक्त हो जाते हैं; अर्थात्
गर्भवास, जन्म, जरा और मरणरूप
भवन्तीत्यर्थः ।
संसारके भयसे मुक्त हो जाते हैं ।
तत्व है
.
तथा च योगियाज्ञवल्क्या इसी प्रकार योगीयानवल्क्य भी
उक्तार्थ नति- ब्रह्मात्मनवावस्थितं ब्रह्मात्मभावसे स्थित होनेको ही
प्रमाणहर्शनन् समाधि दर्शयति- समाधिरूपसे प्रदर्शित करते हैं-
"यदर्थमिदमद्वैतं
"यह जो सवका कारणरूप अद्वैत-
भारूपं सर्वकारणम् ।
प्रकाशस्त्ररूप, आनन्दमय,
आनन्दममृतं नित्यं
सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥
अमृत, नित्य और समस्त भूतोंमें
तदेवानन्यधीः प्राप्य
ओतप्रोत है। अनन्यचित्त पुरुप उस
परमात्मानमात्मना । परमात्माको ही आत्मस्वरूपसे प्राप्त-
तस्मिन्प्रलीयते त्वात्मा
कर उसीमें लीन हो जाता है। वही
समाधिः स उदाहृतः॥
इन्द्रियाणि वशीकृत्य
समाधि कहलाती है। इन्द्रियोंको
यमादिगुणसंयुतः । अपने वशमे कर यमादि गुणोंसे
आत्ममध्ये मनः कुर्या-
सम्पन्न हो मनको आत्मामें लगावे
दात्मानं परमात्मनि ।।
परमात्मा स्वयं भूत्वा
और आत्माको परमात्मामें । फिर
न किञ्चिचिन्तयेत्ततः। स्वयं परमात्मभावसे स्थित हो कुछ
तदातु लीयते त्वात्मा
भी चिन्तन न करे । तब यह चित्त
प्रत्यगात्मन्यखण्डिते॥
अखण्ड प्रत्यगात्मामें लीन हो जाता
प्रत्यगात्मा स एव स्या-
दित्युक्तं ब्रह्मवादिभिः।। है । वही प्रत्यगात्मा है-ऐसा
इति ॥७॥ | ब्रह्मवादियोंने कहा है" ॥ ७ ॥
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ९५ व्यावहारिक भेद और ज्ञानद्वारा मोक्षका प्रदर्शन नन्वद्वितीये परमात्मन्यभ्यु- किन्तु परमात्माको अद्वितीय पगम्यमाने जीवेश्वरयोरपि | माननेपर तो जीव और ईश्वरका भी विभाग न रहनेसे 'लीना ब्रह्मणि विभागाभावाल्लीना ब्रह्मणीति तत्परा योनिमुक्ताः' यह जीवोंका ब्रह्ममें जीवानां ब्रह्मकत्वपरा लयश्रुति- | लय बतलानेवाली श्रुति असंगत ही रनुपपन्नैवेत्याशङ्कय व्यवहारा- | होगी-ऐसी आशंका करके व्यव- हारावस्थामें उपाधिवश जीव और वस्थायां जीवेश्वरयोरुपाधितो ईश्वरका विभाग दिखलाकर श्रुति विभागं दर्शयित्वा तद्विज्ञानाद- परमात्माके विज्ञानसे अमृतत्वकी मृतत्वं दर्शयति- प्राप्ति प्रदर्शित करती है- संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा- ज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ ८ ॥ परस्पर मिले हुए इस क्षर-अक्षर अथवा व्यक्ताव्यक्तरूप विश्वका परमात्मा पोषण करता है । मायाधीन जीव भोक्तृभावके कारण उसमें बँधता है और परमात्माका ज्ञान होनेपर समस्त पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ८॥ • संयुक्तमेतदिति । व्यक्त वि 'संयुक्तमेतत्' इत्यादि । व्यक्त- कारजातमव्यक्तं कारणं तदुभयं विकारसमूह और अव्यक्त कारण ये ही दोनों क्षर और अक्षर हैं। क्षरमक्षरं च व्यक्तं क्षरं विनाश्य- व्यक्त-क्षर यानी विनाशी है और व्यक्तमक्षरमविनाशि तदुभयं अव्यक्त-अक्षर यानी अविनाशी परस्परसंयुक्त कार्यकारणात्मक है । परस्पर मिले हुए कार्य- कारणात्मक विश्वरूप इन दोनोंका विश्वं भरते विभःश ईश्वरः । परमात्मा पोषण करता है ९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय १ ॥ तथा चाह भगवान् ऐसा ही भगवान्ने भी कहा "क्षरः सर्वाणि भूतानि है--"सम्पूर्ण भूत (प्राकृत विकार) कूटस्थोऽक्षर उच्यते । भर हैं और कूटस्थ प्रकृति ( भगवान्की मायाशक्ति) अक्षर उत्तमः पुरुपस्त्वन्यः कही जाती है । इन दोनोंसे अत्यन्त परमात्मेत्युदाहृतः उत्कृष्ट पुरुष [ अर्थात् पुरुषोत्तम ] यो लोकत्रयमाविश्य तो अन्य ही है, जो परमात्मा कहा गया विभर्त्यव्यय ईश्वरः।" है; तथा जो अविनाशी ईश्वर तीन (गीता १५ । १६, १७) लोकोंमें व्याप्त होकर उनको धारण इति । करता है ।" इत्यादि । न केवलमीश्वरो व्यक्ताव्यक्तं परमात्मा केवल व्यक्ताव्यक्तरूप विश्वका भरण ही नहीं करता, अपितु भरतेऽनीशथानीश्वरश्च स आत्मा- जीव अनीश-अस्वतन्त्र भी है और विद्यातत्कार्यभृतदेहेन्द्रियादिभि- वह भोक्तृत्वके कारण अविद्या और बध्यते भोक्तृभावात् । एतदुक्तं उसके कार्यभूत देह एवं इन्द्रियादिसे भवति-परस्परसंयुक्त व्यष्टि- बँध जाता है । यहाँ कहना यह है कि ईश्वर परस्पर मिले हुए समष्टि- समष्टिरूप ईश्वरः । तद्वयटिभृत- व्यष्टिरूप है । उनमे व्यष्टि देह एवं देहेन्द्रियात्मकोऽनीशो जीवः । एवं इन्द्रियोंवाला मायाधीन जीव है । इस समष्टिव्यष्ट्यात्मकत्वेन जीव- , प्रकार समष्टि-व्यष्टिरूपसे जीव और परमात्माका औपाधिक भेट विद्यमान परयोरोपाधिकस्य भेदस्य विद्य- रहनेसे उस उपाधिजनित उपासनाके मानत्वात्तदुपाध्युपासनहारेण नि- द्वारा निरुपाधिक ईश्वरका ज्ञान होने- रुपाधिकमीश्वरं ज्ञात्वा मुच्यत पर जीव मुक्त हो जाता है । अतः भोक्ता जीव और परमात्माका एकत्व इति भोक्त्रात्मक्यवादे नानुपपन्नं माननेवाले सिद्धान्तमें असंगत कुछ किञ्चिद्विद्यत इति । भी नहीं है।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ पाधिकत्वम् याज्ञवल्क्या- - तथा चौपाधिकमेव भेदं इसी प्रकार भगवान् याज्ञवल्क्य मेदस्यौ- दर्शयति भगवान् | भी इनका औपाधिक भेद ही दिखलाते हैं—“जिस प्रकार घटादि- "आकाशमेकं हि यथा में एक ही आकाश भिन्न-भिन्न हो घटादिषु पृथग्भवेत् । जाता है उसी प्रकार एक ही आत्मा तथात्मको बनेकश्च जलाधारेष्विवांशुमान् ॥" जलाशयोंमे सूर्य के समान भिन्न-भिन्न (याज्ञ० ३ । १४४) प्रतीत हो रहा है।" तथा च श्रीविष्णुधर्मे श्रीविष्णुधर्मोत्तरमे भी ऐसा ही "परात्मनोर्मनुष्येन्द्र कहा है-"राजन् ! परमात्मा और विभागोऽज्ञानकल्पितः । जीवात्माका भेद अज्ञानकल्पित है; क्षये तस्यात्मपरयो अज्ञानका नाश हो जानेपर आत्मा विभागाभाव एव हि ॥ और परमात्माके भेदका अभाव ही आत्मा क्षेत्रज्ञसंज्ञोऽयं सिद्ध होता है । यह क्षेत्रज्ञसंज्ञक संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः। जीवात्मा प्रकृतिके गुणोंसे युक्त है और उन्हींसे रहित होनेपर यह शुद्ध- परमात्मा निगद्यते ॥ खरूप परमात्मा कहा जाता है। अनादिसंबन्धवत्या यह क्षेत्रज्ञ अपनेसे अनादिकालसे क्षेत्रज्ञोऽयमविद्यया। सम्बन्ध रखनेवाली अविद्यासे युक्त युक्तः पश्यति भेदेन होनेसे ही अपनेमें स्थित ब्रह्मको ब्रह्मत्वात्मनि संस्थितम्।।" | भेदभावसे देखता है।" तथा च श्रीविष्णुपुराणे- तथा श्रीविष्णुपुराणमें भी कहा "विभेदजनकेऽज्ञाने है-"जीव और ब्रह्मका भेद उत्पन्न नाशमात्यन्तिकं गते । करनेवाले अज्ञानका आत्यन्तिक नाश आत्मनो ब्रह्मणो भेद- मसन्तं कः करिष्यति ॥ हो जानेपर आत्मा और ब्रह्मका (६ । ७ । ९६) | मिथ्या भेद कौन करेगा?" श्वे० उ० १३-~-१४ तैरेव विगतः शुद्धः श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ समय ये तथा च वासिष्ठे योगशास्त्रे वासिष्ट योगशास्त्रमें भी [राम- प्रश्नपूर्वकं दर्शितम्- चन्द्रजीके ] प्रश्नपूर्वक यही बात दिखायी है। राम-]"यदि आत्मा "यद्यात्मा निर्गुणः शुद्धः निर्गुण, शुद्ध, नित्यानन्दवरूप, सदानन्दोऽजरोऽमरः । जराशून्य और अमर है तो हे विमो ! संसृतिः कस्य तात स्या यह संसार किसे प्राप्त होता है ? न्मोक्षो वारिद्यया विभो ।। अथवा ज्ञानसे किसका मोक्ष होगा ? क्षेत्रनाशः कथं तस्य और हे भगवन् ! [ ज्ञानीके महा- प्रयाणके समय ] उसका लिङ्गभङ्ग ज्ञायते भगवन्यतः । होता कैसे जाना जाता है ? इस यथावत्सर्वमेतन्मे सब बातें आप मुझे यथार्थ वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् ।।" रीतिसे बतला दीजिये ।" वसिष्ठः- वसिष्ट---"मनीषिगण उस नित्य- "तस्यैव नित्यशुद्धस्य शुद्ध, नित्यानन्दमय आत्माको ही सदानन्दमयात्मनः। देहावच्छिन्न जीवभावकी प्राप्ति होनेपर अवच्छिन्नस्य जीवस्य संसारकी प्राप्ति बतलाते हैं। प्रत्येक संसृतिः कीर्त्यते बुधैः॥ जीवमें एक ही भूतात्मा ( सत्य एक एव हि भूतात्मा आत्मा-परब्रह्म ) स्थित है। वहीं भृते भृते व्यवस्थितः। जलमें प्रतिविम्वित चन्द्रमाके समान एकधा बहुधा चैव एक और अनेक रूपसे देखा जाता दृश्यते जलचन्द्रवत् ।। है। अविद्याधीन होनेपर वही भ्रान्त्यारूढः स एवात्मा परमात्मा सर्वदा जीवसंज्ञावाला हो जीवसंज्ञः सदा भवेत् ॥" जाता है ।" तथा च ब्राझे पुराणे परस्य इसी प्रकार ब्रह्मपुराणमें भी परत्यवोपाधिक- चौपाधिकं जीवादि- | परमात्माके ही औपाधिक जीवादि जीवादिनेदो मेद दिखलाते हैं । वहाँ यह शंका करके कि ऐसी अवस्थामें व्यवस्सा च कथं तौंपाधिक- औपाधिक भेदसे ही बन्ध-मोक्षादिको भेदेन बन्धमुक्त्यादिव्यवस्था ? व्यवस्था कैसे हो सकती है ? उनकी बन्धमुक्तादि भेदं दर्शयति- अध्याय १] शङ्करभाष्यार्थ ९९ इत्याशङ्कय दृष्टान्तपूर्वकं व्यवस्थां दृष्टान्तपूर्वक व्यवस्था दिखलाते है। दर्शयति- "जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न "एकस्तु सूर्यो बहुधा जलाधारोमें अनेकरूप दिखायी देता जलाधारेषु दृश्यते । है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमे आभाति परमात्मा च स्थित परमात्मा भी अनेकवत् भासता सर्वोपाधिषु संस्थितः॥ है । वह परब्रह्म समस्त शरीरों के ब्रह्म बाहर और भीतर भी स्थित है। सर्वशरीरेषु बाह्ये चाभ्यन्तरेस्थितम् । जिस प्रकार आकाश पञ्चभूतोमे ओतप्रोत है उसी प्रकार समस्त आकाशमिव भूतेषु बुद्धियोंमें एक ही आत्मा अनुस्यूत बुद्धावात्मान चान्यथा।। एवं सति यथा बुद्ध्या है, और किसी प्रकार नहीं। ऐसी स्थितिमें अनात्मामें आत्मत्वकी भ्रान्ति देहोऽहमिति मन्यते । हो जानेसे वैसी बुद्धिके द्वारा वह जीव अनात्मन्यात्मताभ्रान्त्या सा स्यात्संसारबन्धिनी॥ जो ऐसा मानने लगता है कि 'मै देह सर्विकल्पहीनस्तु हूँ' यह मति ही उसे संसार में वॉधने- वाली है। किन्तु इन समस्त शुद्धो बुद्धोऽजरोऽमरः। विकल्पोंसे रहित वह शुद्ध, बुद्ध, प्रशान्तो व्योमवव्यापी अजर, अमर, अत्यन्त शान्त, चैतन्यात्मासकृत्प्रभः ॥ आकाशके समान व्यापक, चैतन्य- धूमाभ्रधूलिभिर्योम खरूप और नित्यज्योतिःस्वरूप है। यथा न मलिनायते । जिस प्रकार धूम, मेघ और धूलि प्राकृतैरपरामृष्टो आदिसे आकाश मलिन नहीं होता विकारैः पुरुषस्तथा ॥ उसी प्रकार पुरुप प्रकृतिके विकारोंसे यथैकस्मिन्घटाकाशे असंग है। जिस प्रकार एक घटा- जलैघूमादिभिर्युते । काशके जल या धूमादिसे युक्त नान्ये मलिनतां यान्ति होनेपर उससे दूर रहनेवाले अन्य दूरस्थाः कुत्रचित्क्वचित् ॥ सब घटाकाग कभी किसी भी [ अध्याय १ श्वेताश्वतरोपनिषद् १०० तथा द्वन्द्वैरनेकैस्तु स्थानमें मलिन नहीं होते उसी प्रकार जीवे च मलिनीकृते । एक जीवके अनेको द्वन्द्वोंसे अभिभूत एकस्मिन्नापरे जीवा होनेपर भी अन्य जीव कहीं भी मलिनाः सन्ति कुत्रचिन् । मलिन नहीं हो सकते।" तथा च शुकशिष्यो गौड इसी तरह शुकदेवजीके शिष्य पादाचार्यः- श्रीगौडपानाचार्य कहते हैं-"जिस "यथैकस्मिन्घटाकाशे प्रकार एक घटाकाशके धूलि और रजोधृमादिभिर्युते । धूमादिसे युक्त होनेपर अन्य सत्र न सवें संप्रयुज्यन्ते घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते, उसी तद्वज्जीवाः सुखादिभिः।।" तरह [एक जीवके ] सुखदिसे सब (माग्० का० ३ । ५) इति। जीव भी युक्त नहीं होते।" तस्मादद्वितीये परमात्मन्यु- अतः अद्वितीय परमात्मामें उपाधि- पाधितो जीवेश्वर- से ही जीव, ईश्वर और जीवोंके जीवगन्दु.ख- नुस्खादेरीश्वरे- योर्जीवानां च भेद- पारस्परिक भेदकी व्यवस्था सिद्ध होनेसे विशुद्ध सत्त्वमयी उपाधिवाले व्यवस्थायाः सिद्ध- त्वान्न विशुद्धसत्त्वोपाधेरीश्वरस्या- ईश्वरको अशुद्ध उपाधिवाले जीवके विशुद्धोपाधिजीवगताः सुख- सुख, दुख, मोह एवं ज्ञानादि प्राप्त दुःखमोहाज्ञानादयः । तथा च नहीं हो सकते । ऐसा ही भगवान् भगवान्पराशर:- पराशरजी कहते हैं-"समस्त "ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे- जीवोंके अन्तःकरणोंमे स्थित ज्ञान- रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य । खरूप, विशुद्ध सत्त्वराशि, सर्वदोष- किंवा जगत्यस्ति समस्तपुंसा- निर्मुक्त और नित्य प्रकाशस्त्ररूप मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य" परमात्माको संसारमें कौन वस्तु (विष्णुपु०५। १७१३२) इति। अज्ञात है ?" नापि जीवान्तरगतसुखदुःख- इसके सिवा किसी बद्ध या मुक्त जीवान्तरका किसी अन्य जीवके प्राप्ति अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ १०१ जीवस्य जीवान्तर- मोहादिना जीवा- | सुख, दुःख या मोहादिसे भी कोई सुखदु खादिना न्तरस्य बद्धस्य सम्बन्ध नहीं है, क्योकि उपाधिके सम्पर्कामाव. मुक्तस्य वा संबन्धः, | कारण ऐसी व्यवस्था होनी सम्भव उपाधितो व्यवस्थायाः संभवात् । है । अतः आपकी इस शकाके लिये अत एकमुक्तौ सर्वमुक्तिरिति कि 'एककी मुक्ति होनेपर सभी जीवोकी भवदुक्तस्य चोद्यस्यानव- मुक्ति हो जानी चाहिये' कोई अवकाश काशः॥८॥ नहीं है ॥ ८॥ यह भी है-- ईश्वर, जीव और प्रकृतिकी विलक्षणता तथा उनके तत्त्व-ज्ञानसे मोक्षका कथन किञ्चेदमपरं वलक्षण्यमि इसके सिवा एक दूसरी विलक्षणता त्याह ज्ञाज्ञौ द्वावजावीशनीशा- वजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश्वात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता त्रयं यदा विन्दते ब्रह्ममेतत् ॥ ६ ॥ ये [ ईश्वर और जीव क्रमशः ] सर्वज्ञ और अज्ञ तथा सर्वसमर्थ और असमर्थ हैं, ये दोनों ही अजन्मा हैं । एकमात्र अजा प्रकृति ही भोक्ता ( जीव ) के लिये भोग्यसम्पादनमें नियुक्त है । विश्वरूप आत्मा तो अनन्त और अकर्ता ही है । जिस समय इन [ ईश्वर, जीव और प्रकृति ] तीनोको ब्रह्मरूप अनुभव करता है [ उस समय जीव कृतकृत्य हो जाता है] ॥ ९॥ ज्ञाज्ञौ द्वाविति । न केवलं 'ज्ञाज्ञौ हौ' इत्यादि । ईश्वर व्यक्त व्यक्ताव्यक्तं भरत ईशो नाप्य- और अव्यक्तरूप जगत्का पोपण श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ नीशः संवध्यते जीवः; अपि तु करता है तथा मायाधीन जीव उसमें ज्ञाज्ञो द्वो ज्ञ ईश्वरोऽज्ञो जीवस्ता- बँध जाता है केवल इतना ही नहीं, बजी जन्मादिरहितौ । ब्रह्मण अपि तु वे दोनों क्रमशः और अज्ञ है-ईश्वर ज ( सर्वज्ञ ) है और जीव एवाविकृतस्य जीवेश्वरात्मना- अज्ञ है। तथा वे दोनों ही अज-- वस्थानात् । तथा च श्रुतिः- जन्मादिरहित हैं. क्योंकि एकमात्र "पुरश्चने द्विपदः अविकारी ब्रह्म ही जीव और ईश्वर- पुरश्चक्रे चतुप्पदः। भावसे स्थित है । ऐसा ही श्रुति भी पुरः स पक्षी भृत्वा कहती है-.-"पुरुपने दो पैरोवाला शरीर बनाया और चार पैरोंवाला पुरः पुरुष आविशत्।।"! । शरीर बनाया और वह पक्षी होकर (वृ० उ० २१५। १८) इति । उन पुरोंमे प्रवेश कर गया," "इसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका वह एक ही "एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं अन्तरात्मा प्रत्येक रूपमे उसके अनु- रूपं प्रतिरूपो बहिश्च" (कठ० उ० रूप हो रहा है तथा उनके बाहर भी २।२ । ९) इति च । ईश- है।" 'ईशनीशौ' इस समस्त पदमें नीशो, छान्दसं हस्यत्वम् । शकारकी हस्खता वैदिक है। नन्वद्वैतवादिनो यदि भोक्तः किन्तु अद्वैतवादीके सिद्धान्तमे भोग्यलक्षणप्रपञ्च- यदि प्रपञ्चकी सिद्धि हो सकती हो जीवेश्वरयो- वरक्षण्यामाव- सिद्धिः स्यात्तदा तभी परमेश्वर सर्वेश्वर है, जीव सर्वेशः परमेश्वरः, अनीश्वर है, परमेश्वर सर्वज्ञ है, जीव अनीशो जीवः, सर्वज्ञः परमे- असर्वज्ञ है, परमेश्वर सब कुछ करने- वाला है, जीव कुछ भी नहीं कर श्वरः, असर्वज्ञो जीवः, सर्व- कृत्परमेश्वरः असर्वकजीवः, । सकता, परमेश्वर सबका पोपण सर्वभृत्परमेश्वरः, देहादिभृ- करनेवाला है, जीव देहाढिका ही जीवः, सर्वात्मा परमेश्वरः, पोपक है, परमेश्वर सबका आत्मा है, गइनन् , --- अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ १०३ जीव, असर्वात्मा विश्वैश्वर्य जीव सबका आत्मा नहीं है, आप्तकामः परमेश्वरः, अल्प- परमेश्वर सर्वेश्वर्यसम्पन्न और पूर्ण- काम है, जीव अल्पैश्वर्यवान् है और श्वर्योऽनाप्तकामो जीवः, "सर्वतः- वह पूर्णकाम नहीं है, तथा"उसके सब पाणि" (श्वेता० उ०३।१६) | ओर हाथ हैं' "वह सहस्र मस्तकों-, "सहस्रशीर्षा" (श्वेता० उ०३। वाला है" "वह नित्योंका नित्य है" इत्यादि वाक्योंसे जीव और ईश्वरके १४)। "नित्यो नित्यानाम्" भेदव्यवहारकी सिद्धि हो सकती है । (श्वेता० उ०६।१३) इत्या- | किन्तु भोक्तादि प्रपञ्चकी सिद्धि स्वतः दिना जीवेश्वरयोर्विलक्षणव्यव- तो हो नहीं सकती, क्योंकि कूटस्थ, अपरिणामी, अद्वितीय वस्तु हासिद्धिः स्यात् । न तु भोक्त्रा- अभोक्तादिरूप है तथा परतः ( किसी दिप्रपञ्चसिद्धिरस्ति स्वतः कूटस्था- अन्यसे ) भी उसकी सिद्धि नहीं परिणाम्यद्वितीयस्य वस्तुनोऽभो- हो सकती है, क्योंकि ब्रह्मसे अतिरिक्त भोक्तादि प्रपञ्चकी हेतुभूत त्रादिरूपत्वात् । नापि परतो किसी अन्य वस्तुकी सत्ता ही नहीं ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य भोक्त्रादि- है। कारण, किसी अन्य वस्तुकी सत्ता प्रपञ्चहेतुभूतस्य वस्त्वन्तरस्यामा- स्वीकार करनेपर तो अद्वैत ही सिद्ध वात् । वस्त्वन्तरसद्भावेऽद्वैत- नहीं हो सकता। ऐसी शंका होनेपर श्रुति कहती है- 'भोक्ताके भोग्य- हानिरित्याशङ्कयाह-अजा ह्येका सम्पादनमें एकमात्र अजा ( प्रकृति ) भोक्तृभोग्यार्थयुक्तेति । ही नियुक्त है।' भवेदयमीश्वरायविभागः यदि यदि प्रपञ्च सिद्ध न होता तो प्रपञ्चासिद्धिरेव स्यात् यह ईश्वरादिका विभाग न होना वैलक्षण्य- सम्भव था, किन्तु प्रपञ्च तो सिद्ध साधनम् सिध्यत्येव प्रपञ्चः ।। होता है । मूलमे 'हि' शब्द 'क्योंकि' के अर्थमें है। क्योंकि हि यस्मादर्थे । यस्मादजा प्रकृतिर्न अजा-प्रकृति, जो उत्पन्न होनेके जायत इत्यजा सिद्धा प्रसव- कारण अजा है, प्रसवधर्मिणी सिद्ध है। मायया २०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ धर्मिणी । “अजामेकाम्" (श्वेता अर्थात् “एक अजाको", "मायाको उ०४।५)। "मायां तु तो प्रकृति जानो", "इन्द्र मायासे प्रकृतिं विद्यात्' (श्वेता० उ० अनेकरूप होकर चेष्टा कर रहा ४ । १०)। "इन्द्रो मायाभिः है", "माया परा प्रकृति है", पुरुरूप ईयते" (वृ० उ० २ । "मैं अपनी मायासे जन्म लेता ५। १९) । "माया परा है" इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध प्रकृतिः "संभवाम्यात्ममायया" होनेवाली भगवान्की आत्मशक्तिरूपा (गीता ४ । ६)। इत्यादि- जगज्जननी एक माया अपने विकार- श्रुतिस्मृतिसिद्धा विश्वजननी भूत भोक्ता, भोग और भोग्यके देवात्मशक्तिरूपका स्वविकार- सम्पादनमे नियुक्त होकर ईश्वरकी निकटवर्तिनी किंकरीरूपसे विद्यमान भृतभोक्तभोगभोग्यार्थप्रयुक्तेश्वर- । अत. वह मायी परमेश्वर भी निकटवर्तिनी किंकुर्वाणावतिष्ठते । मायारूप उपाधिकी सन्निधिसे माया- तस्मात्सोऽपि मायी परमेश्वरो युक्त-सा हो अपने कार्यभूत देहादि मायोपाधिसंनिधेस्तद्वानिव कार्य- विभक्त पदाथोंके कारण उन्हींके भृतदेहादिभिस्तद्वदेव विभक्तैर्वा समान ईश्वरादिरूपसे विभक्त हुआ- विभक्त ईश्वरादिरूपेणावतिष्ठते । सा स्थित है। अत परमात्माको तस्मादेकस्मिन्नेकरसे परमात्मन्य- एक और एकरस स्वीकार करनेपर भ्युपगम्यमानेऽपि जीवेश्वरादि- भी जीवेश्वरादि भेदरूप समस्त सर्वलौकिकवैदिकसर्वभेदव्यवहार- लौकिक और वैदिक व्यवहार सिद्ध सिद्धिः । न च तयोर्वस्त्वन्तरस्य हो सकता है और उन अन्य वस्तुओं- के रहनेसे दे॒तवादकी भी प्राप्ति सद्भावाद्वैतवादप्रसक्तिः । मा- नहीं हो सकती, क्योंकि अनिर्वचनीय याया अनिर्वाच्यत्वेन वस्तुत्वा- होनेके कारण माया कोई वस्तु नहीं योगान् । तथाह-"एपा हि है। ऐसा ही कहा भी है- "यह भगवन्माया सदसद्वयक्तिवर्जिता" भगवान्को माया सन्सद्भावसे रहित इति । है' इत्यादि ।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ , स्वय यस्मादजैव भोक्त्रादिरूपा क्योंकि अजा-प्रकृति ही भोक्तादिरूप है इसलिये उसका तस्मात्तत्स्वीकृतस्य मिथ्यासिद्ध- कल्पना किया हुआ प्रपञ्च मिथ्या वस्तुत्वसंभवादनन्तश्चात्मा । च- और असत् वस्तु होनेसे आत्मा तो अनन्त ही है । मूलमें 'च' शब्द शब्दोऽवधारणे । अनन्त एवा- निश्चयार्थक है; अर्थात् आत्मा अनन्त स्मा । अस्यान्तः परिच्छेदो ही है, यानी देश, काल या वस्तु किसीसे भी इसका अन्त-परिच्छेद देशतः कालतो वस्तुतो वा न नहीं है। विश्वरूप अर्थात् विश्व विद्यत इति । विश्वरूपो विश्व- | इसीका रूप है, क्योंकि परमात्मा तो विश्वरूप है नहीं [ अर्थात् मस्यैव रूपमिति; परस्याविश्व- विश्वरूपमें उसका परिणाम नहीं रूपत्वात् । “वाचारम्भणं विकारो होता ] । “विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र है" इस श्रुतिके नामधेयम्" इति रूपस्य रूपि- अनुसार रूप रूपवान्से भिन्न नही व्यतिरेकेणाभावाद्विश्वरूपत्वाद- होता, इसलिये विश्वरूप होनेसे भी इसकी अनन्तता ही सिद्ध होती है ।* प्यानन्त्यं सिद्धमित्यर्थः । हिशब्दो | यहाँ 'हि' शब्द 'क्योंकि' अर्थमे है, यस्मादर्थे । यस्माद्विश्वरूपवैश्वरूप्यं | क्योकि विश्वरूप बहुरूपता परमात्मा- का ही लक्षण है, इसलिये तात्पर्य यह लक्षणं परमात्मन इत्येवमादिभि- है कि इन सब हेतुओंसे भी आत्माका रात्मनो विश्वरूपत्वमित्यर्थः । यत विश्वरूपत्व सिद्ध होता है । क्योंकि ५. तात्पर्य यह है कि यद्यपि आत्मा परमार्थत. विश्वरूप नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे तो वह सावयव और परिणामी सिद्ध होगा, तथापि विश्व उससे भिन्न भी नहीं है। अघटनघटनापटीयसी मायाकी महिमासे विशुद्ध आत्मतत्त्वमें ही विश्वरूपभ्रान्ति होती है । अतः आत्मासे पृथक् विश्वकी सत्ता न होनेसे उसकी अनन्ततामें कोई अन्तर नहीं आता ।
१०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ एवानन्तो विश्वरूप आत्मात एवा- आत्मा अनन्त और विश्वरूप है इसी- कर्ता कर्तृत्वादिसंसारधर्मरहित लिये वह अकर्ता अर्थात् कर्तृत्वाढि इत्यर्थः। संसारके धर्मोसे रहित है। कदैवमनन्तो विश्वरूपः कई आत्मा इस प्रकार अनन्त, त्यादिसकलसंसारधर्मवर्जितो मुक्तः विश्वरूप, कर्तृत्वादि सम्पूर्ण सासारिक धमोंसे रहित, मुक्त और पूर्णानन्द पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मरूपेणैवाब- अद्वितीय ब्रह्मरूपसे ही कब स्थित तिष्ठते ? इत्यत्राह-त्रयं यदा होता है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति विन्दते ब्रह्ममेतदिति । त्रयं कहती है-'त्रयं यदा विन्दते ब्रह्म- मेतत् त्रय अर्थात् भोक्ता, भोग और भोक्तृभोगभोग्यरूपम् । मायात्म- भोग्यरूप मायामय होनेसे अपने कत्वादधिष्ठानभृतब्रह्मव्यतिरेकेण अधिष्ठान ब्रह्मसे भिन्न नहीं है, किन्तु ब्रह्म ही है—ऐसा जिस समय नास्ति किन्तु ब्रह्मवेति यदा विन्दते | अनुभव करता है उस समय जीवात्मा तदा निवृत्तनिखिलविकल्पपूर्णान- | सम्पूर्ण विकल्योंके निवृत्त हो जानेसे पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होकर न्दाद्वितीयब्रह्मभाकर्तृत्वादिसकल- कर्तृत्वादि सकल संसारधमोंसे रहित, संसारधर्मवर्जितो वीतशोकः कृत- शोकहीन और कृतकृत्य होकर स्थित होता है-ऐसा इसका तात्पर्य कृत्योऽवतिष्ठत इत्यर्थः । समझना चाहिये । अथवा ऐसा जानो ज्ञाज्ञाजात्मकजीवेश्वरप्रकृतिरूप कि क्रमश. यह ज्ञ, अज्ञऔर अजारूप ईश्वर, जीव एवं प्रकृति इन तीनोंको त्रयं ब्रह्म यदा विन्दते लभते तदा यह ब्रह्मरूपसे प्राप्त ( अनुभव ) कर मुच्यत इति । ब्रह्ममिति मका- लेता है उस समय यह मुक्त जाता है । मूलमें 'ब्रह्मम्'यह मकारान्त रान्तं ब्रह्ममेतु मां मधुमेतु माम् प्रयोग 'ब्रह्ममेतु माम्' 'मधुमेतु माम्' इतित्रच्छान्दसम् ।। ९॥ इत्यादिके समान वैदिक है ॥९॥ अथवा हो +0 'अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ १०७ प्रधान और परमेश्वरकी विलक्षणता तथा उनके तत्वज्ञानसे मोक्षका कथन जीवेश्वरयोविभागं दर्शयित्वा जीव और ईश्वरका भेद दिखाकर उनके विज्ञानसे अमृतत्व दिखला तद्विज्ञानादमृतत्वं दर्शितम् । दिया । अब श्रुति प्रधान और इदानी प्रधानेश्वरयोर्वेलक्षण्यं ईश्वरकी विलक्षणता दिखलाकर उनके दर्शयित्वा तद्विज्ञानादमृतत्वं विज्ञानसे अमृतत्व प्रदर्शित करती दर्शयति- क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः । तस्याभिध्यानाद्योजनात्तत्त्वभावा- द्भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः ॥१०॥ विनाशशील प्रधान और अविनाशी जीवात्माको हरसंज्ञक एक देव नियमित करता है । उसके चिन्तनसे, उसमें मनोयोग करनेसे और उसके तत्त्वकी भावना करनेसे प्रारब्धकी समाप्ति होनेपर विश्वरूप मायाकी निवृत्ति हो जाती है ॥ १० ॥ क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर इति। 'क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः' अविद्यादेहरणात्परमेश्वरो हरः । इत्यादि । अविद्यादिको हरनेके कारण परमेश्वर हर हैं । जो अमृत और अमृतं च तदक्षरं चामृताक्षरममृतं | अक्षर है उसे अमृताक्षर कहा है, ब्रह्मैवेश्वर इत्यर्थः । स ईश्वरः | वह अमृत ब्रह्म ही ईश्वर है । वह एक देव ईश्वर अर्थात् सच्चिदानन्दा- क्षरात्मानौ प्रधानपुरुषावीशत इप्टे द्वितीय परमात्मा क्षर और आत्मा- देव एकश्चित्सदानन्दाद्वितीयः प्रधान और पुरुषका नियमन करता है । उस परमात्माके अभिध्यानसे, परमात्मा । तस्य परमात्मनो- किस प्रकारके अभिध्यानसे ? ऽभिध्यानात कथम् योजनाजीवानां योजनासे अर्थात् परमात्माके साथ 7 ज्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय १ वैश्वर्यं हित्वाप्तकाम आत्मकामः तृतीय अवस्थाके सम्पूर्ण ऐश्वर्यको छोड़कर आप्तकाम और आत्मकाम पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मरूपोऽवति- हो पूर्णानन्द अद्वितीय ब्रह्मरूपसे ष्ठते । स्थित हो जाता है। एतदुक्तं भवति–सम्यग्दर्श यहाँ यह कहा गया है कि नस्य तथाभूतवस्तुविषयत्वेन नि- सम्यग्दर्शन तो यथार्थ वस्तुको विषय करनेके कारण निर्विशेष पूर्णानन्दा- विषयपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मविषय- द्वितीय ब्रह्मविषयक होता है। अत. त्वाद्विज्ञानानन्तरमविद्यातत्कार्य- ब्रह्मज्ञानके अनन्तर अविद्या और प्रहाणेन पूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मख- उसके कार्यकी निवृत्ति हो जानेसे विद्वान् पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्मस्वरूपसे रूपोऽवतिष्ठते । ध्यानस्य पुनः ही स्थित हो जाता है। किन्तु सहसा न निराकारे बुद्धिःप्रवर्तत ध्यानजनित बुद्धि सहसा निराकार ब्रह्ममें प्रवृत्त नहीं होती, अत. वह इति सविशेषब्रह्मविषयत्वात् "तं सविशेष ब्रह्मविषयक होनेसे "उसकी यथा यथोपासते..." इति न्यायेन | जिस-जिस प्रकार उपासना करता सविशेषविश्वैश्वर्यलक्षणब्रह्मप्राप्त्या है उसी प्रकार फल मिलता है" इस न्यायसे सर्वेश्वर्यरूप सविशेष ब्रह्मकी विश्वेश्वर्यमनुभूय निर्विशेषपूर्णा- प्राप्तिसे वह सम्पूर्ण ऐश्वर्यका अनुभव नन्दब्रह्मात्मानं ज्ञात्वा केवलात्म- कर फिर निर्विशेष पूर्णानन्दस्वरूप ब्रह्मको आत्मभावसे जानकर केवल कामोऽवाप्ताशेषपुमर्थो मुक्तो आत्मकामी हो सम्पूर्ण पुरुषार्थको भवति । प्राप्त करके मुक्त हो जाता है। तथा शिवधर्मोचरे ध्यानज्ञान- इसी प्रकार शिवधर्मोत्तरमें भी ध्यान और ज्ञानके क्रमश विश्वेश्वर्य- योनिश्चश्वर्यलक्षणं केवलात्मकामा- स्प और केवल आन्मकाम एवं प्तकामलक्षणं च फलं दर्शयति- आप्तकामरूप फल दिखाये हैं- - अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ "ध्यानादैश्वर्यमतुल "ध्यानसे अतुलित ऐश्वर्य मिलता है मैश्वर्यात्सुखमुत्तमम् । और ऐश्वर्यसे उत्कृष्ट सुखकी प्राप्ति होती ज्ञानेन तत्परित्यज्य है । ज्ञानसे उनका त्याग करके देहा- विदेहो मुक्तिमाप्नुयात्" इति। भिमानसे रहित हो मोक्ष प्राप्त करे।" तथा च दहरादिसविशेष इसी प्रकार दहरादि सविशेष और सगुणोपासकानां “स यदि पित- सगुण ब्रह्मकी उपासना करने- लोककामो भवति संकल्पादेवास्य वालोंको श्रुति "वह यदि पितृलोक- की कामना करता है तो उसके पितरः समुत्तिष्ठन्ति" (छा० उ० संकल्पसे ही पितृगण उपस्थित हो ८।२।१) इत्यादिना विश्वैश्वर्य- जाते हैं।" इत्यादि वाक्यसे विश्वैश्वर्य- लक्षणं फलं दर्शयति । तथा च रूप फल ही दिखलाती है । तथा प्रश्नोपनिषदि “यः पुनरेतं त्रिमात्रे- प्रश्नोपनिपमें "जो तीन मात्रावाले णोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुष- ॐ इस अक्षरसे परम पुरुपका ध्यान वह तेजोमय सूर्यमण्डलको मभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये प्राप्त होकर" इत्यादि वाक्यसे परम संपन्नः"(प्र० उ० ५।५) इत्यादिना पुरुषका ध्यान करनेवाले पुरुषको परं पुरुषमभिध्यायतोऽचिरादिमा- अर्चिरादिमार्गका उपदेश करके गोपदेशपूर्वकं "स एतस्माजीव- “वह इस जीवघन (हिरण्यगर्भ ) घनात्परात्परं पुरिशयं पुरुष- से उत्कृष्टतर सम्पूर्ण शरीरोमें स्थित परम पुरुपको देखता है" इस प्रकार मीक्षते" (प्र० उ०५।५) इति ब्रह्म- ब्रह्मलोकमें गये हुए पुरुपको उसी लोकं गतस्य तत्रैव सम्यग्दर्शन- जगह सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति दिखला- लाभं दर्शयित्वा "तमोकारेणैवाय- | कर “विद्वान् उस ओंकाररूप तनेनान्वेति विद्वान्यत्तच्छान्तमजर- अवलम्बनके द्वारा ही उस शान्त, अजर, अमृत और ममृतमभयं परं चेति" (प्र० उ० | परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है" इस ५। ७) इति सम्यग्दर्शनेन मोक्ष वाक्यसे सम्यग्दर्शनके द्वारा मोक्षका करता है अभयरूप श्वेताश्वतरोपनिषद् [यध्याय १ उपदिष्टः । “तमेवं विद्वानमृत उपदेश किया है। तया "उसे इह भवति" (नृ० पू० ता० १। इस प्रकार जाननेवाला यहॉ अमर हो ६) इति विदुपोर्चिरादिगमनं जाता है" इस वाक्यसे विद्वान्को विनेहैवामृतत्वप्राप्तिं दर्शयति । अर्चिरादिमार्गसे बिना गये यहीं अमृतत्वकी प्राप्ति दिखलायी है। "अथाकामयमानः" इत्यारभ्य "न और "जो कामनारहित है" यहाँसे तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मेव लेकर "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं सन्ब्रह्माप्येति" (वृ० उ०४१४६) करते, वह ब्रह्मस्वरूप हुआ ही ब्रह्ममे लीन हो जाता है" यहाँतक इत्यादिना विनवोत्क्रान्तिं विदुषो उत्क्रमणके बिना ही विद्वान्के मोक्ष- मोक्ष उपदिष्टः । “उदस्मात्प्राणाः का उपदेश किया है । तथा "इसके क्रामन्त्यहो नेति नेति होवाच प्राण उत्क्रमण करते हैं या नहीं ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं" इस याज्ञवल्क्यः" (वृ० उ०३।२। ११) इति प्रश्नपूर्वकमुत्क्रान्त्य- विद्वान्के प्रकार बृहदारण्यक श्रुतिने प्रश्नपूर्वक भावो दर्शितः। दिखलाया है। तथा च ब्राह्म पुराणे जीव इसी प्रकार ब्राह्मपुराणमें भी न्मुक्तिं गत्यभावं च दर्शयति- जीवन्मुक्ति और उत्क्रान्तिका अभाव "यस्मिन्काले स्वमात्मानं वे दोनों दिखलाये गये हैं.-"जिस योगी जानाति केवलम् । समय योगी आत्माको शुद्धखरूप जान लेता है उसी समयसे वह तस्मात्कालात्समारम्य जीवन्मुक्तो भवेदसो॥ जीवन्मुक्त हो जाता है। जिस परार्द्ध- मोक्षस्य नैव किञ्चित्स्या स्थायी [ब्रह्मलोकल्प अन्य दन्यत्र गमनं क्वचित् । स्थानपर ध्यानयोगी जाते हैं, उसके स्थानं पराय॑मपरं मोक्षके लिये ऐसे किसी स्थानपर यत्र गच्छन्ति योगिनः॥ जानेकी आवश्यकता नहीं होती। उत्क्रमणका अभाव अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ११३ रहता।" अज्ञानवन्धभेदस्तु अज्ञानरूप बन्धनकी निवृत्ति और ब्रह्म में लीन हो जाना-यही उसका मोक्षो ब्रह्मलयस्त्विति ।" मोक्ष है।" तथा लैङ्गे विदुषो जीवन्मुक्तिं तथा लिङ्गपुराणमे भी ज्ञानीकी दर्शयति- जीवित रहते हुए ही मुक्ति दिखायी है-"क्योंकि ब्रह्मवेत्ता परमार्थतः "इह लोके परे चैव जीवित रहते हुए ही मुक्त हो जाता कर्तव्यं नास्ति तस्य वै। है, इसलिये उसके लिये इस लोक जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद् और परलोकमें कुछ भी कर्तव्य नहीं ब्रह्मवित्परमार्थतः॥" शिवधर्मोत्तरे- शिवधर्मोत्तरमे कहा है-"ज्ञानीकी "वाञ्छात्ययेऽपि कर्तव्यं समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती किश्चिदस्य न विद्यते । हैं, इसलिये उसका कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता । वह पूर्णकाम और सम- इहैव स विमुक्तः दर्शी होनेसे इसी लोकमे मुक्त हो स्यात्संपूर्णः समदर्शनः ॥" | जाता है।" तस्मादुपासको देहादुत्क्रम्या- अत' उपासक तो देहसे उत्क्रमण चिरादिना देवया- कर अर्चिरादि देवयानमार्गसे सर्वै- विदुषोर्गत्युप- नेन विश्वैश्वर्यं ब्रह्म श्वर्यपूर्ण कारणब्रह्मको प्राप्त हो सब प्रकारका ऐश्वर्य भोगनेके अनन्तर प्राप्य विश्वैश्वर्यमनु- बहीं सम्पूर्ण भेदसे रहित पूर्णानन्द- भूय तत्रैव केवलं प्रत्यस्तमित- स्वरूप अद्वितीय केवल शुद्ध ब्रह्मको भेदपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मात्मानं आत्मभावसे जानकर केवल आत्म- ज्ञात्वा केवलात्मकामो मुक्तो कामी होकर मुक्त हो जाता है । भवति । विद्वान्निर्विशेषपूर्णानन्दा- तथा विद्वान् निर्विशेप पूर्णानन्दा- द्वितीयवनविज्ञानादशेषगन्तुगन्त-! द्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जानेसे गन्ता, श्वे० उ० १५-१६ उपासक- सहार श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय १ व्यगमनादिभेदप्रत्यस्तमयाद्विनैवो- गन्तव्य और गमनादि सम्पूर्ण मेदकी निवृत्ति हो जानेसे उन्क्रान्ति और त्क्रान्तिं देवयानं च ब्रह्म- देवयानमार्गके बिना हो ब्रह्मज्ञानके ज्ञानसमनन्तरं जीवन्मुक्तो ब्रह्म- अनन्तर जीवन्मुक्त हो जाता है। वह ब्रह्मज्ञानके पश्चात् ब्रह्मानन्दका ज्ञानसमनन्तरं ब्रह्मानन्दमनुभृय अनुभव कर आत्मरति और आत्मतृप्त हो अपने आत्मामें ही आन्तरिक आत्मरतिरात्मतृप्त आत्मनैवान्तः- सुख, रमण एवं प्रकागका अनुभव सुखोऽन्तरारामोऽन्तर्योतिरात्म- करता हुआ आत्मक्रीड, आत्मरति, क्रीड आत्मरतिरात्ममिथुन आत्ममिथुन और आत्मानन्द होकर इसी लोकमे स्वाराज्य अर्थात् अपनी आत्मानन्द इहैव स्वाराज्ये सार्वभौम महिमामें अमृतरूपसे स्थित भूग्नि स्वे महिम्न्यमृतोऽवतिष्ठते । हो जाता है । वह बाह्य विषयोंको त्यागकर मन, वाणी और शरीरसे तद्धेतुत्वाद्राह्यविषयपरित्यागेन होनेवाले सम्पूर्ण श्रौत-स्मार्त कोको ब्रह्मण्याधाय वाड्मनकायनिष्पाद्यं ब्रह्मार्पण करके अनुष्ठान करता हुआ श्रौतस्मातलक्षणं कर्म कृत्वा शुद्धचित्त और योगारूढ होकर गमादि साधनोंसे सम्पन्न हो जाता विशुद्धसत्त्वो योगारूढो भूत्वा है, क्योंकि ये ही साधन ब्रह्मज्ञानको शमादिसाधनसंपन्नः। प्राप्तिके हेतु हैं। "योगी युञ्जीत सतत- "च्यानयोगीको एकान्तमें अकेले मात्मानं रहसि स्थितः। ही स्थित हो सब प्रकारकी आगा और एकाकी यतचित्तात्मा परिग्रहका त्याग कर शरीर और मनका निराशीरपरिग्रहः ॥ निग्रह करते हुए निरन्तर योगका एवं युञ्जन्सदात्मानं अभ्यास करना चाहिये । इस प्रकार योगी विगतकल्मपः। सर्वदा योगसाधनमे लगा हुआ वह सुखेन ब्रह्मसंस्पर्श पापहीन योगी सुगमतासे ही ब्रह्म- मत्यन्तं सुखमश्नुते॥ साक्षात्काररूप अत्यन्त उत्कृष्ट सुख अध्याय १ 1 शाङ्करभाष्यार्थ ११५ सर्वभूतस्यमात्मानं प्राप्त कर लेता है। जिसकी सर्वत्र सर्वभूतानि चात्मनि । समदृष्टि है वह योगयुक्त पुरुष ईक्षते योगयुक्तात्मा अपने आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें और सर्वत्र समदर्शनः ॥" सम्पूर्ण भूतोंको अपने आत्मामें स्थित (गीता ६ । १०, २८, २९) देखता है।" "इस प्रकार सर्वत्र समान "समं पश्यन्हि सर्वत्र भावसे स्थित ईश्वरको समानरूपसे समवस्थितमीश्वरम् । देखता हुआ वह स्वयं अपना घात न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥" नहीं करता, और फिर परमगतिको (गीता १३ । २८) प्राप्त होता है ।" इत्यादि स्मृतिवाक्य इति स्मृतेः॥११॥ इसमें प्रमाण हैं ॥११॥ ब्रह्मकी ज्ञातव्यता यस्माज्ज्ञानानन्तरं परमपुरुषा क्योकि ज्ञानके पश्चात् परम र्थसिद्धिस्तस्मात्- पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इसलिये- एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं बेदितव्यं हि किश्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्व प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥१२॥ अपने आत्मामें स्थित इस ब्रह्मको सर्वदा ही जानना चाहिये । इससे बढकर और कोई ज्ञातव्य पदार्थ नहीं है । भोक्ता ( जीव ), भोग्य ( जगत् ) और प्रेरक ( ईश्वर )—यह तीन प्रकारसे कहा हुआ पूर्ण ब्रह्म ही है--ऐसा जानना चाहिये ॥ १२ ॥ एतत्प्रकृतं केवलात्माकाश इस प्रकृत विशुद्ध आत्माकाशस्वरूप ब्रह्मरूपं नित्यं नियमेन ज्ञेयम् । ब्रह्मको नित्य-नियमसे जानना १२६ श्वेताश्वतरोपनि पद् [ अध्याय १ किमत्रान्यसंस्थं न स्वात्मसंस्थं चाहिये । क्या यह किसी अन्यमें ज्ञेयं नानात्मनि बाह्ये । श्रूयते स्थित है ? नहीं, इसे अपने आत्मामें ही स्थित जानना चाहिये, किसी च-"तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति बाह्य अनात्मामें नहीं । श्रुति भी धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती कहती है--"जो बुद्धिमान् आत्मामें स्थित उस परब्रह्मको देखते हैं उन्हे नेतरेपाम्" (क० उ० २। २ । ही नित्य शान्ति प्राप्त होती है, १२) इति । दूसरोंको नहीं।" तथा च शिवधर्मोत्तरे योगि तथा शिवधर्मोत्तरमें भी योगियों- नामात्मनि स्थितिः- की आत्मामें ही स्थिति दिखलायी है- "शिवमात्मनि पश्यन्ति "योगिजन शिवका आत्मामें ही दर्शन करते हैं, प्रतिमाओंमें नहीं। प्रतिमासु न योगिनः। जो पुरुष. आत्मामें स्थित शिवका आत्मस्थं यः परित्यज्य परित्याग कर वाह्य शिवका पूजन वहिःस्थं यजते शिवम् ।। करता है वह मानो हाथका ग्रास हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य गिराकर केवल अपनी हथेली चाटता लिह्यात्कूपरमात्मनः । है। जिस प्रकार अन्धा आदमी उदय सर्वत्रावस्थितं शान्तं हुए सूर्यको नहीं देख सकता उसी न पश्यन्तीह शङ्करम् ॥ प्रकार ज्ञाननेत्रोसे रहित होनेके कारण लोग सर्वत्र विद्यमान शान्त- ज्ञानचक्षुर्विहीनत्वा- स्वरूप शिवका दर्शन नहीं कर दन्धः सूर्य यथोदितम् । । पाते । जो पुरुष सर्वगत गान्तमूर्ति यः पश्येत्सर्वगं शान्तं शिवका दर्शन करता है उसके तो तस्याध्यात्मस्थितः शिवः।। । अन्तःकरणमें ही शिव विराजमान आत्मस्थं ये न पश्यन्ति हैं, किन्तु जो आत्मस्थ शिवको नहीं तीर्थे मार्गन्ति ते शिवम् । देख सकते वे ही उन्हे तीर्थस्थानमें अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७ आत्मस्थं तीर्थमुत्सृज्य खोजते हैं। जो पुरुष आत्मस्थ वहिस्तीर्थादि यो व्रजेत् ॥ तीर्थको त्यागकर वाह्य तीर्थादिमें जाता है वह मानो अपने हाथका करस्थं स महारत्नं महारत्न गिराकर कॉच ढूँढता त्यक्त्वा काचं विमार्गति। फिरता है।" अथवैतद्यदपरोक्षं प्रत्यगात्म- अथवा [ इसका यह भी तात्पर्य त्वं तन्नित्यमविनाशि स्वे महिम्नि हो सकता है कि ] यह जो अपरोक्ष प्रत्यगात्मा है उसे अपनी महिमामें स्थितं ब्रह्मैव ज्ञेयम् । कस्मात् स्थित नित्य और अविनाशी ब्रह्म ही हिशब्दो यस्मादर्थे । यस्मान्नातः जानना चाहिये । क्यों ? यहाँ 'हि' शब्द 'यस्मात् ( क्योंकि )' अर्थमें परं वेदितव्यमस्ति किश्चिदपि । है क्योकि इससे बढ़कर और श्रूयते च बृहदारण्यके-"तदे- कुछ भी जाननेयोग्य नहीं है। तत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमा- बृहदारण्यकश्रुतिमें भी ऐसा ही है-- "यह जो आत्मा है वही समस्त त्मा" (वृ० उ०१।४।७) इति । जीवोंका गन्तव्य स्थान है ।" कथमेतज्ज्ञेयम् ? इत्याह-भोक्ता इसे किस प्रकार जानना चाहिये ? सो श्रुति बतलाती है----जीव भोक्ता जीवो भोग्यमितरत्सर्व प्रेरितान्त- है, भोक्ता और अन्तर्यामीसे अतिरिक्त और सब भोग्य है तथा र्यामी परमेश्वरः। तदेतत्रिविधं अन्तर्यामी परमेश्वर प्रेरिता है यह तीन प्रकारसे कहा हुआ ब्रह्म ही है इस प्रोक्तं ब्रह्मैवेति । भोक्त्रायशेष- प्रकार [जानना चाहिये] 1 तात्पर्य यह भेदप्रपञ्चविलापनेनैव निर्विशेष है कि भोक्तादि सम्पूर्ण मेदरूप प्रपञ्च- का लय करके हो निर्विशेष ब्रह्मको ब्रह्मात्मानं जानीयादित्यर्थः । आत्मस्वरूपसे जानना चाहिये ।
[ अध्याय श्वेताश्वतरोपनिषद् तथा चोक्तं कावपेयगीतायाम् ऐसा ही कावपेय गीतामें भी "त्यक्त्वा सर्वविकल्पांच कहा है--"योगी सम्पूर्ण विकल्पों- स्वात्मस्थं निश्चलं मनः । को त्यागकर मनो अपने आमामे निश्चलल्पसे त्थिर कर जिसका ईधन कृत्वा शान्तो भवेद्योगी जल चुका है उस अग्निके समान दग्धेन्धन इबानलः ॥" शान्त हो जाता है।" तथा च श्रीविष्णुपुराणे- तथा श्रीविष्णुपुराणमे कहा है- "तस्यैव कल्पनाहीन "उस व्यय परमेश्वरका ही जो मनके स्वरूपग्रहणं हि यन् । द्वारा व्यानसे सिद्ध होनेयोग्य मनसा ध्याननिष्पाद्यं कल्पनाहीन ( ध्याता. व्यान और समाधिः सोऽभिधीयते ॥" ध्येयके भेदसे रहित ) स्वरूप (६।६।९२) ग्रहण किया जाता है उसे ही समाधि कहते हैं ॥१२॥ ०२ ॥ अब चिन्तनसे ब्रह्म-साक्षात्कारका दृष्टान्तोंद्वारा समर्थन "ओमित्येतेनैवाक्ष "ॐ इस अक्षरसे ही परम पसभिध्यायीत" (प्र० पुरुपका ध्यान करना चाहिये" "ॐ इस अक्षरके द्वारा ही आत्मचिन्तन .)। "ओमित्यात्मानं करना चाहिये" "ॐ इस अक्षरके महानारा०२४।१)। द्वारा ही आत्माका ध्यान करना त्मानं ध्यायीत" इति चाहिये” इत्यादि श्रुतियोंसे आत्मा- नमन्त्रिप्य पराभिध्याने न्वेषण करके उसका ध्यान करनेमे प्रणवचिन्तनका नियम होनेसे श्रुति नियमादभिध्यानाङ्गत्वेन प्रणबको आमचिन्तनके अंगरूपसे दर्शयति- प्रदर्शित करती है-- वहर्यथा मूर्ति- नदृश्यते नैव च लिङ्गनाशः । योनिगतस्य अध्याय १ ] शाङ्करभाज्यार्थ ११९ स भूय एवेन्धनयोनिगृह्य- स्तद्वोभयं वै प्रणवेन देहे ॥१३॥ जिस प्रकार अपने आश्रय [ काष्ठ ] मे स्थित अग्निका रूप दिखायी नहीं देता और न उसके लिङ्ग ( सूक्ष्मस्वरूप ) का ही नाश होता है और फिर ईधनरूप कारणके द्वारा ही उसका ग्रहण हो सकता है उसी प्रकार अग्नि और अग्निलिङ्गके समान ही इस देहमें प्रणबके द्वारा आत्माका ग्रहण किया जा सकता है ॥ १३ ॥ वर्यथेति । वह्वेर्यथा योनि 'वह्वेर्यथा' इत्यादि । जिस प्रकार योनि अर्थात् अरणिमे स्थित अग्निकी गतस्यारणिगतस्य मूर्ति स्वरूपं मूर्ति स्वरूपको मन्थनसे पूर्व देखा न दृश्यते मथनात्प्राङ्नैव च नहीं जा सकता और न उसके लिग यानी सूक्ष्म रूपका नाश ही होता लिङ्गस्य सूक्ष्मदेहस्य विनाशः । है । तथा अरणिमें स्थित वह अग्नि फिर ईंधनयोनिसे पुनः-पुन मन्थन स एवारणिगतोऽग्निर्भूयः पुनः करनेपर प्रकट देखा भी जा सकता है। यहाँ 'योनि' शब्द पुनरिन्धनयोनिना मथनेन गृह्यः। कारणका वाचक है, अर्थात् ईधनरूप योनिशब्दोऽत्र कारणवचनः । कारणके द्वारा पुन.-पुन करनेपर वह ग्रहण किया जा सकता इन्धनेन कारणेन पुनः पुनर्मथ- है । 'तद्वा उभयम्' यहाँ वा शब्द नाद्गृह्यः । 'तद्वोभयम्' इवार्थों इव ( सादृश्य ) अर्थमे है । अर्थात् उन दोनो (अग्नि और अग्नि-लिग) के वाशब्दः । तच्चोभयं तदुभयमिव । समान, जैसे मन्यनसे पूर्व उनका मथनात्प्राङ् न गृह्यते । मथनेन ग्रहण नहीं होता था किन्तु मन्थन करनेपर वे दिखायी देने लगते हैं, च गृह्यते । तद्वदात्मा वह्निस्था- उसी प्रकार अग्निस्थानीय आत्मा मन्थन
१२०
श्वेताश्वतरोपनिषद्
[ अध्याय १
नीयः प्रणवेनोत्तरारणिस्थानीयेन उत्तरारणिस्थानीय प्रणवके द्वारा मनन-
मननाद्गृह्यते देहेऽधरारणिस्था- से अधरारणिस्थानीय देहमें ग्रहण
नीये ॥१३॥
किया जा सकता है ।।१३॥
-
तदेव प्रपञ्चयति-
अव श्रुति उस ( मन्थन ) का
ही विस्तारसे वर्णन करती है-
खदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ।
ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत् ॥१४॥
अपने देहको अरणि और प्रणवको उत्तरारणि करके ध्यानरूप
मन्थनके अभ्याससे स्वप्रकाश परमात्माको छिपे हुए [ अग्नि ] के समान
देखे ॥ १४॥
स्वदेहमिति । स्वदेहमरणिं 'स्वदेहम्' इत्यादि । अपने देहको
अरणिनीचेका काष्ठ करके, तथा
कृत्वाधरारणिं ध्यानमेव निर्मथनं
ध्यान ही निर्मन्थन है, उस निर्मन्थन-
तस्य निर्मथनस्याभ्यासाद्देवं ज्यो- के अभ्याससे देव -ज्योतिस्वरूप
परमात्माको छिपे हुए अग्निके समान
तीरूपं प्रपश्येनिगूढाग्निवत्।।१४।। देखे ॥ १४ ॥
उक्तस्यार्थस्य द्रढिम्ने दृष्टान्तान्
उपर्युक्त अर्थकी पुष्टिके लिये
बहून्दर्शयति-
श्रुति वहुत-से दृष्टान्त दिखाती है-
तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि-
रापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः ।
एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ
सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥१५॥
भध्याय १ शाङ्करभाष्यार्थ १२१ जिस प्रकार तिलोंमें तैल, दहीमें घी, स्रोतोंमें जल और काष्ठोंमें अग्नि देखे जाते हैं उसी प्रकार जो पुरुष सत्य और तपके द्वारा इसे वारम्बार देखनेका प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा आत्मामे ही दिखायी देता है ॥१५॥ तिलेष्विति । यन्त्रपीडनेन 'तिलेषु' इत्यादि । जिस प्रकार यन्त्रसे पेरनेपर तिलोंमें तैल दिखायी तैलं गृह्यते । दधिनि मथनेन देता है, मन्थन करनेपर दहीमें घी सर्पिरिव । आपः स्रोतःसु नदीषु देखा जाता है, पृथिवी खोदनेपर स्रोत--अन्त स्रोता नदियोमे जल भूखननेन । अरणीषु चाग्निर्मथ- दिखायी देता है और मन्थन करनेपर काष्ठोंमें अग्निकी उपलब्धि होती है नेन । एवमात्मात्मनि स्वात्मनि उसी प्रकार मननसे आत्मामें अपने आत्माकी गृह्यतेऽसौ मननेनात्मभूतदेहादि- अन्तरात्मामे ही इस उपलब्धि होती है, अर्थात् आत्मभूत प्वन्नमयावशेषोपाधिप्रविलापनेन । देहादिमें जो अन्नमयादि सम्पूर्ण उपाधियाँ हैं उनका लय करनेपर निर्विशेषे पूर्णानन्दे खात्मन्येवा- अपने निर्विशेष पूर्णानन्दस्वरूप आत्मामें ही इस (परमात्मा ) का वगम्यत इत्यर्थः। अनुभव होता है। केन तर्हि पुरुषेणात्मन्येव अच्छा तो किस पुरुषको आत्मा- में ही इस आत्माकी उपलब्धि होती गृह्यते ? इत्यत आह-सत्येन है, सो अब बतलाते हैं—सत्यसे यथाभूतहितार्थवचनेन अर्थात् यथार्थ और प्राणिमात्रके लिये भूत- हितकर सम्भाषणसे, क्योंकि "जो हितेन । “सत्यं भूतहितं प्रोक्तम्" प्राणियोंके लिये हितकर होउसे सत्य कहते हैं" ऐसी स्मृति है तथा मन इति स्मरणात् । तपसेन्द्रियमन- और इन्द्रियोंकी एकाग्रतारूप तपसे, सामैकाग्रयलक्षणेन । "मनसश्चे- क्योकि स्मृति कहती है "मन और मामुपयान्ति ते" (गीता १०। उन्हे वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे [ अध्याय १ श्वेताश्वतरोपनिषद् १२२ न्द्रियाणां च ऐकायं परमं तपः” इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है।" अत. इन सत्य और तपके द्वारा जो इति स्मरणात् । एनमात्मानं इस आत्माको देखता है [ उसे योऽनुपश्यति ॥१५॥ इसकी उपलब्धि होती है ] ॥ १५॥ आह- कथमेनमनुपश्यति ? इत्यत इस परमात्माको किस प्रकार | देखता है ? सो वताते हैं- सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सपरिवार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥ तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥१६॥ जो आत्मविद्या और तपका मूल है तथा जिसमे परम श्रेय आश्रित है उस सर्वव्यापी आत्माको दूधमे विद्यमान घृतके समान देखता है ॥१६॥ सर्वव्यापिनमिति । सर्व प्रकृ-! 'सर्वव्यापिनम्' इत्यादि । जो त्यादिविशेषान्तं व्याप्यावस्थितं । केवल देहेन्द्रियादि अध्यात्ममात्रमे न देहेन्द्रियाद्यध्यात्ममात्रावस्थि- ही स्थित नहीं है अपि तु प्रकृतिसे लेकर पञ्चभूतपर्यन्त सबको व्याप्त तमात्मानं क्षीरे सर्पिरिव सारत्वेन करके स्थित है, उस आत्माको दूधमे निरन्तरतयात्मत्वेन सर्वेष्वर्पित- साररूपसे स्थित घीके समान सबमें मात्मविद्यातपसोर्मूलं कारणम् ।। अखण्ड आत्मभावसे विद्यमान तथा श्रूयते च-"एष ह्येव साधुकर्म आत्मविद्या और तपके मूल यानी कारयति ।” (कौपी० उ०३।८) कारणरूपसे देखते है । श्रुति भी कहती है-"यही शुभ कर्म कराता "ददामि बुद्धियोगं तं येन है", तथा [स्मृति कहती है----] "मैं - वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं।" १०) इति ।
अध्याय १] शाङ्करभाष्यार्थ १२३ तपश्च अथवात्मविद्या च अथवा ऐसा भी अर्थ हो सकता है—आत्मविद्या और तप ये जिस यस्यात्मलाभे मूलं हेतुरिति । आत्माकी प्राप्तिके मूल यानी कारण तथा च श्रुतिः-"विद्ययामृत- हैं, जैसा कि श्रुति कहती है- "ज्ञानसे अमृतकी प्राप्ति होती है" मश्नुते" (ई० उ० ११)। "तपसा "तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा ब्रह्म विजिज्ञासस्व" (तै० उ०३। करो" इत्यादि । 'ब्रह्मोपनिषत्परम्'- २। १) इति च । ब्रह्मोपनिषत्प- जिसमे परम श्रेय उपनिषण्ण (आश्रित) है । तात्पर्य यह है कि जो सत्यादि- रमुपनिषण्णमस्मिन्परं श्रेय इति । साधनसम्पन्न है वही जो दूधमे घृतके यः सत्यादिसाधनसंयुक्तः स एनं समान सर्वगत और आत्मविद्या एव तपका मूल है तथा जो ब्रह्मोपनिषत्पर सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पि- है, उस सर्वव्यापी आत्माको देखता रिवार्पितमात्मविद्यातपोमूलं तह- है । अर्थात् आत्मदर्शी पुरुप इस सर्वगत ब्रह्मको आत्मामें ही देखता मोपनिषत्परमनुपश्यति सर्वगतं है, जो असत्यादियुक्त और अन्न- ब्रह्मात्मदर्शिनात्मन्येव गृह्यते ना- मयादिरूपसे परिच्छिन्न देहमे ही आत्मबुद्धि करनेवाला है उसे ब्रह्मकी सत्यादियुक्तेन परिच्छिन्नब्रह्मान्न- उपलब्धि नहीं होती । श्रुति भी मयाद्यात्मना । श्रूयते च- कहती है-"यह आत्मा सर्वदा "सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्य- के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । तथा जिनमे कुटिलता, असत्य और न येषु जिह्ममनृतं न माया च, कपट नहीं होता वे ही इसे प्राप्त कर सकते हैं ।" यहाँ 'ब्रह्मोपनिपत्परम्' (प्र० उ०१।१६) इति । द्विर्वचन- । इसका दो बार पाठ अध्यायकी मध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १६॥ समाप्ति सूचित करनेके लिये हैं॥१६॥ इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छङ्कर- भगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ -- द्वितीय अध्याय यानकी सिदिके लिये सविताले अनुज्ञा-प्रार्थना ध्यानमुक्तं ध्याननिर्मथनास्या- [प्रयम अन्यायमें | 'ध्यान- साहेवं पञ्चेन्निगूढ- निर्मयनान्यासाडेवं पश्येन्निगूडवत्' हिनीयाध्याग- इत्यादि मन्त्रले परमात्माके साभाजार- न्गेनन् वदिति परमात्म- के उणयरूपसे व्यान बताग गया । दर्शनोपायत्वेन । इदानीं तदपेक्षि- अब उनके लिये अपेक्षित सावनोंका विधान करने के लिये द्वितीय अन्याय तसाधनविधानार्थ द्वितीयोऽध्याय आरम्भ किया जाता है। उसमें आरभ्यते । तत्र प्रथमं तत्सिद्ध्यर्थं पहले उसकी सिद्धिके लिये सविता सवितारमागास्ते- देवतासे प्रार्थना करते हैं- युञ्जानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः । अग्नेज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १॥ सविता देवता हमारे मन और अन्य प्राणोंको परमात्मामें लगाते हुए अग्नि आदि [इन्द्रियाभिमानी देवताओं ] की व्योति ( बाह्यविषयप्रकाशन- सामळ) का अवलोकन कर तत्वज्ञान के लिये उसे पृथिवी ( पार्थिव पदार्थों) से ऊपर [ शरीरस्य इन्द्रियोंमें स्थापित करे ॥१॥ युञ्जान इति । युञ्जानः प्रथम 'युलानः' इत्यादि । प्रथम मनको मनः प्रथमं ध्यानारम्भे सनः नियुक्त करते हुए अर्यात् पहले- ध्यानके आरम्भमें परमात्मामें लगाये परमात्मनि संयोजनीयं धिय जाने योग्य मन और वियों-अन्य इतरानपि प्राणान् । "प्राणा व प्राणोंको भी [ प्रवृत्त करते हुए ]
अध्याय २]
शाङ्करभाष्यार्थ
१२५
धियः" इति श्रुतेः । अथवा धियो सविता देवता अग्नि आदि इन्द्रिया-
भिमानी देवताओके विषयप्रकाशन-
वाह्यविषयज्ञानानि । किमर्थम् ? सामर्थ्यका अवलोकन कर उसे
पृथिवीसे ऊपर इस शरीर [ शरीर-
तत्त्वाय तत्त्वज्ञानाय सविता
रूप इन्द्रियों ] मे स्थापित करे ।
धियो वाह्यविषयज्ञानादग्नेज्योतिः किस लिये -तत्त्व अर्थात् तत्त्व-
ज्ञानके लिये । यहाँ "प्राण ही
प्रकाशं निचाय्य दृष्ट्वा पृथिव्या धी है" इस अन्य श्रुतिके अनुसार
'धियः' का अर्थ प्राण किया गया
अध्यस्मिञ्शरीर आभरदाहरत्
है । अथवा 'धियः' का अर्थ बाह्य-
विषयप्रकाशन भी हो सकता है ।
मन्त्रनिष्कर्ष
एतदुक्तं भवति--ज्ञाने प्र यहाँ यह कहा गया है कि
वृत्तस्य मम मनो जिसकी कृपासे योगकी प्राप्ति होती
है, वह सविता देवता ज्ञान में प्रवृत्त
बाह्यविषयज्ञानादुप-
हुए मेरे मनको बाह्य विषयोंके प्रका-
संहृत्य परमात्मन्येव संयोजयितु- शनसे रोककर परमात्मामे ही
मनुग्राहकदेवतात्मनामन्यादीनां । लगानेके लिये इन्द्रियानुग्राहक अग्नि
यत्सर्ववस्तुप्रकाशनसामर्थ्य तत्
आदि देवताओंकी जो समस्त वस्तुओं-
को प्रकाशित करनेकी शक्ति है उस
सर्वमस्मद्वागादिषु संपादयेत्
सबको हमारी वागादि इन्द्रियों में
सविता यत्प्रसादादवाप्यते योग
स्थापित करे । यहाँ 'अग्नि' शब्द
इत्यर्थः। अग्निशब्द इतरासामप्य- 'अन्य इन्द्रियानुग्राहक देवताओंको
नुग्राहकदेवतानामुपलक्षणार्थः॥१॥ भी उपलक्षित करानेके लिये है ॥१॥
युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे । सुवर्गे-
याय शक्त्या ॥२॥
श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय २ . सविता देवताकी अनुमति होनेपर उन्हींकी प्रेरणासे परमात्मामें लगे हुए मनके द्वारा हम ययाशक्ति परमात्मप्राप्तिके हेतुभूत व्यानकर्मक लिये प्रयत्न करेंगे ||२|| युक्तेनेति । यदा तत्त्वाय मनो 'युक्तेन' इत्यादि । जिस समय योजयन्ननुग्राहकदेवताशक्त्याधा- तत्त्वज्ञानके लिये मनोनिग्रह करते हुए अनुम्राहक देवताओंके शक्ति- नेन देहेन्द्रियदाढयं करोति तदा सञ्चारके द्वारा [ सविता ] देह और युक्तेन सवित्रा परमात्मनि संयो- इन्द्रियोंकी दृढ़ता कर देगा उस समय युक्त-सविता देवताद्वारा जितेन मनसा वयं तस्य देवस्य परमात्मामें लगाये हुए मनके द्वारा सवितुः सवेऽनुज्ञायां सत्यां सुव- हम उस देवका सब प्राप्त होनेपर गेंयाय स्वर्गप्राप्तिहेतुभूताय ध्यान- । सुवर्गेय-स्वर्गप्राप्तिके हेतुभूत ध्यान- अर्थात् उनकी अनुज्ञा मिलनेपर कर्मणे यथासामर्थ्य प्रयतामहे । कर्मके लिये यथात्रक्ति प्रयत्न करेंगे। परमात्मवचनोऽत्र स्वर्गशब्दः । यहाँ 'स्वर्ग' शब्द परमात्मवाची है, क्योंकि परमात्माका ही यहाँ प्रकरण तत्प्रकरणात्तस्यैव सुखरूपत्वात्त- है. वही सुखत्वल्य है तथा अन्य दंगत्वाचेतरस्य सुखस्य । तथा । सब सुख भी उसीके अंश है । ऐसी च श्रुतिः-"एतस्यैवानन्दस्या- ही यह श्रुति भी है--"इसी आनन्दकी सूक्ष्मतर मात्राके आश्रय- न्यानि भृतानि मात्रामुपजीवन्ति" से अन्य सत्र जीव जीवित रहते (वृ० उ०४।३।३२) इति ।।२।। हैं" ॥२॥ -- युक्त्वायेति पुनरपि सोऽप्येवं , 'युक्वाय इत्यादि मन्त्रसे. फिर करोत्विति प्रार्थना- भी वह ऐसा करे-ऐसी प्रार्थना करते है- - अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १२७ के प्रति यतः युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम् । बृहज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥ पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माकी ओर जाते हुए तथा सम्यग्दर्शनके द्वारा ज्योतिःस्वरूप ब्रह्मका प्रकाशन करते हुए मनके सहित इन्द्रियोंको परमात्मा- से संयुक्त कर वह सवितृदेव उन्हे अनुज्ञा ( सामर्थ्य ) प्रदान करे ॥३॥ युक्त्वाय योजयित्वा देवान् देवताओं, मन आदि इन्द्रियोंको [ परमात्मामें] युक्त-सयोजित मनआदीनि करणानि तेषां कर—उन इन्द्रियोंका विशेषण है 'सुवर्यतः' सुवः-अर्थात् स्वर्ग विशेषणं सुवः स्वर्ग सुखं पूर्णा -मुख यानी पूर्णानन्दस्वरूप ब्रह्म- -जाती हुई [इन्द्रियों- नन्दब्रह्म, यत इति द्वितीयाबहु- को]। यहाँ 'यतः' यह शब्द द्वितीया- का बहुवचन है। तात्पर्य यह है वचनं पूर्णानन्दब्रह्म गच्छतो न कि पूर्णानन्द ब्रह्मकी ओर जाती हुई इन्द्रियोंको [ परमात्मामें संयोजित शब्दादिविषयान् । कर ], शब्दादि विषयोकी ओर जाने- वाली इन्द्रियोंको नहीं। पुनरपि विशेषणान्तरं धिया इन्द्रियोंके लिये] पुन एक दूसरा विशेपण भी दिया जाता है जो सम्यग्दर्शनेन दिवं द्योतन- 'धिया' यानी सम्यग्दर्शनके द्वारा खमावं चैतन्यैकरसं वृहन्मह- दिवम्-द्योतनस्वभाव चैतन्यैकरस वृहत्-महत् अर्थात् ब्रह्मको ज्योति: ब्रह्म ज्योतिः प्रकाशं करि- प्रकाशित करेंगी, अर्थात् पूर्णा- प्यतः पूर्णानन्दब्रह्माविष्करिष्य- नन्द ब्रह्मका प्रादुर्भाव-अनुभव करेगी [ उन इन्द्रियोंको ]–यहाँ तः। अत्र द्वितीयावहुवचनम् । 'करिष्यत में द्वितीयाका बहुवचन है- ૧૮ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ सविता प्रसुवाति तान्करणानि | उन इन्द्रियोंको सवितृदेव अनुज्ञा देता है । तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ यथा करणानि विषयेभ्यो निवृत्ता- ' विषयोंसे निवृत्त हो आत्माभिमुखी होकर जिस प्रकार आत्माको ही न्यात्माभिमुखान्यात्मप्रकाशमेव प्रकाशित करे वैसी अनुज्ञा (सामर्थ्य) कुटुंस्तथानुजानातु सवितेत्यर्थः।३। । उन्हे सवितादेवता प्रदान करे ॥३॥ . - तस्यैवमनुजानतो महती परि इस प्रकार अनुज्ञा देनेवाले उस ष्टुतिः कर्तव्येत्याह- देवकी महती स्तुति करनी उचित है -इस अभिप्रायसे श्रुति कहती है- युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥ ४॥ जो विप्रगण मन और इन्द्रियोको परमात्मामें लगाते हैं उनको चाहिये कि जिस एक प्रज्ञावित्ने होतृसाध्य [ यज्ञादि ] क्रियाओंका विधान किया है उस महान् . सर्वज्ञ और विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक ) सवितृदेवकी महती स्तुति करें ॥ ४ ॥ युञ्जत इति | युञ्जते योज 'युञ्जतें' इत्यादि । जो विप्र- यन्ति ये विप्रा मन उत युञ्जते ब्राह्मण, मन एवं अन्य इन्द्रियोंको धिय इतराण्यपि करणानि ! धी- परमात्मामें लगाते है । इन्द्रिया बुद्धि- जनित है इसलिये उनके लिये 'धी' हेतुत्वात्करणेपु धीशब्दप्रयोगः । शब्दका प्रयोग किया गया है । ऐसा तथा च श्रुत्यन्तरम्-“यदा ही एक दूसरी श्रुति भी कहती है पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा "जब मनके सहित पाँच ज्ञान अध्याय २] शाङ्करभाण्यार्थ १२९ - सह" (क० उ०२।३।१०) इति। ( ज्ञानेन्द्रियॉ) रुक जाती हैं" विप्र-विशेपरूपसे विप्रस्य विशेषेण व्याप्तस्य वृहतो | इत्यादि । व्यापक, बृहत्-महान् एवं महतो विपश्चितः सर्वज्ञस्य विपश्चित्-सर्वज्ञ सवितृदेवकी महती देवस्य सवितुर्मही महती परिष्टुतिः स्तुति करनी चाहिये । किन्हे कर्तव्या। कैर्विप्रैः। करनी चाहिये ?--ब्राह्मणोंको । पुनरपि तमेव विशिनष्टि फिर भी उस सवितृदेवके ही विशेषण दिये जाते हैं--'वि होत्रा वि होत्रा दधे होत्राः क्रिया यो दध' जिसने होत्रा यानी यज्ञक्रियाओं- का विधान किया है और जो वयुना- विदधे वयुनावित्प्रज्ञावित्सर्वज्ञाना- वित्- प्रज्ञावित् अर्थात् सब कुछ जाननेके कारण साक्षिस्वरूप है, वह त्साक्षिभूत एकोऽद्वितीयः । ये [सविता देवता] एक-अद्वितीय है। विप्रा मनआदिकरणानि विषयेभ्य अर्थात् जिसने यज्ञक्रियाओंका विधान किया वह प्रज्ञानवान् सविता एक ही उपसंहृत्यात्मन्येव योजयन्ति तै- है । अतः जो ब्राह्मण मन आदि इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर आत्मामे विप्रस्य वृहतो विपश्चितो महती ही लगाते हैं उन्हें इस महान् एवं परिष्टुतिः कर्तव्या । होत्रा विदधे | सर्वज्ञ विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक ) सविताकी महती स्तुति करनी वयुनाविदेकः सविता ॥४॥ चाहिये ॥४॥ किञ्च- तथा युजे वां ब्रह्म पूज्यं नमोभि- विश्लोक एतु पथ्येव सूरः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥५॥ श्वे० उ० १७-१८ १३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ उनके अनुग्राहक देवगण [हे इन्द्रियवर्ग और इन्द्रियाधिष्टातृ देवगण ! ] मैं तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरातन ब्रह्ममें नमस्कार (चित्त-प्रणिधान आदि ) द्वारा मन लगाता है। सन्मार्गमें विद्यमान विद्वान्की भॉति मेरा यह कीर्तनीय श्लोक (स्तुतिपाठ ) लोकमें विस्तारको प्राप्त हो। जिन्होंने सब ओरसे दिव्य धामोंपर अधिकार कर रखा है वे अमृत ( हिरण्यगर्भ ) के पुत्र विश्वेदेवगण श्रवण करें ॥५॥ युजे वामिति । युजे वां समा 'युजे वाम्' इत्यादि । इन्द्रिय और तुम दधे वां युवयोः करणानुग्राहकयोः दोनोंके द्वारा प्रकाशनीय होनेके कारण तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्रह्ममें संवन्धि प्रकाश्यत्वेन तत्प्रकाशितं | मैं मनको नियुक्त–समाहित करता तात्पर्य यह है कि ब्रह्म इनके ब्रह्मेत्यर्थः । अथवा वामिति बहु- द्वारा प्रकाशित है । अथवा 'वाम्' वचनार्थे युष्माकं करणभूतं ब्रह्म इस शब्दका यदि वहुवचनमे अर्थ किया जाय तो 'तुम्हारे करणभूत पूर्व्य पूर्व चिरन्तनं समादधे । पूर्वतन-चिरकालीन ब्रह्ममें मै चित्त समाहित करता हूँ ऐसा अर्थ होगा। नमोभिर्नमस्कारैश्चित्तप्रणिधाना- [ किस प्रकार चित्त समाहित करता हूँ? ] नमस्कारोंद्वारा अर्थात् चित्त- दिभिः। प्रणिधान (मनोनियोग) आदिके द्वारा। एप एवं समादधानस्य मम इस प्रकार चित्तसमाधान करने- वाले मेरा कीर्तितव्य श्लोक (स्तोत्र- श्लोकः कीर्तितव्य एतु विविधमेतु पाठ ) सन्मार्गमें वर्तमान विद्वान्के समान विविधल्प (विस्तारको प्राप्त) पथ्येव सूरेः पथि सन्मार्गे। हो जाय । अयत्रा [ 'पथ्या इव' ऐसा पदच्छेद करके ] पथ्याका अर्थ अथवा पथ्या कीर्तिरित्येतद्वाक्यं कीर्ति करना चाहिये । अर्थात् अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ - १३१ प्रार्थनारूपं शृण्वन्तु विश्वेऽमृतस्य | [विद्वान्की कीर्तिकी भॉ त मेरा श्लोक विस्तारको प्राप्त हो-] इस प्रार्थनारूप ब्रह्मणः पुत्राः सूरात्मनो हिरण्य- वाक्यको अमृत-ब्रह्मा यानी गर्भस्य । के ते ? ये धामानि | हिरण्यगर्भके सूर्यरूप समस्त पुत्र सुनें । वे कौन हैं ?--जिन्होंने दिव्यानि दिवि भवान्यातस्थु- सम्पूर्ण दिव्य--धुलोकान्तर्गत धामों- रधितिष्ठन्ति ॥ ५॥ पर अधिकार कर रखा है ॥ ५॥ . सविताकी अनुज्ञाके बिना हानि युञ्जानः प्रथमं मन इत्यादिना 'युञ्जानः प्रथम मन इत्यादि मन्त्रसे सविता आदिकी प्रार्थना कही सवित्रादिप्रार्थना प्रतिपादिता । गयी । किन्तु जो पुरुष उनकी यस्तु पुनः प्रार्थनामकृत्वा तैर- | प्रार्थना न करके उनकी अनुज्ञाके ननुज्ञातः सन्योगे प्रवर्तते स बिना ही योगमे प्रवृत्त होता है उसकी भोगके हेतुभूत कमोंमें ही भोगहेतौ कर्मण्येव कर्मण्येव प्रवर्तत प्रवृत्ति हो जाती है--यह बात अब इत्याहः श्रुति बतलाती है- अभियंत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राधिरुध्यते । सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥ जही ( अग्न्याधानादि कनमें ) अँग्नका मन्यन किया जाता है, जहा वायुका अधिरोध होता है और जहाँ सोमरसकी अधिकता होती है उन कर्मों में ही [ उसके ] मनकी प्रवृत्ति होती है ॥ ६ ॥ अग्नियंत्रेति । अग्निर्यत्राभिम 'अग्निर्यत्र' इत्यादि । जहाअग्न्या- धानादिमें अग्निका मन्यन किया जाता थ्यत आधानादौ । वायुर्यत्राधि- है, जहां प्रबादि (वायुकी लुति १३२ श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय २ । ។ - रुध्यते प्रवादो। सवित्रा प्रेरितः आदि ) में वायुका अधिरोध होता है अर्थात् जहाँ सवितासे प्रेरित होकर शब्दमभिव्यक्तं करोति । सोमो वायु शब्दको अभिव्यक्त करता है और जहाँ दशापवित्र (छाननेके यत्र दशापवित्रात्पूयमानोति- वस्त्र ) से पवित्र किये (छाने हुए) सोमरसको अधिकता होती है उस रिच्यते तत्र क्रतौ संजायते मनः । यज्ञकार्यमें उसका मन लग जाता है । अग्निर्यत्राभिमथ्यत इत्यत्रापरा 'अग्निर्यत्राभिमध्यते' इस मन्त्रकी यह दूसरी व्याख्या की जाती है- व्याख्या-अग्निः परमात्मा, अग्नि परमात्माको कहते हैं, क्योंकि अविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । वह अविद्या और उसके कार्यको उक्तं च-.. ''अहमज्ञानजं दग्ध करनेवाला है । [श्रीमद्भगवद्गीता- में] कहा भी है "मैं अपने भक्तोंके तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो अन्तःकरणमें स्थित होकर प्रकाशमय ज्ञानदीपेन भास्वता" (गीता ज्ञानदीपकसे उनके अज्ञानजनित १० । ११ ) इति । यत्र अन्धकारको नष्ट कर देता हूँ।" उस परमात्माग्निका 'स्वदेहमरणिं यस्मिन्पुरुपे मथ्यते स्वदेह- कृत्वा' इत्यादि पूर्वमन्त्रसे कहे हुए मरणिं कृत्वेत्यादिना पूर्वो- ध्यानरूप निर्मन्थनके द्वारा जिस क्तध्याननिर्मथनेन वायुर्यत्राधि- पुरुषमें मन्थन होता है, तथा जहाँ रुध्यते शब्दमव्यक्तं करोति रेचकादि क्रियाओंके कारण जहाँ वायुका अधिरोध होता है अर्थात् रेचकादिकरणात् । सोमो यत्रा- | वायु अव्यक्त शब्द करता है और तिरिच्यतेऽनेकजन्मसेवया तत्र जहाँ अनेक जन्मोंतक [अग्निकी ] सेवा करनेसे सोमकी बहुलता होती तस्मिन्यज्ञदानतपःप्राणायामसमा- है, उस यज्ञ, दान, तप, प्राणायाम विविशुद्धान्तःकरणे संजायते । एवं समाधि आदिसे विशुद्र हुर अध्याय २ शाङ्करभाष्यार्थ १३३ परिपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्माकार अन्तःकरणमे ही पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्माकार मन (मनोवृत्ति) का उदय मनः समुत्पद्यते नान्यत्रा- होता है, अन्यत्र अशुद्ध अन्तः- शुद्धान्तःकरणे । उक्तं च- करणमें नहीं । कहा भी है- "प्राणायामविशुद्धात्मा "क्योकि जिसका चित्त यस्मात्पश्यति तत्परम् । प्राणायामके अभ्याससे शुद्ध हो गया है वही उस परमात्माका तस्मान्नातः परं किञ्चि- साक्षात्कार करता है, इसलिये इस त्प्राणायामादिति श्रुतिः॥ प्राणायामसे बढकर कुछ भी नहीं अनेकजन्मसंसार- है—ऐसी श्रुति है । अनेक जन्मोके चिते पापसमुच्चये। संसारसे जो पापराशि सञ्चित हो तत्क्षीणे जायते पुंसां गयी है उसके क्षीण हो जानेपर गोविन्दाभिमुखी मतिः।। पुरुषोंकी बुद्धि श्रीगोबिन्दकी ओर जन्मान्तरसहस्रेषु होती है । सहस्रो जन्मोके अनन्तर तपोज्ञानसमाधिभिः । तप, ज्ञान और समाधिके द्वारा जिनके नराणां क्षीणपापानां पाप क्षीण हो गये हैं उन पुरुषोंकी कृष्ण भक्तिः प्रजायते ॥" | श्रीकृष्णचन्द्रमें भक्ति होती है।" तस्मात्प्रथमं यज्ञाद्यनुष्ठानं ततः अतः सबसे पहले यज्ञादिका अनुष्ठान किया जाता है, फिर प्राणायामादि ततः समाधिस्ततो | प्राणायामादिका, फिर समाधिका और वाक्यार्थज्ञाननिष्पत्तिस्ततः कृत- उसके पश्चात् महावाक्यके अर्थका ज्ञान होता है, तथा उससे कृत- कृत्यतेति ॥६॥ कृत्यता होती है ॥ ६॥ सविताकी अनुज्ञासे लाभ यस्मादननुज्ञातस्य तस्य भोग- क्ये कि सिविता देवताकी] अनुज्ञा न होनेपर उसकी भोगके हेतुभूत हेतौ कर्मण्येव प्रवृत्तिस्तस्मात्- | कर्ममें ही प्रवृत्ति होती है, इसलिये- शेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत्र योनि कृणवसे न हि ते पूर्तमक्षिपत् ॥ ७ ॥ सरिता देवनाने द्वारा अनुज्ञात होकर उत चिरन्तन ब्रह्मका सेवन करना चाहिये । तुम उस ब्रह्मने निष्टा ( समाधि ) करो । इससे पूर्व कर्म तुम्हारा बन्न करनगला नहीं होगा ॥७॥ सवित्रा प्रसबेन सस्यप्रसबेनेति सन्तिाद्वारा प्रसूत यानी जो अन्न यावत् । जुपेत सेवेत ब्रह्म पूर्व्य प्रसव करनेवाला है उस सविता- चिरन्तनम् । तस्मिन्ब्रह्मणि योनि सेवन करना चाहिये। उसे ब्रह्ममें तुम द्वारा अनुज्ञात होकर चिरन्तन ब्रह्मका निष्ठां समाधिलक्षणां कृणवसे योनि-समाधिरूप निष्टा करो । पुरुष्व । एवं कुर्वतो मम किं ऐसा करनेपर मुझे उससे त्या ततो भवति? इत्यत आह-नहि होगा ? सो श्रुति क्तलाती है- न हि ते झ्यादि । इससे तुम्हारा त इति। न हि ते पूर्न स्मात कमष्टं पूर्तगत इष्टकर्म और श्रौत- श्रोतं च कर्माक्षिपन्न पुनभोग-'कर्न भी पुन. भोगके हेतुसे हेतोर्वघ्नाति; ज्ञानाग्निना सीजस्य बन्धन नहीं करेगा: क्योंकि ज्ञानाग्निके दग्धत्वान् । उक्तं च-"यथेषी- , द्वारा वह बीजसहित भस्म हो जायगा। कानूलमन्ना प्रोतं प्रड्यत एवं हास्य कहा भी है-"जिस प्रकार अग्निमे डाला हुआ सींकका सऑ भत्म सवें पाप्मानः प्रयन्ते' (छा० हो जाता है उसी प्रकार इस (ज्ञानी) २०५।२४ १३) इति । "ज्ञानाग्निः के समस्त पार भत्म हो जाते हैं". सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा' ' "इसी प्रकार ज्ञानाग्नि समस्त को- (गीता ४।३७) इति च ॥ ७॥ को भत्ल कर डालता है इत्यादि ॥७॥ -- अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १३५ ध्यानयोगकी विधि और उसका महत्त्व तत्र योनिं कृणवस इत्युक्तं ऊपर यह कहा गया कि 'उसमें समावि करो, सो वह समाधि किस कथं योनिकरणम् ? इत्याशङ्कय प्रकार की जाय, ऐसी आशङ्का तत्प्रकारं दर्शयति- करके उसका प्रकार दिखाते हैं- त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य । ब्रह्मोडुपेन प्रतरत विद्वान् स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि ॥ ८॥ [शिर, ग्रीवा और वक्षःस्थल इन ] तीनोंको ऊँचे रखते हुए शरीरको सीधा रख मनके द्वारा इन्द्रियोको हृदयमें सन्निविष्ट कर विद्वान् ओंकाररूप नौकाके द्वारा सम्पूर्ण भयानक जलप्रवाहोंको पार कर जाता है ॥८॥ त्रिरुन्नतमिति । त्रीण्युरोग्रीवा 'त्रिरुन्नतम्' इत्यादि । वक्षःस्थल, ग्रीवा और शिर ये तीन जिसमें उन्नत शिरांस्युन्नतानि यस्मिञ्शरीरे (उठे हुए) रखे जाते हैं उस त्रिरुन्नत तत्रिरुन्नतं संस्थाप्यते संस्थाप्यते समं शरीरको समानभावसे स्थित किया जाता शरीरम् । हृदीन्द्रियाणि मन- है। तथा मनके द्वारा मन एव चक्षु आदि श्चक्षुरादीनि मनसा संनिवेश्य इन्द्रियोंको हृदयमें नियन्त्रित कर ब्रह्म संनियम्य ब्रह्मैवोडुपस्तरणसाधनं ही उडुप-तरणका साधन है, उस ब्रह्मरूप उडुपके द्वारा- यहाँ आचार्य- तेन ब्रह्मोडुपेन । ब्रह्मशब्दं प्रणवं लोग 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ प्रणव वतलाते वर्णयन्ति । तेनोडपस्थानीयेन हैं, उस उडुप (नौका) स्थानीय प्रणवेन, काकाक्षिवदुभयत्र संव- प्रणवके द्वारा । काकाक्षिन्यायसे १. कौएके दोनों नेत्रगोलकोंमें एक ही ऑख होती है, उसीसे वह दोनों ओर देख लेता है । इसी प्रकार जहाँ एक वस्तुका दो वस्तुओंके साथ सम्बन्ध होता है वहाँ काकाक्षिन्याय कहा जाता है । , श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ ध्यते । तेनोपसंहृत्य तेन प्रत- | इसका [ सनिवेश और तरण] दोनोंके साथ सम्बन्ध है। अर्थात् रेतातिक्रामेद्विद्वान्स्रोतांसि संसार- प्रणवके द्वारा मन और इन्द्रियोंको सरितः स्वाभाविकाविद्याकाम- | नियमित कर प्रणवहीसे विद्वान् ससार- सरिताके स्वाभाविक अविद्या, कामना कर्मप्रवर्तितानि भयावहानि प्रेत- और कोंद्वारा प्रवर्तित भयावह- तिर्यगूर्ध्वप्राप्तिकराणि पुनरावृत्ति- करानेवाले पुनरावृत्तिके हेतुभूत प्रेत, तिर्यक् एव ऊर्ध्व योनियोंको प्राप्त भाञ्जि ॥ ८॥ स्रोतोको पार कर लेता है ॥ ८ ॥ - प्राणायाम- प्राणायामका क्रम और उसकी महत्ता प्राणायामक्षपितमनोमलस्यचित्तं प्राणायामके द्वारा जिसके पाप ब्रह्मणि स्थितं भव- क्षीण हो गये हैं उसका चित्त ब्रह्ममें निर्देश स्थिर हो जाता है, इसलिये प्राणायाम- तीति प्राणायामो का वर्णन किया जाता है । पहले निर्दिश्यते । प्रथमं नाडीशोधनं नाडीशोधन करना चाहिये । उसके कर्तव्यम् । ततः प्राणायामेऽधि- | पीछे प्राणायाममें अधिकार होता है। कारः । दक्षिणनासिकापुटमगु- दाये नासारन्ध्रको अँगूठेसे दबाकर बायेंसे यथाशक्ति वायु खींचे । ल्यावष्टभ्य वामेन वायुं पूरये- तत्पश्चात् दायीं नासिकाको छोड़कर यथाशक्ति । ततोऽनन्तरमुत्सृज्यैवं इसी प्रकार [वाम नासारन्ध्रको दक्षिणेन पुटेन समुत्सृजेत् । अंगुलियोंसे दबावे और]दायेंसे वायुको सव्यमपि धारयेत् । पुनर्दक्षिणेन | बाहर निकाले। फिर दायेंसे पूरक करके पूरयित्वा सव्येन समुत्सृजेद्यथा- | यथाशक्ति बायें नासिकारन्ध्रसे रेचक शक्ति । त्रिः पञ्चकृत्वो वा एवम् पूर्वरात्रि और अर्धरात्रि इन चार करे । इस प्रकार शेपरात्रि, मध्याह्न, अभ्यस्यतः सवनचतुष्टयमपररात्रे समय तीन-तीन या पाँच-पाँच बार मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षा- | अभ्यास करनेवालेकी एक पक्ष या एक अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १३७ न्मासाद्विशुद्धिर्मवति । त्रिविधः मासमें नाडीशुद्धि हो जाती है । प्राणायामो रेचकः पूरकः कुम्भक यह रेचक, कुम्भक और पूरकभेदसे तीन प्रकारका प्राणायाम है । ऐसा इति । तदेवाह- ही कहा भी है-- "आसनानि समभ्यस्य वाञ्छितानि यथाविधि । प्राणायामं ततो गार्गि जितासनगतोऽभ्यसेत् ॥ मृद्वासने कुशान्सम्य- गास्तीर्याजिनमेव च। लम्बोदरं च संपूज्य फलमोदकभक्षणः ॥ तदासने सुखासीन: सव्ये न्यस्येतरं करम् । समग्रीवशिराः सम्य- क्संवृतास्यः सुनिश्चलः ॥ प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि नासाग्रन्यस्तलोचनः । अतिभुक्तमभुक्तं च वर्जयित्वा प्रयत्नतः॥ नाडीसंशोधनं कुर्या- दुक्तमार्गेण यत्नतः । वृथा क्लेशो भवेत्तस्य तच्छोधनमकुर्वतः ॥ नासाग्रे शशमृद्धी चन्द्रातपवितानितम् । "हे गार्गि | अपने अभीष्ट आसनोंका यथाविधि अभ्यास कर फिर जिस आसनका अभ्यास हो उससे बैठकर प्राणायामका अभ्यास करे। कोमल आसनपर सम्यक्प्रकार- से कुशा और मृगचर्म विछाकर फल तथा मोदक आदि नैवेद्यके द्वारा गणेशजीका पूजन कर उस आसनपर बाये हाथपर दायाँ हाथ रखे हुए सुखपूर्वक बैठे । शिर और ग्रीवाको सीधे रखे, मुखको [ किसी वस्त्रसे] अच्छी तरह ढक ले तथा शरीरको निश्चल रखे। इस प्रकार नासिकाग्र- पर दृष्टि लगाकर पूर्व या उत्तरकी , ओर मुख करके बैठ जाय । तथा अतिभोजन और अभोजनको प्रयत्न- पूर्वक त्यागकर शास्त्रोक्त पद्धतिसे नाडीशोधन करे । जो योगी नाडी- शोधन किये बिना अभ्यास करता है उसका श्रम व्यर्थ होता है। नासिकाग्रपर चन्द्रिकायुक्त विश्वव्यापी चन्द्रवीज (ठे या मॅ) को तथा .
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ सप्तमस्य तु वर्गस्य सप्तम वर्गके बिन्दुयुक्त चतुर्थ वर्ण (4) चतुर्थ बिन्दुसंयुतम् ।। को स्थापित कर दोनों नेत्रोंको विश्वमध्यस्थमालोक्य नासिकाके अग्रभागपर स्थापित नासाग्रे चक्षुपी उभे करे । इजा (वाम) नाडीद्वारा इडया पूरयेद्वायु द्वादशमात्रा-क्रमसे बाह्यवायुको भीतर बाह्यं द्वादशमात्रकैः॥ खांचे । फिर पूर्ववत् देदीप्यमान ततोऽग्निं पूर्ववद्ध्याये शिखाओसे युक्त अग्निका ध्यान करे स्फुरज्ज्वालावलीयुतम्। और उस अग्निमण्डलमें स्थित रेफंच विन्दुसंयुक्त विन्दुयुक्त रेफ (२) का ध्यान करे। शिखिमण्डलसंस्थितम् ॥ तत्पश्चात् धीरे-धीरे पिङ्गला (दायीं) ध्यायेद्विरेचयेद्वायुं नाडीसे वायुको निकाल दे। फिर मन्दं पिङ्गलया पुनः। वह मतिमान् योगी दाये नासारन्ध्रसे पुनः पिङ्गलयापूर्य घ्राणं दक्षिणतः सुधीः॥ पिङ्गला नाडीद्वारा प्राण खींचकर तद्वद्विरेचयेद्वायु- उसे धीरे-धीरे इडा नाडीद्वारा बाहर मिडया तु शनैः शनैः। निकाले । इस प्रकार गुरुकी बतलायी त्रिचतुर्वत्सरं चापि हुई विधिसे एकान्तमें तीन-चार वर्ष त्रिचतुर्मासमेव वा ॥ या तीन-चार मासतक गुरुणोक्तप्रकारेण करे । प्रात.काल, मध्याह्न तथा रहस्येवं समभ्यसेत् । सायंकालमेनान कर सन्ध्यादि कमों- प्रातमध्यंदिने सायं से निवृत्त हो छ.-छः प्राणायाम करे स्नात्वा षट्कृत्व आचरेत्।। तया नित्यप्रति मध्यरात्रिमें भी संध्यादिकम कृत्वैव मध्यरात्रेऽपि नित्यशः । अभ्यास करे । ऐसा करनेसे उसकी नाडीशुद्धिमवामोति नाडीशुद्धि हो जाती है और उसके तचिह्नं दृश्यते पृथक् ।। चिह्न स्पष्ट दीखने लगते हैं। १. जितने समयमें हाय जानुमण्डलके चारों ओर घूम जाय उसे एक मात्रा कहते हैं। अभ्यास अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १३९ twa शरीरलघुता दीप्ति शरीरका हल्कापन, कान्ति, जठराग्नि- जठराग्निविवर्धनम् । की वृद्धि, नादका सुनायी देने लगना—ये सब नाडीशुद्धिकी नादाभिव्यक्तिरित्येत- सूचना देनेवाले चिह्न हैं। नाडियो- ल्लिङ्गं तच्छुद्धिसूचनम् ।। की शुद्धि जप करनेसे नहीं होती, शुध्यन्ति न जपैस्तेन अतः वह नाडीशुद्धिका हेतु नहीं स्पर्शशुद्धेरहेतवः । प्राणायामं ततः कुर्या- "इसके पश्चात् रेचक, पूरक और द्रेचपूरककुम्भकैः ॥ कुम्भक क्रमसे प्राणायाम करे । प्राणापानसमायोगः प्राण और अपानका संयोग होना ही प्राणायामः प्रकीर्तितः। प्राणायाम कहलाता है । हे गार्गि ! प्रणवं च्यात्मकं गार्गि प्रणव त्रिरूप है । ये जो रेचक, रेचपूरककुम्भकम् ॥ पूरक और कुम्भक हैं इन्हे प्रणव ही तदेतत्प्रणवं विद्धि समझो । मैं तुम्हें प्रणवका स्वरूप तत्स्वरूपं ब्रवीम्यहम् । बतलाता हूँ। वेदके आदिमे जो स्वर यो वेदादौ स्वर प्रोक्तो (अ) है और जो खर (उ) वेदान्तोंमें स्थित है तथा इनके पीछे वेदान्तेषु प्रतिष्ठितः ॥ तयोरन्तं तु यद्वार्गि जो पञ्चम वर्ग (पवर्ग) का पञ्चम वर्ण (म) है, इन [ओंकारकी वर्गपञ्चकपञ्चमम् । तीन मात्रा अ, उ और म ] में प्रथम रेचकं प्रथमं विद्धि वर्णको रेचक जानो, द्वितीयको पूरक द्वितीयं पूरकं विदुः॥ समझा जाता है और तृतीयको तृतीयं कुम्भकं प्रोक्तं कुम्भक बतलाया गया है। इस प्राणायामस्त्रिरात्मकः । । प्रकार यह तीन अङ्गोंवाला प्राणायाम त्रयाणां कारणं ब्रह्म है । इन तीनोंका कारण सभीका भारूपं सर्वकारणम् ॥ कारणरूप प्रकाशमय ब्रह्म है । हे रेचकः कुम्भको गार्गि गार्गि ! रेचक और कुम्भक न्ये सृष्टिस्थित्यात्मकावुभौ । दोनों तो क्रमशः सृष्टि और स्थिति- १४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ पूरकस्त्वथ संहारः कारणं योगिनामिह ॥ पूरयेत्षोडशैर्मात्र- रापादतलमस्तकम् । मात्रैर्द्वात्रिंशकैः पश्चा- द्रेचयेत्सुसमाहितः ॥ संपूर्णकुम्भवद्वायो- निश्चलं मूर्धदेशतः। कुम्भकं धारणं गार्गि चतुःषष्टया तु मात्रया।। ऋषयस्तु वदन्त्यन्ये प्राणायामपरायणाः । पवित्रभूताः पूतान्त्राः प्रभञ्जनजये रताः॥ तत्रादौ कुम्भकं कृत्वा चतुःषष्टया तु मात्रया । रेचयेत्षोडशैर्मात्र- न सेनकेन सुन्दरि॥ तयोश्च पूरयेद्वायु शनैः षोडशमात्रया। प्राणस्यायमनं त्वेवं वशं कुर्याजयी कशी ॥ पश्च प्राणाः समाख्याता वायवः प्राणमाश्रिताः। प्राणो मुख्यतमरतेषु सर्वप्राणभृतां सदा॥ रूप हैं तथा पूरक संहाररूप है । इस प्रकार ये योगियोंकी उत्पत्त्यादि- के कारण हैं। पहले षोडशमात्रा- क्रमसे पैरोंसे लेकर मस्तकपर्यन्त पूरक करे । फिर खूब सावधानीसे बत्तीसमात्राक्रमसे रेचक करे और हे गार्गि ! भरे हुए घड़ेके समान चौसठमात्राक्रमसे मूर्द्धदेशमें कुम्भक करता हुआ वायुको निश्चलभावसे धारण करे। "इसके सिवा हे सुन्दरि ! जिन्होंने भूत और ऑतोंकी शुद्धि की है ऐसे प्राणजयमें तत्पर कुछ अन्य प्राणायामपरायण ऋषियोंका कहना है कि पहले चौसठमात्राक्रमसे कुम्भक करके एक नासारन्ध्रसे षोडशमात्राक्रमसे रेचक करे । इसके पश्चात् षोडशमात्राक्रमसे दोनो नासारन्ध्रोमें वायु पूर्ण करे । इस प्रकार प्राणजयी योगी प्राणसंयमको अपने अधीन कर ले। "प्राण पॉच कहे गये हैं, प्राणके आश्रित पाँच दैहिक वायु हैं । समस्त प्राणियोके शरीरोंके अन्तर्गत उन पाँच प्राण-वायुओमें प्राण सबसे मुख्य है। वह प्राण वे अध्याय २1 शाङ्करभाष्यार्थ १४१ ओष्ठनासिकयोमध्ये ओष्ठ और नासिकाके मध्यमें, हृदये नाभिमण्डले । हृदयमें, नाभिमण्डलमें तथा पैरोके पादाङ्गुष्ठाश्रितः प्राणः अंगूठोंमें भी रहता हुआ शरीरके सभी अङ्गोमें विद्यमान है। नित्यप्रति सर्वाङ्गेषु च तिष्ठति ॥ सोलह प्राणायामोका अभ्यास करे, नित्यं षोडशसंख्याभिः इससे मनोवाञ्छित पदार्थ प्राप्त होते प्राणायामं समभ्यसेत् । हैं और वह योगाभ्यासी समस्त मनसा प्रार्थितं याति प्राणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है । सर्वप्राणजयी भवेत् ॥ साधकको चाहिये कि प्राणायामद्वारा प्राणायामैदहेदोषान् शारीरिक दोगेको भस्म करे, धारणा- से पापोंका नाश करे, प्रत्याहारसे धारणाभिश्च किल्बिषान् । वैषयिक ससगोंका अन्त करे और प्रत्याहाराच संसर्गान ध्यानसे अनीश्वर गुणोंकी निवृत्ति ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ करे । जो पुरुष प्रतिदिन स्नान प्राणायामशतं स्नात्वा करके सौ प्राणायाम करता है वह यः करोति दिने दिने । यदि माता, पिता या गुरुकी हत्या मातापितगुरुघ्नोऽपि करनेवाला हो तो भी तीन वर्पमें त्रिभिर्वर्व्यपोहति ॥" | उस पापसे मुक्त हो जाता है ।" तदेतदाह प्राणानित्यादिना यही बात 'प्राणान् इत्यादि मन्त्रसे बतलायी जाती है-- प्राणान्प्रपीडयेह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्सीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ६॥ साधकको चाहिये कि युक्त आहार-विहार करता हुआ प्राणोंका निरोध कर जब प्राणशक्ति ( प्राणधारणका सामर्थ्य ) क्षीण हो जाय तब .
श्वेताश्वतरोपनिपद्
[ अध्याय २
नासिकारन्धारा उसे बाहर निकाल दे। और फिर वह विद्वान् पुरुष दुष्ट
अश्वसे युक्त रथके सारथिके समान सावधान होकर मनका नियन्त्रण
करे ॥९॥
.
प्राणान्प्रपीडयेह संयुक्तचेप्टः : जिसकी चेष्टा "नात्यश्नतस्तु
"नात्यश्नतः" (गी०६ । १६), योगोऽस्ति' इत्यादिश्लोकमे बतलाये हुए
इति श्लोकोक्तप्रकारेण संयुक्ता
नियमके अनुसार संयुक्त यानी संयत
है उसे संयुक्तचेष्ट कहते है । प्राणके
चेष्टा यस्य स संयुक्तचेष्टः । क्षीणे
भीण होनेपर अर्थात् प्राणशक्तिका
शक्तिहान्या तनुत्वं गते मनसि
ह्रास होनेसे मनके तनु हो जानेपर
नासिकायाः पुटाभ्यां शनैः शनै- 'नासिकारन्ध्रोके द्वारा धीरे-धीरे श्वास
रुत्सृजेन्न मुखेन। वायुं प्रतिष्ठाप्य बाहर निकाले, मुखसे नहीं। तात्पर्य
शनैर्नासिकयोत्सृजेदिति । उदा- • यह है कि वायुको रोककर फिर उसे
त्ताश्वयुतं स्थनियन्तारमिव मननेन धीरे-धीरे नासिकासे निकाले । फिर
मनो धारयेताप्रमत्तः प्रणिहि- ' घोड़ोंवाले रथके सारथिके समान
तात्मा ॥९॥
मनको मनन करनेसे रोके ॥९॥
अप्रमत्त-सावधान रहकर उद्धत
.
ध्यान के लिये उपयुक्त स्थानों का निर्देश
समे शुचौ शर्करावह्निवालुका-
विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः ।
मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने
गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥
जो समतल. पवित्र, शर्करा. अग्नि और वासे रहित तथा शब्द, जल
और आश्रयादिसे भी शून्य हो, मनके अनुकूल हो एवं नेत्रोको पीडा
देनेवाला न हो ऐसे गुहा आदि वायुशून्य त्यानमें मनको युक्त करे ॥१०॥
अध्याय २7 शाङ्करभाष्यार्थ १४३ तथा सम इति । समे निम्नोन्नत 'समे' इत्यादि । सम अर्थात् जो रहिते देशे । शुचौ शुद्धे । शर्करा- देश ऊँचाई-नीचाईसे रहित हो, तथा जो शुचि-शुद्ध हो,शर्करा,अग्नि और वह्निवालुकाविवर्जिते । शर्कराः । बालूसे रहित हो---शर्करा छोटे-छोटे पत्थरके टुकडोंको और बालू उनके क्षुद्रोपलाः, वालुकास्तच्चूर्णम् । चूरेको कहते हैं-तथा शब्द, जल शब्दजलाश्रयादिभिः । और आश्रयादिसे भी शून्य हो, यानी शब्द - कलह आदिके कोलाहल, शब्दः कलहादिध्वनिः जलं समस्त प्राणियों के उपयोगमे आनेवाले सर्वप्राण्युपभोग्यम् । मण्डप आ- | जल ( पनघट ) और आश्रय- जनसाधारणके ठहरनेके स्थानसे रहित श्रयः । मनोऽनुकूले मनोरमे चक्षुः हो, मनोऽनुकूल-मनोरम हो, नेत्रोंको पीडने प्रतिवाद्यभिमुखे । छान्दसो । पीडा पहुँचानेवाला अर्थात् जहाँ कोई विसर्गलोपः । गुहानिवाताश्रयणे विरोधी सामने [न] हो । यहाँ 'चक्षु- पीडने' में चक्षु के विसर्गका लोप गुहायामकान्ते निवाते समाश्रित्य वैदिक है । ऐसे गुहादि एकान्त प्रयोजयेत्प्रयुञ्जीत चित्तं परमा- और वायुशून्य स्थानमे बैठकर चित्तको प्रयुक्त करे अर्थात् परमात्मा- त्मनि ॥ १०॥ में लगावे ॥ १०॥ योगसिद्धिके पूर्वलक्षण इदानीं योगमभ्यस्थतोऽभि अब 'नीहार०' इत्यादि मन्त्रके द्वारा योगाभ्यासीको प्रकट होनेवाले व्यक्तिचिह्नानि वक्ष्यन्ते नीहार ब्रह्माभिव्यक्तिके पूर्वचिह्न बतलाये इत्यादिना- जाते हैं- नीहारधूमार्कानिलानलानां खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ योगे ॥११॥ एतानि रूपाणि पुरःसराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगाभ्यास आरम्भ करनेपर पहले अनुभव होनेवाले कुहरे, धूम, सूर्य, वायु, अग्नि, खद्योत ( जुगनू ), विद्युत् . स्फटिकमणि और चन्द्रमा इनके रूप ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करनेवाले होते हैं ॥११॥ नीहारस्तुपारः । तद्वत्प्राणः नीहार कुहरेको कहते हैं, प्राणों- के सहित चित्तवृत्ति कुहरेके समान समा चित्तवृत्तिः प्रवर्तते । ततो प्रवृत्त होने लगती है। उसके धूम इवाभाति । ततोऽर्कबत्ततो पश्चात् घूऑ-सा भासने लगता है । फिर सूर्यवत् और उसके पश्चात् वायुरिवाभाति । ततो बहिरिवा- वायु-सा प्रतीत होता है । तदनन्तर त्युप्णो वायुः प्रकाशदहनः अव- वायु अग्निके समान अत्यन्त उष्ण एवं प्रकाश और दाह करनेवाला तते । बाद्यवायुरिव संक्षुभितो जान पड़ता है तथा बाह्यवायुके बलवान्विजृम्भते । कदाचित्ख- समान अत्यन्त क्षुभित होकर बड़ा बलवान् जान पडता है। कभी द्योतखचितमिरान्तरिक्षमालक्ष्यते। जुगनुओंसेजगमगाता हुआ-साआकाश विद्युदिव रोचिप्णुरालक्ष्यते दिखायी देने लगता है, कभी विद्युत्के समान तेजोमयी वस्तु दीखती कदाचित्स्फटिकाकृतिः । कदा- है, कभी स्फटिकका आकार दीख चित्पूर्णशशिवत् । एतानि रूपाणि पड़ता है और कभी पूर्ण चन्द्रमा-सा दिखायी देता है । ब्रह्मानुसन्धानके योगे क्रियमाणे ब्रह्मण्याविष्क्रिय- प्रयोजनसे किये जानेवाले योगमे ये माणे निमित्ते सब रूप पहले दिखायी देते हैं। पुरम्सराण्यग्रगा- इसके पश्चात् परमयोगकी सिद्धि मीणि । तदा परमयोगसिद्धिः११ होती है ॥११॥ * अर्यात् अभ्यासकालमें मनोवृत्तिके सामने कुहरा-सा छा जाता है ।
अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ रोग, जरा और अकालमृत्युपर विजय पानेके चिह्न पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते । न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥१२॥ पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाशकी अभिव्यक्ति होनेपर अर्थात् पश्चभूतमय योग-गुणोंका अनुभव होनेपर जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो गया है उस योगीको न रोग होता है, न वृद्धावस्था प्राप्त होती है और न उसकी असामयिक मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥ लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसाद खरसौष्ठवं च । गन्धः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति ॥१३॥ शरीरका हल्कापन, नीरोगता, विषयासक्तिकी निवृत्ति, शारीरिक कान्तिकी उज्ज्वलता, स्वरकी मधुरता, सुगन्ध और मल-मूत्रकी न्यूनता- इन सबको योगकी पहली सिद्धि कहते हैं ॥१३॥ पृथ्वीति । पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे 'पृथ्यप्तेजो०' इत्यादि 'पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे' इस पदसे पृथिव्यादीनि भूतानि द्वन्द्वैक- समाहारद्वन्द्वसमाससम्बन्धी एकवद्भाव- वद्भावेन निर्दिश्यन्ते । तेषु द्वारा पृथिवी आदि पॉच भूतोंका निर्देश किया गया है । उन पॉचों पञ्चसु भूतेषु समुत्थितेषु पञ्चात्मके भूतोंके प्रकट होनेपर अर्थात् योगगुणे प्रवृत्त इत्यस्य व्याख्यानम्। पञ्चात्मक योगगुणके प्रवृत्त होनेपर -इस प्रकार यह इसकी व्याख्या कः पुनर्योगगुणः प्रवर्तते ? है । वह कौन योगगुण प्रवृत्त होता श्वे० उ० १९-२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय २ 2 पृथिव्या गन्धवत्या गन्धा योगिनो [सो बतलाते हैं-] गन्ववती भवति । तथाझ्यो रसः । एव- पृथिवीका गुण गन्ध उस योगीको मन्यत्र । उक्तं च-- अनुभव होता है तथा जलसे रस- की प्रवृत्ति होती है। इसी प्रकार "ज्योतिष्मती स्पर्गवती अन्य भूतोके विषयमें समझना तथा रसवती परा। चाहिये। कहा भी है- "ज्योति- गन्यवत्यपरा प्रोक्ता प्मती, स्पर्शवती और रसवती चतवस्तु प्रवृत्तयः॥ तया इनसे भिन्न एक गन्धवतीये आसां योगप्रवृत्तीनां योगीकी चार प्रवृत्तियों कही गयी है। यद्यकापि प्रवर्तते । इन योगप्रवृत्तियोंमसे यदि एककी प्रवृत्तयोगं तं प्राहु भी प्रवृत्ति हो जाय तो योगिजन उस सावकको योगमें प्रवृत्त हुआ योगिनां योगचिन्तका" बतलाते हैं।" न तस्स योगिनो रोगो न उस योगीको न रोग होता है, न वृद्धावस्था होती है और न मृत्यु- जरा न मृत्यु प्रभवति । कस्य ? का ही उसपर प्रभाव होता है । किसे ? जिसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् । हो गया है अर्थात् जिसे ऐसा शरीर प्राप्त हो गया है कि जिसके दोपसमूह योगाग्निसंप्लुष्टदोपकलापं गरीरं योगाग्निसे भस्म हो गये हैं। शेष (तेरहवें मन्त्रका) अर्थ सष्ट प्राप्तस्य । स्पष्टमन्यत् ॥१२-१३॥ है ॥१२-१३।। यांगसिद्धि या तत्त्वज्ञानका प्रमाव तया- - यथैव विम्व मृदयोपलिप्त तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् ।
अध्याय २] शाङ्करभाष्यार्थ १४७ तद्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः ॥१४॥ जिस प्रकार मृत्तिकासे मलिन हुआ विम्ब ( सोने या चॉदीका टुकडा ) शोधन किये जानेपर तेजोमय होकर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्त्वका साक्षात्कार कर अद्वितीय, कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता है ॥ १४ ॥ यथैवेति । यथैव विम्बं सौवर्ण 'यथैव' इत्यादि । जिस प्रकार राजतं वा मृदयोपलिप्तं मृदादिना | सुवर्ण या रजतका पिण्ड पहले मिट्टीसे भरा हुआ अर्थात् मिट्टी मलिनीकृतं पूर्व पश्चात्सुधान्तं आदिसे मलिन हुआ रहनेपर फिर सुधौतमित्यस्मिन्नर्थे सुधान्तमिति सुधान्त अर्थात् अग्नि आदिसे सुधौत यानी निर्मल किये जानेपर तेजोमय च्छान्दसम् । अग्न्यादिना विम- होकर चमकने लगता है-मूलमें लीकृतं तेजोमयं भ्राजते । तद्वा । 'सुधौतम्' के अर्थमे 'सुधान्तम्' यह तदेवात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य दृष्ट्वैको- प्रयोग वैदिक है-उसी प्रकार साक्षात्कार करनेपर द्वितीयः कृतार्थों भवते वीत- जीव अद्वितीय, कृतार्थ और शोक- शोकः । परेषां पाठे तद्वत्सतत्त्वं । रहित हो जाता है । अन्य शाखाओ- मे जहाँ 'तद्वत्सतलं प्रसमीक्ष्य देही' प्रसमीक्ष्य देहीति । तत्राप्ययमे- ऐसा पाठ है । वहाँ भी यही अर्थ वार्थः ।। १४॥ है ॥ १४ ॥ आत्मतत्त्वका योगसिद्ध या तत्त्वज्ञकी स्थिति कथं ज्ञात्वा वीतशोको भवति? किस प्रकार जानकर जीव इत्याह- शोकरहित होता है, सो श्रुति बतलाती है-
श्वेताश्वतरोपनिषद्
[ अध्याय २
,
यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं
दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैविशुद्ध
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१५॥
जिस समय योगी दीपकके समान प्रकाशस्वरूप आत्मभावसे ब्रह्म-
तत्त्वका साभात्कार करता है उस समय उस अजन्मा, निश्चल और समस्त
तत्वोंसे विशुद्ध देवको जानकर वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१५॥
यदेति । यदा यस्यामवस्था 'यदा' इत्यादि । जिस समय
अर्थात् जिस अवस्थामे आत्मतत्त्र-
यामात्मतत्त्वेन स्वेनात्मना । किं- से--अपने आत्मस्वरूपसे, कैसे
विशिष्टेन ? दीपोपमेन दीपस्था- आत्मस्वरूपसे ? दीपोपम---दीपक-
स्थानीय अर्थात् प्रकाशस्त्ररूपसे ब्रह्म-
नीयेन प्रकाशस्वरूपेण ब्रह्मतत्त्वं तत्त्वका साक्षात्कार करता है । यहाँ
प्रपश्येत् । तुशब्दोऽवधारणे । 'तु' शब्द निश्चयार्थक है । अतः
तात्पर्य यह है कि परमात्माको
परमात्मानमात्मनैव जानीयादि-आत्मभावसे ही जानना चाहिये ।
त्यर्थः । उक्तं च तदात्मान- कहा भी है- "उसने आत्माको ही
जाना कि मै ब्रह्म हूँ।" कैसे ब्रह्मका
मेवावेदहं ब्रह्मास्मि' (वृ० उ०
साक्षात्कार करता है ?--जो किसी
१।४।१०) इति । कीह- अन्यसे उत्पन्न नहीं हुआ, ध्रुव
शम् ? अन्यस्मादजायमानं ध्रुवम-
अर्थात् अपने स्वरूपसे व्युत नहीं
होता और सम्पूर्ण तत्वों यानी
प्रच्युतस्वरूपं सर्वतत्त्वैरविद्यात- अविद्या और उसके कायोंसे विशुद्ध-
असंस्पृष्ट है; उस देवको जानकर
कायविशुद्धमसंस्पृष्टं ज्ञात्वा देवं
जीव अविद्यादि समस्त पाशोंसे मुक्त
मुच्यते सर्वपाशेरविद्यादिभिः।१५। हो जाता है |॥ १५ ॥
अध्याय २]
शाङ्करभाष्यार्थ
१४९
परमात्मस्वरूपका वर्णन
परमात्मानमात्मत्वेन विजानी परमात्माको आत्मभावसे जाने-
यह कहा गया, अब उसीका
यादित्युक्तं तदेव संभावय-
सम्भावन ( सम्मान ) करते हुए मन्त्र
नाह
कहता है-
एष. ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः
पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः ।
स एव जातः स जनिष्यमाणः
प्रत्यङ्जनांस्तिष्ठति सर्वतोमुखः ॥१६॥
यह देव ही सम्पूर्ण दिशा-विदिशा है, यही [ हिरण्यगर्भरूपसे ]
पहले उत्पन्न हुआ था, यही गर्भके अन्तर्गत है, यही उत्पन्न हुआ है और यही
उत्पन्न होनेवाला है। यह समस्त जीवोंमें प्रतिष्ठित और सर्वतोमुख है ॥१६॥
एष हेति । एष एव देवः 'एष ह' इत्यादि । यह देव ही
प्रदिशः प्राच्याद्या दिश उपदि- प्रदिश अर्थात् पूर्वादि सम्पूर्ण दिशा
और उपदिशाएँ है, यह हिरण्यगर्भ-
शश्च सर्वाः, पूर्वो ह जातः सर्व-
रूपसे सबसे पहले उत्पन्न हुआ था,
स्माद्धिरण्यगर्भात्मना, स उ गर्भ- यही गर्भके भीतर विद्यमान है, यही
ऽन्तर्वर्तमानः, स एव जातः शिशुः, शिशुरूपसे उत्पन्न हुआ है, यही
स जनिष्यमाणोऽपि, स एव सर्वांश्च | उत्पन्न होनेवाला भी है, यही समस्त
जीवोमें प्रत्यड्-अन्तरात्मरूपसे
जनान्प्रत्यङ् तिष्ठति, सर्वप्राणि-
स्थित है, समस्त प्राणियोके मुख
गतानि मुखान्यस्येति सर्वतो- इसीके हैं, इसलिये यह सर्वतोमुख
मुखः॥१६॥
है ॥१६॥
१५० श्वेताश्वतरोपनिपद् [अध्याय २ इदानीं योगवत्साधनान्तराणि अब योगके समान नमस्कारादि अन्य साधनोंको भी कर्त्तव्यरूपसे नमस्कारादीनि कर्तव्यत्वेन दर्श- प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति यितुमाह- कहती है- यो देवो अग्नौ यो अप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश । य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ॥१७॥ जो देव अग्निमें है, जो जलमें है और जिसने सम्पूर्ण भुवनको व्याप्त कर रखा है तथा जो ओपधि और वनस्पतियोंमें भी विद्यमान है उस देवको नमस्कार है, नमस्कार है ।। १७ ॥ यो देव इति । यो विश्वं 'यो देवो' इत्यादि । जिसने भुवनं स्वेन विरचितं संसार- सम्पूर्ण भुवनको अर्थात् स्वयं रचे हुए संसारमण्डलको व्याप्त कर रखा मण्डलमाविवेश । य ओषधीपु है, जोशालि आदि ओपधियोंमें और शाल्यादिपु वनस्पतिष्यश्वत्थादिपु अश्वत्यादि वनस्पतियोंमें भी विद्यमान तस्मै विश्वात्मने भुवनमूलाय है उस विश्वात्मा--जगत्के मूल परमेश्वराय नमो नमः। द्विवच- कारण परमेश्वरको नमस्कार है, नमस्कार है। 'नम.' शब्दकी द्विरुक्ति नमादरार्थमध्यायपरिसमाप्त्यर्थ आढरके लिये और अध्यायकी च ॥ १७॥ समाप्तिके लिये है ॥१७॥ इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिप्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाप्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ + লুবত্যি अध्याय एक ही परमात्मामें शासक और शासनीयभावका समर्थन कथमद्वितीयस्य परमात्मन अद्वितीय परमात्मामें शासक और शासनीय आदि भाव कैसे रह सकते ईशित्रीशितव्यादिभावः? इत्या- हैं ?-ऐसी आशङ्का करके श्रुति शङ्कयाह- कहती है- य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वाल्लोकानी- शत ईशनीभिः । य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्वि- दुरमृतास्ते भवन्ति ॥१॥ जो एक जालवान् ( मायावी ) अपनी ईश्वरीय शक्तियोंसे शासन करता है, जो अकेला ही ऐश्वर्यसे योग होनेपर और जगत्के प्रादुर्भावके समय अपनी शक्तियोसे सम्पूर्ण लोकोंका शासन करता है, उसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ १ ॥ य एक इति । य एकः पर 'य एको' इत्यादि । जो एक परमात्मा है वह जालवान् है । मात्मा स जालवान् जालं माया दुस्तर होनेके कारण जाल मायाका नाम है । भगवान्ने भी ऐसा ही कहा दुरत्ययत्वात् । तथा चाह भग- है कि "मेरी मायाको पार करना कठिन है।" उस जालसे जो युक्त वान्-"मम माया दुरत्यया" वह [ परमात्मा ] जालवान् है । (गी० ७ । १४) इति । तद्वां- 'तत् अस्य अस्ति' (वह उसका है )* इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'जालवान्' स्तदस्यास्तीति जालवान्मायावी- | शब्द सिद्ध होता है। जालवान् * 'तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्' (५।२।९४) इस पाणिनिसूत्रसे यहाँ 'मतुप्' प्रत्यय करके 'मादुपधायाश्चमतो» . "(८।२।९)इस सूत्रसे 'म'का 'व' आदेश होता है। है श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ त्यर्थः । ईशत ईष्टे मायोपाधिः सन् । अर्थात् मायावी परमेश्वर मायोपाधिक होकर शासन करता है। जिनके कैः ? ईशनीभिः स्वशक्तिभिः। द्वारा शासन करता है ? [ इसके उत्तरमे कहते हैं-1'ईशनाभि.' अपनी तथा चोक्तम्-ईशत ईशनीभिः शक्तियोके द्वारा । इसी आशयसे यहाँ ऐसा कहा है-'ईशते ईश- परमशक्तिभिरिति । कान्? सर्वाल्ली- नीभिः ।' 'ईशनीभिः' अर्थात् अपनी परम शक्तियोंके द्वारा शासन करता कानीशत ईशनीभिः । कदा? है । किनका शासन करता है ? वह उन शक्तियोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका उद्भवे विभूतियोगे सम्भबे प्रादु- शासन करता है। किस समय ! उद्भव–अर्थात् विभूतियों (एश्वयों) र्भावे च । य एतद्विदुरमृता से योग होनेपर और सम्भव जगत्के प्रादुर्भावके समय । जो इसे जानते अमरणधर्माणो भवन्ति ॥ १॥ है वे अमृत-अमरणधर्मा (अमर) हो जाते हैं ॥१॥ कस्मात्पुनर्जालवान् ? इत्या- किन्तु वह मायावी कैसे है ? शङ्कय आह- ऐसी आशङ्का करके कहते हैं- एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु- र्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः । प्रत्यङ् जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्त- काले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः ॥२॥ क्योंकि एक ही रुद्र है, इसलिये [ ब्रह्मविद्गण ] उससे भिन्न किसी अन्य वस्तुके लिये अपेक्षा नहीं करते। वह अपनी [ ब्रह्मादि ] शक्तियों- द्वारा इन लोकों का शासन करता है वह समस्त जीकि भीतर स्थित है, अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ और सम्पूर्ण लोकोकी रचना कर उनका रक्षक होकर प्रलयकालमें उन्हें सकुचित कर लेता है ॥ २ ॥ एको हीति । हिशब्दो यस्मा 'एको हि' इत्यादि । क्योकि दर्थे । यस्मादेक एव रुद्रः स्वतो एक ही रुद्र है, अतः परमार्थदर्शी ब्रह्मविद्गण स्वतः किसी दूसरी वस्तु- न द्वितीयाय वस्त्वन्तराय तस्थु- के लिये अपेक्षा नहीं करते । यहाँ ब्रह्मविदः परमार्थदर्शिनः । उक्तं 'हि' शब्द 'यस्मात्' ( क्योकि ) के अर्थमें है । इसीसे कहा है ‘एको च–एको रुद्रो न द्वितीयाय | रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ।' जो तस्थुरिति । य इमाल्लोकानीशते अपनी शक्तियोंद्वारा इन लोकोका शासन-नियमन करता है। वह नियमयतीशनीभिः। सर्वांश्च जना- समस्त जीवोंके भीतर अर्थात् प्रत्येक न्प्रत्यन्तरः प्रतिपुरुषमवस्थितः। पुरुषमें स्थित है । तात्पर्य यह है रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यर्थः । कि प्रत्येक रूपके अनुरूप हो रहा है। किञ्च, संचुकोच अन्तकाले तथा वह अन्तकाल यानी प्रलय- प्रलयकाले । किं कृत्वा ? संसृज्य कालमे संकुचित करता है। क्या करके विश्वा भुवनानि गोपा गोप्ता सम्पूर्ण लोकोंकी रचना कर उनका गोपा-रक्षक होकर । यहाँ यह कहा भूत्वा । एतदुक्तं भवति-अद्वि- गया है कि परमात्मा अद्वितीय है, तीयः परमात्मा, न चासौ कुम्भ- वह कुम्हारकी तरह मृत्पिण्डरूप कारवदात्मानं केवलं मृत्पिण्ड- | अपने-आपको उपादान कारणरूपसे स्थानीयमुपादानकारणमुपादत्ते । ग्रहण नहीं करता, तो फिर क्या किं तर्हि ? स्वशक्तिविक्षेपं कुर्वन्स्रष्टा करता है ? वह अपनी शक्तिको क्षुब्ध करनेसे ही जगत्का रचयिता नियन्ता वाभिधीयत इति । उत्तरो नियन्ता कहा जाता है। अगला मन्त्रस्तस्यैव विराडात्मनावस्थानं । मन्त्र उसीकी विरापिसे स्थिति . या श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ३ तत्स्रष्टुत्वं प्रतिपादयति ॥ २॥ और उसके जगत्कर्तृत्वका प्रतिपादन करता है ॥ २॥ परमेश्वरस जगत्की सृष्टिका प्रतिपादन विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रै- र्यावाभूमी जनयन्देव एक: ॥३॥ वह सब ओर नेत्रोंवाला, सब ओर मुखोंवाला, सब ओर भुजाओंवाला और सब ओर पैरोंवाला है। वह एकमात्र देव (प्रकाशमय परमात्मा) धुलोक और पृथिवीकी रचना करता हुआ [ वहॉके मनुष्य-पक्षी आदि प्राणियोंको ] दो भुजाओं और पतत्रों (पैरों एवं पंखों) से युक्त करता है* ॥ ३॥ * इस मन्त्रके उत्तराईका अर्थ अन्यान्य टीकाकारोंने अनेक प्रकारसे किया है। प्रस्तुत अर्थ शाकरभाष्यके अनुसार है । शंकरानन्दजी इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं-"हस्ताभ्यां विश्वमुत्सादयन्नुत्पत्तिकाले विविधाञ्शब्दानुत्साद्योत्पाद- कादिरूपेण करोति । वाहुभ्यामिति द्विवचनसामर्थ्यात्सर्वमहेतुत्वाच धर्माधर्माभ्या- मिति विवक्षितम् ।... "यदापि धमतिरनिसंयोगार्थतदापि सन्तापकारित्वेन सुख- दुःखयोक्त्पत्तौ स्थितौ संहारे च सुखदुःखकारित्वं व्याख्येवम् । संपतत्रैः पतनशीलैः पञ्चीकृतपञ्चमहाभूतेर्न परमाणुभिः....."धमतीत्यनुपङ्गः।" अर्थात् वह हार्योते विश्वको उत्पन्न कर उसकी उत्पत्तिके समय उत्साच-उत्पादकादिरूपसे अनेक प्रकारके शब्द करता है । 'बाहुभ्याम्' इस पदमें द्विवचन है तथा हाय समस्त क्मोंके हेतु होते हैं, इसलिये इस पदसे 'धर्माधर्मके द्वारा यह अर्थ बतलाना अभीष्ट है । जिस समय 'धमति' क्रियाका अर्थ अग्निसंयोग लिया जाय उस समय भी सन्तापकारक होनेके कारण सुख-दुःखकी उत्पत्ति-स्थिति और संहारमें उनका सुख-दुःखकारित्व ही बतलाना चाहिये । 'संपतत्रैः'-पतनशील पञ्चीकृत महाभूतोसे युक्त करता परमाणुओंने नहीं । नारायणतीर्थ लिखते हैं- "बाहुभ्या विद्याकर्मभ्यां संघमति पतत्रै वासनारूपैः संघमति दीपयति जीवनिष्ठविद्याकर्मवासनादिभिरीश्वरो जगत्प्रव अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ १५५ . विश्वतश्चक्षुरिति । सर्वप्राणि 'विश्वतश्चक्षुरुत' इत्यादि । समस्त प्राणियोके चक्षु इस परमात्मा- गतानि च ष्यस्येति विश्वत- के ही हैं, इसलिये यह विश्वतश्चक्षु है । अतः अपनी इच्छामात्रसे ही चक्षुः । अतः स्वेच्छयैव सर्वत्र इसमें सर्वत्र चक्षु यानी रूपादिको चक्षु रूपादौ सामर्थ्य विद्यत इति ग्रहण करनेका सामर्थ्य है। इसी प्रकार आगे [ विश्वतोमुखः आदि ] विश्वतश्चक्षुः। एवमुत्तस्त्र योज- में भी अर्थयोजना कर लेनी चाहिये । वह, दो भुजाओद्वारा सयुक्त करता नीयम् । सं बाहुभ्यां धमति संयो- है, धातुओंके अनेक अर्थ होते हैं जयतीत्यर्थः; अनेकार्थत्वाद्धातू- [ इसीसे अग्निसंयोगके अर्थमें प्रयुक्त होनेवाले 'धमति' का अर्थ संयोजन नाम् । पक्षिणश्च धमति द्विपदो लिया गया है ] । तथा पक्षियों और दो पैरोवाले मनुष्यादिको पंतत्रों मनुष्यादींश्च पतत्रैः । किं कुर्वन् ? ( पखों और पैरों ) से युक्त करता द्यावापृथिवी जनयन्देव एको और पृथिवीकी सृष्टि करता हुआ । है। क्या करता हुआ ? धुलोक विराजं सृष्टवानित्यर्थः ॥३॥ तात्पर्य यह है कि उस एकमात्र देवने विराट्की रचना की ॥३॥ यितीत्यर्थः ।" अर्थात् बाहु-विद्या और कर्मद्वारा तथा पतत्र-वासनाओंद्वारा संधमति-दीप्त करता है, अर्थात् जीवनिष्ठ विद्या और कर्मादिके द्वारा ईश्वर जगत्- को प्रवृत्त करता है। विज्ञानभगवान् कहते हैं-"बाहुभ्या मनुष्यादीन्संधमति संयोजयति... पतत्रैः पतनसाधनैः पादैः संधमति'. 'अथवा पतत्रैः पक्षैः पक्षिणः संधमति ।" अर्थात् वह मनुष्यादिको भुजाओंसे युक्त करता है और पतत्र-चलनेके साधन यानी पैरोंसे युक्त करता है । अथवा पतत्र यानी पक्षोंसे पक्षियोंको युक्त करता है। १. 'पतत्र' शब्दका अर्थ है पतनसे बचानेवाला । अतः मनुष्योंके विषयमें इसका अर्थ पैर समझना चाहिये और पक्षियोंके विषयमें श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ३ - परमेश्वरका स्तवन इदानीं तस्यैव सूत्रसृष्टिं प्रति अब उसी परमात्माकी हिरण्यगर्भ- पादयन्मन्त्रहगभिप्रेतं प्रार्थयते- सृष्टिका प्रतिपादन करती हुई श्रुति मन्त्रदर्शी ऋपियोंके अभिमत अर्थके लिये प्रार्थना करती है- यो देवानां प्रभवश्वोद्भवश्व विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्व स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥ जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति तथा ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्पति और सर्वज्ञ है तथा जिसन पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वह हमें शुभ बुद्धिसे सयुक्त करे ॥ ४ ॥ यो देवानामिति । यो देवा 'जो देवानाम्' इत्यादि । जो नामिन्द्रादीनां प्रभवहेतुरुद्भव- देवताओंकी अर्थात् इन्द्रादिकी हेतुश्च । उद्भवो विभूतियोगः । उत्पत्तिका और उद्भवका हेतु है। विश्वस्याधिपो विश्वाधिपः पाल- विश्वाधिप-विश्वका स्वामी अर्थात् उद्भव विभूतियोगों कहते हैं । जो यिता । महर्षिः--महांथासापि- पालन करनेवाला है, महर्षि-महान् श्चेति महर्पिः सर्वज्ञ इत्यर्थः ऋपि यानी सर्वज्ञ है, हित-रमणीय. हितं रमणीयमत्युज्ज्वलं ज्ञानं अर्थात् अत्यन्त उज्ज्वल ज्ञान जिसका गर्भोऽन्तःसारो यस्य तं जनया- गर्भ-अन्तःसार है उस [हिरण्य- गर्भ ] की जिसने पहले-सृष्टिके मास पूर्व सर्गादो । स नोऽस्मान् आरम्भमें रचना की थी वह हमें शुभ बुद्धया शुभया संयुनक्तु परम- बुद्धिसे संयुक्त करे; अर्थात् हम पदं प्राप्नुयामेति ॥४॥ परमपद प्राप्त करें ॥ ४ ॥ . : .
१५७ अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ पुनरपि तस्य स्वरूपं दर्शयन्न फिर भी [आगेके ] दो मन्त्रोंसे उसके स्वरूपको प्रदर्शित करती हुई मिप्रेतमर्थं प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन- श्रुति अभिप्रेत अर्थके लिये प्रार्थना करती है- या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥५॥ हे रुद्र ! तुम्हारी जो मङ्गलमयी, शान्त और पुण्यप्रकाशिनी मूर्ति है, हे गिरिशन्त ! उस पूर्णानन्दमयी मूर्ति के द्वारा तुम [ हमारी ओर ] देखो ॥ ५॥ या ते रुद्रेति । हे रुद्र तव या 'या ते रुद्र' इत्यादि। हे रुद्र शिवा तनूरघोरा । उक्तं च "तस्यैते तुम्हारी जो मगलमयी अघोरा (शान्त) मूर्ति है । अन्यत्र ऐसा ही कहा भी तनुवौ घोरान्या शिवान्या" इति । है—"उसकी ये दो आकृतियाँ हैं, अथवा शिवा शुद्धाविद्यातत्कार्य- एक घोरा है और दूसरी मङ्गलमयी" । अथवा [ तुम्हारी जो मूर्ति ] शिवा- विनिर्मुक्ता सच्चिदानन्दाद्वयब्रह्म- शुद्धा यानी अविद्या और उसके कार्योसे रहित सच्चिदानन्दाद्वितीय रूपा न तु घोरा शशिविम्बमि- ब्रह्मरूपा है, घोरा नहीं है, अपि तु वाह्लादिनी । अपापकाशिनी स्मृ- | चन्द्रमण्डलके सपान आह्लादकारिणी तिमात्राघनाशिनी पुण्याभिव्यक्ति- है, तथा अपापकाशिनी-स्मरणमात्र- से ही पापोंका नाश करनेवाली करी । तयात्मना नोऽस्मान्त- अर्थात् पुण्यकी अभिव्यक्ति करनेवाली मया सुखतमया पूर्णानन्दरूपया है,अपनी उस शन्तम-सुखतम-पूर्णा- हे गिरिशन्त गिरौ स्थित्वा शं नन्दस्वरूप मूर्ति (देह)से हे गिरिशन्त! -गिरिमें रहकर शं--सुखका विस्तार सुखं तनोतीति । अभिचाकशीहि करनेवाले ! हमे देखो-हमारी ओर १५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ अभिपश्य निरीक्षस्व श्रेयसा नि- | दृष्टिपात करो अर्थात् हमें कल्याण- योजयस्वेत्यर्थः ॥ ५॥ पथसे युक्त करो ॥ ५॥ तथा--- किञ्च- यामिषु गिरिशन्त हस्ते बिभय॒स्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिसीः पुरुषं जगत् ॥ ६॥ हे गिरिशन्त ! जीवोंकी ओर फेकनेके लिये तुम अपने हायमें जो वाण धारण किये रहते हो, हे गिरित्र । उसे मङ्गलमय करो, किसी जीव या जगत्की हिसा मत करो ॥ ६ ॥ यामि मिति | यामिपुं गिरि 'यामिषुम्' इत्यादि । हे गिरि- शन्त ! तुम जीवोंकी ओर छोड़नेके शन्त हस्ते विभर्षि धारयस्यस्तवे लिये जो बाण धारण किये रहते हो, जने क्षेप्तुं शिवां गिरित्र गिरिं हे गिरित्र !-पर्वतकी रक्षा करनेके त्रायत इति तां कुरु । मा हिंसीः कारण भगवान् गिरित्र हैं उसे शिव (मङ्गलमय) करो। हमारे किसी पुरुषमस्मदीयं जगदपि कृत्स्नम् । | पुरुषकी और सारे जगत्की भी हिंसा मत करो । यहाँ इस अभिप्रेत अर्थकी साकारं ब्रह्म प्रदर्शयेत्यभिप्रेतमर्थ प्रार्थना की है कि हमे सम्पूर्ण साकार प्रार्थितवान् ॥६॥ ब्रह्मके दर्शन कराओ ॥ ६ ॥ परमात्मतत्त्वके ज्ञानस अमृतत्वकी प्राप्ति इदानीं तस्यैव कारणात्मना अब उस परमात्माकी ही जगत्- के कारणरूपसे स्थिति दिखलाती हुई वस्थानं दर्शयज्ञानादमृतत्व- श्रुति ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति माह दिखलाती है- य ३] शाङ्करभाष्यार्थ १५९ - परं ब्रह्मपरं ब्रह्मपरं बृहन्तं यथानिकायं सर्वभूतेषु गूढम् । श्वस्यक परिवेष्टितार- मीशं तं ज्ञात्वामृता भवन्ति ॥ ७॥ स [ पुरुषयुक्त जगत् ] से परे जो ब्रह्म-हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट एवं जो समस्त प्राणियोंमें उनके शरीरके अनुसार (परिच्छिन्नरूपसे) ना है तथा विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है उस परमेश्वरको जानकर अमर हो जाते हैं ॥७॥ परमिति । ततः पुरुष- 'ततः परम्' इत्यादि । जो उससे यानी पुरुषयुक्त जगत्से परे तः परं कारणत्वात्कार्य- है अर्थात् कारण होनेसे अपने कार्य- पश्चस्य व्यापकमित्यर्थः। भूत जगत्में व्यापक है, अथवा जो उससे-जगद्रूप विराट्से परे है, मे जगदात्मनो विराजः वह क्या है ? इसके उत्तरमें श्रुति किं तब्रह्मपरं बृहन्तं कहती है—ब्रह्मपर बृहन्तम् । जो रण्यगर्भात्परं बृहन्तं ब्रह्म अर्थात् हिरण्यगर्भरूप कार्यब्रह्म- से पर और व्यापक होनेके कारण बृहत्-महान् है। तथा जो समस्त सर्वभूतेषु गूढमन्तर- प्राणियोंमें यथानिकाय-उनके शरीर- अनुसार गूढ-अन्तःस्थित है, यस्यैकं परिवेष्टितारं एवं विश्वका एकमात्र परिवेष्टा है त्वा स्वात्मना सर्व | अर्थात् सबको अपने भीतर करके- अपने स्वरूपसे सवको व्याप्त करके तमीशं परमेश्वरं स्थित है । उस ईश-परमेश्वरको वन्ति ।। ७॥ जानकर जीव अमर हो जाते हैं|७|| पात् । यथानिकायं २८० श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ३ परमेश्वरक विषयमें जानीजनोंके अनुभवका प्रदर्शन इदानीमुक्तमर्थ द्रढयितुं मन्त्र-1 अब उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करने- के लिये मन्त्रद्रष्टा ऋपिका अनुभव गनुभवं दर्शयित्वा पूर्णानन्दा- दिखलाती हुई श्रुति यह प्रदर्शित द्वितीयब्रह्मात्मपरिज्ञानादेव परम- करती है कि पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्म- का आत्मस्वरूपसे ज्ञान होनेपर ही पुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्शयति परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है, अन्य किसी उपायसे नहीं- वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्ण तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ ८ ॥ इस अज्ञानातीत प्रकाशस्वरूप महान् पुरुषको जानता हूँ। उसे ही जानकर पुरुप मृत्युको पार करता है, इसके सिवा परमपदप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है ॥ ८॥ वेदाहमेतमिति । वेद जाने 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । मैं उस तमेतं परमात्मानम् । अथेतं प्रत्य- परमात्माको जानता हूँ। यह जो गात्मानं साक्षिणं पुरुषं पूर्ण प्रत्यगात्मा-साक्षी, और सर्वल्प होनेसे महान् तया महान्तं सर्वात्मत्वात् । आदित्य- आदित्यवर्ण-प्रकाशस्वरूप एवं तम वर्ण प्रकाशरूपं तमसोऽज्ञानात् यानी अज्ञानसे अतीत है इसे जानकर परस्तात्तमेव विदित्वाति मृत्युमेति जीव मृत्युको पार कर लेता है; कैसे मृत्युमत्येति । कस्मात् ? अस्मा- कर लेता है ? क्योंकि परमपदप्राप्तिके न्नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय | लिये इससे भिन्न कोई और मार्ग परमपदप्राप्तये ॥ ८॥ नहीं है ॥ ८॥ मै पुरुप–पूर्ण, अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६१ कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वाति किन्तु जीव उसीको जानकर मृत्युमेति ? इत्युच्यते- मृत्युको कैसे पार कर लेता है ? सो बतलाया जाता है- यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चि- द्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक- स्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ॥ ६॥ जिससे उत्कृष्ट और कोई नहीं है, तथा जिससे छोटा और बड़ा भी कोई नहीं है वह यह अद्वितीय परमात्मा अपनी द्योतनात्मक महिमामें वृक्षके समान निश्चलभावसे स्थित है, उस पुरुषने ही इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥९॥ यस्मादिति । यस्मात्परं पुरु 'यस्मात्' इत्यादि । जिस पात्परमुत्कृष्टमपरमन्यन्नास्ति, य पुरुषसे उत्कृष्ट अन्य कोई नहीं है, स्मानाणीयोऽणुतरं न ज्यायो तथा जिससे अणीयस्-न्यूनतर और महत्तरं वास्ति । वृक्ष इव स्तब्धो ज्यायस्-महत्तर भी कोई नहीं है वह अद्वितीय परमात्मा दिवि अर्थात् निश्चलो दिवि द्योतनात्मनि स्वे अपनी द्योतनात्मक महिमामें वृक्षके महिम्नि तिष्ठत्येकोऽद्वितीयः पर- समान स्तब्ध-निश्चलभावसे स्थित है। मात्मा तेनाद्वितीयेन परमात्मनेदं उस अद्वितीय परमात्मा पूर्ण पुरुपने सर्व पूर्ण नैरन्तर्येण व्याप्तं पुरुषेण | इस सबको पूर्ण--निरन्तरतासे व्याप्त पूर्णेन ॥९॥ कर रखा है ॥९॥ इदानीं ब्रह्मणः पूर्वोक्तकार्य अब पहले वतलायी हुई ब्रह्मकी कार्य-कारणता दिखलाकर श्रुति कारणतां दर्शयज्ञानिनाममृतत्व- ज्ञानियोंको अमृतत्व और अन्य सबको मितरेषां च संसारित्वं दर्शयति- संसारित्वकी प्राप्ति प्रदर्शित करती है- श्वे० उ० २१-२२-
१६३
ध्वेताश्वतरोपनिपद्
[ अध्याय ३
ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् । य एतद्विदुर-
मृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥
उस (कारण-ब्रह्म ) से जो उत्कृष्टतर है वह अल्प और अनामय
है । उसे जो जानते है वे अमर हो जाते है, तथा अन्य दुःखको ही प्राप्त
होते हैं ॥ १० ॥
तत इति । तत इदंशब्दवाच्या 'तत.' इत्यादि । उससे अर्थात्
इदंशब्दवाच्य जगत्से उत्कृष्ट तो
जगत उत्तरं कारणं ततोऽप्युत्तरं
उसका कारण है और उससे भी
कार्यकारणविनिर्मुक्तं ब्रह्मैव उत्कृष्टतर कार्य-कारणभावशून्य ब्रह्म
ही है । वह अल्प-रूपादि-
इत्यर्थः । तदरूपं रूपादिरहितम् रहित और आध्यात्मिकाढि त्रिविध
अनामयमाध्यात्मिकादितापत्रय- तापोसे रहित होनेके कारण अनामय
रहितत्वान् । य एतद्विदुरमृतत्वेन । अर्थात् अपने अमृतस्वरूपसे 'मैं
(दु.खहीन ) है । जो इसे जानते
अहमस्मीत्यमृता अमरणधर्माणस्ते यही हूँ ऐसा अनुभव करते हैं वे
भवन्ति । अथेतरे ये न विदुस्ते और अन्य जो ऐसा नहीं जानते वे
अमृत-अमरणवर्मा हो जाते है।
दुःखमेवापियन्ति ।। १०॥ दुखको ही प्राप्त होते है ॥१०॥
।
अब श्रुति उसीकी सर्वात्मकता
इदानीं तस्येव सर्वात्मत्वं
दर्गयति-
दिखलाती है-
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥११॥
वह भगवान् समस्त मुखोंवाला, समस्त शिरोंवाला और समस्त
ग्रीवाओंवाला है, वह सम्पूर्ण जीवोंके अन्त.करणोंमें स्थित और सर्वव्यापी
है; इसलिये सर्वगत और मङ्गलरूप है ॥ ११ ॥
अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६३, सर्वाननेति । सर्वाण्या 'सर्वानन' इत्यादि । समस्त मुख, ननानि शिरांसि ग्रीवाश्चास्येति | शिर और ग्रीवाएँ इसीकी हैं, सर्वाननशिरोग्रीवः । सर्वेषां भूता- इसलिये यह सर्वाननशिरोग्रीव है । नां गुहायां बुद्धौ शेत इति सर्व- यह समस्त प्राणियोकी गुहा-बुद्धि- भूतगुहाशयः । सर्वव्यापी स में शयन करता है इसलिये सर्वभूत- भगवानैश्वर्यादिसमष्टिः । उक्तं गुहाशय है । वह सर्वव्यापी और "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य भगवान्-ऐश्वर्यादिकी समष्टिरूप धर्मस्य यशसः श्रियः। है । कहा भी है—“समग्र ऐश्वर्य, ज्ञानवैराग्ययोश्चैव श्री, ज्ञान और वैराग्य- पण्णां भग इतीरणा॥" इन छ' का नाम भग है।" भगवान्में (वि० पु० ६ । ५।७४) भगवति यस्मादेवं तस्मात् ये सब ऐसे ही हैं इसलिये वह सर्वगत सर्वगतः शिवः ॥११॥ और शिव ( मङ्गलरूप ) है ॥११॥ धर्म, यश, - किञ्च-- तथा- महान्प्रभु पुरुषः सत्त्वस्यैष प्रवर्तकः । सुनिर्मलामिमां प्राप्तिमीशानो ज्योतिरव्ययः ॥१२॥ यह महान् , परमसमर्थ, शरीररूप पुरमे शयन करनेवाला, इस [खरूपस्थितिरूप ] निर्मल प्राप्तिके उद्देश्यसे अन्तःकरणको प्रेरित करने- वाला, सबका शासक, प्रकाशस्वरूप और अविनाशी है।॥ १२ ॥ महानिति । महान्प्रसुः समर्थो 'महान्' इत्यादि । वह महान् , वै निश्चयेन जगदुदयस्थितिसंहारे प्रभु अर्थात् जगत्के उत्पत्ति, स्थिति और संहारमे निश्चय ही समर्थ और सत्त्वस्यान्तःकरणस्यैप प्रवर्तकः सत्त्व यानी अन्त करणका प्रेरक है। प्रेरयिता । कमर्थमुद्दिश्य ? सुनिर्म- किस प्रयोजनके उद्देश्यसे उसका
१६४
श्वेताश्वतरोपनिषद्
[ अध्याय ३
लामिमां स्वरूपावस्थालक्षणां प्राप्तिं प्रवर्तक है ?
इस स्वरूपावस्थिति-
रूप सुनिर्मल प्राप्ति यानी परमपदकी
परमपदप्राप्तिम् । ईशान ईशिता । प्राप्तिके उद्देश्यसे । तथा वह ईशान
ज्योतिः परिशुद्धो विज्ञानप्रकाशः।
-शासक, ज्योतिः-विशुद्धविज्ञान-
प्रकाशस्वरूप और अव्यय-
अव्ययोऽविनाशी ॥१२॥ अविनाशी है ॥१२॥
-
अङगुष्ठमात्रः
पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
हृदा मन्वीशो मनसाभिक्लुप्तो
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१३॥
यह अङ्गुष्ठमात्र, पुरुष, अन्तरात्मा, सर्वदा जीवोके हृदयमें स्थित,
ज्ञानाधिपति एवं हृदयस्थित मनके द्वारा सुरक्षित है । जो इसे जानते हैं वे
अमर हो जाते हैं ॥ १३ ॥
अङ्गुष्ठमात्र इति । अङ्गुष्ठमा 'भङ्गुष्ठमात्रः' इत्यादि । अपनी
त्रोऽभिव्यक्तिस्थानहृदयसुषिरपरि- अभिव्यक्तिके स्थान हृदयाकाशके
परिमाणकी अपेक्षासे यह अङ्गुष्ठमात्र
माणापेक्षया पुरुषः पूर्णत्वात्पुरि
है, पूर्ण अथवा शरीररूप पुरमें
शयनाद्वा । अन्तरात्मा सर्वस्या-
शयन करनेके कारण पुरुप है,
न्तरात्मभूतः स्थितः । सदा | अन्तरात्मा अर्थात् सबके अन्तरात्म-
जनानां हृदये संनिविष्टो
स्वरूपसे स्थित है। सर्वदा जीवोंके
हृदय-
हृदयमें स्थित है, हृदयस्थित मनके
स्थेन मनसाभिगुप्तः । मन्वीशो
द्वारा सुरक्षित है और मन्चीश-
ज्ञानेशः । य एतद्विदुरमृतास्ते
ज्ञानाध्यक्ष है । जो इसे जानते हैं वे
भवन्ति ॥ १३॥
अमर हो जाते हैं ॥ १३ ॥
अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६५ परमेश्वरके सर्वात्मभाव या विराट-स्वरूपका वर्णन पुरुषोऽन्तरात्मेत्युक्तं पुनरपि वह परमेश्वर पुरुप एवं अन्तरात्मा है-यह कहा गया, अब सबकी सर्वात्मानं दर्शयति-सर्वस्य तद्रूपता प्रदर्शित करनेके लिये श्रुति तावन्मात्रत्वप्रदर्शनार्थम् । उक्तं फिर भी उसका सर्वात्मभाव दिखलाती है । कहा भी है-"अध्यारोप और च--"अध्यारोपापवादाभ्यां नि- अपवादके द्वारा निष्प्रपञ्चको प्रपञ्चित प्रपञ्चं प्रपञ्चयते" इति । किया जाता है" इत्यादि । सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठदशाङ्गुलम् ॥१४॥ वह सहस्र शिर, सहस्र नेत्र और सहस्र चरणोंवाला है तथा पूर्ण है । वह भूमिको सब ओरसे व्याप्त कर अनन्तरूपसे उसका अतिक्रमण करके स्थित है। [ अथवा ऐसा अर्थ करना चाहिये कि नाभिसे ऊपर दश अङ्गुल परिमाणवाले हृदयमें स्थित है ] ॥ १४ ॥ सहस्राण्यनन्तानि शीर्षाण्य इसके सहस्र अर्थात् अनन्त शिर हैं इसलिये यह सहस्रशिरवाला है । स्येति सहस्रशीर्षा । पुरुषः पूर्णः। पुरुप अर्थात् पूर्ण है । इसी प्रकार एवमुत्तरत्र योजनीयम् । स भूमि आगेके विशेषणोंका भी अर्थ कर लेना १. अध्यारोप और अपवाद ये वेदान्तके पारिभाषिक शब्द हैं। किसी सत्य वस्तुमें असत्य पदार्थका भ्रम होना अध्यारोप है, जैसे रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति, तथा उस असत्य पदार्थके बाधपूर्वक परमार्थ-सत्यको प्रदर्शित कराना अपवाद है, जैसे कल्पित सर्पके निराकरणद्वारा उसकी अधिष्टानभूता रज्जुका भान । इसी प्रकार निष्प्रपञ्च ब्रह्ममें मायाका आरोप करके प्रपञ्चप्रतीतिकी व्यवस्था की जाती है और प्रपञ्चके अपवादद्वारा शुद्ध ब्रह्मका साक्षात्कार कराया जाता है । परन्तु वस्तुतः ये दोनों प्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं, अखण्ड चिन्मात्र शुद्ध ब्रझमें तो किसी भी प्रकारके अध्यारोप या अपवादका अवकाश ही नहीं है । इस प्रकार अध्यारोप और अपवाद- के द्वारा उस निर्विशेषका सविशेषरूपसे वर्णन किया जाता है । , १६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अन्याय ३ भुवनं सर्वतोऽन्तर्वहिश्च वृत्वा चाहिये ।* वह भूमि अर्थात् संसार- को सर्वतः बाहर और भीतरसे व्याप्यात्यतिष्ठदतीत्य भुवनं सम- व्याप्त करके संसारका भी अतिक्रमण करके स्थित है। दशाङ्गुल अर्थात् घितिष्ठति । दशाङ्गुलमनन्तमपार- अनन्त-अपार रूपसे । अयत्रा मित्यर्थः अथवा नाभेरुपरि दशा- नाभिसे ऊपर जो दश अगुल परिमाणवाला हृदय है उसमें स्थित मुलं हृदयं तत्राधितिष्ठति ॥१४॥ है ॥ १४ ॥ ननु सर्वात्मत्वे सप्रपञ्चं ब्रह्म किन्तु सर्वात्मक होनेपर तो ब्रह्म सप्रपञ्च (सविशेष ) सिद्ध होगा. स्यात्तद्वयतिरेकेणाभावादित्याह- क्योंकि उससे अतिरिक्त प्रपञ्चकी सत्ता ही नहीं है. इसपर श्रुति कहती है- पुरुष एवेदर सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥ जो कुछ भूत और भविष्यत् है एवं जो अन्नके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है वह सब पुरुष ही है। तया वही अमृतत्र ( मुक्ति) का भी प्रभु है ॥ १५॥ पुरुष एवेदमिति । पुरुष एवंदं 'पुत्य एवेदम्' इत्यादि । यह जो अन्नसे बढ़ता है तथा यह जो सर्व यदन्नेनातिरोहति यदिदं वर्तमान दिखायी देता है तथा जो दृश्यते वर्तमानं यद्भूतं यच्च भव्यं कुछ भूत और भविष्यत् है वह सब पुरुष ही है। इसके सिवा. वह भविष्यत् । किञ्च-उतामृतत्व- अमृतत्वका ईशान है अर्थात् अमरण- * अर्थात् रहन्न यानी अनन्त अभि ( नत्र ) और पाद ( चरण ) होनेके कारण वह हलाल और सहत्रपाद है। , -~- -~- - अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ १६७ स्येशानोऽमरणधर्मत्वस्य कैवल्य- धर्मत्व यानी कैवल्यपदका भी प्रभु है । तथा जो अन्नसे बढ़ता है, जो स्येशानः । यच्चान्नेनातिरोहति विद्यमान है उसका यह स्वामी यद्वर्तते तस्येशानः ॥ १५॥ है ॥ १५॥ पुनरपि निर्विशेष प्रतिपाद- यितुं दर्शयति- फिर भी उसको निर्विशेप प्रति- पादन करनेके लिये श्रुति दिखलाती पाणय: सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१६॥ उसके सब ओर हाथ-पाँव हैं, सब ओर आँख, शिर और मुख है तथा वह सर्वत्र कोंवाला है एवं लोकमें सबको व्याप्त करके स्थित है ॥१६॥ सर्वत इति । इति । सर्वतः 'सर्वतः' इत्यादि । उसके सब पादाश्चेति सर्वतः- ओर हाथ-पांव हैं इसलिये वह सर्वतः- पाणिपादं तत् । सर्वतोऽक्षीणि पाणिपाद है, तथा सब ओर आँख, शिरांसि मुखानि च यस्य तत्सर्व- शिर और मुख हैं इसलिये सर्वतो- ऽक्षिशिरोमुख है । उसके सब ओर तोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिः श्रुति-कर्ण हैं इसलिये वह सर्वतः श्रवणमस्येति श्रुतिमत् । लोके श्रुतिमान् है। तथा यह लोकमे प्राणिनिकाये सर्वमावृत्य संन्या- अर्थात् प्राणिसमूहमें सवको आवृत प्य तिष्ठति ॥१६॥ - व्याप्त करके स्थित है ॥१६॥ आत्माके देहावस्थान और इन्द्रिय-सम्बन्धराहित्यका निरूपण उपाधिभूतपाणिपादादीन्द्रि उपाधिभूत पाणिपादादिके अव्या- रोपसे ऐसी आशङ्का न हो जाय कि याध्यारोपणाज्ज्ञेयस्य तद्वत्ताशङ्का ज्ञेय ( ब्रह्म ) उनसे युक्त है इसी मा भूदित्येवमर्थमुत्तरतो मन्त्रः प्रयोजनसे आगेका मन्त्र है- १६८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥१७॥ वह समस्त इन्द्रियवृत्तियोंके रूपमें अवभासित होता हुआ भी समस्त इन्द्रियोंसे रहित है, तथा सवका प्रभु, शासक और सवका आश्रय एव कारण है ॥ १७ ॥ मन्द्रियेति । सर्वाणि च तानी 'सर्वेन्द्रिय०' इत्यादि । श्रोत्रादि इन्द्रियोंसे लेकर अन्तःकरणपर्यन्त न्द्रियाणि श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्य- जो समस्त इन्द्रियाँ हैं वे सर्वेन्द्रिय- न्तःकरणपर्यन्तानि सर्वेन्द्रियग्रह- | पदके ग्रहणसे गृहीत होती हैं । अन्तःकरण और वाह्य करण जिसकी न गृह्यन्ते । अन्तःकरणवहि- उपाधि है वह परमात्मा उन समस्त संकल्प एवं इन्द्रियोंके अध्यवसाय, करणोपाधिभूतः सर्वेन्द्रियगुणै- श्रवणादि गुणोंसे गुणवान्-सा भासता रध्यवसायसंकल्पश्रवणादिभिर्गुण- है । इसलिये वह सर्वेन्द्रियगुणाभास है । तात्पर्य यह है कि उसे समस्त 'वदाभासत इति सर्वेन्द्रियगुणा- इन्द्रियसे व्यापारयुक्त-सा जानना भासम् । सर्वेन्द्रियैर्व्याप्तमिव चाहिये; जैसा कि "ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा" तज्ज्ञेयमित्यर्थः । “ध्यायतीच इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है । लेलायतीव" (वृ० उ०४।३।७) किन्तु वह किस कारणसे व्यापारयुक्त- सा ग्रहण किया जाता है [ वास्तवमें इति श्रुतेः । कस्मात्पुनः कारणा- व्यापार करता है-ऐसा क्यों नहीं त्तद्वयापृतमिवेति गृह्यते? इत्याह- माना जाता ? ] इसपर श्रुति कहती 'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' सर्वकरण- है--'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' अर्थात् रहितमित्यर्थः । अतो न च वह समस्त इन्द्रियोंसे रहित है। अतः उसे इन्द्रियोंके व्यापारोंसे करणच्यापारावृतं तज्ज्ञेयम् । व्यापारवान् नहीं जानना चाहिये । ?
अध्याय
शाङ्करभाष्यार्थ
१६९
सर्वस्य जगतः प्रभुमीशानम् । । वह समस्त जगत्का प्रभु और
सर्वस्य शरणं परायणं बृहत्कारणं शासक है तथा सबका शरण-
च ॥१७॥
आश्रय और बृहत्-कारण है ॥१७॥
तथा-
किञ्च-
नवद्वारे पुरे देही हसो लेलायते बहिः ।
वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥
सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत्का स्वामी यह हंस ( परमात्मा ) देहा-
भिमानी होकर नव द्वारवाले [ देहरूप ] पुरमें बाह्य विषयोंको ग्रहण
करनेके लिये चेष्टा किया करता है ॥ १८ ॥
नवद्वार इति । नवद्वारे शिरसि
'नवद्वारे' इत्यादि । [ दो
ऑख, दो नाक, दो कान और
सप्तद्वाराणि द्वे अवाची पुरे देही
एक मुख-इन ] सात शिरके और
[ गुदा एवं लिङ्ग ] दो निम्न-
विज्ञानात्मा भूत्वा कार्यकरणो-
भागके इस प्रकार नौ द्वारोंवाले
पाधिः सन्हंसः परमात्मा हन्त्य- शरीरमें देही—विज्ञानात्मा यानी भूत
और इन्द्रियरूप उपाधिवाला होकर
विद्यात्मकं कार्यमिति, लेलायते
यह हंस-परमात्मा बाह्य विषयोंको
ग्रहण करनेके लिये चेष्टा करता
चलति बहिर्विषयग्रहणाय । वशी
चलता है । यह अविद्याजनित कार्यका
सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य
हनन करता है इसलिये हस है । तथा
यह स्थावर-जंगम समस्त लोकका
च ॥१८॥
वशी ( स्वामी ) है ॥ १८ ॥
१७० श्वेताश्वतरोपनिपद् [अध्याय ३ . - ब्रह्मका निर्विशेष रूप एवं तावत्सर्वात्मकं ब्रह्म प्रति इसप्रकार यहॉतक ब्रह्मका सर्वात्म- पादितम् । इदानीं निर्विकारा- भावसे प्रतिपादन किया गया; अब अपने निर्विकार चिदानन्दस्वरूपसे नन्दस्वरूपेणानुदितानस्तमितज्ञा- तथा कभी उदित एवं अस्त न होनेवाले नात्मनावस्थितं परमात्मानं दर्श- ज्ञानस्वरूपसे स्थित परमात्माको यितुमाह- प्रदर्शित करने के लिये श्रुति कहती है- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥१६॥ वह हाथ-पॉवसे रहित होकर भी वेगवान् और ग्रहण करनेवाला है, नेत्रहीन होकर भी देखता है और कर्णरहित होकर भी सुनता है। वह सम्पूर्ण वेद्यवर्गको जानता है, किन्तु उसे जाननेवाला कोई नहीं है । उसे [ऋषियोंने ] सबका आदि, पूर्ण एवं महान् कहा है ॥१९॥ अपाणिपाद इति । नास्य 'अपाणिपादः' इत्यादि । इसके पाणि और पाद नहीं हैं, इसलिये पाणिपादाचित्यपाणिपादः यह अपाणिपाद है । [ पैर जवनो दूरगामी । ग्रहीता पाण्य- न होनेपर भी ] जवन-दूरगामी है और ग्रहीता-हाथ न होने- भावेऽपि सर्वग्राही । पश्यति सर्व- । पर भी सवको ग्रहण करनेवाला मचक्षुरपि सन् । शृणोत्यकों- है । यह नेत्रहीन होनेपर भी सबको देखता है, कर्णहीन होनेपर भी ऽपि । स वेत्ति वेद्यं सर्वज्ञत्वाद- सुनता है और अमनस्क होनेपर भी मनस्कोऽपि । न च तस्यास्ति सर्वज्ञ होनेके कारण वेद्यवर्गको जानता है । किन्तु कोई उसे जाननेवाला वेत्ता "नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा" नहीं है, जैसा कि "इससे भिन्न अध्याय ३ शाङ्करभाष्यार्थ १७१ (वृ० उ०३।७।२३) इति श्रुतेः। कोई द्रष्टा नहीं है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। उसे [ ऋषियोंने] सबका तमाहुरग्रथं प्रथमं सर्वकारणत्वा- कारण होनेसे अग्र्य-प्रथम और पुरुष त्पुरुषं पूर्ण महान्तम् ॥१९॥ -पूर्ण एव महान् कहा है ॥१९॥ तथा- - आत्मज्ञानसे शोकनिवृत्तिका निरूपण किश्च-- अणोरणीयान्महतो महीया- नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥२०॥ यह अणुसे भी अगु और महान्से भी महान् आत्मा इस जीवके अन्तःकरणमें स्थित है । उस विषयभोगसंकल्पशून्य महिमामय आत्माको जो विधाताकी कृपासे ईश्वररूपसे देखता है वह शोकरहित हो जाता है ॥ २० ॥ अणोरणीयानिति । अणोः 'अणोरणीयान्' इत्यादि । अणु सूक्ष्मादप्यणीयानणुतरः । महतो अर्थात् सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, महत्- [ आकाशादि ] महत्त्वयुक्त परिमाणों- महत्त्वपरिमाणान्महीयान्महत्तरः। से भी महत्तर-ऐसा जो आत्मा है स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादि- वह इस जीवके अर्थात् ब्रह्मासे स्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य लेकर स्तम्बपर्यन्त सभी प्राणियोंके गुहायां हृदये निहित गुहा-हृदयमें निहित है; अर्थात् आत्मभूतः उनका स्वरूपभूत होकर स्थित -स्थित इत्यर्थः । तमात्मानमक्रतुं है। जो पुरुष अक्रतु-विषय- विषयभोगसङ्कल्परहितमात्मनो भोगके संकल्पसे रहित. अपने ही श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षय- महिमान्वित स्वरूप और कर्मके कारण रहितमीगं पश्यत्ययमहमस्मीति होनेवाले वृद्धि एवं क्षयसे रहित ईश्वर- रूप उस आत्माको देखता है; अर्थात् साक्षाजानाति यः स वीतशोको 'यही मै हूँ' इस प्रकार साक्षात् जानता है, वह शोकरहित हो जाता है। किन्तु भवति । केन तीसो पश्यति ? यह देखता किसकी सहायतासे है ? घातुरीश्वरस्य प्रसादात् । प्रसन्न [इसपर कहते हैं-] विवाता यानी हि परमेश्वर तयाथात्म्यज्ञान- ईश्वरकी कृयासे, क्योंकि ईश्वरके प्रसन्न होनेपर ही उसके वास्तविक स्वरूप- मुत्पद्यते । अथवेन्द्रियाणि धातवः का ज्ञान होता है । अथवा शरीरको शरीरस्य धारणात्तेषां प्रसादा- धारण करनेके कारण इन्द्रियाँ ही धातु है, उनके प्रसाद यानी विषयोंमें दोप- द्विपयदोपदर्शनमलाद्यपनयनात् । दर्शनके द्वारा मलादिकी निवृत्ति होनेपर उसे देखता है, अन्यया अन्यथा दुर्विज्ञेय आत्मा कामिभिः सकाम प्राकृत पुरुषोंके लिये तो प्राकृतपुरुषैः ॥२०॥ आत्मा दुर्विज्ञेय ही है ॥२०॥ आत्मस्वरूपके विषय में ब्रह्मवेत्ताका अनुभव उक्तमयं द्रढयितुं मन्त्रगनु- उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करनेके लिये भवं दर्शयति- श्रुति मन्त्रद्रष्टाका अनुभव दिखाती है- वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१॥ १. अयवासे लेकर जो व्याख्या है वह मूलमे 'धातुप्रसादात्' पठ मानकर की गी है।
अध्याय ३] शाङ्करभाष्यार्थ १७३ ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्मका अभाव बतलाते हैं, और जिसे नित्य कहते हैं उस जराशून्य पुरातन सर्वात्माको, जो विभु होनेके कारण सर्वगत है, मैं जानता हूँ॥ २१ ॥ वेदाहमेतमिति । वेद जाने 'वेदाहमेतम्' इत्यादि । इस ऽहमेतमजरं विपरिणामधर्मवर्जितं | अजर अर्थात् विपरिणामधर्मशून्य और पुराणं पुरातनं सर्वात्मानं सर्वेषा- | पुराण-पुरातन सर्वात्माको सबके मात्मभूतं सर्वगतं विभुत्वादाकाश- स्वरूपभूतको, जो विभु-आकाशके वदयापकत्वात् । यस्य च जन्म- समान व्यापक होनेके कारण सर्वगत निरोधमुत्पत्त्यभावं प्रवदन्ति ब्रह्म- है तथा ब्रह्मवेत्तालोग जिसके जन्म- वादिनो हि नित्यम् । स्पष्टोऽर्थः | का अभाव नित्य बतलाते हैं, मैं ॥२१॥ जानता हूँ। शेष अर्थ स्पष्ट है ॥२१॥ इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिप्यपरमहंसपरित्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाप्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥ * श्रीशङ्करानन्दजीने इस मन्त्रके उत्तरार्धकी व्याख्या इस प्रकार की है-"जन्म च निरोधश्च जन्मनिरोधमुत्पत्तिनाशावित्यर्थः प्रवदन्ति प्रकर्पण कथयन्ति मूढाइति शेषः, यस्य आत्मनः'...' 'ब्रह्मवादिन. उत्पन्नतत्त्वसाक्षात्कारा हि प्रसिद्धाः प्रवदन्ति प्रकर्षेण कथयन्ति नित्यम् । अर्थात् "जन्म और निरोधका नाम जन्मनिरोध है यानी उत्पत्ति और नाश-इन्हें मूढलोग जिस आत्माके बतलाते है और जिसे ब्रह्मवादीलोग -जिन्हें तत्त्वसाक्षात्कार हो गया है नित्य प्रतिपादन करते हैं।" भाष्यकी अपेञ्चा यह अर्थ अधिक उपयुक्त जान पड़ता है, क्योंकि भाष्यके अनुसार 'प्रवदन्ति' क्रियाका दूसरी बार प्रयोग होनेका कोई प्रयोजन नहीं जान पड़ता। अर्थ करनेसे यहाँ चतुर्थ अध्याय आरम्भ किया परमेश्वरसे सद्बुद्धिके लिये प्रार्थना गहनत्वादस्वार्थस्य भूयो भूयो [प्रस्तुत ] विषय गम्भीर होनेके कारण इसका पुनः-पुनः- निरूपण वक्तव्य इति चतुर्थोऽध्याय करना आवश्यक है, इसलिये अब चतुर्थ अध्याय आरभ्यते-- जाता है- य एकोऽवर्णों बहुधा शक्तियोगा- द्वर्णाननेकान्निहितार्थों दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्धया शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥ सृष्टिके आरम्भमे जो एक और निर्विशेष होकर भी अपनी शक्तिके द्वारा बिना किसी प्रयोजनके ही नाना प्रकारके अनेकों वर्ण (विशेष रूप) धारण करता है तथा अन्तमे भी जिसमे विश्व लीन हो जाता है वह प्रकाश- स्वरूप परमात्मा हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १ ॥ य एक इति । य एकोऽद्वि 'य एको' इत्यादि । जो तीयः परमात्मावर्णो जात्यादि- परमात्मा सृष्टिके आरम्भमें एक- अद्वितीय और अवर्ण-जाति रहितो निर्विशेप इत्यर्थः । बहुधा आदिसे रहित अर्थात् निर्विशेष नानाशक्तियोगाद्वर्णाननेकान्नि- होनेपर भी शक्तिके योगसे निहितार्थ - कोई प्रयोजन न लेकर अर्थात् हितार्थोऽगृहीतप्रयोजनः स्वार्थ- स्वार्थकी अपेक्षा न करके वहुधा- निरपेक्ष इत्यर्थः । दधाति विदधा- ) नाना प्रकारके अनेको वर्ण ( विशेष- स अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७५ त्यादौ । वि चैति व्यति चान्ते रूप ) धारण करता है तथा अन्तमें -प्रलयकालमें जिसमें विश्व लीन प्रलयकाले । चशब्दान्मध्येऽपि हो जाता है। 'चान्ते' के 'च' शब्द- यस्मिन्विश्वं स देवो द्योतनस्व- से यह तात्पर्य है कि मध्यमें भी भावो विज्ञानकरस इत्यर्थः । स | जिसमें विश्व स्थित है वह देव- प्रकाशस्वरूप अर्थात् विज्ञानकरस नोऽस्माञ्शुभया बुद्धया संयुनक्तु परमात्मा हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त संयोजयतु ॥१॥ करे ॥१॥ परमात्माकी सर्वरूपता यस्मात्स एव स्रष्टा तस्मिन्नेव क्योकि वही जगत्का रचयिता है और उसीमें उसका लय होता है लयस्तस्मात्स एव सर्व न ततो अतः वही सर्वरूप है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है-यह वात आगेके विभक्तमस्तीत्याह मन्त्रत्रयेण तीन मन्त्रोंसे कही जाती है--- तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥ २ ॥ वही अग्नि है, वही सूर्य है, वही वायु है, वही चन्द्रमा है, वही शुक्र ( शुद्ध ) है, वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति है ॥२॥ तदेवेति । तदेवात्मतत्त्वमग्निः। 'तदेवाग्नि.' इत्यादि । वह आत्मतत्त्व ही अग्नि है, वही सूर्य तदादित्यः । एवशब्दः सर्वत्र है। आगे तदेव शुक्रम्' ऐसा देखा संवध्यते तदेव शुक्रमिति दर्श- जाता है इसलिये 'एव' शब्दका सबके साथ सम्बन्ध है। शेष अर्थ नात् । शेषमृजु । तदेव शुक्रं | सरल है । वही शुक्र यानी शुद्ध है २७६ श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ४ शुद्धमन्यदपि दीप्तिमन्नक्षत्रादि । तथा और भी जो दीप्तिशाली नक्षत्रादि पदार्थ हैं वह भी वही है, तद्ब्रह्म हिरण्यगर्भात्मा तदापः स तथा वही ब्रह्म-हिरण्यगर्भस्वरूप है, वही जल है और वही विराट- प्रजापतिर्विराडात्मा ॥२॥ रूप प्रजापति है ।।२॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः॥३॥ तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है और तू ही वृद्ध होकर दण्डके सहारे चलता है तथा तू ही [ प्रपञ्चरूपसे ] उत्पन्न होने- पर अनेकरूप हो जाता है ।। ३ ॥ स्पष्टो मन्त्रार्थः ॥३॥ इस मन्त्रका अर्थ स्पष्ट है ॥३॥ नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष- स्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥ तू ही नीलवर्ण भ्रमर, हरितवर्ण एवं लाल आँखोंवाला जीव (शुकादि निकृष्ट प्राणी ), मेघ तथा [ ग्रीप्मादि ] ऋतु और [ सप्त ] समुद्र है । तू अनादि है और सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित है तथा तुझहीसे सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए है ॥ ४ ॥ नील इति । त्वमेवेति सर्वत्र 'नील.' इत्यादि । यहाँ 'त्वमेव' (तू ही) इस पदका सबके साथ संबध्यते । त्वमेव नीलः पतङ्गो सम्बन्ध है। तू ही नीलवर्ण पतङ्ग- A अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १७७ भ्रमरः, पतनाद्गच्छतीति पतङ्गः । भ्रमर है । नीचे गिरते चलनेके कारण हरितो लोहिताक्षः शुकादि- भ्रमरको पतङ्ग कहते हैं। तू ही हरित लोहिताक्ष है, अर्थात् शुकादि निकृष्टाः प्राणिनस्त्वमेवेत्यर्थः । निकृष्ट प्राणिवर्ग भी तू ही है। तू तडिद्गर्भो मेघ ऋतवः समुद्राः । ही तडिद्गर्भ-मेघ, ऋतु एवं समुद्र यस्मात्त्वमेव सर्वस्यात्मभूतस्त- है । इस प्रकार क्योंकि तू ही सब- स्मादनादिस्त्वमेव त्वमेवाद्यन्त- का आत्मा है इसलिये तू अनादि है---तेरा आदि और अन्त नहीं शून्यः, विभुत्वेन व्यापकत्वेन है, जिससे कि विभु अर्थात् व्यापक यतो जातानि भुवनानि विश्वानि होनेके कारण, सम्पूर्ण भुवन उत्पन्न ॥४॥ हुए हैं ॥ ४ ॥ . प्रकृति और जीवके सम्बन्धका विचार इदानीं तेजोऽवन्नलक्षणां प्रकृति अब छान्दोग्योपनिषदमें प्रसिद्ध तेज, अप और अन्नरूपा प्रकृतिको छान्दोग्योपनिषत्प्रसिद्धामजारूप- श्रुति अजारूपसे कल्पित करके कल्पनया दर्शयति- दिखलाती है- अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो टेको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥ अपने अनुरूप बहुत-सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली एक लोहित, शुक्ल और कृष्णवर्णा अजा (बकरी-प्रकृति) को एक अज (वकरा-जीव) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्तभोगाको त्याग देता है ॥ ५ ॥ श्वे० उ० २३-२४ १७८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ अनामेकामिति । अजां प्रकृति 'अजामेकाम्' इत्यादि । सरूपा -एक समान आकारवाली वहुत- लोहितशुक्लकृष्णां तेजोऽवन्नलक्षणां प्रजा उत्पन्न करनेवाली लोहित- वह्वीः प्रजाः सृजमानामुत्पाद- शुक्-कृष्णा-तेज, अप और अन्न- यन्तीं ध्यानयोगानुगतदृष्टां देवा- रूपा अजा-प्रकृतिको अथवा ध्यान- योगमें स्थित ब्रह्मगदियोहारा देख त्मशक्तिं वा सरूपाः समानाकारा गयी देवात्मशक्तिको एक अज- अनो ह्येको विज्ञानात्मानादिकाम- विज्ञानान्मा. जो अनादि काम और कर्मद्वारा वरूपसे भ्रष्ट कर दिया कर्मविनाशितः स्वयमात्मानं गया है, इस प्रकृतिको ही अपना मन्यमानो जुपमाणः सेवमानो- स्वरूप मानकर सेवन करता हुआ ऽनुशेते मजते । अन्य आचार्योप- , भोगता है और दूसरा गुरुदेवके उपदेशरूप प्रकाशसे अविद्यान्धकार- देशप्रकाशावसादिताविद्यान्धकारो के नष्ट हो जानेके कारण इसे छोड़ जहाति त्यजति ॥५॥ देता है ॥ ५॥ जीव और ईश्वरकी विलक्षणता इदानीं सूत्रभृतो परमार्थ अव परमार्थतत्त्वका निश्चय वस्त्ववधारणार्थमुपन्यस्येते- करानेके लिये दो सूत्रभूत मन्त्रोंका उल्लेख किया जाता है- द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥६॥ सदा परस्पर मिलकर रहनेवाले दो सन ( समान नामवाले ) सुपर्ण ( सुन्दर गतिवाले पक्षी ) एक ही वृक्षको आश्रित किये हुए हैं । .
अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ .१७९ उनमें एक उसके स्वादिष्ट फलोंको भोगता है और दूसरा उन्हें न भोगता हुआ देखता रहता है ॥ ६ ॥ - - द्वति । द्वा द्वौ विज्ञानपरमा 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि । द्वा-- त्मानौ । सुपर्णा सुपर्णी शोभन- | दो विज्ञानात्मा और परमात्मा, जो सुपर्ण हैं अर्थात् शुभ पतन--शुभ गमन- पतनौ शोभनगमनौ सुपौँ पक्षि- वाले होनेसे सुपर्ण हैं, अथवा सामान्याद्वा सुपौँ सुपौँ सयुजा पक्षियोंके समान होनेसे जो सुपर्ण सयुजौ सर्वदा संयुक्तौ । सखाया कहलाते हैं, और सयुज्-सर्वदा सखायौ समानाख्यानौ समा- संयुक्त रहते हैं तथा सखा है-- नाभिव्यक्तिकारणौ । एवंभूतो अभिव्यक्तिके कारण समान है। जिनके आख्यान (नाम) यानी सन्तौ समानमेकं वृक्षं वृक्षमिवो- ऐसे वे दोनों समान यानी एक ही च्छेदसामान्यावृक्षं शरीरं परि- वृक्षको-वृक्षके समान नागमें षस्वजाते परिष्वक्तवन्तौ समा- समानता होनेके कारण शरीर वृक्ष है, उसे परिष्वक्त किये हैं अर्थात् श्रितवन्तावेतौ। ये दोनो उसपर आश्रित हैं तयोरन्योऽविद्याकामवासनाश्र उनमें एक-अविद्या, काम और यलिङ्गोपाधिर्विज्ञानात्मा पिप्पलं वासनाओके आश्रयभूत लिङ्गदेहरूप कर्मफलं सुखदुःखलक्षणं स्वादु उपाधिवाला विज्ञानात्मा अविवेकवा अनेकविचित्रवेदनास्वादरूपमत्ति उसके स्वादु-अनेक विचित्र वेदना- रूप वादवाले पिप्पल-सुख- उपले विवेकतः । अनश्नन्नन्यो दु.खरूप कर्मफलोको भोगता है नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः परमे- अन्य-नित्यशुद्धबुद्धमुक्त- श्वरोऽभिचाकशीति सर्वमपि पश्य- स्वरूप परमात्मा उन्हें न भोगता हुआ नास्ते ॥६॥ उन सभीको देखता रहता है ॥६॥ .
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ पश्यत्यन्यमीश- तवं सति- ऐसा होनेपर- समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो- उनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥७॥ उस एक ही वृक्षपर जीव [ देहात्मभावमें ] डूबकर मोहग्रस्त हो दीनभावसे शोक करता है । जिस समय यह [अनेकों योगमागोंसे ] सेवित और देहादिसे भिन्न ईश्वर और उसकी महिमाको देखता है उस समय गोकरहित हो जाता है ।। ७ ।। समाने वृक्षे शरीरे पुरुपो एक ही वृक्ष यानी शरीरमें पुरुष -भोक्ता जीव अविद्या, काम, कर्म, भोक्ताविद्याकामकर्मफलरागादि- कर्मफल और रागादिके भारी भारसे गुरुभाराक्रान्तोऽलावुरिख समुद्र- आक्रान्त हो समुद्रके जलमें डूबे हुए ह्वेके समान यानी निश्रय ही जले निमग्नो निश्चयेन देहात्म- देहात्मभावको प्राप्त हुआ—'यह भावमापन्नः'अयमेवाहममुष्य पुत्रो- देह मै हूँ, मैं अमुकका पुत्र हूँ, उसका नाती हूँ, कृश हूँ, स्थूल ऽस्य नप्ता कृशः स्थूलो गुणवान्नि- गुणवान् हूँ, गुणहीन हूँ, सुखी हूँ, गुणः सुखी दुःखी' इत्येवंप्रत्ययो दुःखी हूँ' इस प्रकारके प्रत्ययोंवाला हो, ऐसा समझकर कि इस देहसे नान्योऽस्त्यस्मादिति जायते म्रि-भिन्न कोई और नहीं है जन्मता, यते संयुज्यते च संबन्धिवान्धवैः। मरता एवं अपने सम्बन्धी वन्धुओंसे संयुक्त होता है। अतः अनीशतासे अतोऽनीशया 'न कस्यचित्सम- 'मैं किसी कार्यके लिये समर्थ नहीं र्थोऽहं पुत्रो मम नटो मृता मे हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया, स्त्री मर अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८१ भार्या किं मे जीवितेन इत्येवंदीन- | गयी अब मेरे जीनेसे क्या लाभ है ?" इस प्रकारका दीनभाव ही अनीशा भावोऽनीशा तया शोचति सन्त असमर्थता ) है उससे युक्त होकर प्यते मुह्यमानोऽनेकैरनर्थप्रकारै- और मोहग्रस्त होकर यानी अनर्थके अनेकों प्रकारोंसे अविवेकवश विचित्र रविवेकतया विचित्रतामापद्यमानः। स्थितिको प्राप्त होकर शोक अर्थात् सन्ताप करता है। स एव प्रेततिर्यङमनुष्यादि वही प्रेत, तिर्यक् एव मनुष्यादि योनियोंमें पडकर दु.ख भोगता है। योनिष्वापतन्दुःखमापन्नः कदा- जब कभी अनेक जन्मोके सश्चित चिदनेकजन्मशुद्धधर्मसञ्चयन- पुण्यकर्मविपाकसे कोई परमकृपाल निमित्तं केनचित्परमकारुणिकेन आचार्य उसे योगमार्गका उपदेश कर देते है तो वह अहिसा, सत्य, दर्शितयोगमार्गो हिंसासत्यब्रह्म- ब्रह्मचर्य एवं सर्वत्यागके द्वारा समा- चर्यसत्यागसमाहितात्मा सन् हितचित्त और शमादि साधनोंसे शमादिसम्पन्नो जुष्टं सेवितमनेक- सम्पन्न हो अनेक योगमागोंसे सेवित अन्य यानी वृक्ष (देह ) रूप योगमागैर्यदा यस्मिन्काले पश्यति उपाधिसे भिन्न, ससारधर्मशून्य, ध्यायमानोऽन्यं वृक्षोपाधिलक्षणा- क्षुधादिसे असंस्पृष्ट, सर्वान्तर्यामी ईश्वर द्विलक्षणमसंसारिणमशनायाद्यसं- परमात्माका ध्यान करता हुआ उसे देखता है। अर्थात् 'मैं यह हूँ, अर्थात् स्पृष्टं सर्वान्तरं परमात्मानमीशम् मै सबमें समान और समस्त प्राणियोके 'अयमहमस्मीत्यात्मा सर्वस्य समः | भीतर स्थित आत्मा हूँ, अविद्याजनित उपाधिसे परिच्छिन मायात्मा नहीं सर्वभूतान्तरस्थो नेतरोऽविद्या- हूँ' इस प्रकार साक्षात्कार करता है जनितोपाधिपरिच्छिन्नो मायात्मा' और उसकी विभूतिरूप महिमाको इति विभूति महिमानमिति जगद्रूप- देखता है यानी यह जगट्टप महिमा श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ - मस्यंत्र महिमा परमेश्वरस्येति , इस परमात्माकी ही है—ऐसा जिस समय देखता है उस समय यह यदेवं पश्यति तदा बीतशोको गोकरहित हो जाता है । अर्थात् भवति । सर्वस्माच्छोकसागरादि- सम्पूर्ण नोकसागरसे मुक्त यानी कृतकृत्य हो जाता है । अथवा मुच्यते कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः । [ ऐसा अर्थ करना चाहिये कि ] जिस समय इस भोक्ता जीवको यह अथवा जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश- : योगिसेवित अन्य-ईश्वररूप अर्थात् मस्यैव प्रत्यगात्मनो महिमानम् । इस प्रत्यगात्माकी ही महिमालप देखता है उस समय शोकरहित हो इति तदा बीतगोको भवति।।७॥ जाता है || - ब्रह्मकी अधिष्ठानन्यता और उसके जानस कृतार्यता इनानीं तद्विढां कृतार्थतां अव श्रुति ब्रह्मवेत्ताओको कृतार्यता नयति- प्रदर्शित करती है- ऋचो अक्षरे परमे व्योमन यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किसृचा करिप्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥ जिसमे समस्त देवगण अविष्टित है उस अभर परव्योममें ही वेदत्रय स्थित है [ अर्थात् वे भी उसीका प्रतिपादन करते हैं ] । जो उसको नहीं जानता वह वेत्रोंसे ही क्या कर लेगा ? जो उसे जानते हैं वे तो ये कृतार्थ हुए स्थित है ॥ ८॥ ऋच इति । वेदत्रयवेद्येऽक्षरे 'ऋचः' इत्यादि । वेदत्रयवेद्य परमे व्योमन्व्योम्न्याकाशकल्पे अभर परमाकाशमें-आकाशसदृश अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८३ यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः- परब्रह्ममें, जिसमे समस्त देवगण अधिष्ठित हैं-उसके आश्रयसे स्थित हैं आश्रितास्तिष्ठन्ति यस्तं उस परमात्माको जो नहीं जानता परमात्मानं न वेद किमृचा वह वेदसे क्या कर लेगा ? और जो उसे जानते हैं वे तो ये सम्यक् करिष्यति ? य इत्तद्विदुस्त इमे प्रकारसे रहते हैं अर्थात् कृतार्थ हुए समासते-कृतार्थास्तिष्ठन्ति ॥८॥ ' स्थित हैं ।। ८ ॥ मायोपाधिक ईश्वर ही सबका स्रष्टा है इदानीं तस्यैवाक्षरस्य मायोपा अब श्रुति उस अक्षर परमात्माका ही मायारूप उपाधिके कारण जगत्- धिकं जगत्स्रष्टुत्वं तन्निमित्तत्वं च स्रष्टुत्व और जगन्निमित्तत्वं अलग- भेदेन दर्शयति- अलग दिखलाती है- छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भृतं भव्यं यच्च वेदा बदन्ति । अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत- त्तस्मिंश्वान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ६ ॥ वेद, यज्ञ, क्रतु, व्रत, भूत, भविष्य और वर्तमान तथा और भी जो कुछ वेद बतलाते हैं वह सब मायावी ईश्वर इस अक्षरसे ही उत्पन्न करता है, और उस (प्रपञ्च ) मे ही मायासे अन्य-सा होकर वधा हुआ है ॥९॥ छन्दांसीति । छन्दांसि ऋग्य- 'छन्दासि' इत्यादि । ऋग, यजुः, साम और अथर्वसज्ञक वेद छन्द हैं, जुःसामाथर्वाङ्गिरसाख्या वेदाः। जिनमें यूपका सम्बन्ध नहीं होता देवयज्ञादयो यूपसंवन्धरहितवि- । वे देवयज्ञादि त्रिहित कर्म यज्ञ कहलाते १. जगत्का उपादानकारणत्व । २. जगत्का निमित्तकारणत्व । .
श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ४ तात्पर्य यह हितक्रियाश्च यज्ञाः । ज्योतिष्टोमा- हैं, ज्योतिष्टोमादि याग क्रतु हैं, तथा दयः क्रतवः । व्रतानि चान्द्रायणा- चान्द्रायणादि व्रत हैं । भूत--जो दीनि । भृतमतीतम् । भव्यं बीत चुका है, भव्य-जो होनेवाला भविष्यत् । यदिति तयोर्मध्य- वर्तमानका सूचक है और 'च' शब्द है। 'यत्' यह पद उनके मध्यवर्ती वर्ति वर्तमानं सूचयति । चशब्दः सबका समुच्चय करनेके लिये है। समुच्चयार्थः । यज्ञादिसाध्ये है कि यज्ञादिसाध्य कर्म कर्मणि प्रपञ्चे भूतादौ च वेदा और भूतादि प्रपञ्चमे वेद ही प्रमाण एव मानमित्येतत् । यच्छब्दः हैं । मूलमे 'यत्' शब्दका सबके सर्वत्र संवध्यते । अस्मात्प्रकृता- साथ सम्बन्ध है। इसका सम्बन्ध दक्षराब्रह्मणः पूर्वोक्तं सर्वमुत्पद्यत इस प्रकार है कि जो कुछ पहले कहा गया है सब इस प्रकृत अक्षर इति संवन्धः। ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है। अधिकारिब्रह्मणः कथं प्रपञ्चो अविकारी ब्रह्म किस प्रकार प्रपञ्चका उपादान कारण हो सकता पादानत्वम् ? इत्यत आह-मायीति। है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती कूटस्थस्यापि स्वशक्तिवशात्सर्व- है---'मायी सृजते' इत्यादि । तात्पर्य स्रष्टुत्वमुपपन्नमित्येतत् । विश्वं यह है कि कूटस्थ ब्रह्मका भी अपनी शक्तिके द्वारा सवका रचयिता होना पूर्वोक्तप्रपञ्चं सृजत उत्पादयति। सम्भव ही है। वह विश्व अर्थात् स्वमायया कल्पिते तस्मिन्भूता- पूर्वोक्त प्रपञ्चको उत्पन्न करता है। तथा अपनी मायासे कल्पित हुए उस दिप्रपञ्चे माययैवान्य इव संनि- | भूतादि प्रपञ्चमें वह मायासे ही अन्य- रुद्धः संवद्धोऽविद्यावशगो भूत्वा अविद्याके वशीभूत होकर संसार- सा होकर बँध गया है, अर्थात् संसारसमुद्रे भ्रमतीत्यर्थः ।। ९॥ समुद्रमे भटकता रहता है ।। ९ ॥
अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १८५ प्रकृति और परमेश्वरका स्वरूप तथा उनकी सर्वव्यापकता पूर्वोक्तायाः प्रकृतेर्मायात्वं पूर्वोक्त प्रकृति माया है और उसका अधिष्ठाता सच्चिदानन्दस्वरूप तदधिष्ठातृसच्चिदानन्दरूपब्रह्मण- ब्रह्म उस ( मायारूप ) उपाधिके स्तदुपाधिवशान्मायित्वं च चिटू- कारण मायावी है तथा उस चिद्रूप पस्य मायावशात्कल्पितावयव- ब्रह्मके मायाके कारण कल्पित हुए अवयवरूप कार्य-करणसघातसे यह भृतैः कार्यकरणसंघातैः सर्व दिखायी देता हुआ भूर्लोकादि सम्पूर्ण भृरादीदं परिदृश्यमानं जगद्व्याप्तं जगत् व्याप्त है-इस आशयसे श्रुति चेत्याह- कहती है- मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१०॥ प्रकृतिको तो माया जानना चाहिये और महेश्वरको मायावी । उसीके अवयवभूत [ कार्य-करणसघात ] से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है ॥ १० ॥ मायां विति । जगत्प्रकृति 'माया तु' इत्यादि । पीछे जिसका जगत्की प्रकृति (कारण) त्वेनाधस्तात्सर्वत्र प्रतिपादिता रूपसे सर्वत्र प्रतिपादन किया गया प्रकृतिर्मायैवेति विद्याद्विजानी- | है—वह प्रकृति माया ही है- ऐसा जाने । यहाँ 'तु' शब्द यात् । तुशब्दोऽवधारणार्थः निश्चयार्थक है । जो महान् और ईश्वर महांश्वासावीश्वरश्चेति महेश्वरस्तं | होनेके कारण महेश्वर है उसे मायावी —मायाको सत्ता-स्कृर्ति आदि मायिनं मायायाः सत्तास्फूर्त्यादि- देनेवाला तथा अधिष्ठानरूपसे उसे प्रदं तथाधिष्ठानत्वेन प्रेरयितारमेव प्रेरित करनेवाला जानना चाहिये- इस प्रकार इसका पूर्वोक्त 'विद्यात्' विद्यादिति पूर्वेण संवन्धः । तस्य क्रियासे सम्बन्ध है। उस प्रकृत १८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ प्रकृतस्य परमेश्वरस्य रज्ज्वायधि- परमेश्वरके, रज्जु आदि अधिष्टानों में ठानेपु कल्पितसदिस्थानीयः कल्पित सादिरूप मायिक अवयवोंसे सायिक स्वावयवरध्यासद्वारेदं अध्यासद्वारा यह भूर्लोकादि सम्पूर्ण भूरादि सर्व व्याप्तमेव पूर्णमित्ये- जगत् व्याप्त यानी पूर्ण है । यहाँ भी तत् । तुशब्दस्त्ववधारणार्थः।।१०॥ 'तु' शब्द निश्चयार्थक ही है ॥१०॥ orm कारण-ब्रह्मके साक्षात्कारसे परम शान्तिकी प्राप्ति मायातत्कार्यादियोनेः कूट- माया और उसके कार्याडिका । मूलभूत कूटस्थ ब्रह्म अपने स्वतन्त्र- स्थस्य ववशतोऽधिष्ठातृत्वं विय रूपसे सबका अविष्टाता है तथा दादिकार्याणामुत्पत्तिहेतुत्वं तेनैव आकाशादि कार्योंकी उत्पत्तिका हेतु है और उस शुद्धस्वरूपसे ही उसके सर्वाधिष्ठातृत्वोपलक्षितसच्चिदान- सर्वाधिष्टातृत्वसे उपलक्षित होनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूपसे 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा न्दवपुपा ब्रह्मास्मीत्येकत्वज्ञाना- एकत्व-ज्ञान होनेसे मुक्ति होती है; न्मुक्तिं च दर्शयति- यह वात श्रुति दिखलाती है- यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीडयं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥११॥ जो अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता है, जिसमें यह सब सम्यक् प्रकारसे लीन होता है और फिर विविधरूप हो जाता है उस सर्व- नियन्ता, वरदायक, स्तवनीय देवका साक्षात्कार करके साधक इस परम शान्तिको प्राप्त होता है ।।११॥
R अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ -- । यो योनिमिति । यो माया- 'यो योनिम्' इत्यादि । जो विनिर्मुक्तानन्दैकघनः परमेश्वरो | मायातीत विशुद्धानन्दधन परमेश्वर योनि-योनिको.--'योनि योनिम्' इस योनि योनिमिति वीप्सया मूल- द्विरुक्तिसे मूलप्रकृतिरूपा माया और प्रकृतिर्मायावान्तरप्रकृतयो विय- अवान्तर प्रकृतिरूप आकाशादि-ये दादयश्च सूचितास्ताः प्रकृतीः | दोनों प्रकृतियाँ ( योनियाँ ) सूचित सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेनाधिष्ठाय तिष्ठ- होती है उन दोनों प्रकारको प्रकृतियोंको सत्ता-स्फूर्तिप्रदरूपसे त्यन्तर्यामिरूपेण । “य आकाशे अधिष्ठित करके अन्तर्यामीरूपसे तिष्ठन्" (वृ० उ०३।७।१२) । स्थित है जैसा कि "जो आकागमें इत्यादि श्रुतेः । एको- स्थित है" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध ऽद्वितीयः । यस्मिन्मायाद्यधिष्ठात- होता है । जो एक अद्वितीय है । जिस मायादिके अधिष्ठाता ईश्वर में यह रीश्वर इदं सर्व जगदुपसंहारकाले सम्पूर्ण जगत् प्रलयकालमें सगत- समेति संगच्छते लयं प्राप्नोति । लयको प्राप्त होता है और फिर सृष्टि- पुनः सृष्टिकाले विविधमेत्या- कालमे विविधताको प्राप्त होताअर्थात् काशादिरूपेण नाना भवति । तं आकाशादिरूपसे नानाकार हो जाता है उस प्रस्तुत अधिष्ठाता, ईशान- प्रकृतमधिष्ठातारमीशानं नियन्तारं नियन्ता, वरद-मोक्षप्रद, देव- वरदं मोक्षप्रदं देवं द्योतनात्मक- प्रकाशवरूप और ईड्य–वेदादि- मीड्यं वेदादिभिः स्तुत्यं निचाय्य द्वारा स्तुत्यको अनुभव कर में ब्रह्म निश्चयेन ब्रह्माहमस्मीत्यपरोक्षी- हूँ' इस प्रकार निश्चयरूपसे प्रत्यक्ष कृत्य सुषुप्त्यादौ प्रत्यक्षीकृता कर सुषुप्ति आदिमें अनुभव की हुई जो सर्वोपरतिरूपा सर्वजनहितकारिणी या सर्वोपरमलक्षणा सर्वजनीना शान्ति है वह यहाँ 'इदम्' शब्दसे- शान्तिः सेदमा दर्शिता तां । 'डमाम्' इस संकेतसे दिखायी गयी है, प्रसिद्धामिमां शान्तिं सर्वदुःख- उस इस प्रसिद्ध शान्तिको अर्थात् सर्व- विनिर्मुक्तसुखैकतानस्वरूपां मुक्ति- दु.खशून्यसुखैकतानतारूपा मुक्तिको श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ 3bd मिति यारत् । गुरूपदिष्टत- प्राप्त हो जाता है । तात्पर्य यह है कि गुरुके उपदेश किये हुए 'तत्त्वमसि' त्वमादिवाक्यजन्यसुतत्त्वज्ञानेना- आदि वाक्योंसे उत्पन्न होनेवाले विद्यातत्कार्यादिविश्वमायानिवृत्त्या- सम्यक्तत्त्वज्ञानसे अविद्या और उसके कार्यादिरूप सम्पूर्ण मायाके निवृत्त हो त्यन्तं पुनरावृत्तिरहितं यथा जानेसे वह आत्यन्तिकी-जिससे कि वह पुनरावृत्तिशून्य हो जाता है ऐसी भवति तथैत्येकरसो भवती- मुक्तिको प्राप्त हो जाता है; अर्थात् एकरस (ब्रह्मस्वरूप ) हो जाता त्येतत् ॥११॥ है ॥ ११॥ अखण्डज्ञानकी सिद्धिके लिये परमात्माकी प्रार्थना सूत्रात्मानं प्रत्यविरतमभि अब अखण्ड तत्त्वज्ञानकी सिद्धिके मुखतया वीक्षन्तं परमेश्वरं प्रत्य- लिये श्रुति सूत्रान्माके प्रति निरन्तर खण्डिततत्त्वज्ञानसिद्धये प्रार्थना- अभिमुख रहकर दृष्टिपात करनेवाले माह परमात्माकी प्रार्थना करती है- यो देवानां प्रभवश्वोद्भवश्व विश्वाधिपो रुद्रो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भ पश्यत जायमानं स नो बुद्धया शुभया संयुनक्तु ॥१२॥ जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति और ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्का स्वामी और सर्वज्ञ है तथा जिसने सबसे पहले हिरण्यगर्भको अपनेसे उत्पन्न देखा था वह हमे शुद्ध वुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १२ ॥ यो देवानामिति । पूर्वमेवास्य 'यो देवानाम्' इत्यादि । इसका अर्थ पहले (अध्याय ३ मन्त्र ४ में) प्रतिपादितोऽर्थः ॥१२॥ , ही कह दिया गया है ॥ १२ ॥ -- अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ ब्रह्मप्रमुखाणां देवानां स्वामि अब, ब्रह्मादि देवताओंके स्वामित्व, तामाकाशादिलोकाश्रयत्वं प्रमा- आकाशादि लोकोंके आश्रयत्व, त्रादीनां नियन्तृत्वं बुद्धिशुद्धि- प्रमातादिके नियन्तृत्व और बुद्धिको द्वारा सम्यग्ज्ञानसिद्धयर्थं मुमु- शुद्धिके द्वारा सम्यग्ज्ञानकी सिद्धिके क्षुभिः प्रार्थ्यमानत्वं च परमेश्वर- लिये मुमुक्षुओद्वारा प्रार्थनीयत्व आदि स्याह- परमात्माके गुणोका वर्णन करती है- यो देवानामधिपो यस्मॅिल्लोका अधिश्रिताः । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥१३॥ जो देवताओंका स्वामी है, जिसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं और जो इस द्विपद एव चतुष्पद प्राणिवर्गका शासन करता है उस आनन्दस्वरूप देवकी हम हविके द्वारा परिचर्या (पूजा) करें ॥१३॥ यो देवानामधिप इति । यः 'यो देवानामधिपः' इत्यादि । जिसका यहाँ प्रसग है ऐसा जो प्रकृतः परमेश्वरो देवानां ब्रह्मा- परमेश्वर ब्रह्मादि देवताओंका अधि- दीनामधिपः स्वामी यस्मिन् पति-स्वामी है, सबके कारणभूत परमेश्वरे सर्वकारणे भृरादयो जिस परमेश्वरमे भूर्लोकादि सम्पूर्ण लोक अधिश्रित--अधि-ऊपर श्रित लोका अधिश्रिता अध्युपरि श्रिता अर्थात् अध्यस्त है तथा जो प्रकृत अध्यस्ता इति यावत् । यः प्रकृतः । परमेश्वर इस मनुप्यादि द्विपाद् ( दो परमेश्वरोऽस्य द्विपदो मनुष्यादे- पैरवाले ) और पशु आदि चतुप्पाद् जीवसमुदायका शासन करता है। श्चतुष्पदः पश्वादेश्वेश ईष्टे । तका- 'ईशे' इस क्रियापदमें तकारका लोप रलोपश्छान्दसः । कस्मै काया- वैदिक है ।* उसक-आनन्दरूप- मूलमें [ 'क' शब्दकी चतुर्थीक एक नन्दरूपाय | स्मभावोऽपि च्छा- वचनको] 'स्मै' आदेश वैदिक है- न्दसः । देवाय द्योतनात्मने देव यानी द्योतनात्मक (प्रकाशस्वरूप) * वास्तवमें यह पद ईश+ते ईष्टे है । है क्योंकि सर्वनाम शब्दोंसे परे 'हे' विभक्तिको ही स्मै' आदेश होता है । . १ १९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय तस्मै हविषा चरुपुरोडागादि- को हवि--चरु-पुरोडाशादि द्रव्यसे द्रव्येण विधेम परिचरेम । विधेः विधेम-पूजे । परिचर्या (पूजा) ही जिसका कर्म है ऐसे 'विध' धातुका परिचरणकर्मण एतद्रूपम् ॥१३॥ | यह रूप है* ॥१३॥ परमात्मनानसे गान्ति-प्राप्ति एव बन्धननाशका पुनः उपदेश परस्यातिसूक्ष्मत्वं जगचके यद्यपि परमात्माके अत्यन्त सूक्ष्मत्व, साक्षित्वेनावस्थितत्वं निखिल- जगचक्रमे साक्षीरूपसे स्थित होने, सम्पूर्ण जगत्को रचने, सर्वरूप होने जगत्स्रष्ट्रत्वं सर्वात्मकत्वं तत्ता- एवं उसके तादात्म्य-ज्ञानसे जीवोंकी दात्म्याजनानां मुक्तिश्चेत्येत- मुक्ति होनेका ऊपर अनेक प्रकारसे प्रतिपादन किया जा चुका है, तथापि द्वहुशोऽधस्तात्प्रतिपादितं यद्यपि यह सब समझनेमे सुगमता हो जाय तथापि बुद्धिसोकर्यार्थं पुनरप्याह- -इसलिये श्रुति फिर भी कहती है- सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैक परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मसे भी मूक्ष्म, अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्गम स्थानमें स्थित, जगत्के रचयिता, अनेकरूप और संसारको एकमात्र भोग प्रदान करनेवाले शिवको जानकर जीव परम गान्ति प्राप्त करता है ॥१४॥ * यद्यपि 'विध विधाने' (तुदा० पर० सेट् ) धातुसे विधि लिडके उत्तम पुत्यके बहुवचनमें 'विवेम' ल बनता है। तथापि विधानका तात्पर्य परिचर्या (पूजा) में ही है-रेमा मान लेनेसे अर्थ ठीक हो जाता है। अथवा 'धातु' के अनेक अर्थ होते है इस न्यायसे भी परिचर्या अर्थ ठीक ही है । +कलिल' शब्दके अर्थमें टीकाकारोंका मतभेद है। प्रस्तुत अर्थ शाबर- भाष्यके अनुसार है । विज्ञानभगवान्ने भी वही अर्थ किया है। नारायणतीर्थ 'कलिलय मध्ये' का अर्थ 'तमसो मधे–'अजानके मध्यमें करते हैं तथा शङ्करा- नन्दनी इस शब्दकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं- 'नारीवीर्येण संगत पौल्प अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९१ ख्यातम् ॥१४॥ सूक्ष्मेति । पृथिव्यायव्याक 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इत्यादि । तान्तमुत्तरोत्तरं सूक्ष्मसूक्ष्मतरमपे- 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मम्' इस पदसे श्रुति पृथिवीसे लेकर अव्याकृतपर्यन्त जो क्ष्येश्वरस्य तदपेक्षया सूक्ष्मतमत्व- उत्तरोत्तर सूक्ष्म और सूक्ष्मतर हैं माह-सूक्ष्मातिसूक्ष्ममिति । उनकी अपेक्षा भी ईश्वरकी सूक्ष्मतमता बतलाती है । कलिलके मध्यमें अर्थात् कलिलस्याविद्यातत्कार्यात्मकदुर्ग- अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्ग-- स्य गहनस्य मध्ये । शेषं व्या- | गहन [ स्थान ] के मध्यमे । शेप अशकी पहले व्याख्या हो चुकी है ॥१४॥ परस्य साक्षिरूपेणावस्थितत्वं अब परमात्माके साक्षिरूपसे स्थित होने, सनकादि और ब्रह्मादि सनकादिभिर्ब्रह्मादिदेवैश्वाधिकारि देवताओं एव अधिकारी पुरुषोंद्वारा पुरुषैरप्यात्मतया प्राप्यत्वं साधन- | आत्मस्वरूपसे प्राप्तव्य होने तथा साधनचतुष्टयादिसे सम्पन्न होनेपर हम चतुष्टयादियुतास्मदादीनां मोक्ष- लोगोंको भी मोक्ष प्राप्त होनेका सिद्धिं चाह- प्रतिपादन किया जाता है-- स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥ वही अतीत कपोंमे विश्वका रक्षक था, वही विश्वका स्वामी और सम्पूर्ण भूतोमे स्थित है । [ ऐसे ] जिस परमात्मामें ब्रह्मर्पि और देवगण वीर्यमल्पकालस्थ कलिलमित्युच्यते । अथवा जगदारम्भकाणामण बुबुदस्य पूर्वा- वस्था कलिलमित्युच्यते । फेनिलान्युदकानीत्यर्थ.' अर्थात् स्त्रीके रजसे मिला हुआ पुरुषका वीर्य कुछ काल स्थित रहनेपर 'कलिल' कहा जाता है । अथवा जगत्की रचना करनेवाले जलके बुलबुलेकी पूर्वावस्था 'कलिल' कही जाती है अर्थात् फेनयुक्त जल ।
श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय १ अभिन्नरूपसे स्थित है उसे इस प्रकार जानकर पुरुष मृत्युके पागोंको काट डालता है ॥१५॥ । स एवेति । स एव प्रकृतः 'सं एवं' इत्यादि । वह प्रकृत परमेश्वर ही कालमें----अतीत कल्पों- कालेऽतीतकल्पेषु जीवसञ्चित- में अर्थात् जीवोंके सञ्चित कोक कर्मपरिपाकसमये भुवनस्य गोप्ता फलोन्मुख होते समय भुवनका गोप्ता तत्तत्कर्मानुगुणतया रक्षिता । यानी विभिन्न जीवोंक कर्मानुसार उनका रक्षक था । वह विश्वाधिप- विश्वाधिपः विश्वस्य स्वामी । सर्व- विश्वका स्वामी, समस्त भूतोंमें गूट भृतेषु गूढो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त साक्षिमात्रतयावस्थितः । यस्मिं- समस्त प्राणियों में साक्षीरूपसे स्थित है। श्विद्घनानन्दवपुपि परे युक्ता जिस चिद्घनानन्दविग्रह परमात्मामें ऐक्यं प्राप्ताः । ते के ? ब्रह्मर्पयः युक्त-ऐक्यभावको प्राप्त हैं; कौन ? सनकादि ब्रह्मर्पि और ब्रह्मादि सनकादयः । देवता ब्रह्मादयः । देवगण । उसी ईश्वरको जानकर तमेवेश्वरं ज्ञात्वा ब्रह्माहमस्मीत्य- अर्थात् 'मै ब्रह्म हूँ' इस प्रकार साक्षात्कार कर [ पुरुप ] मृत्युके परोक्षीकृत्य मृत्युपाशान् मृत्यु- पाशोंको काट डालता है। अविद्या रविद्या तमो रूपादयश्च पाशाः । अर्थात् तम ही मृत्यु है तथा रूपादि पाश्यन्त इति पाशास्तान् “मृत्यु विषय पाश हैं, क्योंकि उनमें ही जीव पाशित (वद्ध) होते हैं, अतः तमः" (बृ० उ० १।३।२८) वे पाश हैं; श्रुति कहती है-"अज्ञान इति श्रुतेः । तत्कार्यकाम- मृत्यु ही है।" उस ( अज्ञान ) कर्मच्छिनत्ति नाशयति । ऐक्य- के कार्य काम और कर्मादिको काट डालता यानी नष्ट कर देता है; रूपस्वप्रकाशाग्निना दहतीत्यर्थः । अर्थात् ऐक्यरूप स्वप्रकाशाग्निसे भस्म 1॥१५॥ कर देता है ।। १५॥
अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९३ परस्यात्यन्तातिसूक्ष्मतमत्वमा अव श्रुति परमात्माका अत्यधिक नन्दातिशयवत्त्वं निर्दोषवत्वं सूक्ष्मतम, अतिशय आनन्दवान् और जीवेष्वतिसूक्ष्मतया स्वरूपेणा- निर्दोप होना, जीवोंमे अत्यन्त सूक्ष्म- वस्थितत्वं सर्वस्यापि सत्तादि- देनेवाला होनेसे व्यापक होना तथा रूपसे स्थित होना, सबको सत्तास्फूर्ति प्रदतया व्यापित्वं तदेकत्वज्ञानात् उसके एकत्वज्ञानसे बन्धनका नाश पाशहानिं च दर्शयति होना दिखलाती है-- घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्म ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यक परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥ घृतके ऊपर रहनेवाले उसके सार भागके समान अत्यन्त सूक्ष्म शिवको भूतोमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित जानकर तथा विश्वके एकमात्र भोगप्रद उस देवका साक्षात्कार कर पुरुप समस्त बन्धनोसे मुक्त हो जाता है ॥१६॥ घृतादिति । घृतोपरि विद्य 'घृतात्' इत्यादि । जिस प्रकार घृतके ऊपर रहनेवाला मण्ड-- मानं मण्डं सारस्तद्वतामतिप्रीति- उसका सारभाग घृतवालोंकी अत्यन्त विषयो यथा तथा मुमुक्षूणामति- प्रीतिका विषय होता है उसी प्रकार परमात्मा मुमुक्षुओंको साररूप साररूपानन्दप्रदत्वेन निरतिशय- अत्यन्त आनन्द प्रदान करनेके प्रीतिविषयः परमात्मा तद्वद् कारण उनकी निरतिशय प्रोतिका विषय है। उस घृतके सारके समान घृतसारवदानन्दरूपेणात्यन्तसूक्ष्म आनन्दरूपसे अत्यन्त सूक्ष्म शिवको, ज्ञात्वा शिवमित्येतद्व्याख्यातम् । 'शिव' शब्दकी व्याख्या पहले की जा चुकी है, समस्त भूतोंमें ब्रह्मासे सर्वभूतेषु गूढं ब्रह्मादिस्तम्ब- लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त जीवोंमें श्वे० उ० २५-२६- २९१ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अन्याय पर्यन्तेषु जन्तुषु कर्मफलभोग- गूढ जानकर कर्मफलनोगके साझी- रूपले प्रत्यकन्या वर्तमान रहते साक्षित्वेन प्रत्यक्षतया वर्तमान- हुए भी उन (काम-नादि ) के द्वारा उनना ईश्वरत्व तिरस्कृत हो मपि तैस्तिरस्कृतेश्वरभावम् । उत्त- गग है [ इसलिये उसे गूढ कहा जाता है। उत्तरार्वत्री व्याख्य राषं व्याख्यातम् ॥१६॥ की जा चुकी है ॥१३॥ परमात्मसाझाकारके सापन प्रातच - निमंदसुर्खेकतानात्मनो विश्व अब भेवन्य मुखैकरन आनाक विश्वकर्नेल एवं विश्वव्यापि त्या कृत्वं तद्व्यापित्वं संन्यासिमि- संन्यासियोंद्वारा मोन- राप्तव्यमाक्षरूपत्वं चाह- वल्पताका वर्णन करते हैं-- एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः । हृदा मनीषा मनसाभिक्लप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ व्ह सर्वव्याग देव जगाऔर सर्वदा सनत जार्गक हत्यमें स्थित है । यह प्रचनियेने उग्नेश, आन्मानानविन बुद्धि और एकजनानक द्वारा प्रकाशित होता है. इसे जो जानते हैं वे अनर हो जाते हैं ॥१७॥ एप इति । एप प्रकृतो देवो 'ए देवों इत्यादि । यह प्रत देव-गेतनाननपरमात्नाग्विकर्मा द्योतनात्मको विश्वकर्मा । महदादि है। महनादि विश्व कर्म है. यह विश्वं कर्म क्रियत इति कर्म माया- किया जाता है इसलिये कर्न है; मायाक संसर्गन चिल्प कार्य वेशाद्विश्वस्पं कार्यमस्येति विश्व- इसीना है इसलिये यह विश्वकर्मा
अध्याय ४]
शाङ्करभाष्यार्थ
१९५
कर्मा । महांश्वासावात्मेति महात्मा है । तथा महान् और आत्मा होनेके
सर्वव्यापीत्यर्थः । सदा सर्वदा कारण यह महात्मा अर्थात् सर्वव्यापी
है। यह सर्वदा जीवोंके हृदय-
जनानां हृदये परमे व्योनि हृदा- परव्योम यानी हृदयाकाशमे जलादि
काशे जलायुपाधिषु सूर्यप्रति- उपाधियोंमें सूर्यप्रतिविम्वके समान
विम्ववन्निविष्टः
निविष्ट अर्थात् सम्यक्रूपसे स्थित
सम्यस्थित
है। वही साक्षीरूपसे हृदा---'हञ्
इत्येतत् । स एव साक्षिरूपेण हृदा हरणे' ( 'ह' धातु हरणार्थक है )
'हृञ् हरणे' इति स्मरणाद्धर- ऐसी [ धातुसूत्ररूप ] स्मृति होनेके
कारण जो हरण करे उसका नाम
तीति हत्तेन हृदा नेति नेतीति
हृत् है उसके द्वारा यानी 'नेति-
निषेधोपदेशेन मनीषायं पुरुषाः नेति' इत्यादि निषेधोपदेशसे, मनीपा
र्थोऽयमपुरुषार्थोऽयमात्मायमना---'यह पुरुषार्थ है और यह
अपुरुषार्थ है, यह आत्मा है और
स्मेत्येतया विवेकबुद्धया मनसा
यह अनात्मा है' इस प्रकारको
विचारसाध्यैकत्वज्ञानेन चाभि- विवेकबुद्धिसे तथा मनसा----विचार-
साध्य एकत्वज्ञानसे अभिक्लप्त---
क्लप्तः प्रकाशितोऽखण्डकरसत्वे-
प्रकाशित होता-यानी अखण्डैक-
नाभिव्यक्त इत्येतत् । रसस्त्ररूपसे अभिव्यक्त होता है।
ये जनाः साधनचतुष्टयसंपन्नाः
जो जन अर्थात् साधनचतुष्टय-
संन्यासिन
सम्पन्न संन्यासिगण इसे 'यह 'तत्त्व-
एतत्तत्त्वमस्यादि-
मसि' आदि वाक्योंसे प्रतिपादित
वाक्यप्रतिपाद्यैकरूपमखण्डैकरस- अखण्डैकरसरूप है' इस प्रकार
मिति यावद्विदुर्ब्रह्माहमस्मीत्य- जानते हैं अर्थात् 'मैं ब्रह्म है इस
परोक्षीकुर्युस्ते यथोक्तज्ञानिनो- प्रकार इसका साक्षात्कार करते हैं वे
इस तरह बतलाये हुए ज्ञानीलोग
ऽमृता भवन्त्यमरणधर्माणः पुनरा- अमृत-अमरणधर्मा अर्थात् पुनरा-
वृत्तिरहिता भवन्तीत्यर्थः ।।१७॥ वृत्तिशून्य हो जाते हैं ॥ १७ ॥
१९६ श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ४ - बानसे द्वैत-निवृत्तिका उपदेश कालत्रयेऽपि मुक्तौ प्रलयादो तीनों ही कालमें तया मुक्ति और प्रलय आदिमे भी परमात्मा कूटस्थ च परमात्मा कूटस्थ इति निश्चया- ही है---ऐसा निश्चय होनेसे जाग्रत् जाग्रत्स्वप्नयोरपि भ्रान्त्या सद्वि- और स्वप्नमे भी भ्रान्तिसे ही द्वैत- प्रतीति होती है; वस्तुतः तो तीयत्वावभासः । वस्तुतस्तु सदा सर्वदा अभेद ही है-यह वात श्रुति निर्मद एवेत्याह- वतलाती है- यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि- नसन्न चासञ्छिव एव केवलः । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥ जिस समय अज्ञान नहीं रहता उस समय न दिन रहता है न रात्रि और न सत् रहता है न असत्, एकमात्र शिव रह जाता है; वह अविनाशी और आदित्यमण्डलाभिमानी देवका भजनीय है तथा उसीसे पुरातन प्रज्ञा (गुरुपरम्परागत ज्ञान ) का प्रसार हुआ है ॥१८॥ यदति । यदा यस्यामवस्था 'यदा' इत्यादि । जिस अवस्थामें अतम-जिसमे तम (अज्ञान ) यामतमो न तमोऽस्येत्यतमस्तत्त्व- नहीं है ऐसा अतम रहता है मादिवास्यजन्यज्ञानेन दीपस्था- अर्थात् जब दीपकरूप तत्त्वमस्यादि- वाक्यजनित ज्ञानसे अविद्या दग्ध नीयेन दग्धाविद्या तत्कार्यरूपतम- हो जाती है, क्योंकि वह अपने कार्यल्प तमवाली है, उस समय स्कत्वात्तदा तत्काले न दिवा न दिन-दिनका आरोप होता दिवारोपोऽपि नास्ति न रात्रिस्त- है और न रात्रि--रात्रिका ही ।
अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ दारोपोऽपि नास्तीति सर्वत्रा- आरोप होता है-इस प्रकार 'आरोप' शब्दका सबके साथ सम्बन्ध लगाना नुपङ्गः । न सन्सत्तारोपोऽपि । चाहिये । और न सत्-सत्ताका आरोप रहता है न असत्-अभाव- नासन्नभावारोपोऽपि । का आरोप ही रहता है। तर्हि तत्त्वं सर्वत्र शून्यमेव तब तो सर्वत्र शून्य ही तत्त्व रहा-इस प्रकार वौद्धमतके सादृश्य- जातमिति बौद्धमताविशेषमाश- की आशङ्का करके श्रुति कहती है ङ्कयाह-शिव एवेति । शिव -'शिव एव' इत्यादि । उस समय एव शुद्धस्वभावो न शून्यमिति शिव यानी शुद्धस्वभाव परमात्मा ही रहता है, शून्य नहीं रहता-यह अर्थ निपातार्थः । केवलोऽविद्यावि- निपातसे ध्वनित होता है । वह केवल कल्पशून्यः । तदक्षरं तदुक्तस्वरूपं अर्थात् अविद्यारूप विकल्पसे रहित, अक्षर-उसके स्वरूपका क्षय नहीं न क्षरतीत्यक्षरं नित्यं तत्तत्पद- होता इसलिये अक्षर यानी नित्य, तत् लक्ष्यं सवितुरादित्यमण्डलाभि -तत्पदका लक्ष्यार्थ तथा सविता मानिनो वरेण्यं संभजनीयम् । -आदित्यमण्डलाभिमानी देवताका वरेण्य--वरणीय यानी सम्यक्प्रकार- प्रज्ञा गुरूपदेशात्तत्वमादिवाक्यजा से भजनीय है । उस शुद्धत्वके हेतुसे बुद्धिः, चकार एवकारार्थः, प्रज्ञा--गुरुके उपदेशसे 'तत्त्वमसि' तस्माच्छुद्धत्वहेतोः प्रसृता नित्य- आदि वाक्यसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धि प्रसृत हुई है अर्थात् नित्य पदाथके विवेकादिमत्सु संन्यासिपु व्याप्ता विवेकादिसे सम्पन्न संन्यासियोमे पूर्णत्वाकारेण पुराणी ब्रह्माण- पूर्णत्वरूपसे व्याप्त हुई है । वह पुराणी यानी ब्रह्मासे आरम्भ करके परम्परासे मारभ्य परम्परया प्राप्तानादि- प्राप्त हुई है अर्थात् अनादिसिद्धा है । सिद्धा ॥१८॥ यहाँ चकार एवके अर्थ में है ॥१८॥ , - १९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्रह्मके अनुपम एव इन्द्रियातीत स्वरूपका वर्णन कूटस्थस्य ब्रह्मण ऊर्ध्वादिपु अब श्रुति यह बतलाती है कि कूटस्थ ब्रह्म ऊर्जादि दिशाओंमें किसी- दिक्षु केनाप्यपरिग्राह्यत्वमद्वितीय- से भी ग्राह्य नहीं है, अद्वितीय होनेके त्वाकेनाप्यतुलितत्वं कालदिगा- कारण कोई उसके समान नहीं है, तथा वह काल-दिगादिसे अनवच्छिन्न धनवच्छिन्नयशोरूपत्वं चाह- यशःस्वरूप है-- नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥१६॥ उसे ऊपरसे, इधर-उधरसे अथवा मध्यमें भी कोई ग्रहण नहीं कर सकता । जिसका नाम महद्यश है ऐसे उस ब्रह्मकी कोई उपमा भी नहीं है ॥१९॥ नैनमिति । एनं प्रकृतमपरि 'नैनम्' इत्यादि । अपरिच्छिन्न, च्छिन्नरूपत्वानिरंशत्वान्निरवयव- निरंश और निरवयव होनेके कारण त्वाचोर्ध्वादिषु दिक्षु कश्चिदपि इस प्रकृत ब्रह्मको ऊर्ध्वाढि दिशाओंमें न परिजग्रभत्परिग्रहीतुं न शक्नु- कोई ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं है। अखण्डानन्दानुभवरूप होनेसे उसके यात् । तस्य तस्यैवेश्वरस्थाखण्ड- समान कोई दूसरा न होनेसे उस सुखानुभवत्वादेतादृशद्वितीयामा- ईश्वरकी कोई प्रतिमा-उपमा नहीं वात्प्रतिमोपमा नास्ति । यस्य है। जिसका नाम महद्यश है अर्थात् नाम महद्यशो यस्येश्वरस्य नामा- जिस ईश्वरका नाम-अभिधान महत् भिधानं महदिगाधनवच्छिन्नं -दिगादिसे अपरिमित यानी सर्वत्र सर्वत्र परिपूर्ण यशः कीर्तिः।।१९।। पूर्ण यश-कीर्ति है* ॥१९॥ * अर्यात् 'वह दिगाधनवच्छिन्न कीर्तिवाला' है।
- अध्याय ४] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ -- ईशस्येन्द्रियाद्यविषयतां प्रत्य अब श्रुति ईश्वरकी इन्द्रियादिकी अविषयता, प्रत्यग्रूपता और उसके ग्रूपतां तदैक्यज्ञानान्मोक्षतां साथ आत्माके एकत्वका ज्ञान होनेसे चाह मोक्षप्राप्तिका वर्णन करती है- न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थं मनसा य एन- मेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥२०॥ इसका स्वरूप नेत्रादिसे ग्रहण करनेयोग्य स्थानमे नहीं है, इसे कोई भी नेत्रद्वारा नहीं देख सकता । जो इस हृदयस्थित परमात्माको शुद्ध बुद्धि यानी मनसे इस प्रकार जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥२०॥ न संदृश इति । अस्य प्रकृते 'न संदृशे' इत्यादि । इस प्रकृत ईश्वरका रूप अर्थात् रूपादिरहित श्वरस्य रूपं स्वरूपं रूपादिरहितं निर्विशेष खप्रकाश अखण्डानन्दा- निर्विशेषं स्वप्रकाशाखण्डसुखानु-नुभवमय स्वरूप संदृश-नेत्रादि भवं संदृशे चक्षुरादिग्रहणयोग्य- इन्द्रियोसे ग्रहण करनेयोग्य प्रदेशमें स्थित नहीं है, अर्थात् यह उनका प्रदेशे न तिष्ठति तद्विपयो न विषय नहीं होता । इन्द्रियोंका विषय भवतीत्येतत् । इन्द्रियागोचरत्वा- न होनेसे ही इस प्रकृत परमात्माको कोई भी नेत्रसेनेन यहाँ समस्त देवैनं प्रकृतं चक्षुरित्युपलक्षणम् । इन्द्रियोंको उपलक्षित करता है, अतः सर्वेन्द्रियैरपि कश्चन कोऽपि न किसी भी इन्द्रियसे नहीं देख सकता अर्थात् इसे इन्द्रियोंके विषयरूपसे पश्यति तद्विपयतया ग्रहीतुं न ग्रहण नहीं कर सकता। "जिसे कोई शक्नुयात् । “यञ्चक्षुपा न पश्यति । नेत्रद्वारा नहीं देख सकता अपि तु २०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ शुद्धबुद्ध्यैतद्व्याख्यातं मनसेति साधनचतुष्टयादिसम्पन्न सन्यासी यानी येन चक्षुपि पश्यति" (के० उ० जिसकी सत्तासे नेत्र देखता है" १ । ६) इत्यादिश्रुतेः । हृदा इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है । जो योग्य अधिकारी हृदयस्थित–हृदया- हृदिस्थं हृदाकाशगुहास्थं प्रत्य- काशरूप गुहामे स्थित अर्थात् वहाँ क्तया तत्रावस्थितं ये साधन- प्रत्यक्रूपसे विद्यमान इस प्रकृत ब्रह्मरूप आत्माको हृदय-शुद्धबुद्धि- चतुष्टयादियुक्ताः संन्यासिनो से, इसीकी व्याख्या करके कहते हैं योग्याधिकारिण एनं प्रकृतं ब्रह्मा- 'मनसे' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे जानते त्मानमेवमित्थं ब्रह्माहमस्मीत्य- हैं कि 'मैं ब्रह्म है' वे उस साक्षात्कार- परोक्षेण विदुर्जानन्ति तेऽपरोक्षी- | की महिमासे अमृत-अमरणधर्मा करणमहिम्नामृता भवन्त्यमरण- हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि मरणके हेतुभूत अज्ञानादिका तत्त्व- धर्माणो भवन्ति । मरणहेत्वविद्या- ज्ञानरूप अग्निसे दाह हो जानेके देस्तत्त्वज्ञानाग्निना दग्धत्वात्पुन- कारण वे पुनः अन्य देह धारण देहान्तरं न भजन्तीत्यर्थः ॥२०॥ नहीं करते ॥२०॥ परमेश्वरका स्तवन इदानीं तत्प्रसादादेवेष्टप्राप्ति अब यह मानकर कि उसीकी कृपासे इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्ति परिहाराविति मत्वा तमेव परमेश्वरं हो सकती हैं दो मन्त्रोंसे उस परमे- प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन- श्वरकी ही स्तुति करते हैं- अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते । रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥२१॥ हे रुद्र । तुम अजन्मा हो, इसलिये कोई [मुझ-जैसा ] संसारभयसे कातर पुरुष तुम्हारी शरण लेता है [ और कहता है कि ] तुम्हारा जो दक्षिण मुख है उससे मेरी सर्वदा रक्षा करो ॥ २१ ॥ [
अध्याय ४]
शाङ्करभाष्यार्थ
२०१
-
अजात इति । इतिशब्दो 'अजात.' इत्यादि । मूलमें 'इति'
हेत्वर्थः। यस्मात्चमेवाजातो ज-
शब्द हेतुवाचक है। क्योंकि तुम्ही
अजात यानी जन्म, जरा, क्षुधा,
न्मजराशनायापिपासाधर्मवर्जितः।
पिपासादि धमोंसे रहित हो, और सब
इतरत्सर्वं विनाशि दुःखान्वितम् , तो नाशवान् एवं दुःखी हैं, इसलिये जो
जन्म-जरा-मरण, क्षुधा-पिपासा एवं
तस्माजन्मजरामरणाशनायापिपा-
शोक-मोहादिपूर्ण ससारसे डरा हुआ है
साशोकमोहान्वितात्संसारागीरु- ऐसा कोई एक मैं परतन्त्र जीव
भीतः सन्कश्चिदेक एव परतन्त्र- तुम्हारी ही शरण लेता हूँ, अथवा
कोई मुझ-जैसा शरण लेता है.
स्त्वामेव शरणं प्रपद्ये मादृशो वा
इस आशयसे इस क्रियाका प्रथम
कश्चित्प्रपद्यत इति प्रथमपुरुष- पुरुषसे सम्बन्ध किया जा सकता
है । अतः हे रुद्र ! तुम्हारा जो
मन्वधीयते । हे रुद्र यत्ते दक्षिणं
उत्साहजनक दक्षिण मुख है,
मुखमुत्साहजननं ध्यातमाह्लाद- जो ध्यान करनेपर आनन्द पैदा
करम् । अथवा दक्षिणस्यां दिशि | करनेवाला है अथवा दक्षिण दिशामें
होनेके कारण जो दक्षिण मुख है
भवं दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि उससे तुम नित्य-सर्वदा मेरी रक्षा
नित्यं सर्वदा ॥२१॥
करो ॥२१॥
तथा-
किश्च-
मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोपु
मा नो अश्वेषु रोरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधी-
हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥२२॥
हे रुद्र | तुम कुपित होकर हमारे पुत्र, पौत्र, आयु, गौ और अश्वोंमें
क्षय न करना और हमारे वीर सेवकोंका भी वध न करना । हम हव्य-
सामग्रीसे युक्त होकर सर्वदा ही तुम्हारा आवाहन करते हैं ॥२२॥
बेताबनरोपनिन्द् सन्याय ४ मा नइति ! ना गरि ति '-: इयादि। सत्र वष्यते । मा गसिः! इस क्रियाकन सक्ने यन्त्र सन दिनाना कानीः दलि:- नरक नजला नोक पुत्रं तनये दिन हरे नरें- -मो. युने तयार गैत्र न आवृति ना नो जानकारी रिययन गच ना नाय? मगधि । । हरे-किनी ये वाला वीर विक्रानन्तो हैं. छ अनहोत्र उगताहेलनानित क्षितः क - क न करे। सत्ता की जला: यना- लेहमहर्वि-त्-हारे युः बुनियन्तो हविया युजा इन हर ना ही उन्हात कहन इन् वा स्वानह नव मनाये- ज्यद उन्हें जो लं नाहान वयः ॥२॥ पूर्व ही करते हैं। रा को श्री स्हंसक नानादिमाये नुभयो ।
पञ्चम अध्याय अक्षराश्रित विद्या-अविद्या और उनके शासक परमेश्वरके स्वरूप तथा माहात्म्यका वर्णन पञ्चम चतुर्थाध्यायशेषमपूर्वार्थ प्रति चतुर्थ अध्यायमें अवशिष्ट रहे अपूर्व विषयका प्रतिपादन करनेके पादयितुं पञ्चमोऽध्याय आर- लिये 'द्वे अक्षरे' इत्यादि मन्त्रसे अध्याय आरम्भ किया भ्यते द्वे अक्षरे इत्यादिना- जाता है- द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्य निहिते यत्र गूढे । क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥१॥ हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट अविनाशी और अनन्त परब्रह्ममें जहाँ विद्या और अविद्या दोनों परिच्छिन्नभावसे स्थित हैं [ उनमें ] क्षर अविद्या है और अमृत विद्या है तथा जो इन विद्या और अविद्या दोनोंका शासन करता है वह इनसे भिन्न है ॥१॥ द्वे विद्याविद्ये यस्मिन्नक्षरे जिस अविनाशी एवं अनन्त यानी ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परे ब्रह्मपरे देश, काल या वस्तुसे अपरिच्छिन्न ब्रह्म- परस्मिन्वा ब्रह्मण्यनन्ते देशतः परमें—ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट कालतो वस्तुतो वापरिच्छिन्ने । अथवा परब्रह्ममें विद्या और अविद्या यत्र यस्मिन्द्वे विद्याविद्ये निहिते ये दोनों गूढ यानी अव्यक्तभावसे स्थापिते गूढे अनभिव्यक्ते । स्थित हैं । उन विद्या और अविद्याको विद्याविद्ये विविच्य दर्शयति- अलग-अलग करके दिखाते है- २०४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ क्षरं त्वविद्या क्षरणहेतुः संसृति- उनमें क्षर-क्षरणकी हेतु यानी कारणम् । अमृतं तु विद्या मोक्ष- ससारकी कारण तो अविद्या है और अमृत यानी मोक्षकी हेतु विद्या हेतुः । यस्तु पुनर्विद्याविद्ये ईशते है। और जो विद्या और अविद्याका नियमयति स ताभ्यामन्यस्त- शासन करता है वह उनका साक्षी साक्षित्वात् ॥१॥ होनेसे उन दोनोंसे भिन्न है ॥१॥ कोऽसावित्याह- वह कौन है ? सो बतलाते हैं- यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषि प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥ जो अकेला ही प्रत्येक स्थान तथा सम्पूर्ण रूप और समस्त योनियों ( उत्पत्तिस्थानों ) का अधिष्ठान है, तथा जिसने सृष्टिके आरम्भमें उत्पन्न हुए कपिल ऋषि ( हिरण्यगर्भ ) को ज्ञानसम्पन्न किया था और जन्म लेते हुए भी देखा था [ वही विद्या और अविद्यासे भिन्न उनका शासक है ]॥२॥ यो योनिमिति । यो योनि 'यो योनिम्' इत्यादि । जो योनि स्थानं स्थानं "यः योनि-योनिको-स्थान-स्थानको अर्थात् "जो पृथिवीमें स्थित होकर [पृथिवी- पृथिव्यां तिष्ठन्" (वृ० उ०३। का शासन करता है ]” इत्यादि ७/३) इत्यादिनोक्तानि पृथिव्या- | मन्त्रसे कहे हुए पृथिवी आदिको अधिष्ठित–नियमित करता है तथा दीन्यधितिष्ठति नियमयति । जो एकोऽद्वितीयः परमात्मा विश्वानि | लोहितादि सम्पूर्ण रूपोंको और रोहितादीनि रूपाणि योनीश्च योनियों-उत्पत्तिस्थानोंको अधिष्ठित प्रभवस्थानान्यधितिष्ठति । ऋपिं करता है; [ जिसने ] ऋपि यानी एक अद्वितीय परमात्मा २०५ शाङ्करभाष्यार्थ अध्याय ५] सर्वज्ञमित्यर्थः । कपिलं कनक- सर्वज्ञ प्रसूत-अपनेहीसे उत्पन्न किये कपिलवर्ण प्रसूतं स्खेनैवोत्पादितं हुए कपिल -सुवर्णसदृश कपिलवर्ण हिरण्यगर्भको पहले जन्म दिया था, हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्वमित्य- क्योंकि आरम्भमें हिरण्यगर्भका ही स्यैव जन्मश्रवणात् । अन्यस्य जन्म श्रुति प्रतिपादित करती है, चाश्रवणात् । उत्तरत्र "यो ब्रह्माणं अन्य ( महर्षि कपिल ) का जन्म नहीं बतलाती । कारण, आगे यह विदधाति पूर्व योवै वेदांश्च प्रहि- कहा जायगा कि "जो आरम्भमें णोति तस्मै" (श्वे० उ०६।१८) इति ब्रह्माको रचता है और उसके लिये वेदोंको प्रेरित करता है।" "कपिल वक्ष्यमाणत्वात् "कपिलोऽग्रज" पहले उत्पन्न होनेवाला है" इस इति पुराणवचनात्कपिलो हिरण्य- 'पुराणवचनसे भी कपिल या हिरण्य- गर्भो वा निर्दिश्यते- गर्भका ही निर्देश किया गया है । "कपिलर्षिर्भगवतः "जगत्का मोह नष्ट करनेके सर्वभूतस्य वै किल। लिये सर्वभूतमय भगवान् विष्णुके विष्णोरंशोजगन्मोह- नाशाय समुपागतः॥" ही अशस्वरूप मुनिवर कपिलने "कृते युगे परं ज्ञानं अवतार लिया है।" "सर्वभूतात्मा श्रीहरि कपिलादिवरूपधृत् । सत्ययुगमें कपिलादिरूप धारण कर ददाति सर्वभूतात्मा सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर उत्कृष्ट सर्वस्य जगतो हितम्।।" "त्वं शक्रः सर्वदेवानां ज्ञान प्रदान करते हैं।" "तुम समस्त ब्रह्मा ब्रह्मविदामसि । देवताओमें इन्द्र हो, ब्रह्मवेत्ताओंमे वायुर्वलवतां देवो ब्रह्मा हो, वलवानोंमें वायुदेवता हो, योगिनां त्वं कुमारका ऋपीणां च वसिष्ठस्त्वं योगियोंमें सनत्कुमार हो, ऋषियोंमें व्यासो वेदविदामसि । वसिष्ठ वेदवेत्ताओंमें व्यास हो, २०६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ५ सांख्यानां कपिलो देवो ज्ञानयोगियोंमें कपिलदेव होऔर रुद्रोंमें महादेव हो" इत्यादि पुराणवचनोंमें रुद्राणामसि शङ्करः॥" कपिल नामसे महर्षि कपिल ही इति परमर्पिः प्रसिद्धः। प्रसिद्ध हैं। "ततस्तदानीं तु भुवनमस्मि- अथवा "ततस्तदानीं तु भुवनम- प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स स्मिन् प्रवर्तते कपिलं कवीनाम् । स पोडशास्त्रः पुरुषश्च विष्णोर्विराजमान पोडशाखो पुरुषश्च विष्णोविराज- तमस' परस्तात् ।" इस मुण्डको- मानं तमसः परस्ताव" इति श्रूयते पनिषदकी श्रुतिके अनुसार वह मुण्डकोपनिषदि । स एव वा हिरण्यगर्भ ही पूर्वकालम सृष्टिके समय 'कपिल' नामसे प्रसिद्ध हुआ कपिलः प्रसिद्धोऽग्रे सृष्टिकाले । जिसे परमात्माने अपने ज्ञानोंसे- चो ज्ञानधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यैर्बिभर्ति धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वयोंसे वभार नायमानं च पश्येदपञ्य- युक्त किया और उत्पन्न होते दित्वर्थः ॥२॥ देखा ॥२॥ . तया- किच्च- एकैकं जालं बहुधा विकुर्व- न्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ इन संसारक्षेत्रमें यह देव [सृष्टिके समय ] एक-एक जालको* अनेक प्रकारसे विकृत कर [ अन्तमें ] संहार करता है; त्या यह महामा १. यह श्रुति नुण्डकोपनिने नहीं मिलती, अन्यत्र भी उसका पता नहीं चला। श्रुतिका पार भी गुह नहीं जान पड़ता । परम्पराते जैसा पाठ मिल वेस ही रहने दिया है और अर्यनंगति न लगनेके कारण उसका अनुवाद नहीं किया गया है। * 'जाल' शब्द अर्य टीकाकारोंने भिन्न-भिन्न प्रकारसे दिये हैं। भगवान् अध्याय ५] शाङ्करभाष्यार्थ २०७ ईश्वर ही [कल्पान्तरके आरम्भमें ] प्रजापतियोंको पुन. उत्पन्न कर सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ एकैकमिति । सुरनरतिर्यगा 'एकैकम्' इत्यादि । यह देव दीनां सृजति जालमेकैकं प्रत्येकं इस मायामय क्षेत्रमें सृष्टिके समय देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादिके एक- बहुधा नानाप्रकारं विकुर्वन्सृष्टि- एक जालको नाना प्रकारसे विकृत कालेऽस्मिन्मायात्मके क्षेत्रे संहर- करके रचता है और फिर संहार त्येष देवः । भूयः पुनर्ये लोकानां कर देता है। फिर यह ईश्वर महात्मा, जिस प्रकार इसने पूर्वकल्पमें मरीचि पतयो मरीच्यादयस्तान्सृष्ट्वा तथा आदि जो लोकाध्यक्ष हैं उन्हे रचा यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सृष्टवानीशः | था उसी प्रकार पुनः रचकर उन सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥३॥ सबका आधिपत्य करता है ॥३॥ -000१00--- तथा- किञ्च- सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्य- क्प्रकाशयन्भ्राजते यद्वनड्वान् । एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४॥ भाष्यकारने इसका कोई अर्थ नहीं किया । श्रीगङ्करानन्दजी लिखते हैं--'जाल महेन्द्रजाल ससाररूपं प्रतिप्राणिव्यवस्थितमित्यर्थ ' अर्थात् 'जाल शब्दका तात्पर्य है प्रत्येक प्राणीसे सम्बन्ध रखनेवाला ससाररूप महान् इन्द्रजाल ।' श्रीनारायणतीर्थ कहते हैं-'जालं कर्मफललक्षण बन्धम्' अर्थात् 'कर्मफलरूप बन्धन ही जाल है ।' तया विज्ञानभगवान्का कथन है-'जाल समष्टिरूप कार्यकरणलक्षणानि जालानि पुरुप मत्स्याना बन्धनत्वाजालवजालम्' अर्थात् 'समष्टिरूप भूत और इन्द्रियवर्गरूप जाल ही पुरुपरूप मत्स्योंको बॉधनेवाले होनेसे जालके समान जाल है।'
२०८ श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ५ जिस प्रकार सूर्य प्रकाशित होता है वैसे ही यह ऊपर, नीचे तया इधर-उधर समस्त दिशाओंको प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है। इस प्रकार वह द्योतनस्वभाव सम्भजनीय भगवान् अकेला ही कारणभूत पृथिवी आठिका* नियमन करता है ॥४॥ सर्वा दिश इति । सर्या दिशः 'सर्वा दिशः' इत्यादि । यह पूर्वादि समस्त दिशाओंको अर्थात् ऊपर- प्राच्याद्या ऊर्ध्वमुपरिटादधश्चा- नीचे और इधर-उधरकी दिशाओंको वस्तात्तिर्यक्पार्श्वदिशश्च प्रकाशयन् प्रकाशित करता हुआ अपने स्वरूप- स्वात्मचैतन्यज्योतिषा प्रकाशते भूत चित्प्रकाशसे भ्राजित यानी दीप्त होता है जैसे कि अनड्वान् । और भ्राजते दीप्यते ज्योतिपा यदु जिस प्रकार कि अनड्वान् यानी सूर्य अनड्वान्यद्वदित्यर्थः । यथानड्- जगच्चक्रको प्रकाशित करनेमे लगा वानादित्या जगचक्रावभासने युक्त हुआ है उसी प्रकार वह देव- एवं स देवो द्योतनस्वभावो द्योतनस्वभाव, भगवान्--ऐश्वर्यादि- सम्पन्न और वरेण्य-वरणीय- भगवानैश्वर्यादिसमन्वितो वरेण्यो सम्भजनीय योनि यानी कारण एक वरणीयः संभजनीयो योनिः अद्वितीय परमात्मा सम्पूर्ण जगत्के कारणं कृत्स्नस्य जगतः स्वभावान् स्वभाव यानी स्वात्मभूत पृथिवी आदि भावोको [अधिष्ठित करता है ] । स्वात्मभूतान्पृथ्व्यादीन्भावानथ अथवा [ 'योनिस्वभावान्' ऐसा वा कारणखभावान्कारणभूतान्पृ- समस्त पद माना जाय तो ] कारण- स्वभाव यानी कारणभूत पृथिवी थिव्यादीनधितिष्ठति नियमयति । आदिको अधिष्ठित-नियमित करता एकोद्वितीयः परमात्मा ॥४॥ * यह अर्थ मूलपाठ 'योनिस्वभावान्' मानकर किया गया है, जहाँ मूलमें 'योनिः स्वभावान्' ऐसा पाट है वहाँ योनिः' शब्द भगवान्का विशेषण होगा और 'स्वभावान्' का अर्थ 'स्वात्मभूतान् पृथिव्यादीन् भावान्' ( अपने स्वरूपभूत पृथिवी आदि भावोंको) होगा। है ||४|| अध्याय ५] शाङ्करभाष्यार्थ २०९ यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥ जगत्का कारणभूत जो परमात्मा [ प्रत्येक वस्तुके ] स्वभावको निष्पन्न करता है, जो पाच्यों ( परिणामयोग्य पदार्थों ) को परिणत करता है, जो अकेला ही इस सम्पूर्ण विश्वका नियमन करता है, और जो [सत्त्वादि] समस्त गुणोंको उनके कार्योंमें नियुक्त करता है [ वह परब्रह्म है ] ||५|| यच्च स्वभावमिति । यच्च 'यच्च स्वभावम्' इत्यादि । [यहाँ वैदिक-प्रक्रियानुसार ] 'यश्च' इस यश्चेति लिङ्गव्यत्ययः । स्वभावं पुल्लिङ्गके स्थानमे 'यच्च' इस प्रकार यदग्नेरौष्ण्यं पचति निष्पादयति लिङ्गव्यत्यय हुआ है । जो स्वभावको यानी अग्निके उष्णत्वको पचाता-निष्पन्न विश्वस्य जगतो योनिः । पाच्यांश्च करता है, विश्व-जगत्का कारण है पाकयोग्यान्पृथिव्यादीन्परिणाम- और पाच्य यानी पाक (परिणाम) योग्य पृथिवी आदिका परिणाम करता है, येद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठति जो अकेला इस सम्पूर्ण विश्वको नियमयत्येकः । गुणांश्च सत्त्वरज- अधिष्ठित-नियमित करता है तथा जो सत्त्व, रज एव तमोरूप गुणोंको स्तमोरूपान्विनियोजयेद्यः । एवं- नियुक्त करता है-ऐसे लक्षणोंवाला लक्षणः ॥५॥ परमात्मा है ॥५॥ . तथा- किञ्च तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तब्रह्मा वेदते वेदते ब्रह्मयोनिम् । श्वे० उ० २७-२८ २१० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदु- स्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥ वह वेदोके गुह्यभाग उपनिषदोमें निहित है, उस वेदवेद्य परमात्माको ब्रह्मा जानता है । जो पुरातन देव और ऋषिगण उसे जानते थे वे तद्रूप होकर अमर ही हो गये थे ॥ ६ ॥ तदिति । तत्प्रकृतमात्मस्वरूपं 'तद्वेद' इत्यादि । उस प्रकृत वेदानां गुह्योपनिपदो वेदगुह्योप- आत्माका स्वरूप वेदोंके गुह्यभाग जो निषदस्तासु वेदगुह्योपनिषत्सु उपनिषद् है उन वेदगुह्योपनिषदोंमें गूढं संवृतम् । ब्रह्मा हिरण्यगर्भो | गूढ--छिपा हुआ है । उस ब्रह्मयोनि यानी वेदप्रमाणक आत्माको ब्रह्मा वेदते जानाति ब्रह्मयोनिं वेद- जानता है, अथवा ब्रह्म यानी हिरण्य- प्रमाणकमित्यर्थः। अथवा ब्रह्मणो गर्भके कारण अथवा वेदके कारणभूत हिरण्यगर्भस्य योनि वेदस्य वा उस आत्माको जो रुद्रादि पूर्वदेव ये पूर्वदेवा रुद्रादय ऋषयश्च और वामदेवादि ऋषिगण जानते थे वामदेवादयस्तद्विदुस्ते तन्मया- वे तन्मयतत्स्वरूप होकर अमृत- स्तदात्मभूताः सन्तोऽमृता अम- अमरणधर्मा हो गये । इसी प्रकार रणधर्माणो बभूवुः । तथेदानी- आधुनिक पुरुप भी उसे जानकर न्तनोऽपि तमेव विदित्वामृतो अमर हो जाता है—यह वाक्य- भवतीति वाक्यशेपः ॥६॥ शेष है ॥६॥ कर्तृत्वादि धोंसे युक्त जीवात्माके स्वरूपका वर्णन एतावता तत्पदार्थ उपवर्णितः। इतने ग्रन्थसे तत्पदार्थका वर्णन अथेदानीं त्वंपदार्थमुपवर्णयितु- किया गया । अब यहॉसे त्वंपदार्थ- का निरूपण करनेके लिये आगेके मुत्तरे मन्त्राः प्रस्तूयन्ते- मन्त्र प्रस्तुत किये जाते हैं- अध्याय ५] शाङ्करभाष्यार्थ २११ गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्मा प्राणाधिपः संचरति खकर्मभिः ॥७॥ स है जो गुणोंसे सम्बद्ध, फलप्रद कर्मका कर्ता और उस किये हुए कर्मका उपभोग करनेवाला है, वह विभिन्न रूपोंवाला, त्रिगुणमय, तीन मागोंसे गमन करनेवाला प्राणोंका अधिष्ठाता अपने कमोंके अनुसार गमन . करता ॥ ७॥ गुणान्वय इति । गुणैः कर्म-। 'गुणान्वयः' इत्यादि । जिसका ज्ञानकृतवासनामयैरन्वयो यस्य कर्म एव ज्ञानजनित वासनामय गुणोके साथ सम्बन्ध है वह यह सोऽयं गुणान्वयः । फलार्थस्य जीव गुणान्वय है । वह फलके लिये कर्मणः कर्ता कृतस्य कर्मफलस्य कर्म करनेवाला है और वही किये स एवोपभोक्ता । स विश्वरूपो हुए कर्मका फल भोगनेवाला भी है । कार्यकारणभावसे [ नाना देह धारण नानारूपः कार्यकारणोपचितत्वात्। करके] वृद्धिको प्राप्त होनेसे वह विश्वरूप त्रयः सत्त्वादयो गुणा अस्येति नाना रूप है । सत्त्वादि तीनो गुण इसीके हैं इसलिये यह त्रिगुण है । इसके त्रिगुणः । त्रयो देवयानादयो देवयानादि तीन मार्गभेद हैं अथवा मार्गभेदा अस्येति त्रिवा धर्मा- धर्म, अधर्म और ज्ञानरूप इसके धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति वा । तीन मार्ग है इसलिये यह त्रिवर्मा है। यह पाँच वृत्तियोंवाले प्राणका प्राणस्य पञ्चवृत्तेरधिपः संचरति । अधिपति सञ्चार करता है। किनके कैः ? स्वकर्मभिः ॥७॥ द्वारा '-अपने कर्मो के द्वारा ॥ ७ ॥ ne .
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ 2 - अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहङ्कारसमन्वितो यः। बुद्धर्गुणेनात्मगुणेन चैव आरायमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ८॥ जो अँगूठेके बराबर परिमागवाला. सूर्यके समान ज्योति स्वरूप, संकल्प और अहंकारसे युक्त तथा बुद्धि और शरीरके गुणोसे भी युक्त है वह अन्य (जीव) भी आरकी नोंकने वरावर आकारवाला देखा गया है ||८|| अङ्गुष्ठमात्र इति । अङ्गुष्ठ 'अङ्गुष्ठमात्रः' इत्यादि । अङ्गुष्ठ- मात्रोऽङ्गुष्ठपरिमितहृदयसुपिरापे- मात्र अर्थात् हृदयगुहाको अपेक्षासे अँगूठेके वरावर परिमाणवाला, रवि- क्षया । रवितुल्यरूपो ज्योति स्वरूप तुल्यरूप अर्थात् ज्योतिःस्वरूप, इत्यर्थः । सङ्कल्पाहारादिना बुद्धिके गुण सङ्कल्प और अहंकारादि- समन्वितो बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन च युक्त तया शरीरके गुण जरादिसे भी सम्पन्न; "जरा और मृत्यु शरीरके जगदिना । उक्तं च "नरामृत्यू धर्म हैं" ऐसा कहा मी है । आराम- शरीरस्य" इति । आराममात्रः मात्र-कोड़ेके अग्रभागमें लगा हुआ प्रतोदाग्रप्रोतलोहकण्टकारमात्रो- जो लोहेका काँटा होता है उसकी नोंकके वरावर अन्य भी यानी आत्मा ऽपरोऽपि ज्ञानात्मनात्मा दृष्टो- । भी ज्ञानस्वरूपसे देखा-जाना गया ऽवगतः । अपिशब्दः सम्भावना- है। यहाँ 'अपि' शब्द सम्भावनामें है; तात्पर्य यह है कि जलमें प्रति- याम् । अपरोऽप्योपाधिको जलसूर्य विम्बित सूर्यके समान उपाधिसे अन्य इब जीवात्मा संभावित इत्यर्थः।।८॥ जीवात्मा भी होना सम्भव है ॥८॥ से पुनरपि दृष्टान्तान्तरेण दर्श- यति- एक दूसरे दृष्टान्तसे श्रुति फिर भी दिखाती है- अध्याय ५ शाङ्करभाष्यार्थ २१३ वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ६ ॥ सौ भागोमें विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवॉ भाग है उस जीवको उसके बराबर जानना चाहिये, किन्तु वही अनन्तरूप हो जाता है ॥९॥ वालाग्रेति । वालाग्रस्य शत 'वालाग्र०' इत्यादि । सौ भागोमें विभक्त किये केशके अप्रभागका जो कृत्वो भेदमापादितस्य यो भाग- एक भाग है उसके भी सौ भाग स्तस्यापि शतधा किये जानेपर जो भाग होता है कल्पितस्य उसके समान जीवको समझना भागो जीवः स विज्ञेयः । लिङ्ग- चाहिये । लिङ्गदेह अत्यन्त सूक्ष्म है, इसलिये उसके परिमाणके स्यातिसूक्ष्मत्वात् तत्परिमाणे- अनुसार ही इसका परिमाण बतलाया नायं व्यपदिश्यते । स च जीव- | जाता है । जीवस्वरूपसे वह ऐसा है, किन्तु खतः ( अपने परमार्थरूपसे ) स्वरूपेण, आनन्त्याय कल्पतेखतः९ वही अनन्त हो जाता है ॥९॥ " तथा- किश्च-- नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स रक्ष्यते ॥१०॥ यह [ विज्ञानात्मा ] न स्त्री है, न पुरुप है और न नपुंसक ही है । यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसीसे सुरक्षित रहता है ॥१०॥ नैव स्त्रीति । स्वतोऽद्वितीया- 'नैव स्त्री' इत्यादि । स्वयं साक्षात् अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण परोक्षब्रह्मात्मस्वभावत्वान्नैव स्त्री यह न स्त्री है, न पुरुप है और न न पुमानेप नैव चायं नपुंसकः । नपुंसक ही है । यह जिस- २११ श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ५ यद्यत्स्त्रीशरीरं पुरुषशरीरं नपुंसक- जिस स्त्रीशरीर, पुरुषशरीर अथवा नपुंसकारीरको धारण करता है गरीरं बादत्ते तेन तेन स च उसी-उसीसे यह विज्ञानात्मा रक्षित- विज्ञानात्मा रक्ष्यते संरक्ष्यते सुरक्षित रहता है, अर्थात् उसी-उसी तत्तद्धानात्मन्यध्यस्याभिमन्यते । शरीरके धर्मोको अपनेमें आरोपित कर ऐसा मानने लगता है कि 'मैं स्थूलोऽहं कृशोऽहं पुमानहं स्त्र्यहं स्थूल हूँ, मै कृश हूँ, मैं पुरुप हूँ, नपुंसकोऽहमिति ॥१०॥ स्त्री हूँ, मैं नपुंसक हूँ' इत्यादि ॥१०॥ जीवको कोक अनुमार विविध देह की प्राप्तिका निर्देश केन तद्यसो शरीराण्यादत्ते ? तो फिर यह किस कारणसे शरीर धारण करता है? सो वतलाते इत्याह- सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहै- साम्बुवृष्टया चात्मविवृद्धिजन्म । कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसंप्रपद्यते ॥११॥ जिस प्रकार अन्न और जलके सेवनसे शरीरकी वृद्धि होती है वैसे ही सकल्प, स्पर्श, दर्शन और मोहसे [ कर्म होते हैं। फिर ] यह देही क्रमश. [ विभिन्न ] योनियोंमे जाकर उन कमोके अनुसार रूप धारण करता है ॥११॥ सङ्कल्पनेति । प्रथमं सङ्कल्प 'सङ्कल्पन०' इत्यादि । पहले संकल्प होता है, फिर स्पर्श यानी नम् । ततः स्पर्शनं त्वगिन्द्रिय- | त्वगिन्द्रियका व्यापार होता है,
२१५
शाङ्करभाष्यार्थ
अध्याय ५]
व्यापारः । ततो दृष्टिविधानम् । तत्पश्चात् दृष्टि जाती है, उससे
पीछे मोह होता है। उन संकल्प,
ततो मोहः । तैः सङ्कल्पनस्पर्शन- स्पर्श, दर्शन और मोहसे शुभाशुभ
दृष्टिमोहै। शुभाशुभानि कर्माणि कर्म सम्पन्न होते हैं । फिर कर्मानुगत
यानी कमोंके अनुसार अनुक्रमसे-
निष्पद्यन्ते । ततः कर्मानुगानि
कर्मविपाककी अपेक्षासे यह देही-
कर्मानुसारीणि स्त्रीपुंनपुंसकलक्ष- जीव स्त्री, पुरुष एवं नपुंसकादि
णान्यनुक्रमेण परिपाकापेक्षया रूपोंको देवता, तिर्यक् एवं मनुष्यादि
स्थानों ( योनियों) में प्राप्त करता
देही मर्त्यः स्थानेषु देवतिर्यम-
है। उसमें दृष्टान्त देते हैं-जिस
नुष्यादिष्वमिसंप्रपद्यते । तत्र प्रकार ग्रास और अम्बु यानी अनियत
दृष्टान्तमाह-ग्रासाम्बुनोरन्नपान- सेचन आत्माका निदान है अर्थात्
अन्न और जलकी वृष्टि-उनका सम्यक्
योरनियतयोवृष्टिरासेचनं निदान- उससे शरीरकी वृद्धि होती है उसी
प्रकार [जीवको कमोंके द्वारा तदनुकूल
मात्मनः शरीरस्य वृद्धिर्जायते
शरीरोंकी प्राप्ति होती है ]-ऐसा
यथा तद्वदित्यर्थः ॥११॥ इसका अभिप्राय है ॥११॥
तेषां
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव
रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति ।
क्रियागुणैरात्मगुणैश्च
संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥
जीव अपने गुणों ( पाप-पुण्यों ) के द्वारा स्थूल-सूक्ष्म बहुतसे देह
धारण करता है । फिर उन ( शरीरों ) के कर्मफल और मानसिक
संस्कारोंके द्वारा उनके सयोग ( देहान्तरप्राप्ति ) का दूसरा हेतु भी देखा
गया है ॥ १२॥
श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ स्थूलानीति । तानि च स्थू 'स्थूलानि' इत्यादि । देही- लान्यमादीनि सूक्ष्माणि तैजस- | विज्ञानात्मा अपने गुण यानी विहित और प्रतिषिद्ध विपयोके अनुभवसे धातुप्रभृतीनि बहूनि देवादि- प्राप्त हुए संस्कारोके द्वारा बहुत-से शरीराणि देही विज्ञानात्मा स्व- यानी पापाणादि स्थूल और तेजस गुणविहितप्रतिपिद्धविषयानुभव- धातु आदि सूक्ष्म देवादि-गरीर संस्कारणोत्यावृणोति । ततस्त- धारण करता है । फिर वह देही उन-उन गरीरोके कर्मफल और त्तक्रियागुणैरात्मगुणैश्च स देह्य- मानसिक संस्कारोके द्वारा अन्य रूप परोऽपि देहान्तरसंयुक्तो भवती- हो जाता है अर्थात् देहान्तरसे युक्त त्यर्थः ॥१२॥ हो जाता है ॥१२॥ परमात्मतत्त्वके जाननेसे जीवकी मुक्तिका कथन स एवमविद्याकामकर्मफल अब श्रुति यह बतलाती है कि इस प्रकार गम्भीर जलमें डूबे हुए रागादिगुरुभाराक्रान्तोऽलावुरिव (वेके समान अविद्या, काम, कर्मफल सान्द्रजलनिमग्नो निश्चयेन देहा- और रागादिके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण अपने निश्चयसे हंभावमापन्नः प्रेततिर्यड्मनुष्यादि- | देहात्मभावसे ही युक्त हुआ जीव योनिप्वाजीवं जीवभावमापन्नः कथ- जीवनपर्यन्त जीवभावमें ही स्थित प्रेत, तिर्यक् एव मनुष्यादि योनियोंमें श्चित्पुण्यवशादीश्वरार्थकर्मानुष्ठा- हुआ किसी प्रकार पुण्यवश ईश्वरार्थ कर्म करनेसे रागादिमलसे शुद्ध हो नेनापगतरागादिमलोऽनित्यत्वादि- जानेपर जब अनित्यत्वादि दोप-दृष्टि करनेसे ऐहिक और आमुष्मिक फल- दर्शनेनोत्पनेहामुत्रार्थफलभोगवि- भोगसे विरक्त और शमदमादि रागः शमदमादिसाधनसंपन्नस्त- साधनसम्पन्न होता है तब उस आत्माको जानकर वह मुक्त हो मात्मानं ज्ञात्वा मुच्यत इत्याह- जाता है- --
अध्याय ५
शाङ्करभाष्यार्थ
२१७
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये
विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यक परिवेष्टितारं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥
इस गहन संसारके भीतर उस अनादि, अनन्त, विश्वके रचयिता,
अनेकरूप, विश्वको एकमात्र व्याप्त करनेवाले देवको जानकर जीव समस्त
पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥
अनाद्यनन्तमिति । अनाद्य 'अनाद्यनन्तम्' इत्यादि । कलिलके
नन्तमाद्यन्तरहितं कलिलस्य मध्ये मध्यमें यानी अत्यन्त गम्भीर संसारके
मध्यमे अनाद्यनन्त-~-आदि-अन्तसे
गहनगभीरसंसारस्य मध्ये विश्वस्य रहित, विश्वकी सृष्टि-उत्पत्ति करने-
स्रष्टारमुत्पादयितारमनेकरूपं वि- वाले, अनेकरूप, विश्वके एकमात्र
परिवेष्टा अर्थात् अपने स्वरूपसे
श्वस्यैकं परिवेष्टितारं स्वात्मना विश्वको व्याप्त करके स्थित हुए,
संव्याप्यावस्थितं ज्ञात्वा देवं देव-ज्योति स्वरूप
जानकर जीव समस्त पाशोसे यानी
ज्योतीरूपं परमात्मानं मुच्यते
अविद्या, काम एवं कर्मादिसे मुक्त
सर्वपाशैरविद्याकामकर्मभिः॥१३॥' हो जाता है ॥१३॥
परमात्माको
केन पुनरसौ गृह्यते ? इत्याह-
किन्तु यह किसके द्वारा ग्रहण
किया जाता है, सो बतलाते हैं-
भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् ।
कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥
भावग्राह्य, अशरीरसंज्ञक, सृष्टि और प्रलय करनेवाले, शिवस्वरूप,
एवं कलाओंकी रचना करनेवाले इस देवको जो जान लेते हैं वे शरीर
( देहवन्धन ) को त्याग देते हैं ॥ १४ ॥
२१८ श्वेताश्वतरोपनिपद् [अध्याय ५ शुद्धान्तःकरणेन भावग्राह्यमिति । भावेन वि 'भावग्राह्यम्' इत्यादि । भाव- विशुद्ध अन्तःकरणसे ग्रहण किया गृह्यत इति जाता है इसलिये जो भावग्राह्य है, भावग्राह्यम् । अनीडाख्यं नीडं अनीडाख्य-नीड शरीरको कहते शरीरमशरीराख्यम् । भावाभाव- हैं अतः अशरीर नामवाले, भाव और अभाव ( सृष्टि और प्रलय ) करने- करं शिवं शुद्धमविद्यातत्कार्य- वाले, शिव-शुद्ध अर्थात् अविद्या विनिर्मुक्तमित्यर्थः। कलानां षोड- | और उसके कार्यसे रहित, कला सर्गकर-~~"उसने प्राणकी रचना शानां प्राणादिनामान्तानाम् “स की" इत्यादि वाक्यसे अथर्वण (प्रश्न) प्राणमसृजत" (प्र० उ० ६ । ४) श्रुतिमें कही हुई प्राणसे लेकर इत्यादिनाथर्वणोक्तानां सर्गकरं नामपर्यन्त सोलह कलाओंके रचयिता उस देवको जो 'यह मैं हूँ' इस देवं ये विदुरहमस्मीति ते जहुः प्रकार जानते हैं वे तनु-शरीरको परित्यजेयुस्तनुं शरीरम् ॥१४॥ त्याग देते हैं* ॥१४॥ इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाप्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ ** अर्थात् फिर उनका शरीरान्तरसे सम्बन्ध नहीं होता, वे मुक्त हो जाते हैं।
घष्ठ अध्याय परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रका सञ्चालन नन्वन्ये कालादयः कारणम् किन्तु अन्य मतावलम्बी तो कालादिको कारण मानते हैं, फिर इति मन्यन्ते । तत्कथं पुनरी- ईश्वर किस प्रकार कलाओंकी सृष्टि श्वरस्य कलासर्गकरत्वमित्या- करनेवाला हो सकता है ?.. -ऐसी शङ्कयाह- आशङ्का करके श्रुति कहती है- स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥१॥ कोई बुद्धिमान् तो स्वभावको कारण बतलाते हैं और दूसरे कालको । किन्तु ये मोहग्रस्त हैं [ अतः ठीक नहीं जानते ] । यह भगवान्की महिमा ही है, जिससे लोकमे यह ब्रह्मचक्र घूम रहा है ॥१॥ खभावमिति । स्वभावमेके 'स्वभावम्' इत्यादि । कोई कवयो मेधाविनो वदन्ति । कवि-मेधात्री स्वभावको [ कारण] कालं तथान्ये । कालखभावयो- यहाँ काल और स्वभावका ग्रहण बतलाते हैं तथा दूसरे कालको । ग्रहणं प्रथमाध्याये निर्दिष्टाना- | प्रथम अध्याय में वतलाये हुए अन्य १. ब्रह्मचक्र अर्थात् संसाररूपमें विवर्तित ब्रह्मरूप चक्र, जिसका वर्णन प्रथम अध्यायके चतुर्थ मन्त्रमें किया है।
२२० श्वेताश्वतरोपनिपद् [ अध्याय ६ मन्येषामप्युपलक्षणार्थम् । परि- कारणोंको भी उपलक्षित करनेके लिये किया गया है । ये स्वभाव और मुह्यमाना अविवेकिनो विषया- कालवादी परिमुह्यमान-अविवेकी स्मानो न सम्यग्जानन्ति । यानी विषयी होनेके कारण यथार्थ नहीं तु- जानते । 'तु' शब्द निश्चयार्थक है। शब्दोऽवधारणे । देवस्यैष महिमा यह तो देव (परमेश्वर ) की महिमा माहात्म्यम् । येनेदं भ्राम्यते है, जिससे यह ब्रह्मचक्र भ्रमित- । परिवर्तित होता है [अर्थात् सब परिवर्तते ब्रह्मचक्रम् ॥१॥ ओर घूम रहा है ] ॥१॥ चिन्तनीय परमेश्वरका स्वरूप तथा उसकी महिमा महिमानं प्रपञ्चयति- उस महिमाका निरूपण करते विवर्तते ह ह येनावृतं नित्यमिदं हि सर्व ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः। तेनेशितं कर्म विवर्तते पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २॥ जिसके द्वारा सर्वदा यह सब व्याप्त है तथा जो ज्ञानस्वरूप, काल- का भी कर्ता, निप्पापत्वादि गुणवान् और सर्वज्ञ है उसीसे प्रेरित होकर यह पृथिवी, जल, अग्नि, वायु एव आकाशरूप कर्म [ जगद्रूपसे ] विवर्तित होता है; [ अतः उसका चिन्तन करना चाहिये ] ॥२॥ येनेति । येनेश्वरेणावृतं व्याप्त 'येन' इत्यादि । जिस ईश्वरके मिदं जगन्नित्यं नियमेन । ज्ञः द्वारा यह जगत् नित्य-नियमसे व्याप्त है, जो ज्ञानस्वरूप, कालकार कालकारः कालस्यापि कर्ता। कालका भी कर्ता, गुणी- अध्याय ६] २२१ शाङ्करभाष्यार्थ गुण्यपहतपाप्मादिमान् । सर्व अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और चेत्तीति सर्वविद्यः। तेनेश्वरेणेशितं सबको जाननेके कारण सर्वज्ञ है। प्रेरितं कर्म क्रियत इति कर्म उस ईश्वरसे ईशित-प्रेरित कर्म । जो किया जाता है उसे कर्म स्रजीव फणी । हशब्दः प्रसिद्धि- कहते हैं, 'ह' शब्द प्रसिद्धिका द्योतक द्योतकः । प्रसिद्धं यदेतदीश्वर- है। अर्थात् यह जो ईश्वरप्रेरित प्रेरितं कर्म जगदात्मना विवर्तत प्रसिद्ध कर्म है वह मालामें सर्पके इति यत्पुनस्तत्कर्म पृथ्व्यप्तेजो- समान जगद्रूपसे विवर्तित होता है। और वह जो कर्म है सो पृथिवी, जल, ऽनिलखानि पृथिव्यादिभूत- तेज, वायु और आकाशरूप है अर्थात् पृथिवी आदि पञ्चभूत है ॥२॥ पञ्चकम् ॥२॥ हैं यत्प्रथमाध्याये चिन्त्यमित्यु-! प्रथम अध्यायमें जिसे चिन्तनीय बतलाया है उसीका निरूपण करते क्तम्, एतदेव प्रपञ्चयति- तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूय- स्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम् । एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः ॥ ३ ॥ उस कर्मको करके उसका निरीक्षण कर फिर जो उस तत्त्वके साथ यानी एक, दो, तीन या आठ तत्त्वोके साथ अथवा काल और अन्तःकरण- के सूक्ष्म गुणोके साथ अपने [ सत्तारूप ] गुणका योग कराकर [ स्वयं स्थित रहता है उसका चिन्तन करना चाहिये ] ||३|| १ १ श्रीशंकरानन्दजीके मतानुसार एक तत्त्व अविद्या है, दो धर्म और अधर्म हैं, तीन सत्त्वादि त्रिगुण हैं और मन, बुद्धि तथा अहंकारके सहित पाँच भूत आठ तत्त्व हैं। भाष्यमें भी आठ तत्त्व तो ये ही माने गये हैं।
२२२
श्वेताश्वतरोपनिपद्
[ यध्याय ६
तदिति । तत्कर्म पृथिव्यादि 'तत्कर्म' इत्यादि । उस पृयित्री
सृष्ट्वा विनिवर्त्य प्रत्यवेक्षणं कृत्वा आदि कर्मको रचकर उसका निरीक्षण
भूयः पुनस्तस्यात्मनस्तत्त्वेन कर फिर उस आत्माका पृथिवी आदि
भृम्यादिना योगं समेत्य संग- तत्त्वके साथ योग कराकर-यहाँ
भय्य । णिलोपो द्रष्टव्यः । कति-
( समेत्यमें ) प्रेरणार्थक 'णिच्
प्रत्ययका लोप समझना चाहिये ।
विधैः प्रकारेः । एकेन पृथिव्या
कितने प्रकारके तत्वोंके साथ ?
द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा प्रकृति-
पृथिवीरूप एक तत्त्वके अथवा दो,
तीन या अष्टधा प्रकृतिरूप आठ
भूमिरापोऽनलो वायुः तत्वोंके साथ । इस विषयमें [गीतामें]
खं मनो बुद्धिरेव च । ऐसा कहा है-'पृथिवी, जल,
अहंकार इतीयं मे अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि
मिन्नाप्रकृतिरप्या ॥ और अहंकार—यह मेरी आठ
(गीता ७ । ४) प्रकारकी विभिन्न प्रकृति है।"
इति । कालेन चैवात्मगुणै- अथवा कालके और आत्मगुणोके
श्वान्तःकरणगुणैः
कामादिभिः यानी अन्तःकरणके कामादि सूक्ष्म
सूक्ष्मः ॥३॥
गुणोंके साय ॥ ३॥
भृतस्तत्त्वैः । तदुक्तम्-
"
भगवदर्पणकर्मसे भगवत्प्राप्ति
इदानीं कर्मणां मुख्यं विनि अव श्रुति कोका मुख्य विनियोग
योगं दर्शयति-
दिखलाती है-
आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि
भावांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ।
तेषामभावे कृतकर्मनाशः
कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥ ४ ॥
अध्याय ६] शाङ्करभाष्यार्थ २२३ जो पुरुष सत्त्वादि गुणमय कर्म आरम्भ कर उन्हें और समस्त भावोको परमात्माके अर्पण कर देता है, उनके सम्बन्धका अभाव हो जानेसे उसके पूर्वकृत कोका नाश हो जाता है; और कमोंका क्षय हो जानेपर वह [ परमात्माको ] प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह तत्त्वतः उन [ पृथिवी आदि ] से अन्य है ।। ४॥ आरभ्येति । आरभ्य कृत्वा 'आरभ्य' इत्यादि । गुण अर्थात् सत्त्वादिसे युक्त कोको करके उन्हें कर्माणि गुणैः सत्त्वादिभिरन्वि- तथा अपने अत्यन्त विशिष्ट भात्रोको तानि भावांश्चात्यन्तविशेषान्वि- जो विनियुक्त करता है अर्थात् ईश्वरको समर्पित कर देता है, नियोजयेदीश्वरे समर्पयेद्यः । ईश्वरको समर्पित कर देनेसे उन तेपामीश्वरे समर्पितत्वादात्मसंव- कोंका आत्मासे सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे पूर्वकृत न्धाभावस्तदभावे पूर्वकृतकर्मणां कोंका नाश हो जाता है। नाशः। उक्तं च- कहा भी है- "यत्करोषि यदनासि "हे कुन्तीनन्दन ! तू जो यज्जुहोषि ददासि यत् । कुछ कर्म करता है, जो खाता यत्तपस्यसि कौन्तेय है, जो श्रौत-स्मार्त यज्ञरूप हवन तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ करता है, जो देता है और जो तप करता है वह शुभाशुभफलैरेवं सब मुझे मोक्ष्यसे कर्मवन्धनैः इस प्रकार " कर्मोको मुझे समर्पण करके तू (गीता ९ । २७-२८) "ब्रह्मण्याधाय कर्माणि शुभाशुभ फलयुक्त कर्मबन्धनों से मुक्त हो जायगा ।" "जो सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः॥ पुरुष कोको ब्रह्मार्पण करते हुए फलासक्ति लिप्यते न स पापेन त्यागकर कर्म करता है वह जलसे पद्मपत्रमिवाम्भसा । कमलके पत्तेके समान पापसे लिप्त अर्पण कर दे ।
२२९ श्वेताश्वतरोपनिपद [अध्याय ६ कायेन मनसा बुद्धया नहीं होता । योगिजन फलविषयक केवलरिन्द्रियैरपि ॥ आसक्ति त्यागकर केवल (ममता- योगिनः कर्म कुर्वन्ति रहित ) गरीर, मन, बुद्धि एवं सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये।।" (गीता ५ । १०, ११) इन्द्रियोंसे ही चित्तशुद्धिके लिये इति । कर्म किया करते हैं" इत्यादि । कर्मक्षये विशुद्धसत्त्वो याति कर्मका भय हो जानेसे वह शुद्धचित्त हो तत्त्वतः प्रकृतिरूप तत्त्वतोऽन्यस्तत्त्वेभ्यः प्रकृति- तत्वोंसे भिन्न होनेके कारण अविद्या भृतेभ्योऽन्योऽविद्यातत्कार्यविनि- और उसके कार्यसे छूटकर अपनेको सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपसे जानते मुक्तश्चित्सदानन्दाद्वितीयब्रह्मात्म- हुए [ परमात्माको ] प्राप्त होता है। त्वेनावगच्छन्नित्यर्थः । अन्यदिति जहाँ 'अन्य' के स्थानमें 'अन्यत्' पाठ हो वहाँ 'तत्त्वोंसे भिन्न जो ब्रह्म पाठे तन्वेभ्यो यदन्यद्रह्म तद्या- है उसे प्राप्त होता है' ऐसा अर्थ तीति ॥४॥ समझना चाहिये ॥ ४ ॥ . 800----- विषयान्ध पुरुष - उपासनासे भगवत्प्राप्ति उक्तस्यार्थस्य द्रढिम्न उत्तरे उपर्युक्त अर्थकी पुष्टिके लिये मन्त्राः प्रस्तूयन्ते कथं नाम आगेके मन्त्र प्रस्तुत किये जाते है। भी किसी प्रकार ब्रह्म- विषयान्धा ब्रह्म नानीयुरित्यत को जान जाये इस उद्देश्यसे श्रुति कहती है- आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः । विश्वरूपं भवभूतमीडयं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५ ॥ आह- तं २२५ शाङ्करभाष्यार्थ अध्याय ६] वह सबका कारण, शरीरसंयोगको निमित्तभूता अविद्याका हेतु, त्रिकालातीत और कलाहीन देखा गया है। अपने अन्तःकरणमें स्थित उस सर्वरूप एवं संसाररूप देवकी ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व उपासना कर [ उसे प्राप्त हो जाता है ] ॥५॥ आदिरिति । आदिः कारणं 'आदिः' इत्यादि । आदि-सबका सर्वस्य, शरीरसंयोगनिमित्तानाम- कारण; शरीरसयोगकी निमित्तभूता विद्यानां हेतुः । उक्तं च- अविद्याका हेतु; कहा भी है- "एष ह्येवैनं साधु कर्म कारयति “यही इससे शुभ कर्म कराता है, और ''एष एवैनमसाधु कर्म यही इससे अशुभ कर्म कराता है।"भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंसे कारयतिच" (को० उ०३।९) अतीत; जैसे कहा है-"जिसके इति । परस्त्रिकालादतीतानागत- नीचे संवत्सर दिनोके द्वारा परिवर्तित वर्तमानात् । उक्तं च-"यस्मा- होता है, देवगण उसकी ज्योतियोंके दक्सिंवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते । ज्योति, आयु और अमृतरूपसे तदेवा ज्योतिषां ज्योतिरायु)- उपासना करते हैं।" क्यों त्रिकाला- पासतेऽमृतम्" (वृ० उ० ४। तीत है ?...क्योंकि यह अकल ४।१६) इति । कस्मात् ? यस्माद- है-इसके प्राणसे लेकर नामपर्यन्त कलोऽसौ न विद्यन्ते कलाः कलाएँ नहीं हैं, इसलिये यह अकल है । कलावान् पदार्थ ही तीनों प्राणादिनामान्ता अस्येत्यकलः । कालोंसे परिच्छिन्न होनेके कारण कलावद्धि कालत्रयपरिच्छिन्न- उत्पन्न और नष्ट होता है। किन्तु मुत्पद्यते विनश्यति च । अयं यह तो अकल यानी निष्प्रपञ्च है, पुनरकलो निष्प्रपञ्चः । तस्मान इसलिये कालत्रयसे परिच्छिन्न न होनेके कारण उत्पन्न या नष्ट नहीं कालत्रयपरिच्छिन्नः सन्नुत्पद्यते होता । उस विश्वरूप-जिसके विनश्यति च । तं विश्वानि रूपा- विश्व (समस्त) रूप हैं, भव- ण्यस्येति विश्वरूपम् । भवत्य- | जिससे जगत् उत्पन्न होता है, भूत- श्वे० उ० २९-३० २२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ स्मादिति भवः । भृतमवितथस्व-सत्यत्वरूप. अपने चित्तमे स्थित. तुय देवको पूर्व-वाक्यार्थज्ञान रूपम् । ईज्यं देवं स्वचित्तस्त्रमुपा- उदय होनेसे पहले उपासना कर स्यायमहमस्मीति समाधानं कृत्वा अर्थात् 'यह मैं हूँ इस प्रकार उसमें चित्त समाहित कर [उसे प्राप्त हो पूर्व वाक्यार्थज्ञानोदयात् ॥५॥ जाता है॥५॥ ज्ञानसे भगवत्प्राप्ति पुनरपि तमेव दर्शयति- फिर भीश्रुति उसे ही दिख्लाती . tw स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् । धर्मावह पापनुदं भगेश ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥६॥ वह, जिससे कि यह प्रपञ्च प्रवृत्त होता है. वृक्षाकार और कालाकारसे अतीत तया प्रपञ्चसे भिन्न है । धर्मकी प्राप्ति करानेवाले और णका नाश करनेगले उस ऐश्वर्यके अविपतिको जानकर [ पुल्य ] आत्नस्य. अमृतवरूप और विश्वावार [परमात्नाको प्राप्त हो जाता है ] ॥६॥ स वृक्षेति । स वृक्षाकारेभ्यः । 'स वृक्ष 'व्यादि । वह वृक्षा- कालाकारेभ्यः परो वृक्षकाला- कार.और कालाकारसे पर (उकृष्ट) कृतिभिः परः । वृक्षः संसार- है. 'भ' शब्दसे यहाँ संसारवृक्ष समझना चाहिये; कहा भी है- वृक्षः । उक्तं च-"ऊर्ध्वमूलो "जपकी ओर मूल और नीचेकी ओर ह्यवाक्शाख एपोऽवत्यः सना- शाखाओंवाला यह सनातन अन्त्य २२७ अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ तन" ( क० उ०२ । ३। वृक्ष है" इत्यादि । अन्य अर्थात् १ ) इति । अन्यः प्रपञ्चा- प्रपञ्चसे असंस्पृष्ट है । जिस ईश्वरसे प्रपञ्च प्रवृत्त होता है, धर्मकी प्राप्ति संस्पृष्ट इत्यर्थः । यस्मादीश्वरात् करानेवाले और पापका उच्छेद प्रपञ्चः परिवर्तते । धर्मावह करनेवाले उस भग यानी ऐश्वर्यादिके स्वामीको जानकर पुरुष] आत्मस्थ- पापनुदं भगस्यैश्वर्यादरीशं स्वामिनं आत्मा यानी बुद्धिमें स्थित, अमृत- ज्ञात्वात्मस्थमात्मनि बुद्धौ स्थित- | अमरणधर्मा, विश्वधाम-विश्वके ममृतममरणधर्माणं विश्वधाम विश्व आधारभूत परमात्माको प्राप्त हो जाता है, क्योकि 'वह ( जीव ) स्याधारभूतं याति । स तत्त्वतोऽन्य पृथिवी आदि तत्त्वोंसे भिन्न है'--इस इति सर्वत्र सम्बध्यते ॥६॥ वाक्यका सबके साथ सम्बन्ध है।।६।। ज्ञानियोंके तत्त्वानुभवका उल्लेख इदानीं विद्वदनुभवं दर्शयन्नु अब विद्वान्का अनुभव दिखलाते क्तमर्थ दृढीकरोति- हुए श्रुति उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करती है- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पति पतीनां परम परस्ता- द्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥ ईश्वरोंके परम महान् ईश्वर, देवताओके परमदेव, पतियोंके परमपति, अव्यक्तादि परसे पर तथा विश्वके अधिपति उस स्तवनीय देवको हम जानते हैं ||७|| २२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ तमीश्वराणामिति । तमीश्वराणां 'तमीश्वराणाम्' इत्यादि । उस वैवस्वतयमादीनां परमं महेश्वरं वैवस्वत यमादि ईश्वरों (लोकपालों) तं देवतानामिन्द्रादीनां परमं च के परम महेश्वर, इन्द्रादि देवताओंके दैवतं पति पतीनां प्रजापतीनां परम देव, पतियों--प्रजापतियों के परमं परस्तात्परतोऽक्षरान् ।। परम पति, पर-अक्षरसे पर, वदाम देवं द्योतनात्मकं भुवना- भुवनोके ईश्वर, देव-चोतनात्मक, नामीशं भुवनेशम् । ईब्यं स्तु- ईड्य-स्तुत्य [ परमात्माको ] हम जानते हैं ॥७॥ त्यम् ॥ ७॥ | उसकी महेश्वरता परमेश्वरकी महत्ता कथं महेश्वरत्वम् ? इत्याह उसकी महेश्वरता किस प्रकार है, सो बतलाते हैं- न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ८ ॥ उसके शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे बढ़- कर भी कोई दिखायी नहीं देता, उसकी पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है और वह स्वाभाविकी ज्ञानक्रिया और वलक्रिया है ||८|| न तस्येति । न तस्य कार्य 'न तस्य' इत्यादि । उसके कार्य-शरीर और करण-चक्षु५ शरीरं करणं चक्षुरादि विद्यते । न आदि इन्द्रियां नहीं हैं। उसके तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते श्रूयते समान और उससे बढ़कर भी कोई देखा या सुना नहीं जाता । उसकी वा । परास्य शक्तिर्विविधैव पराशक्ति नाना प्रकारको ही सुनी जाती
अध्याय ६]
शाङ्करभाष्यार्थ
२२९
श्रूयते । सा च स्वाभाविकी है और वह खाभाविको बानबल-
ज्ञानवलक्रिया च ज्ञानक्रिया क्रिया अर्थात् ज्ञानक्रिया और बल-
वलक्रिया च । ज्ञानक्रिया सर्व- क्रिया है । ज्ञानक्रिया सम्पूर्ण
विषयज्ञानप्रवृत्तिः । वलक्रिया विषयोंके ज्ञानकी प्रवृत्ति और बल-
खसंनिधिमात्रेण सर्व वशीकृत्य | क्रिया-अपनी सन्निधिमात्रसे सबको
नियमनम् ॥ ८॥
वशमें करके नियमन करना ॥८॥
,
यस्मादेवं तस्मा
क्योकि ऐसा है इसलिये-
न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके
न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् ।
स कारणं करणाधिपाधिपो
न चास्य कश्चिजनिता न चाधिपः ॥ १ ॥
लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं है, न कोई शासक या उसका
चिह्न ही है । वह सबका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता जीवका स्वामी
है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न स्वामी है ॥९॥
न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके।
लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं
अत एव न तस्येशिता नियन्ता। है, अतः उसका कोई ईशिता-
नियन्ता भी नहीं है। उसका कोई
नैव च तस्य लिङ्ग चिह्न धूम-
लिङ्ग-धूमादिरूप चिह्न भी नहीं है,
स्थानीयं येनानुमीयेत । स
जिससे अनुमान किया जा सके। वह
कारणं सर्वस्य कारणम् । करणा-
सबका कारणऔर करणाधिप-परमेश्वर
धिपाधिपः परमेश्वरः । यस्मादेवं है। क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका
तस्मान्न तस्य कश्चिज्जनिता कोई जनिता-जनयिता अर्थात् उत्पत्ति-
जनयिता न चाधिपः ॥९॥ कत और स्वामी भी नहीं है ॥९॥
२३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्रह्मसायुज्यके लिये परमेश्वरसे प्रार्थना इदानी मन्त्रहगभिप्रेतमर्थ । अब श्रुति मन्त्रद्रष्टा [ ऋपियों ] प्रार्थयते- के अभिमत पदार्थ के लिये प्रार्थना करती है-- यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः खमावृणोत् । स नो दधाब्रह्माप्ययम् ॥१०॥ तन्तुओसे मकडीके समान जिस एकमात्र देवने स्वभावत. ही प्रधान- जनित कार्योसे अपनेको आवृत कर लिया है वह हमे ब्रह्मसे एकीभाव प्रदान करे ॥१०॥ यस्तन्तुनाम इति । यथो 'यस्तन्तुनाभ' इत्यादि । जिस नाभिरात्मप्रभवेस्तन्तुभिरात्मा- प्रकार मकड़ी अपनेसे उत्पन्न हुए नमेव समायणोति तथा प्रधान- तन्तुओंसे अपनेहीको आवृत कर जैरव्यक्तप्रभवैर्नामरूपकर्मभिस्त- | लेती है उसी प्रकार प्रधानज अर्थात् न्तुस्थानीयैः स्वमात्मानमाणोत् अव्यक्तसे उत्पन्न हुए तन्तुरूप नाम, सञ्छादितवान्स नो मचं ब्रह्मण्य- | रूप और कमोंसे जिसने अपनेको प्ययं ब्रह्माप्ययमेकीभावं दधाद- आच्छादित कर रखा है वह हमें ब्रह्ममें दात्वित्यर्थः ॥१०॥ लय यानी एकीभाव प्रदान करे।॥१०॥ परमेश्वरके स्वरूपका निर्देश पुनरपि तमेव करतलन्यस्ता- फिर भी हथेलीपर रखे हुए आँवलेके समान उसीको साक्षात् मलकवत्साक्षादर्शयंस्तद्विज्ञानादेव रूपसे दिखाते हुए श्रुति ढो मन्त्रोंद्वारा परमपुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्श- इस बातको प्रदर्शित करती है कि । उसके विशेप ज्ञानसे ही परमपुरुषार्थकी यति मन्त्रद्वयेन- प्राप्ति होती है, और किसीसे नहीं- अध्याय ६] शाङ्करभाष्यार्थ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥११॥ समस्त प्राणियोंमें स्थित एक देव है; वह सर्वव्यापक, समस्त भूतोका अन्तरात्मा, कमोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियोंमें बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करनेवाला, शुद्ध और निर्गुण है ॥११॥ कर्माध्यक्ष-समस्त एको देव इति । एको 'एको देवः' इत्यादि । सर्वभूतोमें ऽद्वितीयो देवो द्योतनस्वभावः सर्व- गूढ-समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ एक-अद्वितीय देव-प्रकाशनशील भूतेषु गूढः सर्वप्राणिषु संवृतः । परमात्मा है । [ वह ] सर्वव्यापी, सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा स्व- सर्वभूतान्तरात्मा अर्थात् सबका रूपभूत इत्यर्थः । कर्माध्यक्षः स्वरूपभूत, प्राणियोंके किये हुए विभिन्न सर्वप्राणिकृतविचित्रकर्माधिष्ठाता। कर्मोका अधिष्ठाता, सर्वभूताधिवास सर्वभूताधिवासः सर्वप्राणिषु अर्थात् समस्त प्राणियोंमें निवास करने- वसतीत्यर्थः । सर्वेषां भृत्तानां वाला, समस्त भूतोंका साक्षी अर्थात् सर्वद्रष्टा है, क्योंकि "साक्षाद्दष्टरि साक्षी सर्वद्रष्टा । “साक्षाद्रष्टरि संज्ञायाम्" इस पाणिनिसूत्ररूप संज्ञायाम्" (पा० सू०५।२।९१) स्मृतिके अनुसार 'साक्षी' शब्दका अर्थ द्रष्टा है। तथा वह चेता- इति स्मरणात् । चेता चेतयिता। चेतनत्व प्रदान करनेवाला, केवल- केवलो निरुपाधिकः । निर्गुणः उपाधिशून्य और निर्गुण-सत्त्वादि सत्वादिगुणरहितः ॥११॥ गुणरहित है ॥११॥ - २३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ६ परमात्मज्ञानसे नित्यसुखकी प्राप्ति और मोक्ष एको वशो निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२॥ जो एक अद्वितीय खतन्त्र परमात्मा वहुत-से निष्क्रिय जीवोंके एक बीजको अनेक रूप कर देता है. अपने अन्त करणमें स्थित उस [ देव ] को जो मतिमान् देखते हैं उन्हे ही नित्यसुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥१२॥ एको वशीति । एको वशी 'एको वशी' इत्यादि । जो एक स्वतन्त्रो निष्क्रियाणां वहूनां वशी खतन्त्र परमात्मा बहुत-से निष्क्रिय जीवोके एक वीज-बीज- जीवानाम् । सर्वा हि क्रिया स्थानीय भूतसूक्ष्मको अनेकल्प कर नात्मनि समवेताः किन्तु देहेन्द्रि- देता है उस आन्मस्थ-बुद्धिमें स्थित [ देव ] को जो धीर-बुद्धिमान् येषु । आत्मा तु निष्क्रियो देखते हैं—साक्षात्ल्पसे जान लेते निर्गुणः सवादिगुणरहितः कूट- है उन आमवेत्ताओंको नित्य सुख स्थः सन्ननात्मधर्मानात्मन्यध्य-प्राप्त होता है. अन्य अनात्मज्ञोको नहीं। [यहाँ जीवोंको निष्क्रिय स्याभिमन्यते कर्ता भोक्ता सुखी इसलिये कहा है कि ] सारी दुःखी कृशः स्थूलो मनुष्योऽमुप्य क्रियाओंका साक्षात् सम्बन्ध आमासे नहीं, अपि तु देह और इन्द्रियोंसे पुत्रोऽस्य नप्तेति । उक्तं च- है। आत्मा तो निष्क्रिय. निर्गुण "प्रकृतेः क्रियमाणानि अर्थात् सत्त्वादि गुणोंसे रहित और गुणैः कर्माणि सर्वशः। कूटस्थ होते हुए अपनेमें अनान्म- , अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३ गुणा गुणेषु वर्तन्त अहंकारविमूढात्मा धर्मोका अध्यास करके ऐसा अभिमान कर्ताहमिति मन्यते ।। करने लगता है कि मैं कर्ता, भोक्ता, तत्त्ववित्तु महाबाहो सुखी, दु.खी, कृश, स्थूल, मनुष्य, गुणकर्मविभागयोः । अमुकका पुत्र अथवा इसका नाती हूँ इत्यादि । कहा भी है-"[ हे इति मत्वा न सज्जते ॥ अर्जुन ! ] सारे कर्म प्रकृतिके गुणो- प्रकृतेर्गुणसंमूढाः द्वारा किये जाते हैं; अहङ्कारसे सज्जन्ते गुणकर्मसु ।" मोहित हुए पुरुष ऐसा मानने लगते (गीता ३ । २७-२९) हैं कि 'मैं कर्ता हूँ' । किन्तु है इति । महाबाहो ! जो गुण और कर्मके एक बीजं बीजस्थानीयं भूतः विभागका मर्मज्ञ है वह तो 'गुण सूक्ष्मं बहुधा यः करोति तमा- गुणोंमें बर्त रहे हैं। ऐसा मानकर त्मस्थं बुद्धौ स्थितं येऽनुपश्यन्ति उनमें आसक्त नहीं होता, जो लोग साक्षाजानन्ति धीरा बुद्धिमन्त- प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हैं वे ही स्तेषामात्मविदां सुखं शाश्वतं । उन गुण और कमोंमें आसक्त होते नेतरेषामनात्मविदाम् ॥१२॥ हैं " इत्यादि ॥१२॥ . किञ्च- । तथा- नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ जो नित्योमें। नत्य, चेतनोंमें चेतन और अकेला ही बहुतोंको भोग प्रदान करता है, सांख्ययोगद्वारा ज्ञातव्य उस सर्वकारण देवको जानकर [ पुरुष ] समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ||१३||
श्वेताश्वतरोपनिपट
[ अध्याय ६
नित्य इति । नित्यो नित्या 'नित्य.' इत्यादि । नित्य जीवोके
नां जीवानां मध्ये तन्नि- मध्यमें
निन्य है. अभिप्राय यह
त्यत्वेन तेपामपि नित्यत्वमित्य-
कि उसके नित्यत्वसे ही उनका भी
नित्यत्व है, अथवा पृथिवी आदि
भिप्रायः । अथवा पृथिव्यादीनां नियोंमें जो नित्य है, तथा चेतन
मध्ये । तथा चेतनचेतनानां प्रमाताओंमे जो चेतन है; जो
प्रमातणां मध्ये । एको बहूनां अकेला ही बहुत-से जीवोंके काम-
जीवानां यो विदधाति प्रयच्छति कामनिमित्तक भोगोका विधान यानी
दान करता है और सबके लिये
कामान्कामनिमित्तान्भोगान् ।
साख्ययोगद्वारा ज्ञातव्य है, उस देव-
सर्वस्य सांख्ययोगाधिगम्यं
प्रकाशस्त्ररूपको जानकर [ पुरुप ]
ज्ञात्वा देवं ज्योतिर्मयं मुच्यते समस्त पाशोसे अर्थात् अविद्याठिसे
सर्वपागेरविद्यादिभिः ॥१३॥ मुक्त
हो जाता है ॥१३॥
ब्रह्मके प्रकागसे ही सबको प्रकागकी प्राप्ति
कथं चेतनश्चेतनानाम् ? वह चेतनोंमें चेतन किस प्रकार
इत्युच्यते-
है ? सो बतलाया जाता है-
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव
भान्तमनुभाति सर्व
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१४॥
वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, न चन्द्र और तारे प्रकाशित होते
हैं और न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, फिर यह अग्नि तो कहाँ प्रकाशित
हो सकता है ? ये सब उसके प्रकाशित होनेसे ही प्रकाशित होते हैं,
उसीके प्रकाशसे ये सब प्रकाशित हैं ॥१४॥
२३५ अध्याय ६1 शाङ्करभाष्यार्थ 'न तत्र' इत्यादि । वहाँ-उस न तत्रेति । तत्र तस्मिन्पर- मात्मनि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो परमात्मामे, सबका प्रकाशक होनेपर भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता; अर्थात् न भाति ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। वह ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता। स हि तस्यैव भासा सर्वात्मनो अपितु वह उस सर्वात्मा ब्रह्मके प्रकाश- से ही सब रूपोको प्रकाशित करता है; रूपजातं प्रकाशयति । न तु तस्य क्योंकि उसमे खय प्रकाशित करने- स्वतःप्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा का सामर्थ्य नहीं है । तथा न चन्द्र न चन्द्रतारकम् । नेमा विद्युतो और तारे, एवं न विद्युत् ही वहाँ प्रकाशित होते हैं । फिर हमे भान्ति। कुतोऽयमग्निरस्मोचरः। दिखायी देनेवाला यह अग्नि तो किं बहुना यदिदं जगद्भाति प्रकाशित हो ही कैसे सकता है ? तमेव स्वतो अधिक क्या, यह जो जगत् भास रहा भारूपत्वाद्धान्तं है, स्वत प्रकाशरूप होनेके कारण दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । उस परमात्माकं प्रकाशित होनेसे ही यथा लोहादि वहि दहन्तमनु- प्रकाशित हो रहा है, जिस प्रकार लोहा आदि पदार्थ जलानेवाले अग्नि- दहति न स्वतः । तस्यैव भासा के साथ ही [ उसीकी शक्तिसे ] दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि भाति । जलाते है स्वतः नहीं । ये सब उक्तं च-"येन सूर्यस्तपति तेज- सूर्यादि उसके ही प्रकाश यानी उक्तं च-"येन सूर्यस्तपति तेज- दीप्तिसे प्रकाशित होते हैं। कहा सेद्धः", "न तद्भासयते सूर्यो न भी है "जिसके तेजसे युक्त होकर शशाङ्कोन पावकः" (गीता १५ सूर्य तपता है", "उसे न सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और ६) इति ॥ १४॥ न अग्नि ही" इत्यादि ॥१४॥ - , २३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ मोजके लिये ज्ञानके सिवा अन्य हेतुओंका निषेध ज्ञात्वा देवं मुच्यत इत्युक्तम् ।। ऊपर यह कहा है कि उस देवको जानकर मुक्त हो जाता है; कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वा मुच्यते अव यह बतलाते हैं कि उसोको जानकर क्यों मुक्त होता है, किसी नान्येनेत्यत्राह- और कारणसे क्यों नहीं होता? एको हर सो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५॥ इस भुवनके मध्य एक हस है वही जलमें ( पञ्चमाहुतिल्प देहमें) स्थित अग्नि है । उसीको जानकर पुरुष मृत्युके पार हो जाता है। इससे भिन्न मोक्षप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है ॥१५॥ एक इति । एकः परमात्मा 'एको' इत्यादि । एक परमात्मा, जोअविद्यादि वन्वनके कारणका हनन हन्त्यविद्यादिवन्धकारणमिति करता है इसलिये हंस है, इस मुवन हंसो भुवनस्यास्य त्रैलोक्यस्य -त्रिलोकीके मध्यमें स्थित है, और मध्ये नान्यः कश्चित् । कस्मात् ? कोई नहीं । क्यों नहीं है ? क्योंकि वहीं अग्नि है-अविद्या और उसके यस्मात्स एवानिः । अग्निरिखा- दाह करनेवाला होनेसे वह निरविद्यातत्कार्यस्स दाहकत्वान् । अग्निके समान अग्नि है । कहा भी उक्तंच-"व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः' है-"ईश्वर आकाशातीत अग्नि है" न्यादि । सलिलमें अर्थात् देहरूपमें इति । सलिले देहात्मना परिणते। परिणत हुए जलमें, जैसे कहा है- उक्तं च-"इति तु पञ्चम्यामाहु- इस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें आप कार्यका दाह
अध्याय ६7
शाङ्करभाष्यार्थ
२३७
तावापः पुरुषवचसो भवन्ति" (जल) पुरुष नामवाला हो जाता है।"
(छा० उ० ५ १९११) इति । सन्निविष्ट–आत्मभावसे सम्यग्रूपसे
संनिविष्टः सम्यगात्मत्वेन नि- स्थित है । अथवा 'सलिल'~-यज्ञ-
विष्टः । अथवा सलिले सलिल दानादिद्वारा सलिल (जल ) के
समान स्वच्छ किये अन्तःकरणमें
इव स्वच्छे यज्ञदानादिना
स्थित वेदान्तवाक्यार्यके सम्यग्ज्ञानके
विमलीकृतेऽन्तःकरणे संनिविष्टो
फलरूपसे अविद्या और उसके कार्य-
वेदान्तवाक्यार्थसम्यग्ज्ञानफलका-
का दाह करनेवाला [ अग्नि ]-ऐसा
रूढोऽविद्यातत्कार्यस्य
दाहक | भी अर्थ हो सकता है । अतः उसी-
इत्ययः । तस्मात्तमेव विदित्वाति को जानकर पुरुष मृत्युके पार हो
मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते-जाता है, मोक्षके लिये कोई और मार्ग
ऽयनाय ॥१५॥
नहीं है ॥१५॥
स
परमेश्वरके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन
परमपदप्राप्तये पुनरपि तमेव परमपदकी प्राप्तिके लिये श्रुति
विशेषतो दर्शयति-
फिर भी उसीको विशेषरूपसे प्रदर्शित
करती है-
विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनि-
ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः ।
प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः
स५सारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥१६॥
वह विश्वका कर्ता, विश्ववेत्ता, आत्मयोनि (स्वयम्भू ), ज्ञाता, कालका
प्रेरक, अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और सम्पूर्ण विद्याओका आश्रय है । तथा
वही प्रधान और पुरुषका अध्यक्ष, गुणोंका नियामक एवं ससारके मोक्ष,
स्थिति और बन्धनका हेतु है ॥१६॥
२३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ स विश्वदिति। स विश्वकृति 'स विश्वकृत्' इत्यादि । वह श्वस्य कर्ता । विश्वं वेत्तीति विश्व- विश्वकृत्-विश्वका कर्ता है, विश्वको जानता है इसलिये विश्ववेत्ता है, वित् ।आत्मा चासौ योनिश्चेत्यात्म- | आत्मा और योनि है इसलिये आत्म- योनिः । जानातीति ज्ञः। सर्व- योनि है, जानता है इसलिये ज्ञ है । तात्पर्य यह है कि वह सबका आत्मा, स्यात्मा सर्वस्य च योनिः सर्वज्ञ- सबका योनि ( उत्पत्तिस्थान ) और चैतन्यज्योतिरित्यर्थः । कालकारः सर्वज्ञ अर्थात् चैतन्यज्योति है । तथा कालकार-कालका कर्ता और कालस्य कर्ता गुण्यपहतपाप्मादि- गुणी--अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् मान्विश्वविदित्यस्य प्रपञ्चः । है । यह सब 'विश्ववित्' इस विशेपणका विस्तार है । [ इसके प्रधानमव्यक्तम् । क्षेत्रज्ञो विज्ञा- सिवा ] वही प्रधान-अव्यक्त और नात्मा । तयोः पतिः पालयिता । क्षेत्रज्ञ-विज्ञानात्मा, इन दोनोंका पति-पालन करनेवाला, सत्त्व, रज, गुणानां सत्वरजस्तममामीशः । तम इन तीनो गुणोंका नियामक तथा संसारमोक्षस्थितिवन्धानां हेतुः संसारके मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु यानी कारण है ॥१६॥ " कारणम् ॥१६॥ तथा- किश्च- स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता । य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥ वह तन्मय ( जगद्रूप अथवा ज्योतिर्मय ), अमरणधर्मा, ईश्वररूपसे स्थन, ज्ञाता, सर्वगत और इस भुवनका रक्षक है, जो सर्वदा इस जगत्का अध्याय ६] शाङ्करभाष्यार्थ २३९ है' शासन करता है; क्योकि इसका शासन करनेके लिये कोई और समर्थ नहीं है ॥१७॥ स तन्मय इति । स तन्मयो 'स तन्मयो' इत्यादि । वह विश्वात्मा । अथवा तन्मयो तन्मय अर्थात् विश्वरूप है । अथवा ज्योतिर्मय इति 'तस्य भासा 'उसके प्रकाशसे वह सब प्रकाशित सर्वमिदं विभाति' इत्येतदपेक्षयो- इस उक्तिकी अपेक्षासे 'तन्मय' च्यते । अमृतोऽमरणधर्मा । ईशे शब्दसे ज्योतिर्मय भी कहा जा सकता है । अमृत-अमरणधर्मा, खामिनि सम्यस्थितिर्यस्यासा- ईश यानी ईश्वरभावमे जिसकी सम्यक् वीशसंस्थः । जानातीति ज्ञः। स्थिति है अतः वह ईशसस्थ हे, सर्वत्र गच्छतीति सर्वगः । जानता है इसलिये ज्ञ है, सर्वत्र जाता है भुवनस्यास्य गोप्ता पालयिता । इसलिये सर्वग है, इस भुवनका गोप्ता य ईश ईष्टेऽस्य जगतो नित्य- यानी पालनकर्ता है, जो इस जगत्- मेव नियमेन नान्यो हेतुः समर्थो को नित्य-नियमसे शासित करता विद्यत ईशनाय जगदीशनाय है, क्योंकि जगत्के शासनके लिये ॥१७॥ कोई और हेतु-समर्थ नहीं है ।।१७|| . मुमुक्षुके लिये भगवच्छरणागतिका उपदेश यस्मात्स एव संसारमोक्ष क्योकि वही ससारके मोक्ष, स्थितिबन्धहेतुस्तस्मात्तमेव मुमुक्षुः स्थिति और बन्धनका हेतु है इसलिये सर्वात्मना शरणं प्रपद्येत गच्छे- शरणमें जाना चाहिये-यह प्रति- मुमुक्षु पुरुषको सब प्रकार उसीकी दिति प्रतिपादयितुमाह पादन करनेके लिये श्रुति कहती है- यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तर ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥ - न्वाचो विग्लापन हि तत् ।। क्योंकि वह तो वाणीको पीडित २४० + श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ मैं जो सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो उसके लिये वेदोंको प्रवृत्त करता है, अपनी बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उस देवकी मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ ॥१८॥ यो ब्रह्माणमिति । यो ब्रह्माणं 'यो ब्रह्माणम्' इत्यादि । जिसने हिरण्यगर्भ विदधाति सृष्टवान्पूर्व पहले अर्थात् सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्मा- सर्गादौ । यो वै वेदांश्च प्रहिणोति हिरण्यगर्भको रचा है और जो उसके लिये वेदोंको प्रवृत्त करता है । 'तं तस्मै । तं ह हशब्दोऽवधारणे । ह' यहाँ 'ह' शब्द निश्चयार्थक है, तमेव परमात्मानम् । उक्तं च- अर्थात् उसी परमात्माको । कहा भी "तमेव धीरो विज्ञाय है- "बुद्धिमान् ब्रह्मवेत्ता उसीको प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः। जानकर उसीमें मनोनिवेश करे, नानुध्यायादहूञ्छब्दा- बहुत-से शब्दों-शास्त्रोंको न पढे, (वृ० उ० ४। ४ । २१) करना ही है" तथा "उसी एक "तमेवैक आत्माको जानो" इत्यादि । देव- जानथात्मानम्" ज्योतिर्मय । अपनेमें जो बुद्धि है (मु० उ० २ । २।५) इति उसका प्रसाद (विकास) करनेवाले, च । देवं ज्योतिर्मयम् । आत्मनि क्योंकि परमेश्वरके प्रसन्न होनेपर या बुद्धिस्तस्याः प्रसादकरम् । बुद्धि यानी परमेश्वरविषयिणी प्रमा प्रसन्न हि परमेश्वरे बुद्धिरपि भी निष्प्रपञ्च ब्रह्माकारसे स्थित हो तद्विषया प्रमा निष्प्रपञ्चाकार- जाती है । दूसरे लोग यहाँ 'आत्म- ब्रह्मात्मनावतिष्ठते वर्तते। आत्म- बुद्धिप्रकाशम्' ऐसा पाठ मानते हैं । [ तब यह अर्थ होगा-] बुद्धिप्रकाशमित्यन्येऽधीयते अपनी बुद्धिको प्रकाशित करता आत्मबुद्धिं प्रकाशयतीत्यात्मबुद्धि- है इसलिये जो आत्मबुद्धिप्रकाश प्रकाशम् । अथवात्मैव बुद्धि- | है; अथवा आत्मा ही बुद्धि है, १. यह व्याख्या 'आत्मबुद्धिप्रसाद' पाठ मानकर की गयी है । 1 अध्याय ६] शाङ्करभाष्यार्थ २४१ रात्मबुद्धिः सैव प्रकाशोऽस्येत्या- वही जिसका प्रकाश है उस आत्म- बुद्धिप्रकाशकी मैं मुमुक्षु-~-यहाँ 'वै' त्मवुद्धिप्रकाश मुमुक्षुर्वै वैशब्दो- शब्द निश्चयार्थक है [ अतः तात्पर्य ऽवधारणे मुमुक्षुरेव सन्न फलान्तर- यह है कि ] मुमुक्षु होकर ही शरण लेता हूँ, किसी अन्य फलकी इच्छा मिच्छशरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥ करता हुआ नहीं ॥१८॥ एवं तावत्सृष्टयादिना यल्ल इस प्रकार यहाँतक सृष्टि आदि कार्यसे लक्षित होनेवाले जिस स्वरूप- क्ष्यं स्वरूपं दर्शितम् । अथेदानी का वर्णन किया है उसीको अब तत्खरूपेण दर्शयति साक्षात्स्वरूपसे प्रदर्शित करते है- निष्कलं निष्क्रिय शान्तं निरवयं निरञ्जनम् । अमृतस्य पर सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१६॥ जो कलाहीन, क्रियाहीन, शान्त, अनिन्द्य, निर्लेप, अमृतत्वका उत्कृष्ट सेतु और जिसका ईंधन जल चुका है उस [ धूमादिशून्य ] अग्निके समान [ देदीप्यमान ] है [ उस देवकी मैं शरण लेता हूँ] ॥१९॥ निष्कलमिति। कला अवयवा 'निष्कलम्' इत्यादि । जिससे निर्गता यस्मात्तं निष्कलं निर- कला यानी अवयव निकल गये हैं वयवमित्यर्थः । निष्क्रियं स्वमहि- उस निष्कल अर्थात् निरवयव, निष्क्रिय-अपनी महिमामें स्थित मप्रतिष्ठितं कूटस्थमित्यर्थः । अर्थात् कूटस्थ, शान्त-जिसके शान्तमुपसंहतसर्वविकारम् । निर- सब विकारोंका अन्त हो गया है, वद्यमगर्हणीयम् । निरञ्जनं निर्ले- निरवद्य-अनिन्ध, निरञ्जन-निर्लेप, पम् । अमृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य अमृत यानी अमृतत्व-मोक्षकी प्राप्ति- श्वे० उ० ३१-३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ प्राप्तये सेतुरिव सेतुः संसारमहो- के लिये जो सेतुके समान सेतु है, क्योकि वह संसार-सागरसे पार दधेरुत्तारणोपायत्वात्तम् अमृ- होनेका साधन है, उस अमृतत्वके परमसेतु तया जिसका ईधन जल तस्य परं सेतुं दग्धेन्धनानलमिव गया है उस अग्निके समान देदीप्य- मान-जगमगाते हुए [ देवकी मैं देदीप्यमानंझटझटायमानम्।।१९।। शरण लेता हूँ] ||१९|| परमात्मज्ञानके विना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता किमिति तमेव विदित्वा तो क्या उसीको जानकर पुरुष मुच्यते नान्येन ? इति तत्राह मुक्त होता है किसी और साधनसे नहीं? इसपर कहते हैं- यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः । तदा देवम विज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥२०॥ जिस समय लोग चमड़ेके समान आकाशको लपेट लेने उस समय उस देवको न जानकर भी दुःखका अन्त हो जायगा ॥२०॥ यदेति । यदा यद्वचर्म सडो 'या' इत्यादि । जिस समय. जैसे कोई [फैले हुए चमड़ेको लपेट चयिप्यति तद्वदाकाशममृतं च्या- ले टसीप्रकार यदिअमूर्त और व्यापक पिनं यदि वेष्टयिष्यन्ति संवेष्टयि- आकागको भी मनुष्य सम्यक प्यन्ति मानवास्तदा देवं ज्योति- प्रकारसे लपेट लें, उस समय देव मयमनुदितानस्तमितज्ञानात्मना- | यानी ज्योतिर्मय-उदय-अत्तसे * तात्पर्य यह है कि परमात्माको विना जाने दुःखा अन्त होना ऐसा ही असम्भव है जैसा कि विभु और अमूर्त आकाशको परिच्छिन्न एवं मृर्तस्वरूप चमके समान लपेटना।
२४३ अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ वस्थितमशनायाद्यसंस्पृष्टं परमा- रहित ज्ञानस्वरूपसे स्थित क्षुधादिसे त्मानमविज्ञाय दुःखस्याध्यात्मि- असंस्पृष्ट परमात्माको बिना जाने भी आध्यात्मिक, आधिभौतिक एव आधि- कस्याधिभौतिकस्याधिदैविकस्या- दैविक दुःखका अन्त–विनाश हो न्तो विनाशो भविष्यति । आत्मा- जायगा; क्योकि आत्माके अज्ञानसे ज्ञाननिमित्तत्वात्संसारस्य । ही संसारकी स्थिति है। तात्पर्य यह है कि जबतक पुरुष यावत्परमात्मानमात्मत्वेन न परमात्माको आत्मस्वरूपसे नहीं जानाति तावत्तापत्रयाभिभूतो जानता तबतक वह अजन्मा होनेपर मकरादिभिरिव रागादिभिरि- भी तापत्रयसे अभिभूत हो मकरादि- तस्ततः कृष्यमाणः प्रेततिर्यमनु- के समान रागादिद्वारा इधर-उधर खींचा जाता हुआ प्रेत, तिर्यक एव प्यादियोनिष्वज एव जीवभाव- मनुष्यादि योनियों में जीवभावको प्राप्त मापन्नो मोमुह्यमानः संसरति । हो अत्यन्त मोहवश संसारमे भटकता यदा पुनरपूर्वमनपरं नेति नेती- रहता है । किन्तु जिस समय वह त्यादिलक्षणमशनायाद्यसंस्पृष्टमनुः कारण-कार्यभावसे रहित, नेति-नेति आदि वाक्यद्वारा लक्षित, क्षुधादिसे दितानस्तमितज्ञानात्मनावस्थित असंस्पृष्ट, उदय-अस्तसे रहित ज्ञान- पूर्णानन्दं परमात्मानमात्मत्वेन स्वरूपसे स्थित पूर्णानन्दमय परमात्मा- को साक्षाजानाति तदा निरस्ताज्ञान- साक्षात् आत्मस्वरूपसे जानता है उस समय अज्ञान और उसके तत्कार्यः पूर्णानन्दो भवतीत्यर्थः । कार्यसे छूटकर पूर्णानन्दमय हो जाता है । कहा भी है- "अज्ञानेनावृतं ज्ञानं "ज्ञान अज्ञानसे ढका हुआ है, तेन मुह्यन्ति जन्तवः । इसीसे जीव मोहमे पड़ते हैं। ज्ञानेन तु तदज्ञानं जिन्होंने ज्ञानके द्वारा अपने अज्ञान- येषां नाशितमात्मनः।। को नष्ट कर दिया है उनके प्रति वह उक्तं च-
२४४
श्वेताश्वतरोपनिषद
[ अध्याय ६
तेपामादित्यवज्ज्ञानं ज्ञान [समस्त रूपमात्रको प्रकाशित
करनेवाले ] सूर्यके समान उस ज्ञेय
प्रकाशयति तत्परम् ।
परमार्थतत्त्वको प्रकाशित कर देता
तद्बुद्धयस्तदात्मान-
है। उस परमज्ञानमें ही जिनकी
बुद्धि लगी हुई है, वह ज्ञानस्वरूप
स्तनिष्ठास्तत्परायणाः॥
परब्रह्म ही जिनका आत्मा है, उस
गच्छन्त्यपुनरावृत्ति ब्रह्ममें जिनकी दृढ निष्ठा है और
जो उसीके परायण [ अर्थात् आत्म-
ज्ञाननिर्धतकल्मषाः॥"
रति ] हैं वे ज्ञानद्वारा समस्त दोषोंसे
(गीता ५ । १५-१७) ' मुक्त हो अपुनरावृत्तिको प्राप्त हो
॥ २०॥ जाते हैं" ॥२०॥
श्वेताश्वतर-विद्याका सम्प्रदाय तथा इसके अधिकारी
सम्प्रदायपरम्परया ब्रह्मविद्याया सम्प्रदायपरम्पराके द्वारा ब्रह्म-
विद्याका मोक्षप्रदत्व प्रदर्शित करनेके
मोक्षप्रदत्वं प्रदर्शयितुं सम्प्रदाय | लिये श्रुति इसके सम्प्रदाय और इस
विद्याके अधिकारीको प्रदर्शित
विद्याधिकारिणं च दर्शयति करती है-
तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म
श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् ।
अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं
प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम् ॥२१॥
ह
श्वेताश्वतर ऋपिने तपोबल और परमात्माकी प्रसन्नतासे उस प्रसिद्ध
ब्रह्मको जाना और ऋषिसमुदायसे सेवित इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका सम्यक्
प्रकारसे परमहंस संन्यासियोंको उपदेश किया ॥२१॥
अध्याय ६] शाङ्करभाष्यार्थ तपाप्रभावादिति । तपसः 'तपःप्रभावात्' इत्यादि । 'तपसः' कृच्छ्रचान्द्रायणादिलक्षणस्य, तत्र अर्थात् कृच्छ्रचान्द्रायणादिरूप तपके [प्रभावसे ], क्योकि उसीमें 'तप' तपशब्दस्य रूढत्वात् । नित्या- शब्द रूढ है । यह विधिवत् अनुष्टान दीनां विधिवदनुष्ठितानां कर्मणा- किये हुए नित्यादि कोका उपलक्षण मुपलक्षणमिदम् । "मनसश्चे- है, क्योकि "मन और इन्द्रियों की न्द्रियाणां च बँकाग्रयं परमं एकाग्रता ही परम तप है" ऐसा स्मृतिवाक्य है । वह सम्पूर्ण तप तपः" इति स्मरणात् । तस्य श्वेताश्वतर ऋषिमें नियमसे होनेके च सर्वस्य तपसस्तस्मिञ्श्वेता- कारण उसके प्रभाव यानी सामर्थ्यसे श्वतरे नियमेन सत्त्वात्तत्प्रभावा- तथा भगवान्की कृपासे-कैवल्य- पदके उद्देश्यसे उसका अधिकार तत्सामर्थ्यादेवप्रसादाच्च कैवल्य- प्राप्त करनेके लिये अनेको जन्म- मुद्दिश्य तदधिकारसिद्धये बहु- पर्यन्त सम्यक् प्रकारसे आराधना जन्मसु सम्यगाराधितपरमेश्वरस्य किये हुए परमेश्वरकी प्रसन्नता- से जिसकी महिमाकी कोई सीमा प्रसादाच ब्रह्मापरिच्छिन्नमह- नहीं है, उस ब्रह्मको-~~-यहाँ 'ह' त्वम् । ह इति प्रसिद्धिद्योतनार्थः । शब्द प्रसिद्धिका द्योतक है--श्वेता- श्वेताश्वतरो नाम ऋषिविद्वान्य- स्वतरनामक ऋपिने जाना अर्थात् थोक्तं ब्रह्म परम्पराप्राप्तं गुरु- यथावत्रूपसे वर्णन किये हुए परम्परागत ब्रह्मतत्त्वको गुरुदेवके मुखाच्छ्रुत्वा मनननिदिध्यास- मुखसे श्रवण कर मनन, निदिध्यासन, नादरनरन्तर्यसत्कारादिभिब्रह्माह- आदर ( श्रद्धा ), निरन्तर अभ्यास एवं सत्कारादिके द्वारा 'मैं ब्रह्म हूँ' इस मस्मीत्यपरोक्षीकृताखण्डसाक्षा प्रकार अपरोक्ष किया अर्थात् अखण्ड- त्कारवान् । । वृत्तिसे उसका साक्षात्कार किया ।
२४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अन्याय ६ 1 - अथ स्वानुभवदाानन्तर- फिर अपना अनुभव दृढ़ करनेके मत्याश्रमिभ्यः। "अतिः पूजायाम्" पश्चात् उसे अन्याश्रमियोंको-"अति- इति स्मरणादत्यन्तं पूज्यत- शब्द पूजार्थक है" ऐसी स्मृति माश्रमिभ्यः साधनचतुष्टयसम्पत्ति- होनेके कारण अन्यन्त पूजनीय महिम्ना स्वेषु देहादिप्वपि आश्रमवालोंको अर्थात् साधनचतुष्टय- जीवनभोगादिप्वनास्थावद्भयः । की पूर्णताके प्रभावसे जिनकी अपने गरीरादि नया जीवन और भोगादिम अत एव वैराग्यपुष्कलवङ्ग्यः । भी आस्था नहीं थो उनको, अत. तदुक्तम्- पूर्ण वैराग्यवानोंको [इसका उपदेव 'विराग्यं पुष्कलं न स्या- किया] । ऐसा ही कहा भी है-- निष्फलं ब्रह्मदर्शनम् । "यदि पूर्ण वैराग्य न हो तो ब्रह्मज्ञान तस्माद्रक्षेत विरतिं निष्फल है, अत बुद्धिमान् पुल्यको बुधो यत्नेन सर्वदा ।।" सर्वढा प्रयत्नपूर्वक वैराग्यकी रक्षा इति । स्मृत्यन्तरे च- करनी चाहिये ।" तया दूसरी त्मृतिमें "यदा मनसि वैराग्यं कहा है--"जिस समय मनमें जायते सर्ववस्तुषु । समस्त वत्तुओके प्रति वैराग्य उत्पन्न तदेव संन्यसेद्विद्वा हो जाय उसी समय विद्वान्को नन्यथा पतितो भवेत् ॥' संन्यास ग्रहण करना चाहिये, नहीं तो इति । परमहंससंन्यासिनस्त एवा- उसका पतन हो जायगा।" इस प्रकार जो परमहंस संन्यासी है वे स्याश्रमिणः । तथा च श्रूयते ही अत्याश्रमी हैं। ऐसा ही श्रुति "न्यास इति ब्रह्मा ब्रह्मा हि परः भी कहती है-"न्यास ही ब्रह्मा परी हि ब्रह्मा । तानि वा एता है. ब्रह्मा ही पर- ( परब्रह्म ) है. त्यवराणि तपास न्यास पर ही ब्रह्मा है और ये सब तर एवात्य रेचयत्" (म० ना० ७८) निकृष्ट हैं. संन्यास ही सबसे बड़ा इति । है" इत्यादि; त्या "वहढक. कुटी- "चतुर्विधा भिक्षवश्व चक. हंस और परमहंस-ये चार वहूदककुटीचको प्रकारके भिक्षु हैं. इनमें जो-जो .
२४७ अध्याय ६] शाङ्करभाष्यार्थ पीछेवाला है वह-वह उत्तरोत्तर उत्तम हंसः परमहंसश्च यो यः पश्चात्स उत्तमः॥" है" ऐसी स्मृति भी है । उन अत्याश्रमियोंको उस प्रकृत परब्रह्मका इति स्मरणाच्च । तेभ्योऽत्या- अर्थात् उस उत्कृष्टतम-सम्पूर्ण श्रमिभ्यः परमं प्रकृतं ब्रह्म तदेव अविद्या और उसके कार्यसे रहित निरतिशय-सुखैकरसस्वरूप पवित्र- परममुत्कृष्टतमं निरस्तसमस्ता- शुद्ध यानी प्रकृति और प्रकृतिके विद्यातत्कार्यनिरतिशयसुखैकरसं कार्य आदि मलसे रहित ब्रह्मका, पवित्रं शुद्धं प्रकृतिप्राकृतादिमल- जो ऋषिसघजुष्ट यानी वामदेव एवं विनिर्मुक्तम् । ऋषिसंघजुष्टं वाम- सनकादि ऋषियोंके समूहसे जुष्ट- सेवित अर्थात् आत्मभावसे सम्यक् देवसनकादीनां संधैः समूहैर्जुष्टं प्रकारसे भावना किया हुआ यानी सेवितमात्मत्वेन सम्यक्परिभावितं प्रियतम आनन्दरूपसे आश्रित है, प्रियतमानन्दत्वेनाश्रितम् । “आ- क्योकि श्रुति भी कहती है "आत्मा- के लिये ही सब कुछ प्रिय होता त्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति है," [ अतः ऐसे ब्रह्मका ] जिस (वृह० उ०४।५।६) इति प्रकार वह आत्मस्वरूपसे पूर्णतया श्रुतेः। सम्यगात्मतयापरोक्षीकृतं प्रत्यक्ष हो सके उस प्रकार उपदेश किया । श्रुतिके 'सम्यक्' पदका यथा भवति तथा । सम्यगित्यस्य काकाक्षिन्यायसे 'प्रोवाच' और काकाक्षिन्यायेनोभयत्रानुषङ्गः 'जुष्टम्' दोनों पदोंके साथ सम्बन्ध कर्तव्यः । प्रोवाचोक्तवान् ॥२१॥ . समझना चाहिये ॥२१॥ अनधिकारीके प्रति विद्योपदेशका निषेध यथोक्तशिष्यपरीक्षणपूर्वक इस विद्याका उपर्युक्त प्रकारके शिष्यकी परीक्षा करके उपदेश विद्या वक्तव्या तद्विहाय तदुक्तौ करना चाहिये । उसे छोड़- श्वेताश्वतरोपनिषद् [यध्याय ६ दोपं विद्याया वैदिकत्वं गुप्तत्वं कर इसका उपदेश करनेमें दोप, विद्याका वैदिकव. गुह्यत्र और सम्प्रदायपरम्परया प्रतिपादितत्वं सम्प्रदायपरम्पराद्वारा प्रतिपादित होना चाह श्रुति बन्लाती है- वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्ये प्रचोदितम् । नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिप्याय वा पुनः॥२२॥ उपनिपढोंमें परम गुह्य इस विद्याका पूर्वकपमें उपदेन किय गया था । जिसका चित्त अत्यन्त शान्त ( रागादिमलरहित) न हो उस पुरुष- को तया जो पुत्र या शिष्य न हो उसको इसे नहीं देना चाहिये ॥२२॥ वेदान्त इति । वेदान्त इति विदान्ते' इत्यादि । 'वेदान्ने' जात्येकवचनम् । सकलामूप- इसमें जातिमें एकवचन है, अर्थात् सभी उपनिपोमें, परम-परम- निपत्स्विति यावत् । परमं परम- पुरुषार्थरूप,गुह्म-गोपनीयोमें भी सव- पुरुषार्थस्वरूपं गुह्यं गोप्यानामपि से अधिक गोप्य [ यह विद्या ] गोप्यतमं पुराकल्पे प्रचोदितं पुराकल्प-पूर्वकल्पमें प्रचोदित हुई- उपदेश की गयी थी। इस प्रकार पूर्वकल्प चोदितमुपदिष्टमिति इसका सम्प्रदायप्रदर्शन किया गया । सम्प्रदायप्रदर्शनं कृतमित्येतत् । प्रशान्त पुत्रको अर्थात् जिसका चित्त प्रकर्प-विशेषल्पसे शान्त यानी प्रशान्ताय पुत्राय प्रकर्पण शान्तं रागादि सम्पूर्ण मोसे रहित हो उस सकलरागादिमलरहितं चित्तं यस्य पुत्रको या ऐसे ही गुणोंवाले शिष्य- तस्मै पुत्राय तादृशशिष्याय वा को इसे देना यानी उपदेश करना चाहिये । इससे विपरीत स्वभाव- दातव्यं वक्तव्यमिति यावत् । वालेको तया जो पुत्र या शिष्य न तद्विपरीतायापुत्रायाशिष्याय वा हो उसे केवल लेहादिके कारण स्नेहादिना ब्रह्मविद्या न वक्तव्या। ब्रह्मविद्याका उपदेश नहीं करना হাক্কায় अध्याय ६] अन्यथा प्रत्यवायापत्तिरिति पुनः- चाहिये ।* नहीं तो प्रत्यवाय शब्दार्थः । (पाप) लगता है-यह 'पुनः' शब्दका तात्पर्य है। अत एव ब्रह्मविद्याविवक्षुणा इसलिये जो गुरु ब्रह्मविद्याका गुरुणा चिरकालं परीक्ष्य शिष्य- उपदेश करना चाहे उसे बहुत समयतक परीक्षा करके शिष्यके गुणाज्ञात्वा ब्रह्मविद्या वक्तव्येति गुणोको जानकर इसका उपदेश भावः। तथा च श्रुतिः-"भूय करना चाहिये—ऐसा इसका भाव एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया है । ऐसी ही यह श्रुति भी है- संवत्सरं संवत्स्यथ" (प्र० उ० "फिर एक सालतक तपस्या, ब्रह्मचर्य और श्रद्धापूर्वक तुम यहाँ १।२) इति । श्रुत्यन्तरे च- वास करो ।" तथा एक अन्य "एकशतं ह वै वर्षाणि प्रजापतौ श्रुतिमें कहा है-“इन्द्रने प्रजापति- मघवान्ब्रह्मचर्यमुवास" (छा० के यही एक सौ एक वर्पतक ब्रह्मचर्य उ० ८ । ११ । ३) इति च । व्रतका पालन करते हुए निवास किया" इत्यादि । इस प्रसंगका एतच्च बहुधा प्रपश्चितमुपदेश- उपदेशसाहस्रीमें अनेक प्रकारसे साहसिकायामित्यत्रसंकोचः कृतः विस्तृत वर्णन किया है, इसलिये यहाँ ॥२२॥ संक्षेपसे कह दिया है ॥२२॥ परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले शिष्यके प्रति किये गये उपदेशकी सफलता अत्रापि देवतागुरुभक्तिमता अब श्रुति यह दिखलाती है कि यहाँ भी देवता और गुरुकी भक्ति- * शिष्य और पुत्रके प्रति ही ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेकी विधिका रहस्य यही जान पड़ता है कि जिसे उपदेश किया जाय उसकी उपदेशकके प्रति पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिये और ऐसी श्रद्धा केवल पुत्र या शिष्यकी ही हो सकती है। इसलिये वे ही इसके उपदेशके अधिकारी हैं।
२५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ - मेव गुरुणा प्रकाशिता विद्या- युक्त पुरुषोंके प्रति प्रकाशित की हुई विद्या ही अनुभवकी प्राप्ति नुभवाय भवतीति प्रदर्शयति करानेवाली होती है- यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः । प्रकाशन्ते महात्मनः ॥२३॥ जिसकी परमेश्वरमें अत्यन्त भक्ति है और जैसी परमेश्वरमें है वैसी ही गुरुमें भी है उस महात्माके प्रति कहनेपर ही इन तत्त्वोंका प्रकाश होता है ॥२३॥ यस्येति । यस्य पुरुपस्याधि 'यस्य' इत्यादि । जिस अधिकारी कारिणो देवे इयता प्रबन्धेन । पुरुषकी देवमे-यहॉतकके ग्रन्थद्वारा वर्णन किये हुए अखण्डैकरस दर्शिताखण्डैकरसे सच्चिदानन्द- सच्चिदानन्द परमज्योति.स्वरूप परज्योतिःस्वरूपिणि परमेश्वरे परमेश्वरमें परा-उत्कृष्टा यानी अकृत्रिमा भक्ति है, यह [ अचञ्चलता परोत्कृष्टा निरुपचरिता भक्तिः । और श्रद्धाका भी ] उपलक्षण है । एतदुपलक्षणम् । अचाञ्चल्यं तात्पर्य यह है कि जिसकी भगवान्- के प्रति जैसी निश्चलता और श्रद्धा श्रद्धा चोमे यथा तथा ब्रह्म- है वैसी ही ये दोनों ब्रह्मवेत्ता गुरुके विद्योपदेष्टरि गुराबपि तदुभयं प्रति भी है उसके लिये, जैसे यस्य वर्तते तस्य तप्तशिरसो जल- तपे हुए मस्तकवाले पुरुषके लिये जलाशयको खोजनेके सिवा और राश्यन्वेषणं विहाय यथा साध- कोई उपाय नहीं है तथा क्षुधातुर नान्तरं नास्ति यथा च बुभुक्षितस्य पुरुषको भोजनके सिवा और कोई भोजनादन्यत्र साधनान्तरं न, उसकी शान्तिका साधन नहीं है २५१ शाङ्करभाष्यार्थ अध्याय ६] एवं गुरुकृपां विहाय ब्रह्मविद्या उसी प्रकार गुरुकृपाके बिना ब्रह्म- दुर्लभेति त्वरान्वितस्य मुख्याधि- विद्याका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन यह सोचकर जिसे ब्रह्मज्ञानप्राप्तिके कारिणो महात्मन उत्तमस्यैते लिये अत्यन्त उतावली लगी हुई है कथिता अस्यां श्वेताश्वतरोप- उसमुख्याधिकारी उत्तम महात्माको ही निषदि श्वेताश्वतरेण महात्मना ये कथित-इस श्वेताश्वतरोपनिषद्में महात्मा श्वेताश्वतरद्वारा उपदेश किये कविनोपदिष्टा अर्थाः प्रकाशन्ते हुए तत्त्व प्रकाशित अर्थात् स्वानुभवके स्वानुभवाय भवन्ति । द्विवचनं विषय होते हैं। 'प्रकाशन्ते महात्मनः' मुख्यशिष्यतत्साधनादिदुर्लभत्व- इन पदोकी द्विरुक्ति मुख्य शिष्य और प्रदर्शनार्थमध्यायपरिसमाप्त्यर्थ- उसके साधनोकी दुर्लभता प्रदर्शित करनेके लिये, अध्यायकी समाप्तिके मादरार्थश्च ॥२३॥ लिये तथा आदरके लिये है ॥२३॥ इति श्रीमहोबिन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये पष्टोऽध्यायः ॥६॥ ॥ समाप्तमिदं श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्यम् ।। ॥ ॐ तत्सत् ॥
KKKKekkkkkkkkkkks शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै। तेजस्वि नावधीत- मस्तु । मा विद्विषावहै। iksksks kadke kakke aksaks kakkadkesaksksiksiksaksiksiksaksaksaksiks ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
श्रीहरिः मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका भ० मं० पृष्ठ ३ २०० १३ १९ २ ३ ६ २० १६४ १७० १३१ १७१ २१७ १७७ १३ ५ ५ ८ ६ ५ w ४ १ ४ मन्त्रप्रतोकानि अजात इत्येव कश्चित् अगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा अपाणिपादो जवनो ग्रहीता अग्निर्यत्राभिमध्यते अणोरणीयान्महतो महीयान् अनाद्यनन्त कलिलस्य मध्ये अजामेका लोहितशुक्लकृष्णाम् अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः आदिः स सयोगनिमित्तहेतुः आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि उद्गीतमेतत्परम तु ब्रह्म ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् एको वशी निष्क्रियाणां बहूनाम् एतज्ज्ञेय नित्यमेवात्मसस्थम् एको देवः सर्वभूतेषु गूढः एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः एकैक जाल बहुधा विकुर्वन् एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः एष देवो विश्वकर्मा महात्मा एको ह५ सो भुवनस्यास्य मध्ये ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता घृतात्पर मण्डमिवातिसूक्ष्मम् छन्दासि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि तमीश्वराणा परम महेश्वरम् तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढम् तदेवामिस्तदादित्यः ततो यदुत्तरतर तदरूपमनामयम् २१२ २२४ २२२ ८९ १८२ २३२ ११५ ८ ur १ ६ १२ १२ ११ १६ २ २३१ ३ ३ १४९ २०६ १५२ २ ६ १९४ १५ १ २३६ 10 ५६ २ १६ ९ w ७ ५ २११ १९३ १८३ २२७ २०९ १७५ १६२ ur ४ २ १० [ २५४ ] ... ७ १५९ १ ४ ७४ ६ ३ २२१ २४४ ६ २१ १५ १ ... ३ ३ १२० દ૨ १७६ १७८ .. ४ ६ ५ १ १८ ततः परं ब्रह्मपरं वृहन्तम् तमेकनेमि त्रिवृतं पोडशान्तम् तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयः तपःप्रमावाद्देवप्रसादाच ब्रह्म तिलेपु तैलं दधनीव सर्पिः ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् त्वं स्त्री त्वं पुमानसि द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया वे अक्षरे ब्रह्मपरे वनन्ते नवद्वारे पुरे देही न सहगे तिष्टति रूपमस्य न तस्य कार्य करणं च विद्यते न तत्र मर्यो भाति न चन्द्रतारकम् न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् निष्कलं निष्क्रिय शान्तम् नील. पतझो हरितो लोहिताच. नीहारधूमार्कानिलानलानाम् नैनमूर्य न तिर्यञ्चम् नैव स्त्री न पुमान्पः पश्चस्रोतोऽम्चँ पञ्चयोन्युग्रवक्राम् १६९ १९९ २० .. ६ ८ २२८ ६ ૨૪ ६ ९ २२९ ul ६ १९ २४१ .. २ ११ १७६ १४३ १९८ २१३ ४ ५ ५ ८४ पुरुष एवेदर सर्वम् १६६ ९ प्राणान्प्रपीडयेह संयुक्तचेष्ट पृज्यतेजोऽनिलखे समुत्थिते भावग्राह्यमनीडाख्यम् ३ ४५ १४ २१७ महान्प्रभुर्वे पुरुषः १८५ २०१ ४ २२ २ १४८ १ १५१ माया तु प्रकृति विद्यात् मा नस्तोके तनये मा यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वम् य एको जालवानीशत ईशनीभि. यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित् य एकोऽवों बहुधा गतियोगात् यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिः vo १६१ ४ १८ [ २५५ ] ... I w w १० .. w २० २३ .. २ १४ २०९ २३० ૨૪૨ २५० १४६ १५७ १५८ १२८ १२९ ३ w यच्च स्वभाव पचति विश्वयोनिः यस्तन्तुनाम इव तन्तुभिः यदा चर्मवदाकाशम् यस्य देवे परा भक्तिः यथैव विम्ब मृदयोपलिप्तम् या ते रुद्र शिवा तनू० यामिषु गिरिशन्त हस्ते युञ्जते मन उत युञ्जते युजे वा ब्रह्म पूर्व्यम् युञ्जानः प्रथम मनः युक्तेन मनसा वय देवस्य युकवाय मनसा देवान् येनावृत नित्यमिद हि सर्वम् यो देवाना प्रभवश्वोद्भवश्च यो योनि योनिमधितिष्ठत्येकः यो देवाना प्रभवश्वोद्भवश्च यो देवानामधिपो यस्मिन् यो योनि योनिमधितिष्ठत्येकः यो ब्रह्माण विदधाति पूर्वम् :: : ur २ २ ५ २ ar २ २ २ m wr २ ३ १२५ १२७ २२० १५६ १८६ ४ & ११ १२ १८८ ५ २ २०४ ur १८ २ १५० - १ १३ १३ १४५ سی ९ ११८ २१३ ३ यो देवो अनौ यो मासु लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वम् वह्वेर्यथा योनिगतस्य मूर्तिः वालाग्रशतभागस्य विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखः वेदाहमेत पुरुष महान्तम् वेदाहमेतमजर पुराणम् वेदान्ते परम गुह्यम् स तन्मयो ह्यमृत ईशसस्थः स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिः स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यः सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैः सर्वा दिश ऊर्ध्वमघश्च तिर्यक् स एव काले भुवनस्य गोता my ३ ३ १५४ ८ ३ ६ २२ १७२ २४८ w १७ ६ २३८ ६ ur २३७ २२६ ५ ११ ५ २१४ ४ २०७ १५ १९१ [२५६ पुरुषः ३ १६८ . १३७ १४ २ १० २ १४२ ७ १२ सर्वेन्द्रियगुणाभासम् सर्वतःपाणिपादं तत् सहलगीर्षा समे शुची गर्करावहिवालुका सवित्रा प्रसवेन जुपेत सर्वाननशिरोग्रीवः समाने वृक्षे पुन्यो निमग्न सर्वव्यापिनमात्मानम् सर्वाजीवे सर्वसंस्थे वृहन्ते सूक्ष्मातिसूक्ष्म कलिलस्य मध्ये संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च स्वदेहमरणिं कृत्वा स्थूलनि सूक्ष्माणि बहृनि चैव स्वभावमेके कवयो वदन्ति क्षर प्रधानममृताक्षरं हरः ज्ञानौ द्वावजावीशनीशो ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः त्रिचन्नतं स्थाप्य समं शरीरम् .. १ :: १ १६२ १८० १२२ ८६ १९० ६ १४ १ ८ १ १४ ५ १२ १२० २.५ ६ १ १ १० १०७ ९ १ २ १०१ १०८ १३५ ८ गीताप्रेस, गोरखपुरकी विविध गीताएँ और अन्य पुस्तकें 1) गीता-[श्रीशांकरभाष्यका सरल हिन्दी-अनुवाद ] इसमें मूल भाष्य तथा भाष्यके सामने ही अर्थ लिखा है । भाष्यके पदोको अलग-अलग करके लिखा गया है और गीतामें आये हुए हरेक शब्दकी पूरी सूची है, चित्र ३, पृ० ५१९, ."२||) मूल्य साधारण जिल्द २॥) बढ़िया कपड़ेकी जिल्द गीता-मूल, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी, प्रधान और सूक्ष्मविषय एवं त्यागसे भगवत्प्राप्तिसहित, मोटा टाइप, सुन्दर कपड़ेकी ११) जिल्द, ५७० पृष्ठ, ४ बहुरगे चित्र, मूल्य गीता-प्रायः सभी विषय ११) वालीके समान, श्लोकोके सिरेपर भावार्थ छपा हुआ है, साइज और टाइप कुछ छोटे, पृष्ठ ४६८, मूल्य 19) सजिल्द ||12) गीता-(गुटका) ११) वाली गीताकी ठीक नकल, पृष्ठ ५८८, सजिल्द मूल्य ॥) गीता-भाषाटीका सचित्र, त्यागसे भगवत्प्राप्तिसहित, मूल्य =)॥ सजिल्द )। गीता-साधारण भाषाटीकासहित मोटा टाइप, मूल्य !!) सजिल्द 1) गीता-मूल, मोटे अक्षरवाली, सचित्र मूल्य 1-) सजिल्द गीता केवल भाषा, इसमें श्लोक नहीं है। सचित्र मूल्य !) सजिल्द गीता-भाषा (गुटका) प्रत्येक अध्यायके माहात्म्यसहित, मूल्य गीता पञ्चरत्न-मूल, सचित्र, मोटे टाइप, पृष्ठ ३२८ सजिल्द, मूल्य गीता-मूल, विष्णुसहस्रनामसहित, सचित्र और सजिल्द गीता--मूल, तावीजी, साइज २४२॥ इञ्च सजिल्द गीता-दो पन्नोंमें सम्पूर्ण १८ अध्याय, मूल्य -) गीता केवल दूसरी अध्याय मूल और अर्थसहित, मूल्य गीताका सूक्ष्मविषय-गीताके प्रत्येक श्लोकोंका हिन्दी में सारांश है, मूल्य -) श्रीकृष्ण-विज्ञान-गीताका श्लोकोंसहित हिन्दी पद्यमें अनुवाद सचित्र 1) स० १) श्रीमद्भगवद्गीता गुजराती भाषामें सभी विषय ११) वाली गीताके समान ११) श्रीमद्भगवद्गीता मराठीभाषामें-समी विषय ११) वाली गीताके समान मू०११) श्रीमद्भगवद्गीता बंगलाभाषामें सभी विषय |5) वाली गीताके समान, ॥1) भापाटीका-सहित एवं मूल संस्कृत ग्रन्थ स्वामी श्रीशकराचार्यजीके भाष्य मुण्डकोपनिषद्-पृष्ठ १३२, मूल्य !) हिन्दी अनुवादसहित (सचित्र) उपर्युक्त पाँचों एक जिल्दमें उपनिषद्-भाष्य खण्ड १, मूल्य २१-) ॥) माण्डूक्योपनिषद्-श्रीगौडपादीय कठोपनिषद्-पृष्ठ १७२, मू० ...||-)| कारिकासहित पृष्ठ ३००, मूल्य १) तैत्तिरीयोपनिषद्-पृष्ठ २५२, मू०।-) पता-गीताप्रेस, गोरखपुर ... ... ... ईशावास्योपनिषद्-पृष्ठ ५०, मूल्य । केनोपनिषद्-पृष्ठ १४६, मूल्य प्रश्नोपनिषद्-पृष्ठ १३०, मू० .12) श्वे० उ०३३ " मूल्य ) मूल्य ॥) ( २ ) ऐतरेयोपनिषद्-पृष्ठ १०४, मूल्य 1) | मुमुक्षुसर्वस्वसार-सानुवाद, मूल्य ||-) उपर्युक्त तीनों एक जिल्दमें सजिल्द १-) उपनिषद-भाष्यखण्ड २, मू० २) | सूक्तिसुधाकर छान्दोग्योपनिषद्-पृष्ठ ९८४, चित्र ९, स्तोत्ररत्नावली खण्ड ३, मूल्य ३॥1) श्रुतिरत्नावली मूल्य ॥) श्रीमद्भगवदीता-३ चित्र, पृष्ठ ५१९, लघुसिद्धान्तकौमुदी मूल्य ।) मू० २॥) सजिल्द २||) गृह्याग्निकर्मप्रयोगमाला-(संस्कृत-हिन्दी) विष्णुसहस्त्रनाम-पृ० २०५, मू० -) मूल्य 1-) स्वामी श्रीगंकराचार्यजीके ग्रन्थ, भाषा- प्रेमदर्शन (नारदभक्तिसूत्र) नुवादसहित (सचित्र)- वित्तृत टीकासहित मूल्य ।) विवेक-चूडामणि-पृष्ठ २२४, मू० ।-) सजिल्द मनुस्मृति-केवल दूसरा अध्याय और ॥) प्रबोध-सुधाकर-पृष्ठ ८०, मूल्य )|| उसका हिन्दी अनुवाद, मूल्य -)|| -) अपरोक्षानुभूति-पृष्ठ ४८, मू० =)॥ मूलरामायण-सानुवाद मूल्य गोविन्ददामोदरस्तोत्र-सार्थ मूल्य -) शतश्लोकी-पृष्ठ ६४, मू० -) प्रश्नोत्तरी-(गुटका) पृ० ३२, मू०)। विष्णुसहस्रनाम-मू०)। सजिल्द -)। रामगीता-सानुवाद, मूल्य DIL श्रीविष्णुपुराण-सानुवाद, ८ चित्र, मू० शारीरकमीमांसादर्शनम् (मूल))॥ सजिल्द २॥) बढ़िया जिल्द २) सन्ध्या-विधिसहित, मूल्य ॥ अध्यात्मरामायण-सानुवाद, ८ चित्र बलिवैश्वदेवविधि-मूल्य ॥ मूल्सा जिल्द १)वढ़िया जिल्दर) पातञ्जलयोगदर्शन (मूल) मूल्य )। श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध-संचित्र | नारदभक्तिसूत्र ( सानुवाद) मूल्य )। सटीक, मूल्य ... 1) सजिल्द १) । सप्तश्लोकी गीता-मूल्य आधा पैसा ... श्रीजयदयालजी गोयन्दकाद्वारा लिखित पुस्तकें- -तत्त्व-चिन्तामणि (भाग १)-सचित्र, पृष्ठ ३५०, मोटा कागज, सुन्दर छपाई-सफाई, मूल्य प्रचारार्थ केवल ॥2) सजिल्द ||-) इसीका छोटा गुटका संस्करण, पृष्ठ ४४८, मूल्य ।-) सजिल्द 13) २-तत्त्व-चिन्तामणि (भाग २)-सचित्र, पृष्ठ ६३२, मोटा कागज, सुन्दर छपाई-सफाई, मूल्य प्रचारार्थ केवल =) सजिल्द इसीका छोटा गुटका संस्करण, , पृष्ठ ७५०, मूल्य -) सजिल्द ३-तत्त्व-चिन्तामणि (भाग ३)-मूल्य ) सजिल्द ||) इसीका छोटा गुटका संस्करण, पृष्ठ ५६०, मूल्य ।-) सजिल्द 13) ४-परमार्थ-पन्नावली (भाग १)-सचित्र, कल्याणकारी ५१ पत्रोंका संग्रह मूल्य ।) पता--गीताप्रेस, गोरखपुर आधा पैसा ( ३ ) क) ५-नवधा भक्ति-सचित्र, पृष्ठ ७०, मूल्य ६-ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप-सचित्र, मूल्य ७-गीताका सूक्ष्म विषय-गीताके प्रत्येक श्लोकका हिन्दीमें साराश मूल्य ॥ ८-चेतावनी-पृष्ठ २४, मूल्य ९-गजल-गीता-गजलमें गीताका बारहवाँ अध्याय, मूल्य तस्व-चिन्तामणि तीनों भाग लेनेवालेको नीचेकी पुस्तके नं० १० से २६ तक लेनेकी एक प्रकारसे आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इनके लेख इन तीनों में आ गये हैं। १०-गीता-निबन्धावली a) | १८-सत्यकी शरणसे मुक्ति ॥ ११-नारीधर्म-सचित्र, पृष्ठ ५२, -॥१९-व्यापारसुधारको आवश्यकता १२-श्रीसीताके चरित्रसे आदर्श और व्यापारसे मुक्ति ॥ २०-त्यागसे भगवत्प्राप्ति १३-सच्चा सुख और उसकी २१-धर्म क्या है? -)। २२-महात्मा किसे कहते हैं ? ) १४-श्रीप्रेमभक्तिप्रकाश २३-प्रेमका सच्चा स्वरूप १५-गीतोक्त सांख्ययोग और २४-हमारा कर्तव्य । निष्काम कर्मयोग ॥ २५-ईश्वर दयालु और न्यायकारी है)। १६-भगवान् क्या हैं? On २६-ईश्वरसाक्षात्कारके लिये नाम- १७-भगवस्मासिके विविध उपाय )॥ जप सर्वोपरि साधन है । शिक्षा-मूल्य - )। प्राप्तिके उपाय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारद्वारा लिखित कुछ पुस्तकें विनय-पत्रिका-(सचित्र) गो तुलसी भक्त नारी-(सचित्र) इसमें शबरी, दासजीके ग्रन्थकी टीका १)स०११) मीराबाई,जनावाई करमैतीवाई नैवेध-चुने हुए श्रेष्ठ निबन्धोंका और रबियाकी मीठी-मीठी सचित्र सग्रह । मू० ॥) स० ) जीवनियाँ हैं, ६ चित्र,पृ०८०,1-) तुलसीदल-परमार्थ और साधनामय भक्त-पञ्चरत्न-(सचित्र) इसमें रघुनाथ, निबन्धोंका सचित्र सग्रह), (5) दामोदर, गोपाल चरवाहा, उपनिषदोंके चौदह रत्न-१४ कथाएँ, शान्तोबा और नीलाम्बरदासकी १४ चित्र, पृ० १००, मू०) प्रेमभक्तिपूर्ण कथाएँ हैं, ६ प्रेमदर्शन-नारद-भक्ति-सूत्रकी विस्तृत टीका, चित्र, पृ०२००, मू०/-) चित्र, पृ० ८०, मू० 1-) भक वालक-(सचित्र) इसमें भक्त भक-चन्द्रिका-७ भगवत्-प्रेमियोंकी गोविन्द, मोहन, धन्ना जाट, कथाएँ, ७चित्र, पृष्ठ ९२, मू०/-) चन्द्रहास और सुधन्वाकी सरस, आदर्श भक-७ भक्तोंकी कथाएँ, भक्तिपूर्ण ५ कथाएँ हैं, पृ०८०,1-)| ७ चित्र, पृष्ठ ११२, मूल्य 1) पता-गीताप्रेस, गोरखपुर ।
( ४ ) । लोभमें पाप-मूल्य आधा पैस zationi भक्त-सप्तरत्न-७ भागवतोंकी लीलाएँ, गोपी-प्रेम-सचित्र, पृष्ठ ५८, मू० ७ चित्र, पृष्ठ १०६, मूल्य |-)| मनको वश करनेके कुछ उपाय मूल्य भक्त-कुसुम-६ भगवत्-अनुरागियोंकी आनन्दकी लहरें-सचित्र, मूल्य -) वार्ताएँ, ६ चित्र, पृ० ९१, मू०/-) | ब्रह्मचर्य-ब्रह्मचर्यकी रक्षाके अनेक सरल प्रेमी भक्त-५प्रभु-भक्तोंकी जीवनिया, उपाय बताये गये हैं। मू० -) ९ चित्र, पृष्ठ १०४, मूल्य 1-) समाज-सुधार-समाजके जटिल प्रश्नों- यूरोपकी भक्त-स्त्रियाँ-४ सेवापरायण पर विचार, सुधारके साधन,मू०-) महिलाओंके चरित्र,३ चित्र,मू०1) | वर्तमान शिक्षा-बच्चोंको कैसी शिक्षा कल्याण-कुञ्ज-उत्तमोत्तम वाक्योंका किस प्रकार दी जाय ? पृ०४५,-) सचित्र संग्रह, पृ० १६४, मू० 1) मानव-धर्म-धर्मके दश लक्षण सरल नारदभक्तिसूत्र-सटीक, मूल्य दिव्य सन्देश-भगवत्प्राप्तिके उपाय ) भापामे समझाये है,पृ०११२,मू००) साधन-पथ-सचित्र, पृ० ७२, मू० =)॥ Way to God-Real1- भजन-संग्रह-भाग ५वा (पत्र-पुष्प) -/4/- सचित्र सुन्दर पद्यपुष्पोंका संग्रह,-) our Present-Day Edu- स्त्री-धर्मप्रश्नोत्तरी-सचित्र, ७५००० cation -/3/- छप चुकी, पृष्ठ ५६, मूल्य -)| The Divine Message -/-/ सुन्दर सस्ते धार्मिक दर्शनीय चित्र साइज, रंग और दाम १५४२० सुनहरा -)| रंगीन -) १०४१५ || )३ ७||४१० )३ ) १) सैकड़ा ५४७|| रंगीन १) सैकड़ा * विशेष जानकारीके लिये पुस्तकों और चित्रोंका सूचीपत्र अलग-अलग मैंगवाइये । पता-गीताप्रेस, गोरखपुर कल्याण ( भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, धर्म और सदाचारसम्बन्धी सचित्र मासिक पत्र) वार्षिक व्यवस्थापक-कल्याण, गोरखपुर Kalyana-Kalpataru. English Edition of Hindi Kalyan ) Annual Subscription Rs 4/8 MANAGER- Kalyana-Kalpataru, Gorakhpur " " " सादा मूल्य ४३)