Sanmati Library, Jaipur
Shri Pattavali-samucchaya Volume-1
Front matter
Published by:-
MAFATLAL MANEKCHAND,
Hony. Secretary,
8. C. J. B. S.
VIRAMGAM (Gujrat)
Printed by:
BHOOP SINGH SHARMA,
SARASWATI PRIXTING PRESS,
Belanganj, AGRA.
उपक्रम यह एक अति स्पष्ट बात है कि किसी भी धर्म-समाज या राष्ट्र का जीवन क्षेवल वर्तमान कालीन परिस्थित में ही परिसीमित नहीं होता, वरन् उसके पीछे अतीव विस्तृत भूतकाल होता है और आगे निःसीम भविष्यकाल । भूतकाल को सुचारुतया ज्ञात करने का एक मात्र साधन है उसके इतिहास का तुलनात्मक ज्ञान एवं ऐतिहासिक महापुरुषों का चरित्रावलोकन । भविष्य की रूपरेखाका ज्ञान भी पूर्व इतिहास की बुनियाद के ऊपर चुने हुए विचारपूर्ण मनोमंथन के ऊपर निर्भरित है। इस तरह भूत और भविष्य दोनों ही के लिये इतिहास का ठोस ज्ञान अनिवार्य है, और इसी कारण से इतिहास एक अति महत्वपूर्ण एवं यावश्यकीय विपय मानाजाता है इतिहास के धूरिण पौर्वात्य व पाश्चात्य विद्वानों का यह अनुभवपूर्ण कथन है कि जैन इतिहास के अलावा भारतीय इतिहास अपूर्ण है । अतएव जैन इतिहास के अभ्यास में उपयुक्त हों ऐसे-शिलालेख, पट्टावली, प्रशस्ति, सिक्के एवं राससंग्रह आदि विषयक ग्रन्थरत्न तैयार कराना जैन समाज के लिये अतीव आवश्यक है। इसी विचारजन्य प्रेरणासे, उपलब्ध किन्तु अमुद्रित पट्टावलियों के प्रकाशनरूप में पट्टावली समुञ्चय" नामक ग्रन्थ तैयार करने की योजना की गई है। यह ग्रन्थ क्रमशः कई भागों में प्रकाशित होगा, और इसमें निस्पक्षरित्या, केवल ऐतिहासिक दृष्टि से यथोपलब्ध हरेक जैन मत एवं गच्छ की पट्टावलियों का समावेश होगा। श्राज मैं इसी योजना के फलस्वरूप “पट्टावली समुच्चय" के प्रथम भाग को पुरातत्व के अभिलापियों के सम्मुख प्रस्तुत कराता हूँ। इसमें कुल तेरह पट्टा- वलियां दी गई हैं। "कल्पसूत्र स्थविरावली" व "नंदिसूत्र पट्टावली" ये दोनों देवर्धिगणि क्षमाश्रमण की (१) गणधरवंशीय तथा (२) वाचकवंशीय पट्टावलियां हैं, जिनके ऊपर, जैनधर्म के क्रमिक विकास की ओर दृष्टिपात करने वाले की दृष्टि प्रथम ही । स्थिर होती है। मैंने उपयुक्त दोनों पहावलियों को मुख्य मान कर १३ पट्टावलियां, भाग में संगृहीत एवं संपादित की हैं। जिनमें तीन वाचकवंश की हैं और शेप दस गणधरवंश की । इन सब का क्रम इस प्रकार है- (१)कप्पसुत्त थेरावली (प्राकृत)--चतुर्दशपूर्वधारी श्री भद्रबाहु स्वामी ने नवम पूर्वसे दशा श्रुतस्कंध उद्धृत किया, जिसके आठवें अध्ययन में कल्पसूत्र की रचना हुई । प्रस्तुत ग्रन्थ का समावेश उसी कल्पसूत्र में होता है । पश्चात् उस परंपरा में, देवर्धिगणि क्षमाश्रमण ने वी०नि० सं० १८० की वल्लभीवाचना में विद्यमान एवं अपने नाम तक के गणनायकों की पहावली योजित कर दी। - (, २ ) दे० ला० सुरत मुद्रित कल्पसूत्र सुखबोधिका, आ० स० भावनगर मुद्रित कल्पकिरणावली, सुखबोधिका, भी. मा० बंबई मुद्रित कल्पसूत्र, श्रीचारित्रविजय जी के ज्ञानभन्डार का सचित्र हस्तलिखित कल्पसूत्र तथा. हर्मन जेकोबी द्वारा मुद्रित कल्पसूत्र से इस थेरावली का संशोधन किया है । ग्रन्थकर्ता का परिचय इस ग्रन्थ के पृ० ४४ में दिया है। (२) नंदीसूत्र पट्टावली (प्राकृत) नंदीसूत्र के कर्ता श्री देवर्धिगणिक्षमा- श्रमण ने भगवान् महावीर से प्रारंभकर अपने समय तक के वाचनाचार्यों की नामावली नंदीसूत्र के प्रारंभ में दी है। जिसका रचना काल वी. नि० सं० ६८० है। प्रा० स० सुरत मुद्रित श्री नंदीसूत्र तथा डेला के उपश्रय अहमदाबाद की, हस्तलिखित व. दा. नं० १४ नं. ४१ की ५३ पन वाली प्रति में उपलब्ध श्री अावश्यक नियुक्ति के श्रादि-मंगल पाठ से यह पदावली उद्धृत की गई है। तथा हस्तलिखित प्रति से उपलब्ध अधिक गाथाएँ ब्रोकिट-(.)में दी गई हैं। (३) दुसमाकालसमणसंघथयं (प्राकृत)—इस अन्य में वाचकवंश के श्राचार्यों को नामावली है। श्रीधर्मघोपसूरि ने तेरहवीं शताब्दि में इसकी रचना की। यह स्तोत्र वि० ध० ल. ज्ञा० आगरा से अशुद्ध एवं अपूर्ण प्राप्त हुआ था, जिसे अवचूरी के आधार पर यथाशक्य शुद्ध करके मुद्रित किया है। पश्चात् पू. पा० प्रवर्तक श्रीकांतिविजय जी महाराज से प्राप्त प्रति के शुद्ध पाठ को भी संयोजित कर दिया है। ग्रन्थकर्ता का परिचय पृ० २८ व ६० में दिया है। (४) श्रीगुरुपर्वक्रमः (संस्कृत)-महावैयाकरण श्रीगुणरत्नसूरि ने "क्रिया- रत्नसमुच्चय" नामक ग्रन्थ वि० सं० १४६६ में निर्माणित किया था। जो, य० प्र० मा० बनारस से प्रकाशित हुआ है। उसी से यह पट्टावली उद्धृत की है । ग्रन्थकर्ता का परिचय पृ० ६५ में है। (५) गुर्वावली-पट्टपरंपरासूरिनामानि (संस्कृत)-युगप्रधान श्रीमुनि- सुन्दरसूरि रचित यह ग्रन्थ य० प्र० मा० बनारस से प्रकाशित हुआ है। उसके ४६६ पधमय छन्दों में से केवल पहपरंपरा के प्राचार्यों के नाम मात्र ही फेरिस्त के रूप में यहां दिये गये हैं। रचनाकाल वि० सं० १४६६ है। ग्रन्थकर्ता का परिचय पृष्ठ ६६ में दिया है। (६) सोमसौभाग्य-पट्टावली (संस्कृत)-मुनि प्रतिष्ठासोमने श्रीसोम- सुन्दरसूरि के चरिन रूप "सोमसौभाग्य" काव्य की वि० सं० १५२४ में रचना की। जो जै० ज्ञा० प्र०म० बंबई से भापायुक्त मुद्रित हो चुका है। उसी के तीसरे सर्ग से यह पहावली ली गई है। ग्रन्थकर्ता की प्रशस्ति पृ०४० में है।
. ( ३ ) (७) तपगच्छ पट्टावली सूत्रवृत्ति (प्राकृत-संस्कृत)--उपाध्याय श्रीधर्म- सागर जी ने भगवान् महावीर से प्रारंभ कर जगद्गुरु श्रीहीरविजयसूरि तक के निर्ग्रन्थ, कौटिक, चंद्र, वनवासी वड़ व तपगच्छ का शृंखलाबद्ध इतिहास दिया है । इसकी वृत्ति स्वोपज्ञ है। श्रीहीरविजयसूरिजी ने चार गीतार्थों की परिपद् में इसका निरीक्षण व संशोधन किया था, अतएव यह ग्रन्थ अधिक प्रामाणिक गिना जाता है। यह पहावली वि० ध० ल. ज्ञा० आगरा से प्राप्त ह. लि. प्रति से संग्रहीत की है । रचनाकाल वि० सं० १६४६ है । ग्रन्थकर्ता का परिचय पृ० १७३ में है। इसी के साथ हमने निम्न तीन अनुपूर्तियां भी सम्मिलित करदी हैं। (१) तपागणपतिगुणपद्धति (प्राकृत संस्कृत) उपा० श्रीगुणविजयगणि ने श्रीविजयसेनसूरि व श्रीविजयदेवसूरि के चरित्र वर्णन के रूप में पूर्व पट्टावली की अनुपूर्ति की है। इसे मैंने वि० ध० ल. ज्ञा० आगरा से प्राप्त ह० लि. प्रति व जै० सा० सं० गू० अहमदाबाद से प्रकाशित श्रीविजयदेवमहात्म्य के परिशिष्ठ से सम्पादित की है। ग्रन्थकर्ता का परिचय पृ० ८२ में है। (२) तपगच्छपट्टावली सूत्रवृत्ति अनुसंधान (संस्कृत-प्राकृत) उपा० श्री मेघविजयजी ने स्वीपज्ञवृत्तियुक्त चारगाथाओं द्वारा श्रीविजयसेनसूरि प्रमुखचार प्राचार्यों की जीवनी प्रदर्शित की है। यह, वि० ध० ल• ज्ञा० आगरा से प्राप्त, कर्ता ने स्वहस्त से लिखित शुद्ध किन्तु जीर्ण प्रति से, मुद्रित की गई है। रचनाकाल वि० सं० १७३२ है । ग्रन्थकर्ता का परिचय पृष्ठ १०६ में है। (३) गुरुमाला (संस्कृत)-श्री. य० जै० गु० पालिताना के संस्थापक गुरुदेव श्रीचारित्रविजय जी महाराज ने इस गन्थ में भगवान महावीर से लेकर अपने दादागुरु श्रीविजयकमनसूरि तक के पट्टधरों का परिचय दिया है। साथ ही में पट्टधरों के समकालीन साधुओं की भी गणना दी है। मैंने उस ग्रन्थ में से केवल हीरविजयसूरि से प्रारंभ कर अंत तक के भाग को उद्धृत किया है। (८) श्रीमहावीर पट्टपरंपरा (संस्कृत)-श्रीदेवविमलगणि विरचित एवं नि० सा० प्रेस बम्बई से मुद्रित "हीरसौभाग्य" काव्य के चौथे सर्ग को यहां पर मैंने अक्षरशः उद्धृत किया है । जिसमें भगवान् महावीर से लेकर श्रीविजयहीरसूरि तक के प्राचार्यों की नामावली है। उसकी विशद एवं सोपज्ञ वृत्ति से मैंने यहां पर उपयुक्त भागमात्र ही ग्रहण किया है । इसकी रचना के विषय में यह विशेषता है कि इसका प्रारंभ करीव वि०सं० १६३६ में हुआ था और अंत करीब १६५६ में। क्योंकि धर्मसागरगणि रचित तपागच्छ पट्टावली में इसका उल्लेख है और १६५६ तक की कुछ घटनाओं का वर्णन भी इसमें मिलता है। ग्रन्थकर्ता का परिचय पृ० १७३ में है। ।
- - (९) युगप्रधानाः (संस्कृत)-उपा० श्रीविनयविजय जी रचित व पं० ही. ह. जामनगर द्वारा प्रकाशित "लोकप्रकाश" के ३४ दें सर्ग में दुसमाकाललमणसंघ- थयं का विशद अवतरण संस्कृत भाषा में दिया है। श्रतएव मैंने इसे वहां से संगृ- हीत किया है। रचनाकाल वि० सं० १७०८ है । ग्रन्थकर्ता का परिचय पृ० १०५में है। (१०) श्री सूरिपरंपरा (संस्कृत)-"लोक्यकाश" के ३७ वे सर्ग में कर्ता ने अपनी सूरि परंपरा रूप गणधरवंश का उल्लेख किया है। मैंने इसे वहीं से उद्धृत किया है। (११) पट्टावली सरोद्धार (संस्कृत)-उपा० श्रीरविदर्द्धन रचित इस गून्य में स्वसमयवर्ती गणनायक श्रीविजयरत्नसूरि तक की सूरिपसावली अवतरित की है। इसे मैंने वि० ध० ल. ज्ञा० अागरा से लब्ध प्रति से संगृहीत किया है। इसकी अनुपूर्ति में प्रदत्त परंपरा शायद् गन्यकर्ता की गुरुपरंपरा हो, ऐसा प्रतीत होता है। रचनाकाल वि. सं. १७३६ के करीब है। (१२) श्री गुरुपट्टावली (संस्कृत)-घागरा के श्रीचिंतामणि जी के भण्डार के नापने की श्रीविजयप्रभरि तक की पहावली की एक प्रति उपलब्ध हुई है। जिस पर कर्ता का नाम अवश्य है । कतिपय विशेषता होने से मैंने उसे संगृहीत की है। लेखक ने बाद में जिन नामों की वृद्धि की है, उनका भी अनुपूर्ति में शंयोजन कर दिया है। तथा उनके फुटनोट भी "टिप्यन" स्वरूप अक्षरशः दे दिये हैं। पिछले भाग में उल्लिखित वर्तमानकाल तक की भहारक परंपरा भी अनुपूर्ति में संयोजित कर दी है। (१३) उकेश गच्छीया पट्टावली (संस्कृत)-इसमें भगवान् पार्श्वनाथ से बीसवीं शताब्दी के कवलागच्छ के भट्टारक पर्यंत का इतिहाम दिया है। गन्यकर्ता के नाम का पता नहीं है। यह पट्टादली मैंने जनसाहित्य संशोधक त्रैमासिक से शुद्धाशुद्ध जैसी थी उद्धृत की है। इस प्रकार इस प्रथमभाग में १३ पट्टावलियां, १० अनुपूर्तियों तथा ७ श्रावश्यक परिशिष्ट दिये गये हैं। और यथोचित स्थानों पर विरोप फुटनोट व पाठा-. न्तर देने के साथ साथ विद्वानों की सरलता की दृष्टि से इस ग्रन्थ में आये हुए विशेष शब्दों के सात प्रकार के भिन्न भिन्न प्रकारादि अनुभम दिये गये हैं इस प्रकार इस ग्रन्थ को यथाराक्य पूर्ण करने की कोशिश की गई है। इस उपक्रन को समाप्त करने से पूर्व-मैं उन उदार एवं सहृदय निदहरों का नामोल्लेख करना उचित समझता हूँ, जिनकी प्रेमपूर्ण-हार्दिक प्रेरणा ने इस ग्रन्थ को शीन तैयार करने में सहायता की है। वे हैं-(१) पटना निवासी श्रीयुत - ( ५ ) के० पी० जयस्वाल (२) महान वैज्ञानिक सर जगदीशचंद्र दौत, जिनका प्रत्यक्ष परिचय मुझे राजगृही में हुआ था और जिनकी जैनतत्वज्ञान एवं जैन इतिहास विष- यक जिज्ञासा ने मुझे श्राकर्पित किया था। (३) कृष्णनगर के डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर व बंगला के प्रखर लेखक्ष तथा कवि श्रीयुत भूपदेवेन्द्र सोवाकर चटर्जी और (४) मथुरा न्युज्युम के क्यूरेटर श्रीमान् वाबू दासुदेवशरण M., A. I इस ग्रन्थ के प्रत्येक कार्य में पू० हेतमुनि जी महाराज, मुनिवर्य श्री ज्ञान- विजय जी तथा मुनि श्री न्यायविजय जी का उत्साहपूर्ण एवं हार्दिक सहभाव रहा है। तथा रतिलाल जी देसाई न्यायतीर्थं तर्कभूपण, भिखालाल जी देसाई न्यायतीर्थ तर्कभूपण तथा पं० रामकुमार जी न्यायतीर्थ विद्याभूपण हिन्दी प्रभाकर ने अकारदि क्रम के तैयार करने में उल्लेखनीय समय का भोग दिया है। श्रतएव उनका तथा अन्य गून्य-प्राप्ति में सहायक महानुभावों का हृदय से ऋणी हूँ। साथ ही में इस गन्थ के मुद्रक पं० भूपसिंह जी शर्मा मैनेजर सरस्वती प्रेस को मी धन्यवाद देना जरूरी समझता हूँ। "पहावली समुच्चय" के सब हिस्से प्रकट होने के पश्चात् ऐतिहासिक विचार पूर्ण एक विस्तृत प्रस्तावना लिखने का विचार होने से इस ग्रन्थ में तल्लम्बन्धी अहा- पोह नहीं किया है। जैन इतिहास के विस्तृत क्षेत्र के अभ्यासियों को किसी भी अंश में यह गून्य मार्गदर्शक एवं सहायक होगा तो मैं अपने प्रयास को सफल सममूंगा। अन्त में इस गन्थ के दूसरे भाग को भी मैं शीघ्रातिशीघ्र पुरातत्व के अभि- लापियों के कर कमल में रख सकूँ ऐसी परमात्मा महावीर से प्रार्थना करते हुए, मैं अपने कथन को पूर्ण करता हूं। रोशन मोहल्ला श्रागरा, वी. नि. सं०. २४५६) वसंत पंचमी -मुनि दर्शनविजय । विशेष नोट-उपक्रम प्रथम संस्कृत में ही लिखने का विचार था किन्तु वर्तमान राष्ट्रीय प्रवृत्ति व हिन्दी भापा का, राष्ट्रभाषा बनने की दृष्टि से, बढ़ता हुआ प्रचार देख कर हिन्दी में ही लिखना उचित समझा गया है।
अनुक्रमणिका अंक पट्टावली-नामानि पत्रांक १२ १५ २५ ३३ ३५ ४१ ८८ १-सिरिकप्पसूत्त-थेरावली २-सिरिनंदीसुअ-पट्टावली ३-सिरि दुसमाकालसमणसंघथयं ४-श्रीगुरुपर्वक्रमः ५-गुर्वावली-पट्टपरंपरा-सूरिनामानि ६-श्रीसोमसौभाग्य-पट्टावली ७-श्रीतपागच्छ-पट्टावलीसूत्रम् (१) श्रीतपागणपतिगुणपद्धतिः (२) श्रीतपागच्छ-पट्टावलीसूत्रवृत्यनुसन्धान (३) श्रीगुरुमाला -श्रीमन्महावीर पट्टपरंपरा (तिस्रोनुपूर्तयश्च) ९-श्रीयुगप्रधानाः, १०-श्रीसूरिपरंपरा ११-श्रीपट्टावलीसारोद्धारः (अनुपूर्तिश्च) १२-श्रीगुरुपट्टावली (तिस्रोनुपूर्तयश्च) १३-उपकेशगच्चीया पट्टावली परिशिष्टानि ॥ १-दुष्षमाकाल श्रीश्रमसंघस्तोत्र-संबन्धः २-गाथासंग्रहः ३-राजवंशाः A. B. C. D.E. ४-ऐतिहासिक पत्रं ५-८४ गच्छाः ६-लघुपट्टावली ७-पल्लीवालगच्छ ऐतिहासिक संग्रहः शन्दानां अकाराद्यनुक्रमः A. B. C. D. E. F. G. १०२ १२० १३६ १४४ १४८ १६३ १७७ १६५ १६६ १६७ २०१ २०३ २०४ २०५ २०७
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णयोत्थुणं समणस्स भगवो महावीरस्स | ( १ ) चउद्दस-पुव्वधारग-अन्तिमसुअकेवली-जुगप्पहाण सिरि-मद्दवाहु सामि विरइअस्स, सिरिकप्पसुत्तरस ।। थेरावली (श्री कल्पमूत्र स्थविरावली) तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवत्रो महावीरस्स नवगणा, इकारस गणहरा हुत्था ॥१॥ से केण?णं भंते ! एवं बुच्चइ-समणस्स भगवो महावीरस्स नव गणा, इकारस गणहरा हुत्था ? ॥२॥ समणस्स भगवत्रो महावीरस्स जिट्टे इंदभूई अणगारे गोयम (गोयमस) गुत्तेणं पंच समणसयाई वाएइ, मज्झिमए अग्गिभूई अणगारे गोयमगुत्तेणं पचसमणसयाई वाएइ, करणीअसे अणगारे वाउभूई गोयमगुत्तेणं (नामेणं) पंच समसयाई वाएइ, थेरे अनवियत्ते भारद्दाए गुत्तेणं पंच समसयाई वाएइ, थेरे अजसुहम्मे अग्गिवेसायणे गुत्तेणं पंच समणसयाई वाएइ थेरे मंडितपुत्ते वासिटे गुत्तेणं अधुढाई समसयाई वाएइ, थेरे मोरिअपुत्ते कासवे गुत्तेणं अधुट्ठाईसमणसयाइंवाएइ, थेरे अकंपिए गोयमे (गोयमस) गुत्तेणं--थेरे अयलमाया हारिआयणे गुत्तेणं--पत्तेयं एते दुरिणवि थेरा तिरिण तिरिण समसयाई वाएंति, थेरे अजमेइने थेरेपभासे-एए दुरिणवि थेरा कोडिन्ना गुत्तेणं तिषिण तिरिण समणसयाई वाएंति । से तेणटेणं अज्जो ! एवं वुच्चइ-समणस्स भगवत्रो महावीरस्स नव गणा, इकारस गणहरा हुत्था ॥३॥ بل पट्टावली समुच्चयः सव्वेवि णं एते समणस्स भगवओ महावीरस्स एकारसवि गणहस दुवालसंगिणो चउदसपुग्विणो समत्तगणिपिडगधारगा रायगिहे नगरे मासिएणं भत्तेणं अपाणएणं कालगया जावसव्वदुक्खप्पहीणा, थेरे इंदभूई, थेरे अजसुहम्मेय सिद्धिगए महावीरे पच्छा दुरिणवि थेरा परिनिव्वुया ॥ जे इमे अज्जत्ताए समणा निग्गंथा विहरंति, एए णं सब्वे अजसुहम्मस्स अणगारस्स आवञ्चिजा, अवसेसा गणहरा निरवच्चा वुच्छिन्ना ॥ ४ ॥ १-समणे भगवं महावीरे कासवगुत्ते रणं । समणस्स णं भगवो महावीरस्स कासवगुत्तस्स अजसुहम्मे थेरे अंतेवासी अग्गिवेसायणगुत्ते । २-थेरस्स णं अजसुहम्मस्स अग्गिवेसायणगुत्तस्स अजजंबुनामे थेरे अंवेवासी कासवगुत्तेणं ॥ ३--थेरस्स णं अजजंबुणामस्स कासवगुत्तस्स अजप्पभवे थेरे अंतेवासी कच्चायणसगुत्ते ॥ ४-थेररस्स पं अजप्पभवस्स कच्चायणसगुत्तस्स अजसिज्जंभवे थेरे अंतेवासी मणगपिया वच्छसगुत्ते ॥ ५-थेरस्स णं अजसिज्जंभवस्स मणगपिउणो वच्छसगुत्तस्स अन्ज- जसभद्दे थेरे अंतेवासी तुगियायणसगुत्तेx ॥ संखित्तवायणाए अनजसभद्दाओ अग्गओ एवं थेरावली भणिया। ६--तंजहा-थेरस्स पं अज्जजसभढुस्स तुगियायणसगुत्तस्स अंते- 'वासी दुवे थेरा-थेरे अज्जसंभूअविजए माढरसगुत्ते, थेरे अजभद्दबाहू पाईणसगुत्ते। ७--थेरस्स एणं अज्जसंभूअविजयस्स माढरसगुत्तस्स अंतेवासी थेरे अज्जथूलभद्दे गोयमस्गुत्ते । ८-थेरस्स एणं अज्जथूलभद्दस्स गोयमसगुत्तस्स अंतेवासी दुवे थेरा- धेरे अज्जमहागिरी एलावच्चसगुत्ते, थेरे अज्जसुहत्यी वासिद्धसगुत्ते । x अत्र चतुर्दशपूर्वधारीणः दशाश्रुतस्कंध-कल्पसूत्र रचयितुः भगवतः श्रीभद्रवाट स्वामिनः पट्टावली समाता | कल्पसूत्र-स्थविरावली ६-थेरस्स णं अज्जसुहत्थिस्स वासिठुसगुत्तस्स अंतेवासी दुवे थेरा सुट्ठियमुप्पडिचुद्धा कोडियकाकंदगा बग्घावच्चसगुत्ता । १०-थेराणं सुट्ठियसुप्पडिबुद्धाणं कोडियकाकंदगाणं वग्यावच्चस- गुत्ताणं अंतेवासी थेरे अज्जइंददिन्ने कोसियगुत्ते । ११-थेरस्स अज्जइंददिन्नस्स कोसियगुत्तस्स अंतेवासी थेरे अन्जदिन्ने गोयमसगुत्ते। १२-थेरस्सणं अज्जदिन्नस्स गोयमसगुत्तस्स अंतेवासी थेरे अज्ज- सीहगिरी जाइस्सरे कोसियगुत्ते । १३--थेरस्सणं अज्जसीहगिरिस्स जाइस्सरस्स कोसियगुत्तस्स अंतेवासी थेरे अज्जवइरे गोयमसगुत्ते । १४-थेरस्स एवं अज्जवइरस्स गोयमसगुत्तस्स अंतेवासी थेरे अज्ज- वइरसेणे उक्कोसियगुत्ते। १५-थेरस्स णं अज्जवइरसेणस्स उकोसिअगुत्तस्स अंतेवासी चत्तारि थेरा--थेरे अज्जनाइले १ थेरे अज्जपोमिले २ थेरे अज्जजयन्ते ३ थेरे अज्जतावसे ४॥ थेराओ अज्जनाइलाओ अज्जनाइला साहा निग्गया, थेराओ अज्जपोमिलाओ अज्जपोमिला साहा निग्गया, थेरानो अज्ज- जयन्ताओ अज्जजयन्ती साहा निग्गया, थेराओ अज्जतावसामो अज्जता. वसी साहा निग्गया ४ इति ॥६॥ वित्थरवायणाए पुण अज्जजसभदाओ पुरो थेरावली एवं पलोइज्जइ (विलोजइ)। तंजहा- ६-थेरस्स णं अजजसभहस्स तुगियायणसगुत्तस्स इमे दो थेरा अन्तेवासी अहावच्चा अभिएणाया हुत्था ।। तंजहा-थेरे अन्नभद्दबाहू पाईण- सगुत्ते, थेरे अन्नसंभूअविजए माढरसगुत्ते, ७-थेरस्स णं अज्जभद्दवाहुस्स पाईणसगुत्तस्स इमे चत्तारि थेरा अन्तेवासी अहावचा अभिएणाया हुत्था, तंजहा-थेरे गोदासे १,थेरेअग्गि- दत्ते २, हेरे जएणदत्ते ३, थेरे सोमदत्ते ४ कासवगुत्त णं ॥ थेरेहिन्तो गोदा- सेहितो कासव गुत्तेहिंतो इत्थं णं गोदासगणे नामं गणे निग्गए, तस्स एं .
४
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पट्टावली-समुच्चयः
इमाओ चत्तारि साहाओ एवमाहिनंति, तंजहा-तामलित्तिया १, कोडीवरि-
सिया २ पंडुवद्धणिया (पोंडवद्धणिआ) ३, दासी खब्बडिया ४ ।
७ थेरस णं अजसंभूयविजयस्स मोढरसगुत्तस्स इमे दुवालस
थेरा अन्तेवासी अहावच्चा अभिषणाया हुत्था तंजहा-
नंदणभदु १ वनंदण-भद्दे २ तह तीसभ६ ३ जसभद्दे ४
थेरे य सुमणभद्दे (सुमिणभद्दे) ५, मणिभद्दे (गणिभद्दे) ६ पुण्णभद्दे ७ य॥१॥
थेरे अथूलभद्दे ८ उज्जुमई ६ जंबुनामधिने १० य ।।
थेरे अ दीहभद्दे ११, थेरे तह पंडुभहे १२ य ॥२॥
थेरअस्स णं अजसंभूअविजयस्स माढरसगुत्तस्स इमानो सत्त अंते-
वासिणीओ अहावश्चाओ अभिणायाओ हुत्था,
तंजहा जक्खा १ य जक्खदिएणा २, भूया ३ तह चेव भूयदिण्णा य४॥
सेणा ५ वेणा ६ रेणा ७ भगिणीओ थूलभद्दस्स ॥१॥
८-थेरस्स णं अजथूलभदस्स गोयमसगुत्तस्स इमे दो थेरा अन्ते-
पासी अहावच्चा अभिएणाया हुत्था, तञ्जहा-थेरे अजमहागिरी एलावच्चस-
गुत्ते १ थेरे अज्जसुहत्थी वासिद्धसगुत्ते २
थेरस्स णं अजमहागिरिस्स एलावच्चसगुत्तस्स इमे अट्ट थेरा अन्ते-
वासी अहावच्चा अभिएणाया हुत्था, तनहा-थेरे उत्तरे १ थेरे वलिस्सहे २,
मेरे धणड्डे ३ थेरे सिरिड्ड ४ थेरे कोडिन्ने ५ थेरे नागे,थेरे नागमित्ते ७,थेरे
छलए रोहगुत्ते कोसियगुत्ते णं ८॥ थेरेहिन्तो रणे छलूएहिन्तो रोहगुत्तेहिन्तो
कोसियगुत्तेहिन्तो तत्थ णं तेरासिया निग्गया। थेरेहिन्तो णं उत्तर बलिस्स-
हेहिन्तो तत्थ णं उत्तर वलिस्सहे नाम गणे निग्गये। तस्सणं इमाओ चत्तारि
साहाओ एवमाहिज्जति,
तंजहा-कोसम्बिया १, सोइत्तिया (सुत्तिवत्तिा)२ कोडंबाणी ३, चन्दनागरी ४
१-थेरस्स णं अजसुहत्थिस्स वासिद्धसगुत्तस्स इमे दुवालस थेरा
अंतेवासी अहावच्चा अभिएणाया हुत्था,
तंजहा-थेरे अ अजरोहण १, जसमंदे २, मेहगणी ३ य कामिड्ढी ४
सुट्ठिय ५, सुप्पडिबुद्धे ६, रक्खिय ७ तह रोहगुत्ते ॥१॥
५ -- कल्पसूत्र-स्थविरावली इसिगुत्ते । सिरिगुत्ते १०, गणी अ वम्भे ११ गणी य तह सोमे १२ ।। दस दो अगरणहरा खलु, एए सीसा सुहत्थिस्स ॥२॥ थेरेहिन्तो णं अजरोहणेहिन्तो णं कासवगुत्तेहिन्तो णं तत्थ वं उद्देहगणे नामं गणे निग्गए, तस्सिमाओ चत्तारि साहाओ निग्गयाओ। छच्च कुलाई एवमाहिति ॥ के किं तं साहाओ ? साहायो एवमाहिजति, ताहा-उदुवरिजिया १,मास पूरिा २,मइपत्तिया ३,पुरणपत्तिा (पएणपत्तिा)४ सेतं साहायो।। से किं तं कुलाई ? कुलाइं एवमाहिजति । तंजहा- पढमं च नागभूयं । बिइयं पुण सोमभूइगं होइ ॥ अह उलगच्छ तइअं३, चउत्थयं हत्थलिजं तु ॥२॥ पंचमग नन्दिनं ५, छटुं पुण पारिहासयं ६ होइ ॥ उद्देह गणस्सेए, छच्च कुला हुंति नायव्वा ॥ २॥ थेरेहिन्तो पं सिरिगुत्तेहिन्तो हारियसगुत्तेहिन्तो इत्थ पं चारणगणे नामं गणे निग्गए, तस्स णं इमाओ चत्तारि साहाओ, सत्त य कुलाई एव- माहिज्जति. से किं तं साहाओ ? साहाओ-एवमाहिज्जति तंजहा-हारियमाला- गारी १, संकासीा २, गवेधुया ३, वज्जनागरी ४। से तं सहाओ ।। से किं तं कुलाई ? कुलाई एवमाहिज्जति तंजहा- पढमित्थ वत्थलिज्जं १ वीयं पुण पीइधम्मिश्र२ होइ॥ तइ पुण हालिज्ज ३ चउत्थयं पूसमित्तिज्जं ॥१॥ पंचमगं मालिज्जं ५, छटुं पुण अन्नवेडयं ६ होइ ।। सत्तमयं कएहसह ७, सत्त कुला चारणगणस्स ॥२॥ थेरेहिन्तो भद्दजसेहिन्तो भारदायसगुत्तेहिन्तो इत्थ णं उडुवाडियगणे नामंगणे निग्गये, तस्स यं इमाओ चत्तारि साहाओ तिरिण कुलाई एवमा- हिज्जति॥ -- " -- ६ पट्टावली-समुच्चयः से किं तं साहाओ ? साहाओ एवमाहिज्जंति, तंजहा- चंपिज्जिया १ भहिज्जिया २ काकन्दिया ३ मेहलिज्जिया ४ से तं साहायो । से किं तं कुलाई ? कुलाई एवमाहिज्जति तंजहा-- भद्दजसिगं १ तह भद्द-गुत्तियं २ तइयं च होइ जसमदं ३ ॥ एयाइँ उडुवाडिय-ाणस्स तिएणेव य कुलाई ॥१॥ थेरेहिंतो णं कामिट्टीहितो कोडालस गुत्तेहिंतो इत्थ णं वेसवाडियगणे नाम गणे निग्गये, तस्स पं इमाओ चत्तारि साहाओ चत्तारि कुलाई एव- माहिज्जति । से कि तं साहाओ ? सा० तंजहा--सावस्थिया १, रज्जपालिया २, अन्तरिज्जिया ३, खेमिलज्जिया ४ । से तं साहाओ से किं तं कुलाई ? कुलाई एवमाहिज्जन्ति, तंजहा-- गणियं १ मेहिय २ कामड्डिअं ३ च तह होइ इन्दपुरगं ४ च ।। एयाइं वेसवाडिय गणस्स चत्तारि य कुलाई ॥१॥ थेरेहिंतोणं इसिगुत्तेहिन्तो काकन्दएहिन्तो वासिहसगुत्तेहिन्तो इत्य र माणवगणे नामं गणे निग्गये, तस्स पं इमाओ चत्तारि साहाओ, तिरिण य कुलाई एवमाहिज्जति॥ से किं तं सहाओ ? सहाओ एवमाहिज्जति, तजहा-कासवज्जिया १, गोयमज्जिया २, वासिटिया ३, सोरट्ठिया ४। से तं साहाओ ।। से कि तं कुलाई ? कुलाई एवमाहिज्जन्ति, तञ्जहा- इसिगुत्ति इत्थ पढमं १, वीयं इसित्तिअं मुणेयव्वं २॥ तइयं च अभिजयन्तं ३, तिरिण कुला माणवगणस्स ॥१॥ थेरेहिंतो सुट्टिय-सुप्पडिवुद्ध हिंतो कोडिय-काकंदएहिंतो वग्यावञ्चसगुत्ते- हिंतो इत्थणं कोडियगणे नामं गणे णिग्गए, तस्स णं इमारो चत्तारि साहाओ, चत्तारि कुलाई एवमाहिति ॥२॥ से किं तं साहाओ ? साहाओ एवमाहिजति कल्पसूत्र-स्थविरावली तंजहा-उच्चा नागरि१ विजाहरी य २ वइरी य ३ मज्झिामिला ४। य कोडियगणस्स एया, हवंति चत्तारि साहाओ ॥ १॥ से तं साहाओ। किं तं कुलाई ? कुलाई एवमाहिन्नति तंजहा-पढनित्य वंभलिनं १, विइयं नामेण वत्यलिज्जं तु ॥२॥ तइयं पुरण वाणिज्जं ३, चउत्ययं परवाहण्यं ४ ॥ १॥ १०-येगणं सुट्टियसुप्पडिवद्धाणं कोडियकाकंदयाणं वग्यावश्चसगु: त्ताणं इमे पंच थेरा अंतेवासी अहावचा अभिरणाया हुत्या तंजहा-धेरे अजइंददिन्ने १, थेरे पियगंथे २, थेरे विनाहर गोवाले कासवगुत्ते णं ३, थेरे इसिदिन्न (इसिदत्त)४, थेरे अरिहत्ते थेरेहिंतो णं पियगंथे हिन्तो एत्थणं मज्झिमा साहा णिग्गया, थेरेहिंतो णं विब्जाहरगोवालेहिता कासवगुत्ते हितो एत्ययं कासवगुत्तेहिंतो एत्य णं विनाहरी साहा निग्गया। ११-थेरस्स णं अनइंददिन्नस्स कासवगुत्तस्स अजदिन्ने धेरे अंवे- वासी गोयमसगुत्ते। १२-थेरस्स णं अनदिन्नस्स गोयमसगुत्तस्य इमे दो थेरा अंतेवासी अहावचा अभिएगाया हुत्या, तंजहा-थेरे अन्नसंतिसेणिये माढरसगुत्ते १, “थेरे अन्नसीहगिरी जाइस्सरे कोसिय गुत्ते २॥ थेरेहिंतो णं अन्नसंतिसेणि- एहिंतो माढरसगुत्तेहिंतो एत्वणं उचानागरी साहा निग्गया ! १३-थेरस्स णं अन्नसंतिसेणियस्य माढरसगुत्तस्स इमे चत्तारि थेरा अन्तेवासी अहावचा अभिषणाया हुत्या, तंजहा-थेरे अजसेणिए, थेरे अतावसे, थेरे अज्जकुवेरे, थेरे अज्जइसिपालिए । थेरेहिंतो एं अजसेणिएहिंतो एत्य पं अजसेणिया साहा निग्गया, थेरेहिंतो एं अज्जतावसहिंतो एत्थ णं अज तावसी साहा निग्गया, थेरे हिंतो णं अन- कुवेरे,हिंतो एत्थ णं-अन्नकुवेरा (अन्जकुबेरि) साहो निग्गया, थेरेहितो एवं अज्जइसिपालिएहिंतो एत्य पं अज्जइसिपालिया साहा निग्गया। १३-थेरस्स अज्जसीहगिरस्स जाइस्सरस्स कोसिय गुत्तस्स इमे जत्तारि थेराअंतेवासी अहावचा अभिएणया हुत्या, तंजहा-थेरे धणगिरी, .
. पट्टावली समुच्चयः थेरे अजवइरे- थेरे अजसमिए, थेरे अरिहदिन्न । थेरेहितो'णं अज्जस- मिएहिंतो गोयमसगुत्तेहिंतो इत्थ एवं बंभदीविया साहा निग्गया, थेरेहिंतो अज्जवइरेहिंतो गोयमसगुत्तेहिंतो इत्थ णं अज्जवइरी साहा निग्गया। १४--थेरस्स णं अज्जवइरस्स गोयमसगुत्तस्स इमे तिरिण थेरा अंते- वासी अहावच्चा अभिरणाया हुत्था तंजहा-थेरे अजवइरसेणे, थेरे अन्ज- पउमे, थेरे अजरहे । थेरेहिंतों अजवइरसेणेहिंतो इत्थ वं अजनाइली साहा निग्गया, थेरेहितो पंअजपउमेहिंतो इत्थ एवं अन्जपउमा साहा निग्गया, थेरेहिंतो णं अन्जरहहिंतो इत्थ णं अजजगंतीसाहा निग्गया। १५-थेरस्स णं अज्जरहस्स वच्छसगुत्तरस अजपूसगिरी थेरे अंते- वासी कोसियगुत्ते। १६--थेरस्स पं अज्जपूसगिरिस्स कोसियगुत्तस्स अज्ज फग्गुमित्ते थेरे अंतेवासी गोयमसगुत्ते। १७--थेरस्स णं अज्जफग्गुमित्तस्स गोयमसगुत्तस्स अज्जधणगिरी थेरे अंतेवासी वासिट्ठसगुत्ते । १८-थेरस्स पं अज्जधणगिरिस्स वासिद्धसगुतस्स अजसिव भुई थेरे अंतेवासी कुच्छसगुत्ते। १६--थेरस्स णं अज्जसिवभूइस्स कुच्छसगुत्तस्य अज्जभद्दे थेरे अन्ते- वासी कासवगुत्ते। x अत्रहि श्रीवज्रस्वामिपर्यन्ते संक्षिप्तवाचनाविस्तरवाचनाचेति पट्टायल्यौ समाप्ते । श्रीार्यवज्रसेनसूरिशासने चत्वारो अनुयोगाः संजाताः ॥ यदुक्तं-जावंत अज्जवरा, अपुडुत्तं कालिपाणुनोगरस । तेणारेण पुहुत्तं, कालिअसुइ दिट्ठिवाए ॥ आ० नि० ७६३ ॥ देविंद वंदिएहिं, महाणुभावेहिं रक्खि अब्जेहिं । जुगमासज्ज विहत्तो, अणुभोगो ताको चउहा || भा०नि० ७७४ ॥ अत्रत: श्रीभार्यवज्रसेन प्रभवा पट्टावली निदर्शिता, परं श्रीआर्यरथ संतानीय- श्रीदेवर्षिगणी क्षमाश्नमण पर्यंत गद्य-पथपट्टावलीयुग्मं दर्शितमस्ति ॥ २० ॥ A ३ कल्पसूत्र-स्थविरावली २०-थेरस्स णं अज्जभहस्स कासवगुत्तस्स अजनक्खत्ते थेरे अंते- वासो कासवगुत्ते। २१-थेरस्स णं अजनक्खत्तस्स कासवगुत्तस्स अजरक्खे थेरे अन्तेवासी कासवगुत्ते। २२----थेरस पं अज्जरक्खस्स कासवगुत्तस्स अज्जनागे थेरे अंदै- 5 वासी गोअमसगुत्ते । २३-थेरस्स पं अज्जनागस्स गोअमसगुत्तस्स अनजेहिले थेरे अंते- वासी वासिट्ठसगुत्ते २४-थेरस्स एं अज्जजेहिलस्स वासिट्ठसगुत्तस्स अजविरहू थेरे अंतेवासी माढरसगुत्ते। 10 २५-थेरस्स णं अब्जविण्हुस्स माढरसगुत्तस्स अज्जकालए थेरे अंते- चासी गोयमसगुत्ते २६--थेरस्स गं अजकालयस्स गोयमसगुत्तस्स इमे दो थेरा अंतेवासी गोयमसगुत्ता-थेरे अजसंपलिए १ थेरे अजभद्दे २ । २७-एएसि णं दुराहवि थेराणं गोयमसगुत्ताणं अजबुड्ढे थेरे अंते- 15 वासी गोयमसगुत्ते। २८-थेरस्स णं अजवुडस्स गोयमसगुत्तस्स अजसंघपालिए थेरे अंते- वासी गोयमसगुत्ते। २६-थेरस्स णं अनसंघपालिअस्स गोयमसगुत्तस्स अजहत्थी थेरे अंतेवासी कासवगुत्ते। ३०--थेरस्स णं अजहत्थिस्स कासवगुत्तस्स अजधम्मे थेरे अन्तेवासी सावयगुत्ते (सुव्वयगुत्ते)। ३१-थेरस्स ए अजधम्मस्स सावयगुत्तस्स (सुव्वयगुत्तस्स) अजसिंहे थेरे अन्तेवासी कासवगत्ते। ३२-थेरस्स अजसिंहस्स कासवगुत्तस्स अजधम्मे थेरे अन्ते- 25 वासी कासवगुत्ते। 20 २ । 10 . पट्टावली-समुचयः ३३-थेरस्स णं अजधम्मस्स कासवगुत्तस्स अज्जुसंडिले थेरे अन्तेवासी॥ वन्दामि फग्गुमित्तं च, गोयमं धणगिरिं च वासिटुं। कुच्छं सिवभूइम्पिय, कोसिय दुजंत कण्हे अ॥१॥ ते वन्दिऊण सिरसा, भदं वन्दामि कासवसगुत्तं (कासवंगोतं) 15 नक्खं कासवगुत्तं, रक्खम्पि य कासवं वन्दे ॥२॥ वन्दामि अज्जनागं च, गोयमं जेहिलं च वासिटुं । विण्डं माढर गुतं, कालगमवि गोयमं वन्दे ॥३। गोयमगुत्तकुमारं, सम्पलियं तय भद्दयं वन्दे । थेरं च अज्जवुहूं, गोयमगुत्तं नमसामि ॥४॥ तं वन्दिऊण सिरसा, थिरसत्तचरित्तनाणसम्पन्न । थेरं च संघवालिय, गोयम (कासव) गुत्तं पणिवयामि ॥५॥ वन्दामि अज्जहत्थिं च, कासवं खन्तिसागरं धीरें। गिम्हाण पढममासे, कालगयं चेव सुद्धस्सं ॥६॥ वन्दामि अज्जधम्मं च, सुव्ययं सीललद्धिसम्पन्न । जस निक्खमणे देवो, छत्तं वरमुत्तमं वहइ ॥७॥ हत्थिं (हत्थं) कासवगुत्तं, धम्म सिवसाहगं पणिवयामि । सीहं कासवगुत्तं धम्मपिय कासवं वन्दे || तं वन्दिऊण सिरसा, थिरसत्तचरित्तनाणसम्पन्न । थेरं च अज्जजम्बु, गोयमगुत्तं नमसामि ॥६॥ मिउमदवसंपन्नं, उवउत्तं नाणदंसणचरित्ते। थेरं च नन्दियंपिय, कासवगुत्तं पणिवयामि॥१०॥ तत्तो य थिरचरित्तं, उत्तमसम्मत्तसत्त संजुत्तं । देसिगणि खमासमणं, माढरगुत्तं नमसामि ॥११॥ 15 20 . ..
कल्पसूत्र स्थविगवली सत्तो अणुओगरं, धीरं मइसागरं महासत्तं । थिरगुत्त खमासमणं, वच्छसगुत्तं पणिवयामि ॥१२॥ तत्तो य नाणदसण-चरित्ततवसुटिगं गुणमहन्तं । थेरं कुमारधम्म, वन्दामि गणिं गुणोवेयं ॥१३॥ सुत्तत्थरयणभरिए, खमदममद्दवगुणेहिं सम्पन्ने । देविडिखमासमणे, कासवगुत्ते पणिवयामि ॥१४॥ सिरि थेरावली समत्ता (श्री स्थविरावली समाप्ताः). 5 (२) सिरि नंदीधा-पावली . [ कर्ता-श्रीमद् देववाचकगणी ] उसमें अजियं संभवमभिनंदण सुमइ सुप्पम सुपासं । ससि पुप्फदंत सीयल सिज्जंसं वासुपुज्जं च ॥१८॥ विमलमणंत य धम्म, सन्ति कुथु अरं च मल्लि च । मुनिसुव्यय नमि नेमि, पासं तह वद्धमाणं च ॥१॥ पढमित्थ इंदभूई, बीए पुण होइ अग्गिभूइत्ति । 5 तईए य. वाउभूई, तो वियत्ते सुहम्मे य ॥२०॥ मंडिअ मोरियपुत्ते, अकपिए व अलयभाया य । मेअज्जे य पहासे य, गणहरा हुन्ति वीरस्स ॥२१॥ निव्बुइपहसासणयं, जयइ (उ) सया सव्वभावदेसण्यं । कुसमयमयनासणयं, जिणिंदवरवीरसासणयं ॥२२॥ 10 सुहम्मं अग्गिवेसाणं. जंवूनामं च कासवं पभवं कच्चायणं वन्दे, वच्छं सिज्जंभवं तहा ॥२३॥ जसभई तुगियं वंदे, संभूयं चेव माढरं भद्दबाहुं च पाइन्नं, थूलभदं च गोयमं ॥२४॥ एलावञ्चसगोतं, वंदामि महागिरि सुहत्थिं च सुहत्यिं च । 15 तत्तो कोसिअगोत्तं, बहुलस्स सरिव्वयं वंदे ॥२५॥ हारियगुत्तं साइं च, वंदिमो हारियं च सामज्जं । वन्दे कोसियगोतं, संडिल्लं अजजीयधरं. ॥२६॥ .
5 नंदीसूत्र-पट्टावली १३ तिसमुद्दखायकित्तिं दीवसमुद्देसु गहियपेयालं । वन्दे अजसमुदं, अक्खुमियसमुद्दगंभीरं ॥२७॥ भणगं करगं भरगं, पभावगं णाणदंसणगुणाणं । वंदामि अज्जमगुं, सुयसागरपारगं धीरं ॥२८॥ वंदामि अज्जधम्म, वंदे तत्तोत्र भद्दगुत्तं च । तत्तो अ अज्जवयरं, तवनियमगुणेहिं वयरसमं ॥ वंदामि अज्जरक्खिल-खमणे रक्खिअचरित्त सव्वस्से । रयणकरंडगभूओ, अणुअोगो रक्खिो जेहिं ॥ नाणंमि दंसणंमि अ तवविणए णिचकालमुज्जुत्तं । अज्जं नन्दिलखमणं, सिरसा वंदे पसन्नमणं ॥२६॥ 10 वडउ वायगवंसो जसवंसो अन्जनागहत्थीणं । वागरणकरणभंगिय-कम्मपयडीपहाणाणं ॥३०॥ जच्चंजणधाउसमप्पहाण मुद्दियकुवलयनिहाणं । वड्डउ वायगवंसो, रेवइनक्खत्तनामाणं ॥३१॥ अयलपुरा णिक्खंते, कालियसुयआणुओगिए धीरे । 15 बंभद्दीवगसीहे, वायगपयमुत्तमं पत्ते ॥३२॥ जेसि इमो अणुओगो, पयरइ अज्जावि अड्डमरहम्मि । बहुनयरनिग्गयजसे, ते वन्दे खंदिलायरिए ॥३३॥ तत्तो हिमवन्तमहन्त-विक्कमे धिइपरकममणते । सज्झायमणंतधरे, हिमवंते वंदिमो सिरसा ॥३४॥ कालियसुयअणुओगस्स, धारए धारए य पुवाणं । हिमवंतखमासमणे, वंदे णागज्जुणायरिए ॥३५॥ मिउमद्दवसंपन्ने प्राणुपुवि वायगत्तणं पत्ते । ओहसुयसमायारे, नागज्जुणवायए (ग) वन्दे ॥३६॥ गोचिंदाणं पि नमो, अणुओमे विउलधारणिंदाणं । निच्चं खंतिदयाणं, पडूविणे दुलभिदाणं ॥ 20 25 . पट्टावली-समुचयः तत्तो अ भूगदिन्नं, निच्चं तवसंजमेन निविन्ने । पंडिअजणसामरणं, बंदामि अ संजमविहन्तुं 15 वरकणगतवियचंपग-विमउलयर कमल गम्भ सरिवन्ते। भविअजण हिययदइए, दयागुणविसारिए धीरे ॥३७॥ अड्डभरहप्पहाणे बहुविहसज्झाय सुमुणियपहाणे । 5 अणुओगियवरवसभे, नाइलकुलवंसनंदिकरे ॥३८॥ भूयहिअप्पगन्भे वंदेऽहं भूयदिन्नमायरिए भवभयवुच्छेयकरे, सीसे नागज्जुणरिसीण ॥३६॥ . सुमुणियनिच्चानिच्चं सुमुणियसुत्तत्यधारयं वंदे । सम्भावुन्मावणयातत्यं लोहिचणामाणं ॥४०॥ 10 (सुमुणिय निच्चानिच्चं, मुणियसुत्तत्यधारयं निच्चं । वंदेहं लोहिच्चं, सम्भावुन्भावणा तत्थं)॥+ अत्थमहत्थक्वाणिं सुसमणवक्खाणकहनिव्वाणिं । पयईइ महुरवाणिं पयओ पणमामि दूसगणिं ॥४१॥ तवनियमसच्चसंजम-विण्यज्जवखंतिमहवरयाएं । सीलगुण गद्दियाणं, अणुओगजुगप्पहाणाणं ॥8 सुकुमालकोमलतले तेसिं पणमामि लक्खणपसत्थे । पाए पावयणीणं पडिच्छ (ग) सयएहि पणिवइए ॥४२॥ ने अन्ने भगवते कालिअसुयाणुओगिए धीरे । ते पणमिऊण सिरसा नाणस्स परूवणं वोच्छं ॥४३॥ 20 15 इति पट्टावली समचा (इति श्रीनंदीसूत्र पट्टावली समाप्ता) कमिश्चित् ग्रंथ एता गाथा अपि दृप्यते । + ( ) एतचिन्हांकितानि पाठान्तराणि । .
- ( ३ ) सिरि दुसमाकाल समशासंघ पर्व (दुःषमाकाल. श्रीश्रमणसंघस्तोत्रम् ) [ कर्ता-श्री धर्मघोप सूरिः] . ॥ ॥४॥ वीरजिण भुवरण विस्सुत्र पवयण गयणिक्कदिणमणि समाणो ॥ वट्टन्त सुप्रनिहाणे, थुणामि सूरी जुगप्पहाणे ॥१॥ वीस तिवीस टुनवइ, अडसयरी पञ्चसयरी गुणनवई ।। सउ सगसी पणनउइ सगसी छयस्सरी अडसयरी ॥२॥ चउनवइ अठ तिश्र, सग चउ पन्नुरुत्तरसयं तित्तिससयं सउ पणनउई, नवनवई चत्त तेवीसुदय सूरी ॥३॥ अह उदयाणं पढमे, जुगपवरे पणिवयामि तेवीसं सिरिसुहम्म वयर पडिवय हरिस्सयं नंदिमित्तं च सिरिसूरसेण रविमित्त सिरिपहं मणिरहं च जसमित्तं ॥ धणसिंह सच्चमितं, धम्मिल्लं सिरिविजयाणंदं ॥५॥ 10 वंदामि सुमंगल धम्मसिह जयदेव सूरि सूरदिन्नं. वइसाहं कोडिलं, माहुर वणिपुत्त सिरिदत्तं ॥६॥ उदयांतिम सूरी, पुसमित्त मरहमित्त वइसाई 'वंदे सुकीत्ति थावर रहसुत्र जयमंगलमुणिदं ॥७॥ सिद्धत्थं ईसाणं, रहमित्तं भरणिमित्त दढमित्तं ॥ 15 सिरि संगयमित्तं सिरिधरं च मागह ममरसूरि सिरिरेवइमित्तं कित्तिमित्त सुरमित्तं फग्गुमित्तं च कल्लाण देवमित्तं, णमामि दुप्पसह मुणिवसहं ॥६॥ वंदे सुहम्म जंबू पभवं सिज्जभवं च जसमई संभूयविजय सिरिभह-बाहु सिरिथूलभई च ॥१०॥ 20 ॥ ॥
| 5 १६ पट्टावली-समुच्चयः महगिरि सुद्दत्यि गुणसुंदर] च सामन्ज खंदिलायरिज रेवइ मित्तं धम्म च भद्गुत्तं सिरिगुत्ते ॥११॥ सिरिवयर मजरक्खित्र सूरि पणमामि पूसमित्तं च ॥ इस सत्तकोडिनाम पढम मुदए वीस जुगपवरे ॥१२॥ वीए तिवीस वइरं च, नागहत्यिं च रेवइमित्तं ॥ सीहं नागन्जुणं, भूइदिन्नियं कालरं चंदे ॥१३॥ सिरिसच्चमित्त हारिलं, जिगाभदं बंदिमो उमासाई ॥ पुसमित्तं संभूई. माढर संभूइ धम्मरिसिं ॥१४॥ जिटुंग फग्गुमित्तं, धम्मघासं च विणयमित्तं च ॥ सिरि सीलमित्त,रेवड़-मित्तं सूरि सुमिणमित्त हरिमित्तं ॥१५॥ 10 इय सब्बोदयजुगपवर सूरियो चरणसंजूए वंदे ॥ चउत्तर दुसहस्सा, दुष्पसहते मुहम्माई ॥१६॥ इय सुहम्म जंबू तमव सिद्धा गावयारिणो सेसा ॥ सदुदुनोत्रण मझे. जयंतु दुभिक्ख डमरहरा ॥१७॥ जुगपवर सरिस सूरी, दुरीकय भवियमोह तमपसरे। 15 चंदामि सोलसुत्तर इगदस लक्खे सहस्सेब ॥१८॥ पंचमअरम्मि पणवन्नलवस्त्र पणवन्नसहस कोडीणं ॥ पंचसयकोडि पन्ना, नमामि सुत्ररण सयलसूरी ॥१६॥ तह सत्तरिकोडिलक्खा, नवकोडिसय बार कोडियं छप्पन्न लक्ख बत्तीस-सहस्स एगृण दुन्निसया ॥२०॥ 20 तह सोल कोडिलक्खा, नियकोडिसहस्सा निन्निकोडिसया ॥ सत्तरस कोडि चुलसी लक्खा सुसावगाणं तु ।।२।। पणतीसकोडिलक्खा, मुसाविया कोडिसहत्त वाणई ॥ पणकोडिसया बत्तीस कोडि तह वाख्यहिया ॥२२॥ एवं देविंदनयं, सिरविजयाणंद धम्मकीतिपयं ।। 25 वीरजिण पवयण ठिई, दूममसंघं णमह निच्चं ॥२३॥ || इय दुसमाकाल सिरि समणसंघ थयं ॥
दुष्षमाकाल श्रीश्रमण अवचूरिः-||८०॥ सिरि जिनिव्वाणगमण रयणिए उज्जोणीए चंडपज्जोअमरणे पालो राया अहिसित्तो ॥ तेण य अपुत्त उदाइमरणे कोणिरज्जं पाडलिपुरं पि अहिट्ठिअं ॥ तस्स य परिस ६० रज्जे-गोयम १२ सुहम्म ८ जंवू ४४ जुगप्पहाणा। पुणो पाडलीपुरे ११, १०, १३, २५, २५. ६, ६. ४, ५५ नवनंद एवं वर्ष १५५ रज्जे-जंवू शेपवर्षाणि ४ प्रभव ११ शय्यंभव २३ यशो- भद्र ५० संभूतिविजय ८ भद्रवाहु १४ स्थूलभद्र ४५, एवं वीरनिर्वाणातू २१५॥ मोरिअरज्ज १०८ तत्र-महागिरि ३० सुहस्ति ४६ गुण सुन्दर ३२, उनवर्षाणि १२ ॥ प्रकृष्टलब्धीनां प्रकीर्णकसहस्राणां व्यवच्छेदः । एवं 10 5 वर्षाणि ३२३॥ राजा पुष्यमित्र ३० बल मित्र-भानु मित्र ६० (तत्र)-गुण सुन्द- रस्येव शेपवर्षाणि १२ कालिके ४ (४१) खंदिल ३८ ॥ एवं वर्षाणि ४१३ ॥ राजानरवाहन ४० गर्दभिल्ल १३ शाक ४ (तत्र-वितिमित्र ३६ आर्यमंगुधर्माचार्य २०॥ एवं वर्षाणि ४७० ॥ 15 अत्रांतरे-बहुल सिरिन्वय स्वामि (स्वाति) हारिन श्यामाऽऽर्य शांडिल्य आर्य आर्यसमुद्रादयो भविष्यन्ति ॥ तह गद्दभिल्लरज्जस्स, छेयगो कालगारिओ होही ॥ छत्तीसगुणोवेयो, गुणसय कलियो पहाजुत्तो ॥१॥ वीरनिर्वाणात् ४५३ मरुअच्छे खपुटाचार्याः वृद्धवादी पंचकल्प- 20 विच्छेदो जीतकल्पोद्धारः प्रत्येकबुद्धस्त्रयंबुद्धविच्छेदो बुद्धबोधिताऽल्पता॥ धर्माचार्यस्येव शेपवर्षाणि २४ भद्रगुप्त ३६ श्रीगुप्त १५ वन- स्वामी ३६ । एवं सर्वांक ५८४ ॥ गई (भिल्ल) निव सुत विक्रमादित्य ६० धर्मादित्य ४० भाइल्ल ११ ॥ एवं ५८१ ॥ अत्रांतरे-धर्माचार्य शिष्य श्रीसिद्धसेन प्रभावकः । तथा तोपलि- 25 पुत्राचार्य प्रभावकः ॥ ३
5
१८
पट्टावली-समुश्चयः
'आर्यरक्षितः १३ ॥ राजाभाइल्ल १४ ॥ अत्रांतरे-विलासपुरे
रुद्रदत्ताचार्यः प्रभावको युगप्रधानसमः ६ ॥
पुष्पमित्र (दुर्बलिका पुष्प मित्र) २० ॥ तथा राजा नाहडः ॥१०॥
(एवं) ६०५ शाकसंवत्सरः ॥ अत्रांतरे बोटिका निर्गता। इति ६१७
प्रथमोदयः ॥०॥
वयरसेण ३ नागहस्ति ६९ रेवतिमित्र ५६ बंभदीवगसिंह ७५ नागार्जून ७८।।
पणसयरी सयाई तिन्निसय समनिआई अइकमिऊं ॥
त्रिकमकालाओ तो बहुली (वलभी) भंगो समुप्पन्नो ॥ १॥
बालन्न (वालभ्य) संघकज्जे उज्जमिश्रो जुगपहाण तुल्लेहिं ।।
गंधव्ववाइवेल-संतिसूरिइ बहुलाए (वलहीए) ॥१॥ 10
एवं वर्षाणि ६०४ ॥ भूतदिन्न ७६ कालिकार्य ११ ॥
तेण्उय नवसरहिं, समइकतेहिं वद्धमाणाओ ।।
पज्जोसवणाचउत्थी, कालगसूरिहिं तो ठवित्रा ॥१॥.
सत्यमित्र ७ हारिल ५४ ॥ (एवं वर्षाणि १०५५ वि० ५८५)
पंचसए पणसीए विक्कमकाला उड्ड (झ)त्ति अत्थमित्रो। 15
हरिभद्दसूरि सूरो, भविआणं दिसउ कल्लाणं ॥१॥
जिनभद्रगणिः ६० उमाखाति ७५ पुष्यतिष्य ६० संभूति यति
५० माढरसंभूति गुप्त ६० ॥ ( एवंवणि १३६०)
ॐ संभवन्ति चैते सभाध्यतत्वार्थाधिगमसूत्र पूजाप्रकरादि ग्रंथ निर्मातारः
श्रीउमास्वातिसूरयः । तेषां पितृ-मातृ-जन्मभूमि-गणधर-वाचक वंशानां सबंधश्च ।।
याचकमुख्यस्य शिवश्रियः प्रकाशयशः प्रशिष्येण ॥
शिष्येण घोपनंदिक्षमणस्यैकादशांगविदः ॥१॥
वाचनया च महावाचक क्षमण मुंडपाद शिष्यस्य ।
शिष्येण, च वाचकाचार्य मूलनाम्नः प्रथितकीतेः ॥ २...
न्यग्रोधिकाप्रसूतेन विहरता पुरवरे कुसुमनाम्नि ॥
कोभीषणिना रखातितनयेन वात्सीसुतेनाय॑म् ॥ ३ ॥
दुष्षमाकाल श्रीश्रमण १६ ६८० श्री कल्पसूत्रं श्री महागिर संतानीय श्री देवर्धिगणि क्षमा- श्रमणैलिखितं । तस्मिन्वर्षे आनंदपुरे ध्रुवसेननृपस्य पुत्रमरणे शोकातस्य समाध्यर्थं सभासमक्ष श्री कल्पवाचना जाता इति बहुश्रुताः ।।४ तेरस वास सएहिं, वीराओ समंतिएहिं अइक्कमिडं ॥ सिरिवप्पभट्टसूरी, विउसाण सिरोमणी जाओ ।। १ ।। इत्यादि । द्वितीयोदयः॥छ॥ श्री ॥ इति दुष्षमाकाल श्री श्रमण संघस्तोत्रं समाप्तं ॥१॥ 5. इदमुच्चन गरवाचकेन सत्वानुकंपया हब्धं । तत्वार्थाधिगमाख्वं स्पष्टमुमास्वातिना शास्त्रम् ॥ ५ ॥ x "नववाससयाई विइक्कताई." चायमों, यथा श्रीवीरनिर्वाणादशीत्यधिक-. नववर्षशतातिकमे पुस्तकारूढः सिद्धांतो जातस्तदा कल्पोपि पुस्तकारुढो जात इति, तथोक्तं वल्लहिपुरंमि नयरे, देवढिपमुहसयलसंधेहिं ॥ पुस्थे आगम लिहिओ, नवसय असीआओ वीराभो ॥।॥ भन्येवदंति---नवशतअशीतिव, वीरात् सेनांगजार्थमानन्दे । संघसमक्षं समई, प्रारब्धं वाचितुं विज्ञैः ॥1॥ इत्यादि अन्तर्वाच्यवचनात् ॥ "वायणंतरेपुण." तथाचायमर्थ:--नवशताशीतितमवर्षे कल्पस्य पुस्तके लिखन, नवशत विनवतितमवर्षे च कल्पस्य पर्पद्वाचनेति । तथोक्तं श्रीमुनिसुंदरसूरिभिः रवकृतस्तोत्ररत्नकोश-. वीरात्रिनदांक (९९३) शरद्यचीकरत , खच्चैत्यपूते धुवसेनभूपतिः। यस्मिन् महैः संसदि कल्पवाचना-माषां सदानंदपुरं न कः स्तूते ? ॥ -इति महोपाध्याय श्रीविनयविजयविरचितायां सुखबोधिकायां । १ एतत्ग्रंथकतूणां श्रीधर्मघोपसूरीणां वि० सं० १३२७ तमवर्षे सूरिपदं, वि० सं० ३५७ तममषं स्वर्गमनं ।
पट्टावली-समुच्चयः अयोविंशत्युदययु पधान का यंत्र ६९ ७८ ३ ६ २७. १५ 10 उदय सर्वाचार्य संख्या युगप्रधानाः उदयवर्पप्र मास दिन २३ माणसंख्या १ सूरिकोटि ७० २० ६१७ . १० १७-२७ २ सुरिकोटि ३० २३ १३६०-८०-४६ १० २६ ३ कोटिलक्ष १० १४६४-१५०० ११ २० 5 ४ कोटिलक्ष १० १५४५ ८ २६ ५ कोटिलक्ष १० ७५ १६०० २६ ६ कोटिलक्ष १० ८६ १६५० २२ ७ कोटिलक्ष १० १०० '१७७० ८ कोटिलक्ष ५-१० ८७ १०१० ६ कोटिसहस्र १० ६५ १८ १० कोटिसहस्र १० २ १२ ११ कोटिसहस्र १० ७६ ८०० १४ १२ कोटिसहस्र १० ७८ ४४५ ४ १६ १३ कोटिसहस्र १०-५ ६४ १४ कोटिसहस्र ५ १०८ ५६२ २५ १५ कोटिशत १० १०३ ६६५ २६ १६ कोटिशत १० १०७ ७१० ६ २० १७ कोटिशत १० १०४ ६५५ २४ १८ कोटिशत १० ११५ ४६० १६ कोटिशत १० १३३ ३५६ १७ २० कोटिशत १०० ४०८-८६ ४ ७-२ २१ कोटिशत ६५ ६ २२ कोटिशत ६६ ५६० ५ ५ २३ कोटिशत ४० ४४० ११ १७ 25 ३ २२ 15 ६ ६ है २ 20 १ ३ सर्व २००४ सर्वेषामुदयानां यंत्रलिखितेपु वर्पमासदिनेषु सप्तप्रहर-सप्तघटिका-सप्तपल- उदयांकमीतानराणां वृद्धिः कार्या।।
दुप्पमाकाल श्रीश्रमण उदयादिम २३ घुमप्रधान मंत्र: सर्वायुः १ ६ १०० १२८ १०० 5 ८२ ६७ ६३ ६३ ६३ 10 ३० उदयस्य युगप्रधान बाद्यसूरि नामानि गृहवासः व्रतपर्यायः कालः १ सुधर्मास्वामी ५० ३०-४२ २०-5 २ वयरसेन ६ ११६ ३ ३ पाडिवय ८२ ६ ४ हरिस्सह ६ ६० १३ ५ नंदिमित्र १३ ६ सूरसेन १३ १० रविमित्र १३ १० श्रीप्रभ १३ ४२ ६ मणिरथ १३ ४२ १० यशोमित्र १४ ४१ ११ घणसिंह १४ ४० १० १२ सत्यमित्र ४० १२ १३ धम्मिल्ल २० ३० १२ १४ विजयानन्द १२ ३० १५ सुमंगल १२ २० २४ १६ धर्मसिंह १२ १६ १७ जयदेव १२ २७-२० ११-१८ १८ सुरदिन्न २७ १६ वैशाख २० २० कौडिल्य १०-११ २१ १६-१८ २१ माथुर २५ १५ २२ वाणिपुत्त १० २० १७ २३ श्रीदत्त १० १५-२५ ६३ ६४ ६६ ६२ 15 ५६ ५६ २० १० ५४ 20 ५० 25 २२ पट्टावली-समुच्चयः उदयान्तिम २३ युगमधान यंत्रा . उ० सूरिनामानि गृहवासः. व्रतपर्यायः युगप्रधान सर्वायुः कालः ६७-६० ८१-६१. २ अरह मित्र 5 ५६ २०-१३ ४५-२५ १६ १८ १७ १३ १३ १३ १० ४८ ३० १६ १० २२ २० २८ २० २० ३० .१०-२० २० १५ १५ २०-१० ११ ४५ 10 १ दुर्बलिकापुष्पमित्र १७ २० ३ वैशाख ४ सत्कीर्ति १६ ५ थावर १३ ६ रहसुत १३ ७ जयमंगल १५ ८ सिद्धार्थ १५ ६ ईशान १५ १० रथमित्र २२ ११ भरणिमित्र १० १२ दृढ़मित्र १४ १३ संगत मित्र १२ १४ श्रीधर १८ १५ .भागध १३ १६ अमर १५ १७ रेवतिमित्र २२ १८ कीर्तिमित्र २० १६ सिंहमित्र २० फलगुमित्र १३ २१ कल्याणमित्र २२ देवमित्र १२ २३ दुप्पसहसूरि १२ २० २२ १८ ५५ ४६.16 ५६-४६ ३३ है T १३ १८ w २६-१६ १० १४ १० १६ १२ ४ ७ ६६-५६ ४० 20 ४० .३० .३८ ३६ २० 25 १४ १२ ४. .
दुषमाकाल श्रीश्रमण २३ प्रथमोदय युगप्रधान यंत्र . ७ ७ ७ भद्रवाह ८ स्थुलभद्र २० प्रथमोदय युगप्रधान गृहवास व्रतपर्याय युगप्रधान सर्वायुः मास दिन १ सुधर्माखामी ४२ २ जंवू स्वामी १६ २० ४४ ५ ३ प्रवभ स्वामी ३० ६४-४४ ११ १०५-८५ २ २ ४ शय्यंभवसूरि २८ ११ २३ ६२ ३ ३ 5 ५ यशोभद्र २२ १४ ५० ५६ ४ ४ ६ संभूतिविजय ४२ ६० ४५ ३० २४ ४५ ६६ ५ ५ ६ महागिरि ३० १०० ५ ५ 10 १० सुहस्ति २४-३० ३०-२४ ४६ ११ गुणसुन्दर सूरि २४ ३२ ४४ १०० २ २ १२ श्यामाचार्य २० ३५ ४१ ६६ १ १ १३ स्कंदिल १२-२२ ५८-४८ ३८-३६ १०-१०६५ ५ १४ रेवतिमित्र ४८ ३६ ६८ ५ ५15 १५ धर्मसुरि १५-१४ ४०-४४ ४४ २१ ४५ ३६ १७ श्रीगुप्त ३५ १०० ७ १८ वर्चस्वामी ३६ ८८ १६ आर्यरक्षित ११-२२५१-४० १३ ७20 २० दुर्बलिकापुष्पमित्र ३० २०-१३ ६७-६० ७ . १६ भद्रगुप्त ७ ७ ७ 8 ३ २० ७८ २४ पट्टावली-समुचयः द्वितीयोड्युसनधान यंत्र -- द्वितीयोदयुगप्रधान गृहवास व्रतपर्याय युगप्रधान सर्वायुः मास दिन २३ वर्ष० वर्ष० १ वयरसेन ११६ १२८ ३ ३ २ नागहस्ति १६ ६६ ११६ ५ ५ ३ रेवतिमित्र ३० ५६ १०४ २ २ 5 ४ सिंहसूरि (ब्रह्मद्वीपक) १८ २० ११६. ३ ३ ५ नागार्जुन १४ १११ ५ ५ ६ भूतिदिन्न १८ ૨૨ ७६ ११६ ४ ७ कालिकाचार्य १२ ६० ८३ ७ ८ सत्यमित्र १० ३० ४७ ५ ५ 10 ६ हारिल १७-२७ ३०-३१ ५४ १०१-११२ ५ ५ १० जिनभद्रगणीक्षमाश्रमण १४ ३० ६० १०४ ६ ६ ११ उमास्वातिवाचक २० १५ ७५ ११० २ २ १२ पुष्पमित्र ३० ६० ६८ १३ संभूति १६ ५०-४६ ७६-७८ २ २ 15 १४ माढरसंभूति गुप्त १० ३० ६० १०० ५ ५ १५ धर्मऋपि (रक्षित) १५ २० ४० ७५ ४ ४ १६ ज्येष्ठांगगणि १२ १८ १०१ ३ ३ १७ फल्गुमित्र १४ १३ • ४६ ७६ ७ १८ धर्मघोष १५ १०१ ७ 20 १६ विनयमित्र १० १६ ८६ ११५ २० शीलमित्र ११ ११० २१ रेवतिमित्र १६ १०३ २२ सुमिणमित्र १२ १८ १०८ २३ हरिमित्र १६ ८१ m4 x 0.9 ४४० . ८ १० . ७ ७: ७ ६ ७८ . - . .
[ ४ ] श्रीगुरुपर्वकमकर्णान्नम् 5 (कती-श्रीगुणरत्नमूरि) अनन्तं तज्ज्ञानं स हि निरुपमो दोपविलयो नतिः शक्रादीनामहमहमिकापूर्वमिह सा । विसंवादातीतं तदपि च वचो दैवतगणे न यस्मादन्यस्मिन् स जयतितरां वीरजिनपः ॥१॥ जयति विजितदोषः श्रीसुधर्मा गणेशो जनितजनकजायाचौरवोधोऽथ जम्बूः । प्रभवविभुरथो यश्चौर्यलब्धत्रिरत्नो मनगतजिनबुद्धः सूरिशय्यम्भवोऽतः ॥२॥ यशोभद्रः सूरिस्तदनु समभूद्विश्वविदितः ततः सूरिः ख्यातोऽजनि जगति सम्भूतिविजयः । तथा भद्राद्वाहू रचितवरनियुक्तिततिको वराहाऽमोत्थं शशिवमहरद्यः स्तवनतः ॥३॥ योगीन्द्रः स्थूलभद्रोऽभूदथान्त्यः श्रुतकेवली। सिंहं खं दर्शयामास भगिनीविस्मयाय यः ॥४॥ तस्मान्महागिरिरभूजिनकल्पिकल्पः श्रीसम्प्रतेनरपतेश्च गुरुः सुहस्ती । शिष्योत्तमावथ सुहस्तिविभोरभूतां श्रीसुस्थितस्थविर-सुप्रतिबद्धसूरी ||५|| तदा च सूरिमन्त्रस्य ध्याता ज्ञानचतुष्कवान् । सर्वज्ञदृष्टद्रव्याणां कोट्यंशमवलोकते ॥६॥ 10 15 20 २६ पट्टावली-समुनयः तेन तो कौटिको ख्यातो ततोऽभूत्कोटिको गणः । तत्रेन्द्रदिन्न-दिन्नपी सूरिः सिंहगिरिस्ततः ।७|| जातिस्मृतिन्मकदत्तविद्ये श्रीसङ्घवात्सल्यमनीहता च । यस्मिन्नतुल्यान्यभवंततोऽभूद् विभुःस वनोदशपूर्ववेदी !!! श्रीवत्रशाखाधुरिवनसेनानारोन्द्रचन्द्रादिकुलप्रसूतिः । चान्द्रे कुले पूर्वगतश्रुताड्यःसानन्तभद्रो विपिनादिवासी IHell ततोऽपि वृद्धोऽजनि देवसूरिः प्रद्योतनः सूरिरयो शमान्यः । श्रीमानदेवोऽथ पदस्य काले यदंसयोवीक्ष्य रमागिरौ द्वे ॥१०॥ भ्रष्टोहयं ही भवितेति खिन्ने गुरौ विधिज्ञः किल योऽभ्यगृह्णात् । भक्ताङ्गिभक्ति विकृतीश्च सर्वा आजन्म भोड्ये न हि सर्वथैति ।।शा 10 पद्माजयादिदेबीभिर्नतो नड्डूलपू:स्थितः । शाकम्भरीपुरे मारि जहे शान्तिस्तवाच यः ॥१२॥ -त्रिभिविशेषकम् । भक्तामराबद्भुतकाच्यसिद्धिः श्रीमानतुङ्गोऽय बहुप्रसिद्धिः। श्रीवीरसूरिर्जयदेवदेवानन्दो क्रमेण प्रभुविक्रमश्च ॥१३|| 15 नरसिंहपुरे वोधितहिंसकयज्ञोऽय सूरिनरसिंहः । नागह्रदतीर्थकृते जपणकजेता समुद्रोऽथ ॥१४॥ ख्यातः श्रीहरिभद्रमित्रमभवत् श्रीमानदेवत्ततो मान्द्याद्विस्मृतसूरिमन्त्रमिह यो लेभेऽस्विकाया मुतात् । तस्मात् श्रीविवुधप्रभोजनि जयानन्दस्ततः संचसी 20 भन्यान्भोजरवी रविप्रमगुरुज ऽथ विज्ञेश्वरः ॥१५॥ सरस्वतीकण्ठसुवर्णभूषणख्यातियशोदेवयतीश्वरोऽमुतः । प्रद्युन्नसूरिजिनशासनान्वरप्रद्योतनैकचुमणिस्ततोऽभवत् ॥१६॥ श्रीमानदेवोऽप्युपधानवाचकप्रन्यप्रेरणताऽजनि विश्वपावकः । वादे जिते गोपगिरीशपूजितः सत्वर्णसिद्धिर्विनलेन्दुरप्यतः ॥१७॥ 25 5 10 गुरुपर्यक्रमः . युगाङ्कनन्दप्रमिते ६६४ गतेऽन्दे श्रीविक्रमात्सिह संघलोकैः । पूर्वावनीतो विहरन् धरायामुद्द्योतनः सूरिरथाव॒दाधः ॥१८॥ आगत्य टेलीपुस्सीमसंस्थपद्यासमासन्नबृहद्बटाधः । शुभे मुहूर्ते स्वपदेऽष्टसूरीनतिष्ठिपत्सौवकुलोदयाय ॥१॥ II. युग्मम् ॥ ततो (३५) गणोऽयं वटगच्छसंज्ञोऽप्यभूद् बृहद्गच्छ इति प्रसिद्धः । श्रीसर्वदेवो विदितोऽतिभूरिप्रशस्यशिष्यः प्रथमोऽत्र सूरिः ॥२०॥ रूपश्रीविरुदख्यातो देवसूरिस्ततोऽभवत्। श्रीसर्वदेवसूरीन्द्रः पुनरासीद्गुणोदधिः ॥२१॥ तस्माद्यशोभद्रयतीशचन्द्रः श्रीनेमिचन्द्रश्च विनिद्रभद्रः । ततोऽजनि श्रीमुनिचन्द्रसूरिः प्रज्ञापराभूतसुपर्वसूरिः ॥२२॥ नित्यं पपौ काञ्जिकमेकमम्भस्तत्याज सर्वा विकृतीच.सम्यग् । जिगाय यो भावरिपूश्च सोऽयं श्लाघ्यो न केषां मुनिचंद्रसूरिः ॥२३॥ तस्याभवन्नजितदेवमुनीन्द्रवादि- श्रीदेवसूरिवृषभप्रमुखा विनेयाः । आद्यादभूद्विजयसिंहगुरुर्गरीयान्- निस्सङ्गतादिकगुणैरनिशं वरीयान् ॥२४॥ ततः शतार्थिकः ख्यातः श्रीसोमनप्रभसूरिराट् । सूरिः श्रीमणिरत्नश्च भारत्यास्तनयाविव ॥२५।। मणिरत्नगुरोः शिष्याः श्रीजगच्चन्द्रसूरयः । सिद्धान्तवाचनोभूतपैराग्यरसवार्द्धयः ॥२६॥ विधोश्चैत्रगाणाम्भोधौ तपोज्ञानक्रियानिधेः । वाचकानाममकारात् देवभद्रगणीश्वरात् ॥२७॥ चारित्रमुपसम्पद्य यावजीवमभिग्रहात् । आचामाम्लतपस्तेनुस्तपागच्छस्ततोऽभवत् ॥२८॥ -त्रिभिर्विशेषकम् 15. 20 25.
२८ पट्टावली-समुषायः तत्पट्टोदयभूधरे शशिरवी वागीश्वरीमन्दिरे सेनान्यौ वृपभूपतेः शमरमाकर्णावतंसाभुवौ । श्रीदेवेन्द्रमुनीश्वरोऽमलमना आद्यो द्वितीयः पुनः सुरीशो विजयेन्दुरुत्तमगुणः सेव्यावभूतां सताम् ॥२६॥ 5 श्रीदेवेन्द्रगुरोः शिष्यौ तमस्तौमैकभेदको । महाप्रभावजायेतां जम्बूद्वीपरवी इव ॥३०॥ विद्यानन्दमुनीन्दुरादिम इह प्रह्लादने पत्तने यस्याचार्यपदेऽमुचन् दिविपदो गन्धोदकं मण्डपात् । दुष्टस्त्रीदमनः सुशावरचनः श्रीधर्मघोपः पुनः पायोधिप्रकटीकृताद्भुतमणिः श्रीगोमुखोद्बोधकृत् ॥३१॥ 10 तदाच- योगी कश्चन शिष्यवृन्दकलितोऽवन्त्यां स्थितोगर्वभृ. नानासिद्धिबहुप्रसिद्धिहृतहृद्भपप्रजाऽभ्यर्चितः । तत्र स्थातुमयं न जैनयतिनां दत्ते कदाऽपि कचि- 15 च्चेदागच्छति कोऽपि साधुरिह यस्तं प्रत्यसौ मत्सरात् ॥३२॥ आसन्नोऽप्यथ दूरगोऽपि सहसा सौवप्रभावोधुरो हुकारात्तृणतन्तुधूलिकणिकाक्षेपात्तथा खाङ्कतः । मार्जारान्नकुलोन्दुराहिसरटान् गोधाबृकान् वृश्चिकान् फेरण्डप्रभृतींश्च मुञ्चतितमां लक्षादिसङ्ख्यान् क्षणात् ॥३३॥ 20 ॥ युग्मम् ॥ अन्याश्चापि विभीषिकाः प्रकटयत्युच्चैः स नानाविधा स्तद् दृष्ट्वा भयविप्लुतांश्छलयति तुल्लान् स पापः क्षणात् । साधुः कोऽपि न तत्र तिष्ठति ततः श्रीधर्मधोपोऽन्यदा सूरिस्तत्र समीयिवान् बहुपरीवारो विहारक्रमात् ॥३४॥ 25 २३ गुरुपर्वक्रमः साधूनध्वनि सङ्गतान् स सहसा दृष्ट्वाऽथ दुष्टो रुपा दन्तैर्दष्टरदच्छदोऽवदददः श्वेताम्वराः किंधराः। शून्यास्ते सकलाऽपरा यदिह भोः प्राप्ता विशङ्का हठात् दृष्टोऽहं यदि नो, श्रुतोऽपि किमु रे नात्र स्थितो नन्वहम् ॥३५॥ 5 बाहुभ्यां जलधि तराणि यदि वा तं शोपयाणि क्षणा- दाकाशं विपुलं प्रयाणि खगवद्रात्रौ च कुर्या दिनम् । शेपाहिं दृढयोगपट्टतुलया बध्नानि सौवासने फूत्कृत्यापि गिरीन् नयानि गगने वायू रजोवद् रयात् ॥३६ ॥ - ।। युग्मम् ।। भो भो यात पलाय्य दृष्टिपथतो मां माऽवमन्ध्वं हठा- 10 नो चेत्स्थेयमिह स्थिरैर्भवति यत्तदृश्यतां सम्प्रति । व्याहापुर्मुनयो मुधाऽऽत्मनि मदं धत्से विधत्से न किं क्षान्ति चूम इदं हिताय भवतो जानासि चेकिंचन ॥३७॥ नोचेद्यन्ननु रोचते प्रकुरु तत् तावत् स्थिताः स्मो वयं योगिन्नुच्छलितोऽपि यन्न चणको भाण्डं प्रभेत्तु क्षमः । 15 क्रुद्धस्तद्वचसा विधाय विकृतं वक्त्रं स भीत्यावह दन्तान स्थूलतरानदीहशदथो जान्वग्रजाग्रन्मुखान् ॥३८॥ किं नो भीपयसे तृणाय न वयं मन्यामहे त्वाशं व्याहृत्येति भयोज्झिता मुनिवरास्तत्पातसंसूचनीम् । उद्गीर्य स्खकफोणिमुन्नततरां जग्मुस्ततः श्रीगुरो- 20 रभ्यर्णे जगदुश्च तद्गुरुरथो प्रोवाच सर्वान् यतीन् ॥ ३६॥ घेद्योगीह विभीपिकां विकुरुते माभैष्ट तो मनाक् त्राताऽहं परिवर्त्मि वोऽथ वसतौ दोषागमे लक्षशः। शूच्याख्या अतिवतुण्डनखरा अन्यान्यदेहोवगाः कल्लोला इव वारिधेर्दशदिगुद्भूताः प्रसस्नुः क्षणात् ॥४०॥ 25 . पट्टावली-समुचयः । अङ्गारोहणवनपात्रवलकस्तम्भादनकादरान् दृष्ट्वा तान् वसतेर्बहिश्च परितः श्वानौतुसर्पध्वनीन् । श्रुत्वा रौद्रतमान् प्रकंप्रतनवो भीतेर्भरात्साधवो-. ऽन्योन्याह्वानपराश्च नालमभवन् स्थातु प्रणष्टुं तथा ।।४।। वत्रच्छन्नमुखे घटे प्रथमतः सज्जीकृते श्रीगुरु:- 5, दत्त्वा हस्तमथाजपद्गतभयो यावत्स तावच्छठः। सर्वाङ्गेऽप्युदितं व्यथासमुदयं हर्तुं विपोटुप्रणि- होतु वाऽप्यसहस्ततोऽनुगजनानूचे म्रिये भो.. म्रिये.॥.४२ ॥ धिक् मामनात्मज्ञमदीर्घदर्शिनं येनाभिमानादपमानितो गुरुः । काणुःक मेरुः क सरः कसागरः काहं हहा कैष च सर्वसिद्धिभृत् ॥४३॥ 10, भीतः सोऽविकलं निजं विलसितं संहृत्य पीडावशा- दाक्रन्दंश्च कर्णश्च तत्र वसतौ गत्वा मुखात्ताङ्गुलिः ऊचेऽज्ञानवशाधन विहितं तत्क्षम्यतां क्षम्यतां नातो वो विदधामि किञ्चिदशुभंसाक्षीजनोऽत्राखिलः।। ४४ ॥ निरीक्ष्य दीनं स्वपदोविलीनं तं योगिराज सुसमाधिमाजम् । 15 चकारशान्तः प्रभुधर्मघोषः पुण्यप्रभायाश्च बभूव पोपः।।४।। श्रीसोमप्रभसुरयो ऽजनिपताथैकादशाङ्गीस्फुर- सूत्रार्थाः किल कार्तिके समधिके कृत्वा चतुर्मासकम् . अन्याचार्यगणे निषेधति भृशं ये भीमपल्या ययु भङ्ग भाविनमेक्ष्य मन्त्रनिवहं नालुर्गुरुभ्यश्च ये ॥ ४६ ।। 20 तेषां विनेया वरभागधेयाश्चत्वार आसन् खगुणैरमेयाः । चतुर्गतिभ्योऽसुमतांसुखेनोद्धाराय धर्मस्य वपूषि किं नु ॥४७॥ श्रीविमलप्रभुसूरिः श्रीपरमानन्दसूरिगुरुराजः। वचनातिगयतनावान् सूरिः श्रीपद्मतिलकगुरुः ॥४॥ श्रीसोमतिलकाख्याश्च सूरयों याशोऽर्णवे। 25, ज्योत्स्ना जल ग्रहा: फेनपिएडा वेलाचलिर्दिशः ॥४६॥ युग्मम् ॥ - 10 . गुरुपर्वक्रमः ३१ विश्वख्याततपागणाधिपतयः सार्वत्रिकख्यातयः, सवैराग्यपयोधयस्त्रिजगतीदीव्यद्गुणश्रेणयः । आसन् ग्रन्थकृतः सदागमभृतश्चारित्रलक्ष्मीवृतः सद्भाग्याभ्यधिकाश्च सामतिलकाः सूरीशवृन्दारकाः ॥ ५० ॥ 5 तेषां शिष्यालयः ख्याता अभूवन्नद्भुतैर्गुणैः । ज्ञानदर्शनचारित्रयी मूर्तिमती किल ॥५१॥ संनुन्धसागरगभीररवेण नित्यमावर्जिताखिल जगज्जनमानसालिः । श्रीचन्द्रशेखरगुरुगरिमैकधाम विद्याविलासवसितःप्रथमो बभूव ॥५२॥ भव्यप्राणिशिवश्रियोः परिणये सांवत्सराधीश्वराः गाम्भीर्यादिगुणैर्निजैरुदधिवत्केनाप्यलव्धान्तराः। ते ऽजायन्त यतीश्वराइह जयानन्दा द्वितीयाः क्रमात् । येपां देवतया करेण निहतो भ्राता ऽनुमेने व्रतम् ॥ ५३ ॥ वैराग्यं विमलं शमोऽतिविशदः शास्त्रज्ञता चाद्भुता , सिद्धान्तकरुचिर्मनोहरतरो भव्योपकारः परः । चारित्रं त्रिजगत्यनुत्तरतमं भाग्यं ह्यसाधारणं, येषां श्रीयुत देवसुन्दरवराः ख्यातास्तृतीयास्तु ते ॥५४॥ एकद्वित्रिमुखैर्गुणैः कृतमदा देहेऽपि गेहेऽपि ये, नो मान्ति प्रचुरा नरा जगति ते सन्तु प्रकामं परे। ये सर्वेपु गुणेषु सत्स्वपि मदं कुर्वन्ति नो कर्हि चित् । 20 वे ऽमी श्रीयुतदेवसुन्दरवराः सन्त्येक एवावनौ ॥५५॥ न यन्निन्दास्तुती कत्तुं शक्येते खल सज्जनैः। असद्भावेन दोपाणां गुणानां चाप्रमाणतः ॥५६॥ सच्छिष्याः सूरयः पञ्च मेरुपञ्चकसन्निभाः। सुवर्णभरविख्याता विद्यन्वे गरिमास्पदम् । ५७॥ 25 १-यद्वैराग्यमखण्डितं बहुविधं नित्यं तपो यत्परं, बाहुश्रुत्यमुदारविस्मयकरं यद्यञ्च शान्तं मनः । 15 .
३२ - 5 . पट्टावली-समुच्चयः योऽन्यो वाऽप्यभवद्गुणो गुरुवरे श्रीज्ञानतः सागरे तत्सर्व नहि वीक्ष्यते गणिगणेऽन्यस्मिन् कदाऽपि कचित् ॥५|| २-दाक्षिण्यैकपयोधयश्चतुरसच्चेतश्चमत्कृद्गुणाः सिद्धान्तार्ण वगाहनैकरसिका उत्सर्गमार्गाध्वगाः। प्रागल्भ्यप्रवरास्तपोषिधिरताः सन्मत्युदाराशयाः आसन् श्रीकुलमण्डनाह्वयगुरूत्तंसा द्वितीया इमे ॥५६॥ ३-भूतभाविभवत्सूरिक्रमरेणुकरणोपमः सरिः श्रीगुणरत्नाहस्तृतीयः समजायत ॥६०॥ ४-श्री सोमसुन्दर इति प्रथिताभिधानाः सौभाग्यभाग्यविशदाः क्षमया प्रधानाः तुर्याः सुधामधुरिमाश्चितवागविलासाः सूरीश्वरा गुणिगुणैः कृतनित्यवासाः ॥६॥ ५-श्री साधुरत्नाश्च ततो मुनीन्द्रास्तद्भुतं यत्सुगुणा.यदीयाः। नान्यत्र सन्तोऽपि जगज्जनानां सर्वत्र कर्णातिथयो भवन्ति ॥६२॥ 15 काले पड्स पूर्व १४६६ वत्सरमिते श्रीविक्रमाद्गिते गुर्वादशवशाद्विमृश्य च सदा स्वान्योपकारं परम् । ग्रन्थं श्रीगुणरत्नसूरिरतनोत्प्रज्ञाविहीनोऽप्यमु निर्हेतूपकृतिप्रधानजननैः शोध्यस्त्वयं धीधनैः ॥ ६३॥. 10 20 . इति श्रीगुरुपर्वक्रमवर्णनम् अपरनाम श्रीक्रियारत्नसमुच्चयप्रशिस्तिः समाप्ता [५] श्रीमुनिसुंदरसूरिभिः संदशिनानि गुरुवल्लीपट्टपरंपरासूरिकामानि 5 10 १ भगवान महावीर स्वामी [ निग्रन्थ गच्छः ] २ श्री सुधर्मा स्वामी ३ श्री जंवू स्वामी ४ श्री प्रभव स्वामी ५ श्री शय्यंभव स्वामी ६ श्री यशोभद्र सूरिः ७ श्री संभूति विजयः श्री भद्रबाहु स्वामी + ८ श्री स्थुलभद्र स्वामी ६ श्री आर्य महागीरिः + ६ श्री आर्य सुहस्ति गरे [ कौटिक गच्छः] १० श्री सुस्थित सूरिः श्री सुप्रतिवध्ध सूरिः + ११ श्री इंद्रदिन्न सूरिः १२ श्री दिन सूरिः १३ श्री सिंहगिरि सूरिः १४ श्री वन स्वामी १५ श्री वनसेन सूरिः [ चंद्र गच्छः ] १६ श्री चन्द्र सूरिः [ वनवासी गच्छः ] १७ श्री सामन्त भद्र सूरिः १८ श्री वृध्धदेव सूरिः १६ श्री प्रद्योतन सूरिः २० श्री मानदेव सूरिः २१ श्री मानतुंग सूरिः २२ श्री वीर सूरिः २३ श्री जयदेव सूरिः २४ श्री देवानंद सूरिः २५ श्री विक्रम सूरिः २६ श्री नरसिंह सूरिः २७ श्री समुद्र सूरिः २८ श्री मानदेव सूरिः २६ श्री विबुधप्रभ सूरिः ३० श्री जयानंद सूरिः ३१ श्री रविप्रभ सूरिः ३२ श्री यशोदेव सूरिः ३३ श्री प्रद्युम्न सूरिः ३४ श्री मानदेव सूरिः + ३५ श्री विमलचंद्र सृरिः + 15 20 ५ ३४ . ३६ श्री उद्योतन सुरिः [ वडगच्छः ] ३७ श्री सर्वदेव सुरिः ३८ श्री देव सूरिः ३६ श्री सर्वदेव सूरिः ४० श्री यशोभद्र सुरिः श्री नेमिचंद्र सूरिः ४१ श्री मुनिचंद्र सृरिः ४२ श्री अजितदेव सूरिः ४३ श्री विजयसिंह सूरिः ४४ श्री सोमप्रभ सूरिः श्री मणिरत्न सृरिः [ तपागच्छः] ४५ श्री जगचंद्र सूरिः ४६ श्री देवेंद्र सरिः श्री विजयेन्दु सूरिः पट्टावली-समुच्चयः ४७ श्री विद्यानन्द सूरिः श्री धर्मघोष सूरिः ४६ श्री सोमप्रभ सूरिः (४६) श्री विमलप्रभ सूरिः (3) श्री परमानंद सूरिः (3) श्री पद्मतिलक सूरिः ४६ श्रीसोमतिलकसूरि (५०) श्री चंद्रशेखर सूरिः (..) श्री जयानंद सूरिः + ५७ श्री देवसुंदर सूरिः + 10 (५१) श्री ज्ञानसागर सृरिः (,) श्री कुलमंडन सूरिः (,) श्री गुणरत्न मूरिः ५१ श्रीसोमसुंदर सूरिः (,) श्री साधुरल सूरिः 15 ५२ श्री मुनिसुंदर सूरिः ) एतेषां पारंपरां गुर्वावल्यां संदर्भिता नोपलभ्यते । एतेषां चत्वारः पट्टधरा अासन् ! इति तपागच्छपावतीस्त्रे । + पांविद मते श्रीमद्रबाहुनानियुग्म-आयनहागीरिवरियुग्म-श्रीमुस्मित- चरियुग्माना एकपट्टगणने चंद्रसरंकः १६, अन्येषां मते पृथक्पृथगणने अंकः १९ ॥ मनपा गणनदा वृहद्गच्छादिमाचार्यश्रीसर्वदेवारको ३५,३८ । सीप्रघम्नरि-श्रीमान- देवसूरियोरपि पट्टगणनें कौ ३७,४० ॥ अतः देवन्द्वंदररेरपिष्टांकाः ४८,१०,५१,५३ ॥ श्रीनपानंदसूरपि पट्टगपने अंक: ५४ ॥ (४५) श्री नगच्चंद्ररारम्य विशिष्ट- गपनकातु श्रीदेवसुंदरदरेः ५०,५६,६: अपि अंकाः। किंतु तिगणनया ५० ॥ -इति नतांतराणि ५९, ४८५, ४८६, ४८७ इलोकयु । ५२-प्रीमुनिसुंदरमरिमिः विक्रमीय १४६३ वर्षे ४९६ पददेहा गुर्वावही गुंफिनास्ति, तस्याः पट्टपरंपरा एवात्र मुदिनाति [६] श्रीखोमसोभाग्य टाकली [ कर्ता-मुनिश्रीप्रतिष्ठासोमः ] ततो गणः शिष्यततो वटाख्याख्यातोऽभवत्वापि बृहद्गणाः । तस्मिंश्च गच्छे प्रवरेषु भूरिसूरिष्वतीतेपु बहुश्रुतेषु ॥२३॥ श्रीमान् जगचन्द्र इति प्रतीतनामा सुधामाजनि सूरिराजः । पत्रिंशदाचार्यगुणाः गणेंद्रं तं शिश्रियुः प्रेमभरप्रणुन्नाः ॥२४॥ युग्मम् स्वगोभरैर्ध्वस्तसमस्तपापतमाः क्षमादर्शितपुण्यमार्गः। 5 जगजनानां प्रमदं वितन्वन् श्रीचन्द्रवद्योऽजनि सार्थकाहः ॥२५॥ वैराग्यवान् द्वादश हायनान्याचामाम्लनिर्माणतपो ह्यतप्त । यो दुस्तपं तेन तपागणेति गणस्य सत्ख्यातिरभूत् क्षमायां ।।२६।। श्रीमजगचन्द्रगुरोविनेयस्त्वमेयसद्गेयगुणैर्विनिद्रः । देवेंद्रमत्येंद्रमुनींद्रवंद्यो देवेंद्रसूरिः समभूत् प्रभाढयः ॥२७॥ 10 व्याख्याकलां यस्य कलां विलोक्य श्रीवस्तुपालादिमहेभ्यसभ्याः । घूर्णयन्ति स्म न पूर्णचित्ताः शीर्षाणि हर्षेण च विस्मयेन ॥२८॥ कर्मसरूपप्रथनान्य कर्मग्रंथादिसग्रंथविधानवेधाः । मेधाप्रधानो जगतां गतांहा व्यभासयजैनमतं मतं यः ॥२६॥ संशुद्धसाधुस्थितिदुर्गमार्ग प्ररूपयंश्चारु समाचरंश्च । 15 अनल्पसंकल्पितदानकल्पद्रुमो ऽभवद्यो जिनकल्पिकल्पः ॥३०॥ ख्यातो दिगते वितते तदंतेवासी खदासीकृतदेवसूरिः। निस्सीमगंभीरिमहृद्यविद्यानंदाह्वसूरींद्र इहाबभासे ॥३१॥ अनोकहं नव्यलताः श्रिता चा सरित्पतिं वा सरितस्तता वा। मरालवाला इव मानसं वा यं हृद्यविद्या हि तथा प्रथाढयाः ॥३२॥ 20 5 : - ३८ पट्टावली-समुच्चयः सुधर्मश्रीजंबूप्रभृतिसुगुरून् धीधनगुरून् । महौनत्यान् नित्याभ्युदयजयसत्की तकलितान् । दृशोऽतीतान् स्कीतान् नयति यतिराट् यः स्मृतिपथम् । गुणैश्चंद्रोन्निद्रैगिरिशगिरिशुभ्रौरिह शुभैः ॥ ५७ ।। सदर्पः कंदर्पः प्रसृमरभुजौजाः स समरे ऽवधि क्रोधो योधो निकृतिमदमात्सर्यसहितः । जयानंदश्रीमद्गुरुभिरपरेऽपीह रिपवो ऽन्तरंगास्तेऽखस्तिपदि हृतगर्वा विदधिरे ।। ५८ ॥ ये श्रीमद्गुरवो वोर्जितजितप्रावृधनाः श्रीधनाः श्रीमद्गौतमसंनिभा हृदि निभान्मुक्ताश्च युक्ता गुणैः। 10 विश्व कीर्तिजलैः समुज्ज्वलतरैः प्रक्षालयंतः स्फुर- न्मूर्तिस्फूर्तिजुपः सृजति सुकृतश्रीप्राज्यराज्यं क्षितौ ।। ५६ ।। इति श्री युगप्रधानावतारश्रीबृहत्तपागच्छभंगारहारभट्टारकपुरं- दरपूज्यश्रीसोमसुंदरसूरिसौभाग्यवर्णने सोमसौभाग्यनाम्नि काव्ये श्रीतपा- गच्छपूर्वाचार्यसंहतिप्रकटनो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३॥ 15 अथ अनुपूर्तयः- खगं ययुर्ययुचलेंद्रियजिज्जयाद्याऽऽनंदाह्रसूरिमुकुटाः प्रकटाभिधानाः ।। श्रीदेवसुंदरगुरुप्रभवोऽभवंश्च, श्रीगच्छनायकतया विदितास्तदानीं ।। --सर्ग ५ श्लो०१ अद्रीश्वराग्न्यंबुधिचंद्रसमिते, भृते प्रमोदप्रकरण वत्सरे॥ समं भगिन्या गिरिदेवताद्युता, सोमेन दीक्षा जगृहे महामहैः ।। श्रीसोमसुंदरमुनिस्त्विति नाम धाम,श्रेयःश्रियां वितरतिस्म यतीश्वरोऽसौ ॥ सोमाभिधानपुरुषप्रवरस्य तस्य, दीव्यद्गुणैः प्रसृमरस्य नतामरस्य ।। (दीक्षा वि० सं० १४३७) सर्ग ४, श्लो० ५६-६०, श्रीवाचकोतमपदं खशराब्धिचंद्रसंवत्सरे विगतमत्सरचित्तवृत्तेः ॥ अब्दैः समस्य समभूत् नखसंमितान्दे शाब्देन सन्मधुरिमाऽतिशयेन तस्यः॥१॥ 20 25 .
सोमसौभाग्य-पट्टावली ३६ श्रीसोमसुंदरगुणाद्भुतवाचकेंद्राः केंद्रास्पदानितशुभप्रहशुद्धलग्ने । संस्थापिताः किल तदैव सदैव पुण्याः, प्राची दिशं प्रति विनेययुता विजह्वः ॥ २॥ श्रीदेवसुंदरगुरुगरिमाभिरामः, श्रीवाचकस्य कलिशत्रुभयानकस्य । कर्णेसकर्णमुकुटस्य'स' सूरिमंत्रं, संन्यस्यतिस्म भुवि विस्मयकारिशक्ति॥३ 5 वर्षे कुलाचलशिलीमुखवारिराशिपीयुपदीधितिमितेऽप्रमिते प्रमोदैः ।। श्रीसोमसुंदरगुणोज्वलवाचकानामाचार्यवर्यपदमद्भुतकारि जज्ञे ॥४॥ (वाचकपदं वि० सं० १४५०, सूरिपदं वि० सं० १४५७) सर्ग ५, श्लो० १४, १५, ५०, ५१, स्वर्गगते सद्गुणसंगते श्री-वृहद्गुरौ जजुरथो प्रथाढ्याः ॥ श्रीगच्छनाथा महसा सनाथाः, श्रीसोमयुक् सुंदर सूरिराजाः ॥ सर्ग-६, श्लोक-१ स्वच्छे श्रीयुतसोमसुंदरगुरोर्गच्छे ऽप्यतुच्छे गुणैः । संख्या नो वरिवर्ति पंडितगणिक्षुल्लादिसंख्यावृताम् ॥ रत्नानामिव कांतकांतिसजुपां रत्नाकरस्य स्फुर- 15 त्ताराणां च यथापृथुद्युतिभृतां श्रीतारकाधीशितुः ॥१॥ सर्ग-१०, श्लोकः ६४, 10 x x श्रीसोमसुंदरसूरीणां यहवः पट्टधरा वाचकाः शिम्याश्चासन् तेषु केषांचित नामानि यथा-श्रीमुनिसुंदरसूरिः, कृष्णसरस्वतीश्रीजयसुंदरसूरिः, श्रीभुवनसुंदरसरिः एकादशांगसूत्रार्थधारकश्रीजिनसुंदरसरिः, जिनकीर्तिसूरिः, श्रेष्ठिगोविंदकृतपदोत्सव, श्रीविशालराजसूरिः, महादेवश्रेष्ठिकृतपदोत्सवो दक्षिणदिग्वादिजेता श्रीरत्नशेखरसूरिः, गंधारनगरष्टिलक्षसंघपतिकृतपदोत्सवः श्रीउदयनदिरिः, रत्नशेखररिशिष्यलक्ष्मी- सागरसूरिः, महावादी समर्थव्याख्याता मेवाडाधिपतिकुंभकर्ण-जीर्णदुर्गाधिपतिमंडलिक- चांपानराधिपतिजयसिंहपूजितः समर्थकविः श्रीसोमदेवसूरिः, रत्नमंडनरिः, सप्तनय- रहस्यज्ञाता श्रीरत्नमंडनमूरिः, शुभरत्नसूरिः, महातार्किकसोमजयसरिः। उपाध्याय- साधुराजः, महोपाध्यायजिनमंडनः मुख्यशिष्यकृष्णसरस्वतीउपाध्यायश्रीधारित्ररत्नः, उपाध्यायसत्यशेखरः, वादीज्वरधन्वंतरी उपाध्याय श्रीहेमहंसः । दक्षिणदिग्वादिजेता पं० - ४० जाताः - पट्टावली-समुच्चयः वर्षे नंदनिधानवारिधिहिमज्योतिर्मिते स्वर्ययुः । केचित् सातिशया वदंत्विति सुनिश्रेष्ठा गरिष्ठा धिया ॥ श्रीसीमधरतीथनाथचरणांभोरुट्पवित्रीकृते । पूर्वमहाविदेहनगरे ते सूरयः सत्कुले ॥१॥ (वि० सं० १४६६ स्वर्गमनं ) सर्ग- श्लोक १०६ .. श्रीसोमसुंदरयुगोत्तमसूरिपट्टी, श्रीमान् रराज मुनिसुंदरसूरिराजः ॥ श्री सूरिमंत्रवरसंस्मरणैकशक्ति-यस्याऽभवद् भुवनविस्मयदोनदक्षा ॥१॥ श्रीरोहिणीति विदिते नगरे ततीति पश्चात्कृतेः किल चमत्कृतहत्पुरेशः अरीचकार मृगयाकरणे निषेधं, प्रावर्तयन्निखिलनीवृति चाप्यमारिं ॥२॥ प्रागेव देवकुलपाटकपत्तने यो, मारेरुपद्रवदलं दलयांचकार । 10 श्रीशांतिकृत्स्तवनतोऽवनतोत्तमांग-भूपालमौलिमणिघृष्टपदारविंदः ॥२॥ श्रीमानदेवशुचिमानसमानतुङ्ग-मुख्यान प्रभावकगुरून स्मृतिमानयद्यः ।। श्रीशासनाऽभ्युदयदप्रथितावदातै-स्तैस्तैश्चमत्कृतिकरैः कुमुदावदातैः ॥४॥ पारावारकरस्मरेपुहिमरुक्वति हर्पाद् व्यधात् । विज्ञानां हृदयंगमं च सुगम क्लुप्तेंदिरासंगमम् ॥ 15. काव्यं नव्यमिदं विदंभहृदयः शिष्यः प्रतिष्ठादिमः । सोमः श्रीयुतसोमसुंदरगुरोर्मेरोगरिम्णः श्रिया ।। (रचना वि० सं० १५२४ ) सर्ग १०, श्लो० १, २, ३, ४,.७३, इति समाप्तमिदम् विवेकसागरः, श्रीदक्षिणदिग्वादिजेता राजवर्धनः, श्रीचारित्रराजः, वादीश्रीपुण्यराजः, भीश्रुतशेखरः, श्रीवारभृतशेखरः, श्रीसोमशेखरः, श्रीशानकोतिः, श्रीशिवमूर्तिः, . श्रीधर्ममंडनः, ज्योतिर्विद् श्रीहर्षमूर्तिः, श्रीहर्पकीर्तिः, श्रीहर्षभूपणः, श्रीहर्षवीरः, गणितशः श्रीविजयशेखर,, संस्कृतजल्पपटुश्रीअमरसुंदरः, महावैयाकरणो लक्ष्मीभद्रः, वादीश्रीसिंहदेवः, प्रवरव्याख्यातारत्नप्रभः, श्रीशीलभद्रः, दुर्गमशास्त्रज्ञनंदिधर्मः, शांति- जिनकस्मरणमहातपस्वी शांतिचंद्रगणिः, पंचाशत्क्षपणादिदुःस्तपतपःकर्ता विनयसिंह-. गणिः, महाशब्द: स्वाध्यायकारको हर्पसेनगणिः, नित्यकभरूपानग्राहक आतापनातत्परः श्रीहर्षसिंहगणिः, श्रीप्रतिष्ठासोमः ॥ इति सोमसौभाग्यकाव्ये दशमस्वर्ग ‘अस्य सूरेः १८०० साधूनां परिवारः ॥ इति तपागच्छपट्टावलीसूत्रे .
[७] ७ 5 श्रीतपागच्छपट्टाकली सूत्रम् स्वोपज्ञया वृत्या समलंकृतम् । ( कर्ता-महोपाध्यायश्रीधर्मसागरगणिः) ॥६०॥ तपागच्छाधिराजश्रीहीरविजयसूरिगुरुभ्यो नमः । अथ गुरुपरिपाटीकथनाय संगतिमाह। सिरिमंतो सुहहेऊ, गुरुपरिवाडीइ आगओ संतो ॥ पज्जोसवणाकप्पो, वाइब्जइ तेण तं वुच्छं ॥१॥ व्याख्या-सिरमंत्तोत्ति, यत्तदोर्नित्याभिसंबंधात् येन कारणेन श्री- मान् सश्रीकः श्रियां मंत्रो वा पर्यपणाकल्पो गुरुपरिपाट्या समागतः सन् वाच्यते । उपलक्षणात् श्रूयते च । किंलक्षणः! शुभहेतुः स्वर्गापवर्गकारणं । तेन कारणेनाहं तां गुरुपरिपाटीं वक्ष्ये इत्यन्वयः । श्रीमानिति विशेषणं तीर्थंकरचरित्रस्थविरावलीनामकीर्तनपुरस्सरं साध्वाचारप्रतिपादनेन सर्वे- 10 प्वपि मंगलभूतेषु श्रुतेपु सश्रीकत्वमस्यैवेति ख्यापनपरमिति । गुरुपरिपाट्या- . गत इति च विशेषणं । गुरुपरिपाट्यागतयोगाद्यनुष्टानविधिनैव वाच्यमानः । एगग्गचित्ताजिणसासणम्मि, पभावणापूअपरायणा जे। इत्यादि विधिना च श्रूयमाणः शुभहेतुर्मोक्षफलहेतुर्नान्यथेति ज्ञापनपरमिति गाथार्थः ॥१॥ गुरुपरिवाडीमूलं, तित्थयरो वध्धमाणनामेणं ।। 15 तप्पट्टोदयपढमो, सुहम्मनामेण १ गणसामी ॥२॥ श्रीवर्धमानतीर्थकरः ॥१-तत्पट्टे श्रीसुधर्मस्वामी ॥ व्याख्या-गुरुपडिवाडित्ति, गुरुपरिपाट्या मूलमायं कारणं वर्षमान. नाम्ना तीर्थंकरः। तीर्थकृतो हि आचार्यपरिपाच्या उत्पत्तिहेतवो भवंति नपुनस्तदंतर्गताः । तेषां स्वयमेवतीर्थप्रवर्तनेन कस्यापि पट्टधरत्वाभावात् ॥ 20 ४२ पट्टावली-समुच्चयः १ तस्मात् श्रीमहावीरस्य पट्टे उदये च प्रथमः श्रीसुधर्मस्वामी पंच- मो गणधरः। सच किंलक्षणो ? गणस्वामी यत एकादशानामपि गणधर- पदस्थापनावसरे श्रीवीरेण श्रीसुधर्मस्वामिनं पुरस्कृत्य गणोऽनुज्ञातः दुष्प्रसहं यावत् श्रीसुधर्मस्वाम्यपत्यानामेव प्रवर्तनात् ॥ तत्पट्टोदयेत्य- त्रोदयपदं प्रथमोदयस्यापि प्रथमाचार्यः श्रीसुधर्मेति सूचकं । स च पंचापद- 5 र्षाणि५०गृहस्थपर्याये, त्रिंशद्वर्षाणि ३० श्रीवीरसेवायां, धीरे निवृते वो द्वादशवर्षाणि १२ छामस्थ्ये, अष्टौ ८ वाणि केवलिपर्याचे चेति, सायुः शतमेकं १०० परिपाल्य श्रीवीराविंशत्या २० वर्षैः सिधिं गतः ॥ श्रीवीर- ज्ञानोत्पत्तेश्चतुर्दश१४वर्षे जमालिनामा प्रथमो निहवः । पोडश१६वर्षे तिष्यगुप्तनामा द्वितीयो निहवः ॥२॥ 10 15 वीओ जंवू २ तईओ, पभवो ३ सिज्जंभवो चउत्थो १ अ पंचमओ जस भद्दो ५, छटो संभूय -भद्गुरू ६ ॥३॥ २-तत्पट्टे श्रीजंवूस्वामी ।। ३-तत्प? श्रीप्रभवस्वामी ॥ ४-तत्पट्टे श्रीशय्यंभवस्वामी ॥५-तत्पट्टे श्रीयशोभद्रस्वामी ।। ६-तत्पट्टे श्रीसमूतविजयश्रीभद्रयाहुस्वामिना ।। व्याख्या-२-बीओ जंवृत्ति, श्रीसुधर्मखामिपट्टे द्वितीयः श्रीजंवूखामी । सच नवनवतिकोटिसंयुक्ता अष्टौ कन्यकाः परित्यज्य श्रीसुधर्मखाम्यंतिके प्रबजितः । स च पोडश१६वाणि गृहस्थपर्याये, विंशतिवर्षाणि २० व्रतपर्याये, चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि ४४ युगप्रधान- पर्याये चेति, सर्वायुरशीतिवर्षाणि ८० परिपाल्य श्रीवीरत् चतुःपष्ठि ६४ 20 वः सिद्धः ॥ अत्रि कविः- मत्कृते जंबुना त्यक्ता, नवौढा नवकन्यकाः। तन्मन्ये मुक्तिवध्वाऽन्यो, नवृतो भारतो नरः ॥ १॥ चित्तं न नीतं वनिताविकारै-वितं न नीतं चतुरैश्च चौरैः ।। यद्देहगेहे द्वितयं निशीथे,जंबूकुमाराय नमोस्तु तस्मै ॥२॥ 25 - . 1 , तपागच्छ-पट्टावली मण १ परमोहि २ पुलाए ३, आहार ४ खबग ५ उचसमे ६ कप्पे, ।। संजमतिग ८ केवल ६ सि-ज्मणा य १० जंबुम्मि वुच्छिण्णा ॥१॥ ३-तईश्रोत्ति, श्रीजंबूस्खामिपट्टे तृतीयः श्रीप्रभवस्वामी। स च त्रिंशद्वर्षाणि ३० गृहस्थपर्याये, चतुश्चत्वारिंशत् ४४ वर्षाणि व्रतपर्याये, एकादश११युगश्चेति । सर्वायुः पंचाशीतिपश्वणि परिपाल्य, श्रीवीरात् । पंचसप्तति७५वतिक्रमे स्वर्गभागिति ॥छ॥ ४-सिज्जंभवोत्ति, श्रीप्रभवस्वामिप्रहितसाधुमुखात् "अहोकष्टमहो- कष्टं तत्वं न ज्ञायते परम्॥ इत्यादि वचसा यज्ञस्तंभादधःश्रीशांतिनाथ- बिंबदर्शनादेवाप्तधर्मा प्रव्रज्य, क्रमेण मनकनाम्नः स्वसुतस्य निमित्तं दशवैकालिकं कृतवान् । यतः- 10 कृत विकालवेलायां, दशाध्ययनगर्मितम् । दंशकालिकमिति-नाम्ना शास्त्रं वभूव तत् ॥ १॥ अतःपरं भविष्यंति, प्राणिनो शल्पमेधसः । कृतार्थास्ते मनकवत् , भवतु त्वत्प्रसादतः ॥२॥ श्रुतांभोजस्य किंजल्क, दशकालिकं घदः । आचम्पाचम्पमोदन्ता-मनगारमधुव्रताः ॥३॥ इति संघोपरोधेन, श्रीशय्यंभवसूरिभिः ।। दशवैकालिको ग्रंथो, न संवत्रे महात्मभिः ॥४॥ इति । स चाष्टाविंशतिरस्वर्षाणि गृहस्थपर्याये, एकादश११व्रते, त्रयो- विंशति२३युगप्र० चेति सर्वायुषष्ठि६२वर्षाणि परिपाल्य । श्री वीरादष्ट- 20 नवतिः वतिक्रमे खर्गभाक् ॥छ।। ५ पंचमओत्ति, श्रीशय्यंभवस्वामिपट्टे पंचमः श्री यशोभद्रखामी। स च द्वाविंशतिरवर्षाणि गृहे, १४ व्रते, पंचाशत५०व० युग० सर्वायुः पडशीतिपवर्षाणि परिपाल्य । श्रीवीरादष्टचत्वारिंशदधिके शते १४८- ऽतिक्रांते स्वर्गभाक् ।। छ । 15 25 . 10 पट्टायली-समुच्चयः '६-छट्ठा संभूयत्ति, श्रीयशोभद्रस्वामिपट्टे पष्टौ पदकदेशे पदसमु- दायोपचारात संभूतेति, श्रीसंभूतिविजयः भत्ति, श्रीभद्रबाहुस्खामी युभावपि पष्टपदधरावित्यर्थः ॥ तत्र श्री संभूतिविजयो हिचत्वारिंशन्४२२० गृहे, चत्वाशिंन्ट व्रते, अष्टौ = युग० चेति, सर्वायुवतिलचणि परि पाल्य स्वर्गभा ॥ श्रीभद्रबाहुस्वामी तु श्री आवश्यकादिनियुक्तिविधाता ! ब्यंतरीभूतव- राहमिहिरकृतसंघोपद्रवनिवारकोपसर्गहरस्तवनेन प्रवचनस्य महोपकारं कृत्वा पंचचत्वारिंशत्४५गृहे, सनदश १७ व्रते, चतुर्दश१४युगम० चेति सर्वायुः पट्लप्ततिध्वणि परिपाल्य श्रीवीरान सप्तत्यधिकशत१७० व स्वर्गभाक् । छ । ॥३॥ सिरिथूलभद्द सत्तम ७, अट्ठमगा महगिरी-सुहत्यी ८ अ ॥ सुट्ठिअ-सुप्पडिबद्ध, कोडिअमादिगा नवमा ६॥४॥ ७-तत्सट्टे श्रीथूलभद्रस्वामी ॥ ८-तत्स2 श्रीआयमहागिरि- श्रीआर्यसुइस्तिनौ ॥र-श्रीआर्यमुहस्तिपट्टे श्रीसुस्थितसुप्रतिवद्धौ ।। व्याख्या-5-सिरिथूलभद्दत्ति, श्रीसंभूतविजय-भद्रबाहुस्वामिनोः सप्तम- पट्ट श्रीस्थूलभद्रस्वामी कोशाप्रतिवोधजनितयशोधवलीकृताखिलजगत् सर्वजनप्रसिद्धः । चतुर्दशपूर्वविहां पश्चिमः । क्वचिचत्वार्यन्त्यानि पूर्वाणि सूत्रतोऽधीतवानित्यपि । स च त्रिंशत् ३० गृहे, चतुर्विंशतिरश्वते, पंच- चत्वारिंशन्४५युगप्रधाने, सर्वायुर्नवनवतिःवर्षाणि परिपाल्य श्रीवीरात पंचदशाधिकशतद्वय २१५वर्षे स्वर्गभाक् ॥ अत्र कविः- श्रीनमितापि शकटालमुतं विचार्य, मन्यामहे वयममुं भटमेकमेव ।। देवोऽद्रिदुर्गमधिरुह्य जियाय मोहं, यन्मोहनालयमयं तुबशी प्रविश्या॥१॥ श्रीवीरनिर्वाणान् चतुर्दशाधिकवर्यशतद्वये २१४ श्रापाढाऽऽत्रार्यात अध्यक्त नाम तृतीयो निहवः छ।। 15 20 J ४५ 10 तपागच्छ-पट्टावली प-अट्ठमगत्ति, श्रीस्थूलभद्रपट्टेऽष्टमौ पट्टधरौ श्रीआर्यमहागिरिः श्रीसुहस्ती चेत्युभावपि गुरुभ्रातरौ । तत्र श्रीआर्यमहागिरिजिनकल्पिक- तुलनामारूढो, जिनकल्पिककल्पः । त्रिंशत् ३० गृहे, चत्वारिंशत् ४० व्रते, त्रिंशत् ३० युग०, सर्वायुः शत १०० व० परिपाल्य स्वर्गभाक् ।। द्वितीयेनाऽऽर्यसुहस्तिना पूर्वभवे द्रमकीभूतोपि संप्रतिजीवः प्रव्राज्य 5 त्रिखंडाधिपतित्वं प्रापितः । येन संप्रतिना त्रिखंडमितापि मही जिनप्रासाद- मंडिता विहिता साधुवेपधारिनिजवंठपुरुपप्रेषणेनाऽनार्यदेशेपि साधुविहारः कारितः ॥ सच आर्यसुहस्ती त्रिंशत्३०गृहे, चतुर्विंशति२४व्रते, पट्चत्वा- रिंशत् ४६ युग प्र० सर्वायुः शतमेकं १०० परिपाल्य श्रीवीरात् एकनव- त्यधिकशतद्वये २६१ स्वर्गभाक् ॥ यद्यपि श्रीस्थूलभद्रस्य पंचदशाधिकशतद्वय२१५वर्षे स्वर्गो गुर्वा- वल्यनुसारेणोक्तः । श्रीमहागिरि-सुहस्तिनौ तु त्रिंशत्३०वर्पगृहस्थ- पर्यायावपि शत१००वर्पजीविनौ दुष्पमासंघस्तोत्रयंत्रकानुसारेणोक्तौ ॥ तथा च सति श्रीआर्यसुहस्ती श्रीस्थूलभद्रदीक्षितो न संपद्येत, तथापि गृहस्थ पर्यायवाणि न्यूनानि व्रतवर्षाणि वाधिकानीति विभाव्य घटनीयमिति ।। 15 तथा श्रीसुहस्तिदीक्षिताऽवंतिसुकुमालमृतिस्थाने तत्सुतेन देवकुलं कारितं तस्य च " महाकाल " इति नाम संजातं । श्रीवीरनिर्वाणात् विंशत्यधिकवर्षशतद्वये २२० अश्वमित्रात् सामुच्छेदिकनामा चतुर्थो निह्नवः । तथा अष्टविंशत्यधिकशतद्वये २२८ गंगनाम्ना द्विक्रियः पंचमो निह्नवः ॥ छ। ६-सुट्टिअति, श्री सुहस्तिनः पट्टे नवमौ श्रीसुस्थित-सुप्रतिबधी, कोटिक-कार्कदिकौ । कोटिशःसूरिमंत्रजापात् कोट्यंशसूरिमंत्रधारि- त्वाद्वा । ताभ्यां कौटिक नाम्ना गच्छोऽभूत अयं भावः-श्रीसुधर्मस्वामिनो-. ऽष्टौसूरीन यावत् निर्ग्रथाः साधवोऽनगारा इत्यादि सामान्यार्थाभिधायिन्या- ख्याऽसीत् नवमे च तत्पढे कौटिका इति विशेपार्थावबोधकं द्वितीयं नाम 25 प्रादुर्भूतं ॥ • • 20 . 5 . ४६ पट्टावली-समुच्चयः श्रीार्यमहागिरस्तं शिप्यौ बहुल-बलिस्सहौ यमलभ्रातरौ-तस्य बलि- स्सहस्य शिष्यः स्वातिः तत्वार्यादयोग्रंशस्तु नत्कृता एव संभाव्यते । तच्छिष्यः श्यामाचार्यः प्रज्ञापनाकृत् । श्रीयोरात् पट्सप्तत्यधिकशतत्रये ३७६ स्वर्गभाक् ॥ तच्छिप्यः सांडिल्यो जीतमर्यादाकृदिति नंदिस्थविरावः ल्यामुक्तमस्ति । परं सा पट्टपरंपराऽन्येति वोध्यं ॥४॥ सिरिइंददिनसूरी, दसमो १० इक्कारसो अदिन्नगुरू ११॥ बारसमो सीहगिरी १२. तरसमो वयरसामि गुरू १३॥५॥ १०-तत्स्ट्टे श्री इंद्रदिन्नसूरः ११-तत्सट्टे श्रीदिनसूरिः ।। १२-तसट्टे श्रीसीहगिरिः ।। १३-तत्पट्टे श्री वस्खामौ ॥ व्याख्या-१० सिरि इंदत्ति, श्री सुस्थित-सुप्रतिवद्धयोः पट्टे दशमः 10 श्रीइन्द्रदिन्नसूरिः ॥ अत्रांतरे श्रीवीर० त्रिपंचाशदधिकचतुःशतवतिक्रमे ४५३ गर्दभिल्लोच्छेदी कालंकसूरिः ॥ श्री वी० त्रिपंचाशदधिकचतुःशत व०४५३ भृगुंकच्छे आर्यखपुटाऽऽचार्य इति पट्टावल्यां । प्रभावकचरित्रे तु चतुरशीत्यधिकचतुःशत४८४वर्षे आर्यखपुटाचार्यः ॥ सप्तपप्ठयधिक चतु:शत४६७वर्षे आर्यमंगुः ॥ वृद्धवादी पाइलिप्तश्चात्र । तथा सिद्धसेन 15 दिवाकरो, येनोजयिन्यां महाकालप्रसादरुद्रलिंगस्फोटनं विधाय कल्याण- मंदिरस्तवेन श्रीपार्श्वनाथविवं प्रकटीकृतं, श्रीविक्रमादित्यश्च प्रतिवोधित- स्तद्राज्यं तु श्रीवीर० सप्ततिवर्षशतचतुष्टये ४७० संजातं । तानि चर्पाणि चैवम्- जं रयणि कालगओ, अरिहा तित्थंकरो महावीरो। तं रयणिं अवणिवई, अहिसित्तो पालो राया ॥१॥ सट्ठी पालयरगणोदछ, पणवरणसयं तु होइ नंदाणं १५५|| अट्ठसयं मुरियाणं १०८, तीस चित्र पूसमित्तस्स ३० ॥२॥ वलमित्तं-भांणुमित्ता, संट्ठी ६० वरिसाणि चत्त नहवाणे ४० ।। तह गद्दभिल्लरज्जं, तेरस १३ वरिस सगस्स चउ (वरिसा)४॥३॥छ।। 25 ११-इकारसोत्ति, श्रीइन्द्रदिन्नसूरिपट्टे एकादशः श्रीदिन्नसूरिः ।। १२-बारसमोत्ति, श्रीदिन्नसूरिपट्टे द्वादशमः श्रीसीहगिरिः ॥छ।। 20 - ४७ तपागच्छ-पट्टानली १३--तेरसमोत्ति, श्रीसीहगिरिपट्टे अयोदरीः श्रीवनस्वामी। यो वा- ल्यादपि जातिस्मृतिभाग् , नभोगमनविद्यया संघरक्षाकृत, दक्षिणस्यां बौद्धराज्ये जिनेद्रपूजानिमित्तं पुष्पाद्यानयनेन प्रवचनप्रभावनाकृत् देवा- भिवंदितो दशपूर्वबिदामपश्चिमो वनशाखोत्पत्तिमूलं ।। तथा स भगवान् पएणवत्यधिकचतुःशत४६६वांने जातः सन् अत्री ८ वर्षाणि गृहे, 5 चतुश्चत्वारिंशत् ४४ वर्षाणि व्रते. पट्त्रिंशन्३३वर्षाणि युगप्र. सर्वायुर- टाशीतिपवर्षाणि परिपाल्य, श्री वीरान् चतुरशीत्यधिकपंचशत५८४ वर्षान्ते स्वर्गभाक् ॥ श्रीवनस्वामिनी दशपूर्व-चतुर्थसंहनन-संस्थानानां व्यु- च्छेदः। चतुष्कुलसमुत्पत्ति-पितामहमहं वि 10 दशपूर्वविधिं वंदे, वनस्वामिमुनीश्वरं ॥१॥ अत्र श्रीआर्यमुहस्तिश्रीवत्रवामिनोरंसराले १ श्रीगुणसुंदरसूरिः, २ श्रीकालिकाचार्यः ३ श्रीस्कंदियाचार्यः ४ श्रीरेवतीमित्रसूरिः ५ श्रीधर्मसूरिः ६ श्रीभद्रगुप्ताचार्यः ७ श्रीगुप्ताचार्यश्चेति क्रमेण युगप्रधानसप्तकं बभूव । तत्र श्रीवीरात् त्रयस्त्रिंशदधिकपंचशत५३३वर्षे श्रीआयरक्षितसूरिणा श्रीभद्र- 15 गुप्ताचार्यो नियमितः स्वर्गभागिति पट्टावल्यां श्यते । परं दुष्पमासंघस्तवयंत्र- कानुसारेण चतुश्चत्वारिंशदधिक्रपंचशत५४४वर्षातिक्रमे श्रीार्यरक्षित- सूरीणां दीक्षा विज्ञायते तथा चोक्तसंवत्सरे निर्यापणं न संभवतीत्येतद्बहुश्रुत गम्यं ॥ तथाऽटचत्वारिंशदधिकपंचशतवपति ५४८ त्रिराशिकजित् श्रीगुप्त- 20 सूरिः स्वर्गभाक् ।। तथा श्रीवीरात् सपादपंचशत५२५वर्षे श्रीशत्रुजयोच्छेदः सप्तत्यधिकपंचशत५७०वर्षे जावड्यु द्धार इति । | सिरिवजसणमूरी, १४, चाउद्दसमो चंद सूरि पंचदसो १५ ॥ सामंतभद्दसूरी, सालसमा १६ रण्णवासरई १६ ॥६ १४ - तत्प? श्रीवज्रसेनः ॥ १५ - तत्प? श्रीचंद्रसूरिः ।। 25 १६- तत्प? श्रीसामंतभद्रमूरिः ( वनवासी ) .! :
पट्टावली-समुच्चयः व्याख्या-१४ सिरिवजत्ति, श्रीवत्रस्वामिपट्टे चतुर्दशः श्रीवसेनसूरिः।। सच दुर्भिक्षे श्री वज्रस्वामिवचसा सोपारके गत्वा जिनदत्तगृहे ईश्वरीनाम्न्या तद्भार्यया लक्षपाकभोज्ये विपनिक्षेपविधानचिंतनश्रावणे सति प्रातःसुकालो भावीत्युत्त्या (क्त्वा) विपं निवार्य, १ नागेंद्र २ चंद्र ३ निवृति ४ विद्याधरा- ख्यान् चतुरः सकुटुंबानिभ्यपुत्रान् प्रत्राजितवान् । तेभ्यश्च स्वस्त्रनामांकितानि चत्वारि कुलानि संजातानीति ॥ स च श्रीवज्रसेनो नव वर्षाणिगृह, पोडपा धिकशत११६वते त्रीणि ३ वर्षाणियुग० सर्वायुः साष्टाविंशतिशतं १२८ परिपाल्य श्रीवीरात् विंशत्यधिकषट्शत६२८वपति स्वर्गभाक् ॥ अत्र श्रीवनस्वामिश्रीवज्रसेनयोरंतरालकाले श्रीमदायरक्षितसरिः श्रीदुर्वलिकापुष्पश्चेति क्रमेण युगप्रधानद्वयं संजातं ॥ तत्र श्रीमदार्यरक्षितसूरिः 10 सप्तनवत्यधिकपंचशत ५६७ वति स्वर्गमानिति पट्टावलयादौश्यते । परमा- वश्यकवृत्यादी श्रीमदार्यरक्षितसूरीणां स्वर्गगमनानंतरं चतुरशीत्यधिकपंच- शत५८४वर्षान्ते सप्तमनिह्नवोत्पत्तिरुक्तास्ति । तेनैतद्हुश्रुतगम्यमिति ॥ नवाऽधिक पट्शत ६०० वर्षान्ते दिगंबरोत्पत्तिः ।। 15 १५-चंदसूरित्ति, श्रीवत्रसेनपट्टपंचदशः श्रीचंद्रसूरिः । तस्माचन्द्रगच्छ इति तृतीयं नाम प्रादुर्भूतं । तस्माच क्रमेणाऽनेकगणहेतवोऽनेक सूरयो बभूवांसः॥ १६-सामन्तभद्दत्ति, श्रीचंद्रसूरिपट्टे पोडशः श्रीसामंतभद्रसूरिः। स च पूर्वगतश्रुतविशारदो वैराग्यनिधिनिममतया देवकुलवनादिप्वऽप्यऽवस्थानात् लोके वनवासीयुक्तस्तस्माचतुर्थं नाम वनवासीति प्रादुर्भूतं । छ ।॥६॥ . 20 - सत्तरस बुड्ढदेवो १७, सुरी पज्जो अणो अढारसमो १८ ॥ एगुणवीसइ इमो सूरी सिरिमाणदंवगुरू १६ ||७|| १७-तत्पट्ट श्रीवृदेवसूरिः ॥ १८-तसट्टे श्रीप्रद्योतनसरिः । १६- तसड़े श्रीमानदेवसरिः ।।
. तपागच्छ-पट्टावली व्याख्या-१७ सत्तरत्ति, श्रीसामंतभद्रसूरिपट्टे सप्तदशःश्रीवृद्धदेवसूरिः। वृद्धो देवसूरिरिति ख्यातः । श्री वीरात् पंचनवत्यधिकपंचशत५६५वर्षा- तिक्रमे कोरंटके नाहडमंत्रिनिर्मापितप्रासादे प्रतिष्ठाकृत् ॥ श्रीजज्जगसूरिणा च सप्तत्यधिकपटशतवर्षे ६७० सत्यपुरेनाहडनिर्मित- प्रसादे श्रीमहावीरः प्रतिष्ठितः ।। 5 १८-सुरिपज्जोअणत्ति, श्रीवृध्धदेवसूरिप?'ऽष्टादशः श्रीप्रद्योतनसूरिः ।। १६-एगूणत्ति, श्रीप्रद्योतनसूरिपट्ट एकोनविंशतितमः श्रीमानदेव सुरिः ।। सूरिपदस्थापनाऽवसरे यत्स्कंधयोरुपरि सरस्वतीलक्ष्म्यौ साक्षाद्विक्ष्य चरित्रादस्यभ्रंशो भावीति विचारण्या विषएणचित्तं गुरुं विज्ञाय येन भक्तकु- लमिक्षाः सर्वाश्च विकृतयस्त्यक्ताः ॥ तत्तपसा नड्डुलपुरे १-पद्मा २-जया 10 ३-विजया ४-अपराजिताऽभिधानाभिः देवीभिः पर्युपासमानं दृष्ट्वा कथं नारीभिः परिकरितोऽयं सूरिरिति शंकापरायणः कश्चित् मुग्धस्ताभिरेव शिक्षित इति॥७॥ सिरिमाणतुंगसूरी २०, वीसइमो एगवीस सिरिवीरो २१ ॥ वावीसो जयदेवो २२, देवाणंदो य तेवीसो २३ ॥ ८॥ 15 २०-तत्पट्टे श्रीमानतुंगसूरिः ।। २१-तपट्टे श्रीवारसूरिः ।। २२- तत्पट्टे श्रीजयदेवसूरिः॥ २३–तपट्टे श्रीदेवानंदसूरिः।। व्याख्या-२० सिरिमाणतुगत्ति, श्रीमानदेवसूरिपट्ट विंशतितमः श्रीमानतुंगसूरिः ॥ येन भक्तामरस्तवनं कृत्वा बाण-मयूरपंडितविद्या- चमत्कृतोऽपि तितिपतिः प्रतिबोधितः । भयहरस्तवनकरणेन च नागराजो 20 वशीकृतः । भक्तिभरेत्यादि स्तवनानि च कृतानि ॥ श्रीप्रभावकचरित्रे प्रथम श्रीमानतुगचरित्रमुक्तं, पश्चाच श्रीदेवसूरिशिष्यश्रीप्रद्योतनसूरिशिष्य- श्रीमानदेवसूरिप्रवंधा उक्ताः । परं तत्र नाऽऽशंका यतस्तत्राऽन्येपि प्रबंधा व्यस्ततयोक्ता दृष्यते ॥
पट्टावली-समुच्चयः
२१ - एगवीसति, श्रीमानतुगसुरिपट्टे एकविंशतितमः श्रीवीरसूरिः।।
स च. श्रीबीरात् सप्ततिसप्तशत७७०वर्षे, विक्रमतः त्रिशती३००वर्षे
नागपुरे श्रीनमिप्रतिष्ठाकृत् । यदुक्तम्-
नागपुरे नमिभवन-प्रतिष्टया महितपाणिसौभाग्यः ।।
अभवद्वाराचार्य-निमिः शनैः साधिके राज्ञः ॥१॥
२२--बावीसत्ति, श्रीवीरसूरिपट्टे द्वाविंशतितमः श्रीजयदेवसूरिः ||
२३-देवाणंदोत्ति, श्रीजयदेवमूरिपट्टत्रयोविंशतितमः श्रीदेवानंद-
सूरिः ॥ अत्रांतरे श्रीवीरात् पंचचत्वारिंशदधिकाष्टशतम४५वतिक्रमे
चलभीमंगः ॥ द्वयशीत्यधिकाप्टशतपचतिक्रमे चैत्यस्थीतिः ।। पढ-
शीत्यधिकारशतपक्ष्यतिक्रमे ब्रह्मद्वीपिकाः ॥८॥
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5
३
॥ चउचीसो सिरिविक्कम २४, नरसिंहो पंचवीस २५ इन्चीसो ॥
सूरीसमूह २६ सत्ता-वीसो सिरिमाणदेवगुरू २७ ॥ ६ ॥
२४-तत्सद्दे श्रीविक्रमसूरिः ।। २५-तत्सट्टे श्रीनरसिंहमूरिः ॥
२६-तसट्टे श्रीसमुद्रसूरिः ॥ २७ - तत्सट्टे श्रीमानदेवतरिः।।
व्याख्या-२४ चश्वीसोत्ति, श्रीदेवानंदसूरिपट्टे चतुर्विशतितमः 15
श्रीविक्रमसूरिः।।
२५. नरसिंहोत्ति, श्रीविक्रमसूरिपट्टे पंचविंशतितमः श्रीनरसिंह-
सूरिः ॥ यतः-नरसिंहसृरिरासीदतोखिलग्रंथपारगो येन ।।
यदो नरसिंहपुरे, मांसरनि त्याजितः स्खगिरा ॥१॥
२६ छन्त्रीसोत्ति, श्रीनरसिंहसूरिपट्टे पडिविंशतितमः श्रीसमुद्र- 20.
सृरिः॥
खोमाणराजकुलजोपि समुद्रसूरि-गच्छं शशास किल यः प्रवणप्रमाणी ।।
जित्वा तदा क्षपणकान स्ववशं वितेने, नागदे भुजगनाथनमसतीर्थ ॥१॥
तपागच्छ-पट्टावली २७--सत्तावीसोत्ति, श्रीसमुद्रसूरिपट्टे सप्तविंशतितमः श्रीमानदेव- सूरिः ॥ विद्यासमुद्रहरिभद्रमुनीद्रमित्रं, सूरिर्वभूव पुनरेवहि मानदेवः ।। मांद्यात्प्रपातमपि योऽनघसूरिमंत्रं, लेमेंऽविकामुखगिरा तपसो- ज्जयते ॥१॥ 5 श्रीवीरात् वर्पसहस्र१००० गते सत्यमित्रे पूर्वव्यवच्छेदः ॥ अत्र च श्री १ नागहस्ती २ रेवतीमित्र ३ ब्रह्मद्वीपो ४ नागार्जुनो ५ भूत- दिन्नः ६ श्रीकालकसूरिश्चेति पट् युगप्रधाना यथाक्रमं श्रीवसेनसत्यमित्र- योरंतरालकालवर्तिनो वोध्याः ॥ एषु च युगप्रधनशक्राभिवंदितप्रथमानु- योगसूत्रणासूत्रधारकल्पश्रीकालिकाचार्यैः श्रीवीरात् त्रिनवत्यधिकनवशतः६३ वतिक्रमे पंचमीतश्चतुर्थ्यां पर्युपर्णापर्वाऽऽनीतमिति।।श्रीवीरात् पंचपंचा-10 शदधिकसहस्र१०५५वर्षे, वि० पंचाशीत्यधिकपंचशत५८५वर्षे याकिनी- सूनुः श्रीहरिभद्रसूरिः स्वर्गभाक् ॥ पंचदशाधिकैकादशशत१११५वर्षे श्रीजिनभद्रगणिर्युगप्रधानः ॥ अयं च जिनभद्रियध्यानशतकादेहरिभद्रसूरि- भिर्वृत्तिकरणाद्भिन्न इति पट्टावल्यां । परं तस्य चतुरुत्तरशतवर्षांयुष्कत्वेन श्रीहरिभद्रसूरिकालेपि संभवान्नाऽऽशंकावकाश इति ॥ ॥ अहावीसो विबुहो. २८, एगुणतांसे गुरू जयाणंदो २६ तीसो रविप्पहो ३० इग-तीसो जसदेव सूरिवरो ३१ ॥१०॥ २८-तत्पट्टे श्रीविवुधप्रभसूरिः ॥२६-तत्पट्टे श्रीजयानंदमूरिः ।। ३०-तत्पट्टे श्री रविप्रभसूरिः ।। ३१-तत्पढे श्रीयशोदेवसूरिः ।। व्याख्या - २८ अट्ठावीसोत्ति, श्रीमानदेवरिपट्टेऽष्टावींशति- २८. 20 तमः श्रीविबुधप्रभसूरिः॥ २६-एगुणतीसोत्ति, श्रीविबुधप्रभसूरिपट्टे एकोनत्रिंशत्तमः जयानंद सूरिः॥ ३०-तीसोरवित्ति, श्रीजयानंदसूरिपट्टत्रिंशत्तमः श्रीरविप्रभसूरिः।। स च श्रीवीरातू सप्तत्यधिकैकादशशत११७०वर्षे, वि. सप्तशत७००वर्षे 26 15 , ५२ पट्टावली-समुच्चयः नडुलपुरे श्रीनेमिनाथप्रासादप्रतिष्ठाकृत् । श्रीवी० नवत्यधिकैकादशशत ११६० घर्षे श्रीउमास्वातिर्युगप्रधानः॥ ३१-इगतीसोत्ति, श्रीरविप्रभसूरिपट्टे एकत्रिंशत्तमःश्रीयशोदेवसूरिः।। अत्र च श्रीवीरात् द्विसप्तत्यधिकद्वादशशत१२७२वर्षे, वि० द्वयु त्तराष्टशर्त- वर्षे ८०२ अणहिल्लपुरपत्तनस्थापना वनराजेन कृता.॥ श्रीवीर० सप्तत्यधिक 5 द्वादशशत१२७०वर्षे, वि० अष्टशत८००वर्षे भाद्रशुक्ल तृतीयायां बप्पभट्ट- जन्म, येनामराजा प्रतिबोधितः । स च श्रीवी० पंचपठ्यधिकत्रयोदशशत- १३६५वर्षे वि० पंचनवत्यधिकाष्टशतः५वर्षे भाद्रशुक्लपष्ठयां स्वर्गभाक् ॥१०॥ ॥ बत्तीसो पजुण्णो ३२, तेतीसो माणदेव जुगपवरो ३३ ।। 10 चउतीस विमलचंदो ३४, पणतीसूज्जोअणो सूरी ३५ ॥११॥ ३२-तपट्टे श्रीप्रधुम्नसूरि३३- तत्पट्टे श्रीमानदेवसूरिः ।। ३४-तत्पट्टे श्रीविमलचन्द्रसूरि:३५-तत्पद्देश्री उद्योतनसूरिः॥ व्याख्या-३२ बत्तीसोत्ति, श्रीयशोदेवसूरिपट्टे द्वात्रिंशत्तमः श्रीप्रद्युम्न सूरिः॥ 15 ३३-तेत्तीसोत्ति, श्रीप्रद्युम्नसूरिपट्टे त्रयस्त्रिंशत्तमः श्रीमानदेवसूरिः॥ उपधानवाच्यग्रंथविधाता। ३४-चउतीसत्ति, श्रीमानदेवसूरिपट्ट चतुत्रिंशत्तमः श्रीविमलचंद्र- सूरिः॥४ .. , x मथुरातः समागतैः श्रीविमलचन्द्रगणिभिः श्रीवीरसूरिः दीक्षितः अंग- विद्यया भूषितश्च पश्चात्तः विमलगिरौ अनशनं प्रपदे ॥ पोरसूरिस्वर्गमनं तु विक्रम- स्य ९९१ वर्षे । इतिप्रभावकचरित्रे वीरसूरिप्रबंधे । ततः प्रसिद्धोऽजनि चित्रकूटे, सहेमसिद्धिविमलेन्दुसूरिः। अपूजयपं विषमेपि वादे, सथोजिते गोपगिरेनरेन्द्रः ॥४४॥. इति.गुर्वावल्याम, क्रियारत्नसमुच्चयप्रशस्स्यां च । ..
10 तपागच्छ-पट्टावली ३५-पणतीसोत्ति, श्रीविमलचंद्रसूरिपट्टे पंचत्रिंशत्तमः श्रीउद्योतन सूरिः ॥ स चाऽर्बुदाचलयानार्थं पूवावनितःसमागतः । टेलिग्रामस्य सीस्नि पृथो- चटस्यछायायामुपविष्टो निजपट्टोदयहेतु भवृयमुहूर्तमवगम्य श्रीवीरात् चतुष्प- ठ्यधिकचतुर्दशत१४६४वर्षे, वि० चतुनवत्यधिकनवशत६६४ वर्षे निजपट्टे श्रीसर्वदेवसूरिप्रभृतानष्टौ सूरीन स्थापितवान् । केचित्तु सर्वदेवसूरिमेकमेवेति । वदति ॥ वटस्याऽधः सूरिपदकरणात् वटगच्छ इति पंचमनाम लोकप्रसिध्धं । प्रधानशिष्यसंतत्या ज्ञानादिगुणैः प्रधानचरितैश्च बृहत्वाबृहद्गच्छ इत्यपि ॥११॥ । सिरि सव्वदेवसूरी, छत्तीसो ३६ देवमूरि सगतीसो ३७ ॥ अडतीसइमो सूरी पुणोवि सिरिसव्वदेवगुरू ३८॥१२॥ ३६-तत्स्ट्टे श्रीसर्वदेवसूरिः ३७ तत्पट्टे श्रीदेवसूरिः ।। ३८-तपट्टे श्रीसर्वदेवसूरिः॥ व्याख्या-३६ सिरिसव्वत्ति, श्रीउद्यातनसूरिप? पत्रिंशत्तमः श्रीसर्वदेवसूरिः ॥ केचित् श्रीप्रद्युम्नसूरिमुपधानग्रंथप्रणेतृश्रीमानदेवसूरिं च पट्टधरतया न मन्यते तदभिप्रायेण चतुर्विशत्तम इति ॥ स च गौतम- 15 वत् सुशिष्यलब्धिमान् । वि० दशाधिकदशशत१०१०वर्षे रामसैन्यपुरे श्री चंद्रप्रभप्रतिष्ठाकृत् । चंद्रावत्यां निर्मापितोत्तुंगप्रासादं कुंकुणमंत्रिएं स्वगिरा प्रतिवोध्य प्रावाजयत् ।। यदुक्तं- चरित्रशुधिं विधिवजिनागमा-द्विधाय भव्यानभितःप्रबोधयन् ।। चकार जैनेश्वरशासनोन्नति, यः शिष्यलब्ध्याभिनवो नु गौतमः ॥१॥ 20 नृपादृशाने शरदां सहस्र १०१०, यो रामसैन्याह्वपुरे चकार ।। नामेयचैत्येऽष्टमतीर्थराज-विवप्रतिष्ठा विधिवत् सदर्ग्यः चंद्रावतीभूपतिनेत्रकल्पं, श्रीकुंकुणं मंत्रिणमुच्चऋधिं ॥ निर्मापितोत्तुगविशालचैत्यं, योऽदीक्षयत् बुध्धगिरा प्रबोध्य ॥३॥ ॥२॥ Wriram पट्टावली-समुच्चयः 5 तथा वि० एकोनत्रिंशदधिकदशशत१०२६वर्षे धनपालेन देशीनाम- माला कृता । वि० पएणवत्यधिकसहस्र१०६६वर्षे श्रीउत्तराध्ययनटीकाकृत थिरापद्रगच्छीयवादिवेतालश्रीशांतिसृरिः स्वर्गभाक् ।। ३७-देवसूरित्ति, श्रीसर्वदेवसूरिपट्टे सप्तत्रिंशत्तमः श्रीदेवसूरिः ।। रुपश्रीरिति भूपप्रदत्तविरुदधारी ॥ ३८-अडतीसइमोत्ति, श्रीदेवसूरिपट्टऽष्टत्रिंशत्तमः पुनः श्रीसर्वदेव सूरिः यो यशोभद्रनेमिचंदादीनष्टौ सूरीन् कृतवान् ॥छ।।१२।। ॥ एगुणचालीसइमो, जसभद्दो नेमिचंदगुरुबंधू ३६ ॥ चालीसो मुणिचंदो ४०, एगुआलीसो अजिअदेवो ४१ ॥ १३॥ ३९-तत्पट्टे श्रीयशोभद्रसूरि-श्रीनेमिचंद्रसूरी ।। 10. ४०-तपट्टे श्रीमुनिचंद्रसूरिः॥४१-तत्पट्टे श्रीअजितदेवसूरिः ।। व्याख्या-३६ एगुणत्ति, श्रीसर्वदेवसूरिपट्टे एकोनचत्वारिंशत्तमौ श्रीयशोभद्र-नेमिचंद्रौ द्वौ सूरी गुरुभ्रातरौ ॥ वि० पंचत्रिंशदधिकैकादशशत ११३५वर्षे, केचित् एकोनचत्वारिंशदधिकैकादशशत११३६वर्षे नवांगवृत्ति कृत् श्रीअभयदेवसूरिः स्वर्गभाक् ॥ तथा कूळ पुरगच्छीयचैत्यवासीजिनेश्वर15 सूरिशिष्यो जिनवल्लभश्चित्रकूटे पटकल्याणकप्ररूपणया निजमतं प्ररूपि- तवान् ॥ ४०-चालीसोत्ति, श्रीयशोभद्रसूरि-श्रीनेमिचंद्रसूरिपट्टे तमः श्रीमुनिचंद्रसूरिः। स भगवान् यावजीवमेकसौवीरपायी । प्रत्याख्यात सर्वविकृतिकः । श्रीहरिभद्रसूरिकृताऽनेकांतजयपताकाद्यनेकग्रंथपंजिकोप- 20 देशपदवृत्यादिविधानेन तार्किकशिरोमणितया ख्यातिभाक् ।। यदुक्तम्-सौवीरपायीति तदेकवारि-पानाद्विधिज्ञो विरुदं वभार ।। जिनागमांमोनिधिघौतबुद्धिर्यः शुध्धचारित्रिपु लब्धरेखः ॥१॥ चत्वारिंश-- 5 तपागच्छ पट्टावली संविज्ञमौलिविकृतीश्चसर्वा- स्तत्याज देहेप्यममः सदा यः ॥ विद्वद्विनेयाभिवृतः प्रभाव-प्रभागुणोघैः किल गौतमामः॥२॥ हरिभद्रसूरिरचिताः, श्रीमदनेकांतजयपताकाधाः ।। ग्रंथनगा विबुधानामप्यधुना दुर्गमा येऽत्र ॥ ३ ॥ सत्पंजिकादिपद्या-विरचनाया भगवता कृता येन ॥ मंदधियामपि सुगमा--स्ते सर्वे विश्वहितबुध्या ॥४॥ अष्टहयेश११७८मिताब्दे, विक्रमकालादिवं गतो भगवान् ।। श्रीमुनिचंद्रमुनींद्रो, ददातु भद्राणि संघाय ॥५॥ अनेन चानंदसूरिप्रभृतयोऽनेके निजबांधवाः प्रव्राज्य सूरीकृताः ॥ अयं च श्रीमुनिचंद्रसूरिः श्रीनेमिचंद्रसूरिगुरुभ्रातृश्रीविनयचंद्रोपाध्यायस्य 10 शिष्यःश्रीनेमिचंद्रसूरिभिरेव गणनायकतया स्थापितः ।। यदुक्तं-- गुरुबंधुविनयचंद्राध्यापकशिप्यं स नेमिचंद्रगुरुः ॥ यं गणनाथमकात्,ि स जयति मुनिचंद्रसूरिरिति ॥१॥ अत्र च एकोनपष्ठ्यधिकैकादशशत११५ वर्षे पौर्णिमीयकमतोत्पत्तिः तत्प्रतिबोधाय च मुनिचंद्रसूरिभिः पाक्षिकसप्ततिका कृतेति ॥ तथा श्रीमुनिचंद्रसूरिशिष्याः श्रीअजितदेवसरि-वादिश्रीदेवसूरि- प्रभृतयः ॥ तत्र वादिश्रीदेवसूरिभिः श्रीमदणहिल्लपुरपत्तने जयसिंहदेव- राजस्याऽनेकविद्वज्जनकलितायां सभायां चतुरशीतिवादलब्धजययशसं दिगंबरचक्रवर्तिनं वादलिप्सुं कुमुदचंद्राचार्य वादे निर्जित्य श्रीपत्तने दिगंबर- प्रवेशो निवारितोऽद्यापि प्रतीतः ।। तथा वि० चतुरधिकद्वादशशत१२०४ 20 वर्षे फलवर्धिग्रामे चैत्यविंबयोः प्रतिष्ठा कृता । तत्तीर्थं तु संप्रत्यपि प्रसिधं॥ तथा आरासणे च श्रीनेमिनाथप्रतिष्ठा कृता ॥ चतुरशीतिसहस्र८४००० प्रमाणः स्याद्वादरत्नाकरनामा प्रमाणग्रंथः कृतः ॥ येभ्यश्च यन्नाम्नैव ख्यातिमत् चतुर्विंशतिसूरिशाखं बभूव ॥ एपां च वि० चतुर्विंशदधिके एकादशशत११३४वर्षे जन्म, द्विपंचाशदधिके ११५२ दीक्षा, चतुःसप्त- 25 त्यधिके ११७४ सूरिपदं, पड्विंशत्यधिकद्वादशशत१२२६वर्षे श्रावणवदि- सप्तम्यां ७ गुरौ स्वर्गः।। 15 14 ५६ . पट्टावली-समुच्चयः तत्समये श्रीदेवचंद्रसृरिशिष्यन्त्रिकोटिग्रंथकर्ता कलिकालसर्पज्ञ- ख्यातिमान् श्रीहेमचंद्रसूरिः तस्य वि. पंचचत्वारिंशदधिके एकादशशत- ११४५वर्षे कार्तिकशुदिपूर्णिमायां १५ जन्म, पंचाशदधिके ११५० व्रतं, घड्पष्ठ्यधिके११६६ सूरिपदं, एकोनित्रिंशदधिकद्वादशशत१२२९वर्षे स्वर्गः ॥ ४१-एगुआलीसोत्ति, श्रीमुनिचंद्रसूरिपट्टे एकचत्वारिंशत्तमः श्री- 5 अजितदेवसूरिः ।। तत्समये वि० चतुरधिकद्वादशशत१२०४वर्षे खरतरो- त्पत्तिः ।।४ तथा वि० त्रयोदशाधिक द्वादशशत१२१३वर्ष यांचलिकमतो- त्पत्तिः ॥ वि० पत्रिंशदधिके १२३६ सार्धपौर्णिमीयकोत्पत्तिः ॥ वि० पंचाशदधिके १२५० श्रागमिकमतोत्पत्तिः ॥ श्रीवीरान् द्विनवत्यधिकपोडश- १६६२वर्षे वाहडोधारः+॥छ ॥ १३ ॥ ॥ वायालु विजयसीहो ४२. तेआला हुंति एगगुरुभाया । सोमप्पह-मणिरयणा ४३, चउआलीसो अजगचंदो ॥४४॥१४॥ ४२-तत्प? श्रीविजयसिंहमूरिः ॥ ४३-तत्प? श्रीसोमप्रभसरिः श्रीमणिरत्नसृरिश्च ।। ४४ तत्पट्टे श्रीजगञ्चन्द्रसूरिः॥ व्याख्या-४२-बायालुत्ति,श्रीअजितदेवसूरिपट्टे द्विचत्वारिंशत्तमः।।15 श्रीविजयसिंहसूरिः ॥ विवेकमंजरीशुब्धिकृत् ।। यस्य प्रथमः शिष्यः, शताधितया विख्यातः ।। श्रीसोमप्रभसूरिः, द्वितीयस्तु मणिरत्नमरिः ॥ १ ॥ ४३-तेबालत्ति, श्रीविजयसिंहसूरिपट्टे त्रयश्चत्वारिंशत्तमौ श्री सोमप्रभसूरि-श्रीमणिरत्नसूरी ॥ 10 - 20 x वि० सं० १२०४वर्षे पत्तने पौषधशालि-वनवासिनी विवाद कवलांगरछः खरतरगच्छश्चेति नामनी अभूतान् । इति पूरणचंदनी नहार संग्रहित पावल्यां ( श्रीजैन श्वे. को० हे. पु० ४ ० ४, ५, ६, पत्र १६३ मुद्रितयां) 'ावीरात् ६६८१ वर्षे इति प्रबंधर्चितानयाँ । श्रीवीरात् १६८३ वर्षे इति ५० वारविनयगरिविरचितायां पूजायां ।।
। तपागच्छ-पट्टावली ४४-चालीसोत्ति, श्री सोमप्रभ-श्रीमणिरत्नसूरिपट्टे चतुश्चत्वा- रिंशत्तमः ४४ श्री जगच्चंद्रसूरिः ।। यः क्रियाशिथिलमुनिसमुदायं ज्ञात्वा गुर्वाज्ञया वैराग्यरसैकसमुद्रं चैत्रगच्छीयश्रीदेवभद्रोपाध्यायं सहायमादाय क्रियायामोग्यात् हीरलाजग- च्चंद्रसूरिरितिख्यातिभाक् बभूव । केचित्तुआघाटपुरेद्वात्रिंशता दिगंबराचार्यैः । सह विवादं कुर्वन हीरकवदभेद्यो जात इति राज्ञा हीरलाजंगच्चंद्रसूरिरिति भणित इत्याहुः ।। तथा यावजीवमाचामाम्लतपोऽभिग्रहीतद्वादशवस्तपा विरुदमाप्तवान् ॥ ततः पष्ठं नाम वि० पंचाशीत्यधिकद्वादशशत१२८५वर्षे तपा इति प्रसिध्धं ॥ तथा च १-निग्रंथ २-कौटिक ३-चंद्र ४-वनवासि ५-बटगच्छे 10 त्यपरनामकबृहद्गच्छ ६-तपा इति पएणां नाम्नां पृवृत्तिहेतव प्राचार्याः क्रमेण १-श्रीसुधर्मखामि २-श्रीसुस्थित ३-श्रीचंद्र ४-श्रीसामंतभद्र ५-श्री सर्वदेव.६-श्रीजगच्चंद्रनामानः पट सूरयः ॥छ।॥१४॥ ।। देविंदो पणयालो ४५, छायालीसो अ धम्मघोसगुरू ॥ ४६॥ सोमप्पह सगचत्तो, ४७ अडचत्तो सोमतिलगगुरू ४८॥१५॥ 15 ४५-तत्पट्टे श्रीदेवेन्द्रसूरि ॥ ४६-तत्सट्टे श्रीधर्मघोपसूरिः ४५-तसट्टे श्रीसोमप्रभसूरिः॥४८-तत्पट्टे श्रीसोमतिलकसूरिः ॥ व्याख्या-४५-देविंदात्ति, श्रीजगच्चंद्रसूरिपट्टे पंचचत्वारिंशत्तमः श्रीदेवेंद्रसूरिः। स च मालवके उज्जयिन्यां जिनभद्रनाम्नो महेभ्यस्य वीरधव- लनाम्नस्तत्सुतस्य पाणिग्रहणनिमित्तं महोत्सवे जायमाने वीरधव- 20 लकुमारं प्रतिबोध्य, वि० द्वथु त्तरत्रयोदशशत१३०२वर्षे प्रावाजयत् । तदनु तद्भातरमपि प्रव्राज्य चिरकालं मालवके एव विहृतवान् । ततो गूर्जरधरित्र्यां श्रीदेवेंद्रसूरयः श्रीस्तंभतीर्थे समायाताः। तत्र पूर्वे श्री विजयचंद्रसूरयः १-गीतार्थानां पृथक् पृथक् वनपुट्टलि- कादान, २-नित्यविकृत्यनुज्ञा, ३-चीवरक्षालनानुज्ञा, ४ फलशाकग्रहणं, ५८ पट्टावली-समुच्चयः ५-साधुसाध्वीनां निर्विकृतिकप्रत्याख्याने निर्वृकृतिकग्रहण, ६-बायकासमा- नीताऽशनादिभोगानुज्ञा, ७-प्रत्यहं द्विविधप्रत्याख्यानं, ८-गृहस्थावर्जननिमित्त प्रतिक्रमणकारणानुज्ञा, ६-संविभागदिने तद्गृहे गीतार्थेन गंतव्यं, १०-लेपसं- निध्यभावः, ११-तत्कालेनोप्णोदकग्रहणं, इत्यादिना क्रियाशैथिल्यरुचीन् कतिचिन् मुनीन स्वायत्तीकृत्य सदोपत्वात् श्रीजगच्चंद्रसूरिभिः परित्यक्ताया-5 मपि विशालायां पौपधशालायां लोकाग्रहात् द्वादशवाणि स्थितवंतः । प्रव्र- ज्यादिककृत्यमि गुर्वाज्ञामंऽतरेणैव कृतवंतश्च ॥ श्रीविजयचंद्रसूरिव्यतिकरस्त्वेवं-- मंत्रिवस्तुपालगृहे विजयचंद्रा'यो लेख्यकर्मकृत् मंत्र्याऽऽसीत् ॥ क्व- चनाऽपराधे कारागारे प्रक्षिप्तः । श्रीदेवभद्रोपाध्यायैः प्रव्रज्याग्रहणप्रतिज्ञया 10 विमोच्य प्रत्राजितः। स च सप्रज्ञो बहुश्रुतीभूतो मंत्रिवस्तुपालेन नाऽयं सामि- मानी सूरिपदयोग्य इत्येवं वार्यमाणैरपि श्रीजगच्चंद्रसूरिभिः श्रीदेवभद्रोपा- ध्यायानुराधात् श्रीदेवेंद्रसूरीणां सहायो भविष्यतीति विचिंत्य च सूरीकृतः ।। बहुकालं च श्रीदेवेंद्रसूरिपु विनयवानेवासीत् । 15 मालवदेशात्समागतानां श्रीदेवेंद्रसूरीणां तदा वंदनार्थमपि नाऽऽयातः गुरुभि पितं कथमेकस्यां वसतौ द्वादशवर्षाणि स्थितमिति श्रुत्वा "निर्मम- निरहंकारा " इत्यादि प्रत्युत्तरं प्रेपितवान् ।। संविज्ञास्तु न तं प्रत्याश्रिताः। श्रीदेवेंद्रसूरियस्तु पूर्वमनेकसंविज्ञसाधुपरिकरिता 'उपाश्रय' एव स्थितवंतः ।। लोकैश्च वृद्धशालाया स्थितत्वात् श्रीविजयचंद्रसमुदायस्य "वृद्धशालिक" इत्युक्तं । तद्वशात् श्रीदेवेंद्रसूरिनिश्रितसमुदायस्य "लघुशालिक" इति ख्यातिः।। स्तंभतीर्थे च चतुष्पथस्थितकुमारपालविहारे धर्मदेशनायामष्टादशशत १८०० मुखवनिकाभिमंत्रिवस्तुपालः चतुर्वेदादिनिर्णयदातृत्वेन स्खसमयपरस- मयविदां श्रीदेवेंद्रसूरीणां वंदनकदानेन वहुमानं चकार ।। श्रीगुरवस्तु विजय- चंद्रमुपेक्ष्य विहरमाणाः क्रमेण पाल्हणपुरेसमायाताः। तत्रचानेकजनतान्विताः शीकरीयुक्तमुखासनगामिनश्चतुरशीतिरिभ्या धर्मश्रोतारः। प्रल्हादनविहारेच25 प्रत्यहं मूटकप्रमाणा अक्षताः,, क्रयविक्रयादौ नियतांशग्रहणात् ॥ पोडशमण 20 ।
10 तपागच्छ-पट्टावली प्रमाणानि पूगीकलानि चायाँति । प्रत्यहं पंचशतीवीसलप्रियाणां भोगः ।। एवं व्यतिकरे सति श्रीसंघेन विज्ञप्ता गुरवः यदन गणाधिपतिस्थापनेन पूर्य- तामस्मन्मनोरथः । गुरुभिस्तु तथाविधमौचित्यं विचार्य प्रल्हादनविहारे वि० त्रयोविंशत्यधिके त्रयोदशशते १३२३ वर्षे,क्वचिञ्चतुरधिके १३०४ श्रीविद्यानंद- सूरिनाम्ना वीरधवलस्य सूरिपददानं । तदनुजस्य च भीमसिंहस्य धर्मकीर्ति- 5 नाम्नोपाध्यायपदमपि तदानीमेव संभाव्यते ॥ सूरिपददानावसरे सौवर्णकपि- शीर्षके प्रल्हादनविहारे मंडपात् कुंकुमवृष्टिः ।। सर्वोपि जनो महाविस्मयं प्राप्तः । श्राद्धैश्च महानुत्सवश्चक्रे ॥ वैश्च श्रीविद्यानंदसूरिभिर्विद्यानंदाभिधं व्याकरणं कृतं ।। यदुक्तम्-- विद्यानंदाभिधं येन कृतं व्याकरणं नवम् ।। भाति सर्वोत्तमं स्वल्प-सूत्रं बह्वर्थसंग्रहं ॥१॥ पश्चात् श्रीविद्यानंदसूरीन् धरित्र्यामाऽऽज्ञाप्य, पुनरपि श्रीगुरवो मालवके विहृतवंतः । तत्कृताश्च ग्रंथास्त्वेते- २- श्राद्धदिनकृत्यसूत्र-वृत्ती, २-नव्यकर्मग्रंथपंचकसूत्र-वृत्ती, २-सिध्धपंचाशिकासूत्र-वृत्ती, १-धर्मरत्नवृत्तिः, २-(१) सुदर्शनचरित्रं, 15 ३-त्रीणि भाज्यानि, “सिरिउसहवध्धमाण" प्रभृतिस्तवादयश्च । केचित्तु श्रावकदिनकृत्यसूत्रमित्याहुः । विक्रमात् सप्तविंशत्यधिकत्रयोदशशत १३२७- वर्षे मालवक एव देवेंद्रसूरयः स्वर्ग जग्मुः ।। दैवयोगात् विद्यापुरे श्रीविद्यानंदसूरयोऽपि त्रयोदशदिनांतरिताः वर्ग- भाजः । अतः षड्निर्मासैः सगोत्रिसूरिणा श्रीविद्यानंदसूरिवांबवानां 20 श्रीधर्मकीर्युपाध्यायानां श्रीधर्मघोषसूरिरितिनाम्ना सूरिपदं दत्तं ।। श्रीगुरुभ्यो विजयचंद्रसूरिपृथग्भवने कं गुरुं सेवेऽहमिति संशयानस्य सौवर्णिकसंग्रामपूर्वजस्य निशि स्वप्ने देवतया श्रीदेवेंद्रसूरीणामन्वयो. भव्यो भविष्यतीति तमेव सेवस्वेति ज्ञापितं ॥ श्रीगुरुणां स्वर्गगमनं श्रुत्वा संघाधिपतिना भीमेन द्वादशवर्षाणि 25 धान्यं त्यक्तं ॥छ॥ -- पट्टावली-समुच्चयः ४६- चायालीसोत्ति, श्रीदेवेंद्रसूरिपट्टे पट्चत्वारिंशत्तमः श्रीधर्मघोपसृरिः येन मंडपाचले सा० पृथ्वीधरः पंचमत्रते लक्षप्रमाणं परिग्रहं नियमयन् ।। ज्ञानातिशयात्तद्भगमवगम्य प्रतिपेधितः । स च मंडपाचलाधिपस्य सर्वलोका- भिमतं प्राधान्यं प्रामः, ततो धनेन धनदोपमो जातः ॥ पश्चात्तेन चतुरशीति- ८४र्जिन प्रासादाः सप्त च ज्ञानकोशाः कारिताः। श्रीशद्वंजय च एकविंश-5 तिधटीप्रमाणसुवर्णव्ययेन रेमयः श्रीऋपभदेवप्रासादः कारितः ।। केचिञ्च तत्र पटपंचाशत्सुवर्णधटीव्ययेनेंद्रमालायां (लां यो) परिहितवानिति वदति ॥ तया धरित्र्यां केनचित्साधर्मिकेण ब्रह्मचारिवेपदानावसरे महर्धिक- त्वात पृथ्वीधरस्यापि तपः प्राभृतीकृतः स च तमेव वेपमादाय ततःप्रभृति द्वात्रिंशदीयोऽपि ३२ ब्रह्मचार्यभूत् ।। 10 15 तस्य च पुत्र सा० मांझणनाम्ना एक एवासीत् । येन श्रीशQजयोज- यंतगिर्योः शिखरे द्वादश१२योजनप्रमाणः सुवर्णरूप्यमय एक एव ध्वजः समरोपितः ॥ कप्पू रकृतेराजासारंगदेवः, करयोजनं कारितः॥ येन च मंडपाऽचले जीर्णटंकानां द्विसप्तत्या क्वचित् पत्रिंशता सह- वैर्गुरूणां प्रवेशोत्सवश्चक्रे । देवपत्तनेच शिय्याभ्यर्थनया मंत्रमयस्तुतिविधानतो येषांरत्नाकरस्तरंगे रत्नौकनं चकार । तथा तत्रैव ये स्वध्यानप्रभावात्प्रत्यक्षीभूतनवीनोत्पन्न कपर्दियक्षेण वनस्वामिमहात्म्याच्छचुंजयान्निष्काशितं जीर्णकपर्दिराज मि- थ्यात्वमुत्सर्ययंत प्रतिबोध्य श्रीजैनविवाधिष्टायकं व्यधुरिति ।। एकदा काभि- श्चिद् दुष्टस्त्रीभिः साधुनां विहारिता कार्मणोपेता वटकाभूपीठे यैस्त्यानिताः 20 संतः प्रभाते पापाणा अभवन् । तद्नु चाभिमंत्र्याऽर्पितपट्टकासनास्ताः स्तंभि- ताःसत्यः कृपया मुक्ता इति ॥ तथा विद्यापुरे पक्षांतरीयतथाविधीभिर्गुरूरणां व्याख्यानरसे मात्सर्यात् स्वरमंगायकएठे केशगुच्छके कृते यैर्विज्ञातस्वरूपास्ता प्राग्वस्तंभिताः संत्योऽतःपरं भवद्गणे न वयमुपद्रोप्याम इति वाग्दानपुर:- सरं संघाग्रहान्मुक्ता इति ॥ 25 तपागच्छ-पट्टावली ६१ उज्जयिन्यां च योगिभयात् साध्वस्थिते गुरव आगताः योगिना सार्धवः प्रोक्ताः अगागतैः स्थिरैः स्थेयं ? साधुभिरुक्तं स्थिताःस्मः किं करिष्यसि ? तेन साधूनां दन्ता दर्शिताः, साधुभिस्तु कफोणिर्दर्शिता। साधुभिर्गत्वा गुरूणां विज्ञप्तं ॥ तेन शालायामुन्दरवन्दं चिकुर्वितं । साधवो भीतां गुरुभिर्घटमुखं वरणाऽऽछाद्य तथा जप्तं यथा राटिं कुर्वन् स योगी आगत्य पादयोर्लनः। 5 क्वचनपुरे निश्यभिमंत्रितद्वारदानं, एकदा अनभिमंत्रितद्वारदाने शाकिनीभिः पट्टिरुत्पाटितास्तंभितास्ता वाग्दाने च मुक्ताः ॥ यरेकदा सर्पदंशे रात्रौ विपेणांतरांतरामू मुपगतैरुपायविधुरं संघ प्रत्यूचे । प्राचीनप्रतोल्यां कस्यचित्पुंसो मस्तके काष्टभारिकामध्ये विपापहा- रिणी लता समेष्यति,साच घृष्य दंशे देया इत्येवं प्रोक्त संघेन च तथा विहिते 10 तया प्रगुणीभूय ततःप्रभृति यावजी पडपि विकृतयस्त्यक्ता अाहारस्तु तेपां सदा युगंधर्या एव ॥ तत्कृता ग्रंथास्त्वेवं - संघाचारभाष्यवृत्तिः, सुअधम्नेतिस्तवः, काय- स्थिात-भवस्थितिस्तवौ, चतुर्विंशतिजिनस्तवाः, चतुर्विशतिः, प्रस्ताशर्मेत्या- दिस्तोत्रं, देवेंद्ररनिशं० इति श्लेपस्तोत्रं, यूयं यूवां त्वमिति श्लेपस्तुतयः, 15 जय वृपभेत्यादिस्तुत्याद्याः ।। तत्र जय वृपभेत्यादिस्तुतिकरणव्यतिकरस्त्वेवं-एकेन मंत्रिणाऽष्टयमकं काव्यमुक्त्वा प्रोचे, इगकाव्यमधुना केनाऽपि कतुन शक्यं । गुरुभिरुचेऽन- स्तिर्नास्ति । तेनोक्तं तं कविं दर्शयत । तैरुक्तं ज्ञास्यते ॥ ततो जयवृपभस्तुतयो अष्टयमका एकया निशा निष्पाद्य भित्तिलिखितादर्शिताः । स-च चमत्कृतः 20 प्रतिबोधितश्च॥ ते च वि० सप्तपंचाशदधिकत्रयोदशशत१३५७वर्षे दिवंगताः॥ ४७-सोमप्पहत्ति, श्रीधर्मघोपसूरिपट्टे सप्तचत्वारिंशत्तमः श्रीसोम. प्रभसूरिः॥ नमिऊण भणइ एवमित्याचाराधनासूत्रकृत्। तस्य च वि० दशाधि- कत्रयोदशशत१३१०वर्षे जन्म, एकविंशत्यधिके १३२१व्रतं, द्वात्रिंशदधिके१३३२ सृरिपदं,कएठगतैकादशांगसूत्रार्थो गुरुभिर्दीयमानायां मंत्रपुस्तिकायां यच्छत 25 । 10 ६२ पट्टावली-समुच्चयः चारित्रं मंत्रपुस्तिकां वेत्युक्त्वा न मंत्रपुस्तिकां गृहीतवान् । अपरस्य योग्य- स्थाऽभावात् सा जलसात्कृता ॥ येन श्री सोमप्रभसूरिणा जलकुंकुणदेशे ऽकायविराधनाभयात मरौ शुद्धजलदौर्लभ्यात् साधूनां विहारः प्रतिपिध्धः ॥ तथा भीमपल्या कार्तिके द्वये प्रथम एव कार्तिके एकादशाऽन्यपक्षीया- ऽऽचार्याऽविज्ञातं भाविनं भंग विज्ञाय चतुर्मासी प्रतिक्रम्य विहतवंतः पश्चा- तद्भगोऽभवत् । तेचाऽऽचार्या अकृतगुरुवचना भंगमध्येऽपतन्निति ॥ तत्कृता ग्रंथास्तु सविस्तरयतिजीतकल्पसूत्रं, यत्राखिलेत्यादि २८ स्तुतयः, जिनैन येनेतिस्तुतयः, श्रीमद्धर्मेत्यादयश्च ॥ 10 तच्छिष्याः, श्रीविमिलप्रभसूरि १ श्रीपरमानंदसूरि २ श्रीपद्मतिलक- सूरि ३ श्रोसोमतिलकसूरय ४ इति । यस्मिन् वर्षे श्रीधर्मघोपसूरयो दिवंगताः तस्मिन्नेव वर्षे १३५७ श्री- सोमप्रभसूरिभिः श्रीविमलप्रभसूरीणां पदं ददे । ते च स्तोकं जीविता ॥ तत स्वायुर्ज्ञात्वा त्रिसप्तत्यधिकत्रयोदशशत१३७३वर्षे श्रीपरमानंदसूरि-श्रीसोम- तिलकसूरीणां सूरिपदंदत्वा,मासत्रयेण वि०त्रिसप्तत्यधिकत्रयोदशशत१३७३ 15 वर्षे श्रीसोमप्रभसूरयो - दिवं गताः ॥ तदानी च स्तंभतीर्थे तेषामाऽऽलिग- वसतिस्थत्वेन तत्रत्याः प्रत्यासन्ना लोका आकाशोद्योताद्यालोक्योक्तवंतो यदेतेषां गुरूणां स्वर्गाद्विमानमागादिति ।। अन्यत्र च कापिपुरे तद्दिने यात्राव- तीर्णदेवतयेत्युक्तं " यत्तपाचार्या सौधर्मेन्द्रसामानिकत्वेन समुत्पन्ना" इति- प्रवादोऽधुना मया मेरौ देवमुखात् श्रुत इति ॥ श्रीपरमानन्दसूरिरपि वर्पचतुष्टयं जीवितः ॥छ। ४८-अडचत्तोत्ति, श्रीसोमंप्रभसूरिपट्टेऽष्टचत्वारिंशत्तमः श्रीसोम तिलकसूरिः । तस्य वि० पंचपंचापदधिके त्रयोदशशत१३५५वर्षे माघे जन्म, एकोनसप्तत्यधिके १३६६ दीक्षा, निसप्तत्यधिके १३७३ सूरिपदं, चतुर्विंशत्य- 20 5 सपागच्छ-पट्टावली ६३ धिकचतुर्दशशते १४२४ वर्षे स्वर्गः, सर्वायुरेकोनसप्तति ६६ वर्षाणां ॥x तत्कृता ग्रंथाः-बृहन्नव्यक्षेत्रसमाससूत्रं, सत्तरिसयठाणं, यत्राखिल० जयवृपभ० स्रस्ताशर्म०प्रमुखस्तववृत्तयः श्रीतीर्थराजः० चतुरस्तुतिस्तवृत्तिः, शुभभावानव० श्रीजद्वीरस्तुवे इत्यादि कमलबन्धस्तवः शिवशिरसि० श्रीनाभि- संभव० श्रीशैवैय० इत्यादीनि बहूनि स्तवनानि च ॥ श्रीसोमतिलकसूरिभिस्तु क्रमेण श्रीपद्मतिलकसूरि १ श्रीचंद्रशेखर- रसूरि २ श्रीजयानन्दसूरि ३ श्रोदेवसुन्दरसूरीणां ४ सूरिपदं दत्तं ।। तेषु श्रीपद्मतिलकसूरयः श्रीसोमतिलकसूरिभ्यः पर्यायज्येष्ठा एक- वर्पजीविताः परं समित्यादिपु परमयतनापरायणाः ॥ श्रीचंद्रशेखरसूरेः वि० त्रिसप्तत्यधिकेत्रयोदशशत१३७३वजन्म, 10 पंचाशीत्यधिके१३८५ व्रतं, त्रिनवत्यधिके १३६३ सूरिपदं, त्रयोविंशत्यधिक- चतुर्दशशत१४२३वर्षे स्वर्गः॥ तत्कृतानि-उपितभोजनकथा, यवराजर्षिकथा, श्रीमद्स्तंभनकहारबंधस्तवनानि ।। यदभिमंत्रितरजसाप्युपद्रवं कुर्वाणा गृहह- रिका दुर्द्धरमृगराजश्च नेशुरिति ।। श्रीजयानंदसूरेः वि०प्रशीत्यधिक त्रयोदशशत१३८०वर्षे जन्म, द्वि-15 नवत्यधिके १३६२ श्रापाढशु०सप्तमी शुक्रे धरायां व्रतं, साजणाख्यो वृद्धभ्राता प्रव्रज्याऽऽदेशदानाऽनभिमुखो देवतया प्रतिबोधितो दीक्षादेशमनुमेने, विंश. त्यधिके चतुर्दशशत१४२०वर्षे चैःशु०दशम्यां१० अणहिल्लपत्तने सूरिपदं, एकचत्वारिंशदधिके १४४१ स्वर्गः ॥ तत्कृतग्रंथाः-श्रीस्थूलभद्रचरित्रं, देवाः- प्रभोयं प्रभृतिस्तवनानि ॥ १५ ॥ । एगुणवण्णा सिरिदेव-सुंदरो ४९ सोमसुंदरो पण्णो ५०॥ मुनिसुंदरेगवण्णो ५.१, बावण्यो रयणसेहरओ ५२ ॥ १६ ॥ 20 * श्रीजिनेश्वरसूरिशिष्यो जिनप्रभसूरिः। येन प्रतिदिनं नव्यस्तोत्रादिकरणा- नंतरमेवाऽऽहारग्रहणाभिग्रहेण नैकानि स्तोत्राणि विरचितानि प्रभावतीदेवीवचनात् तपागच्छमभ्युदयवन्तं समीक्ष्य श्रीसोमतिलकमूरये १००स्तोत्राणि समर्पितानि ॥ इति श्रीजिनप्रभसरिकृतसिद्धांतस्तवस्य तच्छिष्यादिगुप्तकृतायामवचूाँ । (जैनरौप्यांके)।
६४ पट्टावली समुच्चयः ४६--तत्पट्टे श्रीदेवसुंदरसूरिः ॥ ५०-तत्पट्टे श्रीसोमसुंदरसूरिः ।। ५१--तत्पढे श्रीमुनिसुंदरसूरिः ।। ५२-तत्प? श्रीरत्नशेखरसूरिः ।। व्याख्या-४६ एगुणवएणोत्ति, श्रीसोमतिलकसूरिपट्टे एकोन- पंचाशत्तमः श्रीदेवसुदरसूरिः ॥ तस्य वि०पएणवत्यधिके त्रयोदशशत१३६६- धर्षे जन्म, चतुर्वाधिक चतुर्दशशत१४०४वर्षे व्रतं महेश्वरग्रामे, विंशत्य- 5 धिके १४२० अणहिल्लपत्तने सूरिपदं ॥ यं पत्तने गुंगडीसरःकृतस्थितिः प्रधानतरयोगिशतत्रयपरिवृतो मंत्रतंत्रादिसमृद्धिमंदिरं स्थावरजंगमविपापहारी जलानलव्यालहरिभयभेत्ता अतीतानागतादिवस्तुवेत्ता राजमंत्रिप्रमुखबहुजन- बहुमानपूजितः उदयोपा योगी प्रजासमक्षं स्तुतिं कुर्वाणः प्रकटितपरमभक्ति- डंबरः साडंबरं वंदितवान ॥ तदनु च संबाधिपनरिआवेदनकारणं पृष्ठः 10 स योगो उवाच-"पद्माऽक्षदंडपरिकरचिह्न रुपलक्ष्ययुगोत्तमगुरवस्त्वया- वंदनीया इतिदिव्यज्ञानशक्तिमतः करायरीपाऽभिधानस्वगुरोर्वचसा वंदित इति ॥ श्रीदेवसुन्दरसूरीणां च श्रीज्ञानसागरसूरयः, श्रीकुलमंडनसूरयः, श्रीगुणरत्नसूरयः, श्रीसीमसुदरसूरयः, श्रीसाधुरत्नसूरयश्चेति पंचशिष्या- 15 स्तत्र श्रीज्ञानसागरसूरीणां वि०पंचाधिके चतुर्दशशत१४०५वजन्म, सप्त- दशाधिके १४१७दीक्षा, एक चत्वारिंशदधिके १४४१ सूरिपदं, पष्ठ्यधिके १४६० स्वर्गः ॥ स च चतुर्थः ।। तदुक्तं गुर्वावल्यां (श्लो० ३३८, ३३६) खरतरपक्षश्राध्धो, मन्त्रिवरो गोवलः सकलरात्रिम् ।। अनशनसिद्धौ भक्त्या, गुरुक' रादिभोगकरः ॥१॥ 20. ईपन्निद्रामाप्या-उपश्यत्स्वप्ने सुदिव्यरूपधरान् ।। तानिति वदतस्तुर्ये, कल्पेस्मः शक्रसमविभवाः ॥२॥ युग्ममिति ॥ तत्कृताग्रंथाश्च-श्रीआवश्यौघनिर्युक्ताद्यनेकग्रंथावचूर्णयः, श्रीमुनि- सुव्रतस्तव-घनौघनवखण्डपार्श्वनाथस्तवादि च ॥ श्रीकुलमण्डनसूरीणां च वि० नवाधिके चतुर्दशशते १४०६ जन्म, 25 सप्तदशाधिके १४१७ व्रतं, द्विचत्वारिंशदधिके १४४२ सूरिपदं, पंचपंचाश- , .
तपागच्छ-पट्टीवली ६५ दधिके १४५५ स्वर्गः।। सिध्धांतालापकोद्धारः, विश्वश्रीधरेत्यादिअष्टादशार- चक्रबंधस्तव-गरीयो०हारवंधस्तवादयश्च तत्कृतग्रन्थाः ॥ श्रीगुणरत्नसूरीणां चासाधारणो नियमः ॥ तदुक्तम् (गुलश्लो० ३८१) जगदुत्तरो हि तेषां, नियमोऽवष्टंभरोपविकथानां श्रासन्नां मुक्तिरमां, वदति चरित्रादिनैर्मल्यात् ॥१॥ इति तत्कृताश्च ग्रंथाः-क्रियारत्नसमुच्चयः षडदर्शनसमुच्चयबृहवृत्त्यादयः ॥ श्रीसाधुरत्नसूरीणां कृतियंतिजीतकल्पवृत्त्यादिकेति छ। ५०-पएणोत्ति श्रीदेवसुन्दरसूरिपट्टे पंचाशत्तम, श्रीसोमसुन्दरसूरिः । तस्य वि० त्रिंशदधिके चतुर्दशशत१४३०वर्षे मा० व० चतुर्दश्यां १४ शुक्रे जन्म, सप्तत्रिंशदधिके १४३७ व्रतं, पंचाशदधिके १४५० वाचकपदं 10 सप्तपंचाशधिके १४५७ सूरिपदं । यमष्टादशशत१८००साधुपरिकरितं सक्रियापरायणं महामहिमालयं गुरुं दृष्ट्वा रुदैव्यलिंगिभिरेकः पंचशतद्र- विणदानेन सशस्त्रः पुमांस्तद्वधायोदीरितः । स च दुर्धिया वसतौ प्रविष्टो यावदनुचितकरणय यतते तावञ्चन्द्रोद्योते जाते सति निद्रालुभिरपि श्रीगुरुभी रजोहरणेन प्रमृज्यपाच परावर्तितं,तदृष्ट्वाऽहो निद्रायामपि क्षुद्रप्राणिकृपा- 15 परमेनमपराध्य "कस्यां गतौ मे गति" रिति विचारण्या परलोकभीतो गुरुपा- दयोर्निपत्य "क्षमध्वं मेऽपराध” मिति वचसा गुरुं प्रबोध्य निजव्यतिकरं क- थितवान् ।सोपि गुरुभिर्मभुरचाचा तथोदीरितो यथा प्रवजित इति वृद्धवचः ॥ तथा यस्य ज्ञानवैराग्यनिधेर्गुणगणप्रतीतिः परपक्षेऽपि प्रतीता । तदुक्तं गुरुगुणरत्नाकरे (सर्ग १ श्लोक ६२)-- आकर्ण्य यद्गुणगणं गृहिणः प्रहृष्टा, लेखेन दुष्कृतततीरतिदूरदेशात् ।। विज्ञप्य केपि कृतिनः परपक्षमाजोऽप्यालोचनां जगृहुरास्यकजेन येपा॥१॥ इति ॥ तत्कृतिश्च योगशास्त्रोपदेशमालापडावश्यकनवतत्वादि- वालावबोधभाष्यावचूर्णिकल्याणकस्तोत्रादिनीति । तच्छिश्यास्तु-श्रीमुनिसुन्दरसूरिः१, कृष्णसरस्वतीविरुदधारकश्री- 25 जयसुन्दरसूरिः २, महाविद्याविडंबनटिप्पनकारकश्रीभुवनसुन्दरसूरिः ३, 20 ६ ६६ पट्टावली-समुच्चयः कंठगतैकादशांगीसूत्रधारकदीपावलिकाकल्पादिकारकश्रीजिनसुन्दरसूरिश्चेति चत्वारः ॥ तैःपरिकरितो राणपुरे श्रीधरणचतुर्मुखविहारे ऋपभाधनेकशत- विवप्रतिष्ठाकृत् ॥ अनेकभव्यप्रतिबोधादिना प्रवचनमुद्भाव्य वि०नवनवत्य- धिकचतुर्दशशत१४६६वर्षे स्वर्गभाक् ।। ५१-मुनिसुंदरेगवण्णोत्ति, श्रीसोमसुंदरसूरिपट्ट एकपंचाशत्तमः 5 श्रीमुनिसुन्दरसूरिः ॥ येनानेकप्रासादपद्मचक्रपटकारकक्रियागुप्तकाऽर्धभ्रम- सर्वतोभद्रमुरजसिंहासनाऽशोकभेरीसमवसरणसरोवराऽष्टमहाप्रातिहार्यादि-- नव्यत्रिशतीबंधतर्कप्रयोगाद्यनेकचित्राक्षरद्वयक्षरपंचवर्गपरिहाराद्यनेकस्तवमय "त्रिदशतरंगिणी नामधेयाष्टोत्तरशतहस्तमितो लेखः श्रीगुरूणां प्रेपितः ।। चातुर्वैद्यवैशारद्यनिधिरुपदेशरत्नाकरप्रमुखग्रंथकारकः ॥ स्तंभतीर्थे 10 दफरखानेन 'वादिगोकुलसंड' इति भणितः, दक्षिणस्यां "कालीसरस्वती" ति प्राप्तविरुदः, अष्टवर्पगणनायकत्वानंतरं वर्षत्रिक "युगप्रधानपदव्युदयोग ति जनैरुक्तः, अष्टोत्तरशत१०८वर्तुलिकानादौपलक्षकः, वाल्येपि सहनाभि- धानधारकः, संतिकरमिति समहिमस्तवनकरणेन योगिनीकृतमार्युपद्रवनिवा- रकः चतुर्विंशतिवार२४विधिना सूरिमंत्राराधकः ॥ तेष्वपि चतुर्दशवारं 15 यदुपदेशतः स्वस्वदेशेषु चंपकराजदेपाधारादिराजभिरमारिःप्रवर्तिता। सीरो- हीदिशि सहस्रमल्लराजेनाऽप्यमारिप्रवर्तने कृते येन तिइकोपद्रवो निवारितः ।। श्रीमुनिसुन्दरसूरेवि० पत्रिंशदधिके चतुर्दशशत१४३६षजन्म, त्रिचत्वारिंशदधिके १४४३ व्रतं, पटपण्ठ्यधिके १४६६ वाचकपदं, अष्टसप्त- त्यधिके १४७८ द्वात्रिंशत्सहस्त्र ३२००० टंकव्ययेन वृद्धनगरीयसं०देव- 20 राजेन सूरिपदं कारितं, व्युत्तरपंचदशशत१५०३चर्षे का शुष्प्रतिपन्१दिने स्वर्गभाक् ।। छ । ५२-बावरणोत्ति, श्रीमुनिसुन्दरसूरिपट्टे द्विपंचाशत्तमः श्रीरत्नशेखर- सूरिः ॥ तस्य वि. सप्तपंचाशदधिके चतुर्दशशत १४५७वर्षे क्वचिद्वा द्विपंचाशदधिके १४५२जन्म, त्रिषष्ठ्यधिके१४६३घ्रतं, त्र्यशीत्यधिके १४८३ 25 पंडितपदं, त्रिनवत्यधिके १४६३ वाचकपदं, द्वथु त्तरे पंचदशशते१५०२वर्षे तपागच्छ-पट्टावली ६७ सूरिपदं, सप्तदशाधिके १५१७ पो०वदिपष्ठीदिने स्वर्गः ॥ स्तंभतीर्थे बांबी- नाम्ना भट्टन “बालसरस्वतीति नाम दत्तं ।। तत्कृताग्रंथाः-श्राद्धप्रतिक्रमणवृत्ति. १, श्राद्धविधिसूत्रवृत्तिः २, श्रा- चारप्रदीपश्चेति ॥ तदानी च लुकाख्याल्लेखकात् वि०अष्टाधिकपंचदशशत१५०८वर्षे 5 जिनप्रतिमोत्थापनपरं लुकामतं प्रवृत्तं ॥ तन्मते वेषधरास्तु वि०त्रयस्त्रिंश. दधिकपंचदशशत१५३३वर्षे जाताः । तत्र प्रथमो वेषधारी भाणाख्योऽभू- दिति ॥ १६ ॥ ॥ तेवण्णो पुण लच्छी-सायर सूरीसरो मुणेअब्बो ५३॥ चउवण्णु सुमइ साहू ५४, पणवण्णो हेमविमलगुरू ५५ ॥१७॥10 ५३-तत्पट्टे श्रीलक्ष्मीसागरसूरिः ।। ५४-तत्पट्टे श्रीसुमतिसाधुसूरिः ।। ५५-तत्पट्टे श्रीहेमविमलसूरिः ।। व्याख्या ५३ तेवएणोति, श्रीरत्नशेखरसूरिपट्टे त्रिपंचाशत्तमः श्रीलक्ष्मीसागरसूरिः॥x - ४ श्रीलचमीसागरसूरिशासनवर्तिसूरीणां शिप्यौः सह संख्या चैवं- श्रीसुधानंदसूरिः शिष्याः २६, श्रीशुभरत्नसूरिः १४ (१८), श्रीसोमजयसूरिः २५, श्रीजिनसोमसूरिः १५, श्रीजिनहंससूरिः ३६, श्रीसुमतिसुन्दरसूरिः ५३, श्रीसुम- तिसाधुसूरिः ५७, श्रीराजप्रियसूरिः १२, श्री इन्द्रनन्दिसूरिः ११ । इति नव ।। उपाध्यायाः-महोपाध्यायश्रीमहीसमुद्रः २६, उपा० श्रीलब्धिसमुद्रः ३१, उ० श्रीअमरनन्दिः २७, उ०श्रीजिनमाणिक्यः ३१, उ० श्रीधर्महलः १२, उ०श्रीश्रा- गममण्डनः १२, उ०श्रीइन्द्रहंसः १०, उ० श्रीगुणसोमः ११, उ०श्रीअनंतहसः १२, उ.श्रीसंघसाधुः १४ ॥ अन्येपि पंचवाचकाः । इति पन्चदश ॥ गीतार्थाः-२८६ ॥ मुनयस्तु-तिलकविवेक रुचि राज सहज भूपण कल्याण श्रुत शीति कीर्ति मूर्ति प्रमोद आनन्द नन्दि साधु रस्न मण्डन नन्दन वर्धन ज्ञान दर्शन प्रभ लाभ धर्म ६८ पट्टावली-समुच्चयः तस्य वि० चतुष्पष्ठ्यधिके चतुर्दशशत१४६४ वर्षे भाद्र० वदि द्विती- यारदिने जन्म, सप्तत्यधिके-१४७७ दीक्षा, घएणवत्यधिके १४६६ पंन्यास पदं, एकाधिके पंचदशशत१५०१वर्षे वाचकपदं, अष्टाधिके १५०८ सुंरिपदं सप्तदशाधिके १५१७ गच्छनायकपदं ।। ५४~-चउवएणुत्ति, श्रीलक्ष्मीसागरसूरिपट्टे चतुष्पंचाशत्तमः 5 श्रीसुमतिसाधुसूरिः॥ ५५-~-पणवएणोत्ति, श्रीसुमतिसाधुसूरिपट्टे पंचपंचाशत्तमः श्रीहेमविमलसूरिः यः क्रियाशिथिलसाधुसमुदाये वर्तमानोपि साध्वाचारानतिक्रान्तः । यतो ब्रह्मचर्येण निष्परिग्रहतया च सर्वजनविख्यातो महायशस्वी संविम- 10 साधुसान्निध्यकारी। यद्दीक्षिता अनिश्रिताश्च बहवः साधवः क्रियापरायणा आसन् । एतचिह्न समुदायानुरोधेन क्षमानमणदिविहृवं पकान्नादिक नात्मना भुक्तवान् ऋहाना-ऋश्रीपति-ऋगणपति प्रमुखा लुकामतमपास्य श्रीहेम- विमलसूरिपार्श्वे प्रव्रज्य तन्निश्रया चारित्रभाजो बभूवांसः ।। 15 सद्युम्नं कंचिद्वतिनं ज्ञात्वा गणानिष्काशयामास ।। न च तेषां क्रियाशिथिलसाधुसमुदायावस्थाने चारित्रं न संभवतीति शंकनीयं, एवं सत्यपि गणाधिपतेश्चारित्रसंभवात् । यदागमः-साले नाम एगे एरण्डपरिवारे ति ।। तदानी वि० द्वापष्ठ्यधिकपंचदशशत१५६२ वर्षे "संप्रति साधवो 20 न हरपथमायातीत्यादिप्ररुपणापरकटुकनानो गृहस्थात् त्रिस्तुतिकमतवासि- सोम संयम हेम चोम प्रिय उदय माणिक्य सत्य जय विजय सुन्दर सार धीर वीर चारित्र चन्द्र भद्र समुद्र शेखर सागर सूर मंगल शील कुशल विमल कमल विशाल देव शिव यश कलश हर्प हंस, इत्यादिपदान्ताः सहसंशः ॥ महत्तरा भार्या १॥ -इति श्रीसोमचारिनगणिविरचिते, गुल्गुणरत्नाकरकाव्ये द्वितीये सर्गे ॥
5 तपागच्छ-पट्टावली तोत्कटुकनाम्ना मतोत्पत्तिः ॥ तथा वि.सप्तत्यधिकपंचदशशत१५७ वर्षे लुकामतान्निर्गत्य वीजाख्यवेपधरेण “वीजामती"नाम्ना मतं प्रवर्तितं ॥ तथा वि०द्विसप्तत्यधिकपंचदशशत१५७२वर्षे नागपुरीयतपागणनिर्गत्य उपाध्या- यपावचंद्रेण स्वनाम्ना मतं प्रादुष्कृतमिति ॥१७॥ सुविहिअमणिचूडामणि, कुमथतमोमहणमिहिरसममहिमो। आणंद विमल सूरी-सरो अ छावण्णपट्टधरो ॥१८॥ ५६-तत्पट्टे श्रीआणंदविमलसूरिः ।। व्याख्या--५६-सुविहियत्ति, श्रीहेमविमलसूरिपट्टषट्पंचाशत्तमपट्ट- धरः सुविहितमुनिचूडामणि कुमततमोमयनसूर्यसममहिमा श्रीआणदिविमल- 10 तस्य च वि०सप्तचत्वारिंशदधिके पंचदशशत१५४७वर्षे इलादुर्गे जन्म, द्विपंचाशदधिके १५५२ व्रतं, सप्तत्यधिके १५७० सूरिपदं ।। तथा यो भगवान् क्रियाशिथिलवहुयतिजनपरिकरितोऽपि संदेगरंग- भावितमातः जिनप्रतिमाप्रतिपेध-साधुजनाभावप्रमुखोत्सूत्रप्ररूपणप्रवलजल- साव्यमानं जननिकरमवलोक्य करुणारसावलिप्तचेतो गुर्वाज्ञया कतिचित्सं-16 विमसाधुसहायो वि० द्वघशीत्यधिकपंचदशशत१५८२वर्षे शिथिलाचारपरि- हाररूपक्रियोद्धरणयानपात्रेण तमुद्धृतवान् , ४ अनेकानि भ्यानामिभ्यपु- त्राणां च शतानि कुटुंबधनादिमोहं संत्याज्य प्रताजितानि । सूरिः॥ . ४ ५८ तस्प श्रीमानन्दविसलसूरिः ५६ तस्प? श्रीविजदानसूरि:-(२) सं०१२८२ क्रियोदार कीधो त्रिणगच्छनायक पाटण विसलनगर वारेजाथी निसरा।। ६० तत्प४ श्रीराजविजयसरि ६१तत्प? श्रीरत्नविजयसूरि सं०१५६६ लुका- मतफेढयो मालवोवालो जीयाजी जीत्यो, साहसलेमने प्रतिबोध्यो, मुगता घाटका सं० १६२४॥ इति, मोहनलाल दलीचंद देशाइ इत्यनेन संग्रहीतायां, रत्नशाखा पट्टावल्याम् (जैनयुग, पु०३, अं० ११-१२) पट्टावली-समुच्चयः.. “यो वादेजयी स नगरादौ स्थास्यति नान्य" इति सुराष्ट्राधिपतिनामां- ऽकितलेखमादाय सुराष्ट्रे साधुविहारनिमित्तं यदीयश्रावकः सुरत्राणदत्तपर्यस्ति- कावाहनः पातसाहिप्रदत्त "मलिकश्रीनगदल" विरुदः सा०. तूणसिंहाख्यः श्रीगुरूणां विज्ञप्तिं कृत्वा संप्रतिभूपतिरिव पंन्यासजगर्पिप्रमुखसाधुविहारं कारितवान् ।। 5. तथा जेसलमेदिमरुभूमौ जलदौर्लभ्यादुष्करोयमितिधिया श्रीसो- मप्रभसूरिभिर्यो विहारःप्रतिपिध्ध आसीत् सोपि व्यवहारः कुमतव्याप्तिभिया तत्रत्यजनानुकंपया च भूयोलाभहेतवे पुनरप्यनुज्ञातः । तत्रापि प्रथम लघुवया अपि शीलेन श्रीस्थूलभद्रकल्पो वैराग्यनिधिनिःस्पृहावधिर्यावजिवं जघन्यतोऽपि षष्ठतपोभिग्रही पारणकेप्याचाम्लादितपोविधायी महोपाध्याय- 10 श्रीविद्यासागरगणिविहृतवान् । तेन च जेसलमेर्वादौ खरतरान् मेवातदेरो च बीजामतीप्रभृतीन मोरव्यादौ (मोख्यादौ) लुकादीन् प्रतिबोध्य सम्यक्त्वबी- जमुप्तं सदनेकधावृद्धिमुपागतमद्याऽपि प्रतीतं ॥ तथा पार्श्वचंद्रव्युग्राहिते वीरमग्रामे पार्श्वचंद्रमेव वादे निरुत्तरीकृत्य भूयान जनो जैनधर्म प्रापितः । एवं मालवकेप्युज्जयिनीप्रभृतिषु॥ किंबहुना !15 संविग्नत्वादिगुणैर्यत्कीर्तिपताका पुनरद्यापि सज्जनवचोवातेनेतस्ततउधूय- माना प्रवचनप्रासादशिखरे समुल्लसति ॥ क्रियोद्धारकरणानन्तरं च श्रीआणंदविमलसूरयश्चतुर्दश१४वाणि जघन्यतोपि नियततपोविशेषं विहाय षष्ठतपोभिग्रहिण: चतुर्थषष्ठाभ्यां विंश- तिस्थानकाराधनाद्यनेकविकृष्टतपःकारिणश्च वि०पएणवत्यधिकपंचदशशत 20 १५६६वर्षे चैत्रसितसप्तम्यामा७ऽऽजन्मातिचाराऽऽद्यालाच्याऽनशनं विधाय 'च नवभिरुपवासैरहम्मदावादनगरं स्वर्ग विभूपयामासुः ॥१८॥ ॥सिरिविजयदाणसूरी, पट्टे सगवण्णए अ५७ अडवण्णे ।। सिरिहीरविजयसूरी, ५८ संपइ तवगणदिणिदसमा ॥१६॥ ५७-तत्झे श्रीविजयदानसूरिः ।। ५८-तत्पट्टे श्रीहीरविजयसूरिः ॥ 25 तपागच्छ-पट्टावली व्याख्या--५७-सिरिविजयत्ति, श्रीआनन्दविमलसूरिपट्टसप्तपंचाश- त्तमः श्रीविजयदानसूरिः॥ येन भगवता स्तंभतीर्था-ऽहम्मदावाद-पत्तन-मही- शानक-गन्धारबंदिरादिपु महामहोत्सवपुरस्सरमनेकजिनविवशतानि प्रतिष्ठि- तानि ॥ यदुपदेशमवाप्य सूरस्त्राणमहिमूदमान्येन मंत्रिगलराजाऽपरनामकम-5 लिकश्रीनगदलेनाऽश्रुतपूर्वी पाएमासी शत्रुजयमुक्तिं कारयित्वा सर्वत्र कुंकुमप- त्रिकाप्रेरणपुरस्सरसम्मीलिताऽनेकदेश-नगर-ग्रामादिसंघसमेतेन श्रीशत्रुज- ययात्रा, मुक्ताफलादिना श्रीशत्रुजयवर्धापनं श्रीभरतचक्रिवच्चक्रे ॥ तथा यदुपदेशपरायणगाधारीयसा रामजी अहम्मावादसत्क सं०कू- अरजीप्रभृतिभिः शत्रुजये चतुर्मुखाऽष्टापदादिप्रासादा देवकुलिकाश्चका- 10 रिताः। उज्जयन्तगिरौ जीएणप्रासादोद्धारश्च ॥ तथा सूर्यस्येव यस्योदये तारका इवोत्कटवादिनोऽदृण्यता प्रापुः ॥ यो भगवान् सिद्धांतपारगामी अखण्डितप्रतापाज्ञोऽप्रमत्तया रुपनिया च श्रीगौतमप्रतिमो गूर्जर-मालव-मरुस्थली-कुंकुणादिदेशेष्वशेषेष्वप्रतिबद्ध- विहारी षष्ठाऽष्टमादितपः कुर्वन्नपि यावज्जीवं घृताऽतिरिक्तविकृतिपंचकपरि-15 हारी माहपामपि शिष्याणां श्रुतादिदाने वैश्रमणाऽनुकारी अनेकवारैकादशा- गपुस्तकशुद्धिकारी । किंबहुना ! तीर्थकरइव हितोपदेशादिना परोपकारी सर्व- जनप्रतीतः ॥ तस्य वि० त्रिपंचाशदधिके पंचदशशत१५५३वर्षे जामलास्थाने जन्म, द्वापप्ठ्यधिके १५६२ दीक्षा; सप्ताशीत्यधिके १५८७ सूरिपदं, द्वाविंशत्य- 20 धिकपोडशशत१६२२वर्षे वटपल्लयामनशनादिना सम्यगाराधनपुरस्सरं स्वर्गः ॥ ५८-अडबएणेत्ति, श्रीविजयदानसूरिपट्टेष्टपञ्चाशत्तमाः श्रीहीर- विजयसूरयः ॥किंविशिष्टाः१ संप्रति तपागच्छे श्रादित्यसदृशास्तद्योतक- त्वात् । तेपां विक्रमतः व्यशीत्यधिक पञ्चदशशतवर्षे १५८३ मार्गशीर्षशुक्ल नवमीदिने प्रह्लादनपुरवास्तव्यऊकेशज्ञातीयसा कुंराभार्यानाथीगृहे जन्म, 25 पट्टावली-समुचयः पएणवत्यऽधिके१५६६कार्तिकबहुल द्वितीयायां २ पत्तननगरे दीक्षा, सप्ताऽधिके घोडपशतवर्षे १६०७ नारदपुर्या श्रीऋषभदेवप्रासादे पण्डितपदम् । अष्टा- धिके १६०५ माघशुक्लपञ्चमीदिने नारदपुर्या श्रीवरकाणकपार्श्वनाथसनाथे श्रीनेमिनाथप्रासादे वाचकपदम् । दशाधिके १६१० सीरोहीनगरे सूरिपदम् । तथा येषां सौभाग्यवैराग्यनिःस्पृहतादिगुणश्रेणेरेकमपि गुणं वचो- 5 गोचरीकर्तुं वाचस्पतिरप्यचतुरः । तथा स्तम्भतीर्थे येषु स्थितेषु तत्रत्य श्रद्धा- लुमिः टङ्ककानामेका कोटिः प्रभावनादिभिर्व्ययीकृता । येषां चरणविन्यासे प्रतिपदं सुवर्णटकरूप्यनाणकमोचनं पुरतश्च मुक्ताफलादिभिः स्वस्तिकरचनं प्रायस्तदुपरि च रौप्यकनाणकमोचनं चेत्यादि संप्रत्यऽपि प्रत्यक्षसिद्धम् । यैश्च सीरोह्यां श्रीकुन्थुनाथविम्बानां प्रतिष्ठा कृता । तथा नारदपुर्या- 10 भनेकानि जिनविम्बानि प्रतिष्ठितानि । तथा स्तम्भतीर्थाऽहम्मदाबादपत्तन नगरादौ अनेकटङ्कलक्षव्ययप्रकृष्टाभिरनेकाभिः प्रतिष्ठाभिः सहस्रशो विम्बानि प्रतिष्ठितानि । येपां च विहारादौ युगप्रधानसमानातिशयाः प्रत्यक्षसिद्धा एव । तथाऽहम्मदावादनगरे लुकामताऽधिपतिः ऋषिमेघजीनामा स्वकी- 15 यमताऽऽधिपत्यं “दुर्गतिहेतु"रिति मत्वा रज इव परित्यज्य पञ्चविंशति२५- मुनिभिः सह सकलराजाधिराजपातिसाहिश्रीअकबरराजाज्ञापूर्वकं तदीया- ऽऽतोद्यवादनादिना महामहपुरस्सरं प्रव्रज्य यदीयपादाम्भोजसेवापरायणो जातः । एतादृशं च न कस्याप्याचार्यस्य श्रुतपूर्वम् । x कुंअरजीऋपिशिप्येण मेवजी ऋपिणा त्रिंशता मुनिभिः साकमकबरपाति- साहिदत्तारावास्तव्यरामशाहसूनुस्थानसिंहाऽऽनीतपूर्यनिनादपुरस्सरं दीक्षा जगृहे । -इति हीरसौभाग्यकाव्ये ॥ सप्तविंशतिशिौर्जगृहे। इति विजयप्रशस्तिकान्यवृत्तौ ॥ तस्य वि० सं० १६२६ वर्षे अहमदावादे श्रीविजयसेनसूरिहस्तेन दीक्षा, वि० सं० १६५६ वर्षे वै० शु० ४ सोमदिने स्तंभतीर्थे श्राद्धमालदेवकृतविजयदेवसूरि- पदमहोत्सवे उपाध्याय पदं ॥ तद्वितीयवर्षे एव शंखेश्वरतीर्थे लुंपाकमतत्यागिश्री- उपविजयस्थापि उपाध्यायपदम् ॥
तपागच्छ-पट्टावली ७३ किश्च । येपांमशेषसंविग्नसूरिशेखराणामुपदेशात् सहस्रशो गजाना लक्षशो वाजिनां गूर्जर-मालव-विहार-अयोध्या-प्रयाग-फतेहपुर-दिल्ली-- लाहुर-मुलतान-क्याविल-अजमेर-बङ्गालाघभिधानानामनेकदेशसमुदा- यात्मकानां द्वादशसूवानां चाऽधीश्वरो महाराजाधिराजशिरःशेखरः पाति- साहिश्रीअकबरनरपतिः स्वकीयाऽखिलदेशेषु पाण्मासिकाऽमारिप्रवर्तनं, 5 जीजायाऽभिधानकरमोचनं च विधाय सकललोकेपु जाग्रत्प्रभावभवनं श्री- मजिनशासनं जनितवान् । तद्वयतिकरो विस्तरतः श्रीहीरसौभाग्यकाव्यादि- भ्योऽवसेयः। समासतस्त्वेवम्- एकदा कदाचित् प्रधाननुरुपाणां मुखवार्त्तया श्रीमद्- गुरूणां निरुपमशमदमसंवेगवैराग्यादिगुणगणश्रवणतश्चमत्कृतचेतसा 10 पातिसाहिश्रीअकबरेण स्वनामाङ्कितं फुरमानं प्रेष्याऽतिबहुमानपुरस्सरं. गन्धारबन्दिरात् दिल्लीदेशे आगराख्यनगरासन्नश्रीफतेपुरनगरे दर्शनकृते समाकारिताः सन्तोऽनेकमव्यजनक्षेत्रेषु वोधिवीजं वपन्तः श्रीगुरवः क्रमेण विहारं कुर्वाणाः विक्रमत एकोनचत्वारिंशदधिकपोडशशतवर्षे १६३६ ज्येष्ट- बहुलत्रयोदशीदिने तत्र संप्राप्ताः। तदानीमेव च तदीयप्रधानशिरोमणिशेपश्री 15 अवलफ़जलाख्यद्वारा उपाध्यायश्रीविमलहर्षगणिप्रभृत्यनेकमुनिनिकरपरि- करिताः श्रीसाहिना समं मिलिताः । तदवसरे च श्रीमत्साहिना सादरं स्वाग- तादि पृष्ट्वा स्वकीयास्थानमण्डपे समुपवेश्य च परमेश्वरस्वरूपं, धर्मखरूपं च- कीदृशं कथं च परमेश्वरः प्राप्यत इत्यादि धर्मगोचरो विचारः प्रष्टुमारेभे । तदनु श्रीगुरुभिरमृतमधुरया गिराऽष्टादशदोषविधुरपरमेश्वरपञ्चमहाव्रतस्व:20 रूपनिरूपणादिना तथा धर्मोपदेशो ददे यथा आगराद्रङ्गतोऽजमेरनगरं याव- दध्वनि प्रतिक्रोशं कूपिकोपेतमनारान्विधाय स्वकीयाखेटककलाकुशलताप्रक- टनकृते प्रतिमनारं शतशो हरिणविपाणारोपणविधानादिना प्राग् हिंसादि- करणरतिरपि स भूपतिर्दयादानयतिसङ्गतिकरणदिपवणमतिः सञ्जातः । .
. ७४ पट्टावली-समुच्चयः ततोऽतीवसन्तुष्टमनसा श्रीसाहिना प्रोक्तम् । यत् पुत्रकलत्रधनखजन. देहादिपु निरीहेभ्यः श्रीमद्भ्यो हिरण्यादिदानं न युक्तिमत् । अतो यदस्मदीय- मन्दिरे, पुरातनं जैनसिद्वान्तादिपुस्तकं समस्ति, तल्लात्वाऽस्माकमनुग्रहो विधेयः। पश्चात् पुनःपुनराग्रहवशात् तत्समादाय श्रीगुरुभिः आगराख्यनगरे चित्कोशतयाऽमोचि । तत्र साधिकप्रहरं यावद्धर्मगोष्ठी विधाय श्रीमत्साहिना 5 समनुज्ञाताः श्रीगुरुवो महताडम्बरेण उपाश्रये समाजग्मुः । ततः सकलेऽपि लोके प्रवचनोन्नतिः स्फीतिमती सञ्जाता। तस्मिन् वर्षे आगराख्यनगरे चतुर्मासककरणान्तरं सुरीपुरे श्रीनेमिजि- नयात्राकृते समागतैः श्रीगुरुभिः पुरातनयोः श्रीऋपभदेव-श्रीनेमिनाथसम्ब- धिन्योर्महत्योः प्रतिमयोस्तदानीमेव निर्मितश्रीनेमिजिनपादुकायाश्च प्रतिष्ठा-10 कृता । तदनु, ॥ आगराख्यनगरे सामानसिंहकल्याणमल्लकारितश्रीचिन्ताम- णिपार्श्वनाथादिविम्बानां प्रतिष्ठा शतशः सुवर्णटकव्ययादिना महामहेन निर्मिता । तत्तीर्थं च प्रथितप्रभावं सञ्जातमस्ति । - . ततः श्रीगुरवः पुनरपि फतेपुरनगरे समागत्य श्रीसाहिना साकं भि- लिताः । तदवसरे च प्रहरं यावद्धर्मप्रवृत्तिकरणानन्तरं श्रीसाहिरवदत् यत् 15 श्रीमन्तो मया दर्शनोत्कण्ठितेन दूरदेशादाकारिताः । अस्मदीयं च न किमपि गृह्यते । तेनाऽस्मत्सकाशात् श्रीमद्भिः सचित्तं याचनीयं येन वयं कृतार्था भवामः। तत् सम्यग्विचार्य श्रीगुरुभिस्तदीयाखिलदेशेषु पर्युपणापर्वसत्काऽष्टा- हिकायाममारिप्रवर्त्तनं बन्दिजनमोचनं चायाचि, ततो निर्लोभताशान्तताद्य- तिशयितिगुणगणातिचमत्कृतचेतसा श्रीसाहिना अस्मदीयान्यपि चत्वारि 20 दिनानिसमधिकानि भवन्त्विति कथयित्वा खवशीकृतदेशेषु श्रावणबहुलदश- भीतः प्रारभ्य भाद्रपदशुक्लषष्ठी यावदमारिप्रवर्त्तनाय द्वादशदिनामारिसत्का- निकाञ्चनरचनाञ्चितानि खनामङ्कितानि पट् फुरमानानि त्वरितमेव श्रीगुरूणां समर्पितानि । तेपां व्यक्तिः-प्रथमं गूर्जरदेशीयं, द्वितीयं मालवदेशसत्कं, तृतीयं अजमेरदेशीयं, चतुर्थं दिल्लीफतेपुरदेशसम्बन्धि, पञ्चमं लाहुरमुलता-5 तपागच्छ पट्टावली नमण्डलसत्कम् , श्रीगुरूणां पार्वे रक्षणाय षष्ठं देशपंचकसम्बन्धि साधारणं चेति । तेपांच तत्तद्देशेषु प्रेषणेनाऽमारिपटहोद्घोपणवारिणा सिक्ता सती पुराऽज्ञायमाननामाऽपि कृपावल्ली सर्वत्रार्याऽनार्यकुलमण्डपेपु विस्तारवती वभूव। तथा बन्दिननमोचनस्याप्यङ्गीकारपुरस्सर श्रीसाहिना श्रीगुरूणां 5 पार्वादुत्थाय तदैवाऽनेकगव्यूतमिते डाबरनाम्नि महासरसि गत्वा साधुसमक्षं स्वहस्तेन नानाजातीयानां देशान्तरीयजनप्राभृतीकृतानां पक्षिणां मोचनं चक्रे । तथा प्रभाते कारागारस्थबहुजनानां बन्धनभञ्जनमप्यकारि। एवमनेकशः श्रीमत्साहेमिलनेन श्रीगुरूणां धरित्रीमरुमण्डलादिपु श्रीजिनप्रासादोपाश्रया- णामुपद्रवनिवारणायानेकफुरमानविधापनादिना प्रवचनप्रभावनादिप्रभावो 10 यो लाभोऽभवत् स केन वर्णयितुं शक्यते ?। तवसरे च संजातगुरुतरगुरुभक्तिरागेण मेडतीयसा०सदारंगेण मार्ग- णगणेभ्यो मूर्तिमद्गजदानद्विपशदऽश्वदानलक्षप्रासादविधानादिना, दिल्ली- देशे श्राद्धानां प्रतिगृहं सेरद्वयप्रमाणखण्डलम्भनिकानिर्माणादिना च श्रोजिन- शासनोन्नतिश्चक्रे । तथैका प्रतिष्ठा सा० थानसिंघकारिता । अपरा च सा० 15 दूजणमल्लकारिता श्रीफतेपुरनगरे ऽनेकटङ्कलक्षव्ययादिना महामहोत्सवोपेता विहिता। किञ्च । प्रथमचतुर्मासकमागराख्यद्रङ्गे, द्वितीयं फतेपुरे, तृतीयमभिरामाबादे, चतुर्थं पुनरप्यागराख्ये चेति चतुर्मासीचतुष्टयं तत्र देशेकृत्वा गूर्जरदेशस्थश्री- विजयसेनप्रभृतिसंघस्याऽऽग्रहवशात् श्रीगुरुचरणा धरित्रीपवित्रीकरणप्रव- 20 णान्तःकरणाः श्रीशेषूजी-श्रीपाढूजी-श्रीदानीबाराऽभिधपुत्रादिप्रवरपरिकराणां श्रीमत्साहिपुरन्दराणां पार्थे फुरमानादिकार्यकरणतत्परानुपाध्यायधीशांतिचंद्र- गणिवरान मुक्त्वा, मेडतादिमार्गे विहारं कुर्वाणा नागपुरे चतुर्मासी विधाय क्रमेण सीरोहीनगरे समागताः । तत्रापि नवीनचतुर्मुखप्रासादे श्रीआदिनाथा. दिबिम्बना श्रीअजितजिनप्रासादे श्रीअजितजिनादिविवानां 25 च ७६ पट्टावली-समुच्चयः क्रमेण प्रतिष्ठाद्वयं . विधाय अर्बुदाचले यात्रार्थ प्रस्थिताः तत्र विधिना यात्रा विधाय यावद्धरित्रीदिशि पादावधारणं विदधति तावत् महारां- यश्रीसुलतानजीकेन सीरोहीदेशे पुरा कराऽतिपीडितस्य लोकस्य अथः पीडां न विधास्यामि, मारिनिवारणं च करिष्यामीत्यादिविज्ञप्तिं स्वप्रधानपुरुपमुखेन विधाय श्रीगुरवः सीरोह्यां चतुर्मासीकरणायाऽत्याग्रहात समाकारिताः। 5. पश्चात् तद्राजोपरोधेन, तद्देशीयलोकानुकम्पयाचं तत्रचतुर्मासी विधायक्रमेण रोहसरोतरामार्गे विहारं कुर्वन्तः 'श्रीपत्तननगरं पावितवन्तः। अथ पुरी श्री सूरिराजैः श्रीसाहिहृदयाऽऽलवालरोपिता कृपालतोपाध्यायश्रीशान्तिचन्द्र- गाणिमिः स्वोपज्ञकृपारसकोशाख्यशास्त्रश्रावणजलेन सिक्ता सती 'वृद्धिमती बभूव । तदभिज्ञानं च श्रीमत्साहिजन्मसम्बन्धी मासः, श्रीपर्युपणापर्व- 10 सत्कानि द्वादशदिनानि सर्वेऽपि रविवाराः, “सर्वसंक्रान्तितिथयः नवरोजसत्को मासः ईदीवासराः, सर्वे मिहर- वासराः, सोफीनिकवासराश्वेति पाण्मासिकामारिसत्कं फुरमान जीजी- आभिधानकरमोचनसत्कानि फुरमानानि च श्रीमत्साहिपाश्र्वात्समानीय ध- रित्रीदेशे श्रीगुरुणां प्राभृतीकृतानीति । एतच्च सर्वजनप्रतीमेव । तत्र नव- 15 रोजादिवासराणां व्यक्तिस्तत्फुरमानतोऽवसेया। किञ्च । अस्मिन् दिल्ली देशविहारे श्रीमद्गुरूणां श्रीमत्साहिप्रदत्तबहुमानतः निष्प्रतिमरूपादि- गुणगणानां श्रवणवीक्षणतश्चानेकम्लेच्छादिजातीया अपि सद्यो मद्य- मांसाशनजीवहिसनादिरति परित्यज्य सद्धर्मकर्मासक्तमतयः, तथा' केचन प्रवचनप्रत्यनीका अपि निर्भरभक्तिरतयः अन्य पक्षीया अपि कक्षीकृतसद्: 20 भूतोद्भूतगुणततयश्चासन् । इत्याद्यनेकेऽवदाताः, पड्दर्शनप्रतीता एव । + । तथा श्रीपत्तननगरे चतुर्मासककरणादनु विक्रमतः पटंचत्वारिशद- धिकपोडपशत१६४६वर्षे · स्तम्भतीर्थे ' सो० तेजपालकारिता सहस्रशो रुप्यकव्ययादिनाऽतीवश्रेष्ठां प्रतिष्ठां विधाय श्रीजिनशासनोन्नतिं तन्वानाः श्रीसुरिराजो विजयन्ते ॥१६॥ 25 .
७७ तपागच्छ-पट्टावली सिरिविजयसैणसूरि-प्पमुहेहि ऽणगसाहुवग्गेहि ॥ परिकलि आ पुहविजले, विहरन्ता दितु मे भई ॥२०॥ ५८-श्रीहरिविजयसूरिः ॥५६-तत्पट्टे श्रीविजयसेनसरिः ।। व्याख्या-सिरित्ति, ते च श्री हीरविजयसूरयः संप्रति ५६ विजयसेन सूरिप्रभृत्यनेकसाधुभिः परिकलिताः पृथ्वीतले विहारं कुर्वाणा मे मम । भद्रं प्रयच्छन्तु ॥२०॥ ॥ इति तवगच्छपट्टावलीसुत्तं सम्मत्तं ।। इति महोपाध्यायश्रीधर्मसागरगणिविरचिता श्रीतपागच्छपट्टावलीसूत्रवृत्तिः समाप्ता ॥छ। तथा चेयं, श्रीहीरविजयसूरीणां निर्देशात् उपाध्यायश्रीविमल--10 हर्पगणि-उपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणि-उपाध्यायश्रीसोमविजय गणि- पं० लब्धिसागरगणिप्रमुग्वगीनाथैः मंभूय संवत् १६४८ वर्षेचैत्रवहुल- पष्ठी ६ शुक्रे अहम्मदावादनगरे श्रीमुनिसुंदरसूरिकृतगुर्वाचली-जीर्णपट्टा- वली-दुप्पमासंघस्तोत्रयंत्राद्यनुसारेण संशोधिता । तथापि यत्किंचित् शोध- नाहं भवति, तत्मध्यस्थगीतार्थः संशोध्यं ॥ 15 किंचाऽस्याः पट्टावल्याः शोधनात्याग वहव आदीः संजाताः सन्ति ते चास्योपरि संशोध्य वाचनीया नत्वन्यथेति श्रीमत्परमगुरूणामनुशिष्टि- रिति ।। वाचकशिरोवतंसश्रीमत्कल्याणविजयगणिशिष्यः । प्रथमादर्श सम्यग्विचार्य शिवविजयगणिरलिखत्॥१॥ 120 इतिश्रीगुर्वावलीवृत्तिः सम्पूर्ण ॥ पट्टपरंपरएणं वायगसिरिधम्मसायरगुरूहिं ॥ परिसंखाया सिरिमंतसूरिणो दितु सिद्धिसुहं ॥२१॥ इयंगाथा शिण्यकृता पछःछिः।।
अनुपूर्तिः १- श्रीलपानणापति गुणापतिः ( क --उपाध्यायश्रीगुणविजयगणिः ) - श्रथाप्रेतना पदावली पुरतोऽनुसन्धीयते- सिरविजयसेणसूरी, पट्टे गुणसहिमे अ । व्याख्या ५६-'सिरिविजयसेणसूरित्ति एकोनषष्ठितमे पट्टे श्रीविजयसे- नसूरिः । तच्चरित्रं विस्तरतः श्रीविजयप्रशस्तिकाव्यतोऽवसेयं समासतस्त्वेवम्- संवत्१६०४वर्षे नारदपुर्या जन्म, सं०१६१३वर्षे पितृमातृभ्यां सह श्रीविजय- दानसूरिहस्ते दीक्षा, ततः श्रीहीरविजयसूरिभिः सर्वशास्त्राणि पाठयित्वा डी- साख्यग्रामे ध्यानं कृत्वाः सं० १६२८वर्षे फाल्गुनशुक्ल सप्तम्यां श्रीश्रहम्मदावादे सूरिपदं प्रदत्तं । तदनन्तरं सर्वप्रकारेण श्रीतपागच्छे ज्ञानदर्शनचारित्रादि समृद्धिः शिष्याणां श्रावकाणां च वृद्धिश्च जाता । यतस्तस्मिन् वर्षे ऋपिमेघ- जीमुख्या लुकाख्यमतमुख्यास्तत्रत्याधिपत्यं हित्वा सर्पः कञ्चुलिकामिव तत्कुमतवासनां त्यक्त्वा श्रीतपागच्छगुरूणां शिप्यतां प्राप्ताः, तत्स्वरूपं तु प्राग् निरूपितं । ततः श्रीहीरविजयसूरयः १६३६वर्षे शाहिश्रीअकव्वरेण 10 आकारिता यथा सन्मानिताः, तद्वयतिकरोऽपि पूर्वं प्रकाशितः । ततः क्रमेण, श्रीहीरविजयसूरयः श्रीविजयसेनसूरिभिः सार्धं श्रीराजधन्यपुरे चतुर्मासीमा- सीनास्तस्मिन्नवसरे लाहोरनगरस्थेन श्रीअकबरसुरत्राणेन श्रीमदाचार्यगुण- गणाकर्णनप्रीतान्तःकरणेन तदाकारणाय स्फुरन्मानं प्रैपि । ततः श्रीगुरूणा- माज्ञा शेपामिवशीर्षे निधाय ततश्चलन्तः पत्तनप्रभृतिनगराणि बहून्ग्रामांश्च15 पवित्रयन्तोऽनेकसङ्घलोकैः पूजिताः परिवृताश्च श्रीअर्बदाचलतीर्थयात्रा ७६ श्रीतपागणपति-गुरणपद्धति विधाय श्रीसीरोहीनगरे प्राप्तास्तदा तन्नायकेन राज्ञा श्रीसुरत्राणसझेन, वहाडम्बरपूर्वकं सन्मानिताः । ततः क्रमेण श्रीराणपुर-वरकाणकपार्श्वना- थादियात्रां कृत्वा स्वजन्मनगरी नारदपुरी च गत्वा क्रमेण मेदनीपुर-डीएडू- याएक-वैराट-महिमनगरादिपु भन्यलोकान् कोकान् सूर्या इव श्रीसूरिधुर्या उद्बोधयन्तो लोधिप्राणायामे समेयुः । तत्र श्रीशाहिमान्यशेखश्रीअवलफजल-5 भ्रातृजन्मा फयजीनामा श्रीसूरीनन्तुमागतः । तत्रानेकलोकविधीयमानवहु- मानस्वरूपं स्पष्टाष्टावर्धानादिसाधकशिष्यश्रेणिस्वरूपं च दृष्ट्वाऽतीवचमत्कृत- चेतास्ततस्त्वरितं लाहोरनगरे गत्वा श्रीशाहिपुरतस्तमुदन्तं यथादृष्टमभ्यधात् । तच्छुत्वा शाहिरपि घनाघनान्नीलकण्ठ इव श्रीगुरून् द्रष्टुं सोत्कएठोऽभूत् । ततः क्रमेण श्रीसूरयोऽपि शाहिप्रदत्तोद्यद्वाद्यवादनानेकानेकतुरङ्गमविचित्र- 10 वैजयन्तीतोरणधोरणीरमणीयमहामहपुरस्सरं लाभपुरं पुरं प्रविश्य तद्दिन एव श्रीशेखजीदरवारीरामदासप्रमुखप्रधानपुरुपद्वारा काश्मीरीमहलनाम्नि धाम्नि श्रीशाहेमिलिताः। शाहिरपि गुरून वीक्ष्य परमप्रमोदमेदुरः सन् श्रीहीर- विजयसूरीणामुदन्तं वर्त्मनि कुशलोदन्तं च पृष्टवान् । श्रीगुरुभिरपि श्रीहीर सूरिभिर्भवतां धर्माशीर्वादो दत्तोऽस्तत्याद्युक्तं । भृशं तुष्टः सन्नष्टावधानानि 15 द्रष्टुकामोऽस्मीति गुरूनाचष्ट । ततो गुर्वाज्ञया गुरुशिष्यश्रीनन्दविजयाभिध- विवुधसाधिताष्टावधानानि द्रष्ट्वा वचनागोचरं चमत्कार प्राप्तः । प्रसन्नः सन् महाऽऽडम्बरपूर्वकं स्वस्थानं प्रापयतामिति स्वजनानादिश्य स्वं धामागमत् । अथेष्टवैद्योपदिष्ठमितिमन्यमानै राजमान्यैर्वदान्यस्तत्रत्यास्तिकजनैरष्टदिनानि यावत् केवलं रूप्यकैरेव प्रभावनाद्याडम्बरस्तथा कृतो यथा जैन राज्यमेक-20 च्छत्रमिवजातमिति । गुरूणां गौरवमसहमानेन केनचिद्भटेन-अमी जैना जगदीश्वरं १ भास्करं २ गंगां ३ च नमन्यन्ते तेन हे श्रीशाहे ! भवाहशा भू- भुजां नैतेषां दर्शनं योग्यमिति श्रुत्वा गुप्तकोपो भूपोऽन्यदा समायातान् श्री अनूचानपुङ्गवान् तद्विजोक्तमुक्तवान् । ततस्तत्वलविलसितं मत्वा तत्कालो- त्पन्नखसमयपरसमयस्मृतिसूक्तिशुक्तिसमुद्रैःश्रीसूरीन्द्रस्तदीयशास्त्रसम्मत्यैव 25 खाभीष्टजगदीश्वर-स्वरूपं निरूपितं ।
८० यथा- . :5 . . पट्टावली-समुच्चयः -यशैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो, न: - बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटवः कर्मेति मीमांसकाः । अहन्नित्यथ जैनशासनरताः कर्तेति नैयायिकाः, 1515 सोऽयं वो विदधातु वाच्छितफलं त्रैलोक्यनाथो हरिः ॥१॥ । अनेन तद्ग्रन्योक्तकाव्येन तदीयशास्त्रशस्त्रेणैव तन्मदच्छेदश्चक्रे । इति.प्रथम जगदीश्वरांगीकारप्रभोत्तरम् । अधांमधामधामेदं, वयमेव स्वचेतसि । यस्यास्तव्यसने प्राप्ते, त्यजामो भोजनोदके ॥१॥ इत्यादियुक्तिभिर्द्वितीयं सूर्याङ्ग कारोत्तरम् । तथा. गङ्गोदकमन्तराऽस्माकं देवप्रतिष्ठेव न स्यात,इति तृतीयं गङ्गाङ्गीकारो! त्तरम्। इति मुरूक्तवाक्यैः प्रहृष्टः शाहिः श्रीगुरूणां सन्मानं दत्वा खलांस्तिरस्कृ- तवान् । ततस्तत्र, द्रङ्गे श्रीशाहेराग्रहेण चतुर्मामकद्वयं विधाय एकदा पुण्योपदे- शक्षणे प्रमुदितेन शाहिना किंचिद्याचध्वमित्युक्ते श्रीसूरिः स्माह-हेश्रीशाहे ! गो १, वृषभ २, महिप ३, महिषी ४, हननं, मृतद्रव्यादानं ५, बन्दिग्रहणं ६ चेति पड्जल्पास्तव जगज्जनदुःखभंजकस्य नार्हन्तीति, एतेषां जल्पाना हान-15 मेवास्माकं मुदां श्रीशाहीनां च सम्पदा निदानमित्युक्तेस्तुष्टेन श्रीशाहिना तत् षड्जल्पस्फुरन्मानं श्रीसूरिनाम्नैव सर्वत्र प्रहिनम् । अस्मिन्नवसरे श्रीहीरसूरि- भिर्वाधायशादन्तिममिलनाय लेखप्रेषणपूर्वमाकारिताः संतस्तत्रविचित्रवादि लव्धजयवादाः श्रीसूरिपादाः शीघ्रमेव गुर्वाकारणं कारणमवमत्य चतुर्मासक मध्येऽपिचलन्तोऽविच्छिन्नप्रयाणैर्मरुमण्डलमण्डलीभवन्तः क्रमेण श्रीपत्तनं 20 प्राप्तवन्तः । तत्र श्रीहीरसूरीणां स्वर्गमनमूनाख्यद्रङ्ग सञ्जातं श्रुत्वा तत्संसार- खभावमनुभाव्यत्यक्तशोकाः सुखप्राज्यंतपागच्छसाम्राज्यं पालयामासुः । अथ तेषां सुकृतकृत्यानि लिख्यते । यथा-तैश्चम्पानेरदुर्गे १६३२वर्षे 'प्रतिष्ठांकृता। ततः सूरतिबन्दिरे श्रीमिश्र-चिन्तामणिप्रमुखेषुभट्टषुसभ्येषु स- सु अनेकंपण्डितपर्षदि श्रीसूरिभिः समं विवादं कुर्वन् श्रीभूषणनामा दिगम्ब- 25 राचार्यो यथातथाऽपसिद्धान्तं जल्पन जैनशास्त्रशैवशास्त्रपारगैर्गुरुभिर्निर्जित- स्ततः काकनाशंननाश । अथ निश्शेपलोकक्रियमाणजयारवपूर्वकं श्रीसूरयःवं 5 श्रीतागणपति-गुणपद्धतिः पदं प्रापुः । ततः क्रमाद् राजनगरे श्रीखानखानाख्यक्ष्मापपर्षदि जयश्रियं शि- श्रियुः । अथ तत्रैव श्रीविद्याविजयनामकं स्वपदयोग्यं शिष्यं दीक्षयित्वा, श्रा० अहिवदेकारितां प्रतिष्ठां, पुनर्गन्धारबन्दिरेसा इन्द्रजीकारितां श्रीवीरप्रतिष्ठां, पुनः स्तम्भतीर्थे श्राधनाईकारितां प्रतिष्ठांच कृत्वा तत्र चतुर्मासी चक्रुः । ततः पारणे मेवातदेशादागतान् श्रीहीरसूरीन सीरोहीनगरे नत्वा स्तम्भतीर्थं पुन- रागत्य प० वजिआराजिआख्यकारितश्रीचिन्तामणिपार्श्वनाथप्रतिष्ठां कृत्वा, क्रमेण १६५४ वर्षे ऽहम्मदावादे भूमध्यान्निर्गतां श्रोविजयचिंतामणिपार्श्वमू- ति शकन्दरपुरेऽस्थापयत् । पुनस्तत्रैव वर्षे सा० मोटाख्यकारितां प्रतिष्ठां, पुनः दो० लहुआख्यकारितां प्रतिष्ठां कृत्वा लाटा [प] ल्यां ध्यानं विधाय क्रमात् श्रीगुर्जरतीर्थयात्रां श्रीसौराष्ट्र शत्रुञ्जयादितीर्थयात्रां च कृत्वा स्तम्भतीर्थे 10 श्रीविजयदेवसूरीणां सूरिपदं दत्वा पुनवर्पद्वयान्ते १६५८वर्षे पत्तने गच्छानुज्ञां नंदिच कृत्वा श्रीशङ्केश्वरतीर्थयात्रायै समेतात् श्रीआचार्यसंयुतान् श्रीपूज्यान द्वादशशतसंकटः सप्तशतीकरभतुरगोद्भटानेकसुभटविकटः सङ्घपतिहेमराजसङ्घो मरुस्थलीतः शत्रुञ्जययात्रार्थं व्रजन महोत्सवेन प्राणमत्। ततःश्रीगुरवो राजनगरे चतुर्मासी चक्रुस्तदा तत्रत्यैः श्राद्धैः श्रीगुरुवाप्रबुद्धैः पञ्चसप्तत्याद्यगुलाह- 15 प्रतिमाणां महाडम्वरविशिष्टाः षट्प्रतिष्ठाः कारिताः। पुनस्तत्रत्येन सं०सूरा- ख्येन प्रतिश्राद्धगृहं महिमुन्दिका प्रयच्छता श्रीअर्बुदाद्रिश्रीराणपुरादिसकलती- र्थयात्रामासूत्र्य क्षेमेणागत्य श्रीसूरीन् प्रणत्य महती प्रभावना कृता। किंबहुना तत्राब्दे श्राद्धैमहिमुन्दिकालक्षमेकं व्ययीकृत। ततो राजधन्यपुरे प्रतिष्ठाद्वयं पुनः स्तम्भतीर्थे प्रतिष्ठामेकामकव्वरपुरेच गंधारवन्दिरे च प्रतिष्ठाद्वयं कृत्वा क्रमेण 20 सौराष्ट्रराष्ट्रसङ्घाग्रहेण श्रीशत्रुञ्जययात्रां विधाय तत्रदेशे चतुर्मासकत्रयं प्रतिष्ठा- ऽष्टकं च कृत्वा रैवताद्रियात्रापूर्वं नवीननगरे ज्येष्ठस्थिति स्थित्वा श्रीजामना- मकं नृपं धर्मोपदेशतस्तुष्टं कृत्वा ततश्चलन्तः श्रीशंखेश्वरपार्श्व प्रणम्य राजन- गरे चतुर्मासी वहाडम्बरविशिष्टां प्रतिष्ठां चतुष्टगी च चक्रुः । इत्याद्यनेकसुक- त्यैर्जिनशासनं प्रभावयन्तोऽनेकसहस्रजिनप्रतिमाः पञ्चाशत्प्रतिष्ठासु प्रति- 25 ठापयन्तो विमलाचलतारङ्गनारंगपुरशद्धेश्वरपंचासरराणपुरारासणविद्या- ११ २ पट्टावली-समुथयः नगरादिपु जीर्णोद्धारान् पुण्योपदेशद्वारा कारापयन्तो हस्तसिद्धथा च श्रीगौत- मावतारा इव, बुद्धया चाभयकुमारा इव, विद्यया चाभिनववनकुमारा इव, कृतज्ञतया श्रीरामचन्द्रा इव, धैर्येण गिरीन्द्रा इव, आज्ञया च सुरेन्द्रा इव, एकस्यार्थस्य शतार्थित्वेन श्रीसोमप्रभसूरय इव श्रीविजयसेनसूरयोऽष्टौ वाच- कपदानि सार्द्धशतपण्डितपदानि च दत्वा द्विसहस्रीमितसंयतिसमुदायस्याशां 5 पूरयित्वा सवाईहीरविजयसूरिरितिबिरुधारका भट्टारकत्वं विंशतिवाणि प्रपाल्याकब्बरपुरे १६७१ वर्षे ज्येष्ठकृष्णैकादश्यां स्वर्ग जग्मुः । साहिअमे सिरिविजयदेवसूरी संवा तवगणतरणितुल्लो ॥१॥२१॥ पष्टितमे पट्टे श्रीविजयदेवसूरिः । तद्वृत्तमपि यथादृष्टं कियल्लिख्यते यथा श्रीराजदेशमण्डले ईडरदुर्गे सम्बत् १६३४ वर्षे जन्म । ततो नवमे वर्षे- 10 १६४३ वर्षे जनन्या सह दीक्षा । ततः १६५५ वर्षे पण्डितपदं । ततीनुक्रमेण १६५६ वर्षे स्तम्भतीर्थे सूरिपदं। तद्व्यतिकरो यथा-सर्वव्यवहारिश्रेणिशिरो- मणि सा० श्रीमल्लनामा स्वभ्रातृजन्मना सा० सोमाख्येन सह श्रीयांचार्यपद- स्थापनार्थनर्थव्ययं कर्तुकामः प्रकामप्रमोदेन मरुमेदपाटलाटसौराष्ट्रकच्छकुक- णादिदेशेषु गुर्जरदेशे च प्रतिग्रामंप्रतिनगरंकुंकुमपत्रिकाप्रेपणा पूर्वं सङ्घलो- 15 कान् सहस्रशः समाहूय तपागणयतियतिनीसप्तशतीमितपरिकरमाकारितवान्। अथ सकलसङ्घमिलनानन्तरं श्रीमल्लसाधुना बन्धुरताऽधरीकृतसुरमन्दिरे निज- मन्दिरे दिव्यदुकूलकमनीयमण्डपं शक्रमण्डपमिव निर्माय विज्ञप्ताः श्रीविज- यसेनसूरयो वैसाखशुद्धचतुर्थ्यां चतुर्थे रवियोगे कुमारयोगे मृगांकमृगशिरः संयोगाद् अमृतसिद्धियोगेऽपि च श्रीविजयदेवसूरिरिति नामस्थापनपूर्वकं 20 सूरिपदं ददुः । अथ श्रीमल्लसाधुना संतुष्टेन सङ्घभक्तिस्तथाचक्रे यथा कल्पवृक्ष एवाचमिति मेने । किंबहुना तस्मिन्महे सा० श्रीमल्लेन दशसहस्ररूप्यकव्ययः कृतः । ततस्तदनेतनदिने तत्रत्येन ठक्करकीकाख्येन तत्पदोत्सवनिमित्तमेवाष्टस- हस्ररूप्यकव्ययपूर्व प्रतिष्ठा कारिता । एवं सर्वसंख्यया श्रीविजयदेवसूरीणां पदमहे पंचाशत्सहस्रप्रमिता महिमुन्दिका व्ययिताः।ततः १६५८ वर्षे पत्तने 25 परीक्षकसहस्रवीरसंज्ञेन पञ्चसहस्रमहिमुन्दिकाव्ययपूर्वकं गच्छानुज्ञानन्दिम- .
श्रीतपागणपति-गुणपद्धतिः ८३ हश्चक्रे । अथ श्रीविजयदेवसूरयोऽहम्मदावादे प्रतिष्ठाद्वयं, पत्तने प्रतिष्ठाचतु- ष्टयं, स्तम्भतीर्थे प्रतिष्ठात्रयं बहुद्रव्यव्ययपूर्वकं कृत्वा स्वजन्मभूमौ श्रीइलादुर्गे चतुर्मासी चक्रुः । तदा तत्रत्यैः संघलोकैरनेके महोत्सवाः कृताः। तन्माहात्म्यह्रष्टो राजा श्रीकल्याणमल्लनामा [चिन्ता] मणिपाठिमहाभट्टचट्टवेष्टितः प्रतिश्रयं प्राप्तस्तकंवादमकारयत् । तदा तेपां सूरीणां पुण्योदयात्पार्श्ववर्तिभिर्वादिदर्प-5 सर्पगरुडरत्नैः पण्डितपद्मसागरगणिगीतार्थशिरोरत्तैरेव सर्वेऽपि भट्टास्तथा निर्जिता यथा लज्जिताः सन्तोऽहो गुरूणां गुरुतेति स्तुवन्तो राजेन्द्रमुख्याःखा- श्रयं प्रापुः । तदा तत्र महतीप्रभावना जाता। ततो वृहनगरे वीरप्रतिष्ठां कृत्वा राजनगरे चतुर्मासी स्थिताः । तत्रावसरे इलादुर्गे श्रीऋपभदेवविम्वं यवनैर्व्य- ङ्गितं ततस्तत्प्रमाणमेव नवीनं विम्वं श्राद्धैविधाप्य नटीपद्रे महत्यांप्रतिष्ठायां10 श्रीसूरिभिः प्रतिष्ठाप्य गिरिशिरःस्थचैत्यचैत्योद्धारपूर्वकं स्थापितं । ततोऽन्यदा श्रीमण्डपाचले श्रीअकबरपातिशाहिपुत्रजिहांगरश्रीसलेमशाहिः श्रीसूरीन् स्तम्भतीर्थतः सबहुमानमाकार्य गुरूणां मूर्ति रूपस्फूर्ति च वीक्ष्य वचनागोचरं चमत्कारमाप्तवान् । ततः समये श्रीगुरुभिः समं धर्मगोष्ठीक्षणे विचित्रधर्मवा- त्र्ता पृष्ट्वा साक्षाद् गुरुखरूपं निरुपमं दृष्ट्वा च स्वपक्षीयैः परैः प्राक् किंचिद् 15 व्युग्राहितोऽपि शाहिस्तदा तत्पुण्यप्रकर्षण हर्पितः सन् श्रीहीरसूरीणां श्री- वियसेनसूरीणां च पट्टे एत एव पट्टधराः सर्वाधिपत्यभाजो भवन्तु, नापरः कोऽपि कूपमण्डूकप्राय इत्यादि भूयः प्रशंसां सृजन जिहांगीरीमहातपाबि- रुदं दत्तवान् , अनुज्ञापितवांश्च तपागच्छश्रावकेन्द्रचन्द्रपालादीन यदस्मदीय- दक्षिणीयमहावाद्यवादनपूर्वकं गुरून् स्वाश्रयं प्रेपयन्तु यथा युप्मद्गुरून् 20 वयमपि गवाक्षस्था निरीक्ष्य हृष्टा भवामः । इत्यादिवचनोत्साहितैस्तै राज- मान्यसंधैर्दाक्षिणात्यमालवीयसंधैश्च तथा महोत्सवाः कृता यथा तपागण- सङ्घमुखे पूर्णिमाऽवतीर्ण अन्येषां च गुरुद्विपां मुखेऽमावास्येति । किंबहुना ? यथा पुराऽकब्बरेण श्रीहीरसूरयस्ततोऽप्याधिक्येन श्रीविजयदेवसूरयः शाहि- जिहांगीरेण सन्मानिता इति । अथ श्रीगुरुवो गुर्जरदेशान्तर्भूत्वा सौराष्ट्रदे- 25 शसुन्दरे द्वीपवन्दिरे फरङ्गीपातशाहिप्रदत्तव्याख्यानानुज्ञापूर्वं चतुर्मासकद्वयीं .
८ ४ पट्टावलौ-समुच्चयः । च कृत्वा क्रमेण हलारदेशे श्रीनवानगरे चानेकलोकान बोधिदानेन सुखयन्तः श्रीशत्रुञ्जये यात्रां विधाय स्तम्भतीर्थे चतुर्मासकं च निर्माय सावलीस्थाने. सोनीरत्नसीक्रियमाणामारिपटहादाने तीघ्रक्रियाकष्टानुष्ठानपूर्वकं सूरिमंत्र- सत्कं मासत्रयध्यानं विधायाक्षयतृतीयायां सभामभ्येयुः। ततस्तत्रैव चतुर्मासी प्रतिष्ठाद्वयीं च कृत्वा श्रीइलादुर्गे प्रतिष्ठात्रयं कृतवन्तः । ततः संघेन सार्द्ध । श्रीधारासणादितीर्थयात्रां छुर्वाणाः पोसीनाख्यपुरे पुराणानां पंचप्रासादानां श्राद्धानामुपदेशद्वारेण वहुद्रव्यव्ययसाध्यमपि तदुद्धारं कारितवन्तः । क्रमेण चारासणे मूलनायकाः पुनः प्रतिष्ठाविपयीकृत्य स्थापिताः । कालान्तरेण च इलादुर्गे श्रीकल्याणमलनरेन्द्राग्रहादागत्य तत्रस्य सासहगृहे महामहेन- १६८१ वर्षे वैशाखशुद्धपप्ठ्या श्रीविजयसिंहसूरीन् स्वपदेऽस्थापयत् । 10 . तन्महोत्सवात्तुष्टः कल्याणराजोऽपि रणमल्लचोकीनामके गिरिशृंगे. श्रीगुरुन् समाहूय धर्मगोष्टी विधाय तत्स्थानं नवीनचैत्यस्थापनाय गुरुपुरः प्राभृतीकृतवान् । अथ च तत्र चैत्यमद्यापि निष्पाद्यमानमस्ति । ततश्चतुर्मा- सान्ते मरुदेशसाधनाग्रहात् श्रीगुरवोऽनूचानान्विता अनेकलोकपतिवृताः श्रीअर्बुदाचलतीर्थं नमस्कृत्य सा० तेजपालेन विधीयमानां महामहमनोहरां 15 श्रीसोरोहीमागत्य चतुर्मासी तस्थुः । तत्र च श्रीजावलपुरप्रमुखतत्परिसरसंध: लोकैङ्गमं तीर्थमागतं मन्यमानैर्वहुतरद्रव्यव्ययपूर्वकमागत्य वन्दिताः । तत्रावसरे सादडीसत्कलुम्पाकैश्चैत्यार्चाद्यसद्भावविपरिणी महती जिनशास- नाशातनां कृता। ततस्तत्रत्यर्निर्बलैः श्रावकैः सीरोह्यामागत्य श्रीगुरको विज्ञप्ताः यद्युष्मादृशेषु गुरुपु सत्सु वयं वराकैर्लम्पाकैः पराभूताः स्मतेनास्मत्सा-20 हाय्यं विधीयताम् । इत्युक्तेः शीघ्रमेव गुरुप्रेपितैर्गीतार्थैरेव तत्र गत्वा तद्व प- घारिणो भास्करैयूं का इव मूकता प्रापिताः। ततोऽप्युदयपुरे मेनपाटदेशाधीश- राणाश्रीकर्णसिंहपावें गत्वा छन्दःकाच्यादिभिस्तं तोपयित्वा सकलराजलो- कपरिकलितायां पर्पदि लुम्पाकान् वादे विजित्य “तपाः सत्यालुझाश्चासत्याग इति श्रीराणाजीसत्कं सहीत्यक्षरद्वयीकुंतांङ्कितं स्फुरन्मानमानीय सादडीचतु-25 पट्टे वाचयित्वा गुरूणां प्रसत्तेस्तपागच्छनौढिः. प्रौढतमा निम्मिता.। ततो श्रीतपागणपति-गुणपद्धतिः योधपुराधीश्वरराजश्रीगजसिंहजीमान्यपरमप्रधानमंत्रिजयमल्लेन श्रीजालोर- दुर्गे श्रीगुरूनाकार्य वहुतराडम्बरेण प्रतिष्ठात्रयमन्तरान्तरा चतुर्मासकत्रय- कारापणपूर्वक स्वर्णगिरिशी चैत्यत्रय च प्रतिष्ठापितम् । १६८४ वर्षे पुनर्जयमल्लमंत्रिणा सहस्त्रशो रूप्यकव्ययेन विजयसिंह- सूरीणां गच्छानुज्ञानन्दिकारिता । ततो मेडतानगरे प्रतिष्ठात्रयं विधाय वि-5 न्ध्यपुरे चतुमासीस्थितान् गुरून् ज्ञात्वा गच्छोयगीतार्थरञ्जितेन राणाश्रीजग- सिंहजीकेन श्रीवरकाणके पौपदशम्यां समागतानां लोकानां शुल्कमोचनं तदाघाटरोपपूर्वं ताम्रपत्रेणोत्कीर्य श्रीगुरूणां पुरः प्राभृतीकृतं तत्कदाप्यभूत- पूर्वं सर्वेषामद्भुतकृत् सञ्जातम् । ततो राणपुगदिपु तीर्थयात्रां कृत्वा झाला- श्रीकल्याणजीकेन संमुखमागत्याकारिताः श्रीमेदपाटदेशं पवित्रयन्तः प्रथमं 10 षमणोरनामे प्रतिष्ठाद्वयं ततो देवकुलपाटके प्रतिष्टामेकां, ततो नाहीग्रामे अघोटानगरे चेति प्रतिष्ठापंचककरणपूर्वकं श्रीउदयपुरे चतुर्मासी चक्रुः । तत- स्तत्पारणके गुर्जरत्रां प्रतिचिचिलीपून दलबादलमहलमध्यस्थितान् श्रीगुरून श्रीजगतसिंहजीसंज्ञको राणकोऽपि नंतुमागतश्चिरं गुरूमुखचन्द्रे चकोरी- कृतचनुस्तदेशनाऽसमसुधां पीत्वा प्रीतः प्रकामं सत्कारसन्मानादि दत्वा 15 गुरूपुरश्चतुरो जल्पान् प्रपन्नवान् । तथाहि-अद्यप्रभृति पिछोलके उदयसागरे च तटाके मीनजालानि निपिध्यति १, राज्याभिषेकदिने गुरुवारे जीवामारिः कार्या २, स्वजन्ममासे स्वजन्ममासे भाद्रपद्राभिधे जीवहिंसा न कार्या ३, मचिंददुर्गे कुम्भलविहारे जीर्णोद्धारः कार्यः ४-इति जल्प- चतुष्टयीग्रहणाभिग्रहवन्तं भूमिकान्तं वीक्ष्य सकला अपि लोका भृशमा- 20 श्चर्यभाजोऽहो ! गुरूणां कोऽपि लोकोत्तरो महिमातिशय इत्यादिवर्णनपरा जाताः । किंबहुना श्रीकुमारपालभूपालेन श्रीहेमसूरय इव, श्रीराणाजी- केन श्रीगुरवो बहुमेनिरे-इत्यादयः · कियन्तोऽवदातो. . लिख्यन्ते । सौभाग्येनाभिनववसुदेवावतास साक्षाद्धन्यागारा इव, इव, 25 ध्यानमौनक्रियाकप्टानुष्ठानादिना श्रीभद्रबाहुस्खामिन इव, निर्विकृतिविकृतित्यागेन प्रायो भक्तजनगृहाहारत्यागेन च श्रीमानदेवसूरय यतस्तपसा - 10 '२६ पट्टावली-समुच्चयः इव श्रीविजयदेवसूरयः सूर्या इव भरतभूमिपनिनी प्रतिबोधयन्तो मालव- मण्डले उज्जयिन्यादौ दक्षिणदेशे च बीजापुर-वानपुरादौ कच्छदेशे च मुजनगरादी मरुदेशे च जाबालपुर-मैदिनीपुर-घंघाणीग्रामादौ जीर्णो द्धारकारापणपूर्वकमनेकशवाईत्प्रतिमाः प्रतिष्टयन्तोऽनेकपण्डितपदानि पाठ- कपदानि स्थापयन्तो दर्शनादेव हीन्दूतुरुष्कादीनामपि चमत्कारं कुर्वन्तो 5 जीवहिंसादिनिषेधनियमांश्च कारयन्तः सिरिविजयसीहरिप्पमुहेहिं णेगसाहुवग्गहि । परिकलिया पुहषिअले, विहरिता किंतु मे मदं ॥२॥२२॥ श्रीविजयसिंहसूरि-प्रभृत्यनेकशतसाधुभिः परिवृताश्चिरं पृथ्व्यां वि- हुरन्तो 'भद्रं दिशन्तु कल्याणं कुर्वन्विति गाथार्थः ।। तथा स्तम्मतीर्थवासिना सा० देवचन्द्रेण देवीभूय स्खे द्वे भार्ये सं० १६७३ वर्षोत्पन्नोपाधिमतमोचनाय भृशं प्रोक्तमपि तन्मतं न त्यजतस्तदान्यदा तदीयश्राद्धजेमनवारायां जायमानायां तेन देवेन तत्र पाषाणवृष्टिस्तथा कृता यथा मुक्तिं त्यक्त्वा सर्वेषु नष्टेषु तं देवं प्रकटीभूतं ते प्रोचतुस्त्वं कोऽसि कथं चावां भापयसि ? इति प्रोक्ते सो- 15 ऽवोचत्-अहं भवद्भर्ता देवचन्द्रो देवीभूतोऽन्यैः सप्तभिर्देवैः सह श्रीविजयदे- वसूरीणां सांनिध्यं कुर्वाणोऽस्मीति तेन भवतीभ्यामपि स एव गुरुरङ्गीकार्यो येन मद्भयं न भवतीति प्रोक्ते ते अपि श्रीगुरुभक्ते जाते इत्येकं देवसांनिध्यम् १ । तथाऽनयैवरीत्या घोघाख्यबन्दिरवासी सा० सोमजीनामा स्खं कुटुम्बं प्राक्- पराङ्मुखमपि देवीभूय प्रतिबोध्य च श्रीविजयदेवसूरिभक्तं कृतवानिति 20 द्वितीयम् २ । तथा श्रीविजयदेवसूरिषु मण्डपाचलं प्रतिचलत्सु सेहरषीनाम-. ग्रामस्वामिपुत्रः कमाख्यः परमारः। स च पूर्व भूतातत्वेन लोकान् मारयन् पित्रा निगडितस्तदा गुरुवासक्षेपेणैव सज्जीभूत इति महदाश्चर्यकृज्जातमिति तृतीयम् ३ । तथा राजनगरवासी वणिकपुत्रः सप्तवर्षाणियावच्च प्रथिलोऽभूत् उतपिन्नादिमिः श्रीविजयदेवसूरिकरौपः कारितस्तत्कालमेव सज्जो जात-25 श्रीतपागणपति-गुणपद्धतिः श्वेति महद्भुतमिति चतुर्थम् ४ । तथा मेडतावासी पीमसरागोत्रीयः साथा- नाख्यो नवमासार याव क्षेत्रपालगृहीतोऽन्यदा श्रीविजयदेवसूरिवासक्षेपेण सज्जोऽजनि, इति सर्वलोकप्रसिद्धमिति पञ्चमम् ५। तथा मरदेशे गुर्जरदेशे दुर्मिक्षेमहति सत्यपिश्रीगुरुपु समागते महत् सुभिक्षं जातमित्यादि श्रीविज- यदेवसुरीणां देवसानिध्य बहुशो दृष्टमिति xIRI इति गाथाद्वयं पूर्वपट्टावल्यां प्रयोज्यम् । तपगणपतिगुणपद्धति-रेपा गुणविजयवाचकैलिलिखे । गन्धारबन्दिरीय श्रावकसा० मालजीतुष्ट्यै ॥ १॥ इति गुर्वावली प्राचीनगुर्वावल्याः पुरोऽनुसन्धीय सुधीभिर्वाचनीया । ॥ श्रीमंगलमस्तु ॥ 5 10 x हस्तलिखितनथे अयं पाठः प्रान्ते लिखितोस्ति, किन्तु अन्न द्वितीय- गाथावृत्या अन्त एव मुद्रितः सुकरवाय ॥ १-श्रीमुनिसुन्दरसूरिशिष्यः श्रीलक्ष्मीभद्रः । ततो लक्ष्मीभद्रीया शाखा निर्गता, तस्यां श्रीहेमविमलसूरिशासनकाले शुभविमला अभूवन् । तच्छिप्यामरविजयस्तच्छिष्यकमलविजयाः । येषां वाचकौ उ० गुणविजयगणि: उ० कुशलसागरगणिश्च प्रज्ञांशाः १५ एवं शिन्याः ७० ॥ तच्छिष्यःकविमुख्यो हेनविजयो विजयप्रशस्तिकाव्यकर्ता, द्वितीयःशिष्यो विद्याविजयस्तच्छिप्यः उ० गुण- विजयः विजयदेवसूरिलानिध्यात् वि० सं० १६८८ व ज्ञानपंचम्यां विजयप्रशस्ति- कान्प्रटीका-विजयदीपिकाकर्ता तपागणपतिगुणपतिकर्ता घेति ।
. - अनुपूर्तिः-२ श्रीतपमच्छ पटाकली सूत्रत्यनुसंधानन् ( कर्ता-उपाध्यायमेघविजयगणिः) - 1 ऐं श्रीवीतरागाय नमः। अथ प्राक्तनपट्टावलीसूत्रान्तसंहितगाथात्रयव्याख्या यथा- श्रीविजयसेणसूरी, पट्टे गुणसहिम सुगुणसिढे । चाए साहिसहाए, जेण हविओ स जिणधम्मो ॥१॥२१॥ सिरित्ति । श्रीमजगद्गुरुविरुदधारिमहाराजाधिराजपातिसाहिश्रीअक-5 व्बरप्रबोधकारिश्रीहीरविजयसूरिपट्टे एकोनपष्टितमे श्रीविजयसेनसूरिभगवान् जज्ञे। किं विशिष्टः ? सुगुणैः श्रेष्टः-गुणाः स्वभावजा ज्ञानादयो विभा- वजा औदार्यादयस्तैरतिशयेन प्रशस्यो वर्णनीयः । येन स्वामिना वादे उप- स्थिते श्रीसाहिसभायां स जगत्प्रसिद्धो जिनधर्मः अर्हतां शासनं स्थापितं प्रामाणिकयुक्त्या साधितः । इत्यनेनास्यभगवतः पाण्डित्यातिशयो ध्वन्यते 110 तस्य च प्रभोर्विक्रमात् सं०१६०४वर्षे नारदपुर्या वृद्धोपकेशशाखीयधोषा- गोत्रभृत् सा० कमा तद्भार्या कोडीमा तयोगृहे जन्म । सं० १६१३ वर्षे मात्रा पित्रा च सह श्रीविजयदानसूरिहस्ते श्रीहीरविजयसूरिनिश्रया दीक्षा। सं० १६२६ पंन्यासपदं, सं० १६२८ वर्षे फाल्गुणसितसतम्यां श्रीअहम्मदावाद- नगरे उपाध्यायपददानपूर्वं आचार्यपदं, सं० १६५२ वर्षे भाद्रसितैकादश्यां 15 तिथौ भट्टारकपदम् । ते च श्रीगुरवो भट्टारकत्वं विंशतिवर्षाणि प्रपाल्य श्री स्तम्भतीर्थे सं० १६७१.वर्षे ज्येष्ठशुक्लैकादश्यां स्वर्गमलंचक्रुः। एतच्चरितं विस्तरतो विजयप्रशस्तिकाव्याद्यम् । किंचिलिख्यते-- .
६९ तपागच्छ-पट्टावली श्रीगुरुभिः सं० १६३२ वर्षे चांपानेरदुर्गे समहोत्सवमनेकाहत्प्रति- माशतानां प्रतिष्ठा कृता । तथा सूरतिबंदिरे श्रीचिन्तामणिप्रमुखानेकसभ्य- भट्टसमक्षं श्रीभूपणनामा दिगम्बराचार्यों निर्जितः । तथा 'नमो दुर्वाररागा- दि-' इत्यस्य श्रीयोगशास्त्राद्यश्लोकस्य सप्तशतान्याः सूक्तावल्यादिग्रन्थाश्च कृताः । तथा राजनगरे श्रीखांनखानाख्यनवाबपर्षदि जैनधर्मव्यवस्थापनेन 5 जयश्रीरलंकृता । तत्रैव च श्रीविद्याविजयनाना स्वपदयोग्यं शिष्यं प्रव्राज्य श्री साहिवदेकारिता प्रतिष्ठा चक्रे । ततो गन्धारबन्दिरे सा० इन्द्रजीकारितां प्रतिष्ठां श्रीवीरस्य कृत्वा स्तम्भतीर्थे श्रीधनाईकारितां प्रतिष्ठां विधाय श्रीसूरय- स्तत्रैव चतुर्मासी चक्रुः। अत्रान्तरे श्रीहीरविजयसूरिपु विद्यमानेष्वपि एपांश्रीसूरीणांगुणा-10 तिशयाकर्णनादुत्कएठाभाजः पातिसाहिश्रीअकव्वरसम्राजःश्रीसूरीन लाभपुरे आकार्य श्रोहीरसूरीश्वरकुशलप्रश्नपूर्वं धर्मवाती पप्रच्छुः । तत्र गुरुवचश्चा- तुर्यरञ्जिता मुख्य शिष्यकृताष्टावधानदर्शनाच्चमत्कृताः साहिपादाः श्रीगुरूणां बहुगौरवं चक्रुः । तदा केनचिट्ठन 'अमी जैना जगदीश्वरं सूर्य गंगां च न मन्यन्ते' इत्युक्ते श्रीसाहिसमक्षं पंचशतभट्टीः सार्धं श्रीगुरुभिर्विवादं 15 प्रारमे। यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वेदान्तिनो वौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटवः कर्मेति मीमांसकाः। अर्हन्नित्यथ जैनशासनरताः कर्तेति नैयायिकाः, सोऽयं वो विदधातु वाच्छितफलं त्रैलोक्यनाथो हरिः॥१॥" 20 इति श्रीहनुमाननाटकोक्तेन, तथा "अधामधामधामेदं, वयमेव स्वचेतसि । यस्यास्तव्यसने प्राप्ते, त्यजामो भोजनोदके ॥२॥ तथा गङ्गोदकं विना नास्माकं देवप्रतिष्टा स्यात् । इत्यादि युक्तिभि- स्तदा भट्टा विजितास्तेन श्रीसाहिपादास्सप्रसादाः श्रीगुरूणां 'काली सरस्वती', १२ 8. . पट्टावली-समुच्चयः इति बिरुदं दत्तवन्तः । गो १, वृष २, महिष ३, महिषी ४, वध-मृतद्रव्यादान ५, बन्धरोध ६,निषेधरूपपड्जल्पस्फुरन्मानं श्रीसाहिभिदत्वा लाभपुरे अत्या- ग्रहेण चतुर्मासिकद्वयं श्रीगुरूणां कारितं, ततः श्रीहीरविजयसूरिभिरबाधाव- शाद् विजयसेनमुखान्नियामनामिच्छद्भिराकारिता। श्रीसाहिपादानापृच्छय श्रीसूरयश्चतुर्मासिकमध्येऽपि चलन्तः पट्टननगरं प्रापुः । तदा सं० १६५२ 5 वर्षे भाद्रसितएकादश्यां प्रातर्जातं श्रीहीरसूरीश्वरस्वर्गमनं श्रुत्वा तत्रैव तस्थुर्भ- द्वारकत्वेन सुमुहूर्ते समहोत्सवं श्रीगुरुपट्टमलंचक्रुः । ततः क्रमेण श्रीगुरुभिः स्तम्भतीर्थे १० राजयाविजयाख्यकारितां श्रीचिन्तामणिपार्श्वबिम्बप्रतिष्ठां कृत्वा सं० १६५४ वर्षे अहम्मदावादे भूमध्यान्निर्गतश्रीविजयचिन्तामणिपा- पार्श्वबिम्बस्य शकन्दरपुरे स्थापनां चक्रे, तथा अहम्मदपुरे साल्भोटाकारिता 10 तथा सा० लहुयाख्यकारिता च प्रतिष्ठां विदधे । समये च लाडोलिग्रामे सूरि- मंत्रध्यानं विवाय श्रीस्तम्भतीर्थे श्रीविजयदेवसूरीणां सूरिपदं दत्त्वा पत्तनन- गरे तेषां गणानुज्ञा नंदि श्रीगुरवः कृतवन्तः । तत्र च पञ्चसप्तत्याचंगुलाहत्प्र- तिमानां पदप्रतिष्ठारच, तदा संघपतिश्रीहेमराजसंघो मरुस्थलीतः श्रीशत्रुजय- तीर्थयात्रार्थं व्रजन सप्तशताश्ववारकटकद्वादशशतशकटसंयुक्तः श्रीगुरुतत्रा- 15 भ्येत्य वन्दितवान् स्वर्णरूपमुद्राभिरर्चितवांश्च । तद्दर्शनाद्राजनगरवास्तव्य सा० सूराख्यः श्रीगुरूपदेशेन मार्गे प्रतिश्राद्धगृहं महमुन्दिकालभनिकां कुर्वन् श्रीअर्बुदाचलश्रीराणपुरादितीर्थेषु मरुदेशे अनेकनगरसंघेन समं तीर्थयात्रां विधाय निर्विघ्नं प्रत्यागत्य श्रीगुरुननाम । तद्वत्सरे श्राद्धैर्लक्षमहमुन्दिकाव्य- यश्चक्रे ।तदनु श्रीगुरवो राजधान्यपुरे प्रतिष्ठाद्वयं, पुनः स्तभतीर्थे प्रतिष्ठात्रयं, 20 गन्धारवन्दिरे प्रतिष्ठाद्वयं विधाय सुराष्ट्रदेशे विजह्वः। तत्र चतुर्मासकवयंप्रति ष्ठाष्टकं श्रीसिद्धाचलश्रीगिरनारिप्रमुखमहातीर्थयात्रास्तत्रत्यसंघेन सह कृतवन्तः ततो हल्लारदेशे नवानगरे चतुर्मासी विधाय तद्देशपतिजामराजोऽपि धर्मोपदेशः श्रीगुरुभिः प्रमोदितः। इत्येवं नानादेशविहारैः भूतलं पवित्रयन्तः श्रीगुर- वोऽनेकजीवान,प्रत्यनुधन ,पञ्चाशजिनप्रतीष्ठाँश्चक्रुः । अष्टौ वाचकपदानि25 सार्धशतं पण्डितपदानि ददुः। द्विसहस्रयतिपरिवृताः "सवाईश्रीहीरविजय , 1 5 तपागच्छ-पट्टावली सूरयइति विरुदं विभ्राणाः श्रीविजयसेनसूरयः प्रवचन बहूनि वर्षाणि प्रभा- वयामासुः । प्रान्ते च विजयदेवसूरीश्वरान् विश्वलनगरे च संघाग्रहात्समनु- ज्ञाप्य स्वयं श्रीस्तम्भतीर्थे सर्वातिचारलोचनपूर्व कृतानशनाः समाधिना सं० १६७१ वर्षे ज्येष्ठसितएकादश्यां श्रीगुरुवः स्वर्गमलंचक्रुः । तत्राद्यापि बहु- वित्तव्ययेन संघकारितं स्तूपं जयतीति गाथार्थः ॥१॥ तप्पट्टे सूरसमी, साहितमोविजयदेव सूरिगुरू । साहिजहांगीरेणं, महातवास्सित्ति वद्ध...हो......॥२॥ ध्या० 'तत्प?' इति-1 तत्पी प्रकाशकत्वात्सूर्यसमः तपस्तेजसा पष्ठितनः श्रीविजयदेवसूरिनाम्ना गुरुर्बभूव । किं विशिष्टः ? साहिना-पातिसा- हिना-श्रीअकबरभूपालजन्मना श्रीजहांगीरेण 'महातपा' इति कृतनामा, 10 इत्यनेनास्य सूरेः तपःप्राधान्यं व्यञ्जितम् । अनेकशः पष्ठाष्टमादिभिः विंश- विस्थानकाद्युत्कृष्टतपश्चरणात् यावज्जीवमुपावासाचाम्लनिर्विकृतिकस्थानभ- तपानरूपनित्यतपःकरणात्तस्य च प्रभोर्विक्रमात्सं० १६३४ वर्षे ईडरदुर्गे वृद्धोपकेश 'ओछतवाल' गोत्रभृत् सांधिरा तद्भार्यारूपा । तयो हे जन्म । सं० १६४३ वर्षे जनन्या सह दीक्षा । सं० १६५५वर्षे पण्डिपदम् । सं० १६५६ 15 वर्षे वैशाखशुक्लपष्ठया उपाध्यायपदपूर्व प्राचार्य्यपदं । सं० १६७१ वर्षे भट्टारकपदं सं० १७१३ वर्षे श्रीउनानगरे आपाढदेवशयनैकादश्यां प्रातः- काले ऽष्टमभक्तेन स्वर्गप्राप्तिःतत्र स्तूपं भणशालीरायचंदकारितं, श्रीहीरगुरोर्मु- ख्यस्तूपपार्श्वे समुद्रतीरेऽस्ति । तस्य भगवतो द्वितीयस्वर्गोत्तरदिशि देवत्वेनावत- रणम् । इष्टदेवेन निजाराधकानामुक्तं श्रद्धेयमेव । यतो नाना देवः सर्वत्र 20 नरदेवमान्यः । प्रकृत्यापि देवपट्टादर्शादिपु देवाराधकः देवसांनिध्यवान् । अत- ; स्तदुक्तस्य युक्तत्वात् । अत एव देवशयनैकादश्यां देववेलायां स्वर्गतिरिति । एतच्चरितं खरतरमतीयश्रीवाचनाचार्यश्रीवल्लभकृत 'विजयदेवमाहात्म्य' काव्यात्तथा मत्कृतमाघसमस्यारूप देवानन्द'काव्यात् ज्ञेयम् । समासस्त्वेवं- श्रीमतामेपां गुरूणां सूरिपदोत्सवे स्तम्भतीर्थेऽनेकदेशग्रामनगरसंघा- 25 द्वानेन सप्तशतीमुनिपरिवृतान् श्रीविजयसेनसूरीन् बहुधा विज्ञप्य स्ववेश्मनि - - हर पहावली-समुनयः द्विधापि विमानश्रियं दधाने सुपर्वशोभाभासुरे प्रचण्डमण्डपाडम्बरेण विचि- त्रराजवादिवनिर्घोषैर्नभसि गर्जति सति सर्वसंघभोजनपरिधापनादिभिः श्रीमल्लनामश्रेष्ठिना स्वभ्रातृसोमान्वितेन दशसहस्त्ररूप्यकव्ययेन भहती प्रभावना चक्रे सुमुहूर्ते श्रीगुरुभिः सूरिपदं प्रदाय 'श्रीविजयदेवसूरिः' इति नाम संदधे । तदा पुनस्तदुत्सवनिमित्तमेवाप्टसहस्ररूप्यकव्ययेन ठकरकी- 5 काख्येन प्रतिष्ठा कारिता पुनश्चैपां सं० १६५८ वर्षे परीक्षकसहस्त्रवीरेण पञ्चसहस्रमहमून्दिकाव्ययेन कृतोत्सवपत्तने गणानुज्ञानन्दिमहो महान् जज्ञे । तथा श्रीविजयदेवसूरिभिः प्रतिष्ठाद्वयं राजनगरे, प्रतिष्ठाचतुष्टयं पत्तने प्रतिष्ठात्रयं स्तम्भतीर्थे सातिशयमहोत्सवपूर्व चक्रे । इलादुर्गे च श्रीकल्याणमल्लराजप्रबोधनात्तत्सभास्थितान्भट्टान् पं0 10 श्रीपद्मसागरगणीनामाज्ञादानेन जापयित्वा राजाग्रहात्तत्र चतुर्मासी चक्रे । तदा च तत्रत्यगिरिशिरसि प्रभूपदेशात् श्रीऋपभदेवबिम्ब नवीनचैत्योद्धारपूर्व श्राद्धैर्नटीपद्रे महदाडम्वरेण प्रतिष्ठायां श्रीगुरुभ्य एव प्रतिष्ठाप्य स्थापयामास । अत्रान्तरे सं० १६७३ वर्षे कतिचिदुपाध्यायैः संभूय कतिचिल्लोकान् स्वायत्तीकृत्य आग्रहबुध्या स्वकीयमतं प्रादुष्कृतम्तन्मतवासिते च स्वकीये 15 भार्ये द्वे सा० देवचन्द्रेण स्तम्भतीर्थवास्तव्येन मृत्वा देवीभूतेन तन्मत- श्राद्धजेमनवारायां पाषाणवृष्ट्या संतयं “अहं भवत्योमा देवचन्द्रः सप्तदशभिर्देवैः श्रीविजयदेवसूरीणां सांनिध्यं कुर्वाणोऽस्मि तद्भवतीभ्या- मप्ययमेव पारंपर्यागतः श्रीगुरुः सेव्यः" इत्युक्त्वा श्रीगुरुभक्ते कृते, इत्यद्भुतदेवसांनिध्यादनेकशो लोकाः कुमतानि परितत्यजुः । तथा घोघाख्यवन्दिरवास्तव्य सा० सोमजीनाम्ना स्वकुटुम्बं पूर्व धर्मा- भ्रष्टं देवीभूय प्रागुक्तवत्प्रबोध्य श्रीगुरोर्भक्तं चक्रे । तदतिशयश्रवणान्महा- राजश्रीजहांगीरपातिसाहिः श्रीसूरीन् सबहुमानमाकार्य श्रीमण्डपाचले श्रीगुरुमिः समं धर्मप्रश्नादिवार्ता विदधे। तदा सुधासमानदेशनाश्रवणेन तपस्तेजोमयमूर्तिदर्शनेन भृशं तुष्टः श्रीसाहिराजोऽयं गुरुमहातपा इति बिरुदं 25 दत्तवान् । सदनु लब्धयशोवादा. श्रीसूरिपादाः श्रीसाहिना स्वयंमनुज्ञापित 20 तपागच्छ-पट्टावली स्वकीयदक्षिणीय महावाद्यवादनादिभिः श्रीचन्द्रपालादिसमृद्धश्राद्धैः सोत्सवं प्रतिपदं सुवर्णमुद्राणां न्यूछनकेपु क्रियमाणेपु भट्टचारणादिमार्गणानां मार्ग यादृच्छिकदानेन सहर्पमुपाश्रये पादावधारणं चक्रुः । किं बहुना, श्रीजिन- प्रवचनप्रासादे कलशारोपणमिदमद्भुतं प्रासीसरत् । ततो गूर्जरत्रां पवित्री- कृत्य सुराष्ट्रदेशे द्वीपबन्दिरे फरंगीपातिसाहिप्रदत्तव्याख्यानानुज्ञापूर्वं चतु-5 सिकद्वयं हल्लारदेशे तद्देशस्वामिभक्त्यनुरोधेन कतिचिदिनावस्थानं च कृत्वा स्तम्भतीर्थे चतुर्मासकं तस्थुः । अत्रान्तरे उपाध्यायपातिकै सागरपाक्षिकैश्च क्रियमाणं जनव्युद्गा- हमवेक्ष्य श्रीसावल्यां श्रीगुरुवो ध्यानं विधुः । मासत्रयं ध्यानेनाधिकप्रवृद्ध- धामानः परेषां द्रष्टुमपि दुष्प्रेक्षास्तत्रैवप्रतिष्ठाद्वयं चतुर्मासी च कृत्वा 'इला' 10 दुर्गे प्रतिष्ठात्रयं संघेन समं तद्देशतीर्थयानां कृत्वा क्रमेण 'पारासणे' मूल- नायकप्रतिष्ठां चक्रुः। कालान्तरे च 'इला'दुर्गेऽभ्येत्य सा सहजू'–कृतमहोत्सवेन सं० १६८१ वर्षे वैशाखसितषष्ठयां श्रीविजयसिंहसूरीन् यौवराज्येऽस्थापयत् । तदा तद्देशभूपेन 'रणमल्लचोकी' नामकं गिरिशृङ्ग गुरूपदेशान्नव्यचैत्य- 15 स्थापनाय संघस्य प्रसादीकृतम् । ततः सीरोह्यां चतुर्मासककरणादनु 'जावालक पुरे समागत्य श्री- गुरुराजाः 'सादड़ी-ग्रामे गीतार्थाननुज्ञाप्य लुम्पाकपाक्षिकान् .श्रीउदयपुरे राणाश्रीकर्णसिंहसमक्षं सभायां पादपूर्व निरुत्तरान् कारयामासुः। ततः श्रीतपागच्छनौढिमहता बभूव । तत्र च श्रीयोधपुराधीश्वरश्री- 20 गजसिंहराजस्य मुख्यमान्यश्रीज़यमल्लनाम्ना 'जालोर' दुर्गे प्रतिष्ठात्रयमन्तरा- न्तरा चतुर्मासकत्रयं श्रीगुरूणामत्याग्रहेण कारयित्वा स्वर्णगिरौ चैत्यं स्वका- रितं प्रतिष्ठापयामासे। सं० १६८४ वर्षे सहस्रशो रूप्यकव्ययेन श्रीविजयसिंहसूरीणां गणानु- ज्ञानन्दिमहोत्सवः कारितः । तदनु 'मेडतानगरें' प्रतिष्ठाद्वयं विधाय'वन्ध्य-25 नगरें' चतुर्मासीस्थितान् श्रीगुरून् श्रुत्वा तन्माहात्म्यश्रवणेन. तुष्टो राणाश्री- - पट्टावली-समुचयः जगत्सिंहजीनामा श्रीवरकाणकपार्श्वयात्रार्थागताना लोकानां पोपदशम्यां शुक्लमोचनं चक्रे । पारणायां च त्वरितमेव स्वप्रधानमालाश्रीकल्याणजीकस सन्मुखप्रेपरणेन श्रीगुरुन् दर्शनोत्कएठया चाजुहाव । ततः श्रीगुरुपादाः 'पमणोरग्रामे' प्रतिष्टाद्वयं, देवळुले चैकप्रतिष्ठा, तबो 'नाहीग्रामे आघाटपुरें चेति प्रतिष्ठापञ्चकं कृत्वा श्रीउदयपुर राणजी । "संयाग्रहाच्चतुर्मासी विधुतना गुरूपदेशाद् राणाश्रीजगसिंहजीनान्ना चतुरो जल्पाः प्रपन्नास्तचया- (१) अद्यप्रभृति पीवाला-उदयसागरनामसरोद्वये मीनग्रहरण- जालनिषेधः। (२) राज्याभिषेकदिने गुरुवारे जीवामारिः कार्य। (३) जन्ममासे भाद्रपद च जोरहिंसा न कार्या। (४) मचिन्ददुर्गे श्रीकुम्भाराणाकारितजैनत्योद्धारश्च कार्यः । ततोऽत्यन्तं श्रीजिनशासनोन्नविर्ज। तदनुक्रमेण गूर्जरधरायां द्वित्रीणि वणि विहत्य सुराष्ट्रदेशेन तत्सि- द्धाचलरैवतकादितीर्थयात्रा संघावगमनेन कुर्वाणाः परमगुरवः प्रतिष्टात्रयं 15 चतुर्मासीद्वयं च कृत्वा इस्लारदेशे नवीननगरे तद्देशेश्वरलाक्षाभिधानयाम (नाम) प्रतिवोधनेन चतुर्मासी कृतवन्तः । अत्रान्तरे दक्षिणप्रदेशे कन्हडदेशे श्रीबीजापुरादिनगरसंघेन श्रीपूज्य- पादानामानयनविज्ञप्तये प्रेपिता महेभ्या श्राद्धी चतुरानान्नी श्रीगुरुन्ववन्दे, प्रतिष्टां चैकां महोत्सवेन कारयामास,'वर्षचतुष्टयं यत्र श्रीगुरवा विहरन्ति 20 (सा) तत्र तत्रान्वियाय। ततो दाक्षिणात्यसंघात्याग्रहात्पुनर्गुर्जरत्रायामभ्येत्य कतिचिद्वाणि तत्र स्थित्वा दक्षिणादेशं विजिहीर्यवः प्रभुपादाः सूरतिबन्दिरे समहोत्सवं समाजग्मुः। -तत्र च सं०.१६८७ वत्सरे ममुत्पन्नसागरमनवासितैः श्राद्वैः स्वमवस्य 25 श्रीगुरुमुखात्सत्यमिदमिति-कथनाय बहुदन्यव्ययेन मीरमोलाख्यभूपं स्वव- .
तपागच्छ-पट्टावली शीकृत्य स्वपाक्षिकगीतार्थानाहूय वादः प्रारम्भितः । श्रीगुरुभिरपिं सागरमत- प्ररूपणा उत्सूत्रत्वान्न सत्येति प्रामाणिकपर्पदि राजसमक्षं गीतार्थाननुज्ञाप्य वादेन सागपाक्षिकॉस्तिरस्कारयांचक्रिरे । ततो लब्धजयवादाः श्रीगुरुपादाः सप्रसादाऽवनिनायकेन सम्मानिताः परे च पराभवं प्रापिता इति । ततो दक्षिणदेशे विहतवन्तः। तत्र वीजापुरेऽन्तरां चतुर्मासकचतु-5 टयी चक्रुः । तदा श्रीगुरुपादतपोमाहात्म्यप्रसरयशःपरिमलानुभवनेन तंत्र- त्यपातिसाहिश्रीईदलसाहिदर्शनोत्सुकः श्रीगुरूनाहूय सबहुमानं धर्मस्वरूपं पप्रच्छ । ततः श्रीगुरूणां वचःपीयूषमासाद्य माद्यन्मना यावद्गुरुस्थिति गोवधनिषेधं प्रपन्नवान् जिनप्रवचनमानंदमेदुरं स्फातिमायाति स्म । पारणायां च बीजापुरायनेकनगरसंघेनान्वीयमानाः श्रीगुरवः पयो-10 धितटनिकटस्य श्रीकरहेडपार्श्वनाथ-~-श्रीकलिकुण्डपार्श्वनाथादितीर्थयात्रां कुर्वाणास्तत्तद्देशराजप्रभृतीन लोकान् धर्मे स्थापयांचक्रुः । ततश्चाऽवरंगाबादनगरे चतुर्मासकमेकं सोत्सवं विधाय खानदेशे वहाँ- नपुरे चतुर्मासकद्वयं सान्तरं चक्रुः । ततः प्रचलय्य संघेन सह श्रीअन्तरीक- पार्श्वश्रीमाणिक्यस्वामितीर्थयात्रां सृजन्तस्तिलिङ्गदेशेगलकुएडप्रत्यासन्नभाग्य15 नगरे पातिसाहिश्रीकुतबसाहिना संगत्य तत्सभायां तैलिङ्ग भट्टान्वादे विजित्य जैनधर्मव्यवस्थापनया श्रीपातिसाहिं प्रमोदितवन्तस्तद्वशानुज्ञाश्च । तत्राहम- तिमानामनेकासां प्रतिष्ठां चक्रुः । एवं च विविधोत्सवैः प्रतिपदं राजप्रबोधा- दिना सर्वत्र दक्षिणामण्डले विहृत्य प्रतिष्ठासप्तकं चतुर्मासकसप्तकं च कृत्वा श्रीमजिनशासनमयं तन्मण्डलं विदधुः। 20 वीजापुरे सा० देवचंद्रेण प्रथम प्रतिष्ठा कारिता। तत्र पोडशसहस्र- रूप्यकव्ययश्चक्रे । द्वितीयस्यां प्रतिष्ठायामष्टसहस्रीरूप्यकव्ययश्च । तत्र पंडित श्रीवीरविजयानां सं० १७०१ वर्षे पन्यासपदं ददुः । दक्षिणामण्डले च सर्वाणि अशीतिपण्डितपदानि, एकमुपाध्यायपदं च प्रसादितवन्तः। ततः पुनः संघाग्रहात् गूर्जरत्रां श्रीगुरवः पवित्रीचक्रुः । 25 १६ पट्टावली-समुच्चयः इतश्च "श्रीविजयसिंहसूरयोऽपि गुर्वाज्ञया मरुमेवातमेदपाटादौ विहृत्य राणाश्रीजगत्सिंहजीनामानं प्रवाध्य विशेषतो जीवदयासु देशस्थित जैनतीर्थेपु सप्तदशभेदपूजाकरणोपदेशादिभिश्च दृढीकृत्य श्रीजिनधर्म प्रभावयन्तः। श्रीमरुदेशे एका प्रतिष्टां,मेरुतानगरे आगरावास्तव्यपातिशा- हिरत्नव्यवहारिमुख्यसा हीरानन्दभार्यया श्राविकामनीत्यभिधानवत्या कारिता निर्माय, श्रीकृष्णदुर्गे राठौरवंशीयश्रीरूपसिंहमहाराजस्य महामात्यश्रीराय- चन्द्रनाम्नोऽत्याग्रहाचतुर्मासकं चक्रुः तत्पारणके सहस्रशो रूप्यकव्ययेन मन्त्रिणा कारितप्रतिष्ठाया बहूनि विम्बानि जिनानां महतोत्सवेन प्रत्यतिष्ठपन् तत्रैव आह्वणपुरादागतेन श्रीमहेशदासमन्त्रिश्रीसुगुणावयेन बहुवित्त- व्ययपूर्वं सुवर्णमुद्रा_दिना महोत्सवेन श्रीगुरवो वन्दिताः। ततः क्रमान्मा- 10 ल्यपुरखुन्दीचत (व) लेरपाचप्रमुखतीर्थयात्रा संघेन सह कुर्वन्तः श्रीजयतार- णिनगरे चतुर्मासी विधाय श्रीस्वर्णगिरौ यात्री कृत्वा क्रमात् श्रीअहम्मदावा- दनगरे श्रीगुरून्नेमुः। तैः सहिताः श्रीपरमगुरवः सं. १७:५ वर्षे श्रोइलादुर्गे पत्तनवास्तव्य- श्रा०श्रीवन्त्याकारितां प्रतिष्ठां विदधुः । तत्र चतुःपष्टिविबुधेन्द्रान्देवसूरय इंव15 स्थापयामासुः । क्रमेण पत्तनराजनगरादिपु चतुर्मासककरणेन लोकाननुगृह्या स्तंभतीर्थे चतुनास्यां तस्थुः। श्रीविजयसिंहसूरीणां सं० १६४४ वर्षे जन्म, सं. १६५४ व्रतं, सं० १६७२ वाचकपदं, सं० १६८१ सूरिपदं, ते सूरयः परमक्षमापात्रं यावजीवं गुर्वाज्ञाराधकाः विवेकायनेकगुणोदधयो ऽष्टाविंशतिवर्षाणि 20 सूरिपदं प्रपाल्य सर्वातीचारालोचनपूर्वमनशनेन सं० १७०८ वर्षे अहम्मदा- वाइपार्श्वस्थनवीनपुरे आपाढसितद्वितीयायां श्रीविजयसिंहसूरयः सर्जग्मुः। तत् श्रावणाभृशं दुःखार्ताः परमगुरवोऽपि संसारानित्यतां विमृश्य क्रमाद्विगतशाजा वभूवुः ।। एपांच भी गुरूणां तपस्तेजसा देवकृतलःन्निध्येन च निरन्तरायतया 25 . भूयांसरतीर्थयात्रासंघाः साडम्बराःश्रीशत्रुज्जयादितीर्थेषु जीर्णोद्धाराश्च जाताः।
। 10 तपागच्छ पट्टावली ९७ देवसान्निध्यं चैपां स्फुटमेव मण्डपाचलप्रस्थाने कमाख्यपरमारस्य भूतातस्य लोकानां मारणापित्रा निगडितस्य श्रीगुरुवासक्षेपेण सज्जीभवनात्, एवं रा- जनगरवास्तव्यवणिक्पुत्रोऽपि सप्तवर्षाणि प्राग्ग्रथिलः सोऽपि, तथा मेडतान- गरे सा० थानाख्यक्षेत्रपालाधिष्ठितश्च वासक्षेपात्प्रादुर्वभूव । एवं चैते भगवन्तः स्वविहारेण गूर्जरत्रासुराष्ट्राहल्लारमरुमेदपाटला- 5 टदक्षिणादेशेषु धर्मवीजानि वपन्तः तद्देशसुभिक्षादिभवनेन स्फुटतरयुगप्र- धानातिशयाः शुद्धाशयाश्चिरं भरतभुवि प्रवचनं प्रभावयामासुः । समये च निजायुःशेपं वर्पचतुष्टयं ज्ञात्वा सं० १७१० वर्षे स्वपट्ट श्रोवैशाखसित दशम्यां श्रीविजयप्रभसूरीन् स्थापयामासुः । तद्व्यतिकरस्त्वनन्तरमेव वक्ष्यते । "सिरिविजयदेवपट्टे, पढमं जाओ गुरू विजयसीहो। सग्गगए तम्मि गुरू-पट्टे विजयप्पहो सूरी ॥१॥इति गाथार्थः तत्पबुजपहकर-सरिसो हरिसेण दरिसणिज्जमुहो। [तत्पटुंबुजपहकर-सरिसो सिरिविजयसिंह दिव्वगुरू] इगसहियमोऽणुवमो, विजयप्पहणाम गच्छगुरू ॥३॥२३॥ व्याख्या-"तप्पटॅवुज" इति, तस्य श्रीविजयदेवगुरोः पट्टलक्षणे अम्बुजे, प्रकाशकत्वात्प्रभाकरः सूर्यः, तत्सदृशस्तुल्यः । एकोत्तरपष्ठितमः श्रीविजयनामा गच्छगुरुभगवान् सूरिविजयवान् । किं विशिष्टः ? 'हरि- सेण'-हर्पण दर्शनीयमुखः । इत्यनेनास्य नित्यप्रसन्नता ख्यापिता । तया चास्य भगवतो भाग्यविस्फूर्जितस्य नित्योदयत्वं प्रशान्तत्वं च ध्वन्यते । 20 कुपाक्षिकानां प्रत्यर्थिनां मनसाप्येतस्य गुरोरहितचिन्तकानां स्वत एव नाशात् । घनस्याभ्युदये शरभानामिव । यद्वा हरिः कृष्णः सेनाया यस्य स हरिसेनो देवानामिन्द्रः । 'सेनाचरी भवदिमानवदानवारि-वासेन यस्य जनिता सुरभी रणश्रीः।' इति नैपधीयकाव्यवचनात् । एवं हरिशब्दस्य तुर- गगजाद्यर्थे,हरिसेनाः नृपाः। अहीनामर्थे धरणेन्द्राधा नागकुमारा ग्राह्याः। 25 १३ 15 ६९ पट्टावली-समुच्चयः तेपामपि दर्शनीयं मुखं यस्य स तथा । इत्यत्रार्थे त्रिजगद्वन्द्यत्वं भगवतो दर्शितम् । पुनः किं विशिष्टम् ?.अनुपमः अतुल्यः । एतेनास्य सूरेः सर्वसू- रिभ्यो धैयौदार्यगाम्भीर्यसौभाग्यतानिस्तन्द्रतापाण्डित्यक्षमादिगुणानामधि- कता ज्ञाप्यते । अस्य च प्रभोः सं० १६३७ वर्षे माघसितएकादश्यां श्रीकच्छदेशे 5 श्रीमनोहरपुरे वृद्धोपकेशवंशघोपागोत्रभृत् सा सिवगणभायाभानुमतीगृहे जन्म । सं० १६८६ वर्षे दीक्षा । सं०१७०१ वर्षे पन्यासपदं । सं०१७१० वर्षे आचार्यपदं । सं १७१३ वर्षे भट्टारकपदं । ते चामी श्रीगुरुपादाः सांप्रतमपि प्रत्यक्ष्यलक्ष्यलक्षप्रभावा नितरां ज्ञानाभ्यासपुस्तकशोधनानेक- भव्यजनविवोधनविविधक्रियामग्नमनसो दुस्तपस्तपननिर्जीयमाणतमसो 10 गच्छस्य स्मारणवारणादिविधाभिरधिकश्रियं पुष्णन्तःसत्यसंधाः कल्पान्तेऽ- प्यविचलवाचः स्वप्रतिपन्नगच्छगीतार्थसंघाभ्युदयदायिनो विजयन्ते । एतेपां महिमातिमहान्न कार्येन वर्णयितुं शक्यः । तथापि किञ्चि- दुच्यते- एकस्मिन् समये परमगुरुतपागच्छाधिपाः श्रीविजयदेवसूरयः खा- 15 मिनो जिनशासनपट्टपरंपराप्रवाहं प्रवर्धयितु श्रीसूरिमन्त्रेण ध्यानं चक्रुः । यदस्मदने कः शासनाधिनाथो भविष्यतीति । तदा च प्रवर्धमानतपःपूर्वक- जपावधानाकृष्टो मंत्राधिराजाधिष्टायको देशेऽभ्येत्य नमस्कूर्वन् विज्ञप्तवान् 'स्वामिन्नद्यापि शासनाधीशितुर्न दीक्षापि प्रवृत्ता, भगवतामपि युष्माकं चिरायुष्कता तत्किमनया चिन्तयाधुना ? समये च स्वल्पेनापि तपसाहं स्म-20 रणीयः, तदैवागत्य वक्ष्यामि' इत्युक्त्वा सुरस्तिरो बभूव । कालान्तरे च स्वकीयपट्टे श्रीजिनशासनस्वामिस्थापनावसरं निभा- ल्य श्रीगन्धपुरे गत्वा श्रीगुरुभिर्ध्यान प्रारमे। तदा तत्क्षणादेव मंत्रराजाधि- ठायको देवः समेत्य निवेदितवान्-“हे स्वामिनः ! पण्डितः श्रीवीरविज- यनामा सौभाग्यनिधिः विद्यामहोदधिः निरुपधिः चारित्रगुणानामवधिः 25 अजिह्मब्रह्मविधिः विधिरिव सा "भुवनोपकारकः केशव इव पुरुषोत्तमः - ६६ तपागच्छ-पट्टावली नरकान्तकृत् कुमोड़कः शिव इव महाव्रती कामासहनो दक्षजातिस्निग्धः त्रिदशगुरुरिव निर्मलमतिः सुमनसामग्रणीरसौ स्वपट्टे स्थाप्यः, यतोऽस्याने महिमा हि मानाधिको भावी इत्युक्त्वा देवे तिरोभूते श्रीगुरुभिः गाम्भीर्य- शालिभिः जनप्रत्ययनाय बहिः शकुनगवेपणदावपि देवोक्तानुवादे दृढीभूते सति राजनगरात्त्वरिताभ्यागत सा० रत्नप्रमुखराजनगरीयसंघाग्रहेण श्री- 5 स्तंभतीर्थ-श्रीपत्तन-श्रीसूरतिबन्दिरप्रमुखानेकदेशग्रामनगरसमक्षं श्रीमहा- वीरस्वामिसातिशयमूर्तेः पुरः पत्रिकाविलोकनादानंदित् सकललोके श्रीग- न्धारवन्दिरे विक्रमात्सं० १७१० वर्षे वैशाखसितदशम्या भृगुवारे पुष्यन- क्षत्रे सुमुहूर्ते रङ्गदुत्तङ्गमण्डपाखण्डशोभादिक्षयेवाभ्यागतेषु मुक्तानिकरद- म्भान्नक्षत्रपक्षेषु वाद्यमानविविधातोद्याडम्बरेण गर्जत्यम्बरे दह्यमानासु 10 दुर्जनमनःशकटिकाविव धूपघटिकासु रसेनापूर्यमाणासु सर्वसङ्घप्रमोदत- टिकाविव घटिकासु प्रसरधशोभिरिव पुष्पप्रकरैराकीर्णे भूवलये श्रीवीर- पट्टाधिपत्यज्ञापनायेव श्रीवीरजिनभवनासन्नदेशे मण्डपेऽभ्यागत्य पं०श्री वीरविजयाः श्रीविजयदेवसूरिभिः स्वपट्टे स्थापयांचक्रिरे । तदा साधुश्री- अखईनाम्नः सुतेन श्रीवर्धमानसंज्ञेन स्वमातृसाहिबदेवीसहितेन प्रतिगृहं 15 सरूप्य मुद्रस्थालिकालम्भनिका चतुर्षिधसंघवस्त्रपरिधापनादिना भूरिद्रव्य- व्ययेन महानुत्सवश्चक्रे । श्रीगुरुणा स्वयं चिन्तिम् , इष्टोपदेशेन उ० श्रीक- मलविजयगणिभिर्जापितमाचार्यपदं प्रदाय श्रीविजयप्रभसूरिः नाम निर्ममे। विजयी जगदाराध्या, यशस्वी च प्रभाववान् । भगवानाधवर्णैस्त्व-ग्नान्नाभूद्विजयप्रभः ॥१॥ तदनु श्रीगुरुः श्रीविजयप्रभसूरिणा सह सूरतिबन्दिरे एकं चतुर्मा- सकं विधाय श्रीराजनगरे चतुर्मासी कृतवान् । तत्पारणायां संघमुख्यसा० सूरापुत्र सा० धनजीनाम्ना श्रीगुरूणां विज्ञप्य वन्दनकमहोत्सवः प्रारंभे, तत्र च मिलितास्तोकलोकस्थानाय कमनीयप्रकटपटमण्डपैर्माशून्यदर्शनं 25 भूत् इतीवाच्छादिते वियति सुवर्णखचितनिचितश्रुतिपञ्चवर्णचन्द्रोदयप्रभा- " इति 20 । १०० पट्टावली-समुच्चयः संकरण रात्रिंदिवातीतविमानोपमानतायामुपनतायां जगति मुसीमताकारि- शमैकसाम्राज्यविजयमाने तत्र न तापनकरप्रचार इतीव सहस्रकरकरेषु भूमिमस्पृशत्सु विविधधवलगानश्रवणैकाग्यूण चित्रतुल्यनिश्चलनराम- रोरगैः शोभितेपु पटकुटेपु विश्वविश्रान्तिसश्रान्तिशारदाभ्रपटलेषु इव .. अत्युच्चमण्डपेषु सिंहासने श्रीविजयप्रभसूरिं निवेश्य भगवान् स्वयं स्वतु- 5 ल्यताज्ञापनार्थं पुरःस्थित्वा सुमुहूर्ते वन्दनकानि दत्तवान् । जातश्च महान् प्रमोदः । तद्नुसर्वसंघसमक्ष श्रीपरमगुरुणाभाणि-“यथातथाऽयम् , सर्वसंघेन सेवनीयः, संसारसागरे प्रवरणमयं कदापि न मोक्तव्यः" । ततः कृतसंस्कारो मणिरिव, घननिर्मुक्तः सूर्य इव, आहुत्युद्दीपितः पावक इव, भावप्रतिबिम्बनादर्पण इव, प्रोक्षलितः कनककलश इव, 10 तैलापूर्णः प्रदीप इव, कृतालंकारः क्षितिपतिरिव, घननिर्धातः कनकगिरि- रिव, शोधितो ग्रन्थ इव, अधिकं संजातवन्दनकोत्सवपरिकर्मा स श्रीवि- जयप्रभसूरि रितेजसा दिदीपे। तदा सा० श्रीधनजीनाम्नाष्टसहस्रमहमूदिकानां यशोबीजानामिव प्रभावना चक्रे । सर्वसंघपरिधापनिका च । ततश्चैकं चतुर्मासकं अहम्म- 15 दपुरे विधाय श्रीपरमगुरुभिः सहैव श्रीविजयप्रभसूरि युगादिदेवयात्रां द्वीपवास्तव्यभणसालीयसा०रायचन्द्रप्रमुखसंघेन सह वि. नालोच्य सुराष्ट्रासंघाग्रहेण श्री- उन्नतपुरमलंचने। क्रमेण देवशयनैकादश्यां 'विजयप्रभसूरिभिः कृतनिर्या- 20 मनाविधयः श्रीविजयदेवसूरयः स्वर्जग्मुः । ततः श्रीवीरनिर्वृते श्रीगौतम- खामीव श्रीपरमगुरौ स्वर्गतेऽत्यन्तदुःखावेशवशात् श्रीविजयप्रभुरपि कति- चिदिनानि विमनस्कतया निन्ये । तद्नु चतुर्विधसंघाग्रहेण संसारखभावमनुभाव्य विगतशोकाः सुमुहूर्ते श्रीविजयप्रभसूरिपादाः भट्टारकपदोद्भूतशोभाप्राग्भारभासुराः 25* श्रीगुरुपर्ट विभूपयामासुः। तदिन एवं शिवपुरीदेशे यतीनां विहारस्य तपागच्छ-पट्टावली १.१ प्राग्वर्षद्वयं यावन्निपेधस्य मुक्तलता जाता, तद्वर्द्धनिका आगता । तद्व च श्रीद्वीपवास्तव्यसा० नेमीदासनाम्ना अष्टसहस्रमहमूदिकाव्ययेन श्रीगुरून् सार्धमादाय श्रीशत्रुञ्जयतीर्थयात्रासंघो महान् चक्रे । एवं श्रीगुरुभिः सुराष्ट्रायां चतुर्मासकदशकं चक्रे। तत्प्रभावात् सं० १७१५ सं०१७१७सं०१७२०वर्पसत्कास्त्रयोऽपि दुष्कालाः सुराष्ट्रादेशे न 5 प्रसारमापुः । तचिह्न तु जीर्णदुर्गादिपु गूर्जरत्रायां धान्यागमनं प्रतीतमेव। सं०१७२३वर्षे घोघावन्दिरे श्रीजसूनाम्न्या कारितानेकजिनप्रतिमानां श्री- सूरिमिः प्रतिष्ठा चक्रे। एषु च श्रीगुरुषु विपक्षभावमावहन्तः केचिद्वालिशाः खत एव लोकापवादविडम्बिता अधुना दृश्यन्ते । ततः श्रीअहम्मदाबादनगरसंघा- 10 यहेण श्रीगुरुवो गूर्जरत्रायामाजग्मुः । तत्प्रभावाल्लोकानांसुभिक्षेण महान्- हो बभूव । इत्यादि परमीणां एपां महिमा प्रकट एव ॥ तेन निश्ची- यते-एतदाज्ञावर्तित्वमेव उभयथापि शिवाय । सिरिविजयरयणसूरि- पमुहहिं णेगसाहुवग्गेहि परिकलिआ पुहविअले, सूरिवरा दिन मे भई ॥४॥२४॥ 15 श्रीगूर्जरमरुमालवमेदपाटमेवातकच्छहल्लारसुराष्ट्रादक्षिणादिदेशेषु श्रीगुरुतपस्तेजसा सांप्रतं धर्मकर्माणि निरन्तराय जायन्त इति सोऽयं वीरपरंपराप्रणयिनीप्राणप्रियः सक्रियः। जीयात् श्रीतपगच्छपः सुरवरैः संसेव्यमानक्रमः। नाम्ना वीर इति क्षमाधरवरप्रोनितनृत्यक्रियः। प्रत्यक्षं विजयप्रभो गणपतिः श्रीवर्धमानप्रमः ॥१॥ श्रीवीरतीयातिकलब्धराज्यः, श्रीवर्धमानेन कृतोत्सवश्रीः । देवाभियुक्तोऽभिधयापि वीरः, श्रीवीरतीर्थे गुरुरेष जीयात् ॥२॥ श्रीविजयप्रभसूरे-रुपासकः श्रीकृपादिविजयानाम् । 25 विदुपां शिष्यो मेघः, संबन्धमिमं लिलेख मुदा ॥३॥ इति श्रीपट्टावलिसूत्रोपरिक्षिप्तगाथात्रयविवरणं संपूर्णम् । 20 अनुपूर्चिः-३ श्रीगुरु माला [तपागच्छपट्टावलीसूत्रवृत्यनुसन्धानम् ] ( कर्ता-मुनिवर्चश्रीचारित्रविजयः ) ५८-श्रीविजयदानसूरिपट्टे अष्टपंचाशत्तमः श्रीहीरविजयसूरिः ।। तत्य वि. त्र्यशीत्यधिक पंचदशशत१५८३वर्षे मृगशिर्षशुक्ल- नवन्यां ६ प्रह्नादनपुरे जन्म, वि० पएणवलविके १५६६ का० कृ० द्वितीयायां २ सोमे अष्टभिः सह अपहिलपुरे दीक्षा, वि० सप्ताधिक पोडशशते १६०७ वर्ष नारदीपुरे पं० पद, अष्टाविक १६०८ तत्रैव वाचक- 5 पद, दशाधिक १६१० मृगशुक्लदशन्या शिरोह्यां सुरिपदं,वि० द्विचत्वा- रिंशदधिके १६४२ फत्तेहपुरे जगद्गुरुपईx. द्विपंचाशदधिके १६५२ भाद्रसितेकाइयां ११ ऊन्नायां स्वर्गभूगमनं ॥ यीनीश्वरपातिसाहिअकबरं मेवाडाधिपतिराणाप्रतापसिंहं च प्रतिबाध्य जैनशासनं स्कातिमद्विदधे । सर्वमिन्दायर्यावर्त अमारिपटयोपः कारितः ॥ तत्तपः-२० चतुर्थभत्तावान्लजनितविंशतिस्थानक-१ अष्टम- २२५पष्ठ-३६००चतुर्थभक्त-२०००आचाम्ल-२०००निर्विकृतिक-सूरिम- .. 10 ४ शुद्धाः सर्वपरीवणेवरा ज्ञात्रेति पृथ्वीपतिः । सन्यानां पुरतः स्वपदि गुणांस्तेषां स्वर्णशोधितान् ।। उक्त्रा सर्वसतीगहारविजयाख्यानानदाद् नतितः । स्वाक्यविल्द "तगद्गुरु"रिति सप्टं महःपूर्वकन् ॥१६७॥ (वि०सं०१६४६ द्वि०मा०शु० ११ मंगलपुरे) -इति, जगद्गुरकान्ये ॥
कर्ता ॥ श्रीगुरुमाला १०३ त्राऽऽराधन-गुरु-रत्नत्रयी-द्वादशप्रतिमादिकं ॥ जंबूद्वीपप्रज्ञप्तिवृत्यादि- तच्छिष्यसंततिस्तु-विजय-विमल-सागर-सुन्दर--हर्प-रत्न-- कीर्ति--चंद्र-वल्लभ-हंस कुशल-रुचि-सौभाग्य-उदय-आनंद-सार एवं शाखासु विभक्ता द्विसहस्रीमीता ॥ उन्नतपुरेऽद्यावधि गुरुमंदिरं श्राद्धीलाडकीकृतस्तूपश्च भव्यानानंद- 5 यतिस्म । श्रीसूरिचरित्रं विस्तररुचिना हीरसौभाग्य--जगद्गुरुकाव्य- हीरविजयसूरिरासादिभ्यो ऽवसेयं ।। ५६-तत्प? एकोनषष्ठितमः श्रीविजयसेनसूरिः ।। तस्य वि० चतुरधिके षोडशशत१६०४वर्षे होलिकादिने १५ नारदपुरे जन्म, वि० त्रयोदशाधिके १६१३ शुक्रशुक्लैकादश्यां पितृ-कमर्षि-.10 वंदनान्तरं श्रीविजयदानसूरि हस्तेन सुरतिबंदिरे दीक्षा, वि० षड्विंशत्य- धिके १६२६ फा० शु० दशम्यां स्तंभनतीर्थे पंण्डितपदं, वि० अष्टाविंशत्य- धिके १६२८ फा० शु० सप्तम्यां सोमे अहम्मदाबादे सूरिपदं, वि० एक- सप्तत्यधिके १६७१ ज्येष्ठकृष्णैकादश्यां स्वर्गः ।। यस्मैअकबरेण "काली सरस्वती ति बिरुदै पड्जल्पाश्च प्रदत्ताः। 15 येन नमोदुर्वाररागादि शतार्थी-सुक्तावल्याद्या कृताः, दिग्वासो भूपणः पराजितः, चतुर्दशभिर्दिनैः प्रवचनपरीक्षावादिनः पराजिताः,। अपरे ऽप्यहमदावादे निर्जिताः, लाभनगरे ईश्वरकतृत्वादिवादेजयो लब्धः ॥ यस्य "सवाई हीरविजयसूरि" रितिविरुदं, अष्टौवाचकाः परःशताः प्रज्ञांशाः द्विसहस्रीमिताः शिष्याश्च ॥ ऋपभदासादिकवयोपि तत्कृपा- 20 कटाक्षप्रफुल्लिता इति । अस्याशेपचरित्रं विजयप्रशस्तिकाव्याद्वा । यस्मिन् स्वर्गेगते तपागच्छे द्वौ संघावभूतां । १-श्रीविजयदेवसू- रिसत्को "देवसूरसंघः" अपरः २-श्रीविजयतिलकसूरिसत्क "आनंद- सूरसंघः" इति ॥ . .
.१०४ पट्टावली-समुश्चयः ६०-तत्पट्टे षष्ठितमः श्रीविजयदेवसूरिः । तस्य वि०चतुस्त्रिंशदधिके पोडशशत१६३४वर्षे पोपशुक्लत्रयोदश्यां रखौं इलादुर्गेजन्म, वि० त्रिचत्वारिंशधिके १६४३ माघे शुक्लदशम्या राजनगरे जनन्यासमं श्रोहीरविजयसूरिहस्तेन दीक्षा, वि० पंचपंचाशदधिके १६५५ सिकंदरपुरे श्रीशांतिजिनप्रतिष्ठायां पं०पदं, वि० पटपंचाशदधिके 5 १६५६ वैशाखसितचतुर्थ्यां सोमेप्रबलयोगे स्तंभतीर्थे श्रेष्ठिमल्लसाधुकृतम- हामहोत्सवे वाचकपदं च सूरिपर्द, वि० त्रयोदशाधिके सप्तदशशतव- १७१३ आपाढशुक्लैकादृश्यां अन्नतनगरे स्वःप्राप्तिः ॥ यस्मै पातिसाहिजहांगीरेण मण्डपाचलदुर्गे वहुमानेन "जहांगीर- महातपा" विरुदंदत्तं । येनाप्रतिबद्धविहारिणा नैकेपु वादेपु जयपताको- 10 च्छ्रिता. श्रारासणे (J. B. A. C.) स्वर्णगिरौ च तीर्थे प्रतिष्ठा कृता । जगत्सिंहराणकाय चत्वारो जल्पा-प्रदत्ताः, बहूनि चमत्काराणि संदर्शितानि, नीतनीत वंदु इत्यादिखाध्यायाः कृताः॥ तत्समये लुपकैरपि शास्त्राध्ययनेन बहुधा प्रतिमा स्वीकृता । अस्यमूरेविशिष्टचरित्रसंबंधी विजयदीपिका-देवानंदाभ्युदय-महा- 15 म्यवृत्तिभ्यो ज्ञेयः॥ तत्समये वि० नवाधिके सप्तदशशत१७० वर्षे गूर्जरदेशे लूपाक- पूज्यस्य बजरंगः शिष्याल्लवजीकात् मुखपट्टीवंधा मूर्तिद्वपिणो ढूढका जातास्तस्य प्रथमोपसर्गाऽऽपातिपदनुसारेण मतभेदेन वा "वावीशटोला" इतिनामान्तरं । तन्मूलभेदौ पडष्टकौटिकौ ॥ ६१-तत्पट्टे एकषष्ठितमः श्रीविजयसिंहसूरिः ।। तस्य वि० चतुश्चत्वारिंशदधिके षोडशशतव १६४४ मेदनीपुरे ओसवंशे पितृनत्थुमल्ल-मातृनायकदेगृहेजन्म, चतुःपंचाशदधिके १६५४ दीक्षा, त्रिसप्तत्यधिके १६७३ वाचकपदं, वि० द्वयशीत्यधिके १६८२ माघ शुक्लषष्ठीसोमे इलादूर्गेसूरिपदं, नवाधिके सप्तदशवर्षे १७०६ सूरौ विद्य- 26 माने एव सुरपदं ॥ 20 5 भगवता श्रीगुरुमाला १०५ ६२-तत्पट्टे द्विषष्ठितमः श्रीसत्यविजयगणिः॥ तस्य अशीत्यधिके पोडशशतवर्षे १६८० सपादलक्षदेशे लाडलुग्रामे जन्म, पिता वीरचंद्रो, माता चीरमदेवी, गृहस्थाभिधानं शिवराजः, चतुर्न- वत्यधिके १६६४ दीक्षा, एकोनत्रिंशदधिके सप्तदशशतव१७२६ सोजतग्रामे पं०पदं०, षट्पंचाशदधिके १७५६ वा सप्तपंचाशदधिके ५७ अणहिल्लपुरपत्तने स्वर्गः॥ तस्य पं० कपूरविजयगणि-पंकुशलविजयगणिनौ शिष्यौ। तस्मिन्काले तस्मिन्समये कालदोपात् निर्ग्रथेषु प्रमादबहुलं कि- याशैथिल्यं प्रवर्तितं । तद्दृष्ट्वा दूनमनसा परमवैरंगिकेण येन घोरतपखिना सूरराज्ञया उ०विनयविजय-उ०यशोविजयादिसहायेन क्रियोद्धारश्चक्रे । “ये क्रियोद्धारं शिश्रियुस्ते साधवो ऽन्ये तु यतय” इति 10 तदा ख्यातिरभूत् । साधयोपि तत आरभ्य यतिभेदचिन्हं कापायिक वस्त्रं दधुर्या प्रवृत्तिरद्यापि तद्रूपैव । यतयोपि सितवत्रधारिणः परिग्रहिणः औपध-मंत्र-तंत्रविद्यया ख्याता दृष्टिपथमवतरन्ति । ततो मुनिभिः सूरिपदग्रहणाय मतांतरेण तु सर्वगच्छनायकपद- ग्रहणाय विज्ञप्तो य उवाच-“यस्मिन्नधिरूढा गणधरास्तत्र मादृशो लघु- 15 हो, माभूत्तस्यपूज्यपदस्याशातना अहं भुनिरेव श्रेयानितिश कृत्वा न स्वीचकार सूरिपदमिति श्रूयते ॥ तस्य विशेपचरित्रं श्रीजिनहर्पनिबध्यात् तन्निर्वाणरासतो ज्ञेयं॥ तत्समये प्रभावकाः- १-श्रीआनन्दधनः । ये तपागच्छे वैराग्यपूर्णाः निस्पृहिणस्तत्त्ववे-20 दिनोऽध्यात्मशखेराः उ०यशोविजयकृतवहुमानस्तवा योगिराजोऽभूवन् । तत्कृतिः-चतुर्विंशतिस्तवाः द्विसप्ततिपदसंग्रहश्च ॥ २-उ० श्रीविनयविजयगणिः । यः श्रीहीरविजयसूरि-शिष्यवा- चकोत्तमकीर्तिविजयस्य शिष्यः काश्या उ०यशोविजयानांसहपाठी परमशां- १०६ पट्टावली-समुच्चयः तरसः नित्यत्रिशतीश्लोककंठाग्रशक्तिः वि० अष्टत्रिंशदधिके सप्तदशशत १७३८ वर्षे रान्देरग्रामे स्वर्गमाक् ।। तत्कृतयः-लोकप्रकाशः (श्लो० २००००), हेमलघुप्रक्रिया, तद्- बृहबृत्तिः, नयकर्णिका, शांतसुधारसभावना, सुखवोधिकानामवृत्तिः, सूर्यपुरचैत्यस्तवः (वि० सं० १६८९) चतुर्विंशतिस्तवनानि, स्तवाद्याः 5 विनयविलासः, चत्तारीअट्ट०चैत्यस्तवनं,ऋपभविनति, श्रीपालरासश्च +॥ ३-उ०श्रीयशोविजयगणयः ।।येजगद्गुरुश्रीहीरविजयसूरिशिष्य- उ०कल्याणविजयगणि-शिष्यप्रमयेरनमंजूपाशुध्धिकृतपं०लाभविजयगणि- शिष्यश्रीनयविजयस्य शिष्याः ॥ तेषां विक्रमादनुमानतः पंचापदधिके पोड- शशतवर्षे १६५० जन्म, अष्टपंचाशदधिके १६५८ दीक्षा,x वि० अष्टाद- 10 शाधिकेसप्तदशशत१७१८वर्षे वाचकपदं, वि० पंचचत्वारिंशदधिके १७४५ दर्भावत्या स्वर्गः ॥ "न्यायविशारद न्यायाऽऽचार्य महामहोपाध्याय इत्यादिनि विरुदानि ॥3 + तेषां शिष्य परंपरा चैवम्-५० नयविजयः पं०उत्तमविजयः पं० नरविजयः पं० मेघविजयः पं० केसरविजयः पं० शांतिविजयः पं० विद्याविजयः पं० लक्ष्मीविजयः (यः धोराजीनगरे कालगतः) पं० गुलावविजयः पं०चारित्रविजयः (यः वि० सं० १९८५ वर्षे पुण्यपत्तने कालं गतः)। x अयं वर्षनिर्णयो विचरणाहः । * तच्चरणशिलालेखः-संवत् १७४५ शा०१६१० मार्गशीर्षशुक्लैकादशी। श्रीहीरविजयसूरीश्वर शिप्यपं० श्रीकल्याणविजयगणि शिप्यपं०लाभविजयगणि शिष्य- पंजीतविजयगणि सोदरा सतीर्थ्याः पं० श्रीनयविजयगणि शिष्यश्रीजशविजय- गणिनां पादुका कारापिता ॥ पूर्व न्यायविशारदत्वविरुदं काश्यां प्रदर बुधै- न्यायाचार्यपदं ततः कृतशतग्रन्थस्य यस्यापितम् ॥ -इति प्रतिमाशतकप्रशस्तौ १७ श्लोकार्पे, ॥
श्रीगुरुमाला १०७ ते च द्विघठ्यामेव देवसीप्रतिक्रमणस्मृतिकारकाः नीत्यपंचशतश्लो- ककरणबुद्धयः संवेगरंगिणः बालब्रह्मचारिणः पंडितदीयमानोद्भिन्नयौवना सुरूपाकन्यायाःपरित्यागिणः परमतार्किकाः प्रतिक्रमणादेशे एव भगवती- खाध्याय-समकितसडसट्ठीस्वाध्यायरचयितारः अनौष्ठ्यवादाः अष्टाधि- कशत न्यायग्रंथप्रणेतारः द्विलक्षप्रमाणग्रंथब्रह्माणो युगैकस्तंभाः सिधैंका-5 रमंत्राः अवधानपटवः प्रकाण्डशासनरागाः श्रुतकेवलिप्रतीविकारणम् ॥ तेषांगुरूभ्राता श्रीपद्मविजयो गणिः । शिष्याः श्रीहेमविजयाद्याः यन्नामानि स्पष्टतया नोपलभ्यते+IF तस्कृताः संस्कृतग्रन्थाः-अध्यात्मोपदेशः, अध्यात्मसारः, अ-10 ध्यात्मोपनिषद्, अध्यात्ममतखण्डनवृत्ती, अध्यात्ममतपरीक्षावृत्ती, अलं- कारचूड़ामणिवृत्तिः, अष्टसहस्रीवृत्तिः, अनेकान्तव्यवस्था, आत्मख्यातिः, आदिजिनस्तवनम्, आराधकविराधकचतुर्भङ्गी, उपदेशरहस्यवृत्ती, ऐन्द्र- स्तुतिवृत्ती, कर्मप्रकृत्तिवृत्तिः, काव्यप्रकाशवृत्तिः, कूपदृष्टान्तः, गुरुतत्वनि- र्णयवृत्ती, छन्दचूड़ामणिवृत्तिः, जैनतर्कपरिभाषा, तत्वार्थवृत्तिः, तत्वलोक-15 वृत्तिः, तत्वविवेकः, त्रिसूच्यालोकविधिः, द्रव्यालोकः, द्वादशारनयचक्रो- ध्धारवृत्तिः, द्वात्रिंशद्वात्रिंशिकावृत्ती, देवधर्मपरीक्षा, धर्मपरीक्षावृत्ती, धर्मसंग्रहटिप्पनकम् ,नयप्रदीपः, नयोपदेशवृत्ती न्यायखण्डनखण्डखाद्यम् , + तत्प्राप्तशिप्यपरंपरा ॥ उ०श्रीयशोविजयगणि श्रीहेनवि० पं०गुणवि० दयावि० मयावि० मणिवि. माणेकवि पं०केसरवि० सुमतिविक पं० विनित वि० उत्तमविजय f वि०सं०१८२० नवपद् पूजाकृता देवविजयगणिः वि०सं० १७८७ योगदृष्टिस्वाध्यायलिखिता वि०सं०१८२१ अष्टप्रकारीपूजाकृता १ , १०८ पट्टावली-समुच्चयः न्यायालोकः पञ्चनिर्ग्रन्थि, पातञ्जलयोगसूत्रचतुर्थपादवृत्तिः, परमज्योतिः- पञ्चविंशतिका, परमात्मविंशतिका, प्रतिमास्थापनन्यायः, प्रतिमाशतक- वृत्ती, मङ्गलवादः, मार्गशुध्धी, यतिदिनचर्या, यतिलक्षणसमुच्चयः, योगविं- शिकावृत्तिः, विचारविन्दुः, विधिवादः, वीरस्तववृत्ती, वेदान्तनिर्णयः, वैरा- ग्यकल्पलता, समाचारीप्रकरणवृत्ती, स्याद्वादमञ्जपा, सिद्धान्ततर्कपरि- 5 कारः, सिध्धान्तमञ्जरीवृत्तिः, श्रीगोडीपार्श्वनाथस्तोत्रम्, श्रीशंखेश्वरपार्श्व- नाथस्तोत्रम् , श्रीसमीपार्श्वनाथस्तोत्रम् , स्तोत्रसंग्रहः, शठप्रकरणम्, पोड- पप्रकरणवृत्तिः, ज्ञानबिन्दुः, ज्ञानार्णवः, ज्ञानसारवृत्ती, रहस्यपदांकित- प्रन्थानामष्टोतरशतम् ४ ॥ गौर्जरीकृतिः-अध्यात्ममतपरीक्षास्तवक, आनन्दघनस्तुतिअष्टक, 10 उपदेशमाला, जशविलास, जम्बुखामीरास, तत्वार्थसूत्रस्तवक, द्रव्य- गुणपर्यायरासतथास्तबक, दिग्पटचोराशीवोल, पञ्चपरमेष्टिगीता, ब्रह्म- गीता, लोकनालितथास्तवक (रचनावि० सं० १६६५) विचारविन्दुतथा- स्तवक, श्रीपालरासअन्त्यभाग, समाधिशतक, समताशतक, समुद्रवहाण- संवाद, सम्यकत्वचोपाइ साधुवंदनमाला, ज्ञानसारस्तवक इत्यादिग्रन्थाः।। 15 कुमतिखंडनस्तवन, त्रणचोवीशी, वीशी, दशमतस्तवन, नयगर्भितशान्ति- जिनस्तवन, निश्चयव्यवहारगर्भितस्तवन, पार्श्वनाथस्तवनद्विक, महावीर- स्तवन,मौनएकादशीस्तवन, वीरहुंडीस्तवन श्रीसीमन्धरचैत्यवंदन, श्रीसीम- न्धरविनति, श्रीसीमन्धरस्वामिबृहत्स्तवन आवश्यकस्तवन । इत्यादिस्तवाः अंगउपांगवाध्याय (वि० सं० १७४४) अढारपापस्थानकवाध्याय, 20 अमृतवेली, आठदृष्टि, आत्मप्रवोध, उपशमश्रेणि, चताडपडतानीस्वाध्याय चाराहार, ज्ञानक्रिया, पांचमहाव्रतभावना, पांचकुगुरु, प्रतिक्रमणगर्भ- हेतु, प्रतिमास्थापन, यतिधर्मवत्रिशी, स्थापनाकल्प, सुगुरु, संयमश्रेणी, समकितनासडसठबोलनीस्वाध्याय,हरियाली,हितशिक्षा इत्यादि स्वाध्यायाः॥ , * नयरहस्यम् भाचारहत्यम् स्याद्वादरहस्यम् प्रमारहस्यम् इत्यादि । यैः वि०सं०१६६श्वर्षे दूंगरपुरे धातुसंग्रहो लिखितः, लोकनालिकापि कृता ।
॥ श्रीगुरुमाला १०६. ४-उ० श्रीमानविजयगणिः ॥ यः श्रीहीरविजयसूरि-पट्टधरश्री- विजयसेनसूरि-पट्टधरश्रीविजयतिलकसूरि-पट्टधरविजयानन्दसूरि-पट्ट- धरविजयराजसूरिराज्यवर्ती श्रीविजयानन्दसूरि-शिष्यश्रीशांतिविजयस्य शिष्यो धर्मसंग्रहकर्ता (वि०सं०१७३१) । ५-श्रीआनन्दविमलसूरीणां शिष्यपंव्हर्पविमलस्य प्रमेयरत्नमंजू- '5 पाशुध्धिकर्तुः संततावनुक्रमेण जयवि० कीर्तिवि० विनयवि० श्रीधीरविम- लगणिनां शिष्यः श्रीज्ञानविमलसूरिः।। यो साधुवंदनरास कल्याणमन्दिरस्त वन-चैत्यपरिपाटी-चैत्यचंदन-स्तव-स्वाध्याय-स्तूति--शतशोसिद्धाचलस्त- वन-आनन्दघनचतुविंशतिस्तबक-तीर्थमाला (वि० १७५५) श्रीपालचरि- त्रादिकं रचयांचकार । यः क्वचित्स्वग्रन्थे उ० यशोविजयं स्मरतिस्म ।। ६-उ०उदयरत्नः । ख्यातमहाकविः बहूनां गूर्जरग्रंथानां प्रणेता ॥ ७-उ० मेघविजयगणिः । लूम्पकमते मेघजीऋपेर्मेघराजनाना' प्रशिप्यः, अत्र वि० एकोनपष्ठ्यधिके पोडशशते १६५ वर्षे श्रीविजयसेन- सूरिहस्तदीक्षितः, श्रीहीरविजयसूरि-शिष्यउ०कनकविजय-शिष्यशील- 15 विजय-शिष्यसिध्धिविजय-शिष्यकृपाविजयानां शिष्यः ॥ 10 . x तत्पट्टपरंपरा-५८ श्रीयानंदविमलसूरिः, ५६ श्रीविजयदानसूरिः, ६० श्रीराजविजयसूरिः, ६१ श्रीरत्नविजयसूरिः, ६२ श्रीहीररत्नसूरिः, ६३ श्रीजयरत्नसूरिस, ६४ भावरत्नसूरिः, ६५ दानरत्नसूरिः, ६६ कीर्तिरत्नसूरिः, ६७ मुक्तिरत्नसूरिः, ६८ पुण्योदयरत्नसूरिः ६६ अमृतरत्नसूरिः, ७० चंद्रोदयरत्नसूरिः, ७१ सुम- तिरत्नसूरिः (खेड) तत्गुरुपरंपरा-~६२ श्रीहीररत्नसूरिः, लब्धिरत्नः मेघरत्नः शिवरत्नः सिद्धिरत्नः उ. उदयरत्नः उत्तमरत्नः जिनरलः क्षमारत्नः राजरत्नः अनोपरत्नः तेजरलः उ० गुणरत्नः (विद्यमानः) -(जैनयुग पु० ३ अं० ११-१२, वि० सं० १९८४) (६०) श्रीराजविजयसूरिशिप्यो देवविमलगणिः पाण्डवचरित्रकृत् ॥
. ११० पट्टावली-समुचयः वकृतयस्तु-देवानन्दाभ्युदयकान्यं, श्रीशांतिनाथचरित्रं (काव्य) विजयदेवनहात्म्यवृत्तिः, दिग्विजयः (श्रीविजयप्रभसूरिचरित्रं ); चंद्रप्र- भान्याकरणं (श्रीसिद्धहेमव्याकरणप्रक्रिया वि० सं०१७५७ आगरा) मेघदूतसमस्या, युक्तिप्रबोधः (दि. तेरहपन्यखंडन), सप्तसन्यानमहा- काव्यम् , त्रिषष्टिशलाकापुल्पचरित्रम् , मेवमहोदयः, ब्रह्मबोधः, मातृका- 5 प्रसादः, श्रीपार्श्वनाथनाममाला, उदयदीपिका, त्रिणि पत्राणि च ॥ ८-श्रीदेवचन्द्रो गणिः-श्रीखतरगच्छे जिनचंद्रसूरि-शिष्योपाध्याय पुण्यप्रधान-शिष्यउम्सुमतिगणि-शिष्यउराजसागर-शिष्यज्ञानधर्मजी- शिष्य दीपचंद्रगणितशिष्यश्रीदेवचंद्रोगणिः परमशांतः द्रव्यानुयोगनि- घणातः सर्वगच्छसमानहृदयः ।। चेन वाचक्रवर्यत्रीयशोविजयेभ्योध्यात्मरसो पीतश्च येन श्रीजिन- विजय-उत्तमविजयाः पाठिताः ॥ तच्छिष्याः श्रीमतिरनाद्याः ॥ तत्कृतयः-ध्यानदीपिका, आगमसार, नयचक्र, ज्ञानमञ्जरीटीका, चतुर्विंशतिः विंशिका, पूजा त्ववाः प्रभंजनाप्रमुखस्वाध्यायाः इत्यादि । यः पंक्षमाकल्याणकगणिना सह क्रियोध्धारश्चक्रे ततः खरतर--15.. गच्छे ऽपि कापायिकवनप्रवृचिरिति श्रूयते, 10 * तत् शिष्यपरंपरा ॥ उ० नेघविजयः (वि० सं० १७१६) पं. मोजवि० पं०मेरवि० तेजवि० सुन्दरवि. प्रेमवि० धनवि० स्थिरवि० रूपवि०. (अजब सागर) पं०माणिक्यवि० पं० भानुविः (भागवि०) (चतुर्विशिकाकृत), (आगरा) पं०कुशलविजयगणिः (वि०सं०१८१०शीतलजिनप्रतिष्ठाकृत) ४वग्रन्यरचनाकातत्तु वि० सं० १७४३ तः १८०४ पर्यन्त इति तस्मादयं श्रीउत्तमविजयसनकालीन इति सयुक्तियुक्न ।
5 श्रीगुरुमाला ६३-तत्पट्टे त्रिषष्ठीतमः श्रीकपुरविजयगाणिः ॥ तस्य पत्तनसमीपस्थवागरोडग्रामे प्राग्वटवंशे भीमजीगृहे वीराकुक्षी जन्म, कानजीअभिधानं, वि०विंशत्यधिके सप्तदशशत१७२०वर्षे जननी- जनकयोर्देवलोकगतयोः दीक्षा, विजयप्रभसूरिहस्ते प्रज्ञांशपदं वि० पादोनाष्टादशशत १७७५ वर्षे श्रावणबहुलचतुर्दश्यां १४ स्वर्गः। ६४-तत्पट्टे चतुष्पष्ठितमः श्रीक्षमाविजयगणिः ॥ तस्य अर्बुदाचलसन्निधौ पोयंद्राग्रामे कलोशाह-वनांदेगृहे ओसवंशे चामुण्डागोत्रे वि० द्वाविंशत्यधिके सप्तदशशते१७२२वर्षे खीमचंद्रनाम्ना जन्म, चतुश्चत्वारिंशदधिके १७४४ वर्षे ज्येष्ठसितत्रयोदशीदिने गुरु भ्रातृकवि पं० श्रीवृध्धिविजयहस्तेन अहमदावादे दीक्षा, विजयक्षमासूरि- 10 हस्तेन पं० पदं, षडशीत्यधिके १७८६ आश्विनमासे स्वः प्रयाणं ॥ येन सप्तशतजिनप्रतिमाः प्रतिष्ठापिताः। तत्कृतयः-पार्श्वनाथजिनस्तवनचैत्यवंदनस्तुत्याद्याः तस्य शिष्यश्रीयशोविजयः श्रीतत्त्वार्थसूत्रस्तबकस्तवादिकर्ता । ६५-तत्पट्टे पंचषष्ठितमः पं०श्रीजिनविजयगणिः ॥ 15 तस्य श्रीमालज्ञातिः पिताधर्मदासो मातालाडकुमारी विक्रमात् द्विपं- चाशदधिके सप्तदशशत१७५२वर्षे अहमदावादेजन्म,जन्मनाम खुशालचंद्रः वि० सप्तत्यधिके १७७० वर्षे कार्तिककृष्णंषष्ठयां अहमदावादे दीक्षा, वि० एकाशीत्यधिके १७८१ वर्षे गुरूणां हस्तेन जम्बूसरे प्रज्ञांशपदं, द्वितीय एव वर्षे गच्छानुज्ञादानं, एकोनाष्टादशशत१७६५वर्षे 20 श्रावणशुक्लदशम्यां पादराग्रामे स्वर्गगमनं ॥ तत्गौर्जरीकृतिः-ज्ञानपंचमीस्तवः एकादशीस्तवः जिनचतुर्विंशिका कर्पूरविजयगणिस्वाध्यायो गुरुस्वाध्यायश्च (सं० १७७१ पट्टने) ११२ पट्टावली-समुच्चयः 10 ६६-तपट्टे पड्पष्ठितमः श्रीउत्तमविजयगणिः ।। तस्य श्रेष्ठिलालचन्द्रगृहे माणेकदेवीकुक्षौ अहमदावादे वि० पष्ठ्य- धिके सप्तदशशतवर्षे १७६० जन्म, पूजासाहनाम, परणवत्यधिके १७६६ वैशाखकृषष्ट्यां ६ दीक्षा, सप्तविंशत्यधिके अष्टादशशतवर्षे १८२७ माघ- शुक्लाष्टम्या ८ राजनगरे स्वर्गगमन, यो बहुश्रुतः सातत्येन गूर्जरसौराष्ट्रमहा- 5 राष्ट्रादिपु विजहार प्रान्ते नेत्रव्याधिना राजनगरेऽवस्थानमकरोत् यः चतुर- धिकाऽष्टादशशत१८०४वर्षे सं०कचरा सं०रूपचंद्रयोः संघेन सूरतिवन्दिरात जलमार्गेण सिध्धाचलयात्रांचकार तत्समये तत्र उ०सुमतिविजयः पंजोग- विमलः पं०देवचंद्रगणिः विधिपक्षगच्छेउदयसागरसूरिः प्रमुखा मिलिताः। तस्कृतिः-श्रीजिनविजयनिर्याणरासः, अष्टप्रकारीपूजा ॥ तत्समयेष्टादशाधिकष्टादशशतवर्षे १८१८ रघुनाथशिष्यानढुंढकमतात् भीखमजीतः जिनप्रतिमा पीअनुकंपाविरोधिमुखपट्टवन्धस्तेरापंथो निर्गतः। ६७-तत्पट्टे सप्तपष्ठितमःपं श्रीपद्मविजयगाणः ।। तस्य वि०द्विनवत्यधिकसप्तदशशत१७६२वराजनगरे श्रीमालीचणिजो गणेशस्य गृहे झमकुकुक्षितो जन्म,जन्माभिधा पानाचंदइति, वि० पंचाधिके 15 अष्टादशशत१८०५वर्षे वसन्तपंचम्यां ५ राजनगरे दीक्षा, विदशाधिके १८१० राजधन्यपुरे भविजयधर्मसूरिहस्तेन, पंन्यासपदं, वि०द्विपष्ठ्य- धिके १८६२ चैत्रशुक्ल चतुर्थी राजनगरे स्वर्गः ।। यासकलशास्त्रपारावारपारीण: पंचपंचापत्सहस्रग्रंथनिर्माता "पर- मद्रह" इतिख्यातकीर्तिः वानपुरे ढुंढकैः सह लब्धजयवादः जिनप्रतिष्ठा- 20 दिक्रियापरायणः क्रियारुचिः परमसम्वेगिः कविशेखरः सततविहारी ।। तत्कृतयो- रास-श्रीउत्तमविजयगणिरास-पूजा-देववंदन-चैत्यवंदन- स्तव-स्तुत्यांद्याः॥ ६८-तत्पट्टे अष्टषष्ठितमः पं०श्रीरूपविजयगणिः ।। चेन विंशतिस्थानकागमज्ञानकल्याणकपूजा श्रीगुरुरासश्च विर-25 चिताः । तच्छिष्याः-पं०कीर्तिविजयगणि उद्योतवि० अमीविजयाश्च ॥
5 श्रीगुरुमाला ११३. तत्समये तच्छिध्यमहाकविमोहनविजयो भक्तिरसप्रधानः “लट- काला" इतिख्यातः ॥ तथा पं० जिवविजयः कर्मग्रन्थस्तबककर्ता+॥ तथा पं०श्रीक्षमाविजयगणि-शिष्यशुभविजयगणि-शिष्याः पं०श्री- धीरविजयः पं० श्रीवीरविजयः, पं० श्रीअमरविजयः पyपणास्तूतिकारक इति प्रमुखाः ।। तेपु पं०श्रीवीरविजयः सौष्टवतायुततलस्पर्शिकवित्वः विविधभंगी- कलितपूजास्वाध्यायस्तुतिवेलीरासरूपलघुग्रंथनिर्माता मोतिशाहहुँक-हठी- सिंहवाडीजिनालये प्रतिष्ठाकर्ता श्रेष्ठिप्रेमाभाइकस्य संघेन सिध्धगिरियात्रा कारकः (वि. सं. १९०५) यस्य अहमदावादे औदिच्यविप्रकुले जगदीश्वरपत्नीवीजकोरकुक्षि- 10 तो विक्रमादेकोनत्रिंशत्यधिकेऽष्टादशशतवर्षे १८२६ विजयादशम्यां जन्म, जन्मनोऽभिधानं केशवराम इति, गंगाभगिनी,पत्नीरलीयात,अष्टादशमे वर्षे विवाहः अष्टचत्वारिंशदधिके १८४८वर्षे स्तंभनतीर्थसन्निधौ प्रामे दीक्षा,ततः पन्यासपदं, सप्तपष्टयधिके १८६७ वर्षे फाल्गुनशुक्ल द्वितियायां स्वगुरो- देवलोके स्थितिः, वि. दशाधिके एकोनविंशतिशत१६१०वर्षे स्वर्गगमनम् ॥15 श्रीतपोगच्छे आनन्दसूरिशाखायां क्रमेण श्रीविजयतिलकसूरि-श्री- हीरसृरिशिष्यविजयानन्दसूरि-श्रीविजयराजसूरि-श्रीविजयमानसूरि श्रीविजयऋद्धिसूरि श्रीविजयसौभाग्यसूरयो भूवन ॥ तच्छिष्यो विजय- लक्ष्मीसूरिः उपदेशप्रासादस्तंभनिर्माणसूत्रधारः (वि० सं०१८४३)-भापायां विंशतिस्थानकपूजा (वि० सं० १८४५)-चैत्यवन्दन-ज्ञानवंदनादीनां कर्ता,॥ 20 यल्लघुगुरुबंधुः प्रेमविजयः।। + श्रीविजयसिंहसूरि शिष्यपंगजविजयगणि शिष्यपं०हितविजय शिष्य पं०ज्ञानविजय शिष्यपं०जीवविजय इति (कर्मग्रन्थ वि०सं० १८०३) 'भयं श्रीधर्मसंग्रह-अष्टमदस्वाध्यायकर्ता उ०मानविजय एव संभवति १५ २१४ पट्टावली-समुच्चयः ६.--तत्पट्टे एकोनसप्ततितमः५०श्रीकीतिविजयगाणः ।। तस्य वि०एकपष्ठ्यधिकाष्टादशतव दीक्षा, वहवाशिप्याः ॥ तच्छिष्यो जीवविजयः सकलतीर्थ-शांतिजिनस्तवकर्ता। ७०-तत्पट्टे सप्ततितम :श्रीपं०कस्तूविजयगणिः ॥ तस्य वि०सप्तत्रिंशदधिके अष्टादशशतवर्षे १८३७ प्रह्नादनपुरे जन्म, 5 वि० सप्तत्यधिके १८७० दीक्षा ॥ ७१-तत्सद्दे एकसप्ततितमः पं० श्रीमणिविजयगणिः ।। तस्य वीरमगामसन्निधौ अघारग्रामे द्विपञ्चाशदधिके अष्टादशशत- वर्षे १८५२ जन्म, पिता जीवणदास, माता गुलाववाइ, स्वनाम मोतिचंद, त्रयो भ्रातरः पानु भगिनी, सप्तसप्तत्यधिके१८७७पालीग्रामे दीक्षा, पंचत्रि- 10 शदधिके एकोनविंशतिशतवर्षे १९३५ आश्विनधवलाष्टम्यां - अहमदावा- दनगरे स्वर्गः॥ यो महातपस्वी, अप्रतिबध्धविहारी प्रशान्तमूर्तिश्च तत्सप्तर्पयः शिष्याः-श्रीअमृतविजयः श्रीपद्मविजयः पं०श्रीवुध्धिवि- जयगणिः पं०श्रीगुलाबविजयगणिः . श्रीहीरविजयः पं. श्रीशुभविजयः पं०श्रीसिद्धिविजयः ॥ प्रज्ञांशगुलाबविजयसिध्धिविजयी सांप्रतं शासनम- 15 लंकुरुतःस्म।। ७२-तत्सट्टे द्विसप्ततिमः श्रीधुधिविजयगणिः ।। तस्य सुस्वप्नसुचितस्य वि०पष्ठ्यधिकअष्टादशतवर्षे १८६३ पंचनदे जन्म, अष्टाशीत्यधिकेव१८८८अजिम्हब्रह्मचर्येणैवादौ ढुंढकमते वुटेरा- यजीनाम्ना व्रतस्वीकारः वि०च्यधिके एकोनविंशतिशते१९०३वर्षे शुद्धधर्म- 20 श्रध्धानं,वि०द्वादशाधिके १९१२ राजनगरे शिष्याभ्यां समंसंवेगदीक्षा,अष्ट- त्रिंशदधिके १९३८ फाल्गुनावास्यां राजनगरे खराप्तिः, भगुभाइपुत्रदल- पतभाइ इत्यनेन निर्वाणोत्सवः कृतः । यः मुखपट्टी बिना ढुंढकसाधुवेपेणैव अष्टौ वर्षाणि शुद्धधर्मदेशकः, सिध्धगिरियात्राकृत् , पंचनदे संवेगमतद्योतकेपु प्रथमः, मुहपत्तिचर्चा- 25 ग्रंथकृत् , परात्मतत्वानंदी, महान्योगी, निःस्पृहः ।
श्रीगुरुमाला तच्छिष्याष्टकम्- (१) प्रथमः श्रीमुक्तिविजयो गणिः गणनायकः चारित्रधर्मयुग- प्रवर्तकः । (२) द्वितीयो मुनिश्रीवृद्धिचंद्रः । यस्य पंचनदे रामनगरे नवत्यधिके अष्टादशशतवर्षे ओसवंशे जन्म, अष्टाधिके एकोनविंशतिशते व ढुंढक- 5 मते दीक्षा, द्वादशाधिके संवेगदीक्षा, एकोनपंचाशदधिके भावनगरे स्वर्गः ॥ तच्छिष्याः-श्रीकेवलविजयः पं०श्रीगंभिरविजयः पं०चतुरविजयः श्रीहेमविजयः श्रीविजयधर्मसूरिः श्रीविजयनेमिसूरिः श्रीप्रेमविजयः श्रीकपूरविजयः उत्तमविजयः । (३) तृतियो मुनिनीतिविजयः । यच्छिष्याः- 10 पं०विनयविजयः, श्रीभक्तिविजयः, शान्तात्मा सिध्धिविजयः, तिलकविजयः, मोतिविजयः, प्रतापविजयः, सुंदरविजयः, दर्शनविजयः, चारित्रविजयः। (४) चतुर्थः पं०आनंदविजयः। यच्छिष्याः-श्रीहर्पविजयः, मानविजयः कुमुदविजयः। 15 (५) पंचमो मोतिविजयः । यलियौ चंद्रविजय-गुणविजयौ । (६) पष्ठः श्रीविजयानंदसूरिः पंचापे जैनधर्मस्थापकः न्यायांभोनि- धिरितिख्यातिमान् दयानंदसरस्वतीविजेता॥ यस्य पंचनदे लहेराग्रामे गणे- शरामगृहे रूपाकुक्षौ विवत्रिनवत्यधिके अष्टादशशतवर्षे १८६३जन्म, वि० एकादशाधिके एकोनविंशतिशतवर्षे १६११मृगशिर्पपंचम्यां ढुंढकमतदीक्षा, 202 एकत्रिंशदधिके १९३१ राजनगरे जैनदीक्षा, त्रिचत्वारिंशदधिके १९४३ वर्षे कार्तिककृष्णपंचम्यां सूरिपदं, द्विपंचाशदधिके १९५२ प्रथमज्येष्ठ-- शुक्लसप्तमीनिशायां गुजरानवालायां स्वर्गमन ॥ यत्कृतग्रंथास्तत्वनिर्णयप्रासाद-जैनतत्वादर्श-अज्ञानतिमिरभास्कर- सम्यक्त्वशल्योद्धार-जैनमतवृक्ष-चिकागोप्रश्नोत्तर-जैनप्रश्नोत्तरसंग्रह-25 पूजा-चतुर्विंशतिस्तव-स्वाध्यायाः ।
2 ११६ पट्टावली-समुच्चयः यलिण्याः श्रीमन्तो लक्ष्मी०संतोष रंग० रत्नचारित्र० कुशल० प्रमाद० उद्योत० सुमति० वाचकवीर० प्रर्वतककांति. जय शांति अमरविजयाः। (७) सप्तमः तपस्वी श्रीखांतिविजयः पंचनदीयः पाष्टमक्ततपो- ऽभिग्रही उग्रतपस्वी । यच्छिष्याः मणिक मोहन खुशाल प्रतापविजयाः ।। (८) अष्टमः श्रीदानविजयः। समये श्रीआनंदविमलसूरितो विमलशाखायां क्रमशः ऋब्धि विमल-कीतिविमल-वीरविमल-महोदयविमल-प्रमोदविमल-मरिणविमल- उद्योतविमल-दानविमलस्य शिष्यः प्रज्ञांशदयाविमलः ॥ तथा हीरे- विजयसूरितः क्रमेण विजयशाखायां ऋधिर चारित्र० रंग. तेज. 10 यशवंत० कुशल. पंजीत० श्री. जय० पं०हर्ष चंद्रविजयाः तत् शिष्यः प्रज्ञांशहतविजयः ॥ तथा ततएव सागरशाखायां शिष्यक्रमण उसहजसागर-उ०जयसागर-पंजीतसागर-मानसागर-मयगलसागर- पद्मसागर-स्वरूपसागर-ज्ञानसागर-अयासागराः तशिष्यस्तपस्वीनेम- सागर॥ श्रीरूपवि शिष्यअमीवि०शिध्यसौभाग्यवि०शिष्यपं रत्नविजयः।15 खरतरगच्छेऽपि प्राप्रह्लादनपुरात् तपागच्छाचारः सौम्यमूर्तिः श्रीमोहन- लालजीमुनिः ॥ तत्समये श्रीनेमसागरंशिष्यश्रीरविसागरशिप्यात् शांतिसागरात्- खेच्छावृत्तिव्रतविधितपोविरोधो मनस्तोपधर्मः "शांतिसागरमतो निर्गतः । त्थान्यदर्शनेषु स्वामिनारायण, ब्रह्मसमाज, कुका, अहमदशाह- 20 फीरका, आर्यसमाज एते मता निर्गताः इति ॥ ७३-त्रिसप्ततितमः श्रीमुक्तिविजयगाणः ।। तत्य वि पड़शीत्यधिके अष्टादशशतवर्षे १८८६ पंचनदे श्यालकोटे जन्म, द्वयधिके एकोनविंशतिशतवर्षे १६०२ श्रीबुटेरायजीहस्तेन हुंडक- मतदीक्षा, द्वितीयवर्षे संवेगधर्माभिमुखता, द्वादशाधिके १९१२ गुरुणा सह 25 श्रीगुरुमाला ११७ संवेगदीक्षा, त्रयोविंशत्यधिके १९२३ पं दयाविमलगणिहस्तेन गणिपदं; पंचचत्वारिंशदधिके १९४५ मृगशिर्षकृष्णपप्ठ्यां६ भावनगरे स्वर्गः, दादा. वाडीउद्याने अग्निसंस्कारः, मोतिशार्कमध्ये सिध्धगिरौ मूर्तिप्रतिष्ठापनं । यः संवेगमुर्तिः शिष्यलाभोदयः चारित्रधर्मकदानी एकछत्रमुनि- सामाज्याधिपतिः मुहपत्तिचर्चावादविजेता शांतिसागरमतनिरसनः युग- 5 प्रधानः । यदुपदेशात् श्रेष्टिप्रेमाभाइ भगिनीउजमबाइ इत्यनया स्वावासः पौपधशालायै दत्तः द्वौसिद्धगिरिसंघौ निर्गतौ (वि०१९२१ वि०सं० १९४४) द्वितीयसंघेन सह विहारे घटः स्फुटितो बहूनां निषेधेऽपि विहारः कृतः पाद- लिप्तेपुरे चतुर्मासकमपिजातं, ततो भावनगरे स्वर्गः युगप्रधाने गते शासने कलिः समागतः ॥ श्रीवृद्धिचन्द्रप्रमुखा गुरुभातरस्तद्धस्तदीक्षिता एव येन 10 नैके शिष्या गुरुवन्धुभ्यो दत्ताः ॥ येन महेशानपुरे संवेगिमुनिप्रचारः कृतः। पादलिप्तेपुरे श्रीदर्शन विजयं प्रेष्य यतिरुद्धं मुनिव्याख्यानमुद्घा- टितं यदद्यापि निरंतरायं समस्ति । सूरिपदप्रदानतत्परं प्रेमाभाइवेष्ठिनं येनोक्तं-श्रेष्ठिनः अतःपरं पुन रेतन्नवाच्यं यदि श्रीसत्यविजयगणिरपि प्रतिष्ठापदमानहानिभिया सूरिपदं 15 न ललौ वदाहंकथं तद्योग्यः ? मम गणिपदमपि महत् पालनेनैव प्राप्त- पदव्याः फलाप्तिरन्यथातु सूरयोऽपि नरकगामिनः सूत्रे कण्ठिता इति । तस्य शिष्याः-(१) प्रशस्तागमाभ्यासिदेवविजयः (२) गुणविजयः (३) हंसविजयः (४) गुलाबविजयः (५) श्रीविजयकमलसूरिः (६)थोमण- विजयः (७) महावैयाकरणन्यायविशारदो दानविजय इति । 20 तेपु श्रीमद्गुलावविजयस्य शिष्याः-मणिविजयः मंगलविजयः, नरेन्द्रविजयः प्रधानविजयः । ७४-तत्पट्टे चतुःसप्ततितमः श्रीविजयकमलसूरिः॥ तस्य वि त्रयोदशाधिके एकोनविंशतिशते वर्षे १९१३ चैत्रशुक्ल- द्वितीयायां २ पादलिप्तेपुरे कोरडीयागोत्रे श्रेष्ठिदेवचन्द्रगृहे मेघबाईकुक्षी- 25 , पट्टावली-समुच्चयः जन्म, कल्याणचन्द्र नाम, चत्वारो भातरः,मृतयोर्मातृपित्रोः पत्रिंशदधिके १६३६ माधवशुक्लाष्टम्यां राजनगरे दीक्षा, द्वितीयवर्षे१९३७कार्तिकासित- 'द्वादश्यां उपस्थापना, वि०सप्तचत्वारिंशदधिके १६४७ ज्येष्ठशुक्लत्रयोदश्यां १३५०श्रीहेतविजयहस्तेन लींवड़ीनगरे गणिपदं पन्यासपदं,वि०त्रिसप्तत्य धिके १९७३ माघ शुक्लपष्टयां ६ रविवारे राजनगरे पं० श्रीदेवविजय- 5 गणिः, पं.श्रीमोहनविजयगणिः, प्रवर्तिनिआर्यागुलाबश्रीजी, साध्वी- प्रेमश्रीजी, नगरप्रेष्ठिकस्तूरभाइ, श्रेष्ठिविमलभाइ, श्रेष्ठिमातागंगामा, श्रेष्ठि- नीमुक्ताबाइ, प्रमुखसमग्रसंघेनप्रदत्तं सूरिपदं ॥ तच्छिष्याः-(१) श्रीभावविजयः, (२)पं श्रीकेसरविजययोगणिः, (३) श्रीविनयविजयो गुरुः, ४ (४) पं. देवविजयगणिः, (५) पं. मोहन- 10 विजयगणिः व्याख्याता (६) श्रीमोतिविजयः ॥ तथा हेतविरामवि० 'नयविज्ञानविजया निरपत्या एव स्वर्गभाजः ।। यः करुणावत्सलः शांतप्रतिमो महातपस्त्री आवालब्रह्मचारी सूरि- शेखरो भगवान् चतुर्विधसंघेन सह समागत्य संप्रति पादलिप्तपुरमलंक- रोति, जीवेभ्यो दुःखौषधिरूपं धर्मलाभं ददन् जगत्कल्याणं वांच्छति स्म 115 सम्प्रति धुरिणः-श्रीविजयनेमसूरिः श्रीविजयकमलसूरिः श्रीविजय- धर्मसूरिः श्रीबुद्धिसागरसूरिः पं.सिद्धिविजयगणिः परमकारुणिकोमुनि- सिद्धिविजयः पं०चतुरविजयगणिः परमक्रियारुचिः श्रीजीतविजयः आग- मनिष्णातः पं० आणंदसागरगणिः पं०हरखमुनिश्च * श्रीविनयविजयस्थविराणां वि०सं० १९१६ वैःशु० ६ जामनगरे जन्म, वि०सं०१९५५ जामनगरे लघुदीक्षा, वि० सं०१९५७ महेसानपुरे पोपकृष्ण११ छेदोप- स्थापना, १९८३ का० कृ० ६ जामनगरे स्थविरपदं, वि०सं० १९८८ पोप कृ. ६, जामनारे स्वर्गः ॥
श्रीगुरुमाला
११६
|| प्रशस्तिः ।
२
5
जीयासुायविभवाः यशोविजयवाचव
गुरुकुलहिते दक्षाः स्मृतिप्रत्यक्षमूर्तयः
वर्द्धमानात्समारभ्य गुरुमाला गुणैर्वरा
वर्द्धमानासहस्राब्दं धीसूच्या सूत्रिता नवा
श्रीमद्विजयकमल-सूरीणामाज्ञयाकृता
गुप्तिध्यानजिनेवर्षे पञ्चम्यां श्रावणे सिते
तेषां शिष्यविनय-विजयस्यान्तेवासिना
चारित्रविजयेनैषा पादलिप्ते पुरे लघुः
४
इति श्रीमती गुरुमालापट्टावली समाप्ता
'10
धर्मचारित्रशिष्येण, अमरचंद्रसूनुना
पं०त्रिभूवनदासेन, शुध्धिकृत्य च चित्रिता १
[८] श्रीमन्महाकारणपरम्परा ( कर्ता-श्रीदेवविमलगाणिः) 5 10. अथो पुरासन्मरते वृपाकमुखाश्चतुर्विंशतितीर्थनाथाः । बाह्यान्यबाह्यानि तमांसि हन्तुं कृतद्विरूपा इव भानुमन्तः ॥१॥ इक्ष्वाकुवंशाम्बुधिशीतभासां द्वाविंशतिस्तीर्थकृतां बभूव । यया तमःपङ्कमपास्य पन्थाः प्राकाशि सिद्धेः शरदेव विश्वे ॥२॥ बभूवतुर्ती भुवनप्रदीपौ जिनौ यदूनां पुनरन्ववाये । अरिष्टनेमिमुनिसुव्रतश्च स्फूर्जद्भुजाविन्द्रियवेश्मनीव । ३।। सिद्धार्थभूकान्तसुतो जिनानामपश्चिमोऽजायत पश्चिमोऽपि । शशी व्यभात्पकिलपङ्कजास्यकादम्बवद्यस्य यशःसुधाब्धौ ॥४॥ बाल्येपि हेमाद्रिरकम्पि येन प्रभञ्जनेनेव निकेतकेतुः । श्रीद्वादशाङ्गी च यतः प्रवृत्ता गुरोगिरीणामिव जहनुकन्या ॥५॥ एकादशासनगणधारिधुर्याः श्रीइन्द्रभूतिप्रमुखा अमुष्य । आर्योपयामे पुनराप्तमूर्ति रुद्राः स्मरं हन्तुमिवेहमानाः ॥६॥ बभूव मुख्यो वसुभूतिसूनुस्तेषां गणीनामिह गौतमाहः । यो वक्रमावं न बमार पृथ्वीसुतोऽपि नो विष्णुपदावलम्बी ॥७॥ यत्पाणिपद्मः सपुनर्भवोऽपि दत्ते नतानामपुनर्भवं यत् । शिष्यीकृता येन भवं विहाय शिवं श्रयन्ते च तदत्र चित्रम् ।।८।। सूर्यस्य रश्मीनवलम्व्य वनावलम्बरश्मीनिव यः शयाभ्याम् । नन्तु जिनानार्षभिक्लृप्तमूर्तीनष्टापदो-धरमारुरोह ।।।। ६-तपः कृशाङ्गास्तं शैलमारोढुं न वयं चामाः । चविष्यति कथं प्रौढदेहोऽयं गजराजवत् ॥ 15 5 श्रीमन्महावीरपट्टपरम्परा १२१ कथं लभेतास्य तुला सुरदुर्य द्यस्य नामापि पिपर्ति कामान् । तपस्विनोऽप्यभ्यवहारयन्यो द्विधामृतास्वादजुपः पुपोप ॥१०॥ आसीत्सुधर्मा गणभृत्सु तेषु श्रीवर्धमानप्रभुपट्टधुर्यः । विहाय विश्वे सुरभीतनूजं कः स्तात्परो धुर्यपदावलम्बी ॥११॥ यः पञ्चमोऽभूद् गणपुंगवानां किं पञ्चमी स्वेन गति यियासुः। यत्रोक्तिभिस्तीर्थकृतां दिदीपे शुक्तिबजे वारिमुचामिवाद्भिः ॥१२॥ सरस्वतीशालिलसज्जिनश्री-रगाधमध्यो रसभासमानः । सिद्धांत आस्ते यदुपज्ञमुद्यदभङ्गभङ्गः सरितामिवेशः ॥१३॥ गणीन्दुना पट्टरमा गणीन्दुः पट्टश्रिया च व्यतिभासते स्म । निशा निशेशेन निशा निशेश इवापि शंभोः परिचारिचेताः ॥१४॥ यशःश्रियाधःकृतकुन्दकम्वु-र्जम्बूकुमारोऽजनि तस्य पढ़ें। लघोरपि स्वस्य यतोऽभिभूतिं पश्यन्हियादृश्य इव स्मरोऽभूत् ॥१५॥ उज्मांचकारैष महेभ्यकन्या मदेन्दिरामूर्तिमतीरिवाष्टौ । नवाधिका यो नवति हिरण्यकोटीर्नु चेटीरिव दोपराजाम् ॥१६॥ वशंवदीभूतजगत्त्रयस्य न पुस्फुरेऽस्मिन्कमनस्य शक्त्या। 15 हविर्भुजो भस्मितकाननस्य विस्फूर्यते किं महसाम्बुराशौ ॥१७॥ 10 पश्यत्सु तेषु मार्तण्डकरानालम्ब्य गौतमः । गणभृनिजलब्ध्यैवाऽष्टापदोय ययौ ध्रुवन् ॥ इति ऋपिमंडलवृत्तौ ॥ सूर्यस्यांगून समाश्रित्य, तेपामुत्पश्यतामपि । स गरुमानिवोड्डीय, ययौ मनु गिरेः शिरः॥ इतिवृन्दारवृत्ती, रविकिरणावलम्बनम् । तथा-" भयवं गोयमो जंचाचारणलद्धिपलूतापुडगम्मिनिस्साए उर्छप्पयह ज़ाव ते पलायन्ति" । इत्यावश्यकद्वाविंशतिसहस्यां । मलयगिरिवृत्तावपि अयमेव पाठः । लूतातन्त्ववलम्बनमिति पाठद्वयमपिशास्त्रानुसारि ॥ इति स्त्रोपज्ञायां तया- . ख्यायाम् ॥
5 10 १२२ पट्टावली-समुच्चयः पश्यन्तु वैदुष्यममुष्य जम्बू-प्रभोर्वपुर्सितमत्स्यकेतोः । विश्वं वृषस्यन्त्यपि पांशुलेव वशीकृता येन शिवस्मतास्या ॥१८॥ अलंचकार प्रभवप्रभुस्तत्पट्टिश्रियं पुण्द्र इवेन्दुवक्त्राम् । स्तेनोपि सार्थेश इवाङ्गिनो यः श्रेयः श्रियं प्रापयन चित्रम् ॥१६॥ किं वय॑ते वर्ण्यगुणस्य चौर्य-चातुर्यमस्य प्रभवस्य भर्तुः । अहार्यमप्येष मनोऽभिधानमपाहरद्यत्रिदिवेन्दिरायाः ॥२०॥ शय्यंभवो ऽभूपयदस्य पट्टसिंहासनं पित्र्यमिवावनीन्द्रः। कलिन्दिका मौक्तिकमालिकेव यत्कण्ठपीठे विलुठत्यकुण्ठा ॥२१॥ यूपादधस्तः प्रतिमां जिनेन्दो-र्वाचा स वाचंयमपुङ्गवस्य । हसंज्ञयेव स्वगुरोः किरीटी नाराचगङ्गां प्रकटीचकार ॥२२॥ वगाह्य शास्त्र मनकाबसूनोः कृते कृतश्रीदशकालिकं यः । हरिः सुधामुद्धृतवान्सुपर्ववर्गस्य निर्मथ्य यथाम्बुनाथम् ॥२३॥ संपूरयन्कीर्तिनभोनदीभिर्दिशो यशोभद्र गणाधिराजः । व्यभूपयरपट्टममुष्य भूभृद्धित्यकां दस्युरिव द्विपानाम् ॥२४॥ एतद्यशःक्षीरधिनीरपूरैः संपूरितायां परितस्त्रिलोक्याम् । अबुध्यमानोऽम्बुनिधिं स्वशय्यां पद्मशयो ऽभूदिव पद्मनाभः ॥२५॥ संभूतिपूर्वो विजयो गुरुस्तत्पट्ट श्रिया पल्लवयांचकार । कदम्बजम्बूकुटजावनीजकुंज नभोम्भोद इवाम्बुवृष्ट्या ॥२६॥ संहर्परोषात्स्वजिघांसुमेतत्प्रतापमार्तण्डमवेक्ष्यसाक्षात् । युयुत्सया हैहयवत्सहस्रं सहस्रभासेव करा ध्रियन्ते ॥२७॥ स तत्सतीोऽजनि भद्रवाहुः सूरिः समग्रागमपारदृश्वा । दशाश्रुतस्कन्धत उद्दधार वज्राकराद्वजमिवान कल्पम् ॥२८॥ उपलवो मन्त्रमयोपसर्गहरस्तवेनावधि येन संघात् । जनुष्मतो जांगुलिकेन जाग्रद्गरस्य वेगः किल जांगुलीभिः ॥२६॥ यत्कीर्तिगंगां प्रसृतां त्रिलोक्यामालोक्य किं पण्मुखतां दधानः । जगभ्रमीभिर्जननी दिदचगंगासुतोऽध्यात मयूरपृष्ठम् ॥३०॥ 15 20 25 5. 10. श्रीमन्महावीरपट्टपरम्परा श्रीस्थूलभद्रेण निजान्वबायस्रोतस्विनीनायककौस्तुभेन । विश्वत्रयी तद्यशसेव शोभामलम्भि तत्पट्टपयोधिपुत्री ॥३१॥ प्रवालमुक्तामणिमञ्जिमश्रीचित्राप्सरःस्वर्द्विरदाश्वदृश्यम् । कोशागृहं प्रापि यः सिपेवे हरिर्धनच्छायमिवाम्बुराशिम् ॥३२॥ पण्यांगनायाः किलकिञ्चितानि न लेमिरे यस्य हृदि प्रवेशम् । धनुर्भूतः सानुमतः शिलायां प्रपत्कपंक्तेः प्रहृतानि यद्वत् ॥३३॥ प्रानिर्जितश्रीरथनेमिमुख्यत्रीरावलीनामिव वैरशुद्धः। विधित्सपाध्यास्य तदाश्रयं यो ध्यानासिनाऽनङ्गनृपं जघान ॥३४॥ चक्रीव रत्नानि चतुर्दशापि पूर्वाणि धत्ते स्म पतिर्यतीनाम् । यञ्च कचिद्देवकुले स्वजामोश्चित्रीयितुं सत्य इवास सिंहः ॥३॥ येनोपदेशच्छूलतः स्वपाणिसंज्ञाज्ञया स्तम्भतलाददर्शि । निधिः स्वनिक्षिप्त इव प्रवासिसुहृद्गृहिण्याः सदने समेत्य ॥३६॥ पट्टोऽथ तस्यार्यमहागिरिश्चापरः क्रमादार्यसुहस्तिसूरिः। वभूवतुर्धर्मधुरं दधानौ रथे यथासारथिकस्य रथ्यौ ॥३७. मरुद्गृहादार्यसुइस्तिमूर्तिभूमौ मरुवृक्ष इवोत्तवार । कृपाणवेन द्रमकोऽपि येन त्रिखएडभूमीप्रभुतामलम्मि ॥३८॥ भूसुभ्रुवो भर्तृतया प्रगल्भभूपाविशेपानिव शातकौम्भान् । सपादलक्षानिह संप्रतिर्यो निर्मापयामास महाविहारान् ॥३९॥ यः सम्प्रतिक्षोणिपतिः सपादकोटीर्नु पेटीः खयशोनिधीनाम् । स्थाद्वादिनां सद्मसु शिल्पिसंधैरचीकरत्पारगतीयमूर्तीः ॥४०॥ नक्तं नलिन्यादि(म)गुल्मनामविमानमार्गः प्रभुणा च येन । स्नेहप्रियेणेव महेभ्यसूनोरदय॑वन्तीसुकुमालनाम्नः ॥ ४१ ॥ 15. 201 ३१-निजः स्वकीयो यो'नागरनामा ब्राह्मणवंशः स 'एवं स्रोतस्विनीनायक: नदीपतिः समुद्रः तत्र कौस्तुभेन । इतिद्वाख्यायां । ३५-~यक्षा, यक्षदिन्ना, भूता, मूतदिन्ना, सेना, वेना, रेणा। क्वचिदेणापि- नामद, दम् । एतन्नाम्नीः स्वजामीः सप्तापि निजभगिनी इति तवृत्तौ ॥
5 10 १२४ पट्टावली-समुच्चयः स्थाने स्ववस्तुस्लिदिवं गतस्य व्यधावन्तीसुकुमालसूनुः । नाम्ना महाकाल इतीह पुण्यपानीयशालामिव सार्वशालाम् ॥४२॥ श्रीमत्सुहस्तिबतिवासवस्य श्रीसुस्थितः सुप्रतिबद्धसूरिः। पदं विनेयौ नयतः खलक्ष्मी क्रम मुरारेरिव पुष्पदन्तौ ॥ ४३ ।। प्रीति सृजन्ती.पुरुपोत्तमानां दुग्धाम्बुराशेरिव पद्मवासा । हृदा जिन बिभ्रत आविरासीत्तत्सूरियुग्मादिह "कौटिकारव्या ॥४४|| श्रीइन्द्रदिन्ननतिसार्वभौमस्तत्पट्टलक्ष्मीतिलकं बभूव । निशुम्भ्यते दांभिकता स्म येन कलिन्दकन्येव हलायुधेन ।।४।। पक्षद्वयं मिन्नतमोभरेण पित्रोः पवित्रीक्रियते स्म येन । कुबेरदिग्दक्षिणयोः पदव्योर्द्वन्द्व प्रियेणेव पयोजिनीनाम् ।।४।। श्रीदिन्नसूरिगुणभूरिरस्मात्सप्तर्पिभूरंगिरसो यथासीत् । येनानुरागोऽवधि कालनेमिः कल्लोलिनी वल्लभशायिनेव ॥४७॥ पञ्चाशुगान्यः समितीविधाय बभञ्ज पञ्चाशुगपञ्चबाणीम् । शरेण केनापि न चेत्कदाचित्कस्मान्न तं स प्रभवेद्वपुष्मान् ॥४८॥ सूरीश्वरः सीहगिरिः क्रमेण व्यभासयत्तत्प्रभुपट्टलक्ष्मीम् । जिनस्य पादं शिरसा स्पृशन्ती निकाय्यराजीमिव केतुवारः ॥४६॥ विन्ध्यं निपीताब्धिरिव तीन्द्रो य एधमानं निपिषेध कोपम् । यद्वाक्तरज्ञैश्च जिताभ्रसिंधुनपातिरेकादिव निमग्नगासीत् ॥५०॥ तमोभरोर्वीधरभेदवनिवज्रोऽथ वज्रप्रभुरेतदीयम् । पट्ट परां प्रापयति स्म भूषां माणिक्यकोटीर इवोत्तमांगम् ।।१।। आशैशवादेव जहौ निजाम्बां वेलामिव क्षीरनिधेः सुधांशुः । अध्यैष्ट यः पालनके शयानोऽप्येकादशाङ्गीः स्मृतपूर्वजन्मा ॥५२॥ यः पुष्पदः पल्लवलीलयेव वैराग्यलक्ष्म्यालमकारिखाल्ये। प्राग्जन्ममित्रात्रिदशान्नभोगविद्यां पुनर्वैकिलब्धिमापत् ॥५३॥ दुर्भिक्षवर्षे सुभिक्षभूमी संघं कृपानीरनिधेनिनीपोः । वज्रप्रभोर्यस्य पटः पटीयान्विमानवद्वयोमनि दीप्यतेस्म ॥५४॥, 15 20 25 १२५ 5 श्रीमन्महावीरपट्टपरम्परा सहैव देहेन समग्रसंघं नयत्यसौ सिद्धिपुरीमिवैनम् । जनैरिति व्योमनि तय॑माणः पटः प्रभोबौद्धपुरीमवाप ॥५५॥ ध्यातुर्वरं श्री श्रुतदेवतेव यस्यादरात्पद्ममदत्त पद्मा । वनापितुर्मित्रहुताशनस्याग्रहाच्च यो विंशतिलक्षपुष्पान् ॥५६॥ मूतैरिव खस्य गुणैः प्रफुल्लत्पुष्पोत्करैः पर्युपणाक्षणेपु । समुन्नतिं शाम्भवशासनस्य तस्यां सुनन्दातनयस्ततान ॥५७|| प्रावोधयद्वौद्धपुरीप्रभु यः समं समग्रैरपि पौरलोकैः । साकं शकुन्तैरिव पङ्कजानां कुचं समुद्यद्गगनाध्वनीनः ॥८॥ अपास्यति स्माद्यसुतां सरागां यो रुक्मिणी काञ्चनकोटिभिश्च । क्रोडन्मृगेन्द्रां स्मितसल्लकीभिर्निकुञ्जराजीमिव कुञ्जरेन्द्रः ॥५॥ श्रीवासेनोऽथ तदीयपट्ट व्यभासयत्प्रीणितजन्तुजातः । स्फुरन्मदोद्मद इव द्विपेन्द्रकपोलमानन्दितचञ्चरीकः ॥६०॥ दुर्भिक्षके पायसमेक्ष्य लक्षपक्कं महेभ्यस्य गृहे प्रभुर्यः । दिने द्वितीये कुलदेवतेव न्यवेदयद्भाविसुकालमस्य ॥ ६१ ॥ 10 ५६-पर्युपणदिनेषु अष्टान्हिकामहोत्सवं कर्तुमिच्छोः जैनद्विष्टतया यौध- नृपतिवारितमालिमण्डलात् पुष्पमात्रमप्यनाप्नुवतः संघस्य कृते कुसुमानयनार्थ प्रस्थितस्य पद्महदे यातस्य यस्य वजूस्वामिनः पद्मा लक्ष्मी श्रादरात् भक्तिभरतः स्तव- नवंदनपूर्वकम् पद्म स्वहदात् सहस्रपत्रमादाय भगवत्पूजार्थ प्रयान्ती श्रीस्तत्सहस्रदल- कमलं पद्मार्थोपगतायास्मै श्रदत्त दत्तवती ॥ + + (विंशतिलक्षपुष्पाणि) मित्र- तिर्यक्जृम्भकदेवविनिर्मितिविमाने स्थापितवानित्यर्थः ॥ इतितद्व्याख्यायाम् ॥ १९-कोडीसए धणसंचियस्स गुणस्स भरियाए कनाए । इत्युपदेशमाला- वचनात् ॥ किंभूताम् ? सरागां स्वसौधर्सन्निधिस्थितसाध्वीगीयमानयद्गुणग्रामाऽऽ कर्ण- नोद्भूतानुरागवशंवदतया 'अस्मिन् भवे मम प्राणनाथो वजस्वाम्येव नान्यः' इतिकृतनिश्चयतया सस्नेहां जही। इति तदव्याख्यायाम् । ६१-यः वजूसेनः प्रभुर्गणस्वामी दुर्भिक्षके द्वितीयवारं द्वादशहायनजलवाहा वृष्टेरुभूतदुष्कालसमये श्रीवजूस्वामिना दक्षिणस्यां दिशि प्रेपितः सन् अस्य महे- 5 10 १२६ पट्टावली-समुच्चयः चत्वार एतत्तनया विनेयाः शाखामृतस्तस्य विभोर्वभूवुः । इवामरद्वोषिचमूजयश्रीजुषः सुरेन्द्रद्विरदस्य दन्ताः ॥६२॥ भर्ना सुराणमिव लोकपालेष्वेतेषु सौदर्ययतीश्वरेपु । श्रीचन्द्रनाना मुनिपुंगवेन तत्पट्टपूर्वा प्रमदेन भेजे ॥६३।। राजा स्वयं राजनतं सदोषो निर्दोषमकोपगतो निरकम् । सास्तो निरस्तं च निजाधिकं यं समीक्ष्य चिक्षाय शशी किमया ॥६४॥ श्रीचन्द्रसूरेरथ चन्द्रगच्छ इति प्रथा प्रादुरभूद्गणस्य । भागीरथीनाम भगीरथाख्यमहीमहेन्द्रादिव देवनद्याः॥६५॥ कल्लोलिकारुण्यरसान्वितस्य सामन्तभद्रप्रभुरस्य पट्टम् । व्यराजयद्वारिरहाकरस्यमध्यं यथोनिद्रितपुण्डरीकम् ॥६६॥ वैमुख्यभाग्यो विषयात्कुरङ्गद्वषीव जज्ञे विपिने निवासी। तस्मान्मुनीन्दोर्वनवासिसंज्ञा परा पुनःप्रादुभून्मुनीनाम् ॥६॥ कोरएटके वीरजिनेन्द्रमूर्ति दृक्पान्थवृत्तिं कृतपुण्यपाकाम् । यः प्रत्यतिष्ठत्किमु सत्त्रशाला स वृद्धदेवो ऽजनि तस्य पट्टे ॥८॥ प्रद्योतनाप्रभुणा ऽप्यमुष्य पट्ट परं वैभवमाबभार। 15. त्रैलोक्यलक्ष्मीतिलकायितेन पितुः स्वपुत्रेण यथान्ववायः ॥६॥ प्रबोधयन्भव्यसरोजराजीः संशोषयन्दुर्नयकर्दमांश्च । दोषोदयं निर्दलयन्महस्वी प्रद्योतनो ऽन्यः किमभूद्धवोऽयम् ॥७०॥ धिया जयंश्चित्रशिखण्डिसूनुं गङ्गातरंगायितवाग्विलासः। श्रीमानदेवः पदमेतदीयं सभ्यः सभास्थानमिवाध्युवास ॥७१॥ पदप्रदानावसरे समीक्ष्य साक्षात्तदंसोपरिवाणिपझे। राज्यादिव क्षोणिपुरंदरस्य भ्रंशोऽस्य भावी नियमस्थितेहाँ ॥७२॥ 20. यामास॥ भ्यस्य द्वितीये अागामिनि दिने वासरे भावि भविष्यत्सुभि सुकालं न्यवेदयत् कथ- + + तस्यैव चतुर्नन्दनस्येभ्यस्य दीक्षाग्रहणवाग्बंधपूर्वकं वस्तनदिने याममध्ये पञ्चशतीयुगंधरीधान्यम तवाहनागमनै विसुकालमावेदितवान् इत्यर्थः ॥ इति तद्व्याख्यायाम् ॥
मिन्महावीरपट्टपरम्परा १२७ इत्थं गुरु स्वं विमनायमान-मालोक्य लोकेश्वरगीतकीर्तिः । तत्याज यः षड्विकृतीव्रतीन्द्रः षडान्तरारीनिव जेतुकामः ॥७३॥ चमूभिरुर्वीन्द्रमिवामरीमिरुपास्यमानं यमवेक्ष्य कश्चित् । किं स्त्रीयुतोऽसाविति संशयानो नड्डूलके ऽशिक्ष्यत तामिरेव ।।७४॥ तदीयपट्टाम्बरभानुमाली श्रीमानतुङ्गश्रमणेन्दुरासीत् । य औजिढत्साधुजनान्निजाज्ञां नाथान्पृथिव्या इव सार्वभौमः ॥७॥ भक्तामराहस्तवनेन सूरिर्बमञ्ज योऽङ्गान्निगडानशेषान् । प्रवर्तितामन्दमदोदयेन गम्भीरवेदीव करी धरेन्दोः ।।७६॥ श्रीमानतुङ्गः करणेन भक्तामरस्तुतेस्तं तितिशीतकान्तिम् चकार ननं फलपुष्पपत्रभारेण यद्वत्फलदं वसन्तः ॥७७॥ 10 5 ४-चमूभिगंजवाजिरथपत्तिलक्षणाभिश्चतुरङ्गिणीभिः सेनाभिः उर्वीन्द्र क्षोणीशक्रमिव । पभा-जया-विजया-अपराजिताभिधाभिश्चतसृभिदें वीभिः प्रत्यक्ष- मुपास्यमानं सेन्यमानं नडूलयनगरोपाश्रयापवरके यं मानदेवसूरिमवेक्ष्य दृष्ट्वा असौ श्राचार्यः किं स्त्रीयुतो वनिताकलितोऽस्तीति संशयानः संदेहं कुर्वाणः । कश्चित् स्वयं संतिष्ठासुतया दुष्टयवनप्रकरैः प्रणुन्नतन्निकृष्टनिर्जरनिर्मितजनमायुपप्लवोपद्भुतेन तिनशिलानगरीसंघेन कृतकायोत्सर्गप्रभावादागत (या) नहलपुरस्थितश्रीमानदेव- सूरयो यद्यनायान्ति तदा शान्तिर्भवेत्, परमत्र म्लेच्छा आगत्य स्थास्यन्ति, ततः संघेन त्रिवीमध्येऽन्यत्र कुत्रापि गत्वा सातव्यमिति जिनशासनदेव्या गिरा श्रीमानदेव- सूरीन्द्राकारणार्थं तत्समय एप स्वजनमरकोपद्रवप्रशमनोत्सुकीभूततत्संघेन प्रेपितः । अज्ञातसूरिस्वरूपः कोऽपि श्राद्धः । ताभिर्विजयाप्रमुखसूरी भिरेवाशिक्षि । शिक्षा ताडयित्वा कुदृयित्वा दृढबन्धनवद्धः पूत्कुर्वाणः कृपापारावारश्रीगुरुवाचैव मुक्तः । यत्रैवविधाः शंकाभाजः श्राद्धास्तत्र सर्वथापि श्रीपूज्यपादै गन्तव्यमिति विजया- देवतया निषिद्धाः सन्तः श्रीगुरुवस्तत्संघे शान्त्यर्थं 'शान्ति शान्तिनिशान्तम्' इति विजयादेवीमन्त्रमयलघुशान्ति विधाय तच्छ्राद्धेन सार्धं प्रेपयित्वा तत्र मरकोपद्रवं निवारितवानिति शेषः ॥ इति श्रीमानदेवसूरिः ॥ इति तद्वृत्तिः ॥
पट्टाबली-समुच्चय 5 10 भयादिमनाथ हरस्तवेन यो दुष्टदेवादिकृतोपमान ! श्रीभद्रबाहुः त्वकृतोपसर्गहरतवेनेव जहार संघात् ॥ ७० ॥ सद्ध्याननागेश्वररश्मिसाम्यमन्याद्रिणालोड्य नदाम्बुरासिम् । तत्सट्टलक्ष्मीरय वीरनान्नाचार्यण वने वनमालिनेव ।। ७६ ॥ ततोऽजनि श्रीजयदेवसूरिट्रीकृताशेयकुवादिवृन्दः । यद्वाग्विलासरवहेलितीः सुधा किमु क्षीरनियों मनन ॥ २० ॥ स्वः कानिनीकीर्तितकीर्तिदेवानन्दश्चिद्वानन्दमना मुनीन्द्रः। तारुण्यमेणाङ्कमुखीमित्रतत्पदृश्रियं वैभवमानिनाय ॥२१॥ श्रीविक्रमः सूरिपुरन्दरोऽभूत्तपट्टदुग्धाब्धिमुधामरीचिः। तमश्चमूं हन्तुमनाः समत्रां किं विक्रनाङ्गोकृतकावयष्टिः . आसीत्ततः श्रीनरसिंहमूरिः ल वाङ्मयान्मोनिधिपारहवा । अत्याजि यतः किल येन मांसं वापं जगद्वारिजवन्नेव ॥८३|| मह-मारिणश्यमिवांगुलीचं पोमाणभूपालकुत्तनदीपः । पट्टश्रियं श्रीनरसिंहस्रेदलंकरोनि ल समूहसरिः ॥2॥ दिग्वाससो येन विजित्य वादे नागदे नागनमत्यतीर्थम् । खवश्वनानीयत भूनिभा दुर्गः प्रतीपानिव संपराये || समानदेवोऽजनि तल पट्टे वाग्देवता यन्मुखपद्मासन्न । तृप्तामृतेश्चारुवचोविलासच्छलादिवोद्गारमिवातनोति ॥८६॥ पदेतदीये विबुधप्रमेण ल भूयते सुरिपुरंदरेण । येनाभिभूनः शिल पुष्पधन्वा पुनर्बुयुत्सुर्वियमायुधोऽभूत् ।। ८७ ॥ तत्पपंकन्हमानसौकाः श्रीमाजयानन्दविभुर्बभूव । चस्वाशये ऽनात्सनयो ऽप्यशेषःकुन्भोद्भवत्य प्रमृताविवान्यिः ॥८॥ यदाननं चन्द्रति दन्तकान्तिोत्नावते युगमवृत्तीह । वाचां बिलासोऽपि सुधायते तत्पदे नुनीन्द्रः स रविप्रभोऽभूत् ॥८ell वर्विष्णुयरकीर्तिनुवार्णवन व्यनुन्यि नानाप्यसितादिमाः। अईन्नहिन्नेव जगत्यनन्यैः सोऽभूयशोदेवपिनुः पदेऽस्य ॥६०|| 15 20 25 5 10 - श्रीमन्महावीरपट्टपरम्परा १२६ प्रद्युम्नदेवोऽथ पदे तदीये प्रद्युम्नदेवो ऽभिनवो वभूव । मिन्दन्भवं मुक्तरतिर्दवीयो भवन्मधुरिश्वविभाव्यमूर्तिः ॥१॥ श्रीमानदेवेन पुनः स्वकीर्तिज्योत्स्नावदातीकृतविष्टपेन । एतत्पदश्रीरगमि प्रतिष्ठां शक्तित्रयेणेव नरेन्द्रलक्ष्मीः॥ १२ ॥ वाचंयमेन्द्राद्विमलादिचन्द्रात्पदान्जभृङ्गीभवदिन्द्रचन्द्रात् । अमुष्य पट्टः श्रियमश्नुते स्म परंतपादभूप इव प्रतापात् ॥३॥ रेजे ऽस्य पट्टे स्मररूपधेयः सुरीन्दुरुयोतननामधेयः । दिग्वारऐंद्रा इव सूरिचन्द्राः संजगिरे यत्पधारिणोऽष्टौ ||४|| मुहूर्तमद्वतमवेत्य टेलीग्रामस्य यः सीन्नि बृहटाधः । अस्थापयच्चैत्यतरोस्तलेऽष्टौ पार्यो गणेन्द्रानिव काशिकुंले ॥१५॥ शाखाप्रशाखाभिरमुष्य वृद्धि हद्वटस्यैव यतो भवित्री। ततो वृहद्गच्छ इतीह नामाऽपरं गणस्य प्रकटीवभूव ॥६६॥ माहात्म्यनम्रीकृतसर्वदेवः पदे तदीये ऽजनि सर्वदेवः । तारापतिस्तारकपर्पदेव गुणश्रिया यः प्रभुरन्वयायि ॥१७॥ यो रामसेनापुरे व्रतीन्दुर्लब्धिश्रियं गौतमवद्दधानः । नाभेयचैत्ये महसेनसूनोर्जिनस्य मूर्तेर्विदधे प्रतिष्ठाम् ।।६८|| चंद्रावतीशस्य नृपस्य नेत्र इवास योऽशेषविशेषदर्शी। तं क्लृप्तचैत्यं प्रतिबोध्य वाचा प्रात्राजयकुंकुणमंत्रिणं यः ॥६॥ कुर्वनिवासं गवि गौरवश्रीगिरामधीशो विबुधैरुपास्यः । श्रीदेवसूरिः किमु देवसूरिः पदे तदीयेऽप्यजनि क्रमेण ॥१०॥ दोपोदयोदीततमःप्रपञ्च-व्यापादनव्यापृतिदीक्षितेन । श्रीसर्वदेवेन पदं तदीयमदीपि दीपेन यथा निकेतम् ॥१०१।। श्रीमद्यशोभद्रगणावनीन्द्रः श्रीनेमिचन्द्रव्रतिपुङ्गवश्च । तत्पट्टमाकन्दमुभौ भजेते शुकोऽन्यपुष्टश्च यथा विहंगौ ॥१०२॥ तयोः पदे श्रीमुनिचन्द्रसूरिरभूत्ततो निर्मितनैकशास्त्रः। शास्त्रे न कुत्रापि तदीयबुद्धिश्चस्खाल वीखेव समीरसस्य ॥१०॥ १७ 15 20 25 5 10 पट्टावली-समुशयः भूपीडखण्डानिव चक्रवर्ती यतीभवञ्पड्विकृतीर्जही यः । कदापि काये न दधन्ममत्वं पपौ पुनर्यः सकृदारनालम् ॥१०४॥ निर्जीयते स्म कचनापि नायं कृतोपसगैरपि देववर्गः। इतीव नाम्ना भुवि विश्रुतेन जज्ञेऽस्य पट्टेऽजितदेवसूरिः ॥१०॥ जगत्पुनानः सुमनःसवन्तीरयो जटाजूटमिवेन्दुमौलेः । अमुष्य पट्ट विजयादिसिंहोऽध्यासांवभूवाथ तपस्विसिंह ॥१०६॥ सोमप्रभश्रीमणिरत्नसूरी अमुण्य पट्ट नयतःस्म लक्ष्मीम् । इक्ष्वाकुवंशं भरतश्च बाहुबलिस्तनूजाविव नाभिसूनोः ॥१०७॥ श्रीमज्जगच्चन्द्र इदंपदश्रीललामलीलायितमाततान । येनोमि शैथिल्यपथस्तटाको घनाविलो मानसवासिनेव ॥१०८॥ द्वात्रिंशदाशावसनैरभेद्यो वादं सृजन्हीरकवद्यदासीत् । आघाटभूपेन स हीरलायो नाम्ना जगञ्चन्द्र इति न्यगादि ॥१०६।। आचाम्लकादशहायनान्ते तपेत्यवापद्विरुदं मुनीन्दुः। महाहवैरिविनिर्नयान्ते भर्तेव भूमेर्जितकाशिसंज्ञाम् ।।११०।। अस्मात्ततः प्रादुरभूत्तपाख्या नेत्रादिवानेर्द्विजराजलेखा। 15 अदीपि यस्माच मुमुक्षुलक्ष्म्या वसन्तमासादिव भानुभासा ॥११॥ देवेन्द्रकर्णाभरणीभवद्धिर्यशोभिरुद्भासितविष्टपेन । १०६-यद्यस्मात्कारणाचः श्रीजगञ्चन्द्रसूरिः द्वात्रिशत्संख्याकैराशावसनैदिगम्ब- राचार्य वादिभिः सार्धं वाद सृजन् कुर्वन् हीरकवद्वतमणिरिव अभेद्यो भेत्तु मशक्यः अजेय आसीत् तत्कारणादाघाटनामनगरस्य भूपेन राज्ञा संप्रति लोके आहडनगरमिति प्रसिद्धपुरस्य स्वामिना स सूरिः इदमेतन्न्यगादि प्रोक्तः । इंदं किम् । यदयं सूरीन्द्रो नाम्ना हीरला इतिपदमाद्यं यत्र तादृशो जगचन्द्र एतावता हीरलाजगञ्चन्द्रसूरिरिति कथितः । इति तवृत्तिः ॥ १११-तस्तपा इति नामकथनान्तरं तद्दिनमारभ्य च असाजगञ्चद्रसूरे- बृहद्गच्छस तपागच्छ इत्याख्या नाम प्रादुरासीत् प्रकटीवभूव ॥ ++ इतिबृहद्- च्छस 'तपागच्छं' इति षष्ठं नाम संजातम् ॥ इति व्याख्यायां ॥
5 श्रीमन्महावीरपट्टपरस्परा १३१ देवेन्द्रदेवेन बभेऽस्य पट्ट विष्णोर्यथा वक्षसि कौस्तुभेन ॥११२॥ निजाङ्गनोद्गीतयदीयकीर्ति शुश्रूपुरक्षिश्रवसासूभुक्षाः । चक्षुःसहस्रे रसिकः किमाधात्पट्ट स तस्याजनि धर्मघोषः ।।११३॥ मिथ्यामतोत्सर्पणवद्धकरं प्रेक्ष्य क्षितौ जीर्णकपर्दिनं यः। प्रवोध्य वाचा जिनराजबिम्बाधिष्ठायकं पूर्वमिव व्यधत्त ॥११४॥ शिष्यार्थनानिर्मितसंस्तवस्याऽनुभावतो देवकपत्तनेऽब्धिः। भूपस्य शुश्रूपुरिवास्य रत्नं तरङ्गहस्तैरुपदीचकार ॥११॥ विद्यापुरे : योऽखिलशाकिनीनामुपद्रवं द्रावयति स्म सूरिः । श्रीहेमचन्द्रो भृगुकच्छसंज्ञे पुरे यथा दुर्धरयोगिनीनाम् ॥११६॥ यो योगिनं पुष्पकरण्डिनीस्थं दुश्चेष्टितै पनबद्धकक्षम् । पादावननं विदधे ऽन्तिमोऽहन्निवास्थिकग्रामिकशूलपाणिम् ॥११७॥ 10 १९६०-य: श्रीधर्मघोपसूरिः प्राक् साधुजनसंतापकारिकाणां वागमने पट्ट- कादिमण्डनं मांसलोहकटकीभूतपायसवटकविहारणं च गुरुशयनपट्टिकोत्पाटनचञ्च- रानयनमित्याग्रुपद्वविधायकानां श्राविकानामधारिकाणामखिलानां सर्वासां शाकि- नीनां सिद्धसीकोतरिकाणामुपसर्गमुपद्रवं द्रावयति स । चत्वरे गमनान्तरं गुरुभिल्यायाभिमन्त्रितचतुःसूचीनां पट्टिकाचतुःपादोपरिक्षेपणेन स्तम्भितानां विमात- प्रायविभावयाँ विवसनानां तासां बहुविलपनाननाङ्गुलीलेपणनृपतिमृतिभीतिनिवेदन- ब्रह्मादिसप्तवाग्बन्धप्रदाननगरजनविज्ञप्त्यवधारणालयान्तःपट्टिकानयनपूर्वकं निवारितान् साधुजनान् निरुपद्वारचक्र । इति तद्वृत्तौ ॥ ११७---यः श्रीधर्मघोपसूरिः पुष्पकरण्डिन्यामुज्जयिन्याम् । 'उज्जयिनी साद्विशालावन्तीपुष्पकरण्टिनी' इति हैम्याम् । तिष्ठतीतिपुष्पकरण्डिनीस्थस्तं कमपि सिद्धचेटकपेटकमत एव दुष्टचेष्टितैर्भयंकरप्रकारैः साधूनां भापने भयोत्पादने बद्धका सज्जीभूतं कोऽपि साधुस्तं प्रतिकर्तुं न शक्नोति श्रतएव तद्भयकरणप्रकारमाह- प्राक् साधुविहारनिषेधक, गुर्वागमने चगोचरीगतसाधूनां प्रश्ने स्थास्यस्थ । गुरुशिक्षित- स्तैरुक्तम् । स्थिताः । ततो महत्कहालतुल्यदन्तानदर्शयद्योगी। साधवः कपोणिक . 5 १३२ पट्टावलौ-समुच्चयः यस्योपदेशान्नृपमन्त्रिपृथ्वीधरश्चतुर्भिः सहितामशीतिम् । ज्ञातीरिवोद्धर्तुमिदंमिताः स्वा व्यधापयत्तीर्थकृतां विहारान् ॥११८।। दंशादहे हितकाप्ठभारविपौपधीसज्जतनुर्निशान्ते। महात्मवद्यो विकृतीर्विहाय वृत्तिं व्यधादेव युगंधरीभिः ॥११॥ यस्मादिदीपे चरणस्य लक्ष्मीर्योत्स्नेव चान्द्री शरदोऽनुपङ्गात् । सोमप्रभाख्यो जनहक्चकोरीसोमप्रभः सूरिरभूत्पदेऽस्य ॥१२०॥ तेनापि सोमतिलकाभिधसूरिरात्म-पट्टे न्यवेशिवशिलक्ष्मिलसल्ललामम् । वादेषु येन परवादिकदम्बकस्या-ऽनध्यायता प्रतिपदेव मुखे न्यवासि ।।१२।। संस्थापितो निजपदे गुरुणाथ तेन श्री देवसुन्दरगुरुः सुरसुन्दरीः । अहोमुखेन तिमिरेण तमस्विनीव येन व्यपास्यत समं मदनेन माया ॥१२२।। 10 कैरर्कमिव द्विवद्भिरुदये हन्तुं परैः प्रेषितं । कंचिश्चन्द्ररुचा प्रमादविमुखं स्वापेऽपि दृष्टा प्रभुम् । दर्शयित्वा गुल्पारने गताः । तत उपाश्रयेऽपि अतिभयंकरप्रचुरोन्दरविडालकुक्कुर- 'गालरवापश्चिभुजगादिदर्शनादिना गुरुमपिभापनोद्यतं प्रभुणा च जैनमन्त्रस्म- रणानुभावेन पुरजननृपतच्छिष्यसन मंत्राधिष्ठायनवम्ध्वा पुरप्रासादशिखरसंघटना- स्फालनपूर्व जनयुष्यमाणप्रवहच्छोणितशरीरं शिप्या अहं निये निये कोऽपि माम- बल्लिति हुनः पुलहनमापिणं वेदनया पूर्वाणं गगनेनोपाश्रये नीतं योगिनं पदाव- नन्न पार्नमनीतं विदधे कृतवान् । कः इव । अर्हन्निव यथा अन्तिमरच- रसरतुर्विशतितमोईन् जिनः श्रीमन्महावीरदेवः अस्थिकामस्थायुकशूलपाणिना- मानं एवं सचरणसेवापराययं च । सोऽपि किंभूतः । दुष्टैजीवप्रणाशनकररचे- टितैल्पसगैर्भगवतो भारदोयतम् । इति तद्वृत्तिः । ११८-श तस्योपदेशाच श्रीशत्रुजयगिरिनारिसंघपतीभवन् रैवतगिरी च इदमलाकं तीर्थमिदममा तीर्थनिति मियो दिगम्बरैः सह विवादे 'य इन्द्र- माला परिधत्ते तस्येदं तीर्थम्' इति संक्वृद्धः प्रोक्त सुवर्णसिद्धयाम्नायेन स्वकृत- सुदर्णपट्पन्नाशद्धटीभिः इन्द्रमाला परिहितवान्, तथा शत्रुजयोज्जयन्तमूलप्रासाद शिखरडल्टयोरेकसौवर्णध्वजाधिरोपणादिना चाप्टौ घटीययितवांश्चेति शेषः समृत्ती. १४ - 5 श्रीमन्महावीरपट्टपरम्परा १३३ ताम्यन्तं गदिताखिलव्यक्तिकरं संबोध्य योऽदीक्षय- त्स श्रीमानथ सोमसुन्दरगुरुभैजे तदीयं पदं ॥१२३॥. पट्टश्रियास्य मुनिसुन्दरसूरिशक्रे संप्राप्तया कुवलयप्रतिवोधदक्षे । कान्तेव पद्मसुहृदः शरदिन्दुविम्बे प्रीतिः परा व्यरचिलोचनयोजनानाम्॥१२४॥ योगिनीजनितमायुपप्लवं येन शांतिकरसंस्तवादिह । वर्षणादिव तप तप्तयो नीरवाहनिवहेन जनिरे ॥१२॥ बाल्येऽपि रश्मीन्सरसीजबन्धुरिवावधानानि वहन्सहसम् । अष्टोत्तरं वर्तुलिकानिनादशतं स्म वेवेक्ति धियां निधिर्यः ॥१२६।। अलम्भि याम्यां दिशि येन काली सरस्वतीदं विरुदं बुधेभ्यः । रवेरुदीच्यामिव तत्र तेजोऽतिरिच्यते यत्पुनरत्र चित्रम् ॥१२७॥ 10 सूरेस्ततोऽजायत रत्नशेखरः श्रीपुण्डरीको वृपभध्वजादिव । बाम्बीति नाम्ना द्विजपुङ्गवेन न्यगादि यो वालसरस्वतीति ॥१२८॥ लक्ष्मीसागरसूरिशीतमहसा लक्ष्मीरवापे ततो दीपेनेव गुणोदयं कलयता ज्योतिबृहद्भानुतः । गायन्तीः सुरसुन्दरीगुणगणान्यस्याष्टदिक्सङ्गिनी- 15 विज्ञायाष्ट विनिर्ममे किमु विधिः श्रोतु श्रुतीरात्मनः ॥१२॥ सुमति साधुरभूदथ तत्पदे त्रिजगतीजननेत्रसुधाञ्जनम् । समकुचत्त्रपया हृदि यगिरां मधुरिमाधरिता किमु गोस्तनी ॥१३०॥ १२६-यो मुनिसुन्दरसूरि ल्येऽपि शैशवे मुल्लकत्वेऽपि अष्टाभिरधिक वर्तुलिकानां कचोलिकानां 'वाटका कचोली' इति प्रसिद्धानां निनादानां शब्दानां शतं वचित्सहस्रमपि वेवेक्ति पृथक् पृथक् कृत्वा कथयति स । पत्तनसमागतैरभुक्त- देशोपेतपण्डितद्विजं पत्रावलम्बनं विधाय प्रतिपत्तनपण्डितस्थानं जलभृतकुण्डलकं तृणपुलकं च स्वशिप्यर्मोचयन्तं तच्छिष्यनिर्धाटनपूर्वकं मुनिसुन्दरशिशुना राजसभायां खेन साधं समागतचतुरशीतिपौषधशालासत्काचा दिजायमाने ' पण्मास्यन्ते रानकथकनपूर्व स्वादृष्टाष्टोत्तरशतवतु लिकानां पृथक पृथक् शब्दान् कथयित्वा तं विजिम्ये । इति तद्वृत्ती ।
. 5 १३४ पट्टावली-समुच्चयः शीलेन जम्धुगणनाथ इवात्र वजू-स्वामी परः किमथ वा महिमोदयेन । जज्ञे नवद्वयशत१८००वलिसेव्यमानो नाम्नाथ हेमविमलः प्रभुरस्य पट्ट॥१३१।। विभूपाम तामकलयदथाऽऽनन्दविमले नतीन्द्रे विद्राणाखिलकुदृशि तत्पट्टकमला। वसन्ते वासन्तीततिरिव पुनर्धर्मजयिनि क्षितीन्द्रे राज्यश्रीरिव विजितविश्वप्रतिभटे ॥१३२।। त्यक्त्वाशेषकुपक्षिकांश्च कुशः किंपाकभूमीरहा- रोलम्बैरिव पारिजातशिखरी यो जन्मिभिः शिश्रिये। येनात्मा शिथिलीभवन्मुनिपथादप्युद्धृतः सूरिणा संसाराम्बुनिधेरिवोद्धतकुडग्यादोव्रजव्याकुलात् ॥१३॥ 10 शुद्वां क्रियामुद्धरतोऽस्य भाविनीमद्वत्प्रवृद्धिस्तमितीव शंसितुम् । स्वप्नेऽनुयुक्तरनु कस्यचिन्जिनध्यातुर्दितीयेन्दुरदर्शयन्निजम् ॥१३४॥ जैना श्रमणायभावभणनाम्भःसाव्यमानात्मनां । जज्ञे द्वीप इव व्रतीशितुरिहोद्धारः कियाया नृणाम् ॥ विद्यासागरनामवाचकवरो यस्याथ दुई गणा- 15 न्सेनानीरिव पक्रियो रिपुनृपान्प्राक्खस्यवश्यान्व्यधात्॥१३॥ १३४-तथा-क्रियोद्धारविधित्सुना सूरीन्द्रेण कश्चिसिद्धश्रीपार्श्वनाथमन्त्रः श्राद्धः प्रथमं पृष्टस्तेन च ध्यानं विदधता किंचिन्निद्रामुद्रितनेत्रेणाभ्युदयमानं द्वितीयाचन्द्र दृष्टा समेत्य प्रभुपुरः प्रोचे । यधुयं द्वितीयाचन्द्र इव दिने दिने वर्ध- मानाभ्युदयभाजो भविष्यथ, तत्वरितमेव क्रियोद्धारं कुरुत, विलम्बो नैव विधेयः । ततः श्रीमानन्दविमलसूरिणा श्रीहेमविमलसूरिशासनपूर्व शुक्रिया उद्धृता इति वाद: इति तस्याख्यायां ॥ ५१३५-नाम्ना तीर्थकृत्संबन्धिनीनां प्रतिमानां, तथा श्रमणानां साधू- नाममात्मसत्ता, सिद्धांत क्वापि प्रतिमा प्रोक्ता नास्ति गुर्जरादिदेशेषु साधवः सर्वथा न सन्तीति भणनं लुम्पाककटुकमतीनां कथनम् ॥ इति तद्वृत्तौ ।।
5 श्रीमन्महावीरपट्टपरम्परा प्रातः साधुवृतस्त्वदापणपुरो यो याति सूरींशिता सम्यक्संयमवान्स पूर्वगणिवत्सेव्यस्त्वयाहनिशम् । स्वप्ने ऽस्वप्नगिरेति यं निजगृहे नीत्वातिभक्त्या प्रभु श्राद्धः कश्चन मण्डपाद्रिवसतिभैजे सगोत्रैः समम् ॥१३६|| तमःस्तोमप्राये कुनयनगणैरुणतमे कलौ श्रीसूरीन्दुः शरणमभद्यो जनिमताम् । मृगारातिव्यालद्विरदशवरव्यूहबहुले गिरेर्दुःसंचारे गहन इव सार्थः पथिजुषाम् ॥१३७॥ गभीरिम्णा पाथोनिधिरिव महिनापरमरुद्- गिरिश्चेतोजन्मप्रतिभटतया वा गगनजित्। प्रसारै रश्मीनां सरसिरुहिणीनामिव पतिः पवित्रीचक्रे यो विहृतिभिरशेपा अपि दिशः ॥१३॥ यो दक्षिणावर्त इव स्रवन्तीपतिलवे कम्बुकदम्बकेन, वाचंयमानां निवहेन पृथ्वीपीठे परीतो चिजहार सूरिः॥१३६॥ भागीरथीव यद्ब्राह्मी पुनीवे भुवनत्रयम् । परं विशेपः कोऽप्यस्या निम्नगा न कदाचन ।।१४०॥ ये कर्णाभरणीवसूवुरनिशं विश्वत्रयीजन्मिनां । सान्द्रोनिद्रितचंद्रिका इव-शुचीचक्रुत्रिलोकीमपि । यान्संस्तोतुमिवाभवद्भुजगराट् जिह्वासहद्वय- स्तेपां सूरिपुरंदरः स समप्भूदेको गुणानां निधिः ।।१४.१।। 20 10 15 १३६ हे वत्स, त्वं तु दुर्वादिवातविविधविरुद्वालपनाकर्णनाकलितानेककल्प- नाजनितसंशातिव्याकुलीकृतनैकलोककलियुगानुभावाकटुमतिरसि । तथापि प्रातः 'प्रभाते यामानन्तरमष्टभिः साधुभिः श्रमणैः परिकलितः यः सूरीशिताःसुरीन्द्रः त्वदा- पणस्य तव हट्टस्य पुरोऽप्रे याति गच्छति, स सूरिरस्मिन् कलियुगे सम्यक् संयम- 'वान् । विशुद्ध चारित्रकलितः तथा भवताहर्निशं निरन्तर पूर्वगणिवत् प्राचीनाचार्य इव सेव्यं उपासनीयः । इति तवृत्तौ ।।
5 . १३६ पट्टावली-समुच्चयः अश्रोत्रैः श्रोतुकामै जगपरिवृद्धैर्यजगद्गीतकीर्ति शब्दाधिष्ठानसृष्ट्यै शतदलनिलयो याचितस्तां चिकीर्षुः । न्याय्या नासौ मयातिक्रमितुमिह जगत्सर्गभङ्गीव्यवस्था शक्तिं शब्दं ग्रहीतु किमिति स कृतवानेव तदृष्टिसर्गे ॥१४२॥ भूरेपा किमु चंद्रचन्दनरसैरालिप्यते सर्वतो दुग्धाब्धिप्रसरत्तरङ्गितपयःपूरैरिवाप्लाव्यते । क्षोदैमौक्तिकजैविलीनतुहिनैः कुन्दैरुतापूर्यते यत्कोति प्रसृतां विभाव्य विबुधैरित्यन्तरारेक्यते ॥१४३॥ विजयदानमुमुक्षुपुरन्दरः पदममुष्य ततः समभूपयत् । उदयभूमिभृतः शिखरं शरद्विशददीप्तिरिवाम्बरकेतनः ॥१४४॥ 10 श्राज्ञां यस्य .विधाय मूर्धनि मुदा शीर्षामिवाप्तप्रभोः सौराष्ट्रपु जगर्पिनामविबुधाधीशा विहारैनिजैः । लुम्पाकान्परिवर्तमारुत इव प्रोन्मूल्य मूलाद्रुमा- न्सम्यक्त्वाख्यकृर्षि सुखं कुलवती चक्र नभोम्भोदवत् ॥१४५॥ प्रावोधयदुष्करनैकतीव्रतपोभिराप्तोक्तिकृतोक्तियुक्तिभिः । सतत्र लुम्पाकजनंयतीन्द्रोभाखानिवाऽम्भोजवनं मरीचिभिः॥१४६ यद्वाचा गलराजमंत्रिमुकुटो निर्माप्यपाएमासिकी मुक्तिं सिद्धगिरौ व्यधाद्भरतवद्यानां समं यात्रिकैः । पञ्चाक्षी दमितु च पञ्चविकृतीस्तत्याज यः सर्वदा प्राणश्यंस्तरणेहा इव पुनर्यस्योदये दुईशः॥१४७|| 20 १४७-यस्य श्रीविजयदानसूरेर्वाचा अर्थादुपदेशेन कृत्वा गलराज इति नामा मंत्रिषु प्रधानेषु मुकुटः कोटीरः गलराजः । अथवा गलो महतो इति लोके प्रसिद्धः। स पटषु मासेषु भवा पाएमासीकी । पएमासान् यावदित्यर्थः । मुक्ति 'मुगतउ' इति प्रसिद्धा "केनापि कस्यापि पार्चे शुल्कदवीणं न मार्गणीयम् अहमेव श्रीमदुक्तं ययेप्सितं द्रव्यं दास्यामि" इत्यधिपस्य प्रोक्त्वा या यात्रिकाणां यात्रा कार्यते सा मुक्तिरिति । तां निर्माप्य कारयित्वा सिद्धगिरी श्रीशत्रुजये भरतवत् अपमदेवनंदन- 15 - .
श्रीमन्महावीरपट्टपरम्परा रत्नानामिव रोहणोऽम्बुरुहिणीप्रेयानिव ज्योतिषां विंध्यांद्रिः करिणामिवामरगिरिः खर्भूरुहाणमिव । लब्धीनां वसुभूतिनन्दन इवाम्भोधिः सुधानामिव श्रीमत्सूरिशतक्रतुभुवि चिरंजीयाद् गुणानां गृहम् ॥१४८॥ य'प्रीसूते शिवाह्वसाधुमघवा सौभाग्यदेवी पुनः पुत्रं कोविदसिंहसीहविमलान्तेवासिनामग्रिमम् । तबाहीक्रमसेविदेवविमलव्यावर्णिते हीरयु- क्सौभाग्याभिधहीरसूरिचरिते सर्गश्चतुर्थो ऽभवत् ॥१४॥ इतिश्रीसीहविमलगणिशिप्य-पण्डितदेवविमलगणिविरचते हीरसौ- ग्यनानि महाकाव्ये श्रीमन्महावीरदेवपट्टपरम्परावर्णनो नाम चतुर्थः सर्गः+10 10 - प्रथमचक्रवर्तिसंघपतेराभिरिव यात्रिकर्यात्रा कतु मांगतैः संघननः सम साध यात्र- न्यधाचकार ।। इति तद्न्याख्यायाम् ॥ . + पं० श्रीपतिः । तस्याप्टी शिष्याः। तेषु धुर्यो बालब्रह्मचारी कविः पड्विकृतित्यागी यावजीवमापष्ठतपोविधायी तपस्वी देवसानिध्यः श्रीविजयदानसूरी- शाज्ञया सौराष्ट्रविहारेण लुम्पार्कमतोंच्छन्दकः योधपुरे यद्विवादमयेन नृममीलदेव- पृष्ठोभिंतवाचकपाश्चंद्रः एकादशांगीधरः श्रीजगर्पिगणि॥ तच्छिष्यो गौतमेवादिविजेता नारायणदुर्गादिनृपप्रतिबोधकः कायस्थमएंडलिऊँचन्द्रभाणस्थानसिंहादिश्रावक रकः बहुप्रतिष्ठा विधायकः श्रादिदेवसमवसरणंयुकरविंधाती पं० श्री सीहविमलो गणिः । तच्छिष्यः पं० देवविमलो येन विक्रमाव्दात् १६३६ तः प्रारभ्य १६७१' अवधिवर्षेषु स्वोपझं श्रीहीरसोभाग्यकाव्यं विदधे, यत् कल्याणविजयशिप्यधनविजयेन समशोधि । इति श्रीहीरसौभाग्यप्रशस्तौ ।। १८ . 10 १३८ पट्टावली-समुन्धनः अनुपूर्तिः१- सूरीन्द्रहीरविजयः प्रतिपद्य पट्ट-लक्ष्मी गुरोरनु विशिष्य पुपोपं भूपाम् ।। वस्तुर्जिनस्य युवराज इवाधिपत्यं क्रान्तारिचक्रमखिलाऽम्बुधिमेखलायाः ।। मण्डयत्यमरमन्दिरं गुरौ, दीप्यते स्म मुनिवासवोऽधिकम् ।। यामिनीप्रियतमे पराम्बुधेमध्यभागमिव पद्मिनीपतिः ॥२॥ श्रीहीरसौभाग्यकाव्ये सर्ग-६, श्लोको-१८७-१८८ । अनुपूर्तिः २- अथसाहिः (अकव्वर) मनसा श्रीगुरूनेवं प्रशशंस प्रावीण्यमन्यहितकर्मणि पश्यतैपां, तथ्यं यतो व्यवसितिमहतां परार्था॥ विश्व शशीव धवलत्यखिलं कलाभिरंभोभरैजलधरोऽपि धरां धिनोति ।।१।। 10 मुनो दधाति वसुधां भुजगाधिराजो, नैःस्थ्यं निहन्ति मणिरध्वरभागभाजाम् ॥ आमोदयन्ति हरितो हरिचन्दनानि, भिन्दन्ति संतमसमंबरकेतवो ऽपि ॥२॥ साला दिशन्ति च फलानि पचेलिमानि, वार्धर्वशा अपि वहति पयःप्रवाहान् । विश्वोपकारकरणकनिबद्धकर्त-रेभिर्वभूव वसुधा किमु रत्नगर्भा ? ॥३॥ श्रीहीरसौभाग्यकाव्ये सर्ग-१४, श्लोकाः १८३,१८४,१८५। 15 अनुपूर्तिः-३ । श्रीसूरिहीरविजये भजति धुलोकमभ्युद्गते विजयसेनगणावनीन्द्रे ॥ प्रीति जना दधति शीतरुचौ प्रयाते, क्षेत्रांतरं समुदितेंऽशुमतीव कोकाः।।१।। तत्पट्टोदयभूधरभावान्श्रीविजयदेवसूरीन्द्रः ॥ भजते तपगणराज्यनियमुर्वीसार्वभौम इव ॥२॥ 20 सीहगिरेरिव वनस्वामी तस्येष पदपयोधिविधुः ॥ श्रीविजयदेवसूरिक्षोणीन्द्रः पर्वतायुः स्यात् ॥३॥ श्रीहीरसौभाग्यकाव्ये सर्ग-१७, श्लोकाः २०८,२०६,२१०, । ॥ इति समाप्ता परम्परा॥
[ ६] 8 श्रीयुगमकामा ( कर्ता-महोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिः) 104 पूर्वयंपेक्षयैवं च, हीनहीनगुणैरपि । मोक्षमार्गाद्यवाप्तिः स्या-निर्ग्रन्थैरेव नापरैः ॥ विषमेपि च कालेस्मिन्, भवत्येव महर्षयः । निम्रन्थैः सदृशाः केचिच्चतुर्थारकवर्तिभिः MELIl यथास्यामवसर्पिण्यामेतस्मिन् पंचमे ऽरके ।। 5 त्रयोविंशतिरादिष्टा, उदयाः सततोदयैः ॥१०॥ विंशतिः१प्रथमे तत्र, युगप्रधानसूरयः ।।. उदये स्युर्द्वितीयस्मिन्, त्रयोविंशतिरेवर ते ॥१०॥ तृतीये ऽष्टाढ्यनवतिः३, चतुर्थे चा ऽष्टसप्ततिः ।। पंचसप्तति ५ रेकोननवतिः ६शतमेव ७ च ॥१०॥ सप्ताशीति ८ स्तथापंच-नवतिश्च ततः परं । सप्ताशीतिः १० षट्सप्तति ११-रष्ठसप्ततिरेव च १२ ॥१०॥ चतुर्नवति १३ रेवाष्टौ १४, त्रयः १५ सप्त १६ चतुष्टयं १७ ॥ शतं पंचदशोपेतं १८, त्रयस्त्रिंशंशतं १६ शतं २० ॥१०४॥ पंचाधिका ऽथ नवति २१-नवतिश्चानवाधिका.२२ ॥ चत्वारिंशत् २३ क्रमादेते, यथोक्तोदयसूरयः ॥१०॥ श्री सुधर्मा१ च वनश्च २, सूरिःप्रातिपदामिधः ३॥ हरिस्सहो४ नन्दिमित्र, सूरसेनस्तथापरः ६ ॥१०६: रविमित्र: श्रीप्रभश्च ८, सूरिमणिरणाभिधः ६ ॥ यशोमित्रो १० धनशिखः११, सत्यमित्रो १२ महामुनिः ॥१०७... 20 195. . . . . - 5 . 10 '. १४० पट्टानली-समुबयः धम्मिल्लो १३ विजयानंद१४-स्तथा सूरिः सुमंगलः१५।। धर्मसिंहो १६ जयदेवः१७ सुरदिन्नाऽभिधो गुरुः१८ ॥१०८।। वैशाखश्चाऽथ १६ कोडिन्यः २०, सूरिः श्रीमाथुराहयः २१ ।। वणिकपुत्रश्च २२ श्रीदत्त २३, उद्येष्वाद्यसूरयः ॥१०॥ स्यात्पुष्पमित्रो १ ऽहन्मित्रः २, सूरिवैशाखसंज्ञकः ३ ॥ सुकीर्ति ४ स्थावर ५ स्थ-सुताश्च ६ जयमंगलः ७ ॥११॥ ततः सिद्धार्थ ८ ईशानो , रथमित्रो १० मुनीश्वरः आचार्यो भरणीमित्रो ११ इदमित्रादयोऽपि-१२ च ॥१.११॥ संगतिमित्रः १३ श्रीधरो १४ मागध १५ या ऽमराभिधः १६ ॥ रेवतीमित्र१७सत्कीर्ति-मित्रौ.१५ च सुरमित्रका १८ ॥११२।। फल्गुमित्रश्व २० कल्याण-सूरि, २१ कल्याएकारणं ।। देवमित्रो २२ दुष्प्रसह २३, उद्येष्वंत्यसूरयः॥११॥: - श्रीसुधर्मा च जम्बूश्च, प्रभवः सूरिशेखरः ।। शय्यंभवो यशोभद्रः, संभूतिविजयाऽऽहयः ॥११४।। भद्रबाहुस्थूलभद्रौ, महागिरिसुहस्तिनौ ॥ -- धनसुंदरश्यामायौं, स्कंदिलाचार्य इत्यपि ना११५॥ रेवतीमित्रधौं च, भद्रगुप्ताभिधो गुरुः ॥ श्रीगुप्तवज्रसंझार्य- रक्षितौ पुष्पमित्रकः ।।११६|| प्रथमस्योदयस्येति, विंशतिः सूरिसत्तमाः ॥... त्रयोविंशविरुच्यन्ते, द्वितीयस्याऽथ नामतः ॥११७॥ श्रीवजो नागहस्ती चं, रेवतीमित्र इत्यपि ।। सिंहो नागार्जुनो भूत-दिन्नः कालकसंज्ञकः ॥११८॥ सत्यमित्रो हारिलश्च बिनभद्रो गणीश्वरः ।। उमाखातिः पुष्पमित्रः संभूतिः सूरिकुंजरः ॥११॥ तथा माढरसंभूतो धर्मः:श्रीसंज्ञको गुरूंगा: : ज्येष्ठांगा फल्गुमित्रश्च, धर्मघोंपायो गुरु॥१२॥ 15 20 - 25 . , 5 . 10 श्रीयुगप्रधानाः सूरिविनयमित्रारव्यः, शीलमित्रश्च रेवतिः ॥ खप्नमित्रो हरिमित्रो, द्वितीयोदयसूरयः ॥१२॥ स्युषयोविंशतेरेव-मुदयानां युगोत्तमाः ।। चतुर्यक्ते सहस्से द्व, मीलिताः सर्वसंख्यया.॥१२२॥ एकावतारा सर्वेऽमी, सूरयो जगदुत्तमाः ।। श्रीसुधर्मा च जंबूश्च, ख्यातौ तद्भवसिद्धकौ ॥१२३॥ अनेकातिशयोपेता, महासत्वा भवंत्यमी ॥ घ्नन्ति सार्धद्वियोजन्यां, दुर्भिक्षादीनुपद्रवान् ||१२४॥ एकादशसहस्राश्च लक्षाश्च पोड़शाऽधिकाः ।। युगप्रधानतुल्याः स्युः, सूरयः पंचमारके ॥१२॥ तथोक्तं, दुष्पमारकसंघस्तोत्रे (गाथा १८)- जुगपवरसरिससुरी दूरीकयभवियमोहतमपसरें। वन्दामि सोलसुत्तर इगदस लक्खे सहस्से यः॥ संतु श्रीवर्द्धमानस्येत्यादि । दीवालीकल्पे तु (१११६०००)-- जुगप्पहाण समाणा, एगारसलक्ख सोलसंसहस्सा सूरिश्रो हुँति अरए, पंचमे जाव दुप्पसहेगारा+ कोटीनां पंचपंचाश-लक्षास्तावन्तं एव च 11 सहस्राश्च शताः पंच, सर्वे खाचारसूरयः ॥१२६॥ त्रयस्त्रिंशच लक्षाणि, सहस्राणां चतुष्टयी ॥ ३३०४४६१ चतुःशत्येकनवतिः, सूरयो मध्यमा गुणैः ॥१२७।।. अस्मिन्नेवारकेऽभूवन , पूर्वाचार्या महाशयाः । । श्रीजगच्चन्द्रसूर्याद्या. स्तपागच्छाऽन्वयक्रम ॥१२॥ . 15 . 20 ... +श्री धर्मघोपसूरिकृतकालसप्ततिकायां:३३ ग्राथायामेतत्संन्याया एबस्तीमा - 5 पट्टावती-समुचयः सूरयो बप्पभट्टाख्या, अभयदेवसूरयः ।। हेमाचार्याश्व मलय-गिर्याद्याश्चाऽभवन्परे ॥१२॥ विजयन्तेऽधुनाऽप्येवं, मुनयो नयकोविदाः ।। अत्युप्रतपसश्चारु-चारित्रमहिमाऽद्भुताः ॥१३०॥ एवं मध्यस्थया दृष्ख्या, पर्यालोच्य विवेकिभिः ॥ न कार्यः शुद्धसाधूनां, संशयः पंचमेऽरके ॥१३१॥ दुष्पमारकपर्यन्ता--वधि संघश्चतुर्विधः ।। भविष्यत्यव्यवच्छिन्न, इत्यादिष्टं जिनैः श्रुते॥१३२॥ तथोक्तं भगवत्या-जम्बूद्दीवेणं दीवे'भारेह वासे इमीसे उसप्पिणीए देवाणुप्पियाणं केवइयं कालं तित्थे अणुसज्जिस्सति ? 10 गो० ? जंबु भारहे इमीसे उस० मम एकवीसवासंसहस्साई 'तित्थे अणुसज्जिस्सति । इति, भगवती श० २० उ० ८.(सू०६७८) ।। दीवाली कल्पे तूक्तं- वासाण वीससहस्सा नवसय तिम्मास पंचदिण पहरा ॥ इका घड़िया दोपल अक्खरअडयाल जिणधम्मो.॥१३॥ : 15 (अथ दुष्पसहसूरेरधिकारः)-x पर्यन्ते त्वरकस्यास्य, सूरिर्दुष्प्रसहाभिधः ।। रनिद्वयोच्छितो विंशत्यब्दजीवी भविष्यति ॥१३४॥, वर्गाच्च्युत्वा समुत्पन्नो, गृहे द्वादशवत्सरौं । स्थित्वा सामान्यसाधुत्वे, चत्वार्यब्दान्यसौ शुचिः ॥१३॥ चत्वार्यव्दानि सूरित्वे, स्थित्वाष्टाऽब्दानि च व्रते.॥ 'स्वर्गमेष्यति सौधर्म-मंते कृत्वाऽष्टमं कृती ॥१३६॥ दशवकालिकं जीत-कल्पमावश्यकं च सः ।। अनुयोगद्वारं नंदि, नतेंद्रो धास्यति श्रुतम् ।।१३७॥. i. साध्वी तदा च फल्गुश्रीः, श्रावको नागिलाभिधः ॥ 25. सत्यश्री श्राविका चेति, जेयः संघश्चतुर्विधः ।।१३८॥. . 10 . . . 20.
5 श्रीयुगप्रधानाः यतः--एगो साहू एगा य, साहुणी सडओ य सड्डी वा ॥ आणाजुत्तो संघो, सेसो पुण अट्ठिसंघाओ ॥१३॥ उत्कष्टं श्रुतमेतेषां दशवैकालिकावधि ॥ षाएमासिकतपस्तुल्यं, षष्ठभक्तं भविष्यति ॥१४०॥ मंत्रीशः सुमुखामिख्यो, राजा विमलवाहनः। भविष्यतस्तदा लोके, नीतिमार्गप्रवर्तकौ ॥१४१॥ अयं दुष्प्रसहाचार्योपदेशेन करिष्यति ।। चैत्यस्याऽन्तिममुद्धारं, राजा श्रीविमलाचले ॥१४२॥ कोव्यैकैकादशलक्षाः, सहस्राणि च पोडश ॥ ११११६००० उत्तमानां क्षितीशानां, संख्यैषा दुष्षमारके ॥१४३॥ 10 कोटयः पञ्चपञ्चाश ५५-लता५५श्चापि सहस्रकाः५५ ॥ तावंतो ऽथ शताः पंच, पंचपंचाश५५५दन्विताः ॥१४४॥ इयन्तो दुष्षमाकाले निर्दिष्टाः सर्वसंख्यया ॥ नवभिः पंचकर्नाम-धारिणो ऽधमसूरयः ॥१४॥ इत्यर्थतो दीपिका कल्पे इतिश्रीलोकप्रकाशे काललोके चतुतिशंतमे सर्गे 15 युगप्रधानसंबंधः समाप्तः * श्रीधर्मघोप सूरिकृतायां कालसप्ततिकायां गाथा ५०, ५१, ५२, ५३, ५४ गाथास्वपि एपोधिकारो दर्शितोन्ति ॥ तस्यामेव ४४, ४५, ४६, ४७, ४८, ४६ गाथासु कल्की नृपाधिकारोस्ति । * गाथायां तु १११६००० जैननृपः इनि सतम् ।
[१०] श्रीसूस्पिरंपरा . [ कर्ता-महोपाध्यायः श्रीविनयाविजयगणिः ] . - श्रेयः श्रीवर्द्धमानो दिशतु शतमखणिभिः स्तूंयमानः । सत्दमाभृत्सेव्यपादः कृतसदुपकृतिर्गोपति तनो वः ॥ कालेऽप्यस्मिन्प्रदोषे कटुंकुमतिकुहूकल्पितध्वांतपोषे ।। प्रादुष्कुर्वन्ति गांव: प्रसूमरविभवा युक्तिमार्ग यदीयाः ॥१॥ तत्प?ऽथेंद्रभूतेरनुज उदभवच्छोसुधर्मा गद्रों।' 5 जंबूस्तत्पट्टदीपः प्रभव इति भवांभोधिनौस्तस्य पट्ट ।' सूरिः शयंभवो ऽभूत्स मनजनकस्तत्पदाभोजभानु- * • •स्तत्पद्वैरायतेंद्रो जनविदितयशाः श्रीयशोभद्रसूरि ।।। तत्पट्टमारधूयौं, गणधरवयौं श्रियं दधाते 'द्वौं । संभूतविजयसूरिः सूरिः- श्रीभद्रबाहुश्वः ॥३॥ 10. श्रीस्थूलभद्र उदियाय तयोश्च पट्टे, जातौ महागिरिसुहस्तिगुरू ततश्च । पट्टे तयोः श्रियमुभौ धतुर्गणीद्रौ,श्रीसुस्थितो जगति सुप्रतिबद्धकश्च ॥४॥ तत्पभूषणमणिगुरुरिंद्रदिन्नः, श्रीदिन्नसूरिरथ तस्य पदाधिकारी ॥ पट्टेरराज गुरुसिंहगिरिस्तदीये, स्वामी च वज्रगुरुरस्य पदे बभूव ।।५।। श्रीवनसेनसुगुरुर्बिभरांबभूव, पटं तदीयमथ चंद्रगुरुः पदे ऽस्य । 15 सासन्तभद्रगुरुरुन्नतिमस्य पट्टे, चक्रेऽस्य पदमभजद्गुरुदेवसूरिः॥६॥ प्रद्योतनखदनु तस्य पदे. च-मान-देवस्तदीयपदभृद्गुरुमानतुङ्गः। वीरस्ततोऽथ.जयदेव इतश्च देवा-नन्दस्ततश्च भुवि विक्रमसूरिरासीत् ॥७॥ तस्माद्बभूव नरसिंह इति प्रतीतः, सूरिः समुद्र इति पट्टपतिस्तदीयः । सूरिः पदेऽस्य पुनरण्यजनिष्टमान-देवस्ततश्च विचुधप्रभसूरिरासीत् ।। 20 १.४५ cr 10 श्रीसूरिपरम्परा जयानन्दः पट्टे नियमपुपदस्याऽस्य च रवि- प्रभस्तत्पद्रेशः समजनि यशोदेवमुनिराट् ॥ ततः प्रद्युम्नाख्यो गुरुरुदयति स्मा ऽथ-पुनर--- प्यभून्मानाद्देवो गुरुविमलचंद्रश्च तदनु ||६|| तस्मादुद्योतनाख्यो गुरुरभवद्रितः सर्वदेवो मुनीन्द्र- स्तस्माच्छीदेवसूरिस्तदनु पुनरभूत् सर्वदेवस्ततश्च ॥ जज्ञाते सूरिराजौ प्रगुणगुणयशोभद्र-सन्नेमिचंद्रौ विख्यातौ भूतलेऽस्मिन्नविरतमुदितौ नूतनौ पुष्पदंतौ ॥१०॥ मुनिचंद्रमुनिस्ततो ऽद्भुतोऽथा-अजितदेवश्च तदन्निघद्वरेण्यः । 'अपरः पुनरस्य शिष्यमुख्यो, भूवि वादी विदितश्च देवसूरिः ॥११॥ अजितदेवगुरोरभवत्सदे, विजयसिंह इति प्रथितः क्षितौ । तदनु तस्य पदं दधतावुभा-वभवतां गणमारधुरंधरौ ॥१२॥ सोमप्रभस्तत्र गुरुः शतार्थी, सतामणिः श्रीमणिरत्नसूरिः। पट्टे मणिः श्रीमणिरत्नसूरे-जज्ञे जगचन्द्रगुरुगरीयान् ॥१३॥ तेपामुभावंतिपदावभूता, देवेंद्रसूरिविजयाच चंद्रः । देवेंद्रसूरेरभवच्च विद्या-नन्दस्तथा श्रीगुरुधर्मघोपः ॥१४ श्रीधर्मघोपादजनिष्ट सोम --प्रभो ऽस्य शिष्याश्च युगप्रमेयाः । चतुर्दिगुत्पन्नजनावनाय, योधा इव प्राप्तविशुद्धत्रोधाः ॥१५॥ श्रीविमलप्रभसूरिः, परमानन्दश्च पद्मतिलकश्च । सूरिवरोऽप्यथ सोम-प्रभपट्ट शश्च सोमतिलकगुरुः ॥१६|| 20 शिष्यालयस्तस्य च चंद्रशेखरः, सूरिर्जयानन्द इतीह सूरिराट् । स्वपट्टसिंहासनभूमिवासवः, शिष्यस्तृवीयो गुरुदेवसुन्दरः ॥१७|| श्रीदेवसुन्दरगुरोरथ पञ्च शिप्याः, श्रीज्ञानसागरगुरुः कुलमंडनश्च ! चंचद्गुणश्च गुणरत्नगुरुमहात्मा, श्रीसामसुन्दरगुरुर्गुरुसाधुरत्नः ॥१८॥ श्रीदेवसुंदरमुनीश्वरपट्टनेतुः , श्रीसोमसुंदरगुरोरपि 'पञ्च' शिष्याः। तत्र स्वपट्टवियदंगणभानुमाली, मुख्योऽतिपद्गणधरो मुनिसुंद्रराख्यः ॥१॥ १६ 15 - 25 .
10 १४६ पट्टावली-समुचयः अन्ये श्रीजयचंद्रः, सूरिः श्रीभुवनसुंदरावश्च । श्रीजिनसुन्दरसूरि-जिनकीर्तिश्चेति सुरींद्राः ॥२०॥ मुनिसुंदरसूरिपट्टभानु-गुरुरासीदथ रत्नशेखराऽऽख्यः । दधदस्य पदंबभूवलक्ष्मी-पदयुक्सागरसूरिरीश्वराय॑ः ॥२१॥ सुमतिसाधुगुरुस्तदनुप्रभा-मुदवहद्दधदस्य पदं प्रभुः । पदमदीदिपदस्य च हेमयुग-विमलसूरिरुदात्तगुणोदयः ॥२२॥ पट्ट तस्य व बुरुग्रतपसो वैरंगिकाग्रेसराः । आनंदाद्विमलाऽऽहया गणभृतो भव्योपकारोधुराः ॥ ये नेत्रेभशराऽमृतद्युतिमिते (१५८२) वर्षे क्रियोद्धारत- श्चक्रुः स्वां जिनशासनस्य शिखरे कीर्तिं पताकामिव ॥२३॥ lo प्रमादाऽभ्रच्छन्नं चरणतरणिं मंदकिरणं । पुनश्चक्रे दीप्तं रुचिररुचिरव्दात्यय इव ।। सृजन्पद्मोल्लासं सुविशदपथश्चन्द्रमधुरो। दिदीपे निष्पंकः स इह गुरुरानंदविमलः ॥२४॥ विजयदानगुरुस्तदनुद्युति, वपगणे ऽधिकभाग्यनिधिर्दधौ । 15 श्रुतमहोदधिरेधितसद्विधि--विधुयशा जिनधर्मधुरंधरः ॥२५॥ अभूत्प? तस्योल्लसितविजयो हीरविजयो । गुरुर्गीवाणौघप्रथितमहिमा ऽस्मिन्नपि युगे । प्रवुद्धोम्लेच्छेशो ऽप्यकवरनृपो यस्य वचसा । दयादानोदारो व्यतनुत महीमाईतमयीम् ॥२६॥ तदनुविजयसेनसूरिराज-स्तपगणराज्यधुरं दधार धीरः । अकवरनृपतेः पुरो जयश्रीर्यमवरीदुरुवादिवृंददत्ता ॥२७॥ जयति विजयदेवः सूरिरेतस्य पट्ट, मुकुटमणिरिवोद्यत्कीर्तिकांतिप्रतापः प्रथितपृथुतप:श्रीः शुद्धधीरिंद्रभूतः, प्रतिनिधिरधिदक्षो जंगमः कल्पवृक्षः ॥२८॥ तेन श्रीगुरुणाहितो निजपदे दीपोपमो ऽदीदिपत् । सूरिः श्रीविजयादिसिंहसुगुरुः प्राज्यैर्महोंभिर्जगत् ।। 20 25 1 5. 10. श्रीसूरिपरम्परा १४७. भूमौ स प्रतिबोध्य भव्यनिवहान् स्वर्गेप्यथ स्वर्गिणः । प्राप्तो बोधयितुंगुरौ विजयिनि "प्रेमाण” मुत्सृज्य नः ॥२६॥ तदनुपट्टपतिविहितोऽधुना, विजयदेवतपांगणभूभृता । गुणगणप्रगुणो ऽनणुभाग्यभूः-विजयते गणभृद्विजयप्रभः ॥३०॥ निर्मंथः श्रीसुधर्माऽभिधगणधरतः कोटिकः सुस्थिताऽऽर्या- चंद्रः श्रीचंद्रसूरेस्तदनु च वनवासीति सामंतभद्रात् ।। सूरेः श्रीसर्वदेवाद्वटगण इति यः श्री जगच्चन्द्रसूरे- विश्वे ख्यातस्तपा ऽऽख्यो जगति विजयतामेपगच्छो गरीयान।।३१॥ अथ प्रशस्तिः इतश्च-श्रीहीरविजयसूरीश्वर-शिष्यौ सोदरावभूतां द्वौ । श्रीसोमविजयवाचक-वाचकवरकीर्तिविजयाख्यौ ॥३२।। तत्र कीर्तिविजयस्य, किंस्तुमः सुप्रभावममृतद्युतेरिव । यत्कराऽतिशयतोऽजनि-ष्ट मत्प्रस्तरादपि सुधारसोऽसकौ ।३३।। प्रतिक्रियां कां यदुपक्रियाणां,गरीयसीनामनुसतुमीशे। ज्ञानादिदानैरुपचर्य सोऽयं,यैः कल्पितः कीटकणोऽपि कुंभी॥३४॥15 विनयविजयनामा वाचकस्तद्विनेयः समहभदणुशक्तिपॅथमेनं महार्थं ॥ तदिह किमपितत्स्यात्तुण्णमुत्सूत्रकाऽऽयं । मयि विहितकृपैस्तत्कोविदैः शोधनीयं ॥३५॥ (रचना वि० सं०१७०८वर्षे राधोज्वलपंचम्यां जीर्णदुर्गे ॥) 20. इति लोकप्रकाशनाम्नः सप्तत्रिंशद्सर्गवन्धस्य । जिनराजकोशस्य. श्रीसूरिपरंपरा:-प्रशस्तिः ॥ - ११ श्रीपावलीसारोवार (कृती-उपाध्यायश्रीरविवर्धनगणिः) . 5 10 पंडितनीखिमांविजयगणिगुरुभ्यो नमः ।। (१) ऐनमः श्रीवर्द्धमानतीर्थंकरः । तत्प? "श्रीसुधर्मस्वामी ॥ पंचाप५ वर्षाणि गृहस्वपर्याय त्रिंशद्वर्षाणि ३० श्रीमहावीरसेवायां श्रीवीरे मोक्षं गते च द्वादशवर्षाणि छानस्थ्ये अष्टो ८ वर्षाणि केवलिपर्याये चेति सर्वायुः शतमेकं परिपाल्य श्रीवीरात् विंशत्या वः २० सिद्धिं गतः। श्रीवीरकेवलज्ञानोत्पत्तेः चतुर्दश१४वर्षे जमालीनामा प्रथमनिह्नवः १ स च निह्नवःसमुत्पन्नाध्यवसायंविशेषेण भगवतीसूत्रानुसारेण नराम- रतिर्यग्योनिषु प्रत्येक पंचभवकरणे पंचदशभवान् भ्रांत्वा उपदेशमाला हेयउपादेयवृत्त्याद्यनुसारेणाप्यनंतं भवं भ्रांत्वा महाविदेहे सेत्स्यतीत्यत्रनि- र्णयः केवलीगम्यइति ११ पोडश१६वर्षे तिष्यगुप्तनामा.द्वितीयो निह्नव २ जातः ॥१॥ (२) श्रीसुधर्मखांमिपट्टे द्वितीयः श्रीजंबूस्वामी ॥ स च पोडश- वर्षाणि १६ गृहस्थपर्याये विशतिर०वर्याणि व्रतपर्याय चतुश्चत्वारिंशष्ट४- द्वर्षाणि केत्रलिपर्याये चेति सर्वायुरशीतिकवाणि परिपाल्य श्रीवीरात्- चतुःपष्ठिः४वर्षे सिद्धिं गतः ||२|| 15 (३) श्रीजम्बूवामिपट्टे तृतीयः श्रीप्रभवस्वामी ॥ स च त्रिंश३० द्वर्षाणि गृहस्थपर्याय चतुश्चत्वारिंश४४वर्षाणि व्रतपर्याय एकादश११ वर्याणि युगप्रयानवे चेति सर्वायुः पंचाशीतिपश्चर्पायुः परिपाल्य श्री- पीरात पंचसप्तति७५वतिक्रमे स्वर्ग प्राप्तः ॥३॥ (४) श्रीप्रभवस्वामिपट्टे चतुर्थः श्रीशय्यंभवस्वामी ।। स चाष्टा- 20 विंशतिरपवर्षाणि गृहस्थपर्याये एकादशश्वणि व्रतपर्याचे त्रयोविं- श्रीपट्टावलीसारोद्धारः शतिवर्षाणि २३ युगप्रधानत्वे सर्वायुः द्वापष्टिः ६२ वर्षाणि परिपाल्य श्रा- वीरादष्टनवती ८ वाण्यतिक्रम्य स्वर्गभाग ॥४॥ (५) श्रीशयंभवखामीप पंचमः श्रीयशोभदसूरिः। स च द्वा- विंशति२२वर्षाणि गृहे चतुर्दश१४दणि व्रत पंचाशद्वर्षारिण५०युग- प्रधानत्वे सायुः पडशीतिपक्ष्वणि परिपाल्य श्रीवीरादष्टचत्वारिंशदधिके । शते १४८ वतिक्रांते स्वर्गभाग । || (६) श्रीयशोभद्रसूरिपट्टे पष्टौ श्रीसंभूतिविजयश्रीभद्रबाहुखामिनौ।। तत्रसंभूतिविजयः द्विचत्वारिंशद्वर्षाणि गृहे चत्वारिंशष्ट-णि व्रते अष्टौ वरिण ८ युगप्रधानत्वे सर्वायुर्नवतिः वर्षाणि परिपाल्य- स्वर्गभाग । श्रीभद्रबाहुस्वामी तु पंचचत्वारिंश४५द्वणि गृहे सप्तदश 10 १७वर्षाणि व्रते चतुर्दश१४वणि युगप्रधानत्वे सर्वायुः पट्सप्तति७६ वर्षाणि परिपाल्य श्रीवीरात्सप्तत्यधिकशत१७०वर्षातिक्रमे स्वर्गभाग्.॥६॥ (७) श्रीसंभूतिविजयश्रीभद्रबाहुस्वामीनोः पट्टे सप्तमः श्रीस्थूलभ- द्रस्वामी ॥ स च त्रिंशद्वर्षाणि गृहे चतुर्विशति२४वर्याणि व्रते पंच- चत्वारिंश४५द्वणि युगप्रधानत्वे सर्वायुः नवनवतिःवर्षाणि परि- 15 पाल्य श्रीवीरात् पंचदशाधिकशतद्वय२१५वर्षातिक्रमे स्वर्गभार । 'अत्रांतरे वीरात् चतुर्दशाधिकद्विशत२१४वर्षे आपाढाचार्यादव्यक्त- नामा तृतीयः निह्नवः ॥७॥ (८) श्रीस्थूलिभद्रखामिपट्ट अष्टमौ श्रोआर्यमहागिरि-श्रीआर्य- सुहस्ती सूरी ।। तत्र आर्यमहागिरिः त्रिंशद्व३०पाणि गृहे चत्वारिंश४०- 20 द्वाणि व्रते त्रिंश३-द्वर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुः शतमेकं १००.परि- पाल्य स्वर्गभाग्॥ श्रीश्रायंसुहस्तिसूरिः त्रिश३०द्वाणि गृहे चतुर्विशतिर४. वाणि व्रते पट्चत्वारिंशद्४६वर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुः शतमेकं १०० । परिसाल्य श्रीवीरात् एकनव्यत्यधिकशतद्वये २६१ स्वर्गभार ।। परं श्रीश्रा-25 चार्यसूहस्तिसूरिणा पूर्वभवे द्रमकीभूतोपि संप्रतिराजालीवः प्रवाज्य:त्रिपं-- 16 पट्टावली-समुच्चयः डाधीपत्यं प्रापितः। तथा श्रीनाचार्यसुहस्तिसूरिदीक्षितश्रीअवंतीसुकुमाल-- मृतस्थाने ततसुतेन देवकुलं कारितं तस्य महाकाल इति नाम संजातं ।। तथा श्रीवीरात् विंशत्यधिकवर्षेशतद्वये २२० अश्वमित्रात्सामुछेदि- कनामा चतुर्थोनिह्नवः । अष्टाविंशत्यधिक वर्पशतद्वये गंगनामा द्विक्रियवादी पंचमो निह्नवः॥८॥ (६) श्रीआर्यमहागिरि-श्रीआर्यसुहस्तिसूरिपट्ट नवमौ श्रीसुस्थित श्रीसूप्रतिबद्धसूरी ॥ कार्कदिकनगर्या जातत्वात् कोटिशःसूरिमंत्रजापाच एतो कोटिककाकंदिकतयाख्यातौ ॥ आभ्यां "कौटिकानामा गच्छो ऽभूत् । अयं भावः श्रीसुधर्मस्वामिनोऽष्टसूरीन् यावन्निग्रंथा साधवो अन- गारा इतिसामान्यार्थाभिधायिन्याख्याभूत् नवमे पट्टे कौटिका इति विशे- 10 पार्थावबोधकं द्वितीयं नाम प्रादुर्भूतं, अवांतरे प्रज्ञापनासूत्रकृत्श्रीअार्यश्या- माचार्यः श्रीवीरात् पट्सप्तत्यधिकशतत्रये ३७६ वर्षे स्वर्गभाग् ||६|| (१०) श्रीसूस्थित-सुप्रतिबद्धपट्टे दशमः श्रीइदिन्नसूरिः॥ अत्रांतरे श्रीवीरात्पंचाशदधिकवर्षचतुःशता४५०तिक्रमे गर्दभिल्लो- च्छेदकारी श्रीकालिकसूरिः॥ 15 तथा श्रीसिद्धसेनदिवाकरोपि जातो येनोज्जयिन्यां महाकालप्रासादे रुद्रलिंगस्फोटनं कृत्वा कल्याणमंदिरस्तवनेन श्रीपार्श्वनाथबिंबं प्रकटीकृत्य श्रीविक्रमादित्यराजापि प्रतिबोधितः श्रीवीरनिर्वाणात् सप्ततिवर्षाधिकशत: चतुष्टये४७.ऽतिक्रमे श्रीविक्रमादित्यराज्यं संजातं ॥१०॥ (११) श्रीइन्द्रदिन्नसूरिपट्टे एकादशः श्रीदिन्नरत्नसूरिः ॥११॥ (१२) श्रीदिन्नरत्नसूरिपट्ट द्वादशः श्रीसीहगिरिः ॥१२॥ (१३) श्रीसीहगिरीसूरिपट्टे त्रयोदशः श्रीवज्रस्वामी ॥ स च वत्र शाखोत्पत्तिमूलं दशपूर्वविदांमपश्चिमः अष्टौपवर्षाणि गृहे चतुश्चत्वारिंशद् ४४ वर्षाणि व्रतेः पत्रिंशद्वर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुरष्टाशीति ८८ वर्षा- णि परिपाल्य श्रीवीरात् चतुरशीतिवर्षाधिकपञ्चशतवर्षाणि ५८४ अति--25. क्रमे स्वर्गभाग ॥ तथा श्रीवीरादृष्टचत्वारिंशदधिकपञ्चशत५४८वर्षांत त्रैरा." 200 श्रीपट्टावलीसारोद्धारः १५१ शिकमतजित् "श्रीसुगुप्तसूरिः” स्वर्गभाग्॥ तथा श्रीवीरात् सपादपंचशत५२५वर्षात "श्रीश@जयतीर्थोच्छेद। सप्ततिवर्षाधिकपञ्चशत५७०(५७८)वर्षे जावडकृतोद्धारः ॥१३॥ (१४) श्रीवत्रसेनरिपट्टे चतुर्दशः"श्रीवनदिन्नसूरिः (वनसेनसूरि)। सच नववर्षाणि गृहे पोडशाधिकशतवर्षाणि व्रते त्रीणि वर्षाणि युगप्रधानत्वे 5. सर्वायुसाष्टाविंशतिशतं परिपाल्य वीरात् विंशत्यधिक षट्शतवर्षांते स्वर्ग- भाग । नवाधिकपटशतवर्षांते६०६दिगम्बरोत्पत्तिः ॥१४॥ (१५) श्रीवनसेनसूरिपट्टे पंचदशः "श्रीचंद्रसूरिः” तस्मात् "चंद्र- गच्छ" इति तृतीयं नाम प्रादुर्भूतं ॥१५॥ (१६) श्रीचन्द्रसूरिपट्ट पोडशः "श्रीसामन्तभद्रसूरिः। स च वैराग्य- To वान् निर्ममतया देवकुले वनादिप्ववस्थानात् लोके वनवासीप्युक्तस्तस्माश्चतुर्थं नाम “वनवासी"तिप्रादुर्भूतं ॥१६॥ (१७) श्रीसामन्तभद्रसूरिपट्टे सप्तदशः "श्रीवृद्धदेवसूरि" ॥१७॥ (१८) श्रीवृद्धदेवसूरिपट्टे अष्टादशः "श्रीप्रद्योतनसूरिः ॥१८॥ (१६) श्रीप्रद्योतनसूरिपट्टे एकोनविंशतितमः श्रीमानदेवसूरिः"१६ 15 (२०) श्रीमानदेवसूरिपट्टे विंशतितमः ''श्रीमानतुङ्गसूरिः" । येन श्रीभक्तामरस्तवनं कृत्वा वाणमयूरपण्डितविद्याचमत्कृतोऽपि क्षितिपतिः प्रतिवोधितः ॥२०॥ (२१) श्रीमानतुङ्गसूरिपट्टे एकविंशतितमः “श्रीवीरसूरिः” । स च श्रीवीरात्सप्तत्यधिकसप्तशतव विक्रमात् त्रिंशतिवर्षे श्रीनाग-20 पूरे श्रीनेमिनाथप्रतिष्टाकृत् ॥२१॥ (२२) श्रीवीरसूरिपट्टे द्वाविंशतितमः "श्रीजयदेवसूरिः" ॥२२॥ (२३) श्रीजयदेवसूरिपट्ट त्रयोविंशतितमः श्रीदेवानंदसूरिः। अत्रांतरे श्रीवीरात् पंचचत्वारिंशदधिकाष्टशतवर्षान्ते ८४५ वलभी- पुरभंगः । द्वयशीत्यधिकाष्टशतवतिक्रमे चैत्यस्थीतिः ॥२३॥ (२४) श्रीदेवानंदसूरिपट्टे चतुर्विशतितमः श्रीविक्रमसूरिः॥२४॥. 25 J - १५२ - पट्टीवली-समुच्चयः (२५) श्रीविकमसूरिपट्टे पंचविंशतितमः श्रीनरसिंहमूरिः ॥रशा (२६) श्रीनरसिंहरिपट्टे षड्विंशतितमः श्रीसमूद्रसूरिः ॥२६॥ (२७) श्रीसमूद्रसूरिपट्ट सप्तविंशतितनःश्रीमानदेवसृरिः । श्रीवीरात् , वर्षे सहने गते सत्यभिने “पूर्वव्यवच्छेदः श्रीवीरात् त्रिनवत्यधिकनवशत ६६३ वर्षातिक्रमे श्रीकालिकसूरिभिः पंचमीतः चतुर्थ्या पर्दू पणापर्वानितं श्रीवीरात्पंचपंचाशदधिकसहन्नवर्षे । विक्रमतः पंचाशीत्यधिकपंचशते५८५ याकिनीसूनुः श्रीहरिमन सरिः स्वर्गभाग ॥२७॥ (२८) श्रीमानदेवसूरिप? अष्टाविंशतितनः श्रीविबुधप्रभसूरिः २८ (२६) श्रीविबुधप्रभसूरिपट्टे एकोनविंशतितमः श्रीजयानंदसूरि:२६ (३०) श्रीजयानंदसूरिपट्ट त्रिंशत्तमः श्रीवीरप्रभसूरिः । श्रीवीरा- 10 नवत्यधिकैकादशशतर्ये श्रीउमास्थानियुगप्रधानः । श्रीवा रात् पंचाशद धिकैकादशशतव जिनभद्रगगिर्युगप्रधानः ॥३०॥ (३१) श्रीवीरप्रभसूरिपट्टे एकत्रिंशत्तमः श्रीयशोदेवसूरिः ।। श्रीवीरात् द्विसप्तव्यधिकद्वादशशतवर्षे विक्रमात् संवत् ८०२ वर्षे वनराजचापोत्कटेन श्रीश्रणहिल्लपुरपाटणस्थापना कृता । विक्रमतः 15 सं०८०० वर्ष भाद्रपदशुक्लानृतीयायां श्रामराजाप्रत्तिबोधकः श्रीवप्पभट्ट- सूरिस्तस्यजन्म, स च विक्रमतः संवत् ८६५ वर्षे स्वर्गभाग् ॥३१॥ (३२) श्रीयशोदेवसृरिपट्टे द्वात्रिंशत्तमः श्रीप्रद्युम्नसूरिः ॥३२॥ (३३) श्रीप्रद्युम्नसूरिप? त्रयस्त्रिंशत्तमः श्रीमानदेवसरिः ।। उप- धानग्रंथकर्ता ॥३॥ 20 (३४) श्रीमानदेवरिपट्टे चतुबिंशत्तमः श्रीविमलचंद्रसूरिः ३४ (३५) श्रीविमलचंद्रसूरिपट्टे पंचत्रिंशत्तमः श्रीप्रद्योतनसूरिः । श्रीवीरात् चतुःपठ्यधिकचतुर्दशशतवर्षे १४६४ विक्रमात सं० चतुर्न वत्यविकनवंशतः६४वर्षे निजपट्टे सूरिः अदाचलवटख छायामुपविष्टः सन् श्रीसर्वदेवसूरिप्रभृतीन् अष्टौ सूरीन स्थापितवान् । बढत्याधः सूरिपद- 25 करशावडमच्छ"इति पंचमं नाम लोकप्रसिद्धं, प्रधानशिष्यसंतत्यादिगुण .
श्रोपट्टावलीसारोद्धार प्रधानचरितैरेव "हद्गन्" इत्यपि नाम । अत्रांवरे विमतनंत्रो सीलदावलोपरितीर्थप्रासादभूत् ॥३५॥ (३६) श्रीउद्योवनसूरिपट्टे पशिचमः श्रीसर्वदेवसूरिः॥ तथा श्रीविक्रमात् एकोनत्रिंशदधिक्दशशतवर्षे धनपालपंडितेन देशोनानसाला कृता । विक्रमात् एणनवत्यधिकतहसवर्षे शीउत्तराध्यय- 5 नवृत्तिकर्ता पिरापद्गच्चीयवादिवेतालशांतिसूरि वर्गभाग् ॥३६॥ (३८) भोसर्वदेवतरिपडे तप्तत्रिंशत्तमः श्रीदेवसूरिः ॥३॥ (३८) श्रीदेवरिपट्टे ऽनिशत्तमः पुनः श्रीसर्वदेवसूरिः ॥३॥ (३६) सीसर्वदेवसूरिपट्टे एकोनचत्वारिंशत्तनौ सीयशोभद्रसूरिः सीनेमिचंद्रसूरिः ।। तथा विक्रमात् पंचत्रिंशदधिककादशशतवनवांरवृत्ति--le कन् "भीमभयदेवरि वर्गभाग ३६ । (४०) श्रीयशोभद्चरिमोनेमिचंदसूरिपट्टे चत्वारिंशचमः शी- मुनिचंद्रसूरिः । स च जावजीवं सौवीरपायी प्रत्याख्याततर्गवतिकः श्रीअनेकांवजयपताकापलिकोपदेशपदत्यादिकता, ताकिशिरोमणिः संवत् ११७८ वर्षे खर्गनाम् ।। मन च संवत् ११५६ वर्षे पौर्णनियकर-पोलारित नत्मविबोधाप च भीमुनिचंद्रसूरिभिः पाक्षिकसप्ततिः इता ।। तथा भीमुनिचंद्रसूरिशिष्यः श्रीवादिदेवतरित्तैः श्रीमदणहिल- पूरपत्तने भीसिद्धराजजसिंहसभायां वादे कुमुदचंद्राचार्य निर्जित्य भी- पत्तननगरे दिगंबरप्रवेशो निवारितः त्या सं० १२३४ वर्षे फलवर्दिमामे : चैत्यर्वियोः प्रतिष्ठा कृता, तथा भारासणे च श्रीनेमिनाथप्रतिष्ठाकृता, तथा ८४२०० प्रमाणः स्वाद्वादरलाकरनाना प्रमाणपंथः कृतः, सच वादिदेवसूरि सं० १२२६ वर्षे स्वर्गभार । तल्लिन्समये श्रीदेवचंद्रसूरिशिष्यः निलोटिग्रंथकर्ता श्रीहेमचंद्र- सूरि वस्य च सं ११४५ वर्षे जन्म सं.१९५०वर्षे व्रतं सं० ११६५वर्षे 25 सूरिपदं सं१२२वर्षे वर्गतिः ॥४॥ 15 पट्टावलो-समुख्यः (४१) श्रीमुनिचंद्रसूरिपट्टे एकचत्वारिंशत्तमः "श्रीअनितदेव- सूरि ॥४१॥ तत्समये सं०१२०४वर्षे "खरतरमतोत्पत्तिः। संवत् १२१३ वर्षे "आंचलकमतोलति संवत् १२२६ वर्षे "सालोणंमीरकमतोत्सत्ति संवत् १२५० वर्षे "प्रागनियकमतोत्सत्तिः वीरात् द्विनवत्यविकपोडश 5 शत१६६वर्षे बाहडदेमंत्रिकृतोद्धारः॥४१॥ (४२) श्रीअजितदेवसूरिपट्टे द्विचत्वारिंशचनः "श्रीविजयसिंहसरि (४३) श्रोविजयसिंहमुरिपट्टे त्रिचत्वारिंशतना "श्रीसोमप्रम- सूरिय "श्रीमणिरत्नसृरि ॥४॥ (४४) श्रीमणिरत्नसूरिपट्टे चतुश्चत्वारिंशत्तमः "श्रीजगञ्चंद्रसूरि 10 सच निवापरायणः सन् “होरलाजगच्चंद्रसूरिरिति ख्यातिभा- ग्जातः तया यावज्जीवमात्राम्लतपोभिग्रही द्वादशवर्षे तपाविदनात- वान , तो लोके पठं नाम संवत् २८५वर्षे "तपा" इति प्रसिद्धं जातं ।। तया च निय१ कोटिक २ चंद्र ३ वनवासि ४ वडगच्छ५तपा ६इति पराणां नान्नां प्रवृचिहेतवः प्राचार्याः क्रमेण प्रोसुधर्मवामि १ श्रीम-15 स्थितसूरि २ चंद्रसूरि ३ श्रीसामंतभद्रसूरि ४ सर्वदेवसूरि ५ श्रीजाच्च- द्रसूरि ६ नामानि पट् आसन् ॥४४॥ (४५) श्रीजगञ्चंद्रसूरिपट्टे पंचचत्वारिंशत्तमः "श्रीदेवेंद्रसूरि । स व चिरकालं मालवके एव विकृतवान् ।। क्रमेण श्रीदेवेंद्रसूरयः श्रीयंभ- तीर्थे समायावाः तत्र च श्री विजयचंद्रसूरयः एकरयां पौफ्यशालायां लोका- 20 प्रहात् छदश वर्षाणि पूर्व स्थिततः प्रत्रयादिकृत्यमपि गुवाज्ञामंतरलेच कृतवंतश्च, तयामाज्ञवदेशादागतानां श्रीदेवेन्द्रसूरीणां वंदनार्थमपि ना- चाताः, ततो लोकैश्च वृद्धशालायां स्थितत्वात् श्रीविजयचंद्रसूरिसमुदायल 'वृद्धशालिक" इति प्रोकं, क्या लघुशालायां स्थितत्वात् श्रीदेवेन्द्रसूरि निमितसमुदायत्व "लघुशाशिक इति ख्यातिर्जाता। .
श्रीपट्टावलीसारोद्धार तत्समये मंत्रिवस्तुपालेन श्रीदेवेन्द्रसूरीणां बहुमानं कृतं, क्रमेण विहारं कुर्वतश्च श्रीसूरयः प्रल्हादपुरनगरे समायाताः, तत्र च' संवत् १३२३ वर्षे विद्यानंदसूरिं स्वपदे संस्थाप्य पुनरपि मालवदेशे विहृतवंतः तत्र मालवके एव सं० १३२७ वर्षे श्रीदेवेन्द्रसूरयो दिवं गताः । तदा दैवयोगाद्विद्यापुरे श्रीविद्यानंदसूरयोऽपि त्रयोदशदिनांतरिता 6 स्वर्गभाजः ॥ तथा श्रीगुरूणां स्वर्गगमनं श्रुत्वा सं०भीमेन मतांतरे सोनीसं- ग्रामेण द्वादशवर्षाणि धान्यं त्यक्तं ॥४॥ (४६) श्रीदेवेन्द्रसूरिपट्टे षट्चत्वारिंशत्तमः श्रीधर्मघोषसूरिः ।। येन मंडपाचले सा० पेथडदेवः सौख्यभाग कृतः सोऽपिमंडपेशप्राधान्य प्राप्तस्तेन ८४ श्रीजिनप्रसादाःसप्तज्ञानकोशाश्च कारिताः पटपंचाशत् स्वर्ण- 10 'घटीव्ययेनेंद्रमाला श्रीशजयोपरि परिहिता, तथा सांपेथडदेवः द्वात्रिंश द्वर्षीयोपि ब्रह्मचार्यभूत् तस्य पुत्रो झांझणदेनामा एक एवासित् येन च श्री- शं@जयोजयंतगिर्योः शिखरे द्वादशयोजनप्रमाणवर्णरूप्यमयः एक एव ध्वजः समारोपितः तथा येन मंडपाचले जिर्णटंकानां षट्त्रिंसत्सहस्रः श्रीगुरूणां प्रवेशोत्सवः कृतः ।। तथा एकदा श्रीगुरुभिः कामिश्चित् दुष्टनिभिः कार्मणोपेता वटका' साधूनां विहरिताः भूपीठे त्याजिता प्रभाते ते पाषाणमया अभवन् तदा वासाभिमंत्र्याप्तिपट्टकासनस्थादुष्टस्त्रियः स्थम्भिताः । ताश्च कृपया मुक्ताः, एवं महा प्रभावकाः श्रीगुरवः संवत् १३५७ वर्षे दिवं गताः ॥४६॥ (४७) श्रीधर्मधोषसूरिपट्टे सप्तचत्वारिंशत्तमः श्रीसोमनभसूरिः - 20 वस्य च संवत्१३१०वर्षे जन्म संवत्१३२१वर्षे व्रतं संवत् १३३२ वर्षे, सूरिपदं । यः कंठगतैकादशांगसूत्रार्थः समासीत् , येन जलबहुलकुंकुणदेशे अप्कायविराधनाभयात् मरुदेशे शुद्धजलदौर्लभ्याच्च साधूनां विहारः. प्रतिषिद्धः क्रमात संवत् १३७३ वर्षे ते श्रीसूरयो. दिवं गताः । (४८) श्रीसोमप्रभसूरिपट्टे अष्टचत्वारिंशत्तमः श्रीसोमतिलकसूरि: 25 तस्य च संवत् १३५५ वर्षे जन्म संवत् १३६६ वर्षे दीक्षा सं० १३७३ वर्षे सूरिपदं संवत् १४२४ वर्षे एकोनसप्ततिवर्षायुः परिपाल्य स्वर्गः ॥४॥ 15 5 १५६ पट्टावती-समुच्चयः (४६) सोमतिलकसूरिपट्टे एकोनपंचाशत्तमः "श्रीदेवसुंदरसूरिः" तस्य च सं०१३६६वर्षे जन्म, सं०१४०४वर्षे व्रत, सं०१४२० वर्षे सूरिपदं । श्रीदेवसुंदरसूरीणां च श्रीज्ञानसागरसूरयः श्रीकुलमंडनसूरयः श्रीगुणरत्नसूरयः श्रीसोमसुंदरसूरयः श्रीसाधुरत्नसूरयः अनेकग्रंथकर्तारः शिघ्याश्चाऽभवन् ४६। (५०) श्रीदेवसुंदरसूरिप? श्रीसोमसुंदरसूरिः ॥ तस्य च संवत्- १४३०वर्षे अन्म, सं०१४३७वर्षे प्रतं, सं०१४५०वर्षे बाचकपदं १४५७ वर्षे सूरिएदं ।। तथा १८शतंसाधुपरिकरितं सक्रियापरं श्रीगुरूं- विलोवद्य रुष्टै व्यलिंगिभिरेकः शरुधारिपुमान् पंचशतद्रव्यदानेन श्रीसूरिवधार्थ उदीरितः स च दुर्धिया वसतौ प्रविष्टो यावदनुचितकरणाय lo यतते ताबच्चंद्रोद्योते जाते निद्रालुभिरपि श्रीगुरुभिः रजोहरणेन प्रमृज्य- पार्श्व परावर्तितं तन्दृष्ट्वा ऽहोनिद्रायायपि क्षुद्रप्राणिषु कृपापरमेनं विराध्य कस्यां गतौ से गतिरिति विचारणया परलोकमीतो गुरुपादयोर्निपत्य क्षमध्वं, मेऽपराधमिति यचसा गुरुं प्रबोध्य निजव्यतिकरं प्रोक्तवान् , सोपिश्रीगुरु- भिस्तथोदीरितो यथा स प्रवर्जितः इति वृद्धवचः। स च राणकपुरे श्रीधरण- 15 विहारोपदेशकः संयममाराध्य सम्वत् १४६६ वर्षे स्वर्गभाक् ५० । (५१) श्रीसोमसुंदरसूरिपट्टे एकपंचाशत्तमः "श्रीमुनिसुंदरसूरिः" येन्नष्टोत्तरशतहरूमितो लेखः श्रीगुरूणां प्रेषित तथा च अष्टोत्तरशतवतु: लिकानादोपलक्षका बाल्येपि सहस्राविधानधारकः संप्रभावं संतिफर मितिरतवपरणेच योगिनीकृतमार्युएट्वं निवारकः तस्य सम्बत् १४३६ वर्षे 20 जन्म, सं.१४४३ वर्षे व्रत सम्बत् १४६६ वर्षे वाचकपदं सम्वत् १४७८ वर्षे ३९००० हेसटंकव्ययेन वृद्धनगरीय संदेवराजेन सूरिपदं कारितं । सम्बत् १५०३ वर्षे स्वर्गः ॥५॥ (५२) श्रीमुनिसुंदरसूरिपट्टे द्विपंचाशत्तमः "श्रीरत्नशेखरसूरिः" । तस्य च संवत् १४वर्षे जन्म, संवत् ६३वर्षे व्रत, सं०१४८३वर्षे 25 पंडितपद सं०१४६३वर्षे वाचकपदं सं० १५० वर्षे संरिपदं सं०१५१७ श्रीपट्टायलीसारोद्धारः १५७ वर्षे स्वर्गः तदानी लुकाख्यातो लेखकात् संवत्१५०८वर्षे श्रीजिनप्रति- मोत्थापनपरं “लुशामत" प्रवृत्तं, तद्वेषधरस्तु सं०१५३८वर्षे जातः, तत्प्रथमो वेपधारी ऋपिभाणाख्यो ऽभूदिति ॥५२॥ (५३) रत्नशेखरसूरिपट्टे त्रिपंचाशत्तमः श्रीलक्ष्मीसागरसूरिः ।। तस्य च सं०१४६४वर्षे जन्म, सं.१४७०वर्षे दीक्षा सं०१४६६-1 वर्षे पंडितपदं सं०१५०१ वर्षे वाचकपदं सं०१५०८वर्षे सूरिपदंसं०१५१७. गच्छनायकपद ॥५३॥ (५४) श्रीलक्ष्मीसागरसूरिपट्टेचतुष्पंचाशत्तमः "श्रीमतिसाधुसूरिः" (५५) श्रीसुमतिसाधुसूरिपट्टे पंचपञ्चाशत्तमः "श्रीहेमविमलसूरिः" यः क्रियाशिथिलसाधुसमुदाये वर्तमानोपि साध्वाचारं नातिक्रांतः तथाऋ-10 पिहानर्पिश्रीपतिऋपिगणपतिप्रमुखा लुक्कामतमपास्य श्रीहेमविमलसूरिपार्श्वे- प्रव्रज्य तन्निश्रया चारित्रभाजो बभुवांसः । तथा संवत्१५६२वर्षे संप्रति साधवो न गपथमायांतीत्यादिप्ररुपणपरं"कटुकनाना मत" प्रवर्तितं, गृह- स्थात् त्रिस्तुतिकमतवासितात् कटुकमतोत्पत्तिः। तथा १५७०वर्षे लुक्का- मतान्निर्गत्य विजयवेपधारिणा विजामतिनाम्ना मतं प्रवर्तितं । तथा संवत्- 15 १५७२ वर्षे नागोरीतपागणादुपाध्यायपार्श्वचन्द्रेण स्वनाम्ना मतं प्रकटित॥५५॥ (५६) श्रीहेमविमलसूरिपट्टे पटपंचाशत्तमः " श्रीआणंदविमल- सूरिः" तस्य च संवत्१५४७वर्षे ईलादुर्गे जन्न सं०१५५२वर्षे व्रतं सं०१५७०वर्षे सूरिपदं । यः क्रियाशिथिलबहुसाधुजनपरिकरितोपि संवेगरंगभावितमतिः उत्सुत्रप्ररुपणापरायणजनसमूह समालोक्य करुणा- 20 रसावलिप्तमना गुर्वाज्ञया कतिचित् संविज्ञसाधुसहायः सं०१५८२वर्षे शिथि- लाचारपरिहाररूपक्रियोद्धारयानपात्रेण तं भव्यजनं समुद्धृतवान् । यो वादे जयी स नगरादौ स्थास्यति नान्य इतिसुराष्ट्राधिपतिनामांकितं लेखमादाय सुराष्ट्र साधुविहारनिमित्तं यदियभावकः सुरत्राणदत्तपय॑स्तिका रोहः पातसाहिप्रदत्त मल्लिकश्रीनगदलविरुदः सातूणसिंहः श्रीआणंद- 25 विमल सूरीणां विज्ञप्ति विधाय पन्यासजगर्षिप्रमुखसाधुविहारंकारितवान् ।
' - १५८ पट्टावली-समुच्चयः तथा जेसलमेदिमरुभूमौ जलदोर्लभ्यात् दुष्करोयमिति श्रीसोमप्रम- सूरिभिर्विहारः पूर्वं सम्प्रतिपिद्ध आसित् सोपि विहारः कुमतव्याप्तिभिया जनानुकंपया च भुयो लाभहेतवे पुनरप्यनुज्ञातः श्रीसूरिणा तत्रापि प्रथम वैराग्यनिधि निस्पृहावधिर्जावजीवंजघन्यतोपि पष्टतपोऽभिगृही पारणकेप्या- चाम्लादितपोविधायी उपाध्याय श्रीविद्यासागरगणिविहृतवान् तेन च 5. जेसलमेर्वादौ खरतरान् मेवातदेशे च वीजामतिप्रभृतीन् मरुदेशादौ लुम्पकादीन्. प्रतिबोध्य वीरनामे पासचंद्रव्युग्राहितं जनं च प्रतिबोध्य भूयान् जनो जैनधर्म प्रापितः,एवं मालवकादिवहुदेशेषु विहृत्य वैराग्यवा-. सिनो जनाः कृताः । तथाक्रियोद्धारकरणानन्तरं च श्रीपाणंदविमलसूरयः चतुर्दशवर्षाणि जघन्यतोपि नियततपोविशेषं विहाय पष्ठतपो अभिग्रहेण lo. चतुर्थषष्ठाभ्यां विंशतिस्थानकाराधनाद्यनेकविक्रप्टतपःकारिणश्च सं० १५६६ वर्षे चैत्रशुदिसप्तम्यामाजन्मातिचाराद्याआलोच्य नवमिरुपवासै- रहमदावादनगरोपकंठे निजां पूरे (?) स्वर्ग प्राप्तः ॥५६।। (५७) श्रीआणंदविमलसूरिपट्टे सप्तपंचाशत्तमः " श्रीविजयदान- सूरिः येन स्थंभतीर्थमहानगरेषु महामहोत्सवपुरस्सरमनेकजिनविवशतानि 15. प्रतिष्ठितानि यदुपदेशेन पातसाहिमुहिम्मुदमान्येन मंत्रिगलराजेन पा- मासिकां शजयमुक्ति कारयित्वासकलनगरसहसहितेन श्रोशत्रुजययात्रा कृता, तथा यदुपदेशपरायणैः गंधारीयसारामजी-अहम्मदाबादसत्कसं० कुंअरजीप्रमुखैः श्राद्धैः श्रीशत्रुञ्जयोजयन्तगिर्योः जीर्णोद्धारो देवकुलिकाच- तुर्मुखादयः कारिताः । तथायः श्रीसूरि जावजीवं घृतातिरिक्तविकृतिपंचप- 20 रिहारी अनेकवारैकादशांगपुस्तकशुद्धिकारः सर्वजनप्रसिद्धोभृत् तस्य च सं० १५५३ वर्षे जांमलाख्यनगरे सा० भामोसा-मातृभ्रमादे रहे जन्म, त्रयो भ्रातरः, भागिनेयो विजयःx x लक्ष्मणकुंअर, सं०१५६२ वर्षे दीक्षा सं०.१५८७ वर्षे सूरिपदं, संवत् १६२२ वर्षे वडालीनगरेऽनशनेन स्वर्गः ५७ (५८) श्रीविजयदानसूरिपट्ट अष्टपंचाशत्तमः श्रीहीरविजयसूरिः"सं० 25 १५८३ वर्षे प्रादादनपुरवास्तव्यउकोशज्ञातीयसा कुंअरजीभार्यानाथीगृहे श्रीपट्टावलीसारोद्धारः १५६ जन्म, संवत्१५६६वर्षे कार्तिकवदिरदिने दीक्षा,सं०१६०७ नारदपूर्या पंडित पदं सं०१६०८वर्षे माघशुदि ५ दिने नारदपूर्वी वाचकपदं, सं० १६१० वर्षे सीरोहीनगरे सूरिपदं । तथा चैरनेकनगरेषु सहस्रशोविबानि प्रतिष्ठिवानि तथा अहम्मदावादनगरे ऋपिर्मेघजीनामा स्वयं मतं परित्यज्य पंचविशति- मुनिभिः सह श्रीगुरुचरणसेवापरो जातः । तथा श्रीगुरवः पातसाहि अक- 5 ध्वरेण स्वनामांकितं फुरमानं प्रेष्य गंधारवंदिरात् श्रीआगरानगरासन्न फतेपुरनगरे समाहूताः सन्तः विहारं कुर्वंतः क्रमेण सम्वत् १६३६ वर्षे ज्येष्ठवदि१३त्रयोदशीदिने तत्र सम्प्राप्ता श्रीसाहिना समं मिलिताः साधिकप्रहरं यावत्तत्र धर्मगोष्ठी कृत्वा श्रीसाहिना अनुजाता सन्तो महताडम्वरेणोपाश्रये समायाताः। तदानीं सकलापि 10 लोकः श्रीहीरसूरिसेवापरो जातः । तस्मिन् वर्षे श्रीश्रागरानगरे चा- तुर्मासकं कृतं तदनुश्रीगुरुभिः श्रीशोरीपुरयात्रां च कृत्वा आगरानगरे सा० मानसिंघकल्याणमल्लकारितश्रीचिंतामणिपार्श्वनाथविवं प्रतिष्ठितं पुन- रपि फचेपुरनगरे समागत्य श्रीसूरयः पातसाहिना साकं मिलिवाः तदवसरे धर्मवाक्या रंजितः पातसाहिः द्वादशदिवसामारिसत्कं फुरमानं खनामां- 15 कितं श्रीगुरूणां दत्तवान् , तदा च श्रीजिनधर्मोन्नतिर्महती जाता । तदवसरे श्रीमेडतीयसदारंगेण याचकेभ्यो मूर्तिमद्गजदानद्विपंचाशदश्वदानादि- ना दील्लिमंडले श्राद्धानां प्रतिगृही सेरद्वयप्रमाणखंडलंभनिकाकरणादि. ना च श्रीगुरूणां प्रतिष्ठा महती संजाता। तथा प्रथमं चातुर्मासीकं श्रीआगरा- नगरे द्वितीयं फत्तेपुरे तृतीयं अभिरामावादे, चतुर्थपुनरपि आगरानगरे 20 एवं चतुर्नासकचतुष्टयं तत्र देशे कृत्वा, गुर्जरदेशसंघाग्रहात् मेडतादिनगरे विहारं कुर्वन्तो नागोरनगरे च चतुर्मासकं कृत्वा क्रमेण सूरयः श्रीसीरोही- नगरे समागताः तत्रापि प्रतिष्टाद्वयं श्रीअदाचलतीर्थयात्रां च कृत्वा रा- जश्रीसूलतानजीकस्याग्रहवशात् श्रीसीरोहीनगरे चातुर्मासीक स्थिवाः । सदनु विहारं कुर्वतः श्रीपाटणनगरे चातुर्मासकं चक्रुः 25 श्रीहीरसूरयः क्रमेण भव्यजीवान् प्रतिवोध्य च श्रीदीववंदीरास जउनानगरे संवत् १६५२ वर्षे भाद्रवाशुदि ११ दिने स्वर्ग प्राप्ताः ॥
१६० पट्टावली-समुच्चयः (५६) हीरविजयसूरिपट्ट एकोनपष्टितमः "श्रीविजयसेनसूरिः” तस्य व संवत् १६०४ वर्षे नारदपूर्या ऊकेशज्ञातीयसा०कमामायाकोडम- देगृह जन्म, शंवत् १६१३ वर्षे दीक्षा, सं० १६२८वर्षे पंडितपदं, सं. १६२८ वर्षे फाल्गुन शुक्ल ५ दिने श्रीअहमदाबाद नगरे उपाध्याय पवानपूर्वकं सुरिपदं । तैश्च सं०१६३२वर्षे चांपानेरदुर्गे प्रतिष्ठा 5 कृता, तथा श्रीसूरतिबंदरे श्रीभूषणनामा दिगंबराचार्यो निर्जितः ।। तथा श्रीहीरविजयसूरिषु विद्यमानेषु आचार्यगुणगणानाकर्य पातसाहिश्रीअकबरः श्रीआचार्यान् श्रीलाहोरनगरे समाकार्य श्रीहीरसूरी- णांश्च कुशलप्रश्नं प्रपृच्छ, तत्र व श्रीसूरिवचनचातुरीरंजितः श्रीसाहिः 'श्रीसूरीणा"कालिसरखती"विरुदं दत्तवान् । श्रीसाहेरत्याग्रहात् चातुर्मासक- 10 द्वयं विधाय' शरीरवाधावशात् श्रीहीरसूरिभिराकारिता श्रीसाहिपादानापृच्छय श्रीसूरयः चातुर्मासकमध्येपि चलंतः श्रीपाटणनगरे समागतास्तदा च संवत् १६५२ वर्षे श्री गंगानगरे श्रीहीरविजयसूरेश्च निर्वाणं समाकर्ण्य तत्रैवस्थितास्तत्र क्रमेण संवत् १६५४वर्षे श्रीशकंदरपूरे श्रीविजयचिंतामणि पार्श्वनाथबिंबस्थापनां विधाय लाडोलग्रामे सूरिमंत्राराधनं विंधाय च 15 श्रीस्थंमतीर्थे श्रीविजयदेवसूरिभ्यः सूरिपदं दत्वा श्रीपाटणनगरे गणाऽनुज्ञा- नंदि श्रीसूस्यश्चक्रुः, तदा राजनगरवास्तव्यसा सूराकेन प्रतिश्राद्धगृहं महं- मूदिकालभनिका चक्रे तस्मिन् संवत्सरे श्राद्धैर्लक्षमहंमुदिकाव्ययश्च कृतः एवमनेकभन्यजनाल प्रतिबोध्य पंचाशजिनप्रतिष्ठां च कृत्वा अष्टवाचक- पदानि दत्वा सार्द्धशतपण्डितपदानि च दत्वा द्विसहस्रपरिकसः श्रीविज-20 यंसेनसूरयः ‘त्थंभतीर्थे संवत् १६७१ वर्षे ज्येष्ठवदि११दिने स्वर्ग प्राप्ताः ॥५६॥ ..६०) श्रीविजयसेनसूरिपट्टे पेष्टितमः "श्रीविजयदेवसूरिः। तस्य च संवत् १६३४वर्षे ईडरदुर्गे-उकेशजातीय साथिरा-भार्यारूपागृहे जन्म, संवत्-१६४३.वर्षे दिक्षा, संवत् १६५५ वर्षे पन्यासपदं, संवत् १६५६ वर्षे 25 सरिषद, वस्य च पदमहोत्सव स्थंभतीर्थवासिनीमल्लकेनः दशसहस्ररूप्यक ..
श्रीपट्टावलीसारोद्धारः १६१ व्ययश्चक्रे, संवत्१६५८वर्षे पाटणनगरवासिपारिखसहस्रवीरेण पंच- सहस्रमहमुदिकाव्ययेन गणानुज्ञानंदिमहोत्सवः कृतः ।। अत्रांतरे पातसाहि श्रीजिहांगिरः श्रीमंडपाचले समाकार्य श्रीजैनधर्मचर्चाश्रवणात् संतुष्टः सन् श्रीसूरीण महातपा"विरुदं दत्तवान् , तन्महोत्सवः सा०चंद्रकेन कृतः क्रमेण विहारं कुर्वन सावलीनगरेपूरिमंत्रा- 5 राधनं कृत्वा च कालांतरे ईडरनगरवासि सा०सहजूकृतमहोत्सवेन संवत्- १६८२वर्षे श्रीविजयसिंहसूरि श्रीगुरुः स्थापयामास । तदनु संवत् १६८४- वर्षे जालोरनगरे मंल्जयमल्लजीकेन श्रीविजयसिंहसूरीणां गणानुज्ञानंदि- महोत्सवश्चक्रे, क्रमेण श्रीउदयपुरे राणाश्रीजगसिंघजीअत्याग्रहात् चातुः मासकं कृत्वा श्रीगुर्जरदेशे श्रीआचार्यसहिताः श्रीसूरयः समागताः। श्रीशत्रु- 10 जयतीर्थ-यात्रां प्रतिष्ठां च कृत्वा, क्रमेण दक्षिणदेशे वर्हानपुरबीजापुरनग- रादिसंघकृतमहोत्सवेन चातुर्मासचतुष्टयं श्रीसूरिः कृतवान् , तदनु संघानः हात् श्रीगुर्जरदेशमलंचकार । तस्मिन् समये "श्रीविजयसिंहसूरयोपि" मरुदेशादायाताः श्रीप्र- हम्मदाबादनगरे श्रीविजयदेवसूरिचरणान्नेमुः क्रमेण भव्यजीवान् प्रति- 15 बोधयंतः श्रीसूरयः स्थंभतीर्थे चातुर्मासकं स्थितवांसः तस्मिन् समये श्रीवि- जयसिंहसूरिः शरीरवाधावशात् अंहमदाबादनगरासन्ननवीनपुरे- तस्थि- वान् , तस्य च संवत्१६४४वर्षे श्रीमेडतानगरे। उकेशज्ञातियसा नथ- मल्ल-भार्यानायकदेगृहे जन्म । संवत १६५४ वर्षे दीक्षा, संवत् १६७३' वर्षे वाचकपदं, संवत् १६८२ वर्षे सूरिपदं अष्टाविंशतिवर्षाणि गुरुसे- 20 वायां, संवत् १७०६ वर्षे आषाढशुदिरदिने स्वर्गगतिः। तदनु श्रीपरमगुरुः गंधारबंदिरे समेत्य श्रीराजनगरादिसंघाग्रहात् स्वपट्टे श्रीविजयप्रभसूरि संस्थाप्य श्रीसुरतबंदिरे चातुर्मासकं तस्थौ, क्रमेण भन्यजीवान् प्रतिबोधयंतः श्रीआचार्यसहिताः श्रीगुरुवः सौराष्ट्रदेशसंघा- महात् श्रीशत्रुजयतीर्थयात्रां कृत्वा' श्रीदीवबंदिरासन्नउंनानगरे समेताः 25 तत्र च संवत् १७१३ वर्षे आषाढशुदिदिने खर्ग प्राप्त। २१ पट्टावली-समुन्धयः (६१) श्रीविजयदेवसूरिप? एकपष्टितमः श्रीविजयप्रभसूरि । तस्य च संवत् १६७७ वर्षे कच्छदेशे मनोहरपुरे. उकेशज्ञातीयसाशिव-- गण भार्याभाणवाइमृहे जन्म; संवत् १६१६ वर्षे दिक्षा, संवन्१७०१वर्षे पन्यासपदं संवन्?७१०वर्षे गंधारवंदरे सूरिपंद, श्रीसजनगरीय सा० अ- पइदेवचंद्रभार्यासाहिवदेनाम्न्या श्राविकया पदमहोत्सवः कृतः, श्रीसूरिभिः । देवतोपदेशात् "श्रीविनयमभसूरि रितिनाम सप्रत्ययं प्रदत्तं तदनु सूरयः- श्रीआचार्यसहिताः संवत् १७११ वर्षे श्रीराननगरे समागतास्तत्र चतुर्माः सके सनुत्तिर्ण सा सूरारतन-सूससाधनजीकन बहुद्रच्चव्ययकरणपूर्वक गणानुज्ञानंदिमहोत्सवः कृतः । क्रमेण संक्त्१७१३वर्षे श्रीपरमगुरुचरण- सेवां कुर्वतः श्रीविजयप्रभसूरयः सौराष्ट्रदेशं समलंचक्रुः, तत्र- चातुर्मास--14 दशकं कृत्वा सं. १७२२ वर्षे गुर्जर समायाता सत्र चातुर्मासत्रयं कृत्वा तं- १७२६ वर्षे -श्रीउदयपुरणारे समागताः । उझ्यपुरवात्तव्यसा• जीवोजावरीयो (ए) प्रासाद कराव्योती- प्रतिष्टा करावी, बहुव्यव्ययः कृतः। ततस्तद्देशे चतुर्मासद्वयं कृत्वा श्रीमरुदेशं समलंचक्रुः। श्रीसृस्य::15 संवत् १७३२.वर्य श्रीनागोरनारे-पालणपुरवास्तव्यउकेशज्ञातियसाहीरा- भाषाहीरादेपुत्ररत्नं श्रीविजयरत्नचूरि स्वपट्टे संस्थाष्ट्र श्रीमेजानतरे- चातुर्मासकं तस्यौ चनु कमेण भञ्यजीवान् प्रतिवाध्य मेवाइमेकात्मरुदेशे विकृत्य व संवत्-१७३६ वर्षे पूर्जरदेशसंवाग्रहात् श्रीपाटणनगरे चातु-. मरिसमागताः । संप्रतिकाले अभिनवगीतमावतारा: साक्षात्कल्पतनलपाः 20 सकलपरिवारविराजनानाश्च सकलसंकल्याणमालाभ्युदयप्रदा : भवंतु.। प्राचार्यत्रीविजयरत्नसूरिसिंहानां द्विधापि स्वभ्रात: पं० श्रीविन- लविजयगणिवाचनाकृते पहावलीसारोद्धारः समुधुन उ श्रीरविवर्द्धना:- णिभिरिति नंगलं । इति श्रीपट्टावनीसंपूर्ण लिखित-श्रीपाटणनगरे श्रीपार्व- नाथप्रसाइत श्रीरतु। अथ अनुचिः ५४-श्रीविजयसेन हि ॥ ६०-राजसागरसूरिः ॥ ६१ - वृद्धिसागरसूरिः । ६२-लक्ष्मीसागरसूरिः ॥ ६३-कल्याणसागरसूरिः ।। । .. 25 [:१२ "श्रीगुरुपावली [कर्ता ] 10. श्रीमंगसीश्वराय नमः। अथाऽत्र श्रीपर्पूषणापर्वणि समागते चतुर्मास- कस्थां मुनयों मांगलिक पयू पेणकल्पनामाध्ययनं पंचदिनानि वाचयन्ति । तद्वाचनादनु च सर्वं हि कार्य मुखमध्याऽन्त्यकृत्तमंगलं सत् सुखाय भवति ततोऽत्रीपश्चिममंगलार्थ गुरुपरिपाटी 'वर्णनीया एतद्वर्णनस्योत्कृष्टतम- मंगलत्वात् । अत"एव सर्व धर्मानुष्ठांनादि :गुर्वाज्ञांसंयुक्तं मोक्षफलदं 5 | स्यादतोगुरुपर्वक्रमलक्षणसम्बन्धज्ञापनाय पट्टीवली वाचनीयैव ।। N तंत्रहितों चरमः श्रीवर्धमानों भगवान् तीर्थंकर एव गुरुपाटीमूलं॥ तस्मात्पूर्वं भगवतः स्वयंबुद्धत्वात् अन्यस्य गुरोरभावात् ॥ स च भगवान् त्रिशंढपाणि ३० गृहस्थपर्याये, 'सार्द्धद्वादशश्श्वणि छद्मस्थावस्थायां, त्रिंशत्३०वर्षाणि केवलित्वे, सर्वायुः साधिकद्वासप्तति७२वर्षाणि प्रपाल्य, सिद्धः परिनिवृत इति ॥ तत्पट्टे १ श्रीसुधास्वामी पञ्चमगणधरः प्रथमोदयस्य प्रथमाचा: र्यो बभूव । स च पंचाशत् ५० वर्षाणि गृहे त्रिंशद्वर्षाणि ३० वीरसेवायां ततः श्रीवीरनिर्वाणात् द्वादशवाणि छाझस्थ्ये अंष्टौ वर्षाणि वलित्वे सर्वायुः शतमेकं प्रपाल्य श्रीवीरात्'विंशतिवः सिद्धः ॥ तत्प? २ श्रीजंबूस्वामी। येन राजगृहे ऋपभदत्तधारिण्योः सुतेन ": संजातवैराग्यानवनवतिकोटि संयुक्ताअष्टौ कन्यकारत्यक्ताः पंचशतंचौराः प्रभवादिः अष्टौ कन्यास्तन्मातृपितरः स्वमातृपितरौं एवं पंचशतसप्तविंशति ५२७ जनसंगे दीक्षा गृहिता । पोडश१६वर्षाणि गृहे, विंशति २० वर्षाणि व्रते चतुश्चत्वारिंशत् ४४ वर्षाणि युगप्रधानभावे । सर्वायुरशीति 20 वाणि प्रपाल्य श्रीवीराच्चतुःपष्टि६४वति सिद्धः । . . 15 १६४ पट्टावली-समुच्चयः तदा मनःपर्यवज्ञानं १ परमावधिज्ञानं २ पुलाकलब्धिः३ आहारक शरीरं ४ क्षपकश्रेणिः ५ उपशमश्रेणिः ६ जिनकल्पिमार्गः परिहारविशुद्धि- चारित्र १ सूक्ष्मसम्पराय २ यथाख्यात ३ रूपसंयमत्रयं ८ केवलज्ञानं ६ मोक्षगमनं १० एते दशपदार्था अत्र भरते व्युछिन्नाः । तत्पट्टे ३ श्रीप्रभवस्खामी । स च त्रिंशद्वर्षाणि ३० गृहे चतुश्चत्वा- 5 रिंशत् ४४ वर्षाणि व्रते एकादश११वर्षाणि युगप्रधानभावे सर्वायुः पञ्चा- शीति ५ वर्षाणि प्रपाल्य श्रीवीरात ७५ पंचसप्ततिवर्षे स्वर्ययौ । (नवनंद इणांक वार) तत्पट्टे ४ श्रीशय्यंभवस्वामी। स च स्वगृहे यज्ञं कुर्वाण: पंचशत- द्विजैः "अहोकष्टमहोकष्टं तत्वं न ज्ञायते कचिदिति"साधुवचः श्रुत्वा यज्ञस्तं 10 भाधःस्थितश्रीशांतिजिनबिंबदर्शनाद् बुद्धः । अष्टाविंशतिवर्षाणि गृहे स्थि- त्वा व्रतं ललौ । एकादश११वर्षाणि व्रते त्रयोविंशतिवर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुषष्टि६२वर्षाणि प्रपाल्य श्रीवीरात्९८वतिक्रमे स्वर्ययौ । अनेन भगवता मनकनाम्नः खसुतस्य पठनाय दशवैकालिकं कृतं । तत्पट्टे ५ श्रीयशोभद्रस्वामी । स च २२ वर्षाणि गृहे १४ वर्षाणि 15 व्रते ५०वर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुः षडशीतिप६वर्षाणि प्रपाल्य श्रीवीरात १४८ वपीते स्वर्ययो। तत्पट्टे ६ श्रीसम्भूतिविजयस्वामि-श्रीभद्रबाहुस्वामिनी एतौ द्रौ पष्टपट्टधरौ बभूवतुः तत्र प्रथमः ४२वर्षाणि गृहे ४० वर्षाणि व्रते अष्टौ वर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुर्नवति ६० वर्षाणि परिपाल्य स्वयंयो। 20 भद्रबाहुस्वामी पुनः श्रीआवश्यकादिनियुक्तिकृत् । तद्भाता वराह- मिहरस्त्यक्तातो राज्ञःपुरोहितो राज्ञः पुरोनिमित्तप्रकाशाद्यैः प्राप्तप्रतिष्ठः तद्- भ्रातुःपराजयकरणे सभासमक्ष ५१ पलप्रमाणो मत्स्यः कुण्डप्रान्ते पतिष्यति गुरुर्वक्ति५२ पलप्रमाणो मत्स्यः कुण्डमध्ये पतिष्यति जिनशासनप्रभावात् गुरुवाक्यमेव सञ्जातं राजाऽपि शासनोत्सवं चकार । ततोऽसौ वराहमि-25 हिरो मानभ्रष्टो मृत्वा व्यंतरीभूतः श्रीसङ्घमुपदद्राव, तज्ज्ञात्वाच भगवंता - 5 श्रीगुरुपावली १६५ उपसर्गहरस्तोत्रकरणेन स उपद्रवो निवारितः । स भगवान् ४५ वर्षाणि गृहे सप्तदश१७वर्षाणि व्रते चतुर्दश१४वर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुः षड्- सप्तति७६वर्षाणि प्रपाल्य श्रीवीरात् १७० वर्षे स्वर्ययौ । तत्पट्टे ७ श्री स्थूलभद्रस्वामी पूर्वपाठी १० पूर्वाणि अर्थतः ४ पूर्वी- णि सूत्रतो अधीतवान् । ३० वर्षाणि गृहे २४वणि व्रते ४५ वर्षाणि युग- प्रधानत्वे सर्वायुर्नवनवतिःध्वणि प्रपाल्य श्रीवीरात् २१५वर्षे स्वर्ययौ । तत्पट्टे ८ श्रीआर्यमहागिरि-आर्यसुहस्तिनामानौ उभौ अष्टमपट्ट- धरौजातौ। तत्र प्रथमस्य त्रिंशद्वर्षाणि गृहे चत्वारिंशद्वते त्रिंशत् युगप्रधा- नत्वे सर्वायुः शतवाणि। द्वितीयेनाऽऽर्यसुहस्तिना पूर्वभवे कश्चिद्रमकः प्रात्राजितः स च 10 मृत्वा सम्प्रतिराजत्रिखंडपतिस प्रतिवुद्धः सन् सपादकोटिबिंव-सपा--- दलक्षनव्यजिनप्रसाद-३६सहस्रजीर्णोद्धार-५सहस्रपित्तलमयबिंव- ७००सप्तशतदानशालाप्रभृतिसुकृतकृत्यैः श्रीजिनशासनं प्राभावयत् । श्रीसुस्थितसूरिः त्रिंशद्वर्षाणि गृहे चतुर्विंशति२४वर्षाणि व्रते ४६३० युगप्रधानत्वे चेऽति सर्वायुः शतमेकं परिपाल्य श्रीवीरात् २६१ वर्षे 15 स्वर्ययौन तत्पट्टे ६ श्रीसुस्थितसूरि-श्रीसुप्रतिवद्धसूरीजातौ। नवमे पट्टे को- टिवारं सूरिमंत्रजापात् तदा कोटिकनाम्ना द्वितीयं नाम गच्छस्य जातं, पूर्व निग्रंथ इति नाम आसीत् । एतद्वारके बलिरसहशिष्यः स्वातिवाचकस्तत्वार्थसंग्रहग्रन्थकारी । 20 तच्छिष्यः कालकाचार्यः प्रज्ञापनासूत्रकृत् । श्रीवीरात् ३७६ वर्षे स्वर्ययौ। तत्पढ़े १० श्री इन्द्रदिन्नसूरिः अत्रांतरे वीरात्४५३वर्षे भृगुकच्छे आर्यखपटसूरिः । + टिपनकम्-अवंतीसुकुमालदीक्षामृतिस्थाने देवकुलं क्रमेण महाकालेति. नाम संजातं।
१६६ पट्टावली-समुच्चयः "वीरात् ४५३ वर्षे कालिकाचार्यः सर्वसङ्घमान्यः गईभिल्लविद्याभ- दकारी येन पंचमीतः चतुर्थी पयू पणापर्व स्थापितं । ४६७ वर्षे आर्यमंगुवृद्धवादिपाइलिप्तश्रीसिद्धसेनाद्याचार्या चभुवुः । संवत्सरकृद्विक्रमराजोपि । तद्राज्यं चैवं यदा श्रीवीरः सिद्धस्तदा तद्दिन एव पालकराजा राज्ये भिषिक्तः । तद्राज्यं ६०वर्षाणि, ततो नन्द- 5. राज्यं १५५वर्षाणि, १०८वर्षाणि ततो मोरिअराजराज्यं, ततः पुप्पमि- त्रस्य त्रिंशद्वाणि ३० राज्यं, ततो वलमित्रयो पष्टि६०वपौणि राज्य, ततः वाणि नमःसेनराज्यं, ततः १३वर्षाणि गर्दभिन्न राज्यं, ततः शकत्यं वीणि राज्यं । एवं सर्वमीलने श्रीबीरात् ४७० वर्षे विक्रमा- दित्यराज्यं । तथा श्रीसिद्धसेनदिवाकरणोजयिनीनगर्यो महाकालप्रसादे 10 लिंगरंफोर्टनं विधाय तुत्या ११ काव्ये श्रीपार्श्वविम्वं प्रगटीकृतं, कल्याण- मन्दिरस्तोत्रं कृतं । तत्प? ११ दिन्नसूरिः। तत्पट्टे १२ औसिंहगिरिसूरिः । तत्पट्ट१३ श्रीवत्रस्वामी। यो बाल्येपि जातिस्मृतिभा अधीकाद- शांगा नभोगमनविद्यया संघरक्षाकृत् दक्षिणस्यां बौधराज्ये जिनपूजार्थं 15. पुष्पानयनेन तीर्थप्रभावको देवाभिवन्दितो दंशमपूर्वविंदामऽपश्चिमो बभूव । स च वीरात्४६६वर्षान्ते विक्रमात पडविंशतिवर्षे जातः सन् अष्टौ वर्षाणि गृहे ४४वते ३६वर्षाणि, युगप्रधानत्वे सर्वायुरष्टाशीति वाणि परिपाल्य वीरात् ५८४वयाते विक्रमात् चतुर्दशाधिकशतवर्षे स्वर्ययों दंश- मपूर्व सूर्यसंहननतूर्यसंस्थानव्युच्छेदत्तदाऽजनिष्टा शाखाप्यंऽतः प्रववृते 20 तदा.५७० वर्षे जावडिकृतोद्धारः। तत्पट्टे १४ श्रीवासेनसूरिः संच. दुर्भिक्षे श्रीवनस्वान्याज्ञया सोपारके परवने गत्वां जिनदत्तगृहे ईश्वरीनाम्न्या भार्यया दुर्भिक्षभया- लक्षपाकभोज्ये विषक्षेपादिकारणे निवेदिते प्रातः सुकालो भावीत्युक्त्वा विषनिक्षेपं निवार्य नागेन्द्र १ चन्द्र २ निवृति३ विद्याधरा ४ ख्यान् चतुरः 25. सकटुवेभ्यपुत्रान् मात्राजितवान तेभ्यश्चत्वारि कुलानि जन्झिरे।
. 5 श्रीगुरुपावली. १६७ स वज्रसेनो ६ वर्षाणि गृहे ११६व्रते त्रीणि-वर्षाणि युगप्रधानत्वे सर्वायुः साष्टाविंशतिशतं प्रपाल्य वीरात् ६२० वर्षा ते स्वर्गभार बभूव । तदा ६१६ वर्षे विक्रमात १३६ वर्षे:दिगम्बरसम्प्रदायोत्पत्तिः। तत्पट्टे १५ -श्रीचंद्रसूरिस्तस्माच्चंद्रकुलं, "चन्द्रगच्छवि तृतीय गच्छनाम-संजातं क्रमादनेकगुणहतवो अनेकसूरयो बभुवुः। : तत्पट्टे १६ श्रीसामंतभद्रसूरि। अस्य देवकुलादिष्ववस्थानाल्लो- कैर्वनवासीति नाम कृतं ततो गच्छनाम तूर्य: "वनवासी तिःप्रवृत्तं। तत्पट्टे १७ श्रीवृद्धदेवसूरिः । तत्प?. १८ श्रीप्रद्योतनसूरिति । तत्प? १६ श्रीमानदेवसूरिः। अस्य सूरिप्रदे: स्कंधोपरिवाग्देवी- 'लक्ष्म्यौ चीक्ष्य, चारित्रादस्य भ्रंशो भावीति विषण्णं विषवादप्राग्न:-गुरुं: 10 विज्ञाय, भक्तकुलभिक्षाः सर्वा विकृत्यश्च येन त्यक्ताः । तत्तपसा नड्डुलपुरे 'पद्मा १ जया २ विजया३ अपराजिताख्या ४भिर्देवीभिः सेवितःगुरुं दृष्ट्वा सर्वे जनाः धर्मप्रशंसां चक्रुः। तत्प? २० मानतुङ्गसूरिः। येन वाणमयूरपंडितविद्यातिशयेनं रंजित- जनात् जैननिन्दा श्रुत्वा प्रभावनायै अष्टचत्वारिंशद्गुप्तातिगुप्ततमवरकम 15 'ध्यस्थेनाऽऽकंठशृंखलबद्धेन भक्तामरस्तवनकरणात् गतबन्धनेन वहिरागत्य- चमत्कृतो नृपः प्रतिबोधितः । नमिऊण इत्यादिस्तवेन नागराजो वशीकृतः । तत्पट्टे २१ वीरसूरिः॥ तत्पट्टे २२ जयदेवसूरिका तत्पट्ट. २३. श्रीदेवानन्दसूरिः ॥ तत्पट्टे २४ श्रीविक्रमसूरिः॥ तत्पट्टे २५ श्रीनरसिंहमूरिः॥ तत्पट्टे २६ श्रीसमुद्रसूरिः॥ तत्पट्टे २७ श्रीमानदेवसूरिः। तदा श्रीवीरात् वर्पसहस्र गते सत्य:. मित्रसूरेः पूर्वविद्याव्यवछेदोभूत् तथा विक्रमात् ५८५ वर्षे चतुश्चत्वारिंश- दुत्तरचतुर्दशशत १४४४ प्रकरणकृत् :श्रीहरिभद्रसूरिः स्वर्गतः । तत्काले. च श्रीकालिकाचार्योपि बभूव, येन ६६३ वर्षे पंचमीतश्चतुर्थी ,पानि:- तमिति.. 25 तत्पट्टे २८ श्रीविबुधप्रभसूरिः। 20 - - .१६८ पट्टावली-समुच्चयः तत्पट्टे २६ जयानन्दसूरिः देवाप्रभो०स्तोत्र कोधो(कृतं ।। तत्पट्टे ३० श्रीरविप्रभसूरि वीरात् १२७२ वर्षे अणहिलपुरपाटणस्थापना कृता, तत्पट्टे ३१ श्रीयशोदेवसूरिः। आमराजप्रबोधकश्रीवप्पभट्टसरिः विक्रमात्.८८५ वर्षे स्वर्ययौ । तत्पट्टे ३२ प्रद्युम्नसूरिः । तत्पट्टे ३३ श्रीमानदेवसूरिः लघुशान्तिकर्ता 15 तत्पट्टे ३४ विमलचन्द्रसूरिः । तत्पट्टे ३५ उद्योतनसूरिस्तेनार्बुदाचले विस्तीर्णयटवृक्षाधः श्रीस- देवसूरीणां स्वपट्टे स्थापने कृते वडगच्छ इति पंचमं नाम गणस्य जातं । तत्प ३६ सर्वदेवसूरिः । उत्तराध्यनटीकाकृता (श्रीशांतिसूरिभिः) विक्रमात्.१.०६८ वर्षे धर्मघोपसूरिः (येन) विमलमंत्रीश्वरःप्रबोधितः । धनपालःशीमनस्तुति(टीका)कर्ता श्रीवीरात् १४६६ वर्षे स्वर्ग ययौ । तत्पट्टे ३७ श्रीदेवसूरिः । तत्पट्टे ३८ सर्वजयदेवसूरिः । तत्पट्टे ३६ यशोभद्रसूरिः । नडुलाईमध्ये जिनालय लात्वा स्थितः। तत्पट्टे ४० सर्वदेवसूरिः विक्रमात् ११३६ वर्षे नवांगवृत्तिकृद् अभयदेवसूरिः स्वर्ग गतः - ततःमुनिचंद्रसूरिः एतद्वारके खगुरुभ्राता श्री- 15 10 * टिप्पनकम्:-श्रीवौंरात् + + राज्ये सं० १९३३ साल में काल पडियो । सं० + + लगे कोइ श्राचार्य हुो नहीं । फिर मुनिचंद्रसूरि हये, जिनोने सिद्धांत देखकर प्रवर्ते। x "श्रीअभयदेंग्सूरिः" चंद्रकुलावतंसाना' श्रीजिनेश्वरसूरीणां श्री- बुध्धिसागरसूरीणां शिष्यः तस्य वि० १०७२ वर्षे जन्म, वि०सं०१०१८वर्षे सूरि- पदं वि०सं.१९३५ मतांतरेण ११३६ वर्षे स्वर्गमन। तत्कृतग्रन्थाः नवांगानां वृत्तयः (सं०११२०-११२८), औपपातिकवृत्तिः, प्रज्ञापना तृतीयपट्टसंग्रहणी (गा०१३३ वृत्तिः, पंचाशकवृत्तिः (सं० १.१२४.) जिनचंद्रगणिकृतनवतत्वप्रकरणभाप्यं,(कृत्तिः) देवेंद्रसूरिकृतसत्तरीमन्यभाष्यं (पघीका), पंचनिग्रन्थीप्रकरणं, जयतिहुणस्तोत्रं, पाराधनाकुलकं इत्याद्या:-अयंसूरिः कस्य भगवतःशिष्यः तन्निश्चेतुं न शक्यते ॥ तद्यथा- - श्रीगुरुपट्टावली १६६ चन्द्रप्रभसूरिःसं० ११५६ वर्षे पूर्णिमापाक्षिकं (पूनमियागच्छं) प्ररुपित- वान् । तत्समये कूर्चपुरगच्छीयचैत्यवासिश्रीजिनेश्वरसूरिशिष्यो जिनवल्ल- भनामा चित्रकूटे पष्टकल्याणप्ररूपणया ऽविधिसङ्घ स्थापितवान् तत्सम्प्र- दायः खरतर इति व्यवहीयते विक्रमात् १२०४ वर्षे जातः । मुनिचन्द्रसूरिः अनेकग्रन्थकर्ता अभूत् निर्मलचारित्रं प्रपाल्य स्वर्गं ययौ। 5 , " १-धीस्थानांगसूत्र-वृत्तिः (श्लो० १४२५०) तच्चन्द्रकुलीनप्रवचनप्र- गीताप्रतियद्धविहारहारिचरितश्रीवर्धमानाभिधानमुनिपतिपादोपसेविनः प्रमाणादि- व्युत्पादनप्रवणप्रकरणप्रवन्धप्रणायिनः प्रबुद्धप्रतिबन्धप्रवक्सप्रवीणाऽप्रतिहतप्रवचनार्थ प्रधानवाप्रसरस्य सुविहिलमुनिजनमुख्यस्य श्रीजिनेश्वराचार्यस्य तदनुजस्य च व्याक- रणादिशास्त्रकत्तुं : श्रीबुद्धिसागराचार्यस्य चरणकमलचञ्चरीककल्पेन श्रीमदभयदेवसूरि- नाम्ना मया महावीरजिनराजसन्तानवर्तिना महाराजवंशजन्मनेव, संविनमुनिवर्ग- श्रीमदजितसिंहाचार्यान्तेवासियशोदेवगणिनामधेयसाधोरुत्तरसाधकत्येव, विद्याक्रिया- प्रधानस्य साहाय्येन समर्थितं । (सं० १९२०)। -श्रीज्ञाताधर्मकथांगवृत्तिः ॥ ०३८०० ॥ (सं०११२०) तस्याचार्य "जिनेश्वरस्य" मदवद्वादिप्रतिस्पर्धिनः । तद्धधोरपि "धुद्धिसागर" इति ख्यातस्य सूरे वि। छन्दोबन्धनिबन्धवन्धुरवचः शब्दादिसल्लक्ष्मणः । श्रीसंविनविहारिणः श्रुतनिधेश्चारित्रचुडामणेः ॥८॥ शिष्येणा"ऽभयदेवाख्य" सूरिणा विवृतिः कृता । ज्ञाताधर्मकथाङ्गस्य श्रुतभक्या समासतः ॥६॥ ३-श्रीऔपपातिकवृत्तिः । (श्लो० ३१२५) सं० ११२० चन्द्रकुलविपुलभूतलयुगप्रवरवर्धमानकल्पतरोः । कुसुमोपमस्य सूरेः गुणसौरभभरितभवनस्य ॥१॥ निस्सम्बन्धविहारस्य सर्वदा श्रीजिनेश्वराहत्य । शिष्येणाभयदेवाल्यसूरितोयं कृता वृत्तिः ॥२॥ २२ .
पट्टावली-समुच्चयः
तत्प? ४१ अजितदेवसूरिः एतद्गुरुभ्रात्रा श्रीवादिदेवसूरिणा अ-
णहिल्लपत्तने जयसिंहदेवस्य राजसभायां चतुरशीतिवादे लब्धयशा दिग-
म्बराचार्यः कुमुदचन्द्रो वादे निर्जित्य पत्तने अद्यापि दिगम्बरप्रवेशो निवारि-
तः। विक्रमात १२०४ वर्षे फलवर्धिग्रामे बिंबप्रतिष्ठा कृता।८०००० सहस्र
प्रमाणस्याद्वादरत्नाकरनामा तर्कग्रन्थः कृतः, एतेषां विक्रमात् १२२६ ।
श्रावणसिते स्वर्गः । तथैतत्समये श्रीदेवचन्द्रसूरिशिष्यस्त्रिकोटिग्रंथकर्ता
हेमचन्द्रसूरिज॑ज्ञे ऽस्य विक्रमतः११४५वर्षे कार्तिक१५दिने जन्म,
सं० १२२६ वर्षे स्वर्ग, तथा येन सं० १२१४ हेमनाममालाकृता, कुमार-
पालराजा प्रतिबोधितः पूर्णतलगच्छं स्थापितं । तस्याग्रे मुखवस्त्रिका श्राद्धस्य
न योग्येति कृत्वांचलेन वंदनकदानादांचलिकगच्छस्थितिः प्रादुर्भूता । तथा 10
विक्रमात् १२३६ सार्द्धपौर्णिमीयकोत्पत्तिः सं० १२५० आगमिकसम्भवः ।
श्रीवीरात् १६६२ बर्षे बाहडोद्धारः।
तत्पट्टे ४२ विजयसिंहसूरिः
तत्पट्टे ४३ सोमप्रभसूरिः श्रीमणिरत्नसूरिः द्वौ पदधरौ। अस्यवारके
वस्तुपालतेजपालयोः१२६२जन्म (येन) सिद्वाचलयात्रा कृता, अर्बुदाचले 15
चैत्यालयं कारापितं १८ कोडिरजतलग्नेन, अद्यापि तीर्थप्रवृतिरस्ति ।
तत्पट्टे ४४ " जगञ्चन्द्रसूरिः" स्वयं वैराग्यरससागरः जावज्जीवं
आचाम्लतपोभिग्रहात् द्वादशवर्षे नाहडराणैः तपाविरुदमाप्तवान् ततः पाठ-
नाम"तपागच्छेगति प्रसिद्धं जातं सं० १२८५1x
वत्पट्टे ४५ श्रीदेवेंद्रसूरिः कर्मग्रन्थश्राद्धदिनकृत्यवृत्त्यादिग्रन्थकृत् 20
एतत्तीर्थात् विजयचन्द्रसूवृद्धशालायां द्वावशवर्षाणि यावदेकत्रस्थितात्
"वृद्धशालिकनाम्ना"सम्प्रदायोऽभूत्श्रीदेवेंद्रसूरिभिः प्रह्लादनपुरेसं०१३२३
श्रीविद्यानन्दसूरयः स्वपदे निवेशिताः श्रीगुरवो विक्रमात् १३२७ स्वर्ययुः
* पद्मावतीवचनतो ऽभ्युदयं विभाव्य । यत्सूरये स्तवनसप्तशती स्वकीयाम् ॥
सूरिर्जिनप्रभ उपप्रददे प्रथायै । सो ऽयं सता"तपगणो"न कथं प्रशस्यः ॥१॥
श्रीगुरुपट्टावली १७१ दैवयोगात् विद्यानन्दसूरयोपि त्रयोदशदिनांतरिताः स्वर्ययुः। ततः षड्भि- मासैः सगोत्रिणा श्रीधर्मकोयुपाध्यायानां "श्रीधर्मघोपसूरि" रिति नाम्ना सूरिपदं दत्तं । तत्पट्टे ४६श्रीधर्मघोपसूरिः। अनेन भगवता एकदा कश्चित् क्षुल्लक- प्रबाजितःस गुटिकाप्रयोगेण योगिभि पितः कफोणिकामदर्शयत् तदा यो- 5 गिभिरपि क्षुल्लकमापनार्थं दंता दर्शिताः साधुभिस्तैमन्त्रप्रयोगेण निराकृत- स्तदा तैरुपाश्रये मूपका विकुर्विता गुरुभिर्घटमुखं वस्त्रेण छाद्य तथा जप्तं यथा राटिं विकुर्वन् वृद्धयोगी आगत्य पादयोर्लग्नः इत्यादयो भूयांसो व्यतिकरास्तत्कृतग्रन्थाश्च सदाचाराधास्तेचविक्रमात १३५७ दिवं गताः । तत्पट्टे ४७ सोमप्रभसूरिः । विक्रमात्१३७३वर्षे अस्य स्वर्गः। अन्यत्र कापि पुरे यात्रावतीर्णं देवतयोक्तं "यत्तपाचार्यः सौधर्मेंद्र- सामानिकत्वेन समुत्पन्न" इति । तत्पट्टे ४८ सोमतिलकसूरिः। तस्य विक्रमात् १४२४ वर्षे स्वर्गः। सर्वायुरेकोनसप्तति ६६ वर्षाणि । 10 + देवेन्द्रसूरिणा करालकलिकालपातालतलावमजद्विशुद्धधर्मधुरोद्धरणधुरीण- श्रीमजगचन्द्रसूरिचरणसरसोरुहचंचरीककल्पेन लिखितमक्षरविन्यासीकृतं । क्रमाप्राप्त"तपाचायें"त्यभिख्या भिचुनायकाः । समभूवन कुले चान्द्रे श्रीजगचन्द्रसूरयः ॥४॥ जगजनितवोधानां तेषां शुद्धचरित्रिणाम् । विनेयाः समजायन्त "श्रीमद्देवेन्द्रसूरयः ॥२॥ स्वान्ययोरुपकाराय श्रीमद्देवेन्द्रसूरिणा । खोपज्ञशतकटीका सुबोधेयं विनिर्ममे ॥६॥ वियुधवर "धर्मकीर्ति"श्री"विद्यानन्द सूरिमुख्यबुधैः । वारसमयैककुशलैस्त देव संशोधिता चेयम् ॥७॥ इति खोपज्ञकर्मग्रन्थमशस्तौ।
१७२ पट्टावली-समुच्चयः तत्पट्टे ४६ देवसुन्दरसूरिरतेपां शिप्या:-श्रीज्ञानसागरसूरि: "श्री कुलमण्डनसूरिः" प्रमुखा विद्वांसः क्रियापरायणा विविधग्रंथकृतो बभूवुः । तत्पट्टे ५० सोमसुन्दरसूरिःप्राग्वंशी राणपुरप्रतिष्ठाकृत् पालणपुरे भगिन्या सह संयमं जग्राह । तत्पट्टे ५१ मुनिसुन्दरसूरिः कृष्णसरस्वतीविरुदभृत, संविग्नमौलि-5 रध्यात्मकल्पद्रुम-सन्तिकरादिग्रंथकृत् । विक्रमात् १५०३ वर्षे स्वर्ययौ। तत्पट्टे ५२ श्रीरत्नशेखरसूरिः अस्य १४५७ वर्षे जन्म १४६३ व्रतं १४८३ पंडितपदं १४६३ वाचकपदं १५०३ सूरिपदं सं० १५१७ पोस- वदि, ६ दिनेस्वर्ययौ । एतत्कृता ग्रन्थाश्च श्राद्धविध्यादयस्तदा लुम्पका- ख्यलेखकात् विक्रमतः १५०८ वर्षे लुक्कामतं प्रवृत्तं, तन्मतवेषधरास्तु 10 १५३३ वर्षे जाताः। तत्पट्टे ५३ लक्ष्मीसागरसूरिः । तस्य विक्रमात १४६० (६४) वर्षे जन्म १४७० दीक्षा, १४६६ पंडितपदं, १५०१ वाचकपदं, १५०८ बाचा- र्यपदं, सं० १५१७ गच्छनायकपदं । तत्पट्टे ५४ सुमतिसाधुसूरिः। 15 तत्पट्ट ५५ हेमविमलसूरिः । यो भगवान् क्रियाशिथिलसमुदायोपि स्वयं संविग्नः क्रियोद्धारकरणे ऋषिहानाश्रीपतिऋपिगणपत्याद्या लुका- मतं त्यक्त्वा श्रीगुरोःपार्वे प्रवृज्य तन्निश्रां यावज्जीवं प्रपेदिरे। तत्समये विक्रमात् १५६२ वर्षे कटुकमतं, १३७० वर्षे लुकामतानिर्गत्य बीजाख्येन ऋखेन बीजामतमुत्पेदे ततः विक्रमात् १५७२ वर्षे नागपुरीयत- 20 पागणान्निर्गतपार्श्वचन्द्रोपाध्यायेन सं० १५७५ पार्श्वचन्द्रमतमुद्भावितं । तत्प? ५६ श्रीपाणंदविमलसूरि । सुविहिताग्रणीः कुमततमोदिन- करस्तस्य विक्रमात् १५४७ वर्षे इलादुर्गे जन्म। १५५२ व्रतं १५७० सूरिपदं येन स्वामिना दुष्कालप्रभावजन्यविविधकुपथमुह्यमानजनान् विलोक्य तदुद्धारनिर्धारितमतिना गुर्वाज्ञया विक्रमात १५८२ वर्षे क्रियोद्धारकरणेन 26 व्युच्छिन्न तीर्थं प्रभावितं तदद्यापि संवेगमतं ।
श्रीगुरुपट्टावली १७३ भूरयः संति सूरयो गच्छे गच्छे च गर्विताः । आणंदविमलादन्यो धन्यो नास्ति महीतसे ॥१॥ + इति स्तुतिः मालवीऋषिकृता। श्रीगुरोरादेशात् संविग्नो यावज्जीवं षष्ठतपोभिग्रही श्रीविद्यासागरोपाध्यायो, मेवातमरुदेशप्रमुखदेशेषु विहृत्य बोधिबीजमुप्तवान् क्रियोद्धारादनु चर्तुदशवर्षाणि षष्ठचतुर्थाभ्यां विशंति- स्थानकाद्यनेकविकृष्टतपः गुरुवश्चक्रुः, प्रांते नवभिरुपवासैः, अहमदा- वादे समाधिना मृत्वा १५६६ वर्षे स्वर्ययौ । तत्पट्ट ५७ श्रीविजयदानसूरिः। विविधमहोत्सवजिनप्रतिष्ठाकृत् सि- द्धांतपारगामी वायुवदऽनेकदेशाऽप्रतिबद्धविहारी तपस्वी यावज्जीवविकृति. पंचकत्यागी बभूव । तत्समये शत्रुजययात्रासंघाः सोत्सवा भूयांसो जज्ञिरे 10 शत्रुजये चतुर्मुखादिप्रासादाश्च । सं० १५८७ वर्षे कर्मासाहेन १६तम + श्रीआनन्दविमलसूरिभिः वि०सं०१५८२ क्रियोद्धारश्चक्रे ॥ विशति- स्थानकस्य ४००चौथभक्ताः ४०.पष्ठभक्ताः विहरमानस्य २०पटाः श्रीवर्धमा- नस्य २२६ षष्ठाः अन्येपि पठाः ज्ञानावरणीयज्ञयार्थ द्वादशमा विघ्नहयार्थ स्वादशमा दर्शनावरणीयक्षयार्थं १ दशमा मोहक्षयाय २८ अष्टमा वेदनीयायुर्गोत्र- क्षयार्थ ८ दशमाष्टमाः तपांसि कृतानि ॥ इति श्रीविजयलक्ष्मीसूरिविरचितायां तपा- गच्छपहावल्यां ॥ एपा पट्टावली द्वितीयभागे मुद्रयिष्यते ॥ तथा तच्छिव्यो विजयदानसूरिः क्रियोद्धारसहायकृत् । तस्य शिष्यः, पूर्व खरतरगच्छः पश्चात्तपोगच्छाचरणः, देवगिरौ श्रीहीरविजयसूरीणांसहाध्यायी, गिर्वा- णभापाजल्पदक्षः, तिव्रयुद्धिः, प्रखरवादी, चतुर्विधवादनिष्णातः, श्रीजंबूद्वीपप्रज्ञप्ति- वृत्ति (वि०सं०१६३६)-कल्पकीरणावली (श्लो० ४८१४) (वि०सं०१६२८ दीपावल्यां राजधन्यपुरे)-कुमतिकुद्दालः-प्रवचनपरीक्षा-तपागच्छपट्टावलीसूत्र- तवृत्ति-नयचक्र-ईरियापथिकापट्त्रिंशिकावृत्ति (श्लो० ८००)-औष्ट्रिकम- तोत्सूत्रदीपिका (वि०सं०१६१७)-पर्युपणाशतकप्रकरण-तवृति-गुरुतत्वदी- पिका (श्लो० १०००)-प्रमुखग्रंथानां प्रणेता, उ० श्रीधर्मसागरः ।
१७४ पट्टावली-समुच्चयः उद्धारः कृतः । तस्य च विक्रमात् १५५३ वर्षे जामलास्थाने जन्म । १५६२ व्रतं, १५८२ (८७) सूरिपदं, (सच) १६२२ वर्षे स्वर्यों। तत्पट्टे ५८ श्रीहीरविजयसूरिः । तस्य विक्रमात् १५८३वर्षे मार्ग- सुदि ६ जन्म, पितुर्नाम कंवरजी, मातुर्नाम नाथीवाई, वृद्धउकेशज्ञातिः षी मसरागोत्रं सं०१५६६ दीक्षा,सं०१६०७ पंडित पदं, १६०८ वरकाणपायें, 5 वाचकपदं, सं० १६१० सीरोहीनगरे सूरिपदं, श्रीआगरानगरे श्री चिंताम- णिपार्श्वस्य १६४० प्रतिष्ठा कृता । तथा लुपकमते ऋ०मेघजीनाम्ना स्वमतं परित्यज्य पंचविंशतिमुनिगु(ग)णेन समं श्रीसूरिपार्श्वे दीक्षा गृहीता । येपा- मुदपद्देशामृतरसमाऽऽकन्ठं निपीय राजाधिराजपातस्याहश्रीमदकब्बरसमाट् स्वकीये अनेकदेशसमुदायात्मकद्वादशसूबास्थाने पाएमासिकामारिप्रव- 10 तैनं, जेजीयाख्यकरमोचनं च चक्रे । तद्वयतिकरस्तु जगतः प्रतीतः, साम- स्त्येन वक्तु वाक्पतिरप्यशक्तः । तस्य च विक्रमात् १६५२ वर्षे भाद्र- पदशुक्लैकादश्यां सौराष्ट्रे उन्नतपुरे सर्वातिचारालोचनपूर्वमनशनेन स्वर्गः । तत्तीर्थं तु जलधिवेलानिलान्दोलस्पताकं स्तूपरूपं संसारार्णवतरणे यानपात्रतां स्वस्य ख्यापयज्जयति । 15 तत्पट्टे ५६ विजयसेनसूरिः । येन भगवता महाराजाधिराजपात- स्याहअकबरसभायां पंचशतभटैः सह वादं विधाय जयश्रियाः पाणिग्रह- श्चक्रे "कालीसरस्वती"विरुदं लेभे । वैदुष्यममुष्य पुनर्वाचस्पतेरप्यतिशायि। तच्चिस्तु नमोदुर्वाररागादीति योगशास्त्रसूत्राद्यपद्यस्यार्थसप्तशती श्री- गुरुभिर्विदधे, सुक्तावल्याद्यनेकशो ग्रंथाश्च । विस्तारार्थं विजयप्रशस्ति- 20 रालोक्या। तेषां नारदपुर्या विक्रमात् १६०६(४) वर्षे जन्म, १६१७(१३) दीक्षा, १६२८ सूरिपदं १६७२(७१) वर्षे श्रीस्तंभतीर्थे स्वर्गः। तत्पट्टे ६० श्रीविजयदेवसूरिः । मानुष्येपि देवमूर्तिरेव यावजी- पं पुनः पुनः च विकृतित्यागी संप्रति वर्तमाने तपसा पष्ठाष्टमचतुर्थादि- भिरावीन (2) धन्यर्परप्यतिशायी । श्रीवीर इव दुर्गोपसर्गेप्यक्षुब्धधैर्यः 25 गच्छांतरीयविरोधे क्रियमाणेपि सजातवैराग्यशांतरसो संविनमौलिमा- श्रीगुरुपट्टावली १७५ णिक्य, विक्रमात १६३४ वर्षे जन्म, १६४१ (४३) दीक्षा, १६५६ (५५) वैशाखे सूरिपदं १६७३(७१) गच्छनायकपदं । अस्य श्रीभगवतस्तपस्तेजो- भिरंजितेन महाराजाधिराजपातस्याहश्रीजहांगीरसम्राजा"महातपा"इतिनाम चक्रे । तथा श्रीगुरूपदेशसुधाऽधिकरसास्वादलुब्धेन राणाश्रीजगतसिंह- जीनाम्ना उदयसागरपीछोलाख्ये महासरोद्वये जीवहिंसा निषिद्धा। तथा- 5 स्मिन्विजयिनि श्रीजिनशासनश्रियाः प्रभावनालंकारा भूयांसो वभुवुः भगवता स्वविहारेणानेकदेशाः पवित्रीकृताः ।। तत्प? ६१ श्रीविजयसिंहसूरयोपि नागद्युगप्रधानोपमाना आसन् । तेषां विक्रमात् १६४४ मेदनीपुरे साहनाथु-भार्यानायकदेगृहे जन्म १६५४ दीक्षा१६५५पंडितपदं १६७५ (७३) वाचकपदं १६८१ (८२) आचार्यपदं 10 यद्वचनचातुर्यमाधुर्यरञ्जितोराणाजगतसिंह श्राध्ध इव जिनधर्मानुरक्त श्रा- सीत्, १७०८ वर्षे स्वर्गं गतः२८वर्षाणि आचार्यपदं प्रपाल्य दक्षिणदेशे विजयदेवसूरीणां मुखांभोजादुपदेशं प्राप्य मृतः । (श्रीविजयदेवसूरिरपि) विक्रमात् १७१३ आषाढशुक्ल११देवश- १६८६ यननाम्ना प्रतीतायां उन्नतपुरे वगं गतः । तत्पट्टे ६२ श्रीविजयप्रभसूरिः (तस्य) १६७७ माघसुदि ११ जन्म, दीक्षा, १७१३ भट्टारकपदं, स चायं भगवानाचन्द्रार्क विजयतां । यस्मिन्नद्भुदिते तपागणश्रीर्युवतीव पीवरानगारागारिपयोधराभ्यां अचीयमानांगोपांगव्याख्यानविपयिनी विवुधजनानानन्दयति । इति । इति गुरुपट्टावली समाप्ता 15 20 १७६ पट्टावली-समुच्चयः अनुपूर्तिः १ - (प्रथम लेखकेनैव संयोजिता) तत्पट्टे ६३ श्रीविजयरत्नसूरिःx पिता हीरानन्द माता हीरादे पालणपुरे जन्म सं० १७२२ दीक्षा, सं० १७३२ प्राचार्यपदं, सं० १७५० सूरिपदं, सर्वायुः ६३वर्षाणि प्रपाल्य, सं० १७७३ भाद्रवावदिर उदेयपुरे स्वर्ग गतः। 5 तत्प? ६४ श्रीविजयक्षमासूरिः। माताभिधानेन चतुरांदे. पिता चतु- रासाह, तद्गृहे जन्म पालीमध्ये, सं० १७३८ दीक्षा, १७७३ सूरिपदं, सर्वा- युर्वर्षाणि ५८ प्रपाल्य,सं०१७६५वर्षे चैत्रशुदि ५ मांगलोरमध्ये स्वर्गगतः । तत्पट्टे ६५ विजयदयासूरिः । तत्पट्टे ६६ श्रीविजयधर्मसूरिः । अनुपूर्तिः २-(द्वितियलेखकेन पूरिता) तत्पट्टे ६७ श्रीजैनेन्द्रसूरिः । तत्पट्टे ६८ श्रीदेवेन्द्रसूरिः । अनुपूर्तिः ३- तत्प? ६६ श्रीधरणेन्द्रसूरिः । तत्प? ७० विजयराजेन्द्रसूरिः । तत्प? ७१ विजयमुनिचन्द्रसूरिः । तत्प? ७२ विजयकल्याणचन्द्रसूरिः । 10 • . ४ श्रीरत्नसिंहसूरिशिष्यशिवविजयेन गीरनारतीर्थमाला रचितास्ति । सं. १७१२ में गुजराती लुंकाशिवजीग्राचार्यना शिष्य गुरुथी कदाग्रह फरी निकलीने दुढिमांहि रहा तपस्या करवांसु लोकां मांन्या, स्वमत "दुढिया" नामें 'थाप्यो । थापनानिक्षेपो निषेधवाथी महानिंदक, श्रापथापी गुरूयाज्ञालोपक गो- शालामती जाणवा लाहोरमध्ये।
[१३] + उपकेशनच्छीया पडावलि [ कर्ता ] ॥ श्रीमत्पार्श्वजिनेंद्राय नमः ।। श्रीमत्केशीकुमारगणधरेभ्यो नमः ।। श्रीमद्रलप्रभसूरिसद्गुरुभ्यो नमः ।। अोकेशशब्दस्यार्थाः लिख्यते ।। इशिक् ऐश्वर्ये, ओकेयु गृहेषु इष्टे पूज्यमाना सती या सा ओकेशा सत्यिका नाम्नी गोत्रदेवता । अत्र ओक शद्वो अकारांतः तस्यां भवस्तस्या अयमिति वा ओकेशः । भवे इत्यण प्रत्ययः तस्येदमित्यनेन वा अणप्र- 5 त्ययः । सत्यिका देवी हि नवरात्रादिपु पर्वसु अस्मिन् गणे पूज्यते सा चास्य गणस्य अधिष्ठात्री अतएवास्य गच्छस्य ओकेश इति यथार्थ नाम प्रोद्यते सद्भिरिति प्रथमोऽर्थः ॥ १॥ ईशनमीश ऐश्वर्यं ओकैर्महर्द्धिकथा- द्धप्रमुखलोकानां गृहैरीशो यस्यां सा ओकेशा ओसिका नयरी । तत्र भव प्रोफेशः । ओसिकानगों हि अस्य गणस्य ओकेश इति नाम श्रीरत्नप्र- 10 भसूरीश्वरतो विख्यातं जातमिति द्वितीयोऽर्थः ।। २ ।। अः कृष्णः उः शं- करः को ब्रह्मा । एपा द्वंद्वसमासे ओकान्ते ईशते पूज्यमानाः संतो देवत्वे मन्यमानाः संतश्च येभ्यस्ते ओकेशाः ॥ ओके कृष्णशंभुब्रह्मभिर्देवैरीशते येते वा ओके शाः। परशासनजनाः क्षत्रियराज्यपुत्रादयः प्रतिबोधविधाना- त्तेपामयं ओकेशः । तस्येदमित्यणप्रत्ययः । श्रीरत्नप्रभसूरिभिस्तेषां पारती- 15 र्थिकधर्मनिष्ठातः सिद्धान्तोक्तविशुद्धजैनधर्मनिष्ठायांप्रतिबोधदानेन प्रवर्तना कृता । तथा च श्रूयते पूर्वं हि श्रीरत्नप्रभसूरीणां गुरवः श्रीपार्धापत्यीयके- + इयं पट्टावली अर्थान्तरसंभावनामिया किंचिदपि स्वाभिष्टं परिवर्तनं वि- नैव मुनिश्रीजिनविजयजीसंपादिस "जैनसाहित्यसंशोधकस्य" प्रथमे भागे मुद्रिता "मक्षिका स्थाने मक्षिका” इति न्यायेन यथास्थितैव-अशुद्धप्राया एवात्र मुदिना । २३ . १७८ पट्टावली-समुच्चयः शीकुमारानगारसंतानयित्वेन विख्यातिमंतो जगति जज्ञिरे । ततः प्राप्तसू- रिमंत्राः ससत्तंत्रा रमणीयाऽतिशयनिचयाः स्वकीयनिस्तुपशेमुखीप्राग्भार- संभारात् ज्ञातत्रिदशसूरयः श्रीमच्छीरत्नप्रभसूरयः कियति गते काले वि- हरंतः संतः श्रीओसिकानगों समवस्मृताः । तस्यां च सर्वे लोकाः पार- तीर्थिकधर्माधारिणो संति । न कोपि जैनधम्मर्धारी। ततः साध्वाचारं 5 प्रतिपालयद्भिः सिद्धान्तोक्ततीर्थंकरधर्मशुभकर्मप्ररूपणां कुर्वद्भिः सद्भिः श्रीरत्नप्रभसूरिभिः पारतीर्थकानेकच्छेकविवेकिलोकाः प्रतिबोधितास्तत . एते अोकेशा इति विरूदो विख्यातो जातः । इति तृतीयो अर्थः ॥ ३ ॥ अः कृष्णः, आः ब्रह्मा, उः शंकरः, एषां द्वद्वे आवस्ततः ओभिः कृष्णव- हाशंकरैर्देवैः कायते स्तूयते देवाधिदेवत्वादिति श्रोकः प्रस्तावात् श्रीवर्ध- 10 मानस्वामी कचिदिति ड प्रत्ययः, ओकश्चासौ ईशश्च ओकेशस्तस्यायं अोकेशः, वर्तमानतीर्थाधिपतिश्रीवर्धमानजिनपतितीर्थाश्रयणादिति चतु- र्थोऽर्थः ॥४॥ अः अर्हन, अः स्यादर्हति सिद्धे चेत्युक्तेः । प्रस्तावादिह अ इति शब्देन श्रीवर्धमानस्वामी प्रोच्यते। ततः अस्य ओको गृहं चैत्यमिति यावत्, 15 ओकः श्रीवर्धमानखामिचैत्यमित्यर्थः । तस्मादीशः ऐश्वर्यं यस्य स ओकेशः यतोयं गणःश्रीमहावीरतीर्थंकरसानिध्यतःस्फातिमवापेति पंचमोऽर्थः ॥शा एवमस्य पदस्यानेकेप्पाः संबोभुवति परं किं बहुश्रमेणेति ॥ अथ उपकेशशब्दस्य कियंतोऽर्था लिख्यतेः उप समीपे केशाः शिरोरूहाः सत्यस्येति उपकेशः । श्रीपार्थापत्यीयकेशिकुमारानगारः। एत- 20 दुत्पत्तिवृत्तांतस्तुः श्रीस्थानांगवृत्त्यादौ सप्रपंचः प्रतीत एवास्ति । तत एवा- वगंतव्यः । ततः उपकेशः श्रीकेशिकुमारानगारः पूर्वजो गुरुर्विद्यते यस्मिन् गणे स उपकेशः । अभ्रादित्वाद प्रत्ययः।' अस्मिन् गछे हि श्री केशिकुमा- रानगारः प्राचीनो गुरुरासीत् । ततो यथार्थमुपकेश इति नाम जातमिति प्रथमोऽर्थः ॥ १।। उपवर्जितास्त्यक्ताः केशा यत्रं सः उपकेशः श्रोसिका- 25 ' नगरी तस्यां हि सत्यिका देव्याश्चैत्यमस्ति । तदर्गे च धनैर्जनैः प्रथमजाव- - - 4 उपकेशगच्छीया पट्टावलिः १७६ बालकानां सुदिने दिने मुंडन कार्यते तत उपकेश इति यथार्थ नाम ओ- सिकानगर्याः प्रख्यातं जातं । तत्र भवो यो गच्छः स उपकेशः प्रोद्यते सद्भिर्विद्वद्भिः । अत्र हि भवे इत्यनेन सूत्रेण अणि प्रत्यये संज्ञापूर्वकस्य विधेरनित्यत्वावृद्धेरभावः । श्रीरत्नप्रभसूरितो अनेकश्रावकप्रतिबोधवि- धानानंतरं लोके गच्छस्य उपकेशेति नाम प्रसिद्धं जातमिति द्वितीयोऽर्थः 5 ॥२॥ को ब्रह्मा, अः कृष्णः, श्रः शंकरः, ततो द्वद्वे काः। तैरीष्टे ऐश्वर्य- मनुभवति यः सः केशकानां ईशः ऐश्वर्यं यस्माद्वा केशः पारतीर्थिकधर्मः सः उपवजितस्त्यक्तो यस्मात्स उपकेशस्तीर्थकूटुक्तविशुद्धधर्मः स वि- द्यते यस्मिन् गच्छे स उपकेशः । अत्रापि अभ्रादित्वादप्रत्ययः । इति तृती- थोऽर्थः ॥ ३ ॥ कं च सुखं ई च लक्ष्मीः कयौ ते ईशे खायत्ते यत्र यस्मा- 10 द्वा स केशः अर्थात् जैनो धर्मः। स उपसमीपे अधिको वाऽस्माद्गच्छा- स उपकेशः इति चतुर्थोऽर्थः॥४॥ कश्च अश्च ईशश्च केशाः-ब्रह्म- विष्णुमहेशाः । तद्धर्मनिराकरणात्ते उपहता येन सः उपकेशः । प्रकरणा- दत्र श्रीरत्नप्रभसूरिः गुरुः तस्यायं उपकेशः । अत्रापि तस्येदमित्यणि प्र- त्यये पूर्ववढू द्धेः अभावो न दोपपोपायेति पंचमोऽर्थः ॥ ५॥ 15 इत्थमन्येऽप्यनेके अर्था ग्रन्थानुसारेण विधीयते परमलं बहुश्रमे- णेति । एवमुक्तव्यक्युक्तिव्यक्तिशक्त्या ओकेशोपलक्षणे उभे अपि नाम्नी. यथार्थे घटां प्राचतः। इति ओकेशोपकेशपदद्वयदशार्थी समाप्ता ।। संवत १६५५ वर्षे ।। श्रीमद्विक्रमनगरे सकलवादिवृंदकंदकुद्दाल- 20 श्रीकक्कुदाचार्यसंतानीयश्रीमछ्रीसिद्धसूरीणां आग्रहतः श्रीमबृहत्खरतर- गच्छीयवाचनाचार्यश्रीज्ञानविमलगणिशिष्यपंडितश्रीवल्लभगणिविरचिता. चेयम् । श्रीरस्तु॥ ग्रीष्महेमंतिकान मासान् , अष्टौ भिन्नुः प्रचक्रमे। रक्षार्थं सर्वजंतूना वर्षास्वैकत्र संवसेत् ॥ १ ॥ मनुष्याणां सर्वेषु पदार्थेषु सारो धर्म एव । मनुष्यत्वं धर्मेणैव वर्यते ।। स धम्मो वर्षास मुनिपार्थात् श्रोतव्यः । यतयो वर्षास्वेकत्र 25 . १८० : पट्टावली-समुच्चयः तिष्ठन्ति, किमर्थं ? सर्वजंतूनां रक्षार्थ । धर्मस्य सारं सर्वं जीवेषु दया। वर्षासु पृथ्वी जीवाकुला भवति संयमो विराध्यते । अतो जीवरक्षार्थं च- तुर्मासकल्पं तिष्ठति । शिवशासने पि जीवदयास्वरूपमेवं व्यावर्णितं- पश्यन् परिहरन् जंतून मार्जन्या मृदुसूक्ष्मया । 5 एकाहविचरेद्यस्तु चन्द्रायणफलं भवेत् ॥ १ ॥ महाभारते कृष्णद्वीपायनेनाप्युक्तं- यो दद्यात्कांचनं मेरुः कृत्स्नां चापि वसुंधरां। एकस्य जीवितं दद्यात् न च तुल्य युधिष्ठिरः ॥ २ ॥ परेप्येवं वदन्ति जैनवाक्यस्य किं वाच्यं । मुनयः क्षेत्रस्य त्रयोदश 10 गुणान् वीक्ष्य तिष्ठन्ति चखिल १पाण २ थंडिल ३ वसहि ४ गोरस ५ जणा ६ उले ७ विज्जे ८ ओसह ६ धन्ना १० हिवइ १० पासंडा ११ भिखु १२ सिज्झाय ॥ १३॥ एते त्रयोदश गुणाः । तत्र स्थिता दशधा समाचारी पालयंति- इच्छा १ मिच्छा २ तहकारो ३ श्रावस्सिया ४ निसीहिया ५ 15 आपुच्छणाय ६ पडिपुच्छ ७ छन्दणा य ८ निमंतणा यह उपसंपयाकाले १० समाचारी भवे दसहा ॥१॥ पुनः धर्मशास्त्राण्युपदिशन्ति । श्राद्धा वासनावासितचित्ताः शृण्वंति ॥ परं चातुर्मासकात्पश्चाशदिने व्यतिक्रांते कल्पावसरं । वीसहि दिणेही कप्पो पञ्चगहाणीय कप्पठवणायं । 20 नव (8) सय तेणू (६३) एहिं वुच्छिन्ना संघाणाए ॥ १॥ अधुना कल्पावसरे अन्यग्रन्थादरो न । यथा दिव्यकौस्तुभाभरणं प्राप्य अन्यरत्नाभरणेषु निरादरत्वं जायते । यथा च कुंडपातालामृतं प्राप्यां- बुजलास्वादो न रोचते । भारतीभूपणकविजनवचनरचनामासाद्य सामा- न्यजनवचांसि न रोचते। चक्रवर्तिन अग्रे सामान्यराजानोऽपसरन्ते देवानां 25 तन्दीश्रवणेनान्यशब्दा हीनतां व्रति । गन्धहस्तिनो गंधे अन्यगजेन्द्रा मद- 4. .
उपकेशगच्छीया पट्टावलि १८१ जलविकला भवन्ति । केवलज्ञानांगमने अन्य ज्ञाना अपसरन्ति । कल्पवृ- क्षाग्रेऽन्ये तरवाः न राजते । सूर्योदये खद्योतस्य का प्रभाः। मुक्तिसौख्याने कानि सौख्यानि । सिंहध्वनेः पुरो यथा अन्ये शब्दा न राजते तथा कल्पा- वसरे अन्यानि शास्त्राणि आदरो न । स कल्पो अनेकविधः श्रीशनुंजय- कल्पः गिरनारगिरिकल्पः कदम्बगिरिकल्पः अर्बुदाचलकल्पः अष्टापदकल्पः 5 सम्मेतगिरिकल्पः हस्तिनापुरकल्पः मथुरानगरीकल्पः सत्यपुरकल्पः शंखे- सरकल्पः स्तंभनतीर्थकल्पः यतीनां विहारकल्पः वस्त्रस्य कल्पसंज्ञा । अनेन प्रकारेणानेके कल्पसंज्ञाः एके कल्पाः एवं विधा वर्त्तते,यस्य प्रमाणेन श्रीपादलिप्ताचार्यों यावदायाति साधवो विहृत्य तावत् पंचतीर्थनमस्कार विधायागच्छति । एके कल्पास्ते उच्यते येपांप्रमाणेन अशीकरणं आका- 10 शगमनं स्वर्णसिद्धिः लक्ष्मीप्राप्तिः मित्रपुत्रबांधवस्वजनप्राप्तिः प्रभृतिलब्धयः संपद्यते । परमयं कल्पो ऽमेयमहिमानिधिः इह लोकाभीष्टसौख्यकारणं । अयं कल्लो दशाश्रुतस्कन्धस्याष्टममध्ययनं । नवमपूर्वात् श्रीभद्रबाहुस्वामि- नोद्धृतः अमेयमहिमानिधानः सर्व पापक्षयं करः! यथा श्रूयमानः द्रुमेषु कल्पद्रुः सर्वकामफलप्रदः, यथौषधीपु पीयूपं सर्वरोगहरं, परं रत्नेषु गुरुडोद्गारं यथा, सर्वविपापहारः मंत्राधिराजो 15 मंत्रेषु यथा सर्वार्थसाधकः, यथा पर्वसु दीपाली सर्वात्मासुखावहा, तथा कल्पः सद्धर्म शास्त्रेषु सर्वपापहरः। तथा सर्वसिद्धान्तमध्ये श्रीकल्पो गुरु- तरः, यथा पर्वतानां मध्ये मेरुः तीर्थमाहिं शत्रुञ्जयः दानमध्ये अभयदान अक्षरमध्ये ॐकार देवेविन्द्रः ज्योतिषीपु चंद्र गजेन्द्रष्वैरावण समुद्रेषु खयंभुरमणः तुरङ्गमेयु रेवत ऋतुपु वसन्त मृतिकायां तूरी सुगंधीषु कस्तुरी 20 धातु पीतं मोहनेपु गीतं काप्टेषु चन्दनं इंद्रियेषु नेत्रं व्यवहारपर्वसु दीपा- लिका धर्मशास्त्रेषु कल्पः सर्वपापहारः सर्वदुखक्षयंकरः। यथा जनमेजयराजा अष्टादशपर्वश्रवणात् १८ विप्रहत्यात्यागः यवनिका श्यामत्वं जातं । यथा एकस्मिन् दिवसे जनमेजयराजाने पुरोहि- तेन कथितं पूर्वे त्रेतायुगे पांडवैश्च कौरवैः कृता अष्टादशाक्षौहिणिमृताः 25 १८२ पट्टापली-समुच्चयः महाभारतो जातः । राजा प्रोक्तं को नाभवत् यत्तेपां निवारयति पुरोहितेन कथितं त्वां न निवारयामि । यतः अद्य दिवसात् पष्टे मासे त्वं आखेटके न गन्तव्यं, यदा गमिष्यति तदा सूकरमृगं तेषां खेटके अश्वो न क्षेपणीयं यदा अस्खो क्षेपयति तदा सगर्भा मृगी तस्यां बाणं न मोचनीयं, यदा मुश्च- ति तदा तस्या उदरं मध्ये पुत्रिका भविष्यति सा न गृहीतव्या, यदा प्राह- 6 यति तदा तस्या पाणिग्रहणं न करणीयं, यदा प्राणिग्रहणं करोति तदा तस्या पट्टराज्ञीपदं न दातव्यं, तस्या कथितं न मान्यं । इत्यादि भविष्यति वचनानि मया तव कथिताः स्युः परं त्वं न तिष्ठसि । अथ पट् मासाः द्वित्रिदिवसोना गता तदा मालाकारणागत्य राज्ञः कथितं भो राजन तव वनो सूकरैः भग्नः । राज्ञा अश्वं सज्जीकृत्य तेषां पृष्ठे गत । ते पूर्वोक्तानि 10 वचनानि सर्वे कृता गढवालस्य पुत्रिका दत्ता एषा त्वं पालय तेन पालिता परं स्वरूपा । अन्यदा राज्ञा दृष्टा सा परिणीता पूर्ववचनानि सर्वे विस्मृताः राज्ञा पट्टराज्ञी कृता । अन्यदा राज्ञा यज्ञो मण्डितः अष्टादशपुराणवेत्तारः अष्टादशब्राह्मणा आकारिताः यज्ञं यजमानं कश्चिदूतेन देशान्तरादागतेन नृपोः आहूतः राझा विप्राणां कथितं अहं उत्तिष्ठामि तैः कथितं, नहि 15 यज्ञस्य विधातो भवति । परं तव शरीरसमाना पट्टराज्ञी अस्ति, राजा उत्थितः ततः कटके किंच च्छात्रस्य रहस्यो आगतः ते ब्राह्मणाः हसिताः, राज्ञी ज्ञातं एते मम हसिता क्रुद्धा राज्ञः कथितं एते विनष्टा मां हसति ततः यदि एते मारयिष्यति तदा तव मम संबंधः । राज्ञा ते मारिता अष्टाद- शधा कुष्टा जातं । ततः पूर्वपुरोहितेन कथितं वरं त्वया न कृतं राज्ञा 20 कथितं अधुना कथय किं करोमि तेन कथितं अष्टादश पुराणानि निसन्दे- हानि शृणु । ते चामि-आदि पर्व १ सभा पर्व २ विराट् पर्व ३ आर- एयक पर्व ४ उद्यान पर्व ५ भीष्म पर्व ६ द्रोण पर्व ७ कर्ण पर्व शल्य पर्व सौतिक पर्व १० गर्भपाल पर्व ११ शान्ति पर्व १२ शासन पर्व १३ श्रासुमास्य पर्व १४ मेपक पर्व १५ मूशल पर्व १६ यज्ञ पर्व 25 १७ स्वर्गारोहण पर्व ॥ १८॥ एभिरष्टादशविप्रहत्याक्षयकृतायवनिकाश्या- मत्वं जाताः।
१ उपकेशगच्छीया पट्टावलिः १५३ तथा अयमपि अधुना ये मुनयः उपवासत्रयेण वाचयन्ति चतुर्वि- धसंघो अष्टमेन शृणोति तदा तस्मिन्नेव भवे मोक्षः । यदि द्रव्यक्षेत्रकाल- सद्भावा भवन्ति । न चेत्तदा तृतीयभवे पंचमे भवे सप्तमे भवे अवश्यं मोक्षः । पूर्वमुनयः पाक्षिकसूत्रवत्ऊद्धर्वस्थाः कथयन्ति चतुर्विध संघ ऊद्ध- सन्नेव श्रणोति परं श्रीवीरनिर्वाणत् ६६३ वर्षे गते आनन्दपुरे ध्रुवसेन- 5 राज्ञः सभायां पुत्रशोकापनोदाय देवर्द्धिमुनिना सभासमक्षं वाचितः श्रावकाः तांबूलदानादिप्रभावना कृता । तद्दिनादाभ्य सा रीतिः। परं त्वस्य कालस्य वाचनैवोच्यते न तु व्याख्या। पूर्वे ये पादलिप्ताचार्य-सिद्धसेनदिवाकर- प्रभृतयोअभूवन तैरपि वाचनैवोक्ता अन्येषां का वार्ता । यतः सिद्धान्तेइत्यु- क्तमस्ति सव्वनईणं जइहु वालुआ इत्यादि। एवंविधस्य कल्पस्य यदहं वाच- 10 नामनोरथं करोनि स बाहुभ्यां समुद्रतरणमभिलषामि। यथा कुन्ज उच्चफलं लातुमिच्छति तथाऽहं यदिच्छामि वाचनां, कर्तुं तत् संघस्य सांनिध्यं पुनः गुरूणां प्रासादः । यद्वर्षाकाले मयूरो नृत्यं करोति तज्जलधरगर्जितप्रमाण दृशद्पश्चन्द्र कांतमणिर्यदमृतं खूते तच्चंद्रस्य प्रमाणं । सूर्यसारथी रविः श्रा- रूण:पंगोपि यदाकाशमुल्लंघयति तत्सूर्यस्य प्रमाणं । पुत्तालिका नृत्यं करोति 15 तद्रिंदजालिकस्य प्रमाणं । तथाऽहं मंदबुद्धिः मूर्खशिरोमणिः प्रमाणे सप्र- माणता नास्ति, लक्षणे संल्लक्षणता न, अलंकारस्याऽलंकरणं नहि, सा- हित्ये साहित्यं नास्ति, छंदसि सुछंदता न, एवंविधो पि वाचनाय साहसं करोमि तत् सद्गुरूणां प्रसादः । पुरातनैर्व्याख्या कृता । ममापि युक्तिः । कथं 20 जं देवो सायरो लहरिगज्जंतनीरपडिपुनो। ता किं गामतलाओ जलभरिओ लहरिगा देऊ ॥१॥ जइ भरह भावछंदे नच्चइ नवरंग चंगमा तरुणी। ता किं गाम गहिल्ली तालिछंदेन नच्चेइ॥२॥ जइ दुद्धधवलखीरी तडफडइ विविभगेहि । ता कुकसकणसहिया वडिया मा तडव्वडह ।।३।। 25 ते २८४ पट्टीवली-संमुधयः अहं यद्व मि तद्गुरूणां प्रसादः ! टोलो रोलो रुलंतो अहियं विन्नाण नाण परिहीणो। दिव्वुवं वंदणिज्जो विहिओ गुरुसुत्तहारेण ॥ ४ ॥ गुरवः श्री पार्श्वनाथसंतानीयाः। १ श्रीपार्श्वनाथशिष्यः प्रथभोगणधरः श्रीशुभदत्तः ।२ तत्प? श्रीहरिदत्तः।। ३ तत्प? श्रीआर्यसमुद्रः । ४ तत्पट्टे श्रीकेशीगणधरः तेन परदेशीनृपः प्रतिवोधितः । राजप्रश्नीयउपांगे प्रसिद्धः। ५ तत्पट्टे श्रीस्वयंप्रभसूरिः । (स्वयंप्रभसूरिशिष्य बुद्धकीर्तिसुं बौ- धमत नीकल्यो, आचारांग टीकासु जाणनो) अन्यदा स्वयंप्रभसूरि देशनां ददतां उपरि रत्नचूडविद्याधरो नन्दीस्वरे गच्छन् तत्र विमानः स्तंभितः। 10 तेन चिंतितः मदीयो विमानः केन स्तभितः । यावत् पश्यति तावदधोगुरु देशनाददंतं पश्यति । स चिंतयते मयाऽविनयः कृतः यतः जंगमतीर्थस्य उल्लंघनं कृतं । स आगतः गुरु वंदति धर्मं श्रुत्वा प्रतिवुद्धः । स गुरु विज्ञपयति मम परंपरागता श्रीपार्श्वजिनस्य प्रतिमास्ति तस्या वंदने मम नियमोऽस्ति सा रावणलंकेश्वरस्य चैत्यालये अभवत् । यावत् रामेण 15 लंका विध्वंसिता तावद् मदीयपूर्वजेन चंद्रचूडनरनाथेन वैताठ्ये आनीता । सा प्रतिमा मम पार्वेस्ति । तया सह अहं चारित्र ग्रहीष्यामि । गुरुणा लामं ज्ञात्वा तस्मै दीक्षा दत्ता । क्रमेण द्वादशांगी चर्तुदश पूर्वी बभूव गुरुणा स्वपदे स्थापितः । श्रीमद्वीरजिनेश्वरात् द्विपंचाशतवर्षे (५२) आ- चार्य पदे स्थापितः पंचशतसाधुभिसह धरां विचरति । श्रीलक्ष्मीमहास्थानं 20 तस्याभिधानं १ पूर्व नाम गुजरातिमध्ये कृतयुगे रयणमाला २ त्रेतायुगे रयणमाला ३ द्वापरे श्रीवीरनयरी ४ कलियुगे भीनमाल ५ तत्र श्रीराजा- भीमसेन तत्पुत्रश्रीपुंज तत्पुत्र उत्पलकुमार अपरनाम श्रीकुमार तस्य वां- धव श्रीसुरसुन्दर युवराज्य राज्यभार धुरंधर । तयोरमात्य चांद्रवंशीय द्वौ माता तत्र निवासी.सा० ऊहड १ उद्धरण २ लघु भाता गृहे सुवर्ण 25 संख्या आष्टादश कोख्यः संति । वृद्धभातुर्ग हे ६६ नवनवति लक्षा संति ।
है उपकेशगच्छीया पट्टावलिः १८५ ये कोटीश्वरास्ते दुर्गमध्ये वसन्ति ये लक्षेश्वरास्ते वाद्ये वसंति । तत उहडेन एकलक्ष भातुः पार्श्वे उच्छीर्णं याचितं । ततो बांधवेन एवं कथितं भवतें विना नगरं उध्वसमस्ति, भवतां समागमे वासो भविष्यति । एवं ज्ञात्वा राजकुमार ऊहडेन आलोचितवान् नूतनं नगरं बसेयं ततो मम वचनं अनायातः । ढीलीपुरे राजा श्री साधु तस्य ऊहडेन ५५ 5 तुरगमा भेटिकृता उवएसा संतुष्टो ददौ । ततो भीनमालात् अष्टादश १८ सहसा कुटुंम्ब अगात् । द्वादश योजना नगरीजाताः। तत्र श्रीमद्रत्नप्रभ- सुरीपंचसयासीप्य समेत लुणद्रही समायाति । मासकल्प अरण्ये स्थिता। गोचर्या मुनीश्वरा ब्रजति परं भिक्षा न लभते । लोका मिथ्यात्व वासिताः याहशा गता ताशा आगता मुनीश्वराः । पात्राणि प्रतिलेख्य मासं यावत् 10 संतोपेण स्थिताः परचात् विहारः कृतः । पुनःकदाचित् तत्रायातः । शासन- देव्या कथितं भो आचार्य अत्रचतुर्मासकं कुरु। तव महालाभो भविष्यति । गुरुः पंचत्रिंशत् मुनिभिः सह स्थितः । मासी द्विमासी तृमासी चतुर्मासी उप्पोसित कारिका । अथ मंत्रीश्वर ऊहड सुतं भुजंगेन दष्टः । अनेक मंत्रवादिनः आहूताः परं न कोपि समर्थस्तैः कथितं अयं मृतः दाघो 15 दीयतां । तस्य स्त्री काष्टभक्षणे स्मशाने पायाता । श्रष्टस्य महान् दुःखो जातः । वादिवान् अाकर्य लघुशिष्यः तत्रागतः । झपाणो दृष्ट्वा एवं कथा- पयति भो ! जीवितं कथं ज्वालयत तैः श्रेष्टिने कथितं एपः मुनीश्वरः एवं कथयति । श्रेष्टिना झपाणो वालितः क्षुल्लकः प्ररष्टः गुरुः पृष्ठे स्थितः । मृतकामानीय गुरु अग्रे मुञ्चति श्रेष्टि गुरुचरणे शिरं निवेश्य एवं कथयति 20 भो दयालु मम देवो रुष्टः मम ग्रहो शून्यो भवति । तेन कारणेन मम पुत्र- भिक्षां देहि । गुरुणा प्रासु जलमानीय चरणौ प्रक्षाल्य तस्य छंटितं । सह- सात्कारेण सज्जो बभूव हर्प वादिनाणि बभूव । लोकैः कथितं श्रेष्टि सुतः नूतन जन्मो आगतः । श्रेष्टिना गुरूणां अने अनेकमणि मुक्ताफल सुवर्ण वनादि आनीय भगवान् गृह्मतां । गुरुणा कथितं मम न कार्य परं भवद्भिः 25 जिन धर्मो गृह्यतां । सपाद लक्ष श्रावकानां प्रति बोधि कारक ! पूर्व श्रेष्ठि- २४ १८६ 'पट्टावली-समुच्चयः ना नारायण प्रासादं कारयितुमारब्धं । स दिवसे करोति रात्रौ पतति सर्वे दर्शनिनः पृष्टा न कोपि उपायो कथितं तेच रत्नप्रभाचार्यों प्रष्टः-भगवान् मम प्रासादो रात्रौ पतति । गुरुणा प्रोक्तं कस्य नामेन कारयतः । नारायण नामेन । एवं नहि महावीर नामेन कुरु मंगलं भविष्यति । प्रासादस्यविघ्नं न भविष्यति श्रेष्टिना तथैव प्रतिपन्नं । अथ शासनदेव्या गुरूणां कथितं 5 हे भगवन् अस्य प्रासाद योग्यं मया देव गृहात् उत्तरस्यां दिशी लूणद्रहा- मिधानं डुङ्गरिकायां श्री महावीर विंबं कारयितुमारब्धं । तत्र तेन श्रेष्टिना गोपाल वचनात् गोदुग्ध सावकारणं ज्ञात्वा सर्वेपि दर्शनिनः पृष्टाः तैः पृथक् पृथक् भापया अन्यदन्यदुक्तं । ततः श्रेष्टिना स आचार्योऽभिवंद्य पृष्टः ततः शासन देव्या वाक्यात् प्राचार्यों ज्ञात्वा एवं कथयति तत्र त्वत्मा-10 साद योग्य विबो भविष्यति परं पट् मासैः सार्द्ध सप्त दिनः निष्कासनीयं। श्रेष्टि उच्छुक संजातः । किंचिदूनर्दिनैः निष्कासितः निंबु फल प्रमाण हृद- यस्य ग्रन्थी द्वरा सहितं । आचार्यैः प्रोक्तं अचापि किंचित् असंपूर्ण विवं विलंबख श्रेष्टिना प्रोक्तं गुरुणां कर प्रासादात संपूर्ण भविष्यति । तेनावसरे कोरंटकस्य श्राद्धानां आव्हानं आगतं । भगवन् प्रतिष्ठार्थमागच्छ । गुरुणा 15 कथितं मुहूर्त वेलायां आगच्छामि । सप्तत्या ७० वत्सराणां चरम-जिनपतेर्मुक्तजातस्य वर्षे पञ्चम्यां शुक्लपक्षे सुरगुरुदिवसे ब्रह्मणः सन्मूहुत्तें। रत्नाचार्यैः सकलगुणयुतैः सर्वसंघानुज्ञातैः श्रीमद्वीरस्य विवे भवशतमथने निर्मितेयं प्रतिष्ठाः ॥१॥ उपकेशे च कोरंटे तुल्यं श्री वीरबिंवयोः प्रतिष्ठा निर्मिता शक्त्या श्रीरत्नप्रभसूरिभिः ॥२॥ निजरूपेण उपकेसे प्रतिष्टा कृता वैक्रिय रूपेण कोरंटके प्रतिष्टा कृता श्राद्ध द्रव्यव्ययः कृतः । ततस्तेन श्रेष्ठिना श्रीऔपकेश पुरस्थ श्रीम- 'वी. बिंब पूजा आरात्रिका मात्रकरण देव वंदनादिविधिः श्रीरत्नप्रभाचा 25 । तदनंतरं मिथ्यात्वाभावात् श्वावकत्वं केपांचित् श्रेष्टिसम्व- . 20 उपकेशगच्छीया पट्टावलिः १८७ न्धिनां सञ्जातं । ततः प्राचार्येण ते सम्यक्त्वधारी कृता । एकदा प्रोक्तं भो यूयं श्राद्धा तेषां देवीनां निर्दयचित्ताया महिप बोत्कटादि जीववधास्थि भंगशब्द श्रवण कुतुहलप्रियया अविरतायाः रक्तांकितभूमितले आईचमबद्धवंदनमाले निष्ठरजनसेवितं धर्मध्यानविद्यापके महाबीभ- त्सरोद्रे श्री सच्चिकादेवि गृहे गंतुन बुध्यते । इति आचार्यवचः श्रुत्वा ते 5 प्रोचुः प्रमोयुक्तमेतत् परं रौद्रा देवी यदि छलिस्याम तदा सा कुटुम्बान् मारयति । पुनराचार्यैः प्रोक्तं अहं रक्षा करिस्यामि । इत्याचार्यवाक्यं श्रुत्वा ते देवो गृहे गमनात् स्थिताः । आचार्याणां प्रत्यक्षीभूय देव्या सकोपमि- त्युक्तं आचार्य मम सेवकान् मम देवगृहे आगच्छमानान् निवारणय त्वं न भविष्यति । इत्युक्त्वा गता देवी परं सातिशय कालभावात् महाप्रभा- 10. वात् अनेकसुरकृतप्रातिहार्ये आचार्य देवी न प्रभवति । एकदा छलं लब्ध्वा देव्या आचार्यस्य कालवेलायां किंचित् स्वाध्यायादि रहितस्य वामनेत्रभूर- धिष्टिता । वेदाना जाता । आचार्यैः यावत् सावधानीभूय पीडायाः कारणं चिंतितं तावत् देवी प्रत्यक्षीभूय इत्ति प्रोक्तं मया पीडा कृता । अहं स्वश- क्त्या त्वां स्फेटयिष्यामि इति सावष्टंभं आचार्योक्तं श्रुत्वा समयाकूतं सा 15 विनयं प्रोक्तं भवाहशानां ऋपीणां विग्रहं विवादो न युक्तः । यदि त्वं कड- डमडडं ददासि तदाहं वेदनां अपहरामि । आचन्द्रार्क त्वकिंकरी भवामि इति श्रुत्वा आचार्यैः प्रोक्तं कडडमडडं दापयिष्यामि । यत्युक्ता गता देवी । प्रभाते श्रावकानामाकार्य तैः पक्कान्न खनकादि सुंडकद्वयं करिकुंकुमादि- भोगश्च आनीय श्रीसञ्चिकादेवी देवगृहे श्रीरत्नप्रभाचार्यः श्रावकैः सार्धं 20. मतः । ततः श्रावकैः पार्थात् पूजां कराप्य वामदक्षिणहस्ताभ्यां पक्कान्नसुंड- कादि चूर्णयद्भिः प्राचार्यैः प्रोक्तं देवी कडडमडडं दत्तमस्तिः । अतः परं ममोपासिका त्वं इति वचनानन्तरं एव-समीपस्थ कुमारिका शरीरे आवेशः कृतः । ततः प्रोक्तं प्रभो मया अन्यंकडडमडडं याचितं अन्यं दचं। आचायः प्रोकं त्वया वधो याचितः स तु लातु दातुन वुध्यते इत्यादिसिद्धान्तवाक्यं 25, कुमारी शरीरस्था श्रीसच्चिकादेवी सर्वलोक प्रत्यक्ष श्रीरत्नप्रभाचार्यैः प्रतिवो. धिता। श्रीउपकेशपुरस्था श्रीमहावीरभक्ता कृता सम्यक्त्वधारिणी संजाता!
. श्वन पट्टावली-समुच्चयः आतां मांसं कुमुममपि रक्तं नेच्छिति । कुमारिका शरीरे अवतीर्णा सती, इति वक्ति भो मम सेवका यत्र उपकेशपुरस्यं स्वयंभू महावीरविंद पूजयनि श्रीरत्नप्रभाचार्य उपसेवति भगवन शिष्यं प्रशिप्यं वा संवति तन्याहं नोपं गच्छामि । तस्य दुरितं दलयामि यल पूजा चित्ते धारयामि एतानि शरीरे अवतीर्णा साकुमारी कथ्यतां । श्रीसचिकादेव्या वचनान् क्रमेण श्रुत्वा 5 प्रचुरा जनाः श्रावकत्वं प्रतिपन्नाः। क्रमेण श्रीरत्नप्रभाचार्य ४ वर्षे स्वगं गतः। तत्स? यक्षदेवाचार्यःमाणभद्रयक्ष प्रतिबोध का संघस्य विनी निवारितः। ६ तत्प? कसूरि । १० तत्प? देवगुमसूरि । ११ तत्पट्टे सिद्धसूरि 110 १२ तत्पढ़े रत्नप्रभसूरि । १३ तत्पदै यज्ञदेवसूरि । १४ तत्सट्टे ककसूरि । स्वयंभू श्रीमहावीरन्नात्र विधि काले, कोसी विविः कदा किमर्थं संजातः इत्युच्यन्ते-तम्मिन्नेव देव गृहे अष्टान्हिका- दिकमहोत्सवं कुर्वतास्तेषां मध्ये अपरिणतवयसा केपांचिन् चित्ते इयं दुर्बुद्धिः संजाताः । यदुत भगवन् महावीरस हदये ग्रन्थी द्वयं पूजां कुर्वतां कुशोभा 15 करोति अतः मशकरोगवन् छेदयितां को दोषः । वृद्धः कथितं अचं अब टितः टंकिना बानो म अर्हः । विशेषतो अन्मिन वयन्भू श्रीमहावीर विवे। वृद्धवाक्यमवगण्य ग्रच्छन्नं लूत्रधारन्य द्रव्यं दत्वा प्रन्यिद्वयं छदितं तन- क्षणादेव सूत्रधारो मृतः । प्रन्धिच्छेदप्रदेशे तु रक्त धारा छुटिता । तत उपद्रवो जातः । तदा उपकेशगच्छाधिपति श्रीककसूरिभिः पायन्दिः चतुर्वि-20 घसंवनाहूना वृत्तानं कथितं । प्राचार्यः चतुर्विधसंघ सहितन उपचान त्रयं कृतं । तृतीय उपवास प्रान्त रात्रिसनये शासनदेवी प्रत्यही भूव प्राचार्या- च प्रोतं हे प्रभो न युक्तं कृतं बालश्रावक मद्घटितं विवं आशातितं । कलानीशकृतं अतोनंतरं उपकेशनगरं शनैः २ उपभ्रंशं भविष्यति । गच्छे विरोधी भविष्यति । श्रावकाणां कलही भविष्यति । गोष्टिका नगरात् 25 दिशादिशं याम्यति। प्राचार्यः प्रोक्तं परमेश्वरि भवितव्यं भवल्यैव परं उपकेशगच्छीया पट्टावलिः १६ त्वं श्रवतुरुधिरं निवारय । देव्या प्रोक्तं घृत घटेन दधि घंटेन इतुरस घटेन दुग्ध घटेन जल घटेन कृतोपवासत्रय यदा भविष्यति तदा अष्टा- दशा गोत्र मेलं कुरु तेमी १ तातहड गोत्रं । २ वापरणा गोत्रं । ३ कर्णाट गोत्रं । ४ वल गोत्रं । ५ मोराक्ष गोत्रं। ६ कुलहट गोत्रं । ७ विरिहट गोत्रं । ८ श्रीमाल गोत्रं । । श्रेष्ठि गोत्रं । एते दक्षिण बाहु । १ सुचती 5 गोत्रं । २ आइचणा गोत्रं । ३ चारवेडीया गोत्रं । ४ भाद्र गोत्रं । ५ चींचट गोत्रं (देशलहरासाखा) ६ कुंभट गोत्रं । ७ कनउजया गोत्रं । ८ डिंडभ गोत्रं । ६ लघु श्रेष्ठि गोत्रं । एते वाम बाहु स्नात्रं कर्तव्यं नान्यथाऽशिवो शान्तिर्भविष्यति । मूलप्रतिष्ठानंतरं वीरं प्रतिष्ठा दिवसातीते शतत्रये ३०३ अ नेहसि ग्रंथियुगस्य वीरोरस्थस्य भेदोऽजनि दैव योगात् इत्युक्तं श्रीमदुप- 10 केशगच्छचरित्र सूत्रे श्लोक-१७२ । १५तत्पट्टे श्रीदेवगुप्तसूरि । १६ तत्पट्टे सिद्धसूरि। १७ तत्पट्टे रत्नप्रभसूरि । १८ एवं अनुक्रमेण श्रीवीरात् वर्षे ५८५ श्रीयक्षदेवसूरिर्वभूव महाप्रभावकर्ता द्वादशवर्षे दुर्भिक्षमध्ये वन्न स्वामी शिष्य वनसेनस्य गुरोः परलोकप्राप्ते यक्षदेवसूरिणा चत्वारि शाखाः स्थापिताः- 15 १६ तत्पट्टे कक्कसूरि । २० तत्पटे देवगुप्तसूरि । २१ तत्पट्टे सिद्धसूरि । २२ तत्पट्टे रत्नप्रभसरि।२३ तत्पट्टे यक्षदेवसूरि । २४ तत्पट्टे ककसूरि । २५ तत्पट्टे देवगुप्तसूरि।२६ तत्पट्टे सिद्धसूरि । २७ तत्पट्टे रत्नप्रभसूरि । २८ तत्पट्टे यक्षदेवसूरि । २६ तत्पट्टे ककसूरि। ३० तत्पट्टे देवगुप्तसूरि ३१ तत्पट्टे सिद्धसूरि । ३२ तत्पढ़े रत्नप्रभसूरि । ३३ तत्पट्टे यक्षदेवसूरि।20 ३४ तत्पटें ककुदाचार्य । तत्पढ़ें देवगुप्ताचार्य । तत्पट्टे सिद्धा- चार्य । एतानि पंच उपकेशगच्छाधिपाचार्याणां मूलनामानि । तत्पट्टे क- क्षसूरि द्वादश वर्पयावत् पष्ट तपं आचाम्लसहितं कृतवान् । तस्यस्मरण- स्तोत्रेण मरोटकोटे सोमकवेष्टिस्य शृंखला त्रुटिता । तेन चिंतितं यस्य गुरोः नामस्मरणेन बंधनरहितो जातः एकवारं तस्य पादौ वंदामि । स 25 भरुकच्छे आगतः । अटणवेलायां सर्वे मुनीश्वरा अटनार्थं गतास्ति । संच- . ११० पट्टावली-समुच्चयः का गुरो अग्रे स्थितास्ति । द्वारो दत्तोस्ति तेन विकल्पं कृतं । शच्यका शिक्षा दत्ता मुखे रुधिरो वमति । मुनीश्वरा आगता। वृद्धगणेशेन नातं भगवन् द्वारे सोमकष्टि पतितोस्ति । प्राचार्यःज्ञातं अयं सचिकाकृतं । सच्चिका पाहूता कथितं त्वया किं कृतं । भगवन् मया योग्यं कृतं 1रे पापिष्ट यस्य गुरुनामग्रहणे बंधनानि शृंखलानि त्रुटितानि संति स अरणा- 5. चारे रतो न भविष्यति । परं एतेन आत्मकृतं लब्धं । गुरुणा प्रोक्तं कोपं त्वज शांतिं कुरु । तया कथितं यदि असी शान्तिर्भविष्यति तदा अस्माकं आंगमनं न भविष्यति प्रत्यक्षं गुरुणाचिंतितं भवितव्यं भवत्येव स सन्नी- कृतः । संचिकावचनात् द्वयोर्नाम भंडारे कृताः श्रीरत्नप्रभसूरि अपरंश्री यक्षदेवसूरि एते सप्रभावा एतदनेहसि अस्य उपकेशगणस्यं द्वाविंशति 10 शाखा नामानि दत्तानि- १ नागेन्द्र २ चन्द्र ३ निवृत्ति ४ विद्याधराणां स्थाने १ सुंदर २ प्रभ ३ कनक ४ मेरु ५सार ६ चंद्र ७ सागर ८ हंस तिलक १० कलस ११ रत्ने १२ समुद्र १३ कल्लोल १४ रंग १५ शेखर १६ विशाल १७ राज १८ कुमार १६ देव २० अानंद २१ श्रादित्य २२ कुंभ इति । ततः तेनैव कक-15 सूरिणा अबूंदाचलमेखलायां तृपातस्य संघस्य डंड स्थापनने जलं प्रगटि कृतं । तेनैव साधर्मिक वात्सल्ये जेसलपुरात् भरुकच्छे घृतो आनीतः । ३५ तत्प? श्रीदेवगुप्तसूरि । तत्सदमहोत्सवे पाठकाः पंच स्थापिता जयतिलकादि । तेन जयतिलकन श्रीशान्तिनाथचरित्रं निर्मितं । ३६ तत्पट्टे सिद्धं सूरि । ३७ तत्प? कक सूर । ३८ तत्प? देवंगुप्तसूरि 20 ३६ तत्पट्टे सिद्धसूरि । ४० तपट्टे कक्क सूरि। ४१ तत्पट्टे देव- गुप्तसूरि । सं० १६५ वर्षे ४२ क्षत्रीयवंशोत्पन्नत्वात् वीणावादने तत्परं क्रियाविपयं सिथिलः। ततः चतुर्विधसंघेन तत्पट्टे वीस विस्त्रोपकारकः स्थापितः श्रीसिद्धसूरिः। ४३ वत्पट्टे ककसूरिः पंचप्रमाणपन्थकर्ता। ४४ तत्पट्टे संवत् 25 १०७२ वर्षे श्रीदेवगुप्तसूरि। वभूव।
१९ उपकेशगच्छीया पट्टावलिः ४५ तत्पट्टे नवपद् प्रकरण-स्वोपज्ञटीकाकर्ता सिद्धसूरि । ४६ तत्पट्टे कफ सूरि । ४७ तत्पट्टे देवगुप्तसूरि। ४८ तत्पट्टे सिद्धसूरि। ४९ तत्पट्टे ककसूरि ५० तत्प? संवत् ११०८ वर्षे देवगुप्त सूरिघुभूव । भीनमाल नगरे साह भईसाक्षेन पद महोत्सवे सप्तलक्ष धन व्ययो कृतः । ततोः गुरुणा 5 पादप्रक्षाल्येन जले विपापहार लब्धी येन भइसाक्ष श्रेष्ठिना श्रीदेवगुप्त सूरे पद महोत्सवः कृतः । स पूर्व डिंडुवारण पूरे भइला भार्या छगणाणि स्था- प्यते ततो गुरूपदेशेन ज्वालितानि छगणानि रुप्यमयानि भवन्ति ततो तेन रुप्येन गदहिया मुद्रा पातिता। भइसाक्ष माता श्री शत्रुजय यात्रागता खरच तुट्यते पत्तन मध्ये ईश्वरश्रेष्ठिनः पार्श्वे खरचो याचिता । तेन पृष्टं 10 भवती कस्य माता तेन कथितं अहं भइसाक्ष माता । तेन हसितं अस्माकं गृहे पानीयमानयंति तेपां माता इति वितर्कितं । ततोऽनंतरं पश्चात् धनं गृहीत्वा यात्रां कृत्वा संघभक्ति कृत्वा गृहे जगाम । पुत्रेण प्रष्ट मातः मम कियद्भूमौ नामं वर्तते । माता कथितं भवतां प्रतोली द्वारं यावन्नाममस्ति । तेन वचनेन असन्तोपो जातः । श्रेष्टि हास्यवचनं कथितं । तद्वचनं वाल- 15 यिस्यामि तदा द्वितीय वेला भोजयिष्यामि । एवं प्रतिज्ञां कृत्वा पत्तने सामान्यवेपे द्वार हट्टे गतः । मोश्चेष्टि रूप्यं ग्रहिष्यसि । तेन कथितं रोप- भरेण यत्किंचिदानयिष्यसि तत्सर्वे गृह्णामि । संचकारो याचितः युष्मा- भिर्दीयते सवालक्ष मुद्रिका दत्ता । ततो गर्दभयानि भारयत्वा पत्तने जगाम: पृष्टं एतस्विं रुप्यं वर्तते एवं श्रुत्वा श्रेष्टिनः चमत्कृताः स श्रेष्टि समग्र पत्तन 20 श्रेष्टि मेलयित्वा चरणे पपात ! भइसाक्षस्तदेव कथितं गुजरधरीत्रीमध्ये महिपेण पानीयमानयेतु तदा मोचयामि। तद्धनं देशे सप्तक्षेत्रे व्ययो कृतः। ततो गादिया इवि शाखा जाता। ५१ तत्प? श्री सिद्धसूरि । ५२ तत्प? श्री ककसूरि संवत् ११५४ वर्षे बभूव । येन हेममूरि कुमारपाल वचसा कृपाहीना मुनिवरा निष्का-25 सिता।
१६२ पट्टावली-समुञ्चयः ५३.तत्पट्ट देवगुणसूरि येन लक्षद्रव्यं त्यजितं । ५४ तत्प? श्रीसिद्धसूरि । ५५ तत्पट्टे संवत् १२५२ श्रीककारिखंभूव येन मरोट कोटः प्रगटी कृतं । ५६ तत्पढ़े श्रीदेवगुप्तसूरि । ५७ नत्प? श्रीसिद्धसूरि । ५८ तत्पट्ट श्रीककसूरि । ६० तत्पट्टे श्रीसिद्धसूरि । ६१ तत्पट्टे श्रीककसूरि । ५६ नत्पढ़े 5 श्रीदेवगुमसूरि । ६२ तत्पट्टे श्रीदेवगुप्तसूरि । ६३ तत्पड़े श्रीसिद्धसूरि । ६४ तत्पट्टे श्रीककमूरि । ६५ तत्पट्टे श्रीदेवगुप्तसूरि । ६६ तत्पट्टे संवत् १३३० वर्षे चीचट गोत्रेऽतएव उवरराय स्थिा- पितः श्री अर्बुदाचल तलहटीकालंकारो वरणीनगरतः शा० देशलेन श्री श@जयादि सप्त तीर्थपु चउदश १४ कोटिं द्रव्यं व्ययेन च उदश यात्रा कृता 10 चतुर्दश बारानं । प्रथम देवगुप्रसूरि तपट्टे सिद्धसूरि प्रमुख समग्र सुविहित सूरि हस्तेन संघपति तिलकः कारितं । उक्तंच श्रीदेशलः सुकृत पेसल वित्त कोटी। चंचञ्चतुर्दश जगजनितावदातः शत्रुजय प्रमुख विश्रुत सप्त तीर्थः । यात्रा चतुर्दश चकार महामहेन॥२॥ तत्पुत्र समरसहजाभ्यां. विमलवसत्युद्धारः कारितः संवत् १३७१ 15 व । तथा एवमपरेरपि तिर्थयात्रा कृत्वा संघपते पदं स्वीकीरितं इत्युक्त- मुपदेशरसाले । साह देशलेन पाल्हणपुरे श्री सिद्धसूरि पदमहोत्सवा कृतः तेन सिद्धसृरिण समराग्रहेण श→जये पष्ठोद्धारे श्रीआदिनाथस्य प्रतिष्टा कृता ६७ तत्पट्टे संवत् १३७१ वर्ष साह सहजागरेण श्री कक्कसरि पद महोत्सवो कृतः । येन गच्छप्रवन्धः कृतः । तत्र देसल पुत्राः समर-सह- 20 जानां चरित्रमस्ति । एवं उपकेश गच्छे अनेक प्रभावका ग्रन्यकर्त्तारोनिरीहा सूरयो अभूवन् तेषां कियद् गण्यते एवं- ६८ तत्पट्टे श्री देवगुप्रसूरि बभूवः । कवि सार्वभौम विचक्रचू- डामणि सिद्धान्तपारगामी सर्वशावपारंगत । श्री सारङ्गधरेण सं० १४०६ वर्षे दिल्यां मध्ये पद महोत्सवी विहितः मुवर्ण सहस्र पंचक व्ययेन ! 25 .
उपकेशाच्छीया पट्टावलिः ६९ तत्पट्टे श्री सिद्धसूरिः संवत् १४७५ वर्षे गुणभूरय अणहिल-. पाटक पत्तने चोखेडीया गोत्रे साह मावा नीवागरेण पद महोत्सवः कृतः गुरूणां। ७० तत्पट्टे संवत् १४६८ वर्षे श्री ककसूरयः चित्रकूटे चौरवेडीया गोत्रे साह सारंग सोनागर राजाभ्यां पद महोत्सवो कृतः येन चतुर्दश 5 शत चतुः चत्वारिंसत् अधिक १४४४ कच्छ मध्ये अमारी प्रवर्ताविता याम श्री वीरभद्रः प्रतिवोधितः। संस्कृतप्राकृतपरमामृतप्रवाहा विरचित निखिलशाखावगाहाः वाणीविलासवाचस्पतितुल्याः सकलकलारंजितको- विदाः धर्मबुद्धिधुरंधरा सकलपुरन्दराः । ७१ तत्पट्टे सं० १५२८ वर्षे जोधपुरे श्रेष्टि गोत्रे मंत्रीश्वर जयता- 10 गरेण श्री देवगुप्तसूरेः महोत्सवे नव महोत्सवो कृतः । श्री पार्श्वनाथस्य प्रासादः कारितः पौषधशालायां च । श्री शत्रुजय यात्रा कृता । पंच पाठकः स्थापिताः । ते नामानि श्री धनसार १ उ० देवकल्लोल २ उ० पद्मति- लक ३ उ० हंसराज ४ उ० मतिसागर ५। ७२ तस्पट्टे श्री सिद्धसूरयो गुणभूरयः। श्री श्रेष्टि गोत्रे मंत्रीश्वर 15 दशरथात्मजेन मंत्रीश्वर लोलागरेण संवत् १५६५ वर्षे मेदिनीपुरे पद महो- त्सवः कृतः। ७३ तत्पट्टे श्री कफसूरयः श्री जोधपुरे संवत् १५६६ वर्षे गच्छा- धिपो जातः श्रेष्टि गोत्रे मंत्रि जगात्मजेन मंत्रीश्वर धरमसिंहेन पद महोत्सवो कृतः। 20 ७४ तत्पट्टे श्री देवगुप्त सूरयः श्री श्रेष्टी गोने मंत्रि सहसवीर पुत्रेण संवत् १६३१ मंत्री देदागरेण पद महोत्सवः कृतः । ७५ तत्पट्टे विद्यमान संवत् १६५५ वर्षे चैत्रसुदि १३ सिद्धसूरि- र्वभूव श्री श्रेष्टी गोत्रे मंत्रि मुगुट मंत्रि शेखर सर्व विश्व विख्यात राज्यभार धुरंधर मंत्रीश्वर महामंत्रि श्री ठाकुरसिंह विक्रमपुरे महा महोत्सवेन पद 25 महोच्छवो कृतः ७६ संवत् १६८८ वर्षे फाल्गुण शुद्धि ३ श्री ककसूरिर्वभूव । श्री २५ . :0 पट्टावली-समुनयः १६४ अष्टि गोत्रे मंत्रि मुगुट मंत्रि ठाकुरसिंह तत्सुत्र मं० साबलशन तत्पनी साहिवन पद महोत्लवो कृतः। ७ संवत् १४२७ वर्षे मृगशिर मुद३ दिने श्री देवगुननरिवभूर्व अष्टि गोत्रे मंत्रि ईश्वरदासन पद महोत्सवो कृतः । ७८ तत्पढ़े श्री सिद्धरि संज्ञातः। श्रेष्टि गाने मंत्रि सगजसिंहेन । पट्टाभिषेक कृतः संवत् १७६७ वर्षे मृगशिर सुदि १० दिने जातः । ६ तत्सद्दे श्री ककरिवभूव । मंत्रिदौलतरामेन सं० १५८३ वर्ष थासाह वदि १३ दिने महोत्सवा कृतः । ८० तत्पढ़े देवगुअरि सं० १८०७ वर्षे बभूव । मुहना दौलत- रामजीना पद मात्सबो कृतः । ? वत्सद श्री सिद्धमूरित्रभूव । संवन् १८४७ वर्ष महामुदि १०. दिने पट्टामिरेकः संजातः । मुं० श्री खुशालचंद्रेण पदनहोत्सवा कृतः । तेषां प्रासादात् अहं कल्यवाचनं करोमि । पुनः दीक्षा गुरुप्रसादान् । र तत्पन्हे श्री ककरिवभूव । संवत् १८८१ रा वर्षे त्र मुद्र अष्टनीदिने पट्टाभिषेकः संजानः । वैध मुंठाकुर मुत मुंसिरदारसिंह 15 गृहे समस्त श्रीसंयन बीकानेर मध्ये पदमहोत्सवः कृतः । ३ तत्सद्दे श्री देवगुप्तमूर्विभूत्र । संवत् १९७५ वर्षे भाद्रवा सुदि १३ चंद्रवासरे पट्टाभिषेकः संजातः । श्रेष्टि गोत्रे वैद्य मुहना शान्तायां प्रेम- राजो तत्व परिवारे हठीसिंघजी ऋषमतासजी मेवराजजीकानां उसंगे गृहीत्वा श्रीनलोवीनगरमध्ये सनन्त वैद्य झुद्दता पट्टाभिपेको कृतः । तेषां 20 प्रासावात् कल्यवाचनां करोमि। ८४ तत्पन्हे श्रीसिद्धमूर्विभूत्र | संबन् १९३५ वर्ष मायग्य ११ दिने पट्टाभिपेक संजात. अष्टि गोत्रे वैद्यमुहता शान्तायां ठाकुर सुन महावजी श्रीहरि सिंहजी पढ़ महोत्सवः कृतः वृद्ध गृह मध्ये चांसीवाला सुरजमलजी हस्तात् सनन्त श्रीलंयसहिनेन विक्रम पुर नव्यं देवदुण्य 25 रंजिव छल्किा राज्य द्वारा समागन ! तेयां प्रासादात् अहं कल्पवाचनां करोमि इति ॥
परिशिष्टम्-2 [मुद्रिते षोडशतमे पत्रे अनुपूर्तिः ] दुष्मकाल श्रीश्रमणासंघस्तोत्र संबंध 16 10 (सूचना-येतत्स्तोत्रं मुद्रितम् , पश्चात् पूज्यतमप्रवर्तकानां श्रीमना कांतिविजयानां प्रतिमिलिता यस्यां विशिष्टता शुद्धिश्चाऽस्ति, अतस्तस्याः १६ श्लोकेभ्यः “परतः" सर्वासां गाथानामन पुनर्मुद्रणं क्रियते) (तित्तीसं लक्खाओ, चउरसहस्साई चउसयाई च ॥ इगनवइ दुसमाए, “सूरिणंग मज्झिमगुणाणं ॥ २० ॥) (पंचावन्नाकोडी, लक्खाणं हुंति तह सहस्साणं ।। चउपन्नं कोडिसया, चउालीसा य कोडीओ ॥२१॥) (इति उपाध्याय-वाचनाचार्यसंख्या:) तह सत्तरि कोडिलक्खा, नवकोडि सहस्सकोडिसयमेगं ॥ इगवीसकोडि इगलक्ख, सट्ठिसहस्सा सु “साहूणं ॥ २० ॥ समणीण कोडिसहस्सा, दस नवकोडिसय बार कोडियो॥ छप्पन्नलक्ख बत्तीस-सहस्स एगूण दुन्निसया ।।२१ ॥ तह सोलकोडिलक्खा, तिकोडिसहस्स तिन्निकोडिसया ॥ सत्तरकोडि चुलसी-लक्खा सुसावगाणं ॥ २२ ॥ पणतीसकोडिलक्खा, सु साविया कोडिसहसबाणउई । पणकोडिसया बत्तीस, कोडि तह बारसम्भहिया ॥ २३ ।। एवं देविंदनयं, सिरि विज्जाणंद “धम्मकित्ति पयं ।। वीरजिणपवयणठिय दूसमसंघं नमह निच्चं ॥२४॥ इति दुष्पमाकालश्रीसंघस्तोत्रं ॥ लिखितं पूज्यपं० "लक्ष्मीभद्र" गणिशिष्येण । श्रीस्तंभतीर्थमहानगरे ॥20. सं० १५१६ वर्षे । दिदिने ॥ ज्ञानमाणिक्यगणिनां ।। . 15.
१६६ पट्टावली-समुच्चयः टिप्पनकम्-२००४ एतावंतो युगप्रधानाः (१६)। युगप्रधान- समानाः १११६००० (१८) सुचारित्रसूरयः ५५५५५५०००००००० (१६) मध्यमगुणसूरयः ३३०४४६१ पाठांतरे ५५५५५५४४, । ४३३- २६४६१ (२०) उपाध्यायवाचनाचार्यसंख्या ५५६०४४४००००००० (२१) सुसाधवः १७०६१२१०१६०००० (२२) श्रमण्यः १०६१२५६- 5 ३२१६६ (२३) सुश्रावकाः १६०३३१७८४०००० (२४) सुश्राविकाः ३५६२५३२०००००१२ (२५)। उक्ताधिकं, उत्तमनृपाः १११६०००॥ निर्गुणसूरयः ५५५५५५५०५ ॥ छ । इदं गाथाद्वयं विंशत्येकविंशतितमसंख्यं दीपालिकाकल्पादन लि- खितं । अधिकारत्वादिति ज्ञेयं ।। 10 एत्थं चायरियाणं, पणपन्नं होंति कोडिलक्खाओ। कोडिसहस्से कोडि-दसए तह एत्तिए चेव ॥ १॥ इति श्रीमहानिपिथे॥ पारीशष्टम् -२ कालिकात्तास्थश्रीतपागच्छसंघग्रंथभांडागारस्य श्रीकल्पसूत्रस्थविरा- वलीमापापुस्तकान्ते एता गाथा लिखिताः सन्ति- 15 रहवीरपुरे नयरे सिद्धिगयस्स वीरनाहस्स । छसै नवहुत्तरीए खिमणा पाखंडिया जाया ॥१॥ दुभिक्खंमि पणढे पुणरवि मिलित्त समणसंघाओ। मिहुराए अणुओगो पवईओ खंदिलो सूरि ॥२॥ वारसवाससएसुं पुणिमदिवसाओ पक्खियं जण । 20 चाउद्दसी पठवेसुं पकप्पीओ साहिसूरिहिं ॥ ३ ॥ पणपण धारसएही हरिभद्दोसूरि आसि पुवकए । तेरस वीसअहिए अहए बपभट्टपहू ॥ ४॥ इति थविरावली समाप्तं ।। सं० १५५० वर्षे शाके १७१५ प्रवर्त- माने मागसिरशुदि४थशनौ । श्रीनवानगरमध्ये । श्रीसंतनाथजीप्रसादात् । 25 वृहत्खरतरगच्छे बृहत्खेमशाखायां । पं० रूपचंदमुनिलिखितं । श्रीः ।। - An. परिशिष्टम् १६७ परिशिष्टम् -३ राजवंशाः (A) नृपकालगणना (तित्थोगालीयपइन्नयं) जं रयणिं सिद्धिगओ, अरहा तित्थंकरो महावीरो। तं रयणिं अवंतीए , अभिसित्तो पालो राया ॥ ६२० ।। १ पालगरएणो सट्ठी ६०, पुण पएणसयं १५० वियाणि नन्दाणं । -मुरियाणं सट्ठिसयं १६०, पणतीसा ३५ पुसमित्ताणं +॥६२१॥ बलमित्ता-भाणुमित्ता, सट्ठा ६० चत्ता ४० य होंति - नहसेणे । गद्दभसयमेगं १०० पुण, पडिवन्नो सो सगो राया ।। ६२२ ।। पंचय ५ मासा पंचय-वासा छच्चेव होंति वाससया ६०५। परिनिव्वुअस्सऽरिहन्तो, तो उप्पन्नो सगो राया ।। ६२३ ॥ (B) अस्मिन्नेव ग्रंथे १७-४६तमे पत्रे (विचारश्रेणौ पावापुरीकल्पे च) 10 5 १-यहनिब्वाय निसाए, गोयम ? पालयनिदो अवंतीए । होहीइ पाडलीयपहू, सो असुयउदाइनिवमरणे ॥१॥ युगः यंत्र । पालकस्य भ्राता गोपालको दीक्षितः पालकपुत्री अवन्तिवर्धनराष्ट्रवर्धनौ । राष्ट्रवर्धनपुत्रौ अवन्तीपेण-मणिप्रभौ उज्जयिनीकौशाम्बीनृपौ इति श्रा०नि० ६६६ ! - वी. नि० सं० २१४ राजगृहे मौर्यवंशी वलभद्रो नृपः। इति श्रा० नि०प० ३१५॥ + पुप्यसिनो यावत्संघारामं भिश्च प्रघातयन् प्रस्थितः स यावत् शाकलं (श्यालकोट) अनुप्राप्तः । तेनाभिहितं यो मे श्रमणशिरो दास्यति तत्साह दीनारशतं दास्यामि ॥ इति दिन्यादाने २६॥ मुडिवतो पायरितो सुहज्झायो, तस्स पुस्तमित्तणं माण विग्धंकतं ।-इति, व्यवहार सूत्र उ० ६ अवचूणौँ । कलिंगनृपेण यस्मात् जिनमूर्तिः प्रापि । इति हाथीगुफालेखे। * उजयिन्या भगिनीभोगी दर्पणराजा, सरस्वतीहरणेन श्राजीविकान्निमि- चपाठिकालिकाचार्यप्रेरितैः पण्णवतिशाहिनृप-भृगुकच्छपतिवलमित्र-भानुमित्रायैः ११८ पट्टावली-समुष्ययः (C) राज्यत्व कालगणना श्रीवीरनिर्वाणात् विशालायां पालकराज्यं २०+वर्षाणि । एतेन सहितं सर्वनन्दराज्यं १७८ । १०८ वर्षाणि मौर्यराज्यं, वर्ष ३० पुष्यमित्रा- - - हतः । मुख्यशाहीराजा वभूव, तस्य शकवंशः, ततो वलमित्रो राजा-भानुमित्रो युव- राजा जातः । तत्समये तन्मातुलाः कालकाचार्या उज्जयिन्यां समागताः वि० सं० ४५३ । येन प्रतिष्ठानपुरे शातवाहननृपानुरोधतः पंचमीतश्चतुर्थी पर्दूपणापर्वानितं, सर्व- संघेन तत्रमाणीकृतं ॥ इति, वृहत्कल्पमाप्य-चूर्णिः, पंचकल्पचूर्णिः निपीथ चूर्णिः अ० १०, कथावली, व्यवहारचूर्णिः उ० १०, कालिकाचार्यकथा, वीरनिर्वाण. कालगणना, श्रीप्रभावकचरित्रे विजयसिंहप्रबन्धः पादलिप्तप्रबन्धः । + चत्वारः कालिकाचार्याः तद्यथा-प्रथमः १ शक्रप्रतिवोधकः प्रज्ञापनासूत्र- कृत् श्रीस्वातिसूरिशिष्यः श्यामाचार्यः 'पी० सं० ३२० तः ३३५ ॥ द्वितीयः २- अविनीतशिष्यत्यागी श्राजीयाकान्निमित्तपाठी गर्दभिल्लोच्छेदकः इंद्रप्रश्नोत्तरदाता, चतुर्थीपर्युपणाकारकः श्रीखपटाचार्य-श्रीपादलिससूरिसमकालीनः वी० सं० ४५३ ॥ तृतीयः ३-आर्य विष्णुसूरिशिष्यः वी० सं० ७२० ॥ ४-श्रीदेवर्द्धिगणिसमका- लीनः, भूतदिनशिप्यः, माधुरीवाचनासहायकः आनन्दपुरे कल्पसूत्रन्याख्यानरूपेन चतुर्विधसंघे चतुर्थी पर्वप्रवर्तकः वी० सं० ११३, वाचनाभेदात् वी० सं० १८१ ॥ इति उत्तराध्यननियुक्तिः, विचारश्रेणिः, रत्नसंचयप्रकरणः, कालसप्ततिका गा० ४१ ॥ + एतत्संख्याभेदस्तु श्रीभद्रबाहुस्वामि-पश्चाज्जातचंद्रगुप्तयोः कालैक्र साधनार्थ । श्रतएव श्रीहेमचंद्रसूरिभिरपि परिशिष्टपर्वणि सर्ग ३, श्लो० २४३ सर्ग ८ श्लो० ३८६ गणनायो पालकस्य पष्टिः वर्षाणि न स्वीकृतानि। एवं बौद्धगण- नायामपि अजातशत्रुतः नवनन्दावधि १७० वर्षाणि ॥ वायुपुराणेपि अ० १६ श्लो. ३६८ महापमानंदस्यमस्थाने २८ वर्षाणि दत्तानि, तानि च शूगवंशे नव्यनामयुग्मेन पूर्णीकृतानि ॥ * भृगुकच्छे नहपानः प्रतिष्ठाने सालवाहन एतौ समकालिनौ, सालवाहनेन नहपानः पराजितः । इति श्रावश्यकनियुक्तिपत्रं ७१२ ॥
परिशिष्टम् । १६ 10 रणां, बलमित्रभानुमित्रराज्यं ६० वर्षाणि । दधिवाहनराज्यं ४० । तदा ४१६ । तदा च देवपत्तने चंद्रप्रभजिनभूवनं भविष्यति । अथ गर्दभिल्लराज्य वर्ष ४४, तदनु चर्प ५० शकवंशा राजानो जीवदयारता जिनभक्ताच भविष्यन्ति । श्रीवीरात् ४७० कालंतरेण केणवि, उप्पाडित्ता सगाण तं वंसं । '5 होही मालवराया, नामेणं विकमाइचो ॥१॥ तो सत्तनवइ ६७ वासा, पालेहि विकमो रन । अरिणतणेण सो विहु, विहए संवच्छरं निययं ॥२॥ संवच्छरं तुल तंम्मि सययंमि गणनाह । श्रीवीरात् ५५० विक्रमवंशः तदनु वर्ष ३८ शून्यो वंशः । श्रीवीरात् ६०५ शकसंवत्सरः ।। इति, श्रीमेरुतुङ्गीयविचारश्रेणौ ॥ (D) राजगृही-पाटलिपुत्र-राजवंशाः अधर्मि x प्रद्योतवंशानन्तरं, शिशुनागः । काकवर्णः शकवणे वा। क्षेत्रधर्मा क्षेत्रवर्मा वा । क्षेमजित् क्षेत्रज्ञः (प्र) सेनजीत् वा ।। विधिसारो विन्ध्यसेनो विविसारो वा व० २८ । अजातशत्रुः (कोणिकः)व० २७ ।। 15 वंशको दर्शको दर्भको वा, वं० २४ वा व०२५ ॥ अजयः उदासी उदायी वा व० ३३॥ नन्दिवर्धनः २०४० वा व० ४२ ॥ महानन्दिः०४६॥ इतिक्षत्रवांधवानां - शिशुनागानां ३६० वा ३६२ वर्षाणि राज्यम् ।। महानन्दिसूनुः शूद्रायां जातः महापद्मपतिः व०६८ अष्टौ नन्दाः व० १२ ।। इतिशूद्रयोनीनां x नन्दाना १०० वर्षाणि राज्यम् ॥ मोर्यः चंद्रगुप्तःव०२४ वा०....वारिसारो भद्रसारो विंदुसारोवा,. व० २५ वा...। शोकः अशोको वा २०२६ वा व० ३६ | दशरथः 20 ४ प्राय इदं परधर्माऽसहिष्णुतापरं अ-शैवनृपनिंदावचनम् ॥. * येन गंगाया दक्षिणे कुले पाटलिपुत्रं स्थापितं तत्रैव च राज्यं कृतं जिन- भूवनमपिनिप्पादितं इति आवश्यकवृत्तौ ६८७-६६० पत्रेषु, श्रावश्यकचूणैः, परि- शिष्टपर्वणि, अर्णिकापुत्रचरित्रे च ॥ तद्वितीयं नाम कुसुमपुरं । इति वायुपुराणे अ०६६ श्लो० ३१६, ब्रह्मांडपुराणे म० भा० उपां० ३ ०७४ श्लो० १३२ ।।
- 5 5 २०.० पट्टावली-समुच्चयः सुयशा कुशालः कुणालो, वां.व०.८॥ बन्धुपालितः संगतः सप्ततिः संप्रतिः वा, व०८ वा व० ६.। इंद्रपालितः शालिशूको वा, व० १०. वा... सोम- शर्मा देववर्मा वा, व०७ वा...! शतधन्वा शतधरः शतधन्वापुत्रो वा, व०८ वा व० ६॥ बृहद्रथः व० ७ वा व० ७०॥ इति : (१०) मौर्याणां १३७ वाणि राज्यम् ।। पुष्यमित्रः व०३६ वा व०६० । सुज्येष्ठप्रमुखाः नव वा दश शृंगाः व० ६६ वा व० ७५ ॥ येपूपान्त्यो राजा समाभागो विक्रममित्रो (बलमित्रो) विक्रमादित्यो वा ।। इति धार्मिकाणं + शृंगानां १०२ वा ११२ वर्षाणि राज्यम् ।। इति--भागवंतं, स्कंध १२, अ० १, सो०५-१८ ।। 10 मात्स्य, अ०२७२, श्लो०६-३२ । आ०सं०००, ५४ १०५५३॥ वायुपुराणं, अ०६६, श्लो०३१५-३४३ ।। प्रा०सं००४६, प०३८३॥ ब्रह्मांडपुराणं, म०भा०उ० ३, अ०७४,श्लो०० ३११-३३७ ॥ तथा विष्णुपुराणं ॥ (E) बौद्धगणानायां राजघंशाः 15 अजातशत्रुः व०३२, उदायी व०.१६, अनुरुद्धंमुण्डः व०.८, नागदासक० व० २४, सुसुनागः व०१८ कालाशोकः व० २८, तत्पुत्राः ' व० २२.॥ नवनन्दाः २२, चंद्रगुप्तः २४, विन्दुसारः २८, अनभिषिक्त अशोकः ४॥ अशोक......॥ इति, महावंशः परिच्छेद-४ श्लो. १-८ तथा परि० ५ श्लो० १४-२२ ।। 20 तस्मिंश्च समये कुनालस्य सम्पदीनाम पुत्रो युवराज्ये प्रवर्तते।xx पृथिवीं निष्क्रिय संपदी राज्ये प्रतिष्ठापितः ॥ इति दिव्यांदानं २६ ॥ तथा-तत्पौत्रः (अशोकपौत्रः) सम्पदी नाम,...... इति क्षेमेंद्रकृता बोधिसत्वावदानकल्पलता पल्लव-७४ है . +तदा शैवधर्महिता राज्यक्रान्तिर्जाता, विप्रसाहायात् सेनानी- पुष्पमित्रो नपं हत्वा नृपो बभूव, यं पौराणिकाः प्रशंसन्ति, बौद्धाश्च निन्दन्ति ॥ ,
परिशिष्टम्
२०१
परिशिष्टम्: -४
[तिहासिकं पत्रं
(कलकत्तावाला बाबु पुरणचंदजी नहारना भंडारमांथी)
सं० १११५ नागोरकोट मंडाणो वैशाखसुद ३ ( ) ठे वासिदाहिमो
सं० १२१२ रावल जेसे "जेसलमेर"वसायो, श्रावण शुद १२
सं० ११८१ फलोदी"पार्सनाथदेवलरी स्थापना हुइ
सं. १२०२ अयासार "अजमेर " वसायो सही
सं०७०३ दिलि तुवर वसाइ अनङ्गपाल तुअर
सं० १३१३ अलावदी पातसाह जालोरगढथी लडीयो, वीरमदे काम श्रायो
सं० १५०० राणा उदैसंघ उदैपुर वसायो
सं० १२१५ सहसमल देवडे सीरोइ वसाइ
सं० १५१५ जोधपुर वसायो, जोधैराव जेठ सुद ११
10
सं० १५४५ वीकानेर वसायो राव वीके जोधारै बेटे
सं० १५४५ फलोदीरो कोट करायो हमीर नरावत
सं० १६४५ नवो कोट वीकानेररो करायो, राजारायसंघजी कामदार
करमचन्द बछावत करायो
सं० १६१६ अकबरपातसाह अकबराबाद कोट करायो, आगरी जमुना 15
नदीरै उपरै हुतो,
सं० १६२४ चितोडगढ पालटीयो पालटीयो पातसाही अकबर पालटीया,
जै(जय)मल इसर मेडतीयो काम प्रायो
सं. ११०० नाहडराव मंडोवर वसायो
सं० १४७१ अहमद पातस्याह अहिमदावाद वसाइ
सं. १६४४ पातिसाह अकबर अहमदाबाद लीधो,
सं० १६६६ किसनसंघ राजा (किसनसंघ राजा) किसनगढ बसायो,
सं० १२४० राजा कुमारपाल हुओ जइनधर्म राखीयो,
२६
20
२०२ पट्टाघली-समुच्चयः सं० ११६३ विमल मंत्रीसर हुआ आबु देहरा कराया ':१ वस्तुपाल तेजपाल हुआ आवुजात्राकरनै भाबु उपर देहरा कराया, वीरधवलवाघेलारा कामदार हुआ पगे पगे निधानहुआ चरस ३६ नो आउखो हुयी सं० १५६६ दुदैजी मेडतो वसायो, श्रागै मानधातारो हुओ। सं. १५५(?) जांम नवोनगर वसायो हलारमै सं० १७३५ ओरंगाबाद वसायो औरंगसा पातस्याह सं० १७८३ सवाइ जेसंघ जैपुर वसायो सं०७०छ(?) राजूवीरनारायण सिवाणो गढ करायो सं० ६०६ चित्रांगद सोरीयो चित्रोड वसाइ 10 इति श्री गावोटरी वीगत संपुरणं सं० १८२२ गांव दीयावड नागो- ररी पटी कुपावतराज श्रीठाकुरसीवकरणजी लुणकरणोत केसरसंघोत केसरसंघ सव भए मोत सबलसंघ दलपतसंघोतरी सीवकरणजी देकवर- राचैनसंघजी कुबार कनजी, दुवार सेरसंघ कुवारप्रथीराज (श्रीजैनश्वेताम्बरकान्फरन्सहेरल्ड पु० १४ अं० ४, ५, ६, वीर 15 सं० २४४४ सं० १६७४) परिशिष्टम् २०३ : गुदविया परिशिष्टम् - ५ ८४ गच्छाः ( जैनसाहित्यसंशोधकः खं०३ अं०१) श्रोसवाल मलधार कुतगपुरा' सिद्धपुरा जीरावला भावराज काळेलिया घोघा(घ)रा वडगच्छ पल्लीवाल रुद्रोली नीगम. पुनमिया (नागराल) (रुद्रपालीय) संजना-(ती) गंगेसरा कोरंडवाल महु(देव)करा बारेजा 5 कोरंटा नागेन्द्र कपुरसीया (बरडेवा) आनपुरा धर्मघोष पूर्णतल मुरंडवाल भत्अच्छा नागोरी रेवइया (सुरंडवाल), उढवीया उछितवाल धुंधुका नागउला नावाल थंभणा .10 उ(द)काउआ सांडेरवाल पंचवलहीया १२ मतानि भीनमाल मंडोवरा पालगपुरा पांचलिक. भुडासीया सुराणा गंधारा पायचंद दासवि(रु)आ खंभाती गुवेलिया वीजा गच्छपाल वडोदरीया सार्धपुनमीया आगमिक 15 घोषवाल सोपारा न(म)गरकोटीया काजा मंगोडी मांडलीया हीसारीया तपा ब्राह्मणीया कोठी(त्थो)पुरा भटनेरा [वडगच्छ जालोरा जांगला(डा) जीतहा चोकडिया छापरीया (सोरठीया) पाटणीया 20 मुडा(झा)हरा (वावरावाल) जगायन साकर चिता(त्रो)डा बोरसडा भीमसेन कोथला साचोरा द्विवंदनीक आ(ता)गडीया कडुआ कुचडीया चित्रवाल कंबोजा श्रात्ममती सिद्धांतीया वेगडा सेवंतरीया 25 रामसेनीया वायड वाघेरा () मतांतराणि आगमीक विजाहरा वा(च)हेडीया - २०४ पट्टावली-समुचयः परिशिष्टम-६ । लघुपट्टाकली [ अथ लघुपट्टावली लिख्यते ] 5 10 विदितसकलशास्त्रान् पार्श्वचंद्रान् कवींद्रान्, भजत समरचंद्रान् भव्यराजीव सुर्यान् , नमत विशदमूर्तीन् राजचंद्रान मुनींद्रान्, विमलविमलचंद्रान् सर्वसुरींद्रमुख्यान् ॥ १ ॥ मालिनी छंदः ।। तत्पदे जयचंद्रसूरिमुनिपा जीता जगत् विश्रुताः, तत पट्टोदयभास्करा गणिवराः श्रीपद्मचंद्रा बभुः, तत्पट्टे मुनिचंद्रसूरिगणिनो नंदंतु भट्टारका- स्तत्पदान्जविभाकरा गणिवराः श्रीनेमिचंद्राह्वयाः ॥२॥ शार्दूलः ।। तत्पट्टे कनकेंदुसूरिगणिपा जाता जगत्युज्वलाः, तत्पट्टे शिवचंद्रसूरिमुनिपा विख्यातकीर्तिव्रजाः तत्पट्टे विमलप्रबोधसहिताः श्रीभानुचंद्राभिधाः तत्पट्टे च विवेकचंद्रयतिपा जाता जगत्पूजिताः ॥ ३॥ शार्दूलः ।। तत्पट्टमानससरोवरराजहंसाः, श्रीलब्धिचंद्रमनिपाः प्रबभूवुरवं, तत्पट्टभास्करनिभा विलसद्गुणोघाः श्रीहर्षचंद्रमुनिवृन्दवरा अजैपुः ॥ ४॥ वसंततिलका ।। तस्मिन्पट्टे प्रजयतितरां हेमचंदो मुनींद्रः सुश्लोकौधैर्विदितमहिमा गांगमंभश्चलोके, जैने धर्मे चरिततपसा श्रावकैर्गीतकीर्ति- न्यिो धीमान् विमलकविताकोमलोद्गीर्णवाणिः ।। मंदाक्रांता ।। संवत् १६३३ मिति जेठ सुदी १२ शनिवासरे श्रीमकसूदाबाद अजीमगंज में मुन्नीलाल के वास्ते + 15 20 + श्रीयुतपूरणचंदजी नाहर इत्येतेषां भंडारतः प्राप्त जैनश्वेताम्बरकान्फरन्स हेरल्ड पु० १४ अंक ४-५-६ वीर सं० २४४४ पल्लीवालगच्छ-सत्कऐतहासिक परिशिष्टम् ७ पल्लीवालगच्छ-सत्क ऐतिहासिकसंगहः सं० ११४४ माघशुक्ल ११, सांप्रतं निःशेपनयसंजुते प्रद्योतनाचार्य- गच्छे, ऐंद्रदेवसूरिणा, नं० वांधवैः, पालीग्रामे वीरमन्दिरे खन्नके प्र० का०। सं० ११५१ आ० शु०८ गुरु, पल्लकीये प्रद्योतनाचार्यगच्छे, लख- 5 मलेन (पालीग्रामे) वीरचैत्ये देवकुलिका कारिता ॥ सं० १२१३ आ० व० १, भ० देवभद्रसूरि-शिष्यसिंहसेनसूरिणा, मं० देदा, पल्लिकायां ऋपाचैत्ये, प्रतिमा कारापिता। सं० १३०० वै० व० ११ बुधैः, चंद्रगच्छीय हरिभद्रसूरिशिष्ययशो. भद्रसूरिणा,सहजिगपुरवास्तव्य-पल्लीवाल ज्ञातीयठरतनपालेन बि०का०110 सं० १३२७ फा० शु०८ वडगच्छे कुनडे माणिक्यसूरिणा, पल्ली- वाल ज्ञातीय ठ..."प्रतिष्ठा कारापिता ॥ (अहमदावाद) सं० १३३८ वै० शु० २ शनिः, पल्लीवालज्ञातीय ठ०. मल्लि बिवं कारापितं, पूर्णभद्रसूरिभिः प्रतिष्ठितं ॥ सं. १३४० ज्ये० ५० १० शुक्रः,कोरंटीयगच्छे ४ ४ सूरिणा, 15 पल्लीवाल ठ......"प्रतिष्ठितं । सं० १३५६ ज्ये० शु० १५ शुक्रः, कुलगुरु 'आदेशेन, पालीवाल ज्ञातीय'''देवकुलिका कारिता । (ली आँ०रि०इ०वा०प्रेपृ०३६३) 'सं० १३७१ श्रा० शु०८ रविः, पल्लीवालज्ञातीय० प्रतिष्ठा ॥ सं० १३८३ वै० व० ७ सोमः, पलिवाल-कीकमेन, प्रतिष्ठा०॥ 20 सं० १३६७ मा० शु०१० शनिः,धर्मघोपगच्छे मानतुङ्गसूरि-शिष्य हंसराजसूरिणा, पल्लीवालज्ञातीय ठ० छाडा, विंबं कारितं ॥ सं० १४५८ फा०व० १ शुक्रः, पल्लीगच्छे शांतिसूरिणा, उपके- शीय-हट्टचायी जो......"प्रतिष्ठा । सं० १५०७ फा०व० ३ पल्लीवालगच्छे यशोदेवसूरिभिः, उपकेश-25 धाकडगोन....'प्रतिष्ठा कारिता॥ . ..
, २०६ पिट्टावली-समुच्चयः सं० १५०८ ज्ये० शु० १०, श्रीपल्लिगच्छे, श्रीमालीज्ञाती-मंडाव- तगोत्रे शा० भोजा...."कारितं ।। सं० १५१० फा०व० ३ शुक्रः, अञ्चलगच्छे जयकेसरसूरिणा, पल्लीवाल ज्ञातीय-मं० मंडलिक' 'प्रतिष्ठा० सं० १५११ मा० व० ५ शुक्रः, पल्लीवालगच्छे यशोदेवसूरिणा, 5 जिनपट्टः प्रतिष्ठितः ॥ (बामणवाडा)॥ सं० १५१३ वै० शु० २ सोमः, श्रीपल्लिगच्छे श्रीयशःसूरिउपदेशेन, श्रोसवाल-छाजडगोत्रे माधा इत्यनेन प्रतिष्ठा कारापिता ।। सं० १५२८ मा० ३०५ बुधः, पल्लिवालगच्छे नन्नसूरिभिः, ओस- वाल-धनेरियागोत्रे बिंबं कारापितं ।। 10 सं० १५२८ चै० व० १३ सोमः, पल्लोगच्छे नन्नसूरिपट्टे उज्जोयण सूरिभिः, उपकेशज्ञातौ वर्द्धनगोत्रे जिणदासकेन बिंब कारापितं ॥ सं० १५३६ श्रा० शु० ६ श्रीपल्ली० भ०श्रीउजोअणसूरिभिः बिं०प्र०॥ सं० १६६७ भा० शु० ५ (६) शुक्रे पल्लीगच्छे भ० यशोदेवसूरि- राज्ये तेजसोजी विजयराज्ये उ० देवशेखरविजयराज्ये श्रीवीरमपुर (ना- 15 कोडा) संघेन कारितं । श्रीसुमतिशेखरेण लिपीकृतं ॥ सं० १६७८ द्वि० आ० शु० २ रविः, श्रीपालकीयगच्छे भ० यशो- देवसूरिविजयमाने छाजड'''"संघेन नाकोडातीर्थे वीरचैत्ये चतुष्कि- का कारिता ॥ पं० सुमतिशेखरेण लिखितं ।। आषाढादि सं० १६८१ चै००३ सोमः, पल्लीवालगच्छे भ० 20. यशोदेवसूरिविजयमाने, श्रीपल्लीगच्छसंघेन (वीरमपुरे) पार्श्वचैत्ये निर्ग- मचतुष्किका कारापिता ॥ उ० हरशेखर-शिष्य उ. कनकशेखर-शि०. उ० देवशेखर शि० उ० कनकशेखर-शि० उ० सुमनिशेखरेण लिखितं ।। इति श्वेतांवरीयःपल्लीवालगच्छः वडगच्छ-कोरंटगच्छसमाचारः ॥ तस्यक्षेत्र:-पाली, सहजिगपुरं,कोरंटा,बामणवाडा,वीरमपुर,नाकोडा॥ 5 तद्गच्छाऽन्यनामानि-प्रद्योतनाचार्यगच्छ, पल्लकीय, पालकीय, पल्ली, प्रल्लीवाल ॥ एवं जयपुरराज्येपि पल्लीवालसंस्थापितं श्वेतांवर-दीगंबरैरुपास्यमानं "श्रीमहावीरजी नाम्ना श्वेतांबरतीर्थमद्यापि वर्तते । - पट्टावली-समुच्चयान्तर्गत-शब्दानां प्रकाराथनुक्रमः अकाराद्यनुक्रमस्थ सूचिः A B श्रीतीर्थकर-गणघराणां नामानि ।। (अस्मिन्ननुक्रमे श्रादिस्थैः श्रीभगवदादिमिः अन्तस्यैः स्वामिगण- धरादिभिश्च सामान्यपदै रहितानि केवलानि तीर्थंकर-गणधरनामानि दर्शितानि सन्ति, एवं सर्वत्र ज्ञेयं)। श्रीजैनश्वेतांवरश्रमण-श्रमणीनां नामानि ।। (प्रारंभस्थिताज्जाचार्येत्यादिभिः प्रान्तस्वसूरिगणिविजयप्रमुखैः सामान्यपदै रहितानि शुद्धानि जैनश्वेतांवराचार्योपाध्यायपं०पन्यास- साधुसाध्वीनामानि)। C पड्दर्शन- ज्ञाति -गच्छ.-कुलानां नामानि ॥ (विविधदर्शन-ज्ञाति-मतानां, जैनीयगणगच्छकुलवंशगोत्रशाखा- प्रशाखादीनां नामानि)। D गृहस्थानां नामानि ।। (राजा-मंत्रि-मंडलिक-संघपति-श्रेष्ठि-कवीनां नामानि)। देश-नगरादीनां नामानि ॥ (देश-ग्राम-नगर-गिरि-नदी-सर: स्थान-तीर्थाणां नामानि)। F ग्रन्थ-स्तोत्राणां नामानि । (नियुक्ति-भाग्य-चूर्णि-टीका-टिप्पनक-विवरण-पञ्जिका-सार-स्तवक (टब्बो) प्रमुखवैशेष्यरहितानि केवलमूलग्रन्थानां नामानि)। G इतरधर्माचार्य-ऋषि-देव-विरुदानां नामानि ।। (जैनस्थानकमार्गि-दिगंवरसाधूना, निन्हवानां, जैनेतरधर्माचार्याणां, विरुदानां च नामानि)। तथा-अत्र नाम्नां अक्षरभेदः चंद्र ( ) वन्धे दर्शितोस्ति, यथा अन्नवयर-अजवईर अनयोः स्थाने "वय (इ) ॥ इति ।। नाम्नामधिका अक्षराश्चतुष्क [ ] बन्धे दर्शिताः सन्ति । कानिचिन्नामानि एकस्मिन्पत्रे वहुश उल्लेखितानि प्राप्यन्ते, तानि सर्वाण्यत्र एकपत्रांके एव न्यासीकृतानि,यथा-१६२तमेपत्रे “ककसूरिः इति ॥
अकाराद्यनुक्रमः २०६ A श्रीतीर्थकर-गणधराणां नामानि ॥ पत्राणि नाम पत्राणि पार्श्व [ नाथ]-४६, १०८, ११०, १११, १२६; १३४, १५०, १६२, १६६, १७७, १७८, १८४, १६३, २०६ अकम्पिय-१,१२, अग्गिभूई-१, १२, अजित (य)-१२,७५, अणंत-१२ अभिनंदण-१२ अयलभाया-१, १२, अर-१२, अरिष्टनेमि-१२०, आदिदेव-१३७, आदिनाथ-७५, १०७, १६२, इन्दभूई-१, १२, १२, उसम-१२, ऋषभदेव-६०, ६६, ७२,७४,९३ ६२, १०६, १२६, २०५, कुंथु-१२, ७२, केशी-१७७, १७८, १८४, गोयस-१७, १६७, गौतम-३८, ५३, ५५, ७१, १२, १००, १२०, १२१, १२६, १६२, चन्द्रप्रम-५३, १६६ धम्म-१२ नमि-१२,५० नाभिसुनु-१३० नाभेय-५३, १२६ नेमि-१२, ४४, ५२, ५५,७२, ७४, १५१, १५३, (१२०) पभास-१ अंतरीक पा०-६५ करहेड पा०-१५ कलिकुएड पा०-६५ गोडी पा०-१०८ चत्त (व)लेर पा०-६६ चिंतामणी पा०-७४,८१, ६० १५६, १७४ फलौदी पा०-२०१ वरकाण [क] पा०-७२,७६ ६४, १७४ विजयचिंतामणि पा०-८१, ६०, १६० शंखेश्वर पा०-८१, १०८ समी पा०-१०८ नवखण्ड पा०-६४ पास-१२ पुंडरिक-१३३ पुप्फदंत-१२ मगसीश्वर-१६३ मंडितपुत्त-१ मंडिय-१२ मल्लि-१२, २०५ पहास-१२ २१० पटावली-समुश्यः नाम पत्राणि पत्राणि महावीर-१, २, ३३, ४२, ४६, ४६, ६६, १०८, १२०, १३२, १३७,१४८,१६६,१७८, १८६, १८७, १८, १६७, २०६ माणिक्यत्वामी-६५ मुनिसुब्बय-१२ समज-१२ मईज-१ मोरित्रपुत्त-१, १२ युगादिदेव-१०० वद्धमाण-१२, १८, ४१ वर्धमान-४१,११६, १२१, १४१, १८४, १४८, १६३, १७३, १७८ वसुभूति-१२० वाम्भूइ-१, १२ वासुपुज-१२ विनल-१२ वियत्त-१, १२ १७४, १८४, १८६, १८६, १६५, १६६, १६८, २०५, २०६ दृपमध्वज-२३३ वृपांक-१२० शान्ति-४०, ४३, १०४, १०८, ११०, ११४, १६४, १६६ शीतलनाथ-११० शुभदच-१८४ संति-१२ संभव--१२, ६३ ससि-१२ सिम्जंस-१२ सीमंधर-४०, १०८ सीयल-१२ सुधर्मा-२१, २३, २५, ३३, ३... ४१, ४२४५, ५७, १२१, १३६, १४०, १४१; १४४, १४७, १४८ १५०, १५४, १६३ मुपास-१२ सुप्पम-१२ सुमई-१२ सुहम्म-१, २, १२, १५, १६,१७,४१ वीर-१२, १५, १६, १७, १६, २५ ४२, ८१,८३, ८६, ६६, १०१, 20८, १२६, १४८, १६३, १६६, नाम B श्रीजनश्वेताम्बरश्रमण-श्रमणीनों नामानि ।। पत्राणि पत्राणि अजितसिंह १६; अग्निदत्त-३, अणन्तहंस ६७, अजवसागर ११०, अनोपरत्न १०६, अजित (य) देवसूरि २५, ३४,५४, अभयदेवसूरि-५४, १४२, १५३. ५५, ५६, १३०, १४५ १५४, १७०, १६८, १६४ अकारानुक्रमः पत्राणि नाम . २११ नाम पत्राणि अमरनन्दि ६७ अमरविजय-८७,११३, ११६ अमरसुन्दर-४० अमरसूरि १५, २२, १४० अमीविजय ११२, ११६ अमृतरत्न १०६ अमृतविजय ११४ अरहमित्र (त्त) १५, २२ अरिहदत्त ७ अरिहदिन्न अर्णिकापुन १६६ अर्हन मित्र १४० अवन्तिसुकुमाल ४५, १२३, १२४ १५०, १६५ आगममंडण ६७ [विजय ] आणंद १५, २१, १४० आवंदघन १०५, १०८, १०६ पाणंदविजयगणि ११५ आणंदसागर ११८ आणंदसूरि ५५,१०६, ११३, ११५, आदिगुप्तमुनि ६३ आनं (णं) दविमलसूरि६ि६,७०, ७१, १०६, ११६, १३४, १४६, १५७, १५८, १७२, १७३, इंद्र(द)दिन्न ३, ५, ७, २६, ३३, ४६, १२४, १४४, १५०, १६५ इंद्रनंदि ६७ इन्द्रहंस ६७ इसिगुत्त ५, ६ इसिदत्त.७ इसिदिन ७. इसिपालिअ ७ ईशान (साण) १५, २२, १४० उज्जुमइ ४ उज्जोअण ५२, २०६ उत्तमरत्न १०६ उत्तमविजय १०६, १८७, ११०, ११२, ११५ उत्तर ४ उदयनंदिसूरि ३६ उदयरत्नगणि १०६ उदयसागरसूरि ११२ उद्योतनसूरि २७, ३४, ५२, ५३, १२६, १४५, १५३, १६८ उद्योतविजय ११२, ११६ उद्योतविमल ११६. उमासाइ १६ उमास्वाति १८, १६, २४,५२, १४०, १५२ उवनंदणभद्द ४ ऋधिविजय-११६ ऋधिविमल-११६. ऋधिसूरि-११३ एणा-१२३ ऐन्द्रदेवसूरि-२०५ ककसूरि-१८८, १८६, १०, १४१ १६२, १६३, १६४ ककुदाचार्य-१७६, १८६ कण्ह-१० ३ नाम -२१२ पट्टावली-समुच्चयः पत्राणि नाम पत्राणि कनकविजय-१०६ कुशलविजय[गणि]-१०५,११०, कनकशेखर-२०६ ११६ कनकेन्दु-२०४ कुशलसागर-८७ कमर्षि-१०३ कृपाविजय-१०१, १०६,' कमलविजय ५७, ६६ केवल विजय--११५ कमलसूरि-११७, ११८, ११६ केशीकुमार--१७७,१७८, १८४ कर्पूरविजय-१०५, १११, ११५ केसरविजय-१०६, १०७, ११८, कल्याणचन्द्रसूरि-१७६ कोडिन्न-४, १४०, कल्याणमित्र (त)-१५, २२, १४० कोडिल-१५, कल्याणविजयगणि-७७, १०६,१३७ कौडिल्य-२१, क्षमाकल्याण-११०, . कल्याणसागर-१६२ कस्तुरविजयगणि--११४ क्षमारत्न-१०६, कान्तिविजय--११६, १६५ क्षमाविजय-१११, ११३ कामिडी-४.६ क्षमासूरि-१७६ कालग.(अ) (य)-६, १०, १६, [आर्य] खपु(पोटाचार्य १७, ४६, १७, १८, ५१, १४० १६५, १६८ कालिकाचार्य १७, १८, २४, ४६, खंदिलसूरि १३, १६, १७, १६६ ४७, १५०, १५२, १६५, १६६, खान्तिविजय ११६ १६७, १.६.७, १८ खीमाविजय १४८ कित्तिमित्त-१५ खुशालविजय ११६ कीर्तिमित्र-२२ गजविजय ११३ कीर्तिरत्नसूरि-१०६ गणपतिऋपि ६७, १५७, १७२ कीर्तिविजय-१०५, १०६, ११२, गणिभद्द ४ ११४, १४७ गंभीरविजय ११५ 'कीर्तिविमल-१०६, ११६ गुणरत्न १०६ कुबेर-७ गुणरत्नसूरि २५, ३२, ३४, ६४, 'कुमारधम्म-१० ६५,१४५, १५६ कुमुदविजय--११५ गुणविजय ७६, ८७, १०७, कुलमण्डण-३२,३४,६४, १४५, ११५, ११७ १५६, १७२ गुणग्न्दर १६, १७, २३,.४७ - अकाराद्यनुक्रमः २१३ पत्राणि नाम पत्राणि नाम गुणसोम ६७ [श्री] गुप्त (त) सूरि ५, १६, १७, २३, ४७, १४० गुलाबविजय १०६, ११४, ११७ गुलाबश्री ११८ गोदास ३ गोवाल ७ गोविन्द १३ घनसुन्दर १४० घोपनंदि १८ चतुरविजय ११५, ११८ चंद्रप्रभसूरि १६६ चंद्रविजय ११५, ११६ चंद्रशेखर, ३१, ३४, ६३, १४५ चंद्र (द) सूरि २६, ३३, ३४,४७, ४८,५७,१२६,१४४, १४७, १५१, १५४, १६७ चंद्रोदयरनसूरि १०६ चारित्ररत्न ३६ चारित्रराज ४० चारित्रविजय १०२, १०६, १५५, ११६, ११६ छलूम४ जक्खदिन्ना ४ जक्खा ४ जगचंद ५६ जगच्चन्द्रसूरि २७, ३४, ३५, ५६, ५७,५८,१३०,१४१, १४५, १४७, १५४,१७०, १७१ [प] जगर्पि७०,१३६,१३७, १५७ जजगसूरि ४६ जएगदत्त ३ जंवू २, ४, १०, १२, १५, १६, १७, २३, २५, ३३, ३८, ४२; ४३, १०८, १२१, १२२, १३३, १४०,१४१, १४४, १४८,१६३ जयकेसर २०६ जयचंद्र १४६ २.४ जयतिलक १६० जयदेव १५, २१, २६, ३३, ४६, ५०. १२८, १४०, १४४,१५१, १६७, १६८ जयन्त ३ जयमंगल १५, २२, १४० जयरत्नसूरि १०६ जयविजय ११६ जयविमल १०६ जयसागरगणि ११६ जयसुन्दर ३६, ६५, जयान(ण)द २६, ३१, ३३, ३४, ३७, ३८, ५१, ६३, १२८, १४५, १५२, १६८ जशविजय १०६, १०८ जसदेव ५१ जसभ६ २, ३, ४, १२, १५, ४२, ५४, जसमित्त १५, जिटुंग १६ जिणभद्द १६ जितविजय १०६, ११६, ११८ २१४ पट्टाबली-समुदयः नाम पत्राणि पत्राणि . जितसागरमणि ११६ तावस ३,७ जिनकीर्चि-३६, १४६ विलकविजय ११५ जिनचंद्रसूरि-११०, १६८ तिलकरि १०३,१०६, ११३ जिनप्रमभूरि-६३,१७० तीलभद्द४ जिनभद्रगणि-१८,२४,५१,१४, तेजरत्न,१०९ तेजविजय ११०, १०६ जिनमंडए-३६ तेजसोजि २०६ जितमाणिक्य ६० तोसलियुन १७ जिनरन-१०६ यावर १५, २२ जिनवल्लम--५१, १६६ थिरगुत्त ११ जिनविजय-११०,१११, ११२,१४७ शुलभ २,४. १२, १५,४ष्ट जिनमुन्दर-३६,६६,१४६ योमरणविजय ११७ जिनसीन-६७ दवमित्त-२५ जिनहर्ष-१०५ दयाविजय-१०७ जिनहंस-६७ दयाविमल-२१६, ११७ जिनेश्वरसूरि-५८, ६३, १६८, १६६ यात्रि-१७६ पाच जियवर १२ दर्शनविजय-११५, १७ जीवविजय-११३ दानरत्रसूरि-१०६ ज्येष्ठांग-२४,१४० द्वानविजय-११६, ११७ जेहिल-८,१० दानविमल-११६ जैनेन्द्रनुरि-१७६ दान(ण)सूरि-६६, ७०, ८१,४८, जोगविमल-११२ १०२, १०३,१०६, १३६, १३७, ज्ञानकिर्चि-१० १४६, १५८, १७३ ज्ञानधर्म ११० [आर्च] दिन्नसूरि-३,७,२६, ज्ञानमाणिक्य १६५ ३२,४६,१२४,१४४, १५०,१६६ ज्ञानविजय-११३, ११८ झानविमल--१०६, १७६ दीपचंद्रमणि-११० ज्ञानसागर-११६,१७२ दीहभ६-४ ज्ञानसागरसूरि-३२,३४, ३४, दुष्य (प) सह-१५, १६,२२,४२, १४५, १५६, १७२. १४०,१४१,१४२, १४३ अकारायनुक्रमः २१५ नाम पत्राणि नास पत्राणि देवेन्द्रसूरि २८,३४, ३५,५७, ५८ ५६, ६०, १३१, १४५, १५४, १५५,१६८, १७०, १७१, १७६ देसिगणि १० धणगिरी ७, ८, १० धगड्ढ४ दुसगणि-१४ दृढमित्र-२२, १४० देवकल्लोल-१६३ देवगुप्तसूरि-१८८, १८६, १६०, १६१, १६२, १६३, १६४ देवचंद्रगणि-११०, ११२ देवचंद्रसूरि-५६, १५३, १७० देवभद्र-२७, ५७, ५८ देवभद्रसूरि २०५ देवमित्र (त्त) १५, २२, १४० देवद्धि(ड्डिोगणि ८, ११, १६, १८३, १६८ देववाचक १२ देवविजय १०७, ११७, ११८ देवविमल १०६, १२०, १३७ देवशेखर २०६ देवसुन्दरसूरि ३१, ३४, ३८, ३६ ६३, ६४, ६५, १३२, १४५, १५६, १७२ देवसूरि २६, २७, ३४, ३५, ४६, ५३, ५४,५५, ७२,८१, १२, ३, ८६,८७,६०, ६१, ६२, ६७, ६८, ६६, १००, १०३, १०४,११०,१२६, १३८, १४४, १४५,१४६, १४७, १५३, १६०, १६१, १६२, १६८, १७०, १७४, १७५ देवानंदसूरि २६, ३३, ४६, ५०, १२८, १४४, १५१, १६७ देविन्द ५७ धणसिंह १५, २१ धनविजय,११०, १३७ धनशिख १३६ धनसार १६३ धन्यर्षि ८५, १७४ धम्मघोस १६, ५७ धम्मपिय १० धम्मरिसि १६ धम्मसायर ७७ धम्मिल १५, २१, १४० धरणेन्द्रसूरि १७६ धर्मऋषि २४ धर्म (म्म) कीर्ति (त्ति) १६, ५६, १७१, १६५ धर्मघोषसूरि १५, १९, २४, २८, ३०, ३४, ३६,५७, ५६, ६०, ६१, ६२, १३१, १४०,. १४१, १४३, १४५, १५५, १६८,१७१ धर्ममंडन ४० धर्मसागर ४१,७७, १७३ धर्म (म्म) सिंह १५, २१ १४० धर्म (म्म) सूरि ६, १०, १३, १६, १७, २३,४७, ११२, ११५, ११८, १४०, १७६ .
पट्टाचली-समुश्चयः नाम. पत्राणि: पत्राणि नाम. धर्महंस ६७ धीरविजय'११३ धीरविमल १०६ नक्ख [त्त], १० नंदणभद्द ४ नंदविजय ७६ नंदिधर्म ४० नंदिमित्त (त्र) १५, २१, १३६ नंदिय १० नंदिलक्खमण १३ नन्नसूरि २०६ नयविजय ७२, १०६. नरविजय १०६ नरसिंहसूरि २६, ३३, ५०, १२८, १४४, १५२, १६७ नरेन्द्रविजयः ११७ . पज्जुण्ण ५२ पज्जोअण ४८, ४६ प (पा) डिवय १५, २१ पण्डुमद्द ४ पद्मचन्द्र २०४ पद्मतिलक ३०, ३४, ६२, ६३, १४५, १६३ पद्मविजय १०७, ११२, ११४ पद्मसागर ५३, ९२. ११६ परमानन्दसूरि ३०. ३४, ६२, १४५ पादलिप्त ४६, १६६, १८१, १८३ १६८ पार्श्वचन्द्र ६६, ७०, १३७, १५७, १७२. २०४ पियगंथ ७ “पुरणभद्द ४ पुण्यप्रधान ११० पुण्यराज ४० पुण्योदयसूरि १०६ पुष्यतिष्य १८ [दुर्बलिका] पुण्य (प) मित्र १८, २२, २३ ४८, १४० पुष्पमित्र २४, १४० पुसगिरी पुसमित्त १५, १६ पूर्णभद्र २०५ पोमिल ३ प्रतापविजय ११५ ११६ प्रतिष्ठासोम ३५,४० प्रद्युम्नसूरि २६, ३३, ३४, ५२ ५३ . १२६, १४५, १५२, १६८ . नाइल ३ नाग ४, ६. १० ना (णा) गजुण १३, १४, १६ नागमित्त ४ नागहस्ति (स्थि), १३, १६, १८, २४, ५१, १४० नागार्जुन १८, २४, ५१, १४०ः । नागेन्द्र २६ नीतिसूरि ११५ नेमसागर ११६ नेमिचंद्र (इ) सूरि २७,३४, ५४, ५५,.१२६, १४५, १५३, २०४ नेमिसूरि ११५ ११८ पउम .
अकारानुक्रमः २१७ नाम पत्राणि नाम पत्राणि प्रद्योतनसूरि २६, ३३, ४८, ४६, १२६, १४४, १५१, १५२, १६७ प्रद्योतनाचार्य २०५ प्रधानविजय ११७ प्रभंजना ११० प्र (प्प) भव २, १२, १५, १७, २३, २५, ३३, ४२, ४३, १२२, १४०, १४४ १४८, १६४ प्रभसूरि ६७, ६६, १००, १०१, ११०, १११, १४७, १६१, १६२, प्रमोदविजय ११६ प्रमोदविमल ११६ प्रातिपद १३६ प्रेमविजय ११०, ११३, ११५ प्रेमश्री ११८ फग्गुमित्त ८, १०, १५, १६ फल्गुमित्र २२, २४, १४० फल्शुश्री १४२ बप्पभट्टसूरि १६, ५२, १४२, १५२, १६८, १६६ बंभ ५ बंभदिवग १८ बलिस्सह ४, ४६, १६५ बहुल १२,,१७, ४६ . बुटेरायजी ११४, ११६ बुद्धिविजयगणि ११४. बुद्धिसागर' ११८, १६८, १६६ ब्रह्मद्वीपक ५१ २८ भक्तिविजय ११५ भद्द ८,६,१० भदगुत्त-१३, १६ भद्दजस-५ भद्रगुप्त-१७, २३, ४७,१४० भद्र (६) बाहु-१, २, ३, १२, • १५, १७, २३, २५, ३३, ३५, ४२, ४४, ८५, १२२, १२८, १४०, १४४, १४६, १६४, १८१, १६८ मरणिमित्र (त्त) १५, २२, १४० भानुचंद्र २०४ भानु (ण) विजय ११० भावरत्नसूरि १०६ भावविजय ११८ भीमसिंह ५६ भुवनसुन्दर ३६, ६५, १४६ भून (य) दिन्न १४, १८, ५१, १४० १६८ भूत (य) दिन्ना ४, १२३ भूता (या) ४, १२३ भूति (इ) दिन्न १६, २४ भोजविजय ११० मंगलविजय ११७ मंगु १३, १७,४६, १६६ मणिभद्द४ मणिरत्नसूरि २७, ३४, ५६, ५७, १३०, १४५, १५४, १७० २१८ पट्टावली-समुच्चयः पत्राणि पत्राणि मणिरथ (ह) १५, २१, १३६ मणिरयण ५६ मणिविजय १०७,११४, ११७ मणिविमल ११६ मतिरन ११० मतिसागर १६३ मनक (णग)२,४३, १२२, १४४, १६४ मयगलसागर ११६ मयाविजय १०७ मयासागर ११६ मलयगिरि १२१, १४२ [आय] महा (ह) गिरि २, ४, १२, १६, १७, १६, २३, २५, ३३, ३४,४४,४५,४६, १२३, १४०, १४४, १४६, १५०, १६५ महीसमुद्र ६७ महोदयविमल ११६ मागध (ह) १५,२२, १४० माढरसंभूति (इ) १६, १८, २४, १४० माणिक्यसूरि २०५ माणेकविजय १०७, ११०, ११६ माथु (हु) र १५, २१, १४० मान (ण) तुग २६,३३,४०,४६, ५०, १२७, १४४, १५१, १६७, २०५ भान (ण) देव २६, ३३, ३४,४०, ४८, ४६, ५०, ५१, ५२, ५३, ६५, १२६, १२७, १२८, १२६, १४४, १४५, १५१, १५२,१६७, १६८ मानविजय १०६, ११३, ११५ मानसागर ११६ मानसूरि ११३ मालवी ऋपि १७३ मुक्तिरत्न १०६ मुक्तिविजयगणि ११५, ११६, मुड्डींवत १६७ मुंडपाद १८ मुनि(णि)चंद्र (द) सूरि २७, ३४, ५४,५५, ५६, १२६,१४५,१५३, १५४, १६८, १६९, १७६, २०४ मुनि(णि)सुन्दरसूरि १६, ३३, ३४, ३६, ४०, ६३, ६४, ६५, ६६, ७७, २७, १३३, १४५, १४६, १५६, १७२ मूल १८ मेघजिऋषि ७२, ७८, १०६, १५६, १७४ मेघरत्न १०४ मेघविजय ५८, १०१, १०६ १०६, ११० मेरतुग १६६ मेरुविजय ११० मेहगणि ४ मोतिविजय ११५, ११८ मोहनलालजीमुनि ११६ मोहनविजय ११३, ११६, ११८ यक्षदिन्ना १२३ - अकाराद्यनुक्रमः २९६ पत्राणि नाम पत्राणि यक्षदेवसूरि १८८, १८६, १६० यता १२३ यशवन्तविजय ११६ चशःसूरि २०६ यशोदेव २६, ३३,५१,५२, १२८, १४५, १५२, १६८, १६६,२०५, यशोभद्र १५, २३, २५, २७, ३३, ३४, ४२,४३, ४४. ५४, १२२, १२६, १४०, १४४, १४५, १४६, १५३, १६४,१६८, २०५ यशोमित्र २१, १३६ यशोविजय १०५, १०६, १०७, १०६, ११०, १११, ११८ याकिनी १५२ रक्स ६,१० [आर्य] रक्षित (रस्त्रिय) ४, ८, १३, १६, १८, २३, ४७, ४८, १४० रंगविजय ११६ रत्नम (प) म ४०, १७७, १७८ १७६, १८५, १८६, १८७, १८८, १२६, १६० रत्नमंटन ३६ रत्नविजय ११६ रत्नविजयसूरि ६६, १०६ रत्नशेखररि ३६, ६४, ६६, ६७, १३३, १४६, १५६, १५७, १७२ रत्नसूरि १६२, १७६ रथनेमि १२३ रथमित्र २२, १४८ रथसुत १४० रयणसूरि १०१ रयणसेहर६३ रविप्रम (प्पह) २६. ३३, ५१, ५२. १२८, १४५, १५२, १६८ रविमित्र (त्त) १५, २१, १३९ रविवर्धन १४८, १६२ रविसागर ११६ रहस रहमित्त १५ रहसुत (अ) १५, २२ राजचंद्र २०४ राजप्रिय ६७ राजरत्न १०६ राजवर्धन ४० राजविजयसूरि६९, १०६ राजसागर ११०, १६२ राजसूरि १०६, ११३ राजेन्द्रसूरि १७६ रामविजय ११८ रुद्रदत्ताचार्य १८ रूपचन्द्र १६६ रूपविजय ११०, ११२, ११६ रेणा ४, १२३ रेवइनक्खत्त १३ रेवइगित्त १५, १६ रेवति (ती) मित्र १७, १८, २२, २३, २४, ४७,५१, १४० रोहगुत्त ४ रोहण ४,५ २२०. पट्टावली--समुच्चयः नाम. पत्राणि. पत्राणि नाम. विक्र(क)मसूरि २६, ३३, ५०, १२८, १४४, १५१, १५२,१६७ विजय (विजा):६६, १५७, १७२ ।' लक्ष्मीभद्र ४०, ८७, १६५ लक्ष्मीविजय १०६, ११६ लक्ष्मीसागर ३६, ६७, ६६,.१३३, १४६, १५७, १६२, १७२ लक्ष्मीसूरि ११३, १७३ लखमण १३ लच्छीसायर ६५ ...: लब्धिचन्द्र २०४ लब्धिरत्न १०६ लब्धिसमुद्र ६७ लब्धिसागरगणि ७७ लाभविजयगणि १०६: लोहिच १४ वइ (य) र ३, ८, १३, १५, १६, ४६ वइ (य) रसेण ३, ८, १८,२१, २४ चईसाह १५ वजसेण ४७ वज्रदिन १५१ वज्रसेन ८, २६, ३३, ४७, ४८, ५१, १२५, १४०, १४४,. १५१, १६६, १६७, १८६ वनस्वामी ८, १७, २३, २६, ३३, ४६,४७, ४८, ६०, १२४, १२५, १३४, १३८, १३६, १४०, १४४, १५०, १५१, १६६, १८६ वणिकपुन १४० वणिपुत्त १५,२१ . . वर्धमानसूरि १६६ वल्लभगणि ६१, १७६. विजयचन्द्र ५७, ५८, ५६,, १४५, १५४, १५८, १६८, १७० विजयशेखर ४० विजयसिंहसूरि २७, ३४, ५६, १३०,.१४५५,१५४, १७०, १६८ विजयेन्दु २८, ३४ विजाणंद १६; १६५ . विणयमित्त १६, विण्हु ६, १० विद्यानं (जाणं) दसूरि २८, ३४, ३५, ५६, १४५, १:५५, १७०, १७१ विद्याविजय ८१,८७,८६, १०६ विद्यासागर ७०, १३४, १५८, १७३ विनयचन्द्र ५५ विनयमित्र २४. १.४१ विनयविजय १६, १०५, ११५, ११८, ११६, १३६, १४४, १४७ विनयविमल १०६ विनयसिंह ४० विनीतविजय १०७ विबुधप्रभ २६, ३३, ५१,, १२८, १४४, १५२, १६७, विबुह ५१ विमलचन्द्र (द) ३३, ५२, ५३, १२६, १४५, १५२, १६८, २९.४ अकाराद्यनुक्रमः २२१ नाम पत्राणि नाम पत्राणि विमलग्रम ३०,३४, ६२, १४५ विमलम्जिय १६२ विमलहर्ष ७३.७७ विमलेन्दु २६, ५२ विवेकचन्द्र २०४ विवेकसागर १० विशालगज ३६ विप्रगुरि १६८ बिहन्नु ? वीरधवल ५६ चीरकृतशेखर ४० वीरविजय ५६, १५, १८, ६६, ११३, ११६ वीरविमल ११६ वारसूरि २६, ३३, ४९, ५० ५२, १२८, १४४, १५१, १६७ शान्तिविजय १०६, १०६, ११६ शान्निसागर ११६, ११७ शान्तिसूरि ५४, १५३,१६८, २०५ शिवचन्द्र २०४ शिवमूर्ति ४० शिवरत्न १०४ शिवविजय ७७, १७६ शिवश्री १८ शीलभद्र ४० शीलमित्र २४,१४१ शीलविजय १०६ शुभरत्न ३६, ६७ शुभविजय ११३, ११४ शुभविमल ८७ शोमनमुनि १६८ श्यामार्च १७, २३, १६, १४० १५०, १६८ श्रीदत्त २१, १४० श्रीधर २२, १४० श्रीपति [ऋषि] ६८, १३७, १५७, १७२ श्रीप्रम २१, १३६ श्रीविजय ११६ श्रुतशेखर ४० संगत (य) मित्त १५, २२ संगतिमित्र १४० संघपा (वा) लिअ६, १० संघसाधु ६७ सच्चमित्त १५,१६ संडिल्ल १०, घट्ट ६,१२,४८ वृद्धदेवमूरि २६, ३३, ४८, ४६, १२६, १५१, १६७ वृद्धवादी १५,४६, १६६ वृद्धिचन्द्र ११५, ११७ वृद्धिविजय १११ वृद्धिसागर १६२ वेना (रणा)४, १२३ वैशाख २१,२२, १४० शम्यंमत्र १५, २३, २५, ३३.४२, ४३, १२२, १४०, १४४, १४८, १४६, १६४ शांडिल्य १७ शान्तिचंद्रगणि ४०, ७५, ७६ २२२ पट्टावली-समुच्चयः पत्राणि नाम नाम पत्राणि सत्कीर्ति २२, १४० सत्यमित्र १८,२१, २४,५१,१३६ १४०, १५२, १६७ सत्यविजयगणि १०५, ११७ सत्यशेखर ३६ सन्तिसूरि १८ संतिसेणि ७ संतोषविजय११६ समरचन्द्र २०४ समीय [आर्य] समुद्र (इ) १३, १७, २६, ३३,५०,५१,१२८,१४४,१५२, १६७, १८४ संप (पा) लिम, १० संभूत्र (य) विजय २, ३, ४, १२, १५, ४२ संभूई १६ संभूति (त) विजय १७, १८, २३, २४, २५, ३३,४२,४४, १२२, १४; १४४, १४६, १५२, १६४ सरस्वतीसाध्वी १५७ सर्वजयदेवसूरि १६ सर्व(व्व)देवसूरि २७, ३४, ५३, ५४, ५७, १२६, १४५, १४७, १५२, १५३, १५४, १६८ सहजसागर ११६ साई १२, १६६ सांडिल्य ४३ साधुरत्न ३२, ३४, ६४, ६५, १४५ १५६ साधुराज ३६ सामन्ज १२, १६ सामंतभद्र (६) २६, ३३, ४७, ४८, ४६,५७, १२६, १४४,१५७ १५१, १५४, १६७ [आर्य] सिं (सी) ह ६, १०, १३, १६, १८, २४,१४० सिं(सी)हगिरि ३, ७, २६, ३३ ४६, ४७, १२४,१३८, १४४, १५०, १६६ सिंहदेव ४० सिंहमित्र २२ सिंहविमल १३७ सिं.(सी) हसूरि ५१, ८४, ८५,८६ ६३, ६६,६७,१०४, ११३, १४६ १६१, १७५ सिंहसेनसूरि २०५ सिमभव २, १२, १५, ४२, ४३ सिद्धत्थ १५ सिद्धसूरि १७६,१८८, १८६,१६०, १६१, १६२, १६३, १६४ सिद्धसेन १७, ४६, १५०, १६६, १८३ सिद्धार्थ २२, १४० सिद्धिरत्न १०६ सिद्धिविजय १०६ ११४, ११५ ११८ सिरिट्ट४ सिरिदत्त १५ सिरिधर १५ सिरिपह १५ अकाराद्यनुक्रमः २२३ पत्राणि पत्राणि सूरमित्र (त) १५, १४० सेना (णा) ४,१२३ मिश्र ७ सेन (ण) सूरि ७२, ७५,७७,७८, ८२, ८३, ८८ ६०, ६१, १०३, १०६, १३८, १४६, १६०, १६२, १७४ सोम ५ सिवभूइ ८, १० सीलमित्त १६ सुमोति (त्ति) १५, १४० सुगुप्त १५१ (४७) मुट्टिय ३,४,६,७,४४, ४५ सुधानन्द ६७ सुंदरविजय ११०, ११५ सुप्पडिबद्ध ३,४,६,७,४४ मुप्रतिबद्ध २५, ३३.४४, ४५,४६, १२४, १४४, १५०,१६५ सुमंगल १५, २१, १४० सुमतिगणि ११० सुमतिरत्न १०९ सुमतिविजय १०७, ११२, ११६ सुमतिशेखर २०६ सुमतिसाधु (हु) ६७, ६८, १३३, १४६, १५७, १७२ सुमतिसुंदर ६७ सुमि(म)णभ६४ मुमिणमित्र (स) १६, २४ सुरसेन १५, २१ १३६ सोमचारिजगणि ६८ सोमजय ३६, ६७ सोमतिलक (ग) ३०, ३१, ३४, ३७, ५७, ६२, ६३, ६४, १३२, १४५, १५५, १५६, १७१ सोमदत्त ३ सोमदेव ३६ सोमप्रभ (पह)२७ ३०,३४,३७, ५६ ५७, ६१, ६२, ७०, ८२, १३०, १३२, १४५, १५४, १५५, १५८, १७०, १७१ सोमविजयगणि ७७, १४७, सोमशेखर ४० सुव्वय १० [आय] सुस्थित २५, ३३, ३४, ४४,४५, १६,५७, १२४, १४४, १३७, १५०, १५४, १६५, [आर्य] सुइस्ति (स्थि)२, ३, ४, ५ १२, १६, १७, २३, २५, ३३, ४४ ४५, १७, १२३, १२५, १४०, १४४, १४६, १५०, १६५ सरदिन्न १५, २१, १४० सोमसुन्दर ३२, ३४,३८, ३६, ४०, ६३, ६५, ६५, ६६, १३३, १५५) १५६, १७२ सौभाग्यविजय ११६ सौभाग्यसूरि ११३ स्कंदिल २३, ४७, १४० स्थावर १४० स्थिरविजय ११० .
२२४ पट्टावली-समुच्चयः नाम पत्राणि । नाम पत्राणि स्थूलभद्र १७, २३, २५, ३३, ४, ४५, ७०, १२३, १४०, १४, १४६, १६५ स्वप्नमित्र १४१ स्वयंप्रम १८४ स्वरूपसागर ११६ खाति (मि) १७, ५६, १६५, १९८ हत्थि ६, १० हंसराज १६३, २०५ हंसविजय ११७ हरखमुनि ११८ हरशेखर २०६ हरिदत्त १८४ हरिभद्र (६) १८, २६, ५१, ५४, ५५, १५२, १६७, १६६, २०५ हरिमित्र (त्त) १६, २४, १४१ हरिसय १५ हरिस्सह २१, १३६ हर्षकीर्ति ४० हर्षचन्द्र २०४ हर्पभूषण ४० हर्षमूर्ति ४० हर्षविजय ११५, ११६ हर्ष विमल १०६ हर्षवीर ४० हर्पसिंह ४० .. हर्षसेन ४० हानाऋषि ६८, १५७, १७२ हारिल १६, १८, २४, १४० हिमवन्त १३ हीतविजय ११३ . हीररत्न १०६ हीरविजयमुनि ११४. हीरविजयसूरि ४१, ७०, ७१,७७, ७८, ७६, ८०,.८१, ८३, , ८६, ६०, ६१,. १०२, १.१०४ १०५, १०६, १०६, ११३, ११६, , १३८, १४६, १४७, १५८, १५६; १६०, १७३, १७४ । हेतविजयं ११६, ११८ हेमचंद्रसूरि ५६, ८५, १३१, १४२ १५३, १७०, १६१, १९८, २०४, हेमविजय ८७, १०७, ११५ हेमविमल ६७,६८, ६६,८७, १३४ १४६, १५५, १७२ हेमहंस ३६ .. - अकाराद्यनुक्रमः २२५ 0 षड्दर्शन-शाति- गच्छ-फुलानां नामानि ।। नाम पत्राणि पत्राणि नाम अखई ६६, १६२, १६७ अग्गिवेसाअण १, २, १२ अज्जवेडिय ५ अंचल २०६ अंतरिजिया ६ भाभिजयन्त ६ अव्यक्त ४४, १४६ अष्टकोटी १०४ अहमदशाह फीरका ११६ आईचणा १८६ प्रागडीया २०३ आगमिक (ग)५६, १७०, २०३ श्रागमियक १५४ आजीवक १६७, १६८ आंचलिक ५६, १५४, १७०, २०३ आणंदसूरसंघ १०३ आत्ममति २०३ प्रादित्य १६० आनंद १६० आनंदसूरि शाखा ११३ भानपुरा २०३ आर्यसमाज ११६ आशावसन १३० इक्ष्वाकु १२०, १३० इंदपुरग ६ इसिगुत्ति ६ इसिदत्तियं ६ इसिपालिया ७ २६ उकाउआ २१३ ऊकेशजाति ७१, १५८, १६०, १६१, १६२, १७४ उकोसिय ३ उच्चानागरी ७ उच्चैनांगर १६ उछितवाल २०३ उडुवाडियगण ५, ६ उढवीया २०३ उत्तरबलिस्सह ४ उढुंबरिजिया ५ उद्देहगण ५ उ (औ) पके (को) श १७८, १७६, १८६, १८८, १८६, १६० १६२, २०५, २०६ उपाध्याय पाक्षिक ६३ उल्लगच्छ ५ एलावच २,४, १२ अोकेश १७७, १७६ ओछतवाल ६१ ओसवंश १०४, १११, ११५ प्रोसवाल २०३, २०६ श्रौदिच्य ११३ श्रौष्ट्रिकमत १७३ ककुदाचार्य संतानीय १७६ कच्चायण २, १२ कटुक ६६, १३४, १३५, १२७, १७२ पट्टावली-समुच्चयः पत्राणि नाम पत्राणि कदुत्रा २८३ कएहसह ५ कनऊजया १६ कनक ११० कपुरसीया २०३ कंबोजा २०३ कर्णाट कलश १६० कल्लोल १६० कवला ५६ कादिया ६ काछलीया २८३ काजा २०३३ कानविय ६ कायस्य १३७ कासव १, २, ३, ५, ७, ८, ६, १०, ११, १२ कासवजिया ६ कुन्न ११६ कुचडीत्रा २०३ कुच्छ ८, १० हागपुरा २८३ कुत्रा २०५ कुपावत २०२ कुवेरा (री) ७ कुमार १६० कुंभ १६० कुंभट १६ कुर्चपुरगच्छ ५४, १६९ कुलद १८९ कोडवाणी ४ कोडाल६ कोडिन्न १ कोडिय ३, ६, ७,४४ कोडीवरीसिया ४ कोयला २०३ कोथी (थों) पुरा २०३ कोरडीया ११७ कोरंटा (टीय) २०३, २०५, २०६ कोरंडवाल २०३ कोसंविधा ४ कोसिब ३,४,७,८, १०, १२ कौटिक २६,३३, ४५, ५७, १२४, १४७, १५०, १५४, १६५ क्षपणक २६,५० खंभाती २०३ खरतर ५६, ६४,७०, ११, ११०, ११६, १५४, १५८, १६६, १७३ वृहत्तरतर १७६, १६६ खीमसरा ८७,१७४ समिलजिआ६ सोमाणवंश ५० (१२८) गंगेसरा २०३ गच्छपाल २०३ गणिय ६ गंवव्व १८ गंवारा २०३ गर्दभ १६७, १६ गवेधुश्रा ५ गादिया १६१ अकाराद्यनुक्रमः २२७ नाम पत्राणि नाम पत्राणि गुवेलीया २०३ गोदासगण ३ गोय (अ) म १, २, ३, ४,७,८, ६, १०, १२ गोयमन्जिा ६ गोशालामत १७६ घोघा (घ) रा २०३ घोपवाल २०३ घोपा (८), चंदनोगरी ४ चंद्रकुल २६, ४८, १६६, १६८, १६६, १७१, १६० चंद्रगच्छ २६, ३३,४८,५७, १२६ १४७, १५१, १५४,१६७, २०५ चन्द्रवंश १५४ चंपिजिया ६ जालोरा २०३ जीतहरा २०३ जीरावला २०३ झाला ८५, ६४ ठकर ८२, ६२ डिडम १८६ ढुंढक १०४, ११२, ११५, ११६ ढिया १७६ तपगण १३८, १४६, १७० तपा (व) गण (गच्छ) २७, ३१, ३४, ३५, ३८, ४१, ५७, ६३, ७०,७१,७७, ७८, ८०, ८२, ८३, ८४, ६३, ६८, १०१, १०२, १०३, १०५, ११६, १३०, १४१, १४७, १५४, १७०,१७१,१७३, १७५, १६६, २०३ [विजय] देवतपा १४७ नागपुरीयतपा ६६, १७२ नागोरीतपा १५७ वृहत्तपा ३८ महातपा.८३,६१, ६२, १०४, १६१, १७५ तपोगच्छ ११३, १७३ तागडीया २०३ तातहड १८६ तामलित्तिया ४ तावसी ३, ७. तिलक १६० तुगिय १२ तुगियायण २,३ चामुन्डा १११ चारणगरण ५ चारवेडीया १८६, १६३ चिंचट १८६, १९२ चितो (त्रो) डा २०३ चित्रवाल २०३ चैत्यवासी ५४, (१५१), १६६ चैत्रवालगच्छ २७, ५७ छाजड २०६ छापरिया २०३ जगायन २०३ नयन्ती ३,८ जसम६६ जांगला (डा) २०३ २२८ पट्टावली-समुच्चयः नाम पत्राणि नाम पत्राणि तूवर २०२ है . तेरा (रह) पंथ ११० ११२ २०१, तेरासिय ४ त्रि () राशिक ४७, १५० त्रिस्तुतिक ६८, १५७ थंभणा २०३ थिरापद ५४, १५३ दकाठा २०३ दासवि (6) आ २०३ दासी खब्बडीया ४ दिगंवर ४८, ५५. ५७, ८०, ८६, १३०, १३२, १५१, १५३, १६०, १६७,१७०,२०६ दिग्वास १२८ [नव नंद १७,४६,१६४, १६६, १६७, १८, २०० नंदिज ५ नरावत २०१ नहार ५६, २०१, २०४ नाइलकुल १४ नाईला (ली) ३,८ नागऊला २०३ नागभूय ५ नागर १२३ नागराल २०३ नागेन्द्र २६,४८,१६६, १६०,२०३ नागोरी २०३ नाणानाल २०३ नि (ग्गं)थ २, ३३, ४५, ५७, १०५, १३६, १४७, १५०, १५४, १६५ निर्वृति ४८, १६६, १६० नीगम २०३ नैयायिक ८०,८६ पउमा८ पंचवलहीया २०३ पंडुवद्धणिया ४ पएहवाहणियं ७ परमार ८६, १७ परीक्षक ८२, ६२ पल्लकीय २०५, २०६ पल्लीगच्छ २०५, २०६ पल्लीवाल २०३, २०५, २०६ पाईण (न)२,३, १२ दुज्जन्त १० देवकरा २०३ देवडै २०१ देवशाखा १६० देवसुरसंघ १०३ देशलहर १८६ देशाई ६६ द्विक्रिय ४५, १५० द्विवंदनीक २०३ धनेरीया २०६ धर्यघोप २०३, २०५. धाकड २०५ धुंधुका २०३ धोपा ८८, (८) नगर कोटिया २०३ . , .
प्रकारानुनमः २२६ पदागि पत्राणि पाटनीना २.३ बग्नेया २०३ पाकिम १६१ पारिवालयं, पादचन्द [ग] (६६) ७२, १५७. १५८, १७२ (२-३)) पारगाम संतानीय १४ सारापरल १४४, १७८ पलिस्सहगमा ४ यापरणा १८ वारंजा २०३ यावरावाल २०३ चार्वासटोला १०४ बोजा [गन ] ७२, १५७, १७२, पानगापुन २०३ पनिार पु (5) एगपनिमा ५ पुनगीगागच्य १६६, २०३ गुम्मानितिनं ५ पानलमय १४०, २०३ पूगिनाराधिपः १६६ पोदरदीया पामिला। पोगणित २०० पागनायर ५५, १५३ प्रयोन [यंश] १६६ प्रयातनाचार्यगच्छ २०५, २०६ प्रम १६० प्रनायक २७,१८ प्रागवंश १७२ गृहत्येमशाला १६६ वृहद्गच्छ २७, ३४, ३५. ५३, १२६, १३०, १५३ बोकडीवा २०३ बाटिका १८ बोरसदा २०३ चौद्ध (४७) २०, ८, १२५, १६६, १८४, १६८, २००, प्रहाद्वीपिक ५० ब्रहासमाज ११६ प्रापणीया २०३ भटनेरा २०३ मणशाली १०० (भं०) अंडावत २०५, २०६ भदद्गुत्तियं ६ भदद्जसियं ६ भक्षिजिया ६ भन्अच्छा २०३ भाद्र १८६ भारद्दाअ १,५ भावराज २८३ भीनमाल २०३ प्रागयट १११ बछावन २०१ बंमदीवग १३ वंभदीविया मलिनं.
२३० पट्टावली-समुच्चयः नाम पत्राणि नाम पत्राणि भीमसेन २०३ भुडासिया २०३ मईपत्तिा ५ मगरकोटी २०३ मंगोडी २०३ मन्जिमा ७ मजिमिल्ला ७ मंडोवरा २०३ मलधार २०३ महुकरा २०३ माढर २, ३, ४,७,६, १०, १२, १६ मागवगरण ६ मांडलीया २०३ मालिज्जं ५ मासपूरिआ ५ मीमांसक ८०,८६ मुडा (झा) हरा २०३ मुरंडवाल २०३ राज १६० राठोर १६ रामसेनिया २०३ रुद्रपालीय २०३ रुद्रोलीया २०३ रेवइया २०३ लक्ष्मीभद्रीया ८७ लघुशालिक ५८, १५४ लघुश्रेष्ठि १८६ लुङ्का [मत] ६७, ६८, ६६, ७०, ७२, ७८,८४, १५७, १७२, १७६, २०३ लुपाकमत ७२,८४, ६३, १०४, १०६, १३४, १३६,१३७, १५८, १७४ वइरी ७,८ वग्धावच ३, ६,७ वच्छ २,८,११,१२ वज्जनागरी ५ वज्रशाखा २६, ४७, १५०, १६६ वड (ट) गच्छ २७,३४, ३५, ५३, ५७, १४७, १५२, १५४, १६८, २०३, २०५, २०६ वडोदरीया २०३ वत्थलिज्जं ५,७ वनवासी [गच्छ] ३३, ४७, ४८, ५६, ५७, १२६, १४७, १५१, १५४, १६७ वर्धन २०६ वल १८६ मुहता १६४ मेडतिया २०१ मेरु १६० मेहलिज्जिा ६ मेहिय ६ मोरात १८६ मो (मु) रिअ १७,४६, १६६, १६७ मौर्य १६७, १८, १९६, २०० रंग १६० रजपालिया ६ रत्नशाखा ६६, १६० अकारायनुक्रमः २३१ नाम पत्राणि नाम पत्राणि शिशुनाग १६६ शृंगवंश १९८, २०० शेखर १६० शैव,८०, ८६, १६६, २०० श्रीमाल (ली) १११, ११२, १८६, २०६ वाघेरा २०३ वाघेला २०२ वाणिज्ज ५,७ वायगवंस १३ वायड २०३ वासिट्ठ १, २, ३, ४, ६, ८, ९, १० वासिट्ठिया ६ वा (4) हडीआ २०३ विक्रमवंश १६६ विजयशाखा ११६ विजामत ६६, १५७, १५८ विजाहरा २०३ विज्जाहरी (२)७ विद्याधर ४८, १६६, १६० विधिपक्षगच्छ ११२ विपिनवासी २६ विमलशाखा ११६ विरिहट १८६ विशाल १६० वृद्धशालिक ५८, १५४, १७० वृद्धोपकेश ८, ६१, ६८ वेगडा २०३ वेदान्ती ८०, ८६ वेसवाडिय ६ वैद्य १६४ वैद्यमुहत्ता १६४ शक १६६, १६८, १६६ शान्तिसागरमत ११६, ११७ शांभवशासन १२५ शिवशासन १९० श्रेष्ठी १८६, १६३, १६४ श्वेताम्बर २६, २०६ पड्कोटी १०४ षीमसराह षोमाण १२८ संविज्ञ ६८, ६६, ७०,७३, १५७, १७२, १७३, १७४ संवेगमत ११२, ११४, ११६, ११७ १७२ सग १६७, १६६ संकासिय ५ समुद्र १६० संजना (ती) २०३ साकर २०३ सागरपाक्षिक ६३, ६५ सागरमत ६४, ६५ सागरशाखा ११६, १६० साचोरा २०३ सांडेरवाल २०३ सामुच्छेदिक ४५, १५० सार १६० सार्द्धपौर्णिमीयक ५६, १५४, १७० सार्धपुनमिया २०३ सावत्थिया ६ २३२ पट्टादलो- समुच्चयः पत्राणि पत्राणि सावध सिद्धपुरिया २०३ सिद्धान्तीया २०३ सुचंती १८६ सुत्तिवत्तिया ४ सुन्दर १६० सुरंडवाल २०३ सुराणा २०३ सुबह सेणिया ७ सेवंतरिया २०३ सोइरिया ४ सोपारा २०३ सोमभुइय ५ सोरट्ठीया ६ सोरठीया २०३ स्वामिनारायणमत ११६ हंस १६० चाची २०५ हत्यलिन्न ५ हारिअमालागारी ५ हारिायण १ हारित (य) ५, १२, १७ हालिनं ५ हीसारीया २०३ D गृहस्थानां नामानि ।। पत्राणि पत्राणि अकबर ७२, ७३, ७८,८३,८८, ८६, ६१, १०२, १०३, १३८, १४६, १५६, १६०, १७४, २०१ अजय १६६ अजातशत्रु १६८, १६६, २०० अनंगपाल २०१ अनुरुध्ध २०० अवलफनल ७३, ७६' अभयकुमार अमरचंद्र ११८ अर्णिका १६४ अलावदी २०१ अवन्तीवर्धन १६७ अवन्तीनेणी १६७ अशोक १६६, २०० अहन्मद २०१ शामराज ५२, १५२, १६८ आर्पमि १२० यालिग ६२ . इन्तसादि६५ इन्द्रजी ८१,८६ इन्द्रपालित २०० इबर १६१, १६४ इश्वरी ४८, १६६ . .
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२३४ पट्टावली-समुच्चयः नाम पत्राणि पत्राणि गणेश ११२, ११५ गर्दभिल्ल १७, ४६, १५०, १६६, १९८, १६४ गलराज ७१, १३६, १५८ गुलाववाइ ११४ गोपालक १६७ गोवल ६४ गोविन्द ३६ गौतम १३७ चंडपज्जोत्र १७ चतुरा [दे] ६४, १७६ चतुराशाह १७६ चंद्र ४८, १६६ चंद्रक १६१ चंद्रगुप्त १६८, १६६, २०० चन्द्रचूड़ १८४ चन्द्रपाल ८३,६३ चंद्रभाण १३७ चंपकराज ६६ चित्रांगद २०२ चिन्तामणि ८०, ८ जयतागर १६३ जयमल्ल ८५, ६३, १६१,२०१ जयसिंह ३६, ५५, १५३, १७० जसु १०१ ज (जि) हांगीर ८३, ६१, ६२, १०४, १६१, १७५ जा(या)मराज ८१, ६०, ६४, १६३, २०२, जावड (डि)४७, १५१, १६६ जिणदास २०६ जिनदत्त ४८, १६६ जिनभद्र ५७ जियाजी ६६ जिवनदास ११४ जीवोजि १६२ जोधइराव २०१ झं (झां) मरण ३६, ६०,१५५ झमकू ११२ झावा १६३ ठाकुरसिंह १६३, १६४ तुणसिंह ७०, १५७ तेजपाल ७६, ८४,१७०, २०२ त्रिभूवन ११६ थान ८७,६७ थानसिंग ७५ थीराशा १६० दधिवाहन १६६ दफरखान ६६ चैनसंघ २०२ छाडा २०५ जग १६३ जगतसिंह ८५, ६४, ६६, १०४, जगदीश्वर ११३ जगसींग १६१ जनमेजय १८२ दर्पण १६७ दर्भक १६६ दर्शक १६४ जम्यूकुमार १२१ अकाराधनुक्रमः २३५ पत्राणि नाम पत्राणि दलपतभाइ ११४ दलपतसंग २०२ दलिचंद ६६ दशरथ १६३, १६६ दानीयार ७५ दुदैजी २०२ दूजणमल्ल ७५ देदा २०२ देदागर १६३ देवचन्द्र ८६,६२, ६५,११७,१६२ देवराज ६६, १५६ देववर्मा २०० देशल १६२ दोलतराम १६४ धनजी ६६, १०० धनपाल ५४, १५३, १६८ धनाइ ८१,८६ धन्वन्तरी ३६ घरण ६६, १५६ घरमसिंह १६३ धर्मदास १११ धादित्य १७ धारिणी १६३ धीरा १ ध्रुवसेन १६, १८३ नत्थु (थ) मल १०४, १६१, १७५ [नव नंदु १७, ४६, १६४, १६६, १६७, १८, १६६, २०० नंदिवर्धन १६६ नभस्सेन १६६ नरवाहन १७ नहपा (वा) ण ४६, १६८ नहसेन १६७ नागदासक २०० नागिल १४२ नागेन्द्र ४८, १६६ नाथी ७१, १५८, १७४ नाभि ६३, १३० नायकदे १०४, १६१, १७५ नारायण १३७, १८६ नाहड १८,४६, १७०, २०१ निर्वृति ४५, १६६ नेमिदास १०१ पबनाम १२२ परदेशी १८४ पादुजी ७५ पानाचन्द ११२ पानु ११४ पालक(अ)१७,४६,१६६,१६७,१८ पुरणचंद ५६, २०१, २०४ पुरुषोत्तम १२४ पुष्प (प्य) मित्र १७, १६६, १६७ १६८, २०० पुसमित्त ४६ पूजासाह ११२ पृथ्वी १२० पृथ्वीधर ३६, ६०, १३२ पेथडदेव १५५ प्रतापसिंह १०२ प्रथीराज २०२ २३६ पट्टावली-समुच्चयः पत्राणि नाम नाम पत्राणि प्रद्योत १६६ प्रभव १६३ प्रह्लादन ३६ प्रसेनजित् १६६ प्रेमराज १६४ प्रेमाभाइ ११३, ११७ फरंगीपातशाही ८३, ६३ फैजी ७६ बन्धुपालित २०० बलभद्र १६७ वलमित्र (त) १७, ४६, १६६ १६७, १९८, १६६, २०० बाण ४६, १५१, १६७ वांबिभट्ट ६७, १३३ वाहड ५६, १५४, १७० वाहुवली १३० बिन्दुसार १६६, २०० बिम्बिसार१६६,२०० बृहद्रथ २०० भईसाक्ष. १६१ भगीरथ १२६ मगुभाइ ११४ भद्रसार १६६ भरत (ह)७१, १३०, १३६ १८३ भाइल्ल १७, १८ भागबाइ १६२ भानुमति ६६ भानुमित्र (त्त) १७, ४६, १६७, १६८, १६६ भीम ५६, १५५ भीमजी १११ भीमसिंह ५६ भीमसेन १८४ भोजा २०६ भोटा ८१,६० भ्रमादे १५८ मणीप्रभ १६७ मंडलिक ३६ मनी ६६ मयूर ४६, १५१,१६७ मल्ल [साधु] ८२, ६२, १०४ मल्लक १६० महादेव ३६ महानंदी १६६ महापद्म १६८, १६६ महासेन १२६ महिमद ७१, १५८ महेशदास ६६ माणेकदेवी ११२ माधा २०६ मानसिंह ७४, १५६ मान्धाता २०२ मालजी ८७ मालदेव ७२, १३७ मिश्रचिन्तामणी ८०,८६ मोरमोजा ६४ मुक्तावाइ ११८ मुन्नीलाल २०४ मेघवाइ ११७ भामोसा १५८ अकारानुक्रमः २३७ पत्राणि पत्राणि मेघराज १०६, १६४ मोतीचन्द ११४ मोतोशा ११३, ११७ मोहनलाल ६६ या (जा) म (८१)(६०) ६४, १६३ युधिष्ठिर १८० रतनपाल २०५ रत्नचुड १८४ रत्नशी सोनी ८४ रलीात ११३ राजिया ८१, ६० रामचंद्र २, १८४ रामजी ७१, १५८ रामदास ७६ रामशाह ७२ रायचंद्र ६६, १०० रायसंघजी २०१ रावण १८४ राष्ट्रवर्धन १६७ रुक्मिणी १२५ रूपचन्द्र ११२ रूपसिंह ६६ रूपा ११, ११५, १६० लक्ष३६ लक्ष्मणकुंवर १५८ लखमल २०५ लहुआ ८१६० लाक्षराज ६४ लाडकी १०२ लाडकुमार १११ लालचंद्र ११२ लुका [ लेखक] ६७, १५७, १७२ लुगकरण २०२ लोलागर १६३ वंशक १६६ व (वि) जिया ८१,६० वज्रकुमार ८२ वनमाली १२८ वनरोज ५२, १५२ वनांदे १११ वराह २५, ४४, १६४ वर्धमान ६६, १०१ वसुदेव ८५ वसुभूति १२०, १३७ वस्तुपाल ३५, ५८, १५५, १७०, २०२ वात्सी १८ वारिसार १६६ विक्रम १८ विक्रममित्र २७,३२, २००० विक्रमादित्य १७,४६, १५०,१६६, १६६, २०० विजकोर ११३ विजय १५८ विजयचंद्र ५८ विद्याधर ४८, १६ विधिसार १६६ विंध्यसेन १६६ २३८ पट्टारली, समुच्चयः । -- पत्राणि नामा पत्राणि . - सग (क) ४६,१९७ सगतसिंह १९४ संगत २०० संग्राम ५६, १५५ सत्यश्री १४२ सदारंग ७५, १५६ सप्तति २०० समर १६२ संपदि २०० संप्रति २५, ४५, १२३, १४६, १६५, २०० •- विमल १५३, १६८, १९२, २०२ ' विमलभाइ ११८ विमलवाहन १४३ वीकइराव.२०१ वीर १०१ वीरचंद १०५ वीरधवल ५७, ५६, २०२. वीरनारायण २०२.. वीरभद्र १६३ वीरमदे १०५, २०१ वीरमदेवी १०५ वीराबाइ १११ शकटाल ४४ शकवर्ण १६६ शतधन्वा २०० शतधर २००: शाक १७, १८ : शातवाहन १९८ शालिशूक २०० शाहिनृप १९७, १८. शिवगण १६२ शिवराज १०५. शिवसाधु-१६५ शिशुनाग १६६. शेखु (ख) जी ७५, ७६ शोक १६६ श्रीकुमार १८४ श्रीपाल १०६, १०८, १.०६.. श्रीपुंज १८४ श्रीवन्ती १६ .- भ संभव ६३ सलेम ६६, ८३ सवलसंग २०२ सवाइजेसंग २०२ सहज १६२ सहजू८४, ६३, १६१ सहस्रमल्ल ६६, २०१ सहस्र (स) वीर ८२, १२, १६१ . १६३ साजन ६३ सारंग १६३ सारंगदेव ६० सारंगधर १६२, सावलक१६४ साहिबदे ८६, ६, १६२, १६४ सिद्धराज १५३, (१७०) सिद्धार्थ १२० सिरदारसिंह १६४ , अकारायनुक्रमः २३४ पत्राणि नाम पत्राणि सिवगण ८ सीवकरण २०२ सुगुरण ६६ सुज्येष्ठ २०० सुनंदा १२५ सुमुख १४३ सुयशा २०० सुरत्राण ७६ सुरसुंदर १८४ सुलतानजी ७६, १५६ सुसुनाग २०० सूरजमल १६४ सूरा ८१,६०, १६, १६०, सूरारतन १६२ सूरासाचन १६२ सेनजित् १६६ सेरसंघ २०२ सोनागर १६३ सोम ३८,८६ सोमक १८६, १० सोमशर्मा २०० सोमाशाह ८२, ६२ सौभाग्यदेवी १३७ स्थानसिंह (ग) ७२, १३७ स्वाति १८ हठीसिंह ११३, १६४ हमीर २०१ हरिसिंह १६४ हलायुध १२४ हीरादे १६२, १७६ हीरानंद १६, १७५ हीराभाइ १६२. हेमराज ८१,६० सेनांगज १६ . २४० आबू २०२ पट्टावली-समुच्चयः देश-नगरादीनां नामानि । नाम पत्राणि पत्राणि नाम अकबराबाद २०१ आघाटपुर ५७,६४,१३० अकबरपुर ८१,६२, आनन्दपुर १६, १८३, १६८ अघारग्राम ११४ अघोटानगर ८५... आरासण ५५,८१, ८४, ६३, १०४ १५३ अजमेर ७३, ७४ २०१ अजीमगंज २०४ आहडनगर १३० आहल्लणपुर ६६ अणहिल्लपुर ५२, ५५, ६३ ६४ इलादुर्ग ६६, ८३, ८४, ६२, ६३,. १०२, १०५, १५२, १५३,. १६८ ६६, १०४, १५७ १७०, १६३ ईडरदुर्ग ८२, ६१, १६०; १६१ अभिरामाबाद ७५, १५६ उजयंत ३६, ६०,७१,१३२, १५५), अयलपुर १३ १५८ अयाध्या ७३ उज्जयिनी ३६, ४६, ५७, ६१, ७०, अर्बुदाचल २७, ५३, ७६, ७८, ८६, १३१, १५०,१.१६६, १६७, ८१, ८४, ६०, १११, १५२, १६८ १५३, १५६, १६८, १५०, १८१ उज्जोणि १७ १६०, १६२ उदयपुर ८५, ६३, ६४,१६१ १६२, अलका ३६ १७६ २०१ अवन्ति १३१, १९७ उदयसागर ६५, ६४, १७५ अवरंगाबाद ६५, (२०२) उना (उन्ना) ६१, १०२, १५६, अष्टापद ७२, १२० १२१, १८१ १६०,१६१ अस्थिकग्राम १३१, १३२ उन्नतपुर १००, १०२, १०४, १७४, अहम्मदाबाद ७०,७१, ७२, ७७, १७५ ७८,८१, ८३, ८८, ६०, ६६, उ (ओ) पकेशनगर १८६, १८८ १००, १०१, १०३, १११,११२, उपकेशपुर १८७ १८८ ११३, ११४, १५८, १५६, १६० प्रोसिका १७७, १७८, १७६ १६१, १७३, २०१, २०५० औरंगाबाद (६५) २०२, आगरा ७२, ७३, ७४,७५, ६६ कच्छ १२, ८६, १८, १०१, १६२ ११०, १५६ १७४, २०१, १६३ " अकाराद्यनुक्रमः २४१. नाम पत्राणि पत्राणि कदंबगिरि १८१ कनकगिरि १०० कन्हड़ ६४ करहेड ६५ कलकत्ता (१६६) २०१ कलिंग १६७ कलीकुंड ९५ काकंदी (द) ३, ६, ७,४४, ४५, १५० कालीकाता १६६ काशी १०५, १०६ १२६ काश्मीरीमहल ७६ कीसनगढ २०१ कुंकुण ६२, ७१,५२,१५५ कुमारपालविहार ५८ कुंभलविहार ८५ कुसुमपुर १८, १६६ कृष्णदुर्ग ६६ कोरंटक ४६, १२६, १८६ कोरंटा २०५, २०६ कौशाम्बी १६७ क्याबिल ७३ खानदेश-६५ खेड़ा १०६ गंगा ७६, ८०, ८६, १२२, १२६, १६६, २०४ गंधपुर गंधार [बंदिर] ३६, ७१,७३,६१, ८७, ८६, ६०, ६६, १५८, १५६, १६१, १६२ गलकुंड ६५ गिरनारि ६०, १३२, १८१ गुंगड़ीसरोवर ६४ गुजरानवाला ११५ गुरुकुल ११६ गुर्जर [त्रा] ५७, ७१, ७३, ७४, ७५,८१,८२,८३,८५,५५,६३, ६४, ६५, ६७, १०१, १०४, १०६, ११२, १३४, १५६, १६१, १६२, १६१ गोपगिरि २६, ५२ घंघाणी ८६ घोघाबंदिर ८६, १२, १०१ चतलेर ६६ चंद्रावती ५३, १२६ चांपानेर ३६,८०, ८६, १६० चितो (त्रो) डगढ २०१, २०२ चित्रकुट ५२, ५४, १६६, १६३ जमुना २०१ जंबूद्वीप (दीव) २८, १४२ जंबूसर १११ जयतारणी ६६ जयपुर २०२, २०६ जाबालकपुर ६३ जामनगर ११८ जामला ७१, १५८, १७४ जालोर ८५, ६३, १६१, २०१ जावलपुर ८४, ८६ जीर्णदुर्ग ३६, १०१, १४७ पट्टीवली-समुच्चयः . पत्राणि नाम. पत्राणि . . जेसलपुर १६० जैसलमेर (रू),७०,६१५८, २०१ जोधपुर १६३, २०१ . टेलीग्राम ५३, १२६ टेलीपुर २७ डावर ७५ डीडूयाणक ७६ डीडूवाणपुर १६१ डीसा ७८ डुगरपुर १०८ ढीली १८५, १६२ तारंग ८१ तिक्षशिला १२७ तिलंगदेश ६५ दक्षिण ६६,८६,६४, ६५, ६७, १०१, १६१, १७५ दर्भावती १०६ दलवादलंमहल ८५ दादावाडी ११७ दिल्ली ७३, ७४, ७५, ७६, १०२, १५६, (१८५, १६२) २०१, दीयोवड २०२ दीव १५६, १६१ देवकुलपाटक ४०,८५ देवगिरि १७३ देव [क] पत्तन ६०, १३१, १६६, द्वीपबंदिर ८३.६३, २००, १०१ धरणविहार ६६, १५६ धांसी १६४, धोराजी १०६ नटीपद्र ८३, ६२ नडुलाई १६८ नड्डुलपुर २६, ४६, ५२, १२७, १६७ नंदीश्वरद्वीप १८४ नरसिंहपुर २६,५० नलिनीगुल्मविमान १२३ : नवा (वीन) नगर ८१, ८४, ६०, ६४, १६६, २०२ नवीनपुर ६६, १६१ नाकोडा २०६. नागपुर ५०, ७५, १५१ नागद २६,५०, १२८ : नागोर १५६. १६२, २०१, २०२ नारंगपुर १ नारदपुरी (र)७२,७८,७६, ८८, १०३, १५६, १६०,१७४ नारायणप्रासाद १८६ नाहीग्रामः५५, ६४ न्यग्रोधिका १८ पंचनद ११४, ११५, ११६ पंचासर १ पत्त (ट्ट) न ५५,७१,७२,७६, ८०,८२, १३, ६०, ६६,६६, १२.१, १५३, १७०,१६१, १६३ पद्महद १२५ पल्लीका २०५ पाटण ६६, १५२, १५६, १६०, १६१, १६२, १६८ पाडलीपुत्त (र) १७ १६६, १७, 1 - अकारानुक्रमः २४३ नाम पत्राणि नाम पत्राणि बौद्धपुरी (४७).१२५, (१६६) भरत (ह) १३, १४, ४३, ८६, ६७ १२०, १६४, भरुष (क) च्छ १७, १८६, १६० भाग्यनगर६५ भारह १४२ भावनगर११५, ११७ भीनमाल १८४, १८५,१६१ भीमपल्ली ३०, ६२ भूज ८६ पादरा १११ पादलिप्तपुर ११७, ११८, ११६ पाल (ल्ह) णपुर ५८, १६२, १७२, १७६, १६२ पाली ११४, १७६, २०५, २०६ पावापुरी १६७ पीछोलक ८५, १७५ पीबोला ६४ पुण्यपत्तन १०६ पुष्पकरंडिनी १३१ पोयन्द्रा १११ पोसीनापुर ८४ प्रतिष्ठानपुर १६८ प्रयाग ७३ प्रह्लादनपुर २८, ३६. ७१. १०२, ११४, ११६, १५५, १५८, १७० प्रह्लादनविहार ५८, ५६ फतेपुर ७३, ७४, ७५, १०२, १५९ फलवी ५५, १५३, १७० फलोधी १६४, २०१ बंगाल ७३ वरहानपुर ८६, ६५, ११२, १६१ वहुलि (ला) १८ वामणवाडा २०६ वारेजा ६६ विजापुर ८६, ६४, ६५, १६१ बीकानेर १६४,२०१ वुदी ६६ वृहद्वट १२६ बृहनगर-३ भृगुकच्छ ४६, १३१, १६५, १६७, १६८ मकसुदाबाद २०४ मंगलपुर १०२ मीददुर्ग:५, ६४ मंडपाचल ६०,८३,८६, ६२,६५, १०४, १३५, १५५, १६१ मंडोवर २०१ मथु (हु) रा ५२, १८१, १६६, १९८ मनोहरपुर 85, १६२ मरु ६२, ७०,७१, ७५, ८१,८२, ८४, ८६, १७, ६०, ६६, ६७, १०१, १५५, १५८, १६१, १६२, १७३ मरोटकोट १८६, १२ महाकाल ४५, ४६, १२४, १५२ १६५, १६६ महाराष्ट्र ११२ महाविदेह ४०, १४८ महावीरजी २०६ पट्टावली-समुच्चयः पत्राणि नाम पत्राणि महिमनगर ७६ महेशानपुर ७१, ११७, ११८ महेश्वर ६४ मांगलोर १७६ मालव [क] ५७, ५८, ५६, ७०, ७१, ७३, ७४, ८३, ८६, १०१, १५४, १५५, १५८, १६४ माल्यपुर ६६ मुलतान ७३, ७४ मेडता ७५, ८५, ८७, ६३, ६७, १५६. १६१, १६२, २०२ मेदनीपुर ७६,८६, १०४, १७५, १६३ मेदपाट ८२,८४, ८५, ६६, ६७, १०१ मेरु ३१ मेरुता ९६ मेवाड़ ३६, १०२, १६२ मेवात/७०, ८१, ६६, १०१, १५७, १६२, १७३ मोतिशाहूँक ११३, ११७ मोरव्य ७० योधपुर ८५,६३,१३७ (१६३,२०१) रणमल्लचोकी ८४,६३ रयणमाला:१८४ रहवीरपुर १६६ राजगृह (२) १६३, १४७, १६६ राजदेश २ राजधन्यपुर ७८, ८१,१०, ११२, १७३ राजनगर ८१, ८३,८६,८६,६०, '६२,६६,६७,६६, १०४, ११२, ११४, ११८, १६०,६१६१, १६२ राण [क] पुर ६६ ७६,८१, ८५, ६०, १५६, १७२ रांदेर १०६ रामनगर ११५ रामसैन्यपुर, ५३, १२६, रायगिह २ रैवताद्रि (चल) ८१, ६४, १३२ रोह ७६ रोहण १३७ रोहीणीनगर ४० लक्ष्मीमहास्थान १८४ लंका १५४ लहरा ११५ लाट ८२, ६७, लाटापल्ली८१ लाडलुग्राम १०५ लाडोली (ल)६० १६० लाभपुर ७६, ८६,६०,१०३ लाहो (हु) र ७३, ७४, ७८, ७६, १६०, १७६ लीबड़ी ११८ लुगद्रही १८५, १८६, लोधिप्राणा ७६, वटपल्ली ७१, ६५ वडाली १५८ वंध्यनगर ८५, ६३ वरकाण [क] ७२, ७, ८५, ६४, १७४ अकारायनुक्रमः २४५ नाम पत्राणि वरणी १६२ वलभी (ही) १८, ५०, १५१ वल्लहीपुर १६ वागरोड १११ वालम्भ (भ्य) १८ विक्रमनगर १७६, १६३, १६४ विद्यानगर ८१ विद्यापुर ३७, ६०, १३१, १५ विन्ध्याद्रि १३७ विमलगिरि ५२ विमलवसति १६२ विमलाचल ८१, १४३ विलासपुर १८ विशाला १३१, १६८ विश्व (स) लनगर ६६, ६१ विहार ७३ वीरनयरी १८४ वीरमग्राम ७०, ११४, १५८ वीरमपुर २०६ नाम पत्राणि शाकंभरी २६ शिवपुरी १०० शोरीपुर (७४) १५६ श्यालकोट ११६, १९७ पमणोर ८५,९४ सत्यपुर १८१ सपादलक्ष १०५ समी १०८ सम्मेतगिरि १८१ सहजीग २०५, २०६ सादडी ८४, ६३ साबली ८४, ६३, १६१ सिद्धगिरि ११३, ११४, ११७, १३६ सिद्धाचल ६०, ६४, १०६, १.२२; १७० सिरोही (ई) ६६, ७२, ७५, ७६, ७६, ८१, ८२,८४, ६३, १०२, १५६, १७४, २०१ सिवाणा २०२ सीकंदरपुर १०४ सु (सौ) राष्ट्र ७०, ८१, ८२,८३, ६०, ६३, ६४, ६७,१००, १०१, १.१२, १३६, १३७, १५७, १६१, १६२, १७४ सुरीपुर ७४ (१५६) सूरतिबंदिर ८०, RE, .६४, RE, १०३, ११२, १६०, १६१ सोजत १०५ सोपारक ४८, १६६ वृद्धनगर ६६, १५६ वैतात्य १८४ घेराट ७६ शकंदरपुर ८१,६०, १६०, १७३ शंखेश्वर ७२,८१, १०८, १८१ शत्रुजय ३६,४७, ६०,७१, ८१, ८४,६०,६६,१०१,१३२, १३६, १५१, १५५, १५८, १६१, १७३, १८१, १६१, १६२, १.६३ शाकल १६५ .
२४६ पट्टावलो-समुच्चयः पत्राणि नाम पत्राणिः स्तंभतीर्थ ५७, ५८, ६२, ६६, ६७, ७१, ७२, ७६, ८१, ८२, ८३, २४, ८६, ८८, ८६, ६०, ६१, ६२, ६३, ६६, ६६,१०३, १०४, ११३ १५४, १५८, १६०, १६१, १७४, १८१, १६५ वर्णगिरि ८५, ६३, ६६, १०४ हट्ठीसिंहवाडी ११३ हला (ला) रदेश ८४, ६०, ६३, ६४, ६७, १०१ २०२. हस्तिनापुर १८१ हाथीगुफा १६७ हीमवंत १३ हेमाद्रि १२० गंथ-स्तोत्राणां नामानि ।। - पत्राणि नाम पत्राणि . अंगविद्या ५२ अंगोपांग स्वा० १०८ अज्ञानतिमिर भास्कर ११५ अढारपापस्थानकस्वा० १०८- अनुयोगद्वार १४२ अनेकान्तजयपताका ५४,५५१५३ अनेकान्तव्यवस्था १०७ अध्यात्मकल्पद्रुम १७२ अध्यात्ममतखंडन १०७ अध्यात्ममतपरीक्षा १०७, १०८ अध्यात्मसार १०७ अध्यत्मोपदेश १०७ अध्यात्मोपनिषद् १०७ अमृतवेली १०८ अर्णिकापुत्रचरित्र १६६ अबूंदाचलकल्प १८१ मलंकारचूड़ामणि १०७ अवचूर्णि ६४, ६५ अष्टप्रकारी १०७ ११२ अष्टमदरवा० ११३ अण्टसहस्री १०७ अष्टादशाई चक्रबंधस्तव ६५ अष्टापदकल्प १८१ आगमपूजा ११२ आगमसार ११० आचार प्रदीप ६७ याचारांग १८४ आठद्रष्टिस्वा० १०८ आत्मख्याति १०७ आत्मप्रबोध १०८ आदिजीनस्तव १०७ आदिदेवसम० १३७ आनंदघनचतुर्विशतिका १०६ आनंदघनस्तूति १०८ थाराधक वि० च० १०७ .
अकारानुक्रमः नाम पत्राणि नाम पत्राणि: आराधना [कुलक] ६१, १६८ औपपातिक १८, १६६ - आवश्यक । ८, २५, ४४ ४८, औष्ट्रिकमतोत्सुत्रदीपिका १७३ [नियुक्ति ६४, ६५, १२१, कथावली १६८ | १४२, १६४, १६५, कदम्बगिरिकल्प १८१ [वृत्ति ) १६८, १६६ कप्पसूत्त १ आवश्यकस्तवन १०८ कमलबंधस्तव ६३ ईर्यापथिकी १७३ कम्मपयडी १३ उत्तमविजयरास ११२ कर्पूरविजयगरिणखाध्याय १११ उत्तराध्ययन ५४,१५३,१६८,१६८ कर्मग्रन्थ ३५, ५६, ११३, १७०, उदयदीपिका ११० १७१ उपकेशगच्छचरित्र १८६ कर्मप्रकृति १०७ उपकेशगच्छीय प० १७७ कल्प १६, १८०, १८१, १८३, उपदेशपद ५४, १५३ १६४ उपदेशप्रासादस्तंभ ११३ कल्पकिरणावली १७३ उपदेशमाला ६५, १०८, १२५,१४८ कल्पसूत्र १, २, १६, १६६,.१६८ उपदेशरत्नाकर ६६ कल्याणकपूजा ११२ उपदेशरसाल १६२ कल्याणकस्तोत्र ६५ उपदेशरहस्य १०७ कल्याणमंदिर ४६, १०६, १५०, उपधानवाचक २६, (१५२) १६६ उपधानवाच्य ५२, १५२ कायस्थीतिस्तव ६१ उपशमश्रेणी १०८ कालसप्ततिका १४१, १४३, १६८ उपसर्गहरस्तव ४४,१२२,१२८,१६५ कालिकाचार्य कथा १६८ उपितभोजनकथा ६३ काव्यप्रकाश १०७ उसहवद्धमारगस्तव ५६ कुमतिकुदाल १७३ ऋपभविनति १०६ कुमतिखंडन स्तवन १२८ ऋपिमंडलवृत्ति १२१ एकादशीस्तव १११ कृपारसकोश ७६ ऐतिहासिक पत्र २०१ क्रियारत्नसमुच्चय ३२, ५२, ६५ ऐन्द्रस्तुति १०७ क्षेत्रसमास ६३ श्रोधनियुक्ति ६४. गरीयो० स्तव.३५ कूपदृष्टान्त १०७ २४८ पट्टावली-समुचयः पत्राणि नाम नाम पत्राणि गिरनारकल्पं १८१ गिरनार तीर्थमाला १७६ गुरुगुण रत्नाकर ६५, ६८ गुरुतत्वदीपिका १७३ गुरुतत्वनिर्णय १०७ गुरुपट्टावली १६३, १७५ गुरुपर्वक्रम २५, ३२ गुरुमाला १०२, ११६ गुरुरास ११२ गुरुखाध्याय १११ गुर्वावली ३३, ३४, ४५, ५२, ६४, ६५, ७७, ८७ गोडीपार्श्वनाथस्तोत्र १०८ धनौधनवखंड पार्श्वस्तोत्र ६४ चडतांपडतानी स्वाध्याय १०८ चतुर्था स्तुति ६३ चतुर्विशति [स्तव ६१,१०५, १०६, ११०, १११, ११५ जयतिहुण० १६८ जयवृपभस्तुति ६१, ६३ जसविलास १०८ जिनराजकोष १४७ जिनविजयनिर्वाण रास ११२ जिनेन येन० ६२ जीतकल्प १७, १४२ जीतमर्यादा ४६ जीर्णपट्टावली ७७ जैनतत्वादर्श ११५ जैनतर्कपरिभाषा १०७ जैनप्रश्नोत्तर संग्रह ११५ जैनमतवृक्ष ११५ जैनयुग ६६, १०६ जैनरौप्यांक ६३ जै० श्वे० को० हे०५६, २०२, २०४ जैनसाहित्यसंशोधक १७७, २०३ ज्ञाताधर्मकथा १६६ ज्ञानक्रिया स्वाध्याय १०५ ज्ञानपंचमीस्तव १११ ज्ञानपूजा ११२ ज्ञानबिन्दु १०८ ज्ञानमंजरी ११० ज्ञानवन्दन ११३ ज्ञानसार १०८ ज्ञानार्णव १०८ तपा (व) गच्छपट्टावली ३४, ४०, ४१, ७७, ८८, १०२, १७३ तपागणपतिगुणपद्धति ७८, ८७ तत्वनिर्णयप्रसाद ११५ चत्तारी अट्ट० १०६ चंद्रप्रभाव्याकरण ११० चार आहारं स्वाध्याय १०६ चिकागो प्रश्नोत्तर ११५. चिन्तामणी ८३ चैत्य परिपाटी. १०६ चोवीशीस्तवन १०८ छन्दश्चूडामणि १०७ जगद्गुरुकाव्य १०२, १०३ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति १०३, १७३. जम्बूखामीरास १०० . .
प्रकारानुक्रमः पत्राणि नाम पत्राणि तत्वनिर्णयप्रासाद ११५ तत्वविवेक १०७ तत्वार्थाधिगम १८,१६,४६, १०७ १०८, १११, १६५ तत्वालोक १०७ तपा (व) गच्छपट्टावली ३४,४०, ४१, ७७, ८, १०२, १७३ तपागणपतिगुणपद्धति ७८, ८७ तित्थोगालीय १६७ तीर्थमाला १०६ तीर्थराजस्रोत्र ६३ त्रिदशतरंगिणी ६६ त्रिषष्ठी श० पु० च० ११० त्रिसूच्यालोक १०७ थविरावली १६६ थेरावली १, २, ३,११ दशमतस्तवन १०८ दशवकालिक ४३, १२२, १४२, १४३, १६४ दशाश्रुतस्कन्ध २, १२२,१८१ दिग्पटचौराशीवोल १०८ दिग्विजय ११० दिव्यादान २०० दीपा [व] लीकाकल्प ६६, १४१, १४२, १४३, १६६ दुप्पमाकालभ०१५ १६, १६, ४५, ४७,७७, १४१, १६५ देवधर्मपरीक्षा १०७ देवानंदाभ्युदय ६१, १०४, ११० ३२ देवाः प्रमोऽयं० ६३, १६८ देवेन्द्ररनिशम्० ६९ देशीनाममाला ५४, १५३ द्रव्यगुणपर्यायरास १०८ द्रव्यालोक १०७ द्वात्रिंशद्वात्रिंशिका १०७ द्वादशारनय० १०७ द्विसप्तती पदसंग्रह १०५ धर्मपरीक्षा १०७ धर्मरत्रवृत्ति ५६ धर्मसंग्रह १०७, १०६, ११३ धातुसंग्रह १०८ ध्यानदीपिका ११० ध्यानशतक ५१ नंदी १२, १४, १४२ नंदीस्थविरोवली ४६ नमीउण १६७ नयकर्णिका १०६ नयगर्भित० १०८ नयचक्र ११०, १७३ नयप्रदीप १०७ नयरहस्य १०८ नयोपदेश १०७ नवखंडपार्श्वस्तोत्र ६४ नवतत्वप्रकरण ६५, १६० नवपदपूजा १०७ नवपद प्रकरण १६१ नवांगवृत्ति ५४, १५३, १६२ निशियसन १६८ पट्टावली-समुच्चयः S नाम বুঝবি। नाम অন্য্যি निश्चयव्यवहारगर्भित स्त० १०८ नीत नीत वंदू खाध्याय १०४ नैषधीय ६७ न्यायखंडनखंडखाद्य १०७ न्यायालोक १०८ पज्जोसवणाकप्पो ४१ पञ्चकल्प १७, १६ पञ्चनिर्गन्थी १०८, १६८ पंचपरमेष्टीगीता १०८ पंचप्रमाणग्रंथ १६० पंचाशक १६८ पट्टावली २,८,१४, ३५,४६, ४८ ५१, ५६, ६६, ७, ८, १०१ ११६, १६२, १६३, १७३, १७७ २०४ पार्श्वनाथ नाममाला ११० पार्श्वनाथ स्तव १०८, १११ पावापुरीकल्प १६७ पूजा ५६, ११०, ११३, ११५ पूजाप्रकरण १८ प्रज्ञापनासूत्र ४६, १५०, ५६५ १६८, १६ प्रतिक्रमणगर्भहेतु १०० प्रतिमाशतक १०६, १०८ प्रतिमास्थापन १०८ प्रतिमास्थापनन्याय १०८ प्रबंधचिन्तामणि ५६ प्रमंजना स्वाध्याय ११० प्रभावकचरित्र ४६,३६, ५२, १६८, प्रमारहस्य १०८ प्रमेयरत्नमंजूषा १०६, १०६ प्रवचनपरीक्षा १०३, १३३ . प्रस्ता (शस्त) शर्म स्तोत्र ६१, ६३. वृहत्कल्पसूत्र १६८ बोधिसत्त्वावदान २०० ब्रह्मगीता १०८ ब्रह्मबोध ११०. बह्मांडपुराण १६६, २०० भक्तामर २६, ४९, १२७, १५१ भगवतीसूत्र १०७, १४२, १४८ भयहरणस्तव ४६, १२८ भागवत २०० भाषारहस्य १०८ .भाष्यत्रय ५६ मंगलबाद १०८ पट्टावलीसारोद्धार १४८, १६२ परमज्योतिःपंचविंशिका १०८ परमात्मविंशिका १०८ परिशिष्टपर्व १६८, १६६ . पर्युषणाकल कल्प ४१, १६३ पर्युषणाशतक १७३ पर्युषणास्तुति ११३ पाक्षिकसप्ततिका ५५, १५३ पाक्षिकसूत्र १२३ पांचकुगुरु स्वाध्याय १०६ पांचमहाव्रतभावना स्वाध्याय १०८ पांडवचरित्र १०६ पातंजलयोगदर्शन १०८. पादलिप्तकल्प १६८ 2 .
प्रकाराद्यनुक्रमः २५१ नाम पत्राणि नाम पत्राणि मथुराकल्प १८१ महानिशिथ १६६ महाभारत १८०, १८२ महावंश २०० महाविद्याविडंबन ६५ महावीरपट्टपरंपरा १२०, १३७ महावीरस्तवन १०८ माघ ६१ मातृकाप्रसाद ११० मात्स्य २०० मार्गशुद्धि १०८ मुनिसुव्रतस्तव ६४ मुहुपत्तीचर्चा ११४ मेघदूतसमस्या ११० मेघमहोदय ११० मौनएकादशीस्तवन १०८ यतिजीतकल्प ६२, ६५ यतिदिनचर्या १०८ यतिधर्मवत्रीसी १०८ यतिलक्षणसमुचय १०८ यत्राखिल स्तुति ६२, ६३ यवराजर्षिकथा ६३ युक्तिप्रवोध ११० युगप्रधान १३६, १६७ यूयं युवां त्वं० स्तोत्र ६१ योगदृष्टिखाध्याय १०७ 'योगविंशिका १०८ योगशाल ६५, ८६, १७४ रत्नसंचय १६८ रहस्यपदांकितअंथ १०८ राजपनीय १८४ लघुशांति १२७, १६८ लोकनाली १०८ लोकप्रकाश १०६, १४३, १४७ ली० ओ०री. इ० ब्रा०प्रे० २०४ वायुपुराण १६८, १६६, २०० विंशतिस्थानकपूजा ११२, ११३ विशिका ११० विचारविन्दु १०८ विचारश्रेणि १६७, १८, १६६ विजयदीपिका ८७, १०४ विजयदेवमहात्म्य ६१,१०४, ११० विजयप्रशस्ति ६५, ७२, ७८,८७, ५८, १०३, १७४ विजयसिंहकल्प १६८ विद्यानंद व्याकरण] ५ विधिवाद १०८ विनयविलास १०६ विवेकमंजरी ५६ विशी १०८ विश्वश्रीधर० स्तोत्र ६५ विष्णुपुराण २०० वीरनिर्वाण १६८ वीरस्तव १०८ वीरहुंडीस्तव १०८ वृंदारुवृत्ति १२१ वेदान्तनिर्णय १०८ वेली ११३ वैराग्यकल्पलता १०८ व्यवहारसुत्र १६७, १९८ न जहुकन्या १२० पट्टावली--समुचयः G इतरधर्माचार्य-ऋषि-देव-बिरुदानां नामानि ।। नाम पत्राणि पत्राणि नाम अंगिरस १२४ +जगद्गुरु , १०२, १०६ अत्रि ऋषि १३० जमाली ४२, १४८ अपराजिता (या) ४६, १२७, १६७ जया २६, ४६, १२७, १६७ अम्बिका २६, ५१ अश्वमित्र ४५, १५० +जाइस्सर ३,६ आषाढाचार्य ४४, १४६ +जातिस्मृति २६ उदयिपा ६४ जिनशासन देवी १२७ ओकेशा १७७ +जुगप्पहाण १ १५. १७,.१४१ कण्यरिपा ६४ +तपा ६२, १३०,१५४,१७०, १७१. कपर्दी ६०, १३१ +तार्किक शिरोमणि ५४, १५३ +कलिकाल सर्वज्ञ ५६ तिर्यक्जृम्भकदेव १२५ +कामदार २०१, २०२ तिष्यगुप्त ४२, १४८ +काली सरस्वती ६६, ८६, १०३, दन 8 १३३, १६०, १७४ दयानंदसरस्वति ११५ कुंअरजी ऋषि ७२ दिग्पट १०८ कुमुदचन्द्राचार्य ५५, १५३, १७० धनद ६० कुंभोद्भव १२८ धरणेन्द्र ६७ कृष्ण ६७, १७७, १७८, १७६ +नगरष्टि ११८ कृष्णद्वीपायन १८० नागकुमार६७ + कृष्णसरस्वती ३६, ६५, १७२ नागराज ४६, १६७ केशव ८ नागेश्वर १२८ क्षेमेन्द्र २०० +न्यायविशारदन्यायाचार्य १०६, गंग ४५, १५० ११७ गोमुख २८ +न्यायांभोनिधि ११५ गोशाल १७६ पमा देवी] २६,४६, १२५, १२६ चित्रशिखंडिसुनु १२६ १२७, १६७, १७० छल्म४ +परमद्रह ११२ + इति चिह्वेन अंकितानि नामानि व्यक्तिविशेषायां पदविशेषवाचकानि (बिरुदानि)।
- . अफारायनुकमः पत्राणि नाम एनाषि प्रभजन १२० रघुनाथजी १२२ प्रभावतीदेवी ६३ रुद्र १२० प्रवर्तक ११६, १६५ +रूपनी २७, ५४ प्रवर्तिनि ११८ लक्ष्मी देवी] ४६, १२५, १६४ बजरंग १०४ १७६, १८४ +बालसरस्वति ६७, १३३ +लटकाला ११३ बुध्धकीर्ति १८४ लवजी १०४ ब्रहा १७७, १७८, १५६ +वाइवेपाल १८ नायो १३५, १३७ वाग्देवी २८, १६७ भागीरथी १२६ वाचस्पतिदेव ७२ भाणसाधु ६५, १५७ वाणि १२६ भारती २७, १८० +वादिगोकुलपण्ड ६६ भीखमजी ११२ +वादिवेताल ५४, १५३ भूजगनाथ ५० | +वादी ५५, १४५. १५३, १७० भूजगाधिराज १३८ विजया दिवी] ४६. १२६, १६७ भूपणाचार्य [दगंबर]८०,८६, विष्णु १३१, १४७, १८, १t १०३ १६० शक ६४, १८२ +मलिकधीनगदल ७०,७१, १५७ शंकर १७७, १४८, १४८ +महातपा ८३, ६१, ६२, १०४, १६१, १७५ +शतार्थीफ २७,५६,१४५ +महामहोपाध्याय १०६ शंनु १२१, १५७ +महाराव १६४ शाकिनी ६१, १३१ महेश १७६ शिकोतरी १३१ मागभद्र १५ शिव ६६, १७६ मुरारि १२४ शूलपाणि १३१, १३२ गेपजी ४२ पएमुस १२२ : यक्ष २६, ५०, १२८ मन्यि (जि) का १४७, १४८, + युगप्रधान १८, २०, २१, २२ १२१, २३, २४,४२,४३,४४,४५,४७, सरस्वनि ६, १६, १२३ म ५२, ५२, ६६, ७२, ११७, १३६, १४२, १४३, १४८ १४६, +सबाद होगविजय,१२३ +थतिर ११८ +हीरला ५५, ३५१ 44 २५१ नाम श्र घ त्र च D पट्टावली-समुच्चयः शुद्धिपत्रकम् पत्रं पंक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् १६ ११ चउत्तर चउरुत्तर २४ बारम्भहिया बारसम्भहिया २५ सिरविजयाणंद सिरिविजाणंद १८ ६ वालन्न वालब्भ २३ १८ ३५॥५०॥५० ३५१५०११५ १८ श्रीसोमनप्रभ श्रीसोमप्रभ ३६ ३७ सस्यशेखरः सत्यशेखरः ४१ १८ वर्षमान वर्धमान ५३ २ सीस्नि सीम्नि ६८ २ १४७७ १४७० ६६ १५७ १५७० १६ विजदानसूरिः विजयदानसूरिः ८१ स० मोटाख्य सा० भोटाख्य ३ १७ वियसेनसूरीणां विजयसेनसूरीणां २४ साक्षाद्धन्यागारा साक्षाद्धन्यानगारा ६१ १४ सां धिरा ६७ थानाख्य थानाख्यः १११ श्रीकपुरविजयगणिः श्रीकपूरविजयगणिः १२१ २१' . लद्धिपलूतापुडगम्मि लद्धिएलूतापुडगंपि २१ उठ्ठप्पयइ उप्पय २२ पलायन्ति पलोयन्ति १४२ १४ भारह भारहे १५० १३ श्रीइददिन्नसूरिः श्रीइंद्रदिन्नसूरिः १५१ ४ वनसेनसूरिपट्टो वज्रस्वामिपट्टे १० श्रीवीरप्रभसूरिः श्रीरविप्रभसूरिः १८४ ५ प्रथमो गणधरः प्रथमो गणधरः सूचना-तथा त्रुटिताक्षर-मात्रा-बिन्दु-ब-ब-हख-दीर्घ-प्रमुखार 'शुद्धि विद्वद्भिः स्वयमेव कर्तव्या। . सा०धिरा oc. १ १५२
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