Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Rasikapriya��
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भूमिका। दोहा-अति रति गति मति एक कार, विविध विवेक पिलास । रसिकन को रसिकप्रिया, कीन्हीं केशवदास ॥ कविकुल कुमुद कवि केशवदास की प्यारी हितकारी महारसवारी कविता का गौरव जगत् प्रख्यातहे तिसपर इस " रसिकप्रिया' की कविता तो सविताके समान जनप्रियहोरहीहै हो क्यों न ? इसमें उक्त कविने कवित्त और दोहा के मध्य करुणारस, हास्य रस, बीमत्सरस, शृंगाररस, वीररस अरु भयानक रस संतत निरंतर अरु बेर सहित विचार कर वरणाहै इस रसिकप्रियाके पढनेसे रति मति अतिशय करके बढती है और सब रस विरस कहे नवरस तिनकी रति का ज्ञान होताहै तथा मूल स्वार्थ चातुर्यताकी प्राप्ति होती है और तब सब राजा प्रजाको बहान होताहै तथा, इसमें श्रीकृष्ण राधाको वर्णन है इससे तिनके ध्यानको परमा- थभी होताहै भावरसिकप्रियाकी प्रीतिते दोनों बातें स्वार्थ और परमार्थकी सिद्धि होतीहैं । इसमें प्रच्छन्न प्रकाश संयोग वियोग वर्णन, नायक नायका वर्णन, स्वकीया परकीया वर्णन, दर्शन वर्णन, चेष्टादि मिलनस्थान वर्णन, राधा कृष्ण हावभाव वर्णन, अष्टनायका नायक संभोगभंगार वर्णन, दशदशा वर्णन, मानवर्णन । विप्रलंभशंगार मानमोचन वर्णन । करुणादि विरहप्रवास वर्णन । सखी जन वर्णन, नघरस वर्णन । चतुर्विधियतिरस वर्णन रस अनरस वर्णन, आदि नानाप्रकारके वर्णन हैं और फिर तिनके भेदोंका वर्णन है भाव कोई विपय रसके अंग प्रत्यंग का शेष नहीं रहा तिसपर महामान्य सरदार कविने सोनमें सुगंधकिया है अर्थात् श्री १०८ काशी- राजकी आज्ञासे बहुतही सुंदर और रोचक विलककियाहै तथा किसी २ स्थानपर नारायण कवीश्वरनेभी सुंदर भावरित अर्थ किया है जिनका विशेष वर्णन कहां तक लिखें सज्जन रसिकवर आप अवलोकन कर आनंदके भागी होंगे। इन्हीं कविवर कविकेशवदासप्रणीत “रामचन्द्रिका-सटीक" कोभी हमने अत्यंत सुंदर और शुद्ध छापाहै जिसका मूल्य २ रु० है. भापका कृपाकांक्षी- खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेंकटेश्वर" यन्त्रालयाध्यक्ष-मुम्बई. - रातका भापाटीका समेत। सरदार कवि कृत. दोहा-सीता सीतापति करत, शीतल हीतल जासु ॥ तासु दास सरदार पनि, छाडो करम कुवामु ॥१॥ उहिताहित नंदहै, जगमें आनंदकंद ॥ ईश्वर भूपति भावते, जस राकाकेचंद ।।२।। करतजु निशिदिन भूपमणि, शुचिविलास सुखसंग ॥ सो तरंगिनी तासुकी, भापत एक तरंग ॥३॥ निशाअंतजप रामप्रभु, सीतालपण समेत ॥ जागत हैं भूपालमणि, बहुविमन धनदेत ॥४॥ छंदभुजंगप्रयात। रहें यामिनीभूमिकेनाथजागे । सदानाथसीतादुवोपाँइपागे ।। पढेवेदताविप्रबंदीउचारें। चहूँओरसोधामकेदिव्यद्वारें। वजीनोक्त टोल ओझाँझनीकी। भली साहनाई करनालपीकी। नपातुराँ द्वारपैभूपऐसी । मनॉसिद्धशोभा धरेरूपवैसी ॥ मुहायेकई भूमिकेभूपभारी । अयेराजके द्वारआनंदकारी।। सबैशूरसानी लयेसंगथोरे। जुहारे करें भूमछूराखधोरे।। महाराजश्रीईश्वरीननखोले । तवैद्वारकेपालतोचैनबोले ॥५॥ छप्पे-महाराजमणिमुकुटनाथकाशीप्रतापवर । 'महावीर रणधीर धरमअवतारधरा पर ।। सीतापति पदपद्म प्रेमपालक अधिकारी। चंचरीक चितचार चंदजस चतुरविहारी ॥ .
रसिकप्रिया। सरदारभूमि.पालनसकलस्वच्छस्वच्छशोभाठये। तजजानजोरयुग पाणिसंवदेवदरशकारणअये ॥६॥ दोहा-सुनतश्रवणमंगल करण, नित्यक्रिया करचार ॥ दिव्यदिवाकरसेदिपत, अयेदेवदरखार ॥७॥ करिप्रणाम महिपाल मणि, शीशनाइ करजोर ॥ देनलगे आशीपवर, विप्रवृन्द सबओर ॥८॥ छप्पे-सरसमुयश शशिउदित होहिदिनरैनिप्रकाशित । मारतण्डउद्दण्डतेजब्रह्मण्डविलासित ॥ पंचदेवपरपूरक्रिया दृगकोरनिहारें। दुश्मनदावादारपाँयपर शीशशुधारें। सरदारस्वच्छ अतलच्छ ग्रह अच्छअच्छ क्रीडाकरो। पुत्रनसमेतईश्वर नृपति जो शोशविप्रआशिपधरो ॥९॥ दोहा-चंदीवर विरदावली, बोलनुलगे अनूप ॥ शचनशिर अबदे, विचरौभारीभूप ।। १० ।। पिरद। भूपमणिमुकुट विकटभटपटकनकटिपटतटतूणीरवीरवर वर- छीकृपानपान कमानतान शप्राण भंजन रंजन जगमित्रमित्र प्रताप तापत्रयसंडन। महाराज ऋतुराजसाज साजनसमाज सुमन- दराज कपिराज भ्रमरमकरंद धुंदलच्छ अच्छ स्वच्छदिनदान ग्रीपमगुमान अरिसरतानमुखावन उदंडवारशूर नृरमंडन पायसन चंड भूमंडल पालनसल पलपालन गजराजपनसपनशेलवरसपा- सानसान गरजतोपगोलागान भरिपुर पहारफारन शरदनसशशि हेमंत शिशिरसुससकलसभाशोभन पुत्रपरिवार पुनपालन ॥११॥ दोहा-पालनयश शालन, अरिन पालन दारिद भूमि ॥ रहोवीर आनंदयुत, जाहिरजगत मुमि ॥ १२ ॥ तोटक। महिपाटमवेमिटिभूपटसे । करनारिमुपानशीशरसे ।। मिलिभरमसरदारजिते । करनोर जुहरतमानतिते॥
मरणालासपाठरहतापता नरजासुनरायण नामलसें । कर दक्षिणआपवली विलसें ॥ लघुवंधुमहीपतिके कहिये। वलस्वारथपारथसोलहिये ।। तिनतेंउतभूपनकीअवली । बलबीरजु धीरनको सवली ॥ शहिनादिनके मिलियूथ रहे । रुखपावतवोलतवोलचहे ।। इंतशूरअनूपअनूपलसे । सवअत्रअनूपमअंगकसे ॥१३॥ रोहा-तहाँआइ सरदार कवि, देअशीप मुखमान । आयमुपाय महीपकी, वैठिगयोनिजथान ॥ १४॥ ताहिनिहारि महीपमणि कहेवेन सुखदैन । रसिकप्रिया भूषणरचो, कविकुलआनंदऐन ॥ १५॥ परिशिर आयसु भूपकी, मनमहमानिअनंद ।। रसिकप्रिया भूपणरचो, जसराकाको चंद ॥ १६॥ शिवहग गगनोग्रहसुपुन, रदगणेशकीशाल ॥ जेठशुकदशमीमुगुरु, करोग्रंथमुखमाल ।। १७ ॥ वासललितपुरनंदहे, हरिजनकोसरदार ।। वंदीजनरघुनाथको, पालतपवनकुमार ॥ १८ ॥ नहिं विद्यावलयालमति, नहींअंगमेजोर ॥ लखकपूतपालनकरत, श्रीकेशरीकिशोर ॥ १९॥ कहुँकहुँनारायणकियो, याकोतिलकअनूप ॥ चित्तवृत्तिदैकरिकृपा, मुदितभयेसबभूप॥२०॥ मूल छप्प ॥ एकरनगजवदनसदनबुधिमदनकदनसुत । गौरिनंदआनंदकंदजगवंदचंदयुत ॥ सुखदायकदायक सुकृत्तजगनायकनायक। खलपायका कदरिद्रसवलायकलायक ॥
रसिकप्रिया। गुणगंण अनंतभगवंतभवभगतवंतभवभयहरण। .. 'जयकेशवदासनिवासनिधिलंबोदरअशरणशरण ॥१॥ टीका-या छप्पय में कवि मंगलाचरण करत हैं ।। मंगलाचरण को विचार यह कि अन्य निर्विघ्न नियाहै सो तीनि रीतिको होतहै नमस्कारास्मक १, आशीर्वादात्मक २, वस्तुनिर्देशात्मक ३ ॥१॥ अथनमस्कारात्मकलक्षण । दोहा-करिप्रणाम सुमिरणकर, इप्टदेवताजोइ ।। नमस्कारआत्मकसुतो ग्रंथनमतिते होइ ॥१॥ आशीर्वादात्मकलक्षण। आवतहै जयशब्दजहँ, देव नामकेसंग ॥ मंगलआशिर्वादसो, कहत सुकविरुचि रंग ॥२॥ वस्तुनिर्देशलक्षण। नमस्कारजयरहितपद, ग्रंथवस्तुकोरूप ।। जानिपरेसुरविनयजत, कहतताहिकविभूप ॥३॥ तो यहां इतनी जानतीने दो प्रपमपारे तो एकरूप हैं। काहे नमस्कार जय साली नाही होत ॥ भर वस्तु निर्देश को भी पाछे अर्य कहेंगे ॥ अम नमस्कारात्मक को अर्थ यह है कि एक रदन है जिनके । एकको आशय यह कि, अभिमान कप जो दशन सो नाशकीन्हों जिनने । काहे भाषन मापनो स्वरूप हीन करदयो गज दापी. पत् पदनते इदां जो मेशर गनपदन कही है तामें यह जनावत रि, प्रणयरूप गजानन हैं जो दोई कुंभ तेई सीनके भंककी शनित तीनको अंक मध्यमे हीनहोइ हैं जाना कुंभ जो उट मोह तीनके अंकपत् ॥ अर शुण्ड जो र सोई ६ प्रणय को दण्ड. आ. शप पर लिमपम प्रणा उस्पारण किया। यह प्रणव भर गणेश चैरो पुदिक पर मदन जो काम वालो कीन्हा कदन माग जिन शंभु तिनके हैं गुत पुत्र ॥ अरस अमर में मदन कदन करता? जाके मुतका तीनदेव प्रणवम | गणेश केस गौरीके मन्द हैं अस मा गौरी माया नंद पुत्र मर मंमार ताक है आनन्दके कन्द जर पापन्दव दान में पन्दपुट दो गणेा के भाटमें पन्द्रह प्रणय चन्द्राकार माया हे मुरादाता । मुहद के भी दाताई ॥ गण जो देखो दिन के मापको इन्द्र ॥ दिलके भी नाप गर्न । म मा गगनापक ग्रना दिनकै मापक ॥ राल पाया । भर ददि पापकरें । म सापक जो मन्त्रशान मा गुणको जो मममा सो अनन्द दोन में माना जो मंमार सा दिल मगान्तर मग एंप.
भाषाटीकासमेत र्यवन्त, अशरण के शरणहें . ॥ दोऊ जय करो केशवदास की काहे सकल निधि निवास स्थान हो मी लम्ब है उदर अशरण शरण हो ॥ प्रणवको भी जा विप सर्व सिद्धाहत अशरण जेहें पद जिन भानको शरणं नाहाराखो हो भी जाके शरणहें । प्रपम प्रणव उच्चार वेद पाठ टोकमें भी प्रसिद्ध है । यह तो परण अर्थ भप गमे श में या पथ ॥ सदन धुद्धिदाता नाहिं होत ताकी यह उत्तर के दांत नहीं तो अघु- द्धि सदन कहांगो । अरु मदन कदन प्रपम करचुके तो कृष्ण ने मदन उत्पन्न कीन्हों साको कदन कहियो अनुचित नहीं मदन धरा को नाम है । तो यामें विधि- पिता के पुत्र कौन नीकीतहां ऐसी भी कहे कि कदनहीं है जिनकी कदन में नाश यरने की है सामर्थ्यता जिन को ती वा अर्थ में एक मदन मात्ररही यामें सब संसार- आयो यह भति व्यापी है ॥ तहाँ मदनही है भर कद शरीर भी नाही है ।। ज्ञानरूप शिव मुत, भर कोई कहे कि पवन भाषा काहे राखी तहाँ भाषा टक्षण, दोहा-भापा ब्रजभापा रुचिर, कहें सुमति सब कोय । मिले संस्कृत फारसी, जो अति प्रगटी होय ॥ अपवा मद संयुक्ति है जिन को गजवदमन कदनसुन नाश नाहों जिनको तिनके पुत्र हैं इति ॥ भर मुगम अप कीमियत है यामें केशव मे सब पद साभिमाप दिये ।। परकरांकुर अलंकार पर गौरीनन्द को यह अभिप्राय कि गणेश गोद महामंगल दाता हैं। साको लक्षण ॥ दोहा ॥ साभिमाय विशेष जहै, परकर अंकुरनाम ॥ एक रदन मिनके का एकदन्तको गन ॥ गमायुर्वेद में शुभ लिसो है ।। पामें कोई की दो अशुभ सो महीं जैसे हाप में तिल उत्तम सामुद्रिक पारंने कही तो का भान अशुभ है। सदन पुद्धि को अभिमाप तुम बुद्धि परहो इत्यादि जानी ॥ भर परतु निर्देश अर्प ॥ एक है रदन दशन मिन के हाप में का जम कंस भयो है तहां गये कृष्ण सम एकापलपापीह को दांत आप टयो एक पदराम सदन युद्धिके पर मदम कदम माशभपो का अनंग साहिबीन्दा है उत्पन्न नितने भर गौरी यशोदा मन्द तिनये भानन्ददेन पर जग निनसी पन्दना करता है। पन्द्रयुत चन्द्रश यदि ॥ अपग पन्द अंतमें देके कृप्पपन्द्र भपा मोर पन्द्रिका रे ॥ शिर मुरादापर सभार रण मुहत दापों इत्यादि मुगम गुपर्क गप सम्ह जो अनन्त पटरामी सो भएसंसार को भगवन्त जान मप रण परदा भर रंगरदर निनको पनी दाये मारी थे. मिस पर प्रहार आपने मुग में दिग्गपो मे जो भाव गिनी जप समें देशतिभा पति है । मुभाशक्तिभटगर सक्षम नारी असो पगम कहिये । () रसिकप्रिया। गुणंगण अनंतभगवंतभवभगतवंतभवभयहरण। 'जयकेशवदासनिवासनिधिलंबोदरअशरणशरण ॥१॥ टीका-या छप्पय में कवि भंगलाचरण करत है। मंगलाचरण को विचार यह कि अन्य निर्षित निषाद सो तीनि रीतिको होतहे नमस्कारास्मक १, आशीर्वादात्मक २, वस्तुनिर्देशात्मक ३ ॥१॥ अथनमस्कारात्मकलक्षण । दोही-करिप्रणाम सुमिरणकर, इष्टदेवताजोइ ॥ नमस्कारआत्मकसुतो, ग्रंथनमतिते होई ॥१॥ आशीर्वादात्मकलक्षण। आवतहै जयशब्दजहँ, देव नामकेसंग ॥ मंगलआशिर्वादसो, कहत सुकविरुचि रंग ॥२॥ वस्तुनिर्देशलक्षण। नमस्कारजयरहितपद, ग्रंथवस्तुकोरूप॥ जानिपरैसुरविनयजत, कहतताहिकविभूप ॥३॥ तो इहां इतनी जानलीज दो प्रथमवारे तो एकरूप हैं | काहे नमस्कार जय साली नाही होत ॥ अरु वस्तु निर्देश को भी पाछे अर्य कहेंगे || अब नमस्कारात्मक व अर्थ यह है कि एक रदन है जिनके । एकको आशय यह कि, अभिमान रूप दशन सो नाशकीन्हों है जिनने । काहे आपुन आफ्नो स्वरूप हीनकरदयो गज हार्य वत् वदनते इहां जो केशव गजबदन कहो है तामें यह जनावत कि, प्रणवरूप गजाना हैं जो दोई कुंभ तेई हैं तीनके अंककी रीतिते तीनको अंक मध्यमें हीनहोइ हैं जानी कुंभ जो उठेहें सोइ तीनके अंकवत् ॥ अरु शुण्ड जो है सोई है प्रणव को दण्ड. आ शय यह कि, प्रथम प्रणव उच्चारण कियो । वह प्रणव अरु गणेश कैसे बुद्धि घर मदन जो काम ताको कीन्हों है कदन नाश जिन शंभु तिनके हैं सुत पुत्र ॥ अर प्रणव में मदन कदन करता है जाके सुतका तीनदेव प्रणवसेहैं ।। गणेश कैसे हैं गौरीव नन्द हैं अस प्रणव गौरी माया नंद पुत्र सब संसार ताके है आनन्दके कन्द जा जगबन्दत दोहुन में चन्दयुत दोई गणेश के भालमें चन्द्रहै प्रणव चन्द्राकार मात्र है मुखदाताह । सुकृत के भी दाताह ॥ गण जो देवह तिन के नायकहें इन्द्र ।। तिनके भी नायकहें गणेश ॥ अरु प्रणव गणनायक ब्रह्मा तिनके नायकहें ॥ सल पायक । अरु दरिद्र पायक । अरु सब लायक जो मन्त्रशास्त्र अरु गुणको जे. गणसमूह सो हैं भनन्त दोहुन में अह भव जो संसार ता विपे भगवन्त, भग ऐश्व.
1 (५) भापाटीकासमेत र्यवन्तहें अशरण के शरणहैं. ॥ दोऊ जय करो. केशवदास की काहे सकल निधि निवास स्थान हो औ लम्ब है उदर अशरण शरण हो । प्रणवको भी जो विष सर्व सिद्धरहत अशरण जैहें वेद जिन आनको शरणं नाहीराखो सो भी जाके शरणहें ॥ प्रयम प्रणव उच्चार वेद पाठ लोकमें भी प्रसिद्ध है ॥ यह तो वरण अर्थ भव गणे श में या मन ॥ सदन बुद्धिदाता नाहिं होत ताकी यह उत्तर के दांत नहीं तो अयु- दि सदन कहांपैगो । अरु मदन कदन प्रथम करचुके तो कृष्ण ने भदन उत्पन्न कीन्हों ताको कदन कहियो अनुचित तहाँ मदन धतूरा को नाम है । तो यामें विक्षि- सता के पुत्र कौन नीकीतहां ऐसी भी कहें कि कदनहीं है जिनको कदन में नाश करने की है सामर्थ्यता जिन को तो वा अर्य में एक मदन मात्ररहो यामें सब संसार- आयो यह अति व्याप्ती है ॥ तहाँ मदनहीं है अरु कद शरीर भी नाही है ।। ज्ञानरूप शिवसुत, अरु कोई कहै कि यवन भाषा काहे राखी तहाँ भाषा लक्षण, दोहा-भापा ब्रजभाषा रुचिर, कहैं सुमति सव कोय ।। मिलै संस्कृत फारसी, जो अति प्रगटी होय ॥ अथवा मद संयुक्ति है जिन को गजवदनन कदनसु न नाश नाहों जिनको तिनके पुत्र हैं इति । अब सुगम अर्य कीजियत है या केशव ने सब पद साभिप्राय दियहें ।। परकरांकुर अलंकार कर गौरीनन्द को यह अभिप्राय कि गणेश गोद महामंगल दाता हैं। ताको लक्षण ॥ दोहा ॥ साभिप्राय विशेष जह, परकर अंकुरनाम ॥ एक है रदन जिनके का एकदन्तको गज ॥ गमायुर्वेद में शुभ लिखो है ।। यामें कोई कह दी अशुभ सो नहीं जैसे हाथ में तिल उत्तम सामुद्रिक वारेने कहो तो का आन अशुभ है। सदन बुद्धि को अभिमाय तुम बुद्धि परहो इत्यादि जानलीन ॥ अरु वस्तु निर्देश अर्थ ॥ एक है रदन दशन जिन के हाय में का जब कंस वधो है तहां गये कृष्ण तब एककुवलयापीड़ को दांत आप लयो एक बलराम सदन बुद्धिके परहें मदन कदन नाशभयो का अनंग ताहि कीन्हों है उत्पन्न मिनने अरु गौरी यशोदा नन्द तिनको आनन्ददेन हारे जग जिनकी वन्दना करता है ॥ चन्द्रयुत चन्द्रवंश कहि ॥ अपवा चन्द अंतमें देके कृष्णचन्द्र अथवा मोर चन्द्रिका है ॥ शिर पै सुखदायकहें भूभार हरण मुकृत दायक, इत्यादि सुगहें गुणके गण समूह जो अनन्त बलराम सो भवसंसार को भगवन्त जान भय हरण. करता अरु लंबो है उदर जिनको यशो- दाको माी के मिस सब ब्रह्माण्ड आपने मुख में दिखायो ऐसे जो केशव जिनकी जय यामें देवरतिभाव ध्यान हैं । सुभावोक्तिअलंकार लक्षण जाको जैसो रूप गुग कहिये तेसो जान ॥
. . रसिकप्रिया । छप्पै-श्रीवृपभानुकुमारिहेतु शृंगाररूपभय । वासहासरसहरेमातबंधनकरुणामय ॥ केशीप्रति अतिरौद्रवीरमारोवत्सासुर । भयदावानलपानपियोबीभत्सवकीउर ।। अतिअद्भुतवंचविरंचिमतिशांतसंततेशोचचित । कहिकेशवसेवहुरसिकजन नवरसमेंब्रजराजनित ॥२॥ इहां उक्ति कविकीते देवरति भाव ध्वनि है । यह कविजनावत है कि अजरान नव- समें हैं जाको जो रसमें प्रीतिहोइ सो ताही रस में कृष्णचन्द्र को सेवन करेअपस्मरण. श्रीकृपभानु कुमारी राधा ताकेतु तो शंगार रूप होतभये ॥ तहाँ प्रथमहीं रसरूप कहियत है कि रसरूप काको कहिये।।२।। दोहा-मिल विभाव अनुभाव पुनि, संचारी सुअनूप । व्यंगकर थिरभावजो सोई रस मुख रूप ॥२॥ ये जो पार है तिनते रस उत्पत्ति होत है। यह मत ती लोलट्ट भट्टको है ।। अरु कि अनुमान कहै हैं कि उत्पत्तिका दस्ति परति यह अनुमान है || अरु भट्टनायक करे कि अनुमान तो वह का कहावे के जो कल्पना मात्र मन में निश्चय करे यह भोग । अर अभिनभ गुरापाद कह ॥ कि भाग जो दृष्टिगोचर नहीं ताको कहांत भयो सविनित होत है सो कहियत है कि विभावना इक नापका परस्पर ताको माम आल. पन विभार || frमार गांद इनके आश्रम में रहत १ अस पनवन शरद पसंत ये दीपन जो या जहां नाही तहां ताकी उत्पन्न कर सो उद्दीपन अपया प्रकाश ज्यादा रेअर स्टार मोक्षपन अनुभात अनियंदादि संचारीरति स्थापी तेरस उत्पत्ति है। पर टोटहभह किमनि । काई असे राम स्वरूप की उत्पत्ति नहीं तथापि ला रामते रामरूप की उत्पत्ति होता है तब संकुकही के उत्पत्ति तो दगा में आरत पदा रामदगने में भारत अनुमान कहो के ऐसे राम रई अपवा ये राम सह- परीति अनुमान की अ भट्टनायक यहाई कि अनुमान नहीं है याको दो सोमाया आररदिय जो तुन्य परमात्मा जो रम साको विशिष्ट जो मोटीसा मते ठहै अर अमिना गुमाद कंद । आदम्यन कारण सत्त अर. दिन भी मतअर मंचारी भी मन स्यापी भी अनुमाते छत मरम के कारण पर कारन में नहीं जान परत जमे पप रस. भानन्द का रोबा १ दहाव्याम नाही रहन मा कैशर कार न रम का भाषाटीकासमेत । श्रीवृषभानु कुमारी के हेतु आप शृंगाररूपढ़ेगये तहां श्रीवृषभानु कुमारी काहे. को यह हेतु कि श्री शोभा देनहार तप्त नहीं ॥ अरु यमुना में व्याति वारनं अर्य श्रीकहीं यमुना भी.पत्नी हैं ॥ अथवा श्रीलक्ष्मी जो है वृषभानुकुमारी सो राधा तामें पन्न कविकरत हैं कि शृंगार रूप कहा तहाँ उत्तर शृंगार को रंग श्याम है सो आपभी श्याम ‘गये तहाँ प्रश्न शृंगार पाछे भयो येश्याम जन्मकेंहैं यह उत्तर नहीं बनत। शृंगार अवस्या होगये जैसे कोई बूझत अमुकको आजकाल्हि कहारूप है तीरूप- नहीं लक्षनातेवाकी अवस्था बुझतहैं ॥ रूप कहा कहाँ है तहां यह कही चाहिये कि शृंगारको रूप कैगये ॥ आपनरूप भूलिगये बिहारी दोहा ॥ कहालटे ते दृग को परे, लाल बेहाल || कहूं लकुट कहुं पीतपट, कहूं मुकुट बनमाल ॥ यहां नायका आलंयन विभाव ॥ बेहाल नेत्र देख है गये यह अनुभाव ।। मोहसंचारी रतियाई ताते विजित शृंगार ॥ अथवा पांच वर्षमें पोडश वर्षको कर्म कियो यह गीत गोविन्दमें ।। मेपैलेंदुर ।। अरुवास हास रसहरे जब गोप-कन्याके वस्त्र हरे तब हास रस द्वैगये.॥ प्र.॥ तहां विभावनहीं बनत | काहे हास तो..अयोग्य वस्तु || जो उलटो कार्यते होतेहै ॥ तामें यह उत्तरहै ॥ कि गोपी जल विपे वस्त्र हीन रही सोई विभाव है || अरु आप कृष्ण पर वस्त्र लेन अनुभाव हर्प, संचारी हास व्यंग ॥ अरु माताके बंधन विपे करुणा नहीं बनत | काहे ॥ यहस माता को है ।। तहां यह कही कि ।। माता बांधत रही तहां रसरी छोटी होनात ॥ तब माताको दुःख जान के आप बंधगये तो यामें भी शोकस्थायी न हो सकेगी कि माता बांधत यमला. र्जुन तारे तिनकी शाप यादआई ।। तोभी उनको तारे तब करुणा कहाँ इहा ऐटी कही चाही के मान बंधन देखि कंस के गृह में आप करुणारूप भयेतो वसुदेव देवकीआलं. बन विभाव ॥ अरु कृष्ण रुदन करत आये सो अनुभाव मोहसंचारी शोक स्थायी ताते करुणा रस ॥ इहां अवस्या क्रम नहीं विचारी ।। रसक्रम जानिये ॥ अरु केशीप्रति अतिरौद्र काहे वारंवार कोप करे ॥ केशीविभाव अरुणदृग अनुभाव गर्भसंचार क्रोधस्थायी ते रुद्ररसअरु उत्साहते वत्सासुरमारोसोशत्रु विभाव आप के अंग अनुपमलीला अनुभाव गर्भ संचारी ॥ उत्साहस्थायी ताते धीर ।अरु वीर रौद्रमें इतनी भेदहै कि वीरमें समताको सुध बनीरहन रौद्रमें नहीं अरु भयानक रस दावानल पानविषे काहे केशव को भय देख आधु भी भय मानी ।। अरु वीभत्सकी उर जय स्तन पान करे तब बहुत गलानी मानि ताको तारी ॥ इहां वाके स्तन पानकी अपने मनमें कंदर्यता जानी ॥ साई वि भाव नेत्रादिको रूप फिरय अनुभाव निंदा संचारी ग्लानिथाई ताते वीभत्स जानिये ॥ अरु ब्रह्मा वत्स दरन में अद्भुत कहाभये ॥ के देखो ब्रह्मा भी अज्ञानी है.सोई विभाव अरु ऐसी आवत रोमांच आये-11-सो अनुभाव शंका संचारी॥ आश्चर्य स्थायी. ताते अद्भुत अरु शांत संतत निरंतर ॥ जव शोच कीनो निरंतर शोच कहा अर्जन wa
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भाषाटीकासमेत -रचोविरंचिविचारतहँ, नृपमणिमधुकरशाहि ॥ गहिरवारकाशीशरवि, कुलमंडनयशजाहि।। ७॥ 3 आदिरद चंद्रकुलपाछे कहायो ताते आदिकुटकहो ॥ ७ ॥ -ताकेपुत्रप्रसिद्धमहि, मंडनदूलहराम॥ इन्द्रजीतताकोअनुज, सकलधर्मकोधाम ।। ८॥ दीन्हींताहिनृसिंह, तनमनजयरणसिद्धि ॥ हितकरलक्ष्मणरामज्यों, भईराजसोवृद्धि ॥९॥ -तिनकविकेशवदाससों, कीन्होधर्मसनेहु ।। सवमुखदेकरियोंकझो, रसिकप्रियाकरिदेहु।। १०॥ -संवतसोरहसेवरस, वीतेअडतालीस ॥ कातिकमुदितिथिसप्तमी, वारवरनरजनीश।। ११॥ (जनीश चन्द्र॥ ८॥९॥ १० ॥११॥ -अतिरतिगतिमति एककार, विविधविवेकविलास ॥ रसिकनकोरसिकप्रिया, कीन्हींकेशवदास ॥१२॥ तिका प्रीविकी गति अर्यनीति सव औरते स्वीचि मतिकी गति कहा अपनी मति जाइ एककरि कहाँ जापनीति ॥ ताहीमें मविटगी अरु नानारीति को दिवे- लास अरु विविध रीतिको जो विवक ताको विलास यहहै मानशास्त्र चितवन सेक जोपुरुप है विषयहीन जैसे राधाकृष्ण उपासक ॥ तिनके देत रसिक- हि ॥ अयवा जिन रसिकन रति की गति मतिकी गति एककरी है । अरु विकले विलास तिनकेहित अयवा रतियाईकी गतिमें करी ॥ मतिकीगति की गति मति एक अप कम प्रथम विभावजान अनुभाष रूपजान सो संचारी पई सवलीन आश शुटिगयो है अपदेहाध्यास जिनको ॥ १२ ॥ -ज्योपिनडीटनशोभिये, लोचनलोलविशाल ॥ त्योंहीकेशवसकलकवि, विनवाणीनरसाल।। १३ ।। ( तातेरुचिशुचिशोचिपचि कोजसरसकवित्त ॥ केशवश्यामसुजानको, मुनतहोइवशचित्त ॥१४॥ । कदिन पैसा बनाइये ॥ के जामुनत श्याम मुजान मुमुन्दर श्याम कृष्ण नानरें ऐसे करिशे पित्त यशहोइ अपाभ्याम मुजातशृंगार रस जाननहार,
()
रसिकमियां ।
को उपदेश करन लगे तब अयवा उद्धव को तो यहां कोई शांत ते पाठ कहेहें
तहाँ सात मुनिनसों मिलें अयंवा शांत है चित्तं जिनको ऐसे महादेव जब ब्रज में
जब उनको शांतकंप देख आप भी शांत रूप दे गये इहा महादेव विभाव
समता ज्ञान अनुभाव || धैर्य हर्ष संचारी निरवेद थाई ताते शांत रस सो कहत ।
केशव कवि अयवा केशव यह नाम रहार कर हे रसिक जन । सेवहु ॥ ब्रजर
नवरस भयहें ॥ यहां रचना कर बात कही ताते परजा उक्त अरुं बहुविधि वर्ण
उल्लेख ।। अरु एक कृष्णको अनेक रीति ते अनेक गैर कहे ताते तृतीय विशेष
शंकर है ।।दोहा । अलंकार है क्षीर औ, नीर सरस कविराज ॥ मिले समुझ शंकर
जे जानत मुखसाज ॥२॥
दोहा-नदीवेतवैतीरजहँतीरथतुंगारन्न ।
नगरओडछोबहुवसैधरणातलमधन्न ॥३॥
अपकवि अपने नगर कीस्तुतिकरत हैं कि नदी है जामें येतवे ताके तीर विपेठीय है तुंगार
ताके नजीक नगर वरी है धरणीतलमें बहुत धन्यहै धन्य काहे के जहांनगर तहां तीरतय ना
जहां तीरय तहानगर नाही जहांदोई || तहां उत्तमभूप नाही यामें पहुं पसे कहनेते ये
सूचत की है के देवता भी बहुत है ताते देव धन्य कहतहे अरु कोई ऐसी भी कह
के देवलोकते तरे हैं ॥ ३ ॥
दोहा-आश्रमचारवसेजहां, चारवरणशुभकर्म ।
जप तपविद्यावेदविधि, सर्ववढेधनधर्म ॥४॥
पारंभाश्रम गृहस्य ब्रह्मचारीयानप्रस्य संन्यासी पारवर्ग ग्राह्मण क्षत्रिय य'शूद्रसे सन
शुंभकर्मकरें हैं यजन याजन अध्ययन अध्यापन दान प्रतिग्रह ब्रह्मान इत्यादि समजा
निये पारभाश्रम पारवर्ण जप तप विद्या वेद विधिवारी करत जाको जो धर्म है
मंप करत ॥४॥
'दोहा-दिनप्रतिजहँदूनॉलहै, जहाँदयाअगदान ॥
एकतहकिशवसुकवि, जानतसकलजहान ॥५॥
दोहा-अपनेअपनेधर्मते, संसदामुखकारि ॥
जासादेशविदेशक रहेसवेनृपहारि ॥६॥
अपने अपने धर्म ते मनमुम कर तिनस्य देशके नृप दारिंग प्रम का धारक
रांगामे वे बड़े प्रपटाई ३० पूर्वकादि आवे अपने अपने पर्ममें सयाँ इहिते राम
नही देर ते भाराव बाई महा करत इहित परि अरु विदेशके भयो ।। ५॥६॥
भाषाटीकासमेत दोहा-रचोविरंचिविचारतहँ, नृपमणिमधुकरशाहि ।।. गहिरवारकाशीशरावि, कुलमंडनयशजाहि॥७॥ रविकुल आदिरहै चंद्रकुलपाछ कहायो ताते आदिकुलकहो।। दोहा-ताकेपुत्र प्रसिद्धमहि, मंडनदूलहराम ॥ इन्द्रजीतताकोअनुज, सकलधर्मकोधाम ॥ ८॥ दोहा दोन्हींताहिनृसिंहजू, तनमनजयरणसिद्धि ॥ हितकरलक्ष्मणरामज्यों, भईराजसोवृद्धि ॥९॥ दोहा-तिनकविकेशवदाससों, कीन्होधर्मसनेहु ।। सवमुखदेकरियोंकह्यो, रसिकप्रियाकारदेहु॥ १०॥ दोहा-संवतसोरहसैवरस, बीतेअडतालीस ॥ कातिकमुदितिथिसप्तमी, वारवरनरजनीश॥ ११॥ मार रजनीश चन्द्र ॥ ८॥९॥ १०॥ ११॥ दोहा-अतिरतिगतिमति एककार, विविधविवेकविलास। रसिकनकोरसिकप्रिया, कीन्हींकेशवदास ॥१२॥ रतिगतिका प्रीतिकी गति अर्यप्रीति सव ओरते स्वीचि मतिकी गति कहा अपनी अनंत न जाइ एककरि कहां जापैप्रीति ॥ ताहीमें मतिलगी अरु नानारीति को क।। विलास अरु विविध रीतिको जो विवेक ताको विलास यहहै आनशाख कि त्याग रसिक जोपुरुष है विषयहीन जैसे राधाकृष्ण उपासक ॥ तिनके हेत र प्रिया करीहै ॥ अथवा जिन रसिकन रति की गति मतिकी गति एककरी है ॥ विविध विवेकके विलास तिनकेहित अयवा रतियाईकी गतिमें करीहे ॥ मति संचारिन की गति मति एक अर्यक्रम प्रयम विभावजान अनुभाव रूपनान सो याईद्वेगयेहें लवलीन आश छूटिगयो है अर्थदेहाध्यास जिनको ॥ १२ ॥ दोहा-ज्योपिनडीठनशोभिये, लोचनलोलविशाल ।। त्योंहीकेशवसकलकवि, विनवाणीनरसाल॥ १३ ॥ दोहा-तातेरुचिशुचिशोचिपचि, कीज़ेसरसकवित्त । केशवश्यामसुजानको, मुनतहोइवशचित्त ॥१४॥ सरस कवित्त कैसो बनाइये ॥ कै जामुनत श्याम मुजान मुसुन्दर श्याम जिनने जानेहें ऐसे कविको चित्त पशहोइ अथवा श्याम मुजानशृंगार रस जान
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भाषाटीकासमेत। अथ प्रच्छन्नसंयोगउदाहरण || सवैया। वनमेंवृपभानकुमारिमुरारिरमेरुचिंसों रसरूपपिये। कलकूजतपूजतकामकलाविपरीतरचीरतिकेलिहिये। मणिसोहतश्यामजराइजरीअतिचौकीचलैचलचारहिये। मखतूलकेझुलझुलावतकेशवभानुमनोंशनिअंकलिये॥२०॥ वनमें वृषभानकुमारी राधा अरु माधव रमन करें हैं । बहुत रुचिसो रस जो रूप. ताहिको पीकरके तो रसनाम जर को सोईरूप वारुणी को अर्यांश मदमत्तगये। मनोहर कूजतहैं शब्दकरत हैं । अरु काम कलानको पूजके पूर्ण करतहैं तहां रीित रतिहै ॥ रविकेलिहियेमें ॥ विचार ताते मणिमय जी चौकीश्याम है । सो शके हियेमें सोहत है । अरु चलत है सो कैसी लागत ! मानों मखतूल श्याम पाट के झला में झूलावत है भान शनि अंक गोदीमें लेके ॥ इहां चौकीभानु । श्यामम शनि अरु जो वेणिके बार सोई मखतूल अथवा मखतूलही में वहचौकी गोईहे में पांचप्रश्न । एकनायक को नाम शृंगारमें मुरारी दूसरो प्रयम कवित्तमें विप- शब्द अमंगल तीसरे सखीउक्ति सखीप्रति प्रच्छन्न में चौथो सूर्य अरुण है सुवर्ण समें ।। पंचम स्त्री पुरुष में पिता पुत्रकी उत्पेक्षा तामें उत्तर । के मुरनामा गरका- : कोई दैत्य रहो स्त्री इच्छाकारी ताहि मारि सोरह हजार कन्याल्याये ताते महा गाररूप नामहै || अरु कोई कहैकीमुरारि नाम पाछेभयो ॥ द्वारका में यह लीला नकी है ।। तहां परमेश्वरके नाम सब अनादिहें तो इहांवृपभानकुमारी नाम ॥ काहे न कीनी गोपकुमारि अथवा राधामुरारि इककहते तहांऐसी कहिये के म- न संयोग करनकी इच्छाजान वृषभान कुमारि मुरारिनाम राखौहे का वृषभान- मारी महा तेजवंत अरु मुरारि महावीर ते यहसूचित करत के स्त्री तहां आन- हो रहै ।। ताहि के डरते बिहारी को घटाये वृपभानजा वे हलधरके वीर । अरु परीतको उत्तर यह कियो के दोहुन की प्रीति पूर्ण है ताते स्थायी पूर्ण भयो अरु नुज्ञा अलंकारकी रीति केशवने राखीहै ।। ताकी लक्षण । दोहा ॥ होइ अनुज्ञादोप , जोलीजैगुणमानि । होई विपत जाम सदा हिये वसेहरिआनि ॥ तो इहां थोरोदोष हुतगुग ॥ तो इहां भी दोप मनोरहो । तहां ऐसी कहेचाही एकै पूजत काम कला. (मकी कला सयपूजत नाम पूर्ण होत तब विपरीत रचि ।। कै कामकला कौनहु वाकी न मियम तोरमण पहिली तुक में करचुके जोमंगलरूप है । अरु अंत में पूर्णमें रति विप-- त रचि तीनो उत्तर । कि सखी एक नायककी रही एक नायक की रही सो ऐसेही ॥ अरु सखीते लक्षण कर सस्ती भी बनतहै । काहे सखी मंडन शिक्षा करन उपा म परिहास ॥ ससाविट चेटकादि कहे हैं तो यामें प्रभहू नाही है ॥ अंतरंग ससा (१२) रसिकप्रिपा। अंतरंग सखी चारों तिन समानहें ॥ याते के नायका को मान नायक की सस्त्री छुटा- वत नायक | नायका की सखी सों अंतरंग || सखी अंतरंग सखी सौ कह । अरु चौथो उत्तर के मणिरक्त में न्यामको प्रतिषिय परी तहां एक यात रहिजात है के उपमान तीन उपमेय दो है सौ न बहें तहां ऐसी कहै चाही कि उपमानते उपमेय बोध होत है । सो प्रसिद्ध है।इहां मसतूल ते गुणको योध कीन्हो परंतु ऐसो अर्थ कर तो सरिल अर्य होइ । के मणि शोभावान् होइ है। यामते मध्य की जराउ जरी । अति चौकी भी का सुवर्ण नाहिं देखि परत । ऐसी जराउते जरी है सो अति साहत है काहे जे ॥ मणि के कण लागते रूप देखिपरत । तोजो बाहिरकिनारेकी मणि सोझला अरु मध्यकी सोईहै- शनि | अरु पांचयें प्रश्नको उत्तर यह कीन्हों के उत्प्रेक्षामें दोपनहीं तथापि अनजी मणीहै । चार तरफकीतहां कहिकै मणि सोहत है ॥ श्याममूर्तिके श्यामशोभित है । चौकी में सो चौकी चलतह सो मानों मखतूलके झूला झुलावत केशव कृष्णकि न्हेभाशोभातिनको झुलावत हैं ॥ आस पास जो मणी लगी हैं सो मानों शोभा रूपहें । रूपवंत तिनको एकअंकमें लेके झुलावत हैं। शनि कहा प्रीतिमें सनिके। तहां बहुत कलेश ते अर्थहोतहै ॥ उत्प्रेक्षा में इनकोदोष नाहीं। बिहारी दो० ॥ भाल लाल बेंदा दिये, छुटे धार छवि देत। गहोराहु अतिआहुकर, जनु शशिसूरसमेत तो इहांशशिसूरस- मेंत नाहीं गहत ॥ उत्प्रेक्षालक्षण दोहा । उत्प्रेक्षासंभावना, वस्तुहेत फललेख ॥ पहिली उक्तिअनुक्ति है, सिद्ध असिद्ध विशेष । तो इहां वस्तु चौकीमणि संभावना तामें शनि- सूर्यकी अरु झुलावन क्रिया के आगे मानो ताते अनउक्ति विषयावस्तूत्प्रेक्षा! २० ॥ प्रकाशसंयोगलक्षण । दोहा-सोप्रकाशसंयोगअरु, क.प्रकाशवियोग ॥ अपनेअपनेचित्तमेंजानैसिगरेलोग ।।२१ ॥ जो सिगरे लोग न जानो तो आगेस्वकीया के लक्षण में कहा होइगो ॥ लज्जानर- ही तहाँ एक तो इन लज्जा लक्षण में । नाहीं करी तयापि सिगरेलोग अंतरंग पहिरंग. सखी सता जान॥ २१ ॥ अथप्रकाशसंयोग उदाहरण ॥ कवित- केशवएकसमयहरिराधिकाआसनएकलसरंगभीने। आनंदसौतियआननकीद्युतिदेखतदर्पणमेंडगदीने ॥ भालकेलालमबालविलोक तहीभरिलालनलोचनलीने । शासनपीयसवासिनसीय हुताशनमजनुआसनकीने।।२२॥
भाषाटीकासमेत। बहिरंग सखीकी उक्ति बहिरंगसंखी सों। के हेस्सी एकप्तमय में हारिअस राधिक 'आसन रसभीने बैठे हैं । तहां कहीकै सामुहे बैठेहै तब रसभीने होंहिगे । तामें जब सामुहे बैठे । तब दर्पण दोई कैसे देखिहैं | तो बराबर कहो चाहि ये रस भीने भुजउ "नकी उनके ऊपर उनकी उनके ऊपर । अरु आनंद सों तीय आनन की युति दर्पण 'मैं देखतहै गदैकै॥ तब माल जो बालकोहै तामें जो लालबेंदा तामें जो परी प्रतिबिंब पालको सो देखतही लालने लोचन भरलये। काहे कि शासन आज्ञा ताको पाइदै संवासिन बत्रसहित सीता हुताशन मेंमानों आसन कीन्हे है।। अरु जी आपन भालकह तनायक विषभालमें लालकहा अरुजो मुकुटसहित माणिक है तो भाल के ऊपरहै अरु बालको देखियो नाही रही जो अपने लाल में देखो । अरु यह कहो तो कि रस भी हैं । कहारति विपरीतकर उठेहैं । सो भूपण घसन वैसही बने हैं तो अर्थ बनत तामे चार प्रश्न एकता संयोग विषे वियोग दूजे आंशूती वस्त्रको कहा प्रयोजन ॥ चौ दोसखी में प्रकाश कैसे ताको उत्तर । के सीता लंकाविषे अग्निमें पैठी तो संयोग है। अरु सवस्त्र ते सीताके सत्तकी पढ़ाई के सीताकोवस्त्र भी न जरी तहां यहमन्नहै कि श्री राम जब जानकी को अग्निप्रवेश करायो तब कालाग्नि सरिस द्वैगये अरु कृष्ण शृंगार - स्वरूप सो कैसेवनिहैं तहां ऐसे कही है । जब जानकी अग्नि प्रवेश कीन्हों तब कया तो वियोग ताते जब लवकुश को युद्ध भयो तबकी क्याहै तो तहां हर्ष होगी। तो यामें आनंद आंशूबनि अरु कोई कहकिइहांजानकीकहांतोसुमिरण है । अरु चौथ यहकि आन समयकी वात बहिरंग कहतहैं । अरु जी द्युति सो भरिलई कहत ते सब अर्थ नष्टद्वैगयो | काहे जानकीकी सुधिआई सौ व्यर्थपरिगई । इहां नायव नायका आलंबनविभाव अरु अविलोकन अनुभाव आनंद संचारी रतिथाई तारे शृंगारसे सुमिरण अलंकार ताकोलक्षण दोहा ॥ लखतआनसुधि आनकी, आवत सुमि रणहोई । भालपाल के पेखते, सियसुधि आईसोइ ॥ २२ ॥ अथराधिकाकोप्रच्छन्नवियोगशृंगार यथा ॥ सवैया । कीटज्योंकाटत्योंकाननकानसोंमानहिलेकहिआवतजनो। ताहिचलेसुनकेचुपद्वैगयेनीकहीकेशवएकहिदूनो ॥ नेकअटेपट फूटतआँखिसुदेखत,कवकोत्रजसूनो । काहेकोकाहूको कीजैपरेखोसुजीजेरेजीवकिनाकदेचूनो ॥२३॥ उक्ति नायकाकी अंतरंग सखीसों कैसे सखीमें जो मान में ऊतीबात कहतरही वे मेरे कानन को जैसेकीट 'काटततसीलागतरही यह अर्थम प्रश्नकरी कि जीभको क नायकनीको नाहीं लगतरहो ॥ तहां उत्तर । तूमेरी पक्षकरकान्ह 'सों कहतरही तहाँ मानयह शन्दव्यर्पही जाईहै ॥ तहांऐसी अर्यकीजिये कि कानन को तो कान्हकीट समान काटतरहे अरु जीभमान में भी कतो कहै विपम कामों तें विषममें मानवती जीभनेहिनी ताकोचलो सुनचुपगये । एकन. एकजीभनाहीं । दूनीजीभभी कान A रसिकप्रिया। या कोई कह का कान पोलतरहे तो मैन तब काननको सुननेकोज्ञान रहत तब विचारो तो भावान भाविहे जययथिर होनात तब आयान नहींभावत यहरीति इनकी अरु आंखिन की कौनयात ।। कहोंनेक अटेपट पटजी इनपै मेकटे ब्रजर के सामुहे तो फूटतरही सो करको ब्रजसूनो देखती है तातेकाहे निमित्त काहूको खो करिये । अयंजी जे हेजीव कि नाक यमको चुनोती देके इहां कीटज्या दृष्ट- चुनोती लोकोक्ति है ॥ २३ ॥ अथराधिकाकोप्रकाशवियोगशृंगार यथा ॥ कवित्त ॥ अन्यच्च ॥ जिनकेमुखकीद्युतिदेखतहीनिशिवासरकेशवदीठअटी। पुनिप्रेमवदावनकीवतियांतजिआनकरसनानरटी ॥ जिनकेपदपाणिउरोजसरोजहियेधरिकपलनैनघटी। तिनके सँगछूटतहीफटुरेहियतोहिंकहानदरारफटी ॥२४॥ यह कवित्त केशवको नहीं है । तिलक कारने नहीं लिखो ॥ २४ ॥ अथराधिकाकोप्रकाशवियोगशृंगार यथा । कवित्त ।। शीतलसमीरटारिचन्द्रचन्द्रिकानिवारिकेशोदासऐसहीतोहरप हिरातुहै । फूलनफैलाइडारझारिडारिधनसारचन्दनकोडारे चि त्तचौगुनोपिरातुहै ॥ नीरहीनमीनमुरझाइजीवनीरहीते क्षीरकैछि रीकेकहाधीरजधिरातहै । पाईहतपीरकधीयोंही उपचारकरआगि कोतोडाढ़ोअंगआगहीसिरातुहै ॥२५॥ उक्ति नायकाकी सखीसों ॥ के शीतल समीर टारिदै । अरु चन्द्र अरु चन्द्रिका में निवारिका जिन दिखरा । कि मेरो हर्ष तो ऐसही हराइ जातु है तू काहेको उपचार करति है । अरु फूलनको फैलाइदै अरु धनसार झारदै ।। अरु चन्दन को डार दे याकों देख मेरोचित्त चौगुन पीडा पावतु है ॥ जलहीन जो भीन मुरझानी सो जल. हीते जीवत है क्षीर दूधके छीटाते वाको धीरज नाही होत । तूने पीर नाही जानी ।। येजाने उपाय कर रही है। आगि को जरो शरीर आगिही के सेकनेते आछोहोत है।।अर्य वनायक मेरी पीर न जायगी। यह तो परन अर्थ तो इहां प्रश्नकरी ॥कि जहांचन्द्र तहां चन्द्रिका रहत है ताको यह उत्तरकीजै कि चन्द्र शशी चन्द्रिका भूपण अरु कोई कहै के भूपण विरह में कहांते आये तो वियोग पांचरीति को होत है ॥रसरहस्य दोहा । अब वियोग कहि पांचविधि जहँ पूरवअनुरागविरह ईरपा शाप पुनि गमन विदेश विभाग । तो इहां विदेश गमन सुन करिके दुःखभयो है या पदते जानीजातक||आग को जरो अंग भागतसिराति है। तो नायक को रोकनेकी तदवीरकर ॥ अथवा सूरने विरह में लिसे भूषण । जात पेद सनाह मारीवीर भूपणजार ॥ अयथा गैहमें रहीतहां । भूपग घरे . . . भाषाटीकासमेत। हैं ॥ अरु दूसरीप्रश्न । उन हर्ष हिरात में कि हर्प कहां रहै | विरह में जो हिरानो है ताको उत्तरकी कि ध्यानजन्य सुखरहो सो संखीनके छुवेते गयो तो यामें ध्यान- होति ॥ तो शीतल समीर टार काहेको पहिले कहती । इहां ऐसीकहे. चाही एकैनाद दशा को प्राप्तहोत है अयवा || नायक,विदेश गमनते हर्ष हिराइगो । अयवा ॥ ऐसो अर्थ करो चाही तू ऐसही तो || गतिमें हरपत है । मोको दुःख दीबेको तहां कोई कहे उकारांत ॥ शब्दको ईकारांत काहेकरो तो ऊकारांत ईकारांत इकारांत उकारांत। अर्थ के निमित्त हो जातिहै ॥ विहारी दोहा । पारो सोर सुहागको इत, विनहीं पियने- ह ॥ उनदोही अँखियां कि कै; कै अलसोहीदेह ॥ उनींदीसी आंखें कैके चाही तहां कि कही है।याते दोष नाही अरु तीसरी प्रश्न में चौगुन काहे कहे १० ॥ २० ॥ गुण- कहते ताको उत्तर ॥ कि चकार मयत्री। तहां फेर प्रश्नकै १४ ॥ २४ ॥ २४ ॥ गुणकाहे न कहो । कि चन्दन काष्ट ताते । अनि निकसत तो सोभी नाही बनतकाहे चौगुन को अर्थ न निकसो तामेंविरह. १ दूजो ध्यान छुट व तिसरो रोगआन उपाय आन ॥ चौथेसखी कूरतहां फेरप्रश्नकै उपाय विरोध में सखीकी कूरता होचुकी फेर- अजात काहेकोकही तहां उत्तर ॥ के आनवैद्य जो देहकी तासीर नाहीं जानत सो कर तो औषध दोपकाहे प्रकृति वाने नाही जानी ॥ अरु जाननहार प्रकृतिको करती कूरकहावे । तहां येनाहीबनत काहे कि परपीरके कारण संयोग विरह पाइ भये ॥ इहां- यहकही कि एकपीर नायक जो अवस्था उत्तम में छोड विदेश जात । अयवा गयो दूसरो मदन धाण तीसरे लोकलाज जाते राखनसखी ॥ चौथे शीतल उपचार । अरु सखी बहिरंग काहे कि ॥ विरहदाह नाहीं जानत रही ।। नायका कहति । तु बिन पी- रपाइ उपचार करतिहै ॥ याते प्रकाश । इहां शीतल समीरादि उद्दीपन नायका जोत- लफत सोई अनुभाव दीनता संचारी रतिथाई ताते शृंगाररस ॥ अरुनायकनाही तातेवियोग |.इहां व्याघात अलंकार ताकोलक्षण ॥ दोहा । व्यघात तो कछु आनते कारज होवआन || शीतल सबउपचारते बाढी तपन महान ॥२५॥ दोहा-योप्रच्छन्नप्रकाशसव, वरणैयोगवियोग ॥ 'अवनायकलक्षणकहों, गूढअगृढप्रयोग ॥२६॥ यो प्रच्छन्न सुगम ॥ २६ ॥ इतिश्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायरसिकप्रियायां प्रच्छन्नप्रकाशवर्णनंगाम प्रथमः प्रकाशः ॥ १॥ इतिश्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्या ज्ञाभिगाभिललितपुरनिवासिहरिजनकवीश्वरात्मनेनसरदाराख्यकवीश्वरेणवि रचितायां मुखपिलासिकाटीकायारसिकप्रियायां भूपणे प्रच्छन्नप्रकाश संयोगवियोगवर्णनंनाम प्रयमा प्रकाशः॥ १॥ H
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भाषाटीकासमेत। (१७) अथप्रकाशअनुकूल यथा ॥ कवित्त । केशवसुधीविलोचनसूधीविलोकनकोअविलोकसदाई। सृधियोंवातसुनसमझेकहिआवतसूधियोंवातसदाई ॥ सूधीसुहांसीसुधाकरसों मुखशोधलईवसुधाकीसुधाई। सुधेस्वभावसवेसजनीवश केसेकियेअतिटेड़ेकन्हाई ॥५॥ बहिरंगससीकी उक्ति नायकासी ॥ कि तेरी विलोकन सूधीहै । अरु सब स्वभा भी सूधहें || पर टेटे कान्ह कैसे वश करे हैं | तो यामें नायक आनते टेदा रहत यही अनुकूलता है इहां टेढ़े को कारण नहीं अर यश कलिये ताते प्रथम विभावन अलंकार । ताकीलक्षण ॥ दोहा । विनकारण कारज उदो, प्रयम विभावन जान बिन टेदि ही रीतित: यश किय टेटे कान || अरु इच्छाफल विपरीतिते विचित्र ॥ ५ अन्यच ॥ कवित्त। मेरेतोनाहिनेचंचललोचननाहिनकेशववानिसुहाई। जानॉनभूपणभेदकेभावनभूलहूनैनहिौहँचदाई ।। भोरेहनाचितयोहरिओरत्योपरकरेइहिभांतिलुगाई। रंचकतोचतुराईनचित्तहिकान्हभयेवशकाहेते माई ॥६॥ उक्ति नायका की यहिरंग ससीसों कि हे सस्त्री! मेरे नेत्र पंचट नहीं अरु मुह गाणी भी नहीं है जानोंहों नहीं भूपण भेदके भावको अरु भोरे भौहें नहीं पढ़ाई अरु भोरेभी इरिकी और नहीं चितवतहों मेरो परनाम गीला लुगाई नाहक कर- हैं । अरु रंचचतुराई भी नहीं है । पर हरि काहे घों वशमये सो में नहीं जानतर परंतु भाई चदाई नहीं । अरु दूसर भोरही हरिकी और नहीं देखो तो अनुर की नायका स्वकीया कैसे? यह दूसरी प्रश्न ताकी उत्तर ॥ कि में भूपण के भेद न जानती । तथापि उन भी नहीं पढ़ाई तो इहां प्रसंग इत होनात है ॥ काहे भए रीति तीन तुकमें कहत है । सो बीचहीमें नायककी रीति जनाई । अरु फेरजप पात कहन लागी ॥ ताते भूपण भावको भेद यह पदको भर्प नहीं दगी के यह कहत कि ।। भू(पृथ्वी)सनमेवारो भाव ताको भेदमें नहीं जानत । अयंदपु मध्य गुरुमानतो में जानत नहीं हो पामें यह जनाई कि नापक परकीयान के संग ती तप में मान करती अरु भौहे पदाई नहीं भूला यामें यह पानेकीराद भेदभी न जानत हो पातें यह सूचित करत रि कनिष्टाक पासभी नहींगात । भरु वितई न तारी उत्तर को जैसे पैर दंगाई करती तेसे में नहीं चितई ।। तो यामें लगाई तो पैरसरती किन नापक मार लिये सो क्या मी चितवन रही लाको यह उत्तर: ३
(१८)
रसिकप्रिया।
भूपण भौहें चदाइकी कौनकहै ? मैं भूलहू त्या हरिकी और चितई नहीं त्यान
जैसे तैसे रोपपती चितवताह इति । जहां पहिरंग ससी कहै तहां प्रकाशनानने नह
रंग तहां प्रच्छन । इहांहू विभावना अलंकार प्रयम जानने पूर्वरीतिते ॥ ६ ॥
दक्षिणलक्षण ।
दोहा-पहिलीसोहियहेतुडर, सहजबढाई कानि ।
चित्तचलेहूंनाचलै, दक्षिणलक्षणजानि ॥ ७॥
अनेक नायका जाके विवाहिता तामेपहिली सौह हीयमें हेतु हरसहन जाकी'
होतिहै अरु कानलजाकी अरु चित जाको चलेहू तनअचल रहेसो दक्षिण प्रथा
लक्षिण दक्षिण को कियो, अक्षिन केशवदास ।। लक्षण लक्षण कयिनको, कीन्हों।
नास ॥ उत्तर कि पहिलीसों जैसो हेत है तेसो सब विवाहितासों ॥ ७ ॥
प्रच्छन्नदक्षिणउत्तर ॥ कवित !
हरिसेहितूसोंभ्रमभूलहूंनकीजेमानहातोकरिहियहसोंहोतहित
नियें । लोकमेंअलोकआननीकहूलगावत, सीताजूकोदूतंग
कैसेउरआनिये ॥ आँखिनजोदेखियतसोईसांचीकेशवराइकानन
सुनिसांचीकबहूंनमानियें । गोकुलकीकुलटाययोंहीउलटाव
आजलातोवैसहीकाल्हिकहाजानियें ।। ८॥
नायकासों काहू कहीं कि नायक एकपर आसक्त भयो सो सुनि अपने मनसों
है कि हरि ऐसे हितसों भ्रम भूलिहू न कीजे हे मन । हरत करके नामहत नाश क
होय हानि होति है । अरु लोकके अलौकिक नीकेको लगावै यामें सीताजू की
दूतने श्रीराम सो नीचकी कहो कैसी कहीं ॥ ताजे जो आंख देखिये सो साँची है व
नकी सुनी कयहूं ना पतियाइये । ये जो गोकुल की कुलटा है सो ऐसही उलटा
हैं आजुलौं तौ कान्ह वैसही है काल्हको कहाजानी ? यामें आन कविसों विरोध :
काहे एकभांति रहत इहां नायकको अन अपराध वस्तु तातें काव्यलिंग अलंका
लक्षण दोहा । "काव्यलिंग सामर्थ्यता, जहँ दृढ़की जैवात । काननकी झूटी लिये, सि
दृष्टांत देसात"॥८॥
प्रकाशदक्षिण ॥ सवैया।
चितचोपचितवकीतैसीयेहेअरुतसीयेभांतिडरातघने ।
अरुतेसेइकोमलवोलगोपालके मोहतहतिहिभांतिमने ॥
गुणतैसेइहाँसविलाससबैहुते तैसेइकेशवकोनगने ।
सखितूकहोमानवधूकेअधीनसापरतीककिधोंसपने ॥ ९॥
भाषाटीकासमेत। उक्ति नायका की बहिरंग सखीसों कि हे सखी उनके चितवे में चोंप तैसी है जैसी गे रही का एकभांति नेह मानत रहे ||अरु जैसे डरातिरहे तैसेई डराति है । अरु सेई बोलीत है जैसे बोलतरहे ॥ अरु मनको जाभांति मोहत रहे तामांतिमोहत है अरु ग हासविलास तैसेई हैं जैसे रहे तैसे सब हाव भाव जैसे रहे । कहांतक गनिये ।। रु तूं कहत है कि आनहीं के वधू एकके आधीन होगये सो सापरतीक साक्षात्में देखें कि स्वपमें इहाँ नायकाके उत्तरते उत्तरा अलंकार जानीजात है |॥ ९ ॥ पुनः कवित्त । बहिअंतरगूठअगूढनिरन्तरकामकलाकुलकोनगने । कहिकेशवहासविलाससवैप्रतिद्यौसवढेरसरीतिसने ॥ जिनकोजियमेरेईजीवजियसखिकायमनोवचप्रीतिघने । तिनसोंकहेंआनवधूकेअधीन, सापरतीक किधोंसपने ॥१०॥ यह कवित्त केशवको नहीं है ॥ १० ॥ शठलक्षण। दोहा-मुखमीठीवातेंकहे, निपटकपटजियजान । जाहिनडरअपराधको, शठकरताहिबखान ॥ ११॥ मुखते मीठी बातें निपट करै अरु जियमें कपट राखे जाहि जाको अपराधको इर न राखे ॥ १२ ॥ प्रच्छनशठ यथा ॥ सवैया। रुचिपंकजचंदनकंचनचम्पकरंचनरोचनहूकिरची। कहियेकिहिंकारणकोइतेलायककापरभामिनिभौंहनची। अनुमानतहाँखियालखिलालयेनाहिनेरातिकोपरची । तनतेरेवियोगतपोतरुणीतिहिमानहुँमोहियमाहँतची॥१२॥ नायक नायकाके नेत्र में लाली देख आपनो अपराध छुपाइवे निमित्त मीठी बातें कह- त है कि हमाणप्यारी तेरे जे नेत्र तिन में रुचि पंकन (कमल)अरु चंदनअरु कंवन चंपक की अरु रोचनहूँ की रचोद । यामें पंकजरोचन तो अरुण है ॥ पर चैपक कंचन पीत सो काहे कही यात पंथ विरोधी अंवदोप होतहै । पीत नेत्र तो नाहि काहू बरणे तामें यह कि कछुक लाली आई है तो रोचन काहे कहो तहां यह कही कि आगे वि- योग आंचलों तबाह तो तप्त कंवनभी अरुण होत है । अरु चंपकरंच नहीं कहां चंपकवारी पीतता रंचभी नहीं है रोचनसी रचीहिं कहिये किहि कारण को है । इनते
(२०)
रासकामया।
लायक का पर भानिमि भेहिं नवीह ॥ तातें में अनुमान करतहों तिहारी आंख
लाल लखत कि जो रोपते नाही रचीहि ।। तेरे पियोगते मेरो तन तपोहै तामें जेरहती
ताही आंच सौ ये तीहें । इहां हेतू मेक्षा अलंकार है ताको लक्षण । दो० ॥ जाको
हेतु न होइ, सो ताको यांपै होत । हेतूप्रेक्षा जान तहँ हग लाली तप चेत ॥ १२ ॥
अथप्रकाशशठ यथा ।। कवित्त ।
कानरंगरंगेनैनतिनहूकेडोलैंसंगनासाअंगरसनाकेरसहीसमानहो।
औरगूढकहाकहोंमूढहौजूजानजाहुप्रौढरूढकेशोदासनीकेकरजाने
हो|तनआनमनआनकपटनिधानकान्ह सांचीकहोमेरीआन काहे-
कोडरानेहीं । वेतोहविकानीहाथमेरेहाँतिहारेहाथतुमंब्रजनाथहा-
थकानकेविकानेही ॥१३॥
उक्ति बहिरंग सप्तीकी नायक प्रति । कि कान्हके रंगों रंगेहें तिहारे नैन अर्थ
जो मुनपाई आननायका सोई आप चले गये । ताते तिहारे नैन तिनकानन संगडोलत
है जहां चाहें तहां लेजाइ यामें नायक अपराध नेत्रकी यहाई ॥ अरु नासा रंग हो
नुम नासारंग जैसे भ्रमर कि जहां सुवास पावे तहां को मधु पीवे । अरु और जोमूह
कहिये योग नाही एहो कहा कहाँ मूढ जो होइ सो भी जानजाइ तुम मोद कट्ट
केशवदास हो प्रौढ़ होइ वा रूट होइ सुंदर असुंदर कोई होइ परंतु तुमताके
दासही या नीक कर जानेही । तुम्हरो तन आन को है मन आन कोहे हे कप-
टके निधान! काहयात तो सांची कहो काहेको डराने हो ॥ वे मेरे हाय यिका
नौ अरु में तिहारे हाय विकानी हो परंतु तुम हे अजनाय कौनके हाय विका-
नेही ॥ यामें मुस मीठी यातें नहीं निकासी सो यह निकासी । कि यामें उत्तरा
अलंकार नायक कदत हो तिहारे हाय विकान, तय सही कही । तुम कौनके हा
विकाने हो? तो या प्रसंग हतहोजात ॥ कवित्त ॥ तामें यह कहीचाही ! कि माया
आइकर सतीशी मुशामद करत तय सप्ती कहहै ॥ कि तुममेरी मुशाम
वाहेको करता जिनके पास में रहत तिनकी करो तो इहां एकावली भलंकारहोइ ।।
वे मेरे हायमें विहारे हाय । तुम आतंक हाय अरु कारण काप संपते कार
माटा र छवीवात प्रकट करत वापिहितको संकरहे। मेरे हाय विकीकहां ।
अंतरंगको कहीनहीं मानदी में तिहारे हाय कहां तिहार अपराय दुरावत । अतुमको
नहाय विक| अपर मिटनीन अपराध करतही ।। १३॥
अपकृष्टलक्षण।
दोहा-टाजनगारीमारकी, छडदईसवत्रास ।
देख्योदोपनमानहीं, धृष्टमुकेशवदास ॥१४॥
भाषाटीकासमेत। (२१) प्रच्छन्नधृष्ट यथा ॥ सवैया । नेहभरेलैलेभाजतभाजनकोनाहिंगनेदधिदूधमिठाये। गारीदयेतेहसेंबरजें घरआवतजनुवोलपठाये ।। लाजकिऔरकहाकहिकेशवजेसनियगुण तेसबठाये। मामीपियेइनकीमेरीमाइकोहेहरिआठहूगांठहठाये ॥१५॥ याको शन्दार्थ यह है कि नायका मानकीनों ताके बुलाइबेनिमित्त वाके जे नेहमा- खनभरे भाजनले भाजे दूधदधि भी फेंकदीनो ताते अंतरंग सखीसों कहतहै कि मेरे भाज ननाशकीने गोरस भी अरु गारी देनेते इसमें बरजेपर घरकैसे आवत मानी बोल पठाये है। अरु आनलाजकी कहाकहाँ जेगुणहें । ते सब नाश कीने। सो इनकी मामी को न पिये जे आठगांठ अठाईहै । मनसा वाचा कर्मणा विहसन चितवन चटन चातुरी आतुरी सो ये बातें तो परकीयाकीहै । अरुनायकाबहुत प्रीति बराबर सों दक्षिण अरु है विवाहिता बहुत तिनमें कबहूं कहूं कबहूं कहूं मिध्या मीठी ढिठाई समेत सोशठ अरु गारी मारकीलाजनाहीं अरु त्रास छोडिदेइ । अरु देखे दोपको नमाने सो धृष्ट से यामें तो मारनाही अरु देखो दोपभी नाही अरु वचन परकीया पोपकहै । तातेवाच्य र्थयाको ऐसोचहिये । किनेहभरे भाजन कि जोनेह हमारे भरेभाजन, आठ जाको आठगां ठकहत सो लेकर भाजत, अरु दधि दूधको गनेनहीं खटाई नहीं मिठाई जो प्रातहोइ ताई सों रमै अरु गादित रहतहो । अरु आप आनके संग हँसत रहत अरु मैं बरजत मेरे निकट मति आइये परघरमें कैसे आवत मानों आपते बुलाये अरु लाजकी ओर कहा कहों । अर्थाश सुरत भी जबरही करतो जे गुणहोत ते सब टाइदये का नाश करदरे हैं। तातेवकहत अवनकरिहै जोजेठ आठगांठ अठाईहै। अरु जो आठगांठ कहीं सो तीन होतिहै। कर्मणामें सब भोग। पांचों कहोजात चितवनादिक कर्महे ताते ये आठ गांड जानियें नेत्र भू श्रवण जीभ कर पद अधरचितवत तैं टेदभूइशारा श्रवण सुनवोसीध नाहीं सुनत बोलनकर चलावनपदचलन अधर मुसकान अरु मनइच्छा जहां लो कोक्तिअलंकार | जहां लोककी बात कहें सो लोकोक्ति इहां आठोगांठ यह लोकोत्ति अरुअंतरंगसों। कहत ताते प्रच्छन्न ॥ १४॥ १५ ॥ दोहा-मनसावाचाकर्मणा, विहँसनचितवनलेप। चलनचातुरीआतुरी, आठोंगांठविशेप ।। १६॥ टीका सुगम ॥ १६ ॥ प्रकाशष्ट यथा । सवैया। सोहकोशोचसँकोचनपांचकोडोलतशाहुभयेकरचोरी। पैननवंचकताईरचीरतिनेनन केसँगडोरतिडोरी॥
(२२)
रसिकप्रिपा।
लाजकरेंनडरहितहानितेआनिअरेजियनानिकिभोरी।
नाहिनेकेशवशाखजिन्हेंवकिकेतिनसोंदुसमुसकोरी ॥ १७ ॥
उक्तिनायका की पहिरंग सीसे केसांह.फो इनकी शांच नहींई का वचन तें जो
चाही सो कही अरु पांचको संकोच नहीं । जो कहो सो सुनलेत । अम चोरी करशाद
भये डोलत है याते पान में भी भय नहीं। भर पेनन में पंचतारचीद याम मनकाई
रचीहै ।। रति इनकी नैननिके संग डोलत डोरी सी होकर । अरु लान नहीं करत नहीं
हितहानिते ॥ डरत करनते जी चाहत सो करत अरु मौसी आन अरत मेरे
श्यामुहें भौंह नचावत मुसक्यात है ! नहीं है केशव शासननको चक
तिनसों मुखको दुसाच ॥ यामें जो पंचम विभावना है चौरी शाह भय सौ नाही
आनपद में निर्याह नहींहोत अरु हो वक्तये नहीं मानत यहि हेतुते कार्य नहीं भयो
ताते विशेपोक्ति जानिये ॥ १६ ॥ १७ ॥
दोहा--वरणहुकविनायकसबै, नायकइहिअनुसार।
सवगुणलायकनायका, सुनअवबहुतप्रकार ॥ १८॥
इतिश्रीमन्महाराजकुमारइन्दनीतविरचितायारसिकमियापांचवाधिनायक
प्रच्छन्नप्रकाशवर्णननाम द्वितीयः प्रकाशः॥२॥
उक्ति कविकी कि हे कविनायक यहीरीति ते वर्णनहुआ अब नायका सबलायक
का नायक शठघृष्ट भी होतहै नायका सर्व गुण लायक कहावै स्वकीया परकीया॥१८॥
इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुर-
स्याज्ञाभिगामिललितपुरनिवासिहरिजनकवीश्वरात्मजेन सरदाराख्यक-
वीश्वरेण विरचितायां रसिकप्रियायांभूषणे सुखविलासिकानामटी.
कायांनायकनायकावर्णनंनाम द्वितीयः प्रकाशः ॥ २ ॥
अथ नायकाजातिवर्णन ।
दोहा-प्रथमपद्मिनीचित्रिणी, युवतीजातिप्रमान ।
बहुरिशंखिनीहस्तिनी, केशवदासबखान ।। १ ।।
नायकाकी जाति पसिनी आदि ॥ १॥
पद्मिनीलक्षण।
दोहा-सहजसुगंधस्वरूपशुभ, पुण्यप्रेम मुखदान ।
तनुतनुभोजनरोसरति, निद्रामानवखानः ॥२॥
सहजहै मुगंध अरु स्वरूपहै शुभश्रेष्ठ जाको अरु पुण्यरूपी है प्रेमजाको तनु
सूक्ष्म है तनु भोजन रोस राते अरु निद्रा मान ॥ २ ॥
भाषाटीकासमेत। (२३) दोहा-सलजमुबुद्धिउदारमृदु, हासवासशुचिअंग ॥ अमलअलोमअनङ्गभुव, पद्मिनिहाटकरंग ॥३॥ लज्जासहित है सुंदर है दद्धिउदार है कोमल है अरु हास वास कपड़ा शुचिपवित्र पाहतहै अथवा हासवास शुचि है जाके अंगमें अमल है लोमरहित मदनसदन जाको इसी जोहोइ सो पद्मिनी कहावै ॥ ३ ॥ पद्मिनीउदाहरण ॥ कवित्त । हँसतकहतवातफूलसेझरतजातगूढभूरहावभावकोककैसीका- रेका । पन्नगीनगीकुमारिआसुरीसुरीनिहारिडारोंवारिकिन्नरीनरी- मारिनारिका ॥ तापैहाँकहालैजाउँवलिजाउँकेशवराइरचिवि घेएकत्रजलोचनकीतारिका । भौरसेभ्रमतअभिलापलाखभांति- देव्यचम्पैकप्तीकलीपभानुकोकुमारिका ॥४॥ हँसत बात कहतहै सहजकहतघातभी पाठहै तब फूलसे झरत अरु मूडजेहाव भावहे रतिनानिमित्त कोककी कारिका है पन्नगी सर्प की कन्या नगी पर्वत की आसुरी मसुरन की सुरी देवतनकी किन्नरी किनरनकी नरी पारिडारों नरीजे गमार नारिकाह।। गपि मैं कहाकहाँ करजाउँ है केशवराय में पलिजातहों विधाताने ब्रजसमूहलोचन की पारिका एकवरही रची है । जापै अभिलाप लाखन भौर से भ्रमतहें ॥ ऐसी चंपैकी कलीसमान वृषभानु कुमारी है । हसत बात कहत काबहुत सुगंध आवत अरु बहुत इचिहोत अरु बहुत कोमलचित्त में लगतहै अरु सोई रतिवात में अरु कोकवारिका कहा कहाँ गूढो । पाके अर्थ तसही शूट हैं ।। हावभाव जाके तात उपमा दई अर्थ का काम- कलनते पूररहोह अंग जाको । अरु भोजन निमित्त पनगी पारी सो नाही पनत काहे नापै पारिये तातं अधिकगुण चाही तोकाज्यादा सातरही । अरु पनीतो पवनभाहार हरतहै सो जय नायका पोरोपवन आहार करै पनगी बहुत कर तय बने ।। अरु नगी र्वतकी तिनको रोप नहीं यह कहतहें । सोभीनाही बनते काहे कि पहारजह हैं जब वेतन्यकहे तप महारोप है श्रीरामायणे । तुमसहित गिरिते गिरों पावक जरों जलनिधि में परो । परजाहु अपयशहोहु जगजीवत विवाहनहीं करों ।। अरु आमुरीमें निद्राकहत केनाहीं । तहां श्री हनुमानजू जनगये तय मंदोदरी आदिक सब सोवतरहीं।।रामायणे । को मुन कुंभकरण पऍगयऊकरियहुयतन जगावत भयऊ । अरु सुरीम रतिको अभावह इहां अभाव नाही बिहारी । परोजौरविपरीतरतिरूपोमुरतनधीर । करत कुलाहट किंक नांगहो मोनमंजीर ।। अरु क्रमभंग दूपण है दोहामें रतिनिद्रामान घसानह । पहिले (तिशन्दो पाठेनिद्रा है।।कवित्नमें आसुरी मुरीनिहार आसुरीकी निद्रालीन्ही मुरीकीरति- लीन्ही । अरु मनपर स्निरीवारी || किनरीगानप पारोंचाही। वारोबहुत भानजाको २१६१
रसिकप्रिया।
होइसो । उनका तो मानई महोई ॥ काहे गानका । तब माननहा इन अर्यनमें
प्रयोजन यह कि यसविस्तार पोरे में दिसादियो । अरु भार पेपर पेटन माहीं।
भ्रमतरहत हैं सो दूतिकहत या अनेक के मनोरय भ्रमतई परंतु बैठत
नहीं भरु यामें केशप को अभिप्राय यह कि सरगुणसंपन्न है अयं भतिउत्तम
है। गृपभानु कुमारी इहां उपमा अलंकार है कहुँ लुप्ताभी प्रधान जाती ॥ ४ ॥
चित्रिणीलक्षण ।
दोहा-नृत्यगीतकवितारुचे, अचलचित्तचलिष्ट ।
पहिरतिरतअतिमुरतिजल, मुसमुगंधकीसृष्ट ॥५॥
टीका मुगम ॥ ५॥
दोहा-विरललोमतनमदनगृह, भावतसकलमुवास ।
मित्रचित्रप्रियचित्रिणी, जानहुकेशवदास ॥६॥
टीका मुगम ॥ ६॥
चित्रिणी यया ॥ सवैया।
वोलिबोबोलनकोमुनिवोअविलोकनकोआवलोकनजोते।
नाचिवोगाइबोबीनवजाइबोरीझरिझाइवोजानततोते ॥
रागविरागनकेपरिरंभनहासविलासनतेरतिकोते ।
जौमिलतौहरिमित्रहुसोंसखिऐसेचरित्रजोचित्र होते ॥७॥
सखीकी उक्ति नायकासोंकि जे गुण साक्षात् हरिमेहें ते गुण चित्रमें नाही कोन
आप घोलो अरु बोलआनके सुनियो आनको अविलोकन करनी अरु आपआनकी म
विलोकन ते जोतेका संगचले रामायणे । तेतिनस्थन सारयिनजोते ॥ अरु नाचिन
पुनि गाइयो पाछेवीन बनाइयो आपूरीझ आनको रिझाइयोजानत तो ते ते तोते सूगा
समान अर्थयह कि जोकरो कहोसो कहेंकरें ॥ रागअनुराग विरागभये पर आलिंग
अरु हासविलास नरतिको ताकरत का हासविलास जहां रतियोरीतीका कोई हरि ।
मित्रको मिलतो हेसस्ती जौयगुण चित्रमें होते तामें कोई कहै । कि नायका चित्रकाहे है
खत | जोमानवतीहै तहां माननाही है नायका को प्रथम स्वमदर्शन भयो फेर व
तव चित्र भयो । अवसखी नायक को साक्षात् मिलायो चाहतहै । इहां संभावना
उकार जानियें। ताकोलक्षण दोहा-ज्योपो त्योयो होइ तो, संभावना विचार । होतो
असचित्रतो को, देखत पियप्यार ॥ ७॥
भाषाटीकासमेत। शंखिनीलक्षण। दोहा-कोपशीलकोविदकपट, सजलसलोमशरीर । अरुणवसननखदानरुचि, निलजनिशंकअधीर ॥ ८॥ टीका मुगम ॥८॥ दोहा-क्षारगंधयुतमारजल, तप्तभूरभगहोइ । सुरतारतिअतिशंखिनी, वरणतकविजनलोइ ॥ ९ ॥ टीका सुगम ॥ ९॥ शंखिनी यथा ॥ सवैया। • जातनहींकदलीकिगली नभलीविधिहोवदलीमुखलावे । चाहेनचम्पकलीकिथलीमलिनीनलिनीकिदिशानसिधावे ।। जोकोउकेशवनागलवंगलतालवलीअवलीनचरावे । खारकदाखवाइमरोकिनऊँटहिऊँटकटारहिभावै ॥ १० ॥ उक्ति नायकाकी नायकमति । अन्योक्ति औरूपकातिशयोक्ति को संकर कहतहैं 'कि ऊँट कैसाहै कि जात नहीं कहूंकबहूँ कदली की गलिमें कहा कदली सरसजिनके जंघा तिनके पास नहीं जात || वेरके कंटक सरीखे जिनकै लोमहें तिनके पास जात है ।। अरु चंपकलीयली सरस जिनकी नासिका तिनके पास भी नहीं जात अरु नलिनीकम- लिनी की सुवास तिनप भी नहीं जात । अरु कोऊ नागवेलि लयंगलवल्ली हरफारेवरी ऐसे गंध यताव तोमा त्याग देइ खारक छुहारा दाख सरीखे जिनके अधर तेभी पान नहीं करत ऊँटवाकी ऊंट कटारेसरीखी जाकी गंध है ते भावती।कि वह शंखिनीह जो नायक सों कहत तहां आपने शरीर की निंदा कोइ नाही करत वह शंखिनी है जोरोम कुवास स्थूल अंग परणे काहे कि जो शंखिनी होती तो साफ कोपकरती ॥ १० ।। हस्तिनीलक्षण। दोहा-थूल अंगुलीचरणमुख, अधरभृकुटिकटुवोल । मदनसदनरदकंधरा, मंदचालचितलोल ॥ ११॥ टीका मुगम ॥ ११ ॥ दोहा-स्वेदमदनजलद्विरदमद, गंधितभूरेकेश। अतितीक्षणबहुलोमतन, भनिहस्तिनिइहिवेश ॥ १२॥ टीका सुमम ॥१२॥ -- रासकामया। हस्तिनीयथा ।। सधैया। सवदेहभईदुगंधमईमतिअंधदईसुखपावतकेसे । कछुसालत्तेलोमविशालसेहंश्रुतिताइनकेशवयोलअनसे ॥ अलिज्योंमलिनीनलिनीतजिककरिनाकेकपोलनमंडिततेसे । क्षितिछोडिराजसिरीवशपापिनिरयपदराजविराजतजसे १३॥ इहां हस्तिनी नायका अरु हस्तिनी करिणी जाकी सब देह दुर्गधमई है । ताक पास मतिते जे अपहें ते कैसे सुख पावत अरु साल कांटांतह लोम विशाल दोहुनके । अरु श्रुति काननको ताहेहे ऐसेहे असे बोल जिनके ।। सो हे भली ऐसिनके पास अलि भ्रमर अरु नायक जे मलीन कमलिनी तनिके भार अरु नलिनी पद्मिनी तनिके नायक ये दोऊ कैसे करिणी हस्तिनी अरु हस्तिनी नायका के कपोल सेवत कैसे ॥ राजश्रीभूमिको छोड़के पापके पशहौइकै। राजतनिरय पदनाम नरक में ॥ यामें जात. पूर्ण उपमा लेप । दृष्टांतको संकर है ॥ सालसेलोम देह दुर्गधते तोजातिहै । अरु अ. लिउपमान पुरुप उपमेय ज्या वाचक जाइ वैधरम ताते पूर्ण उपमाअरु नलिनी करिणी में श्लप राजा दृष्टांतको संकर है ॥ १३॥ दोहा-तानायककीनायका, ग्रंथनितीनिवखान। सुकियापरकीयाअवर, सामान्यासुप्रमान ॥ १४॥ तानायककी नायका ग्रंयमें तीन कही । स्वकीया परकीया अरु सामान्या । स्वकी- या परकीया अरु स्वकीया परकीयाआन। यह भी पाठहै । तहांआनसो कहा सामान्य सो जानलीज ॥ १४ ॥ स्वकीयालक्षण । दो०-सम्पतिविपतिजोमरणहूं, सदाएकअनुहार। ताकोस्वकीयाजानिये,मन क्रमवचनविचार ॥१५॥ संपति अरु विपत्ति मरण में एक अनुहारहै कहा। जेधर्म वेद विदिततेन त्यागे।मनसा वाचा कर्मणा करके जाको विचाररहेअरु कोई ऐसोभीर्य करतहें संपति संकहिये कल्याए कल्याणरूपी है पतिजाको ।। वेदोक्ति पूर्वक यातें विवाहिता कढ़ी । और विपतिमें मर णमें सदा कहिये सुखदाई है सकारको अर्थश्रेय ताकी दाता ॥ संकोशहू कहिये जस सं आकाशहै सचरआकाशगामी कहाँहैं ॥ भ नक्षत्रको कहैहैं भहकहतिहैं । जैरे समता नताकी भेश भईशचंद्रमा नक्षत्रको ईश ऐसो सदाको अर्थ मंगलदायक है ।। ते इहां पतिकी तोबा उद्योतनभई । क्योंकि विपत्तिमें श्रेयदाता कहा सेवा करै । औ लाजहूको बातो की लजीली होइ तौ नायक सुख पावै अरु मरणहमें श्रेयदा कहापनि भाषाटीकासमेत। (२७) को उत्तम गति देन हारी । ऐसे स्वकीया कही परंतु यह अर्य खींचिकै होइहै । ताते माहीमें जे बातें निकस गई ॥ का संपति दिपतिमें एक अनुहार ठहरीतो एक अनुहार आन न हहै ।। १५ ॥ स्वकीयाभेदलक्षण। दोहा-मुगधामध्याप्रौढगनि, तिनकेतीनिविचार। एकएककोजानिये, चारचारअनुहार १६॥ मुग्धा मध्या प्रौटा || एक एकके चारचार भेदजानिये ॥ १६ ॥ मुग्धाभेद । दोहा-नवलवधूनवयोवना, नवलअनंगानाम । लज्जालियेजुरतिकरै, लज्जाप्राइसुधाम १७ ॥ नवलवधू नवयौवना नवल अनंगा औ लज्जापाया लाज लिये रति करहै यह मुग्धाके चार भेद ॥ १७ ॥ नववधूमुग्धालक्षण। दोहा-जासोंमुगधानववधू, कहतसयानेलोइ । दिनदिनद्युतिदूनीवढे, वरणिकहकविलोइ ॥१८॥ दिनदिन टुति दूनी बढजाय ॥ १८ ॥ यथा ॥ सवेया। मोहिवोमोहनकीगतिकोगतिहीपनकहांधोंपड़ेगी। ओपउरोजनकोउपजैदिनकाइमोंगियानमढेगी। नैननकीगतिगूढचलाचलकेशवदासअकाशचढ़ेगी। माइकहांयहमाइगिदीपति जोदिनदोइहिभांतिवढेगी॥१९॥ उक्ति सखीकी सखीप्रति ॥ कि हेससी यह बहुत आश्चर्य मय होत जातिहै। कि मोहनकी जोगति है। का जितेक मोहनमंत्र यंत्रादिक यशहें !! अथवा मोहन कृष्ण- तिनकी जो गति है ताको तो याकी चलन मोहात है अरु ओपजाक उरोजनकी उपनहें ऐसी दिनदिन तो कासों मटैगी आंगी तो नमदेगी। अयं ऐसी आंगीकहां जासों जाके उरोज म हैं ।। अरु नयनन की गति बहुत गूढहै ।। बलाबल विषे सो केशवदाएं आकाशश्रवण सीमामें मैगी ।। हैमाई यह दीपतिकहां अमाइगी जो या भांति दोदिन मदेगी इहां भविष्य में अधिक अलंकार जहां आधारतें आधेय अधिक हाई सो इहां अंगकी दीति आधेय । अंगआधारते ।। १२ ।।
(२८)
रसिकप्रिपा
नवयौवनाभूपिता मुग्धालक्षण ।
दोहा-सोनवयौवनभूपिता, मुग्धाकोयहवेश
वालदशानिकसैजहां, यौवनकोपरवेश ॥२०॥
योवनके प्रवेश में पाल अवस्था छूटतजाय ॥ २० ॥
यथा ॥ सपेया।
॥ केशवफूलिनचेंभृकुटीकाटिलूटिनितम्बलईबहुकाली।
वैननशोचसकोचसुनैनन छूटिगईगतिकीचलिचाली।
घौसकधीरधरोनधरोअवलमिलिवैतुमकोवनमाली ।
वाकोअयाननिकासनकों उरआयेहयोवनकेअवताली २१॥
उक्ति सखीकी नायक प्रति कि द्यौसक धीर तुमधरो वाके उरते अयान निकासि-
वेको यौवन के ॥ अवताली निकासनहार आइ चुकहें काहे उनको देखभृकुटीफूली
नवतीहैं । कि हमारे सहायी आये || अरु नितंबने कटिको लूटलई । बहुकालीजो बहु-
बरसते अयानने पोसी रही ॥ अरु वचन को शोच प्राप्त होगयो अयान पारेकै अब-
हमारो दस्तउठो । अरु नयनन जे अयानपनके रहे तिनको संकोच भयो है ॥ अरु गति-
की जो चलचाल हती अयानपनकी सो छूटिगई तातें तुमधीरघरो नघरोः। अब पाको
तुमको है। मिलावतहों । वाको अयान निकासिबेके यौवन के अवताली आय
इहां जो काकोक्ति सो लगावत तामें नववधू होजात है ।। नवयौवना नाही होति तात
समाधि अलंकार है समाधि कौन कहाँव जहां आपन कार्य आनके कारण होइ सो
इहां यौवनके अवतालीत तिहारो काजभयो ॥ २१ ॥
मुग्धानवलवधूअनंगालक्षण ।
दोहा-नवलअनंगाहोइसो, मुग्धाकेशवदास ।
खेलेबोलेबालविधि, हँसत्रसैसविलास ॥२२॥
कर सब बालविधिते ॥२२॥
यथा ॥ कवित्त ।
चंचलनहूजोनथअंचलनबँचौहाथ सौवनेकसारिकाऊशुकतो-
वायोजू । मंदकरोदीपद्युतिचन्दमुखदेखियत दौरकेदुराइआऊद्वा-
रतौदिखायोजू ॥ मृगजमरालवालवाहिरैविडारदेउँभायोतुम्हेकेशव-
सुमोहूंमनभायोजू । छलफेनिवासऐसेवचनविलासमुनि सौगुनोमुर-
तहूंतेश्याममुखपायोजू ॥ २३॥
भाषाटीकासमेत। उक्ति नायका की नायक प्रति ॥ नायक कही नायका सौ चलो सेजप सावं सो सुन नायका कही बहुत नीकी यह तो मेरे मनहीं में रही अब बहुत रात्री बीती चली सौवें जामें कोई जगावे नाहीं । मेरी चंचल, होके अचल न ऐची हाय को शुक सोइ चुकाहै सारिकाहू सोवै ।। मंदकर देहु दीपकी युति चंदमुख तो देखि परतहै । अरु दौरनाम वेंगिते दुराई आऊँ जो द्वार दिसातहै । अरु मृगज जैहें मराल यालजें. ते बाहिरे विडाराऊँ । जो तुम्हारे मनमें है सो मेरे भी मन भायौहे छलके निवास जो नायक सो ऐसे वचन सुनकर सुरतते सौ गुणो श्याम सुखपायो श्याम श्रृंगार सुख पायो । अरु यामें छल निकासो कि छल सोगयो थाहत शुक सारिका तो ज्ञान वारे हैं मराल ना होय वचन है सो तासों पायोक्ति अलंकार सो नहीं बनत जब इतनी छलजानो तब नवलवधू कहाँ । ताते इहां प्रहर्पण अंकार जानियें ॥२३॥ अथलजामायरतिमुग्धालक्षण । दोहा-मुग्धालज्जापायरति, वरणतहेइहिरीति । करेजुरतिअतिलाजसों, पतिहिबढ़ावैप्रीति ॥२४॥ सुरति लाज युक्त करिके पतिको प्रीति बढ़ावै ॥ २४ ॥ यथा ॥ सवैया। बोलिनहोंवेवुलायरहेहरिपायपरेअरुओलियोओडी। केशवभेटबेकोंभरिअंक छुडाइरहेजकहोंनहींछोडी।। सीधेचितयकोंकेतोकियो शिरचापउठाइअँगूठनठोडी। मैंभरचित्ततचितयो नरहीगढनैननलाजनिगोडी ॥२५॥ उक्ति नायकाकी सती मति ॥ कि है सस्ती नायकने लाज छुटाइवेको बहुत उपाय कीन्हें परंतु लाज न टूटी । काहे निगोडी गोड़ते रहित ॥ वे प्रथम सुरति विषे बुलाय रहे पर होनबोली ! मेरे पाय परे अरु आलीओढ़ी ।। अरु भार अंक भेटिने के लिये जक मेरी हटाइ रहे पर ही नछोडी । अब सीधे चितवे कों केतो उपाय कीनों दोह अंगुठा ठगेटीमें लगाये ॥ अरु शिरदोई पगल अंगुरिनत दवायो । पैमें लाज न ही अरु कहाँकै रदिवाच्यार्यते नहींक्सत तो विज्ञार्य कहतहै के इतनो उपापभये तऊँ- लाज नगई यातें सूचित रति करावति है इहां विशेपोक्ति अलंकार है। जहां जाकानको कारण होइ अरु कारज न होइ तहां विशेषोक्ति जानिये इहां नायक उपाय कर लाज न झूटी ॥ २५ ॥ मुग्धाशयनलक्षण। दोहा-मुग्धासोइरहनहीं, पियसँगमुनोमुजान । जोक्योंहूंसोवेसखी, मुखनहिताहिसमान ।। २६ ॥
रसिकमिया।
मुग्धा नायकके पास नहीं संवि जो ससी साये लेके तो मुख नहीं प्रमाण राधिका मात्र
दे
एक ही सेज पे धायले सोई मुभायसलीने ॥ २६ ॥
यथा ॥ सवैया।
पांइपरेमनुहारकरे पलकापरपांइधरेभयभीने ।
सोइंगईकहिकेशवकसहूं कोरककोरहूंसोहन कीने ॥
साहसकैमुखसोंमुसवे छिनमेंहरिमानमहामुखलीने ।
एकउसांसहीकेउससे सिगरेईसुगन्धविदाकरदीने ॥२७॥
उक्ति सखीकी सखीप्रति । कि हे ससी पाइपरतें मनुहार करेंत पलकापरपाइ भयमें
भीनधेरै ॥ कैसह पलंगपर संहिं करे तें सोगई । तय साहसकर नायकन मुम्बमों मुम्
छुवायो । औ हरिने महासुख मानो ! तब नायकाने उसामलई ताप्सा सिगरे जे मुगंधये
रहे ते विदा करदिये ॥ अरु जो साहे सुगंध विदाकरे तो का रति न होती यातें यह अर
आछोनहीं । यहां कारणके सँग कारज भयो तात हेतु अलंकार है । सोहकरिवी का
रण पलंगपे आइवो कारन |॥ २७ ॥
मुग्धाकोसुरतिलक्षण।
दो०-मुग्धासुरतिकरैनहीं, सपनेहुंमुखमान ।
छलबलकीनेहोतहै,सुखशोभाकाहान ॥२८॥
मुग्धा स्वपमें भी सुख मानके रतिनहीं करत छलबलते नापक रति करे तो सुख.
शोभा घटजाय ॥ २८॥
यथा ॥ कवित्त ।
सुखदेसखीनधीचदैकसहिसायकै खवाइकछूस्वायवशकीनीवर
सुहै । कोमलमृणालकासीमल्लिकाकीमालिकासी पालिकाजुडारी
माड मानसकैपशु है । जानैनाविभातभयोकेशवसुनेकीवात देखो
आनिगातजातभयोकैधोंअसुहै । चित्रसीज़राखीवहचित्रिणीविचि
जगति देखौधोनयेरसिकयामेंकौनरसुहै ॥२९॥
उक्ति संखीकी नायकप्रति ॥ कि सुख देकै सखीनको बीचदे के अरु सौहेंबाइ नसावा
रीवस्तु खवाइ वाको वरवश सुवाई । फेर महा कोमल मृणाल कासी चमेली मालिका
सीतुम बालिकासी जो यह मानसवारीबात है । किपशुवारी है।अवजानत नहीं विभातयं
है। वातको सुनेगाततोदेखो ऐसो अनर्यभयो जात है वह चित्रिणी चित्रकैसी होगई है।क
अचल होगई है । या तुम्हेकीन रसुमिलो ! कहेषों नये रसिकभी पाठहै। इहांविषा
अलंकार है अनमिल तेके संग ते । नायक प्रौढ़ नायका नवोढ ॥ २९ ॥
भाषाटीकासमेत । (३१) मुग्धाकोमान । दोहा-मुग्धामानकरैनहीं, करतोसुनोसुजान । त्योंडरपाइछुड़ाइये, ज्योडरपेअज्ञान ॥३०॥ मुग्धा मानकदापि नहीं कर जो करै तौअज्ञानकी रीतित डरपायके छुड़ाइये ||करहित सुनहु यहभी पाठहै ॥ ३०॥ यथा ॥ सवैया. बोलैनवालबुलावतहूं नखरेखलिखैभुवप्रेमपरेखो । आपनेहाथविलोकविलोक कहीतबकेशवबुद्धि विशेखो। छोटिवडीविधिरेखलिखी युगआयुकिरेखसुकौनसुलेखो। प्रेमतेवोलसहोनपरौ अकुलाइकहीपियकैसिहदेखो ॥३१॥ मुग्धा सखीनके सिखाये मानकर बैठी है नायक बुलावत आपु नाही बोलत नखते भूमि लिखतहै जाहीप्रेम परखी । आनमानकी रीति माहीं जानत । तब नायक आपने हाथ देख देख बुद्धि विशेष करके कही । कि विधाताने एक छोटी एक बड़ी रेख लिखी है सो नहीं जानत ॥ हमारी आयु की रेख कौन है । इतनी सुनमान छोड़कै प्रेमते यह बोलसही नहींगयो । अकुलाय बोल. पीय कैसीहै । तुम देखो तो बोलत मान छूटगयो । तवनायककही जयनायका कही पीय कैसी है । तवनायककही- र देखो ॥ इहां संसृष्ट अलंकार है जहां तिलतंदुलसे अनेकअलंकार मिलें तहां संसृष्ट ॥बलावत नबोली | कारण अछित कारज न भयो यातें विशेषोक्ति अरु नायक छलकरो ॥ आपन हाथ देख तातें दूसर पर्यायोक्ति । अरु कैसीहै नायका वचन देखी नायक वनते उत्तरा यातें जहां प्रति गरी उत्तरहोइ तहां उत्तरा यातें संसृष्ट इति मुग्धा !॥ ३१ ॥ अथमध्याकेचतुर्भेद। नि दो-मध्याआरुढयौवना, प्रगलभवचनाजान। प्रादुर्भूतमनोभवा, सुरतिविचित्रामान ॥३२॥ आरूढ यौवना प्रगल्भवचना प्रादुर्भूतमनोभवा उत्पत्तिभयो है कामजाके ओ मुरति मालिक विचित्रा यह मध्या के चारभेदहे ॥ ३२ ॥ मध्याआरूढयौवनालक्षण। दो०-मध्याआरुढ्यौवना, पूरणयौवनवंत । भागसोहागभसिदा, भावतहमनकंत ॥ ३३ ॥ वर जमा हो
(३२)
रसिकप्रिया ।
आरूढ़ यौवना नव्या है यौवन जानायका के परिपूर्ण । भाग सुहाग भरी सदा जाने
मनमें कंतभावत है ॥ ३३ ॥
यथा ॥ कवित्त ।
चंदकैसोभागभालभृकुटीकमानऐसी मेनकेसेपनेशरनेननविला-
सुहै । नासिकासरोजगंधवाहसेसुगन्धवाह दारयोंसेदशनकसाबीजु-
रीसोहासहै। भाईऐसीग्रीवाभुजपानसोंउदरअरु पंकजसोंपांइगति-
हंसऐसीजासुहै । देखाहैगुपालएकगोपिकामेदेवतासीसोनोसोशरी-
रसव सोधेकसीवामहे ॥३४॥
उक्ति सखी की नायकसों कि एकनायका मैदेसी सांकेसी ॥चंद्रभाग आधेचन्द्र सों
जाको भालहै । अरु भृकुटी कमान ऐसी है मैनकाम के शरवाणसेपेनहें मैन अरु नासि
का सरोजकमल सी गंधवाहसी है ।। सुगंधगंधवाह नाम पवनको है । दारोंसे जाके दशन
हैं अरु बीजुरीसी है हास जाकी अरु भाईउतारी ऐसी ग्रीवाद ॥ अरु बाँद है पान-
पत्रसो उदरहै कमल से पाइ हंससी चालहै ।। हेगुपालएक! गोपिका में देवता सी देसी
है । जाकोसुवर्ण सो शरीर है ॥ सोधेकी वास है । तो इहां नापका की रुचिजान ! सखी
नायक को मिलायो चाहत ॥ यह तो काम अरु चलो कहत नहीं यातें मध्या । मध्या
की सखी भी मध्या होतहै ॥ कि मैनके शरसे पैने नैन ते काम वीजुरी से हांस तें।
लाज या मध्या तो नेत्रके वाण मारत ॥ अरु हँसत । यहलज्जाको धर्म नहीं ,
अरु पीय की चाह यह । निकासी कि सब नायक के पचनहें ॥ तीन तुक में चौथी
में ससीके कि मैं देखी है तो यामें नायका की चाह कहांतें आई। अरु यह कही सोनो
सुगंधहै तोभी न निकसी ॥ कहा यह आन मैं नहीं होति । कोई कहै यह परकीया
में होजात ॥ तातें वही व्यंगते कही । इहां कवि निबद्धवक्ता की उक्ति ते नायका के
रूप की अधिकाई वस्तु तातें तुम मिली यह दूसरी वस्तुहै ।। अयवा उपमा अलंका-
रतै नायक को मिलायो चाहत यह वस्तुहै । चंदभाग उपमान सो वाचक । भाल
उपमेय । इहां धर्म लुप्ता सोई भृकृटी कमान मैं मैन शर उपमान नैन उपमेय से
वाचक पैने धर्म यारीति ते सब उपमाके भेद जानियें ॥ ३४ ॥
अथप्रगल्भवचना मध्यालक्षण।
दोहा-प्रगलभवचनाजानतिहि, वरणोंकेशवदास ।
वचननमाहँउराहनो, देइदिखावैत्रास ॥ ३५ ।।
वचन प्रगल्भहोय ।। बोलत में शंका नकर । पचननमें उराहनो देय औ प्रास
दिखावे ॥ ३५॥
भापाटीकासमेत। यथा ॥ सवैया। कान्हभलेजुभलेटॅगलागे भलेनैननकॅरंगरागे। जानतहोंसवहीतुमजानत आपसेकेशवलालचलागे । जाहुनहींअहोजाहुचले हरिजातजहाँदिनहींवनवागे । देखकहारहैधोखेपरे उभटोगेजुदेखयोदेखहुआगे ॥३६॥ नायक तयार होकर बाहिरजात तयनायकाकहत है कि हे कान्ह! तुमबहुत भले ही अरु लेढंग सीखही ।। अरु भलेहोके मैनकरंगरंगे हो । अर्थ जासौं नैन लागत ताहीके गातही भले इन नैननिके रंगरागे यहभी पाठ है ॥ जानतही सब पात तुमहीं रु तुमको जे तुमसे. ते जानत जो या लालचमें लगे. ॥ तुम जाहु नहीं जातही ही इहांसे पलेजा ॥ जहां जातही दिनमें ॥ धनाइकै धागे । उत्तमजामा बनाइके हा देख रहेही धोखेपरके व्यठोगेजू देखबौजी जोदेखबौ उबटत है उपटयौ बढ़ो जो (भिमान कोई बातकर आनको दिखाने वासों उबटव कहेहैं आगे देखो कहाहोइगो ॥ इहां रहितअलंकार है । छपी वातको प्रगट करै सो पिहित भरु लाटा अनुमासहै वही शन्द- करफिर आवत ताते । उलटेकसे देखिहोयभी पाठ है। प्रश्न ॥ यामें स्वकीया नहीं। खेपरेइत्यादिक वचननितें परकीयासी भासती है । मध्याके वचन स्वकीयामें कई त्तर यह कहती है नायकाजातही पनियनि वागे जहां ॥ तौवागेको पहिर चलियो निज. रही में बने परकीयाके घरवागे कहां । याते स्वकीयाई है । ऐसेभीकोई कहत ॥३६॥ प्रादुर्भूतमनोभवामध्यालक्षण । दोहा-प्रादुर्भूतमनोभवा, मध्याकदेवसान । तनमनभूपितशोभिये, केशवकामकलान ॥३७॥ जाके तनमन में कामकलाभूषित होइ सो प्रादुर्भूतमनोभवा मध्या ॥ ३५ ॥ सवैया। आजुमेंदेखिहेगोपसुता इकहोइनऐसिअहीर किजाई। देखतिहीरहियेद्युतिदेहकि देखतेऔरनदेखि सुहाई ॥ एकहिवंकविलोकनऊपर वारीविलोकत्रिलोक निकाई। केशवदासकलानिधिसोरु झिहैकामकिमेरोकन्हाई ॥३८॥ पकविलोकनते तनमन भषित कामकलान यहकदो ॥ तहां तीनपार क्यों कहे क तो यही यात अनुचित है ॥ दूने जहां कन्हाई कई तहां उनकी समता क्यों कटा. नधि भरु काम कहो न चाहिये तहां ऐसो अर्थ केशवदास कलानिपि सों कही ।। ३ रासकाप्रपा कलानिधि सों पर चाहिये । काहे कलाकामकी ॥ पाठौर दीर्य को लहे ॥ का कियो सो भासत है सो कामको कलाकी निधि है कौन है || मेरोकन्दाई है। एक कान्हही कहहें तहां कोईक है यहां नायकामध्या है || सोऊचारभेदके तीन स्य पैहै ॥ मोड़ा के निकट जाइलगी ॥ सोकहां अपलों विवाही नहीं ॥ यह तो भार विरुद्ध है ॥ काहे पीटाके निकट बैंस आई ॥ और सब अवस्या पतिविन बीती. यहयात शृंगारशानसा विरुद्ध भौर काढून टीकामें लिखी है ॥ तहां कन्या लिमी सो जादेश में ऐसी कन्या है ॥ तो मौदा कौनयातकी है है प्रौदाही जानपरत यह बड़ी शंका है। तहां ऐसी कहेचाही काहने कोई अतिसुंदर नायकादसीसी जानवना कौनकी है ॥ कि में एकगोपसुता देखी है । सो कहती है ॥ में एकगोपसुता दे सो ऐसी सुंदर है । ताकावरु कि ती कलानिधिबूझियं ॥ कि मेरी कन्हाई ताकी नाया बूझिये ।। ऐसे संदेह सों कहत है || तहां प्रश्न || जो संदेह है जानतीही नहीं। तो मेरो कन्हाई यननो यह प्रश्नताको उत्तर जासों कहत है ॥ सोवा नायरा को धाई है सो वह वहिरंगता पाईसों कहत कि मैं आजुदेसी गीपमुता नायका ताकी स्तुति करी और कही कि मेरे अनुमानमेंयाँ आवत है कि वाकोपति कलानिमिबूझिये। कहाके तो चंद्रमाकी स्त्री है कि कामकी ऐसिन के घरकी मोहिलागत है। तब घई को कि मेरो कन्हाई ।। धाईने जताई दियो । धाईके उत्तर ते उत्तराअलंकार ।।.. सीधो अर्थ ऐसोयाको है । सखी सखी प्रति नायकको सुनाई कहत तात नायका के नजदीक नायक जाइकै ॥ में एक गोपसुता देखीहै ऐसी गोपकी कुमारी नहीं होत ।। जाकी देहकी शुति देखत रहिये । आन को देसको नहीं सुहात ॥ पाकी एक वंक विलोकनपै त्रिलोककी निकाई वारिये जाकोकलानिधि सौ वर्ण कन्हाई -बूझिहै वे बातें कामकी । अयवा काम बूझिह काहे वहमनोभव है कलानिधि है अनेककला जा तकि कन्हाई । अर्थ अर्थ परसमै वाको देखनहार दोहें ॥ कि अंगमें कामके बाद रकन्हाई विकल्प अलंकार ते नायक मिलाइवो चाहत यहवस्तु जहां भविष्य कही यह बैह कि यह हैहै तहां विकल्प भूतवर्तमानमें संदेह यह भेद संदेह विकल्प को है ॥ ३८ ॥ अथसुरतविचिंत्रामध्यालक्षण । दोहा-अतिविचित्रसुरतासुतौ, जाकीसुरतविचित्र । वरणतकविकुलकोकठिन, सुनतसुहावैमित्र ॥३९॥ विचित्र सुरता वह है कि ज़ाको सुरतविचित्र होइ।। औ कविकुलपै कठिनतासों का जाय । और जो कोऊ मुनै ताहि सुहाय । और मित्र संबोधन है ॥ ३९ ॥ कवित्त। केशवदाससाविलासमंदहासयुतअविलोकनअलापनकोआनंद अपारहै । बहिरतिसातअरुअंतरितसातसुन रतिविपरीतनिकोवि भोपाटीकासमेत। वेधविचारहै ।। छुटिजातलाजतहाभूपणमुदेशकेश टूटजातहारसब- मेटतशृंगारहे। कूजिकूजिउठेरतिकूजतिनसुनिखग सोईतोसुरत- सखीऔरविवहारहै ॥४०॥ उक्ति नायकाकी अंतरंग सखीसों । कि हेसखी! जो ऐसी होइ जो रति है कि केशव नोहै सो जामें आपनदास होइना ॥ सो विलास सहित । अरु मंदहास युतहोइ । अरु देखचेको बोलवे को आनंद अपार होइ । फेरअंतर वाहिरकी जे सातरतिहें ।। तेहोहिं । तदनंतर विपरीत को नानाप्रकार को विचार होइ अरु लाभाटि जाइ । भरु भूपण सुंदर देशते विगरजाई केशभी छूटिजायेंहीं ॥ अरु हार टूटजाहिं । संघ शृंगार मिटनाहि ॥ अरुरतिके कूजनसुन पक्षी कूजन लगे। यह जानकोई पक्षी कूजतहै सोई सुरतहै और ती व्यपहार है दंपतिको तो या कविको कठिन कौन पातकेशवरात्रि कोई कैद तो रतिकरी है नहीं विचारमात्र रतिहै । ती विन सुरत की सुरत यह कठिनता इहां लाटा अनुमास वृता अनुपासवीप्सा है ॥ केशवदास साविलास यह वृता सात सात कूजकूज यह वीप्सा अय सातबहिररति ॥ ४०॥ पहिररतिसात । दोहा-आलिंगनचुंबनपरस, मर्दननसरददान । अधरपानसोजानियें, पहिरातिसातसुजान ॥४१॥ टीका सुगम ॥४१॥ अथसातअंतररति। दोहा-थितितिर्यकसनमुखविमुख, अधउरधउत्तान ।' सातअंतरतिसमझिये, केशवसकलसुजान ॥ ४२ ॥ स्थिति इत्यादिकं भासन जानिये |॥ ४२ ॥ दोहा-सोरहईशृंगारसव, सोरहसुरतसमान । बुधिविवेकवलसमुझिये, केशवसकलसुजान ॥४३॥ पहदोहा प्राचीन पुस्तकनमें नहीं मिलत ॥ ४३ ॥ अथषोडशशंगार ॥ कवित्त । प्रथमसकलशुचिमज्जनअमलयासजावकसुदेशकेशपाशकोस- म्हारियो।अंगरागभूषणविविधमुखवासरागकज्जलकलितलोललोच- नविहारियो । बोलनिहँसनिमृदुचलनिचित्तोनिचारुपलपलप्रतिप- रसिकप्रिया। तिव्रतपरिपारियो । केशवदाससाविलासकरहुकुंवरिराधेइहिति सोरहशृंगारनिशृंगारियो ॥४४॥ इहां केशव ने सौरह शृंगार कहे । तहां शृंगार जो करने ते होई सौद कहावं तहां। चोलनि चितानि चलनि पतिव्रत यह शृंगारमें कैसे यनिहाशृंगार जो पतिव्रत तो कहापति सूटत मनतहै ॥ सुरतांतमें सम शृंगार छूटत । परगहें अयहीं केशव पाठिले कदिन काहे चुके कि सुरत विचित्राके उदाहरण में के । टूटनात हार सब मिटत शृंगार है तो पतिव्रत मिटिहै अरु फेर हैहै । अरु हसनि मोल आदिक सब स्वभाव में हैं । ऐसो अर्थ कीजिये प्रथम सकलशुचि र मन्जन २अमलयास ३जावक ४ केशसमारवं अंगराग ६ तहां एक अंग को राग अंग बनाइयो तो पहिले पांच ५ भयेमांगसिंदूर भालसौर ७ फेर चियुक तिल ८ मेहँदीरचाइयो ९ अरगजा लगाइयो १. फिर म म विविध दो तरहके || मणि सुवर्णके ११ फूल के १२ मुखवासमें तीन मुसमें वास लवंगादि १३ दन्तमञ्जन १४ अधररंग ताम्बूल ते १५ अरु काजर १६ ॥ कोई कहै कि अंगरागमें सब बनाये तहां जापक काजर काहे जुदा कीनो तो ये दे ज्यादा रंग करनहार हैं जैसे नेत्र श्याम कि अधिक श्याम । अरुण अधिक अरु अरु बोलनि चितवनि को ऐसो अर्थ ॥ इन विलासन सहित इहां केशवदास सादिल स यह पतिव्रत औ वृत्यनुप्रास है ॥ ४ ॥ अथसुरतान्त ।। सवैया। सुन्दरतापयपावकजावकपीकहियेनखचन्दनयेहैं। चन्दनचित्रसुधाविपअंजनटिसमणिहारगयेहैं । केशवनयननिनीदमईमदिरामदघूमतमोहमयेहैं। केलिकैनागरिनागरप्रातउजागरसागरभेपभयेहैं ॥१५॥ उक्ति सखीकी सखी प्रति ॥ कि आज सुरतांत में नागरी अरु नागर उजागर की गर के भेषक होइ रहेहैं जो सुन्दरता है सोई पय जलहै । अरु पावक बड़या अग्नि- सो जावक अरु पीक अरु हियेमें नख तेई चन्देहे ॥ चन्दनते चित्रित सोई सुधा . मृत है । अरु विष अंजनहै ।। अरु जो हार टूट सोई मणि है । अरु जो नोंद है सोई मदिराहै ताके मदते घूमत मोह मपहैं । केलिकरिके सागररूप हो। तहां कोई कहै किचंदन एकहै तोआन पुरानोचाहिये ।तहां ऐसी कहिये कि वन पूरण निकसे ये द्विती याके हैं यातें नयेकहे अरु मध्या काहे कि घूम रहे हैं। नापकाकी ओर मुख कीने है नायका पीठदिये यातें लाज अरु सुरत कराई काम ॥ अरु कोईहार टूटवे में मध्याकही संचन क्रियाते | लाजआयो औ मोटा "
भाषाटीकासमेत।
काम सों भेटती है ॥ मुग्धाको सुरतांत सुन्दरता यह पदने दूरकियो । सो तो प्रौढाकी
रतिमेंभी वर्णन करतहैं । देव आदिक सब कविनने वर्णन करे ॥ सोति मखहार है
निहार टूटे हारहै इहां रूपक अलंकार जहां उपमान उपमेय समता वाचक हीनकर
होई सौ रूपक | तो सागर उपमान नागरि उपमेय । अरु कोई कहै कि इहां वाचक
धर्मलप्ता कहि न होई तो वामें विशेषमात्र होई है ॥ यामें विशेष विशेषण दोनों
इतनी भेद ॥ ४५ ॥
अथ मध्याधीरादिभेद ।
दोहा-सिगरीमध्यातीनविधि, धीराऔरअधीर ।
धीराधीरातीसरी, वरणतसुकविअमीर ॥१६॥
धीरावोलैवविधि, वाणीविपमअधीर ।
पियकोदेइउराहनो, सोधीरानअधीर ।। १७॥
धीरा वक्रबोल अर्थ व्यंगलिये कोपकरै ॥ वाणी विषम कहिये टेढ़ी बात कहै व्यंग
न राखे । सो अधीरा ॥ पियको उराहनो देय अर्थ व्यंग अव्यंग दोईकर सो
'धीरा धीरा ॥ १६ ॥ ४७ ॥
धीरायथा ॥ सवैया।
ज्योज्योंहुलाससोकेशवदासविलासनिवासहियेअविरेख्यो।
त्यात्योंवढयोउरकम्पकछूभ्रमभीतभयोकिपाशीतविशेख्यो।
मुद्रितहोतसखीवरहीमेरेननसरोजनिसांचकैलेख्यो।
तेजुकह्योमुखमोहनकोअरविन्दसोहैसुतौचंदसोदेख्यो ॥४८॥
उक्ति नायकाकी सखी प्रति ॥ नायकके सुनाई कहत है कि हे सखी !
नायकको मुखकमल सो तू कहत रही सो चंदसो आज मैंने देखा चंदको आशय
यह कि कलंकीहै अरु शीतकरहै अरु घट बढ़ होतहै अरु प्रात शुति हीन होजात अरु
कमल आफ्नो स्थान छोड अन्तनहीं जात चंद्रमा घटादिकमभी पहुँचे है जोदेखै सो
यह जान कि हमारेनेत्र सामुह है अरु सोई रीति इनकी है यह तें पकरक्तिअलंकार
धीरानायका अरु मध्या काहेत सो अय कहतह नायकाको क्रोधते कंप भयो ताको
लाजते छपावत है कि हे सखी! जैसे जैसे बड़े हुलाससों विलास को निवास हिये
में अवरख्यो त्यों त्यों में कंपनलगी तबमोको भ्रम भयो कि भीतभई है कि विशेपशीत
तब वर श्रेष्ट है हे सखी! बरहीसे जो मेरे नैनसरोज है ते मुद्रित है गये हैं ऐसी जानि
ससी कहो कि अरविन्दसो मुख हैं सोवह चंदसो हैं अरु कोई कहै कि घरही नेत्रवाही
काहे कहे तोकमल चंदते दूर रहत मुदित होतमध्या ॥ १८ ॥
१ 7 नापकाकी ओरझायाम प्रीति काई कहि कि मुकरगई अरु तुम पाहीलापन अथमध्या अधीरां यथा कवित्त । रिसाम सामु भायोहै । सोअचलश तपलचित.. जकैसोगायो है ॥ केशोदासबसतअकाशकेप्रकाशंघोप घटघट घरपेरैंचनोछायोहै। कनाथरू५.तिना साहात राइझूठकौनयहपायोहै ॥ १९॥ उक्ति नायकाकी नायकसों । तात वैसो ती गातहे कहा तात पिता को . अरु तिहारो डगत बलबीर कैसो बल बलवीर वारुणीखाइ मतिजात. अ... मुख है का कछु कछु महावर लगो है अरुयलसों शीलवाको नाम क्षमा : तुम क्षमा धारण करही अरु पवनसो सव शरीर है शीतल संग .. चित्त कहा नीचे चलत तेज कहे अग्नि तो तेज मेरे अंगकै ते पायो अथवा 4 आकाशं सो होत अरु तुह्मारे घर सर्वदा व्यापक कहे बसत है अरु रति कैसी रहे पति त्यागअरु रूपमें रूप रतिनाय कैसो कहा संगिन कै सुखद असंगिन के दुम्बर विपमवाणीको अर्थ सहजही सब जानत परंतु जो जो झूठ है सो नायकचित्त ते अरु साफ नहीं कहत कि यह कीनों ताते मध्याउल्लेस अलंकार परने सो यहां तात आदर्शन कहि दीनो है ॥ ४९ ॥ अथमध्याधीराधीरा यथा सवैया। कान्हभलेजुभलेसमुझायहोमोहसमुद्रकोज्योंउमडयोहै। केशवआपनेमाणिकसोमनहाथपरायेदेकौनौलहयोहै ।। नेननहींमिलवोकरियेसववेननको मिलवैतौरह्योहै । जायकह्योतुमसेससीनसोऐहोगपालमअसोकह्यो है ॥५ रक्ति नापकाकी नायक प्रति । कि काहूमलीने भली समुझाई है नायक मt-- सो उमड़ो हुतो अरु आपने माणिक सोजो मन है सो पराये हायदे कौनने । सो मिलियो करियअप पननको मिलियोती रहो जैसे तुमससानसो जाइकै कहती हो गोपाल में ऐसा कहाँहै यह असरार्य परंतु या प्रश्नगोपालाने सखीनसों कहा मो नहीं कड़ी वहां उत्तर ॥ कि ऐहोगोपाल मेरे गोपाल एहें यह अर्थ नीको या शन्दका मुरयदलत शब्द एही गुपाल है वहां गोपालको अर्थ गोगऊले. तहलोप मनोरदो गोपालको गोपाल किया अरु सूरत कहें कि ऑसिनको पूरण निकम लयो गयो में सो कारकही कादयामें प्रीति उदासीन दाई बड़ी वाम । अरु कांदा भाषाटीकासमेत । तो यामें उदासीनता तो या परकीयत दोषको दुसरा प्रश्न उत्तर चाहने परा तौ धीर भी परकीया हो जाइगी जैसे क्षुद्र कविन लिखदई कि मुग्धापरकीयाऊ- । होसकत ताही गनती केशवदास होनहें भलावतो धीराको भेद नहीं जानत रहे अरु नकी हुब तनपाई रही केशव ती महाराज वीरवर महाराज रामशाहि महाराज के दरवारी रहे तो वे कैसे कहेंगे काहे धीरा सपत्नी सों कलंकलगावत या अर्थमें घाफ परकीया है गई तहां तीनतुकवारी घात चौथी तुकमें है कै काभलीने में समझाई है कैये मोह समुद्रम उमहे, तौमोह समुद्रम अपनो मन माणिक पराये दयो सो काहूने पायो के घेही पावें अरु नयनन को मिलबो तिहारो रहो बैनन को बोगयो यहमोहि आननै सिखाई ताते तुम उनसों कहो नाराज होके सौमें ऐसी कहींहै तोयामें मैं नहीं कही अरुकही दोनों बात आई तातें धीरा अधीराभई यामैं ॥ अलंकार मोह उपमेय समुद्र उपमान ज्यों पाचिक उमह्यो धर्मताते पूर्ण उपमा क उपमान मन उपमेयसो वाचिक तातें धर्म लुप्ता ॥५०॥ अथ प्रौढाभेद चतुर्विधा। हा-सुनिसमस्तरसकोविदा, चितविभ्रमयाजाति । अनिआक्रामितनायका, लुन्धापतिशुभभांति ॥५१॥ अक्रांमित पतिआन औलब्धापतियखान यहभी पाठहै ॥ ५१॥ अथ समस्तरसकोविदालक्षण । हा-सोसमस्तरसकोविदा, कोविदकहतवखान । जोरसभावप्रीतिमें, ताहीरसकीखान ॥१२॥ समस्त रस कोविदा सब सुखसाधनकी सिद्धिहो अरु जो प्रीति में रस भाव ताही की खानिहोइ दान भी पाठहै।। १२ ।। कवित्त। दखीहैगोपालएकगोपिकाअनूपरूप,सोनेतसलोनीवाससोधेतेसुहा । शोभाहीसुहाईअवतारुघनश्यामकीघों, कीधायहदामिनीयेका नीयोआईहै ॥ देवीकोउदानवानमानहानहोइऐसीभानवनिहाय वभारतीपठाईहै। केशोदाससवसुखसाधनकीसिद्धयह, मेरेजानमै सोमैनकीकीजाईहै ॥ ५३॥ हे गोपालएक गोपिका सोने के से रंगकी जिसकी उपमाहीमो सोनहीं कहिजातकी :धनश्याम शोभा ही ने अवतार लिया है या बिजुलीही स्त्रीको रूपधारण किये रसिकांप्रया। है ऐसी मैंने देखी है ऐसी स्त्री तीन देवतों के और न दानयों के न मनुष्योंके है कोश सरस्वती है यासव साधनकी सिद्धिहै या मेरे जानमें मैन कामदेवकी उत्पन्न की हुई है॥५॥ विचित्रविभ्रमाप्रौढा। दोहा-अतिविचित्रविभ्रमसदा, प्रौढ़ाप्रगटवखान । जाकीदीपतिदूतिका, पियहिमिलावेआन ॥२४॥ विचित्र विभ्रमा मौटा नायका का उदाहरण ! जा स्त्रीका अतिविचित्र विभ्रम हो वे जाकीदीतिको देखके दूतीकावाके पियका मिलाप करादेवै ऐसी खीको विचित्र विभ्रमा प्रौढा कहें हैं ॥ ५४ ॥ कवित्त। हैगतिमन्दमनोहरकेशवानंदकन्दहियेउमहेहैं । भौंहविलासनकोमलहासनिअंगमुवासनिगाढेगहेहैं ।। हे विलोकनिकोअवलोकिसुमारुह्यानन्दकुमारुरहेहैं। येकतोकामकेवाणकहावतफूलनिकी विधिभूलगहेहैं।॥५५॥ जाकी गति मनके हरनेवाली मन्दर होय और मनमें आनंद के कन्दको उमा ? भौर जाके माह की मरोहन और कोमल मुसक्यान और अंगकी सुगंध और नयनों वी टेदी पितनि देस कहे नन्दके कुमार श्रीकृष्णजी कामदेव फूलनकी विधिको भूल गपहें यही तो कामर याण कहावं हैं ॥ ५५॥ अक्रमतिमाढा। दोहा-सोभकामतिनायका, प्रोटाकरिवेचित्त। मनसावाचाकर्मणा, वशकीन्हेजेहिमित्त ॥५६॥ कामति प्रोदा नायकाको उदाहरणानो नायका मनसा वाचा कर्मणा करिकापने मित्र यशकर पांग अकामति पादानायका कद हैं ॥ ५६ ॥ कविता रोहितगाइबनावतनाचतवारअनेकशृंगारवनायो । सीमानकोआनिवाड़ियोतरोतउनभयोमनभायो' विसतिकारखाकोभामिनाभागयते यशचौकांडपायो। मान्दन्यामधेनूचादतनहिनचादतिदअयपाइटगाया। हे मापा बाद गाई पनांद मा नायत र अनेक गार र नंगे मन नहीं भी देह मामिना तो यहभाग हॉग भानो पर को होइई बार का पमन्द होगी दो नर हिदमें मलाई न होगी।
भाषाटीकासमेत। प्रौदा लब्धापति। दोहा-सोलब्धापतिजानिये, केशवप्रगटप्रमान । कानिकरैपतिकुलसबै प्रभुताप्रभुहिसमान ॥ ५८॥ लब्धापतिमौदा नायकाको उदाहरण! जानायका पति औरकुलके सबमनुप्योंकीकानिकरवाकोलधापति प्रौटानायका. ५८ कवित। आजविराजतिहकहिकेशवश्रीवृपभानुकुमारिकन्हाई। पानीविरंचिवहीक्रमकामरचीजोवरीसोबधूनवनाई॥ अंगविलोकित्रिलोकमेंऐसीकोनारिनिहारिननारबनाई। मूरतिवन्तशृंगारसमीपशृंगारकियेजानोसुन्दरताई ॥१९॥ हे कन्हाई ! आज वृषभानु कुमारी ऐसी सोहै है कि मानों काम देवने सरस्वती हीको जिस क्रमरोरचाहे वहीं क्रमसे इनको भी रचा ऐसी तो त्रिलोक में कोई स्त्री नहीं है कीधों मूरतिवंत शृंगार के समीप मानों शृंगार किये सुन्दरता ही आई होय ऐसी शौभ है ॥ ५९॥ प्रौढाधीरा। दोहा-आदरमांझअनादरे, प्रगटकरेहितहोइ । आकृतिआपुदुरावई, प्रौढ़ाधीरादोइ ॥ ६०॥ धीरानौदा नायका को उदाहरण || जो आदर के वीवमें अनादर करे और प्रकट में हितकर और आकृति को छिपाये रहै वाको धीरा प्रौदा नायका केहेहे ॥ ६॥ कविता आवतदेखिलयेउठिआगेहुइआपहिकेशवआसनदीनो। आपुहिपाइपखारिभलेजलपानकोभाजनुलाइनवीनो॥ वीविनाइकेआगेधरीसोजवैहरिकोवरवीजनलीनो। बांहगहीहरिऐसोकह्योहंसियेतोइतोअवराधनकीनो ॥६१ ।। जो नायका श्रीकृष्णजीको आवते देखिके आगे उठिक लें और आसन बैठवेको देवे और आपही जलके भाजनको लाय के चरण धोयके वारी साने के लिये देके आप पंसा हॉक ऐसी आराधना करै ॥ ६ ॥ प्रौदाधीरा आकृति गुप्ता ॥ कवित। चितवोचितवायेहंसायहसोआबुलायसेवोलोरहेमतिमौने ।
(४२) रासकामया। सोहअनेकनिआवहुअंककरौंरतिकोप्रतिरैनकोरोनै । कोईखवायतेखाऔविराजनुआइहोंकेशवआजुहिगोनै। मोहनकेमनमोहनकोसखीतोहिनहींसिखईसिसकोनै ॥२॥ आकृति गुप्ताधीरा प्रौटा नायका को उदाहरण, ॥ जो नायका चितवायेते विद्यौ और हँसाय ते हँसे और बोलायेते वोले नहीं तो मौनही रहै और खवाये ही ते सारे मनो गौने या रीनेमें आई है और मन मोहनके मन मोहिको मानों काहूने नई सीम सिसाई है ऐसी नायका को आकृतिगुप्ताधीरापीड़ा नायका कहैं हैं ।। ६२ ॥.. कवित्त । हितकोइतदेखोजुदेखोसबैहितुवातसुनोजोमुनीनिवहींहै। यहतौकछुऔरवहेसबहैऔरसोहकरोजूकोजुतुहीहै ॥ समुझाइकह्योसमझायकैकेशवझूठीसवैहमसोंजुकहींहै। मानकियेअपमानकरेजोहंसोअवकेहंसिकोरहीहै ॥ ६३ ॥ हे नायका? यहां हितको देसो जो सधै देखतीहैं और हित ही की यातसुनो जाके मुनयते निवाइ होइगो यह तो सम कटू और ही है याकी सोहकहे इस तरह ते समाप के कहो और सप जो हमसों कही है वह सब झूठी है और मान कियेते अपमान करी है॥ ६३॥ प्रौदाअधीरा। दोहा-मुसरूसीवातेकहै, जियमें पीकीभूख । धीरअधीराजानियें, जसीमीठीऊप ॥ ६॥ पतिकोअतिअपराधगनि, हितनकरहितमानि । कहतअधीरामोढ़तिय, केशवदासपखानि ॥ ६५ ॥ अधीग प्रौदा नापाको उदाहरण । जोनापका मुगतरूमी याने कई और जिप पिनी भम रई एमी असमरसमीरी नायकाको अधीरा प्रौदा नायका कद, ॥ ३४ ॥ बहा अपराय गान हित मानिक जी वी हित म करे ताली केशवदाम लिप रमीसी वो अभींग मोटा स्वीकहते हैं ।। ६५॥ कविता होमनमेटेनबोटोकटअपांडहुबोलियोपोल हंसाह । केमवारनिसारसरासरिसोरसबादसहमसौदे ।।
भाषाटीकासमेत। (४३) देखहुधायकवारसकोचनआरसलोचनआरसीसोहै । आयजूवैसेईसाजसोआजुसोभूलिगईपियकाल्हिकीसोहै६६॥ जो स्त्री पतिको अपराध हृदयमें गनिकै पासों नेहनहीं लगाव है उसको अवीरा प्रौदा नायका कहते हैं-सो पतिसों कहै है कि में मनसों अधीर हों यासों हमसों बोलियो छांडी और हांस आदिक न करो और रात्रिक विषे रास मिलासकी वार्ता सोभी न करी काहसे कि आलसयुक्त पतिके नेत्र देखिकै पाको उपदेश करहे यामें व्यंग्याय दरशातहै कि पतिके नयन आलस युक्त हैं तो सूचितहै कि किसी दूसरी स्त्रीके भवनमें जगहेंयासों कहै है कि जोई ढंग काल्हिथे सोई आज फिर, क्या तुम को काल्हि की सोंह भूलि गई यह स्वकीया नायकोक्ति है ॥ ६६ ॥ अथ परकीया लक्षण । दोहा-सवतैपरपरसिद्धजो, ताकीप्रियाजुहोइ परकीयातासोंकहैं, परमपुरानेलोइ ॥६॥ सवते परका मेद लोकते परका परपुरुषन लोकमें लीनन पेदमें अरु परशब्द जगमें ॥ देहरी भी दीपक करिके लीजिये कि पर सिद्धतें पर कहा कोइ न जाने ताकी जो यादोयसो परकीया ॥ ६७ ॥ अथ परकीयाभेद। दोहा-परकीयाद्वैभांतिपुनि, उदाएक अनूढ़। जिन्हेंदेखिक्शहोतहे, संततमूढ़अमूढ़ ॥ ६८॥ ता परकीयाके दै भेद कहे एक ऊदा एक अनूदा जाहि देखि मूढ़ अमूढ़ निरंतर (श होत है ।। ६८॥ उढ़ा अनूदा लक्षण। दोहा-उड़ाहोतविवाहिता, अनब्याहिताअनूढ़। तिनकेकहोंविलाससव, केशवगूढ़अगूढ़ ।। ६९ ॥ अदा न्याहिता विना न्याहिता अनूदा तिनक गिलास गढ़ और अगृढ़ है ।। ६९ ।। उड़ा यथा ॥ सवैया। वेठीसखीनकीशोभेसभासवहीकेजुनेननमांझबसे । बूझतेवातवराइकहेमनहीमनकेशवराइहंसे ।। खेलतिहेइवखेलउतपियचित्तखिलावतयोंविलसे। कोउजानेनहोंगदारेकबैकिततॆहरिआननछुवैनिकस।।७०॥
रासकामपा । . सब सखिनकी सभा बैठी है मंडन शिक्षाकरन उपालंभपरिहासकी अर सपके नैनन मांझ पसे है कहा सपकी दृष्टि पाहीकी और है अरु कोई बूझै पात ती वराइकै कहै जामें मित्र आपन यूझे प्रीतम मापुन ऐसे पचन बोले कैसे कि यह दिन तन मन मिथ्याहे तो सतिन को वैराग नायकको उदासीके तुमसे अपराधी हमें मिले अरु भित्रको यह कहत तुम न मिले तो सब या ऐसे यराई बोलती है अरु मनही मन हैसहे का जे सब मूढहें भरु सेलती सखिन संग सेलती पैपीपके चित्त- को खिलावत अरु यह कोई नाहीं जानत हगन को दौराई कय हरिके नैनन यूके निक- सत यहां कारण वित्तको दौराइयो कारज हरिमानन छूयो ताते चपला अतिशयोक्ति अनूढा यथा ॥ सवैया। बैठीहुतीनजनारिनमेंवनिश्रीबृपभानकुमारिसभागी। खेलतहींसखीचौपरचारुभईतिहिंखेलखरीअनुरागी॥ पीछेतेकेशवबोलिउठेसुनिकेचितचातुरिआतुरिजागी। जानैनकाहूकवैहरिकेसुरमारगहीसरसीदृगलागी॥७॥ वृषभानु कुमारी जहां सभागी बन बैठीरही सभागी कहावा दिन पिताने वाक्य आनके गेह कीनों राधा विवाह आन संग ब्रह्मवैवर्त पुराण में हैं सो खेलनहीं चारु रताके खेलमें अनुरागिन व्हेगई यह सुनिके आनकै बाक्यदान भयो तहां पीछे जाइक बहानेते हरि बोलउठे सो सुनि आतुरी चित्तमें जग गई सो काहूने न नानी कि हरि सुर बाण मारो यातें चितवनते शब्दवेधी वाणमारो जो ऐसो अर्थ कीजै तो अनूढा हो है नाही तो पारवती जानकी दमयंती अविवाह विप अनुरागिन भई सो सब अन व्ह जाएंगी अरु वैसे अर्थमें परकीयाको जो आपपति त्याग पर पतिसों प्रीतिकरै अविवाहिता पति हीन है वह कय परकीया भई अरु कोईकहै के परज्ञात में तो स्वज्ञा पर ज्ञातको यामें विचार नहीं यहां तो पतिपर पतिको विचारहै कि एक गोपकन्या गोप आसक्तरही अविवाहिता विषे अरु फेर वही गोप सों बिवाह भयो तो वह कहा कहाँ जैसे दो० ॥ दिखरायो पे वंदपिय, पीपरमें वरलाइ । समुझिपाछिली पक्ष तिय रा सकुचि शिरनाइ ॥ पीयने एक पैवंदका पेडनायकाको दिखायो तामें जर पीपरकी ड वरकीका जानावो वाच्य लिंगते के हम तुह्मारे पीपर नाम परापे पीरहें अविवाहि विपे अरु अववरहैं तो वह परकीया है है किन है तहां संकल्प दोरीतिको एक मान एक साक्षात् तामें मानसीको फलज्यादहकाहे देवयानीने शुक्राचार्यासों कहीकि अब मारो हाय क्षत्रीने ग्रहण करो तो हम ययाति के संग जैहैं सो सुनि मानस संक जानि राजाको विवाहि दई अरु रुक्मिणी ऐसेही कृष्णके संग गई तो स्वकीया छ भाषाटीकासमेत । परकीया न है हैं आनकी कहा वहतो बात दिव्य प्रकृतिकी है तुम अदिव्यमें कहो तहां संयोगितादि राजाके संगभापते गई तो स्वकीया की गति पाई अरु कोई कहै कि सामा न्याकी पुत्री प्रथम समागम जाके साथ भयो ताहीके पास पतिव्रताकी रीति ते रही जैसे यह । दोहा ।। अनरुपसों पियसँग कियो सबसौं सरुष सुभाइ । बासुदेव पूजौन- तरु अनगन धनि धन पाइ ।। तहां जाने वासुदेव तरु न पूजौ यह जानकै यह पीपरहै सो परपतिसंगकी कौन कहै तहां कहा होइगो तो याहीते चार विवाह ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र एक लिख्पो है पातें वही अर्य कीकै सभागी भई है का पिता वाक्पदान करचुको यहांभी चपलातिशय उक्ति अलंकार कहत सो नाहीं । काहेकै कृष्णको अभि- पाये जान रसीली चितवनते जवाब कियो कि मैं तुह्मारे पासरहोंगी।तहां कोई कहै कि व्यंगमें अलंकार नहीं होत । काहे लक्षणमें अलंकारको ऐसो शब्द है कि जुदोरहै इस व्यंगते तो रस अरु व्यंग ते जुदो चाहिय सो अर्थ याको नहीं ॥ याको अर्थ ऐसो. कीजै कि रस पारी जो व्यंग है । विभाव अनभाव संचारी अस्थायी ताते जो व्यंग है सो नहीं ताते जुदो रहै ॥ अपिहित सूक्षम परजा उक्ति आदिक गूढोक्ति गूढोत्तर ये ब्यंग हीन नहीं होत ॥ ७१ ॥ दोहा-काहूसोनकहेंकछू, वातअनूदागूढ । सखीसहेलीसोंकहै,ऊढागूढअगूढ ॥७२॥ गढ़वात काहू.सों न कहै सो अनूदा । अंतरंगसों गूढ कहै अरु सहेली बहिरंग स अगूड कहै ताको ऊढ़ा जानियें || ७२ ॥ उढ़ा बचन यथा ॥ सवैया केशवरायकिसौंहकिकैकछुएकनआपुमेंहोडपरी। एकचितैमुसक्यायइतैउतबातकहेबहुभाइभरी।। चारुचकोरविलोचनभासीचहूदिशि अंगुरीपसरी। सखिआजुगईहूतिगोकुलहोंसवहींमिलिटेजकोचंदकरी॥७३॥ इहां जड़ाके बचन उदाहरण निमित्त ! दूसरो कवित कीनों प्रश्न अरु कोई कहैं कि पहिले कह फेर क्यों कह्यो । ऊदा को कवित्त ताको उत्तर यह कि । दोहामें कह्यो ।। अनूढ़ा काहूसे न कहै । औ ऊढ़ा यातकहै ताके कहिवेको उदाहरण दियों चाहिये याही ते कवित्त दूसरो केशवने कियो प्रश्न होड परी सो कहाहै? उत्तर । तहां नायका को देखिकै ॥ गोलमें सब कहन लागी इन्हींसों मोहनकी प्रीति लगी है । अरु कोई कहै कि यह नहीं औ वातकी होड परी है ॥ का छुटाई बडाई की होडाहोडी परी है । यामें रस नहीं होत || तहां नायका अपनी बात कहत है कि ऐसी मेरी ओर ।
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भायोटीकासमेत । नायकको प्रकाश साक्षात दर्शन ॥ सवैया। इकतोउरऔरउरोजअनूपमतैसेमनोहरहारमहारी। चित्तचलैतरुणीनहुको अरुनैनकिकेशववातकहारी ॥ हितकीहितसोंकहिहीपनिआवतकौलगिहोहुँरिकौतुकहारी। अंचरुदैनंदलालविलोकतरीदधिनोसिविलोवनहारी॥९॥ । अनीसी दधिविलोवन हारीहै ।। अंचल की भोट करिकै नायक को देखती है तो तेरो उर उत्तम दूसरे उरोज तीसरे हार मनहरणहार सो तेरो चित्त जो है सो है | तरुणी नैनको अरु मनकी को अरु नैनकी कौनधात कही जे हित आफ्न नसों हितकी कोई वनत है कमीतक में कौतुक देसन हारी हो । इहां सार अलं- उरते उरोज अधिक उरोजते हार अधिकं किंवा एक तो उरोजमें मनोहरता बनीही हार पहिरे यामें मनोहरताकी अधिकाईभई । ताते अनुगुनालंकार भयो हो जो ताते बहिरंग सखीते प्रकाश ६ ९ ॥ -प्रकटकामकोकल्पतरु, कहिनसकतिमतिमूढ़। चित्र मेंहरिमित्रकी, अतिअद्भुतगतिगूढ़ ॥१०॥ हा केशव को नहीं है।॥ १० ॥ राधाकीमच्छन्नचिवदर्शनासवैया। लोचनऍचिलियेइतकोमनकोगतियद्यपिनेहनहींहै। आननआइगयेश्रमसीकररोमउठेउरकंपगहीहै ।। तासोकहांकहियेकहिकेशवलाजसमुद्रमंचूडिरहीहै । चित्रहुर्मेहरीमित्रहिदेखतियाँसकुचीजनुवाहगहीहै ।।११।। अंतरंग ससीकी अंतरंगमति कि देसी याके चरित्र चित्र देसि सात्विक भाव है लोचन नेत्र इतको ऐचिलये तदपि नैनकी गति नेह नहीं है जोती है अरु के सीकर आइ गहें अरु रोमभी उठि भाये कंपभी बैगयो कहो यासों कहा हम तुमको देस सात्विक जान लाजरूपी समुद्र में बड़ी चित्रही में हरिमि- कि कैसी सकुची मानी वांगहि लई है इहां दूसरो विभावना अलंकार है हेतु. है कहा तसवीर देखत, अरु सात्विक भाव कार्य पूरण है अरुस्वभावो- अन्यच्च ॥ सर्वया। नुमोहनकेचितयोकछुऐसेकहीजसमोसोंकहीहे। जतजेनहितेलतहीमनकीमतिगूढ़कहांधोटहीहै ।।
रासकाप्रया।
आंगुरी पसरी जैसे द्वैजक चन्दको देखतेहे ऐसे देखिरही या वातमें ऊदाके वाक्य को
वर्णन सिद्ध भयो चारुचकोविलोचनभासी कह्यो ताते उपमाद्यअंलकार भयो !
दोहा-जगनायककीनायका वरणीकेशवदास ।
तिनकेदरशनरसकहीं सुनहुप्रछनप्रकाश ॥ ७४.॥
इतिश्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायारसिकप्रियायर्यास्वकी
यापरकीयादिभेदवर्णननामतृतीयःप्रकाशः॥३॥
जगसंसारके नायक श्रीकृष्णचंद्र तिनकीनायकाश्रीराधा ताको चरणन केशव दासक
रचुके अब तिनके दरशन अरु रस प्रछन्न कहिये छिपी अरु प्रकाश कहिये जाहिर
परणन करत ॥७॥
इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायगसिंहबहादुरस्पाज्ञाभि
गामिललितपुरनिवासिहरिजनकवीश्वरात्मजेन सरदाराख्यकवीश्वरेणविरचितायां
रसिकंप्रियायां भूषणमुस्तविलासिका नामटीकायां स्वकीयापरकीया
वर्णनाम तृतीयः प्रकाशः ॥ ३ ॥
अथ दरशनवर्णन ।
दोहा-येदोउदरशेंदरशाहोहिंसकामशरीर ।
दरशनचारिप्रकारको, वरणतहमतिधीर ॥१॥
नापक अपनापका जहां दरी कहे देगि परे तिहि दरश ते काम संयुक्त होनाय
तारो दमन फाहिये सो पार प्रकारको है ॥१॥
दोहा-एकजुनीकोदेखिये, दुजोदरशनचित्र ।
तीनासपनोजानिये चौथोश्रवणसुमित्र।। २।।
एक जुनीरो दोमय अपांच मामात् दरशन होदि दूना विप्र ॥ तीनो स्वप्नमें
पापीयान दरशन दिएका
दोहा-दरशननीकेदरशियह दंपतिअतिमुसमान।
ताहिकहतमानात केशवदासमुजान ॥३॥
यह दोहा का दाम भो । मापीन पुलकसमें नहीं मिटत पात निक
ना किसी
अपमाक्षाददाशन।
दोदा-नोंदमयुनिदेद्दकी, गईमननहींनादि।
कोजान देकदा, केशवदेगनादि ॥2॥
भाषाटीकासमेत।
(४७)
नींद भूख अरु देहकी युति जा राधाके सुनत गई ता राधाको केशव देखो देखे हैं को
जॉन अब कहा हैहै । अरु राधापक्ष ऐसो अर्थ कीजै ताहि राधा देखतीहैं ॥ प्रश्न
अरु कोई कहै कि पहिले श्रवण स्वप्न तब चिन तब साक्षात् चाहतरही उत्तर तहां
यह है कि दरशन में मनही ऊपाको प्रथम स्वप्नभयो अरु रंभावतीको अरु
रावतीको प्रयम साक्षात् सोनाही यामें श्रवणक्रम केशव देखाइ चुके कि नोंदभूखाति
देहकी जाके सुनतगई अरुकोई कहै कि स्वप्नलोभी याहीमें है काहे नींदगई जब स्वप्न
में देखी भूखगई जब चित्रमें देखी अरु सुनत देहकी द्युतिगई अब साक्षात् दोई देख-
तहे किंवा मित्रपरस्पर चित्र नहीं चिवजड है सो नहीं देखिसकत स्वप्नमेंभी एकही
देखत एकको परस्पर स्वप्न अरु देखियो नहीं वनत ऐसेही श्रवणमें दौऊ सुनै सो न
हो वनत जहां प्रत्यक्ष बैठेहैं तहां श्रवण दर्शन कहावै अरु साक्षाद में दाऊ दोहुन
को देखत यह दोहा दंपति दर्शन को है आगे कवित्त में एक एकको दर्शन करेंगे यामें
मिलायकै कह्यो है दोहुन को || ४ !!
दोहा-देखनकोपियरूपहग,तजीसकलजगकाज ।
कोटियतनहूँ कै रही, रहे नैन गडिलाज ॥५॥
यह दोहा भी काहूको बनायो है केशव को नहीं ॥ ५॥
राधाकोसाक्षात्प्रच्छन्नदर्शन यथा सवैया।
कहिकेशवश्रीकृपभानुकुमारिंशृंगारशृंगारसवैसरसै।
सविलासचितहरिनायकत्यों रतिनायकशायकसेवरसै॥
कवहूंमुखदेखतिदर्पणलेउपमामुखकीसुखमापरसै ।
जनुआनंदकंदसुपूरणचंददुरयो रविमंडलमें दरसे ॥६॥
उक्ति अंतरंग सखीकी अंतरंग सखी प्रति । दर्शनं एकको साक्षातू नहीं दे सकत
कि वृषभान कुमारी अगारकरिचुकी कैसी है यह शृंगाररसको सरसै नाम बढावहै यामें
कोई कहै जिभेगार कहा सरस रहीअयै तो नायक देख्यो नहीं तौ पहिले दोहामें चारों
दर्शन दिखायचुके अब केवल अन्यकी रुचिकेलिये बनावत, अरु सविलास ताही
समय हरिनायक त्यों नाम तैसही रति नायक सापक से यरसावत ज्यों राधाशृंगार
सरसत अरुनायक सविलास है तैसेही रतिनायक सायक बरसावत है अरुकबहू
दर्पण में मुख देखती सो दर्पण.अरुणमतिको है तामें राधाको मुख कैसी शोभादेत
मानों आनंद को कंद जो पूरणचंद है सो रत्रिमंडल में दुयो दर्शतहै यहां फल
उत्प्रेक्षालंकार मानों राधाको आनन देखिकै आप द्वैगयो आनंद को कंद सो दुरिकै
देखत है चंद अरु अहेत के हेतते हेतुउत्प्रेक्षा भी होतहै अरु दर्पणमुख वस्तु में चंद
सूर्यकी संभावना करीतातेयस्वृत्प्रेक्षा ॥६॥
साक्षात् दर्शन प्रकाशराधाको यथासवैया।
पहिलेतजिआरसआरसीदेखिपरीकघसघनसारहिले।
पुनिपोंछिगुलावतिलोंछिफुलेलअंगोछेमें आछेअंगोछनके ॥
कहिकेशवमेदजवादसोमांजिइतेपरआजे अंजनदे।
बहुरेदुरिदेखोंतोदेखोंकहासखिलाजतेलोचनलागेइहें ॥ ७॥
उक्तिनायकाकी सखीप्रति हे सखीम छिपिके भी देखती हो तौभी हमारे लोचन के
नायकसामुहे नहीं होतलाजमें लगेई रहतहें आलस तजिक आरसी घनसारादि
उपाय बहुत कियो पान्तु इनने लाज न छोडी प्रश्न पनसारादिते लाज कैसे जायगीर
उत्तर । इहां मौग्धभाव की अधिकता है नायका यह सुनेरही कि उद्दीपन ते लान
छुटिजात याते धनसारादि उपाय किये ॥अर्थ । इन सबको नेत्रमें लगायो। प्रश्र-अरु
यामें परस्परदर्शन दोऊको कैसे || उत्तर । लाज तवहीं आवत कि जब दूसरी त"
कोऊ देखतहोय इहां लाजतो हैई है ॥ अरु येतेउपाय आप किये अंतरंग सस्तीप
नहीं है अरु जासों कहत सो बहिरंगहै याते प्रकाश जानिये या कवित्त के तिलक
विस्तार कविप्रिया के तिलकमें कीनों है याते इहां नहींकियो कारण बहुतकिये
कार्य नहीं भयो ताते विशेपोक्ति अलंकार जानिये ॥ ७ ॥
नायककोप्रच्छन्नं साक्षात् दर्शन ॥ कवित्त ।
भालगुहीगुनलाललौलपटीलरमोतिनकीमुखदैनी ।
ताहिविलोकतआरसीलैकरआरससोइकसारसनैनी॥
केशवकान्हदुरेदरसीपरसी उपमामतिकोअतिपैनी।
सूरजमंडलमेंशशिमंडलमध्यधसीजनुताहित्रिवेणी॥८॥
उक्ति अंतरंग सखीकी अतरंग प्रति ॥ कि भालमें तौ गुही हैं लालगुनते लट अ
तामें लपटि रही हैं लर मोतिन की ताको विलोकत नाम देखत है ॥ आरसी कर
लेकर आरस अलसौहीं दीठिकरिकै आलसते साविक भाव जनायो । सारस कमलने
सो कान्ह दुरे देखत तहां उपमा मनमें कभीभासत कि मानों दरपण जो है मणिमा
तामें है मुख सो दर्पण सूर्यमंडल मुख शशिमंडल ताके मध्यमें त्रिवेणी है । इह
लटश्यामयमुना मोती गंगा लाल गुन सरस्वती अरु कोई क है यामें राधा नहीं देखें
सात्विक कहांते आयो । आफ्नो रूप देखि आपको सात्विक न आयो चाहिये।रामा
यणे ॥ मोहननारिनारिकेरूपा । मानोपदते उत्प्रेक्षालंकार ॥ ८॥
-- भाषाटीकासमेत। नायकको प्रकाश साक्षात दर्शन ॥ सवैया। इकतोउरओरउरोजअनूपमतैसेमनोहरहारमहारी। चित्तचलैतरुणीनहुको अरुनैनकिकेशवयातकहारी ॥ हितकीहितसोंकहिहीवनिआक्तकौलगिहो?रिकौतुकहारी। अंचरुदैनंदलालविलोकतरीदधिनोसिविलोवनहारी ॥९॥ के तू अनोखी दविविलोपन हारीहै । अंचल की मोट करिकै नायक को देखती है एक तो तेरो उर उत्तम दूसरे उरोज तीसरे हार मनहरणहार सो तेरो चित्त जो है सा चलता है। तरुणी नको अरु मेनकी को अरु नैनकी कौल यात कही जे हित आपन है तिनसों हितकी कोई वनत है कमीतक में कौतुक देखन हारीहो । इहां सार असं- कार उरते उरोज अधिक उरोजते हार अधिक किंवा एक ती उरोनमें मनोहरता यनीही रही वापे हार पहिरे यामें मनोहरताकी अधिकाईभई । ताते अनुगुनालंकार भयों ही कमलों देखा ताते बहिरंग सखीते प्रकाश ॥ ९ ॥ दोहा-प्रकटकामकोकल्पतरु, कहिनसकतिमतिमूढ़। चित्र मेंहरिमित्रकी, अतिअद्भुतगतिगूढ़ ॥१०॥ यह दोहा केशव को नहीं है।॥ १० ॥ राधाकीमच्छन्नचित्रदर्शनासवैया। लोचनऐचिलियेइतकोमनकीगतियद्यपिनेहनहींहै। आननआइंगयेश्रमसीकररोमउठेउरकंपगहीहै ।। तासोंकहाकहियेकहिकेशवलाजसमुद्रमेंवृडिरहाहै। चित्रहुमेंहरीमित्रहिदेखतियोंसकुचीजनुयाहगहोहे ॥११॥ रति अंतरंग समीकी अंतरंगप्रति कि देसौ याके चरित्र नित्र देखि सात्विक भाव हो आयो है लोचन नेत्र इतको ऐचिटय तदपि नैनकी गति नेद नहीं है जोता है अरु • मुसो अमके प्रीकर आइ गपहें अरु रोमभी उठि भाप का भी गयो कहो यासों का • वही अपे हम तुमको देस सात्विक जान लाजरूपी समुद्रमें बड़ी चित्रही में हरिमि. | प्रको देखिकै केसी सुकुची मानी यांहगाह लई है इहां दूसरी विभावना अलंकार हेतु । तो अपूरण है कहा तसवीर देगत, अरु सालिक भार कार्य प्रण भिमसभाती. क्ति भी है।।१॥ अन्यच ॥ सवैया। तेजनुमोहनकेचितयोकछुऐसेकहीजसमोसॉकहींहै। लाजतनाहटतंहीमनकीमतिगृढकहांघोलहाहै ॥ ..
रासका प्रया। . केशवचित्रितमंदिरआजुदिसावतहीमतिरीझिरहीहै । चित्र मेंहरिमित्रहिदेखतयोंसकुचीजनुवांहगहीहे ।। १२ ।। यह कवित्त केशप को नहीं याते तिलक नहीं किया ॥ १२॥ राधाकोप्रकाशचित्रदर्शनयथा ॥ कवित्त । केशोदासनेहदशादीपकसंयोगकैसेज्योतिहीकेध्यानतपतेजहिन शाइहै । आंखिनसोबांधेअन्यकाहूकानभागीभूखपानीकीकहाना रानीप्यासक्योबुझाइहै॥ येरीमेरीइंदुमुखीइंदीवरनेनलिखेइंदिराकम दिरक्योसंपतिसिधाइहै । ऐसेदिनऐसेहीगवास्तगवाँरकहाचित्रदेखे मित्रकेमिलेकोसुखपाइहै ॥ १३॥ उक्ति बहिरंग सस्ती की नायका चित्र देखिरहीहै ताको देखिकहत है कि विनर्द तुम भोजनक्षुधा वे लक्ष्मी संपति वे मित्र मिले काहूको सुस्त होतहै ? तुम गवारि कां भई गवारपद कहेते बहिरंग जानी जात याते प्रकाशकाकोक्ति अलंकार ॥ १३ ॥ . नायकको प्रच्छन्नचित्रदर्शनयथा ॥ कवित्त । रूठवेकोतूठवेकोमृदुमुसक्याइकैविलोकिवेकोभेदकछूकह्यो परतुहै । केशोदासबोलेविनवोलनकेसुनेविनाहिलनमिलनविनाम हक्योंतरतुहै ॥ कौलगअलोनोरूपप्यायप्यायराखौनेननीरविन मीनकैसेधीरजधरतु है । चित्रनाविचित्रकिननींकेईचितैयैमननि चितयेतेचित्तचौगुनोंजरतु है ॥ १४॥ नायक आप मनसों कहत है कि हे मनरूठयेको अरुठ्येको अरु कोमल मुसुक्या नको अरु विलोकियको भेद कछु कहतनहीं बनत वे बोले अरु बिना नीके बोल सुने अर हिलन मिलन बिन मोह कैसे सरे ये नयन कबलों अलोनोरूप प्याय प्याय राखिय वेनीर मीन धीरज नहीं धरत वह जो चित्रनीविचित्रहै ताको चल देखिये चित्रको देखती 'चित्त चौगुनो जरतु है चौगुन जरन को आशय प्रथम तो श्रवनदर्शन ते जरी दूजे स्वप्नते तीजे चित्रते चौथे हेमन तू नहीं चलत चित्रमें चेष्टा नहीं उपमानते विशेषता उपमेय में है याते व्यतिरेक अलंकार जानिये चित्रते नायकाविशेष भई ॥ १४ ॥ . नायककोप्रकाश चित्रदर्शन यथा कवित्त ॥ अंतरिक्षगच्छनीनियक्षनसुलच्छनीनिअच्छीअच्छीअच्छनीनि छविक्षमनीयहै । किन्नरीनरीसुनारिपन्नगीनगीकुमारिआमुरीमुरीन
मापाटीकासमत।
हूंनिहारिनमनीयहै । भोगिनकोभामिनीआदेहधरेदामिनीयोंकाम
कामनीयोंकहाऐसीकमनीयहै । चित्रहमेंचित्तहिचुरायेलेतकोउ.
यहरामकसोरमनीरमासीरमनीयहे ॥ १५ ॥
नायक जाको चित्रंदमत ताकी स्तुति करतहै | अंतरिक्ष गच्छनीपरीयक्षनी तिन सवी
छविकी क्षमनीय है क्षमा करावनहारी का उनकी विनिदनहार जिनके छविसंबंधीकोप है
याको दोस जरहे यह उन्हें दीन जान समा करत यातें यहसमनीय है और समको नमनीय है
नमस्कार सब याको करत हैं ऐसी कोऊ यहहै जासों छपायो सोयहिरंगहै याते पहिरंगने
देखे चित्र देखत ती चित्र दर्शन प्रकाश भयो किन्नरी जाहें अरुण रण में जे मुनारी, अरु
पन्नगी नगी पर्वतकुमारी । अरु आमुरी मुरी भादि सय पद मुगहें इहां इनानुप्राम
दपमा अलंकार अंतरिक्ष गच्छनी यानी ये वृत्तानुप्रास ॥ अर देहधेरै दामिनी यह
सपमा ।। १५ ॥
स्वप्नदर्शन।
दोहा-केशवदरशनस्वप्नको, सदादुरोईहोय ॥
कवहूं प्रकटन देखिये, यहजानतसवकोय ॥१६॥
स्वप्न दर्शन छिपा रदतहै ।। प्रकट नहीं होत ॥ १६ ॥
राधाको प्रच्छन्न स्वमदर्शन । सधैया।
आतुरज्योंउठिदौरीअलीजनुआतुरज्योंगहियेसुगहीत्यों।
हेमेरीरानीकहाभयोतोकहवझतकेशवाझिरहात्यों ।
डीठिलगीकिधोंप्रेतलग्योकिलग्योउरप्रीतमजाहिडरीयों।
आननसीकरसीकहियेधकसोवततेअकुलायउठीक्यों ॥१७॥
उक्त अंतरंग ससी कई नायिकाने स्वममें नायक देख्यो।अरुलायक अंकग चादी
नाही समप नदिसुली तो सरसी को पकरी सो सनी कहातिद अली जिन आतुर
पाकोदेसी अरु भातुर सय पकरो जैसे में पकरी हूं अपवा मोदि पकरीभिर पति के
सो को कहा भयो है मझातेहै ॥ तैसे ही मुन पझक रहिगई । तोको रष्टि लगी कि
मतलगी कि प्रीतम उरसों सगी है । ताते ऐसी हरानी मानन जो मुगद वापर
सीकर स्वंद के माप । अरु सीसी कहत है धक देग सोरतने क्यों भरटार
उठीह ओ सप्न में मायक भंतपदते जानीजात । काई दह अंतरंग है सो जानत याद
निपयांत संदेह अलंकार । आगे दृष्टि में मंदिर प्रीतमने निधप ॥ १७॥
(५२) रसिकप्रिया नायकको प्रच्छन्न स्वप्न दर्शनं यथा ।। कवित्त। नखपदपदवीकोपावेपदद्रौपदीनएकौविसेउरवसीउरमेंनआ। वी। लोमसीपुलोमजानतिलसातिलोत्तमानमलहूसंमानमनमैनका मानिवी । जानियेनकौनजातिअवहींजगायेंजातजानुजानिहाँजो हिकेहूंपहिचानिवी । वातकीसीवानीमांहभावसोभवानीमांहके दांसरतिमेरतीकज्योतिजानिवी ॥ १८॥ नखपदवीको द्रौपदी कही । अरु उरमें उरवसी लोममें पुलोमा ॥ तिल में ति तमा । मेलमें मैंनका ऐसी जो नायका जानी नगई जो स्वपमें दर्शनदै जगाइ गई अपनी जान जानहै जो वाको पहिचानिह बातमें पानी कही भावमें भवानी रति रतीपातें दूसर पर्याय अलंकार जानिये काहै एककी छवि अनेक ठौर वर्णी कहीसो याम कम नहीं है कहां तिलोत्तमा तिलमें कहां भेनका मलमें तो इहां मयत्री हेत ये नाम राखे ताते उल्लेस जहां एकको एक अनेक प्रकार समुझे या नायका अनेक भांति समुझी ऐसीजी महाराज सवाई आपने तिलक में लिस नहीं उल्लेसमें धर्म मात्र अनेकको होत पर्याय में विशेषण यह भेददै अरु । दर्शन प्रकाश नहीं होत ॥१८॥ दोहा-भूखहोइजिहिवातकी, बिनदेखतहीपीव । सखीमुनागुणश्रवण, अंगअंगसमजीव ॥ १९॥ यह दोहा केशव को माहीं ॥ १९ ॥ श्रयण दर्शन। दोहा-शीलरूपगुणसमुझिके, सखीमुनावआनि । केशवताकोकहत, दरशनश्रवणयसानि ॥२०॥ पर भी दोहा केशवदास की नहीं है ॥ २० ॥ नायककोपच्छन्न अयणदार्शनयथा । सबैया। साहदिवायदिवायसवीइकवारककाननआनयसाये। जानकोके शवकाननतेकितहरिनननिमांझसिधाये ॥ लाजकेसाजधरईरहे तवनेननलेमनहींसोमिटाये किसीकरोअवक्योंनिकसोरीहरे हरेदि यमहरिआये ॥२१॥ गल माती मगोमा । ममीत लिहा क कददि ऐमा सदाचार हक मनरेटर टोन और टैटगाना मा नायक अपनीयवाया कात मनकी भाषाटीकासमेत। (५३) यकको सखी नायकके गुण सुनायगई है सौह दिवाइ के याको प्रयोजन के जिन २ की बातें सुनी तेते व्याकुल होगई तब नायककै सखीने सहि दिवाय दिवाय कही लिी वाकी एकही वात सुन सोमली कहाँत जानी सो कवित्त के पाठमें यही है कैमोकों ने सहें दिवाइ दिवाइ इक वार का मनमें वसाये कहा एकही वार मोको सुनाई में नाहीं जानती का धौं नैनन मांह सिधारे अरी हे सखी लाजके सान सब धरे हे जब मैनन ने मनसौं मिलाइ दिये सो अब में कैसी करों वे कैसे निकसे? मनते रे हरे जो हीय में हरि आये यह तो शब्द अर्थ अरु यामें यह प्रश्न है कि मन नहीं कानन मुनते ताते मनही ने कानन नैनन दियसो मिलाये सी नाहीं कहूं ऐसी भी त मन नाही रहतअरुइन्द्रीको ज्ञान वैजात ॥ जैसे त्वइन्दी के तप्तवस्तु को ज्ञान- त इहां हरिनाम मुनिबो कारण मनआइजैवो कार्य ताते हेतु अलंकारहै ॥ २१ ॥ नायकाको प्रकाश श्रवण दर्शन ॥ कवित्त । कोलौंपीहौकानरसरूपकीवुझेहेप्यासकेशवदासकैसेनयननभर जिये । बीरकीसोंमेरीवीरवारीहेजुवारीआननकहसिहांकरवलइते लीजिये। वरसकमांझयहवैसअलवेलीवीतेदेहौमुखसखिनक्योंअय हनदीजिये । येरीलड्यावरीअहीरऐसीबूझोंतोहिनाहिंसोंसनेहकी नाहसोनकीजिये ॥२२॥ उक्ति बहिरंग सखीकी नायकासों । वाको ववलों कानरस पीजिये रूपको प्यास हे कैसे नयननभर पीहै । मोको वीरकी सोहहै तू बालकहै अरु वारो आनक जो त हे तो नेकहँस तेरी चलाइलङ हेअलयेली! वर्षमें यह तेरी अलबेली घस वीतिजैहै जो दुख सखिनको दैहै सो अवहीं काहे नहीं देती है तू लड़ पारीहे हों अहीर ऐसी बू ही ताको नाह सों सनेह कर नाही सो नकर । ये यात लड़वावरी अहीरकी पहिरंग हत ताते प्रकाश | अरु यह अलबेली वैस धीति जैहै । सनेह नाहसों न कीज । क- कीजै या काकोक्तिः । यहशृंगार को अंगशांत है ताते रसवद अलंकार मुख्य जा- नेयें ॥ २२ ॥ नायका को प्रच्छन्न श्रवण दर्शन ॥ कवित्त । लंघतहैलोकलोकलीकनाउलंघीजातसवहीतूसमझावैतोहिंसम झाको। छोड़नकहततनतनकोनछूटेलाजधनमीतराखदोऊकोवि कहावेको । शोचकोसंकोचहूकोपूरवपच्छिमपंथकेशोदासएको कालएकोजनधावको । दुसमुखदूरदुरादूरहोतेमेरेमनजैसीमुनीते तीतोहिआंखिनदिखावेको ।।२३।।
रसिकप्रिया।
नायका मनसों कहत कि तू मत विस्तार छोड़न कहतअयया तन छोड़न कहत अ.
थवा तन जे तेरे अंतरंग यहिरंग तिनको छोड़न चाहत । अरु लाज नाहीं छोड़त । घन
मीत देईरास पंडितको कहायोहै । तैसे तू लोक लंपत अरु लोक नहीं लंघी जात टी-
ते अरु यह शोच संकोचकी पूरुय पश्चिम पंयह एक बेर एक जनि कौन धावै । तोते
दुख अरु सुख दूर दुराइक दूरते हैमेरे मन जैसी तैने कानते सुनी है तैसी आंख ते क्यों
न दिखावत यह दृष्टांत अलंकार है धननीत यह लोकोक्ति ॥ २३ ॥
नायकको प्रकाशश्रवणदर्शन ।। कवित्त ।
निपटकपटहरिप्रेमकोप्रकटकरवीसोविसेक्शीकरकैसेउरआनि
ये । कामकोप्रहरपनकामनाकोवरपनकान्हकोसकरपनसबजगजा
निये। किधौंकेशवराइमनमोहनीकोभूपणहेकिधौंत्रजवालनिकोदूप
णवखानिये। सुनतहींछूट्योधामवनवनडोलैश्यामराधेतेरोनामकेट
चाटमंत्रमानिये ॥२४॥
निपट कपट हिय प्रेमको प्रकट करनहार है के वीस विसे वशीकर है यह कैसे द
रमें आनिये कि काम को उत्कर्ष रुप बढावन हारहै के कामना कै वर्षन हारहै कैका
हूको कर्पनहार या कैसे उरमें आनिये कैमोहनीकी भूपण है के ब्रजबालन को दूषण है
जाके सुने श्याम घरछोड़ बन बनडोलत सो राधे तेरोनाम है कि उच्चाटन मंत्रहै या
ते संदेह अलंकार दो तुकमें किधौं साक्षात् दौमैं लुप्त जैसे लुप्तोत्प्रेक्षामें मानों जन-
सह तैसही संदेहमें किधौं लुप्त होत अरु यामें ब्रजबालनको दूषणहरणहै सो यह उपास
नाको ग्रंथ नहीं शृंगार ग्रंथ है ऐसी अर्थ करते दूपण है जात राधाके रूपकी उत्कर्षता
नहीं होति इहां जब सबकेरूप को दूषण करै तब भूषण २४॥
दोहा-दरसनरसरमनीयके,कहेपरमरमनीय ।
प्रकटनप्रेमप्रभावअब, कहींकछूकमनीय ॥२५॥
इति श्रीमन्महाराजकुमार इंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां.
चतुर्विधदर्शनप्रच्छन्नप्रकाशवर्णनं नाम चतुर्थःप्रकाशः ॥ ४ ॥
दर्शन प्रत्यक्षादि तिनको रसकहिये आनंदरमनीय नामदंपति के परम रमनीय
मुंदर को अय प्रेमको प्रभाव कहाँही दर्शन रमन रमनीनको अरु दर्शन रसरमनीनके
यहभी पाठहै ॥ २५ ॥
इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराज श्रीमदीवरीप्रसाद नारायणसिंह-यहादुर-
स्याज्ञाभिगामिललितपुरनिवासि हरिजनकवीश्वरात्मजन सरदाराख्य-
कवीश्वरेण विरांचतायां रसिकप्रियाभूपणे मुखविलासिकानाम
टीकायां दर्शनवर्णननाम चतुर्यः प्रकाशः ॥ ४ ॥
भाषाटीकासमेत ।
अथ दंपतीचेष्टा वर्णन।
दोहा-तियकेचित्तकीजानसखि, पियसोंकहैसुनाय ।
कहेसखीसोंप्रीतिमें, आपुनतेअकुलाय ॥ १॥
तियके चित्तकी बात जानके सखी पियसा सुनायकै कहै सो सखी प्रीतिमें कही
आपु अकुलाय कि सखी सखी सों प्रीति में कहै औ आप ब्याकुल होय राधिकाकी
किंवा नायक सखीसों कहै तो प्रीति में ब्याकुल होजाय आप ॥ १ ॥
सखीको वचन नायकासों विरह निवेदना ॥ सवैया।
काल्हिकीग्वारितोआजहुतौनसम्हारतिकेशवकसहंदेहे । सीरी
लैजातउठेकवहूंजीरजीवरहैकरहीरुचिरेहै। कोरिविचारविचारतिहै
उपचारनकेवरससखिमेहै । कान्हवुरोजिनमानौतिहारी विलोकनमें-
विसपीसविसहे ॥२॥
उक्ति सखीकी नायकपति ॥ के हे कान्ह काल्हि जबते तुम वाको देखो तबते आ
जुलौं देह नहीं सम्हारति है। रेहरेखा रेहारेख छंद शास्त्रमें एकहै । कबहूँ सीरी
होनात कवहूं जरउठत जीवरहौ कै रुविकी रेहरेखि रहीहै । कोटिन विचार उपचार
नके सखीमेह बरसावती तथापि नाहीं उठत याते चीसविसे तिहारी चितवनमें विप है
यहां विपचितवनको रूपकहै ॥ २॥
नायकाकी सखीप्रति नायक अपनीबात कहतहै | कवित्त ।
प्यासैव्हरहीउदासभागीभूखगईवास केशोदासनींदहकीनिंदा
नितठानीहै । मतिकोमतौनलेयविद्याकीविदाईदेयशोभामुकीसेइ
सेइसवसुखसानीहै ॥ विपसोलगतगीतकेलिकीनपरतीतप्रीतिउरपा
हुनीसीपचिपहिचानीहै । तोविनकोकहैगाथधीरजत्तालेकसाथमोहि
कोमिलावहाथलाजकोषिकानी है ।। ३॥
नायक वचन सखीप्रति । कि प्यास तो तनते उदाप्त है गई अरु भूख भागी
पास गई अरु नींदकी निंदा भई है मेरी मतित मतो नहीं लेत अरु विद्या जो है ताकी
विदाई देत है सो भासुकी सेयकै सब सुखमें सनीहै । सेजसूनी पाठमें सेजसूनी है
अरु गीत विषसो मानत अरु कीलकी ती प्रतीतह नहीं करत अरु प्रीति उरकी पाहुनी
बरोबर पचिपचि पहिचानी है ऐसो जो मेरो तनहै जो बातें कीनी सो याकी गाया
तो विन को कहनहार है । या धीर्यता सायल मीको हायमें मिला जो बाला जाके
हाय विकानी है तुक प्रति जहां धरन की समता वारंवार आवे सो वृत्तानुमास अरु
विषसो गीत इत्यादिक में व्याघात जानिये ॥ ३ ॥
रसिकप्रिया। अथचेष्टालक्षण। दोहा-पियसोंप्रकटनपीतिकडं, जितनैकरतउपाय। तेसबकेशवदासअव, वरणतसवनसुनाय ॥४॥ नायका जितनो उपाय अर्थ चेष्टा करै तामें यह जानी जाय कि तास मियामों पीति प्रकट नहीं है ॥ ४ ॥ दोहा-जबचितवैपियअनतहूं, तबचितवैनिरशंक। जानविलोकआपुसों, अलिहिलगावैअंक ॥५॥ जय पियाकी दृष्टि अन्यओर नाय तर आप निश्शंक देखन लगे अरु जवनायक वाकी ओर देखे तब सखीको अङ्कम लगावै ॥ ५ ॥ दोहा-कवहूंश्रुतिकंडुनकरे, आरससोऍड़ाय। केशवदासविलाससों, वारवारजमुहाय ॥ ६॥ कवहूं श्रवण सुजलावै कभी आलस्यभरिके ऐंडाय अरु बिलासते वारम्वार जमुहाय ॥ ६॥ दोहा-झुठेऊहंसिहंसिउठे, कहसखीसोवात । ऐसेमिसहीमिसप्रिया, पियहिदिखावेगात ॥७॥ झूठे हँसिहँसिकं काहू यहानेते पियाको तिया अगदिखावे ॥ ७ ॥ दोहा-योंहीपीयप्रियानिप्रति, प्रकटतअपनीप्रीत ॥ सोप्रच्छन्नप्रकाशकर, बुधिवलकरतसमीत ॥८॥ ऐसेही प्रीतम प्यारी सों अपनी प्रीति प्रकट कर कहूं चेष्टा छिपाय अरु कहूं प्रकट कर ॥८॥ राधाजीको प्रच्छन्नचेष्टा ॥ कवित्त । चोरिचोरिचितचितवतमुहमोरिमोरिकाहेतेहँसतहियेहरपबढ़ा- योहै। केशोरायकोसोंतूजम्हातिकहायारवार विसिखाहमेरीवीरआ- रजोरआयोहै । ऐंडसोऐंडातअतिअंचलउठातउरउपरिउपरिजात- गातछबिछायोहै । फूलफूलमेंटतिरहतिउरझलिझलिभूलिभूलिकह- तकछूतेंआजपायोहै ॥९॥ सब चेष्टा नायकाकी देख पहिरंगसखी कहति के त कौन को चित चौरि चोरि मुह मोरि मोरि चितपत इत्यादि येष्टा कहत सो भान कहूं कछू पायो नामकको देख भाषाटीकासमेत। करत सो नहीं जानत ताते प्रच्छन्न स्वभावोक्ति अलंकार स्वभाव वर्णन ते बीरी साय मेरी वीर भारस ज्यों आया है दूसरीतुकमें यहभी पाठहै उर उरज उपरिजात तीसरे चरणमें ऐसी भी पाठ है ॥ ९ ॥ अथ प्रियाजकी प्रकाशचेष्टा ।। कवित्त । मेरोमुँहचूमतेरीपूरीसाधमवेकीचाटओसआंशूक्योरीरातल्या सडाढ़ेहैं। छोटेछोटेकरकहावत छवीलीछातीछावोजाकेछवायवे केअभिलापवाड़े हैं ॥ खेलनजोआइहोतोखेलोजैसेखेलियतकेशव- रायकोसोतेयेखेलकौनकाढ़े हैं । फूलफूलमेंटतिहमोहिकहामेरी- भटू टेकिनजायजेवेभेंटबेकोठाहें ॥१०॥ पहिरंगसखी । नायका की चेष्टा देख कहत है मेरो मुंहचूमै तेरी चूमनेकी साधन पूरहै अरुकहूं ओसवाट प्यास बुझात है आंश क्यों सिरात पाठ भी है तेरी जो छविवारी छाती है तामें मेरे छोटे छोटे हाय कहा छुआवत है याही छुआवो जाके छुवा इवेकी अभिलापद सैटिवे को भाई तो खेल खेली ये कौन खेल निकासे हैं मोकों काहेको भेंटतिहै जिनसे भेंट जे सामुहें खड़े यहां बहिरंग जागो यात प्रकाश अरु सूक्ष्म अलंकार लिखो सो नहीं नायका सौ सखीवचन न होते तो होतो ताते टिपी पात जनाई यात पिहितहै ऐसी सवाई महाराज लिखी सो नहीं पामें भाव चाही यहां साफ कहत तात विवृतोक्तिह काहेकै छपी जो आशय सो प्रकट दिवायो विवृतोक्ति दो रीतिकी होत कहूं लेप सी कहूं साफ ॥ १०॥ नायकाकी प्रच्छन्न चेष्टा ।। कवित्त । छोरछोरवांधेपागआरससोंआरसीलेअनतहीआनभाँतिदेखतम नैसेहो । तोरितोरिडारततिनूकाकहोकौनपर कौनकेपरतपायवा वरेज्योंऐसेहो ॥ कबहुंचुटकदेतचटकीसुनावोकान मटकीयों डा उजुरीज्योंजम्हातजैसेहो । वारवारकौनपरदेतमणिमालामोहिंगावत कछूककछूआजुकान्हकैसेहो ॥११॥ उक्त उसीकी नायकमात । यारवार पाग यांयत हो अरु अनत चितवतही कानप नृप तोरत हो कौनके पांय वावरेसे परतही कहा वार घार चुटकी देदे कान सुनावत हो कौन पे मटकी चलाततही काहे ऐसे जम्हातहभिरकि ऍहांत ज्यों जुड़ी जम्हात भी पाट है कौन पै यार यार मणि माल देत हो कछको कडू गावत आयु तुम कैसे भयेही सगी बहिरंग तावे प्रच्छन्न है स्वभारोक्ति अलंकार ।। ११॥
(५८) रसिकप्रिया। नायककी प्रकाश चेष्टा ॥सवैया। जालगिलांचलुगायनदै दिननाचनचावतसांझयहांऊं। केशवमंत्रकरोषशकारक हारिकयंत्रकहांलगिनाऊं ॥ हारिरहेहरिकेहूंमिलीनमिलाउंजोजाहितीमांगसुपाऊं। ठाढ़ीवेजाइमिलीमिलबेकह औरकहाकनियांकरल्याऊं॥१२॥ उक्ति सखीकी नायकप्रति ॥ जाके हेतु लुगाइनको लाचदई लाच नाम रुसबढ लोंच भी पाठ है अरु तुमको उन नाचनचाये अरु तुम वश करन हेतु मंत्र करे अरु यंत्र करि हारे कहांतक गनाऊं तुम हारगये वह न मिली ताको हो मिलाउती जो मुख मांगो पाउती जाहु वे टाढे मिली और का कनियां के ले आऊं यहांऊं विवृतोरि पूर्ववत् बहिरंग सखी तें प्रकाश जाननी ॥ १२ ॥ अध स्वयंदूतत्त्व वर्णन । दोहा-जोक्योंहूंनमिलैकहूं, केशवदोउईठ । तौतवअपनेआपही, बुधिवलकरतवसीठ ॥ १३॥ जो क्योंहूं प्रकारते कहूँ दोऊकी अर्थ नायक नायका की चेष्टा न मिले अरु सवं दूती के मिलाये ते भी ईठ वेष्टा न मिलै अर्थ सखी आदिकते छिपावै तो तब अपं ते आपही बुद्धिके बलते बसीठ दूतपन करै ॥ १३ नायक को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व॥ सवैया। दूरतेदेखवेकोढ़दीनमनाइहुतीलिखहूलिखचीठी। देसेमिलोमनहींहुमिली मिलखेलवेहूंकोमिलीमतिमीठी ॥ ऐसमेंऔरचलाइकेशवकैसहूंकान्हकुमारिदैदीठी। लागेनवारमृणालकेतार ज्योंटूटैगीलालहमैं तुम्हेंईठी ॥१४॥ नायका नायकसों कहति है देखोदूरते तो परस्पर चिट्टीलिखी ताते अब मिले मन खेल है तब मति भी मिली जो ऐसे में कोऊ बालकी दीठि परजायगी तो हम तुमसे मृणालके तार सी ईठ टूटजे है अभिप्राय यह रतिकरोचाही स्वयंदूतीकैयो रीति ई होति यहां रतिहेत दूतपनकीनो. पठाईहुतीभी पाठ है गूढोक्ति अलंकार आशय गूढक ? प्रश्न स्वयंदूती के लक्षण में यह है कि जहां कोऊ न मिल अर्थ सखी दूतीआदि निकट न होय तहां आप दूतत्व फर वे पहिचान पीयों यहां पहिचान है नायक अरु आन मिल्यों है नायक नायका पासही है यहां स्वयंदूतत्व कसे । उत्तर । नायका के स्वयं दूतत्वमें दो भावहैं जो नायकागकट होयतो आप काहू भांतिते संकेतस्थल जतांव भाषाटीकासमेत। दूसरी भेद नायक पासही होय संकोचवशते कुछ न कहिसके कि नायकाके मन में न जाने का है तहां नायका मुरत स्वयंदत कर यहां सुरतस्वयंदूत है संकेतस्थल नहीं संकेत स्थलमें नायक आपके प्राप्तहोत है प्रच्छन्न तो प्रसिद्ध ही है ॥ १४ ॥ पुनाप्रियास्वयंदूतत्व ॥ यथा-संवैया। छुवोजनिहाथसोंहाथकियेपलहीपलबाढ़तप्रेमकला। नजानियेजीमेंकहावसिजायचलैपुनिकेशवकौनचला। भलेहीभलेनिवहेजोभलीयहदेखवेहीकीहलाहुभला । मिलोमनतोमिलवौयकहूंमिलवानअलौकिकनंदलला ॥ १५ ॥ उक्ति नायकाकी नायकप्रति ॥ एकान्तमें नायक नायका हैं सो नायक संकोच बश हाथ नहीं पसारत यह जान नायका कहत कि हमारे हाथों हाय मत छुआवे प्रेमकी कला हमारे उर बढ़तजात है नहीं जानिये फेर जीम का आय जाय तब हम तुह्मारो का कर सकि, जो भलाई में नियह सोई भली है यह देखिये की हला भल तो है जो हमारो तुह्मारो मन मिलो है तब अब मिलवो अलौकिक नहीं अलंकार भाव पूर्ववत् ।। १५ ॥ प्रियाको प्रकाश स्वयंदूतत्व ॥ यथा-सवैया । धाइनहींघरदाइपरीजुरिआइखिलाइकिआंखवहाऊं। पौरपेआवरतौंधीइतैपरउंचोसुनैसुमहादुखपाऊं ॥ कान्हनवेरहुयाउनयौंइनआलिनकोलगहौंवहराऊं। येसबमोसंगसोवनआवेंकैमइनकेसंगसोवनजाऊं ॥१६॥ अक्षरार्थ सुगम ॥ परंतु सखी न जाने तो प्रकाश नहीं जान तो स्वयं दूती नहीं तह यह स्वयंदूती के प्रच्छन्न प्रकाश में है कि एकांत नायकसों कहै सो प्रच्छन्न समुदाय मैं कहै सो प्रकाश ॥ अरु वचन विदग्धा स्वयंदूतीभेद प्रथम मिलाप सो स्वयंदूती दती सो वचन मिदग्धा अलंकार पूर्ववत् अरु स्वयं तत्व तहां यही अलं- कार जानियें ॥ १६॥ नायकको प्रच्छन्नस्वयंतत्व ॥ कवित्त। आपनोईभाइकेयेसोहतसरीकसेवेकेशोदासदासज्योंचलत चित्तलीनेहें । आपहीअटाउकैयेलेतनाउमेरोवेतौवापुरेमिलापकेस तापकरहीनेहें । प्रियाकोसुनायकैकहतऐसीवनश्यामसुबल कोले लैनामकामभयभीनहैं । साथलेसखानअवयोवनछांडोहमखेल बेकोसंगसखाशाखामृगकीनेहैं ।। १७॥
(५८) . रसिकमिया। नायककी प्रकाश चेष्टा ॥सवैया। जालगिलांचलुगायनदै दिननाचनचावतसांझयहांऊं। केशवमंत्रकरौवशकारक हारिकयंत्रकहांलगिनाऊं। हारिरहेहरिकेहूंमिलीनमिलाउंजोजाहितीमांगसुपाऊं। ठाढ़ीवेजाहुमिलौमिलवेकहं औरकहाकनियांकरल्याऊं ॥१२॥ उक्ति सस्तीकी नायकमति || जाके हेतु लुगाइनको लाचदई लाच नाम रुसरः लोच भी पाठ है अरु तुमको उन नाचनचाये अरु तुम वश करन हेतु मंत्र करे अरू यंत्र करि हारे कहांतक गनाऊं तुम हारगये वह न मिली ताको हौ मिलाउती जो मुख मांगो पाउती जाहु वे टाढेह मिली और का कनियां के ले आऊं यहांऊं विवृतोनि- पूर्ववत् पहिरंग सखी तें प्रकाश जाननो ॥ १२ ॥ अथ स्वयंदूतत्व वर्णन। दोहा-जोक्योंहूंनमिलेकहूं, केशवदोउईठ। तौतवअपनेआपही, अधिवलकरतवसीठ ॥१३॥ जो क्योंई प्रकारते कहूँ दोऊकी अर्थ नायक नायका की चेष्टा न मिले अरु सस दूती के मिलाये भी ईठ घेष्टा न मिले अब ससी आदिकते छिपाये तो तम अपने ते आपदी युद्धिकं पलते पसीठ दूतपन करे ॥ १३ ॥ नायक को प्रच्छन्न स्वयंदूतत्व।सयया। दृरतेदेसवकोहदीनमनाइहुतीलिसहूलिखचीठी। देखेमिलीमनहीं मिली मिलसेलयेहूंकोमिलीमतिमीठी ।। ऐसमेंऔरचलाइहकेशवकेसहूंकान्हकुमारिददीठी । लागेनपारमृणाटकेतार ज्यादृटगीलालहमंतुम्हेइंटी ॥ १४॥ मापरा नापकों कहीत है दसौदरत तो पररसर विट्टीलिपी तान अम मिट मन में मेर तप मति भी मिली जो ऐसे में कोऊ पालकी दीठि परजायगी तो हम तुम मादके तार मी ईट दृटन है अभिप्राय यह रनिकरीनाही म्पयंदूतीया शनि थी हानि पहावित दतानकीनी टाइनीभी पाट ६ गृढोक्ति अलंगार आशय गदा । प्रम मपंती के समय में यह है कि जहां कोऊ न मिल अयं गमी दृतीदि निस्ट न होप नहां आप न करें ये पहिचान पीपमा यहां पदिगान र नायक प्रा. आन मिया र नायक नापा पामही है यहां स्वपतन मे | उनर माया रूपं दन में दो भाई जो नायगाकट होपा आ कर मानित कनायर र व भाषाटीकासमेत। दूसरो भेद नायक पासही होय संकोचवशते कुछ न कहिसके कि नायकाके मन में न जाने का है तहां नायका मुरत स्वयंढ़त कर यहां सुरतस्वयंदूत है संकेतस्थल नहीं संकेत स्थलम नायक आपके प्राप्तहोत है प्रच्छन्न तो प्रसिद्ध ही है ॥ १४ ॥ पुनाप्रियास्वयंदूतत्व ॥ यथा-सवैया। छुवोजनिहाथसोंहाथकियेपलहीपलबाढ़तप्रेमकला। नजानियेजीमेंकहावसिजायचलैपुनिकेशवकौनचला। भलेहीभलेनिवहैजोभलीयहदेखवेहोकीहलाहुभला। मिलोमनतोमिलवायकहूंमिलवानअलौकिकनंदलला ॥ १५॥ उक्ति नायकाकी नायकप्रति ॥ एकान्तमें नायक नायका हैं सो नायक संकोच यश हाय नहीं पसारत यह जान नायका कहत कि हमारे हाथों हाय मत लुधि प्रेमकी कला हमारे उर बढ़तजात है नहीं जानिये फेर जीमें का आय जाय तब हम तुह्मारों का कर सकिहें जो भलाई में निवहे सोई भली है यह देखिये की हला भला तो है जो हमारो तुह्मारो मन मिला है तब अब मिलवो अलौकिक नहीं अलंकार भाव पूर्ववत् ॥ १५॥ प्रियाको प्रकाश स्वयंदूतत्व ॥ यथा-सवैया। धाइनहींघरदाइपरीजुरिआइखिलाइकिआंखवहाऊं। पौरपआवरतौंधीइतैपरउंचोसुनैसुमहादुखपाऊं ॥ कान्हनवेरहुयाउनयोइनआलिनकोलगहीवहराऊं। येसयमोसंगसोवनआवकर्मइनकेसंगसोवनजाऊं ॥१६॥ अक्षरार्थ सुगम ॥ परंतु सखी न जानै तो प्रकाश नहीं जान तो स्वयं दूती नहीं तह यह स्वयंदूती के प्रच्छन्न प्रकाश में है कि एकांत नायकसों कहै सो प्रच्छन्न समुदाय में कहै सो प्रकाश ॥ अरु वचन विदग्धा स्वयंदूतीभेद प्रथम मिलाप सो स्वयंदूती दती सो वचन विदग्धा अलंकार पूर्ववत् अरु जहां स्वयं तत्व तहां यही अल- कार जानिये ॥ १६॥ नायकको प्रच्छन्नस्वयंतत्व ॥ कवित्त । आपनोईभाइकेयेसोहतसरीकसेवेकेशोदासदासज्योंचलत चित्तलीनेहैं । आपहीअटाउकैयेलेतनाउमेरोवेतौवापुरेमिलापकेस तापकरहीनेहैं । प्रियाकोसुनायकैकहतऐसीधनश्यामसुवलकोले लैनामकामभयभीनहें । साथलेसखानअवजेवोवनछांडोहमखेल वेकोसंगसखाशाखामृगकनिहैं ।। १७ ॥ ३ रसिकप्रिया। उक्ति अंतरंग सखीकी अंतरंग प्रतिकि देसकै कान्हको चरित्र आननायकका बनमें घुलायन हेत ये उपाय नधि चलेजात ताको मुनायकै कि हमारे साय के रुवा अपने भाइनके शरीकहें उनहीं के दासकी रीति भयवान चलतहे ॥ आपु मानको विगार करत हमारो नाम लगायत ऐसे यावरे मिलाप की सलापकर हीने भयह अर मुघल अपने यलको नामलेत कि हम ऐसे पल हैं कि साथम ससन के जयो हम चाही शाखामृग शानर सखा कर स्वरलको नाम वानर ते निकसत कि हमारे सम्बा प्राचीन पानर, नुग्रीवादि ॥ १७ ॥ नायकाको प्रकाश स्वयंदूतत्व ।। संवैया । · बनयेचलीकोउठाली हैकेशवहेतुमहींतीअरीअरहो । कछूखेलियेखेलनआवत आजहीं भूलोनभूलोगरेपरहौ । हितहहियोंकिधोनाहिं तऊंहितनाहीहियेतौललालरहो। हमसोयहवृझियेऐसी कहोजोकहीतुकहीवकहाकरहो ॥ १८ प्रथम उक्ति नायककी कि यनये चलो तब नायका कहति कि कोऊ ठाली नहीं ठाली नाम कोऊबेकामी अरुताही पदमें नायक को जातवत का हम ये म नकहें हमहूं चाहती तब नायक न समझौ सो कही तुमहूं-हो जय नायका सीन जो यहवोधकरत कि तू हमारोअरीवैरी है सो काअरिहैलरिहै अरु नायकमति का कोई हमा अरीहै शत्रुहै जो एकहै तथ ना समुझ नायक कहीं कछू खेलसेलिवेको बुलावत झगरान करन आवत सखिन समुझावत कि हमें नहीं अब नायक प्रति का आज नहीं आ तय नायक न समुझी अरु कही के ही तें भूलो सो सुन सखिन प्रति कहत का क के गरे परिहो नायक प्रति का मेरे गरे सों लगिही सो नायक न जानी हित है हीय कि नहीं है सो सुन कहत सखीप्रति हित नहीं तौ लला काहू सों लारही अरु नाय प्रति यह अर्थ लला आजु लरि हौ आजु विहार करिहौ तब नायक न झी सोनाय सों कही हम सों यही वूझ ऐसे कहो है यहसों यह भी पाठ है तव नायका ससि प्रति जो कही सो कही तुम का करिहो अरु नायकप्रति जु कही सुही वही अप बक रहिही चलो हम आवतहैं. यद्यपि यामें गूढोक्ति अलंकार है तथापि एक ही शब्दमें हि अनहितवारी दोई याते हैं ताते तुल्य योग्यताजानियें अरु जो उत्तर अलंकार को अप कीज तो दुःसंधान रस दोप होत है अरु नायक प्रथम पाक्यते नायक को स्वयंदूतत खिन सामुहे ते प्रकाश ॥ १८ ॥ अन्यच्च कवित्त । केशोदासपरपरनाचतफिरतगोप एकरहेछकतेमरेईगुनियतहै। वारुणीकेवशवलदाऊभयेसखासव संगकॉलजयेदुखशीशधुनियत भाषाटोकासमेत। (६१) है ॥ मोहितोगयेईवनदेहदीपमालापायगायनसंवारवेकोचित्तचुनि यतहै । जोनवसौलोलनेनलेरुवामरहिंसब खरकखरेईआजसूनेंसु नियतहै ॥ १९॥ उक्ति नायककी नायकाको सुनायकै कहतहै घर घर गोप नाचत अरु एके छकके मरसे बैगये अरु मदिराके वश बलदाऊ सखन समेत होगये या दुःखते शीश धुनिय- तहै मोको तो जानेई परेगो काहे दिवारीकोदिनहै गायनके प्रचारबेको अर्थ देखयेको और में जोखिरकमें न बसों हे चंचलननी तो लेरुआ नाम बछरू सब मरजायँ खरिकमें सूने सुनियतहै प्रमाणगीतावली ललन लोनेरेरुवा अलंकार पूर्ववत् ॥ १९ ॥ दोहा-ऊढ़ापुनियहिभांतिकरि, बहुविधिहितनजनाय । आपनहींतेलाजतज, पियहिमिलेअकुलाय ॥ २० ॥ ऊहा नायका या रीतिते बहु विधिते हित को जनावै और आपुनते लाज तजके पीतमसों अकुलाय के मिले ॥ २० ॥ कवित्त । पंथनथकितपलमनोरथरथनकेकेशोदासजगमगजेसेगायगी नमें। पवनविचारचक्रचक्रमनचित्तचढ़ि भूतलअकाशभ्रमैघामजल गीतमैं ॥ कौलौंराखोंथिरवपुवापीकूपसरसमहरिविनकीनेवहुवास वितीतमैं । ज्ञान गिरिफोरतोरलाजतरुजायमिलौ आपहितेआप- ज्योआपनिधिप्रीतमैं ॥२१॥ उक्ति नायकाकी मनकी रीति बखानत नदीसों रूपक करिकै कि देखो पंथ राह कत नहिं पलंकहूं नदी अरु मनोरथ जो है ताहीदे जे रथ जगमग कैसे होत जैसो तमें गाये अरु पवन औ विचार देईिहैं चक्रवा रथके अथवा पवन इनके विचार देख कित होनात अरु मन जो है सो भी चकित होजात भू पृथ्वी आकाश में घाम जल- जीत नहीं गनत अरु इनको यपु शरीर सो वापी कूप सर समकर कबलौं राखौं हरिके रनते निकसबहु वासर ब्यतीत में द्वैगये ज्ञानगिरिको फोरिकै अरु लाजरूपी तरु रिकै आपही से आपगाज्यो आप निधिरूपी प्रीतिमें यहां नदीरय मनको रूपक ऊढ़ जयका है॥ २१ ॥ अन्यञ्च ॥ यथा-सवैया। जातभईसँगजातिलेकीरतिकेशवहेकुलसोंहितफूटयो। गर्भगयोपुनियौवनरूपकोसोतो सबैपलहीपलखूट्यो। - रासकामया। कान्हतिहारहीआनकियेकहीनीकहिलाजसोनातोईछूट्यो। छांडयोसवैहमहेरतुम्हें तुमपेतनकौकपटोनहिछूटयो । २२।। कीति जो हमारी सो जातिसमेत गई अर्थ यह कि पतिव्रता ते हम व्यभिचारिणी भई अरु जातिते गई अरु कुलसों भी हित गयो अरु योयन रूपको गर्व गयो या ॥इन का नायकावृद्ध भई।उत्तर | अपनसों बोली तय गर्व कहां ऊतो पलहीपल साटो भयो अरु हे हरि तिहारी शपय कर कहत कि लानसोंतोनातोई टूटा हम सब छांध्यो पर तुम कपट न छांज्यो परकीया पण्डितामें भी लगावत काहे नायक आनसों रमन- कार आयोहै याते खोटो शब्द घटिगयो जाति अरु कीरति संगगई तातेसहोति अलंकार ॥ २२॥ दोहा-अधिकअनूढालाजते, पियपैजायनआप। कैहूंकैसखियोंकहै, ताकेतनकोताप ॥२३॥ अनूढ़ा अधिक लाज ते पिया सों न योले ताको दशा सखी जनावै ॥ २३ ॥ कवित्त । जानेकोकेशवकौनेकह्योकवकान्हहमारेहिंडोरनझूले । पानन खाइनपानीपियतवतेभरिलोचनलेतसमूलै ॥ जाहुनहींचलियेगव लायल्योलेहुसकेलकहांयहभूलै । जानौतहकामकलीकुम्हिला 'यगयेबहुरैफिरफूलै ॥२४॥ उक्ति सखीकी नायकप्रति ॥ कि नहींजानत काहू कहिदई है कि कान्ह हमारे हिंडोरापर झूलनभावत तबते पय पान छोड़ आंखें मूलतक यरूनीलों भरलेत ताते बलायल्यों गजाहुसंकेल लेहु वाको भलो जिन काहे वा कामतरुकी कल है जोकुम्हि लाय जैहै तो फेर न फूलिहै काकूक्ति अलङ्कारहै । का फूल है न फूलिहै ॥ २४ ॥. प्रथममिलन स्थानवर्णन । दोहा-जनीसहेलीधाइघर, सूनैघरनिसँचार । अतिभयउत्सवव्याधिमिस, न्यौतोसुवनविहार ॥२५॥ दासी सहेली धाईके घरमें औ काहू सून घरमें रात्रिसमयमें किया ऐसे मिलनको संचार प्रचार होय भतिभपते कहूं छिप तहां मिलन होय किंवा आप नायका डर संयुक्त होय ता समय मित्र आयकै उपचार करै अरु काहू उत्सवमें जाय न्याधिरोग के बहानेते और न्यौतमें अरु मुन्दर वनमें मिलिकै विहार करै ॥ २५ ॥ दोहा-इनहींठोरनहोतहप्रथममिलनसंसार। केशवराजारंकको रचिराखोकरतार ।। २६॥
भाषाटीकासमेत। (६३) याहीठौर में मिलाप होतह प्रयमराजाको अरु रंकको यह कर्तार रचिराखो ॥२६॥ जनीके घरको मिलन ।। कवित्त । वे कैकुमारिकाकोबजकीकुमारिकानिमांझसांझकेशोदासवासप गपोलक। कामकीलतासीचलप्रेमपाससीअमलराधिकाकोबुद्धिवल कंठभुजमलिका दौरिदौरिदुरिदुरिपूरिरअभिलापलाखभांतिकेअनू नरूपबहुकेलिक। जनीकेआजरआजरजनी सजनीरीसांचीकीन्ही श्यामचोरिमिहिचनिखेलिकै ॥२७॥ उक्ति सस्तीकी सखीप्रति ॥ कि आजु दासीके घर में सखिन यह काम कीन्हों हरिको कुमारी वेप बनाय सांझ के मध्य त्रास खेल कामलतासी राधाके संग मिलाप कराय दयो अरु उन संग संग दौर दौर दुर दुरके अभिलाष पूर्ण करे लास भांतिक ननंत रोति केलि करि रातमें सांची चोरि मिहिचनि श्याम कीनी ॥ यहां पर्यायोक्ति बलकार है छलते इष्टसाधन कीन्हौं याते ॥ २७ ॥ सहेलीके घरको मिलन ॥ कवित्त । नयननकेतारिनमेंराखोप्यारे पूतरीकैमुरलीज्योलाइराखोदशन सनमें । राखोभुजबीचवनमालीवनमालाकरचंदनज्योंचतुरचढ़ा राखोतनमें ॥ केशोराइकलकंठराखोवलिकठुलाकैकरमकरम कहूआनीहेभवनमें । चम्पककलीज्यों घिसूषिकाहदेवतासी लेह रेलालइन्हेंमेलिराखोमनमैं ॥२८॥ अर्थ सुमग ढिठाईत कहत ॥ याते सहेलीलुप्तोपमालङ्कार नयन तारिन में पुतरी रिराखो पुतरी उपमान नायका उपमेय याते वाचकधर्मलुप्ता अरु मुरली उपमान शन बसन अधरनमें राखो ज्यों बाचक ताते उपमेय धर्मलुप्ता इत्यादि जानियें अरु मक्रिया भी पाठहै ॥ २८ ॥ धाईकेघरको मिलन॥ कवित्त । हँसतखेलतखेलमंदभईचंदद्युतिकहतकहानीअरुबूझतपहेली ल । केशोदासनींदमिसुआपनेआपनेघरहरेहरउठिगईग्वालि कासकलबाल ॥ घोरउठेगगनसघनघनचहूंदिशिउठिचलेकान्हयाइ लिउठीतिहिंकाल । आधीरातअधिकअँधेरीमांझजेहीकहांराधि कीआधीसेजसोइरहौनंदलाल ॥ २९॥ अरु पालिका पाठ में बालक बालिका स्त्री उठाइयो नहीं गनको उठिबो अकस्मैक हो भयो जो धाइको कहिराख्यो होइ यह यत्न ठहराओ जो बालक न उठतेतीधाइ सो-
रसिकामिया।
कहती याते यह जानिये कि अकस्मात् इच्छा पूर्ण भई ताते यहां जो महर्षण अलङ्कास
लिखो सो नहीं काईके आगे सखीसब उठगई ते जानतरही ताते गूढोक्ति होत धाइके
कहनेते कहां धाइ की इच्छारही यह जो कोऊ है सो नहीं काहे सहेली ती नोंद
बश गई धाइकी ये बातें सिखाइयो छलकर इष्टसाध्यो ताते पर्यायोक्ति मानी
आही अरु धाइ जो कही सो अंधेरी रात जान तात समाधि अलङ्कारहै कि कार्य
सुगम आनकारणते भयों पनकी अँधेरीते ॥ २९ ॥
सूनेघरको मिलन ॥ कवित्त ।
देखतेहीचित्रसूनीचित्रशालावालाआजुरूपकीसीमालाराधार
पंकसुहायेरी । नूपुरकेसुरनकेअनुरूपतानलेतपगतलतालदेत
अतिमनभायेरी ॥ ऐसेमेदिखाइदीन्हींऔचकंकुंवरकान्हसे,येगा
ततैसेजातनबतायेरी । केशोदासकहेपरैअलजसलजसेनजलजसे
लोचनजलदसेढआयेरी॥३०॥
उक्ति सखीकी सखी प्रति ॥ कि आज चित्र सुनो देखि कैसो चित्रहै चित्रनी ज
बाला है तासमरूपकी मालासी राधांरूपक जे सुहाउँहें तिन्हें देख रूपंकनाम ताल वि.
शेष सो नूपुरके ने सुर हैं तिनके अनुरूप तानें लेत, पगतल ताल देतहैं मन भाये कर
तल भी पाठहै ऐसो समय समुझ औचक कान्हने दिखाईदई तब आनगात जैसे भये
तैसे नहीं कहत यनत परन्तु जे जलज कमलसे लोचन रहे ते जलद मेघसे द्वेगये
॥ अर्थ ॥ आंसूनामा भी सात्विक है गयो। प्रहर्षण अलङ्कार जो चित्त चाहत रही
राधा सो हरि मिलिगये ॥ ३० ॥
निशिवारिको मिलन ।। सवैयो।
एकसमैसवदेखनगोकुलगोपीगोपालसमूहसिधाये ।
रातिहआईचलेघरकोदशहूंदिशिमेघमहामढ़िआये ।।
दूसरोवोलतहीसमुझैकहिकेशवयोंक्षितिमेतमछाये।
ऐसेमेंश्यामसुजानबियोगविदाकैदियोमुकियेमनभाये॥३१॥
अरु कोई कहे उक्ति कौनकी काहे तहां तो कोई देखत नहीं रहे तो पीछे केशव
कहि चुके जाने पीउ पिया कि सस्ती होय जु तिनहिं समान ताते दश दिशि मेघन
जब छाय लीन्हो अरु पहुत रीतिक तम ह गये एक रात्रि दुजे वन तीजे मेघ तर
ससी मंग नहीं छोडो यह कहांते निकसत कि दूसरो वोलतही ते जानी जात तो आन
चले गये ससी संग रही अलंकार समाहित काहे कि देव जो तें जाकार्य होत तहां
समाहित होता है |॥ ३१॥
भाषाटोकासमेत। अतिभयको मिलन ॥ कवित्त । जानिआगिलागीवृपभानकेनिकटभौनदौरिव्रजवासीचढ़ेचाँद शिधाइके। जहाँतहाँशोरभारीभीरनरनारिनकीसवहीकीछूटिंगई लाजयहिभाइकै ॥ ऐसेमेंकुँवरकाहसारीशुकबाहिरकैराधिकाजगाई औरयुवतीजगाईके । लोचनविशालचारुचिबुककपोलचूमिचके सीमालालाललीन्हीउरनाइकै ॥३२॥ उपमा अलंकार है अरु दैवयोगते कार्य ताते समाहित इष्ट सिद्धि भयो दिन यतन ताते महर्षण भी है ।। ३२ ॥ उत्सवको मिलन | कवित्त । वलकीवरसुगांठताकीरातिजागिवेकोआईब्रजमुंदरीसँवारितन सोनोसो । केशवदासभीरभईनंदजूकमंदिरनिआधोमध्यऊरधव चौनकाहूकोनोसो । गावतिवजावतिनचतनानारूपकरिजहाँतहाँउ मैंगतआनंदकोऔनोसो। साँवरेकिमुनिसेजसोवतहीराधिकाजसोये आनिसाँवरेऊमानिमनगोनोसो ॥३३॥ औनी तालते जहां होई पानी जात ताको कहतहैं यहां राधा सेज मापनी पाई यात महर्षण अलंकार बिन श्रम कार्य सिद्ध भयो अरु पर्यायोक्ति भी है नायकने सखीसों यह कहि राख्यो कि जब निद्रा नायकाको आवै तत्र हमारी सेज बताइयो यह छलते इष्ट साध्यो || ३३ ॥ व्याधिमिसको मिलन ॥ सवैया। शोधिनिदाननिदानदियउपचारविचारकियेनधिरानी। वेदकिशासनव्याधिविनाशनहोमहुताशनहूनहिरानी ।। केशववेगिचलोयलिवोलतिदीनभईवृपभानुकिरानी। आयेहीमेटिमरूकरिकैवहुरेउनकोवहपीरपिरानी ॥ ३४ ॥ उक्ति ससीकी नायक प्रति ॥ कि शोषक निदान कारण बहुत दान कीन्हें अरु । उपचार विचार पहुत करें न धीरीपरी अरु वेदकी आज्ञाते अप्रिमें होम भी करो ताते । मलिजाउँ पगि चलो तुमको पुलावतंहै वृपभानुरानी दीनभई है मरु मुश्किलते जोमिदाप | आयोहे सोई परि फेर भईहै अरु प्रयमही मिलन कही केशवने दूसरो तो चाहतहै । छलते ताते पर्यायोक्ति ॥ ३४ ॥ ५
न्योतके मिसको मिलन || कवित्त ।
न्योतकैबुलाईदुतीवेटीवृपभानुजूकीवेकोयशोदारानीआनीह
शृंगारिके । भोजनकेभवनविलोकिकोपानसातउपरअकेली
गईआनंदविचारिक ॥ देसतिदेखतिहरिभावतेकोभागीदेखिदोरिंग
हीव्यालऐसविनीडारडरिक । भेटिभरिअंकमनभायोकारांझ्योमु
खकेशरिसोंमाडिलीनीवेशरिउतारिक ॥३५॥
उक्ति सखीकी सखीप्रति ॥ कि हे सखी ! आज यशोदाने राधा को बुलाय शृंगार
करि भोजन कराइचुकी तब भवन देखिये को राधा ऊपर गई सो तहां हरिको देखि
भागी तिन दौरिके ताकी वेनी पकारकै मनमानी कीन्हीं अरु गरि उतारि केशाग्ने
मुख मांज्यो अभिप्राय यह कि राधा को अंग केसरि सो है तामें रद रद नख छदन-
देखि परै अरु केसरि तौ अंगके रंग में मिलिगई याते मीलित अलंकार अरु बेमान
उतारिबेते सब गहना उतारे ताते लक्षित लक्षणा आफ्नो येसर को अर्थ गहेरही अरु
आन को ग्रहण करो ब्यंग यह कि आनन जानी अरु क्रमनाही ताते असंलक्ष क्रमम
नि अरु पर्यायोक्तिभी है वेसर उतारलई की बहुत देरतक रहै यह छल ॥ ३५ ॥
वनविहारके मिसकोमिलन ॥ सवैया।
दैदधिकाल्हिगईकहिदैनपसारहुओलिभरोपुनिफेटी ।
छाँडोनहींमगछाँडोजुपायेछुड़ावैरिलोकनिलाजलपेटी ॥
वातसम्हारिकहौसुनिहेकोउजानतहोयहकौनकिवेटी।
जानतवृपभानुकिहैपरतोहिनजानतकौनकिचेटी ॥३६
वनमें चेटीशब्द व्यंग अर्थ है काहे चेटी घरमें नाहिये तहां हरि कही कितीही ह
नहीं जानत तू कौनकी चेटीहै ? अर्थ । तेरी मालिक तो दधि देवो चाहत काहे जबा
नहीं देत याते उत्तराअलङ्कार है पहिली तुकमें देहरीभी पाठ है ॥ ३६ ॥
जलबिहारको मिलन || सवैया।
हरिराधिकामानसरोवरकेतटठाड़ेरीहाथसाहाथछिये ।
प्रियकेशिरपागप्रियामुकताछरराजतमालदुहूनाहिये।
कटिकेशवकाछनीश्वेतकसेसवहीतनचंदनचित्रकिये।
निकसेजनुक्षीरसमुद्रहीतेसँगश्रीपतिमानहुँश्रीहिलिये ॥३७॥
सुगम अलङ्कार उत्पदा ॥ ३७ ॥
भाषाटीकासमेत। (६७) अन्यच्च ॥ सवैया। ऋतुग्रीपमकीप्रतिवासरकेशवखेलत,यमुनाजलमें। इतगोपसुतावहिंपारगुपालविराजतगोपनकेदलमें। अतिवूडतहेंगतिमीननकीमिलिजाइउठेंअपनेथलमें । इहिभाँतिमनोरथपूरिदुवोजनदूरिरहेछबिसोंछलमें ॥ ३८ ॥ सुगम पर्यायोक्ति अलङ्कार ॥ ३८ ॥ दोहा-यहि विधिराधारमणके, वरणेमिलनविशेष । केशवदासनिवासवहु, बुधिवललीजहुलेख ॥ ३९ ॥ सुगम इति परकीया ॥ ३९ ॥ दोहा-औरजुतरुणीतीसरी, क्योंवरणोंइहिटौर । रसमेंविरसनवरणिये, कहतरसिकशिरमौर ॥ ४०॥ सुगम ॥१०॥ दोहा-प्रथममिलनथलमेंकहे, अपनीमतिअनुसार। हावभाववर्णनकरों, सुनिअवबहुतप्रकार ॥४१॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रिया- यां नायकनायकाचेष्टादर्शनवर्णनं नाम पंचमःप्रकाशः ॥ ५ प्रथम मिलन थल पै कहे अब हाव भाव वर्णन करतही बहुत प्रकारते ॥ ४५ ॥ इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराज श्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्याज्ञा भिगामीललितपुर निवासीहरिजनकवीश्वरात्मजेनसरदाराख्यकवीश्वरेणविरचित रसिकप्रियायांभूषणेसुखविलासिकानामटीकायांचेष्टादिमिलनस्थानवर्ण नंनामपंचमाप्रकाश: ॥ ५॥ भावलक्षण। दोहा-आननलोचनवचनमग, प्रकटतमनकीवात । ताहीसोसवकहतहैं, भावकविनकेतात ॥१॥ आननते नेत्रनते पचनते मनवारी यात जो प्रकटै सो भाव कहाँव शब्दको अर्थ तो यह है अरु कोई कहै कि भाव तौ मन अनुकूल विकार कहावत यह तो अनभाव है ॥ १ ॥ दो-जो देखे मुविभाव है, आपरूप अनुभाव।संचारी जो संघर, पाई है पिरदावा तहां (६८) । रसिकप्रिया ऐसीजानिये।कि जो मानन लोचन बचनते अपने मनकी बात जनावहि साई भाव है वामनकी बात भाव हैअरु कोई कहे वचन काहे कहे तो इहां विद्वल वचन हैं। रामायणे- "थके नयन रघुपति छायदेसेपिलनकहूं पर हरे निमेषाअधिक सनेह देह भइ भोरी' अरु कोईकहै या तो चार चाहिये विभाव अनुभाव संचारी स्थायी यहां अनुभावमात्र काहे दिखायो तहां 'अनुभावो भाववोधक' एसो अमरमें है ताते ‘भावको बोध करता जतायो ॥१॥ दोहा-भावसुपाँचप्रकारको, सुनुविभावअनुभाव । अस्थाईसात्विककहें, व्यभिचारीकविराव ॥२॥ यामें कोई कहै कि पांच प्रकार कैसे तिलककार तो चारही गनावत तहां सात्विक भाव अनुभावहीमें है भरतसूत्रमें चारही मानत विभावानुभाव व्यभिचारी संयोगाइस- निष्पत्ति अरु जो कहत कि मनवारीरीति सबमें चाहियेसो "विभावेर्टलनोद्यानादिभिरा- लंबनोद्दीपनकारणैःस्थायी इत्यादिको भावोजनितः । अनुभावः कटाक्षभुजोरक्षेपमभूति- भिः कार्यः प्रतीतयोग्यव्यभिचारभिनिवेदादिभिः सहकारिभिरुपचितों मुख्यया वृत्या' ताते पिता पुत्रपौत्रपर पौत्रको भाव यामें जानने ॥ २ ॥ विभाववर्णनम् । दोहा-जिनतेजगतअनेकरस, प्रकटहोतअनयास। तिनसोंविमतिविभावकाह, वर्णतकेशवदास ॥३॥ जिनते जगत् संसार में अनेकरस कहा नवरस कहिये प्रकट होत तिनको नाम विभाः वरसको कारण रूपसो विभाव ॥ ३ ॥ अथविभावनामभेदवर्णनम् । दोहा-सोविभावदोभाँतिके केशवरायवखान । आलंवनइकदूसरो, उद्दीपनमनआन ॥४॥ सोई विभाव दो रीतिके एक आलंबन दूसरो उद्दीपन |॥ ४ ॥ दोहा-जिन्हेंअतनअवलंबई, तेआलंबनजान। जिनते दीपतिहोतहै, तेउद्दीपबखान ॥५॥ यामें कोई कहै कि अतन शब्द शृंगार को कहत सो नहीं बनत काहे एक शृंगार मावरहिजे है ताते ऐसे कहा कि जिन्हें पाइ अतन जो रस है सो अविलंब न कर कहां जहांजबतक आलंबन नहीं तवली रस अतन है जैसे जीव देहको अविलंय पाय प्रकट- त तैसेही रस आलंबन पाइ प्रकट होत है अरु कोई कहै कि रस नियतामें है देखो रस तोनायकमें है भरु आलंबन नायका हैतौनायकामें रहो चाही तहां यह है कि नायका नेत्र भाषाटीकासमेत । (६९) द्वार होइ हृदयमें यशकर है तबतक रस है जब नायका नहीं उरमें तब रस नहीं रहत जैसे रात्रिमें सोवत एकांत स्थानमें अरु एकै सुन्दरी आई ताहि देख शृंगार उपजौ अरु वही मुंदरी आवत काहू कही जागत रहियो यहां एक पिशाचिनी आवे है तब भयानक कैगयो ती जबतक या सुंदरी हृदय में रही तप तो शृंगार रहो अरु अब भ्रम न दूरि हो हृदय में पिशाचिनी आई तब भयानक है गयो अरु जो कहो कि उद्दीपनमें कहां मुंदरी है तो ताही आलंबनको दीपन करत है सो दो रीतिको है धनवन शरद वसंत एक यह तो देवी कहावत अरु गेह वसनादिक मानवी ऐसी रीति है ॥ ५ ॥ अथ आलंबनस्थानवर्णन ॥ छप्प। दंपतिजोवनरूपजातिलक्षणयुतसखिजन । कोकिलकलितवसंतफूलिफलदलिअलिउपवन । जलयुतजलचरअमलकमलकमलाकमलाकर । चातकमोरसुशब्दतड़ितपनअंबुदअंबर ॥ शुभसेजदीपसोगंधगृहपानखानपरधानिमनि । नवनृत्यभेवीणादिसवआलंबनकेशववरनि ॥६॥ परधान पिछोरा वादरदुलही एकह सारी तायामें कोई प्रश्न करे कि जे उद्दीपनहें आलंबन काहे कहे तहां यह अर्य करत कि आलंपन ऐसे वर्णोका उद्दीपन सहित खाली आलंयन न चाहिये तो यामें नायक नायिकाके रूपकी अधिकाई ना रहेगी दोहा- गहनेसे गहने परेपिय पहिरन नहिं देवगन अंतर डरनते, करंसें गहिगहि लेइ॥विहारे दीपउ- जेरीहू हरतहरत यसन रतिकाजरही लपटि छविकी छटन छनको लूटी नलान अरु हमा- रोकियो चित्रचंद्रिका नाम विहारी सतसयीको तिलक है तामें अनेक अर्य कियाँ इन दोहनको तामें ऐसो अप है कि पामें मिलायकै पहिली तुफमें तो अलंगन कहे अरु चारमें उद्दीपन अरु फेर कहिके आलंघनके सय वरणे का सब आलंवन सरसह सोदेव मानुषी दोई है परंतु पराधीहे अव नायिक नायकाके आधीन जेद्दीपन सौ कहतहें तीसरे घरणमें कमल मारुत कमलाकरभी पाटहै ओ चोये चरणमें तडितधनुभी पाटहै अर पंचम चरण में पान गान भी पाठ है औ षष्ठ चरण में घीणादि रव भी पाठहै ।।६।। उद्दीपनवर्णन। दोहा-अविलोकनआलापपरि रंभननखरदान । चुंबनादिउद्दीपये, मईनपरसप्रवान ॥ ७॥ देखो या पनवन आदिक नहीं कई प्रश्र रद्दीपन छप्प में कहि भाये वो दोहामें फेर काईकहे याते यह जानी जातकिये आलंघन होहं रद्दीपन एकहै पाउद्दीपन अनं.
(७०)
रसिकप्रिया।
तह याते दोठोर कहे जो उद्दीपन अनंत तो एकही दोहा कह्यो चाहिये नहीं तो अनेक
दोहा कहते उत्तर उत्तर छप्प में उद्दीपन औरतरहके और दोहा में औरतरह के
कहा छप्प में जे उद्दीपन कहे ते बाह्यारूप है बाहरहें चंद्र कोकिलादि अरु दोहामें जो
कहे सो अंगही.मात्रके कहे अपिलोकन परिरंभ नसरद ये नायकाके अंगते उपजत, याने
न्यारी रीति कहे अरु येऊ कहे जैसे वस्त्र दो प्रकार के रेशमी और सूत्रके पर दोऊ में
भिन्नताह तैसेही एक बाह्य और एक अंगहें याते अन्य दोहा में कहे यहभी
कोई कहत ॥ ७ ॥
अथ अनुभाववर्णन ।
दोहा-आलंबनउद्दीपके, जेअनुकरणवखान ।
तेकहियेअनुभावसव, दंपतिप्रीतिविधान ॥८॥
आलंबन अरु उद्दीपन जे अनुकरणहें तेअनुभाव कहावत कहा जब भालंबन नायक
नायिका नायका उद्दीपन घनवनकोकिलादि जब देखे नबजे मुखपै आइजात ते अनु-
भाव कहावतहैं ॥ ८॥
अथस्थाईभाववर्णन ।
दोहा-रतिहासीअरुशोकपुनि, क्रोधउछाहसुजान ।
भयनिंदाविस्मयसदा, स्थाईभावप्रमान ॥ ९॥
ये जो स्थाई आठ कहे नौ न कहे सो याते कि रसको न कहाँव जोन काव्य में अरु
नाट्यमें होई यह आठ होत, सातको जो स्थायी निर्वेद सो नाट्य में नहीं होसरत
काहे नाट्य में बहुत विषयहैं अरु काव्य एक विषयी है याते विकार नहीं हो सक्त
ताते आठ कहे सो कहियत है राति शृंगार रसको स्थायी है रति नाम प्रीति सोई जब
खीरकी रीतिते होतह तब दधिवत् रस होजातहै इष्टइच्छाते उपजे मन विकार सोरति तहाँ
कोई कहैके इए इच्छाते उपजी तो संलक्ष क्रमवाने काहनहीं कहत असंलक्षक्रमकोहगनी
ताको उत्तर यह किया प्रथम विभावतवक्रमजाने अरु फेर अनुभाव पुनि संचारीपुनःस्थायी
तक देहाध्यास रहत है जब रसको रूपभयो तब सुटिजात जैसे धीरमें रावणादिको
छूटिगये रामायणे गरजो मरत घार रख भारीकहां रामरणहती प्रचारी"इत्यादि जानिये
ताते असंलक्षम व्यंग ध्वनिजानिये तामें जो दूध दधि को दृष्टांत दीन्हों सो नहीं
चनत यामें जल धर्फवत् कहो चाहिये जामें एक स्वादु रहै अरु काईकहै है प्रीति तो
सबपे होति है सो नहीं मदन उत्साह संबंधी जो प्रीति है सो स्थायी है अरु तहां कोई
कहै कि प्रीतिते मदन संबंधी सामान्य कि अनेक होत है तो आलंयन एक काहे भनेक
आलंबन कहो चाहिये तहां रस नहीं होत वा रसाभास हो जात यही रीतिते आई.
यन आन जानलीने ॥९॥
भाषाटीकासमेव । (५) अथ सात्विकभाववर्णन। दोहा-स्तंभस्वेदरोमांचसुर भंगकंपवैवर्ण । अश्रुप्रलापवखानिये, आठोनामसुवर्ण ॥१०॥ स्तंभक्रिया न करिसकै वैवर्ण रूप बदलनाइ इत्यादि सुगम, इनका अनभावही में मानतहें ॥ १० ॥ अथ व्यभिचारीभाववर्णन । दोहा-भावजुसबहीरसनमें, उपजतकेशोराय। विनानियमतिनशोकहें, व्यभिचारीकविराय ।। ११ ॥ सब रसन में नियमही नहीं उपजत है तहां कोई कह कि हर्ष उद्वेग चपलत हास्यको नियम कीन्हों इत्यादि सो काहे तहां कालको नियम केशव कहो तहां कोई कहै कि कालको निमय तो विभ.वादिकमें भी नहीं है तहां रहनेको नियम चाहिये ता रहने में रसकी पूरणता को समय जब होत तब सब क्रम छूटिजात याते संकल्प विकल्प नानारीतिके तेई संचारी जानिये तिनके नाम कहत ॥ ११ ॥ दोहा-निवेदग्लानिशंकातथा, आलसदैन्यऽरुमोह । स्मृतिधृतिबीड़ाचपलता, श्रममदर्चिताकोह ॥ १२ ॥ निर्वेद पासनारहित ग्लानि अचाहीवस्तुदखव शंकाभावतीवस्नु हान जानन आलस देह टूटव दैन्यता मुगम मोह सुमिरण सुधि आइये धृतिसंतोष नीड़ा लजा चपलता श्रम चिंता प्रियवस्तु ध्यान कोह क्रोधमूल ॥ १२ ॥ दोहा-गर्वहर्पआवेगपुनि, निदानींदविवाद । जड़ताउत्कंठासहित, स्वप्नप्रयोधविपाद ॥ १३ ॥ गर्व सरते अधिक मानयो हर्प अनहोनी देख चित्तभ्रम आवेगा निंदा नींद सोइयो विवाद आनते करियो जडता सब कर्मते मुन्न उत्कंठा आन वस्तु प्राप्त होत स्वप्न होत स्वा प्रबोध ज्ञान विपाद दुःस ते मनको पटियो ॥ १३ ॥ दोहा-अपस्मारमतिउग्रता, आशतकअतिव्याध । उन्मादमरणभयआदिदे, व्यभिचारीयुताय ।। १४॥ अपस्मार मिरगी रोगमति यथा ज्ञान उग्रताअपनंको रजजानव घास भय रन्माद पे विचार अधिमनकी व्यया याही रीतिते सब मुगम है ये सब व्यभिचारी कहै तहां इनको विचार तहां स्थायी भाव तो वीन मात्र है रसको विभाव कारण है रसके अनु- भाव कार्य व्यभिचारी सहाय जानिये भरुसात्विक की अनुभाव को इतनो भेद है सात्तिक (७५) रसिकप्रिया। रसको मापक मही नगे का स्तंभ खेद भयो तो मानही जानानात मयते । शोधते भोई गाते न्यारी है अरु भनुभार ते जानपरत पति मपी है पाते रसके सब पांच भंग करे ॥ १४ ॥ अथ हायलक्षण। दोहा-प्रेमराधिकाकृष्णको, हेतातेशृङ्गार। ताकेभावप्रभावते, उपजतहासविचार ॥ १५॥ राधाकृष्णको जो शृङ्गार है ताकी जो पेष्टा सीई हाव है ॥ १५ ॥ दोहा-हेलालीलाललितमद, विभ्रमविहितविलास । किलकिंचितविक्षिप्तअरु, कहिरिबोकप्रकाश ॥१६॥ सुगम ॥ १६ ॥ दोहा-मोहाइतसुनकुट्टमित, बोधादिकबहुहाव। अपनीअपनीइदिवल, वर्णतकविकविराव ।। १७ ॥ मुगम ॥ १७ ॥ अथ हेलाहाय लक्षण । दोहा-पूरणप्रेमप्रतापते, भूलतलाजसमाज । सोहेलानिहिंहरतहिय, राधाश्रीत्रजराज ॥१८॥ पूर्णप्रेम ते लान छुटिजाय हियको हरे सो हेला ॥ १८॥ अथ मियाजको हेला हाव ॥ सर्वया । अवलोकनिअंकुशऍचिअनूपमधयुगपासभलैगलमेली। ' मृदुहाससुवासउठायमिलीबहुजोन्हकियामिनिमाँझअकेली ॥ अधरारसप्यायकियेवशकेशवरायकरीरसरीतिनवेली। वनवपभानुमुतासुखहीहरिकोहरिलैगईहेलहीहेली ॥ १९ ॥ उक्ति सखीकी सखीसों ॥ कि हेसखी! आजु राधाने यह चरित्र कौन्हों कि चितवन रूपी अंकुशते अपनी तरफ ऐंचिकै अरु भ्रूरूपी फांसी गरेमें डारिकरि कोमलदास केवल उठाइ सुसुन्दर बारमें छिपाइ जोन्हकी यामिनि मध्य अकेली अरु अघर को रस प्याइ पश कीन्हों नवेली रस शतिते सो घनमें वृषभानुसुता हरिको हेलाहेली लगई यह अक्षरार्थ परन्तु तामें जो अधर रसते घश कीन्हें सो ताको आशय यह कि सुधा को नाम मधु है अरु मदिराको नाम मधु है सो अपररसरूपी मदते मतमारे जब भये चव अरु यामें यह प्रश्न करत कि लाज न छूटी अरु ताको उत्तर करत कि लाज भूली
भाषाटीकासमेत ।
(५३)
का सखी भूलि गई सो लाज समाजमें छूटय अनउचित है आपते लैगई यही वेला.
है यामें लोकोक्ति अंलकार हेलोहली लोक कहनापति है । रामायणे ॥ "निहि
लनाथ बँधायोहला" || तामें प्लेपते हेलाहाव निकसो ॥ १९ ॥
अथ नायकको हेलाहाव ॥ सवैया।
चैनसुनायबुलायलईवनभानभुलाइकेभाँतिभलीको ।
फूलगयोमनफूलोविलोकतकेशवकाननरासथलीको ।
अधरारसप्याइकियोपरिरंभनचुंबनकमुखकामकलीको ।
हेलहिश्रीहरिनागरिआजुहरयोमनश्रीवृपभानुललीको ॥२०॥
उक्ति सखीकी सखीसों। कि, हेसखी! हारने आजु वेणु बाँसुरी बजाय सुनाई भवन
लाप भांति भलीते भव भवन भुलाय पाठहै, नहीं तो बन काननमें पुनरुक्ति होयगा
रु ताको मन न भूलगयो फूलनको देखि कानन वनथली देखी तब अधर रस
गाय परिरश्मन कीन्हो अरु कामकलीको मुख आप चूमो रूप महामधु पान करा.
कियो, परिरम्भन कामकली को ऐसोभी पाठ है, हेलाहलाहीते हरि प्रवीणने राधाको
न इरलयो अलंकार शंका समाधान पूर्ववत् ॥ २० ॥
अथ लीलाहाव लक्षण।
दोहा-करतजहाँलीलानको, प्रीतमप्रियावनाय ।
उपजतलीलाहावतहँ, वर्णतकेशवराय ॥२१॥
प्रिया पीय पीय प्रिया यह कहिये ऐसो रूप धारण करें तहां लीला कहिये करत
हां ललितानको भी पाठ है ॥ २१ ॥
अथ प्रियाको लीलाहाव ॥ सवैया ।
पायनकोपरिवोअपमानअनेकसोकेशवमानमनैरो ।
सीखोतोमोरखवाइवोचोविशेपचहूँदिशिचौंकिचितेवो ।
चीलकुचीलनिऊपरपोड़िवोपातनकेसरकेभजऐवो।
ऑखिनमंदिकैसीखतराधिकाकुंजनतेप्रतिकुंजनजयो ॥२२॥
उति समीकी गस्तीमति ।। राधा हरिरूपपर सकल लीला सीसत है पौई पर पर
पमान साहेमान छुटाइयो पान सइयो खवाइयो सीभी पाठहै चितवो चील कुचीलन-
ने पैठपो पात सरकत मानवी आखिन मंदि कुंजते कुंज जाइयो स्वभावोक्ति अलं-
कर चोंक चितवो आंसिन मंदिवो लिसो सो नहीं यामें प्रथम समुच्चय जानिये बहुत
पावते अरु जहां भाव सबलता होत तहां यही अलंकार होतई ॥ २२॥
(७४) रसिकप्रिया। नायकको लीला हाव यथा ॥ सवैया । झाँकिझरोखनिमेंचढ़िऊंचेअवासिनऊपरदेखनधावै । निंदतिगोपचरित्रनकोकहिकेशवध्यानकिकैगुनगावै ॥ चित्रितचित्रमेंआपुनयोंअविलोकनआनंदसोंउरझावै । आँगनतेघरमेंघरतेफिरआँगनवासरकोविरमावे ॥२३॥ उक्ति सखीकी सखीप्रति ॥ कि हरि जो हैं सो नायकाकोरूप होयकै सब ताहीती कला करतहैं झरोखन चढ़ि चढ़ि झांकत गोपनके चरित्र निन्दन इत्यादि सब पद सुगम हे प्रश्न दिनको बिरमाइयो नाइबो नहीं संभवत दिन आप नहीं विरमत उत्तर- वासरमें अपनेको विग्मावत स्वभावोक्ति अलङ्कार ॥ २३ ॥ लति हाव लक्षण । दोहा-बोलनिहँसनिविलोकिवो, चलनिमनोहररूप । जैसेतैसेवरणिये, ललितहावअनुरूप ॥२४॥ बोलतमें हँसनमें देखियेमें अरु चाल मनोहर रूपमें जैसे होहिं तैसेही वर्णन में आवे अरु चातुर्यता जामें आवै सो क्रिया ललितहाव है ॥ २४ ॥ नायकाको ललितहाव यथा । कवित्त । कोमलविमलमनविमलासीसखीसाथकमलाज्योंलीनेहाथकम- लसनालके । नूपुरकीध्वनिमुनिभोरेकलहंसनकेचौकिचौकिपरेंचा रुचेटुवामरालके । कचनकेभारकुचभारनिसकचनभारलचकिलन किजातकटितटवालके । हरेहरेवोलतविलोकतहेरईहरहरहरैंचलन हरतमनलालके ।। २५॥ मरालके यच्चा चोकत ताते भ्रामअलङ्कार अरु स्वभादौक्तिभी है या कवित्तवी असे नारायणकविने कविप्रियाके तिलक में लिसीह याते इहां अर्थ मुगम करदयाहै ॥२. नायकको ललितहाव यथा ॥ सवैया । चपलापटमोरकिरीटलसेमघवाधनुशोभवढ़ावतहें । मृदुगावतआवतणुवजावतमित्रमयूरनचायतहें। उठिदेखिभट्टभरिलोचनचातकचित्तकोतापवुझावत । घनश्यामपनेपनवेपधरेजुवनेबनतेत्रजआवतहे ।। २६ ।।
भापाटीकासमेत । (७५) इहां सविपय साम्यवरूपक अलंकार है जहां संपूर्ण अङ्ग धर्गनमें आये सो अपय सापयवरूपक कहिये, इहां चपला पट किरीट धनु घेणु वजावत मित्र मयूर इको घनश्याम पनते जानिये ॥ २६ ॥ अथ मदहाव लक्षण । दोहा-पूरणप्रेमप्रभावते, गर्ववडेबहुभाव । तिनकेतरुणविकारते, उपजतहमदहाव ॥२७॥ पूर्ण प्रेम प्रतापभी पाठ है पूर्ण प्रेमके प्रतापते गर्भ बड़े अरु तरुणपनक विका. मद उपजे और बहुभावभी होय ॥ २७ ॥ नायकाको मदहाव यथा ॥ कवित्त । छविसोंछवीलीवृपभानुकीकुँवरिआजुरहाहुतीरूपमदमानमदछ के । मारहूतेमुकुमारनंदकेकमारताहिआयेरीमनावनसयानसव केके । हँसिहसिसहिकरिकारपायपरिपरिकेशोरायकोसोंजवरहे यजकिके । ताहिसमयउठेवनपोरदामिनीसीधाइउरलागीश्याम नसोलपकिक ॥२८॥ आपनी छपिसों जो थ्वीली राधा है सो रूपके मदत अरु मानमदते छकीरही सौभी पाठ है अरु रहीयुतिरूप मदभी पाठहै ताको कामते मुकुमार हरि मनाइचेको तयाण यनाय आये सो हंसके सो हैं करि पांय परके थकिरहे पांय परि कर जोर भी है प्रश्न मद कहां रही जबमिली उ०-पायपरिवी आदि उपाय नायकने कियी तमतक पका गर्भ में रही न मानी जय घन उटीत घनके उठत दामिनिसी उरमें लाग गई तो में सामर्थ्य ता दुख छुटाइवेकी अरु डर सूचित करायो ताते समाधिअलंकार है हेतु नते कारण भये घनश्याम तन तकिकै अर लोटि श्यामपन पनसों लपाटके भी. है भर समाहित अलंकार केशव के मतते भी हातहै ॥ २८ ॥ नायकाको मदहाव यथां ।। सर्वया । महिमोहिनिमोहिसकैनसखीचपलाचलचित्तवखानतह । रतिकीरतिक्याईनकानकरद्युतिचंदकलायटिजानतह । कहिकेशवओरकिवातकहारमणीयरमाहूनमानतहे। वृपभानुमुताहितमत्तमनोहरऔरहिडीठनआनतहै ॥२९॥ रक्ति सस्तीकी सखीप्रति कि हेसखी ! राधिकाको रूप निहार हरि औरको दृष्टि में ही आनत मोहनी महिमें मोहि नहीं सकत मनमोहनीभी पाठ है चपलाचितकी चंचल
(७६)
रसिकप्रिया।
है अरु रतिकी प्रीति कोई कान नहीं करत काहे काम जरेपर आप जीवत रही चं-
कला घटतह रमा अति रमनी नहीं ताते ऊरजस अलंकार यहां उग्रता भाव राय
निंदाभी आन में सोईहै अंग ॥ २९ ॥
अथ बिभ्रमहाव लक्षण।
दोहा-बाँकविभूपणप्रेमते, जहाँहोहिविपरीत।
दर्शनरसतनमनरसत, गनिविभ्रमकेगीत ।। ३०॥
बांकादि भूषण जहां प्रेमवशते उलटो पहिरिये अरु देखियेत रसमें तनमन रसित
सदाकार होई सो विभ्रम ॥ ३० ॥
नायकाको विभ्रम हाव यथा ।। सवैया ।
कटिकेतटहारलपेटलियोकलकिङ्गिणिलैउरमेंउरमाई ।
करनूपुरसोंपगपौंचिवनीअँगियामुधिअंचलकीविरमाई।
करिअंजनअंजितचारुकपोलकरीयुतजावकनैननिकाई ।
सुनिआवतश्रीब्रजभूपणभूपणभूपितहीउठिदेखनधाई ॥३॥
सुगम गरेको हार कटिमें लपेटो ताते असंगति अलंकार यह हावमें यही अलंकार
होतहै और ठौर यह कीजिये और ठौर को काम सुनिआवत श्रीब्रजभूषण भूपित हो
भतिआतुर देखनधाईभी पाठ है ॥ ३१ ॥
नायकको विभ्रमहाव यथा ॥ सवैया।
नँदनंदनखेलतवनगातवनीछविचंदनकेजलकी।
वृपभानुसुताहिविलोकतहीरुचिचित्तमें विभ्रमकीझलकी॥
गिरिजातनजानतपाननखातविरीकरपंकजकेदलकी।
विहँसीसबगोपमुताहरिलोचनदिमुरोचिगंचलकी ॥३२॥
उक्ति सखीकी सखी प्रती कि आज नंदनंदन खेल रहे चंदन पढ़ाये तबतक पुर
भानुमुता देखी तब मुधि भूलिगई पान तो गिरि गये परंतु कमलके पत्रकी पीरी सात
लगे सो देखि गोपसुता इसी तय आपटना ले नेत्रमूंद तहां इससी का आठी सुगंबर
लकी रुचि भई अलंकार पूर्ववत् सरोजगंपल पाठ है ॥ ३२ ॥
अथ विहितहायलक्षण ।
दोहा-चोलनिकेसमयविपे, वोलनदेइनलाज।
विहितहाक्तासोंकहें, केशवकविकविराज ॥ ३३॥
मोटियके समयमें लानन बोलन देय ॥ ३३॥
भाषाटीकासमेत।
नायकाको विहितहाव यथा ॥सवैया ।
मेरेकहेदहियेजुतऊफिरग्रीपमज्योंहठकाठदहोगी।
पैरवोप्रेमसमुद्रपरायकरायकियकितक्योंनिवहोगी।
हौसमरैसजनीसिगरीकव₹हरिसोहॅसिवातकहोगी।
पीचितकीचित्रसारिचढ़ीचित्रकीपुतरीभइकोलोरहोगी ॥३॥
उक्ति सखीकी नापका प्रति कि मेरे कहे आप दहीयत है फिर पीछे आपआग्ने बैंक
रूपी काठको जराइ हो पैरयो प्रेम समुद्रको परोसो पराय कहे कहांतक पैर निवहोगी
रीसजनी हौसन मरतीहैं कबहूँ हरिसों हसिक यात कहोगी पीके चित्तकी चित्रसारी
पै चदि चित्रकी पूतरीभई कवलौं रहोगी यहांरूपक अलंकार है पीपके चित्तकी चित्र-
में नायका हाँक रहो।प्रश्न-इठतो काठ भयो अग्रिको त है उत्तर-अग्निरूपदै नायका-
8 जरावेगी! पुनः प्रश्न-चित्रकी पुतरीमें पुतरीपद उ०-यहां अंगुल्यानिर्देश जैसी
चत्रकी पुतरी तैसी तुम कयलों रहोगी ? अर्थ जड़ हैकै मति रहो ॥ ३४॥
नायकको विहितहाव यथा ॥ सवेया।
केशवरायसोंआजुसखीवृपभानुकुमारिउराहनोदीनो।
पारिदईअरुमारदईअरविंदनसोमनुकेहितहीनो ॥
सीखदईमुखपाइलईउरलाइसुगंधचढ़ाइनबीनो।
उत्तरदेइकोनंदकुमारकशिरनीचेतऊंचोनकीनो ॥ ३५॥
यका धीराधीर है सो नायका नायकको देख उराहनो दियो यह तो धीरा अरु
गरिदई तुम अन्य संभोगी हो अरु कमल के फूलकी मारदई मनहितते हीन कहे
सीख जो दई सो मुख मानिकै लई उरमें लगाई सुगंध नवीन चढायो परनंदकुमार
परते ऊंचो न कियो अरु कोई ऐसोभी अर्थ करत कि सखी सखीसों कहत कि
ने ये बातें करी, सो यालिये उराहनो दीनो कि ऐसी बातें निषट छिपी औरनके
क्यों कहत ? मायकानके मानमें कहां कहां नहीं होत सो यहां सखीके आगे मुँह
उराहनो दीनो हम कर ऐसो आचरण करीहै तो यामें बहुत क्लिष्ट कल्पना होतहै
असंगतिलकार जानिये प्रीतमको प्यारी मारे है याते अरु काकोक्तिभी है।॥३५॥
अथ बिलासहाव लक्षण।
हा-खेलतबोलत्तहँसतअरु, चितवतचलतप्रकाश ।
जलथलकेशवदासकहि, उपजतविविधविलास ॥३६॥
खेलतमै बोलतमें हँसतमें चितवनमें चालमें जहां प्रकाश जानी जाय अरु जल
आदिमें बहुत तरहको बिलास उपजै तहां बिलासहाव कहिये ॥ ३६ ॥
. (७८) रसिकमिया। नायकाका बिलासहाव यथा ॥ कवित्त । किलकअलकयुतिलकचिलकनिमिसभौंहनमेंविभ्रमनिभौन ददीनोहै । लोचननिशोचनसकोचनिनचावतिहैदशनचमका कितचिंतकीनोहै। मंदहासमुखवासअनियासदासकरिलीनेकै इजीययद्यपिप्रवीनोहै । मोहनकेतनमनमोहिवेकोमेरीभटूतेरा मुसहीअनंतव्रतलीनोहै ॥ ३७॥ उक्ति सखीकी नायका प्रति कि हेसखी! तेरे मुखने मोहिवेको बहुत प्रतलियाई कदमके है अलक समेत तिलक चिलकन मिस होइकर अलि कपाटमें निये अरु भौंहनमें विभ्रम विलास जो है ताने भवनघर बनायो भेद देकर अरु नेत्र तिनको शोचडार संकोचयुत नचावत रहत हैं अरु दशनकी जो चमक है। चकित कीन है अरु मंद हँसते मुखकी जो सुवास है ताने केशव जो हरि हैं ताको करलीनो है मोहनके तनमन मोहिये निमित्त हेसखी! तेरे मुखने बहुत व्रतलियों सक्रिया करत में आई ताते बिलासहाव अरु तिलक चिलक मिस यखानते हैं यहुनत अलंकार ॥ ३७॥ नायकको बिलासहावं यथा ॥ कवित्त । जिनननिहारतेनिहारवेकोनिहोरतकाहूननिहारेजिनकैसेही रेहें । सुरनरनागनवकन्यनकेप्राणपतिपतिदेवतानिहूकेहिय- हारेहैं । इहिविधिकेशोरायरावरेअशेपअंगउपमानउपजीविरं चिहारेहें। -चनमदनमदमोचनहती ५ ॥ तिहारें ॥ ३८॥ उक्ति सलीकी नायक प्रति कि, हेलाल!तिहारे लोचन जिन नहीं निहारे ते तो रके लिये निहोरत रहत हम कैसे निहारि हैं? अरु निन काहूके नहीं निहारे अर्य छोड़ दयो तिन कसे हूँ कयई निहार पायोअरु मुर देव नर मनुष्य तिनकी जे. तारा मंदोदरी आदिक तितके तो प्राणनके पति हैं भर पति देवताजे हैं जिनक विहार करनहार हे कदाइनहींके ध्यानते पतियत निवहतया गिते है ........ अंगहें जा विवि नेदं तिनको टपमा नहीं है भान विरंचि पचिक हारि रहे कपा मदर वाके मोपनहार अग मदनके मदके मोचन हारे अरु तीययत मोचनहारे । रे ने यहां निन नहीं निहारे तिनको टटयावत एक क्रिया भर जिन प दिन दरमा भी क्रिया पति देवतनके दीये बिहार तीसक्रिया इत्यादिने नि.
भाषाटीकासमेत। (७९) नोविलास है तामें निपुण परन्तु तीय मदमोचन जो कहे सो प्रथम पतिव्रतन के छे तहां दोषकोई कहै सो नहीं काहेके इहाँ काकोक्ति अलंकार है का तुम्हारेस नेत्र- इनके मधु घटावनहार तेतियान को मद मोचन है अर्थ मान मतिराखौ सवतीय आप- होते वश्य, अरु मोचन शब्द कैयो वारआयो ताते लाटानुभासभी है ॥ ३८ ॥ किलकिंचित् हाव लक्षण । दोहा-श्रमअभिलापसगर्वस्मित, क्रोधहरपभयभाव । उपजतएकहिवारजहँ, तहकिलकिंचित्हाव ॥ ३९ ॥ श्रम अभिलाप गर्व स्मित कहिये मंदहास अरु क्रोध हर्ष भय इत्यादिक भाव जहां एकवार उपजै तहां किलकिंचितहाय कहिये गर्वयुतभी पाठ है ॥ ३९ ॥ प्रियाजको किलकिंचितहाव यथा ॥ सवैया। कौनरसैविहँसैलखिकौनहिंकापरकोपिकेभौंहचढ़ावै । भूलतिलाजभटूकबहूँकबहूँमुखअंचलमेलिदुरावै। कौनकिलेतवलायवलायत्योतेरिदशायहमोहिनभावे । ऐसितौतूकवहूँनभईअवतोहिंदईजनिवाइलगावै ॥४०॥ उक्ति सखीकी नायका प्रति कि, तेरी दशा कैसीहै आज कौने देख तेरे जे नेत्र ते नय होत, अरु काको देखिकर बिहँसत है अरु कापै कोप कर कर भौंह चढ़ावत्तहैं हे बाल कौनकी वलाइ लेत, तेरी ये जो दशा है सो मोहि ना भावती एसी तू कबहूँ नहीं भई है दई तोहिं यह बाय नलगावै या क्रम लगाइडको प्रयोजन परंतु श्रमआदि सतभाव होतह कोने से यह अभिलाप १ विहस कौन लखिया स्मित मंदहास २ भौहें चढ़ावे क्रोध ३ भूलाते लान यामें गर्वश्रम ५ काहे गर्व ती एसो कौन है जाकी देख लजात अरु श्रम पूँघट न डारबो मुख दुराइयो भय बलाले 4 ॥०-अरु कोई कहै यामें एक नायका अनेक को देखत तौ रसाभास होत तहां पर कि नायका अनेक नायकनकै देख अनेक भाव करतहै अरु अनेक भावते समुच्च- अलंकार ताते नायकाको जो मान है ताको छुटावत यह वस्तु अरु किल निश्चय है में किंचित् थोरो तासों किलकिंचित् कहिये अरु येभी कहतेहैं ऐसी कौन है सो सकुचत है अरु श्रम आलस्य तो धूंघट न करिवो मुख दुरायवो यह भय डायलेतिमें हर्ष ॥ ४०॥ नायकको किलकिंचित्हाव यथा । सर्वया। ऐसिंहगोकुलकोकुलकोजिनदक्षिणनयनकियेअनुकूले। संजनसेमनरंजनकेशवहासविलासलतालगिझले ।
(७८) रसिकप्रिया। नायकाका बिलासहाय यथा ॥ कवित्त । किलकअलकयुतिलकचिलकनिमिसभोहनमें विभ्रमनिभानों ददीनोहै । लोचननिशोचनसकोचनिनचावतिहैदशनचमकहीं- कितचिंतकीनोहै। मंदहासमुखवासअनियासदासकरिलीनेकेशो- इजीययद्यपिप्रवीनोहै । मोहनकेतनमनमोहिकोमेरीभतेरोमुत सुखहीअनंतव्रतलीनोहै ॥ ३७॥ उक्ति सखीकी नायका प्रति कि हेसस्वी तेरे मुखने मोहियेको बहुत व्रतलियोहै कि कदमके है अलक समेत तिलक चिलकन मिस होइकर अलि कपाटमें ललाट निये अरु भौहनमें विभ्रम विलास जो है ताने भवनघर बनायो भेद देकर अरुलोच नेत्र तिनको शीचडार संकोचयुत नचावत रहत हैं अरु दशनकी जो चमक है तानं चकित कीनोहै अरु मंद हँसते मुखकी जो सुवास है ताने केशव जो हरि हैं तारो दम करलीनो है मोहनके तनमन मोहिवे निमित्त हेसस्त्री! तेरे मुखने बहुत व्रतलियोहै यह सबक्रिया करत में आई ताते विलासहाव अरु तिलक चिलक मिस बखानते कैठक यहुनत अलंकार ॥ ३७ ॥ नायकको बिलासहाव यथा ॥ कवित्त । जिनननिहारतेनिहारवेकोनिहोरतकाहूननिहारेजिनकैसेहूनि रेहैं । सुरनरनागनवकन्यनकेप्राणपतिपतिदेवतानिहूंकेहियनि हारेहैं । इहिविधिकेशोरायरावरेअशेपअंगउपमानउपजीविरंचि चिहारेहैं। रूपमदमोचनमदनमदमोचन,तीयवतमोचनविलोच तिहारेहैं ॥ ३८॥ उक्ति सखीकी नायक प्रति कि, हे लाल!तिहारे लोचन जिन नहीं निहारे ते तो नि रयेके लिये निहोरत रहत हमकैसे निहारि है? अरु जिन काहूके नहीं निहारे अर्थ संह छोड़ दयो तिन कैसे हूं कयहूं निहार पाये?अरु सुर देव नर मनुष्य तिनकी जे नव कत्र तारा मंदोदरी आदिक तिनके तौ प्राणनके पति हैं भरु पति देवताजे हैं तिनके हिप विहार करनहार हैं कहाइनहीके ध्यानते पतिव्रत निवह तथा शिधिते है केशवरायरावरेआ अंगहें जा विधि नेत्र तिनकी उपमा नहीं है आन विरंचि पचिकै हारि रहे रूपको मदेह ताके मोचनहारे अरु मदनके मदके मोचन हारे अरु तीयव्रत मोचनहारे लिए मित्र हैं इहां जिन नहीं निहारे तिनको ललचावत एक क्रिया अरु जिन काह न मिल दिनको दरसो भी क्रिया पति देवतनके हीये बिहार तीसरीक्रिया इत्यादित विलासर भाषाटीकासमेत। (७९) तो विलास है तामें निपुण परन्तु तीय मदमोचन जो कहे सो प्रथम पतिव्रतन के छ तहां दोपकोई कहै सो नहीं काहेके इहाँ काकोक्ति अलंकार है का तुम्हारेसे नेत्र- नके मधु घटावनहार तेतियान को मद मोचन हैं अर्थ मान मतिराखौ सवतीय आप- होते वश्यहें अरु मोवन शब्द कैयो वारआयो ताते लाटानुप्रासभी है ॥ ३८ ॥ किलकिंचित् हाव लक्षण । दोहा-श्रमअभिलापसगर्वस्मित, क्रोधहरपभयभाव । उपजतएकहिवारजहँ, तहकिलकिंचित्हाव ॥ ३९ ॥ श्रम अभिलाष गर्व स्मित कहिये मंदहास अरु क्रोध हर्ष भरा इत्यादिक भाव जहां एकवार उपजै तहां किलकिंचित्हाव कहिये गर्वयुतभी पाठ है ॥ ३९ ॥ प्रियाजको किलकिंचित्हाव यथा ॥ सवैया । कौनेरसैविहँसैलखिकौनहिंकापरकोपिकेभौंहचढ़ावै । भूलतिलाजभटूकपहूँकवहूँमुखअंचलमेलिदुरावै। कौनकिलेतवलायवलायत्योतेरिदशायहमोहिंनभावे । ऐसितौतूकबहूँनभईअयतोहिंदईजनिवाइलगावै ॥४०॥ उक्ति सखीकी नायका प्रति कि, तेरी दशा कैसी है आज कौन देख तेरे जे नेत्र ते समय होतं, अरु काको देखिकर विहसत है अरु कापै कोप कर कर भौंह चढ़ावत, अरु हे बाल कौनकी बलाइ लेत, तरी ये जो दशा है सो मोहिं नहिं भावती ऐसी तो तू कबहूँ नहीं भईहै दई तोहिं यह बाय नलगावै या क्रम लगाईबेको प्रयोजन नहीं परंतु श्रमआदि सतभाव होतहैं कौने रसै यह अभिलाप र विहसे कौने लखिया में स्मित मंदहास २ भौहे चढ़ावे क्रोध ३ भूलात लाज या गर्वश्रम ५ काहे गर्व ती यह एसो कौन है जाको देख लजात अरु श्रम पूँघट न डारवो मुख दुराइयो भय वलाले सहर्ष प्र-अरु कोई कहै या में एक नायका अनेक को देखत तौ रसाभास होत तहां उत्तर कि मायका अनेक नायकनकै देख अनेक भाव करतहै अरु अनेक भावते समुच्च- य अलंकार तात नायकाको जो मान है ताकी छुटावत यह वस्तु अरु किल निश्चय है जामें किंचित् योरो तासों किलकिंचित् कहिये अरु येभी कहतेहैं ऐसी कौन है तासों सकुरत है अरु श्रम आलस्य तो यूंघट न करिबो मुख दुरायवो यह भय बदायलेतिमें हर्ष ॥ १०॥ नायकको किलकिंचितहाव यथा || सर्वया । ऐसिहगोकुलकोकुलकोजिनदक्षिणनयनकियेअनुकूले। खंजनसेमनरंजनकेशवहासविलासलतालगिझूले।
(८०) रसिकप्रिया । बोलेझुकेउझकैअनवोलेफिरेंविझुकेसेहियेमहँफूले । रूपभयेसवकेविसऐसेढकान्हकहोरसकोनकेभूले । उक्ति ससीकी नायकमति कि, हे लाल ! ऐसी यागोकुल में कौन कुलवारीदे जाने जा पके नैन दक्षिणा आपने अनुकूल बनायेहें खंजन से जो मनरंजन करनहार सौ हामाः- लासरूप लतासौं लगि झूल रहे हैं हारविहारभी पाठहै जोयोलत कोई तवती रोप करत अ नहीं बोलत तो उझकतई अरु फिरत है पिझुकैसे हृदयमें फूल रूप सबके विसरनको है गये किंवारूसबके विपई भये सो कान्ह कही तो कौनके रसमें तिहारे नयन भू आनवार नहीं देखत याते श्रम अरु हासविलास लताते झुले यामें स्मिता झक्तवाले ते यामें क्रोध उझके आभिलाप विझुके में भय फूले में हर्परूप सबके विस भये है गर्व अरु कोई कहै कि नायक सों ऐसी बात काहे कहत अप्रयोजन तो यहां नायर मानी है ये बातें स्वतः संभवीमें नायक मनाइबो यस्तु ताते समुच्चय अलंकारहै॥४१॥ विब्योक हाव लक्षण ॥ दोहा-रूपप्रेमकेगवते, कपटअनादरहोय । तहँउपजतविन्वोकरत, यहजानेसवकोय ॥१२॥ रूपते और प्रेमके गर्वते जहाँ कपटवारी अनादर होइ तहां विन्योहाव कहाँव वारे रस उपजतह ॥ ४२॥ नायकाको बिब्बोक हाव यथा ॥ सवैया। आवतजानकैसोयरहीहरुयेहरिवैठिनजातजगाई। साहसकेउरमध्यधरोकरजागतिरोमकिरोचिजनाई ॥ नीविविमोचितचौंकिउठीपहिचानझुकीवतियांकहिवाई। वासरगाइगँवारचरावतआवतनिशिसेजपराई ॥१३॥ उक्ति सखी की सखीसों । कि आज नायका नायकको आवत जानिकै सोय रही हरिहरुये धैठे जानिक न जगाई अरु साहस करिकै उरमें हाथ धरो तब नायकाके उठिआये सो सात्विक जानि नीची खोलन लगे सो जान आप चौंकि कर उठी चान झुकी का जानिकै रिसकरी ये भूले नहीं बतियां पाई कैसी कही जैसे बोलत कि धासरमें तो गँवार गाय चरावत निशि में पराई । सेज आवत ५ जो कोई व्यय दूपणवारो प्रश्न करे कि पहिले तो जानके सोई पाछे . पूर्वापर विरोध है सो नहीं काहे जानकर झुकीझूमयो प्रेमके गर्वते अरु कपट . के दिनमें गाय चरावत हृदयमें प्रीति यह कि दिन हमें न वियोग चाही गवार पद ग्राम कहत सो अर्थ नहीं पांव काहे नायका कहत बसर में वार . . ५ ..1 भाषाटीकासमेत । रावतहै गायको नाम गो गोनाम इन्द्रियदिनमें गवार सुरु करत सो तुम आन ख्रीपास मे अरु यहां कही विन्चोक मैं तो कपट अनादरहैं अपराध नहीं है तो यहां झुकनो आयकाको कारण क्रोध कैसे होय तानिमित्त नायक झूठ अपराध लगायो अनुमान नलंकार रोम उठे सात्विक जानो ॥ ४३ ॥ नायकाको विवोक यथा ॥ सवैया। एकसमैइकगोपिसोंकेशवकैसहुहांसिकिवातकहीं। याकहतातदईतजिजाहिकहाहमसोरसरीतिनहीं । कोप्रतिउत्तरदेइसखीहगअंशुनकोअवलीउमहीं। उरलायलईअकुलायतऊअधिरातकलीहिलकीनरहीं ॥४४॥ उक्ति सस्तीकी सखीप्रति । एक समय एक गोपीसों नायक ने हांसीकी बात कही कि जाको पिताने तजिदई तासों हम सों कौन रस रीति है ? ताको प्रति उत्तर देवकी कौन कहै नेत्रमें बहुत आँशू आये तब अकुलाय नायक उरसों लगाई परंतु आधीरात तक हिलकी न रही अरु कोई ऐसे भी कहत जाको तात तुम्हारेने तुमको दई का जो साथ विवाही ताको तुम तजौती ऐसे वचन न कहो चाहीसो नायक ने कह्यो यामें रस- भंग होत है अरु कोई कहत कि जाको दई जो यह निर्गुणी है ताको तुझे विवाही यहां एक वचन है अनादर को अरु हमको नदई आपको उत्तम कहत तो यहां कप- ट्युत नायकाको अनादर न निकार है या विशेपोक्ति अलंकारहै अंक लगायबो करण है हिलकी रुकबेको सो नहीं भयो अरु तात शन्द दई या शन्दके संबंधते अविधा मूल अविधा लक्षण | बहुत अर्थ करनहार जो शब्द सो आन के योग ते एक अर्थका नियम कर सोअविधा सों कहूं संयोगते कहूं वियोगते कहूंसंगते कहूँविरोधते कहूं अर्थते कहूं प्रसंगते कहूं आनशब्द के सायते कई चिहते कहूं समयते कई देशते इत्यादि औरहू व्यंग प्रसंग पाय होतहै जैसे लक्षण मुख्य षट् रीतिको है अरु फेर अस्सीरीति को होतहै निरूढी ८ उपादान १ श्वेत बाजीधावत श्वेत ती निरूट अरु वाजि धावत यह उप दान, उपादान जो परायो गुण गहै तो इहां अश्वग्रहण कीन्हों निरूढीलक्षण लक्षणा २ कलिंगसाहसी कलिंग निकटी साहसने जो आपनअर्थ सो पुरुषको दियो यह लक्षण लक्षणा अरु निरूढ़ी सारोपाउपादान ३ अश्व श्वेत धौहें निरूदी सारोपा उपादान ४ कलिंग पुरुपयुद्ध कर निरूढ़ी उपादान टक्षण लक्षणा सारीपागोती ५ ये तेल हेमंतमें सुसद निन्दी साध्य वसना गौनी ६ तेलान हेमंतसुखद निरूढ़ी लक्षित लक्षणा सारो पागोनीरानागौडेंद्र कंटक संधिहै निरुढीलक्षण लहणासाध्य दसानागौनीराजा कंटक सौधहे यह आठ भेद तो निरूदी के अरु प्रयोजनवतीके यह उपादान १ कंता प्रविशत ६ अरवचन : रसिकप्रिया। लक्षित लक्षणा २ नदीम पर सारोपाउपादान ३ एते कुंत .मसह सारोग ला लक्षणा आलंघृत उपादान लक्षित लक्षणा सारोपा प्रयोजनवती ५एते राजा गन्त, उपादान लक्षित लक्षणा साध्यपसाना ६ राजकुमार गच्छेहैं लक्षित टा सारोपा ७ गार्वाहीक लक्षण लक्षणा साध्य बसाना गौनत्यति ते जे,फल लक्षण गूढ भगढ़ व्पङ्ग कार सोरह होतो ते धर्मी धर्म गति के ३२ अरु आठ विक मिलत सय चालीस होत, तेपद पाक्य कर ८. भेद होत हैं जैसे ध्वनि के भेद में विक्षित के २ से पद पाक्यते चार होत ४ पदते अर्यातर १ वाक्यते "अर्थान्तर पदते अत्यन्त तिरस्कृत १ वाक्यते अत्यन्त तिरस्कृत १ ऐसे ४.अरु, विविक्षित ६ पदते विविसित :१ अरु पाक्य ते विविक्षित १ पदेकते विविक्षित १. विविक्षित १ वरण ते विविक्षित १ प्रबंध ते विविक्षित १ ऐसे ६ अरु शब्द का के. २ शब्दते अलंकार अरु शब्दते वस्तुवाक्यते अलंकार १अरु पाक्य ते वस्तु अरु संघ अर्थ शक्तिके यारह १२ ते पदवाक्यते अरु प्रबंधते ३६ अरु दम शक्ति कौरतो सब मिलकर५१ ते एकते एक मिलायेते दो हजार छः से.एक२६॥ होत, अरु संकर ३ रीतिको होतहै एक संशय १ अंगांगीश्व्यजक.१ अरु असंसृष्ट चार गुण करनेते सय दश हजार चार से बारह होते, १०४१२ ऐसेही नायिक धीरादि भेद ते ३ ज्येष्ठा कनिष्ठा ते ६ ते मध्या अरु प्रौढ़ाकर सब बारह होती 'अरु'स्वकीयां ३ मुग्घा १ ते मोषित पतिकादि ते गुनी तय १०२८ सा रत्तम मध्य अमधेते ३०३०८४ ते दिल्यअदिव्य दिव्यादिव्य कर ११०५२ होत ॥ १४ ॥ अथ विच्छित्तहाव लक्षण ॥ दोहा-भूपणभूपबकोजहां, होहिअनादरआन । सोविच्छित्तविचारिये, केशवरायसुजान ॥१५॥ भूषण भूपिवेको भर्य अलंकार पहिरिवे को जहां अनादर कहिये आदर न होव सो विच्छित्त कहावे ॥ १५ ॥ नायिकाको विच्छित्तहाव । यथा ॥ सवैया। तनआपनेभायेगारनहीयेशृङ्गारशृङ्गारशृंगारैवृथाहीं। ब्रजभूपणनैननिभूखहेंजाकिसुतोपैशृंगारउतारनजाहीं।। सबहोतसुगंधनहींतीसुगंधसुगंधजातिसुगंधवृथाहीं। 'सखितोहितहसबभूपणभूपितभूपणतोतुवभूपितनाहीं ।। ४६ ॥ क्ति मसीकी नायका प्रति तनु मापने भाये शृंगारनिको शृंगार जे शृंगार भाये अर्थ नायकांकी भावत है ते शृंगार द शृंगार र शृंगार तू शृंगार करिन हैं यशृंगार
भाषाटीकासमेत।
शृंगार नहीं, जे तू शृंगारे है ये तीच्या प्रथम तुक में अक्षर अर्थ इतनी है तामें
प्रभ करतहै कि नायक तौ शृंगार करत सखी रोकत उलो अर्थ लक्षणते
। नायका भूषणअनादर चाहिये सो ती पहिरत अरु सखी रोकत अरु लक्षणमें
खीकि भूषण भूपवेको अनादर अरु दूसरो मन यह कि दूसरी तुकमें ऐसे सखी
[त कि तोप शृंगार उतारे न जाहि कहा ये तो उतारे जात भूषण पर जिनकी ब्रज
ण को चाह है ते न उतारे जाहेिंगे सो याम भूषण उतारे से लोगहें ॥ ऊपर पहिरत
कही यह पूर्वपर अनमिल दोष लाग्यो उत्तर तहां ऐसी अर्थ की सखी कहतहै
। आपने भा तन आपने के मेंभा कहिये शोभा जो है ये शृंगार शृंगार कहावत है
शृंगार शृंगार हैं अवजे शृंगार उतार धेरैहे तिनकी ओर देखि कहतहै नहींहैं ये शृगारशृं
अर्थ कि इन भूषणनको शृंगारही पद नहीं ये गहने हैं ग्रहण करिये हैं ग्रहण करिवे लाय-
हैं लोक रीतिके बलसों जोई करै शोभा इनमें लक्षण नहीं और तनमें जोभा(शोभाहै)
केवल शृङ्गारही है अरु ये शृङ्गार शृङ्गारही नहीं कहा शृंगार पदहू है अरु ये
से पद हैं याते ये तू उतार धरेसो भली करी कि उतारे न जायँगे जिनके भूपण व
हा चाह ब्रजभूषण के हैं यह अर्थ और स्तुति करतहैं सबस्तु होत सुगन्ध सुगन्ध
लाये सों वह सुगन्ध जो है तामें तेरी सुभाय की सुगन्ध जात है कहा सब सुगन्ध-
को तेरी भाइकी सुगन्ध मिलिकै उनको सुगन्ध करहै और तोतं भूषण आछे लगेंहें
भूषण ते आठी नहीं लागत ॥ यह अर्थ तो सबन कीनो परंतु इनते अक्षर को
र्य न भयो अरु भूपण को पहिले अनादर करत फेर आदर देत ताते ऐसो कहिये
जिनके तनमें भा शोभा नहीं है ते ये शृङ्गार शृङ्गारतो वृथा कहावे शोभावान्
शृङ्गार भी नहीं सोहत ॥ सूर । खरको कहा अरगजालेपन मर्कट भूपण अंग। अरु
कैसी है कि प्रजभूषण है नयननके भूषण अपवा तेरे अंग । ब्रजभूषण हरि तिनके
पहें तो तो वै शृङ्गार करने लायक भी नहीं हैं अर्थ अति हीन है सब जगद सुगन्ध
सुगन्धवव होत है अरु तेरो जो सुगन्ध है तामें जितनी सुगंध की जात सो
पाव्हेजात तामें हेसखि तोहिमें है सबभूपणन ब्रजनाय भूपित ताते भू पृथ्वी ताको
तू खनत है अर्थ मानकर है सो तू भूपितनाही होत अर्थ मान छोड़ि नायक संग
वहार कर । इहां सुगंधकी अधिकाई वस्तु ते पंचम प्रतीप अलंकार है जहां टपमान
यर्थ हाइ सो पंचम प्रतीप इहां गहना सुगन्ध व्यर्थ कीनी अरु सहज शृंगार शृंगा-
वो कविनियद्ध तामें सखीकी उक्ति ताते कवि निबद्ध बक्ताकी उक्तिम वस्तुमें
नलंकार अरु यामें जो हेतु अलंकार लिखो सो कारण कारज संगमें नहीं है काहे
न नहीं छोड़ो ॥ ४६॥
(८४) । रसिकप्रिया । नायकको विच्छिन्नहाय ।। यथा-सवैया। पान न खायन पाग रची पलटेपटचित्तकहाँधरिक। कंठसिरीवनमालमनोहरहारउतारिधरेअरिक ।। चंदनचित्रनिलोपिसुलोचनलोकपिलोकनिसोंलरिके। अंगसुभाइसुवासप्रकाशितलोपिहोकेशवक्योंकारकै ॥ १७॥ उक्ति नायकाकी सापराध नायकमति कि तुमजो पान न साये पाग न बांधी पर पलटी कंठी यनमाल पुष्पहार उतारिधरे भरु चंदन चित्र लोप लोचन लीकसोटरे सबै अच्छी करी चंदनचित्र कपोलनि लोपि मुलोचन अंजनसोंभरिकै यहभी पाठहै सबम जनको निरादर कीन्ह्यों पं गोजा आपके अंगकी स्वाभाविकमुपास है सो कैसे लो जायँगे व्यंगते यह जनावत यामें अनेकस्येदकी वास है इहां स्वतः संभव है नायक सुवासते नायक अपराधवस्तु ते परसंख्या अलंकार जानियें "परसंख्या इक्या वरजि दूजे थल ठहराइ" सो इहां सब बातमें नायक अपराध बरनि सुंयासमें टहरा अरु याको व्यर्यापत्ति कोई कहहोत सो नहीं, काहे ! वामें एकको जीति एको निष चाहिये ।। ४७॥ अथमोट्टायितहाव लक्षण । दोहा-हेलालीलाकरिजहां, प्रकटतसात्विकभाव । बुधिवलरोकतसोहिये, सोमोट्टायितहाव ॥४८॥ हेला कहिये लाजको बिसारियो अरु लीला कहिये वेप बनायबो यह लीलाहल है। जहां सात्विकभाव उपजै ताको बुद्धिबलते रीकै अर्थ काहू बहाने ते छिपाव ताको नाम मोहाथित है रोकत सोभी यहभी पाठ है ।। ४८ ॥ नायकाको मोट्टायितहाव ।। यथा-सवैया। खेलत हरिवागेवनेजहांवठितियारतिते अतिलोनी। केशवकैसहुपीठिमेंदीठिपरीकुचकुंकुंमकोरुचिरोनी ॥ मातुसमीपदुराइभलेजिनिसात्विकभावनकोगतिहोनी। धूरकपूरकिरिविलोचनइंघिसरोरुहओदिउढ़ोनी ॥५०॥ उक्ति सखीकी सखीप्रति । किआज हे सखी हरिक बाग में राधाने आपने कुछ चिह्न देख जो पूर्व आलिंगन कीन्हों रहे किंवा नायकाने पाछे ते नायककी पीटा आलिंगन कियोरहो कसरि अगियाकी लगाही से आपनो चिह्न देखि नायक पीठ में नायकाको मात्विक उपनो ताको कागकी सतित छिपायो कि कपूरतेती ने भाषाटीकासमेत। नको आंशू सरोरुहने कंज अरु वर्ण ओढ़नी ते रोमांच छिपाये यामभी नायकाकी असक्तता स्वतः संभवीते वस्तु ताते युक्ति अलंकार यहहै युक्ति कीनों क्रियाकर्म छिपायो जाय सो याम.जो सालिक भयो सो आनन क्रियाते छिपायो अरु या कवित्तको तिलक हमारे शिष्य नारायणदास कविने कविनिया के तिलक में पूर्व किख्योहै।॥५०॥ नायकाको मोडायितहाव ॥ यथा-सवैया। भोजनकवृपभानुसभामहँबैठे,नंदसदासुखकारी। गोपपनेबलवीरविराजतखातबनाइविरागिरिधारी ।। राधिकाझांकिझरोखनढकविकेशवरीझिगिरेमुविहारी। शोरभयोसकुचेसमुझेहरवाहिकह्योहरिलागिमुपारी ॥२१॥ उक्ति अलंकार वस्तु पूर्ववत् जी व्याजोक्ति लिखोसो नहीं हो काहे ? यामें कहिकर दुराया ताते छकापति जानिये "छेका पति युक्तिकर, परसों वात दुराइ" अरु चीसरी तुझको ऐसो भी पाठ है ॥ राधिका झांकि झरोखेद्वै झापसी लागिगिरे मुरझा- यबिहारी॥५१॥ अध कुट्टमितहाच लक्षण । दोहा-केलिकलहमेंशोभियेकेलिकलहपटरूप। उपजतहतहँकट्टमितहावकहतकविभूप ॥१२॥ कैलिरूपी कलहमें जहाँकेलि कलह पटरूप रहै || अर्थयह कि प्रथम तौ केलि कैलिवत् रहे ॥ पुनि वही केलिशोभा देहि तौ नानी वह कलह झूठो जहां कलिको कलह झूठो लगे कहा वह नहिं करियेकी बातझूठी कपट को वस्तु है जेबातें केलि अनकरवेकीसो उपर की मनमें कलि भाव है नहीं नहीं कहि भाजिवो ॥ ५२!! प्रियाजको कुट्टमितहाव ॥ यथा-सवैया। पहिलेहठिरूठिवलीउठिपीठिदेमैचितईसखितनलखीरी। पुनिधाइधरीहरिकिभुजानतें छूटियेकोबहुभांतिझखीरी ।। :. गहिकैकुचपीडनदंतनखक्षतरिनकीमादनखीरी। पुनिताहिकोपानखवायतउलटीकछुप्रीतिकिरीतिसखीरी९३ । उक्ति सखीकी सखी प्रति ॥ कि हे सखि पहिले तो हठकठि चली मैं देखतरही तू नहीं या वाके भगरेकी नायक के परिवे की शीघ्रता सूचित करत कैसे तू एक स्थान ही देखत रही परंतु त् न देख्यो अरु जब धरीतच छूटिवेकी बहुभांति खिसानी वाहि पकरिकर कुच नखक्षतसों पीड़ अरु दंतनसों भी बहुत पीडादई यह कलह सो (८६). रसिकप्रिया। फेर कीन्हों अब ताको पानखवावत हैं ताते प्रीति की रीति उलटीहै इहां स्वतः संभाते नायका को डरिवो अरुंनायका को केलतामें नायका कपट वस्तुते पंचम विभावना अलंकार जानिये काहे विरोधते कारज है किलक अलिक कवित्त औरको बनायो ताते नाही लिख्यो ।। ५३ ॥ नायकको कुट्टमितहाव । यथा-सवेया। देखतहीजिहिमौनगहीअरुमौनतजेकटुवोलउचारे । सौहकियेहुनसौहैंकियोमतुहारकरेहुनसूधेनिहारे । हाहाकैहारिरहेमनमोहन पाँइपरेजिन्हलातनिमारे। . मण्डतुहैमुहताहिकोअंकले हैकछुप्रेमकेपाठनिन्यारे ॥५४॥ रक्ति सस्तीकी सखीप्रति ॥ आजु जब हरि आये तब प्रथमराधा मौनभई अरु बोली तो कटु अरु उन शपय दई तौभी मनु सौहें नहीं किया अरु मनुहार करेहूं स न निहारी अरु हाहा करिकै हारगये जब पांइपरे तव लातनिमारे ताके अंकम मुँह में करि अब सुख माड़े हैं ताते प्रेम के पाठ न्यारेहें कहिये योग नहीं या जो कोई करतह नायकको कुट्टमित हाव नहीं होत काहेनायकाकोमानकरो नायक कपट राम अनचाहियो को देखतही कटु बोल कहे अरु मौन गही तो नायकाका हाय है नाय को नहीं कीलकलह होत अरु अन चाहियो दिसाद रतिको तीर न समुझे तहां उत्त करतहैं कि नायकको गुरुमान है नायका लोक लीक उल्लंघन कर नायकको अन दर कियो ताते यह गुरु मान उपजो सो आगे मान वर्णन में कहेंगे लोक लीक उही कटु त्रिया वह कह पैन उपजत है गुरु मानत, भीतमके उर ऐन सो नायका न मौन गही अरु कटु ययन कई अर नायका सोहें करो पर आपसोहन भये मनुहार पर भीमधे नहीं हेरे तम नायकाफी सस्ती उत्तर देत दौतुकमें नायककी ससीके पर मुनिक कहापौर पर मान नहीं रहत इन ती निपट भतिकरी लातनमारे यही लोकली उलंपन तब प्रिय की सगी कही जो ऐसी जाप किया होइ सो कयई न योले येतो मेर नई मुंद तो तादीके अंक लेक तय नायक की सती कही प्रमक पाठ न्यारहैं । रमाभास हो जान अफ महा कलंशते अबहीन ॥ यामें येशरको अभिप्राय या बैलिमीरलामें कलहरूप केटि महि तो नायका नत रद कर नापकपीड़ा दई नायरमें नायरापीडादशा सावनमारे नायकानहीं नहीं करत रहीनायक अन्यनाया चिट बनाइन्याय पुढे वायुत नप तो माया पाटे समा मह अंकम परी नापरतो पासपी नापका धरण प्रहार यह कनिनपद है तामें वक्तामणी नित पानु भ्रटंगार दर अप कई उत्तराटंकार भी वहन है ॥५
भाषाटीकासमेत।
अथ बोधहाव लक्षण।
दोहा-गूढभावकबोधजहं, केशवसमुझतकोइ।
तासबोधकहावयों, कहतसयानेलोइ ॥५५॥
गूढभाव को बोध काहू और समुझे ॥ ५५ ॥
नायकाको वोधहाव ॥ यथा-सवैया ।
बैठिहुतीवृपभानुकुमारिसखीनकिमण्डलिमण्डिप्रवीनी ।
लैकुम्हिलानोसोकंज परीइकपाँयनआइगुवारिनवीनी॥
चंदनसोंछिरकीवहवाकहँपानदयेकरुणारसभीनी।
चंदनचित्रकपोलनलोपिके अंजनआंजिविदाकरिदीनी ॥५६॥
उकि सखीकी सतीप्रति ॥ कि हेसखी!आजुराधा सखिन में बैठीरही तहां एकसखी
कुम्हिलानो सो कमल ले पाइँ नपरी ताको चंदन ते ठिरक करुणा तापै कर पान दये
अरु चंदनको चित्र मिटाइ आंजनआंज विदा करदईयामें कुम्हिलाने कंजते वाने नाइककी
दशा सूचित करी कि तुम विन मुरझात, अरु याने चंदन छिरको हम शीतलकरिहैं
अरु चंदनको चित्र कपोलको लोपो हम चंद अस्त भयेआइहैं फेर चित्र नवीन बनाइ-
दयो प्रजचंद पै अंजन आंजत हमारे हगनमें हैं प्रश्न यामें कोई कहै फेर चित्र
कहांते निकसे तौवाको चंदन लगायो अंजन आंज्यो तौ शृंगार कीन्ह्यों तब का-
चित्र मिटाइदयो सब सखीजानेंगी नहीं याते चित्रभी नवानकीनी अरुयहभी जताईकि
तुम्हारे श्यामरूप हमरे नेत्रनमें वसतुहै। म.. - इहांदोउनको बोधभयो प्रियाको बोध से
उत्तर-प्रथम प्रियाकोहे याते प्रियाको वोध जानिये ऐसो जोकोई कहै सो नहींहोत काहे
तहां एक बात रहिगई कि सखीन काहे न जामीसखी तौ प्रवीन, जो जामे तौ मूर्खसखी
चाहिये तहां कविको यह आशय कि पाने कमल दै पाइँपरे हम आप के पाइँ पूजतहै
तय राधा सब शिंगारकरे हमहू तिहारो पूजन करिहैं सखीनजानी यह नवीन मत है ताते
मीति दोहुन ने वढाई इहां चंदनमें चंद अंजनमें तम कविनिबद्ध है तामें सूक्ष्मालंकार से
नायक सखीको बोध करबो यह वस्तुहै ॥ सूक्षमपरआशयलखै करै किया क्छुभाइ॥५६
नायकको बोधहाव ॥ यथा-सवैया ।
सखिमोहनगोपसभामहँगोविंदवठेहुतेद्युतिकोधरिकै ।
जनुकेशवपूरणचन्दलसचितचोरचकोरनकोहरिके।
तिनकोउलटोकरिआनदियोकिहुनीरजनारनयेभरिके।
कहिकाहेतेनेकुनिहारमनोहरिफेरदियोकलिकाकारकै-॥१७॥
रसिकप्रिपा!:: (१८८) उक्ति सखीकी सखीमति - कि गोप सभाम जहां हरि रहे चंदवत् आप चकोरदन सब चित्त करें तहां काहू.सखाने नयोजल भार कमल दयो सो उनने कलीकरि फेरिद योयामें गोप गण यह जानी इन फूल नयो जलभरि दीन्ही वरपाऋतु सूचितकरी का हे बरपामें गोपबहुत सुखी रहत अरु उन कली कर दई हम मुदित भये अरु बोधक यह कि तुम बिन यह रोवत तब इन कलिका करी हम रात्रिमंआइहें नये जल को आशययर अब पावस आई मुलाकात कम हुइहै यमुना पदहें किंवा नम्रता सो कद्दा ल्याई जिर नीचो करिकै नेक निहारिक कली करि दयो याको यह आशय नायकने आपनी प्रीति जनाई कमल देखिकै कि तुम्हारे नेत्र कमल हमारे नेत्रमें वसत, अरु देश रहने ते आसक्तता सूचित करी वस्तु अलंकार सूक्ष्म पूर्ववत् "सखि सोहत गोप सभा मई गोविंद" भी पाठ है ।। ५७ ॥ दोहा-राधाराधारमणके, कहेयथाविधिहाव । ढिठईकेशवदासकी,क्षमियोकविकविराव ॥५८॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायारसिकप्रियायां राधाकृष्णहावभाववर्णनंनामषष्ठः प्रभावः ॥६॥ राधाके अरु राधारमण कहैं श्रीकृष्ण चंद्रके कहे नाम वरणन करे यथा विधिले हावको सो ढिठाई हमारीहै कविनके रावक्षमा करियो । ५८ ॥ इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराज श्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहवहादुरस्याज्ञाभिगानि ललितपुरनिवासिहरिजनकवीश्वरात्मजेन सरदाराख्यकवीश्वरेण विरचिता या रसिकमियायां भूपणेसुखविलासिकानामटीकायां राधाकृष्णहावभाव- वर्णनं नाम षष्ठः प्रभावः ॥ ६ ॥ अथ अष्टनायका वर्णन। दोहा ये सवजितनीनायका,वरणीमतिअनुसार । केशवराइयखानिये तेसवआठप्रकार ॥१॥ ये सय नायका जोपूर्व धर्णन कर आये ते सब आठ प्रकारकी होती ॥ १ ॥ दोहा-स्वाधिनपतिकाउत्कला,वासकशय्यानाम । अभिसंधितावखानिये,औरखंडितावाम ॥२॥ स्वाधीन पतिका १ उत्कला कहिये उत्कंठिता २ यासकशप्या मामा ३ अभिसंधिता नाम कलहांतरिता ४ और संहिता ५ वाम कहिये नायका ॥ २ ॥ !-केशवप्रोपितप्रेयसी लब्धाविप्रसुजान । भटनायकायेस अभिसारिकावसान ॥३॥ ॥
भाषाटीकासमेत
(८९)
प्रोषित मेयसी कहिये प्रोपित पतिका ६.औरविपलब्धा ७ येही अष्टनायका अभि-
सारिका सहित ८ होतीहै और प्रवरयत्पति का अरु आगत पतिकाये दोई प्रोपितपति-
का में अंतर भूत होती हैं ॥ ३ ॥
स्वाधीनपतिका लक्षण ।
दोहा-केशवजाकेगुणघ्यो,सदारहपतिसंग।
स्वाधिनपतिकातासुको,वरणतप्रेमप्रसंग ॥४॥
जाको कहिये जो नायकाके गुणमें वधिकै कहिये यश होइकै सदा सर्वकाल पति
संगमें रहै सो स्वाधीनपतिका है तेहिके प्रेम प्रसंग को बरणतहीं ॥ ४ ॥
प्रच्छन्नस्वाधीनपतिका ॥ यथा-सर्वया।
केशवजीवनजोव्रजकोअरुजीवहुतेअतिवापहिभावै ।
जापरदेवअदेवकुमारिनिवारतमाइनवारलगावै ॥
ताहरिपैतूअहीरकिबेटीमहाउरपाइंझवाँइदिवा ।
मैंतोवचीअवहासिनहींअसऔरजुदेखैसोऊतरुआवै ।।५॥
उक्ति सखीकी नायकाप्रति ॥ कि ऐसे जो हरिहैं ब्रजजीवन अरु जीवतें पिताको पियारो
इहां कोई कहत कि पिताको पियारो पाछे कहो ब्रज प्रथम दोष होइ है जो ब्रजको प्रय-
मंसो आपने पापकै पीय तहां ऐसी अर्थ अति वाप सबको बाप ब्रह्मा ताको जो भाव
है तातहि भाव भी पाठहैअरु देवअदेव कुमारी जाप निवारत रति जोप्रीति ताको निवाह
मा लक्ष्मी अरु सूर्यवार बहुलगा है ऐसे हरिप व अहीरपुत्री होकै पाइ झवावत्त
महावर लगवावत है मेंतो भली बची हांसीते परंतु आनदेखिहै अरु तुमते यूझिहें
तो तुमको का उत्तर आइ है अर्थ न आइ है इहांका आइ है जहां काकोक्तिअलंकार--
अरु कोई कहैकि प्रेम गर्वितासों स्वाधीनपतिकासों कहाभेद नौ सर्ख की उक्तिते स्वाधान
पतिका नायकाकी उक्तिते मेमगर्विता अरु जबजय गर्वकी रीतिते कहैं तो गर्विता अरु
'आधीन मात्रमें स्वाधीनपतिका "मैं तो चली अव हांसि नहीं सखी" यहभी पाठहै ||५||
प्रकाश स्वाधीनपतिका ॥ यथा-कवित्त ।
चोलिकेसोपानतोहिंकरतसमारखोईमुकरज्योंतोहिमाह्मृरति
समानीहै । तेहिं त्रियदेवतापैपायोपतिकेशोराइपतनीचहुतपतिदे
वतावखानीहै । तेरेमनोरथरथभागीरथपापा,डोलतगुपालमेरोगं
गकेसोपानीहै । ऐसीवातकौनजुनमानीसुनमेरीरानीउनकेतौतेरीवा
नीवेदकेसीवानी है ॥६॥
(९०) रसिकमिया। उक्ति बहिरंग सस्ती की नायका प्रति ॥ नायका आन सम्सीन की बात सुन मुन कि सखी सों कही कि नायकको रु परजी ऐसे आधीन न रहें या हमारी हांसी ही तिहे सो सुन सखी जयाय देतहै कि चोलीके सोपान तो सम्हारत अरु मुकुर सम तीन बसत अरु आप त्रिय देवता हैं जैसे त्रियपति देवता बहुत पसानत कहे तेरो जो मन- रथ रूपी स्य है सोई भगीरथ रथ है ताके पथ पीछे गंगासी फिरत है परंतु ऐसी कौन बात है जो न मानि है परंतु जो पात न मानिह उनके तेरी याणी येदवाणीसीई अरु या कोई कहै कि पूर्वापर विरोधहोतहै कि वेदपाणीसीमान फेर न मानी है तहां कोई कहे कि घेद नमानो तो वेदइष्टीनाही मानत जो में कहोंगी न मानिहे यामें चोली के पान उपमा भगीरय रथमें रूपक वेदवाणीमें लुप्ताको संकरहै ।। ६ ॥ अथ उक्ता लक्षण । दोहा-कौनहुहेतनआइयो, प्रीतमजाकेधाम। ताकोशोचतिशोचहिय, केशवउक्तावाम ॥७॥ कोई कारण ते प्रीतम घरमें न आवै ताके शाचते जो शोचित होय सो रक्त नायका है ॥ ७ ॥ अथ उक्ती प्रच्छन्न ॥ यथा-कवित्त । कैधोंगृहकाजकैनछूटतसखासमाजकैघोंकछुआजवतवासरविभा भातौं । दीन्होंतेनशोधकिधोंकाहसोंभयोविरोधउपजोप्रबोधकिधी उरअवदाततैं।मुखमैंनदेहकिधौंमोहीसोंकपटनेहकैधौंदेखिमेहअति डरेअधरातते । किधौमेरीप्रीतिकीप्रतीतिलेतकेशवराइअजहूंनआ येमतसूधोकौनवातते ॥ ८॥ उक्ति नायका की सखीप्रति ॥ गृहकार्यते न आये कि सखा समाज नहीं छोड़ी गयो कि कोई बतको दिनहै कि काहूते विरोध भयो कि केई ज्ञान बोध भयो उरमें कि देहसुखमें नहीं कि मौत कपट स्नेह कर पत्नी के गये कि वर्षांत डरे कि मेरी प्रीतिकी प्रतीतिलेत अवैलों न आये मन कौन बात में सूधो भयो जो मोहिं त्यागे मनसों कहत याते प्रच्छंन दीन्हों ते न शोध यातें अंतरंग सखी जानीनात अथवा दिन से आज शोध नहीं संदेह अलंकार ॥ ८ ॥ प्रकाश उक्ता ।। यथा-सवैया । मुधिभूलिगईभुलयेकिधोंकाहुकिभूलेइडोलतवाटनपाई।.. भीतभयेकिधोंकेशवकाइसौंभेटभईकोईभामिनिभाई ॥..
भाषाटोकासमेत! (९१) मावत,मगाइगयकिधोंआवहिंगेसजनीसुखदाई। आयेननन्दकुमारविचारिसुकौनविचारअवारलगाई ॥९॥ अर्थ सुगम ! सजनी सो सुखदाई सुशामद करि ताते बहिरंग है सन्देहालंकार पूर्ववत् ॥ ९॥ वासकशय्या लक्षण । दोहा-वासकशय्याहोइसो, कहिकेशवसविलास ।। चितैरहेगृहद्वारत्या, पियआवनकीआस ।।१०॥ सो वासकशष्याहाइहै कहिकेशव विलासविलासयुक्तहोयक गृहके दारते पिय आवन की आश लगाये चितवत रहै । "चितवै रतिगृह दार" भी पाठहै ॥ १० ॥ प्रच्छन्नवासकशय्या ॥ कवित्त । चंदनविटपवपुकोमलअमलदलकलितललितलतालपटीलवंग की। केशोदासतामेंदुरीदीपकोशिखासीदौरिदुरावतनीलवासयति अंगअंगकी ॥ पोनपानपक्षीपशुशन्दजिततितहोततिततितचौकि चौकिचाहेचोपसंगकी।नंदलालआगमविलोकैकुंजजालबाललीन्हीं गर्तितेहीकालपंजरपतंगकी ॥११॥ उक्ति अन्तरंग ससीप्रति ।। सती के भाजु नायका कुंजमें यह रीतिते है पंदन के गृह ताको वपुशरीर तामें जैहै कोमल अरु अमट दल पत्र तासों लिपटरदी? लता लवंग की तामें दुरीहै दीपकी शिखासी दौर भासार सो नील वसन दुरावतहै शुति दरशत नीटवास भी पाठहै कि पवनते अरु पशिनते पशु ते शन्द जित तित होतहे तित तित पाइभर देखत है फाहे पोप लागीदे जाको प्रीतम संग की सो मंद- लाल को आगमन पिटॉक है कुंजनके जाटमें माला तासमय पिंजरे के पसी की गति रही है का इतते उतनात उतते इत यहां दीपउपमान नायरा उपमेयसी वाचक दुरत- नाहों धरमते पूरण उपमानानि ये कि दा चन्दनकी कुंजनील वासमें अंग दुराइयों जातिरर्णन है तात जात्पलंकार भीहै ॥ १५॥ प्रकाश वासकशय्या सवैया । भापतहसुसवेनससीसहुलासहियेअभिलापननोहै। कोमटहासनिनेनविठासनिअंगमुवासनिकमनमोह ।। मूरतिवंतकिर्षीतुलसीतुलसीवनमरतिमृरतिकोहे । कुंजविराजतिगोपवधूकमटाजनुकंजकुटीमसोहै ।। १२॥
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भाषाटीकासमेत। (९३० देह जरतहै तोजो में उलटी न्याइकरी के अपराध रिसाई मनावत न माने ताके निमि- त्तमबविधि उलटी वैगई जातेसुसहोतरहौताहितेदुख होन लागो विरोध कारजते पांचयों विभावनालंकार ॥ १५ ॥ खण्डितालक्षण । दोहा-आवनकहिआवैनहीं,आवैप्रीतमप्रात। ताकघरसोखंडिता कहेसुबहविधिवात ।। १६ ॥ यामें प्रश्न प्रात आयेते यह तो जानी रातऔर ठौर रहेहैं परवी पासरहे यह कैसे जानिये रहिबेकोठीर उत्सवादिअनेकहें और ग्रंथनहूं में कह्यो पर स्त्री चिह्नधर प्रातगेह आवैयह शंकाकार कोई उत्तर कीन्हयों कैआनको प्रीतम होइकै आव सो यामें प्रीतम आप न आनकीनहूं पदते नाहीं निकसत अरु दूसरे जो प्रात आवै तौ खंडिता होइ कदाचित् अर्द्ध रात में औरतों नहोइ ताते याकोउत्तर यह कि आवनकी वकिपातआवै का वह घरामें न आवै अरु ताके घरकहेते आन घरते आवै अरु सो बहुविधि घातकहै नाना तरहके वचन सुनावै अरु कोईकहे कि बात नाही चिह्न सूचित तौ सुखवारी बात एक होतदुखवारीहएकहोत यामें सवतरहकी कहै दुखवारी सुखमें दुखवारी आदर अनादरवारी'तासों कहिये खंडिता कहै रोपस बात" भी पाठहै ॥ १६॥ प्रच्छन्न खण्डिता ॥ यथा-कवित्त । आंखिनजोसूझतनकानन सुनियतकेशोराइजैसेतुमलोकनमेंगा येहो । वंशकीविसारीमुधिकाकज्योंचुनतफिरजूठेसीठेसीथशठईठठी ठठायेही ॥दूरिदूरिकरतहूंदौरिदौरिगहोपाइजानौनाकुठौरठौरजानि जियपायेहो। काकोघरघालिवेकोबसेकहाँघनश्यामघूघूज्योंघुसनप्रा तमेरेगृहआयेही ॥१७॥ उक्ति नायकाकी नायकप्रति ॥ तौखंडिता तीनिप्रकारकी होतिहै उत्तमा मध्यमा अधमा तहां अधमा नायकाकहतकि ऐसे आंखते सूझत तैसे कानमते भी नाहीं सुनिपर- तजैसे तुम लोकनमें गाय अरु लोकलाज दुरैवेमें गायेही तुम आफ्नवंशकीसुधि विसा रिकरि फाककी रीतिते जूठेसीय चुनत फिरतही शठकी ईठ चेष्टा ढीठ होइ करहै हम दूरकरत तुम दौरि पाई परत और कुठौर नाहीं जानत कौनको घर पालिवेको रात बसे पात घूयू की रीतिते मेरे घरघुसन आये इहां उपमा अलंकार जानिये काक घूमें नायका एकांत ते प्रच्छन्न ॥ १७ ॥ प्रकाश खण्डिता ॥ यथा-सवैया। आजुक अंखियाँहरिऔरसीमानोमहावरमाहरगीहैं।
रसिकमिया। मेरीसोंमोसहुँमानहुवेगिहियेरसरोपकीरीतिंजगीहैं। मोहनमोहीसीलागतिमोहिंइतेपरमोहनमोहिलगीहैं। मेरेवियोगकतेजतकिधोंकेशवकाहूकेप्रेमपगीहें ॥ १८॥ उक्ति नायकाकी नायक प्रति ॥ कहेलाल आजु आपुकी आखें औरसीभईहें मार्न महावर माह रँगाहें हमारीसौं हा गो मानहुँ वेगि शीघ्र हियेमें रस अरु रोपकी रीति जगा अरु मोहनी में मोहीसी मोहि लागतीहैं तथापि मोहन हेमोहन मोको लम सो ये मेरे वियोग के तेजमें तपरहहिं कि आनके प्रेम में पग रही, यामें कोई पर करें कि जानत तौ है कि पर घर जागे है फेर ऐसे वचन काहे कहत संदेह करि कि रसरोप की रीति अंगी अरु मोहूं मोहन लगी है यह वचन संडिता क्या की ताको काहूने उत्तर कीन्हों कि प्रकाश खंडिता है सयसखिन के सामुहें आपनी प्रेर न्यून नहीं करत अरु बहुरि दूसरी प्रश्नकारकै असाधारण धर्म कहति कढ़यो ता यहउत्तरकीन्हों कि अरुणाई नेत्रनकी देखि चंदन पंकज वंदन की जाहीरहै सो नाई कहीं महावर कही याते राति सूचित कराई तहां ऐसो न कहो चाही याको उत्तर यहाँ कि नायका प्रौढ़ाई सो सर्व वात जुगति के साथ कहैहै कि हे हरि आजु औंसें और हनितकी नहीं का परासक्तिहें मानो महा श्रेष्ठ रंगते रँगीहें अर्थ कुश्चित ते रंगी मोसे तो मेरी साह करत अरु मानो तुम हृदय में रोपरस की रीति ते जगी हे अर्थ मुम 'नेह हृदय कपट मोहन मोह नहीं है मो मेरेही ऐसी मोको लागती हैजसो मेरो उर दुखित देती ये दुखित इतनेईपे मोहन मोकोननक मारये के मोह में लागी का अपराध भरीसामुह होती हंसो मेरे वियोग दीये के तेज में तचीकि आनके प्रेममें पगी हैं या स्वतः संभवीमें संदेहालकारतें नायक अपराध वस्तुताते संलक्ष क्रमधुति जानिये ॥ १८॥ प्रोपितपतिका लक्षण। दोहा-जाकोप्रीतमदेअवधि, गयोकोनहूंकाज । ताकोप्रोपितप्रेयसी, कहिवर्णतकविराज ॥१९॥ जारो प्रीतम आय देवारिक कार कार्य निमित्त जाय ताको मस्तिपाल चपि ।। १९॥ प्रच्छन्न प्रोपिनपनिका ॥ यया-मयया। केशवसहुँपुरवपुण्यामिल्योमनभावताभागभरचोरी । जानकोमाइकहाभयाकमेहुँऑषिकोआपिकयोसदस्योरी ।।
भाषाटीकासमेत ।
ताकहँतूनअज्योंहँसिबोलेजऊँमेरोमोहनपाइँपरचोरी ।
काठहुतेहठतेरोकठोरइतेंविरहानलहूनजरचोरी ॥२०॥
यामें कोई कहै कि पति विदेश में चाहिये अरु यहां सामुहै बतावत तो प्रोपित
पतिका के लक्षण में नहीं मिलीहै तहां ऐसो अर्थ करत कि वह दिन जादिन पति
आवन कहिगयो सो दिन आयो तव सखी कहति है कि कैसहूं कौनहूं पुण्य ते यह
दिन भाग भरोपायो को जानै माईकहा कैसहूं अवधि को जो अधिक दूरि दिन रहो
सो पायो अरु अधिक कछु लगि गयो तौ कहाभयो तेहि दिनको त् हँसिनाही बोलत
है जऊँ मेरोमोहन पाइपरोका मोहन मोसों कहिकर गये कि याको खुशी राखबी ताके
निमित्त मेरे पाँयन परे सो काठ तें तेरो हठ कठिनहै कियेते विरहानल में नजरो वह
देन आयो आजु हँस्यो बोल्योचाहिये यह अर्थ जो कोई कहै तहां दूसरो कहत कि यह
अर्थ अच्छी नहीं बनत काहे मोइन मेरे पाँइ परो यह वर्तमान है तब उनकही सखी-
कहतहै मेरोमोह तेरे नाहिं जो तू मेरी बात नहीं मानत पाँइ परोरी तेरे पाई परतहीं
नहां और कोई कहै कि या अर्थ मेंतो तुकांत विगरिंगयो परोरी तवजरोरी चाहिये तुकांत
नरचोरी है तहां उन कही मोसों मोहन दिनको विशेषण है जो दिन कैसो है मेरो मोह
नहै सो तेरे पाइँ परचो है जैसे ऊपर दिनही के विशेषणहैं मन भावतो भाग भरयो
नरो मन भावतौ दिनतेरे भाग भरो दिन आयो है और यह अचरज है मोको यह
देन मोहतहै तेरे मनको नाही मोहत याते यह व्यंग्यकहो चाहिये कि तोको तो महा-
नोहन है जाइ सो सखी कहत है जो दिन आइबोकठिन रहो सोदिन आयो जैसे
से पाइपरयो पाइलियो अथवा पाइ परयोरी परयो पायो जैसे कोई कहत हम यह
वस्तुपरी पाई सखी अंतरंग है याने अपनो मोहन दिन यतायो याते प्रच्छन्न अरु यामें
शव को अभिप्राय यह कि कैसहूं पूरवको जो पुण्यहै सोमिलो कैसोहै वह पुण्यभाग
चारोहै या नहीं जानीजात कि पुण्य तो प्राप्तभयो परन्तु अवध को आधे दिन टरे
नाकहँ तू नहीं अबतक हसिके बोलत है जोई मेरो मोहनहार पुण्य तेरे पाइँ परयो
काठते हठ तेरोबडो कठोर है जो विरहमें नजरौ इहां कविनिबद्ध इठकाठ विरह
बग्नि ते विरह कारण हठजरवो कारजनहीं सो विशेपोक्ति अलंकार ॥२०॥
प्रकाश प्रोषितपतिका ॥ यथा-सवैया।
औधिदेआयेउहांउनकोयहभोजनकैअवहींहमऐहैं।
ताकहँतौअवलोबहराइकैराखीवस्वाइमरूकर हैं।
बैंठेकहाइनकेढिगकेशवजाउनहींकोऊजाउजुकैहैं।
जानतहोउनआंखिनतेअंशुवाउमहेबहुरचोपुनरैहैं ॥२१॥
'रसिकप्रिया सुगम अलंकार काकोक्तिका रह रहे ॥ २१ ॥ अथ विप्रलन्धा लक्षण। दोहा-दूतीसोंसंकेतवदि, लेनपठाईआप । लब्धविप्रसोंजानिये, अनआयेसंताप ॥२२॥ नायकदूतीसों संकेत बदि आप लेन पठाये ताको जय संकेतमें आपनमिले तब वाको संताप होइ सो विमलब्धा ।। २२ ॥ प्रच्छन्न विप्रलब्धा । यथा-सया। शूलसेफूलसुवासकुवाससीभाकसीसेभयेभौनसुभागे।. केशववागमहावनसोजुरसीचढिजौन्हसवैअंगदागे ॥ नेहलगोउरनाहरसोनिशिनाहधरीककहूंअनुरागे। गारीसेगीतविरीविषुसीसिगरेईशृंगारअँगारसेलागे ॥२३॥ उक्ति अंतरंग सखीकी सखीप्रति । कि है ससीआजुनायकघरीक कहूं अनुरागे बिलं इतने में यह बैगई कि फूल जैहैं ते शूल से लागन लगे इत्यादि सुगम है अरु विर हिनी होती तो शृंगार न करती गीत न होते बीरी न साती तो इहांहू कवि निबन्द बक्ता की उक्ति में व्याघात अलंकार ते नायका अतिदुःखित यह वस्तु जहां सुखदार दुख दाताहोहि तहां व्याघात अलंकार जानों ॥ २३ ॥ प्रकाश विप्रलब्धा । यथा-कवित्त । देखतउदधिजातदेखिदेखिनिजगातचंपककेपातकछूलिख्याहै बनाइकै।सकलसुगंधटारिफूलमालतोरिडारिदूतिकाकोमारिपुनिवी रीविगराइकै ॥ लेलैदीहसांसतजिविविधविलासहास केशोदासह उदासचलीअकुलाइकै । सेइकैसंकेतसूनोकान्हजसोंबोलऊनोमो सोंकरजोरदूनोंदूनोंदुखपाइकै ॥२४॥ यह कवित्त बहुत फैलोहे अरु याके अर्थ कई तरहके कई कवि करतहते अक्षरा मेंनी नाहीं होत कोई तो कहत शिव लिखे कि हे महाराज कामभलेजरायो । र को कहत सर्प लिखो पदन को धैरीजान कोऊ राहु शशिहेत कोऊ कहत भ्रमर पर कके पाप लिखो कोऊअग्निवन हैत इत्यादि बहुत कहतहैं तो ये सब अर्थ अयुक्ति काहे ऊपर सो निकसे कोऊ कहत धृग धृग लिखो सौभी कविततं नाही निक्स अकोऊ कहत यह एक श्लोक मैं ऐसो शन्दई सो यह बात तो निपट अयुक्त क्योंकि जो श्लोक होत है ताकी उल्या कवित्त में धनत है सो यह शब्द तो कवित्त भाषाटीकासमेत । (९७) धशेनाहीं उहां के शब्द इहां मानलीने यह कौन चतुराई है ऐसो कोऊ कहूं ग्रंथ को श्लोक पढे सो वह कहेगो श्लोकप कवित्त है अरु श्लोकको कवित्त तय कहावै जब श्लोकको अर्थ सब वरायर राखे काहे चंद्रमुख नेत्र मीन आदिक शब्द सबही में आवत तो उल्या न होइगो याते यही युक्ति है अरु धृगधृग अर्थ झूठो लगावनो इष्ट देवता को यह महा दोषहै जो कविने कवित्त में अनुचित शब्द धरो होइ तो भी रचित अर्थ करिये तब बढ़ाई है जैसे शिशुपाल ने शब्द अनुचित कहे तहां सरस्वती के वाक्यमें अर्थ उत्तमकरतहैं जैसे गुसाई कही "भरत भुआल होहिं यह सांची" तहांकवि भूपृथ्वी में घर करिहैं यह सत्य है सरस्वतीकहत नाही कि विगार के अर्थ करो तहां और एक बड़ो दोपहै व श्लोकों काहू साधारण नायका की वार्ता मनुष्य पै धृग धृग कहती तुकको इहां तो कान्ह जूसो बोलि उनौ वी श्रीकृष्ण कह काहे केशय काय प्रियामें कहा ॥ दोहा-जगके देवी देवता, श्रीहरिदेव वखान ॥ तिन हरिकी श्रीराधिका, इष्ट देवता जान । सो धिक कैसे कहेगी अरु कोई कहत कि कछू कछु वाको कहतहैं तहां कूर्म को अंग कठोर है मन नाहां इहां मन कठोरचाही अरु कोई कहतकानाम जलसोंके लिखो काजलतें तुम जैलहै जैसे हमें जरावतवियोगाअरु कोई कहत तुमजलस म नीचे चलतहाँअरु कोई कहत काजलते है लिख्यो कहा तुम महापशुहौ तौ कोऊकाहू को पशु कहत घोड़ा नाहीं कहत तुम यहे वृषभही कहें हैं अरु कोई अर्थ करत लिख्योहे कहें जुतुमान आये सोभी नहींवनत कहे है हाहा ये जब वनत तब नायक सामुद्द होइ इहां तो लिख्योहै घोड़ा को अर्थ हो है केहे कटू वस्तु है यह अर्थ भासे याते यह नहीं बनत ऐसे अनेक अर्थ करत विवादी बुद्धिहीन तहां कोई तो यह कहत कि यह नायका जय अभिसार करआई तब कृष्ण अभिसारिका यह बात कहांते जानी सो देखत उदाधे जात कहा प्रयम नहीं रहे जब संकेत यलमें आई तब चंद्रमा देख्यो अरु अपने गात को देख्यो तब दुःख पाये मैतो अधेरै को साज पहिर आई अरु अब यह चन्द्रमा निकस आयो तो श्याम पत्र अंधेरे में मेरे मन भायो अब चन्द्रमा निकसोती सय देखिहें याहीते दनों दुलपायो चली दूनों दुलपाइ के यह बात सारय भई एक नायक न पायो दूसर पर जैवोदुस्तर भयो सो यह नायकाने उदधि जात देखि अरु निज गात देखि दुख भयो सो तब चंपकके पातमेकडू लिख्यो कटूयोरो लिख्यो किसे लिख्यो पनाइकै कहा ज्यों नायक भली भांति यांचे सो कवि लिख्यो सकल सुगंध दार पहिले ये कारज करके फूलमालको तोरिडारो.अरु दूतिकाको मारि वीरा गराइ फेर लैबहुतसांस ये सब बातें करिकै लिख्यो इहां सब ठतीया विभक्तिको भर्य कीन्हों या करिके पे करिक तृतीया विभक्ति की शीत होत है सो टेटे दीद सांससासनको टैलेंके कहा लिख्यो कहाकि तजि छांडदेह ये भांति भांति के विलास
(९८)
रसिकप्रिया।
हास विलास हांसीको कहां किये हांसी छोडे देह कि यन वुलाइकै आपन आउन
हास रसकी बातें तजिदेहु एतौ उराहनों लिख्यो और. या अर्थ को हास शब्द न
कियो नहीं तो उहां वनमें हास विलास कब इन कियो जिनको छांडि के चली यर
आवतही संकेत सून पायोपीयन पायो तबहीं खेद पावत भईयाको हास विलास कहांदुते
कहिकै हास विलास तनि चली इहां शब्द मेंही पूर्व पक्षहो वहपूर्वपक्षहूमध्योअर्थहूदा
अरु कोईपाठ एसोकहत हैंतजि विविध विलासहास कहा आश छोडदई सो तो यह
न यनै एक्येर नायक न मिलै कहा फेर मिलि है आशतौवनी यह आश छोड़ि
अमंलग है यात आश पाठ अशुद्ध है अरु ताहीमें फेर प्रश्न करो कि चंपकप लिस
को प्रयोजन कहा तहां फेर उत्तर कीनी चंपक पै लिखते विरह सूचित करता
चंपकसीदेह रही ताप श्यामताहोगई यातेचंपकप लिख्यो और वह जासों दोनों में
जोरे सो उहां है वह कहिहै या चंपक पात पै लिखगई पत्र जा वनपै है इहां दिखा
दहें इहां सखी अनेकहें जासों करजोर कही तुम जहां होहु तहां ऐसो छल न था
यह जो अर्थ है सो क्रम भंग है काहे मयम कवित्त में चंपक है पाछे सुगंध दार
फूलन की माल तोरयो सो ये प्रयम सगंध टारयो कहत पाछे कछूपाप थोरो लिग
तामे पोरो कहा लिसो सो नहीं निकयोताते अब सिद्धांत अर्थ लिसियत है कि देश-
उदधिजात चंद्रमा यामें पिरह पदयो सूचित कीन्हों अयया निज गात चन्द्रमा दो
मिलाप के चंद्रसरीमो प्रकाश मेरे गात में है तय घंपकके पातपै कलिलो ॥ दोहा
"कामी कुटिल कुमारगी कटु लंपट कटु धृष्ट" तोकछुनाम कुमारगीकोहे अर्थतुम कुमार
रंगी है। अरु चंपक को लिसियेको प्रयोजन यह लोकोक्तिमें कहत फलानों पको
नाव भागगपे दूसरेतुम आन के पास चपेहो अरु सुगंध टारदये फूल मालातोर दूती
मारकै पाननकी पारी पगरायदई यदुतसांस लेले विविवितिके मिलास हास तजिउदास
अकुटाइके चली गुनों संकेत सेइ कान्द मूसों उनै पट योलयोल में जो शिक्षा कर
तासेंदोई हाप जोर दूनों दुमपाइपलीदूनों दुस काहकिएकतौ संकेतमैन मिले दूसरे पर
पानपरी या व्यापात अलंकार जानिये जो मुस दातासों दुस दातात ॥ २४ ॥
अथ अभिसारिका लक्षण ।
दोहा-हिततकमदमदनतें, पियसामिलेजुजाइ ।
सोकदियेअभिसारिका,वरणीतिविधियनाइ ॥२५॥
अभिमरिया तीन रीतिवी एक तिमिले सो प्रेमाअभिसारिकामदत मिल गौ र
अभिमारिवाद मदन भाइ मिल मी कामा अभियारिका ।। २५॥
अप भ्यकीया अभिसारिका पक्षण ।
दोहा-आंतरजापगडगधरे, चलतवधुनकेसंग।
स्वकियाकोअभिसारयद, भूपण भूपितभंग ॥२६॥
भाषाटीकासमेत। : अतिलजाते पगडग कहिये राहमें धरै वधूइस्त्रीनके संग चलत में यह स्वकीयाको अभि. सार भूपणते भूपित है जाकेअंगअति सलज भीपाठ है अबूंदचधुनके संगभीपाठहै ॥२६॥ परकीया अभिसारिका लक्षण यथा । दोहा-जनीसहेलीशोभहीं, बंधुवधूसँगचार। मगदेइवराइडग, लजाकोअभिसार ॥२७॥ सुगम ॥ २७॥ सुगम ॥ २८ ॥ सामान्याको अभिसार यथा । दोहा-चकितचित्तसाहससहित, नीलवसनयुतगात । कुलटासंध्याअभिसरे, उत्सवतम अधिरात ॥२८॥ मोहा-चहूँओरचित्तहँस, चित्तचोरेसविलास । अंग रागरंजितनितहि, भूपणभूपितभास ॥२९॥ सुगम ॥ २९ ॥ दोहा-कुसुमकंदुकरमंदगति, सखीसंगमगजार । सखी सहेलीसाथवह, वरणिनारिअभिसार॥३०॥ मुगम येह चारों दोहे काहू अन्यके पनाये हैं ताते इनको तिलक मारापण कति गरे शिप्यने नहीं लिखो ॥ ३० ॥ मच्छन्न प्रेमाभिसारिका यथा-कवित्त । लीनहमेंमोलअनवोलेंआईजान्योमोह, मोहिंघनश्यामचनमाला लिल्याईहै । देसोहैदुसजहाँदेहऊनदेखापरे, देखोकसेवाटकेशो मिनिदिखाईहे ।। ऊँचेनीचेवीचकाचकंटकनपीडेपग, साहसगयंद तिअतिमुखदाईहै भारीभयकारीनिशिनिपटअकेलीतुम, नाहींप्रा नाथसाथप्रेमजोसहाईहै ॥३१॥ यक नायकाको प्रतिउत्तर !नायक कहत तुम हमकोमोल टैलिये जो दिनयुलायेआई- [यका । मोको हे घनश्याम पनकी माला धुलाइ ल्याईहै प्र. यामें कोई कासोंद पिनमाला ते उद्दीपन भयो ताते काम सतावत है, । उत्तर । मो नहीं घनदेस तुम्हारे नकी मुधिआई।नायक । देवो है नुमते दुःसकहे जहां देहनहीं दिमात ऐमौ अंधेरो गगाहै अरु तुम राई कैसे देखी। नायका दामिनीत दिसाई। नायक। ऊंचेनीचे पीच' अवमें कंटकते पाइनको पीड़ा भई है नापका । मोशे साहम पी जी गयंद मात (१००) रसिकप्रिया। अति सुखदाता करी ।नायक । महाभारी कारीरातमै निपटअकेलीतुम आई । नायका नहीं प्राणनाथ साय तिहारो प्रेमरही प्रति उत्तर ते उत्तरालंकार ।। ३१॥ प्रकाशप्रेमाभिसारिका ॥ यथा-कवीत्त । नैनन की अतुराई वैननिकी चतुराई, गातकी गुराई ना दुरवि द्युतिचाल को। आपने चरित्रनकै चित्रित विचित्र चित्र, चिचिनी ज्यों सो हैं साथ पुत्रिका गुवाल की॥ चंदके समान. चारुचाय सों चढ़ी फिरति, क रिकै तिहारे मृगनैननिकी पालकी । कीजैपयपान अरुखैये पानप्राण प्यारे, आई है जूआई अलबेलीग्वालि कालिको उक्तिसखीकी नायकपति । कि नैनकी आतुर बैन(बचन)की चातुर अरुगातकी कैसी गोरीहैकि जाकी द्युति(दीप्ति ) नहीं दुरति अरु चालकी भी नहीं दुरति अरु आपने जो चरित्र हैं ताही के चित्र विचित्र चित्रित अरु चिनीसो सस्ती साथ सोहत । जाके याते जनावत आपपदमिनी है चंद केसर चारु सुंदर जाकी चाहसी.चढी फिरत तिहारे नेत्रनको पालकी करिकै अर्थतिहारे मृग नेत्रनिकों पालकी में आफ्नो जो चाउ है दरूपी सी जिनने चढायो है काहे मृगको असवारी चंद्रमाकी है इन तुमसा चार- प्रेम किया है यात तुम्हारे मैनको चाउ चदिरह्यो है याही प्रेमतेप्रेमाभिसारिका प्रकाश कढ़ी ताते आप पानीपीने पानसाइये किया जाके लिये आप पान खात रहे सोई। मैटक्षणनित पहिचानी यह ससी कही कि निश्चजानी जोग्यालि काल्हिापदेखी ही सोई आई हां येयुलाई आई प्रेमतें यातें प्रेमाभिसारिका है प्रेमकामा परकीयकामा होति है इहां महर्पन अलंकार जानियें ताको लक्षणयांछित फलजहां पाइपै तहां प्रहर्ष म जान जाको चित्त चाहतहो तो मिली आजसो आन अरु स्वभावोक्तिहू होतं? ॥३२॥ प्रच्छन्न गर्शभिसारिका ॥ यथा-सवैया। लाडिलीलीली कलोरी लुरी कहलाटलुके कहाँआंग लगाइके। आजुता केशवकै सहुँलेर लागन देत न केस हूँ आइके । वेगिचलोचलिआईबुलावनदारिअकेलियाहांअकुलाइके। भूटहुगोकुटगांटमेंगोविदकीजेगरूरनगाइचराइकै ॥ ३३ निभदरंग समीकी मापयति । को हमारीगर है मो दहियकों चली रसीद ताहिटी देरंगी टीटी क्लोर पासी ननदि मुरीयारे दिन कीजनीताको भाए और तरह मुकरोडो भान मई टेवा पाता टागन माह देव तुम मन भाषाटीकासमेत। (१०१) देखो बलि जांऊँ वेगे चली ही बुलावन आईहों अकेली दौरिके यह गोकुल गांउ है हेगोबिंद गकर मति करो गाइ चराइकै यामें जो पंचम विभाविना कोई कहैकि होतकार हेकारज जो बुलावन आई ताकीहै यति छलकरनी पर जा उक्तिसां स्वतः संभवीमह तातें मायकाको मिलाइयो वस्तु जानियें गर्व वचन चरावन हार तुम चरवावन हार इम ॥ ३३ ॥ प्रकाश गर्वाभिसारिका ॥ यथा-कवित्त । चंदनचढाई चारुबरकै उरहारसुमनश्रृंगारसोहैआनंदकेकंद ज्योंवारौंकोररतिनाथवीनमैवजावेंगाथ मृगयमरालसाथवानीजग- बंदज्यों ॥ चौकचौंकचकईसीसौतिनकीदूतीचलींसोतेंभई दीनअरि विंदगतिमंदज्यो । तिमिरवियोग भूले लोचन चकोरफूलेआईब्रजचं द्रचद्रावलिचलिचंदज्यों ॥ ३४॥ इहां चंद्राभिसारिकाको वर्णन करतंहें कपिकि चंदन चारु सुंदर नढाये हैं अथवा अंबर वस्त्र पे चंदन चढाये, अरु ताहीकोहै उर विष हार अरु सुमन फूल जो पहिरे शृंगारके हेत तास आनंदकंदहो रही, जाके अंगप करोररति नाथ वारतहैं अरु वीनमें कैसे गुनन के गाय बजावत मृगअरु मराल जाके साय मै फिरत. वानी सरस्वती जगवंदसी मुनि जाके देखत हैं वियोग रूपी तिमिरअंधकार भूलैतै लोचन रूपचकौर फूले खुशी भये अरुसौतिनक युति चकई सातें कमलवत् ऐसे ब्रजचंद चंद्रावलिदोईचलेचंद्रस प्रश्नअरु यांम कोई कहै गर्वाभिसारिकाकैसे इहाँतौ गर्व की बात नहीं निकसत उ०॥तहांयहकहतकि । अभिसारिका तीन भांति/हैं प्रेमागर्वा कामा इहां कामाभिसारिकाकी रीतितो यह कि कामान्धसी चले ऐसेउदाहरणकहे हैं यथा “उरझत उरण चपत चरणाने फणि औरभी । कुंजअंधियारी नगधारीहै" रैन विहारी पैजात तृण शुद्ध मथी रही प्रेमाभिसारिका ताके- अंतर्भूत कहिये एकती यह बात अरु आनकहत जहाँप्रेमशन्दआवै तहाँ प्रेमाभिसारिका जैसे उहांदोऊ पर कवित्त कहि आये नहीं प्राणनाय एक प्रेमचूसहाइ हैं द्ने कवित्तमें चारुचावसोंचढ़ाये फेरयाहू मकड़ी तहां फेर प्रश्न प्रेमविना अभिसारती करतनहीं प्रेम तौ आवश्यक है इहां गर्वकोभाव कछू चाही तहां फेर उत्तर कि "चोंकि चौकि सौतिन की दूती चली" या यहबात निकसी कि या समान आन नायका नहीं सब की दूती निराश तो लक्षणा सों जानिये याहि गर्व है और यह जानक चलीकै मेरे गये काहूकीदूती न ठहार याते गर्वाभिसारिकादूतीनजानी याते प्रकाश चंदसों रूपकसी सब पाको आशय नहीं पायो केशव यह कहतकि आपु बीन बजावत जात पात यह सूचि- तगत अब हो जात सो छपिकेनाहीं गाय वजाइकै जातहीं जाको रूपकोमदहोहि सो (१०२) सिकमिया।.. चलो यही गर्वजतायो आपुचंद समान आई का बहुत प्रकाश करत ॥ ३४ ॥ प्रच्छन्नकामाभिसारिका ॥ यथा-कवित्त । उरझत उरगचपतचरणनिफणि देखतविविधिनिशिचरदिशिचा रिकोगनतनलांगतमुसलधारवरपत झिल्लीगनघोपनिरपोपजलध' रिके ॥ जानतिनभूपणगिरनपटफाटतनकंटकअटीकउरउरजउज रिकोप्रेतनकीपूछनारीकोनपैतेसीख्यो यहयोगकैसोसारअभिसार भिसारिके ॥३५॥ उक्तिअंतरंग की अंतरंगों किआजुकी बातऐसी है जब नायक के पास गई किसा उरझत फणिपाइ ते दवत निशाचर देखत चारों दिशन के मूसलधार वर्षा झिल्ली समूह तिनके घोपशब्द निरपोपअधिक बड़ीगरज सों मेघनकी भूपण गिरत पट फाट कंटक लागत उरमें उजार को प्रेतन की नारी धूझतीहै कि यह तेने योग सोस अभिसार हे अभिसारिका योग उपमान अभिसार उपमेय सार धर्म सौं वाचिक तां पूर्ण उपमा सो कविनिबद्ध वक्ताकी उक्तितेंपोप निरघोष अभिसार अभिसारिका जम ताते अलंकारत अलंकार ॥ ३५ ॥ प्रकाशकामाभिसारिका ॥ सवैया । गोपबड़े बड़े बैठेअथाइनिकेशवकोटिसभाअवगाहीं। खेलतवालकजालगलीनमैवालविलोकिविलोकिरिकाहीं॥ आवतिजातिलुगाईचहूंदिशिघुटमपहिचानतिछाहीं। चंदसोआननकाठिकहांचलिसूझतहेकछुतोहिकिनाहीं ॥ ३६ उक्ति ससी की नापका प्रति।कि तू यह कहांजात बड़े बड़े गोप अयाइन' बैठे जिन कोटिन राम सभा जानी अरु पालकन के जाल सेलतई कैसह याल कि जिन्हें देशि याला पिकाती हैं अरु लुगाई बहुतावती कैसी है जे पुर डांह पहिचानती ऐसे समय चंदसो आनन काडि त कहांचली कटू तोको मुझ कि नहीं तो या कामाभिसारिका एकती यह कि कामांध ते काहू को नहीं देश अरु कोई कदकिपदकाहे जानी किअभिसार की जान याऔरही कार्य निमित्त होहि तो मुसनिकास ते वाकी कामांपता सूचित होत है तोभी कोई कहै कि ग्राम पुत्री तहांनी पुत्रीहोती तो मुसनिकामेई रहत तामा यह कैसे कहती कि मुग निक वाई जान इहां वामांध वस्तु ते अर्यातरन्याम भटंकार जानिये गोप सामान्य दिन सभा देनी यह विशेष दिमही पाटक सामान्यता यालक मुगाई पिराया भाषाटीकासमेत। (१३) 'यह विशेप अरु यह सखी सिखावतिहे की लुगाई चारों और से देखती हैं तातेप्रकाश- जानियें ॥ ३६॥ दोहा-केशवदाससुतीनविधि,वरणीसुकियानारि । परकीयाद्वैभांतिपुनि,आठआठअनुहारि ॥३७॥ केशव दास ने तीन विधि की स्वकीया नायका वर्णी और परकीया दाभांति की वर्णी तिन सबकेआठ आठ भेद कह सो सब देखावत हैं तिलक में || ३७ || दोहा-उत्तमध्यमअधमअरु, तीनतीनविधिजानि। प्रकटतीनसैसाठत्रिय,केशवदासरखानि ॥ ३८॥ इहां तीनसेसाठको वेरा ताकोविचार केशवदाप्त तीनविधि यों कहां सुकिया तीन विधि वर्णी तहां एक एक की चार चार अनुहार कही ऊपरतें सबवारहभई अरु परकी या दो भांति तो चौदह भई अरु पुनके कहिये सोव्यंग्य तैसामान्यानिकसीनाम लियो सो ऊपरही कहि आये तहां हूं नामलीनो कहीं स्वकीया परकीया न यह कह्यो तीस. रीनायका कैसी है स्वकीयाहै न परकीया है कहीं तैसेही परनाम न उच्चारयो तैसे इहां हूं पुनि शब्द तें वही जानियें यह सब पंद्रह भई फिर आठनायका सों जोरथो एक से बीस भई फेर उत्तम मध्यम अधमसों तीनसे साठजुरी यह रसिकप्रिया को मत जानिये ॥ ३८॥ अथ उत्तमा। दोहा-मानकरैअपमानते, तजैमानतेंमान। पियदेखेसुखपावई, ताहिउत्तमाजान ॥३९॥ मान कर अपमान ते नायक जो अपमानकर तो मान कर कहा नायक को आदर कर अथवा मान नहीं कर अपमान करत विपे अर्थअन्य स्त्री गमन न रोके अरु तजि- देइ मानतें मानको अर्थनायक जब आदर करै तब आपु गर्व न करे अथवा तजै मा श्री अमर "में लोक माता मा" नामलिसो है अथवा त मान तो मानमनकरिबी न तजे पिय देख मुख पावे सी उत्तमा ॥ ३२ ॥ उत्तमा । यथा-सवैया। होहिकहाअवकेसमुझेसमुझेनतबैजवहीं समुझाये । एकहीबंकविलोकनमांहअनेकअमोलविवेकविकाये। जानिपरोनजनावहुजूजनमावधिलौंउहिजानिहींपाये। बातवनाइवनाइकहाकहोलेहुमनाइमनाइज्योंआये ॥४०॥ सखी नायक सौ कहत है कि जैसेमनाइआये तैसेही मनाइलेउ अरु कोई अर्थ याको है रसिकप्रिया ।। मेसोलिखो है किससी कहतमापक सों तुम मिन पायन परे मनायो है सोन मान्यो । भय पायन परि मनाइ लेहु सो इतनो विचार न कीनो मयम तो उत्तमा मान नाही करत यापैइतनोमानजोपांय पर तें है यह उत्तमा को अर्थ ते राख्योती ऐसेभयते उत्तमामध्यमा है गई अरु कोऊ यह कहींकि नायक नासा बहुत प्रीति राखत रही तामा रूढ़ आयी तय उत्तमाकहत है भयके समुझे कद्दा होत जयलोगन तुम को समुझायो तबतो न समझे ताते तुम जानपनो न जनावटु भरु "जान परयो" भी पाठ है एजू जनम अवार लौं इदि यहि कहा उहिको जानपनो कहा निर्यद येराग्य निन जनावो काहे हिंदही दीपक कहिये यहि तुहें जान पाये हैं कि मो बिन एक घरी न रहिहें तात जैसे मनात तरहे तैसे मनाहि लेहु प्रश्न तहां काहू यहकही कि याम जय का बोली वातमैरे सामुहे न यनावर तय उत्तमा कहां तहां उत्तर यह कहत कि बाके मामुळे बातें पनाइ पनाइ कही जाते यहरूसीन रहै यति बनाइ बनाइ कहाकहो याको अर्थ कि वाके यात बनाइ बनाइ कहा कहीं कहियो करी तहां यह प्रश्नकरत बातें कहा करों ऐसे कहतवातें कहाकहीं यह शब्द अप्रयुक्त है | ताकोउत्तरयातें बनाइके कही अरुवाको कहा कहाँ कहा जोवहक मुखतेसोईतुमहूं कही । अयं ॥ जो बात वह कहत सो टारिकै न कही अपनी चतुराई सौ जोराति कहे तोराति जो दिन कहै तो दिन ऐसे अनेक रीति कहत है अरु केशव को आशय तो यह है कि वासों अब बात बनाइये कहा काहे कहत दोहा कहितो आगे मनावतरहै अर्थ हाहा करि मनाबहु इहां नायक को प्रात आइयो यह कविनिबद्धता में नायका वक्ता तांतें नायका अपराधजान नहीं मानत यह वस्तुते काव्यलिंगअलंकारजानिये काव्यलिंग सामर्थ्यता जहां दृढ़ करत वनाईसी- वानै जान पाये बाको जान पाइवो एक बंक विलोकनमें जतायो यह दृढ़ जानियें।॥४०॥ मध्यमा लक्षण। दोहा-मानकरैलघुदोपतेंछोडेबहुतप्रमाण ॥ केशवदासवखानियेंताहिमध्यमावाम ॥११॥ मान करै थोरे दोपते ताही मान को बहुतप्रमाणतें छोड़े ताको केशवदाप्समध्यम नायका कहतहें ॥ ४२ ॥ मध्यमा । यथा-सवैया। भूलहूंसूधेनहींचितयोइहिंकान्हकियोलचि लालचकेतौ। हाहाकैहारिरहेमनमोहनपायपरेंत्योंपरेईरहेतौ॥ होतोयहेतवहाँकिविलोकतिहोतोगुमानक्योंयाहिधौंकेतौ । लांबीलटेंअरुपातरोदेहजुनेकवड़ीविधिआंखिनदेतौ ॥१२॥ यामें यह प्रदाकरतकि मान कौलघुदोषते सोलघुदोपकवित्त में कहो चाहिये भाषाटीकासमेत । अरु मान छोड़े बहुतप्रमाण सों सोमानको छोड़बो कहाहै यह नायकाती सूधेहून चितई कान्हने लालचबहुतेरो कियो तहां उत्तरकहतकि याविधिकवित्तकोअर्य कीजै लघुदोषअन्य नायका देखते होतहे वातनतें मध्यदोपचिहनते गुरुदोष होतहै सौ सखीनायक की कहत है नायकाकीसखीसों कि तेरी नायका जानतिहै ये और को देखतहैं सो ये काहूको मनसोंदेखत नहीं योदृष्टि जाइ परो पर चाहसों नहीं देखत, सोकहतहैं कि वह जो कोऊ आन नायकहै उन इनके लच लालचकेतौ पर भले ह॥सूधेन चितयोवहां कान्ह"करयो परि" मी पाठ है अरु याही में प्रश्न है इनजु को नहीं वितयोती लघुदोपचितयेतें होतहै तातेलघुदोपकरित्तते जातरह्यो तामें उत्तरकरत "भूलिहूसुधे नहीं चितयो" सूधी दृष्टि नहीं देख्यो चाहतें अर्थ दृष्टि जाइपरी यांमें लघु दोष स्थापित भयो सो यह लघु दोष जानि कि नायका ने एतो कियो हाहा करि पांय परे त्यों परेई तब नायका की सखी बोली रहेती कहाकि पायन परनदिययामें मान छूटयो ।।दा करिवो यही प्रणति है छां? बहुत प्रमाण यह लक्षणसाध्यो अरु यामें कोई कहै कि कान्हकहो अरु मनमोहन कह्यो पुनरुक्तितो नहीं है परंतु नजीक न जीकहें तहां प्राचीन पुस्तकमें यह पाठ है "हाहाकै हारिरहे पुनिकेशव प्यारीकेपायपरेईरहेतो"फेरतीसरी तुक सीधी है नायकाके सखीवचन किये ती गुमान याहीक्यों होती जो या वात न होती लांबीलटेअरुपातरी देह केशव ऐसे काहूके नहीं अरु मुकुमारताको गर्व यह अरु या केशव को आशय यह कि कान्हत भूलकर सूधेकाहूकी ओर नहीं चितयों कर कोई लचकर लालच कितनो सो कान्ह हाहाकर हाररहे परंतु याके मन मोहन पांय परेती परेई रहे सोहों तब की देखतको इतनो गुमान काइको होती जो विधाता पातरी देह लांगीलट अरु बड़ीभांस न देतो तो देखो लघु दोपते मान चाही सोयाहीमें निकस के सूघेमनते लचके लालचतेनहीं चितयेतो चितवीसावितभया जैसे कोई कहै हम आ पुती नहींगये तो जै बो जानो जाइ है अरुछूटवो भी याहीअर्थ ते निकसा काहे कि फिरयो नहीं रूसे वचन नहीं यति रहे अथवा हाहाकरकेती हारे परंतु जब पाय परे तर त्यो परेरद जैसे सब दिन एक सेज पर रहत रहे अरु तीसरी तुकको एसो भी पाठ है "हों तो यह तवहींकी विचारीत होतो गुमान क्यों साहि सो एतौ ताते हैत अलंकारहै जहां कारण अरु कार्य एक साय कयन होहि लांबी लौ पातरी देह घड़ी आंख कारण को "कयन गुमान कार्य के साप है ।। ४२ ॥ अथ अधमा लक्षण। दोहा-रूठेवारहिवारजो, तूटबैठहिकाज । ताहीकोअधमावरण, कहेंमहाकविराज ॥४३॥ वारंवाररूले अर्थ मानकर अरु विना मयोजन गुस्साहोप टै चिनही कार्य भी है पाउ है ! १३ ॥
(१०६)
रसिकप्रिया।
अधमा ॥ यथा-सवैया ।
काटोकपटुंजुकान्हसोंकीजैरीवांटो वेवोलकुवोलकसाई।
फाटौजु घुटओटअटैसोईदीठिफुरौअधिकौजुधंसाई ॥
केशवऐसीसखीनकोमारीसिखेकै करैहितहीजुहँसाई।
वारहिवारकोरूसिबोवारोवहाउजुबुद्धिवियोगवसाई ॥४४॥
नायकासों कि वह कपट काटि डारिये जोनायक सौहोय वे कुबोल पीसि डारिये जो
नायकको कसकें वह पूँघुटफारियेजो नायक को देख कि मुसपै रहै दीठे फौरिये जो
अधिकसे नायक को कूर जानः जाय ऐसी सखी न को मारिये जो हित की हँसई
करै वारंवारको रूसिबो जराय दीजिये वा बुद्धिबहाय दीजिये जो नायक सौ वियोग
करावे स्वभावोक्तिअलंकारहै ॥ ४४ ॥
दोहा-इहिविधिनायकनायका, वरणोंसहितविवेक ।
देशकालवयभावते, केशवजानिअनेक ॥ ४५ ॥
देश-जैसे गुर्जरी मालवी बंगाली इत्यादि काल-पावसाभिसारिका वसंताभिसारिका
वयभाव-अज्ञातादिक जातिकाल पाठ में पद्मिन्यादिक ॥ ४५ ॥
अथ अगम्या।
दोहा-तजितरुणीसंबंधकी, जानमिवद्विजराज ।
राखलेइदुखभूखते, ताकीतियतेंभाज ॥ ४६॥
नो तरणीत संबंध होय अर्थ भगिनी आदिक संबंधों परत होय ताके साप विहार न
करिये अर मित्र की तरुणी को जान के तजिये कयिप्रिया केतिलक में नारायण दाम
का पदमाताके प्रसंगमें लिखे दिजरान ब्राह्मण की स्त्रीजो रास लेय दुसित देगडे
भूसते अर्थ जो अपनी पालन करे ताकी तियातें भाजिये अर्य गमन न करिये ॥ ४६॥
दोहा-अधिकवरणभरुअंगपटि, अंत्यजजनकीनारि।
तजिविधवाअरुपूजितारमिया, रसिकविचारिः ॥४७॥
अपने ते जो उत्तम जाति होय अरु अंगपट होय अयं न्यून जाति होय न
जनकी नारिभी पाठ है अंत्यज यांहालादिक की घी जनदास की तमनी विधा
पूजिता जो पूजनीय होप इन सपको त्याग करके रमण करियो विचार पूर्वक हरमित
यह अगम्यागमन है॥१७॥
दोहा-यहसंयोगशृंगारकी, केशववरणीरीति ।
विप्रलंभशंगारकी, रीतिकहांकरिणीति ॥ १८ ॥
भाषाटीकासमेत। ( १०७) इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायांरसिकप्रियाया मष्टनायिकासंभोगशृंगारवर्णननामसप्तमःप्रकाशः ७ यह संयोगशृंगार की रीति केशवदास ने वर्णी अब विप्ररंभा कहिये वियोग शृंगार की रीति कहत हों प्रीति करके || ४८ ॥ इति श्रीमन्महाराजाधिराज-काशिराज-श्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्या- ज्ञाभिगामि-ललितपुरनिवासि-हरिजनकवीश्वरात्मजेन सरदाराख्य कवीश्वरेण विरचिते रसिकप्रियाभूपणे सुखविलासिकानामटीकाया मष्टनायकानायकसंभोगशृंगारवर्णनं नाम सप्तमः प्रकाशः॥४॥ अथविप्रलंभशृङ्गारलक्षण। दोहा-विछुरतप्रीतमप्रीतमा, होतजुरसतिहिटौर । विप्रलंभतासोंक, केशवकविशिरमौर ॥१॥ जहां नायकनायकाको मिलन न होइ सो विप्रलं नामवियोग ॥ १ ॥ अथ विप्रलंभशृङ्गारकेभेद। दोहा-विप्रलंभशृङ्गारको चारिप्रकारप्रकाश। प्रथमपूर्वअनुरागपुनि,करुणामानप्रवाश ॥२॥ विप्रलंभशृंगारके चार प्रकारके प्रकाश (भेद) हैं पूर्वानुराग एक द्वितीय करुणा तृतीय मान चतुर्थ प्रवास (विदेश बसियो ) ॥२॥ अथ पूर्वानुरागलक्षण । दोहा-देखतिहींद्युतिदंपतिहि, उपजपरतअनुराग। विनदेखेदुखदेखिये, सोपूरवअनुराग ॥३॥ प्रश्न इहां देखतकहो तो सुनने ते न होहिंगो रुक्मिणी को दमयंती को सुनकर भयो है और ग्रंथन में एकश्रुति अनुराग एकदृष्टानुराग तहां यह उत्तर है कि दर्शन अवण कहावत तो का श्रवण सो देखतहैं तहां फेर प्रश्र कि स्वप्न चाही दर्शन में तो. न हृदय के क्षेत्र न वाह्य के देखतहें तौ स्वभानुराग कहोचाही अरु चित्रानुराग चाही अनुराग दो न चाही चार चाही तहां उत्तर कि चित्रसाक्षात् एतौ देखवे में है अरु स्वपभी देखिये में है काहे स्वप्नी देख्यो कहत याते तीन दृष्टानुराग श्रवण श्रुतानुराग है दिनदेसे दुखहोत सो है भी पाठहै ॥ ३ ॥ नायकाकोप्रच्छन्नपूर्वानुराग.॥ यथा-कवित्त । फूलनदिखाउशुलफलतहहरिविनारि करि मालावालाव्यालसी लगतिहै।वरचलाउजिनवीजनहलाउमति, केशवसुगंधवायुवाइसी .
(१०८) रसिकप्रिया। लगतिहे। चंदनचढ़ाउजिनतापसीचतितन कुंकुम नलाउ अंगमा गसी लगतिहे। वारवारवरजतिवावरीहेवारों आन वीरीनासवानी रविपसीलगतिहे ॥१॥ उक्तिनायका की सती अंतरंग मति । कि हेससी फूलमति लिया? मीको शल फूलत है इत्यादि पदार्य तो सय मुगपरंतु मयाम विरह सौ जातोनात ताते कुम कुम भरु पीरीने तसं जो नायक पिदेश होय तो ससी सीरउपयार लियाति अयदा हरिको जय देखत रही तब सम सामान नीके लागतरहे भर हरि नाही ताते पंचम विभावनारूप व्हेगये कारण कार्यविरोधभयो तापसी तरसि भी पाठहै ॥४॥ नायकाकोप्रकाश पूर्वानुरागा:यथा-सवैया । केशवकसहुँईठनदीठ व्हेदीठपरेरतिईठकहाई। तादिनतेमनमेरेकोआनि भईसोभईकहिक्योंहुँनजाई ॥ होहिगीहांसिजोआवेकहूं कहिजानिहितहितझनआई। कैसेमिलोंरीमिलेविनक्योरहोंनननिहतहियेडश्माई॥५॥ उक्तिनायकाकी बहिरंगसखीसों कि इससी जो तू मेरीदशायूझाते है ताकी बात यह है सब जो हरिसों ईठन चेष्टा ते मेरी दीठमें आये तबते रसपीतिकी चेष्टा कहाई : कन्हाईभीपाठहै तादिनतेजोमेरे मनकी दशा भईसोकैसेकहीं सोयाबात कहे मेरी हांसी है हैमेरी हित है ताते हितकी यूझयेकोआईही ताते में कैसे मिलों अरुमिले दिन कैसे रहें मैन हेतु है अरु हृदयमें डरहै यह दो भावकी संधमें ही परीही इहां प्रेमालंकर है लक्ष कपट निपटि जाइ जहां सो प्रेमालंकार ॥५॥ नायकाको प्रच्छन्नपूर्वानुराग ॥ यथा-सवैया। एकसमैवृपभानुसुता सजनीगनमेंजननीसँगवैसी। जातउचितयोजिहिरीति सुप्रीतिहियेकहिजाइनतैसी ॥ तादिनतेजगकीयुवतीनिलगावतकेशववातअनैसी। चाहिफियोचितचक्रचहूंनकहंद्युतिदेखियेवामुखकैसी ॥६॥ उक्ति नायका की अंतरंग सखी प्रति । याते प्रच्छन्न अर्थ यह कि एकदिन वृ भानु कुमारी माताके ढिग बैठीरही ॥ ताही समय में जात रही तहां जैसे चितई सोकद नहीं जात अर्थ अतिरसीली तादिनते जग की रसीली जे युवती हैं नीकी ते अनी लागती चाहि कारके सिगरेब्रजमंडलमें चित्त करो पैवाके मुखकीसी युति न देखी अर कार पूर्ववत् ॥ ६ ॥ - भाषाटीकासमेत। (१०९) नायककोप्रकाशपूर्वानुराग ॥ यथा-सवैया। भांतिभलीपभानुललीजवतेअँखियांअँखियानसोंजोरी। भौंहचढ़ाइकछूडरपाइबुलाइलईहासकैवशभोरी॥ केशवकाहुसोंतादिन ते रुचिकैनविलोकतिकेत्योंनिहोरी। लीलतिहैसवहीकेशगारअँगारिन ज्योविनचंदचकोरी ॥७॥ ' वहांप्राचीन ऐसीकहत कि सबके शृंगार लीलत, हरिजैसेचंद विनचकोरी अंगार डीलत तहां स्त्री काहे कही चकोर काहे न कहो इहां नायक को बिरह है अरु रुचि- कर काहूकी ओर नाही देखत नायक के तौ निहारे कहाँही निहोरी नचाहिये अरु बुला लई हँसिकै यह शब्द अलग्न है तहां फेर आन यह कहत कि हरिके बचन सखी वों अपनी अँखियानि की बात कहत कि राधान जब ते अँखियान सों अखियां जोरी कैसे भौंह चढ़ाई भृकुटी विलाससों कछू हरपाईकै बुलाइलई अपनी और को कैसे हसिकै बुलाइलई और अपने वश भोरी करिकै ता दिनते जे आंसं काहूसों रुचिनहीं करती हमकेती निहोरहि काहू त्यों भी पाठ है सबके शृंगार लीलती हैं जैसे चकोरी भंगार बिन चंद लीलती तहां यह प्रश्न है कि शृंगारकेसे लीलयो बनै आनके अरु कहोकै उनकी युति लीलती हैं तो उनको तौ भावह नाही भास है कैसे तहां उत्तर है ही के हृदय के शंगार आंखें लीलतीहैं श्यामअरुण श्वेत नेत्र वर्णत सो आपु अरु गमात्र बनी रहती हैं जैसे चकोरी अंगार लीलती तैसो आपुनै शंगार लीलति, विलो- कनमें सबलखत याते प्रकाश इहां अलंकार पूर्ववत् ॥७॥ दोहा-अविलोकनआलापते, मिलिवेकोअकुलाहिं। होत दशादश बिनमिले, केशवक्योंकहिजाहि ॥ ८ ॥ देखिबेते आलाप स्वरतेअर्थ टेरियतें मिलापके हेत व्याकुल होय तहां दश दशा होतहें केशव कहत विगर मिलक्यों दशा कही जाय ॥ ८ ॥ अथ दशदशानामकथन । दोहा-अभिलापसुचिंतागुणकथन, स्मृतिउद्धेगप्रलाप । उन्मादव्याधिजड़ताभये, होतमरणपुनिआप ॥९॥ अभिलाष १ चिंता २ गुणकयन ३ स्मृति ४ उद्वेग '५मलाप ६ उन्माद ७ व्यापित जड़ता ९ मरण १०॥ यहदशदशा हैं ॥ ९ ॥ अथअभिलाषलक्षण । दोहा-नैनवनमनमिलिरहे, चाहैमिलन शरीर।
(११) रसिकप्रिया। कहिकेशवअभिलापयह, वर्णतहमतिधीर ॥१०॥ नैन वैन मन मिलिबेको अर्थ एतो मिलिरहे भरीर मिलो बाहत तहां कोई प्रश्न र करतकि शरीरमिलो चाहै ताकोअभिलाप कहें तो यह बात नहीं संभवत काहे देखिने को भी अभिलाप होतहै । रामायणे । सिय हिय अति उतकंठाजानी इहां देसी अभिलाप है अरु बोलिवेको भी अभिलाप होतहै अरु मन मिलाइयेको भी होती है अभिलाष जैसे रामायणमें । सुनाचहें प्रभु मुखकों बानी । ऐसे काहू को बात की को जानियें तहां ऐसो अर्थ चाहिये नैन चैन मन मिलरहे चाहेहैं अरु मिलोशरीर चाहै देसो सबभांतिको अभिलाप चाहिये सो दशा कहावत सो ऐसो अर्थ नहीं बनत काहे पूर्वानुरागविनदेखे सुने नाहीं होत तौ जब देखें तवतो नयननिमै नयन पैननमें बैन मनमें मन अंतःकरण मानस ते मिलिगयो अरु बाह्य शरीरमिलो चाहत ॥१०॥ नायककोप्रच्छन्नाभिलाष ॥ यथा--सवैया । सुधिबुद्धिपटीद्युतिदेहमिटीदिनहींदिनचाहियेवादतिसी। कछुकेशवआपनेपेटकीपीरदुरावतपैमुखकादतिसी ॥ विसयोसुख खसखी निशिनींदपरीचितचाहतआढ़तिसी। गिरिगोकछगाँठिते छूटछवीलीसुकाहेतेंडोलतडादतिसी॥११॥ ससी चितचाहनाको जानति नाहीं ॥ कि याकी दशा विरहकी है नायका सों पूछ तिहे ताते प्रच्छन्न तीसरे चरणमें आदतिसी तहां आदतिमें चित्त बहुत लगो रही या वयक्रममें पढ़ो चाहिये सो घटत जात याहीते कारणते कार्य विरोध सो पंचम विभ चनालंकार को रूप है ॥११॥ नायकाकोप्रकाशअभिलाष ॥ यथा-संवैया। जोकहींदेखेलगैदिखसाध दिखावतहीदिनहीदुखपैहौं । याहीमेंकेशवदेखियेवोलन देखिहाँ देखिसखी अपकहीं ॥ जोउनकी दुरिदेखि होंदेहज्योंआपनीदेहनदेखनदेहों। देखिबेकोवहरावति मोहिमुहीवकहाकछुदेसहोलेहों ॥१२॥ नापका पचन समीसों । जोदीकहाँक देमतोलगी है दसिय की साय अर दिगार ती दिनहींदिन ज्यादा दुःख पाइहों या हिय में केशवका पोलन देखिये मोद दागीमयको दामहीअर्य इससीअंतर मरहत याहिर महीका दिसात यों ऐमर रनरी दुरिकै देह दागहों ज्यों नामजैसेआपन देह जो प्रत्यक्षा सो न देखनदेही देश हामी पाठ है दमिवो जो मोदि महरावत मोहादसमी सोही याहाकम्देशहीद भाषाटीकासमेत। नथवा सखीसों.कहतहै कि तूजो मौको.बहरावतहै सो तोहिं देखै दिखिबेकी साध लगी है रदेखिवोई सुहाइगो अरु तयों को दिखापत मैं दिन दिन दूनो दुःखपाइहै तोमेरो गोलदेख लीजै अबको देखि फेरन देखि हौं जो सखी बहरावत सो बहिरंगयातें प्रकाश रंतु या अर्थ में रचना नाही है प्रेमालंकार जानियो ॥ १२ ॥ 'नायककोप्रच्छन्नअभिष ॥ यथा-संवैया । पाइप बलिजाउँमनोहरि आपुनसीनकरौअवताहू । देखेअघातनहींतिनकेफिरिवारिकर्षाअनदेखहीजाहू ॥ मोसोंकहीसुकहीअबकेशव कैसहुँकान्हपत्याउतकाहू । डाठहुगेजुकहूंकइतीरुचतातोहोनेकसिराइधोंखाहू ॥१३॥ उक्ति नायकसों सखीकी नायक कही तूजायकै मोहिं दिखायदै सोसुन सखीकहति के तिहार में पाँइ परतु तुम घरजाहु हे मनहरण आपुनीसी ताको न करो अर्थ जैसे लोग तुम्हें कुचाली कहत तैसे वाकोमति कहवावा आपुसमान भी पाठ है दिनभर देख मघाने नाही फिरकईचार अनदेखे जैही मोसों कही सो कही आनको कौनहूं ठौरमति पतियावहु जो ऐसी तिहारीरुचि है तौका जरिजही ताते सिराइसाउ बहती रुचिभीपाठहै अलंकार प्रेमा ॥ १३ ॥ 'नायककोप्रकाशअभिलाष ॥ यथा-सवैया। हैकोउमाईहितू इनको यहजाइकहैकिहिवायुवहेहैं। 'न्यारहीकेशवगोकुलकीकुलटाकुलनारिननाउलहेहैं । देखिरीदेखिलगाइटकीइत सोनोसोपालिजुचाहिरहेहैं। 'कोहरीकोजेसेजानतनाहिं नकाल्हिहीवाकेसंदेशकहेहैं ॥१४॥ उक्ति ससीकी सखीप्रति । नायक को सुनाय दोईसखी यहिरंग आपमु में कहतिहे के इनको कोऊहित करताहै यहवातक एकौन वायुमें वहेहें देखि न्यारि ही गोकुटकीकुला अरु कुलनारिन इन के नामलयहें न्यायहोंभी पाठहै तहां नीतिते नामपायो है देखिर तूसोनोसोवालिकेचाहिये रहे हैं सोनो सोपाल ज्योंडारिरहेहैं इस पाठमें जैसे सुवर्ण डार कोई देखत रहें याको यह अभिप्राय है एक तो सुनारसौनकोतपाय देखिरहत है अर्थ अग्नि में डारके भले बुरेको पहिचान करतअरु ठग मार्ग में सोनो डारिक टक लगाए रहत जो याको उठावै ताको मैं पकरौं यह बचन ससी सों सुन नायक कही कि कोहै-री कोहै तबसस्ती कही तुम नहीं जानत कि कौन, कीवातहै ऐसे अजान व्हेगयेही, काहिही काके तुम संदेशोकहै सो में सुनत रही उत्तरालंकार ।।.१४.॥ .
रासकोप्रया।
पुनः सवेया।
केशवनैननिलागिहैज्योंवहमूरुढप्रेमअएवढ़ावै ।
क्योंवहकामकलामिलैमोहिंसुतोमनमूढउपाउनपावै ।।
कीजैकृपाबुधिदीजैबुधीशजूराधिकाके उरमें यहआवे।
लागतिज्योंकवहूंकवहूं मुखचारकज्योंमुखसों मुखलावे॥ १९॥
यह कवित्त केशवको बनायौ नहीं है काहूऊपरतेलिसिदियो याते हमारोशिष्य नारा-
यणदासकविनयाकोअर्थनहीं लिखो ॥ १५ ॥
अथचिन्तालक्षण।
दोहा-कैसेमिलियेमिलेहरि, कैसेधौंक्शहोइ।
यहचिंताचितचेतकै, वर्णतहसबकोइ ॥१६॥
कौनभाँति सो मिलियेजा हरिमिलें अरु कैसे कि वश होइ यह चिंता को जोषित
चत चितवन करै ताको चिंतादशासब कोई वर्णन करतहें प्रश्न नायका नायक दोनों की
चिन्ताचाही या प्रश्ननायका मात्रकी होतहै तहां उत्तरसय कोई वर्णनकरत चिन्ता चित्तमें
चेतक या ते दोहु न की आई ॥ १६ ॥
नायककोप्रच्छन्नचिंता॥
दोहा-आपुनहींतूआपनो, होतनदेखेनाहि ।
आपुनहीतेआपुनो, क्योंमनकरिहैताहि ॥ १७॥
नायका मनसों कहति याते प्रच्छन्न जानियें हेमन व आपु नहीं है कहा आपन नहीं ।
है काई देरात तू जातरइत है सो पेयुलाये तोपराये को कैसे यश कार? अथवा मनको
व्याकरण में नपुंसक लिसोहै सो तू मन नपुंसकनहीं है काहे देखतपासंग जातहै इस
आधु नहीं ते पद शब्द अधिक है ताको अभिमाय यह कि पली होय सोशको दही
आधुन पै समझिकि में अपल हों काईते अपलाकोमनहे याते नायका की चिन्ता हो
आपु आषु पद एक अर्य भिन्न ताते टाटानुपास है ।। १७॥
नायकाकीप्रकाशचिंता। कवित्त ।
प्रेमभयभूपरूपसचिवसकोचशोचविरहविनोदपीलपलियतप-
चिक । तरटनुरंगअविलोकनिअनंतगतिरथमनोरथरहेप्यादेगुनगः
निकै ॥दुई औरपरीजोरपोरपनीकेशोदासहोइजीतकोनको कोदारे
जियटनिका देसतनुम्हें गुपालतिदिकालगदि वाल र सतरंजके
पीवानीरासोरचिक ॥ १८॥
भाषाटीकासमेत । प्रेम अरु. भय एती भूप कहे सो होतहीहं अरु शोव संकोच मंत्री सोभीहोतहें अरु विरह विनोद फीलकहे सो चार चाही एक प्रश्न यह है अरु विलोकन में पारि प्रकार कहाँ यह प्रश्न दूजी है रथ मनोरथ चारि कहां यह तीसरी प्रश्न है अरु गुणप्यादा सोरह कहां यह चौथो प्रश्न है वहां ऐसो उत्तर वारी अर्य करत प्रेमभय ये दोऊ राजा है प्रेमभयभू ये तो पाठमें रूपसीचवहै प्रेमकी आकृति ये दोऊ सचिवहें मंत्री अरु संकोच शोच अरु विरह विनोद ये चारयो पीटहेअरु तरल तुरंग कहायोरे कौन अनिलो कनि किन की शोचकी संकोचकी विरहकी विनोद की ये चारो जो ऊपर कहे ये जब नेत्रन में आवें तब इनकी अवलोकन चार भांतिकी वैजाइ तेई तुरंगहें. कैसेहें तुरंग अनंत गति जिनकी यह तुरंगन को विशेषण है फेर इनचारोंअवलोकननापकाकी मन की पात जानी परति है कि मनमें यह मनोरथ है सो बेचारो मनोरथ स्पभये रप मनो रथ या पाठ में रहे प्यादे गुण गचिकै अब प्यादासोरह चाही सो यह यात सर्वत उपर कहो ते सोरहहें दै भूप सचिव चार फील चार तुरंग चार रथ येजो सवसो. रह तिनके गुण जय विचारियत है मेममें गुण कहा प्रेमवती नाम पायो १ भय में गुण "ण कहाँहें शीलवतीनाम पायो २ सो शील गुणहे गुण चौवीसह सोहमारो क्रियो न्याय क्तावली की भाषा न्यायप्रकाशिका मेंहें ताकी व्याख्या कावप्रिया के तिलक में रायण कवि लिख चुके प्रेमकी आकृति तै गुण कहहि प्रेमकी प्रतीति सरनको (व ३ भयकी आकृति में गुण कहाँहे शील की मतीति और निको आव ४ संको- में गुण कहा तिय को संकोच भूपण है ५ शोच में गुण कहा तियमें धर्मरीति जानी । ६ विरह गुण कहाँहै सुतती दर्शन देय . विनोदमें गुण कहाहे मीतवेग भेट ८ रिहा विलोकन में गुणकहाँहे सखी मित्रको दिखाये ८ अरु विनोदविलोकनमें गुण हाहै कि ससी मित्र मिलावे १० संकोचविलोकन में गुरु जन सराहे यह गुणहै ११ चविलोकनमेंशीलवतीसराहसोई गुणहै १२ दर्शनविलोकन में यह गुण है कि न म्पपा नाशे१३निजप्रतिष्ठामें लोकमें कहागुणहै लोक मेंस्तुति १४भेटन के मनोरपमें नमव्यया नारी यही गुणहै १५ कुलप्रतिष्ठामें परलोक मुधरै यहगुण कहे ऐसे सतरंजके साउलिसे प्रकाश से दुई वोर परीपोरानगर में पोरारा परी है याते प्रकाशसो यामें संदेह इतपत पात परकीयाकीमत स्वकीया की यहतीपूरय अनुराग रारुपी पाही ऐसांप्रेम भय २ भूप, संकोच शोच मंत्री, अरु विरहको विनोद पांपतरहको, तामें शाप बोनुरागमें नाहीं होत येचार पीत अरु तरल पंचल तुरंग यह अविलोचन श्रवण स्वपदी १ श्रवण तीन । मत्युस ४ अरु स्प मनोरयमनोरयके जे पारउपाय साममित्रमिटन दामानंदहरभेदलगाइ आपकी ससीको मिलाइदंडकुल कानि नाश करिपो ४ मा न्यादा १६ सोरह शृंगारयुत जाहिदेस आपुरीझो दुहओर परी है जोर तुम्हारीऔर बाकी भोर पोरभतिशयपनी देशव राह सोनाही जानतको वानी जीनत को हारत तुमठी माही ८ (११४) रसिकप्रिया। मिलयो चाहत अरु यह पाहत सादेखी तुमनीतत के यह ऐसी मानीको रूपकई सदि- पय साययव यात सयोगयर्णन १७ ऐसी जिनकही तिनसे यह प्रश्न कि प्रेम अरु भय दो राजहिं तो दोहुन के सचिव केशवने वर्णनकै संकोचकुलकी अरु शोच मिलनको तो दाईभांतिकी पानी चाही तहां यह अर्य फि विरह दोरीति को एक प्रच्छन्न एक प्रकार साई विनोद येई हैं अरु अपिलोकन देसन कुललाज अरु लगनकी सोभी प्रच्छन्नप्रकार शते ४ रीतिलै ते पोरे अरु मनोरय भी दोई एकहांसीतं डारियोदूसरे आपको देखत्र सोभी प्रच्छन्न प्रकाशते ४ भये सोई स्यहें अपइनके जे गुणहें ते प्यादेह प्रेमको गुण स्वरूपदर्शन एकभयको गुण एक नरहै याही रीतित सब जान लीने ॥ १८ ॥ नायकाकीप्रच्छन्नचिंता ॥ यथा-कवित्त । केशोदाससकलसुवासको निवासतनकहिकविभृकुटीविलासमा सछोलिहै । कसो हैसुदिनबड़भागीअनुरागीजिहिंइंगवाकेसंगसंगला गोलागीडोलिहै ॥ ऐसीहहैईशपुनिआपनेकटाक्षमृगमदघनसारस ममेरेउरओलिहै । दीपके समीपपुनिदीपतिविलोकवहचित्रकैसी तरीसुक्योंहहँसिबोलिहै ॥ १९ ॥ नायक हमसों कहत किंवा विचार करत ऐसोदिन है विधाता कौन है कैवा जो चित्र- कैसी पुतरी है सोहँसिक मोसोयोलैगी तोहँस बोलन के सब येअंगकहत कि अपनेरूप केगर्भते सुगंधला उससमै कहैगी मेरोतन सकल सुवास को निवास है अन्यसुगंध काहेको लगावत वाकहत समय को जो भृकुटिनको विलासहै तासों मेरे तन में जो त्रास ताको छोलडोरगी अर्थ जुदाकरि डारेगी अरु कौन दिन वह अनुरागी बड़भागी है। जा दिन मेरे इंग चेष्टा के संग चेष्टा करैगा अरु प्राचीन पुस्तकन में मेरे गवाके संग उगि लागि डोलि यह पाट है मृगमें कस्तूरी घनसार कपूर ऐसो श्यामसेत कटाक्ष नयननेश्यामता श्वेतताहै सोमेरे उरमें ओलि हैडार है यह कब है है प्रश्न अरु अभि- लाष को क्योंन कहियो उत्तर जहां विचारसों करे तहां चिंता जानिये मनसों वचन है याते प्रच्छन्न इहां पर्यायाअलंकार एक विपे जुअनेक को वास बहूपराजय सकल सुवास एक तन में जाके बसत है अरु कहूं मेरे अंग पाकेसंग लागिलागि डोलि ऐसी भी पाठ है अरु मृगमद घनसार समतात धर्मलुप्तालंकार ।। १९ ।। नायकाकोप्रकाशचिंता। यथा-सवैया। राधिकाकीजननीकोजनीकोऊक्योंहूस्वयंवर वातजनावै । देवकुमारसेगोपकुमारनिमानदेदै वृपभानबुलावै ।।
भापाटीकासमेत। केशवकैसहुँवालभलीबहुमालसुमेरेहिये पहिरावै । तोहिसखीसमदेसँगवाकेसुक्यों यहवातसबैवनिआवै ॥२०॥ नापक वचन बहिरंग सखी सोंकि राधिकाकी माताकी सखी स्वयं घर बनावै अरु वृपभालु गोपन को आदरसों बुलावे अरु रावा.मेरे गरमें जयमाल डारे अरु तोहि सखी समदै विवाह की विदाको कहत संगवाके वा राधा के संग ऐसी बात क्यों बनि आवत सखी अंतरंग होती तो यान कहते कि तोको संगदेहि याते प्रकाश देव कुमारसेमें धर्मलप्ता अलंकार अरु प्रेमीहे ॥ २० ॥ अथगुणकथनलक्षण । दोहा-जहँगुणगणमाणिदोहंद्युति, वरणतवचनविशेष । ताकहँजानहुँगुणकथन,मनमथमथनमुलेप ॥२०॥ जहां गुणगण मनमें राख अरु युतिको वरण विशेष कारकै मन्मय का मलेख करिकै ॥ २० ॥ नायकाकोप्रच्छन्नगुणकथन ॥ यथा-कवित्त । कीरतिसहितनितकेशव कुँवरकान्हकेवलअकीरतिनृपतिसोम मानिये। छुवतचंपकपातकुम्हिलातजाततनअतिहरपितगातहरिजू को जानिये ॥ कोमलसुवासयुतप्यारेकेपरमपानिकंटककलितना लनलिनवखानिये । लोचन विशालचारुमदनगुपालजूकेमदनसरन दरशनरसहानिये ॥२१॥ उक्ति नायकाकी मनसों। कि कुँवर कान्ह कीर्ति सहितहें ब्रजराज सदा गुतिवान अरु सौम जो शशि है सो केवल अकीरत है एक तौऋक्षराजसदाछीन कलंक युत दिन मलीन अरु चंपक पात छूते कुंभिलातहै अरु हरिको गात अति हर्पित होतहै अरु प्यारेके पानकोमलहें औसुवास युत, अरु नलिन कमल कंटक युत, अरु मदनगुपालक नेत्र विशाल, मदन शरद रसते हीन अर्य मदन सरन में दर्शन रसनाही एकतो उनमें दृष्टि- नहीं दूजे वे दीसत नहीं इहाँ नायकके गुण पस्तुते उपमानके दूपण ताते दूपणोपमा मनसों कहत याते प्रच्छन्न जानिये ।। २२ ।। नायकाको प्रकाशगुणकथन यथा-सवैया। संजन,मनरंजनकेशव रंजननेनकिधोंमतिजीकी। मीठीसुधारसकीसुधाकीद्युत्तिदंतनकोकिधोंदाडिमहीको । चंदभलोमुखचंदसखीलखि सुरतिकामकी कान्हकीनीकी । कोमलपंकजकैपदपंकज प्राणपियारेकीमूरतिपीको ॥ २२
(११६)
रसिकप्रिया।
उक्तिनायकाकी पहिरंग सस्तीस कि संजन मनरंजन हैं कि नायक के नेत्र मनर
तूं जीकी मतिमोगों का मीठी सुधाकी है कि सुधाघर अधरकीहै गुति दंतनकी नी
किती दाडिमहीकी है चंद भलोहै कि मुराचंदसूरति कामकी माहीहै कि कान्हकी को-
कमलहें किपदई तय ससीकहत कि प्राणपियारे कीरति पीकी है जेसेकोई कह यदा-
पीकोभये यामनाही बहिरंगसस्सीसोंकहत ताते प्रकाश सप्तरीक उत्तरतं उत्तरालंकार :
मान उपमेयकी घरापरी के संबंधते सारोपालपणागुण कयनतें गौनी अरु सुधावर
अधरको नाम नाही ताते रूपकातिशय रक्तिको संकरहै ।। २२ ॥
नायककोप्रच्छन्नगुणकथन । यथा-सवैया।
जोकहोंकेशवसोमसरोजसुधासुर गनिदेहदहेहें।
दाडिमकेफलश्रीफलविद्रुमहाटककोटिककप्टसहेहैं ।।
कोककपोतकरीअहिकेसरि कोकिलकीरकुचीलकहेहैं।
अंगअनूपमवात्रियकेउनकी उपमाकहँ वेईरहेहैं ।। २३॥
उक्तिनायककी मनसों कहतहें जोमुख चंदकी उपमा कहियेतो सोमके अंग सुद
सुरति नदह, एककलानित्तलेतहैं सरोजकहो नेत्रनकी उपमाको ती सरोजनकी मुंग
दह्योहै अरु दाडिम तौ वनमें शीत उप्ण वर्षा सहत, अरु कोक आदि कुचील हैं।
ते उन अंगनकी उपमाको ये सय नाहीं इहादूपणोपमा अरु अनन्वय को संकर है मना
कहत यातें प्रच्छन्नं ॥ २३ ॥
नायकको प्रकाशगुणकथन ॥ यथा-सवैया ।
लोचनवीचचुभीरुचिराधेकीकेशवकेसहूंजातिनकाढ़ी।'
मानहुमेरेगहीअतुरागिनिकुंकुमपंकअलंकितगाढ़ी।
• मेरीयालागिरहीतनुताजनुयोंद्युतिनीलनिचोलकीवाढ़ी।
मेरहीमानौंहिये कहुँसुंघतियोंअरविंदादेयमुखठाढ़ी ।। २४ ॥
नायक वचन सखीसों-कि लोचन के बीच मैं राधाकी रुचि मोहि चुभी हे सो का
नहीं कुंकुम पंकजी लगी है सो मानों मेरे अनुरागिन गहहि कलंकित भी पाठ है अर
नील वसन नहीं जानी मेरी तनुता लगी है अर्थ अंगक रंगसों है मानों अरु जो र
कमल सूंघत सो मेरे हृदय कमल मानों हाथके लिये हैं ऐसे गुण देहात वर्णत है की
अरुविंद लियेठाढीदेखी हैयातें प्रकाश इहां वस्तुउत्प्रेक्षालंकार जानिये मानों दयाते२॥
अथ स्मृतिलक्षण।
दोहा-औरकळूनसुहायजहँ, भूलिजाहि सयकाम।
मनमिलियेकीकामना,ताहिस्मृतिनाम ॥ २५ ॥
भाषाटीकासमेत । (१९७) मनमें कामना और सब भूलि जाहि ध्यान सा लग्यो रहै सौ स्मृति है ॥ २५ ॥ नायकाका प्रच्छन्नस्मृति ॥ यथा-सवैया । वोल्योमुहाइनखेल्यो हँस्योअरुदेख्योसुहाइनदुःखबढ्योसो। नीकीयोंचातसुनै समुझेनमनोमनकाहूकेमोदमढ़योसो।। केशवढूंढतयोंउरमेंमनमूढ़भयोगुणगूढ़पढ़योसो। कोकरेसाजवजविकोपीनहिवाकोकछूचितचाकचढ़योसो ॥२६ उक्ति अंतरंग सखी प्रति अंतरंगकी किवा नायकाकों बोल्पोनही सुहात नखेलियो सेबो न देखबो सुहाइ बढ्यो सो दुःख भयो है यह नीकी बात कोई कहैती न सुने समुझै मनोकाहूके मोदमै मन मन्यो है मनमें कैसे ढूंढति है जैसे पढ़िके गूढ़ गुण मूट जाइ फेर ढूँढन लगे हमारो कहा पोहे को साज करे को बीन बजावै पाको मनती कसो चढौहै इहां नायका को विरह वस्तुते व्याघात अलंकार सुखद दुःखंदह चित्तको चाकचट्यो सो बतायो स्मृति इशा सखीने नहीं जानी यति प्रच्छन।। २६॥ नायकको प्रकाश स्मृति । यथा-सवैया । मेरेमिलायहीयेमिलिहोंमनमोहनसोमनमीहिनदीजै। मौनहिमोनवनेनकळू अवक्यों मनमानदकेरसभीजै॥ ऐसहीकेशवकैसेजियौअहोपाननखाउतोपान्यौनपीजै। जानिहेकोऊकहाकरिहौ तबसोचिनएकतौसकोचतोकीजे ॥२७ सखी पचन नापका सोजानहै कोऊ तम कहा करिही तब नायकाकही यह शोच- ही काहे सब जानति तब सखी कही संकोच तौ राखिये पान नाही खातीतो पानी पीयो यामें लोग इंसिंह ऐसी निपटलीन रहति पियसोनायकाने कहोसब जानतिही ही मकाश इहां उपादान लक्षणजहां आनकोगुण गहै तो पानीत भोजन पान आयगये मा उत्तराको संकरहै ॥ २७ ॥ नायककोप्रच्छन्नस्मृति ॥ यथा सर्वया । पोरिचनोपनसारपस्यो घनश्यामसुचंदनछ तन तूल्यो। केशवकुंजको कूल चितेप्रतिकूलभयेशुभफूलेनफूल्यो। भूलेसेडोलतबोलत हूं उतजात कितैमन संभ्रमभूल्यो । जानतिहीं यह काहुको आजुमनोहरिहारहिंडोरनझूल्यो ॥२८॥ सखी पवन नायक सौ कि घोरकै घने धनसारकपूर पस्यौसो हे घनश्याम सुंगंधन ल्प तुम्हारे चित्तते तनकी तूल द्वैगयो कहाश्याम ही वैगयो अर्थ जरकर उठगयोअंरु ..
(११८) रसिकप्रिया। कुंजको कूलभी तुम्हारे चित्ततें प्रतिकूल बैगयो कैसोई कुंज जोशुभ फूलनिफूल्यो तामें मन तुम्हारो संभ्रम भूल्योहे किंवा सव फूलनफूल्योभी पाठ है तहां प्रतिकूल दैगयो कड़े सब फूलन फूल्यो तिहारे विरह की तापते भूले से डोलतही अरु घोलत हो उत कित जात हौ मन भ्रमसहित करिकैसी मैं जानतहीं तिहारोमन काहूके मनोहरिहारकै झुटामें- झूलोहै इहां सखी अनुमान कर कहत ताते प्रच्छन्न अनुमानालंकार अरु कोई यह प्रश्न करत जी नायकको मन संभ्रम भूल्यौ कहिये तो हारहिंडोरा निर्धार सस्ती ने जान्यो तो प्रकाशही द्वैगई जो कहै मेरो मन संभ्रम भूल्यौ तौ प्रच्छन्न है तहां मन शब्द एक और चाही हार हिंडोर कौन झुल्यो है।उत्तर-चितको अर्थ चितही तुम्हारो प्रतिकूलमयो है कुंजके कूलते अरु चित्त ही उहां लग्यो हार हिंडोरा झल्योहै के यह मेरे मन संभ्रम है सखी स्मृतिदशा निर्धार नाहीं जानति यातें प्रच्छन्न अलंकारव्याघात ॥ २८ ॥ कृष्णको प्रकाशस्मृति ॥ यथा-सवैया ।. वासनवासभयोक्सिकेशव डासनडासनकीगतिलीने। चंदनचांदनीज्यों चितचाहैन चंद्रकवंदचितारसभीने ॥ पाननखातन पानकरैकछुहांसविलासविदाकरदीने। ऐसीहैगोकुलकोकुलकी जिनिगोकुलनाथकेजेढंगकीने ॥२९॥ योसनवस्त्रयास मुगंधडांसनविछौना डांसडांससस्सी बहिरंगहै सोजानति नायवाको नहीं जानात यात प्रकाश इत्यादि चिता समानते चंद्रकपूर व्यापातालंकारजानिये॥२९ अथ उद्वेगलक्षण। दोहा-दुसदायकव्हेजातजहँ, सुखदायकअनयास । सोउद्वेगदशादुसह, जानहुकेशवदास ॥३०॥ मुखदायक अनयास दुःसदायक होनाय सो रदेग की दुसह दशा है ।। ३. मियाकोप्रच्छन्न उद्वेग ॥ यथा-संवैया। चंदनहीविपकंद हेकेशवराहुयहीगुणलीलिनलीनों। कुंभजपावनजानिअपावनपोखेपियोपचिजानिनदीनों॥ यासोंमुथापरशपविपापरनामधरोविधिहेविधिहीनों। सरसोमाईकहाकहियेनिनपापलेआपरावरिकीनों ॥ ३१ ॥ रक्तिनापी मनमा तिमि पंदनादी विपकी मरहे राष्ट्र यह गुगते सीर नहीं रेतनु चुनर वा पवित्र तिनपान कियो ताले अपवित्र धोग त गयो पनि दाल दिया ना मा ती मुभा अटस वाहत भर पर याद शेष इनार मन भाषाटीकासमेत। (११९) ने क्षमा धारण करें यह एक मुखते लाख वियोगिनी को नाश करतहै सो विधि सिख रोधि हीन है बुद्धिद्दीन पाठ में बुद्धि ते हीनहै परंतु सूर्य सों काकहिये ऐसे पापीको भाप बराबर करो यामें कोई यह प्रश्नकर कि चंदसों दुःख पायो अरु शेषसों कहासुख यो जो कहति याको विषयर क्यों कह्यो अरु सूर्यने वरामरि कहाकियो सूर्यलोक प्णहै चंद्रलोक शीतल है अथवा सूर्यदिनकर चंदनिशिकर यह विरुद्ध ताको उत्तर रहहै कि शेषके मुख हजारहे तो मुखते महादुःख देनहार जो पवन है ताको भक्षण करत याते हितकारी कह्यो अरु सूर्य चंद्रमाकी कला मिलाइलेत अमावसको आपुने राबर धारण करतं, याते चंद्रमा सूर्यके परावरि भयो पापीको घरावर आपक्यों किया महाँई व्यापात प्रतिषेधालंकार पूर्ववत् है ॥ ३१॥ नायकाकोप्रकाशउद्वेग । यथा-सवैया। केशवकाल्हिविलोकिभजीवहआजुविलोकेविनासौमरैजू । वासरवीसविसेविपमीडियरातिजुन्हाईकीज्योतिजरेजू ।। पालिकतेंभुवभूमितँपालिकालिकोरिकलापकरैजू । भूपणदेहिकब्रजभूपणदूपणदेहिकोहेरिहरैजू ॥३२॥ सुगम । सखी नायकसों कहतहै कि काल विलोके आजुविन विलोकैमरसिंह बासर दिन) में विष में मीजी रहत अरु रातितो जुन्हाई की ज्योतिते जरीजात जे पालिकहें तेनते भुव भूमि ते पलिक हो रही है आलीकरोर कलापकरतिहे वहिरंग सखी ते प्रका राकाहे नायकाके समाधान हेतु भूपण मांगत पाके मनकी वात नाही जानति अंतरंग ससी होती तो नायकको लिवाय जाती ताते तुम हे ब्रजभूपण धाकेनिमित्त भूपण देहु जा. वाकी देहको दूषणनाश होहि पालिकतेभुव भूमितेपालिक आली करोरि कलालि करेनू या पाठ में अत्यंतउद्वेग है अलंकार व्याघात ॥ ३२ ॥ नायकको प्रच्छन्नउद्वेग ॥ यथा-सवैया। मेघनज्योंहँसिहंसनहेरतहंसनज्योंघनरूपनपी । कंजनज्योंचितयंदनचाहतचंदनज्योंकजनिक्योहुँछीवें॥ तालतेंवागनिवागतालनितालतमालकोजातनिसावें। कैसीहेंकेशववेयुवतीसुनिऐसीदशापियकीपलजीवें ॥३३॥ नायका ससिन में बैठी है तहां अंतरंग समी प्रस्ताव ते पियकी वात नापकाको मुनाइके कहत है कि युवती कैसी हैं जे ऐसी दशा मुनिके नायक की पल आरजीपती है अर्प नायक की दशा ऐसी है तू जायके मिल नायक की दशा भेष हंसको परसर पर है तैसे मेपन की रीति ते इस इंसनकी रीति ते मेयन देयत है कंजन की रीति ते (१०) रसिकप्रिया। चंदनहीं देरत भर चंदनकी रीतिते कंज नाही परसत तालके यागनमें आवत अरू पागते तालन में भरु जहां ताल तमाल दोई है ॥ तहां नाहीं जात यात संकेत सूचित, मस्तायते करो ताते प्रच्छन्न है जो सती अंतरंगते अलंकार व्यापात पूर्ववत् ॥ ३३ ॥ नायकको प्रकाश उद्वेगाायथा सवैया । शोचिससीभरिलेतिविलोचनकांपतदेखतफूलेतमालहि । भूलेसेडोलतयोलत नाहिंनवागगएकिधोंतेरेईतालहि ॥ देख्योजुचाहतिदेखे नआवतिऐसमेंहोंनदिखारीलालहि । आजुकहादेखेसाधिलगोजवदेख्योमुहाइकछूनगुपालहि ॥३४॥ उक्ति पहिरंग सखी की नायका प्रतिशिौच ते नेत्र भरिरलेत भरु फूले तमाल को देखिके कंपत भ्रमेसे डोलत काई तेरे बागमें कयहूं तेरे ताठप और देखें चाइव सी नाही देखिपरत ऐसी में ही न दिखाऊंगी लालको आजु तुम्हें कहादेखियेकी इच्छा लगी है जम गोपालको कळू नाहीं सुहात इहां सस्ती बहिरंग है देख्यो जु चाहत याने प्रकाश ते अलंकार पूर्ववत् ॥ ३४ ॥ अथ प्रलापलक्षण। दोहा-भ्रमतरहैमनभौरज्यों हैतनमनपर ताप। वचनकहैप्रियपक्षसों,तासोंकहतप्रलाप ॥३५॥ मनती भ्रमत रहै अर्थ एकजगह थिर न रहै अरु वचनकह सो वचन व्यर्थ कहै ॥ प्रश्न अमर कोशमें यह कह्यो है "कि प्रलापोनयंकवच तो प्रलाप यहिये या घर- नको नाम भयो सोया लक्षण में नाहीं निकसताउत्तर-मियपक्ष वचन कहै अथवा प्रिय पक्ष को ऐसो अर्थ कीजिये कि जैसो जाको व्यसन होइ सोई पकिये में आपत है. "भावत है मनमें सदा ॥ हेतनमन परिताप ऐसो भी पाठ है ॥.३५ ।। नायकाको प्रच्छन्नमलाप | यथा-सवैया। खेलनहाँसीनखोरिअटाउनहेतुनवैरहियोपैहोसों। लेनोनदेनो हलाउभलाउरनातोनगोतोकहाकहौंतोसों ॥ आनिदियोमुखमेंदुखकेशवकैसेहँसोरीकहाकहिकोसों। नैननिनीरभरेकहैग्वालिनिदेख्योतकान्ह कहाकह्योमोसों॥३६॥ सखी बहिरंग आन सखी सों कही इन ग्वारिन कहा कह्यो मोसों सो में न जानी जो . मायकाने प्रलाप के वचन कहेहैं आइके सखी सों सो ऊपर ते बचन नायका पर घृयावाक, सेलन हांसी यह ऊपर कह्यो है"धैरु न हेत हियो का परसा भी पाउ ।
भाषाटीकासमेत ।
(१२१)
क "कहति कसे हँसोरी कैसे सहोरी" भी पाठ है ।। अरु कहा कहि कोसों देखो तो कान्ह
सब पद अलम, ताते प्रलाप अरु इन सखी कळू न समझेउ याते प्रच्छन्न परंतु
में प्रलाप मात्र निकसत पचन नाहीं है तहां नायका कहति देखतौ कान्ह मोसोंकहा
यो मिलनी कि नाही नभरी भरी ग्वालि कहै अलि” यह भी पाठ है अलंकार पूर्व-
4
नायकाको प्रकाशप्रलापायथा-सवेया।
आलिनमांझमिलीहुतिखेलति जानकोकान्हधोंआयेकहातें।
डीठिहिडीठिपरचोन कछूमुढिठाईगहीहठिपीठकीपातें ॥
गईगडिलाजनहींहियहाँताउठीजरिकोसवकाँपनीयातें।
इतीरिसमैंनसहीकवहंपरहीपचिहौंअंखियानकेनातें ॥३७॥
खर वचन नायका के बहिरंग सखी न पति ॥ नायकाको देखि जो सात्विक कंप
को ताको छपावत कि आजु में आलिन में खेलत रही तबलों कोजाने कान्ह कहां ते
ए सो जब सौ डीठ डीठ सामुहे भई तब दिठाई पाने गही इठ पीठ कीपातते तव
लाज में गड़ि गई अरु जरि उठी ताहीते कांपति ही अरु इतनी रिसमें नहीं सही
कयहूं पै बचिगई केवल आंखिन के नाते ते इहां प्रीति दुरावति है अरु सबसों कहति है
मलाप में प्रकाश विरोधाभास अलंकार परि उठी गडिगई यहविरोध सो लगत मला.
आविरोध है ॥ ३७ ॥
नायकको प्रच्छन्नमलाप ॥ यथा-सवैया।
नीलनिचोलदुराइकपोलविलोकतिहींकियेओलिकतोही।
जानिपरीहंसि वोलतिभीतरभाजिगई अविलोकतिमोही।
बूझिवेकी जकलागीहेकान्हहिकेशवकैरुचिरूपलिलोही।
गोरसकी सोंववाकीसों तोहि किवारलगीकहिमेरीसॉकोही॥३८॥
उक्ति अंतरंग सखी की कि आजु मोहिदेस नील निचोल वस्त्र ते कपोल दुराह
हेदेखि भाजगई अरुमोको यह जानिपरी हंसि कि भीतर घोलति है कान्ह को जक
बाकी लगी है कि रुचिरूपलिलोही लालची होईकै मिलोहों भी पाठहै सोतोकासप-
३ कि पारलगी सो कहकौरही ऐसे मोसोंकहत रहे. यहां जान परी अरुकोही
दोऊशन्द विरुद्धहें याही ते प्रलाप सस्ती अंतरंग ते प्रच्छन्न स्वभावोक्ति अलं-
नायकको प्रकाशमलाप ॥ यथा-कवित्त ।
मोहनमरीचिकासोहांसघनसारकैसो वास मुख रूपकेसोरेखाभ
दातहैं । केशोदासवेणी तौत्रिवेणीसीवनाइगुहीजाममेरे मनोरयभु
र॥ ३८॥
(१२२) रसिकप्रिया। निसेअन्हातहैं ॥ नेहउरझेसेनेनदेखिवेकोविरुझेसेविझुकीसीभौहेत- झकेसेउरजातहैं । देवीसीवनाईविधिकौनकीहैजाईयहतेरेघरजाईआ जुकहिकैसीवातहै ।। ३९ ॥ यहांजो बातें कहत है सो सब अमिलापहें ताते प्रलाप के नेहमें उरझेसे नयन यामें नायका नेहवती जाके बै नउरझे प्रेममें अरु उरझे से उरजातंहें यामें मुग्या षय संधिम प्रलाप अरु तेरे घर आई जोसो कहत है सो पहिरंग याते प्रकाश मोहनमरीचिका सो हास यामें पूर्ण उपमा हास उपमेय मोहन धर्म सो वाचक मरीचिका उपमान धन- सार कैसी वास में लुप्तावात मुपरूपकी भी पाठहै ॥ ३९ ॥ अथ उन्मादलक्षण । दोहा-तरकिउठेपुनिउठिचलै, चितैरहैसुखदेखि ॥ सो उन्मादगनावही, रोवैहँसविशेखि ॥१०॥ तर्कना कर उठिचले पितरहै सुख देखिकै अर्थ सुख न माने ॥ १० ॥ नायकाको उन्माद ॥ यथा-सवेया। केशवसुबुद्धि सिद्धहरि तुम विनवृथा अगाधराधिहिबाढ़ी । छूटीलटलटकति कटि तटचितवतिनीठनीठकरठाढ़ी ॥ तरकितोरतितनुतलफतिअतिअपारउपचारनिडाढी। सकसकांतिलैश्वास अचेतसुचेतहुप्रेमप्रेतगहिगाड़ी ॥ ११ ॥ सुबुद्धि सिद्धि हरि ए तीन शब्दसंबोधन के काहेको कहे ऐसी कोई कहै तहां सखी अंतरंग है सब नायक नायका के भेद जानतिहै कि तुमकदो घाको फछू व्याधि भा हूहै सो ससी कहति तुमको सय मुधि पुद्धिहुँदै अथवा तुम मुसुंदर विधियुद्धिवारे हो जोरोग है सो जागत हौ कदाचित्कहाँ हम कैसे जाहि आन के घरमंती तुम सिदी सिद्धनहां चाहे तहां जाप कही पीर कैमे हरतो तिहारो नाम हरिहै हरणकरताही अंतरंग ससीते मन्टन प्रेम प्रेतको रूपक अरु सुबुद्धि विशेषण हरि साभिमाय है ताते परि- करांकुर अलंकार " केदार मुषियुद्धि रदै तुम्हें विनु रिया अगाप राधिकाहि यादी" भी पाउदे ॥४॥ नायकाको प्रकाशउन्माद ॥ यथा-सया । केशवचीकतिसीचितवेक्षितिपांधरकेतरकेतकिछाँहीं। वृझियेऔरकहेमुसोरममारकीऔरभईक्षणमाहीं।।
भाषाटीकासमेत
(१२३)
डीठिलगीकिधीवाइलगीमनभूलिपरयोकैकरचौकछुकाहीं।
घुघुटकीपटकीपटकीहरिआजुकमुधिराधिकैनाही ॥ ४२ ॥
सुगम । सस्ती पहिरंग ताते प्रकाश संदेहालंकार ॥ ४२ ॥
नायकको प्रच्छन्नउन्माद ॥ यथा-सवेया।
गृढ़अगूढप्रकाशितवात निलोकअकोलककीवातसरीसी।
रोवतहकवहूंहंसिंगावतनाचतलाजकीयाँहछरीसी ॥
काहूकोशोचुसकोचुनकेशवदेखतिआवतिदेहमरीसी।
बामकिवाइकिकामकिवाइकिहैहरिकीमतिकाहूहरीसी ॥ ४३॥
यामें सखी निश्चय नाही करो कि कहाभयो ताते प्रच्छन्नसंशयालंकार ॥ ४३ ।।
नायकको प्रकाशउन्माद । था-कवित्त ।
सजलचकितचितवतचितचहूदिशि,चाइचाइरहमुखचपलचलत-
धाइ । शोचतसेमनमनकंपततपततन केशोदासरोवतहँसतउठे-
गाइगाइ ॥ चलहिदिखाऊंतोहिंदेखतहीभयोमोहिं भयोसुकहनआई
नोसोंकलिअकुलाइ । जैसेकछुअकवाकुचकतहैंआजु हरितेसेजिन-
वमुखकाइकोनिकसजाइ ॥१४॥
सखी बहिरंग है कहति कि बलि तोकों दिखाऊं ताते प्रकाश जात्यलंकार ल• जैसो
को रूपगुण कहिए तैसा साज ।। यहां सजल बकित ए भाव कहे ताते भाव सब
गां॥४४॥
अथ व्याधिलक्षण।
दोहा-अंगवरणविवरणजहां, अतिऊंचोउश्वास ॥
नैननीरपरतापबहु, व्याधिसुकेशवदास ॥ ४५ ॥
सुगम ॥ ४५ ॥
नायकाको प्रच्छन्नव्याधि॥ यथा-सवैया।
वैनतज्योउनवीनतेंवोल्यौनवोलिविलोकतिबुद्धिभगीहै।
वेनमुनैसमझेनतवातहितलग्यौकियोंप्रीतिजगीहै ।
केशववेतुहितोहिरटरटतोहिंइतैउनहींकीलगीहै।
वेभपाननपानीनतूमुतोकान्हठगेकितूकान्हढगीहै ॥ १६ ॥
E
।
एसी अंतरंग दे ताने प्रच्छन जड़ता कहतहें सरे उपचारते शीतल हामी
तेसरी एमे में भान करे तो आन दोजाइ इत्यादि पद सब मुगम पंचम दि.
प्रियाको प्रकाशजड़ता ॥ यथा-सर्वया।
मंसियानिमिठीसखियांनिमिलीपतियानमिलीमतियांतमि
ध्यानविधानमिटीमनहींमनज्योंमिले एकमनोमिलसोने !
पणप्रेमसमाधिमिलें मिलिजह तुम्हें मिलहोतयकोने ॥६
पर मो में मनोमय कि मानेसो मिलेग्यों एरये मताही परत
मन मिटर कालोमिविही भयं किसमापिसी भाई है पूल
की मनपान क मंगमिटीयाम प्रसता प्रेमालंकार
रसिकप्रिया।।
सखीसंशय करतिहै कि तोकों कान्हनेठगहें किवं कान्हकोठगे यह संदेडते प्रकार
संदेहा को संकर अर्य सुगम ॥ १६ ॥
नायकाको प्रकाशव्याधि ॥ यथा-सवेया।
उनकेतनतापतैंतापियेह्यांइनकेतनतोअंशुवानअन्हैयें।
व्हाँउनकेउड्यैउसासनियांइनकैउपचारजुडेय ॥
केशववेवृपभानलडीनंदलालनएपैनिदाननपैय।
एकहीवेरदुहूंनिकहाभयौ माईयहचलिदेखिडरै ॥ १७ ॥
आंशु श्वास ते व्याधि दोउन को ताते न्यारो न जानिये प्रेमालंकार ॥ ४७
अथ जडतालक्षण ।
दोहा-भूलिजायसुधिबुधिजहां, मुखदुख होयसमान ।
तासोंजडताकहतहैं, केशवरायसुजान ॥१८॥
मुषि युधि भूलजाइ मुत दुःख समान होय सो जड़ता ॥ १८ ॥
मियाको प्रच्छन्न उताज ॥ यथा-सवैया ।
सरेउपचारखरीसियरीसियरेतैखरोईखरोतनछीजें ।
ऐसमंआरकिएतकछूउपजैतसकेलकहाहमलीज ॥
देखतहीयहकामलताकुम्हिलानियेजातिकहाअवकीज।
कौनपैजाउँकहाकरोंकेशकसजियवहक्योंहमजीनें ॥ १
केशवकसहुँगिमिठीतनव्हहेवहेहरिजोकछुहोने !
ईशार कारण काविरुद्धते ॥ १९ ॥
भापाटीकासमेत। (१२५) नाययको प्रच्छन्नजडता ॥ यथा-संवेया। पलही पलशीतलहोतशरीरविचारसबैउपचारनिदानें। जोकरियेतनखंडनमंडनचित्तकछूमुखदुःखनआने ॥ केशवकानसुनैसमुझेनहिझियकौनहिंकोयहमानें । योगलियोकैवियोगहैकाहुकोलोगकहाइन रोगनिजानें ॥५१॥ सुख दुःख चित्त नहीं समुझे है यह जड़ता जोगहै कि वियोगहै यातें प्रच्छन्न संदेहा लंकार ॥ ५१ ॥ नायकको प्रकाशजड़ता ॥ यथा-सवैया। कान्हकेआसन वासन हीन हुताशनमीतकोपासनकीजै । केशव इंद्रिय सोधिसबैमन साधिसमाधिनकेरसभीजै ॥ जौलोभये हरिसिद्धप्रसिद्धनतौलों विलोकिअलोकनलीजै । देवीकरैतपितोलगिवेवरदाननजोजियदानतोदीजै ॥१२॥ हुताशन मीत पवन को मासन भोजन करत है और समाधिके सरसभीजेहैं हहां जड़ता की तो लगि तप करें हैं या अपन जान यो जतायो सो पहिरंग है संभावनालं- कार जो घरदान नहीं तो जियदानहूँ दीजै जौ तौ ए शन्द पूरे ॥ ५२, ।। अथ मरणलक्षण । दोहा-बनेनकेहूंमिलनजहँ छलबलकेशवदास । पूरण प्रेमप्रतापते,मरनहाहि अनियास ॥५३॥ मुगम ॥ ५३॥ दोहा-मरणमुकेशवदासपे,वरणोंजाइनिमित्त । अजरअमरतासोंकहैं कैसेप्रेतचरित्त ॥५४॥ अजर अमर जस कार कहीं भी पाठ है सुगम ! ५४ ॥ दोहा-रतिउपजैरमनीनके पहिलेकेशवदास । तिनकी इंगितजानसखिकरतसुप्रेम प्रकाश ॥ ५५ ॥ दोहा-अति आदरअतिलोभतें,अतिसंगतितमित्त । साधुनिहूंकोहोतिहै,केशवचंचलचित्त ॥५६॥ मुगम ।। ५६ ॥ a (१२६) रसिकप्रिया । दोहा-सुभगदशादशमेंकही, उपजेपूरनराग। जिहिंविधि उपजैमानमन, वरनहुँ सुनहुं मुभाग ।।६७॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितार्या रसिकप्रियायो विप्रलंभशृंगारपूर्वानुरागवर्णनं नामाष्टमम्प्रकाशः ॥ ८॥ सुभग दशा दशमें कही हैं कि पूरनराग कहिये प्रीति उपजे है अब निहिं विधि मनमें मान उपजे सो परणत है। हेभाग्यमानपुरुप मुनो ॥ ५ ॥ इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्या- ज्ञाभिगामिललितपुरनिवासिहरिजनकवीश्वरात्मजेन सरदाराख्यकवीश्व- रेण विरचितायां रसिकप्रियायां भूपणे सुखपिलासिकानामटीकायां दशदशावर्णनं नामाष्टमःप्रकाशः ॥ ८ ॥ अथ नाम लक्षण। दोहा-पूरणप्रेमप्रतापते, उपजपरतअभिमान । ताकीछबिकेछोभसों, केशवकहियतमान ॥१॥ सुगम ॥ १ ॥ दोहा-मानभेदप्रकटहिप्रिया, गुरुलघुमध्यममान। प्रकटहिंप्रीयप्रियानप्रति, केशवदासमुजान ॥२॥ सुगम ॥२॥ गुरुमान । दोहा-आनिनारिकेचिन्हलुखि, कैसुनिश्रवननिनाउ । उपजतहैगुरुमानतहँ, केशवदाससुभाउ ॥३॥ संगम ॥ ३ ॥ नायकाको चिवदर्शन प्रच्छन्नगुरुमान ॥ यथा-सवैया। आजुमिलेवृषभानकुमारिहिनंदकुमारवियोगवितेके । रूपकीरासरस्योरसकेशवहांसपिलासनिरोसरितैके। वागेकेभीतरदेखिहियेनखनेननवाइरहीमुइतके। फूलहिमेंभ्रमभूलिमनोसकुचेसरसीरुहचंदचितके ॥४॥ वृषभात सूताको नन्दकुमार वियोग बिताइ मिले रूपकी राशि सों नायकासा रस्यो बहुत अर्थ रस लियो अरु हास बिलास रोस रीतिकै फेर यागेमें आन तियाकी देखी तय नयन कैसे नवाये जैसे कमल चन्दको देख्न संकोचि साय हा भाषाटीकासमेत । (१२७) रोस रीतकै कहा लघुमान छुटाइ अंतरंग अंतरसों कहत याते प्रच्छन्न उत्प्रेक्षा अलंकार "बागेके भीतर देखिहियेनखरेख बनाइ रही" भी पाठ है ॥ ४ ॥ नायकाको प्रकाशगुरुमानश्रवणते ॥ यथा-सवैया । बूझतहीवहगोपीगुपालहि आजुकछूहँसिकैगुणगाथहि । ऐसेमेंकाहूकोनामसखीकहिकैसेधौंआइगयोवजनाहिं ॥ खातिसवापतिहीजबिरीसुरहीमुखकीमुखहाथकीहाथहिं । आतुरव्हैउनआंखिनतेशुआनिकसेअखरानिकेसाथहिं ॥५॥ गोपकुमारी यूझत बतरात रही नन्दनन्दनके साथ ता समय हरिके मुखते आन गोपी को नाम निकसो सो सुनि जो बीरी सात खवावत रही सो जहां की तहां रहि- गई अरु उन अखरान के साथ अँशुआ निकसे ती सहोक्ति अलंकार कही चाहिये परंतु इहां अपर कारण अंशुवा कारजकी चपलता है ताते चपलातिशयोक्ति जानिये ॥५॥ नायकाको प्रच्छन्नगुरुमान। दोहा-लोकलीकउल्लंपिकछु, प्रियाकहेजयबैन । उपजतहेगुरुमानतहँ,प्रीतमकेउरऐन ॥६॥ लोक की मर्याद उल्लंघके नायका कुछ बात कहै तहां गुरुमान प्रीतमके उर- रूपी घरमें उपजे ॥ ६ ॥ कृष्णको प्रच्छन्नगुरुमान ॥ यथा-कवित्त । ऐसीऐसीरतिराचेसोहनकेसांचेश्यामदेखोंआनिवांचिकिषोंकौन कियेचीठीहै । मुनहुसभागपाईरावरीयेपागमहँकागदकेरूपहूमुआग कोअँगीठहै ।।जानतिहोंएहीमगपायोहैजनमजगौहअविलोकनकी वीथीतुमदीठीहै । काहेकोकहावतकटुककालकूटसीएकह्योहरिहरें हसिहमकोतोमीठीहै ॥७॥ नापका नायक सौ कहत याते प्रच्छन्न चीटी पागमें ताको आगि कहनी यह लोकली फरलंपनी याते गुरुमान भयो इहां कारणते कारजको ज्ञान जैसे रजवर्षातकीच वाते भनुमान ॥७॥ नायकको प्रकाशगुरुमान ॥ यथा-कवित्त । आपनसोआपनेहींआगेकहियतकिधोंसोरकेखजानेखोरहीमेसो लियतहै। डीठहूतौरोकियतजोरकहूंजाइकेशोऔरकहूंनेनटेछरीसों रसिकमिया। छोलियतहे ॥ वेईघनश्यामजिनविनपनीघरनीनिधरीहपनेपन सारपोलियतहै । बोलतहाँकैसेऐसेयोलोजैसेवोलियतमोलहूलियस ऐसे बोलवोलियतहै ॥८॥ उक्ति नायका साँसखीकी । कि आपनेसो आपनेई आगेवात कहने परतीहैं कहूं वाई- जो खोरहै ताके खोरन में गलीन में सजाने सोलियत है दीठ तो रोकत है जोरक- कहूं जाइ तौ जात नहीं देत अरुका नैन छुरीते छोलेजातहै जे वेई घन श्यामहें जिन बिन बहुत घरनी मिठुरे घनसार घोरतीहें बोलती कैसेही ऐसे बोलो जैसे सब बोली मोलहूके लयेते ऐसे बोल नहीं बोलियतु जैसे तुम बोलती तहां कोई कहै सस्त्रीकोअप- राध दुरायो चाहीये तो जाहिर करति कि जिन पिन धनी घरनी घनसार घोरती तहां तिहारे हेत उपचार करती यह उत्तर कीजै अरु कोई ऐसी भी कहत नायका कहीं वे जेई घनश्याम निन बिन धनी घरनी विरहिन होती अरु कोई ऐसोभी अर्य करत नायका कही कि अपनो जोहै तासों आपने आगे बोलियत जे सोरके खजाने खोरमें खोलत सो या अर्थ ते कवित्त अलग्न होजात है इहां जो सीने कही कि तुम खोरमें नायकको त्रास दिखावती सो लोकलीक लांघी अरु मलामें सोरके सजाने खोले सोई प्रकाश अरु कोई सखाके हाँकसे बोलत तब नायका जैसे बोलत अरु सोर खोर बोल बोल एक शब्द बहुवार ताते लाटानुप्रास है अरु कोई अनुमान और उत्तरालं- कार भी सखीको प्रति उत्तरते कहत ॥ ८॥ अर्थ लघुमानलक्षण। दोहा-देखतकाहूनारित्योंदेखैअपनेनैन.। तहँउपजैलघुमानकै, सुनसखीकेवैन ॥९॥. नायक को अन्य स्त्री देखतनायकाअपने नैनसों देस किवासखी से सुनै तहांलघु- मान उपजतहै ॥ ९॥ मियाको लघुमानमच्छन्न ॥ यथा-सवैया। कान्हतिहारीवेगानाप्रियाकेअयानसयानसबैमनमाहीं। मानकिधोंअपमानअवयहमानलखौअनमानेनज़ाही। मुखदुःखनकेशवजानिपरेसमुझेरिसहांसीनहींअरुमाहीं। . योसियरोखिनहूंखिनतातीहैज्योंवदलैवदरानकीछाहीं॥ १० ॥ ससी नायक सौ कहाँतहै इकान्ह तिहारी जो प्राण प्रियाहै ताके अयान अरु सयाम सम मनमें है यह मान है कि अपमान है यह तुम मानौ अनुमान मति करी" मान किया भाषाटीकासमेत। (१२९) अपमान सबै यह मानुषपै अनुमानिन जाही"इस पाठ में मनुष्य पै अनुमान नहीं करयो- जात मुख दुःख नहीं जान्यों जात समुझत रिस हाँसी नहीं और नहीं ए दोई नहीं समुझत छाही अवै क्षण क्षण सियरी ताती होति जैसे पादर की छाँह तो यामैं मान कीनो सो अनुमान ते नायक जानों ताको सखी छपावत हे यात प्रच्छन्न उपमा अलंकार ॥१०॥ नायकाको प्रकाशलघुमान || कवित्त । झूठेहूनरूठियेरीईठसोईतोकहावनेकपीठदेइईठकौनकेभएअली। काल्हकेतोनंदलालमोसोंघालिलालिकरैकाल्हहीनआईग्वारिजोपै तूहुतीभली॥आजुहीजुबीचपरीवीचवरिवेकोमाईआनरंगआनजिय ज्योंकनेरकीकली। तेरेहीकहेकीकोउसाखहैबुझियरीदेखियेजुआं खिताहिसाखकीकहाचली ॥११॥ ससी पचन नायका सौं । कि झूठेहू न कठिये तय नायका कही मैं नेक पीठ देत तव सखी कही काल्हि की घाल उताइल लाल करिरहे हैं नायका काल्हि क्यों न आई सखी अजहूं वीचपरी तीय तिय कही बीच परिघेको वासों जो आनरंग है कनेर की कली ज्यों ऊपर लाल भीतर सेत विनुरंग सखी कही अंतरंग क्योंकरि जान्यों ऊपर लाल भीतर सेत बिन रंग सखी कही नायका तेरेही कहैं तब नायकाने कही आंखही देखिये ताको साखी कहा तो इहां नायकाने अन्य तियाको देखत देख्यो है जो बांति करत लख्यो तो कहती मैं अपने कान सुनी देखिये आंखिया में देखतेही देखौ आजही पीच परी याते बहिरंग प्रकाश भयो उत्तरालंकार पूर्ववत् ॥ ११ ॥ प्रियाको प्रच्छन्नलघुमान ! दोहा-प्रियकोकटोकरयोनहीं, प्रियकोनाहीलाज । उपजतहलघुमानतहँ, वरनत,कविराज ॥ १२ ॥ प्रिय नायक को कह्यो नायका न करै तियको कहो कर नहीं पिया यह पाट में नायक लाज ते कह्यो न करै नायकाको ॥ १२ ॥ प्रियप्रच्छन्नलघुमान ॥ सवैया । आगेकहाहरिहौअवहींतौइतौदुखदीनोकझोविनकाने । केशवकौनहुँलाजकालाउतभूलिगईतौभईहितहीने ॥ भेटतहीभरिअंकललाभरिजीवनबोलीजुवोलनवाने । देखेनहींकवहूंभरिआंखिनिआजुहीकैसेचलोचितुलीने ॥१३॥ नायक गेह में आयो सो नायका नायकको अपराध जान नाकय की कही बात करत परंतु कपट साय करत ताते प्रच्छन्न तम सस्ती कहाति है आगे तुम कहा हीरहे (१२८) रसिकप्रिया। छोलियतहे ॥ वेईघनश्यामजिनविनघनीघरनीनियरीहूमेंपनेपन सारपोलियतहै । वोलतहाँकैसेऐसेवोलोजैसेवोलियतमोलहूलियेसों ऐसे बोलबोलियतहै ॥८॥ उक्ति नायका साँसखीकी । कि आपनेसो आपनेई आगेयात कहने परतीहैं कहूं पारी जो खोरहै ताके खोरन में गलीन में खजाने खोलियत है दीठ तो रोकत है जोरकर कई जाइ तौ जात नहीं देत अरुका नैन छुरीते छोलेजातहै जे वेई धन श्याम, जिन बिन बहुत पानी बिछुरे घनसार घोरती बोलती कैसेही ऐसे बोलो जैसे सब बोलतई मोलहूके लयेते ऐसे बोल नहीं बोलियतु जैसे तुम बोलती तहां कोई कहे ससीकोअप- राध दुरायो चाहीये तो जाहिर करति कि जिन घिन घनी घरनी घनसार घोरती तह तिहारे हेत उपचार करती यह उत्तर कीजै अरु कोई ऐसो भी कहत नायका वहीं वे जेई पनश्याम, निन पिन धनी परनी विरहिन होती अरु कोई ऐसोभी अर्य करत मापका कही कि अपनी जौहे तासों आपने आगे पोलियत जे सोरके सजाने सोरम सोलत सो या अर्थ ते कवित्त अलग्न होजात है इहां जो सखीने कही कि तुम सोरमें नापकको त्रास दिसावती सो लोकलीक लांघी अरु गलामें सोरके सजाने सोले सोई प्रकाश अरु कोई ससाके हॉकसे बोलत तब नायका जैसे घोलत अरु सोर सोर घोल पोल एक शन्द पहुवार ताते लाशगुमास है अरु कोई अनुमान और उत्तरालं- कार भी ससीको प्रति उत्तरते कहत ॥ ८॥ अथ लघुमानलक्षण। दोहा-देसतकाहूनारित्यादेखेंअपनेनेन । तहँउपजेलघुमानकै सुनेससीकेरेन ॥९॥ मापक को अन्य सी देसत नायकाअपने नैनसों दे किया ससी से मुने तहांठपुः मान उपजत ॥ ९॥ मिपाको लयुमानप्रच्छन्न ॥ यथा-संवैया। कान्दतिहारीवेगानापियाकेअयानसयानसवैमनमाहीं । मानकियोंअपमानअयेयद्दमानलसोअनमानेननाहीं॥ मुखदुःसनझावनानिपरेसमुरिसहांसी नहींअमाहीं। यासियरीसिनहंसिनतातीदग्याचबदरानकीछाहीं ॥ १० ॥ मीनापर मों का वाद विहारी नोमान प्रियाद नार भयान भर सकार रोमन सामान पान मातीनुमान महिमा .
भाषाटीकासमेत।
रची है रंचक अथवा पंचककी रीति यह रंचक नायकारची तय हँसि नायक उरसोंलगाई.
अरु यामें जो कोई प्रश्न करत रेख चिन्ह है सो गुरु मान कहै वाही ताको उत्तर करत कि
झट कही काहे बंधकता सों सो नाही नायका सनेहकी रेख कहति जब तुम वासों सनेह
को रेख रची अरु दूसरो प्रश्न कि उरलगाने वे मान मोचन होजात ताको उत्तर कि
जब नायक कहीकि वंचकता करती हौ तब नायका बोलीतवहीं उरमैन लाइ लई अरु
बात करत कहा हो अन्यनायकासों यह तीसरो प्रश्न तहां उत्तर कि बात करत देख
धोसो भयो यह रीतते मध्यममान जागोजात अरु नायक नायका के वचनते प्रच्छन्न
उत्तरालंकार प्रतिउत्तरते ॥ १६ ॥
प्रियाकोप्रकाशमध्यममानायथा-सवैया ।
ज्योंउनकोतूबकावतमोहिंसोंआईवकावनव्हैगरई।
अबयाहीतेतोसहुवातककहियेकिहुतीनकहीथरई ॥
कहिकेशवआपनीजांघउचारिकआपहीलाजनकोमरई।
इकतीसवतेहरएहरिहेंअवहाँहुँकहाहरितेहरई ।। १७॥
जासों हरिवात करत रहे सो मनादन आई तासों नायका कहति है कि जैसे तूतनको
पकावत है तैसे मोकों यकवन आई गरू होके याहीते कहु तूमान छुटावन आई जोपात
कहते रही सो परयल यह न कहोगी काहे अपनी जांघ उपार आप तोको साजन मरे जैसे
हरि सपते हरु, तैसेही कहांहरुई होहुँ यामें आन सखी सोंकहत ताते प्रकाश जांघ उपार
कहनेते लोकोक्ति अलंकार है ॥ १७ ॥
प्रियको मध्यममानलक्षण ।
दोहा-जहांनमानेमानिनी हारपियजुमनाइ।
उपजतमध्यममानतहँ,प्रीतमकेउरआइ ॥ १८॥
जहां मानिनी न माने प्रीतम मनावत में हार जाय तहां प्रीतमके उरमें जो मान
सपने ताको मध्यममान कहिये ॥ १८ ॥
मियको प्रच्छन्नमध्यममान ॥ यथा-कवित्त ।
वारवारवरजीमसारससरसमुखीआरसीलदेखमुखआरसमेवोरिहे।
शोभाकेनिहारतेनिहारतननेकहूंतूंहारीहेनिहोरसवकहाकाहूसो
रिहे । सुखकोनिहोरोजोनमानोसोभलीकरीतेकेशोराइकीसोंअब
जोमुखमोरिहै । नाहकेनिहोरेकिनिमानतिनिहोरतिहोंनेहकेनिहा
रेफिरमोहिनिहोरिहे ॥ १९ ॥
(१२)
रसिकप्रिया।
प्रश्रया नापका मानसा भापत प्रत्यक्षम सोनाही130-नायकमान कीनों तब नायक
हे तानायका के वचन सखीतों कि तू नायकको भनाइ ल्याउ तब सखी पूर्ववारी यात
रात है कि तब में कहीं सो तू न मानी कि नायकके मनाये ते नहीं मानति आस्व-
में मोको निहोरेगी या रीत तें पद सुगम है अरु नारायण कवि कविप्रिया के तिलक
याको अर्थ लिसचुके याते इहाँ नहीं लिख्यो अरु निहारे पद यहुवार आये ताते लाटा-
मास जानने और प्राभाविक भी पछिलीमातते ॥ १९ ॥
प्रियकोप्रकाशमध्यममान || यथा-सवेया।
मानहिंमानतेमानिनकेशवमानसतेकछुमानटरेगी।
मानहैरीमुजुमानेनहींपरिमाननखेअभिमानभरगो।।
व्हहैसहेलीसमानतवैजवसौतिनमेंअपमानकरैगो ।
आपुमनावतमानहिरीबहुरयोजुमनावनतोहिंपरैगो ॥२०॥
यामें कोई कहतहैं जे मानिन, ते मान आदरही तेमानती अरु नहीं तो कछु मानस
नुप्यते काहूको मान टरत है अरु मानें नहीं तो रूठियोई हाय रहत परमान हद्दनस्से
अतिकरे ते देखि वह नायक अभिमान के भरे कहिये भारसों नैगयो उठि के ताते
सहेली मान व्हैहै तब जब अपमानकरैगो अवहूं मैं जो कहति हो सो आपहीको मना
जो जान नाही ती फेर तोहिं मनाइयो परि हे सहेली ऐसे सामान कहत ताते बहिरंगसे-
में भी नायका मानहेति ताते पूर्व वृत्तांत याही में भीजाननेअलंकार पूर्ववत्॥२०॥
दोहा-राधाराधारमनके, वरनेमानसमान ।
तिनकोमानमनाइयो, कहियतसुनहसुजान ॥२१॥
इति श्रीमन्महाराजकुमार-इन्द्रजीतविरचितायारसिकप्रियायां-
विप्रलंभशृंगारमानवर्णनं नाम नवमः प्रकाशः ॥ ९ ॥
राधाको अरु ताके रमन नायक ताको मान वरने सामान्य करके अम तिनके मान
मनाइवो कहत है। अर्थ मानमोचन कहोंगी ॥ २१ ॥
इति श्रीमन्महाराधिराज काशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्या
ज्ञाभिगामि ललितपुरनिवासि हरिजनकवीश्वरात्मजेन सरदाराख्यकवीश्व
रेण विरचिते रसिकप्रियाभूपणसुखविलासिकानामटीकायां मानव
र्णननाम नवमः प्रकाशः ॥ ९ ॥
अथ मानमोचनलक्षण।
दोहा-मानतजहिंप्रीतमप्रिया, कहिकेशवकरिणीत ।
वरनिमुनाउँसोसवै, मैंजुसुनीपटरीत ॥१॥
भाषाटीकासमेत ।
(१३३)
मानतजि देहि प्रीतम अरु प्रिया प्रीति करके सो पट रीति ते वर्णत हो अरु प्रसंग
विध्वंस पुनि जियमें मुनि पटरीत यह भी पाठ है ॥ १ ॥
दोहा-सामदामअरुभेदपुनि, प्रणतिउपेक्षामानि ।
अरुप्रसंगविध्वंसपुनि, दंडहोहिरसहानि ॥२॥
साम १ दाम २ अरु दान भी पाठ है | भेद ३ मणति ४ उपेक्षा ५ प्रसंग विध्वंसद
अरु दंड कहेते रस हानि होहिगी याते पट कह्यो ॥ २ ॥
अथसामउपायलक्षण ।
दोहा-ज्योंकेहूमनमोहिये, छूटिजायजहमान ।
सोईसामउपायकहि, केशवदासबखान ॥३॥
कोई रीतिते मनमोहिके मान छुड़ाइये ताको साम उपाय कहतहैं ॥ ३ ॥
प्रियाको सामउपाय ॥ यथा-सवैया।
केशवदाससदाकियेआशरमुखकीदुखताहिनदीजै ।
ताहुसोरोपनमानियेमानिनिभूलिहूआपनोमानिजुलीजै ॥
हौतुमहीतुमहौसुनिसुंदरिमूरतिद्वैजियएकहीजीजे ।
मानहेभेदकोमूलमहाअपनेसहुसोसपनेनहिकीजै ।।।।
प्रथम वचन नायक के जो सदा सुखकी आशकरे रहै ताहि दुःखनहीं
दीजे अरु ताहूसों मान न करिये जो आप न भूल मानें मैं तुमही तुमहाही वै
तुमही तुम वै मुनि सुंदर इस पाठमें सखी की उक्ति करनी परेगी मूरति दोन
जिय एक मान भेद को मूलहै यहांतक नायक तब नायका कही जो अपनो सो होहि तोन
कीजै तुमतो पराये सों हो जैसे लोग कहत फलानी सॉ फलाने, बिहारी अहे कहे
न कहा कहो तोसों नंद किशोरवढबोली कति होतिहै वेडे हगनिकेजोर १ कहत काहे
माहीं कहाहै जो तू मान कीनों तब नायका कही तोसों नंद किशोर, नायका पोली
ताते मान मोचन प्रति उत्तर ते उत्तरालंकार अरु दो देह एक जीय आन सो तुमहो.
यह लोकोक्तिसंकर है "अपनेहुनते सपनेहुन कीजै" यहभी पाठ है ॥ ४ ॥
प्रियको सामउपाय ॥ यथा-सवैया ।
कहिआवतिहैजुकहावतहीतुमनाहीतौताकिसकेहमसोहीं।
तिहिपेंड़ेकहाचलियेकवहूंजिहिकांटोलगपगपीरदुखोहीं।
प्रीतकुम्हेड़ेकीजैजईसमहोतितुम्हेंअंगुरीपसगेहीं।
कीजैकछूयहनानिककेशवहौतुमहीतुमतौहरिहोहीं ॥५॥
१३४) रसिकप्रिया। नायका वचन नायक सों जो तुम कहावत तो कहिआवत तुम हमारे सोहेन ताक- तापै न चलिये जामें पामें कंटकल- हमारी तिहारी प्रीतिमें जब अँगुरी पसरी कुम्हेड़े की जई जैसे अंगुरीपसारत कुम्हिलात तैसे कुम्हिलाय हे जई कोहडेके ब- को नाम है तब नायक कही कीजै कछू जानकै हम तुम तुम हम हौ यामें नायक ते मान छूटो प्रत्युउत्तर ते उत्तरालंकार ॥ ५॥ अथ दानउपायलक्षण । दोहा-केशवकौनिहुँन्याजकछु, दैजुछुड़ावैमान । वचनरचनमोहेमनहिं, ताकोकहियेदान ॥६॥ कोई छलते अथवा कछू देइ कै मान छुड़ाइये अरु वचन की रचनासों मन मोहि जाको दान उपाय कहत हैं | मन-या बछू देयेते गणिका काहे न होइ । उ-गणिकामें दनो चाहिये यहां कछु कह्यो है ॥ ६ ॥ होहा-जहांलोभतेदानते,छाँडै मानिनि मान । वारवधूकेलक्षणहि, पावैतवहिंप्रमान ।। ७ ।। जहांलोभते अरु दान ते मानिनी जोमान छोडे ताको गणिका मानवती कहिये "जहां भते दानले" भी पाठहै ॥ ७॥ नायकाको दानउपाय ॥ यथा-कवित्त । मिलअमलदलदीन्हेंजुकमलभवअरुणअरुणप्रभुजूकोसुखदाइये । शोदासशोभाधरअधरमुधाकेघरमधुरअधरउपमातोइनपाइये।।3- नमलयशेलशीलसमसनिदेखिअलकवलितव्यालआशाउरभाइये । पिटनिगंधियहहारवंधुजीवकोसुचाहतमुगंधभयोनकग्रीवनाइये ८ क्ति ससी की नायकासानायक ने यंपुनीव(दुपहरिया)के पू.ट को हार सती के हाय पापोदै सो सगी कहत यह कैसा है कोमट अरु अमल याको दल कमलमा माने देय अह अहम है अरुन प्रभु सूर्य के मन भायादै शोमा धारण करे और मुश । हारह भर अपर मुधाक धानहार मधुर अपर शोभायो पायत है अधरन की मा इनके इनकी टपमा उनको सो यह रजनिहारे मसपगिरि जान पाई मटक डिरटे देखि मुगय आरके दरत साहनंदै अपना मलयापस शैलप जो वस्तु जाप मुगन्यमयी रोगा। इनमें मुगन्धमाद याने तो रज मलय मैदराम मुने सोया नई आप भर भटक रूपी मपं ना पाते आमा भई कि हम मुगन्धरता शिव हारद पुनीको सो पाइत गंगमयो मेकमा सुन नापका की मेक
भापाटीकासमेत।
श्रीवामें नाइदे याही ते मान छूटी । प्रत्युत्तरते उत्तरालंकार मलय उरजका रूपक-
दोईको संकरहै ॥ ८॥
अन्यच्च-सवेया।
मत्तगयंदनसाथसदाइहिथावरजंगमजंतुविदारयो।
तादिनतेकहिकेशववेधनबंधनकैबहुधाविधिमारयो।
सोअपराधसुधारनसोधिइहैइनिसाधनसाधुविचारयो ।
पावनपुंजतिहारेहियेयहचाहतहैअवहारविहारयो॥९॥
रक्ति नायका सौ सखीकी । नायक ने गज मोतिनको हार पठायो है ताहि देखि
युक्तिसोंसखी कहत कि यह जो गजमोतिनको हारहै ताने मतवारे जे हाथी तिनके साथ सदा
रहिके यावर जंगम जंतु जीव विदारे अथवागज जीवविदार नहार है ताके ये सार्थीहें तादिनते
याको निबंध कर विधिने बंधन में डार दियो अर्थ छेद डारे सोअपराध सुधारिवेको सोधिक
साधन इन साध्य एहू विचारचौहै कि पावन ताको पुंज जोतिहारोहियो? काहे यामें शंभु कुच
युगुल रोमावली यमुना त्रिबला त्रिवेणी उदरसिन्धु इत्यादि अनेक तीर्य, सो चाहतहैं
तब नायका कही बिहारी बिहारकरयो याही ते मान छूटो हेतोत्प्रेक्षालंकार है अहेत
को हेतचाप्यो ताते ॥ ९ ॥
प्रियाको दानउपाय ॥ यथा-कवित्त ।
हँसतुहँसतआईआईइकगाथगाईकहहुकन्हाईयाकोभाउसमुझाय
के। पीवैक्योंअधरमधुदंपतिएकहीवाररदनकरजथलदीजहिवताय
के ॥ यहपरिरंभनकहावैकौनकेशोराइमेरीसोंजोमोसोंतुमराखहुदुरा
यके । राधिकाकीअधिकाईकहाकहोंतीनौआजुआपनोपियारोपिउ
आपुहीमनायकै ॥१०॥
नायका नायक की कया। सखी सखी सोंकहतिकि आजु नायक मानजान हसत हसत
आई राधा एक गाया कही याको भाव हमको समझावहु कि एकवार दंपति जो अपर
पान करो चाहै तौ कैसे कर रदन करन थल बतादीजे अरु उरज करज भी पाठहै
अरु यह परिरंभन कौन कहावत तुम्हें हमारी सपय जो दुरावहु सो रापाकी अधिकाई
कहा आजु अपनो पिय आपहू मनाइ लये यामें प्र० कोई कहै कि दान कहां पायो उ.
तौ परिरंभन कर कहो कि यह कौन कहावत सोई दानभयो परजा उक्ति अलंकार छल
कारकै इष्ट साधौ ॥ १०॥
अथ भेदलक्षण ।
दोहा-सुखदेकैसबसखिनकहँ, आपलेइअपनाइ ।
तवमुछुडावैमानको, वरणोंभेदवनाइ ॥११॥
रसिकप्रिया।
सब ससीको सुख देकै अपनायलेय तब मान छुड़ावै ताकी भेदोपाय कहिये।। १५॥
नायकाको भेदउपाय | यथा-सवैया।
केशवधाइखवासिनतोहिसखीसकुचैसवआपनिघातें।
मोहितोमाईकहेईवनेअवांधिदईविधितीकहतातें।
नेकहरेहरेवोलिपलाइलौहौंडरिपौंगडिजाइनयातें।
मासनसोमेरेमोहनकोमनकाठसीतेरीकठेठीयेबातें ॥१२॥
नायंका सों जनी वचन नायकने वाको आफ्नी और करलई सो उनहींकी ओर
होके कहैहै जनी जो दहेजमें संग आवत पूरब में वाको लोकनीकहतबुन्देलसण्ड में
खवासिन नायकाको समुझायो सो कठोर बोली तय वा कहत मोको तिहारे संगयांप
दई ताते माप नहीं सुनीजाति माखन सो धर्मलुप्ता काठसीक्ठेठी बातें पूर्णोपमा अलंकार
नायक भेद करिके खवासिन फोर लई ताते भेद नायका कठोर घोली याते
मानमोचन ॥ १२॥
नायकाको भेदउपाय ॥ यथा-सवेया।
काहूकह्योहरिरूठिरहेतवतेवहुबुद्धिवितर्कबढ़ावै ।
सोधिसबैअपनोसोरहीधनमीतरहेसुउपायनपावै॥
हेवहरीतिइहाइहिकेशवज्योंदुहुँओरजरेक्योंजुड़ावै ।
बूझतिहोंपियप्यारीतिहारीमुमानकरेकिमनावनआवे ।। १३ ॥
ससी नायककी नायकाने मिलाई मनावन हेत पठाई सो कहतहै कि काहूने नापासों
कही कि हरि तोते कई तयते अपनी बुद्धिमें भी विशेष तर्क पदापती अरु अपनेते
सोपि रहीहै कि पन भी रद भरु मित्रता न छूटे यह लोकोक्तिदै सो उपाय नहीं पारत
भात्सपलीनमें अपमान न होय इसे नहीं अरु नापक अपनो होइनायाहां वह रीति है
कि दोई और तोआगि लगीदै सो आगि कैसे घुझाइये ध्वन्यार्य यह किसपत्नी अभिमान
कररहीं अरू भार कटिरहे दोसोम यूझति दोहे पाय तिहारी प्यारीमानकर कि मनावर
आवसाही प्रश्नोत्तर मटकारते नापककहीमनाइन आवेयाहीत मान मोचनभयो॥९॥
अप प्रणतिलक्षण ।
दोहा-अतिहिततेभतिकामते, अतिअपराधदिनान ।
पायपरप्रीतमप्रिया, ताकोप्रणतिवसान ॥१४॥
अविदित कहिये अवि प्रेमते और अति काम और आने परापनानपीनम
दारिया पाई पर दावी ननि कहिये ॥ १४ ॥
भाषाटीकासमेत।
(१३७"
नायकाको प्रेमते प्रणति ॥ यथा-सवैया।
तेंचितयोजुनसूधेतऊतउप्रेमकैकैपियपांयगरोहै।
मोहिविलोकिविलोकिअलीनिअलकिअलीकप्रवाहबह्योहै ।।
बूझतिहौंसखीशीशदियेतिनऔरसबैहियहेतुरह्योहै ।
कान्हजुआयेमनावनतोसों मैंमानकिधौंअपमानकह्योहै ॥ १६॥
म. या कवित्त में मान छोड़ब नाहीं जानोजात पाय गह्यो तऊ न मानरह्यो ताते
सकी हानभासतहै उ० ता निमित्त ऐसो अर्थ चाही कि नायका पूर्व वृत्तांत सखीसों
हति है कि हे सखी ! देखिये सखी मोसों कहती हैं कि जब नायक आयो तब तैं सीधी
ही चितई अरु नायक ने प्रेम करकर तेरो पाइँ गह्यो सोमोको देखि अरु इन सखिनको
खि जिन अलीकमें मर्याद कहिये मिथ्या अलोक कलंककोप्रवाह बहायो है ताते हेससी!
तोसों बूझति हो शीशदै मेरोशीश छुइकै कहु तिनओर सबने तो हीयको हेतु गहि
ख्यो है अर्थ मन मानी कहती कान्हति आये मनावन जव तोसों तब मैं मान को
अपमान इहां पूर्व वृत्तांतते भाविक अलंकार जानोजात अरु लोकोक्ति भी है।॥१५॥
नायकाको अतिकामते प्रणति । यथा-सवैया ।
नवोलतिआपुवुलायेहीवोलकहालगीमोहिवकायेहीमारन ।
सोपरोपाँयनिवृझिसखीसवदेतिहजीयुवतीजिहिकारन ॥
हठछाँडिकैकंठउठाइलगाइकहांलगिऍठिअकाशनिहारन ।
कानोंभयेनटद्वैदिनयेतिनतेहीलगीकऊलटपारन ॥१६॥
प्रथम सखी वचन नायका सों अरी नहीं बोलति बोलायेते तघ नायका कही मोहि
हा वकावति है तब सखी कही अरी सो तेरे पाँय परौहे जाके हेतु युवती जी देती
तेि हठि को छोड़ कण्ठ लगाय ले ऐंठके आकाश न निहार कानौं तू नहीं करिहै ये
न ये दीन भये कामासक्ति भये सो सुन नायका कही तेही कळू उलट पार न लगी
यामें दीनते काम सखी नायकासों कहतनायका सखीसों याते उत्तरालंकार बोले-
मान छूटो अरु विशेषोक्ति भी कोई कहत सो नाही कोनोभये नटि है दिन ये दिन
भी पाठ है ॥ १६ ॥
नायकाको अति अपराधते प्रणत ॥ यथा-सवैया।
केशवदासउदासभईदरसाइदशादुखद्योसभरचोरी
रातिभयेअधिरातकहूंलोविनबहुबंधुवधूनकरचोरी॥
धाइरहीसमुझाइकछ्नसखीनहुंकेसिखयेतेसरचोरी।
काहेतेमान्योनमानिनितौलगिजौलागिपाइनपीउपरयोरी॥१७॥
(१३८)
रसिकामिया ।
नायक राति मनावत रह्यो सोन मान्यो जब नायक जात रहो तब सप्ती सों कह
अब तू मनाय ल्याउ सो मुन राखी कहति है कि भय उदास भई है दुःखदशा र
घोस भरचो राति जप आधी राति ली उनकी बंधु बंधून देयरानिन जिठानिनने दि
बहुत करी अरु फेर धाई सिकायो अरु सखीनपर कट्र कार्य न सरयो तब काद
मानों जय प्रीतम पायन परो तो अपराध यकसायो यात अपराध बोलिउटी ।
माननो न पाखिल यात कदेते भाविक अलंकार किया हेतु कारण कारज सहित ।
परिषो कारण मानियो कारज ते ॥ १७ ॥
दोहा-पियहिमनावैपायपरि प्रियापरमहितमान ।
ना अपराधनकामते, वरणतहीरसहान ॥ १८॥
प्रिय पोय परिके मनाये अरु प्रिया परम हित मनि न अपराध होय न काम ई
ऐसो वर्णन करते रसकी हानिहोय ॥ १८॥
प्रियाको प्रणति अतिहितते ॥ यथा-सवैया।
नीरहितौविनमनिसरैवरुमानतौनीरहिकेजियजीजे।
जाविनऔरसुहाइनकेशवताहिमुहाइसुनौसवकोजे ।।
जालगिमोपगलागतहसुलगीपगअंकलगायनलीजै ।
हौसिखवोंअपनेसपनेहुँतो आवतलक्षकिंवारनदीजै ॥ १९ ॥
उक्ति सखी की नायकसों ॥ कि नीरहीते विना मीनसरै वरु मानों तौ नीरही
वल जीजहें अप्रिया मीन तुम नीर हो जा घिना आन नहीं सुहात ताको जो मुद्दा
सोई करो चाही जाके लिये मेरे पग लागतरहे सो पगलगी है ताको अंक काहे न
लगावतही हो अपने जान सिखावत हो कि घर सपनेहू लक्ष्मी आवत किंवार न
दीजतु है ही सिखवों अपने सपने घर ये भी पाठ है या मीन नीर को दृष्टांत का
एक शब्द दोवार आयो याते जमक अरु ऐसो भी कोई अर्थ करत कि प्रिया पगल
यह बात सखी कही तब नायक कह्यो अंकसों लगायलेहु तव सस्ती वचन कहो आएर
उठाय लगाय लेहु या उत्तरालंकार ॥ १९ ॥
अथ उपेक्षालक्षण ।
दोहा-मानमुचावनवाततजि, कहियेऔर प्रसंग ।
छूटिजाइजहँमानतहँ, कहतउपेक्षाअंग ॥२०॥
मान मोचनवारी वात तजिके और कडू प्रसंग कहिये तहां मान छुटिजाय ताव
उपेक्षा कहिये ॥ २०॥
भाषाटीकासमेत।
(१३९)
प्रियाकी उपेक्षा ॥ यथा-कवित्त ।
पलानचमकतिचमकहथ्यारनकीबोलतनमोरबंदीसयनसमाजके।
हाँतहाँगाजत नवाजतदमामेदीह देत न दिखाईदिनमणिलीने
जकोचलिचलिचंद्रमुखीसाँवरेसखापवेगिसोखकजुकेशोदासर
खसाजके । चदिचढ़िपवनतुरंगनगगनयनचाहतफिरतचंदयोधा
भराजके ॥२१ ॥
प्रश्न-यहाँ जो डरदैकै मान छुड़ायो सो मसंग विध्वंस को लक्षण है यामें उपेक्षा कहा
यह कोई कहै उ-तहां ऐसी कहो चाहिये यहां सखीने उक्ति कारकै मघवाको कोप
चत कीन्हों जब मघवा ब्रजपे चढ़ो तब जिन रक्षाकरी तिनहीं के पास चलिये रक्षा-
रहे सो सुनि नायका कही चलि काहे सखीके कहेते यह सूचित भई तू चन्द्रमुखी है वे
दही को ढूंढ़त फिरत सो सुन नायका कही चलि तो यहां मान छूटो सविषय सावयव
टक अलंकार है ॥ २१ ॥
प्रियको उपेक्षा॥ यथा-कवित्त।
केशोदासदिनरातिकेतकीकीभावभांतिजियमेवसतिजातिनेन
निलिनी । माधवीकोपियेमधुसूझतनअंधकहूंसेवतीसेवनकहीसे
धफलिनी ।।औरहींकहतिवातकान्हकाहेकोलजातऐसेतौखिस्या
जुहोइमनमलिनी । देखहुधोंप्राणपतिनिलजअलीकीगतिमालती
मिल्योचाहैलीनेसाथअलिनी ॥२२॥
ससी कहहै कि हो तो भ्रमर की बात कहत तुमकाहे लाज लेतही याही में मान
को छूटो ताते उपेक्षा का कहीं दिन रात ती केतकी की भांति भारत है केतकी के
अर्थ एक केतकी फूल एक आपनी जाति वारी नलिनी कुमोदिन एक कुमुदिन जो
का आनन्दको नहीं जानति माधवी फूल को मधु सुगन्ध पियत दूसर जो थे साति
सूझत नहीं सेवती फूल अरु स्वकीया गन्धफलिनी चम्पकली एक गन्धहींहै जामें
रस नहीं देखो तो हे प्राणपति निलज अली भ्रमर की गति भ्रमरी संगठेके
ती के फूलसों मिली चाहत है दूसरोअर्य सती संगलै मालती वेश्या अथवा तमाल
रिपाकी मालसों यामें विवक्षितवाच्य ध्वनि काहे सखीकी इच्छा ते अरु भयो-
भी है अर्थ के अन्तरते अश्लेप अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार है ॥ २२ ॥
अथ प्रसंग विध्वंसलक्षण।
दोहा-उपजपरेभयचित्तभ्रम, छूटजायजहमान ।
सोप्रसंगविध्वंसकवि, केशवदासबखान ॥२३॥
--- (१४०) रसिकप्रिया। भयते चित्तमें भ्रम उपजै ताते मान छूटै सो प्रसंग विध्वंसहै ।। २३ ॥ प्रियाको प्रसंगविध्वंस ॥ यथा-सवेया। केकिनकेशवकामकेकिंकरखोलतडोलतदेतदुहाई। कामनिशायहकामिनकोऊरिसाइगीताकहुहहरिसाई॥ गाजतिनाहिंनमेघघटायहवाजतडोंडीसखीसुखदाई। भोरभयेफिरकीवौअबोलौसुबोलौअवै बलीयोलकन्हाई॥२४ उक्ति सखी की नायका सों ॥ कि ये केकी मयूर न जानो कामके किंकरहें सो डोल फिरत दुहाई देत फिरतहैं सोक हैं कि कामराति में कोऊ कामिनी जो रिस करिहै त महारान रिसायगो जे मेघकी घटा नहीं गर्जती है डोंड़ी बाजति है भोर होत फेर अबो करवो अरु अबै वोलौ हेवलि बोलत है कान्ह इहां कवि मोदौक्ति में रूपकालंक ताते चल बौलिके कन्हाई ताहीमें नायका उत्तर दीनो हे पलि कन्हाई पुलाव त मानलूटो अरु कामकी भय दिखाय माग छुड़ायो याते प्रसंगविध्वंस है ॥ २४ ॥ प्रिया को प्रसंगविध्वंस ॥ यथा-कवित्त । कोकनकोकारिकाकहतकाहूशारिकासोंदरिदूरिहितचितचौगुनोर ढायोहै । सकिरहीसकुचनियापुरीसुकीतौकहिकाहूसोनसकैदे दुखनउठायोहै ।उठिचलोन्यायकीजैअवकैमनायदीजेनेकहीमेंकेर राइकलहबढ़ायोहै । मानतनएतेपरउलटोमनावैवरुऐसोइसया श्याममुकहिपढ़ायोहै ॥२५॥ रक्ति ससी की नापक सॉ कि देखो कि कोककी जो कारिका है सो शुक व शारिका सों कहतद देसी शुकीने दूरदूरभयेते हितचितयारगुण यदायरामाई मुकार सकुपों पापुरीशुकी जोहै सो काहसो नहीं सब त कहि देव दास ने उठायोहे देहर जो मुमहै सो टठापदयो सोचलो उठके न्याय करिये अपकै मनायदीने नेकहीमें हम पट्टाप राग है देसोहम एतेपर नहीं मानत याउलटी मनावत दे ऐसोजी सपानी याम! नुम शुरुको पढ़ायाँहै यामें प्राचीन तीन प्रश्न करतदै एकतो अन्योक्ति सीम है दूजे उपेक्षा काद न हो और हर महीं तो प्रसंग विध्वंम कसे तीने मान मही शामें टनर परत शुकी की देह सूमतमें नायकको भपभई तो भप आई का प्राणा नहीं जाप पा रहा पटी गई अरमान टूटियो यह दिमायो कि जय सनी । रट पटी तर नापक वदी अपके मनाय दीन दम नीवही कलह पदापोर मोर परंतुआरदी टो अन्यानि वी शंका करी जर आपही रि अन्योति विगत से मानो नामें ऐसी जानिये किदां गुरुको प्रमंग भूयनके निमिनी पाई दिए भाषाटीकासमेत। (१४१) शुकमें कोककी कारिका कही याते यह सूचित कराई कोककी कारिका शुकको तो ई अरु आपुन भूलिगेये द्वितीय तिहारीनायका माण ताजिदेहै याते कवि निबद्धवक्ताकी में मुद्रालंकारते उत्तरालंकारजनायो ॥ २५ ॥ दोहा-देशकालवुधिवचनते, कलध्वनिकोमलगान । शोभाशुभसौगंधते, सुखहीछूटतमान ॥२६॥ ये सब उद्दीपनहें इनते सहजहीमान छूटत यह सहज उपाय है मानछूटन को ॥२६॥ कवित्त । घननकीघोरसुनमोरनिकीशोरमुनिमुनिसुनि केशवअलापअली नको । दामिनीदमकिदेखिदीपकीदीपतिदेखिसुखसेजदेखिदेखि दरसुवनको ॥कुंकुमकीवासघनसारकीमुवासभयोफूलनकीबास नफूलिक मलन को । हँसिहँसियोलेदोऊअनहीमनायेमानछूटिंग एकवारराधिकारमनको ॥२७॥ देशकाल आदि जो सब कहि आये ते यहांसब उद्दीपन हैं कवित्त में घनकी घोरते वर्षा रय अरु काल मोर वाणी कल ध्वनि २ अली जनके अलाप में कोमलगान ३ मनीके दमक में बुद्धि वचन ४ शुभाशुभ सदन सुवनको नीकी वन संकेत या में न ५ सौगंध कुंकुमादिकी बास ६ ऐसो अर्थ भी कोई करत सो सहजही मान यो याते समाधि अलंकार आनि हेतु ते मान छूटेते ॥ २७ ॥ दोहा-इहिविधिमानछुड़ावहीं, आपुसमेंनरनारि । पल पलप्रीतिबढावहीं, केशवदासविचारि ॥२८॥ यहि विधित सखी मान छुड़ावति है आपुसमें जो नरनारी में मान भयो है तिनको पलमें भीति षढावति है बातें विचार विचारिके ॥ २८॥ दोहा-प्रियानप्रीतमसोंकर, अतिहठकेशवदास । बहुरयोहाथनआवई, जोवैजायउदास ॥२९॥ हे प्रिया न प्रीतम सों अति हठ कर फेर हाय न आवैगोजो उदासदै जायगो ॥२९॥ दोहा-बारहिवारनकीजिये, वारककोजेमान । कहि केशवज्योंआपमें, सदाबढेसनमान ॥३०॥ वारंवार न कीजिये वारक छांडि दीजिये मानके छांडे ते सदा सन्मान भादर गो (१४२) रसिकप्रिया। दोहा-प्रीतिविनाभयहोयनहि, भयविनहोहिनप्रीति । प्रीतिरहेजहँभयरहै, यहेमानकीरीति ॥३१॥ प्रीति बिना भय नहीं होत अरु भय चिना मीति नहीं होत जहां भीति है तहां है यही मानकी रीति है ॥ ३१॥ दोहा-गर्वव्यसनधनत्यागते, निष्ठुरवचनप्रवास । लालचविप्रियकरनते, तियपियहोइउदास ॥ ३२॥ गर्वते व्यसनते किम्वा व्यसनके गर्वते भयवा गर्व के व्यसनते धनते अरु त्य निठुरवचनते अरुप्रवासते लालचते अमिय यचनते तिया प्रियाको जीय बंदास होय तहां मान होय तह । मन धन अरु लालच क्यों कही उ० गणिका को धनहीते छूटेहै प्रमाण-"पावन पुंज तिहारे हिये अब चाहतहै यह हार विहारो" ली विप्रिय करन त्रय प्रियते होइ उदास यहभी पाठहै ॥ ३२ ॥ दोहा-मानविरहवरणोविविध, जहाँविविधबुधवास ।। केशवकरुणाकहिकछू, कीजतविरहप्रकाश ॥३३॥ इतिश्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायांवि प्रलंभशृंगारमानमोचननामदशमप्रकाशः। बहुत भाँतित मान विरह वर्णन करचुक्यो अब यह प्रकाश में, करुणा वि वर्णन करिहौं । ३३॥ इतिश्रीमन्महाराजाधिराज काशिराजश्रीमदश्विरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्याज्ञाभिः गामी ललितपुरनिवासीहरिजनकवीश्वरात्मजेनसरदाराख्यकवीश्वरेणविर- चितारिसिकप्रियायांभूपणेसुखविलाप्तिका नाम टीकायां विमलंभ शृंगार मानमोचनं नाम दशमः प्रकाशः ॥ १० ॥ अथ करुणाविरहलक्षण। दोहा-छुटिजातकेशपजहां, सुखकेसपैउपाय । करुणारसउपजततहां, आपुनतेअकुलाय ।। १ ।। ग्रन्यन में यहमेद लिखौहे करुणा विरहके जहालौं आश मिलनकी तहालौ विरह जा आश छूटि जाय तहां करुणा अरु जहां मरणमें फेर मिलन आश तहां करुणाविरहवाहे शोकअस्थाई नहीं है रतिस्थाई बना रहत अरु.भास साक को हात है ताते विरह का णात्मकहै यहीते लक्षण में कहीहै छुटिजात उपाय सुखके सुखके उपाय जीवत में होत फेर भाषाटीकासमेत। जिवाई लीवो नहीं होति पर आशा रहेहै कि मिलगौ यात रतिस्थाई रहो उपाय नहीं हैं ताते करुणा विरहको लक्षण राख्यो प्रसंग पाइ कवि इतनी कह्यौ ॥ १॥ दोहा-मुखमेंदुखक्योंवरणिये,यहवरणतव्यौहार। तदपिप्रसंगहिपायकछु, वर्णतमतिअनुसार ॥२॥ सुखमें दुखको वर्णन करी तदपि प्रसंगते बुद्धि अनुसार कहो कविनकी बुद्धि उक्ति लिये होतिहै पाते कळू उक्ति ते वरणकाजत तौ यहां करुणा विरह के कवित्त में अरु प्रवास विरह के कवित्त में यह भिन्नता राखी जहां प्राण तजियेसी बात और दिनादिक बलिष्ठ होहिं जा कवित्त में तहां करुणा विरह जानियेअरु देखोरामलक्ष्मण । के विरह में दशरथ को तो साफ विरह नहीं भयो केवल करुणा अरु कौशल्या सुमि- आदिकानको करुणा विरह इत्यादि जानिये ॥ २ ॥ नायकाकोप्रच्छन्न करुणा विरह ॥ यथा-सवैया । मेंपठईमतिलेनसखीमुरहीमिलिकोमिलिबेकहँआने । जायमिलेदिनहींग दूतदयालसोदेहदशानवखाने । प्रेरतपैजकियेतनप्राण नियोगकेऔरप्रयोगनिधाने । लाजतेबोलनपाउंनकेशव ऐसेहीकोऊकहादुखजाने ॥३॥ उक्ति नायका की अपने मन ते निवारति कि मैं मतिरूपी सखी पठयाई सो आप के रहिगई को मिलायवे की आने दृग रूपी जी दूतहैं सो भीजाइ मिले दिनहीं इयाल सों सो देहदशा नहीं बखानत इतने पर प्रेरतहैं पैजकर कि प्राणन को तन प्राणको पठावतहैं योगसंयोगताके प्रयोग उपचार निधाने निधन भये निधाने पाठ में पटे यह अर्थ अरुलाजते बोलनो भी नहीं होत सोदुख कैसे कहिये अरु ऐसे कोई कैसे जा- पहा मतिकी गति गई नेत्र मिल ताते दिखियो गयो तन प्राणन को प्रेरत याते करुणा इ मनते कहत याते प्रच्छन्न अरु मेमते मिलन चाहत लाजते नहीं बोलत एदोभा. चपलता बीड़ा ताकी संधि अरु सखी जो लेन पठाई न ल्याइसकी याते कारण कार्य न भयो तासों विशेपोक्ति अरु मात सुख दाता दुखदाता दैगई ताते व्यापार संकरहै ॥ ३ ॥ प्रियाको प्रकाश करुणाविरह ॥ यथा-कवित्त । हरितहरितहारहेरतहियोहरतहारोहोंहरननैनीहरिनकहूलहों। नमालीवजपरखरपतवनमालीवनमालीदूरदुख केशवकैसेसहों। स्यकमलनैनदेखिकेकमलनैनहोहूंगीकमलनैनिऔरहोकहाकहों।
(१४४)
रसिकप्रिया।
आपघनेघनश्यामधनहीसेहोतघनश्यामकेदिवसंघनश्यामविन
रहों ।। ४॥
हरे हरे हार वतवनमाली जो वनकी पंक्ति जहां वर्पत वनमाली मेघ अरु वन
कृष्ण हृदयको कमल जो है सोई नयन उनको देसिके कमल नयन कृष्णकी
कमल नयनकमल पानी है नयननमें जाके ऐसी होहुँगी कहा रुदन करोंगी 4
धनश्यामनके द्यौस कहा बादरनके दिन कैसेहैं बादर अपघने जल, घनेजामें
सघन हैं अरु श्याम, धनहीं से होतयन नाम लोह ताडन करन हार यहां रुदन
दूना नहीं भयो याते करुणा विरह हरिणनयनी सखी कोई परोसिन बहिरंग है
प्रकाशजमकालंकार अरु याको तिलक कविप्रियाक टीका नारायणकवि लिसि
याते इहां नहीं लिख्यो संक्षेपकरदियो है ॥४॥
प्रिय को प्रच्छन्नकरुणा विरह ।। यथा-कवित्त ।
ऐसेमिल्योप्रथमश्रवणमगजाइमनरवनभवनकीनेअलिकमल
में। मनमिले मिले नैनकेशोदास साविलासछविआशभूलि
कपोल फलकमें ॥ नैनमिलेमिल्योज्ञानसकलसयानसजितजि
भिमानभूल्योतनकीझलकमें । तैसेछलबलसाधिराधिकै मिलनय
चाहत कियोपयानप्राणहपलकमें॥५॥
नायक मनसों कहत है प्रथम तो ऐसे मिले श्रवणकी राह जायकै सोरवन सं.
भवन तुमकीनों अलिकमायो अरु अलकावली में फेर मन मिले जोतिहारे नपन
ताखों मिले तहां विलास सहित रहे फेर छवि की आसते कपोल रूपी फलक आका
अथवा फल में फेर तिहारे संग जो नयनहें सोभी ज्ञान सों भी सब सयान सज
अभिमान आपन तजकै तनकी झलक में भूल तोसोंछल बल कहां है साधतै राधि
को मिलने की प्राण भी पलक में मिलतहैं प्राण तजन सो करुणा विरह मना
कहत यात प्रच्छन्न जसे मन मिल्यो तेसही प्राण मिलन चाहत यह दृष्टांत ब-
कार ॥ ५॥
प्रियाको प्रकाश करुणाविरह ॥ यथा-सवैया ।
हेतरुणाईतरंगिनपूर अपूरवपूरवरागरंगेपय ।
केशवदासजहाजमनोरथसंभ्रमविभ्रमभूरभरभय ।
तर्कतरंगतरंगिततुंगतिमिगिलशूलविशालनिकेजय।
कान्हकहकरुणामयहेससितेहीकियेकरुणावरुणासय ॥६॥
. भाषाटीकासमेव । उक्ति बहिरंग सखीकी नायकासों। कि कान्ह कछू करुणामय रहै अबतें वरुणालय समुद्र बनाये ताहीको रूपक करति है जो तरुणाई है सोई तौ तरंगिणी नदी है सो अपूर्व है ऐसी आन नाही अरु पूर्व राग राग पूर्वक है दाग सहित है अर्थ तेरे प्रेमते तरुणाई उमगी व्यंग्यते तरुणाई की उमंग दिखापत हैं रंगे पय पय जो जल है सो रंगरंग है अरु जहाज मनोरथ है ते संभ्रम होरहेहैं अरु विभ्रम भूरमय है अर्थ जो मनोरथ में भय है सोई भंवर है कहा मनकी विकलताते जहाज भरै है अरु तर्क रूपी जो तरंग लहर है तरंगत है भयदा है तुंग ऊँची है अरु तिमिङ्गिल बड़े बड़े जीव सो विरह के शूलहें चय समूह ते तामें उठतहैं यामें सखी बहिरंग ते प्रकाश अरु पूर्ववत् करुणा विरह रूपक समुद्रको ॥ ६॥ अथ प्रवासविरहलक्षण। दोहा-केशवकौनहुकाजते, पियपरदेशहिजाय । तासोंकहतप्रवाससव, कविकोविदसमुझाय ॥७॥ कौनों कार्यते पिया परदेश जाय ताको प्रयासविरह कहिये ।। ७ ॥ प्रियाको प्रच्छन्नप्रवासविरह ॥ यथा-सवेया । तूकरिहेकविधोंकहिगौनहिनंदकुमारतोगोनकियोई। मोहिमहाडरुतोउरकोनरहैलटिलेजिनकेधोलियोई ॥ ऐसोनवृझियेकेशवतोहिविचारैजुबीचविचारवियोई। तेरेहीजीयजियेजिनकोजियरेजियताविनतूवजियोई ॥८॥ नायका जीवसों कहत है कि तुकबतक गमन करहै नन्दकुमार तो गमन कीनो मोको यह तेरे उरको डर लागतहै कि तू लटी कमीकी वात लेके न रहे लटी निषिद्ध जिन कि घों लियोई है होतिई जातहै रहत है ऐसी तोहि न चाहिये जो दूसरी विचार तेरे जीवसों जिनको जिय जिये रे जिय ता विन व् जियो यहां कोई प्रश्न करै कि जाके जियसों जियत ताको छोड़ि कैसे जैहें ताको उत्तर करत किजीय को लक्षणा प्रेममें हैलोकमें कहत हम तिहारो जीप पाय यह कही तहां जिय प्रेमहीसों जियो तो भी जायवो नहीं बनत कहा प्रवास में जो प्रेमछूटत तो विहारी आदिक कदि यह वरणी दोहा । मिलि बिछुरत फिर फिर मिलत, आंगन अथयो भानु । भयो मुहूरत भोरको, पौरहि प्रथम मिलानु ॥ ताते इहां नायका को विरहताप ते सुधि भूल जो जिय आवत सोई कहति है मनसों कहत याते प्रच्छन्नका जियत है याते काकोक्ति अरु दृष्टांत अलंकार ॥ ८॥ प्रियाकोप्रकाश प्रवासविरह ।। यथा-कवित्त । कौनकेनप्रोतिकौनप्रीतमहिंविछुरततेरेहीअनोखेपतिव्रतगाइ
(१४)
रसिकप्रिया।
यतुहे । यतन करेहीभलेआवेहाथकेशोदासऔरकहोपक्षिनकेपाछे-
धाइयतुहै । उठिचलोजोनमानकाहूकीवलाइजानेमानसोजोपहिचा-
नैताकेआइयतुहै । याकेतौहैआजुहीमिलोंकिमारिजाउँमाईआगि-
लागेमेरीआलीमेहपाइयतुहै ॥९॥
सक्ति बहिरंग सखीकी नायक विदेश गयो तासमय नायका अति व्याकुल भई तहां
कहति कि कौनके अपने नायकमें प्रीति नहीं है अरु कौन नायक नायकाते विछोह नहीं
होत तेरोही अनोखी पतिव्रतहै कि प्रीतम गमन सुनि भोजनादि त्यागकीनो देस यत्न करते
पक्षी हाय आवतहै कोऊ पक्षीके पाछे धावत नाही उठि चल यह द्वितीय सखी ते कही
जोनहीं मानत तो नायका को काहूकी बलाय जान जोमान मनको पहिचान ताक घर
आइयेहै यह या चाहत कि नायक मिलै नहीं तो में प्राण छोड़ देउँसो आगि लगै कई
पानीबरसो है चलो कहेते पहिरंग आग लगे मेह नहीं मिलत यहते लोकोक्ति अलंकारर
विरहभयविभ्रम ॥ यथा-सवैया।
कोकिलकेकीकुलाहलहूलउठीउरमेंमतिकीगतिलूली।
केशवशीतसुगंधसमीरगयोउड़िधीरजज्योंतनतूली ॥
जैमुनिजैमुनिकैयचिनोन्हकी यामिनीपैनअजोसुधिभूली।
क्योंजियेकैसीकरैविसुसी बहुरचोबिनसीबिसवासिनफूली॥१०॥
कोकिल अरु मयूर इनके कोलाहलते उरमहल उठी तासोमंतिकी गति लूली लैंगरी
द्वैगई अरु शीत सुगन्ध जो समीर है तासों धीरज तूल रुई की भांति दिगयो जैमुनि
अगस्त्य कहि कहि जोन्हकी यामिनमें वची अगस्त्य समुद्र शोषणकरत अरु चन्द्रमा
समुद्रको पुत्र सो सुनि मंद बैगयो अरु कोई कहत कि चांदनीमें जो न्हाई को भ्रम
गयो कि विजुरी न परै ताते अगस्त्य कहोमव क्यों जियो विससी फेर दिनसी विस-
वासिन विसनाम जल ताकी वाहिन पुरइनि फूलीहै या विरहते भय भई अरु मुखद
'दुःखद बैगये यह व्याघात अलंकार तेन जी है यह वस्तु व्यंग ॥ १० ॥
प्रियाको प्रच्छन्न प्रवासविरह ॥ यथा--सवैया ।
जिनबोलिमबोल अमोलसवैअँगकेलिकलोलनिमोललिये। ।
जिनकोचित लालचोलोचनरूपअनुपपियूपसुपीयजिये।
जिनकपद केशवपानिहियेसुखमानिसबैदुखदुरकिये ।
"तिनकोसँग फूटतहोफिटिरेफटिकोटिकटकभयोनहिये ॥११॥
भाषाटीकासमेत। (१४७) प्रयक चित्तते कहत है जा प्रियाने केलि कलोलनि में सुबौल बौलिके जिनको मोल नहीं ते अंग मोल लेलय जिन लोचन निको चित्त लालची ते वाको अनूपरूप सुधा पीके जिये जिन के पदको परसके हाय जोहे सो हियमें सुसमानिके सब दुःख दूर कर- दिये पान छिये भी पाठ है ताको संग फूटतमें फिटिरे धिकरे है हिये सो टूक काहे नहीं भयो । तिनको संग छूटतही फटुरे फटि कोटिक टूक यह भी पाठ है । चित्तते प्रच्छन्न बोल अमोल इत्यादि ले वृत्त्यनुप्रास ॥ ११ ॥ प्रियाको विरहप्रकाशप्रवास ॥ यथा सवैया। केशवक्योंहूंचलैंचलिकोरिसदेशकहेंफिरिपेंडकदूपर । आगेधरेअपनोसुकैसाहसपाछहिंपेलपरॅपंगभूपर ॥ होतजहीतहिंठाढ़ेठगेसे चलोनकझोपरैकान्हहितपर । लोककिलाजफिरचोनपरेपेमिलानकरेदशकोशकऊपर।। १२॥ रक्ति सखीकी सखी सों ॥ कैसेहूं चले फेर दो पेंड़ पे कोरन संदेशे कह अरु अपनी साहस करके आगेको पाउँ घरै पर पीछे को परजाय जहां तहां ठाढ़े ठगेसे होजात चलो नहीं कहत धनत हित सो अरु लोक की लाजते फिरतन ही बनत परंतु दश रोज में एक कोश गये यहां सब जानत ताते प्रकाश अरु लोककी लाज कारण फिरयो न वने कार्य एक संगते हेतु अलंकार अरु नूपुर पाठ में जय प्यारीसों कान्ह कहे चलो न तप नूपुर गारे परे ।॥ १२ ॥ कृष्णको विरह भयविभ्रम ॥ यथा-सवैया। प्रेतकोनारिज्योंतारेअनेकचढ़ायचलचितवैचहुंचातो। कोडिनिसीकुकरेकरकंजनिकेशवश्वेतसचेतनतातो ।। : भेटतहीवरहीअवहींतो वश्याइगईहीमुरीमुखसातो। • केसीकरोंकहिकसेवचों बहुरोंनिशिआइकियेमुखरातो ॥१३॥ यहां रात्री चुरेलको रूपक मेतकी नारी की ज्यों जैसेतारे नेवन के होते, तसेही तो तारागण रात्रीमें अनेकहें सो चदाई कर चलत चारऔर चितवत है भर इतने पर गोदिनी है काहे कररूपी के शिकार जरी कमल सिंकुर गात अरु कोदिन के करभी सिकुरे होत अर सय अंग श्वेत कर, चांदनी ते भेटत ही यरत है दीप अग होती सातों मुरा पराप गई नाश करगई मा जराप गई मुम्बैमुधिमातोभी पाठ है कैसी करों का कैसे बचे फेर राती मुग रके आई है निशिमुस संध्या वाये रंगल. होतही है थर सातपुराशे नाम दोहा । सान पान परधान पुन ज्ञान गान सुति- भंग । शुभ संयोगरियोग दिन,सातारा तियसंग ॥ अरु कोई यह मानत नादसेजस (१४८) रसिकप्रिया। मनोसमा संगति साल सुगंध । सात वियोगिनकांवरत महा विरह ते अंथ [[ आशय यह, कि रात्री विरहनी को दुःखदेनहार आई ताको वर्णन किया है रूपकालंकार ॥ १३ ॥ मियाको निद्रा । यथा-संवेया। आयेतेआवेगीआंखिनआगेहीडोलिहमानहमोललईहै । सोवेनसोवनदेयनयोंतवसोइनमेंउनसाथदईहे ॥ मेरियभूलिकहाकहोकेशवसोतिकहूंतेसहेलीभईहै। स्वारथहीहितुहैसवकेपरदेशगयेहरिनींदगईहै ॥ १४ ॥ नायका कहति है कि हे सती या नींद मेरी सौति है काहे जब पीव आवेंगे तर आखिन आगे आवेगी अरु डॉलेगी मानो मोलकी लीनि है सौह आपुन ॥. सोवन देति पीय पास का पीय आपनो करलेत सोवनमें नाम जानी वेरटन मेरे साथ दई है कि यह नीकै राख है सो भूल मेरी है जो मेमानी कहूंसौति सहेली भई है स्वार्थ के लिये सब हि तु है परदेशगये हरि नोंद संग लई है रूपकालंकार ॥ १४ ॥ प्रियको निद्रा ॥ यथा-सवैया । केशवकेसहुँकोरिउपायनिआनसुतोउरलागतिहै। चकचौंधतिसीचितवैचितमेंचितसोवतहूंमहँजागतिहै । परदेशप्रियापलमोहिंपत्यातिनजानेकोयाकीकहागतिहै । तजिनेनननींदनवोढ़वधूल आधिकातितेभागतिहै ॥ १५ ॥ यहां नवोढ़ाको अरु निद्राको एकसी कहें नोंद अनेक उपायन ते आवत माद वस्तु ते अथवा किस्सा कहानीते तैसही नवोदा साखन के छल बल ते आवति है नीं चकचौधति सी चितवे अधखुलीऑखिनमें नवोदाभी तैसही अधखुली आँखिन ते चित पति कब जब मैं जागत तब चकचौघतसी चितवत आपन नोंदसी जता अरु नींदहूर नागि यह अधखुलीआंखिन रहै नींद उमच उमय जात नवोदा भी उचकि उबकि परत नींद परदेश प्रिया जान मोको नहीं पत्यात नवोढ़ा परदेश परदासे रहित मोहिनही पत्यात को जाने याकी कहा गति है ऐसी तन नैनन नोंद नवोढा वधू आधीरात ते भागति तहां नवोदा पत्याति नहीं मना नींद काहे ॥ नहीं पत्याति यह कोई कहै उत्तर वो नींद विरहाने की भयमानतिमन अरु कोई कहै नेत्रतौ दोहें पीय एकहै तहां उत्तर यहां नींद नवोदा सो-सविषयमें सावयव रूपक भयो है वहां एकदेशी भी सावयव हातुहे एकवस्तु ऊपरत कहे दिन कहे जैसे विधुमुस मृगमद बिंदु अंक लखत सुपिय गहिटेक इहां मुखवंद मृगमद अंकअरु चकोरल बिन कहे ठसे तैसे यहां नेत्रनको नींद: छोडि जातिहै नवोटा पियको अंक छुटाय भागिजाति है सो अंग ऊपर ते लगाय भाषाटीकासमेत। (१४९) क देश विवर्ती सावयव रूपक भयो ऐसीती प्राचीन कहत तहां यह प्रश्न है किरूपक मैनहूँ होहि विष विषयीको संबंध नहीं छूटन चाही प्रथम वर्ण पुन अवर्ण कोई कहत पम अवर्ण पाछे वर्ण सो याम वर्ण अवर्ण एकही अर्थते पुष्ट कीने ताते यहां वाच्य दांग व्यंग होत है वस्तु उत्प्रेक्षा अनुक्त विपया जानिये काहे सप पद क्रियाके हिले कहि पाछे वाचिक दीनो है जैसे बिहारी ऐचतसी चितवन चित भई ॥ १५ ॥ मियाको विरहनिवेदन ॥ यथा-कवित्त । शिवकुँवरवृपभानुकीकुँवरिवनदेवताज्योंवनउपवनविहरतिहै।कम अज्योथिरनरहतिकहूंएकठौरकमलानुजाज्योंकमलनितेडरतिहै ॥ गालीज्योंनकेतकीकेफलसंघसीताजज्योंनिशिचरमखचंददेखिही रतिहै । वदनउघारतहींमदनसुयोधनहीद्रौपदीज्योंनाउँमुखतेरो ररतिहै ॥ १६॥ विरह में राधिका की सखीकी पत्री कृष्णको हे केशव कुँवर वृषभानुकी कुंवरि राधा- न कहिये बनाय देवताज्यों वन देवीसी वनके उपवन में फिरति है किंवा देवीसीयनके न जंगल उपवन बगीचामें फिरति है कमलासी चंचल चंचलताई में लगति है कमल डरति है याते मानो कमला है कमल ते डरतहे किंवा कमलासी चंचल है मलानुजादरिदासी कमलते डरत कालीसमान 'केतकी सूंघत काली ज्यों । केतकी कफूल रुचे या पाठमें जैसे कालीको केतकीको फूल नहींरुचत तैसे याको भी तासमान निशाचरीचंदते जरत निशिचर राक्षस अरु चंद्रमा मदनरूपी दुर्योधन जब दन उधारत तब द्रौपदीकी रीतिते तिहारो नाम लेति है यहां उल्लेख अलंकार बहुविध र्णन ते ॥ १६ ॥ पुनः कवित्त । भौरिनिज्योभावतरहतवनवीथिकानहंसिनिज्योंमृदुलमृणालिका वहतिहै । पीउपीउरटतरहतचितचातकीज्योंचन्दचितचकईज्योंच व्हरहतिहै। हिरनीज्योंहेरतिनकेशरिकेकाननको केकामुनिव्याली योपिलानहींकहतिहै । केशवकुँवरकान्हविरहतिहारेऐसीसुरतिनरा धेकाकीमूरतिगहति है ॥ १७ ॥ सती वचन नायक साराधे तिहारे विरह ते भौरीसीभैवत रहत वनवीधिन में भर भारी यो भवति है भवन वनपीयिकान' भी पाठ है। अरु हंसिनीमी कामल मृणालिका याति यंतोरिडारात अरु पीठ पीउ पपीहा की तरह रटत रहति अरु चंद्रमा को देखि चक्रवाकिन . रसिकप्रिया। सीरहिजातअरु हिरनी केशरी सिंहके कानन ते भागे तैसे केसरि के वन ते भागति , सर्पिणी जैसे मयूरके वचन सुनिके बिलमें घुसति तैसे यहभी उद्दीपन जानके बहति है 'चहातहै' यहभी पाठहै। अरु वाकी मूरति सूरति को नहीं गहति अति बेहोश है इहां भी उल्लेख अलंकार पूर्ववन् जानिये ॥ १७ ॥ प्रियको विरह निवेदन कवित्त । दीरघदरीनवसैकेशोदासकेशरीज्योंकेशरीकोदेखेवनकरीज्योंक पतहै । वासरकीसंपदाचकोरज्योंनचितवतचकवाज्योंचंदहीतेचीगु नोचपतहकिकासनिव्यालज्योंबिलातजातघनश्याम धननिकीघोर निजवासेत्यांतपतहै । भौंरज्यों वतवनयोगीज्योंजगतनिशिचात कज्योंश्यामनामतेरोईजपतहै ॥ १८॥ उक्ति कृष्णकी सस्तीकी राधिकाप्रति दीरघजे पहार की दरी, तिनम यसत केशरी सिंहकी रीतिते याके दोइ अभिप्राय एक गेह में नहीं रहत दूजे अकेले केशरी आदिक सुगन्धित वन देखि हायीकी रीतिते कैंपत अर्थात् प्राणहानिको डर मानिके वासर दिन" जो संपदा है भोजनादिक ताको चकोरकी तरह नहीं चितवत अर्थ खान पान छोड़ा यो 'वासरकी संपत्ति ज्या वृधू ज्यों न चितवत' यहभी पाठ है। चक्रयाककी रीतिते चंद्र को देसिक चौगुनो चंप जात चौगुन में यह अभिप्राय है चांदनी ते विरह तपन १ उई पन चंदते २. मुस को स्मरणही ते चंदको आकार देस ३ अरु चौथे प्रकाश ते संके स्थल देखि परत चकवा में भी चार अभिप्रायहें एक विठुरन दूजे रात्रि सपन किंवा रात्रि दिनसी भासत तीजे चकई दृष्टि आयत चीये शीतलताविम्वा चाँद उद्दीपन रावत है विरही को चकवा ज्यों चंद चित' यहभी पाठहै केकामपरवीवार मुन सर्पकी तरह बिलात जात घनश्याम कृष्णचंद्र और पनमेषको चौर मुन जा मकी नाई तपत 'जिय जवान ज्यों सपतई' यहभी पाठ है।भार की रीतिते यनमें भंव योगी की रीति ते रात्रिम जागत चातक की रीतिते श्याम नायक तेरो नाम जपत 'चातक ज्यों श्याम नाम तेरोई जपत है' यहभी पाट है प्रश्न ॥ इहां कालनिरीप हान उत्तर वर्षको.वर्णन है अरु कृष्णकी ससीकी पत्री राधिका प्रति है यापरभी अर्थ टगा है. अलंकार पूर्ववत् ॥ १८॥ दोहा-केशवदासप्रवासको, कोयथामतिसाज । राधाहरिवाधाहरण, बरणोंससीसमाज ॥ १६॥ इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायारसिकप्रिपा संभोगशृङ्गारप्रवासवर्णनं नाम एकादश प्रकाशः ११
भाषाटीकासमेत।
प्रषासको यथा मतिते वर्णन करयो अब बारहवें प्रकाश में राधा की अरु हरिकी
बाधा हरनिहार सखी वर्णन करिहौं ॥ १९ ॥
इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्याज्ञा
भिगामिललितपुरनिवासिहरिजनकवीश्वरात्मजेनसरदाराख्यकवीश्वरेण
विरचितायारसिकप्रियायांभूपणे सुखविलासकानामटीकायांकरुणा
दिविरहप्रवासवर्णनं नाम एकादश:प्रकाशः ॥ ११ ॥
अथ सखीवर्णनम् ।
दोहा-धाइजनीनायननटी, प्रकटपरोसिननारि ।
मालिनबरइनशिल्पिनी, चुरहेरनीसुनारि ॥१॥
धाइ जनी जो दुरागमनमें साथ आवत, नायन नटी परोसिनमालिन तमोलिन शिल्पि-
नी नाम चितेरिन चुरिहेरिनी सुनारिन ॥ १॥
दोहा-रामजनीसंन्यासिनी, पटुपटवाकीवाल
केशवनायकनायका, सखीकरहिंसवकाल ॥२॥
रामजनी गोसाइन पटु प्रवीण पटया की स्त्री नायक अरु नायका इनको सवकाल
में सखी करतं, यह केशव कहत ॥ २॥
प्रियासों धाइको वचन ॥ यथा-सवैया ।
मोहनसाथकहानिशियोसरहैसतरंजहिकेमिसिवैठी।
केशवक्योंहुँसुनैमहतारीतोराखहिरीवरहीमहँपैठी।
होसिखवोसिखदैरुखितोहितेभौंहचढ़ायकैदीठउमैठी।।
कौनल तीसुरूपनकाहितुहीकछुजातिअकाशहिऐंठी ॥३॥
पद सुगम अरु कोई कहै या धाइ कहां है तो लडैति शब्द पोपण करत लाड़धाइ
करतहैं पिहित अलंकार जो नायकाकी हियेकीवात सो सतरंजके मिसते कहीअरु पर्या:
योक्तिभीहै ॥ ३ ॥
प्रियप्रतिधाइकोवचन ॥ कवित्त ।
थोरीसीसुदेशवेपदीरघनयनकेशगौरीजूसीगोरभोरीभवजूकीसारी
सी । सांचेकीसीढारीअतिसूक्षमसुधारिकढ़ीकेशोदासअंगअंगभाइके
उतारीसी॥शोधेकैसीशोधीदेहसुधासोंसुधारीपांउधारीदेवलोकतकि
सिंधुतेउधारीसी । आजुयासोबोलिचालिहसिखेलिलेहुलालकाल्हिए
सीग्वारिलाउँकामकीकुमारीसी ॥४॥
((१५२) रसिकप्रिया। "नायका यह आपनी ससुरारि जाति है ताको नायक बहुत चाहत रहो तानिमित्त धाइ समाधान करति है भवकी सारी पार्वती की वहिन सीह प्रश्न ॥ जाको लाइ है ताकी हीनता क्यों करै यासों आज कार्य साधिलेहु उत्तर ॥ काल्हिहू ऐसी ल्याइह यह तौ जाति है यह तो तुमको नीकी लगीहै याते ऐसीही काल्हि और ल्याइही कुमारी शब्दते धाइ जानिये इहां जाति अरु संशय है दीरयनयनके समय जाति सिंधुते रधारी- सीह यामें संदेह भवजूकी सारीसी में उपजा अरु याको अर्थ कविप्रिया के तिलक में नारायण कवि लिखिचुकें याते इहां नहीं लिसो उपमा लुप्तालंकारको संकर है nen प्रियासों जनीको वचन ॥ यथा-कवित्त । शोभाकोसघनननमेरोघनश्यामनितनईनईरुचितनहेरतहिराइये । केशोदाससकलसुवासकोनिवासकरिविविधविलासहासत्रासविसर ये ॥ ऊपरसकेतकुमयूपरसमीठोपियूपहीपैलीघाहेजार्क यराइये । चोरीचोरानैननिचुरायेसुखकोंनेजोलोंपियमनमाही मेलनाचराइये ॥५॥ शोभाको जाकी धन नहीं है कहें नवीन २ शोभा धारत सुवास को निवास । विलास हास त्रास विसारे अरु अप कितनो मयूप मधु पियूष अमी के पारहै । नियरें ताते चोरी काहे चुरावत नयनन को कौन मुसहै जोलोमन मेलि न घरावेगी इतनी बातें मेघमें नहीं हैं याते टपमान ते उपमेय अधिक है ताते 'व्यतिरेक शोम सघन वन ' या पाठमें उपमा विलास इत्यादि में वृत्तानुप्रास ऊप मयूप कहा है उपमानकी निंदा ते प्रतीप अलंकारादिको संकरदै जनीको अर्य जन चाकर कीद अर मइकेके घरते दि ॥५॥ जनीकोवचन मियसों। यथा-फपित्त । ऐसीबातेऐसेहीधोकसेकहापरतनजाकीगतिमतिलाजपटसॉलपेट मेरेहीनआवमरीवीरएतीपारवेतोजातपाइहीकेयरसायलौटिलेटी ऐसीतोहचेरिनकीचेरीवाकीकेशोदासजेसीतमहाहाकर पांइपरमेंट है ।. जानतिहोंनंदजकेटोटाहोजानोवोनवेऊतोउतहिवृपभान कीवटीदे ॥६॥ नापाको अपराध जान जनी कहति है कि ये बातें हम कैसे करें तामों जैमी: काटी का दामों जाय गति पर मति अति सम्जा ते लपेटी मेरे महीमा यादव पर जाति है अर जमी नुम आजु बावरी मी दावी घरी की ही मही - .. भाषांटीकासमेत। (२५३) जानत हम नंदनलालहैं या नहीं जानत वे वृषभानु मुताहें चेरीके नामते चरी वचन लाज पट ते रूपक ॥ ६॥ नाइनको वचन प्रियाप्रति ॥ सवैया । अहोतोगयेपुनिपौरहिलासुतोवोलनजाहितूपाछहिलागे। : ‘करतबकैसेपरायेजुढोटहिहहैकछूनिशियोसकेजागे ॥ जोनरद्योपरेकेशवकैसहँदेखतहीसुखश्यामसभागे । देतिहाँजानक्योरासतिकाहेनआरसीयोंकरिआंखिनआगे ॥७॥ आरसी याते उपमा अलंकार आरसी शब्दते नाइनअहोतो गये पुन पौरहि लांमुतो घोलन जाहिरी पाहि लागे करिहै तव कैसी परायहि टोटहि यह भी पाठहै ॥ ७ ॥ नाइनवचन प्रिय प्रति ॥ सवैया । वड़ीबड़ीआंखबड़ी छविसों चितवैवड़ीवेरखड़ोसुखदीने । बड़ीही विचारवड़ीरुचिकेशवक्योंहूंमिलोसुबडीहमहीने ॥ बड़ीजियलाजवडोडरआलीवडीलहरीयोंचलैंचितलीने । बड़ीनिहूंसोंतोपड़ेदुखबोलेइतौबड़ेमानवडोमनकीने ।। ८॥ नाइन कहतिहै एक तो क्या मिली तो मिलें हमहीने हमही को मिले केश संवारि- वैके संबन्ध दूजे नायका न्हातिहै तब नाइन सौ लाज नहीं करति यद्द माइनई सों लजाति है सो नाइन कहतिहै याके यही लाजहे याते नाइन लाटानुप्रास यई पड़े शब्दते ॥ नटीवचन नायकासों॥ संवया। ज्योंहोंदिसावनतोहिंगईरोतमारियग्रीवगहीफिरिमाई । आजुकहादिससाधलगी हैदिखाउंगीजाइतावेईकन्हाई ॥ देखेतेशीरीहैजातिभट्टअनदेखेजस्तुवहेअधिकाई। रातिकीवागतिद्योसकेएपुनहींतेरीवालनिवाजनआई ॥९॥ अति प्रेमते प्रेमालंकार गतिते नटी ॥९॥ नायकमति नटीवचन ॥ कवित्त । जहाँ जहाँ दुरै तहीजान्हऐसीजगमगकसेहूंजुकेशवदुराइल्याउँरं- गकी । पवनको पंथ अलिअलिनकपीछेआलीअलिनज्यिालागीरहें जिन्हें साधसंगकी॥निपटअमिठवहतुम्हें मिलिवेकोजक केसेकेमि- ॥
(१५४) रसिकप्रिया।. डाऊंगतिमोपैनविहंगकी । इकतोदुसहदुखदेतिहुती दुतिहूंजे वीस- स्वेविसवासभईवाकेअंगकी ॥१०॥ मुगम विपरीति अलंकार ता को लक्षण ॥ साधक बाधक सिद्धको जो वाप्त सुग• इन को पिय को मिलावत है पीय पश होइ जात है सोई बाधक भयो मिलन में धिकता करत है कि जोवाको लिवाइ कुंजमें दुराऊं तो युति चांदनी दिखात अरु बनके पंयते भ्रमर संग लगेरहत अरु अलिन के पीछे आली सस्त्री भ्रमरी समान इतों सो एक तो दुःसदा गुति रही अरु ताहूपै विषसी सुवास भई है तहां प्रश्न है कि ली भ्रमर के पीछे रहनेको कहाआशय नायका के पाछे काहे नहीं रहती ताको उत्तर: क वह चांदनी में जब चलत तब मिलजात देख नहीं परत तब सखी जा ओर भ्रमर इत जात ताही ओर जातीहैं अर्थ कुंजकी राहे लाऊँ तो प्रकाश नहीं छिपत चांदनी तो भ्रमर दिक करत अरु वास उपमेय विप उपमान फैटन धरम ताते याचक लुगा होत है ॥ १० ॥ परोसिन वचन नायकाप्रति सवैया। पांइपरेपलिकापरस्योसुलगीरतितोलनमेलिरतीहो । सोहॅकियेमुहसोहेकियो अबलोंतुमपैगतिऐसीनतीहो । केशवकेसहुंदेखनकोजिन्हेंभोरहिौरीहै आनंदतीहो । पानखवावतहीजिनसोंतुमरातिकहांसतरातहतीहो ॥११॥ इहां रातिको सतरयो अपने भवनते जानों याते परोसिनके पाइपर तुम पलंग पर• न दीनो अरु अपनी रति मेल मिलाई अयवा डारको उनकी रति भीति तोलत रही बनके देसयेकी भोरते भारी है मोसों दती रही तिनसों पान सवारत राति कहा तरात रही प्रभाइहां पान राबावत सतरानी सो काहे उत्तर|ानको पान सवारत रहे - मुधि आई याते स्मृति अलंकार अरु दूसरी प्रश्नकि जो परोसिन जानी तो गेहरू न न जानहें तहां जाने त निरलज्जता भूचित होति उत्तर ॥ नायक प्रात आ६ सय या क गयो रही प्रश्न तदअन्य धाइनटी सो फाहेन कही उत्तर ॥ परोमिन की मुनयी मर होति है॥ ११॥ परासिनवचन नायकमति॥सवैया । हांसमेंचातकवासोंकही हॉसवाहकहीमुहितकारिलेख्यो । आंसमिलीनमिटीसखियाँ मिटबोईसुकेशवक्योंअवरेख्यो । चिच्याइमरोचुपसापकिवातकस्वातिसमेहीलवसविशेख्यो । आजद्दोक्यावह भावतयांजिनिआगिटगेहूंनआंगनदेख्यो॥१२ रे । । - ।
भाषाटीकासमेत । उक्ति परोसिन की नायक प्रति कि जा सखीसों तुम कही रही वासों मिलावहु ताकी बात मैं मुनत रही परोसिन हो ताते वाने हांसी करि नायका सों कही अरु हाँसे ये कैसी बात वाहू कहीं हम मिलिहें सो तुम हित जानोअबै तुमसों नहीं याक्षण सस्ती मिलि है मिलबो कहा अबरेखति है सो चिच्याइ काहेको मरत हो चुप साधिरहो स्वाती समय पाइ श्रवत है आजही वह क्यों ह्या आवत है ताते तुम आगि लगो आंग. ममें मति देखो भाविक अलंकार पाछिली बातें भी कहेतेअर आगिलगेहूं आंगन मआई पामें कोई विशेषोक्ति भी कहत अरु परोसिन भी याही में |॥ १२ ॥ मालिनिवचन नायकासों ॥ कवित्त । दुरिहैक्योंभूपणवसन दुतियौवनकीदेहहीकोजोतिहोतियोसऐसी रातिहै । नाहकोसुवासलागेव्हहेकैसीकेशवसुवासहीकीवासभौंरभी रफारेखातिहै ॥ देखितेरोसुरतिकीमूरतिबिसूरतिहाँलालनकेगदे खियेकोललचातिहै। चलिहक्योंचंदमुखीकुचनकेभारभयेकंचनके भारतोलचकलंकचातिहै ॥ १३ ॥ जो सखी है सो नायक के रूपकी अधिकाई नायकको जतावत नायका प्रति कहिक अरु सुवास भ्रमर ते मालिन सुभावही' भी पाठ है।अरु अभूत उपमाअलंकार के उदा- हरण में यही कपित्त कविप्रिया में है याते नारायण कवि याको तिलक नहीं लिख्यो मालिनिवचन नायकमति ॥ कवित्त । घेरोजनिमोहिंघरजान देहुघनश्यामपरिकमेंलागीउरदेखिवीज्यों दामिनी । होई कोऊऐसीसीआवेइतउतव्हेकैवेउवृपभानुजूकीवेटी गज गामिनी ॥ आदितकोआयोअंतआवोवनिवलिजाउंावतहेवे ऊवनीआईअरुयामिनी । कामकेडरनतुमकुंजगहोकेशोदासीर नकेभयनभवनगलोभामिनी ॥१४॥ उक्ति मालिनि की नायक सों तहां प्राचीन प्रश्न करत कि कुंजमें जो नायकको पटावत कामके डरते सो तौ कुंजउद्दीपन है वहां ज्यादा विरह है कोई काम अत्यंत- सतावत है तब कंज गह्यो क्यों कह्यो तहां उत्तर यह कीन्हों कि कुंजकामको पर है घरमें आये तोन मारि है तहां कुंजमें क्या न्यून चाही सोअधिक है पनवनशरदवसंत उद्दीपनस्यलहें ते सब काम के भवनहेंटहाई गये काम बढ़त है तहां कुंज दो प्रकारकी एक संभोग कुंज १ दूसरो तपकुंज २ सोतुम तप कुंजमें जाहु यांत वाम न सताइ है (1५६) 'रसिकप्रिया। ३ सो इहां लक्षणा ते जान्यो कि तुम काम सोंडरिक तप कुंन गयो जहाँ निर्वद मराग्य उपजे तहां सखी काहेकी रही जो शृंगार विरोध भई ती कवित्तको अर्य कि नरो जिन मोको है घनश्याम परजान देहु जायरमें नायका है एक परीमें दामिनि वत अंगों लगी देखि पीन्यो साधारन होहितो आनरीति ते आइसके वह एकवड़े वापकी मेटी दूजे गजगामिनी सो सूर्य कोअंतआयो सो अय पलिजाउं वन जलभी आवत ३ अरु भी धनको आवती हैं अरु यामिनी भी आई भ्रमर जिनके डर भवन में बैठी ३ ते कमल में बंद है हैं अवै घरमें बैठी हैं तुम कुंज में बैठी इहां कोई कहै वन नल कहेते पाव सूचित होत तहां कमल कहां जो यन आवत अब तिहारी बनी भावत है तुम घनश्याम हो सो रस बरसियो करिही ताते साभिप्राय पदते परिकरांकुर अलं- कार अरु मुवास पदते मालिन जानिये ॥ १४ ॥ बरइनबचन नायका सों ॥ कवित्त । मैनऐसोमनतनमृदुलमृणालिकाकसूतऐसोसुरधुनिमनहिहरति है। दारोंकैसीवीज दंतपांतिसेअरुणओंठकेशोदासदेखेगआनंदर तिहै ।एरीमेरीतेरीमोहिंभावतभलाईतातेवूझतहौंतोहिंउरवूझतब तिहै । माखनसीजीभमुखकंजसोकुवंरिकहुँकाठसी कठेठीवातकैर नेकरतिहै ॥ १५॥ पात पान अरुणाई तें वरइन 'मृदुमृदुलमृणालिकाके भीपाठ है।अरु 'विय से अरुण गोठ'यह भी पाठहै।याको अर्थ कविप्रिया के तिलकमें नारायण कवि लिखिचुके याते इहां नहीं लिख्यो यामें उपमालंकार है ॥ १५ ॥ बरइनबचननायकासों कवित्त । नैननिनवावोनेकअतिहीअनीतकरेजानतहौतुमसेजगजानिय है । चंचलचरित्रचितचेटिकीचेटकागायोचोरीकैचितनअभिसार नोपियतुहै।।एकनिकेपैठेउरउररीउरोजनमें उरझतेकेशोराइकैसेवैजि मतुहै । ऐसीकहुँहोतिहैजोवालनिकीचोरीचोरीचितमतिमनमथहा- नवेचियतुहै ॥ १६॥ घरइनकी उक्ति कि हे प्राणप्यारे नयनन नवावांनेकहूं अरु अति अनीत करत, तुम नानत हो जैसे जाग के जानिये है अरु चंचल जो तिहारो चरित्र सोई चेटका है ताने इटक गायौहै सो चोरी करि चित्तकी ताको अभिसार करावत हो 'चेटक 'चटक लावो ह भी पाठहै । एकन के उरमें पैठे अरु उरोजन में उरझे फिर कैसे तजत हो अर्थ -जेते वह कैसे जीवंगी 'उरटरन उरोजन में यह भी पाहै । ऐसी नाही होति कि बन
भाषाटीकासमेत ।
(१५७)
बालानकी चोरी चोरीउनको मनकाम हायवेचत है। 'मन मनमयही के हाथ' भी पाठ-
है।चंचल चरित्र ते नायक के नयननिमें था लेत चित्त को अभिसार कहा सारपीलेत
है पानाने कोऊसार पीजियतु है इहां चेटक करकतुहै पान बचिवेमें ताते बरइन चोरको
रूपक अरु नयन को भी ॥ १६॥
शिल्पिनिवचनप्रियासों।सवैया।
अवहींपुनवोलिरीबोलिलगीपौरहूंलौंउठिजाननदीने ।
मेरेहीजानभईउलटीवशकेशवहकहिवेकहॅकोने ॥
जोपैइतोदुखपावतितलफैगमीनमनोजलहीने ।
तोकितछांइतिहेछिनएकरहेकिनचित्रज्योंहाथहिलीने॥ १७॥
उक्ति सखीकी नायकासों अवहीं ते बुलायवेकी जक लगिरही है तोको नायक दर-
बाने तक नहीं पहुंचो अवहीं पुनिबोलरीबोललगी जक'यहभी पाठहीयामें कलहांतरिता-
सूचित होत याते मेरे जान ही वश उनके जो पै ऐसोदुख पावत मीन जलकीरीति
नेत्रकरिकै तो चित्रकी नाई हाय में काहे नहीं लियेरहति इहां चित्र शिल्पिनी तलफ
हग मानो जलते हीन मीन यह उत्प्रेक्षा ॥ १७ ॥
शिल्पिनिवचनप्रियप्रति सवैया।
खोटनुरीजिमिखुटिरहोगहिठौरकुठौरनिजानिनजाहू ।
लालनआवतमारेसमाजनलागेअलोककेताजनताह ॥
कोरिविचारविचारहुकेशवदेखहुबूझहितेसवकाहू ।
नेहहिकेफिरलागहुसंगननैननिकेसँगऔरनिवाहू ॥ १८॥
शिल्पिनि वचन है कितुम पोट अडैल घोड़ा कीरीति खूट किनारोगहिकर रहेही ठौर
कुठौर नहीं जानत जहां मनमानो तहीरहे किंवाऔर कुठौर कहा जाने न जात हौ पैट-
तुरी जिमि भीपाट है । लालन कोई को तो समाज में न आवो अरु ताजन चाबुक
मारे तो आरो'लाजन आवत मारे समाजन' इस पाठ में अलोक के ताजने चाबुक लागे
सभा तौभी लाज नहीं आदत या जो में कहति हो कोरिभांति सों सो विचारो पुनि
हितसों बूझो नेहही के फिराफर मंग लगतहो सो नयननिकै संग और निवा-
हत हो इहां नेह के संग लगो नयनके न लगो नेहपद अश्लेष है सचिमनरंग
बतावत ताते शिल्पिनि किंवा खोटातुरी ते वित्रको घोड़ा याते शिल्पिनी जानिये
घोटतुरीकी उपमाते उपमालंकार अरु अदीयल घोड़ा को दृष्टांत है ताते दृष्टांत
अलंकार हैं ॥ १८॥
- (१५८) रसिकप्रिया। चुरिहेरिनिवचनप्रियाप्रति ॥ कवित्त । मनमनमिलेकहामिलिहैमिलेकोसुखमिलहुधौंदेवहुवोलाहिकाहू बालसों। भूलिपरेभौहनिधीवांधिहौंकितेकदिनबांधौरलिजाउँवनमा लीवनमालसों।मुहुमोरेमारेनामरतिरिसकेशोदासमारहुधौमरेकहेक मलसनालसों । नैननिहीविहँसिविहँसिकौलोबोलिहौजूबचहूतोवो लियेविहँसिमुखलालसों ॥ १९॥ उक्ति सखीकी नायका प्रति परस्पर तुम जो मनं मनमिले हो तामें मिलेको कौन मुख तुम्हें मिलिहै मिलिकै देखो अरु काहू बाल सों मिलेको मुख बूझो भूल परे पे भौहनि सो कितेकदिन बांधिही याते वनमाली को धनमाल सों बांधो अरु मुखमो रति हौ याते रिस नहीं मरत याते मेरे कहे सनाल कमलसों मारो अर्थ बनमालते कुंज सनाल कमल ते बांहःसाध्य वसाना लक्षणा कर नैनन नैनी तिनहीं, विहँसिविहसि के बोलो याते मुख विहौसलालसों वोलो चुरी पहिरत मुँह मोरत सोई बात कहत ताते दुरिहे िनि है रूपकातिशयोक्ति अलंकार अरु स्वभावोक्तिभी है ॥ १९ ॥ चुरिहेरिनवचननायकसों॥ सवैया। आपुनहूजेदुखीदुखजाकेहौताहिकहाकवहूंदुसदीजै। जाविनऔरसुहाइनकेशवताहिसुहाइसुतोसबकीजै ।। भागवडोजरचीतुमसोवहतोविझकाइकहोकहँलीजै । जोरिसियाइतोजैयेमनावनतातोहैदूधसिराइनपीजै ॥२०॥ जाके दुसते आपु दुखी होत ताको टुस का कयहूं दी जा दिन तुमको और नहीं हात ताको जो सुहाय सो करोचाही तिहारे बड़े भाग हैं जो पा रचीहै तुमसों ताको बेझकायते कहा पावोगे घिरचाये औचिठाये भी पाठहै।नोसिस कर तोमनाइये चुरी पहरा- तमें मुहात चुरी पहिरावत ताते चुरिहेरिन अन्योक्ति अलंकार दूपसिराक पीने भरे तहारे लायक नहींहे का सिराइन पीने याते काकोक्ति ॥ २० ॥ सुनारिनवचननायकासों ॥ सर्वया। लोलअमोलकटासकलोलअलोलिकसोपटओलिकैफेरे। पानिपसोअतिपनेरसालविशालयनेमनभावतेमेरे ।। केशवचीकनेचौगुनेचोसेचितकेकियेहरित्याइनचेरे। शोचसँकोचनऔरतिरोचनधीरजमोचनलोचनतेरे ॥२१॥ मस्ति नापका सा मुनारिनकी । किसोट चंपल अमोटरें तरे कटाक्षानपीकरंट भाषाटीकासमेत । (१५९) कहें अलोलिक तासा धीरज सों पट ओलि के औट देके फेरे अर्य नेत्रपट काहेको फेरतहै पानिप करन अति तीक्ष्ण रसाल रसको पर बहुत विशालयनो है ताको देग मेरो मन भावतहै यह सब नेत्रके विशेपणहैं ॥ 'पानिप सो अति वैन विशाल' भी पाट है। केशव चीकने सचिकन चतुर चोगुने चोखहे ते चौसे जो चतुरके गुण तेचौमहें सो इनको चितैकि हरिचरै भये सान्याय है अन्याइ नहीं शौच संकोच श्रीरति की रोचनजर धीरज इनको मोचन तेरे लोचनको स्वभाव है 'धीरज मोहन' भी पाठ है । इहां अमोट पानिप पैने चौगुने चौपन्याइये वचन मय सुनारिनिक अमोल आभपण संज्ञाह यात गृत्तानु पास अलंकार ॥ २१ ॥ i. सुनारिनवचन नायकसों। कवित्त । हांसी हँसतेहरिहरेकोझुकतमनहरिकहँसतहेरहियेअनुरागीहै । 'प्रेमकीपहेलीगूढ़जानतिजनावतिहींआजुअधरातकलोमेरसँगजागी है। अपलोंज्योंधीरधरयोतैसेदिनद्वैक ओरधरोगिरिधरनुमतेकोवड़ भागीहै । भावतीतिहारीवहकाल्हहीतेकेशोरायकामकीकथानिक छूकानदेनलागीहै ॥२२॥ उत्ति सुनारिन की नायक सौं हांसी में हँसते हरि हरेधीरे मुकति है ।। मन हरित इसह हरिक उरको अनुरागी है। प्रेम पहेलिका जो गूढ़ जाने जनावे भरुआन आधी- रात लों मेरेसाय जागी है । अब दोदिन धीर रासो जैसे धीरज पो रही है गिरियर तुमते को पहभागी है तिहारी जी भावती भामिन है सो काल ते कामकथा मुनतमें कान देन लगी है इहां गूढयात मुनार की है वृत्तानुप्रास हास ईस दम ताने ॥ २२ ॥ रामजनीवचन नायकासों। कवित्त । कोमलअमलवेतोअमलएतीछेचलमलिननलिननवनीलकैसेपा तहें । सूधेसाधु शुद्धवेतोकुटिटकरमएतोकेशवमरमचौरपरमकि रातहें ।। पाइपकरितवपाइहेनकैसेहूतूयोरेइठलातएतोअतिइठला तहें । घरजतक्योंनतूहाकविकीकहतमेरेमोहनकोमनतरेननः जातहें ॥२३॥ वे जो मापक हैं सो कोमट अमल हैं ए ममट हैं परन्तु होगी पल पंपट मटीन नव नवीन नीलकमल पार फेर मोहन कोई ।। सी साधु सशु में भी गुद सोये अरु पे कोल दिरात में भी पुरिट अमरमके पार पिठोर' भी पाट। भप पर रिपाइ तय त् ह न पाहोद पोरी इटयाउ थे पद पावती र पर.
(१६) रसिकप्रिया। जति काहे नहीं है में कवकी कहति हो । मेरे मोइनको जो मन है सो तेरे नयन छु जातहै इहां रामननी सामान्या न जानिये काहे अमीरके घर कैसे जैहै यामें वैरागिन है सो साधु पदते जानीजात अरु कुटिल चोर इस्पादिककी निन्दा करत यांत राम जनीपाइहै पाईहे ते नमक अरु जैसे उहां कोमल अमल थे कहे तैसेतीक्ष्ण कुटिल याते क्रमा भी है ॥ २३ ॥ रामजनीवचन नायकासों सवेया। कौनइंतोपकहाभयोकेशवकामिनकोटिकसोहितठाटे। रंचनसाधसुधैसुखकोविन राधिकआधिकलोचनडाटे॥ क्यासरशीतलवासकरमुख ज्योभपियेवनसारकेसाटे। लालचहाथरहैत्रजनाथपेप्यासवुझायनओसकेचाटे ॥२१॥ रामजनी कहहै कि कौनहूँ तोप तुमकरो अर्थ काहसों सनेह करो कोटि कामनी सों हित ठटिके तो कहाभयो पैतिहारीसाध रंच नसधेगी सुसकी जपली राधाके अधिसुले- नेत्र न देखि ही डॉट इँटके जैसे सरी माय सपेद होत परंतु शीटल सुवास ता पिन धनसार नहीं होति कपूर के सांबरारी या कपूर के सांट बदले भक्षण करे का होत तिहारे साथ लालच मात्र रहैगो कहूं ओस चाटे प्यास बुझती है इहां साधुपद तोप पद याते रामजनी वैरागिन है दृष्टांतालंकार है अरु ओस के चाटे यह अन्योक्ति संन्यासिनिवचन नायकासों कवित्त । छूटिहछुटायेजबकरिहौधोंकैसीतबकेशोदासअनियासप्यास खभागिहै । खेलभूलिजाइगोजुड़ाइगोनचित्तचेतकछूनासुहाइगोरी रैनदिनजागिहे ॥ तातेतेतपतिदूनीसोरतेसहसगुनीउपजिपरेगीउ रऐसीएकआगिहै । ऐंडसोऐंडाईजिनअंचलउड़ातभोलीओढतहीं काहूकीजुडीठउडिलागिहे ।। २५॥ उक्ति संन्यासिनि की नायका सों ॥ कि अंचल उटाय ऐंड सों मति एंडाय में भोली भोदके मांगति हों काहूकी डीठि लगिजायगी सो छुड़ाये ते न छूटिहै ॥ तब ख का करेगी। भूख प्याप्त जात रहेगी अरु सेल भूलि जैहै ॥ अंग तपि है सपाये ते दूनो अरु हिमते हजारगुनी शीतल व्हेजैह एसी व्याध उपजेगी रात दिन जगनेते संन्या. सिन शुभोक्ति अलंकार ॥ २५॥ संन्यासिनिवचन नायकसों ॥ कवित। शीतलहूहीतलतिहारेनवसतवहतुमनतजततिलताकोउरताप- गेहु । आपनेजोहीराकोपरायेहाथवजनाथदेकेतौअकाथहाथमेंनए- भाषाटीकासमेत । (१६१) गोमनलेहु । एतेपरकेशोरायतुम्हेंनाप्रवाहवाहिवहेजकलागीभा खसुखमूल्योदेहु । मांजोमुखछाजोछिनछलनछवीलेलालऐसी- जोगवारिनसोंतुमहूंनिवाहोनेहु ॥२६॥ इहां व्याज स्तुति अलंकारते नायका की निंदा नायक की स्तुति है वह तिहारे तल हृदय में नहीं बसत है ऐसी खोटी अरु तुम कैसे भल हौ ताको पत हियो तिलभरभी नहीं तजत हौ भरु तुम कैसे आपन मन हीराको पराये हाय दियो अमोल अरुवाको मन में न नाम मोमसों लैलियो एसे उदार हो तुम यहै काम ह काम अकाय अकथ कियो इतनेपर तुम्हें अपने हीराकी कछु चिन्ता हो । अरु वाको वही अपने मोम मन की जक लगी है मेरी मन गयो है सी तुच्छ है बाकी भूस भागि गई सुख सब भूलि गये शरीरते फेर तुम केश- सो वाको मुखमांडत हौ अरु वह छल छिनभरभीनहीं छोडतहै ऐसी गवार सो तुमहूं ह निबाहो मांथ्यो मुँह छांव्यो छिन यह पाठ है दूसरो अर्थ व्यङ्ग सो वाही में मायका । स्तुति कड़िक यह तिहारे शीतल उरमें नहीं वसति है कहा तुमको वाको वाकी यह नहीं है अरु वहको जो तिहारे तापते तपत हृदय होरहा है तामें तुमहूं वसत अर्थ ह तुम्हें चाहत तुम नहीं चाहत अरु तुम अपनी हीरा सो कठोर मन आन नायका य दीनो धाको मोम ऐसो मन लैकि अर्थ वाको मन कोमल सो तिहारे पास तिहारो । कठोरमन सो आन के पास एतेई पै तुम्हें वाकी परवाह वाह नहीं अरु पाको तिहा जक लागी है भूख प्यास घर भूलन की कहा देहाध्यासभी नहीं है मांडो मुख मुख मुहे छल न छांहो ऐसी जैसिनके पास रहत तैसिनसों नेह निबाहत यह सों न निवाहत हां भूख प्यास सुख दुःख भागी या शब्द सो संन्यासिन है ॥ २६ ॥ पटइन वचन नायका सों सवैया। याहीकोमेरीगुसाइनमें पहिलेमिलईवतियांछलिछैलो। वातेमिलेअँखियांमिलईसखियानकीआंखिनपारकेऐलो। आंखिमिलेमुहुँलागिरहेमनलेहुमिलेवगहैहमगेलो। माइमिलेमनकाकारहोमुहँहाकमिलतेकियोमनमैलो ॥२७॥ नायका मान कीन्हीं तव सखी कहति है मेरी गुसाइन इन बातन निमित्त मैं तु हिलेही छल कारकै छैल नापक सों मिलाई किंवा नायक को वातन में छलि के पनि वात फेरिकै आंखि मिलाई सव सचिन की आखिन में ऐल पार के ऐलो और रियो अरु बँटिबेको नामह आंखि मिलेते मुँह भी लागो अब मन तुम मिलाबहु यह बिहे हम गैल गही सो माई जो मन मिलिहै तो का करोगीमुखकेमिले जो मन को मैलो
(१६२)
रसिकपिया।
कियो अब हम जानी कि मोती प्रीति करिद सो उलटो मन मैलो कियो. ॥ इहां डारो
बहन ते पटइन अरु इष्टके उधिम ते अनिष्ट भई ताते विषम ॥ २७॥
पुनः सवैया।
गेहकीनेहकीदेहकीदीखेकीभूपणकीजिन भूसभराई ॥
मोहिहँसीदुखदोउदईतिनहूंसोंजनावतहेचतुराई ॥
केशवराइबड़ाईदईसोकहाभयोजानसुभावनजाई ।
सोनेसिंगारहीसोधेचढ़ाइहोंपीतरको पितराईनजाई ॥२८॥
याही पेंचते केशव सामान्य कहिचुके अर्यसुगम । लोकोक्ति अलंकार हमारे शिष्य
नारायण कवि को भ्रम भयो कि यह कपित्त औरको है ताते भर्य याको नहीं
लिख्यो ।॥ २८ ॥
पटइन वचन नायकासों सर्वया।
वामृगनैनीज्योंऔरनहींजुलगावतहोमुंहऐसेनहूजे।
सोनेसीजोकहूंपीतरहोहितोकेशवकैसहूंहाथनछूजे ॥
आपुगिरागुनजोसिखवैतऊकाकनकोकिलज्योंकलकूनें।
सुंदरश्यामविरामकरोकछुआमकिसाधनआमिलीपूजे ॥२९॥
उक्ति पटइनकी नायक सों कि वा मृगनयनी अन्य नायकापराबर नहीं । जो मुस
लगावत है। ऐसो मति की सोनेसे जो पीतर होहि तो भी हाय से न छूजै जो काक
को सरस्वतीआपु सिखावे तोभी कोकिल समान न बोले हे श्याम विचार करो आमकी
साध अमली नहीं करत अन्य पीतर यह सोना है इत्यादि सब पद में जानिये इहां
मुख मुखमिलाइब धरमपट वाको वितरेक अलंकार जो कहत सो भी है परन्तु लोको-
क्ति बहुत मिली सोने सी पीतर सोनईसी सोन पीतर यहभी पाठहै आम अमलीते अरु
गुन नाम डोरा ते पटइन ॥ २९ ॥
दोहा-बैनऐनसुखमैनकार, कहेसखिनकेधर्म।
केशवकहोंककअव, तिनकेकोविदकर्म ॥३०॥
इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीत विरचितायारसिकप्रियायां
सखीजनवर्णननाम द्वादशाभभावः ॥ १२ ॥
भाषाटीकासमेत। सखीके कर्म यावत रहे सो वचनादि ते कहे अब तिनको धर्म कहत ही नयन बैन दमयन कार कहे सखिन के मर्म यह भी पाठहै ॥ ३०॥ इति श्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्याज्ञा भिगामीललितपुरनिवासीहरिजनकवीश्वरारमजेनसरदाराल्यकवीश्वरेणाव रचितापारसिकप्रियायांभूपणेसुखविलासिकानामटीकायांसखीजन वर्णनोनामद्वादशमः प्रकाशः ॥ १२ ॥ सखीजनकर्मवर्णन। दोहा-शिक्षाविनयमनाइयो, मिलकरहिसिंगार । झुकिअरुदेइउराहनो, यहतिनकोव्यवहार ॥१॥ शिक्षा आदिक सखीजनको व्यवहार कहत हों ॥१॥ नायका सों शिक्षा सखीको सवैया । नाहलगेमुखसौतिदहेदुखनाहिलगेदुखदेहदहेगी। नाहि अबैसुखदेतहैकेशवनाहसदासुखदेतरहुँगो ॥ नाहितेनाहिरीनाहीभलाईभलोसपनाहहितेपैकहेगो। नाहसोनेहनिवाहिवलाइल्योंनाहीसोनेहकहानिवहेगो ॥२॥ शिक्षाकार के वचन नायक सों नहीं लगे, मुख सौति के अरु वाके जो दुःख सो जिराये अरु लगैहे वाको अझै दुःख तासों वाको देह दहीहै अरु जो तुमको अवै- सुख देतअरु नाह सदा नहीं यह सदा सुख दे अर्य पाछे ताप देहे सो में पुका- है कहत कि नहीं ते भलाई नहीं है भलो सब कोई नहीं हित 4 कहिहै ताते तु नाह- नेह निवाहु मैं बलाइ लेतही नाही सो नेह न निवहै या उपदेश व्यंग्यहै लाटा स अरु कोई व्यतिरेक भी कहत ॥ २ ॥ शिक्षा नायकसों सखीकी कवित्त । कुंकुमउवटिकुंकुमानअन्हवाइजलशोधोसिरलाइयाहिलायेकहा- समें चंदनचढ़ाइपुनिफूलपहिराइभूलियेहीकाजमांजिआंजिकीनो- पकासमें ॥ केशवकपूरपूरकाहेकोखवावोपानमनजोमगनहेजूऐसे- वेलासमें। वाहिनामनावोहरिहाहाकरपाइपरसवहीसुवासबसेजाके- खवासमें ॥३॥ नायक आन नायका को शृंगार करावत सो सुन शिक्षादेत कि पाको मनायो जाक बवास में सबै सुवास भरी है जाको शृंगार करावत तामें विशेषोक्ति सुवास कारण कार्य नाही है अरु जाकीबात कहत तामें दूसरो विशेष काहे थोरही आरंभ ते सप (१६४) रसिकप्रिया। सुवास प्राप्त है है कुमकुम जवादि मेद भी पाठ हैअरु जोपे मनमंगन है यह भी पाठहै॥३॥ राधाकी विनय सवैया । ऐसेहिक्योंचुपव्हरहिहौंससिहौंसहिहौंसतराहटसौलों। क्योंसरिहैमिलिवेविनतोहितऊमिलिहैमिलियेदिनजीलों॥ केशवकोरिकरोउपचारमिलेकोकहामिलिहसुखतौलों। देखियेअंगनआरसीलमिलिहोपियसोमनहीमनकौलों ॥४॥ उक्ति सखीकी नायक सों ऐसे कयलों बुरी होगी हों तिहारो सतराहट सहिही उनके बना मिले कार्य कैसे है वे तऊ मिलिहें जौलों दिन मिलिहे कोर उपाय करो जोलों मिलि हो तौलों मिलेको सुख नाहीं अंगआरसी लेदेखो मन कालों मिलीगी पियों हां पियासों मिलाइबेकी विनय अरु अलंकार काकोक्ति ॥ ४ ॥ कृष्णसों विनय कवित्त । कंजकैसेफूलनैनदारोसेदशनऐनर्विवसेअधरहाससुधासोंसुधा- चोहीवेनीपिकवैनीकीत्रिवेनीसीचनाइगुहीवारसी वारीककरिहांक करिहारयोहै ।। कीनेकुचअमलकलपतरुकैसेफलकेशोदासयातेवि धिमुगुधविचारयोहै । देख्योनागुपालसखीमेरीकोशरीरसवसोनेसों सवारिसबसोधेसोंसुधारोहै ॥५॥ उक्ति सतीकी नायक सौ कंन से नयन दारयोसे दशन माणिक से अधर मुघास हास त्रिवेनी सीवेनी कचसों कटि मार ज्यों सिवार पाठहै कल्पतरुफलसे कुन भर कई अमलका फल भी पाठहै तुम अवै देख्यौहे की नाही जहां सोनी तहां सुगंध नाही यामें दोई हैं या व्यतिरेक अरु व्यंग्य ते स्तुति है यातव्याज स्तुति भी॥ ५ ॥ राधाकोमनाइयो सवैया। नाहसिखावतनाहिंभलीससिपावकलोतिनकोमुहँडादौ । भौहनकोभुलयोभटभावननेननकोमतसहितुबादौ ।। काल्हिकेकालकदीनदईहँसिपाइ परोतनप्योमुहुँकादो। राजकरोजहँराजसदारहेकेशवचित्रज्योंआगहीडाढ़ो ॥६॥ यह कवित्त प्राचीन पुस्तान में नहीं मिलव ताते नारायण कार नहीं लिस्यो॥६॥ रीझिरिझाइझरोखनिझांकिरहीमुखदेखिदिसाइमुभाहीं। बोलनभायेभबोलभईअवकेशवऐसीहमेंनसुद्दाहीं। पुनः सबैया।
भाषाटीकासमेत । ।
मैंबहुतैवहराईहैतोसोरीतूवहरावतमोहिंवृथाहीं।
याहीसयानसदाचलिहौंहारसोहसिहांकरैमोहिंसीनाहीं ॥७॥
उक्ति सखीकी नायका प्रति ॥ कि हरि सों तो हां करत अरु मोप्तों नाही करत
झरोखन झांकि रीझि रिझाय मुख देखि दिसावत जब बुलाउन आवत तब अनबोली
होइ रहत ॥ ऐसी मोहिं नहीं सुहात मैं तोसी कितनीभुराई त् मोको का भुरावत मोहिंसों
नहीं करत यही मनावन विभावनालंकार ॥ ७॥
कृष्णको मनाइबो ॥ सवैया ।
भूपणभेदवनाइकैकेशवफूल बनाइवनाइकैवागे।
भागवढ़ाइसुहागबढ़ाइकैरागवढ़ाय हियेअनुरागे ।
पांइनिलागनसोंधोलगावतपानखवावतहीनिशिजागे।
कान्हचलोउठयैठेकहामनमूसिपरायोसुरूसनलागे ॥८॥
उक्ति सखीकी नायकसों ।। भूपण फूल वसन बहुत प्रकार के बनाय पहिर भाग
सपनो बढ़ाय वाकी सुहाग चढ़ाय प्रीति बढ़ाय आप अनुरागे पायन परि सुगंध लगाय
पान खवावत जागतरहे अब चलो मिलो परायोमन मूसिके अब का रूसत इहां चित्रा-
लंकार सांधो चढाइयो तहां इच्छा रूसन की ॥ ८ ॥
राधाको मिलैबो ॥ सवैया ।
दुर्लभदेवनहूंकोसुतोहरिकोमन हांसिनहूंहठिलीनो।
बारहुजोहियतेकबहूंअवज्योंगुरको दियोमंत्रप्रवीनो।
लेतिलियोतीनदेतदियोअवमानहुता दिन दुःखनवीनो।
मांगनआवैतौदीजेभटूअपनोमन ज्यों बहजाइनदीनो ॥९॥
यह सवैयाकेशव को नहीं ताते नारायण कवि तिलक नहीं लिख्यो ॥९॥
सवैया।
आजुदेवारिकिरातजोकीजैतोआजुकेद्योसलौं ह्हैसभागी।
वातसुनीजननीपैजवैतवहींमतिमानकी नींदत्तजागी।
अंगशंगारनिहारनिशातिनचित्तविहारन सों अनुरागी।
दीपदेदेवनजाइजुवामिलकेशवराइसों खेलनलागी ॥१०॥
पूर्ववत् यह भी अन्य को बनायोहै ताते नारायण कवि तिलक नहीं लिख्यो॥१०॥
(१६६)
रसिकाप्रिया।
कवित्त।
जोहोंगनोऔगुणतो तूगुनगुननगनजोहोंगुनो गुणतौतूअगुनगुन-
बमें किशोदासऐसीप्रीतिछिपावतछलनमेंजैसेछिनछरिटिछिपैजा-
घनमें। भारीहैनिठुरनिशिभादोंकीभयावनी सोक्योंचसैपरजाको
पेय वसे वनमें । वैठेतेउठावैउठिचलेतेमचलिरहेसोईक्योंनकहै
रजोईतरेमनमें॥११॥
उक्त सस्ती की नायका सौ ॥ नो में गुन कहाँती तृ औगुन गनत ऐसी प्रीति छपा-
ति जैसे घनमें विदुरी छपिजात यह भादोंकी भारी निशि भयावनी में पिय वनमें तू
रमें कैसे रहेगी बैठेते उठावत चलेतेमचलतसो क्यों नहीं कहत जो तेरे मनमें है यहां
Eष्टांत अलंकार जैसे टिन छवि ॥ ११॥
कृष्णको मिलयो कवित्त ।
सिखेहारीसखीडरपाइहारीकादंबिनीदामिनीदिखाइहारीदिशिअ
घिरातकी । झुकिझुकि हारीरतिमारि मारिहारयोमारहारीझकझो.
रतित्रिविधगतिवातकी॥दईनिरदईवाहिऐसीकहिमतिदईजारतजुरे
नऐनदाहऐसीगातकी । केसेहूंनमानेहीमनाइहारीकेशोराइयोलि.
हारीकोकिलावुलाइहारीचातकी ॥ १२॥
उक्ति ससी की नायक सों। किवाकी ससी सिसाय घटा डरपाय दामिनी दिसाय
कोप करि करि रतिमार दे देकाम झकझार पश्न ये सय हारे दईने वाको ऐसी मति
काद दई है कि. जासों अपने अंगको जरावत कोकिला योल हारिप में यह व्यंग्य
के रिसियार्य कि घोटउठेगी सप उपाइ करि हारी वा नहीं मानत ताते तुम चली
कर रद्दीपन कारण है कार्य नहीं होत ताते विशेपोक्तिः ॥ १॥
राधिकाकोशद्वार सवैया ।
दीनोमपांइवाइमहावरांना आंजनआंससुहाई।
भूपणभूपितकीनमेंकेशवमालमनोहरहपहिराई ।।
दर्पणलेंभवदीपतदेखिससीसवअंगणगारसिधाई ।
वंकविलोकनअंकलेपानखवावकोकान्दकुमारकीनाई॥ १३ ॥
अपं मुगम ॥ रनि समीती ममी मों ! पाक मंजर भूपनादि सत्र में में रिये
पर नापकी रीति पान की सगी व्यय न मापक पाम पर यह मंडन सगी?
सम अहंकर ॥१३॥
भाषाटीकासमेत । कृष्णकोशृंगार सवैया। पागवनीअरुबागोवन्योपटुआपटुकाकटिराजतनीको। सोंधोबन्योअतिचारचढ़ावतहार बन्योउरभावतजीको ।। बीरीचन्योमुखखातमनोहर मोहिं अँगारलग्योसबफीको। भालभलीविधिजौलीगुपाल कियोवहवालवनाइनटीको ॥१४॥ अर्थ सुगम उक्ति नायक सौ सकीकी पाग बागो पटुका मुगंध तांबूल ये सब यद्यपि बने हैं तथापि जोली राधिका के हाथ को तिलक नहीं लगो रहै तौलों सब पीको है इहां पहिली विनोक्तिअलंकार अरु मिलाईयो व्यंग्य ॥ १४ ॥ राधाको झुकियो कवित्त । फिरिफिरिफेरफेरफेरोमहरीको मनमनफेरैफिरीपुनिभागकीभ लीघरी । पलपलपायनपरतिहुतीजिनकेसुपरयोपीयतेरेपांइपीके पांइहोंपरी ॥ बड़ी बड़ीवधुनकीवड़ीयेवड़ाईमेटिकेशोदासवडेनमें जोतुमेंबड़ी करी । होतोजान्योमनमेंतूमेरेगुणमानिदेहोंताहिक्यों मनायहाँजोमोहसोभलीकरी ॥१५॥ उक्ति ससी की नायका प्रति ।। फिर फिरकै में उनका मन फेरपी फिर आई ना तू पावन परत रही सो तेरे पायन पेपरयो में पायन परिकै जे उत्तम उत्तम रहीं तिनकी उत्तमता मेटि तिनमें उत्तम तोहिं करी में तो अपने मन जानी कि मेरो गुण मानि है तू मोहसों भली करी अर्थ रिसानी मनी धरी भी पाठ है पापन परत होत माहि मुक्यिो विषमालंकार ॥ १५ ॥ पुनःसर्वेया। केशवराइवुलावतहेंचितचारुविलोचननीचेकरोन । कालकेलावरवीसविसापरोवीसविसत्रततेनटरोन ॥ आगिलगतेरेकालकेशीशपरोहरजायवजागि परोन । आजुमिलौतौमिलौत्रजराजहिनाहितोनीकेव्हेराजकरोनृ॥१६॥ यह कवित्त भी प्राचीन पुस्तकन में नहीं मिटत ताते नारायण कविमर्थ पारो महों लिख्यो ।॥ १६ ॥ नायकको झुकियों यथा-सवैया। तासांवसाइकहाकहिकेशव कामटतातरुतेदुरई। विधिकोगतिलोपिनजाइअलोपितटेमपिशीशभुजंगदई ।।
(१६८)
रसिकप्रिया।
अपनोमुहुँ देखहुआरसौल पुनि वातकहोपरमानलई।
वृपभानसुतापरऔरसुहागिन वारोंजहांलगिजीभगई ॥१७॥
जासों का बसाइ ताने कामलता या सों लपेटि नागके शिर मणिदई हे कान्ह आर-
ले मुख तोदेखा फिर प्रमाणवारी बात कही यही झुकियो किंवा तेंदूवृक्ष सो काम-
ता रई मिलाई यही झुकियो वा हाउंबाते राधापर जहां लग जीव जासों सब वारों
ह सखी नायक सों कही लोकोक्ति अलंकार ॥ १७ ॥
प्रियासों उराहनो ॥ यथा-कवित्त
केशोदासकौनबड़ीरूपकुलकानपैअनोखोएकतेरहीअनसउर
मोलिये। आपनेसमानकाहूमानसेनमानेतूगुमानकेविमानचढ़ीव्यो
व्योम डोलिये ॥ ऐंडसॉऐंडाइअतिअंचलउड़ाइऐसीछांडिऐंडबैंड
चतवननिरमोलिये । दीनोमनहाथजिनहीरासोहरपिऐसेहरिसोंह
ननैनीहरेईतोवोलिये ॥ १८॥
उक्ति सखीकी नायकासों तेरो कुल औ रूप बड़ो है पै एक कनख तेरी आंचर
जारि के मांगिये है अपने समान आन को नहीं मानत या गुमान के विमानपै चाके
काशमें फिरति जो अंचल उठाय ऐंड सों ऐडातहै सो ऐड छोडि जिन अपनोमन हीरा
र हाथ दियोहे तिनसोंधरि बोल सुभावोक्ति अलंकार १८ ॥
कृष्णको उराहनि कवित्त ।
सौंहनकोशोचनसकोचकाहूवीचकीकोपोंछोप्यारेपीकलीकलोच
किनारेकी । माखनकीचोरीकीहैथोरीथोरीमोहूंसुधिजानतकहाकि
रीमोरीहैजुवारेकी ॥ मेरीयेकुमतिऔरकहाकहोंकेशोराइलागतन
गललाजइहांपगधारेकी। एतीहेझुठाईवाहिअवहीरुंठाईयहछारहूतौ
टीनाहींपाँइनकेपारेकी ॥ १९॥
उक्ति नायकाकी नायक प्रति किंवा सखोकी रक्ति शपथ को शोच तुम्है नहीं न
को बीच में डारी ताको संकोच लोचन की पीकतो पोंछो अरु माखन जो तुम
डायो ताकी सुधि मोको है तुम किशोरी बालापन की जानत हौ मैं अपनी कुमति
- कहाँ तिहारे गेह में पांव घरेकी लज्जा नहीं छूटत इतनी अँठाई अबलों नहीं
हत जो पांयन परेकी घर वदन में ते नहीं छूटी मुभावोक्ति औ अनुमाना
नर ॥ १९॥
भाषाटीकासमेत। राधावचन सखीसों अपरंच सर्वया । आंधीसीधाइहदाइदवारसीदासिनकोदुखदेहदहीहै । तापकेतूलतमोलिनमालिननाइननाहकेनेहनहींहै ।। तेरीसोंतेरिसोंमेरीसखीसुनतेरीअकेलिकीआशरहीहैं। कान्हमिलाउकिमोहिनपैहै,आपनजीयकीतोहिंकहीहै ॥२०॥ उक्तिनायकाकी सखीसों कि धाई आंधी सी दाई दवारिसी दासिन की देह जरत सी तमोलि औ मालिन और नाइन तो माह के नेहई में नहीं है कान्ह को डाउ नहीं तोमें मरिजाउँगी प्रश्न ॥ इहांकोई कहै कि सखी कौन है ताको उत्तर ॥ यह हैकी तो नाइन नाहके तौ नेह नहीं है हियमें नेह नहीं ठौर और फिरतहैं फेर प्र०तहां नाह ने नहीं तो नायका की प्रीति आगे काहे करीउताते संन्यासिन जानिये का आन के वश भई तू न है है आंधी उपमान सी वाचक धाई उपमेय धर्म नहीं ताते गोप मालंकार ॥ २०॥ दोहा-इहिविधिश्यामशंगाररस, बहुविधिवरणोलोइ । चारवर्णचहुँआश्रमन, कहतसुनतसुखहोइ ॥२१॥ यामें चार आश्रम कहेते संन्यासिनभी भई तो संन्यासिनि काम कया कैसे सुनिहें को उत्तरकि जिनको मोक्षकी आकांक्षा है तेई रसानंदन को जानिहें विषई पुरुप 7 जानिहैं जैसे शुकदेव सुतो अरु व्यास कही फेर परीक्षित को सुनायो ॥२१॥ दोहा-राधाराधारमणके, करयोगँगारसुवेश । रसआदिकआगेकहीं औररसनिकोभेप ॥२२॥ इतिश्रीमन्माहाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायारसिकपि यायांसखीजनकर्मवर्णनंनामत्रयोदशप्रकाशः ॥ १३ ॥ राधाको अरु राधारमण कृष्णको शृंगार वर्णन करयो अबऔर रसादि औ रसको । कहिहों यह चौदहवें प्रकाश में ॥ २२ ॥ जानन गामीललितपुरी... रा..... रसिकप्रियाभूषणे सुर मत्रयोदशमः प्रकाशः ॥ Nathun n .
१७.) रसिकप्रिया। 'अथहास्यरसलक्षण। दोहा-नयनवयनकछुकरतजहँ, जनकोमोदउदोत । चतुरचित्तपहिचानिये, वहांहास्यरसहोत ॥१॥ नयनमेवाषचन में जहां चेष्टा कछुआन वनावे अर्यवाचाकर्मनाते कछु आकृति आनकी न बनावै तहां हास्यरस जानिये यह याके विभावहे नयन वयन जब करत का मन मोद पदोत चतुर वित्त पहिचानियो यहभी पाठ है ॥१॥ अथ हास्यरसको भेद। दोहा-मंदहासकलहासपुनि, कहिकेशवअतिहास । कोविदकविवर्णतसवे, अरुचौथोपरिहास ॥२॥ हास्य रसके यह चारि भेद हैं मंदहास १ कलदास २ अतिहास अरु चौयो परिहा निये ॥ २॥ अथ मंदहास लक्षण। दोहा-विकसहिनयनकपोलकछु, दशनदशनकवास । मन्दहासताकोकहे, कोविदकेशवदास ॥ ३॥ नेत्रकपोल दांत अरु दशनके पसन ओष्ठ थोरो विकसे ताको मंदहास कहिये ॥३॥ दोहा-वर्णतवाढ़ेग्रन्थबहु, कहेनकेशवदास । औरॉरसयोंजानियो, सवप्रच्छन्नप्रकास ॥४॥ अंप रद्ध भये ते नहीं पयों सर्यस प्रच्छन्नप्रकाश होतहै ॥ ४ ॥ राधाको मंददास यथा सवैया। भेदकीरातसुनेतेकवहमासिकतेमुसुकानीलगाई । पेठतिहतिनमेंहठिकेजिनकीतुमसोमतिप्रेमपगीहे ।। जानतिहोंनलराजदमंतीकीद्वतकथारसरंगरेंगीहै । पूजेगीसाधसमुसकीवड़भागकोकेशवज्योतिजगाहे ॥५॥ पासे तिलक कविनियाके तिलक में हमारे शिप्य नारायण दाम कतिहमा रचुके पति इहां नहीं टिस्यो ॥५॥ अपांच सयया। जानेकोपानसवावतक्याहंगईलगिभंगुलीमोठनवीने । तेंचितयोतबहतिहिभांतिजुलाटकेटोचनलीटिसेलीने ।
भाषाटीकासमेत।
(११)
वातकहीहरयहँसिकसुनिमेंसमुझी वै महारसभीने ।
जानतिहाँपियकेजियकेअभिलापसवैपरिपूरणकीने ॥६॥
उक्ति सती की नापकांसों किनजान आजु पानहरि खवायत रहे तहां अँगुरी नवीन
मोठनमें कोई प्रकारते किंवा नवीन अँगुरी ओठमें लागि गईते चितयो सो हे सखी तू
इसी तवहीं ताही भांति ते जो लालके नयन लीलि से लिये अरु सनेहरे अर्थ धीरे हँसिके
पातकही सो मुनिहौं समुझी अरु वै बहुत रसमें भीजे सोजानातिहों किपीयके जीयके अभि-
आप सब पूरण को तहां बात कौन कही यह प्रश्न है।ताको उत्तर कि यामें सती नायकासों
कहत महारसभीने ते कही तुम महारसभीने हो तो इहां राधा लायक नाही, शृङ्गारके
यह अयोग्य पातहै सो कहत तुम महारसभीने ही तो पान नायक के हायते काहे खाये
जो इहां नायकाने जो कही रसभीने सोई मोद उदोत करनहार है अरु यह सब रस
गो केशव कीने सो ताकोसमाधान केशव सो बनिहै आन सब के मतते विरोध है जैसे
भत्स शृंगारमें उन कीनों तथापि युद्धि अनुसार समाधान लिखो है अरु जो वस्तु
जन्म की बिगरी सो नहीं सुधरत फेर प्रभ ।। ओठ नवीने कहा; ताको उत्तर ।। एक तो
यह कि जिन ओठन में कबहूं अंगुरी नहीं लगी याते नवीन अरु नवीने पान हर ए
हसि कि याही पदते मंद हासभी अरु सुभावोक्ति अलंकार स्वभाव वर्णन और रस-
व भी है ॥ ६॥
श्रीकृष्णको मंदहास ॥ यथा-कवित्त ।
दशनवसनमाहँदरशैदशनद्युतिवरपिमदनरसकरतअचेतहो ।
झाईझलकतिलोल लोचनकपोलनमेंमोललेतमनक्रमवचनसमे-
तहौ । मो हैं कहेदेतभाउ कहोमेरीभावतीकेभावते छवीलेलाल
मौन कौनहेतही केशवप्रकाशहासहँसिकहालेहुगेजूऐसही हसत-
तौहियेकोहरिलेतही ॥७॥
उक्ति सखी की नायक प्रति ॥ दशन वसन जो ओठहै तिनमें युति दशनकी दर्शत
मदन कामके रस वर्षाय अर्थत करत हो चंचल लोचन की कपोलन में झांई झलकत
मरु मोल लेतही मन कर्म वचन करके अरु भृकुटीभाव भापती मेरो भावतीको है
भावते छबीले लाल चुप कौन हेतु सापही अरु प्रकाश हास इसके कहा लेहुगे मन्द
हास ते तो मन को हरलेत हौ अरु जो स्वभावोक्ति अलंकार माचीन कहत तामें चम-
कार नहीं द्वितीय विभावना होतहै हेतु अपूर्णप्रकाशहास नहीं दियो इरिलेत है ॥७॥
अथ कलहास लक्षण ।
दोहा-जहसुनियेकलध्वनिकछू, कोमलविमलविलास ।
केशवतनमनमोहिये, वर्णहुकवि कलहास ॥८॥
१२) रसिकप्रिया। जह कलध्वनि सुनिये कोमल निर्मल विलास देखि के तन मन मोहै सो कल- है ॥ ८॥ राधाको कलहास ।। यथा-सवैया। काछेसितासितकाछनीकेशवपातुरज्योंपुतरीनविचारो। कोटिकटाक्षनचेगतिभेदनचायतनायकनेहनिहारो। वाजतहमृदुहासमृदंगसोदीपतिदीपनिकोउजियारो। देखतहीहरिदेखितुम्हेंयहहोतुहै आंखिनवीचअखारो॥९॥ नाचको रूपक है जो सित अतित है नेत्र सोई काछनी है पातुररूपी पुतरी कोअरू पक्ष सोई नृत नायकको नेह सोई नायक है नचावन हार अरु निनारो पाठ में निनार कहा व नायक न्यारोनचावति ही हो अरु मृदु कोमल हास जो है सोई मृदंगहै त नेत्र पलकन को दीपत सोई दीप ॥ प्रश्न | मृदुहास नयननको हास वाजत कहाउत्तर। पलक सो पलक लगति यही ॥ मानों मृदंगहै जो स्पर्श है तहां सूक्ष्म स्थूलशब्द नहीं है सो ही देखत तुम्हें हरिको कि आज आंखिनमें अखारो यह भी पाठ है । कवित्त मंदहास में जहां वात कहो हरये हँसि सो कलहात सौहै परंतु बहुत पुस्त- में यही लिखौहै ताते हम हूं लिख दीनो ॥ ९॥ अपर सवैया । प्रेमघनेरसवेनसनेगतिनैननकीरसमें न भईहै। वालवयक्रमदीपतिदेहत्रिविक्रमकीगतिलीलिलई है। भौंहचढ़ाइसखीनदुराइइतैमुसुकाइउतैचितईहै । केशवपाइहीं आजुभलेचितचोरजुकालगुवारिगईहै ॥१०॥ सुगम यह कवित्त प्राचीन पुस्तकनमें नहीं मिलत याते नारायण कवि या अर्थ लिख्यो ॥ १०॥ कृष्णको कलहास सवैया। आजुसखीहरितोसोंकबड़ी वारलोंवातकहीरसभीनी । मेलिगरेपटुकापुनिकेशवहारहियेमनुहारसोंकीनी ॥ मोहिअचंभोमहासुहहाकहिचाइकहाबहुपारनलीनी । तेंशिरहाथदियोउनकेउनिगांठिकहाहंसिआचरदीनी ॥११॥ उक्ति-सखीकी नायका प्रति ॥ हे सखी आजु तोसों हरि बड़ी पारलौं कहा बात भरी कहत रहे अरु गरे पटुका डारो हियमें कहा हार मनिहारसी कहा करी मनुहा-
भाषाटीकासमेत।
(१३)
रिति कीनी भी पाठ है यह मोको अचंभव लागत हाहा काहुका चाह बहुबार लई यांह
कहा बड़ी पारलौं अरु बांह कहा बहु पारनि लीनी यह दोनो पाठ है । तें कहा उन-
के शिर हायदयो उनते आंचर में कहा गांठि दई पटुका में लेते विनै इहां हरिजूने बातें
कही सो सखीने ध्वनिसी सुनी याते पूंछाते है । औ हँसि गांउदीनी या हँसियो अरु
वात कहियो यही ध्वनिप्सी भासत है ॥ श्रीकृष्णको कझो याते कलहास भयो बांह
गहाई की चाह गह्यो शिर हाथ देनेते मान छोडब औ शपय कराइब पनि शिरहाय
ते संकेत बतायो कि हम संकेत में मिलेंगी उन गांठ दई न भूलिहैं ।। अर्थ हमैं तिहा.
री सुधि रहेगी सूक्ष्म अलंकार औ जाति अलंकार भी कोई कहत लक्षण पूर्ववत् ।। ११॥
अथ अतिहास लक्षण ।
दोहा-जहाहँसैनिरशंकदै, प्रकटैसुखमुखबास ।
आधेआधेवरणपद, उपजपरतअतिहास ॥ १२॥
जहाँ निःशंक प्रकट होइ हँसै आधो वचन कहि फिर हँसि उठे सो अतिहासहै ॥१२॥
राधिकाको अतिहास ॥ यथा-कवित्त ।
तैसीयेजगतज्योतिशीशशीशफूलनिकीचिलकततिलकतरुणि
तेरेभालको । तैसीयेदशनद्युतिदमकतिकेशोदासतैसीयेलसत
लालकंठकंठमालको ॥ तैसीयेचमकचारुचिवुककपोलनिकीतेसो
चमकतनाकमोतीचलचालको । हरेहरैहँसिनेकचतुरचपलनैनीचि
त्तचकचौधमेरेमदनगुपालको ॥ १३ ॥
हरे हरे हैसि हँसि कहियेते अतिहास लेश अलंकार हँसन गुणते चकचौंधी दोप
भयो अरु अनुगुण भी है ॥ १३ ॥
कृष्णको अतिहास || यथा-कवित्त ।
गिरिगिरिउठिउठिरीझरीझलागेकंठ बीच बीच न्यारेहोतछवि
न्यारीन्यारीसों । आपुसमेंअकुलाइआधेआधेआखरान आछीआठी
बातेंकहे आछीएकह्यारीसों॥ सुनतसुहाइसवसमुझिपरैनकछू केशो
राइकीसोंदुरैदेखोमहुस्यारीसों । तरणितनूजातीरतरुवरतरठादेता
रोहँसतकुमारकान्हप्यारीसों ॥१९॥
उक्ति सखीकी सखी प्रति 11 गिरि गिरि उठि सठिबमें अति विह्वल ॥ कंठ लगि
बेमें प्यार जुदे होत में हास्य ॥ आधे आध आखर में कष्ट गद्गद ॥ तरणि सर्प
तनुजा पुत्री यमुना तीर के तरे केवृक्ष यहां समुच्चय अलंकार बहुभावते ॥ १४ ॥
(१४) रसिकप्रिया। अथ परिहासलक्षण। दोहा-जहँपरिजनसवहँसिउठे, तजिदम्पतिकीकान। . केशवकौनहुँबुद्धिवल, सोपरिहासबखान ॥ १५ ॥ परिजन नायक नायकाको मर्याद छोड़ि हसि उठे सोबुद्धिबलते परिहास जानो१५॥ राधाको परिहास ॥ यथा-सवैया। आईहैएकमहावनतेतियगावतमानोंगिरापगुधारी। सुंदरताजनुकामकीकामिनियोलिकह्योवृपभानुदुलारी॥ गोपिकेल्याईगुपालहिवैअकुलाईमिलीउठिसादरभारी। केशवभेटतहीभरिअंकहँसीसवकीकदैगोपकुमारी ।। १६ ।। गोपिन कही एक गोप कुमारी आईहे सो सुनि राधा बुलाई वह वेष बनाये गोपाल- रहे तिनसों जघ राधा मिली तबसप सस्सी हँसी विशेष अलंकार राधा को मान योरे उपा- यते छूटो ॥ १६ ॥ कृष्णको परिहास ॥ यथा-सवेया। सखियातसुनोइकमोहनकीनिकसीमटुकीशिररीहलके। पुनिबाँधिलई सुनियेनतनारुकहूंकहुँकुंदकरीछलकै ॥ निकसीउहिगैलहुतेजहँमोहनलीनीउतारिजवैचलकै । पतुकीवरीश्यामखिसाइरहेउतग्वारहँसीमुखआंचलकै ॥ १७॥ इहां कृष्णको हास गोपिन को करनो ताके निमित्त खाली ढांककर मटुकी छीटा डार ले आई सो जब हरिलीन्हीं तब सब हँसी यह छलकर साप भयो याते हासपर उत्कर्ष पर जो उक्ति अलंकार अरु कृष्ण को अभिलाप दूध लूटनो गोपिन की ईसी करनो सो अपनी भई याते विषम अरु जोकोई विपाद लिखो सो नाही काहे विषाद में चित्तचाहमात्ररहै विषममें क्रिया करनो यह विषाद विषम को भेद शिररी तिय लैके यह भी पाठ है ॥ १७ ॥ अथ करुणा लक्षण। दोहा-प्रियकेविप्रियकरणते; आनकरुणरसहोत । ऐसेवरनवखानिये, जैसेतरुणकपोत ॥ १८॥ नायकाको विप्रिय नाम | वियोग ते जहां करुणाको रंग उपजे कपोतवत औ करुणारस को रङ्ग कपोत की नाई भी वर्णन करत करुणारस तहैं होत यह भी पाउ है ॥ १८ ॥ .
भाषाटीकासमेत । (१७५) प्रियाज़ को करुणारस ॥ यथा-कवित्त। तेजशूरसेअपारचन्द्रमासेसुकुमारशंभुसेउदारअतिउरधारयत है। इंद्रजूसेप्रभुपूरेरामजूसेरणशूरेकामजूसेरूपरूरेहियहरियतहै। सागरसेधीरगणपतिसेचतुरअतिऐसेअविवेकीकैसेदिनभरियतहै। नंदमतिमंदमहायशुदासों कहींकहाऐसेपूतपाइपशुपालकरियतहे प्राइहांजे कोईकहै कि करुणामें मिलन आश नाहीअरु वियोगमें आशरहत यह भेद चाही सो तो केशव न राख्यो यामें वियोगहू कहो चाही। उत्तर। तो इहां उन्माद दशा मायाकी द्वैगई ताते इहां उनको यह खबर न रही कि फेर मिलन है विहारी दौरत है समुहे शशी सरसिज सुरभि समीर अरु कहोखबर नाहीं तौ कामसे रामसे कैसे कहे जो वहांतक नायकके रूपको विचारहै पशुपाल की जाति होइ ताहीकी निन्दा करी याही ते देखबर जानी इहां रसवत् अलंकारहै जहां रस अँगिआन अंगों रसवत् इहां वियोग अङ्गी करुणाअङ्गहै किंवा शृङ्गार रसमें करुणा रस याही भांति पुरण्यो चाही पशुवार योग है अरु ऐसनिको ऐसो न चाहिये यामें विपिय करन है पूर्णोपमाअलंकारभी कोई नहत. पहिले चरण में उर उर भी पाठहै ॥ १९ ॥ कृष्णको करुणारस ॥ यथा-कवित्त । चंपेकेसीकलीअलीकेशवसुवासभलीरूपकैसीमंजरीमधुपमनभा न्ये । देवकैसीवानीअतिवानीतेसयानीदेवराजकसीरानीजानीजगसु बदाइयो।कामकीकलासीचपलासीकामअविलासीकमलासीधरेदेहपू पुण्यपाइये । कौनकीनेनिपटकुजातिजातिग्वारऐसीराधिकाकुँवरि रगोरसविचाइये ॥२०॥॥ चम्पकली रूपमंजरी आदि अर्य सुगमहे अलंकार पूर्ववत् । २० ॥ अथ रौद्ररस लक्षण। दोहा-होहिरोदरसक्रोधमें, विग्रह उग्र शरीर। अरुणवर्णवर्णततसवै,कहिकेशवमतिधीर ॥२१॥ क्रोध होनेते रौद्ररस प्रगटत ताते व्यंग्य चित्त होंक उग्रता को प्राप्त होतहै शरीर वा रौद्ररस होनेते क्रोधमय विग्रह उग्रशरीर होत तौरौद्ररसको रंग अरुण है॥२३॥ प्रिया को रौद्ररस ।। यथा-कवित्त । केहरीकोहरीकटिकरीमृगमीनफणिशुकपिककंजखंजरीटवनली है । मृदुल मृणालविम्वचंपकमरालवेलकुंकुमरुदाडिमकोदूनो (१६) रसिकप्रिया। दुस दीनोहै ॥ जारतकनकतनतनकतनकशशिघटतपढ़तवंधु जीवगंधहीनोहै । केशोदासदासभयोकोविदकुँवरकाह्न राधिकाकुँव रिकोपकोनपरकीनोहै ॥ २२॥ उक्ति सखीकी उक्ति करिके नायका को कोप मिटावत कि तेरो अंगके जे उपमा न ते सप आप भाग गपे केहरी सिंहके कटिकी शोभा हरी चालकरी को मृगके नयन अरु मीनकी चंचलता तेरे नेत्र हरि लिये इत्यादि जानिये इहां कहरी कपोतकर भी पाठ है अरु इतने सय वनयात लियो सो वनयास की तर्क किंवा मृगवन उद्यान में गयो अरु धनको नाम जल भी है याते मीनयन जलमें अब कौन कोपकीनो है इहां सपत्नी पर कोप जानिये ॥ उत्प्रेक्षालंकार केशव और वस्तु में और कीने तर्क उत्प्रेक्षा भरु मृणाल आदि लैके कुम कुम पर्यंत एक बन से दाडिमको दूनों दुःख काहे फाटजात याको उदर अरु कनक तन को जरावत शशि घाट बढ़ि होत बन्धुजीव सुगन्ध हीन है गयो ए सब तर्कहें ॥ २२ ॥ कृष्णकोरौद्ररस ॥ यथा-कवित्त । मीडिमारयोकलहवियोगमारयोगोरिकैमरोरिमारयोअभिमानभ योभयभान्योहै । सबकोसुहागअनुरागलूटिलीनोदीनोराधिकाकुँ वरि कहँ सबसुखसान्योहै ॥ कपटकपटडारचोनिपटकैऔरनसों मे टीपहिचानिमनमेहूंपहिचान्योहै । जीत्योरतिरणमथ्योमनमथहूको ननकेशोराइकौनईपैरोपउरआन्यो है ॥२३॥ सखी नायक सों कहत तुम कलह आदिक तो मीडि माड यो अव कोप कौनपर कररहे हो इहां नायकको अति अपमान भयो सो सखी छुड़ायो चाहत रचना करके नाते पर्या रक्ति अलंकार अरु तीसरे तुकमें कपट झटीक डारयो निपटकै औरनिसों पहिचान मानि मनमें भी पाठ है जीत्यो रतिमतिमन यह चौथे तुकको पाठ है ॥२३॥ अथ वीररसलक्षण। दोहा-होहिवीरउत्साहमय, गौरवर्णद्युतिअंग । अतिउदारगंभीरकहि, केशवपाइप्रसंग ॥२४॥ उत्साहते वीर रस होत है उत्साह बढ़नोवीर इत्यमरः औ वीर रसको वर्ण और ॥ २४ ॥ प्रियाजीकोवीररस ॥ यथा-कवित्त । गतिगजराजसाजिदेहकी दिपतिवाजिहावरथभावपतिराजिचल बालसों।लाजसाजकुलकानिशोचपोचभवभानिर्भी हैंधनतानिवान भाषाटीकासमेत । (१७७) लोचन विशालसों ॥ केशोदासमंदहासअसिकुचभटभिरेभेटभये प्रतिभटभालेनखजालसों । प्रेमकोकवचकसिसाहससहायकलै जी तिरतिरणआजुमदनगुपालसों ॥२५॥ सेनाको निबाहहै तामें गति हाथी देह दीपति बाजी हाव रथ भाव पतिराज प्यादेवी पंगति है लाजकीसाज अरु कुलकीकान अरु शोच पोच झूठ इनकी भय भानि नाश- कर भृकुटी धनु तान कर लोयनके पाण विशालसों मन्दहास सङ्ग कुच भट भेंट भई है प्रतिभट नख सो नख लालसो भी पाठ है मेमको कवच बख्तर पहिर साहस सहाय पाइ रतिरूपी रण जीती मदनगुपाल सो इहां सेनाको रूपक है ।। २५ ॥ कृष्णको वीररस ॥ यथा-कवित्त । अघज्योंउदारिहौकिवकज्योंविदारिहौजू केसज्योंकिकेशोरायके शीज्योंपछारिहो । हरिहौकिप्राणनाथपूतनाकेप्राणनिज्यों बनतेकि वनमालीकालीज्योंनिकारिहौ ॥ करिहौविमदधनवाहनज्योंघन श्याम काहूसोनहारेहरियाहीसॉक्योंहारिहौ । वेहीकामकामवरबूज कोकुमारिकानि मारतहोनंदकेकुमारकबमारिही ॥२६॥ उक्ति सखीकी नायक सों। प्रश्न । कसमारि फेर नंदघर नहीं आये तब कंसादिक को कहिबो अयोग उत्तर ॥ मथुरा में दूतकी उक्ति है विरह निवेदन करत अरु जे जे मारे सो सब उत्साह सों मारे सो सुन वीर होतही है यहां उपमाअलंकार ॥ २६ ॥ अथ भयानकरस लक्षण । दोहा-दोहिभयानकरससदा, केशवश्यामशरीर । जाकोदेखतसुनतही, उपजिपरेभयभीर ।। २७n नाको देखे ते औ सुनेते भय उपजै सो भयानक रस है ताको रंम श्याम है ॥२७॥ राधिकाको भयानकरस ॥ यथा-सवैया। भुवमंडलमंडितकैघनघोरउठेदिवमंडलमंडिघटी। पहरातिघटापनवातकेसंघटघोपपटैनघटीहूंघटी। दशहूदिशिकेशवदामिनिदेखलगीपियकामिनकंठतटी। जनुपारथपाइपुरंदरकेवनपावककीलपटेंझपटी ॥२८॥ उक्ति कविकी पृथ्वी पै मेघ छाइ रहाँ अरु घोर करत आकाश मंडल में जुर (१७) रसिकप्रिया। जुरके अरु धन पवन के संयोग ते घरी घरी घोरत हैं दामिनि चमकत देखि कामिनि कंठसों लगिगई ताकी उत्प्रेक्षा की अर्जुन की सहाय पाय इंद्रके वनमें अग्नि की लपE लपटी है यहां गटी समूह कामिनी आलंबन घोपशब्द दामिनि आदि उद्दीपन भयवार चेष्टा अनुभाव शंका त्रास संचारी कंप सात्विक भय थाई ताते भयानक सो शृंगार के अंगहै ताते रसवव जनु पावक की लपटते उत्प्रेक्षा जनु पंयहि पाइ पुरंदर यह में पाठ है ॥ २८॥ कृष्णको भयानकरस ॥ यथा-कवित्त । रिसमेंविरसयोलविपतेसरसहोत जानेसोप्रपलपित्तदाखेजिनचाखी है । केशोराइदुखदीवेलायकभयेवतुम आजुलहुजीमेंजाकीआंखेंअ भिलापीहै ।। सूधेहोसुधारिवेकोआयेसिखवनमोहिं सूधेहमेंसूधीवातें मोसॉउनभासीहै । ऐसेमेंहोंकैसेजाउँदुरिहूधौदेखीजाइ कामकीकमा नसीचदाइभौंहरासीहै ।। २९ ॥ नायक अपराध करि आपुही पुनः सखीसों कही तू मान चुदाउ तब ससी कहत रसमें रसके घोल यह भी पाठ है रिस में जो विरस के चोलहें सो विष ते पडे होतहें सो जाने जिन या पित्तकी दासें जिन साई हैं ताको तुम दुःस दीपे लायक भये जाकी आजुली आंखिन की जीम अभिलापि है तुम पड़े रुथे ही अप मोहिं मुधा- रन आये हो का कयहूं सुधे में मोसों उन सूधी पातें कही न कही ऐसे समय में कैसे जाएं तुम दरते दुर देसी तो काम कैसी कमान भी घढी प्रबल पित्तमें दास दृष्टांत का मोसों भापी है या काकोक्ति भोई उपमेय कमान उपमान बढ़ी धरम सी वायक ते पूर्ण उपमा शृंगार को अंग भय ताते रसवद याते संकर जानिये ॥ २९ ॥ अथ बीमत्सरस लक्षण । दोहा-निंदामयवीभत्सरस, नीलवरणवपुतासु । केशवदेखतसुनतही, तनमनहोइउदासु ॥३० जाके देसे तेभर मुनेते तन मन उदास होइ घृणामय होइ ऐसी निन्दामय वीमनगरम जानिये वाको रंग मील है अरु निंदा भय भी पाट है ॥ ३०॥ राधाको यीमत्सरस यथा-पायित्त । मातादीकोमासतोहिंलागतु हे मीटोमुस पियतपिताकोलोहनेक नअपातिहे। भैयनके कंटनिकोकाटतनकसकति तेरोहियो कसोहै- १. सिहातिहै ।। जवनवहोतिभेटमेरीभट्टतवतर ऐसीसोहें दिन भाषाटीकासमेत ! (१७९) उठिखातिनअघातिहै । प्रेतिनीपिशाचिनीनिशाचरीकी जाईदेतू के- शोराइकीसोंकहुतेरीकौनजातिहै ॥३१॥ उक्ति सखी की नायकाप्रति यहां जो शपथ करति सोझूठी करति कि माताको मास- खाउँ जो न चलौं ऐसेही पिताआदि को शपय करति इत्यादि जानिये इन्होंसे वीभत्स जानीजाते परनिष्ठ वीभत्स है जिनसों वीभत्स उपनै सो परनिष्ठ अरु स्वनिष्ठ में वैराग्य प्रकटत है रसवत् अलंकार ॥ ३१॥ कृष्णको बीभत्सरस ॥ यथा-कवित्त । टूटेटाटिघुनघनेधूमधूमसेनसने झींगुरछगोड़ीसांपविच्छिनकी- घातजू । कंटककलितत्रिनवलितविगंधजल तिनकेतलपतलताको ललचातजू । कुलटाकुचीलगातअंधतमअघरात कहिनसकतबात- अतिअकुलातजू । छेड़ी घुसेकिघरईधनकेघनश्याम घरघरनी नियहनातनपिनातजू ॥ ३२॥ उतिनायकाकी नायकप्तों यहां अपवित्र नायकानके अपवित्र स्थान को वर्णन टाटी टुटी धुन सहित धूमरे जालासे धुंवाँसों हो रहे ॥ अर्यन से नाश भये झंगुर छगोही मकरी लागीह तल्प सेज ठंडी छोटी गली ऐसे ठौर जात पितात नाहींइहांभी परनिष्ठ वीभत्स कुचीलस्थल को वर्णन है जाति अलंकार जानिये ॥ ३२ ॥ अथ अद्भुतरस लक्षण । दोहा-होहिअचंभौदेखिसुनि, सोअद्भुत रसजान । केशवदासविलासनिधि, पीतवर्णवपुमान ।। ३३॥ जहांअचंभव देखिके वा मुनके होय तहां अद्भुत रस होत है ताको रंग पीत है।।३३॥ प्रियाको अद्भुतरस यथा-कवित्त । केशोदासबालवैसदीपततरुण तेरी वाणीलघुवरणतबुद्धिपरमा- नकी । कोमलअमलउर उरजकठोरजाति अबलापेबलवीरवन्धनवि धानकी ।। चंचलचितीनचितअचलस्वभावसाधु सकलअसाधभा- बकामको कथानकी चतफिरतदधिलेततिन्हेंमोललेत अदभुतर- सभरविटीपभानको ॥ ३४॥ हे सखी और अगुवात करत तो अद्धा रससों भी बेस बाल दीति तरुण पाणी लघु बुद्धि परमातको परमान याते वड़ी,भाल नहीं र कोमल अमल निर्मल है
(१८.)
रसिकप्रिया।
उरज कुच कठोर जात की अबला बंधन बलवीर की अर्थ वशकर निहार है चितवन
चंचल चित्त अंचल स्वभाव साधुभावादिक असाथ कामकी कयनको कहत दहीचा
फिरति है जो लेत सोई विकत ये सब बातें आश्चर्य की हैं ताते अद्भुत रस भयो अलं
कार रसवव है ।। ३४॥
पुनः अन्यच्च ॥ यथा-कवित्त ।
बजकीकुमारिका वैलीने शुक शारिका पढ़ाकोककारिकानके-
शवसबैनिवाहि|गोरीगोरीभोरीभोरीथोरथोरीवैसफिरें देवतासीदौ-
रीदारीआईचोराचोरीचाहि॥विनगुणतेरीआनिभ्रुकुटीकमानतानिक
टिलकटाक्षवाणयहैअचरजआहि। एतेमानडीठईठतेरेकोअदीठमन-
पीठदैदैमारतीपैचूकतीनकोऊताहि ॥३५॥
कुमारिका कोक शारिका पढ़ावती भोरी चोरी जानती बिन गुणकी कमान बाण मारने टेढ़े
मनते अदृष्ट बेझो पीठ दै मारत चूकती नहीं यही अद्भुतता अलंकार वीप्सा जानिये
अरु याको तिलक कविप्रियाके टीकामें नारायन कवि लिखचुके याते विस्तार इहां नहीं
लिख्यो ॥ ३५॥
कृष्णको अद्भुतरस ॥ यथा-कवित्त ।
माखनकेचोरमधुचोरदधिदूधचोर देखतहोंदेखतहीहियोहरिले
तहैं । पुरुपपुराणअरु पूरणपुराणइन्हें पुरुपपुराणसुकहतकि
हिहेतहें ।। केशोदासदेखिदेखिसुरनकीसुंदर वे करती विचार सबसु
मतिसमेतहें। देखिगतिगोपिकाकीभूलिजातनिजगति अगतिन कैसे
घोंपरमगतिदेतहैं।॥३६॥
पुरुष पुराण लोमशादिककपि पूरण पुराण भारतादिक इन्हें पूरण ब्रह्म जो कदव
सो काहे येतो मासन की चोरी करत यही अद्भुतता अरु अहरिनीनि की गति देरिट
आपनि गति भूलि जात ती अगतिनको सुगति कैसे दे यही भद्रतता अलंकार विभा-
पना विरुद्ध ते कार्य की उत्पत्ति जो गति भूल जैयो ऐछो हाय सो गति देय ॥३६॥
पुनः यया-सवेया।
वनमोहिमिटेहुतेकेशवराइकहावरणों गुणगृढउधारे।
यशुदापगईतवरोहिणिपेचुटिआदिगुहावतजाइनिहारे।
परजाउँनुसोवतहफिरजाउँतानंदपसातवरादधिपारे।
सपनेअनसत्तकियोसजनीयरवाहिरहोतबड़ेपरवारे ॥३७॥
भाषार्टीकासमेत। (१८१) या कवित्त बहुत'माचीन पुस्तकन में नहीं मिलत ताते नारायण कावे याको तिलक कछू नहीं लिख्यो विशेष अलंकार ॥ ३५ ॥ अथ समरस लक्षणं । दोहा-सवतेहोइउदासमन, बसैएकहीठौर । ताहीसोंसमरसकहें, केशवकविशिरमौर ।। ३८ ॥ सर्वते मन उदास होके एकठोर रहै सो समरस है ॥ ३८ ॥ श्रीप्रियाजकोसमरस यथा-सवैया। देखनहींअरविंदनित्योंचितचंदकीआनंदकंदनिकाई। कामिनिकामकथाकरै कानन ताकेत्रिधामकीसुंदरताई ॥ देखिगईजवतेतुमकोतवतेकछुवाहिनदेख्योसुहाई। छोड़ेगीदेहजोदेखेबिनाअहोदेहुनकान्हकहूंढदिखाई ॥ ३९ ॥ उक्ति सखीकी नायक प्रति चितदेके कमल नहीं देखत अरु चंदको भी नहीं देखत अरु कामिनी है कामकी कथा करति है कान मर्याद नहीं मानत ताको तीन धामकी मुंदर ताताकै है कहा अति सुंदरी है जवते तुझें देखिगई तबते वाको आन देखियो नहीं मुहात सो देह छांडे है ताते तुम दिखाइ देहु इहां सवते निर्वेद द्वै गयो तिहारेपर आश- तिता है यह समरस रचना ते बात है याते पर्यायोक्ति अरु रसवत तो चलोई आवत अरु पर्यायालंकार भी कोई कहत कि एक तुमही में चित्त बसत ॥ ३९ ॥ कृष्णको समरस यथा-सवैया। खारिकखातनदारी उदाखन माखनहूंसहमेटिइठाई। केशवऊखमयूपहिदूखतआईही तोपहँछाडिजिटाई॥ तोरदनच्छदकोरसरंचकचाखिगयेकरिकेहूंढिठाई। तादिनतेउनराखीउठायसमेतसुधावसुधाकी मिठाई ॥४०॥ सब मिठाईते निवेद एकतरे ओष्ठकी मिष्टता पर आशातिता है अर्थ अघरवारी जो मिठगई है तो मिठाई के जो अन्य मिष्ठता उपमान तिन सबको तिरस्कार निंदा है याते प्रतीप अरु माको अर्थ कविमिया के तिलक में नारायण कवि लिम्बचुके याते इहां नहीं लिख्यो और अलंकार पूर्ववत् ॥ १० ॥ अपरंच कवित्त। दनुजमनुजजीवजलथलजननिको परचोईरहतजहांकालसोंसम- रहै । अनंतमनंतअजअमरमरतपर केशवनिकसनानेसोईतोअम;
(१८२)
रसिकप्रिया।
रुहै। वाजतुश्रवणसुनिसमुझिशवदकरिवेदनिकोवादनाहींशिवको-
डमरुहै। भागहुरेभागोभैयाभागनिज्योंभाग्योपरै भवकेभवनमांझ
भयकाभंवरहै ।। ४१ ॥
इहां केशव शुद्ध शांत दिखावत तहां शांतता को रूप ऐसा है कि सिद्ध तपवन
पुराण कथा श्मशान ये विभाव चाही सयमें समता ज्ञान की सो अनुभाव चाही धीर्य-
दर्प संचारी निर्वेद स्थायी सो कहत, दानव मानुप जे जलयल वासहि जीव दानक
आदि जलके मनुष्यादि थल के तिनसों कालसों संग्राम परो रहत है अर्थ ये सब नाश
को प्राप्त होत अरु अनंत अनंत ब्रह्मा अमर देय ते मर कर परतहें ताते यह संसार ते
निकस जानत सोई अमर होत अनन्त अजर अज अरोऊ मरत यह भी पाठहै तें यो
वन युत है मेरे श्रवण कानन विपे ताको मुनिकर समुझिवह वेदकी कानको शब्द नाहीं
है जो त्रिकुटी विपे शिवहें ताकी डमरू है जब त् श्रवण मुनि समुझि सबै शब्द यह भी
पाठ है ताते भागोर जो भागते भागत बरे याभवके भवन में भयको भँवर मोरहै अरु
कोई कहै कि अमर कैसे जानों तहां शिवको डमरू मति मानो यह वेद शब्द श्लेप है
कि वेदको शब्द है कान को नाहीं वेद कहत भागहु रे जो भागते भागत वने अरु
यह वेद श्रवण को वाद नाहीं शिवहीं को डमरूहै ऐसो भी बनत है डमरू वजाइ शिव
'कहतुहैं कि देव दनुज मनुज अज सवसों कालको समर होरहो है तो इहां निर्वेद सबते-
उदास भये यह कहां ते आई सो उदास होनो भगवते अरु वेदशब्द ते विभाव अरु
सब मरत तो सब एक समसे यह अनुभाव अरु धीर्य देयकै भाग है सो पचिहै
अरु कंप रहाहै सोई सात्विक ताते शांत रस पूर्ण भयो तहां कोई प्रश्न
करै कि सबरस रसिक प्रियामें शृंगार में अंग अंगीभावते जनाये यह जुदो काहे
करयो ।। ताको उत्तर ॥ कि खारक खात तौ शृंगार में उदाहरण करचुके अब दनुज
मनुज ते शृंगार आगे नाही है अब आन प्रसंग चलावने है कवित्तनकी रीतिवारो यात
यही कवित्त ते चलायो प्रश्न ॥ तहां केशव विलास पूरणकाहे न कीनो, उत्तर ॥ तौ
सारक खात में करचुके अव आन हेतु मंगल करत, तहां मंगल विलासके आदि अंत
में कीनो आदिमएकरदनअंतमें दनुज मनुज प्रश्न | तो मंगल में दनुजको नाम आदि
में काहे घरो ॥ तो इहां शांत रसहै सबमें समता चाही ।। ४१ ॥
दोहा-इहिविधिवरणोंवर्णवहु, नवरसरसिकविचारि ।
वांधहुँवृत्तिकवित्तकी, कहिकेशवविधिचारि ॥४२॥
इतिश्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायारसिकमिया-
यांनवरसवर्णननामचतुर्दशः प्रकाशः ॥ १४ ॥
भाषाटीकासमेत । (१८३) यहिप्रकार ते हमने नव रस को वर्णन कियो अब चार तरह की वृत्ति कवित्तकी बांधत हौं ॥ ४२ ॥ इतिश्रीमन्महाराजाधिराजकाशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायणसिंहबहादुरस्या ज्ञाभिगामीललितपुरनिवासीहरिजनकवीश्वरात्मजेनसरदाराख्यकवी इवरणविरवितेरसिकप्रियाभूपणेसुखविलासिकानामटीकायां नवरसवर्णनोनामचतुर्दशः प्रकाशः ॥ १४ ॥ अथ वृत्तिवर्णन। दोहा-प्रथमकौशिकीभारती, आरभटीभनिभांति । कहिकेशवशुभसात्विकी, चतुरचतुरविधिजाति ॥१॥ कौशिकी १ भारती २ आरभटी ३ अरु सात्विकी ४ ये चार वृत्ति ॥१॥ अथ कौशिकी लक्षण । दोहा-कहियेकेशवदासजह, करुणाहासशृंगार। सरलवर्णशुभभावजहँ, सोकोशिकीविचार ॥२॥ जहां करुणा रस हास्यरस औ शृंगाररस कहिये भी सीधे अक्षर होहिं औ शुभ व मुन्दर भावभी होहिं सो कौशिकी जानिये ॥ २॥ यथा-कवित्त। मिलिवेकोएकमिलीमिलीफिरदूतिकानि मिलिमनमनहिविलास विलसतिहैं । बोलिवेकोएकवालयोलसुनिवेको और बोलियोलितीर थनिव्रतनिवसति । देखियेकोएकैफिरदेवतासीदोरीदौरी देवताग नायदिनदानमैनसति हैं। कीजैकहाकरमकोइहिरूपमेरीमाई येतामेर कान्हजूकेनामहिहँसतिहैं ॥३॥ उक्ति धाय की ससिन प्रति कि देसी हमारे कान्हके नाम ते हँसती कान्ह काहे नहीं सुन्दर चक्षुहें यह तो हास्यरस ॥ किंवा ऐसे जिनको समरी थाहत तिनको नाम लिये ये हसति ॥ या पातको कहिके कि उनको रूप श्याम है ॥ भर कहा करों यह कर्मको जाने यह नाम राख्यो ॥ सोई करुणा अरु मिलियो को एकै किरें मिल मिलके तिकानि सो एकै मनसों मिलती एकै मिटिके पिटास ते पिटसती एकै चोलिये को एक बोल मुनियेको एक बोलिमा योलि घोलि वीर्षत करती एके देखिवेको देवीसी दौरी दोरी फिरतों । एकै देवी मनाइ दान करती इत्यादि पदन ते भृङ्गार किंवा विलास विलसति येभी शृङ्गार जानिये यांत कौशिकी वृत्ति रसको अंगरस याते रसवतालंकार । मिलि मिलि बोलि योलि भन्दवे टायनुभास भी होत है ॥
(१८) रसिकप्रिया। अथ भारती लक्षण। दोहा-वरणेजावीररस, अरुअद्भुतरसहास । कहिकेशवशुभअर्थजहँ, सोभारतीप्रकाश ॥४॥ जामें पीर अद्भुत भी हास्य रस यरणिये ॥ अरु मुन्दर अर्यभी जहां कहिये सो भारती है ॥ परणहि जाम वीर रस मिलि शृंगार रस यह भी पाठ है ॥ ४ ॥ उदाहरण कवित्त । काननिकनिकपत्रचक्रचमकतचारु ध्वजाझुलमुलीझलकतिअ- तिसुखदाइ। केशवछवीलोछत्रशीशफूलसारथीसों केसरकीआडअ- धिराधिकारचीवनाइ ।। नीकेहीनकीवशमनीकोनकमोती नाक एक- हीविलोकनगुपालतोगयेविकाइ । लोचनविशालभालजरितजराऊ लाल मानोंचढयोमीननकेरथमनमथराइ॥६॥ इहां सवारीको वर्णन है ।। कि तरवन चक्र झलि मलि छवि की झूल ध्वन शीश फूल सारथी केसरकी आड अधिराधिका जाके आसरे पर सब रहत नकीव नाक मोतीमें उत्साह ते वीररस बेंदा काम लोचन मीन एक विलोकन मंदास वारीते हास वेदारक्त सों काम थाप्यो ताको रंग श्याम ताते अद्भुत अथवा मीन के रय पै चढ्यो यह अद्भुत ताते भारती रसवत् अलंकार अथवा सवारी को रूपक है वेदा में मन्मयकी तर्कनाते उत्प्रेक्षा लक्षणके दूसरे पाठमें शृंगार कह्यो तो यहां विकाय जैयो शृंगार क्यों कि जब इंसि चितवै है ॥ तब नायक बेग वश होजात है ॥ ५ ॥ अथ आरभटी लक्षण। दोहा-केशवजामेरुद्ररस, भयवीभत्सकजान । आरभटीआरंभयह, पदपदजमकवखान ॥६॥ जा रौद्र भयानक वीभत्स रस अरु पद पदमें जमक भी होय सो आरभटी वृत्ति कहावै ॥ ६॥ उदाहरण सवैया। योरघनेघनघोरतसज्जलउज्जलकज्जलकीरुचिराचैं। फूलेफिरैइभसेंनभपाइकसावनकीपहिलीतिथिपाचें ॥ चाहूंकुघातड़ितातडपेंडरवनिताकहिकेशवसाचें ॥ जानिमनोब्रजराजविनात्रजऊपरकालकुटुम्बिननाचें ॥७॥ तरप है तद्धिता अरु घोरहें घन यामें या जान्योजात कि मारिवेक हेतु कोष करति है ताते रौद्ररस । चौहूदिशा तडुपै तड़िता यह भी पाठ है अरु देखि देखि वनिता
भाषाटीकासमेत।
डरपती सोई भयानक है अरु काल कुटुम्ब नाचै या वीभत्सरस । अरु हृदयमें मारि-
वेकी रुचि है याते आरभटी अरु पूर्ववत् अलंकार रसवत् । मानों काल कुटुम्ब
ते उत्प्रेक्षा ॥ ७॥
अथ सात्विकी लक्षण।
दोहा-अद्भुतवीरांगाररस, समरसवरणिसमान।
सुनतहिसमुझतभावनिहि, सोसात्विकीसुजान ॥८॥
अद्भुत वीर औ शृंगार रस या समरस समान कहिये ।। अद्भुत रुद्रो वीर रस, समरस
वरणि समान ! सुनतहि समुझत भावमन सोसात्विकी प्रमान ॥ यह भीपाठहै ॥ ८ ॥
उदाहरण कवित्त ।
केशोदासलाखलाखभांतिनकेअभिलाप बारिदैरीवावरीनवारि
हियेहोरीसी । राधाहरिकेरीप्रीतिसयतेअधिकजानि रतिरतिनाथहू
मेंदेखोरतिथोरीसी ॥ तिनमेंभेदनभवानिहपारयोजाइ भारती
कीभारतीहै कहिवेकोभोरीसी। एकैगतिएकैमतिएकमाणएकमन दे
खियेकोदेहदैहनननकीजोरीसी ॥९॥
क्ति सखीकी अन्य नायका सों। कि तू कहति है कि मोहिं श्यामलों मिलाउ सो
ये अभिलाप बारि दै हे वावरि हृदय में होरी मति बार राधा हरिकी प्रीति सवते
अधिक जान रति में अरु काममें रति थोरी है इनमें भेद भवानीभी नहीं पार सकति
भारती की भारतीभर शोभाहै कहतमें भोरीसीजानी जातभारत मेंभारतकी भारती कभारी
सी यह भी पाठ है ॥ गति मति प्राण इनके एकहैं । देखिने में देह दोहे नयनन कैसे
नोरी । इहां दोहुनको उत्साह वीर जब सखी कही येअमिलाप वारि दे हृदयमें होरीसि
कहा जराइ रही यह क्रोध ते रौद्र राधा हरिकी प्रीति ते शृंगार अरु देह दै जीव एक
इहां अद्भुत अरु भेद नहीं । अभेद वर्णन ते सम रस । किंवा अभिलापन को पारि-
देबो विषय वासना छुड़ाइयो यह भी समरस अरु द्वै देहमें एक जीवको वर्णन तो
एक अनेक ठौर कही याते दूजोपर जाइ अलंकार अरु एकै एकै बहुबार आयो यात
लाटानुप्रास भी है ॥९॥
दोहा-इहिविधिकेशवदासकवि, नवरसवरणिकवित्त ।
पांचभांतिअनरससुनो, ताहिनदीजैचित्त ॥ १०॥
इति श्रीमन्महाराजकुमारइन्द्रजीतविरचितायारसिकप्रियायां
चतुर्विधिकवित्तवृत्तिवर्णनंनाम पंचदशा प्रकाशः ॥ १५॥
(१८६)
रसिकप्रिया।
इहि प्रकारके केशवदास ने नवरस अरु वृत्ति वर्णन कियो । अब पांचभांति ते अन-
रस वर्णत तापे कोई चित्त न दीजियो ॥ १० ॥
इति श्रीमन्महाराजाधिराज काशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसादनारायण सिंहयहादुरस्पा
ज्ञाभिग.मीललितपुरनिवासीहरिजनकवीश्वरात्मजेनसरदाराख्यकवीश्वरेण
विरचितेरसिकप्रियाभूपणे सुसविलासिकानाम टीकायां चतुर्विधि-
तिरस वर्णनोनामपंचदशमःप्रकाशः ॥ १५ ॥
अथ अनरस वर्णन।
दोहा-प्रत्यनीकनीरसविरस, केशव दुःसंधान ॥
पत्रादुष्पकवित्तपहु, करहिनसुकविश्खान ॥१॥
प्रत्यनीकरस १ नीरस २ विरस ३ दुःसंधान ४ अरु पात्रा दुष्ट ५ कवित्त को
कविलोग नहीं कहत हैं अनरस जानिक ॥ १ ॥
अथ प्रत्यनीक लक्षण ।
दोहा-जहँशृंगारवीभत्सभय, विरसहिवरणकोइ ।
रौद्रसुकरुणामिलतही, प्रत्यनीकरसहोइ ॥२॥
जहां शृङ्गार अरु करुणा और रसके जे विरोधी रसह तिनके मिले प्रत्यनीकरस
होतुहै ॥ जहँ शृङ्गार वीभत्सभय, विरहीवरणे कोइ ॥ अरु धीरहि परणे यह भी पाठ
उदाहरण सवैया॥
हँसियोलतहीसुहँसैसबकेशवलाजभगावतलोकभगे।
कछुवातचलावतरचलेमनआनतहीं मनमत्थजगे।
सखितूजुकहीसहुतीमनमेरेहीजानियेनेह हियेउमगे ।
हरित्यानेकुदृष्टिपसारतहीअँगुरीनिपसारन लोगलगे ॥३॥
इहां नायका सो ससीने परिदास कीनो सो मुनकर नापया कहति है। किसि
बोलत न सय कोई हँसन लागः हसि पोलियो शृङ्गार ॥ लान भगारत शृगार लोक
भगयो वीभत्स ॥ यात चलाईयो शृङ्गार पर चटयों वीभत्स मन आनत मन्मय जी
मृगार हियो न रमग यह वीभत्स यात समीयह यात जो तूने कदी मोमो मनमें
भी रही। जानि यही नहींज्योटमग अर जानिये न दिया समग या दोनी पाठ भर
हरिको योरी भी दृष्टि पसारके में देखा तो लोग अंगुरी पसारन टगत दृष्टि पगारियत
मृहार अरु लोग अँगुरी पमारत पामें वीमरस को वहांप्रत्यनीक रसभपो पद परितृत
चहा । कप्रिय में यह करित परिवृत्तके उदाहरण में है तारे इहां नारापन भी
विस्तार पूर्वक अप नहीं लिया भी भय वीर रोद राणा जहां पमही मिले वहां भी
प्रत्पनी रस जातिये ॥ ३ ॥
भाषाटीकासमेत। (१८७) अथ नीरस लक्षण । दोहा-जहांदम्पतीमुँहमिले, सदारहैयहरीति । कपटरहैलपटायमन, नीरसरसकीनीति ॥ ४॥ जहां नायक अरु नायका मुंहसों मिले हृदय सो न मिले यही रीति सों छदा रहें। अरु लपटाय पर मनमें कपट रहै यही नीरस रसकी प्रीति है ॥ ४ ॥ . उदाहरण सवैया। गाहतासंधुसयाननिकजिनकीमतिकोमतिदेहदहेली। मोहिंहसीदुखदोऊदईतिनहूंसोजनावतिप्रेमपहेली। आजुलोंकाननहूनसुनीसुतौदेखिचलीहमसौतिसहेली। जानीहैजानीमिलीमुहहीहियनाहिये भावति गर्वगहेली ॥६॥ सखी अपनी बात कहति है कि हम ऐसी हैं सयाननी के सिंधु गाइत गाहत मतिकी दहेली द्वै गई हैं पानी में बड़ी बार भीजते देह दहेली जाति है सो हम ऐसीही तिनके आगे प्रेम पहेली जनावति है सो मोहिं हँसीह आवति है और दासह है तेरे छलको यात जानिहीं तुमहू मिलहि हियमें तेरे नाहँ नहीं भावति है हेगर्व गहेली सो नहीं तेने अपने आंगी करि राखी है सो वह नहीं तो है तो सौति जो पियको मिलन नहीं देति पर तैने सहेली करि राखौह पारयार वहींहै तेरे पास सहेलीहू पास हीरहति है यह अर्थ तहां प्रभाइहां तो नायकाको कपट कह्यो लक्षण में तो क्ह्योहै दंपति मुहँमिलें कपट लहें लपटाइ सो नायकको कपट या कवित्तमें कैसे जानिये इहांतीम मिली यह पाट है मिलेपाठ होतो तो दोऊ जाने जातेअरु गर्व गहेलीपद बने दोऊ में अरु नायक में सौति सहेली पद बनै या कपित्त में बड़ी मन है तहां उत्तराससी दोउन सौ कहति दो बैंठ, अरु मनमें तो कपट है क्योंकि नायक शठ है अन्याशक्त है नायका कुलटाहै यह अन्यसों आशक्त है सो झूठी बातें बनाइ यनाइ सती के आगे कहत ते तहां सखी कहति है कि हमें तुम ठगत हो हम कैसीह जिन मात देह सयाननके सिंधुमें परति है परत परत देह दहेली गई ताते मोहिं हँसी दुःख भोको हंसीर है अरु दुःसह माहि ठगत हो यही तो हँसी और तुम्हारे कपट को दुःख है क्योंकि दोऊदई तुम दोऊ तुम दोऊप्रेमकी पहेली हमें सुनावत ही पहेलीसोहे फेरि हमारे आगे कहत होचतुराई जनावत हो तो जानी हो जाती मिली मुहे मिली वह प्रेम पहेली तुम्हारी मुहही मिटीद और हियमें तुम्हें नहीं ये भावति है दोऊ यात नहीं कौन मिलाप कौन तो भलोहे जो मिलाप न होइ ती और और पहुँचिये कैसी है वह नहीं गर्व गईटीअपनी चतुराई को गर्वता- करि बावरी है रहीहै और की चतुराईकी सपरिही सूझति है नहीं पाते वा वस कदी तर ससीने एक औरत देसी सो कहति है एक यहां सहेली है सो वह सौति है अर सहेलीह है सहेली सौति को कोऊ करत नहीं पर या नायका के दो मन में या नहीं (१८८) रसिकप्रिया। जो पिय सो अनुरक्त होइ तो अन्य स्त्री की ईपी अवि यह तो भौरही टौर लगी है याते पा माइका को इन सहेली करि राख्यौहै सो इन सखीने कही आजुलों यह यात काननिहूं नहीं मुनी सोयह आखिन देखी चलो सौति सहेली या मांति अर्य इहां दंपतीन को कपट घण्यो याते नीरस कवित्त जानिये इहां पांचमी विभावना कारज होइ विरुद्ध ते यह विभाषना महिं सौति ते सहेली के कर्म उपजे यही विरुद्ध ते कार्य यह जो प्राचीन ने लिख्यो सोईअर्थहै ॥ ५ ॥ अथ विरस लक्षण। दोहा-जहांशोकमहिंभोगको, वरणिकहैकविकोइ । केशवदासहुलाससों, तहँहावीरसहोइ ॥६॥ जहां शोक में भोगको वर्णन होइ तहां विरस जानिये ॥ ६ ॥ उदाहरण कवित्त। - केशोदासन्हानदानखानपानभूल्योगान गयोज्ञानभयोप्राणपीठि कोसीपीठिहै । छांडहरसिकलालयहजकवहवाल देखतहींसंवसुख तुमहिंउवीठिहै ।ऐसीशोचसीठीसीठी चीठीअतिदीठीसुनेमीठोमीठी वातनिजुनीकेहूनीठिहै । इठनिसोंतूटीईठीताकेशोककीअँगीठी उठीजाकेउरमेंसुकैसेहँसिडीठिहै ॥७॥ सखी वचन नाइकासों कि नाइका की यह अभ्यस्य है न्हान दान इत्यादि सब भूले प्राणतो पीठि चौकी ताकी पीठिसे भयेहैं ताते तुम भोगकी जक छड़ेि देहु वहयाल तोतुम्हें देखि के सब सुख छोड़ि है ऐसीशोच सीटीअरु चिठीसोसीठीहै अति फीकी काहे- ते जुनाइका सुनति है मीठी मीठी बातें नीकेहूमें क्योंहूं क्योहूं हँसौ तौ अब यह अव- स्थाहै और ईठनि सो जु टूटीहै ईटी जाके सो टाकी अंगीठी वाके उरी है सो कैसे तुम सो हँसिकै देखि है तो इहां भोग में शोक वरण्यो याते विरस भयोइहावृत्यनुमास है यह भी पूर्ववत् जानिये ॥ ७ ॥ अथ दुःसंधान लक्षण । दोहा-येकहोइअनुकूलजहँ, दूजोहैप्रतिकूल ॥ केशवदुःसंधानरस, शोभिततहांसमूल ॥ ८॥ जहां एकतो अनुकूल मित्रभाव होडु अरु दूजो प्रतिकूल शत्रुभाव होइ तहां दुःसंधान रस सहित मूल जड़के सोहतहै ॥ ८ ॥ दैधिदीनोउधारहोकेशवदानकहाँअरुमोललेखैहैं। दीनोविनाजुगईहोगईनगईनगईघरहीफिरि हैं। उदाहरण सवैया।
भाषाटीकासमेत । (१८९) गौहितुवैरकियोकवहोहितवारुकियेवरनीकीव्हरेहैं। वैरुकैगोरसबेचहुगीअहोवेच्योनवेच्योतोढारिनदेहैं ॥९॥ इहां प्रत्युत्तरहै नापक अनुकूलतासों बोलतु है नायका प्रतिकूलता सों बोलति है तहां प्रमादिदधि यहती नायक क्ह्यो दीनो उधार यह नायका को तब नायक कह्यो दान कहा अरु दान देहु तब नायका कही कहा अरु मोलले खेह नहीं मोल लेखेही ऐसे चाहिये है पदतो ऐसेहै जनु औरसों कहति है प्रत्युत्तर में खेही पद चाहिये एक प्रश्न तो यह अरु वैरु नायक के वचन है वैरु किये वरुनीकी ढरह इहां ह रही हरेही चाहिये रहे पद इहां अनबन है अरु तीसरो प्रश्न नायकहूने प्रतिकूल वचन कहो वैरुकै गोरस बेबहुगी नायकको वचन अनुकूल न रहो उत्तर ॥ या कवित्तको अर्थ या भांति कीजै दैदधि यह तौनायक ने कह्यो तब नायकाने को दान तब नायका बोली कहा अरु और कहा करोगे भिक्षाही मांगोगे तब नायक ने कही भली हम मोल लेख मोल देके लैंहैं यह अर्थ तब फेरि नायका बोली दीने विना कहाजो हम देहिंगी नहीं तो तुम कैसे मोल ले खावगे तब नायक ने कही गई जू गई कहा लौं तुम गई जूगई कहि कह्यो प्रतिष्ठा दैके कहा कि दान देहुगी पै तब नायका ने कही नगई नगई घरही फिरि जैहैं फेर नायक कह्यो गयो हितु वैरु कियो उन कह्यो हितु काहो तब नायक कहीं वैरु किये कर कछू करुनाई है श्रेष्ठता है तय नायका कहीनीकी द्वैनीकी है रहैं हम नीकी भांति रहिहैं तुह्मारे वैरुते कछू डरिहैं नहि नीकी रहे वैरुकै यह वैरुकै शब्द चौथी तुकको इहां अर्थमें लगाइ लीजै कहानीकी ढेरह वैरुकै तुमसो तब नायक कही गोरस तो वैरुके वेबहुगी तब नायकाने कह्यो बेच्यो न बेच्यो ती ठारहू तो न देविंगी घरही राखिहैं इहां सर्व वचन नायका नायकके अनुकूल प्रतिकूल लगे याते दुःसंधान रस भयो उत्तरालंकारहै उत्तर जहां प्रतिउत्तरौ यह उत्तर लक्षण है उत्तरालंकारको ऐसो अर्थ भी कोई करत अरु हमार शिष्य नारायण कविने याकवित्तको अर्थ कावे प्रियांक टीकामें हॉनरसपर खूब लिख्यो है याते इहां नहीं लिख्यो ॥ ९॥ अथ पावादुष्टरसलक्षण । दोहा-जैसोजहांनवृझिये, तैसोकरियेपुर । विनुविचारजोवरनिये, सोरसपातरदुष्ट ।। १०॥ जैसे जहां नहीं बूझिये तैसे ताकी पुष्ट भी न करिये अरु विना विचारे वर्णन करिये सो पात्रादुष्टरसहै जैसे जाकहँ बूझिये करिये तेसो पुष्ट यह भी पाठहै ॥ १०॥ उदाहरण कविता कपटकृपानीमानीप्रेमरसलपटानी प्राननिकोगंगाजूकेपानीसम जानिये। स्वारथनिधानीपरमारथकीरजधानी कामकीकहानीकेशो
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भाषाटीकासमेत। यारसिकप्रिया के पढ़े रति मति अति बढ़े और सब रस विरस कहानवरस तिनकीर जाने और स्वास्थ २ कहायाके पढ़े चातुर्यतालहै तब सय राजा प्रजा को वल्लभ होइ भांति तो स्वारय लहै और श्रीकृष्णराधा को वर्णन है याते तिनकेध्यानको परमारय है याते रसिकप्रिया की प्रीति ते दोऊ यात सिद्ध होहि ॥ १६ ॥ इतिश्रीमन्महाराजाधिराज काशिराजश्रीमदीश्वरीप्रसाद नारायण सिंहबहादुरस्या- ज्ञाभिगामीललितपुरनिवासी हरिजनकवीश्वरात्मजेनसरदाराख्यकवीश्वरेण विरचितरसिकप्रियायां भूषणेसुखविलासिकानामटीकायां रसअ- नरसवर्णनोनाम पोड़शा प्रकाशासमाप्तः ॥ १६॥ शिष्यसरदार काविक नारायण कविता कृत स्फुट कवित्त लिख्यते । परमप्रकाशीसुखराशीरहेमुक्तिदासी कलुपनिवासी ऐसीकार्य कोबसैयाहीदिक्षिणदिशामें विश्वनाथते सुनारपुर सन्निधिकेदारह मानकोपुजेयाहो ॥ पुत्रअन्नपूरणाभवानीजीकोजाहिरहौं बंदीजन तजह्वसुताको नहैयाहीवानीअवतारसरदारकविकोशिष्य नारा णनाम रामसुयशकहैयाहों।।।।काछनीकछोटीकसे कामरीकधापे रेअतिअनियारेहगतारेकजरारेहैं । ठटुकिचलतलटलटकपोलन करमेलकुटमोरमुकुटसुधारे।। खेलंतखिलतजातखिरकनरायण कुटिलकटाक्ष कचकारेघुघुरारेहैं। चूमिचुचुकारतचरावतधरपैथे घाइधरैधूमरीकलिंदजाकिनारेहैं ॥२॥ तहालसखीनसंग आई वृ भानसुता जहां खरे श्यामसखासहितनिकाईमें । तकितकि किजकि दोउबैदुईकोरहे कहेकौनकविछविउपमानपाईमैं खेलेलगेगेंदगोरीसंगमेंनरायणजू लखिलखिमारेलगैकुचउचताईमें उचटिगिरतकझोकान्ह ना अधीरहोहुल्याइहौंतुरतरहोनेकधीरत ईमैं ॥३॥ चड़िके कदंब कान्हकूदिकालिंदीकमांझकालीनाथिल्य कृपाकरिकैजननपै ॥ मंदमुसुकातजातनृत्यतनरायणजुवारतम ककामवानिकवनन ॥ मटकिमटकिगतिअतिचटिकीलोत भ तिभांतिछूटीछटाछविकछिननपै । मोदभरिमोहन मधुरसुरसा साधिमोरिमुखमुरलीवजावतफननपे॥४॥ एहोत्रमनाथहोअनार निकनाथअब कीजियेसनाथमोहिअवलाविचारिक । देवयक्षनारिन (१९२) रसिकप्रिया। रजेतेजीवजंतुसवै मायामेतिहारेपरेतुमहिंविसारिके ॥ करतिविनय बहुनागिनिनरायणसों याहिछाडिदीजैप्रभुमोतननिहारिक महामोहग्रसितफैसितकामादिकमेंयाहीतेनचीन्योरूपमूढमदधा- रिकै ॥५॥ मंजुमोरमुकुटकपोलपैअलकपटपीततेचटकचारुचूनरी अनूपकी । मंदमुसुकातजातकहतवनायवात श्यामपीतगातछटा टीछवीकूपकी ॥ नोकदार नैनतेनिहारतनरायण हावभावकरप्या - रीभारीब्रजभूपकी। थोरीथोरीवैसमनदेखतठगोरीहोत, आजजुरीजो रीयहयुगुलस्वरूपकी ॥६॥स० ॥ जातविहालमहाइहिकालतहांति हिकोजुरिआइघनेरी । नीकीनईनिमकीननरायण वालविशालसबै मिलिघेरी॥ सोनँदलालतमालतरेखरे प्रेमभरेयहवातनिवेरी। मीन चखोजिनिहोविलखीतूसखीना लखीविनतीपरमरी ॥णा तेहतरेरन कीजियेमोढिगप्रीतिकीरीतिमेंहोहनिहालहि।नातोव्यतीतभईसवबा तसुतोकहिहौंसंबसोंहमहालहि ॥ तानमुनेतरकीतिहिवेरनरायणको तरताकितमालहि । होइलटूझटबांधिपटूभटूभारीभुजाभरिभेटिगु- पालहि ॥८॥क०॥ जगमैगजटितजवाहिरको ज्योतिजगी जमी- हैजलजमुखी जूहिनकी सेजपर। जोम भरीजोवनजलूसतेजमायेजेब ज्वालसीजरबदेतमनकीमजेजपर ॥ जाहुतोजलदयोगजानिकैनरा- यणजूजादाजाहिजपतभई हैं वाअमेजपर। याहीजामजोहतजनीते- लैजलजहार जातज्योंज्योंयामिनीजम्हातत्योंत्योंतेजपर ॥६॥ इतिश्रीसरदारकविशिप्यनारायणदत्तकविकृते स्फुट।कवित्तसमाप्त ॥ समाप्तोऽयग्रंथः। पुस्तकमिलनेकाठिकाना-. खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना सेतवाड़ी-चम्बई.
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