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Uddish Tantram Parvatishwar Sanvad Rupam

Narayan · 2012/08

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॥ पार्वतीश्वरौवंदे ॥
Merea
पानी
धाकर
Dear Alamansaaminen otetaan
इस पुस्तकका रजिष्टरी सब हक १८६७ के ऍक्ट २५
बम्जव यन्त्राधिकारीने अपने स्वाधीन रक्खा है.
( All rights reserzcil by the publisheta)
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
लक्ष्मीवेंकटेश्वर " छापाखाना
कल्याण-मुंबई
SECRETAREEEEEEEEEEverage
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प्रस्तावना। - । उड्डीशं यो न जानाति स रुष्टः किं करिष्यति। जो मनुष्य उड्डीशतंत्रको नहीं जानता है, वह किसीपर क्रोध करके क्या कर सकेगा, उड्डीशतंत्र चार प्रकारका है, १ शिवउहीश, २ भैरवउड्डीश, ३ रावणउड्डीश, ४ मेघ- नाइउडीश । १ श्रीशिवजीमहाराजने दत्तात्रेयजीके पति जो तंत्र वर्णन किया है उसको शिवउड्डीश तथा दत्तानेय- तंत्रभी कहते हैं। २ भैरवजीका कहा गया उड्डीशतंत्र भैरवउड्डीश करके प्रसिद्ध है । ३ श्रीशिवजीने पार्वतीप्रति जो तंत्र वर्णन किया उसको रावणने अपनी वाणीसे प्रकाशित किया उसको रावणउड्डीश कहते हैं । ४ मेघ- नादके कहे उड्डीशका नाम मेघनादउड्डीश है। अब इनमेंते शिवउड्डीश अर्थात् दत्तात्रेयतंत्र छपकर प्रकाशित हो चुका है और भैरवउडीशकी खोज की जाती है और रावणउड्डीश स

यह आपके करतलमें है तथा मेघनादकत उड्डीशतंत्रमें
सम्पूर्ण प्रयोग राक्षसी प्रकारसे वर्णन किये गये हैं जो
मनुष्यधर्मके विरुद्ध है, इस कारण छपनेके योग्य नहीं है,
इस रावणकत उड्डीशका नाम तो सहस्रों पंडितोंको मालूम
होगा परंतु इसके प्रकाश करनेके निमित्त इसकी खोजमें
बहुत दिन व्यतीत हुए, किसी पंडितके पास न प्राप्त होने के
कारण इम ग्रंथके प्रकाश करनेसे हम वंचित रहे, यद्यपि
अनेक ग्राहकोंके मांगनेपर हम इस पुस्तककी खोज
सर्वदा करते रहे और अबतक इस तंत्रकी खोजमें थे
तबतक स्वरोदय विद्या के परमप्रेमी सारस्वतवंश पण वैद्य
दुर्गाप्रसादजी तिनके पुत्र ज्योतिर्वित्पण्डित भैरवप्रसादजी
तिन्होंने अपने फुफेरे भाई पंडित श्यामसुन्दरलाल खैरा-
बाद निवासीसे यह उड्डीशतंत्र प्राप्त करके हमारेको लाकर
दिया, यद्यपि यह प्राचीन लिखा ग्रन्थ अनेकानेक अशु-
दियोंसे पृरित था, तथापि हमने यथाबुद्धि शुद्ध करके
यथोचित भापानुवाइसे विपित कर दिया है इस तंत्र में
.

५
१० पटल है, जो दशमुख रावणने अपने एक एक मुखसे
एक एक पटल वर्णन किया है तहां:-
१ प्रथम पटलमें-मारणप्रयोग वर्णन किया है।
२ द्वितीय पटलमें-अश्वनाशनादि प्रकार वर्णन है ।
३ तृतीय पटलमें-मोहनभयोग वर्णन है।
४ चतुर्थ पटलमें-स्तम्भनप्रयोग वर्णन है।
५पंचम पटलमें-विद्वेषणप्रयोग वर्णन है।
६ पष्ठ पटलमें-उच्चाटनप्रयोग वर्णन है।
७ सप्तम पटलमें-वशीकरणप्रयोग वर्णन है ।
८ अष्टम पटलमें-आकर्षणभयोग वर्णन है।
९ नवम पटलमें यक्षिणीसाधनप्रकार वर्णन है।
१० दशम पटलमें-इन्द्रजालकौतुक तथा शिवायलिविधान
वर्णन है।
इस प्रकार इन दश पदलोंसे विभूषित यह अत्युत्तम
तंत्र तंत्रों में शिरोमणि लंकापतिरावणकी वाणीसे प्रका-
शित पंडितों का शत्रास्त्ररूपयन्थ है, इस ग्रन्थका सम्पूर्ण

हक्क श्रीयुत सेठ गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजीके समर्पण किया गया है इस कारण अन्य किसीको इसके छापनेका अधि- कार नहीं है। वेदवाणांकचन्द्रेन्डे भाद्रे मासि सिते दले ।। तृतीयायां सोमवारे भापारम्भः कृतो मया ॥१॥ समस्त तंत्ररसिकोंका परमहितैषी- पंडित नारायणप्रसाद मुकुन्दरामजी संस्कृतपुस्तकालय-चामरेली और लखीमपुर (अवध) ॥ श्रीः॥ अथ लंकापतिरावणविरचितं उड्डीशतंत्रम्। भाषाटीकासहित। मंगलाचरणम् । यस्येश्वरस्य विमलं चरणारविन्दं संसेव्यते विबु- घसिद्धमधुव्रतेन ॥ निर्माणशातकगुणाएकवर्ग- पूर्ण तं शङ्करं सकलदुःखहरं नमामि ॥१॥ अर्थ-जिस ईश्वरके निर्मल चरणकमलाको सम्पूर्ण देवता और सिद्धगण मधुकररूपसे सेवन करते हैं तथा जो सम्पूर्ण जगतके उत्पत्ति, पालन, प्रलय करनेहारे और अ- टांगयोग, चारों वर्ग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) इन करके परीपूर्ण है. तिन सम्पूर्ण दुःखोंके नाश करनेहारे शंकरजी- को नमस्कार करता हूं ॥ १ ॥ , उड्डीशतंत्रम् । ग्रंथारंभः। उड्डीशेन समाकीर्णे योगिवृन्दसमाकुले ॥ प्रणम्य शिरसा देवी गौरी पृच्छति शंकरम् ॥ १॥ ईश्वर श्रोतुमिच्छामि लोकनाथ जगत्पते ॥ प्रसादं कुरु देवेश ब्रूहि कामार्थसाधनम् ॥ २ ॥ अर्थ-योगियोंके समूहमें बैठे हुए श्रीशिवजीको शि- रसा प्रणाम करके श्रीपार्वतीजी जगतका कल्याण करने- वाले महादेवको पूछती है।॥ १॥ हे ईश्वर लोकनाथ जगत्के स्वामी ! हम सुननेकी इच्छा करती हैं, सो हे देवेश! प्रसन्न होकर सम्पूर्ण कामना तथा अर्थसाधन वर्णन करो ॥ २॥ ईश्वर उवाच ॥ शृणु तत्वं वरारोहे सिद्धयर्थयत्प्र- यच्छति ॥ तददिष्यामि देवेशि सर्वं यत्समुदा- हृतम्॥३॥देवि प्रयोगमंत्रैश्च रिपुं हन्यान्न संशयः ॥ उड्डीशाख्यमिदं तंत्रं कथयामि सुभक्तितः॥४॥ अर्थ-श्रीशिवजी कहते हैं-हे वरारोहे (पार्वति )! तुम सुनो सिद्धिके अर्थ जो कुछ वर्णन किया गया है. सो

भाषाटीकासहितम् ।
हे देवेशि ! सम्पूर्ण प्रयोग वर्णन करूंगा ॥ ३ ॥ हे देवि ।
इसमें कहे हुए प्रयोग तथा मंत्रोंसे निःसन्देह शत्रुका नाश
हो जाता है, यह उड्डीशनामका तंत्र हम तुह्मारी भक्तिसे
वर्णन करते हैं ॥४॥
वक्ष्ये मयोद्भवान्योगान्सर्वशत्रुविनाशकान् ॥
यैस्तु प्रयोजितैः सद्यः प्राणान् हंति न संशयः॥५॥
भूतानां कर्षणं चादौ द्वितीयोन्मादनं तथा ।।
विद्वेषणं तृतीयं च चतुर्थोच्चाटनं तथा ॥६॥
अर्थ-श्रीशिवजी बोले कि हम करके उत्पन्न प्रयोग
सम्पूर्ण शत्रुऑको नाश करनेवाले कहूंगा, जिन प्रयोगोंके
करनेसे शीघ निःसन्देह शत्रुओंका नाश होवे है ॥ ५ ॥
उनमेंसे प्रथम भूतकर्पण, दूसरे उन्मादन, तीसरे विद्वेषण,
चौथे उच्चाटन ॥ ६॥
ग्रामस्योचाटनं पंच जलस्तंभं च पष्टकम् ।।
स्तंभनं सप्तमं चैव वशीकरणमष्टमम् ॥७॥

१० उड्डीशतंत्रम् । अन्यानपि प्रयोगांश्च बहून् शृणु वरानने ॥ शिवेन कथिता योगा उड्डीशे शास्त्रनिश्चये ॥८॥ अर्थ-पांचवें ग्रामका उच्चाटन, छठे जलका संजन, सातवें स्तंभन, आठवें वशीकरण ॥ ७ ॥ अन्यमी बहुतसे प्रयोग मुझ शिव करके कहे भये उड्डीशनामक निश्चय शा- खमें हैं सो हे वरानने (पार्वति) | श्रवण करो ॥ ८॥ अधीकरणं मूककरणं गात्रसंकोचनं तथा ॥ बधिरीलूककरणं भूतज्वरकर तथा ।। ९ ॥ मेघानां स्तंभनं चैव दध्यादिकविनाशनम् ॥ मत्तोन्मत्तकरं चैव गजवाजिप्रकोपनम् ॥ १० ॥ आकर्पणं भुजंगानां मानवानां तथैव च ।। सस्यादिनाशनं चैव परग्रामप्रवेशनम् ॥ ११ ॥ अर्थ-अंधीकरण, मूककरण,गात्रसंकोचन, बधिरीक- रण, लूककरण तथा भृतज्वरकरण ॥९॥ मेघशंका स्तंभन, दधिआदिपदार्थोंका विनाश, मत्त तथा उन्मत्तकरण, हाथी घोडेका प्रकोपन ॥ १० ॥ सपोंका आकर्षण तथा मनु-

भाषाटीकासहितम् ।
प्योंका आकर्षण, सस्पादिका नाशन और सस्य (धान्य)
आदिका नाशन व पराये पुरमें प्रवेश करना ॥ ११ ॥
वेतालादिकसिद्धिं च पादुकांजनसिद्धयः॥
अन्यान्वहस्तथा रोगान् विद्यामंत्रांस्तथापरम् १२
औपधं च तथा गुप्त कार्य वक्ष्यामि यत्नतः ॥
गुप्ता गुप्ततरा कार्या रक्षितच्या प्रयत्नतः॥१३॥
उड्डीशं यो न जानाति स रुटः किं करिष्यति ॥
मेरुं चालयते स्थानात्सागरं वयेन्महीम् ॥१४॥
अर्थ-बेताल आदिकी सिद्धि और पादुका व अंजन-
सिद्धि, अन्यत्ती बहुत प्रयोग तथा रौदविद्या ॥ १२ ॥
तथा गुप्त औषधियोंको यत्नपूर्वक कहूंगा, गुप्तसे गुप्त इस
विद्याको गुप्त करे और यनसे रक्षा करे ॥ १३ ॥ जो
मनुष्य उड्डीशतंत्रको नहीं जानता है सो क्रोध करके क्या
कर सकेगा, जिस तंत्रके बलसे स्थानसे मेरुको चलाय देवे
और समुद्रको पृथिवीमें लय कर देवे ॥ १४ ॥

उड्डीशतंत्रम् । अकुलीनोऽधमोबुद्धिर्भक्तिहीनः क्षुधान्वितः॥ मोहितः शंकितश्चापि निन्दकश्च विशेषतः ॥१६॥ अभक्ताय न दातव्यं तंत्रशास्त्रमनुत्तमम् ॥ ततैस्सह संयोगे कार्य नोड्डीशकीध्रुवम् ॥ १६ ।। क्रियाभेदं च कुर्वीत किमत्र बहुभाषिते ॥ १७ ॥ अर्थ-जो अकुलीन हो तथा जिसकी बुद्धि अधम हो, भक्तिहीन, शुधायुक्त, मोह तथा शंकासे युक्त हो व निन्दक हो ॥ १५॥ और आत इन सबके अर्थ यह तंत्रविद्या नहीं देनी तथा इनके साथ निश्चय करके उड्डी- शतंत्र में लिखित विधियुक्त ॥ १६ ॥ क्रियाको नहीं कर- ना, यहां अधिक और क्या कहा जाय ॥ १७ ॥ यदि रक्षेत्सिदिमेतामात्मानं च तथैव च ॥ सुपुरुपाय दातव्यं देवतागुरुभक्तये ॥१८॥ तपस्विवालवृद्धानां तथा चैवोपकारिणाम् ॥ निश्चये सुमति प्राप्य यथोक्तं भापितानि च।।१९।। अर्थ-जो इस तंत्रमिद्धि तथा अपने आत्माकी रक्षा भापाटीकासहितम् । करना चाहे तो सज्जन, देवता व गुरुभक्तके अर्थ यह तंत्र विद्या देवे ॥ १८॥ और तपस्वी, बाल (विद्यार्थी ), वृद्ध तथा उपकारी जनोंको तथा जिनकी तंत्रविद्यामें सु- न्दर मति व तंत्र में जिनका निश्चय यथार्थ भापण करने- वाले हैं उनको यह विद्या देना ॥ १९॥ न तिथिर्न च नक्षत्रं नियमो नास्ति वासरः ।। न व्रतं नियम होमं कालवेलाविवर्जितम् ॥ २० ॥ केवलं तंत्रमात्रेण ह्यौपधी सिद्धिरूपिणी ॥ यस्य साधनमात्रेण क्षणात्सिद्धिश्च जायते ॥२१॥ अर्थ-इस तंत्रमें लिखित प्रयोगोंके करनेमें न तिथि, न नक्षत्र, न वारका नियम है तथा न व्रतका नियम, न हवनका नियम है और समय आदिका नियमभी नहीं है ॥२०॥ केवल तंत्रमानसे सम्पूर्ण औषधी सिद्धस्वरूपिणी है, जिसके साधनमानसे क्षणमें सिद्धि होती है ॥ २१ ॥ मारणं मोहनं स्तंभं विद्वेपोचाटनं वशम् ।। एषां सिद्धिं प्रयच्छामि पार्वति शृणु यत्नतः २२॥ " -

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उड्डीशतंत्रम् ।
शशिहीना यथा रात्री रविहीनं यथा दिनम् ॥
नृपहीनं यथा राज्यं गुरुहीनं न मंत्रकम् ॥ २३ ॥
अर्थ-मारण, मोहन, स्तम्मन, विदेपण, उच्चाटन,
वशीकरण इन ६ प्रयोगोंकी सिद्धिको वर्णन करूंगा सो
हे पार्वति! सावधान हो श्रवण करो ॥ २२ ॥ जैसे चंद्रमा
विना रात्री, सूर्य विना जैसे दिन, राजा विना जैसे राज्य
तैसेही गुरु विना मंत्रसिद्धि नहीं होती ॥ २३ ॥
इन्द्रस्य च यथा वजे पाशं च वरुणस्य च ॥
यमस्य च यथा दंडं वह्नश्शक्तिर्यथा दहेत् ॥२४॥
तथैवते महायोगाः प्रयोज्योधमकमणे ।।
सूर्य प्रपातयेद्भूमौ नेदं मिथ्या भविष्यति ॥२६॥
अर्थ-जैसे इन्द्रका वन्न वरुणकी फसरी जैसे यमका
दंड तथा अमिकी शक्ति दाह करनेकी है ॥ २४ इसी
प्रकार पटप्रयोगोंमें यह तंत्र शीब सिद्धिके अर्थ प्रयोजिन
करे इसके बलसे सूर्यको पृथिवीपर गिराय देवे यह मिथ्या
नहीं है ॥ २५॥

भापाटीकासहितम् । अपकारेषु दुरेषु पापिष्ठेषु जनेषु च ॥ प्रयोगैर्हन्यमानेषु दोपो नैव प्रजायते ॥२६॥ योजयेदनिमित्तं य आत्मघातीन संशयः॥ असन्तुष्टः प्रयोगो यः शास्त्रमतन्न सिद्धिदम् ॥२७॥ अर्थ-अपकार करनेवाले तथा दुष्ट, पापी मनुष्योपर मारणादि प्रयोग करनेसे दोष नहीं होता है ॥ २६ ॥परंतु जो मनुष्य निष्पयोजन प्रयोग करता है वह आत्मघाती जानना, जो असन्तोषी होकर प्रयोग करता है उसको यह तंत्रशास्त्र सिद्धिका देनेवाला नहीं होता है ।। २७ ॥ अथ मारणम् ।। ईश्वर उवाच ॥ अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रयोग मारणाभिधम्॥ सद्यसिद्धिकरं नृणां पार्वति शृणु यनतः ॥२८॥ मारणं न वृथा कार्य यस्य कस्य कदाचन ॥ प्राणांतसंकटे जाते कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥२९॥ अर्थ-अब मारणप्रयोग लिखते हैं-श्रीशिवजी कहते हैं, कि अब हम मारणप्रयोगको प्रथम वर्णन करेंगे सोहे उड्डीशतंत्रम् । गौरि ! शीघ्र सिद्धि करनेवाले मनुष्योंको हितकर प्रयोग सावधान होकर श्रवण करो ॥ २८ ॥ यह मारणप्रयोग वृथा नहीं करना अर्थात् जिस किसीपर सहसा यह प्रयोग करना योग्य नहीं, प्राणांत संकट होनेपर अपने कल्याणकी इच्छासे मारणप्रयोग करना योग्य है ॥ २९ ॥ ब्रह्मात्मानं तु विततं दृष्ट्वा विज्ञानचक्षुपा ॥ सर्वत्र मारणं कार्यमन्यथा दोपभाग्भवेत् ॥३०॥ मूखेण तु कृते तंत्रे स्वस्मिन्नेव समापयेत् ॥ तस्माद्रक्ष्यं सदात्मानं मारणं न कचिच्चरेत्॥३१॥ कर्तव्यं मारणं चेत्स्यात्तदा कृत्यं समाचरेत् ॥ अर्थ-जब ब्रह्मज्ञानी पुरुष अपने ज्ञाननेत्रोंसे सर्वत्र ब्रह्मही व्याप्त हो रहा है ऐसा दीखता है, तब कोई अत्यंत आवश्यक कार्यार्थ किया जाय तो ठीक है, अन्यथा अर्थात् जो ऐसा नहीं जानता उसको महान् दोप प्राप्त होवे है ॥ ३० ॥ मूर्ख मनुष्यने अपनी अज्ञानतासे मारण प्रयोग किया, तो अपनेही ऊपर पड़ता है, इस कारण जो भाषाटीकासहितम् । अपने शरीर चाहे तो मारण प्रयोग कभी नहीं करे॥३१॥ जो कदाचित् मारण करनाही होवे तो इस प्रकारसे करना। मृत्तिकारिपुपादाभ्यां पुत्तली क्रियते नरः ॥ चिताभस्मसमायुक्तं मध्यमारुधिरं तथा ॥३२॥ कृष्णवस्त्रेण संवेश्य कृष्णसूत्रेण बन्धयेत् ॥ कुशासने सुप्तमूर्तिीपंप्रज्वालयेत्ततः ॥३३॥ अयुतं प्रजपेन्मंत्रं पश्चादृष्टोत्तरं शतम् ॥ मंत्रराजप्रभावेण मापांश्वाष्टोत्तरं शतम् ॥३४॥ पुत्तिकामुखमध्ये च निक्षिपेत्सर्वमापकान् ॥ अर्धरात्रिकृते योगे शकतुल्योपि मारयेत् ॥३५॥ प्रातःकाले पुत्तलिकां स्मशानांते विनिःक्षिपेत् ॥ मासकेन प्रयोगेण रिपोमृत्युभविष्यति ॥३६॥ अथ शत्रुमारणमंत्रः। *सर्वकालकसंहाराय अमुकस्य हन हन की हूं फट् भस्मीकुरु स्वाहा ॥ अर्थ-शत्रुके चरणतलोंकी मिट्टी लाकर मनुष्याकार २० उड्डीशतंत्रम् । तथान्यच्च। नरास्थिकीलकं पुप्ये गृह्णीयाचतुरंगुलम् ।। निसनेत्तु गृहे यावत्तावत्तस्य कुलक्षयः ॥४०॥ मंत्रः ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ॥ अयुतजपासिद्धिः ॥ अर्थ-पुप्यनक्षत्रके दिन मनुष्य के हाडकी चार अंगु- लकी कीलको लेके जिसके घरमे दाबकर रखी जावे, जब- तक वह रक्खी रहे तबतक उसका कुलक्षय होता है॥४०॥ ॐ हीं फट् स्वाहा, इस मंत्रका जप दश हजार करना, यह सर्वत्र कम है, कि जिस मंत्रका पुरश्चरण करे उसके जपकी संख्यासे दशांश हवन, तद्दशांश तर्पण, तद्दशारा मार्जन, तद्दशांश ब्राह्मणभोजन यह परमोत्तम कम सिद्धिदायक है। तथाच ॥ ॐ सुरेश्वराय स्वाहा ॥ सास्थ्यगुलमानं तु चाश्लेपायां रिपोहे ।। निखनेच्छतधा जप्तं मारयोरेपुसन्ततिम् ॥ ११ ॥ अर्थ-ॐ सुरेश्वराय स्वाहा, इम मंत्रसे सर्पके हाइकी भापाटीकासहितम् । कील एक अंगुलमात्र लेके आश्लेपानक्षत्रमें एक सौ आठ वार मंत्रसे अभिमंत्रित करके शत्रुके घरमें रखनेसे शत्रुकी सन्ततिका नाश होवे है ॥ ४१ ॥ अश्वास्थिकीलमश्चिन्यां निखतेचतुरंगुलम् ।। शत्रुगृहे निहन्त्याशु कुटुम्बवैरिणां कुलम् ॥४२॥ मंत्रस्तु ।। हुं हुं फट् स्वाहा ॥ सप्ताभिमंत्रितं कृत्वा निखनेत् ॥ अर्थ-घोडेके हाडकी कील चार अंगुल अश्विनीन- क्षत्रमें लेकर शत्रुके घरमें दावकर रख देवे तो शीघ्र शत्रु- ओंका कुल नाशको प्राप्त होता है ॥ हुँ हुं फट् स्वाहा, इस मंत्रसे सात पार अभिमंत्रित करके कीलको रक्खे ॥४२॥ आर्द्रायां निम्बवन्दाकं शवोः शयनमन्दिरे । निखनेन्मृतवच्छत्रुरुद्धृते च पुनः सुखी ॥१३॥ तथा शिरीपवन्दाकं पूर्वोक्तनोडुना हरेत् ॥ शत्रोहे स्थापयित्वा रिपो शो भविष्यति॥४४॥ अर्थ-आनक्षत्रमें नींबके वृक्षका बांदा लाकर " २४ उडीशतंत्रम् । दिन लाये, फिर उसको गोमूत्रसे सींचकरके शत्रुकी मूर्ति बनावे ॥ १९ ॥ और निर्जन वनमें नदीके किनारे वेदी बनाकरके उसके ऊपर मूर्तिको स्थापित करे अर्थात् सीधी सुला देवे, अनन्तर अतिदारुण लोहेका त्रिशूल उसकी छातीमें गाड देवे ॥५०॥ और उसके बांई ओर वेदपिर कालौरवको स्थापित करे. प्रतिदिन यथोक्त विधिसे बलि- दान और पूजन करे ॥५१॥ एकादशवटुंस्तत्र परमानेन भोजयेत् ।। अखण्डदीपं तस्याने कटुतैलेनमालयेत् ॥५२ ।। व्याघ्रचर्मासनं कृत्वा निवसेत्तस्य दक्षिणे ।। दक्षिणाभिमुखो रात्रौ जपेन्मंत्रमतन्द्रितः ॥५३॥ अर्थ-अनन्तर ११ बालक ब्राह्मणोंके वहाँपर श्रेष्ठ अन्न (क्षीरान, खीर) से कुमारोंको भोजन तृतिपर्यन्त करावे, भैरवके आगे सरसोंके तेलका अखण्डदीप जलावे ॥५२॥ और तिस शत्रुकी मृतिक दक्षिण नागमे व्याघां- घरको बिछाय उसपर आप दक्षिण मुख करके बैठे,परन्तु भापाटीकासहितम् । २५ रात्रिसमय यह प्रयोग करना श्रेष्ठ है आलस्यको छोडक- र सावधानचित्त होके मंत्रका जप करे ॥ ५३ ॥ अथ मंत्रः ॥ ॐ नमो भगवते महाकालभैरवाय कालानितेजसे अमुकं मे शर्ड मारय २ पोथय २ हुं फट् स्वाहा।। अयुतं प्रजपेदेनं मंत्रं निशि समा- हितः॥ एकोनविंशदिवसारणं जायते ध्रुवम् ॥५४ अर्थ-ॐ नमो भगवते इत्यादि मंत्रका जप दश हजार करे सावधान होकर रात्रिसमय यह उपाय करे, इस प्रकार२९ दिन प्रयोग करनेसे निश्चय मृत्यु होवे है।५४॥ तथाच आईपटीविद्या॥ रहस्यातिरहस्यं च कौतुकं कथितं शृणु। आईपटेश्वरीविद्या कथिते शनिग्रहे ॥ अथ मंत्रः॥ की नमो भगवति आईपटेश्वरि हरितनीलपटे कालि आर्द्रजिह्वे चांडालिनि रुद्राणि कपालिनि ज्वालामुखि सप्तजिह्वे सहस्रनयने एहि एहि

२६
उड्डीशतंत्रम् ।
अमुकं ते पशुं ददामि अमुकस्य जीव निकृन्तय
एहि तजीवितापहारिणी हुं फट् भूर्भुवः स्वः फट्
रुधिरादिवसाखादिनि मम शत्रून् छेदय छेदय
शोणितं पिब २ हु फट् स्वाहा ॥
ॐ अस्य श्रीआईपटीमहाविद्यामंत्रस्य दुर्वासा
ऋपिर्गायत्री छन्दः हुं बीजं स्वाहा शक्तिः ममा-
मुकशउनिग्रहकाम्यार्थे जपे विनियोगः ॥
केवलं जपमात्रेण मासान्ते शत्रुमारणम् ॥
ततः कृष्णाएमी यावत् तावत्कृष्णचतुर्दशी॥१५॥
शतनामसमायुक्तं तावत्कालं जपेन्मनुम् ॥
मृत्तिकारिपुपादेन पुत्तलिकां क्रियते नरः ॥
अजापुत्रवलिं दत्त्वा तद्रते वस्त्रं संलिपेत् ॥५६॥
तद्वस्त्रं गृहीत्वा पुत्तलिकोपरि निध्यात् मंत्र
जपेत्,यावदनं शुष्यति तावच्छचर्यमालयं -
जति ।। मंत्रराजप्रभावेनात्र कार्या विचारणा॥
यमालये व्रजेच्छचर्मुकुन्दसदृशोपि वा ॥१७॥

२७ 1 भापादीकासहितम् । अर्थ-अब मारणप्रयोग विषयमें आईपटी विद्या वर्णन करते हैं हे पार्वति । गुप्तसे गुप्त कौतुक कहते हैं सो श्रवण करो, यह आईपटेश्वरीविद्या शत्रुनाशार्थ वर्णन करी गई ॐ नमो भगवति आईपटेश्वरि इत्यादि मंत्र है इस मंत्रका केवल जप मात्र करनेसे एक महीनेमें शत्रुमरण होवे है अर्थात् एक मासपर्यन्त नित्य १०८ मंत्र जपे, अनन्तर रुष्णपक्षकी अष्टमीसे लेके कृष्णचतु- दशीपर्यन्त ।। ५५ ॥ शत्रुके नामसहित सावधान मन हो- कर मंत्रको जपे १०८ मंत्र नित्य जपे, अंतदिवसमें यह विधि करे,सो क्या कि, शत्रुके चरणतलकी मृनिका लेक- र शत्रुकी पूतलिका बनाये, नीलवस्त्रसे लपेटकर मंत्रपूर्वक प्राणप्रतिष्ठा कर, कालीका पूजन करके, बकरेका बलि- दान करके उसके रक्तमें वस्त्रको भिगोय लेवे ॥५६॥ फिर उस वस्त्रको पूतलीके ऊपर उढाय मंत्रका जप करे, जबतक वह वस्व सूखे तबतक शत्रुका माण यमपुरको गमन करे है इस आईपटेश्वरी विद्यामंत्रके प्रभावसे मुकुन्द , उड्डीशतंत्रम् । (कृष्ण) के समाननी शत्रु होवे लोभी यमालयको जाता है, इसमें सन्देह नहीं करना यह प्रयोग सत्यही है ॥५७॥ अथ पैरिमारण (काली) कवचम् ॥ देव्युवाच ॥ भगवन्सर्वदेवेश देवानां भोगद प्रभो ॥ प्रवहि मे महादेव गोप्यं यद्यपि च प्रभो ॥५८ ॥ शत्रूणां येन नाशः स्यात् आत्मनो रक्षणं भवेत् ॥ परमैश्वर्यमतुलं लभेदनहितं बद ।। ५९ ।। ईश्वर उवाच-पक्ष्यामिते महादेवि सर्वधर्मविदांवरे।। अद्भुतं कवचं देव्याः सर्वकामप्रसाधकम् ॥६॥ विशेषतः शत्रुनाशमात्मरक्षाकरं नृणाम् ॥ सर्वारिष्टप्रशमनं व्यभिचारविनाशनम् ॥ ६ ॥ सुखदं भोगदं चैव वशीकरणमुत्तमम् ॥ शरसंघाः क्षयं यान्ति भवन्ति व्याधिपीडिताः६२ दुःखिनो ज्वरिताश्चैव स्वाभीष्टप्रच्युतास्तथा ।। तदने कथयिष्यामि पार्वति शृणु यत्नतः ॥६३ ।। अर्थ-अब वैरीमारण (काली) कवच लिखते हैं, भाषाटीकासहितम् । श्रीपार्वतीजी साक्षात् शिवजीसे प्रश्न करती है, कि हे भग- वन् ! सर्वदेवेश! देवताओंको भोग देनेवाले प्रभो हे महादेव । यद्यपि छिपानेके योग्य प्रयोग हैं तथापि हमारेसे आप वर्णन करो ॥५०॥ जिस प्रयोगसे शत्रुगणोंका नाश होवे और अपने आत्माकी रक्षा होवे तथा महान ऐश्वर्य अतुल भोग प्राप्त होवे सो आप हमारे हित वर्णन करो ॥ ५९॥ श्रीशिवजी घोले हे महादेवि ! सब धौंको जाननेवाली कालीदेवीका सम्पूर्ण कामनाओंका साधन करनेवाला अद्भुत कवच मैं तुमारेसे वर्णन करता हूं ॥ ६० ॥ इसके प्रभावसे विशेष करके शत्रुका नाश होता है तथा यह कवच मनुष्योंके आत्माकी रक्षा करता है. और सम्पूर्ण अरिटको नाश करता तथा व्यभिचारको नाश करता है ॥ ६१ ॥ सुख देनेवाला, भोग देनेवाला, उत्तम वशीकरणरूप यह कवच है, जिससे शत्रुगण नाश होते हैं और व्याधि ( रोग) से पीडित होते हैं ॥ ६२ ॥ . ज्वरसे दुःखी और अपने मनोरथसे रहित होते हैं सो भापाटीकासहितम् । पृथिवपिर छोड देना, इस कालिकाकवचका भैरव ऋपि, गायत्री छन्द, कालिका देवता, शीच शत्रुनाशनार्थ विनि- योग करना, अनंतर श्रीकालीजीका ध्यान इस प्रकार करके कि तीन नेत्रोंवाली तथा बहुत विकटरूपयाली, चार भुजावाली, चंचल तथा तृष्णायुक्त जिह्वावाली तथा पूर्ण चन्द्रमाके समान मुखवाली १६४॥ नील कमल- के समान श्यामवर्णवाली सम्पूर्ण शत्रुओंको नाश करने- वाली, चारों भुजाओं से एक हाथमें मनुष्यका मुण्ड, दूसरे हाथमें खड्ग, तीसरेमें कमल, चौथे हाथमें वरदको धारण करनेवाली ॥ ६५ ॥ रक्तवस्त्रोंको धारण करने- पाली तथा घोर दाढवाली, अट्टाहास करनेवाली, सदैव दिशारूप वस्त्रोंकोसी धारनेवाली ॥ ६६ ॥ शव (मुर्दा) के आसनपर स्थित, मुण्डोंकी मालासे विभूपित इस प्रकार महाकाली देवीका ध्यान करके फिर कवच पढे । ६७ ॥ ॐ कालिका घोररूपान्या सर्वकामप्रदा शुभा ।। सर्वदेवस्तुता देवी शत्रुनाशं करोतु मे ६८॥

३२ उड्डीशतंत्रम् । होहीस्वरूपिणी चैव ह्रींहीसंगिनी तथा । हाहीशीस्वरूपा सा सर्वदा शत्रुनाशिनी ॥६९॥ श्रीहीऐरूपिणी देवी भवबन्धविमोचनी ।। यथा शुंभो हतो दैत्यो निशुंभश्च महासुरः॥७०॥ वैरिनाशाय वन्दे तां कालिकां शंकरप्रियाम् ।। ब्राह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नरसिंहिका ॥७॥ कौमारी श्रीश्च चामुण्डा खादयन्तु मम द्विपान् ।। सुरेश्वरी घोररूपा चण्डमुण्डविनाशिनी ॥७२॥ मुण्डमालावृतांगी च सर्वतः पातु मां सदा ।। हीहीकालिके घोरदंष्ट्रे रुधिरप्रिये रुधिरपूर्णवक्के च रुधिरावितस्तिनि मम शत्रून्सादय खादय हिंसय हिंसय मारय मारय भिधि भिधि छिंधि गिधि उच्चाटय उच्चाटय द्रावय द्रावय शोपय शोपय यातुधानी चामुण्डे हाहीवाची कालि- काय सर्वशत्रून् समर्पयामि स्वाहा ॐ जहे २ किटि २ किरि २ कटु २ मर्दय २ मोहय २ भापाटीकासहितम् । हर २ मम रिपून ध्वंसय २ भक्षय २त्रोटय ३ यातुधानिका चामुण्डा सर्वजनान् राजपुरुपान राजश्रियं देहि देहि नूतनु नूतनु धान्यं जक्षया॥२॥ क्षांक्षीभुशीक्षः स्वाहा ॥ इति कवचम् ॥ यह कवच समाप्त भया, अब फल लिखते हैं । इत्येतत्कवचं दिव्यं कथितं तव सुन्दरि ।। ये पठति सदा भक्त्या तेपांनश्यति शत्रवः॥१॥ वैरिणः प्रलयं यांति व्याधिताश्च भवन्ति हि ॥ धनहीनाः पुत्रहीनाः शत्रवस्तस्य सर्वदा ॥२॥ सहस्रपठनात्सिद्धिः कवचस्य भवेत्तथा ॥ ततः कार्याणि सिद्धयन्ति तथा शंकरभाषितम्॥३ स्मशानागारमादाय चूर्ण कृत्वा प्रयत्नतः ।। पादोदकेन पिट्वा च लिखेल्लोहशलाकया ॥४॥ भूमौ शत्रून हीनरूपान् उत्तराशिरसस्तथा ॥ हस्तं दत्त्वा तद्भुदये कवचं तु स्वयं पठेत् ॥ ५ ॥ २ ३२ उड्डीशतंत्रम् । ह्रींहीस्वरूपिणी चैव ह्रींहीहसंगिनी तथा ॥ हाहीक्षिीस्वरूपा सा सर्वदा शत्रुनाशिनी ॥६९॥ श्रीहीऐरूपिणी देवी भवबन्धविमोचनी॥ यथा शुंभो हतो दैत्यो निशुंभश्च महासुरः।।७०॥ वैरिनाशाय वन्दे तां कालिकां शंकरप्रियाम् ।। ब्राह्मी शैवी वैष्णवी च वाराही नरसिंहिका ॥७॥ कौमारी श्रीश्च चामुण्डा खादयन्तु मम द्विपान् ॥ सुरेश्वरी घोररूपा चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ ७२ ।। मुण्डमालावृतांगी च सर्वतः पातु मां सदा ॥ हीहीकालिके घोरदंष्ट्रे रुधिरप्रिये रुधिरपूर्णवके च रुधिरावितस्तिनि मम शत्रून्सादय खादय हिंसय हिंसय मारय मारय भिधि भिंधि छिधि छिराधि उच्चाटय उच्चाटय द्रावय द्रावय शोपय शोपय यातुधानी चामुण्डे हाहीवांवी कालि- काय सर्वशत्रून् समर्पयामि स्वाहा ॐ जहे २ किटि २ किरि २ कटु २ मर्दय २ मोहय २ भापाटीकासहितम् । ३३ हर २ मम रिपून् ध्वंसय २ भक्षय २ चोटय ३ यातुधानिका चामुण्डा सर्वजनान् राजपुरुपान् राजश्रियं देहि देहि नूतनु नूतनु धान्यं जक्षय॥२॥ क्षांक्षीखूशौक्षः स्वाहा ।। इति कवचम् ॥ यह कवच समाप्त भया, अब फल लिखते हैं । इत्येतत्कवचं दिव्यं कथितं तव सुन्दरि ॥ ये पठति सदा भक्त्या तेषां नश्यति शत्रवः ॥१॥ वैरिणः प्रलयं यांति व्याधिताश्च भवन्ति हि॥ धनहीनाः पुत्रहीनाः शत्रवस्तस्य सर्वदा ॥२॥ सहस्रपठनासिद्धिः कवचस्य भवेत्तथा। ततः कार्याणि सिद्धयन्ति तथा शंकरभापित्तम्॥३ स्मशानांगारमादाय चूर्ण कृत्वा प्रयत्नतः ।। पादोदकेन पिष्ट्वा च लिखेल्लोहशलाकया ॥४॥ भूमौ शत्रून हीनरूपान् उत्तराशिरसस्तथा ।। हस्तं दत्त्वा तद्धदये कवचं तु स्वयं पठेत् ॥६॥ २ ३४ उड्डीशतंत्रम् । प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा वै तथा मंत्रेण मंत्रवित् ॥ हन्यादत्रप्रहारेण शत्रोश्च कण्ठमक्षयम् ॥ ६॥ ज्वलदंगारलेपेन भवति ज्वरितो भृशम् ॥ प्रोक्षणैर्वामपादेन दरिद्रो भवति ध्रुवम् ॥ ७ ॥ वैरिनाशकरं प्रोक्तं कवचं वश्यकारकम् ॥ परमैश्वर्य्यदं चैव पुत्रपौत्रादिवृद्धिदम् ॥ ८॥ प्रभातसमये चैव पूजाकाले प्रयत्नतः॥ सायंकाले तथा पाठात् सर्वसिद्धिर्भवेद्धवम् ॥ ९ ॥ शउरुचाटनं याति देशादै विच्युतो भवेत् ॥ पश्चात्किकरतामेति सत्यं सत्यं न संशयः ॥ १०॥ शत्रुनाशकरं देवि सर्वसंपत्करं शुभम् ॥ सर्वदेवस्तुते देवि कालिके त्वां नमाम्यहम् ॥११॥ इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीशतंत्रे पार्वती- श्वरसंवादे मारणप्रयोगो नाम प्रथमः पटलः ॥१॥ अर्थ-श्रीशिवजी कहते हैं, हे सुन्दरि ! यह दिव्य भापाटीकासहितम् । कवच हमने तुमसे कहा; जे सदैव भक्तिपूर्वक पढते हैं उनके शत्रु नाश हो जाते हैं ॥ १ ॥ तथा सब शत्रुगण रोगसे पीडित होकर नाश हो जाये तथा उन शत्रुओंके धन व पुत्रनाश होवे ॥ २ ॥ तथा इस कवचके सहन पाठसे सिद्धि होती है, सम्पूर्ण कार्य सिद्धि होते हैं यह शंकरजीने कहा है ॥ ३ ॥ चितामें जाकर स्मशानका कोयला लाकर उसको पीसे चरणोंके जलसे पीसकर लोहेकी कीलसे लिखे ॥ ४॥ फिर पृथिवीपर शत्रुकी मूर्ति बनाय लोहेकी कीलस्वरूपको काटकर उत्तरमुख सुलाय देवे फिर उसके हृदयपर अपना हाथ धरकर कवचको पढे ॥ ५॥ तथा मंत्रसे प्राणप्रतिष्ठा मंत्रज्ञजन करे फिर शस्त्रप्रहारसे शत्रुका शिर काट डाले ॥ ६ ॥ जलते हुए अंगारके लेपसे शत्रु ज्यरपीडित हो जाये, वाम- पादके प्रोक्षणसे निश्चय दरिद्री होवे ॥ ७ ॥ यह वैरिनाश करनेवाला तथा वश करनेवाला कवच कहा, महान् ऐश्वर्य देनेपाला पुत्रौत्रादि वृद्धि करनेवाला है ॥ ८॥ , उड्डीशतंत्रम् । प्रातः समयमें पूजाकालमें तथा सायंकालसमय सावधान- तापूर्वक पढनेसे निश्चय संपूर्ण सिद्धि होती है ॥ ९ ॥ शत्रुका उच्चाट होता है देशसे निकल जाता है अथवा पीछेसे सेवक बन जाता है, सत्य है इसमें कुछ संशय नहीं ॥ १० ॥ हे देवि । सव शत्रुओंके नाश करनेवाली सम्पूर्ण सम्पत्तिको करनेवाली, सम्पूर्ण देवताओं करके स्तुति करी जाती है ऐसी जो तुम कालिकादेवी हो साहि मैं नमस्कार करता हूं ॥ ११ ॥ इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीगतंत्रे पापायां पार्वती- श्वरसंवादे मारणप्रयोगो नाम प्रथमः पटलः ॥१॥ अथ द्वितीयः पटलः ॥२॥ ॥ तत्रादौ अश्वमारणम् ॥ कृष्णजीरकचूर्णेन अंजिताधो न पश्यति ॥ तण क्षालयेच्चक्षुः सुस्थो भवति घोटकः ।। १॥

भापाटीकासहितम् । प्राणे च्छुच्छुन्दरीचूर्ण दत्ते पतति घोटकः ॥ सुस्थश्चन्दनपानेन नासायां तु न संशयः ॥ २ ॥ अश्वास्थिकीलमश्चिन्यां कुर्यात्सप्तांगुलं पुनः ।। निखनेदश्वशालायां मारयत्येव घोटकान् ॥३॥ ॐ पच पच स्वाहा ॥ इति मंत्रः॥ अर्थ-अब दूसरा पटल लिखते हैं काले जीरेका चर्ण कर उसके अंजनसे घोडेको दीख नहीं पड़ता है, अर्थात् घोडा अंधा हो जाता है, फिर मठासे नेत्र धोये जानेसे नेत्र अच्छे हो जाते हैं ॥ १ ॥ मरी हुई छुछंद- रिको सुखाय चूर्ण करके उसकी सुगंधि देनेसे घोडा तुरत गिर जाता है, फिर जलमें चन्दन घिसकर नासिका- द्वारा पान करानेसे निस्सन्देह अच्छा हो जाता है ॥ २ ॥ घोडेके हाडकी कीलको लेके अश्विनीनक्षत्रमें सात अंगुलकी घोडशालामें गाड देवे तो वहांके घोडोको मारे है ।। ३ ।। ॐ पच पच स्वाहा ॥ यह मंत्र पढकर कील गाडे, प्रथम १०००० मंत्र जपकर सिद्ध कर लेवे ॥ , उड्डीशतंत्रम् । ॥धीवरस्य मत्स्यनाशनम् संग्राह्यं पूर्वफाल्गुन्यां बदरीकाष्ठकीलकम् ॥ अष्टांगुलं च निसनन्नाशयद्धीवरे गृहे ॥४॥ मंत्रः॥ॐ॥ जले पच पच स्वाहा ।। इत्यनेन मंत्रेण ।। अयुतजपासिद्धिः । अर्थ-अब धीवरकी मछलियोंके नाश होनेका प्रकार वर्णन करते हैं पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें बेरीकी लकडीकी कीलको लाकर आठ अंगल प्रमाण धीवरके घरमें गाड देनेसे उसकी मछलियोंका नाश हो जाता है ॥ ४ ॥ मंत्र यह है, ॐ जले पच पच स्वाहा । इस मंत्रसे कीलको गाडे, प्रथम दस हजार जप कर सिद्धि कर लेवे ॥ ॥रजकस्य वस्त्रनाशनम् ॥ ग्राहयेत्पूर्वफाल्गुन्या जातीकाष्ठस्य कीलकम् ॥ अष्टांगुलप्रमाणं तु निखन्याद्रजके गृहे ॥६॥ शताभिमंत्रितं तेन तस्य वस्त्राणि नाशयेत् ॥ ॐ कुंभं स्वाहा॥

भापाटीकासहितम् ।
अर्थ-पूर्वाफाल्गुनीनक्षत्र में आठ अंगुलप्रमाण चमेलीके
काठकी कीलको लेकर धोबीके घरमें गाड देवे॥५॥सौवार
मंत्रसे अभिमंत्रित करके गाडे तो उसके बवोंका नाश हो
जावे ।। ॐ कुम्भ स्वाहा ॥ इस मंत्रसे अभिमंत्रित करे।
॥ तेलनाशनम् ॥
मधुकाप्टस्य कीलं तु चित्रायां चतुरंगुलम् ॥
निखनेतैलशालायां तैलं तत्र विनश्यति ॥६॥
ॐ दह दह स्वाहा, इत्यनेन मंत्रण
सहस्रसंख्याकजपः॥
अर्थ-मौरेठीकी लकडीकी कील चार अंगुलप्रमाण
चित्रानक्षत्र में लेकर तेलकी शालामें गाड देवे तो तेलका
नाश हो जाता है ।। ६ ॥ ॐ दह दह स्वाहा ।। इस मंत्रका
एक हजार जप करनेसे प्रथम मंत्रको सिद्धि कर लेवे ।।
शाकनाशनम् ॥
गन्धकं चूर्णितं तत्र निक्षिपेजलमिश्रितम् ।।
नश्यन्ति सर्वशाकानि शेपाण्यल्पबलानि च ॥७॥

४० उड्डीशतंत्रम् । अर्थ-जल मिलाय गन्धकके चूर्णको खेतमें छिडक- नेसे सम्पूर्ण शाक नाक हो जाता है अर्थात् सब शाक सूख जाता है ॥ ७ ॥ ॥ दुग्धनाशनम् ॥ निक्षिपेदनुराधायां जम्बुकाष्ठस्य कीलकम् ॥ अष्टांगुलं गोपगेहे गोदुग्धं परिनश्यति ॥८॥ अर्थ-अनुराधानक्षत्रमें जामुनकी लकडीकी आठ अंगुलको कीलको लाकर अहीरके घरमें गाड देनेसे उसकी गौरोंके दूधका नाश हो जाता है ॥८ ॥ ॥ ताम्बूलनाशनम् ॥ नवांगुलं पूगकाष्टकीलकं निक्षिपेनहे ।। तांबूलिकस्य क्षेत्रे वा ऋक्षे शतभिपाऽहये॥९॥ तदा तस्य च ताम्बूलं नाशयत्याशु निश्चितम् १ अर्थ-नी अंगुलप्रमाण सुपारीके काउकी कील शतनिपानक्षत्र में संबोलीके घरमें अथवा उसके खेतमें झापाटीकासहितम् । डाल देनेसे ॥ ९ ॥ तिसके ताम्बूलों ( पानों) का निश्चय नाश हो जाता है ॥ १०॥ मद्यनाशनम् ॥ पोडशांगुलकं कीलं कृत्तिकायां सितार्कजम् ॥ शौण्डिकस्य गृहे क्षिप्त मदिरां नाशयत्यलम् ११॥ अर्थ-कृत्तिकानक्षत्रमें सपेद आंक वृक्षके काटकी सोलह अंगुल प्रमाण कील लाकर कलारके घरमें डालनेसे उसकी मदिराका नाश होता है ॥ ११ ॥ ॥ अथ सस्यनाशनम् ॥ अथ सस्यविनाशं च कथयामि समासतः। येनैव कृतमात्रेण सस्यनाशो भविष्यति ॥ १२ ॥ इन्द्रवत्रं यत्र पतेत् गृहीत्वा तत्र मृत्तिका ॥ तन्मृत्तिकां समादाय वज्रं कृत्वा विचक्षणः ॥१३॥ क्षेत्रे यस्यारोपयेत्तत् तस्मिन् सस्यं विनश्यति ॥ इमं मंत्रं समुच्चार्य वनं क्षेत्रे च रोपणात् ॥ १४॥ अप्टोत्तरशतेनैव मंत्रेणानेन मंत्रयेत् ॥ मंत्रस्त ॥

४२
उड्डीशतंत्रम् ।
ॐ नमो वज्रपाताय सुरपतिराज्ञापयति हुँ
फट् स्वाहा ॥
इति श्रीमदुड्डीशतंत्रे रावणकृते द्वितीयः पटलः॥२॥
अर्थ-अब सस्यनाशन प्रकार कहते हैं जिसके कर-
नेसे सस्यका नाश अवश्य होवेगा ॥ १२ ॥ इन्द्रवज
(बिजली ) जहाँपर गिरे, वहांकी मिट्टी लेकर वन
बनाय लेवे ॥ १३ ॥ फिर उस वजको लेकर जिस
खेतमें खड़ा कर देवे, उस खेतका धान्यनाश हो जावे,
आगे लिखे हुए मंत्रसे वज्रको खडा करे ॥ १४ ॥
मंत्रसे उस वजको १०८ वार अभिमंत्रित कर लेवे ॥
ॐ नमो वज्रपाताय सुरपतिरानापयति हुं फट् स्वाहा ॥
यह मंत्र है ॥
इति श्रीलंकापतिरायणविरचिते उहीशतंत्रे उमाम-
हेश्वरसंवादे भापायां द्वितीयः पटलः ॥ २ ॥

३
भापादीकासहितम् ।
अथ तृतीयः पटलः॥३॥
तब मोहनम् ॥ ईश्वर उवाच॥
अथातस्सम्प्रवक्ष्यामि प्रयोग मोहनाभिधम् ।।
सद्यः सिद्धिकरं नृणां पार्वति शृणु यनतः ॥१॥
सहदेव्या रसेनैव तुलसीवीजचूर्णकम् ॥
खो यस्तिलकं कुर्यान्मोहयेत्सकलं जगत् ॥२॥
अर्थ-अब तीसरे पटलमें मोहनप्रयोग लिखते हैं
श्रीशिवजी बोले अब आगे मोहन नाम प्रयोग वर्णन
करूंगा जो मनुष्योंको शीच सिद्धि करे है. हे पार्वति! साव-
धान होकर श्रवण करो ॥ १॥ सहदेवीके रसमें तुलसांके
बीजका चूर्ण मिलाय रविवारके दिन जो तिलक करे वो
सब जगतको मोहे ॥ २॥
सिंदूरं कुंकुम चैव गोरोचनसमन्वितम् ॥
धात्रीरसेन संपिष्टं तिलक लोकमोहनम् ॥३॥
मनश्शिला च कपूरं पेपयेत्कदलीरसैः॥
तिलकं मोहनं नृणां नान्यथा मम भापितम् ॥ ४॥

उड्डीशतंत्रम् । अर्थ-सेंदुर, केशर, गोरोचन, वह सब लेकर आंव- लोके रसमें पीसकर तिलक करे तो लोक मोहित होवे॥३॥ मैनशिल, कपूरको केलेके रसमें पीसकर तिलक करे तो मनुष्योंको मोहित करे, श्रीशिवजी कहते हैं कि यह हमारा कहा गया सत्य है ॥ ४ ॥ हरितालं चाश्वगन्धा पेपयेत्कदलीरसैः ।। गोरोचनेन संयुक्तं तिलक लोकमोहनम् ॥५॥ शृंगीचन्दनसंयुक्तं वचाकुष्टसमन्वितम् ।। धूपं देहे तथा वस्त्रे मुखे चैव विशेषतः ॥६॥ राजाप्रजापशूपक्षिदर्शनान्मोहकारकम् ॥ गृहीत्वा मूलतांबूलं तिलक लोकमोहनम् ॥ ७ ॥ अर्थ-हरताल, अमगन्ध, गोगेचन इन सबको लेके केलंक रसमें पीसकर तिलक करे तो सब लोक मोहित होवे ॥ ५ ॥ काकरासिंगी, चंदन, वच, कुठ यह सब संयुक्त कर इनकी धृप अपनी देह तथा वन्न व मुखपर देवे ॥ ६ ॥ तो देखनमे राजा, प्रगा, पशु, पक्षी, मोहित भाषाटीकासहितम् । हो जाये तथा ताम्बूल (पान ) की जड़को पीसकर तिलक करे, तो सब लोक मोहित होवे ॥ ७ ॥ सिंदूरं व बचा श्वेतां ताम्बूलरसपेपयेत् ॥ अनेनैव तु मंत्रेण तिलक लोकमोहनम् ॥ ८॥ भृगराजमपामार्ग लाजा च सहदेविका ॥ एभिस्तु तिलकं कृत्वा त्रैलोक्य मोहयेन्नरः ॥९॥ श्वेतदूर्वी गृहीत्वा तु हरितालं च पेपयेत् ॥ एभिस्तु तिलकं कृत्वा त्रैलोक्य मोहयेन्नरः।।१०॥ मंत्रस्तु ॥ ॐ उड्डामरेश्वराय सर्वजगन्मोहनाय अंआईईउऊंचंहुं फट् स्वाहा ।। अयुतजपासिद्धिः ॥ सप्तवाराभिमंत्रितं कुर्यात्।। इति श्रीमदुड्डीशतंत्रे तृतीयः पटलः ॥३॥ अर्थ- सेंदुर, बच सपेद, इनको पानके रसमें पीसे, अनन्तर इसका तिलक मंत्रसे अनिमंत्रित करके करे तो सब लोक मोहित होये ॥ ८॥ अंगरा, चिमिटा, लाजा- वन्ती, सहदेई इनका तिलक करे तो देखनेसे मनुष्य मोहित

४६
उड्डीशतंत्रम् ।
होवे ॥ ९ ॥ सपेद दूबको लेकर हरतालमें घोटकर इसका
तिलक करे तो लोकमें मनुप्य मोहित होये ॥ १० ॥ ॐ
उड्डामरेश्वराय सर्वजगन्मोहनाय अंआईइंडऊकहुं फट
स्वाहा । यह मंत्र है, दश हजार मंत्र जपनेसे मिद्धि होवे,
तिलक करते समय मंत्रमे सात वार अनिमंत्रित करे ॥
इनि श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीरानं
भापाटीकायां तृतीयः पटलः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थः पटलः॥४॥
तत्र स्तंभनम्॥अथ जलस्तंभनम् ॥ईश्वर उवाच ॥
अथाग्रे संप्रवक्ष्यामि प्रयोगं स्तंभनाभिधम् ॥
यस्य साधनमात्रेण सिद्धिः करतले भवत् ॥ १ ॥
तबादी कथयिप्यामि जलस्तंभनमुत्तमम् ।।
कुलीरनेवदंडाणि रुधिरं मांसमेव च ॥२॥
हृदयं कच्छपम्यय शिशुमारवसा तथा ।
विभीतकस्य तेलेन सर्वाण्येकन सिद्धयेत् ॥ ३ ॥

भापाटीकासहितम् । एभिः प्रलेपनं कुर्याजले तिष्ठेद्यथासुखम् ।। उरगस्य वसा ग्राह्या नकस्य नकुलस्य च ॥४॥ डंडुभस्य शिरो ग्राह्यं सर्वांण्येकत्र कारयेत् ॥ विभीतकस्य तैलेन सिद्धं कुर्यायथाविधि ॥५॥ तैलं पक्त्वाऽयसे पात्रे कृष्णाटम्यां समाहितः ॥ शंकरस्यार्चनं कृत्वा मूर्ध्नि कृत्वा प्रदक्षिणाम् ॥६॥ अष्टाऽधिकसहस्रेण चाज्यहोमं प्रजायते ॥ लेपं कृत्वाऽस्य मंत्रेण ततः सिद्धिः प्रजायते ॥७॥ मंवस्तु ॥ ॐ नमो भगवते जलं स्तंभय हुं फटू स्वाहा ॥ अर्थ-अब चौथे पटलमें स्तंभन मकार कहते हैं वहां प्रथम जलस्तंभनप्रकार वर्णन करते हैं श्रीशिवजी बोले अब आगे जलस्तंचन कहूंगा जिस स्तंभनप्रयोगके साधन मात्रसे सिद्धि हाथमें आ जाती है॥१॥ तहां प्रथम उत्तम जलस्तंभन कहूंगा. केकडाकी आंखें, दाडे, रुधिर, मांस ॥ २॥ कछुवेका हृदय, शिशुमारकी वसा तथा

४८
उहाशतंत्रम् ।
भिलावेको लेके इन सबको एकत्र कर तेलमें सिद्ध करे,
॥३॥ इसका लेप करके जलमें जावे तो जलमें स्थिति
हो जावे है यथासुखपूर्वक स्थित हो जावे तथा सांपकी
चा लेके व न्यौला व नाकेकीनी बसाको लेवे ॥४॥
निर्विप सांपके बच्चेका शिर लेके इन सबको एकत्र करे
भिलावेके तेलमें यथाविधिपूर्वक सिद्धि करे ॥ ५ ॥ तेल
पक जानेपर लोहेके पात्रमें कृष्णपक्षकी अष्टमीमें अच्छे
प्रकार रक्खे, शंकरजीका पूजन करके शिरसा प्रणाम
करे ॥ ६॥ एक हजार आठ वार मंत्रसे हवन घीसे करे
इसका लेप मंत्रसे करे तो तैल सिद्ध हो जाता है ॥ ७ ॥
ॐ नमो भगवते जल स्तंभय हुं फट् स्वाहा ॥ यह मंत्र है।
॥ अथ अग्निस्तंभनम् ॥
मंडूकस्य वसा ग्राह्या कर्पूरेणैव संयुता ।।
लेपमानाच्छरीराणामग्निस्तंभः प्रजायते ॥ ८॥
कुमारीरसलेपेन किंचिद्वस्तु न दह्यते ॥
अगिस्तंभनयोगोयं नान्यथा मम भापितम् ॥९॥

भाषाटीकासहितम् ।
अर्थ-मेंडकको चौको लेके कपूर मिलाय शरीरपर
लेप करनेसे अमिसे अंग नहीं जले ॥ ८ ॥ धीग्वारके
रससे लेपन करनेसे कोईनी वस्तु हो दग्ध नहीं होती है
यह अमिस्तम्भनयोग हमारा कहा गया सत्य है ॥ ९ ॥
॥अथ बुद्धिस्तम्भनम् ॥
उलूकस्य कापि तांबूले यस्य दापयेत् ॥
विष्ठां प्रयत्नतस्तस्य बुद्धिस्तंभःप्रजायते॥१०॥
अर्थ-उल्लूपक्षी और वानरकी विष्ठाको लेकर पानमें
रखकर जिसको यनसे खिलावे उसकी बुद्धि स्तंभन हो
जाती है अर्थात् वह मनुष्य जडबुद्धि हो जाता है॥१०॥
॥ अथ शस्त्रस्तंभनम् ॥
पुष्यार्केह्नि समादाय अपामार्गस्य मूलकम् ॥
घृष्ट्वा लिंपेच्छरीरे स्वे शस्त्रस्तंभःप्रजायते ॥११॥
अर्थ-रविवार पुष्यनक्षत्रके दिन ओंगाकी जडको
लेके और घिसके अंगमें ले तो शरीरपर कोई हथियार
नहीं गढे ॥११॥

५०
,
उड्डीशतंत्रम।
॥ अथ मेघस्तंभनम् ॥
इप्टकाद्वयमादाय संपुटं करयेन्नरः॥
स्मशानांगारसंलेख्य भूस्थं स्तंभनमेषकम् ।।१२।।
अर्थ-दो ईटोंको लेकर स्मशानके कोयलेमे मेघ
लिखकर संपुट बनाय पृथिवीमें गाड देवे तो मेघोंका
स्तम्भन होवे, गाडते समय ॐ मेघानां स्तंभनं कुरु २
स्वाहा, यह मंत्र पढे ॥ १२ ॥
॥ अथ निद्रास्तम्भनम् ॥
मधुना वृहतीमूलैरंजयेल्लोचनद्वयम् ।।
निद्रास्तम्भो भवेत्तस्य नान्यथा मम भापितम्१३
इति श्रीरावणकृते उड्डीशतंत्रे चतुर्थः पटलः॥४॥
अर्थ-कटेलीकी जडको सहतमें पिसकर दोनों नेत्रों में
अंजन करे तो उसकी नींद थम जावे,श्रीशिवजी कहते हैं
यह हमारा कहा गया असत्य नहीं है ॥ १३ ॥
इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीशतंत्रे पार्वतीवरसंवादे
भापायां स्तजनप्रयोगो नाम चतुर्थः पटलः ॥४॥

भापाटीकासहितम् । अथ पंचमः पटलः॥५॥ तत्र विद्वेषणम् ॥ ईश्वर उवाच ॥ अथाने कथयिष्यामि योगं विद्वेपणाभिधम् ॥ महाकौतुकरूपं च पार्वति शृणु यत्नतः ॥१॥ अर्थ-अब पांचवें पदलमं विद्वेषण प्रयोग लिखते हैं श्रीशिवजी कहते हैं कि अब आगे विद्वेपण नाम प्रयोग वर्णन करूंगा जिस महाकौतुकरूप विद्वेपणयोगसे आपसमें वैरभाव हो जाता है, सो हे पार्वति 1 सावधान होकर श्रवण करो॥१॥ गृहीत्वा गजकेशं च तथा व्याघ्रकचं पुनः॥ मृत्तिका पादयोऽरीणां पोटली निखनेदवि ॥२॥ तस्योपरि स्थापयेऽनि मालतीपुष्प होमयेत् ।। विद्वेपं कुरुते यस्य भवेत्तस्य हि नान्यथा ॥३॥ मंवस्तु ।। ॐ नमो आदित्याय गजसिंहबदमु- कस्य अमुकेन सह विदेपं कुरु कुरु स्वाहा ।।

उड्डीशतंत्रम् । अर्थ-हार्थीके केश तथा व्यावके केश लेकर फिर शत्रुओंके दोनों चरणतलोंके नीचेकी मृनिका लेके पोट- लीमें रख पृथिवीमें गाइ देवे ॥ २ ॥ फिर उसके ऊपर अमि स्थापन करके चमेलीके फूल व घी मिलाय मंत्र- पूर्वक हवन करे तो जिनके नामसे हवन किया जाय उन दोनोंमें परसर वैर नाव हो जावे ॥ ३ ॥ मंत्र मूलमें लिखा है,अमुक्की जगह दोनोंका नाम उच्चारण करे कि जिन दोनोंका विद्वेषण कराना है। ब्रह्मदंडी समूला च काकजंघासमन्विता ॥ जातीपुष्परसैभाव्या सप्तराचं पुनः पुनः ॥ ४॥ ततो मारिसूत्रेण सप्ताई भावयेत्पुनः ।। एप धूपः प्रदातव्यो शत्रुगोत्रस्य मध्यतः॥५॥ यथा गन्धं समाघ्राति तथा सबैस्समं कलिः॥ महद्विवेपणं याति सुदृद्भिवन्धिवैस्सह ॥ सुस्थी च करणं प्रोक्तं घृतं गुग्गुलुधूपतः ॥ अर्थ-ब्रह्मदंडी जडसहित, काकजंघा मिलाय चमे-

भापाटीकासहितम् ।
लोके रससे भावना देवे इस प्रकार सात रात्रितक सात
भावना देवे ॥ ४ ॥ अनन्तर विल्लीके मूत्रकी सात दिन
भावना देवे फिर इसकी धूप शत्रुगोत्रके बीचमें देवे अर्थात्
जिनसे विद्वेषण कराना चाहे, उनके मध्य धूनी देवे ॥५॥
तो यथाधूपानुसार उसकी गंध सूंघनेसे शत्रुओंके बीच
कलह हो मित्र व बांधवों सहित बड़ा पैरभाव हो जावे
॥६॥ और फिर जब वैरभाव दूर कराना चाहे तो धी
और गुग्गुलकी धूप देवे ॥
एकहस्ते काकपक्ष उल्लूकस्य परे करे ॥७॥
मंत्रयित्या मिलत्यग्रे कृष्णसूत्रेण वेष्टयेत् ॥
यगृहे निखनेद्भुमो विद्वेपं तस्य जायते ॥८॥
अर्थ-एक हाथमें काकपक्षीका पंख, दूसरे हाथमें
उपक्षीका पंख लेके मंत्रसे अभिमंत्रित कर मिलाय देवे
फिर काले सूतसे लपेटे, फिर जिसके घरमें गाडदेवे, उसको
विवेप होवे अर्थात् उसके घर में वैरभाव होनेलगे॥७॥८॥

उड्डीशतंत्रम् । गजकेसरिणो देतान्नवनीतेन पेपयेत् ॥ यन्नाम्ना हूयते चानो तयोविद्वेपणं भवेत् ॥ ९॥ अश्वकेशं गृहीत्वा च महिपं केशसंयुतम् ।। सभायां दीयते धूपो विद्वेपो जायते क्षणात् ॥१०॥ अर्थ-हाथी और व्यापके दांतोंका चूर्ण गौके मक्ख- नमें मिलाय जिसके नामसे मंत्र पढकर अनिमें हवन करे तो उन दोनोंका परस्पर वैरभाव हो जावे ॥९॥ तथा घोडेके और भैसाके केश मिलाय सधाम धूप देवे तो वि- द्वेषण हो जावे ॥१०॥ मूपमार्जारयोश्चैव विष्टामादाय यत्नतः ॥ विद्वेष्यपादतलतो मृदमादाय मिश्रयेत् ॥ ११ ॥ जपेन्मन्त्रशतं कुर्यानरपुत्तलिकां शुभाम् ॥ नीलवस्त्रेण संवेष्टय तद्गृहे निखनेद्यदि ॥ १२ ॥ विद्वेषं जायते शीघ्रं पितापुत्रावपि ध्रुवम् ॥ मंत्रस्तु ॐ नमो नारायणाय अमुकस्य अमुकेन

,
भापाटीकासहितम् ।
५५
सह विद्वेपं कुरु कुरु स्वाहा ॥१३॥
इति श्रीरावणविरचिते उड्डीशतंत्रे पार्वतीश्वरसंवादे
विद्वेषणप्रयोगवर्णनो नाम पंचमः पटलः ॥५॥
अर्थ-मूसे और बिल्लीकी विष्ठाको यत्नसे लेकर और
जिन दोनोंका द्वेष कराना हो, उनके चरणके नीचेकी मि-
ट्टी लेकर मिलाय देवे ॥११॥ फिर एक सौ चार मंत्र
जप कर मनुष्याकार पूतली बना लेवे और नीले कपडेसे
लपेटकर घरमें गाडना ॥ १२ ॥ तो पिता पुत्रमेंनी निश्चय
शीघही वैरभाव हो जावे, मंत्र जो मूलमें लिखा है सो
विचारपूर्वक उच्चारण करना ॥ १३ ॥
इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीशतंने भाषा
विवेपणप्रयोगकथनो नाम पंचमः पटलः ॥ ५ ॥

जापाटीकासहितम् । हाथसे उठाय लेवे ॥ २॥ वह धलि जिसके घरमें फेंक देवे इसका उच्चाटन होवे इस प्रकार सात दिन धूलि फेंक- नेसे उस परके स्वामीका अवश्य उस घरसे चित्त उच्चाटन हो जावे ॥ ३॥ मंत्र मूलमें है जिसका दश हजार जा करनेसे सिद्धि होवे ॥ गृहीत्वोदुम्बरं कीलं मंत्रेण चतुरंगुलम् ॥ निखनेद्यस्य शयने तस्योचाटनकं भवेत् ॥ ४॥ काकोलूकस्य पक्षाणि यद्गुहे निखनेद्रवौ ।। यन्नाम्ना मंत्रयोगेन समस्तोचाटनं भवेत् ॥५॥ नरास्थिकीलक भौमे निखनेचतुरंगुलम् ॥ तत्र मूत्रं तु यः कुर्यात् तस्योचाटनकं ध्रुवम् ॥६॥ मंत्रस्तु॥ ॐ नमो भगवते रुद्राय करालदंष्ट्राय अमुकं सपुत्रांधवैस्सह हन हन दह दह पच पच शीघ्रसुच्चाटय शीघ्रमुच्चाटय हुं फटू स्वाहा ठाठः॥भयुतजपासिद्धिः॥ अर्थ-गूलरवृक्षके काठकी चार अंगुल प्रमाण कील ५८ उड्डीशतंत्रम् । जिसके शयन करनेके स्थानमें पलंगपर गाड देवे उसका उच्चाटन हो जावे ॥ ४ ॥ तथा काकपक्षी और उल्लप- क्षीके पंख रविवार के दिन लाकर जिसके घरमें गाइ देवे जिसके नामसे अनिमंत्रित करके गाडे उन सबका उच्चाटन होवे ॥५॥ तथा मनुष्यके हाडकी चार अंगुल प्रमाण- की मंगलवारके दिन लाकर जिसके द्वारपर गाड दे थे, वहां पर जो मूत्र करे उसका उच्चाटन होवे निश्चय जानना॥६॥ मंत्र मूलमें लिखा है । इस मंत्रका जप दश हमार करके प्रथम सिद्ध कर लेवे ॥ सिद्धार्थ शिवनिर्माल्यं यगृहे निखनेन्नरः ।। उच्चाटनं भवेत्तस्य उद्धते च पुनः सुखी ॥७॥ इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीशतंत्रे पार्वतीश्वरसंवादे उच्चाटनप्रयोगवर्णनो नाम पष्ठः पटलः ॥६॥ अर्थ-सरसों और शिवजीका निर्माल्य मिलाकर नष्य जिसके घरपर डाल देवे उसका उच्चाटन होवे, आपाटीकासहितम् । अथवा एक पोटलीमें करके गाड देवे, उखाड लेनेसे फिर वह सुखी होवे ॥ ७॥ इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डशितंत्रे पार्वतीश्वरसंवादे भापायां उच्चाटनप्रयोगो नाम पठः पटलः ॥ ६ ॥ अथसप्तमःपटलः॥७॥ तत्र वशीकरणम् ॥ ईश्वर उवाच ।। वशीकरणसर्वेपां पार्वति शृणु यत्नतः ॥ राजप्रजापशूनां च नान्यथा मम भाषितम् ॥ १॥ अर्थ-अब सातवें पटलमें यशीकरणप्रयोग लिखते हैं, श्रीशिवजी कहते हैं कि हे पाति ! सावधानपूर्वक श्रवण करो राजा, प्रजा तथा पशु आदि सबका वशीकरण वर्णन करताहूं यह हमारा कहा अन्यथा नहीं जानना ॥ १ ॥ चन्दनं तगरं कुठं प्रियंगु नागकेशरम् ॥ कुठं धत्तूरपंचांगं समभागं तु कारयेत् ॥२॥ छायायां वटिका कार्या प्रदेया खानपानयोः ॥

उडीशतंत्रम् । देखे सो वशी होवे ॥ ८॥ राजदार, तथा न्याययुद्धमें अर्थात् कचहरी, मुंसिफी आदि सब स्थानोंमें उसकी जय होचे॥ ॥स्त्रीवशीकरणम् ॥ अथातस्सम्प्रवक्ष्यामि योगानां सारमुत्तमम् ।। येन विज्ञानमात्रेण नारी भवति किंकरी ॥९॥ उशीरं चंदनं चैव मधुना सह संयुतम् ॥ गलहस्तप्रयोगोयं सर्वनारीप्रसाधकः ॥ १० ॥ चिताभस्म वचा कुष्ठं कुंकुमं रोचनं समम् ॥ चूर्ण स्त्रीशिरसि क्षिप्तं वशीकरणमद्भुतम् ॥ ११ ॥ अर्थ-अब आगे योगोंमें उत्तम सार कहूंगा, जिसके जानने मात्रसे स्त्री किंकरी ( दासी) समान हो जाती है । ॥ ९ ॥ खस, चन्दन इनमें शहत, मिलाय तिलक लगावे, और स्त्रीके साथ गलबांह योगसे स्त्रीको वश करे ॥ १० ॥ चिताकी भस्म, बच, कूठ, केशर, गोरोचन इनको समान भापाटीकासहितम् । भाग ले चूर्ण करके जिस स्त्रीके शिरपर छोडे सो वशमें होवे यह अद्भुत वशीकरण है ॥ ३१ ॥ ॥पतिवशीकरणम् ॥ रोचनं मत्स्यपित्तं च मयूरस्य शिखा तथा ॥ मधु सर्पिःसमायुक्तं स्त्रीवरांगविलेपनम् ।। १२ ।। निभृते मैथुने भावे पतिर्दासो भविष्यति ॥ रुपयौवनसम्पन्नानाऽन्यास्विच्छा कदाचन॥१३॥ कुलत्थं बिल्वपत्रं च रोचना च मनःशिला ॥ . एतानि समभागानि स्थापयेत्ताम्रभाजने ॥१४॥ सप्तरात्रस्थिते पात्रे तैलमेवं पचेधः ॥ तैलेन भगमालिप्य भर्तारमनुगच्छति ॥१५॥ संप्राप्ते मैथुने भर्ता दासो भवति नान्यथा ॥ अर्थ-गोरोचन, मछलीका पित्त, तथा मोरशिखा, सहत,घी इनको मिलाय स्त्री अपनी भगपर लेप करे॥१२॥ फिर मैथुन करे, तो पति दासनावको प्राप्त होवे, रूप यौ- चन सम्पन्न स्त्रीको छोड अन्यकी कदापि इच्छा नहीं करे, . - " ६४ उड्डीशतंत्रम्। ॥ १३ ॥ कुलथी, बेलपत्र, गोरोचन, मनशिल इनको समान भाग लेकर तांबेके पात्रमें ॥ १४॥ सात रात्रि पर्यन्त रखने उपरान्त तेलमें पचाय बह तेल जगपर लेपन करके अपने पतिके पास जावे ॥ १५॥ तो जाके साथ मेथुन करनेसे उसका पति दास हो जाता है, यह कथन अन्यथा नहीं है। कुंकुमं शतपुप्पं च प्रियंगुं वंशरोचना ॥ अश्वमूत्रेण लेपं च पुरुपाणां वशंकरम् ॥ १६ ॥ निवकाष्ठस्य धूपेन धूपयित्वा भगं पुनः ।। या नारी रमयेत्कांतं सा च तं दासतां नयेत्॥१७॥ कपित्थरसमादाय त्रिफला च ततः समा ।। नारी वरांगलितेन स्वपति दासतां नयेत् ॥१८॥ इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीशतंगे सप्तमः पटलः॥७॥ अर्थ-केशर, सौंफ, कांगनी, वंशलोचन इनको लेकर घोडाके मूत्रसे लेप बनाय भगपर करके पतिसंभोगसे

६५
भापाटीकासहितम् ।
पतिको वश करे ॥ १६ ॥ नींबकी लकडीकी धूपसे अग.
को धूपित करके जो स्त्री अपने पतिसे रमण करे वह उस-
को दासभावमें लाये ॥ १७॥ कैथका रस लेकर त्रिफला
समान भाग मिलाकर जो स्त्री अपनी भगपर लेप करे सो
अपने पतिको दास बना लेवे ॥ १८॥
इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उमामहेश्वरसंवादे भापायां
वशीकरणप्रयोगो नाम सप्तमः पटलः ॥ ७ ॥
अथाष्टमः पटलः॥८॥
तत्राकर्षणम् ॥ ईश्वर उवाच ॥
अथातः संप्राक्ष्यामि आकर्षणविधि वरम् ॥
यस्य विज्ञानमात्रेण सत्यमाकर्षणं भवेत् ॥ १॥
मानुपासुरदेवाश्च सयक्षोरगराक्षसाः ॥
स्थावरा जंगमाश्चैव आकृष्टास्ते वराङ्गन्ने ॥२॥
सूर्यावर्तस्य मूलं तु पंचम्यां ग्राहयेदधः ॥
ताम्बूलेन समं दद्यात्स्वयमायाति भक्षणात् ॥३॥

६ - ६६ उड्डीशतंत्रम् । अर्थ-अब आठ पटलमें आकर्षणप्रयोग लिखते हैं श्रीशिवजी बोले कि अब हम आकर्षण प्रयोग वर्णन कर- ते हैं जिसके जानने मात्रसे सत्य आकर्षण होता है ॥१॥ मनुप्य, असुर, देवता, यक्ष, नाग, राक्षस और स्थावर, जंगम जीव इन सबका आकर्षण होता है हे पार्वति! ॥२॥ सूर्यावर्त ( हुलहुल ) वृक्षकी जडको पंचमी तिथिमे लावे और पानके साथ जिस स्त्रीको भक्षण करा दी जावे तो वह उसके खानेसे आनेही आप खींचकर वहां आ जाती है, अर्थात् स्वयं वह आ जाये ॥३॥ गृहीत्यार्जुनवन्दाकमाश्लेषायां प्रयत्नतः ।। अजामूत्रेण सम्पिष्ट्वा निक्षिपेद्यस्य मस्तके ॥ ४ ॥ नारी वा पुरुपो वापि सुतो वा पशुरेव च ।। आकृष्टः स्वयमायाति सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥६॥ अर्थ-अर्जुन वृक्षकी जड आश्लेपानक्षत्र में लाकर बक- रीके मत्रमें अच्छे प्रकार पीसकर जिसके मस्तकपर छोड दिया जाये ॥ ४ ॥ तो स्त्री हो या पुरुष अथवा पुत्र तथा भाषाटीकासहितम् । पशु सो स्वयं आकर्षण होकर आ जावे, यह हमने सत्य सत्य वर्णन किया है ॥ ५॥ इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते पार्वतीश्वरसंवादे उड्डीशतंत्रे आपायां आकर्षणप्रयोगो नामाष्टमः पटलः ॥८॥ अथ नवमःपटलः॥९॥ तत्र यक्षिणीसाधनम् ॥ ईश्वर उवाच ।। अथ ते कथयिष्यामि यक्षिणीसाधनं वरम् ।। यस्य सिद्धौ नराणां च सर्वे संति मनोरथाः ॥१॥ अर्थ-अब नवम पटलमें यक्षिणियोंका साधन वर्णन करते हैं श्रीशिवजी बोले हे पार्वति । अब तुमारेसे में यक्षिणियोंका साधन कहूंगा, जिनकी सिद्धिसे मनुष्योंके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं ।। १॥ ॥ अथ यक्षिण्यः कथ्यते ॥ १ सुंदरी २ मनोहरी ३ कनकवती ४ कामेश्वरी ५ रतिकरी ६ पमिनी ७ नटी ८ अनुरागिणी ।।

६८ उड्डीशतंत्रम् । ॐ ह्रीं आगच्छ सुरसुंदरि स्वाहा ॥ॐ आगच्छ मनोहरि स्वाहा ॥ ॐ ह्रीं कनकवति मैथुनप्रिये स्वाहा ॥ॐ आगच्छ कामेश्वरि स्वाहा ॥ ॐ आगच्छ रतिकरि स्वाहा॥ ॐ आगच्छ पद्मिनि स्वाहा ॥ॐ ह्रीं आगच्छ नटि स्वाहा ॥ ॐ ह्रीं आगच्छ अनुरागिणि स्वाहा ।। इति यक्षिणीसा- धनमंत्राः ॥ अथ सुरसुंदरीसाधनम् ॥ पवित्रगृह गत्वा पूजनं कृत्वा गुग्गुलधूपं दत्त्वा त्रिसन्ध्यं पूजयेत् । सहस्रं नित्यं जपेत् । मासाभ्यन्तरे आगतायै चन्दनोदकेनापों देयः । माताभगिनी- भार्याकृत्यं करोति । यदा माता भवति सिद्धद्र- व्याणि ददाति । यदि भगिनी भवति तदा ह्यपूर्व- वस्त्रं ददाति । यदि भार्या भवति तहि सर्वेश्वर्य सर्वेषां परिपूरयेत् ॥ वर्जयेदन्यस्त्रीसह शयनम् । अन्यथा विनश्यति ॥ अर्थ-अप यक्षिणियों कहते हैं-सुन्दरी, २मनो- आपाटीकासहितम् । हरी, ३ कनकवती, ४ कामेश्वरी,५ रतिकरी, ६ पमिनी, ७ नटी, ८ अनुरागिणी सम्पूर्ण सिद्धियोंकी देनेवाली यह आठ योगिनियां हैं, इन सबके मंत्र मूलमें लिखे हैं, वहां प्रथम सुरसुंदरीसाधन लिखते हैं-वित्र घरमें जाकर पूजन करके गूगलकी धूप दे वे तीनों संध्याओंमें सुरसुंदरीका पूजन करे और एक हजार मंत्र नित्य जपे तो एक महीनेके अन्तरमें सुरसुन्दरी देवी आवेगी तो चन्दनजलसे अर्घ देवे माता, बहिन, स्त्रीका कृत्य करे, जो माता होवे तो सिद्ध- द्रव्य देती है, जो बहिन होवे तो अपूर्व वस्त्र देती है, जो स्त्री हो तो सब ऐश्वर्यसे सबको पूर्ण कर देवे, परंतु दूसरी स्त्रीके साथ शयन करना वर्जित करे, इसके विरुद्ध वर्ताव करनेसे नाशनावको प्राप्त होगा। ॥ अथ मनोहरीसाधनम् ॥ नदीसंगमे गत्वा चन्दनेन मण्डलं कृषा अगरु- धूपं दत्त्वा मासैकोपरि आगतायै पूजयेत् । यदा आगच्छति तदा चंदनेनार्यों दीयते, पुप्पफलै- १ .

उड्डशितंत्रम् । रेकचित्तेनार्चनं कर्तव्यम् । अर्धरात्रे नियतमा. गच्छति । आगतायां सत्यामाज्ञां देहि सुवर्ण- शतं च प्रतिदिनं ददाति ॥ अर्थ-अब मनोहरीका साधन लिखते हैं-नदीके संग- ममें जाकर चन्दनमे मण्डल करके अगरुकी धनी देकर पूजनादिसे यक्षिणीको प्रसन्न करे, जब वह एक मास उप- रांत आवे तो उसका पूजन करे, यक्षिणीके आनेपर चन्द- नसे अर्घ दे , फल और फलसे सावधानमन होकर पूजन करे, आधी रातको नियत समयपर आवे है, आनसे नित्य प्रति सौ संख्यक सुवर्ण अर्थात् महर देवे है। ॥ अथ कनकवतीसाधनम् ॥ वटवृक्षतलं गत्वा मद्यमांसं च दापयेत् । सहस्र- मेकं च मंत्र जपेत् । एवं सप्तदिनं कुर्यात् अष्टम- रात्रौ सा सर्वालंकारसंयुता आगच्छति, साध- कस्य भा भवति, द्वादशजनानां वस्त्रालंकार- भोजनानि ददाति ।। " " भापाटीकासहितम् । अर्थ-अब कनकवतीका साधन लिखते हैं-बटके वृक्ष- तले जाकर मद्यमांसको देवे, एक सहस्रसंख्यक मंत्रोंका जप करे, इस प्रकार सात दिनपर्यन्त करे, आठवें दिन रात्रिमें सब अलंकार तथा वखोंसहित देवी यक्षिणी आवे साधककी स्त्री होकर रहे, बारह मनुष्योंको वस्त्र, अलंकार तथा भोजन देवे॥ ॥अथ कामेश्वरीसाधनम् ॥ भूर्जपत्रे गोरोचनया प्रतिमा विलिख्य तां देवीं पूजयेत् । शय्यामारुह्य एकाकी सहस्त्रं जपेत् । मासान्ते वा पूजयेत् । घृतदीपो देयः। पश्चान्मौनी भूत्वा पूजयेत् । ततोऽर्धरात्रे निय- तमागच्छति । साधकस्य भार्या भवति । प्रति- दिनं शयने दिव्यालंकार परित्यज्य गच्छति । परस्त्री परिवर्जनीया इति ॥ अर्थ-अब कामेश्वरीका साधन लिखते हैं-भोजपत्रपर गोरोचनसे कामेश्वरीकी प्रतिमा बनाकर तिस देवीका उड्डीशतंत्रम् । पूजन करे। फिर शव्यापर सवार होकर अकेले एक हना- र जप करे । एक मासपर्पल करे । चीका दीपक जलावे । पश्चात् मौन होकर पूजन करे । अनन्तर अर्धरात्रिसमय देवी आयेगी। सापकी त्री होगी, प्रतिदिन शयन कर- के सुन्दर आभूषण छोड़कर चली जाया करेगी । इसमें परसोगमन त्याग देवे॥ ॥ अथ रतिप्रियासाधनम् ॥ पटे चित्ररूपिणी लिखित्वा कनकवस्त्रसलिंका- रभूपिता उत्पलहस्तां कुमारी जातीफलेन पूज- येत् । यदि भगिनी भवति तदा योजनमात्रात्स्त्री- मानीय समर्पयति वस्त्रालंकारभोजनं ददाति ॥ अर्थ-अब रतिप्रियाताधन लिखते हैं-वनपर देवीका चित्र लिखकर सुनहले वख अलंकार आदिसे शूपिन करके कमल हाथमें लिये ऐसी कुमारीका पूजन जायफलसहित करे जो भगिनी होकर आवे तो एक योजन (४ कोश) प्रमाणसे श्रीको लाकर देवे और वसालंकार तथा भोजन देवे ॥

भापादीकासहितम् । ॥अथ पद्मिनी नटी तथा अनुरागिणीसाधनम् ॥ कुंकुमेन भूर्जपत्रे प्रतिमा विलिख्य गंधाक्षतपु- प्पधूपदीपविधिना सम्पूज्य त्रिसंध्यं त्रिसहस्त्रं जपेत् मासमेकं यावत् ततः पौर्णिमायां विधिव- त्पूजा कर्तव्या वृतदीपं प्रज्वालयेत सकलरात्रि- पर्यन्तं जपेत् अत्र केवलमंत्रभेदाः। प्रभाते निय- तसमये आगच्छति दिव्यरसायनं ददाति इति॥ अर्थ-अब पमिनी नटी तथा अनुरागिणीका साधन लिखते हैं-केशरसे भोजपत्रपर जिस देवीकी आराधना करना चाहे उसकी प्रतिमा बनाय चन्दनाक्षत, फूल, धूप, दीप आदिसे विधिपूर्वक पूजन करे, तीनों सन्ध्याओंमें तीन सहस्र जप करे, प्रतिदिन इस प्रकार मासपर्यन्त करे, अनन्तर पौर्णमासीके दिन विधिवत् पूजा करे, यहां केवल मंत्रका भेद है। पमिनी, नटी, अनुरागिणी इनमें से जिसको साधन करे उसका मंत्र जपे, घीका दीपक जलावे, प्रातःस- मयमें आवे, दिव्यरसाधनको देवे है । नटीदेवी सुंदर वना- - ७४ उड्डीशतंत्रम् । भूपणोंको देती है और नृत्य दिखाती है। अनुरागिणी देवी वस्त्रालंकारोंको देके प्रसन्न करनेवाली मधुर वाणीसे सन्तुष्ट करती है ॥ ॥ अथ भूतवादः॥ भूतवादं प्रवक्ष्यामि यथा रावणभापितम् ॥ येनैव ज्ञातमात्रेण शत्रवो यांति वश्यताम् ॥२॥ निर्यासं शाल्मली चैव वीजानि कनकानि च ॥ भावयेत्सप्तरात्रेण भक्ष्ये पाने च दीयते ॥ ३ ॥ ततो भक्षणमात्रेण ग्रहः संगृह्यते नरः॥ शर्करादुग्धपानेन सुस्थो भवति नान्यथा ॥४॥ निर्यासं सल्लकीनां च वीजानि कनकस्य च ।। पष्टिकाचूर्णयुक्तानि भावयेत्सप्तवासरम् ।।५।। खाद्यपानसमायोगाद् ग्रहो माहेश्वरो भवेत् ॥ शर्करादुग्धपानेन सुस्थो भवति नान्यथा ॥६॥ अर्थ-अब नबाद कहते हैं-अब नयाद लिखता हूं जो शिवजीकी वाणीमे निकटा भया मुझ रावण करके भाषाटीकासहितम् । ७५ वर्णन किया जाता है, जिसके जानने मात्रसे सब शत्रु पश- में होते हैं ॥ २ ॥ सेमलके बीजका काढा तथा धतूरेके बीज इनको उस काढेमें सात दिनपर्यन्त भावना देवे और खानपानमें देवे ॥ ३ ॥ तो भक्षणमात्रसे उसको यह ग्रहण कर लेवेगा फिर शक्कर दूध पीनेसे शरीर आरोग्य हो जावेगा॥ ४॥ तथा सालईवृक्षके काढे, धतरेके बीजकी भावना देके साठीके चर्णमें मिलाय फिर सात दिवस भाव- ना देवे ॥५॥ इसको खानपानमें लानेसे माहेश्वर नाम ग्रह यसता है, शकर और दूधके पीनेसे आनन्दचित्त हो जाता है ॥ ६ ॥ ॥अथ मंत्रवादः॥ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि मंत्रवादं सुदुर्लभम् ॥ येन विज्ञानमात्रेण सर्वसिद्धिःप्रजायते ॥७॥ काली कंकाली किलकिले स्वाहा, अनेन मंत्रेण मल्लिकापुप्पं सहस्रं जुहुयात् कंकाली वरदा भवति सुवर्णमापचतुष्टयं ददाति । प्रत्यहं सहस्रहवनन ।

उड्डीशतंत्रम् । ॐ ठिरिमिठठः । अनेन चतुःपंकजचूर्ण घृतम- धुभ्यां सह होमयेत् सर्वदा सुखी भवेत्॥ ॐनमो- च्छिटचांडालिनि कंकालमालाधारिणि साधु २ त्रैलोक्यमोहिनी प्रकांडक्षोभिनी शत्रूणां क्षोभय क्षोभय हुं फट् स्वाहा ॥ इति क्षोभिनीमंत्रः॥ ॐ नमो भगवति दुर्वचनी किलिकिलि वाचा - जनी मुखस्तंभनी स्वाहा ॥ सर्वजनमुखस्तं- भः ॥ ॐ ह्रीं धूं हूं स्वाहा ॥ अनेन विलस- मिधं घृताक्तांजुहुयात् । समस्तजानपदाः किंक- राभवन्ति । यदि वटन्यग्रोधसमिधं घृताक्तां होम- येत् सहस्रकाहुति नित्यं दद्यात् तदा स्त्री वश्या भवति नाऽत्र सन्देहः ॥ॐ ऐं पद वद वाग्वादिनी वागीश्वरी नमः । कवित्वं जायते न संदेहो नित्यं सहस्रक जप्तेन ॥ इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उडीशतं यक्षि- णीसाधनं नाम नवमः पटलः ।। ९॥

भापाटीकासहितम् ।
अर्थ-अथ मंत्रवाद लिखते हैं-अब दुर्लभ मंत्रवादको
आगे वर्णन करूंगा, जिसके जानने मात्रसे सब सिद्धि प्राप्त
होती है ।। ७ ॥ ॐ काली० इत्यादिमंत्रसे एक हजार
चमेली के फूलोंका हवन एक सहल घी मिलाय करे तो
काली वर देनेवाली होती है, चार मासे सुवर्ण नित्यप्रति
देती है ।। ॐ ठिरिमिठठः । इस मंत्रसे चारों प्रकारके
कमलोंका चूर्ण घी सहत मिलाय नित्य एक सहस्र हवन
करे तो सदैव सुखी होये॥ॐ नमोच्छिष्टचांडालिनी इत्यादि
मंत्र क्षोभिनीदेवीका है, इसका जप करने व हवन करनेसे
शत्रुओंको क्षोज होता है। ॐ नमो भगवति इत्यादि मंत्र
जाने व हवनसे सब जनोंका मुखस्तंभन होता है ॥ ॐ
हींधू हूं स्वाहा । इस मंत्रसे बिल्वपत्रको समिश ले घी
मिलाय हवन करे तो सब मनुष्य सेवकसमान हो जाते हैं
तथा जो वट और शमीवृक्षकी समिध धीमें बोर एक हजार
आहुति नित्यप्रति करे तो स्त्री वश होती है इसमें सन्देह
नहीं ।। ॐ ऐं बद० इत्यादि मंत्र नित्यप्रति एक हजार

७८
उड्डीशतंत्रम्।
जपनेसे कविता करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है अर्थात्
कवि हो जाता है।
इति श्रीलंकापतिरावणविरचिते उड्डीशतं मापायां
यक्षिणीसाधनं नाम नवमः पटलः ॥९॥
अथ दशमः पटलः॥१०॥
तन्द्रजालकौतुकम् ॥ ईश्वर उवाच ॥
इन्द्रजालं प्रवक्ष्यामि पार्वति शृणु यत्नतः ॥
येन विज्ञातमात्रेण ज्ञायते सर्वकौतुकम् ॥ १ ॥
आदौ भूतकरणम् ॥ आदौ भूतकरं वक्ष्ये तच्छृ-
गुप्त समासतः॥ भल्लातकरसे गुंजां विपचित्र-
कमेव च ॥२॥ कपिकच्छुकरोमाणि चूर्ण कृत्वा
प्रयत्नतः ॥ एतपूर्णप्रदानेन भूताकरणमुत्तम-
म्॥३॥ तस्य रूपं प्रवक्ष्यामि ज्ञायते येस्तु लक्ष-
णः॥ अंगानि धिमधिमायंति मूर्छन्ति च मुहुर्मु-
हुः ॥ एतद्रूपं भवेद्यस्य तद्भूतावेशलक्षणम् ॥४॥

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भापाटीकासहितम् ।
७९
अर्थ-अब दशवें पटलमें इन्द्रजाल कौतुक लिखते हैं-
श्रीशिवजी बोले हे पार्वति ! इन्द्रजालको वर्णन करूंगा
जिसके जाननेसे सब कौतुक जाने जाते हैं ॥ १ ॥ प्रथम
भूतकरण कहता हूं सावधान होकर श्रवण करो, मिलायेके
रसमें धुंधुची, विप, चीता ॥ २॥ किंवाचके रोम इनको
मिलाय पीसकर महीन चूर्ण करे, इस चुर्णके देनेसे भूत
उसको पकड लेता है ॥ ३ ॥ उसका रूप कहता हूं जिस
लक्षणोंसे वह जाना जाता है, अंग सब धिमधिमाने लगे
तथा अंग टूटे और वारंवार मूर्छित होवे इस प्रकार रूप
जिसका होवे उसको भूतावेशलक्षण जानना ॥ ४ ॥
चिकित्सां तस्य वक्ष्यामि येन संपद्यते सुखम् ॥
उशीरं चन्दनं चैव प्रियंगुं तगरं तथा ॥ ५॥
रक्तचन्दनकुष्ठं च लेपो भूतविनाशकः ॥६॥
ॐ नमो भगवते उड्डामरेश्वराय कुहुनी कुर्वती
स्वाहा ।। शताऽभिमंत्रितं कृत्वा ततो सुस्थो
भविष्यति ॥७॥

उहीशतंत्रम् । अर्थ-अब उसकी चिकित्सा वर्णन करता हूं, जिसके फरनेसे सुख होता है, खस, चन्दन, कांगनी, नगर ॥५॥ तथा लाल चन्दन, कृठ इन औषधियोंका लेप भूतवाधा- को विनाश करता है ॥ ६ ॥ ॐ नमो भगवते० इत्यादि मंत्रसे सौ वार अभिमंत्रित करे तो उनके करनेसे आनन्द- चित्त होयेगा ॥ ७ ॥ ॥औपधीकल्पः ॥ औषधी परमा श्रेष्ठा गोपितव्या प्रयत्नतः ॥ यस्याः प्रयोगमात्रेण देवता याति वश्यताम् ॥८॥ शनिवासरे ग्रामस्योत्तरदिशि लघुकंटकारिमूलं लोहितपाटलयस्त्रेण संयम्य शुचिर्भूत्वा निमंत्र- येत् । आदित्यवासरे खदिरकाष्ठकोलकेन नग्नी. भूयोत्पाट्य मुक्तकेशो गृहीत्वा तत्क्षणात्स्त्री- पार्थं पेपयेत् सा वशीभवति नात्र संदेहः॥९॥ अर्थ-अब औषधीकल्प लिखते हैं-परम श्रेष्ठ यह औपधिकल्प यलपूर्वक छिपानेके योग्य है, जिसके प्रयोग

भापारीकासहितम् ।
मात्रसे देवता वश हो जाते हैं। शनिवारके दिन यामके
उत्तरदिशामें काले वा लाल सपेद वस्त्र पहिरकर पवित्र होकर
छोटी कटाईको न्यौत आवे, रविवारके दिन प्रातःसमय
खैरकी लकडीकी कीलसे अपने शिरकेश मुक्त करके अर्थात
चोटी खोलकर नम होकर उखाड लावे, तिसको लाकर
स्वीके पास रख देवे तो वह स्त्री निःसंदेह वश हो जावेगी ॥९॥
ॐक्षांक्षी शं क्षों क्षः । इत्यनेन मंत्रण
धीमान् पंचनातीनि फलानि पंचप्रकाराक्षताः
पंचवर्णपुष्पाणि स्थिरचित्तेन मंत्री कलशोपार
फलं प्रविन्यसेत् पूजयेत् नित्यं सहस्त्र जपेञ्च ।।
अपुत्रा लभते पुत्रं दुर्भगा सुभगा भवेत्॥
अनैनवाभिपेकेण कन्या प्राप्नोति सत्पतिम् ॥१०॥
मंत्रावधिप्रयोगेण सर्वाः सिद्ध्यंति सिद्धयः॥
नराभिचारिताः क्रूरैः शुद्धदेहा भवन्त्यपि ॥११॥
ये चान्ये विघ्नकारश्चरति भुवि राक्षसाः॥
ते सर्वे प्रलयं यांति सत्यं देवि वदामि ते ॥ १२॥

८२ उड्डीशतंत्रम् । सकृदुच्चरितो मंत्रो महत्पुण्याय जायते ॥ ब्रह्महत्यादयो दोपाः क्षयं यांति न संशयः ॥१३॥ ॐ घंटाकर्णाय स्वाहा । इति मंत्रं सप्तवारं जपित्ता ग्रामं प्रविशेत् तदा विशेपभोजनं प्राप्नोति ॥१४॥ अर्थ-ॐ क्षांशी च ौ सौ क्षः । इस मंत्रसे बुद्धि- मान पांच जातिके फल, पांच प्रकारके अक्षत, पांच रंगके फूल इन सामग्रियोंसे मन्त्रपूर्वक सावधानचित्त होकर विधिसे कलश स्थापन कर फल चढावे, पूजन करे, नित्य प्रति एक सहस्र जप करे तो पुत्रहीन स्रीको पुत्र प्राप्त होये, दुर्शगा सागा होवे तथा इस प्रयोग करनेसे कन्या उत्तम पति पाये ॥ १० ॥ मंगोन अक्षरांकी अवधि अर्थात ६ लक्ष प्रयोगों मब मिद्धि होये है तथा सब अभिचारोंमे मनुप्य शुद्ध देह हो जाये ॥ ११ ॥ जो अन्वनी चिन्न करनेवाले पृथिरीपर गक्षम विचरने हैं, वे सब नागो भान होवं, श्रीशिवजी कहते हैं, हे देवि ! यह में मत्य करता हूं ॥ १२ ॥ एक वाग्मी मंत्र उच्चारण . - भाषाटीकासहितम् । करनेते महापुण्य होता है और ब्रह्महत्या आदि दोष निःसन्देह नाश हो जाते हैं १३ ॥ ॐ घंटाकर्णाय स्वाहा । यह मंत्र सात बार जप कर ग्राममें प्रवेश करे तो विशेष भोजन माप्त होता है ॥ १४ ॥ रविवारे शुचिर्भूत्वा शिमूलान्युत्पाटय बहुजलेन प्रक्षालयेत् तवस्तीक्ष्णशस्त्रेण छित्त्वा खंडखंडा- न्कारयेत् । ततश्छायायां शुष्काणि कृत्वा वृक्षण- चूर्णानि कारयेत् । नूतनभाण्डे निधापयेत् विडा- लपदमात्रं भक्षयेत् । वातरोग नाशयति इन्द्रिय- बलं भवति क्षुधा च जायते जठरस्थिताश्च सर्वे रोगा विनश्यन्ति हस्तपादशिरपीडा न भवति रक्तविकारदोपो न जायते॥ अर्थ-रविवार के दिन पवित्र होकर सहजनेकी जडको उखाडकर बहुतसे जलमें धोवे, अनंतर पैने हथियारसे का- टकर खण्ड खण्ड करे । फिर छायामें सुखाकर महीन चूर्ण बना लेवे । फिर नवीन हांडीमें रख छोडे । फिर ८४ उड्डीशतंत्रम् । बिडालपदमात्र क्षण करे तो वातरोगका नाश होता है, इंद्रिय बलवान होती हैं, शुधानी होती है और उदरमें स्थित सम्पूर्ण रोग नाश हो जावे हैं, हाथ पैर और शिरकी पीडा नहीं होती है। रक्तविकारदोष नहीं होते है । शियमूलं चाईकराजिका कटुतैलमेतत्समं कृ. त्वा नूतनभांडे निधाय मासकेन संधान साध्य- ते। ततः प्रहरैकोपरि खण्डमेकमुद्धृत्य प्रतिदिन भक्षयेत् । तदा उदरांतरव्याधिमांसग्रन्थिशाह- गुल्मारुचिश्वासकासधरजठरकुष्ठपामाविचर्चि- कादयो दोपा. सर्वे नाशमायान्ति नात्र सन्देहः ।। अर्थ-सहजनकी जड, अदरख, राई, कडुवा तेल इन सबको समान भाग लेकर नगीन हाडीमें एक मासतक रस- कर साधन करे, अनन्तर एक प्रहर व्यतीत करके प्रतिदिन चलानुमान माना भक्षण को नो उदर (पेट) के मध्यकी व्याधि, मासयन्थि, पीह, गुल्म, अमषि, बाम, काम, गर, - - भापाटीकासहितम् । जठररोग, कुष्ठ, दाद, खाज, फोडा, फुसी आदि रोग सब नाराको प्राप्त होते हैं इसमें संशय नहीं करना ॐ नमः पण्मुखाय शक्तिहस्ताय मयूखाहनाय औपधिक निदोंपे भव स्वाहा ॥ अनेन मंत्रण चतुर्दश्यां तिथो शुचिर्भूत्वा मयूरशिखा समु- त्पादयते तदामहाप्रभावयुक्ता भवति गव्यवृतेन सह नस्यंगृह्यते तदेन्द्रियबलं भवति घृतमधुभ्यां सहावलेहेन गलरोगो न जायते । एक वर्ष क्रिय- माणे देवतुल्यो भवति सर्व रोगा नश्यति ॥ अर्थ-ॐनमः पण्मुखाय० इत्यादि मंत्रसे चतुर्दशी तिथिको पवित्र होकर मयूरशिखा नाम औषधिको उखाड़ लावे सो वह महाप्रभावशाली औषधि उसको लाकर गौके पीके साथ नस्य लेवे तो इन्द्रियोंमें बल होता है तथा घी सहनके साथ चटनी बनाय चाटनेसे गलरोग नहीं होता है, एक वर्ष पर्यन्त इस मयूरशिखाका सेवन करनेसे देवताके तुल्य होता है और सब रोग नाश हो जाते हैं ।

उड्डीशतंत्रम् । त्रिफलापंचनिंव,गराजमयूरशिखा एतानि सम- भागानि श्लष्णवर्णानि कारयेत् । मधुना सह लेहयेत् भोजनं च यथाहारं कारयेत् । एतचूर्ण सुरैरपि दुर्लभम् । मयूरशिखाचूर्ण गव्यघृतेन तक्रेण सह दीयते तदा कृमयः पतंति । यदा लवणेन सह दीयते तदा मृत्तिकादोपं नाशयति । यदि गव्यधृतेन सह दीयते तदा आमानुवन्धं नाशयति । गुडूचीगुंठीचूर्ण मयूरशिखाचूर्ण च गोमूत्रेण सह दीयते एकीकृत्य भक्षितम् तदा हस्तपादादिमुखशोभा भवति । एतचूर्ण शिरी- पवल्कलचूर्ण च गव्यघृतेन सह यदा दीयते तदा वन्ध्या गर्भ धाति । एतचूर्ण लक्ष्मणास- हितं गव्यदुग्धेन सह यस्यै दीयते सा गर्भवती भवति । एतचूर्ण कपित्थफलेन सह याऽपुत्रा खादति तस्याः पुत्रो भवति नान्यथा । एतचूर्ण श्वेतकंटकारिकामूलस्य चूर्ण समं एकीकृत्य .

भापाटीकासहितम् ।
ककुभफलकाथेन ऋतुसमये आदौ वंध्याय
दीयते तस्याः शरीर शुद्ध पश्चाहतुसमयोपरि
पंच दिनानि दापयेत् तदा गर्भधारणं भवतीति
निश्चितम् ॥ इति मयूरशिखाकल्पः।।
अर्थ-त्रिफला (आंवला, हरे, बहेडा), पांच निय,
भांगरा, मोरशिखा यह सब समान भाग लेकर महीन
चूर्ण पीस लेके सहतके साथ सेवन करे तो भोजन यथो-
चित करे यह चूर्ण देयताओंकोजी दुली है। मोरशिखाका
चूर्ण गायके घीके साथ और छाछके साथ देवे तो कीडे
गिर जाते हैं । तथा जो लवणके साथ देवे तो मृत्तिका-
दोष नाश हो जाता है। जो गौके घोके साथ देवे तो
आमबंधदोष नाश हो जाता है। तथा गिलोय और
सोंठका चूर्ण व मोरशिखाका चूर्ण गोमूत्रके साथ एकमें
करके देवे तो हाथ पाव मुख आदिकी शोभा होती है।
यह चूर्ण सिरसके बकरके चूर्णको घोके साथ जो देवे तो
वन्ध्या गर्नको धारण करती है । तथा यह चूर्ण लक्ष्मणा-

८८ उड्डीशतंत्रम् । सहित गौके दूध के साथ जिस स्त्रीको देवे सो गर्भवती होवे । यह चूर्ण कैथके फलके साथ पुत्रहीन खावे तो उसके पत्र होता है इसमें अन्यथा नहीं जानना तथा यह चूर्ण सपेद कटाईकी जडके साथ ककुन (कोहवृक्ष ) के काढके सहित ऋतुसमय प्रथम बन्ध्याको देवे तो उसका शरीर शुद्ध होवे, पश्चात् ऋतुसमयके उपरान्त पांच दिन- पर्यन्त देवे तो निश्चय वन्ध्या स्त्री गर्भ धारण करती है। यह मयूरशिखाकल्प भया ॥ ॥पुष्टिकारकयत्नः॥ मापैस्तु पायसं कृत्वा धृतशर्करया युतम् ।। भुंजानः स्त्रीशतं भुक्ते हृष्टः सन्तुष्टमानसः॥१॥ अश्वगंधां समरिच तिलान्शर्करया युतान् । हेमन्तकाले यो भुक्ते मांसाशी पुष्टिवर्धनः ॥२॥ अर्थ-उडदोंकी खीर बनाकर घीशक्कर मिलाय सानेसे सौ स्त्रियोंको मोगकरे और आनन्द व सन्तुष्टचित्त रहे॥१॥ असगन्ध, मिर्च, तिल, शक्कर इनको मिलाय हेमन्तकालमें

भाषादीकासहितम् ।
जो भक्षण करे वह हृष्टपुष्ट शरीरवाला हो जावे ॥ २ ॥
॥ गाढीकरणम् ॥
कपूरं चैव कस्तूरी जातीफलसमाक्षिकम् ॥
गुह्यस्य लेपानारीणां गाढीकरणमुत्तमम् ॥ ३ ॥
घातकी चाश्वगन्धा च शाल्मली खादिरं जलम् ।।
एतेन क्षालयेद्योनि ततो विस्तीर्णतां वज्रेत् ॥४॥
अर्थ-कपूर, कस्तुरी, जायफल, सहत इन सबको
लेके लेप बनाय गुदासे भगपर्यन्त स्त्री लेपन करे तो यह
उत्तम गाडीकरण प्रयोग है ॥३॥ धाई, असगन्ध, सेमली,
खैरका जल इनको लेके योनिको प्रक्षालन करे तो भग
विस्तारयुक्त हो जावे ॥४॥
कटुचिकं विडंग च पचेतलं समाक्षिकम् ।।
प्रयत्नतस्तस्य लेपायोनिः संकोचतां ब्रजेत् ॥५॥
नालानि चोत्पलानां च नारक्षिीरेण पेपयेत् ॥
दशवारप्रसूतापि कन्यात्वमुपजायते ॥६॥

९० उड्डीशतंत्रम् । कुंकुम हरतालं च पिट्या योनि प्रलेपयेत् ॥ निरानं पंचरानं वा योनिर्भवति संवृता ॥७॥ अर्थ-त्रिकुटा (सोंठ, मिर्च, पीपर), वायविडंग इनको तेलमें पचाव फिर सहत मिलाय यत्नपूर्वक उसका लेप योनिपर करनेसे योनि संकोचयुक्त अर्थात् सिमिट जावे छोटी हो जाये ॥ ५॥ कमलोंके नाल स्वीके दूधके साथ घीसे अर्थात् पीसकर योनिपर लेप करे तो दशवार पुत्र जनी भईभी स्त्री कन्याके भगके समान भगवाली हो जावे ॥ ६ ॥ केशर, हरताल पीसकर तीन रात्रि वा पांच रात्रि योनिपर लेप करे तो योनि छोटी हो जाती है ॥ ७॥ ॐ अधोरेभ्योऽथ पोरेभ्यो घोरवोरतरेभ्यः सर्वे- भ्यः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः ।। इत्यधोरमंत्रः ।। गोशृंगं सर्पनिर्मोकी कार्पासा- स्थिवचान्वितम् ॥ अनुविष्टा तुपा केशा मरिचं वृहतीद्वयम् ।। ८॥ द्वे निशे पद्मकं पित्तं मायूरं कुंदुरूफलम् ॥ धूपो भूतग्रहादीनां शाकिनी- .

भापाटीकासहितम् ।
फणिनामपि ॥ उच्छेदं कुरुते शीघ्रं तमसां
भास्करो यथा ॥ ९॥
अर्थ-ॐ अधोरेग्यो। यह अघोरमंत्र है इस
मंत्रसे गोका सींग, सांपकी केंचली, विनौर, वच इनको
लेने तथा गोबर भूसी, बाल, मिर्च, दोनों कटाई ॥ ८॥
दोनों हल्दी, कमलगट्टा, पित्तपापडा, मोरशिखा, कुंदुरूका
फल इन सबकी धूप बनाय देनेसे भूतग्रह आदिक तथा
शाकिनी डाकिनी सर्प आदिको शीव दूर करे जैसे अंधकार
सूर्यसे नाश हो जाता है ॥ ९ ॥
। ज्वरवारणम्॥
श्रीवेष्टकं घृतं हिंगु देवदारु गवाक्षि च ॥
गोवालाः सर्पपा केशाः कटुकी निम्बपल्लवाः ॥१०
दे वृहत्यौ पचा चव्या कासास्थिरुपा यवाः॥
छागरोमाणि मायूरपिच्छमेकत्र मेलयेत् ॥ ११ ॥
सुपिष्टो वत्समूत्रेण मृद्भाण्डे धारयेधः ।।
एप माहेश्वरो धूपो धूपितोन्मत्तरोगिणे ॥ १२ ॥

उड्डीशतंत्रम् । ग्रहरक्षःपिशाचाद्याः पन्नगा भूतपूतनाः॥ शाकिन्येकाहिकद्वित्रिज्वराश्चातुर्थिकांतकाः १३॥ नश्यन्ति क्षणमात्रेण ये चान्ये विनकारिणः ।।१४।। अर्थ-ज्वरनिवारणोपाय वर्णन करते हैं-लोबान, घी, हींग, देवदारू, इन्द्रवारुणी, गोदंती, सुगंधवाला, सरसों, केश, कुटकी, नबिके पत्ते ॥ १० ॥ दोनों कटाई, वच, चव्य, विनौले, सूखे जब, यकरीके रोम, मोरशिखा यह सब लेकर एकमें मिलाय लेवे ॥ ११ ॥ अनन्तर बैलके मृत्रसे पीसकर मिट्टीके कोरे पात्र में रख छोडे, यह माहे- श्वरधूप है, उन्मत्त रोगीको देवे ॥ १२॥ तो ग्रह, राक्षस, पिशाच आदि तथा नाग, भूत,पूतना, शाकिनी, ग्रह, एका- हिक, दयाहिक, न्याहिक, चातुर्थिक ज्वर॥ १३॥ तथा जे अन्यमी विनकारी रोग है ये सब नाशको प्राप्त होते हैं। गुग्गुलं लशुनं सर्पिः कंचुकः कपिरोम च ॥ शिखिकुक्कुटयोर्विष्टा मलः पारावतस्य च ॥ १५ ॥ - - भापाटीकासहितम् । एतदूपाद् ग्रहाः कूराः पिशाचा भूतपूतनाः॥ डाकिन्यो हिज्वरारोदा नश्यन्ति स्पर्शमात्रतः१६ अर्थ-गूगल, लहसन, घी, सांपकी कांचली, वानरके रोम, मोर ,मुर्गाकी विटा, कबूतरको बीठ ॥ १५ ॥ इन वस्तुओंको धूप देनेसे क्रूर ग्रह, पिशाच, भूत, पूतना, डाकिनी, ज्वर आदि सर्शमावसे नाशको प्राप्त होते हैं। १६ अंजनं राजिकाकृष्णामरिचर्भूतनाशनम् ।। नागरं बकुचीनिम्ब एतद्वा रौद्रभंजनम् ॥ १७ ॥ सहिगुवारिणा पीता भूकदम्बस्य मूलिका॥ शाकिनीग्रहभूतानां निग्रहं कुरुते ध्रुवम् ॥ १८॥ विशालायाः फलं पक्कं हितं गोमूत्रनस्यतः॥ ब्रह्मराक्षसभूतानि पद्मं वा मरिचान्वितम् ॥ १९॥ पुष्ये कूष्मांडतोयेन निशां सम्पिष्टय निर्मिताम्।। गुटिकांजनमात्रेण ग्रहभूतविनाशिनी ॥ २० ॥ नमो भगवते रुद्धाय नमः क्रोधेश्वराय नमोज्यो- तिःपतंगाय नमो नमः सिद्धरूपो रुद्रो ज्ञापयति . । उड्डीशतंत्रम् । स्वाहा।।सर्पपैः सप्तयारं जप्तैः हटग्रहो मुंचति॥२१॥ अर्थ-अंजन ( सुर्मा ), राई, काली मिर्च इनका अंजन भृतको नाश करता है तथा सोंठ, वाकुची, नींव इनका अंजनी नेत्रोंमें करनेसे मृतग्रह नाश हो जाता है ॥ १७ ॥ हींगके जलमें कुलाहलवृक्ष अथवा अज- वायनकी जडको पीवे तो निश्चय शाकिनीमह तथा भूतादि ग्रहोंका नाश करे ॥ १८ ॥ इन्द्रवारुणीका पका जया फल लेके उसका नस्य बनाय गोमत्रके साथ सुंघावे अथवा मिर्च और कमलगट्टाके चूर्णका नस्य देवे तो ब्रह्मराक्षस और भृतादि दोप नाश हो जाये ॥ १९ ॥ तथा कुम्हडेके फूलोंको जलमें पीसकर गोली बना लेये फिर उसका अंजन करनेमे वह गुटिका नृतग्रहकी नारा करनेवाली होती है ॥ २० ॥ ॐ नमो भगवते. इत्यादि मंत्र पढकर सरमा लेकर सात वार मंत्रसे अभिमंत्रित कर मार देनेसे भृतयह छूट जाता है ।। २ ।। ॐ नमो भगवते रुद्राय शूलपाणये पिशाचाधि भाषाटीकासहितम् । पतये आवेशय २ कृष्णपिंगल फट् स्वाहा ॥ अनेन ज्वरमावेशयति ॥ ॐ नमो भगवते ।। रुद्धाय छिन्धि २ ज्वरस्य ज्वरोज्वलितकराल- शुलपाणे हुं फट् स्वाहा । एप निग्रहं करोति । ॐ नमो भगवते रुद्राय भूताधिपति हुं फटू स्वाहा । सर्वज्वरानुपशाम्यति ॥

, उड्डीशतंत्रम् । स्वाहा।।सर्पपैः सप्तवारं जप्तैः दृढग्रहो मुंचति॥२१॥ अर्थ-अंजन ( सुर्मा ), राई, काली मिर्च इनका अंजन भूतको नाश करता है तथा सोठ, बाकुची, नींव इनका अंजनभी नेत्रोंमें करनेसे मृतग्रह नाश हो जाता है ॥ १७ ॥ हींगके जलमें कुलाहलवृक्ष अथवा अज- वायनकी जड़को पीवे तो निश्चय शाकिनीग्रह तथा भूतादि ग्रहोंका नाश करे ।। १८ ॥ इन्द्रवारुणीका पका जया फल लेके उसका नस्य बनाय गोमूत्रके साथ सुंघावे, अथवा मिर्च और कमलगट्टाके चूर्णका नस्य देवे तो ब्रह्मराक्षस और अतादि दोप नाश हो जावें ॥ १९॥ तथा कुम्हडेके फूलोको जलमें पीसकर गोली बना लेवे फिर उसका अंजन करनेसे वह गुटिका जूतमहकी नाश करनेवाली होती है ॥ २०॥ ॐ नमो भगवते. इत्यादि मंत्र पढकर सरसों लेकर सात बार मंत्रसे अनिमंत्रित कर मार देनेसे नृतग्रह छूट जाता है ।। २३ ॥ ॐ नमो भगवते रुदाय शूलपाणये पिशाचाधि- भापाटीकासहितम् । मंचस्तु ॥ ॐ नमो भगवती गृही गृही वाराही सुभगे ठठः॥ धृतगुग्गुलधूपेन सुस्थो भवति नान्यथा ॥२७॥ अर्थ-अब उन्मनीकरण कहते हैं-धतूरेके बीज व लोहकिट्टका चूर्ण तथा गौदाकी वीट वकंजाके बीज न सबको बराबर भाग लेकर ॥ २५ ॥ चूर्ण करे, यह उन्मनचूर्ण पक्षण करनेसे उसी क्षण मनुष्य उन्मन हो जाता है, इक्कीस बार मंत्रसे अभिमंत्रित करके देवे॥२६॥ फिर खानपानमें देवे तो उन्मत्त होवेगा, मंत्र यह है ॥ ॐ नमो भगवती गृही गृही वाराही सुभगे उठः। घी और गूग- लकी धृपदेने से सुस्थ होवे, यह सत्य है अन्यथा नहीं॥२७ ॥ विस्फोटीकरणम् ॥ अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि योग परमदुर्लभम् ।। शवणामपकाराय यथा मम प्रकाशितम् ॥२८॥ येन योजितमात्रेण शवदेहे समन्ततः॥ विस्फोटकाश्च जायन्ते घोराः शत्रुविनाशकाः२९॥

उड्डीशतंत्रम् । अर्थ-सद्योजात० इत्यादि मंत्र तथा अबोरमंत्रको मनविपे धारण करनेसे प्राणियोंका ज्वरनाश हो जाता है, सम्पूर्ण सिद्धोंसे वन्दित श्रीरुदजीके मंत्रका प्रभावही ऐसा है ॥ २२ ॥ तथा इस विद्या में प्रयुक्त हो वटवृक्षके पत्ते- पर यह मंत्र लिखे, कोयलेसे लिखे तो देसनेही मात्रसे तीक्ष्ण ज्वर नाश हो जाता है ॥ २३॥ तथा यह मंत्र लिखकर दहिनी भुजापर बांधनेसे नित्य आनेवाला ज्वर नाश हो जाता है और १०८ बार मंत्र जपनेसे नित्य ज्वर नाश होता है ज्वरसे प्रस्तके अर्थ यह मंत्र आचार्य जपे तो ज्वर शान्त हो जावे ॥ २४ ॥ ॥ उन्मत्तीकरणम् ॥ अलं कनकवीजानि धूर्तचूर्णसमं ततः।। गृहचेटकविष्ठां तु तथा बीजकरंजकम् ॥ २५ ॥ एतदुन्मत्तकं चूर्ण भक्षणात्तत्क्षणाद्रजेत् ।। एकविंशतिवारानभिमन्य प्रयत्नतः ॥२६॥ खाने पाने प्रदातव्यं तदोन्मत्तो भविष्यति ।।

मापाटीकासहितम् । मंत्रस्तु ॥ ॐ नमो भगवती गृही गृही वाराही सुभगे ठठः॥ घृतगुग्गुलधूपेन सुस्थो भवति नान्यथा ॥२७॥ अर्थ-अब उन्मत्तीकरण कहते हैं-धतूरेके बीज व लोहकिट्टका चूर्ण तथा गर्गीयाकी वीट य कंजाके वीज इन सबको बराबर भाग लेकर ।। २५ ॥ चूर्ण करे, यह उन्मत्तचूर्ण लक्षण करनेसे उसी क्षण मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, इक्कीस बार मंत्रसे अभिमंत्रित करके देवे॥२६॥ फिर खानपानमें देवे तो उन्मत्त होवेगा, मंत्र यह है ॥ ॐ नमो भगवती गृही गृही वाराही सुभगे उठः॥ घी और गूग- लकी धूप देने से सुस्थ होवे, यह सत्य है अन्यथा नहीं।२७ ॥विस्फोटीकरणम् ॥ अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि योगं परमदुर्लभम् ।। शबणामपकाराय यथा मम प्रकाशितम् ॥२८॥ येन योजितमात्रेण शवदेहे समन्ततः॥ विस्फोटकाश्च जायन्ते पोराः शत्रुविनाशकाः२९॥

उड्डीशतंत्रम् । कीटकं पविन्दु च कृष्णवृश्चिकमेव च ॥ मूपकस्य शिरो ग्राह्यं मर्कटस्य तथैव च ।। ३०॥ एतचूर्ण यमो दंड निवारं यत्सुरैरपि । योजयेच्छनुसंघातर्वस्त्र शय्यासु यत्नतः ॥ ३१ ॥ विस्फोटाः सर्वगात्रेषु जायन्तेतिभयावहाः ॥ पीडया सप्तरात्रेण म्रियते नात्र संशयः ॥३२॥ अर्थ-अब विस्फोटीकरण कहते हैं-श्रीशिवनी कहते हैं कि हे देवि ! अब आगे और प्रयोग वर्णन करते हैं जो योग परम दुर्ली है, शत्रुगणोंके अपकारनिमित्त ययो- चित हमसे प्रकाशित किया जाता है ॥ २८ ॥ जिसके करने मात्रसे शत्रुके शरीरमें विस्फोटक कहिये फोडा फुसी आदि घोर पीडा देनेवाली तथा शत्रुओंके नाश करनेवा- ली उत्पन्न हो जावे ॥ २९ ॥ सर्प, भौरा, काला वीछी, मृपक इनका तथा वानरका शिर ॥३०॥ यह चूर्ण यम- दण्डसमान जानना, जिसके निवारण करनेको देवताली स. मर्थ नहीं, यह चूर्ण शत्रुके मारनेसे शत्रुकी शपयार भापाटीकासहितम् । वापर अच्छे प्रकार ढाल देवे ॥ ३१॥ तो उस वस्त्रको पहिरनेसे.सब शरीरमें जयके देनेवाले फोडा फुसी उत्पन्न हो आवें और अत्यन्त पीडा होकर सात दिनमें मृत्युको माप्त हो जावे ॥ ३२॥ ॥ तथा च॥ मातुलंगस्य बीजानि पविंदुविषमेव च ।। कपिकच्छोश्च रोमाणि हिंगुभल्लातकं तथा ॥३३॥ पतानि समभागानि तथा तंदुलकारिका । योजयेत्सर्वयत्तेन गोप्यमेतत्सरैरपि ॥३४॥ योजयेच्छवसंघाते प्रस्वेदं तं तु तद्भवत् ।। अग्निसंघा इव स्फोटा जायते नाऽन्न संशयः॥३५॥ नीलोत्पलं सुकुमुदं तथा वे रक्तचन्दनम् ।। कुछटीपित्तसंयुक्त पेपयित्वा प्रयत्नतः॥ ३६॥ तदा लेपनसंयोज्यं ततः सम्पद्यते सुखम् ॥३७॥ अर्थ-विजौरा नींधूके बीज तथा पीपलामूल, विष, कौंचके रोम, हींग, मिलाथा ॥ ३३ ॥ इन औषधियोंको

उड्डीशतंत्रम् ।
समान भाग लेकर चांवलोंकी भूसी मिलाय अच्छे प्रकार
यलसे धूनी देवे, यह गोप्य यल देवताओंसेमी छिपानेके
योग्य है ॥ ३४ ॥ शत्रुके मारने निमित्त यह प्रस्वेद प्रय-
ल करनेसे अनिके समान दहकते हुएसे फोडा शत्रुके
शरीरसे उत्पन्न हो जायें इसमें संशय नहीं करना ॥ ३५॥
नीलकमल, लालकमल वा सपेद कमल तथा लालचन्दन
और मुरगीका पिन मिलाय पीसे फिर इनका लेप करनेसे
मुखी हो जाता है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥
अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि कुष्टीकरणमुत्तमम् ॥
यस्य योजितमात्रेण कुष्ठी भवति नाऽन्यथा ३८॥
भल्लातकरसं गुंजा तथा वै मंडुकादिका ॥
गृहगोधीसमायुक्ता खाने पाने च दापयेत् ॥३९॥
सप्ताहाजायते कुष्टं तीव्रपीडासमन्वितम् ।।
एतस्य प्रशमं वक्ष्ये यथा रौद्रप्रकाशितम् ॥१०॥
धात्रीसदिरनिवानि शर्करासहितानि च ॥
विचूर्य मधुसर्पियो जीर्णान्नेन प्रदापयेत्॥४१॥

भापाटीकासहितम् ।
शालिभक्तं पटोलंच तथा शीघ्रविपाचिनम् ।।
एतेन दत्तमात्रेण नरः संपद्यते सुखी ॥४२॥
अर्थ-अब अन्य उत्तम कुष्ठीकरणाकार वर्णन कर्म-
गा, जिसके करने मात्रसे मनुष्य कोठी होता है इसमें अ-
न्यथा नहीं जानना ॥३८॥ मिलायेका रस, घुघुची तथा
मेंडक और गृहमोधीको मिलाय खानपानमें दे ये ॥ ३९ ॥
तो सात दिवसमें अत्यन्त पीअसे युक्त कुष्ठरोग हो जावे॥
अब इसके नाशनार्थ उपाय कहूंगा जैसा कि शिवजीने
प्रकाशित किया है ॥४०॥ आंवला, खैर, नींब, शकर
इनका चूर्ण शहत घी मिलाय पुराने चावलोंके साथ देखें
॥४१॥ पथ्यमें चांवलोंका भात, परवल तथा शीघ्र पच
जानेवाले पदार्थ इनके देने मात्रसे मनुष्य सुखी हो जाता
है॥४२॥
1
॥ शिवावलिः ॥ ईश्वर उवाच ॥
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि शिवावलिमनुत्तमम् ॥ ,
न जपो न तपश्चैव न होमो न च संयमः ॥ १३ ॥

१०२
उड्डीशतंत्रम् ।
एकरात्रिप्रयोगेन सिद्धिदा परमा शिवा ॥
सर्वकार्येषु कर्तव्यं शिवापूजनमुत्तमम् ॥ १४ ॥
वशीकरणमुच्चाटे तथा विद्वेपणे नृणाम् ॥
मारणे मोहने चैव स्तम्भने पुष्टिकर्मणि ॥ ४५ ॥
अर्थ-अब शिवावलिविधान वर्णन करते हैं-श्रीशिवजी
बोले हे देवि! अब मैं उत्तम शिवावलिको वर्णन करता हूं,
इसमें न जप है, न तप है, न होम है, न संयम ॥ ४३ ॥
केवल एकरात्रिके प्रयोग पात्रसे श्रेष्ठा शिवा सिद्धिको देवे
है। यह शिवावलि सब कार्योंके विपे करना चाहिये
दमका पूजन परम उत्तम है ॥ ४४ ॥ वशीकरण तथा
उच्चाटनप्रयोगमें व मनुष्योंका विद्वेषण, मारण, मोहन,
स्तंभन तथा पुष्टिकर्म इनमें शिवावलि करना ॥ ४५ ॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां च विशेषतः ।।
महाप्टम्यां प्रयत्नेन होलिकादिवसे तथा ॥४६॥
एकरात्रिप्रयोगेण सर्वकार्य प्रसिद्धयति ।
एकांते च निराहारे स्वयं पाकं प्रकल्पयेत् ॥४७॥

- भापाटीकासहितम् । १०३ तन्दुलं मांसभोज्यं च गोधूमानं सपूपकम् ॥ दधिमापप्रकारं च पायसं शर्करायुतम् ॥ १८॥ रक्षयेत्पाकगेहं च मूपमार्जारकैरपि ।। यदि दूपति कोपिभ्यो जनयापाकगेहतः ।। ४९ ॥ तदान तृप्तिमायाति शिवा सिद्धिविधायिनी। तस्माद्यनेन कर्तव्यं भोजनं विधिपूर्वकम् ॥५०॥ अर्थ-अष्टमी, चतुर्दशी चा नवमी इन विशेष तिथि- यौमें अथवा महाअष्टमीके दिन तथा होलिकाके दिवस यत्नपूर्वक ॥ १६ ॥ एक राविको यह शिवाप्रयोग कर- नेसे सम्पूर्ण कायोंकी सिद्धि होती है, एकांतमें निराहार होकर अपने आप पाकमें जाकर सब बलिका भोजन बनावे ॥ १७ ॥ चावलोंका भात, मांस, गेहूंके मीठे पुआ, दही व उडदके पदार्थ (वडे आदि), सरि शकर मिली मई ॥ १८ ॥ यह सब पदार्थ पनावे चौकासी रक्षा से बिल्ली आदिसे अच्छे प्रकार करे, जो यह पाकगह किसीकीसी दृष्टि व स्पर्शसे दूषित हो जापगा १०४ उड्डीशतंत्रम् । ॥४९॥ तो सिद्धिकी देनेवाली शिवा तृप्त नहीं होगी, इस कारण यत्नसे विधिपूर्वक रक्षा करता हुआ भोजन पदार्थ बनाये ॥५०॥ मंत्रं वक्ष्यामि भो देवि कार्ये कार्ये प्रयत्नतः।। येन सिद्धिर्भवेन्नृणां साधकानां सुखावहम् ॥५१॥ गृह देवि महाभागे देवि कालानिरूपिणि ॥ शुभाशुभफलं व्यक्तं ब्रूहि गृह्ण बलिं तव ॥ १२ ॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिवे बलिं गृह २ अमुकं मे वशं कुरु २ स्वाहा ॥ १ ॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिवे वलिं गृह्ण २ अमुकमुच्चाटय २ ठंठंठं ॥२॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिवे बलिं गृह्ण २ अमुकं रोगविमुक्तं कुरु २ ते नमो नमः ॥ ३॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिवे बलिं गृह २ अमुकं विद्वे- पय २ फटू ॥ ४॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिवे बलिं गृह २ अमुकं शांति कुरु २ स्वाहा ॥५॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिवे बलिं गृह्ण २ अमुकं आपाटीकासहितम् । १०५ कार्य कुरु २ स्वाहा ॥६॥ ॐ पोरे पोरदर्शने शिव पलिं गृह २ अमुकं शई हन हुन हुहुहुँ स्वाहा ॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिव बलि गृह २ अमुक सिद्धि मे दर्शय २ स्वाहा ॥ एवं विधानं यः कुर्यान्मांसेन मधुना सह || क्षिप्रं भवति कार्याणि एकरात्रिप्रयोगतः॥५३॥ अर्थ-शिवजी कहते हैं हे देवि ! अब कार्य कार्यमें अमपूर्वक पलसे पृथक् २ मंत्र वर्णन करता हूं, जिन मंत्रोंसे मनुष्यों को सुखदायिनी सिद्धि होयेगी ॥ ५१ ॥ प्रत्येक कार्यमें मंत्रार्थ इसी प्रकार है, हे देवि! हमारे दिये हुए बलिको महण करो और हे कालामिस्वरूपिणि देवि! शुभाशुतफल प्रगट करो और बलि ग्रहण करे तो कहीं ॥ ५२ ॥ अब आगे मंत्र लिखे हैं जिनको साधकजन समझकर यथाकार्यमें उच्चारण करें। इस प्रकार विधिपूर्वक जो मनुष्य मांस व शहतसहित शिवाको बलिदान करेगा, उ- सका एकही रात्रि के प्रपोगसे सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होवे हैं ।

उड्डीशतंत्रम् । यदि दत्तं बलि खादेच्छिवा पोरनिनादिनी ॥ तदा कार्य न ज्ञातव्यं सिदिन च शिवा भवेत्५४ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्यं बलिमुत्तमम् ॥ स्मशानभूमो कर्तव्यं दक्षिणस्यां दिशि प्रभो९५॥ मारणे दक्षिणमुखे सिद्धिकार्य तु पश्चिमे ।। उच्चाटने चोत्तरस्यां शान्तिकर्मणि प्रामुखे५६॥ आकर्षणे तथाग्नेय्यां नैऋते विद्वेषणं भवेत् ॥ वायव्यां मोहनं चैव ईशाने ज्ञानसिद्धये ॥५७॥ वश्याकर्पणकार्याणि वसन्ते कारयेद्बुधः ।। शिशिरे मारणं प्रोक्तं शरदे शांतिकं तथा ॥२८॥ अर्थ-जो दी हुई बलिको घोर शब्द करनेवाली शिवा न सावे तो कार्यकी सिद्धि नहीं जानना, अर्थात् वह शिवा सिद्धि करनेवाली नहीं होती है ॥ ५४॥ इस कारण सब प्रयलोंसे उत्तम बलिदान करे, स्मशानमामिमें को तथा दक्षिणदिशामें करे ॥ ५५ ॥ मारणपयोगकी मिहके अर्थ दक्षिणदिशा तथा दक्षिणमुख होकर करे, जापाटीकासहितम् । १०५ कार्य कुरु र स्वाहा ॥६॥ ॐ पोरे पोरदर्शने शिव बलिं गृह २ अमुकं शत्रु हन हन हुँहुई स्वाहा ॥ ॐ घोरे घोरदर्शने शिरे बलिं गृह २ समुकं सिद्धिं मे दर्शय २ स्वाहा ॥ एवं विधान यः कुर्यान्मांसेन मधुना सह ॥ क्षिप्रं भवति कार्याणि एकरानिप्रयोगतः॥५३॥ अर्थ-शिवजी कहते हैं हे देवि ! अव कार्य कार्यमें कमपूर्वक यलसे पृथक् २ मंत्र वर्णन करता हूं, जिन मनाते मनुष्योंको सुसदायिनी मिदि होवेगी ॥ ५ ॥ प्रत्येक कार्यमें मंत्रार्थ इसी प्रकार है, हे देवि ! हमारे दिये हुए बलिको ग्रहण करो और हे कालामिस्वरूपिणि देवि! शुनाशुभफल प्रगट करो और वलि ग्रहण करे तो कहा ॥ ५२ ॥ अब आगे मंत्र लिखे हैं जिनको सापकजन समझकर यथाकार्यमें उच्चारण करें। इस प्रकार विधिवक, जो मनुष्य मांस व शहतसहित शिवाको वलियन करेगा, सा एकही रात्रिके प्रयोगलें सम्पूर्ण कायं निद होवर उडीशतंत्रम् । देवे है ॥५९ ॥ तृतीया तथा त्रयोदशी तिथिमें आकर्ष- णप्रयोग सिद्ध होते है। उच्चाटनप्रयोग हे वरानने ! द्वि- तीया तथा पष्ठी तिथि कही हैं ॥ ६ ॥ तथा मोहना- योगमें नवमी व चतुर्दशी सिद्धिदायिनी कहीं है. एकादशी और द्वादशी मारणमें कही है ।। ६३ ॥ शिवावलिविधानं तु कथितं तव शोभने । साधका ये करिष्यन्ति ते भवन्ति च निर्भया:६॥ राजदारे इमशाने च नदीवनसमागते ॥ संग्रामभूमो दुर्गे च ते चरन्ति विनिर्भयाः ॥६३ ॥ ग्रहभूतपिशाचानां शांति कुर्यान्मदेश्वरि ।। न मारी न च दुर्भिक्ष यत्र पूज्यः शिवावलिः॥६४॥ अर्थ-हे शोमने ! यह शिवारलिविधान हम तुमारेसे कहा, जे साधक इसको करेंगे ने निर्भय हो जाते हैं ॥१२॥ राजद्वार और स्मशानमें, नदी तथा वनके बीच व संयामन- मिमें, दर्गमें वे निर्मय विचरते हैं।६३॥ ग्रह, जत, पिशाच इनकी शान्ति हे महेश्वार ! करे जहां शिवालिका पूजन ,

वेताल और अपस्मार (मृगी) आदि ज्वर समस्त यह
भाषादीकासहितम् ।
होता है वहाँ न मारी और न दुर्भिक्ष होता है ॥ ६४ ॥
दृष्टाय च न दातव्यं परविद्यारताय च ॥
देयः शिष्याय पुत्राय शान्ताय गुरुभक्तये ॥६५॥
पूतनाभूतवेतालाापस्मारादयो ज्वराः ॥
नवसन्ति गृहे ह्यस्मिन् यत्र पूज्यः शिवावलिः६६
सर्वाबाधा विनश्यन्ति सर्वदुःखं विनाशयेत् ।।
सर्वारयो विनश्यति यत्र पूज्यः शिवावलिः॥६७॥
सत्यं सत्यं महेशानि मम वायं न संशयः ।।
उड्डीशमुत्तमं तत्रं रावणेन प्रभापितम् ॥ ६८॥
इति श्रीलंकापतिरावणाविरचिते पार्वतीघर-
संवादे उड्डीशतंत्रे दशमः पटलः ॥ ३०॥
अर्थ-यह उडीशतंत्र दुष्टके अर्थ नहीं देता तथा
परविवारतके अर्थ नहीं देना, शिष्यके वा पुत्रके, शांत.
चित्त तथा गुरुभक्तके अर्थ देना ॥६५॥ पूतना, शत,
नहीं वसते हैं जहां कि शिवाबलि पूजन होता है ॥६६॥

-
उड्डीशतंत्रम् ।
सम्पूर्ण बाधायें नाश हो जाती हैं और सब दुःखनाश
हो जाते हैं, तथा सम्पूर्ण शत्रु विनाश हो जाते हैं, जहां
शिवाका पूजन व बलि होते है ॥ ६७ ॥ हे शिवे ! सल्ल
सत्य हमारा वाक्य है, इसमें संशय नहीं, यह उत्तम ।
उड्डीशतंत्र रावणने वर्णन किया है । ६८
इति श्रीउमामहेश्वरसंवादे लंकापतिरावणविरचिते ज्योति-
वितण्डितनारायणप्रसादमुकुन्दरामान्यां विरचितमापाटी-
कान्विते इन्द्रजालकौतुकवर्णनो नाम दशमः पटलः ॥१०॥
प्रार्थना।
समुंद्रेषुनिधीन्द्रन्दे आश्विनस्यासिते दले ।।
पंचम्यां गुरुवारे च भाषा सम्पूर्णतामगात् ॥ १॥
अशुद्धं यत्किचित्पावलिखितमत्राल्पकुधिया ।
बुधैस्तत्संशोध्यं परमकृपया द्रोहरहितः ।।
यतो याचे सर्वानखिलगुणविज्ञान्सुविबुधान् ।।
कृपां यूयं दध्वं पदकमलसेवानुशरणः ॥२॥

भापाटीकासहितम् । १११
अर्थ-श्रीमन्महाराजा विक्रमादित्यजीके संवत्
१९५४ आश्विनक्रष्ण पंचमी गुरुवारके दिन यह उड्डीश-
| तंबकी नापा पं० नारायणप्रसादजी करके पूर्ण करी गई।
॥१॥ यहां इस पुस्तकमे हमारी अल्प बुद्धि करके लि-
सा गया जो कुछ अशुद्ध रह गया हो सो विदजन दोहर-
हित होकर अपनी परमदयालतासे कृपापूर्वक शुद्ध कर लें।
इसीसे सम्पूर्ण गुणोंके ज्ञाता समस्त बुधजनोंके चरणकम-
लोकी सेवामें में शरण है यह हमारी विनयपूर्वक प्रार्थना है.
अस्य ग्रन्थस्य तात्पय्यैश्रुत्वा यत्नाद्विलोक्यताम् ।।
उल्लसिष्यति दुप्यति सन्तोऽसन्तश्च भूतले ॥३॥
अर्थ-इस ग्रन्थके तात्पर्यको सुनकर और यन्त्रपूर्वक
दोश्कर पृथिवीमें सन्त जन प्रसन्न होवेंगे और असन्तजन
कहिपे असज्जन दुःखी होगे ॥३॥

११२ उड्डीशतंत्रम् । । समर्पणम् ।। लक्ष्मीपुरे बरेल्यां च नारायणमुकुन्दयोः ।। ताभ्यामुड्डीशतंबीयं गंगाविष्णोः समर्पितः ॥४॥ अर्थ-लखीमपुर और बांसवरेलीमें संस्कृतपुस्तकाल- यके खामी पंडित नारायणप्रसाद मुकुन्दराम उन दोनोंने यह उड्डीशतंत्र भापाटीकासहित श्रीयुत सेठ गंगाविष्णु श्रीकृष्णदासजीके अर्थ समर्पण करा ॥ ४॥ समाप्तोयं ग्रन्थः। , पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना कल्याण-मुंबई.

Uddish Tantram Parvatishwar Sanvad Rupam

Author
Narayan
Title
Uddish Tantram Parvatishwar Sanvad Rupam
File name
Uddish Tantram Parvatishwar Sanvad Rupam
Text
OCR done
Citation
1820
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,laxmi Venkateshwar
Language
Sanskrit
Pages
107
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311340
Barcode
99999990320237.00
Scanning centre
Banasthali University
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