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Tripadi
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त्रिपदी
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त्रिपदी
आशापूर्णा देवी
(भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता)
विशाल साहित्य सदन
20-ई, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
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रात काफी गहरा उठी है। सड़कों पर चलने वाले यान-वाहन विरल नहीं हुए हैं, फिर भी कम तो हो ही गए हैं। निममितों में से अनेकों ने विदा ले ली है और बाकी भी जाने को प्रस्तुत हैं । प्रतापराय के गेट पर से एक- एक, दो-दो करके उपस्थित कारें खिसक रही हैं, वही कारें जो अभी तक सड़क के दोनों और इस छोर से उस छोर तक अपने चिकने गंभीर चेहरे लिए लम्बी लाइन लगाए हुए थी । प्रतापराय काफी दिन पूर्व ही दिवंगत हो चुके है, फिर भी इस मकान को लोग अभी 'प्रतापराय को कोठी' कहकर ही पुकारते हैं। संभवतः कोठी के वर्तमान मालिकों ने उपर्युक्त नाम को लोगों की स्मृति से पोछ डालने का कोई प्रयास नहीं किया है, इसी कारण लोगों का पुराना अभ्यास वरकरार है। अवश्य ही वर्तमान स्वामित्व दो व्यक्तियों में घटा हुआ है। प्रदीप- राय और उनका अविवाहित छोटा भाई संदीपराय । प्रतापराय के दो बच्चे हैं। त्रिपदी: 5 प्रदीपराय की उम्र चालीस पार होने को है और खोजने पर उनकी कनपटियों के एकाध बाल रुपहले भी मिल जाएंगे । सिर को गौर से देखने पर गंजेपन का आभास मिलता है, फिर भी सबल, स्वस्थ, दीर्घ देहयप्टि उन्हें राजकीय गौरव से युक्त करके उनके व्यक्तित्व को बहुतों से अधिक प्रभावशाली बना देती है । प्रदीप चेहरे-मोहरे से अपने बाप पर गए हैं। पिता प्रतापराय साठ वर्ष की अवस्था में सीधी, सतेज देह लेकर ही स्वर्ग- वासी हुए थे। संदीप और तरह का है। संदीप अपनी मां की तरह कोमल और ठिगने कद-काठी का है। मुख का लावण्य और ठुड्डी का सीकुमार्य भी बार-बार उसकी मां की ही याद दिलाता है। आकृति मां की तरह किंतु प्रकृति भी मां की ही तरह है क्या? वह मां की तरह ममतामय है अथवा वाप की तरह दृढ़निश्चयी ? प्रतापराय देखने में कोमल थे, किंतु उनके भीतरं का आदमी इस्पात का था । संदीप क्या वैसे ही है ? तुलना करके देखने का कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि पिता प्रतापराय और माता कल्पना दोनों ही व्यक्ति इस समय चित्र वनकर दीवार पर झूल रहे हैं । चारों सन्तानों (दो लड़के और दो लड़कियों) में से सबसे छोटे संदीप के प्रकृति-निर्माण के पूर्व ही उन्हें दीवार पर चित्र बनकर झूल जाना पड़ा। तो भी संदीप की प्रकृति का जव निर्माण हुआ तो देखा गया कि उसमें पिता-माता दोनों की प्रकृतियों का समावेश था। वही दोनों प्रकृतियां जैसे विपरीत शक्तियों के समान उसकी व्यक्ति-सत्ता पर धूप और छाया की तरह बारी-बारी से हावी होती रहती हैं। और संदीप अपनी उस सत्ता का ज्ञानोन्मेप के समय से ही बड़ी निष्ठा के साय लालन-पालन करता आया है। कौन जाने किस देवी शक्ति ने बचपन से ही संदीप के माथे पर सबसे भिन्न, सबने पृथक् होने का टीका लगा दिया था, इस कुल की परिपाटी से सर्वथा भिन्न । 6: विपदी किसने कहा यह नहीं मालूम पर किसी अदृश्य शक्ति का आदेश संदीप अपने बाल्यकाल से ही मानता आया है। इसी कारण संदीप इस मुखशांतिमय राय परिवार में अशाति का स्फुलिंग और उस निरपद्रव कोठी में नीरव उत्पात-सा है। 'प्रतापराय को कोठी' का एक अभिजातीय इतिहास रहा है। बड़े लडके प्रदीपराय ने उसकी रक्षा बड़े यल और अपने स्वभाव की महत्ता से की थी। प्रदीपराय की जाति विरादरी मे इस ममय नौ बरम के लड़के का यज्ञोपवीत कराते किसी को नहीं देखा जाता, कोई अपनी मर्जी के अनु- सार करता है, कोई सीधे लड़के की शादी के समय एक ही नादीपाठ में दोनों चालू कर देता है । किंतु प्रदीप ने अपने कुल की प्रथा को बचा रखा था । नौ बरस के बच्चे का यज्ञोपवीत किया था। आज का उत्सव उसी उपलक्ष्य में था। लडका उज्ज्वलदीप कल 'दडी घर' से निकला है, आज भोज है। जैसा प्रचुर आयोजन है वैसी ही मनोहारी अतिथेयता भी है। सभी आड़ मे कह रहे थे--'एकदम वाप की तरह है' अथवा-'आजकल इतना कौन करता है ? पैसा होने पर भी हिम्मत नहीं पड़ती। केवल धन होने से ही तो बात नही चलती, मन भी तो वैसा ही होना चाहिए'--इत्यादि- इत्यादि। निश्चय ही इस प्रकार की बातें वे लोग ही कर रहे थे जो वयस्क और आत्मीय थे और जिन्होंने प्रतापराय के समय में माता-जाना और खाना-पीना किया था। जो नये हैं अर्थात् जो प्रदीप के मित्र अपरा पिके मोग हैं, वे तो एकदम चकित हैं। तामझाम के लिए नहीं, सोजल के लिए। प्रदीप ने केवल आमश्रितों का ही आदर-सम्मान किया ह बात भी नहीं है। की से निकलकर प्रत्येक गाडी के ड्राइवर से सरकार पूछा है कि उसका भोजन हुआ या नहीं। माधुरी ने कहा था-'नोचे तले मे मे लगाकर उन साथ बैठाकर खिला देने से भी तो बात रही होती।' क्ति - में राजी नहीं हुना था। कहा था उसने-'यह कैसे होगा? वे भी तो अच्छे बरों के लड़के हैं, उनका कोई आत्मसम्मान नहीं है क्या? केवल निमंत्रण- पत्रही तो उन्हें तो उन्हें नहीं मिला है। खाने-पीने की चीजें किसी के घर अनायास चूमने आने पर भी खा ली जाती हैं।' एक प्रसिद्ध मिपठन्नगृह से प्रदीप ने मिठाइयों का इन्तजाम किया या। चार-पांच तरह की मिठाइयां और उसके साथ घर की बनी चाय और फ्राई की हुई चीजें । प्रदीप हर आदमी के पास जा-जाकर पूछ रहा है कि उन्होंने मुंह मीठा किया या नहीं? 'बच्चे को आशीर्वाद दीजिए इत्यादि। प्रतापराय के पिता प्रभासराय अपने निज के तथा आत्मीय कुटुंवी, यहां तक कि पास-पड़ोस के घरों के नौकरों को बुलाकर बड़े आदर ते खिलाते और तव तक स्वयं सामने खड़े रहते जव तक कि वह आदमी ना न कर दे। वे कहते-'खाओ भैया, खाओ, अच्छी तरह पेट भर के खा लो। तुम्हीं लोगों के मुख से भगवान का भोजन होता है।' राय परिवार की यह परम्परा रही है कि धनी-गरीव सभी को बड़े यत्न से खिलाते- पिलाते किंतु इस जमाने में यह चीज दुर्लभ है, इसीलिए प्रदीप की नम्रता और सदाशयता से सभी लोग चकित हैं और उसकी प्रशंसा कर रहे हैं। किंतु इधर जितना भी पूर्ण सव काम वह कर रहा है और मानन्दित हो रहा है, उधर एक अपूर्णता भी उसके मन को सताती है। विशेषकर समारोह के अन्त के समय । घर में इतना बड़ा एक आयोजन हो रहा है और माज सवेरे से ही संदीप का कहीं पता नहीं है। खूब सवेरे वहन और भाभी के अनुरोध पर उसने घर में बनी कुछ मिठाइयां मुंह में डाली थीं। और शायद उसी समय उसने दोपहर के अपने खाने के लिए मना कर दिया था। कहा था-'वस, अव इस वेला के लिए निश्चित । और किसी चीज की जरूरत नहीं है। अतएव श्रीमान् संदीपराय फकत आज-भर के लिए गायब हो सकते हैं।' किंतु यह बात सच हो सकती है अथवा उस बात को मानने योग्य 8: विपदी चातो की श्रेणी में रखना होगा, ऐसा तो किसी ने सोचा तक नहीं था। इम परिवार का लड़का क्या इतना बेहया हो सकता है। यह जो आयोजन हो रहा है उसके लिए तो उसने अपनी कानो उगली तक नही हिलाई होगी। प्रदीप और उसके कार्यालय के कुछ माथियों ने सारा काम किया है । छोटदी ने बल्कि एक बार कहा भी.-'क्यों रे तेरी आंखो का पानी क्या एकदम मर गया है ? तू क्या घर का एक भी काम नहीं करेगा? बडे भाई का हाय बंटाने में तुझे क्या मुश्किल गुजरती मंदीप ने हसकर कहा था -'हमारे कार भरोमा ही कौन करता 'भरोमा ? किम बात का भरोसा रखा जाए तुझ पर? तू कोई काम करता भी है ? क्यो, क्यो तेरे मुह से नहीं निकलना-भैया, बताओ, कोई काम-वाम हो तो करूं । नहीं तो...।' 'अरे रुको न छोटदी, समुद्र पर पुल बांधने के काम मैं गिलहरी की भूमिका नहीं निभाना चाहता।' 'तो फिर वीर हनुमान की भूमिका लेने से ही तुझे किसने मना किया था? बडा हो गया है, भैया का दाहिना हाय बनने लायक हो गया है।' 'गजब की बात करती हो दीदी, जिसके दोनों कंधो के नीचे दो-दो मजबूत हाथ साक्षात् झूल रहे हों उसका दाहिना हाथ ! कमाल है, क्या तुम उम भले आदमी को तीन पैरो वाले बैल के सामान तमाशा दनाना चाहती हो? क्या उसके जसा सेजस्वी व्यक्ति एक उसी तीसरे हाथ के भरोसे इतना बड़ा आयोजन कर रहा है छोटदी नाराज होकर बोली-'तो क्या तू घर को अपना घर नही समझेगा?' 'यह लो, घर को घर नहीं समझता तो क्या मैदान समझता हू' घर समझता हूं, इसीलिए तो जब इच्छा होती है निकल पड़ता हूं, जब इच्छा होती है लौटता हूं, और फिर हाथ के पाम भोजन देखकर एकदम कुठिन नहीं होता, मजे में हाथ बढ़ाकर मुह मे रखना जाता हूं।'
'चुप ही रहना । खाने की बात मुंह पर लाना भर मत । जो खाता है वह मेरा जाना हुआ है। ससुराल में हूं तो क्या तू समझता है कुछ घर की खबर नहीं रखती हूं ? भाभी सदा दुःखी रहती हैं कि तू कोई भी चीज कभी खाता ही नहीं है। मैंने सुना है तू कहता है-~अच्छा भोजन तेरे अंदर एलर्जी पैदा करता है ?' 'कोई झूठ कहता हूं ? रत्ती भर भी नहीं। सच, दीदी, तुम लोगों के उन 'सुन्दर' से विभूषित पदार्थो के प्रति मुझे एलर्जी है, शायद यही कारण है मैं तुम लोगों की आशा के अनुरूप न बन सका।' 'वह तो देख ही रही हूं। सोचा था अपनी ननंद के साथ तेरे विवाह की चेप्टा करूंगी मगर...' 'वाप रे ! जान बची। और दीदी, तुमने अपने उस शुभ विचार को कार्यरूप में नहीं परिणत किया इसके लिए तुम्हें अशेष धन्यवाद । 'क्यों, क्या हमारी ननद इतनी सस्ती है ?' नाराज होकर दीदी ने पूछा था---'बदसूरत है या अयोग्य है ?' 'नहीं, बात ठीक इसकी उल्टी है । मैं तो कहना चाहता था कि अच्छा हुआ उस विदुपी, सुन्दरी एव महामूल्य वाली वस्तु को लेने के लिए मुझ जैसे तीन कौड़ी के आदमी को लेकर बाजार में नहीं जा खड़ी हुई, इसलिए धन्यवाद ।' 'मगर इस कारण तुझे अपने को इतना छोटा सोचने की भी जरूरत नहीं है । वावू जी की आधी जायदाद का तो तू मालिक है ही। इतनी बड़ी कोठी..।' 'देखो छोटदी, अब तुम बड़ी सीरियत हुई जा रही हो, मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा। तुम नहीं जानती, मुझे सीरियस वातों के प्रति भी एलर्जी . इस पर छोटदी बहुत गुस्सा होकर उसके पास से उठ गई थीं। मगर ये सब वातें तो कई दिन आगे की हैं, जब प्रणति आई थी, अपने भतीजे के जनेऊ-संस्कार के आयोजन-पूर्व की पहली मीटिंग में । वह सब तो ठीक है।
किंतु आज के दिन सदीप का यह क्या व्यवहार है ? जाते-जाते प्रायः सभी अभ्यागत पूछ रहे हैं-'भाई को नहीं देख रहे हैं " निकट सबंध की महिलाए आलोचना की झोक मे पंचमुख हो रही है। कोई इस पक्ष में, कोई उस पक्ष में । जो प्रदीप के सौजन्य को चालाकी, विनय को दिखावा, आयोजन को चतुरता को आडवर बता रहे हैं, वे कह रहे हैं--'वह तो ऐसे ही करता है, यह कहकर ही क्या निश्चित हुआ जा सकता है ? चिंता नहीं होती? शायद वेचारे ने सारा दिन कुछ खाया ही नही। ताज्जुब है ' तिलमात्र किसी के चेहरे पर शिकन नहीं है । फलकत्ते में राह-घाट में कितनी भीड होती है । ऐक्मीडेंट भी तो हो सकता है; मा-बाप होते तो क्या इस तरह निश्चित रह सकते थे।" जरूर ऐसे लोगों की संख्या नगण्य है । अधिकांश लोग सदीप की ही निंदा कर रहे हैं। ऐमे लापरवाह और माया-ममता से होन लड़के ही तो घर-घर में है, यह बात भी लोग कह रहे हैं । वे यह भी मीमासा कर रहे हैं कि ये कलयुगी लडके क्यों अपने घर को अपना नहीं समझ पा रहे हैं । इन मीमांसकों में रथी भी हैं और पैदल भी, हेयान भी है और अद्धी की साड़िया भी, गोल्ड-पलेक भी हैं और चारमीनार भी। और उधर--मतलब अदर की बात नहीं कर रहा हू । अंदर, अंत.. पुर आदि आज समाप्त हो गए है । सभ्रांत घरो में तो और भी नहीं । सवाल ही नही उठता । किन्तु शायद जातिभेद विधाता की सृष्टि है, इसी- लिए साज-सज्जा, बोलचाल मे फर्क पाया जाता है। हां, तो उधर जहा रूखे बाल, बड़े पालिण्ड नख, रगे होंठ थे, तो भर- हाथ चूडी, बीस तोले का हार, शातिपुरी साडी भी थी। मामाजिक कार्यों में ममाज के सभी स्तर के लोगों में से अभ्यागतों को चुना जाता है । और ये लोग एकत्रित होकर क्या करते हैं ? वह उसको देखकर मुंह विचकाता है, वह उसको देखकर हंसता है । फिर भी मजे की बात यह है कि दोनो पक्षो की आलोचनाओ को गौर से सुनिये तो पाइएगा उनको विषयवस्तु प्रायः एक होती है।
'चुप ही रहना । खाने की बात मुंह पर लाना भर मत। जो खाता है वह मेरा जाना हुआ है। ससुराल में हूं तो क्या तू समझता है कुछ घर की खबर नहीं रखती हूं? भाभी सदा दुःखी रहती हैं कि तू कोई भी चीज कभी खाता ही नहीं है। मैंने सुना है तू कहता है-अच्छा भोजन तेरे अंदर एलर्जी पैदा करता है ?' 'कोई झूठ कहता हूं ? रत्ती भर भी नहीं। सच, दीदी, तुम लोगों के उन 'सुन्दर' से विभूपित पदार्थो के प्रति मुझे एलर्जी है, शायद यही कारण है मैं तुम लोगों की आशा के अनुरूप न बन सका। 'वह तो देख ही रही हूं। सोचा था अपनी ननंद के साथ तेरे विवाह की चेप्टा करूंगी मगर...।' 'बाप रे ! जान बची। और दीदी, तुमने अपनेउस शुभ विचार को कार्यरूप में नहीं परिणत किया इसके लिए तुम्हें अशेष धन्यवाद । 'क्यों, क्या हमारी ननद इतनी सस्ती है ?' नाराज होकर दीदी ने पूछा था--'बदसूरत है या अयोग्य है ?' 'नहीं, वात ठीक इसकी उल्टी है । मैं तो कहना चाहता था कि अच्छा हुआ उस विदुपी, सुन्दरी एव महामूल्य वाली वस्तु को लेने के लिए मुझ जैसे तीन कौड़ी के आदमी को लेकर बाजार में नहीं जा खड़ी हुई, इसलिए धन्यवाद ।' 'मगर इस कारण तुझे अपने को इतना छोटा सोचने की भी जरूरत नहीं है । वाबू जी की आधी जायदाद का तो तू मालिक है ही। इतनी बड़ी कोठी।' 'देखो छोटदी, अब तुम बड़ी सीरियत हुई जा रही हो, मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा । तुम नहीं जानतीं, मुझे सीरियस वातों के प्रति भी एलर्जी 1 । इस पर छोटदी बहुत गुस्सा होकर उसके पास से उठ गई थौं । मगर ये सब बातें तो कई दिन आगे की है, जब प्रणति आई थी, अपने भतीजे के जनेऊ संस्कार के आयोजन-पूर्व की पहली मीटिंग में । वह सब तो ठीक है। 10 : विपदी . । किंतु आज के दिन सदीप का यह क्या व्यवहार है ? जाते-जाते प्रायः सभी अभ्यागत पूछ रहे हैं-'माई को नहीं देख रहे है " निकट सबंध की महिलाए आलोचना की झोंक मे पंचमुख हो रही है । कोई इस पक्ष में, कोई उस पक्ष मे। जो प्रदीप के सौजन्य को चालाकी, विनय को दिखावा, आयोजन की चतुरता को आडवर बता रहे हैं, वे कह रहे है-'वह तो ऐसे ही करता है, यह कहकर ही क्या निश्चित हुआ जा सकता है ? चिता नहीं होती? शायद वेचारे ने सारा दिन कुछ खाया ही नहीं । ताज्जुब है । तिलमात्र किसी के चेहरे पर शिकन नहीं है । कलकत्तं मे राह-घाट में कितनी भीड होती है । ऐक्मोडेंट भी तो हो सकता है; मा-बाप होते तो क्या इस तरह निश्चित रह सकते थे?' जकर ऐसे लोगों को सस्या नगण्य है। अधिकांश लोग संदीप की ही निदा कर रहे हैं। ऐसे लापरवाह और माया-ममता से हीन लड़के ही तो घर-घर मे है, यह बात भी लोग कह रहे हैं । वे यह भी मीमांसा कर रहे हैं कि ये कलयुगी लडके क्यों अपने घर को अपना नहीं समझ पा रहे हैं । इन मीमांसको में रथी भी हैं और पैदल भी, हेयान भी है और अदी की साड़िया भी, गोल्ड-पलेक भी हैं और चारमीनार भी। और उधर--मतलव अंदर की बात नहीं कर रहा हूँ। अंदर, अंत.- पुर आदि आग समाप्त हो गए है । सम्रात घरो मे तो और भी नहीं। सवाल ही नहीं उठना । किन्तु शायद जातिभेद विधाता की सृष्टि है, इमी- लिए साज-मज्जा, बोलचाल मे फर्क पाया जाता है। हां, तो उधर जहां से वाल, बड़े पालिश्ड नख, रंगे हॉट थे, तो भर- हाथ चूडी, वीस तोले का हार, शातिपुरी साडी भी थी। सामाजिक कार्यों में समाज के सभी स्तर के लोगों में से अभ्यागतो को चुना जाता है । और ये लोग एकत्रित होकर क्या करते हैं ? वह उसको देखकर मुंह विचकाता है, वह उसको देखकर हंसता है। फिर भी मजे की बात यह है कि दोनो पक्षो की आलोचनाओ को गौर से मुनिये तो पाइएगा उनकी विषयवस्तु प्रायः एक होती है।
मनुष्य की यह प्रकृति आदिकालीन है। वही आत्मगरिमा और परचर्चा। जैसे मनुप्य युग-युग से प्रेम करता आया है, वैसे ही यह सव भी। मनुप्य मंगल ग्रह पर पहुंच जाए अथवा चंद्रमा पर सैर करे, यह सब चलेगा। दो आदमी जहां एकत्र हुए नहीं कि यह सब चला । यह रहेगा। इसलिए है। रायकोठी में भी था। उसी की जैसे खेती हो रही थी। फिर क्रमशः हल्का हो गया और फिर रुक गया। एक-एक करके बहुत सारी गाड़ियां चली गई और बाकी भी जा रही थीं । जो हैं अर्थात् महिलाओं के वाक्- चातुर्य की अंतिम गोष्ठी की समाप्ति की प्रतीक्षा में रुकने को बाध्य हैं, उनके चालक और स्वामिगण वार-वार कलाई उठा-उठाकर घड़ी के कांटे देख रहे हैं। इस अंतिम किस्त के एक व्यक्ति ने दुःख प्रकट किया-'आखिर संदीप से भेंट नहीं हो सकी।' ये प्रदीप के एक दूर के रिश्ते के साड़, लगते थे और इत्तफाक ते एक व्याह देने योग्य पुत्री-रत्ल का पिता होने का गौरव उन्हें प्राप्त था । पत्नी और पुत्री समेत आए थे। इच्छा थी एक बार अपनी सुसज्जिता कन्या को संदीप के दृष्टिपात में रखने का अवसर प्राप्त करते । प्रत्येक कन्यागवित पिता की तरह उसकी भी धारणा थी कि एक बार लड़की को किसी प्रकार लड़के की नजर के सामने डालने-भर की देर है, बस । टाल-टूलकर एक आदमी का वहां और कितनी रात तक रुकना संभव था। हार मानकर विदा हुए वे लोग। कोई भी बाहर का आदमी न रहा। हां, बहिनों को भी यदि अभ्यागतों में गिना जाए तो केवल दो परिवार अब रायकोठी में रह गए । संदीप की बड़ी बहन, बड़े दामाद और उनके कन्या-पुत्र, छोटदी और तस्य-तस्य । प्रदीप से बहनें छोटी हैं। इसीलिए प्रदीप और संदीप की आयु में इतना अंतर है । अल्प आयु में ही मातृ-पितृहीन हुए छोटे भाई को मां-बाप 12:त्रिपदी । और भाई तीनो के म्नेह देने की चेष्टा की थी प्रदीप ने, किंतु सदीप के बाल्यकाल से ही प्रदीप को पता चल गया था कि उसे पकड़े रहना अममव कार्य है और स्नेह का बंधन भी उसे वाध सकने में सक्षम नहीं है । स्नेह, प्रेम, ममता, प्रीति जैसी चीजें सदीप के लिए अत्यंत हास्यकर हो उठती हैं । इसलिए छुटपन से वह परिवार के लिए समस्या बना हुआ है । माधुरी लडकी बुरी नहीं है, किंतु यह सच है कि वह संदीप को मगी वहन नही है, दूमरे की लडकी है, सदीप की भाभी। बार-बार अस्वीकृत और प्रतिहत होकर वह कितना दफा अयाचित अभ्यर्थना करती रहेगी। मंदीप से बहुत बडी भी नहीं है वह कि उमको सारी बातो को बचपना कहकर उड़ा दे सकेगी। सदीप जमे-जैसे बडा हुआ है वैसे-वैसे ही माधुरी उसके पाम से हटती गई है, कठिन होती गई है। प्रदीप के साथ भी वैमा ही हुआ है। फिर भी फल्गु नदी के समान बालू के नीचे जो स्नेहधारा प्रवाहित रही है, बीच-बीच मे वह आत्मप्रकाश किए बिना नहीं रहती है । किंतु अब और उस स्नेहधारा का अप्रतिहत रहना सभव नहीं दीखता। भीतर से भी जमे वह मूखती जा रही है । यह क्या है ? ऐसा क्यो हुआ? इस तरह की असभ्यता का क्या अर्थ है ? बड़े जीजा सुरजित आकर बोले-भाई साहब, हम लोग तो और एक नहीं पा रहे हैं, बच्चा सो गया है । और बाकी दोनों का स्कूल है।' प्रदीप ने यके कठ से कहा-'अच्छा भाई...।' सुरजित जाते-जाते वोले-~-'समझ में नहीं आ रहा है छोटे को क्या हुआ । घर पहुंचकर एक बार फोन करूगा। हो सकता है मचमुच...।' चिंता की कोई बात नहीं है । थोड़ी देर बाद आ जायेगा ।' प्रदीप ने कहा । 'भीड़ कम होने के बाद ही जमे उसे शाति मिलेगी।' बहुत पहले से ही उसके मुप को उज्ज्वलता का लोप हो गया है, शारीरिक बलांति से नहीं मानसिक यकान में। पिता को बहुत-बहुत पाद आ रही है । अपने जनेऊ की भी बात याद आ रही है। उस दिन भी ।
- काफी आदमियों ने भोजन किया था । प्रदीप को ठीक याद है, सभी लोगों के भोजन कर लेने के बाद, यहां तक कि जब नौकर-चाकर भी खा-पीकर चले गये तो रात दो बजे के लगभग पिता जी ने गुहार लगाई थी- 'अरे भाई कोई है, अव हमारा खाना ले आओ। हमारे लिए सब चीजें बची हैं न? भई मैं तो लिस्ट मिलाकर खाऊंगा।' इन शब्दों में आह्लाद की कैसी झंकार थी। काकी और मौसी दौड़कर थाल में सजाकर सब सामान ले आई। पिताजी ने उस रात कितने संतोप के साथ जमकर खाया। बचपन में प्रदीप कुछ दुर्वल था, इसी कारण पिताजी उसे 'पिद्दीप मामा' कहते थे। खाने के बाद उन्होंने पूछा था-'अच्छा अब ले आओ, देखें पिद्दीप मामा' की झोली में क्या-क्या पड़ा है।' इसी की प्रतीक्षा में उतनी रात तक प्रदीप जागता रहा था। पिताजी देखेंगे तो सही, उसे कितनी अच्छी-अच्छी चीजें मिली हैं। पिताजी प्रदीप के लिए देवता के समान थे। उसी पिता को अत्यंत यल्प आयु में ही संदीप ने खो दिया था, इसी कारण प्रदीप शुरू से ही संदीप के प्रति अतिरिक्त स्नेहशील हो उठा था। प्रदीप सोचता, वह पिता की तरह बनेगा। किंतु चाहने मात्र से कोई बात होती है क्या ? समय बदल गया और अब पिताजी की तरह बनना क्या संभव होगा ? खैर, तो उस दिन उसने अपनी भिक्षा की झोली पिताजी के सामने लाकर उलट दी थी। आजकल की तरह उस समय जनेऊ में उपहार देने का रिवाज इतना प्रचलित नहीं हुआ था । प्रदीप को ठीक याद है, उसने वहुत-से रुपये ही पाये थे, कोई और वस्तु अधिक नहीं थी। आजकल की तरह कागज के रुपये नहीं चांदी के थे। वे रुपये भिक्षा के चावल में मिल' गये थे । मौसी जी वार-बार चावल में हाथ डालकर रुपये निकालती थीं। रुपये के अतिरिक्त उसने दो-चार ही चीजें पाई थीं। प्रदीप की मौसी ने उमे एक चटक लाल पेलिकन कमल दी थी। और दादा जी ने एक हाथ- घड़ी। नौ साल का लड़का घड़ी लेकर भला क्या करेगा, इस बात पर' सभी लोग हंसे थे। किंतु यह किसी ने नहीं सोचा कि नौ बरस का लड़का 14 : ग्रिपदी . तीन-चार जोडे सोने के बटन या एक मुट्ठी अंगूठी लेकर ही क्या करेगा, क्योंकि यह मब देने की प्रथा थी उन दिनो। पिताजी देखकर कितने खुश हुए थे । जैसे सचमुच लड़का बहुत बडे एश्वयं का स्वामी हो गया है। फिर पिताजी ने प्रदीप के सिर पर हाय रखकर कहा था-'प्रदीप, इतने दिन तक तुम ब्राह्मण के लड़के थे, आज से तुम म्वय ग्राह्मण हो गए। ममझे न ! ब्राह्मण माने बहुत कुछ होता है। वह सब समझना होगा, सीखना होगा। मैं आशीर्वाद देता हूँ कि तुम वास्तविक ब्राह्मण बनो।' पिताजी का आशीर्वाद पत्थर पर बीज रोपना था या और कुछ किंतु वह तो अपने बच्चे को ऐसा आशीर्वाद नही दे पाएगा। यदि आशीर्वाद दे भी तो कहेगा-'सुखी होओ, स्वस्थ रहो, विद्वान बनो', और क्या कहेगा वह ? जनेऊ प्रथापालन के लिए उतना नहीं आयोजित किया गया था जिनना घर में एक विराट् आयोजन कर पाने के सुयोग के लिए । एक बड़ा काम घर में हो इसी इच्छा के वशीभूत होकर, इसी उत्साह को लेकर वह इस काम में आगे बढा था। इसके अलावा यह भी डर था कि कहीं थोड़ा और बड़ा होने पर लडका कह दे मैं जनेऊ नहीं कराऊगा । जमे संदीप ने कह दिया था। पिताजी की आकस्मिक मृत्यु के कारण उसका जनेऊ उपयुक्त समय से न हो सका। जब वह सोलह साल का हुआ तो जनेऊ की बात पर उसन साफ कह दिया कि वह जनेऊ नही करेगा। बहुत समझाने-बुझाने के बाद और वादा करने के बाद कि उसे दंडी घर में नहीं रहना होगा, मुडन कराने की भी कोई जरूरत नहीं है, उमे गगाजल में डुबाकर शीघ्रता से एक यज्ञोपवीत पहना दिया गया। किंतु कुछ दिन बाद एक दिन वह सूतो का गुच्छा कमीज के साथ गले में निकलकर धोबी के यहा चला गया था, उनके यहां से लौटकर ही नहीं भाया । इसी डर से उज्ज्वल की वारी आने पर ममय रहते वह काम निपटा लेने की बात सोची गई, सब कुछ बड़ा सुन्दर हुआ। किंतु घर के ही एक लड़के ने व्यर्थ अहकार के कप्त होकर एक ऐसा काम किया कि सब मिट्टी हो गया। शाम को अभ्यागतों का स्वागत करते समय प्रदीप का मुख आनंद से उज्ज्वल हो उठा था । किंतु ज्यों-ज्यों रात होती गई उसका मुख निष्प्रभ होता गया। लोगों ने समझा थकान है। मगर यह बात नहीं थी। प्रदीप की शारीरिक क्षमता काफी । ऐसे सामान्य-से परिश्रम की छाया को उसके चेहरे पर खोजना व्यर्थ है। कुछ लोगों ने सोचा दुश्चिता के मारे उसका मुख उदास हो गया है । मगर संदीप के विषय में दुश्चिता करना उसने वहुत पहले ही छोड़ दिया है। पहली वार जव संदीप केवल वारह-तेरह साल का था एक दिन वह रात नौ बजे तक घर नहीं लौटा था, तो सचमुच उसे दुश्चिता हुई थी। इतनी-सी देर होने से ही वह काफी धवड़ा गया था, और संभव-असंभव हर जगह उसने संदीप को खोज डाला था। घर लौटने पर जब उसने देखा था कि लड़का बड़े मजे से पैर फैलाकर खाना खा रहा है, उसके मुंह पर कोई अपराध- भावना नहीं है तो उसने जो जीवन में कभी नहीं किया था वही कर बैठा। संदीप का कान पकड़कर उसने उससे कैफियत तलब की थी। संदीप ने कोई कैफियत नहीं दी थी। चुप खड़ा रह गया था। भाभी, दोनों बहनें, यहां तक कि घर के पुराने नौकर पूछ-पूछकर हार मान गये मगर उसने कुछ भी कहने की जरूरत नहीं समझी थी। पत्थर की मूरत की तरह अचल हो गया था। हार मानकर प्रदीप ने ही अंत में कहा था-'अच्छा, आज जो हुआ, हुआ । इतना ध्यान रहे ऐसी हरकत फिर कभी न हो।' संदीप ने इस बात का प्रतिवाद नहीं किया था, केवल दूसरे दिन नी के बदले साढ़े नौ पर घर लौटा था। उस समय उमर उनकी काफी कम थी, इसी कारण उस दिन भी बहुत डांट-फटकार हुई थी। निश्चय ही इतना छोटा लड़का अपने-आप इतनी बदमाशी नहीं कर सकता, इसलिए इसके पीछे कौन है-क्या है, इस बात की खोज-बीन शुरू हुई थी मगर कुछ भी पता नहीं चला था। संदीप दूसरे दिन और भी देर से घर लोटा था। उसके बाद वाले दिन 'उससे भी अधिक देर से । एक बात है कि डांट-फटकार खाकर भी उसने 16: त्रिपदी - मुंह नही फुलाया था। बड़े आराम से खाना खाने बैठ गया था। उसके इस असहनीय दु.साहस को देखकर घरवाले पहले तो स्तब्ध रह गये थे, फिर धीरे-धीरे उन्होंने चुर लगा लिया था। इसके बाद सभी ने उसे उसके हाल पर छोड़ दिया था। वह घर आ जाता है, आकर दो कोर भोजन कर लेता है, इतने से ही राय-परिवार के लोग अपने को कृतार्थ मानते है । मानो कोई सुदर वन-पक्षी आकर मुंडेर पर बैठकर चना खा रहा हो, जरा- सा हाथ-पैर हिलाते ही उड़ जायेगा । भया, हाथ-पैर हिलाने की कोई जरूरत नहीं। किन्तु आज के दिन भी सदीप ऐसा करेगा, जरा-सी लोकलज्जा भी नही मानेगा, यह वात जैसे सबके लिए अमहनीय हो उठी है । इतने सारे लोगो ने क्या सोचा होगा ! सोचा होगा, शायद सदीप इस घर में अब नहीं रहता। हो सकता है यह भी सोचा हो कि भाई-भौजाई का व्यवहार शायद इतना बुरा है कि..। इसके अलावा क्या उसे आज के दिन यह याद नहीं रहा कि उज्ज्वल के लिए यह दिन तो बार-बार नहीं आयेगा? क्या उसे एक बार उज्ज्वल को देखने की भी इच्छा नहीं हुई ? इस उत्सव में एक बार भाग लेने की भी उसे इच्छा नहीं हुई, केवल इसलिए कि वह अपने को अस्वाभाविक जताना चाहता है । शायद वह सोचता है, स्वाभाविक होना छोटे और सामान्य लोगों के लिए ही उपयुक्त है । पाच आदमी जो घर पर आ रहे है उनसे मिलने-जुलने जैसा सस्ता काम जैसे उससे नहीं होता। इसी कारण उमने ऐसा विचित्र रास्ता अपना लिया है । ऐसे भाई के लिए प्रदीप दुश्चिता करने वैठेगा ऐसा मुर्ख वह नहीं है, किंतु वह सोच रहा है, इसका अंत क्या होगा? क्या वह इसी प्रकार सबरी ममता छोड़ देगा और अपने लिए जो अस्वाभाविक सुख का रास्ता उसने चन लिया है, उसका अनुमन होगा? प्रदीप की बड़ी साली यही रहेगी, इसीलिए उन्हें कोई उली नई है। धीरे-धीरे पास आकर उन्होंने प्रदीत में कहा-'प्रदीर मई नहीं आया । खाने के लिए तो नहीं हो। न हो तब तक नहीं क्या पाया है, यही देखते।' 'रहने दो। वाद में देख लूंगा।' 'वाप रे ! कितना सामान पाया है उसने। शादी-ब्याह में भी लोग इतना सामान नहीं पाते। आलमारी में सजाने के पहले एक बार देख लेते...।' । . 'जल्दी क्या है ? आलमारी की चावी तो फेंकी नहीं जा रही है।' 'धन्य हो तुम भी। ऐसे भाई के लिए इतना मोह ?' दुःखी होकर साली ने कहा-'खाने के लिए तो कह नहीं पाई..।' सचमुच प्रदीप ने खाना नहीं खाया। पिताजी की तरह ऊंची आवाज में कह नहीं पाया---'अरे भाई, कोई है ? अव हमारे लिए भी खाना ले आओ । लिस्ट मिलाकर खाऊंगा।' संदीप ने दोपहर को भी खाना नहीं खाया था, यह बात प्रदीप के कान में पड़ चुकी थी। घर में कड़ा हुकुम है कि संदीप के लिए कोई विना खाये बैठा हुआ है यह बात उसके कान में न पड़े क्योंकि वह इस बात से दुःखी होता है । इसीलिए उसके आने पर प्रदीप भाई के साथ खाने बैठ जायेगा, यह भी संभव नहीं है । संदीप आया है, उसने खाना खा लिया है, यह बात जानकर बाद में ही वह खाने बैठ सकता है। एक गिलास शर्वत मांगकर प्रदीप ने पिया और अपने कमरे में जा बैठा। सोचने लगा, लोग कहते हैं व्याह कर देने से स्वभाव बदल जाता है। किंतु व्याह वह करेगा किसका, आकाशाचारी पक्षी का? ओफ्, यदि प्रदीप अपने भाई की चिंता को 'उह, भाड़ में जाये'-~कहकर उड़ा पाता ! जैसे संदीप सामाजिक जीवन के समस्त मूल्यों को झाड़कर अलग हो गया है, जैसे स्नेह, ममता, प्रीति, व्याकुलता को उसने परे फेंक दिया है, उसी प्रकार प्रदीप भी कर सकता। हाथ में से घड़ी खोलकर उसने टेवल पर रख दी है। दीवाल-घड़ी के वजने की प्रतीक्षा कर रहा है। वह अव वजने लगी थी। काफी देर तक वजती रही। प्रदीप ने एक गहरी सांस फेंकी और करवट बदल ली। 18 :त्रिपदी 2 सिनेमा का अन्तिम शो छूटा । हाल से निकलकर जलस्रोत की तरह जन- स्रोत रास्ते में बिखर गया है। जिनका हाथी दरवाजे पर खड़ा है ये तो हाल से निकलते ही हवा हो गए, किंतु जिन्हें अपने पावो का ही भरोसा है उनके लिए दूसरा शो सिनेमा देखना अपनी दुर्गति कराना है। फिर भी देखने के पहले कौन मोचता है यह सब । उस समय तो यही सोचता है आदमी कि सिनेमा कैसे देखा जाए । अव यही लोग अनाथ की तरह रास्ते पर कसमसाकर खड़े हो गए हैं । एक छोटी-सी प्रकाश मुकुटधारिणी टैक्सी अगर वगल से गुजरती है तो वीस आदमी उस ज्योतिर्मयों से प्रणययाचना करते उसके पीछे भाग खड़े होते हैं । मगर जब 'देवी' ठीक उनकी नाक के नीचे से उनकी आकांक्षाओं पर धूल डालती, बिना रुके गुजर जाती है तो विचारे भग्न हृदय प्रेमी रोने-रोने को हो जाते है। इस भीड़ में केवल तीन आदमी ऐसे हैं जिन्हें कोई जल्दी नहीं है, या 'लग रहा है । संदीप, अतीश और सुरभि । ये जाने किस वात पर हसते हुए चल रहे हैं । लगता है. यह , आधी से ऊपर गुजर चुकी है इस वात का उन्हें पता नहीं है। जैसे सारी रात उन्हें रास्ते पर काटनी है। दो पत्ते और एक कली। दो लड़के और एक लड़की। हंसते-हंसते वे रास्ते का अतिक्रमण कर रहे हैं । पिक्चर का गुण-दोष ही उनका आलोच्य है । कहना नहीं होगा कि उन्हें उसमें कुछ भी पसंद नहीं आ रहा है । यह उनकी उम्र का ही असर है । इस उम्र के लड़के-लड़कियों का यह स्वधर्म है, खासकर लड़कियों का । घर में कोई वात पड़ने पर आंखों पर आंचल रखकर घंटों विसूरेंगी, मगर बाहर आने पर मुंह विचकाकर कहेंगी-छि:, कितना सेंटीमेंटल है । रात की अप्रतिहत शून्यता में वे अवाध रूप से आलोचना-प्रत्या- लोचना करते जा रहे हैं । ये कैसे एकत्रित हुए यह उन्हें याद नहीं है किंतु, नित्य एक निश्चित स्थान पर वे रोज मिलेंगे यह निश्चित है । बड़े घर का लड़का संदीप, सामान्य घर का लड़का अतीश और निहायत गरीब घर की लड़की सुरभि। अभावग्रस्त पिता की चार लड़कियों में से अंतिम सुरभि छुटपन से ही कुछ न पाकर संसार के प्रति निस्पृह, ममताशून्य और दुविनीत हो गई. है। ज्यों ही वह थोड़ी सयानी हुई वहनों का व्याह हो गया और विवाहिता दीदियों ने भरसक अपनी लाड़ली छोटी बहन के लिए प्रसाधन के उप- करण जुटाने में कुछ भी बाकी नहीं रख छोड़ा। उनकी हैसियत ही कितनी थो? किंतु उनकी वह सामान्य हैसियत भी सुरभि को चौपट करने के. लिए काफी थी। सुरभि के पास खराब आदतों की कमी न थी। सुरभि ने अपने अतिरिक्त और किसी के बारे में सोचना नहीं सीखा। इसीलिए किसी प्रकार इंटर पास करने के बाद उसने जव लीवर ब्रदर्स में. एक नौकरी का जोगाड़ किया तो पहले माह की तनख्वाह से उसने अपने लिए ढेर सारी साड़ियां, सौंदर्य प्रसाधन सामग्री और चट्टी-जूते खरीद डाले । एक पैसा भी घर लेकर नहीं गई। उसकी हरकत देखकर मां-बाप ने सोचा था कि उससे भविष्य में वे एक भी पैसा नहीं लेंगे, मगर अभाव वाली गृहस्थी में ऐसी प्रतीक्षा करने. 20::त्रिपदी का कोई मतलब नहीं होता, लज्जा से सिर नीचा करके भी लेना पड़ता है। इमीलिए उसकी मा को दूसरे ही महीने उमके सामने हाथ फैलाना पड़ा था। और उन फैले हायों में दया करके सुरभि ने कुछ नोट पकड़ा दिए थे । सुरभि को तनख्वाह कुछ कम नही थी, जैसी उसकी शिक्षा यी उस हिमाब से । चेहरा-मोहरा उसका अच्छा था और उसका लाभ उसे हुआ था। उमी सुरभि का साथ अचानक एक दिन प्राप्त हो गया संदीप और अतीश को, जाने कोन-सा महालग्न था वह । उन्होंने कनवंसर होने के वारण सुरभि को सगिनी बनाने में कोई आनाकानी की हो, यह बात भी नहीं। इन खामखयाली युवको में एक महानता भी थी। वे मनुप्य का मूल्य उमके पद से नहीं आकते थे। उनके लिए उसका मनुष्य होना ही काफी था। उनका परिचय कैसे हुआ यह भले गद न रह गई हो, किनु उसका सूत्रपात एक घटना के माध्यम से हुआ, जो इस प्रकार आज एक दिन वस पर चढ़ जाने के वाद अतीश को पता चला कि उसका पसं गायब है । उसने पॉकेट टटोलना आरम्भ ही किया था कि वहा खड़े बहुत-मे सभ्य व्यक्तियों के चेहरे विद्रूप से विकल हो उठे। कडक्टर ने भी हंसकर कहा था 'रहने दीजिए भाई जान, पॉकेट फाडने से क्या उसमें से पैसा निकलेगा, जव है ही नही । पॉकेट खाली है यह बाहर से ही देखा जा सकता है, अद्धो का कुरता तो ठाटदार उड़ा लिया है कही से ।' अतीश लाल चेहरा करके नीचे उतरा जा रहा था कि तभी पिछली सीट से एक युवक उठा और अतीश का कुरता पीचकर उसे अपनी ओर मुपा- तिव करते हुए बोला--'अरे तू भी अच्छा आदमो है ! पैसे नहीं हैं तो यस से ही उतरा जा रहा है । मैं पीछे बैठा हूं क्या दीखता नहीं' आंखो-आखो मे इशारा हुआ । सदीप ने पैसे दे दिए । सुरभि उमी बस में थी । इनकी इशारेवाजी उसने भी देखी। उसे कौतूहल हुआ। उसने दोनों को मुखातिब होते और उनकी नजरो में तैरते अपरिचय को गौर किया था। उसे वे मित्र नहीं लगे थे । सहसा दूसरे ही क्षण यह । ।
सम्बोधन कसा? दोनों युवक एक स्टापेज पर उतरे । सुरभि भी उसी स्टापेज पर उतर गई, अपने स्टापेज से एक स्टापेज पहले ही उतरकर वह उनके नजदीक हो गई। पहले वह संदीप के ही पास गई। उसने सीधे संदीप से प्रश्न किया-'अच्छा आप दोनों आदमी क्या सचमुच परिचित हैं ? 'आपको क्या लगता है ? हंसकर संदीप ने उत्तर दिया था। 'मुझे तो परिचित-से नहीं लगते आप लोग।' स्पष्ट ही उसने कहा था। 'अच्छा, अपरिचित भी क्या एक-दूसरे को 'तू' कहकर पुकारते हैं ?' कहकर संदीप ने मस्ती में आकर जैसे अतीश के कंधे पर अपना एक हाथ रखते हुए उससे प्रश्न किया था---'क्यों रे तू मेरा कौन होता 'पागल ! अरे तेरे साथ तो मेरा जन्म-जन्मांतर का परिचय है।' अतीश ने हंसकर कहा था । सुरभि भी हंसी। बोली-'समझी। लगता है, उनका पैसा लौटाने की आपकी इच्छा नहीं किन्तु मुझे भी बड़ी लालच लग रही है। अगर आप लोगों की इस जन्म-जन्मांतर की जान-पहजान में मैं भी हिस्सेदार हो पाती...' 'उधार लेकर फिर लौटाना नहीं पड़ेगा, शायद इसलिए !' कहा अतीश ने और हंस पड़ा था । संदीप और सुरभि भी हंसे थे। बस इतना और ऐसा ही था उनका परिचयसूत्र । एक अद्भुत निकटता का सृजन हो गया इन तीनों व्यक्तियों के बीच । इस-एक लड़की, दो लड़कों को-लघुत्रयी ने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि वे इस मित्रता को किसी प्रकार टूटने या गहित होने नहीं देंगे। इन तीनों को इस मित्रता के नियमों का पालन करने की मज- बूरी थी और तीन से दो होने की बात उस नियम के विरुद्ध थी। 22:त्रिपदी
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1
सुरभि उन दोनों के आकर्षण का विदु थी। उसी को लेकर उनकी
मंत्री पूर्ण होती थी। उसको अनुपस्थिति में दोनों विचलित हो उठते थे।
सुरभि की उपस्थिति मे दोनों यह बात उससे स्वीकार करते थे। उनमें से
एक कहता-'ओह, कल तुम्हारे विरह में शाम ही वेकार हो गई। किंतु
एकात पाकर उनमे से कोई भी उससे प्रेमनिवेदन नहीं कर डालता था ।
और मुरभि? उसको उन दोनों के ही प्रति समान आकर्षण का अनुभव
होता था। इसीलिए जब उनमें से किसी को देखती उसका मुंह उज्ज्वल
हो उठता, वह वोलती-'ओफ, इतनी देर बाद आना हो रहा है ? यहा
अगोरते-अगोरते."
इसी प्रकार उनकी दोस्ती तीन वरस पुरानी हो चली थी।
लगता था वे रात-भर ऐसे ही पैदल चलते रहेंगे, किंतु ऐसा नहीं
हुआ। एक पतली-सी गली के नुक्कड़ पर सुरभि रुक गई और उमने
कहा-'रहने दो इस नरक में तुम लोगों को जाने की जरूरत नहीं है।'
फिर थोड़ा हंसकर बोली-'तो फिर वही बात तय रही।"
उन दोनो ने भी हमकर कहा-'हां, वही बात तय है !'
इसके बाद अतीश और सदीप में भी विच्छेद हुआ। अलग होने के
पहले अतीश ने बघु मे कहा-'आज तो डाट पड़ेगी?'
'मेरे बारे मे डांट-फटकार की बात नही उठती।'
'फिर भी आज तो स्पेशल वात थी।'
'धत्, कितनी स्पेशल वातें पार कर गया हूं। मुझे तो सोच-सोचकर
आनन्द आ रहा है कि इस समय घर पर अभ्यागतो को भीड नही
होगी।'
'रहने से भी क्या नुकसान है ?'
'बाप रे, तू तो जानता है मुझे वह सब नीला-पीला, चकमक, शलमल,
चिकन, सैटिन वगैरह देखते ही परेशानी होने लगती है। मेरा हृदय घडकने
लगता है।'
'यह तो है किंतु तेरे भैया-भाभी"।'
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'तू क्या समझता है, इतने के बाद भी वे लोग मुझसे कुछ आशा किए बैठे हैं ? 'नहीं, वह बात नहीं। फिर भी अच्छा।' अतीश विदा हुआ। वह पास ही रहता है। पैदल ही मार देगा। संदीप वस पर सवार होगा। कलकत्ते में अतीश के लिए चिंता करने वाला कोई नहीं। एक दूर की बहन के साथ 'पेइंग गेस्ट' होकर रह रहा है। एकदम मुक्त विहंगम हैं। वहन के मकान के बाहरी हिस्से में तीन हाथ चौड़ा और चारेक हाथ लंबा एक कमरा है। उसी में अतीश का वास है। वह कमरा प्रायः मकान से संपर्कच्युत है। कमरा प्रायः बंद रहता है । उसके दरवाजे पर ताला झूलता रहता है। उसकी डुप्लीकेट चाभी अतीश के पास रहती है। वह जब भी आवे उसे कमरे में स्थित मेज पर अपना खाना ढका मिलता है। अतीश खाने के बाद फिर थाली पर ढक्कन रख देता है । सवेरे महरी आकर उसकी उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति में वह थाली उठाकर ले जाती। मेज को साफ करने की बात कभी नहीं उठती । अतीश को यह बात याद ही नहीं रहती। गांव में उसके पिता, माता, ताऊ, चाचा सभी कोई हैं और उनके रहने की व्यवस्था भी है । अतीश कभी-कभी कुछ रुपये भेजता है। गाहे- बगाहे घर जाता भी है। ज्यादा रुपये भेजने लायक तनख्वाह नहीं पाता और बार-बार घर जाय ऐसा कोई आकर्पण भी वह अनुभव नहीं करता। अतीश के वहुत-से छोटे भाई-बहन हैं। मां के साथ तो उसकी मुलाकात ही नहीं हो पाती। पिता को वह अधिक पसंद नहीं करता। अतएव निरंकुश। संदीप तो स्वभाव से ही निरंकुश है। अतएव उसी निरंकुशता के आधार पर उनके वीच एक योजना बन गई है। 'तो फिर वही बात रही पक्की।' यह हुआ उस योजना का शपथ । और यह शपथ वे रोज ही उच्चारण करते हैं। कौतुक के लिए बोलते- बोलते यह उनका तकियाकलाम हो गया है, विदा होते समय उनके मुंह 24 : विपदी - . से यह बात निकलेगी ही। योजना यों है- दोनों वधुओं में से एक भी विवाह नहीं करेगा । और अगर करेंगे भी तो एक ही लड़की से अर्थात् सुरभि मे। शास्त्रीय आचार अथवा लोकाचार के अनुसार वह विवाह नही होगा । विवाह का जो चालू अर्थ है उम नर्य में वे विवाह नहीं करेंगे। तीनों मिलकर एक गृहस्थी बनाएगे बस । यही पूरी बात है। उम गृहस्थी का रूप ? वह सब भी एकदम तय कर लिया गया है। मुरभि होगी उस गृहस्थी को मालकिन और वे दोनो होंगे उसके पोप्य । दोनों कमाकर लायेंगे और सुरभि के हाथ पर धरेंगे। वह जैसा चाहेगी चलायेगी। दोनों में से किसी को कोई हिसाब नहीं देगी किसी से कोई परामर्श नहीं करेगी। और 'हा, वही एक बात करने में देरी हुई थी, उन से बेपरवाह मस्तानों को भी। और यदि किसी दिन प्रयोजन हुआ तो सुरभि को उनका सामयिक पत्नित्व ग्रहण करना होगा, वह आपत्ति नही कर पायेगी । सुरभि ने मुस्कराकर कहा था-'और दोनों यदि एक साय अयवा बराबर के लिए मेरी जरूरत अनुभव करें"तो?' 'तब पंचभ्राता पांडवो का स्मरण करूगा। उनसे बल मागूंगा। उन परलोकगत भद्र पूर्वपुरुषों का पदानुमरण करके ही हमारी समस्या का समाधान होगा। 'लोग क्या कहेंगे !' 'लोग? अभी भी तुम लोगो की बात कर रही हो । नः, तुमको इस विशक्ति संघ' से पारिज किया जाता है।' 'इस प्रस्ताव पर राजी होने वाली दूसरी लड़की पाओगे कहा से?' "इस दुनिया में क्या नहीं पाया जा सकता? किसी टोहा की लड़की के शरणापन्न होंगे।' 'ओह, कितनी घृणास्पद बात है ! किंतु ।'
, 'तू क्या समझता है, इतने के बाद भी वे लोग मुझसे कुछ आशा किए बैठे हैं ? 'नहीं, वह वात नहीं । फिर भी अच्छा।' अतीश विदा हुआ। वह पास ही रहता है। पैदल ही मार देगा। संदीप बस पर सवार होगा। कलकत्ते में अतीश के लिए चिंता करने वाला कोई नहीं। एक दूर की बहन के साथ 'पेइंग गेस्ट' होकर रह रहा है । एकदम मुक्त विहंगम है। वहन के मकान के बाहरी हिस्से में तीन हाथ चौड़ा और चारेक हाथ लंबा एक कमरा है। उसी में अतीश का वास है। वह कमरा प्रायः मकान से संपर्कच्युत है। कमरा प्रायः बंद रहता है। उसके दरवाजे पर ताला झूलता रहता है। उसकी डुप्लीकेट चाभी अतीश के पास रहती है। वह जब भी आवे उसे कमरे में स्थित मेज पर अपना खाना ढका मिलता है । अतीश खाने के बाद फिर थाली पर ढक्कन रख देता है । सवेरे महरी आकर उसकी उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति में वह थाली उठाकर ले जाती। मेज को साफ करने की बात कभी नहीं उठती। अतीश को यह बात याद ही नहीं रहती। गांव में उसके पिता, माता, ताऊ, चाचा सभी कोई हैं और उनके रहने की व्यवस्था भी है । अतीश कभी-कभी कुछ रुपये भेजता है। गाहे- वगाहे घर जाता भी है । ज्यादा रुपये भेजने लायक तनख्वाह नहीं पाता और वार-बार घर जाय ऐसा कोई आकर्पण भी वह अनुभव नहीं करता। अतीश के बहुत-से छोटे भाई-बहन हैं। मां के साथ तो उसकी मुलाकात. ही नहीं हो पाती। पिता को वह अधिक पसंद नहीं करता। अतएव निरंकुश। संदीप तो स्वभाव से ही निरंकुश है। अतएव उसी निरंकुशता के आधार पर उनके बीच एक योजना वन गई है। 'तो फिर वही बात रही पक्की।' यह हुआ उस योजना का शपथ । और यह शपथ वे रोज ही उच्चारण करते हैं। कौतुक के लिए वोलते- बोलते यह उनका तकियाकलाम हो गया है, विदा होते समय उनके मुंह 24: विपदी
।
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से यह बात निकलेगी ही। योजना यो है-
दोनों बंधुओं में से एक भी विवाह नहीं करेगा। और अगर करेंगे भी
तो एक ही लडकी से अर्थात् सुरभि से । शास्त्रीय आचार अथवा लोकाचार
के अनुसार वह विवाह नही होगा । विवाह का जो चालू अर्थ है उस अर्थ
मे वे विवाह नहीं करेंगे। तीनों मिलकर एक गृहस्थी बनाएगे यस । यही
पूरी बात है।
उस गृहस्थी का रूप ? वह सब भी एकदम तय कर लिया गया है ।
सुरभि होगी उस गृहस्थी की मालकिन और वे दोनो होंगे उसके पोप्य ।
दोनो कमाकर लायेंगे और सुरभि के हाय पर धरेंगे। वह जैसा चाहेगी
चलायेगी। दोनों में से किसी को कोई हिसाब नहीं देगी किसी से कोई
परामर्श नहीं करेगी।
और 'हा, वही एक बात करने मे देरी हुई थी, उन से वेपरवाह
मस्तानों को भी।
और "यदि किसी दिन प्रयोजन हुआ तो सुरभि को उनका सामयिक
पनित्व ग्रहण करना होगा, वह आपत्ति नहीं कर पायेगी।
सुरभि ने मुस्कराकर कहा था-'और दोनो यदि एक साथ अथवा
बराबर के लिए मेरी जरूरत अनुभव करें"तो?'
'तब पंचधाता पांडवों का स्मरण करूगा। उनसे चल मागूगा । उन
परलोकगत भद्र पूर्वपुरुषों का पदानुसरण करके ही हमारी समस्या का
समाधान होगा।
'लोग क्या कहेंगे!'
'लोग ? अभी भी तुम लोगो की बात कर रही हो। नः, तुमको इस
'निशक्ति संघ' से पारिज किया जाता है।'
'इस प्रस्ताव पर राजी होने वाली दूसरी लड़की पाओगे कहां
से?'
'इस दुनिया में क्या नहीं पाया जा सकता? किसी टोहा की लडकी
के शरणापन्न होंगे।
"ओह, कितनी घृणास्पद बात है ! किंतु...।'
'किंतु-परंतु वाली कोई बात हमारी नियमावली में नहीं है, यह तुम भूली जा रही हो सुरभि ।' 'नहीं, यह बात नहीं । मैं सोच रही थी...।' 'जानता हूं क्या सोच रही हो। उस संबंध में तुम निश्चित रहो। इस दुनिया में अथवा उस दुनिया में-अगर वह दुनिया नाम की कोई चीज हो तो यहां भी सर्वत्र हम लोगों को अक्षय स्वर्ग मिलेगा इसमें कोई संदेह नहीं है, क्योंकि हमें नरक जैसी किसी चीज पर विश्वास ही नहीं है। उसमें उद्धार होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। निश्चित रहो, हम जो भी संपत्ति बनायेंगे वह पूरी तुम्हारी होगी। हो सकता है हमारे ही हाथों फिर मातृतन्त्र का उद्धार लिखा हो ?' लगता है इस योजना को हजम करने में सुरभि को कुछ दिक्कत हुई थी, इसीलिए जव-तव वह इस प्रकार के प्रश्न उठाती रहती थी। उसने फिर कहा था-'अच्छा ठीक, यहां तक तो समझ गई, किंतु इस योजना का उद्देश्य क्या होगा? 'सत्यानाश, तो संदीप, अब इसे उद्देश्य बताओ । नः, औरतों को लेकर कोई बड़ा आयोजन पूरा करना एकदम असंभव है । भूल गई कि निरुद्देश्य जीवन विताना ही हमारा उद्देश्य है । यही महान कल्पना लेकर ही तो हमारी यह योजना बनी है।' "अच्छा, जव हम बूढ़े हो जाएंगे?' 'बूढ़ा? धत् तेरे की। बूढ़े तो हम होंगे ही नहीं। तेल समाप्त होने के पहले दीपक ही बुझा देंगे।' दो-चार दिन यों ही गुजर गए। 'अच्छा तो यही बात तय रही फिर।' कहकर वे एक-दूसरे से विदा लेते। किंतु फिर दूसरे दिन सुरभि कोई वात उठा देती। 'हम यह जो नौकरी-वौकरी कर रहे हैं, वह भी तो एक प्रकार की पराधीनता है । जिसे दासता कहते हैं। जव यह करना ही पड़ रहा है तो...?' 'अरे, यह तो एक प्रकार का आपद्धर्म है | कुछ रुपया तो चाहिए ही 26 : त्रिपदी - जीवन-यापन के लिए।' 'तो क्यों न हम कोई व्यवसाय ही कर?' 'उसमे तो और झमेला है। इसमे तो कुछ ही घंटों की गलामी है। उसमे जीवन-भर अपने को चाबुक मार-मारकर चलाना होगा । नौकरी ही की जाएगी। कोई वैसी बड़ी नौकरी नहीं। यही खाने-पीने-पहनने भर को जिससे आमदनी हो जाए।' सुरिभ ने कहा था-'और मकान जुटाने का काम तो सदीप के ऊपर रहेगा ! इसकी इतनी बड़ी कोठी है।' सदीप चौक उठा था। 'गजव रे गजव। अभी यह भी आशा तुम लोग लगाए बैठे हो ? हमारी उस पवित्र, कुलीन तथा महिमामंडित रायवाडी मे हम जैसे निर. कुश, असभ्य एव निरुद्देश्य लोगो को जगह मिलेंगी ? नैव-नंद च...।' 'वाह, क्यो नहीं होगा? न होगा तुम अपने हिस्से में दीवार उठा लेना। और 'अरे महीपसी महिला, क्षमा, देवी, क्षमा। इस प्रसंग पर यवनिका- पास करो । तीन कमरों का एक फ्लंट खोजने को जो बात हमारे वीच तय हुई थी उसी को रहने दो।' उस दिन बात यही अटक गई। और एक दिन मुरभि ने सदीप से पूछा-'तो क्या तुम अपने घर-द्वार धन-संपत्ति में से कुछ भी नहीं लोगे?' 'हमारा? हमारा कहां है श्रीमती जी हमारा भला क्या है ? मैं क्या रायकोठी के प्राचीन गौरव में चार चाद लगा रहा है कि वहा हमारा कुछ हो गया या मैं उस पर दावा रखूगा।' 'आहा ! उत्तराधिकारी जैसी कोई चीज जैसे इस दुनिया में है ही नहीं।' 'छि-छि-छि। देवी जी, अतीश ठीक ही कहता है कि औरतों को लेकर कोई भी बड़ी चीज नहीं की जा सकती है। हम पीछे की बात की चिंता या खोज नहीं करते। हम आगे देयते है । अग्रगामी होने के लिए ही हमारा इस दुनिया में अवतार हुआ है। हमारी योजना तुम्हारे दिमाग मे क्यों नहीं घुस रही है, क्या बता सकती हो?' सुरभि लजाकर चुप रह गई थी। कुछ दिन बहुत संभलकर वोलती रही मगर कुछ दिन बाद फिर वहीं संदेह झलक आया उसकी वातों में। 'अच्छा, हमारी जीवन-पद्धति क्या होगी। 'ठीक वैसे ही जैसे अभी चल रही है । फर्क सिर्फ इतना होगा कि तब यह त्रिशक्ति सम्मेलन एक ही स्थान से होगा।' 'अगर मुझे घर सजाने की इच्छा करे तो?'' 'पैसे अंटे तो सजाना । हम तो कृच्छ्रसाधना के कंटीले रास्ते से आगे वढ़ेंगे। पैसे की कमी रहने पर स्वाच्छन्द्य तथा स्वेच्छाचारिता भी नहीं कर पाएंगे हम, इसीलिए थोड़े में ही संतोप की नीति हमने अपनाने की प्रतिज्ञा की है।' 'अगर मैं उतने में ही घर सजा सकूँ, तो तुम लोगों को आपत्ति नहीं होगी न?' 'एकदम नहीं। हमारी चाह होगी केवल दो वक्त भोजन और दो कपड़े।' क्रमशः सुरमि के प्रश्न थम गए थे। और क्रमशः वह अभ्यस्त हो गई। तो फिर वही वात तय रही।' मगर वह विशक्ति सम्मेलन कब कार्यान्वित होगा इस बात की मीमांसा अभी कोई नहीं कर रहा था। किसी को कोई जल्दी नहीं थी। तीनों आदमी तीन जगह रह रहे हैं और तीनों के पॉकेट अलग-अलग हैं, फिर भी उनकी जीवन-पद्धति तो पूर्व निश्चित योजना के अनुसार ही चल रही थी। जीविका-निर्वाह की साधारण-सी समस्या का समाधान हो जाए, बाकी तो आदमी को कोई परेशानी है नहीं, वह मुक्त ही है। इच्छा हुई सिनेमा गए, नहीं तो गंगा-किनारे टहल आए, न हुआ होटल बाजी ही हो गई या फिर कहीं एकांत में बैठकर घंटों गप हांका किए.''वस, यही तो उनका काम्य जीवन था। पहले सुरभि के मन में अवश्य ही इस प्रकार के विचारों का जन्म 28: त्रिपदी नही हुआ था, किंतु अद्भुत रूप से आकर्षण और संपूर्णतया नवीन इन रगीन विचारो ने उसे भी अदम्य आकर्षण और मोह में बाघ दिया । दो. दो पुरुषो को प्रिया होने का मादक प्रस्ताव उसे एक विचित्र एवं आनद उन्माद से भर देता। वाह, कितनी उच्चकोटि का उनका संसार होगा? और कितना तो 'प्यार और आदर उमे प्राप्त होगा। देखने में वह अपनी दीदी लोगों मे सुन्दर जरूर है-माधवी, करवी और पूरवी से वह काफी सुन्दर है, 'किंतु केवल सुन्दरता के जोर पर इम दुनिया को कितना पाया जा सकता है। बहुत होता उसी सुन्दरता के बल पर उसको अपने जीजा ‘लोगों मे थोड़ा अधिक संपन्न वर प्राप्त हो जाता, किंतु उस जीवन में और उसकी दीदियो और मा के जीवन मे अन्तर ही क्या होता? यह गगा का किनारा, ये मैदान-घाट, पथ-प्रातर, यह स्वेच्छाचारिता और लापर. चाह जीवन का स्वाद वह कहा पाती इतनी नई जिंदगी उसे कहां 'मिलती? इतना नया आलोक? यह आलोक का नशा बडा खराव होता है। भगवान ने मनुष्यों को 'चेतावनी देने के लिए इस दुनिया मे पतिंगों को भेजा, मगर आदमी ने उससे सावधान होने के बदले उल्टे उसी को रीति-नीति का अनुसरण करना आरम्भ कर दिया। उसी आलोक के नशे में सुरभि मां-बाप का शासन आपाह्य करती है । उनका तिरस्कार उसे स्पर्श नहीं करता। यही है वह नीति जिमसे मिशक्ति 'शक्तिमान है। उधर मां-बाप के लिए वह करत सांप हो रही थी। लडका तो थी नही, कि घर से निकाल बाहर कर दिया जाता । वह तो उसके लिए और भी घातक हो जाएगा और उसका मतलब होगा एक प्रकार मे उसे विनाश के पथ पर ढकेल देना। -धीरे-धीरे उनके लिए सब कुछ अब असह्य होता जा रहा है । दो-दो छोकरों के साथ जब देखो तव घूमती रहती है। जो देखता है समझ जाता कि दोनों अवारा हैं और लड़की बदमाश । एक लड़की के साथ एक लड़का देखते-देखते तो अनेक लोगों की आंखों में घट्टा पड़ गया है । मगर उसकी तो फिर भी कुछ युक्ति है । किंतु यह क्या ? यह तो नि:संदेह खराब चीज है। बहुत ही खराव । अतएव परिचित दृष्टि में पड़ते ही सुरभि की गतिविधियों की सूचना जगमोहन और अपर्णा-उसके मां-बाप-के कानों में नियमित ही पड़ती रहती है। और वह प्रौढ़ दंपति विवश क्रोध से दिन-रात जलते रहते थे । आज भी जल रहे हैं। रात का एक बज रहा है, फिर भी लड़की का पता नहीं । सुन्दरी, जवान लड़की है। कुछ और रात होने पर घर वह लौटेगी। मुहल्ले-भर को जगाते हुए सांकल खड़काएगी। और पड़ोसी देखेंगे कि जगमोहन दरवाजा खोलकर अपनी उसी लड़की को घर में घुसा लेगा। हे ईश्वर कब इस दुर्गति का अंत होगा? कब वे एक साथ विप खा लेने का साहस एकत्रित कर पाएंगे तथा खाकर मर पाने लायक विप पा सकेंगे। किंतु अभी तक तो ऐसा वे कर नहीं पाए थे। उस दिन भी नहीं कर पाए । शायद इसी कारण वे आधी रात को बैठकर लड़की की मृत्युकामना कर रहे हैं और परस्पर एक-दूसरे को दोपी करार दे रहे हैं। 'रुपया ! लड़की के रुपयों से गृहस्थी बनाने चली थीं, देवी जी।" जगमोहन ने युद्ध गले से कहा, 'लालच उफन आई । लड़की को नौकरी से मना करते नहीं पार लगा। उसके रुपये फाड़कर फेंकते नहीं बना ।। अब ? केंचुआ कालनागिन हो गई। अब पछताने से क्या होगा !' अपर्णा भी चुप नहीं रही। वैसे ही कड़े गले से बोली-~-'केंचुए को केंचुआ रखू पिस जोर पर । कुछ रखा था तुमने घर में? ग्याला को छुड़ा. 30: विपदी ही दिया, धोबी के बदले खुद घर में कपड़े साफ करने लगी, मकान-मालिक दावा दायर करने की धमकी दे गया है । तुम तो बड़े मजे से बोल देते हो- कहां में लाऊ ! क्या चोरी करू ! उमर रहते हुए ही बूढ़े बनकर बैठे हुए हो, ऊपर से वातें बना रहे हो। गृहस्थी कसे चला रही हूं, मैं जानती हूं। अपने पेट की जाई लड़की के सामने ही तो हाथ फैला रही हूं। क्या गलती कर रही हूं? और नहीं तो भीख के अलावा कही ठिकाना " जगमोहन कड़वे स्वर मे कमते-'इस पर भी तो जिंदा रहने का शौक गया नहीं।' 'मुझे नहीं, तुम्हे । रात-दिन तो कहती हू जहर ला दो। या लू, छुट्टी मिले । मगर वह भी तो तुमसे नहीं होता । हुह, एक दिन बीडी का बहल न मिले तो आखों के सामने अधेरा छा जाता है और चले हैं बड़ी-बड़ी बातें बनाने।' इसी प्रकार ये दोनों व्यक्ति सारे जीवन को रिक्तता एक-दूसरे के कार झोककर दिल ठंडा करते रहते है। आज उमे आने दो। अगर आते ही उसे घर से नहीं निकाला तुमने तो" ।' जगमोहन चुप लगा गए। तभी वाहर साल बजी । अपर्णा उठ खडी हुई। जगमोहन ने चौकी के नीचे से घर बुहारने वाला झाड इस प्रकार निकाला की अपर्णा उसे देख सके। आगे बढ़कर उन्होंने लडको को निकल जाने को कहा और साय ही जैसे इसी श्रम से उनका बात-रुग्ण शरीर चिलक उठा। कराहने का बहाना करते हुए दवे गले से लड़की से कहा-'जो करना है कल करना, इसी ममय माधी रात को...।' इसी समय अपर्णा आ गई, किंतु उसी रुद्राणी रूप में। उस मूर्ति से सुरभि विचलित नहीं होती । उसके लिए यह कोई नई बात नहीं है । यह तो रोजमर्रा की बात है । आज की ही तरह तीखे और कड़वे गले से उसे पुकारती है- 'किम चूल्हे में गई थी !' आज भी उमी तरह पूछा । सुरभि को गुस्सा नती माता । गम्या करना उनकी नीति के विरुद्ध है । पहले करती थी। जव तक त्रिशक्ति सम्मेलन को नीति को वह अभ्यस्त नहीं हुई थी तब तक वह नाराज हो जाती थी और डांट-फटकार को 'अमृतं वालभापितम्' समझकर सह नहीं पाती थी । मां को सख्त-सुस्त वक देती थी। मगर अव वह नीति की अभ्यस्त हो चुकी है । इसलिए कुछ भी नहीं वोलती वह। वरन् हंसकर कहा- 'वाप रे ! कितनी भुलक्कड़ हो गई हो तुम ! वताकर नहीं गई थीं कि आज सिनेमा जाऊंगी।' 'उस नालायक से पूछो, किसी भले घर की लड़की नाइट शो में अकेली सिनेमा देखने जाती हैं ?' भीतर से जगमोहन गरज उठे। अपर्णा को लगा कहीं लड़की कोई कड़ा उत्तर न दे बैठे वाप को, इसलिए वोल उठी, अव, तुमको सोते-सोते क्या हो गया, जो इस तरह गरज रहे हो ? जो कहना है मैं कहूंगी उसको।' 'हां, मुझे मालूम है तुम उससे जो कहोगी।' वाप की बात पूरी होने के पहले ही लड़की ने परम शांत गले से कहा-'अकेली मैं कहां गई थी वाबू जी ! हमारे वही दोनों दोस्त साथ में थे मां, बड़ी भूख लगी है । एकदम खड़ी नहीं हो पा रही हूं।' 'हमें एक गिलास पानी दे जाना ।' तभी चिल्लाकर जगमोहन ने कहा। अपर्णा ने भी उसी प्रकार चढ़े गले से कहा-'देती हूं। अभी तुम्हारी इस राजकन्या का नखरा उठा लूं, तो देती हूं।' सुरभि ने सोचा, त्रिशक्ति संघ की नीति का पालन करना कितना कठिन है ? उसने सोचा, कल उन दोनों मूों से कहूंगी यह वात । 'कोई जो चाहे कहे, मगर गुस्सा नहीं करना होगा, इससे कठिन साधना और क्या हो सकती है? फिर भी उस दिन उसने उपवास नहीं किया। खुशी मन से खाना खाया। खाना खाकर जब वह सोने का उपक्रम कर रही थी, तभी एक अप्रत्याशित वात हुई । अपर्णा ने उसके पास आकर गंभीर कंठ से कहा- 'कल तुम्हें हम लोगों के लिए एक चीज ले आना होगा।' सुरभि चौंक - 32 : निपदी उठी, क्योकि अपर्णा कभी कोई चीज इस तरह नहीं मागती है। बाप को लेकर कहती है कि अमुक चीज के अभाव में उन्हें कितना कष्ट हो रहा है ? मुरभि का अवाक् होना अकारण नही था। 'क्या ।" उसने पूछा। 'थोड़ा-सा विप, अपर्णा धोली, 'दो आदमियों के खाने लायक ।' सुरभि एक पल मां के मुख की ओर देखती रही फिर उसने धीरे से कहा---'अच्छा', और चुपचाप सोने चली गई। सोने से पहले उसने प्रतिज्ञा की कि कल भेंट होते ही उन दोनो अभागों से कहेगी-'तीन दिन के भीतर अगर तीन कमरों के पलट का नही जोगाड़ किया जा सका तो मेरे लिए थोडे-से जहर का इतजाम करना होगा इतना जिससे आसानी से प्राण निकल सकें।' अगर वे कहे कि कड़ी बात का हमारे ऊपर कोई असर नहीं होगा यही हमारी नीति है, तो मैं साफ कह दूगी कि चलकर हमारे घर पर दो दिन रहकर दिया दो लड़का और लड़की क्या वरावर होते हैं ? हम तीन आदमी समाज के विरुद्ध चाहे जितना विद्रोह करें, मगर क्या औरत और मदं का अतर मिट जाएगा? नहीं मिटता। किंतु औरत की अपेक्षा मर्दो का चमड़ा कही ज्यादा मोटा होता है और वे बिना साधना के ही डांट-फटकार नामक वस्तु को झाडकर चल दे सकते हैं। कही साधना कर लें तब तो बात ही क्या है। . इसीलिए सदीप आधी-पानी-विजली सब झाड़कर हंसते हुए बोला-- 'अच्छा अव तो तुम लोग वोल चुके ? अब खाने-पीने को मिलेगा या नहीं? या कि तुम्हारे माननीय अतिथिगण सव कुछ समेटकर चले गए हैं !' हा, उस दिन आधीपानी-वज्रपात सभी कुछ तो हुआ था। इतनी देर उसमे प्रधान भूमिका ग्रहण की थी उसको छोटी दीदी प्रनति ने। उन्होंने तीसे गले से कहा-'नुप रह । और कवक करने की जरूरत नही है।
- जैसे खाने के लिए तो तू मरा ही जा रहा है।' 'मरा नहीं जा रहा हूं तो और क्या ? पेट में एक राक्षस मुंह बाये बैठा है। सोचता हूं तुम लोगों का मेनू देख लं । लिस्ट मिलाकर खाऊंगा हां-आ।' कमरे में बैठा प्रदीप चौंक उठा । लगा, वावूजी बोल उठे। उठकर बैठ या । आंखों में आंसू आ गए। फिर सोचा, इस पर गुस्सा करके मैंने खाना नहीं खाया । छिः । आकर सहजभाव से बोला-'प्रनति, ला हमें भी थोड़ा-सा कुछ दे । सिर का दर्द अब कुछ ठीक लग रहा है' संदीप भी चौंक उठा। और जीवन में प्रथम वार शायद लज्जित होकर बोला-'अरे, अभी भाई साहब ने खाना नहीं खाया है क्या ?' प्रनति झनझनाकर बोली-'नहीं। तुझे लाज नहीं आई पूछते ? प्रदीप शांत हंसी हंसकर बोला-'अरे, प्रनति, तू आज उससे झगड़ा करने पर ही तुल गई है ? उस समय थोड़ी थकान मालूम हो रही थी और माथे में दर्द भी था। अव ठीक बहुत दिनों बाद दोनों भाई एक साथ खाने वैठे। एकाएक संदीप ने सोचा उसे इतना अच्छा क्यों लग रहा है। इसमें अच्छा लगने की तो कोई वात नहीं है । पारिवारिक सुख का अच्छा लगना ही तो पकड़ा जाना है, बंदी हो जाना है। तब भी भाई के साथ खाना उसे अच्छा लग रहा है । बड़े उत्साह से खाने की तारीफ की। चाप वगैरह कुछ वचा है कि नहीं इस बात का भी उसने पता लगा लिया, बोला, 'अच्छा है, कल चाय के साथ खाया जाएगा।' कमरे में बैठी माधुरी सोच रही थी-नाटकी कहीं का । प्रदीप को लगा आज का आयोजन सफल हो गया । प्रनति ने सोचा, बड़े भाग्य से मैं आज ल्क गई। वेचारी बड़ी दीदी की कितनी इच्छा थी केवल बड़े जीजा के मारे-बावा बुढ़ापे में भी इतना। एक दिन छोड़कर नहीं रह सकते। चलो प्रनति रुक गई है। कम से कम बातचीत का तो आनंद ले लें। 24. शिपती
इसलिए फिर संदीप को छेड़ने की गरज से बोली-'सच संदीप, आज
तुमने जो किया...।'
'तुम लोगो ने भी कुछ कम नहीं किया।'
'माने?'
"ओह ? बेचारे उज्ज्वल पर कितना अत्याचार तुम लोगो ने किया।
जब से देपा वेचारा मजबूर होकर अपने रेशमी वालों को मुड़ाने के लिए
नाई के सामने बैठा है । मैंने प्रतिज्ञा को-जब तक उसके सिर पर फिर
से बाल नही उग आएंगे, मैं उससे आखें मूदकर बातें करूगा।'
'अब सुनिए। आदमी के ऊपर तो तिल-भर माया नही है जनाब को
और बाल-दो-बाल पर इतनी ममता।'
'माया चीज ही मायामय है।'
उघर प्रदीप याते-खाते सोच रहा था। तेज धार वाली नदी का
बहाव मुड़ जाता है, मगर आदमी का मन क्या नहीं घूम सकता नहीं,
ऐसा नहीं हो सकता-संदीप आज से बदल गया, स्वाभाविक हो गया।
संदीप सोने आया। छोटदी भी आकर उसके पास बैठ गई। बोली-
"जानता है आज तेरी नया-नया निंदा हुई ?'
'जानता हूं।'
'कसे जाना?
'अनुमान से।
'कितना खराब लगता है बोल तो?'
'मुझे तो बड़ा मजा आता है, लोग निंदा कर रहे होंगे, यह सोचकर
ही मन गद्गद् हो उठता है।'
'ताज्जुब है । तेरे लिए एक विवाह प्रस्ताव आया था।'
'अच्छा ?' उछल पड़ा संदीप, 'अरे पहले क्यों नहीं बताया ? तो फिर
खिसकू यहां से । अरे वाप रे।'
'अरे क्यो बेकार उछलकूद मचाता है ? भाई साहब ने सब ठीक कर
दिया है । इस बार तुझे मुक्ति मिलने से रही।'
"फिर क्या है। नायलोन की साड़ी का आर्डर दे डाल न । माड़ो
गाठड, तोरन, साज-शहनाई वाले को आर्डर दे, झाड़-फानूस, विजली वगैरह का इंतजाम कर और जितने तेलचट् खोपड़ी वाले हों उनके सिरों पर तेल डाल । एक गरीब गृहस्थ के दस-बीस वर्ष घर चलाने-भर को रुपया रात-भर में फूंक न डाला तो बात ही क्या वनी ।' 'ये सब तो पुरानी बातें हैं । अव ये सब बातें कोई नहीं मानता है । देश के लोग खाने, को नहीं पा रहे हैं। इसीलिए हम लोग अपनी हैसियत के मुताविक खर्च नहीं करेंगे ये सब सड़ी हुई सेंटिमेंटल वातें इस समय कोई नहीं मानता है। जिसकी जैसी हैसियत होगी उसी के अनुसार काम करेगा ही। 'वह तो है । हैसियत दिखाएगा नहीं तो कोई मानेगा कैसे? जिसके पास उड़ाने-पड़ाने और फूंकने के लिए पैसा है, वह उड़ाये और फूंके विना मानेगा ? जरूर करेगा। उसके अलावा अगर पत्तल में छुपे अन्न से तुम लोगों ने डस्टबिन न भर दिया तो भिखमंगों को अच्छी-बुरी चीजों का स्वाद कहां से मिलेगा?' 'तुम्हें तो हमेशा का यही रोना रहता है । मैं तो सी बात को एक बात जानती हूं, जिसके भाग्य में जो लिखा है उसे वही मिलेगा। हम लोग अगर कुछ न भी करें तो क्या गरीबों का दु:ख मिट जाएगा?' 'वाह ! तर्क तो एकदम अकाट्य है । अच्छा, रात के दो बज रहे हैं। अब जल्दी से अपनी असली वात कह डालो।' 'बताती हूं। देख, भाई साहव तुझसे व्याह की बात करेंगे। कोई उल्टा-सीधा उत्तर मत दे बैठना।' 'अच्छी बात है, नहीं दूंगा।' 'भाई साहब जहां लड़की देखने जाने को कहेंगे, जाएगा न ?' 'जाऊंगा।' 'भाई साहव अच्छी ही लड़की दिखायेंगे तुझे।' 'ऐसा ही लगता है।' प्रनति को अब कुछ संदेह होने लगा-'हर बात पर हूं-हूं तो कर रहा है। शादी की बात पर भी हां करेगा या नहीं? या उस समय कह देगा- - - 36:त्रिपदी हमसे नहीं होगा ! 'ठीक उन्ही शब्दो का व्यवहार करंगा, ऐसा तो मैंने नहीं कहा।' 'मगर शादी? 'बम उसी एक बात पर हां मत करवा । देख तेरी हर बात में मैंने बिना न-नुकर किये सही कर दी है।' 'सदीप, तेरा क्या होगा रे?' 'देख छोटदी, और सब तो ठीक है, जरा मेरे बारे में कम सोचो तो बडी मेहरबानी होगी।' 'अच्छा अव भाग । लडकी देखने अभी तो जाना नही है । आखें बंद हुई जा रही है । आखें नीद से बद हुई जा रही थी, फिर भी सदीप तुरन्त सो न मका । सोचकर देखा अब और देर करना ठीक नहीं होगा, अब यह बंधन तोड़ने का समय आ गया है । इन लोगों ने पड्यत्र शुरू कर दिया है। आज भाई साहब के साथ खाना मुझे भी बहुत अच्छा लगा था, इस दुर्वलता को और प्रथय देना अच्छा नहीं होगा। यह विपत्ति का सकेत है, थोड़ी-सी भी दिलवाही करने पर यह कोचड़ उसे ले डूवेगी। अतएव इम दुर्बलता को कोई प्रश्रय नहीं देगा वह । । आज अतीश को भी नीद नहीं आ रही है । खाली पेट सोने की मंत्रणा ने नीद को कोसों दूर भगा दिया। सिनेमा से लौटकर ज्यों ही उमने कमरा पोला, एक विल्ली घर में से निकलकर भागी। कमरे में घुसकर उसने देखा, उमका साना जमीन पर गिरा पड़ा है। देखते ही समझ गया कि शायद बद करते समय बिल्ली चौकी के नीचे छुपी हुई थी। एक गिलास पानी गट-गट करके पी गया । बिस्तर पर आ बैठा तो उमे मबसे पहले सदीप की याद आई । सोचा-पछा मजे मे भोज के पक- वान उडा रहा होगा। वह यदि स्वाभाविक होता तो भतीजे के जनेऊ में मित्रों को तो जरूर आमपित करता । नीद न आने से चिढ़े हुए मन से उसने सोचा-थोड़ा स्वाभाविक होने मे ही क्या दोष है ! सोने से पहले उसने सोचा-यह पलट खोजना वहन आवश्यक हो - उठा है । कल मिलते ही यही बात उठाऊंगा। किंतु त्रिशक्ति संघ की अगली मीटिंग में सुरभि ने ही आगे वह वात उठाई। बोली-'तुम लोगों का वह फ्लैट क्या मंगल ग्रह पर तैयार हो रहा है ? - 'हुआ क्या? अचानक यह रुद्र-मूर्ति क्यों?' 'हमारी मां की मूर्ति देखते तो ऐसी बात नहीं करते।' "फिर वही पुरानी बात । वही सहन न होने वाली बात ।' 'हां, तुम्हें क्या ? बड़े आदमी के लाडले भाई हो, तुम्हें दूसरे का कष्ट कैसे मालूम होगा? अच्छा, मान लो घर पहुंचने पर तुम्हारी भाभी एक थाल ठंडा, ऐंठा चावल तुम्हें खाने को दे दें और तुम्हारे भाई साहब तुमसे खाने के लिए विप मांगें तो तुम क्या करोगे?'' 'विप? 'हां, अभागी वदमाश लड़कियों से पीछा छुड़ाने का रास्ता गाजियन के पास और क्या है ?' संदीप थोड़ी देर तक चुप रहा। फिर बोला-- 'एक तीन कमरों का किराये का मकान खोज निकालना इतना कठिन काम नहीं है । फिर भी तुम्हारी जो हालत सुन रहा हूं, तुम आओगी ? कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे मां-बाप अंत में विरोध करके कोई खासा झमेला खड़ा कर दें ?' 'आपत्ति तो करेंगे ही । झमेला नहीं कर सकते । मैंने तय कर लिया है। कोई नाबालिग नहीं हूं कि पुलिस बुलाकर कुछ कर पाएंगे। जो नहीं रहना चाहे उसे वे लोग कब तक अटका रखेंगे? कह दूंगी--विष मांगा था न । तो, यही है वह विप ।' अतीश अभी नहीं आया था। संदीप ने नहीं-नहीं करके भी पॉकेट में रखा सारा भुना चना खा डाला। अंतिम चने से उसने घास पर चलते एक कीड़े को निशाना बनाया और धीरे से कहा- 'शायद उनके दिल को बहुत चोट पहुंचेगी?' 'आहा हा ! भूत के मुंह में रामनाम ! गाजियन के आहत होने की बात सोच रहे हो तुम? तुम चले आओगे तो क्या तुम्हारे भैया को दुःख 38: विपदी
..
'लो अब सुनो, रायकोठी में न सही, इसमको कही किराये याने
न होगा?
पल-भर सदीप ने अपने को बड़ा असहाय अनुभव किया। फिर महम
उसने जोर से हसकर कहा-'यह बात तो ठीक ही कह रही हो भूत के मुंह
मे सचमुच ही रामनाम नहीं मुहाता ।'
तभी अतीश आ पहुचा।' वोला-'इतनी हंसी किम बात की है ?'
"भूत के मुह में रामनाम की बात हो रही है। सदीप मोच रहा है कि
हमारे चले बाने पर हमारे मा-याप दुषी होंगे।'
अतीश इस मजाक को पकड नहीं मका। उसने गभीर मुख बनाकर
कहा-'देय सदीप, यह मामला अब हमी में टालने से काम नहीं
चलेगा। सीरियस होकर सोचना पड़ेगा। मैं जिस प्रकार वहा रह रहा
इसके बाद पिछली घटना का उमने वर्णन किया
सदीप का विवेक उसे अदर से कचोटने लगा। उमे नगा, वह ता बढे
आराम से ही अपने घर मे बैठा बडे मजे उड़ा रहा है। उन बेचाग की
अवस्या पर ध्यान नहीं दे रहा है और योजना को टालना जा रहा है। यह
तो एकदम स्वार्थपरता है।
'अच्छा चलो, आज ही मकान खोज डालें।
अतीश योड़ा इधर-उधर करके वोला- कह रहा था, तुम्हारे नों
अपने दो मकान भाड़े पर चलते है।'
'हमारे नहीं, रायों के ..।'
मेरेभाई।'
मकानों में ही कोई एक फ्लंट दिला दो
'उमको जरूरत नहीं है । एकार को कहने-भर की
है वे कृतार्य होगे हम लोगों को बाहर
'अरे तो भाई साहब को हरमोन
'पागल हो क्या?
'यह तो तुम्हारी मान तुम्हारे ।
कोई अपनी कमाई काट ले।'
.
'अतीश, इस बात को रहने दो।' गंभीर होकर संदीपने कहा, 'फक्कड़ी
होने का मतलब तो यह नहीं होता है कि मैं क्षुद्र बनूंगा।'
'मगर मकान पाना क्या आसान है ? सुनते तो हैं कि आजकल भगवान
मिल जाते हैं, पर मकान नहीं मिलता।'
'ठीक है, मैं गारंटी देता हूं कि एक सप्ताह में मकान जरूर ढूंढ
लूंगा।'
'मगर उसमें तीन कमरे जरूर होने चाहिए।' सुरभि ने बीच में ही
टोका।
संदीप थोड़ा हंसा । बोला-'जरूर।'
40:त्रिपदी
3 मकान ढूढ़ने का काम संदीप ने अपने जुम्मे लिया। चाहता तो घर की कार का उपयोग कर सकता था। जरा-सा कहने-भर की देर थी। मुहल्ले मे उसके ऐमे बहुत-से भक्त थे जो उसके लिए यह काम करने में एक मिनट की भी देर नहीं करते, मगर उसने न कार ही ली और न भक्तों मे ही कहा । खुद ट्राम, बस या पैदल इधर-उधर घूमकर पता लगाने लगा। परेशान होने लगा। जहां जाता वही एक जवाव । फिर भी कोशिश करने पर माप की आख, वाघ का नख तक मिल जाता है, मकान ऐसी क्या वडी चीज है। मकान मिला। मगर कलकत्ता में नही, सवर्व मे । सुरभि गई देय आई, अतीश ने भी वाहवाही दी। मकान सदीप ने खोजा था । इसलिए नम्रता से बोला-'नल नहीं है, ट्यूवेल का पानी पीना होगा। यह एक असुविधा होगी...।' 'घुत्, वह भी कोई अमुविधा है ?' सच, वह कोई वही असुविधा नही थी।
सुविधा हुई दूसरी जगह ।
असुविधा हुई अतीश की दीदी को। एक मुट्ठी भात, चार रोटियां
एक फालतू-सी कोठरी के लिए महीने में अस्सी रुपये मिलते थे, सो
गए । मारे गुस्से से आते समय अतीश से वोली तक नहीं। जीजा जी,
न्होंने उस दिन तक कभी उससे बुलाकर एक बात तक नहीं की थी,
न्तिम प्रयास करने से नहीं चूके।
'साले साहव को यहां असुविधा क्या थी। पता चलता तो..।'
'सिर पर और कब तक बोझ बना रहता?'
'मगर सिर ने तो कभी कहा नहीं कि उससे ढोते नहीं पार लग रहा
+
'अच्छा तो?' अतीश ने और कुछ न कहकर आज्ञा मांगी।
अपर्णा की आंखों में अंधेरा छा गया। उन्होंने धिक्कार के स्वर में
कहा-'अकेली, तू क्या अकेली रहेगी?'
'अकेली नहीं। तीन मित्र एक साथ।'
'तेरे मित्र कैसे हैं यह जानना वाकी तो है नहीं? वही दोनों बदमाश
लड़के न? इसका मतलब है तू घर छोड़कर जा रही है।'
'अब तुम जो समझो...।
'और हम दोनों बूढ़ा-बूढ़ी क्या खाएंगे यह नहीं सोचा ?'
'बड़ी दीदी, छोटी दीदी या मझली दीदी क्या सोचती हैं ?''
'उनकी बात छोड़ दे । उनकी गृहस्थी हो गई।'
'गृहस्थी हमारी भी हो रही है ?'
'हो जाती तो कम-से-कम लोगों के सामने मुंह दिखाने लायक तो
रहते, तू क्या यही चाहती है कि हम लोग दुनिया में मुंह दिखाने का
न रहें?'
'मुंह तो बहुत दिन पहले ही मैंने तुम लोगों का काला कर दिय
मां।
'वह तो ठीक है, मगर पेट नाम की भी तो एक चीज होती है,
नहीं जानती?'
'मैं महीने में एक सौ रुपये दे जाऊंगी और फिर तुम्हारी दूसरी भी तो लडकिया है।' 'वे मव कितना ख्याल रखती है, यह तो तू देख ही रही है।' 'फिर भी वे ही तुम्हारे लिए अच्छी है । उनसे तो तुमने कभी विष मागा नहीं होगा। 'लाठी मारकर पर तोड दो हरामजादी का। जन्म-भर को लंगड़ी बना दो इस पतुरिया को।' घर में से जगमोहन गरज उठे। किमी ने वात का उत्तर नहीं दिया । मुरभि खाली हाथ चली गई। विशक्ति का यही कानून है, कि घर से खाली हाय ही आना होगा। मुरभि ने सोचा, पुरप बडे कट्टर होते है । आदमी कितनी छोटी-छोटी चीजें अपनी पसन्द के मुताबिक मुरीदकर इकट्ठा किए रहता है। उन्हे छोड आना क्या आसान है ? फिर भी उस गली में से निकलने का अवसर मिला है, यही मोचकर वह नुकसान सह गयी। अनीश का घर ही नहीं है । छोड आने का मवाल ही नहीं उठता था। विस्तर और मूटकेस तो रास्ते में छोड़े नहीं जा सकते। इसीलिए वह अपनी चीजे लेता आया है। मुरभि और अनीश पास के मुहल्ले मे ही रहते हैं, इसीलिए प्रायः एक माय ही घर में निकले । मुलाकात हुई। मुरभि बोली-तुम तो अपना मव मामान ही लिए जा रहे हो ।' 'अरे, कुछ नहीं । मब वेकार की चीजें है। देखने पर तुमको हसी भाएगी।" गुरभि मोचने लगी हमारा हो क्या राज या? फिर भी नौकरी करके कपडे जरूर कापी बनवा लिए थे। वे ही छोटी-छोटी चीजें आज नव- जीवन के पथ पर आगे बढ़ जाने के बाद भी आंखों के सामने रही थीं । सुरभि के पैरों को पीछे खींच रही थीं। नये मकान का आकर्षण आंखों के सामने से ओझल हो गया। बाद में चाहे जितनी चीजें वह खरीदे, पर जो चीजें छोड़कर जा रही है उनकी कमी क्या कभी मिटेगी? उसी अफसोस में पैर जैसे पीछे की ओर भागने लगे। या फिर और कोई वात है ? क्या अपाहिज वाप और कटुभापिणी मां का मोह ही उन चीजों का मोह बनकर उसे पीछे खींच रहा है ?
4 मुरिम और अतीश आकर नये मकान में प्रविष्ट हुए। मंदीप अभी नहीं आया था। अचानक सुरभि को लगा वह और अतीश जैसे एक जात के है। अतीश के माथ तो मेल खाने का सवाल ही नही उठता । किंतु सदोष किमी और हो जात का है। उसो को लेकर हो तो चिता है । असली बात यह है कि संदीप के भूल जाने पर भी ये दोनो नहीं भूल पा रहे हैं कि वह बड़े घर का लड़का है । माय-साथ घूमना और बात है और साथ-साथ रहना दूसरी बात है । इसके अलावा- ईश्वर जाने सुरभि ने ठीक किया या गलत ? ये सब विचित्र बातें क्या सचमुच चलने लायक है ? क्या सचमुच मनुष्य के लिए कल्याणकारी हैं ? केवल उद्देश्यहीनता का उद्देश्य लेकर क्या कभी दो लड़कों को लेकर एक लड़की ने अथवा एक लड़की को लेकर दो लड़कों ने गृहस्थी बसाई है ? ऐमी यात केवल इस देश में ही नहीं, अत्यंत आधुनिक देशो में भी यदि कोई सुने तो स्तब्ध नहीं रह
जाएगा?
,
मगर सब बातें न जानते हुए भी माधुरी स्तब्ध रह गई । अविश्वास
के स्वर में वोली-'यहां नहीं रहोगे ! दूसरी जगह मकान लिया है !'
'हां, ऐसा ही तो हुआ है।
'मगर क्यों, क्या जान सकती हूं?' कठोर स्वर में माधुरी ने पूछा।
'कारण कुछ भी नहीं है। यों ही।' संदीप ने सहज भाव से कहा।
गुल्ला करना उनकी नीति के विरुद्ध है।
'ऐसे ही, वेकार में घर छोड़कर चले जाओगे !'
'ओहहोह, इस तरह क्यों सोत्र रही हैं। समझ लीजिए दूसरी जगह
नवादला हो गया।
'मान लेने से वात नहीं बनती। तुम इस प्रकार चले जाओगे तो
लोग क्या कहेंगे?
'जानना हूं, कहेंगे लड़का आवारा है, फालतू है ।'
'नहीं, ऐसा नहीं कहेंगे।' माधुरी ने कठोर होकर कहा--'कहेंगे भाई-.
भावज ने सारी संपत्ति का भोग करने के लिए दुर्व्यवहार करके भाई को
भगा दिया। तुम्हारी खामखयाली के लिए हम लोगों की निंदा क्यों हो?'
'ओफ् ! आप ऐसा क्यों सोच रही हैं ? यह तो सभी जानते हैं कि
में खामखयाली ।'
'क्यों तुम खामखयाली हो यह तो नहीं जानते लोग। अव उन्हें
कारण भी मिल जाएगा।
'ऐने लोगों को वात छोड़ दीजिए।'
'नहीं, लोगों की बात छोड़ देना हमारे लिए संभव नहीं । हमें तो
इन्हीं लोगों के बीच रहना है। अगर तुम्हें हमारे साथ नहीं रहना है तो तुम
अपना हिस्सा अलग कर लो।'
'पया ऐसा करने पर ये लोग प्रशंसा करने लगेंगे?'
'नहीं', माधुरी ने और भी निष्ठुर होकर कहा-'शायद निंदा ही
करेंगे । परंतु हमारी नहीं, तुम्हारी।'
46:त्रिपदी
. 'आप समझती क्यों नहीं ? क्या कुछ लड़के वैरागी नही हो जाते, किमी मठ में नहीं चले जाते !' 'जाते क्यों नहीं, मगर वे मबके हृदय पर अपने त्याग की मुहर लगा- कर जाते है । उनको निदा नहीं होती।' 'अच्छी बात है। जिसे लोग त्याग कहते है, वही पक्का कर जाता हूं। मैं इस घर के पूर्वज प्रतापराय का अधम पुत्र अपने परिवार के गौरव के उपयुक्त नहीं हू, अतएव में उनकी अजित संपत्ति का अधिकारी अपने को नहीं मानता और इस प्रकार अपना हिम्सा उनके पोते उज्ज्वल- दीप के नाम किए जाता हूँ। 'कभी नही । मैं अपने लड़के को किसी प्रकार नहीं लेने दूगी।' मंदीप स्तब्ध रह गया। सोचा था, कुछ भी नहीं लेगा मगर देखता है वात उतनी आसान नहीं है जितनी उसने सोची थी। धीरे से वोला- 'लने क्यों नहीं दीजियेगा? उसके जनेऊ में सभी ने कुछ-न-कुछ दिया उसे । अभी तक मैंने ही उसे कुछ नहीं दिया । ममझ लीजिये ।' ठीक तो है । उपहार देना बनावटी लगता, इसीलिए सदीप ने उज्ज्वल को कुछ भी नहीं दिया था। अस्वाभाविक संदीप अब अस्वाभाविक रूप से ही अपने भतीजे को एक अस्वाभाविक उपहार दे रहा है तो इसमे फिमी को क्या एतराज होना चाहिए ? मगर जो बात मदीप के लिए बडी महज लगती है, वह और किसी के लिए उतनी सहज नही भी हो सकती है । मदीप को वात पत्म होने के पहले ही प्रदीप अपने कमरे मे से उठकर वहा आ गया परदे की आड़ होने के कारण प्रदीप को बगल के कमरे में बैठे सदीप ने नहीं देखा था। दीर्घकाय उन्नत व्यक्तित्व वाला प्रदीप उसके सामने आकर खड़ा हो गया। वोला-- 'नहीं, उपहार लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। किंतु उपहार भी तो उपहार की तरह होना चाहिए. पर्ज निवशने जैसा तो नहीं होना चाहिए और अगर दान देने की इच्छा हो तो एक बात नोट कर लो, रापदर का लड़का कभी दान नहीं लेना।' संदीप ने सिर नीचा रिहा-'तो जैा * -- जए 'तो तुम जाओगे ही !' गंभीर निलिप्त स्वर । संदीप को उत्तर देने में समय लगा। कौन जानता था जाने के समय सी कठिन परीक्षा होगी? वह अपने को हमेशा से बंधनमुक्त मानता था। पके हुए फल की तरह टेंपी तो गल ही गई है । टप् से चू पड़ता है, वस । किन्तु कहां पकी है डेपी? अब उपाय क्या है? रुक जाऊं? पीछे हट जाऊं! एक मित्र को उसके सिर छिपाने की जगह से निकाल ले आया और एक लड़की को उसकी सामाजिक मर्यादा से च्युत करके खींच लाया हूं, अब क्या पीछे हटने का मौका है ? योजना जब तक पूरी कल्पना थी, तव तक तो इसके पक्ष में जितनी बड़ी-बड़ी बातें की जा सकती थीं की गई, मगर अब युक्ति धुंधली हुई जा रही है । इसीलिए उत्तर देने में देर हुई। प्रदीप के सामने उसने अपने को बहुत ही छोटा अनुभव किया। धीरे से बोला-'दो मित्रों के साथ मैंने एक मकान ले लिया है । वे लोग हमारे आसरे...।' 'तुम्हारे भरोसे ?' थोड़ा-सा हंसा प्रदीप, 'अच्छी बात है। तुम मकान का भाड़ा दे देना।' ! वे क्यों लेने लगे? यह तो सहायता जैसी चीज हो जाएग वे गरीब हैं इसका मतलब तो यह नहीं है, कि उनका कोई आत्मसम्म नहीं है !' संदीप ने इस बार सिर ऊंचा करके कहा। 'यह वात तो है।' प्रदीप ने हंसकर कहा, 'उनके सम्मान की रक्ष करनी ही होगी।' माधुरी अभी तक चुप थी। इस बार बोल पड़ी. के सम्मान की बात तो तुम्हें याद रही देवर जी, मगर भाई के सम्म बात क्या एक पल के लिए भी तुम्हें नहीं याद रही ?' 'ओह माधुरी, रुको । जब वह किसी प्रकार रुक नहीं सकता जाने दो। हमारी-तुम्हारी निंदा होगी यह कोई बड़ी बात नहीं है अपना पता दे जाना।" संदीप ने बड़ी मुश्किल से कहा-'मैं क्या फिर आऊंगा न 'वाह - - -48: विपदी । बीच मे आता रहूंगा। 'अच्छा, बीच-बीच आओगे? फिर क्या बात है? जिस दिन घूमने आओगे उसी दिन पता ले लेंगे।' कहकर पर्दा उठाकर प्रदीप दूसरे कमरे में चला गया। सदीप को लगा प्रदीप उसके सामने एक लोहे को दोवार खडी कर गया। यह दीवार कैसे टूटेगी? सोचा था भाभी को बताकर ही खिसक आऊगा । फिर किसी दिन घूमने आने पर सब सहन कर लूंगा। जाने कितने लड़के इस तरह अपने घर से अलग रहते हैं। उसके मियो में से हो कई लोग मा-बाप के रहते हुए भी अलग रहते हैं। वे कोई पाप या अप- राध कर रहे है ऐमा तो नहीं लग रहा उसे? किंतु उमे स्वय ऐमा लग रहा है ? वह ? कुछ नही। सामयिक मोह है । बाद में सब ठीक हो जाएगा, और बहुत तरह से उस दिन मदीप ने अपने को तैयार कर लिया। इतनी सुश्किल के बाद तो योजना साकार होने जा रही है । जीवन का एक नया प्रयोग करने जा रहे हैं वे लोग। अगर उनकी योजना सफल हो गई तो परिवर्ती समाज उनका ऋणी होगा। सदीप जव पहुचा तो उसे देखा, उन दोनो ने करीब-करीब गृहस्थी जमा की है । उसने देखा, अतीश के मुह पर एक अनिर्वचनीय प्रकाश है और सुरभि के चेहरे पर एक विचित्र और मधुर लावण्य । आश्चर्य । मानता हूं अतीश का यहा कुछ नहीं था, मगर सुरभि का तो घर- द्वार, मां-बाप सभी कुछ था। वह तो सब कुछ छोडकर आई है ! फिर? अपने को जितना भी कठोर और निर्मम सदीप क्यों न समझे, परतु अदर से वह भी कम भावुवा नहीं है । और कोई बात नहीं है, राय परिवार की आवहवा का असर है । इमको समाप्त करना होगा, संदीप ने सोचा। अच्छा नहीं लग रहा है । किमे ? मन को। मन क्या चीज है ? छि:, इससे हास्यकर वान क्म हो सकती है, अतएव भयवार उत्माह या जाय। 'क्यों भई, तुम लोगों ने तो देख रहा हूं, सब कुछ ठीक-ठाक कर लिया मालूम होता है गरम चाय तैयार है और साथ में शायद फ्राई या र कुछ..। 'आहा, टके की टोपी, रुपया पकड़ाई। चाय तो हम लोगों ने खरीद कर पी ली है।' 'कमाल है, खाना-पीना सव खतम । अच्छी बात है। हमारे हिस्से में एक कप चाय कम करके लिखी जाए।' 'ठीक है। 'तव ! खाना-वाना?' 'वह भी आज होटल में।' 'हत्तेरे की ! कहां सोचता-सोचता आ रहा था कि देर करके जा रहा हूं। जाते ही गरम-गरम तैयार मिलेगा और तुमने होटल दिखा दिया। अतीश हंसकर बोला-'सच पूछो भाई संदीप तो होटल मैने ही खाया है। श्रीमती सुरभि का भोजन । पता नहीं मुंह में पड़ेगा या नहीं। 'देखो, इस तरह अपमान करने पर तो कभी खाना बनाऊंगी ही नहीं। जो मर्जी हो बनाना और खाना।' 'हां-हां-हां, चिढ़ती क्यों हो। तुम्हीं तो इस समय हम लोगों के लिए अन्नपूर्णा हो।' 'रहने दो, इतनी देर कैसे हुई ! मैंने तो सोचा हम लोगों को पेड़ प चढ़ाकर आप घर का मजा ले रहे हैं। हम लोगों को इस मच्छर-वृन्दा में पठाकर अपने हाजरा रोड की अट्टालिका में आमोद प्रमोद...।' 'हमारे बारे में यही धारणा है तुम लोगों की ? छि:छिः, अतीश, क्या सुन रहा हूं? अतीश ने हंसकर कहा था--'मेरी नहीं, उसकी धारणा है।' वात सच है। सुरभि ने ही संदेह प्रकट किया था। कहा था-'मतीश, मेरा मन कह रहा है, वह आयेगा नहीं। 'नहीं आयेगा। . - निपदी 'हां, मुझे तो ऐमा ही लग रहा है। बाद में आकर कहेगा, भाई साह्य नहीं छोड़ा। 'हट्, वह क्या ऐसा है ? 'देखो, आदमी के मन का कोई ठिकाना नहीं । उसकी हालत कोई हम ती तो है नहीं । घर का इतना आराम छोडकर-जानते हो उसके घर ई का गद्दा नहीं है, सब डनलपिल्लो के गद्दे हैं ।' 'गजब-रे-गजब । उसको हाडी का भात तुमने कैसे जाना? वह तो पता नहीं है । तुम्हें ये खबरें आखिर देता कौन है ? उस दिन तुम्ही तो जा रही थी कि उसके दो-दो मकान किराये पर चलते हैं। उसकी दोनों इनें ये बंडी-बडी कारो मै चढ़कर आती-जाती हैं । आज बिछौने की खबर ना रही हो। इन बातो की खबर में हो जाती है तुम्हे ?' 'लगाना पड़ता है जनाव, लगाना पडना है। कोशिश करनी पड़ती । यबरें कोई अपने-आप चलकर मेरे पास नहीं पहुंच जाती हैं । किमी- विषय में अंधकार मे रहना मुझे नहीं भाता।' 'ऐसा तव तो हमारे बारे में भी तुमने पता लगाया होगा ?' मुरभि हंस पड़ी। बोली-'तो तुमने क्या सोचा था ? तुम्हारी उन जनीया दीदी जी के पास एक दिन सनलाइट साबुन का प्रचार करने गई सच, सुरभि एक दिन गई थी वहा । मगर बहुत दिन पहले । जब नई- ई जान-पहचान थी। बड़ी सफाई से उसने अतीश के मकान का पता जान लया था । वैसे भी तो कम्पनी को नौकरी में हजार घरो में आना-जाना करना पड़ता है। यही तो उसकी नौकरी है। जान-बूझकर ही अतीश के घर गई थी। अधिकाश मे कौतूहल हो या और कुछ अपनी मगलभावना भी थी कि जिसके साथ मिल-जुल रही हूँ, कमे लोग है यह जान लेना अच्छा होगा। मगर वहां तो अतीश की मौसेरी बहन ने करीब-करीब उसके मुह पर ही दरवाजा बंद कर दिया। जल-भुनकर बोली थी-'सनल की अच्छाई-बुराई अब तुमसे सीपना होगा क्या? तुम्हारी पदाइश नलाइट का उपयोग कर रही हूं।' फर भी सुरभि ने साहस करके कह दिया था-'हो सकता है आपके वाले कमरे के किरायेदार लें?' 'यह किरायेदार तुमने कहा देख लिया?' 'वो बाहर जो ताला झूल रहा है, उसी कारण हमने सोचा...।' रभि ने एकदम देवी की तरह मुंह बनाकर कहा, जैसे वह एकदम बच्चा 1. निप्पाप और भोली-भाली। 'उस घर में किरायेदार रहता है यह बात तुमसे किसी ने कही है ? वहुत सदिग्ध भाव से दीदी ने पूछा था। नहीं-नहीं। ऐसे ही कह रही थी। दरवाजे पर ताला झूल रहा है न, उमी ने।' 'वाह रे दिमाग, दरवाजे पर ताला झूलते देखा तो वस समझ लिया कोई किरायेदार रहता है। किराये पर मैं कभी भी मकान नहीं देती, समझी? उसमें मेरा छोटा भाई रहता है, खाता है, सोता है और जव इच्छा हो घूमने निकल जाता है। और कमरे में ताला झुका जाता है। वह साबुन लेकर कपड़ा साफ करने बैठेगा? जाओ-जाओ, यहां से कोई लाभ नहीं होगा। यहां जितनी भी महिलाएं रहती हैं सभी खोजकर सस्ता साबुन लाती हैं और उसी का उपयोग करती हैं, समझी ? इस मुहल्ले में कोई लाभ नहीं होगा।' अतीश के विपय में उसकी जानकारी का यही आधार है। मगर संदीप की और बात है। संदीप के घर वह अपने-आप नहीं ग उसकी मंझली वहन की ननद का मकान वहीं पर हाजरा रोड में : अचानक उसने उस घर में जाना आरंभ किया। 'कंपनी का नमूना कहकर पहले कुछ चीजें उन्हें दीं। फिर ज लगी गप करने । उनको भी नौकरी करने वाली इस लड़की के सं कौतूहल था। भले ही वह नोकरी रास्ते-रास्ते घूमने की हो, म में चूल्हा-चौका लेकर बैठे रहने से तो अच्छा है। घुमावदार साई शवदी कर वालो को दो चोटी झुलाकर घर से निकलने का मौका तो मिलता इसीलिए गप अच्छा ही जमता था। मुरभि ने एक दिन कहा था-'अच्छा तो है। एक बड़े आदमी के मकान के मामने रहती है, हमारा परीदार बना दीजिए न?" 'याप रे, उनके माय हमारा क्या वास्ता ?' 'उससे क्या? पडोसी तो है। अपनी जाति को तो है " 'हा, पड़ोमी-जैसे गरुड पक्षियों का स्वजाति होता है।' और फिर ननद ने उसके बारे में बहुत-मी वातें बताई। भले उसने भी केवल मुन रखा हो, मगर बात तो ऐमे उसने की जैसे उसने स्वयं देखा हो । 'वाप रे, उस घर में रुई का एक भी गद्दा नहीं है । राव इनलपिल्लो है । रोज ही पकवान बनता है, मालकिन तो हमेशा सिल्क की साडी ही पहनती हैं इत्यादि-इत्यादि । और फिर यह भी बताया था कि मालिक का भाई कुछ ऐसा ही-मा है। घर मे दो-दो गाडी हैं, फिर भी चप्पल फट- फटाना घूमता है । टिराम-बम मे घूमता-फिरता है। अच्छा खाना उसे पसद ही नहीं है, वगैरह-वगैरह । फिर भी आते-जाते कोठी का सुरभि ने अच्छी तरह निरीक्षण किया है । इमी मकान में सदीप रहता है । उसका स्वभाव जैसा भी विचित्र हो, मगर जब इतनी विलामिता में रहता है तो जरूर हो-उह कितना त्यागी कोई होगा। सदीप को जब भी देखती उसकी कोठी का चित्र उसकी आखो के सामने नाचने लगता, किंतु सदीप की बोल-चाल और उसका आचार-व्यव- हार उसको दुविधा को समाप्त कर देता। ...किंतु ये सब तो पहले की वाते हैं। फिर भी आज अचानक ही वे सब बातें उसे याद पड़ गई। उसने कहा-'इतना ऐश-आराम छोड़कर वह था भी सकेगा?' अतीश इस मामले में निद है।
, ला-'उतना जोर है उसमें।' फिर आ क्यों नहीं रही है ? आ जाएगा।' कहकर अतीश रहस्यमय हंसी हंसा, 'क्या किसी और होने से तुम्हें डर लग रहा है ?' 'डर? 'मुंह देखने से तो यही लग रहा है ?' 'जी नहीं, श्रीमन्, डर नाम की वस्तु इस शरीर में होती तो इतना मेला सिर पर उठाकर और अपना घर-द्वार छोड़कर अकेली दो-दो जवान आदमियों के साथ रहने नर्हो चली आती। जानते नहीं, दो में अकेली तीन में हाट । हाट के वीच डर किस बात का?' 'अरे, अचानक इतना बड़ा भापण?' सुनकर सुरभि ने भौंहें टेढ़ी की थीं। 'नाराज हो रही हो? अरे जरा-सा मजाक भी कोई नहीं कर सकता क्या? सुरभि की भौहें सीधी हो आई थीं। उसने फिर गंभीर होकर अपनी वात दुहराई थी। 'संदीप नहीं आएगा 'अरे, आएगा कैसे नहीं । कान पकड़कर लाऊंगा।' 'न हो तव तक हम लोग सामान ही ठीक-ठीक सजा लें।' मगर सजाने को वहां धरा भी क्या था? असवाब के नाम पर ती कमरों में तीन वेंत की कुसियां और तीन निवाड़ को खाटों के अतिरि तीन छोटी अलमारियां थीं, बस । संदीप इन सभी चीजो को खरीदकर रख गया था। खाली आलमारी की ओर देखते ही लगा वह सुरभि का मजाक रही है, मुंह फाड़कर । छोड़कर आए भरे मुंह वाले वाक्स की याद सुरभि के मन को मथने लगी। अगर घर में पड़ी साड़ियां और ब्ला इस आलमारी में सजा दी जाती थाक की थाक'ओह, यदि इन की बात में वह न आयी होती? मगर ले आते लज्जा लगती। । त्रिपदी जगमोहन और अपर्णा की इस छोटी लड़की में लज्जा नाम को कोई चीज है क्या ? नही जी । राम भजिए। भय, लज्जा जैसी कोई चीज उममें है ही नहीं। उसके मित्र अगर उसे इसके लिए मजबूर न करते तो वह निश्चय ही ये चीजें लेकर आती। मामूली मे कुछ कपड़ों के लिए इतनी माया ! जिसके लिए चिड़िया वनकर घर मे उड जाने की नवियत कर रही है उमको । जा पाती तो क्या मचमुच यह चली जाती ! जाकर क्या देखती । क्या अपर्णा और जगमोहन अपनी जरूरत को चीजें पाकर सतुष्ट हो गये होंगे । उनके अपमान की ज्वाला शांत हो गई होगी ! नहीं, नहीं, यह असभव है । ऐसा कर पाने तो बहुत दिन पहले ही कर लेते । इतना उनका अपमान मुरभि ने क्या कभी किया था ? वाह, मुरभि ने सचमुच मा-बाप का मन कर्ज उतार दिया या। दरिद्रता से असमय ही बूढ़े हो गये अपने मा-बाप की पीठ पर अपमान का पावुक खूब कसकर लगा आई थी। सुरभि ने प्रतिपल जिस तिक्तता के वातावरम से जिस मुक्ति की कामना की थी उसकी याद आज उसे पल-भर को भी नहीं आई। नगविग्नर पर चुप बैठी रह गई और उसकी आंखों के सामने यही दरिद्र घर तरता रहा । जाने कितनी देर बाद अतीश की बात पर उसका ध्यान टूटा । 'अरे, क्या बात है, ध्यानी बुद्ध होकर बैठी हुई हो?' उसी समय सुरभि ने घोषणा की थी-'सदीप नही आनेगा।' कुछ ही देर बाद सदीप आ गया। अतीश मुरभि को और देखकर मुस्कराया। सदीप ने उसकी ओर देषा । सुरभि ने अतीश के हसने का कारण यताया। छि: सुरभि, तुम मेरे बारे में ऐसा सोच सकी ?' 'सोचा तो क्या? बहुत चार आखिर समर आदमी का मन बदल जाता है।' 'हा, साधारण आदमी का। हम लोगों में अमाधारण आदमियों का नहीं।'
'माहाहा, देखती हूं जनाब के धमंड की सीमा नहीं।' सुरभि ने तिरछी निगाह से उसे देखते हुए कहा-'देखना कहीं आखिर तक नीले गीदड़ की हालत न हो।' 'अतीश ने वह तिरछी निगाह देखी?' 'और नहीं तो क्या ? देखता हूं पक्षपात अभी से शुरू हो गया।' 'ताज्जुब है । सुनती आ रही थी, पुरुप जाति बड़ी उदार होती है। देखती हूं वे तो इस मामले में औरतों को भी मात दे सकते हैं।' 'वह भी आप लोगों की ही कृपा है, देवी।' हंसकर कहा संदीप ने, 'यह पक्षपात और कटाक्षपात ही उस डाह को जन्म देता है।' 'अच्छ, उस विषय को रहने दो। वह तो अनादि काल से तर्क का विषय बना हुआ है। इधर पेट का संतुलन बनाए रखने का कोई उपाय होना चाहिए । अब और संभालना कठिन हो रहा है।' 'बाप रे, अभी तो चाय पी है तुमने । अरे, जैसे राक्षसों से पाला पड़ गया हमारा।' और हंस पड़ी वह । वे दोनों भी हंसे। इसी प्रकार हास-परिहास में थोड़ा समय कट गया। बेंत की चार कुसियां जो मंदीप खरीदकर लाया था, उसी पर बैठकर काफी देर तक उनकी बातचीत चलती रही। फिर कपड़े पहनकर वे होटल की ओर चले। 'तो फिर ऐसे ही चले न, बुरा क्या है ?' संदीप ने कहा, 'नून, तेल और चूल्हा-चौके का झमेला पालने से क्या फायदा ?' 'वाह रे, मैंने क्या-क्या प्लान बनाया है और तुम एक कलम से सब खारिज किए दे रहे हो।' सुरभि झल्ला उठी। 'देखना सब इंतजाम कैसा वढ़िया करती हैं।' 'इसका मतलब है तुम चूल्हा-चौका में ही सारा दिन फंसी रहना चाहती हो?' 'कभी नहीं। सव करूंगी।' सुरभि मन ही मन सोचने लगी। उद्देश्यहीन जीवन बिताने का मत- लव यह तो नहीं होता कि कुछ किया ही न जाय । मैं सव करूंगी। खूब 56:त्रिपदी हालत में पसा जमा करूंगी। दरिद्रता में तो सारा जीवन ही बीत गया। इन लोगों ने कहा है कि अपनी कमाई का मारा पैमा हमारे हाथ में देंगे। पता नहीं ये लोग कितना पंसा देंगे? उह जो भी दें, उमी से हमारे हाथ में मोना बरसेगा । अपनी तनख्वाह में से मा को एक सौ रपया दे दूंगी। जय कह दिया है, तो न देना अमानुपिकता होगी। मगर बाकी का एक सौ अस्मी रुपया में जमा करूगी। जरूर जमा करूगी। अपने लिए कपड़े तो मैं घर खर्च में से निकाल लूगी। पैसे का मूल्य सुरभि जानती है। इसीलिए पैसे के बारे में ही उमे मय मे पहले चिंता हुई। उसने देखा था कसा करुण चेहरा बनाकर मा उमके गामने हाय फैलाकर रुपया लेती थी। इतना अपमान स्वीकार करके भी उन्हें लेना पडता था। सुरभि मोचती है-'हे ईश्वर, मुझे मा की कभी मत डालना।' सुरभि सोचती है, वह सब बाजार-हाट अपने हाथो करेगी। इन वेफिक्रों के कर कुछ भी नहीं छोड़ेगी । इन्हें किमी चीन के सिर-पैर फा पता नहीं है। माना कि संदीप लयपति घर का है, मगर गरीव घर का अतीश कौन बडा हिमावी है ? चचेरी वह्न के घर अस्सी रुपये देकर केमा वेकार का पाना खाता था। दीदी भले मुह से जहर उगलती, मगर जरा-सा भी उमका ख्याल रखती तो वह उनके दरवाजे से हिलता भी नहीं। मैं इन दोनों को वश में रखूगी । पमो का हिमाव तो ये मागेंगे ही नहीं । और घर छोड़कर आने का उसका दु.ख कम हो गया। सुरभि का मन एकदम हल्का हो गया। होटल से खाकर लौटने पर एक बार उन लोगों ने फिर कुर्मियों पर आसन जमाया। और तभी उन्हे याद आया कि खाने के बाद एक और कार्यक्रम होता है, जिसे 'सोना चाहते हैं। 'अच्छा, अब सो जाया जाय ।' सदीप ने कहा। 'मोना होगा भी कैम?' सुरभि ने झनककर कहा, 'ऐमा भी क्या हुकुम है तुम लोगों का कि एक तकिया तक नहीं लाने दिया। मिर के नीचे तकिया न होने से क्या नीद आती है ?'
प हंस पड़ा। बोला-'जीवन की परीक्षा का यह नया रस हजन अमी आपको समय लगेगा महाशया। आज हमें अपनी इन निवाड़ हों की परीक्षा करनी है। देखें नींद जीतती है या निवाड़ की खाट! नोजिये, नींद न आये तो बुरा क्या है ? बिना सोये सारी रात काट सी बड़ी चीज क्या हो सकती है ? जीवन को अनुभव करने और र को भली प्रकार समझने का इससे अच्छा कौन-सा मौका हो ना है? 'अरे वाह रे दार्शनिक की पूंछ।' सुरभि ने आंखें नचाकर कहा। अनीश ने संकोच के साथ कहा-'हमारी राजशय्या, फेंक पाने लायक जगह के अभाव में, हमारे साथ चली आई है। श्रीमती सुरभि देवी यदि दया करके उसका उपयोग करें तो हमें बड़ी प्रसन्नता होगी।' नंदीप भी हंसकर बोला-'अतीश, वैसे नहीं। इस तरह कह-हे बांधवी, यदि एक तुच्छ से तकिये के विना तुम्हारी सुखनिशा महानिशा वनने जा रही है तो तुम्हे चादर-गद्दा समेत सारा विस्तर दान करता हूं।' 'मैं इतना अपमान सहकर कोई चीज नहीं लेती।' 'नुरभि, संदीप ने कहा, 'तुम्हें अभी भी बहुत कुछ सीखना बाकी है। 'मान-अपमान' बड़ी वेकार-सी चीज है । उसे झाड़ न सकी तो हमारा यह 'एक्सपेरिमेंट' सफल कैसे होगा?' ठीक उसी समय संदीप के बड़े भाई प्रदीप ने भी ऐसी ही एक वा कही 'मान-अपमान की बात भूल जाओ, माधुरी। वेकार अपना म दुखाने से क्या फायदा? एक वेवकूफ लड़का अगर वेवकूफी करे, भले वह कितनी ही बड़ी हो, तो उससे तुम्हारी वेइज्जती क्या होगी?' किंतु माधुरी क्या सिर्फ अपमान की बात से विचलित हो रही वह तो एक दिखावा था। असल बात तो यह थी कि संदीप का र कमरा देखकर उसके प्राणों में एक अव्यक्त यंत्रणा कसकने लगती यो कनरा तो प्रायः खाली ही रहता था। संदीप कोई सारा दिन उस तो नहीं रहता था। फिर भी उस कमरे में वह रहता है, इसी वा ।
कमरा भरा-भरा-सा लगता था। वह मोचती, सदीप का व्यवहार असा है, जब उमे किसी को परवाह नही तो माधुरी को ही क्या पड़ी है कि वह उसके नाम की रोए। किंतु अब उसे लगता है, कि जो स्नेहधारा उसके मन के किमो कोने में सदीप की उपस्थिति में दबी रहती थी, अनुपस्थिति में बालू के भीतर से सैकडौं धाराओं में वह निकली है। ममुगल मे आने के बाद से ही उसने जिम खामपयाली लडके को घर में देखा, जो राजेश्वर होने पर भी उदासीन, सब कुछ का हकदार होते हुए भी पडौमी के ममान घर में रहता हो, जिसने कभी जिद करके कुछ मागा नही, जिसे कभी किसी नौकर से भी ऊचे गले से बोलते नहीं सुना गया, उम पर माधुरी का स्नेह नही तो किस पर ढलेगा? उसको वार- वार को अवहेलना से माधुरी का ऊपर से उदासीन हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उमर मे भी उससे पाच-छ बरस ही बड़ी है माधुरी, पर बड़ी तो है, इसीलिए अपने बड़प्पन की भावना को छोड़कर वह अपने- आप उसके निकट नहीं आ सको। और आज उमी मन की ज्वाला को उसने पति के मामने स्वय अपने भी- अपमान की ज्वाला कहकर प्रस्तुत किया। नाराज होकर बोली-'क्यो, मान-अपमान की बात क्यों भूल जाऊ?' दो-चार बार इधर से उधर चहलकदमी करके प्रदीप ने कहा -- 'भूलना ही होगा । अकारण उसके लिए कष्ट पाने का लाभ भी क्या है ?' 'और लोग जब पूछेगे कि वह क्यो चला गया, तो क्या कहेंगे ?' 'लोगों की बात का उत्तर क्या कोई भला आदमी आज तक दे पाया है ? और बहुत परेशान करें तो कहना होगा-जरूर कोई कारण था।' 'तभी तो लोग और सदेह करेंगे' माधुरी ने भरे गले से कहा-'लोग सोचेंगे हमारा व्यवहार पराय था, इसीलिए।' प्रदीप हंसकर बोला--'तुम कोई उपयुक्त उत्तर देकर ही क्या उसके सदेह को ममाप्त कर सकोगी? 'किंतु वह ऐमा करता ही क्यों है ?' कहकर माधुरी ने मह दूसरी ओर घुमा लिया।
प्रदीप थोड़ी देर तक उसकी ओर देखता रहा, फिर का दुर्भाग्य उससे ऐसा कराता है, माधुरी।' 'ऐसा सोचकर तुम अपने को संतोष दे रहे हो, मैं जानती हूं। मगर सा करके क्या उसे सुख मिलेगा? 'ईश्वर से यही प्रार्थना करूंगा कि उसे सुख मिले। कभी उसे अपार दुःख में न पड़ना पड़े।' काफी रात होने पर प्रदीप को सहसा नींद आ गई। और उसी कमरे की दूसरी दीवार के पास माधुरी जागती हुई पड़ी रही। वह चकित थी कि और दिन तो माधुरी दी पहले सो जाती है। प्रदीप कुछ पड़ता-लिखता रहता है। किन्तु आज सोते हुए प्रदीप की सांस ऐसी क्यों लग रही है जैसे वह सोया न हो, जैसे उसकी सांस एक अशरीरी आत्मा की तरह सारे घर में भटक रही हो। बहुत रात वीतने पर माधुरी को जाने कैसा एक भय-सा लगने लगा। वह जाकर बगल वाले कमरे में उज्ज्वलदीप के पास वच्चे से हटकर सो रही । वह बहुत धीरे से उसके कमरे में गई थी, जिससे उसकी नींद टूट न जाय। मगर उसकी नींद विना तोड़े वह ऐसा न कर सकी ! लड़का जाग गया था शायद पहले से ही जाग रहा था। मां से लिपटकर धीरे से बोला 'मा, रात में चाचा ने क्या खाया होगा, कहां सोये होंगे वे ?' 60 : विपदी 5 गय्या ? हा, वही राजशय्या थी। वही निवाड को खाट, नई खरीदी हुई। उह, बैठे रहने में ही क्या एतराज है ? सच, मदीप की इच्छा कर रही थी, वह यो ही सारी रात बैठा रहे। "पीठ टिकाने को बात उमे याद ही नहीं रही। बाहर चारों ओर जब मब कुछ नौरव हो गया तब भी उसके कानों में वही एक गभीर स्वर बार-बार 'प्रतिध्वनित होने लगा-'उमे जाने दो, उसे जाने-उमे जाने-उमं...।' यह कठ म्बर किमका है। सदीप के बडे भाई प्रदीप का। क्या ऐमा ही गला है उनका ? यह मकान फिमका है ? मदीप का? मदीप ने अपने रहने के लिए म्वयं इसे पसंद किया तव उमे इतना राराब क्यो लग रहा है। विदंगयात्रा के ममय तो बहुत बार इसमे भी सराव स्यानो पर उमे रान वितातो पडो हैं-किसी धर्मशाला में, वेटिंग रूम मे, सस्ते होटल में या ऐमी ही किमी गह, किंतु ऐसी अनुभूति तो किसी दिन नहीं हुई उस नों तीन कमरों में सोए है। अतीश मोच रहा है, दीदी तो जरूर सौ चिट्ठयों की एक चिट्ठी पिता को लिखेंगी। उसके बाद क्या होगा, कहा नहीं जा सकता। अगर जी उनकी खोज-खबर लेने यहां तक आ पहुंचे तो? अगर आकर देखा उनका लड़का यह अद्भुत गृहस्थी वसाकर बैठा हुआ है ? अवश्य ही खुशी से गद्गद नहीं होंगे। मगर अतीश के लिए भय से विचलित होने वाली कोई बात नहीं है। फिर भी वह सोच रहा है, वह क्या कहेगा? सुरभि के सम्मान की रक्षा किस प्रकार कर सकेगा? लोग तो खराव छोड़कर और कुछ कहेंगे नहीं । नाक-भौं सिकोड़कर कहेंगे-'छि:-छि:, तुम दोनों एक ही गिलास में पानी पी रहे हो? तुम्हें दूसरा गिलास नहीं मिला ?' और अगर उनसे वास्तविक बात कही जाए तो वे हो-हो करके हंस पडेंगे, कहेगे-'हां-हां, हाथ में पानी का गिलास लेकर तुम लोग निर्जला एकादशी का व्रत कर रहे हो ? हा-हा-हा-हा...।' अनीश मोचता है, वे यदि व्यंग्य करें तो उन्हें ही दोप नही दिया जा मकता । पानी का घड़ा सामने रखकर वे प्यास से मरेंगे, ऐसी अवास्तविक कल्पना उनको ही कसे? क्या यह संभव है ? फिर सोचा, दलील तो है। प्यास लगने पर पानी पीया जा सकता है मगर पहले कौन प्यास बुझाएगा वह भी बिना किसी अनुष्ठान के । छिः, ऐसा क्या संभव है ? मुरभि को भी नींद नहीं आ रही थी। अतीश के विौने के आर के बावजूद । वह सोच रही थी-हम लोगों ने क्या सोचा था, और क्या रहा है ? सोचा था, जिस तरह विदेश में भ्रमण करते समय : काम चला लिया जाता है, उसी प्रकार अपना काम चला लिया जा कितु एक वेला में ही पता चल गया, ऐसे नहीं चलेगा। गृहस्थी मे चीजें लगती हैं। गुरभि की पुरानी गृहस्थी मे दैनिक वस्तुओं का अभाव थ ? 62: मिपदी स्थायी वस्तुओं का अभाव नहीं था। असुविधा में भी काम चला लेने का उमे अभ्यास था । इसीलिए कौन-कौन-मी चीजें आवश्यक है, किन चीजो के बिना काम नहीं चलेगा, उनको मूची वह मन-ही-मन बना रही थी। अन्त में जब उन्हें याद रपना सम्भव नहीं रह गया, तब उठकर उसने लाइट जलाई और मोचा, बैठकर लिख डाल । किंतु लाइट जलाने के बाद उसे अपनी गलती का पता चला । लिसंगी कमे? हैडबैग में रखकर कलम तो लाई थी, पर कागज ? दीवार पर लिख डालू ? मगर उसमे तो कलम नष्ट हो जाएगी। कुछ भी न लाने के लिए राजी हो जाने को अपनी बेवकूफी पर उसका जी जल उठा। विफल क्रोध में थोड़ी देर वह चुप रही। फिर सोचा-महीने के अन्त मे जब घर रूपया देने जाएगी तो सब चीजें ले आएगी। मगर अभी? एक टुकड़ा कागज के बिना मुह पोट लेने का मन कर रहा है। अगर कोई उसे अमहिष्णु कहे तो यह उसकी भूल होगी। बडो चीजो का अभाव महा जा सकता है, पर छोटी-मी चीज न मिलने पर कभी-कभी आदमी पागल हो जाता है। नये मकान में अगर उसके पास खाट और कुर्सी न होती तो वे जमीन पर सोते-बैठते, फिर भी उन्हें असुविधा नहीं होती। यह तो होता ही है। मगर काम पड़ने पर एक टुकड़ा कागज न मिले यह भी कोई बात हुई ? चन्द दरवाजे की मिटकनी खोलकर बाहर आ गई। हर्ज ही क्या है ? क्या होगा ? अनीश बुद्धिमान है । वह अपनी चीजें लेकर आया है। दरवाजा खोलते ही अतीश चकित हो गया। सोचा था, सदीप है। मोचा-ठक-ठक् करने के लिए मदीप डाट पिलाएगा। कहेगा--'धक्का नहीं देते वन रहा था। मेरे माय यह नजाकत नहीं चलेगी। ऐसो मृद भद्रता मुझे बर्दाश्त नहीं होती। किंतु उसे स्वयं धक्का लगा। दरवाजा पोलते हो वह अवाक् होकर बोला-'क्या बात है?'
र देने में गला कांपेगा ५९ तो उनकी नीति नहीं है, फिर भा का गला कांपा। गज का एक मामूली-सा टुकड़ा मांगने में उसका गला कांप गया। नतीश और भी अधिक चकित हो गया। 'इतनी रात को कागज का क्या होगा?' है जरूरत ।' कागज दिया अतीश ने। देते समय मजाक के स्वर में वोला-'सोचा, यद नई जगह है । रात को डर लग रहा है। इसीलिए कमरे में आश्रय न आ रही हो। 'धत्, अमभ्य कहीं का।' मुरभि की यह भंगिमा तो एकदम नई है। अतीश इसके लिए प्रस्तुत नहीं था। सुरभि के स्वर का झंकार उसके कानों में गूंजने लगा। कमरे में लीटकर सुरभि को भी फिर आवश्यक चीजों की सूची बनाने का उत्साह न रहा, इतनी देर तक क्या-क्या सोचा था, कुछ याद नहीं पड़ रहा था। एक अस्वाभाविक विह्वलता उसे परवश किये दे ही थी। रात में अचानक नींद टूटने पर, इस कमरे से उस कमरे में आने- नाने के वाद, क्या ऐसी शिथिलता आती है ? वहत देर बाद सुरभि स्वाभाविक हो सकी। जाने क्या सोचा होगा अतीश ने ? कागज एक बहाना था, यह तो नहीं सोच रहा होगा वह ? और सुरभि के मन की दुर्वलता का पता पाकर कहीं वह मुस्करा तो नहीं रहा है? नहीं, नहीं, बहुत सावधानी से चलना होगा। इन दोनों भूतों को किसी प्रकार यह मौका नहीं देना है कि वे स सुरभि उनसे कमजोर है, वह हार जाएगी। यह रात का जागना चलेगा। रात बड़ी भयानक चीज है । रात के सामने आदमी असहा जाता है। रात जैसे आदमी को अपनी मुट्ठी में जकड़ लेती है । व आदमी को अपनी इच्छानुसार उल्टा-सीधा नचा सकती है ।
विजयिनी रात से निस्तार पाने का एक ही उपाय है, नीद। गहरी नीद की चिकनी तलहटी मे डूब जाना । उसोको माधना मे उसे सिद्ध होना होगा । सोचा मुरभि ने। फिर भी नीद तो नही ही आई। सवेरे के आलोक का रूप कुछ और ही तरह का होता है । इस आलोक से दीप्न प्रकृति के बीच, उपनगर के उस खुले वातावरण के बीच नये बने मकान के बरामदे मे चाय पीते-पीते लगा, जैसे कही बाहर घूमने आए हो। आज छुट्टी का दिन है । कोई जल्दी नही है कम-से-कम सदीप को। इसीलिए वह जमकर गपवाजी करने बैठा है। किंतु दूसरे दो आदमियों का हृदय चल है। 'क्या हुआ जैसे तुम लोगों का मन ही नहीं लग रहा है।' 'नहीं, ऐसी बात तो नहीं है । मगर सोचता था, थोडा धूम आते हम लोग, तो कमा रहता?' 'क्यो, अखवार खरीदने या सिगरेट खत्म हो गई है " 'नहीं, यह बात नहीं है। मगर कुछ खरीद-फरोस्त तो करनी 7 होगी?' "खरीद-फरोख्त ?' सदीप आख फाडकर बोला, 'और क्या खरीदना है ? कुर्मी है, खाट है. चाय का सब मामान है, जो सबसे मुख्य चीज है। इसके बाद होटल। 'हां, रोज-रोज होटल। पागल हो गए हो क्या?' अनककर मुरभि ने कहा। 'यहां तो कितने लोग सारा जीवन होटल के भरोसे काट देते हैं।' 'रहने दो, यह इंग्लैंड नहीं है । अब मैं खाना बनाने का सामान खरी- दने निकलूगी।' 'और तुम लोगों के लिए विछावन भी तो चाहिए ?' अतीश ने 'विछावन? हमारे लिए नहीं चाहिए। खाली निवाड़ में बड़े मजे मे था। निपर्द
'मैं तो एकदम मजे में नहीं थी। सारी रात मुझे नींद ही नहीं आई।
र अतीश का जैसा अपूर्व विस्तर है, भगवान वचायें।'
'नई जगह में ऐसा होता है।'
'मजेदार विस्तर और मानसिक शांति नहीं मिलती।
'कल किस चीज का अभाव लग रहा था ?'
'दोनों का।'
'दोनों का ही?'
'हां, और नहीं क्या? इस मकान को जब तक ठीक न कर लूंगी
व तक मुझे चैन नहीं मिलेगा। कल आधी रात को मैंने लिस्ट तैयार
की है।' यह वात सुरभि ने झूठ कही थी। लिस्ट उसने सवेरे तैयार की
ची।
'लिस्ट ? इतना क्या लोगी, जो लिस्ट बना रखी है ?' संदीप
चौंका।
'देखो ।' कहकर सुरभि ने लिस्ट उसके सामने फेंक दी।
किन्तु संदीप पूरी लिस्ट पढ़ने का धैर्य नहीं एकत्र कर सका।
कागज उसके हाथ से गिर पड़ा। कातर भाव से वह आर्तनाद कर
उठा।
'इतना सव चाहिए तुम्हें ? वह सब खरीदोगी? वह वाल्टी, मग,
सील, लोढ़ा, चूल्हा, हांडी, कढ़ाई, संडसी, खंती। अरे बाप रे ! वह सव
इस मकान में समायेगा?'
'देखो अंटता है या नहीं।
'ऐसी गृहस्थी तुम करोगी?'
'उसमें इतना सोच-विचार करने की क्या आवश्यकता है ? ये सब
एकदम जरूरी हैं । छलनी, वालपेन, कील, रस्सी...।'
'सव, सब चाहिए ? अतीश, वह कह क्या रही है ?'
'सुन तो रहा हूं । इसीलिए सोच रहा हूं...।'
"भई, मुझे इसमें मत फंसाओ । पैसा लगेगा। यह लो।' नोटों का
एक पुलिंदा संदीप ने निकालकर उन्हें दे दिया। अतीश ने रुपयों को हाथ
•66 :विपदी
नही लगाया। थोड़ा सकुचित-सा होकर बोला-'मैं भी तो इन बातो में नहीं पड़ना चाहता था। मगर सुरभि इतनी चीजें एक साथ कैसे लाएगी। उसे असुविधा होगी, इसीलिए।' सुरभि ने नोटों का पुलिदा उठाकर वंग में भरते हुए कहा-'खैर, अक्ल तो आई। चलो, चलो। इतना नयरा दिखाने की जरुरत नहीं 'सुरभि, तुम शर्त तोड रही हो,' सदीप ने कहा, 'तुम्हारी इम घर- गृहस्थी मे हमारे पड़ने की बात नहीं थी। 'हुंह, बड़े आए जज के नाती । देखो, पग-पग पर शतं तोडूगी। वाप रे, रात-दिन अगर शतं मे ही फमे रहना है, तो मुस्ति क्यो हुई हमारी? चलो, चलो अतीश । इम पागल की वात में पडे तो पाना-सोना भी बन्द हो जाएगा।' वे दोनों निकल पड़ते हैं। सदीप स्तब्ध होकर पड़ा रह जाता है । महमा उसका मस्तिष्क किसी और दिशा मे मुड गया। रात भाई साह्य ने खाना खाया होगा? उज्ज्वल ने अपने चाचा की कीर्ति सुनी होगी? यह क्या अपने चाचा को इस भयकर बात को सुनकर भौचक नहीं रह गया होगा? शायद रोया भी हो ? बीच-बीच मे धूमने घर की ओर आऊगा, ऐसा कहा तो था उसने। आज का दिन ही क्या वह 'वीच-बीच' का दिन नहीं हो सकता ? शायद गेट पार करने में उसे लज्जा लगेगी?' किंतु क्या उस विशक्ति सघ के किसी सदस्य मे लग्जा जैसी किसी चीज का सधान "पाया जा सकता है ? सवेरे को चढ़ती हुई धूप में कितना माधुर्य होता है ? हवा में जाने कसा तो एक रोमान सिहरता है। नोटो का एक बडल वैग में भरकर बाजार-हाट करने में कैसा तो एक पुलक मन में भरा रहता है, आज के पहले क्या कभी सुरभि को इसका पता भी था? नोकरी करने के बाद कभी सुरभि वाजार करने नहीं निकली है, ऐमी यात तो नहीं है। बीच-बीच में जाती रही है, किंतु यह सौदा नितात सीमित पैसों में करना पड़ता था । साड़ी, ब्लाउज, बंग, संहिल और दो- एक अन्य प्रसाधन सामग्री, वस । और कुछ भी तो नहीं । दीवार को सुना- कर कही गई मां की दो-एक फरमाइशों को खरीदते समय सुरभि का कलेजा फट जाता था । लगता था एक-एक दस रुपये का नोट जैसे पसली की एक-एक हड्डी है। वटुआ खाली करने पर लगता था हड्डी-पसली सब निकालकर बाहर रख देना पड़ रहा है। उसकी बड़ी वहनें छुटपन में उसे कभी-कभी उपहार देती थीं। उसने भी कई वार सोचा कि उन्हें भी कुछ उपहार देगी, हिम्मत ही नहीं हुई ।। चाहती तो कर सकती थी। मगर मामूली-से कारण पर कौन अपनी पसली निकालकर बाहर रखेगा? आज के वे नोट सुरभि के लिए पसली की हड्डियां नहीं हैं। इन्हें किसी और ने एक मुट्ठी धूल की तरह उसके सामने फेंक दिया है । आश्चर्य ! कैसे ऐसा कर सका वह ? अधिक रहने पर भी क्या ऐसे अनायास फेंका जा सकता है ? अभी तो रायकोठी के उत्तराधिकारी के रूप में उसके पॉकेट में नोटों का पुलिंदा है; कल रहेगा या नहीं, कौन जाने ? छोड़ो, आज तो दुकान-दुकान घूमकर लिस्ट-भर सामान खरीदने का सुख वह ले ले। अपने को खुलकर दिखाने और अपने अधिकार को सावित करने की जगह दुकान ही है । एक खंती लेने के लिए सत्रह खंतियां क्यों न सुरभि निकलवाये ? क्यों न कहे-'निकालिए तो महाशय और दस-पांच । क्या ? और नहीं है ? यही दस ठो खंती लेकर चले हैं दुकान चलाने ?' दुकानदार ने कहा था-'लोहे का लीजिए न, जितना चाहिए मिलेगा। 'लोहे का ? खूब, खरीदने आई हूं स्टेनलेस स्टील का और जनाव हमें दिखा रहे हैं, लोहा । न अतीश, इधर की दुकानें बड़ी पूअर हैं।' अतीश दुकानदार के चेहरे की ओर नहीं देख पाता है, इसीलिए और तरफ मुंह करके कहता है-'अगर एक-एक चीज के लिए तुम्हें इतना समय लगेगा तो तुम्हारी लिस्ट का सब सामान खरीदने में तो एक महीना लग जाएगा।' 68 :निपदी
मुरभि झनक उठती है।
उस झनक में जो एक विचित्र रस है, उसे अपने सर्वांग मे भोगते हुए
वह बोली-'आहा, तो क्या आप बंद करके जो मिले अनाप-शनाप खरीद
डालू"
'आयें खोलकर खरीदने लायक बहुत-सी चीजें हैं, इस दुनिया में ।
मामूली चम्मच, कलफुल, खतो आख वद करके भी खरीदे जा सकते हैं।'
'खूब चलो-चलो, किसी और दुकान पर चलो।'
'देखो यह अभद्रता
।' अतीश उससे फुमफुमाकर कहता है ।
'अरे वाह रे मेरे भद्रपुरप " सुरभि ने आखो मे अपूर्व रम भरकर
कहा । उसके चेहरे से अजीव मादकता भर रही थी।
थोड़ी देर बाद उसी तरह फुमफुसाते हुए अतीश ने कहा-'जानती
हो तुम्हारा चेहरा देखकर मुझे कैसा लग रहा है ?'
'कैमा
'मुझे लग रहा है दूध छानने वाली छलनी में बढ़कर सुन्दर वस्तु
इम दुनिया में एक भी नहीं। जिस तरह उसके ऊपर हाय फिरा रही हो
और तुम्हारा चेहरा पुलक्ति होता जा रहा है।'
"अच्छा, रहने दो।'
'नहीं, रहने क्यो दू?'
'कौन जानता है वाल्टी, मग, सिल-लोढा आदि मे इतना काव्य, इतना
उद, इतना सौदर्य छुरा हुआ है ? इम समय तो तुम वाकायदे कोई अनुपम
रूपमी लग रही हो।'
'लग रही हूं? थी नहीं?
'नहीं, सुन्दरी थी, रूपसी नहीं। रूपसी का अयं और ही कुछ है।'
'मुनूं, वह अर्थ क्या है ?
'उमे समझाना बहुत मुश्किल है। मोटो बात यह है कि मुझे चिता
हो रही है।'
'अच्छा, क्या चिंता हो रही है, यही बता दो।'
'यह तो और भी मुश्किल है।'
J
'तो रहने दो, मुझे भी समझने की फुरसत नहीं है। अरे यह क्या है, बहुत अच्छा है, देखने में, क्या वताया ? आलू काटने की छुरी है ? कितना दाम है ? क्या कहा ? डेढ़ रुपया ? इस मामूली-सी चीज का डेढ़ रुपया. कोन देगा? एका रुपया, एक रुपया नहीं होगा तो रखे रहिए। अच्छा बीस आने में होगा? नहीं होगा ? आप तो बड़ा झमेला करते हैं साहब ! इस मुहल्ले में नई आई हूं न? इसीलिए ठग रहे हैं क्यों? सब चीजों का दाम बढ़ा रखा है। जानते हैं कि लेंगी नहीं तो जाएंगी कहां? अच्छा, आखिरी दाम कहे दे रही हूं, मन हो दीजिए चाहे रखे रहिए। एक रुपया छ: आना । कमाल करते हैं जनाव, आपकी दुकान में मोल-भाव नहीं होता है तो इसका मतलब है, आपकी दुकान में औरतों को खरीदारी करने आना ही नहीं चाहिए । मोल-भाव नहीं किया तो वाजार करने का मजा ही क्या? ऐसे ही सुरभि अपने को विकीर्ण करेगी। कमल की तरह शत-शत दलों में अपने नारी रूप को विकसित करेगी । अकारण ही अपने स्वर के झंकार से राह-घाट को गुंजरित करेगी। उसके पैरों के नीचे पक्की जमीन है और उसके हाथों में नोटों की एक गड्डी जो टूटकर टुकड़े-टुकड़े हो रही है, इधर-उधर बिखर रही है। मगर उसका हृदय फट नहीं रहा है। ओह ! कितना मजा आ रहा है ? एक वार डरते-डरते अतीश ने पूण था-~-कितने थे ?' 'कोन जाने ?' मुंह विचकाकर सुरभि ने कहा, गिना नहीं था। होगा यही-~-उंह, होगा कुछ- 'सब खर्च कर दिया? 'और क्या ? खर्च करने ही तो निकली थी। क्या संदीप को हिसाव देना होगा? 'धुत्, मेरा मतलब यह नहीं था । कहने का मतलव है कि शुरू से ही तुमने जिस तरह पैसा फेंकना चालू किया है, इस हिसाब से तो अंत तक · ।' सुरभि ने हंसते हुए चेहरे पर गंभीरता का आवरण तानते हुए कहा--- 'यही तो असली शुरुआत है.। जीवन नामक चीज को फालतू खर्चे के खाते में लिखकर ही हमारा यह प्रयोग आरंभ हुआ है।' 170.: विपदी अतीश चुप रह गया । उसे कोई जवाब ही नहीं सूझा। किंतु क्या मुरमि सच ही वैमा सोच रही है ? नहीं। यह बात तो उसने एक रहस्यमय बात कहने के लिए ही कही थी। उस समय उसके मन में एक माधुर्य की अचीन्ही तरग लहरा रही है, वह एक मजेदार बात मोच रही थी। सोच रही थी कि पुराने जमाने में जो पुरुष तीन-चार शादिया करते थे, उमरा भी एक उज्ज्वल पक्ष था । एकदम बकारण नहीं था एकः औरत अगर गृहस्थी चलाती थी, तो दूसरी उसकी मगिनी होती थी। औरतो के लिए भी वैमा इतजाम बुरा नहीं है । एक पैसों का जुगाड करंगा तो दूसरा उसकी फरमाइशें पूरी करेगा, उमं आने सिर पर विशकर घुमायेगा। हमेशा उसके सग लगा रहेगा । बात माफ है । जो पैसे देगा वह समय नहीं दे सकेगा । जो समय देगा वह पैसे नहीं दे सकेगा। यही स्वाभाविक है। क्योंकि दुनिया के दोनो पनदो में से एक है अयं और दूमरा है समय । ममय के बदले मे पैमा और पैसे के बदले में समय । और अचानक सुरभि हम पड़ी। 'क्या हुआ?' अतीश ने प्रश्न किया। 'कुछ नहीं।' 'कुछ नहीं ? रास्ता चलते-चलते हस रही हो विना-वजह । तुम्हारे स्वभाव में कुछ परिवर्तन देव कहा है।' 'परिवर्तन होना ही स्वाभाविक है। जीवन में भी तो कम परिवर्तन नहीं हुआ। अनतकाल से चले आते हुए सस्कारो वा उन्मूलन । मारे जीवन में सचित मूल्यत्रोधों का आमूल परिवर्तन ।' 'सच, सदीप ठीक ही कह रहा था, तुम बहुत सीरियस होती जा रही हो । निशक्ति संघ का यह नियम नहीं है।' 'सभी नियमो को अस्वीकार करने की प्रतिज्ञा करके भी फिर अगर नियमों की दासता स्वीकार करनी पड़े तो आखिर हमने नया क्या किमा?' 'मगर कोई रास्ता तो पकड़ना ही होगा?' 'नहीं, उसमें ही हमे आपत्ति है । जो हमारी इच्छा है वही हमारा मन में जिसमें खुशी मिलती है, जो हमें अच्छा लगता है, वहीं । है। किसी निर्दिष्ट नियम का अभाव ही होगा हमारा नियम । अभी गृहस्थी जमाने की इच्छा कर रही है, कर रही हूं और अगर किसी दिन री इच्ण करेगी कि जलते हुए चूल्हे में पानी डालकर निकल पडूं, तो ो करूंगी। हो सकता है...।' अतीश उसे वात पूरी नहीं करने देता और बीच में ही ठंडी आह भर- कर कहता है-'बाप रे वाप, देखता हूं तुम तो हम लोगों से भी एक कोस आगे चल रही हो। 'दुनिया का यही नियम है । प्रगति के पथ पर औरतें ही आगे कदम बढ़ाती हैं।' 'लगता है कोई नई थियरी ईजाद की है तुमने ।' 'ऊहुंक्, अच्छी तरह सोचो तो तुम्हें मेरी वात ही सही लगेगी। पुरुप की उछल-कूद से समाज एक कदम भी आगे नहीं बढ़ता। बस, उछल-कूद ही हाथ रहती है। मगर जव औरतें जागती हैं और देह झाड़कर उठ पड़ती हैं तो सारा समाज धड़धड़ाकर आगे बढ़ जाता है।' 'हूं, देखता हूं तुम बहुत सोचती हो।' 'पहले नहीं सोचती थी। हमें सोचने का एकदम अभ्यास ही नह था। मगर सोचना तो तुम्हीं लोगों ने सिखाया है।' 'और देखता हूं, गुरु-गुड़ ही रह गये, चेला शक्कर हो गया।' अर्व ने हंसकर कहा। सुरभि भी हंसी, फिर बोली-'गुरु को हराया नहीं तो वा क्या? गुरु का केवल अनुशरण किया जाय तो कोई विद्या ही आ वढ़ती । तव तो आज भी आदमी यही जानता कि सूरज पृथ्वी की प कर रहा हैं।' 'तुलना बड़ी पुरानी दी तुमने ।' 'तुलना पुरानी हो या नई उससे क्या होता है ? एक बात सो कह दी । मगर एक वातं इस समय समझ रही हूं।' 'वह क्या? थी 'इतना सामान परीद लिया है हमने कि एक रिक्शे में तो जाने मे 'अच्छा, वह वात अब ममझ में आई है।' 'नही, मोचा था मव मामान पैर के पाम रखकर.. 'हा, रास्ते में तमाशा बनने का अच्छा तरीका है।' 'यही नो मजा है। तमाशा होना तो मजेदार चीज है । जानते नहीं हो तमाशा बनने के लिए ही तो लोग जाने क्या-क्या करते घूमते है। 'नो फिर हज ही क्या है? रिक्शा बुलाऊ " 'नही एक रिक्शे में तो मव जायेगा नहीं । टंकमी होती तो काम चलता । मगर देखती हू, यहा टैक्सी पाना बहुत कठिन है।' 'लगता तो ऐसा ही है। 'एकदम बेकार जगह है। 'ऐमा लगता तो नहीं। इसी वेकार जगह मे आकर तो देख रहा ह मानों मुर बज रहे है। 'कर कमा रहे हैं वे लोग ' सदीप अब कुछ परेशान होने लगा है। इतनी देर बाजार में किया भी क्या जा सकता है, आगिर ? जर-जमा माठ तो रपया था, जो हमने उनको दिया था। कुछ उन दोनो के पाग रहा हो और बात है। हो भी तो कुल मिलाकर सौ से ज्यादा किमी हालत में नहीं होगा, और गुरभि को कंजूसी का तो पता है। कॉफी हाउस में पुनने के पहले सात बार पैसे गिनती है । मब दिन तो 'अनत काफे' की चाय पर ही गोष्ठी जमती रही है। तो फिर इतनी देर से गरीद क्या रही है वह क्या परीद ही मकती है ? एक मामूली गृहस्थी के लिए कितनी चीजों की जरूरत पड़ती है ? यही बिस्तर के लिए गद्दा-तकिता नहीं बनवाने लगे? कितनी दूर गये होगे? ओह ! एपिसडेंट भी तो हो सकता है या कही सुरभि का मन तो नही फिर गया? और वह घर लौट गई। अतीग उरो दौटा न पाया हो. तरह की अनत चिताओ में सदीप टूब गया । फिर उसने अपनी दि. 7 किसी वच्छंद वहने के लिए छोड़ दिया और उसका मन सहसा मकान के कमरों में, दालान मे सीढ़ियों पर, उनके नीचे, हर कहीं कने लगा। नदीप की इम निष्ठुरता की वहां क्या प्रतिक्रिया हुई होगी? मंदीप क्या आज अपनी छोटदी के घर जाये? क्या वह उसे वता आय, कि वह सामाजिक जीवन-यापन का एक नया एक्सपेरिमेंट कर रहा है ' मगर इतनी सफाई भी देने की क्या जरूरत है ? अपने को संदीप अपराधी के कटघरे में खड़ा ही क्यों करे? अपने जीवन के सम्बंध में मनुप्य को स्वाधीनता मिलनी चाहिए, क्या यह सभ्य समाज का नियम नहीं है ? नव मन में यह जो बन्दी है, वह क्या है, कौन है ? उसकी हड्डियों में, उसकी शिग-उपशिरा में यह टीस किस बात की है ? मन्कारों की? नही, प्यार की? नहीं, नही, केवल उदामी की? और उमी क्षण संदीप की छोटदी प्रनति चौधरी टेलफोन पर अपन भावज को मदीप के ही सम्बंध में अपना मत दे रही थी...'मन? अरे उ अभाग के पाम मन नाम की कोई चीज है भी? अपना पता तक तो व नहीं गया। अच्छा, मैं तुम्हारे छोटे ननदोई को कल ही उनके आदि भेजती हूं। जाकर उस अभागे पाजी को कान खींचकर लायेंगे। क्या क हो ? गाली नहीं दूंगी उम कलमुंहे को तो क्या पूजा करूंगी? ना तुम्हारे ममान सभ्य तो में होने से रही । गुस्सा लगेगा तो गाली दूर्ग अवश्य दूंगी । गुस्सा होने पर तो मैं भगवान को भी गाली देती हूं गुम्मे मे मभ्यता?' इसी भाषा में बहुत देर तक प्रनति ने अपन उनाग और अंत में कहा-'अच्छा तो फिर रखती हूं।' 'रखती हूं' माने अब बड़ीदी को अपने मन की ज्वाला सुनाने है। अवश्य उनसे बात करने का टोन कुछ भिन्न होगा, क्योंकि बड़े दामाद का अनुमान है कि छोटी का यह विग्रही भाव मतलब रखता है। छोटी के घर में शायद स्नेह का वाता अन्यथा "" इसीलिए यडोदी के साथ उसका सुर नहीं मिलता। सुर में मुमिनना ही तो अमल चीज है, नहीं तो सारी वार्ता वैमुरी हो जाती है । दो-दो रिक्शों पर आगे-पीछे, सीट पर, मीट के नीचे, गोद में और परी के पास तक मामान से लदी-फदी सुरभि वडे प्रसन्न मन से घर की ओर जाते-जाते बोली-'जो भी कहो परतु सदीप की यह योजना है बड़ी अयथार्थपूर्ण । योलो तो, इन चीजों में से कौन-सी ऐसी है जिसकी जरूरत न हो। अतीश के अनुसार उनमे से कई चीजों के बिना भी काम चल सकता था, परनु वह वात उमने न कहकर, कहा-'यह बात तो ठीक है।' फिर भी उसका मुह देखकर तो नहीं लगता था कि वही कुछ देर पूर्व 'तमाशा' बनने के आतक में सिहर उठा था। 'फिर भी एक वान्टी खरीदना रह ही गया ।' सुरभि ने कहा। 'और वाल्टी चाहिए।' 'जार । वाथरूम और रमोइघर के लिए तो अलग-अलग चाहिए हो। उमरे अलावा नल से पानी लाने के लिए...।' 'अनीश' बरामदे मे वेंत की गर्मी पर बैठा मदीप प्राय. वेहोश ही गया। अनीश और सुरभि दोनो चौक उठे। सदीप कराह उठा-क्या इम मुहल्ले में कोई डाक्टर नहीं है ?' 'डाक्टर 'अतीश भौचक्का हो जाता है। 'हा--हा, डाक्टर । यही से एक डाक्टर अभी टूटकर लाओ। लगता है मंग हार्टफेल हो रहा है। और सदीप कलेजा पकडकर जमीन पर बैठ गया। 'सुरभि. मुरभि, जल्दी आओ। अचानक संदीप को जाने क्या हो गया 'तीश कातर होकर हमाल ने ही सदीन को हवा करने लगा। सुरनि दालान में उतारे गए गधमाग्न पर्वत को लिस्ट से मिला-मिला- कर गिन रही थी, वैसे ही बैठे-बैठे बोली-'अरे, क्यों वेवकूफी कर हो ? मैं उमरे हार्टफेन का कारण जानती हू। अच्छा
मने मे हटाये दे रही हूं।'
तेरे की ! उसी के लिए क्या ?' अतीश ने कहा ।
• नही तो क्या ? संदीप, डरो मत। सब ऐसे फैलाकर नहीं
अभी सजाए देती हूं।' और हंसकर सुरभि ने संदीप को उठाकर
र बैठा दिया।
स तरह त्रिशक्ति-संघ का उद्घाटन दिवस बीता।
कंतु सुरभि की प्रसन्नता का ओर-छोर नहीं था। देर भन्ने हो गई
फिर भी बड़े उत्साह से वह खाना बनाने चली। फिर वह परोसने
। अतीश ने टोका -'अब यह परोसने का झमेला लगाने की क्य
करत है ? तो कुछ बना है, सब एक साथ लेकर हम लोग खाने बैठ
ये।'
सुरभि ने भौहें टेढ़ी करके कहा-'पागल हुए हो।'
शाम को संदीप ने प्रस्ताव रखा-'अब निकला जाए किसी ओर।'
मुरभि ने फिर झनककर कहा था-'आज तो अब और कही जाना
नहीं हो सकता।'
'कही जाना नहीं हो सकता?'
'एकदम नहीं । तुम लोग चाहो तो जा सकते हो। मुझे बहुत-सा काम
करना है।"
'वह सव आज रहने दो।'
'पागल हो क्या?
उनके सभी प्रस्तावों को पागलपन कहकर सुरभि ने उड़ा दिया था।
वह उस दिन घर से नहीं निकली। संदीप अकेला ही रहा। अतीश भी
नहीं गया। उसने शका प्रकट की थी--'एकदम नये मुहल्ले में इस तरह
सुरभि को अकेली छोड़ना...' वात एकदम हंसी में भी उड़ा दें
लायक नहीं थी। इसलिए संदीप अकेला ही चल पड़ा। हाजारा के में
पर आकर बस से उतर पड़ा। सोचा था, उतरते ही घर की ओर
पड़ेगा। मगर उसे क्या मालूम था कि वस से उतरते ही उसके पैर प
के हो जायेंगे। लग रहा था कि वह किसी प्रकार रायकोठी से आंख
मिला सकेगा। जैसे उसके सामने एक पत्थर की अलक्ष्य दीवार उव
निपदी
हुई है । उसे लाधना संदीप के बम को बात नहीं है । आज तक पह बाधा कहा थी? दो दिन पहले तक तो संदीप रात साढ़े ग्यारह बजे भी बिना किमी दुविधा के लोहे के बड़े फाटक को ठेलकर, मीढिया चढ़ना हुआ, दुतल्ल पर अनायाम ही चढ जाता था। किंतु एक दिन में ही यह क्या हो गया? कहा से आ पड़ी हुई यह दुर्लध्य दीवार ? यह तो मदीप को अपनी दुलता है। क्या सदीप इतना दुर्बल है ? हि-छि.। किंतु वह धिक्कार जमे उसके अन्दर में नहीं निकलना चाहती थी। एक विचित्र अनुभूतिहीनना उमे निकाले ले रही थी । अचानक उसे याद आया, वह बेवकूफ की तरह एक 'ऐमी जगह खडा है, जहा से न केवल अपना घर देख पा रहा है बल्कि आम- पास के घरो की खिडकियों से लोग उसे भी देख रहे है। उफ् ! एक दिन मे ही सदीप अपने मुहल्ले के लिए दर्शनीय हो उठा है ? मुहल्ले में सभी लोग शायद जानते है कि वह अब यहा नहीं रहना । क्या सचमुच उसका इस मुहल्ले में कोई सवध नहीं है ? ठीक हो तो मोचते है लोग । मदीप तो मचमुच राय परिवार का कोई नहीं था । वचपन में ही तो वह यही भूमिका निभाता रहा है । नो आज जव कि अपनी अभीपिमत वस्तु पा ली है तो एकाएक उमे सज्जा यो हो रही है ? नहीं, यह केवल लज्जा नहीं है। एक भयानक पत्रणा उमको मथने लगी है । किम जगह वह यत्रणा हो रही है, वह ठीक ममझ नहीं पा रहा है, फिर भी फिर भी । और वह पैदल ही चलने लगा है। सैमडाउन पार कर क्व, वह 'पद्दीकुर के पाम आ गया उसे यह भी ख्याल न रहा । होश आया तब, जब उसने छोटी भानजी मोलू का हपं-विह्वल कठ मुना। 'छोटे मामा । ओ छोटे मामा।' मीलू दुतल्ले के बरामदे में से पुकार रही थी। इसका मतलब तो यह हुआ कि वह अनजाने ही वडोदी के घर की और आ निकला था। ऐमा हुआ कम ? क्या आश्रयहीन मन अज्ञात भाव से किसी पात्रय की तलाश में उमे यहा ले आया है ? अथवा अभ्यामवश ही ऐमा हुना लिया। मैं पागल हो गया हूं। संदीप ने झटककर अपने को न मे छुड़ा बड़ीदी ने विगलित होकर कहा-'संदीप, तू मेरे यहां आकर रह।" मंदीप हंस पड़ा । बोला-'तो फिर हाजरा वाली कोठी ने ही क्या नी की है ? बड़ीदी ने उमी तरल कंठ से कहा-'गलती न होती तो तू इस तरह व कुछ छोड़कर क्यों चला जाता ? हमारे पास मीलू-बूतू की तरह ही हेगा तू ।' छोटदी से बड़ीदी केवल दो-चार वरस की ही बड़ी होंगी। मगर उनकी बातें ऐसी ही बड़ी-बड़ी होती हैं, जैसे कोई पुरखिन हों । संदीप ने मोत्रा-नही, यहां ज्यादा आना-जाना ठीक नहीं होगा। इस तरह की भावुकना को प्रश्रय देना खतरनाक हो जायेगा। ऊपर से हंसकर वोला 'मोचता हूं, अगर अचानक मेरा पोस्ट घटकर मीलू-बूतू के बराबर हो जाये, नो मैं अपने को मुनाफे में समझूया घाटे में। 'देव, मैं तुझसे बड़ी हूं, कोई छोटी नहीं हूं। तू चाहे जितना छिपाये पर अमल वात समझने में मुझे देर नहीं लगती है। अगर घर पर तुझे आगम मिलता तो तू इस तरह वेहाल क्यों बनता? क्या करूं, तुम लोगों ने नो परायी समझ लिया। भूले से इधर आ निकला तो अपने दिल की बान कहने का मौका पा गई।' मंदीप ने मुंह का भाव करुण बना कहा-'आहा वड़ीदी, अगर ह घर मे तुम्हारी तरह एक स्नेह-प्रतिमा होती, तो इस देश का क्या कह था? एकदम स्वर्ग हो जाता।' 'तू मेरा मजाक उड़ा रहा है ?' भौहें टेढ़ी करके बड़ीदी ने पूछा
"
मुझे बढी चिन्ता होती है ।
बड़ीदी ने और भी भारी मुह करके कहा-'मेहरवानी करके
खा ले।
'हा, अभी तो अमल वात पर आई तुम ।'
बड़ीदी ने एक प्लेट खाने का मामान उसके सामने रपकर कहा-
'कुछ या लेगा तो भी अपने को कृतार्थ मानूगी। अच्छा, बना, कहां
ठहरा है?'
'यही थोडी दूर पर है।'
'शायद किसी मित्र के यहा पेइग गेस्ट है, क्यो ?' बड़ोदी के चेहरे पर
उत्सुकता नहीं, एक सकल्प है, जैसे मारी बात जाने बिना छोड़ने वाली
नहीं है । सदीप हम पडा। बोला-'बडोदी देखता हू तुमने तो दिव्य
दृष्टि में सब कुछ परले ही जान लिया है।'
'दुनिया देखते-देखते आपने-आप दिव्य दृष्टि आ जाती है । तो तुम्हारे
मित्र की बहू है न
'हाय भगवान । बहू होती तो फिर चिन्ता ही क्या थी?"
'लो, वह भी तुम्हारी ही तरह घडा-छडगा है'
'वह नहीं, वे।' अपनी हमी को किमी तरह रोककर कहता है
सदीर ।
"मया रे, कितने सब फालतू एक माय जुट गए हैं"
'ज्यादा नहीं है । वस दो, एक लडका और एक लडकी ।'
"एकल 'ल.. लड़की" लगा मानो बडीदी का दम निकल जायेगा।
'इमका मतलब?
'लड़की माने लड़की । साडी पहनती है । वालो का वडा-सा जूडा है
उमका।'
'क वारी है?
'और नहीं तो क्या, हम जैसे फालतू आदमियों के पास कोई आनी
बहू छोड़ जाएगा।'
बड़ीदी का चेहरा मे भयकर लाल हो उठा-'किम चूल्हे को लखी
ह? 'होगी ही किसी चूल्हे की।' 'इसका मतलब हुआ तू वरवादी के रास्ते पर जा रहा है । सब समझ ई । कुछ भी वाकी नहीं है।' 'समझ गई न? चलो जान बची।' 'तुम्हारा पता क्या है ?' 'हुआ गजब, तुम जिस तरह चेहरा लाल कर रही हो, उस हिसाब मे तो पता मालूम हो जाय तुम्हें, तो हमारे उस अड्डे में हुआ प्रलय ।' 'मैं कौन होती हूं प्रलय करने वाली? सोच रही हूं कि बार के मुह में अगर कालिख लगेगी तो अपने मुंह में भी लगेगी। और क्या ? वंश । वंशमर्यादा। बड़ा पुराना सौदागर है यह । अनन्तकाल से आदमी अपने नाम इसके खाते में लिखे हिसाब को चुकता करता आ रहा है। फिर भी वह कर्ज चुक नहीं रहा है । रास्ते में लौटते समय संदीप यही सब सोचता आ रहा है। इस झूठे कर्ज को अस्वीकार करते ही, आदमी ममाज से खारिज । यह अच्छी वेवसी है । सचमुच क्या कभी ऐसा नहीं हो सकेगा कि आदमी केवल अपने निज के परिचय से जाना जाएगा? वंश, गोत्र, पदवी, परिवार आदि सैकड़ वधनो में बंधा हुआ आदमी नहीं, जो एकदम बनावटी और नकली है अपने जीवन को अपनी इच्छा के अनुसार बिताने की स्वाधीनता उसे नहीं है ? अपने सभी सुख-दुःख और अपने अच्छे-बुरे का उत्तरदा आदि उसी मनुष्य नामक प्राणी पर रहे तो क्या वह थोड़ा-सा और जि दार, थोड़ा-सा और बुद्धिमान नहीं होगा? सदीप के ही विचारों को जैसे प्रतिध्वनित करती है सुरभि । 'थोड़ी-सी और जिम्मेदारी फील करते, थोड़ी-सी और बुद्धि तुम्हारे अन्दर तो क्या हर्ज था ? नई जगह, रात के नौ बजे है मूना हो जाता है और तुम ग्यारह बजे घूमकर आ रहे हो।' संदीप जैसे जबर्दस्ती की हंसी हंसता हुआ बोला-'असे क्या ? अबला महिला तो अकेली थी नहीं, था तो पहरेदार ।' 80: त्रिपदी ? "उमसे क्या होता है ? इसका मतलव तो यह नहीं कि तुम अकेले इधर-उधर भटकते फिरो।' 'किया भी क्या जाए ? तुम लोग तो निकलने को राजी नहीं हुए।' 'घर-गृहस्थी में जय चाहे तभी क्या निकला जा सकता है ? घर में इतना मामान फैलाकर क्या धूमने को वात मोची जा सकती है ? 'गृहस्यो ?' सदीप सिर पर हाथ रखकर बैठ गया । 'अतीश ।' 'तुम भी कमाल करते हो, सदीप । अरे ! गृहस्थी माने घर, जहां दो आदमी रहे । और क्या ? ज्यादा शरारत करोगे तो अभी सुरभि नाराज हो जाएगी।' 'नाराज हो जाएगी? 'और नहीं तो क्या?' अतीश माथे पर वल डालते हुए बोला- 'इसके अलावा. "मेरा मतलब है, हमेशा तीनो आदमी साथ-साथ रहे यही अच्छा होगा । उससे मनोवल बना रहता है । इतनी रात तक एक लड़की के माथ अकेले बैठे रहना.. मतलब 'मेरी वान तो समझ ही गए होगे?' 'इमका मतलब ?' मदीप पल-भर एकटक अतीश की और तिरछी निगाह से देखता रहा। 'आज तक तो कभी तुम्हारे मुह से नहीं सुना प्रा कि मुरभि एक लड़की है। सदीप सच कह रहा था । कई बार बहुत रात गए तक उनमें से एक मुरभि के साथ किसी पार्क की बेंच पर बैठा गप्प लहाता रहता था। कभी सदीप नही आ मका, तो कभी अतीश ही को फुरमत नहीं मिली, मगर आज तक कभी भी तो उन्होंने यह अनुभव नहीं किया कि मुरभि एक लड़की है। मगर मुरभि को कैसा लगता था? क्या उसे भी भूल जाता था कि वह एक लड़की है ? नहीं, उसे कभी यह बात नहीं भूली । केवल वह मित्रों के सामने और अपने सामने भी उस एहसास को मूले रहने का दिया करती हमारी दोस्त हो !' वे कहते, तो कैसे वह अपन से तो कि वह दोस्त नहीं, एक लड़की है। सिर्फ एक लड़की। नहीं, नहीं कह सकी थी कभी। यहां तक कि उसने कभी अपने सामने वात को नही स्वीकार किया था। असाधारण बनने के उन्माद ने अपने अन्दर की नारी को अपने अन्दर ही किसी कालकोठरी में तो बना रखा था। कितु इस नये परिवेश में उसके अन्दर जैसे एक अद्भुत परिवर्तन हो पा था । दो पुरुषों के बीच एक तीसरा पुरुप बनने की उसकी एकदम च्छा नहीं कर रही थी। वह पुरुप नही, पुरुष की प्रिया होना चाहती थी। किमी घर वाले की घरनी होना चाहती थी और वह इच्छा एक-एक पल बढ़ती ही जा रही है। सारी बड़ी-बड़ी वातें जैसे किसी कुहासे में गुम होती जा रही हैं। भीतर का क्षुधात, संसारी मन जैसे पैरों के नीचे एक नई माटी पाकर परवान चढ़ रहा है। क्या सुरभि के उस मन को वे रोक सकेंगे ? उनका 'त्रिशक्ति संघ' क्या उसकी आत्मा की वह पुकार रुद्ध कर सकेगा? शायद नहीं। सुरभि ने खाना बना लिया है । आकर तेज गले से वोली है.--'अच्छा . अब उठकर खाना खा लो तुम लोग । वेकार गप्पवाजी में टाइम मत खराब करो। खा-पीकर हमें छुट्टी दो। वहुत-सा काम अभी बाकी है।' अपने किसी काम से बाहर जाते समय वह दोनों पुरुपों को अवोध बालकों की तरह डांट पिला रही है-'देखो भूल मत जाना।' बाज़ार मे लौटकर बड़बड़ा रही है-'वाप रे ! वाजार कैसा आग हो रहा है और गृहस्थी का संयोजन करती सुरभि की आवाज में जैसे एक दृढ़ संक वज उठता है, उसकी आंखों में किसी नागपाश की छाया है और उस आंखों की वह चमक रह-रहकर कौंध उठती है। क्या उनकी कल्पना का निरुद्देश्य, स्वच्छंद जीवन यही है? यही उस अद्भुत प्रयोग का नक्शा है ? नमक के डिब्बे का चम्म साफ-सुथरा झलक रहा है। । 82: त्रिपदी क्या इमी के लिए प्रदीपराय का गभीर स्वर वजा था-'उने जाने दो।' एक पगले बाउल का एकतारा जैसे गूगा हो गया है । एक टूटा हुआ तार जैसे रह-रहकर व्यग्य-मे मुस्करा पडता है । वह कभी ममाप्न न होने वाली बातें, गुला आकाश, गगा का किनारा, आधी-आधी रात का मिनेमा देखना मय जैसे कहीं खो गया है। मुरभि को समय नहीं है। गत मे घर छोड़ने से कोई ताना तोडकर मव कुछ ले जाएगा, इसी आशका से वह शाम को जाने के बाद घर से हिलना भी नहीं पमद करती। और सदीप देवता है अतीश भी उसमे सुरभि का ही साथ देना है । वह भी घर में बाहर नहीं जाना चाहता । सदीप को लगता है, जैन वे दोनो ममगोप है। सदीप के माथ उनका मेल नहीं बैठना । वे दोनो जमे अपने मन को सदा के लिए पीछे छोडकर नहीं आ सके हैं। यह मच है। दोनो 'हासं कार्नर' में घूमकर खिडकियो के लिए मस्ता माळ पर्दा पने दते हैं या कोई रगीन वेह-गवर, कोई टूटी-मी फूलदानी, कोई बैढगा भीगे का सेट या वानिश लगा चीड का सस्ता फर्नीचर । और वही सब सदीप को दिया-दिखाकर मुरभि वडी गौरवान्विन अनुभव करती। चेहरे पर आत्मश्लाघा का भाव लगाकर वह कहती - 'यह टी-सेट कुछ नहीं तो तीम- यत्तीस का तो होगा ही। जरा-मी हैंडिल चिटकी हुई है। उससे नुकमान ही क्या है। इतनी अच्छी पीज मिर्फ मयह रुपये में ले आई हू । तुम लोग सात जन्म मै ऐसी चीज नहीं ला सकते थे।' संदीप हसकर कहता--'यह बात तो तुम ठीक ही कह रही हो । बडी देख-भाल कर एक चिटका हुआ सेट घरीद रहा हू, इस बात का ध्यान आते ही मेरा तो मन मर जाता।' सुरभि रहस्यमय ढंग से मुस्कराती है-'क्यों नहीं, क्यों नहीं । जनाव मह से चाहे जितने प्रगतिशील वन लीजिये, मगर असल में बड़ा आदमीपन जा नहीं सकता। अच्छी-खासी चीज जरा-सी चिटक गई तो वैकार हो गई, क्यों ? भाई, मैं इतना नपरा नहीं कर सकती। किसी तरह काम चलना चाहिए।' अतीश बाबू भी नाक-भौं सिकोड़ रहे थे-'मुरभि, यह बर्तन ।
। नहीं और इसका रंग भी नहीं रहेगा । भले न रहे ये। अगर बीस रुपये में एक अच्छा-सा सेट में एक-दो साल भी चला तो मेरा पैसा वसूल । एक सेट खरीदकर बीस साल तक एक ही सेट राय पीने से तो अच्छा है कम पैसों में उसी अवधि में तीन सेट खरीदे । - संदीप अवाक् होकर उसकी बात सुनता है। यह सुरभि जो घंटों गण- व और आर्थिक समानता पर बहस करती थी, समाज को धिक्कार देती पी, पूंजीपतियों को गाली निकालती थी, दो-दो पुरुपों के बीच बैठकर समान भाव से उनसे तर्क-वितर्क करती थी, वह क्या पार्क की बेंच पर ही छूट गई ? जादू के वल से सुरभि का रूप धर कर क्या यह कोई और मायाविनी है, जो संदीप को भा गई है ? अचानक उसे लगता है, अतीश ठीक ही कहता है । इसके साथ अकेले ज्यादा देर नहीं बैठा जा सकता । जाने कैसी होती जा रही है सुरभि आज- कल । इसीलिए संदीप किसी प्रकार अपने को एकांत-प्रिय बना रहा है। किन जिस वस्तु के सहारे आदमी अपने अकेलेपन को भी भूल जाया करता है. उसी वस्तु का अभाव संदीप को खल रहा है । लयनेरी से पुस्तकें लाकर क्या आदमी का जी भरता है ? प्रतापराय की पुस्तकों के साथ प्रदीपराय और सदीपराय द्वारा लाई गई पुस्तकें मिलकर एक अच्छी खासी लायब्रेरी बन गई थी । वही जैसे अपनी हजार-हजार वाहें बढ़ाक उसे बुला रही है, मन का 'कैसा कैसा करना' क्या चीज है, यह संद अब अनुभव कर पा रहा था। अपने को बंधनमुक्त समझने का सुख जैसे धीरे-धीरे समाप्त जा रहा है । आदमी का नहीं, वस्तुओं का मोह भी इतना प्रवलं होस है, अव संदीप की समझ में आ रहा था। रात में ढेर सारी किताबें पास में रखकर सोने की आदत है की। उसका अभाव जैसे उसकी नींद ही चुरा ले गया है। वह रात देर तक जागकर टहलता रहता है। संदीप ही नहीं तीनों में से किसी को नींद नहीं आ रही 2 त्रिपदी प्रया हुआ ? " ? मे । मव कुछ पाकर भी, मुरभि जाने और क्या पाने के लिए छटपटाती रहती है । मन ही मन वह उन दोनों को ही अभिशाप देती है । अपने को भी कम धिक्कार नहीं देती है । कसे वह अपने नारीत्व का अपमान करने वाली इस योजना के लिए राजी हुई जी चाहता है धक्का मारकर उन दोनों के दरवाजे तोड़कर कहे-'ययो, तुम लोगो के उम 'प्रयोजन' का तुम लोगों ने मुझे क्या पाना बनाने के लिए नौकरानी रण छोड़ा है। वह उनकी दोस्त है यह बात तो वह कय को भूल गई है । वह मोवती है, अगर कोई आकर पूछे, ये लोग तुम्हारे कौन है, तो क्या उत्तर देगी वह ? क्या कहेंगी कि हम लोग भाई-बहन हैं ' सुनकर क्या पूछने वाला हम नहीं पड़ेगा ' शायद कहेगा कि तुम लोग भाई-बहन हो तो तुम्हारी पदवी अलग-अलग क्यो है ? अगर वह कहे कि उनमे से एक मेरे पति हैं और दूसरे उनके मित्र। इस पर शायद वह कहे कि इन दोनो मे मे कौन क्या है । देखने मे तो कुछ पता नहीं चल रहा है। छि:छि, कितनी गर्म को बात है ? क्या वह समाज को नहीं जानती है ? ओह ! इन पागलो की चात में आकर उसने अपना कितना नुकसान किया? असामाजिक जीवन का मूल्य क्या है ? सुरभि अगर पैगा-पंसा जोड- कर घर मजाये तो उमे कौन देखने जायेगा। अगर गहना बनवाये तो उसे पहनकर किसे दिमायेगी छोटीदी, वहीदी और मंझलीदी को ही अगर कुछ नहीं दिखा मको तो किसी बात का लाभ ही क्या? अपना घर, अपनी गृहस्थी नहीं जिसकी, उसका जीवन ही क्या? यहां, इन लापरवाह सनकियो के वीच वह किसी भले आदमी को कमे चुलायंगी। सुरभि के जीवन को सभी उम्मीदें खत्म हो गई और उसके बदले में उमने पाया क्या? अपनी कमाई के पैसे खर्च करके खाना-कपड़ा पा रही है । वह तो अपने घर भी वह पाती यो । नया क्या हुआ? ये सब धूर्त है । मुरभि को उन्होंने फंसा दिया है । गोश में अपना मुंह देखती है सुरभि । उसे अपना मह वापिनी की तरह लगता है। सोचती है कैसे ये दोनों ऐसे निश्चित है- - - सचमुच ही वे निश्चित होकर सोते हैं, जैसा सुरभि सोचती है ? नहीं दीप तो नहीं ही सोता है, अतीश भी नहीं। आखिर वह भी तो आदमी , हाड़-मांस का बना हुआ आदमी । जीवन की बहुत-सी सुंदर वस्तुओं से वंचित रहा है वह । वातों-बातों में उसने भी सोचा था कि वह कल्पना के संसार का एक आकाशचारी व्यक्तित्व है। सोचा था धरती से उसका कोई भी संबंध नहीं है। रक्त की पुकार को वह अनसुनी कर सकता है । सोचा था सुरभि और संदीप दोनों को दिखा देगा कितना सभ्य और संयत है वह ? किन्तु अब जैसे उसके अन्तर में कोई क्रुद्ध आक्रोश रह-रहकर गरज उठता है। उसे लगता है जैसे किसी ने उसे ठग लिया है। वह कौन है ? संदीप? हां, संदीप । वही। संदीप यदि महानता की यह दीवार अपने चारों ओर न खींचे रहता, यदि वह आकाश से नीचे उतरकर मिट्टी में खड़ा होता तो उससे कहा जा सकता था--"भाई, ऐसे तो नहीं चलेगी। इसकी कोई व्यवस्था करो।' किंतु संदीप आकाश ही में उड़ता फिरेगा। वह जमीन पर नहीं उतरेगा। वह ऊंचे बैठकर उनकी नकेल थामे रहना चाहता है। मैं क्यों उमसे डरूं, क्यों शर्म करूं, हम लोगों के नियम में तो लज्जा नामक वस्तु का कोई अस्तित्व ही नहीं है। अपने कमरे का दरवाजा खोलकर अतीश बाहर निकला। जाकर संदीप के दरवाजे के सामने खड़ा हुआ। फिर जंगले से झांक- कर देखा। संदीप चुपचाप अंधेरे में ध्यानस्थ योगी की तरह वैठा हुआ था। अतीश को लगा संदीप उससे बहुत ऊंचाई पर है। उससे ऐसी छोटी वात नहीं कही जा सकती। यह बात कहकर वह उसकी निगाह में कितना छोटा हो जाएगा छोटा हो जाने का भय ही जैसे गिरते हुए मकान को रोक रखने वाले खम्भे की तरह आदमी को नीचे उतरने से रोक रखता है। महानता, उदारता, दया, क्षमा, ममता, प्रेम ये सब भीतर के किसी रहस्य कमरे ? 86:त्रिपदी मै रहते हैं। है भी या नहीं यह भी कहना मुश्किल है। मनुष्य को गिरने से वचाने वाला भय ही है। मुरभि जो विद्रोह करते-करते रह जाती है, अपने को व्यस्त करते- करते रह जाती है, उमका भी यही कारण है। इन दोनों के सामने छोटी नहीं होना चाहती वह। इसके अतिरिक्त और भी एक कारण है। वह कारण सुरभि को पागल किए दे रहा है । अगर किमी दिन विद्रोह आवश्यक ही हो जाय तो वह इनमे से किमके पास जाएगी? जो व्यक्ति रुपया तुडाने के लिए देने पर रेजगारी देना भूल जाता है और महीने का पैसा बिना मागे पाकेट से नहीं निकालता, उसके पास अयवा उसके पाम, जो रुपये का नाम सुनते ही अपनी जेब का पैसा निकाल फेकना है और हिसाव की बात सुनते ही अपने दोनो कान बन्द कर लेता है, उसके? नही, पैसा ही एकमात्र कारण नहीं है। यह ना फेवल उसका उपलक्ष्य है। उनके स्वभाव को पहचान कराता है। सदीप आकाश का है और अतीश मिट्टी का । सदीप जब अकेला बैठा होता है, उसके पाम जाते मन आतकित हो उठता है। लगता है, वह बहुत दूर है बहुत अचे। उसकी समता मे उस क्षण मुरभि अपने को और अतीश को अत्यन्त छोटा पाती है। तब उमको लगता है कि यदि आत्ममम्मान खोना ही हो तो दुर्लभ के ही लिए खोया जाए, कानी कोडी के लिए क्यो खोया जाए। फिर जव अतीश के पास आती है तो उसे लगता है कि मदीप अयथायं, अद्भुत और सनकी है। उस पर निर्भर करके गृहस्थी नहीं वसाई जा सकती। उसके लिए अतीश जमा एक माधारण अच्छे-बुरे का मिथ व्यक्तित्व ही चाहिए। निखालिस सोना मूल्यवान होता है, मगर उससे गहना नहीं बनता। उसके लिए वावा मिलाकर सोने को मजबूत करना पड़ता है । तब वह काम का होता है। विधाता ने जिन व्यक्तियों में तांबा मिला रखा है, अतीश उन्ही में से एक है। इसलिए वही ठीक है।
। . फिर भी मन जैसे स्थिर नहीं होता है उसका । संदीप की ओर देखत कर उसमें दुविधा जाग उठती है। कई बार निद्राविहीन रातों में भ के भीतर की भूखी नागिन फन फैलाकर फुफकार उठती है। किसी र को नही डम पाती, तो उसे ही चवा लेना चाहती है। वह कमरे में 3 नही पाती है और बाहर निकल पड़ती है। देखती है संदीप अपने कमरे • वगमदे मे आगम कुर्सी डालकर बैठा है । जाने क्या आकाश की ओर कटक ताक रहा है। मुरभि चौक पड़ती है। किसी दिन चुपचाप लौट जाती है और किमी दिन उसके पास जाकर कहती है-'यह क्या, अभी सोये नहीं नृम मदीप हमता है-'तुम भी तो शायद सो नहीं रही हो।' 'मैं तो- माने गरमी लग रही थी। इसी ने नींद नहीं लग रही थी।' 'मुझे भी तो गरमी लग सकती है ?' 'हा, मगर देख रही हूं, तुमने तो जैसे रात-भर बैठे ही रहने की सोची है । क्या सोचते रहते हो इतना, आसमान की ओर मुंह उठाये ?' 'मोच तो कुछ भी नहीं रहा हूं। सुन रहा हूं।' 'क्या मृन रहे हो?' 'अतीश के खर्राटे।' और वह हो-हो करके हंस पड़ता है। मुभि के अन्दर की नागिन का फन नीचे झुक जाता है। उसे हमना पड़ता है। 'जैसे वह कोई बड़ी मधुर आवाज हो?' 'क्यों नहीं? उनमें शायद एक आवाज बार-बार कहती-स पडनी है.--'मैं सुखी हूं, मैं सन्तुष्ट हूं, मैं मस्त 'किंतु मैं तो उसमें और ही कुछ सुन रही हूं।' सुरभि वराम खम्भे का सहारा लेकर खड़ी हो जाती है। 'अच्छा!" 'हां, मुझे तो लग रहा है उसकी नाक कह रही है.---'मैं । ' चोदा हूं, मैं ईडियट हू, बुद्ध है सदीप, अजीव ढग से हंसता है। "चलो, सो जायें।' सुरभि से कहता है । मुरभि के शरीर का रवत उमकी नसों में भयानक वेग से नाचने लगता है। वह मंकडों टुकडे होकर सदीप के सामने बिखर जाना चाहती है । फिर भी वह कुछ नहीं कर पाती । वह मदीप के को पकहकर उमे झकझोर कर कह नहीं पाती, कि वह आदमी नहीं पत्थर है । वह उमसे पूछ नहीं पाती-'तुम्हारी इम बनावटी भावुकता का मुझे कब तक मूल्य चुकाना पडेगा ? यह गव मेरे लिए अव असह्य हो उठा है। मगर यह सव कुछ कह या कर नहीं पाती वह । होता केवल यह है कि वह चुपचाप अपने कमरे में चली आती है और एक गिलाम पानी अपने माथे पर उडेल लेती है। फिर भी मयेरे उठने पर उमे बडी लज्जा लगती है । पिछली रात का अपना आक्रोस उमे वडा अजीब लगता है और वह अपनी दुर्बलता दिखाने का पागलपन नहीं कर बैठी, इसके लिए अपने प्रति कृतज्ञ होती है । और वह कृतज्ञता जमे उसको वातचीत में छलकती रहती है। मगर शायद रात पाले सितारे मूरज को ओट में छिपकर मुस्कराते रहते है। अतीश के पर्राटो का जिक्र होता, सदीप की मध्यरापि वाली आकाशचारी भावुकता का जिक होता और अन्त में पोपणा होती है कि वे दोनों परीक्षा में सफल रहे । मगर केवल नसों मे नाचता हुआ विप ही समस्या थी, यह बात भी नहीं है । उमके अन्दर एक और भी तनाव बढ रहा था। एक बार मन में आता---'विमलिए मैं ही मा-बाप की चिता मे जान दं? क्यो कोई अच्छी चीज मुंह में डालते ही उनका रूखा-सूखा याद आ जाता? क्यों लगातार उमके अन्दर एक आवाज कहती रहती है कि तुम अन्याय कर रही हो, अपराध कर रही हो । यहीदी, मझलीदी तो कभी ऐमी बात नही मोचती। अपनी-अपनी गृहस्थो लेकर आराम से दिन बाट रही हैं।'
भी कभी उसे लगता है वह बहुत नीच है। वहुत ही तो कोई अपने मां-बाप के साथ नहीं करता होगा। इस तरह घर कल आना असभ्यता की बात है। वह यह भी कह सकती थी कि वाहर वदली हो गई है अथवा आने-जाने में असुविधा हो रही है। -सा झूठ बोलकर दोनों पक्ष के सम्मान की रक्षा कर सकती - मां-बाप के मान और मन को लेकर परेशान होते सुरभि को कर्भ ही देखा गया था। मगर आजकल सुरभि उन्हीं बातों को लेकर काप परेशान दीख पड़ती है। मां को उसने जो कड़वी वातें कहीं थीं उनकी य भी उमे मालने लगी है। मोचती है, अब उनके साथ कोई अन्याय वह नहीं होने देगी। महीने का पैमा कैसे पहुंचाएगी? किती के हाथ भेज देगी अथवा मनीआर्डर कर देगी? इस जीवन में अब उस घर की अंधेरी ड्योढ़ी लांघने से रही वह । मगर वही तो एक रास्ता है मुक्ति का। क्या वह अपने ही हाथों उस रास्ते में काटा बोएगी? कई दिनों तक वह अनिश्चय में झूलती रही। एक महीने के बदले डेढ़ महीना हो गया, और देर करना अमानुपिकता होगी साहस करके वह निकल पड़ी। गली में घुसते ही उसका हृदय कांप उठा और दरवाजे की मांकल खड़काते हाथ जैसे उठ हो नहीं रहे थे। पहले तो उससे कोई वोला ही नहीं। फिर जगमोहन जैसे दीवा बोले-“पाप का अन्न जब खाना ही है और चांदी का ज मिर पर लेना ही है तो लो, मगर उससे कह दो रुपया मनीआर्ड को मुनाकर अपर्णा सोचती थी सुरभि रुपये मनीआर्डर द्वारा भेजेगी। घ मुह दिखाने नहीं आयेगी यह । वह कुछ बोलना नहीं चाहती थी, मग जगमोहन ने चुप्पी तोड़ ही दी तो उनसे भी वोले बिना न रहा कितु उन्होंने वात स्वामी के विपरीत ही कही। 'विप खाकर हम मर नहीं सकते तो वेकार ये सव वातें विपदी मतलब क्या चुप रहो।' सुरभि को गुस्मा तब भी नहीं आया । उसने देगा, मा आधी रह गई हैं । पिता का विस्तर तार-तार हो गया है। लगता है मा के शरीर में दम नहीं रहा । मरने बैठ गई हैं ! सोचा, मां से कहेगी कि वह कुछ और रुपये देगी । एक दाई रख लें । मगर कह नहीं सकी। उमक बदले धीमे स्वर में केवल इतना कहा-'यह मेरी तनखा का रुपया है मा।' काफी देर चौकी पर बैठी रही। अपर्णा एक बार जो रसोई-घर में घुसी तो बाहर ही नहीं निकली। सुरभि कब उठकर चली गई इम पर उन्हनि ध्यान ही नहीं दिया। लौटते समय सुरभि वार-बार अपनो आ- आचन के छोर से पोछती हुई मोच रही थी कि हमारा अपना कोई घर होता, अपनी कोई गृहस्थी होती, म्वाभाविक गृहस्थी, तो वह मा और पिताजी को जबर्दस्ती अपने घर ले जाती। कहती-'तुम लोगो को देख-भाल कौन करेगा, बोली। किंतु इस अद्भुत गृहस्थी में उम प्रकार की बातो के लिए स्थान नही है । वह इमे गृहस्थी भी कैसे कह रही है ? यह तो तीन आदमियों का मेस है, मेम। 'कहा गई थी '' अतीग ने पूछा। 'घर ।' सुरभि ने थकी हुई आवाज में कहा। 'तुम्हारा चेहरा देखकर मैं भी मही अनुमान कर रहा था । कमी आव- भगत हुई ? 'चुप्पी से ।' 'ह. मैं भी कल दीदी के घर गया था। पुराने आश्रय के प्रेम के कारण नहीं । केवल कत्तंम्यवश । दीदी ने कहा कि...।' 'क्या कहा 'कहा कि पराया व भी अपना नहीं हो सकता। सगा भाई होता तो क्या एमा नमकहराम हो सकता था?' 'अतोग, पहले इस तरह की बात सुनकर मेरा जी जल उठता था। - - र अव में चीजों को दूसरी तरह से देखने लगी हूं। जानते हो, आद जहां से आशा रहती है वहीं वह चोंच मारता है। किंतु आशा वह रखता किससे? जिसे अपना समझता है उसी से तो?' 'सुरभि, तुम्हारी इस थियोरी से मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूं।' 'हो सकता है, मगर है यह सच ।' 'लगता है, घर से कुछ अधिक ही अपमानित होकर आई हो।' 'ना, ऐसा होता तो अच्छा ही था।' 'ओह, शायद तुम्हारे विना उन्हें काफी कष्ट हो रहा है ?' सुरभि की आंखों में आंसू आ गए। उसने सोचा-आकाशचारी संदीप यह सब नहीं समझता है, जैसे अभी अतीश ने समझ लिया। उसी दिन से जाने क्या हुआ कि वह जीर्ण मकान और गंदी गली सुरभि को प्रबल वेग से खींचने लगे। क्यों न वह एक जोड़ा साड़ी ही खरीद कर मां को दे आए ? अभी तो महीना होने में काफी देर है जग- मोहन ने अवश्य कहा था मनीआर्डर से रुपया भेजने के लिए मगर अपर्णा ने साफ-साफ नहीं कहा था कि वह मुंह दिखाने कभी न आए। सुरभि ने मां के लिए चुनकर दो ठो चौड़े पाड़ की साड़ी खरीदी और एक पैकेट सिंदूर । फिर सोच-विचार करके पिता के लिए एक पैके विस्कुट और योड़ी-सी खजूर खरीदी । जगमोहन को खजूर बहुत अचा लगती है। अपर्णा ने ही दरवाजा खोला। और कौन खोलेगा? जगमोहन पाते तो भी जहां तक होता उठते नहीं। इस वार अपर्णा के मं पहले ही निकला-'अरे फिर आ गई ?' 'क्यों, आना नहीं चाहिए था क्या?' उन्होंने कुछ कहा नहीं। जल्दी से घर में चली गई और जा जगमोहन से धीमे से कहा । शायद चिल्लाने को मना किया था कोई वात, मगर उस दिन सुरभि ने पिता की उपस्थिति अनु । की। नुरभि ने हाथ का पैकेट नीचे रखकर इधर-उधर देखकर 'पानी का घडा कहां है ? 'टूट गया है।' फिर रसोई घर मे मे एक गिलास पानी लेकर मुरभि के सामने ला रखा । सुरभि ने पानी पीने की बात नहीं मोनी थी। मामने घडा रखने का टीहा खाली देखकर ही अकस्मान् उसने पूछ लिया था। मगर सामने पानी आते ही उमे लगा वह बहुत प्यासी यो। गिलास उठा- कर एक ही मास में गटक गई। अपर्णा ने इस बार आप में वह आए आंसुओ को छिपाने को चेप्टा नहीं की । कांपते गले में वोली-'अगली बार आना तो थोडी-मी मिठाई माय लेती आना। इतनी धूप मे चलकर आ रही है और मैंने एक गिलाम पानी मामने रख दिया । करती भी क्या" सदीप को कुछ भी पता नहीं चलता है। वह कुछ मुयाल नहीं करता। अतीश को सब पता चलता है । छोटी-सी बात पर भी उसकी नजर पडनी 'आजकल देखता हू. रोज ही घर जाना हो रहा है।' 'वाह, रोज कहा जाती है ? तरसों गई थी बाबू जी की दवा देने और मां के लिए दाई का इतजाम करने।' 'यह सब व्यवस्था स्वीकार हो रही है।' 'होगी क्यो नहीं ? मैं क्या ऐसे ही छोड़ने वाली हू।' फिर एकाएक ही जैसे बुझती हुई-सी बोली 'अगर हमारा अपना कोई घर होता, अपनी गृहस्थी होती तो क्या मैं उन्हे ऐसे अकेले रहने देती ?' 'मच वात है।' अतीश ने गभीर होकर कहा। मुरभि के लिए उमके पुराने मवध नये सिरे से मूत्यवान हो उठे थे । कभी बड़ीदी के यहा जा रही है, तो कभी छोटीदी के यहा । जातो भी तो साली हाय नहीं । कुछ न कुछ ले ही जाती थी। दीदी लोगो के लिए छोटी-मोटी चीजें और बच्चों के लिए चाकलेट-विस्कुट । दीदी लोग भी सुरभि को पहले से कही अधिक मानने लगी हैं । चलने समय बार-बार कहती हैं, 'फिर आना, सुरभि ।' कभी कहती है, 'एक विपदी 93 के समय आओ ना एक साथ बैठकर को दीदी हंसकर कहती हैं-'क्यों रे, अभी चारा ही लगाए बैठी उनमें से एक भी अभी तेरी कंटिया में नहीं फंसा?' 1, असभ्य कहीं की।' सुरभि कहती, 'हम लोग वैसे नहीं हैं । क्या' लड़के दोस्त नहीं हो सकते?' हो क्यों नहीं सकते ? सोने का सिल-लोढ़ा भी हो सकता है। मगर जा में ही, वास्तव में नहीं।' 'देखना।' 'देबूंगी।' नव कोई सुरभि को धिक्कारता नहीं। कोई उसे देखकर मुंह नहीं विचकाता । शायद यही दुनिया का नियम है। जब तक कोई चीज हाथ मे होती है, तभी तक उस पर जोर चलता है और आदमी उसके प्रति मदय नहीं हो पाता, मगर ज्योंही वह वस्तु हाथ से खिसककर गिर गई, आदमी का मन बदल जाता है। तव उसे उस चीज को पाने की चिंता हो जाती है । उस वस्तु को एक बार स्पर्श करने मात्र के लिए व्याकुलता होने लगती है। मुरभि अक्सर रुआंसी-सी होकर फिरती है उन लोगों के पास से।। फिर अतीश से बातें करती है, कभी भारी मुह और कभी हंस-हंसकर । मदीप से वह ये सब बातें किसी तरह नहीं कह सकती। सुरभि रोज घर जानी है, यह बात संदीप से कहना बड़ा कठिन काम है। वह संदीप की नजर में छोटा बनना नहीं चाहती। कभी-कभी संदीप के ऊपर उसे भयं कर क्रोध आता है। क्यों उसके अन्दर कोई दुर्वलता नही है कई महीने यों ही गुजर गए । इस वीच सुरभि माता-पिता के अंक बड़ा परिवर्तन लक्ष्य कर रही है । उसके घर पहुंचते ही जगमोहन चाय शवंत बनाकर उसे देने के लिए अपर्णा को परेशान कर डालते हैं। क्या कर रही हो इतनी देर से ? लड़की धूप में चलती हुई आई है ? । 94 :निपदी
है। अपर्णा फिर कहती है-'मुनता हू तू नगंदकर -
देती रहती है? आखिर वह किम सुनी?
ऐमे ममय मुरभि को याद नहीं रहता कि उसी वाप ने एक दिन उसे मह
कहकर लाठित किया था कि वह उसके मुंह में कालिय लगा रही है।
सुरभि का दिल पिता के प्रति कृतज्ञता से भर उठता । यह बोल उठनो-
'इतना परेशान होने की क्या जरूरत है यावू जी ?'
अपर्णा भी नाराज नहीं होती। दूसरे कमरे में से आकर पान खड़ी
हो जाती है।
'दे रही हूँ । कोई अतिथि तो है नही सुरभि ।'
मच, अतिथि के समान ही आदर होता है सुरभि का । सुरभि का
है-'शवंत की जरूरत नहीं है । न हो तो एक कप चाय ही बना दो।
तुम्हारे हाय की चाय पीने की आशा में सवेरे से चाय नहीं पी ने
अपर्णा चाय का मरजाम लेकर सुरभि के पाम आ ब है के
अपनी अक्लमद छोटी लडकी मे मूर्य बडी लडकियों को निदा
देती है-'सुरभि, सच कहती हूं, लगता है वे सब तो हर कोई
तो
एक वार हाल पूछने नहीं आएगी। तुम कभी-कर्म
तो सन्तान का मुंह देखने को मिल जाता है। हम ना ?
दिन मर जाए तो शायद उनको तो खबर भी नहीं हो।
तो तुम्हे ही हमारी सडी-गली लाश उठानी पड़ेगी।
मुरभि उनके साथ नहीं रहती, शायद यह बात का
नहीं आती। उन्हें तो केवल यही याद रहता है कि दो बाई
'अरे नाम मत लो उन सबका । जमनंदन दिन
जाए
इस समय सुरभि के घर की यही अवस्था है।
अतोश का तो घर ही नहीं है।
मामला
वे उससे कोई उम्मीद नहीं करते है। इन
म लिख रखा है। मगर राना
मोह पर?
ज्या वहां भी लोग कहते होंगे-'नाम न आवारा लड़के का? 'नहीं। वहां पर ये सब बातें नहीं होती। उस मकान की ईट-ईट एक विचित्र निस्तब्धता से आक्रांत है। जैसे कोई अदृश्य तर्जनी तन- र कहती है-'उसकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है।' शुरू में यह बात माधुरी की समझ में नहीं आई थी। इसीलिए वह कई दिनों तक आते-जाते संदीप को सामने पाकर कह देती थी-'सुना था कि जाते ही पता भेज दिया जाएगा। उसका कोई भी तो लक्षण नहीं देख रही हूं।' अथवा किसी और दिन कहती-'साधु-संन्यासी भी जिन गुफा में ज्यादा दिन रह लेते हैं, उसके प्रति उनको मोह हो जाता है । मगर देख रही हूं ये लोग उनसे भी आगे बढ़ गए हैं।' इसके जवाब में प्रदीप ने गंभीर कंठ से कहा-'माधुरी अगर तुन्हें कोई काम न हो तो मेरी पैंटों में टूटे बटनों की जगह नये लगा दो।' माधुरी अपनी बातों का ऐसा विचित्र प्रतिवाद सुनकर अवाक् नहीं होती है। केवल दांतों से होंठ काटते हुए वहां से चली जाती है । प्रदीप का शानन इतना ही होता है। इससे अधिक नहीं। मगर इसका असर होता है । यह चीज दवा की तरह है। ठीक मात्रा में देने पर काम करत है और अगर अधिक हो जाए तो उसका बुरा प्रभाव भी हो सकता है किमी दिन अकेले में मां-बेटे में इस प्रकार की बातें होतीं। उज्ज्व दीप पृछता--'चाचा क्या फिर कभी नहीं आयेंगे?' माधुरी शांत कंठ से कहती-'आयेगे। हमारे मरने पर।' 'क्यों, तुम्हारे साथ उनका झगड़ा हुआ है क्या मां?' 'हां, हमारे साथ तो उनका जीवन-भर का झगड़ा है।' 'धुत्' उज्ज्वलदीप समझता है मां उसका मजाक उड़ा रही है उसकी मां के साथ किसी का झगड़ा भी हो सकता है ऐसी अद् वह सोच भी नहीं पाता। गुस्सा होने पर जरूर मां का चे कसा लाल-लाल और कठोर हो जाता है, कितु उसी समय चुप हो जाती है। फिर उसके साथ किसी का झगड़ा 96: त्रिपदी
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समझूगा, इस दुनिया में कोइ । सारी दुनिया की बात करने नहीं आई हूं। संदीप -- । हि ! संदीप । मगर अचानक तुम्हें उसका नाम ही भूल जायेगा, कैसे जान सकता था?' भूल जाने की बात तो नहीं कह रही थी, परन्तु अब तो उसका जवान पर लाने की भी इच्छा नहीं होती। निश्चय ही तुम्हारे समान पुरुप की और वात है । तुमको तो किसी बात ने कप्ट ही नहीं होता जानते हो, वह क्या कर रहा है ? घर छोड़कर बाहर रहने का कार नते हो? एक आवारा-सी लड़की को लेकर ...।' 'आरती... ‘देखिये भाई साहब, मैं बिना जाने-बूझे कोई बात नहीं कह रही हूं। में अपनी आंखों से सब देखकर आ रही हूं।' 'देखकर?' 'हां, हां, जानती हूं न । तुम लोग तो किसी की बात पर विश्वास ही नहीं करते । इसलिए सोचा खुद जाकर देख लेना चाहिए।' आरती प्रदीप के मुंह की ओर गौर से देखती है । उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहती है । किन्तु उसका चेहरा देखकर कुछ समझ नहीं पा रही है। प्रदीप ने उसकी बात सुनी है. ऐसा भी उसे नहीं लगता। इसलिए उसने गला थोड़ा और चढ़ाया। भाई का स्वाभाव जानते हुए भी। बोली- 'जाकर जो देखा छिः छिः, कोई अपूर्व सुन्दरी होती तो वह भी माना जाता। एकदम मामूली लड़की । अलवत्ता मुंह की गढ़न थोड़ा। 'आरती, तेरा वड़ा लड़का किस क्लास में पढ़ रहा है ?' आरती का चेहरा और लाल हो उठा-'तुम मेरी बात न सुन चाहो, न सुनो मगर एक बात कहे जा रही हूं। तुम लोग शुतुरमुर्ग तरह अपनी गर्दन वालू में गाड़कर भले रहो, और लोग ऐसा कभी करेंगे । संदीप अगर किसी और जाति की लड़की से शादी रचाता शायद एक बात होती। कोई कुछ कहने नहीं जाता। मगर इस तरह . 98:त्रिपदी
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-- ठीक है । तुम यही मानकर वैठे रहो। मगर एक बात कह । रही हूं। अगर समय रहते संदीप को उचित शिक्षा और अनुशासन गया होता तो लड़का इतना नहीं वह जाता।' आरती नाराज होकर चली जाती है। मगर उज्ज्वलदीप, जिसने रे के बाहर से सभी बातें सुन ली थीं, मौसी के चले जाने के पूर्व ही चे आकर उन्हें पकड़ लेता है। 'वुआ, तुमने चाचाजी का घर देखा है ?' 'हमारा देखना, देखना ही नहीं है, वेटा। तुम्हारा बाप, जव उसकी आख में उंगली डालकर कोई दिखाएगा, तभी देखेगा।' कहकर एक प्रकार से उसे ठेलकर आरती बाहर निकल गई। आंखों को पोंछती हुई आरती गाड़ी में जा बैठी। सोचा था ऐसी महन्वपूर्ण घटना भाई को बताने जा रही है। कम से कम कान देकर सुनेंगे। मगर आरती पति-पत्नी तो जैसे प्रदीप के लिए सदा के फालतू हैं । अच्छी बात है। अब इस मकान की परछाई भी वह नहीं काटेगी। अम्मा- बाबू जी ही जव नहीं हैं तो इस घर में उसको कौन पूछता है । भाग्य से गाड़ी में और कोई नहीं था। ड्राइवर मालकिन के रोने की आवाज नहीं सुन सका। सच, आरती ने संदीप का पता लगाने में बड़ी दीड-धूप की थी। चलो कुछ तो हुआ । उस पतुरिया को दो-चार खरी-खोटी तो सुन आई। इतनी परेशानी का यही लाभ सही। पहले तो बड़ी चकराई, जब सुना कि संदीप की दीदी हैं तो कैसी मेमना वन गई । हुंह, जोप करता है वह क्या कभी किसी से आंख मिला सकता है ? आरती ने जाते ही एक वेढव सवाल किया था-'इस घर का मा कोन है ?' सुरभि ने चेहरे पर चरम घृणा का भाव लाकर कहा है 'क्यों, क्या इस घर की मालकिन मैं नहीं हो सकती ?' 'तुम? अकेली लड़की सुरभि को आरती 'आप' कहेगी ऐसी आशा करना ही गलत है पिंदी
अपने लिए 'तुम' सुनकर सुरभि का जो जल उसको
'लगता है आपने किसी लड़की को अकेली रहते नहीं देखा है:
'देखा क्यों नहीं है ?' आरती ने भी चोट
कोरेको
महिलाओं को देखा है, जैसे मास्टर, प्रोफेसर, डासर। दर,
औरतो को।'
'मैं वैसी नही हूं, यह कैसे जान गई आर?'
आरतो की आवाज मे जैसे भाले की नोक उरसाईको कहा
या-'तुम क्या हो यह जानकर ही मैंने यह बात कही है। वह है
कहाँ ? सदीप राय । घर पर नहीं है शायद ।'
मुरभि चौक पड़ी। सोचती थी मुहल्ले की कोई न करने
. महिला है। इस बार थोड़ा नरम होकर बोली-
लगती हैं ?'
'ना, अब कोई नहीं हू । आज तक उसकी बड़ी बहिन पो। दर
देख-समझ लिया। वह होता तो केवल एक वात उनले पूती-
राय का बेटा होकर कैसे उसकी रुचि इतनी हीन हो गई?'
मदीप को दीदी।
सुरभि चुप रह गई।
किंतु अतीश जब आया तो वह फट पड़ी थी।
'तुम लोगों को यह अपूर्व योजना इस देश में नहीं चलेगी, समझे और
नहीं तो तुम लोगो ने यही समझ लिया है कि हमारी गर्दन पर ही मुद्र
पाप लादकर तुम लोग वरी हो जाओगे । जानते हो आज संदीप को दीदी
क्या-क्या बक रही थी?
और उसने सच्चाई के साथ अपने दिल की मारी भंडास मिलाकर
आरती-प्रसंग का नमक-मिचं लगा वृत्तांत अतीश के सामने पेश किया था।
अतीश उस दिन बहुत देर तक विचारों में हुवा रहा । सत्र, यह का
हो रहा है ? पहले वाला मन जैसे अब बदल गया है। अब तो लगता है
एक-एक दिन जो समय बीतता जा रहा है, वह घोरे-धीरे उने तोड़ रहा
'संदीप कब गया है ?
'वही, सवेरे।'
-
--
'आज उसे आने दो। इसका फैसला करना होगा।'
'किस बात का?' सुरभि शंकित हो उठी थी।
'इसी स्थिति का।'
'वह भी तो सुरभि के लिए लज्जा ही की वात होगी। इसका मतलब
यह है अपनी हार स्वीकार करनी होगी, उस पत्थर के देवता के सामने।
छि:-छि।'
वोली---'इसमें फैसला क्या करना है ? हम लोग क्या नावालिग हैं ?
क्या वह हमें जवर्दस्ती ले आया है ? हम तो अपनी इच्छा से ही उसकी
योजना में शामिल...।'
'बड़ी-बड़ी बातें करके उसने हमें विभ्रमित कर दिया था।'
'वह तो आज भी बड़ी-बड़ी बातें ही करता है। छोटी बातें उसने कब
की? वह तो आज भी बड़ा है।'
'तुम ठीक कहती हो।' अतीश आहत हो उठता है। वह अपमानित
अनुभव करता है । और आहत अपमान का स्वर उसके स्वर में बज उठता
'छोटा तो मैं हो रहा हूं सिर्फ ।'
सुरभि चौंककर उसके चेहरे की ओर ताकती है। फिर उसकी आंखों
मे एक अद्भुत और रहस्यमय मुस्कान निखर आती है-'तुम नहीं । हम
दोनों।'
लो, स्वीकार कर बैठी न सुरभि ।
अब और नहीं लड़ पा रही थी वह अपने से । विक्षुब्ध मन का आक्रोश
उसके संभाले नहीं संभल रहा था। उसके मन का द्वंद्व भी अव समाप्त
हो रहा था 'कस्मै देवाय' का प्रश्न उत्तरित हो चुका था। उसने समझ
लिया था कि संदीप की ओर केवल देखा जा सकता है। श्रद्धा, विस्मय
और प्रशंसा की दृष्टि से उसका अभिनन्दन किया जा सकता है। उसकी
ओर हाथ नहीं बढ़ाया जा सकता । सुरभि को चाहिए ऐसा आदमी जो
102 : त्रिपदी
उसकी मुट्ठी मे हो । सपने देखनेवाला नही, हाड़-मास का बना एक वास्त- विक आदमी। 'सुरभि ।' अतीश ने सिनेमा के नायक के समान भाव-विह्वल स्वर में पुकारा, 'सुरभि !' अचानक एक रहस्यमय जगत् का द्वार युल गया। सतरंगे आलोक से अतर का कोना-कोना रगीन हो उठा। इतने दिनो का परिचित व्यक्ति जैसे एकदम नया-नया-सा लगने लगा। वह लुका-चोरी, आंखों-आखों में कुछ कह लेने की कामना, सदीप के सामने ही उसकी नजर बचाकर उंगली से उगली छुआ लेने की चातुरी और जब-तव सहज वाक्यो के बीच अर्थ की एक और व्यजना भरकर मुस्करा पडना-ओह । कैसा अनास्वादित सुख है, कितना अनिर्वचनीय आनंद है। अब वे सदीप को अपने से बड़ा नहीं मानते । उन्हे सदीप एक छोटा- मा अवोध शिशु लगता है और वे उसकी अवोधता का आस्वादन कर रहे हैं। सदीप उनके इस गुप्त खेल का रहस्य नहीं जान पा रहा है, इससे बडी मजे की बात और क्या हो सकती है ? सदीप कभी-कभी टोकता है--'अतीश, देखता हू, स्थविरत्व को प्राप्त हो रहा है। आफिस जाने के अलावा तू कभी घर से निकलता ही नहीं।' कभी-कभी वह सुरभि से भी कहता-'सुरभि, तुमसे मुझे बड़ी आगाएं थी, मगर देखता हूं तू भी धीरे-धीरे होपलेस होती जा रही . 'केवल होपलेस?' अतीश कनखियो से मुरभि की ओर देखकर मुस्कराता-'अरे ! मर्डर केस है यह तो।' एक दिन संदीप ने कही घूम आने का प्रस्ताव किया। उस दिन वह बड़ा अस्थिर लग रहा था। छोटे-छोटे तीन कमरों और एक पतले से बरा- मदे में सीमित जीवन उमे बसह्य-सा लगा था। थोड़ी देर के लिए वह उम '- वातावरण से मुक्ति पाना चाहता था। उन दोनों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया, सुरभि और अतीश ने, जिनका जीवन सहसा फूल की तरह हलका हो उठा था, जो मुक्ति की आकाक्षा की छटपटाहट को पार करके विपदी. 102 - के स्वप्न में विभोर हो रहे थे। 'बहुत खूब, बहुत खूब । तो फिर आज की छुट्टी रहे। लता है? 'जहां तक दोनों पर ले जाएं।' 'बाह, मुनने में तो बहुत अच्छा लग रहा है, मगर बात यह है कि रेलवे ने ऐसी स्वाधीनता तो दी है नहीं 'कि जहां चाहे चला जाए । वह तो नील गिनकर किराया लेती है और गंतव्य-स्थल को भी जानना चाहती 'नां तुम्हीं तय करो हमें कहां जाना है ?' 'हमी लोग माने?' सुरभि ने भौंहें ऊंची की, 'हम लोगों को इस तरह एक कोष्ठक में बांधने का मतलब ?' 'मतलब क्या? तुम लोग इन सब मामलों में मुझसे ज्यादा समझदार हो, इसीलिए।' 'अच्छी बात है। मैं कोई एक जगह तय कर रही हूं। बस एक टाइम- टेबुल चाहिए।' टाइमटेबुल आया। कई दिनों तक अतीश और सुरभि में वहस चल रही, सुरभि जो जगह ठीक करती अतीश उसे रिजेक्ट कर देता अं अनीश जिन जगह की सिफारिश करता उसे सुरभि अनफिट कर देते हार कर दोनों व्यक्ति संदीप से पूछने आए। संदीप ने कहा-'मुझे कुछ नहीं कहना है । केवल एक बात कहनी है कि कलकत्ता छोड़क सो मील दूर कहीं जाया जाए।' 'मन्दार हिल कैसा रहेगा?' सुरभि ने कहा । 'वहां भले आदमियों के रहने लायक कोई होटल मिल सके बात का पता है ? 'तुम्हें ।' अतीश ने शंका की। सुरभि को गुस्सा आ गया। 3 -'अच्छा होटल चाहिए तो वम्बई जाओ, कश्मीर जाओ।' 'राजगिर ही क्या बुरा है ?' संदीप ने सुझाव दिया। 'बुरा क्या है किन्तु वहीं कौन हमारे लिए किसी सुरंग 104 :त्रिपदी
दरवाजा खोल बैठा है?"
'मुना है वहा एक गेस्ट हाउस भी है।'
'सुना तो सभी ने है मर जाते ही मिल जाएगा यह कौन जानता
'ऐमी गारटी इस युग में किसी चीज को नहीं है । किसी मामले में
नहीं। सभी जगह वही बात है । दवात है तो स्याही नहीं और स्याही है
तो ददात नहीं।'
'और यदि कौशल हो तो उस दवात में भी गगा को उतारा जा
सकता है।
'हा, एकदम ठीक। मगर उसके लिए भगीरथ का प्रयत्न करना
पड़ेगा।'
इसी बीच अचानक सदीप के मुह से निकल गया-'राय-परिवार
का भी एक मकान राची में है ।' मगर इतना कहकर ही वह चुप हो गया।
क्या जरूरत थी यह बात कहने की? सदीप क्या प्रदीपराय के पास उस
मकान की चागे मागने जा सकेगा? एक माली है अवश्य वहा
और उसके पाम एक चीबी भी होगी। किन्तु सदीप क्या उमसे कह
सकेंगा-'कमरे खोत दे, मैं अपने इन मित्रो के साथ कुछ दिन रहूगा
पहा । क्या प्रदीप को विना सूचित किए ! छिः। क्यों कह दी मैंने वह
वात? वह पछताने लगा।
'वाह क्या बात है ! क्या वही है तुमने भी सो टके की बात ।'
'धत् ।'
'धन् माने?
'मैंने तो केवल यह कहा था कि वहां राय-परिवार की एक एक कोटी
'इसका मतलब है तुम्हारा उसमे कोई हक नहीं है, यही न?'
'हक ! हक वाली बात बहुत साफ नहीं है । हक दो प्रकार का होता
है। एक तो।'
'रहने दो। इतनी मफाई देने की कोई जरूरत नहीं है । यह समाचार
.
देते तो भी क्या हर्ज था ?' समय तो बात कुछ ऐसी ही है।' संदीप बोला। तीश, मुझे लगता है संदीप राय-परिवार का पाला हुआ लड़का ने दिन दया करके उन लोगों ने उसे घर में रहने दिया। अब इसका चलन विगड़ते देखकर उन लोगों ने इसे मारकर घर से भगा है। संदीप हंस पड़ता है। हंना अवश्य था वह, मगर उसकी हंसी असली नहीं थी । एक पल द ही लुप्त हो गई। बीच-बीच में वह घर जाएगा ऐसी बात उसने कही हो । वह वादा क्या वह निभा पाया है ? नहीं। वह चाह करके भी नहीं कर मका था । बार-बार घर के पास जाकर लोट आया था। उसे राय कोठी का गेट हिमालय की तरह अलंध्य लगता था । अन्त में देवघर जाना ही तय हुआ। ज्यादा दूर जाने से फायदा क्या ? वहां पर सुना जाता है वहुत-से आश्रम हैं । उन्हीं में से किसी एक में जाकर कहा जाएगा-'प्रभु, हम तीनों प्राणी शरणागत हैं। हमारा परि- वाण कीजिए।' थोड़ी देर बाद सुरभि चली जाती है। अतीश भी थोड़ा इधर-उधर की बात करके खिसक जाता है। संदीप को लगता है वे दोनों समगोत्र हैं। इमलिए वे दोनों एक-दूसरे के इतने निकट आ गए हैं । संदीपं अकेला रह गया है। कहीं कुछ वेसुरा हो गया है । वाहर जाने पर तो यह छंदभंग और भी असहनीय हो उठेगा। किन्तु संदीप ही तो इस सुर का रचयिता है फिर भी उनका जाना न हो सका। अचानक संदीप के शरीर सारे तार झनझना उठे। संदीप अखवार पढ़ रहा था। पढ़ क्या था अखबार की सुखियों पर नजर फेर रहा था। अतीश अखबार प समाप्त करके एक वार सुरभि के पास घूम आने का बहाना ढूंढ या। अचानक उसने देखा संदीप के हाथ से अखबार गिर पड़ा और विपदी
गले में एक अस्फुट आत्तंनाद-सा निकल पड़ा।
'क्या हुआ?' अतीश ने पास आकर पूछा ।
मदीप
कुछ बोला नही । उठकर खूटी पर से अपने कपड़े उतारने
लगा।
'आखिर बात क्या है ? बाहर जा रहे हो क्या?' अतीश ने फिर
पूछा।
सदीप बिना बोले दालान से उतर गया।
'अरे सदीप ! पागल हो गया है क्या ?' अतीश ने पीछे से चिल्लाकर
पूछा । मदीप फिर भी चुप रहा । चला गया विना कुछ उत्तर दिए ।
सुरभि खाना पका रही थी। उसके कानों में अतीश की अन्तिम
चोवार गई । 'क्या हुआ?' उसने भी रसोई घर से निकलकर पूछा।
'पता नहीं । बाबू साहव अखबार पढ रहे थे । अचानक अखबार हाथ
से गिर पड़ा और श्रीमान् कपडे पहनकर निकल गए।'
मुरभि ने तुर्रा कसा-'उसको आजकल जाने क्या हो गया है ? आधी
बातों का उत्तर ही नहीं देता।'
'मुह से चाहे जो कहे, पर वह एक बड़े आदमी के घर का लडका है,
यह बात वह किसी तरह भूल नही पाता, शायद ।'
'मुझे भी ऐसा ही लगता है।'
'हम लोग अपने मन से तो उसके साथ रहने आए नहीं थे।' अतीश
ने क्षुब्ध स्वर में कहा।
मुरभि कुछ कहने जा रही थी। अचानक रुककर एक पल अंने कुछ
सोचने लगी। फिर बोली-'तुमने चिल्लाकर उससे पूछा, फिर भी वह
नहीं बोला ? क्या इसका कोई खास कारण नहीं हो सकता"
'कारण और क्या होगा ? वह हमें तुच्छ समझता है।'
'अच्छा, एक बात बताओ। कही अखबार में तो जमने कोई कुरी
खबर नहीं पढी ?
'बुरी खबर?'
'मतलब ऐसी खवर, जिसे पढकर वह एकाएक पर
हो।
'अखवार में ऐसी खवर क्या हो सकती है ? बैंक फेल ?' 'बैंक फेल होने पर घबराने वाला लड़का तो वह है नहीं।' सुरभि ने झपटकर अखवार उठाया। एकाएक वह चिल्ला पड़ी। 'अरे संदीप के भाई साहब...।' 'मंदीप के भाई साहब ? तस्वीर निकली है क्या हुंह, बड़े लोगों की तस्वीर तो अखबारों में छपती ही रहती हैं।' 'अरे ! नहीं-नहीं, यह तो बुरी खवर है ! मोटर ऐक्सीडेंट ।' 'मोटर-ऐक्सीडेंट ? संदीप के भाई साहब का ? कहां निकला है ? देवू नो।' सुरभि अखबार लेकर अतीश के पास आ गई । दोनों पास-पास प्रायः मटकर अखबार पढ़ने लगे। 'सुप्रसिद्ध राय एंड कम्पनी के मालिक श्री प्रदीपराय जी ० टी० रोड पर मोटर-दुर्घटनाग्रस्त। कल सवेरे दस बजे श्री राय...।' यद्यपि सुरभि और अतीश की इतना सटकर बैठने की जरूरत नहीं थी, फिर भी जैसे अनजाने वे दोनों सटे हुए खड़े रहे । 'जी० टी० रोड जैसे महाभारत का बकासुर है। रोज उसे नरमांस का नैवेद्य वाहिए।" 'वकामुर को तो दिन-भर में शायद एक ही आदमी का मांस चाहिए था।' अतीश निनिमेप भाव से सुरभि के चेहरे की ओर देखे जा रहा था। यह तो एक दिन में दस-बीस आदमियों का नाश्ता कर जाता 'यह बात है। इसका मतलब है संदीप वहीं गया है।' 'अब समझ में आ रहा है। मगर इस तरह पगलाने की क्या जरूरत थी? कम-से-कम कहकर तो जाता।' 'तुमने पागल देखे हैं ।' सुरभि उसकी आंखों में आंखें डालकर देखती है। एक मिनट पहले उन्होंने अपने परम प्रिय मित्र के किसी आत्मीय के दुर्घटनाग्रस्त होने का समाचार पाया है, यह तो उनके चेहरें देखने से 108:त्रिपदी नहीं लग रहा है। कम से कम सुरभि के मुख पर तो किसी दुर्घटना का चिह्न नहीं है । उसको पुतलियों में एक विचित्र प्रकाश अलमल कर रहा सुरभि की आंखों से आखें मिलते ही अतीश के चेहरे पर भी वही भाव उभर आता है । लगता है वह मधुर आलोक समामक है । वह भी आखों में अद्भुत रस भरकर कहता है-'देखा है ? अरे, रोज ही तो देखता हूं।' 'रोज देखते हो" 'हू ! एक व्यक्ति को रोज देखता हू । वह रोज पाधी रात को जाग उठता है, छत पर अकेला टहलता है, गहरी सासें भरता है, पानी पीना है और कभी-कभी सिर पर भी पानी डालता है । 'बस करो, बहुत बातें बनानी आती है तुम्हें । सुरभि का चेहरा माधुर्य और आह्लाद की लहरों में भीग उठता है। फिर वह बोलती है--'रात-भर तो नाक बजती है तुम्हारी। कब देखते हैं उस व्यक्ति की जनाब' 'देखने की जरूरत भी क्या है ? अन्जाम से ही सभी वातो का पता चल जाता है।' काफी समय इसी तरह की अर्थपूर्ण निरर्थक बातों में कट जाता है । अचानक अतीश को याद आता है कि उसका एक मित्र पागलो की तरह कुछ देर पहले वहां से चला गया है। 'मैं भी एक बार हो आऊं? क्या कहती हो?' 'जाना तो चाहिए अवश्य, मगर सदीप को अच्छा लगेगा या नही, पही बात सोच रही हूं।' "पसन्द नहीं करेगा, क्या कह रही हो?' 'मैंने यह कब कहा कि नहीं पसंद करेगा। फिर भी तुम तो जानते ही हो उसके घर के झमेले। 'अच्छा, आज रुक जाता हूं। जरा देख लिया जाए।' कहकर अतीश आश्वस्त होकर बैठ जाता है। उसका चेहरा देखकर लगता है जान 4 बत्री लाखों पाए। कितना मजा आए अगर आज की छुट्टी लेकर दोनों कहीं घूमने चलें या फिर घर पर ही बैठकर मीठी-मीठी बातें करें। ऐसा मौका फिर शायद मिले न मिले। यह मौका किस मूल्य पर मिला है, यह वात अनीज के दिमाग में नहीं आई उस समय । सुरभि फिर रसोईघर में लौट गई थी। अतीश उसके पास यही प्रस्ताव लेकर चला। किसी का सर्वनाश -किसी का वसन्तमास । , जिसका सर्वनाश हुना था, वह वैचारा सूखा मुंह लिए रायकोठी के गेट के मामने आ खड़ा हुआ। पता नहीं घर पर हैं भाई साहब या अस्प- नाल में, वह सोचने लगा। जो भी हो, घर तो जाना ही पड़ेगा। नहीं नो यह भी पता लगाना कठिन होगा कि वे किस अस्पताल में हैं, कितने नन्बर के बेड पर हैं। नहीं, उस दिन लोहे का वह गेट हिमालय नहीं बन सका । विना दायें-- वायें नाके नदीप लोहे का फाटक ठेलकर सीढ़ियां फांदता ऊपर जा आश्चर्य ! ! ! अद्भुत लग रहा था संदीप को। वह सीढ़ी, वह वरामदा, सीढ़ियों से नहने ही सामने माता-पिता का विशाल तलचित्र, कोने में छोटी-सी निपाई पर पीतल की बड़ी-सी फूलदानी, प्रत्येक कमरे के दरवाजे के ऊपर प्रतापवाय द्वारा मारकर लाए गए भैसे के सींग, हिरण का चमड़ा इत्यादि । मोह ! इसको देखे विना कैसे वह रह सका इतने दिन ? प्रदीपराय के कमरे का पर्दा स्थिर लटका हुआ था। जरा भी हिलडुल नहीं रहा था कि पार्क से अन्दर की चीजें देखी जा सके। भाई साहब क्या कमरे में है ? नहीं होत तो हवा इतनी भारी क्यों लग रही है ? दीवारें और परदे इतने स्तब्ध क्यों हैं ? जरूर वे अन्दर है। तभी तो कमरा इतना भरा-भरा लग रहा है। हो सकता है भाई साहब न हों अकेली भाभी हो कमरे में और अचानक उसे देखकर वह बोल उठे-'क्यों, इतने दिनों के बाद घर की यादः - 110:निपदी । आ रही है । मगर मेरे पास तो वैठकर तुम्हें गप लड़ाने-भर को समय नहीं है। जाओ, भागो यहा से ।' ऐसी कल्पना करते ही सदीप का शरीर काप उठा । कापते गले से ही उसने पुकारा-'भाई साहब !' नही । भाभी का गला तो नहीं है यह । एक गभीर स्नेहिल कंठ उत्तर देता है अदर से । 'कोन सदेश? आ जा अदर।' संदेश !! मदीप के वचपन का बुलाने का नाम । वह नाम अभी भी भाई साहब को याद है। आज भी उसे उसी नाम से वैने ही स्वर में बुला रहे है । उस माया-ममताविहीन, हृदयहीन मूर्ख भाई को। जल्दी से सरीप पर्दा उठाकर कमरे में घुस पड़ा । रोग-शय्या पर पड़े उस महामहिम व्यक्ति को धधलाई आखो से देखने लगा। उसके रुधे गले से स्वर फूटा-'भैया !' नहीं उसके मुंह से कोई आवाज नही निकली। केवल उसके होंठ काप उठे । वैसे ही जैसे बचपन में कोई शरारत करने पर उसे इसी तरह भाई साहब दुलाते थे। प्रदीप के सिर पर पट्टी बधी हुई है और हाथ पर प्लास्टर चढा हुआ है । अपने दूसरे हाथ को सदीप के हाथ पर रखकर प्रदीप ने कहा-'मैं जानता था तू आएगा। मंदीप के मुह से अभी भी कोई बात नही निकलती। किस मुंह से वात करे वह ? जाते समय क्या वह इतना भो कह गया था-'भैया, पता दे जा रहा हूँ। कोई जरूरत हो तो।' नही, ऐसा कुछ भी नहीं कह गया था। एक बार फिर उसने गला साफ करके बोलने की चेष्टा की- 'भैया !' तभी माधुरी का निस्मंग स्वर सुन पड़ा-'पता मालूम होता तो खबर भेजवा देती मगर"' 'माधुरी, मुझे योड़ा-सा हालिक्स अब दे सकती हो। प्रदीप ने कहा। माधुरी की आंखों में आग कौंध जाती है, मगर वह वरफ जैसी ठडी आवाज में कहती है-'अभी दस मिनट पहले तो हालिंक्स लिया है।' विपदी:111 'ओह ! हां, याद ही नहीं रहा । फिर एकाएक मुझे भूख-सी क्यों लग रही है ? 'वह मैं समझ रही हूं।' कहकर माधुरी तेजी से कमरे से बाहर निकल जाती है । जाती हुई माधुरी को देखकर प्रदीप मृदुकंठ में कहता है-'देख संदेश, तूने अपनी भाभी को बड़ा नाराज कर लिया है। अब उसे मना ले। थोड़ी और देर हो जाती तेरे आने में तो तू उसके सामने सदा के लिए अपराधी हो जाता । फिर तो हम दोनों की इज्जत नहीं बचती।' जो हो अभी तो भाभी को वहां से हटाकर भाई ने उसकी इज्जत बचा दी। संदीप की आंखों में आंसू रोके नहीं रुक रहे हैं। ऐसे आश्चर्यजनक दृश्य की कल्पना कौन कर सकता है ? कम से कम प्रदीप को तो वह दृश्य अद्भुत ही लग रहा था । एक पल सब कुछ भुलाकर प्रदीप वह दृश्य देखता रहा । फिर सहसा परेशान-सा बोल पड़ा-'बड़ी मुश्किल है, तू ऐसा चुप क्यों बैठा है ? कुछ भी तो नहीं हुआ है। मामूली-सी चोट है । तुझे कैसे पता चला? अखवार से ? अखवार वाले तो तिल को ताड़ बनाने में उस्ताद होते हैं । जरा-सा कुछ हुआ नहीं कि उनके लिए बड़ी दुर्घटना हो जाती है। थोड़ी-सी चोट हाथ में लगी है।' 'और फिर मैं?' 'सिर में कोई खास चोट नहीं लगी है। दो टांके लगे हैं शायद।' 'कब हुआ है ऐक्सीडेंट ?' 'यही आज तीसरा दिन है।' 'उस तरफ कहां जा रहे थे ?' 'मत पूछो। वारासाल के कारखाने में मजदूरों ने बिना नोटिस हड़- ताल कर दी थी? 'क्या मांग थी उनकी?' 'शनिवार की छुट्टी चाहिए उन्हें । वह भी फुल-पे । हमने कहा- छुट्टी चाहिएं, लो। मगर विना काम किए मजदूरी कैसे पाओगे ? बस, -- हड़ताल।' 'समझाया. गया होता तो:::::: 112:त्रिपदी 'वही करने तो जा रहा था कि रास्ते में यह मेला हो गया। किरमा थो तो बाल-बाल बच गए । जव ठीक सामने दैत्य की तरह सारी आती दीख पड़ी तो मन ही मन सोच लिया था कि इहलोला यही समाप्त है। मचा यह कि उसी एक सेकेंड में सारी बातें दिमाग में नान गई। ममा कभी दिमाग इतना तेज काम करता है ? तू घर में या नहीं। तेरा पसा भी नहीं मालूम था ! तेरी भाभी और उज्ज्वल को किसे सौंपता? फिर अपने-आप पर हंसी आई-कौन लेगा? किसे देगा? मैं तो इसी पस सडक पर चटनी हो जाऊगा 'भया.."आ" 'ले. नू तो औरतों की तरह टेसुए बहाने लगा। दुर।" "भैया, इतने पर भी तुम मुझे कैसे माफ कर सके।" 'क्या बात कही ? तेरा अपराध ही क्या था, जो मैं माफ भारता 'नही भैया, सब मेरी ही गलती है।' 'नहीं रे, प्रदीप ने हसकर कहा-'इसे अपराध कहा जाय तो फिर बचपना और पागलपन जैसे शब्द कोश में किसलिए रपे गए है?' 'संदीप' माधुरी कमरे में प्रवेश करती है। प्रदीप की और एक यार देखती है, फिर बोल पड़ती है-'देख सदीप, झूठ नहीं बोलूगी, यगरा के कमरे से सारी बातें सुन चुकी है। तुम्हारे भपा को महापुरष पाहणार मजाक उडाती रही हूं। देखती हूं वह मजाक नहीं है। राम ही है। अगर मैं उनकी औरत न होकर भाई होती...।' प्रदीप धीमे से हंसता है । संदीप एक बार भाभी को ओर देग्रफर मुंह नीचा कर लेता है । 'न, तुम्हें लज्जित होने की जरूरत नहीं।' माधुरी भी मुस्कराती है--'खाओगे न आज ? तुम्हारे लिए गाना यन रहा है।' 'खाऊंगा नहीं ? वाह । खाऊगा और रहूंगा भी । अब यहां गे दिसूगा भी नहीं । सोचता हूं, योजना तो अच्छी ही थी, पर कार्यान्वित करणेही कैसे सब गोलमात हो जा रहा है।' । दो दिन बाद अतीश आया ! नौकर ने मंदीप को युगा दिया । अनी तण नचारामार वार 'राय परिवार का।' 'जानता हूं। ऐसे घर का लड़का होकर तू उस"।' फिर सहसा चुप होकर पूछता है, 'वे हैं ? 'हां-हां, एकदम भिटफाट । जानता तो है अखवार वाले कैसा फालतू हंगामा रच देते हैं । अच्छा, छोड़ अपने लोगों का हालचाल बता।' 'हम लोगों का?' कहकर वह एक पल संदीप की ओर देखता है । फिर नजर नीचे करके सिर खुजलाते हुए कहता है, "भई वहां तो जो होना था - हो चुका 'अरे हुआ क्या ?' ऐसे नई-नवेली की तरह शरमा क्यों रहा है ?' 'और क्या होगा? तूने तो एकदम डुबकी मार ली। हम दोनों वहां अकेले "मतलब समझ सकते हो क्या होगा-वस, हो गया गोलमाल ।' 'अब क्या बताऊं भाई । समझते तो हो।' 'क्या कह रहा है ?' 'क्या कहने को रह ही गया है । और उसी समय से उसने न खाया न पीया । गो-रोकर हलकान हुई जा रही है। अब तू ही बता रजिस्ट्री कैसे होगी? 'रजिस्ट्री ? मलकदी।' और हो-हो करके संदीप हंसने लगता है। हंसी थोड़ी थमती है तो दोस्त की पीठ पर एक धौल जमाकर कहता है-- 'वंडरफुल केवल अड़तालीस घंटे में इतनी तरक्की ?' अतीश फिर सिर खुजलाते लगता है । 'और क्या किया जाए ? मगर हां, एक बात समझ में आ गई कि प्रकृति के विरुद्ध विद्रोह करने का कोई लाभ नहीं। उससे प्रकृति की प्रतिशोध-भावना और प्रवल हो उठती है । मगर इसका क्या किया जाए। वह तो खटवास-पटवास लेकर पड़ी है । 'ओहहोह ! कचहरी का मामला है। तुम लोगों के चाहने से आनन- फानन में तो वह काम हो नहीं सकता । नोटिस देना होगा। एक महीने 114:त्रिपदी
का समय लगेगा। इतने दिन पाना-पीना चंद रपने से भादमी राजपाट
पहुंच जाएगा । फिर व्याह किसके साप होगा? अच्छा पल, मैं समझा-
युझाकर।'
'अरे, नहीं, ऐसा करना भी मत । सबसे यही संज्जा तो उसे यही है
कि कैसे यह तुझे मुह दियाएगी? मगर व्याह में गवाही सुशे ही करनी
पड़ेगी।
'तो फिर हमारी भी एक शर्त है।' गभीर स्वर में सदीप कहता
'क्या ?" अतीश कान खड़ा कर लेता है। कही अभागा सुरभि में अपना
हिस्सा न मांग बैठे, जसा पहले तय हुआ था। उसके आशकाग्रस्त मुरा की
तरफ देखकर सदीप हंसता है - 'मत घबड़ाओ वालक, केवल एक शनं
कि तुम्हारे घ्याह का भोज हमारे घर पर होगा और कुछ नही, बस ।'
'तेरे घर से ? मतलब रायकोठी से ! क्या बक रहा है ?'
"इसमे ताज्जव करने की क्या बात है ? क्या किसी का ब्याह उमरे
मित्र के घर से नहीं हो सकता? मैं समझता हू, तेरे मा-बाप तो इस व्याह
में...।'
'सवाल ही नहीं उठता।'
'तव ? पल अपने भाई साहब से तेरा परिचय करा दू।'
'आह अव उन्हें क्यो सानता है इसमें ?
'अबे चल !' सदीप अतीश को जबर्दस्ती पोछ ले जाता है।
शादी कर रहा
'भैया, यह है हमारा दोस्त अतीश । इसी के माय में हर दिन
अब देखो यह मुझे मकान छोड़ने का नोटिम देने जाल है। ट है
। इसीलिए।
'अच्छा', प्रदीप हंसकर कहाँ है । रिट द इन
हुई-पुनर्मूपिको भव।'
'और रास्ता है?
और सम्मिलित हंसी का सार |
अतीश विदा होते समय पूछता है-'तो फिर तू गुस्सा नहीं हुआ
न?'
न कम न ज्यादा ।'
'मंगर वह तो तेरे ही डर से...।'
'और मैं इधर उसके डर से...।'
'तुझे किस चीज का डर है ?'
'वही योजना की असफलता । और क्या ?'
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