Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Nekiram Ki Charpaeiyan

Jagdish Chandra Sharma · 2011/03

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(22)
ਐਫ ਦੇ
ਦਿੱqਹੁੰਦਾ
जगदीशचन्द्र पाडेय

गान भारती
4/14 रूपनार
दिम्ली 110007
द्वारा प्रशस्ति
मकरण
1992
.
.
मृण्द 3500
परमपिटम
नरहर 1ि2
मुन
153%8135741104

पूज्य पिताजी
की
स्मृति में

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क्रम
1
17
दूरी
दायित्व
डेलीवजर
शिकायत
पागल
मैं, मेरी दराज और च्ह
25
33
41
47
56
हसा की ईजा
63
73
पौधे
एक और कालिदास
भूवाल
सम्मलन
नेवीराम की चारपाइया
84
93
99

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००० दूरी अफ्रीका एवेयू के जिस हिस्से पर हरित रहता है उस जगह से निखिल बैमाटर की दूरी आज भी उतनी ही है जितनी कि कल या तव, जब तीन माल पहले निखिल को भी यही क्वाटर एताट हुआ था । वैसे भी जाने क्या अजीब बात थी कि जव से हरित ने होश सभाला, तभी से वह एक बात देखता था कि उसकी और निखिल की रिहाइश के बीच की दूरी कमोवेश एक-सी ही रही है। अलबत्ता उस मवा डेढ साल की बात और थी जब हरित नैनीताल में पढता था निखित दिल्ली में नौकरी करने लगा था। शायद एसा इसलिए कि धरती के दो स्याना के बीच की दूरी विना हिमालयी परिवतन ये घटती बढती नहीं है। हिमालयी परिवतन म ही ममुद्र की जगह हिमालय का उभरना सभव है, वम नही । हरित इसी दूरी को देन अब तक कितना खुश रहता था । वह अक्सर सोचा करता था, यदि वह इधर रहता है तो निखिल इसी एवेन्यू के उस हिस्से पर, जहा दिल्ली की रिंग रोड इसे दूसर हिस्सा मे बाटती है । पर आज निकी की एक छोटी-सी बात ने हरित के मन मस्तिष्क को झकझोर डाला । निकी ने तो उसे यह तक अहसास करा दिया कि वह अब तक जिम भ्रम को पाले हुए था, वह बिल्कुल गलत था। निखिल और उसम भोलो और कोसो की दूरी है। तभी तो निकी की बात सुनत-सुनत वह झटके के साथ बालकनी पर आकर खड़ा हो आया। देखने लगा उसी ओर जिधर देख वह परेशानी के क्षणो मे भी राहत की सास लिया करता था। सामने वाली सडक की पल्ली और टाइप वन क्वाटरा के बीच चप- रामियो रे बच्चे म ममय भी खेल रह थे। अलबत्ता उनके बगलवाला । वह हिस्मा आज मूना पड़ा हुआ था जहा जमान पहले मात जाठ सौ युग्गिया थी। परशानी के क्षणा म वहाँअक्मर यही पर खड़ा हो मामन देखा जा करता था। हालागि निकी ने पिता के दिल को दुखाने भर की दष्टि से वह बात नहीं कही थी। पौन तीन साल का वह अभी इस काविल हुआ ही कहा था। जभी तो उमका ससार ऐमा ससार या जिमम ज जा इ इ या ए बी मी डी की स्टा को जोडकर आदमी के रहने लाया घर बनाया जा सकता था। उसकी मा ने उसे यही तो बताया था कि आज जिन घरी म तर गुडा-गुडिया रहा करत ह आनेवाले कल म वसे ही धरो म तुम रहा करागे। जगाय का अक्षरा की पहचान जो क्रानी थी। अलबत्ता खिडकी मे दिखती रेना का देखत देखते वह यह जान चुका था-खिलौने की रख भी पटरी पर चला करती है। यही तो वात थी कि हरित ने जब उसे रल पकडायो तब उमन वह डिवा भी मागा जिमम से उसे रल दी गयी थी। यदि वह इतना ही करता तो हरित यही सोचता, बच्चे एसा विया ही करत है। उमन ता क्यिा यह कि पहल तो डिव का मुह धरती की आर किया तानि उमम वचा सामान नीच गिर जाय पर जब नीचे नहीं गिरा तो डिब्ध के भीतर हाय डालत हुए वह बोला, 'पापा रल पथरी पर थलती ह ना ! इथवी पथरी भला हरित इसका क्या जवाब दता। वह ममझ भी गया था कि निका न मग क्या और किम कारण किया है। धरती म रेन पटरी पर ही ता चला करती है । वह तो पिता था जा निको को जिद पर सामन ल जाकर उम पटरी पर चलती रेल को दिखा तक चुका था। यह दूसरी बात थी जन पटरी पर चलती रेल को दिखा वह सहम उठा था कि मौका पाकर वही यह रेल देखन उधर अकेले न आ जाय । तभी ता तब निकी का उमन सामन चौराहे पर बठे रहनवाने बावा वार 4 अजीवा-गरीब बातें बताया थी कि वह एमा वावा है जो वच्चा का परडवर भगा ले जाता है, जवकि तथ्य इमय ठीक विपरीत या । वह तो एमा वादा था जिस इलाक के लोग एव वहद म आदमी के रूप म जानन थे। पहले उमन झुग्गिया वबीच एक मदिर बना रखा था। जवमे मामन की झुग्गिया हटायो गयी । - 2 / नीराम की चारपाइया । तब से अपनी मूर्तिया लिय वह इमो चौगहे पर पड़ा हुआ था। शुरू शुरू में लागा न उमे बहुनरा समझाया-तुम भी, जहाँ युग्गीवालों को बसाया गया है, वहीं बम लो । वह किमी को मानता ही नहीं था। पता नही ड्य जगह पर रहकर वह अपनी जीवनसंगिनी या आषिश यादा को याद । करता था या उस अफ्रीका एवं यू के नाम से ही कोई विशेष प्रेम था यो इम एवं यू वे अफ्रीका एवे यू नाम का साथ करन के लिए यही रहना वह जरूरी समझता था । वह यहा मे क्मिी कीमते पर हटता 'नेही ये सिमें इसी बैठे रहन से हरित का यह लाभ हुआ कि निकी अब खिडकी-सवलती रेल भी तव दता था जब चौराहे पर वावा न हो। पर आज निकी की पटरीवाली बात का सुन हरित अदर हो-जदर हिल चुरा था । इसलिए नहीं कि वह निको के लिए पटरोवाली रेल गरीद नही माता था वरन इसलिए दि निकी की पटरी न उम पिता की एक बात याद ताजा करा दी थी । एक बार उहान उससे कहा था बेटा जिसकी रल पटरी पर चला करती है उमका एमा ही हुआ करता है। कहा तो तब उसन निखिल को भी वजीफा मिलन की बात पिता को इसलिए सुनायी थी कि उम शाबाशी मिते । कहा उहाने उससे वह बात कह डाली जिममे खीजार उसे कहना पडा था-जरा फस्ट आकर तो दिखाय । इसी पर उसके पिता न उसमे कहा था 'हरी, तुम इस बात को नही समझ मक्त कि तीमरी पाजीशा आन पर दो के बदले तीन वजीफे क्या और क्मे दिय जात है । इसीलिए ता कहता हू खूब मेहनत लिया करो। वम फस्ट जाना अच्छी बात है पर जिंदगी की दौड म पस्ट आना ही बाफी नही हुआ करता है । उसके लिए दूसरी जरूरी बातें होती है। जिस दिन तुम उन बातो को ममयोगे, उमी दिन तुम्ह पता चलेगा निखिल और तुमम क्तिनी दूरी है। उसकी रल बेटा पहले ही पटरी पर . तब मे कर अब तक हरित इसी दूरी को पाटने म लगा हुआ था। उसकी तो निस्मत न उमका पूरा माथ नहीं दिया वरना तो उसने निखिल को एक ही झटके म चारा खान चित कर डाला था। इतने पर भी उसने जितना किया था, उतना भी अपन आप म कम नहीं था। दसवी तक दूरी 3 आते-आत यदि निखिल के लिए दो टयूशन लग चुब थे ता हरित के पास रो-पीटवर कोस की किताबें भरी थी। हा, बुद्धि हरित की अपनी था। सभावित खतरे की कल्पना भर से उसन अपना एसा साथी खोज निकाला जिसके लिए जिद्दवाजी म तीन ट्यूशन लगाय गय थे । हरित न उसी जिद्द- वाजी का फायदा उठाया। सहपाठी नरी की बदौलत उसे अब तीन नोटस मिल आय थे। बदले म वह भी उसे मदद क्यिा करता था। इतना ही उम्र म तथा ग्रामीण परिवेश के कारण वह इस बात को ताड गया था-उसक पिता और नरी के पिता म यदि नजदीकी है तो नरी के पिता का निखिल के परिवार भर से चिढ है। ऊपर से हरित वे स्वभाव की एक और खासियत यह थी कि यदि वह नरी के डीलडौल शरीर का लाभ उठा निखिल वो पग-पग पर दबाय रहता था, तो खेला म पगडा हो जाने पर वह निखिल और नरी म बीच- बचाव करके निरिल का भी प्रस न रखा करता था। इस बार महरित के लिए सबसे लाभप्रद बात यह भी थी कि गाव के बच्चा के खेलन का तप्पड उसी व घर के पास था। इसलिए भी उसका सवम रोष था। फिर पढन म वह बहुत होशियार था । यह उसकी इसी हाशियारी का नतीजा था कि मट्रिक का जब रिजल्ट आया तो वह अपने स्कूल म नहीं आमपास के कई स्कूला मे सबसे अधिक नवरा से पास हुआ था। हालाकि निखिल भी फस्ट डिवीजन म पाम हुआ । जहा तक नरी की बात थी वह तो हरी की वदी- लत एसे सेविंड डिवीजन म पास हुआ जिसकी नरी और उसक पिता तक को उम्मीद न थी। हरित के द्वारा नरी को बताय गय गैम का जो अमर था । हरित भाप जा चुका था-नरी को की गयी आज की मदद आग काम आयगी। उसके तो पिता की ब्रह्मवत्ति वाली जामदनी इतनी कम थी कि वी० ए० एम० ए० करना उसके लिए सपना था। ऊपर से उसक पिता पर उसकी विधवा चाची और उसके दो बच्चा की जिम्मेदारी भी थी । वह तो उसकी मा ने जिद्द की वरना तो उसके पिता उस मट्रिक के वाद भी पढाना छुडा नौकरी करान की सोचन लग थ। इसीलिए माता- पिता की बाते सुन उसकी आखें मातवर पर थी। मातवर को भी अपनी मजबूरी थी। पसा उमक पास था । पनाव - । 4 /नकीराम की चारपाइया बल पर उसकी ख्वाइश थी कि वह अपने नरी को एम० ए० कराये । नरी से हरित भी एम० ए० करने की बातें सुना करता था। उसकी बातें सुनकर वह ऊपर दिखने वाली दूर्णागिरि पहाडी को देखता-देखता रह जाता था। उसन मुना जो था वहा एक देवी है जो सबकी मनोकामना पूरी करती है। जबकि अब दिन-पर दिन घर की हालत बिगडती चली आयी। इसीलिए कोई और उपाय न देख हरित न मन ही मन नरी को अपना आधार मान 'लिया था। उसका यह आधार उस समय काम आया जब इटर म निखिल को फिर पछाडन पर भी हरित के बी० ए० मे दाखिला के लाले पड गये। हालाकि ऐसे क्षणा उसकी चाची ने अपने जेवरा की पोटली हरित के पिता के सामने रखकर सबको स्तब्ध कर दिया। पता नही यह उसका हरित के पति प्यार था या यह भी उमकी सूय थी कि आगे चलकर यही उसके अपने बच्चा के काम आयगी । उसके इसी व्यवहार का इतना असर पड़ा कि हरित के पिता उसे पढन अल्मोडा भेजन के उपाय खाजो लगे। वहा उसकी बुआ जो थी। इही उपयो के धीच उहोंन बात मातवर से भी की। वम उमसे जिक्र करना था कि वह तो फूला नहीं समाया। वह उनस तुरत बोला "दाज्यू नरी के लिए मैंन नैनीताल म कमरा ता लेना ही है । आपका हरी भी उसके साथ रह लगा। इतना मैं आपके बेटे के लिए करू गा। जरूरत पड़ने पर और देखूगा । कौन जान आपके ही की बदौ. लत मेरा नरी भी पढ ले ।" मातबर का यही सुझाव हरित के लिए वरदान साबित हो आया। एप कमरे के कारण नरी की कितावें भी उसे मिल आयी । कार से एक बात और कि हरित भी वहा पढने लगा जहा निखिल पढ रहा था । यह अलग वात थी कि हरित को इतने पर भी यह उम्मीद नहीं थी कि वह नरी के माथ अधिक रह सकेगा। उसकी कई आदतें उसे पसद नहीं थी। पर ननीताल पहुचत ही स्थितिया एसी बदली कि नरी बदल आया । दाखिला लेने के दिन दोना को ऐसा लगा, जैसे पूरे क्लास म वै ही दो गवार है। निखिल की वजह से उनका साक्षात्कार निखिल की दीदी के लडके मुवेश से हुआ। उसके पिता बिडला स्कूल मे उच्च अधिकारी थे। इस नाते वह किसी को कुछ समझता ही नही था। पढने म वह होशियार दूरी 15 ता था ही। अग्रेजी एमी परिदार पानता था सिनरी और हरित दाना उममा मुह तारत रह जात थ । यह वार' मनप जमान का एक ममप- दार बच्चा था। फिर इस प्रररण म इम बान या मी यम महत्त्व नहीं था किनरी या अपन पिता की दौलत वा नाज था। इसीलिए अब हरित और नरी की मुश से भी प्रतिम्पद्धा हा आया। हालाकि उनके दापित ये रिना मुक्श कमिन्दा म एम० एम-मी० कर रहा था प्रोविए। म था । पर उनकी प्रतिस्सी ग्रेजी पारण हा पायी। इमीलिए अब नरी जोर हरित घर पर टूटी फूटी अग्रेजी वालन लग तथा आग-पीये देखकर ननीताल की मडया पर। चारा को यतरा जा रहता या-यदि काइ जानकार उनकी नालायकी को अग्रेजी मुनगा तो हसगा। मनीतान ता भारत में उन शहरा म एक प्रमुख शहर था जहा व लाग अग्रेजा व ममय म जाज स ज्यादे जग्रेज बन आय थे। इसीलिए वचारा का काम चलना कठिन हा आया । इसीलिए मजबूरी म वे अब धीरे धीर अग्रेजी की विताये पढने लगे। इस बार म उन जग्रेजी व उम रोक्चरर का भी कम अएर नही था जो अग्रेजी पढात-पढात अमर अस्तिववाद की व्याख्या करने लगता था। उसकी पूरी याख्याए ता उनक पल्ल नहीं पडी उमकी बदौलत वे इतना अवश्य समझ गय कि वे अस्तिववादी युग मे जी रहे है । अस्तित्ववादी विचारधारा के अनुसार दूसरा को पीछ वक्ल- कर आग बढना पाप नहीं है । अपने अस्तित्व को बनाय रखने के लिए जितना हिम्मत नहीं हारना और मेहनत करना जरूरी है उतना ही अग्रेजी का जानना नतीजा यह कि वी० ए० तक पहुचत-पहुचत नरी और हरित न लाइसे अग्रेजी की ढेरा किताव पढ डाली। इस अध्ययन का उनको लाभ भी हुआ। अद वे भी अग्रेजा वालने म हिचकिचात नहीं थे। अधिक अध्ययन होने के कारण उनकी नजरा म अग्रेजा की जग्रेजी और अपन लागा की अग्रेजी म फ्क साफ दिखन लगा । वह इसलिए कि मुक्श अग्रेजी बोलत ममय एसे नाक भी मिकोडता था जस वह अपन गुलामा स वातें कर रहा हो । तभी तो हरित की यह धारणा बन आया थी कि जग्रेजी ता खतरनाक नहा अलवत्ता अग्रेजियत खतरनाक है । क्यापि अध्ययन वरत- 6/नकीराम की चारपाइया ... विका करत अब वे यह अच्छी तरह जान चुके थे दुनिया में वाई भी बुरी नहीं होती। भला-बुरा होता है आदमी जो अपनी म दूसरा की भाषायी धरोहा का जलती आन मे ऐसे यादती स्पनिश लोगा न दक्षिणी अमरिकी भाषायी धरोहमा था। इसीलिए इस तरह के अध्ययन का उह यहा तक लोम ता अलग, नरी तक बी० ए० म पस्ट डिवीजन मे एसा पास हुआ कि नरी के पिता मातवर ने हरित का एम० ए० कराने की पूरी जिम्मेदारी ल ली। यह जलग वात थी कि एम० ए० ज्वाइन करने के पाचवे ही महीने जब अचानक निखिल ने पढना छोडा और दिल्ली आकर नौकरी करन लगा तो वे दोना भी नौकरी की सोचन लगे। उधर अब निखिल क साथ-साथ मुरेश की भी नौररी ट्राबे म लग गयी थी। विश्वविद्यालय के उसन पिछले पचीस वो क रिकार्डो का भी ताडा था । इसमे भी बडी बात उस पक्ष मे यह थी कि बड़े बाप का बेटा तो था ही साथ म एक सीनियर आई०ए० एम० मा साता भी था। जब- कि हरित और नरी दोना अभी नैनीताल म ही थे। इसीलिए अव उनके लिए वही ननीताल सूना हो आया था जो कभी उहे लुभावना लगता था। अब तो उनके लिए केवल उस सडक का महत्त्व था जो दिली का आती थी। तभी तो अब वे दिल्ली को आनेवाली बस को तरसती निगाहा मे देखत थे। यह दूसरी बात थी कि दिल्ली को आनेवाली मडका न उनके लिए नयी समस्या पैदा कर दी। रही-सही कसर उहे मिली इस सूचना न पूरी कर दी किनिखिल की नौकरी टक्निकल असिस्टट की लगी है। उनक लिए अब यह प्रश्न था आखिर स जेवट तो उमके भी वही थे जो उन दाना के पास थे। तब उसने प्रेमी कौन-मी महारत हासिल की जो उनकी यह नौकरी लगी। वचारा को भी इन जमलियत का पता कहा था कि वे उम समान अवसरा वाल युग में जी रहे है जिसमे एक वी० ४० इटरव्यू -ता है एक इटरव्यू देता है और तीसरा चपरासी को भी नौकरी को तरसता है। बचार तो अभी उमी किताबी अध्ययन में ये जिनके अनुसार सदिया से दिल्ली पहुचन वे अब तक नये और नये ही रास्त बनत रहे हैं। दूरी 17 अब वे दाना भी एमा ही एक नया राम्ना याजने की मोचन ला। नरी या सुमाव था-सार सवा आयाग से असिस्टेंट ग्रेड की परीक्षा पाम पर दिल्ली जापा जाय । हरित का सुझाव या परीक्षा ता अमिन्टेंट ग्रेड की भी दी जाय, पर मुख्य जोर आई० ए० एम० परीक्षा पर दिया जाप । उमरी नजरा म सबसे अच्छी नौकरी यही थी वह चाहता था नाद. ए० एम० वनकर निखिल को यह जतला दें कि दुनिया म ममझदार वे नहीं हात हैं जो दूमरा पी पीठ के महार से चली बटूक ये वल पर खडे हा । समझदार वे होत हैं जो अपना रास्ता पुद बनायें। बचार वो अभी तक इम बात का भी वहा पता था कि सिरतोड मेहनत करा परीक्षा तो पाम की जा सकती है पर आई० ए० एम० परिवार म नहीं होन के कारण इटरव्यू के उन निर्णायका की आखा में धूल नही झाकी जा सकती जिनकी दृष्टि में आज का सारा ब्रह्माड उनक और उन रिश्तदारा पर ही टिका हुना है। यही तो बात थी कि हरित और नरी दोना ही आई० ए० एस० की रिटन परीक्षा म पाम हात हुए भी आई० ए० एस० नहीं वन सवे हा, दाना अवश्य ही असिस्टेट ग्रेड म पास हो आय थे। यह वात जलग थी कि नरी ने असिस्टेंटी ज्वाइन नही की। उसके पिता का सपना एम० ए० था। पिता और छोटे बेटे के अरमाना की दूरी की जो बात थी हरित क लिए असिस्टेंट की नौकरी भी कम नहीं थी। एक तो पारिवारिक स्थिति का सवाल दूसरा अब वह इतना तो समझ ही गया था कि ऐसे परिवेश म नौकरी मिनना मामूली नही पिसम नौकरी के लिए तो सकडा बी० ए० एम० ए० मैं, मैं कर रहे हा पर नौकरी नहीं हो ही। फिर इस बारे मे एक खास बात यह भी रही कि कई जानकारा ने हरित का यह बताया कि असिस्टेंट की नौकरी के सामन टेक्निकल असिस्टेंट की नौकरी कुछ नहीं है। इसीलिए वह मारे खुशी के दिल्ली चला आया। यहा आकर उसकी खुशी क्षण प्रतिक्षण वढती ही चली गयी थी। निखिल को मिलता वेतनमान उसके वेतनमान से कम था। काम भी उन दिना का समान था। और तो और कुलीग की बदौलत किराये पर हरित को जो कमरा मिला उससे निखिल के कमरे की दूरी उनके गाव के घरा मे कम थी। हरित यदि शुरु. 8/ नेकीराम की चारपाइया शुर मे सरोजिनी नगर मे होशियार सिंह रोड म रहता था तो निखिल नेताजी नगर रहता था। निखिल के क्वाटर के लिए चपरासिया के छोटे क्वाटरो से जाना पड़ता था। ऊपर से निखिल के घर के पास अनगिनत इतनी झुग्गिया थी कि निखिल को वहा रहना ऐसा लगता था जैसे वह अफ्रीका के क्मिी देश में रह रहा है । उमने हरित से ये बातें कई बार कही थी, फिर रही-सही कसर इसलिए पूरी हो आयो कि दिल्ली में पाव रखने के महीने भर के अदर हरित को यह पता लगा, जिस तरह से परीक्षा देकर वह असिस्टेंट बना, उसी तरह वह परीक्षा देकर आफ्सिर भी वन सक्ता है। इसीलिए वह दिल्ली आने के ही साथ पूरी तरह से आफिमर प्रेड की परीक्षा की तैयारी में जुट गया। उसके लिए अब निखिल को दी पछाड को बनाये रखने का प्रश्न जो खडा हो आया। धीरे-धीरे वह यह भी जान गया था कि अमिस्टेटी से ज्यादा प्रमोशन टेक्निकल लाइन म हुआ करती है। नतीजा यह कि अब उमका ससार दफ्तर व जपने कमरे म सिमट आया था। होटल तो वह खाने की ही मजबूरी में जाता था। हर क्षण हर पल पढता रहता था। शायद उस भाग्य में पढना ही था। इस बारे मे भाग्य न भी उसका साथ दिया । पहल तो उमे कमरा ऐसा मिला जिसके मालिक ने उमसे दूसरा कमरा ढूढने को नहीं कहा । दूसरे एक वार एक अफसर को बदौलत वह मिनिस्टर के माथ क्या लगा कि उसने मकान की ममस्या हमेशा हमेशा के लिए निपट गयो । बल्कि उमसे तो यहा तक पूछा गया - वह क्वाटर कहा चाहता है । तभी तो उसे अपना क्वाटर यहा मिला जहा से उमकी दिल्ली की जिंदगी शुरू हुई थी। अलबत्ता जब उसे क्वाटर मिला तब मे आसपास के माहौल म अतर यह हो आया था कि झुग्गिया अब हट गयी थी। झुग्गियो के बदले अव उम जगह पर सरोजिनी नगर और चाणक्य पुरीको जोड़ने वाला अडर ग्राउड पुल वन आया था। चाणक्यपुरी वडे अफ्सरा की जो नगरी थी। उस ओर देखकर वह भी अफ्मर बनन व मपने लिया करता था। चाणक्यपुरी को उसका यही देखना उनके लिए वरदान मावित हुआ। उसकी खुशी का उस क्षण पारागार नहीं था जब पिता को अपने अफ्नर दूरी 19 बनने की सूचना देने का उम सुजवसर मिला । अफ्मर की सीट पर वठन वाल दिन वह फूला नहीं समाया था। इसी खुशी मे तो उसने पिता का लिया था, 'पूजनीय पिताजी आज मुझे अपन जग्रेजी के लक्चरर की कई वाते याद जा रही है। वे अक्सर कहा करत थ, यह ठीक है कि आज 4 सत्राम मे जादमी हर क्षण हर पल यह महमूम करता है जैसे उसका दम जब घुटा तब घुटा । पर यदि वह हिम्मत न हारे तो वह क्या नहीं कर सकता है। मुझे खुशी है कि मैं आज उही लेक्चरर की बदौलत निखिल स पहले अफ्मर वन आया हू । आज में आपका जोर मातवर चाचा का जाशीर्वाद चाहता हूँ। पर उसका यही पन उनर लिए प्रग्ना का जबार बन आया । उस क्या पता था उसके पत्र के उत्तर म उसके पिता एसी वात लिखग जिह पढकर वह हिल जायगा । उहान लिखा था 'तुम्हारा पत्र पढकर अत्यत खुशी हुई है। मातवर भी खुश है। पर पिता के नाते मैं आज तुमसे एक-दो वाते कहना जरी समयता हूँ । मैं जाज तुम्ह वह वात भी बताना चाहता हू जिम मैं अब तक तुमस छिपाय हुए था। मुझे खतरा जो हो आया है कि तुम निरथ ये भ्रम पालकर जाग दुखी होजागे। तुम अभी भी आदमी और जाटमी के बीच की दूरी का दूरी समये हुए हो, जबकि यह सत्य नहीं है । धरती म तरह की दूरिया हुआ करती है। एक वह जो एक स्थान से दूसरे स्थान के बीच की दूरी की तरह दिखाया दे। दूसरी वह जोहो तो अवश्य पर दिखायी न दे । जादमी और आदमी वीच यही न दिखन वाली दूरी हुआ करती है । आदमी यही पर भूल करता है । वह दिखनवाली दूरी क भ्रम म यह तक समयता नहीं है कि जिम दौरान वह आग वढे हुए आदमी तक की दूरी को पाटन की कोशिश करता है म दौरान आग वढा हुआ आदमी भी ता जागे वढेगा। फिर विकाम म ता गति और भी उल्टी हो जाती है । अव तुम्ही सोचा बम म सफर करन वाले के लिए जा दूरी दिना की है वही रेल और हवाई जहाज के लिए घटा और मिनटा की दूरी है या नहीं? अगर तून अपन जफमर बनन भर की वात लिखी होती तो बात और थी। तून जा निखिल की बात लिखा है। वह मेरी समझ म नहीं आती। 10/नवीराम की चारपाइया उमके दोनो भाइ अच्छी नौकरिया पर है। माता पिता की भी उस पर और उसके भाइया पर जिम्मेवारी नहीं है, जबकि तरी ओर हम आठ मुह देखन वाल है । फिर मैं यह भी समझ नहीं पा रहा हूँ कि तू हिम्मत क्सेि मानता है। अगर तर को नरी का साथ या उसकी कितावें और कमरा नहीं मिलता तो क्या तू ऐसा लिखने लायक बन पाता ? बेटा, हिम्मत की दौड वहा में शुरू होती है जहा जिंदा रहने लायक आदमी के पट महो। वहा नही, जहा आत भूख से सिकुड रही हो वहा नही, जहा बुद्धि तो हो, पर पढन को वितावे नहीं हो । बेटा, म आज तर से अपन दिल की बाते कह रहा हू । जिम तरह से आज निखिल की त् बातें कर रहा है इमी तरह मैं भी जमाने पहले निखिल के पिता से टक्कर नने की सोचता था। यह मेरे इसी सोच का नतीजा था कि पिता और माता की मत्यु के बाद काइ और उपाय न देख मैं भूसा प्यासा बनारम पहुचा था। मैंने सुना था रीव बनारस म पढ सक्त है । मुझे पता नहीं था कि बनारस पढकर गरीब वेदपाठी ता वन सक्त है, पर वह नानी नहीं जिसे आज की धरती ज्ञानी मानती है। आज का युग वह नही है, जिसम मछुआरिन का बेटा वेदव्यास बना था। भाज तो हम उस यग स भी कोसा आग निवल आय है जिसम द्रोणाचाय के पुत्र अश्वत्थामा को दूध के वदल आटे मिल पानी को दूध ममझकर पीना पडा था। इतिहास कहता है कि महाभारत का काल भारतीय इतिहास का स्वणयुग था । वटे, इतिहास म स्वणयुग एसे ही हुआ करत है जब राजपुत्रा को युद्ध विद्या मिखाने वाला अपन वेट के लिए दूध तक खरीद नही सक्ता तो वह स्वणयुग पैसा ? बेटे, एक्लन्य का ता अगूठा महाभारत म ही कट गया था, मेर और तर सपना की बात ही और है। हा, बनारस का मुझ पर यह असर अवश्य था कि मैं टूमरा का ग्रहा का यूठा भय दिखाकर तरे लिए कापी फ्तिारें बटार सकता था। पर में जब भी ऐसा करने की सोचता तब मेरी आखा के सामने मेरी मा का वह चहा सिंच आता था जो गोबर की डलिया लिय या ठोकर खाकर मरी थी। तव मेरा सोच था कि मेरी मा को उस पत्थर न मारा था जिसस ठोकर बाकर वह गिरी थी। आज अहमास करता हूं कि मेरी मा पत्थर से ठोकर खाकर नहीं मरी थी। मरी थी इसलिए कि उसने घर पर वचे आट की दूरी | 11 । आखिरी राटी तीमरी रात स्वय न सासर मुझे दी थी। इसलिए बट, तर पन व कारण आज मैं गमय नही पा रहा कि हिम्मत तरी और मेरी है या उसकी, जिसन तीन राता की भूपी आता के बावजूद गोवर की डलिया मेरे कारण उठायी थी। इसलिए बेटा, दूमरा को ग्रहा का डर दिखान की मोचने के ही क्षण मेरे सामन प्रश्न खडा हो आता था कि यदि एसा डर काई पडित मेरी मा का दिखाता तो मेरी मा क्या करती? बटा, धरती म ग्रह भी उसी के शात होत है जिसरे पास दान करने को होता है उसा नही जिसके पास देन को कुछ नही एसा की तो पूजा-पत्थर के आग आसू बहाना भर हुआ करती है। इसलिए वेटा, वस तो तेरी मर्जी, पर मेरी तेरे को सलाह है कि ऐसे भ्रमा का पालना छोड, अब तू आगे की बातें सोच । दुनिया अब हमसे कहने लगी है कि अपन और छोटा के पीछे तरी शादी नहीं कर रहा हू सचमुच यही वह पत्र था जिस उसने एक बार नहीं दजनो बार पढा। हर बार वह और भी उलझ जाता था। कई बार तो उमे ऐम लगता था जमे उसके भाई-बहन किताबा के लिए रो रहे है । कई बार लगता था कि उसके भाई-बह्न भूखे पट मो रहे हैं। कई वार लगता था, गाव के लोग आपस म बातें कर रह है-थोडे दिनो की वात है, शादी होत ही था. भेजेगा वह इनको एमे पैसे। इसलिए वह घर को अधिक-से-अधिक पैसा भेजता । सोचता रहता चाहे उस कुवारा ही रहना पडे पर अपने भाई-बहना को अधिक-से-अधिक पढायेगा। उधर अब उसके पिता थे कि सुझाये सारे रिश्ता को उसके द्वारा मना करने से घबरा आये । उहतो उल्टा उस पर यह शक हो गया कि कही यह रिश्ता से बाहर तो शादी करने की नहीं साचे हुए है । इसीलिए अब वे परेशान हो उठे। यह भी उसकी इमी परेशानी का नतीजा था कि उसके खान का बहाना ले उसके पिता उसके पास उसकी चाची को छोड गये। अपनी मा से ज्यादा वह चाची की बातें जो माना करता था। चाची के इमी आने ने सचमुच ही कमाल का काम कर दिखाया। कहा तो हरित शादी को किसी कीमत पर तैयार नहीं होता था कहा वही चाची मे बोला 'अच्छा, यदि तुम मेरी शादी करना ही चाहती हो ता 12 / नेकीराम की चारपाइया फ्ला स करा । वह भी ऐसी लडकी से जहा से दहेज मिलने की कोई उम्मीद ही न हो।" जबकि उसकी वापलियत देख कई ऐमे उसे अपनी लडकी दना चाहत थे जो उसे सोने से मढ़ दें। और तो और, मुकेश के जीजा जी ने तक अपनी लड़की के लिए उसे मकेत दिया था। उन जसे सीनियर आई०ए०एस० या दामाद बनना भर उसके लिए काफी था। पर तव हा यह आया कि चाची में आने पर कई रिश्तेदार आने शुरु हो आय । एक इतवार उसकी चाची की चचेरी बहन भी उनके यहा आयी, उसके साथ उसकी विटिया रेखा थी। तब एकाएक उसन रखा को क्या देखा कि उसे तो लगा जसे रेखा उसकी युग युगा से प्रतीक्षा कर रही है। ऊपर से बड़ी बात यह हो आयी वि उमन नोट किया कि नाची की बहन बीच-बीच म उम तरमती निगाहा से दख रही है। उसे दखत समय अमर उमपी पलमें डबडवा आती है, बल्कि इसी बीच एव धार तो यहा तक हो आया कि उसे दपत समय उनकी इव- डवायी पलया से उछलपर एव आमू उनके यायें गाल से लुढक्ता उनपे परल म एमा गिरा रि उसन तो हरित वा वचन ही कर दिया। उमरे जाने पर हरित न चाची स पहा था 'चाची, तुम्हारी बह्न बहुत दुखी मालूम होती है "दुखी हो कसे नही? एक तोलामाल पहल इमय माये का सिंदूर पुछ आया । दूमर, इमकी दो जवान बटिया और दो छाट लडवे है। यह ता पति पी जगह शापो नौररी मिल गयी, वरना ता जान 'सब ता नया दुरी हाना स्वाभाविर है । ' अव हरित न भी चाची कोपरगना शुरू किया था। मगर सभी उगवी चाची बीच मही बाली, "यमे यह जिम मतलव म आयी पी में मममती हूँ। पर ना ही हुआ, पाली पुछ नहीं । णी ही रह गयी यया हमारहरी लिए सभी तो हरित अवार-मा पाची मो दयता-दाता रह गया था। उगरे अनुगार एव विधवा यो दूसरी विधया मेहमी होनी चाहिए पी, जपनि पहां मामला ही अजीर हो मापापा । चाची या याश्य मी ही रह गयी है या हमारे हरी मे लिए उम यह मारा पा! वन्धि पानी मग सारय नेता उसे उन परिणामी या परा दी पो ग्निम मुोगरे मा. जीना सीमारीमागिता सर गामिल था। दूमगे मोर पानी " " - बहन की आग म लुढया वह आमू था जिमन उमे एक तरह मे हिना मा दिया था। तभी ता उस क्षण यह स्थिति हा आयी कि हरित का बार-बार चाची की बहन को आप म लुढाता आसू जहा दिन रहा था, वही धीर धीर ता उम यहा तर लगन लगा जस म्वय रया उमसे कहन लगी हो- तुम वही हा न जो अब तक अपन और निखिल के बीच की दूरी कोखम करन की बाते दिया परत थ । अब दिख रही है न तुम्ह आत्मी और आदमी क वीच की दूरी । मुशव जीजा या उम जम लाग तुम्ह माना और चादी ही नहीं, एसी तरविण्या दिला मक्त हैं जिसम तुम वइया का निखिल जसी नौकरिया पर रख सक्त हो । मरी मा तुम्ह आशीर्वाद के जलावा क्या द मदनी है ? मेरी मा १ पास दन का ही कुछ हाता ता में वदमूरत हाते हुए भी पूवमूरत मानी जाती, जबकि मैं आज सूवमूरत हात हुए वमूरत हू । दुनिया म लडकी और लडका या आदमी और आदमा बीच की दूरी भिसा वे उछाल मर स नापी जाती है बल्कि सिक्को का इही उछाला र बल पर ता आदमी युग-युगा मे धरती में आय दिन खूबसूरतिया की इसानी और इसानियती दूरी बो नापना-नापता आ रहा है । बोतो, खूबसूरतिया धरती के हाटा म आये दिन विक्ती नहीं है ? जहा तक धरती के दिल और दिला की बात है। धरती दिला ने धरती के दूसरे दिला की धडकना को समझन की कभी कोशिश की है, अगर धरती मे दिल धरती टूमरे दिल को समझने की कोशिश करत तो क्या मती को भरी मभा म अपमानित होकर यनबुड म कूदना पडता? शादी हा जान भर म क्या धरती की बिटियाआ के मन म माता पिता की यादें मर जाती है । क्सी अजीव है फेरे होने से पहले और फेरे लगने के बाद के बीच के फामत की यह दुनियावी दूरी ? सती का यही गुनाह था न कि वह फेरे लगन के बाद विना बुलाय पिता के यज्ञ में शरीक हुई थी। उसका यही गुनाह था न कि उमन विभति वान को वरण किया था। विभूति वाला कहकर दूमर का अपमानित करना सरल है पर उस जहर को पीना सरल नहीं जिमन समुद्र-मथन म निकले नाना रत्ना की खुशी का गमी म बदल डाला था। विमन पिया था समुद्र मथन म निक्ला वह जहर जा पूरी धरती का भस्मीभूत करने के लिए काफी था उसी न पीया था न, जिसे दुनिया न 14 / नवीराम की चारपाइया विभूतिवाला कहकर अपमानित किया था। मिया अस्तित्व की रक्षा स्वय अमत्त पान या अपना-अपना भर का अमृत बाटन म नही हुआ करती है। अस्तित्व की रक्षा हुआ करती है दूसरा के लिए जहर पीने मे । बोलो क्या मुये अपनाकर पीओगे तुम जहर? मै पावती की तरह तपस्या तो नहीं कर मक्ती, इतना अवश्य विश्वाम दिला सक्ती हू, यदि तुम मुझे अपनाआग तो और चाह में कुछ कर सकू या नही मै यह कभी नही भूल पाऊगी कि जिम तरह से मेरे भाई-बह्न नग्न-अद्ध नग्न है उमी तरह तुम्हारे भाई-बहन भी 'क्या रे, क्या रेखा पसद हे तुये?" इस वार चाची ने हरित की मान मिक्ता को थकझोरा था। तभी तो पहले तो वह ठगा-ठगा-सा चाची को दरता देखता रह गया था। फिर एक अजीव मी मानमिक्ता के साथ वाला था, हा चाची | जगर तुम मेरी शारी करना ही चाहती हो तो आज निकी की पटरीवाली बात न हरित की इही यादा को याद करा दिया था। उसकी तो इन यादा मे वे यादे तर शामिल थी जब रखा से फेर होत समय निखिल मुस्कराया था। स्पष्ट था कि निखिल उससे मक्ता हो मवेता म कह गया था--लाखिर अपनी ही जसी जगह हो रही है न शादी । मुकुल के जीजा की लडकी से शादी न करने का भी तो अपना प्रभाव था। यह भी इस प्रभाव का असर था कि हरित ने बड़े अधिकारिया ने शादी के बाद ही उसे परशान करना शुरु कर दिया था। वह ता हरित को रेखा ने अपने स्वभाव की रेखाआ म सभाल लिया, वरना तो उसकी गहस्थी एक तरह से चौपट होने को हो आयी थी। एक तो दफ्तर की परशानी, दूसरा वह क्मिी को हाथ फैलाते देखता तो घटा यही मोचता रह जाता था--आखिर धरती का यह विधान क्या है, जिसके तहत आदि काल से यही सब होता चला आ रहा है? क्यावि पिछले पाच छ वर्षों म निनिल न मिफ आउट आफ टन क्वाटर ले चुवा या, वरन् दो प्रमोशन लवर उसे वापी पीछे छोडचुका था। हालावि अडर सेनेटरी पनल म उसका भी नाम था। निखिल के पीछे मुकुल के आई० ए० एस० जीजा जा थे। उनकी बदौलत मुबुल इन दिना महान वज्ञानिक बनकर अमेरिकामपा । वही स तो दूरी / 15 उसन फॉरेन मेड पटरीवाली रल निखिल केवट के लिए बथडे प्रजेंट भेजी थी। उसी को तो देख निकी न पटरीवाली रल की बात हरित से कही थी। बचार को क्या पता था कि उसका पिताअडर सेनेटरी बनने की एमीप्रतीक्षा कर रहा है, जसे मिट्टी के तल या डालडा की लाइना म लागाको खडा होना पडता है। वह तो रेखा नौकरी करती थी वरना तो शायद उनके खाने तक के लान पड मक्ते थे । हरित क चार भाई इन दिना कॉनेज म पढ रह थ । ऊपर से हरित को साले और सालिया की भी ता मदद करनी पडती थी। हालाकि इस सबके वावजूद वह खुश रहा करता था। उसे विश्वास था कि निधिल को पिर जो पछाडेगा। पर निकी की बात ने आज उसे पूरी तरह हिला दिया था । आज तो जब उस चौराहेवाला वह वावा तक राहत नहीं दिला पा रहा था जिसके अद्ध नग्न रूप को दस वह अपने को अफ्रीक्यिा के बीच सा पा राहत की सास लिया करता था। शायद इसके पीछे सामने की उम रोड का असर था जो उसके क्वाटर के पास से शुरु-मी हो एशिया पालि- टविन वे एक सिर पर खत्म होती थी। निकी की बात ने आज उस उस पुरानी याद को भी ताजा करा दिया था जव उसने और उसके गाव के कई लोगा ने निखिल के लिए लायी गयी खिलौना रल को सबसे पहा दखा था। गाव की एक बुढिया न तो तव उसे ही मचमुच की रल समझा था। उसन तब भी अवश्य यह सोचा था रेल तो एमी ही होगी पर इसकी पटरिया कैसी होगी? जवकि अब वह सारी बाता का देश और समझ चुका था। क्यापि कई दिना में दनिक खच बचाकर भी आज पटरीवाली रलवे लायक उसन पाम पैसे नहीं थ 16 / नकीराम की चारपाइया

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चालमारी माड की चुगी चौकी । इस समय वहा किशोर, उमरे पिता व
उन मामान लान वाल दमदा के अलावा कोई और नहीं था। हाता भी
से इम समय कुमाऊ रेजीमट + मिपाही चालमारी पर फायरिंग का
अभ्यास ता पर नहीं रह थे, जो वहा आगे बढन वाल हर यक्ति व वाहन
को बलात वहा रकना पडता। और न इस समय एसा समय था कि आन
वाला को लेने व जाने वाला को छोडनेवाल लोग जो लगभग हमेशा
ही वहा होत थे, इस समय जमा रहत । इस समय तो चौकी पर चौतीसा
घट की मस्त डा
-re बटती दिसवरी ठड से
जपने को बचाता
पूरा विश्वास छ
ट्रक आ सक्ती
कोई जादमी
आत्मो तो न

शियही पिता नगमिच गिरी गम भी ममी पागवार और नागज
न हा जायें। पर 'ग गगर उहा मा गुछ नहरी निया, परन इतना भर
पहा, 'मधिया इममता पाम नही पगा। जानीमा नियानय लिए
छिन चीर की गुपच्चिया यानआ।"
रामदा एकाण्य ही इटर व माय उठे तन पदमा म मडर कवायें
उम आर चन जिधर दायी आर पी झाडिया कोअपमा चीड ही चीड य
पड थ । मायद तजुर्वेदार मलाह उह जची थी।
"क्या अभी ता भौत जल्दी है है न?" दमदा अर आग मॅन रहे थे ।
प्रश्न भरी जात्रा स विशार व पिता को देख रहे थे । चार अव उहाँने
विशारद ऊपर रख दी थी। दाता की विटविटाहट अब उनका
थम गयी थी।
मगर किशोर के पिता थे कि उनकी वात का उत्तर देने के बदन तीखी
निगाहा मे क्वल किशार को देयत थे। शायद उह इस बात की चिता थी
कि यदि अभी रानीखेत से उनकी ही वम आ जाय ता नही निकली चादर
यही छूट न जाय ? विशोर पिता के चहरे पर उभरत इन विचारा को ताड
गया, फिर उमन तीखी नजरो स एक वार चादर को देखा, ता जगल ही
क्षण देखा दमदा की जार। वह भी उस ही देख रहे थे। शायद उनके इन
भावा को वह भी ताड गय थे। नर्गिक भाव विभावा को ताडन के लिए
विश्वविद्यालयीय डिग्रिया का होना तो जावश्यक नहीं। दमदा वोल,
विशोर चादर ट्रकम रख ले, कही
विशार न चादर सभाल ली। उसके पिता सतोष की साम लेत बीडी
रहे थे और देखते रहे दमदा की ओर ।
.
'पुटे से अब दिन म बदलना शुरू हो जाया था। चौकी क
टोल मुहरिर भी अब लप जला बिस्तर पर लेटे-लट
रहा था।
की बनी होती तो
। तखतो क
wear

बीच की जगह से जदर सिगरेट पीता वह साफ दिख रहा था। एक बार टोल मुहरिर ने भी देखा-बाहर जलती आग व उन तीना की ओर । फिर उनकी उपेक्षा-मा करता वह मिगरट की चुम्बिया कुछ एसे भरने लगा, जसे उसने अपने अनुभवो के बल पर अदाजा लगा लिया था कि आमपाम के गाव से कोई, दिल्ली व बग्ली जान वाली साढे छ बजे की बस पक्डन के लालच मे जरा जल्दी पहुच गय हागे । किशोर को दिल्ली वाली ही वस पकडनी थी। अगले दिन उसे दफ्तर पहुंचना था। पहले की जमी बात होती तो रल मे जाकर दूसरे दिन बारह बजे तक वह दफ्तर जा सकता था मगर इम इमरजेंसी मे तो नहीं, क्योकि एक महीन पहले पाच-सात मिनट की ही देर होने पर आधे दिन की वह छुट्टी पर रह चुका था जो कि अब सभव नही था क्योकि इस बार नट होन पर उस तीन दिन की छुट्टियो क कटने का खतरा जो था । भला सोमवार के दिन छुट्टी हाने पर दूसर शनिवार व इतवार की सरकारी छुट्टी के भी कटने के कानून को वह रोक तो नहीं मक्ता था। इमीलिए तो वह इतनी जल्दी यहा पहुच गया था। फिर उसके पिता का वह स्वभाव भी तो था तो माढे दस बजे की रेल पकडने मात बजे ही दिल्ली रेलवे स्टेशन पर खडे होने पर भी बेहद देरी का एहसाम कर उस डाट रहे थे कि तुम दिल्ली वाला की लापरवाही का तो भगवान ही मालिक । योज नाए तो बना डालो आने वाले पचामो साला को। मगर रावर यह नहीं वि दस मील स्टेशन पहुंचन म ही, वस के कारण तीन घट लगे या चार । इतने से पहल ता म पटल ही तभी तो वे पाच बजे ही मरोजिनी नगर से चल पडे थे, जब कि आज वे तीन बजे ही गाव से चले थे। शायद उनका स्टेरिस्टिक्ल अदाजा, गाव से चुगी चौकी में तीन मील ही होन के कारण अनुमानत एक ही था। अब किशोर वे पिता ने एक और वीडी सुलगा ली। इस बार उहोन दमदा की ओर बीडी नहीं बढायो। शायद उह यह विश्वास था कि उसे अभी वीडी की जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं, वे दमटा की उपक्षा में परते टोल मुहरिर को वेवत टक्टवी बाधे देख रहे थे। किशोर ने भी देखा उधर की ही ओर । मगर इम पर चौती के अदर जलन लप ने उसे दायित्व | 19 पिछली गत की उस ली की याद करायी, जिम वह रात भर देखता रहा था। हालाकि पहाडी इस धरती पर, किमी भी ऊची पहाड़ी पर स एगी अनक नमर्मिक लौआ को रात म देखा जा मक्ता था, पर उम लौ का विशेप ही महत्त्व था। एक तो नायित्वा को अपनी मिफुडन व पिता के दायित्वा फ्लार के बीच तव विशोर घुटन अनुभव कर रहा था। दूमरा वह तो सारी रात भर जलती रही थी। पता नहीं मगमीर के लग्ना के बीच उस घर म किसी की शादी थी या क्मिी के उठावनी की मातमी या चीथडो व चीथडिया के अभाव में इधर महल सुलभ प्राक्त लडक्यिा का वह प्रतिफल था। तब करीव एक बजे उसके मन में भी तो उठे थे य ही विचार-जिनके कारण उस यहा कुछ राहत-सी मिली थी। वहीं, उस याद हो आयी थी उस मौलि लोहार की काली कलूटी अधनग्न सूरत, जिसक वार मे उसने सुना था कि विस्तर व कपडा के अभाव म सारी सदिया भर उसो घर सारी गत धूनी ही जली रहती है जिसकी यात कारण इम बार उसन झटके के साथ आग मेंते दमदा का देखना भी चाहा पर उसकी आखे पिता पर टिकी ही रह गयी । इस बार भी उसे एमा लगने लगा जसे उसके दायित्वो की सिकुडन की भद्द उसके पिता इस समय भी वसे पीटन को उतारू हो आये है जम क्ल रात रात तव किशोर व उम पिता मे हो आय वाद विवाद के कारण दमदाही थे । दमदा उसका सामान चालमारी मोड तक पहुंचान की मजदूरी और पाच रुपय क्ज माग रहे 41 ताकि वह चिलिपानौने म ठाकुरदत्त की दुकान म आय कटाल के खद्दर को खरीद सके । पर उसके पिता ये कि उसे खद्दर दिला देने की पूरी जिम्मदारी लत हुए बार-वार काम करने के बाद ही देन पर अडे हुए 4 । जव कि दमदा इसके बावजूद कहे जा रहे थे, काका मेरी बात होती तो काई बात नहीं थी। आप लागा के फ्ट- पुराने कपडे ही पहन लता । पर जभागी वहन के वच्चा + लिए दावों से नय कपडे नहीं बना सका । पुगन कपडा से ही काम चलाया। पर जब जीतू बडा हो गया है। पता नहीं क्मिन उमस क्या कह दिया कि पिछन तीन दिन से नय कपडा की जिद क्या करन लगा वि पुशली न तो सुबह से 20/नकीराम की चारपाइया खाना तक क्या तुम्हार भरोमे ही पल रहे है। पर क्ट्रोत के कपड का क्या पता कि, तुम्हारे गनीखेत से नोट । तर वंस भी इमरा भरोसा नहीं कि मुवह दुकान खुलने तक वह रह भी पाय या मगर विशार के पिता थे कि आज पिघल नहीं रहे थे। हालावि उनो बारे में यह प्रसिद्ध था कि मौरे पर उहान गाव व इलाम भर के हर आदमी की मदद की। अपन पास न हान पर भी दूसरा से तकर, चिना एक पैसा ब्याज लिये, उहान लोगा का काम किया। पर इस बार दमदा वा खद्दर दिलाने का आश्वामन ता वे अवश्य दे रहे थे मगर पमा नहीं । जो न तो विशार का ही अच्छा लगा और न उसकी मा का ही। यही तो कारण था कि मा कहने पर विशोर न दमदा की जोर जाउ रपय क्या पढाये 4 कि वम उसके पिता ता उस पर फूट मे ही पडे, विशार तुमने मेर जीत जी मर से आग वढन की यह हिम्मत कसे की। 'पिताजी इसस अधिक कुछ वहन की वह हिम्मत नहीं कर पाया । करता भी कसे? क्यावि एक तो वह उनके काध से परिचित था। उह पहन ना बडी बडी बातो पर भी गुस्मा नही जाता है और यदि आ जाता है ता फिर वे अवे ही हो जान है । और दूसरा वह जहा काय म जान- पीले हो आय थ वही, बाल ही चने जा रहे थे 'विशार | जगर तुम्हारे इस दुस्माहम में भला वाला अश नही होता तो मैं तुम्ह इम ममय मी ही पीट देता जैम । नुम अभी बच्चे हो । दुनियादारी बा तुम अभी 70 भी पता नही। और न इस मूख दमुआ को परिस्थिति रामनाहानी पमे देने का लाभ भी क्या? लाम इमलिए नहीं कि,माल जमा कोई अवगुण है बल्कि इसलिए कि मुग्यिा श्री र के कपडे की लाइन मे इसका खड़ा हाना, गुमानन्दि, Prit पाम वह पसे रहन देगा? एक ता इमन मर Tridaritam उधार देना है। दूसरा यदि यह कटारा, पण वरमा का पुराना व रद्दी कागम' ?-ATE तो 'बगल म ही है। विशार मिल रही है, मरीने पहले एक दिन अग्यिा, शिरमहा या इनर जोर, गुमानिया न उदा:rzzkanाने - हालाकि इस बात को सुन मुझे इतना मदमा पहुचा कि इसके वे ही सोलह रपय गुमानिया मे नत हुए वाद म मैंने उससे कहा था कि पचीस-तीस स्पय माहवार इसे जो भी चीज चाहिए दे देना। पहल तो यही दे देगा और यदि न दे सके तो मुझसे ले लना। पर उसका मुझे जरा भी भरोसा तब किशोर व उसकी मा की समझम आया था कि वे उस पस क्या नही पक्डा रहे थे। वे तो अलग स्वय दमदा तक समय चुके थे। दमदा को ता तब व क्षण याद हो आय थे-जव वे उस दिन बेहद उदास से अपन चाय म वठे यह सोच रहे थे कि जब वह वहन को मुह किस तरह दिखायगा। क्योकि उन सोलह रुपया मे ग्यारह तो उसी थे । तभी मामन एकाएक विशोर के पिता को आया देख व उन हाथ म ठीक एक धोती व पाच गज खद्दर देख वे जहा भौचक्क रह गय थे वहीं वे उनव पावा म गिर पडे थे । भला गरीव दुनिया मे कभी जक्तज्ञ रहा है। मगर अब इस समझ का क्या लाभ ? अव तो वे किशोर का दाटत- फ्टकारत ही चा आ रहे थे इसकी आर आठ रुपये बढाने को तो बडे तयार हा । एष अपनी बहन के लिए मन पसद बनियान पद्रह दिन से नहीं खरीद सक। यह तो बहुत आगे की बात है तुझसे तो अपन ही बच्चा के लिए स्वेटर नहीं बन पात । पिछल बरम देहली माया ता देशातीनो म स एव भी पास न ता इधर उधर जान के लिए अच्छे कपड़े थे और न स्वटर ही। पूर साडे चार सौ खच पर बनवा आया था मैं । वस तुम सरकारी दफ्तर मे असिस्टेट हुए। आग लग तुम्हारी अमिस्टटा का। जरा भरी आर देखो, तीन भाइया सहित पाच तुमका, जिसन जितना पढा, शादिया पर तुम लोगा या जादमी ही नहीं बनवाया बच दाना वाजव भी पढ़ा रहा है । और एक सब मा । बीच-बचाव वरन पर ही वह चुप हुए थे। पर चुप हात ममय ता व विशार य दापि वान सिकुडन की भद्द पीटन के बीच यहा तक यह गय तुमस तो दमुआ ही मला, वमन्म-बम अपनी बगहारा बाल- विधवा बह्न व उमर दा वच्चा को पाल ता रहा है । इस अघपगलपन मेवारण पहल गनी शादी नहीं हुई। तब का भी इम लहकी देन का 22 / नेवीराम की चारपाइया पढाया तयार नहीं था, पर अब उसे कई लडकी देने को तैयार है। मगर वह कि अब तयार नही । कहता है, "बहन व उनमे बच्चे । एक तुम हो तुम तो क्या तुम्हारे जमाने के सभी लाग जो पसी के कारण पिता का पिता, माता को माता तथा वहन का वहन भी मानन को तयार नहीं। अपना पट तो युत्ता भी तब तव उसका माथा झनझना ही नहीं उठा था, बल्लि उसे तो यहा तक लगन लगा था कि जैसे वह कैशियर से तनखा लेता रहा है पर मरान के किराय, नून-तेल आदि वे विल को कल्पना कर सोचता-मोचता जला जा रहा है पिछले महीने सा बच्चा ये कपडे व स्वेटर नहीं बना पाया। इस बार देन वाला को दे या इतना याद आना था कि उसे यहा तक लगने लगा कि उसके पिता व दमदा तो अलग, उनक ही जस दुनिया भर के लाग उसकी स्थिति देख खिलखिलाकर एक जार ता हम रहे है। मरी आर वह स्वय साच की एक एमी स्थिति म पहुच गया है कि जैम विमी एव महामारी न उमर हाथ-पाव, नार-वान मुह आदि मब ही या निधिय-मा कर दिया है। वेवल उसका दिमाग और उसकी आमें ही प्रियाशीत है । दिल दिल भी एमा, जा अय अगा की निप्रियता म दुखी तो है मगर रो तक नही पा रहा है। दिमाग के बीच माता पिता, भाई-बहन जादि सभी बी एमी तडफ व छटपटाहट वि उम तडप व छट- पटाहट की वजह स अध विक्षिप्तता वा एहमाग ता कर रहा है मगर विवातावश उस भी नकारन वे कारण वह अपन स्वय के अस्तित्व प्रति तर रितित है । और आखें जो धन अधेर वावजूद अदर वात कमर म रटी बह्न अचना व चेहर पर व्यक्त हात घर जा रहे भाव व भना विशारा पो माप देश तो रहा है। मगर उमप हर पर चढन उतरत भाषा या अय, अपनी पालनिवना र बल पर गह रहा है कि वह लगातार यही वही नला जा रही है-भया, तुम मरे स्वेटर की चिंता नहीं रना । पयिता, रिभा व नीटू वे लिए डेस व स्थैटर जर यना नना। क्यानि अभाय म मन अपनी कई गहतिया का मिट देगा है। भमा जन झुटपुटा दिन म बदल जाया था। और तो और सुदूर उत्तर को ओर की वोली पहाडिया तब साफ दिखन लगी थी। अब टोल मुहरिर ने भी चौकी के दरवाजे आधे चाल दिय थ। मगर न ता अव भी, विशोर + पिता ही उमम कुछ बोल रहे थे और न वह ही। शायद पिछली रात के वाक्यि के कारण दोना कुछ देर और पश्चाताप करना चाहत थे। तभी एकाएक दमदा उठे। हडबडाय से वोल "क्का, यह क्या? जल्दी करो बम अब देहली वाली ही बस मामन खडी थी। दमदा उसम उसका मामान चढा चुके थे और वे दोना इस बार की विदाई की आखिरी रस्म अदा करन के बावजूद वेवल आखा-ही-आखा म बातें कर रहे थे कुछ- कुछ एसे जैसे 24/नकीराम की चारपाइया 080 डेलीवेजर उसन घबराते पदरात कमरे म पाव रखा ही था कि हरान रह गयी। सोलह-साह आदमिया वाले सेक्शन म आज एक भी आदमी नही था उसे मदेह हुआ कि कही आज छुट्टी तो नहीं ? पर अपने कमरे के खुले होन से उमने अनुमान लगाया -नही, एसा नही यदि ऐसा होता तो दरवाजे खुलत ही नहीं? फिर एकाएक उस एक बयाल आया- -कहीं कोई महान नता या कोई एसा बडा आदमी स्वग को प्यारा तो नही हो आया, जिसके कारण दफ्तरा के बद होन का ऐलान मजदूरन आकाशवाणी को करना पडा हो? मगर कमरे की एक एक सीट को देखते ही उमे लगा कि यह वान भी गलत है । संक्शन आफीसर दासगुप्ता का अटैची-वेश परीन से रैक पर रखा था । जुनेजा, भवरसिंह आदि कश्या के वग हमेशा की तरह पडे थे । लगभग कइ मेजो पर खुली-अधखुली पाइने प्रमाणित कर रही थी कि ऐमी बार जरा भी नही । बल्कि य मय बातें तो मूब भाषा में कुछ ऐमा जतला रही थी, जम वमरे के मारे-प-सारे लाग कही इधर उधर गय हैं? हा प्रश्न यह था कि ऐमो क्या बात हो आयी जा मेक्शन 4 लाग एक माय बम, क्या चले गय? इही विचारा व बीच एक बार अस्मिता वे मन म भी विचार जाया कि अपना पस माट पर रस वह स्वय बाहर चली जाय । रमे-मामला क्या है। किंतु तभी उसे सयाल आया-वह डेलीवेजर है। फिर आज का निता यह काप उठी । पबराबर हा हो-होठा म बुदवुटाना मीधे अपनी मीट को आर जात-जान उमन साचा-37 वे सब सुविधाए वहा जा औरा को उपलब्ध 1251

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टाइप करने लगी। इसी जत्दबाजीम वह पाच पत्रा का टाप कर गयी-- वडे कबूतर एक बच्चे क्बूतर वो उडना मिखात, उसकी रक्षा करन म तत्पर थे । ऐसा उमन शायद इस वार नहीं, अनेक बार देखा था। मगर इस बार के दखने न उसा मन मस्तिष को ही शवझार डाला। अब उसके लिए मीट पर बैठा रहना भी कठिन हो गया । सामन दो बडे क्बूतरा और बच्चे कबूतर न उम कमरे अदर बद असहाय व वेवस अपने रोहित और भरत की याद ताजा करा दी। वैस यह बात भी कदापि नही थी कि वह अपने दोना बच्चा को आज ही कमरे में वद करके आयी थी। ऐसा ता उस पिछले तीन साल से हर रोज वरना पडता था। उसकी पलके डबडवा आयी। एकाएक उसे ऐसे लगने लगा, जैस उसकी जिदगी परिंदा मे भी बदतर है। परिंदे जर मर्जी दाना चुगन निकल मक्त है जब मर्जी लौट आत है, जबरि उम अपने आठ वर्षीय गहित और पाच वर्षीय भरत को भगवान की रहम पर क्मर म ताला नगा छोडना पडता है । अडोसी-पडासी भी तो तभी काम आते हैं, जबकि उहे भरोसा हो कि अगला भी भी उनके काम का मक्ता है। फिर उमका इतना वेतन भी नहीं था जा वह उह उन शिशु-पदा म छाड मरे जहा आज ६ जमान में नौररी-पेशा दपति बन्चाका छोड जपनीलपनी भौकरिया पर जाया करत है। उसका माथा झनझना उठा । पर तभी मामन रबी फाइ देख उस कुछ राहत-सी मिली। लगा, जैमे उमकी मेज पर टाइपिंग के लिए रखी फाइल नहीं, बल्कि प्रत्यक फाइल वे दान है, जिह चुग चुगकर उम जमा करना है। इतना सोचना ही था कि उसन बडे ही जतन से तीन चार पाइला को उठा लिया । पिर एक दो फाइला को ता उसन अपन माथ पर चिपका-सा दिया । वह भी कुछ ऐम जम कहना चाहती हा-परमात्मा, तूने मुझम मेरे माथे का सुहाग भले ही छीन लिया, मगर इमवे वाद तो वह विजली का-सी पुर्ती के साथ एक क बाद एक पत्र मगर तब तक भी सक्शन 4 लोग नही लौटे । औरो की अनुपस्थिति की बात किसी और दिन की होती तो शायद उस थोडा बहुत अखरता ! पर डेलीवेजर / 27 आज उमर लिए यही यात मुग यो। आज गहिन व वुमार ने वारण उग दर हो गयी थी । उम डास्टर म पाम जाना जा पडा था? लागा की अनुपस्थिति य कारण ही उगमा आज पद्रह-बीस मिनट बाट आना हिन गया था । वर्ना ता किमी व भी दर में आन पर, एक-दूसरे पर पनिया पगा म माहिर उमा माथी उम भी ऐडन म जहा चूवन नहीं, वहीं हाजिरी लगान बूढे दासगुप्ता की भाडी छानी भी उस सुननी पडती । लागा थी अनुपस्थिति वा पायता उठा उमन आज पहली बार रजिस्टर म समय भी सवा दम ही भर दिया था। यही बात थी कि अब वह पूर मनोयाग से टिक टिव टाइप कुछ एग करन लगी, जस उसन अक्ल ही अया की जनु पस्थिति को छिरान का निश्चय कर डाला हो। जल्दी-जल्दी म वह आठ लेटर और टाइप कर चुकी । अलबत्ता रोहित भरत की याद जान पर वह थोडी क्समसाई थी। फिर अपनी असलियत की याद आन पर वह अपन नय माहौल म पूरी तरह डूव-मी गयी थी। यह वात था कि वह एक एक कर दस पत्र टाइप कर गयी। हा ग्यारहवा टाझ कर रही थी कि एकाएक सक्शन के सार लाग आ धमरे ? उमे टाइप करत दख सक्शन आफ्मिर दामगुप्ता झल्लाय, अर तुम जरा देखो तो वाहर ।' -जाज ता भाई हद हो गयी ? सुवह ही मुवह आई० सी० पी० की नयी बिल्डिंग से छलाग लगाकर एक डेलीवेजर न जात्महत्या कर ली? जुनेजा का पर था। --चारे का उम स्थिति म नौकरी में हटाया गया था, जबकि वह अभागा अपन पहने बच्चे होने की खुशी भी मना नहीं पाया था। अजीव है यह दुनिया -यह स्वर रावत का था। -अब कसे जीयेगी वह वचारी अन तीन दिन के बच्चे को छाती से चिपकाय?-मिस्टर मदान बोल । -~वचारा सात माल से डेलीवेजर था । जुनजा का गला भर-मा जाया था। वसे भी यह सारा समाचार इतना करण था कि स्पय करुणा तक का दहला द? फिर अस्मिता के लिए तो इमने एक नया ही समेत दे डाला। उसे तीन दिन पहले के वेक्षण याद हो जाये जब उसे एकाएक ही उम बडे 28 / नेवीराम की चारपाइया अधिकारी न बुलाया~जिसके बारे मे मारे दफ्तर म यह बात प्रचलित थी कि वह महिला क्मचारियो वा अपनी बदनीयती के कारण बुलाया करता है। पहन ता य बाते केवल कुछ को ही मालूम थी। पर आभा वाली घटना ने ता दफ्तर के सभी लोगा का उसकी हरक्त से अवगत करा दिया था। उसन जहा उसके खिलाफ लिखकर शिकायत की थी, वही उसन यूनियन को साथ ले पूर दस पदह दिन मेन गेट पर उसक खिलाफ नारे लगवा दिय थे। वह दूसरी बात थी कि बना बनाया कुछ नही । क्याकि एक दूसरे की मददगार अप सरशाहो अपन एक साथी का अपमान कसे सह पाती । हा, आभा वाली घटना का एन मनावनानिक अमर यह जरूर पड़ा किवडे अधिकारी न महिना क्मचारिया को बुलाना छोड़ दिया था । मगर बही बुलाना उसके लिए सिरदद वन आया । एक तो उसके 'क्लीग' आखा के इशार में अपने आपम म कुछ ऐम इशारे करने लगे, जसे कहना चाहत हा कि अब तक यह बडी मच्चरित्र बनी रहती थी देखें अव फिर टूसरे उन क्षणा वी एक अजीव विडवना यह थी कि वह उन क्षणा मे अपन माथे के सुहाग के पुछने की चौथी वपगाठ के कारण जी भरकर राना चाहती थी। ठीक ऐम ही क्षणा में उसे बडे अधिकारी के पास अनिच्छा के बावजूद खडा होना पड़ा था। मजबूरी का नाम ही नौकरी है शायद तव जफ्सर ने उमकी सारी स्थिनि स जानकारी हासिल की थी। उस स्थायी करने का आश्वासन दिया था। साथ ही मिलत रहन की सलाह दत समय उमे भूखी अधभूखी नजरा म पूरा था। तब वह अदर ही जदर इतनी अधिक काप उठी थी कि इस बार में इन दिना अपन जिगर के टुक्डे रोहित और भरत भार-म लगने लग थे । ठीक ऐमी मन स्थिति के बीच जपन साथीकी आत्महत्या वाली बात न उस दहला दिया था। फिर इम समाचार न तो उमे यह सवत-सा भीद डाला था कि यदि वह उस बड़े अधिकारीस मिलती नहीं रहती तो -अजीव जमाना आ गया चपरासिया और क्लों की ता भरती बद । डेलीवजरो की दफ्तरा म बाट ?--मा स्वर में पपर पुक्षी की- मी छटपटाहट थी- ऊपर वी पोस्ट पर तो कोई निदी नहीं। पाक्दी । मिए । इलीवजा ।

-~भाई, मरकारें तो बदलती आयी मगर इन वचारा का भाग्य नहीं बदला शायद । चुलबाजी म माहिर भवरसिंह बाला। पर इस बार उमके स्वर म अजीव-सी खोज थी-हा है पाठ आठ, नौ-नौ साल से डेलीवजर डेलीवजर । - डेलीवेजर शब्द पा शाब्दिक अथ तो हाता है वे मजदूर जा राज को मजदुरी गज वमूल कर जात है-यह स्वर उस भीमदानी का था, जिम लोग अनुवादक महोदय' कहकर चिढात थ । क्याक्विवारा वर्षों म पारिभाषिक शब्नावली रटत रटन अनुवादव नही बन पाया था -~~भापा विनानी भीमदानी साहब मम्टड रोल का शाब्दिक अथ क्या होता है चडा व स्वर म 'यूनियनपन था। फिर वह बोला- इसका अथ मरसाद तल निकालने के तरीके मता नहीं? -भाई तुम्हार साथिया वे डर सता निकालने वाल बेचार आज दफ्तर म भाग गय । मगर अब हाय हाय' व नारा से वह तो जिंदा नहा हा सक्ता~भला भवरसिंह अपनी चुहलबाजी की आदत से बाज कहा . आता? - - --क्या अस्मिता जी, आप भी तो बोलिए कुछ ?----सेक्शन ऑफ्भिर दामगुप्ता के स्वर म कुछ ऐमे भाव थे, जमे अस्मिता पर अपना प्रभाव जमाने का उचित अवसर इस समय वह गवाना नहीं चाहता हा-यह ता आपने लिए जातीय मामला है? मगर अम्मिता बोल तो बोले क्या वह तो इस बीच अपनी वास्तविक अस्मिता को पहवानन को उधेडबुन म पूरी तरह खो चुकी थी। वह ता अपनी अमलियत बहुत पहले से जानन वारण उससे जूझने लगी थी राजीव से काट मरेज करने के साथ ही दोना के ही माता पिता उनसे नाराज हो आय थे अपने दुर्भाग्य के कारण शादी के सात-आठ साल बाद ही अचानक उमा माथ का सुहाग पुछ आया था तब एक दो लोगान ता उम पर उमी क्षण से डोरे डालन शुरू कर दिय थे, जब राजीव की अर्थी मज रही थी पिर बह धीरे धीरे यह भी अच्छी तरह अनुभव करने लगी थी मिअपनी अस्मिता को बचाने के लिए उसे पग-पग पर कितना जूझना पड रहा है बल्कि अब तो पग-पग पर आने वाली कठिनाइया से तग आ वह 30/नकीराम की चारपाइया स्वय एसे माथी को खोज रही थी जो उसके शरीर के दो टुक्डा को भी छाती से लगा ले जवकि परिवेश उसे ना निगल जाना चाहता था, मगर उममे बच्चो से हर हद तक परहज चाहता था। य ही बाते थी कि उसे मजदूरन ही मही, नौकरी करनी पड़ रही थी। क्योकि इसके बल पर वह अपन बच्चा + जीवन का सभालने का सपना जहा मजा पा रही थी, वहीं अपरा नये साथी की पोज म वय वरत पा रही थी। यह दूसरी बात थी जिजामनगर हाउस के पुराने हटमटा से सामने दिखने वाले आई० सी० पी० के नय मवन को देख वह कई बार क्समसा उठनी थी। हमेशा केवल यही सोचती-क्या सामने की यह बिल्डिग उन जसा के लिए ही है जो अच्छे खासे किस्म के पूर्व जमा के फल भोली म लिये पैदा होत है या उन-जैसा के लिए भी-जिनके बच्चा को पढन की उम्र मे या तो कडक्ती ध्प के दिना पेड की छाया में ही अपनी मजदूरिन मा को देख सतोप करना पड़ता है या फिर दो जून पट भरन के लिए मा-बाप का हाथ जुटाना पडता है। पर आज तो उसे उधर देखन को कल्पना भर से घबराहट हो आ रही थी। सेक्शन के लोग उमे बलात बह्म में घसीटना चाहत थे। मगर वह चुप थी। हा, मन-ही-मन माच रही थी कि कह-चिता न करो। बहुत जल्दी अब ऐसा समय आने वाला है, जब प्राइवेट फ्भों म ता हाग रेगुलर रोल पर आदमी सरकारी दफ्नरा म नीचे हाग सिफ डैलीवेजर । क्यामि दिन पर दिन हो रहे विकास के कारण ऊपर वालो के बच्चों की तादाद अब इतनी अधिक हो गयी ह कि उहे ही खपाना कठिन हो रहा है । इसीलिए य नयी-नयी स्कीम या तरवीरें चालू की जा रही है । पर वह फिर भी बोल कुछ भी नहीं पायो। केवल फ्टी फ्टी आखो से देखती रही सेक्शन यो।एकाएर उमकी आखे टाइप- राइटर पर चर्दै डी० ओ० पाम पर सिमट आयी। डी० ओ० फाम पर अशोक चिह्न वे नीचे छप 'सत्यमेव जयते' को देख उसन कुछ राहत मो. सी सास ली। तभी एकाएक उस लगा, जसे उस चिह्न के नीचे लाखो- करोडा लोग श्रद्धानत खडे हैं । उनरे अग प्रत्यग म कुछ एमा विश्वास है कि जैसे व मोच रहे हो-जब एव वार इस चिह्न को साभी भर हमने डेलीवेजर /31 - ।

---भार, मरसारता बदलती जायी मगर इन वचारा का भाग्य नहीं बदला शायद । चुहलयाजी म माहिर भवरसिंह वाला। पर इस बार उसर पर म अजीर-मी पोज धी-हन है आठ आठ नौ-नौ माल म डेगावजर स डेलीवजर। डेनीवजर शब्द या शाठिन्य जय ता होता है व मजदूर जा राज की मजदूरी गज वमूल पर जीत है- यह स्वर उस भीमदानी का था, जिस लाग अनुवादक महोदय' कवर चिढात थ । क्याकि वारा वर्षों म पारिभाषिष शलावती रटत रटन अनुवार नहीं बन पाया था। -~भाषा विनानी भीमदानी साहा मस्टड रोल का शास्टिक अप क्या होता है, चडोक व स्वर म यूनियनपन' था। फिर वह बोना इसका जय मरसा व तल निकालन तरी सता नहीं? -भाई तुम्हार साथिया वे डर मता निवालन वाल बेचारे आज रफ्नर म भाग गय । मगर अब हाय हाय' नारा से वह तो जिंदा नहा हो मक्ता-भला भवरसिंह अपनी चुहलबाजी की आदत से वाज कहा आता 7 -~-क्या अस्मिता जी, आप भी ता बोलिए कुछ ?--सेक्शन आफिसर दासगुप्ता के स्वर म बुछ ऐस भाव थे, जस अस्मिता पर अपना प्रभाव जमाने का उचित अवसर इस समय वह गवाना नही चाहता हो-यह ता आपके लिए जातीय मामला है ? मगर अस्मिता बोले तो वोले क्या? वह ता इस बीच अपनी वास्तविक अस्मिता को पहचानने की उधेडवुन म पूरी तरह बो चुकी थी। वह ता अपनी असलियत बहुत पहले से जानने के कारण उससे जूपन लगी थी। राजीव से कोट मरज करने के साथ ही दोना के ही माता पिता उनसे नाराज हा आये थे अपन दुर्भाग्य के कारण शादी के सात-आठ साल बाट ही अचानक उस माथे का सुहाग पुछ आया था तब एक दो लोगान तो उस पर उसी क्षण से डोरे डालन शुरू कर दिय थ, जव राजीव की अर्थी सज रही थी फिर वह धीरे धीरे यह भी अच्छी तरह अनुभव करने लगी थी विअपनी अस्मिता को बचाने के लिए उसे पग-पग पर क्तिना जूझना पड रहा है बल्लि अब ता पग-पग पर जाने वाली कठिनाइया से तंग आ वह 30/ नेकीराम की वारपाइया स्वय एसे साथी का खोज रही थी जो उसके शरीर के दो टुकड़ा को भी छाती से लगा ल जबकि परिवेष उमे तो निगल जाना चाहता था, मगर उमके वच्चा से हर हद तक परहज चाहता था। य ही बात थी कि उसे मजबूरन ही मही, नौकरी करनी पड़ रही थी। क्यापि इसके बल पर वह अपन बच्चा है जीवन को सभालने का सपना जहा सजा पा रही थी, वही अपन नय मायो को खाज मध्य वरत 'पा रही थी । यह दूसरी बात थी कि जामनगर हाउस के पुरान हटमेटा से सामन दिखने वाल आई० सी० पी० प नय भवन को देख वह कई वार कममसा उठती थी। हमेशा वेवल यही सोचती--क्या सामन की यह विडिग उन जैसा के लिए ही है जो अच्छे-खासे किस्म के पूर्व-जमा के पल पोली म लिय पैदा होते है या उन-जसा के लिए मी--जिनन वच्चा को पढ़ने की उम्न में या तो कडक्ती धूप के दिना पड की छाया ही अपनी मजदूरिन मा को देख सतोप करना पडता है या फिर दो जून पेट भरत के लिए मा-चाप का हाथ जुटाना पडता है। पर आज तो उसे उधर देखने को कल्पना भर से घबराहट हो आ रही थी। सेक्शन के लोग उसे बलात वहस म घसीटना चाहत थे। मगर वह चुप थी। हा, मन-ही-मन मोच रही थी कि कह-चिता न करो। बहुत जल्दी अब ऐमा समय आन वाला है जब पाइवट फर्मो म तो होगे रेगुलर रोल पर आदमी मरवारी दफ्तराम नीचे हाग मिफ डेलीवेजर । क्यामि दिन पर दिन हो रहे विकास क कारण ऊपर वालो वे बच्चा की तादाद अब इतनी अधिक हो गयी हानि उह ही खपाना कठिन हो रहा है । इसीलिए ये नयी-नयी स्कीम या तरकीबें चालू की जा रही है । पर वह पिर भी बाल कुछ भी नहीं पायी। केवल फटी-फटी आखो से देखती रही सेक्शन को । एकाएक उनकी आखे टाइप- राइटर पर चढ़े डी०जो० काम पर सिमट आयी। डी० ओ० पाम पर अशाक चिह्न के नीचे छप 'सत्यमेव जयत' को देख उसने कुछ राहत की- मी मास ली। तभी एकाएक उसे लगा, जसे उस चिह्न के नीचे लाखो- करोडा लोग श्रद्धानत खडे है । उनके जग प्रत्यग में कुछ ऐमा विश्वाम है कि जमे वे सोच रहे हो-जब एक बार इस चिह्न को साक्षी कर हमने डेलीवेजर/31 यह प्रतीक्षा की है रिदम हम धरती पर गमना, मापणीन तथा ममान अवमगवा गमाज पी मराना मारपणे ही दम ली तो फिर -हद है छह दिनय याद गरिन 4 पगार हा वाला पाटगे एट Tो यहा लागू नहीं हुआ --चाव अब अपन पूर 'यूनि पनपन पर उतर आया था-हा, तीन महीन याद ग्रेप वाला पकरा तरपीर यहा भी चल पडी --मजा यह है कि श म छायो मारी बुराइया का दाप व्यापारिया मगर मढ़ दिया जाता ।-यामिक विचाराचाल नायर का भी उचित अवगर गा मिल आया-कार से बातें गरीया की भलाइ वी । पर अस्मिता अब भी मौन थी । अनुभाग की याता न उमा राम- रोम का पा दिया था । सक्शन व लोग अब पूरी तरह मे डेलीवजर और उनकी समस्याआ पर एस वहस पर रह थे, जैस पूरी ससद इसी कमरे म सिमट जायी हो। इतना ही नहीं, कई लोग तो आत्महत्या करने वाल की पत्नी और उसके तीन दिन के भाग बच्च तक की बात करने लगे थे। मगर जस्मिता चल गुमसुम-सी बठी थी। अत्र ता उस यह भी याद हो जाया था कि आज का दिन ता वह दिन है जबकि थोडी दर बाद उसे पिछन कई बारा की तरह प्रशासन विभाग म बुलाया जाना है । वहा खडे होकर बिना क्मिी लिखित के उस लबी चौडी हिदायत भर सुननी है-- क्ल से नियमानुमार दा-तीन दिन के लिए उसकी मर्विस वो ब्रेक दिया जा रहा है विना किमी प्रतिवाद + उम सरकारी दफ्तर के अदर आ सक्न के अधिकार वाला पाम लौटाना है इन हिदायतो की जवलना का सीधा जय होगा नौकरी से पूरी तरह निकाला जाना, आदि-आदि । तभी तो वह बाता म शरीफ कहा म हाती। सहमी-सहमी बीच-बीच म जहा दरवाजा की जार दखती थी। वही उम बडे अधिकारी के मिलत रह्न की बात याद हो आती थी । 32/ नकीराम की चारपाइया 8.शिकायत दफ्तर स आवर दिग्विजय न अभी जूते भी नही उतारे थे कि उसका राहुल उसो पाम आर खडा हो आया। कभी वह टुकुर टुकुर पिता को देख रहा था तो कभी ग्माद म खडी अपनी मा तथा दीदी को । स्पष्ट था वह आज विमीन किमी की फिर शिकायत करने वाला है। बचारे को अभी इननी समक्ष नही हा आयी है कि घर म पाव रखत ही शिकायत नहीं परत । सवस छोटा जा है। पहले पहल उसकी शिकायतें यह भर हाती पी--आज बड़े न आज छाट ने आज मा न उस नाहक मारा है। पर अत्र उमकी शिकायत वसी हो आयी हैं जिनके माथ जुडनी शिकायता के वारण घर म अक्सर लबी चौडी महा-सुनी हो आती है। दिग्विजय ऐमी ही कहा-सुनिया स तो तग था। फिर आज तो वह ऐसी कहा-सुनी स बिल्कुल बचना चाहता था। आज उसन फैमला जो कर रखा था-बल महगाई- भते मी विश्ता वे जा पम मिले थ उनमे वह बच्चा व एक साथ पटें आदि परोदगा। तापि पुछ तो घर म शाति रहे । इसीलिए उमन राहुन के पडे हान को अनन्यो पर दी। पर रत्ना थी कि तभी एवाय ही वाल उठी-- गह पल इधर आ। अब एक दिन इसकी टाग तोडनी पडेगी । देखो -इमरी क्या तोडेगी-ताड उसकी जिसन 1-बडे को रत्लास विद थी। चाग राहुल वहा में अपनी बात कहता। घबराबर रसाई के पास पगम मगड़ा हो गया। मगर राहुल प राहे होन तथा घर के वार्तालापो पानागपारिविनय पथरा उठा। उस यह अदाजा लगान में जरा कोरा नहीं लगी भार बार कुछ-न-कुछ मुमीवन ना पहाड टूट आपा है। पिछल कर्द गिना म एमा ही ता हो रहा था। कई बार तो छोटी घाटा सी बात इतनी सगीन हो जाती है कि दिग्विजय का दम ही घुट जाता था। वह तो इन दिना अक्मर यही सोचता था-क्या कभी उस इम माहोल से मुक्ति भी मिल पायगी कल भी ता एसा ही हुआ था । वह चाहता था पहल वच्चा का कपडे बनाय। बच्चे चाहत ये पहले वह अपनी पट बनायें। इसीलिए चाहत हुए भी वल कुछ नहीं हो पाया था। हा, मुबह बच्चा के क्पडा पर फैमला हुआ था। वह भी जब नया मोड लन लगा था। इसीलिए पहले तो वह टालन का मा अभिनय कर सोफे पर बैठा रहा। फिर एकाएक उठ घर को चीजा तथा परिवार के लागा को दसन लगा। और तो उस घर में सभी कुछ सामाय लगा। असामा य लगा तो केवल रत्लश । वह घबराया घवराया-मा दाटी के पास तखतपोश पर वठा था । शायद वह दादी के उस गाने की प्रतिमूर्ति बन आया था जा इन दिना वह अक्सर गुनगुनाया करती थी। दिग्विजय का मा के इस गान म चिढ थी। खासकर तव जव वतन मलत वे कहा करती थीं-करम गति बलवाना, गिना भोगा नही जाना वैसे रत्नेश के हाथ म इस समय स्तिाव थी। पर वह कभी टुपुर टुकुर मा को देख रहा था कभी उस दीटी को जिमन टाग ताडनी पडेगी कहा था । उसका चेहरा उतरा हुआ था। जस कि वह अपन को पड मवने वाली सभावित मार भर में जदर ही-अदर काप रहा हो। इसीलिए निग्विजय एक भूगे शेर की तरह उमी पर गरजा-क्या तूफान मचाया है रे तूने मेरे खयाल मे नून ही --उसने क्या मचाया है । वह ता आपन खुर मचा रखा है। यह उसको यशोधरा थी-तुम्ही जो बच्चा को दखत हात तो मेरे वच्च एम थोड ही विगटत । एम नवर थाडे ही उनके आत । इतनी लापरवाही योडे ही होती जो क्ल खरीटी क्तिाब आज ही अब ममझा कि हजरत किताव खो आय है । बहत पहत दिग्विजय का खून खोल आया था। क्रोध बकावू हा आया । इन निना उम ऐमा ही गुस्सा आता है । गुस्मे म वह इतना अधा हो आता है कि यदि दूसरा उन रोके नहीं तो जान वह क्या कर डार। फिर आज तो उमन अपनी पट मरीन का विचार छाड उमली किताब खरीटी थी । इमीलिए -अच्छा 34 / नोराम की चारपाइया उसन आव देखा न ताव दखा एक हाथ मे रत्नश के बाल खीचे । दूसरे से उमे जोर स दो थप्पड जड दिये । इस पर वह जोर से चीखा क्या कि उसन बाना को और भी क्मर उसे हवा म उठा एक परिक्रमा करा डाली। शायद अब वह पिता नहीं रहा था। पूरी तरह क्साई वन आया था। --मार डाला मार डालो। कापी किताबें बच्चा का दे नही मक्त। -~~-अब यशोधरा जपने को रोक नही पायी-मारो मारा एक इसे क्या हम सबका मार दो। खाने को तो दे नही सक्त । मारन को वस, अब क्या था कि पत्नी की बात सुन उसकी आखा र आग अधेरा छा आया । घबराकर उसने रत्नश को छोड दिया । अलवत्ता वह पागला की तरह पानी को देखता-देखता भर रहा। वह भी कुछ एमे जैसे उमें स्वय पर तक मदेह हा आया हा—वह सचमुच ही कमाई तो नहीं? पिता तो बच्चा का पालन करता है । वह जबकि इस बीच उसकी गिरफ्त म छूटत ही रत्ने दारी स जा लिपटा । नतीजा यह कि उसन रत्नश को पुन तो धूरा, पर मा को देखत ही उसके लिए अव मा और रत्नश का दखन रहना ही कठिन हो आया । झटके के माय कमर म आ सोफे म विफर गया। पर तभी उसे लगा जैसे उसके सारे बच्चे उससे शिकायत करने लगा। वटा कहता है--जो बच्चे फस्ट आत है उह दो-दो, तीन-तीन टयूशन पढाये जाते हैं। एक हम हैं जो रत्ना कहती है या तो हमारे लिए टेलीविजन लाओ या हमें दूसरा के घर जाने दो राहुल कहता है--पापा मैं कमेटी के स्कूल मे नही जाऊगा । वस वाले में जागा । इतना तो क्या एकाएक ही उसकी यशोधरा कहने लगी-इनमे कुछ मत कहा । इनकी जैसी तनखा वाला वे पर क्या है, क्या नहीं है? इनसे बहन का लाभ क्या कहा उममे जाता है जो दूसरो की मुने कहा उससे जाता है जिसके पास निल हो उससे नही, जो पत्थर हो । ये तुम्हारी एक नही सुनेंगे । ये मुनेंग आज भी उनकी परियाद जिनकी जिंदगी भर मेवा करवाकर इहाने मेरा शरीर मेरे वच्चा के लिए तक, मेरा रहन नहीं दिया। य तो शुभ म ही गौतम हुए आज के योडे ही। उमने तो यशोधा और हल गोरस्मल्याम ये घर पर रहते हुए स्वामी है। उसनता सम्यक सभा को य मम्यर नजरो मे हमारा उपकार कर रहे है इनोन शिकायत /351 लिया था गोजा या 'चाचा ताऊ पिता की हमार जासू दियत है न इनको हमारा राना सुनायी देता है हूँ, में अधाह-मैं बहरा --दिग्विजय आवेशवा बडबडाउटता है । पर तभी अपन आरा-पाम विमी योन दय यह सहम जाता है । उमर जी मे माता है.-भागकर एसी जगह चला जाय, जहा दाणचन वी साम ले सके । मगर वह उटता नहीं है । बैठाया-वठा ही रहता है। शायद वह जान चुका था कि उसका नाम दिग्विजय रखते समय उस पिता ने उसा दिशा जीत हान को जो पल्पना की थी वह झूठी और यायी थी। क्यापि दिशाए सिफ भाव बोध भर है। उनके स्थूल होन पर तो उन पर की वात होनी चाहिए । जववि दिशाआ ये परे है कुछ नही । ससार या ब्रह्मांड जो कुछ भी है वह सिफ दिशाआ व अदर है । अगर यह बात नहीं होती ता वह बारह वर्ष की उमम पिता की अर्थी वा सजती दस चाह यह नहा वह पाता-अर, बाल इनव बदल तुम मुझे ले जाओ पिता जीत जा जब चाचा, ताऊजा ने उ ह भरे घर स उस गोह पहुचा डाला जहा गौशाला बनन से पहल गाय बघा करती थी, ता मौत के बाद हम यहा रहन दग मगर इतने लवे अनुभवों के बाद वह भाया व मामन खामाश नहीं रहना । यह अवश्य ही रहता-मैंन तुम्हें पढात लिखात समय न तिन दखा न रात मैंने तुमवा न उत्तर समझान दक्षिण और न पूरब न पश्चिम । तुम यह क्या कर रह हो । कम-से-बम तुम मा वे जीते जी तो पूरव-पश्चिम मत बनो। तुम्ह अलग देख ताई चाची खुश नही हाग क्या ---दीदी सौरमडल म क्तिन गह होत है । -राहुल दीदों से पूछता है। शायद उसकी कल परीक्षा थी -~-मुझे नहीं याद रत्ना के स्वर म मादगी थीमा मे योडr ही तो दर पहन उताया था उमन सौरमडल में कितने --दिखा नही क्या मर सौरमडल म क्तिने ग्रह है। यशोधरा खीज उठी थी---यह मेरा हो तो सौरमडल है जो पहल तो स्कूल की पाच दिना की मार दे वाद किताब आयी। फिर जब आयी तो हालाकि पत्नी की बात सुन उमर जी म माया कह-यशोधरा यह तुम्हारा नही मेरा सौरमडल है। क्याकि यदि यह तुम्हारा सौरमडल होता - - 36/नेकीराम की चारपाइया तो मैं तुमसे कहता। जबकि तुम मुझसे। मगर यह कुछ कह नहीं पाया। उल्टा अतीत की यादो के एसी यादो या विचारोमे उलझ गया जिसमे उसकी आखो के सामने वे क्षण उभर आये जब पिता की मौत के थोडे ही दिनो बाद चाची और ताई ने मा को पीटा था। मा को पिटत देख उमने प्रतिज्ञा की थी- वह चाह कुर्बान हो जाय । मगर एक्-न-एक दिन चाची और ताई को यह बतला कर रहेगा-धरती म जिंदा रहन वा हर उसकी मा का भी है। बल्कि उस सपत्तिपर भी उसका हक है जिसे हडपन के लिए तुम यह मव कर रहे हो। तब उसकी समझ इतनी ही भर थी कि मा को मा कहकर उसे 'दिलासा द। जबकि आज लव अनुभवा के बल वह जान चुका है यह धरती कोरी भावनाआ की धरती नहीं है यह धरती हानि और लाभ के तराजू की धरती है। यहा आदमी के अपने भी तब तक होत है जब उसके पाम कुछ हो । कुछ न हान पर तो आदमी के अपने बच्चे तो क्या, वह पत्नी तक उसकी अपनी नहीं होती-जा उसके दुखा की सहभागिनी होती है। चल्कि आज तो आदमी की दुनिया भाई-बहन मे हटकर उसका अपना परियार भर है । चाहे इस टूटन के परिणाम आगे चलकर कुछ-वे कुछ क्या न हो आये । अगर ऐमा नहीं होता ता जिन भाइयो को पढ़ा लिखाकर उसने चाचा और ताऊआ के बच्चो के बराबर ला खडा किया वे उसमे अलग होत । बल्कि यह इसी तरह के सोरी का नतीजा था कि एक जोर उसे यशोधरा का वह रूप दिखने लगा जिसमे उमन अपने दवरा और ननदो को अपन जिस्म के लोथडा से अधिक समझा था। दूसरी ओर उसी यशोधरा का वह रूप जो अक्मर बच्चा से कहती थी- अब तो तुम्हारी मा को भगवान तुम्हारे आसुआ को देखने भर को भी रहने दे तो काफी है। कम-से- कम तुम्ह कापी कितावे मागते देख मैं अपने को यह तसल्ली देनी रह- मेरे बच्चो की कापी क्तिावाको मेरे देवर पहले ही पढ चुके है । उह दुबारा तिबारा कैसे लायी जाय । धरती मे एक बार पढी किताबो को कभी किसी ने दुवारा पढा? अगर ऐसा नहीं होता तो क्या मेरे देवर यह भूलत अपना पेट काटकर उह बडा करने वाली भाभी आज प्नुरूसी वी मरीज है। प्लुरूसी के मरीज को दवाओ से ज्यादे खराक चाहिए होती है। कैसी खिला रहे हैं मुझे खुराक । और तो और अपने पतियो के सामने उनकी शिकायत / 37 । बस बहुए कहा करती है-वैसे तो जगह जगह कहती फिरती है मेरी ता वर्ग ही वहू हुई क्या नही रहती अपनी वडी पास य ही सार सोर या वातें थी कि अब उसके लिए सोफे म भी बठा रहना कठिन हो आया। बल्कि धीरे धीरे विचारा के कारण उसकी यह स्थिति हो आयो कि वह इमी क्षण ऐसी जगह चला जाय जहा स फिर लौट ही नही । वह ता मा की याद आत ही वह उठ नही पाया, वठा का बठा रहा । वरना जाने वह क्या कर डालता। क्योकि भले ही उमसे सवको शिकायते थी पर मा की उससे कोई शिकायत नहीं थी। होती भी क्स, भाइया को पढान तथा शादिया व क्ज वह आज तक चुका रहा था। फिर मा के पास रत्नश के होन का ध्यान आत ही उसे लगा जसे मा उसस इशारा ही इशारा मे कह रही है-दूसरी किताब ता ला दे नव अव क्या था कि वह अपन को सभाल नही पाया। वह झटक के साथ उटा । द क स बीस का नोट निकाला। मार्कीट की आर चल पडा । पर दो चार ही सीढिया उतर पाया कि उस सुनायी दिया-वटा शायद घर म सजी छान का भी तल डालडा नही । पाव भर -उफ 1-वह हाठा ही-हाठा म वुदबुदाया। लौटकर अदर आया। रसाई स डालडा का हिवा उठाया । सिर नीचे कर मोढिया उतरन लगा। उसके लिए पत्नी तथा बच्चा को दखना कठिन हो आया। उम तो डिब्बा उटात उठाते यहा तक लगा था जम वे सब उसमे वह रहे हा हम माफ कर दना । म तुमको तग करना नहीं चाहत थे। पर क्या कर हमारा मौर: मडल पाव भर डालडा या तल बन गया है। वम हम यह भी जानत हैं कि पहली तक के लिए तुम जिन चीजा को लाय थे व चार-पाच दिन पहले ही खतम है । पर क्या करें म मजबूर है । यही वजह थी कि अप उमका गला भर आया। वह अब जितना जितना आग बन्ना उतना उतना उसका वचागिता उस यामती-जाखिर उम बच्च का एम ता नहीं मारना पाक्षिा या आपिर जिस तरह से उमन रत्नश का वस मारा था माग्न बाा यह स्वय पाया उमरी यह ववसी थी-जा दराची व बाद ही तनगायी बतावी म प्रतीमा पिया परनी थी आविर उगका वह छ पिम माम वा जिताऊ- चाचा हया का तरह कपडा बाट कर 38/गम की पारपाच्या नयी सिलवाय? जबकि जितन म ऐसी एक पैट सिलती ह उतन म इतवारी बाजार से पाच पैट आ जाती है । वह भी उस माहौल म जबकि आज वे लाग तर इह पहनने लगे है जो कभी पहले कहा करते थे-बैस पहनते हागे लोग दूसरा के पहन कपडा को क्ल दिग्विजय की पत्नी ने भी तो दिया था ऐसा सुझाव । वह तव अवाक्-मा पत्नी को देखता रह गया था । उस पहली बार लगा था यशोधरा के कारण अब तक वह जिस गहस्थी की चूल को अडिग समझता था वह हिलनी शुरु हो आयी है। जबकि आज वह विचारा के ताने-बाना के कारण यशोधरा-सा ही सोचन लगा था। यह दूसरी बात थी कि ऐसे सोचा के बीच उसे यहा तक ध्यान नही था वह जिस तरह से बाजार मे जा रहा था, उसम वह भले ही वाजारू भीड म क्सिी जादमी से न टकराये । मडक पर चलती कारा स्कूटरा तथा साइक्लिा से टकरा सकता है । उल्टा वैचारिक्ता के बीच तो उसे यहा तर लगने लगा था जसे सामने की भीड म से एक जीब-मी आकृति उभरकर उससे लगातार कह जा रही है- मिया क्या तुम वही आदमी नहीं जिसने क्ल महगाइ भत्ते की किश्तें लेन में आपस म झगडत जपन कुलीगो का देख सोचा था कि उनसे कहे-कितना अच्छा हाता यदि आपस में झगडने के बदले तुम यह सोचत--यह कौन- सी महगार है जिसमे एक की किश्त बारह और सोलह दूसरे की पाच- पाच छ छ सौ क्या पाच पाच, छ छ सौ पान वाला के सूचकाका के निए क्वाली मिट्टी का तल, चीनी, गहू, चावल के वदत कुछ और चीजे होती है क्या तुम यही नही हो जिसने ऐसा सोचन के बावजूद किश्तें लन के बाद इस बात पर गव का एहसास क्यिा था कि कईया की तरह तुम्हारे ऐरियर को छीनन साहूकार आस पाम नहीं है । इतना तो अलग रत्नेश की किताब लेत समय तक तो उसकी मान- सिक्ता इस सीमा तक पहुंच आयी कि उसे लगन लगा जैस कोई उससे कह रहा है-शिकायत करना मरल है, शिकायत का मनात जब शिकायता का निरा अपार भरा हो तब तो और भिवापस तुमने कभी सोचा कि महगाई की जिन्न निरता के लटके रहने से शिकायत थी। वह इसलिए लटकी नई राहतो थी कि सरकार तुम्ह देना। शिकायत ३५ - नहीं चाहती थी। वल्लि इमलिए लटकती है कि सरकार जान चकी है एम तो वाबू कोई काम पर नहीं पाते हैं। इस तरह जमा ऐरियर से कुछ भर डाले। क्यावि जितना जितना वह अपन अगल-बगल यरीददारी करते लोगा को दखता उतनी उतनी उमदे मन म एवं टीस-मी उठन लगता थी। कपडे की दुकाना की ओर देखने पर तो उमका माथा फटने-मा लगता था। ऊपर मे गहुल की मार का दुःख अलग । हा. इसके बाद उसकी वैचारिक्ता एकाएर उस समय टूटी, जत्र पाव भर तल सुलाकर उसने ती पाच का नोट गल्ल पर बैठे सावनदाम की ओर बढाया। उसे उम्मीद थी दूकानदार उमे आठ आना लौटायगा। सावनताम था कि उत्टा उमी म एक रुपया मागन लगा । तभी ता उसकी वैचारिक्ता आक्रोश म बदल आयी थी। वह वाला था-बल परसा तो ओले नही गिरे थे। जेठ में तो सरमा नही होती जो दो-तीन ही दिन म तल अट्ठारह से चौबीस हो आया -~~वावू लना है तो ले, नही तो लोटा दे |--भला मावनदाम दिग्विजय को वहा से पहचानता। वह तो उसे उसी दिन स भूल गया था जब उसने उम फीस माफ कराने की गरीवी का प्रमाण-पत्र दन में मना किया था। वह तो सावन की आखा को देख उसने उसे एक रुपया पकडा दिया वरना वह जाने क्या-क्या कहता। क्याकि उमरे लौटत-लोटत भी वह झनाया था-करो न शिकायत दरबार मे भला इस पर दिग्विजय सावन से क्या उलझता। क्यानि अपन लब अनुभवो के वल वह भने ही गौतम नहीं बन सका था। पर इतना तो जान हो चुका था-परती का सत्य जहागीर की घटिया नही । बल्कि धरती या मत्य यह है कि पहल तो शिकायतें केवल हवाई पिर यदि कोई बहुत माहस बटोर उहे कागजी रूप दे भी तो चाहे शिकायतें सर्वोच्च स क्या न वो जार्य पर आज उसका भाग्य विधाता वह जिम ही खिलाफ शिकायत हो । इसीलिए उमन मुडवर सावन की ओर देखा तक नहो । हा घर आकर उसने रत्नेश को किताब कुछ ऐसे पकडायो जस जपने अभिनय भर में वह उसस बह गया हो-बेटा, तुम तो मेरा मुह देख शात हो आत हो। मगर मैं विमा मुह दखू 40/ नकीराम की चारपाइया ...पागल उसन मार्शीट व उम हिस्ग म अच्छा धामा तमाशा यहा परा रखा था जिधर हमारे राशन की दुकान थी। उधर डी ब्लाप को मडप को छाड पर मारीट पी आर देवन भर म आभाग हो आता था, निश्चय ही इधर कुछ मारपीट जमी वारदात हो आयी है। सबसे किनारे की दुकान चक्की थी । उमर पास वाफी लाग जमा थे। बापी मारी मावीट सुनमान थी। उम मुनमानी ये कारण तो कोई यह यकीन नही कर सकता था यह क्या सराजिनी नगर की मार्कीट है जिम दक्षिण दिली वी पगाट प्लेस तक इन दिना बहने लग थे। यहा हर ममय भीड रहा करती थी। पर आज छ हिस्मा म वटी मरोजिनी मार्कीट ये इम हिस्सम सुनसानी थी। मडक और दुकाना पर इने गिने ग्राहम थे । उनक भी चेहरा को ख यह जदाजा लग जाता था कि मामला कुछ मगीन है। फिर भीड की आखें मार्कोट और डोनार भी सहर पी और टिकी नहीं थी। टिकी थी सामन वाले उम पाक की ओर जिधर बिजली के प्रयाश म अक्मर बच्चे खेला करत थे । चवकी परखडे लोग उसके बारम अजीब-अजीब बातें कर रहे थे । आज वह उधर अक्ला या। पाय म आज उसया एकछत्र राज्य था। किमी और माझ की बात होतो तो मारींट के बच्चे उधर टनिस आदि खेलते दिखते । भार उधर आज वह अकेला था । उसकी आकृति बेहद भयावनी थी। इससे पहल वह सब्जी मार्कोट के मामने वाले नुक्कड पर हमेशा गुमसुम बठा रहता था। ‘वसे वह चालीस-पैतालीम की ही उम्र मे सत्तर पचत्तर का बूढा सा हो आया था। वह किसी से मागता भी भी कुछ नही था। उस पर तरस /41/ या योई उस कुछ द दता ता वात अलग थी। आज चीथडे-चीथडे हुआ उमया कुर्ता व पायजामा क्वल अपन पूवरूप को या दिला रहे थे। कभी वह एक टाग का उपर उठाता, कभी दूसरी टाग व बल छलागें लगाता मार्कीट वे समानातर चलता रहता कभी दाना हाया यो मिर स ऊपर उठा अजीबोगरीब तरीके म हिलाता कभी हाया से दोना बाना को बद कर हाइट हाट हूरहूर कर चिल्लाता कभी हाथ व पावा के बल जानवरा की तरह चलन लगता यानि कि वह आज अपन बिल्कुल ही नय रूप म था। वम वह अभी एमा कुछ नही कर रहा था जिसस लोग आतक्ति हा या वहा से भाग पडे हात या दूकानदार अपनी दुनाने वद करत । उमन इतना अवश्य कर डाला था कि मार्कीट 4 इम हिस्स की आर क्वल व लाग आग बढत में जिन लिए इधर आना मजबूरी थी। यह दूसरी वात थी कि इस हिस्स म आन वाल हर व्यक्ति का सिफ यही प्रयास होता कि जितनी जल्दी हो सके अपने को निवटा वह मार्कीट 4 अय हिस्मा की ओर चले जायें। वाकी मजबूरी वात लोगा के अलावा अय उसकी हरवतें देय मार्कीट कालबा चवर सा काट लौट पडत थ । बम एच जाकार म हान के कारण दूसर हिस्सा म आसानी स जाया जा सकता था। क्याकि मार्कीट के बीचाबीच से भी इधर उधर जाने के रास्त यहा पर मेरे लिए इमी हिस्स की आर जाना मजबूरी थी। एक तो राशन लेना था । दूसरा मैं इस हिस्म के उस दुवान को जानना चाहता था जिसक साय इम पागल का सवध लोग बता रहे थे। वैस मैं सरोजिनी नगर के उन पुराने वासिंदा म स था जिहाने इम माऊट को बसत देखा है । पर लाख प्रयास करो पर भी मुझे यह याद नहीं आ रहा था जब इस आदमी को कभी मैंन इबर की क्सिी दुकान पर मालिक या नौकर की हैसियत स देखा था । जवकि मैं इम मार्कीट के हर दुकानदार को सूरत शक्ल से तक जानता हू । बल्कि यहा तक जानता हू दि इनम स क्तिना की दुवाने आम पास क अय नगरा म भी है। लोगों की बाता पर एक्दम विश्वास भी नहीं किया जा सकता था। लाग इधर आने वाले हर नय व्यक्ति को यह बता रह थे कि इसके बारे म य बातें इधर के एक सरदार ने बतायी है। इसकी - । 42 / नकीराम की चारपाइया मा के मरत ही इसकी सौतली मा तथा इसके सौतले भाइया ने इमस दुवान छीन ली इसे मार मार कर घर म निकाल डाला तव यह तरह वष का था। मा के भरत ही यह एक बार फिर रिफ्यूजी आ बना पहल- पहल रिफ्यूजी बनन म इस सरकार न तथा नगरपालिका आदि न मदद वीथी पर इस बार इस कौन मदद करता मगर यह हिम्मत हारन वाला जादमी नहीं था। धीर धीर इमन खिलोन बनाना सीखा दो चार माल बाद तो यह रावण वनान का ठेका लेन लगा दखत-देखत इसन अपनी बहन की शादी कर दी और फिर यह इसी मार्कीट में आकर रहन लगा। इसी तरह खिलौन आदि वना यह अपना दरगुजर क्यिा करता था अव उसन और भी भयानक रुख अख्तियार कर लिया था। बार बार वह पाक के काटा वाल फेस को लाधन का प्रयत्न करता। अपनी पूरी ताक्त स काटदार तारा का दवाता। यह अलग बात थी म पार कर सक्न म वह सफल नहीं हुआ। अपनी असफलता देख अब वह उस गेट से कुछ बाहर आता जा कि उस पाक में जाने का एकमात्र रास्ता था। फिर जबर पाक म चला जाता। अव उसके हाथ म पत्थर था। धीर- धीर ऐमा करने के बाद वह पुन हू हा करत पाक म ही चक्कर काटन लगता । इस कारण अव मार्कीट के इस हिस्से म इक्क दुको लोगो का आना भी लगभग वद हो गया था। और ता और अब इस ओर के दूकानदार तथा ग्राहक भी घबरा आय थे । ऐसा स्वाभाविक भी था। दूकानदार और ग्राहक घवराय से दुकाना के अदर सिमट जाये थे । अलवत्ता इस मौके का फायदा उठाता एक बछडा एसा था जिस पर उसका जरा भी अमर नहीं था। वह इधर की एक मान चक्की व सामन उस जगह अपनी धुन म था जहा भी गहू साफ करन वाली बठा करती थी। शायद उधर वह कूडे म गहू के दान वीन रहा था। वह भी कुछ एम जसे कि उस जीवन म पहली बार मुहमागी वस्तु मिल आयी हा । किमी और समय की बात होती तो कोई न-कोद बछडे को मार मार कर भगा देता । बडे नही तो बच्चे कम-से-कम उसे छोडते नहीं। पर इस बार उसकी वजह से उसकी ओर क्सिी का ध्यान नहीं था। अब मेरा पागल | 43 ध्यान पूरी तरह उस पर केंद्रित हो आया था। मुझे उमका उह खाना भला लग रहा था। बल्कि उसके निर्भीपपन ने ता मुझमे तर साहम भर दिया। उमी की वजह म अब मैं अपनी गशन की दुकान की आर बढ रहा था। अभी पाच-मात ही दुशाने पार कर आगे बढा था कि मैंने पाया-सभी दूकानदार भूखी भूखी नजरा से मुझे देख रहे हैं। वह भी कुछ ऐस जैमे में अकेला ग्राहक ही सही, पर एमा ग्राहक ह जा उनकी आधे दुकान के सामान को खरीदन निक्ला है। यह बात दूमरी थी कि जस ही मैं एक दुवान से माग वढता उस दुकान के दूकानदार के चेहरे पर मातमी काली स्याह लकीरें पड़ आती । वह फिर घूर घूर कर पागल की ओर देखन लगता। उनके चेहरी पर एसे भाव उभर आते जस उनका यदि बस चलता तो वे पागल की वोटी-चोटी उडा दत। इतना तो क्या, उनको आखा स एमा लगता था जम वे राखा ही आखा स रहना चाहत हा-ठीक मौके पर यह कवन कहा स आ फना । इसने तो दशहरे के त्योहारी दिना के पहले इतवार का उनकी रोजी रोटी तर छीन डाली है । इस दिन का ता व महीना म इतजार कर रहे थे । जाज के दिन तो हम बहुत बडी वित्री की उम्मीद कर रहे थे। मुश्किल से एक तुम हिम्मत कर आये और तुम भी आगे खिसक गय । कुछ तो हमारा खमाल क्रो- बस इधर वे दुकानदारो का ऐसा सोचना जायज था । आसपास नयी वस्तिया के फ्लाव के बावजूद दूसरी मारींटा म अभी सारा सामान नहीं मिलता था। फिर इस मार्कीट को नयी दिल्ली की व्यवस्था न चमका भी रखा था। यहा सभी जारी सामान मिल जाता था। इसीलिए यहा दूर दूर स लोग खरीददारी करने आते थे। इस मार्कीट को देखकर तो ऐमा लगता था कि इस मार्कीट को बनाने वाले ने आने वाले हिंदोस्तान की तरक्की का पूरा अदाजा लगा लिया था। पहली के बाद के इतवार के दिन तो इधर का लुत्फ ही कुछ और होता था । ग्राहक माल के बार म "पूछत-पृछत तग जा जाता था। दूकानदार की यह स्थिति हाती थी कि एक हो तो उत्तर दे, मवको एक साथ कसे उत्तर दें? भला एमी विक्री वाले दिन दूकानदार खीजत नही तो और क्या करत? मगर मजदूरी थी कि किया कुछ नहीं जा सकता था। 44 / नीराम की चारपाइया उघर वह अब पाक के अदर ता अलग, इस हिस्स की सड़क पर बीच-बीच म आ उछल-कूद करने लगा था। इतना तो अलग उमन एक वार सडक के किनारे पडी चारपाइया तथा कूड-बाड का कुछ एस धक्का दिया जमे वह वहा कुछ खास चीज खोज रहा हो । पता नही वबदला लेन को कुछ खोज रहा था या उधर उसकी काई खाम चीज थी। इधर अब दूकानदार थे कि उसे एसा करते दख अपनी अपनी दुकाना के आग बरामन मे खडे हा आये थे। वह भी लगभग एसे जंस उन सबन यह निश्चय कर लिया हो- यदि उसने इमसे आगे खुराफात की तो वे एक साथ उम पर पिल पडेंगे। मैं भी अब अपनी राशन की दुवान के बरामद म खडा था । उसकी हरकते देख घबरा आया था। जी चाहता था विना राशन लिय लौट पडू । मगर मेरी मजबी थी। एक तो मेरी पर्ची कट रही थी। दूसरा अदर गल्ल पर वठे लगभग पचासी साल के बूढे दूकानदार को दस मुये उस बारे म जानने का लालच हो आया था। पर मैं अभी उस तक पहुच भी नहीं पाया था कि लगा बूढा बडबडा रहा है । दूरी के कारण उसकी बात मै सुन नहीं पाया । इसीलिए और भी चौक ना हो बूढे के पास खडा हो गया । वह फिर भी धीरे से गुनगुनाया । बहुत जोर देन पर ही इस बार मैं वेवल सुन पाया-माया महा ठगिनी । बस, इसके बाद पता नहीं वह भी मेरे मनोभावो को ताइ गया या क्या बात थी। मुझे अपनी और बातें देख मुझे सबोधित करते हाथ जोडत बोता- बेटा, जैसी इसकी हालत हो आयी है वसी भगवान विमी की न कर। कहा दस पद्रह लाख का आदमी। कहा लायो की चपत तो बेचारा सह गया । मगर औरत जोर बिटिया की मौत बाबा क्या यह इधर की क्सिी दुकान का मालिक था ? यास ही मेर मुह से निकला था। हालाकि उसकी बात सुन मेरा माया झनझना आया था। हा बटा कहते-कहत बापा ने एक गहरी उसास भरी थी। एक बार छत की ओर देखा। फिर भर्राय भर्राय स्वर म बोला-यह दाये हाथ की ओर उसी दुकान का मालिक था जिस पर मोटे माटे अपरा म अना- पागल / 45 जाज लिखा है-ईमान की कमाई म ही ताक्त होती है। मैं जब अवाक सा वाना को देखता भर रह गया था। उसके सक्त की दुकान को पहचानने की कोशिश कर ही रहा था कि पीछे भिड भिड की आवाज सुन चौक पड़ा । झटके के माथ वरामदे के बाहर ही पहुचा था कि दखा-पहले तो वगत की दुकान पर खडे स्कूटर को उसे गिरात दख एक आदमी ने उसकी पीठ में भद्द में एक लटठ दे मारा। फिर वह अभी सभलता या न सभलता तीन चार आदमिया ने उसे धर-दबाचकर जमीन मे गिरा दिया। जवकि अब वह एक आर जोर जोर से "मार दिया मार दिया ' चिल्ला रहा था। दूसरी ओर वछिया थी कि अपनी दुम पीछे की दो टागा म दवाय पागल की ओर बढती भीड का चीरत आदमिया के घेर म वाहर निकल रही थी। इसी के साथ कुछ लोग थ कि उस मारत लागा मे कह रहे थे-ज्यादे मत मारो कही यह मर न जाय । पर अधिकाश लोग ये कि उसकी पीठ और टागा पर खडे लागा का महानुभूति से एसे देख रहे थे जसे कि उसे मारन वालो ने रावण से भी अधिक खतरनाक आदमी को परास्त कर कोई बड़ा काम कर डाला हो - 46/नकीराम को चारपाइया ...मै, मेरी दरोज और चूहे मैंन जब पहली बार दफ्तर में अपनी मीट के नीचे चूहा देखा ता मेरे आश्चय का ठिकाना ही नहीं रहा। आश्चय इमलिए नहीं हुआ कि चूहा दफ्नर की विडिग के हर दरवाजे पर खडे होमगार्डों की नजर वचा, जदर क्से घुस आया । क्यावि वेचारा होमगाइ तो केवल सरकारी कम- चारिया के पासा को चेक कर मक्ता है दूसरो की आखा म धूल थोकने की विद्या म निपुण चोर उचक्का का नो वह नही पक्ड सक्ता। फिर इन उचक्ये चूहो पर उसका क्या बम जो दीवारा और धरती को अदर ही- अदर कुरेद कहा से कहा पहुच जाते है । मेर तो आश्चय का विषय था-- ये क्वख्न दपतरा म खासे क्या होग? क्योकि मैं तो दफ्तरा म घरो की तरह इनके खाने के लिए अनाज आदि कुछ देखता ही नहीं था। दन भी क्या पाता ? फाइला व कागजा के अलावा कुछ हो तभी तो। मगर चूहे मिया तो चूह ही थे। मेरे आश्चय को और भी अधिक बरन के लिए वह आख मिचौनी से खेलन लगे । कभी खरगोश की तरह चुनाचे भरता खुमुर-बुसुर करता फाइला को सूधन लगता, तो कभी बड़े रोव से रैक पर चढ जाता, तो कभी मेरे मामने वाली सीट पर रखी टाइप- राइटर पर चढ जाता। जमे उसे विश्वास ही न पा रहा हो कि जहा वह है, वहा ऐमा हा ही नही सकता है कि खान के लिए अनाज आदि न हो । मुझे उस नासमझ की बुद्धि पर तर आया। जी म आया, इसे समझाऊ-भई, इस दफ्तर का नाम खाद्य मत्रालय अवश्य है पर यहा तो मात्र खाद्य की स्थिति व माध की समस्या का लेखा जोखा रहता है । यह भी देवल कागजो और फाइला पर। जानते हो, यह देवताआ के भी देवता महाराजा / 47 / का कार्यालय है। अगर मिया, तुम्ह भूख लगी है तो तुम किसी लाला जी की दुकान म जाओ, किसी किसान के घर या खेता म जाओ जहा अनाज होता है। किंतु मैं उसे समझाता क्या? आदमी हो ता उसे समझाऊ भी। इस जानवर को क्या समझाऊ, जो न मेरी भाषा समयता है और न मैं ही इसकी भापा बाल पाता हूँ। हा, केवल समझान के लिए विवश-मा उसकी ओर देखन लगा। मेरा देखना ही था कि वह चौक ना-सा मुझे ही देखन लगा। मुझे उसकी बुद्धि पर अब और भी तरस आया। मैं कुछ हस-सा पडा। मेरा हसना था कि वह एसे भागा जैस उसे सदह गया हो कि कही उसे पकडकर जेल म बद न कर दिया जाय । इसके बाद जान इसकी भूख मिट चुकी थी या वह भय के मार इधर- उधर निकलना उचित न ममझ रहा हो, वह मुझे काफी दर तक दियायी नहीं दिया। मुपे भी उसके बारे म अधिक गौर करने का मौका नहीं मिला। क्याकि तभी हमारे अडर सेक्रेटरी माहब कमर म ही आकर कह गय ये- सार मेक्शन के तोग काम पर जारा से जुट जाओ । 'पालियमट क्वश्चन है। हर प्रात की फाइला को अच्छी तरह देखा कि किम प्रात म भुखमरी के कारण क्तिन आदमी मर । इस बात का ध्यान रखना कि स्टेटमट निल नही होनी चाहिए । वना पार्लियामट के मबर वौखला उठग । बाल की खाल उधेडना शुरू कर देग। अडर सनेटरी साहब कमर में जा चुके थे। उनका जाना ही था कि हम सभी फाइला को सोलने लगे। फाइला के खुलन स मरे म एक अजीव प्रकार की आवाजें होने लगी जो मुझे चूह मिया की फाइला को सूधन की खुसुर खुसुर मी लगी। मगर किसी भी प्रात को रिपोट म भुखमरी के कारण मरा एक भी कम न मिल पा रहा था जा मैक्शन आफिसर सहित हम सभी + लिए सिरदद का कारण बन गया था। तभी चपरासी हजारीमल को एक तरकीय सूझी। उसने सुझाया कि अगर पिछन साल के सार अखवार इवटठे क्यि जायें तो शायद कुछ काम वन जाये। क्यापि कभी-कभी एसी मौता का हवाला अखबारा म तो छपता ही है । उसका सुझाव यद्यपि छ हद तक सफल हो सकता था पर समस्या यह थी कि पिछले साल क सारे अपवार से इक्टठे किये जायें और उह दवा से जाये क्याकि अगवारा 48 / नवीराम की चारपाइया मे भी ऐसी मौतो का हवाला इतने मोटे अक्षरो मे तो छपता नहीं था जो अखबार उठाते ही पढा जा सके। अखबार वाले भी क्या कम चालाक है। तभी टेलीफोन की घटी बज उठी। सेक्शन ऑफिसर साहब ने टेलीफोन उठाया-हैलो-हेलो हा जी, हा जी-स्टेटमट बन रही है--जाप फिकर न करें-नही, नही, 'निल' रिपोट नहीं होगी। क्या कहा है जी- रिपोट बनावटी बिल्कुल नही लगगी तो फिर स्टेटमेट के चार कालम बनाय-हा जी, पहला कालम--सीरियल नबर, दूसरा कालम राज्य का नाम---हा जी,-तीसरा कालम प्लेस आफ डेथ हा जी,-चौथा कालम, -टाटल डेथ नवर--हा जी, सब आ गया समझ में सेक्शन आफ्मिर साहब चोगा रख चुके थे। झुककर अपनी नोट बुक पर कुछ लिख रह थे। शायद स्टटमट में बताय कालमा को लिख रहे थे। पर उनका चेहरा पहले से काफी विचारमग्न हो आया था। सहसा सिर के वाला पर हाथ फेरत हुए वे पुन हम सभी को देखने लगे। फिर एक गहरी उसास भरत हुए बगल में बैठे स्टेटिस्टिकल असिस्टेट सरदार जी की ओर देखते हुए बोले, मरदार जी, आप तो स्टैटिस्टिक्स म माहिर है, कोई तरीवा सोचिा तो।" "जी साब, मै तो पहले से ही सोच रहा हूँ।" सरदार जी जपनी दाढी को सहलाते हुए बोने । फिर अपने चेहरे को और भी गभीर बनाते हुए टेबुलेटिग मशीन की ओर देखने लगे । मैं भी गौर से अपने बगलवाली सीट पर रखे टाइपराइटर को देखने लगा । मुपे कुछ भी उपाय नहीं सूझा । पर तभी सरदार जी बोले, 'साहब मुये तो कोई और उपाय नहीं सूझ रहा ह। केवल एक उपाय सूझ रहा है हर प्रात के बडे-बडे शहरा का नाम अलग-अलग नोट क्यिा जाय। फिर यह अदाजा लगाया जाय कि हर पाच शहरा के पीछे औसतन एक आदमी मर सकता है । इस तरह स्टेटमेट तैयार पर लिया जाय।" सरदार जी का सुपाव सबको माय हो आया । सेक्शन आफ्मिर न सवको आदश दिया कि एक वागज पर पसिल से बडे-बडे शहरा का नाम नोट करा । मैंने पंसिल निकालन को दराज योली ही थी कि मुये लगा जैसे पिसी चीटी या विमी विच्छू 7 मरा हाय काट दिया है। मैन दराज की मैं, मेरी दराज और चूहे / 49 - ओर देखा ही था कि एक चूहा उछनकर मेरी छाती पर चढ जाया। मैं इम अप्रत्याशित चूहे के आक्रमण की कलना भी नही कर सकता था मैं उछल पड़ा । फाइलें इधर उधर विजर पड़ी। स्याही की दवात भी गिर पड़ी। तभी वगलगीर बोला 'वाह, तुम तो बडे डरपोक हो । एक छोट स चूह स डर गय। मैं अप मा उठा। कपडा को झाडता, पाइला का मभटता पुन पूववत काम पर जुट गया। स्टटमट भेज दिया गया। कुछ लोग लव पर चले गय थे। मैं कमर म ही बैठा था। क्याकि आज श्रीमती जो सुझाव के अनुमार पसा की तगी से तग आकर पहती बार रोटिया लाया था । पर चूह मिया के कारण झटक के साथ दराज खोलने का साहस न बटोर पा रहा था। मैंने धीरे मे दराज खोली ता चूहे मिया फिर दराज म ही निको । मगर इस वार वै मुय पर उछले नही । धीरे से दराज से बाहर निकल भाग । मैंने गौर से राटिया का देखा ता काध मारे आग बबूला हो गया। मेरी नयी रूमाल का चूहा तीन जगह से काट चुका था। वस्ल इस चूहे को भी मैं ही मिला । म हाठा म बुदबुदाया । यद्यपि चूह की जूठी राटिया ग्रान की इच्छा नहीं हो रही थी, पर विवशता भी काइ चीज होती है । जूठी जगह म राटिया नोच-नाचकर मैं खान लगा। तनी मैंने नपा कि चूह मिया कुछ दूरी पर से शिकायत भरी नजरा मे मेरी आर ही दख रहे है । मुझे गुस्सा तो उस पर आ ही रहा था। धीरे से वोला "भाग जा चोर माला कही का।' मगर चूहे मिया भाग नही बल्कि छाती तानकर मिर उठाकर मरी जार कुछ इस तरह देवन लगा जसे कहना चाहता हो-वाह माहब वाह, एक ता गाना न देकर हम इस तरह पाने का मजवर करत हो, उस पर भी अपनी ही मिखायो विद्या के कारण हम चोर कहत हो । तुम तो वडे ढागी आत्शवानी हो । वहा है आपका वह आश जिसवा तुम जगह-जगह ढिंढोरा पीटन हा-मब मनुष्य बरावर हैं, सब समान हैं। मनुप्या के लिए तो तुम्हारा यह आदश ' हम वचार अमहाय पशु-पक्षिया के लिए आश अलग अब मैं उसका दखना अधिक वरदास्त न कर मका। पाव उमकी ओर बढाया ही था कि वह पाच छह कदम पीछे भागार पुन मुडवर मुझे रखने लगा, । 50/ नवीराम की चारपाइया । जमे अभी ऐमा ही कुछ और कहना चाहता हो । पर फिर मैंने उसकी ओर दमा नहीं। रोटिया खाकर हाथ धोने बाहर चला गया। बस उस दिन के बाद तो मेरा भी एक तरह मे राटिया लाने का स्टीन चन गया । साथ ही मिया चूह का भी दराज मे रखी रोटिया का चुपके से खा जान का । राटिया खाते ममय चूहे मिया को कभी-कभी गालिया भी देता । मुझे युझलात देख मेरे एक दो कुलोग जो मेरी इस झुयलाहट को जान चुके थे, मुये मलाह देत--भई, चार-पाच रुपय का टिपित कैरियर ल आआ । वस, तुम्हारी झुपलाहट दूर। मैं उनका धयवाद अदा करता। मन ही मन योजना बनाना कि अबकी पहली को जरूर टिपिन कैरियर खरीदूगा। पर पहली को वनिया, दूध मकान का किराया व कोयले का विल पूरा करने की समस्या खडी हा जाती। टिफन कैरियर का विचार धराया धरा रह जाता । अलबत्ता रोटिया को दराज से निकालत समय पीज अवश्य उठता । इस तरह चार-पाच महीन गुजर गय । इही दिना महाराज इद्र की बड़ी कृपा हुई। सभी वनों को आठ आठ रुपये तनख्वाह वढान का ऐलान किया गया । मेरी प्रसन्नता का ठिनाना ही नहीं रहा कि तनख्वाह के अलावा तीन महीने के चौबीस रुपय जो एरियर मिलेंगे उनसे दिन पर दिन बढती महगाई से लड सबू या नहीं, पर इस क्बस्न चूह मे अवश्य लडाई लड़गा। टिपिन-करियर अवश्य ले लूगा। पर उन दिना जब भी चूह को देखता तो लगता जसे चूह मिया शिकायत कर रह हा-यह अवेले-अकेने खान की दिन-पर-दिन बढती प्रवति क्या अब तुम भी शुरु कर दागे । अगर एमा करोगे तो हमारा क्या होगा? हम तो भूखे मर जायो। आखिर हम भी तो प्राणी हैं । उसकी इस शिकायत से मैंने एक तरकीब मोची। उसकी शिकायत भी ठीक ही थी । रोटी यात समय दा चार टुक्डे इस लिए सीट के नीचे पत्र दूगा। मगर टिपिन-करियर लाऊगा जार । जूठी रोटी तो नही बाने पडेगी। जिस दिन एरियर के हाय मिलने वाल थे, उम दिन एक अजीव घटना घटी। मेरी तबीयत खराव थी। मैं वही मीट पर लेट गया। तभी क्या देखता हू ति दराज म एव चूह की ही शस्त की अजीय आति मुयमै वह मैं, मेरो दगज और चूहे / 51 रही है-भर दोन, तुम्ह हम एव राज की बात बतात है। परमीशन का चेयरमन गाहन का नाम ता तुमन गुना ही होगा। उना यार म वान गोल- पर सुन ला । एव लिन जब घे दूसरी बार हमार भारी भरकम गणेश जा पाम आय तो बडे ही पयगह थ, गणेश जी ने पहन उह डाटा था। थाडी दर वाद यादा गुस्तावर व गणेश जी ग पान "भुपे तुम्हार उन सवका रा बड़ी सहानुभूति है। जो पढ़ लि पर दफ्तरा व अपर रहन लग है । उनप ही वारण मैन एव सीम निवाली है वि दफ्तराम बाम करने वाल नन्द प्रतिशत चपरामिया व क्लवों की इतनी तनयाह पर दी जाय कि वे शेष दस प्रतिशत अपमरा की तरह बैटीन से नाश्ता कर सबन या घरो म नौकर व चपरामियाम भोजन मगवाने कापाव भीन दख सतावि मज- वूरन वे रोटिया लाना शुरू करें जिमग उनके बचे-युचे दो दो, चार चार रोटी के टुकडो से अथवा हिंदुत्व व पचप्रास के कारण आपके मवका का भी पट भर जाय। उनकी यह बात मुन गणेश जी भी खुश हो गये उहोंने पटापट दराज स उनके माशनवाला वम निकाल हस्ताक्षर कर दिय और विष्णु भगवान जी के पास रिकमड कर दिया। उनक जाने बाद जब हमने गणेश जी को समझाया कि आपन तो हमारे ही साथ अयाय कर दिया । भला, जरा मोचिए तो भुक्सड, क्या दार करेगा। इस तरह तो हम भूखे मर जायेंगे। अव गणेश जी सिर पीटते रह गय । वोले "वडा चालाक है। मेरी तो मति भ्रष्ट हो गयी।' फिर कुछ गभीर होकर वाले 'कोई बात नहीं, है तो हिंदू ही हिंदू लोग जब भी कोई काम करते हैं तब मेरी पहन पूजा करते है। अगली बार पकडू गा उस ।' पर अब पता चला कि वे तो ईसाई हो गये। अब तो गणेश जी क्या विमी हिंदू दवता वे वस से बाहर की बात हो गयी। इसलिए भई सुन ला, अव अगर तुम भी अफ्मरा की तरह टिफिन- करियर लाने लगोग ता तुम लोगो की और भी मुसीवत निकल जायगी। सोच लो। मैं जवाक्-मा उस आकृति को देखता ही रह गया । क्लव जो ठहरा। क्लक भी बीस बरम स। उसकी वाता के सत्य-असत्य को क्या मोच पाता। फिर वह क्लक ही क्या जो अपनी अक्ल से काम कर सके । मेरी चुप्पी से चिढकर अचानक ही वह आकृति मुझ पर झपट पड़ी। में चीख उठा । नीद 52 / नकीराम की चारपाइया गुली तो देखा लोग लच पर जा चुके थे। कमरे म मैं ही था अफेला। सिर वे बाला पर हाथ फेरता हुआ दराज खोली तो दग रह गया। दराज में पहली बार चार-पाच चूहे थे। अब वह चूहा मुझे वडा ही डिप्लामेट लगा। मैं उसकी डिप्लोमेसी के बारे म सोचता रह गया--अब तो यह क्वस्त बडे-बडे जफमरा की तरह अपन सारे रिश्तदारा को दफ्तरा म बुलाने लग गया है। इस तरह तो थाडे ही दिना म मेरे लिए कुछ भी नहीं बच पायगा। कल निश्चय ही टिफिन-करियर ले जाऊगा। अगले दिन सचमुच ही मै टिफिन कैरियर ले जाया । उस दिन च है मिया मुझे बहुत उदास दिखायी दिय । उसकी उदासी को देख मैंने दो चार टुक्डा के बदले मात-आठ टुक्डे मीट के नीचे फेंकने शुरू कर दिये । यह म चलता रहा। मगर इसी बीच चूहे मिया ने बहुत ही उपद्रव खड़ा कर दिया । अब उसने पाइली व कागजो का कुतरना शुरु कर दिया। जो टिफिन-करियर के अभाव म अकेले मेरे लिए मिग्दद नही बना, अब वह मार दफ्तर के लिए ही सिरदद बन गया। सबसे अधिक सिरदद उस दिन चना जब चूह मिया न सबस बड़े अफसर की दराज से एक काफीडेशि- यल फाइल को कुतर डाला। अब क्या था, मारा दफ्तर चूहा वे उपात से बचने के लिए एसे खडा सा हो गया, जो च्हा द्वारा खडी की गयी समस्या मबम बड़ी समस्या हो । मभी कमरा मे चूह मिया द्वारा किय गय छेदो को चपरासिया द्वारा बत कर दिया गया और बढई को बुलाकर सभी टेबुला को दराजा को ठीक करवा दिया गया। मगर चूहे मिया कहा मानने वाले थे, कुछ दिन बाद एक दिन सवा पाच बजे हम लाग घरा को बलने की तैयारी म ही थे कि अचानक हमारे सेक्शन आफिसर न कमरे म आत ही बडे अफ्सर का हुक्म सुनाया कि सारा सेक्शन व जाये। एक अर्जेंट लेटर इश्यू करना है । सभी प्रसनता भरी नजरो स उनका मुह देखते रह गये । यद्यपि मुझे उम दिन काम था पर ओवरटाइम के पैमा का लालच हो गया। मगर कुछ देर बाद जब नेटर देखा तो चक्ति रह गया। चूह मारन- बाली दवा के लिए इडेंट मागे जा रह थे जिह सारे हिंदुस्तान के व्यापारिया मैं, मेरी दराज और चूहे / 53 का जाना था । उस अजेंट लटर पो रात पौन रम बजे तक हमन यन वन प्रकारण इश्यू किया। पर बगन दिन दफ्तर पटुना ता मैं भौचक्का रह गया। दणी विशी फ्मों के रिप्रेजेंटेटिव हाया म बडे-बडे चमडे बैग थामे इडट बॉक्म सामन कतार मखडे दिखायी दिय । मैं हैरान हो गया। इस चूह मारन वाती दवा के इडेट का ममाचार ता आकाशवाणी द्वारा प्रसारित भी नहीं किया गया। फिर इन लोगा को रातारात क्स पता चल गया?पर तभी खयाल आया कि शायद माढे नौ बजे वाली डाव म लेटर मिल गया होगा। सेक्शन में घुसा तो सेक्शन आफिसर साहन किसी म कहत सुनायी दिये- अब नो कुछ दिना में काफी काम बढ जायगा। मुसोवत खडी कर दी इन - चूहा न। दीवाल पर टगी घडी बारह बजा रही थी। अभी लच होन म आधा घटा शेप था। मगर सेक्शन आफिसर साहब की मुवह कही बात के कारण सभी काम पर जुट थे । वमरे म छायी खामोशी को कभी-कभी टिक टिक टाइपराइटर की आवाज वश्य भग कर रही थी। तभी दो बड़े ही हृष्ट- पुष्ट मूटेड-बूटड व्यक्ति सेक्शन आफिसर साहब की सीट के पास खड़े हो गये। उनमे से एक ने उह नमस्त कर एक चिट उह मोपी । चिट पढत-पढत उनका चेहरा काफी गभीर हो आया। वे दोना उनके पाम वाली कुर्मिया पर बैठ उनम बात करन का प्रयास कर ही रह थ तभी एकाएक मक्मन- आफ्मिर जोर जोर से चिल्लात हुए उछल पडे। उना उछलना था कि पाइला आदि से भरा टबल का ऊपरी तख्ता आगतुका पर उछन पड़ा। मगर वे फिर भी चिरलात चिल्लान अपन दोना हाथा स दायें पाव को कभी क्मिी जगह, कभी किमी जगह पक्डत फिर छाडत व फिर पक्डत रह । हम सभी घबराकर उनकी ओर भाग । उनके पास पहुंचे ता दवा उनके दायें पाव के मोजे से रपटता एक चूहा उछलकर भागता दिखायी दिया। दम अब लाग अय क्मराम भाग भाग मारे सेक्शन म आ चुद थे। मगर व दो मूटेड-बटेड आगतुक कमर म गायब थे। जान क्या? शायद 54 / नीराम की चारपाच्या उह खतरा हो आया हो कि कही सारा दोप उन पर न मढ दिया जाय । सेक्शन आफिसर साहब अब यद्यपि कुछ सतोप की सास ले रहे थे, किंतु बोल फिर भी नहीं पा रह थे। हम लोग हैरान से उह देख रहे थे। सारे कमरे म खामोशी थी। मगर दरवाजे के पास खडे अय सेक्शना के लोग आपस मे बातें कर रहे थे कि बाहर से एक आवाज सुनायी दी, "अब तो भाई अहिंसावादी चूहे भी हिंसावादी हो गये।" तभी वाहर ही से एक आवाज और आयी "शायद यह फ्रायड का शिष्य हो।" मैं, मेरी दराज और चूह / 55 हसा की ईजा हालापि हमा अभी गाय म दिवन वाली उम पहाडी पर दिखा था जहा स गाव पहुचन म लगभग आधा घटा लगता था। पहाडी धरती तथा रास्तो भी अपनी बात जो थी। पर गाव से साफ दियत हमा वे पावा की तजी से स्पष्ट था-यह इस दूरी को पद्रह-चीम मिनट म तय कर लगा और गाव पनुचकर परमा द्वारा उस दी गयी चुनौती की धज्जिया ही उडाकर दम लेगा। यही वजह थी कि जितनी तजी से हमा आ रहा था उसम भी कई गुना गाव म सरगर्मिया शुरु हो आयी थी। बच्चा के लिए तो हसा का आना एक तरह स एक खेल-सा हो आया था। सयाने थे वि व इस तावड तोड कोशिश म जुट जाय थे-हसा के गाव पहुचने वे बचे समय का फायदा उठाकर किमी तरह परमा को मनायें ताकि अप्रिय घटना में गाव बच सके । जबकि जवान थे कि हसा की ईजा के घर पर एसे मिमटने लग जस परमा के माय खडा होकर वे सब हसा का सबक ही मिखाकर दम लगे। उसने पूरे गाव का काफी समय स दुखी जा कर रखा था। औरतें थी कि इशारा ही इशारा म आपस म बातें कर रही थी—देखें अब क्या होता है ? इसलिए एक तरह म हसा क इस वार के आने की वजह स पूरा गाव हिल उठा था। क्यादि परमा द्वारा हसा को दी गयी चुनौती के कारण हो सक्न वाले झगडे म दोना म से कोई मर-मुरा गया तो पूरे गाव के वधने की एक स्थिति आ सकती थी। इसी के माथ खतरा यह भी कम नहीं था-- ताकतवर हसा के हाथा परमा के पिटन की स्थिति को देख, गाव वाले ही हसा पर एक साथ पिल पडे तो भलाई-बुराई का स्प धारण न कर ले। नतीजा यह था कि लोग इस हत म थे कि हसा का बीच मे ही रोकने 156/ का प्रयाम किया जाय ताकि मामला कुछ गलत रूप न ले। पर हसा के आत से सब डरते थे। किसी म यह साहस नही था। भला यदि ऐमा ही साहस उनमें होता तो चुनौती की बात सुन तरबूबू यह थोडे ही कहती- चलो गाव के एक बेटे ने उम ललकारा तो सहीतरदा भी परमा को साहस जुटाने के बदले यह थोडे ही कहते-चेटा, हसा की तो मति को पत्थर पड गया है। यह क्या बवाल अपने सिर ले बैठा। वैमे वेटा तू बात मही कह रहा है पर समयाया या रोका उस जाता है जिसे समझ हो । यदि उसे समझ ही होती तो क्या हसा ऐसा करता। बेटा, यह तो दुनिया का नियम है जो जैसी रोटी तोडता है उसकी बुद्धि वैमी ही हो जाती है हा, दीवादा अवश्य यह कह रहे थे-वेटा फिकर मत करना। पूरा गाव तेरे साथ ह । अलवत्ता हम यह जरूर चाहत है हमारा विरोध बाद मे शुरू हो, पहले उसकी ईजा विरोध पर जबकि इही क्षणा की विचिनता यह थी कि हसा की ईजा गाव के लोगा के जमा हो जाने तथा हमा ६ आन की स्थिति से बखबर थी। क्याकि पिछली साझ-तेरा लडका मर गया है सुन शब्दो के कारण व इस समय एसी मानसिकता म जी रही थी जिसम वे पत्थर की प्रतिमा की तरह दर वाले दरवाजे के पास बैठी थी। अयथा तो वे इस समय घर पहा होती। उनका तो रोज का नियम था। दिशा पुलत ही दैनिक काम से निबट वे अपनी लाठी पक्डे जागन म पडी होती थी। सोचती- एसा घर कौन हो सकता है जहा पहुचत ही उह चाय मिले। उनकी नजरो म ऐसा घर वह होता था जिसका वेटा पिछली साझ नौकरी से लौटा हाता था। ऐसा घर न सूझ पाने पर वे यह सोचती थी—अब ऐसा कौन घर हो सकता है जो उहे खाली न लौटाये । पर आज अपने इसी नियम को तोड वे जपन घर ही सिमटी हुई थी । उत्टा आज तो रात उहाने फमता जो क्यिा था-चाह व भूखी मर जाये पर अब घसे ऐसा मला वे एक वार नही, कई वार कर चुकी थी। पर हर वार उहे अपना फैसला मजबूरीवश वदलना पड़ता था। भला पट का गडढा ही वह गडढा क्या जो आदमी को न झुकाय । फिर घर म कुछ भी न होने के कारण उनका ता मभी कुछ गाव था । अलबत्ता इस बार उनके मन को - हसा की ईजा / 57 राम दाग मिरा वि स रा भाता -~-रेवारही ना याजन उनका हना rr---रको ओग्ने तपा मगाने अवार-म "}-हमार जान दे दाद ता तू सूब rrना-मानमवगैहै। अन भार *~ | को चुपी का दा एकाएक लग गेरना पारिता न हे एन Irrrrrrfeीयतया गाव उत्तजित Trrrrr गराउन माया राम लिया था। r-निरपर गौरा था । क्यादि रोपी।न पर ता गिनी वा बम था रासारव मान रही थी। इन अलावा व कर 'Prम में वो मानन बना यह सारा rrrrrबिहानरे तोरग्नि उनके हाया को हमेवरही पा-जान तडके का व नाम हरारेमनगरसव की एक औरत tramमिन ध में दूध और पानी को Wrer मेसेपी। इन बात का उन पर r-rrr- पमनारहमारपन का पूरा फ्मला सोलार और नर ने उनका जायज हह राहकाने हनाको एाहन वनायगा मेजलसहर भी यह नि रोना रारा-47 कोई बात गाजरे दिन बैत बात है । थोडे और वह सुनना पडापा-- रमनदीपरास्हारा पर इतन हो । हाने नलिफ उनका ." ममेहनत देवानपुरूकर निय। .

हालाकि मजबूरिया उनव लिए यहा तक खडी हा जायी कि जमीन न होन के कारण उनके लिए दूसरो के घर काम उस हालत म करना पड़ा जबकि हसा दो माह का भी नही हुना था। क्यावि घर मे थोडा-बहुत जो कुछ था भी उसमे उसे पति की गति निया करनी पड़ी। छाटे ससुर तथा उनके बच्चे उनके पास अभाव के इन क्षणा झाकन तक नहीं आय । आन पर खच करने की जो नौबत थी। हा, थाडा-बहुत उनक लिए राहत की बात यह थी कि परमा की ईजा न अपनी आर से उह पूरी मदद की। यानी कि मजबूरी के क्षणा मे वे हमा को दूध और पानी आदि पिलाकर उसकी देखभाल ही नही किया करती थी बल्कि उहोने उह काफी जमीन भी दी थी। वर्ना यदि वे उनकी यह मदद नहीं करती तो उनके तो भूखो मरन की नौबत आ जाती। शायद दुख ही दुखा को वाटा करता है । क्याकि दोना के दुख लगभग समान थे। अतर यह था यदि परमा की ईजा के पास जमीन थी तो हमा की ईजा के पाम परमा की बीमार ईजा स बेहतर शरीर था। सोच भी दोना का एक- मा था। दोना गाव के पढ़त बच्चो को देख यही सोचती रहती-- अपने बच्चा को एसे पढा पाती। उहे क्या पता था कि कारी भावना स यह मभव नहीं है । वह भी उस जमाने मे जबकि सविधान म सभी वच्चा का अपना विकास करने की पूरी स्वतनता की बात कहकर यह समझ लिया जाता है कि बस काम पूरा हो गया है । शायद सविधानी आयता की 'तरह हसा की ईजा की नसीब भी थी। हसा को पढत दख तो फूली नही ममाती थी। वे अनपढ अवश्य थी पर नासमय नही। इसीलिए वे हमा को जपन तरीके स पढाया करती थी-बेटी धरती में सबसे बडा गुरु हुआ करता है। गुर तो साक्षात भगवान हुआ करत है । बेटा शुभाचाय एसे गुर थे जिहाने जपन शिप्य राजा बलि को बचाने में अपनी आख तो गवा दी पर ऊप तक नहीं की । बल्कि कई बार तो वे हसा को राजा बलि के बली बनन वाली पूरी कहानी सुनाती थी। उहे क्या पता था कि वदल परिवेश में बलिक जमान से चले आ रह गुरकुला का आधुनिक भारत क नय महर्षि मकाले ने जहा सफाया कर दिया है । वही इन दिनो गुरुकुला का स्थान स्कूला ने लिया है। इसी का नतीजा यह वि गुरु के बदले अब शिक्षका को मास्टर -काश । हमा की ईजा / 59 । जग ग्यान ठेग लगी थी । हमा दाग समस्यूयू का दिय धमाया भी ता अपना अमर था। रान उहई बार यही लगा पा जम उनया हमा साडिया या गट्टर बाध रहा है--गाय की औरतें तथा सयान अवार-म उग टगे है उह उपमा रह है-हमा जान ये याद ता तू गूब वहा करती है अरोरगे। पर वगामाग आगन म वठी है। अपने भाग्य यो याम रही है। तभी ता तब आमिया पी चुप्पी या दय एकाएक कमइयूवू न हमा का गेरा था। उनका गबना था कि हमा ने उहएग धपका दिया रिय घडाम म गिर पड़ी। इसी पर तरदा तया गाय उत्तेजित हुआ था। यह ता तव विशन वडयाज्यू न उन लागा यो रोग लिया था। वना जान तव भी क्या होता। तब उस दिन हमा वे जान वे बाट गाय उन पर वीजा था । क्यावि हमा न पूर गाव यो परीछोटी मुनायी थी। उस पर तो विमो का वम था नही । गुस्मा उन पर उतरा था। पर व मौा रही थी। इसके अलावा व कर भी क्या मक्ती थी । हा तव उनकी आखा ये सामन अपना वह सारा अतीत खिंचा था जिमम हसा व पैदा होन तीसर दिन उना हाथा की चूडिया उन क्षणा टूटी थी तब व यह साच रही थी-अपन लडके का व नाम क्या रखेगी। इसी वार म तो उन मन मस्तिष्क वा गाव की एक औरत ने झकझोरा था। उमन एक दिन उस पानी मिन दूध मे दूध और पानी को अलग-अनग करने वाले हम की बात सुनायी थी। इस बात का उन पर इतना असर था कि उहान अपन लाल का नाम हमा रयन का पूरा फ्मला कर लिया था। क्योकि उसकी छोटो साम और ससुर ने उनका जायज हक तक छीन लिया था । उनका साच था वह अपन हसा को एस्स हस बनायगी को धरती से याय और अयाय को अलग-अलग करगा। हद भी यह कि सोच के उही क्षणा के बाद ही उह सुनना पड़ा था-चणा कोई बात नहीं, भगवान ने तुम्ह सहारा दिया है। दुख के दिन बीत जाते हैं । थोडे दिना मे तुम्हारा लाल तुमस मा कहेगा और या यह सुनना पडा था-- चना पिता टोका ही सही। पर तुम्हारे दुषी क्षणा का सहारा पर इतने पर भी वे हिम्मत हारने वाली महिला नही थी। उहान न सिफ उसका कानाम हसा रखा । वरन अपन मा को हस बनाने के प्रयास शुरू कर दिय। 58 / नकीराम की चारपाइया हालाकि मजबूरिया उनके लिए यहा तर यही हो आयो कि जमीन न होन पे वारण उनरे लिए दूसरा वे घर याम उस हालत म करना पडा जयपि हमा दो माह का भी नहीं हुआ था। क्योवि घर मे थोडा-बहुत जो कुछ था भी उसम उम पति की गति प्रिया करनी पड़ी। छाट मसुर तथा उनवे बच्चे उनर पास अभाव में इन क्षणा झावन तक नही आय । आन पर गच करन को जा नौरत थी। हा थोडा-बहुत उनव लिए राहत की बात यह थी कि परमा को ईजा ने अपनी आर से उह पूरी मदद की। यानी वि मजबूरी + क्षणा म व हमा यो दूध और पानी आदि पिलावर उमकी देखभाल ही नहीं किया करती थी बल्कि उहाँने उह काफी जमीन भी दी थी । वर्ना यदि वे उनकी यह मदद नहीं करती तो उनके ता भूखा मरन की नौबत आ जाती। शायद दुख ही दुखा को वाटा करता है। क्यादि दोनों के दुख लगभग समान थ । अतर यह था यदि परमा की ईजा के पास जमीन थी तो हमा की ईजा के पाम परमा की बीमार ईजा स बहतर शरीर था। मोच भी दाना का एक- मा था। दोना गाव पढत बच्चा को देख यही साचती रहती काश वे अपने बच्चों को एसे पढा पाती। उह क्या पता था कि कोरी भावना म यह मनव नहीं है । वह भी उस जमाने म जवकि सविधान म सभी बच्चा का अपना विकास करन की पूरी स्वतत्रता की बात कबर यह समझ लिया जाता है कि बस काम पूरा हा गया है । शायद सविधानी आयता की तरह हसा की ईजा की नसीव भी थी।हमा को पढत देख ता फूली नहीं समाती थी। वे अनपढ अवश्य थी पर नासमझ नहीं। इसीलिए वे हमा को अपन तरीके से पढाया करती थी-बेटी, धरती म सबमे बडा गुरु हुआ करता है। गुरु तो साक्षात भगवान हुआ करते है । बेटा शुत्राचाय एमे गुरु थे जिहान अपने शिष्य राजा बलि को बचाने म अपनी आन तो गवा दी पर ऊफ तक नहीं की। बल्कि कई बार तो वे हसा का राजा बलि के बली बनन वाली पूरी कहानी सुनाती थी। उहे क्या पता था कि बदल परिवेश म वलि के जमान स चले आ रहे गुरुकुला वा आधुनिक भारत १ नय महर्षि मकाले न जहा सफाया कर दिया है। वहीं इन दिनो गुरुकुलाका स्थान स्कूला ने लिया है। इसी का नतीजा यह वि गुरु के बदले अब शिक्षको को मास्टर हसा की ईजा / 59 जगमगमापी माया भी ग गरा TT यार परी ममा माग उमामा गापामार याथ गा-गप की प्रोगा राया गया। अगर TIPM TET/गा-गाना मा तागू गव मासमी अवगेरा गामा-आगामबेटी मन मार मा माग रहा। सभी ना आ मिया की पुणा माग राण गम प्यू मामा गरापारा गैरना पाशिमाTM धरा दिषा टिम ग गिरीगो पर माराया गाय रोजिन प्रभा था। यह सा तय nि यस्यान्यू 7 STमागाया गेर लिया था। बना जा सय भी गया सय उग निमार जान 4 याद गायन पर गोगा पा । क्यानि हमारेपूर गाय मागी-मोटी मुनापापा। उस पर ता पिगी माधगया नहीं । गुम्गा उन पर उतरापा। पर य मौन ही थी । 17 अगाया य पर भी पया गयी थी। हा तब उनी आयाम गामा अपना यह मारा अनीन विधा था जिगम हगा प पैदा होन र तीगर दिन उना हाथा की घूडिया उसाणा टूटी यो तव व यह गा रही थी--अपन सडक या बनाम क्या रखेंगी। इगी यार मता पर मन मस्तित्व का गाव की एक औरत न झयनारा पा । उगन एक दिन उम पानी मिन दूध ग दूध और पानी का अलग-अलग परन वाले हम पी बार गुनायी थी। इस बात का उन पर इतना अमर था कि उहान अपन लान या नाम हसा रयन का पूरा फ्मला कर लिया था। क्यापि उमयी घाटी साम और समुर न उनका जायज हर तक छीन लिया था । उनका साच था वह अपन हसा को एमा हन बनायगी जो धरती स न्याय और जयाय को अलग-अलग परेगा। हद भी यह कि सोच । उही क्षणा के बाद ही उह सुनना पडा था-वणा कोई बात नही, भगवान न तुम्ह सहारा लिया है। दुख के दिन वीत जात है । थोडे दिना म तुम्हारा लाल तुमस मा रहेगा और या यह सुनना पड़ा था- चला पिता टाका ही सही। पर तुम्हारे दुखी क्षणी का सहारा पर इतन पर भी वे हिम्मत हारने वाली महिला नहीं थी। उहान न सिफ उसका का नाम हसा रखा । वरन अपने हसा को हस बनाने के प्रयास शुरु कर दिय । 58/नकीराम की चारपाइया हालावि मजबूरिया उनर लिए यहा तर पडी हा जायो दि जमीन न होन बारण उनय लिए दूसरा व घर काम उस हालत म करना पड़ा जपनि हसा दा माह का भी नहीं हुआ था। क्यादि घर म पाडा-बहुत जो कुछ था भी उसम उस पति की गति प्रिया करनी पड़ी। छाट मसुर तथा उनके बच्चे उनके पास अभाव में इन क्षणा झापन तक नही आय ! आन पर यच परन की जो नौरत थी। हा थाडा-बहुत उनके लिए राहत की बात यह थी कि परमा की ईजा न अपनी कार से उह पूरी मदत की। यानी कि मजदूरी 4 क्षणा म व हसा का दूध और पानी आदि पिलावर उमकी दखभाल ही नहीं किया करती थी, बल्कि उहाने उह वाफी जमीन भी दी थी । वर्ना यदि व उनकी यह मदद नही करती तो उनके तो भूखा मरने की नौबत आ जाती। शायद दुप ही दुखायो बाटा करता है। क्यापि दोनो के दुय लगभग समान थे । अतर यह था यदि परमा की ईजा के पास जमीन थी तो हमा की ईजाय पाम परमा की बीमार ईजा मे बहतर शरीर था। मोच भी दोना का एक- मा था। दोना गाव के पढत बच्चा का देख यही सोचती रहती ---बाशवे अपने बच्चा को एस पढा पाती। उह क्या पता था कि कोरी भावना स यह मभव नहीं है । वह भी उम जमान में जारि सविधान में सभी बच्चा का अपना विराम करन की पूरी स्वतत्रता की बात कहकर यह समझ लिया जाता है कि यस काम पूरा हो गया है । शायद सविधानी आयता की तरह हसा की ईजा की नसीय भी थी।हमा का पढत देख तो फूली नहीं ममाती थी। वे जनपढ अवश्य थी पर नाममझ नहीं। इसीलिए व हसा का अपने तरीके से पढाया करती थी-वटी, धरती म मवस बडा गुरु हुआ करता है । गुरु तो साक्षात भगवान हुआ करत है । बेटा शुभाचाय एसे गुरु थे जिहान अपने शिप्य राजा बलि का बचान म अपनी आख तो गवा दी पर ऊप तक नहीं की। बल्कि कई बार तो व हसा को राजा बलि के वली बनन वाली पूरी कहानी सुनाती थी। उह क्या पता था कि बदल परिवेश म बलि के जमान से चले आ रह गुम्कुला का आधुनिक भारत के नय महर्षि मकाले ने जहा सफाया कर दिया है । वही इन दिनो गुरुकुलाका स्थान स्कूला न लिया है। इसी का नतीजा यह वि गुरु के बदले अब शिक्षको को मास्टर हसा की ईजा / 59 - जी कहा जाता है। इस भेद वा उह पता तब चला जब नवीन की ईजा ने उनमे कहा-वणा तर हमा न तो हत कर दी। तलादी गाव व आवारा कहन स मेरे नवीन का तो पीटा हो । साथ ही पूछने पर बोला-भला यह भी कोई बात हुई कि मेरे गुरु जी पीटने को कह और मैं नवीन को न पीटू । तव उह पता चला था उनकी सीख का हमा पर क्या असर पड़ा है। तव उहान नवीन की ईजा से माफी मागी थी। छानबीन वरन पर उहे पता नगा उनका हमा न सिफ नदन को गुरु ममझ बठा है, वरन दम चारह ही साल की उम्र मे चरस और गाजा पीने लगा है। साथ ही वह हफ्नो हफ्ता स्कूल जाने के बदले दूर के जगला मे जाकर आन जान वाली अकेली दुवेली औरता का छेडन लगा है । भला नये जमान के पिक्चरी प्रभाव का तो अपना अलग असर हुआ करता है। इन दिनो तो कई बड़े आदमी वे हो आय थे जिनके बच्चे दिन भर तो नदन की तरह आवारागर्दी करें और शाम को घर रखे टयूशना को वैसाखियो के सहारे खडे रहे । यही वजह थी कि इन बातो को सुन वे स्त न रह गयी थी। इमस भी अधिक दुख की बात उन लिए यह हो आयी कि हमा के कारनामो का पता लगने पर उनकी वह छोटी साम उनके पास सहानुभूति के झूठे आस् वहान आयो जा उनके दुखो का कारण थी। सास के इस जाने का उनपर यह प्रभाव पडा कि उनके लिए अपन का सभाल पाना भी कठिन हो आया था । व तो उस दिन उमसे भी अधिक रोयी थी जब उनके हाथा की चूडिया टूटी थी । तव कोई और उपाय न दख घर ये दवालय मे उहोन भी मनौतिया की थी- प्रभो । मेरे हमा को जब भी सभाल दो क्या गुनाह क्यिा है मैंन रात रात भूखी रहकर मैं हमा की कापी किताब जुटाती रही कापी वितावा 'व फीम के कारण मैंन न दिन देखा न रात पर पर यह क्या प्रभो अब भी बचा दोहमा को उमे क्या पता था कि वे जिन दवी दवताओ की मनौतिया क रही हैं वे मनुष्य नही जो पिघल जायें । वे तो कम फ्लाक एस देवना है जिनकी नजरा म अहल्या के अहल्या बनने के पीछे अहल्या के ही अपने कम थे । वर्ना इद्र की निगाह थाडे ही बदलती । शायद ये भी हसा के ही कम थे जो उनके वा, वह ऐसा बिगडता गया कि एक दिन आवारागर्दी करने के बावजूद वह नदन की विधवा बहन को अपने घर 60/नकीराम की चारपाइया ले आया। पता नहीं उसके पीछे कारण उसके गुर द्वारा मागी गयी गुरु दक्षिणा थी या दोनो के दिल ही मिल आये थे। यह अलग बात है कि हसा की इजा मे उपकी जहा भी बनी नहीं वही वह एक दिन पिता के मरते ही नदन का सहारा पा पुन मायके चली गयी। शायद अपने दो हमा को हस बनाने के लिए उसके पास इसके अलावा और चारा नहीं था। यहा तो पेट पालने तक की परेशानी थी। अब पूरा गाव हसा की ईजा के आगन मे जमा हो आया था। आरते तथा बच्चे अवश्य दूर दूर खडे थे । लगता था जमे हसा को ज्यादतिया से खीज- कर उहान परमा को मनाने के बदले हमा को सबक सिखाने की ठान ली है। क्योकि इस बार वह भरे उजाले आ रहा था। अन्यथा ता वह तब आता था जब चारा ओर अधेरा होता था। वह तो जात समय हरक्त कर अपने आने की ऐसी सूचना गाव को देता था कि गाव आया है । वर्ना तो लोगो का शायद ही पता चलता। जहा तक हमा द्वारा आज ले जा सकने वाली चीज की बात थी वहा हसा की ईजा के पास अब ऐमी कोई चीज बची नही थी जिसे लेकर वह इठलाता । अब तो घर म एक फूटी तोली एक टूट गिलास एक अधफूटी थाली तथा सक्डो छेदो वाले तवे के अलावा कुछ था ही नहीं। विस्तर ऐसा जिसे हसा की ईजा के अलावा गरीब-से-गरीब भी शायद ही विधाय । रही बात जेवर की, पहले तो हसा की ईजा के पास था ही क्या। फिर जा था भी वह हसा की फीस जादि म स्वाहा हो चुके थे। रही सही कसर उस दिन पूरी हो गयी थी जब उह पता चला था परमा का दसवी के बोड का पाम व गया है। भला वे इस बात को कम सह पाती। वह तो हसा द्वारा निराश कर दिय जान की कमी को परमा को हस देखकर पूरा करना चाहती थी। तभी तो उस दिन उहान अपन सुहाग की आखिरी निशानी गले की हसनी वैचवर परमा की जा को पस पकडाये थे । जहा तक हसा क ईजा की स्थिति थी वह ता जव भी गाव के बाहर जमा हा आय तथा हसा के गाव आने से बेखवर थी। वह तो अभी तक तेरा नडका मर गया है शब्दो की मार से उभर नहीं पायी थी । इमी का तो हसा की ईजा/61 कारण था जहा व सारी गा गुमती रही थी। वही अव उनी एमी स्थिति थी कि जहा ये हमा पो प्राचाय और यति पानी बहानी मुनान वाले पहले दिन का याद पर रही थी। वहीं एम प्रयागा के बीच ता कई पार उहामा ता नगन लगता जग व इम ममय याम स लौट रही है और उना दरवाजा मानत ही उना हगा दरवाजे 7 पास ओंगामाया पडा है या घुटना ये बल पिमक्त उनका हमा ररवाजे तक पहुंच गया है और व उम वचान दमा काम छोड उम परड रही है । इमरी जार इही क्षणा की हकीकत यह हा आयो थी कि गाव क लागा की भीड का लगभग चीरता-सा हसा उनम वोला था -ईजा ---कौन कौन परमा हसा की ईजा वो जब भी विश्वास नहीं था। -परमा नहीं हसा- अब तो हमा झल्ला उठा था । भला वह परमा का नाम कहा मह पाता? वह आज के जमान का हम जा था। बम, अब क्या था हसा की ईजा की तद्रा पूरी तरह टूट आयी। भला अब अपनी हकीक्त समाने म उह क्या दर लगती । इसीलिए वह काप उठा। पर तभी जान उनम इतनी स्फूति कहा स जायी कि बिजली की-मी फुर्ती म बाहर आ परमा के पावो मे लिपट एसे सिसक्यिा भरने लगी जस अपने इस अभिनय भर से अपने अतर का उडेलत कह रही हो-बेटा मैं हसा को हस न बना मकी । तुझे मै अपने मन का हस समझती थी। क्या एक मा के लिए हमा को बनाने मे क्या यह कम है कि उसके हसा क हस बनने की आस अभी मरी नहीं । जबकि पहले वे हमेशा मूक रहा करती थी। 62/नकीराम की चारपाइया फिर वही अधेरा, वही, बिल्कुल वही जिससे उसे सस्त नफरत है । उम वह क्षण भर के लिए भी नहीं देखना चाहता है । मगर देखता चला आ रहा है। कई बार ता वह इस अधेर स तग आकर यहा तक मोचता है-दूर कही ऐसी जगह चला जाय, जहा अधेरा निन म ता अलग रात भी न हो। किंतु पमा स्थान है कहा ? ऐमी जगह है कहा? जहा अधेरा हो ही नहीं ? इम धरती पर तो अलग, शायद सारी सप्टि म भी न हो। वह जिस कमरे म रहता है, उमम एक तरह से काफी अधेरा है। कमरा सकरी गली के बीच है । वह भी निचली मजिल का, जिसमे लाख प्रयत्न परन पर भी कभी धूप नहीं झार पाती है। हा, गर्मियो म गली की उठती धूल वयिझक कमरे म घुम आती है । कम आख दखन वाला तो दिन म भी छोटी छोटी चीजें भर नहीं दख पाता है । वदलियो के घिर आन पर तो अच्छा खासा देखन वाला भी यहा नही दर पाता है। कमर की शक्ल भी अजीव तरह की है। यदि पथ्वी की तरह इस कमरे को अडाकार कहा जाय तो भी गलत नहीं रोशनदान की जगह इमम चार छेद दीवार पर है। जिह देख एसा लगता है -जब मकान वना होगा तब शायट मकान मालिक को रोशनदान का खयाल ही न रहा हो। बाद में किरायदार के कई वार कहने पर ये मोटे से चार छेद गली की ओर वाली दीवार म दिये गय हो । ये छेद भी एक तरह से अभी खुले ही है । आदमी तो अवश्य ही उन छेदा से अदर घुस नही सरता था । साप-कीडे जदर न घुम पाय, एसा सोच उनमें पक्की जाली लगायी गयी है। साथ ही पार्टीसन कराकर कमर को दो हिस्मा म वाटा गया है। तादि मकाना की तगी के कारण कोई-न-कोई 1631 किरायदार यहा आकर रहने लग । पार्टीशन करने पर कमरे काफी छाटे हा गय है । वैमे अगला कमरा पिछले कमर का दुगुना है । पर उसम मुश्किल से तीन छोटी चारपाइया ही जा सकती है । वडी तो शायट दो भी न आ सकें। पिछले कमर को उसन किचन बना रखा है । अगल वो वह वैठक सोन पढने आदि के लिए आवश्यक्तानुसार मभी कामो म लाता है। और दफ्तर दफ्तर की स्थिति उमरे घर स गयी गुजरी है । घर म वह पत्नी पर रोर तो हार सकता है पर दफ्तर में अलबत्ता उसने दफ्तर की नयी बिल्डिग है किंतु जिम कमर में वह बैठता है उसम अधेरा है। उधर भी निचली मजिल का कमरा होने के कारण व कमरे के विल्कुल कोन म बठने के कारण जहा वह बठता है वहा काफी अधेरा है । पाच साल पहल जर उसका तबादला उस कमर म हुआ तब उसने सिरतोड प्रयत्न क्यिा था कि वह खिडकी की पास वाली सीटो म स किसी म बैठे। पर उन सीटो पर जाफीमर व दो असिस्टेंटा ने पहले से ही अपना कब्जा दिया हुआ था। खिडकी पास वाली नजदीकी सीटो पर चार सीनियर क्लक अपना नतिक अधिकार समझत थे। भला वे भी पीछे कैसे रहत । इसलिए बाकी बचे कमरे के तीन क्लव व एक दफ्तरी । उनकी पूछ क्स हो सकती थी। उह तो बतायी सीटा पर ही वठना पडता था। इसी कारण हकीकत का पता चलत ही उसन अधिक प्रयत्न नही किया । चुपचाप कोने वाली सीट को ही स्वीकार कर लिया था। इही वातो का असर उन पर यह पड़ा कि वह सुबह-साझ घर पर नहीं रहता है । अधिकाश बाहर रहता है । चाहे काम हो या नहीं । हा, यदि वह कही म जा नही मक्ता है तो अपनी रफ्तर वाली सीट से । घर म वाहर निकल पहले-पहल वह खुले कमर की तलाश म धूमता रहता था। उमी तलाश म वइ बार वह अच्छे कमर दउ भी चुका । पर अपनी जेव कारण उन क्मराम रह्ने का इच्छा को छाड बीजवर पाक म आकर बठ जाता। सोचता अधेरा ता है पर चालीस स्पय म कमरा है वहा ? दो-सवा दो मो म जो कमरे मिलत ह ठीक हात हुए भी हम जमा के लिए क्स ठीक हो सक्त है ? इतना किराया दकर व खायेंगे क्या? यही वजह थी कि अब उसन कमर को तलाश वद कर दी थी। हा वह घर पर फिर भी नहीं रहता 64 / नेवीराम की चारपाइया - था । विवश हो अत म उमे पर लोटना ही पड़ता था। ठीक एस ही जैस जहाज का पछी धरती की खोज करने म अमफल हो पुन जहाज पर ही नोट आता है। घर न लोटने के अलावा वह जा भी कहा सकता है ? मगर दहलीज के पास पहुचते ही अधेग देख उसका दम घुटने लगता था पुन भाग जाने को उसका जी करता है । आज छुट्टी का दिन है। इतवार है। टबल पर रखी घनी ग्यारह बजा रही है। वह आज सुबह म घर पर ही है । अब तक वह किताबें पढ़ रहा था। इसलिए नहीं कि वह घर पर रहना चाहता था वल्लि इसलिए कि वह पत्नी की शिकायत दूर करना चाहता है। अपन-आप तो बाहर चले जात हैं। हम यही छोड दते है इम काल-कोठरी म घुटन के लिए। आग की छुट्टी के दिन वह सारे दिन घर ही रहगा उसन पिछते इतवार को ही मोच लिया था । इम एक हफ्ते की परिधि में गनो ता पिछली वारदाता को भूल गयी। मगर वह नहीं भूला था। इसी कारण उसकी पत्नी उसर निणय स अनभिन-मी सुबह से अब तक कई बार उसस आग्रह कर चुकी थी-वैसे ता तुम कभी घर पर रहत ही नहीं। हम कही ले नहीं जाते। आज तो आप घर पर ही है, आज तो वही चलो । इम जधेर कमर स, इम ल-कोठरी से कुछ समय के लिए मुक्ति तो मिल जायगी । नन्ही-सी पाच वर्षीया बिटिया नीता भी कई बार मा की बाता का ममथन कर चुकी थी-'चतो ना।" लेकिन वह सुनी की अनसुनी क्यि जा रहा है । नीता कई बार आसी मूरत बनाती उठी थी। पर वह उसकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता था। जब नीता जिद पर उतर आयी थी तो उसन उसे एक जोर का थप्पड जड़ दिया था। वह बिलबिला उठी थी। इसी पर रानो को काफी गुस्सा आया था। पर वह बोलती कुछ नहीं थी। याना बनाना छोडकर उस चुप कराने जा लगी थी । जब वह चुप ही नहीं हुई तो वह सीज उठी थी-बेटी, पत्थर की मूर्ति के सामने रोने से कभी लाभ नही होता है। हा लाभ की आशा अवश्य बधती है। पर इनके सामने रोने से तो वह भी नहीं । जाने ये किम धातु के बने है । पौधे / 65 वह पाडा-मा मिर वितान पर मे उठाकर रानो की ओर रखता है। उसकी भाहा म निराशा का तनाव बढ आता है। उमवे जी में आता है कि पत्नी को बुरी तरह डाट द कि इस तरह की वक्वास मत क्यिा कर। पर कमर म छाय अधेर का दखकर गहरी नि श्वाम भरकर रह गया था। माचता रह गया था-गनो सचमुच ठीक कह रही है। वह क्सिी एमी धातु का बना है जा न पिघलता है और न जिम पर जय धातुओ का प्रभाव ही पड़ता है । हो मक्ता है, पहले वह एसा न हो, पर जीवन के अधेर न अवश्य हा उम विमी एसी ही धातु के रूप म बदल दिया है । जयथा जबकि नीता निगश-सी कुछ देर बाद बेलन वाहर चली जाती है । जात ममय वह पलक उठागर भी उसकी बार नहीं देखती है। कुछ एम जस उम भय हा- उमका देखना इस बार पुन उसे मार न खिला दे। पर नीता की नजरें दख उमका दिमाग बोझिल हो आता है। वह पाम ही से पक्ट उठा, मिगरेट मुलगाता है । एश-ट्रे उठावर पाम ही रख लेता है ताकि उस राख झाडन म परशानी न हो। पच्छे बनाता धुआ छत से टकराकर कमर म फलने लगता है । अधेर के कारण वह घुआ उस नहीं दिखायी देता है जिसस अअमर वह अपन जीवन की तुलना क्यिा करता था--और उमका अत भी वह धुए के रूप म ही समझता था और फिर वह उसी धुरा की जत्द-से-जल्ट आकाक्षा रिया करता था। –अव कब तक एस बैठे-बैठे मिगरेट फूवत रहाग खाना बन गया है-रानो कोयते बुयान लगती है--अब पानी भी ता यद हान वाना वह मिगरट का जार वा क्श खीचता है। पिर मिगरेट एग-ट्रम हाल, तौलिया उठा नहान चला जाता है। सकिन उस विचाग का तनाव फिर भी कम नगे हाता । उमकी आबा के सामन वे क्षण विच आते है जन राना में उनकी भारी हुई थी। जब वह गना 4 माय एक मुखी जिंदगी वितान व मजयाग मजोता था, जर लाय प्रयत्न करन पर भी उसे शहर म कमरा न मिल पाया था। तर इच्छा न होत हुए भी उमे इमी पमर म दिन बसर करन का मानना पडाथा जब कमरे म पाव रमते ममय ही राना न पहा पा-क्या यरीवमरा लिया है तुमन' मुपग ना इगम नहा रहा 66 / नवीगम की चारपाइया जायेगा । कही दूसरे कमरे की तलाश करो।" नब और अब म ह भी कितना अतर | तब वे दो थे। जब उनके साथ नीता और अनिल है । उन दानो के ही दो न स्म ! तब राना किमी-न- किसी तरह रोज ही कमग बदलन को कहती थी। पर अब वह कभी भी नहीं कहती है । बल्कि अब तग आकर जब कभी वह कही मरा कमरा किराये पर लेन की वान करता है तो वह हमेशा मना करती है । बातो का रुख ही पलट देती है । इन वाता म जरा भी दिलचस्पी नहीं दिखाती है। शायद वह अब अच्छी तरह समझ चुकी हो-उमके पति-जसे कम वेतन पाने वाल के लिए ता यह कमरा भी एक महल के समान है । एक अच्छे चमर वे सपन मजान तो जलग इसी म जपनी स्थिति सभाले रहना बडी बात है और या फिर उसन अपन-आपको इस अडाकार कमरे म कुछ इम तरह खपा लिया हो कि अब उसे कही और जहा भला लगता ही न हो, वही अयत्र सुखी रहन की वह कल्पना भी नही कर सकती हो । क्योकि अयन यदि चने भी जाये तो और वातें तो नही बदल सकती हैं। पर अब रानो का यही मौन उमे अपरन लगा है। बचि कई बार तो अब वह यहा तर माचता है-क्या हो गया ह राना ना? आता वह बिल्कुल ही बदल गयी है । क्सिी वात के लिए जिद नहीं करती है न मान के लिए न पहनन के लिए । जो कुछ लाकर रख दिया, पमा उनी है, जा पुछ ला दिया, पहन लेती है । बम, और कुछ नहीं। क्या हा गया मागना वो इही विचारा म कई बार वह रानो व वनमान पानी पली मे तुलना करता है कि जिस तरह अफ्मगें की माटमा मुनने का धीरे धीरे वह जादी हा चुका है, हा मरतात,frrrr कीपनी ने भी अपने को इसी कमर म सपा जियारत ध्यान यात ही उमया माथा फिर झनपना उठता है।30 ar,न मान-आ- वर्षों में उसकी माखें पापी महारहारीमा से रमजोर हो जायगी कई या ना यार उसने पे सामने मारी गली राr 14 लगता र मजदूरोनाइया आदि निगwrrnार मरिर' - बार जिम मसा-मार उगे मुटभीमा परपर पास गाटपही धम मेगामिम गमगतीयायाम गाग मगर नगर विगार TT मममनारायन परपर या पुरा अपार मार्ग मोमोट आगीमान भय उग जला अधर म गग मापी पी जापा पर परजा मगा और यर पर वारसा निम्मा सामुछ मोरी मप सगाती है। पिर महा-ममी मोगामी विमपर पर यासी माम म शेवाती गाना गायीपानी पी। गमीगर गएप अपची मारियो क्ष्य सा उगमामय सीप तारपीटाम उटमी हमर उसपी आयाम गामा मायTTAFT गिय नारा जय यह भी मापी पनीमी तर हा परती पी।मई यार meणाम उमा मन युरो सरह उचट आता मागती पति मे समातिपर ग्नि दयती इण्टा मो व्यस्त सरगी। पार ये युछ भी परे पर अय परा नही रहगी। यदि तुम इंतजाम नही पर गपते तो मुगे माया पट्टा दो मेर मां या अभी भी मुझे घरात पर सेंगे पर पTिT दुवत-पतन विचारमग पर पो य कुछ कह नहीं पाती। यह बात दूमरी थी रि पति ये हर मलय हर व्यवहार में यह अब अपना पक्षा अनुभव परती। यई वार तग आयर सोचती-वह जिग समर म रहती है उसम व जेल यो योठरी म क्या अतर है ? यद्यपि जेल यो तरह यहा पहा नहीं, यह बिना पहले ही इधर-उधर जा सकती है। पर यहा भी जिंदा रहा भर के लिए दियो का तरहरूखागूखा नौजन मिलता है और तो कुछ नहीं । वह अभी नहा रहा था। राना विचारमग्न-सी रसोई म वठी थी। उसक पास ही अनिल बठा था। अभी-अभी उठा है सोकर। तभी तीन-चार छोटो छाटी गौरय दहलीज व पास आ पहचहाने लगती है। वे कभी कुछ जदर तव बढ आती हैं। फिर लौटकर दहलीज के पास रसे दो छाट छाट अधटूट कनस्तरा म उगाये तुलसी के पौधो पर बठ जाती है । राना को उन पौधा के साथ जुड़ी बातें याद हो आती है, जब उसन पति के विरोध करने पर भी इम कमरे म आन के दस पद्रह दिन बाद य पौधे लगाय था तब 68 / नकीराम को चारपाझ्या एक साथ लगाने पर लाख प्रयत्न करने पर भी, एक पौधा दिन पर दिन काफी अच्छा हो आया था और दूसरा दिन-पर-दिन न तो सूख ही माता था, न अच्छा ही होता था। उमी पौधे की याद के कारण वह पान ही से लोटा उठाती है, तुलसी के पौधा में पानी भरने आगे बढती है । गौरये उडक्र ार मल्मेना साहब के बरामदे की दीवाल पर रखे गमला पर बठ जाती है। "चल, हमारे घर चल । मैं तुझे अपने गम ने दिखाऊगी।' सक्सेना साहब की लडकी के स्वर म एक अफमरी रोव था। "ले आय, तो क्या हुआ | मेरे पापा भी मेरे लिए एक माय वीम अमरे ना देंगे।' नीता चिढकर कहती है। मगर मरमना साव की लडकी उसका हाथ पकडकर उसे अपने घर की ओर खीचती है। नीता उमसे उम्न म छोटी तो नहीं पर दिखायी काफी छाटी देती है। इसलिए वह अपने को 'छुडान का मिरतोड प्रयत्न करते हुए भी खिंचती चली जाती है। रानो यह सब देख रही थी। तुलसी के पौधा म पानी देना भी भूल जाती है। उसने हाथ से लोटा नीचे गिर जाता है । वर झटरे २ माथ “लोदा उठान झुक्नी ही है कि घर पर की आवाग हाती हैं। दपती है, धोती घुटना के पास काफी फट आयी है। खीज उठती है नीता क्या पगडा कर रही है ?" नीता फो सकमेना माहब की लडकी छोड दनी है । यह दौडकर मरम आ जाती है। वह नहा चुका है। सिर के बाला पर रवी करता है। माता पिताना को पास दब वह पूनी नही ममाती है । धीर-धीरे आकर उसने पाव भो पर लेती है। कुछ ऐसे, जम कुछ ममय पर पडी मार को विधुत ही भूल गयी हो । अब भरी आखा से दाना का देखती है। शायद अर पहली मार शीयाद हा आयी यो। पर दो-दव स्वरमबहती है पापा, मेरे लिए भी ला दो घामले । बीना के पिता, उमरे लिए एक माथ दाने आय" या 'ना' करता है न हा हो । अदर वाले कमरे मला चूद व पाम एस पठ जाता है जब वह गोतासीवान का उत्तर दन पी जापापना दीनही ममलता हा। अदर रानाधाना परान साती है। मगर पीना फिर 70 भी गमले सान या आग्रह परती रहती है। किंतु वह इस पर भी कुछ नहीं बालता है। याना गान लगता है। नीता गमल लान पी स्वीकृति मिन विना याना गान का मना कर देता है । वह अदर-ही-अदर झुमला उठना है। माचता है-नीता का एष थप्पड मार । यह-पिजूत म जिद कर रही है। अगर व दस गमन ल आय ता क्या हुआ? उह जामदना भी नो मुपम यइ गुना ज्याद है। पर राना व झुर्रातार चहर का दय कुछ को नहीं यह पाता । एकाएर उम जसे चुछ सूझ आता है बात टालन के लिए कहता है 'गमन ता में ला दू । पर रोगी वहा वमर म रयूगी और कहा रखूगी।' वह रुलामी मूरत वनात हुए कहती है। उसके हाथ का कौर हाथ म ही रह जाता है मुह या मुह मही। वह प्रश्न मरो आखा स कभी नीता भी पत्नी व कभी अनिल की जोर दखता ही रह जाता है। कभी दयता रह जाता है अपन चारच भर कमर का, जिसम वह सामान रखन व विभि न तरीके अस्तियार करन पर भी कितावें रखन के लिए रव की जगह न बना पाया था। उम या जाता है-एक बार रानो न भी कही थी य वाते । तव उस कितना गुस्मा आया था ' तब उसे लगा था जसे यह जानते हुए क्मर म तिल रयन के लिए भी जगह नहीं है। गमले लाकर रखन की बात क्वल म चिढान के लिए कही जा रही है और कमरा बदलन की माग का न मानन के कारण ही कही जा रही है। तब उसन झिडक्कर कहा था-गना गमल व पौधे ही चाहती तो वस घर म ज म लेती ताकि वैसी ही जगह तरी शादी मी हाती। इन बाता का रानो चुपचाप सह गयी थी । इसके अलावा जय काई चारा भी नहीं था। यद्यपि औरतो के स्वभाव के प्रतिकूल माय पर आक्षेप सुन उसकी सारी दह म त्रोध के कारण कपकपी छूट आयी थी । उम क्षण उसकी पलकें गीली हो आयी थी और उसकी जाखो सामन धना जध- कार छा आया था। जिस अधेरे म एक के वार एक मायव की घटनाए व क्षण धुघल धुधल होत चले जा रहे दिखायी दिय थ और दिखायी दिया था पिता का जीण चेहरा जिस चेहर म उसन एक बार भी चमक नहीं 70 / नेकीराम की चारपाइया देखी थी। यदि देखी थी तो एक खोज और असफलता । धुधलपन को गति इतनी तीन थी कि लगता था कि कुछ ही देर में उसके पिता का छोटा-मा घर, पाच भाई-बहना से मिला परिवार, गाव का सारा माहौल व हमेशा ही बीमार रहने वाली मा सभी वे सभी अदश्य हो जायेंग। फिर उसके सामन अडाकार कमरा व पनि के अलावा शेप कुछ भी नही होगा। मानो वह यही सब कुछ दखन के लिए पदा हुई हा । इसके अलावा अच्छा देखना तो अलग, माचना तब उसके लिए गुनाह हो। तब उमन सतप्ण नत्रा से पति को कुछ इस तरह देखा या जैसे वह अपन इम मूक अभिनय द्वारा कहना चाहती हो--आप ठीक कह रह हैं ।' तभी उमन निश्चय किया था-'अब भविष्य म वह पति से किसी भी तरह का आग्रह नहीं करगी। वाई भी वात नही कगी। उनकी ही तीर पर चतगी। आना सब कुछ भून जायगी, सब कुछ। पापा ला दो ना। मैं वही न-वही रख लूगी। नीता पुन जोर दती है। जिद करती है, पौधा के लिए खुली जगह खुली हवा चाहिए । वह कडकर पहता है। "फिजूल में जिद न कर, खाना खा। राना भी कटक उठती है । गौर से पति कीनार देखती है। उसे लगता है जम उसरे पति को ये बाते भनी नहीं लग रही है। 'ममी, तू भी अजीब बात करती है।" नीता बीच म ही तुनक उटती है । उसे कल ही पढात समय पिता की कही वातें या हो आती है। पिता की ओर दखत हुए कहती है 'पापा, समझाओ न ममी को । तुम्ही न तो कहा था-'आदमी हवा के बिना एक मिनट भी जिंदा नहीं रह सकता। जम इस कमर में हम रहते है वस गमन भी रहगे । अगर इस कमरे में हवा नहीं तो हम क्स जिंदा रहत है ? उसका माथा झनझना उठता है । आखा म आसू भर जात है। उसकी आखो के सामने इन सात-आठ वर्षों का सारा अतीत खिच आता है। सोचता है नीता ठीक ही कह रही है। जाने क्मे जीवित है हम इस अडाकार कमर मे-जिसम न हवा है और न प्रकाश ही । फिर राना की आर देखता पौधे 171 है पर अधेरे के कारण उसे कुछ भी दिखायी नही दता। लकिन उस एहसास होता है जैम वह रो रही है और सिसक्यिा भर रही है । एकाएर उम लगता ह जमे उसके कमरे की मारी हवा महमा निक्ल गयी है। जब उसके कमरे म जरा भी हवा नहीं है। हवा में अमाव वे पारण उन सबका न्म घुट रहा है। वे सभी छटपटा रह हैं। धवडाबर वह पाना छावर बाहर चला आता है। रानो नीता के गाला पर जोर के दो चपत जड देती है। वह फिर जोर से रान लगती है । उसके गाला पर दसा पतल-मतले निशान विल्कुल नीले हो जात हैं। पर वह नीता की तनिक भी परवाह किये बिना गीनी पलका से पति का देखती भर रह जाती है। 72 / नकीराम को चारपाइया 080 एक और कालिदाम शायद अब उहे विसी न कालिदास शब्द का नया जथ बता दिया था जो वे अपने का ऐमा कहत सुन मुस्करात थे या गव का एहमास क्यिा करत थे। वरना तो पहले उनसे किसी न ऐमा कहा नही कि वे उसे मारन ऐसे उतर पडत थे जसे कि वे शाखा पर बैठकर शाखा का काटने वाले कालिदास से भी खतरनाक हा। उनकी ता मारापीटी की कई वारदाते थी। पर रमिका, सावना तथा काली जेडज्या वाली तो एमी थी जिन्हान पूर गाव का हिला दिया था। यह दूसरी बात थी कि गाव की बातें हान व वारण समय के साथ ये बातें आयी-गयी की बन आयी थी। रमिका और सोवना के मामल मता गाव ने उल्टा उह ही जो फ्टकारा था--जब तुम्हे मालूम है कि एसा क्न पर वे ऐसा किया करत है तब तुमने एसा क्हा ही क्या? जबकि काली जेडज्या वाली बात ऐमी थी जिसने पूरे गाव को उत्तेजित कर डाला था। एक ता एक मद द्वारा एक औरत पर हाथ उठाने का मामला था। दूसरा उनका अपना क्सूर भी कुछ नही था। वे ता उल्टा उह डाट रही थी जो उसे छेड रहे थे। वे तो वह रही थी-शरम नहीं आती है र तुम लागा का जो उसे छेड रहे हा । वह अगर किमी को मार देगा ता सब वहग उसने मार दिया। इस समय कोई नही देख रहा है कि य उसे कालिदास बस, उनकी यही तो फटकार उनके अपने लिए सिरदद बन आयी थी। पेनल जान क्या समझा कि उसने उन ऐमा कहते-कहत तक न सिफ् दो- तीन थप्पड उह जड दिये, वरन् एमा धक्का दे डाला कि बेचारी वहाश हा धडाम से नीचे गिर गयी। वह ता माया को भिड भिड तथा मार गिया, मार दिया सुन गाव के कई लागो न उह छुटा दिया, वरना तो उन्हनि / 73/ पाली जेडग्या का मार ही टालना था। पर जितना भी अब तक उहनि वर डाला था वही यम नहीं था। जेडन्या का होश नहीं लौट रहा था। जेडज्या यतीना यद उह बरीनाग अम्पताल ल जान वा उतर आय थे। सवल की ईजा व राने-पीटन तया पाय परातर का उन पर असर नहीं पड़ा था। वह ता काली जेटग्या काही पानी व छीटा से हाश लौट आया तथा अपनी चचरी वहन व वेट यो बचान उहान यह यहन स इवार कर दिया कि उह क्वल न मारा है । वरना ता उनक चट फिर भी उह अस्पताल ले जान पर जामादा थ । तमीता गाय व लागा न ऐमा मी एक लिस्ट तैयार की थी जा उर ऐडा करत थे। कशवा दामू रतन का तभी न ता आगाह किया था-आइदा व एसा न पिया करें मुझे आज भी याद है वह दिन जब उहान वाली जेडज्या का मारा था। तब गाव वे लाग वीच-बचाव क्रान की बातें कर रह थे। मैं था कि गाव व उन लागा क बार म माच रहा था जा अब तक उह परशान दिया करत थे। मुझे केवल म और उह परशान करन यालो म जरा भी जतर नहीं दिखा था। तर बस यह भर था कि यदि वे स्कूल नहीं पढ़ पाय थ ता ता दूसर स्कूल जान पर भी स्कूल ठीक से नही पढत थे। कुछ एस थे जा ठीक वेवल की तरह दुडिया गय थे। तभी ता इन मार माचा के वीच मुझे लगा था इनकी यह स्थिति हाजान के पीछे इनकी मा जिम्मदार है। उनकी मा का ता माच था-वेट का पढा लिखाकर क्या करना । सेती उनव पास गाव मे सबसे ज्याद है। उनके वेट के लायक जमीन से पदा हा ही जायगा। नमक तल के लायक जदमानी म निकल ही आयगा। पटान पर ता खतरा यह तक ह कि गाव के दूसर वेटा की तरह वह उनसे दूर चला जाय । उनका यही ता साच था जिसके कारण उहाने उसे तब तक स्कूल नहीं भेजा, जबकि एक दिन मर पिता ने उनसे यह नहीं कहा-देख अभी तू लाड-प्यार म उसे बिगाड रही है। आग चलकर जव दूसरा व बट पढ लिखकर बडे बनग और तरा वटा दमरा वा वाय उठान लायक रहेगा तब आयगा तेर का होश । देख लना एसे मे बटा कालिदास नहीं बना ता मेरा नाम बदल, 74/ * पिता जी को यही बात मैंन भी सुनी थी। उनकी बात न मेर सामने अनक प्रश्न खडे कर दिये थे-उद उद्र और कालिदास क्या हुआ? काफी दर तक मैं यही साचता रहा था। मौका मिलन पर मैन पिता जी स पूछी थी उद उद वाली बात । इस पर उहान बतायी थी वह बात जिस अनु- सार शासपर बैठकर शाखा काटन वाले कालिदास की शादी विद्यात्तमा मे कमे हुई थी। तव मुये मालूम नही था कि उद उद करन वाल न ही बाद म अभिनान शाक्तल' और 'रघुवश की रचना की थी। अयथा ता मैं उनसे उमी समय वसी ही जिरह कर डालता जसी मैंने पिता जी से गगदत्त मढर और प्रियदर्शी साप की कहानी सुनान पर की थी। मन ता उस कहानी या सुनत-सुनते पिता जी से कहा था--लाप मुये ता यह सूना रह है वि गगदत्त मेढक अपने दुश्मन मेंढवा को मरवान जिस प्रियदशन साप को कुए पर ल आया उसन बाट म गादत्त व ही परिवार का खाना शुरू कर दिया। तब आप जमीन के छाटे मे टुक्डे व पगडे के पीछे चाचा का पिटवान "ननमिह म बाते क्या कर रह हैं जरवि अब मुये केवल की बढती उम्र की बाता और अभिनान शाउतल वाले कालिदास के वार म माचत-सोचते लगता है क्या वह कालिदाम भी एमी ही वात ता करन वाला नहीं था जसादि क्वल ? क्याकि शादी केवल की तय हा पाये या नहीं, पर होन वाले मसुर से न्हेज की उनकी माग धी--एक हारमोनियम एक तवला दो दरिया तथा एक वाजे वाला चिमटा । वह इमलिए नही कि इनकी उनका जमरत थी, वरन इमलिए वि गाव मे किमी के घर कामकाज हान पर य चीजे गाव के लागा का दूसरे गावा से मागनी पड़ती थी। व नही चाहत थ पि उनव गाव लागा को मागन दूम गाव जाना पडे। हालाकि इसानी दष्टि से उनकी य वाते भी वणी ही थी जसी बातें वे मर मे अक्सर क्यिा करत थ । व ता मूट मे कई बार यहा तक कहा करत थ–दुनिया में जो भी बुर काम आदमी करता है वह आदमी स्वय करता है । भला वाम तो यदि आदमी भूले भटक करता भा है ता वह उससे सिफ जनासी ताक्त करवाती है पर गाव वे लडका के लिए उनकी इन बाता की क्या कीमत थी। उनके लिए तो उनके दहन की बात और घटा-घटो नदादवी और पच- ? । एक और कालिदास /75 - चूली आदि वर्फी ने पहाडा को उनका दखना महत्त्वपूग था। रही-सही कमर गाव के उम परदा ने पूरी कर दी जो अपने जमाने म लगभग केवल से ही थे। वरिक ववनम दो कदम आग थे। क्वल तो छेडन पर ही झरा का मारन दौडता था । व तो वेमतलब नी दूमरा को मार दिया करते थे। पर आज व जसनी हकीकत को भूल गय थे । वुढारे का फायदा उठा दहान झूठमूठ म केवल की शादी की वाते चलायी थी । साथ ही केवल का पाटा मागने वाला पत्र केवल को दिखाया था। इसी स ता उहान क्वल व पोज नदन के कमरा में खिंचवाय थे जिसम वे अच्छी खामी दह के बावजूद काटू न बनाय गय थे। उनम उनकी एक मूछ कोयले की कालिख से बनायी गयी थी। दूसरी जार की मूछ के थोडे-बहुत उगे वालो को उस्तरे से पूरी तरह साफ किया गया था। साहव बनाने के चक्कर म उह एक टोप और "एक काट पहनाया गया था। मुझे ता उनक य पोज विशेष जय म दिवाय गये थे। उहममयदार जा मानता था। उनके पोजा का देस मेरी आखो के सामन वे क्षण उभर आये जब काफी बड़ी उम्र में ज आ, क स सीखत केवल को छोट छाटे वच्चे छेडा करते थे। ऊपर से रही सही क्सर उसके उस टीचर न पूरी कर दी जिसन पहले तो इह एक दिन बहद पीटा। फिर इह भरे क्लास कालिदाम एमा घोपित क्यिा विदा तीन दिन केही जदर सारे स्कूल के बच्चे इह कालिदाम बन लगे थे। नतीजा यह कि इन्हान फिर मूल हो जाना छोड दिया । तभी तो उनक पोजा को देख मुझे लगा था जसे सामने बरीनाग तक फन जगल म बाई आदमी इस ममय भी शाखा पर वठकर शाखा को काट रहा है । क्याकि दमवी तक पहुचत-पहुचत पिता जी की बदौलत कालिदास के वार म मुये काफी कुछ पता चल चुका था। इसलिए मैं तव केवल के बारे म कई दिना तर माचता-मोचता रह गया था। मैं यह भी समय गया था कि कालिदाम मुनत हीय सिफ यह अथ लगाते हैं-दस क्वल 'जव तर का पाई लडसी नही दगा। इसी के साथ उना वार म साचत-साचन मुगे यह भी लगने लगा था कि कालिदाम का तो विद्योत्तमा दिलान वाल पडित मिल आय थे । इम व भी नही मिलेंगे। इस नय कालिदाम कासास पडित मित आप है जिन्ही इमरी शादी की उम्मीद का ही लगभग-लाभग यम कर । 76/नकीराम की पारपाच्या दिया है। इन पोजो का जो भी देरोगा या इनकी बातें जा भी सुनेगा वह इनके वार म क्या मोर्चा मेरी यह जाशका वास्तव मे बटा समय वे बीच सही हा आयी। इनमें माय के जय दादो तीन तीन बच्चो के पिता हो जाय । इनकी शादी नहीं हा पायी। इनका भी उन पर अमर यह दि वे जिस किसी से अगल दम-पद्रह दिनो मे अपनी शादी होने की बात क्यिा करत । ह शादी वी वातें चल भी न रही हो। उनकी इस हालत के पीछे भी उनकी ही मा निम्मेदार थी। ढनौली के पत होने के कारण तथा अपनी जमीन र बल पवे चपन सवधा दे पत, पाडे तथा जोशी की अच्छी लडकी चाहती थी। अच्छी लडकी का अच्छा पिता उह कौन अपनी लडको पता। वह तो कोई मजबूर ही ऐमा कर सकता था। फिर जब ढनोली ये पतपन वा उनवा सपना टूटा तब तक समय आग निकल गया था। अब तो थोडे वम सबधो म भी बातें शुम हाती तो अगला यही सोचता-पढे लिसे नौकरी पाले वी रतनी उम्र तक शादी न हाने की बात समझ म आती है गाव वाले पर के मामले मे अवश्य कुछ-न-कुछ मामला है। नतीजा यह कि उनकी बात जितनी जुगाड से शुरू होती उमसे कही तजी गे खत्म हो जाती। अलबत्ता इस वार मे विचित्र बात यह थी पितावीजा तो उनकी शादी की आस छोड चुकी थी जिरा विसी ये सामा अब या ता रोन लगती थी या वटे की इस दशा के पीछे जिम्मेदारी अपने पर थोपते हुए अपने को कोसने लगती थी। पर वाली जेडज्या थी वि हिम्मत हारी हुई नही थी। अक्सर कहा करती थी--अरे यहा तो वेवल में गय-बीतो की अब तक शादिया होती रही है क्या पेशवा की शादी नहीं हुई जा युद निरक्षर ता है ही, साथ ही गरीब भी क्या रता यी शादी नहीं हुई जा बदर-सा है, वह कितना पढ़ा लिखा था? यह तो जरा जमानाहीसा आ गया जा लडको लडक्यिा को देखने का रिवाज हो आया, वरना हमार जमान म अपनी होने वाली को विसने देखा विरा। अपो हो घारापा देखा? यह तो इसकी भी शादी हो जाती अगर इगयी मा मेरी पात मानती। अपनी जमीन और अपो पतपने का इस नाज था। पौर ऐसा एक और कालिदास / 77 वाप हाता है जा जमीन कालडकी दमा का ता गरीब ही दता है अपनी लडकी।गरीब भी वमी गरीबी मजिसम रडवी वा हाथ पीला करना भा दूभर हा। क्या हाता अगर थोडे कम मवधा म इमली शादी हो जाती वहू-बट और पात-पातिया वाली ती होती शायद यही कारण था कि हर दा-तीन महीना बाद काई नकार रिश्ता ल, वे फिर-फिर वेवल की शादी की उम्मीद बंधा दती थी। उनोदन रिश्ता का अब अमर यह था कि केवल अब उन उठ कहन पर उठन थ बट पहन पर बैठन थे। पता नही ऐमा वरर व अपने द्वारा काली जेडज्या को मारने का पछतावा किया करत थे या वे यह समझ चुरे थे कि गाव म एकमात्र व ही ऐमी है जो उना लिए विद्यात्तमा का पोज मरती हैं। मन्चमुच यह भी आश्चय की बात थी कि उनकी विद्योतमा को उहाँने ही खोजा । इस वान का पता मुझे तब चला जन एक माझ गाव का रतन मुथे बुलाने अन्मान आया । व वही सन था जिसने उनका काटू न बनाकर फाटा विचान म सबमे बड़ी भूमिका निभायी थी। उसी न मुझे बताया कि वेवल की शादी वाली जेडण्या न पक्की कर डाली है। परमा उनकी शादी म शरीव हान तुपे बुलाया है मैं ता इम ममाचार का सुन मार खुशी व उछन पडा था। ग्रामकर इसलिए कि जिमन मुझे चिढान हेतु उनर काटन-पाज दिखाय थे वही आज मेरे सामन रम समाचार के साथ राडा था । ऊपर से वह मेर घरको चीजा का एम दरा रहा था जम कि उसने मेर जन माधारण घर की भी चीजें दखी न हो। वैसे भी वेवल व उमम तर यह था कि वह जैस समे मास्टरा की बदौलत मात तव पास हा गया था। आटवी म उस पाम वराना मास्टग के भी बस की बात नही थी। यह अलग बात थी कि वह काली जेडग्या द्वारा केवल की शादी तय करन की बात को एस सुना रहा था जस कि वह इशारा ही इशारा म कहना चाहता हा- उन्होंने एसे पागल की शादी तय करवाकर गलत वाम दिया है। क्याकि उसन बताया था- वह ता उन्हाने क्वल का लडकी के पिता का गाव स वहुन दूर दिखाया। वरना यदि वह एक बार गाव जाकर उह दखता ता शायद ही हा परता। 78/ नवीराम की चारपाडया - ap इमर अलावा उसने केवल और केवल के हान वाले ससुर के प्रश्नोत्तरा को ऐसे मनाया जैसे कि वे कालिदाम और विद्यात्तमा के प्रश्नात्तरा स कम न हो । बकौल उमये केवन में उमरे हान वाले ममुर का पहला प्रश्न था-- 'आवे पाम कितनी जमीन है?" माना इस प्रश्न के उत्तर म केवल कसे मार पाता। उसे तो अपनी जमीन तो अलग, पूरे गाव वे लागा की जमीन का पता था कि किस पास कितनी रक्मी जमीन है, कितनी विमवे पाम सर जमीन है, कितनी किसके पाम मितवान जमीन है । इमीनिए रावल 'न स छोटे म प्रश्न के जवाये म यह जतला दिया कि उसे गाव की एक-एक बात की जानकारी है। सूर बाद उनमे दूमरा प्रश्न पूछा गया था--- तुम्हारा गाव में अपना पनि 'मरा गाव म अपना वाइ नहीं है। केवल का उत्तर था। इस उत्तर की रही-सही कसर काली जेडज्या न पूरी कर दी थी-भला इसका अपना ही काई होता तो क्या इसकी शादी अब तक नहीं हाती? इसकी विधवा मा इसकी शादी से ठहराती इसके लिए तो मद चाहिए । अब तुम्ही देखा क्या कमी है इसमे। जच्छी खामी देह है। अच्छी खासी समय है। नासमझ विधवा का वटा दुआ। वरना तो यह भी पढ़ा लिखा होता। इमी कारण उनमे तीसरा प्रश्न पूछा गया था-~~-'क्वल, जौर बात तो छाडा, तुम यह बताआ, तुम आगे क्या करना चाहत हो?' जादमी दुनिया मे अपन आप करता ही क्या है? वह तो वही करता है जो ऊपर वाला उमसे कराता है।" उनका उत्तर था। उनके इसी उत्तर का मुन नयी विद्यात्तमा के पिता न हामी भरी थी। तभी तो तब रतन की बातें सुन मैं और मेरी पत्नी दाना हसत-हमत लाटपाट हा जाय थे। मैं तो तव यही मोचता माचता रह गया था-क्या केवल वे उत्तरा के पीछे उम माटी का असर था जहा कालिदाम न माधना की थी या यह केवल की अपनी निजी मूझ थी? रतन अब मुझमे और बातें कर रहा था। पर में सिप वेवल के बारे म साच रहा था । खाना खाकर सोत-सात तक तो मेरी यह स्थिति ही आयी थी कि जमे केवल और काली जेडज्या टक्टकी बाधे मेरी वाट जाह रह है। 1 .. एक और कालिदाम / 79 सर पेपर मधुनिकीरमय गुजावितरि गात्रप रि गात्रम्य मुरा आपा था। मगर में पानि मुकुट या सरल पाग दाहामा भी नहीं था। यामागचल पटा घटाऊनी ऊवीयतार-बद पापिया या दगा सराय। मा TT frr मगही यह स्थिति पी।गम गरी यो शिथी। जो अलावा मारे बारातिया गाय पाय पने हुए मग याामा जगभी यियाग ही पारि औरता और गानिया की पानी चाय मयम बरत नागा । उग तान गिना एगा गुम्गा आरसा या frमुम्म यी फिी उह मानना पठिन हा आना था । कार में गार योदान म इम पता चल चुरा पामि सडरी व पिता गोयल 7 अमागरण हान पा पता ना चुका है। दुशानदार न पाप पितात पिलात मा दमा यात पूछ डाली थी। अलबत्ता उगन हम यह भी यता दिया था रिचारी को दा पटिया शानी छ महीना | अदर ही विधवा हा आयो । वरना व एमा वर थाडे ही अपनी लडकी के लिए ढूढत । वह ता दर्जा आठ पाम है। हा उमरा याया हाथ अवश्य थाडा कमजार है। इसीलिए हम परशान थे कि किसी भी ओर से गडबड कर दन पर हम यात बम निभायेंगे । वल से सतरा था कि गुस्से म जाकर यह कह दें-मी ही रह गयी क्या मेरे लिए सडी वालो के मना कर दन पर खतरा था कि गुस्मा ना जान की स्थिति म हम क्वल का कैसे सभालेंगे। वसे उनकी बारात में उनकी उम्न का एक मैं था । वाती तो सार के सार सात-साठ बुजुग थे । एमा इमनिए कि कम उम्र के लोगो के बाराती हाने की स्थिति म बचवानी वाता ये हा आन का खतरा था। वह ता मेर कहन पर केवल न बडी बारात की जिद छोड दी, वरना तो वे अपनी बारात म पूरे गाव का ले जाना चाहत थे। इस बात को समझे नहीं थे, पूरे गाव काल जाने पर वे लाग भी बाराती बन जायेंगे जो अभी तक उनके भाटू नी पोजा को छाती से लगाये हुए थे । इससे ता यह तक खतरा था कि कही काली जेडज्या का क्यिा कराया चौपट न हो जाय । इसीलिए उनकी बात का मैंन तीव्र विरोध क्यिा था। मेरी बात वे मान भी गय । मेरी बातें अक्सर मान भी जात थे। फिर उनके वारात की सबसे बडी ममस्या यह भी थी कि पल ता वलिप्ठ दह के कारण उनका भोजन ही 80/ नेकीराम की चारपाइया अच्छा था। पर से उनको खाने मे देर लगती थी। पक्ति मे बठकर दूसरे खाने वाला के लिए वे हमेशा सिरदद रहा करते थे। पक्ति में एक के भी खाते रहने की स्थिति म दूसरे उठ जो नही सक्त थे। इस बारे में भी मैंन तरकीब निकाली थी। वे आज के दिन उतनी ही देर तक खाना खायेंगे जब तक कि खाना खाते-खाते मेरा बाया हाथ ऊपर न उठ आये यानी कि केवल का अच्छी तरह समझाया गया था कि आज के दिन भूखा रहकर उह जिंदगी भर खिलाने वाली मिलने वाली है। इधर अब धुलिअध के शास्त्राथ जोरो पर थे। पहले ता मार ही पडित जी बनारस के शास्त्री थे। ऊपर स लड़की वाला का पडित और तज निकल आया। वे दोना एक-दूसर को नीचा दिखान पर उतर जाय। जवकि हम बारातिया की स्थिति यह थी कि अदस्नी घबराहट के कारण हम सब एक-दूमरे का मुह ताक रहे थे । सतोष की बात कि हम लोगो के उत्तरे चेहो का अथ लडकी वाला ने सारे दिन की दुगम पवतीय यात्रा का लगाया। पूरे अटठारह मील का पहाडी रास्ता था। इस पर भी चार भील की तो एक एसी चढाई कि उसे पार करने म कई बूढा के हाथ-पाव फूल आये थे। फिर मेरी ता स्थिति और भी खराब थी। मुझे न सिफ उनकी शादी की खुशी जाहिर करनी पड़ रही थी। वरन लडक्यिा और जोरता की छेडखानियो का अकेल मुझे जवाब देना पड रहा था । पर शुक्र कि धुलिअध की रश्म तो पूरी हो ही आयी। साथ ही मेर द्वारा वाया हाथ उठाने ही केवल न खाना सचमुच म ही छोड दिया। हालाकि हमम सबस मयाने रघुवर चाचा गलती से यह कह ही बठे केवल आज के दिन ता छक्कर खाना खाते है।" इसलिए उह खाना न खात देख हम सब फूते न समाय थे। हमारी नजरा म अब हमने आधा यन जीत लिया था। तभी तो खाना खाकर मैंन केवल के ससुर जी ये मकान और उनके गाव का पूरे सतोप से देखा था। उनका मकान गसो को राशनी म आस-पास के अय भवाना की तुलना में अच्छा घर था। सयोगवश यादान की रश्म भी खाना खाने के तुरत बाद शुरू होनी थी। इसलिए हम अब के यादान की तयारी में जुट आये। पर क्यादान के लिए उनकी विद्यातमा को लाना ही था कि मेरा ता एक और कालिदाम / 81 मापाहीना उठा। उगीमा यो पर गीती थी। पर उगाहा क्या लाती अपगभी ओरता की यही स्थिति पी। उनसी परागता यह तय गनगम आया था कि कहीं पयन पी अगलियत का पता नीं चत आपा छाटी-मी रिसदारिया वारण मा पता लग ही आना था। पर यहा यह यान नहीं थी । यहा ता दुपानगार यो सूचना वाली बात थी। हें अपनी दा विटियाआ यमालाना यी या हा आयी थी।'मा का नतीजा था पिप यान गुम्हान तर ता मुमै एमा नगन लगा जम काइ मुझम यह रहा है-यही ता य आगू है जिनकी वजह म तुम्हार येवल का ये अपनी सडयो द रहे हैं वरना ता य भी अपनी लडकी नहीं देव । दुग और मजबूरी म ही तो आदमी एमा करता है । यह अलग बात है कि धरती व लाग न ता तर ही कालिगम यी उद-उद्र की अमलियत या समझे और न आज । दुनिया न वालिदासो और वाल्मीरिया र दद का ममयन की वाणिश की ही वव है ? भाई एमा कौन-मा युग रहा है जन आम आदमी और सभ्राता की भापा म अतर नहीं रहा है । उम ममय क्या आम आदमी सस्कृत बालता था वह ता उम ममय उद्र उद्र वानी पाली ही बालता था। आम यादमी का वटा सघ्रातो की भाषा में उष्ट्रप्ट्र कब बाल सका है? यही तो है उसरा अभाग । वरना धरती म एसा कौन प्राणी है जो मृत्यु से डरता नहीं है ? मत्यु म ता स्वय काल तक डरता है। क्या तुमन काई एमा पागल देखा है जो जलती आग या चलती बस तया रेल के आग कूद पडे ? ऐमा ता सिफ जिंदगी से हारा हुआ आदमी करता है। पागल नहीं इतना ता क्या, धीर धीरे तो मेरी यह स्थिति हो आयी कि केवल की शादी की रश्म का भागीदार होते हुए मैं वहा नही था। उधर शादी की रश्म के फेरे तक हो जाय थे। इधर मैं केशव रतन तथा दामू की यादो म उलझ गया था। रही-सही क्मर क्वल के ससुराल के उस नथुवा न पूरी कर दी जिसे लोग क्वल की ही तरह छेड रहे थे। उसके कारण तो मुझे यहा तक लगने लगा जैसे केवल कयादान की रश्मा के बीच उसे बीच-बीच मे देखकर मुझसे कहन लगा है-अरे तू अभी भी नहीं समझा कि कालिदास शाखा पर बैठकर शाखा का काटने वाला आदमी नहीं था । अगर वह ऐमा 82 / नकीराम की चारपाइया ही आदमी होता तो वह ठीक उतनी ही देर मौनी कसे रहा जितनी दर तक विद्योत्तमा उमकी अपनी नही हा आयी? हकीकत यह थी कि वह पागल नहीं था। वह तो ऐमा आम आदमी था जिसे यदि विद्योत्तमा जमी ठोकर लग आये तो वह राम के पदा हान से पहले ही राम की मरचना वाल्मीकि की तरह कर डाने । गरीव का तो हर बेटा कालिदास हुआ करता है। कमर सिफ ठोकर भर की हुआ करती है । यह अलग बात है वि विद्यातमा जसी ठोकरें कभी कभी या विरला को ही लग पाती है आज केवल की शादी को हुए पद्रह वप हो आये है। इन वर्षों में वे भले ही अभिज्ञान शाकुतल' जैसा कोई बड़ा काम तो कर नही पाये पर वे इतने तो फिर भी काबिल हो ही आये थे कि दर्जा पाच तक अपने दो चच्चा का हिमाव व हिंदी आदि पढा सकें। व तो अब अपन बच्चो के साथ ऐसे लग रहते थे जसे अपना नाम लिखने और पढने वाले साक्षरा का कोसो पीछे छाड चुके हो तथा वे यह समझ गये हा वि उद-उद्र से उप्ट्र-उष्ट्र कहन लायक भल ही वे न बन पायें, पर बच्चा को एसा कैसे बनाया जा सकता है, वे अच्छी तरह जान चुके हैं। इसीलिए मैं जब उह देखता था मेरे सामने प्रश्न खडा हो आता था---यदि वे आज वे नये कालिदास हैं तो उनकी वह विद्योत्तमाक्सी है जिमने इह विना ठोकर मार ही इतना बदल दिया । एक और कालिदास / 83 ...भूचाल अठारह साल यकीन मानिए, यह कहानी भूचाल' वही कहानी है जिस मैं पहते एक रात पूरी करने बैठा था । मेर साथ तव एक अजीब हादसा गुजरा। उसके बाद मै इस कहानी को अव तक भी पूरा नही कर पाया । हा, जव भी पुरानी कहानिया की पाडुलिपिया के बीच मे इस कहानी को देखता, दुबारा पूरा करन का लालच हो जाता। मगर जसे ही इसको पूरा करने का मूड बनान का प्रयास करता, मै जदर-ही-जदर काप उठता। हमेशा लगता, जसे भूचाल का जलजला अब आया अब आया तथा ऊपर से एक दीवार मेर ऊपर आ गिरी। रह रहकर आखा मामन अठारह साल पहले की वह रात खिंच जाती । उस रात सिगरेट का पूरा काटा रख तथा तज चाय का डोज चढा मै अपने बिस्तर म चला गया । विचारा के तान-वान के बीच उन क्षणा की कल्पना कर रहा था कि जमीन के जदर के लावे या जाग पर पानी एकाएक गिर पडे क्याकि लोगो का विश्वास है कि भूचाल इसी कारण आता है। लोगों का यह भी कहना है कि धरती व अदरको पदा हुई ऐसे क्षणो की गस धरती के अदर के बल्टो के जरिये पास हाकर समुद्र म गिर जाय ता ठीक है वरना यह जमीन का तोदकर बाहर निकलती है । तब उस रात मैं अभी इन्ही विचारा म गोत लगा रहा था कि सचमुच ही भूचाल आ गया। धड धड धडाम की बेहद भयानक आवाज से धरती तब पाप उठी थी। मगर मैं पहले ता एक दो पल यही निश्चय नहीं कर पाया कि यह मेरी कल्पना का परिणाम है या हकीकत है ? पर तभी चारा और भूचाल भूवाल' की चीत्कार तथा सत्सा बिजली के गुल हो जान पर ही मैं भागा था बाहर की ओर । मूसलाधार बारिश हो रही थी। फिर लौटकर घरो म | 84/ जाने का माहस क्सिी म नही था। उस रात तब दिल्ली नगरी के लोग पहले झटके को भूल अभी बिस्तर पर ठीक तरह से लेट भी नही पाये थे कि दुबारा पहले जैसा ही झटका आया था। इतना ही नही उस रात तब जहा थोडी थोडी देर बाद पाच छह हत्के झटके आय थे, वही उसके वाद दिल्ली पूर दो महीने तक लगातार भूचाल के झटके महसूस करती रही थी। इस अजीब हादसे के बाद जहा मैं इस कहानी का दुबारा लिखने का साहस नही बटार पाया वही उस भयावनी रात के बाद मैं एक रात भी सो नही सका। हर क्षण, हर पल एक अजीब से मूड मे रहता। हमेशा इसी प्रयास म रहता, ऐसी वस्तु खोज निकालू जिससे भूचाल की पूर्व सूचना दुनिया का दे सकू । मगर लाख प्रयत्न के बावजूद मैं ऐसा नहीं कर पाया । यह बात दूसरी रही कि इस प्रयास के कारण अब मैं सारी दुनिया मे इधर-उधर भट- बता फिरता है । यह भी एक विचित्र सयोग होता है कि जब कभी दुनिया के किसी हिस्से में भूचाल आता है, भूचाल आने के क्षण हमेशा मैं वही होता हू। तव एसे क्षणो मे मेरी दशा बडी विचित्र हो जाती है । क्योकि एक जोर तो अपनी असफलता के प्रति दुखी होता हू, दूसरी ओर इस अथक प्रयास में चावजूद भूचाल आने के इतने कम समय पहले पता चलता है कि चाहते हुए हर वार कुछ नहीं कर पाता। भला दा-तीन मिनट म किया भी क्या जा सकता है । वह भी पता इसलिए चल पाता है कि जब भी सडका ये आवारा कुत्ता को एक निश्चित दिशा की ओर मुह कर तीखे स्वर म भौक्त हुए पाता तो घबरा उठता। इतना ही नहीं, तब एसे क्षणा चूहा को खोजता। लगभग सार चूहे एक साथ घबराय विलो से निकलकर खुली जगहो की ओर दौडत हात । तब मुझे याद आता कुत्ता के माथ मुर्गे व मुगिया की लगातार बाग । तब ऐसे क्षणा किसी भी कुत्ते को भौक्त देखकर मेरा माथा उसके पावा की आर जा युक्ता है वही मेरा जी आमग्लानि से भर जाता। एक आर समाज इह आवारा और हानिकारक समझ जहर द तडफा-तडफापर या गोली दागकर मौत के घाट उतारता है दूसरी ओर तब मेरा जी चाहता कुत्तो प्रति आभार प्रक्ट कर । मगर होता यह नि मुये कुत्ता नफरत भरी आखो सैन्यता हुआ लगता है और इशारा ही इशारों में ऐसे लगता जस कहना भूचाल / 85 चाहता हा-मिया भगवान के नाम पर रहम करो जानवर होने के कारण लाग मेर भौंकन का अथ समझ नहीं पा रहे है । तुम ता जरा जल्दी करा। चिल्लाआ भूचाल भूचाल ताकि आस-पास के दरवाजे भल ही सुरक्षित न रह पाये कम से कम इन दरवाजा के अदर रहन वाले थे हाय तो सुरक्षित रह जाये जिनके बल पर हम यह आशा ता सजाए रख सकें कि कभी य हाथ वस ही दरवाजे फिर बना डालगे जिनके टुक्डा से हम पला करत थे। यकीन मानिए ऐसा एक बार नही लगभग हर वार ही हाता। तब आवारा कुत्ता द्वारा राय गय क्तव्य-चोध के कारण मैं भूचाल भूचाल चोखता चिल्लाता कुछ ही क्षणा म सडका मडका, गलियो गलिया दौडता' है । मगर अफ्मोस कि मेरी चीख सुन भले ही लोग खिडकी खोल बाहर माय लत मुझे पागल समझ मेरो चोख भरी पूर्व सूचना पर यकीन नहीं करत । तब अवश्य चीखत चिल्लात जब सचमुच ही भूचाल आ चुका होता, तब उन क्षणाम आम-पाम चिली क्वेटा चीन, जापान तथा ईरान आदि जसी विनाशलीला एक वार और घट चुकी हाती। चारा आर एक साथ राबडा, हजारा चीखें मुन मैं जहा याप उटता वही अबरार पागला की तरह अपन घर की आर लौटता। मगर आमपास २ पडाय देर हुई लाशा से टकरान के वारण स्वय भी चीख उटता-बचाआ बचाआ। एस क्षणा, मरी पत्नी हडबहारर मुझे झरझारती। तब मरी पत्नी मुझे मपन की अवस्था म समय मुझे चेतनावस्था म लान 4 लिए तारहताड याशिश परती। तब मुझे लगता, मकहो हजारा पहरा म टक्गन के कारण भर अग प्रत्यग म जहा तोया दद है यही मर शरीर में वह रवन व वारण विपनिमाहट है जामीलाशाशीभराहट म बाच मरीरमाय आ चिपका था। पाटीदर या तब पत्नी पिर साजाती। शायः गहीवत वा उसन मरीआन ममम लिया है। मगर मैं पिरसा नहीं पाता। घटा घटा पिर भूपात य चार म साचता आगिर यह बला क्या है जा एप ता दिनमा मामान या यह नही अधिक भयावह होता है यही रात मगनार म समानान मिनट पहन पना पल पाता है PिTमा नहो।दूगरामा आटपानामा प्रभाव क्या नि आमा अरनाम माहजार मगर उबर- 86 / नागम की पारपाट्या । कर केवल अपन तक ही सिमट आता है। आदमी पली, माता पिता तथा बच्चा के प्रति नैसर्गिक लगाव तक को भूल, केवल अपनी ही प्राण रक्षा पर उत्तर आता है। मगर उत्तर कुछ भी खाज नही पाता । यह बात दूसरी है वि ऐसे कई क्षणा मे अपनी पुरानी इस कहानी को पूरा करन की कल्पना के बीच मेरे सारे शरीर में कपकपी छूट जाती । रह रहकर आखा के सामने व क्षण उभर आत जब अठारह साल पहले दिल्ली के काफी लोग तबुओ के नीचे पूरे दो महीन रातें बिताने को विवश हुए थे । फिर इस बार तो हद ही हो गयी। बहुत ही साहस बटोरकर मैंने पुरानी कहानी की पाइलिपि को उठा थोग बहुत उस पर साचा ही था कि पुन भूचाल आ खडा हुआ। यकीन मानिए, मेरी इस कहानी के माथ कई बार ऐसा ही कुछ हुआ है। इमलिए में सोचना हू-जव इम भारत भूमि म भगवान का नाम ले किसी भी काम के पूरा हो मरन का विश्वास है तो फिर उसी भगवान से हाथ जोड प्राथना क्या न की जाय कि जब तक यह कहानी पूरी न हा जब तक इस कहानी को दुनिया के अधिकाश लाग पढ न ल, तब तक कम- से-अप फिर एसा न हो। इसीलिए इसी प्राथना के माथ में इस पुरानी कहानी का पुन उठाता है। उस रात जब पहली बार भूचाल का झटका आया, आगुताप घर पर नही था। घर मोली विजया थी। वह एमी विजया जा बिना महारा दिय विस्तर म हिल तक नहीं सकती थी। उस पर भी दा कमरा तथा एक घाइगरूम वाला फ्लट इतना वडा कि जिमम उसका वसे ही दम घुटना था। तब ऐसे ही क्षणों में आया था उस बार का भूनाल । लाग तब चीखत- चित्लान अपने-अपने घरो में बाहर भागे थ। मगर तब विजया क्या कर सक्ती? केवल घिसट घिसटकर दरवाजे तक ही आ पायी थी। पता नहीं उम क्षण उसम इतनी शक्ति कहा से आ गयी थी। यह वात दूभरी थी कि इसमे आगे वह जा नही सक्तो थी क्योकि आशुताप उमर लिए दवा नन जान समय दरवाजे बाहर म बद कर गया था। वम डॉक्टर की दुवान अधिक दूर नहीं थी। मुश्वित स उस फ्लट म पाच-मात मिनट का रास्ता या । मगर ताज्जुब कि इस बार उस लौटन भूचाल | 87 मे वापी समय लग गया। एकता घर में ही जदर सिमट रहन से तग आवर टहनन कुछ आग निकल गया था दूगर मन बहलान का उस अच्छा अवसर मिल गया था। तीम दिना से विजया का इलाज करने का कारण डॉक्टर भी यह तप जान चुका था कि उसका मरीज और सब कुछ सह मक्ता है पर इम वात वा जरा भी सह नहीं मकता कि उगवा आशुनाप उमस अधिक दर दूर रह । इसीलिए वह उसे विना लाइन भी दवा दरिया परता था जवकि आज पहला मौका एसा था कि डाक्टर मक्खिया मारता सा ग्राहक का इतजार कर रहा था। पर इमसे क्या आज ता आशुताप का मन थाडा टहलने यो वेचन था | फिर दूसरी बात यह हुई कि थाडा आगे निक्लत ही जसे भूचाल का झटका आया वसे ही विजली गुल हा गयो। उस पर भी बात यह कि भागत भागत वह बच इसलिए गया कि उसन सुन रखा था यटक के बाद घबराहट म यदि काई गिर पडे ता गिरन वान का वह अग वकार हो जाता है जा जमीन स पहने टकराता है। जवनि यह धारणा क्वल जलजले के दौरान ही लिए थी लवे समय के लिए नहीं । फिर टाग की मजारी र कारण वह वमे भी तज दौट नहीं सकता था। ठीक य ही बाते विजया ने भी उम क्षण माची थी जब आशुताप न घबराहट म दरवाजा खोला था। बल्वि तव वह दरवाजे से कुछ टर झटके साथ जा बैठी थी। एक आर जब आशुतोप पागला की तरह चित्लाया था-विजया विजया-वही वह भी प्रत्युत्तर मे पूरी पकिन से चिल्लायी थी। वास्तविक्ता का पता लगत ही दाना न पवगकर तब एक दूसरे का अपनी-अपनी बाहो म भर लिया था। विज्या के अग प्रत्यग म अपन एकमात्र महार के मिन जान का जहा प्रमनता थी वही आशुनाप के अप प्रत्यग म जहा आत्मग्लानि यी, वही उसकी जाखोके आगे दम महीने पहले के वे क्षण उभर आ रह थे जब स्कूटर एक्सीडट क बाट पूर तीन महीने उसके हाथ व पाव मे प्लास्टर चढा रहा था तव विजया न क्या कुछ नहीं दिया था। तभी ता उसकी लगन व सेवा का दर अगल-बगल के बेड वाला न आशुताप को मा से कहा था धय है मा जाप जो आपको इस जमान में भी ऐमी बहू मिली है हालादि वस्तुस्थिति यह पिता भाइ-बहन विजया को सूरत स जहा नफरत करत थे वही व उसके थी कि माता 88 / नेवीराम की चारपाइया पारण आशुताप त का भल चुवं थे । यह वात दूसरी थी कि मा की वह ममता मा का वहा तक तीच लायी थी जिसने दुनिया की सामा य माओ की तरह नह आशुताप का दूध पिलाया था। पर अव ता मामला उत्टा था । आशुताप की जगह बीमार अव विजया थी । विजया भी वह जिसब एहमाना मे वह दबा हुआ था । भला अपनी निजी जमा पूजी उत्म कर जैवग तक को येच जाशुताप का इलाज वगना आसान नहीं था । उस पर भी हर पल, हर क्षण उसी के सिरहाने या पावो की आर वैठी रहती थी । क्याकि अरबपति की बटी हाने कारण, उसके एक इशार भर से इतने रुपये आ सकते थे कि जिन वल पर यह एक तो क्या, तीन-तीन, चार चार नौकर तक आशुतोप की सेवा में रख सक्ती थी। फिर उसके पिता न कहा भी था 'वेटी, तुने मेरी बात न मान भले ही यह शादी कर डाली है मगर याद रखना, दुसरो के आगे हाथ मत फैलाना क्याकि मुझे सदेह है कि तग पति इतन साधन नहीं जुटा पायगा जितने तू ।' पिता के इन्ही शबा का तो प्रतिफल यह था कि विकट से विक्ट स्थिति म पिता के आगे हाथ न फैलाने को जहा उसन प्रतिना कर डाली थी वही अपनी बीमारी की स्थिति म पति का डगमगाते देख कडे शादी म उसने कहा था, 'सबरदार पिता जी को मेरी बीमारी की सूचना नही दना । जानत हा इस सूचना का अय यह हागा कि तुम्हें पसा की जरूरत है । वैसे एसे विक्ट क्षणो मे कौन नहीं चाहता कि उसके आपरेशन से पहले अपने लाग उसके पास हा । पर मैं नहीं चाहती कि जीवन के इन अतिम क्षणाम आपयो जपमानित होन देखू ।' तब आशुताप अवाक्-मा विजण का मुह ताक्ता रह गया था । वसे एसा क्ढे वे पीछे उसका यह आशय वदापि नहीं था। उसन तो जत्यत सहजता में यह बात इसलिए कही थी दि कही जापरेशन में पहले विजया अपने माता पिता, भाई बहनो का देवना ता नहीं चाहती है, क्योंकि डॉक्टरान उसे स्पष्ट कह दिया था वैस तो इन बचने की जरा भी उम्मीद नहीं है पर अन्छा यह है कि ईश्वर पर भरोसा कर आपरशन कर दिया जाये । ऐसी मानसिकता के वीच विजया के इन शब्ान जहा उसके गेम रोम का झक्योर दिया था वही उमा मन म रह रहर केवल यही भूचाल / 89 विचार आ रहे थे कि चाहे कुछ भी करना पडे पर इसके मन म यह विचार न आय कि पसा की वजह से इसके इलाज म क्मीना गयी है । मगर लाख प्रयत्न करन पर भी कोई उपाय उस नही समझ आ रहा था । क्यादि नौकरी के अलावा अपनी आय के अय साधन लेखन को वह दस हजार रुपय म एक प्रकाशक के हाथा इस शत पर बेच चुका था कि अगल पाच वर्षो म वह जितना भी लिखेगा- वह केवल उसे ही देगा और यदि इन पाच वर्षों म वह प्रकाशक को तीन उप यास तथा चार अय कृतिया नही दगा ता उसके अब तक के सारे लेखन का कापीराइट स्वत ही प्रकाशक के हाथ म चला जायगा। हा मत्यु की स्थिति अपवाद है। वैसे यह वात किसी और समय की हाती ता जाशुताप शायद ही इस शत ना स्वीकारता । क्याकि उसका आदश जहा चाणक्य का गुरु शक्टार था वही वह लखा था-जा जपन वच्चा व पत्नी की भूख मिटान के लिए कठिन स-कठिन परिश्रम करत हुए इस स्थिति तक ता पहुच पाया कि अपनी पत्नी तथा बच्चो का अपने उन मित्रा के सरक्षण म छोड द- जिन पर उम विश्वास था कि वे परिवार के मदस्या की तरह उसकी बवसी वा नाजायज फायदा नहीं उठायेंग । मगर बावजूद इसके उसन बिक्कर सस्ता बाजारू साहित्य लिखना नही स्वीकार किया। जववि विजया के इलाज की बवसी एमी थी कि आशुताप के पास इसके अलावा और चारा न था। हालाकि करारनामे पर हस्ताक्षर करत समय उमक मन में अपन एक मह यागी रचनाकार की सलाह हावी हा आयी थी कि सस्त किस्म के तथा जासूसी उप यास लिरो और प्रति उपयाम तीन हजार पल्न बाधो । इम बात की चिंता न करा कि उप याम विसवे नाम स छरे। किंतु बावजूद इसके उसने अपन प्रकाशन का शर्तों का इमलिए स्वीकारा कि क्म-म-बम वहा अपनी मनमर्जी का लियन की पूरी आजातीता थी। जबकि मित्र की सलाह म ता वियन व अलावा और कुछ नहीं था। फिर इतना मब कुछ कर चुक्न पर विजया द्वारा कही बात न ता उम जड से ही हिला दिया पा । भर ही तब वह वापी दर तब विजया व पाम अस्पताल म बठे-बठे इधर उधर की बातें करता रहा । पर उमदे मन म बार-बार क्वल यहा मन आ गहे हा रह थरि यह मब उसकी आयित्र स्थिति का परिणाम 90/ नीराम की चारपाच्या ।

है । फिर दस हजार की पूजी है भी क्तिनी ? यदि इनसे भी आगे जरूरत पड जाये तो ? तभी तो अस्पताल से घर लौट एकात पा उसने उस रात वह उप याम लिखा था जिसे फाडकरटुवडे टुकडे करत विजया न कहा था, "जब एक मा अपने जिस्म के टुकडे अपन बच्चा का अपन से अलग होते देख तथा पति के आदेशानुसार घर में रहकर भी अपने इष्ट की साधना म भागीदार बनने का सपना सजा सकती है तो क्या मैं इतनी अभागिनी हू नि अब विजली आ चुकी थी। सार पाहर म छाया भयावह कुहराम अव भूचाल की चर्चाआ म बदल चुका था। लगभग सभी लोग अपने-अपन घरा म लौट चुके थे। अलवत्ता कभी कभार मडक पर एक दा आदमियो के चलने की ध्वनि साफ सुनायी द रही थी। मजे की बात यह कि झटके के बीच हिली धरती, दरवाजा तथा खिडविया वे खटखटाट की किसी को याद नही थी क्योकि घड धड घटाम की प्रलसवारी आवाज के सामने य मब फीके थे । आशुताप भी विजया का सहारा देते हुए पुन बिस्तर पर लिटा चुका था। मगर विजया अभी भी इतनी डरी हुई थी कि दरवाजा पुला ही रत्न की जिद कर रही थी। आशुतोप भूचाल के झटका के क्षण घर पर न होने के प्रति दुख प्रकट कर रहा था। जबकि विजया भूचाल का मत्यु का प्राकृतिक महाविनाशकारी स्प बतान हुए तक कर रही थी कि मत्यु एक ऐसा प्रत्यय है जिसे ब्रह्माड के प्रत्येक पाणी का अकेले वरण करना पड़ता है । ठीक इमी तरह भूचाल की भी ऐसी भयावहता है कि प्रत्येक प्राणी इसके दौरान एकाकी हा जाता है। तब फिर आप इस क्षण घर पर रहने या न रहन का अथ ही क्या हाता? पर आशुतोप था कि इस बात को नहीं मानते हुए दुनिया भर के त्याग के उदाहरण दे रहा था । इसी तरह इन वैचारिक आदान प्रदाना में काफी ममय हो गया । वल्कि धीरे धीर दरवाजो से बाहर दिखन वाली सड़क जहा सुनसान हो आयो, वहीं अब दरवाजा के बद करन की आवश्यक्ता तक विजया महसूस करने लगी । यही कारण था कि विजया की इच्छा क अनुरूप आशुतोप दरवाजा बद करने के लिए आग बढा। पर भी दरवाजे भूचाल 191 तक पहुच भी नहीं पाया था कि धड धड घडाम की आवाज के बीच धरती एक बार फिर काप उठी । एक बार फिर बिजली गायब हो गयी। भला एम म आशुनोप भी अपन को कहा रोक पाना । आस पाम के लागा की तरह वही भर मे भूचाल भूचाल चिल्लात वाहर को चार भागा । यह वात दुमरी थी कि दरवाजा से दा चार ही कदम आग पहुचा विजया की याद आत ही काप उठा । विजली की-मी पुर्ती के वीच पागला की तरह अदर लौटा । एक माम की बीमारी से बेहद कमजार हा आयी विजया को नही गुडिया की तरह वाहा म भरकर बाहर ले आया । बाहर चारा आर अव फिर कुह राम मचा हुआ था । सुरक्षित स्थान पर पहुचते पहुचत जाशुतोप का अग प्रत्यग जात्मग्लानि म भर आया, जबकि इस सबसे वेखबर विजय कृतनता के भाव से दबी जा रही थी। अब परमपिता परमात्मा की कृपा स यह कहानी पूरी हो पायी है। इसीलिए मैं उसका तहदिल से आभार प्रकट करता हू। हा इमी के माथ उसस यह प्राथना करता हूँ, जस-जैसे इस कहानी को अधिक म-अधिक लोग पढ़ें वैसे-वस भूचाल व झटका की भयावहता कम होती चली जाये तथा अपन सहृदय पाठका से मैं यह निवेदन करता है कि चाह मैं दिखामी दू या नही मगर रात के सनाट के बीच जब कभी मैं भूचाल भूचाल' चिल्लाऊ ता मुझ पर जहा वे यकीन करे, वही सडका व गलियो के आवारा कुत्ता को जावारा और हानिकारख न ममझ उन पर निगरानी रखें कि व वे एक निश्चित दिशा की ओर मुह ऊपर उठाकर लगातार क्कश स्वर मे भौंकत है और 92 / नेकीराम की चारपाइया .०० सम्मेलन पाटन भाग हिम न साइम पार भासरया इतना विपलित पर दिया रि उस लिए एर मन्द आग टाइप परना नाठिन हा आया। पंग, डिपटगनमत समय भीग हिम्ग । उस परमान दिया था। सम्मेना हान म मुश्विन म गार-आठ मिनट शप थे, जबषि उद्घाटन-भाषण एपना तादूर, टाइप तप नहीं हुआ था । एसा इसलिए हुआ कि जिस मत्री जी या पहले उत्पाटन परना पा उह पिगी जरी पाम मे नयी दिल्ली जाना पड़ा था। वह तो मम्मान 'आगनाइजिंग-सेनेटरी' ही इतन तेज- तर्रार थे पि उहान गारा मामला मभाल लिया था। उहाने रान-हीं गतम एव अयमत्री जीग उत्पादन वरन यी स्वीकृति ली थी।नय मत्री जी म मपर र उदघाटन भाषण वा मगोदातपार पर उनम एप्रूव' भी पग्यानिया या बल्कि उहाँने ता यहा तय व्यवस्था पर ली थी इधर उद्घाटन भापण हागा उधर भापण एक घटे म छपार पषवारा आदि पाटीव वस ही वाटा जायगा-जस अध्यक्षीय भाषण । यही वजह थी कि मारी तयारिया अफरा-तफरी म हा रही थी। ठीक ऐम ही समय भास्कर की यह मानसिकता कम यपती? तभी तो उसने टाइप राइटर की टिक टिपली नहीं कि मत्रेटरी सहित तीन चार व्यक्ति एप साय बोल उठे थे कि, 'क्या हुआ" टिर टिक टक-टक । मजबूरन भास्वर को भी अपने का सपत करना पहा था। हरी-अप प्लीज, हरी-अप । बमे भास्वर की टाइपिंग की स्पीड नब्वे शब्द प्रति मिनट थी। पर 193/ जाज उमके लिए बचे दो पृष्ठ टाइप कर पाना कठिन हा आया था। वह पर वार फिर उमी मानसिकता म आ गया था, जब डिक्टशन' लेन समय इमी हिस्म पर वह ठहरा था। तब उसकीहू ह न सुनन पर मेग्रेटरी साहब न उमका ध्यान अपनी आर खीचा था। पर वह था कि न केवल अतात को यादा म जा पहुचा था वरन उन यादा के कारण उसकी पलकें तक गीती हो आयी थी । यही वजह थी कि मरेटरी माहव अवाक में भास्कर को देखत रह गये थे। वे समझ गय थे कि भास्कर की इस मन स्थिति के पीछे उनक द्वारा तैयार किये गय उदघाटन भाषण की लाइनें है । भाषण का विषय भी तो 'ड्राप आउट स्टूडेंटम यानी स्कूल छोडनवाले बच्चा की समस्याए था । आखिर वे भी ता स्वय भुक्तभागी थे। तब उनके लिए भी आग भापण का 'डिक्टेशन द पाना कठिन हो आया था। मगर अब उनकी मजबूरी ऐसी थी कि भाषण के तयार हुए बिना काम चल नहीं सकता था। इसीलिए उहांने भास्वर को तब झकझोरा था। - माहव सुना है आपको नौकर की ।' उसी न तो पूछा था। यम यम कम इन कम इन क्तिने पढे लिम्बे हो?' 'जी साहर में ता अनपढ सचमुच वही दिन भास्कर की जिंदगी का स्वर्णिम दिन था। कहा वह वरतन मलन की नौकरी की खोज म निकला था कहा उसकी स्कूली जिंदगी फिर शुरू हो गयी थी जिसकी उम सपन में भी उम्मीद नहीं थी । क्यापि पिता की मत्यु के साथ उसकी स्कूनी जिंदगी समाप्त हा गयी थी। वेचारी मा की भी तबीयत यदि ठीक हाती, तो तूल पढन का सपना वह बनाय रह मक्ता था। पर बीमारी के कारण मा का खुद ही सहारे की जरूरत थी। ऊपर से मबसे बड़ा हान के कारण सार परिवार का भार उसी पर था। यह भी मात्र सपाग था कि वह एम दरवाजे पटचा जिहान भले ही उमसे नौररी करवायी पर साथ ही उस पढाया भी । वह ता उसकी मालरिन नहीं मानी, नही ता मालिक शायद उसम नौकरी भी नहीं करवात । इतना ही नहीं उसर मालिक न उमर भाई-बहना व मा ता की पूरी मदद की थी। वह दिनभर काम और 94 / नकीराम की चारपादया रानभर पढाई करता था। यही सारी बातें थी कि उदयाटन भाषण के इस हिस्से को वह सह नहीं पाया था । क्याकि मेटरी मानव ने उसे रिक्टेशन दिया था -'अपवादो का छाड जो भी बच्चे पहाद के दिनों स्कूल छोडते है उसके पीछे काई न कोई मजबूरी होती है । चाह वह माता पिता की अकाल मौत हा या फिर गरीवी । आरडे यदि इवट्ठे क्यि जाये तास्सल छोडनवाला का पचानवे प्रतिशत ऐसे हो अभागो का होता है। पर अफमोस कि ड्राप आउट स्टूडेंटम' की बातें तो आय दिन होती है और उनकी साक्षरता की बातें भी आय दिन की जाती है, पर इस दिशा म सोचा ही नहीं जाता कि एस बच्चे स्तन क्या छोडते है । यह ठीक है वि सविधान के अनुसार चौदह साल मे कम उम्र बच्चा में मजदूरी कराना काननन जुम है। क्या इस मुद्दे पर अमल होता है ? निरक्षर प्रौढो वा माभर बनाने में लाप प्रयास करत हुए भी निरक्षरा की सम्या म कमी नहीं आ पाती है । ऐमा इसलिए कि मी निरक्षरा का जहा साक्षर बनाया जाता है, वही निरपरा म एक साथ पाच सौ और आ मिलत है। इनकी समस्याओं के बारे में गाधी जी तथा जवाहरलाल जी ने गभीरता स सोचा था। वे समझते थे कि ये ही बच्चे आगे चलकर समाज के लिए अभिशाप बनत है। इसलिए स्वल छाडनवालोनी ममम्याआ। इससे आगे भास्कर के लिए डिटशन पाना कठिन हा आया था। क्याकि, इससे आग की लाइनें बिल्कुल उमकी जिंदगी स मेल खाती थी। पर म 'डिक्टेशन' दत समय मेटरी साहब की गोली पलका के दद ने उसे और भी विचलित कर दिया था। क्योकि तब उसके मन म विचार आया था कि जो व्यक्ति इस तरह की भाषा लिख रहा है उमरे अपने अतर म कही-न कही इसका दद जार छिपा हुआ है । अयथा मचमुच उसका यह सोचना तब जरा उतरा था जब मेनेटरी साहन ने अपनी कहानी उसे सुनायी थी। मसौदा टाइप हाने मे वाद मेनेटरी साहब ने स्पष्ट शब्ा म स्वीकारा था कि यदि में तीन दिन की भूख के कारण हुसनी साहब की क्लास मे न गिर पडता तो शायद मैं भी मूरय-गवार ही रहता। क्योरि तब हनीपत का पता चलत ही हुसैनी माहब सम्मेलन / 95 हाथा कापी- पढाइ की व्यवस्था की थी। ऊपर स यदि मर नबरो को दप मेरी बीवी मुय पर, फ्दिा नही होती, तब शायद इतन पर ही मैं किसी स्कूल का मास्टर ही रह जाता । जवकि आज मैं प्रोफेसर है।' इतना ता क्या उन्होंने यहा तक सुनाया था कि उहाने न क्वल चार-पाच घरो म वतन मल, वरन मालिका के बच्चा का मक्खन डबल राटी खिलाकर खुद जाधे पट कई दिन बिताय हैं। क्याकि तीन चार राटिया खात ही मालक्नेिं कह उठनी थी- अर, तुम तो बहुत खाना खात हा । तुम्हारी ही उम्र का मरा बेटा दा राटी भी नहीं खा पाता है। मगर इतने पर भी मेरी पढने की लालमा खत्म नहीं हुई थी। जब भी मालिका के बच्चा के किताबें देखता, तब मेरे मन म विचार आता कि क्या कभी मैं भी इसी तरह किताबें पढ पाऊगा? बरी स चलत मुह की मुये चाह नही थी। सयोग से एक दिन मेरा सप रानि स्कूल के एक अध्यापक स हा गया । उसन मुये मट्रिक की परीक्षा प्राइवेट तौर पर दन की सलाह दी। मगर मेरे लिए फाम भरना आदि सभी कुछ समस्या थी। जान उस अध्यापक का मुझ पर कैसे तरम आया या जान क्या बात थी कि उसने मेरा फाम खुद फीस दकर भरा दिया। मैं मालिका की नजरें बचाकर रात म पढता था। मैं परीक्षा म पास हुआ और अपन जिन म फस्ट आया था। इसी नतीजे के साथ मेरा भाग्य बदला । मुझे वजीफा मिल गया और मैंन इटर मदाखिला ले लिया। वजीफे के पसा स वापी क्तिावें ता जुट जाती, पर राटी व मकान नहीं जुटत थे। यह मव कुछ हुमैनी माहब ने दिया था। मैं भूखा उनका क्लाम म वहोश जो हुआ था। यही वजह है कि अब जब भी मैं किसी छोट बच्चे को मजदूरी करते देखता हू, तब मेरा माया फ्ट आता है, घटों घटा में यही सोचता रह जाता हू, काश ! इस भी रात्रि-स्कूल के मास्टर चदरसिंह व हुमैनी साहव जस काई मिल जान । 'यह भी भाग्य की बात है कि एक जाई० ए० एस० की वटी हात हुए भी मेरी पत्नी मुमे इन कामो से रोक्ती नहीं, बल्कि पसा की वजह समर कामो म रुकावटें आती दख स्वय नौकरी करती है। मगर इस तरह के अभाग बच्चो की तादाद इतनी है कि चाहते हुए भी हम उनक 96/नकीराम की चारपाइया , लिए अधिक कर नहीं पान है । बच्चो को इन केंद्रा का समर्पित करके मैं मिफ उम चदरसिंह को गुरु दक्षिणा को चुका रहा है जिन्हान मेरी नोकरी गन की खुशी पर मिठाई के डिब्बे का पक्डत समय कहा था--- बैट यदि भाग बच्चा के आखो के आसुआ का अधिक म-अधिक पाछ मका ता यह मेर पर बडी कृपा होगी भास्कर तब अवाक्-मा सक्रेटरी माघ को दवताह गया उमका अनुभव यही था कि जितन भी लाग और पहुच है अम अनसीसीचक याता है ही नहीं, या फिर व एम है। जा अपनी अर्मा, है । जबकि इस वार नये मत्री जी नस्पष्ट श दा म स्वीकारा था- दुनिया की अधिकाश सरकारें भल ही शिक्षा पद्धति परजार देने की दिशाचा करती ह, मगर उनकी माजनाए एसी हाती है, जिसमें कि एहसास मेया के लिए और अधिक दबत चल जायें। क्यावि शिकलने निकम्मे बेटा की जिंदगी निभर रहती है । वम म भी यह दावा तो नहीं परत कि इस तरह की बाता स हम उबर गय है । मैं तो यह मानता हूँ कि हमारी शिक्षा पद्धति वच्चा को दो भागा म वाट दती है । एक जोर सपना के बच्चे होत ह, दूसरी आर विपना के । पर एक्दम सारी बुराइयो को दूर नही किया जा सकता। नेहरू जी का सपना था कि उनके वतन का एक भी आदमी शारीरिक व मानसिक रूप से गृलाम न रहे । इसीलिए उनके इसी सपन का पूरा करन के लिए पूर देश म एक योजना बनायी गयी है कि उद्घाटन भाषण पूरा टाइप हो चुका था। मक्रेटरी साहा भास्कर की पीठ थपथपात हुए एक प्रति छपने के लिए प्रेस वाले का दे और दूसरी का स्वय लेकर हाल की ओर चल पड़े। पूरा हॉल खचाराच भरा हुआ था। भीड की वजह स भास्कर की भी अदर पहुचने में थोडी दर लगी। वह अदर तब पहुचा, जब तालिया की गडगडाहट के बीच उद्घाटन भाषण शुरू हो चुका था । मच के पीछे मोट- मोटे अक्षरों में लिखा था- 'बाल मजदूर और उनकी समस्याए। उसने मुडकर पीछे देखा ता दग रह गया, क्याषि हाल म इधर- सम्मेलन / 97 उधर जान भर का छाडी जगहा म ट्रे म पानी के मिनाम लिप बारह- चौदह माल के बन्च नहा-तहा गडे थे । वे कुरमिया के बीच निमकर लोगा का पानी पिना रह ।। उसका माथा झनयना वठा । मका मन वहा स फिर उखड गया । पर हाल से बाहर निकनन की साच ही रहा था कि उमवी नजर फिर मरेटरी माहब पर जा टिवी । वह साचता रह गया, पहा मनेटरी माहव न मम्मेलन के विषय की जार लागा का ध्यान गीचने के लिए जान-बूझकर ता ऐमा नहीं किया है या व्यस्ततावश अनजान म उनम एमा हो गया है ? 98 / नेकाराम की चारपाइया नेकीराम की चारपाइया मया कि वह आज 'बानी या । उनको अपनी जोर जान दख स्य वाला था-'माहब चारपाझ्या वनानी हर" यही कारण था कि उनकी यह बात सुन नकी म जातक उम दवत रह गये। उह तब ऐमा गगा जमे उह धरती या वह दानत मिल आयो ह जिसकी कल्पना नी उनक निए असभव थी। क्योकि वे तो पता इम वात म परशान थे यदि इस वार व चार- पाइया नहीं बना पाय ता फिर वे शायद ही बना पाये । खतरा था उनकी योगना का पनी को पता चलन ही उनको योजना पर मुसीबत का पहाड टूट पडेगा । इसीलिए महमून के खानीपन का पता लगत ही उनके झुरिया भर चेहरे पर पहनी बार चमक या नायी थी तव उहोन महमूद के पीछे दीवार के सहार सटी वनी-वनायी चारपाइया का ईप्या भरी नजरो से देवा था, मोचा था-इनसे सौ गुना अच्छी चारपाइया बनवाऊगा। इमी कारण मारे खुशी के वे महमूद का अपना सारा काम ममझाने लगे। पर हुना यह कि उनकी बात पूरी होते ही महमूद ने जैसे ही पाच चारपाइया का हिसाब फनाया ता उनवी ता लग, उनकी खुशी तक की जमीन हित गयो । क्यावि चारपाइया के लिए उहाने सौ तय करे थ । महमूदी हिमाव अटठारह क्लिा बान, बुनाई तथा टूट फूट के कारण एक सा तीस तक जा खिचा था। वमे यह बात नहीं कि वे आज इतन पसे खच नहीं कर सकते थे। आज तो उनके पास इमरजेंसी लोन के तीन सौ म्पय थे। वे ता इन पमा मे चारपाइया के अलावा रजाइया गद्दे आदि ठीव कराकर एक बच्चे का एक स्वेटर खरीदत हुए भी क्वे पमो मे तनम्रा तर वे चार-पाच दिन 1991 ।

खीचन की साचे थे। पर महमूद न उनके इमी हिमाव के लिए प्रश्न खदा कर दिया था । मगर हद यह वि तनी बातें कर चुका पर व महमूद का मा भी नहीं कर सक्त थे । एयता सफेदपाशी जिंदगी की प्रतिष्ठा की बात दूसरा महमूद और उनकी बाता र दौरान तीन चार और वायू महमूद म खालीपने की बात पूछार निराश स लौट चुके थ। कौन जान व लाग भी नेकीराम की तरह महमूद की फिराक म ५ । यही कारण था कि नकीराम का महमूदी हिमाव स्वीकारना ही पडा । यह अलग बात थी कि बान खरीदने के बाद जम ही वे महमूद क माथ घर का लौटन लग तब पनी की याद आत ही वे घबरा उठे ! मगर इस बार उनकी पत्नी महमूद और बान लिय जात पति को दख- कर भी खीजी नही । उल्टा लव नर्से के वाद मुस्करायी थी। यह जलग बात थी कि नकीराम न पत्नी की इस मुस्कराहट का भी अथ दूसरा ही लगा लिया। महमूद व वदल व स्वय जावान ला रह थे। जवकि जाज की हतीक्त यह थी कि उनकी पत्नी एसा कुछ मात्र सक्न या वरन की स्थिति म नही थी। पिछली रात को एक बात का उन पर इतना जमर था कि वह जदर ही अदर जाज रा रही थी। फिर वसाखिया वाल महमूद न उनके मन मस्तिष्क का झक्कार डाला था। उह तो महमूद का देख यहा तक लगा था जम मामन चारपाई बनान वाला महमूद नही बल्कि उनकी गहस्थी उसके स्प म खडी है । एक ता अतराष्ट्रीय स्तर पर मनाये गय विक्लाग वप का उन पर असर था दूसर उन्हाने रात सपन म पनि कोबडबडात सुना या-चिंता मत करा। अव क्ल से कार्ट फ्श पर नही माएगा। उन्होंने सारा इतजाम कर रखा है। जव एक तुम तो क्या धरती का काई भी नहीं । तब वह अवाक्-सी अगल बगल माय पति व बच्चा को दखती रह गयी थी। पहली बार उह भी अपना परिवार चूह के परिवार-मा नगा था। सयोग कि उनका नाम दमयती था। हालाकि इसस पहल पति के गुस्म और वाता का मुन वह अक्सर सोचा करती थी-उनके पति का दिमाग सठिया आया है जबपि अव पति की बात सुन अपन का कामन तगी थी--पति की इस मानसिक्ना वे पीछे सिफ वे है । तब उनका अपना वह सारा व्यवहार याद 100/ नवीराम की चारपाया हा आया था जब उन पनि सक्मर चारपाइया वी वाते छेडत थे। और वे थी कि किमी न विमा बहान चारपाट्या की बात टाल देती थी। यही पारण था कि रात उनसी नासा मामा वार-चार वह दिन खिच आया “था--जब उनकी जिद के वारण नकीराम की चारपार याजना चादर और दरी याजना म तवदील हुई थी। उनकी नजरा म ऊपर का क्वाटर हान के कारण पश पर सोया जामता था। तब दरी व चादर खरीदने पर वे पाफी पुश हुद थी जवकि जब उह बार-बार याद जा रहा था उनो पति उम रात ता अलग पडकई रात सिफ वरवटे बदरात रह थे। तव उह पति की करवटा स जरा भी हमदर्दी नही थी जबपि जव ह यह खतरा हो आया था कि कहीं उनके नल उमे मात न छोड जायें। जनवता पो पटत समय तक उहे यह मदह अवश्य हा जाया था-लाज जस्र दाल म काला है । इसीलिए उन्होंने पति के नहात समय पति की जेवें टटाली थी। पर वावजूद तीन मो रुपय देख लेन के वे चुप रही थी। क्याकि जव वे इम सीमा ना ना पहुची थी-इस बार यदि पति न काई और बात भी की तो वे स्वय चारपाइया की जिद करेंगी। मना एसी मानसिकता म वह आज विरोध कम करती । आज तो उनका एमा तक व्यवहार था कि महमूद न छत म पहुचकर वान बाद में फ्श पर रजा वे चारपाइया के पाया और डडा का पहले लाकर महमूद के मामन रखन लगी। हा उहे नात उनके चेहरे पर यह घबराहट अवश्य झनकी थी कि उनको देख महमूद क्या सोचेगा। क्यापि चारपाइया के पायो व डडा का एक जार नक्डी का ढेर सा लगा था। यह इस तरह लात दख महमूद ने भी मोचा था-बावू जी अभी-अभी बदली होकर जाय है। ऐसा वह कई घरो म देय भी चुका था। उस क्या पता था, नेकीराम की चारपाइयो की यह दशा बदली के मफर से नहीं, जिंदगी के एसे सफर के कारण है जिमके लिए विश्ववक भी कम है। ऊपर से रही-सही स्थिति नेकीराम की उम चारपाई ने स्पष्ट कर दी, जो कमर में निछी हान की स्थिति म तो चारपाई की शक्ल मे थी । मगर नकीराम तथा उनकी पनी द्वारा छत पर लात ही ऐस दिखन लगी जैसेकि उमये वानो म नापमी होड हो कि छन के फ्श का छूने का उनम गोल्ड नेकीराम की चारपाइया / 101 मंडन यौन पायगा। एसा इसलिए कि नेवीराम के देवा के ऊपर रणे विस्तर का महारा पाकर वान जहा उठे थ वही चारपाई पर विछ बिस्तर न नसीराम की उम अमलियत का छिपा रखा था जिमम रात उम पर स विस्तर उठावर पश पर माया जाता था। हा, उमको बची-सुची शक्त ऐमी कि वर्गापार न होपर लगभग समानातर चतुभुज पी शक्न म थी। यही कारण था कि अब महमूद तक पहल कभी नकीगम र उनकी पत्नी का देखता रह गया था, फिर मजदूरपन की अपनी मजबूरी म यह यह परखन लगा-चौन-कौन माथी पाये और डडे हैं सचमुच नकीराम की इन चारपाइया की दास्तान ही अजीब थी। कमर म विछी चारपाई का छाड बाकी चारपाइया तव खरीदी गयी थी जब पाठ साल पहल उनके दा भाई बी०ए० पास कर नौकरी की खोज मे एक माय जाय थे। हालाकि नेकीराम तब भी वारपाइया खरीदने की स्थिति म नहीं थे। क्योकि भाइया की पीम जादि क लिए उ ह इतना भेजना पड़ता था कि बची तनया में मुश्किल म राटिया चल पाती थी । वह भी इसलिए नहीं कि बची तनया राटिया के लिए काफी थी, बल्कि इसलिए कि बच्चा का दूध तथा सब्जी जम दमाखों का काटकर । फिर उनका सोच था-कष्टक दिन तभी तक ह जब तर भाइया की नौकरी नहीं लगती। इसम भी बडी बात यह थी कि उनकी पत्नी भाइया की मदद के मामले में उदार थी। उनका ता उनमे कहना था—यह ठीक है वे आपके मौतत भाई ह पर क्या पिता की मदद करना आपका फ्ज नहीं? फिर भाइया के जाते ही चारपाइया खरीदन के पीछे कारण यह था कि जब वे दिल्ली आय थे तव उह लगभग आठ माल नीच फश पर ही साना पड़ा था। हालाकि गाव म भी व हमशा पश पर मोय थे। पर जान क्या वात थी कि दिल्ला म फ्श पर साना उह बेहद खरता था। तब व लक्सर साचा करत थ-सी अजीव है जादमी की यह जिंदगी जिसम जादमी नय भार की आपाधापी से जूझत वीत दिन की थकान भी न मिटा सके। आदमी के पास भरपट खान के बाद जाराम मे साने लायक चारपात ता हानी चाहिए। कई बार उनके मन मे खयात जाता-दुनिया की सी अजीव है यह दास्तान, मरने पर तो आदमी का चारपाई म ल जाया जाता 102 / नकीराम की चारपाइया हैं, जीत-जी चारपाई उसके लिए सपना बनी रहती है । इसलिए उहान एक बार नही, कई बार जपना फैसला दुहराया था-नौकरी की पहली तनखा पर सबसे पहले वे चारपाई खरीदेंगे। मगर इसम भी दिक्कत यह हो आयो कि पहले तो चार साल तक नौकरी नही लगी। फिर नौकरी लगने पर समस्या यह हो आयी, यदि वे चारपाई खरीद ले तो गाव के वे बाकी चार वेकार कहा सोयेंगे जो दिलावर चाचा की सराय म रात एक दूसरे का मुह देख अपना दुख भूला करत ये? ऊपर से चाचा की बाते एसी कि जिनके कारण दूसरी जगह कमरा लन के बदले उहान चाचा के ही साथ रना उचित समझा । क्योकि चाचा जक्सर कहा करत ----- भाई, यह ता मराय है जिसके दरवाजे गाव व इलाके के लागा के लिए हमेशा खुल है । यह अलग बात है कि काम निकल जान पर लोग दिलावर चाचा को न सिफ भूल जान है वरन् जब कभी सब्जी म ज्याद पानी पट जाय ता कहा करत ह कि आज दिलावरी मार्वा सब्जी बन आयी है । लाग भूल जात ह, सराय मिफ रैनबसरा हुमा करती है जबकि मेरी सराय एमी है जिसम जब कभी काइ आया, कोई भूखा नही रहा । काइ साचे ता जरा खान वाल आठ दम जन हा ता मैं पाव जिमीकद लाकर उनका रीग-रोग सब्जी नही खिलाफ ता और क्या करू ! दुनिया समझती है, बीवी-बच्चा की भी परवाह न करन वाला मैं बेवकूफ हू, पर मैं सोचता हू-मेरी धरती इतनी ता वाझ नहा जा रोमा जादमी पदा ही नही कर जो जपने दुख मे दूसरा का दुख बड़ा समझ- कर मरे इलावे व मेर देश क लागा का दुख दूर न कर। मुझे ता हर वेवार वे चहरे पर ऐस ही भला ऐसी बातें सुनकर नकीराम नौकरी लगन पर भी दिलावर की मराय से अलग क्स जात ? इसी कारण वे पहली तनखा पाकर भी चारपाई नहीं खरीद सके थे। हा, उहाने चारपाई तब खरीदी थी जब शादी हा आन कारण चाचा की मराय म रहना अव्यावहारिक था। पर फिर भी वे चाचा की सराय का भूल नहीं थे । जरा भी गुजाइश होन पर व न सिप चाचा की सराय म दस-पद्रह दिला आटा पहुचा आत थे वरन् जब भी ठड म ठिठुरन बच्चा का देखत थे तो उनका मन पमोज आता था। यी ता कारण या दि भाइयो को फश पर सात वे कम सह पात । नकीराम की चारपाइया / 103 उनके आत ही उहान उन मप लिए चारपाइया खरीदी थी। शायद यह भी एक सयाग था। एक ता भाइया के आत ही कमरे की दिक्कत, दमरा एक गरीव मका मालिक का लडकी की शादी के लिए एक हजार रुपया पी जररत । तीमरा एक हजार एडवास दन पर चपरासी-क्वाटर की खुली जगह का लालच । र म जाश्चय किनकीगम न एक मित्र स इस बात का जिक्र क्या किया किलही घटे मे हजार की जगह पद्रह सौ हाजिर । नतीजा यह कि ममाज की सामायटी के सहारे छत्तीस ही घट के अदर न मिफ नया मकान वरन वे पाच चारपाइयो म पहली वार जपने पूरे परिवार के माथ । जलवत्ता वे ऐसा देखते हुए भी यह भूल नही पाये थे कि उनकी मा मौतली मा के व्यवहार के कारण इस समय भी गाव मकान के चाख मै फश पर सायी होगी। पर तभी उहाने सोचा था-भलाई का फल हमेशा भला मिलता है। उनके भाई जार उमकी मा को चारपाई पर मुलायेंगे । उह क्या पता था जिनका वे भाई समझे है वे भाई नहीं ह मौतले ह । व तव भूल गये ये आन वाल क्ल में जब उह पचास की जगह न सिफ पचहतर किराया देना पडेगा वरन् छ जना के बदन आठा के लिए राशन जुटात जुटान व इस स्थिति तक पहुच जायेग कि जिम सोसायटी म उह दी घट मे हजार की जगह पद्रह मोमिने थे उसी मासायटी की मामिक किश्त जग न कर पान के कारण उह अपमानित होकर इस्तीफा इसलिए देना पडेगा कि भादया के पाम में आन वाने मनीआदरा के लिए फाम ही पास्ट आफिम म खतम हा गय है इम पर भी इतना ही हुआहाता तो वात और थी। हद ता यह हा जायी कि एक भाई को शादी के मोके पर उह अपनी सौतली मा म एक ऐमा वाक्य मुनना पडा जिम सुन वे हक्के-बक्के रह गय। तभी ता वे चक्कर-मा सा छम्जे पर वठ गय थे। पर आश्चय कि पूरी रिश्नदारी म स न ता क्सिी न सौतली मा का फ्टकारा था और न नकोको दिलासा दी थी। वम भी नका के पाम अब बचा क्या था । अब तो उनके पास मिफ वे आमू बचे थे जिह बहाने की काई कीमत नही चुकानी पाती है। अगर एमो वात नहीं हाती ता मौतली यह थाडे ही पती-वह ता जनम भर का नगा हुला। जरा उमम पूछा ता उमर पास लोटन को पम है या नही हा इमक जवाब म । 104 / नीराम की चारपाश्या -जाज के अब तक खामोश रही उनकी मा अवश्य गोली थी-दुनिया मे सभी नगे पदा होत है । मभी दुनिया मे नगे ही जात है । फिर किमी के पाम यदि होता भी है तो दूसरो का कौन देता है । वसे जो दूसरा का देता है वहीं आज के जमान वा नगा है। कोई बात नहीं मेरा बेटा नगा ही सही, जब मैं अपन वट के साथ जाती हू दा रोटी मुझे दे ही देगा । वैसे भी अपना पट तो कुत्ता भी पाल लता है । खवरदार जा इससे जाग किमी न कुछ कहा इसके बाद नेकीराम अपनी मा का क्या समझात ! अगले ही सुबह अपनी मा को अपन साथ दिल्ली ले आय थे। अलबत्ता मा को लात ममय उहें यह अहसाम हो आया था कि वे न मिफ मा को ला रह है, वरन् हमेशा हमेशा के लिए भाइया स अलग हो रहे है तथा अब आग का समय उनका ऐसा आन वाला है जिसमे उनकी दमयती उनम कहा करगी-तुम निनम्मे नही तो और क्या हा, जा यह तक नही ममय सके- जमान म तो एक काम में पैदा हुए भाई भाई नहीं हा मक्त ह । हा उनके लिए थोडे सतोप की बात यह थी कि नियोजित परिवार के जमाने मे उनका परिवार इतना नियोजित नही था जिम सभाला ही नही जा सके। इस मामन म उहोंने काफी सफलता भी पा ली थी । क्यापि भाइया के जमाने म पहली का खतम हा आती उनकी तनखा धीर धीर वीस तर खिंचन ही लगी थी। इमस अधिव उमम वरक्त इमलिए नही थी कि वे ऐसे कमचारी नही थे जिनका बिना माग हो सरकार पाच-पाच छ छ मगाई- भत्ते का तोहफा बैक या फड में जमा करन दिया करती थी। व ता एने यमचारी थे जिनका महगाई-भत्ता महीना पहल डयू होलान पर भी वो तक कुभवर्णी पंमले के अधीन लटका ही रहता था। क्याकि नीति निर्देशक अच्छी तरह जानत थ, उनकी मुविधाए निफ तब तब है जब तक लोग राटी और कपडा म ही उनझे रहें। चारपाइया ता बहुत दूर की बात थी। एग म उनो पाम पाच चारपाइया को बनान नायव म माय पम में हाते? हा वे एकर चारपाइया बना मत थ । पर उमम दिक्कत यह थी कि बच्चो को जम ही एन पे बनान का पता चलता, व आपम में पहन लगत- नयी म में मोऊगा, मैं माऊगा ।' एमपिए नतीजा यह वि नीराम की चारपाया गभग तीन साल पड़ी थी। नीराम यी चारपाझ्या / 105 अव अपर महमूद चारपाइया बुनने लगा था । जाखिर वह इतना अनुभवहीन तो नही था जो मालिक के नवता मरने पर भी अलग-अलग चारपाझ्या के डडा और पाया का अलग-अलग न कर सके। यह अलग बात थी कि इस छटाई के दौरान पहले जहा वह खीजा था, वही बाद मे उसका मन नकीराम के प्रति इतना पसीजा था कि उसन अदर-ही- अदर फैमला किया था-भले ही पाया के छोटे-बडे हो आने के कारण उहें ठीक करन म उसे नये सिर से मेहनत करनी पडे । वह टूट-फूट को निभायगा। सयोग कि सिफ एक पाया टूटा था। अलबत्ता दो चारपाइयो के डडे तब तक नही बनत जब तक फिर काटन पर चारपाई के घुटना तक सिकुन्ने की मजबूरी ही न हो आये । नीचे नकीराम थे रि रजाइया और गद्दा को एक जगह जमा करन के वाद इम कशमकश म ना पहुचे ये करें तो करें क्या? क्योंकि विटिया के सुबह ही फट जाय सूट की पूर्ति उनकी जरुरता म और जुड चुकी थी। इसलिए वे चाहत हुए भी रजाइया म हाथ डालन की हिम्मत नहीं जुटा पा रह य । ऊपर से रजाइया व गद्दे एम-जमे कि वे सुदामा के तदुला की पाटलिया हा । क्याकि उनकी गई यदि कई जगह रूई के ढेर की शक्ल म थी ता रई जगह सिफ कपडा आमन-सामन । - पापा चला न बाजार। सबस पहले मेरा स्वटर।' नकीराम का लडका जिद पर उतर जाया था। हा बेटा जर खरीदेंगे दमयती वेट को दिलासा दे रही थी। बिटिया का समझा रही था वटी, पहल वडा काम कर लन दे । तरा मूट ता पहली का भी बन जायगा । दख ता पहल इसका स्वटर चाहिए। दमक निकम्म माथिया न स्वटर के टूट डारो काखीच-खीचकर पहनन लायक भी नहा छाडा है । गाउँ नगायी जाये ता कब तक?' मगर नकीराम खामाश थे। शायद व पन्नी की तरह बच्चा को दिलामा तक दन की स्थिति म नहा थ । क्यापि सबकी निगाह उन पर था, उसका दुध था- क्सिका मुह दखें। इसलिए उनकी निगाह मिफ रजाइया पर थी । जानन जा थे, जिस तरह स उनकी ख्वाहिश चारपाइया थी उमी तरह उनकी पत्नी की स्वाहिश कभी अच्छा विस्तर या। यही 106 / नकीराम की चारपाया कारण था कि इस याद न उनका इतना वेचन कर दिया कि उनकी आखो वे सामने उनका सारा अतीत खिंच आया । वसे, उह भी लखपति बनने के मौके मिले थे। पर व लखपति बनत क्स ? उनका तो आदश वह दिलावर था-जा बेकारा का रोग रोग सब्जी खिलाया करता था। उसी का तो असर था कि वे आज के खुलेआम रिश्वती जमान म भी एक कप चाय को भी रिश्वत मानते थे। तभी जान क्या हुआ कि उन्होन आवेशवश एक रजाई उठा ली। तागा ताडन लग । उनको देख दमयती न भी दूसरी उठा ली। अब इधर रजाइया के ताग टूट रहे थे। उधर वर्षों बाद दमयती व उनके दिला के टूटे तागे जुडन शुम हा आये थे । गरीव दिलो के तागे ऐस ही टूटते और जुडत हैं । नकीराम को पत्नी का वह चेहरा याद आ रहा था जब बच्चो की माग के बीच वह अक्सर कहा करती थी--मर सामन रोकर कुछ नहीं बनगा। राआ अपन उन चानाजा के मामन जिनकी याद छत पर पडी है। कौन जान चारपाइया ही पिघल आय दमयती को अपन पति उस मपन की याद आ रही थी जिसम उहान धरती भर के लोगा के लिए चारपाइयो की कल्पना की थी। सामन बरामद म दम की मरीज मा खास रही थी-खो खो । शायद नीचे फ्श पर सान के कारण मा का भी गाव याद गया था। क्योकि गाव मे ठीक उनक साने की जगह के ऊपर नवडी की बनी पाटी म दजना पाय व डडे पडे रहत थ । तब नकीराम बचपन मे क्ड बार रात ही रात म हे जोडन की साचत थे । बम, इमी याद का आना था कि नकीराम के लिए भी अपने का सभाल पाना कठिन हो जाया। उहोंने गुम्स म काकर तागा इतने जार स तोडा कि वर्षो पुराना रजाई का छीजा कपडा बुरी तरह फ्ट आया-चर-चर अब नकीराम और भी काप उठे । अब ता रजाई के कपड़े की जरुरत और उभर आयी थी । आखिर बधी-बधाई कदी आमद की यह स्थिति न हा ता क्सिकी हा । इसीलिए उनकी जाखो के आग पूरी तरह अधेरा छा जाया। घबराकर उहान दमयती को देखा, इसस अधिक वे कर भी क्या सक्त थे। क्योकि नकी की नक्यिा अब तक उही के क्धे पर टिकी थी। फिर उनके अपन अनुभव थे-इसान इसान के आसू देख पिघल सकता है पर पत्थरदिल' ईश्वर नहीं । शुक्र भी यह कि दमयती इतने पर भी घबरायी नकीराम की चारपाइया | 107 । नहीं । पायद जानता था-भक्ता की परीक्षा वाना वा भले ही द्वापर व त्रेता युग म रही हा पर आज के जमान म तो स्थिति यहा तक हा आयी है कि आदमी का उपना श्रम तव उमका अपना नहीं। मगर आज अव जनक लिए भी समस्या करे ता करें क्या? आज ता उनके पास तक कुछ नहीं था, वक्त-वक्त के लिए छिपाय उनव पैस तर अव गहस्थी व चूल्ह म स्वाहा हा चुके थे। उनके पति व पानी भर पाय फेफ्डा के पानी का मुखान, फ्ला की एकाएक जस्रत जा पड जायी थी। क्यावि व पिछले ज मा म एम ही कर्मों के फ्ला की धरोहर लकर पदा हुए थ। भला जब एक गूगी मा जपन वटे के लिए नगा शब्द नही सुन सकी ता एक नारी यह क्से सहती-उसके पति की ता जीभ फ्ला के लिए सम्व और वह वक्त वेवक्त लिए पति स पैसे छिपाये रहे ? हा उनके लिए तव ममम्या अवश्य खडी हो जाती था जब पति जबरदस्ती फल वच्चा कापडात थे और बच्चे उह पुन पिता का पकडा दत थे । शायद वे भी जान चुक थे—वे धरती म धरती के फला का खान नही धरती कपूवज मी कर्मों के फला का खान पैदा हुए है । आखिर जब वे इतने बच्चे ता रह नही थे जो पिता की हकाक्त की जनदेखी कर मरें। क्याकि व देव चुक थे, उनके चाचा एक दावार जाय अवश्य थ, पर उहान पमा की कमी के बारे म पजिया भर भी पूछा नही था। हा जहा-तहः वहा अवश्य करत थे-भाई साहब का परिवार ता ऐसा परिवार है जिसमे ममुद्र की तरह सारी मदद स्वाहा हो जाय । य ही बाते थी जानी र वच्चे तक एक तरह म तन स आय थ । और ता जार काइ और उपाय नही दखा ता उहाने इम्तहान ये दिना तर रात-रात बडाई पर पिता लिए फन जुटाय थे। -पापा, स्वटर पहली का ही खरीट ना। नकी च बट न इस बार भी उह ढाढम बधाया था। जाखिर वह था ता उमी वावू का वटा जिसकी जरूरत ता द्रौपदी की पौर हा और तनखा दा जून राटी तय का न हा । भाइ की बात सुन मूट की बात कहती विटिर भा वाहर चली गयी थी। शायद उमके लिए भा अव अधिय दख पाना अमा हा आया था, जबकि अव नकीगम की निगाह वाह उधर टिकी थी जिधर मा श पर लटी थी। और दमयती थी कि उहें एम लगा जम भगवान नरा 108 / नेकीराम की चारपाच्या का नहीं उनकी अपनी परीक्षा न रह हैं। उनका नाम राजा नन को म दमयती पर जो था। नल की दमयती मामान कम हान पर भी छनीम पदाथ तयार कर सकती थी। इमलिए वह बाहर एम गयी जस अनजान म वह पति का यह सरन द गयी हो, जिम आदमी पाम पम नही हात उसके मा-बाप, भाइ-बहन दास्त रिश्तदार कोइ भी अपन नहीं होत । यही वजह थी कि पत्नी कम वार के बाहर जान के कारण नकी और भी घबरा आय । अव ता सह एसा लगन लगा, जम और ता और अब उनक अपन ही हाथ-पाव तर उनक अपन नहीं रह " हातापि तव दमयती एमा मक्त टन बाहर नहीं निकली थी। वह ता उस मूप के कारण गयी थी जिमरवल पर उन्हाने चारपाइया म बचे पमा स ही स्कूली स्वेटर एक सूट-रजाइया तथा गद्दा को ही माग पूरी नहीं की वरन तीन किलो और मई खरीदते हुए घुटना मे थोडी फटी अपनी धाता तक की एम क्षति पूर्ति कर दी जम कि नकीराम का इमरजेंसी लान नहाकर धरती म आय दिन लगन वाली इमरजेंमिया मे कम न हो। क्यानि सयागवश उह सरकार द्वारा गरीबा के लिए मुहैया वह कद्राली पपटा मिल गया जा तनखा ज्याद हाने के कारण उनके पति कातो मिलता नही था । मिलता था उनका-जा बधी जामद न हान के कारण गजेटेड अपमरा के सर्टिफिकेट के सहार दूकानदारी तक करत हुए आज के गरीव थे । यह अलग बात थी कि इतना करने पर भी नको की एक और चूक के कारण दमयती का इतना पिया-वराया भी उस समय धरा का धरा रह गया जव रजाइया लकर लौटत ही वच्चा स उहे पता चला- महमूद दूसरी चारपाई व बुनन के समय से लेकर अब तक कई बार चारपाइया की अदवायनी उन छ रस्सिया की भाग कर चुका है जिह खरीदने का अब पस बचे नहीं थे। हालाकि उन क्षणा की हकीकत यह थी कि पति-पत्नी दोना लब अर्से बाद आतरिक खुशी के वीच जहा घरेलू बातें कर रहे थे वही यह सोचे थे--अब घर पहुचत ही बेटे का नया स्वेटर पहन देखेंगे विटिया सूट सिल रही होगी । यही कारण था कि बच्चो की बात सुन ता व दोना हक्के-बक्के स एक-दूसरे का मुह नेकीराम की चारपाइया | 109 ।

ताक्त रह गय । फिर काइ और उपाय न माच दमयती कपडे मुगगन का
टगी रस्मिया वरामद म पालन लगी। नवी थे कि छत पर जा महमूद
म बाल---'जर अर, इस जाखिरी चारपादक बुनने तक अभी रस्मिया
खरीदकर लाता है।
मगर मामन पान म एमे बैठे कि कब कवकर
महमूद बमाखिया के महार दुकान को लौट और क्व वे घर लौटें,
क्याकि अधेग क्षण श्रण गाढा हाता चला जा रहा था
C.

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Nekiram Ki Charpaeiyan

Author
Jagdish Chandra Sharma
Title
Nekiram Ki Charpaeiyan
File name
Nekiram Ki Charpaeiyan
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2011/03
Publisher
Gyan Bharati Dehli
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551267
Barcode
4990010032025.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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