Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Granamai

Joshi,ilachandra · 2011/01

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श्रेष्ठ उपन्यास और कहानियाँ १॥ रवीन्द्रकथाकुंज हिन्दी-मन्थरलाकरने अयतक नीचे लिखे उपन्यास और कहानियाँ प्रकाशित की हैं:- उपन्यास कनकरेखा १) हृदयकी परख १) पुप्पलता छत्रसाल प्रतिभा शमानवहृदयकी कथायें अन्नपूर्णाका मन्दिर शान्तिकुटीर ऑसफी किरकिरी '२) वीरोंकी कहानियाँ चन्द्रनाथ सुखदास -) कहानियाँ घृणामयी ११) श्रमण नारद कहानी-संग्रह दियातले अँधेरा भाग्यचक्र १) सदाचारी बालक १)/ चन्द्रकला १० नवनिधि चित्रायली ) फूलौका गुच्छा नोट-एक कार्ड लिखकर हमारा पता सूचीपन मँगाइए। हमारा पता-- मैनेजर-हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, हीराबाग, पो. गिरगॉव, बम्बई हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकरका ६७ याँ प्रन्थ । घृणामयी। लेखक--- इलाचन्द्र जोशी। प्रकाशक- हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय हीराबाग, वम्बई । आपाट, १९८६ वि० जून, सन् १९२९ ३०॥ प्रथमावृत्ति । सजिल्दफा १) [मूल्य १० प्रकाशक- नाथूराम प्रेमी, मालिक हिन्दी-अन्य नरनाकर कार्यालय, हीराबाग, यम्बई। मुद्रक- मंगेश नारायण कुलकर्णी, कर्नाटक प्रेस, ३१८ ए, ठाकुरद्वार, बम्बई २॥

घृणामयी। प्रथम भाग। or - घृणा ! घृणा ! मेरी सारी आत्मा आज घृणाके भारसे ओत-प्रोत है। मुझ हत्यारी नारीने आज समस्त प्रकृतिको, सारे विश्वको अपने अन्तस्तलकी घृणासे लीप-पोतकर एकाकार कर दिया है। इस अनत सृष्टिका अस्तित्व ही आज मेरे लिये केवल घृणाको लेकर है। स्त्रीका रूप देखते ही घृणासे मेरा खून खौलने लगता है, पुरुषकी छायासे भी मेरा हृदय जर्जरित हो उठता है। दिनके कोलाहलसे मैं बेतरह ऊब उठती हूँ, रात्रिकी विजन शान्तिसे मेरा दिल दहल जाता है । अनन्त सुख-दुखमय जीवनधाराकी विचित्र लहरी-लीला देख देखकर मेरी आत्मा भड़क उठती है, और महामृत्युकी कल्पनासे भी मेरी रग-रगमें निनिड़ उदासीनतामय धृणा व्याप्त हो जाती है। हाय मेरे भगवान् ! इस घृणामयी नारीकी क्या गति होगी! किस विकराल अधकारमय, अनतशून्यमय, निबिड अवसादमय गहन गहरकी और इस क्रूरा, उत्तेजिता, हिंसामयी रमणीको तुम ढकेले लिए जाते हो। हे मेरे अदृश्य देवता ! इस विपुल शून्यकी अनंत छायामें क्या कहीं भी मेरे लिये त्राण नहीं है ? अनटा! इस हतभागे देशने नारीको अपने अपलापनपर गर्न करनेकी शिक्षा दी है। प्राचीनतम कालसे हमारे देशकी नारी इसी भारसे प्रेरित होती आई है। इसका फल यह हुआ है कि आज उसमें -- घृणामयी। २ न तो स्त्रीत्व ही पाया जाता है, और न पुरुषत्व ही ! नपुसकके भाव भी शायद उससे कहीं अधिक पुष्ट होगे। कायरकी क्रूरता प्रसिद्ध ही है। आज जब मेरी स्वजातिमें 'नई जागृति' फैलने लगी है तो उसकी चिर-दासत्व-जन्य कायरता अपना क्रूर रूप प्रकट करने लगी है। देशमें नारी-जागरणके प्रथम सूत्रपातकी भेरीने अपने भैरव-हुकारसे बडे-बडे वीरोंके दिल भी दहला दिए हैं। इस मगल-शखनादको सुनकर देशहितैपीगण गद्गद-भावसे पुलकित होकर आनदाश्रु बहा रहे हैं। मासिक-पत्रोंमें नई-नई उपाधि-प्राप्ता महिलाओंके चित्रोंकी धूम मची हुई है। कौन महिला एम० ए० की परीक्षामें सर्व-प्रथम हुई है, कौन महिला 'वार-प्रेक्टिस' कर रही है, किस रमणी-रत्नको ऑनरेरी मजिस्ट्रेटकी पदवी दी गई, किस वीरागनाने देशहितका व्रत ग्रहण किया है---इन्हीं सब विपयोंकी चर्चासे देशका वर्तमान चायु-मडल गूंज उठा है। ये सिद्धार्थनी, कार्य-व्रती, वीर रमणियाँ वन्य हैं ! भगवान इनका मगल करें! पर कहाँ हो तुम मेरी प्यारी सखी शकुतले ! तुम्हारी आत्मामें कभी 'नारीके अधिकार' और 'नारी-जागरण'का भार उत्पन्न नहीं हुआ। तुमने कभी युनिवर्सिटीकी शिक्षा प्राप्त नहीं की। तुमने कभी राजनीतिक क्षेत्रमें धूम मचानकी चेष्टा नहीं की । अपने मत - करणके स्वाभाविक माधुर्यस पुष्ट होकर, अपनी चिरसंगिनी सहकार- लताकी तरह, तुम बिना किसी बाह्य ससर्ग और कृत्रिम चेष्टाके प्रकृति माताकी प्रिय कुमारीकी तरह विकसित हो चली थीं ! कहाँ हो तुम प्यारी सखी ! आज इस चिर-दु खिनी, चिर-पापिनीको क्या किसी तरह भी तुम्हारे पवित्र चरणोंकी धूलि प्राप्त नहीं हो सकती ? हाय सखी, विंश शताब्दीकी उन्नतिके तुमुल कोलाहलसे उकताकर, वर्तमान युनिवर्सिटीकी शिक्षासे परितृत और सभ्य-समाजकै शिष्टाचारकी धूलिसे लिप्त होकर मैं , , N ।

३ - घृणामयी। तुम्हारे तपोनिकी विजन शातिमें अपनी आत्माको निमजित करना चाहती हूँ। क्या कालके उलटे स्रोतमें वहकर मैं किसी प्रकार तुम्हारे पास तक नहीं पहुँच सकती। २ द खकी ज्वालासे तप्त और पापकी यातनाओंसे उत्तेजित इस पापि- उनीकी रामकहानीको धैर्यपूर्वक सुननेवाले सहृदय पाठक कितने मिलेंगे ? हाय, जिस देशमें मैंने जम लिया है वहाँ पापियोंके प्रति समवेदना प्रकट करना जघन्य पाप समझा जाता है। भगवान् ! तब क्यों मै इस पुण्यके भारसे गुरु-गभीर देशमें उत्पन्न हुई ? जीरनकी समस्त अनुभूतियोंसे परिचित होनेपर आज मुझे मालूम हो रहा है कि इस देशकी आत्मासे मेरे स्वभावका बहुत कम सामजस्य है । प्राचीन ग्रीस देशमी उत्तप्त उत्ते- जनासे मेरा स्वभार गठित हुआ है। इस उत्तेजनाकी प्रचड अग्नि आज तक मेरी आत्माके अतल गर्भमें समाधिस्थ थी। आज अचानक आग्नेय- गिरिके निलोल शासनकी तरह वह वाहरको फूट निकली है। इलाहाबादके जिस विशाल भवनमें मेरा जन्म हुआ, उसकी विलासिता शहर-भरमें विख्यात थी। पर उस भरनका जो बदनाम था वह कहाँ तक सत्य था, मै कह नहीं सकती। क्योंकि बचपनसे ही मैं उसके भीतरके राजसी जीवनमें एक ऐसी मधुर शातिका अनुभव किया करती थी जिसकी कल्पना भी अब मैं किसी तरह नहीं कर सकती । हाय, भाई-बहनोंके साथ आनदसे हिल-मिलकर रहने और निद्व भारसे मुक्त विचरकर खेलकूद करनेके उन प्यारे दिनोंको अतीतकी कराल छाया कितनी निष्ठुरताके साथ हरण कर ले गई ! नाल-प्रभातके पक्षीकी तरह तन मेरी आत्मा कितनी निष्पाप, किननी विशुद्ध, और कितनी घृणामयी। ४ आनढमय थी ! भाई-बहनके बालकपनका निर्मल प्रेम ! कितना दुर्लभ और कितना अमूल्य है ! भाई ? विकार है मुझ हत्यारीको ! किस जले मुँहसे यह शब्द मै अब निकाल सकती हूँ ? किस निर्लज्ज लेखनीसे इन दो अक्षरोंको लिख सकती हूँ। भगवान् ! इस वेहयाईका क्या कुछ ठिकाना है ! जान बूझकर अपने प्यारे भाईकी हत्या करके उसीकी गुण-गाथा गानेका पाखड रचती हूँ! कुछ भी हो, आज अतिम बार अपनी निर्लज कहानी समस्त ससारको मुझे सुनानी ही होगी । जब तक वायुसडलके प्रत्येक अदृश्य अणुके साथ मेरी निर्लज्जता एकप्राण होकर मिल न जाय, तब तक मेरी उत्तप्त आत्माको कभी शाति मिलनेकी नहीं। मैं कह रही थी कि उस विशाल भवनकी अव्यक्त शातिमें मेरी बाल्या- वस्था बीती थी। हम तीन भाई-बहन थे। मैं सबसे बडी थी। मेरा नाम काकाने बडे लाडसे लज्जारती रक्खा था। (हाय, तब उन्हें क्या खवर थी कि उनकी लाडिली लडकी ऐसी चेहया निकलेगी!) मुझसे छोटा मेरा भाई राजेंद्रप्रसाद था। घरके सब लोग उसे रज्जन या राजू कहते थे। मुझ कलमुहीको भगनानने असीम सौदर्य प्रदान किया था। पर रज्जन हम तीनोंमें अधिक रूपान्, गुणवान् और बुद्धिमान् था। मुझे बहुत ही छोटी अवस्थासे अपने इस भाईका बडा गर्न था और मै उसे जी-जान- से प्यार किया करती थी। भाई मेरे । आज तुम्हारी बात लिखते-लिखते इन फूटी आँखोंसे आंसुओंकी झडी वह रही है। सारा अत करण पिघल. पिवडकर वाहरको निकलना चाहता है। हाय, मुझे कोई बतला समता है कि किसी जन्ममें इस हत्यारीको फिर कभी तुम मिलोगे । भैया, तुम जिस नक्षत्रलोकमें हो वहीं सुख और शातिसे रहो, मैं केवल इतनी ही प्रार्थना भगवानसे करती है। मैं सब तरफसे हार माननेपर भी यह आशा किसी तरह नहीं छोड़ सकती कि किमी-न-किसी जन्ममें तुम्हारे घृणामयी। दर्शन मुझे फिर मिलेंगे ही। तुम्हारे देवताके समान उन्नत चरित्रकी छत्र- च्छायामें रहकर मै अपनी आत्माको तुम्हारे ही समान उन्नत बनानेकी चेष्टा एक बार अवश्य करूँगी। जहाँ कही भी हो, अपनी इस पापिनी, चिरदुःखिनी वहनको न भूलना! बाल्यकालमें हम तीन भाई-बहनोंने जिस निष्कलुप प्रेमके आनदमें पगकर दिन बिताए थे, उस मधुर स्मृतिको कभी न विसारना ! मेरी बहन लीला रजनसे प्राय ढाई साल छोटी थी। जब मेरी अवस्था दस वर्षकी यी तो रजन सात सालझा या और लीलाने पाँच वर्षमें पदार्पण किया था। सारे घरसे हम लोगोंका कोई विशेप सबध नही रहता था । हम तीनोंकी दुनिया ही न्यारी थी। हम अपने ही खेल-कूद, राग- रग और स्नेह-प्रेमके झगड़ेमें मग्न रहा करते थे। हमारी इस एकात बाल्यलीलामें यदि कोई बाधा थी तो वह हमारी अद्भुत नामनाली गर्नेस' ' मादमाजेल मार्या पारलोनना । इस अद्भुत रूसी महिलाको काका बबईसे पकड लाए थे । बबईमें वह उनके हाथ कैसे लगी, इसका इतिहास किसीको मालूम नहीं था। वह कन, कैसे और क्यों भारतर्पमें आई, यह बात भी कोई नहीं जानता था । उसके माँ-बाप वास्तवमें रूसी ही थे या नहीं, काकाको इस सबधमें भी शक था। कुछ भी हो, वह अँगरेजी खूब अच्छी तरहसे बोलती थी और फ्रेंच, जर्मन आदि पिलायती भाषाओंसे भी परिचित थी। हिंदोस्तानी भी वह टूटी-फूटी बोल लेती थी। 'क्यों' के बदले वह काहे ' शब्द काममें लाती थी। ऐसे अद्भुत acrant साथ वह 'काहे' कहती थी कि रज्जन निना हसे नहीं रह हँसनेपर वह पूछती-"तुम काहे हँसते. : भी जोरसे हंस पड़ता और .

घृणामयी। और आँखोसे ऑसू निकल पड़ते थे। रज्जनको हंसते देखकर मुझे भी हंसी आ जाया करती थी। मैं अक्सर उसके सामने नाच दिया करती थी और गाती थी- अँगरेजी बोली हम बोला- टटारि टूटि टुम' कभी गाती- अंगला नाचे बैंगला नाचे नाचे गुसलखाना, मेमसाहबकी चिट्ठी आई, जत्दी भेजो साना वह खीझनेपर भी हँस पडती । मेरा नाम उसने 'टॉम वॉय' रखा था। हम लोग केवल 'मादमाजेल' कहकर उसे पुकारते थे। जब काका उसे पकड लाए थे, तब उसकी अवस्था शायद ३० वर्षसे अधिक नहीं होगी। पर उसके मुंहमे इसी अवस्था में झुर्रियाँ पड गई थीं, गालोंकी हड्डियों साफ दिखलाई देने लगी थीं और ऑखोके नीचे गढे पड़ गए थे। रजन उसे यह कहकर खिशाता था-" पावलोवना-- ढल गया तेरा जोबना !" वह इस अज्ञान बालकके निष्पाप व्यगका अर्थ नहीं समझती थी। एक दिन मुझसे पूछनेपर मैंने इसका अर्थ वतला दिया। तब तो मादमाजेल ऐसी बुरी तरह बिगड उठी कि हम दोनोंपर बेभारकी मार पड़ी। मार खा चुकने पर मैं रजनको अपने सोनेके कमरेमें ले गई और उसे अपने गलेसे लगाकर उसका मुंह चुमा, उसकी पीठपर हाथ फेरकर दिलासा दिया । ३तकी चोटसे हम दोनोंके हाथोंमें खून उछल पड़ा था और छाले पड़ गए थे। अपने हायकी परवा न कर अपनी साड़ीके अंचलको मुंहकी भाफसे गरमकर मैं उसके हाथ सेंकने लगी। भाईकी पीड़ासे मेरा कलेजा फटा जाता था। मैं उसके हाथोंको सेंकती जाती थी और मेरी आँखोंसे आँसू वहते घृणामयी। जाते थे । रजन शायद समझ रहा था कि मैं अपने दर्दकी वजहसे रो रही हूँ। इस लिये यह बीच-बीचमें पूछता जाता था-"दीदी, क्या बहुत दर्द हो रहा है " उस दिनसे हम दोनोंने मार्या पारलोरनाका नाम 'मादमाजेल पूतना' रख दिया और इस नए आविष्कारसे हम दोनोंको बहुत प्रसन्नता हुई। और तो क्या, हम कभी कभी उसके सामने भी उसे पुकार बैठते ये- ।' यह हमारी गलती सुपारकर कहती थी-'पार- लोचना कहो !' मै अँगरेजीमें कहती-"माफ कीजिए, भूल हो गई ! मैं फिर-फिर आपका नाम भूल जाती हूँ। क्या कहा---मादमात्रेल पूतना वह झिड़ककर बोलती-"फिर वही गलती !" पर हम लोग बीच-बीचमें फिर-फिर वही गलती करके इसी नानिष्कृत नामका इस्ते- माल करते थे। इस नामके अर्थका रहस्य उसे माइम नहीं था । मादमाजेल पूतना 2" ३ मादमात्रेठ हमें अंगरेजी पढाया करती थी और यथासभन अंगरेजीमें ही बातें करनेके लिये बाध्य किया करती थी । इसका फल यह हुआ कि हम लोग बहुत जल्दी शुद्ध अँगरेजी बोलना सीख गए । मादमाजे- लने हमारे लिये विलायतसे चार-पाँच साताहिक तथा मासिक पत्र मँगना दिए। किस्से-कहानियोंसे भरे हुए उन पत्रोंको पाकर रज्जन और मैं फूले न समाए । कहानियोंका चस्का बड़ा बुरा होता है। हम लोग इस लतमें ऐसी बुरी तरह फंस गए कि गवर्नेससे छुट्टी पाते ही खाने-पीनेकी सुध भूलकर कहानियोंके पीछे लग जाते। रजन एक कुर्सी पकडकर एक कोनेमें बैठ जाता और मैं एक कोचमें बैठकर पढ़ती। जब कोई हँसीकी या ८ घृणामयी। अचरज-भरी वात होती तो हम एक-दूसरेको सुना दिया करते और फिर चुपचाप अपने मनमें पढने लग जाते। मेरी अवस्था अब बारह वर्षकी हो गई थी और रज्जू नौ वर्षका था। लीला अक्सर अम्मकि साथ रहती थी, पर अब वह भी धीरे-धीरे हम दोनोंके साथ हेलमेल बढाने लगी ! काकाने मुझे 'क्रॉसवेट' विद्यालयमें भरती करवा दिया । छठे दरजेमें मैं रक्खी गई। आरभमें तो मेरे लिये स्कूलमें समय विताना बडा दूभर हो गया। मै असर पाते ही अलग एक कोनेमें जाकर रोया करती और किसी लडकीसे बाते तक न करती। घर लौटकर रज्जनको देखते ही आनदसे फूली न समाती और पुस्तकोंको जमीनपर पटककर उसे अपनी दुखभरी बातें सुनाकर कलेजा ठडा करती। पर स्कूलकी लडकियाँ शायद आरभसे ही मुझे प्यार करने लगी थीं। इसका कारण मैं ठीक बतला नहीं सकती। शायद मेरे मुखमें एक करुण, सुकुमार और स्नेहपूर्ण काति वर्तमान थी, जिसकी अवज्ञा नहीं की जा सकती थी। इसके अतिरिक्त मुझे इतनी छोटी अवस्थामें ही विशुद्ध अँगरेजी बोलते और लिखते देखकर भी शायद सबके हृदयमें मेरे प्रति प्रशसा उमड़ पड़ी थी। हाय, ससारको इसकी क्या खबर कि इस निपुल विश्वकी भीतरी आत्मामें प्रवेश करनेके लिये और भग- वानकी अज्ञेय पाठशालामें भरती होनेके लिये जिस आभ्यतरिक भापाकी आवश्यकता है उसका ज्ञान न अँगरेजी सीखनेसे हो सकता है, न लैटिनसे और न ग्रीकसे। दुनियाको यह बात कैसे समझाई जाय कि अँगरेजी और फ्रेंचका ज्ञान होना अन्यत तुच्छ बात है। भगनानके यहाँ जिस ज्ञानकी कद होती है वह, संभन है, एक अशिक्षिततम कृषक- रमणीसे भी सीखी जा सके ! सैर । इन सब फालतू बातोंसे मै अपने पाठक पाटिकाओंकी धैर्यच्युति नहीं करना चाहती। मेरे जैकी और -- ९ घृणामयी। बड़े दोंकी लड़कियाँ भी मेरे प्रति अकारण प्रीतिका भार प्रदर्शित करने लगी। पडितानियों भी मेरे ऊपर मेहेरवान थी। धीरे-धीरे मैं लड़कियोंसे हिलमिल गई और डिट, ड्रामा आदिमें भाग लेकर स्कूल- भरमें सर्वप्रिय हो गई। स्कूलमें मुझे तीन वर्ष हो गए। इस बीचमें मैंने वहाँ जो 'अलौकिक ज्ञान' प्राप्त किया उससे परम पुलकित हो उठी। पर रह-रहकर एक अन्यमनस्क भार अपने सुकुमार और मधुर विपादकी छायासे मुझे निकल करने लगा। ससारके कोलाहल्में सम्मिलित होनेपर भी मैं अपने हृदयकी निनिड़ विजनतामें ही दिन बिताने लगी। कभी बगीचेके एक बेंचपर वैठकर शरत्सध्याके सूर्यास्तको स्वर्णच्छटा देखती और हृदयमें एक प्रकारको सुकुमार वेदना उमड़ पडती । ऐसा मालूम होता जैसे इस धूलि- मय कर्मचक्रके परे कहीं अनगमोहन राजकुमारों और रिलासवती परियोंकी प्रेमलीला आनदकी लहरियोंके ऊपरसे होकर बहती चली जाती है, पर मै यद्यपि परियोंसे कम रूपात्ती नहीं हू, मेरा हृदय यद्यपि परियोंके हृदय- से कम रसमय नहीं है, तथापि मैं चिरकालके लिये उस राग-रगमय लीलासे वचित की गई है। नारी-हृदयका मान-अभिमान कितना भयकर होता है, इसे पुरप-पाठक कैसे समझेंगे ? मुझ मानिनीका हृदय इसी निकट अभिमानके भारसे फूल उठता था। सुबहको जब मेरी नींद टूटती तो जिस गिलासमय वेदनाका दीर्घनि श्वास बेस मेरे हृदयसे निकल पड़ता उसका वर्णन मैं कैसे कर? मुझे भय होने लगा कि धीरे-धीरे राजूके साथ मेरा सनध विच्छिन्न होता चला जाता है । पर फिर भी हम दोनोंके स्नेह-प्रेमके झगडे और खेल वैसे ही जारी थे। मैं अब भी उसे खिझाती थी। कभी कागजकी एक गधा-टोपी बनाकर बेमालूम उसके सिरमें डाल देती थी। कभी जब -- घृणामयी। - वह कुर्सीमें बैठकर कहानी पढ़नेमें व्यस्त रहता तो उसे उठाकर और बातोंमें भुलाकर कुर्सीको चुपकेसे पीछे खिसका देती और तब उसे बैठनेके लिये कहती । वह ज्योंही बैठने जाता त्योंही घडामसे जमीनपर गिर पडता । मै खिलखिलाकर हँस पडती। वह नकियाता हुआ, बड- वडाता हुआ उठ बैठता और फिर मुस्कुराकर फ्रेंच भाषामें गाली देते हुए कहता "ऑफॉ तेरिब्ल !” (Enfant terrible)* हम लोग अब मासीसी भाषा सीखने लगे थे। कभी ऐसा होता कि मैं राजूको घूसोंसे मारती और राजू भी उन घूसोंका जनाव घूसोंमें देता । इस घूसे- वाजीको देखकर लीला रोती हुई अम्माँके पास जाती और हमारी शिका- यत करके उन्हें बुला लाती । एक दिन इसी तरह हम दोनोंकी धूम- वाजी चल रही थी। लीलाकी जासूसीके फलस्वरूप अम्मा दबे पाँव आ खडी हुई । अम्माको देखकर हम लोग बाघकी तरह डरते थे । हम दोनों सन्न रह गए। अम्मा कुछ मिनटों तक ऑखे लाल किए हुए चुपचाप खडी रहीं। फिर बोलीं-"शाबाश लज्जा, शाबाश ! वाह रज्जू , तू भी बहुत होशियार हो गया है । यही तुम लोगोंकी पढाई हो रही है। कहाँ गई मादमाजेल पानलोगना ? वह रॉड क्या यों ही दो सौ रुपए लेती है ? इधर इन छोकरे-छोकरियोंकी यह हालत है ! कोई देखनेवाला नहीं, कोई सुननेवाला नहीं। इनके काकाने इन्हें सिरपर चढा लिया है । जब लकडीकी मारसे इन लोगोंकी हड्डियाँ दुरुस्त की जाती, तब कहीं ये ठिकाने आते ! उस गोरी रॉड़की पाँचों धीमें तर है। कुछ मिहनत नहीं, कोई काम नहीं। घूमती-फिरती है, मोटरमें सैर करती है, नाच-पार्टियोंमें जाती है और हरामके दो सौ रुपए हर महीने बैंकमे जमा करती है।" * धेशा बातें पकनेवाली मालिका।

, घृणामयी। 'गोरी रॉड से अम्मॉ बेतरह जलती थीं। उनके लिये इसका कारण भी था। उन्हें शायद यह सदेह था कि काफाका उसके साथ अनुचित सबध रहता है। यह सदेह कहाँ तक सच था, मै कह नहीं सकती। पर काकाके प्रति मेरे मनमें यथेष्ट श्रद्धा थी। उनकी तीन बुद्धि, विशाल और स्नेहपूर्ण हृदय तथा उन्नत और मधुर स्वभावका मुझे गर्न या । अम्माँसे मैं अपने मनकी कोई भी वात खोलकर नहीं कह सकती थी। पर काकासे कोई बात छिपा नहीं रखती थी, गुप्त-से-गुप्त बात भी बिना किसी झिझक कह देती। कुछ भी हो, अम्माकी झिडकियोंकी हमें आदतसी पड़ गई थी। इसलिये उनके चले जानेपर हम दोनों खूब जोरसे हंसने लगे। लीलाको पकडकर मैंने उसे अपनी गोदमें बैठाया और उसका मुँह चूमकर पूछा- तूने अम्मोसे क्या कहा री पगली ? " वह चुप रही । मैंने फिर एक बार उसे चूमकर कहा-"दीदी और भैयाकी शिकायत अम्माँस करने गई थी वह हमें जब मार बैठतीं तब वह बोली-"क्यों तुम भैयाको घूसोंसे मार रही थी ?" अच्छा, अनसे नहीं मारुंगी भैना ! तू भी शिकायत मत करियो । , मला?" वह बोली- " नहीं करेंगी। काका हिंदोस्तान-भरकी बड़ी बड़ी देसी कपनियों और मिलोंके शेयरहोल्डर थे। वह पिलायतमें भी एक छोटा-सा हिंदोस्तानी होटल खोलनेका इरादा कर रहे थे । उनकी गणना युक्तपातके सर्वश्रेष्ठ धनाधिपतियोंमें थी। इधर कुछ वाँसे वह राजनीतिक क्षेत्रमें सम्मिलित घृणामयी। १२ हो गए थे और चौचीसों घटे राजनीतिक चर्चा में ही निमग्न रहते थे। प्रातके बड़े-बड़े नेता उनसे मिलने आते थे और उनकी सलाह लेकर जाते थे। काका लोकमान्य तिलकके बडे कट्टर भक्त थे। समीको मालूम है कि जब लोकमान्य अंतिम बार जेलसे छूटकर आए ये तो आते ही उन्होंने देशभरमें स्वराज्यकी धूम मचा दी थी। काका तब तक राज- नीतिक सभाओंमें निशेप रूपसे भाग नहीं लेते थे। पर इस पुनर्जागृत आदोलनसे उनकी चित्तवृत्ति भी भडक उठी। उनके जिस भननका नाम पहले 'विलास-भवन' था, उसका नाम बदलकर उन्होंने स्वराज्य-भवन ' रख दिया और खुले दिलसे राजनीतिक सम्मेलनों में सम्मिलित होने लगे। अनेक स्वदेशी सस्थाओंको उन्होंने आर्थिक सहायता दी। उनकी बातोंमें और उनके कार्यमें दृढ़ता और सहृदयता थी। इसलिये थोडे ही दिनोंमें राजनीतिक क्षेत्रमें उनकी धाक जम गई। अम्माको भी उन्होंने जबर्दस्ती अपने साथ घसीटा । इसका फल यह हुआ कि वह भी सार्वजनिक सभाओंमें वक्तृता देने लगी और लोगोंके धन्य-धन्य रखसे उत्साहित होकर घर-गृहस्थीके सब काम भूलकर देशोद्धार' की चितामें लग गई। अम्मा जब देशहितकी खातिर नेताओंके साध परामर्श करनेमें व्यस्त रहनेके कारण बाल-बच्चोंकी सुधि भी भूलने लगी तो काकाको हमारे लिये एक 'गार्नेस' रखनेकी चिता हुई । मादमाजेल मार्या पावलोपना इसी चिताका फल थी। इसके पहले हमारे लिये एक साधारण धाई नियुक्त थी। जलियानवाला बागकी रक्तोत्तेजक घटनाके कारण देश-भरमें आत्म- बलिदानका ख गूंज उठा। अलकापुरीके स्वप्नोंसे मोहाच्छन मेरे नव- वसत-मय हृदयमें इस घटनासे कुछ आघात पहुँचा, पर बहुत हलका । किंतु राजू एकदम अग्निमय हो उठा । उस समय उसकी अवस्था प्रायः . .

१३ घृणामयी। चौदह वर्पकी होगी । इस छोटी अवस्थामें ही वह उत्तेजित होने लगा और राजनीतिक विज्ञानके बडे-बडे जटिल प्रयोंके अध्ययनमें अपने दिन बिताने लगा । वह ऐंग्लो-इडियन स्कूलमें पढता था । उसने विद्रोहकी उत्तेजनाके कारण स्कूलमें जाना छोड दिया । असहयोग आदोलनके पह- लेसे ही वह असहयोगी हो गया था ! राजनीतिक प्रथोंका उसने वहुत अध्ययन किया। पर उनसे उसे विशेप सतोष नहीं हुआ । हो, एक बात अवश्य हुई । वह यह कि उसे गभीर निपयोंके अध्ययनका चस्का लग गया। आज तक वह मेरी ही तरह केवल तुच्छ किस्से-कहानियोंकी किताबोंको ही पढ़ा करता था। अब वह दर्शन, इतिहास, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी, और तो क्या डॉक्टरीकी किताबोंको भी मननपूर्वक पढने लगा। पाठकोंको अवश्य ही मेरी इस बातपर आश्चर्य होगा और यह अवश्य ही औपन्यासिक अत्युक्ति समझी जायगी। इतनी छोटी अवस्थामें ऐसे-ऐसे गहन निपयों- पर मनन करनेकी प्रवृत्तिका होना आश्चर्यकी ही बात है, इसमें सदेह नहीं। पर उसकी बुद्धि कैसी असाधारण थी और उसकी स्मरणशक्ति कितनी तीव्र थी, यह बात वे लोग जानते हैं जिन्होंने उसे देखा है। केवल बुद्धि ही नहीं, उसकी ज्ञान-पिपासा भी अत्यत उत्कट थी। वह परलिक लाइनेरीमें जाकर घटों वहीं समय काट देता ! अचानक उसे साहित्यकी धुन सवार हुई। ससार-साहित्यके पुराने और कीडों द्वारा नष्ट किए गए प्रथोंसे लेकर आधुनिकतम साहित्यिक रचनाओंका रस वह ग्रहण करने लगा। हमारे कुटुबमें स्वदेगीपनका जोर होनेपर भी हिंदीकी चर्चा आरश्यकतासे भी कम दुआ करती थी। हिंदीकी कोई भी मासिक पत्रिका हमारे यहाँ नहीं आती थी। फ्रेंच और अगरेजीके चटकीले-भड़कीले पत्र-पत्रिकाओंसे ही सर अलमारियों .

घृणामयी। भरी रहती थीं। रजनने झट हिंदीकी दो तीन प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ मैंग- वाई। अब वह हिंदी लिखनेका अभ्यास करने लगा और थोडे ही दिनों- में एक कविता लिखकर मेरे पास ले आया। उसकी यह नई मनोवृत्ति देसकर मैं हंसते-हंसते लोटपोट हो गई। उसकी करिताका अर्थ मैं कुछ भी समझ न पाई, केवल हँसते-हँसते मेरे पेटमें बल पड़ गए। उस कविताकी पहली दो पक्तियो मुझे अभी तक याद हैं- इस निष्ठुर भौतिक रीलाका पार नहीं पाया भगवान् ! दहल-दहल उठता है यह दिल सुन-सुनकर पैशाचिक गान। असलमें इस कवितामें हंसनेकी कोई बात नहीं थी। बल्कि उत्कट विभीपिकाका पिप ही उसमें मथित हुआ था। पर मुझे कवितापर हँसी नही आई थी। हंसी आई थी रज्जनकी खामखयालीपर । रजनने वह करिता काकाको दिखलाई । काकाने उसकी हार्दिक प्रशसा की और इतने प्रसन्न हुए कि तत्काल एक हजार रुपयेका चेक लिखकर पुरस्कार- स्वरूप रजनको प्रदान कर दिया । उस समय रजनकी सुदर दैदीप्यमान ऑखोंमें जो तीत्र उल्लास व्यक्त हुआ या वह अब तक मेरी आत्मामे अकित है । भाईकी योग्यताके गर्नसे मेरी छाती फूल उठी । मैं यह बात नहीं छिपाना चाहती कि राजूको एक साथ एक हजारका पुरस्कार पाते देखकर मेरे हृदयमें नारी-सुलभ विद्वेपका भार भी कुछ-कुछ जागरित हुआ था, पर इसके साथ ही उसके प्रति आतरिक स्नेह भी द्विगुण वेगसे उमड चला। अपने कमरेमें ले जाकर राजूने मुझे उस कविताका भीतरी मर्म सम- झाया | ऍसीरिया, बेबिलोनिया, मिसर और रोमकी प्राचीन सभ्यता- ओंका अध्ययन उसने खूर अच्छी तरहसे किया था। उसने समझाया "कि भौतिक सभ्यताको राक्षसी शक्ति उन्मत्त लास्य-लीलाकी कैसी कैसी 7 १५ घृणामयी। करामाते दिखला सकती है । वेबिलोनियामें लाखों टनोंके वजनकी प्रकाड मूर्तियाँ लाखों दासों द्वारा सारे शहरमें फिराई जाती थीं। जगत्-प्रसिद्ध ईफेल टॉवरसे भी ऊँची गगनचुवी मीनारें, सडकके हजारों फीट ऊपर, आकाश-मार्गसे होकर जानेवाले, मीलों तक विस्तृत राज-पथ, नाच- रग और पाशनिक आमोद-प्रमोदके लिये रचे गए एक-एक वर्ग मील तक फैले हुए सुविशाल पिलास-कक्ष, जीवनके आनदसे अपरिचित, स्वामा- निक स्वातत्र्यसे वचित, असख्य दास-दासियोंका बाजारमे क्रयनिमय आदि अनेक रहस्यपूर्ण तथा रोचक ऐतिहासिक बातोका विस्तृत वर्णन करके उसने कहा कि सात हजार वर्ष पूर्वकी इस घोर राक्षसी ऐसीरियन सभ्य- ताने अपनी उन्मत्त शक्तिके विलाससे मानव-जीवनको कितना निरानद बना दिया था ! मिसरकी सभ्यताका भी यही हाल था। रेगिस्तानके वीचमें दिल्को दहला देनेनाले, आत्माको आतकसे कपित कर देनेवाले, भीषणाकार ठोस पिरामिडोंके निर्माणमें कितने असख्य नर-मुडोका सहार हुआ होगा, इसकी क्या कोई व्यक्ति कल्पना भी कर सकता है ! वहकि 'फारो' वशकी सामसयालियोंको तृप्त करनेके लिये मानवी आत्माका रस कितनी निर्दयताके साथ निचोड़ा गया था, इसका क्या कुछ ठिकाना है। रोमके 'कॉलीजियम' तथा अन्य प्रकाड गिलास-गृहोंमें धनी दर्शक- गण किम प्रकार गुलामोंकी निष्ठुर सहार-लीला देखकर तृप्त होते थे और राज्य-निस्तारके लोभसे सीज़र प्रमुख शासकगण किस प्रकार महा- युद्धोमें असल्य नरोंका विनाश साधित करनेमें व्यस्त रहते थे, यह बात उसने विस्तारपूर्वक समझाई । उसने कहा--तबसे आज तक मानव- जाति उसी प्रबल भौतिक शक्तिके ताड़नसे क्षत-विक्षत होती आई है। वर्तमान विष भरी सभ्यताकी फुफकार उसी प्राचीन गर्जनकी प्रतिवनि है। धर्म-प्रथोंमें कहा गया है कि ईश्वर दयामय है । यदि शक्तिके ताइ- , घृणामयी। नसे आहत असख्य प्राणियोंके हृदय-विदारक हाहाकारके प्रति धन- उदासीनताको ही दया कहते हैं, तो निर्दयता शन्द ही निरर्थक है। कर्म- फलका सिद्धात बिलकुल ढोंग है। जो असहाय, अशिक्षित, कर्मजीवी लोग अपने अस्तित्वका ही अर्थ नहीं समझते, उन्हें कर्मोका दड देना कभी न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे सरल-प्रकृति, दीन-हीन व्यक्तियोंके ऊपर पाप-पुण्यका ढकोसला आरोपित करना अतिशय क्रूरता . विश्व-नियत्रिणी किसी अज्ञात शक्तिके प्रति व्यर्थ आक्रोगसे गर्जन करते हुए राजू बोला---.." इन्हीं सब बातोंको सोचकर मैं पागल हुआ जाता हूँ, दीदी ! मानव-जीवनका क्या अर्थ है, मनुष्यकी अत्यत जटिल प्रकृतिका क्या नियम है, कोई व्यक्ति दस वर्प जीए या सौ वर्ष, इससे क्या फर्क पडता है, राजनीतिक चर्चा, समाज-सुधार, प्रथ-रचना, देशोद्धार और विश्व-विजयमें रत रहनेसे मनुष्य सचमुच अपनी उन्नति कर सकता है या नहीं, इन सब विचारोंसे मेरा चित्त ठिकाने नहीं है। ससारके सभी श्रेष्ठ ज्ञानियोंकी रचनाओंका अध्ययन मैंने किया है। पर सभीकी बातें मुझे निखिलव्यापी निष्ठुरताके सामने पोपली लगती हैं। ससारके प्राचीन और आधुनिक नेताओं के सयानेपनके ढोंगसे मेरी आत्मा भडक उठती है-~-जैसे सृष्टिका सारा रहस्य इन लोगोंके करतल- गत हो गया हो। इस अव्यक्त चकके व्यक्त पैशाचिक अट्टहासका मर्म अज्ञेय और अज्ञात है-इसे जाननेकी चेय न कर, इस जटिल सम- स्याको सुलझानेके लिये प्रवृत्त न होकर जो लोग वाह्य काँसे मानव- जातिके उपकारका पाखड रचते हैं, वे प्राकृतिक अत्याचारके ऊपर अपना अत्याचार और जोडकर चिर-पीडित मानर-समाजको और भी अधिक भार-प्रस्त करते हैं।"

. घृणामयी। कौतूहल, भय, विस्मय और हर्पने एक साथ मिलकर मेरे हृदयको आदोलित कर द्रिया । मैंने स्पष्ट देखा कि मेरा यह असाधारण भाई ससारके रात-दिनके तुच्छ सुख-दु खमें लिप्त होनेके लिये पैदा नहीं हुआ है। उसकी चिता-धारा उसे किस अपरिचित लोकको खींचे लिए जाती है, यह सोचकर मैं आतकसे कॉप उठी । जिस भाईको मैं अपने तुच्छ जीननके संकीर्ण मडलके भीतर बांधकर अपना ही समझे वैठी थी, आज उसके वधन-मुक्त होनेकी प्रवृत्तिसे परिचित होकर भय- निहल-सी हो गई। ६ यदि सच पूछा जाय तो उस समय मैं रजनको अच्छी तरहसे समझ भी नहीं पाई थी । आज समझने लगी हूँ। भीतर ही भीतर प्रतिभाकी कैसी उत्तप्त ऑचसे पीड़ित होकर वह छटपटा रहा था। भगवान बुद्ध एक दिन इसी भीपण ज्वालासे झुलसे थे । बुद्धकी और उसकी विचार-धारामें बहुत कुछ अंतर था, इसमें सदेह नहीं। पर अग्नि चाहे किसी भी रूपमे हो, उसका गुणधर्म सदा एक-सा रहता है । अगर मेरे कारण उसकी हत्या न हुई होती तो आज ससार देखता कि विजन अधकारका जो यह तारा शीतल-भारसे टिमटिमा रहा था उसके भीतर प्रलयातक वहि-ज्वाला लेलिहान हो रही थी। पर अब इन फालतू वार्तोसे क्या फायदा! कुछ भी हो, मै समझ गई कि इस भाईको मैं प्यार किए बिना नहीं रह सकती, पर उसका साथ किसी प्रकार नहीं दे सकती। मैं अपने ना-मल्लिका-मय, मलय-कोमल, मोहाच्छनकारी, मधु-मय स्वमोंको टेकर ही दिन निताने लगी। खाते पीते, सोते-जागते मुझे मेरे भीतर अव्यक्त रूपमें । - , २ - , . घृणामयी। १८ स्फुरित हुए मृग-मदका सौरभ आकुल करने लगा।, रजू प्रकृतिके भीतर शक्तिकी कठोरताको देखकर त्रस्त था, मैं उसीके, कुसुम-कोमल माया- स्पर्शसे पिघली पड़ती थी। हाय हतभागिनी नारी ! पुरुपके बिना तुम्हारा जीवन ही नहीं है। पुरुषको लेकर ही इस अनतव्यापी, 'ईथर'-प्रकपित सृष्टिमें तुम्हारी सत्ता है, अन्यथा तुम शून्यकी तरह निस्तरग, जड और निर्विकार हो। पुरुपको अपने हृदयकी कमनीय सुकुमारतासे रिझानेमें ही तुम्हारी सार्थकता है। एक ओर तुम पुरुषके बलिष्ठ स्वभावकी गरिमाका प्रभाव अपने ऊपर अनुभव करके सिकल पुलकसे रोमाचित हो उठती हो, दूसरी तरफ अनंत-सख्यक पुरुपोंको अपने रूप-जालमें दृढ़तासे जकड़े विना तुम्हारी अतृप्त आत्मा छटपटाती रहती है । हे निष्ठुरा, मायापिनी, चक्रिणी नाग- कन्या 1 पुरुष-जातिके बलिष्ठ और उन्नत प्रेमके विना तुम मृत हो, तथापि उसीके विनाशका सकल्प करके तुम सृष्टिमें अपतरी हो । हे बालभक्षिणी, भ्राता-संहारिणी पूतना ! सतानके सुमगल स्नेहसे ही तुम रसवती हो, तथापि उसीके निग्रह, उसीकी हत्याका व्रत तुमने लिया है। हाय, मुझे कौन बतानेगा कि मैं किस जन्ममें और कैसे नारी-योनिसे मुक्ति पाकर या तो पुरुष-योनि या पक्षीकी योनिमें जन्म ग्रहण करूँगी ! यदि पुरुष योनिमें मेरा जन्म हो सकेगा तो सृष्टिके नाना कमामें सम्मिलित होकर मृत्युके दुस्तर सागरको पार करके अतमें अमृतमय आनदरूपमें एक-प्रार हो जाऊँगी। यदि पक्षी-योनिमें जन्म लँगी तो जीवन-मृत्यु, पाप-पुणे और स्नेह-प्रेमके बधनसे मुक्त होकर द्विधाहीन और चिताहीन भाष विशुद्ध सौंदर्य और निर्लेप उमगके रसमें डूबी रहूँगी ।. कहाँ हो तुम अनुपम रूपवती, प्रीक-सुदरी हेलेन 1 एक जमाना जब तुमने समस्त पुरुप-जातिको अपने अलौकिक रूपके बलसे अप घृणामयी। अचलके मृत्यु-मोहक जालमें जकड़ लिया था। हाय, रक्त-पिपासिनी, पुष्प-कोमलागी दैत्य-वाला ! तुम्हारे ही लिये टॉयके प्रलयातक युद्धमें असख्य नर-मुडौंका विनाश हुआ था । अपने रूपके शाणित अस्त्रकी परीक्षामें रत रहकर अतको तुमने अपना ही विनाश किया था। अस्त्र-परी- क्षाकी यही घातक प्रवृत्ति मेरे हृदयमें भी एक बार धधक उठी थी। प्रीस देशके बडे बड़े कनियों ने अपने कायोंमें तुम्हारी ही गाथा गाई है। सभा है, इस पिशाचिनी नारीकी रूपगाथा भी भविष्यमें कोई करि वर्णित करेगा। पर स्त्री-हृदयकी राक्षसीवृत्तिका पार क्या वीर और सहृदय पुरुष-जाति कमी पा सकती है? पर इसी पुरुष-जातिने मुझे कितना धोखा दिया है, यह वात मैं किस "मुंहसे और कैसे लोगोंको समझाऊँ ? स्त्री-जातिके प्रति मेरे हृदयमें घातक भाव उमड पड़े है, इसमें सदेह नहीं । पर पुरुषके प्रति भी तो प्रतिहिंसासे मेरी आत्मा रह-रहकर काँप उठती है ! नाश ! नाश ! मेरे लिये कोई आशा शेष नहीं रह गई है, देवता !--- काकाके पास मिलनार्थी लोगोंके आने-जानेका तांता नित्य लगा रहता था। मैं भी अक्सर उनके कमरेमें आलस्यके भारसे झूमती हुई, बिना किसी उद्देश्यके, उनके बगलमें बैठ जाया करती थी, और यद्यपि मैंने प्रथम यौग्नमें पदार्पण कर लिया था, तथापि बच्चोंकी तरह भरी सभामें उनके गलेसे लिपट जाती थी। कारण क्या था, नहीं सकती, पर काका मुझे ही सबसे अधिक प्यार करते थे। मैं उनके मुंह लगी हुई थी और वह मेरी सब हठों और ज्यादतियोंको प्रसन्नता- पूर्वक सहन करते थे। मैं कह - २० घृणामयी। मैं बिना उद्देश्यके तो आती थी, पर एक अस्पष्ट उद्देश्य मेरे अत- स्तलमें वर्तमान रहता था। वह उद्देश्य था लब्ध और मुग्ध पुरुषोंको अपने अतुल रूपसे छकानेका । हाय अधम नारी ! अधिक करके राजनीतिक चर्चा ही वहाँ छिडी रहती थी। यद्यपि मुझे राजूकी तरह ज्ञानकी पिपासा नहीं थी, फिर भी मदमाती आँखोंसे ससारको देखकर, अलसाते हुए मनसे संसारकी सभी बातें सुननेका शौक रखती थी। दुनियाकी सभी नई-नई बातोंमें मुझे किस्से-कहा- नियोंका-सा रस मिलता था। इसलिये काकाके पास एकत्रित हुए नेताओंपर अपने अस्त्रकी परीक्षामें रत रहकर मैं सभी बातें सुना करती थी । न तो किसी पुरुपके दर्शनसे मेरे हृदयमें अधिक प्रभार पडता या, न किसीके दर्शनसे कम । केगल सबकी समष्टिके सामजस्यसे मेरा हृदय उल्लसित हो उठता था। जब इस नित्यकी परिचित सभासे लौटकर मैं अपने कमरेमें आती तो एक आकाश-पातालव्यापी अवसाद- के भारसे मेरा हृदय दब जाता था। तब मै रोनेकी इच्छा होनेपर भी नहीं रो सकती थी, सोचनेपर भी कुछ सोच नहीं सकती थी। केवल अपने अकेलेपनसे घबराकर कॉप उठती थी। अचानक इस वैचित्र्यहीन पुरुष-समाजके चिर-पुरातन वायु-मडलके ऊपर अपनी नसीनतासे तरगित होते हुए दो पूर्ण-यौवन-प्राप्त असाधारण युनक कैसे और कबसे मेरी आँखोंको विशेष रूपसे अपने अधिकारमे 'करने लगे, आरभमें मुझे इसका कुछ पता भी न चला। इन दोनोंमेसे एक सज्जन डाक्टर थे। उनका नाम कन्हैयालाल था। दूसरे महाशय कालेजके प्रोफेसर थे। उनका नाम किशोरीमोहन या। प्रोफेसर साहबको "तो मैं पहलेसे ही जानती थी। वह "क्रॉथ्समेट" की छात्रियों को एक घंटा अगरेजी पढ़ाने के लिये आया करते थे। पर आज तक उनसे मेरा 4.

घृणामयी। संबंध केवल गुरु-शिष्यका था। अब मुझे उनके साथ मित्रताका सबध स्थापित होनेकी आशा हुई। डाक्टर साहनको मैं पहले बिलकुल नहीं जानती थी। इन दोनों मित्रोंके शुभागमनसे मेरे जीवनका इतिहास विशेष रूपसे संबंधित है। इसलिये इसी विषयकी चर्चा में मुख्य रूपसे करेगी। वहुत सभव है, इस अभागिनीकी कहानीको पढनेवाली कुछ ऐसी पाठिकाएँ भी होंगी जो पतिकी पूजामें, बाल-बच्चोंके पालनेमें, अतिथि- अभ्यागतोंकी सेनामें, समस्त ससारके मगलार्थ तीज और मगलके पुण्य व्रत रखनेमें, कल्याणीया देनीकी तरह घर-गिरस्तीके काम-काजमें रत रहकर बडी कठिनाईसे फालतू कितानोंके पढनेके लिये समय निकालती होंगी। इन सन देवियोंको मगल-कोसे अनभिज्ञ इस पापिनीकी बातें विलकुल अनोखी और अचरज-भरी जान पडेंगी। मैं जानती हूँ कि मेरी कथा ससारसे निराली है। मैं पुण्यमय गार्हस्थ्य जीवनसे अनभिज्ञ है। पर फिर भी सभी नारियोंकी तरह मेरी नसोंमें भी तो प्राणकी वही एक ही धारा बह रही है। हे मेरी प्यारी माताओ और बहनो! इस अधम नारीके हृदयमें चाहे कितनी ही घृणा भरी हो, पर मैं प्रार्थना करती हूँ, तुम अपनी पनित्र आत्माओंको धृणासे मलिन न करके मेरी दु ख-भरी पाप-पूर्ण बातोंके उपर अपनी सुकुमार करुणा और सहृदयताका अमृत वरसा दो! डाक्टर क हैयालाल और प्रोफेसर किशोरीमोहनमें गादी मित्रता थी। दोनों फुतीले, बोलनेमें तेज, बातें बनाने में कुशल और सभा- चतुर थे। तुच्छसे-तुच्छ घटनापर भी ये मित्रद्वय अपने रचना-कौशलसे घृणामयी। २३, ऐसा महत्व आरोपित कर देते थे और उसे इस तरह रोचक बना देते थे कि सब सुननेवाले दग रह जाते | थोडे ही दिनोंमें इन मिलनसार मित्रोंने काकाकी सारी सभामें अपनी धाक जमा दी। शायद काकाको इन दोनोंका भीतरी हाल मालूम हो गया था। कारण कुछ भी हो, काका उनके वाक्-चातुर्यसे बिलकुल भी विचलित-से नहीं दीख पडे । मुझे यह वात बहुत खटकी । मैं जीसे चाहती थी कि काकाके साथ उनकी घनिष्टता बढे और मेरी ही तरह काका भी उनके प्रति आकृष्ट हो। पर इसके कोई चिह्न नहीं दिखलाई दिए। उस दिन कॉलेजमें छुट्टी थी। दोपहरके समय काका अपने कमरेमें अकेले बैठकर कुछ अखबारोंको मेज़पर रखकर शायद कोई देशहित- सबंधी लेख लिख रहे थे। मै उनकी एकाग्रचिंतामें विन डालनेके लिए पिना इत्तिलाके भीतर घुस गई। क्या काम है ?" मेने कहा काम कोई नहीं । यों ही अरजबार पढ़ने आई हूँ।' बोले- अखजार ले जाओ । अपने कमरमें पढ़ो। मैं झूठ बोल गई थी। असल में मैं अखबार पढने नहीं, पर काका- के साथ व्यर्थकी बकनाद करके अपना दिल बहलाने आई थी। मैंने उनकी बातपर ध्यान न देकर कहा क्या लिख रहे हो, काकाने पूछा " " " काका?" । बोले एक जरूरी लेख । इसमें बहुत-से नेताओंके दस्तखत होंगे। ' मेनीफेस्टो' के रूपमें यह छपेगा !" "किस विषयमें है ?" काकाने आधा लिखा हुआ वह लेख मेरी तरफको खिसकाकर कहा-" इसे जोर से पढो । कोई गलती रह गई हो तो सुधार लेंगे।"

घृणामयी। मैं उस अंगरेजी लेखको पढने लगी। इतनेमें नौकरने आकर कहा- दो आदमी मिलना चाहते हैं। दो आदमियोंके लिये बैठकके कमरेमें जाना फिजूल समझकर काकाने उन्हें उसी कमरेमें लिवा लानेका हुक्म दे दिया । चकित होकर मैने देखा कि मेरे मनोवाछित वही दो मित्र हैं। मैंने विस्मय-भरी दृष्टीसे दोनोंकी ओर ताका । उन दोनोंने भी मृदु-मद मुसकानसे मेरी ओर ताककर शायद यह प्रकट किया कि मेरे प्रति वे लोग उदासीन नहीं है । काकाने रूखी हँसी हँसकर दोनोंका अभिवादन किया । " पहले प्रोफेसर किशोरीमोहन बोले-" माफ कीजिए, हमारे आनेसे आपके काममें विघ्न पड़ गया। काकाने पूर्ववत् रुखाईके साथ हँसकर कहा-" नहीं, कोई ऐसा निन नहीं हुआ। अपनी झेंप प्रोफेसर साहबने शायद पहले ही मिटा लेनी चाही। इसलिये काकाके बिना कुछ पूछे ही वोले- "हम लोगोंका कोई ऐसा खास काम तो था नहीं। यों ही आपके दर्शनार्थ चले आए।" न मालूम क्यों, मैंने उसी दम यह कल्पना कर ली कि काका मन- ही-मन व्यंगके तौरपर कहेंगे—“बड़ी कृपा की।" कह नहीं सकती कि वास्तवमें उन्होंने मनमें क्या सोचा । पर वह बिना कुछ उत्तर दिए उसी खाईक साथ हँसते रहे । मुझे उनकी रखाई बहुत खटक रही धी। कुछ देर तक सब चुप रहे और कमरेमें सन्नाटा छा गया। यह सन्नाटा बड़ा अशोभन जान पड़ा। मैं अच्छी तरहसे जानती थी कि काका यदि चाहते तो बिना किसी चेष्टा या कष्टके इन अनिच्छित और ।

घृणामयी। २४ अनुपयुक्त निस्तब्धताको भग करके कोई भी रोचक चर्चा छेड सकते ये। पर वह जान-बूझकर चुप थे और शायद दो मित्रोंकी घबराहट और असमजस-भाव देखकर तमाशेका आनद लूट रहे थे। मुझे दोनों मित्रोंपर भी क्रोध आया और काकाके ऊपर भी। मित्रद्वयपर इसलिये कि आज अचानक उनकी वाक्शक्तिकी चपलता विलकुल तिरोहित हो गई थी। मैने सोचा कि काकाके सामने जिन व्यक्तियोंकी जबान ही-बद हो जाती है वे उनसे मिलनेके अधिकारी ही नहीं हैं। काकाकी निष्ठुर आमोद- प्रियतापर क्रोध आया। काकाके स्वभावसे दोनों मित्र भली भांति परिचित नहीं थे। उहें खबर नहीं थी कि सारे देशमें उनकी धाक यों ही नहीं जमी है। उनकी हठकारिता, व्यगप्रियता, वुद्धिकी तीक्ष्णता, तेजस्विता और सिद्धात- दृढ़ताके कारण ही उनके नेतृत्वकी इतनी प्रतिष्ठा है। अपने ओछे स्वभाव और छिछले ज्ञानकी चपलतासे लेहगा-मजलिसमें डींग मारनेवाले ये दो वीरवर शायद समझे बैठे ये कि काकापर भी अपने व्यक्तित्व" की धौंस जमा सकेंगे। हाय काका ! माना-चरित्रसे परिचित होनेके कारण तुम पहले ही इन लोगोंकी पोल पहचान गए थे। ९ पाँच मिनिट तक सन्नाटा रहा होगा । पर इतना ही समय एक युगके बरावर चीता । सकोच, घृणा और ग्लानिके मिश्रित भावसे मेरी पीठको रोदसे होकर काँटे चुभनेकी-सी हलकी वेदना और मैलेरिया बुखारकी-सी कँपकँपी दौड़ गई । वातें बनानेमें डाक्टर कन्हैया- लाल दोनों में ज्यादा होशियार थे। दोनोंमें अधिक रूपमान भी वही थे। -उनके रूपमें सबसे अधिक विशेषता उनकी आँखों और मूछोंमें धी।

२५ घृणामयी। उनकी लंबी-लनी, बड़ी-बड़ी आँखोंकी चितवनमें एक ऐसा नशा-सा रहता था जिसका वर्णनमें ठीक तरहसे नहीं कर सकती । स्वामी विरे. कानदको मैंने कभी नहीं देखा । मेरे पैदा होनेके समय वह इस ससारमें थे या नहीं, यह भी मुझे ठीक मालूम नहीं। पर उनकी भिन्न-भिन्न अवस्थाओंके चित्रोंका एलबम मैंने अपश्य देखा है। परिणत युवावस्थामें और उसके बाद उनकी ऑखोंमें जो एक नशीला उद्दीप्त भाव प्रतिक्षण झलका करता होगा उसी किममकी झाँई डाक्टर कहैयालालकी आँखोंमें भी मैंने पाई। मुझे यह सोचकर बड़ा आश्चर्य होता था कि आचार-विचारमें स्वामी विकानटके पैरोंकी धूल झाड़नेके योग्य न होनेपर भी यह अद्भुत सादृश्य कैमा ! उनकी मूंछोंमें और भी अधिक विशेषता थी। जर्मनीके भूतपूर्व सम्राट् , पुरुष-सिंह कैसर निलहेल्मकी शेरवारकी-सी मूठं जगत्-विख्यात हैं। जिन लोगोंने कैसरकी पक्षपात-रहित जीवनी पढ़ी है और उनका चित्र देखा है, वे जानते है कि इन मूंछोंके रौबका कैसा महत्व डाक्टर साहबकी बड़ी-बड़ी, घनी-घनी, काली-काली, सिरोंपर ऊपरकी तरफको मुडी हुई मूंछोंमें भी वही रौत्र था। पर यह होनेपर भी कैसरके स्वभार और चरितका भीतरी सादृश्य डाक्टर साहबमें बिलकुल भी नहीं पाया जा सकता था। प्रकृतिकी इस अद्भुत सामरतयालीकी घोखेबाजीसे मुझे पीछे बहुत कुछ शिक्षा मिली थी, इसमें सदेह नहीं। पर उस समय तो मे इसे देखकर चकरा गई थी। हाय ! नेपोलियनने भी अपनी जनानी सूरतसे ससारको छला था। उनकी सूरत देखकर कौन कह सकता था कि यह दुबला-पतला, नपुसकके समान रूपनाला व्यक्ति विश्व-विजय करनेके योग्य है ! डाक्टर साहबका वाह्य रूप देखकर भी कोई यह नहीं कह सकता था कि इस सिंहके समान दर्शनीय पुरुषके भीतर नपुंसकोचित भान-छिपे होंगे। te - । - घृणामयी। २६ कुछ भी हो, वह अखड नीरवता पहले कन्हैयालालने ही भंग की। वह बोले--"आज मेरे पास एक देवीजी आई थीं। वह अपने इलाजके लिये आई थीं, पर उनसे कई और भी बातें हुई। उन्होंने एक यह नया विचार प्रकट किया कि ऑल इडिया काग्रेस कमेटीके आगामी अधिवेशनमें यह प्रस्तार पेश किया जाय कि हिंदोस्तान- भरकी सब वेश्याओंको काग्रेसकी सदस्या वनानेके लिये देश-भरमें प्रचार-कार्य होना चाहिए। उन्होंने सुझाया है कि वेश्याओंमें सार्वजनिक जीवनकी वृत्ति जागरित होनेसे उनका पतित जीवन भी सुधर सकेगा और देशको भी सहायता मिलेगी। 'फीमेल इमेसिपेशन' की हमा जितनी जल्दी वेश्याओंमें फैल सकती है उतनी घर-गिरस्ती स्त्रियोंमें नहीं। मेरे विचारमें भी वेश्याओंके सुधारके आदोलनका आरभ इसी ढगसे होना चाहिए । यह तरीका ' प्रेक्टिकेबल' भी है। मै डाक्टर साहबकी बातें भी सुन रही थी, और बीच-बीचमें उत्सु- कता-पूर्वक काकाके चेहरेके भावोंपर भी ध्यान देती जाती थी। उनके मुखमडलमें व्यगकी चिर-परिचित हसी धीरे-धीरे फुरित होती जाती थी। अतको वह हॅसी चमकती हुई तलवारकी तरह निष्ठु- रतापूर्वक झलक उठी। वह बोले-"जी हॉ, इसमें क्या शक | आपकी बात विलकुल सही है। सुधार हो तो वैश्यामोंका हो ! वेश्या-सुवारके रिना देशोद्धारका लता ही जाता रहता है। इसलिये आजकलके 'डॉन किकजोट'-- सप्रदायकी प्रवृत्ति ही इस ओर है। 'पतित वहनें', 'फालन सिस्टर्स', 'अभागिनी देवियाँ' आदि कानोंको ठढक पहुँचानेवाले नामोंसे वेश्याओंके प्रति समवेदना प्रकट की जा रही है। यह देशके कल्याणके ही चिह हैं, इसमें संदेह ही किस वातका। इधर घरकी औरतें जूतोंसे ठुकराई जा घृणामयी , . रही है, भगवानकी इस आनंदमयी सृष्टिमें उनकी कोई सत्ता ही नहीं मानी जाती । भाग्यके परिहाससे हमारे देशमें भी अब यह बात देखी जाती है कि पुरुपोंके राजनीतिक जीवनका ढकोसला ही ईश्वर और प्रकृतिके आदर्शक अनुकूल समझा जाने लगा है और त्रियोंकी घर-गिरस्तीका मंगलमय जीवन-जिसके कारण ही इस दुखमय सृष्टिका कुछ अर्थ हो सकता है—अत्यत तुच्छ, अकिंचित्कर, बेकार और 'सुपरछुअस' समझा गया है। धीरे-धीरे हमारे समाजमें यह धारणा बद्धमूल होती जाती है कि सार्वजनिक जीवन ही स्त्रियोंकी उन्नतिका मूल है, इस जीवनके विना स्त्रियोंका अस्तित्व ही अर्ध-रहित है। रात-दिन सास-ससुर, पति- पुत्र, माता-पिता और भाई-बहनकी निष्काम सेवामें रत रहकर हमारे गाँवोंकी अशिक्षिता स्त्रियाँ जीवन-चकमें अपनी इच्छासे पिसती जाती हैं और कर्मके कोल्हमें अपने हृदयोंको पेरकर उनका तेल निकालनेमें लगी हैं,---इस सुदुर्लभ और अत्यत उन्नत आत्म-त्यागकी महत्तापर कोई ध्यान देना नहीं चाहता। आत्म-त्यागकी महत्ता अब केवल सभा-समिति- योंमें व्याख्यान देने और कौसिलोंका श्राद्ध करनेमे ही रह गई है।" काका अम्मकि राजनीतिक जीननसे सभपत यथेष्ट शिक्षा पा चुके थे। गृहस्थ-समधी कर्मोकी देख-रेख और सतानके लालन-पालनसे निमुख होकर चिंताहीन, और उत्तरदायित्व-रहित सार्वजनिक जीवनकी वाहनाही लूटनेके लिये कितना त्याग स्वीकार करना पडता है, यह बात वह भली भाँति जान गए थे। पर कुछ भी हो, उनके मुँहसे इस प्रकारके उत्तरकी प्रत्याशा कोई भी नहीं कर सकता था। जो व्यक्ति स्वय राजनी- तिक नेताओंका अग्रणी हो, जिसकी स्त्री राजनीतिक क्षेत्रमें विशेष ख्याति प्राप्त कर चुकी हो, जिसकी लड़कियाँ भी नगीन शिक्षाका आलोक प्राप्त करनेमें लगी हों, जिसका भूतपूर्व जीवन निलासिताके लिये बदनाम हो, " घृणामयी। २८ उस व्यक्ति के मुंहसे वेश्यासुधार और " स्त्रियोंके अधिकार" के विरुद्ध बातें सुनकर किसे आश्चर्य नहीं होगा! डाक्टर कन्हैयालाल सन्न रह गए। प्रोफेसर साहबका भी यही हाल था। पर सबसे अधिक आश्चर्य स्वय मुझे हो रहा था। मैं अब तक काकाकी कुसकि पिछे खडी थी। काकाकी चातोंसे कौतूहल बढ़नेके कारण एक कुर्सी पकड़कर उनके बग़लमें बैठ गई। पक्टर कन्हैयालाल किगोरीमोहनकी तरह सहजमें झेंप जाने- वाले आदमी नहीं थे। बोले-" तो आप क्या यह चाहते हैं कि स्त्रियाँ अनतकाल तक अज्ञताके अधकारमें डूबी रहें और अंध- भारसे पुरुपोंकी गुलामी करती रहें " काकाने चिढकर कहा-"पुरुषोंकी गुलामी ! आप क्या यह समझते हैं कि हमारी अशिक्षिता स्त्रियाँ नासमझीके कारण पुरुषोंकी सेवामें लगी है ? देश-भरमें यही भारी भ्रम फैला हुआ है। हम लोगोंको यह खबर नहीं है कि जानबूझकर, अपने हृदयके अपरिमित स्नेहकी अविरल धारा- को बद्ध न रख सकनेके कारण, हमारी स्त्रियों अपनी इच्छासे अपनेको बधनमें जकडकर गीताके निष्काम धर्मका पालन कर रही हैं। पुरुषोंका ख्याल है कि स्त्रियों उनके दवावसे दवी हुई हैं। यह बात किसीके ध्यान- में नहीं आ रही है कि अगर स्त्रियाँ इस बधनसे मुक्त होना चाहें तो ससारकी कोई भी शक्ति उन्हें रोक नहीं सकती। पुरुपकी तुच्छ शक्तिका स्त्रियाँ सदा मन-ही-मन परिहास किया करती हैं ?" अपनी तीव्रतासे डाक्टर साहबकी वाक्-शक्ति को प्रतिहत करके काका कुछ देर तक आँखें फाड-फाडकर शून्य दृष्टिसे ताकते रहे। हम २९ घृणामयी। लोग सब भयभीत होकर स्तब्ध भारसे बैठे रहे । कुछ देर तक चुप रहकर काका फिर बोले "स्त्री-शिक्षा! स्त्री-शिक्षा ! चारों ओरसे आजकल यही आवाज सुनाई देती है । पर स्त्री-शिक्षा क्या केवल युनि- वर्सिटी और राजनीतिक क्षेत्रमें ही फलित होती है ? स्त्रियोंकी आत्मा- ओंमें स्थित उन्नत वृत्तियोंको सुसंस्कृत करनेसे ही उन्हें उपयुक्त शिक्षा प्राप्त हो सकती है । जिस नई राष्ट्रीय शिक्षाकी कल्पना मै कर रहा हूँ उसमें स्त्रियोंके अधिकार ' का कोई प्रश्न ही नहीं उठता । स्त्रियोंके अधिकार भगवान्ने जन्मसे ही उन्हें दिए है। उन्हें कोई छीन नहीं सकता । वोटके अधिकारी होने, कौन्सिों में प्रवेश करने, 'बार-प्रेक्टिस' करने और ऑनेररी मैजिस्ट्रेट होनेसे ही कुछ उनकी उन्नति नहीं हो जाती ।" कन्हैयालाल इसके उत्तरमें कुछ बोलना चाहते थे। काकाने उन्हें रोककर गात स्वरमें कहा " मारिए गोली ! इन सब बातोंमें क्या रक्खा है। इस प्रकारके निनादोंका अत नहीं होता । इधर कुछ दिनोंसे मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता । पेटमें दर्द हुआ करता है, सिर भारी रहता है, तमाम वदनमें सुस्ती छाई रहती है, हर वक्त लेटे रहनेकी इच्छा होती है, किसी कामको जी नहीं करता । आप क्या इसका कोई कारण बतला सकते हैं " निपयके परिवर्तनसे कन्हैयालालने अपनेको अपमानित हुआ समझा, यह बान मै स्पष्ट देख रही थी। फिर भी गुस्सेको पीकर यथासभर गात होकर बोले "कोई सास बीमारी आपको नहीं है। 'जेनेरल टेवी- टीटी के चिह्न दिखलाई देते हैं। मैं एक बार आपको अच्छी तरहसे साउड' करेंगा । कब्जियतके लिये आप रातको 'लिकिड पेरेफिन' पिया कीजिए। कमजोरीके लिये आपको किसी टॉनिकका सेग्न करना घृणामयी। होगा। पर सब टॉनिकोंसे बेहतर आजकल एक नई दवाका आविष्कार हुआ है। मनुष्य-शरीरके क्षीण होनेके सबधमें लेटेस्ट थिओरी' यह है कि जिन-जिन उपादानोंसे मानव-शरीर गठित होता है उनमें केल्सि- यम'का भाग विशेप रूपसे पाया जाता है। हड्डियाँ और पसलियाँ 'केल्सियम से ही वनी हैं। इस केल्सियमके नष्ट होनेसे 'लॉस आफ इनर्जी के चिह्न दिखलाई देते हैं। अक्सर देखा जाता है कि जिस आद- मीके दाँत खराब होते हैं वह बीमार रहता है। अधिकाश डाक्टरोंका यह ख्याल है कि दॉत साफ न करनेसे दाँत खराब होते हैं और उनकी सराबीसे आदमी बीमार हो जाता है। इसलिये दाँतोंकी सफाईपर आज- कल बहुत जोर दिया जाता है। पर मुझे यह बात बिलकुल गलत जान पड़ती है। असलमें दॉत साफ न करनेसे दॉत खराब नहीं होते बल्कि केल्सियमका सार-भाग नष्ट होनेसे ही वे सराव होते हैं। मैंने बहुतसे ऐसे लोगोको देखा है जो रोज-बरोज दॉत साफ करते हैं, टुथ- पेस्ट, टुथ पाउडार, नमक और तेलका लेप काममें लाते हैं, कभी पान नहीं चबाते, पर फिर भी उनके दाँत खराब रहते हैं । दाँतोंकी खरानीसे आदमी वीमार नहीं होता, पर दाँतोंकी खराबी बीमारीका एक लक्षण है। इस कारण 'केल्सियम से प्रस्तुत किया गया एक नया रसायन आजकल शरीरकी दुर्वलताके लिये दिया जाने लगा है। इसका नाम है 'ट्राइकेल- सीन' | मैं आपको इसीके सेवनका उपदेश दूंगा । भारतवर्षमें अभी इस दवाका विशेष प्रचार नहीं हुआ है, पर मैं इसकी परीक्षा कर चुका हूँ। काकाने उल्लसित होकर कहा- इस थिओरीकी युक्ति मुझे जंचती है। यह बात बिलकुल नई और दिलचस्प है । 'रिकाल्सिफिकेशन' का जिक इधर मैंने राजूके मुंहसे भी सुना था, पर उसे इस सबधमें अनाड़ी , N ३१ घृणामयी। समझकर मैंने उसकी वातपर ध्यान नहीं दिया । मैं अवश्य 'दाइकल- सीन' का सेवन करूंगा। उत्सुकतापूर्ण दृष्टिसै मेरी ओर ताककर डाक्टर साहब बोले-~"अवश्य कीजिएगा। और केवल आप ही नहीं, (मेरी ओर इशारा करके) आपको भी इसका सेवन कराइए । इनका चेहरा बहुत जर्द दिखलाई देता है। इनका टेंपरेचर नॉर्मल रहता है या नहीं, यह बात मालूम करनी होगी। एक हफ्ते तक दिनमें तीन बार इनका टेंपरेचर जब लिया जाय तब मालूम पड़े। पहलेसे ही सावधान रहना ठीक होता है। इस उम्रमें स्त्रियोंको अक्सर टी वी ' हो जाया करता है।" चौंककर काकाने कहा- ऐं।' टी बी ! यह आप क्या कहते हैं |" डाक्टर साहब मुस्कुराए । बोले-~-" अभी घबरानेकी कोई बात नहीं है। इन्हें शायद ' टी वी' होगा भी नहीं। पर सारधान रहनेमें कोई हानि नहीं है। आपका क्या यह ख्याल है कि इसमें टी बी ' की टेंडेंसी' पाई जाती है ! " 'टेंडेंसी' तो अवश्य है । पर 'ग्लेंड' अभी उपजे या नहीं, यह दिना देखे नहीं कहा जा सकता। मैं साफ देख रही थी कि काकाका चेहरा स्याह होता जाता था। इस पापिनीको वह प्राणोंसे भी अधिक चाहते थे । अनिश्चित आशकासे यह घबरा उठे। पर मेरा हृदय आनदकी पुलकित धारामें हिलोरें ले रहा था। डाक्टर साहब नाना कर्मों और नाना चिंताओंमें व्यस्त रहनेपर भी मेरे प्रति उदासीन नहीं हैं, इस विचारसे मैं फूली नहीं समाती थी। - .

. A घृणामयी। ३२ मुझे 'टी. बी' हो गया है या लकवा मार गया है, इस बातकी मुझे तनिक भी चिंता नहीं थी। इस समय तक प्रोफेसर साहबकी घिग्घी बंधी हुई थी। अकस्मात् वह बोले--" पर साहब, देखेगा कौन ? इस कठिन रोगकी जॉचके सबधमें लेडी डाक्टरोका विश्वास नहीं किया जा सकता । डाक्टर कन्हैया- लाल इस सवधमें 'स्पेशियालिस्ट' हैं, सदेह नहीं। पर मीका स्त्रियोंको 'साउड' करना भद्दा जान पडता है और समाजकी ऑखोंमें खटकता है। मैं तो कोई हानि नहीं देखता, पर--" काकाने एक बार मेरी ओर ताका और इस वातका विना कोई उत्तर दिए चुप हो रहे। मेरी रग-रग में नशा समा गया था। डाक्टर साहब जब अपने मित्रके साथ वापस चले गए तो मैं अलसाती, झूमती और बल खाती हुई अपने कमरेमें जाकर पलंगपर लेट गई। आज न जाने कितने दिनोंके बाद मेरे हृदयमें चैतन्य और मूर्छाकी पारस्परिक प्रीति और ऑखमिचौनीका खेल चलने लगा था ! डाक्टर साहबका वह बुद्धिसे प्रदीप्त, सौंदर्यसे उज्ज्वल, तेज-सपन्न मुखमडल अपनी मोहनी स्मृतिसे बार-बार मुझे जीनित और मृत कर रहा था। कुसुम-कोमल, सज्जित, एसेंस-सुनासित, बिग-पोंसे निर्मित शय्याकी सुकुमार कोमलतामें मैं मक्खनकी तरह मिलकर पिघली जाती थी। दूसरे कमरेसे पियानोकी उत्सव-मय पनि कर्ण-कुहरोंसे अंतस्तलमें प्रवेश करके लदन और पैरिसके उल्लसित जीवनकी चचलतासे - हृदयको , तरगित कर रही थी। राजू शायद पासमें कोई काम न होनेसे रेशम- . घृणामयी। ना किमी उद्देश्य के निर्मिकार भारसे एक विलायती रागिणी बजा रहा या। निर्विकार भावसे इसलिये कहती हूँ कि उसकी प्रकृतिका व्यक्ति निलायती सगीतके उल्लास-विह्वल रससे कभी उत्तेजित नहीं हो सकता। विजन विश्वके विभीपिकामय दिपादसे ही उसे प्रेरणा मिला करती थी। पर मादमाजेल पानलोपनाके शिष्यत्वमें हम दोनोंने रिलायती संगीतकी शिक्षा भी पाई थी और रजन इस विद्यामें भी मुझसे बहुत आगे बढ़ गया था। इस कारण कभी-कभी वह बेठोफेनके जगत्-प्रसिद्ध 'सोनाटा' जा लिया करता था। पर उसने मुझसे कहा था कि पाश्चात्य सगीतसे उसकी आत्मा तृप्त नहीं होती। और मैं ? मैं रह-रहकर इस आनटमय सगीतकी तरगोंसे कपित होती जाती थी। कॉलेजकी लडकियोंके गाभीर्य-हीन हास-विलाससे उकताकर, घरके विपादमय और वैचित्र्यहीन जीवनसे घराकर मै इस अनत सृष्टिमें अपनेको अकेली, असहाय, नि सगिनी और उपेक्षिता समझ रही थी। आज राजूका यह सगीत मुझसे कहने लगा-" विपुल जीवनमें तुम्हारी भी सार्थकता है.--तुम भी एक दिन ससार-भरके मुग्व पुजारियोंकी पूजा पाकर नारीका सौन्दर्य-विभासित यौननोन्मत्त जीवन सार्थक करोगी। एक दिन आयेगा जब समस्त ससारका आनन्दमय उत्सव केवल तुम्हारे ही चरणोंमें हृदयाजलि देनेके लिये मनाया जायगा।" कहाँ गई 'टी बी' की चिन्ता, कहाँ गया 'केल्सियम' पर डाक्टर साहबका मतव्य ! अनत जीवन और अनत यौनके भानसे मेरी नाड़ियाँ सुरित होने लगी। मैं जानतावस्थामें ही स्वम देखने लगी। मै अनुभव करने लगी कि डाक्टर साहब मुझे टेकर देश-विदेश भ्रमण करने निकले है। असल्य पुरुषोंको रूप-मुग्ध करके मैं उनकी बातोंसे, ऑखोंसे, इगितोंसे उनकी प्रशसा लूट रही हूँ, पर प्यार सिर्फ डाक्टर साहबको ही - घृणामयी। कर रही हूँ ! डाक्टर साहब मेरे ही लिये टाक्टरी कर रहे हैं, मेरी ही चिन्तामें दिन बिता रहे हैं, मेरी ही रक्षाका व्रत उन्होंने लिया है। मुझे ससारमें किसीका डर नहीं है, क्योंकि मैं एक तेजस्वी पुत्पकी छत्रच्छाया महारानीकी तरह आसीन हूँ। यह जाग्रत स्वप्न देखते-देखते जब मैं मोहाच्छन हो गई तो अप्रसाद और क्लान्तिसे शक्तिहीन होकर यह कल्पना करने लगी कि यदि सचमुच मुझे कोई रोग हो जाता और डाक्टर कन्हैयालाल मेरा इलाज करते तो कैसा अच्छा होता फिर सोचने लगी-" अच्छा, सचमुच क्या मेरा रूप पुरुषोंको मोहित करनेके योग्य है ? क्या कन्हैयालाल सचमुच मुझे चाहते हैं । क्या मेरा सुस्त चेहरा देखकर सचमुच उन्हें दुःख हुआ था और उनके कलेजेमें चोट पहुंची थी ?" इसके बाद फिर मेरा मन उनका चित्र अकित करके उनकी रूप-सुधा, उनकी सरस ऑखोंके मद-विह्वल भारकी मधुरता पान करने लगा। इसके साथ ही प्रोफेसर किशोरीमोहनकी मूर्ति भी मेरे स्मृति-पटलमें उदित हो रही थी। मैंने सोचा-" दोनोंमेंसे अधिक रूपवान् कौन है' कन्हैयालाल ही मुझे अँचते है। किशोरीमोहन भी देखनमें सुदर हैं, इसमें सदेह नहीं । पर डाक्टर कन्हैयालालके मुखका-सा तेज उनमें कहाँ पाया जाता है । किशोरीमोहन मेरे रूपफे भक्त हैं. ऐसे भक्तोंकी मुझे आवश्यकता है। पर डाक्टर साहनको ही मैं अपना हृदय अर्पित करूंगी।" भगवानकी कृपासे पुरुष अपनी पूरी शक्तिसे परिचित नहीं है। स्त्री- हृदयको वह कैसे भयकर तूफानके ताडनसे आदोलित कर सकता है, इस बातसे वह अनभिज्ञ है । अच्छा ही है। नहीं तो संसार-भरमें आज स्त्री-जातिपर जैसा निकट अत्याचार हो रहा है उसकी मात्रा दूनी बढ़ घृणामयी। जाती। पुरुपको इस बातपर विश्वास नहीं है कि नारीके हृदयके ऊपर उसकी गक्ति कोई काम कर सकती है। इस कारण अपनेको नारी- हृदयका अनधिकारी समझकर वह उसकी पार्थिर सत्ताके ऊपर अपना सपूर्ण बल आरोपित करता है । हाय मूढ ! यदि नारीका हृदय तुम्हारे पुरुषत्वकी शक्तिसे चकनाचूर न हुआ होता, तो विश्वकी प्रबलतम शक्तिको काममें लानेपर भी तुम स्त्री-जातिको दासत्वकी शृखलामें न वाँध सकते। अपने हृदयकी विनशताके कारण वह स्त्रय लाचार है। अन्यथा उसकी प्रलयकरी काली-मूर्तिकी विकरालता और रण-चडीके समान उन्मत्त भीपणतासे सारी सृष्टिका ही लोप कभी हो गया होता। १२ पर यह सब होनेपर भी कौन मूर्ख इस बातका प्रचार कर गया 'है कि स्त्री-जाति धीर पुरुपको भजती है ? पुरुषकी मनोहरतासे स्त्री मत्र-निहल-सी रहती है । उसका देव-विनिंदक, मदन-मोहन रूप देख- कर वह मोहाच्छन्न हो जाती है, और यह वात सोचनेका अवकाश ही उसे नहीं मिलता कि उसका मनोनाछित पुरुष वीर है या नपुसक । जिस समय प्रीस देशमें वीरताकी सच्ची पूजा होती थी उस समय भी विश्व- निमोहिनी हेलेनने अपने ऊपर मुप समस्त वीरोंकी आज्ञा करके, नपुं- सक पैरिसके रूपपर मुग्ध होकर अपने स्वामीको छोडकर ग्रीक-जातिका विनाश घटित किया था। किंग लियरको पितृ-द्वेपिणी लड़कियोंने जिस व्यक्तिको अपना हृदय समर्पित किया था उसकी नीचतासे सभी परिचित हैं। नैपोलियनने जन स्पेनको अपने अधिकारमें करनेझी चेष्टा की थी तो वहाँकी रानी उस समय सारा राज्य एक अर्यंत तुच्छ, छैले छबीले, बाँक और रसिया 'सिपाही को लगानेमें लगी थी। अपने इस प्रेमिकको सेनासे घृणामयी। ३६ बरी करके उसने अपने राज-काजमें रख लिया था। फ्रासके 'लई' वशकी रानियोंकी कहानी सभीको विदित है। और तो क्या, हमारे देशकी तापसी शकुतला दुष्यतके वीरत्वपर मुग्ध न होकर उनका रूप देखकर ही रीझ गई थी। असल बात यह है कि रूपवान् पुरुषको देखकर नारी उसके प्रति कभी उदासीन नहीं रह सकती । मैं मानती हूँ कि उदासीन रहना अपने वशकी बात नहीं है। पर अपनी दुर्वलताके विरुद्ध हठ करनेके लिये स्त्रीके हृदयमें इच्छा ही नहीं उत्पन्न होती। पुरुपमें यह बात नहीं है । जो यथार्थ पुरुप होता है वह पहले तो अपने उन्नत आदर्शके प्रतिकूल स्त्री को उसके मुखके भाषसे ही पहचानकर दूसरी बार उसके प्रति आँख उठाकर भी नहीं देखता, फिर चाहे वह अप्सरासे भी अधिक रूपाती क्यों न हो । यदि किसी कारणसे वह ऐसी स्त्रीके रूपपर मुग्ध हो भी जाय, और मनको न रोक सके तो आतरिक इच्छासे मनके विरुद्ध समाम करता है । पुरुपकी इस प्रवृत्तिका परिचय मुझे अपने भाईके ही चरित्र- से मिला है। राजुको अपने अल्प जीवन में अपने आदर्शके अनुकूल कोई स्त्री मिली या नहीं, मैं कह नहीं सकती। पर मेरी सहपाठिनी और संगिनी जिन-जिन स्त्रियोंसे उसका परिचय हुआ उनके लिये उसके उनत हृदयमें आतरिक घृणा उमडा करती थी, यह मैं अपनी आँखोंसे देख चुकी हूँ। ससार-भरमें जितने भी महत्वपूर्ण धार्मिक आदोलनोंसे भानव-जाति जागरित हुई है उन सबके मूलमें नारीके विरुद्ध पुरुषका विद्रोह है। चिरकालसे पुख्य नारीकी भावनाको हृदयसे उखाड़कर महत् तत्वमें लीन होनेकी चेष्टा करता आया है । नारीके त्यागसे ही उसके धर्मका आरभ होता है। पर हाय हतभागिनी नारी! पुस्पकी चिता और पतिकी घृणामयी। भक्ति ही तुम्हारा मूल धर्म है। पतिको त्यागनेसे इस विपुल जगत्में तुम्हारे लिये धर्माधर्म कुछ भी नहीं रह जाता । केवल शून्य ही शेप रहता है । पुस्पके निना तुम्हारी सत्ता ही नहीं है। पुरुष तुम्हारे फदेसे बचकर निकल भागनेकी चेष्टामें है, पर तुम नाना चेष्टाओंमें उसे रिझाकर अपने प्रेमा- चलसे जकड़नेमें लगी हो । इसका कारण क्या है ? कारण यही है कि तुम्हें अपने अबलापनपर गर्म करनेकी शिक्षा दी गई है, और इस कारण तुम्हारा हृदय भी दुर्वल हो गया है। जब तक नारी-जाति अपने करालिनी कालिकाके स्वरूपसे परिचित नहीं होगी तब तक उसका शरीर, उसका हृदय और उसकी आत्मा नीचता, दासत्व और पापपकसे पतित! होती जायगी। हाय ! आज नारी-जातिके प्रति मेरे हृदयमें क्यों इतना भयकर आक्रोश वर्तमान है ! न मालूम क्यों, मेरे हृदयमें यह विश्वास बद्धमूल हो गया है कि स्त्रीके सतीत्वकी कल्पना ही निलकुल मिथ्या है । ससारमें कोई भी स्त्री सती हो सकती है, इस वातपर मुझे विश्वास ही नहीं होता । पुरुष-पाठक मेरी इस उक्तिसे भडक उठेंगे, क्योंकि स्त्री-हृदयमें स्वजातिके प्रति जो ईर्ष्या वर्तमान रहती है उससे वे परिचित नहीं रहते। पर पाठिकाएँ मेरे अतस्तलकी क्रोधाग्नि और प्रतिहिंसाके स्वरूपसे परिचित होकर अवश्य ही इस हतभागिनीके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करेंगी, मुझे यह पूरी आशा है। हे मेरी सती-साधी माताओ और बहनो ! अपने स्वर्गीय शाति-रसकी स्निग्धता वरसाकर इस पापिनीकी ज्वालाको शात करो! अपने हृदयके सहज स्नेहसे आशीर्वाद देकर इस हतभागिनीको क्षमा करो। घोर पाप और असहनीय दु खसे पीड़ित होनेके कारण मेरा हृदय आज गहन । " घृणामयी। सशय और अविश्वासके तिमिरसे आच्छन्न है। अपनी आत्माके उज्ज्वल, निष्कलुप, शुभ्र प्रकाशसे मेरा अतःकरण प्रभासित कर दो। पाठक उकताकर कहेंगे कि इस कहानी में कैफियत अधिक है और तथ्य कम | कैफियतके बिना मेरी कहानीका कोई महत्त्व ही नहीं रह जाता, यह बात मैं लोगोंको कैसे समझाऊँ। कैफियत ही मेरी कहानी है और कहानी कैफियत । १३ ?" निमत्रण दिया। सबके पास निमत्रणपत्र भेजे गए, पर पूर्यो- , ल्लिखित दो मित्रोको वह भूल गए। बहुत सभव है, जानबूझकर उनके पास उन्होने न्योता नहीं भेजा। पर मैं न रह सकी। मैंने काकाको याद दिलाई। कहा-" डाक्टर कन्हैयालाल और प्रोफेसर किशोरीमोहनके लिये न्योता नहीं भेजा गया। उन लोगोंको तुम क्यों भूल जाते हो मेरे भीतरका क्रोध बहुत दवाने पर भी शायद बाहरको कुछ फूट निकला था। काकाने तीन बुद्धिमत्तासे पूर्ण अपनी दो उज्ज्वल आँखोंसे स्नेहकी स्निग्ध धारा बरसाकर मेरी ओर ताका । बोले-" ओह ! भूल हो गई है। तुमने खूब याद दिलाई। अभी भेजे देता हूँ।" मेरे भाषी सर्वनाशकी आगका करते हुए भी वह मेरा अनुरोध न टाल सके। भोजके दिन नियत समयपर एक-एक दो-दो करके मित्रगण पधारने लगे। मैं बडी उत्सुकतासे डाक्टर साहब और प्रोफेसर साहवकी वाट जोह रही थी। अतको अपना सजीला और गठीला बदन, तमतमाता हुआ चेहरा, चमकती हुई आँखें और रौबदार मूंछे लेकर डास्टर साहब किशोरीमोहनके साथ आ उपस्थित हुए। युगल मित्रोंकी घृणामयी। यह जोड़ी अविच्छेद्य थी। जिस प्रकार नैय्यायिकोंने यह स्वयसिद्धि प्रचारित की है कि धूएको देखते ही आगके अस्तित्वकी कल्पना कर लेनी चाहिए, उसी प्रकार इन दो मित्रोंमेंसे एकको देखते ही यह कहा जा सकता था कि दूसरे महाशय भी अवश्य ही इनके साथ होंगे। आज प्रोफेसर किशोरीमोहनके मुखपर भी विशेष तेज झलक रहा था । दोनों मित्र अश्विनीकुमारोंकी तरह अपनी प्रभा और नवीनतासे स्वय दीप्त होकर सारी सभाको उज्ज्वल कर रहे थे। मुझे ऐसा जान पड़ने लगा कि ससारमें जितने भी उत्सव निन्यप्रति मनाए जा रहे हैं वे सत्र केवल इन्हीं दो मित्रोंके शुभागमनके लिये । सारी सभाकी ऑखें इसी नगीन जोडीकी ओर लगी हुई थीं। दोनोंके मुखमडलके भानोंमें, पहनानेमें, चालकी गतिमें और बोलने में एक ऐसी अद्भुत मौलिकता थी जिसकी उपेक्षा किमी तरह नहीं की जा सकती थी । महिलाओंकी मुग्यताके समधमें तो कुछ कहना ही व्यर्थ है, परन्तु पुरुष भी उनकी विशेषतासे विमूढ हो रहे थे। दोनोंको मेरे पास बिठाकर काकाने व्यंग-भरी मुसकानके साथ कहा " स्मृति-शक्तिकी दुर्नलताके कारण मैं तो आप लोगोंको न्योता देना भूल ही गया था। पर लज्जा हमारी बड़ी समझदार है। उसीके याद दिलानेपर मैंने आप लोगोंको बुलाया है, इसलिये उसीके साथ आप लोगोंको बैठना होगा।" यह कहकर उसी चिर-- परिचित न्यगकी मुस्कराहटसे मेरी और ताककर मेरा मर्म विद्ध करके वह चले गए और अन्यान्य मित्रोंका अभिवादन करने लगे । लाज और सकोचको वेदनासे मेरे सारे शरीरमें काँटे चुभनेकी सुरसुराहट होने लगी। पर ये दोनों विशेष रूपसे उटसित हो उठे। ।

घृणामया। ४० प्रथम परिचयकी लजा कैसी भयकर होती है, पाठिकाओंको यह बत- लानेकी आवश्यकता नहीं। मेरा मुंह शायद बहुत लाल हो आया था और मै पसीनेसे तर हो गई थी। डाक्टर कन्हैयालाल अपने सुदृढ, सुदर, पौरुप कठसे बोले- आपका नाम लज्जा रखकर आपके पिताजीने अपनी सुबुद्धिका ही परिचय दिया है । वैसे तो स्त्री-जाति लज्जाके लिये प्रसिद्ध ही है, पर सुशिक्षिता महिलाएं भी इतनी लज्जावती हो सकती है, इसकी मुझे खबर नहीं थी।" डाक्टर साहब आज प्रथम बार मेरे साथ बोले थे। अव्यक्त पुलकके आनदसे मेरे रोएँ खडे हो गए। सकोचको यथाशक्ति दवानेकी चेष्टा करके मधुर लाजकी विलासितापूर्ण हंसी हंसकर मैं बोली-"तो क्या आप लज्जाको एक दुर्गुण समझते हैं " यहॉपर प्रोफेसर किशोरीमोहन बोल उठे "अगर नहीं समझते तो समझना चाहिए। मै किसी तरह लज्जाको गुण नहीं बतला सकता । हमारे देशकी स्त्रिया इतने नीचे इसीलिये गिरी हैं कि उनमें बात-बात- में जडता और सकोच पाया जाता है । इस घृणित सकोचके कारण ही वे जनतामें अपनी सत्ता प्रतिष्ठित करनेमें असमर्थ है। इस सकोचके कारण ही वे पर्देमें सडकर पुरुयोकी गुलाम बनी हुई हैं।" डाक्टर कन्हैयालालने कहा—" माफ कीजिए, प्रोफेसर साहब 1 मैं आपकी बातसे सहमत नहीं हूँ। लज्जा ही स्त्री-जातिका एकमात्र ऐसा गुण है जिसने पुरुषयोंको बाँध रक्खा है । लज्जा बुरी नहीं है, पर आवश्यकतासे अधिक मात्रामें होनेसे ही इससे नुकसान पहुंचता है। 'अति सर्वत्र वर्जयेत्'-वाली चाणक्य नीति मुझे वार-बार याद आती है ।" प्रथम लजाका बॉध टूटनेसे मैंने निर्लज होकर मधुर मुस्कराहटके साथ नयन-वाणोंसे दोनों मित्रोंको वेधते हुए डाक्टर साहबसे कहा- ४१ घृणामयी। "कितनी लना आवश्यक होती है, और कितनी आवश्यकतासे अधिक, इस बातका ठीक ठीक हिसाव रखकर कैसे चला जा सकता है लजाको कम करना या बढ़ाना क्या अपने वशकी बात है ? आप तो डाक्टर हैं, आप तो जानते हैं कि स्नायुके विशेप रिकारसे ही मनुष्यको लज्जा आ घेरती है। जिस व्यक्तिका नायु-चक अधिक मुकुमार होता है, वह लाख लज्जाको दबानेकी चेष्टा करने पर भी उसकी ल्लाईसे रँग जाता है। स्त्रियोंका स्नायु-चक्र सनसे अधिक सुकुमार होता है, इसलिये वे किसी प्रकार भी लज्जाको त्याग नहीं सकतीं । हाँ, अगर आप स्नायु-चक्रको अधिक पुष्ट और दृढ़ बनानेकी कोई दवा 'प्रेसकाइव' कर सकते हैं तो दूसरी बात है।" मेरी अतिम वातसे प्रोफेसर साहब ठठाकर हँस पड़े और डाक्टर कन्हैयालाल शायद आनदकी उत्तेजनाके कारण तमतमा उठे। प्रोफेसर साहब बोले खूब ! यह आपने खूब कहा । लज्जा जब एक स्नायनिक विकार है, तो इसका डाक्टरी इलाज अवश्य होना चाहिए। मुझे पूरा विश्वास है कि डाक्टर साहब इसकी दवा जानते है । पर इस मर्जके लिये कोई ऐसी दवा 'प्रेसक्राइन' नहीं की जा सकती जो चखने लायक हो। आपको शायद मालूम होगा कि आजकल पिलायतमें हिमो- टिजम और मेस्मेरिजम द्वारा भी कई रोगोंका इलाज किया जा रहा है। डाक्टर साहब इन विद्याओंमें भी पारगत हैं | आप बेमालूम कई रोगोंको दूर कर देते हैं। बहुत सभव है आपके ऊपर भी इन्होंने हिमोटिजमका उपयोग कर लिया हो, नहीं किया होगा तो शीघ्र ही करेंगे।" प्रोफेसर साहब शायद समझ गए थे कि डाक्टर साहबकी बातोंके जादूसे मेरी लजा तिरोहित हो गई है, इसी लिये व्यगकी यह वर्षा कर रहे घृणामयी। ४२ थे। पर इसमें सदेह नहीं कि डाक्टर साहबकी आँखोंमें और उनकी बातोंमें एक ऐसी विशेपता थी, जो मनुष्यको वेवस मोह लेती थी। इसलिये नहीं कि उन्होंने हिमोटिजमकी तुच्छ विद्याका अभ्यास किया हो। उनका यह जादू उनकी प्रकृतिके साथ जडित था । दो पुरुष-प्रशसकोंकी मुग्ध दृष्टिसे पूजित होकर मैं अपनेको सारे ससारकी महारानी समझ रही थी। कोई दैन्य, कोई हीनता और कोई तुच्छता मैंने अपने भीतर नहीं पाई । मैं अच्छी तरह समझ रही थी कि हमारे बीचमें जो बातें इस समय हो रही हैं, वे अत्यत तुच्छ और नाशवान् हैं । पर हमारे बीचसे होकर चुवक-शक्तिकी जो अदृश्य धाराएँ तरगित हो रही है वे चिरस्थायी और अत्यत महत्वपूर्ण है। डाक्टर साहब बोले-" हिप्नोटिज़म, मेस्मेरिजम, मेग्नेटिज़म, ये सव विद्याएँ कोई निद्याएँ नहीं है। इसमें सदेह नहीं कि रिलायतमें ' मेडिकल सायस' की तरह ये विद्याएँ भी पहाई और प्रयोगोंद्वारा सिखाई जाती है, पर मनुष्यका यह ज्ञानाभिमान कैसा तुच्छ है ! केवल पुस्तक और 'लेबोरेटरी' के भीतर बद ज्ञान ही उसके लिये सब कुछ है । आत्मा- नुभवको वह कोई महत्व ही नहीं देता। मनुष्यकी शक्तिको जड बनाकर उसे बेवस अपने इशारोंपर नचाना, प्रकृतिको अपने वशमें कर लेना, क्या एक साधारण खेल है कि जो पुस्तकगत सिद्धातोंको रटनेसे ही अभ्यस्त हो सके हमारे देहाती भाई मुरादाबाद या मथुराके प्रेससे छपी हुई इद्रजाल और तत्र-मत्रकी पुस्तकें पढ़कर हिमोटिस्ट' बनना चाहते है । वर्तमान 'हिमोटिक सायस' की विलायती पुस्तकोंकी दौड इद्रजालकी उन पुस्तकोंसे अधिक है, मैं इस वातपर विश्वास नहीं करता। .

घृणामयी। प्रोफेसर किशोरीमोहन कुछ खीझकर बोले " तो क्या आप 'हिमो- टिजम' को केवल एक शब्द-जाल समझते हैं ?" " हरगिज नहीं। हिप्नोटिजम शब्द जब कोपमें है, तब उसका कुछ-न-कुछ अर्थ अपश्य होना चाहिए। मैं 'हिप्नोटिजम' को कोई बाहरी विद्या नहीं समझता जो पुस्तकोंके पढनेसे सीखी जा सके। मनुष्यकी भीतरी वृत्तियोंके विशेप विकाससे ही उसका सबध है। महात्मा बुद्धने समस्त मानव-जातिको किस विद्याद्वारा मोहित किया था ? उन्होंने मद्रास प्रातके अडयार पन्लिशिंग हाउससे प्रकाशित वशीकरण योगकी पुस्तकोंका अध्ययन किया था या ट्रिष्टिकेनके पुस्तक- प्रकाशकोंका मेस्मेरिजम सीखा था ?" मैं स्पष्ट देख रही थी कि डाक्टर कन्हैयालाल आज प्रारभसे ही प्रोफेसर साहबको परास्त करनेकी चेष्टामें थे और प्रोफेसर साहब भी बीच-बीचमे अपनी व्यगोक्तियोंसे उन्हे उत्तेजित करनेमें लगे थे। इसका कारण क्या था? यह क्या प्रतियोगिताका विद्वेप था ? सभर है। कुछ भी हो, इससे मेरा आत्माभिमान अधिकाधिक बढता जाता था। प्रोफेसर किशोरीमोहन घोले-" आपके विचारमें क्या महात्मा बुद्ध- के जमानेमें हिप्नोटिज़म का प्रचार नहीं था। यह आप कैसे कह सकते है ? 'हिमोटिजम' नहीं तो हठयोग, राजयोग आदि नाना योग तो उस समय वर्तमान थे। ये हिमोटिजमके ही अन्य रूप है। कौन कह सकता है कि बुद्धने इन योगोंका अनुशीलन नहीं किया था ?" प्रोफेसर साहबकी यह उक्ति शायद अत्यत हास्यजनक थी। इसलिये डाक्टर साब ठठाकर हस पड़े। डाक्टर साहनको विजय अब निर्विवाद थी। उनकी निकट हंसीसे किशोरीमोहनके चेहरेकी रगत उड़ गई । वह परास्त होकर कभी कन्हैयालाटफा और कभी मेरा मुँह ताकते रह गए। .

घृणामयी। डाक्टर कन्हैयालालने प्रोफेसर साहबके इस हास्यास्पद तर्कका उत्तर देना ही उचित न समझा। वह अपनी ही धुनमें कहते चले गए-- "रमणी अपने रूपकी मोहनीसे सारे जगत्को अपने इशारोंपर नचा रही है। इस रूपके 'मेग्नेटिज़म से पागल होकर पुरुप-समाज इस बातका ख्याल नहीं कर रहा है कि इस प्रबल आकर्पणके मूलमें स्त्रीका हृदय है जो चुवक-शक्तिसे पूर्ण लोहेके चट्टानसे भी कठिन है। इस भीषण चट्टा- नकी ओर बेबस आकर्पित होकर उससे टकराकर पुरुप-हृदय चकनाचूर हो जानेकी इच्छा रखता है। स्त्रीके रूप और हृदयके इस आकर्पणका कारण क्या आप यह बतला सकते हैं कि उसने भी किसी योग- शास्त्रका अध्ययन या अभ्यास किया है " शैतानकी तरह अव्यक्त हसी हँसकर डाक्टर कन्हैयालालने अपनी चात समाप्त की। प्रोफेसर साहबको निरुत्तर देखकर मै अपने शरीर और मुखके सुदर गठनका विलास पूर्ण मात्रामें व्यक्त करके डाक्टर कन्हैयालालसे बोली- "तो क्या आपका हृदय भी स्त्री-हृदयके चुवक-चट्टानसे टकराकर चकनाचूर होनेको है " यह प्रश्न करते ही निरतिशय लज्जाके कारण मेरा मुंह खूनसे रंग गया और आँखें नीचेकी तरफ झुक गई। प्रोफेसर साहब इतने जोरसे हॅस पड़े कि सारी सभाकी उत्सुक ऑखें हमारी ओर केंद्रित हो गई। अपनी निर्लज्ज मूर्खतापर मैं चेतरह पछताने लगी । मेरा दिल जोरोंसे धड़कने लगा और हाथ-पौन वेबस काँपने लगे। किसी पुरुपसे ऐसा प्रश्न कभी कर सकूँगी, यह बात मैंने स्वममें भी नहीं सोची थी। पर टाक्टर कन्हैयालालने स्थिर होकर मद-मद मुसकानसे और तीखी नजरसे मेरी ओर ताका । उनकी उस तीक्ष्ण दृष्टिकी आँचसे मेरा हृदय ।

, ४५ घृणामयी। पुलकित होकर पिघलने लगा । उनकी ऑखोंके विद्युत्-वर्पणसे मेरी आँखें चौधिया गई और मैं इच्छा होने पर भी एकटक उनकी ओर न ताक सकी। अधखुली आँखोंसे कभी ऊपरको उनकी ओर ताकती थी और फिर उसी दम नीचेको नजर फिरा लेती थी। मैं लज्जासे मिट्टीमें गडी जाती थी, पर फिर भी मन-ही-मन यह अनुभव कर रही थी कि मेरी आँखोंकी मोहिनी इस समय दूनी बढ गई है। अपनी दृष्टिकी तीक्ष्ण धारसे मेरा हृदय चीरकर, उसमेंसे न मालूम क्या गुप्त रहस्य निकालकर डाक्टर साहबने स्थिर भानसे पूछा--" आप क्या सचमुच यह बात जानना चाहती हैं ? " इस समय भी उनकी आँखोंके कोनोंमें शैतानका वहीं निष्ठुर, अव्यक्त हास्य भरा था। मैंने धीमे, काँपते हुए स्वरमे कहा यह आपका कैसा अनोखा प्रश्न है !" डाक्टर साहब बोले " आपका प्रन अनोखा था या मेरा यह प्रश्न अनोखा है ? खैर !- फिर वही क्रूर, अव्यक्त, मद हास्य ! मैं अफीमके नशेसे झूमने लगी। - भोज समाप्त होते ही मैं वहाँसे उठ गई और बिना किसीसे 'कुछ कहे-सुने बाहर चली आई । मैं अच्छी तरह समझ रही थी कि मेरा यह आचरण अनुचित और शिष्टाचारके निरुद्ध है, पर एक ऐसी अप्रिय भावनासे मेरा दृदय आलोड़ित हो रहा था जिससे मैं मुक्ति पाना चाहती थी। प्रेम-संभापणके प्रपम सूत्रपातसे ही मेरे हृद- ।

घृणामयी। यमें प्रेम-जनित तृप्ति उत्पन्न होने लगी थी। अपनेको धिक्कारकर, निर- पराध काकाको कोसकर मैं जी मसोसकर बाहर आई। बाहर राजू लीलाके साथ 'वेडमिंटन' खेल रहा था। भीतर बड़े-बड़े नेता आए हुए थे, प्रात-भरकी प्रसिद्ध महिलाएँ उपस्थित थीं, तरह-तरहकी दिलचस्प बातें छिड़ रही थीं, नए-नए और एक-से-एक बढकर फैशनों- की प्रतियोगिता हो रही थी, पर राजू इन सब बातोंके प्रति बिलकुल उदासीन या । अर्थ और कामकी जलती हुई आगके बीचमें यह वैराग्यसे स्थिर मूर्तिमान धर्म न मालूम किस नक्षत्र-लोकसे आकर शात भावसे विराज रहा था! लीलाके उल्लासकी किलकारियोंसे सारा वायुमडल गूंज रहा था और राजू बडे आनदसे उसके निष्पाप जीवनकी प्राकृतिक उमगका उपभोग कर रहा था। मुझे अपने इन दो भाई-बहनके ऊपर ईर्ष्या होने लगी। मैं एकटक दोनोंको ताकती रह गई । धीर-धीरे मेरी आँखोंसे अकारण ऑसू उमड आए । ऑखें पोंछकर मैं उन दोनोंके पास आकर खडी हो गई। लीला दौड़ती हुई मेरे पास आई और बडे स्नेहसे मुस्कुराती हुई बोली-“दीदी, पहला 'गेम' मैं हार गई हूँ, दूसरे 'गेम' में भी भैया ही अब तक आगे बढे हैं। मेरे बदले तुम खेल दो !" मैं अन्य- मनस्क हो रही थी। चित्त चंचल था। पर लीलाका स्नेहानुरोध न टाल सकी । बोली-" अच्छा मैना, मैं खेल दूंगी।" उसके हाथसे रैकिट लेकर मैं खेलने लगी । राजू इस खेलमें बडा तेज था। इसलिये मैं भी हारती चली गई। मुझे भी हारते देखकर लीलाका मुँह फीका पड़ता जाता था। मैं मनमें कहने लगी-" हाय, प्यारी बहन ! अभी तुम घृणामयी। संसार-चक्रसे परिचित नहीं हो | अभी तुमने अपना हृदय नहीं पहचाना है। एक दिन प्रकृतिको विकट अग्नि-परीक्षामें तुम्हारा यह हृदय भी जलेगा, तब तुम्हें माझ्म होगा कि सारे जीवनको आलस्यजनित आनदकी क्रीड़ामें बितानेकी इच्छा करनेवाली स्त्रियोंके लिये यह समार नहीं है। जिन लड़कियोंको वचपनसे ही इस प्रकार जीवन मितानेकी शिक्षा दी जाती है, वे अतकाल तक जल-जलकर, धुल-घुलकर अपने दिन बिताती हैं । जलनेके सिना उनके कपालमें और कुछ लिखा नहीं होता। पर कर्म ? स्त्री क्या कर्म कर सकती है। जब भगवानने लीलाको और मुझे अर्थ और कामसे पूर्ण, पार्मिन ऐश्वर्यसे सपन्न घरमें पैदा किया था, तो ऐसे घरमें क्या कर्म हमें करना था ? कौनसा कर्तव्य मै निभा सकती थी ? निर्धन घरोंकी स्त्रियोंका कर्तव्य तो प्रकृतिने जन्मसे ही निर्दिष्ट कर दिया है-भाई-बहन और बाल-बच्चोंकी देख-रेस करना, चूल्हा जलाना, खाना बनाना, कूटना, पीसना, वर्तन मॉजना, अतिथि- अभ्यागत, माता-पिता, सास ससुर पति और देवरोंकी सेनामें लगे रहना, इत्यादि सभी ककि भारसे वे दवी रहती है, और इसी प्रकारके नि स्वार्थ, निष्काम कर्ममें लगे रहनेमें ही उन्हें स्वर्गका आनद मिलता है, और, सभव है, स्वर्गका फल भी प्राप्त होता होगा। पर हम दो बहनोंको इन सब पुण्य कर्मोंमें निमग्न रहनेका सौभाग्य कैसे प्राप्त हो सकता था ? नौकर-चाकर, दास-दासी, धाई, मिसरानी और चार्चियोंसे सारा घर भरा था । जमीन परसे एक तिनका उठानेका सौभाग्य भी हमें प्राप्त नहीं होता था। ऐसी हालतमें आलस्य-विलास और सुख-स्वप्नों में वे रहनेके अतिरिक्त और क्या किया जा सकता था ? पर मैं अच्छी तरहसे जानती थी कि इस प्रकारके आलस्यजनित स्वमोसे मेरा सारा जीवन मिट्टीमें मिला जा रहा है और इस कर्म-भूमिमें पैदा होने पर भी मे निकराल , - ४८ - घृणामयी। शून्यका ही पास बनी हुई हूँ। कर्ममें निमग्न रहनेकी आतरिक इच्छा होनेपर भी मैं लाचार थी। यदि मै निनाहिता होती, तो मैं अपने लिये काम निकाल लेती। पर ऐसा भी नहीं था। पतिकी सेवा और सतानके लालनका कर्म अपने आपमें पूर्ण है। उसके होते हुए किसी वाहरी कर्मकी आवश्यकता नहीं रहती । पर मैं इससे भी बचित थी। मेरी समस्या कैसी निकट थी। एक तरफ तो चढ़ती जवानीका जोश मेरी नसोंको उत्तेजित करके मुझे प्रचड कर्मके लिये उकसा रहा था और दूसरी तरफ मैं अकर्मण्यताकी व्यर्थतासे क्षुब्ध हो रही थी। मैं अच्छी तरहसे समझ रही हूँ कि लोग मेरी बातपर हँसेंगे । कहेंगे--"जब कर्म करनेकी उत्कट इच्छा तुम्हारे हृदयमें वर्तमान थी, तो तुमने देशहितका व्रत क्यों नहीं लिया ? ऐसा करनेसे तुम्हारे लिये कर्मका अभाव न रहता। सभा-समितियोंमें व्याख्यान देकर, चरखेका प्रचारकर, गॉव-गॉरमें जाकर ग्रामीण स्त्रियोंकी राजनीतिक चेतना जाग- रितकर अपना कर्तव्य तुम निभातीं। यह कर्म ही सब काँसे श्रेष्ठ है और यह तुम्हारी ही प्रकृतिकी स्त्रियों के योग्य है भी।" हाय, दुनियाको इसकी क्या खवर कि यह कर्म तामसिकताका ही दूसरा रूप है ! स्त्री-हृदयमें कर्मकी जो उत्कट वासना वर्तमान है, वह क्या इस पोपली 'कर्मबाजी' (इस प्रकारके विकृत कर्मवादका और क्या नाम दिया जा सकता है ! ) से कभी पूर्ण हो सकती है ! सभा- समितियोंमें व्याख्यान देकर, उल्लसित जनताकी हर्पधनिसे पुलकित होकर, जयमाला गलेमें डालकर, राजनीतिक भोजसे तृप्त होकर, मोटरमें चढ़कर शहरकी परिक्रमा करके जुल्सके साथ उत्सुक भक्तवृदको अपने दर्शन देकर क्या उपकार देशका और जनताका हो सकता है ! और इस प्रकारके कर्ममें 'त्याग'की आवश्यकता ही क्या है ?

घृणामयी। प्रामीण स्त्रियोंकी राजनीतिक चेतना ! इस अभागे देशमें 'स्त्री-जाग- रण'का आदर्श ही यही है ! अगर ईश्वरानुमोदित पिपुल कर्मका मर्म इस जगतमें कोई समझ पाया है तो वह हमारे कगाल देशकी कर्मक्लिष्ट ग्रामीण स्त्रियों। ऐसी स्त्रियोंको राजनीतिक अधिकारके लिये कौंसिलोंमें लड़नेकी शिक्षा देकर हमारे देशनासी किस महती उन्नतिकी आशा करते है। १६ खेलते-खेलते एक 'गेम' भी पूरा न हुआ होगा कि डाक्टर . 'कन्हैयालाल अपनी वही भयकर मुसकान लेकर 'बेडमिंटन' के कोर्ट के पास आकर खड़े हो गए । इस समय वह अकेले थे, प्रोफेसर किशोरीमोहन उनके साथ नहीं थे। अभी कुछ ही देर पहले उनका अपमान करके, उनके प्रति उपेक्षाका भार दिखलाकर और अपनी अद्भुत, चचल प्रकृतिका परिचय देकर मै अचानक उनके पाससे उठकर चली आई थी। पर इस समय फिर उन्हें देखकर मैं अपने जीवनकी चिंता भूल गई, कर्म-अकर्म और कर्तव्य-अकर्तव्यकी भावना मेरे हृदयसे तिरोहित हो चली ! मैं केवल विमूढ-सी होकर उनकी अनिर्वचनीय रूप-माधुरी अतृप्त हृदयसे पान करने लगी। मैं अनुभव करने लगी कि मेरा जीवन अभी व्यर्थ नहीं हुआ है, अभी उसका प्रारभ है और पुरपके स्नेहसे पुलकित होकर उसे अभी आनदके नाना रंगोंमें रंगना है। फिर एक वार अनंत यौवन और अनंत जीवनकी तरग मेरे भीतर हिलोरें लेने लगी। डाक्टर साहब आते ही उपदेश बघारने लगे। बोले- यह क्या ! आपको शायद खबर नहीं कि आपके स्वास्थ्यके लिये इतना 'इग्जरशन' ४ , घृणामयी। भी बहुत खराब है। नर्वस डिज़ीज़' में 'कप्लीट रेस्ट' ही एक ऐसा इलाज है जिसका कुछ असर हो सकता है। आपको 'कासशन आफ इनर्जी' का मूल्य समझना चाहिए।" डाक्टर साहबसे मेरी वाते आज ही हुई थीं। पर इतने थोडे समयके आलापसे ही उनकी धृष्टता इतनी अधिक बढी देखकर मुझे आश्चर्य होना चाहिए था। पर कुछ नहीं हुआ। यह शायद इस लिये कि मुझे डाक्टर लोगोंके प्रिविलेज उनके विशेष अधिकार का ख्याल हो आया। पर मैंने जब शकित होकर राजूकी ओर ताका तो एक पलकमें ही उसके मुखका भान देखकर मैं समझ गई कि डाक्टर कन्हैयालालके प्रति विद्वेषके भारसे उसका खून खौल रहा है । मैं घबरा गई । डाक्टर साहबको राजू ऐसी वुरी निगाहसे देख रहा था जैसे उसके जन्म-जन्मातरका बैरी अनेक समयके बाद फिर उसके सामने आ खड़ा हुआ हो। मैं सिरसे पैर तक कॉपने लगी। पर डाक्टर साहबकी बातका उत्तर दिए बिना न रह सकी। मधुर मुसकानके साथ बोली-" सारे ससारके अनुभवी लोग तो यह उपदेश देते हैं कि शरीरको हिलाने-डुलाने और हर वक्त उससे काम लेते रहनेसे तदुरस्ती बढती है, पर आप यह अनोखी बात सुनाते हैं कि उसे बिलकुल आराम देना चाहिए।" राजूके मुँहकी ओर ताककर डाक्टर साहबकी हँसी उनके होंठोंमें ही विलीन हो गई थी। फिर भी बड़ी मुश्किलसे अपनेको संभालकर बना- घटी हँसी दिखलाकर उन्होंने कहा- लेटेस्ट थिोरी' यही है।" राजू अचानक खिलखिलाकर हँस पड़ा। यह क्या सोचकर हँसा, कह नहीं सकती। पर उसकी हँसी और भी अधिक भयंकर थी। उसके , ५१ घृणामयी। चॉए हाथमें 'शटलकॉक' था और दाहिने हाथमें रौकट । 'शटलकॉक' को ऊपर उछालकर उसने उसपर ऐसे जोरसे रैकिट चलाया कि कुछ देर तक वह आकाशमें दिखलाई भी न दिया । 'शटलकॉक' कहाँ गिरा, इस बातकी बिलकुल परवा न कर वह सीधा बरामदेकी तरफ आगे बढा और डाक्टर साहबके पास आकर खड़ा हो गया। उसका स्वास्य, सौंदर्य, दृढता और तेज देखकर डाक्टर साहब चकित रह गए। आक- स्मिक और अनिच्छित सभ्रमके कारण वेबस कुछ पीछे दवकर खडे हो गए और उसका मुँह ताकते रह गए। उन्हें शायद अपने झूठे तेजका बड़ा घमड या । उनका यह दर्प अपने भाईकी सच्ची तेजस्विताके आगे चूर होते देखकर मैं गर्नसे पुलकित हो उठी। पर कहीं राजू कोई बेजा वात उनसे न कह बैठे, इस चिंतासे मेरा कलेजा जोरोंसे धडक रहा था। मैं अभी तक 'बैडमिंटन के कोर्ट में अपने ही स्थानपर खड़ी थी । वहाँसे हटनेकी हिम्मत नहीं होती थी। राजू व्यगपूर्वक मुस्कुराते हुए बोला--" आपकी यह लेटेस्ट थिओरी' बड़े मजेकी है, इसमें शक नहीं । अपनी सारी-शक्ति एकत्रित करके मैं आगे बढ़ी और दोनोंका पार- स्परिक परिचय कराते हुए बोली-" डाक्टर साहब, यह मेरा माई राजू है-राजू, यह डाक्टर कन्हैयालाल हैं।" पारस्परिक अभिवादनके बाद डाक्टर साहन बोले-"आपकी तारीफ आपके पिताजीसे बहुत सुना करता था। आज आपके दर्शन पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई । आपका चेहरा और वदन देखने लायक हैं, इसमें शक नहीं। डाक्टर साहन लोगोंको वशमें करना जानते थे। प्रोफेसर किशोरीमोह- हनने भी इस बातकी ताईद की थी, और मैं इसकी यथार्थताका अनुभव - " ।

- यह - घृणामयी। बडे दुखका भाव प्रकट करते हुए डाक्टर साहबने कहा- अच्छा नही । स्त्रियोंका नॉर्मल टेपरेचर तो वैसे ही पुरुपोंसे ज्यादा रहता है। और आप फर्माती हैं कि आपका सतानबेसे भी कम रहता है। 'एनीमिया के कारण वदनमे खून कम हो जाता है, और खूनकी कमीसे वदनकी गरमी भी जाती रहती है। पर आपको अवश्य ही कोई-न-कोई मीतरी रोग है। किसी लेडी डाक्टरको आप पहले बुलावें ।" आपका क्या यह ख्याल है कि लेडी डाक्टर मेरी बीमारी ठीक ठीक मालूम करके उसका इलाज कर लेगी ?" मेरा प्रश्न जरा विकट था । उसका मर्म न समझकर डाक्टर साहन बोले-"क्यों न करेगी ?" मुझे तो विश्वास नहीं होता !" " तब ? आप क्या चाहती है ? आपकी भीतरी शिकायतोका हार मैं कैमे मालूम कर सकता हूँ ?" आप क्या यह समझते हैं कि जगह-जगह रवरकी नली लगाक शारीरिक विकारोंका पूरा-पूरा ब्योरा माल्लम कर लेनेसे ही क्या मनुष्यर्क अस्वस्थताका कारण जाना जा सकता है ? शारीरिक विकार ही क्य सब कुछ हैं ?" नहीं, मानसिक विकारोंपर भी 'मेडिकल सायस' विचार करत है। 'साइकोपेथी का सबध मानसिक विकारोंसे ही रहता है। मनुष्य क्यों पागल होता हैं, क्यों अनिच्छा होनेपर भी ऐसे-ऐसे काम कर पैरता है, जिनके लिये यह बार-बार पछताता रहता है, क्यों युधिष्ठिर और नल जैसे सालिक पुरयोंमें जुआ खेलकर अपना सर्वनाश करनेकी प्रश्त्ति पाई जाती है, क्यों रूसो और टाल्सटाय जैसे महात्मा घोर नीच मैंने कहा- - “ , - , घृणामयी। कर्मों में लिप्त रहे, क्यों महात्मा गाँधी जैसे सहृदय व्यक्तिको जीवन भर अत प्रकृतिकी दुर्बलताएँ सताती रही है, क्यों निशेप-विशेष प्रकृतिके स्त्री-पुरुपोंमें खून करने या आत्महत्या करनेकी उत्कट लालसा रहती है, 'साइकोपेथी या ' साइकिएट्री 'के अध्ययनसे हमें इन्हीं बातोंका ज्ञान होता है । हृदय और मस्तिष्कके सूक्ष्म कोपोके दुर्बल पड जानेसे मनुष्य- की प्रकृतिमें असामजस्य उत्पन्न हो जाता है। इस असामजस्यके कारण वह ऐसे-ऐसे अभावनीय काम कर बैठता है और उसकी प्रवृत्तियों ऐसी अनोखी हो जाती हैं कि देखकर दिमाग चकरा जाता है।" . वह प्रश्न किया था और उत्तरमें कैसी-कैसी 'अनोखी बातें सुननेमें आई ! धिक्कार है डाक्टर लोगोंकी मोटी बुद्धिको । निराश होकर मै कुछ कहना ही चाहती थी कि अचानक रजन अपने नगे सिरमें अपने घुघराले, चमकीले और कोमल वालोंकी वहार दिखलाता हुआ, अपनी सुदर, शात, धीर, गभीर और करुण, ऑखोंसे अपूर्व, अनिर्वचनीय ज्योति विकीरित करता हुआ, अपने रूप और व्यक्तित्वसे डाक्टर साहबको चकित और मुझे गति और रोमाचित करता हुआ आ पहुंचा। अपने भाईका सामान्य रूप और साधारण गुण भी देखकर किस बहनको गर्व नहीं होता ! तब ऐसे तेजस्वी भाईको देखकर मुझे कैसे उत्कट आनदका अनुभव होता होगा, इसका अनुमान सहजमें किया जा सकता है। रज्जन को देखते ही मैं संभलकर उठ बैठी। मेरे मिरका अचल नीचे खिसक गया था । डाक्टर साहबके सामने मैंने इस बातमी कुल .

घृणामयी। ५६ परवा न की थी। बल्कि जान-बूझकर अपना सिर निर्वस्त्र ही रहने दिया था। पर रज्जनके आनेपर एकदम अपना सिर ढक लिया । अँगरेजीमें यह मसल मशहूर है कि अपराधीका मन सदा शकित रहता है। उस कमरेमें अकेले डाक्टर साहबके सामने उस अवस्थामें कौचके ऊपर लेटे हुए देखकर राजू अपने मनमें क्या सोचेगा, इस वातका ख्याल करके मै कॉपने लगी। मुझे ऐसा जान पड़ा कि मुझे उस अवस्थामें देखते ही उसका मुंह पहले तो लज्जाके कारण लाल हो आया और पीछे धीरे-धीरे उसकी रगत उतरती गई और वह पीला पडता गया। रज्जनको देखते ही मेरे हृदयमें जो एक गर्वका भार उत्पन्न हुआ या वह धीरे-धीरे तिरो- हित होता गया और अज्ञात भयने उसका स्थान अधिकृत कर लिया । डाक्टर साहब रूखी हँसी हँसकर उसका स्वागत करते हुए बोले---- आइए साहब, तशरीफ रखिए। मानसिक विकारोंकी चर्चा छिड़ रही है। आपकी बहन पूछ रही थी कि मनुष्यकी अस्वस्थतामें क्या मानसिक विकारोंका कोई महत्व नहीं है ? मैं कहता हूँ कि शारीरिक निकारोंके कारण ही मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं।" किस पियकी चर्चा छिड रही है और किसकी नहीं, इसकी कैफि- यत डाक्टर साहबने प्रारममें ही दे देना उचित समझा। इससे साफ उनकी घबराहट झलकती थी। रजन जब कुर्सीपर बैठ गया तो मैंने कहा- डाक्टर साहब कहते हैं कि महात्मा गाधीको जीवन-भर भीतरी दुर्बलताओंका सामना करना पडा है, रूसो और टाल्सटायकी प्रकृति सात्विकी होनेपर भी उन्हें घोर नीच कामें लिप्त रहना पड़ा है, मनुष्यकी अतःप्रकृतिके इन सत्र अस्वाभाविक विकारोका कारण ' मेडिकल सायस' बतलाता है।

. घृणामयी। रजन जब मेरी बात सुन रहा था तो उसकी आँखोंमें आज सहज स्नेहका भार वर्तमान नहीं था। उसके इस भानसे मेरे दिलमें गहरी चोट पहुँची। मेरी बात समाप्त होते ही उसने मेरी तरफसे उसी दम मुँह फिरा लिया और व्यगकी तीखी मुसकानसे डाक्टर साहबका मर्म वेधता हुआ वह बोला-" तब तो डाक्टर साहब, आप इसी दम कोई 'मिक्शचर' या 'टॉनिक' 'प्रेस्काइब करके साबरमतीको भेज दीजिए। महात्माजीका दिल और दिमाग ठीक होनेसे उनके स्वभावमें 'सामजस्य' और 'स्वाभाविकता' आ जायगी। इस प्रकार देशका कितना बडा उपकार होगा, इस बातका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी प्रकृतिके असामजस्यके कारण देश कभी नीचेकी ओर झुक रहा है कभी ऊपरकी ओर । डाक्टरी विद्याद्वारा इसका इलाज हो सकता है, यह वात विलकुल नई, मौलिक और चमत्कारपूर्ण है।" डाक्टर साहब इस समय तक घनराए हुए थे। इस बार कुछ खीझ उठे। कुछ तमककर बोले-" तो क्या आपका विश्वास 'साइकोपेथी में नहीं है ?" " विश्वास ? अजी रामका नाम लीजिए ! यहाँ तो ईश्वरमें भी विश्वास नहीं है, प्रकृतिकी करामातमें भी नहीं। फिर डाक्टरी विद्या तो तुच्छ विषय है। हाँ, आपकी बातपर मुझे अवश्य विश्वास होना चाहिए।" डाक्टर साहब चौंक पडे । कुर्सीमें जरा डटकर बैठ गए और वोले- "तो क्या आप यह बात भी नहीं मानना चाहते कि उपयुक्त ओषधि- योंके सेजनसे रोग अच्छे हो जाते हैं।" राजूने स्थिरतापूर्वक कहा आप क्या सचमुच इस बातपर निवास करते है ? अपनी छातीपर हाथ रखकर अपने अंत करणसे पूछिए कि .

+ घृणामयी। ५८ आपके इलाजसे आज तक जितने रोगियोंको फायदा पहुंचा है वह क्या आपकी दवाइयोंके सेवनले ? सच्चे दिलसे यह बात बतलाइए कि डाटरी विद्या कोई निश्चित विद्या है या अटकलपच्चू शास्त्र १ प्रकृतिके सुनियत और मुनिश्चित नियमोंसे क्या उसका कुछ भी सवध है ? " डाक्टर साहब राजूकी बातका कोई उत्तर न दे संक। पर अपनी हार स्वीकार करना वह अन्यत लज्जास्पद समझते थे । इस कारण कुछ अक- डकर दृढताका ढोग रचकर बोले-" है क्यों नहीं ! प्रकृतिसे उसका सबध नहीं है तो किससे है ? " उनकी व्यर्थकी अकडवाजी देखकर राजू कुछ अजीब ढगसे मुस्कु- राया। अपना स्वर अधिक कोमल करके बोला- अच्छी बात है; साहब। यह बात मान ली कि प्राकृतिक नियमोंके ऊपर ही आप लोगोंकी, विद्या स्थित है। पर यह तो बतलाइए कि जबसे सभ्य-समाजमें वैद्यक- शास्त्रका प्रचार हुआ है तबसे मानन-गरीरने कितनी तरक्की कर ली है? मैं तो स्पष्ट ही यह देखता हूँ कि डाक्टरी विद्या जितनी ही उन्नति करती जाती है, मानवसमाजमें रोगोंकी वृद्धि भी उसी परिमाणमें होती जाती है। इस पिंश शताब्दीमें प्रतिवर्प नए-नए रोगोंकी सृष्टि हो रही है। प्रतिवर्ष लाखों मनुष्य कालकी कराल गतिमें बेबस वहते चले जा रहे हैं, पर डाक्टर लोग यह देखकर भी कि रुद्रके प्रलयकर चक्रका सामना नै किसी प्रकार नहीं कर सकते, अपनी करतूतसे बाज नहीं आते। मजा यह है कि ज्यों-ज्यों सम्यता आगेको बढती जाती है, डाक्टरोंकी संख्या उससे डबल तेजीके साथ बढ़ रही है। अकेले इंगलैण्डमें इस समय कम-से-कम पचीस हजार डाक्टर वर्तमान हैं। कुछ ठिकाना है ! अब बतलाइए, इन महापुरषोंने इंगलैंडको क्या फायदा पहुँचा रक्खा .

- , ५९ घृणामयी। है ? क्या वहाँके लोगोंकी आयु बढ़ने लगी है ? क्या वहाँके लोग अन 'रोग-प्रूफ' हो गए हैं ?" डाक्टर साहबने कहा 'रोग-प्रूफ' नहीं हुए-हो भी कैसे सकते है ! पर हों, वहाँ डाक्टरोंकी सख्या अधिक होनेसे वहकि लोगोंको रोग कम सताया करते हैं । इधर हिंदोस्तानका हाल देखिए । डाक्टरोंपर हम लोगोंका विश्वास नहीं है, डाक्टरोंको यहाँ उत्साह नहीं मिलता। इसलिये हम देखते हैं कि यहाँ भरी जवानीमें ही प्रतिदिन असख्य स्त्री-पुरुप मौतके शिकार बनते हैं।" व्यगके साथ उनकी वातपर हुँकारा भरकर राजू बोला-" जी हाँ। यह तो है । पर आप क्या दानेके साथ यह बात कह सकते है कि विलायतके लोग भरी जवानीमें नहीं मरते ? अनुभन यही कहता है कि भरी जवानीमें जैसे भयकर रोगोंसे नहाँके लोग पीडित रहते हैं उसका अनुमान भी भारतके लोग नहीं कर सकते । मास और मदिराके सेवन और मायानी युवतियोंके सत्सगसे उन लोगोंका जो महोपकार होता है, उससे परिचित होनेका सौभाग्य हमारे युवकोंको कहाँ प्राप्त होता है ! वहकि युगक इस प्रकारके घृणित भोग-विलासमें रत रहनेके कारण वीस वर्षकी अवस्थासे ही 'कॉलिक,' 'कैसर,' 'हेमरेज,' 'एपेंडिसा- इटिस' और 'फिरगी रोग से पीड़ित होने लग जाते हैं। वहॉकी युवतियों तो और भी अधिक रोग-प्रस्त रहती है । यह सब होनेपर भी औसतमें वहकि लोग हिंदोस्तानियोंसे अधिक परिश्रमी होते है-इस- का कारण यही है कि जीवनके आनदसे वे लोग परिचित हो गये है, और हम लोगोंके हृदयोंमें नाना कारणोंसे जीवनके प्रति अरुचि उत्पन्न हो जाती है। अब सगाल यह है कि अगर डाक्टरी विद्या रोगोंको उप- शम करनेका दम भरती है, तो जिस देशमें इस विद्याकी सबसे अधिक . .

घृणामयी। उन्नति हुई है, वहाँके लोगोंको रोग क्यों अधिक सताते हैं । असल बात यह है कि मनुष्य-समाज अंध, स्वतन्त्रबुद्धिसे हीन और अनुकरणशील है। प्रकृतिके अनत रहस्यका एक आध बिखरा हुआ छींटा उसे कहीं मिल जाता है तो वह फूला नहीं समाता और एकदम यह अनुमान कर लेता है कि उसने पूरे रहस्यका पता लगा लिया है। डाक्टरोंने रोगोंका बाहरी रूप देखकर अपने- अपने अनुभवसे अनोखी-अनोखी दवाइयोंका आविष्कार किया है। अब यह मजा हो गया है कि प्रतिदिन सैकड़ों नई-नई दवाइयोंका आविष्कार होता जाता है और एक दवाईके सेवनसे जो खरावी पैदा होती है उसके निराकरणके लिये दूसरी दवाई दी जाती है। इधर मरीज यह समझता है कि उसका इलाज हो रहा है। यह बडे मजेका इलाज है, इसमें शक नहीं!" १९ डाक्टर साहब और मैं बड़े ध्यानसे उसकी बातें सुन रहे थे । इसके उत्तरमें एक शब्द भी डाक्टर साहबके मुँहसे नहीं निकलता था। कुछ देरतक चुप रहकर रूमालसे अपना मुँह पोंछकर वह फिर कहता चला गया डाक्टर लोग मनुष्यका स्वास्थ्य बढ़ानेके लिये पैदा नहीं हुए हैं। उनका उद्देश्य रोगोंको दमन करनेका रहता है । रोगोंसे ही उनका सवध रहता है, मेडिकल कालेजमें वे लोग रोगोंका ही अध्ययन करते हैं, स्वास्थ्यका नहीं । और तो क्या जीवों में रोगोंके कीटाणुओंका प्रवेश कराके विशेष-निशेप रोगोंके निरीक्षणमें विशेषज्ञता प्राप्त करते हैं। ऐसी हालतमें स्वास्थ्यका विचार ही उनके मस्तिष्फो कैसे उत्पन्न हो सकता है। स्वास्थ्यको 'चैकग्राउड में रखकर . - , ६१ घृणामयी। रोगोंके अध्ययनको प्रधानता देनेका अर्थ यही है कि जीवित मनुष्यको छोड़कर उसकी छायाकी गतिसे उसका भीतरी हाल मालूम किया जाय । इस कारण डाक्टरी विद्या मूलमें ही सत्ताहीन और ढकोसलेसे भरी है। असल बात यही है कि मनुष्य जन्मसे ही रोग और मृत्युकी ओर, अपने अनजानमें, धीरे धीरे एक-एक पग आगेको बढ़ता ही जाता है। उसके सारे जीवनको अगर हम मृत्यु नामक तीर्थकी महायात्रा कहें तो कुछ अनुचित न होगा। क्यों आदमी पैदा होता है, क्यों मरता है, क्यों यह शरीर नाशवान् है, क्यों यह रोग-व्याधिसे पीड़ित रहता है, स्वास्थ्यका आदर्श क्यों एक निरी कल्पना है, ये सब गहन तथ्य हैं । इनका पता लगाना मनुष्यकी क्षमताके अतीत है । ऐसी हालतमें डाक्टर लोगोंका दम और विद्या-चातुर्य अन्यत असहनीय जान पडता है । अगर ससारसे डाक्टरी विद्या बिलकुल उठ जाय तो मनुष्य प्राथमिक युगके दीर्घजीनी और अपेक्षाकृत स्वस्थ जगली लोगोंकी तरह स्वाभाविक जीवन व्यतीत करके पिना रोगोंकी चिंताके शातिसे मर सके !" उसकी बात समाप्त होनेपर कुछ देर तक कमरेमें बिलकुल सन्नाटा रहा। अचानक डाक्टर साहबने उसकी पीठ ठोंकी और बोले- खूब भाई खूब ! यह बडे मजेकी लेकचरबाजी रही। इतनी छोटी उम्रमें ही आप जीने और मरनेके सवालके पीछे लग गए। यह अच्छा ही है। पर हम करें क्या ! हमारा तो पेश ही यही है। कोई मरे चाहे कोई बचे । यहाँ तो पापी पेटसे मतलब है। डाक्टरी विद्या कैसी ही निगोड़ी क्यों न हो, हमारे लिये तो कल्पवृक्ष है। हॉ, अगर आप लोग कृपापूर्वक मेरे लिये दो रोटी सुबह और दो रोटी शामका बदोबस्त कर सकें तो मैं अभी यह पेशा छोड दूं" P - . घृणामयी। ६२ डाक्टर साहबके इस सरल परिहाससे राजूके मुंहसे व्यगका भाव तिरोहित हो गया । वह भी निष्कपट परिहासके स्वरमें बोला-क्यों, आप क्या अकेले हैं? मियाँ-बीबीके बीच क्या 'डॉयवोर्स का मामला चल रहा है " नहीं साहब, मेरे तो बीवी ही नहीं है, 'डायवोर्स' कहाँस हो! मैं बिलकुल अकेला और भार-मुक्त है। आप लोगोंको केवल मेरी ही चिंता करनी पडेगी । कहिए, आप क्या राजी हैं !" डाक्टर साहबकी अवस्था प्राय. बत्तीस सालके होगी। अभी तक उनका विवाह ही नहीं हुआ है, या उनकी स्त्रीकी मृत्यु हो गई है, यह वात जाननेके लिये मैं बडी उत्सुक हो रही थी। पर लाचार थी। फिर भी इस बातसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि राजूके और उनके बीच निरोध और विद्वेषका जो भाव धीरे-धीरे जागरित हो रहा था, उडा पड़ने लगा है। राजूने कहा- हमें एक 'फेमीली' डाक्टरकी जरूरत है। आपकी इच्छा हो तो आप शौकसे यहाँ रह सकते हैं। डाक्टर साहबको सभवत बड़ा आश्चर्य हुआ। बोले यह क्यों साहब ! डाक्टरोंपर तो आपका बिलकुल विश्वास ही नहीं है। इसी बातपर इतनी बहस हो गई। अब आप कहते हैं कि फेमीली' डाक्टरकी वह अब " " जरूरत है !" राजूने कहा " औरतोंको यह बात कैसे समझाई जाय ! उनके लिये तो आप लोग ही सृष्टि-रक्षक हैं। अम्माँसे अगर आप यहाँ रहनेका प्रस्तान करते तो यह फूली न समातीं । में रह न त क बोल उठी." सिर्फ अम्माँ ही क्यों, मै भी आपसे अनुरोध करूंगी कि आप यहीं रहें।"

घृणामयी।
मेरी यह बात बिलकुल असगत, असामयिक और अशोभन थी।
कहते ही लज्जासे मेरा सारा शरीर जर्जरित हो उठा । मैंने सिर नीचा
कर लिया । राजूके मुंहकी ओर ताकनेका मुझे साहस नहीं हुआ।
कुछ देर तक चुप रहकर राजूने कहा-
आपको सैरके लिये ले चलें । वैठे-बैठे जी उकता गया है। पार्कसी हना
खाते हुए जरा चौककी तरफ हो लें।"
डाक्टर साहब प्रसन्न होकर बोले-" अच्छी बात है।
राजूके साथ घनिष्ठता वढते देखकर वह अपनी प्रफुल्लता छिपा न
चलिए डाक्टर साहब,
सके।
मैंने कहा--" मैं भी चलेंगी।"
अपनी असहनीय तीक्ष्ण दृष्टि से मेरी ओर ताककर राजूने बिना कुछ
उत्तर दिए मुँह फिरा लिया और वह शोफरको बुलाने चला गया ।

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दूसरा भाग। १ तबसे डाक्टर कन्हैयालाल निन्य हमारे यहाँ आने लगे। वह अब निना किसी द्विविधा या रुकावटके मेरे पास आ जाया करते थे। हम दोनों अकेले घटों बैठकर गप्पें मारा करते थे। कामकी बातें कभी नहीं होती थीं । मेरा काम ही क्या था ! पर हम लोग ऐसा भान दिख- आते जैसे कोई बड़ा भारी दायित्र दोनोंके ऊपर आ पडा हो, और एक दूसरेसे सलाह लेना परम आवश्यक हो गया हो। जिस दिन किसी कारणसे डाक्टर साहब मेरे पास न आ सकते उस दिन मिनटोंको गिनते- गिनते अत्यत अधैर्य और व्याकुल उत्सुकताके साथ मेरा समय बीतता था। ज्यों-ज्यों डाक्टर साहबमे मेरी घनिष्टता बढ़ती जाती थी, त्यों-त्यो मेरी स्नायविक दुर्बलता भी जोर पकड़ने लगी। उनके सामने मेरा हृदय उद्दीप्त होकर उमगसे भर जाता था, पर उनके चले जानेपर मुझे ऐसा जान पड़ता जैसे सारा शून्य अपना निकराल मुंह खोलकर मुझे निगल. नेको तैयार है, और एक भयकर अवसादके बोझसे मेरी छाती दव जाती थी। मैं गाढ़ी नींदके लिये कुटुम-भरमें निरयात थी। पर अब धीरे-धीरे मुझे उनिद्राका रोग पकडने लगा। रातको खा-पीकर जब मैं बिस्तरमें लेट जाती तो मेरी आँखें उसी दम झपने लगती और कुछ देरके लिये मुझे नींद आ जाती । पर वह नींद गादी नींद नहीं कही जा सकती। अनेकानेक निकट और भयकर स्त्रमाके उनके ऊपर मेरा विश्वास देखकर राजू बहुत कुढ़ता था और धीच-बीच घृणामयी। उपद्रवसे नींदके समय भी मेरा दिल जोरोंसे धडकता रहता। कुछ ही देरके बाद अचानक नींद उचट जाती और तब मेरा भय दुगना वढ जाता । यद्यपि मेरे कमरेकी बत्ती रात-भर जली रहती थी, पर फिर भी आधी रातमें विकट स्वप्न देखनेके बाद अचानक नींद उचटनेपर भयके कारण मेरी आत्मा इस लोकमें नहीं रहती थी। बत्तीके इर्द-गिर्द पतिंगे फडफडाया करते थे। उनके फडफड़ानेके शब्दसे ही मैं बीच- बीचमें चौंक पडती । मैं ऐसी हौलदिल हो गई कि उस कमरेमें अकेले पड़े रहना मेरे लिये कठिन हो गया। लीला अम्माँके साथ सोया करती थी। जब मेरी हालत बहुत खराब होने लगी तब मैने अम्माँसे लीलाको अपने साथ मुलानेकी आज्ञा मॉगी। मेरी घबराहट और डर देखकर अम्मा मुस्कुराई। तबसे लीला मेरे ही कमरेमें सोने लगी । सोनेके पहले वह कहानी सुनानेके लिये जिद करती । कहानी सुननेके बाद जब वह सो जाती तो मुझे उसके निश्चित निर्विकार जीवनपर ईर्ष्या होने लगती। एक स्त्री दूसरी स्त्रीके सामने अपना डरपोकपन जाहिर नहीं करना चाहती, पर पुरुपके (विशेषतया अपने प्रेमिक जनके) निकट अपनी दुर्ब- लता, हीनावस्था, और दुर्गतिका वर्णन करनेमें अवर्णनीय आनदका अनुभव करती है। डाक्टर साहबके निकट मैं दिल खोलकर अपनी शोचनीय अवस्था व्यक्त करके उनकी समवेदना उभाइनेकी चेष्टा करती थी। वह मुझे परहेजसे रहनेका उपदेश देते और एक-आध दवा प्रेस्काइब ' कर जाते । मैं शौक और विश्वाससे उस दवाको पीती थी। , बोलियाँ मुनाता था।

घृणामयी। अम्मौ डाक्टर साहबको देखकर बहुत प्रसन्न थीं। डाक्टर साहब भी उनके प्रति यथेष्ट श्रद्धाका भार प्रदर्शित करते थे। एक दिन मुझे हलका-सा बुखार आया । अम्माँ बहुत घबराई । डाक्टर साहबके आनेपर रोती हुई बोली-इस लड़कीकी फिक्रके मारे मैं रात दिन वेचैन रहती हूँ, डाक्टर साहन ! कभी इसे बुखार आता है, कभी-पेटमें दर्द रहता है, कभी नींद न आनेकी शिकायत करती है। मुझे बिलकुल उम्मेद नहीं रहती कि यह ज्यादा बचेगी। इसका इलाज कीजिए, नहीं तो हम लोग कहींके न रहे।" डाक्टर साहब दिलासा देते हुए बोले "चिंता किसी बातकी न कीजिए । इस उम्रमें अस्सी फीसदी स्त्रियोंको रोग आ घेरते है। दो-एक सालके बाद इनका स्वास्थ्य बिलकुल ठीक हो जायगा।" आज बहुत दिनोंके बाद अम्मकि हृदयमें मेरे प्रति स्नेहका भार उमड पड़ा था। अपने सभ्य समाजके निमत्रण-आमत्रण और उत्सर्वोमें व्यस्त रहनेके कारण आज तक हम लोगोंकी खबर पूछनेकी भी फुर्सत उन्हें नहीं रहती थी। यदि हमसे वह कभी बोलती भी तो झिड़ककर और रुखाईके साथ । मैं यह नहीं कहती कि उनके मनमें हमारे प्रति स्नेहका भार वर्तमान नहीं था। पर उनकी उपेक्षा आश्चर्यजनक और असाधा- रण थी। आज उनका दिल मुझे देखकर भर-भर आता था । वह डाक्टर साहबके सामने बिलख-बिलखकर, फूट-फूटकर रोने लगी। शायद उन्हें इस बातका खयाल हुआ कि वह परिणतासस्थामें 'सोसायटी' के आनदमय उत्सनोंमें सम्मिलित होकर जीवनका सुख प्राप्त कर रही है और उनकी लड़की नई जनानीमें सगहीन, अकेली और चिता-अस्त रहती है--चिताओंसे पीड़ित रहनेके कारण ही वह बीमार रहती है और आज , घृणामयी। उसे इसी कारण वर आया है। मैं ठीक कह नहीं सकती कि वह क्या सोच रही थीं। पर मैंने ऐसा ही अनुमान किया । २ मेरा बुखार बढता चला गया । घरके सब लोग चिंतित हो उठे। 'राजू भी बहुत घबराया। लीलाको मैं हरवक्त अपने पास रखना चाहती थी, पर वह बैठे-बैठे उकता जाती थी और बाहर खेलने चली जाती । तेरह सालकी हो चली थी, पर अभी तक अज्ञान थी। उसके लिये मुझे अधिक दुख था। डाक्टर साहब दिनमें तीन-तीन चार-चार वार आते थे और जी- जानसे मेरी टहलमें लगे थे। छठे दिन मेरे सारे शरीरमें भयकर वेदना होने लगी। सिरके दर्दका तो वर्णन नहीं हो सकता । " हाय अम्माँ ! हाय काका! हा राम !" चौबीसों घटे मैं यही चिल्लाया करती। बीमारीका बुरा हाल देसकर डाक्टर साहब चौबीसों घंटे मेरे पास रहने लगे । कभी टेंपरेचर लेते, कभी नाडी देखते, कभी इजेक्शन देते, दवाई पिलाते, कभी धाईको सारा वदन गरम पानीसे सेंकनेका उपदेश देते। उनका अलात परिश्रम देखकर राजूकी ऑखोंमें भी उनके प्रति कृतज्ञताका भार छलक उठता था, इस बातपर में अपनी उस धुरी हालतमें भी गौर कर रही थी। दसवें दिन मै सन्निपात-ग्रस्त होकर बेहोश हो गई। दो-तीन दिन- तक यही हाउ रहा। फिर धीरे-धीरे चैतन्य होने लगा। धीरे-धीरे सानेकी रुचि जागरित ई। धीरे-धीरे कमजोरी घटने लगी। प्राय चालीस दिनके पाद में चारपाईसे उतरकर नीचे पाँर रखनेमें समर्थ कभी घृणामयी। हुई । मेरा पुनर्जन्म हो गया था। डाक्टर साहबका विजयोल्लास उनके मुँहमें उद्दाम भानसे, असयत तीव्रतासे चमकने लगा। अम्माँ कृतज्ञतासे गद्गद होकर गिड़गिडाकर उनके पैरोंमें गिर पड़ीं। चौंककर, घबराते हुए डाक्टर साहबने उनका हाथ पकड़ा और ऊपरको उठाया । बोले-" आप ऐसी बुद्धिमती होकर यह क्या करती है ! " आपकी ही वजहसे मेरी लड़कीकी जान बच गई। नहीं तो क्या आज मैं कभी-~अम्माँ अपनी बात पूरी न कर सकीं। अचलसे मुँह ढॉपकर बेबस रोने लगीं। यह कैसे हो सकता है ! आदमीकी क्या ताकत कि वह किसीको वचा सके और किसीको मार सके ! जिसने सबको पैदा किया है उसके कोपका सामना कोई नहीं कर सकता। उसीकी दयासे आज हम लोग घोर अनर्थसे बच गए।" डाक्टर कन्हैयालालको मैं नास्तिक समझती थी। पर आज माइम हुआ कि सृष्टिके अज्ञात परिचालकपर उनका भी विश्वास है। मैं उनकी ओर ताककर विना कुछ कहे, यह भाव जतलाती हुई स्कुराने लगी कि मेरे ऊपर उनका कोई अहसान नहीं है-- अपना व्य समझकर अपनी गरजसे ही उन्होंने मेरी टहल की है । मेरी इस रकृतज्ञ मुसकानके उत्तरमें उन्होंने अपनी बॉकी चितानसे मेरा सुकुमार दय चीर डाला। उनकी इस मुसकान रहित, आदेश-विह्वल चितवनमें ही चिर-परिचित नशा पूर्णमात्रामें विद्यमान था । उसकी अनिर्वचनीयतासे लकित होकर मेरा कलेजा धड़कने लगा। जी चाहने लगा कि रो रोकर जनके पैरोंमें गिर पहूँ और सारे कलेजेको आँसुओंके रूपमें बाहर निकाल मा। उनकी आँखोंके उज्ज्वल, सरस पर करुण आवेशसे मेरी मुसकान

७०
,
घृणामयी।
किसी मत्रके वलसे तिरोहित हो गई और मेरे हृदयमें गभीर निपाद छा
गया।
राजूने आकर कहा-" डाक्टर साहब, इतने दिनोंकी कड़ी मेहनतसे
आप थक गए हैं। चलिए एलफेड पार्ककी ठडी हवासे थकान दूर
कीजिए।"
मैंने कहा--" मैं भी चलेंगी।"
डाक्टर साहब बोले यह क्यों ! आपको अभी कुछ दिनोंतक
कप्लीट रेस्ट' करना होगा।"
" तो आप लोग भी यहीं बैठे रहें । मैं यहाँ अकेली नहीं रह सकती।"
राजू कुछ देर तक बडे गौरसे मेरी ओर ताकता रहा ।
आप वैठिए डाक्टर साहब, मैं चला ।" यह कहकर वह विना
किसीके उत्तरकी प्रतीक्षा करके चल दिया। अपने भाईकी निर्मोहिता
देखकर मैं दग रह गई।
कुछ देर तक डाक्टर साहब और मैं सन्न होकर बैठे रहे। फिर
डाक्टर साहब बोले---" आपके भाई सनकी और तेज-मिजाज़ मालम
होते हैं।"
मैं बलपूर्वक चेष्टा करके मुस्कुराने लगी। मेरी उस मुस्कुराहटमें
ग्लानिका आभास शायद स्पष्ट झलक रहा था।
३
ढल चुका था। मैं अपने कमरेमें बैठकर चाय पी रही
थी। डाक्टर साहब इतनेमें आ खडे हुए। मुझे इस समय
चाय पीते देखकर आश्चर्यसे पूछने लगे" यह क्या ! आज वेवक्त
क्यों ?"
दिन
।

घृणामयी।
मैंने कहा--" चायके लिये मै कभी वक्त-बेक्तका विचार नहीं
करती । जब जी चाहता है पी लेती हूँ।"
"पर माफ कीजिए, चाय आपके लिये किसी तरह भी फायदेमंद
नहीं है। मैंने आपसे 'बाइनो-हाइपोफास्फाइट्स के सेवनके लिये कहा
था । वह क्या आपने मॅगाया है।"
"जी हाँ।
"
।
बस उसीका सेवन करते चले जाइए। चायको विप समझकर
त्याग दीजिए।"
यह कैसे हो सकता है, डाक्टर साहब ? चायके कारण ही मेरे
प्राण टिके हैं । यही मेरे जीवनका एक आधार है और इसीको आप छोड
देनेके लिये कहते हैं।"
डाक्टर साहब खीझ उठे। वोले-"स्त्री-जाति जहरीली होती है।
इसलिये जहरके पीनेसे उसके प्राण टिके रहे, इसमें आश्चर्यकी कोई वात
नहीं। विपके कीड़े निपके सेवनसे ही प्राण धारण करनेमें समर्थ
होते है।"
मैंने पूछा--" क्यों, स्त्री-जाति जहरीली क्यों होती है ? "
यह प्रश्न करते समय मैंने अपनी आँखोंके विषका प्रयोग डाक्टर
साहनपर करना चाहा था।
कुछ विचलित होकर अपनी दृष्टिकी प्रखरतासे उन्होंने मेरा मर्म
वेधनेकी चेष्टा की। अपनी आवेश-विह्वल आँखोंसे एक्टक मुझे ताककर
मंद-मद मुस्कुराकर मुझे मत्र-मुग्ध करते हुए बोले-" स्त्री-जाति क्यों
जहरीली होती है, तुम्हें क्या नहीं मालूम "
।

। " घृणामयी। ७२ आज पहली बार उन्होंने मेरे लिये 'आप' के बदले 'तुम का प्रयोग किया। अनिर्वचनीय पुलकसे व्याकुल होकर मैंने काँपती हुई आवाजमें कठपुतलीकी तरह मत्र-विह्वल होकर बेबस उत्तर दिया-- नहीं। " अच्छी बात है। अगर मालम नहीं है तो मालूम करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ।” मैं कुससि उठकर, न मालूम क्या सोचकर चारपाई पर बैठ गई । डाक्टर साहब अभी तक खडे थे और अपने 'हिप' को इधर-उधर घुमा रहे थे। मैं अपनी स्प्रिंगकी चारपाईका ऊपरका डडा पकड़कर उसके सहारे लेट गई। पर कुछ ही देरके बाद लोहेके डडेकी कठिनताके कारण मेरी पीठकी हड्डी दुखने लगी और मै संभलकर उठ बैठी। दोनों हाथोको चारपाईकी दोनों ओर फैलाकर मैने अपने पॉर नीचेको लटका दिए । मेरी साड़ी सिरसे नीचेको खिसक गई थी। मैंने उसे फिरसे ऊपरको समेटनेकी कोई आवश्यकता नहीं समझी। अपना यह अद्भुत विलास डाक्टरसाहबको दिखलाती हुई मैं घोली- " बैठिए डाक्टर साहब, आप खड़े क्यों हैं !" घबराहट और भ्रातिके कारण डाक्टरसाहब शायद पहले चारपाईके जपर ही बैठनेको आगे बढे ये, पर किसी अज्ञात शक्तिद्वारा अकस्मात् नियत्रित होकर एकदम ठिठककर सामनेवाली आराम कुर्सीपर बैठ गए। मैं खिलखिलाकर हँस पड़ी। लज्जित और संभवत अपमानित होकर डाक्टर साहन बोले-"क्यों, हंसनेकी क्या बात है " - घृणामयी। माफ कीजिए डाक्टर साहब, मेरा मन आज ठिकाने नहीं है । इस लिये बिना किसी कारणके वारली-सी हँस रही हूँ। बहुत सभर है, थोड़ी ही देरमें रोने लगूंगी।" डाक्टर साहब दोनों हाथ जोड़कर स्तुतिका स्वांग रचकर बोले-.-" मायावती, तुम धन्य हो ! जब हँसी आई, तुम हँस देती हो, रोना आया, रो देती हो । हॅसने और रोनेके बीचकी अपस्थासे तुम्हारा कोई सरोकार नहीं । आत्माको पीस देनेवाली यह भयकर मध्यावस्था भगनानने पुरुषके लिये ही रची है।" हाथ जोडनेके समय भी 'हिप' उनके हाथमें ही था । मैंने कहा- " स्तुतिके समय पुष्प और वेलपत्रसे देवी-देवताकी अर्चना होती है। आप क्या कोडेसे मेरी अर्चना करने चले हैं ?" डाक्टर साहब ठठाकर हंस पड़े। अकस्मात् दरसाजेपर राजू आ खडा हुआ । यमदूत भी यदि वहाँपर प्रत्यक्ष दिखलाई देता तो भी मै शायद इतनी भयभीत न होती जितनी उसके आनेपर हुई। सिरको अचलसे ढककर हडबडाती हुई मैं चारपाईपरसे उठ बैठी । डाक्टर साहब भी सन्न - राजू विना कुछ कहे उलटे पाँव लौट चला । मैं सोचने लगी- क्या यम भी मेरे भाईकी तरह रपमान है।" ४ हमारे कालेजकी लड़कियोंने एक नाटक खेलनेका उद्योग किया था । बीमार होनेके समन मै कोई 'पार्ट' इस साल न ले सकी थी। फिर भी नाटक देखनेकी बड़ी इच्छा थी। राजूके लिये ७४ घृणामयी। अलग निमत्रण आया था । नाटकमडलीकी सेक्रेटरी साहित्रा उसपर विशेष रूपसे प्रसन्न थीं। एक ही दिनके परिचयमें वह उसके गुणोंपर मुग्प हो गई थीं। पर राजूने जानेसे साफ इनकार कर दिया । इधर डाक्टर कन्हैयालाल इस नाटकके लिये विशेप उत्सुक और लालायित हो रहे थे। इस नाटकमें पुरुषों के लिये निषेध था। पर एक नियम यह था कि सेक्रेटरीकी अनुमतिसे दो-एक विशेष-विशेष पुरुष प्रवेश कर सकते है । सेक्रेटरी साहिबासे डाक्टर साहबके दुर्लभ गुणोंका बखान करके मैंने उनके लिये अनुमति मांगी। कमलिनी ( सेक्रेटरी साहिबाका यही नाम था) इस ढगसे मुस्कुराने लगी जैसे वह मेरे दिलकी सब बातें ताड गई हो। बोली- " ऐसे गुणगान पुरुषको स्त्रियोंकी महफिलमें लाना क्या खतरेकी बात नहीं है। मैंने पूछा--" खतरा कैसा ?" " अरी पगली, समझती नही ? तेरे अनुमोदित और इच्छित पुरुषकी ऑखें जब इतनी अलबेली नारियोंपर दौडेंगी तो क्या फिर वह तेरी परवा करेगा?" !" कहके मैंने गुस्सेमें आकर उसकी पीठपर एक धौल जमा दिया । पर उसकी इस बातसे मेरे हृदयमें भयका सचार होने लगा। कमलिनीने कहा--" अच्छी बात है। मुझे कोई ऐतराज नहीं । पर मैं सावधान किए देती हूँ। पीछे पछताना पड़ेगा।" युनिवर्सिटीके लड़कों और प्रोफेसरोंके साथ कमलिनीकी बडी धनि- ठता थी। बहुत सभर है, उन लोगों के स्वभावसे परिचित होनेपर वह पुरयोंकी प्रकृतिसे अभिज्ञ हो चुकी थी। उसकी बातसे कुछ भय होगे- पर भी मुझे विशेष चिंता नहीं हुई। मुझे अपने रूप-गुणका बड़ा धमड ७५ घृणामयी। था । किसी व्यक्तिको मुझे छोड़कर अन्यत्र जानेका लोभ हो सकता है, यह आशंका मेरे हृदयमें उत्पन्न नहीं हो सकती थी। अम्मनि जानेका विचार किया था। पर सिरमें दर्द हो जानेके कारण वह न जा सकी । लीला जाना चाहती थी, पर राजूने उसे समझा-बुझा- कर रोक लिया । मुझसे राजूने कुछ नहीं कहा, और ऐसा भाव प्रदर्शित किया जैसे मैं उसकी बहन ही नहीं हूँ। डाक्टर साहवकी सरक्षकतामें मैं रातको खा-पीकर चल पडी। नाटक-गृहके भीतर प्रवेश करके देखा कि वह वृहत् कक्ष विलास- वती युवतियों और नगीना किशोरियोंकी सुमधुर गुजारसे मुखरित था । एक-आध कोनेमें दो-एक पुरुष भी दृष्टिगोचर हो रहे थे, पर वे इस स्त्री- सागरमें बुद्बुदकी तरह पिलीन होनेको थे । ऐसी हालतमें एक प्रखर व्यक्तित्व-सपन दर्शनीय पुरुषको बगलमें लेकर भीतर प्रवेश करनेमें मैं लज्जासे गडी जाती थी। हमारे प्रवेश करते ही तत्काल सैकडों उज्ज्वल ऑखें हमारी ओर आ लगीं । डाक्टर साहबने सगर्न एक सरसरी दृष्टि चारों ओर दौडाई । स्त्री-समाजकी मुग्ध दृष्टिसे उल्लसित होनेके कारण उनका चेहरा तमतमाने लगा। मै मन-ही-मन कहने लगी-“हे गोपी- जन-बल्लभ ! तुम्हें नमस्कार है।" डाक्टर साहबकी दृष्टि अत्यंत चंचल हो गई थी। वह कभी वाई. तरफकी युवतियोंको घूर रहे थे, कभी दाहिनी तरफको ताकते थे और कभी पीछेको । मैंने ईयसेि जलकर धीमे स्वरमें उनके कानके पास जाकर कहा- क्या तृप्ति नहीं होती। चौंककर वह बोले " ऐं ! यह क्या कहती हो ! मैं अपने एक 'फ्रेंड'को ढूँढ़ रहा था!" .

वृणामयी। पुरुष या स्त्री!" प्रश्न करते समय मेरी आवाज काँप गई थी। यह वात शायद डाक्टर साहबके ध्यानमें आ गई । इसलिये उत्तर देते समय वह पल-भरके लिये हिचकिचा गए। बोले- ये तो पुरुष ही, पर शायद वहाँ स्त्रीके आकारमें मिल जाँय, यह दुराशा मेरे मनमें समा रही थी।" उत्तर देनेका यह ढग विलकुल नया या, इसमें सदेह नहीं । पर वह साफ चनापटी था । मैं कुढ़कर, जी मसोसकर रह गई। मनमें कहने लगी" कौन चुडैल इनकी सगिनी है, यह बात अगर मालम हो जाती तो एक वार कलमुहीको देख लेती कि वह मुझसे कितनी अच्छी दिखलाई देती है।" पर्दा उठा। आरंभमें परियोंका मगल-गान कोरसमे गाया जाने अलबेली युवतियों नाना रगोंके मनोहर वस्त्र पहनकर, आभूपणोंसे सज्जित होकर, वालोंको बिखेरकर, पौडरसे रजित होकर, विद्युत्के उज्ज्वल प्रकाशसे प्रदीप्त और प्रफुल्लित होकर, मुकोमल और सुकुमार अगोंको सचालित कर, कोकिल-कठोंसे स्वर-लहरी तरगित कर दर्शक-मडलीको मत्र-मूढ करने लगीं। • डाक्टर साहब यह दृश्य देखकर, इद्रपुरी में भी अप्राप्य मधुर गान सुनकर शायद इस लोकमें नहीं थे। उनका मुग्ध होना तो स्वाभाविक ही था। पर मैं भी इन नवेली परियोंके सुकुमार हृदयोंकी उड़ानसे अनमनी और उदास हो गई। मुझे ऐसा जान पडने लगा कि मैं युगातस्थामें पदार्पण करनेके पहले ही जवानीकी सभी उमगें खो चुकी हूँ। आज पहली बार मुझे मालूम हुआ कि जिन उमोंके कारण मैं अपनेको युवती समझती थी ये अत्यत तुच्छ " ৩৩ घृणामयी। और अकिंचित्कार हैं। आज मेरी आँखोंके सामने अनत-यौपन-सपन्न परियोंका वास्तविक लोक उद्घाटित हो गया था, और मैं भाई-बहन माता-पिता और डाक्टर साहबकी समस्त चिंताओंको तिलाजलि देकर अफेली उस रग-उमंगमय लोकमें विचरना चाहती थी। गाना बद हुआ । दुवारा गाए जानेके लिये तालियाँ पड़ी। फिर वही गीत गाया गया। फिर मेरे मनको उसी पूर्व उन्मादने आ घेरा । मैंने उसी वेहोशीकी हालतमें डाक्टर साहबका हाथ पकड़ लिया । डाक्टर साहब भी शायद अज्ञात ईथरीय तरगोंसे प्रेरित होकर इसके लिये पहलेसे ही तैयार थे। उन्होंने प्रतिरोध करके अपना हाथ नहीं छुडाया, केवल एक बार सतृष्ण और स्निग्ध ऑखोंसे मुझे ताककर उन्होंने अपनी दृष्टि फेर ली। गाना समाप्त हुआ। उसके समाप्त होते ही मेरा नशा उतर गया । इतना भयकर तुफान मेरे मनमें उठा था, और वह इतनी जल्दी समात हो गया ! चैत और वैसाखके महीनेमें अक्सर देखा जाता है कि ऑधी और तूफानके भयकर वेगसे आसमानमें प्रलयकर बादल छा जाते है, बिजलीकी कड़कड़ाहटके साथ पृथ्वीको वहा ले जानेवाली धाराएँ वरसने लगती हैं । ऐसा जान पड़ने लगता है कि अब पृथ्वी-सुदरी लाज-शरम सब विसारकर, अपनी सततिकी माया छोड़कर, उन्मादिनी बनकर अकेली अनतकी ओर वही चली जाती है, अब कभी लौटकर न आवेगी। हाय माता ! तुम्हारा स्वप्न, तुम्हारा उन्मादक और उत्तेजक मोह क्षण-भरमें नष्ट हो जाता है और फिर तुम सतानके पास लौटकर, सूर्यके उज्ज्वल प्रकाशमें सुमधुर लज्जासे रजित, और सुमद वायुके ताड़- नसे वृक्षके पत्रों द्वारा कपित होकर अपनी पून:रत्तेजनाके कारण सकु- चित हो जाती हो।

में घृणामयी। ७८ ठीक यही हाल मेरा भी था। उस क्षणिक पर भीपण उमगसे उत्तेजित होनेके कारण मैंने डाक्टर साहनका हाथ पकड लिया था। गाना समाप्त होते ही जब नशा उतर गया तो तत्काल मैंने उनका हाथ छोड दिया और लज्जाके कारण धरती फाड़कर उसमें समा जानेकी इच्छा हुई। खेल आरम हुआ। उत्तररामचरित खेला जा रहा था। जो युवतियाँ राम और लक्ष्मणका नेप धारणकर रगमचमें विराजमान थीं उनकी नपु- सकता देखकर मेरे हृदयमें अश्रद्धा उत्पन्न हो गई। जब राम महाशव अपनी जनानी आवाजसे नजरेके साथ नकियाकर सीताको प्रिये कहकर पुकारते थे, तो मेरा जी घृणासे मचल मचल उठता था। जानती हूँ कि कई पुरुष ऐसे होते हैं जो स्त्रीका पार्ट वडी सुदरतासे खेल सकते हैं। इसका कारण सभपत यह है कि दुखिनी स्त्रीके उन्नत आद- र्शके प्रति पुरुषके हृदयमें विशेष श्रद्धा वर्तमान रहती है। पर पुरुपके उन्नत आदर्शकी कल्पना ही अभी तक स्त्री-जाति ठीक तरहसे नहीं कर पाई है। इसलिये ससारकी कोई भी स्त्री पुरुपका पार्ट खेल सकती है, इस बात- पर मैं विश्वास नहीं कर सकती । काकाकी भी यही धारणा थी। मूल नाटकके खेलमें कोई विशेषता नहीं थी । इसलिये मैं उसे देख- कर उकता गई थी। पर बीच-बीचमें विना किसी कारणके परियोंका नाच दिखलाया जा रहा था और नाचके साथ उनका गाना भी चल रहा था। यह दृश्य मेरे लिये अत्यत उत्तेजक और उन्मादक था । परि- योंका नाच गान आरभ होते ही मैं बिलकुल वेचैन और आपेसे बाहर हो जा रही थी। कितना ही मैं अपना मन रोकती थी पर किसी तरह भी सफल नहीं होती थी। अतिम वार 'ड्रॉप सीन' गिरनेके पहले जो नाच हुआ वह ऐसा सम्मोहक और आकर्षक था कि मेरी नसोमें बड़ी तेजीसे रक्त प्रवाहित होने लगा और उत्तेजनाके कारण सिरमें झनझनाहट पैदा घृणामयी। हो गई । मैं रह न सकी और अर्द्धमूर्छित-सी होकर बेवस डाक्टर साह- चके कधेके सहारे लेट गई । उस भरी महफिलमें लाज-भरम सब खोकर मैंने अर्द्धचेतन अवस्थामें दोनों हाथोंसे उनका गला जकड़ लिया । पर्दा गिरा। खेल समाप्त हुआ। डाक्टर साहब मुझे जगाकर बोले- लजा, चलो, सव चलने लगे हैं।" आज पहली बार उन्होंने मेरा नाम लेकर मुझे पुकारा था । मैं उनका हाथ पकडकर काँपती हुई उठ खडी हुई। उनका हाथ पकडनेमें मैं अपना गौरव समझने लगी थी। ६ मोटरमें जब चढ बैठी तो उसी उन्मादारस्थामें उन्हें जकड़े रही । मनमें कहने लगी-" प्यारे, मुझे घर मत ले जाओ! सीवे मौतके घर ले चलो। आजसे मेरा घरमे सब सबध टूट गया है । काका, अम्मा, राजू, लीला, मै किसीके पास अब नहीं जाना चाहती और वे भी अब मुझे नहीं चाहेंगे। आजकी उन्मादिनी रात्रिमें केवल तुम्हारे अगके विद्युत्-स्पर्शसे मूर्छित होकर मरनेके लिये ही भगवानने मुझे आदेश दिया है। मुझे मौतकी गोदमें ले जाकर छोड़ दो !" स्तन्ध रात्रिके उस विजन पथमें मौतका बिगुल बजाकर मोटर बड़े वेगसे आगे बढ़ी। उज्ज्वल प्रकाशकी दो सुदूर-प्रसारित रेखाएँ उस मृत्यु- गामी रथको यमलोकका मार्ग दिखला रही थीं। हर्ष उमाद और तीक्ष्ण वेदनासे पीड़ित होकर मैं डाक्टर साहपकी छातीमें अपना मुंह रखकर दिलख-विलखकर सिसक-सिसककर वेअरितयार रोने लगी। डाक्टर साहनका घन-घन उष्ण निश्वास मेरे सिरके वालोंको आदोलित कर रहा घृणामयीं। था। कह नहीं सकती कि शोफ़रको मेरे रोनेका हाल मालूम हुआ या नहीं। थोडी देरमें मोटर हमारे भवनके फाटकके पास आकर उसीकी और मुड़ी। मै अबतक समझे थी कि सचमुच मौतके ही द्वारकी ओर जा रही हूँ! फाटकके भीतर जब मोटर घुसी तो मेरा मोह भग होने लगा, और प्रचट ऑधीके समय जब नाव मझधारमें बहकर डॉवाडोल होने लगती है, और उस समय दुबिधामें पडे यात्रियोंके दिलकी जो हालत होती है वही मेरी भी हुई। उस समय मेरे पास यदि कटारी होती तो मै कसम खाकर कह सकती हूँ कि उसी दम अपनी छातीमें भोंक देती। ऐसे भीपण उन्मादका अतिम परिणाम यह हुआ है कि मैं साधारण अवस्थाकी तरह अपने घरको वापस चली आई ! चाहिए तो यह था कि इस अँधेरी रातमें मै किसी अंधेरे चट्टानसे टकराकर चकनाचूर हो जाती, किसी अँधेरी, भयावनी गुफामें फंसकर मर जाती, किसी उत्ताल तरंग- माला-समाकुल भीपण समुद्रके काले-काले जलमें फाँद पडती, तब जाकर मेरे हृदयकी उत्कट वासना शात होती । पर ऐसा न होकर मुझे नित्यकी तरह शात अबस्थामें अपने कमरेमें जाकर सोनेकी तैयारी करनी पड़ी ! क्या इससे अधिक शोचनीय अवस्थाकी कल्पना भी की जा सकती है । मेरे कमरेकी बत्ती जली हुई थी। लीला शायद आज अम्मौके साथ सो रही थी। डाक्टर साहब मेरे कमरेतक मुझे पहुँचाने आए थे। मेरी हालत देखकर वह बहुत घबराए-से जान पड़ते थे। कमरेमें पहुंचनेपर बोले लजा, शांत होकर सो जाओ। दिमागमें बहुत स्ट्रेन' पड़नेसे तुम दुवारा बीमार पड़ जाओगी और ऐसा होना बहुत खतरनाक है।" । -- "मैं चला " ८१ घृणामयी। मैंने अपनी उन्माद-भरी दृष्टिसे उनकी ओर ताका । वह अधिक घबरा गए। कुछ देर तक भ्रात भारसे ताकते रहे, फिर कहकर मुंह फेरकर चल दिए। चारों तरफ सन लोग निस्तब्ध होकर सो रहे थे। कहींसे किसीके खकारने या खाँसनेकी आवाज़ भी नहीं सुनाई देती थी। उस भयकर रात्रिमें उस अवस्थामें मैं अकेली अपने कमरे में खड़ी थी । अकस्मात् एक प्रचड भीतिके भावने मुझे धर दवाया । मेरे पैर उसी हालतमें जमीनपर जकड़ गए और मैं उन्हें बिलकुल न हिला सकी । जोरसे चिल्लानेकी इच्छा हुई, पर किसी कारणसे चिल्ला न सकी । बड़ी मुश्कि- लसे, प्रनल चेष्टा करके मै पलंगपर चढ़ बैठी। पलंगपर चढनेसे अंगके दबनेके कारण जो आगाज हुई उससे कॉप उठी । भयके कारण झे कपडे बदलकर, सोनेके समयकी पोशाक पहननेकी हिम्मत भी नहीं ई । उन्हीं कपड़ोंको लेकर काल ओढकर लेट गई । सिरकी नसें वड़े कोरोसे झनझना रही थीं, दिल बेतहाशा उछल रहा था। वहुत देरके बाद जब मेरी अवस्था कुछ शात हुई तो, न जाने क्यों, मुझे याद आया कि राजू और लीला दस बजे रातसे इस समय तक शात और निरद्वेग होकर सोए हुए है। दूसरे दिन डाक्टर साहब किसी कारणसे नहीं आए । मै दिन-भर डबडी उत्सुकताते उनकी बाट जोहती रही। आज मुझे उनकी बड़ी आवश्यकता थी। अपने जीवनके प्रथम स्खलनके बाद मैं और किसी दूसरे व्यक्ति के सहारेकी आशा नहीं कर सकती थी। मेरी यह घृणामयी। हीनता केवल उन्हींके साथ मिलकर मुख-दुःखकी बातें करनेसे मिट समती धी। पर वह किसी तरह नहीं आए। जिनके कारण अपने प्यारे भाईकी आँखोंमें गिरना मैंने स्वीकार किया वह मेरे जीवनकी इस विक स्थितिमें, इस नाजुक हालतमें क्या मुझे त्याग देना चाहते हैं ?...-इर भयकर विचारसे मेरे रोएँ खड़े होने लगे। रातके जागरणसे मेरी और झप रही थी। मैं पलँगपर लेटे-लेटे बीच-बीचमें झपकियाँ लेती जात पी और फिर इस आशकासे हड़बड़ाकर उठ बैठती थी कि मुझे सोते देखकर कहीं डाक्टर साहब वापस न चले जायें। नौकरसे पूछती जाती थी कि डाक्टर साहब आकर चले तो नहीं गए ? बार-बार इसी एक प्रश्नसे तंग आकर वह आखिर रह न सका। बोला-"क्यों बीबी, तुम नाहक प्राण खाती हो ? अगर आए होते तो क्या हम तुम्हें जगाने देते ? हमें मालूम है कि उनके बिना तुम्हारे प्राण कैसे सूखे जाते है । रात-भर जागरण किए बैठी हो, वेफिकिर सो क्यों नहीं जाती। उनकी फिकिर तुम्हारी ही तरह हमें भी लगी है।" यह नौकर बुड्डा था और वडा पुराना था। उसने मुझे अपनी गोदमें खेला रक्खा था इसलिये उसकी बात सह गई। नहीं तो यदि कोई दूसरा नौकर होता तो उसी दम काकासे कहके उसे निकलवा देती। कर्मोका ही दोप था, इसलिये मन मारकर सबकी बोली-ठोली सह लिया करती थी। मैं सोचने लगी कि डाक्टर साहबसे हेलमेल बढाना ऐसा कौन भारी अपराध है कि उसकी वजह घर-भरके लेग मेरे खिलाफ हो उठे हैं। यह स्पष्ट था कि काका भी इस बातसे निशेष प्रसन्न नहीं थे । यह होनेपर भी उन्होंने मुझे प्यार करना नहीं छोड़ा था। पर राजने तो एकदम विद्रोहकी ही घोषणा कर दी थी। वह मेरे साथ अब बातें तकन . मेरे " राजू, घृणामयी। करता था। उसका यह विद्वैप कैसा अन्यायपूर्ण था! किसी युक्ती कुमारीका किसी विशेष पुरुषको चाहना विलकुल स्वाभाविक है और सामाजिक नियमों के अनुकूल भी है। यह कौन अधेरकी बात है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि राजू नासमझ और बुद्धिहीन था। उसके समान समझदार और बुद्धिमान व्यक्ति मुझे कोई नहीं दिखलाई दिया था। यही कारण था कि उसका अमूलक और अकारण विद्वेष मुझे और भी अधिक खटक रहा था और मेरे कलेजेको अत्यत निष्ठुरताके साथ आरीकी तरह चीर रहा था। भैया मेरे, मुझे क्षमा करो ! एक प्याला जहरका लाकर मुझे पिला जाओ ! मेरी और कोई दूसरी गति नहीं है ।" मन-ही-मन यह कहकर मैं पछाड खाकर, ओधे होकर तकिएके ऊपर सिर रखकर लेट गई और रोने लगी। दीनोंकी टेर सुननेवाले दीनदयालु भगवानकी तरह राजूको न मालम कैसे मेरी टेर सुनाई दी। अचानक मेरे कमरेमें आकर उसने पुकारा- दीदी 1 " कैसी मीठी, कैसे मधुर स्नेहसे भरी उसकी आनाज थी। मैं क्षण-भरके लिये पुलकित और रोमाचित होकर मूछित-सी रह गई। मन ही मन उसकी वलेया लेती हुई हडबडाकर उठ बैठी । आँखे पोंछ- कर अनजान-सी बनकर बोली-" कौन ? राजू ? क्या बात है ?" मेरी आँखोंमें ऑसूके दाग शायद अभी तक वैसे ही बने थे। पोंटने- पर भी नहीं मिटे थे। मेरी और ताकनेपर राजूकी आँखे भी फरणासे । म्लान हो गई। उसने पूठा--"क्या तबियत कुछ सरान है ?" "नहीं, कुछ खरान नहीं। रातको जगे रहनेके सबब कुछ मुस्ती आ गई थी।" .

"
अकेली थी। शायद इसीलिये मुझपर तरस खाकर वह मुझे बुलाने
'अपनी-अपनी चिताओंमें मग्न थे। हम दोनोंमेसे किसी के
घृणामयी।
८४
" तो चलो, कहीं सैरको चले चलें । सत्र सुस्ती दूर हो जायगी।
"कहाँ चलोगे."
"जिधरको तुम्हारी इच्छा है।"
" मेरी इच्छा किसी खास जगहके लिये नहीं है।"
"तो चौककी तरफ चलें।"
" अच्छी बात है," कहकर मैं चारपाईसे नीचे उतर पड़ी और
दूसरे कमरेमें जाकर कपडे बदलने लगी। कपडे बदलते-बदलते में यही
सोचने लगी कि आज राजूकी विशेष कृपाका कारण क्या है। मुझे
विश्वास था कि यदि डाक्टर साहब मेरे साथ होते तो वह कदापि में
साथ चलनेको राजी न होता | आज डाक्टर साहब नही थे, और ।
आया था।
कपड़े बदलकर, बाल संचारकर, सजधजकर वाहर
आई।
भी चलनेके लिये तैयार होकर बाहर खड़ी थी।
राजूने कहा--" फिटन तैयार है । उसीमें जाना होगा। मेरी मोटा
कोई ले गया है। दूसरी कोई मोटर मुझे पसंद नहीं।"
फिटन
टन कपनी बागके रास्तेसे होकर जाने लगी। राजू और में
मनमें बातें करनेकी इच्छा उत्पन्न नहीं होती थी। पर लीला वडी बचत
और प्रसन्नचित्त लडकी थी। वह बीच-बीचमें अपने उद्भट प्रश्नोंसे हम
लोगोंको तग कर रही थी।
लील

घृणामयी। जब हम लोग रेलवे लाइनके नीचे, कृत्रिम टनेल'के पास पहुंचे तो राजू बोला- अब तुमसे बात क्या छिपाऊँ, दीदी ! मैं तुम दोनोंको अपने एक मित्रके यहाँ लिए जाता हूँ। अपने मित्रकी अम्माँको मैं भी अर्मों कहता हूँ। वह बहुत दिनोंसे तुम दोनोंको लिवा लानेके लिये ज़िद करती थीं । आज तुम्हें उन्हींके पास लिए चलता हूँ। राजू मिनके साथ परिचय होनेमें मुझे कोई एतराज नहीं था। हमारी फिटन हेवेट रोडकी तरफ मुडी । कुछ दूर आगे वटकर एक मकानके पास राजूने गाडीको रोक लेनेकी आज्ञा दी। दूकानके लगे-लगे एक तग फाटक था। हम लोग उसके भीतर घुसे । भीतर मकानके नीचे नालीसे होकर गदा पानी वह रहा था। बड़ी बदबू आती थी। मैंने रूमालसे नाक ढक ली । मुझे मन-ही-मन बडा आश्चर्य हो रहा था कि राजू हमें कहाँ ले आया है। पर मुझमें उस समय कुछ बोलनेकी शक्ति नहीं थी। मैंने आज अपने जीवनमें पहली बार वाजारके भीतरका मकान देखा था। इसलिये हैरतमें थी। मकानके सबसे नीचे जो कमरा या उसके पास जाकर राजने पुकारा "भोला !" कोई आवाज़ नहीं सुनाई दी । चारों तरफकी बड़ी-बडी दीनालोंसे मकान ढका था, इसलिये वहाँ प्रकाश अच्छी तरह नहीं प्रपेश कर सकता या । सध्याका समय होनेके कारण इस समय और भी अधिक अँधेर हो रहा था। वरामदेके भीतर जाकर जन यह उस कमरेके बिलकुल समीप ही गया तो माराम दुआ कि यहाँ ताला लगा है। भोलाके मिउनेकी आशा छोड़कर वह हमें सीदियों के रास्तेमे होकर ऊपर ले गया । जपर दरसाजेके पास पहुँचकर वह पुकारने गा- "अम्मों | दीदी |" राजू ?" रह गई थी और शायद इसी कारण उसे हमें भीतर बुलानेकी हिम्मत राजूने कहा-" इन दोनोंको देखकर क्या घबरा गई हो दीदी! घृणामयी। ८६ भीतरसे युवती-कठकी मीठी आवाज सुनाई दी-" हो । कौन है। राजू बोला--" हॉ, मैं ही हूँ। किवाड खोलो। राजूकी यह आश्चर्यमयी दीदी कैसी है, यह जाननेके लिये उत्सुक होकर मैं अधैर्यके साथ खडी रही। खट-से दरवाजा खुला । मैंने देखा कि चौबीस-पच्चीस सालकी एक युक्ती दाहिने हाथमे प्राय दो सालका एक बच्चा पकडे, लाल रगमें रणे हुए खद्दरकी एक अर्द्ध-मलिन साड़ी पहने, अपनी गात और स्तिमित ऑखोंसे आश्चर्यपूर्वक मुझे और लीलाको ताकती हुई वहॉपर खडी है। उसके मुंहका रंग गेहुंआ था-उसमें उज्ज्वलता नहीं पाई जाती थी। पर वह कैसा प्यारा मुंह था ! मैं स्पष्ट देख रही थी कि मेरा और लीलाका ठाठ देखकर वह चकित नहीं होती थी। चलो, इन्हें भीतर ले चलो।" " आओ वहना," कहके उसने पहले मेरा हाथ पकडा और फिर लीलाका । मेरा उत्साह पहले ही ठडा पड़ गया था। अब निलकुल ही जाता रहा । दो अंधेरे कमरे पार करके हम लोग एक तीसरे कमरेमें आए। यह कमरा वाजारकी तरफ था। वहाँ एक अधेड स्त्रीके पास बैठकर दे बच्चे लीलाकी उम्रकी एक लडकीके साथ खेल रहे थे। राजूने उस अधेड़ स्त्रीको प्रणाम किया और कहा - अम्माँ, आ अपनी बहनोंको आपके दर्शनके लिये ले आया हूँ।"

. u घृणामयी। है राजूकी अम्मोने कहा--" आओ वेठा, बैठो। बहनोंको ले आए, अच्छा किया । आओ बेटी, सामने आओ, जरा तुम्हारा मुँह तो देवू ।" सकोच और घृणासे मेरा सारा शरीर जर्जरित हो रहा था। मुझे राजूपर क्रोध आ रहा था। क्यों वह मुझे सध्याके अधकारमें ऐसे अज्ञात स्थानमें ले आया ? मुझे डर मालूम हो रहा था । फिर भी मैंने मन मारकर राजूकी 'अम्मा'को प्रणाम किया। लीलाने । मेरा अनुकरण किया । "कैसा मुदर चाँद-सा मुखडा है !" कहकर वह बड़े स्नेहसे मेरे * गालोंपर हाथ फेरने लगीं । मैं नाक-भौंह सिकोडकर, मन ही-मन मचल- कर रह गई। वह बोली "तुम राजूकी ही बहन हो, इसमें सदेह नहीं।" राजू खिलखिलाकर हँस पडा। राजूकी 'दीदी'ने लालटेन जलाई । उजाला देखकर बच्चे उछल पड़े ! इस अवकार घरमें प्रकाशका कितना मूल्य था यह बात मै घरमें प्रवेश करते ही समझ गई थी ! 'दीदी की गोदमें जो दो सालका बच्चा या वह बत्ती जलते ही उसकी तरफ दोनों हाथ जोडकर उमगमें आकर वोला--"जै ।" उसे शायद ऐसा करना सिखलाया गया था । यह सब तो ठीक था, पर मै एक वातके लिये बड़ी दुविधामें पड़ गई थी। उस कमरेमें बैठने के लिये मुझे कहीं एक कुर्सी भी नहीं दिख- लाई दी। नीचे फर्शमें एक मैली दरी बिछी हुई थी और उसके ऊपर दो छोटे-छोटे पुराने कालीन पड़े हुए थे । राजू बड़े आरामके साथ कालीनके ऊपर बैठ गया था। पर मैं नीचे कैसे बैठती ! हाय राजू ! तुम करके वैरका बदला लेने मुझे यहाँ ले आए ! अपने जीवनमें आज तक मै . - घृणामयी। ८८ कभी फर्शपर नहीं बैठी थी । लीलाका भी यही हाल था। पर वह राजूकी कट्टर भक्त थी। राजूको नीचे बैठे देखकर उसे नीचे बैठनेमें तनिक भी सकोच नहीं हुआ। वह उसीके बगलमें बैठने लगी। पर राजूने न मालूम क्या सोचा, उसे नीचे नहीं बैठने दिया। कमरेके कोनेमे एक चार- पाई पडी थी। उसने लीलाका हाथ पकडकर उसीके ऊपर बैठा दिया और मुझसे भी उसीके ऊपर बैठनेको कहा। यद्यपि चारपाईपरका निस्तर साफ सुथरा नहीं था, तथापि फर्शकी अपेक्षा उसीपर बैठना मैने अच्छा समझा। लीलाकी उम्रकी जो लडकी वहॉपर बैठी थी, वह चुपके-से भीतर गई और एक पुरानी, टूटी हुई कुर्सी लाकर राजूसे बोली- भैया, तुम इसपर बैठ जाओ।" पर राजू वडा जिद्दी आदमी था । फर्शपरसे हटा नहीं। ९ " , महलमें रहती हो। भगवानकी दयासे तुम्हारे पास चार पदार्थ मौजद हैं । सब तरफसे तुम भरी-पूरी हो। पर यह होनेपर भी गरीम लोगोंकी कुटीमें पॉव रखनेसे भगवान कभी तुमसे असतुष्ट नहीं होंगे । दुनियामें बड़े लोग कितने कम होते हैं । सारी सृष्टि दरिद्रोंके ही भारसे दवी हुई है। इस हालतमें तुम कहाँ तक दीन-हीन लोगोंसे बचकर, संभल-संभलकर चलोगी ? किसी-न-किसी समय उनकी गदगीसे ।। बेदाग पापोंमें मैल लगता ही । आज श्रीगणेश इसी धरसे हुआ। किसी बातको समझानेका यह ढग निलकुल नया सकुचित होकर मैं बोली-" नहीं अम्माँ, मैं तो आपके सौभाग्य समझती हूँ।" -- , ८९ घृणामयी। " सौभाग्यकी कोई वात नहीं है, वेटी। यह मेरा ही सौभाग्य है कि तुम्हारा चाँद-सा प्यारा मुखड़ा देख पाई हूँ। राजूसे कबसे कहती थी। आज आरितर यह दोनों बहनोंको ले ही आया ।" हमारे भीतर आनेके समय जो दो छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे वे राजूकी नई दीदीमा अचल पकडकर उसीके साथ खड़े थे और आश्चर्य- चकित दृष्टिसे मुझे और लीलाको ताक रहे थे। राजूने अपने जेनसे विलायती मिठाईकी एक पुडिया निकालकर दोनोको अपने पास बुलाया और दोनोंको गोदमें बैठाकर बड़े लाइसे उन्हें अपने ही हाथसे मिठाई खिलाने लगा। पर उन लडकोंकी निस्मित आँखें हमारी ही ओर लगी थीं। मिठाई खाते-खाते वे दोनों एकटक होकर हम ताक रहे थे। बडे लडकेने बड़ी हिम्मत बॉधकर एक बार राजूसे पूछा--" ये कौन है, भैया " राजूने कहा- "दीदी।" - " दोनों । हाँ। बुढी अम्माने कहा-" दीनू, रामू , जाओ, दोनोंको प्रणाम कर आओ। दोनोंने तत्काल उठकर हमें प्रणाम किया। मै क्या कहकर उन्हें आशीर्वाद दूँ, कुछ समझमें न आया । चाहिए तो यह था कि दोनोंका हाथ पकडकर मैं उनसे लाड़की दो-चार दोनोंके प्रति अकारण घृणा पैदा हो गई था कि राजूने कैसे विना . घृणामयी। ९० लिया था। दोनोंके कपड़े यद्यपि धुले हुए और साफ-सुथरे थे, पर उनमें सौष्ठन नहीं था। दोनोंके चेहरोंसे भी वोदापन टपकता था। उनके प्रणामके उत्तरमें मै केवल मुस्कुराई । बच्चोंके अंतस्तलमें भी शायद अपमानकी एक अस्फुट, अस्पष्ट, अनुभूति वर्तमान रहती है। अपने प्रणामका स्नेहपूर्ण उत्तर न पानेपर दोनो कुछ देर तक खड़े-खड़े अत्यत विरस भानसे हमारी ओर ताकते रहे । जिस युवतीने दरवाजा खोला था वह अचानक गभीर स्वरमें वोली--" दीनू, रामू, इधर चले आओ | " दोनों दौडकर उसके पास चले गए। शायद वह दोनोंकी मॉ थी। मैंने उसकी ओर ताका। देखा कि पुत्रोंके अपमानसे माताका अभिमान प्रचड तीव्रताके साथ उसकी आँखोंमें झलक रहा है। मैं डर गई और हौलदिलीके कारण मेरा कलेजा धडकने लगा। मुझे ऐसा मालूम होने लगा जैसे मैंने कोई घोर अनर्थका काम कर डाला है। उस युवतीके मुंहके तात्कालिक तेजसे मेरी आँखें वास्तवमें चौधिया गई। अब तक उसके मुँहसे एक बात भी नहीं निकली थी। पर इस एक अत्यत तुच्छ और साधारण बातसे उसका सारा अत करण मेरी आँखोके सामने स्पष्ट प्रभासित होने लगा। मैं उसी टम समझ गई कि राजू क्यों इस तेजोमयी माताके पुत्रोंको प्यार करता है और अपने हृदयकी सकीर्णतापर मुझे दुख हुआ । पर यह होनेपर भी दरिद्र घरकी इस युवतीका वह दर्प मुझे अत्यत असह्य और कडवा जान पड़ा। राजूको भी शायद रगढग अच्छे नहीं दिखलाई दिए। इसलिये उसने बूढ़ी अम्माँकी ओर मुँह करके कहा- " अच्छा अम्मा, अब चलें। मोला अभी तक नहीं आया, उससे कल मिल लूंगा।"

, घृणामयी। अम्मान कहा--" क्या करूँ बेटा, लाचार हूँ। तुम्हारी बहनोंको यहाँ बुलाया, पर उन्हें कुछ भी खिला पिला न सकी । इस दरिद्र घरकी बनी हुई क्या चीज़ उन्हें पसद आ सकती है ! इमलिये कुछ कह न सकी।" "वाह, यह भी कोई बात है अम्मा । तुम्हारे हाथका प्रसाद ये दोनों कहाँ पा सकती है 2 मै तो रोज ही तुम्हारा प्रसाद पाकर अप- नेको धन्य समझता हूँ। पर आज देर हो गई है। फिर किसी दिन इन्हें लेता आऊँगा।" "ज़रूर लेते आना, बबुआ कहकर अन्माने उसके गालोंपर हाथ फेरा और लीलाके और मेरे सिरपर हाथ रखकर हमें आशीर्वाद दिया। " यहाँ जब हम लोग जाने लगे तो बच्चोंकी माता-राजूफी दीदी- उस तेज- स्विनी युनतीने मेरा हाथ पकडकर मुझसे कहा- आनेपर तुम्हें जो कुछ कष्ट हुआ उसे भूल जाना वहन " इस समय कैसा तिग्म और करग उसका कठ था ! मुझसे कुछ कहते न बन पडा । पर चुप रहना घोर नीचता है, यह सोचकर मैं बोली-" कष्ट किम वातका दीदी ! तुम लोगोंका प्यार पाकर मैं अपनेको आज कृतार्थ समझती हूँ।" जो लडकी लीलाकी समवयस्का थी वह लालटेन हाथमें पकड़कर हमें रास्ता दिखाने चली। सीढियोंसे नीचे उतरकर जन हम लोग वाहर फाटकके पास पहुंचे तो वह अपने मुंहमें अन्यत मधुर हास्यकी झलक दिखलाफर बड़े मीठे स्वरमें स्नेहपूर्वक बोली-" राजू भैया, पल तुम्हें जरूर आना होगा। उसकी बातसे ऐसा जान पडा कि राजूपर उमका विशेष अधिकार है। तेरह-चौदह वर्षकी लड़कीके मुँहसे स्नेहसे पूर्ण और अधिकारसे भरी " घृणामयी। ९२ वह वाणी सुनकर मैं आश्चर्यचकित रह गई। इस समय तक मैं उसके प्रति उदासीन थी। पर अब मैंने लालटेनके प्रकाशमें गौरसे उसे देखा। उसकी दो सुदर, उज्ज्वल ऑखोंमें स्नेह, करुणा, हास्य और बुद्धिमत्ताका अपूर्व मिश्रण वर्तमान था। राजूने कहा--" जरूर आऊँगा, बहना ! अव तुम लौट जाओ।" , . घर पहुँचने तक रास्ते-भर मै केवल यही सोचती रही कि राजूने 'ससारके नाटकका कैसा अनोखा दृश्य आज मुझे दिखलाया है। कभी मेरे मनमे घृणा उत्पन्न होती थी, कभी एक अपूर्व, अज्ञात चेतना । बूढी अम्मान कहा था कि संसारमें 'वडे लोग बहुत कम होते है-सारी सृष्टि केवल उन्हीं लोगोंके समान दरिक भारसे दबी है। मैने सोचा कि यदि यह वात सच है तो ससारसे मेरा परिचय कितना अल्प है | पर कुछ भी हो, राजूने क्या समझकर इस दरिद्र परिवारसे नाता जोडा है ? वह क्या अपने जीवनमें किसी : रोमेंस' की इच्छा रखता है, या वास्तवमें दरिद्रताको अपनाना चाहता है ? मुझे याद आया कि वह बिना किसी झिझकके नीचे फर्शपर बैठ गया था, और उसने वडे लाडसे दोनों बच्चोंको गोद में बैठा लिया था। यह तो किसी तरह भी रोमेंस'-प्रिय व्यक्तिकी सामरतयाली नहीं कही जा सक्ती। उन लोगोंके साथ पिना एकप्राण हुए कोई ऐसा नहीं कर सकता। भोगैश्वर्यसे पूर्ण घरमें लालित होकर, रात-दिन विलासिताकी तडक-भडक- में अपना जीवन बिताकर वह कैसे अपने हृदयमें बद्ध सस्कारोंको उखाडकर फेंकनेमें समर्थ हुआ । और वह भी इतनी छोटी अबस्थामें । उसकी अवस्था इस समय केवल सत्रह वर्षकी थी। दुःख, आश्चर्य, - घृणामयी। घृणा और श्रद्धाके भान बारी-बारीसे मेरे हृदयमें उमटने लगे। आज मै समझ गई हूँ कि भगवानके दिए हुए विपुल जीवनकी स्वाभाविक वृत्ति- योंका असली खेल दरिद्र गृहोंमें ही पाया जा सकता है। धनी और सभ्य समाजका तुच्छ शिष्टाचारपूर्ण जीवन कुछ निश्चित रेखाओंके भीतर नियम-बद्ध होकर चला करता है। इस जीवनके सुख-दुख भी 'टाइम- टेबिल में लिखे हुए, सुनिश्चित, नियमित और सीमा-बद्ध होते है । पर दरिद्र गृहका जीवन अनेकानेक उलटे-सीधे चोंके फेरसे सुविस्तृत, प्रकृतिकी मूल शक्तिद्वारा परिचालित, आत्माके भीतरी पीडनद्वारा निर्झरकी तरह उत्साहित और शात करुणा तपा स्निग्ध वेदनासे ओसकी बूंदोंको अलकानेवाली विजन निशाकी तरह उन्मुक्त होता है। अनेक जन्मोंके सस्कारोंसे राजू इसी प्रकारके वास्तविक जीवन के लिये लालायित या। यह वात आज मुझे स्पष्ट विदित हो रही है। पर उस समय मै उस जीवनका महत्त्व बहुत कम समझे हुए थी। इसलिये राजूकी साम- सयालीसे सतुष्ट नहीं थी। पर लालटेनसे हमें रास्ता दिखानेवाली वह प्यारी लड़की ! राजू उसे किस दृष्टिमे देखता है ? यह नई भावना मेरे मनमें समाई । मै जानती थी कि मेरी सगिनी और सहपाठिनी जितनी भी लडकियोंसे उसका परिचय था उनके साथ वह अच्छी तरहसे बातें तक न करता था । पर इस दीन-हीन लडकीका उसपर इतना अधिकार कैसे हो गया ! यह कितने आश्चर्यकी बात थी, इसे केवल मै ही समझ सकती हूँ। और मातृगर्नसे गभीर, सतानकी वेदनासे परिलात वह तेजोमयी युनती ! सत्रह वर्पकी अवस्थामें राजू उसके हृदयकी महत्तासे परिचित हो गया था और सतानका स्नेह भी इस छोटी अस्थामें उसके हृदयमें मैं , घृणामयी। ९४ अस्फुट रूपसे परिस्फुट होने लगा था। अन्यथा क्यों वह इस युनती माताके हृदयकी वेदनाको अपनी श्रद्धाजलि प्रदान कर रहा था ! पर यद्यपि स्त्री थी, तथापि उन छोटे-छोटे बच्चोंको देखकर मेरे हृदयमें नामको भी चेतना उत्पन्न नहीं हुई। यह कितने बड़े आश्चर्यकी बात थी। 'सेल्यूलाइड' या गटा पार्चाकी बनी हुई एक खूबसूरत गुडियाको मैं जी-जानसे प्यार कर सकती थी, पर दरिद्रकी सतान उन दो बच्चों के लिये मेरे मनमें असह्य घृणाका भाव उत्पन्न हो रहा था। एक ही ढगसे, एक ही घरमें पले हुए हम दो भाई-बह्नमें इतना बड़ा प्रभेद या । आजका अद्भुत दृश्य देखकर मै अपने सीमाबद्ध हृदयकी दुर्बलताओं- पर अच्छी तरहसे विचार करना चाहती थी, पर प्रबल चेष्टा करनेपर भी अपने अतस्तलकी मूलगत जडताके कारण या अन्य किसी कारणसे उन्हीं दुर्वलताओंको हृदयमें इस तरह जकडे रहनेकी इच्छा होती थीं मानो वे मेरी जन्म-जन्मकी प्यारी सहचरियाँ थीं । सोचते सोचते मै उकता गई और दिमागमें ज़ोर पडनेके कारण सिरमें दर्द होने लगा । गाडीके घोड़े बड़ी तेजीसे दौड रहे थे । एक लवी सॉस लेकर मैंने लीलाके मुंहपर दृष्टि डाली । कैसा भारहीन, अनु- भूतिहीन, चितारहित, आमोद-प्रिय वह मुँह था ! जिस बालिकाने अपना स्नेहाधिकार प्रकट करके राजूसे कहा था कि कल तुम्हें जरूर आना होगा उसके हृदयकी सयत तीव्रतासे क्या इस सरल-प्रकृति और बोदी लड़कीके निस्तेज चाचल्यकी कुछ भी तुलना हो सकती थी ? मैं मनमें कहने लगी- हाय प्यारी वहन ! राजू हम दोनों बहनोंको कर्त्तव्यके काँटोसे कंटकिन जिस गहन मार्गकी और ढकेलना चाहता है उसमें चलनेका साहस और शक्ति हम कहाँसे लावें !"

९५ घृणामयी। घर आकर जब मैंने विलासिताके नाना उपकरणोंसे सुसज्जित अपने कमरेमें प्रवेश किया तो ऐसा जान पड़ा जैसे किसी अपरिचित दूरस्थित देशसे लौटकर मैं अपनी दुनिया में आ गई है। दरिद्रता, दुख और शोककी जो अप्रिय भापना मेरे मनमें गड गई थी वह किसी मायाके वलसे तिरोहित हो गई और काल्पनिक आनदकी नई नई उमगें मेरे मनमें हिलोरें लेने लगी । नाटकके खेलके समय और उसके बाद जिस अनोखे नशेने मुझे धर दबाया था उसकी मधुर और उत्तेजक स्मृति फिर धीरे-धीरे जागरित होने लगी। फिर-से डाक्टर साहवकी रसी- ली, मद-भरी आँखें मेरे मानसमे झिलमिलाने लगी। मैं अपनी कल्पना और वासनासे स्वय झूमने लगी और मद-विहल होकर मधुर मूछकि पिलाससे पलंगपर लेट गई। ऑखें बद करके अर्थहीन स्वप्नोंकी तरगोंमें बहने लगी। " अचानक वाहर दरसाजेसे जादूसे भरा हुआ वही चिर-परिचित कठ सुनाई दिया- क्या मुझे भीतर प्रवेश करनेकी आज्ञा है " भीतर प्रवेश करनेकी आज्ञा 2 प्राणप्यारे ! तुम्हें क्या खबर नहीं कि मेरे भीतर तुम कबसे प्रवेश किए, अधिकार जमाए बैठे हो ! एक पलके लिये भी मैं तुम्हें हटने नहीं देती । जान-बूझकर फिर क्यों अनजान बनते हो? मै उठ बैठी और बोली- आइए कृपानिधान ! तशरीफ लाइए ! यह नया ढग कबसे सीखा है ?" मादक स्वप्नोंके रगसे रंगे हुए मेरे मुखमें शायद आज कुछ विशेषता थी। डाक्टर साहब जब भीतर आए तो मुझे देखकर उनका चेहरा भी तमतमाने लगा।

मेरी राय ? वर्णन सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। इस हालतमें घृणामयी। जब वह बैठ गए तो मैंने कहा--" आज यह देर कैसी !" बोले----" आज कई मरीजोंको देखना था। अभी जिस मरीजको देखकर मैं आ रहा हूँ उसकी हालत ऐसी खराब है कि बिलकुल ' हॉरि- वल' समझिए । मै तुमसे उसका कुछ वर्णन नहीं कर सकता। तमाम वदनमें फोड़े हो गए हैं, चेहरा इतना सुस्त हो गया है कि मासका कहीं पता नहीं चलता, फोड़ोंसे मवाद निकलता जाता है जिसके सबब वदवूसे वहॉपर मिनट भर नहीं रहा जाता, इधर-उधर करवटें नहीं बदल सकता, मलमूत्रके लिये उठ नहीं सकता, तिसपर मजा यह कि वह खानेके लिये रुचि वतलाता है, पर हजम नहीं कर सकता। घरवाले उसकी टहल करते-करते अब थककर उकता गए है। सब मनमें यही सोच रहे हैं कि उसके प्राण-पखेरू उड जाये तो तकलीफसे बचे। पर यह बात कोई मुहर्स नहीं निकाल सकता। मेरी समझमें नहीं आता कि उसके लिये क्या उपाय किया जाय । ऐसी हालतमें कोई दवा क्या असर कर सकती है ! उसका कराहना ऐसा भयकर मालूम होता है कि आतक छा जाता है । उचित तो यह होता कि जहर देकर वह मार डाला जाता । पर मनमें झिझक पैदा होती है । तुम्हारी क्या राय है ?" मैं राय क्या देती । तत्काल मेरे मनमें यह आशका उत्पन्न हुई कि सब मनुष्योंके शरीरकी बनावट तो एक-सी ही होती है। जब किसी कारणसे इसी व्यक्तिकी तरह मुझे भी यही रोग हो गया तव मेरी क्या गति होगी' इस समय तो मैं अपने रूपके धमडके मारे जमीनपर पाँव नहीं रखती। सौगमें एसेंस छिडककर सोनेमें सुगध उत्पन्न कर रही हूँ। जवानीकी उमंगमें आकर पुस्पोंको अपने वशमें करनेका भी दाता रखती हूँ। पर

-
करता है।
T
मुस्कुराने लगी। हायरी मन्वन्द
सराप है । जरा मेरी नादा-
डाक्टर साहब के मरन
सकती। पर उन्होंने एक
पकड़ लिया और शाtrittitively
शरीरमें रोमप और
Twitter
स्थानपर अपनी ।
जब, ईश्वर न करे, पादक :ter ki
मनाद निक्लनेके मान से
निरतिशय पीड़ाने में बाराहने -
भगवान ! मनुष्यत्र शु...
सुंदर बनाया था तो कोइ..
सोचते-सोचते मेरा मान
अनुभव करने लगी जैसे अE
उत्पन्न होने लगे है । यह "
लोमहर्षक वर्णन आपने मुनर: ,
है। कहीं मुझे भी यह ata
मेरी बात सुनकर दाय,
मेरा भय कुछ दूर हुआ | Athar
टाइम' देने का
मैंने कहा-
न
2
रही है।" यह कहकर

,
,
देखकर और दिलको लुभानेवाला गाना सुनकर मैं कल रातसे आपेमें
वनके सामने भाईसे इस तरहकी बातें करना मार्जित रुचिके कितने
घृणामयी।
मिनट-भर देखकर वोले" आपका पल्स-बीट' बिलकुल नॉर्म
है । कह नहीं सकता कि किस वजहसे तुम्हारी तबियत खराब हो गई।
मैंने कहा-" क्या बतलाऊँ डाक्टर साहब, मै भी ठीक-ठीक नहीं
वतला सकती कि कैसे मेरी तबियत खराब हो गई।
राजूने आकर बडे जोरसे व्यंगके रूपमें कहा- आदाबअर्ड,
डाक्टर साहब । मिजाज-शरीफ ?"
मैंने सोचा कि यदि नाडी देखनेके समय राजू आया होता तो कैसा
अधेर न हो गया होता | फिर सोचा--" राजू क्या हररोज हम दोनोंकी
घातमें बैठा रहता है ? ठीक नियत समयपर क्यों मेरे कमरेमें पहुँच
डाक्टर साहबने उत्तर दिया--" अरे साहब, मिजान-शरीफके बाबत
कुछ पूछिए मत | कल लडकियोंका जो नाटक देखा, उसके कारण
मिज़ाजकी हालत कुछ अजीब हो गई है।"
"क्यों साहब, हुआ क्या ?"
क्या बतलाऊँ, नाजनीन परियोंका नज्ञाकतसे भरा हुआ नाच
नहीं हूँ। तुमने ऐसा अच्छा मौका हाथसे जाने दिया ।"
मैंने साफ देखा कि असह्य लज्जासे राजूका सारा मुंह रंग गया।
विरुद्ध था, यह मोटी बात डाक्टर साहबकी बुद्धिमें नहीं समाई । और
वह भाई भी राजूझी प्रकृतिका ! क्रोध और भयके कारण मेरा दिल
जोरोंसे धड़कने लगा।
नौकरने आकर कहा-
खाना तैयार है।
जाता है ?"
।
.

घृणामयी।
हम लोग इस विकट सकटमय स्थितिसे बच गए । मैंने कहा-
" चलिए डाक्टर साहब, आज आपको हमारे ही साथ खाना होगा।"
बिना किसी एतराजके यह बोले-" अच्छी बात है।"
-
१२
डाइनिंग टेबिलमें अम्मा और काका हमारे इंतजारमें बैठे थे।
'डाक्टर साहबको देखकर अम्माँ उछल पड़ी । पारस्परिक
अभिवादनके बाद अम्मॉने कहा-
" आज बहुत दिनोंके बाद आपके
साथ खानेका सुअवसर प्राप्त हुआ।" सभ्य लो!के साथ वोटनेमें अम्माँ
शुद्ध संस्कृतके शब्दोंका प्रयोग करना पसद करती थीं, यद्यपि उन्हें
संस्कृतका बिलकुल भी वोध नहीं था।
/ राजू हमारे साथ नहीं आया था । नौकरके आनेपर काकाने कहा-
,
--
" रजनको बुलाओ।"
नौकरके चले जानेपर काकाने डाक्टर साहबसे पूछा--" कहिए, कल
रातका 'प्ले' कैसा रहा ? आपके पसद आया या नहीं है"
उत्तरमें डाक्टर साहब मधुर लाजके साथ मुस्कुराए, फिर बोले-
साहब, सच बात तो यह है कि लडकियाँ बिना लड़कोंकी सहायताके
ऐसे कामोंमें कभी सफल नहीं हो सकतीं। हो, एक वात वहाँ जरूर
देखने लायक थी। लड़कोंको स्त्रियोंका पार्ट खेलते मैंने अक्सर देखा है।
पर कल जब मैंने लड़कियोंको पुरमोंका पार्ट खेलते देखा तो यह नई
वात मुझे बहुत पसद आई । लड़कियोंकी यह चेष्टा सराहनीय यो।"
काका बोल उठे-"हॉरिखुल !"
हम सब चौंक पड़े।

घृणामयी। १०० डाक्टर साहबने पूछा-"क्यों साहय " "जो लड़की मर्द बनकर स्टेजपर खडी हो सकती है, वह क्या नहीं कर सकती ! का न करइ अबला प्रबल " मुझे और अम्माको हँसी आ गई, पर डाक्टर साहबका मुंह गीर हो आया । बोले-" आपका यह 'सेंटिमेंट' न्यायसगत नहीं कहा जा सकता। जब लडके स्त्रियोंका पार्ट खेल सकते हैं तो लड़कियोंको क्या पुरुषोंका पार्ट खेलनेका अधिकार नहीं है ? क्यों इसे आप इतना भारी अपराध समझते हैं " काकाका स्वभाव था कि वह अपनी किसी भी वातका विरोध नहीं सह सकते थे। अपनी हठ और अकड़बाजीके लिये वह प्रसिद्ध ये उनकी आँखोंसे चिनगारियाँ निकलने लगीं। शेरकी तरह गरजक बोले---" सेंटिमेंट ? आप सेंटिमेंटको क्यों इतना महत्वहीन समझते हैं - युक्ति ही क्या ससारमें सब कुछ है ? आपको खबर नहीं कि सेंटिमेंट ही आधारपर सारी सृष्टि स्थित है। युक्तिसे साख्यिक लोग यह सिद्ध कर दिखाते हैं कि नारी केवल अस्थि, मास, मेद, मज्जा और रक्तक समष्टि है, तब फिर क्यों लोग उसके वशीभूत होते हैं ? कारण स्प ही यह है कि पुरुष अपने हृदयमें किसी सेंटिमेंटकी प्रेरणासे नारी आत्मिक चैतन्यका अनुभव करता है-यह युक्तिद्वारा उसके शरीरले प्रत्येक अवयवका विश्लेषण नहीं करना चाहता । यही बात दूसरे सेंटि- भेंटोंके सवधमें भी कही जा सकती है। शील, सभ्रम, लज्जा, गाीर्य- ये स्त्रीके प्रधान गुण माने जाते है। सिर्फ हमारे ही देशमें नहीं, ससा रके सभी सभ्य देशोंका यह हाल है। इन्हीं गुणों के कारण पुरुष स्त्रीका काय है। थिओरीमें स्त्री भले ही पुरुषको देता माने, पर उसके देवत्वयं - - , १०१ घृणामयी। वास्तविक कल्पना ही वह नहीं कर सकती क्यों नहीं कर सकती, इस बातपर मैं इस समय वहस नहीं करना चाहता । पर पुरुपके हृदयमें स्त्रीके देवीत्वका आदर्श अच्छी तरहसे जम गया है, इसलिये वह चाहे स्त्रीके ऊपर कैसा ही भयकर अत्याचार करे, पर फिर भी स्त्रीवके प्रति उसके हृदयमें अकपट भक्ति और प्रगाढ़ श्रद्धा पाई जाती है। जिन गुणोंके कारण वह स्त्रीके देवीत्वका कायल है, पुरुषका अनुकरण करते ही उनका लोप हो जाता है। इसी लिये मैं कहता था कि जो स्त्री मर्द वनकर स्टेजपर खड़ी हो सकती है और इस बातपर अपना गौरव समझती है, उसमें स्त्रीका सर्वश्रेष्ठ गुण-~मातृहृदयका सुमधुर, सरस गाभीर्य-- कभी नहीं पनप सकता। इसी तरह राजनीतिक या सामाजिक स्टेजोपर मर्दोकी करतूत दिखलानेवाली स्त्री भी माता वननेके योग्य नहीं है।" अंतिम आक्षेप स्पष्ट ही अम्मॅकि प्रति था। काकाकी उत्तेजना देख- कर और उनकी चुभती हुई बातें सुनकर हम लोग सत्र सन्न रह गए। अम्मा यद्यपि स्पष्टत अपनेको अपमानित समझ रही थी, तथापि काका- का रुख देखकर कुछ उत्तर देनेका साहस उन्हें नहीं होता था । डाक्टर साहब भी घबराए हुए जान पड़ते थे । आतरिक दु खसे काकाने ये सब बातें कही थी, इसलिये तर्कद्वारा उनका विरोध करनेकी शक्ति किसीमें नहीं थी। नौकरने कहा- "छोटे वाबू तबियत सराब बतलाते हैवानेको नहीं आना चाहते।" वाद-निनादमें पड़े रहनेके कारण राजूका खयाल ही किसीको नहीं था। नौकर शायद जाव लाकर कुछ देरसे खड़ा था। इस समय मौका पाकर उसने राजूकी याद दिलाई। मैं तत्काल समझ गई कि डाक्टर तबियत - इनका मर्ज़ भी तो साहब, देसी है । जरा-जरा-सी बातमें इनका घृणामयी। १०२ साहबको भोजनके लिये आमत्रित करने के कारण ही वह रुष्ट हो गया है और तबियतका खराब होना केवल एक बहाना है। अम्मा और काका बड़े चितित हुए। काकाने कहा- खराव है ! बात क्या है ? कुछ भी हो, डाक्टर साहब यहाँ मौजूद हैं। चलिए डाक्टर साहब, जरा उसे देख तो लीजिए।" यह कहकर काका उठनेको तैयार हुए। डाक्टर साहबने कहा- वात कुछ समझमें नहीं आती। अभी तक तो वह मेरे साथ बातें कर रहे थे। मुझसे उन्होंने कुछ नहीं कहा।" इतनेमें राजू वहाँ स्वय आ पहुँचा और बोला-'मैं पेटमें कुछ दर्द-सा मालूम कर रहा हूँ, इसलिये इस वक्त खाना नहीं चाहता । आप लोग खाइए । मेरी चिंता न कीजिए।" यह कहकर वह उलटे पॉर लौट चला । डाक्टर साहब भी शायद अब उसके बहानेका कारण थोड़ा-बहुत समझ गए थे। इसलिये मुस्लु. राते हुए काकासे वोले-" इन्हें सोनेके पहले गरम पानीके साथ एक गोली हिंगाष्टक चूर्णकी दीजिएगा।" हम सब लोग खिलखिलाकर हंस पड़े। काकाने कहा- साहब, वाह ! खुब ! आप तो आयुर्वेदमें भी पारगत हो गए हैं । पिला- यती दवाका पानी छोड़कर आप हिंगाष्टक प्रेस्क्राइब करने लगे। खूब!" - वाह , मिजाज बिगड जाता है, और मिजाज बिगडनेसे पेटमें दर्द होगा, यह तो मानी हुई बात है।" डाक्टर साहबका यह आक्षेप अत्यत क्ष था। कह नहीं सकती कि राज्के कानोंमें यह बात गई या नहीं । पर यह मेरे कानोंमें भी खटकने लगी।

१०३ घृणामयी। १३ कुछ छ भी हो, राजूकी मानसिक प्रत्ति देखकर मैं हैरान थी। मै सोचने लगी-"क्यों वह डाक्टर साहबको देखकर इस कदर जल्ता है ।" उसका आजका व्यवहार किसी तरह सभ्य और सुशिष्ट नहीं कहा जा सकता था। मेरे मनमें विद्रोहका भार समा गया। अपने सनकी और युक्तिहीन भाईपर बड़ा क्रोध आया। मैंने सोचा-"पर्दानशीन औरतोंको पर-पुरयोंके साथ बातें करनेका अधिकार नहीं होता। इस सत्यनाशी प्रथाके विरुद्ध अब देश-भरमें आदोलन मच रहा है । पर हमारे घरमें स्त्री-स्वाधीनता पूर्णरूपमें वर्तमान होनेपर भी राजूको यह बात वेतरह अखरती है कि मैं डाक्टर साहबके साथ वेधड़क बातें करती है। यह कैसा अन्याय है ! नहीं, इस अन्यायका निरोध करना ही होगा । राजूका लिहाज करने और उससे डरनेसे काम नहीं चलेगा!" सोचते- सोचते क्रोधके कारण मेरा म्वून खौलने लगा। मैं दाँतोंको पीसकर . रह गई। - खा-पीकर मै डाक्टर साहबके साथ अपने कमरेमें आई । डाक्टर साहबने प्रस्ताव किया कि आज पैलेस थिएटर में एक विलकुल नया और सनसनी फैलानेवाला फिल्म दिखाया जा रहा है, वहाँ चलना चाहिए। में राजूके अन्यायका बदला लेना चाहती थी। इस लिये प्रतिहिंसाके भावसे प्रेरित होकर तत्काल सम्मत हो गई। जिस तरहसे सजू अधिक- अब मैं वही उपाय चाहती थी। पिना किसीकी आज्ञा लिए, गुप्त रूपसे शोफरको सूचित करके हम दोनों निकल पडे । मैं बाहरसे गरम कोट पहन लाई थी और गलेमें मुलायम पशम भी डाल लाई थी। पर फिर भी जाड़ेसे शरीर काँप रहा था। कह नहीं सकती अधिक जले, सर्वो- - घृणामयी। १०४ कि मेरा जाड़ा कितना कल्पित था और कितना वास्तविक । आज मैंने जो असीम दुस्साहसका काम किया था, उसके कारण भी शायद गर्ने कँपकँपी मालूम होती थी। कुछ भी हो, मैं मोटरमें बैठे-बैठे डाक्टर साहबके कधेपर हाथ डालकर उनके गलेसे लिपट गई। अभिसारकी इस निस्तब्ध, अधकारमयी रात्रिमें मेरा प्रेमिक मुझे मिना ढूंदे मिल गया था, उसे मैं कैसे छोड सकती थी, वहुत देर तक हम दोनों मत्र-विह्वलकी तरह स्तब्ध होकर बैठे रहे। अचानक डाक्टर साहबने अत्यत धीमे स्वरसे मेरे कानमें कहा- लज्जा, क्या सिनेमामें जाना जरूरी है ?" तब कहाँ जाओगे" प्रश्न करते समय मेरा कलेजा धड़क रहा था । डाक्टर साहब वोले-" चलो, लौट चलें।" मैं गुस्सेसे कॉपने लगी। बोली-" तब क्यों मुझे इतनी दूर लाए" अच्छा सिनेमामें नहीं, किसी दूसरी जगह चलें कहाँ " डाक्टर साहब जरा हिचकिचाए । उनकी हिचकिचाहट देखकर मैं किसी अज्ञात आशकासे सिहर गई। मेरे दिलकी धड़कन बढने लगी। कुछ देर बाद वह बोले-.--" अच्छा चलो, सिनेमामें ही चलें ।" डाक्टर साहबकी इन संशय और द्विविधासे भरी बातोंको सुनकर वैतरह घबरा गई और टरकै कारण मैंने और मी ज्यादा मजबूतीसे उन्हें जकड़ लिया। सिनेमा हॉटमें पहुँचनेपर विद्युद्दीप्त प्रकाशसे मेरा भय कुछ दूर हुआ। रागको मेरे प्रणप-पटायनका समाचार विदित हुआ या नहीं, यह बात । 2" " . मैं - मैं नहीं रह गई। डालना पसद नहीं करते थे। पर राजू। यह चाहे प्रत्यक्षमें इस कार्य में घृणामयी। सोच-सोचकर मेरे शरीरमें लोमहर्प उत्पन्न हो रहा था-कह नहीं सकती कि यह लोमहर्ष भयके कारण था या प्रतिहिंसा-जनित आनदके कारण। पर फिर भी राजूके दिलकी जलनकी कल्पनासे मेरे दिलकी हालत अजीब होती जाती थी। भाईके प्रति ऐसी उत्कट प्रतिहिं- साका भाव किसी वहनके हृदयमें कभी उत्पन्न हुआ है या नहीं, जानती। मैंने अपने मनमें कहा--"पिनाह होनेके बाद यदि मैं किसी पर-पुरुपके प्रति आसक्त होती तो राजूका यह दुर्भाप मैं किमी तरह सह लेती। पर अविवाहित अवस्थामें जब मैं किसी पुरुषको चाहती हूँ-" मैं अधिक सोच न सकी। फिर एक बार कुढकर दाँतोंको पीसकर पर मेरे विवाहके सबधमें काका और अम्माँके मनमें क्यों चिन्ता उत्पन्न नहीं होती, यह सोचकर मैं हैरान थी। इसमें सदेह नहीं कि मुझे अब अपने विवाहके सबधमें कोई चिन्ता नहीं थी। क्योंकि मैंने अपने मनमें यह निश्चय कर लिया था कि विवाह करूँगी तो डाक्टर साहबके ही साथ काँगी, नहीं तो विप पीकर मर जाऊँगी। पर काका और अम्मा क्या सोच रहे थे । वे क्या मेरे मनकी हालतसे परिचित नहीं थे ? यह हो नहीं सकता था। मेरी मानसिक स्थिति स्पष्ट थी। यह किसीसे छिपी नहीं रह सकती थी । पर क्या वे मेरे इस प्रणयका अनुमोदन करते थे। मुझे इस समधमें केवल अम्माँका भरोसा था। क्योंकि मैं जानती थी कि वह डाक्टर साबको स्नेहकी दृष्टिसे देखती हैं । और काका चाहे डाक्टर साहबको न चाहें, पर अम्मकि और मेरे एकमत होनेसे वह कभी बीचमें निन्न नहीं डालेंगे, यह बात भी मैं अच्छी तरहसे जानती थी । क्योंकि मुझे माझ्म था कि वह कभी किसीकी मानसिक स्वाधीनतामें दवाव य आती थीं। पर आज इस उद्दाम, चचल प्रेमके उन्मुक्त, बधनहीन प्रवाहमे घृणामयी। १०६ बाधा न डाले, पर उसका दुर्भाव में जीवन-भर कैसे सहन करूँगी है। फिर उसी अप्रिय भावनासे मेरे दिलमें जलन पैदा होने लगी और मुझे आकाशको फाडने और धरतीको चीरनेकी इच्छा हुई। चित्र-लीला आरम हो गई थी। अमेरिकन फिल्म था । डाक्टर 'साहबने कहा था कि सनसनी पैदा करनेवाला फिल्म है । पर मैं सब फिल्मोंको एक-सा समझती हूँ। युवक-युवतियोंका वही बाधा- हीन स्वच्छद विलास, प्रेमका वही आलस्य और अफीमका-सा नशा, पाश्चात्य-जीवनकी वही उन्मत्त लास्य-लीला। नित्य यही सब बातें देखने मैंने को सशयहीन होकर वह जानेकी उत्कट इच्छा मेरे मनमें उत्पन्न हुई। मैंने सोचा- अगर मेरा जन्म योरप या अमेरिकामें होता तो क्या वहे. मेरा भाई कभी मेरे स्वच्छद प्रेममें वाधा पहुंचाता तमाशा खतम होने पर जब हम दोनों लौट चले तो मेरा चित जडता और अप्रसादसे आच्छन्न हो गया था । घर पहुँचने पर डाक्टर साहबसे कहा- " आज आपको यहीं रहना होगा। मुझे अके डर लगता है। परसों तक लीला मेरे साथ सोती थी, पर नहीं है। आजकी रात हम दोनोंको जागरणमें बितानी होगी। ग मारते हुए वैठे रहना होगा। पर पिछली रात नाटक देखनेमें जगे रहनेके कारण मेरी आँखों नींदका बड़ा प्रकोप हो रहा था और आँखें झपती जाती थीं । डाक्टर साहन बोले कल रातके जागरणसे तुम्हारी आँखें ला हो गई है और इप रही हैं। अगर आज रात भी जगे रहना होगा वड़ी आफत होगी।" आज “ १०७ घृणामयी। मैं वच्चोंकी तरह जिद करते हुए बोली-" नहीं, मुझे डर लगता है, मैं किसी तरह यहाँ अकेली नहीं रह सकती ।" डाक्टर साहबने कहा "अच्छी बात है। मुझे कोई उन्न नहीं । मैं तुम्हारे ही लिये कहता था ।" मै चारपाईपर लेट गई और डाक्टर साहब भी मेरी ओर मुंह करके पासनाले एक कौचपर लेट गए। प्रेमकी इस मोहोत्पादक स्तब्ध रात्रिमें हम दो प्रणयी उस निर्जन कमरेमें, उस आलस्यविलास-मय तद्रावस्थामे, बिना किसी बापा या स्कापटके निर्मुक्त भारसे अवस्थित थे। पर एक प्रकारकी अनोखी धुकधुकीसे क्यों मेरा हृदय आदोलित हो रहा था ? क्या डाक्टर साहबका भी यही हाल था ? उस समय मैंने अपनी उस ज्यादतीपर कुछ भी विचार नहीं किया। पर आज जब अपने उस दुस्साहसकी बात याद आती है तो आतकसे कलेजा कॉप उठता है। न जाने किस देवताकी मगलेच्छासे मै उस रात वच गई । नहीं तो में जिस घोर अनर्थकी सीमा-रेखाके पास पहुंच गई थी, उसकी कल्पना भी आज नहीं कर सकती। मैंने कहा था कि बैठे-बैठे गप्पें मारेंगे। पर गप्पें मारनेकी शक्ति किसीमें नहीं थी। दोनों लालसा, मोह, आलस्य और तदासे आच्छन्न होनेके कारण ऐसे परास्त और दुर्बल होकर पड़े हुए थे कि किती । बातकी सुध नहीं थी। इच्छा न होने पर भी लेटे-लेटे मेरी आँखें धीरे-धीरे लग गई और में कुछ ही देरमें घोर निद्रामें अभिभूत हो गई। जब आँख खुली तो देखा कि डाक्टर साहब वहाँ नहीं है । हाथमें बैंधी हुई घड़ीमें समय देखने पर माइम हुआ कि तीन बज चुके ओंने मुझे आ घेरा । मैंने सोचा--स्त्रीका जीवन क्या केवल शारिरिक साथ वहन करती चली जाती। पर नारी-हृदयमें दृढ़ता और सहनशीलता- घृणामयी। १०८ हैं। जाते वक्त डाक्टर साहब बाहरकी तरफका किवाड़ बंद कर गए थे, पर फिर भी जाड़ा मालूम हो रहा था। डर और जाड़ेसे सिरसे पैर तक काँपते हुए मैंने बिना कपड़े उतारे गरम कोटके ऊपर दो कवल ओढ़ लिए और मुंह भी ढॉप लिया। हाथकी घडी भी नहीं उतारी। कहीं कोई दुष्ट प्रेतात्मा किसी क्षुद्र छिद्रद्वारा प्रवेश करके मेरा गला न दबा बैठे, इस भयसे मैंने कबलोंको चारों तरफसे अच्छी तरह समेटकर शरीरके नीचे दवा लिया और पार न पसारकर ऊपरको समेट लिए । भयके कारण मेरी निद्रा-जडित ऑखें कुछ ही देरमें सचेत और जागरित हो गई। धीरे-धीरे जब भय कुछ कम हुआ तो अपने संवधर्म नाना चिन्ता- और मानसिक दुर्बलताओंमें ही बीतनेके लिये है ? उसका क्या और कोई उद्देश्य नहीं है ? कब तक मुझे पुरुषका सहारा मिलता रहेगा और कब तक मैं दूसरोंकी सहायताके भरोसे अपना जीवन बिताऊँगी। भगवान ! क्यों तुमने स्त्री-जातिको इतना अशक्त, दुर्बल और सुकुमार बनाकर पैदा किया है !" मैं अच्छी तरहसे जानती थी कि मेरा यह शारीरिक भय मेरी आत्मिक दुर्वलताका ही दूसरा स्वरूप है। यदि मेरी आत्मामें दृढ़ता, सहनशीलताके भाव वर्तमान होते तो मैं किसी भी बाहरी भयसे कभी भीत न होती। अपने अबलापनसे मन-ही-मन गर्वित होकर डाक्टर साहबकी सरक्षकताका आनद लूटनेकी इच्छा कभी न करती। अकेले, शात और सयत मावसे, अपने भीतरकी समस्त यातनाओंको नीरवताके काठिन्य और का होना एक प्रकारसे असभव ही है। ये ही गुण ऐसे हैं जो उसके चेहरेकी रगत उड़ गई। फिर भी अपनेको मैंने किसी तरह सँभाला और १०९ घृणामयी। जीवनकी सार्थकताके लिये परमावश्यक है और इन्हीं गुणोंका उसमें अमान पाया जाता है। भाग्य-चकका परिहास इसीको कहते हैं ! प्राय. दो घटे तक दुख, शोक, अवसाद और भ्राति-मिश्रित इसी प्रकारकी भावनाओंमें मैं निमग्न रही। फिर धीरे-धीरे मेरी आँखें झपने लगी और मैं अचेत होकर सो गई । जब ओख खुली तो सूरज बहुत ऊपर चढ़ चुका था। एक दिन कॉलेजमें मेरी बाल्य-सगिनी और सहपाठिनी कमलिनी- ने मुझसे कहा--" कल तेरे डाक्टर साहबसे मेरा परिचय हो गया है। हमारे अगरेजीके प्रोफेसर साहबके साथ कल शाम अचानक वह मेरे कमरेमें घुस पडे । उस समय धरपर कोई नहीं था। मैं अँगरेजीके 'टेस्ट'की तैयारीमें लगी थी। मै तो इस 'सरप्राइज विजिट से चौंक पडी। प्रोफेसर साहबने परिचय कराया ! डाक्टर साहब बड़े भनेके आदमी जान पड़े । गजवकी बातें करते हैं । मुझसे कहते थे कि अपने कॉलेजकी सव लड़कियोंसे मेरा परिचय करा दो ! वाप रे बाप ! मैं तो घबरा गई। यह उस दिनके नाटकका मजा । मैं तो पहले ही कहती थी।" मेरा कलेजा धक-से रह गया । मुझसे कुछ कहते न बन पडा और मेरे हाथकी किताबसे उसे मारकर कहा--" चल हट ! ऐसी बातें मुझसे करेगी तो मुँह झुलस दूंगी। मुझे न डाक्टर साहबसे मतलब है, न तुझसे।"

लेंगी। पर उसका यह परिहास मेरे लिये असह्य था। कुछ भी हो, उसके सामने मैं अपने हृदयकी तात्कालिक दुर्दशा किसी प्रकार प्रकट नहीं घृणामयी। ११० वह निष्टुरताके साथ मुस्कुराती हुई बोली- क्या सच कहती है । तुझे डाक्टर साहबसे कुछ भी मतलब नहीं है। अच्छी बात है । देख यह कहकर वह जाने लगी। मेरे हृदयमें ईर्ष्याकी आग धधकने लगी थी और इसी आगके कारण कमलिनीसे कई बातें पूछनेको जी तड़फडा रहा था। इसलिये उसे जाते देखकर मैंने कहा-" अरी पगली, भगती कहाँको है ! जरा एक चात सुनेगी भी या नहीं ?" लौटकर उसने पूछा--" क्या बात !" " यही कि तू कब मरेगी ? " "जब डाक्टर साहबके साथ मेरा व्याह होगा। यह कहकर वह निर्लज्जताके साथ खिलखिलाकर हँस पड़ी। करना चाहती थी । इसलिये बड़े कष्टके साथ धीरज बाँधकर अपने मार्मिक दुखको हँसीमें उडानेका भाव दिखलाकर मैंने कहा- पर तेरे साथ व्याह होगा कैसे ? यह तो कॉलेजकी सभी लड़कियों को अपने जादूकी डोरीमें एक साथ बॉधनेका इरादा किए बैठे हैं।" " हॉ, यह बात तो जरूर है ! " कहकर वह फिर एक बार खिल- खिला पडी। उस दिन कॉलेजके लेकचरमें मेरा जी बिलकुल नहीं लगा। जब घर आई तो मनमें वडी वेकली समाई हुई थी। अचानक पख छिन है जानेपर जिम प्रकार आकाशमें उडता हुआ पक्षी शून्यमें कहीं को सहारा न पाकर फडफडाता है, उसी तरह मेरा मन भी बेचैनीके सब . .

१११ घृणामयी। छटपटाने लगा। आज कमलिनीकी तरह सारा ससार मेरा परिहास कर रहा था। प्रोफेसर किशोरीमोहनका साथ इधर दो-ढाई महीनोंसे डाक्टर साहबने छोड़ दिया था । कम-से-कम हमारे यहाँ डाक्टर साहब पहलेकी तरह उन्हें लेकर अब नहीं आते थे। कारण मुझे मालूम नहीं था। मेरा ख्याल था कि दोनोंके वीच किसी कारणसे अननन हो गई है। पर आज कमलिनीसे मालूम हुआ कि प्रोफेसर साहबकी सहायतासे डाक्टर साह्न कॉलेजकी सभी लडकियोंसे परिचित होना चाहते हैं। यह समा- "चार बिलकुल अप्रत्याशित था। दुर्बलता ! दुर्बलता ! यह सब मेरे नारी-हृदयकी स्वाभाविक दुर्बलताका ही फल था। क्या अपने हृदयको वज्रसे भी कठोर और पत्थरसे भी दृढ बनानेका कोई उपाय मेरे लिये नहीं था ? मन-ही-मन कहने लगी- 'भगवान् , क्या मैं किसी भी उपायसे संसारके सब स्त्री-पुल्योंकी उपेक्षा करके अकेले अपने वलपर खडी नहीं हो सकती 2 वात-बातमें सशय और भयकी यह धुकधुकी अन किसी तरह सही नहीं जाती !" डाक्टर साहलके इतजार में रहकर मै उनके आने तक किसी तरह अपना समय विताना चाहती थी । एक ताजा अखबार हाथमें लेकर पड़ने लगी। मेरे पास दो-तीन अखबार रोज पहुंच जाते थे, पर मैं कभी जी लगाकर उन्हें नहीं पढ़ सकती थी। ऊपर हेड-लाईन देखकर जो कुछ बातें मादम हो जाती थी उन्हींमें सतुष्ट रहती थी । इधर असहयोग बडा जोर पकड रखा था। नित्य नए-नए उत्साह और नई-नई खरे अखबारोंमें छप रही थीं। पर मुझे अपने आगे ये सब बातें अत्यत तुच्छ जान पड़ती " 2 Y * मिलती है। अखबारोंको तो कॉलम काले करके ग्राहकोंको फुमलानेका धृणामयी। ११२ परामर्श करने, नई-नई 'स्कीमो'को रचने और शहर-शहरमें जाकर सभा- समितियोंमें जोश फैलानेके कारण विलकुल बेफुर्सती रहती थी । अम्म भी अत्यंत उत्साहित होकर स्त्रियोंमें नई 'जागृति' उत्पन्न करनेकी चेष्टामें लगी थीं। पर राजू और मैं इन सब बातोंके प्रति उदासीन थे। मैं इसलिये उदासीन थी कि अपनी ही आमाके तात्कालिक सुख और संतोपकी कल्पनामें मग्न थी । और राजूकी दृष्टि शायद इस वर्तमान कोलाहलके परे जीवन और मृत्युके किसी निगूढ और गभीर उद्देश्यकी ओर लगी हुई थी। एक ही पर्पके भीतर जिस आदोलनका जोश विना किसी फलकी प्राप्तिके ठडा पड गया था उसे कोलाहलके अतिरिक्त और क्या कहा जाय ! कुछ भी हो, नित्यकी तरह आज भी मैं अखबारके हेड-लाईन देख- कर पन्ने उलटती गई । लोगोंका खयाल है कि अखबारोंमें नित्य नई-नई खबरें पढनेको मिलती है । यह कैसी भयकर भूल है, इस बातको बहुत कम लोग समझते है । समारका चक्र कुछ योडे हेर-फेरोंके साथ नित्य एक ही रूपमें चलता जाता है। पर मनुष्य ऐसा अधा है कि वे हेर-फेर उसे नित्य नए जान पड़ते है । आज अमुक स्थानमें हिंदू-मुसलमानोंका दगा हुआ । दो-तीन दिनके बाद फिर पढिए । किसी दूसरे स्थानमें ठीक उसी ढगका झगडा दूसरे रूपमें हो गया। आज अमुक नेताप्रणीने किमी निराट् समामें बड़े जोरदार शब्दोंमें कहा कि हमारे युवकोंको ससारके सब काम छोड़कर देशकी सेवामें लगकर स्वराज्यकी प्राप्तिके डिपे मर मिटना होगा । यही बात सैकडों ऐटफार्मोंसे सैकड़ों नेता नित्य चिटाते जाते हैं और नित्य यही एक ही बात अखबारोंमें पढ़नेको मौका मिल जाता है। पर नेता लोग न माहम क्या आदर्श अपने सामने -ऊँचेपर थी । दक्षिणकी ओर दृष्टि डालनेपर गगा-यमुनाका सगम घृणामयी। रखकर युवकोंको ससारके अन्य सब काम छोड़कर 'देशोद्धारमें टगे रहने- का उपदेश देते हैं । ससारमें विपुल जीवनकी जो धारा अविरल गतिसे प्रवाहित हो रही है उसके सभी वृहत् कर्मोंसे विमुख होनेपर देशोद्धारका अर्थ केवल यही रह जाता है कि शहर-शहर, गाँव-गॉवमें जाकर चदा जमा करो, हैंडविल बाँटो, स्थान-स्थानपर क्रातिके प्लेकार्ड चिपकाओ, फ़ार्मोपर खड़े होओ, कौंसिलोंमें घुसो, अरनबारों में जोरदार टिप्पणियाँ लिखो और बहुत हुआ तो जेल जाओ। ये ही सब बातें नित्य अख- बारोंमें पढनेको मिलती है । वहुत हुआ तो आप यह पढ़ेंगे कि रूसमें क्राति मचनेके कारण जार कल किया गया और सोवियट गवर्नमेंटका अधिकार स्थापित हो गया । कुछ दिनोंके लिये यह खबर नई जान पडती है, पर फिर शासनका वही पुराना नियम जारी हो जाता है, फिर वही कानून, यही जुल्म, युद्ध और प्रतिहिंसाकी वही घातक प्रवृत्ति, वहीं अतराष्ट्रीय कूटनीति । आज भी कोई नई खबर नहीं थी । उठकर मैंने अखबार नीचे पटक दिया और ऊपर छतपर चली गई । चार वज चुके थे । धूप बहुत मीठी जान पडती थी । हमारे विशाल भवनकी यह छत बहुत यहाँसे स्पष्ट दिखलाई देता था। मैं इस सुदर दृश्यको अक्सर देखती थी। आज भी उसी ओर टकटकी बाँधकर खडी रही । सगमका शात, स्थिर और स्निग्ध प्रवाह देखकर मेरे चचल और उत्तेजित हृदयमें एक मीठी और शात उदासी व्याप्त हो गई। अकारण मेरी आँखोंसे आँसू उमड़ चले और हृदयकी चाला धीरे-धीरे बुझने लगी । बहुत देर तक मैं छतपर इधर-उधर टहलती रही । फिर नीचे उनर- कर बगीचे चली आई और फूलोंकी क्यारियोंकी परख करने लगी।

- दिन आपके मरीजोंकी सख्या बढती जाती है | आज कितनी युगतियोंकी घृणामयी। पर वहाँ भी मन नहीं लगा और मैं लौटकर अपने कमरेमें चली आई : सारे शरीरमें यकावट मालूम होती थी, इसलिये पलंगपर लेट गई । सोनेकी चेष्टा करने लगी, पर नींद नहीं आती थी। आखिर डाक्टर साहब आही पहुँचे । मैं उठ बैठी और व्यगने बतौर मैने नीचे झुककर धरती छूकर सलाम किया । बोली- " सैकड़ों परीजादियोंकी गलहियोंसे जकडे रहनेपर भी हुजूर इस बाँदीको नहीं भूले, इसके लिये हुजूरका शुक्रिया अदा करती हूँ। 1" मेरा यह नया ढग देखकर डाक्टर साहब दग रह गए। अन्यत सिस्मित होकर बोले " यह क्या । आज यह क्या अजीव तमाशा देखता हूँ" मैंने कहा-'"डाक्टर साहब, बड़ी खुशीकी बात है कि आजकल दिन- ।। नाडी देखकर आप यहाँ पधारे हैं । घबराकर डाक्टर साहब बोले-.-.-"क्यों, क्यों ! बात क्या है । समझाकर क्यों नहीं कहती " वाह साहब, खुच ! आप इस समय तो ऐसे भलेमानस बने हैं, जैसे कुछ जानते ही नहीं। तुम्हारी कसम, मुझे कुछ नहीं मालूम । सच कहते हो?" " तुम्हें क्या विश्वास नहीं होता ?" अप्छा सच बतलामो, कल कमलिनीके यहाँ गए थे या नहीं !" " ११५ घृणामयी। डाक्टर साहबका चेहरा स्याह हो गया, मुँहपर हमाइयाँ उड़ने लगीं। खीसें निकालकर बोले- गया तो था। पर इसके क्या यह मानी है कि मैं किसी बुरी निगाहसे यहाँ गया था। प्रोफेसर किशोरीमोहन मेरा हाथ पकड़कर वहाँ ले गए थे। अगर यह बात पहलेसे मालूम होती कि यहाँ जाना इतना बड़ा अपराध है, जितना तुम समझे बैठी हो तो हर- गिज न जाता।" डाक्टर साहब अपने गुस्सेको जबरदस्ती पी रहे थे। पर उनके गुस्सेकी परखा न कर मैं अपनी ईर्ष्याकी असह्य आँचसे उन्हें जलाते हुए बोली- "कमलिनीके साथ क्या तुम्हारी कोई खास बात नहीं हुई।" उत्तरमें डाक्टर साहब लापरवाहीकी हँसी हेसे और बोले....." मैं समझ गया हूँ, कमलिनीने तुम्हारा वहम चढ़ानेके लिये कई बातें अपने मनसे गढ़कर कही हैं । मैं इस प्रकारकी वनावटी और झूठी बातोंकी कोई सफाई नहीं देना चाहता । तुम्हारा जी चाहे तो इन बातोंपर विश्वास करो, न चाहे तो न करो।" प्यारे, तुम अगर कृष्णकी तरह सोलह हजार गोपियोंको भी अपने पास रखो, तो भी मैं तुम्हें प्यार करना नहीं छोड़ सकती । तुम्हारी वातोंपर विश्वास कर चाहे न कसैं, इससे मेरे प्रेममें कोई फरक नहीं पड सकता। सिर्फ इतनी ही विनती करती हूँ कि दर्शनकी प्यासी इस दासीको दिनमें एक बार अपना प्यारा मुखडा मैंने मनमें कहा- दिखला दिया करो।" अपना सारा क्रोध भूलकर मैं फिर एक बार उनके गलेसे लिपटनेके लिये लालायित हो उठी। मैंने कहा- " मैं सफाई नहीं चाहती । इन बातोंको लगे आग। पर मेरी मौतके दिन अब नजदीक आ गए हैं । दिन-भर मेरे मनमें डर तत्काल घृणामयी। बना रहता है और रात-भर मै कौंपती रहती हूँ, और नींद नहीं आती र मेरे पीछे या तो कोई भूत लग गया है या कोई खराब बीमारी चिपट- गई है। जल्दी इसका इलाज न होगा तो मैं जरूर मर जाऊँगी ।" मेरी आँखें भर आती थीं। डाक्टर साहब बोले--- भूत-बूत कुछ नहीं, तुम यों ही घबरा उठी हो। तुम्हारे लिये सिर्फ नर्व-टानिक' की जरूरत है। दो दिनमें तुम्हारी यह 'वीकनेस' सब ठीक हो सकती है। 'वाइब्रोना' या 'मेनोला' किसीका भी इस्तेमाल कर सकती हो। 'न्यूरेस्थीनिया' के लिये एक ऐसा टॉनिक मैं वतला सकता हूँ जो अचूक और फलदायक होगा। पर उसका नाम सुनते ही तुम चौंक पड़ोगी, इस लिये साहस नहीं होता।" उत्सुक होकर मैंने कहा- अब तुम्हें बतलाना ही होगा। मेरा जी तलमलाने लगा है।" " पोर्टवाइन ! धीरे-धीरे इसका अभ्यास करनेसे सब किसमकी कम बोरियाँ बहुत जल्दी काफूर हो जायेंगी, मैं दावेके साथ यह बात कह सकता हूँ। सिर्फ सेंटीमेंटको दबानेकी ज़रूरत है ।" टॉनिकका नाम सुनकर मैं वास्तनमें घबरा गई । बोली-" मान चाहती हूँ। मुझे किसी टॉनिककी जरूरत नहीं।" डाक्टर सार्ने कहा- " मैं तो पहले ही यह बात कह चुका था इस प्रकारके वाहियात सेंटीमेंटोंकी वजहसे ही यह देश आज दुर्बल औ नपुसक वना है। पहले हमारे देशमें इन सब बातोंमें स्वाधीनता पाई जाती थी। आयुर्वेदमें कहा गया है कि 'औषधार्थे सुरा पिवेत् । पर आजक सभ्य समाज में टेपरेस' का ढोंग पाया जाता है। मैं कई .

११७ घृणामयी। ऐसे लोगोंको जानता हूँ जो एक-एक बोतल रोज साफ कर जाते हैं, पर बाहर आकर कहते हैं कि हम तो कोई विलायती टॉनिक भी इसलिये नहीं पीते कि उसमें बीस 'पर सेंट' एलकोहल मिला रहता है। यह सब ढोंग नहीं तो क्या है ! मैं तो दो-चार पेग रोज चढ़ा लिया करता हूँ-फॉर हेल्थस सेक । मैं यह बात किसीसे छिपाना नहीं चाहता । तुम्हारे समाजकी कई लेडिया भी तो पार्टियोंमें खुले-खजाने 'ड्रिंक' करती हैं।" मुझे आज तक मालूम नहीं था कि डाक्टर साहब रसायन-विशेषका सेवन करते हैं। मेरे हृदयमें इस 'रसायन' के विरुद्ध जो एक सस्कार (डाक्टर साहब जिसे सेंटीमेंट कह रहे थे) बद्धमूल था, उसपर आघात पहुँचा। कुछ भी हो, डाक्टर साहबकी अतिम वात सत्य थी। जिन सभ्य महिलाओं के समाजमें हम लोगोंको आना-जाना पड़ता था उसमें ऐसी महिलाएं कुछ कम नहीं पाई जाती थीं जो नित्य मद्यका सेवन करती थीं । पर हमारे कुटुबमें इसका उपयोग बिलकुल निषिद्ध था। सभा है, किसी जमानेमें काकाने इसका उपयोग किया हो । पर अब राजूका कट्टर- पन देखकर सबके मनमें इस तरल पदार्थके प्रति उत्कट घृणा उत्पन्न हो गई थी। मैंने कहा- -"मैं समझ गई, तुम कभी मेरे रोगका ठीक-ठीक निदान नहीं कर सकते। सिर्फ एक धुन तुम्हारे मनमें समाई हुई है। वह यह कि तुम हद दर्जे तक मेरा नैतिक पतन देखना चाहते हो। स्त्रियोंकी मानसिक दुर्बलता जितनी बढ़ती जाती है, पुरुषों को उतनी ही अधिक प्रसन्नता होती है। पुरुषोंमें नैतिक दृढ़ता नहीं होती, इसलिये वे इस सवध स्त्रियोंका बढ़प्पन सहन नहीं कर सकते।" मेरी इस बातका कुछ उत्तर न देकर डाक्टर साहब मुस्कुराने लगे।

लिया था। केवल मेरे लिये ही इस कुटुबका जीवन बिलकुल विदेशी
क्षणिक झलक जो मैंने देखी थी, वह फिर मेरे हृदयमें प्रतिबिंवि
घृणामयी।
११८
रातको मैंने लीलाको सोनेके लिये अपने ही कमरेमें बुलाया।
'सोनेके पहले लीलाने कहा- माधवी दीदीके पति सख्त
वीमार हैं।
मैंने आश्चर्यके साथ पूछा--" कौन माधवी दीदी ?"
" वही जिनके यहाँ उस दिन हम लोग गए थे। जिन्होंने भीतरका
दरवाजा खोला था-दीनू और रामूकी अम्माँ। उनके पति देहरादून में
नौकर हैं। वह माधवी दीदीको अपने साथ ले जानेके लिये यहाँ आए थे।
यहाँ आते ही उन्हें न्यूमोनिया हो गया-डबल न्यूमोनिया । आज चार
दिन हुए । आज हालत बहुत खराव है । डाक्टर लोग भी निराश हो
गए हैं। भैया मुझे साथ लेकर आज वहाँ गए थे।
इस दुखी कुटुबके साथ लीलाने भी अपना सबध स्थापित कर
अपरिचित, अज्ञात और विजातीय था। पर आज लीलाकी माध
दीदीके पतिका समाचार सुनकर मेरे हृदयके तलप्रदेशमें सहानुभूतिक
एक सुकुमार वेदना उत्थित होने लगी। उस तेजस्विनी नारीकी
मैंने पूछा-
लीलाने कहा-
होने लगी।
" माधवी दीदी क्या रोती थीं ?"
" रोएगी क्यों नहीं ! भैया उन्हें दिलासा देते थे।
असहाय, अबला नारी-जातिकी जन्म-जन्मातरकी वही प्रकृति--
दुर्वलता ! रोओ, रोओ ! हे नारी ! तुम्हें रोनेके अतिरिक्त और
अधिकार या बट ही ब्रह्माने नहीं दिया है
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वृणामया। लीलाने पूछा--"दीदी, विधाको क्या सचमुच भारी दुरस होता है : माँ-बापके मरनेका दु ख क्या पतिके मरनेके दु खसे बड़ा नहीं होता" इस अवोध बालिकाको मैं यह बात कैसे समझाती जन निधनाके दुख- का मर्म मैं स्वय नहीं समझती थी ! मुझे विधवाका दु ख केवल स्वार्थ- जनित जान पड़ता था। स्त्रीके हृदयकी असमर्थतासे मैं भली भाँति परिचित थी। मेरी यह धारणा थी कि स्त्रीका शक्तिहीन हृदय उसके जीवनका भार ढोनेमें असमर्थ है, इसलिये पुरुपके ऊपर अपने जीवनका दुर्वल भार डालकर वह निश्चिन्त होकर अपना जीवन बिताती है । पर जब अचानक उसका पुरुष किसी अपरिचित कारणसे अपना बोरिया- बधना फेंककर किसी अज्ञात देशकी यात्राको चल पड़ता है तो स्त्रीके लिये महासकटमय स्थिति उपस्थित हो जाती है । वैवाहिक जीवनमें वह भार वहन करनेकी रही-सही शक्ति और अभ्याससे भी वचित हो जाती है, इसलिये विधनाकी अवस्था और भी अधिक जटिल हो पडती है । वैवव्यके दुखकी इसी प्रकारकी धारणा मेरे हृदयमें बद्धमूल थी। [--" मैना, माँ-बापके मरने पर भी घोर दुख होता है और पतिके मरनेपर भी। कौन दु ख वड़ा है और कौन छोटा, यह मैं नहीं बतला सकती। भगमानसे विनती करती हूं कि इन दो दुखों से कोई भी दुख मुझे न सहना पड़े। कुछ देर तक चुप रहकर लीला अचानक बोल उठी-" अच्छा दीदी, कोई कहानी सुनाओ, पलंगके ऊपर लेटे-लेटे सुनूंगी। तुम भी अपने पलँगके ऊपर लेट जाओ।" जो कहानियाँ मुझे याद थीं प्राय उन सबको लीला मुन चुकी थी। पर फिर भी उसकी हास पूरी नहीं होती थी। वेताल पचीसीकी दो-तीन मैने कहा- घृणामयी। १२० कहानियाँ मुझे याद यो। सम्य-समाजमें हमारे प्राचीन, हिंदू-समाजको इन सुदर लौकिक कथाओंका प्रचलन नहीं है। पर राजू बड़ा शैतान और धूर्त लडका था। अगरेजी और फ्रेंच कहानियोंसे उकताकर वह मथुरामें छपी यह अनोखी पुस्तक न मालूम कहाँसे एक दिन उठा लाया। मैंने भी उसे चुराकर पढ़ा था। पर लीलाके हाथ वह पुस्तक न लगी--शायद कोई नौकर उड़ा ले गया था। कुछ भी हो, लीलाको वह कहानियाँ बिलकुल नई और रोचक जान पडीं। दो कहानियों तक तो वह हुँकारा भरती रही, पर तीसरी कहानीके आरभसे ही उसकी आँखें लग गई। एक लवी सॉस लेकर मैंने करवट बदली। अपनी प्यारी, भोली और स्नेहमयी वहनको अचेत जानकर मेरे मनमें एक सकरुण, स्नेहमप, सुमधुर पिपादका भाव व्याप्त हो गया। अचानक न मालूम क्या सोचकर मैं पलंग परसे उठ बैठी और लीलाके पास जाकर बड़े गौरसे उसकी और टकटकी बाँधे रही। उसके प्यारे मुखमें मूर्छाकी तरह मनोमुग्धकर आभा प्रभासित हो रही थी। मेरी आँखोंसे प्रेमके आँसू उमड चले। मैंने वार-बार उसका मुँह चूमा, पर फिर भी जी नहीं भरता था । वह अचेत पड़ी थी। मेरे चुननसे उसकी निद्रामें बिलकुल विन्न नहीं पहुँचा । लीला कैशोरावस्थामें पदार्पण कर चुकी थी। पर उसके स्वभावमें और मुखमें किसी प्रकारको तीव्रता या स्वप्नमय जीवनका आनेश नहीं पाया जाता या। बालकपनकी वही सरलता और स्निग्ध चचलता अभीतक उसकी प्रतिमें वर्तमान थी। इस कारण में उसे और भी अधिक प्यार करती धी। मेरी आँखें उसीके मुंहकी ओर लगी थीं और हटना नहीं चाहती थी। उसे ताकते-ताकते एक तीखी, सुकुमार वेदनासे मेरा हृदय रह- रहकर काँप उठता था। है

उनके पास ले जाना नहीं चाहता। जर उनसे मेरा कोई नाता ही नहीं
में उनकी दुनियासे निलकुल बाहर हूँ और उनकी बहन कहलाए जानेके
१२१
घृणामयी।
मैंने सोचा-"लीला जब बड़े सुखमें शातिपूर्वक सोई हुई है तो
क्यों मेरे मनमें उसके लिये करुणामय वेदना जागरित हो रही है ? यही
क्या सतानकी मगलाकाक्षिणी माताके हृदयका हाहाकार है ? अगर ऐसा
है तो कैसे मेरे स्वार्थपूर्ण, निष्ठुर हृदयमें यह भार अपने आप सचारित
होने लगा है "
प्रकृतिके अज्ञान और अज्ञेय चक्रके प्रति सभ्रमके साथ मन-ही-मन
प्रणाम करके मैं फिर लौटकर अपने पलंगपर आकर लेट गई ।
दसरे दिन खा-पीकर जब मैं कॉलेज जानेकी तैयारी कर रही थी,
तो लीला रोते हुए मेरे पास आई और कहने लगी- "माधवी
मेरा कलेजा-धक-से रह गया। चौंककर मैंने कहा--" ऐं ! यह
"अभी भैयाको वुलाने एक आदमी आया है। मैं
भोज स्कूल नहीं जाऊँगी । भैयाके साथ वहीं जा रही है।"
'राजूने क्या मुझे बुलाया
'नहीं, उन्होंने मुझसे अपने साथ चलनेके लिये कहा । मैं सिर्फ़
उन्हें खबर देनेके लिये आई हूँ।"
मैंने सोचा--" माधवी दीदीका सबंध केवल इन दो जनोंक सार है-
दीदी विधवा हो गई।"
क्या कहती है "
लीला बोली-
"
योग्य नहीं हूँ
| इसलिये राज उनकी इस घोर संकटमय स्थितिमें मुझे

शक्तिने - बीच-बीचमें ऐसा विकट गन्द मुंहसे निकाल रही थी कि उस दोपहर घृणामयी। १२२ है और केवल आधे घटेका बाहरी परिचय है तो क्यों मैं उनके लिये दुःखित होऊँ ? ससारमें कितनी ही स्त्रियाँ रात-दिन विधवा होती जाती हैं, उन सबके लिये क्या मुझे दुख होता है ? तब क्यों इस एक विशेष स्त्रीके वैधव्यसे मेरे हृदयमें आघात पहुँचता है। मुझे खबर नहीं थी कि वह क्षण-भरका परिचय ही युग-युगातका परिचय, था। दरिद्र घरकी उस असाधारण युवतीके हृदयकी जिस चुबक राजूको स्नेहपाशमे दृढताके साथ बाँध लिया था, उसीने क्षण-भरमें मेरे हृदयपर भी अज्ञात रूपसे गहरा प्रभाव डाल दिया था । मैंने बडे दुःखके साथ लीलासे कहा-“ नहीं लीला, यह नहीं हो सकता । राजू चाहे अपने साथ मुझे वहाँ ले चलनेके लिये राजी न हो, मैं जबर्दस्ती उसके साथ चलूंगी। तुम दोनोंकी ही, तरह क्या माधनी दीदी मेरी भी दीदी नहीं हैं ?" " क्यों नहीं दीदी ! तुम भी चलो। तुम्हें कौन रोकता है ? भैयाको तुम्हारे आनेसे बड़ी खुशी होगी।" हेवेट रोडमें नियत स्थानपर पहुँचकर जब हमारी मोटर रुकी तो वाहर सड़कपरसे ही स्त्रियोंकी रोआ-पीटी और हाहाकारका ख सुनाई दिया । मै मन-ही-मन यह कल्पना करते हुए चली कि माधनी दीदी सिर पीट-पीटकर, बालोंको नोचकर, धरतीपर पछाड़ खाकर रो रही होंगी। भय, आतक और सकोचसे मेरे पांव आगेको नहीं बढ़ते थे। मकानके हातेके भीतर जाकर क्या देखती हूँ कि मानवी दीदी नहीं, बूढी अौं लाशको घेरकर सिर पीटकर, धाडे मारकर रो रही है। वह क्यों नहीं लेती ! मर जा बेटी, मर जा! अब जीना महापाप है।" , " काका तक जीती क्यों है ? क्या तूने भीतर कहीं जहर नहीं रखा है। मा १२३ घृणामयी। समय, सूर्यके उज्ज्वल प्रकाशमें भी बड़े-बड़े धीरोंके दिल सभात दहल- दहल उठते थे । माधवी दीदीकी आँखें आंसुओंसे भीग रही थीं, पर वह शातिपूर्वक अपनी अम्माका हाथ पकड़कर उन्हें दिलासा दे रही थीं। करुण कठसे कहती थीं— अत्र रोनेसे क्या होगा अम्माँ ? मेरा सन- नाश होना था, सो हो गया। अब धीरज धरो। दीनू और राम् तुम्हें देखकर बौखला-से गए हैं।" वास्तनमें दीनू और रामूके होश ठिकाने नहीं थे। वे दोनों नानीकी ओर ताकते थे, फिर रोकर अपनी अम्माँका अचल पकड़ते थे। फिर कुछ देर तक चुप रहकर बडे गौरसे नानीका हाल देखते थे, फिर अम्माँका अचल पकडकर रोने लग जाते थे और पूछते ये और नानीको क्या हुआ अम्मा ? " उस घोर सकटके समय भी, जब अपने तन-बदनकी सुधिका रहना भी असंभव होता है, माधवी दीदी अत्यत धैर्यके साथ अपने पुत्रोंका मुंह घूम रही थी और उन्हें दिलासा देती हुई कहती थीं-" रोओ मत मेरे लाल ! किसीको कुछ नहीं हुआ ।" पर बच्चे नहीं मानते थे। जन माधवी दीदी बूढी अम्मॉको समझानेकी कोशिश करती थीं तो वह और भी जोरसे रोकर कहती थीं- " मैं कैसे यह दुख सहूँ, मापनी ! 'क्या ऐसे दु खोंको एक-एक करके मेरे ही सिरपर सवार होना था ! मैं अभागिन आज तक मर क्यों नहीं गई ! एक लड़का गया, दूसरा लड़का गया, अब आज लड़की रॉड़ हुई। मेरी कोखमें क्या इसी तरह आग लगना था।" यह कहकर वह जोरसे अपनी छाती पीटने । कुछ देर तक छाती पीटकर फिर बोलीं-" माची, तू अभी दगी घृणामयी। १२४. माधवी दीदीके कलेजेमें इन शब्द-वाणोंसे कैसी चोट पहुँची होगी, इस वातकी कल्पना सहजमें की जा सकती है। पर इन मर्म-भेदी शब्दोंको भी शातिपूर्वक धैर्यके साथ सहकर दीदीने कहा--" मरनेसे क्या होगा, अम्माँ ! अपने कर्मोंका भोग तो मुझे हर हालतमें भोगना होगा । मैं मर जाऊँ तो दीनू, रामू और छोटे बच्चेका क्या हाल होगा!" पर बूढी अम्मा अपने होशमें नहीं थीं, नहीं तो जले दिलके फफोलोंमें नमक छिडकनेपाली ऐसी मार्मिक बातें कभी उनके मुँहसे न निकलतीं । दीदीकी बातें उनके कानों में गई या नहीं, इसमें शक है। वह अपना ही रोना एक ही ढंगसे रोते चली गई। , बड़ी अम्माँके दो पुत्र भी गुजर चुके हैं, यह बात मालुम होने पर उनका उत्कट शोक-प्रकाश, जो पहले कुछ अशोभन जान पड़ता था, अधिक अनुचित नहीं मालूम हुआ। पर माधवी दीदीका धैर्य अत्यत आश्चर्यजनक, अविश्वसनीय, अनुभवातीत था। मैं चकित और निमूढ-सी रह गई । जब कुछ स्थिर हुई तो इधर-उधर दृष्टि फेरने लगी। एक कोनेमें उस दिनकी वही किशोरी लड़की, जो हाथमें लाल- टेन लेकर हमें नीचेतक पहुँचा गई थी, अपने हाथमें माधवी दौदीका दुधमुंहा वच्चा यामकर अत्यंत शात और अस्पष्ट स्वरमें रोते हुए नीर- वताके साथ अश्रु नर्पण कर रही थी, और बीच-बीचमें अपने अंचलसे आँखें पोंछनी जाती थी। एक तरफ दो-चार आदमी अर्थीको तैयार करनेमें लगे थे। एक कोनेमें राजूकी अवस्थाका एक लड़का अपना उदास मुंह टेकर खड़ा था। राजूने बड़ी स्फुर्ती से उसके पास जाकर उसका " मोला, अब इस तरह उदास ओर सुस्त होकर न पकड़कर फहा- १२५ घृणामयी।। खड़े रहनेसे क्या फायदा 2 अम्माँ और दीदीको समझाकर दिलासा देनेका काम तुम्हारा ही है। चलो।" यह कहकर वह भोलाका हाथ पकड़कर बुढी अम्माँके पास लाया । पर भोला बहुत घबराया हुआ था और हौलदिल-सा जान पड़ता था । वह पहलेकी तरह चुपचाप खड़ा रहा। राजूने बूढी अम्माँके दोनों हाथ पकडे और दृढताके साथ कहा- "अम्मा, समझदार होने पर भी आप नासमझोंका-सा काम कर रही हैं, यह वडे अफसोसकी बात है ! आपको चाहिए था कि धीरज रखकर दीदीको दिलासा देतीं, पर आप खुद वेसुध बनी बैठी हैं। जरा शात होकर अपने नातियोंको गोदमें बिठाइए।" राजूके कठस्वरमें जादू था । उसके शब्दोंसे उस शोकाच्छन्न जन- समाजके मुर्दे दिलोंमें भी उत्तेजना पहुंची। ऐसा जान पडा जैसे इन सम्मोहक शब्दोंसे मृतककी आत्मामे भी किंचित् चैतन्यका सचार हुआ । किसी दूसरे व्यक्ति के मुंहसे ये बातें ढोंगसे भरी और अशोभन-सी जान पडती, पर राजूके कठ-स्वरकी सहृदयता अविवादास्पद थी। कुछ भी हो, बूढ़ी अम्मनि रोना नहीं छोड़ा। कहने लगीं-"राजू, मुझे जहर देकर मार डालो, बेटा ! मैं अब जीना नहीं चाहती । एक दूसरी अर्थीमें ले जाकर मुझे भी चितामें जला डालो !" राजू हैरान था। माधनी दीदी नीरस अश्रुपात कर रही थीं। लीला और मै पुतलीकी तरह खड़ी थी। इस शोक-पिहल समाजके बीच हम दोनों वन-ठनकर , शृगार किए हुए विराजमान थी । लज्जा, जड़ता और आत्मग्लानिसे मैं गड़ी जाती थी। इतनी शक्ति और योग्यता भी मुझमें नहीं थी कि माधवी दीदीसे समवेदनाकी दो-चार बातें कहूँ । राजके कार्यमें बाधा पहुंचाने के लिये ही हम दोनों आई थीं। " ।

१२६ घृणामयी। माधवी दीदीने भन्न कठमें मुझसे कहा-" वैठो वहन, कब तक खड़ी रहोगी!" भगवान् ! क्या स्त्रीके कपोत-कोमल हृदयमें ऐसी धन-दृढ़ताका होना सभन है ! मेरी आँखोंसे श्रद्धाके आँसू उमड़ चले । आज अपने कपडोंकी माया त्याग कर मैं निराभरणा पृथी माताके ऊपर दीदीके साथ बैठ गई और बोली-" दीदी, तुम्हारे इस घोर दुखके समय तुम्हारे रोनेमें केवल बाधा पहुंचानेके लिये ही मैं आई हूँ। मुझे माफ करो ! मेरी इस वातसे दीदीके दुखका बॉध टूट पड़ा। वह न रह सकी और मेरे गलेसे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगी। अर्थी तैयार हो गई थी। राजूने लाशके पाँव पकड़े और एक दूसरे आदमीने सिर पकडा । जव लाशको उठाकर अर्थीपर ले जाने लगे तो बूढ़ी अम्माँने यथाशक्ति गला फाड़-फाड़कर चिल्लाना शुरू कर दिया और बाल-बच्चे भी चिल्लाकर रोने लगे। माधनी दीदीने चौंककर मेरा गला छोड दिया और मुँह फेरकर उठ खडी हुई। इस समय तक वह धीमे स्वरमें रो रही थीं । अब उन्होने भी अपना स्वर कुछ चढा दिया । उनके इस स्वरमें न मालूम क्या जादू भरा था जिससे उनका रोना भी मीठा जान पडता था। इस समय उनका सुदर मुखमडल किसी अलौकिक आभासे देदीप्यमान हो रहा था और उसमें एक उन्मत्त आवेश झलक रहा था। उनके सयमका बाँध विलकुल टूट गया था। अज्ञात और अपरिचित पुरुषोंसे भरे हुए उस समाजके वीच उनके सिरका अचल नीचेको खिसक गया था और उनके निखरे हुए वालोंकी नग्न बहार स्पष्ट दिख- लाई देती थी। पर इस संबधमें बिल्कुल उदासीनता प्रकट करके यह धीरे-धीरे शांत और संयत गमनसे, अर्थीकी तरफ़ आगेको बढ़ीं। तात्काठिक उत्कट दुखकी विकरालताके फारण द्विषा, संशय और - साथ रोते हुए कहा- . १२७ धृणामयी। रनाका लेश भी उनकी विशुद्ध आत्मामें वर्तमान नहीं था। महामाया नारीकी वह मोहिनी मूर्ति देखकर सभ्रमके अतलव्यापी मानसे मेरा हृदय । पुलकित और कटकित हो उठा। राजूने किसी अज्ञात आशकासे भयमीत होकर दीदीको आगे बढ़नेसे रोक दिया। दीदीने व्याकुल करुणाके स्वरमें अत्यत अनुनय-विनयके राजू, मुझे जाने दे मेरे भैया, मत रोक, जानेके पहले एक बार मुझे उनके पाँव छूने दे, मैं और कुछ नहीं करूँगी, सिर्फ पान छुने दे, छूने दे ! क्यों रोकता है !" पत्थरको पिघला देनेवाला, दीदीका यह अनुनय-वचन सुनकर राज्ने उन्हें छोड दिया । अर्थीके पास जाकर दीदीने पतिदेवके पैरोंके ऊपर अपना सिर रखा और उन्हें प्रणाम किया। कुछ देर तक यह इसी स्थितिमें रहीं। फिर उठकर ऊपर किसी अज्ञात देवताके प्रति हाथ जोडकर न मालूम क्या प्रार्थना करने लगी। फिर लौटकर अम्मकि पास चली आई । अम्माँ पहलेकी ही तरह सारे आसमानको अपने सिरपर उठाए हुए थी। "राम नाम सत्य है" के ससे आकाश गूंज उठा और मेरे हृदयमें आतक छा गया। राजू अर्थीक साथ श्मशानको चला गया। मैं और डीला स्तब्ध होकर बैठी थीं। अर्थीके चले जानेपर हम दोनों कुछ देर तक दीदी के साथ बैठकर फिर मोटरमें सवार होकर घरको वापस चली आई। २० आज तक मेरा ख्याल था कि दुर्बलता ही नारी-प्रकृतिका प्रधान 'लक्षण है। नारीके हृदयमें शक्तिकी कठिनता पाई जा सकती है, यह बात मेरी कल्पना अतीत थी। आज जब माधवी दादीका मुझे आज अचानक रामायण पढ़नेकी धुन सपार हुई। सती-साध्वी घुणामयी। १२८ सर्वनाश हो गया तो उसके शून्य और आशाहीन हृदयमें दृढ़ता और धैर्यके अपूर्व सामंजस्यका जो अनुपम दृश्य मुझे दिखलाई दिया उसने मुझे चकित और मोहित कर दिया था। आज तक मुझे विश्वास था कि स्त्रियाँ तात्कालिक, प्रत्यक्ष लाभ-हानिको लेकर ही जीवन बिताती हैं। पतिके द्वारा जब तक उनकी शरीर-यात्राका निर्वाह हो सका, जब तक उनकी रक्षा हो सकी, तब तक उसे देवता मानकर पूजती है और जब उनका यह परम और मुख्य स्वार्थ पतिद्वारा सिद्ध नहीं हो सकता तो वह चाहे इस लोकमें विराजमान हो या परलोकमें, उससे उनका विशेष सरोकार नहीं रहता । आज तक यही धारणा मेरे- हृदयमें बद्धमूल थी । पर आज मैंने देखा कि भयकर स्वार्थहानि होते हुए भी माधवी दीदीने अविश्वसनीय धैर्यके साथ सब दुख सहा और अप्रत्यक्षमें पतिके मिल- नकी आशा नहीं छोड़ी । अपने पतिके मृत शरीरको उन्होंने इस ढगसे आतरिक प्रणाम किया जैसे वह मृत्युलोकको नहीं, कहीं परदेशको जा रहे हो । एक-न-एक बार उनके दर्शन फिर मिलेंगे ही, यह ध्रुव विश्वास उनकी म्लान और करुण आँखोंसे स्पष्ट झलक रहा था। रास्ते-भर मैं मन-ही-मन उन्हें निरतर प्रणाम करती जाती थी। आज मैंने अपने जीव- नमें प्रथम वार एक ऐसी स्त्रीको देखा जो बिना किसी पुरुपकी सहाय- ताके अकेले अपने बलपर अनत विश्वके असख्य दुर्गमपयोंसे होकर यात्रा करनेका दम भरती थी। एक गहन रहस्यका अधकारमयं पट आज मेरी, आँखोंसे तिरोहित हो गया । भक्ति, श्रद्धा और सम्मोहके भावसे गद्गद और आच्छन्न होकर मैं घर पहुँची । सीताफे पुनीत चरित्रका रस आकंठ पान करनेकी इच्छा हुई। वाल्मी- कीय रामायणका एक पूरा, बढिया 'सेट' मेरे पास वर्तमान था।

- जैसे मेरी आत्मामें कभी कोई अपवित्र भाव उत्पन्न ही नहीं हो सकता। मंडलमें तरगित होने लगी। मेरी नसो, एक अभिनन स्फूर्ति और अचड शक्तिका सचार होने लगा। इस कायाकल्पसे मुम्प और आश्चर्या- इन्वित होकर मै पलंगपर लेटी रही और नाना भावनाओंमें हमी रही। अम्माँको उसमें सम्मिलित होनेके लिये आज चार बजेकी गाड़ीसे जाना ना। डाक्टर साहबको यह बात कलहीसे मालूम थी। इसलिये उन्हें टेशनपर पहुँचानेके लिये वह नियत समय वाहनफी सूरत देखते ही मेरा कलेजा फड़क उठा और एदयकी सिनि १२९ घृणामयी। उत्तरकाड उठाकर सीता-वनवासकी कथा पढ़ने लगी। नारीके ऊपर पुरुष-जातिके चिर-कालिक अपमानका वर्णन पढ़कर मेरा खून खौलने लगा, और सुकुमारी, निस्सहाया, अबला सीताकी विवशता देखकर क्रोधसे मैं भर गई । जब निर्दयी राम सीताको अपना सतीत्व एक बार फिरसे प्रमाणित करनेके लिये बुलाते हैं तत्र इस वर्णनमें नारी-निर्यातन चरम सीमापर पहुँच जाता है। इस घोरतम अपमानके बदलेमें जब सीता कहती है.--" तदा मे माधवी देवी विवर दातुमर्हति," तब यह वाक्य पढ़कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए और आँखोंसे आंसुओकी झडी लग गई। पुस्तक वद करके मैं मन-ही-मन रटने लगी-" तदा मे माधवी देवी मिरं दातुमर्हति तदा मे माधनी देवी पिचर दातुमर्हति ।" मै भी आज निवरके गर्भमें चिरकाल के लिये विलीन हो जाना चाहती थी। माधवी दीदीके वैधव्यका दृश्य देखनेपर और रामायण पढनेपर मैंने अपने हृदयमें अद्भुत परिवर्तन-सा पाया और ऐसा माम करने लगी एक दिव्य प्रेरणाके प्रभारसे उत्तेजित होकर में अत्यंत ऊर्द्धबाही वायु- लाहौरमें एक वृहत् राजनीतिक कानफ्रेंस होनेवाली थी। काका और आ पहुँचे। डाक्टर मिलकुल उल्ट-पुलट हो गई। कहाँ गई माधनी दीदीकी चिना और कुछ भी हो, मेरी उदासीका सबसे बड़ा कारण या-काका विदाई । अम्मकि विना मैं बडी खुशीसे रह सकती थी। पर काका दिनोंसे अधिक तीक्ष्ण मालम हो रहा था। काकाको मैं बहुत प्यार कर घृणामयी। १३० कहाँ गया सतीत्वके आदर्शका पुनीत निषाद ! पलक-भरके भीतर ही मैं अपने रात-दिनके आमोद-प्रमोदकी दुनियामें आ गई । डाक्टर साहबका कंठ-स्वर सुनकर मेरा हृदय ठीक तालमें नाचने लगा। २१ और अम्माको पहुँचानेके लिये लीला, मै और डाक्टर 'साहब भी उनके साथ चले । जव डाक्गाडी छूट गई तो हम तीनों वापस चले आए। दिन ढलने लगा था, सूर्य छिपनेको हो। था। हेमत-कालकी सध्या एक तो वैसे ही विपाद-भरी होती है, तिस- पर आज माधवी दीदी विधवा हो गई थी, राजू श्मशानको गया हुआ थ और काका और अम्मा भी घरको सूना करके चल दिए थे । घर पहुँ चने पर मेरे मनमें ऐसी उदासी छा गई कि बोलनेकी भी शक्ति नई रही । केवल डाक्टर साहब मुझे उल्लसित करनेमें समर्थ थे। पर आ वह भी किसी कारणसे उमगहीन जान पडते ये । शायद लीला हमा साथ होनेसे उनकी स्वच्छद बातोंमें विघ्न हो रहा था। विछोह मेरे लिये असह्य था । आज तो उनके बिछोहका दुख से यी, यह बात मैं जानती थी। पर इतना अधिक प्यार करती हूँ, घात आज प्रथम वार मुझे माछम हुई । इसके अतिरिक्त मैं आज एक नई और अनोखी वेदनाका अनु कर रही थी। इस वेदनाका सबध राजूसे था। मेरे मनमें यह भान रह-रहकर जागरित हो रही थी कि मेरा भाई राजू, जो पहले .

सोचती- और घृणित हूँ और राजूकी बहन कहलाए जानेके योग्य नहीं है। अपनी मानसिक वृत्तिकी हीनताकी कल्पना करके अरसाद और प्लातिके भारसे मेरा हृदय दब जाता था। साहन, आज मेरे मनमें बडी उदासी छा गई है। एक स्त्रीको मैं आज अपनी आँखोंके सामने विधवा होते देख आई।" वास्टर साहन मुस्कुराने लगे। मोले-.--" संसारमें रात-दिन असंख्य स्त्रियाँ नियम होती जाती हैं, किस-किसके लिये रोया जाय। १३१ घृणामयी। अपने प्राणोंसे भी अधिक चाहता था और अब उपेक्षा ( सभवत घृणा ) की दृष्टि से देखता है, एक दुखी घरके दुखका साझी होकर श्मशानको गया है-मेरा प्यारा भाई इतनी छोटी अवस्थामें आमोद-प्रमोदसे रहित होकर गभीर-भावनाओंमें निमग्न रहकर, असख्य मनुष्योंसे पूर्ण इस ससारमें निःसग जीवन विताकर स्वेच्छासे दुख और कर्तव्यके गहन - कटकमय पथमें भ्रमण कर रहा है। इस भावनासे मेरे मनमे एक तरफ तो गर्न, करुणा और स्नेहका उद्रेक हो रहा था और दूसरी तरफ प्रति- हिंसा और मानके भावसे मेरी छाती फल उठती थी। एक बार मैं क्या मैं राजूकी उपेक्षा और घृणाके योग्य हूँ ? क्या मैं - इतनी हीन हूँ ? क्यों वह मेरा स्नेह स्वीकार नहीं करना चाहता ?" और यह सोचते-सोचते से कॉपने लगती और रोना चाहती । पर फिर उसी दम मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न होता कि मैं वास्तवमें नीच भीतर आकर जब हम लोग बैठ गए तो मैंने कहा- । डाक्टर साहब बोले-~~" इसमें आश्चर्यकी बात क्या है !" कहा- - पर वह युनती थी। डाक्टर मन . वाल-वैधव्य नहीं भोगना पड़ा, यही गनीमत है। आपका कलेजा मनसे भी कठोर है।"

- लीलाने कहा- था । होस्टलमें उसके साथी जितने भी लडके थे वह हरवक्त मौका किया करता था। इस रोगके संबंध में अनेक तथ्योंका अध्ययन करने घृणामयी। १३२ माधवी दीदीसे डाक्टर साहब परिचित नहीं थे, नहीं तो कैसे उसकी उपेक्षा करते, जरा मैं भी देख लेती। मैंने कहा-" भगवानसे प्रार्थना करती हूँ कि निर्मोही आदमीसे दुश्मनका भी पाला न पड़े।" डाक्टर साहब ठठाकर हँस पड़े। बोले-" निर्मोही किसे बतलाती हो ? मै क्या निर्मोही हूँ?" मैंने बच्चोंकी तरह मुंह बनाया। " अच्छा डाक्टर साहब, अगर आप निर्मोही नहीं हैं तो मेरी एक प्रार्थनापर ध्यान दीजिए। डाक्टर साहबने पूछा क्या प्रार्थना है ॥ लीलाने कहा-" आप अपने जमानेके मेडिकल कॉलेजके लडकोंक कई किस्से सुनाया करते हैं। आज भी कोई दिलचस्प किस्सा सुनाइए जिससे वक्त कटे और उदासी न रहे।" डाक्टर साहबने एक किस्सा शुरू किया। उनका सहपाठी एक लडका 'टी वी स्पेशियलिम्ट' होना चाहता था। इस रोग-विशेषके सवधर्म पूर्ण अभिज्ञता प्राप्त करनेकी धुन उसके सिरपर बड़ी बुरी तरहसे सवार हो गई। उसके अध्यक्षके पास जो-जो 'केस' आते ये वह मनन- पूर्वक उनका अध्ययन किया करता था। इस रोगके कीटाणुओको अच्छी तरहसे पहचानने के लिये वह नित्य अणुवीक्षण यत्रद्वारा बड़े ध्यानके साथ रोगियोंके श्लेष्मा और रक्तकी परीक्षा किया करता पाते ही उनके सारे शरीरमें हाथ लगाकर टी बी ग्लैंड' की खोज - टेंपरेचर किसी कारणसे बढ़ गया। तब तो वह ऐसा घबराया कि तत्काल इटता न था । मौतको बुलाने पर वह तत्काल उपस्थित होती है, यह गया। अंतको 3 महीनके अंदर काम तमाम !" होने लगा। लीलाका भी शायद यही हाल था। उसने कहा- क्या आपका दिलचस्प किस्सा है ? डाक्टर लोगोंको मरनेकी बातों में बड़ा १३३ घृणामयी। पर और अनेक 'फेस' देखनेपर उसे धीरे-धीरे अपने संबंधों भी वहम हो गया और यह रोज अपना टेंपरेचर' लेने लगा और नित्य अपनी नाड़ीकी गतिकी परीक्षा करने लगा। कीटाणुके भयसे पानी अपने सामने 'फिल्टर' कराके पीता या। रोटी, मक्खन और दूधके अतिरिक्त और सा प्रकारका खाना उसने त्याग दिया । बहुत हुआ तो कुछ फल सा लेता था। भगनानका ऐसा कोप हुआ कि उसका अपने अध्यक्षके पास जाकर उसने अपने शरीरको परीक्षा करवाई। अध्यक्षके यह कहने पर भी कि उसे यक्ष्मा नहीं है, उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने अपने श्लेष्माकी परीक्षा स्वयं की । उसमें उसे 'कीटाणु' दिखलाई दिए ! कॉलेजसे छुट्टी-लेकर वह घर गया और — कमीट रेस्ट' करने लगा। चौनीसों घंटे वह चारपाई पर लेटे रहता और विलकुल हिलता- वात प्राचीन दतकथाओंमें पाई जाती है। उसका भी यही हाल हुआ। धीरे-धीरे वह क्षयीभूत होने लगा और उसका शरीर क्षीण होता चला २२ लोगोंके लिये भले ही दिलचस्प हो, पर निपाद और विरह-व्यथासे म्लान आजकी सध्यामें मृत्युकी भीतिसे पूर्ण इस कथासे मेरा सुकुमार और दुर्वल हृदय त्रस्त कपोतकी तरह कपित यही . किस्सा डाक्टर आनद मिलता है . IT लोगोंका दिल बड़ा सख्त होता है, इसमें शक करने लगी। ऐसा मालूम करने लगी जैसे इस मायामय स्वल्पाधकारक कोई अज्ञात प्रेरणा मेरे कानोंमे कहने लगी-" जीवनके रात-दिन- झझट और भय-सशयसे मुक्त होनेका केवल यही क्षणिक समय है। यदि किसी नव-जीवनकी आशामें मरना है तो इसी समय मरो अथर घृणामयी। १३४ नहीं। अपने सहपाठीकी मौतका समाचार पाकर आपको बड़ी प्रसन्नता हुई होगी।" यह कहकर वह चलने लगी। मैने कहा--" लीला, बैठती क्यों नहीं। अरी, जाती कहाँको है !' " वह बोली-" तुमने जो 'नाबिल' मुझे उस रोज दिया था, उ अभी मैंने पूरा नहीं किया। जाकर उसीको पढ़ती हूँ।" यह कहकर वह चली गई। वाहर अभी थोड़ा-बहुत उजेला था, पर भीतर अँधेरा होने लगा था डाक्टर साहब और मैं उस कमरेमें अकेले थे। नाना भाननाओंके कारण मेरा मस्तिष्क ठिकाने नहीं था। संध्याकालकी इस निशेप घडीमें है कोई अलौकिक माया वर्तमान रहती है या मेरी ही मानसिक अवस्य उस समय विकृत हो गई थी, मैं निश्चित रूपसे कुछ नहीं कह सकती पर एक प्रकारकी अभूतपूर्व चचलतासे मेरा हृदय आदोलित होने लगा दिन-भरके पिपादसे इस चंचलताका कोई सबध नहीं था। मैं सुख-दु। और जीवन-मृत्युके अतीत आनदकी एक अनिर्वचनीय चेतनाका अनुभ- हलकी छायामें मैं डाक्टर साहबके साथ बेमालम अन्तर्धान होकर सौंदन और प्रेमके किसी अभिनन लोकमें निर्भय और निद्व होकर विच सकती हूँ और इसीमें ही मेरे छिन्न-विच्छिन्न, भ्रष्ट जीवनकी सार्थकता है चिराधकारके गहन गहरमें सदाके लिये विलीन होना है तो इसी सम होओ-यदि यह समय गया तो जन्म जन्मातरमें तुम्हें छिन मेघकी तर आकाशमें व्यर्थ और निरुद्देश्य भटकना पड़ेगा। .

कमजोरी पकड़ी जायगी, इस ख्यालसे मैं चुप रही। देख लिया। मेरा हाथ पकड़कर वोले- १३५ घृणामयी। मेरा सर्वांग कपित हो रहा था और वत्तीका बटन दबानेका साहस नहीं होता था। कमरेके अधकारको भेदकर साध्य-गहनके अस्पष्ट और अस्फुट प्रकाशकी स्तिमित रेखाएँ हम दोनोंके मुखोंपर छायाकी मायाका खेल खेल रही थीं। हम दोनों स्तब्ध और नि शब्द थे। अकस्मात् डाक्टर साहबने अपने पैरोंसे मेरे पानोंको स्पर्श किया। मेरे सारे शरीरमें एक विजली-सी दौड़ गई । मेरे रक्तमें उन्मत्तता व्याप्त हो गई। मैने अपनेको संभालनेकी चेष्टा की । क्षण भरमें सहस्र भावनाएँ मेरे मस्तिष्कसे होकर गुजर गई। अचानक मुझे अपने शात, उत्तेजना-विहीन वाल्य-जीवनको याद आई। उस मधुर और प्यारी स्मृतिसे मेरे रक्तका उत्ताप धीरे-धीरे शीतल होने लगा, और उस शीतलताकी करुणासे मेरा हृदय गद्गद हो- गया। इतने अल्प समयमें मेरे हृदयाकाशमें एक भयंकर तूफान उठकर अतको शातिके साथ गभीर मेघोंका श्रात धर्पण भी हो गया । किसी अज्ञात कारणसे मेरे स्मृति-पटलमें मेरे जीवनके एक ऐसे दिनका चित्र अकित हुआ जब खूब जोरसे पानी बरसनेके बाद पूर्वाकाश इद्रधनुपकी मनो- हर छटासे निभासित हो गया था, पत्तोके झुरमुटोंसे होकर जलकश सूर्यके प्रकाशमें मुक्ताकी तरह नीचेको टपकते जाते थे और में अपने भानी जीवनके उदासमें बाहर वीचेम बिना किसी कारणके इधर-उधर दौड़ रही थी। आजकी मानसिक स्थितिसे इस घटनाका क्या सबंध था, ठीक बतला नहीं सकती। पर इस स्मृतिके उदित होते ही मेरी आँखें उमड़ चीं। उस अस्पष्ट आलोकमें भी शायद डाक्टर साहबने मेरे आसुओंको झलकते " लज्जा! पुलकित होनेके कारण मेरा गला रेध गया था। बोलनेने मेरी हैं। आपसे छोटा आपका एक भाई है जिसकी असहनशील, टीजिए आप एक नर-युवती हैं। आप किसी पुरुपकै प्रणय-पाशमें घृणामयी। १३६ मैं अपने पलंगपर बैठी हुई थी। डाक्टर साहब मुझे निरुत्तर देखकर या अन्य किसी कारणसे चट अपनी कुर्सी परसे उठकर मेरे साथ ही मेरे पलँगपर बैठ गए और गलेमें हाथ डालकर धीमे स्वरमें बोले- चुप क्यों हो?" मैं रह न सकी और उनकी गोदमें मुंह छिपाकर सिसक-सिसककर वेअख्तियार रोने टगी। कुछ देरके बाद जब मेरा सिसकना बंद हो गया तो मैं फिर भी उसी अवस्थामें उनकी गोदके ऊपर अपना सिर रखे रही । आकुल मोहके कारण उस स्थितिसे हिलने-डुलनेकी शक्ति भी मुझमें नहीं थी। अचानक बाहरसे चिर-परिचित कठस्वर वायुमडलको तीरके समान चीरता हुआ मेरे कानोंमें पहुँचा-"दीदी 1" इस शब्दसे मेरा हृदय गूंजते ही राजू दरवाजेपर आकर खडा हो गया। मैं हड़बड़ाती हुई सैंभलकर उठ बैठी । एक झलक देखकर राजू उलटे पाँव लौट चला। २३ कलेजेका वडकना, शरीरका थरथराना, धरतीमें समा जानेकी 'इच्छा रखना, आदि कई ऐसे प्रचलित और निर्दिष्ट मुहावरे हैं जिनका उपयोग मै अपनी उक्त स्थितिका वर्णन करनेमें कर सकती है। पर क्या इन मुद्दावरोंसे सचमुच पाठक उस घोर अनर्थका, इस चिर- दुर्भागिनीके जीवनके उस जटिलतम सकटसे सकुल स्थितिका यथार्थ अनुभव करनेमें ममर्थ हो सकेंगे ? जरा एक बार चित्तवृत्तिको एकान करके कल्पना कीजिए । मान , MP १३७ पुणामयी। प्रकृतिके कारण अप्रसन्न होने पर भी आप उसे प्यार किए बिना नहीं रह सकते। उसके उन्नत स्वभावके गांभीर्यके कारण आपके हृदयमें उसके प्रति सभ्रमका भाव भी वर्तमान है । पर जिस पुरुपसे आपका प्रेम है उमे आपका यह भाई किसी विशेप कारणसे अयंत घृणाकी अधिसे देराता है, और फल्त वह नहीं चाहता कि उसकी बहन ऐसे पुरुपको चाहे । पर बार-बार वह आपको उसी घृणित और अनिच्छित पुरुपके साथ देखता है, और इसी कारण भाई-बहनके चिर-जीवनके गादे स्नेहमें वित आ उपस्थित होता है। अतको एक दिन संध्याके प्रायांधकारमें आपका वही भाई आपको एक स्तब्ध कमरेके भीतर उसी पुरुषकी गोदमें लेटे हुए पाता है और एक झलक देखकर लौट जाता है। किसी ग्रीक उपाख्यानमें मैंने पढ़ा था कि गॉर्गनका मुख देखते ही दर्शक तत्काल प्रस्तर बन जाता था। राजूका पलक-पात अंधकारके कारण अस्पष्ट होनेपर भी उससे मैं पत्थरसे अधिक जड़, मृत और निर्जीन बन गई। वन-स्तमित-सी होकर कुछ देर तक बिलकुल संज्ञाशून्य चैठी रही। जब कुछ चैतन्य हुआ तो मुझे उन्मादने आ घेरा। मैं जोरसे चिल्लाना चाहती थी और अपने बालोंको नोचनेकी इच्छा होती थी। कुछ ही देर पहले डाक्टर साहबके स्पर्शसे मैं रोमांचित हो रही थी। अब उनके शरीरको छूकर बहनेवाली वायुके भी स्पर्शसे और उनके निवा- समे उत्कट वितृष्णा और नारकीय घृणाके कारण मेरा हृदय आलोदित होने लगा । डाक्टर साहब अभी तक मेरे पलंगपर ही बैठे थे। मैंने धीमे स्वरमें तीव्रताके साथ कहा डास्टर साहब, आप जाइए । मेरा सर्वनाश होना था सो हो गया अब आप जाइए।" उस अंधकारमें शायद मेरी आँखोंकी चिनगारियों साफ़ दिखलाई दे रही थीं। भीत होकर डाक्टर साहबने पूछा- क्यों ?" " , घृणामयी। उन्हें यह घटना बिलकुल साधारण जान पड़ती थी। हायरी पुरुषों- की निर्वाधिता ! मैंने तमककर कहा-"नहीं, नहीं, आप फौरन यहाँसे उठकर चले जाइए |" यह कहकर मैंने बत्तीका बटना दवा दिया । सारा कमरा प्रकाशसे जगमगाने लगा। क्रोवित और अपमानित होकर वह चट-से अपनी साहबी टोपी और हिप' पकड़कर उठ खड़े हुए और लाल-लाल आँखोसे एक बार मुझे घूरकर सीधे चल दिए। अपमानित प्रेमको प्रतिहिंसाका भार उनकी उत्तप्त ऑखोंमें स्पष्ट झलकते हुए दिखलाई दिया था। पर इसावातपर विशेष ध्यान देनेकी स्थिति उस समय मेरी नहीं थी। आज दिनके समय रामायण पढा था। मुझे बार-बार वही पद याद आता था- "तदा मे माधवी देवी निवर दातुमर्हति ।" रातको खाना खानेकी रुचि बिलकुल नहीं थी। पर न खानेसे नौकर-चाकरोंके मनमें सदेह उत्पन्न होगा और हठ तथा अनु- रोधका अभिनय सहन करना पडेगा, इस कारण मैंने अपने , ही कमरे, खाना लानेका ' आर्डर' दे दिया। थोड़ा-बहुत खाकर लेटनेकी तैयारी फर ही रही थी कि लीलाने किवाड खटखटाते हुए कहा--" दीदी, खोलो !" मैं नित्य लीलासे अपने साथ सोनेका अनुरोध किया करती थी। 'पर आज उसके आनेसे मुझे विलकुल प्रसन्नता नहीं हुई-मेरी एकात- चिंतामें पिन ही हुआ ! लीला नित्यकी तरह प्रसन्न, निश्चित और निध- एक थी। बोली- दीदी, आज बड़ी जल्दी सोनेकी तैयारी करने टगी हो!" , घृणामयी। मैंने मुरझाई हुई आनाजमें कहा-" हाँ, आज नींदने बडा जोर पकड़ा है।" लीला नित्यकी तरह हँसी-खुशीकी बातें करनेके लिये लालयित हो रही थी, मेरी इस वातमे उसका मुख म्लान हो आया । मन मारकर वह अपने पलंगपर जाफर लेट गई । मेरे मस्तिष्ककी नसें बहुत उत्तेजित हो रही थीं। कितनी ही बातें सोचना चाहती थी, पर कुछ भी ठीक तरहसे नहीं सोच सकती थी। फिर भी एक बात रह-रहकर मेरे हृदय और मस्तिष्कमें एक साथ ही काँटेकी तरह चुभ रही थी। वह यह कि मैं कलसे राजूको अपना मुँह कैमै दिखाऊँगी ? डाक्टर साहबके साथ अकेले बैठे मुझे राजूने बहुत बार देख लिया था, इसमें सदेह नहीं । पर आजकी बात ही विलकुल दूसरी थी । आज मैं अपनी सफाईमें किसी प्रकारकी कैफियत नहीं दे सकती थी। मैंने सोचा- "राजूके हृदयमें यदि किसी जघन्यसे भी जघन्य वातका सशय उत्पन्न हो तो मै उसके निवारणके लिये एक अक्षर भी किस मुँहसे निकाल सकती है । यद्यपि भगवान्की कृपासे मैं अब तक शारीरिक पापसे वची हूँ, तो भी आजकी स्थितिके कारण कैसे राजूको इस वातका निश्वास दिला सकती है। भगवान् ! मेरे लिये कोई भी उपाय तुमने नहीं रख छोडा !" सोचते-सोचते मैं प्राल वेदनासे छट- पटाने लगी और उत्कट मानसिक व्यथाके कारण मेरे मुंहसे वेअख्तियार कराहनेकी तीखी आगाज निकल पडी । आगाज सुनकर लीला चौंककर उठ बैठी और उसने घनराकर' पूछा दीदी, क्या हुआ कुछ नहीं हुआ भैना, तू सो जा । चिंताकी कोई । 2" , मैंने कहा- बात नहीं। " घृणामयी। १४० पर वह बहुत डरी हुई थी, इसलिये कुछ देर तक बैठी रही। वह शायद चाहती थी कि मैं उसके साथ बातें कीं। पर मैं चुप रही। लाचार होकर वह फिर लेट गई। मुझे बहुत देर तक नींद नहीं आई। दो बजे तक गिर्जेकी घडीमें घटोंके बजनेका शब्द सुनती रही । दो बजेके बाद आँखें लगी । आँखें लगते ही कितने ही अर्थहीन, अस्पष्ट और भयकर स्वप्नोंसे मेरा मस्तिष्क आच्छन्न हो गया। उन अस्पष्ट स्वप्नों के बीच भी एक स्पष्ट अर्द्ध-वाक्य मेरे मुंहसे निकलता जाता था-" विवर दातुमर्हति—विवर दातुमर्हति !" थोडी देर बाद नींद उचट गई । फिर आँखें लगी और फिर उसी प्रकारके विकट स्वप्न दिखाई देने लगे। फिर आँखें खुली, फिर आँखें लगी । सारी रात इसी तरहकी वेचैनीमें कटी । पर सुबहको वड़ी मीठी और गाढ़ी नींदने मुझे वर दबाया । नौ बजेके करीब आँखें खुली । बाध जगत्के अधकार और प्रकाशका अतर्जगतसे वडा भारी सबध रहता है । निगत रात्रिके अधकारमें मुझे अपनी स्थिति अत्यत जटिल और चिकट मालूम होती थी, पर प्रात कालके उज्ज्वल प्रकाशमें मुझे आशातीत सात्वना प्राप्त हुई । मैंने सोचा कल रातकी घटना उस क्षणके लिये चाहे कैसी ही भयकर क्यों न हो, पर वास्तवमें उसके कारण अधिक चिंतित होनेकी कोई बात नहीं है। इसमें सदेह नहीं कि राजूके हृदयमें उस समय बड़ी गहरी चोट पहुंची होगी, पर अभ्यासनश वह धीरे-धीरे उस बातको भूल जायगा। इतनी बार उसने मुझे डाक्टर साहबके साथ अकेले बैठे देखा है, और जितनी बार देखा है उतनी बार वह नाराज हुआ है, पर फिर-फिर इस वातको भूलकर " रहेगा । राजू अब कभी मेरा मुंह देखना नहीं चाहेगा। वह अब किसी जागरित होने लगी। मात काल मैंने समझा था कि मेरा भय अमूलक और व्यर्थ है । पर मलेरिया बुखार जिस प्रकार वीचमें; नियत समयमें धर दवाता है उसी प्रकार अधकारके धीरे-धीरे बढ़ते ही राजूके साथ मेरा जो पिच्छेद हो गया है वह अब जीवन-भर स्थायी घृणामयी। यह 'दीदी' कहके पुकारता हुआ मेरे पास आया है। मेरा ऐसा उदार और बुद्धिमान भाई अफी बार भी दो-एक दिनमें कलकी बात भूल जाएगा और मन-ही-मन मुझे क्षमा करके मेरे पास अपना स्नेहसे भरा हुआ प्यारा मुखड़ा लेकर चला आयगा ।" आशासे भरी यह बात सोच-सोचकर में उल्लसित हो उठी और मेरी सारी दुश्चिता किसी जादूके स्पर्शस तिरोहित हो गई। प्रातर्भोजन मैंने अपने ही कमरेमें किया। लीलाने शायद राजूके ही साय खाना खाया। खाना खाकर लीला स्कूलको चली गई। तबियत ठीक न होनेसे मै घरपर ही रही । एक किताब खोलकर पढ़ने लगी। दो-चार पेज भी न पढ़ पाई थी कि औखें झपने लगी। किताब वद करके पलंग- पर लेट गई । तत्काल प्रगाढ निद्रामें मग्न हो गई । प्राय एक घटेके वाढ आँखें खुली। पर सारे शरीरमें ऐसी थकावट जान पडती थी जैसे किसीने मार-मारकर मेरी हड्डियाँ तोड डाली हो । आलस्य, दुर्बलता और जडता- कारण उठनेकी शक्ति मुझमें नहीं थी। इसलिये लेटी रही। फिर अबकी बार जब ऑसें खुली तो दिन ढल चुका था । गत रात्रिमें जिस भीपण भीतिका अनुभव मैने किया था, वह अब फिर धीरे-धीरे पिछले दिनकी आशका उदित होने लगी । मैंने सोचा कल सच्या- के समय जो घटना हो गई है, वह किसी प्रकार भी साधारण नहीं थी। , के नींद आ गई। टूटकर फिर-फिर घृणामयी। १४२ तरह नहीं मनाया जा सकता। इस घटनासे मेरा जीवन कलंकित लाछित और निरर्थक हो गया है।" ऐसी स्थितिमें स्त्रियोमें वहुधा आत्मघातकी प्रवृत्ति जागरित होती है। पर मेरे हृदयमें मरनेकी इच्छा लेशमात्र भी उत्पन्न नहीं होती थी। मरनेकी इच्छा तो दूर रही, मृत्युकी कल्पना ही किसी भी रूपमें मेरे मनमें जागरित नहीं हुई। पर मेरा भावी जीवन निरानदमय है, इस विश्वासके कारण मुझे शून्यके अवसादने आ घेरा । काका और अम्मा घर-पर नहीं थे, डाक्टर साहनके साथ अनबन हो गई थी और राजूकी ऑखोका तो मैं कॉटा ही बन चुकी थी। अपने जले दिलके फफोले मै किसके आगे फोडती ! मेरी उस दशाका केवल अनुभव ही किया जा सकता है, वह समझाई नहीं जा सकती। डाक्टर साहब आज नहीं आयेंगे, यह बात मैं अच्छी तरह जानती थी, पर एक क्षीण आशा भी मेरे मनमें वर्तमान थी। प्रतीक्षा करते- करते अंधेरा हो आया और खानेका समय आ गया। पर उनका आना असभर था और वह आए भी नहीं । भयकर निराशा छा गई । यदि वह सचमुच आ गए होते तो मुझे प्रसन्नता होती, ऐसा नहीं कहा जा सकता । बल्कि सभर तो यही था कि उनके आनेपर मैं अधिक सशकित हो उठती । पर फिर भी उनके न आनेसे निराशा ही हुई। रातको फिर नींदका वही हाल रहा और वीच-बीचमें तद्रा आनेपर उसी प्रकारके विकट स्वम दिखलाई दिए। दूसरे दिन सूर्यके उज्ज्वल प्रकाशमें मैं फिर आशान्वित हो उठी और पहले दिनकी ही तरह, रातकी सारी दुश्चिता दूर हो गई। केवल एक वातके लिये मैं बहुत पछताने लगी। वह यह कि क्षणिक उत्तेजनाके कारण बुद्धिभ्रष्ट होनेपर मैंने डाक्टर साहबको अपमानित करके निकाल - १४३ घृणामयी। दिया था। जिनको लेकर ही मेरा जीवन था, उन्हींके साथ मेरा सबंध टूट गया। मैंने सोचा-" राजू तो मेरा ही भाई है-कभी-न-कभी उसके साथ समझौता होगा ही। पर तिरस्कृत प्रेमीको अन किस प्रकार मना सकती हैं ?" पश्चात्तापका यह कौटा मेरे मनमें गडा ही रहा । दिन-भर मेरी भावनाओंमें उलट-फेर होता रहा। कभी एक बात सोचती थी, कभी ठीक उसका उलटा । अँधेरा होते ही फिर मेरा दिल आशकाके कारण दहलने लगा। इसी प्रकारके चक्रमें चार दिन वीत गए । न राजूके ही भारमें कोई परिवर्तन दिखलाई दिया और न डाक्टर साहलके ही दर्शन हुए। २६ पाँचौ दिन काका अम्माँके साथ वापस चले आए । मेरी जानमें 'जान आई और चित्त कुछ स्थिर हुआ। उनके घर पहुंचते ही मैं कानफ्रेंसके सव समाचार पूछने लगी । क्या-क्या प्रस्ताव पास हुए, हिंदू-मुस्लिम पिरोधकी समस्याका समाधान किस प्रकार किया गया, निदेशी-बहिष्कारके सबधमें किन-किन नए उपायोंकी खोज हुई, इत्यादि और भी कई प्रश्न मैंने किए। काकाने अत्यत स्नेह और धैर्यके साथ मुझे सन वातें समझाई । इन सब बातोंको जाननेके लिये मैं बडी उत्सुक धी, सो नहीं ! पर चार दिनके पिच्छेदके बाद आज काकाको पाकर उनसे बातें करनेके लिये मै आकुल हो रही थी। जब कानफ्रेंसके सबधमें सब बातें हो चुकी तो काकाने पूछा- "राजू कहाँ है ? वह नहीं दिखलाई देता।" लीला वहींपर थी। उसने कहा- "भैयाकी तनियत आज तीन- चार दिनसे खराब है। मैं कितनी ही वार उनके पास गई हूँ, पर वह , ज सरको आश्चर्य हुआ। नौकरोंने घर-भरमें ढूंदा, ऊपर छतपर जाकर घृणामयी। १४४ कोई बात मेरे साथ नहीं करते। पलंगपर लेटे-लेटे उपनिपत् या इसी तरहकी कोई किताव पढ़ते हैं और मुझसे कह देते हैं कि मेरी तबियत ठीक नहीं है। क्या हुआ, बुखार है या नहीं यह कुछ नहीं बतलाते ।" काकाने शकित होकर मुझसे पूछा- क्या हुआ, तुम्हें कुछ मालूम है ?" मैं क्या जवाब देती ! राजू पलंगपर लेटे-लेटे अपनी तबियत खराब वतलाता है, यह बात भी मुझे मालूम नहीं थी। और जो एक कारण मुझे मालूम था उसे मैं बतलाती कैसे ! मैंने कहा मुझे तो कुछ भी खबर नहीं । काकाके चेहरेमें उनके स्वाभाविक व्यगका तीक्ष्ण भाव प्रफुटित हो उठा । बोले-"भाईके लिये वहनका प्रेम हो तो ऐसा हो। तीन दिनसे वह पलंगपर लेटा है, और तुम्हें अब तक खबर नहीं कि क्या हुआ ! खूब उनकी आँखोंमें स्नेहपूर्ण तिरस्कारकी छाया घनीभूत होने लगी। मैं उनकी ओर ताक न सकी और गुरुतर अपराधके भारसे दबकर मैने सिर नीचा कर लिया। उसी दम उठकर काका राजूका हाल मालूम करने चले । अम्मा और लीला भी उनके साथ हो ली। मैं पीछे पीछे दबे पाँव अपराधिनीकी तरह धड़कता हुआ कलेजा लेकर चलने लगी। राज्के कमरेमें जन हम लोग पहुंचे तो देखा कि कमरा खाली पड़ा है। राजू वहाँ नहीं था। कुछ ही देर पहले तो भैया यहीं थे। अभी- अभी न माटम कहाँ चले गए !" " लीला ने कहा- " देखा, बगीचेमें तलाश की, पर कहीं पता न चला । कोई मोटर या बाहर कहीं नहीं रहता था--पेस्तर ही घर पहुंच जाता था। भान पह इसमें सदेह नहीं। रहा था और किसी तरह शात नहीं होता था। चटता था। जाड़ेके दिनोम राजू रातको सात बजेरु नाद कभी घरक १४५ घृणामयी। फिटन भी वह साथमें नहीं ले गया था। काकाके आनेका समाचार सुनकर ही क्या वह कहीं चपत हो गया ? काका और अम्माँका आग- मन क्या उसे सचमुच इतना अखरा ? यह आश्चर्यकी ही बात थी, हम लोग सब चकित होकर लौट चले । पर काकाको शायद यह जानकर तसल्ली हुई कि राजू पलगपर लेटे रहनेको बाध्य नहीं है। आनंदपूर्वक हँसकर बोले- तबियतके खरान होनेका यह ढग बिलकुल नया है । मरीजका पलगपर लेटे रहना तो दूर रहा वह कमरेसे ही गायब है।" राजूका स्वास्थ्य सुदृढ और असाधारण था । साधारणत उसकी तबियत खराब होनेकी बातपर कोई विश्वास नहीं करता था। इसका एक कारण यह भी था कि वह किसी कारणसे रुष्ट होनेपर झूठमूठ अपनी तबियत खराब बतला देता था। सन लोगोंको यह बात माझ्म थी। काकाने शायद आज भी यह अनुमान कर लिया कि वह किसी कारणसे नाराज है । इसलिये उसकी अस्वस्थताकी बात हँसीमें टडा दी। पर मेरा हृदय किसी अज्ञात आशकासे रह-रहकर बड़े जोरोंसे धड़क रातको तको भोजनके समय हम लोग बहुत देर तक टिके रहे, पर 'रान नहीं आया। कहाँ गया, इस बातका भी पता नहीं २७ नई बात थी । जब बहुत देर तक टिके रहने के बाद भी आया तो

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। उत्कठासे इस बातकी बाट जोहती रही कि सभनत कोई नौकर मेरे पास आकर इस रहस्यका मर्मोद्धाटन कर जायगा। फिर सुनाई दिया और तत्काल ही किसीके चीखनेकी आवाज आई । वह निकट आर्तरन सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। सारे शरीरका रक्त सूख गया। माजरा क्या है, यह बात कुछ भी समझमें नहीं आती थी। १४७ घृणामयी। और उसके आनेपर उसने फाटक बंद कर दिया था । फाटक वद होनेके कुछ ही देर बाद राजूका कमरा खुलने और फिर बंद होनेकी आवाज आई । मुझे पूरा विश्वास हो गया कि राजू आ गया है और मेरी दुश्चिता बहुत कुछ दूर हो गई मस्तिष्कका भार हलका होनेसे मेरी आँखें झपने लगीं। निद्रा ओर जागरणके वीचमें एक अवस्था होती है। धीरे-धीरे मैं उसी अवस्थाको प्राप्त हो गई। कितनी देर तक यह अवस्था रही, ठीक वतला नहीं सकती। अचानक बन्दूकके चलनेकी-सी एक धड़ाकेकी आवाज सुनाई दी और मैं चौंक पड़ी। अपने कमजोर दिलकी वह हालत मैं कैसे लोगोंको समझाऊँ ! ऐसा मालूम होने लगा जैसे अभी मेरे हृदयकी गति रककर क्या हुआ, आवाज कहाँसे आई, कुछ मालूम नहीं हुआ। मैं बड़ी प्राय पन्द्रह मिनटके बाद राजूके कमरेका किनाड़ खुल्नेका शब्द दम निकलनेको तैयार है। , दाया। भीत होकर मैंने थोड़ी देर बाद किसीने आकर बाहरसे मेरे कमरेका किनाड खटख- पूछा- --" कौन है ? काकाके 'पर्सनल एसिस्टेंट ' गौरीशकर दुबेकी आवाज सुनाई दी। लज्जा, उठो, किवाड़ खोलो, सर्वनाश हो गया है। कहकर मैं रोती हुई पगपरसे उठ बैठी और उन्होंने कहा- " क्या हुआ चिटसनी खोल दी।

घृणामयी। १४८ " राजूने अपनी छातीमें गोली मारकर आत्महत्या कर डाली है ! कहकर दुबेजी बोंकी तरह फूट-फूटकर रोने लगे। वज-स्तभित होकर मैंने कहा-" ऐं! यह आप क्या कहते। दुवेजी!" मुझे चक्कर आने लगा था इसलिये मैं दीवारके सहारे खड़ी हो गई दुबेजीने कहा--" क्या कहूँ ! कहने-सुननेकी कोई बात अब रही। लीला ! अरी लीला !" कहकर वह लीलाको जगाने लगे राजूके कमरेसे अम्माँके रोने-चिल्लानेकी दिल दहलानेवाली आगाज सुन दे रही थी। लीला गाढ निद्रामें मग्न थी। जब दुवेजीने हाथसे धक्का दिया । वह हडबड़ाती हुई उठ बैठी। क्या हुआ, दुबेजी ?" राजू चल दिया ।" दुवेजीका गला काँप रहा था । लीलाने घबराकर पूछा--" कहाँको ?" "उसने अपनेको गोली मार ली।" यह कहकर भावावेग न रोक सकनेके कारण दुबेजी फिर एक व्याकुल होकर रो पड़े। भैया, क्या किया ! भैया ! भैया !" कहकर रोती, बिललार और सिर पीटती हुई लीला बावली-सी होकर पलेंगपरसे नीचे कूद पड़ी दुवेजीके साथ अर्द्धचेतनावस्थामें दुर्घटनाके स्थलपर पहुँचकर देखर क्या हूँ कि राजू-मेरा प्यारा भाई, हमारे कुटुबका एक मात्र गौर राज---नीचे फर्शपर हाथ-पार पसारकर मृतावस्थामें और उस कपड़े उसकी छातीके खुनसे तर । नीचे पड़ी हु थी। अम्माँ तिर । व रखक - - कुछ लिखना ही वृथा है। की नहीं चलाई। इस पापिनी, कुलबोरिनी, हत्यारी लड़कीकी मूल्छति १४९ घृणामयी। । हाय-हत्या मचाकर रो रही थीं । काका निर्विकार भानसे ऊपर खडे खडे भाग्य-नियताकी यह निष्ठुर लीला देख रहे थे । कुछ कहनेको, किसीको कुछ समझाने-बुझानेको शक्ति उनमें नहीं थी। लीला आते ही यह सब दृश्य देखकर, बरतीपर पछाड़ खाकर, अपने विदीर्ण कदनसे नैश- पायुको चीरकर कहने लगी--" भैया । यह अनर्थ क्या हुआ भैया ! मैं अब क्या कर भैया 1 भैया ! भैया " अर्द्धरात्रिके उस विकट भौतिक काडकी विभीषिकाका वर्णन मैं किस प्रकार करूँ ? यह बात मेरे सामर्थ्यके वाहर है। इसलिये इस सवधर्म मुझे रोना नहीं आ रहा था। मैं स्वप्नावस्थाकी तरह, विभ्रात आँखोंसे कैपल राजूकी ओर देख रही थी। कभी खनसे तर उसकी सुदृढ छाती- र दृष्टि डालती और कभी उसके चैतन्यविहीन, सुदर, शात और प्रसन्न मुखमंडल के प्रति टकटकी बाँधे रहती । धीरे-धीरे मेरा मस्तिष्क निर्जीव-सा होने लगा और सिरमें चक्कर आने गा। मैं मूच्छित होकर नीचे गिर पड़ी। २८ जब आँखें खुली तो मैंने अपनेको उसी अवस्थामें, वहीं नीचे 'फर्शपर, पड़े पाया । स्पष्ट ही मालूम हो गया कि किसीने मुझे गानेकी चेष्टा नहीं की, किसीको लेशमात्र भी मेरी चिंता नहीं हुई। स महाशोकमें सारा कुटुब मन या उसके आगे मेरी मूर्छा--मेरी मृत्यु नगण्य थी। सिाबर' तो वहींपर पड़ा था, एक-आध गोली नमें अवश्य ही वची होगी । ता क्यों काकाने मेरी छातीपर तत्काल . 4 घृणामयी। १५० प्रति उत्कट अवज्ञा प्रकट करके उन्होने उचित ही किया था-पर चिर- कालके लिये उसका अस्तित्व ही मिटा देनेमें क्यो कोई बात उठा रखी। अम्मा और लीलाका रोना अभी तक उसी प्रकार जारी था। राजूकी मृतदेहको घेरकर अभी तक लोग उसी प्रकार खड़े ये । मूळ भग होनेपर निहायत कमजोरीके कारण मुझमें उठनेकी न तो शक्ति ही थी और न इच्छा। मुझे फिर स्मरण हो आया कि जो आतककारी घटना आज हो गई उसके बाद अब मरने, मूछित होने, बैठने और उठनेमें कोई भेद ही नहीं रह गया है--ससारकी समस्त क्रियाएँ शून्य- की गाढतम काली छायासे आच्छन होनेके कारण एक रूपमें परिणत हो गई हैं। यह बात सोचते-सोचते फिर मेरा मस्तिष्क वीरे-धीरे विह्वल हो आया, और मैं फिर एक बार मूञ्छित हो गई। दूसरी बार ऑखें खुलनेपर भी मैने अपनेको उसी अवस्थामें पाया किसीने मुझे उठाकर पलँगपर नहीं रक्खा था। इस बातके लिये मेरे मनमें दुख बिलकुल भी नहीं हुआ और न किसीके प्रति अभिमानका भान ही उत्पन्न हुआ। रात बीत चुकी थी, उजाला हो गया था। लोग उसी तरह खडे ये पुलिसके दो-एक आदमियोंकी लाल पगडियाँ देखनेमें आई। "हा राम कहकर मैं प्रबल चेष्टा करके उठ खडी हुई । 'पोस्ट मार्टम' हो रहा था। पुलिसमें शायद पहले ही सबर भेज दी गई थी। इस समय 'रिसाल्वर' को लेकर विवाद मचा हुआ या असहयोगी होनेके कारण काकाकी सभी वदूकों और रिवाल्वरों के लाय- संस जब्त किए गए थे। लायसंस जन्त होनेके बाद भी यह यहसि आया, इस बातपर निनाद चल रहा था.' - १५१ घृणामयी। - काकाने राजूके हाथका लिखा एक कागज दिखलाया। पीछे मुझे मालूम हुआ कि राजू अपने जिस मित्रसे 'रिवाल्वर' माँग लाया था उस कागजमें उसका उल्लेख किया गया था। रिसाल्वर और कागज़ पकडकर पुलिसराले विदा हुए। जो डाक्टर महाशय परीक्षाके लिये आए थे वह भी चल दिए। उन लोगोंके जानेपर काकाकी आँखोंसे दो-एक बूँद आँसूके टपक पडे । इसके पहले उन्होंने अभी तक एक बूंद ऑसूका नहीं गिराया था। जो कागज पुलिसमाले ले गए थे, उसमें राजूने क्या क्या बातें लिखी थीं-कोई वात मेरे समधमें भी थी या नहीं, यह जाननेके लिये मै विशेप उत्सुक थी । पर किसी तरह यह वात मालूम नहीं हुई। गया ! गया। सारे कुटुवसे सदाके लिये अपना सवथ तोड़कर वह अब गया । रह-रहकर मेरे मनमें केवल यही भावना गड़ती जाती थी। मैंने सोचा--- "मेरे दुश्चरित्रपर दु खित, सतप्त और उत्तेजित होनेवाला कोई व्यक्ति अब घरमें नहीं रहा । मै अब जी-भर डाक्टर साहब या अन्य किसी मुरूप पुरपके साथ आनदकी बातें कर सकती है मेरे सुखकी स्वतत्रतामें बाधा पहुंचानेवाला जो तीखा कटक या वह अब निकल गया- नित होकर पिचर सकती हूँ। पर उस कटकके निकलनेपर ऐसी तीक्ष्ण वेदना होगी, यह बात पहले कौन जानता था ? यह बात मुझे आज माधम हुई कि कटककी यह वेदना नारीके हृदयको इतनी प्यारी होती है । हाय, यदि समस्त जीवन यही वेदना मेरे मनमें गडी रहती ! अर्थी तैयार थी। माधनी दीदीके प्यारे भाईकी लाश उसके पतिका मृत्युके छठे दिन श्मशानको ले जानी पड़ेगी, यह किसने सोचा पर--- भगवान् ! मुझे क्या क्षमा मिलेगी? . -अब मैं । ।

घृणामयी। १५२ २९ य तमाम शहरमें सबर फैल गई थी। लोग समवेदना प्रकट करने के लिये एक-एक करके काकाके पास आने लगे । काका हाँ या नहींके अतिरिक्त किसीके प्रश्नका कोई उत्तर नहीं देते थे। यह न मालूम क्या सोच रहे थे, उनका ध्यान न मालूम कहाँको लगा हुआ था। पर यह निश्चित था कि उनके मुखपर शात और निर्विकार भार निराज रहा था। अचानक मैंने आश्चर्यचकित होकर देखा कि डाक्टर कन्हैयालाल प्रोफेसर किशोरीमोहनको साथ लेकर 'हिप' को हाथसे इधर-उधर घुमाते हुए तेजीके साथ चले आ रहे हैं। आरभमें जब डाक्टर साहबसे मेरा परिचय हुआ था तब इसी अवस्थामें, प्रोफेसर साहबके साथ मैंने उन्हें देखा था। तबसे आज प्रोफेसर साहबने हमारे यहाँ पधारनेकी कृपा की थी। मैं दूरहीमे डाक्टर साहबको एकटक देख रही थी । मैं सोचती थी-" यह वही डाक्टर साहब हैं जिनकी-बदौलत हमारे घरका सर्व- नाश हो चुका है । यह वही महाशय हैं जो नित्य नई-नई युवतियोंकी खोजमें रहते हैं, और यह वही हजरत हैं जिन्हें मैंने घृणाकी सनकमें एक- वार दुतकार दिया था। पर आज ऐसे घोर अनर्थके बाद भी क्यों रह-रह- कर मेरी आँखें उन्हींकी ओर लगी हैं ? क्यों उनके रूपका मोह मैं नहीं त्याग सकती ? क्यों ऐसे हत्याकाडके बाद भी मेरा जी रह-रह- कर उनसे बातें करनेके लिये आकुल हो रहा है ? भगवान् ! इस दुरा- चारिणी नारीकी अतिम गति क्या होनेवाली है !" ।

44 घृणामयी। मैंने दोनों हापोंसे अपनी आँखें ढक ली और डाक्टर साहबको न देखनेका सकल्प किया । डाक्टर साहब भीतर काकाके पास चले गए। मैं अपने कमरेमें आकर बैठ गई। पर रह रहकर मन उनसे मिलनेके लिये चचल हो उठता था। बहुत देर तक मै द्विविधामें बैठी रही। कितनी ही बार उनके पास जानेके लिये उठी, पर फिर-फिर बैठ गई। बहुत देर हो गई थी । एक अस्पष्ट विश्वास मेरे मनमें वर्तमान या कि डाक्टर साहब अवश्य ही जानेके पहले एक बार मेरे पास आकर मिलेंगे। पर मिलकर क्या करेंगे और मैं क्या बातें करूँगी, इस सवधर्मे मैंने कुछ नहीं सोचा । कुछ भी हो, आखिर मिनट तक मै उनके आनेकी -आशा अथमा आशका करती रही । पर वह नहीं आए। संध्या हुई । अधेरा होने लगा । मृत्युलोकका हाहाकार अपना दल- बल लेकर मेरे कमरेमें डेरा बाँधने लगा। कहीसे कोई आश्वासन, किसी नकारकी मात्वना मुझे नहीं मिल रही थी। ऑसू गिराना वृथा था, हाय-हत्या मचाना विफल था। सब शोक-संतप्त थे। किसीको देखकर धारण करनेकी आशा ही नहीं की जा सकती थी। सबके ऊपर चानक सारा आसमान ही टूट पड़ा था । सारे घरका चमकता हुआ र्य उठकर शून्यमें विलीन हो गया था । वह विशाल भनन जो जीवन- -उल्लास और राजनीतिक क्रियाओंकी उत्तेजनाके कारण प्रतिक्षण दोलित और जागरित रहा करता था, आज मृत्युके अंपकारतम इरसे भी अधिक शून्य जान पड़ता था। पर इस बातकी नालिश ससे की जा सकती थी! उस दिन किसीने खाना नहीं खाया। आँखें बंद करके मैं किसी -र्य ह लेटे रही।

धृणामयी। १५४ इस घोर विपत्तिमें भी मेरे अतस्तलके एक अतरतम कोनेमें यह अस्पष्ट आशा वर्तमान थी कि कालकी गतिसे धीरे धीरे एक दिन दुःखका यह घोर अधकार विलीन हो जायगा और जीवनकी नौका फिर पहलेकी तरह आनदकी तरगोंमें वहने लगेगी। धिक्कार है। । ३० दूसरे दिन सुबहको जब आँखें खुली, उस समय शायद नौ बज चुके होंगे । आलस्यके कारण मै पलंगपर लेटे-लेटे जम्हाइयों और ॲगडाइयाँ लेने लगी। अभी उठना चाहिए या नहीं, कुछ देरतक इसी द्विविधामें रही । जो कुछ होना या वह हो चुका, अब वृथा शोक करनेसे क्या होगा, यह सोचकर मनमें कुछ ज्ञानका भी आविर्भाव हो रहा था। इसी तामसिक अवस्थामें रहकर कुछ देरके वाद उठ बैठी । स्नानादिसे निवृत्त होकर बाहर बरामदेमे आई। देखा कि काकाके कमरेकी तरफ नौकर-चाकर व्यस्त होकर दौडे जा रहे है। कुछ घबराहट- सी हुई। एक नौकर उनके कमरेसे लौटकर तेजीसे दौड़ा आता था। मैंने जोरसे उसे पुकारकर पूछा- छन्नू, क्या हुआ ?" उसने कहा-" अधेर हो गया, बीवी, काका अपने पलंगपर बेहोश पड़े हैं । डाक्टर आए हुए हैं।" यह कहकर वह अपने कामको चल दिया । भगवान, यह दूसरा वनपात क्या सहन हो सकेगा!" यह सोचती हुई, लड़खड़ाते हुए पानोंसे मै काकाके कमरेकी तरफ चली। किसीने अब तक मुझे सबर नहीं दी थी। जाकर देखा लोग काकाके पलंगको घेर कर खटे है। काकाकी आँखें यद थीं। वह चित होकर लेटे थे। साँस बहुत रुक-रुककर चल रहा , १५५ घृणामयी। या। गोरा-उजला मुँह निलकुल पीला पड़ गया था और कपालकी नसें ऊपरको उछलकर साफ दिखलाई दे रही थीं। कपालकी दोनों तरफकी हड्डियोंके वीचमें गहे पड़ने लगे थे। सिविल सर्जन आया हुआ था। वह उनके वाएँ हाथकी टहनीके ऊपर मासमेंसे एक पिचकारी द्वारा रक्त निकालनेकी चेष्टा कर रहा था और जितना रक्त निकलता जाता था उसे एक झाडनसे पोंछता जाता था। मैंने ऑखोंमें आँसू भरकर उससे अँगरेजीमें पूछा----" साहब, काकाको क्या हो गया ?" वह पिचकारीसे रक्त निकालता हुआ एक बार मेरी ओर ताककर बडे शात और मधुर स्वरमें बोला— “सेरीनल हेमरेज' हो गया है। दिमागमें ज्यादा खून जमा हो जानेकी वजहसे दिमागकी कोई नस टूट गई है। यह सन 'एपोप्लेक्सी' के चिह्न हैं। इसका कारण क्या हो सकता है ?" "कई कारणोंसे ऐसा हो जाता है, पर साधारणत किसी कठिन दुखकी चिंताके कारण अधिक उत्तेजित हो जानेसे ही ऐसा हुआ करता 21 "हाथसे आप रक्त क्यों निकालते हैं इस स्थानका सबध सीधा मस्तिष्कसे ही होता है। यहाँसे खून निकालनेपर सभवत दिमाग कुछ हलका हो जाय । पर अब आशा बहुत कम है। हालत बहुत ज्यादा खराब है। I am afraid, it is too late now I am very sorry, Miss I मैं सिर्फ अपना कर्तव्य पालन कर रहा हूँ, बस । ईश्वर ही कुछ कर सकता है तो दूसरी बात है, नहीं तो अब इनके जीवनको आशा छोड़ देनी चाहिए।" , " 'घृणामयी। १५६ ओफ ! उसकी यह अतिम बात कैसी तीक्ष्णतासे मेरे कलेजेमें चुभी! मैं अब तक यह समझे थी कि यह मामूली बेहोशी है और थोडी देरमें अच्छी हो जायगी। अम्माँको भी शायद अब तक यही आशा थी । डाक्ट- रकी यह बात सुनकर उन्होंने सिर पीटना शुरू कर दिया। पर इस एक क्षणके भीतर मेरे हृदयमें एक आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया। मेरे अत्यत दुर्बल नारी-हृदयमें एक पौरुप-मय दृढता धीरे-धीरे अपना अधिकार जमाने लगी। ऐसी घोर सकटमय और निस्सहाय स्थितिमें इस प्रकारकी कठिन दृढताका होना असभव-सा या, इस कारण मुझे अपने हृदयके इस आकस्मिक परिवर्तनपर अत्यंत आश्चर्य हो रहा या। एक अज्ञात वाणी मेरे हृदयके कानोंमें कह रही थी- राजू गया, काका जानेको तैयार हैं। महाकालका भयकर कोप तुम्हारी दुर्बलताका अनुचित लाभ उठाकर तुम्हारे पापका निठुर वदला लेना चाहता है। तुम्हें पूरी तरहसे नष्ट-भ्रष्ट करके ही वह शात होगा। निष्ठुर दैवसे तुम्हें किसी प्रकारका सहारा नहीं मिल सकता । जब तक तुममें स्वय अपने पैरोंपर खड़े होनेकी शक्ति उत्पन्न नहीं होगी तब तक नियतिके चक्रमें तुम वेभाव पिसती जाओगी । यदि तुम अनत शून्यके वीचमें अपना अस्तित्व कायम रखना चाहती हो तो इसी असरपर, इसी क्षण, जागरित हो जाओ और अपनी आत्माके भीतरसे निपुल शक्ति संग्रह करके कठिनसे-कठिन विपत्तिके लिये तैयार हो जाओ । यदि ऐसा न करोगी तो तुम्हें छिन्न-भिन्न होकर गहन शून्यमें बिखर जाना पडेगा और तुम्हारी आत्मा खड-खड होकर प्रलयाधकारमें 'विलीन हो जायगी।" इस दैव-गाणीसे मेरे भीतर तत्काल एक अलौकिक और अवर्णनीय प्रेरणा उत्पन्न हो गई और अमृतका सचार होने लगा। मैंने एक लबी ,

१५७
घृणामयी।
साँस लेकर मन-ही-मन कहा-"
काका, राजूकी तरह इस पापिनीके
ऊपर कुपित होकर तुम भी बिना सूचना दिए जाते हो ? जाओ। जाओ।
इस समय निस्सहाय हूँ, मेरा कोई सहारा नहीं है, इसलिये इस समय
तुम मुझे धोखा देनेमें समर्थ हुए हो । पर मेरी मृत्युके बाद मेरी सततः
और उत्सुक आत्माको कैसे धोखा दे सकोगे ? कहीं जाओ, जन्मसे
जन्मातर तक तुम दोनोंकी खोज किए बिना मैं कभी विश्राम नहीं देगी,
इस बातका मुझे पूरा विश्वास हो गया है । इसी एक सात्वनाको लेकर
मै जीवन धारण करूँगी । जाओ, जाओ | इस पतिताका कलकित
मुख अव अधिक न देखना ही तुम्हारे लिये उचित था ।
मैंने मन-ही-मन उन्हें प्रणाम किया ।
दिन भर अवस्था प्राय एकसी रही । सॉस उसी तरह स्क-रुककर
चलता रहा। बीच-बीचमें बेहोशीकी हालतहीमें उलटियों भी होती
जाती थीं। मेरे मनमें आसिर मिनट तक यह आशा बनी थी कि शायद
किसी कारणसे फिर उनके प्राण लौट चलें । पर यह केवल दुराशा धी।
जीवनका तेल धीरे-धीरे घटता जाता था । दिया मुरझाता जाता था।
अंतको रातके समय, आठ बजेके करीन, दीप सदाके लिये निर्गपित
"
.
हो गया!
३१
काकाकी मृत्युपर देश-भरसे शोक-प्रकाशक तार ओर पत्र
अम्मकि पास आए थे और समाचारपनोंमें भी कुछ दिनों
तक इस सबमें बड़ी सनसनी-सी फैली रही। ऐसा माश्म होता था
जैसे
सचमुच उनकी मृत्युसे देशजी जो भयकर हानि हुई है उसकी
पति कदापि नहीं हो सकेगी। पर मुझे इस शिष्टाचार-जनित दिग्यास्टी

घृणामयी। १५८ शोकका अनुभव अन्यान्य प्रसिद्ध नेताओंकी मृत्युसे पहले ही हो चुका था, इसलिये मैं इस सबंध यथेष्ट उदासीन थी। आज काकाकी मृत्युको कुछ ही महीने हुए हैं पर कहीं उनका नाम न तो सुनाई देता है न कहीं पढनेमें ही आता है। देशोद्धारकी कीर्ति इतनी क्षणिक है । राजनीतिक क्षेत्रका कोलाहल इतना पोपला है ! यदि काकाके राजनीतिक व्याख्यानों और सदेशोंकी अपेक्षा लोग उनके उन्नत स्वभावसे परिचित होते तो सभरत. उनकी कीर्ति अधिक स्थायी रहती । पर मुझे इस बातका दुख नहीं था कि उनकी कीर्ति स्थायी नहीं रही । उनकी आकस्मिक मृत्युसे जो गहरा धक्का मुझे पहुँचा या उसने मेरी मृत और गलित आत्माको पुनर्जीवित कर दिया, यह बात मेरे लिये अधिक महत्वपूर्ण थी। काकाने राजूके शोकमें प्राण त्यागे ये, इस बातमें कुछ भी सदेह नहीं रह गया था। पर क्या राजूकी मृत्युसे मेरे हृदयमें चोट नहीं पहुंची थी। क्या काकाका दु ख मेरे दुःखसे बड़ा या १ सभव है । पर मैं यह बात अच्छी तरहसे जानती हूँ कि राजूफी भयकर मृत्युके कारण जो धार मेरे हृदयमें बना है यह कभी अच्छा नहीं हो सकता- -उस स्थानपर सदाके लिये नासूर हो गया है, यह वात कैसे लोगोंको समझाई जाय । काकाका घार तो उनकी मृत्यु हो जानेसे तत्काल ही अच्छा हो गया- उहें अधिक कष्ट ही नहीं भोगना पडा। साधारणत लोगोंका यह विश्वास रहता है कि जिस दु खसे आदमी प्राण त्याग देता है वही दु ख ही सबसे बड़ा होता है । पर यह भयकर भूल है । किसी दु खसे मृत्यु इस लिये होती है कि उसके कारण स्नायविक चक्रमें तकाल एक जबर्दस्त उचे- जना पैदा हो जाती है। यदि किमी कारणसे उत्तेजित व्यक्ति उस समय अपनेको संभाल सके तो फिर वह दु ख से अधिक नहीं - । - , , १५९ घृणामयी। धीरे-धीरे विस्मृतिके गर्भमें विलीन हो जाता है । पर एक प्रकारका दुख ऐसा होता है जो तत्काल तो रिशेप कष्ट-दायक मालूम नहीं होता, पर घारके पकनपर धीरे-धीरे हड्डी-हड्डी और रोम-रोममें व्याप्त हो जाता है। ऐसे दु खसे मृत्यु तो नहीं होती, पर आजीवन उसकी जलनसे आत्मा झुलसती रहती है। पुत्रकी मृत्युकै शोकसे पिताकी मृत्यु हो जानेकी घट- नाएँ बहुत देखनेमें आती हैं, पर यह बहुत ही कम सुना जाता है कि किसी माताने इस दु खसे प्राण त्याग दिए । इससे यह नहीं समझा जा सकता कि पिताका दुस माताके दु खसे बढकर होता है । माताको दु खको जो अग्नि धीरे-धीरे जीवन-भर जलाती रहती है वह मृत्युसे कई गुना भयकर होती है। राजकी मृत्युसे काका अपने प्राण त्यागकर दु खते मुक्त हो गए । पर मेरी नस-नसमें उस दु खकी जो जलन व्याप्त हो गई थी उसके आगे मृत्युका क्षणिक दु ख कितना तुच्छ था! पहले मेरा ऐसा विश्वास था कि मैं काकाको जितना प्यार करती हूँ उतना किसीको नहीं । पर अपने अनजानमें मेरा रोम-रोम केनल राजूको ही प्यार करनेके लिये उन्मुख रहता था, यह मुझे नहीं माद्यम था। अपने भाईके लिये मेरा प्रेम इतना हद्ध, अतर्व्यापी और स्थायी था, यह बात मुझे उसकी मृत्युके बाद माम हुई । अन्य सब व्यक्तियोंके प्रति मेरा चचल प्रेम धीरे-धीरे मिलीन होने लगा था, पर राजूके लिये मेरा हृदय अधिक-अधिक हाय-हाय करता जाता था। रह-रहकर मुझे यह भानना सतप्त कर रही थी कि मेरे कारण मेरे प्यारे भाईके हृदयमें जीवन- मर कॉटा गड़ा रहा और अतको उसका उन्नत और अमूल्य प्राण सरकी माया त्यागकर ससारसे उठ गया। 1 घृणामयी। ३२ क दिन मै राजूके कमरेमें एक विशेष प्रथको ढूँढ़ रही थी । अचानक एक डायरी मेरे हाथ लगी। खोलकर पढने लगी। पढ़ते-पढते मेरा चित्त उसमें इस तरहसे लग गया कि खडे-खड़े मैंने उसे पूरा पढ़ डाला । मैं उसमें ऐसी लवलीन हो गई थी कि अपने तन- बदनकी सुध भी मुझे नहीं थी। राजूके हृदयसे मैं बहुत-कुछ परिचित थी, पर इस डायरीसे उसके सबधमें जो प्रकाश मुझे प्राप्त हुआ वह अतुलनीय था । डायरीका कुछ अश आज जन-साधारणके सम्मुख पेश करती हूँ- " मेरी दिन-चर्याका क्रम कैसा अद्भुत है ! जीवनका महत् उद्देश्य मेरे सामने होते हुए भी किसी निश्चित कार्यक्रमके नियमोंका पालन मुझसे नहीं होता। जीवनकी अनत गति देखकर मेरी बुद्धि चकरा गई है। मुझे चारों तरफ केवल अधकार ही अधकार दिखलाई देता है। कहींसे कोई सहारा मुझे नहीं दिखलाई देता, कहींसे कोई उत्साह मुझे नहीं मिलता { निराशा, निरुत्साह और नियम ! मैं यह सोचकर हैरान हूँ और दुबिधामें पड़ा हूँ कि मुझे जीना चाहिए या मरना । मैं जानता हूँ कि इस निकट समस्याने अनेक युगोंमें अनेक पुरुषोंको पागल बनाया है और इसका समाधान कोई नहीं कर सका। पर यह जानकर भी मैं वेवस इसी एक भावनाले आच्छन हुआ जाता हूँ। " में चाहता हूँ कि जीवनके आनद-विलासमें सम्मिलित होकर इत दुःखमय संमारमें जहाँ कहीं जो कुछ भी पार्थिव सुख प्राप्त होना है उमे अन्यान्य मुसान्वैपियों की तरह ग्रहण करें। पर यह इन्छा मनमें उत्पन्न १६१ घृणामयी। होते ही थोड़ी ही देर बाद निविड़ घृणासे मेरा सौग आलोड़ित हो जाता है, और फिर दुखके अतल सागरमें इव जानेको जी करता है। दुखके प्रति क्यों मेरे मनमें ऐसी चाह है ' दुखकी भावनाओंमें क्यों मुझे इतना आनद प्राप्त होता है ? क्यों मैं सदा दुख, अधकार और मृत्युका ही चिंतन किया करता हूँ ? लोग उपदेश देते हैं कि मनुष्यको सदा आशान्वित होकर कार्य करते रहना चाहिए। वे कहते हैं कि जीवनमें सुख है, आशा है और आनद है, हमें आनदका ही अनुकरण करना चाहिए। पर मेरी आँखोंके सामने क्यों प्रतिपल अन्याय, अत्याचार, नीचता और स्वार्थक वीभत्स दृश्य नाचते रहते है ? क्यों हर घड़ी मेरा खून खौला हुआ रहता है । क्यों मैं अपनी बेबसीके कारण अपने दाँत पीस-पीसकर, जी मसोसकर रह जाता हूँ? क्या मनुष्यका जीवन सचमुच एक आनदमय स्वप्न है ? अथवा किसी पैशाचिक देवताका निष्ठुर अभिशाप है ? यदि आनदकी नींपर जीवनकी इमारत खड़ी हुई है तो क्यों रात-दिन दुर्वलोंकी हाय-हाय सुनकर मेरे कलेजेमें लाखो छिद्र हो गए हैं? क्यों सबलोंमें स्वार्थपूर्ण भोगके प्रति उत्क्ट लालसा देखकर घृणा और प्रतिहिंसाके भारसे मेरा दम घुटने लगता है ? क्यों रोग-शोक और हुख-दारिद्यकी कालिमासे पृथ्वीमाताका समस्त शरीर जर्जरित और उत्तप्त हो रहा है ? क्यों अतमें दुर्बलोंकी तरह सबलोंकी भी गति समान होकर रोनोंको किसी भयकर पापाणसे टकराकर किसी अधकारमय निकराल छायाका ग्रास बनना पडता है ? इन सब बातोंको देखते हुए भी कैसे मेरे नमें आनदकी उमगें हिलोरें ले सकती हैं ? . * "मै अकेला हूँ। मुझे जीवनका एक भी साथी कहीं कोई नहीं ला । काका, अम्मा और अपनी बहनोंके साथ मेरे स्नेह-प्रेमका चक्र घृ११ , घृणामयी। १६२ चल रहा है, पर क्या सचमुच हम लोग एक-दूसरेको प्यार करते हैं। मैं विश्वास नहीं कर सकता। सवको अपनी-अपनी जान प्यारी है, सब अपने-अपने स्वार्थकी पूर्तिके लिये जीवन धारण किए हैं। सभव है, कोई मुझे सच्चे दिलसे प्यार करता हो, पर मैं किसीको प्यार नहीं करता है काका, अम्माँ, दीदी, लीला, इनमेंसे अभी कोई इस लोकसे चल बसे तो मुझे कुछ भी दुःख होगा, इस बातकी आशा मुझे नहीं है। कोई मरे या जिए, जब इस संबंध में उदासीन हूँ तो कैसे किसीको प्यार कर सकता हूँ ! हॉ, रक्तका सबध अवश्य प्राकृतिक नियमोंके अनुसार कुछ- न-कुछ असर दिखलाता है। अपने घरके लोगों के साथ मै केवल इतने ही वैधनमें बँधा हूँ। " मैं इस जिन विश्वमें अकेला हूँ, इस अनुभूतिकी वेदना कैसी तीव्रतासे नित्य मेरे मर्मको विद्ध करती है। इस वृहत् संसारमें एक व्यक्ति भी मेरी यातनाओंका, मेरी भावनाओंका साझी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपने रात-दिनके सासारिक चक्रमें व्यस्त है, और मैं अकेला रात्रिके गहन अधकारमें तारोंको गिनता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि लोग मेरी इस डायरीको पढ़कर कहेंगे कि यह एक अनुभवहीन अव्याव- हारिक, आलसी व्यक्तिकी पोपली भावुकता है और कोरी कविता है। हाय मेरे भगवान, कैसे मैं लोगोंको विश्वास दिलाऊँ कि मेरा रोम-रोम केवल इसी अंधकारमय सत्यके लिये लालायित है ! २ "पापी पेटके मारसे जो लोग मुक्त हो गए हैं, खाने-पानेकी चिंता नहीं है, उनमेंसे कोई राजनीतिके घृणामयी। १६३ कोई संसारकी भलाईमें लगा है, कोई देशोद्धारमें रत है, कोई व्याख्यानों और रचनाओंद्वारा परोपदेशमें व्यस्त है। पेटकी चिंतासे मैं भी मुक्त हूँ, पर ससार अथवा देशका हित मैं किसी रूपमे भी करनेके योग्य नहीं हूँ। अपनी वैयक्तिक आत्माके अनत रहस्पके उलझनसे ही मुझे छुटकारा नहीं मिलता । एक बिंदु आत्माके भीतर वासनाओंकी कैसी- कैसी भयंकर लहरें प्रबल वेगसे प्रवाहित होती हुई क्षुब्ध गर्जनसे उद्दाम क्रीड़ा करती जाती हैं ! प्रकृतिकी यह कैसी आश्चर्यमयी लीला है ! घृणा, प्रेम, आनद, विपाद, प्रतिहिंसा, करुणा, धैर्य और उत्तेजनाका ताड़न प्रतिक्षण कैसी पिचित्रताके साथ मनुष्यके भीतर चला करता है। इन सब विकारोंसे मुक्त होनेके लिये मैं रात-दिन छटपटाता रहता हूँ, पर न मालूम किस रहस्यमय लोकसे, किस अधकारमय युगसे, कौन अचिंतनीय शक्ति मुझे मेरी इच्छाके विरुद्ध धर दवाती है !--मेरी आत्मामी सत्र स्वतत्रता पलभरमें नष्ट हो जाती है, और मैं अपनी आतरिक, अव्यक्त वासनाओं और विकारोंका क्रीतदास बन जाता हूँ। हाय, क्या अनत- काल तक मनुष्यकी वैयक्तिक आत्मा और प्राकृतिक शक्तिका सग्राम इसी तरह चलता रहेगा? क्या तात्त्विकोंका ज्ञान सन ढकोसला है ? अथवा- " , * - " मुझे देखकर बहुत-से लोग संभवत यह समझते हैं कि यह नवीन युवक कैसा भाग्यशाली है ! कैसा जगमगाता हुआ रूप है, कैमा गठीला शरीर है, कैसा अच्छा स्वास्थ्य है, और तिसपर धनी पिताका इकटौता पुत्र है और रंगमहलमें रहता है ! संभात वे लोग विचारते हैं कि एक परमा सुदरी कन्याके साथ मेरा विवाह होकर उसके साथ रंग-रहस्पमें मैं समस्त जीवन आनंदर्षक निता दंगा । ठीफ है। जीरनके मुख धृणामयी। १६४ और आनदके आदर्शके सवधमें लोगोंकी अपनी-अपनी धारणा ही तो है ! जीवनको कुछ लोग एक निष्कटक राजमार्ग समझते है जो मोटर तथा पाथेय मिलते ही आनदपूर्वक बिना किसी कष्टके तय किया जा सकता है। उन लोगोंकी धारणामें कठिनाई जो कुछ है वह राजमार्गकी दूरी और पाथेयका अभाव है। यदि केवल यही भेद होता तो कोई बात नहीं थी। पर 'क्षुरस्य धारा -वाली बात भुलाने योग्य नहीं है। वह निकट सत्य है। * पर क्या सचमुच मेरे इस भावुक कैगोर हृदयमें स्त्रीके लिये कोई स्थान नहीं है ? प्रेमकी विकट वासना क्या मेरे मर्मको कभी नहीं छेदती क्या मेरा हृदय पत्थरकी तरह कठोर और रूखे नैयायिककी तरह तालिक है ? जो लोग मेरे निकट रहकर नित्य मेरी दिन-चर्या देखते हैं उनमेंसे बहुतोंका यह भी ख्याल है कि मैं विशुद्ध तात्विक हूँ और सासारिक वातोंके प्रति एकदम उदासीन हूँ। मानवात्माको ये लोग गगाकी नहर समझते हैं जो एक सुनिर्दिष्ट, सुनिश्चित मार्गसे होकर बहती है। आत्माके सागरकी उत्ताल-तरग-मालाओंके विकराल प्रवाहसे ये लोग परिचित नहीं हैं। उन्हें खबर नहीं है कि इस सागरकी अनत-गति-सपन्न प्रलयकर मूर्तिको किसी सुनिश्चित गतिके वधनमें नहीं बाँधा जा सकता। " * * "प्रेमको लेकर ही मैंने जन्म धारण किया था और प्रेमको लेकर ही जीवन बितानेका मेरा सकल्प या । पर इस सर्पशोपी तृष्णाके निवा- रणका कोई उपाय मै इस जन्ममें नहीं देखता । कौन मेरे उत्कट वासना- मय हृदयके. सर्वसी प्रेमको स्वीकार करेगा ? कौन मेरे इस उत्तत १६५ घृणामयी। प्रेमकी आच सहन कर सकेगा। अपने इस क्षुद्र जीवनके अल्प समयमें संसारका जो कुछ अनुभर मुझे हुआ है उससे मैंने यही निश्चय कर लिया है कि अपने उत्कट प्रेमकी प्रलयाग्निको किसीके आगे व्यक्त न कर उसे अपनी ही राखसे ढकना होगा। यही कारण है कि मैं किसी भी सुदरी किशोरीके साथ अधिक हेलमेल बढाकर उसके आगे अपना हृदय व्यक्त करनेकी तनिक भी इच्छा नहीं रखता। दीदीकी कितनी ही सहेलियों नित्य हमारे यहाँ आती, जाती रहती हैं। दीदीने उन सबसे मेरा परिचय करा दिया है। पर मुलाकात होनेपर दो-एक बातें करके मैं उदासीन- ताके साथ उनसे मुंह फेर लिया करता हूँ। संसारका समस्त स्त्री-समाज मुझे एक monotonous affar. -एक वैचित्र्यहीन धधा-जान पडता है। कौन बतला सकता है कि मेरे मनको समझनेपाली स्त्री मुझे कहाँ मिलेगी। * चुका है " मेरे रूपका आकर्षण स्त्रियोंके लिये कितना प्रबल, कितना सम्मो- हक है, इसका अनुभन मुझे अच्छी तरह पर मुझे इस वातका बिलकुल गर्न नहीं है। अपने उद्दाम रूपकी प्रचड ज्वालासे मैं स्वय झुलसा जाता हूँ। प्रेमकी प्यासी कितनी ही करुण आँखोंकी मुग्ध दृष्टिने इस ज्वालामें फॉदकर, भस्म होकर जल मरनेकी इच्छा प्रकट की है। पर मैं जल मरनेकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको नहीं चाहता । मैं ऐसी स्त्रीको चाहता हूँ जो मेरे रूप और प्रेमकी अग्निको अपने हृदयकी ज्वालामें विलीन करके शात और सयत रूपसे जीवनका जटिल चक्र निभा सके। पर जिस समाजमें मैं रहता हूँ उसमें ऐसी स्त्रीका मिलना असंभव है। पीडन, निर्यातन और आत्मत्यागके अनुभव के पिना स्त्रीमें इस गुणका विकास नहीं हो सकता । केरल मावनी दीदीमें मैंने यह -- घृणामयी। अपूर्व गुण पाया है | दारिद्य और दुःखके घोर अंधकारके भीतर वह जगमगाता हुआ अमूल्य रत्न मैंने पाया है--जिन खोजा तिन पाइयाँ । इस प्रकारकी प्रकृतिकी स्त्रीके दर्शनकी उत्कट लालसा मेरे हृदयमें वर्तमान थी। भगवानने मेरी मनोकामना सफल कर दी है। मेरी भक्तिरसनिहल उच्चाकाक्षाकी सिद्धि हो चुकी है । माधवी दीदीके उन्नत और पवित्र चरणोंके तले अपने गर्षित हृदयकी अकपट श्रद्धाजलि प्रदान करने में समर्थ होनेके कारण मैं अपनेको कृतार्थ और अपने जीव- नको धन्य समझ रहा हूँ। मेरे जीवनकी सगिनी मुझे इस जन्ममें किसी प्रकार नहीं मिल सकती इसलिये इस बातके लिये रोना अब वृथा है । * * ३ "डाक्टर कन्हैयालालको मैंने जिस दिन पहली बार देखा तो उन्हें देखते ही एक अनोखी अप्रिय अनुभूतिसे मैं सिहर उठा। मुझे ऐसा मालूम हुआ जैसे जो एक विशेप वेदना कितने ही जन्म पहले मेरे हृदयके तल-प्रदेशमें बलपूर्वक गाड़ दी गई थी, वह फिर आज नए सिरेसे जाग पड़ी-जैसे मेरे जन्मजन्मातरका बैरी आज बहुत दिनोंके बाद मेरे प्राणोंकी घातमें आ पहुँचा है। क्यों मुशे ऐसा प्रतीत हुआ ? उनसे परिचय होनेके पहले ही क्यों मेरे दिलमें यह बात जम गई 2 क्या पूर्वजन्मका सस्कार इसीको कहते हैं ! समन है । पर कुछ भी हो, डाक्टर साहबके प्रति घृणा और क्रोधका भार मेरे भीतर दिन-दिन बढ़ने लगा है और साथ ही एक अनोखे भयका संचार भी होने लगा है।

१६७ घृणामयी। "जिस व्यक्तिको मै जी-जानसे घृणा करता हूँ उसे दीदी क्यों इतना चाहती हैं ? भगवान! क्या भाई और बहनकी प्रकृतिमें इतना भेद हो सकता है ? जिस दीदीके साथ बचपनमें खेल-कूद करके मैंने आनद- के दिन बिताए हैं, जिसके साथ मैं दो-चार साल पहले तक वेधड़क होकर, बिना किसी सकौचके, हिलमिलकर रहा करता था, स्नेहपूर्वक कलह किया करता था, जिसके हृदयको मैं अपने हृदयसे बिलकुल भिन्न नहीं समझता था, उसकी प्रकृतिसे मेरा भेद कुछ वर्षोंसे धीरे-धीरे बढ़ता चला गया है और अब यह भेद चरम सीमाको पहुँचना चाहता है। "डाक्टरके किस गुणपर दीदी मुग्ध हुई हैं ? उसमें ऐसी कौनसी विशेषता है ? सौंदर्य 2 वाक्-चातुर्य : सभव है । पर क्या एक उन्नत पुरुपका आदर्श इन्हीं दो गुणोंमें समाप्त हो जाता है । इस शख्समें पुरुषन्यकी दृढ़ता, गाभीर्य और भावावेश कहाँ पाया जाता है ? उसमें पाई जाती है केवल चापलसी, तुच्छ व पोपले ज्ञानका दम, स्वार्थ- सिद्धिकी बुद्धि और उच्चाकाक्षाका पाखड । उसके स्वभावकी नम्रतामें निर्लज्जता भरी है, उसके सुमधुर शिष्टाचारमें नीचता पाई जाती है, उसकी चतुराईकी बातोंमें घृणित दर्पकी दुर्गंध आती है। इस निर्लज्ज ढोंगसे भरे आदमीको मैं अपनी समस्त अतरात्मासे घृणा करता हूँ। मैं कितना ही अपने मनको समझाता हूँ कि उसके प्रति बिलकुल उदासीन रहूँ, पर असह्य घृणा रह-रहकर उमड पडती है और मेरे सारे हृदयको तिक्त और विपमय कर देती है। हे भगवान ! ऐसे आदमीके साथ दीदीको अपने एकान कमरेमें हँसी-खुशीकी बातें करते देखकर मेरा हृदय जलकर भस्म हुए विना कैसे रह सकता है ? हाय, मेरा कलेजा रात-दिन असह्य आँचमें मुनता रहता है, और मेरी दीदी जो मुझे घृणामयी। १६८ बचपन में इतना प्यार करती थी, यह बात देखते हुए भी नहीं देखना चाहती। उसे आज मेरी परवा बिलकुल भी नहीं है। इसी लिये मैं कहता हूँ मनुष्यका प्रेम स्वार्थजनित है, भाई-बहनका प्रेम क्षणिक है, माता-पुत्रका प्रेम झुठा है और पति-पत्नीका प्रेम ढोंग है । * * इस डाक्टरका साहस कितना भयकर है ! वक्त-वेवक्त वह वेधड़क दीदीके कमरेमें चला जाता है। दीदीके मनमें अथया व्यवहारमें भी किसी प्रकारका सकोच नहीं जान पडता और काका व अम्माँ इस सबधमें बिलकुल उदासीन है। उदासीन ? नहीं । अम्मा तो चाहती है कि डाक्टरके साथ दीदीका हेलमेल बढे। भगवान ! औरतोंको तुमने कैसी मनोवृत्ति दी है ! डाक्टरके प्रति विद्वेष और द्रोहके कारण कभी- कभी मैं यहाँ तक सोचने लगता हूँ कि स्त्री-जातिमें पर्देके प्रचलनपर जिस व्यक्तिने पहले-पहल मानन-जातिके सम्मुख प्रस्ताव पेश किया होगा चह बड़ा भावुक, दूरदर्शी, और सहृदय रहा होगा। मैं अच्छी तरहसे जानता हूँ कि पर्देकी प्रथा अत्यंत हास्यास्पद और नाशकारी है, पर चीच-बीचमें, इच्छा न होनेपर भी, इस प्रकारकी कुभावना मेरे मनमें उत्पन हो जाती है। मैं विवश हूँ, मै लाचार हूँ, मेरी मति दिन-दिन भ्रष्ट होती चली जाती है। , दीदीके प्रति मेरे मनमें क्या भार रहता है, क्रोध, घृणा अथवा प्रतिहिंसा : निश्चयपूर्वक कुछ नहीं बतला सकता। शायद इन तीनोंका सम्मिश्रण वर्तमान है। पर बीच-बीचमें, जब मैं दीदीको अकेले अपने कमरेमें उदास और एकांत-चिंतामें ममतापा हूँ, तत्र हृदयमें न मालम १६९ घृणामयी। कौनसी पुरानी वेदना जाग पड़ती है और वेवस मेरी आत्मा करुणा और स्नेहसे गद्गद हो जाती है। किंतु डाक्टरको उसके कमरेमें देखते ही फिर यही घृणा और प्रतिहिंसा उमड़ी पड़ती है। मेरा सारा शरीर काँपने लगता है और मैं अपने कमरेमें जाकर छाती पीटकर लेट जाता हूँ। " माधवी दीदीके यहाँ दीदीको इस ख्यालसे ले गया था कि उसे कुछ चैतन्य होगा-माधवी दीदीकी अतरात्माका तेज उसपर कुछ असर करेगा। पर अब समझ गया हूँ कि ऐसा होना असंभव है। , ४ "माधवी दीदीके पति आते ही सख्त बीमार पड़ गये हैं। मेरी इस जगज्जननी दीदीके मनमें कैसी वेकली समाई हुई है ! संसारकी यह माता अभी तक अपने आतरिक वैभव, अपनी आतरिक शक्तिसे परिचित नहीं है। देवि ! जगत्को छलनेके लिये ही क्या तुमने अपना यह करुणामय मायानेश धारण किया है। क्या तुम अपना विकराल कालिका-रूप जान-बूझकर ससारकी आँखोंसे छिपाए बैठी हो ? संतानके पालनमें रत रहकर तुम सतानके विवसका सुनिश्चित कर्तव्य कब तक भूली रहोगी ४ अपना दृढ़ और कठोर रूप तुम क्यों इस कठिन स्थितिमें व्यक्त नहीं करती : क्यों अपनी अन्यंत सुकुमार और कोमल करुणासे मेरा इदय पिघलानेमें लगी हो "दीदीकी निर्लज्जता इस हद तक पहुंच गई है कि अन रातको की वह डाक्टरके साथ सिनेमा और थियेटर देखनेमें गायन रहती है।

जिससे पुण्यकी अविरल धारामें प्रवाहित कर दिया था। मुझे इस जीवनमें घृणामयी। १७० क्या समझकर, किस साहसके बलपर यह ऐसा करती है ? क्या वह मेरे विद्वपकी आगमें आहुति डालकर अपनी प्रतिहिंसाके कारण सारे कुटुमको फूंक देना चाहती है 2 अच्छी बात है। जब विधाताकी इच्छा ही यही है कि सारा कुटुब अत्यत दुर्गतिके साथ विनाशको प्राप्त हो तो उसकी यह इच्छा सफल हो, मैं भी यही प्रार्थना करता हूँ। दीदी, मेरे कलेजेको और भी तेज ऑचमें भूनकर उसके जितने टुकडे चाहो कर डालो, सारे घरकी अतरात्मामें विध्वंस मचा दो, और प्रलयकी ज्वालामें सबको जलाकर हास्य करो । जो जी चाहे मन भरके कर डालो, तुम्हारे दिलमें कोई अरमान बाकी न रहने पारे । " माधवी दीदीके पतिको पृथ्वीकी कोई शक्ति नहीं बचा सकी। निखिल-सहारक रुद्रकी जव यही इच्छा थी, तब उसके विरुद्ध कौन अपना बल काममें ला सकता था। मैंने सोचा था कि इस घटनासे माधवी दीदी वजाहत होकर बावली-सी बन जायेगी। पर मैं मुर्ख इतने दिनों तक उनकी प्रकृतिकी दृढ़तासे परिचित नहीं हुआ था । कितनी शात करण और साथ ही ज्रकठिन दृढ़तासे उन्होंने इस घोर सकटके समय भी अपना गाभीर्य कायम रक्खा ! पतिकी मृतावस्थाके समय कैसी अलौकिक आभासे उनका मुखमडल प्रदीप्त हो रहा था ! अपने चिर- जीवनकी इस आराध्य देवीको मैंने अत्यत श्रद्धाके साथ मन-ही-मन प्रणाम किया। मेरे हृदयके भीतर भक्ति और श्रद्धाका इतना रस छिपा हुआ है, यह मैं नहीं जानता था। माधवी दीदीने उद्गमके ठीक स्थान- पर आघात किया था इसलिये उस गुप्त रसने प्रबल वेगसे उमड़कर मुझे इतना ही संतोष है कि स्त्री-जीवनको अनेक चचलता और दुर्बलताओं के घृणामयी। दलदलसे होकर जीवनके पथमें जाते हुए मुझे अतको नारीका यथार्थ स्वरूप दिखलाई दिया है। " श्मशानमें जाकर चिता तैयार करके उसके ऊपर लाश रखकर जब हम लोग उसमें आग जला चुके तो यकावटके कारण सब वालके ऊपर बैठ गए । आसमानमें वादल छाए हुए थे। सर्वत्र एक अरसाद- जनक उदासी व्याप्त थी। चिताग्निकी लपटें धीरे-धीरे उग्र रूप धारण करती जाती थीं। मैं बहुत देर तक निर्विकार भावसे इन लपटोकी वहार देखता रहा । धीरे-धीरे लाशका मुँह विकृत हो गया और नीचे पैरोका मास, हड्डी और चर्बी जल-जलकर, पिघल पिघलकर नष्ट-भ्रष्ट हो गए। ज्वालाओंका भीपण रूप सॉय-भाय करके उनतर होता चला गया । " ज्ञानी लोग यह उपदेश बरावर देते आए हैं कि मनुष्यके नश्वर शरीरका ख्याल न करके उसकी आत्मापर ध्यान दिया करो। पर लाख यह उपदेश सुननेपर भी मनुष्यके सुदर शरीरके प्रति जो एक मोह- जनित संस्कार अतरात्मामें वद्धमूल रहता है वह सहजमें जाना नहीं चाहता । इस कारण चिताग्नि जन इस अनुपम देहको विकृत कर देती है तो इस वीभत्स दृश्यसे हृदयमें एक प्रकारकी उत्कट भीति उत्पन्न हो जाती है। मेरा भी यही हाल था। यह दृश्य देखकर भय, चिंता और आध्यात्मिकताकी तरगें रह-रहकर मेरे चित्तको आदोलित कर रही थीं। स्मशान-वैराग्य प्रसिद्ध ही है। मैं सोचने लगा-'एक दिन मेरे अपरूप सौदर्य-मडित शरीरका भी यही हाल होगा । मर्मर-प्रस्तरकी सजीन मूर्तिके समान मेरा सुदर, सुडोल, सुगठित और चलता-फिरता हुआ शरीर निकृत, विगलित और गतिहीन होकर जिस अवस्थाको प्राप्त होगा उसका , 'घृणामयी। १७२ अनुमान ही नहीं किया जा सकता । नाना रसों और आवेगोंसे प्रतिक्षण प्रकपित रहनेवाला मेरा हृदय न मालूम किस शून्यमें विलीन हो जायगा और नाना चिंताओंसे आच्छन रहनेवाला मेरा चचल मस्तिष्क बिलकुल निश्चल और अचेत पड़ जायगा। विपुल प्रेम और आनंदके भावसे फूली हुई आत्माका भी अस्तित्व रहेगा या नहीं इसमें भी संशय है। किस अधकारके विकराल जबडोंका ग्रास बनना होगा, यह मालम नहीं। तब कैसा रहेगा ? इस भीपण, अनिश्चित अधकारसे मिलित होनेकी उत्कट लालसा यदि किसीमें पाई जायगी तो वह मेरे हृदयमें व्याप्त हिंसा, और घृणाके भावोंमें । मेरे ये भार मुझे अनतकाल तक अनत अंधकारमें निलीन रहनेको वाध्य करेंगे।' विद्वेष " सोचते-सोचते मेरा दिल भयके कारण जोरोंसे धड़कने लगा। मैं बैठा नहीं रह सका और उठकर गगाके किनारे-किनारे टहलने लगा। गगाका शात और स्निग्ध प्रवाह कैसी सुमधुर प्रसनतासे, अविरल गतिसे आगेको चढता चला जाता था। कुछ देर तक मैं अन्यमनस्क-सा होकर टहलता रहा । धीरे-धीरे मेरा चित्त कुछ स्थिर हो आया और एक सुनि- श्चित सकल्प मेरे मनमें गड गया। मैंने सोचा- किसी तरहसे भी हो, विद्वेप और घृणाके भारको मनसे उखाड़ फेंकना होगा और मृत्युके रोमाचकारी आलिंगनके लिये हर घड़ी तैयार रहना होगा । डाक्टर कन्है- यालालकी सूरतसे मुझे चिढ़ है और दीदीके प्रति मेरे मनमें विद्वेष भरा है---मौतके द्वारमें इन भागोंको लेकर यदि मैं जाऊँगा तो मेरा आत्म-सम्मान जाता रहेगा। प्रेम और आनदसे जब मैं भरपूर रहूंगा. तो मृत्यु मुझे कितना ही टवारे, मेरी गर्षित आत्माको कभी दमन करनेमें समर्थ नहीं - होगी।'

घृणामयी। " मैंने अपने मनको यह विश्वास दिलानेकी चेष्टा की कि डाक्टर कन्हैयालाल बडे सज्जन और प्रेमी आदमी हैं। यदि वह बदलेमें मेरी दीदीका प्रेम चाहते हैं तो कोई अन्याय नहीं करते और यदि दीदी उनके गुणोंको देखकर उन्हें चाहती है तो उसे इस वातका पूरा अधिकार है। यदि ऐसा है तो मैं क्यों वृथा इस वातसे जलता हूँ ? स्त्री-पुरुषका पार- स्परिक प्रेम स्वाभाविक है और अपनी दीदीकी प्रसन्नता देखकर मुझे भी हर्प होना चाहिए । किसीके दोप और दुर्बलतापर विचार करनेका मुझे कोई अधिकार नहीं है। जो व्यक्ति जिस वातपर प्रसन्न रहता है वही उसके लिये अच्छा है। सभी मनुष्योंकी वृत्तियाँ एक-सी होती हैं। डाक्टर कन्हैयालालमें और मुझमें कोई भेद नहीं है। इस प्रकार मैंने अपने मनको समझाया । वीरे-धीरे मेरी आत्मामें एक उद्दीप्त गरिमा जाग उठी और मैंने अपनेको तुच्छ हिंसा और विद्वपके नावसे बहुत ऊँचा उठा हुआ पाया । निजयके उल्लाससे मेरा हृदय नगमगा उठा और एक अपूर्व आध्यात्मिक स्फूर्तिसे मेरे पख उडनेके लेये फड़फड़ाने लगे। मैने सोचा-'रात-दिनकी दुश्चिताओंमे मुक्ति टाकर यदि इसी प्रकार आनढकी उमगमे मै सदाके लिये अपनी दो नाँखोंको शीघ्र मुंद सकता तो कैसा अच्छा न होता ! इस समय मेरे नमें किसीके प्रति घृणा नहीं है, किसीके प्रति द्रोह नहीं है। मेरी नारमा समस्त प्राणियोंको, समस्त विश्वको सुमधुर प्रेमसे आलिंगन कर ही है । इसी अवस्थामें यदि मेरी मृत्यु हो जाती तो मौन भी मुझे स्नेह गले लगाती ।" बहुत देर तक इस प्रकारकी भावनाओंमें निमग्न रहनेके बाद जन शे चैतन्य हुआ तो मुझे अपनी स्थितिपर तरस आया। मैंने सोचा- घृणामयी। १७४ 'इतनी छोटी अवस्थामे, जब मै यौवनके द्वारपर ही अच्छी तरहसे नहीं पहुँचने पाया हूँ, इस प्रकार जीने-मरनेकी चिंताओंमें मग्न रहनेकी क्या ऐसी आवश्यकता मुझे पड़ी थी ! ससारमे इतने आदमियोंको मै रात- दिन जीवनका आनद लूटते और हँसते-खेलते हुए देखता हूँ, साठ-साठ सत्तर-सत्तर वर्पके बूढोंको जीवनकी सभी बातोंमें दिलचस्पी लेते हुए देखता हूँ, तब अपनी इतनी अल्पावस्थामें मैं क्यों जीननसे उकता गया हूँ? क्यों मै अपनेको अकेला, स्नेह-बचित और निरुपाय समझ रहा “ फिर सोचा- मैं अकेला ही तो है, इसमें सदेह ही क्या है ! श्मशानसे लौटकर जब मैं घर जाऊँगा तो कोई वहाँ मेरी कुशल पूछने- चाला नहीं है, कोई दिलासा देनेवाला नहीं है। दीदी अपने ही सुख- दुखकी कल्पनामें व्यस्त रहती है, अम्माँ घरमें नहीं है, और यदि घरमें होती भी तो कभी भूलकर भी मेरी मानसिक वेदनाओंका हाल न पूछती। काकाको राजनीतिक भावनाओंसे बिलकुल फुर्सत नहीं रहती, इसलिये उन्होंने कभी मुझसे यह न पूछा कि मेरे भावी जीवनका उद्देश्य क्या है और मैं आजकल किन चिंताओंमें लगा हूँ। लीला मुझे थोड़ा-बहुत प्यार करती है, इसमें सदेह नहीं, पर वह अभी बच्ची ही है, उसकी । समबेदनाका कोई महत्व नहीं है। ऐसी हालतमें मेरे लिये जैसा श्मशान है घर भी वैसा ही है । ' मेरी आँखोंसे दो-एक बूंद ऑसूके टपक पडे । मैंने बलपूर्वक अपनी दुर्बलताको दमन किया । " श्मशानसे लौटकर कुछ देरके लिये मावनी दीदीके पास बैठा रहा । पर उनके साथ बैठनेसे मेरा सिपाद ही बढ़ा, किसी प्रकारका उत्साह प्राप्त नहीं हुआ।

घृणामया । जब घर पहुँचा तो अँधेरा हो गया था। दीदी आज अकेली और उदास बैठी होगी, इस ख्यालसे उसीके पास जाकर कुछ देर तक बैठे रहनेका विचार किया। उसके प्रति आज मेरे मनमें करुणाका भार जागरित हो गया था। कमरेके पास जाकर मैंने बाहरसे पुकारा-'दीदी !! कमरेके भीतर अधकार छाया हुआ था और बत्ती नहीं जलाई गई थी। कुछ आगे बढकर उस प्रायाधकारमें मैंने जो दृश्य देखा उससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए, हाथ-पान कॉपने लगे और दिल वेतहाशा धड़कने लगा। यदि वही दृश्य मैं किसी अन्य समय देखता तो इतना उत्तेजित न होता। पर सायकाल और रात्रिके बीचका यह समय अत्यत विकट था। मैंने देखा कि मेरी दीदी अपनी चारपाईमें डाक्टरकी गोदमें बैठी हुई थी और अब मुझे देखकर उसने घबराहटसे उठनेकी चेष्टा की । मैं विभ्रांत होकर लडखडाते हुए पैरोंसे उसी दम अपने कमरेकी तरफ चले चला। मुझे चक्कर आ रहा था और सारा मकान और सारी पृथ्वी मुझे घूमती हुई मालम होने लगी। " कमरेमें पहुँचकर मैं बिलकुल मृतावस्थामें लेट गया । एक तो दिन-भरकी थकान और दुश्चिताएँ और तिसपर यह दृश्य ! हिस्टीरिया- अस्त औरतकी तरह मै प्रनल वेगसे अपने हाथपाँर छटपटाने लगा। बहुत देर तक मैं वेचैन होकर करवटें बदलता रहा। जन धीरे-धीरे कुछ स्थिर हुआ तो निश्चित सकल्पसे मेरा हृदय उल्लसित हो उठा। जिस बातकी इच्छा मुझे बहुत दिनोंसे थी, और, नाना कारणोंसे, जिसके लिये मैं आज तक हिचकिचा रहा था, उसकी पूर्तिके समधमें आज मेरे हृदयसे सब दुविधाएँ दूर हो गई और मैंने उसके लिये शुद्ध संकल्प कर लिया। मैंने आत्महत्या करनेकी ठान ली । * * घृणामयी। १७६ " मैने उपनिपत् और गीताका यथेष्ट अध्ययन किया है और आज एक बार फिर उनपर विचार किया है। मैं जानता हूँ कि आत्महत्या करना महामूर्खता और कायरता है। पर जब मनुष्य विशेप-विशेप स्थितियों के जालमें जकड़ जाता है तो उसका ज्ञान उसे लेशमात्र सहायता नहीं देता । मुझे अब आत्महत्या करनेसे स्वर्गका देवता भी नहीं रोक सकता, कोई ज्ञान, कोई उपदेश मुझे निवारण नहीं कर सकता, अब जीना मेरे लिये बिलकुल असभव है। आत्महत्याकी जो उल्लासमय उमग,रात-दिनकी हाय-हाय और दुर्भाग्नाओंसे मुक्ति पानेकी जो उत्कट लालसा मेरे मनमें समा गई है उसके सामने गीताका मोक्ष नाचीज़ है। मैं जानता हूँ कि लोग कहेंगे-' मरके भी अगर छुटकारा नहीं मिला तो क्या करोगे। मर जानेसे ही क्या तुम मुक्त हो जाओगे ?' हाय, जिसपर नहीं बीती है वह आराम कुर्सीपर बैठकर ज्ञानका सासा उपदेश दे सकता है, तोफा तर्क कर सकता है ! " दीदी 1 तुम्हें अगर यही मजूर है तो मै चला । अब तुम्हारे पथमें कोई कटक नहीं रहा, अबसे कोई तुम्हारे निद्व सुखमें वाधा नहीं पहुँ- चावेगा । आज तक तुम्हारे दिलको मैने जितना दुखाया है, उसके लिये मन-ही-मन क्षमा चाहता हूँ। काकाके आनेकी राह देख रहा हूँ। कल- परसो जन काका लौट आयेंगे तब सन समाप्त हो जायगा । 1 बहुत सभर है, आज काका वापस चले आयेंगे। आज सुन- हको फिर ईशोपनिपत् पढा। आत्महत्या करने जा रहा हूँ, पर उपनि- पत् पढनेकी लालसा नहीं जाती। कैसी अद्भुत प्रवृत्ति है ! मेरा यह विश्वास प्रतिक्षण बढ़ता जा रहा है कि आत्महत्या करनेपर मेरी

१७७
घृणामयी।
आत्माको अपने विकासके लिये कोई उन्नत और आनदमय पारिपार्धिक
अवस्था प्राप्त होगी। यह विश्वास चाहे कितना ही भ्रात हो, पर यह
मेरे मनमें जम गया है।
.
वाहर
नौकरोंने बड़ा शोर मचाया है। उनकी बातोंसे मालूम होता
है कि काका आ गए हैं । मोटर भी आ पहुँचा है। अच्छा ही हुआ।
लीला एक बार मेरे कमरेमें आई थी, पर मैं उससे बोला नहीं। उपनि-
-पत्की जो पुस्तक में पढ़ने लगा था उसे पढ़ता ही चला गया। न
मालम क्यों, आज मैं लीलाके प्रति भी यथेष्ट उदासीन हो गया हूँ।
काका
और अम्माँसे मिलनेकी इच्छा मैं नहीं रखता। इसलिये
पहले ही यहाँसे निकल जाना चाहता है। देखू, कहीं किसी मित्रके
ास 'रिनाल्वर' मिलता है या नहीं।
*
"बड़ी मुश्किलसे, बहुत खोजके बाद, एक जगहसे रिवाल्वर प्राप्त
हुआ है । प्राय आधी रात बीतनेपर घर पहुँचा हूँ। इस आशकासे
जल्दी नहीं आया कि घरके लोगोंको मेरी करतूत कहीं पहले ही मालम
हो जाय।
सन
ठीक है। मैं तैयार हूँ। हे सारे विश्वको एकात्मा ! मुझे
क्षमा करना।
*
*
टायरी पढ़ते-पढते आँसुओंकी अविरल धाराओंसे मेरे गाल न जाने
सबसे भीगे हुए थे, मुझे मालूम भी नहीं होने पाया--मैं इतनी तन्मय
,

घृणामयी । १७८ हो गई थी कि यह बात जानने भी न पाई । जब पढ़ चुकी तो मैंने एक लबी साँस ली और राजूझी आत्मासे क्षमा-भिक्षा और करुणाकी प्रार्थना करने लगी। ३३ एक दिन था जब मैंने माधवी दीदीके यहाँ फर्शपर बैठनेमें अपना अपमान समझा था । पृथ्वी-माताके ससर्गसे मैं इतना परहेज रखती थी! आज मेरा भाई राख वनकर श्मशानके धूलि-कणोंसे एकमाण होकर पड़ा था ! मैंने मनमें अपने-आपको सबोधित करके कहा--" हतभा- गिनी, जब तक तू अपने दर्प, अपने मान, अपने बड़प्पन और अपनी आत्माको मिट्टीमें मिलानेमें समर्थ न होगी तब तक तेरे पापका प्रायश्चित्त नहीं होगा। भ्रष्टा अहल्या जिस प्रकार गौतमके शापसे वायुभक्ष्या, निरा- हारा और भस्मशायिनी वनी थी, उसी प्रकार तुझे भी अपने भाईकी पवित्रात्माकी तरह शुद्ध होनेके लिये कठिन नियमोंकी आँचमे अपनी आत्माको भस्म करना होगा—ससारके दुःखित और तप्त जनोंकी सेवा करनी होगी, दरिद्रताको अपनाना होगा, पृथ्वीको धूलिको नित्य अपने मस्तकपर धारण करना पड़ेगा। दीर्घ-जीवनके अभ्याससे जब शुद्धि हो जायगी तब मृत्युके बाद दूसरे जन्ममें यदि किसी रूपमें राजूको पा सकी, तो उमकी वहन कहलाए जानेके योग्य तू हो सकेगी।" उठते, बैठते, सोते, जागते मुझे केवल राजूझी ही भावना व्याकुल करने लगी। क्षण-क्षणमें मेरे मानसमें केवल उसीकी मूर्ति जागरित होकर मुझे उन्मना करके एक अत्यत तीक्ष्ण वेदनासे मेरा कलेजा छेदती जाती थी। पर यह वेदना मुझे बड़ी प्यारी लगती थी। यदि मैं इस' वेदनाका अनुभव न करती तो बहुत सभव है मेरे प्राण कभी न टिकते । प्रायश्चित्तके लिये मेरे प्राणोंका टिकना परमानश्यक था। , १७९ घृणामयी। अपने एकसे-एक बढ़कर फैशनेविल कपड़े फेंककर मैंने विशुद्ध खदर धारण कर लिया। यही नहीं, नित्य दो घटे बैठकर चरखा चला- नेका नियम भी मैंने रख लिया । इसलिये नहीं कि इससे देशका उपकार होगा या समाजकी सेवा होगी। अपनी पतितात्माकी शुद्धिके लिये ही मैने यह व्रत ग्रहण किया था। कॉलेज जाना छोड़ दिया। दीन, दरिद्र, भूखे और कगले व्यक्तियोंको सप्ताहमें एक दिन भरपेट भोजन और कुछ दक्षिणा देनेका नियम भी रक्खा । कुछ दिन तक प्रकारसे दिन बीते और मेरी आत्माको शान्ति प्राप्त होने लगी। डाक्टर साहब काकाकी मृत्युके बाद केवल शोक प्रकाश करनेके लिये एक दिन अम्मकि पास आए । तबसे उन्होंने बिलकुल ही आना छोड दिया। उनके न आनेसे मुझे और भी अधिक दृढ़ता प्राप्त हुई और व्रत निर्मित चलने लगा । अपने नए जीवनके वैराग्यकी सफल. तासे एक अपूर्व शातिका सयत और स्निग्ध आनद धीरे-धीरे मेरे हृदयमें जागरित होने लगा । प्राचीन कालकी तापसी महिलाओंके उन्नत चरित्रकी महत्तासे मैं धीरे-धीरे परिचित होने लगी। कुछ दिन तक यह स्थिति रही एक दिन मैं अन्यमनस्क होकर अपने भवनके फाटकके पास खडी थी और उदासीनताके साथ सड़कसे होकर आने-जानेवाले आदमियों, मोटरों ओर गाडियों को देख रही थी। अचानक मैने देखा कि डाक्टर कन्हैयालाल एक मोटरमें मेरे कॉलेजकी सगिनी कमलिनीको साथ लिये चले जा रहे है । मैं पथरकी मूर्तिकी तरह स्तब्ध रहकर दोनोंकी ओर ताकती रह गई । कमलिनी मुझे देखकर मेरे जले हुए कलेजेमें नमक छिड़कनेके लिये मद-मद मुस्कुरा रही थी। डाक्टर साहमने लजा या अन्य किसी कारणसे मुंह फेर लिया था। जर - घृणामयी। १८० तक मोटर मेरी आँखोंसे ओझल न हो गई, मैं उसीकी ओर आँखें लगाए रही। जब मोटर अतर्धान हो गई तो मेरा यम-नियम सब भग हो चुका था। प्रतिहिंसाकी प्रलयाग्नि फिर एक बार मेरे हृदयमें धधकने लगी। सिरमें झनझनाहट पैदा हो गई थी और चक्कर आने लगा था। मैंने फाटककै एक किनाडका डडा पकड़ लिया। राजूकी मृत्युकी कटकमयी वेदना और काकाकी मृत्युके शोककै अतीत एक अनोखी भावना मेरे मनमें उत्पन्न हुई। सुख-दु ख, जीवन-मृत्यु, पाप-पुण्य, और स्वर्ग-नरक, सब मेरे लिये एकाकार हो गए और शून्यका भैरव हुकार मेरे दोनों कानों में गूंजने लगा । कोई उपाय, कोई गति, कोई मार्ग न सूझनेपर उत्कट निराशाके वश होकर मैंने सोचा--" यदि मैं भले घरकी महिला न होकर ताडका राक्षसी होती तो उन दोनोंकी छाती फाडकर उन्हें -मोटरसहित निगल जाती !" . " मेरा व्रत भ्रष्ट हो गया था । अव मेरा जीना भी व्यर्थ था और मरना भी । मैं केवल आकुल होकर भगवानसे प्रश्न करने लगी दयामय, मुझे बता दो कि मैंने किसी पूर्व जन्ममें स्वाभाविक नियमोंका पालन करके नारीका जीवन पूर्ण रूपसे बिताया या नहीं ? अथमा वर्तमान जीवनकी तरह मेरे सभी पूर्ण जीवन भी अर्थहीन, और लक्ष्यभ्रष्ट होकर व्यर्थताके गहन गहरमें विलीन हो गए।" m ४ समाप्त।

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Granamai

Author
Joshi,ilachandra
Title
Granamai
File name
Granamai
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2011/01
Publisher
Hindi Granth Ratnakar Karyalaya Bombay
Language
Sanskrit
Pages
182
Library
Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546606
Barcode
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Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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