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Bruhadyavanajathakam
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ka ॥ श्रीः ॥ बृहद्यवनजातकम्। हि मुरादाबादनिवासि पं० ज्वालाप्रसाद मिश्रकत- मापाटीकासमेतम् । मंगाविष्णु श्रीकृष्णदाम, " ARE मालिक "लक्षपीकटेश्वर" स्टीम्-प्रेत, कल्याण-मुंबई. संवत् २०१०, शके १८०५. 1953 CEO मुद्रक और प्रकाशक- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, मालिक- लक्ष्मीवेंकटेश्वर १४..-स्टीम- प्रेस, कल्याण-डई. बलू १८६७ के भाक्ट २५ के व मुजब रजिष्टरी सस हा प्रकाशकने अपने भाधीन रक्खा है। with प्रस्तावना सब संसारमें ज्योतिष शास्त्रका चमत्कार प्रसिद्ध है, बडे २ महा विद्वान् महर्षियोंने इस शास्त्रके अनेक ग्रंथ निर्माण किये हैं। यह एक ऐसा शास्त्र है कि, जिसके द्वारा भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालोंके वृत्तान्त जानेजाते हैं, यदि पूर्ण ज्योतिषी हो तो कैसा भी कुतकी हो उसको अपनी विद्यासे विश्वास करा. सकता है । जबतक इस देशमें ज्योतिषके सिद्धान्तपन्य लब्ध होते थे और पूर्ण पण्डित इस विद्याके पायेजाते थे तबतक जो कुछ वे गणित द्वारा फल कयन करते थे उसमें किसी प्रकारका फेरफार नहीं होता था, कालक्रमसे सिद्धान्त अन्योंका लोप होने लगा गुरुमुखसे विद्या उपार्जन करने में आलस्य आया सिद्धान्त ग्रन्योंको छिपानेकी परिपाटी चली, शिष्योंने नम्रता त्यागी और दीर्घ काल परिश्रम न करके कार्यवाहीमात्रसे वही अपनेको कृतकृत्य मानने लगे तबसे ज्योतिष शाखमें कुछ न्यून- बासी आगई और मनुष्यों को भी कुछ कुछ विराग होने लगा तथा कोई २ आक्षेप भी करने लगे, परन्तु “ सबै दिन नाहि बरोबर जात" इस वाक्य के अनुसार अंग्रेजी सरकारके राज्यमें कुछ २ फिर विद्याकी बुद्धिके यल किये जाने लगे और यंत्रालयोंसे अनेक ग्रन्थ प्रकाशित होने लगे तबसे प्राचीन ग्रन्थों की खोज होने लगी और उनका प्रकाश होने लगा जितने ग्रन्थ चाहिये उतने प्रकाशित नहीं हुए हैं तथापि उपयोगी ग्रन्थ प्रायः छप चुके हैं मैं आज जिस ग्रन्थके विषयमें लिखें रहा हूं वह यवनजातक का छोटासा ग्रन्थ छप चुका है परन्तु यह उससे बहुत बड़ा है और इसके फल बहुत चमत्कारके हैं इसके अनु- सार जन्मपत्रका फल कहनेसे सुननेवाला मोहित होजाता है एक एक- भावमें सात सात विचारोंका कथन किया है जो प्रति हमको ५० वर्षकी (२). लिखी पं० नारायण दाससे प्राप्त हुई उसी प्रतिको यथासंभव शुद्ध कर टीका निमाण किया है इतना मैं विश्वासके माथ कहता हूं कि, जन्म- कुण्डलीका फल इस ग्रन्थमें बहुत उत्तम प्रकारसे कयन किया है । वर्षफल कथनके विषयमें मेरे टीका किये वर्षयोगसमूह ग्रन्यसे वर्ष- फलका बहुत अच्छा फल विदित होता है । यह अन्य कब निर्मित हुँआ इसका निर्णय करनी दुरूह है परन्तु अन्यकी उत्तमतामें कोई 'सन्देह नहीं है। इस ग्रन्यका सब प्रकार स्वत्व और अधिकार जग- प्रसिद्ध वैश्यवंश उजागर "श्रीवेङ्कटेश्वर" यंत्रालयाध्यक्ष सेठजी खेमराज श्रीकृष्णदासजीको समर्पण कर दिया है. अंतम 'पाठक महाशर्योसे प्रार्थना है कि, यदि कहीं भूल हुई हो तो उसे 'सुधारल कारण कि, सर्वज्ञ परमेश्वरही है। पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र, (दीनदार पुरा) मुरादाबाद TAH श्रीः ॥ बृहद्यवनजातक-विषयानुक्रमणिका । पृष्ठांकाः विषयाः पृष्ठांकार १ विषयाः (१) तनुभाव विचारः संग्रफलम् ग्रहफलम सनुभवनेशफलम् " ४ १ चतुर्थ सुखभवनम् सुखभावे लग्नफलम् प्रहफलम् सुखभवनेशफलम् सुखभावे ग्रहदृष्टिफलम् ग्रहवर्षसंख्या विचारः दृष्टेः फलम् " ११ सुतभवनं पञ्चमम् 'लग्नफलम् १९ ग्रहफलम् २१ सुतभवनेशफलम् २३ दृष्टिफलम् वर्षसंरुण २५ २९ विचार: ५८ तनोहवर्षसंख्याफलम् विचारः (२) द्वितीय धनमवनम धनमाणे लग्नफलम् प्रहफलम् भनमवनेशफलम् धनभावे दृष्टिफलम् बनभावे ग्रहाणां वर्षसंख्या विचारः (३) तुतीयमावं सहजम् सहजभावे लग्नफलम् प्रहफलम् सहजभवनेशफलम् टिफलम् सहजभावे वर्षसंख्या विचारः - १. ६५ २७ षष्ठं रिपुभवनम् २८ लग्नफल ग्रहालम् ३२ रिपुमवनशफलम् महफिलम ग्रहमख्या ३७ विचारः ७ ७१ ६ विषयानुक्रमणिका । टांकाः .५ विषयाः (७) सत्तम जायाभवनम् इनफळम् प्रहफलम् सप्तमभवनेशफलम् उष्टिफलम् वर्षसंख्या विचार: (८) भष्टमं मृत्युमवनम् हनफलम प्रहफलम् भष्टमभवनेशफलम् प्रहदृष्टिफलम् प्रहवर्षसंख्या विचार: पृष्ठांकाः विषयाः (१.) दशममावविचार ७६ लग्नफलम् ७८ ग्रहफलम् दशमभवनेशफलम् ८३ दृष्टिफलम् ८५ वर्षफलम् विचारः एकादशभावफल्म लग्नफलम माग्यभावो नवमः प्रहफलम् ९३ लाभभवनेशफलम् ९९ दृष्टिफलम् ९८ वर्षसंख्या विचारः (१९) ९९ द्वादशभावफलम लग्नफलम् १०१ ग्रहफलम् १०४ व्ययमावेशफलम् १०६ दृष्टिफलम् १०८ वर्षसंख्या विचारः रुग्नफलम् प्रहफलम् नवमभवनेशफलम दृष्टिफलम् वर्षसंख्या विचार: इति विषयानुक्रमणिका ।
श्रीगणेशाय नमः।
बृहद्यवनजातकम् ।
→HE
भाषाटीकासमेतम् ।
द्वादशभावेषु ग्रहभवनेशसहितफलानि लिख्यन्ते । तत्रादौ
तनुभवनम् । अमुकाख्यममुकदैवममुकायुतममुक-
ग्रहावलोकितं न वेति ।
दोहा-कृष्णचरणपंकज अमल, प्रेमसहित हिय लाय।
यवनप्रोक्त शुभ ग्रंथको, माषा लिखत बनाय ॥
अर्थ बारह भावोंका ग्रहसम्बन्धी फल और भवनोंके स्वामीका
फल लिखते हैं । आदिमें तनुभाव है, उसका फल देवता, ग्रहयोग,
अंहंदृष्टि तथा स्वामीकी दृष्टि वा योगसे कहना चाहिये ।
तत्र विलोकनीयानि ।
रूपं तथा वर्ण विनिर्णयश्च चिह्नानि जातिर्वयसः प्रमाणम् ।
सुखानि दुःखान्यपि साहसं च लग्ने विलोक्यं खलु सर्वमेतत्॥३॥
रूप, वर्णका निर्णय, चिह्न, जाति, अवस्थाप्रमाण सुख, दुःख,
साहस यह सम्पूर्ण विचौर लग्न अर्थात् तनुभावसे करना चाहिये ॥ १ ॥
लग्नफलम् ।
मेषोदये जन्म यदा भवेच्च स्वपित्तरोग स्वजनापमानम् ।
दुष्टैवियोगं कलहं च दुःखं शस्त्राभिघातं च धनक्षयं च ॥ १॥
यदि मेष लग्नमें जन्म हो तो पित्तका रोग, अपने जनोंसे अपमान,
दुष्टोंसे वियोग, कलह, दुःख, शस्त्रसे आघात और धनक्षय होता है॥१॥
बृहद्यवनजातकम् । : वृषोदये श्वेलतनुर्मनुष्यः श्लेष्माधिकः क्रोधपरः कृतघ्नः । अमन्दबुद्धिः स्थिरतासमेतः पराजितः स्त्रीभृतकः सदैव ॥३॥ यदि वृष लग्नमें मनुष्यका जन्म हो तो वह श्वेतवर्ण कफप्रकृति क्रोधी, कृतनी, मंदबुद्धि, स्थिरतायुक्त, दूसरोंसे पराजित और स्त्रीका भृत्य होता है ॥ २॥ द्वतीयलग्ने पुरुषोऽतिगौरः खोविचचिन्तापरिपीडिताङ्गः। दूतः प्रसन्नः पियवाग्विनीतः समृद्धियोगी च विचक्षणश्च ॥३॥ मथुन लग्नम जन्म हो तो पुरुष गौरवर्ण, स्त्री धन चिन्तासे वीडितशरीर त, प्रसन्न, प्रियवचन बोलनेवाला, नम्र समृद्धिमान् , योगी और चतुर होता है ॥ ३ ॥ ऊदये गौरवपुर्मनुष्यः पित्ताधिकः पुष्टतनुः प्रगल्भः । जलावगाहानुरतोऽतिबुद्धिःशुचिःक्षमी धर्मरुचिःसुखी स्यात् ४ जो कर्कमें जन्म हो तो गोरा शरीर, पित्त अधिक, पुष्टशरीर, वाचाल, जलमें घुसकर स्नानमें प्रीति करनेवाला, बुद्धिमान, पवित्र, क्षमावान्, धर्मरुचि और सुखी होता है ॥ ४ ॥ सिंहोदये पाण्डुतनुर्मनुष्यः पित्तानिलाम्यां परिपीडिताः । प्रियामिषोऽरण्यचरःसुतीक्ष्णः शूरःप्रगल्भः सुतरां नरोहि ॥५॥ सिंहमें जन्म हो तो वह मनुष्य पाण्डशरीर, पित्त और वातसे पीडित शरीरवाला, मांसप्रिय, तीक्ष्णस्वभाव, शूर और प्रगल्भ होता है ॥ ५ ॥ कन्याविलग्ने कफपित्तयुक्तो भवेन्मनुष्यः सुखकान्तिमांश्च । वेष्मार्दितः स्त्रीविजनः सुभीरुर्मायाधिकः कामकदर्थिताङ्गः६॥ कन्यालग्नमें जन्म हो तो वह मनुष्य का पित्तसे युक्त, सुखी,
भाषाटीकासमेतम् ।
(३)
कान्तिमान्, श्लेष्माके विकारसे पीडित, स्वीवियोगी, भीरु, मायावान्,
कामसे पीडित अंगवाला होता है ॥ ६ ॥
तुलाविलग्ने च भवेन्मनुष्यः श्लेष्मान्वितः सत्यपरः सदैव ।
पुण्यप्रियः पार्थिवमानयुक्तः सुरार्चने तत्पर एवं कल्पः ॥७॥
तुलामें जन्म हो तो वह मनुष्य श्लेष्मासे युक्त, सत्यवादी होता
है, पुण्यप्रिय, राजाका माननीय, देवताओंके अर्चनमें तत्पर और
समर्थ होता है ॥७॥
लग्नेऽष्टमे कोपपशे न सत्यो भवेन्मनुष्यो नृपपूजिताङ्गः ।
गुणान्यतः शास्त्रकथानुरक्तःप्रमर्दक शत्रुगणस्य नित्यम् ॥८॥
वृश्चिक लग्नमें जन्म हो तो वह मनुष्य क्रोधी, असत्यवादी,
राजासे पूजित, गुणवान्, शास्त्रकथामें अनुरक्त (धर्मवादी ) नित्य
शत्रुनाशक होता है ॥ ८॥
चापोदये राज्ययुतो मनुष्यः कार्यप्रष्टो द्विजदेव भक्तः।
तुरङ्गन्युक्तः सुहृदैः प्रयुक्तस्तुरङ्गजङ्घश्च भवेत्सदैव ॥ ९ ॥
जो धन लग्नमें जन्म हो तो राज्ययुक्त, कार्यमें ढीठ, द्विज देवता-
आंका भक्त, घोडोंसे युक्त, मित्रोंसे प्रयुक्त, अश्वकी जवाओंके तुल्य
जंघावाला होता है ॥ ९ ॥
मृगोदये तोषरतः सुतीवो भीरुः सदा पापरतश्च धूर्तः ।
श्लेष्मानिलाम्यां परिपीडिताङ्गःसुदीर्घगात्रः परवश्वकश्च ॥१०॥
मकर लग्नमें जन्म हो तो वह मनुष्य संतोषी, तीवस्वभाव, भीरु,
सदा पापमें प्रीति करनेवाला, धूर्त, कफ वातसे पीडित, दीर्घ शरीर,
दूसरेको वंचित करनेवाला होता है ॥ १० ॥
घटोदये सुस्थिरतासमेतो वाताधिकः स्तेयनिवेशदक्षः।
सुस्निग्धशत्रुप्रमदास्वभीष्टः सिद्धानुरक्तो जनवल्लभश्च ॥ ११ ॥
वृदयघन पालकम् ।
कुम्भ लग्नमें जन्म हो तो स्थिरस्वभाव, अधिक वातवाला, परद्र
हरण करनेमें चतुर, स्निग्धशत्रु, स्त्रीजनोंका प्यारा, सिद्धों में अनुर
और कुटुम्ब प्रिय होता है ॥ ११ ॥
मीनोदये पापरतो धनाढयो भवेन्मनुष्यः सुरतानुकूलः ।
सुपण्डितः स्थूलतनुः प्रचण्डः पित्ताधिकः कीर्तिसमन्वितश्च ।
मीन लग्नमें जन्म हो तो वह पुरुष पापरत, धनी और सुर
अनुकूल होता है, श्रेष्ठ पंडित, स्थूल शरीर, प्रचण्ड स्वभाव, अधि
पित्तवाला, कीर्तियुक्त होता है ॥ १२ ॥ इति तनुभावे लग्नफलम् ॥
अथ ग्रहफलम् ।
सूर्यफळम् ।
लमेऽल्पकचः कियालसतनुः क्रोधी प्रचण्डोन्नतो
मानी लोचनरुक्सुकर्कशतनुः शूरोऽक्षमी निघृणः ।
फुल्लाक्षः शशिभे क्रिये स्थितिहरः सिंहे निशान्धः पुमान
दारिद्योपहतो विनष्टतनयो जातस्तुलायां भवेत् ॥ १ ।
लग्नमें सूर्य हो तो थोडे केशवाला, कार्य करनेमें आलसी, क्रो
प्रचण्ड उन्नत, अभिमानी, नेत्ररोगी, कर्कशशरीर, शूर, अक्षमावा
दयारहित होवे । यदि लग्नमें कर्कका सूर्य हो तो फुल्लाक्ष होता है :
मेषका हो तो स्थितिका हरनेवाला होता है, सिंहका सूर्य हो
रतोंधी होवे, तुलाका हो तो दरिद्री और पुत्रहीन होता है।॥ १ ॥
चन्द्रफलम् ।
दाक्षिण्यरूपधनभोगगुणैर्वरेण्यश्चन्द्रे कुलीरवृषभाजगते
विलगे । उन्मत्तनीचबधिरो विकलश्च मूकः शेषे पुमान्
भवति हीनतनुर्विशेषात् ॥ २॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(५)
जो कर्क वृष और मेष राशिका चन्द्रमा लग्नमें हो तो वह मनुष्य
चतुर रूपवान् धन और भोग गुणोंसे प्रधान होता है । यदि वह
चन्द्रमा उक्त राशियोंसे अन्य राशिका हो तो उन्मत्त नीच बहिरा
विकल और गूंगा तथा हीनशरीर होता है ॥ २ ॥
भौमफलम् ।
अतिमतित्रमतां च कलेवरं क्षतयुतं बहुसाहससंगतम् ।
तनुभृतां कुरुते तनुसंस्थितोऽवनिसुतो गमनागमनानि च ॥३॥
जो लग्नमें मंगल हो तो बुद्धिमें महाभ्रम हो तथा शरीरमें क्षत हो
और वह पुरुष बडा साहसी होता है गमनागमनमें सदारत रहता है ॥३॥
बुधफलम् ।
शान्तो विनीतः सुतरामुदारो नरः सदाचाररतोऽतिधीरः ।
विद्वान्कलावाविपुलात्मजश्च शीतांशुमूनौ जनने तनुस्थे ॥ ४ ॥
जो लग्नमें बुध हो तो शान्त, विनीत, उदार, सदाचारयुक्त,
धैर्य-
वान्, विद्वान्, कलाओंका जाननेवाला, बहुतपुत्रयुक्त होता है ॥ ४ ॥
गुरुफलम् ।
विद्यासमेतोऽभिमतो हि राज्ञां प्राज्ञः कृतज्ञो नितरामुदारः ।
नरो भवेचारुकलेवरश्च तनुस्थिते देवगुरौ बलाढये ॥ ५॥
जो बलवान, बृहस्पति लग्नमें हो तो वह पुरुष विद्यावान्, राजाओंको
प्रिय, बुद्धिमान, कृतज्ञ अत्यंत उदार और सुन्दर शरीरवाला होता है५॥
भृगुफलम् ।
बहुकलाकुशलो विमलोक्तिकत्सुवदनामदनानुभवः पुमान् ।
अवनिनायकमानधनान्वितो भृगुसुते तनुभावमुपागते ॥ ६ ॥
जो लग्नमें शुक्र हो तो वह पुरुष अनेक कलाओंमें चतुर, निर्मल
उक्तियोंका करनेवाला, सुन्दर स्त्रीके साथ कामसुखके अनुभवसे युक्त,
पृथ्वीपति करके मान और धनसे युक्त होता है ॥ ६ ॥
(६)
सुहावनजलकम् ।
शनिफलम् ।
प्रसूतिकाले नलिनीशसूनो स्वोच्चत्रिकोणसंगते विलग्ने ।
कुर्यानरं देशपुराधिनाथं शेषर्भसंस्थे सरुज दरिद्रम् ॥ ७ ॥
जो लग्नमें उच्च या स्वमूलत्रिकोणका शनैश्चर हो तो वह पुरुषको
देश तथा पुरका अधीश्वर करता है । यदि वह उक्त राशियोंसे अन्य
राशियोंमें स्थित हो तो रोगी और दरिद्री करता है ॥ ७ ॥
राहुफलम् ।
लमे तमो दुष्टमतिस्वभावं नरं च कुर्यात्स्वजनानुवश्चकम् ।
शीर्षव्यथां कामरसेन युक्तं करोति वादैविजयं सरोगम् ॥ ८॥
लग्नमें राहु हो तो उस पुरुषकी खोटी मति, दुष्ट स्वभाव हो,
अपने मनुष्योंका वंचक, शिरव्यथाले युक्त, कामरसमें लिप्त, विवादमें
जीतनेवाला और रोगी होता है ॥ ८ ॥
केतुफलम् ।
केतुर्यदा लग्नगः क्लेशकर्ता सरोगाद्विभोगाद्भयं व्ययता च ।
कलवादिचिन्ता महोद्वेगता च शरीरेऽपि बाधा व्यथा मातुलस्य।
जो लग्नमें केतु स्थित हो तो क्लेश करनेवाला, रोगो, भोगसे भय-
भीत और व्यग्रता करता है, स्त्री आदिकी चिन्ता, महा उद्वेग, शरी-
रमें बाधा, तथा मामाको पीडा होती है ॥ ९ ॥ इति तनुमावे ग्रहफलम् ।
अथ तनुभवनेशफलम् ।
तनुपतिस्तनुगो मदनानुगो गतरुजं कुरुने बहुजीवितम् ।
अतिबलो नृपतेः कुलमन्त्रिणं सुखविलासयुतं सधनं मदा ॥३॥
जो जन्मलग्नका स्वामी जन्मलग्नमेंही स्थित हो वा सप्तममं हो तो
रोगरहित चिर जीवन करता है, आति बलवान हो तो राजाका कुल-
मन्त्री, सुखविलास और धनयुक्त करता है ॥१॥
(७)
भाषाटीकासमेतम् ।
तनुपतिर्धनभावगतो भवेद्धनयुतं पृथुदीर्घशरीरिणम् ।
विलघुजीवितमन्त्रकुटुम्बिनं विविधधर्मयुतं कुरुते नरम् ॥ २ ॥
यदि लग्नेश धनस्थानमें प्राप्त हो तो धनी, विस्तारयुक्त, दीर्घ
शरीर, दीर्घायु, मंत्रयुक्त, कुटुम्ब और अनेक धर्मयुक मनुष्यको
करता है ॥२॥
तनुपतिः सहजे सहजपो भवति मित्रयुतोऽपे पराक्रमम् ।
बलहतश्च सदा न पवित्रतां शुभवचः शुभहोष्टेवशान्नृणाम् ॥३॥
जो लग्नेश तीसरे घरमें हो तो सहजकी वृद्धि करता है, मित्रयुक्त
हो तो पराक्रम देता है, बलसे हीन हो तो अपवित्रता और शुभ
ग्रहकी दृष्टि हो तो शुभवचन बोलनेवाला होता है ॥ ३ ॥
सुखगते तनुते तनुपे सुखं विविधभक्ष्यविला ससुपूजितम् ।
नृपतिपूज्यतमं जननीसुखं गजरथाश्वमुखं सुरसाशिनम् ॥ ४ ॥
जो लग्नेश सुखस्थानमें हो तो सुख करता है तथा मनुष्यको अनेक
भक्ष्य और विलाससे युक्त करता है, राजाओंमें पूज्य हो, माताका सुख
हो, हाथी घोडोंका सुख और अच्छे पदार्थ खानेवाला हो ॥ ४ ॥
तनुपतिः सुतगस्तनुते सुतान्विनयधर्मयुतान्बहुजीवितान् ।
विदितमिश्रखलः शुभकर्मणां भवति गानकलासु ग्तो नरः॥५॥
लग्नेश पंचम घरमें हो तो विनय और धर्मसे युत, दीर्घजीवी पुत्र
उसके होते हैं, जैसे ग्रहके साथ हो वैसा फल कहना, अच्छा स्वरवाला
अच्छे कर्म और गानकलामें निरत होता है ॥५॥
रिपुगतस्तनुपः सरिपुं नरं सहजमायुसुतं सुखमातुलम् ।
पशु कृतं जननीसुखसभृतं कपणमेव धनैर्विविधैर्युतम् ॥ ६ ॥
(८) बृहद्यवनजातकम्। लग्नेश छठे स्थानमें हो तो उसके शत्रु हों, आयुवान् हो, पुत्र और मामाको सुख हो, पशु और मातासे सुख हो अनेक धनांसे युक्त- मनुष्य कृपण होता है ॥ ६ ॥ प्रथमलग्नपतिर्मनुजः स्त्रियं सुखधनैः शुभशीलविलासिनम् । सविनयं वनितोपयुतं च हि सफलरूपयुतं कुरुते सदा ॥ ७॥ लग्नेश सप्तम हो तो मनुष्य स्त्री धनका सुख पावे, अच्छे शील और विलाससे युक्त, विनयवान्, सकल रूपवान करता है ॥ ७॥ प्रथमभावपतिर्मृतिगो मूर्ति विदधते कपणं धनवञ्चकम् । विविधकष्टयुतं शुभदृष्टितो भवति मानवपुः कृतवान् सुधीः॥८॥ जो लग्नेश अष्टम हो तो मृत्यु हो वह मनुष्य कृपण ओर धन- वंचक हो, तथा अनेक कट हों ओर अच्छे ग्रहों की दृष्टि हो तो मान बडाई युक्त बुद्धिमान होता है ॥ ८ ॥ तनुपस्तिनुते तपसा युतं सहजमित्रवदान्यविदेशरुत् । सुखसुशीलनिरेकयशोनिधि गतिज्यतमो मनुनो नृगाम् ॥९॥ जो लग्नेश नवम हो तो तपस्वी, भाई मित्रोंसे युक, प्रवासी, सुख शीलका स्थान, यशसी, राजों में पूज्य, मनुष्यों में प्रतिष्ठित होता है॥९॥ दशमधानमते तनुजायके जनकमातृवं नृपतेः समन् । सकलभोगनुवं शुभकर्नगां कविवरं गुरुपूजनकं वरम् ॥ १०॥ जो लग्नेश दशम घरम हो तो माता ओर पिताका सुख हो राजाको समान हो, सम्पूर्ण ओगांका सुख हो तथा शुभकर्माका कर्ता और गुरुपूजन करनेवाला होता है ॥ १० ॥ सुबहुजीविन आयनने जास्त पती शुभाशर माहिर : गजरथाश्चम कोशनृपात्वं शिवेधकोनिविवेकनिमः
(९
भाषाटीकासमेतम् ।
लग्नेश ग्यारहवें स्थानमें हो तो पुरुष दीर्घजीवी हो और तनुपति
शुभभावसे संयुक्त हो तो हाथी, घोडे धनका राजासे सुख हो, अनेक
प्रकारकी कीर्ति और विवेक विचारवान् हो ॥ ११ ॥
चनुपतिळयगः कदुवाक्पुमान्खलसमाममहकरो वृणी ।
व्ययकरः सहजः परदेशगः सहजगोत्ररिपुर्झरिसंयुतः । १२ ॥
जो लग्नेश बारहवें स्थानमें हो तो मनुष्य कटुभाषी, दुष्ट समा.
गमवाला, दाहयुक्त, घृणी होता है, खर्च करनेवाला, स्वभावसे परदेश-
गामी, भाई गोत्रवालोंका रिपु ओर शत्रुयुक्त हो ॥ १२ ॥
इति तनुभावपतिफलम् ।
अथ दृष्टः फलम् ।
रविदृष्टिफलम् ।
तनुगृहे यादे सूर्यनिरोक्षिते भ्रमाते देशविदेशमसौ सा ।
सुकतभाग्यफलं सुकतक्षयं गृहसुखं च करोति निमीडितम् ॥१॥
यदि तनुस्थानको सूर्य देखता हो तो मनुष्य देश विदेशमें भ्रमण
करता रहे, सुकृत भाग्य फल हो, सुकृतका क्षय हो गृहसम्बन्धी
सुख हो पीडा भी हो ॥१॥
चन्द्रदृष्टिफलम् ।
तनुगृहे यदि चन्द्रनिरीक्षिते विकलनां च करोति नरस्य हि ।
तनु मार्गमते च जलं सदा सरलता सुकलाक्रयशोभितः ॥२॥
तनुस्थानको यदि चन्द्रमा देखे तो मनुष्यके शरीरमें विकलता
होती है और मार्गगमन, सरलता, सुंदरकला और क्रयवृत्ति होती है ।।२।।
भौंमदृष्टिफलम् ।
आद्यभावसदने कुजेक्षिते पित्तकोपयहणीरुजः सदा ।
अविनेत्रविकलं करं नरं जीवितोऽपि तनयादिनाशनम् ॥ ३ ॥
(१०) वृह व जातकम् । जो लग्नको मंगल देखता हो तो पित्तका कोप और ग्रहणी रोगभी हो, चरण और नेत्रमें विकलता हो जीवित रहे तो उस पुरुषके पुत्र आदि नष्ट हो जाते हैं ॥३॥ बुधदृष्टिफलम् । तनुगृहे यदि चन्द्रसुतेक्षिते वणिजराजकुले पुरुषोन्नतिः । स्वजनसौख्ययुतः प्रसवः नियस्तदनु जीवचिरायुकरो भवेत्॥ जो लग्नको बुध देखता हो ता व्यापारमें या राजकुलमें पुरुषकी उन्नति होती है,स्वजनाम सुख हो कन्याका जन्म हो और सन्तान चिरायु हो॥४॥ गुमदृष्टिफलम् । तनुगृहे यदि देवपुरोहिते गृहमुखं प्रचुरं खलु भाग्यवान् । सकलवित्तगृहे ग्रहमंबले व्ययकाश्च चिरायुयुतो भवेत् ॥ ५ ॥ यदि बृहस्पति लग्नको देखता हो तो पुरुषको गृहसम्बन्धी सुख हो और वह भाग्यवान् हो और ग्रहोंसे युक्त अर्थात् बलवान् ग्रह हो तो वह व्यय करनेवाला और दीर्घायु होता है ।। ५ ।। भृगुदृष्टिफलम् । सम्पूर्ण दृष्टियदि जन्मलने शुक्रो यदा स्यात्तनुरुत्तमा च । नानार्थसंभोगकलत्र नौख्यं मौन्दर्यरूपं खलु भाग्ययुक्तः ॥ ६ ॥ जो शुक्र लग्नको पूर्ण दृष्टिसे देखता हो तो शरीर उत्तम होता है। अनेक अर्थोका सम्योग, स्त्रीसुख सुन्दर रूप और वह निश्चयसे भाग्यवान् होता है ॥ ६॥ शनिहष्टिकलम । तनुगृहे यदि मन्दनिरीक्षिते तनुलुखं न करोति नरः सदा । अनिलपीडितवातरजा भन्न व गुणाधिक आलयकद्भवेत्॥७॥ जो शनि शरीरस्थानको देवता हो तो शरीरमें सुख नहीं होता,
भाषाटीकासमेतम् ।
(११)
अतिवातसे पीडित वातरोगी हो, गुणी अधिक न हो और स्थान
बनानेवाला हो ॥ ७ ॥ इति तनुमावोपरि सर्वग्रहदृष्टिफलानि ।।
अथ तनोपहवर्षसंख्याफलम् ।
सप्तविंशति चन्द्रमाः सुखकरं सूर्यस्तिथिः पोड नं
भौमो बाण अरिष्टकालकदशं कीर्ति बुधो यच्छति ।
प्रजामष्टमवत्सरे सुरगुरुर्दैत्येश्वरः सप्तः
दारान्यः परतः शरार्कितमसारिष्टं करोति ध्रुवम् ॥ ८॥
तनुस्थानपर ग्रहोंका संख्याफल कहते हैं-चन्द्रमाकी २७ वर्षकी
अवस्था सुखकी करनेवाली, सूर्यकी १५ वर्ष पीडाकारक है, मङ्गलकी
पांच वर्ष अरिष्ट करती है, बुधको दश वर्ष कीर्ति देती है, गुरुकी आठ
वर्ष सन्तानदाता, शुक्रको सात वर्ष स्त्रीसुख और शनि राहुकी पांच
वर्ष अरिष्ट करती है ॥ ८ ॥ इति तनुभावे वर्षफलम् ॥
..
अथ विचारः ।
विलोकिते सर्वखगैर्वि लग्ने लीलाविलासः सहितो बलीयान् ।
कुल नृपालो विपुलायुरेवाभयेन युक्तोऽरिकुलस्य हन्ता ॥ ३ ॥
याद लममें सब ग्रहोंकी दृष्टि हो तो लीलायुक्त विलाससे सहित
बलवान् हों तथा कुलमें राजा हो, दीर्घजीवी, भयरहित और शत्रुकु-
लका नाश करनेवाला होता है ॥ १ ॥
सौम्यास्त्रयो लगगता यदि स्युः कुर्वन्ति जातं नृपति विनीतम् ।
पापास्त्रयो दुःखदरिदशोकैर्युतं नितान्तं बहुभक्षकं च ॥ २ ॥
जिसके जन्मकालमें लग्नमें तीन शुभग्रह स्थित होंय वह नम्रतासे
युक्त राजा होता है और यदि लग्नमें तीन पापग्रह स्थित होवें तो दुःख
दरिद्र शोकसे युक्त और निरंतर बहुत भोजन करनेवाला होता है ॥ २॥
.
१२)
बृहद्यवनजातकम् ।
उन्नायूनषडष्ट केऽपि च शुभाः पापैर्न युकेक्षिताः
मन्त्री दण्डातिः क्षितेरधिपतिः स्त्रीणां बहूनां पतिः।
दो दवजितो गतभयः सौन्दर्यसौख्यान्वितः
उच्छोलो यवनेश्वरैर्निगदितो मत्यः प्रसन्नः सदा ॥३॥
जो लग्रमे मातवं, छठे, आठवें शुभग्रह स्थित हो और पाप ग्रहोंसे
युक्त वा दृष्ट न हो तो वह पुरुष मंत्री, दंडपति, वा भूमिपति, बहुत
वियोंका पति दीर्घायु, रोगहीन, भयरहित, सुन्दरता और सुखसे युक्त,
उत्तम गलसे युक्त, सदा प्रसन्न रहता है यह यवनेश्वरने कहा है ॥ २ ॥
मेषे शशाङ्कः कलशे शनिश्च भानुर्धनुःस्थश्च भृगुर्ममस्थः।
परस्य विनं न कदापि भुंने खबाहुवीर्येण नरो वरेण्यः ॥ ४ ॥
मेवमें चन्द्रमा, कुंभमें शनि, धनुषमें सूर्य और मकर राशिमें शुक्र हो
तो वह मनुष्य दूसरेका धन नहीं भोगता और अपने भुजाओंके बलसे
उपार्जन कर भोगता है ॥ ४ ॥
चतुर्यु केन्द्रषु भवन्ति पापा वित्तस्थिताश्चापे च पापखेटाः ।
नरो दरिद्रो नितरां निरुक्तो भयंकरश्चात्मकुलोद्भवानाम् ॥ ५॥
जो केन्द्र (१।४।७।१०) स्थानमें पापग्रह स्थित हो और
वनस्थानमें भी पापग्रह हों तो वह मनुष्य महादरिद्री और अपने
कुलमें उत्पन्न हुओंको भयंकर होता है ॥ ५ ॥
सुनस्थितो वा यदि मूर्तिवर्ती बृहस्पती राज्यगतः शशांकः ।
नरस्तपस्वी विनितेन्द्रियश्च स्याद्राजसो बुद्धिविराजमानः ॥६॥
बृहस्पति पांचवें वा लग्नमें हो, दशम भावमें चन्द्रमा हो तो वह
मनुष्य तपस्वी, इन्द्रियोंका जीतनेवाला और राजसी बुद्धिसे युक्त
हाता है ॥ ६॥
भाषाटीकासमेटम
कन्यायां च तुलाधरे सुरगुर्मेरे वृपे वा भृगुः
सौम्यो वृश्चिकराशिगः शुनखगैईष्टः कुले श्रेष्ठताम् ।
नूनं याति नरो विचारच नुरश्चदाजानादरों
नित्यानन्दमयो गुगरतरो लिक जो विमान 1.1
कन्या वा तुला, बृहस्पति हो, नेस वा वृषक मुना. ध वृश्रि.
कमें हो और शुभ ग्रहांकी दृष्टि हो तो यह मनुष्य कुलमंट वेचा-
रमें चतुर, उदारता, आदरयुक, नित्य आनंदनहिन मुग, नेटा-
वान और धनी होता है |
षष्ठे समोरो भवनो बुधारौ नरो भवेचौरसरो नितान्तम् ।
कुकर्मसामयविधेर्विशेषालरानपाणिः कुगुणस्थितश्च ॥ ८॥
जो छठे भावम शनैश्चर करके सहित बुध और मंगल स्थित हो
तो वह पुरुष महाचोर होता है विशेषने कुकर्मकी मामर्थ्य विधिने
दूसरेके अनका ग्रहण करनेवाला और अवगु गामे युक होता है ।८१
प्रसूतिकाले फिल यस्य जन्तोः कर्के जन्म कर महोजः
चौर्यप्रसंगोद्भवचंडदंडशाखादिदण्डाच भवंति नूनम् । ९१
जिसके जन्म समयमें कर्कके शनि मकरके मंगल हो तो उसको
चोरीके प्रसंगसे दंड मिले और शाखादि दंड उसको अवश्य होते हैं।॥९॥
कुम्भे च मीने मिथुनानिधाने शरामने स्युर्यदि पापादेयाः ।
कुचेष्टितःस्यात्पुरुषो नितांतं बजेग नूनं नियनं हि नस्य॥३०॥
जिसके जन्मसमयमें कुंभ, मीन, मिथुन, धनुषके, पाप ग्रह पड़े
हों तो वह पुरुष अत्यन्त बुरी चेष्टावाला हो और निश्चयमे उसकी
वज्रसे मृत्यु हो ॥ १० ॥
यस्य प्रसूतौ किल नैधनस्थः सौम्यग्रहः सौम्यनिरीक्षितश्च :
तीर्थान्यनेकानि भवंति तस्य नरस्य सम्यङ्मतिसंयुतश्च ॥ १३॥
(१४)
बृहद्यवनजातकम् ।
निनक जन्मकालमें अटन भावमें शुभग्रह स्थित हो और शुभ
ग्रहका दृट हो तो उस मनुष्यको अनेक तीर्योका दर्शन हो और
वह श्रेर बुद्विम युक्त हो ॥ ११ ॥
बुधवेमागेर युते विलय केन्द्रस्थचन्द्रेण निरीक्षित च ।
नाजान्वये यद्यपि जातजन्मास्यानीचकर्मा मनुजः प्रकामम् १२
जो लपमें बुधका द्रेष्काग हो और केन्द्रस्थानमें स्थित चन्द्रमा
देवता हो तो वह मनुष्य राजकुलम उत्पन्न हुआ भी अवश्य नीच
कर्माका करनेवाला होता है ॥ १२ ॥
भानुदिनीये नवने शनिश्च निशीथिनीयो गगनाश्रितश्च ।
भूनन्दने चेनदेनदानी स्यान्मानको हीतकलेवरश्च ॥ १३ ॥
मूर्य और शनि दूसरे स्थानमें हों चन्द्रमा दशम स्थानमें हो, मंगल
सनम स्थानमें हो तो मनुष्य हीनकलेवर होता है ॥ १३ ॥
पापांतराले च भवेत्कलापानिकलार्कमूनुमईनालयस्थः ।
कलेवरं स्याद्विकलं च तस्य श्वासक्षयप्तीहकगुल्मरोमैः॥ १४ ॥
जो पाप ग्रह के अन्तरालमें चन्द्रमा हो, शनि सप्तम हो तो उस
मनुष्यका शरीर श्वास, भय, प्लीहा, गुल्म रोगसे व्याकुल हो ॥ १४ ॥
शशी दिनेशस्य यदा नवांशे भवेदिनेशः शशिनो नवांश ।
एकत्र संस्थौ यदि तोमवता लश्नोविहीनो मनुजः स नूनम् १५
जो चन्द्रमा सूर्यके नवांशकमें स्थित हो, सूर्य चन्द्रमाके नवांशमें हो
और ये दोनों एकत्र स्थित हों तो मनुष्य अवश्य लक्ष्मीसे हीन होताहै १५
व्ययेऽरिनावे निधो धने च निशाकरारार्कशनैश्चराः स्युः ।
बलान्निासे त्वनिलाधिकत्वात्तेनोविहीने नयने प्रकुर्युः॥१६॥
जो वारहवें, छठे, अष्टम, दूसरे वरमें चन्द्रमा, मङ्गल, सूर्य, शनि
स्थित हों और वं बलिष्ठ हो तो मनुष्य वातकी अधिकतासे तेज करके
हीन नेत्रोंवाला होता है ॥ १६ ॥
बावाटोकास मेनन । वनव्ययस्थानगताश्च शुक्रो वक्रोऽयवा कगंज कगेति । नक्षत्रनाथो यदि तत्र संन्योहग्दरकारी कथिनी मुनीन्द्रः॥१७॥ जो शुक्र वा मङ्गल धन वा व्यय स्थान नं कंगनगनाई. जो चन्द्रमा भी वही स्थित हो तो नत्रग काल है, कई यदि भवंति हि काय॑तनुर्भवेत्तनुगता गवाहुकुनाकन : । रुधिरपाण्डुपराः परतापदाः शुषतमः पादातर बिटुः ॥ ३८॥ जो लग्नमें सूर्य, राहु, मंगल और शनि हो नो नगर कृश होना सकि पाण्डुरोग हो, परतापदायक हो शुभग्रहांसे युक्त होतोभी रोग कान हैं।८ तनुगतं खलखेचरमन्दिरं त्रिदशपूज्यशाङ्कसमन्वितम् । शिरसि घातगदानिलशूलयुग्भवति नातियला मठराग्निना॥१९॥ जो पाप ग्रहकी राशि लग्नमें हो और उमीमें वृहसति और चन्द्रमा हों तो शिरमें आघातरोग, वातशृल होता है और जटगनि रे अधिकबली नहीं होता है ॥ १९ ॥ गुरुशशांकबुधास्तु जितास्तनों वपुषि मुष्टिकराः शुभकांतिदाः। पदविनाशकराः कथिता बुधैरतिखलाः करातःपकमः परम् २० जो गुरु, चन्द्रमा, बुध तनुस्थानमें हो तो शरीरमें पाटे और कान्ति हो, और रोगका नाश हो और जो क्रूर ग्रह हों तो कृशता और ताप करनेवाले होवें ॥ २० ॥ एवे हि योगाः कथिता मुनीन्द्रैः सांई बलं यस्य नभवरस्य । कल्प्यं फलं तस्य च पाककाले सुनिर्मला यस्य मतिस्तु तेन ॥ यह योग मुनियोंन कहे है जो ग्रह बलसे युक्त हो उतका फल उसके पाक समयमें निर्मल बुद्धियुक्त पुरुष कहें ॥ २१ ॥ इति भावविवरणं समाप्तम् ।
वृहद्यवन जातकम् ।
अथ द्वितीयं धनभवनम् ।
अालयमा कदेवस्यममुकययुतममुकदृष्टया चात्र
विलोकित तथा स्वस्वामिना दृष्टं वा युतं न वति ।
भावके नाम, देवता ग्रहोंका योग तथा दृष्टि और अपने स्वामीकी
दृष्टि वा योग आदिसे भावफल कहना चाहिये ।
तत्र विलोकनीयानि ।
स्वर्णादिधातुक्रयविक्रयश्च रत्नादिकोशेऽपि च संग्रहश्च ।
एतत्समस्तं परिचिंतनीयं धनाभिधाने भवने सुधीभिः॥१॥
सुवर्णादि धातु बेंचना, सोना रत्नादिकोंके खजानेमें संग्रह यह सब
वस्तु बुद्धिमानोंको धनस्थानमें देखना चाहिये ॥१॥
अथ धनभावे लग्नफलम् ।
मेषे धनस्थ कुरुते मनुष्यं धनैश्च पूर्ण विविधैः प्रसूतैः ।
भाग्याधिक भूरिकुटुंबयुक्तं चतुष्पदाढयं बहुपंडितज्ञम् ॥ १॥
धनस्थानमें मेष लग्न हो तो मनुष्य धनसे पूर्ण अनेक सन्तान
वाले होते हैं भाग्य अधिक, अधिक कुटुम्बवाला, चौपार्योस पूर्ण
तथा बहुत पण्डितज्ञ होता है ॥ १ ॥
वृषे धनस्थे लभते मनुष्यः कषिप्रयासेन धनं सदैव ।
अनाभिधातश्च चतुष्पदाढयं तथा हिरण्यं मणिमुक्तकार्थम् ॥२॥
धनभाववृष लग्न हो तो मनुष्योंको कृषिके प्रयाससे सदा धनकी
प्राप्ति होती है, तथा अनाघात, चतुष्पदोंकी प्राप्ति, हिरण्य मणि और
मुक्ताकी प्राप्ति होती है ॥ २.॥
तृतीयलने धनगे मनुष्यो धनं लभेत्स्त्रीजननश्च नित्यम् ।
रूप्यं तथा काञ्चनजं प्रभूतं दयाधिकं पुष्टिभिरेव सख्यः॥३॥
भाषाटीकासमेम् ।
१७)
यदि धनस्थानमें मिथुन लग्न हो तो मनुष्यको धन प्राप्त होता है
कन्या संतानवाला हो, चाँदी, सोना अधिक होता है दया अधिक
तथा प्रीतिमान होता है ॥ ३ ॥
चतुर्थराशिधनगो मनुष्यो च लभेद् तनोत्र नित्यम् ।
जायोद्भवं सत्सुखमिष्टभोज्यं नयार्जितं प्रीतिकरं सुतानाम् ॥४॥
जो धनस्थानमें कर्क लग्न हो तो मनुष्यको नित्य वृक्षोंके सम्बन्धन
धनकी प्राप्ति होती है, तथा स्त्रीसे प्राप्त इष्ट भोज्य और सुखको भोगना
है और नीतिसे सञ्चित तथा पुत्रोंकी प्रीति करनेवाला होता है ॥ ४ ॥
सिंह धनस्थे लभते मनुष्यो धनान्तपारं नृजनोत्तमांशम् ।
सर्वोपकारप्रवणं प्रभूतं स्वविक्रमोपर्जितमेव नित्यम् ॥ ५ ॥
सिंह उन धन स्थानमें हो तो मनुष्यको धनकी प्राप्ति, मनुष्योंमे
उत्तम धन पानेवाला, सबका उपकार करनेवाला, अपने पराक्रममें
नित्य धन उपार्जन करनेवाला होता है॥५॥
कन्योदये वित्तगते मनुष्यो धनं लभेद्भूमिपतेः सकाशात् ।
हिरण्यरूप्ये मणिमुक्त जातं मजाश्वनानाविधषितजं च ॥ ६ ॥
कन्या, लग्न यदि धनमें हो तो राजासे धनकी प्राप्ति होती है, हिरण्य,
चांदी, मणि, मोती, हाथी, घोडोंसे अनेक धन प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥
तुले धनस्थे बहुपुण्यजातं धनं मनुष्यो लभते प्रभूतम् ।
पाषाणजं मृण्मयभूमिजातं सस्योद्भवं कर्मजमेव नित्यम् ॥ ७ ॥
धनस्थानमें तुला लग्न हो तो पुण्यसे बहुतसा धन मजुध्यको प्राप्त
होता है, तथा पत्थर, मृत्तिका भूमिसे उत्पन्न और अनसे प्राप्त धन
कर्मके द्वारा उपलब्ध होता है ॥ ७ ॥
घनेऽलिलग्ने प्रभवे च यस्य स्वधर्मशीलं प्रकरोति नित्यम् ।
विलासिनीकामपरः सदैव विचित्रवाक्यं द्विजदेवभक्तम् ॥८॥
.१८, सुस जातकम् । जिसके मामा वृश्चिक लग्न हो वह मनुष्य धर्मशील, स्त्रियोंमें -A5, विचित्र बनाम बोलनेवाला, देव द्विजोका भक्त होता है ॥ ८॥ श्रदुरे विणतो मनुष्यो धनं लभेत्स्यैर्य विधानजातम् । चतुषाढयं विविधं यशश्च रणोद्भवं धर्मविधानलब्धम् ॥ ९॥ धनस्थानमें धनलग्न हो तो उस मनुष्यको धनुष बाणादि कर्तव्यसे धन मिले और चौपायोंने आन्य हो तया धर्मविधानसे प्राप्त युद्धोद्भव, अनेक प्रकारका धन होवे ॥ ९ ॥ मृगे धनस्थे लभते मनुष्यो धनं प्राश्चैर्विवियरुपायैः। निच्छयाऽयो वराकनृपाणां कृषिक्रियाभिश्च विदेश बङ्गात् १० धनस्थानमें मकर लग्न हो तो वह मनुष्य अनेक उपाय और प्रपंचो धन प्राप्त करे, अपनी इच्छासे राजोंको प्रसन्न करे, कृषिक्रिया और विदेशमें धन प्राप्त करे ॥ १० ॥ घटे धनस्थे लभते मनुष्यो धनं प्रभूतं फलपुष्पजातम् । जलोद्भवं माधुजनस्य भोज्यं महाजनोऽयं च परोपकारः॥११॥ जो धनस्थानमें कुंभ लग्न हो तो वह मनुष्य फल, पुष्प और जलसे उत्पन्न द्रव्योंके द्वारा धन एकत्र करता है, साधु महात्माओंका सत्कार करनेवाला, परोपकारमें धनव्यय करता है ॥ ११ ॥ मत्स्ये धनस्थे लभते मनुष्यो धनं प्रभूतैर्नियमोपवासैः । विद्याप्रभावान्निधिसङ्गमाच्च मातापितायां समुपार्जितं च।।१२।। जो धनस्थानमें मीन लग्न हो तो वह मनुष्य नियम उपवासादि पूजापाठसे धनकी प्राप्ति करे, विद्याके प्रभाव वा निधिके लाभ से धन पावे, तथा माता और पितासे सम्यक् सञ्चित किये हुए धनकली प्राप्ति होवे ॥ १२ ॥ इति धनभावे लग्नफलम् ।
भाषाटीकासमेतम् ।
धनस्थितो न विलोकिनश्य कराः शुशाकोडी पनादिकानाम ।
पूर्वार्जितानां कुरुते विनाशं नवीनवित्तप्रतिवन्धनं च ।।५।।
धनस्थानमें निर्बल चन्द्रमा स्थित हो और उमर चुप,
तो पहलेके संग्रह किये हुए धनादिका नाम .
धनकी प्राप्ति न हो ॥५॥
वित्तस्थितो दैत्यगुरुः करोति वित्तागम मोप्रमुतन यः
स एव सौम्यग्रहयुक्तष्टः प्रकृष्टवित्तातिकग नगणाम् ।।
जो धनस्थानमें शुक्र हो और उसे बुध देखता हो तं धन प्रालि
होती है । यदि शुक्र शुभ ग्रहांसे युक्त वा दृट हा तो बात बन की
प्राप्ति होती है ॥ ६ ॥
अत्र धने पापदृष्ट्यधिकत्वाद्धनहामिः,
सौम्याधिकदृष्टया भवेद्धनप्राप्तिः॥
धनस्थानमें पाप ग्रहोंकी हाष्ट अधिक हो तो धनकी निजी
और सौम्यग्रहोंकी दृष्टि अधिक हो तो धनापि होत .
इति धनभावविवरणम् ।
अथ तृतीयभावं सहजम् ।
अमुकायम मुकदैवत्यममुकग्रहयुनं स्वस्वामिना दृष्ट
वा न दृष्टमन्यैः शुभाशुभैहैदृष्टं युनं न वेति ॥
सहज अर्थात् तीसरे स्थानका विचार-कौन ग्रह और कासमी
वा कौन शुभाशुभ ग्रह देखते हैं यह सब विचारना चाहिये ।
तत्र विलोकनीयम्।
सहोदराणामथ किङ्कराणां पराक्रमाणामुपजीविनां च ।
विचारणा जातकशास्वविद्भिस्तृतीयभावे नियमेन कार्या ॥३॥
(२८) बृहद्यवनजातकम् । तीसरे म्यानमें सगे भाई, दासवर्ग, पराक्रम, उपजीवी जनोंका विचार भले प्रकार करना चाहिये ॥ १॥ सहजमावे लग्नफलम् । तृतीयसंस्थे प्रथमे च राशौ मित्रं द्विजातेश्च भवेन्मनुष्यः । परोपकारप्रवणः शुचिश्च प्रभूतवियो नृपपूजिताङ्गः॥१॥ याद तीसरे स्थानमें मेष लग्न हो तो वह मनुष्य द्विजका मित्र हो तथा परोपकारमें चतुर, पवित्र, विद्यावान, राजोंसे पूजित होता है ॥ १॥ वृषे तृतीये लभते मनुष्यो मित्रं नरेन्द्रं प्रचुरं प्रतापम् । सुवित्तदं भूरियशोनिधानं शूरं कविं ब्राह्मणवित्तरक्षम् ॥२॥ तीसरे स्थानमें वृष हो तो मनुष्य प्रतापी हो तथा दानी, यशस्वी शूर, कवि, ब्राह्मण और धनकी रक्षा करनेवाला राजा मित्र होता है ॥२॥ तृतीयसंस्थे मिथुने च लग्ने करोति मयं वरयानयुकम् । स्त्रीवल्लभं सर्वमुदारचेष्टं कुलाधिकं पूज्यतमं नृपाणाम् ॥ ३॥ तीसरे स्थानमें मिथुन लग्न हो तो मनुष्य सुन्दरयानसंयुक्त, स्त्री जनोंका प्रिय, सब प्रकारसे उदार चेष्टावान्, कुलमें अधिक, राजोंमें पूज्यतम होता है ॥ ३ ॥ कुलीरराशौ महजे प्रयाते मित्रं लभेत्सद्गुणवल्लभत्वम् । कपीवलं धर्मकथानुरक्तं सदा सुशीलं सुमहत्पतिष्ठम् ॥ ४ ।। यदि तीसरे स्थानमें कर्क लग्न हो तो सद्गुणोंमें प्रेम हो तथा कृषिकर्मकर्ता, धर्मकथामें अनुरक्त, सदा शीलवान और बडी प्रतिष्ठासे युक्त मित्र होता है ॥४॥ सिंह तृतीये लभते मनुष्यः शूद्रं कुमित्रं परवित्तलुब्धम् । वधात्मकं पापकथानुरकं सदार्थयुक्त जनमर्हितं च ॥५॥ तीसरे स्थानमें सिंह लग्न हो तो शुद्र, पराये धनका लोभी,
भावाटीकासमेतम्।
(२९)
हिंसक, पापकथामें अनुरक्त, सदा स्वार्थमें तत्पर तया मनुष्योंस
निन्दित कुमित्र होता है ॥ ५॥
तृतीयभावे किल कन्यकाख्ये शास्त्रानुरक्तं मधुजं सुशीलम् ।
नानासुहृसंस्थिताल्पको प्रियातिथि देव गुरुप्रभक्तम् ॥६॥
तीसरे स्थानमें कन्या लग्न हो तो मनुष्य शास्त्रमं अनुरक्त, सुशील
होता है, अनेक मित्रवाला, थोडे क्रोधवाला, अतिथिप्रिय, देवता और
मुरुजनोंका भक्त होता है ॥ ६ ॥
तृतीयमस्थे हि तुलानिधाने मैत्री भवेत्तापरतर्मनुष्यैः ।
त्याज्यात्मकस्तोककथानुरक्तःसाई च भृत्यैश्च सुतार्थयुक्तः॥७॥
तीसरे स्थानमें तुलालग्न हो तो उसकी पापी मनुष्योंसे मित्रता
होती है, वह त्यागी, बालकोंकी कथामें अनुरक तथा दास,
पुत्र, धनसे युक्त होता है ॥ ७॥
अलौ तृतीये भवने नरस्य गैत्री सदा पा युननरेन्द्रः।
म्लेच्छः कृतः लहानुर
रकैर्लज्जाविहीनैर्मनु नै ईरौदैः ॥ ८॥
यदि तीसरे घरमें वृश्चिक हो तो पापयुक्त राजोंके साथ तथा म्लेच्छ,
कृतन,कलहप्रिय, निर्लज्ज और रोद्र स्वभाववाले मनुष्योंसे मैत्री हो॥८॥
चापे तृतीये लभते मनुष्यो मैत्री सुशूरैप वेवकैश्च ।
वित्तेश्वरैर्धर्मपरैः प्रसन्नैः रूपानुरक्तैर्बहुकोविदश्च ॥ ९ ॥
धनलग्न तीसरे स्थानमें हो तो मनुष्यकी मैत्री शूर तथा राजसेव-
कोंसे हो और धनी, धर्मात्मा, प्रसन्नचित्त, कृपावान् और श्रेष्ठ पंडित
जनोंसे मित्रता हो ॥ ९ ॥
मृगस्तृतीये च नरस्य यस्य करोति सौख्यं सततं सुखाढयम् ।
नित्यं सुहृदेवगुरुप्रसक्तं महाधनं पण्डितमप्रमेयम् ॥१०॥
(३०)
बृहद्यवनजातकम् ।
जिस मनुष्यके तीसरे स्थानमें मकर लग्न हो उसको निरन्तर
सुख होता है । वह सदा मित्र देव गुरुमें प्रेमी, महाधनी, पंडित
अप्रमेय होता है ॥ १०॥
कुम्भे तृतीये लभते मनुष्यो मैत्री व्रतबहुकोर्तियुक्तैः।
समाधेिकैः सत्यः सुशीलैगीतपियैः साधुपरेः खलैश्च।।११॥
तीसरे स्थानमें कुंभ लग्न हो तो उस मनुष्यकी मित्रता व्रतके
जाननेवाले, विस्तृत कीर्तियुक्त, क्षमावान्, सत्यवादी, सुशील, गीत-
प्रिय, साधु मनुष्योंसे हो और खलोंसे भी होती है ॥ ११ ॥
तृतीयभावे स्थितमौनराशौ नरं प्रसूते बहुवित्तयुक्तम् ।
पुत्रान्वितं पुण्यधनैरुपेतं प्रियातिथि सर्वजनाभिरामम् ।।१२।।
जो तीसरे घरमें मीनलग्न हो तो मनुष्य बहुत धनी होता है
और पुत्रवान् , पुण्यधनोंसे युक्त, अतिथिप्रिय, सब मनुष्योंको मंगल
दायक होता है ॥ १२ ॥ इति सहजे लग्नफलम् ॥
अथ ग्रहफलम्
सूर्यफलम् ।
प्रियंवदः स्थानवाहनाढयः सुकर्मयुकोऽनुचरान्वितश्च ।
मितानुजःस्यान्मनु नो बलीयान्दिनाधिनाथे सहजऽधिसंस्थे॥१॥
जो तीसरे स्थानमें सूर्य हो तो मनुष्य प्रिय बोलनेवाला, धन
वाहनसे युक्त, सुकर्मयुक्त, अनुचरोंसे युक्त, थोडे भाइयोंवाला और
बली होता है ॥१॥
चन्द्रफलम् ।
हस्रम्सगर्वः रुपणोऽल्पबुर्भिवेन्नगे बन्धुजनाश्रयश्च ।
दयामयाभ्यां परिवर्जितश्च द्विजाधिराजे सहजप्रसूतौ ॥ २॥
भाषाटीकासम्मेलम् ।
D
जो तीसरे चन्द्रमा हो तो मनुष्य हिंसक, सगर्व, कृपण, अल्प-
बुद्धि, बंधुजनोंके आश्रयवाला,दया और आमयसे रहित होता है ॥२॥
श्रीमफलम् ।
भूरसादोत्तमसौख्यमुझेः कथारतवारूपराक्रमच !
धनानि च भातृसुखातिहानिर्भवेन्नराणां सहजे महीजे ॥३॥
जिसके तीसरे भावमें मङ्गल स्थित हो उसको राजाको प्रसन्नतासे
उत्तम सुख हो, कथामें प्रीति हो तथा उत्तम पराक्रमी, धनवान और
भाइयोंके सुखसे हीन होता है ॥ ३ ॥
बुधकळम।
साहसी च परिवारजनान्यचिन शुद्धिरहितो हतसौख्यः ।
मानवः कुशलवान हितकर्ता शीतभानुतनुजेऽनुजसंस्थे ॥४॥
जिसके तीसरे स्थानमें चुव हो वह मनुष्य साहसी,अपने जनोंसे युक्त,
चित्त शुद्धिसे हीन, सौख्यरहित, चतुर, हितकारी होता है ॥ ४ ॥
गुरुफलम् ।
सौजन्यहन्ता करणः कृतनः कान्तामुतप्रीतिविपाचितश्च ।
नरोऽमिमान्याबलनासमेतः पराकमे शुक्र पुरोहितेऽस्मिन् ॥५॥
जो तीसरे स्थानमें गुरु हो तो सुजनतासे हीन, कृपण, कृतघ्नी,
स्त्री तथा पुत्रकी प्रीतिसे रहित और मन्दाग्नि रोग करके बलते हीन
होता है ॥ ५॥
भृगुफलम् ।
सहजगे सहजैः परिवारितो भृगुमुते पुरुषापुरुषैर्नतः ।
वजनबंधुविबंधनतां गतः सततमाशुगतिर्गतिविक्रमः ॥६॥
जोतीसरे स्थानमें शुक्र हो तो कुटुम्बसे प्रीति करनेवाला पुरुषा
पुरुषों (स्त्री पुरुषों) से नत अपने कुटुम्बी बन्धुओंसे विवन्धताको
प्राप्त हुआ सदा शीघ्रगति विक्रमबाला तथा पराक्रमी होता है ॥ ६ ॥
(३२)
बृहद्यवनजातकम् ।
शनिफलम् ।
राजपान्यशुभवाहनयुक्तो धामपो बहुपराकमशाली।
पालको भवति भूरिजनानां मानको रविसुतेऽनुजसंस्थे ॥ ७ ॥
जिसके तीसरे शनि हो वह मनुष्य राजाका माननीय, शुभ वाहनसे
युक्त, बहुत ग्रामोंका अधिपति, पराक्रमी बहुतसे जनोंका पालक होता है।
राहुफलम्।
न सिंहो न नागो भुजाविक्रमेण प्रतापीह सिंहीसुते तत्समत्वम् ।
तृतीये जगत्सोदरत्वं समति प्रभावेऽपि भाग्यं कुतो यत्र केतुः।।
जिसके तीसरे राहु हो उस मनुष्यका बाहुपराक्रम सिंह और हाथीसे
भी अधिक होता है और वह प्रतापी तथा जगतको अपना बन्धु मान-
नेवाला हो, प्रतापसेभी भाग्य कहां? जहां केतु हो ॥ ८॥
केतुफलम् ।
शिखी विक्रमे शत्रुनाशं च वादं धनस्यापिलाने भासिनता :
करोतीड़ नाशं सदा बाहुनीडां नयोगतां मानवोद्वेग मह वा ९३६
जो तीसरे केतु हो तो शत्रुका नाश, विवाह, धनका लाभ, मिज
पक्षसे भय, हानि, भुजामें पीडा, भयसे तथा मनुष्योंने उद्देग हो।।९ :
इति ग्रहफलम् ।
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अथ सहजभवनेशफलम् ।
सहजपती लग्नगते खीस्वादलंपटः स्वजनभेदैः ।
सेवां करोति मित्र प्रवेत्कट करः पण्डितः पुरुषः ।।
जो तीसरे स्थानका स्वामी लग्नमें हो तो वह पुरुष स्त्रीलम्पट, अपर्ने
पुरुषोंमें भेद रखनेवाला, सेवा करनेवाला, मित्रोंसे कटुभापी और
पण्डित होता है ॥ १॥
भाषाटीकासमेतम् । यदि धनगे सहजेरो भिक्षुर्धनाल्पजीवितः पुरुषः । बन्धुविरोधी करैः सौम्यैः पुनरीश्वरः ख वरैः॥ २॥ याद सहजपति धनस्थानमें हो तो वह भिक्षुक, धसे रहित, थोडा जीवनेवाला, बन्धुविरोधी होता है, क्रूर, ग्रहका फल है, सौम्य ग्रह हे तो अधिपति होता है ॥ २ ॥ सहजगते सहजपतौ नृपमन्त्री सौहृदेऽतिनिपुणश्च । गुरुपूजननिरतो वै नृपतो लाभं परं नरं कुरुते ॥ ३ ॥ जिसके सहजपति तीसरे ही स्थानमें हो वह मनुष्य नृपमन्त्री, मित्र- तामें कुशल, गुरुपूजनमें तत्पर, राजासे परम लाभवाला होता है ॥ ३॥ भातृपंता तुर्यगते पितृमोदसुखमुदयकत्तेषाम् । मातुरकरश्च पापैः पित्रर्थभक्षकः पुरुषः॥ ४ ॥ जो तृतीयाधिपति चौथे हो तो पितासे, हर्ष और सुख हो तथा उनका उदय करे, मातासे वैरै करनेवाला हो, यदि पापग्रह हो तो पिताका धन भोगनेवाला होता है ॥ ४ ॥ सहजपे सुतमे बहुबान्धवैः सुतप्तहोदरपालधनी सुखी । विषयभुक्परकार्यकरः क्षमी ललितमूर्तिरसौ चिरजीवितः ॥५॥ जो तीसरे स्थानका स्वामी पांचवें हो तो वह बहुत बंधुवाला, पुत्र और सहोदरका पालक धनी सुखी होता है, विषयभोगी, परकार्यकर्ता, क्षमावान् सुन्दरमूर्ति चिरजीवी होता है ॥५॥ रिपुगते सहजाधिपती भवेन्नयनरोमयुतो रिपुमान् भवेत् । सहजसज्जनतोऽपि च दुष्टता क्रययुतोऽथ रुजा परिपीडितः॥६॥ यदि तृतीयाधिपति शत्रुस्थानमें हो तो नेत्ररोगी और रिपुवाला
बृहद्यवनजातकम्।
होता है, भाई और सुजनोंसे दुष्टतावाला, क्रयविक्रयसे युक्त तथा
रोगसे पीडित होता है ॥ ६ ॥
युवतिवैरकल्पपराक्रमी सहनभावपतौ मदगे नरः ।
सुभगसुन्दररूपवतीसतीयुवातिपापगृहेषु रतो भवेत् ॥ ७ ॥
तीसरेका अधिपति सप्तममें हो तो स्त्रीसे वैर, थोडे पराक्रमवाला हो ।
स्त्री सुभग सुन्दर रूपवती हो, पापग्रह हों तो युवतियोंमें रत हो ॥ ७॥
सहजपेऽष्टमगे सरुषो नरो मृतसहोदरमित्रजनः खलैः ।
शुभखगः शुनताधनयुग्भवेत्स्वयमपि प्रचुरामयवान्भवेत् ॥ ८॥
सहजाति अष्टम हो तो वह मनुष्य क्रोधी हो । खल ग्रह हो तो
सहोदर और मित्रजनसे हीन हो और जो शुभग्रह हों तो शुभता
धनयुक्तता हो तथा स्वयं प्रचुर रोगाला होता है ॥ ८ ॥
सहजभावातौ नवमस्थिते सहजवर्गरतोऽपि बनाश्रयः ।
भवति बाल युतोऽय पराक्रमीशुभमतिः खलखेटगृहेऽन्यथा ।।९।।
जो सहजपति नवम हो तो भ्रातृवर्गमें अनुराग करनेवाला हो तो भी
बनमें निवास को तथा पुत्रवान् पराक्रमी और शुभमति हो यह
शुभग्रहका फल है, खलग्रहोंका इसके विपरीत जानना ॥ ९ ॥
सहजो दशमे च नृपासुखं पितृजनैः कुलवृद्धजनाश्रयः ।
बहुसुभाग्ययुतो नयनोत्सयो भवति त्रियुतोऽनितरांशुचिः१.
सहजपति दशममें हो तो राजासे सुख पितृजन और कुलमें
वृद्धजनोंके आश्रयवाला, बहुत भाग्यवान, उत्तववाला मित्रयुक्त बल-
वान अति पवित्र होता है ॥१०॥
सहजपे शुभलाभपराक्रमी भगवत सुतबन्धुभिरन्धितः ।
नृपतिनाभिमतो विजयी नरो बहुलभोगयुतो निपुणः सदा॥११॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(३५)
सहजपति ग्यारहवें हो तो शुभ लाभ पराक्रमी सुत बंधुओंसे युक्त हो
राजासे मान्य हो विजयी अनेक भोगोंसे युक्त सदा चतुर हो ॥ ११ ॥
व्ययगते सहजे व्ययवाञ्छुचिनिजसुहृद्रिपुरल्पपराक्रमी ।
शुभसमागमतोपि शुभं भवेत्खलखगैर्जननीनृपतेर्भयम् ।। १२॥
सहजपति बारहवें हो तो खर्च करनेवाला तथा पवित्र हो और
अपने सुहृभी शत्रु होवें, अल्प पराक्रमवाला हो, अच्छे समागमसे
शुभ हो, यदि खलग्रह हों तो माता और राजासे भय हो ॥ १२ ॥
इति सहजभवनेशफलम् ।
अथ दृष्टिफलम् ।
सूर्यदृष्टिफलम् ।
तृतीयगेहे रविवीक्षिते च सहोदरं पूर्वसुखं विनश्यति ।
पराक्रमे वाऽभिभवः स्वभाग्ये नृपाद्यं चैव न संशयोऽत्र ॥१॥
जो तीसरे स्थानको सूर्य देखताहो तो भाइयोंका सुख उस पुरुषको
न हो, पराक्रममें तिरस्कार और अपने भाग्यमें राजासे भय हो
इसमें सन्देह नहीं ॥१॥
चन्द्रदृष्टिफलम् ।
सहजगे यदि चन्द्रविलोकिते भगिनिजन्मकरो न पराक्रमी ।
प्रथमपूर्वधनेन सुखं धनं तदनु चोत्तरगे सकलार्थदः ॥२॥
सहज स्थानको यदि चन्द्रमा देखता हो तो भगिनीका जन्म हो
अर्थात् छोटी बहिन उत्पन्न होय, पराक्रमी न हो और पहले पूर्वधनके
द्वारा सुखपूर्वक धनकी वृद्धिाहो पीछे सब अर्यकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥
भौमष्टिफलम् ।
तृतीयभावे यदि भौमदृष्टिः पराक्रमे सिद्धिमुपैति नूनम् ।
देशान्तरे राजगृहे च मान्यं सहोदराणां च विनाशनं स्यात्॥३॥
बृहद्यवनजातकम् ।
तीसरे घरमें यदि मंगलकी दृष्टि हो तो पराक्रममें अवश्य सिद्धि हो,
देशान्तर तथा राजघरमें मान्य और सहोदरोंका विनाश हो ॥ ३ ॥
बुधदृष्टिफलम् ।
सहजगे द्विजराजसुतेक्षिते सहज सौख्ययुतश्च नरः सदा ।
वणिजकर्मरतोऽत्र विचक्षणो नरवरः खलु तीर्थकरोद्यमी॥४॥
जो तीसरे घरको बुध देखे तो वह मनुष्य भाइयोंसे सुख पावै,
वणिजकर्ममें रत और चतुर, तीर्थकारी तथा उद्यमी होता है ॥ ४ ॥
गुरुहष्टिफलम् ।
सुरगुरुर्यदि विक्रममोक्षते सहजसौख्ययुतः पुरुषो भवेत् ।
पितृधनं पितृवर्जितगर्वितः स्वजनबन्धुरतोऽथ च कीर्तिमान।।५।।
तीसरे घरको बृहस्पति देखता हो तो वह पुरुष सहजभावके सुखसे
युक्त होता है, पिताका धन पानेवाला, पितासे हीन, गर्वित, वजन
वन्धुओंमें रत यशस्वी होता है ॥५॥
भृगुदृष्टिफलम् ।
सहनगे सति भार्गववीक्षिते सहजप्तौख्ययुतश्च नरः सदा ।
तदनु पुष्टेियुतः किल कन्यकाजनिविदेशगतो नृपपूजितः॥६॥
सहज स्थानको यदि शुक्र देखता हो तो मनुष्यका सहज भावका
सुख होता है और वह पुष्ट शरीरवाला, कन्याको उत्पन्न करनेवाला
तथा विदेश जानेमें राजोंसे पूजित होता है ॥ ६॥
शनिदृष्टिफलम् ।
यदि पराक्रमगं शनिवोक्षितं बहुपराक्रमवान्बलवान्भवेत् ।
सहजपक्षमुसौख्याविनाशकः फलविपाकदशासु फलं नहि ॥७॥
यदि तीसरे स्थानमें शनिकी दृष्टि होतो वह मनुष्य बडा पराक्रमी बली
होता है तथा सहजपक्षसे सुख न हो, परिपाक अवस्थामें फल न हो ॥७॥
भाषाटीकासमेतम् । (३७) राहुदृष्टिफलम्। तृतीयगे राहुनिरीक्षिते च पराक्रमात्सिविमुपैति नूनम् । नानार्थसौख्यं बहुपुत्रदुःखं चौराग्रिसन्नि च राजतो भयम्।।८। जो तीसरे स्थानमें राहुकी दृष्टि हो तो वह अवश्य पराक्रमसे सिद्धिको प्राप्त होता है, अनेक अर्थोंसे सुख, बहुत पुत्रोंका दुःख, चोर आने सर्प तथा राजासे भय न हो ॥ ८॥ इति सहजभावे दृष्टिफलम् ॥ सहजभावे वर्षसंख्या। सूर्यों धनं नखमिते सहजे विधुश्च व्यब्देऽनुजाक्षति सुतोनुजमुच्च विश्वे । ज्ञोकब्दिवित्तविलयं गुरुतोत्रनेत्र- मित्राप्तरत्ननखतः प्रकरोति चाम् ॥ १ ॥ सूर्यका फल २० वर्ष सुख करे, चन्द्रमा ३ वर्ष सुख करे, मंगल १३ वर्ष कुछ कष्ट करे, बुध १२ में धनकी प्राप्ति, गुरु २० वर्ष, मित्रप्राप्ति, शुक्र २० वर्ष तीर्थकी प्राप्ति कराता है ॥ १ ॥ अथ विचारः। पापालयं चेत्सहज समस्तैः पापैः समेत प्रतिलोकितं च । भवेदभावः सहनोपलब्धेस्तईपरीत्येन तराप्तिरेवम् ॥ २ ॥ जो सहजपति पाप ग्रहोंके साथ पाप स्थानमें प्राप्त हो वा देखा गया हो तो सहजसुखकी प्राप्ति न हो इसके अभावमें अर्यात् विपरीततामें सुखकी प्राप्ति हो ॥ २ ॥ नवांशका ये सहनालयस्थाः कलानिधिक्षोणिसुतानु दृष्टाः । तावन्मिताः स्युः सहजा भगिन्यश्चान्येक्षिताचे परिकल्पनीया:३ जो सहज स्थानमें नवांशकके ग्रह स्थित हो तथा चन्द्रमा और..
(३८)
बृहद्यवनजातकम् ।
मंगल देखते हों तो जितने ग्रह हों उतनेही सगे भाई बहन हों वा
जितने ग्रह देखते हों उतने जानना ॥ ३ ॥
कुजेन दृष्टे रविजे तनूजा नश्यन्ति जाताः सहजा हि तस्य।
दृष्टे च तस्मिन्गुरु गर्गवाभ्यां शश्वच्छुभं स्यादनुजेषु नूनम् ॥ ४॥
जो मंगल शनिको देखे तो उत्पन्न हुए भ्रातादि नष्ट हों और गुरु
भार्गव देखते हों तो भाइयोंका अवश्यही कुशल हो ॥ ४ ॥
सौम्येन भूमीतनयेन दृष्टः करोति दृष्टिं रविजोऽनुजानाम् ।
शशांकवर्गे सहजे कुजेन दृष्टे सरोगाः सहजा भवेयुः ॥५॥
सौम्यग्रह तथा मंगल शनिको देखते हों तो भाइयोंकी उत्तम दृष्टि
हो और चन्द्रवर्गमें मंगलकी दृष्टि हो तो भाई रोगसे युक्त होने हैं॥५॥
दिवामणौ पुण्यगृहे स्वगेहे संदेह एवानुजजीवितस्य ।
एकः कदाचिच्चिरजीवितश्च भ्राता भवेद्भूपतिना समानः ॥ ६॥
जो सूर्य पुण्यस्थानमें वा अपने घरमें स्थित हो तो उसके
अनुजोंके जीवनमें सन्देह हो। कदाचित् एक हो, वह चिरजीवी
और राजाके समान होता है ॥ ६ ॥
चन्द्रमाः पापयुक्तश्च सहजस्थो यदा भवेत् ।
भातृनाशककरो योगो यदि नो वीक्षितः शुभैः ।। ७ ॥
जो चन्द्रमा पापयुक्त सहज स्थानमें हो तो यह भ्रातृनाशक योग होता
है याद शुभ ग्रह न देखते हों तो ॥ ७ ॥
यदि खलैःसहजे च खला ग्रहाःशुभषहैः सहिताश्च विलोकिताः।
नहि भवन्ति सहोदरबान्धवा बहुविधायनपक्षविधातयुकू॥८॥
जो सहज स्थानमें खलग्रह शुभ ग्रहोंसे युक्त वा देखे जाते हो तो
उसके सहोदर और बांधव न होवें तथा बहुत प्रकारमे बडे भाइयोंके
पक्षके विघातसे युक्त होता है ॥ ८ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (३९) शुभनिजेशयुतेक्षितमानभं भवति ज्येष्ठसहोदरसौख्यभाक् स्वपतिना न युतं शुभनेक्षितं न सुखमन्यसहोदरजं तदा ॥९॥ जो सहज स्थान अपने स्वामी शुभ ग्रहसे युक्त वा देखा गया हो तो ज्येष्ठ सहोदरका सुखभोगी होता है और जो अपने स्वामीसे युक्त तथा शुभ ग्रहोंकी दृष्टि न हो तो सहोदरोंका किया सुख नहीं होता ॥ ९ ॥ यदि खलाः प्रबलाः ख लमध्यगं खलयुतक्षितमग्रजहं तदा । नहि कनिष्ठ सहोदरजं सुखं भवति ज्येष्ठसुखं न तु जायते॥१०॥ जो क्रूरग्रह प्रबल हों और उक्तभाव पापग्रहोंके मध्यमें स्थित हों तथा पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो बडे भाईका नाशक हो तथा छोटे सहोदर भाईसे भी सुख न हो, ज्येष्ठसे सुख हो ॥ १० ॥ प्रथमजातशिशुस्तरणिग्रहस्तदनु हन्ति शिशुं लघुकर्भमः ! धरणिजो लघुबालकघातकबहुखला यदि हन्ति च भार्गवाद। प्रथम उत्पन्न पुत्रको सूर्य नष्ट करता है पीछे उत्पन्न लधुवालकको शनि घातक है, मङ्गल लघुषालकका घातक है बहुत खल हों तो शुक्रसे सन्तान पीडित हो ॥ ११ ॥ रविराहू भातृहणौ चन्द्रे च भगिनीसुखम् । शन्यारराहवः षष्ठे भातृनाशकरो गुरुः ॥ १२॥ रवि और राहु भाईको मारते हैं चन्द्रक सहित होनेसे भगिनीका सुख होता है जो छठे स्थानमें शनि भौम या राहु हों तो भ्राताकेनाश करनेवाले हैं तथा गुरुके साथ भी यही फल है ॥ १२ ॥ इति हजभावविवरणं संपूर्णम् ।।
(४०)
बृहद्यवनजातकम् ।
अथ चतुर्थ सुखभवनम् ।
अमुकाख्यममुकदैवत्यममुग्रहयुतं स्वस्वामिना दृष्टं वा
न दृष्टं तथाऽन्यैः शुभाशुभ हैदृष्टं युतं न वेति ।
चौथे भानका विवरण यह है कि अमुक देवता अमुक ग्रह अपने
स्वामी तया अन्य शुभाशुभ ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट है या नहीं है इसका
निर्णय देखना चाहिये।
तत्र विलोकनीयानि ।
सुहृद्गृहं ग्रामचनुमा वा क्षेत्रोद्यमालोकनके चतुर्थे ।
दृष्टे शुभानां शुनयोगतो वा भवेत्सवृद्धिनियमेन तेषाम् ॥ १ ॥
सुहृदों गृह, ग्राम, चौपायें, क्षेत्र, उद्यम यह सब चौथे घरसे
देखना चाहिये । शुभग्रहोंसे देखा गया हो वा शुभयोग हो तो इतने
वानोंकी यह वृद्धि करता है ॥ १ ॥
मेषे सुखस्थ लभते सुखं च चतुप्पदेश्योऽथ विलासिनीयः ।
भोगैर्विचित्रः प्रचुरानपानः पराकमोपार्जितसर्वभं मैः॥१॥
सुखस्थानमें मेष लग्न हो तो चौपायोंसे और स्त्रियोंसे सुख हो,
विचित्र भोग, बहुतसे अन्नपान तथा पराक्रमसे उपर्जित सर्व भोंगोसे
सुख प्राप्त होता है ॥ १ ॥
वृषे सु वस्ये लभते सुखानि नरोऽतिमान्यो विविधैश्चमान्यैः।
शौर्येण भूपालनिषेवणेन विप्रोपचारैर्नियमैर्वनैश्च ॥२॥
सुखस्थानमें वृष हो तो सुखकी प्राप्ति तथा मान्यता और धन
बहुत मिले । शूरतासे, राजाके सेवनसे, ब्राह्मण उपचारसे धन मिले।
नियम और व्रत करनेवाला होताहै तया इन्हीं कृत्योंसे धन
मिलता है ॥ २॥
तृतीयराशौ सुखभे सुवानि लभेन्मनुष्यः प्रमदारुतानि ।
जलावगाहर्वनसेवया च प्रभूतपुष्पाम्बरसेवकांश्च ॥३॥
भाषाटीकासमेतम् । (४१)
जो मिथुन लग्न चौथे घरमें हो तो पुरुष स्त्रियोंसे सुखको प्राप्त होता है,
जलकाअवगाहन, वनसेवा, बहुतसे पुष्प अम्बर और सेवकको पाता है॥३
कुलीरराशौ हि यदा सुखस्थे नरं सुरूपं सुभगं सुशीलम् ।
खीसंमतं सर्वगुणैः समेतं विद्याविनीतं जनवल्लभं च ॥ ४ ॥
जो चौथे घरमें कर्क लग्न हो तो वह मनुष्य स्वरूपवान् सुभग
सुशील होताहै, स्त्रीसम्मत, सब गुणोंसे युक्त, विद्यासे विनीत और
जनोंका प्यारा होताहै ॥ ४ ।।
सिंहे सुखस्थे न सुखं मनुष्यः पामोति योऽसौ प्रचुरः प्रकोपात् ।
कन्याप्रसूति कुटिलप्रसङ्ग नरो भवेच्छीलविवर्जितश्च ॥५॥
सुखस्थानमें सिंह लग्न हो तो मनुष्योंको सुख नहीं होताहै और
वह मनुष्य क्रोधी होताहै कन्याकी प्रसूति कुटिल संगवाला होता है
तथा मनुष्य शीलसे वर्जित होताहै ॥५॥
कुमित्रसङ्गं धनसंश्रयं च कन्यागृहे दुर्मतिमान्मनुष्यः ।
पैशून्यसङ्गाल्लभते सुखानि चौर्येण युद्धेन च मोहनेन ॥६॥
जो कन्या लग्न चौथे घरमे हो तो कुमित्रका संग, दुर्बुद्धि और
उन्हींसे धनका आश्रय हो, चुगली करनेवालोंकी संगतिसे सुख होवे,
चौर्य युद्ध और मोहनकर्म करे ॥६॥
तुले सुखस्थे च नरस्य यस्य करोति सौख्यं शुभकर्मदक्षम् ।
विद्याविनीतं सततं सुखाढयं प्रसन्नचित्तं विभवः समेतम् ॥७॥
जिसके चतुर्थ भवनमें तुला हो वह सुखी हो, शुभ कर्ममें चतुर
विद्यासे नम्र, सदा सुखी, प्रसन्नचित्त ऐश्वर्यसे युक्त होता है ॥७॥
अलौ चतुर्थे च यदा भवेत्तं सुतीक्ष्णभावं परभीतियुक्तम् ।
प्रभूतसेवं गतवीर्यदक्षं परैः सुरक्षं च गुणैर्विहीनम् ॥ ८॥
(४२) बृहधवनजातकम् । जो चौथे स्थानमें वृश्चिक हो तो वह मनुष्य तीक्ष्ण स्वभाव- वाला तथा भययुक्त हो प्रभूतसेवी वीर्यहीन चतुर दूसरोंसे रक्षित गुणविहीन होताहै ॥ ८॥ चापे सुखस्थे लभते मनुष्यः सुखं सदा संमरसेवनं च । सत्कीतिरेवं हरिवनं च सद्भावसम्पन्नतयान्वितश्च ॥ ९॥ धन लग्न चौथे घरमें हो तो मनुष्यको सुख और सदा युद्धसे प्रस- नता हो, कीर्तिमान् हरिसेवाविचक्षण सद्भावसम्पन्न होताहै ॥९॥ मृग सुखस्थे सुखभाङ्मनुष्यः सदा भवेचापनिवेशनेन । उद्यानवापीतटसंगमेन मित्रोपचारः सुरतप्रधानः ॥ १० ॥ सुख स्थानमें मकर लग्न हो तो मनुष्य सुखभागी और माननी चिन्तावाला होताहै उद्यान बावडी तट संगम मित्रोंके उपचार तथा सुरतमें प्रधानतासे सुख पाताहै ॥ १० ॥ घटे सुखस्थे प्रमदानिधानात्मामति सौख्यं विविध मनुष्यः ! मिष्टान्नपानः फलशालपत्रैर्विदग्धवाक्यैः कटुसावकारी ॥११॥ सुख स्थानमें कुंभ हो तो मनुष्य स्त्रीसे अनेक सुख पाताहै, मिष्टान- पान, फल शाकपत्रभोजी, चतुरखाक्यवाला, कटु सहायकारी होताहै ११ मीने सुखस्थे तु सुखं मनुष्यः प्रामोति सौख्यं जलसंश्रयण । शनैश्चरे देवसमुद्भवैश्च यानैः सुवस्त्रैः सुधनैर्विचित्रैः ॥ १२ ॥ मीनलग्न सुख स्थानमें हो तो मनुष्य जलके आश्रयसे सुख पाता। यदि शनैश्चर हो तो देवसे प्राप्त यान वस्त्र और विचित्र धनको प्राप्त होताहै ॥ १२ ॥ इति सुखभावे लग्नम् ।
भाषाटीकासमेतम् ।
(४३
अथ ग्रहफलम् ।
सूर्यफलम् ।
सौख्येन यानेन हिते रतस्य नितांतसत्प्रेमयुतप्रवृत्तिः ।
चलनिवासं कुरुते मनुष्यः पातालशाली नलिनीविलासी ॥१॥
जो चौथे घरमें सूर्य हो तो वह पुरुष सुखयुक्त सवारीमें अत्यन्त
प्रेमपूर्वक प्रवृत्त होताहै तथा चलायमान निवासवाला भी होता है ॥ १॥
चन्द्रफलम् ।
जलाश्रयोत्पन्नधनोपलब्धि कृष्यङ्गनावाहनसूनुसौख्यम् ।
प्रसूतिकाले कुरुते कलावान्पातालसंस्थो द्विजदेवभक्तम् ॥२॥
जो चौथे घरमें चंद्रमाहो तो जलके आश्रयसे धन मिले तथा अंगना
वाहन और पुत्रोंसे सुखकी प्राप्ति हो और द्विजदेवोंका भक्त होता है ॥२॥
भौमफलम् ।
दुःखं सुहृद्वाहनतः प्रवासात्कलेवरे रुग्बलताबलित्वम् ।
प्रसूतिकाले किल मङ्गलेऽस्मिन रसातलस्थे फलमुक्तमायैः॥३॥
मङ्गल चौथे हो तो सुहृद्, वाहन, प्रवाससे दुःख हो कलेवरमें रोग
होता है तथा बली भी होता है ॥ ३ ॥
बुधफलम् ।
पुत्रसौख्यसहितं बहुमित्रं मंदवादकुशलं च सुशीलम् ।
मानवं किल करोति सुलीलं शीतदीधितिसुतः सुखसंस्थः॥४॥
जो जन्मसमय चौथे घरमें बुध हो तो पुत्रका सुख, बहुतसे मित्र:
वाला,मंद वादमें कुशल, उत्तम लीलाओंसे युक्त सुशील होता है ॥ ४॥
गुरुफलम् ।
सन्माननानाधनवाहनायैः संजातहर्षः पुरुषः सदैव ।
नृपानुकंपासमुपात्तसंपत् स्वर्गाधिपे मंत्रिणि भूतलस्थे ॥५॥
(३२)
बृहद्यवन जातकम्।
शनिफलम् ।
राजमान्यशुभवाहनयुक्तो घामपो बहुपराकमशाली।
पालको भवति भूरिजनानां मानको रविसुतेऽनुजसंस्थे ॥ ७ ॥
जिसके तीसरे शान हो वह मनुष्य राजाका माननीय, शुभ वाहनसे
युक्त, बहुत ग्रामोंका अधिपति, पराक्रमी बहुतसेजनोंका पालक होता है।
राहुफलम्।
न सिंहो न नागो भुजाविक्रमेण प्रतापीह सिंहीसुते तत्समत्वम्
तृतीये जगत्सोदरत्वं समति प्रभावेऽपि भाग्यं कुतो यत्र केतुः।।
जिसके तीसरे राहु हो उस मनुष्यका बाहुपराक्रम सिंह और हाथीसे
भी अधिक होता है और वह प्रतापी तथा जगतको अपना बन्धु मान,
नेवाला हो, प्रतापसेभी भाग्य कहां ? जहां केतु हो ॥ ८ ॥
केतुफलम् ।
शिखी विक्रमे शत्रुनाशं च वादं तस्यानि लाने भाविकातोऽ।
करोती नाशं सदा बाहुपीडां भयोइंगतां मानवोदेग गाई । ६॥
जो तीसरे केतु हो तो शत्रुका नाश, विचार, धनका लान, मिक
पक्षसे भय, हानि, भुजामें पीडा, भयसे तथा मनुष्यों ने उद्धेग हो । ६..
इति ग्रहफलम् ।
।
-"
अथ सहजभवनेशफलम् ।
सहजपनी लग्नगते स्त्रीस्वादलंपटः स्वजनभेदैः ।
सेवां करोति मित्रै भवेत् मदु करः पण्डितः पुरुषः ।।
जो तीसरे स्थानका स्वामी लग्नमें हो तो वह पुरुष स्त्रीलम्पट, अपने
पुरुषोंमें भेद रखनेवाला, सेवा करनेवाला, मित्रोंसे कटुभाषी और
पाण्डित होता है ॥ १॥
भाषाटीकासमेतम् । (३३) यदि धनगे सहजेरो भिक्षुर्धनाल्पजीवितः पुरुषः । बन्धुविरोधी क्रूरैः सौम्यैः पुनरीश्वरः ख वरैः।। २।। याद सहजपति धनस्थानमें हो तो वह भिक्षुक, धसे रहित, थोडा जीवनेवाला, बन्धुविरोधी होता है, क्रूर, ग्रहका फल है, सौम्य ग्रह हो तो अधिपति होता है ॥ २ ॥ सहजगते सहजपतौ नृपमन्त्री सौहृदेऽतिनिपुणश्च । गुरुपूजननिरतो वै नृपतो लाभं परं नरं कुरुते ॥ ३॥ जिसके सहजपति तीसरे ही स्थानमें हो वह मनुष्य नृपमन्त्री, मित्र- तामें कुशल, गुरुपूजनमें तत्पर, राजासे परम लाभवाला होता है ॥ ३॥ मातृपता तुर्यगते पितृमोदसुखमुदयकत्तेषाम् । मातुर्वैरकरश्च पापैः पित्रर्थभक्षकः पुरुषः ।। ४ ॥ जो तृतीयाधिपति चौथे हो तो पितासे, हर्ष और सुख हो तथा उनका उदय करे, मातासे वैर करनेवाला हो, यदि पापग्रह हो तो पिताका धन भोगनेवाला होता है ॥४॥ सहजपे सुतमे बहुबान्धवैः सुतसहोदरपालधनी सुखी । विषयभुक्परकार्यकरः क्षमी ललितमूर्तिरसौ चिरजीवितः ॥५॥ जो तीसरे स्थानका स्वामी पांचवें हो तो वह बहुत बंधुवाला, पुत्र और सहोदरका पालक धनी सुखी होता है, विषयभोगी, परकार्यकर्ता, क्षमावान् सुन्दरमूर्ति चिरजीवी होता है ॥५॥ रिपुगते सहजाधिपती भवेन्नयनरोमयुतो रिपुमान् भवेत् । सहजसज्जनतोऽपि च दुष्टता क्रययुतोऽथ रुजा परिपीडितः॥६॥ यदि तृतीयाधिपति शत्रुस्थानमें हो तो नेत्ररोगी और रिपुवाला ३ (३४) बृहद्यवनजातकम्। होता है, भाई और सुजनोंसे दुष्टतावाला, क्रयविक्रयसे युक्त रोगसे पीडित होता है ॥ ६ ॥ युवतिवैरकल्पपराक्रमी सहजभावपतौ मदगे नरः । सुभगसुन्दररूपवतीसतीयुवातपापगृहेषु रतो भवेत् ॥ ७॥ तीसरेका अधिपति सप्तममें हो तो स्त्रीसे वैर, थोडे पराक्रमवाला श्री सुभग सुन्दर रूपवती हो, पापग्रह हों तो युवतियोंमें रत हो॥ सहजपेऽष्टमगे सरुषो नरो मृतसहोदरमित्रजनः खलैः । शुनखगः शुनताधनयुग्भवेत्स्वयमपि प्रचुरामयवान्भवेत् ।। सहजपति अष्टम हो तो वह मनुष्य क्रोधी हो । खल ग्रह है सहोदर और मित्रजनसे हीन हो और जो शुभग्रह हों तो धनयुक्तता हो तथा स्वयं प्रचुर रोगवाला होता है ॥ ८ ॥ सहजभावपतौ नवमस्थिते सहजबर्गरतोऽपि वनाअयः। भवनि बालयुतोऽय पराक्रमी शुभपतिः खलखेटगृहेऽन्यथा । जो सहजपति नवम हो तो भ्रातृवर्गमें अनुराग करनेवाला हो। बनमें निवास को तथा पुत्रान् पराक्रमी और शुभमति हो शुभग्रहका फल है, खलाहोंका इसके विपरीत जानना ॥ ९ ॥ सहजो दशमे च नृपात्सुखं पितृजनैः कुलवृद्धजनाश्रयः बहुसुभाग्ययुतो नयनोत्सवो भवति मित्रयुतोऽतितरांशुचि सहजपति दशममें हो तो राजासे सुख पितृजन और वृद्धजनोंके आश्रयवाला, बहुत भाग्यवान, उत्तववाला मित्रयुक्त वान् अति पवित्र होता है ॥१०॥ सहजपे शुभलाभाराक्रमी भगवत सुतबन्धुभिरन्वितः । नृपतिनाभिमतो विजयो नरो बहुलभोगयुतो निपुणः सदा॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(३५)
सहजपति ग्यारहवें हो तो शुभ लाभ पराक्रमी सुत बंधुओंसे युक्त हो
राजासे मान्य हो विजयी अनेक भोगोंसे युक्त सदा चतुर हो ॥ ११ ॥
व्ययगते सहजे व्ययवाञ्छुचिनिजसुहृद्रिपुरल्पपराक्रमी ।
शुभसमागमतोपि शुभं भवेत्खलखगैर्जननीनृपतेर्भयम् ।। १२॥
सहजपति बारहवें हो तो खर्च करनेवाला तथा पवित्र हो और
अपने सुहृभी शत्रु होवें, अल्प पराक्रमवाला हो, अच्छे समागमसे
शुभ हो, यदि खलग्रह हों तो माता और राजासे भय हो ॥ १२ ॥
इति सहजभवनेशफलम् ।
अथ दृष्टिफलम्।
सूर्यदृष्टिफलम् ।
तृतीयगेहे रविधीक्षिते च सहोदरं पूर्वसुखं विनश्यति ।
पराकमे वाऽभिभवः सभाग्ये नृपाइयं चैव न संशयोऽत्र ॥१॥
जो तीसरे स्थानको सूर्य देखता हो तो भाइयोंका सुख उस पुरुषको
न हो, पराक्रममें तिरस्कार और अपने भाग्यमें राजासे भय हो
इसमें सन्देह नहीं ॥ १॥
चन्द्रदृष्टिफलम् ।
सहजगे यदि चन्द्रविलोकिते भगिनिजन्मकरो न पराक्रमी ।
प्रथमपूर्वधनेन सुखं धनं तदनु चोत्तरगे सकलार्थदः ॥२॥
सहज स्थानको यदि चन्द्रमा देखता हो तो भगिनीका जन्म हो
अर्थात् छोटी बहिन उत्पन्न होय, पराक्रमी न हो और पहले पूर्वधनके
द्वारा सुखपूर्वक धनकी वृद्धिाहो पीछे सब अर्यकी प्राप्ति होती है ॥२॥
भीमदृष्टिफलम् ।
तृतीयभावे यदि भौमदृष्टिः पराक्रमे सिद्धिमुपैति नूनम् ।
देशान्तरे राजगृहे च मान्यं सहोदराणां च विनाशनं स्यात्॥३॥
(३६)
बृहद्यवनजातकम्।
तीसरे घरमें यदि मंगलकी दृष्टि हो तो पराक्रममें अवश्य सिद्धि हो,
देशान्तर तथा राजघरमें मान्य और सहोदरोंका विनाश हो ॥ ३ ॥
बुधदृष्टिफलम् ।
सहजगे द्विजराजसुतेक्षिते सहजसौख्ययुतश्च नरः सदा ।
वणिजकर्मरतोऽत्र विचक्षणो नरवरः खलु तीर्थकरोखमी॥४॥
जो तीसरे घरको बुध देखे तो वह मनुष्य भाइयोंसे सुख पावे,
वणिजकर्ममें रत और चतुर, तीर्थकारी तथा उद्यमी होता है ॥ ४ ॥
गुरुदृष्टिफलम् ।
सुरगुरुर्यदि विक्रममोक्षते सहनसौख्ययुतः पुरुषो भवेत् ।
पितृधनं पितृवर्जितगर्वितः स्वजनबन्धुरतोऽथ च कीर्तिमान्॥५॥
तीसरे घरको बृहस्पति देखता हो तो वह पुरुष सहजभावके मुखसे
युक्त होता है, पिताका धन पानेवाला, पितासे हीन, गर्वित, स्वजन
बन्धुओंमें रत यशस्वी होता है ॥५॥
भृगदृष्टिफलम् ।
सहजगे सति भार्गवीक्षिते सहज तौरुपयुतश्च नरः सदा ।
तदनु पुष्टेियुतः किल कन्यकाजनिविदेशगतो नृपपूजितः॥६॥
सहज स्थानको यदि शुक्र देखता हो तो मनुष्यका सहज भावका
सुख होता है और वह पुष्ट शरीखाला, कन्याको उत्पन्न करनेवाला
तथा विदेश जानेमें राजोंसे पूजित होता है ॥६॥
शनिदृष्टिफलम् ।
यदि पराक्रमगं शनिवोक्षितं बहुपराक्रमवान्बलवान्भवेत् ।
सहजपक्षसुसौख्याविनाशकः फलविपाकदशासु फलं नहि ॥७॥
यदि तीसरे स्थानमें शनिकी दृष्टि होतो वह मनुष्य बडा पराक्रमी बली
होता है तथा सहजपक्षसे सुख न हो, परिपाक अवस्थामें फल न हो ॥७॥
भाषाटीकासमेतम् । (३७) राहुदृष्टिफलम्। तृतीयगे राहुनिरीक्षिते च पराक्रमात्मिद्धिमुपैति नूनम् । नानार्थसौख्यं बहुपुत्रदुःखं चौरामिसान्न च राजतो भयम्॥८॥ जो तीसरे स्थानमें राहुकी दृष्टि हो तो वह अवश्य पराक्रमसे सिद्धिको प्राप्त होता है, अनेक अर्थोंसे सुख, बहुत पुत्रोंका दुःख, चोर आग्ने सर्प तथा राजासे भय न हो ॥ ८ ॥ इति सहजमावे दृष्टिफलम् ॥ सहजभावे वर्षसंख्या। सूर्यो धर्म नखमिते सहने विधुश्च ध्यब्देऽनुजाक्षति सुतोनुजमुच्च विश्वे । ज्ञोकब्दिवित्तविलयं गुरुतोभनेत्रै- मित्राप्तरननखतः प्रकरोति चाम् ॥ १ ॥ सूर्यका फल २० वर्ष सुख करे, चन्द्रमा ३ वर्ष सुख करे, मंगल १३ वर्ष कुछ कष्ट करे, बुध १२ में धनकी प्राप्ति, गुरु २० वर्ष, मित्रप्राप्ति, शुक्र २० वर्ष तीर्थकी प्राप्ति कराता है ॥ १ ॥ अथ विचारः। पापालयं चेत्सहनं समस्तैः पापैः समेत प्रतिलोकितं च । भवेदभावः सहनोपलब्धेस्तदैपरीत्येन तदाप्तिरेवम् ॥ २ ॥ जो सहजपति पाप ग्रहोंके साथ पाप स्थानमें प्राप्त हो वा देखा गया हो तो सहजसुखकी प्राप्ति न हो इसके अभावमें अर्थात् विपरीततामें सुखकी प्राप्ति हो ॥ २ ॥ नवांशका ये सहनालयस्याः कलानिधिक्षोणिसुतानु दृष्टाः । तावन्मिताः स्युःसहजा भमिन्यश्चान्येक्षिता वै परिकल्पनीयाः३ जो सहज स्थानमें नवांशकके ग्रह स्थित हों तथा चन्द्रमा और. :
(३८)
बृहद्यवनजातकम् ।
मंगल देखते हों तो जितने ग्रह हों उतनेही सगे भाई वहन हों वा
जितने ग्रह देखते हों उतने जानना ॥ ३ ॥
कुजेन दृष्टे रविजे तनूजा नश्यन्ति जाताः सहजा हि तस्य
दृष्टे च तस्मिन्गुरु गर्गवास्यां शश्वच्छुभं स्पादनुजेषु नूनम् ॥४॥
जो मंगल शनिको देखे तो उत्पन्न हुए भ्रातादि नष्ट हों और गुरु
भार्गव देखते हों तो भाइयोंका अवश्यही कुशल हो ॥ ४ ॥
सौम्येन भूमीतनयेन दृष्टः करोति दृष्टिं रविजोऽनुजानाम् ।
शशांकवर्गे सहजे कुजेन दृष्टे सरोगाः सहजा भवेयुः ॥५॥
सौम्यग्रह तथा मंगल शनिको देखते हों तो भाइयोंकी उत्तम दृष्टि
हो और चन्द्रवर्गमें मंगलकी दृष्टि हो तो भाई रोगसे युक्त होते हैं॥५॥
दिवामणौ पुण्यगृहे स्वगेहे संदेह एवानुजजीवितस्य :
एकः कदाचिच्चिरजीवितश्च भाता भवेद्भुपतिना समानः ।।६।।
जो सूर्य पुण्यस्थानमें वा अपने घरमें स्थित हो तो उसके
अनुजोंके जीवनमें सन्देह हो। कदाचित् एक हो, वह चिरजीवी
और राजाके समान होता है ॥ ६ ॥
चन्द्रमाः पारयुक्तश्च सहजस्थो यदा भवेत् ।
भ्रातृनाशककरो योगो यदि नो वीक्षितः शुभैः ।। ७ ।।
जो चन्द्रमा पापयुक्त सहज स्थानमें हो तो यह भ्रातृनाशक योग होता
है यदि शुभ ग्रह न देखते हों तो ॥ ७ ॥
यदि खलैः सहजे च खला ग्रहाःशुभप्रहैः सहिताश्च विलोकिताः।
नहि भवन्ति सहोदरबान्धवा बहुविधायनपक्षविघातयुकू॥८॥
जो सहज स्थानमें खलग्रह शुभ ग्रहोंसे युक्त वा देखे जाते हों तो
उसके सहोदर और बांधव न होवें तथा बहुत प्रकारसे बडे भाइयोंके
पक्षके विधातसे युक्त होता है ॥ ८ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (३९) शुभनिजेशयुतेक्षितमानभं भवति ज्येष्ठसहोदरसौख्यभाक् । स्वपतिना न युतं शुभनेक्षितं न सुखमन्यसहोदरजं तदा ॥९॥ जो सहज स्थान अपने स्वामी शुभ ग्रहसे युक्त वा देखा गया हो तो ज्येष्ठ सहोदरका सुखभोगी होता है और जो अपने स्वामीसे युक्त तथा शुभ ग्रहोंकी दृष्टि न हो तो सहोदरोंका किया सुख नहीं होता ॥ ९॥ यदि खलाः प्रबलाः ख लमध्यगं खलयुतेक्षितमग्रजहं तदा । नहि कनिष्ठसहोदरजं सुखं भवति ज्येष्ठमुखं न तु जायते॥१०॥ जो क्रूरग्रह प्रबल हों और उक्तभाव पापग्रहों के मध्यमें स्थित हो तथा पापग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो बडे भाईका नाशक हो तथा छोटे सहोदर भाईसे भी सुख न हो, ज्येष्ठसे सुख हो ॥ १० ॥ प्रथमजातशिशुस्तरणिग्रहस्तदनु हन्ति शिशुं लघुकर्भगः धरणिजो लघुबालकघातकबहुखला यदि हन्ति च भार्गवायू १३ प्रथम उत्पन्न पुत्रको सूर्य नष्ट करता है पीछे उत्पन्न लधु बालकको शनि घातक है, मङ्गल लघुवालकका बालकका घातक है बहुत खल हों तो शुक्रसे सन्तान पीडित हो ॥ ११ ॥ रविराहू भातृहणौ चन्द्रे च भगिनीसुखम् । शन्यारराहवः षष्ठे चातनाशकरो गुरुः ॥ १२॥ रवि और राहु भाईको मारते हैं चन्द्रक सहित होनेसे भगिनीका सुख होता है जो छठे स्थानमें शनि भौम या राहु हों तो भ्राताके नाश करनेवाले हैं तथा गुरुके साथ भी यही फल है ॥ १२ ॥ हजभाव विवरणं संपूर्णम् ॥ इति
अपने
(१०)
बृहद्यवनजातकम् ।
अथ चतुर्थ सुखभवनम् ।
अमुकायममुकदैवत्यममुकमयुतं स्वस्वामिना दृष्टं वा
न दृष्टं तथाऽन्यैः शुभाशुभग्रहदृष्टं युतं न वेति ।
चौथे भवनका विवरण यह है कि अमुक देवता अमुक ग्रह
स्वामी तथा अन्य शुभाशुभ ग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट है या नहीं है इसका
निर्णय देखना चाहिये।
तत्र विलोकनीयानि ।
सुहृद्गृहं ग्रामचतुषां वा क्षेत्र बनालोकनके चतुर्थे ।
दृष्टे शुभानां शुभयोगतो वा भवेत्सवृद्धिनियमेन तेषाम् ॥ १ ॥
सुहृदों गृह, ग्राम, चौपायें, क्षेत्र, उद्यम यह सब चौथे घरसे
देखना चाहिये । शुभग्रहोंसे देखा गया हो वा शुभयोग हो तो इतने
वातोंकी यह वृद्धि करता है ॥ १ ॥
मेषे सुखस्थ लभते सुखं च चतुप्पदेश्योऽथ विलासिनीयः ।
भोगैर्विचित्रैः प्रचुरानपानः पराक्रमोपार्जितसर्वभ मैः॥१॥
सुखस्थानमें मेष लग्न हो तो चौपायोंसे और स्त्रियोंसे सुख हो,
विचित्र भोग, बहुतसे अनपान तथा पराक्रमसे उपर्जित सर्व भोंगोसे
सुख प्राप्त होता है ॥ १॥
वृषे सुवस्ये लभते सुखानि नरोऽतिमान्यो विविधैश्चमान्यैः ।
शौर्येण भूपालनिषेवणेन विप्रोपचारैर्नियमैवतैश्च ॥२॥
सुखस्थानमें वृष हो तो सुखकी प्राप्ति तथा मान्यता और धन
बहुत मिले । शूरतासे, राजाके सेवनसे, ब्राह्मण उपचारसे धन मिले।
नियम और व्रत करनेवाला होताहै तया इन्हीं कृत्योंसे धन
मिलता है ॥ २॥
तृतीयसशौ सुखभे सुखानि लभेन्मनुष्यः प्रमदारुतानि ।
जलावगाहवनसेवया च प्रभनपुणाम्बरसेवकाच ॥३॥
भाषाटीकासमेतम् । (४१) जो मिथुन लग्न चौथे घरमें हो तो पुरुष स्त्रियोंसे सुखको प्राप्त होता है, जलकाअवगाहन, वनसेवा, बहुतसे पुष्प अम्बर और सेवकको पाता है॥३ कुलीरराशौ हि यदा सुखस्थे नरं सुरूपं सुभगं सुशीलम् । जीसंमतं सर्वगुणैः समेतं विद्याविनीतं जनवल्लभं च ॥४॥ जो चौथे घरमें कर्क लग्न हो तो वह मनुष्य स्वरूपवान् सुभग सुशील होताहै, स्त्रीसम्मत, सब गुणोंसे युक्त, विद्यासे विनीत और ननोंका प्यारा होताहै ॥ ४ । सिंहे सुखस्थे न सुखं मनुष्यः प्रामोति योऽसौ प्रचुरः प्रकोपात् । कन्याप्रमूर्ति कुटिलप्रसङ्ग नरो भवेच्छीलविवर्जितश्च ॥५॥ सुखस्थानमें सिंह लग्न हो तो मनुष्योंको सुख नहीं होताहै और वह मनुष्य क्रोधी होताहै कन्याकी प्रसूति कुटिल संगवाला होता है तथा मनुष्य शीलसे वर्जित होताहै ॥५॥ कुमित्रसङ्गं धनसंश्रयं च कन्यागृहे दुर्मतिमान्मनुष्यः । पैशून्यसङ्गाष्लभते सुखानि चौर्येण युद्धेन च मोहनेन ॥ ६॥ जो कन्या लग्न चौथे घरमे हो तो कुमित्रका संग, दुर्बुद्धि और उन्हींसे धनका आश्रय हो, चुगली करनेवालोंकी संगतिसे सुख होवे, चौर्य युद्ध और मोहनकर्म करे ॥६॥ तुले सुखस्थे च नरस्य यस्य करोति सौख्यं शुभकर्मदक्षम् । विद्याविनीतं सततं सुखाढयं प्रसन्नचित्तं विभवैः समेतम् ॥७॥ जिसके चतुर्थ भवनमें तुला हो वह सुखी हो, शुभ कर्ममें चतुर विद्यासे नम्र, सदा सुखी, प्रसन्नचित्त ऐश्वर्यसे युक्त होता है ॥ ७ ॥ मलौ चतुर्थे च यदा भवेत्तं सुतीक्ष्णभावं परभीतियुक्तम् । प्रभससेवं गतवीर्यदक्षं परैः सुरक्षं च मुणैर्विहीनम् ॥ ८॥ ..
जो चौथे स्थानमें वृश्चिक हो तो वह मनुष्य तीक्ष्ण स्वभाव- (४२) बृहधवनजातकम् । वाला तथा भययुक्त हो प्रभूतसेवी वीर्यहीन चतुर दूसरोंसे रक्षित गुणविहीन होताहै ॥ ८॥ चापे सुखस्थे लभते मनुष्यः सुखं सदा संमरसेवनं च । सत्कीतिरेवं हरिसेवनं च सद्भावसम्पन्नतयान्वितश्च ॥ ९॥ धन लग्न चौथे घरमें हो तो मनुष्यको सुख और सहा युद्धसे प्रस- त्रता हो, कीर्तिमान् हरिसेवाविचक्षण सद्भावसम्पन्न होताहै ॥९॥ मृग सुखस्थे सुखभाङ्मनुष्यः सदा भवेत्तापनिवेशनेन । उद्यानवापीतटसंगमेन मित्रोपचारैः सुरतप्रधानः ॥ १०॥ सुख स्थानमें मकर लग्न हो तो मनुष्य सुखभागी और मानसी चिन्तावाला होताहै उद्यान बावडी तट संगम मित्रांके उपचाः तथा सुरतमें प्रधानतासे सुख पाताहै ॥ १० ॥ घटे सुखस्थे प्रमदानिधानात्यामति सौख्यं विविधं मनुष्यः । मिष्टान्नपानैः फलशाकपत्रैर्विदग्धवाक्यैः कटुसावकारी ॥३१॥ सुख स्थानमें कुंभ हो तो मनुष्य स्त्रीसे अनेक सुख पाताहै, मिष्टान्न- पान, फल शाकपत्रभोजी, चतुरवाक्यवाला, कटु सहायकारी होताहै ११ मीने सुखस्थे तु सुखं मनुष्यः प्रामोति सौख्यं जलसंश्रयेण । शनैश्चरे देवसमुद्भवैश्च यानैः सुवः सुधनैर्विचित्रैः ॥ १२ ॥ मीनलग्न सुख स्थानमें हो तो मनुष्य जलके आश्रयसे सुख पाताहै। यदि शनैश्चर हो तो देवसे प्राप्त यान वस्त्र और विचित्र धनको प्राप्त होताहै ॥ १२ ॥ इति सुखभावे लग्नम् ।
भाषाटीकासमेतम् ।
(४३।
अथ ग्रहफलम् ।
सूर्यफलम्।
सौख्येन यानेन हिते रतस्य नितांतसत्प्रेमयुतप्रवृत्तिः ।
चलनिवासं कुरुते मनुष्यः पातालशाली नलिनीविलासी ॥ १॥
जो चौथे घरमें सूर्य हो तो वह पुरुष सुखयुक्त सवारीमें अत्यन्त
प्रेमपूर्वक प्रवृत्त होताहै तथा चलायमान निवासवाला भी होता है ॥ १॥
चन्द्रफलम्।
जलाश्रयोत्पन्नधनोपलब्धि कृष्यङ्गनावाहनसूनुसौख्यम् ।
प्रसूतिकाले कुरुते कलावान्पातालसंस्थो द्विजदेवभक्तम् ॥२॥
जो चौथे घरमें चंद्रमाहो तो जलके आश्रयसे धन मिले तथा अंगना
वाहन और पुत्रोंसे सुखकी प्राप्ति हो और द्विजदेवोंका भक्त होता है ॥२॥
भौमफलम् ।
दुःखं सुहृदाहनतः प्रवासात्कलेवरे रुग्बलताबलित्वम् ।
प्रसूतिकाले किल मङ्गलेऽस्मिन् रसातलस्थे फलमुक्तमायैः॥३॥
मङ्गल चौथे हो तो सुहृद्, वाहन, प्रवाससे दुःख हो कलेवरमें रोग
होता है तथा बली भी होता है ॥ ३ ॥
बुधफलम् ।
पुत्रसौख्यसहितं बहुमित्रं मंदवादकुशलं च सुशीलम् ।
मानवं किल करोति सुलीलं शीतदीधितिसुतःसुखसंस्थः॥४॥
जो जन्मसमय चौथे घरमें बुध हो तो पुत्रका सुख, बहुतसे मित्र:
वाला,मंद वादमें कुशल, उत्तम लीलाओंसे युक्त सुशील होता है ॥ ४॥
गुरुफलम् ।
सन्माननानाधनवाहनायैः संजातहर्षः पुरुषः सदैव ।
नृपानुकंपासमुपात्तसंपत् स्वर्गाधिपे मंत्रिणि भूतलस्थे ॥ ५॥
(४४) बृहधवनजातकम्। जो जन्मकालमें चौथे गुरु हो तो सत्पुरुषोंसे माननीय, प्रसन्नचित्त, राजमान्य, सम्पत्तिमान होता है तथा अनेक प्रकारसे धन वाहनकी प्राप्ति होती है ॥ ५॥ भगुफलम् । मित्रक्षेत्रे ग्रामसवाहनानां नाना सौख्यं बंदनं देवतानाम् । नित्यानन्दं मानवानां प्रकुर्यादैत्याचार्यस्तुर्यभावस्थितश्वेत्॥६॥ मित्रक्षेत्रमें शुक्र प्राप्त हो तो ग्राम और अच्छे वाहनोंका सुख प्राप्त हो, देवताओंकी पूजा करनेवाला हो मनुष्योंको नित्य आनन्द करे यह चौथे भावमें शुक्रका फल जानना ॥ ६ ॥ शनिफलम् । पित्वेन विक्षीणवलं कुशीलं शीलेन युक्तं कुरुते मनुष्यम् । मालिन्यभानं मनसस्तनोति रसातलस्थो नलिनीशजन्मा ॥७॥ जो चतुर्थ घरमें शनि हो तो पित्तसे क्षीणबल हो कुशील भी शीलवान हो तथा चित्तमें कुछ मनकी मलीनता होती है ॥ ७ ॥ राहुफलम् । चतुर्थे भवने चैव मित्रचातृविनाशकत् । पितुर्मातुः क्लेशकारी राहौ सति सुनिश्चितम् ॥ ८॥ जो चौथे घरमें राहु हो तो मित्र भ्राताका सुख न हो, पिता माताको क्लेश हो यह निश्चय है ॥ ८॥ केतुफलम् । चतुर्थे च मातुः सुखं नो कदाचित्सुहृद्धर्मतः पितृतो नाशमति । शिखी बंधुहीनःसुखं स्वोच्चगेहे स्थिरत्वं न कुर्यात्सदा व्यग्रतां च९ जो चौथे घरमें केतु हो तो माताका सुख न हो, धर्मसे सुहृदसे पितासे दु:ख हो और बन्धुहीन हो, उच्चका हो और अपने घरका हो तो सुख हो अन्यथा स्थिरता न हो सदा व्यग्रता हो ॥ ९ ॥ इति सुखमावे ग्रहफलम् ।
भाषाटीकासमेतम् ।
(४५)
अथ सुखभवनेशफलम् ।
सुखपतौ सुखवाहनभोगवांस्तनुगते तनुते धवलं यशः ।
जनकमातृसुखौधकरं परं सुभगलाभयुतं निरुजं वपुः ॥१॥
यदि सुखेश शरीरके स्थान ( प्रथम घर) में प्राप्त हो तो सुख
वाहन भोगवाला करता है तथा विपुल यशवाला करता है, माता
पितासे सुख और लाभवान् तथा रोगहीन शरीवाला होता है ॥१॥
सुखपती धनगे खलखेचरैः पितृविरोधकरः कृपणः शुचिः।
शुभखगैः पितृभक्तिधनाश्रयःशुभयुतः श्रुतिशास्त्रविशारदः ॥२॥
जो सुखेश धन स्थानमें प्राप्त हो और वह क्रूर ग्रहोंके साथ हो
तो पितासे विरोध करनेवाला तथा कृपण और पवित्र होवे । यदि शुभ
ग्रहोंसे युक्त हो तो पिताकी भक्तिवाला धनवान्, शुभयुक्त सब
शास्त्रमें पंडित हो ॥२॥
सुखपती सहजालयगे क्षमो पितृसुहृज्जननीकलिकारकः ।
रथमहीवृषभादिसुखान्वितः शुभखगैर्बहुमित्रयुतो नरः ॥३॥
जो सुखपति तीसरे घरमें प्राप्त हो तो क्षमावान्, पिता सुहृद् मातासे
कलह करनेवाला हो, रथ भूमि वृषभादिका सुख हो, जो अच्छे ग्रहोंक
साथ हो तो उस मनुष्यके बहुत मित्र होते हैं ॥ ३ ॥
सुखपतौ सुखगे सुखसन्निधौ नृपसमो धनवान् बहुसेवकः ।
पितृसुखं बहुलं जनमान्यता रथगजाश्वशुभैः सुखभाङ्नरः॥४॥
जो सुखेश सुखभवनमें प्राप्त हो तो वह पुरुष राजाकी समान धनी
बहुत सेवकोवाला हो, पितासे अधिक सुखवान हो, जनमान्यता, रथ,
हाथी, घोडेकी सवारी करके सुखभागी होता है ॥ ४ ॥
सुखपती बहुजीवितवान्नरः सुतगते सुनयुक्तसुधीर्नरः ।
शुभवशात्सुखभोगधनान्वितः श्रुतिधरोऽतिपवित्रविलेखकः॥५॥
(४६) बृहद्यवनजातकम् । जो सुखेश पुत्रघरमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य दीर्घजीवी पुत्र बुद्धिवान होता है, शुभग्रह हों तो सुखभोग धनसे युक्त शारु पवित्र और लेखक होता है ॥५॥ भवति मातृपतौ रिपुगे नरो रिपुयुतोऽपि अनर्थविनाशका खलखगोऽपि कलङ्कितमातुलो भवति सौम्यखगैर्धनसंचयी। जो सुखेश छठे घरमें हो तो शत्रु बहुत हों तथापि अनर्थका। करनेवाला होता है, जो दुष्ट ग्रहोंसे युक्त हो वा खलग्रह हों तो म दुःख, सौम्ययुक्त होनेसे धनसंचय होता है ॥ ६ ॥ मदनगेऽम्बुपतौ च सुराकतिर्धनयुतो युवतीजनवल्लभः । स्मरयुतःसुभगःशुभखेचरैः खलखगेऽतिखलःकठिनः पुमान् जो सुखेश सातवें वरमें हो तो देवतुल्य आकृतिवाला, ध स्त्रीजनोंका प्यारा होता है, शुभग्रहोंसे युक्त होनेसे कामयुक्त सुभग और खल ग्रहोंसे युक्त होनेसे पुरुष कठिन स्वभाव और दुष्ट होता मृतिगते सरुजोऽम्बुपतौ नरः सुखयुतः पितृमातृसुखाल्प भवति वाहननाशकरः शुभे खलखगेऽतिसमागमनाशक: जो सुखेश अष्टम हो तो सुखसे युक्त हो पिता माताके पक्षसे सुख हो, शुभ ग्रहोंसे युक्त होनेसे वाहननाशक और दुष्ट ग्रह समागमनाशक है ॥ ८ ॥ नवमगे सुखपे बहुभाग्यवान्पितृधनार्थसुहृन्मनुजाधिपः । भवति तीर्थ करो वतवान्क्षमो सुनयनः परदेशसुखी नरः ॥ सुखपति नवम स्थानमें हो तो भाग्यवान् पिताके धनसे प्रम मित्र और मनुष्योंमें अधिपति तीर्थ करनेवाला व्रतवान् क्षमावान् परदेश जानेमें सुखी हो ॥९॥ :
भाषाटीकासमेतम् । (४७) गगनगे सुखपे गृहिणीसुखं जनकमातृकरो धलभुरक्षमी। सुनयनः परतो नृपसम्मतः खलखगैर्विपरीतफलं वदेत् ॥१०॥ जो सुखेश दशम घरमें हो तो स्वीका सुख हो, माता पितासे भाग्य प्राप्त हो क्षमावान् मुनेत्र नृपसम्मत हो जो खलग्रहोंने संयुक्त हो तो इससे विपरीत फल जानना ॥ १०॥ भवगतेन्दुपतौ पितृपालको विविधलब्धियुतः शुभकत्सदा । पितरि मातरि भक्ति युतो नरः प्रचुरजीवितरोगविवर्जितः॥११॥ जो सुखेश ग्यारहवें हो तो वह मनुष्य पितृपालक अनेक धनकी प्राप्ति वाला सुखकारी माता पिताकी भक्तिवाला चिरजीवीरोगरहित हो ॥११॥ व्ययगते सुखपे पितृनाशको यदि विदेशगतो जनको भवेत् । भवति दुष्टखगैर्युतजातकःशुभखगैः पितृसौख्यकरः सदा ।।१२।। जो सुखेश बारहवें हो तो पिताका नाश करै यदि दुष्ट ग्रहोंसे युक्त हो तो पिता परदेशमें हो और शुभग्रहोंसे युक्त होनेसे पिताको सुख करनेवाला होता है ॥ १२॥ इति सुखभवनाधिफलम् । अथ मुखभावे प्रहदृष्टिफलम् । सूर्यदृष्टिफलम् । विलोकिते चापि चतुर्थगेहे सूर्यः करोत्येव हि मातृपीडाम् । बन्धुक्षयं चैव यशः सुखं च लाभार्थदं पुण्ययशः सदैव ॥१॥ जो चौथे घरमें सूर्यकी दृष्टि हो तो माताको पीडाकरता है, बंधुक्षय यश सुख मिले, लाभप्राप्ति और सहा पुण्य और यश मिले ॥ १ ॥ चन्द्रदृष्टिफलम् । तुरीयगे शीतकरे च दृष्टे बन्धुक्षयं चैव यशः सुखं च । लाभार्थदं पुण्ययशः सवायुः पित्रादिलोकान करोति सौख्यम् २॥
(४६)
बृहद्यवनजातकम् ।
जो सुखेश पुत्रघरमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य दीर्घजीवी पुत्रवान्
बुद्धिवान् होता है, शुभग्रह हों तो सुखभोग धनसे युक्त शास्त्रधारी
पवित्र और लेखक होता है ॥५॥
भवति मातृपतौ रिपुगे नरो रिपुयुतोऽपि अनर्थविनाशकः ।
खलखगोऽपि कलङ्कितमातुलो भवति सौम्यखगैर्धनसंचयी॥६॥
जो सुखेश छठे घरमें हो तो शत्रु बहुत हों तथापि अनर्थका विनाश
करनेवाला होता है, जो दुष्ट ग्रहोंसे युक्त हो वा खलग्रह हों तो मामासे
दुःख, सौम्ययुक्त होनेसे धनसंचय होता है ॥६॥
मदनगेऽम्बुपतौ च सुराकृतिधनयुतो युवतीजनवल्लभः ।
स्मरयुतःसुभगःशुभखेचरैः खलखगेऽतिखल कठिनः पुमान्॥७॥
जो सुखेश सातवें घरमें हो तो देवतुल्य आकृतिवाला, धनवान,
स्त्रीजनोंका प्यारा होता है, शुभग्रहोंसे युक्त होनेसे कामयुक्त सुभग होता है
और खल ग्रहोंसे युक्त होनेसे पुरुष कठिन स्वभाव और दुष्ट होताहै॥७॥
मृतिगते सरुजोऽम्बुपती नरः सुखयुतः पितृमातृसुखाल्पकः ।
भवति वाहननाशकरः शुभे खलखगेऽतिसमागमनाशकः ॥ ८॥
जो सुखेश अष्टम हो तो सुखसे युक्त हो पिता माताके पक्षसे थोडा
सुख हो, शुभ ग्रहोंसे युक्त होनेमे वाहननाशक और दुष्ट ग्रह होनेसे
समागमनाशक है ॥ ८ ॥
नवमगे सुखपे बहुभाग्यवान्पितृधनार्थसुहृन्मनुजाधिपः ।
भवति तीर्थ करो व्रतवान्क्षमी सुनयनः परदेशसुखी नरः ॥ ९॥
सुखपति नवम स्थानमें हो तो भाग्यवान् पिताके धनसे प्रसन्न हो,
मित्र और मनुष्योंमें अधिपति तीर्थ करनेवाला व्रतवान् क्षमावान् सुनेत्र
परदेश जानेमें सुखी हो ॥ ९ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (४७) गगनगे सुखपे गृहिणी सुखं जनकमातृकरो धलभुक्क्षमी। सुनयनः परतो नृप सम्मतः खलखगैर्विपरीतफलं वदेत् ॥१०॥ जो सुखेश दशम घरमें हो तो स्त्रीका सुख हो, माता पितासे भाग्य प्राप्त हो क्षमावान् मुनेत्र नृपसम्मत हो जो खल ग्रहोंमे संयुक्त हो तो इससे विपरीत फल जानना ॥ १० ॥ भवगतेन्दुपतौ पितृपालको विविधलब्धियुतः शुभकत्सदा । पितरि मातरि भक्तियुतो नरः प्रचुरजीवितरोगविवर्जितः॥११॥ जो सुखेश ग्यारहवें हो तो वह मनुष्य पितृपालक अनेक धनकी प्राप्ति वाला सुखकारी माता पिताकी भक्तिवाला चिरजीवीरोगरहित हो ॥११॥ व्ययगते सुखपे पितृनाशको यदि विदेशगतो जनको भवेत् । भवति दुष्टखगैर्युतजातकःशुभखगैः पितृसौख्यकरः सदा ।।१२।। जो सुखेश बारहवें हो तो पिताका नाश करै यदि दुष्ट ग्रहोंसे युक्त हो तौ पिता परदेशमें हो और शुभग्रहोंसे युक्त होनेसे पिताको सुख करनेवाला होता है ॥ १२ ॥ इति सुखभवनाधिफलम् । अथ मुखभावे ग्रहदृष्टिफलम् । सूर्यदृष्टिफलम् । विलोकिते चापि चतुर्थगेहे सूर्यः करोत्येव हि मातृपीडाम् । बन्धुक्षयं चैव यशः सुखं च लाभार्थदं पुण्ययशः सदैव ॥१॥ जो चौथे घरमें सूर्यकी दृष्टि हो तो माताको पीडाकरता है, बंधुक्षय यश सुख मिले, लाभप्राप्ति और सदा पुण्य और यश मिले ॥१॥ चन्द्रदृष्टिफलम् । तुरीयगे शीतकरे च दृष्टे बन्धुक्षयं चैव यराः सुखं च । लाभार्थदं पुण्ययशः सवायुःपित्रादिलोकान करोति सौख्यम् २॥
बृहद्यवनजातकम् ।
चौथे स्थानमें चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो बंधुक्षय होवे तथा यश और
सुख हो, लाभ हो, पुण्य यश मिले, वातयुक्त हो पिता और
लोकोंसे सुख न मिले ॥२॥
भीमदृष्टिफलम् ।
तुर्यभावगृह अरिवीक्षित मातृकष्टमथ तुर्यवर्षके ।
भूपतेर्भवति भूमितः सुखं दर्शनेन च रिपुर्विनश्यति ॥ ३ ॥
यदि चौथे घरको मंगल देखता हो तो चौथे वर्ष माताको कष्ट
हो, उस मनुष्यको राजाके द्वारा भूमिसे सुख हो और उसके देखनेसे
शत्रुनाश हो ॥३॥
बुधदृष्टिफलम् ।
बुधेक्षिते यबथ तुर्यभावे मातुश्च सौख्यं प्रचुरं करोति ।
राज्यादिसौख्यं धनवर्धनं च पितुर्धन चैव हि कामलुब्धः ॥४॥
यदि चौथे घरपर बुधकी दृष्टि हो तो मातासे महासुख मिले,
राज्यादिसे सुख धनकी वृद्धि पिताका धन बढानेवाला कामलुब्ध
पुरुष होता है ॥४॥
गुरुदृष्टिफलम् ।
हिबुकसमनि चार्यनिरीक्षिते जनकमातृसुखं त्वतुलं भवेद ।
गजरथाश्वयुतोऽथ च पंडितः स्वजनवर्गभवं त्वतुलं यशः॥५॥
जो चौथे घरको गुरु देखता हो तो पितामातासे बहुत सुख मिले,
हाथी रथ घोडोंसे युक्त वह मनुष्य पंडित होता है और अपने
सुजनोंसे उसको बडे यशकी प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥
भृगुदृष्टिफलम् ।
संपूर्णदृष्टियदि तुर्यभावे शुक्रस्तदा मातृसुखं करोति ।
कर्माधिको व्ययुतो नरः स्यायशश्च सौख्यं बहुवाहनोत्थम्॥६॥
यदि चौथे घरको शुक्र पूर्णदृष्टिसे देखता हो तो माताको सुरक
करता है वह पुरुष कर्ममेंतत्पर द्रव्यवान् यश और वाहनका सुख
करनेवाला होता है ॥६॥
भाषाटीकासमेलम् ।
(४९)
शनिदृष्टिफलम् ।
तुर्यभाव भवने शनीक्षिते तातमातृमरणं भवेन्नृणाम् ।
जन्मतो हि खलु तुर्यवर्षके षोडशेऽथ गदतो महद्भयम् ॥ ७॥
यदि चौथे वरमें शनिकी दृष्टि हो तो माता पिताका अनिष्ट करता
है, जन्मसे चौथे और सोलहवें वर्षमें रोगसे महाभय होता है ॥ ७ ॥
राहुदृष्टिफलम् ।
चतुर्थगेहे तमसा निरीक्षिते मातुः सुखं नैव करोति तस्य ।
कर्मोदयं म्लेच्छकुलाजयंच व्यथोदरे स्थाच्च नरस्य दारुणा॥८॥
जो चौथे घरमें राहुकी दृष्टि हो तो माताका सुख नहीं करता है,
कर्मका उदय, म्लेच्छकुलसे विजय हो और उस मनुष्यके उदरमें
दारुण पीडा रहे ॥ ८ ॥ इति सुखभावे ग्रहदृष्टिफलम् ॥
अथ ग्रहवर्षसंख्या।
तुर्ये रविर्मनुमिते कलहं हि चन्द्रो, द्विव्यब्दपुत्र-
ममृगष्टसहोदरार्तिम् । ज्ञो वित्तहा यमयमैर्गुरुरारुतौ स्वं
शुक्राऽम्बुजे सुखमथो कुजवछनिश्च ॥३॥
सूर्यकी चतुर्थ घरमें १४ वर्षतक अवधि क्लेशकारक, चन्द्रमा २२
वर्ष पुत्रप्राप्ति, मंगल ८ वर्ष सहोदरपीडा, बुध २२ वर्ष धन नाश,
गुरु २२ वर्ष धनप्राप्ति, शुक्र ४ वर्ष सुख करता है मंगलकी समान
शनि हाान करता है ॥ १॥
अथ विचारः।
अखिला सुखभावगता यदा जननिसौख्यकरा भवन्ति ते ।
शुभविलोकमतः खलु पीडनं जठरवातगदं रविजोऽब्रवीद ॥३॥
जो सब ग्रह सुखभावमें प्राप्त हों तो माताको सुख करनेवाले होते हैं,
शुभ ग्रहोंकी दृष्टि हो तो भी यही फल है । अशुभ ग्रहोसे पीडा, पेटमें
वातरोग हो यह शनिका फल कहा है ॥ १ ॥
(५०) बृहद्यधनजातकम् । हिबुकगाः खलु सौम्यखगा यदा हृदयरोगकराः परतापदाः। नृपतिभीतिकरा अतिदुःखदाः पवनगुल्मकराश्च जलार्तिदाः॥२॥ जो सौम्यग्रह चतुर्थभावमें हों तो हृदयके रोग करनेवाले, दूसरोंको ताप देनेवाले होते हैं तया राजभयदायक, अतिदुःखदायक, यवनका मुल्म करनेवाले जलसे दुःख करते हैं ॥२॥ सुखगृहं यदि भौमयुतं तथा खलखगैः सहजेऽपि स एव चेत् । भवति वह्निकतो जठरे गदो ज्वरसमीरणवह्निगदव्यथा ॥३॥ जो सुखस्यानमें काल मंगल हो और सहज स्थानमें दुष्ट ग्रहोंसे युक्त हो तो उदरमें अग्निव्यथा हो और ज्वरवात वद्विकृत रोगोंकी व्यथा हो ॥३॥ लग्ने चैव या जीवो धने सौरिश्च संस्थितः । राहुश्च सहजे स्थाने तस्य माता न जीवति ॥४॥ जो लग्नमें जीव (बृहस्पति), धनमें शनि, सहजस्थानमें राहु हो तो उसकी माता नहीं जीती ॥४॥ लग्ने पापो व्यये पापो धने सौम्योपि संस्थितः। सप्तमे भवने पापः परिवारक्षयंकरः ॥५॥ लग्न और बारहवें पापग्रह हो, धनमें सौम्यग्रह हो, सातवें घरम पापग्रह हो तो परिवारका क्षय करनेवाला होता है ॥५॥ सौम्यदृष्टयधिकत्वात्तु मातुर्धनसुखं भवेत् । पापयधिकत्वात्तु मातृकष्टं सुखं नहि ॥६॥ जो अधिक सौम्य ग्रह चौथे घरको देखते हों तो मातासे धनका सुख मिले और अधिक क्रूरग्रहोंकी दृष्टि हो तो माताको कष्ट हो स्वप्नमें भी सुख न हो ॥ ६ ॥ इति सुखभावविवरणं सम्पूर्णम् ॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(५१)
अथ सुसभवनं पश्चमम् ।
अभुकास्यममुकदैवत्यममुक्यहयुतं स्वस्वाभिना दृष्टं
वा न दृष्टम् ।
पांचवें घरसे देवता ग्रहयोग तथा स्वामीकी दृष्टिवशमे फलका विचार
किया जाता है सो पूर्ववत् देखें ॥
तत्र विलोकनीयानि ।
बुद्धिप्रबन्धात्मजमन्त्र विद्याविनेयगर्भस्थितिनीतिसंस्थाः।
सुताभिधाने भवने नराणां होरागमः परिचिन्तनीयाः॥ १ ॥
बुद्धि प्रबन्ध पुत्र मंत्र विद्या विनय गर्भस्थिति नीतिमंस्था यह सब
वार्ता पांचवें घरसे ज्योतिषियोंको विचारनी चाहिये ॥१॥
तत्र लग्नफलम् ।
मेषे सुतस्थे लभते मनुष्यः प्रायेण पुत्रान्विधनांस्तथा च ।
सुरात्सुखं नित्यकता मुदः स्युः पापानुरक्तः कुलवित्तयुक्तः॥१॥
जो पांचवें मेष लग्न हो तो उस मनुष्यके बहुधा धनहीन पुत्र होते हैं,
देवताओंसे सुख कर्मकर्ता पापमें प्रीति कुलके धनसे युक्त होवे ॥ १ ॥
वृषे सुतस्थे लभते मनुष्यः प्रामोति कन्याः सुभगाः सुरुषाः।
अपत्यहीना बहुकांतियुक्ताः सदानुरक्ता निजभर्तृधर्मे ॥२॥
जो पांचवें वृषलग्न हो तो मनुष्य सुभग स्वरूपवान् कन्याओंको
प्राप्त होता है और वे कन्या सन्तानहीन बहुत कांतियुक्त और सदा
अपने स्वामीके धर्ममें युक्त रहती हैं ॥२॥
तृतीयराशौ सुतगे मनुष्यः प्रामोति पत्या तिजसौख्यधर्मान् ।
गीवानि सदानि गुणाधिकानि प्रभासमेतानि बलाधिकानि ॥३॥
जो पांचवें मिथुनराशि हो तो मनुष्य स्वामीसे सुखधर्मको प्राप्त
होता है, सद्गीतवाला गुणवान् प्रतापी अधिक बली होता है ॥ ३ ॥
(१४)
बृहद्यवनजातकन् ।
सुखयुक्त और अनेक पदार्थोंसे युक्त तथा उस मनुष्यका चित्त सदा
भ्रान्त रहता है ॥ १ ॥
चन्द्रफलम् ।
जितेन्द्रियः सत्यवचाः प्रसन्नो धनात्मजावालसमस्तसौख्यः ।
सुसंग्रही स्यान्मनुजः सुशीलः प्रसूतिकाले तनयालयेऽब्जे ॥२॥
जिसके पञ्चम चन्द्रमा हो वह जितेन्द्रिय,सत्यवादी, शरणगत साधु,
धन और पुत्रोंसे प्राप्त समस्त सुखवाला, संग्रह करनेमें तत्पर सुशील
होता है ॥ २ ॥
भीमफलम् ।
कफानिलव्याकुलता कलत्रान्मित्राच पुत्रादपि सौख्यहानिः ।
मतिर्विलोमा विपुलो जयश्च प्रसूतिकाले तनयालयस्थे ॥३॥
जिसके पञ्चम मंगल हो वह वात कफसे व्याकुल हो, स्त्री मित्र पुत्रोंसे
सुख न मिले, बुद्धिमें विलोमता रहे और विपुल जय होवे ॥ ३ ॥
बुधफलम्।
पुत्रसौख्यसहितं बहुमित्रं मित्रवादकुशलं च सुशीलम् ।
मानवं किल करोति मुरूपं शीतदीधितिसुतः सुतसंस्थः ॥ ४ ॥
पंचम बुध हो तो पुत्रोंके सौख्यसे युक्त, बहुतसे मित्र, मित्रवादमें
कुशल, सुशील सुरूप मनुष्य होता है इसमें सन्देह नहीं ॥४॥
गुरुफलम् ।
सन्मंत्रपुत्रोत्तममंत्रशस्त्रसुखानि नानाधनवाहनानि ।
बृहस्पतिः कोमलवाग्विलासं नरं करोत्यात्मजनावसंस्थः ॥५॥
जो पञ्चम सुरु हो तो उत्तम पुत्र मन्त्र शस्त्र सुख अनेक प्रकारके
धन वाहनोंकी प्राप्ति हो, कोमल वाणीके बिलाससे युक्त, वह पुरुष
गम्भीर होता है ॥ ५ ॥
भृगुफलम् ।
सुकलकाव्यकलाभिरलंकृतस्तनयवाहनधान्यसमन्वितः।
सुरपतिर्मुरुगौरवभाङ्नरो भृगुसुते सुनसाने संस्थिते ॥ ६ ॥
भाषाटीकासमेतम् । जिसके पंचम शुक्र हो वह सम्पूर्ण काव्य कलासे युक्त, पुत्र वाहन धनसे युक्त सुरपति गुरुसे भी गौरवका पानेवाला होता है अर्थात् उसका सब मान करते हैं ॥६॥ शनिफलम् । सुजर्जरक्षीणतरं वपुश्च धनेन हीनत्वमनङ्गहीनम् । प्रसूतिकाले नलिनीशपुत्रः पुत्रे स्थितः पुत्रभयं करोतेि ॥ ७॥ जिसके पंचम शनि हो उसका आति जर्जर क्षीण शरीर हों, धनसे हीन कामहीन हो और पुत्रोंको भी भय करनेवाला है॥७॥ राहुफलम् । सुने समनि स्याबदा हिकेयः सुतेच्छा चिरं चित्त- संतापनीया । भवेत्कुक्षिपीडा मृतिः क्षुलबोधायादि स्यादयं स्वीयवर्गेण दृष्टः ॥ ८॥ जो राहु पंचम हो तो बहुत कालतक पुत्रकी प्राप्तिमें चिन्ता रहे, कोखमें पीडा होवे और वह यदि राहु अपने वर्गसे देखा गया हो तो शुधासे उस पुरुषकी मृत्यु हो ॥ ८॥ केतुफलम् । यदा पञ्चमे जन्मतो यस्य केतुः स्वकीयोदरे वातधातादिकष्टम् । स्वबुद्धिव्यया सन्ततिस्वल्पपुत्रः सदाऽनुलाभादियुक्तो भवेच्च९॥ जिसके केतु पंचम हो उसके उदरमें वातघातादिका कष्ट रहे, बुद्धिमें विकलता होवे, थोडी सन्तान और धेनुलाभादिसे युक्त हो ॥ ९॥ इति ग्रहफलम् । अथ खतभवनेशफलम् । लग्ने गते मन्ततिप सुतानां सुखं सुविद्या तिमन्त्रमिद्धिः । शास्त्राणि जानाति सुकर्मकारी रागाङ्गयुक्तः खलु विष्णुभक्तः बृहद्यवनजातकम्। यदि पंचमेश लग्नमें हो तो पुत्रोंका सुख, विद्या प्रेम तथा मंत्र सिद्धि होवे, शास्त्रज्ञाता,सुकर्मकर्ता,अंगरागयुक्त, विष्णुका भक्त होता है? सुतेशे गते द्रव्यभावे नरः स्याकुलेशाप्तवित्तः कुटुम्बे विरोधी। भवेद्धानिकारी जनो भोगसक्तःशुभैनीवपुत्रो भवेद्र्व्यनाथः २॥ जो पंचमेश धनस्थानमें हो तो कुलेश द्रव्यकी प्राति, कुटुम्बमें विरोध, हानि करनेवाला, भोगासक्त हो शुभग्रहोंसे युक्त हो तो चिरजीवी पुत्रोंवाला द्रव्याधीश होता है ॥ २ ॥ सुतेशे गते विक्रमे विक्रमी स्यात्सुहृच्छांतियुक्तो वचो- माधुरीयुक् । शुभे खेट्युक्ते शुभप्राप्तिकारी मनःकार्य- सिद्धिः सुखी शान्तनम्रः ॥ ३ ॥ जो सुतेश (पंचमपति) तीसरे हो तो पुरुष पराक्रमी, सुहृत् , शांतियुक्त, मधुर वचन बोलनेवाला हो, शुभग्रहों से युक्त शुभ लाभ करे, मनके कार्य सिद्ध हों, सुखी शांत और नम्र हो ॥ ३ ॥ सुनातिः कुरुते सु वभावगो जाकभक्तिकरं कुरा नरम् । तदनु पूर्व कर्मकरं सदा कविनने वववनिरूपणम् ॥ ४ ॥ जो पुरेश चौये घरमें हो तो पिता माताको भक्ति करनेवाला कुशल, पूर्वजोंके कर्म करनेवाला, कविजनोंको धनादिका देने- वाला होता है ॥ ४॥ तनयमावानिस्तनपस्थितो मतियुतं वचनं प्रबलं जनम् । बहुलमानयुतं पुरुषोत्तम प्रवरलोकवरं कुरुले नरम् ॥ ५॥ जो सुतेश पंचाहो तो वह पुरुष बुद्धिमान, प्रवल वचन बोलनेवाला, बहुत मानसे युक्त, पुरुष श्रेष्ठ तथा सबसे अधिक श्रेष्ठ होता है ॥५॥ रिपुगतस्तनयाधिसतिश रिपुजनाभिरतं कुरुते नरम् । स्थितनहुँ बहुदोषयुनं सदा धनसुनै रहितं खलखेचरैः ॥६ भाषाटीकासमेतम् । (५७) पंचमेश छठे हो तो मनुष्य शत्रुओंसे मिलनेवाला, इशरीर, अनेक दोषोंसे युक्त होवे, दुष्ट ग्रहोंसे युक्त हो तो धन पुत्रसे रहित हाता है ॥६॥ मदनगस्तनयस्थलनायकः सुभगपुत्रवती दयिता सदा । स्वजनभक्तिरता प्रियवादिनी सुजन शीउवती तनुमध्यमा ॥७॥ जो पंचमेश सप्तम हो तो उसकी स्त्री सुन्दर पुत्रवाली होती है, अपने जनोंका भक्तिमें तत्पर प्रियवादिनी सुजना शीलवती पतली कमरवाली होती है ॥ ७ ॥ सुतपतौ निधनस्थलगे नरः कुवचनाभिरतो विगताङ्गकः । भवति चण्डरुचिश्चपलो नरो गतधनो विकलःशठतस्करः॥८॥ जो सुतेश अष्टम हो तो मनुष्य कुबचन बोलनेवाला विकल अंग होता है, तथा चण्डरुचि चपल धनहीन विकल शठ और तस्कर होता है। सुकतभावगतस्तनयाधिपः समवितर्कविभाजनवल्लभः। सकलशास्त्र कलाकुरालो भवेन्नृपतिदत्तस्थाश्वयुतो नरः ॥९॥ जो सुतेश नवम हो तो मनुष्य वितर्कवाला, मनुष्योंका प्रिय, सम्पूर्ण शास्त्रोंकी कलामें कुशल, राजाके दिये स्थादिसे युक्त होता है ।। दशमगः कुरुते सुननायको नृपतिकर्मकरं सुखसंयुतम् । विविधलाभयुत प्रवरं नरं प्रवरकर्मकरं बनितारतम् ॥१०॥ पुत्रेश दशम घरमें हो तो राजोंके कर्म करनेवाला, सुखसहित अनेक लाभसे युक्त, प्रबल श्रेष्ठ कर्मकर्ता, वनिताप्रिय होता है ॥ १० ॥ सुतपतिर्भवगः सुखसंयुतं प्रकुरुते सुतभित्रयुतं नरम् । प्रवरगानकलाप्रवरं विभुं नृपतितुल्यकुलं च सदैव हि ॥११॥ जो पंचमेश ग्यारहवें हो तो सुखसे युक्त पुत्र और मित्रोंसे युक्त, मानवियामें कुशल औरसदाराजोंकी तुल्य कुलवालामनुष्य होताहै ११॥
(५८)
बृहद्यनजातकम् ।
व्ययगतो व्ययकत्सुतनायको विगतपुत्रसुखं खचरैः खलैः ।
सुतयुतं च शुभैः कुरुते नरं स्वपरदेशगमागमनोत्सुकम् ॥१२॥
जो पंचमेश बारहवें हो तो विशेष व्यय हो, खल ग्रह हो तो पुत्रका
सुख न मिले, शुभ ग्रह हो तो पुत्रवान् स्वदेश और परदेशके जाने
आनेमें उत्साही होता है ॥ १२ ॥ इति पुत्रादिफलम् ।
अथ दृष्टिफलम् ।
रविष्टिफलम् ।
सुतगृहे यदि सूर्यनिरीक्षिते प्रयमसंततिनाशकरश्च हि ।
तदनु पीडितवातयुतः सदा गृहभवाल्पसुखः कथितः सदा ॥१॥
पुत्रके घरको यदि सूर्य देखता हो तो पहली सन्तानका नाश करता
है, पीछे सदा वातसे पीडा और स्त्रीका सुख न्यून होता ॥१॥
चन्द्रदृष्टिफलम् ।
सुतस्थानगा चंद्रदृष्टिर्यदा स्यात्पसूते सुखं मित्रजन्यं सदैव ।
नरेन्द्रादितुल्यः स्वर्वशे प्रधानोऽप्यथैवान्यदेशे कये जीवितं च २
जो पुत्रस्थानमें चन्द्रमांकी दृष्टि हो तो मित्रोंसे सुख, अपने वंशमें
राजाकी तुल्य प्रधान, दूसरे देशमें क्रिय विक्रयकी आजीविका करे॥२॥
भौमहष्टिफलम् !
सुतगृहे यादे भीमनिरीक्षिते प्रथमसंततिनाराकरश्च हि ।
जठरगः खलु वह्निरथाधिको भोजने धमति चैव गृहेगृहे ॥३॥
पुत्रगृहमें यदि मंगलकी दृष्टि हो तो पहली सन्तानका नाश करे,
उदरमें तीव्र अग्नि हो, भोजनके निमित्त घर घर घूमता फिरै ॥ ३ ॥
बुधाष्टफलम् ।
संपूर्णदृष्टियदि पंचमे च बुधो यदा स्यातनयाप्रसूतिः ।
चतुष्टयान्ते खलु पुत्रजन्म सुकीर्तिरश्वर्ययुतो नरो हि ॥४॥
भाषाटीकासमेम् । (५९ यदि पाचवें घरमें बुधकी पूर्ण दृष्टि हो तो कन्या ही उत्पन्न हो चार कन्या होनेपर पुत्र हो यश और ऐश्वर्यवान् मनुष्य होता है ॥ ४ ॥ गुरुदृष्टिफलम् । सन्तानभावे गुरुपूर्णदृष्टिः सन्तानसौख्यं प्रचुरं करोति । शास्त्रेषु नैपुण्यमथो च लक्ष्मी विद्यां धनं वै चिरजीवितं च ॥५॥ जो पंचम घरमें मुरुकी पूर्णदृष्टि हो तो वह सन्तानका सुख अत्यन्त करता है और सब शास्त्रमें चातुर्य लक्ष्मी विद्या धन और आयुकी वृद्धि करता है ॥ ५ ॥ भृगुदृष्टिफलम् । सुतगृहं यदि काव्यनिरीक्षितं तनय जन्म पुनश्च सुता भवेत् । द्रविणवान्खलु धान्यसंचयीपठतिशास्त्रमथापि च सौख्यभाक्६ जो पुत्रघरपर शुक्रकी दृष्टि हो तो पहले पुत्र फिर पुत्री हो और वह मनुष्य द्रव्यसे युक्त धनसंचय करनेवाला होता है, विद्या पढने- वाला तथा सुखभोगी होताहै ॥ ६ ॥ शनिदृष्टिफलम् । सुतगृहं यदि मन्दनिरीक्षितं सुतसुखं न करोति नरस्य हि । स्थिरमना यशआमयवृद्धिमाक्स्वकुलधर्मरतच चिरं भवेत् ॥७॥ पुत्रधरको याद शनि देखता हो तो मनुष्यको पुत्रका सुख नहीं होता और वह स्थिर मनवाला यशस्वी रोगी तथा बहुत कालतक अपने कुलके धर्ममें रत होवे ॥ ७ ॥ राहुदृष्टिफलम् । सुतगृहं यदि राहुनिरीक्षितं सुतसुखं न करोते नरस्य हि । तदनु भाग्ययुनो नृपतेर्नयः श्रमकता विफलापि हि भारती ॥८॥ पुत्रके स्थानमें यदि राहु हो तो उस मनुष्यको पुत्रका सुख नहीं होता है पीछे भाग्युक्त हो और राजासे जय हो श्रम करनेसे भी उसकी विद्या निष्फल होती है ॥ ८॥ इति संतानभावे दृष्टि फलम् ॥
(६०)
बृहद्यवनजातकम् ।
अथ वर्षसंख्या।
रविर्भयं पितृमृतिर्नवमे च चन्द्रः षष्ठेऽग्निभीर्धरणिजोऽनुजहा
शराब्दे । मातुःक्षयं रसयमेपि च रिष्ट मातु लोगे मातुला.
तिमुशना शरवर्षलक्ष्मीम् ॥ १ ॥
रवि ९ वर्ष फल भय, चन्द्र ९ पितृवियोग, मंगल ६ अग्निभय,
बुध ६ माताक्षय, गुरु ७ मामाको दुःख, शुक्रकी दशा पांच वर्ष
लक्ष्मी मिले ॥ १ ॥
अथ विचारः।
लग्ने द्वितीये यदि वा तृतीये विलमनाथे प्रथमे सुतः स्यात् ।
तुर्ये स्थितेऽस्मिश्च सुतो द्वितीयःपुत्री सुतो वित्तयुतो नरःस्यात्
लग्नसे दूसरे वा तीसरे वा प्रयम लग्नपति हो तो पुत्र होताहै चौथे
वरमें हो तो उसके दूसरा पुत्र फिर पुत्री पुत्र हो और उसके धन
भी होवे ॥ १॥
सुताभिवानं भवनं शुभानां योगेन दृष्ट्या सहितं विलोक्यम् ।
सन्तानयोग प्रवदेन्मनीषी विपर्ययत्वेन विपर्ययं च ॥ २॥
याद पंचम घरको शुभग्रह देखते हों वा शुभग्रहोंसे युक्त हो तो
यह संतानयोग जानना इससे विपरीतका विपरीत फल कहना ॥ २॥
सन्तानभावो निजनाथदृष्टः सन्तानलब्धि शुभदृष्टियुक्तः।
करोति पुंसामशुभैः प्रदृष्टः स्वस्वाम्यदृष्टो विपरीतपेव ॥ ३॥
जो पंचम घरको उसका स्वामी देखता हो वा शुभग्रहकी दृष्टि हो
तो सन्तानकी प्राप्ति हो और खलग्रहोंसे दृष्टि हो स्वामी न देखता
हो तो विपरीत फल हो ॥ ३ ॥
व्ययं वित्तं तृतीयं वा लग्नेशः पश्यताबदि ।
तुर्यलग्नं पश्चमस्थः पुरः पुत्रस्य जन्म च ॥ ४ ॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(६१)
जो द्वादश दूसरे तीसरे और चौथे लग्नको पंचम स्थानमें स्थित
लग्नेश देखे तो पहले पुत्रका जन्म होता है ॥ ४ ॥
द्विदेहसंस्था भृशुभौमचन्द्राः सन्तानमादौ जनयन्ति नूनम् ।
एते पुनर्धन्विगता न कुर्युः पश्चात्तथादौ गदितं महद्भिः ॥५॥
जो शुक्र मंगल चन्द्रमा द्विस्वभाव लग्नमें स्थित हों तो पहले निश्च-
यसे संतान होती है और यदि धन लग्नमें स्थित होवें तो आदि अन्तमें
सन्तान नहीं होती ॥ ५ ॥
सन्तानभावे गगनेचराणां यावन्मिनानामिह दृष्टिरति ।
स्यात्सन्ततिर्वित्तमथो वदन्ति नीचोच्चमित्रारिगृहे स्थितानाम् ६
सन्तान भावको नीच उच्च मित्र शत्रु गृहमें स्थित जितने ग्रह
देखते हों उतनी सन्तति हों तथा धन होवे । यहां किसीका मत ऐसा
है कि-" नीचोच्चमित्रारिगृहस्थितानां दृशः शुभानां शुभमभकाणाम्
इति
वैष्णवतन्त्रे । शुभ ग्रहोंकी दृष्टिसे सन्तानको शुभ और अशुभ ग्रहोंकी
दृष्टिसे अशुभ होता है ॥ ६ ॥
नवांशसंख्याप्यथवांकसंख्या दृष्टया शुभानां द्विगुणा च संख्या ।
क्लिष्टा च पापग्रहदृष्टियोगान्मिभं च मिश्रग्रहदृष्धिरत्र ॥ ७॥
पंचम भावमें जिसका नवांश हो अथवा पंचम भावमें जो अंक हों
उस संख्याके तुल्य सन्तानोत्पत्ति होवे यदि पंचम भावमें शुभग्रहोंकी
दृष्टि हो तो उक्त संख्यासे द्विगुण संख्या समझना चाहिये और यदि
पापग्रहोंकी दृष्टि वा योग हो तो दुःखसे सन्तान कहना चाहिये और
जो मिश्र ग्रह हो तो मिश्र अर्थात् मिला हुआ फल होता है ॥ ७ ॥
सुताभिधाने भवने यदि स्यात्खलस्य राशिः खलखेटयुक्तः।
सौम्यग्रहैकेन न वीक्षितश्च सन्तानहीनो मनुजस्तदानीम् ॥ ८॥
(६२)
बुधवनजातकम् ।
जो पंचम भावमें पाप ग्रहकी राशि होवे और पाप ग्रहसे युक्त हो
मौर एकभी सौम्यग्रहकी दृष्टि न होतो वह मनुष्य संतानहीन होताहै।॥८॥
कविः कलत्रे दशमे मृगाङ्कः पातालयाताश्च खला भवन्ति ।
अमृतिकाले च यदि ग्रहास्तदा सन्तानहीनं जनयन्ति नूनम्॥९॥
यदि जन्मकालमें शुक्र सातवें चंद्रमा दशवें खल ग्रह चौथे स्थित
हों तो मनुष्य संतानहीन होता है ॥९॥
सुते सिताशे च सितेन दृष्टे बहून्यपत्यानि विधोरपीदम् ।
दासीभवान्यात्मजभावनाथे यावन्मितेशे शिशुसंमितिः स्यात् १०
यदि पंचम भावमें शुक्रका नवांश होय और शुक्रकी दृष्टि होवे तो
अनेक सन्तान उत्पन्न होवे इसी प्रकार चन्द्रमाके नवांशमें भी बहुत
सन्तान होते हैं और पंचम भावाधिपति यावत्संख्यक नवांशमें होय
लावत्संख्यक दासीसे उत्पन्न पुत्र कहना उचित है ॥ १० ॥
शुक्रन्दुवर्गेण युते सुताख्ये युतेक्षिते वा भृगुचन्द्रमोभ्याम् ।
भवन्ति कन्या:समराशिव पुषाश्च तस्मिन्विषमाभिधाने॥११॥
शुक्र और चन्द्रमाके वर्गसे युक्त पंचम भाव हो वा शुक्र और
चन्द्रमाकी पंचम भावपर दृष्टि हो और समराशिके वर्गमें हो तो कन्या
और विषमराशिके वर्गमें हो तो पुत्र होते हैं ॥ ११ ॥
मन्दस्य राशिः सुतभावसंस्थो मन्देन युक्तः शशिनेक्षितश्च ।
दत्तात्मनाप्तिः शशिवन्दुधेपि क्रीतः सुतस्तस्य नरस्य वाच्यः १२
जो मकर वा कुंभ राशि पंचम होय और शनिसे युक्त हो वा चन्द्र
देखता हो तो दत्तक पुत्र उसके होता है और यदि चन्द्रमाके तुल्य
बुध योगकर्ता होय तो क्रीतक पुत्रकी प्राप्ति होती है ॥ १२ ॥
मदस्य वर्ग सुतभावसंस्थे निशाकरेणापि सुवीक्षिते च ।
दिवाकरेणाथ नरस्य तस्य पुनर्भवासम्भवसूतिलब्धिः ॥ १३॥
(६४) बृहद्यवनजातकम् । जो पंचमेश केन्द्रमें पापग्रहकी राशिमें हो पापग्रहसे दृष्ट हो तो मनुष्य गतिमें श्रेष्ठ शास्त्रज्ञाता शूर होताहै,लिखने में चतुर हो सन्तानका दुःख रहे नारायण और शिवके पूजनसे संतान हो ॥१८॥ सुतपतिरस्तगतो वा पापयुतः पापवीक्षितो वापि । संततिबाधां कुरुते केन्द्रे पापान्विते चन्द्रे ॥ १९ ॥ सुतेशका अस्त हो व पापग्रह युक्त वा पाप ग्रहोंसे देखा गया हा और केन्द्रमें पापग्रह युक्त चन्द्रमा हो तो सन्तानकी बाधा करता है १९ तुलामीनमेषे वृषे दैत्यपूज्ये धनी राजमानी कलाकौतुकी च । त्रयोऽस्यात्मजावै चिरंजीविताश्च भवेद्वत्सरे वह्निभीतिद्धितीये२० जिसके तुला मीन मेष और वृष लग्नमें शुक्र हो तो वह धनी राज' मानी कला कौतुकवाला होता है, तीन पुत्र उसके चिरंजीवी रहें और दूसरे वर्षमें कुछ अग्निभय होता है ॥ २० ॥ एकः पुत्रो रवौ पुत्रस्थाने चंद्रे सुताद्वयम् । भौमे पुत्रास्त्रयो वंश्या बुधे पुत्रीचतुष्टयम् ॥ २१ ॥ सुतभवनमें सूर्य होनेसे एक पुत्रं, चन्द्रमासे दो कन्या, मंगलसे वंशमें रहनेवाले तीन पुत्र, बुधसे चार कन्या होती हैं ॥ २१ ॥ गुरौ मर्भे सुताः पंच षट् पुत्रा भृगुनंदने । शनी च गर्भपातः स्यादाही गर्भो भवेन्न हि ॥ २२ ॥ मुरु हो तो पांच पुत्र, शुक्र हो तो छः पुत्र, शनि हो तो गर्भपात हो, राहु होतो गर्भही नहीं रहता है ॥२२॥ सौम्यदृष्टयधिक संतानसुखं पापदृष्टयधिक संतानपीडा २३॥ अधिक सौम्यग्रह देखते हों तो सन्तान सुख, पाप ग्रहोंकी आधिक दृष्टिसे सन्तानपीडा होती है ॥ २३ ॥ इति सुतमावफलं समाप्तम् ॥ -
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(६६)
वृहद्यवन जातकम् ।
क रिपुस्थे सहजैश्च युको भवेन्मनुष्यश्च मुतादियुक्तः ।
समो द्विजेन्द्रश्च वराधिपैश्च महाजनेनैव विरोधकर्ता ॥४॥
याद छठे कर्क लग्न हो तो वह मनुष्य अपने भाई पुत्रादिसे युक्त
राजा और अच्छे ब्राह्मणों के समान होता है और वह प्रतिष्ठित महान
मनुष्योंके साथही विरोध करनेवाला होवे ॥४॥
सिंहे रिपुस्थे प्रवेच्च वैरं पुत्रैः समं बन्धुजनेन नित्यम् ।
धनोत्थ पातस्य विनिर्जिनत्य या मनुष्यस्य वराङ्गनाभिः॥५॥
सिंह लग्न छठे हो तो पुत्र और बन्धुजनोंके साथ नित्य वैर
हो । यदा वेश्याओंमें आसक तया आत उस मनुष्यका धनके
निमित्त वैर होवे ॥ ५॥
कन्यास्थितः शत्रुगृहे स्ववैरं का वधर्मस्य नरस्य सायोः ।
स्वबन्धुवर्गाच्च निकालपत्थो रिपुत्रनोऽपि प्रभवेन्नराणाम् ॥६॥
छठे घरमें कन्या लग्न हो तो अपने घरमें वैर करे आर वह मनुष्य
धर्म तथा साधुजनों का कार्य करनेवाला हो, अपने बन्धुवर्गले घरमें
स्थित हुआ वर्ते तथा उसके शत्रु अधिक बल करें ॥ ६॥
तुलाधरे शत्रुगृहे नरस्य नाये स्थितस्य पनवेच्च वैरम् ।
दुश्चरिणीभिश्व सुताङ्गनाभिर्वेश्याभिरेवाश्रमवर्जिताभिः ॥ ७ ॥
तुला लग्न छठे घरमें हो तो उस मनुष्पकी अपने सामीसे
अनवन रहे तथा दुश्चरित्रसे युक्त सुत और अंगता तथा आश्रमवर्जित
वेश्याजनोंसे उसका समागम हो ॥ ७॥
को रियुस्थे बसवेत्तु वैरं साई विजिकैश्च सरीसौश्च ।
व्याडौथोग गैर्नराणां भवेत्सवान्यैश्व विलासिभिश्च ॥ ८॥
वृश्चिक लाछ घरमें हो तो सर्प और सरीसृप टेढे चलनेवाले जीवोंसे
वैर होता है तथा व्याल मृग चोरगण और स्त्री जनोंसेभी वैर होताहै ॥८॥
भाषाटीकासमेतम् । (६७) चापे रिपुस्थे च भवेद्धि वैरं शरैः समेतं च सरावकेश्च । सदा मनुष्यैश्च हयैश्च हस्तिभिः पुनस्तथान्यैः परवञ्चनैश्च ॥९॥ छठे घरमें धन लग्न हो तो शब्दयुक्त बाणोंके द्वारा मनुष्य हाथी घोडोंसे वैरं करे तथा अन्य परवंचनसे भी वैर करनेवाला होता है ॥९॥ मृगे रिपुस्थे च भवेच्च वैरं सा नराणां धनसम्भवञ्च । मित्रैः सम साधुमहाजनेन प्रभूतकालं गृह सम्भवेन ॥ १० ॥ जो छठे घरमें मकर लग्न हो तो मनुष्योंसे धनके निमित्त सदा वैर करे मित्र साधु महाजन तथा गृहवालोंसे बहुत कालतक वैर रहे ॥ १०॥ कुम्भे रिपुस्थे च तथार्थहेतोनराधिोनेत्र जलाश्रयैश्च । वापीतडागादिभिरेव नित्यं क्षेत्रादितो वै पुरुषैः सुशीलैः ।।११॥ कुम्भ लग्न छ ह' तो धनके निमित्त नराधिपति जलाशयवाले जीव बावडी तालाब क्षेत्र और सुशील पुरुषोंसे वैर रक्खे ॥ ११ ॥ मीने रिपुस्थे च भवेन्नराणां वैरं च नित्यं सुनवस्तुजातम् । बीहेतुकं स्वीयजनेषु नूनं पितुः परैः साकमथातिवरम् ॥३२॥ जो छठे मीन लग्न हो तो पुत्र और दूसरी वस्तु के निमित्त स्त्रीके निमित्त प्रियजन तथा पिताके सिवाय अन्याने वैर रहे ॥ १२ ॥ इति रिपुलग्नफलम। अथ ग्रहफलम् । सूर्यफलम् । शश्वत्सौख्येनान्वितः शत्रुहन्ता सत्वोपेनचारुयानो महौजाः। पृथ्वीभर्तुः स्यादमात्यो हि मर्त्यः शत्रुक्षेत्रे मित्रज्ञो यदि स्यात् । जो छठे घरमें सूर्य हो तो निरन्तर सौख्य सहित शत्रुओंका
(६८)
बृहद्यवनजातकम् ।
मारनेवाला, पराक्रमी उत्तम रथ आदि सवारियोंसे युक्त महाबली
गजाका मन्त्री होता है ॥ १ ॥
चन्द्रफलम् ।
मन्दानिः स्थानियः कोपयुक्तो लौल्योपेतो निठुरो दुष्टचित्तः।
रोषावेशोत्यंतसंजातशत्रुः शत्रुक्षेत्रे रात्रिनाथे नरः स्यात् ॥२॥
यदि छठे स्थानमें चन्द्रमा हो तो उस पुरुषके मंदाग्नि होती है
वथा वह निर्दयी, क्रोधयुक्त, चंचल, निष्ठुर, दुष्टचित्त और क्रोधके
आवेशसे बहुत शत्रुओंवाला होता है ॥ २ ॥
भौमफलम् ।
प्राबल्यं स्याजाठराविशेषाद्दोषावेशः शत्रुवर्गेऽपि
शान्तिः। सनिः सङ्गो धर्मिभिः स्यान्नराणां गोत्रैः
पुण्यस्योदयो भूमिसूनौ ॥ ३ ॥
छठे स्थानमें यदि मंगल हो तो उस मनुष्यकी जठराग्नि अत्यन्त
प्रबल होती है, शत्रुवर्गमें शांति होवे, धर्मात्मा, सत्पुरुषोंसे मेल तथा
अपने गोत्रके जनोंसे पुण्यका उदय होता है ॥ ३ ॥
बुधफलम् ।
वादप्रीतिः सामयो निठुरात्मा नानारातिवातसंतप्त-
चित्तः । नित्यालस्यव्याकुलः स्यान्मनुष्यः शत्रुक्षेत्रे
रात्रिनाथात्मजे स्यात् ।। ४ ।।
यदि छठे स्थानमें बुध हो तो झगडमें प्रीति करनेवाला, रोगसे
युक्त, निष्ठुर चित्त तथा अनेक शत्रुसमूहोंसे संतप्त चित्त, नित्य आक-
स्यसे व्याकुल होवे और उसके चित्तमें शांति न हो ॥ ४ ॥
गुरुफलम्।
सदीतनृत्याहतचित्तवृत्तिः कीर्तिप्रियोथो निजशत्रुहन्ता ।
आरम्भकालोद्यमकन्नरः स्यात्सुरेन्द्रमन्त्री यदि शत्रुसंस्थः॥५॥
भाषाटीकासमेतम् । (६९) जो छठे स्थानमें बृहस्पति हो तो अच्छे गीत और नृत्यमें चित्त वृत्ति लगे, कीर्तिप्रिय शत्रुहंता हो और कार्यका आरंभ करनेवाला होता है ॥ ५॥ भृगुफलम् । अभिमतो न भवेत्समदानने ननु मनोभवहीनतरो नरः । विबलताकलितः किल संभवे भृगुसुतेरिगतेरिभयान्विनः ॥६॥ जो छठे घरमें शुक्र हो तो वह स्त्रीजनोंका प्रिय नहीं होता तथा काम- देवसे हीन और निर्बलता करके सहित शत्रुओंके भयसे युक्त होता है ॥६॥ शनिफलम् । विनिर्जितारातिगणो गुणज्ञः स्वज्ञानिजानां परिपालकश्च । पुष्टाङ्गन्यष्टि प्रबलोदरानि रोकपुत्रे सति शत्रुसंस्थे ॥ ७ ॥ यदि छठे शनि हो तो वह मनुष्य शत्रुओंका जीतनेवाला, गुणी, अपनी जातिका पालनेवाला, पुष्ट शरीवाला, प्रबल जठराग्निवाला बलिष्ठ होता है ॥७॥ राहुफलम् । बलोदुद्धिहानिधनं तद्वशे च स्थितो वैरभावेऽपि येषां तनूनाम् । रिपूणामरण्यं दहेदेकराहुः स्थिरं मानुलं मानसं नो पितृश्यः ॥८॥ जिसके छठे घरमें राहु हो वह बल बुद्धिसे हीन हो, धन उसके वशमें हो,शत्रुओंका नाश होवे तथा मामा और पिताके मनमें स्थिरता न हो बेतुफलम् । शिखी यस्य षष्ठे स्थितो वैरिनाशो भवेन्मातृपक्षाच्च तन्मानभङ्गः। चतुष्पात्सुखं सर्वदा तुच्छमेव निरोगो गुदेलोचने रोगयुक्तः॥९॥ जो केतु छठे घरमें हो तो शत्रुनाश हो, मामाके पक्षसे मानभंग, चौपायोंते तुच्छ सुख हो, निरोग हो परन्तु मुदा और नेत्रों में रोग होता है ॥ ९ ॥ इत्यरिमावे ग्रहफलम् ।
(७.)
बृहद्यवनजातकम्।
अथ रिपुभवनेशफलम् ।
रिपुपतौ रिपुहा तनुगे यदा विगतवैरभयः सबलः सदा ।
स्वजनकष्टपदश्च पुमान्सदा बहुचतुष्पदवाहनभोगवान् ॥ १ ॥
जोछठे घरका स्वामी शरीरस्थानमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य शत्रु-
ओंका नाश करनेवाला हो, वैर और भयसे हीन बलवान हो अपने
जनोंको कष्ट देनेवाला, चौपाये वाहनोंका भोगनेवाला होता है ॥ १ ॥
रिपुपतौ इविणे चतुरो नरः कठिनताधनसंग्रहणे क्षमः ।
निजपदप्रवगे विदितश्चलो गइयुतः कशगात्रयुतो नरः ॥२॥
याद रिपुपति धनस्थानमें हो तो वह मनुष्य चतुर, कठिनतासे धन-
संग्रह करनेमें समर्थ हो, अपने पदमें श्रेष्ठ प्रसिद्ध चलायमान रोगी
और शरीरसे कृश होता है ॥ २ ॥
सहजगे रिपुभावातौ क्षमी खलरतः कुरुते बहुकर्मकः ।
पितृभुजाप्तधनव्ययकारको बहुलकोपभरः सहजोज्झितः।।३।।
जो शत्रुपति तीसरे स्थानमें हो तो वह पुरुष क्षवावान, दुष्टोंमें
प्रीतिवाला, बहुत कमौका करनेवाला, पिताके उत्पन्न किये धनको
खर्च करनेवाला, महाक्रोधी भाइयोंसे त्यक्त होता है ॥ ३ ॥
सुखगतेरिसतो पितृपक्षपः कलहवान्वपुषा च रुजान्वितः।
तदनु नात बनेन युतो बली जनानेसोख्ययुतश्वपलः स्मृतः ॥४॥
जो शत्रुपति चौये हो तो वह पुरुष पितृपक्षका पालक, कलहप्रिय,
रोगी, पिताके धनसेधनी बली और माताके सुखसे युक्त चपल होता है।
रिपुपतौ तनयस्थलगे भवेपितृसुनायतिवादकरः प्रियः ।
मृतसुतश्च खलयहयोगतः शुभयुतोपि धनाद्भुत एव सः ॥५॥
शत्रुपति पञ्चम हो तो पिता और पुत्रोंसे विवाद करनेवाला हो, खल
ग्रहोंसे युक्त हो तो पुत्र नष्ट होवें, शुभग्रह हों तो अद्भुत धनकी
प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥
भाषाटीकासमेतम्।
(७१)
निजगृहे रिपुभावपतौ नरो रिपुगतः कपणश्च खलेोज्झितः।
स तु निजस्थललब्धसुखः सदा भवति जन्मरतः पशुयोषितः ६॥
जो शत्रुपति अपने घरहीमें हो तो वह शत्रुपक्षमें प्राप्त कृपण हो
और दुष्टोंसे त्याग किया जावे तथा अपने स्थानके सुखमें लुब्ध हो
पशु और स्त्रीसे अनुरुक्त होता है ॥ ६ ॥
अरिपती मदने खलसंयुत प्रवरकामभरावनितायुतः ।
बहुलवादकरो विषसेवकः शुभखगैर्बहुलाभसुतान्त्रितः ॥ ७ ॥
जो शत्रुपति सप्तम हो और खल ग्रहोंसे संयुक्त हो तो वह पुरुष
अतिकामवाली स्त्रीसे युक्त हो, बडा विवादी, विषसेव हो, यदि शुभ
ग्रहोंसे युक्त हो तो बहुत लाभ और पुत्रसे युक्त होता है ॥ ७ ॥
ग्रहणिरुपिपुनाथयुतेऽष्टमे विषधरान्मरणं विषतो वधः।
मरणदो विधुरेव रवि पागुरुरिती नयनेषु विपत्पदौ ॥ ८॥
जा शत्रुपात अष्टम हो तो ग्रहणी रोग होवे तथा सर्प वा विषसे
मरण हो, चन्द्र रवि हो तो राजासे हो, गुरु चन्द्र हो तो नेत्रोंमें
पीडा होती है ॥ ८ ॥
नवमगेरिपतौ रूलसंयुते चरणभङ्गकरः सुकनोज्झितः।
विविधवारकरश्च स वै प्रियो न च धनं न सुखं न सुतःसदा॥९॥
जो शत्रुपति नवम खल ग्रहोंके साथ हो तो चरणभंग करनेवाला
होवे, पुण्यहीन अनेक विवाद करनेवाला प्रिय होवे और वह धन पुत्र
तथा सुखसे रहित होता है ॥९॥
मीरगृहाधिपतिर्दशमे यदा जननवैरकरश्चपलः खलः ।
भवति पालकपुत्रयुतः शुभैर्जनकहा जगतीपरिपालकः ॥१०॥
जो शत्रुपति दशममें हो तो वह मातासे वैरै करनेवाला, चपल
स्वभावसे युक्त खल होता है यादि शुभ ग्रहोंसे युक्त हो तो पालक पुत्रोंसे
युक्त होवे और पितृघाती पृथिवीका पालन करनेवाला होता है ॥१०॥
(७३)
बृहद्यवनजातकम्।
भवगतेरिपती खलसंगमो रिपुजनान्मरणं खलु जायते ।
नृपतिचौरजनादनहानिकच्छुभखगैः सततं शुभवेत् ॥११॥
खल ग्रहों के साथ शत्रुपति ग्यारहवं हो तो दुष्टमनुष्योंके साथ मेल
हो तथा शत्रुले उस पुरुषका मरण हो राजा और चोरसे धनको हानि
हो, शुभ ग्रहोंसे युक्त हो तो शुभ करता है। ॥ ११ ॥
व्ययगते च चतुष्पदवाजिनां रिपुस्तौ धनधान्यसुखक्षयः।
गमनबुद्धिनिरंतरमेव यदिननिशं च धनाय कृतोपमः ॥ १२ ॥
शत्रुपति बारहवें हो तो चौपाये घोडे धन धान्यके सुखका क्षय हो
कही जानेको सदा इच्छा रहे रात दिन धनके निमित्त उद्यम करे ॥१२॥
इति रिपुमवनेशकालम् ।
अथ प्राष्टिफलम् ।
सूर्यदृष्टिफलम् ।
रिपुगृहेऽथ च सूर्यनिरीक्षिते रिपुविनाशकरश्च नरः सदा ।
भाति दक्षिगनेत्रहनादितः खलु मुखं न भवेज्जननीजनम् ॥१॥
यदि शत्रुवरको सूर्य देखता हो तो वह मनुष्य सदा शत्रुओंका
नाश करनेवाला हो, दक्षिण नेत्रमें पीडा हो और माता आदिका
सुख न हो ॥ १॥
चन्द्रदृष्टिकलम् ।
ओरगृहे पनि चन्द्रनिरीक्षित रिसुविवृद्धिकः सततं नृणाम् ।
क्षय कार्तिहनो मला तुरुयुतो बहुरोगयुनो भवेत् ॥ २ ॥
यदि छ वरको चममा देवता हो तो उस पुरुषके शत्रु बहुत ही
क्षय और काका रोग हो, कामका क्षय हो, गुरुके साथ हो तो बहुत
रोगोंसे युक्त होता है ॥ २ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (७५)
भौमहाष्टिफलम् ।
भौमदृष्टिममवेक्षिते शिौ वैरिनाशनकरो नरस्य हि ।
मातुलीयमुख नारानः सदा लोहशस्त्ररुधिरानिपीडनम् ॥ ३॥
छठे घरमें यदि मङ्गलकी दृष्टि हो तो उस मनुष्यके शत्रुओंका नाश
हो, मामाका सुख न मिले, लोहा शस्त्र रुधिर और अग्निसे पीडा
होती है ॥ ३ ॥
बुधदृष्टिफलम् ।
षष्ठे गृहे चन्द्र सुतेन पीक्षिते विशेषतो मातुलजं च सौख्यम् ।
परापवादी परकर्मकारी नानारिपुद्वेषकरच सः स्यात् ।। ४॥
जो छठे घरमें घुधकी दृष्टि हो तो मामाके द्वारा विशेष सुख मिले,
पराया निंदक पराये कर्म करनेवाला अनेक शत्रु उस पुरुषके
होते हैं ॥ ४ ॥
गुरुष्टिफलम्
रिपुगृहे सुरमन्त्रिनिरीक्षिते रिपुविवृद्धिमहाक्षयकारकः ।
स्थितिविनाशकरः स भवेन्नरः परिकरोति च मातुलजं सुखम् ५
शत्रु घरको यदि बृहस्पति देखे तो शत्रुवृद्धिका क्षयकारक
स्थितिका विनाश करनेवाला तया मातुलासे सुख होता है ॥ ५ ॥
भृगुष्टिफलम् ।
अरिग्रहे सति शुकतिरीक्षिते भवति मातुल जं सुखमद्भुतम् ।
स्वयमसीह भवे नापूनितो रियुविवृद्धिविनाराकरोपि हि ॥ ६ ॥
जो छठे घरको शुक्र देखता हो तो मामासे अद्भुत सुख प्राप्त हो
और वह स्वयं मनुष्योंसे पूजित हो तथा शत्रुओंकी उन्नतिका नाश
करनेवाला होता है ॥ ६ ॥
(७४)
बृहद्यवन जातकम् ।
शनिहष्टिफलम् ।
रिपुगृहे सति मन्दनिरीक्षिते रिपुविनाशकरः स च मातुलैः ।
चरणनेत्रमुखे व्रणपीडितः परुषवाग्ज्वरमहानिपीडितः ।। ७॥
शत्रु घरको याद शनि देखता हो तो शत्रुओंका तथा मामाका भी
नाश करता है चरण नेत्र और मुखमें व्रणोंसे पीडा हो कठोर वचन
बोलनेवाला हो, ज्वर और प्रमेहसे पीडित रहे ॥ ७ ॥
राहुदृष्टिफलम् ।
अरिगृहे सति राहुनिरीक्षिते रिपुविनाशकरो मनुजो भवेत् ।
खलवशाधनहानिकरो नरःसकलसद्गुणवान्विनयान्वितः॥ ८॥
शत्रु घरपर याद राहुकी दृष्टि हो तो मनुष्य शत्रुओंका नाश कर-
नेवाला हो, खल ग्रह साथ हो तो धनकी हानि करे सम्पूर्ण उत्तम
मुणोंसे युक्त विनयवान् हो ॥ ८.॥ इत्यरिभावे ग्रहदृष्टिफलम् ।
अथ ग्रहवर्षसंख्या।
सूर्यस्त्रीणि च वत्सराणि हि सुखं षड् वै हिमांशुम॒ति
भीमो वै जिनसंमिते प्रददते पुत्रं च सप्तत्रिके ।
सौम्यः शत्रुभयं मृतिं सुरगुरुः खाब्धौ च शत्रोभयं
शुक्रो भूयुगवत्सरे रिपुमृति सौरिः सुतं वै जिने ॥ १ ॥
सूर्यके वर्ष ३ सुख प्राप्ति, चन्द्रमा ६ मृत्यु, मंगल २४ वर्ष पुत्र-
दाता, बुध ३७ शत्रुभय, बृहस्पति ४० शत्रुसे भय करे, शुक्र ४१ शत्रु-
मृति, शनि राहु केतु २४ वर्ष पुत्रप्राप्ति हो ॥ १ ॥
अथ विचारः।
दृष्टियुतिश्वेलखलखेचराणामरातिभावे रिपुनाशनं स्यात् ।
शुभग्रहाणां प्रतिष्टितोऽत्र शत्रुद्रमोप्यामयसंभवः स्यात् ॥१॥
भाशटीकासमेतम् ।
(७२
जो शत्रुभावमें क्रूर ग्रहोंकी दृष्टि वा योग हो तो शत्रुओका नाश
होता है और जो शुभग्रहोंकी दृष्टि हो तो शत्रुओंकी उत्पत्ति और
रोगोंकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥
षष्ठे कूरो नरो यातः शत्रुपक्षविमर्दकः ।
षष्ठ सौम्ये सदा रोगी षष्ठे चन्द्रस्तु मृत्युः ॥ २ ॥
छठे स्थानमें क्रूर ग्रह हो तो शत्रुपक्षका मर्दक होता है, छठे मौम्य
ग्रह हो तो सदा रोगी और छठे चन्द्रमा हो तो मृत्यु देता है ॥ २ ॥
षष्ठे सौम्ये ग्रहे रोगी दीर्घायुर्मातुलात्सुखम् ।
पापग्रहे भवेच्चैव शत्रुमातुलनाशकृत् ॥ ३ ॥
छठे सौम्य ग्रह हो तो रोगी और दीर्घायु होवे मामासे सुख हो,
पाप ग्रह हो तो शत्रु और मामाका क्षयकारक होता है ॥ ३॥
इत्यरिभावविवरणं संपूर्णम् ।
अथ सप्तमं जाघाभवनम् ।
अमुकाख्यममुकदैवत्यममुग्रहयुतं स्वस्वामिना दृष्ट
युतं वाऽन्यैरपि शुभाशुभैहदृष्टं युतं न वेति ॥
नाम देवता ग्रहोंकी युक्तता स्वामीका तथा अन्य शुभाशुभ ग्रहांका
योग वा दृष्टिके भावाभावको विचार कर देखे ।।
व विलोकनीयानि ।
रणाङ्गणश्चापि वणिक्रिया च जायाविचारं गमनप्रमाणम् ।
शास्त्रप्रवीणैर्हि विचारणीयं करत्रभावे किल मर्वमेतत् ॥ १॥
युद्ध, व्यापार, स्त्रीविचार, यात्राका प्रमाण यह सब वार्ता शास्त्रमें
चतुर पुरुषोंको सप्तम घरसे विचारना चाहिये ॥१॥
(७६)
बृहद्यवनजातकम्।
अथ लग्नफलम् ।
मेषेऽस्तसंस्थे हि भवेत्कलत्रं क्रूरं नराणां चपलस्वभावम् ।
पापानुरक्तं कुजनप्रशंसं वित्तप्रियं स्वार्थपरं सदैव ।। १॥
जिसके सप्तम घरमें मेष लग्न हो तो उस मनुष्यकी स्त्री कूर और
चपल स्वभाववाली हो तथा पापानुरक्त कुजनोंमें प्रशंसावाली धनाप्रिय
और सदैव स्वार्थमेंही तत्पर रहती है ॥ १ ॥
वृषस्तसंस्थे च भवेत्कलनं सुरूपदन्तं प्रणतं प्रशान्तम् ।
पतिव्रतं चारगुणेन युक्तं लक्ष्याधिकं ब्राह्मणदेवभक्तम् ॥ २॥
जिसके सातवें वृष लग्न हो उसकी स्त्री सुन्दर दांतोंवाली नम्र शान्त
और पतिव्रता सुन्दर गुणोंसे युक्त लक्ष्मी करके अधिक तथा ब्राह्मण
और देवमें भक्ति करनेवाली हो ॥२॥
तृतीयराशौ सति वै कलत्रे कलत्ररत्नं सधनं सुवृत्तम् ।
रूपान्वितं सर्वगुणोपपन्नं विनीतवेषं गुरुवर्जितं च ॥ ३ ॥
जिसके मिथुन लग्न सप्तम भावमें हो उसकी स्त्री धनसे युक्त सुन्दर
चरित्रवाली रूपवती सब गुणोंसे,युक्त विनीतवेष और मुरुसे रहित हो॥३॥
कर्केऽस्तसंस्थे च मनोहराणि सौभाग्ययुक्तानि गुणान्वितानि ।
भवंति सौम्यानि कलत्रकाणि कलंकहीनानि च संमतानि ॥४॥
यदि सप्तम कर्क लग्न हो तो मनोहर सौभाग्ययुक्त गुणवती कलंक
दीन सौम्य स्वभाववाली माननीय स्खी उस पुरुषके होती है ॥ १ ॥
सिंहेस्तसंस्थे च भवेत्कलत्रं तीवस्वभावं चपलं सुदृष्टम् ।
विहीनवेषं परसमरक्तं वक्रस्वनं स्वल्पसुतं कुशं च ॥५॥
यदि सप्तम सिंह लग्न हो तो उसकी स्त्री तीव्रस्वभाव चपला और
दुष्टा होती है, विहीन वेष पराये घरमें रहनेकी इच्छावाली टेटे स्वरवाली
थोडी पुत्रवाली दुबली होती है ॥ ५॥
भाषाटीकासमेतम् । (७७) कन्यास्तसंस्थे च भवन्ति दाराः स्वरूपदेहास्तनयविहीनाः । सौभाग्यभोगार्थनयेन युक्ताः प्रियंवदाः सत्यधनाः प्रगल्भाः॥६॥ जो कन्यालग्न सप्तम हो तो स्त्री स्वरूपवती हों तया पुत्रांस हीन हों सौभाग्य भोग अर्थ और नीतिसे युक्त हो प्रिय वचनबोलनेवाली सत्यवादिनी तथा धृष्ट स्वभाववाली होती हैं ॥ ६ ॥ तुलेस्तसंस्थे गुणगर्वितांग्यो भवन्ति नार्यो विविधप्रकाराः । पुण्यपिया धर्मपराः सुदन्ताः प्रभूतपुत्राः पृथुलाङ्गन्युक्ताः।।७।। जो तुलालग्न सप्तम हो तो उस पुरुषकी स्त्री गुणोंसे गर्वितांगी अनेक प्रकारकी होती हैं तथा. पुण्यात्मा धर्मपरायणा सुन्दर दांतामे युक्त बहुत पुत्रोंवाली और स्थूल अंगवाली होती हैं ॥ ७ ॥ कीटेऽस्तसंस्थे च कलासमेता भवन्ति भार्याः कपणा नराणाम् । सुकुत्सितांग्यः प्रणयेन हीना दौर्भाग्यदोषैर्विविधैः समेताः॥८॥ जो सप्तम वृश्चिक लग्न हो तो उस पुरुषकी स्त्री कृपण तथा कला- ओंसे युक्त निंदित अंगोंवाली प्रणयसे हीन और अनेक दुर्भाग्य दोषोंसे युक्त होती है ॥ ८ ॥ चापेऽस्तसंस्थे च भवेत्कलत्रं सदा नराणां पुरुषाकति स्म) सुनिष्टुरं भक्तिनयेन हीनं प्रशान्तिसौख्यं मतिवर्जितं च ॥९ ।। जो'सप्तम धन लग्न हो तो उस पुरुषकी स्त्री पुरुषके आकारवाल, हो तथा निष्ठुर, भक्ति और नीतिसे हीन, शांतिसुखसे युक्त और बुद्धिसे हीन होती है ॥ ९ ॥ मृगेस्तसंस्थे च भवेत्कलत्रं धर्मध्वजं सत्सुतया समेतम् । पतिव्रतं चारुगुणेन युक्तं सौभाग्ययुक्तं सुगुणान्वितं च ॥१०॥ जो सप्तम मकर लग्न हो तो स्त्री धर्मवाली अच्छी पुत्रीसे युक्त हो पतिव्रता सुन्दर गुणोंसे युक्त सौभाग्य और सुन्दरखोंसे सम्पन्न हो १०
(७८)
बृहद्यवनजालकम् ।
कुंभेस्तसंस्थे च भवेत्कल स्थिरस्वभावं पतिकर्मरक्तम् ।
देवद्विजप्रीतियुतं प्रकृष्टं धर्मध्वजं सर्वसुखै समेतम् ॥ १३ ॥
जो सप्तम कुंभलग्न हो तो स्त्री स्थिरस्वभाव पतिनिर्दिष्ट कर्म करने
वाली देवता ब्राह्मणोंकी निरन्तर सेवा करनेवाली धर्मध्वजा और
सर्वसुखोंसे युक्त होती है ॥ ११ ॥
मीनेस्तसंस्थे च विकारयुक्तं भवेत्कलनं कुसुतं कुबुद्धि ।
अधर्मशीलं प्रणयेन हीनं सदा नराणां कलहप्रियं च ।। १२॥
जिसके सप्तम घरमें मीन हो उसकी स्त्री विकारवाली कुमाति और
कुपुत्रवाली हो तथा अधर्म करनेवाली प्रणयसे हीन और सदा कलह
करनेवाली होती है ॥ १२ ॥ इति कलत्रे लग्नफलम् ।
अथ प्रहफलम्।
सूर्यफलम् ।
स्त्रिया विमुक्तो हृतकार्यकीर्तिर्भयामयान्यां सहितः कुशीलः ।
नृपप्रकोपातिकशो मनुष्यः सीमन्तिनीसद्मनि पद्मिनारो॥१॥
जिसके सप्तम स्थानमें सूर्य हो वह पुरुष स्त्रीसे हीन हृतकार्य और
कीर्तिवाला भय और रोगोंसे युक्त कुशील हो, राजाके क्रोधसे जो
दुःख है उससे दुर्बल शरीर होवे ॥ १ ॥
चन्द्रफलम् ।
महाभिमानी मदनातुरः स्यानरो भवेत्क्षीणकलेवरश्च ।
धनेन हीनो विनयेन चन्द्रे चन्द्राननास्थानविराजमाने ॥ २॥
जो सप्तम चन्द्रमा हो तो वह मनुष्य महा अभिमानी कामसे
व्याकुल क्षीणशरीर धन और विनयसे हीन होता है ॥ २ ॥
भौमफलम् ।
मानानर्थव्यर्थचित्तोपसँमरिवातैर्मानवं हीनदेहम्
दारापत्यानन्तदुः खपततं दारागारेगारकोऽयं करोति ॥ ३ ॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(७९)
जो सप्तम मंगल हो तो अनेक प्रकारके अनर्थ रूप जो व्यर्थ चित्तके
उपसर्ग हैं उनसे तथा शत्रुसमूहसे उसका देह हीन होजाय और वह
मनुष्य स्त्री तथा सन्तानके अनन्त दुःखसे प्रतप्त रहे ॥ ३ ॥
बुधदृष्टिफलम् ।
चारुशीलविभवरलंकतः सत्यवाक्सुनिरतो नरो भवेत् ।
कामिनीकनकसूनुसंयुतः कामिनीभवनगामिनीन्दुजे ॥ ४ ॥
जो सप्तम बुध हो तो वह मनुष्य सुन्दर शील तथा ऐश्वर्यसे अलंकृत
हो सत्यवादी हो तथा सुन्दर स्त्री और सुवर्ण पुत्रसे युक्त होताह ॥४॥
गुरुफलम् ।
शास्त्रायासे सक्तचित्तो विनीतः कान्तापित्रात्यंतसंजातसौख्यः।
मन्त्री मर्त्यःकार्यकर्ता प्रसूतौजायाभावे देवपूज्यो यदि स्यात्५
जो सप्तम गुरु हो तो उस पुरुषका चित्त शास्त्र के अभ्यासमें
रहे और विनीत हो तथा ससुरेसे अत्यन्त सुखकी प्राप्ति हो और
कार्यकर्ता मन्त्री हो ॥ ५ ॥
भृगुफलम् ।
बहुकलाकुशलो जलकेलिकदतिविलासविधानविचक्षणः ।
अधिकतां तु नटी
बहु मन्यते सुनयनाभवने भृगुनन्दने ॥ ६ ॥
यदि सप्तम शुक्र हो तो वह मनुष्य अनेक प्रकारकी कलाओंमें
कुशल, जलविहार करनेवाला, रतिविलासके विधानमें चतुर नटीमें अति-
शय सुहृदता करनेवाला होता है ॥ ६ ॥
शनिफलम् ।
आमयेन बलहीनतां गतो हीनवृत्तिजनचित्त संस्थितः ।
कामिनीभवनधान्यदुःखितः कामिनीभवनने शनौ नरः ॥ ७ ।।
जो सप्तम शनि हो तो वह पुरुष रोगसे हीनवलवाला तथा
हीनवृत्तिके कारण मनष्योंके चित्तमें स्थिति करनेवाला धान्यादिसे
दुःखी रहे ॥ ७ ॥
(८०)
बृहद्यवनजातकम् ।
राहुफलम् ।
विनाशं चरेसप्तमे सैंहिकेयः कलत्रादिनाशं करोत्येव नित्यम् ।
कटाहो यथा लोहजो वह्नितप्तस्तथा सोऽतिवादान शान्ति प्रयाति
जो सप्तम राहु हो तो विनाश करे, नित्य स्त्री आदिको नाश करे जैसे
अग्निसे तप्त लोहँका कटाह शान्तिको नहीं प्राप्त होता है इसी प्रकार
वह मनुष्य विवादरूपी अग्निसे तप्त शान्तिको नहीं प्राप्त होता है ॥ ८॥
केतुफलम् ।
शिखी सप्तमे चाध्वनि क्लेशकारी कलत्रादिवर्गे सदा
व्यग्रता च । निवृत्तिश्च सौख्यस्य वै चौरभीतिर्यदी
कीटगः सर्वदा लाभकारी ॥९॥
जो केतु सप्तम हो तो उस पुरुषको मार्गमें क्लेश होवे और स्त्री
आदिके वर्ग में सदैव व्यग्रता हो और सुखकी निवृत्ति हो चौरसे भय
हो जो कर्कका हो तो सदा लाभ करता है ॥ ९ ॥
इति सप्तमभावे ग्रहफलम् ।
अथ सप्तमभवनेशफलम् ।
मदपतिस्तनुगः कुरुते नरं सकलभोगयुतं च गतव्ययम् ।
बहुकलत्रसुखी नहि मानुषो दलितवैरिजनः प्रमदोत्सुकः ॥१॥
जिसके सप्तमेश शरीरभावमें प्राप्त हो वह मनुष्य सम्पूर्ण भोगोंसे
युक्त खर्चरहित हो और बहुत स्त्रियोंसे सुखी न हो तथा वैरिजनोंको
जीतनेवाला स्त्रीमें उत्कंठित रहता है ॥ १॥
मदपतौ धनगे वनिता खला भवति वित्तवती सुखवर्जिता ।
स्वविवाक्यविलोपकरी मदान्मतिमती स्वयमात्मजवर्जिता॥२॥
भाषाटीकासमतम् ।
(८१)
जो सप्तमेश धनस्थानमें प्राप्त हो तो उस पुरुषकी खी दुष्टा,
धनवती, सुखसे वर्जित हो,' मदसे अपने पतिके वचन लोप करनेवाली
बुद्धि मती, और स्वयं सन्तानसे रहित होती है ॥२॥
मदपतौ सहजस्थलगे स्वयं बलयुतो निजबान्धववल्लभः ।
भवति देवरपक्षयुताऽबला स्मरमदा दयितागृहगाः खलाः ॥३॥
जो सप्तमेश तीसरे स्थान प्राप्त हो तो वह पुरुष स्वयं बली
बांधवजनोंका प्रिय हो और सप्तममें खल ग्रह हों तो उसकी स्त्री
देवरका पक्ष करनेवाली कामदेवके मदवाली हो ॥ ३ ॥
स्मरपतिस्तनुते मुखभावगो विबलिनं पितृवैरकर खलम् ।
भवति वा दयितापरिपालकः स्वपतिवाक्ययुता महिला सदा।।४॥
जो मदनेश चतुर्थ हो तो वह बलरहित तथा पितासे वैर करनेवाला
दुष्ट हो, स्त्रीका पालक' हो और उसकी स्त्री सदा उसके वचन करने
वाली होती है ॥ ४ ॥
मदपतिस्तनये तनयप्रदः सुभमसौख्यकरः सुखसंयुतः।
भवति दुश्वधस्तनयैर्युतः खलखगैर्दयितापरिपालकः ॥५॥
जो मदनेश पञ्चम हो तो पुत्रका देनेवाला सुभग सुख करनेवाला
तथा सुखसे संयुक्त हो और खलग्रहोंसे युक्त हो तो क्रूरवध हो
पुत्रोंसे युक्त स्वीका पालन करनेवाला होता है ॥५॥
बतवया विपदां तु निषेवको रिपुगते रुचिरं हि चिरं वपुः ।
मदपतौ दयितादयितः खलु क्षयगदेन युतः खलखेचरैः ॥ ६॥
जो मदनेश छठे स्थान में हो तो वह मनुष्य आयुहीन विपत्तिके
आश्रित रहे और उसका शरीर मनोहर हो तथा स्त्रीका प्रिय हो यदि
खल ग्रह उसके साथ हो तो क्षयरोगसे युक्त होता है ॥ ६ ॥
प्रमदभावपती निजमन्दिरे गतरुजं हि नरं परमायुषम् ।
परुषवाग्रहितो पतिशीलवान्भवति कीर्वियुतः परदारगः ॥७॥
(८.) वृहद्यवनजातकम् । जो सप्तमेश अपने ही स्थानमें हो तो वह मनुष्य रोगरहित परमायु, युक्त होता है और कठोर वचनरहित अति शीलवान्, कीर्तियुक्त परदाराभिगामी होता है ॥ ७ ॥ निधनगे तु कलत्रपती नरः कल इकद्गृहिणीसुख वर्जितः । दयितया निजया न समागमो यदि भवेदयवा मृतभार्यकः ॥८॥ जो सप्तमेश अष्टम हो तो वह मनुष्य कलह करनेवाला, स्त्रीसुखसे हीन, अनी स्त्रीसे समागम करनेवाला न हो तो अयवा उसकी स्त्री मृत्युको प्राप्त होती है ॥ ८ ॥ मरपतिर्नवमे यदि शीलवान् खलखगैः कुरुते हि नपुंसकम् । तपसि नि सुपथितो नरः प्रमदया निजया सह वैरकत्।।९।। यदि पाने नवम हो तो वह पुरुष शीलवान हो यदि दुष्ट ग्रह हो तो नपुंसक हो तथा तप और तेजसे प्रसिद्ध हो, स्त्रीसे वैर करनेवाला होता है ॥ ९॥ दशमगे मदसे नृपदोषः कुवचनः काटी चपलो नरः । श्वशुरदुष्ट जनानुचरः खलानेजवधूजनयोर्नहि हर्षकत् ॥१०॥ यदि सप्तमेश दशममें हो तो वह राजाको दोष देनेवाला कुवचन बोलनेवाला, कपटी चपल होता है, खल ग्रह युक्त हो तो श्वशुर और दुष्टजनोंका अनुचर हो तथा अपने बन्धुजनों और कामिनोम प्रेम न करे ॥ १० ॥ भवगते तु कलत्रपतौ सदा स्वदयिता प्रियकच्च तथा सती । अनुचरी स्वधवस्य सुशालिनी पशुमतिः क .या पितृसंशया११॥ जो सप्तमेश एकादश घरमें हो तो उसकी स्त्री प्यार करनेवाली सती अनुचरी और सुशीला हो तया कलाकरके पशुमति पितामें अनेक संशयवाली होती है। ११ ॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(८३)
मसतिय॑य गस्तनुते व्ययं स्वदयितागृहबन्धुविवर्जितः ।
भवति लौल्यवती खलवाक्यदाव्ययपरा गृहतस्करयुक्तता॥१२॥
जो सप्तमेश बारहवें घरमें हो तो बहुत व्यंग हो तथा वह पुरुष गृह
बंधु और भार्यासे वर्जित हो, स्त्री चंचला, कटुभाषण करनेवाली खर्च
करनेवाली घरमें तस्करतासे संयुक्त होती है ।। १२ ॥
इति सप्तमभवनेशफलम् ।
अथ दृष्टिफलम् ।
सूर्यदृष्टिफलम् ।
संपूर्ण दृष्टिं यदि कामभावे सूर्यश्च कुर्यान्मदनक्षयं च ।
जायाविनाशं खलु शत्रुपीडां नरो भवेत्पाण्डुरदेहवर्णः । ॥
यदि सातवें घरमें सूर्यकी सम्पूर्ण दृष्टि हो तो वह कामक्षय करता है।
स्त्रीविनाश शत्रुपीडा करता है, वह मनुष्य पाण्डुपर्णमाला होता है॥१॥
चन्द्रष्टिकला।
जायागृहे शीतकरण दृष्टे सौंदर्यभार्या गुणशालिनी च ।
चापल्ययुक्ता गजगामिनी च परापवादे निपुणा कुशीला ॥२॥
जो सप्तम घरमें चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो उसकी स्त्री सुन्दर गुण-
शालिनी हो, चापल्ययुक्त गजगामिनी पराये अपवादमें चतुर कुशील-
बाली होती है ॥ २ ॥
भीमदृष्टिफलम् ।
जायागृहे भौमनिरीक्षिते च जायाविनाशं कुरुते च पुंसाम् ।
वस्तौ तथा व्याधिनिपीडितश्च वीतो विवादोगमने महाभयम् ३
यदि सप्तम घरको मंगल देखे तो उस पुरुषकी स्त्रीका नाश करता है,
वस्तिव्याधिसे व्याकुल, स्वीसे विवाद, गमनमें महाभय होता है ॥३॥
बुधष्टिफलम् ।
जायागृहे चन्द्रसुतेन दृष्टे जायासुखं चैव करोति पुंसाम् ।
जीवेचिरं प्रोऽदुतमात्रधारी कलाधिवाली धनधान्यभोमी॥४॥
(८४) बृहृद्यवनजातकम् । जो स्त्रीघरको बुध देखे तो पुरुषको नित्य स्त्रीका सुख हो और चिरजीवी अद्भुत शरीरवाला कलाओंसे शोभित धनधान्य भोगी वह पुरुष होता है॥४॥ गुरुद्दष्टिफलम् । कलत्रभावेऽमरपूजितेक्षिते जायासुन्वं पुत्रसुखं नरस्य व्यापारलाभो महती प्रतिष्ठा धन धर्मेण च संयुतोऽयम् ॥५॥ जो स्वीघरमें गुरुदृष्टि हो तो उस पुरुषको स्त्री और पुत्रका सुख करता है, व्यापारमें लाभ बहुत प्रतिष्ठा धर्म और धनकी प्राप्ति उस पुरुषको होती है ॥ ५ ॥ भृगुष्टिफलम् । कलत्रभावेऽसुरपूजितेक्षिते जायासुखं पुत्रसुखं करोति । प्रभूतपुत्रं यदि सौम्पयुक्तो व्यापारसौख्यं विमलां च बुद्धिम्॥६॥ जो स्वीके घरको शुक्र देखता हो तो स्त्री और पुत्रका सुख करता है सौम्य ग्रहोंसे युक्त होनेसे बहुत पुत्रोंकी उत्पत्ति होती है तथा व्यापारमें मुख और निर्मल बुद्धि होती है ॥ ६ ॥ शनिदृष्टिफलम् । जायागृहे मन्दनिरीक्षिते च जायाविनाशः खलु मृत्युतुल्यः। पाण्डुव्यथा चाथ तनौ च पुंसां जरातिसारग्रहणीविकारः॥७॥ यदि स्त्रीघरको शनि देखता हो तो स्वीका नाश करे वा उसको मृत्युतुल्य कर देवे, शरीरमें पाण्डुरोगसे क्लेश हो तथा ज्वर, अतिसार और संग्रहणीका विकार रहै ॥ ७ ॥ राहुदृष्टिफलम् । यदि कलत्रगृहे तमवीक्षिते मदविवृद्धिरथो मनुजस्य वै । स्ववचनं हि सदैव तु साधयेत्तमदशासमये म्रियतेऽङ्गना ॥८॥ जो खीघरको राहु देखे वो दिन दिन मदकी वृद्धि हो, अपने वाक्योंका वह मनुष्य सिद्ध करनेवाला हो, राहुकी दशाके समय स्त्रीकी मृत्यु हो ॥ ८॥ इति सप्तममाने महदृष्टिफलम् । auf भाषाटीकासमेतम् । (८५) अथ वर्षसंख्या। बोनाशकागगुणै रविरिन्दुरेव मृत्युं च तिथ्यमृगथानि- मयं मुनीन्दौ । शशिजः कलत्रे स्वयाप्तिं गुरुर्यमयमै मनुके । सितः स्त्रीवर्षे राहुशनिकेतवः स्त्रीकष्टकराः ।। ३ ।। रविकी दशा ३४ वर्ष' स्त्रीनाश करे, चन्द्रमा १५ वर्ष मृत्यु तुल्य करे, मंगल अग्निभय दशा वर्ष १७ रहे, बुधकी दशा ७ .वर्ष स्वीकी प्राप्ति, मुरुदशा २२ वर्ष स्त्रीप्राप्ति, शुक्र १४ वर्ष में स्त्रीप्राप्ति तथा शनि राहु केतु स्वीको कष्ट करते हैं ॥ १ ॥ अथ विचारः। - मूर्तों कलत्रे च नवांराको वा द्विषट्कभागविलवः शुभानाम् । अनेन योगेन हि मानवानां स्यादङ्गनानामचिरादवाप्तिः ।। १ ॥ मूर्तिमें सप्तम भावमें जो शुभ ग्रहोंका नवांश द्वादशांश वा द्रेष्काण हो तो स्त्रीप्राप्तिके निमित्त शुभ होवे अर्थात् इस योगसे बहुत शीघ्र पुरुषोंको स्त्रीकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥ सौम्यैर्युक्तं सौम्यभं सौम्यदृष्टं जायास्थानं देहिनामङ्गनानिः। कुर्यानूनं वैपरीत्यादभाव मिश्रत्वेन प्राप्तिकाले प्रलापः ॥ २ ॥ यदि सप्तम भाव शुभ ग्रहोंसे युक्त राशिवाला, तथा शुभ ग्रहोंसे बष्ट हो तो अवश्यही स्त्रीकी प्राप्ति हो इससे विपरीत होने में स्त्रीका मभाव हो और मिश्रग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो तो स्वीकी प्राप्ति होनेके समय प्रलाप अर्थात् अनर्थक वचन होवें ॥ २ ॥ लगाइयये वा रिपुमन्दिरे वा दिवाकरेन्द्र भवतस्तदानीम् । शुभेक्षितौ तौ हि कलत्रगेहे भायाँ तदैकां प्रवदेन्नरस्य ॥ ३॥ -
(८६)
वृहद्यवनजातकम् ।
लग्नसे बारहवें वा छठे स्थानमें सूर्य और चन्द्रमा स्थित हों अथवा
शुभ ग्रहोंसे दृष्ट सप्तम भावमें स्थित हों तो उस पुरुषके एक ही स्त्री
होती है ॥ ३ ॥
मण्डान्तकालेऽपि कलत्रमावे भूगोः सुते लग्नगतेऽजाते ।
वन्ध्यापतिः स्यान्मनुजस्तदानीं सुभेक्षितं नो भवनं खलेन ॥४॥
गंडान्त समयमें भी सप्तम भावमें शुक्र स्थित हो तथा लग्नमें शनैश्चर
स्थित हो तो वह मनुष्य वंध्या (बाँझ) स्त्रीका पति होता है परन्तु वह
सप्तम भाव शुभग्रहोंसे दृष्ट न हो किंतु पापग्रहोंसे दृष्ट हो ॥४
ययालये वा मनालये वा खलेषु बुयालयगे हिमांशौ ।
कलत्रहीनो मनुजस्तनूजैर्विवर्जितः स्यादिति वेदितव्यम् ।।५।।
यदि बारहवें वा सातवें स्थानमें पापग्रह स्थित हों और पञ्चमभावम
चन्द्रमा स्थित हो तो मनुष्य स्त्री और पुत्रसे हीन होता है ॥ ५ ॥
प्रसूतिकाले च कलत्रभावे यमस्य भूमीतनयस्य वर्गे ।
ताश्यां प्रदृष्ट व्यभिचारिणी स्यावापि तस्या व्यभिचारकर्ता ६
जन्मसमय सप्तम भावमें शनि और मंगलका वर्ग हो और इनकी
दृष्टि हो तो उस पुरुषकी स्त्री व्यभिचारिणी होती है और पुरुष भी
व्यभिचार करनेवाला होता है ॥ ६ ॥
शुक्रन्दुपुत्रौ च कलत्रसंस्थौ कलत्रहीनं कुरुते मनुष्यम् ।
शुभेक्षितौ तो वयमो विरामे कामं च रामां लभते मनुष्यः।।७।।
शुक्र बुध सप्तम हों तो मनुष्य स्त्रीहीन होता है और यदि शुभ ग्रहोंसे
दृष्ट हो तो अधिक अवस्थामें उसको स्त्री प्राप्त होती है ॥ ७
शुकेन्दुजीवशशिजैः सकलैविभिश्च द्वाश्यां युतं मदगृहं
तु तथैककेन । आलोकितं विषमभरिदमेव नूनं यङ्गिना
भवति नुश्च खलस्वभावा ॥८॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(८७)
शुक्र चन्द्रमा बृहस्पात बुध यह सब तीन दो वा एक सप्तम भावमें
स्थित हों और विषम ग्रह देखते हों तो स्त्री क्रूरस्वभाववाली हो ।।८।।
चन्द्राद्विलगाच खलाः कलत्रे हन्युः कलत्रं बलयोगतस्ते ।
चन्द्रार्क पुत्रौ च कलत्रसंस्थौ पुनश्च तौ स्त्रीपरिलब्धिदौ स्तः९॥
चन्द्रमासे वा विलग्नसे जो कलत्र भावमें क्रूर ग्रह हों तो बली होनेमें
वे स्त्रीको मार डालते हैं, चन्द्रमा शान जो सप्तम हो तो वे फिर स्त्रीकी
प्राप्ति कराते हैं ॥९॥
कलत्रभावेशनवांशतुल्या नार्यो ग्रहालोकनतो भवन्ति ।
एकैच भौमार्कनवांशके च जामित्रभावे च बुधायोर्वा ॥१०॥
सप्तम भावका स्वामी जितनी संख्याके नवांश में हो, वा जितने
ग्रहोंसे दृष्ट हो उतनी ही स्त्रियां उस मनुष्यके होती हैं, यदि मंगल
और सूर्यका नवांश हो तथा बुध और सूर्य सप्तम भावमें स्थित हों
तो एक ही स्त्री होवे ॥ १० ॥
शुक्रस्य वर्गेण युते कलत्रे वह्वङ्गानाप्ति गुवीक्षणेन ।
शुकेक्षिते सौम्यगणेऽङ्गनानां बाहुल्यमेवाशुभवीक्षणान्न ॥११॥
याद सप्तम भावमें शुक्र ग्रहका वर्ग हो तथा शुक्रकी दृष्टि हो तो
बहुतसी स्त्रियों की प्राप्ति हो और शुक्रसे दृष्ट सौम्यगण हो तो बहुत
स्त्रियोंकी प्राप्ति हो यदि पाप ग्रह देखते हों तो उक्त फल न हो ॥११॥
महीसुते सप्तमगेहयाते कान्तावियुक्तः पुरुषस्तरा स्यात् ।
मन्देन दृष्टे म्रियतेपि लब्ध्वा शुभग्रहालोकनवर्जितेऽस्मिन् ॥१२॥
जो सातवें घरमें मंगल हो तो पुरुष स्त्रीसे वियुक्त होताहै, यदि शनि
देखता हो और शुभ ग्रहोंकी दृष्टि न हो तो स्त्री प्रप्त होकर मरजाती है१२
पत्नीस्थाने यदा राहुः पापयुग्मेन वीक्षितः ।
पत्नीयोगस्तदा न स्यात्वापि म्रियतेऽचिगद् ॥ १३ ॥
(८८) बद्यवनजातकम् जो सप्तम भावमें राहु हो और दो पापग्रहों की दृष्टि हो तो स्त्रीयोगे नहीं है और यदि प्राप्ति भी हो तो शीघ्रही मरजाती है ॥ १३ ॥ षष्ठे च भवने भौमः सप्तमे राहुमंभवः । अष्टमे च यदा सौरिस्तदा भार्या न जीवति ॥ १४ ॥ छठे मंगल सातवें राहु अष्टम शनि हो तो उसकी स्त्री न जीवे १४॥ सप्तदशभावस्यैन्यं कृत्वा संख्याऽस्ति या खलु । तत्संख्याकैर्गतैर्विवाहो भवति ध्रुवम् ॥ १५ ॥ सातवें दश भावको एकत्र कर जो संख्या हो उतनेही वर्ष व्यतीत होनेपर विवाह हो इसमें सन्देह नहीं ॥ १५ ॥ अथवा यत्र वर्षे तु गुरुदृष्टिस्तदोदहः। कुजदृष्टिस्तु यद्वर्षे तत्र कष्टं विनिर्दिशेत् ॥ १६॥ अथवा जिस वर्ष में गुरुकी दृष्टि हो उस वर्ष में विवाह हो और जिस व मंगलकी दृष्टि हो उस वर्षमें कष्टसे कहना ॥ १६ ॥ कलत्रभावाधिपतेहि वाच्या मूर्तिः कलत्रस्य वयःप्रमाणम् । विलमनाथेन सखित्वमस्ति पतिव्रता भक्तियुता सदा सा ॥१७॥ कलत्र भावके अधिपतिवत् स्त्रीकी अवस्था तथा मूर्ति जाननी, यदि लग्नेश सप्तमेशका मित्र हो तो वह पवित्रता भक्तियुक्त हो ॥ १७ ॥ सौम्याधिक्ये स्त्री पुखं क्रूराधिक्ये स्त्रीमरणं नेष्टं च ।। सौम्यग्रह अधिक हों तो स्त्रीको सुख हो, कर ग्रह अधिक हों तो स्वीका मरण हो वा नेष्ट जानना ॥ इति जाया भावविवरणं संपूर्णम् ॥ अथाष्टमं भृत्युभवनम् । अमुकाख्यममुकदैवत्यममुकग्रहयुतं स्वस्वामिना दृष्टं युतं वाऽन्यैरपि. शुभाशुभैहैर्न वेति ।।
भाषाटीकासमेतम् ।
(८९)
-नाम देवता ग्रहोंकी स्थिति तया स्वामी और अन्य शुभाशुभ ग्रहोंके
योग वा दृष्टिके भावाभावको देखकर पूर्ववत विचार करे ।
तत्र विलोकनीयानि ।
नद्युत्तारात्य नवैषम्पदुर्ग शस्त्रं चायुः सङ्कटं चेति सर्वम् !
रन्ध्रस्त्याने सर्वथा कल्पनीयं प्राचीनानामाज्ञया जात कैज्ञः॥३॥
नदीका पार उतरना, अति विषमदुर्ग, शस्त्र, आयु, संकर यह सब
वार्ता प्राचीन आचार्योंकी आज्ञासे अष्टम स्थानसे देखना चाहिये ॥१॥
लग्नफलम् ।
मेषेऽष्टमस्थे निधनं नरस्य भवद्विदेश कुरुते स्थितस्य ।
परार्थवीक्षानिकषायितत्वं महाधनित्वं त्वतिदुःखितत्वम् ॥१॥
जो अष्टम मेष लग्न हो तो उस मनुष्यका विदेशमें मरण तथा प्रत्येक
वस्तुकी परीक्षामें चतुर महाधनी और अतिदुःखते युक्त होता है ॥१॥
वृषेऽष्टमस्थे च भवेन्नराणां मृत्युप्रेहे श्लेष्मकृताद्विकारात् ।
महाशयाहा च चतुष्पदावा रात्री तथा दुष्ट जनमहाभयम् ॥२॥
जो अष्टम स्थानमें वृष लग्न हो ता उस मनुष्यकी कफके विकारसे
गृहमें मृत्यु हो महाशय वा चौपायोंसे तथा रात्रिमें दुष्ट जनोंसे
महाभय हो ॥ २॥
तृतीयराशी हि भवेन्नराणां मृत्युस्थितन्तश्च कनिष्ठसङ्गात् ।
पोहोद्भवादा रससंभवा गुदस्य रोगादथवा प्रमादाद ॥ ३ ॥
जो मिथुन लग्न अष्टम स्थानमें हो तो कनिष्ठ संगसे मृत्यु हो
अथवा प्लीहारोगसे वारसभक्षगसे वा गुदरोगसे वा प्रमादसे मृत्यु होती
है ॥३॥
कऽष्टमस्थे च जलोपसर्गाकीटात्तथाऽतीय हि भीषणाहा ।
भवेविनाशः परहस्ततो वा विदेशसंस्थस्य नरस्य चैव ॥ ४॥
जो अष्टम स्थानमें कर्क हो तो जलसे कीटसे अति भीषण वस्तुसे वा
इसरेके हाथसे परदेशमें स्थित मनुष्यकी मृत्यु हो ॥ ४ ॥
(९०)
बृहद्यवनजातकम् ।
सिंहेऽष्टमस्थे च सरीसृपादै भवेछिनाशौ मनुजस्य सम्यक् ।
बालोद्भवो वापि वनाधितोवा चौरोद्भवो वाथ चतुष्पदोत्थः५॥
जो सिंह लग्न अष्टम स्थानमें हो तो उस मनुष्यका सर्प आदि जीवोंसे नाश
हो, बालकसे वा वनके आश्रयसे चोरसे वा चतुष्पदसे विनाश हो ॥५॥
कन्या या चाष्टमगा विलासात्सदा स्ववित्तान्मनुजस्य
घातः । स्त्रीणां हि हन्ता विषमासनस्थः स्त्रीभिः कतो वा
स्वगृहाश्रिताभिः ॥ ६ ॥
जो अष्टम कन्या लग्न हो तो उस मनुष्यका विलाससेवा निज धनसे
मरण हो, स्त्री जनोंका हन्ता हो, विषम आसनमें स्थित रहे वा अपने
घरमें स्थित स्त्रीजनोंसे निधन हो ॥ ६ ॥
तुलावरे चाष्टमगे च मृत्युभवेन्नराणां विपदौषधादै ।
निशागमे चाथ चनुपशवा कतोपवासास्थ वा प्रलापात् ॥ ७ ॥
जो अष्टम तुला लग्न हो तो उस मनुष्यका मरण विषद औषधिसे
अथवा रात्रिमें चतुष्पदमे उपवाससे प्रलापसे निधन हो ॥ ७ ॥
स्थानेऽष्टमे चाष्टमराशिमंगानृणां विनाशोवनो भवेन ।
रोगेण वा कीटममुद्भवेन स्वस्थानसंस्थेन कुलोद्भवेन वा ॥ ८॥
जो अष्टम वृश्चिक लग्न हो तो उस मनुष्यका विनाश मुखरोग वा
कीटसे उत्पन्न रोगसे अपने स्थानमें स्थित मनुष्यसे व वंशोद्भव मनुष्यसे
होता है ॥ ८ ॥
चापेष्टमस्थे च भवेन्नराणां मृत्युर्निजस्थाननिवासिना ध्रुवम् ।
गुह्मोद्भवेनोपगुदोद्भवेन रोगेण वा कीटचतुष्पदैश्च ॥ ९ ॥
जो अष्टम धनुषलग्न हो तो उस मनुष्यकी मृत्यु निज स्थानमें स्थित
मनुष्यसे वा मुह्यरोगसे वा मुदाके पास होनेवाले रोगसे अथवा कीट
और चौपायोंसे होती है ॥ ९ ॥
भाषाटीकासमेम् । (९१) मृमोष्टमस्थश्च नरस्य यस्य विद्यान्वितो मानगुणैरुपेतः । कामी च शूरोऽथ विशालवक्षा शास्त्रार्यवित्सर्वकलासु दक्षः१० जिस मनुष्यके अष्टम मकर लग्न हो तो वह मनुष्य विद्यासे युक्त, मानगुणोंसे युक्त, कामी, शूर, विशाल छातीवाला, शास्त्रार्थज्ञाता, सब कलाओंमें चतुर होता है ॥ १० ॥ घटेऽष्टमस्थे तु भवेद्विनाशो वैश्वानरात्संगमजाच रोगात् । नानावणैर्वा जलजैर्विकारः श्रमैः कृतेर्वाऽपरसंश्रयादा ।।११॥ जो अष्टम कुंभ हो तो अग्नि से वा संगमसे उत्पन्न हुए रोगसे अनेक प्रकारके व्रण, जलविकार, श्रम, वा दूसरेके आश्रयसे मृत्यु हो ॥११॥ मीनेऽष्टमस्थे तु जनस्य मृत्युभवेदतीसारकताच कष्टात् । पित्तज्वराद्वाथ मरुज्ज्वराई पित्तप्रकोपादथवा च शस्त्रात्॥१२॥ मीन लग्न अष्टम हो तो उस मनुष्यको अतिसारकृत कष्ट, पित्तज्वर, बातज्वर, पित्तप्रकोप इनसे वा शस्त्रसे मृत्यु होती है ॥ १२ ॥ इत्यष्टमे लग्नफलम् । अथ ग्रहफलम् । सूर्यफलम् । नेत्राल्पत्वं शत्रुवर्गाभिवृद्धिर्बुद्धिवंशः पूरुषस्यातिरोषः । अर्थाल्पत्वं काश्यमङ्गे विशेषादायुःस्थाने पद्मनीषाणनाथे ॥१॥ जो अष्टम सूर्य हो तो उस पुरुषकी छोटी आंखें हों, शत्रुवर्गकी वृद्धि हो बुद्धिभ्रष्ट हो बडा क्रोधी थोडा धनी और दुर्बल शरीरवाला हो॥१॥ चन्द्रफलम् । मनारोगैः क्षीणदेहोतिनिस्वश्चौरारातिक्षोणिपालाभितप्तः । चित्तोडेगव्याकुलो मानवस्यादायुःस्थाने वर्तमाने हिमांशौ।।२।।
(९२) बुधवनजातकम् । जिसके अष्टम चन्द्रमा हो वह रोगोंसे क्षीण शरीर तथा धनसे तीन हो, चोर शत्रु और राजासे संताप हो, चित्तके उद्देगसे उस मनुष्यका मन व्याकुल होता है ॥ २॥ भौमफलम् । वैकल्यं स्यान्नेत्रयोर्दुभंगत्वं रक्तालीडा नीचकर्मप्रवृत्तिः। बुदेरान्ध्यं सज्जनानां च निन्दा रंध्रस्थाने मेदिनीनंदनश्चेत् ॥३॥ जो अष्टम मंगल हो तो नेत्रामें विकलता दुर्भगता रक्तसे पीडा नीच कर्ममें प्रवृत्ति बुद्धिका अंधा तथा सजनोंकी निन्दा करनेवाला हो॥३॥ बुधफलम्। भूपप्रसादाप्तसमस्तसिद्धिनरो विरोधी सुतरां स्ववर्गे । सर्वप्रयत्नैः परतापहन्ता रंधे भवेञ्चंद्रसुतः प्रसूतौ ॥ ४ ॥ जो रन्ध्रस्थानमें बुध हो तो उस मनुष्यको राजाके प्रसादसे सब सिद्धि हो तथा वह अपने वर्गमें विरोध करनेवाला हो सब प्रयत्नसे पराये तापका हन्ता हो ॥ ४ ॥ गुरुफलम् । प्रेष्यो मनुष्यो मलिनोऽतिदोनो विवेकहीनो पिनयोज्झितश्च । नित्यालसः क्षीणकलेवरश्चेदायुनिशेषे वचसामधीशः॥५॥ जो अष्टम स्थानमें गुरु हो तो वह मनुष्य मलिन, अति दीन, विवेक और नम्रतासे हीन, नित्य आलसी और क्षीणशरीवाला होता है ॥५॥ भृगुफलम् । प्रसन्नमूर्तिर्नुपलब्धमानः सदा हि शंकारहितः सगर्वः । श्रीपुत्रचिंतासहितःकदाचिन्नरोऽष्टमस्थानगते सितारये ॥६॥ जो अष्टम शुक्र हो तो वह मनुष्य प्रसत्रमूर्ति, राजासे मान प्राप्त करनेवाला, सदा निशंक, गर्वयुक्त तथा स्त्री और पुत्रकी चिन्ता करनेवाला होता है । ६॥
भाषाटीकासमेतम् ।
शनिफलम् ।
कशतर्नुननु द्रुविचर्चिको विभवतोद्भवदोषविवर्जितः ।
अलसतासहितो हि नरो भवेन्निधनवेश्मनि भानुसुते स्थिते ॥७॥
जो अष्टम शनि हो तो वह कृशशरीर दाद और पामाले युक्त,
विभवताके दोषसे रहित तथा आलस्यसे युक्त होता है ॥ ७ ॥
राहुफलम्।
नृपैः पण्डितैर्वदितोऽनिंदितश्च सद्भाग्यलाभः सद्भश एव ।
धनं जातकं तज्जनाश्च त्यजन्ति श्रमपंथिरुग्रंध्रगश्चद्धि राहुः॥८॥
जा अष्टम राहु हो तो वह मनुष्य राजाओं और पंडितोंसे तथा
अनिंदित हो एक साथ उसको लाभ एकसाथ ही भ्रष्टता हो, जातक धन
मनुष्य उसको त्याग करे श्रमसे युक्त हो ग्रन्थि रोग हो। ॥ ८ ॥
केतुफलम् ।
गुदं पीडयते वा जनै व्यरोधो यदा कीटके कन्यके युग्मके वा।
भवेच्चाष्टमे राहुछायात्मनेऽपि वृषं चाभियाते सुतार्थस्य लाभः९
जो अष्टम केतु हो तो मुदामें पीडा हो और जो वृश्चिक कन्या वा
मिथुन राशिका हो तो मनुष्योंसे द्रव्यका अवरोध हो और जो मेष वा
वृष राशिका हो तो पुत्र और धनकालाभ करता है ॥ ९ ॥
स्त्यष्टमें ग्रहफलम् ।
अथाष्टमभवनेशफलम् ।
मृतिपतिस्तनुगो बहुदुःखकद्भवति वा बहुरुष्टविवादकत् ।
यदि नरो नृपतेर्लभते धनं मदयुतो बहुदुःखसमन्वितः ॥ १ ॥
जो अष्टमेश जन्मलग्नमें हो तो बहुत दुःखका करनेवाला, बहुत रुष्ट
तथा विवाद करनेवाला होता है तथा राजासे धनको प्राप्ति और रोग
तथा दुःखसे युक्त होता है॥१॥
(९४)
बृहद्यवनजातकम्।
निधतपे धनगे चलजीवितो बहुलशास्त्र युतोऽपि च तस्करः।
खलखगैश्च शुभं न गदान्वितो नृपतितो मरणं हि सुनिश्चितम्॥२॥
जो अष्टमेश दूसरेमें हो तो चलजीवित हो बहुत शास्त्र युक्त होकर
भी तस्कर होता है, दुष्ट ग्रह होनेसे शुभ न हो, उसका राजासे मरण
हा और वह रोगी होता है ॥ २ ॥
सहजमेऽष्टमपे सहजैः स्वयं स च विरोधकरोथ सुहृज्जनः ।
काठनवाक्यपरचालः खलो भवति बन्धुजनेन विवर्जितः॥३॥
जो अष्टमेश तीसरे हो तो वह भाइयोंसे तथा सुहृजनोंसे स्वयं
विरोध करे, कठिन वाक्य बोलनेवाला, चञ्चल स्वभाव, दुष्ट बंधुजनोंसे
हीन होता है ॥ ३ ॥
मृतिपतौ सुखभावगते नरो जनकसंचितवैभवनाशकद ।
गदयुतश्च सुते जनकेथवा कलह एवमिथश्च सदैव हि ॥ ४ ॥
जो अष्टमेश चौथे हो तो वह मनुष्य पिताके संचित धनको नष्ट
करता है तथा रोगी रहे और पिता पुत्रमें परस्पर सदा केश होता रहे॥४॥
मरणभावपतिस्तनये स्थितस्तनयनाशकरच सदैव हि ।
यदि खलैरशुभंस च धूर्तराद्शुभखमैश्च शुभं सुतवृद्धिभाक्॥५॥
जो अष्टमेश पंचम हो तो पुत्रका नाश होता है जो खल ग्रह हो तो
अशुभफल और छली पुरुषोंमें मुख्य हो और शुभग्रहोंसे युक्त हो तो
शुभ फल तथा पुत्रादिकी वृद्धि हो ॥६॥
मृतिपती रिपुभावगतो या रविमहीननयो च विरोधकत् ।
विधुयुनश्च विरोधको बुधे भृगुशनी बहुरोगकरावुभौ ॥ ६ ॥
जो अष्टमेश छठे हो और सूर्य या मंगल होतो विरोध करनेवाला
हो, चन्द्रयुक्त बुध मा विरोध करे भूतु शनि हो वो बहुत रोग करें॥६॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(९५)
मदनगेऽष्टमपेऽपि च गुह्यरुकपणदुष्ट कुशीलजनप्रियः ।
खलखगैर्बहुपापविरोधकत्तमदया क्षितिजेन च शाम्यति ॥ ७॥
जो अष्टमेश सप्तम हो तो मुह्यस्थानमें रोग, कृपण, दुष्ट, कुशील
जनोंका प्रिय होता है, दुष्ट ग्रहोंके साथ हो तो वह पुरुष बहुत पाप और
विरोध करे । मंगलके साथ होनेसे प्रमदाद्वारा शान्ति होती है ॥ ७ ॥
मृतिपतौ मृतिगे व्यवसायकद्गदगणेन युतः शुभवाक्छुचिः ।
कितवकर्मकरः कपटी नरः कितपकर्मणि ना विदितः कुले 1८॥
जो अष्टमेश अष्टम हो तो वह पुरुषव्यापार करनेवाला, रोगोंसे युक्त
शुभवाक, पवित्र, धूर्त कर्मकारी कपटी, कुलमें धूर्ततासे विदित हो ॥८॥
सुकतगेऽष्टमभापतौ जनो भवति पापरतः खलु हिंसकः।
खलु सुहन्मुखपूज्य इतस्ततो भवति मित्रगणेन विवर्जितः॥९॥
जो अष्टमेश नवम हो तो वह मनुष्य पापकारी हिंसक होता है इधर
उधरसे सुहृदोंके मुखसे पूजित और बन्धुगणमे हीन होता है ॥९॥
मृतिपतौ दशमस्थलमाश्रिते नृपतिकर्मकरोपिसमः खलैः ।
भवति कर्मकरश्च नरः सदा प्रियजनै रहितः खलु दुःखितः॥१०॥
जो अष्टमेश दशम स्थानमें स्थित हो तो नृपकेसे कर्म करता हुआ
भी वह दुष्ट होता है और प्रियजनोंसे रहित एवं दुःखित होता है ॥१०॥
भवमतोऽष्टमपः खलु चाल्पतो भवति पुष्टियुतः परतः सुखी।
शुभखगैर्बहुजीवति युक्खलैर्भवति नीचजनैश्च समन्धितः ॥११॥
जो अष्टमेश एकादश स्थानमें प्राप्त हो तो वह पुरुष अल्प पुष्टियुक्त
मुखी होता है। शुभ ग्रहोंसे युक्त हो तो चिरजीवी हो, दुध ग्रहोंसे युक्त
हो तो वह मनुष्य नीच पुरुषोंकी संगति का है ॥ ११ ॥
(९६)
बृहद्यवनजातकम् ।
व्ययगते मृतिपे च कठोरवाग्भवति तस्करकर्मकरः शठः।
विकलकर्मकरो निपुणः खलो मृतिमितश्च मृगाङ्कसुभक्षणाद १२
जो अष्टमेश चारहवें स्थानमें हो तो वह पुरुष कटुभाषी तथा
चागेके कर्म करनेवाला और शठ होता है, विकलकर्म करनेवाला, चतुर
और खल होता है तथा कपूरके भक्षणसे मृत्युको प्राप्त होता है ॥१२॥
इत्यष्टमभवनेशफलम्।
अथ ग्रहदृष्टिफलम् ।
सूर्यदृष्टिफलम् ।
धुमणिवीक्षितमष्टमकं गृहं गुदरुजार्तिकरं च नरस्य हि ।
पितृपरेण व्रतेन विवर्जितो नृपतिपीडित अन्यरतः स्त्रियाः॥१॥
जो अष्टम स्थानको सूर्य देखता हो तो उस मनुष्यकी मुदामें पीडा
हो पिताके आचरणोंसेहीन राजासे पीडित और अन्य स्त्रियों में प्रीति करे।
चन्द्रदृष्टिफलम् ।
संपूर्णदृष्टियदि रंध्रगेहे विधोस्तु कुर्यात्खलु मृत्युतुल्यम् ।
व्याधियं चैव जलादिकष्टं तथात्यरिष्टं धनधान्यनाशनम् ॥२॥
यादि अष्टम स्थानमें चन्द्रमाकी पूर्ण दृष्टि हो तो मनुष्यको मृत्युकी
तुल्य करता है व्याधिका भय जलादिसे कष्ट महा अरिष्ट तथा धना
धान्यका नाश करता है ॥ २ ॥
भौमफलम् ।
रन्धं गृहं भौमनिरीक्षितं च हर्षस्तथा वस्तिविशेषपीडा ।
लोहाइयं वा धनधान्यनाशो मार्गे भयं तस्करतो धनव्ययः॥३॥
यादि अष्टम स्थानमें मंगलकी दृष्टि हो तो इर्ष हो बस्तिमें विशेष पीडा.
तोहसे भय, धनधान्यका नाश मार्गमें भय तस्करसे धन नष्ट हो ॥ ३॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(९७)
बुधदृष्टिफलम् ।
अष्ट हि भवनं बुद्धक्षितं मृत्युनाशनकरो नरः सदा ।
राजवृत्तिकषिकर्मजीवितश्चान्येदशगमनं च तस्य हि ॥४॥
जो बुधकी दृष्टि अष्टम स्थानमें हो तो वह मनुष्य मृत्युका नाश
करनेवाला हो, वह राजवृत्ति तथा कृषिकर्म जीविका करे तथा उसका
अन्य देशमें गमन हो ॥ ४॥
गुरुदृष्टिफलम् ।
रन्ध्रवेश्म सुरपूजिक्षितं मृत्युनुल्यता छरदि चाटने ।
राजतो भयमयान्यनो भवेद्रव्यहीनपुरूषो मतिक्षमः ॥५॥
जो अष्टम घरपर गुरुकी दृष्टि हो तो उस मनुष्यके अष्टम वर्षमें
मृत्युकी तुल्य रोग हो, राजा वा अन्य पुरुषसे भय हो द्रव्यहीन हो
और मतिहीन होता है ॥ ५ ॥
भृगुष्टिफलम् ।
रन्धे गृहे शुक्रनिरीक्षित च रन्ध्रे सदा व्याधिविवर्द्धनं च ।
कष्टेन साध्यो भवतीह चार्थः कुबुद्धितोऽनर्थकरः सदा नरः॥६॥
जो अष्टममें शुक्रकी दृष्टि हो तो उस पुरुषके रंध्रमें सदा व्याधिकी
वृद्धि हो उसका अर्थ सदा कष्टसाध्य हो और कुबुद्धिके कारण
सदा अनर्थ करे ॥ ६॥
शनिदृष्टिफलम् ।
मृत्युभावगतमन्ददर्शनं वारितो भवति लोहतो भयम् ।
जन्मतो हि नखवत्सरे भवेन्मृत्युतुल्यमथवा रुनो भयम् ॥ ७॥
जो अष्टम शनिकी दृष्टि हो तो जल और लोहेसे उस पुरुषको भय
हो, अथवा जन्मसे बीसवें वर्ष मृत्यु तुल्य रोग भय होता है ॥ ७॥
राहुदृष्टिफलम् ।
निधनवेश्वनि राहुनिरीक्षिते वंशहानिबहुदुःखितो नरः ।
व्याधिदुःखपरिपीडितोऽथवा नीचकर्म कुरुतेऽत्र जीवितः ॥८॥
(९८) बृहयवनजातकम् । अष्टम यदि राहुको दृष्टि हो तो वंशहानि और वह पुरुष बहुत दुःखी होता है। व्याधिके दुःखसे पीडित हो और अपने जीवन में नीच कर्म करनेवाला होता है ।। ८ ॥ इति दृष्टिफलम् । अथ ग्रहवर्षसंख्या। छिद्रे त्रयो मृतिमितो हिमगुः पढदे नाशं कुजस्तु विपदा- क्षियमेऽथ सौम्यः। मन्यन्दके हि धनधान्यविनाशकारी गुरुरिन्दुरामैः रोग सितो दशागमे स्वपराक्रमं च ॥१॥ अष्टम सूर्यको दशा ३ वर्ष मृत्युभय, चन्द्रमाकी छ वर्ष मृत्यु भय, मंगलकी २२ वर्ष विपत्ति, बुध १४ वर्ष धन धान्यनाश, गुरु रोग ३१ वर्ष, शुक्र १० वर्ष पराक्रम करे ॥ १॥ भथ विचारः। चतुर्थस्थो यदा भानुः शशिना च विलोकितः । यदि नो वीक्षितः सौम्यैमरणं तस्य निर्दिशेत् ॥१॥ जो चौथे स्थानमें सूर्य हो उसको चन्द्रमा देखता हो और सौम्य ग्रहकी दृष्टि न हो तो उस पुरुषका मरण होता है ॥१॥ अष्टमाधिपतिर्यत्र तदई त्रिगुणीकृतम् । अष्टमाङ्केन संयुक्तं चोदयेत्स्फुटमायुषः ॥२॥ जहां अष्टमेश हो उस अंकको तिगुना कर अष्टम अंकको जोडकर अवस्था कहे ॥२॥ दिनकरप्रमुखैनिधनाश्रितेर्भवति मृत्युरिति प्रवदेकमात् । अनलतो जलतः करवालतो ज्वरबलेन रुजा क्षुधया तया॥३॥ जो सूर्यादिग्रह अष्टमस्थानमें हों तो मृत्यु क्रमसे इस प्रकार जाननी- अनि, जल, तलवार, ज्वरवल, रोग, क्षुधा और तृषा इनकी बाधासे मृत्यु होती है ॥ ३ ॥ इत्यष्टममावविवरणं समाप्तम् ।
भाषाटीकासमेतम् ।
(९९)
अथ भाग्यभावो नवमः ।
अमुकायममुकदैवतममुकग्रहयुतं च स्वस्वामिना दृष्ट
युतं वाऽन्यैः शुभाशुभमेहेर्न वेति ।
अमुक नाम, अमुक देवता, अमुक ग्रहको योग स्वामीकी दृष्टि तथा
शुभाशुभ ग्रहोंसे देखा गया है या नहीं यह विचारना चाहिये ।।
तत्र विलोकनीयानि ।
धक्रियायां मनसः प्रवृत्तिर्भाग्योपपत्तिर्विमलं च शीलन् ।
तीर्थप्रयाणं प्रणयः पुराणैः पुण्यालये सर्वनिदं प्रविष्टम् ।। १॥
धर्मकी क्रियामें मनको प्रवृत्ति, भाग्यका उदय, निर्मल शील,
तीर्थयात्रा, पुराणोंसे प्रणय यह नवम घरसे देखना चाहिये ॥ १ ॥
तत्रादौ लग्नफलम् ।
धर्मस्थितं चैव हि मेषलग्नं चतुष्पदोऽर्थ प्रकरोति धर्मम् ।
तेषां प्रदानेन तु पोषणेन दयाविवेकेन च पालनेन ॥१॥
जो धर्मस्थानमें मेषलग्न हो तो वह पुरुष चौपायोंसे प्राप्त धर्म करे
अर्यात उनके दान पोषण दया विवेक और पशुपालन यह उस
पुरुषको होते हैं ॥१॥
वृषे च धर्मे तु गते मनुष्यो धनी च कुर्याद्वचनं प्रभूतम् ।
विचित्रानबहुलप्रदानर्षिभषणाच्छादनभोजनैश्च ।। २ ॥
जो धर्मस्थानमें वृष लग्न हो तो वह मनुष्य धनी बडे वचन बोलने-
वाला, विचित्र दान भूषण वस्त्र भोजन प्रदान करनेवाला होता है॥२॥
तृतीयराशौ प्रकरोति धर्म धर्म मति तस्य नरस्य चैव ।
मायागताद्वै द्विजभोजनाच दीनानुकंपाश्रयणाच्च नित्यम् ॥३॥
जो मिथुन राशि नवम हो तो उस मनुष्यकी बुद्धि अभ्यागतसेवा,
ब्राह्मणभोजन और दीनोंपर दयाके आश्रयसे सदा धर्म करने में
तत्पर होता है ॥३॥
(१००) बृहद्यवनजातकम्। वृतोपवासविषमैर्विचित्रधर्म नरः संकुरुते सदैव । धर्माश्रिते चैव चतुर्थराशौ तीर्याश्रयावा वनसेवया च ॥ ४ ॥ जिसके धर्मस्थानमें कर्क लग्न हो तो वहा मनुष्य सदा विचित्र व्रत उपवासोंसे धर्म करे तथा तीर्थ आश्रय वा वनकी सेवा करे ॥ ४ ॥ आसंस्थितेऽङ्के खलु सिंहराशौ धर्म परेषां प्रकरोति मर्त्यः । स्वधमहीनश्च क्रियाभिरेव सुतीर्थसंपद्विनयौविहीनः॥५॥ जिसके नवम सिंह राशि हो वह मनुष्य दूसरेका धर्मानुष्ठान करे, स्वयं धर्म क्रियासे हीन हो और तीर्थ सम्पत् विनय इनसे विहीन होता है ॥५॥ धर्मस्थितः स्यादि षष्ठराशिः स्त्रीधर्मसेवी मनुजो भवेद्वै । विहीनभक्तिर्बहुजिष्णुता च पाखण्डमाश्रित्य तथान्यपक्षम् ॥६॥ जिसके नवम कन्या लग्न हो वह मनुष्य स्त्री धर्मसेवी होता है तथा भक्तिसे होन, अधिक जयशील हो, पाखण्डके आश्रित होकर दूसरेका पक्ष स्वीकार करे ॥ ६ ॥ तुलाधरे धर्मगते मनुष्यो धर्म करोत्येव सदा प्रसिद्धः। देवद्विजानां परितोषणाच जनानुरामेण तथाद्भुतः सः ।। जो नवम तुला लग्न हो तो वह मनुष्य सदा धर्मसे प्रसिद्ध हो, देवता ब्राह्मणोंका सदा संतोष करे, मनुष्योंसे प्रेम करे, अद्भुत हो॥७॥ धर्माश्रितोऽलिश्च भवेबदा 4 पाखण्डधर्म कुरुते मनुष्यः। पीडाकरश्चैव तथा जनानां भक्त्या विनीतः परितोषणेन ॥८॥ जो धर्मस्थानमें वृश्चिक राशि हो तो वह मनुष्य पाखण्ड धर्म करे, मनुष्योंको पीडाकारक हो, भक्तिसे और परितोषसे नम्र होता है ॥८॥ चापे तथा धर्मगते मनुष्यः करोति धर्म द्विजपोषणं च । स्वेच्छान्वितोऽथो सविनिर्मिता च प्रभूततोषः प्रथितविलोके ९
भाषाटीकासमेनम् । (१०१)
धन लग्न नवम हो तो मनुष्य द्विजपोषणके धर्म करे तथा स्वेच्छा-
पारी दूसरोंको सन्तोष करनेवाला सब लोकोंमें विख्यात होताहै ॥ ९ ॥
धर्माश्रितेवै मकरे मनुष्यो धर्मात्प्रतापी खलु जायते च ।
पश्चाद्विरक्तिवलु कामिनीषु कौल्यं समाश्रित्य सदा च पक्षम् १०
नवम मकर लग्न हो तो मनुष्य धर्मसे प्रतापी होताहै और वह
कुलके पक्षको आश्रय करके पीछे स्त्रियोंमें विरक्त होता है ॥ १० ॥
कुम्भे च धर्म प्रगते हि धर्म पुंमां विधत्ते सुरसङ्घजातम् !
वृक्षाश्रयोत्थंच तथाशिषंच आरामवापीप्रियता सदैव ॥११॥
कुंभ लग्न नवम स्थानमें हो तो वह मनुष्य देव निर्दिष्ट धर्म करे, वृक्ष
आरोपण बाग बावडी तालावादिके निर्माणमें उसकी उत्कृष्ट इच्छा रहे ॥
धर्माश्रिते चैव हि मीनराशौ करोति धर्म विविधं नृलोके ।
देवालयारामतडागजातं तीर्थाटनैश्चाथ मखैर्विचित्रैः ॥ १२॥
जो नवम मीन राशि हो तो वह मनुष्य लोकमें अनेक प्रकारसे धर्म
करनेवाला होताहै, देवालय बगीचे तालाव तीर्थाटन यज्ञाादे करने-
वाला होता है ॥ १२ ॥ इति धर्मभावे लग्नफलम् ।
अथ ग्रहफलम्।
सूर्यफलम् ।
धर्मकर्मनिरतश्च सन्मतिः पुत्रमित्रजमुखान्वितः सदा ।
मातृवर्गविषमो भवेन्नरो धर्मगे सति दिवाकरे खलु ॥ १ ॥
जो नवम सूर्य हो तो वह पुरुष धर्मकर्ममें प्रीति करनेवाला श्रेष्ठ
मति, पुत्र और मित्रोंसे उत्पन्न जो सुख उससे युक्त तथा मातृपक्षक
मनुष्योंसे वैर करनेवाला होता है ॥ १ ॥
(१०२) बृहद्यत्रन जातकम् । चन्द्रफलम् । करत्रपुत्रद्रविणोपपन्नः पुराणवातोश्रवणानुरक्तः । सुकर्ममतीर्थपरो नरः स्यायदा कलावानवमालयस्थः ॥२॥ जिसके नवम चन्द्रमा हो वह स्त्री पुत्र और धनसे युक्त पुराणवार्ता श्रवणमें अनुरक्त, श्रेष्ठ कर्म तथा श्रेष्ठ तीर्थ करनेवाला होता है ॥ २ ॥ भौमफलम् । हिंसाविधाने मनसः प्रवृत्तिं धरापतेगौरवतोपलब्धिम् । क्षीणं च पुण्यं द्रविणं नराणां पुण्यस्थितःक्षोणिसुतः करोति३॥ जो नवम मङ्गल हो तो उस मनुष्यके मनमें हिंसाका उदय, राजासे गौरवकी प्राप्ति क्षीण पुण्य और थोडा धन होता है ॥ ३ ॥ बुधफलम् । बुध उपक्रतिधाता चारुमातादरो यो- ऽनुचरधनसुपुहर्षयुक्तो विशेषात् । विकृतियुतमनस्को धर्मपुण्यैकनिष्ठो झमृतकिरणजम्मा पुण्यभावे यदा स्यात् ॥४॥ जो नवम बुध हो तो वह मनुष्य ज्ञानी उपकारी आदर करनेवाला, सेवक धन और पुत्रोंसे युक्त, विशेष हर्षवाला, कभी उन्माद युक्त होता है तथा उसकी बुद्धि पुण्य और धर्ममें तत्पर होती है ॥ ४ ॥ गुरुफलम् । नरपतेः सचिवः सुकृती पुमान्सकलशास्त्रकलाकलनादरः । व्रतकरो हि नरो विजतत्परः सुरपुरोधसि वै नवमस्थिते ॥५॥ जो नवम गुरु हो तो वह पुरुष राजाका मन्त्री, श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, सम्पूर्ण शाब कलामें प्रेमी तया व्रत करनेवाला विनामें बत्पर होता है ॥५॥ भृगुफलम् । अतिथिगुरुसुराचर्चातीर्थयात्रोत्सवेषु पितृकतधनसंघात्यन्तसंजाततोषः ।
भाषाटोकासमेतम् । (१०३) मुनिजनसमवेषो जातिमान्यः कराच भवति नबननावे संस्थित भार्गवेऽस्मिन् ॥ ६ ॥ जो नवम शुक्र हो तो अतिथि गुरु और देवताओंका पूजन, तीर्य- यात्रा, उत्सवोंमें पिताका संचित किया वन व्यय कर संतोष मानने. बाला, मुनिजनोंके समान वेषवाला,जातिमान्य कृशशरीर होता है ॥६॥ शनिफलम् । धर्मकर्मरहितो विकलाङ्गो दुर्मतिर्हि मनुजो विमनाः सः । संभवस्य समये हि नम्र भाग्यमानि शनौ स्थिरचित्तः ॥७॥ जिसके नवम शनि हो वह मनुष्य धर्म कर्म से रहित, विकल अंग, दुर्मति, विमन और स्थिरचित्त होता है ॥ ७ ॥ राहुफलम् । बमोङ्गोकतं न त्यहा ब्रतानि त्यजेत्सोदरानैव चाति- प्रियत्वात् । रतिः कौतुके यस्य तस्यास्ति तस्यास्ति भाग्ये शयानं सुखं वन्दित बोधयन्ति ॥ ८॥ जो नक्म राहु हो तो वह मनुष्य जो अंगीकार करे उसको वा बतोंको त्याग न करे और अतिप्रिय होनेके कारण भ्राताओंको नहीं त्यागता है, रतिमें कौतुकवाला होता है, शयनसे बंदीजन उसको जगाते हैं ॥ ८॥ केतुफलम् । यदा धर्ममा केतवो धर्मनाशं सुतीर्थे मतिम्लेच्छतोलाभवृद्धिम् । शरीरे व्यथा बाहुरोग विधत्ते तपोदानतो हास्यवृद्धिं करोति॥९॥ जो धर्मस्थानमें केतु हो तो धर्म नाश, तीर्थमें मति म्लेच्छसे लाभ- वृद्धि हो, देह में व्यया, बाहुमें रोग तप वा दानसे हास्यवृद्धि हो । ९॥ इति ग्रहफल ।
(१०४)
बृहद्यवनजातकम्।
अथ नवममवनेशफलम् ।
तनुगते नवमाधिस्तो गुरौ सुरविनायकपूजनतसरः।
सुकतवान्कपणो नकर्मकस्मृतियुतो मितभुक्स नरः शुचिः।।
जो धर्म स्थानका अधिपति तनु स्थानमें स्थित हो तो वह मनुष्य
देवता विनायकके पूजनमें तत्पर सुकृत युक्त, कृपण नृप कर्म करने-
वाला, स्मृतियुक्त, परिमित भोजन करनेवाला, पवित्र होता है॥१॥
नवमपे धनभावगते बनी स तु सुशीलसुनश्च नरः शुचिः
मतियुतश्च चतुपदशीडितो व्यययुतः शमसाधनतसरः॥२॥
जो नवमेश धनस्यानमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य व्रतयुक्त सुशील
पुत्रवाला पवित्र होता है, गतिमान् चौपायोंसे पीडित, व्यययुक्त
शान्तिसाधनमें तत्पर होताहै ॥ २ ॥
सुक्रतो सहजस्थलगे तथा भवति रूपयुतो जनवल्लभः ।
स्वजनबन्धुजनप्रतिपालको विदितकर्मकरो यदि जीवितः ॥३॥
जो नवमेश सहजस्थानमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य रूपवान, जनोंका
पिय होता तथा स्वजन बंधुजनका प्रतिपालक और जीवित रहे तो
विदित कर्म करनेवाला होता है ॥ ३ ॥
हिबुकभावगने सुकमेश्वरे बुधमुहृत्पितजनतत्परः।
भवति तीर्थतः सुरभक्तिमानिखिलभित्रपरःस समृद्धिमान्॥४॥
जो नवमेश चौये स्थानमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य पंडित, सुहृद और
पिताके पूजनमें तत्पर होता है तथा तीयों में रत, देवताओंकी भक्ति
करनेवाला संपूर्ण मित्रोंमें तत्पर, समृद्धिमान होता है॥४॥
मुकतपे तनयस्थलगे यदा सुरमहीसुरभावयुतो न ।
प्रकृतिसुन्दरतामतिमानरो मधुरवातनयाच भवन्ति हि ॥५॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(१०५)
जो धर्मपति पञ्चमस्थानमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य देवता और ग्राम-
गोंमें भाव रक्खे तथा स्वभावसे सुन्दर और बुद्धिमान हो मधुरवाणी-
बाले पुत्रोंसे युक्त होता है ॥ ५ ॥
नवमपे रिपुगे रिपुसंयुतः प्रणयकद्विकलः कथितः शुचिः ।
विकतदर्शनभाक्स तथा खलो भवति निन्दितकीर्नियुतो नरः॥६॥
जो नवमस्थानका पति षष्ठस्थानमें प्राप्त हो तो वह पुरुष शत्रुओंसे
युक्त, प्रणय करनेवाला, विकल तथा पवित्र हो, विकृत दर्शनवाला,
दृष्ट, निंदित कीर्तिवाला होता है ॥ ६ ॥
नवमपे मदगे वनितासुखं वचनकच्चतुरा धनसंयुता ।
भवति रागवती किल सुन्दरी मुकतकर्मरता बहुशीलिनी ॥ ७ ॥
जो नवमेश सप्तम हो तो उस पुरुषको स्वीका सुख हो, वचन रचने
वाला हो और तिसकी स्त्री चतुरा धनवती रागवती सुकृत कर्ममें
तत्पर बहुत शीलवाली होती है ॥ ७ ॥
भवति दुष्टत नुर्जनवञ्चको मृतिगते सुकताधिपतौ यदा ।
खलजनः सुरतै रहितः शठो विट्सखश्च तथैव नपुंमकः॥ ८॥
जो धर्मपति अष्टम हो तो वह पुरुष दुष्ट शरीर, जनवंचक तथा
खल होता है। अच्छे पुरुष सज्जनोंकी संगतिसे रहित, शठ, कामि-
योंकी संगतिवाला नपुंसक होता है ॥ ८ ॥
सुलतभाषपतिर्नवमे स्थिती भवाते बन्धुजनैः सहितः शुचिः।
भरुचितश्च विवादकरो जनो गुरुसुहृत्स्वजनेषु रतः सदा ॥९॥
जो धर्मेश धर्मस्थानमेंही स्थित हो तो वह पुरुष बन्धुजनयुक्त पवित्र
होता है, अरुचिसे विवाद करनेवाला, गुरु, सुहृद और अपने जनोंसे
प्रीति करनेवाला होता है ॥९॥
सुपतिकर्मकगे नृपवित्तयुस्सुकतकर्मकरो जननीपरः ।
विदितकर्मकरः सुकताधिपो गगनगे पुरुषो भवति ध्रुवम् ॥१०॥
(१०६)
बृहद्यवनजातकम् ।
जिसके धर्मपति दशस भवन में हो वह पुरुष राजाका कर्म करनेवाला
और राजाके धनसे युक्त हो तथा श्रेष्ठ कर्म और माताकी सेवामें तत्पर
विख्यात कर्म करनेवाला होता है ॥ १० ॥
भवति कर्मकरो बहुनायकः सुरुतवान्बहुदानपरः पुमान् ।
धनपतिर्नृपतेर्बहुवित्तभुक्सुकतपे भवगेहगते सदा ॥ १३॥
जो धर्मेश ग्यारहवें घरमें हो तो कर्म करनेवाला बहुतोंका स्वामी पुण्य-
वान्,बहुत दान देनेवाला,धनपति राजासे बहुत धन पानेवाला होता है११
व्ययगतः सुकताधिपतिर्या भवति मानयुतः परदेशगः।
मतियुतस्त्वतिसुंदरदेहयुग्यदि खलाञ्च खगादिह धूर्तकः॥१२॥
जो धर्मपति बारहवें हो तो वह मनुष्य मानयुक्त परदेशमें रहने-
वाला हो, मतिमान्, अतिसुन्दर देहवाला होता है खलग्रह हो तो धूत
होता है ॥ १२ ॥
इति नवममावाधिपतिफलम् ।
अथ दृष्टिफलम् ।
सूर्यदृष्टिफलम्।
नवमभाव इहैव निरीक्षिते दिनकरेण सुखं न भवेतियाः।
तरनु पापरतो न तपो यदा तदनु वृद्धतनी सकलं सुखम् ।।
जो नवम भावको सूर्य देखता हो तो वह पुरुष स्त्रीसुखसे रहित
हो, युवावस्थामें कुछ पापरत हो और तप न करे पीछे वृद्ध शरीर
होनेपर सम्पूर्ण सुख होते हैं ॥ १ ॥
चन्द्राष्टिफलम् ।
धर्मसमान तु चन्द्रवीक्षिते चान्यदेशगतराजपुत्रकः ।
बन्धुमौख्यमपि चार्थतो दयाद्रव्यहीनपुरुषो यशः कचित् ॥२॥
जो धर्मभावको चन्द्रमा देखता हो तो वह पुरुष अन्य देशों
विचरता हुआ राजपुत्र हो, बन्धुजनोंसे सुख पावे, वह पुरुष दया
द्रव्यसे हीन हो कुछ यश मिले ॥ २ ॥
भाषाटीकासमेतम् । १.७ भौमहष्टिफलम् । भाग्यनामभवने कुजेक्षिते भाग्यवृदिरपि वै नरस्य हि । शालकेन सह सत्यनाशनं धर्मयुक्तमपि चोयतासुखम् ।। ३ । जोभाग्यस्थानको मंगल देखता हो तो उस मनुष्यके भाग्यकी वृद्धि हो, साला सहित सत्य नाश हो, धर्मयुक्त सुखमें अति उग्रता हो, पश्चात् मुख होवे ॥३॥ बुधष्टिफलम् । . भाग्यसन यदि चेन्दुनेक्षिते पुत्रसौख्ययुगथो च भाग्यवान् । भन्यदेशगतराजपूजितो मानुषो भवति सन्ततं सुखी ॥ ४ ॥ जो बुधकी दृष्टि हो तो वह मनुष्य पुत्रके सुखसे युक्त भाग्यवान् होता है, दूसरे देशमें जाकर राजासे मान पानेवाला तया धर्मम रत निरंतर सुखी होता है ॥४॥ गुरुदृष्टिफलम् । भाग्ये यथा देवपुरोहितक्षिते धर्मप्रवृद्धिः मुखराज्यकामः । शायेषु नैपुण्यमथो सदा भवेत्स निर्गुणो राजवनान्वितःमदा॥५॥ जो भाग्यस्थानको देवगुरु देखता हो तो उस पुरुषकी धर्मवृद्धि, सुख राज्यकी प्राप्ति हो, सम्पूर्ण शास्त्रमें निपुणता, निर्गुणता, सदा राजा वा पिताके धनसे युक्त होता है ॥५॥ भृगुरष्टिफलम् । भाग्यसम यदि भार्गवेक्षितं भाग्यवृद्धिमथवा करोति हि। अन्यरेशगतजीविकायुतश्चान्यदेशनृपतेर्जयः सदा ॥ ६ ॥ जो भाग्यस्थानको शुक्र देखे तो उस मनुष्यके भाग्यकी वृद्धि करनेवाला होता है, दूसरे देशमें जानेसे उस मनुष्यको जीविका प्राप्त हो, दूसरे राजासे सदा जय मिले ॥ ६ ॥ - (१०८) बृहद्यवनजातकम्। शनिदृष्टिफलम् । भाग्यभाव इनसूनुवीक्षिते तस्य भाग्यवशतो यशो भवेत् । बन्धुहीनः परदेशतः सुखी धर्महीनः पुरुषः पराक्रमी ॥ ७ ॥ भाग्यस्थानको शनि देखता हो तो तिस पुरुषके भाग्यवशसे यश होता है और पुरुष बंधुहीन परदेशमें सुखी, धर्महीन और पराक्रमी होता है। राहुदृष्टिफलम् । नवमसनहि राहुनिरीक्षितं नववधूषु विलासयुतः सदा । निजसहोदरतोऽतिनिपीडनं सुतसुनार्थयुतश्च नरः सुखी ॥८॥ जो नवमस्थानको राहु देखता हो तो वह पुरुष नववधुओंमें विलास करनेवाला होता है अपने भाइयोंसे आति पीडा हो और पुत्रादिसे युक्ताहोकर मनुष्य सुखी होता है ॥ ८ ॥ इति दृष्टिफलम् । अथ वर्षसंख्या। तीर्थञ्च धर्मकदिनो नवमेथ चन्द्रस्तीर्थ नखेसृगिह वातभयं च चके । गोक्ष्यब्दमातृमृतिमिन्दुसुतोऽय जीपस्तिथ्यब्दके पितृमृतिं च मितोऽत्र लक्ष्मीम् । शनिराहुकेतुभिर्वर्षतातभपम् ॥ १ ॥ सूर्यदशा वर्ष ९ तीर्थ व धर्म करे, चन्द्रमाकी २० वर्ष तीर्थ करे, मंगलकी १५ वर्ष वातरोगसे भय हो, बुध २९ वर्ष मातृकष्ट वा मृति हो, गुरु १५ वर्ष पिताको अरिष्ट वा मृति, शुक्र २ वर्ष लक्ष्मीकी प्राप्ति हो, शनि राहु केतु १४ वर्ष तातभय करें ॥ १॥ अथ विचारः। मूर्तेश्चापि निशापतेश्च नवमो भाग्यालयः कीर्तितः चस्वस्वामियुतेक्षितः प्रकुरुते भाग्यं स्वदेशोषम् १
भावाटीकासमेतम् । (१०९)
चेदन्यैर्विषयांतरेऽत्र शुभदाः स्वोच्चादिगाः सर्वदा
कुटुंभाग्यविवर्धनन्तु विबला दुःखोपलब्धि पराम् ॥ १ ॥
जन्मलग्नसे वा चन्द्रमासे जो नवम स्थान है वह भाग्यभाव
कहाता, है यदि वह अपने स्वामीसे युक्त वा दृष्ट हो तो निज देशमें
भाग्यका उदय हो और यदि अन्य ग्रहोंसे दृष्ट वा युक्त हो तो पर
देशमें भाग्यका उदय हो यदि योगकारक ग्रह अपने उच्च वा मूल-
त्रिकोण आदिमें हों तो सर्वदा भाग्योदय रहे और यदि बलहीन हों
तो अत्यन्त दु:ख हो ॥ १॥
भाग्येश्वरो भाग्यगतो ग्रहगोवाधिवीर्यो नाम प्राश्येत् ।
यस्य प्रसूतौ स च भाग्यशाली विलासयुको बहुलार्थयुकः॥२॥
जिमके जन्मकालमें भाग्यपति भाग्यस्थानमें स्थित हो या अधिक
बलवान् होकर नवम घरको देखता हो तो वह मनुष्य भाग्यशाली हो,
विलासयुक्त बहुतसे अर्योंसे युक्त होता है ॥२॥
चेदाग्यमामी खचरः स्वगेहे सौम्येक्षितो यस्य नरस्य सुनौ ।
भाग्याधिशाली स्वकुलावतंसो हंसो यथा मानसराजमानः।।३।।
जिसके जन्मकालमें भाग्येश अपने घरमें हो और शुभ ग्रहोंकी
उसपर दृष्टि हो तो वह पुरुष भाग्यशाली तया अपने कुलमें प्रतिष्ठित
होता है, जैसे मानस सरोवरमें इस ॥ ३ ॥
पूर्णेन्दुयुक्तौ रविभूमिपुत्रौ भाग्यस्थितौ सत्त्वसमन्वितौ च ।
वंशानुमानासचिवं नृपंच कुवैति ते सौम्यहशा विशेषात् ॥४॥
जो सूर्य मंगल पूर्ण चन्द्रमासे युक्त हों और वे वली होकर भाग्य
स्थानमें स्थित हो तो वह वंशके अनुमानते राजाका मन्त्री हो और
शुभ ग्रहोंकी दृष्टि हो तो विशेषतासे हो ॥ ४ ॥
(१९०)
बुधवनजातकम् ।
स्वोचोपगो भाग्यगृहे नभोगो नरस्य योग कुरुते स लक्ष्या ।
सौम्येक्षितोऽसौ यदि भूमिपालं दन्तावलोकष्टविलासशीलम् ५
जो भाग्यस्थानमें अपनी उच्च राशिका कोई ग्रह हो तो उस मनुष्यको
लक्ष्मीका योग करता है और वह शुभ ग्रहोंसे दृष्ट हो तो राजा हो
तथा हाथियोंमें अधिक विलास करनेवाला होता है ॥ ५ ॥
द्वाविंशे रविणा फलं हि कथितं चन्द्रे चतुर्विंशति-
रष्टाविंशति भूमिनंदनसमा दन्ताश्च सौम्ये स्मृताः।
जीवे षोडश पञ्चविंशति भृगौ षट्त्रिंच सौरौ स्मृताः
कर्मेशो यदि कर्मगः फलमिदं लाभोदये संस्मृतम् ॥६॥
सूर्यके २२ वर्ष, चन्द्रके २४ वर्ष, मंगलके २८ वर्ष, बुधके३२ वर्ष
बृहस्पतिके १६ वर्ष शुक्रके २५ वर्ष शनिके ३६ वर्ष हैं कमेंश जैसे
स्थानमें प्राप्त होता है वैसा लाभादिफल करता है ॥ ६ ॥
इति भाग्यमावविवरणं समाप्तम् ।
अथ दशमभावविचार:।
अथ दरामं कर्मभवनममुकायममुकदैवतममुकाहयुतं
स्वस्वामिना युतं दृष्टं च वाऽन्यैः शुभाशुभप्रेहैदृष्टं युतं
न वेति ॥ १ ॥
दशम कर्मभवन है इसमें अमुक देवता ग्रहयोग निज स्वामीसे
देखा गया है यानहीं या शुभाशुभ ग्रहोंकी दृष्टि है या नहीं पूर्ववत्
देखना चाहिये ॥ १॥
वत्र विलोकनीयानि ।
व्यापारमुद्रानृपमानराज्यं प्रयोजनं चापि पितुस्तथैव ।
महत्सराप्तिः खल सर्वमेतद्राज्याभिधाने भवने विचार्यम् ॥ १॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(१११)
ब्यापार, मुद्रा, राजासे मान, राज्य, प्रयोजन, पिता, बडे पदकी
प्राप्ति यह सर्व दशम घरसे विचारना चाहिये ॥ १॥
तत्र लग्नफलम्।
मेषाभिधः कर्मगृहे यदि स्यात्करोति कर्मप्रवरं सुहृष्टम् ।
पैशुन्यरूपं च नृपानुरक्तं सुनिन्दितं साधुजनस्य लोके ॥ १॥
कर्मस्थानमें मेष लग्न हो तो वह पुरुष सदा श्रेष्ठ कर्म करे हर्षवान्,
चुगली करनेवाला तया राजोंमें अनुरक्त हो, निंदित हो, साधुजनोंका
मान्य करे ॥ १॥
वृषेऽम्बरस्थे प्रकरोति कर्म व्यपात्मकं साधुजनानुकम्पम् ।
द्विजेन्द्रदेवातिथिपूजकं च ज्ञानात्मकं प्रीतिकरं सतां च ॥२॥
जो कर्मस्थानमें वृष लग्न हो तो वह मनुष्य खर्चके कार्य और
साधुजनोंमें दया करे, ब्राह्मण, देवता, अतिथियोंका प्रेमी. ज्ञानात्मक
सत्पुरुषोंसे प्रीति करनेवाला होता है ॥२॥
सुम्मेऽम्बरस्थे प्रकरोति मर्पः कर्म प्रधान गुरुभिः प्रदिष्टम् ।
कीयान्वितं प्रीतिकरं जनानां प्रभासमेत कृषिजं सदैव ॥३॥
जो कर्मस्थानमें मिथुन लग्न हो तो वह मनुष्य मुरुजनोंके कहे
प्रधान कर्म करे, कीर्तिसे युक्त मनुष्योंके प्रीतिदायक कांतियुक्त तपा
कृषिव्यापार भी करे ॥२॥
कऽम्बरस्थं प्रकरोति मर्त्यः कर्म प्रपारामतडागजातम् ।
विचित्रवापीतस्वृन्दनं च कूमादिव कसरं मदैव ॥ ४ ॥
जो कर्मस्थानमें कर्क लग्न हो तो वह मनुष्य वापी बगीचे तालाब
संबंधी कर्म करे, अनेक विचित्र बावडी वृक्ष स्थापित करे और निरंतर
इन्ही कोंमें रत रहे ॥ ४ ॥
सिंहेऽम्बरस्थे कुरुते मनुष्यो रौद्रं सपा विरुतं च कर्म ।
संपौरुषं प्रापणमेव नित्यं वधात्मकं निन्दितमेव पुंसाम् ॥५॥
(११२)
बुहद्यवनजातकम् ।
कर्मस्थानमें सिंह लग्न हो तो वह मनुष्य रौद्र तथा पापयुक्त
विकृत कर्म करे और पुरुषार्थसे प्राप्ति करे तथा वध बन्धनके निन्दित
कर्म नित्य करे ॥५॥
नभःस्थलस्थस्त्वथ षष्ठराशिःकरोति कर्मज्ञमिनो मनुष्यम् ।
स्त्रीराजभारो जवानिरुक्च सुरूपयोषिनितरां धनी च ॥६॥
जो कर्ममें कन्या राशि हो तो वह मनुष्य काँका करनेवाला हो,
खी राजका भार माननेवाला, वेगवान् रोगरहित हो, खी उसकी सुन्दर
हो और वह अत्यन्त धनवान् होता है ॥ ६ ॥
तुलाधरे व्योमगते मनुष्यो वाणिज्यकर्मप्रचुरं करोति ।
धर्मात्मकं चापि नयेन युक्तं सतामभीष्ट परमं पदं च ॥ ७॥
जो तुला लग्न दशम घरमें हो तो वह मनुष्य अनेक वाणिज्य कर्म
करता है और धर्मात्मक नीतिसे युक्त, सत्पुरुषोंसे अभीष्टकी प्राप्ति
तथा परम पदकी प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥
कीटेऽम्बरस्थे प्रकरोति कर्म पुमान्सुदुष्टैः पुरुः समानम् ।
पीडाकरं देवगुरुदिनानां सुनिर्दयं नीतिविवर्जितं च ॥८॥
जो दशम भवनमें वृश्चिक लग्न हो तो वह पुरुष दुष्ट पुरुषोंकी
समान कर्म करे तथा देव गुरु और ब्राह्मणोंको पीडा देनेवाले दया
और नीतिसे रहित कर्मोको करे ॥ ८ ॥
चापेऽम्बरस्थे प्रकरोति कर्म सेवात्मकं चौर्ययुतं मनुष्यः।
परोपकारात्मकमोजसाढयं नृपात्मकं भूरियशःसमेतम् ॥ ९॥
जो दशम स्थानमें धनुष लग्न हो तो वह मनुष्य सेवा और चौर्य
कर्म करे तथा परोपकार पराक्रम नृपात्मक और वढे यशसे युक्त
कमीका करनेवाला होता है ॥९॥
भाषाटीकासमेतम् । (११३) मृमेऽम्बरस्थे प्रचुरप्रतापं कर्मप्रधानं कुरुते मनुष्यम् । सुनिर्दयं बन्धुवधैः समेतं धर्मेण होनं खलसम्मतं च ॥१०॥ जो दशम स्थानमें मकर लग्न हो तो वह पुरुष अधिक प्रतापी, कर्म- प्रधान होता है और वह दयाहीन बन्धुओंके वधसे युक्त, धर्महीन, खल पुरुषोंके सम्मत कर्म करता है ॥ १० ॥ घटेऽम्बरस्थे च करोति कर्म प्रयाण सक्तं परवञ्चनार्थम् । पाखण्डधर्मान्वितमिष्टलोभाविश्वासहीनं जनताविरुद्धम् ॥१३ जो दशसस्थानमें कुंभ लग्न हो तो वह मनुष्य गमनागमनकर्म दूसरोके वंचन करनेके निमित्त करे तथा इष्टके लोभसे पाखण्ड धर्म युक्त, विश्वासहीन, जतविरुद्ध कर्म करे ॥ ११ ॥ मीनेऽम्बरस्थे च करोति मर्त्यः कुलोचितं कर्म गुरुपदिष्टम् । कीयान्वितं सुस्थिरणारेण नानादिजाराधनसंस्थितं च ॥१२॥ जो दशमस्थानमें मीन लग्न हो तो वह पुरुष कुलधर्मानुसारी गुरु- प्रदिष्ट कर्म करे तथा कीर्ति और स्थिरतासे युक्त, आदरपूर्वक अनेक ब्राह्मणोंकी आराधनासे युक्त कर्म करे ॥ १२ ॥ इतिकर्मभावे लग्नफलम् । अथ ग्रहफलम्। सूर्यफलम् । सदुद्धिवाहनधनागमनानि नूनं भूपप्रसादसतसौख्यसम- न्वितानि । माधूपकारकरणं मणिभूषणानि मेधूरणे दिनमणिः कुरुते नराणाम् ॥ १ ॥ जिसके कर्मस्थानमें सूर्य हो तो वह मनुष्य श्रेष्ठ बुद्धि, वाहन और धनके आगमसे सदा युक्त रहे, तथा राजाको प्रसन्नता और पुत्रोंक (११४) बृहद्यवनजातकम्। सुखसे युक्त हो, साधुओंका उपकार करनेवाला, मणियोंसे युक आभूषणवाला होता है ॥ १ ॥ चन्द्रफलम् । क्षोणीपालादर्थलब्धिर्विशाला कीर्तिमूर्तिः सत्त्व सन्तोषयुक्ता। चञ्चलक्ष्मीःशीलशालिनी स्थान्मानस्थाने यामिनीनायकश्वेद। जो कर्मत्यानमें चन्द्रमा हो तो राजोते विशेष धनकी प्राप्ति हो और उसकी विशाल कीर्ति हो, तथा सच और सन्तोषसे युक्त हो और उसके शीलसंपन्न शोभायमान लक्ष्मी होती है ॥ २ ॥ भौमफलम् । विश्वंभराप्राप्तिमथो धनित्वं सत्साहसं परजनोरकती प्रपलम् । चञ्चभूषणमणिविगागमांच मेषरणे धरणिनः कुरुते नराणाम् ॥ ३॥ जिसके कर्मस्थानमें मंगल स्थित हो तो उस' मनुष्यको पृथ्वीकी प्राप्ति हो, धनी हो, श्रे साहसते यु हो दूसरे कि उसकारम प्रयत्न करनेवाला तथा सुन्दर भूग मगि ओर द्रव्यके आगमसे युक्त होता है ॥३॥ बुधफलम् । ज्ञाताऽत्यन्त श्रेष्ठकर्मा मनुष्यो नानासंपत्संयुनो राजमान्यः । चञ्चडीलावाग्विलासाविशाली मानस्थाने बोधने वर्चमाने ॥४॥ जो दशमभावमें बुध हो तो वह मनुष्य ज्ञाता, अत्यन्त श्रेष्ठ कर्म करनेवाला, अनेक सम्पत्तिते युक्त, राजमान्य सुन्दर लीलासे युक्त, वाणीके विलासमें चतुर होता है ॥ ४ ॥ गुरुफलम् । सदानचिह्नोत्तमवाहनानि मित्रात्मनश्रीरमणासुखानि । पशोषिवृद्धिर्बहुधा जगत्यां राज्ये सुरेज्ये विजयं नराणाम् ५ भाषाटीकासमेतम् । (११५) दशम भवनमें गुरु हो तो श्रेष्ठ राजाके चित, उत्तम वाहन, मित्र, पुत्र लक्ष्मी स्त्रीसुखकी प्राप्ति जगत्में यशकी वृद्धि बहुत होती है और विजय प्राप्त होता है ॥५॥ भृगुफलम् । सोभाग्यसन्मानविराजमानः कान्तासुतप्रीतिरतीव नित्यम् । भूमोः सुते राज्यगते नरः स्थानानार्चनध्यानविराजमानः॥६॥ जो दशम स्थानमें शुक्र हो तो वह पुरुष सौभाग्य और सन्मानसे विराजमान स्त्री पुत्र में अत्यन्त प्रीतिमान, स्नान अर्चन और ध्यानसे युक्त होता है॥६॥ शनिफलम्। राज्ञः प्रधानमतिनीतियुतं विनीतं संग्राम चन्दनपुराबंधि- कारयुक्तम् । कुर्यानरं सुखवरं द्रविणेन पूर्ण मेधूरणे हि तरणेस्तनुजः करोति ॥ ७॥ जो कर्म स्थानमें शनि हो तो वह पुरुष राजाका मन्त्री, नीतियुक्त, विनीत, संग्राममें चतुर, चन्दनचर्चित, पुरके अधिकारमें युक्त, मुखी और धनसे पूर्ण होता है ॥७॥ राहुफलम्। पनायूनता न्यूनता च प्रतापे ना कुलोऽसौ सुखं नातिरोते। सुहृदुःखग्यो जलाच्छीतलवं पुनः खे तमो यस्य स क्रूरकर्मा जो पुरुषके दशम भावमें राहु हो तो वह पुरुष धनादिमें म्यून, प्रतापहीन और जनोंमें व्याकुल हो, सुखसे शयन न करसके, मित्रोंके दुःखसे दग्ध रहे, क्रूर कमाका करनेवाला हो, जलसे अति शीतलता माने ॥ ८॥ केतुफलम् । पितुनों सुखं कर्मणो यस्य केतुः स्वयं दुर्भगो मातुनाथ
बृहद्यवनजातकम् ।
करोति । तथा वाहनैः पीडितोरुभवेत्स यदा वैणिकः
कन्यकास्थोऽसितेष्टः । ९.
जितके कर्मस्थानमें केनु हो उस पुरुषको पितासे सुख न मिले,
स्वपं दुर्भागी होकर माताका नाश करता है, वाहनसे उसकी जंघा
पीडित रहें, जो कन्याका हो तो वीणा बजानेवाला और कृष्ण पदार्थोमें
रुचि करनेवाला होता है ॥ ९ ॥ इति कर्मभावे ग्रहफलम् ।
अथा दशमभवनेशफलम्
दशमपे तनुगे जननीसुखं पितरि भक्तिपरः सुखसंयुतः ।
खलखगैर्बहुदुःखपरः खलो जनकवञ्चनकृच्च सुखान्वितः ११॥
जो दशमपति तनुस्थानमें हो तो उस पुरुषको माताले सुख हों,
पिताकी भक्तिमें तत्पर और सुखसे युक्त होता है और क्रूर ग्रह हो तो
बहुत दुःख युक्त, दुष्ट तथा मनुष्योंका वंचक और सुखी होता है ॥१॥
भवति विचगते गमनाधिपे जनकमातृसुखं शुभखेचरैः ।
कठिनदुष्टवचस्तनुभुङ्नरः सुतनुकर्मकरो धनवान्भवेत् ॥ २ ॥
जो कर्मेश धनस्थानमें हो और वह शुभ ग्रहोंसे युक्त हो तो वह
पुरुष माता पिताको सुखदायक होता है, कठिन दुष्ट वचन बोलनेवाला
सुन्दर शरीर अच्छे कर्म करनेवाला धनी होता है ॥ २ ॥
स्वजनमातृविरोधकरः सदा बहुलसेवककर्मकरो भवेत् ।
तदनु मातुलपुत्रसुखोल्पको न हि समर्थवपुः पृथुकर्मणि॥३॥
यदि कमेंश तीसरे घरमें हो तो वह पुरुष स्वजन और मातासे
विरोध करनेवाला, सेवकोंके अनेक कर्म करनेवाला, मामाके पुत्रसे
बोडा सुख पानेवाला, बडे कर्म करनेमें असमर्थ होता है ॥ ३ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (११७) दरामपेऽम्धुगते नितरां सुखी पितरि मातरि पोषणतत्परः। सकललोकदशामपि तापकनृपतिसंभवलाभविभूषितः ॥ ४ ॥ जो दशमपति चतुर्थस्थानमें हो तो वह पुरुष अत्यन्त सुखी, पिता माताका पोषण करनेवाला होता है, सब लोककी दशासे तप्त होनेवाला, राजाके पक्षसे लाभ प्राप्त करनेवाला होता है ॥ ४ ॥ भवति सुन्दरकर्मकरो नरो नृपतिलाभयुतोऽप्यतिभोगवान् । विमलगानकलाकुशलः स्मृतो गगनपे सुतगेऽल्पसुखी नरः ॥५॥ जो कर्मेश पञ्चम हो तो वह मनुष्य सुन्दर कर्म करनेवाला, राजासे लाभ प्राप्त करनेवाला, अति भोगवान्, श्रेष्ठ गीतगानकी कलामें कुशल और थोडे सुखसे युक्त होता है ॥ ५ ॥ रिपुगृहे दशमाधिपती गदी नृपतिवैरकरश्च विवादकत् । प्रबलकामपरोऽप्यथ भाग्यतो रिपुगणाद्यदि जीवति जीवति ॥ जो कमेंश छठे हो तो वह पुरुष रोगी, राजोंसे वैर तया विवाद करनेवाला हो और वह अत्यन्त कामासक्त होकर भी दैववश यदि शत्रुसमूहसे नष्ट जीवन न हो तो जीवित रहे ॥ ६ ॥ सुतवती बहुरूपसमन्विता रमणमातरि भक्तिसमन्विता । भवाने नस्य जनस्य निरंतरं प्रियतमाऽम्बरपे दयितां गते ॥७॥ जो कर्मेश दशमपति सप्तम स्थानमें हो तो उस पुरुषकी स्त्री रूपवती, पुत्रवती होती है तथा पति और सासमें भक्ति करनेवाली, अत्यन्त प्रिय होती है ॥ ७ ॥ अतिखलोऽनृतवाकपटी नरस्तरनु चोरकलाकुशलः सदा । जननिपीडनतापकरः सदा दशमपे निधने तनुजीवितः ॥८. जो कर्मेश अष्टमहो तो वह पुरुष अत्यन्त दुष्ट, झूठा, कपटी, चोर- कलामें कुशल,माताके क्लेशमें दुःख करनेवाला और लघुजीवी होता है।
(११८) बृहद्यबन जातकम् भवति ना सुभमस्तनुजः सदा शुभसहोदरमित्रपराक्रमी । दशमप नवमस्थलगे नरः सततसत्यवचा वसुशालितः ॥ ९ ॥ जो कर्मेश नवम हो तो वह मनुष्य सुन्दर शरीर, सहोदर मित्रोंसे युक्त पराक्रमी होता है, वह निरन्तर सत्यवचन बोलनेवाला तथा धनसे युक्त होता है ॥ ९॥ जननिसौख्यकरः शुभदः शुभो भवति मातृकुलेषु रतः सुधीः। अतिपटुः प्रबलो दशमाधिपे स्वगृहगे नृपमानधनान्वितः ॥१०॥ जो कर्मेश दशमस्थानमें प्राप्त हो तो वह मनुष्य माताको सुख दायक, शुभ, मातृकुलमें प्रीति करनेवाला बुद्धिमान होता है, अति- चतुर और बलिष्ठ हो, अपने घरका हो तो राजासे मान और धनकी प्राप्तिवाला होता है ॥ १० ॥ विजयलाभयुतः प्रमान्वितः परपराजयतो वसुलाभवान् । सुतसुतानुगतो भवगे गृहे दशमपे बहुभृत्ययुतो नरः ॥ १३ ॥ जो कर्मेश ग्यारहवें स्थान में हो तो वह पुरुष विजयलाभसे युक्त, श्रीमान्, दूसरेका पराजय करनेसे धनकी प्राप्ति तथा पुत्र कन्या और मृत्योंसे युक्त होता है ॥ ११ ॥ नृपतिकर्मकरो निजवीर्ययुग्जननिसौख्यविवर्जितवऋधीः । दशमये व्ययगे परदेशवान्व्ययपरश्च तथा सुभगः स्वयम्॥१२॥ जो बारहवें कर्मेश हो तो वह पुरुष अपने पराक्रमसे नृपतिके तमान कर्म करे, माताके सुखसे रहित, कुटिलचुदि, परदेशमें रहने- वाला, खर्चीला और सुभग होता है ॥ १२ ॥ इति दशमाधिपफलम् ।
भाषाटीकासमेतम्। (११९) अथ दृष्टिफलम् । सूर्यदृष्टिफलम् । कर्मप्रमानि रवेयहि दृष्टिः कर्ममिचिसहितः स नरः स्यात् । आद्य एव वयसि म्रियतेऽम्बिका स्वीयममाने तथोश्चगते सुखम् । जो कर्म स्थानमें सूर्यको दृष्टि हो तो वह मनुष्य सदा कमोंकी सिद्धिसे युक्त होता है आदि अवस्थामें माताका मरण हो, यदि अपनी राशि वा उच्चका हो तो सुख मिले ॥ १ ॥ चन्द्रदृष्टिफलम् । कर्मममनि सतीन्दुवीक्षिते स्याच्चतुष्पदकुलोपजीवकः । पुत्रदारधनसौख्य दो नृणां पितृबन्धुसुखधर्मवर्जितः ॥ २॥ जो कर्मभावमें चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो वह मनुष्य चौपायोके कर्मसे जीविका करे उस मनुष्यको पुत्र, स्त्री, धनका सुख, पिता बंधुका सुख हो, धर्मसे हीन होता है ॥ २ ॥ भीमदृष्टिफलम् । कर्मभावभवने क्षके कुजे सर्वसिद्धिसमुपस्थितिः सुम्बम् । आत्मविक्रमदशागमे नृणां जायते खलु महोदयो नरः ॥ ३ ॥ जो कर्मभावको मंगल देखता हो तो वह मनुष्य सब सिद्धियोंसे युक्त, सुखी, पराक्रमी, श्रेष्ठ प्रतापी हो अपनी दशामें भाग्योदयसे युक्त करता है ॥३॥ बुधष्टिफलम् । दश मभावगृहे बुधवीक्षिते कर्मजीविकविताकरो नरः। शाजमान्यनृपपूजितः मदा सौख्यदः पितृधनान्वितोयमी ॥४॥ जो कर्मस्थानको बुध देखता हो तो वह पुरुष कर्मजीवी, कविता करनेशला, पण्डित, राजमान्य, नृपपूजित सदा सुख देनेवाला, पिताके बनसे युक्त और उद्यमी होता है ।
(१२०) वृदयवनजातकम् । गुरुदृष्टिफलम् । कर्म मननि सुरेज्यतीक्षित कर्मसिद्धिरथ राजमंदिरे । पुत्रदानधनवर्जिनः सुवी दिव्य हर्म्यम्पूर्वजाधिकः ॥५॥ जो कर्म स्थानको गुरु देखता हो तो वह पुरुष राजमंदिरसे अवश्य कर्मसिद्धिको प्राप्त हो, पुत्र दान धनले रहित, सुखी, दिव्य महल में रहनेवाला, पूर्वजोंसे अविक सुख पावे ॥ ६ ॥ भृगुष्टिफलम् । कर्मसमनि भृगुप्रतितीक्षित जीविका निज पुरे नृपालये । उत्तमाङ्गपरिपीडितो जनः पुत्रबन्धुसुखमद्भुतं सदा ॥ ६॥ कर्मस्थानको यदि शुक्र देखता हो तो वह मनुष्य अपने पुर वा गुजमंदिरसे कर्मसिद्धिको प्राप्त हो, उतमांगसे पीडित, पुत्र बंधुका अद्भुत सुख पावे ॥६॥ शनिदृष्टिफलम् । दशम समनि सौरिविलोकित पितृविनाशकरो हि नरस्य तु । प्रतनुमातृसुखं न च जीवति यदी जीवति भाग्ययुतो नरः॥ ७॥ दशम भावको यदि शनि देखता हो तो उस मनुष्यके पिताका नाश करता है माताका थोडा सुख हो, अल्प जीवन हो यदि जीवे तो भाग्यवान होता है ॥ ७॥ राहुदृष्टिफलम् । सिंहीसुतः कर्मगृहं च पश्यति कर्मसिद्धिमतुलां करोति च । बाल्यभावप्नमये पितुर्पतिर्मातृमोरूपमपि चालमेव हि ।। ८॥ यदि राहुकी दृष्टि दशम धरमें हो तो वह मनुष्य अत्यन्त कर्मसिदि करता है वाभावमें ही पिताका मरण हो,मातासे थोडा सुख होता है। इति दृष्टिफलम् ।
भाषाटीकासमेतम् ।
(१२१)
अथ वर्षफलम्।
एकोनविंशति वियोगमिनोऽम्बरस्थश्चन्द्रनिवेदधनकत्
क्षितिजो भवर्षे । शवायं विदि हि गोकुशरद्धनं च
जीवोऽके धनमथो भृगुजोऽत्र सौख्यम् ॥ १ ॥
शनिराहुके नुभिः शस्त्रभयं चास्ति ।। २ ।।
सूर्यदशा १९ वर्ष वियोग करे, चन्द्रमा ४३ वर्ष धनकी प्राप्ति करे,
मंगल २७ वर्ष शस्त्रसे भय, बुध १९ वर्ष धन प्राप्ति, गुरु १२ वर्ष धन
प्राप्ति, शुक्र १२ वर्ष सुखकी प्राप्ति, शनि राहु केतु २७ वर्ष शस्त्रभय
करते हैं ॥ १ ॥ २ ॥
अथ विचारः।
तनोः सकाशादृशमे शशाङ्क बृत्तिर्भवेत्तस्य नरस्य नित्यम् ।
मानाकलाकौशलवाग्विलासैः सर्वोयमः साहसकर्मभिश्व ॥१॥
जिसके लग्नसे दशम स्थानमें चन्द्रमा हो उस पुरुषकी नित्य
वृत्ति हो अनेक कलाओंमें कुशलता, वाग्विलास, सब प्रकारके उद्यम
और साहस युक्त काँके करनेसे नित्य जीविका होती है ॥१॥
तनोः सकाशादशमे बलीयान्स्या जीवितं तस्य खगस्य वृत्त्या ।
बलान्वितावर्गपतेस्तु यदा वृत्तिर्भवेत्तस्य खगस्य पाके ॥२॥
जन्मलग्नसे दशमस्थानमें बलिष्ठ ग्रह हो तो उस ग्रहकी वृत्तिसे
मनुष्यका जीवन हो अथवा बलवान् वर्गपतिकी वृत्तिसे उसकी दशामें
उसका जीवन होवे ॥ २॥
दिवामणिः कमगि चन्द्रतन्वोईव्याण्यनेकोबमवृत्तियोगात् ।
सत्वाधिकत्वं नरनायकत्वं पुष्टत्वमङ्गे मनसः प्रमोदः ॥ ३ ॥
यदि लग्न वा चन्द्रमासे दशमस्थानमें सूर्य स्थित हो तो वह मनुष्य
अनेक प्रकारके उद्यमोसे द्रव्यकी प्राप्ति करता है तथा बलकी
माधिकता, मनुष्योंका अधिपतित्व, अंगमें पुष्टता और मनमें आनन्द
होता है ॥ ३ ॥
(१२२)
वृहद्यवनजातकम् ।
लनेन्दुतः कर्मणि चेन्महीजः स्यात्साहसक्रौर्यनिषादवृत्तिः ।
नूनं नराणां विषयाभिसक्तिर्दूरे निवासः सहसा कदाचित् ॥४॥
लग्नसे वा चन्द्रमासे कर्म स्थानमें मंगल हो तो वह मनुष्य साहसी,
क्रूरकर्मा, निषादोंकीसी वृत्ति करे तथा विषयोंमें आसक्त और दूर
निवास करनेवाला होता है॥४॥
लमेन्दुतः कर्मगो रौहिणेयः कुर्याद्रव्यं नायकत्वं बहूनाम् ।
शिल्पेऽत्यासः साहसं सर्वकार्ये विद्ववृत्त्या जीवनं मानवानाम्॥
बन वा चन्द्रमासे कर्मस्थानमें बुध स्थित हो तो उस मनुष्यको
द्रव्यकी प्राप्ति और बहुत पुरुषोंका स्वामी हो, शिल्पविद्यामें अभ्यास
करनेवाला, सब कार्योंमें साहसी, विद्वानोंकी वृत्तिसे जीविका करनेवाला
होता है ॥ ५॥
विलमतः शीतमयूखतो वा माने मघोनः सचिवो यहा स्यात्
नानाधनाश्यागमनानि पुंसां विचित्रवृत्या नृपगौरवं च ॥६॥
लग्नसे अथवा चन्द्रमासे बृहस्पति यदि दशम भावमें हो तो उस
पुरुषोंको विचित्र वृत्तिसे अनेक प्रकारके धनकी प्राप्ति और राजासे
गौरव होता है ॥ ६॥
होरायाश्च निशाकरागुसुतो मेषरणे संस्थितो
नानाशास्त्रकलाविलासविलसद्वृत्त्यादिशेज्जीवनम् ।
दाने साधुमति जयं विनयतां कामं धनाश्यागमं
मानं मानवनायकादविरलं शीलं विशालं यशः॥ ७॥
होरासे चन्द्रमासे शुक्र यदि दशमस्थानमें हो तो वह पुरुष अनेक
शास्त्र कला विलास वृत्तिसे जीवन करनेवाला, दानमें श्रेष्ठमति, जय,
नम्रता, यथेष्ट धनकी प्राप्ति, राजासे प्रतिष्ठा पानेवाला, उत्तम शीलसे
युक्त और विशाल यशवाला होवे ॥ ७ ॥
भाषाटीकासमेम् । (१२३) होरायाश्च निशाकराइविसुतः सूतो खमध्यस्थितो वृत्तिं हीनतरां नरस्य कुरुते काय शरीरे सदा । खेदं वादभयं च धान्यवनयोहीनत्वमुच्चैर्मन. श्चिन्तोदेगसमुद्भवेन चपलं शीलं च नो निर्मलम् ॥ ८॥ होरासे चन्द्रमासे शनैश्चर दशम भावमें स्थित हो तो आजीविकाकी हीनता तथा शरीरमें कृशता हो, दुःख हो, विवादका भय हो, धन और धान्यकी हीनता हो और मानसिक चिन्ताओंके उद्देगसे चपल हो तथा शील निर्मल न हो ॥ ८॥ सूर्यादिभिव्योमखगैर्विलनादिन्दोः स्वापाके क्रमशो विकल्प्या अपलब्धिर्जनकाज्जनन्याः शत्रोहिताद्भातृकलप्रभृत्यात्।।९॥ लग्न वा चन्द्रमासे दशमस्थानमें सूर्यादि सात ग्रहों से कोई ग्रह स्थित हो तो उस मनुष्यको क्रमसे पिता, माता, शत्रु, मित्र, भ्राता, स्त्री और भृत्यते अपनी २ दशामें अर्थकी प्राप्ति कहना चाहिये ॥ ९ ॥ रवीन्दुमासदमंस्थितांशे पतेस्तु वृत्त्या परिकल्पनीयम् । सदोषधोणादितृणैः सुवर्णैर्दिवामणिवृत्तिविधि विदध्यात् ॥३०॥ यदि लग्न और चन्द्रमासे कोई ग्रह दशम न हो तो लग्न चन्द्र और सूर्यसे दशमस्थानका स्वामी जिस नवमांशमें हो उस नवमांशका स्वामी मो ग्रह है उसके तुल्य वृत्ति कहना अर्यात् लग्न चन्द्र और सूर्य इनसे दशमस्थानका स्वामी यदि सूर्यके नवमांशमें हो तो श्रेष्ठ औषध, ऊन, तृण और सुवर्ण आदिसे उस मनुष्यकी आजीविका होती है ॥१०॥ नक्षत्रनाथोऽत्र कलत्रतश्च जलाशयोत्सनकशिक्रियादेः । कुजोऽनिमात्माहमधातुशबैः सोमात्मजः काव्यकलाकलापैः११ यदि चन्द्रमाके नवमांशमें हो तो उस मनुष्यकी स्त्रीके सम्बन्धसे और अलाशयसे उत्पन्न शंख मोती आदिसे तथा खेती आदिके (१२४) बृहद्यवनजातकम् । कर्मसे और मंगलके नवांशमें हो तो अग्निकर्म साहस धातु (चांदी, सोना आदि) और शस्त्रकर्ममे, बुध हो तो काव्यकलामनबसे जीविका होती है ॥ ११ ॥ जीवो द्विजन्माकरदेवधर्मः शुको महिष्यादिकरौप्यरमैः । शनैश्चरो नीचताप्रकारः कुर्यात्रराणां खलु कर्मवृत्तिम् ॥१२॥ यदि बृहस्पतिके नवमांशमें हो तो उन पुरुषकी ब्राह्मण, खान और देवताओंके धर्मसे वृत्ति होती है और शुक्रके नवमांशमें हो तो महिषी आदिसे तथा चाँदी और रत्नांसे जीविका होवे, यदि शनैश्चरके मवामांशमें हो तो नीच काँसे जीविका होती है ॥ १२ ॥ कर्मस्वामी ग्रहो यस्य नवांशे परिवर्तते । तत्तुल्यकर्मणा वृत्तिं निर्दिर्शन्ति मनीषिणः ॥ १३ ॥ दशमभावका स्वामी जिसके नवांशकमें हो उसीके तुल्य कर्मोंस अपनी आजीविका करता है ऐसा बुद्धिमान कहते हैं ॥ १३ ॥ मित्रारिंगेहोपगतनभोगैस्ततस्ततोऽर्थः परिकल्पनीयः । तुझे त्रिकोणे स्वगृहे पतङ्गे स्यार्थसिद्धिनिजबाहुवीर्यात् ॥१४॥ जो पूर्वोक्त योगकारक ग्रह मित्र और शत्रुके घरमें स्थित हों तो उनसे वैसेही अर्थकी कल्पना करनी और सूर्य उच्च स्वक्षेत्र वा अपने मूलत्रिकोणमें हो तो वह मनुष्य निज बाहुबलसे धनकी प्राप्ति करता है ॥ १४ ॥ लमार्थाभोपगतैः सवीर्यः शुभैर्भवेधनसौख्यमुचैः । हदीरतं पूर्वमुनिप्रवर्यैर्बलानुसारासरिचिन्तनीयम् ॥ १५ ॥ जो लग्न धन और लाभ स्थानमें बलयुक्त शुभग्रह प्राप्त हो तो भूधनकी प्राप्ति होवे ऐसा पूर्व मुनिजनोंने कहा है बलके अनुसार सब ग्रहोंसे वस्तुओंका विचार करना चाहिये ॥ १५ ॥ इति दशमभावविवरणं समातम् भाषाटीकासमेतम् । (१२५) अथैकादशभावफलम् । अथैकादश लाभभवनममुकायममुकदैवत्यममुकायुतं न वा । स्वामिना दृष्टं युतं न वाऽन्यैश्शुभाशुभैर्य हैदृष्टं व वेति ॥ ग्यारहवाँ लाभस्थान है उसमें भी देवता ग्रह स्वामीकी दृष्टि अष्टि तथा शुभाशुभ ग्रहोंका योग पूर्ववत् देखे ॥ तत्र विलोकनीयानि । मजावहेमाम्बरन जातमान्दोलिकामङ्गलमण्डलानि । लाभः किलास्मिन्नखिलैर्विचार्यमेतत्तु लाभस्य गृहे ग्रहोः।। १।। हाथी घोडा सुवर्ण वस्त्र रत्न सवारी मंगल मण्डल और लाभ यह सब कुछ विद्वानोंको ग्यारहवें घरसे विचारना चाहिये ॥ १ ॥ तत्रादी लग्नफलम् । लाभाभिने सत्यय मेषराशो चतुष्पदोत्यं प्रकरोति लाभम् । तथा नराणां नृपसेवया च देशांतराराधितसत्प्रभुत्वम् ।। ३ ।। जो ग्यारहवें स्थानमें मेष लग्न हो तो उस पुरुषको चौपायोंसे लाभ हो तथा राजमेवा और देशान्तरोंमे प्रभुतकी पाप्ति और बन मिले ॥१॥ आयस्थिते वै वृषभे प्रलाभो भवेन्मनुष्यस्य विशिष्ट जातः । स्त्रीणां सकाशादशसज्जनानां कुसीदतोऽग्याक्षितितस्तथैव।।२।। जो ग्यारहवें स्थानमें वृष लग्न हो तो उस मनुष्यको श्रेष्ठ लाभ हो त्रियोंसे वा सज्जनोंसे व्याजसे अग्रजसे और क्षितिसे लाभ हो तथा धर्म करनेवाला होता है ॥ २ ॥ तृतीयराशौ कुरुतेऽतिलाभ लाभाश्रिते स्त्रीदयितं सदैव । बनार्थमुख्यासनयाननानं सदा नराणां विविधप्रसिदिः ॥३।
(१२६)
बृहद्यवनजातकम् ।
जो एकादशस्थानमें मिथुनराशि हो तो उस मनुष्यको लाभ
हो, स्त्री प्यारी हो, वस्त्र मुख्यासन यानकी प्राप्ति और अनेक
प्रसिद्धि होती हैं ॥३॥
लाभो भोल्लाभगते च राशौ नृणां चतुर्थे च वराङ्गनानाम् ।
सेवाकषिष्यां जनितः प्रभूतशावेग वा माधुजनोपकारात्॥४॥
जो ग्यारहवें स्थानमें कर्क हो तो उस मनुष्यको स्त्रीपक्षसे लाभ हो
तथा सेवा कृषि शास्त्र साधुजनोंके उपकारसे लाभ होता है ॥ ४ ॥
लाभाश्रिते पञ्चमके च राशौ भवेन्मनुष्यस्य च गर्हणाभिः ।
मानाजानां वधावन्यनैश्च व्यायामदेशान्तरसंश्रयाच ॥५॥
जो ग्यारहवें स्थानमें सिंह हो तो उस मनुष्यको गति कर्म,
भनेक मनुष्योंके वध बन्धन व्यायाम तया अन्यदेशके आश्रयसे
छाभ होता है ॥५॥
कन्यात्मके लाभगते मनुष्यः प्रामोति लाभं विधिधैरुपायैः ।
छलेन पारेन सुभाषणेन परसरैः शून्यकर्विकारैः॥६॥
जो ग्यारहवें कन्या लग्न हो तो वह मनुष्य अनेक प्रकारके उपायोंसे
लाभको प्राप्त करे, छल पाप सुभाषण वा परस्पर शून्य विकारोसे
बन संचय करे ॥ ६॥
तुलाधरे ल.भगते मनुष्यः पामोति लाभं वनविचिौः ।
सुसाधुपेवाविनयेन नित्यं सुतस्तुतं मुख्यतया प्रभुत्वम् ॥ ७॥
जो ग्यारहवें तुला लग्न हो तो उस मनुष्यको अनेक प्रकारके
बनमें उत्पन्न पदायोंसे लाभ हो, अच्छी साधुसेवा, विनय, स्तुति
और मुख्य प्रमुपनको प्राप्त होता ॥७॥
लाभाश्रितेचाष्टमके हि राशी प्रामाति लाभ मनुजोऽवि-
मुख्यम् । शाखागमाश्यां विनयेन पुंसां नित्यं विवेकेन
तथाऽद्भुतेव ॥८॥
भाषाटीकासमेतम् । (१२७) जो लाभमें वृश्चिक राशि हो तो वह मनुष्य मुख्य लाभको प्राप्त है, वेदशास्त्र विनय तया नित्यज्ञानसे भी धन प्राप्त करता है ॥ ८॥ लाभाश्रिते चैव- धनुरे च नृपाद्धि मानं भजते मनुष्यः । सुसेवया वा निजौरुषेण मनुष्यकाराधनतोऽश्वतोऽपि ॥ ९ ॥ जो लाभमें धनुष लग्न हो तो उस मनुष्यको राजाके स्थानसे सुसेवासे अपने पुरुषार्थसे वा दूसरे मनुष्यको आराधनासे वा अवकृत्यसे धनकी प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥ लामाश्रिते वै मकरेऽर्थलाभो भवेन्नराणां जलयानयोमाद । विदेशवासानृावया च व्ययालको भूरितरः सदैव ॥ १० ॥ जो ग्यारहवें मकर लग्न हो तो मनुष्यको जलयान अर्थात् जहाज नौका आदिसे तथा विदेशमें वास वा राजसेवासे ठाम हो और वह सदा अनेक व्ययकार्य करे ॥१०॥ आयस्थिते कुम्भवरे च लाभो भवेन्नराणां जलयानयोगात् । त्यागेन धर्मेण पराक्रमेण विद्यामभावात्सुममासमेत ॥ ११ ॥ जो ग्यारहवें कुंभ लग्न होतो जहाज नौकासे उस मनुष्यको लाभ हो, त्याग धर्म पराक्रम विद्याके प्रभाव और अच्छे समागमसे धन मिले ११ लाभाश्रिते चान्तिमगे च राशौ प्राप्नोति लाभ विविध मनुष्यः। मित्रोद्भवं पार्थिवमानजातं विचित्रवाक्यैःप्रगयेन नित्यम् १२॥ जो ग्यारहवें मीन लग्न हो तो उस मनुष्यको अनेक प्रकारके लामकी प्राप्ति हो, मित्रसे वा राजाके सत्कारसे, विचित्र वाक्य और प्रणयसे लाभ होता है ॥ १२ ॥ इति लाममावे उम्म् ।
(१९८)
बृहद्यवनजातकम् ।
अथ ग्रहफलम् ।
सूर्यफलम् ।
गीतिप्रीति चारुकर्मप्रवृत्तिं शुश्चत्कात्ति वित्तपूर्ति निनान्तम्
भूपात्प्राप्ति नित्यमेव प्रकुर्यात्प्राप्तिस्थाने भानुमान्मानवानाम् ।
जो ग्यारहवें सूर्य हो तो गानविद्यामें प्रीति, अच्छे कर्ममें प्रवृत्ति
निरन्तर कीर्ति और धनमे पूर्ण हो तथा राजासे नित्यही धनकी प्राति
करनेवाला होता है ॥ १ ॥
चन्द्रफलम् ।
सन्माननानाधनवाहनाप्तिः कीर्तिश्च सद्भोगगुणोपलवधिः ।
प्रसन्नता लाभविराजमाने ताराधिगजे मनुजस्य नूनम् ॥ २॥
जो ग्यारहवें चन्द्रमा हो तो मनुष्यको आदर अनेक प्रकारके
भौर वाइनकी प्राप्ति और कीर्ति अच्छे भोग तथा मुणोंकी मामि
और प्रसन्नतासे युक्त होता है ॥ २ ॥
भीमफलम् ।
ताम्रप्रवालविलसत्कलधौतरक्तवखाममं सुललितानि च
वाहनानि । भाप्रसादसुकुतूहलमङ्गलानि दयादवांति-
भवने हि सदाऽवनेयः ॥ ३ ॥
जिसके मंगल ग्यारहवें हो वह मनुष्य तांबा, मूंगा, सोना, रक्त
वस्त्र तथा सुन्दर सवारीसे युक्त होता है और राजाकी प्रसन्नतासे श्रेष्ठ
कौतुक मंगलोंकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥
बुधफलम् ।
भोगासक्तोऽत्यन्तर्वित्तो विनीतो नित्यानन्दश्वारुशीलो
बलिष्ठः । नानाविद्याभ्यासकन्मावनः स्याल्लाभस्थाने
नन्दने शीतभानोः॥ ४ ॥
भाषाटीकासमेतम् । ( १२९) जो ग्यारहवें बुध हो तो वह पुरुष भोगमें आसक्त, अत्यन्त धन- बान, नम्रस्वभाव, नित्यही आनन्दसे युक्त, सुशील, बलवान और अनेक विद्याओंका अभ्यास करनेवाला होता है ॥ ४ ॥ गुरुफलम्। सामीमाममनं च नूनं सदावोत्तमवाहनानि । भाप्रसादं कुरुते नराणां गीर्वाणवन्यो यदि लामस्थः॥५॥ जो बृहस्पति ग्यारहवें स्थानमें हो तो उस पुरुषको बल अर्थकी प्राप्ति, सद्रन वस्त्र उत्तम वाहनकी प्राप्ति और राजाकी प्रसन्नतासे युक्त होता है ॥५॥ भृगुफलम। मद्रीतनृत्यादिरतो नितान्तं नित्यं च वित्तगमनानि नूनम् । मकर्मधर्मागमचित्तवृत्ति गोः सुतो लाभगनो यदि स्यात् ॥६॥ जो ग्यारहवें शुक्र हो तो वह पुरुष श्रेष्ठ गीत और नृत्यमें अत्यन्त मीप्ति करनेवाला हो, धनकी प्राप्ति हो तथा मत्कर्म और धर्ममें चित्तकी वृत्ति होती है ॥ ६ ॥ शनिफलम् । कृष्णाभानामिन्द्रनीलादिकानां नानाचश्चदस्तुदन्ताव लानाम् प्राप्ति कुर्यान्मानवानां प्रकष्टां प्राप्तिस्थाने वर्तमानोऽसूनुः।।७॥ जोशान ग्यारहवें हो तो वह मनुष्य इंद्रनीलमाण तथा और भी हाथीदांतादि अनेक प्रकारके वस्तुओंकी प्रामिको करता है ॥ ७॥ राहुफलम्। लभेडाक्यतोऽथै चरेकिकरण बजोरिकं च देशं लभेत प्रतिष्ठाम् । यो पक्षयोर्विश्रुतः सत्यजावान्नता:शत्रवः स्युस्तमी लाभगवेव ॥८॥ जो राहु ग्यारहवें हो तो उस मनुष्यको अच्छे वचनोंसे लाभ हो
(१३०)
बृहद्यवनजातकम् ।
मवको पहित देशान्तरयात्रामें। प्रतिष्ठा हो, दोनों पक्षोंमें प्रसिद्ध हो,
उसम प्रजासे युक्त हो और शत्रुगण उतसे दबे हुए रहें ॥ ८ ॥
केतुफलम् ।
भाषी सुविद्याधिके दर्शनीयः सुभोगः तुतेजाः
सुजिऽपि यस्य । भवेदोदरार्तिः सुता दुर्भगाश्च शिखी
लाभगः सर्वलाभं करोति ॥ ९ ॥
जो ग्यारहवें केतु हो तो वह पुरुष अच्छा भावण करनेवाला, सुन्दर
विद्यावान्. दर्शनीयमूर्ति, श्रेष्ठ भोगोंसे युक्त, तेजस्वी और सुन्दर वस्त्रों
महित देता है नया उदरमें पीडा, अभागी सन्तानवाला, सब प्रकारके
लाभास युक्त होता है ॥ ९ ॥ इति ग्रहफलम् ।।
अथ लामभवनशफलम् ।
भवति ना सुगः स्व जनप्रियः कलिन एव वहान्यकुपुत्रवान् ।
भवपतौ तनुग च सुरुत्तमो नृपतितो धनलाभकरः सदा ॥१॥
जो लाभेश तनु स्यानमें प्राप्त हो तो वह पुरुष सुभग, स्वजन-
निय, बहुत दान करनेवाला, पुत्रवान और राजासे धन प्राप्ति करने.
वाला होता है ॥१॥
चपलजीवितमल्मसुखं तथा भवपतिर्धनभावयुतो यदि ।
खलखगे त्वतितस्करतायुतः शुसखगे धनवानतिजीवति ॥ २॥
यदि लाभेश धनस्थानमें प्राप्त हो तो उस पुरुषका चपल जीवन
और थोडा सुख होता है, क्रूर ग्रह हो तो तस्कर और शुभग्रह हो तो
धनवान होकर दीर्घजीवी होता है ॥ २ ॥
सहजवित्त युतश्च सुबान्धवः सहजवत्सल एव नरः सदा ।
सहजगे भवभावपती शुचिः स्वजनमित्रजनानातिलाभदः ॥ ३॥
जो तीसरे स्थानमें लाभेश हो तो वह पुरुष भाइयोंके धनसे युक्त,
बन्धुआन सहित भाइयोंका प्रिय, पवित्र तथा स्वजन मित्रजनाको
लाभ देनेवाला होता है ॥ ३॥
भाषाटीकासमेवम् ।
(१३१)
अमितजीवनयुक् पितृपंक्तियुक्त नयकर्मरतः सुभगः शुभः ।
सुरुतकर्मवशादतिलाभवान्मुखाते भवभावपती भवेत् ॥ ४ ॥
जो लाभेश चौथे स्थानमें हो तो वह पुरुष दीर्घजीवी, पितासे
युक्त, पुत्रके कर्ममें प्रीति करनेवाला, सुभग सुन्दर और पुण्य कर्म-
क्शसे अति लाभवाला होता है ॥ ४ ॥
जनकसंयुतमातृजनप्रियः सुतगते भवभावपतो नरः।
शुभखगर्मितभुक्सुखसंयुतः खल खगैविपरीतफलं लभेत् ॥ ५ ॥
जो लाभेश पंचम हो तो वह पुरुष माता पिताका पारा होता है,
शुभ ग्रह हो तो थोडा भोजन करनेवाला सुखी होताहै, क्रूर ग्रह
हो तो इससे विपरीत फल कहना ॥५॥
रिपुयुतोऽपि हि दीर्वगही कराश्च तुरताचतुरैः सह सम्मतः ।
रिपुगते भवो च विदेशगो भरणमेव च तस्करजं भयम् ।।६।।
जो लाभेश छठे हो तो वह पुरुष शत्रुओंसे युक्त, अधिक रोगी,
दुर्बल शरीर, चतुरतामें भी चतुर, मनुष्योंसे आदरको प्राप्त हो और
विदेशगामी हो तथा विदेशमें मरण वा तस्करसे भय होता है |
प्रकृतिजोयतनुबहुमम्मदो बहुल जीवियुतं बहुशीलयुक् ।
खलखमैर्बहुरोगयुतो नरः शुभखगैर्बहुसौख्यसमन्वितः॥ ७ ॥
जो लाभेश सप्तम हो तो वह पुरुष स्वभावसेही उग्र शरीर, बहुत
सम्पत्तिमान् दीर्घजीवी शीलवान होता है, क्रूर ग्रह हो तो बहुत रोगसे
युक्त हो, शुभ ग्रहोंसे सुख युक्त होता है ॥ ७ ॥
बहुलरोगयुतश्च तथा शुभः खचर एवमिदं ददते फलम् ।
भवपतौ मृतिगे रिपुवृन्दतो विपुलवैरकरश्च नरः सदा ॥ ८ ॥
जो लाभेश अष्टम हो और शुभ ग्रह हो तो उस पुरुषको अनेक प्रका-
रके रोग करता है तथा शत्रुओंसे वैर करनेवाला होता है ॥ ८॥
(१३२) बृहद्यवनजातकम् । एकादशेशः सुकृत स्थितश्चेद्बहुश्रुतः शास्त्रविशारदश्च । धर्मप्रसिद्धी गुरुदेवभक्तः क्रूरे च बंधुव्रजवर्जितश्च ॥ ९॥ यदि लाभेश नवम स्थानमें हो तो वह पुरुष प्रसिद्ध और बहुत प्रकारसे वेदशास्त्र के विचारमें चतुर हो, धर्म में प्रसिद्ध, देव गुरुका भक्त हो, क्रूरग्रह हो तो वन्धुजनोंसे रहित होता है ॥९॥ पितरि बैरयुतो जननीप्रियो बहुलसद्धनकीर्तियुतो नरः । जननिपालनकर्मरतः सदा भवपतिर्दशमस्थलगो यरा।॥ १० ॥ जो लाभेश दशम हो तो वह मनुष्य पिताका विरोधी, माताका प्रिय, बहुतसे धन और यशसे पूर्ण, मातृपालन कर्ममें तत्पर होता है ॥ १० ॥ बहुल जीवितमुग्धजनान्वितः शुभव तुः खलु पुष्टियुतः सदा । अतिसुरूपसुवाहननयुक्स्वगृहगे भवभावपतौ नरः ॥ ११॥ जो लाभेश ग्यारहवें स्थानमें हो तो वह पुरुष बहुजीवी, मुग्ध- जनोंसे युक्त, सुन्दरशरीर पुष्टियुक्त, अति स्वरूपवान् सुन्दर वाहन वस्खसे युक्त होता है ॥ ११ ॥ भवपतौ व्ययगे च खलो नरवाल जीवितवित्तयुनो नरः । भवति मानयुतो बहुकष्टदः स्थितधनी बहुदुष्टमतिः खलः ॥१२॥ जो लाभेश बारहवें स्थानमें हो तो वह पुरुष खल चपलजीवित बोडे द्रव्यवाला होता है, मानसे युक्त, बहुत कष्ट देनेवाला, धनवान, दुष्टमति होता है ॥ १२ ॥ इति लाभभवनेशफलम् । अथ दृष्टिपलम्। सूर्यदृष्टिफलम् । बामसमनि रवीक्षिते सति प्राप्यते सकलवस्तु निश्चितम् । भाधियुक्त सुतनाशकत्सदा कर्मजीवकसुबुद्धिमान्सदा ॥१॥ जो लाभस्थानमें सूर्यकी दृष्टि हो वो उस पुरुषको सब वस्तुकी प्राप्ति हो, आधि व्याधिसे युक्त. सुतनाशकारक, कर्मजीवी, सुबुद्धि- मान होता है ॥१॥ .
भाषाटीकासमेतम् ।
पन्द्रहष्ठिफलम् ।
लाभालये स्यायदि चन्द्रदृष्टिलानार्थदो व्याधिविनाशनं च ।
चतुष्पदानां कनकस्य वृद्धिः सर्वत्र लाभश्चन मंशयोऽत्र ॥२॥
जो ग्यारहवें स्थानमें चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो उस पुरुषको धनकी
प्राप्ति और गेगका नाश हो, चौपायोंकी और सुवर्णकी वृद्धि तथा
सर्वत्र लाभ होता है इसमें सन्देह नहीं है ॥ २ ॥
भोमटिफलम् ।
सत्यायभावे कुजवीक्षिते च आयुर्विवृद्धिः खिया गर्भनाशः।
दिकायसमये तृतीयके पुत्रप्सौख्यमपि चतुष्पदासुखम् ॥३॥
जो ग्यारहवं मंगलकी दृष्टि हो तो उस पुरुषकी आयुकी वृद्धि और
स्त्रीका गर्भनाश हो तथा शरीरकी वृद्धि पुत्र और चौपायोंसे सुख होता है।
बुधदृष्टिफलम् !
लाभालये चन्द्रजवीक्षिते मति भाग्यवांव सकलार्थसौख्यभाक् ।
बुद्धिशाखनिपुणोऽतिविश्रुतः पुत्रिका भवन्ति तत्य पुष्कलाः४॥
जो ग्यारहवें चन्द्रमाकी दृष्टि हो तो वह पुरुष भाग्यवान् सम्पूर्ण
अर्थ और सुखका भोगी होता है, बुद्धिमान, शास्त्र में पण्डित और
प्रसिद्ध हो तथा अनेक पुत्रियोंसे युक्त होता है ॥ ४ ॥
गुरुदृष्टिफलम् ।
गरोदृष्टिः पूर्णतरायभावे आयुश्च पूर्णश्च नरः सदा स्यात् ।
पुत्रदारधनसौख्यतः सुखं व्याधिहीनमापे कान्तिमाअयी ॥५॥
जो गुरु पूर्ण दृष्टिसे ग्यारहवें स्थानको देखता हो तो वह मनुष्य
पूर्ण आयुवाला हो, पुत्र स्त्रीधनसे सुख हो,' व्याधिहीन, कान्तिमान्
जयशील होता है ॥५॥
भृगुदृष्टिफलम् ।
लाभसमनि च शुक्रवीक्षिते लाभवृद्धिसुखवित्तसंयुतः।
धामणीनिजजनादिपालकः पूर्ववृत्तिपरिपालने रतः ॥६॥
(१३४) बृहद्यवनजातकम्। जो ग्यारहवें स्थानको शुक्र देखता हो तो उस पुरुषको लाभ वृद्धि सुग्व और धनकी प्राप्ति हो, प्रामाधिपति, अपने जनोंका पालक तथा पूर्ववृत्तिके परिपालनमें रत होता है ॥ ६ ॥ शनिदृष्टिफलम् । यदायभावे रविसुनुदृष्टे लाभस्तरा दुष्टखलावेच । पुत्रतश्च पुखमल्पकं भवेद्धान्यलाभयुगथापि पण्डितः॥ ७॥ जो ग्यारहवें स्थानको शनि देखता हो तो उत्त पुरुषको अति दुष्टसे लाभ हो, पुत्रसे थोडा सुरव, धान्य लाभ और पंडित भी होता है॥७॥ राहुदृष्टिफलम् । मायसम यदि राहुवीक्षितमायुपूरगकरं वरस्य हि । द्रव्यलाभमथ भूपवर्गतः सुख मास्मवृद्धिनिरतो नरः सदः।। ८ ।। जो ग्यारहवें स्थानको राहु देखता हो तो उस मनुष्यकी आयु पूर्ण होती है, द्रव्य लाभ, राजोंके वर्गसे सुख और सदा अपनी उन्न- तिमें तत्पर होता है ॥ ८॥ इति दृष्टिफलम् । अथ वर्षसंख्या। लाभे रविर्जिनसमामितलाभामिन्दो भूपाच लाभमसूजो जिनवर्षलक्ष्मीम् । ज्ञः पञ्चवेदधनमीज्य इनाअदलक्ष्मीम् । शुक्रः करोति धनमार्किफलं कुजोक्तम् ॥ १ ॥ शनिराहुकेतुभिर्जिनवर्षलाभः । इति लामभवनम् ॥ मूर्यके २४ वर्ष लाभ हो, चन्द्रमाके १६ वर्ष लाभ हो, मंगलके २४ वर्ष लक्ष्मी प्राप्ति, बुध ४५ धनप्राप्ति, गुरु १२ वर्ष लक्ष्मी लाभ, शुक्र १२ वर्ष धनलाभ, शाने राहु केतु २४ वर्ष धनलाभ करते हैं ॥१॥ इति लामभवनं सम्पूर्णम् ।
भाषाटीकासमेतम् ।
(१३५)
अथ भावविचारः।
मूर्येण युक्तोऽथ विलोकितो वा लाभालयसस्य गणोऽत्र
चेत्स्यात् । भूपालतश्चौरकुलादथो वा चतुष्पादा
बहुधा धनाप्तिः ॥ १॥
जो ग्यारहवां घर सूर्यसे युक्त हो वा सूर्यकी दृष्टि हो अयवा सूर्यका
पडवर्ग हो तो उस पुरुषको राजासे चोरकुलले और चौपायोंसे अनेक
प्रकारसे धनकी प्राप्ति होती है ॥१॥
चन्द्रेण युक्तः प्रविलोकितो वा लाभालयश्चन्द्रगणाश्रितश्चेत् ।
जलाशयत्रीगजवाजिवृद्धिः पूर्णे भवेत् क्षीणतरे विनाशः॥२॥
जो ग्यारहवां स्थान चन्द्रमासे युक्त हो वा चन्द्रमाकी दृष्टि हो वा
चन्द्रमा षड्वर्गमें हो तो उस मनुष्यको जलाशय, स्त्री, हायी और
घोडोंकी वृद्धि हो और यदि चन्द्रमा क्षीण हो तो विनाश होता है॥२॥
लाभालये मङ्गलयुक्त दृष्टे प्रभुतभूषामणिहेमवृद्धिः ।
विचित्रयात्रा बहुमाइसैः स्यान्नानाकलाकौशलघुद्धियोगैः ॥३॥
जो ग्यारहवें मंगलकी दृष्टि वा योग हो तो उस मनुष्यको अनेक
भूषण, मणि, सुवर्णवृद्धि और अनेक कलाओंमें निपुण बुद्धिसे विचित्र
पात्रा तथा बहुत माहमसे युक्त होता है ॥ ३ ॥
यत्रक्रियासाधुजनानुयातो राजश्रितोत्कृष्टकशो नरःस्यात् ।
व्येण हेमप्रचुरेण युक्ता लाभे गुरोर्वर्गयुतेक्षणं चेत् ॥ ४ ॥
जो ग्यारहवें मुरु हो या गुरुकी दृष्टि हो वा गुरुका वर्ग हो तो वह
पुरुष यज्ञकर्ममें रत, सजनोंके साथ समागम करनेवाला, राजाश्रय-
वाला उत्कृष्ट तथा शरीरसे कृश और अधिकतर सुवर्णके द्रव्योंसे
युक होता है॥ ४॥
बृहद्यवनजातकम् ।
लाभालरे भार्गववर्गजाते युक्तेक्षिते वा यदि भार्गवेण ।
वश्याजनैपि गमागमै सोन्यमुक्तापत्रस्वलब्धिः ॥५॥
जो ग्यारहवें भावमें शुक्रका वर्ग हो अयव। शुक्रका योग वा दृष्टि
हो तो उस मनुष्यको वेश्याजनोंसे वा गमनागमनसे उत्तम चांदी और
मोती आदि धनकी प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥
लाभवेश्म शनिवीक्षितयुक्तः तद्गुणेन सहितं यदि पुंसाम् ।
नीलगोमहिषहस्तियाढयो प्रामवृन्दपुरगौरवमिश्रः ॥ ६ ॥
जो ग्यारहवें भावमें शनिका योग वा दृष्टि हो वा शनिका वर्ग हो
ना उस मनुष्यको नील गौ, महिषी, हायी घोडोंका लाभ हो तथा
ग्राम समूह पुरमें गुरुतासे युक्त होता है ॥ ६ ॥
युक्तक्षिते लाभगृहे शुभैवेद्वर्गे शुभानां समवस्थितेऽपि ।
लाभो नराणां बहुधाथवास्मिन्सर्वग्रहैरेव निरीक्षमाणे ॥ ७ ॥
पदि लाभभाव शुभग्रहोंसे युक्त वा दृष्ट हो अथवा शुभग्रहोंके षडू.
वर्गमें हो तो उस मनुष्यको अनेक प्रकारसे लाभ हो और सब ग्रहोंसे
युक्त वा दृष्ट हो तो वहुधा लाभ होता है ॥ ७ ॥
इत्येकादशभावविवरणं समाप्तम् ।
अथ द्वादशभावफलम् ।
द्वादशभावव्ययभवनममुकायममुकदैवत्यममुक्यायुतं ।
बस्वामिदृष्टं न वाऽन्यैः सर्वग्रहश्शुभाशुभैदृष्टं युतं न वेति ।।
चारहवें घरके विचारमें ग्रहप्राप्ति स्वामीकी दृष्टि शुभाशुभ ग्रहोंकी
दृष्टि है या नहीं पूर्ववत् विचार करे ।
तत्र विलोकनीयानि ।
हानिदर्शनं व्ययश्चापि दण्डो बन्धनमेव च ।
सर्वमेतब्ययस्थाने चिन्तनीयं प्रयत्नतः ॥१॥
भाषाटीकासमेतम् ।
(१३७)
हानि दान व्यय दण्ड बंधन यह सष वारहवें स्थानसे विचारना
चाहिये ॥ १॥
लप्रपालम् ।
मेषे व्ययस्थे स्यात्पुंसां व्ययश्च तनुपीडनम् ।
स्वमशीलो नरो नित्यं लाभयुक्छुभसंयुते ॥१॥
जो बारहवें स्थानमें मेषलग्न होवे तो उस पुरुषके दस्यका खर्च
हो, शरीरमें पीडा हो, स्वप्न बहुत देखे और यदि शुभ ग्रहों से युक्त
हो तो लाभ होता है ॥ १ ॥
वृष व्ययस्थ व्यय एव पुंसां भवेद्विचित्रो वरयोषिताममः।
लामो भवेत्तस्य सदैव पुंमां सुधातुवाइ विबुधैश्च सङ्गः ॥२॥
जो बारहवें स्थानमें वृषलग्न हो तो उस मनुष्यके धनका खर्च हो,
विचित्र स्त्रीकी प्राप्ति हो तया धातुवाइमें लाभ हो और ज्ञानी मनु-
इयोंका समागम होता है ॥ २॥
तृतीयराशौ व्ययगे नराणां व्ययो भवेत्नीव्यसनास्मकैश्च ।
भुतोवो वा सततं प्रभूतः कुशीलता पापजनाश्रयाच ॥ ३ ॥
जो मिथुन लग्न बारहवें हो तो उस पुरुषका स्त्रीव्यसनके कार्यों में
व्यय हो वा निरन्तर भूतोद्भव कृत्य करे तथा कुशीलता और पाप युक्त
जनोंके आश्रयसे व्यय होता है ॥ ३ ॥
कर्के व्ययस्थे द्विजदेवतानां व्ययो भवेबज्ञसमुद्भवश्व ।
धर्मकियाभिर्विविधाभिरेव प्रशस्यते साधुजनेन लोके ॥ ४ ॥
जो बारहवें कर्कलम हो तो दिज देवता और यज्ञादिके विषयमें व्यय
हो, अनेक प्रकारकी धर्मक्रियासे युक्त लोकमें साधुजनोंसे प्रशंसा पावेश
सिंहे व्ययस्थे तु भवेन्नराणामसव्ययो भूरितरः सदैव ।
रुगादिपीटा च कुकर्मसङ्कने विद्यापयःपार्थिवचारता च ॥५॥
( १३८) बृहद्यवनजातकम् । जो सिंह लग्न बारहवें हो तो उस पुरुषका दुष्ट कमोंमें अधिक व्यय हो तथा रोगादिसे पीडा हो कुकर्ममें तत्पर रहे विद्यामें व्यय हो और राजधनकी चोरी करने में प्रवृत्त होता है ॥ ५ ॥ कन्याभिधे चान्त्यगने व्ययश्च भवेन्मनुष्यस्य हि चाङ्गनोत्सवैः। विवाहमाङ्गल्यमखैर्विचित्रैः सत्रैः सभाभिर्बहुसाधु मंगात् ॥ ६ ॥ जो बारहवें कन्यालग्न हो तो वह पुरुष अंगनाओंके उत्सव विवाह मंगल कार्य, यज्ञ, निरन्तर अनादि दान और सभामें माधु समागमसे व्यय करनेवाला होता है ॥ ६ ॥ तुले व्ययस्थे सुरविप्रबन्धुश्रुतिस्मृत्तियश्च करो व्यवस्था । भवेन्नरोऽमौ नियमैर्यमैश्च सुतीर्थसेपाभिरिति प्रसिदः ॥ ७ ॥ जो बारहवें तुलालग्न हो तो वह पुरुष देवता, विप्र, बंधु, श्रुति और स्मृतिमें द्रव्य व्यय करे तथा यम नियम और तीर्थसेवामें व्यय करे॥७॥ अली व्ययस्थे च भवेद्ययस्तु पुमा प्रमादेन विडम्बनाभिः। कुमि सेवाजनिता सुनिन्दा धनव्ययश्चौरकताधिकारात् ॥८॥ यदि वृश्चिक लग्न बारहवें हो तो वह पुरुष प्रमादसे वा दूसरे पुरु- षोंके वंचनसे धनका व्यय करे तथा कुमित्रसेवासे निन्दा हो और चोरोंके किये अधिकारसे उसका धन व्यय होता है ॥ ८॥ चापे व्यवस्थे बहुवचनाभिर्व्ययो भवेत्तापजनप्रसङ्गात् । सेगकताद्वित्तधिया च पुंसां कषिप्रसंगात्परवश्वनाद्वा ॥ ९ ॥ जो वारहवें धनुषलग्न हो तो उस पुरुषका पापी जनोंके प्रसंगसे अनेक प्रकारकी वंचनाओंसे धनका व्यय हो और धनलाभार्थ कीहुई सेवा तथा कृषिके प्रसंगसे वा दूसरोंकी वंचनासे धनका व्यय होता है ॥९॥ मृमे व्ययस्थे च भवेन्नराणां व्ययस्तु पानासवसस्यजातः । स्ववर्गपूजाजनितोऽन्यतस्तथा कृषिक्रियाभिश्चधनव्ययोव्यथ!
भाषाटीकासमेतम् ।
(१३९)
जो बारहवें मकर लग्न हो तो वह पुरुष पान, आसव और अनमें
व्ययको अपने वर्गके सत्कारमें और खेतीके कार्यमें व्यय को ॥१०॥
घटे व्ययस्ये सुरसिद्धविपतपस्विवंदिवजनो व्ययस्तु ।
पुंमां भवेत्साधुजनानुरोधाच्छवादिष्टागतितश्च भूरि ११॥
जो कुंभलग्न वारहवें हो तो देवता सिद्ध ब्राह्मण तपस्वी और बंदी
मनोंमें उस पुरुषका धन व्यय हो तया साधुजनोंके अनुरोधमे शान
कथित कार्यसे उसका धन व्यय होता है॥ ११ ॥
मीने व्ययस्थे जलयानतो वा कुसङ्गमादा प्रभवेव्ययश्च ।
पुमां कुमित्रासनतोऽपि जातस्तथा विवादेन निरन्तरेण ॥१२॥
जो वाहवं मीन लग्न हो तो उस पुरुषका जलयान, दुष्टसंगति
कुमित्रके माथ बैठनेसे तया निरन्तर विवादमें व्यय होता है ॥ १२
इति व्ययभाव लग्नफलम् ।
अथ दृष्टिफलम् ।
सूर्यफलम् ।
तेजोविहीन नयने भवेतां तातेन साकं गतचित्तवृत्तिः ।
विरुबुर्व्यियभावयाते कान्ते नलिन्याः फलमुक्तमार्यैः॥३॥
जो बारहवें सूर्य हो तो उस मनुष्यके नेत्रों में न्यून तेज हो पिताके
साथ गतचित्तवृत्ति और विरुद्ध बुद्धिसे युक्त होता है ॥ १ ॥
चन्द्रफलम् ।
हीनत्वं वै चारुशीलेन मित्र कल्पं स्थानत्रयोः शत्रुवृद्धिः ।
रोपावशःपूरुषाणां विशेषाच्छीतांशुश्चेद्वादशे वेश्मनिस्यात्॥२॥
जिसके चन्द्रमा बारहवें हो तो वह मनुष्य मित्रोंके द्वारा सुन्दर
शीलसे रहित हो, नेत्रों में विकलता हो और वह शत्रुओंकी वृदिसे
युक्त अत्यन्त क्रोधी होना है ॥२॥
(११५) वृहद्यवनजातकम् । भीमफउम्। ममित्रवैरं नयनातिबाधां क्रोधाभिभूतं विकलत्वमङ्गे । धनव्ययं बन्धनमल्पतेजो व्ययस्थभौमो विदधाति नूनम् ॥३॥ जो बारहवें मङ्गल हो तो वह मनुष्य अपने मित्रोंसे वैर करे, नेत्रों में बाधा, क्रोधसे युक्त, अंगमें विकलता धनका व्यय बंधन और अल्पतेजसे युक्त होता है ॥ ३ ॥ बुधफलम् । दयाविहीनः स्वजनैर्षिभक्तः सत्कार्यदक्षी विजितारिपक्षः। तॊ नितान्तं मलिनो नरः स्याब्बयोपपन्ने द्विजराजपूनौ ॥४॥ जो बारहवें बुध हो तो वह पुरुष दयासे हीन, अपने जनोंसे विभक्त, शुभ कार्यमें चतुर, शत्रुओंका जीतनेवाला, अत्यन्त धूर्त और मलीन होता है ॥ ४ ॥ गुरुफलम् । नानाचित्तोद्वेगमातको पापात्मानं सालसं त्यकलज्जम् । बुद्ध्या हीनं मानवं मानहीनं वागीशोऽयं द्वादशस्थः करोति।।५।। जिसके बारहवें शुक्र हो तो वह पुरुष अनेक प्रकारके चित्तके उद्दे- गोंसे उत्पन्न क्रोधसे युक्त, पापात्मा, आलसी, निर्लज तया बुद्धि और मानसे हीन होता है ॥५॥ भृगुफलम् । सन्त्यक्तसत्कर्मविधिविरोधी मनोभवाराधनमानसथ । इयालुतासत्यविवर्जितः स्याकाव्ये प्रसूतीब्ययभावयाते ॥६॥ जिमके चारहवें शुक होतो वह मनुष्य शुभ कोंके विधानकात्यागने वाला तया मनुष्योंसे विरोध रखनेवाला, मनोभक्के आराधनमें दत्त. चित्त, दयालुता और मत्यमे रहित होता है ॥६॥ शनिफलम् ।। दयाविहीनो विधनो व्ययातः सबालमो नीच जनानुरक्तः। नरोऽङ्गभङ्गोजिशनमर्वमौल्यो व्ययस्थिो भानुसुते प्रसूती॥॥
भाषाटीकासमेतम् । (१४१)
जिसके जन्मकालमें बारहवें शनि हो तो वह पुरुष दयाहीन, धन-
हीन, खर्चसे दुःखी हो, सदा आलसी, नीच मनुष्योंमें अनुरागी तथा
अंगोंके भंग होनेके कारण सर्व सौख्यसे रहित होता है ॥ ७ ॥
राहुफलम् ।
तमो द्वादशे विग्रहे संग्रहोपे प्रपातात्पपातोऽथ सञ्जायते हि
नरो नाम्थतीतत्ततो नार्थसिद्धिविरामे मनोवाञ्छितस्य प्रवृद्धिः
जो बारहवें राहु हो तो वह पुरुष संग्रहमें विग्रह करनेमें रत प्रपात
(गिरनेके स्थान ) पर्वतादिसे गिरनेवाला तथा इधर उधर भ्रमण
करनेपर भी अर्थ सिद्धिसे रहित होता है और विराममें मनोवांछितकी
वृद्धि होती है ॥ ८॥
केतुफलम् ।
शिखी रिष्फगवारुनेत्रः सुशिक्षः स्वयं राबतुल्यो व्ययं
मत्करोति । रिपोर्नाशनं मातुलानैव शर्म कजा पीडचते
बस्तिगुह्यं सदैव ॥ ९॥
जो केतु वारहवें हो तो वह पुरुष सुन्दर नेत्र, शिक्षावान राजोंकी
तुल्य श्रेष्ठ व्यय करनेवाल! हो, शत्रुका नाश हो मामाके पक्षसे सुख
न हो और उसकी वस्ति मुद्यस्थान रोगसे सदा पीडित रहे ॥ ९ ॥
इति व्ययभावे ग्रहफलम् ।
अथ व्ययभावेशफलम् ।
तनुगते व्ययभावपतौ नरः सुवचनः स्वसरूनविदेशगः ।
खलजनानुरतश्च विवादयुग्युवतिभिः सहितोऽपि नपुंसकः ॥३॥
जो बारहवें स्थानका पति तनु स्थानमें हो तो वह पुरुष सुवचन
बोलनेवाला, स्वरूपवान, विदेशगामी, खल पुरुषोंमें अनुरक्त, विवाद
करनेवाला, स्त्रियोंके सहित होकर भी नपुंसक होता है ॥१॥
कपणता कटुवाधिनभावगे व्ययपतौ विकलभ विनष्टधीः ।
धरणिजे विधनं नृपतस्करादपि च पापकरच चतुष्पदे ॥२॥
१४२)
बृहद्यवनजातकम्।
जो व्ययाति धनस्थानमें हो तो वह पुरुष कृपण, कटुभाषी, विकल,
नष्टबुद्धि होता है, मङ्गल हो तो राजा वा चोरसे धनका व्यय हो,
चतुष्पदोंमें पाप करनेवाला होता है ॥ २ ॥
विकतबन्धुजनः खलपूजितो व्ययपतौ सहजस्थलगे सति ।
धनयुतोऽपि भवेन्मनुजः क्षितौ कपणबन्धुजनानुरतः सदा ॥३॥
जो व्ययपति तीसरे हो तो वह पुरुष बन्धुजनोंसे हीन, खलोंसे
मुस्कृत होता है, धनसे युक्त होकर भी कृपणता युक्त, बन्धुजनोंसे
अनुरक्त, सुभग शरीरवाला होता है ॥३॥
कर्मयुतः शुभकर्मरुध्ययपतो सुखगे च सुखान्वितः ।
सुनजनान्मरणं च दृढवती दिविचरे स भवेदुपकारकः ॥४॥
जो व्ययेश चौथे हो तो वह पुरुष कठिन कर्मसे युक्त, अच्छे
काँका करनेवाला सुखी होता है तथा सुतजनोंसे मरण पानेवाला,
दृढ संकल्पवाला होता है ॥४॥
तनयगेऽपि वलस्तनयो भवेव्ययपतौ तनुतेऽथ खलान्विते ।
शुभ वगेत्रिशुभं पितृकं धनं भवति चापि समर्थतयाऽन्वितः॥५॥
जो व्ययेश पंचम हो तो उसका पुत्र दुष्ट होता है जब कि अशुभ
ग्रह हो तो और शुभ ग्रह हो तो शुभ पुत्र सामर्थ्य युक्त पिताके
धनको भोगता है ॥५॥
व्ययस्तो रिपुगे कपणः खलः खलखगे नियतं नयनामयम् ।
परगृहाशयिणो भृगुपुत्रतो गतसुतः शुभबुद्धियुतो भवेत् ॥ ६ ॥
यदि बारहवें स्थानका अधिपति छठे हो तो वह पुरुष कृपण खल
होता है क्रूर ग्रह हो तो नेत्रों में रोग हो पराये घरमें रहनेवाला हो, जो
शुक्र हो तो पुत्रहीन आप बुद्धिमान होता है ॥६॥
भवति दुष्टमतिश्च गृहायणीः कपटदुष्टदुराचरणः खलः।
सलखने मदगे व्ययभावपे खलखगे गणिकाधनवान्कुधीः॥ ७ ॥
..
भाषाटीकासमेतम्।
(१४३)
जिसके बारहवें स्थानका अधिपति सप्तम हो तो वह मनुष्य दुष्टमति
और अपने गृहमें प्रधान हो तथा कपटी दुष्ट और दुराचारी हो यदि
खल ग्रह हो तो वेश्यासे धन मिले और क्रूर बुद्धिसे युक्त होता है ७॥
निधनो व्ययपेष्ट रूपाललकलकार्यविवेकविवर्जितः ।
भवात निन्दित एव तथा शुभे दिविचरे धनसंग्रहतत्परः॥८॥
जो व्ययपति अष्टम हो तो वह पुरुष अष्टकपाल हो तथा सम्पूर्ण
कार्य और विवेकसे रहित हो जो खल ग्रह हो तो यह फल कहना
और शुभ ग्रह हो तो वह पुरुष धनके संग्रहमें तत्पर होता है ॥ ८ ॥
सुकतकव्यय नवमाश्रिते वृषभगोमहिषीद्रविणः सुधीः ।
भवति तीर्थविचक्षणपुण्ययुक्खलखगेपि च पापरतो नरः ॥९॥
जो व्ययपति नवमस्थानमें स्थित हो तो वह पुरुष वृषभ गौ
महिषी धनसे युक्त सुबुद्धिमान तीर्य विचक्षण पुण्य युक होता है, दुष्ट
ग्रह हो तो पापमें रत होता है ॥९॥
मुतपुतो धन संग्रहतत्परः परजनानुरतः परकार्यकत् ।
व्ययपतौ दशमे जननीखलो भवति दुर्वचनानुरतः सदा ॥१०॥
जो व्ययपति दशवें स्थानमें हो तो वह पुरुष पुत्र युक्त, धनके
संग्रहमें तत्पर, अन्य मनुष्योंमें अनुरक्त तथा उनके कार्य करनेवाला,
मातामें दुष्ट और दुर्वचनमें अनुरक्त होता है ॥ १० ॥
धन्युतो बहुजीवितयुक्पुमान्यतखलः प्रमदश्च उदारधीः ।
एयपता भवगे सति सत्यवाक्सकलकार्यकरः प्रियवाग्भवेत् ११
जो व्ययपति बारहवें स्थानमें हो तो वह पुरुष बद्दजीवी, हर्वयुक्त
उदार बुद्धि तथा खल हो, और सत्यवाक् सम्पूर्ण कार्यकर्ता, प्रियवाणी
बोलनेवाला होता है ॥ ११ ॥
भवति बुद्धियुतः कपणः खलः परनिवासरतः स्थिरकार्यकत् ।
पशुजनैश्च रतो बहुभोजनो व्ययपतौ व्ययगे सति मानवः॥१२॥
(१४४)
वृहद्यवनजातकम् ।
जो बारहवें स्थानका पति बारहवें स्थानमें हो तो वह पुरुष कृपण तथा
दुष्ट स्वभाव, पराये स्थानमें रहनेवाला, स्थिर कार्यकर्ता, पशुजनोंमें रत
तथा बहुत भोजन करनेवाला होता है।॥ १२ ॥ इति व्ययभावेश फलम् ।।
अथ दृष्टिफलम् ।
सूर्यदृष्टिफलम् ।
द्वादशे दिनकता निरीक्षिते स्थानभङ्गमपि चान्यव हनम् ।
बाहनाच खलु शृङ्गिना भयं द्वादशाब्दमथ कष्टजीवितम् ।।
बारहवें स्थानमें सूर्य की दृष्टि हो तो उस पुरुषका स्थानभंग हो
मौरके वाहनपर चढनेवाला हो, सवारीसे भय, मांगवाले जीवोंसे भक
हो बारहवें वर्ष कष्टसे जीवे ॥१॥
चन्द्रदृष्टिफलम् ।
व्ययगृहे प्रति चन्द्रनिरीक्षिते पितृमुखं न करोति नरस्य हि।
नयनचंचलता पटुता धाव्ययारश्च अदानूनभाषकः ।।२।।
जो बारहवें घरमें चन्द्रमाको दृष्टि हो तो उस मनुष्यको पिताक:
सुख नहीं होता, नेत्र चश्चल हों, चतुर हो तथा धनका व्यय करनेवाला
और झंठ बोलनेवाला होता है ॥२॥
भीमदृष्टिफलम् ।
व्ययगृह सति भौमनिरीक्षिते पितृसुखं न करोति नरस्य हि ।
सकलशत्रुविनाशकरःसरा तदपि चान्यजनादि सुखक्षयम् ॥३॥
जो चारहवें स्थानको मंगल देखता हो तो उस मनुष्यका पिताका
सुखन हो, सब शत्रुओंको नाश हो और अन्य जनों के सुखका क्षय हो॥३॥
बुधदृष्टिफलम् ।
व्ययगृहे शशिपुत्रनिरीक्षिते व्ययकरश्च सदैव विषाहतः।
स्वजनबन्धुविरोधमहर्निशं हृदयदुष्टरुजा वणवातजा ॥ ४॥
जो बारहवें स्थानको दुध देखे तो उस पुरुषके विवाहके कृत्योंमे
सदा व्यय हो स्वजन और बंधुओंमें प्रतिदिन विरोध रहे, बण वातसे
उत्पन्न हृदयमें दुष्ट पीडा होती है ॥४॥
भाषाटीकासमेतम् । (१४५३
गुरुहष्टिफलम् ।
व्ययगृहे सुरराजनिरीक्षित व्ययकरः सुरभूसुरकार्यकत् ।
सकलकष्टकरोरिपुषीडितः सकलस्वार्थारः स च बुद्धिमान् ॥५॥
जो बारहवें स्थानको वृहस्पति देखता हो तो वह पुरुष सा देव
ब्राह्मणोंके कार्यमें व्यय करे सब कष्ट हो शत्रुसे पीडा सम्पूर्ण स्वार्थ-
परायण और बुद्धिमान् हो । यह फल शुक्रकाभी जानना ॥
शनदृष्टिफलम् ।
व्ययगृहे सति मंदानरीक्षित वन विनाशकरो हि धनव्य पम् ।
सुतालामुखाल्पससभितः ममरनो विजयी स भवेन्नरः ॥६॥
बारहवें स्थानको यदि शनि देखे तो उस मनुष्यका धन नष्ट होजाय,
उसको सुतकलत्रका सुख थोडा हिले, समरमें विजयी होता है ॥ ६ ॥
गहरष्टिफलम् ।
व्ययगृहे सति राहुनिरीक्षित व्यविवर्जितदानविजितः।
समरशत्रुविनाशकरः सा विकलता च सुखं प्रचुरं भवेत् ॥७॥
जो बारहवें स्थानको राहु देखता हो तो वह पुरुाव्ययरहित हो, दान
न करे और समरमें सदा शत्रुका नाश करनेवाला. विकलता और अधिक
भुखमाला होता है। यही फल के तुझा भी जानना ॥७॥ इति दृष्टिफलम।
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अथ वर्षसंख्या।
त्रिंशदष्टयुतं धनव्यपरविचन्द्रो जोड पचोदमित कुंको
पनहरं बाणे व्ययं चन्द्रजः । वार्षियसंचविंशे धनब्धया
एको धनं द्वादशे चत्वारिंशसञ्चयुततमः केतुः शनिई दिः,
सूर्यके ३८ वर्ष धन व्यय हो, च द्रमा १५ वर्ष जलपीडा हो, मंगल
५ वर्ष धन हरण हो, बुध २२ वर्ष व्यय हो, गुरु २५ वर्ष धाव्यय,
एक १२ वर्ष धन हो, केतु शनि गहु १५ वर्ष हानि देते हैं ॥१॥
(१४६) बृहद्यवनजातकम् । अथ व्ययभावविचारः। ब्ययालये क्षीणबलः कलावान्सूर्योऽथवा वावपि तत्र संस्थौ । इव्यं हरेद्भूमिपतिस्तु तस्य व्ययालये वा कुजदृष्टयुक्ते । ३ ॥ जो बारहवें भावमें क्षीण चन्द्रमा वा सूर्य अथवा दोनोंही स्थित हों का मंगलसे दृष्ट वा युक्त हा तो उसका धन राजा हरण करे 1 3 23 पूर्णेन्दुसौम्येज्यसिता र यस्थाः कुर्वन्ति संस्था धनसंचयस्य । पांत्यस्थिते सूर्यसुते कुजेन युक्तेक्षिते वित्तविनाशनं स्यात् ॥२॥ जो बारहवें भावमें पूर्ण चन्द्रमा, बुध, गुरु और शुक्र स्थित हो तो वह पुरुष धनका संचय करनेवाला होता है। यदि प्रान्त्यमें शनैश्वन स्थित हो और वह मंगलसे युक्त वा दृष्ट हो तो धनका नाश करताहै॥२॥ दोहा-उन्निससौ चौमन सुभग, सम्वत आश्विन मास । कृष्ण पक्ष शनि सप्तमी, ग्रंथ पूर्ण सुखरास ।। १ ।। गौरिगिरा गणपति शिवा, शम्भु गिरीश मनाय । बुध ज्वालाप्रसादने, ट'का लिख्यो बनाय ॥ २ ॥ जन्म पत्रको फल सकल, माख्यो यवन महान । सौ मैं भाषामें कियौ, देखहि सन्त सुजान ॥ ३ ॥ खेमराज श्रीसेठजी, विदित सकल संसार । तिनके यह अर्पण कियो, छापहिं करहिं प्रचार ॥१॥ नित प्रति मजिये राम कहु, जै जै सीताराम । जिनके सुमिरण ध्यानसे, सिद्ध होत सब काम ॥५॥ इति श्रीमत्पण्डितज्वालाप्रसाद मिश्रकृतभाषाटीकायुते बृहयवनजातके द्वादशभावविवरणं सम्पूर्णम् । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास लक्ष्मीवेंकटेश्वर" स्टीम्-प्रेस./ श्रीवेंकटेश्वर "टीम्-प्रेस, कल्याण-बंबई. खेतवाड़ी-बंबई:
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