Charan Sahitya Shodh Sansthan, Ajmer
Geeta Martmani�
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tetit, itet Partitute ouyi ha 60000 PHILIMILAIPULA HILDILAnshutnuuniti ॥ श्रीः॥ न गीतामृततरङ्गिणी. (श्रीमद्भगवद्गीताकी भाषाटीका.) --. श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मज-पंडित रघुनाथ- प्रसादजीकृत। - यह पुस्तक म Ufimi OssTARIO 11 Degil nila ni mtu mti eilini monumenten 100000 खेमराज श्रीकृष्णदासने बंबई निज "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यन्त्रालयमें मुद्रितकर प्रसिद्ध किया। १००००n शके १८३४ संवत १९६९. सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर।" यन्त्रालयाध्यक्षने स्वाधीन रक्खा है, រវេរាត ប្តូរឬ ឬវរពររបូរបររក្មេច បវរតបពរ y ប្តូររទ្រ
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. H युद्धप्रसंग ale- अर्जुन BAR ORA 72 ali יהולי XO
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शिघ्यमंडळी.
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गीतामूर्ति.
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१३
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अथश्रीमद्भगवद्गीतार्थवाड्मयीमूर्तिः ।। श्लोकौ।। क्राणि
पंचजानीहिपंचाध्यायाननुक्रमात । दशाध्यायाभुजाश्चै
कमुदर द्वौपदांबुजे।।१।। एवमष्टादशाध्यायीवाड-मयीमूर्तिरै
श्वरी।। जानीहिंज्ञानमात्रेण महापातक नाशिनी॥२॥ ।।
इस मूर्तिमें अंक डालने का मतलब ये है कि जो जो अध्यायके जो जो अंग हैं उन अंगों में उन
अध्यायोंके अंक लिखे है.
נגנו נגד!
הר
דרוזי ריידרוויי"
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האות
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.
गर्नुन
भूमिका। हो. हम बडे आनंदसे सर्व सद्धर्मावलंबियोंपर विदित करते हैं कि, यह "भगवद्गीता" ग्रंथ सर्व लोगोंको धर्मग्रंथ शिरोमणिरूपसे मान्य है प्रायः समस्त सनातनधर्माभिमानी विज्ञलोगोंको पाठ आता है. साधारणसभी साधारण क्यों न हो एक आध श्लोकका तो मुखसे उच्चारण करताही है. ऐसा इस ग्रंथका माहात्म्य है. यह क्यों नहीं हो कि, जो साक्षात् पद्मनाभ भगवान् श्रीकृष्णचंद्रजीने परम भक्त अर्जुनको श्रीमुखसे निरूपण करा है. जिसमें एकएक अक्षर तत्त्व- ज्ञानसे भराहुआ है. ऐसा यह ग्रंथ है तो इसकी इतनी महिमा होना क्या आश्चर्य है। यह ऐसी गीता सर्व उपनिषदोंके साररूप है श्रीकृष्ण- जीने इसको निकाली है, अर्जुनजीने इसका प्रथम आस्वाद लिया है. इसके भोक्ता बुद्धिमान लोग हैं. यह परम पवित्र और चतुर्विध पुरुषार्थको सिद्ध करता है. ऐसा यह तत्त्वज्ञान महाभारतके भीष्मपर्वमें श्रीव्यासमुनिने ग्रंथरूपसे निरूपण किया है, यह ग्रंथ संस्कृतभाषामें रहनेसे इसका अर्थ समझनेमें साधारण लोगोंको पराधीन करता था. यह. न्यूनता देखकर मैंने इस ग्रंथकी “गीतामृततरंगिणी" नामक भाषाटीका निर्माण करी. इसको प्रथम आवृत्तिमें अन्यत्र छपवायाथा. वह आवृत्ति हाथों हाथ विकगई. इस वास्ते अब इस भाषाटीकाका रजि- स्टरी हक सदाहीके लिये यथोचित पारितोषिक पाकर बड़े उत्साहसे श्रीमान सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासजी "श्रीवेङ्कटेश्वर” छापाखानाके अधिपतिको निवेदन किया है. उन सेठ श्रीखेमराज श्रीकृष्णदास- जीने यह ग्रंथ परम उत्साहसे अपने "श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखानेमें .
(2) भाभका। मुंदर मनोहर अमरों में पुष्ट चिकने काग़ज़पर छापके प्रसिद्ध किया है यह उक्त सेठजीका परम उपकार है. अब हम आशा रखतहें कि, इस अलभ्य मनोहर भाषाटीकास- मेत पुस्तकको संग्रह करके भगवदुक्त तत्त्वज्ञानको पायकर परम आनंदका विद्वान् अनुभव करेंगे. सुकुल सीतारामात्मज- पण्डित रघुनाथप्रसाद.
MEN . . 1 ॥ श्रीः ॥ अथ श्रीभगवद्गीतामाहात्म्यम्। भाषाटीकासमेतम् । on- ऋषिरुवाच। गीतायाश्चैव माहात्म्यं यथावत्सूत मे वद ॥ पुराणमुनिना प्रोक्तं व्यासेन श्रुतिचोदितम् ॥ १॥ श्रीर्जयति ॥ नत्वा रामानुजं कृष्णं गीताचार्य जगद्गुरुम् ॥ गीतामाहात्म्यसब्याख्या कुवै प्राकृतभाषया ॥१॥ अनेकप्रकारकी कथा सुनते सुनते शौनकऋषी सूतजीसे प्रश्न करतेभये कि, हे सूत ! जो श्रीमद्भगवद्गीताका माहात्म्य श्रीव्यास- जीने कहा है सो यथावत् मेरेको कहो ॥१॥ सूत उवाच ॥ पृष्टं वैभवता यत्तन्महद्रोप्यं पुरातनम्॥ केन वा शक्यते वक्तुं गीतामाहात्म्यमुत्तमम् ॥२॥ शौनकका प्रश्न सुनिक सूतजी बोले. कि, जो तुमने मेरेसे पूंछा यह अतिगोप्य प्राचीन है. अति उत्तम यह गीताका माहात्म्य किसी करिके भी कहने में नहीं आता है ॥२॥ कृष्णो जानाति वै सम्यक् कचित्कौंतेय एव च ॥ व्यासो वा व्यासपुत्रो वा याज्ञवल्क्योऽथ मैथिलः॥३॥ सम्यक्प्रकारसे तो, कृष्णही जानते हैं और किंचित् अर्जुन तथा व्यासजी, शुकदेवजी, याज्ञवल्क्य अथवा जनक जानते हैं ॥ ३॥ अन्ये श्रवणतः श्रुत्वा लोके संकीर्तयंति च ॥ तस्मात्किचिद्रदाम्यद्य व्यासस्यास्यान्मया श्रुतम् ४ .
(६)
गीतामाहात्म्य ।
औरजन कानोंसे सुनिके लोकमें वर्णन भी करते हैं, परंतु जानते
नहीं हैं, इसते जैसा मैंने श्रीव्यासजीके मुखारविंदसे सुना है तैसा
कुछ थोडा कहूंगा॥४॥
सर्वोपनिपदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः ॥
पार्थो वत्सः सुधीभॊक्ता दुग्धं गीताऽमृतं महत् ॥५॥
सर्व उपनिपढ़ें तो गऊरूप होतीभई; दुहनेवाले श्रीकृष्ण और
बछरारूपी अर्जुन प्रथम पान करतेभये. पीछे यह गीतारूप दूध
अतिमिष्ट लोकमें प्रवर्त्त करतेभये ॥५॥
सारथ्यमर्जुनस्यादौ कुर्वन् गीतामृतं ददौ ॥
सर्वलोकोपकारार्थे तस्मै कृष्णाय ते नमः॥६॥
जो भगवान् प्रथम अर्जुनका सारथीपना करते करते सर्वलोकोंके.
उपकारके वास्ते अर्जुनको गीतारूप अमृत देता भया ऐसे आप
श्रीकृष्णको मेरा नमस्कार है ॥ ६॥
संसारसागरं घोरं तत्तुमिच्छति यो जनः॥
गीतानावं समारुह्य परं याति सुखेन सः ॥७॥
जो संसारपोरसागर तरना चाहता होय, सो गीतारूप नावपर
बैठके सुखसे पार पाता है ॥७॥
गीताज्ञानं श्रुतं नैव सदैवाभ्यासयोगतः ॥
मोक्षमिच्छति मृतात्मा याति वालकहास्यताम् ॥८॥
जिसने गीतासंबंधी ज्ञान सदा अभ्यासयोगसे नहीं सुना है और वह
मूर्ख मोक्ष चाहता है वह बालकोंकरिके उपहासको प्राप्त होता है ।।८!
ये शृण्वंति पठेत्येव गीताशास्त्रमहर्निशम् ॥
न ते वै मानुपाज्ञेया देवा एव न संशयः ॥९॥
भाषाटीकासमेत। (७) जो रातदिन गीता पढते और सुनते हैं वे मनुष्य नहीं, देवताही हैं, ऐसे जानना यहां संशय नहीं ॥९॥ गीताज्ञानेन संबोध्य कृष्णः प्राह तमर्जुनम् ॥ अष्टादशपदस्थानं गीताध्याये प्रतिष्ठितम् ॥ १० ॥ श्रीकृष्णभगवान् अर्जुनको गीताके ज्ञानसे प्रबोधिके बोले कि, इसगीताके एकएक अध्यायमें अष्टादशपद जो विष्णु उनका स्थान जो परमपद सो स्थापित किया है ॥ १०॥ मोक्षस्थानं परं पार्थ सगुणं वाथ निर्गुणम् ॥ सोपानाष्टादशैरेवं परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ११ ॥ हे अर्जुन ! सगुण अथवा निर्गुण स्वइच्छाप्रमाण मोक्षस्थानपर इन अठारह अध्यायरूप सोपानोंकरिके परब्रह्मको प्राप्त होता है।॥११॥ मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने । सकृद्गीतांभसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥ १२ ॥ जो दिनदिनप्रति जलस्नान है सो शरीरमलका नाशक है और इसगीतारूप जलका स्नान संसारदुःखरूप मलका नाशक है ॥१२॥ गीताशास्त्रस्य जानाति पठनं नैव पाठनम् ॥ परस्मान्न श्रुतं ज्ञानं नैव श्रद्धा न भावना ॥ १३॥ स एव मानुषे लोके पुरुषो विड़राहकः ॥ यस्मादीतां न जानाति नाधमस्तत्परो जनः॥ १४ ॥ जो गीताशास्त्रका पढना पढावना नहीं जानता है, न दूसरेसे सुना, न जिसके श्रद्धा है और न भावना है सो पुरुष इसलोकमें ग्राम- (८) गीतामाहात्म्य । सूकरके समान है; जिसते कि, वह गीता नहीं जानता है तिसीसे उसके सिवाय दूसरा अधम नहीं है ।। १३॥ १४ ॥ धिक्तस्य मानुषं देहं धिरज्ञानं धिकुलीनताम् ।। गीतार्थ न विजानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥ १५॥ जो गीतार्थको नहीं जानता है उसके मनुष्यदेहको, ज्ञानको और कुलीनताको धिक्कार है और उससे अधिक कोई अधम नहीं है ॥१५॥ धिक्सुरूपं शुभं शीलं विभवं सद्गृहाश्रमम् ॥ गीताशास्त्रं न जानाति नाधमस्तत्परो जनः ॥ १६ ॥ जो गीताशास्त्रको नहीं जानता है उसके सुंदररूपको, सुंदरशी- लको, विभवको और श्रेष्ठगृहाश्रमको धिकार है और उसते. अधिक अधम दूसरा नहीं है ॥ १६॥ धिक् प्रागल्भ्यं प्रतिष्ठां च पूजां मानं महात्मताम् ॥ गीताशाख्ने रतिनास्ति तत्सर्व निष्फलं जगुः॥ १७॥ जिसकी गीताशाखमें प्रीति नहीं उसकी हिम्मत, प्रतिष्ठा, पूजा, गान और महात्मापनेको धिकार है और उसका सर्व निष्फल है ।।१७|| धिक्तस्य ज्ञानमाचारं व्रतं चेष्टांतपो यशः॥ गीतार्थपठनं नास्ति नाधमस्तत्परो जनः ॥ १८ ॥ जिसके गीतार्थका पठन नहीं है तिसके ज्ञानको तथा आचार, व्रत, चेटा, तप और यशको धिक्कार है, उससे अधिक कोई जन अधम नहीं है ॥ १८॥ गीतागीतं न यज्ज्ञानं तद्वियासुरसंज्ञकम् ॥ तन्मोघं धर्मरहितं वेदवेदांतगर्हितम् ॥ १९॥ जो ज्ञान गीताका गाया नहीं है उस ज्ञानको आसुरी ज्ञान जा. .
भाषाटीकासमेत। (९) नना; वह व्यर्थ और धर्मरहित तथा वेदवेदांतकरिके निंदित है ॥ १९॥ यस्माधर्ममयी गीता सर्वज्ञानप्रयोजिका ॥ सर्वशास्त्रमयी गीता तस्माद्गीता विशिष्यत ॥ ९ ॥ जिसवास्ते कि, गीता धर्ममयी और सर्वज्ञानोंकी प्रवर्तकरने- वाली है और ; सर्वशास्त्रमयी है। ऐसा कहा है, तिससे गीता सबशा- स्त्रोंसे श्रेष्ठ है ॥२०॥ योऽधीते सततं गीतां दिवा रात्रौ यथार्थतः ॥ स्वपन्गच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं मोक्षमाप्नुयात् ॥ २१॥ जो निरंतर रातिदिन अर्थसहित गीताको सोते, चलते, बोलते, खडेभी पढते रहते हैं वे सनातन मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥२१॥ शालग्रामशिलाग्रे तु देवागारे शिवॉलये॥ तीर्थे नद्यां पठेद्यस्तु वैकुंठं याति निश्चितम् ॥ २२ ॥ शालग्रामके संमुख देवमंदिर में, शिवालयमें, तीर्थमें और नदी- किनारे जो गीताको पढता रहै सो निश्चय वैकुंठको जाताहै ॥ २२ ॥ देवकीनंदनः कृष्णो गीतापाठेन तुष्यति ॥ यथा न वेदैर्दानैश्च यज्ञतीर्थव्रतादिभिः ॥ २३॥ जैसे श्रीदेवकीनंदन कृष्ण गीतापाठसे संतुष्ट होते हैं। तैसे वेद- पाठ, दान, यज्ञ, तीर्थ और व्रतादिकोंसे नहीं संतुष्ट होते हैं ॥२३॥ गीताऽधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा ॥ तेन वेदाश्च शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः॥२४॥ जिनने भक्तिभावपूर्वक चित्त लगायक गीताका अध्ययन किया उसने सर्व वेद, शास्त्र और पुराणभी पढचुका ॥२४॥ योगिस्थाने सिद्धपीठेशिष्टाग्रे सत्सभासु च ॥ + .. (१०) गीतामाहात्म्य । यज्ञे च विष्णुभक्ताग्रे पठन्याति परां गतिम् ॥२५॥ योगीके स्थान में. सिंधोग्नी रनगारि रिछपीठमे, श्रेष्ठपुरुषके समुख, साधुसभामें, यज्ञमें और विष्णुभक्तके संमुख पाठ करनेसे मोक्ष पावेगा ॥२५॥ गीतापाठश्रवण के यः करोति दिने दिने॥ क्रतवो वाजिमेधाद्याः कृतास्तेन सदक्षिणाः ॥ २६ ॥ जो दिनदिन प्रति गीताका पाठ और श्रवण करता है तिसने सब भनिष्टोमादिक और अश्वमेधादिक दक्षिणासहित यज्ञ करचुका ॥२६॥ यः शृणोति च गीता कीर्तयेच्च स्वयं पुमान् ॥ श्रावयेच्च परार्थं वै स प्रयाति परं पदम् ॥ २७॥ जो गीताका अर्थ सुनै और आप कहै दूसरोंको श्रवण करावे सो परमपदको प्राप्त होताहै ॥२७ ।। गीतायाः पुस्तकं नित्यं योऽर्चयत्येव सादरम् ॥ विधिना भक्तिभावेन तस्य पुण्यफलं शृणु ॥२८॥ जो आदरपूर्वक नित्य गीताके पुस्तकको विधिपूर्वक भक्तिभा- वसंयुक्त पूजेगा उसके पुण्यका फल सुनो ॥२८॥ सकला चोर्वरा तेन दत्ता यज्ञे भवत्किल ॥ व्रतानि सर्वतीर्थानि दानानि सुवहून्यपि ॥ २९ ॥ उस गीताके पूजनेवालेने यज्ञमें सर्व पृथ्वी दान देचुका तथा सर्वव्रत, सर्वतीर्थ और बहुतसे दानभी देचुका ॥२९॥ भृतप्रेतपिशाचाद्यास्तत्र नो प्रविशति वै ॥ ऑभेचारोद्भवं दुःखं परेणापि कृतं च यत् ॥३०॥ जिस परमें गीताका पूजन होता है तहां भूत, प्रेत, पिशाचादिक पूजन है तहां दैहिक, दैविक और भौतिक भाषाटीकासमेत। (११) और दूसरेके कियेभये मंत्रयंत्रादिक अभिचारज दुःखभी नहीं प्रवेश कर सकते हैं।॥ २४॥ नोपसर्पन्ति तत्रैव यत्र गीताचन गृह ।। तापत्रयोद्भवा पीडा नैव व्याधिभयं तथा ॥ ३१ ॥ इन तीनों तापोंकी पीडा और गेगकृतपीडाभी नहीं होती है ॥ ३१॥ न शापौ नैव पापं च दुर्गतिर्न च किंचन ॥ देहेऽरयः षडेते वै न बाधते कदाचन ॥ ३२॥ वहां कोईका शाप और पाप और दुर्गति तथा देहमें रहे जो पांच ज्ञानेंद्रिय, एक मन ऐसे छः शत्रु वेभी पीडा नहीं करते हैं ॥ ३२॥ भगवत्परमेशाने भक्तिरव्यभिचारिणी॥ जायते सततं तत्र यत्र गीताभिनंदनम् ॥ ३३ ॥ जहां गीताके अर्थका निरंतर विनोद होता है तहां भगवान्में अतिउत्तम अखंडभक्ति उत्पन्न होती है ॥३३॥ प्रारब्धं भजमानोऽपि गीतास्यासे सदा रतः ॥ स मुक्तः स सुखी लोके कर्मणा नैववध्यते ॥३४॥ जो सर्वकाल गीताहीके अभ्यासमें निरत है वह प्रारब्धवशसे संसारभी भोगता है, तोभी वह मुक्त और सुखी है, तथा कर्मसेभी बँधनेका नहीं ॥३४॥ महापापादिपापानि गीताऽध्यायी करोति चेत् ॥ न किंचित्स्टशते तं तु पद्मपत्रमिवांभसा ॥ ३५॥ जो नित्य गीताका श्रवण, पठन, मनन करता होय और वह देव- Che.
(१२)
गीतामाहात्म्य ।
योगसे जो भूलमें ब्रह्महत्यादिक महापापभी करे तो भी जलकरके
कमलपत्रवत् लिप्त नहीं होता है ॥३॥
माता या याद वाऽस्नातः शुचिर्वा यदि वाऽशुचिः॥
विभूतिं विश्वरूपञ्च संस्मरन्सर्वदा शुचिः॥३६॥
स्नान किये होय अथवा न किये होय, पवित्र होय अथवा अप-
वित्र होय, विभूतियोग और विश्वरूपदर्शन अध्यायको पढताभया
सदा पवित्र होता है ॥३६॥
अनाचारोद्भवं पापमवाच्यादिकृतं च यत् ॥
अभक्ष्यभक्षजं दोषमस्टश्यस्पर्शजं तथा ॥ ३७॥
ज्ञाताज्ञातकृतं नित्यमिंद्रियैर्जनितं च यत् ॥
तत्सर्वं नाशमायाति गीतापाठेन तत्क्षणात् ॥ ३८॥
जो अनाचारसे और जो निंदितशब्द बोलनेसे, जो अभक्ष्यभक्ष-
णसे जो न छूने योग्यके छूनेसे, पापं भये हों; तथा जो जान और
मजानमें नित्य पाप भयेहों और जो इंद्रियोंसे पाप भया हो सो सर्व
गीतापाठसे तत्काल नष्ट होता है ॥३७॥ ३८॥
सर्वत्र प्रतिभोक्ता च प्रतिग्राही च सर्वशः ॥
गीतापाठं प्रकुर्वाणो न लिप्येत कदाचन ॥ ३९ ॥
जो सर्वत्र भोजन करता हो सर्वप्रतिग्रह लेताहो उसके भी
पापों करके गीतापाठसे लिप्त नहीं होता है ॥ ३९ ॥
रत्नपूर्णी सहीं सर्वो प्रगृह्यापिविधानतः ॥
गीतापाठेन वैकेन शुद्धः स्फटिकवत्सदा ॥ ४० ॥
विधिहीन रत्नपूरित पृथिवीका दानभी लेके एक गीतापाठसे
शुद्ध स्फटिकमणिवत् निष्पाप होताहै ॥ ४० ॥
भाषाटीकासमेत।
(१३)
ययातःकरणं नित्यं गीतायां रमते सदा ॥
सर्वाग्निकः सदाजापी क्रियावान्स च पंडितः॥४१ ॥
जिसका अंतःकरण सदा गीतामें रमता हो सो सर्वअग्निहोत्री,
सदा जप करनेवाला, सो क्रियावान और सोई पंडित है ॥४१॥
दर्शनीयः स धनवान्स योगी ज्ञानवानपि ॥
स एव याज्ञिको ध्यानी सर्ववेदार्थदर्शकः॥४२॥
सौई दर्शनयोग्य है, सोई धनवान, सोई योगी, सोई ज्ञानवान, सोई
याज्ञिक, सोई ध्यानी और सोई सर्ववेदोंके अर्थका देखनेवालाहै ॥४२॥
गीतायाः पुस्तकं यत्र नित्यं पाठे प्रवर्त्तते ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि प्रयागादीनि भूतले ॥ ४३ ।।
गीताका पुस्तक जहां नित्य पाठमें प्रवत हो तहाँ पृथिवी-
परके सर्व प्रयागादितीर्थ सदा रहते हैं ॥४३॥
निवसति सदा गेहे देहदेशे सदैव हि ॥
सर्वे देवाश्च ऋषयो योगिनः पन्नगाश्च ये ॥ ४४ ॥
और यहाँ घरमें और देहमें भी सर्व देव, ऋषि, योगी और पन्नगभी
सदा वसते हैं।॥४४॥
गोपालबालकृष्णोपि नारदध्रुवपार्षदैः॥
सहायो जायते शीघ्रं यत्र गीता प्रवर्तते ॥४५॥
जहां गीता प्रवृत्त होती है तहां नारद, ध्रुव और सर्व पार्षदनस-
हित गोपाल-बालकृष्ण शीघ्रही सहाय होते हैं ॥१५॥
यत्र गीताविचारश्च पठन पाठनं तथा ॥
तत्राहं निश्चितं पार्थ निवसामि सदैव हि ॥ ४६ ॥
.
"
(१४)
गीतामाहात्म्य ।
श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहते हैं कि, हे पार्थ ! जहां नित्य गीताका
विचार होता है, तहां मैं निश्चय सर्वदा रहता हूं ॥४६॥
गीता मे हृदयं पार्थ गीता मे सारउत्तमः ॥
गीता मे ज्ञानमत्ययं गीता मे ज्ञानमक्षयम् ॥४७॥
हे अर्जुन ! गीता मेरा हृदय है, गीता मेरा उत्तम सार है, गीता
मेरा अतिअग्रज्ञान और अक्षयज्ञानभी है ॥ ४७॥
गीता मे चोत्तमं स्थानं गीता मे परमं गृहम् ॥
गीताज्ञानं समाश्रित्य त्रिलोकी पालयाम्यहम् ॥४८॥
गीता मेरा उत्तमस्थान है और गीता मेरा उत्तम सार है, गीता-
के ज्ञानको धारण किये भये तीनों लोकोंका पालता हूं॥४८॥
गीता मे परमा विद्या ब्रह्मरूपा न संशयः ॥
अर्द्धमात्राक्षरा नित्या त्वनिर्वाच्यपदात्मिका॥४९॥
गीता मेरी उत्तम विद्या है, गीता ब्रह्मरूप है, इसमें संशय नहीं
अर्द्धमात्रा, नाशरहित, सनातन, अनिर्वाच्यपदरूप ऐसी परावाणी-
रूप मेरी यह गीता है ॥४९॥
गीतानामानि वक्ष्यामि गुह्यानि शृणु पांडव ॥
कीर्तनात्सर्वपापानि विलयं यांति तत्क्षणात् ॥ ५० ॥
हे पांडव ! गीताके जो गुप्त नाम हैं सो मैं तुमसे कहता हूं
जिनके कीर्तनसे तत्काल सर्वपापक्षय होते हैं ॥५०॥
अथ गीतानामानि ।
गीता गंगा च गायत्री सीता सत्या सरस्वती ॥
ब्रह्मविद्या ब्रह्मवल्ली त्रिसंध्या मुक्तगेहिनी ॥ ५१ ॥
पदम ॥५३॥
भाषाटीकासमेत ।
अर्द्धमात्रा चिदानंदा भवघ्नी भयनाशिनी ॥
वेदत्रयी पराऽनंता तत्त्वार्थज्ञानमञ्जरी ॥५२ ॥
इत्येतानि जपन्नित्यं नरो निश्चलमानसः॥
अब गीताके नाम कहते हैं-गीता १ गंगा २ गायत्री ३ सीता
सत्या ५ सरस्वती ६ ब्रह्मविद्या ७ ब्रह्मवल्ली ८ त्रिसंध्या ९ मुक्तगहि-
नी १० अर्द्धमात्रा ११ चिदानंदा १२ भवनी १३ भयनाशिनी १४
वेदत्रयी १५ परा १६ अनंता १७ तत्त्वार्थज्ञानमंजरी ॥ १८॥५१॥
॥५२॥ गीताके इन अठारह नामनको नित्य मन स्थिर करके
जपता रहै तो शीघ्रही ज्ञानसिद्धिको प्राप्त होके, अंतमें मोक्षको
प्राप्त होताहै ॥५३॥
पाठेऽसमर्थः संपूर्णे तदई पाठमाचरेत् ॥
तदा गोदानजं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥ ५४॥
जो संपूर्ण पाठ न करसके तो आधीगीताका याने नव अध्यायन-
का पाठ करे, तो एक गोदानका पुण्य पावै। इसमें संशय नहीं॥५४॥
षडंशं जपमानस्तु गंगास्नानफलं लभेत् ॥
त्रिभागं पठमानस्तु सोमयागफलं लभेत् ॥ ५५ ॥
छठे अंशको याने तीन अध्यायोंका नित्य पाठ करै तो गंगास्ना-
नका फल पावै. तीसरे भागका याने छः अध्यायनका नित्य पाठ
करनेसे सोमयागका फल पावै ॥५५॥
तथाऽध्यायद्वयं नित्यं पठमानो निरंतरम् ॥
इंद्रलोकमवाप्नोति कल्पमेकं वसेद्धवम् ॥ ५६ ॥
दो अध्यायोंका नित्य पाठ करता रहै तो इंद्रलोकको प्राप्त
होके, वहां एककल्प वास करै ॥५६॥
(१६)
गीतामाहात्म्य ।
एकमध्यायकं नित्यं पठते भक्तिसंयुतः ॥
रुद्रलोकमवाप्नोति गणो भूत्वा वसच्चिरम् ॥५७ ॥
जो एकही अध्यायका निरंतर नेमसे भक्तिपूर्वक पाठ करतारहै
तो रुद्रलोकको प्राप्त होके वहां शंकरका गण होके, बहुतकाल-
पर्यंत याने कल्पपर्यंत रहिके मुक्त होताहै ॥१७॥
अध्यायाई च पादं वा नित्यं यः पठते जनः ॥
स प्राप्नोति खेलोकं मन्वंतरशतं समाः॥५८॥
जो मनुष्य गीताका आधा अथवा पाव अध्यायकाभी नित्यने-
मसे पाठ करता रहै, तो वह सूर्यलोकमें सौ मन्वंतरके वर्षांपर्यंत
वास करै ॥२८॥
गीतायाः श्लोकदशकं सप्त पंच चतुष्टयम् ॥
त्रिकद्रिकैकमर्द्ध वा श्लोकानां च पठेन्नरः॥
चंद्रलोकमवाप्नोति वर्षाणामयुतायुतम् ॥५९ ॥
जो गीताके दशश्लोक अथवा सात पांच चार तीन दो एक
अथवा आधे श्लोककाभी निरंतर पठन करै, तो अयुतायुतवर्ष याने
दशकोटिवर्प १०,००,००,००० चंद्रलोकमें वास करेगा ॥ ५९
गीतार्थमेककालेपि श्लोकमध्यायमेव च ॥
स्मरस्त्यक्त्वा जनो देहं प्रयाति परमं पदम् ॥ ६ ॥
जो एककालभी गीताके एकश्लोकका अथवा अध्यायका अर्थ
स्मरताभया देहको त्यागै तो मोक्षको पावै ॥६० ॥
गीतार्थ वापि पाठं वा शृणुयादतकालतः॥
महापातकयुक्तोपि मुक्तिभागी भवेज्जनः ॥६१ ॥
भाषाटीकासमेत ।
(१७.)
जो अंतकालके 'समयमें गीताका अर्थ अथवा पाठ सुनता देह
त्यागै, तो महापातकीभी मुक्त होय ॥६॥
गीतापुस्तकसंयुक्तः प्राणांस्त्यक्त्वा प्रयाति यः॥
स वैकुंठमवाप्नोति विष्णुना सह मोदते ॥६२॥
जो गीताके पुस्तकयुक्त प्राणोंको त्यागे, सो विष्णुलोकको
प्राप्त होके विष्णुके समीप आनंद कर ॥ ६२ ॥
गीताध्यायसमायुक्तो मृतो मानुषतां ब्रजेत्॥
गीताभ्यासं पुनः कृत्वा लभते मुक्तिमुत्तमाम् ॥६३॥
जो मरणसमयमें गीतापुस्तकका एक अध्याय भी समीप होय.
तो मनुष्यजन्म पायके फिर गीताभ्यास करके मुक्त होय ॥ ६३ ॥
गीतोच्चारणसंयुक्तो प्रियमाणो गतिं लभेत् ॥
यद्यत्कर्म च सर्वत्र गीतापाठं प्रकीर्तयेत् ॥
तत्तत्कर्म च निर्दोष कृत्वा पूर्णमवाप्नुयात् ॥६४॥
मरनेपरभी जो गीता ऐला उच्चारण करके मरे तो भी मुक्त होय
जो जो कर्म करै उस उसमें गीतापाठ करे तो निदोषकर्मका
संपूर्ण फल पावे ॥ ६४॥
पितृनुद्दिश्य यः श्राद्धे गीतापाठं करोति वै ॥
संतुष्टाः पितरस्तस्य निरयाद्यांति सदतिम् ॥६५॥
जो श्राद्धमें पितरनके निमित्त गीताका पाठ करे तो वे पितर
संतुष्ट भयेहुये नरकसे मुक्तिको जाँय ॥ ६ ॥
गीतापाठे तु संतुष्टाः पितरः श्राद्धतर्पिताः॥
पितृलोकं प्रयांत्येव पुत्राशीर्वादतत्पराः ॥ ६६ ॥
गीतापाठसे प्रसन्न पितर पुत्रको आशीर्वाद देतेभये पितृलोकको
जाते हैं ॥६६॥
(१८)
गीतामाहात्म्य ।
लिखित्वा धारयेत्कंठे बाहुदंडे च मस्तके ॥
नश्यंत्युपद्रवाः सर्वे विघ्नरूपाश्च दारुणाः ॥ ६७ ॥
गीताको लिखके गलेमें, भुजापर अथवा मस्तकमें धारण करे
तो उसके विघ्नरूप दारुण उपद्रव नाश होय ॥६७ ॥
गीतापुस्तकदानं च धेनुपुच्छसमन्वितम् ॥
दत्वातत्सद्विजे सम्यकृतार्थों जायते जनः॥६८॥
गोदान देनेपर गाईकी पूंछसहित हाथमें गीताका पुस्तक लेके
जिसने दान दिया वह सर्व करचुका ॥ ६८॥
पुस्तकं हेमसंयुक्तं गीतायाः शुद्धमानसः ॥
दत्वा विप्राय विदुषे जायते न पुनर्भवे ॥६९॥
सुवर्णसंयुक्त गीतापुस्तकका दान जो शुद्धमनसे विद्वान् ब्राह्मण-
को देय, सो फिर जन्म न पावै ।। ६९॥
शतपुस्तकदानं च गीतायाः प्रकरोति यः॥
सयाति ब्रह्मसदनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥ ७० ॥
जो गीताके सौ पुस्तकोंका दान करे, तो जिसलोकसे फिर
इहां नहीं जन्मता है। उस वैकुंठको जाता है ॥ ७० ॥
गीतादानप्रभावेण सप्तकल्पावधीः समाः ॥
विष्णुलोकमवाप्नोति विष्णुना सह मोदते ॥७१ ॥
गीतादानके प्रभावसे विष्णुलोकमें सात कल्पपर्यंत विष्णुसंयुत
रहके आनंद करे ।। ७१ ॥
सम्यक् श्रुत्वा च गीतार्थ पुस्तकं यः प्रदापयेत् ॥
तस्मै प्रीतोस्मि भगवान्ददामि मनसेप्सितम् ॥ ७२ ॥
भाषाटीकासमेत। (१९) श्रीकृष्ण कहते हैं कि, जो गीताका अर्थ सुनिके पुस्तकका दान करे, उसको मनवांछित फल देता हूं॥७२॥ देहं मानुषमाश्रित्य चातुर्वण्र्येषु भारत ॥ न शृणो- ति पठत्येव गीताममृतरूपिणीम्॥७३॥ हस्तात्त्य- क्त्वाऽमृतं प्राप्तं कष्टात्क्ष्वेडं समश्नुते ॥ पीला गी- तामृतं लोके लब्ध्वा मोक्षं सुखी भवेत् ॥ ॥७४॥ जो मनुष्य देह पाइके इस अमृतरूपिणी गीताको नहीं पढताहै और नहीं सुनता है सो हाथमें आयेभये अमृतको त्यागके विषको कष्टसे पीता है। इस गीतारूप अमृतका पान करके मोक्षको प्राप्त होके सुखी होता है॥७३॥७४॥ जनैः संसारदुःखाञीताज्ञानं च यैःश्रुतम् ॥ संप्राप्तममृतं तैश्च गतास्ते सदनं हरेः ॥ ७५ ॥ संसारदुःखकरके पीडित जिन मनुष्योंने इस गीताके ज्ञानको सुनावे अमृत होके विष्णुलोकको प्राप्त भये ॥..७५ ॥ गीतामाश्रित्य बहवो भूभुजो जनकादयः॥ निधूतकल्मषा लोके गतास्ते परमं पदम् ॥ ७६ ॥ इस गीताका आश्रय करके, बहुतसे जनकादिक राजा पापरहित होके परमपदको गये हैं। ७६॥ गीतासु न विशेषोस्ति जनेषूच्चावचेषु च ॥ ज्ञानेष्वेव समग्रेषु समा ब्रह्मस्वरूणी ॥ ७७ ॥ गीतामें नीच ऊंचका विशेष नहीं, आत्मा सबमें; समान है। इससे यह ब्रह्मस्वरूपिणी है ॥७७॥ योभ्यसूयति गीतां च निंदा वा प्रकरोति च ॥ ..
(२०) गीतामाहात्म्य । प्राप्नोति नरकं घोरं यावदाभूतसंल्लवम् ॥ ७८ ॥ जा गीताकी ईपी और निंदा करता है सो प्रलयपर्यंत नरकमें रहता है ॥ ७८॥ अहंकारेण सूढात्मा गीतार्थ नैव मन्यते ॥ कुंभीपाके स पच्येत यावत्कल्पलयो भवेत् ॥ ७९ ॥ जो अहंकारसे गीताके अर्थको नहीं मानता है, सो प्रलयका- लपर्यंत कुंभीपाक नरक में पचता है ॥ ७९ ॥ गीतार्थं वाच्यमानं यो न शृणोति समीपतः ॥ श्वसूकरभवां योनिमनेकां सोऽधिगच्छति ॥ ८०॥ जो गीता बचतीभईको नजदीक जाके नहीं सुनता है. सो कुत्ता और सवरके अनेक जन्म पाता है ॥८॥ चौर्यं कृत्वा च गीतायाः पुस्तकं यः समानयेत् ॥ न तस्य स्यात्फलं किंचित्पठनं च वृथा भवेत्॥८१॥ जो गीताके पुस्तक चोरीसे लाइके उसपर पाठ करे तो उसको पाठका फल तो नहीं मिले और वृथा परिश्रम होता है ॥८॥ यःश्रुत्वा नैव गीतार्थ मोदते परमादरात् ॥ नैवानोति फलं लोके प्रमादाच्च वृथा श्रमम् ॥ ८२ ॥ जो गीताके अर्थको सुनके अतिआदरसे आनंद नहीं पाता है उसको फल नहीं मिलता है वह प्रमादसे वृथा होता है। ८२॥ गीतां श्रुत्वा हिरण्यं च पट्टांवरसुवेष्टनम् ॥ निवेदयेच तवेष्टय प्रीतये परमात्मनः॥ ८३ ॥ गीताको सुनके सुवर्ण और रेशमी वस्त्र पुस्तक लपेटनेका उस पर लपटिक परमात्माकी प्रीतिके वास्ते बाँचनेवालेको देना॥८३॥ -- भाषाटीकासमेत। (२१) वाचकं पूजयेद्भत्तया द्रव्यवस्वाशुपस्करैः। अन्नैर्बहुविधैः प्रीत्या तुष्यतां भगवानिति ॥ ८४ ॥ द्रव्य, वस्त्र, आभूषणादिकोंकरके वक्ताका पूजन करके नाना- प्रकारके अन्न देना कि, भगवान प्रसन्न होवे, इस बुद्धिसे देना ॥८४॥ माहात्म्यमेतद्गीतायाः कृष्णप्रोक्तं सनातनम् ॥ गीतांते पठते यस्तु यथोक्तं फलमाप्नुयात् ॥ ८॥ यह श्रीकृष्णका कहाभया सनातन गीताका माहात्म्य इसके गीतापाठके अंतमें पड़े तो यथोक्त फल पावै ॥ ८५ ॥ गीतायाः पठनं कृत्वा माहात्म्यं नैव यः पठेत् ॥ वृथा पाठफलं तस्य श्रम एव हि केवलम् ॥ ८६ ॥ गीतापाठ करके माहात्म्यको न बाँचै तो उसके पाठ करनेका श्रम वृथाही है. पाठका फल नहीं पाताहै ॥ ८६॥ एतन्माहात्म्यसंयुक्तं गीतापाठं करोति यः ॥ श्रद्धया यः शृणोत्येव दुर्लभां गतिमाप्नुयात् ॥ ८७॥ जो इस माहात्म्यके संयुक्त गीतापाठ करेगा अथवा सुनेगा सो दुर्लभ मोक्षपदको पावेगा ॥ ८७॥ श्रुत्वा पठित्वा गीतां च माहात्म्यं यः शृणोति वै ॥ तस्य पुण्यफलं लोकेभवेद्धि मनसेप्सितम् ॥ ८८ ॥ -- गीतामाहात्म्य । जो गीताको सुनके और पढके माहात्म्यको पढते सुनते हैं। मनइच्छित फलको पावते हैं। ८८॥ इति श्रीमद्वाराहपुराणे सूतशौनकसंवादे श्रीकृष्ण- प्रोक्तं श्रीमद्भगवद्गीतामाहात्म्यं संपूर्णम् । इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता श्रीमद्भगवद्गीतामाहात्म्यचंद्रिकाव्याख्या समाप्तिमगात् ॥ ॥श्रीकृष्णार्पणमस्तु॥ ॥ शुभं भवतु ॥ आपका-खेमराज श्रीकृष्णदास, 'श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस, खेतवाड़ी-चंबई.
भीगणेशाय नमः। श्रीमद्भगवद्गीता। सान्वय-अमृततरंगिणीभाषाटीकासमेता श्रीर्जयति। प्रणम्य परमात्मानं कृष्णं रामानुजं गुरुम् ॥ गीताव्याख्यामहं कुर्वे गीतामृततरंगिणीम् ॥ १॥ धृतराष्ट्र उवाच। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सर्वः॥ मामकाः पांडवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ १ जब श्रीकुरुक्षेत्रमें दुर्योधनादिक धृतराष्ट्रके पुत्र और युधिष्ठिरा- दिक पांडुके पुत्र आपआपकी सेनाओंको लेके युद्धके वास्ते तयार भये तब यहां हस्तिनापुरमें धृतराष्ट्र संजयसे पूछने लगे कि, हे संजय ! धर्मस्थल कुरुक्षेत्रमें युद्धकी इच्छा कियेभये इकट्ठे भयेहुये मेरे पुत्र और पांडके पुत्र ये निश्चयकरके क्यों करनेको प्रारंभ करते भये सो कहो॥१॥ संजय उवाच। दृष्ट्वा तु पांडवानीकं व्यूँढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥२॥ ऐसे धृतराष्ट्रके वाक्य सुनिके संजय कहते भये कि, हे राजन् ! राजा दुर्योधने तबैव्यूहरचनायुक्त पांडवनकी सेनाको देखके और द्रोणा- चार्यके समीपं जाके वचन बोलतेभये ॥२॥ पश्यैती पांडुपुत्राणामाचार्य महेती चमूम् ॥ व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३ (४) भगवदगीता। [अध्याय:- हे आचार्य ! जो तुम्हारी बुद्धिमान् शिष्यं हुपदका पुत्र धृष्ट- घुन्न तिसकरके यथायोग्यस्थानोंपर स्थापित पांडुपुत्रोंकी इस सर्वो- त्तम सेनीको आप देखो ॥३॥ अंत्र शूरां महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ॥ युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥ इससेना में जो युद्धकरनेमें भीम अर्जुनके समान बडे धनुषधारी शूरं हैं वे ये कि, युयुधान और विराट और महारथी द्रुपद ॥ ४॥ धृष्टकेतुश्चेकितानः काशीराजश्च वीर्यवान् ॥ पुरुजित्कुंतिभोजश्च शैब्यश्च नरपुंगवः ॥५॥ धृष्टकेतु चेकितान और बलवान् काशीका रोजा तथा पुरुजित और कुंतिभोज और नरोंमें श्रेष्टं शैव्य ॥५॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।। सौभंद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व ऎव महारथाः॥६॥ पराक्रमी और उत्तमशक्तिवाला और धीरजवान ऐसा युधामन्यु सुभद्राका पुत्र आभिमन्यु और महास्थवाले संवही" द्रौपदीके पुत्र जिसमें हैं इसप्रकार पांडवोंकी सेना रची है ॥६॥ अस्माकं तुं विशिष्टाय तान्निबोधैं द्विजोत्तम ॥ नायका मम सैन्यस्य संज्ञार्थ तान्छवीमि ते ॥७॥ है द्विजोत्तम ! हमारेनमें जो श्रेष्ट और हमारी सेनाके पति हैं उनको जाननेके वास्ते तुहारसे कहता हूं तिन्होंको जानो ॥७॥ भवान् भीष्मंश्च कर्णश्च कृपंच समितिजयः॥ अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ ८ ॥ जो हमारी सेनामें सुख्य हैं उनमें एक आप दो और भीष्म और कर्ण
प्रथमः १.] साल्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (२५)
और संग्रामके जीतनेवाले कृपाचार्य अश्वत्थामा और विकर्ण
और तैसा ही राजा सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा ॥ ८ ॥
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ॥
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९॥
और मेरेवास्ते जीवितकोत्यांगनेवाले और नानाशस्त्रोंके प्रहारकर-
नेवाले और भी सर्व युद्धचतुर ऐसे बहुत शूर हैं ॥९॥
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ॥
पर्याप्तं विद॑मेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ १० ॥
हमारी सेनौ भीष्मकरके रक्षित है तिससे असमर्थ है और इनकी
यह सेना भीमकरके रक्षित है इससे बलिष्ठ है. तात्पर्य यह है कि, भीष्म
उभयपक्षपाती हैं॥ १०॥
अयनेषु चे सर्वेषु यथाभांगमवंस्थिताः॥
भीष्ममेवाभिरक्षतु भवंतः सर्वएव हि ॥ ११ ॥
इससे सवै नाकेनपर यर्थीयोग्य भागबनायेभये खड़े रहके तुर्म
संबही निश्चयकरके भीष्मका ही संरक्षण करो ॥ ११॥
तस्यं संजनर्यन्हर्ष कुरुवृद्धः पितामहः ॥
सिहँनादं विनद्योञ्चशंखं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १२ ॥
ऐसे सुनके बडेप्रतापवान् कौरवनमें वृद्ध पितामह भीष्म उस दु-
योधनको हर्ष उत्पन्नकरनेवाले ऊंचेस्वरसे सिंहनादसे गर्जनाके
र शंखको बजातेभये ॥१२॥
ततः शंखांश्चै भेर्यश्च पणानकगोमुखाः ॥
सहसैवाभ्यहन्यंत संशब्दस्तुमलोऽभवत् ॥ १३ ॥
भगवद्गीता।
[अध्याय:--
तवे शंख और भैरी और तासे नगारे रणसिंहे एकसंग होवनतेभये
"सो शब्दै मिश्रितभारी होताभयौ ॥ १३ ॥
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यंदने स्थितौ ॥
माधवः पांडवश्चैव दिव्यौ शंखौ पँदध्मतुः ॥ १४ ॥
तबै जिसमें श्वेतं घोड़े जोडे हैं ऐसे श्रेष्टे रथपर बैठेभये कृष्ण और
अर्जुन दिव्य शंखोंको वनौतेभये ॥ १४॥
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनंजयः॥
पौंडूं दध्मौ महाँशंखं भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥
तहां श्रीकृष्ण पांचजन्यको, अर्जुन देवदत्तको, भयंकर है कर्म
जिसका ऐसा वृकोदर याने तीक्ष्णाग्निउदरवालाअर्थात् भीम पौंडूनॉमक
महाँशंखको बजातेभये ॥५॥
अनंतविजयं राजा कुंतीपुत्रो युधिष्ठिरः॥
नकुलः सहदेव मुघोषमणिपुष्पकौ ॥ १६ ॥
कुंतीका पुत्र राजा युधिष्ठिर अनंतविजयशंखको, नकुल और
संहदेव सुघोप और पुष्पक खोंको, क्रमसे बजातेभये गाने नकुल
सुघोपको और सहदेव मणिपुष्पको वजातेभये ॥ १६॥
कांश्यश्च परमेष्वासः शिखंडी च महारथः ।।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥१७॥
श्रेष्टधनुपवाला काशीका रोजा और महारथ शिखंडी और धृष्टद्युम्न
और विरोट और शत्रुनकरिके अजित सात्यकि यादव ॥ १७ ॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः टथिवीपते ॥
सौभद्रश्चं महाबाहुः शंखाँन्दध्मुः पृथक्टक् ॥१८॥
प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (२७)
हे पृथ्वीनाथ ! राजाद्रुपंद और सर्व द्रौपदीके पुत्र और महाबाहु
अभिमन्यु ये न्यारे न्यारे शंखों को बजातेभये ॥१८॥
सं घोषो धार्तर्राष्ट्राणां हृदयानि व्यदौरयत् ॥
नभश्च मृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥ १९ ॥
सो मिश्रित ऐसा बैडा शन्दै आकोश और पृथिवीको शन्दायमा
न करनेवालाधृतर्राष्ट्रके पुत्रोंके हृदयोंको ही विदीर्णकरताभया॥१९॥
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः॥
प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुषम्य पार्डवः ॥ २० ॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ॥
सेनयोरुभैयोर्मध्ये रैथं स्थापय में ऽच्युत ॥ २१ ॥
हे महीपते। तवे शस्त्रपात प्रवृत्तहोने के समय में कपिध्वज पांडव अर्जुन
तुम्हारे पुत्रोंको युद्धार्थ खंडे देखके तव धनुषको ऊंचाकरके श्रीकृ-
ष्णसे ये वाक्य बोलतेभये कि, हे अच्युता दोनों सेनाओंके मध्य में
मेरे रथको स्थापितकरो॥ २० ॥ २१ ॥
योवदेतानिरीक्षेऽहं योद्धंकामानवस्थितान् ॥
कैमया सह योद्धव्यमस्मिन्त्रणसमुद्यमे ॥ २२ ॥
मैं प्रथम इन युइच्छावाले खडेभयेनको देखूगां कि, इस
रणखेतमें मेरे साथ कौनकरके युद्धकरना योग्य है ॥ २२ ॥
योत्स्येमानानवेक्षेह य एतेऽ समागताः॥
धार्तराष्ट्रस्य दुबुद्धेयुद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ २३ ॥
जो ये जितने दुद्धि धृतराष्ट्रपुत्रके युद्ध में प्रियइच्छनेवाले यहां
इकडे भयेहैं इन युद्धकरनेवालोंको में देगी ॥२३॥
(२८)
भगवद्गीता।
[ अध्यायः-
संजय उवाच ।
एवर्मुक्तो हपीकेशो गुडाकेशेल भारतं ॥
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां चे महीक्षिताम् ॥
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति ॥ २५॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि भारत ! अर्जुनकरके ऐसे कहेभये
श्रीकृष्णं दोनों सेनाओंके वीमें श्रेष्ठस्थेको स्थापितकरके भीष्म
और द्रोणाचार्यके सामने और सर्व राजाओंके सामने इसप्रकार बोले-
तेभये किहे पार्थ ये इकडेभये जो कुरुवंशी तिनको देखौ ॥२४॥२५॥
तंत्राऽपश्यस्थितान्पार्थः पितॄनथं पितामहान् ॥
आचार्यान्मातुलान्धातन्पुत्रान्पौत्रीन्सवींस्तथा ॥
विशुरान्सुहृद श्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौंतेयः सर्वान्बंधूनवस्थितान् ।।
कृपयाँ परयाविष्टो विषीदैनिदमत्रवीत् ॥२६॥२७॥
श्रीकृष्णजीके कहनेपर अर्जुन उस रणमें खडेहुए पित (पिता-
सहशभूरिश्रवादिक काका) पितामह (भीष्म सोमदत्तादिक ) आचाँ-
र्य (द्रोणाचार्यादिक ) मामाँ ( शकुनिशल्यादिक ) भ्राता ( दुर्योधना-
दिक) पुत्र (द्रौपदीमें पांचों से भये जो पांच) पौत्र ( लक्ष्मणादिकोंके
पुत्र) तथा सखों (अश्वत्थामा जयद्रथादिक) ससुर (द्रुपदादिक) और
सुहृद (कृतवर्मादिक)इनको देखतेभये ऐसे दोनों सेनाओंमें भी उन
सर्व बंधुनको खडे देखि के सो बुतीपुत्र अर्जुन अति कृपांकरके
व्याप्त खेदित होते होते यह बोलते भये ॥ २६ ॥२७॥
प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। । (२९)
अर्जुन उवाच ।
दृष्ट्वेमं स्वर्जनं कृष्णं युयुत्सुं समुपस्थितम् ।।
सीदति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥२८॥२९॥
अर्जुन कहते हैं कि, हे कृष्ण ! युद्धइच्छावाले खडेभये ईन स्वेज-
नोंको देखिके मेरे गात्र शिथिल होतेहैं और मुख सूखेता है और
मेरे शरीर में कंप और रोमांच होते हैं।॥ २८॥२९॥
गोंडीवं खंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ॥
न च शक्नोम्यवस्थातुंभ्रमतीव च में मनः ॥ ३० ॥
हाथसे गांडीवधनुष गिरीपरता है और त्वचाभी जरीजातीहै और
खंडेहोनेको भी नहीं सकता हूँ और मेरी मन भ्रमतीसरीखाहै॥३०॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ॥
नं चं श्रेयोऽनुं पश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥ ३१ ॥
और हे केशव ! निमित्तभी विपरीत देखता हूँ और संग्राममें वज-
नोंको मारके फिर कल्याणभी नहीं देखताहूं ॥ ३१ ॥
नं काँक्षे विजयं कृष्णं न च राज्यं सुखानि च ॥
किन्नो राज्येन गोविंद किं भोगै जीवित वा ॥६२॥
हे कृष्ण ! विजय और राज्य और सुखं नहीं चाहताहूं. हे गोविंदै !
हमारेको राज्यकरके भोगकरके क्या प्रयोजन ? अथवा जीवनकर भी
क्या प्रयोजन है ॥३२॥
येषाम) कांक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ॥
त इमेवस्तिथा युद्धे प्राणास्त्यत्वा धनानि च ॥ ३३॥
हमको जिनके वास्ते भोग सुख और राज्य चाँहीयेथा वे ये प्राण
और धनोंको त्यागके युद्ध में खड़े हैं ॥ ३३॥
भगवद्तता। [ अध्याय:- औचार्याः पितरः पुत्रोस्तथैव च पितामहाः॥ . मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथी॥३४॥ ये सर्व मेरे आचार्य पितातुल्य काका पुत्र और तैसेही पितामई मामाँ ससुर नातीपोती साले तथा और संबंधी हैं ॥३४॥ एतान्ने हंतुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन ॥ अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥३५॥ हे मधुसूदन ! तीनोंलोकोंके राज्यके वास्ते भी मेरेको ये मारते होयँ तोभी इनको मारनेकी नहीं इच्छाकरताहूं तो पृथिवीके- वास्ते क्यों मारूंगा ॥ ३५॥ निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याँज्जनार्दन ॥ पापमेवी |येदस्मोन्हत्वैतानाततायिनः॥ ३६॥ हेजनार्दन ! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारके हमको क्या प्रसन्नता होयगी इनं आततायिनंको मारके हमको पापही लगेगा ॥ आततायी- लक्षण।।दोहा-अग्निदेइ विपदेइ जो, क्षेत्रदारहरजोइ॥धनहरसन्मुखश- स्त्रकर, आततायिपहोइ ॥ १॥३६॥ तस्मान्नहिी वयं हेतुं धार्तराष्ट्रान्स्ववांधवान् ॥ स्वर्जनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधर्वं ॥३७॥ तिससे कि, इनके मारनेका पाप ही होयगा तिससे हमारे बंधूधृतरा- ट्रके पुत्रोंको मारनेके वास्ते हम नहीं योग्य हैं हे माधव ! निश्चयपूर्वक स्वजनोंको मारके कैसे मुंखी होयंगे" ॥३७॥ याप्येते न पश्यति लोभोपहतचेतसः ॥ कुलक्षयकृतं दोपं मि–दोहे चं पातकम् ॥ कर न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मॉनिवर्तितम् ॥
प्रथमः १.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (३१) कुलक्षयकृतं दोषं पश्यद्भिर्जनार्दन ॥ ३८॥ ३९ ॥ हे जनार्दन ! लोभकरके जिनके चित्त भ्रष्ट भयेहैं ऐसे ये दुर्योधना- दिक कुलक्षयकरनेके दोषको और मित्रद्रोहमें पापको यद्यपि नहीं देखते हैं नहीं जानतेहैं तोभी कुलक्षयकृत दोषको देखतेभये हम- करके इस पापसे निवृत्त होनेके वास्ते कैसे न जाननाचाहिये ॥३९॥ कुलक्षये प्रणश्यति कुलधर्माःसनातनाः॥ धर्मे नष्टे कुल कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥४०॥ कुलके क्षयहोनेसे सनातन कुलके धर्म नाश होतेहैं फिर धर्म नष्ट- होनेसे सर्व कुलको अधर्म जीतलेताहै याने कुलको अप्रतिष्ठित करदेताहै ॥ ४०॥ अधर्माऽभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यंति कुलस्त्रियः ॥ स्त्रीपुं दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥४१॥ हे कृष्ण ! अधर्मकरके कुलको अतिष्ठितहोनेसे कुलकी स्त्रीजन दुष्ट होयगी हे वृष्णिवंशोद्भव । उन दुष्ट स्त्रियनमें वर्णसंकर उत्पन्न होयगा॥४१॥ संकरो नरकायैवं कुलघ्नानां कुलस्य च ॥ पतति पितरो टेषां लुप्तपिंडोदकक्रियाः॥४२॥ जिससे कि, जिनके पितर पिंडोदकक्रिया प्राप्तभयेविना संसारमें पे- डतेहैं और इसीसे कुलघातिनके कुलँको वह वर्णसंकर नरकप्राप्तिही के हेतु उत्पन्न होता है ।। ४२॥ दोषैरे तैः कुलनानां वर्णसंकरकारकैः ॥ उत्सांचंते जांतिधर्माकुलधर्मार्थ शाश्वताः॥४३॥ जो कुलघांती हैं उनके जो ये वर्णसंकरकारक दोष तिनकरके जातिधर्म और सनातन कुलधर्म नष्ट होतेहैं ।। १३ ॥ T - भगवद्गीता। [अध्यायः- उत्सन्नाकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ॥ नरंके नियंतं वांसो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥४४॥ हेजनार्दन! जिनके कुलधर्म नष्ट भये उन मनुष्योंको नरकमें अवश्य वास होताहै ऐसा सुनतहैं ॥४४॥ अहो बैत महत्पापं कर्तुं व्यवसितां वयंम् ॥ यद्राज्यसुखलोभेन हेतु स्वर्जनसुधताः ॥ ४५ ॥ अहो कष्ट ! हगं बडेपॉपको करनेको निश्चयकिये हैं जो राज्यसु- खलोभकरके स्वजनोंको मारनेको उद्योगकियहैं ॥ ४५ ॥ यदि ममिप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः॥ धार्तराष्ट्रा रणे हन्मुस्तन्मे क्षेमतेरं भवेत् ॥ ४६॥ जो हाथमें शस्त्रलियेहुये धृतर्राष्ट्रके पुत्र अशस्त्रको और अप्रतीकार- को याने जो मैं बदला नहीं लेताहूं ऐसे मेरेको रणमें मारेंगे सो मारना भी मेरी अतिकल्याणरूप होयगा ॥ ४६॥ संजय उवाच । एवमुक्त्वाऽर्जुनः संख्ये स्थोपस्थ उपाविशत् ॥ विसृज्य संशरं चापं शोकसंविनमानसः ॥४७॥ राजातराधृष्टसे संजय कहते हैं कि, संग्राममें अर्जुन ऐसे कहके वाणसंयुक्त धनुप डॉरिके शोमव्याकुलमनहुआ भया स्थके पिछाडी जायके रथमें वैटरहतामया ॥४७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविपादयोगोनाम प्रथमोऽध्यायः॥१॥ इति श्रीमत्सुतुलसीतारामात्मनपंडितरघुनाथप्रसादविरचि- तायां गीतामृततरंगिण्यांप्रथमाध्यायप्रवाहः॥१॥ -
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरगिणी भा० टी०
संजय उवाच ।
त तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदंतमिदं वाक्यमुवाच मधुसूंदनः ॥ १ ॥
राजा धृतराष्ट्रसे संजय कहते हैं कि, जो प्रथम अध्यायमें करुणावाक्य
कहे वैसेही कृपाकरके व्याप्त आंसूंनके भरनेसे नेत्र व्याकुल विषाद-
युक्त उस अर्जुनसे मधुसूदँन भगवान् ये वाक्य बोलते भये ॥ १ ॥
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ॥
अनार्यजुष्टमस्वयमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥
जो बोले सो कहतेहैं कि, हे अर्जुन ! जो अनार्यनके सेवनेयोग्य
नरकको लेजानेवाला और अर्पकीर्त्तिका करनेवाला ऐसा यह मोह
तुमको ऐसे विषमस्थलमें कैसे प्राप्तंभया ॥२॥
कैव्यं मां स्मगमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते॥
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्टं परंतपं ॥३॥
हे पृथाके पुत्र! तुम कायरतांको न ग्रहणकरो तुम्हारेमें यह
नहीं योग्य है हे परंतप ! तुच्छ हृदयकी दुर्बलताकारके काय-
रताको छोडि के खडेहोजावो ॥३॥
अर्जुन उवाच ।
कथ भीष्ममह संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ॥
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजाहविरिसूदन ॥४॥
ऐसे कृष्णके वाक्य सुन अर्जुन बोले कि,हे मधुसूदन! मैं संग्राममें भी
म और द्रोणाचार्य से बाणोंकरके कैसे युद्धकरूंगा हे अरिसूदन ! ये
दोनों पूंजनेयोग्य हैं यहां मधुसूदन कहनेका तात्पर्य यह कि,आप दैत्यह-
ता हो तो सजनोंसे क्यों युद्धकरातेहो आरिसूदन कहनेका तात्पर्य यह
कि, जो शत्रुनाशक हो तो भीष्मादिक पूज्यनपर बाणप्रहार क्यों
कराते हो॥४॥
(३४) भगवद्गाता। [ अध्यायः- गुंरूनहत्वां हि महानुभावाञ्छ्रेयो भोक्तुंभक्ष्यम- पीह लोके ॥ हेत्वार्थकामांस्तु गुरूनि हैवभुजीय भोगान्त्रुधिरप्रदिग्धान् ॥५॥ इस लोकमें अतिउत्तमप्रभाववाले गुरुनको मारेविनी भिक्षाका अन्न भी सानेको कल्याणही जानना और अर्थ याने व्यकी है कामना जिनके ऐसे गुरुनको इस संत्राममें मारके रेतसे भरेभये भो- गोंको भोगोंगा॥६॥ में चैतंद्विः कर्तरन्नो गरीयो यंदा जयेम यदिवा 'नो जयेयुः ॥ याने हत्वा नजिजीवि- पामस्तेऽवस्थिताः प्रमुंखे धार्तराष्ट्राः ॥६॥ यह भी नहीं जानतेहैं कि, हमारेमें कौन बली है नजाने हम जीतेंगे किंवा ये हमको जीत जिनको मारके हम जीना नहीं चाहतेहैं वे" धृतराष्ट्रके पुत्र सन्मुख ही खंडे हैं ॥६॥ कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्म- संमूढचेताः । यच्छ्रेयः स्यौनिश्चितं ब्रूहि तन्में शिप्यस्तेऽहं शांधि मी त्वा प्रपन्नम् ॥७॥ कार्पण्यं यह कि हम इनको मारके कैसे जियेंगे तथा जो कुलक्षय- का दोप इन कार्पण्य और कुलक्षय दोपोंकरके मेरा क्षत्रियस्वभाव विध्वं- सित भयाहै इसीसे धर्ममें भी मेरा चित्त चकित भया जैसे कि क्षत्रिय धर्म- युद्ध अथवा भिक्षान्न भोजन इनमें कौन कल्याणकारक है ऐसे चित्त चकि- तह ऐसा मैं तुम्हारा शिष्य तुमको पूंछताँ जो मेरेवास्ते निश्चय कल्या- पायक होय वही कहो तुम्हारे शरणागत मेरे को सिखावो ॥ ७ ॥ न हि पश्यामि माँपर्नुद्याचंच्छोकमुच्छो- द्वितीयः २.] “सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (३५) : षणमिंद्रियाणाम् ॥ अवाप्य भूमावसँपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाँधिपत्यम् ॥ ८॥ अरे रे रे रे ! बडा अनर्थ है कि, जो पृथिवीमें शत्रुरहित संपदायुक्त - राज्यको और देवताओंके भी अधिपतित्वको पायके मेरी इंद्रियेनके सुखानेवाले शोकको दूरकरे उसको मैं नहीं देखताहूं ॥८॥ संजय उवाच। एवमुक्त्वा ह्रषीकेशं गुडाकेशः परंतपः॥ न योत्स्यं इति गोविंदमुक्त्वा तूंष्णीं बभूव है ॥९॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहनेलगे कि, शत्रुनको संतापितकरनेवाला तथा गुडाका जो निद्रा तिसके जीतनेमें समर्थ ऐसा जो अर्जुन हृषी- केश याने इंद्रियोंके मालिक श्रीकृष्णको ऐसे कहके फिर नहीं युद्धकरूंगा ऐसे गोविंदसे कहके मौन होतेभैये ॥९॥ तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ॥ सेनयोरुभयोर्मध्ये विषादतमिदं वचः ॥ १० ॥ हे भरतवंशोत्पन्न धृतराष्ट्र ! दोनों सेनाओंके मध्यमें युद्धके- उत्साहको त्यागिक शोक कररहो जो अर्जुन तिससे हँसतेसरीखे श्रीक- ष्णजी यह याने जो आगे कहेंगे सो वचन बोलते भये ॥१०॥ श्रीभगवानुवाच । अंशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांचं भाषसे ॥ गतासूनगंतागुंश्च नाऽनुशोचंति पंडिताः ॥ ११ ॥ श्रीकृष्णभगवानने निश्चय किया कि, इसको धर्माधर्मका ज्ञान नहीं है, इससे यह धर्मको तो अधर्म और अधर्मको धर्म मान रहा है, परंतु धर्मको जानना चाहता है सो मोह गये विना यह कैसे जानेगा? . सो मोह आत्मदर्शनविना नष्ट होनेका नहीं. ज्ञानविना आत्मदर्श - भगवद्गीता। [अध्याय:- न होने का नहीं सो ज्ञान निष्कामकर्मविना होनेका नहीं और अध्या- त्मशास्त्र जो आत्मा-अनात्मा-विवेक उपदेश याने जीव और शरीर- का विवेक उसका उपदेश इसविना निष्काम कर्म होने सकतानहीं इससे अध्यात्मशास्त्र ही उपदेश करो, ऐसा विचारके उपदेश कर- नेलगे. अब इस श्लोकसे लेके अठारहे अध्यायमें छासठके श्लोकमें जो “माशुचः” ऐसा वाक्य है वहां पर्यंत गीता उपदेश है. तहां प्रथम भगवान कहते हैं कि, हे अर्जुन ! "त्वं अशोच्यान् अन्वंशोचः" याने जो शोचनेयोग्य नहीं तिनको शोचते हो और प्रज्ञावाद याने पंडितोंसरीखी बातें तिनको भापते याने कहते हो वे ऐसे कि, हमारे पितरोंका श्राद्ध और तर्पण न होनेसे वे स्वर्गसे नरकमें पडेंगे सो स्वर्गप्राप्ति और पडना श्राद्धादिक होने न होनेके स्वाधीन नहीं हैं; वे तो आपके करे पुण्यपापके स्वाधीन हैं " क्षीणे पुण्ये मर्त्य- लोकं विशति " इस प्रमाणसे वे पुण्य पाप सदेह आत्माके स्वाधीन हैं. केवल देहके स्वाधीन नहीं हैं यद्यपि पुत्रादिकोंके करेभये श्राद्धा- दिकोंका पुण्य प्राप्त होता है; कारण कि, पुत्रादिक सदेह आत्मसं- बंधी है; तथापि श्राद्ध न होनेसे स्वर्गसे पडना यह कोई कालमें भी होनेका नहीं। इसवास्ते गताएं जो.ये शरीर नित्य नाशधर्मी और अगतामू जो जीव नित्य अमर एकरस है इससे "नासतोविद्यते भावोनाऽभावोविद्यतेसतः ” इसप्रमाणसे पंडितजन इनका शोच नहीं करते हैं। इससे तुमकोभी शोचना अयोग्य है. "स्वेस्वेकर्म- ण्यभिरतःसिद्धिविंदतिमानवः इसप्रमाणसे स्वधर्मयुद्ध ही कल्याण- कारक है ॥ ११॥ नत्वेवाह जांतुनासं न त्वं "नेमे "जनाधिपाः ॥ नं चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥ श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन ! जो आत्मा याने जीवात्मा " द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (३७) परमात्मा है उनके स्वभाव सुनो. सो ऐसे कि, "अहं सर्वेश्वर इतः पूर्वमनादौ काले जातु नासमपि त्वासमेव" मैं सर्वेश्वर इस समयसे प्रथम अनादिकालमें क्या न था ? क्योंकि, निश्चयकरके था "त्वं नासीः अपितु आतीः एव" जैसा मैं था ऐसा क्या तू न था ? तू भी था. " इमे जनाधिपाः किं न आसन् अपित्वासन् एव" ये सब राजा क्या न थे? अर्थात् ये भी थे."अंतः परं सर्वे वयं किं न भविष्या- मः अपितु भविष्याम एव" इसकालसे अगाडी क्या हम, तुम ये सर्व न होयंगे ? अर्थात् होयहींगे. इससे आत्मा नित्य है. शोच करना वृथा है. तथा जो यहां हम, तुम और ये ऐसा कहा इससे यह सिद्धां- त भया कि, जीवात्मा और परमात्मा न्यारे न्यारे हैं यह न्यारापनाही सत्य है. इसीसे श्रीकृष्णजीने भी उपदेश किया क्यों कि, अज्ञानमो- हित अर्जुनको मिथ्याउपदेश करनेहीके नहीं. इस न्यारेपनेमें श्रु- तिभी प्रमाण है सो यह-"नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहू- नां यो विदधाति कामानिति” अर्थ-जो एक नित्यचेतन परमात्मा है सो बहुत नित्यचेतन जीवोंकी कामनाको परिपूर्ण करता है। जो कोई कहे कि, यह भेद अज्ञानकृत है तो उनसे कहना कि, यह परमार्थदृष्टिके अधिष्ठाता और आत्मयाथात्म्यसे. सदा अज्ञानर- हित नित्यस्वरूप परमपुरुष श्रीकृष्णमें अज्ञानकृतभेददर्शनकार्य होनेका नहीं. तोभी कोई कृष्णको अज्ञ कहे. तो उनकरके उप- दिष्ट गीता अप्रमाण होती है. जो कोई कहे कि, श्रीकृष्णने अभेद- निश्चय किया है इससे वह भेद निराकृत है; सो जले वस्त्रतुल्य बंधन- कारक नहीं है. तब कहना कि मृगतृष्णानिराकृत जानिके फिर उसमें जल लेने न जायगा जो गया तो वह अज्ञ है. इसीतरह जो मिथ्या भेदका इसमें उपदेश दिया तो इस गीताकाभी प्रमाण न मानना चाहिये. दूसरा यह कि, भेदविना उपदेशभी नहीं बनेगा " . " (३८) भगवद्गीता। [अध्यायः- तथा परमात्मामें ऐसाभी होनेका नहीं कि, प्रथम अज्ञ थे शास्त्रा- ध्ययनसे ज्ञानी भये. जिराको शास्त्राभ्याससे ज्ञान होताहै उसको कोई समयमें अज्ञान भी होता है. सो नित्यज्ञानस्वरूप श्रीकृष्णमें यह भी नहीं होसकताहै. यहां श्रुती प्रमाण है सो ऐसे कि, 'यःसर्वज्ञः सर्ववित् ॥ पराऽस्यशक्तिर्विविधैवश्रूयतेस्वाभाविकीज्ञानवलक्रियाच' तथा यहांभी कहेंगे 'वेदाहसमतीतानिवर्तमानानिचार्जुन । भविष्या- णिचभूतानिमांतुवेदनकश्चन' इत्यादि प्रमाणोंसे भेदही सिद्ध होता है. भेदविना उपदेश किसको करै ? तहां कोई कहतेहैं कि, अर्जुन कृष्णका प्रतिबिंव है, आपको आपही उपदेश करतेहैं. तहां कहना कि, दरपन जल इत्यादिमें आपके प्रतिश्विको देखके जो बातें करे सो उन्मत्त याने चित्तभ्रष्ट सिरीं होताहै, उसके वाक्यभी अप्र. माण हैं, जिसको अभेदज्ञान है उसको उपदेश बननेहीका नहीं न उसके गुरू हैं न शिष्य है इससे यही सिद्ध भया कि, परमात्मासे जीव न्यारे हैं ॥१२॥ देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारे यौवनं जरीं ॥ तां देहांतरप्राप्तिधारस्तत्र न मुहाति ॥ १३॥ जे 'से इस देहमें जीवकी कुमार अवस्था यौवन और जरा अवस्था होतेहैं तैसे देहांतरकी प्राप्ति भी होतीहै तहां धीर याने ज्ञानीपुरुप नहीं मोहता है ॥ १३॥ मात्रास्पशीस्तु कौंतेयं शीतोष्णसुखदुःखदाः॥ आगमापायिनोऽनित्यास्तॉस्तितिक्षस्व भारत॥१४॥ हे कुंतीपुत्र ! मात्रां जो इंद्रियां तिनके स्पर्शजो शब्दस्पर्शरूप रस और गंध ये शीत उप्ण याने मृदु कठोर शब्द शीतोष्ण शस्त्र प्रहारादिक और " जिस आत्मतत्त्वकरके यह सर्व अचेतन तत्त्व व्याप्त है उसकी द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। संयोगवियोगादिक दुःखके देनेवाले अनित्य और आगापायी याने होते जाते रहते हैं हे भारत ! तुम भरतवंशी हो उनको सहनकरो ॥१४॥ यं हिनं व्यर्थयंत्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । संमदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥ हे पुरुषर्षभ! सुख और दुःख है सम जिसके ऐसे जिस ज्ञानी पुरुष को ये निश्चयकरके नहीं पीडों करते हैं सो" मोक्षजानेको समर्थ- होती है ॥१५॥ नाऽसतो विर्यते भावो नाभावो विद्यते सतः॥ उभयोरपि दृष्टोऽतस्त्वनयोस्तत्वेदर्शिभिः ॥ १६ ॥ जो “गतासूनगतातूंश्चनानुशोचंतिपंडिताः” इस वाक्यकरके आ- त्माका स्वाभाविक नित्यत्व और देहका नाशित्व समझके शोक न करना कहा उसीको अब 'नासतः' इत्यादिकरके खुलासा दृढता- करके कहते हैं सो ऐसे कि, असद जो नाशवान है उसकी थिरता नहीं होती है और सत् जो अविनाशी है उसका नाश नहीं होता तत्त्वदर्शी- पुरुषोंने इन दोनोंकी भी सिद्धांत देखाँ है सोई आगे दो शोकोंमें खुलासा कहेंगे ॥१६॥ अविनाशि तु तैबिडि ओने सर्वमिदं ततम् ।। विनाशमव्ययस्याऽस्य नैं कश्चित्कर्तुमहति ॥ १७॥ आविनाशी जानो इस अविनाशीका विनाश करनेको कोई नहीं समर्थ है ॥ १७॥ अंतवंत इम देहां नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युद्धयस्व भारत ॥ १८॥ जो यह जीव अविनांशी है तथा अप्रमेय है याने यह इतना ही है १ (१०) भगवद्गीता। [ अध्याय:- ऐसा कहने में नहीं आता है तथा नित्य है याने सर्वदा एकसा है ऐसे जीवके ये देह हैं नाशवंत कहे हैं हे अर्जुन ! तिसँसे युद्धकैरो॥१८॥ यं एनं वेत्ति हतारं यश्चै नं मन्यते हैंतम् ॥ उभौ तौ" न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥१९॥ जो इस आत्माको मारनेवाला जानता है और जो इसको अन्यक- रके मंरा मानता है। वे दोनों नहीं जानते हैं यह न किसीको मारता है न किसीकरके मरता है ॥ १९॥ नं जायते म्रियते वा कदाचिनीयम्भूत्वा भविता वॉ न भूयः॥ जो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो ने हन्यते हैन्यमाने शरीरे ॥२०॥ यह आत्मा कोईकालमें भी जन्मता और मरती नहीं यह अर्ज- न्माहै नित्यं सर्वकालमें है पुराण याने पहिले था सो भी है नवा नै भयाँ और फिर होनेवाला भी नहीं है शरीरके मारनेपर भी नहीं मैरता है ॥२०॥ वेदाँऽविनाशिनं नित्यं ये एनमंजमव्ययम् ॥ कथं से पुरुपः पार्थ कं घातयति हंति कम ॥२१॥ जो इस आत्माको अजन्मा अक्षयं नित्य अविनाशी जानता है तो हे अर्जुन ! सो वह पुरुप के से किसको मरवावताहे और कैसे किसको मारता है ॥२१॥ वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि नाति नरोऽपराणि ॥ तथा शरीरीणि विहाय जीणी- न्यन्यानि संयाति नानि देही ॥ २२ ॥ यद्यपि शरीर नष्टहोनेसे आत्माका नाश नहीं तो भी शरीरवियोगका जो दुःण्य होताहे ऐसा अर्जुनका आशय जानिके भगवान् कहनेलगे कि, .
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी० । (४१) जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागिक और नवीनोंको ग्रहणकरताहै तैसे जीव पुरीने शरीरोंको त्यौगिके और नवीन शरीरोंको प्राप्त होताहै२२ नैनं छिन्दति शस्त्राणि नै नं दहति पावकः ॥ ने चैनें केदयंत्यांपो न शोषयति मारुतः ॥२३॥ सर्व शस्त्र भी इस आत्माको नहीं छेदि काटि सकतेहैं अग्नि इसको नहीं जलाँताहै ॥ जल इसको नहीं भिजोयसकताहै और पवनभी नहीं सुखायसकतीहै ॥ २३॥ अंच्छेद्योऽयमदाँह्योऽयमक्लयोऽशोध्य एव च ॥ नित्यः सर्वगतः स्थाणुरंचलोऽयं सनातनः ॥२४॥ यह आत्मा छेदनेयोग्य नहीं यह जलानेयोग्य नहीं और भिजाने सुखानेयोग्य भी नहीं है। यह नित्य सर्वप्रकारके शरीरोंमें जानेवाला -स्थिरस्वभाव अचल और सनातनहै ॥ २४ ॥ अव्यक्तोऽयमचिंत्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ॥ तस्मादेवं विदित्वैन नानुशो चिर्तुमहसि ॥२५॥ अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ॥ तथापि त्वं महाबाहो नै नै शोचिंतुमहँसि ॥२६॥ यह अतिसूक्ष्मतासे अप्रगट है यह विचारमें नहीं आताहै यह वि- काररहित कहाँहै ॥ तिससे इसको ऐसा जानिके शोचकैरनेको ने- ही योग्यहै । जो कि, इसको नित्य जन्मा. अथवा नित्ये मरा जॉनों- गे। तोभी हे महाभुज अर्जुन ! तुम इस आत्माको शोचनेको, नहीं योग्यहो ॥ २५ ॥ २६॥ जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धर्व जन्म मृतस्य च ॥ तस्मादपरिहार्येऽर्थ न त्वं शोचितुमर्हसि ॥२७॥ ...
(१२) भगवद्गीता। [अध्यायः- जिससे कि, जन्मेको मृत्यु निश्चय है और मरेका जन्म निश्चय है। तिसंस इस निरुपाय परिणाम में तुम शोचनेको नहीं योग्यहो ॥२७॥ अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ॥ अव्यक्तनिधनान्येवं तत्रं का परिदेवना ॥२८॥ हे अर्जुन ! मनुष्यादिक भूतप्राणी जन्मके आदिमें प्रगट नथे जन्म- के पीछे मरणके आदिमध्य अवस्थामें प्रगट दीखतेहैं मरेपीछे भी नंदीखें- ने ऐसे निश्चयसे तहां शोक कौन है ॥२८॥ आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वे- दति तथैव चान्यः । आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेदै नै चैवं कश्चित् ॥ २९ ॥ ऐसे देहात्मवादमें शोकका परिहार किया अब कहतेहैं कि, देहसे न्यारे आत्मामें द्रष्टा श्रोता वक्ता और ज्ञाता भी दुर्लभहै।प्रथमकहेभये लक्षणों- करके युक्त आत्मा सर्वसे विलक्षणहै तहाँ कोईतपस्वी पुण्यवान इस आत्माको आश्चर्यवत् देखतीहै और तैसाही कोई आँश्चर्यवत् कहता है । और तैशाही और पुरुपं इसको आश्चर्यतुल्य सुनताहै और कोई पुरुष इस आत्माहीको सुनिक भी नहीं जानता है ॥२९॥ देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ॥ तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥३०॥ हे अर्जुन ! सर्वकी देहमें यह जीव नित्यही अवध्य है । तिससे तुम सर्व मूतोंको शोचनेको नहीं योग्यहो ॥३०॥ स्वधर्ममपि चावेक्ष्य में विकषिमतुर्हसि ॥ धाद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षेत्रियस्य न विद्यते ॥३१॥ स्वधर्मको भी देखके दाँकरनेको नहीं बोय॑हो ॥ क्यों कि क्षत्रियको धर्मसंबंधी युद्धसे और कल्याण नहींहै ।। ३१ ॥
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (४३) यदृच्छंया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ॥ सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लेभले युद्धमीहशम् ॥ ३२ ॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो आपले प्राप्तंभया और खुलांभया स्वर्गका द्वार ऐसे युद्धको पुण्यवान क्षत्रियलोग पार्वते हैं ॥३२॥ अथ चेत्त्वमिमं धर्य संग्रामं न करिष्यसि ॥ ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥३३॥ अंकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यति तेऽव्ययाँम् ॥ संभावितस्य चाऽकीर्तिमराँदतिरिच्यते ॥३४॥ जो कदाचित् तुम इस धर्मरूपं संग्रामको न करोगे। तो उस से स्वधर्म और कीर्तिको भी छोड़ के पापको प्राप्त होवोंगे । और लोगे तुह्मारी अखेर्ड अकीर्तिको भी कहेंगे । सो अकीर्ति संभावितपुरु- पके मरणसे अधिक है ॥३३॥३४॥ भाद्रणादुपरतं मंस्यंते त्वां महारथाः॥ येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥ ३५॥ अवाच्यवादांश्च बहुँन्वादिध्यति तैवाहिताः । निंदतस्तव सामर्थ्य ततो दुःवतरं ७ किम् ॥३६॥ श्रीकृष्णजीने अर्जुनका अभिप्राय जाना कि, जो मैं बंधुनके स्नेह और दयालुतासे युद्ध न करूंगा तो मेरी अकीर्ति कैसे होयगी याने होनेकी नहीं ऐसा जानिके बोले कि, हे अर्जुन ! जिन कर्णदुर्योधनादिक महारथोंके तुम शूर हाच ऐसे मान्य थे उनहीके अब युद्ध न करनेसे निंदनयोग्यल- घुताको प्राप्त हो वोगे वोई महारथ शच तुमको भय संग्राम न किया ऐसा मानेंगे वोई तुहारे श तुहारी सामयको निंदतेभये बहुत ते दुवाक्य बोलेंगे याने अर्जुन कायर है शोभाके वास्ते शस्त्र बांधताहै जैसे १७ (४४) भगवद्गीता। [ अध्यायः- स्त्री आभूपनमें सर्पसिंहादिक देखिके प्यारसे धारण करै और साक्षात् दे- खिके प्राणलेके भागे तैसे जब ऐसी निंदा करेंगे तब उससे बडादुःख कौन है सो कहो ॥३५॥३६॥ हतो वा प्राप्स्यसे स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ॥ तस्मादुत्तिष्ट कौंतेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७॥ उसनिंदाके सुननेसे रणमें मरना मारनाही श्रेष्ठ है ऐसा कहते हैं हे कुं- तीपुत्र ! जो रणमें शत्रुप्रहारसे मरोगे भी तो स्वर्गको प्राप्तहोवोगे जो जी- तोगे तो पृथिवीको भोगोगे तिससे युद्धके अर्थ निश्चयकियेभये उँठो। सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ॥ ततो युद्धाय युज्यस्व नै वं पाँपमवाप्स्यसि ॥३८॥ सुख और दुःखको समानकरके तथा लाभ और होनि जय और परा जय समान जानिके फिर युद्धके अर्थयुक्तहो ऐसे पाँपकोनहाँप्राप्तहोवोगे। एषां तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोंगे विमाँ शृणु ॥ बुद्धयाँ युक्तो यया पार्थ कर्मबंधं प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥ श्रीकृष्णभगवान्ने ऐसा आत्मस्वरूप दिखाया अवं आत्मस्वरूप ज्ञानपूर्वक मोक्षसाधनभूत कर्मयोग कहतेहैं सो ऐसे कि, हे पृथापुत्र! यह बुद्धि तुम से मैंने सांख्य जो आत्मा देहका विवेक उसमें कही और इसीको योगमें याने कर्मयोगमें सुनो जिस वुद्धिकरके युक्त कर्मबंध जो संसौरदुःख उसको छोडोगे ॥३९॥ नेहांभिक्रमनांशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ॥ स्वल्पमप्यस्यं धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥४०॥ जो अब ज्ञानयुक्त कर्मयोग कहेंगे तिसका माहात्म्य कहतेहैं । इस ज्ञानयुक्त कर्मयोगमें याने निष्काम कर्मयोगमें प्रारंभका भी नाश नहीं है द्वितीयः २.] सात्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (४५) याने प्रारंभ होके समाप्त न होय तो भी नाश नहीं है इसके छूटनेका दोष भी नहीं होताहै इस निष्काम कर्मको लवलेशमात्र भी जन्ममरणरू- प बडेभयले रक्षणकरताहै ॥ ४० ॥ व्यवसायात्मिकाबुद्धिरेकेंह कुरुनंदनं । बहुशाखाह्यनंताचं बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥ हे कुरुनंदन! व्यवसाय जो विष्णुपरमात्मा तिनमें है आत्मा नाम मन जिनका ऐसे पुरुषोंकी बुद्धि इस निष्काम कर्महीमें वह एक है याने एक मोक्षसाधनहीके वास्तेहै जो अव्यवसाई याने परमात्माविना नानापदार्थ पशुपुत्रादिकोंके चाहनेवाले हैं उनकी बुद्धि बहुँतहै याने अनेककामना- ओंमें लगीहै और तहां भी बहुशाखायाने एककार्यके वास्ते कर्मकरके उसमेंभी अनेक फल मांगतेहैं जैसे पुत्रार्थ यज्ञमें धन धान्य,आयुष्य, आरोग्यका मांगना ॥४१॥ यामिमी पुष्पिता वाँच प्रदत्यविपश्चितः ॥ वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीतिवादिनः ॥कामा- त्मानः स्वर्गपरौं जन्मकर्मफलप्रदाम् ॥ क्रियावि- शेषबहुलांभोगैश्वर्यगति प्रति ॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तीनां तयाँपहतचेतसाम् । व्यवसायात्मिकाबुद्धिः समा- धौ नै विधीयते॥४२॥४३॥॥४४॥ हे पृथापुत्र! जो अज्ञानी जैन वेदवादरत याने वेदोक्त कर्मसे स्वर्गा- दिकफलही होताहै ऐसे कहनेवाले स्वर्गसुखसे और सुख नहीं है ऐसाँ कहनेवाले कामनाहीमें चित्तरखनेवाले स्वर्गहीको श्रेष्ठमाननेवाले जिस पुष्पित याने कहनेमात्रमें रमणीय जन्मकर्मरूपफलकी देनेवाली तथा जिसमें भोग और ऐश्वर्यनिमित्त बहुत उपकरण याने कर्मसाधन हैं जि- समें ऐसी इस वाणीको कहतहैं इसीसे उसी वाणीकरके अपहरणभयेहैं (४६) - भगवद्गीता। [ अध्यायः- चित्त जिनके इसीसे भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त हैं उनके मन में वह पर- मात्मविषयकवुद्धि नहीं प्रवृत्तहोतीहै ॥ ४२ ॥४३॥४४॥ वैगुण्यविषया वेदां निपुण्यो भवार्जुन । निद्वो नित्यसत्त्वस्थौ निर्योगक्षेमं आत्मवान ॥४५॥ हे अर्जुनावेदें ये चैगुण्यविषयहें थाने तीनों गुणोंके कर्मनहींको कहते हैं तुम निद्व याने सुखदुःख,जयपराजय लामअलाभ, इन इंद्रनसे र- हितहो अर्थात् इनसे उत्पन्न हर्षशोकरहितहों नित्यसत्वेस्थहो याने साविककर्म करो निर्योगक्षेम याने कोइसा भी लाभ और लब्धका रक्ष- नईश्वराधीन नजानो आत्मवान् याने परमात्मामें चित्त राँखो ऐसेभये हुये निस्त्रगुण्यहो याने कर्मफलोंका त्यागकरों ॥४५॥ यावानर्थ उदपीने सर्वतः संप्लुतोदके ॥ तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणा विजानतः ॥४६॥ जो कहा कि, वेदोक्त कर्मों से तुम सात्त्विक करो उसीको खुलास. कहतेहैं जैसे सर्वत्र जलसे भरेभये तालाव इत्यादिक जलाशयमें मनुष्य- का जितना प्रयोजन होताहै उतनाही लेताहै तैसेही वेर्दैके जाननेवालेको सर्ववेदोंमें तावान्याने सात्विककर्म ही योग्यहै ।। ४६॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ॥ मा कर्मफलहेतुर्भूमौ ते संगोऽस्त्वकमणि ॥४७॥ तुलारेको कर्महीमें अधिकारहै फैलोंमें नहीं कौके फलका कारण तुझारेमें कोई समयमें भी मति हो तुम्हारे को अम याने स्वधर्म योग्य युद्धादिकाँका न करना इसमें संग जोनिष्ठा सो कदाचित् न हो ४७॥ योगस्थः कुरुं कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ॥ सिद्धयसिद्धयोः संमो भूत्वा समत्वं योग उच्यते४८॥
तात्पर्य चित्तको समाधानकरक लवणोचित कर्म करो॥४८॥
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० (४७)
हे अर्जुन ! सिद्धि और असिद्धिमें समबुद्धि होके कर्मफलके संगको
त्यौगिके योगमें स्थितभयेहुये काँको केरो सिद्धि और आसिद्धिमें जो
समत्व है वहीं योग कहाँ है अर्थात चित्तके समाधानत्वको योग कहते हैं
दूरेण हावरं कर्म बुद्धियोगांदनंजय ॥
बुद्धो शरणमन्विच्छ कृपणीः फलहेतवः॥ १९॥
हे अर्जुन ! जो बुद्धियोगसे और कर्म है सो निश्चयकरके अत्यंत नी-
र्च है इसवास्ते बुद्धियोग जो निष्काम कर्म उसीमें ईश्वरप्राप्तिकी इच्छा
करो फलेकी इच्छा करनेवाले कृपण हैं॥४९॥
बुद्धिंयुक्तो जहाँतीहं उभे सुकृतंदुष्कृते॥
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०॥
बुद्धियुक्त जो निष्कामकर्मी सो इसीलोकमें सुकृत जो पुण्यकर्म
और दुष्कृत जो पापकर्म उन दोनोंको त्यागताहै इससे योगके अर्थ याने
बुद्धियोग जो निष्काम कर्म उसकेवास्ते युक्तहो यह योग सर्वकमौके
कुशल कारकहै ॥५०॥
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फैलं त्यका मनीषिणः ॥
जन्मबंधविनिर्मुक्ताः पदं गच्छंत्यनामयम्॥५१॥
जो बुद्धियोगयुक्तहैं वे ज्ञांनी कर्मजन्य फलको त्यागके जन्मबंध-
नसे मुक्तंभयेहुये निश्चयकरके मोक्ष पदको जातेहैं ॥५१॥
यदाते मोहॅकलिलं बुद्धियंतितरिष्यति॥
ती गंतासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥ ५२ ॥
जब तुमारी बुदि मोहरूप दुःखको उल्लंघनकरेगी तब जो फला-
दिक सुननेयोग्य और जो सुनेहो उनके वैराग्यको प्राप्तहोवोगे ॥५२॥
1.
(५८)
भगवद्गीता।
[ अध्यायः-
श्रुतिविप्रतिपन्नाते यदास्थास्यति निश्चला॥
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥५३॥
जब तुह्मारी बुद्धि श्रुतिमें याने मेरे उपदेशमें विशेषकरके आसक्त
निश्चलं मनमें अचल टहरैगी तवं योगेको पावोगे ॥५३॥
अर्जुन उवाच।
स्थितप्रज्ञस्य का भाषां समाधिस्थस्य केशव ॥
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम ॥५४॥
ऐसा सुनिके अर्जुन वृझते भये कि, हे केशव! याने सर्वके अंतःकर-
णमें रहनेवाले हे ईश्वर ! स्थिरबुद्धि समाधिस्थकी कौनसी भाषी याने
उसका वाचक कौन हैं अर्थात् वह स्थिरबुद्धि किससे कहाताहै स्थिरबुद्धि
के से बोलताहै कैसे बैठताहै और कैसे चलता है ॥५४॥
श्रीभगवानुवाच ।
प्रजहाति यदा काँमान्सान्पार्थ मनोगतान ॥
आत्मन्येवात्मना तुष्टंः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥ ५५॥
अब श्रीकृष्णभगवान स्थिरबुद्धिवालेका स्वरूप कहतेहैं तहाँ ऐसा
न्याय, कि, रहनिरीतिसे भी स्वरूपनिश्चय होताहै इससे रहनिरीति
कहतेहैं सो ऐसे कि, हे अर्जुन ! जब आपके मनकरके आप स्वरूपहीमें
संतुष्टभया हुआ मर्नमें रहेभये सर्व मनोरंथोंको सर्वथा त्यागताहै तब
वह स्थिरबुद्धि कहाताहै ॥५६॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः मुखेषु विगतस्पृहः ।।
वीतरांगभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥
दुःखों में निसका मनं व्याकुल नहीं होताहै सुख में निराश होताहै
और जिसके पुत्रादिन्नेह भय और क्रोध न होय सो मुंनि स्थिरद्धि
कहाता है ॥५६॥
द्वितीयः २.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (४९)
यः सर्वत्राऽनभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाऽशुभम् ॥
नाऽभिनंदति न द्वेष्टि स्थितप्रज्ञस्तेदोच्यते ॥५७॥
जो सर्वत्र स्नेहरहित उसउस शुभाशुभको पाइकेभी न शुभसे ऑ-
नंदहो न अशुभसे दुःखीहो तंब सो स्थिरबुद्धि कहाताहै ॥६७ ॥
यदा संहरते चोयं कूर्मोऽगानीर्वं सर्वशः।
इंद्रियाणींद्रियाँर्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५८ ॥
जब यह कछवा जैसे अपने सर्व अंगोंको समेटिलेताहै तैसे
इंद्रियोंके विषयन से आपकी सर्व इंद्रियोंको चिलेता है तब उसकी
बुद्धि स्थिर होतीहै ॥१८॥
विषया विनिवर्तते निराहारस्य देहिनः॥
रसर्वज रसोप्ययं परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥५९ ॥
इंद्रियनके आहार इंद्रियविषय उनको जो नहीं सेवताहै उस देहीके
विषयानुरागविना विषय निवत होतेहैं उसका वह विषयानुराग भी
आत्मस्वरूपको देखके निश्चय निवर्त होता है ।। ५९॥
यततो ह्यपि कौंतेयं पुरुषस्य विपश्चितः ॥
इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥
तौनि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः॥
वैशेहि यस्येंद्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठित ॥६१ ॥
हे कुंतीपुत्र ! आत्मदर्शनविना विषयानुराग निवर्त होता नहीं और
- उसकी निवृत्तिविना जो ज्ञानी पुरुष बुद्धिकी स्थिरताकेवास्ते यनकर-
ताहै तोभी जिससे ये जोरावरीले मनको हरनेवाली इंद्रियां जबरईसे
मैंनको हैरती हैं। इससे योगयुक्तभैयाहुआ उन सर्वइंद्रियोंको निय-
मितकरके मेरेऔंश्रय है जिसके इंद्रियों वश हैं तिसकी निश्च-
यकरके बुद्धि स्थिर है ।। ६० ॥६॥
(५०)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
ध्यायंतो विषयान पुंसः संगस्तेषूपजायते ॥
संगॉत्संजायते कामः कामाको धोऽभिजायते ॥६२॥
क्रोधौद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ॥
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥६३ ॥
बाह्यइंद्रियनकी प्रबलताऔर उनको वश नकरनेमें जो दोष सो कहा
अब मनसंबंधी कहते हैं जो पुरुष मन वशकिये विना जितेन्द्रियता चाह-
ताहै सो होने की नहीं जैसे कि, जिसके मनमें विषयोंको चितवन है उस
पुरुपको उनविषयोंमें संयम करतेकरतेभी आसक्ति होगी उस आँसक्ति-
से अभिलापा होगी अभिलापासे क्रोध होगी क्रोध से मतिभ्रम होता है
मतिभ्रमसे स्मरणशक्तिमें विभ्रम होताहै स्मृतिविभ्रमसे ज्ञानका नाश
ज्ञानके नाशंसे स्वरूपसे नष्ट होताहै याने संसारमें भ्रमताहै ॥६२॥६॥
रागद्वेषविंयुक्तैस्तु विषयांनिद्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैविधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥६४॥
प्रसादेसर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ॥
प्रसन्नचेतसोह्यार्थी बुद्धिः पर्यवतिते ॥ ६५॥
वश्यहै मन जिसका ऐसा पुरुप रागद्वेषकरके रहितं और आपके
वश्य ऐसी इंद्रियों करके विपयोंका सेवनकरताँ भया प्रसन्नताको प्राप्त
होताहै याने निर्मलांतःकरण होताहै तब निर्मलचित्तहोनेसे इसके स-
दुःखोंका नाश होता है उस प्रसन्नचित्तवालेकी बुद्धि शविही स्थिर
होतीहै ॥ ६४॥६५॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ॥
ने चाँभावयतः शांतिरशांतस्य कुतः सुखम् ॥६६॥
द्वितीयः २.]. सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
अयुक्त जो समतारहित है उसकी बुद्धि नहीं स्थिर होतीहै और उस
अयुक्तके भावना याने आस्तिकता सो भी नहीं होतीहै और जिसके
भावना नहीं उसके शांति नहीं जिसके शांति नहीं उसको कहाँ से
सुख होगा ॥६६॥
इंद्रियाणां हि चरतीयन्मनोऽनुविधीयते ॥
तदस्यं हरति प्रज्ञां वायुवमिवाभासि ॥६७॥
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः॥
इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥६८ ॥
जिससे कि, जो मन विषय में प्रवृत्त इंद्रियोंको अनुसरताहै सो इस
पुरुषकी बुद्धिको वायु जलमें नावको ऐसे हरता हे तिसीसे हेम-
हाबाहो ! जिसकी सर्व इंद्रियाँ इंद्रियोंके विषयोंसे सर्वथों रोकीम हैं
तिसकी बुद्धि प्रतिष्टित है ॥ ६७॥६८॥
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी॥
यस्याँ जाग्रतिभूतानि सौ निशा पश्यतो मुनेः॥६९॥
सर्वभूतप्राणीमात्रोंकी जो रात्री अर्थात् जिसविषयमें सर्वसोइसे रहे
हैं ऐसी परमात्मविषया बुद्धि तिर्स में इंद्रियसंयमी जागताहै याने आत्म-
स्वरूपको देखताहै जिस शब्दादिविषयरूपं रात्रिमें सर्वभूतप्राणी
जोगतेहैं सो ज्ञानीजनकी रात्रिरूप है ॥ ६९ ॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्टं समुइँमापःप्रविशंति यदत्॥
तत्कामाय प्रविशंति सर्वे में शांतिमाप्नोतिन
कामकामी ॥ ७० ॥
.. जैसे आपही परिपूर्ण सर्वदा एकसे भरेभये समुंद्रमें जल वाहरसेभ-
रंताहै तैसे जिसकी सर्व कामना प्राप्तहोयहैं सो शांतिको प्राप्त होता है
जो कामनाओंकी इच्छाकरनेवाला हैसो नहीं शांतिको पावताहै ॥७॥
२) भगवद्गीता। [ अध्याय:- विहायं कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्टहः॥ निर्ममो निरहंकारः संशांतिमधिगच्छति ॥ ७१ ॥ जो पुरुप सर्व अभिलापनको छोड़के इच्छारहित विचरताहै सो ममतारहित और अहंकाररहितभयाहुआ शांतिको प्राप्तहोताहै।। ७१ ॥ एपा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नै नां प्राप्य विमुहाति ॥ स्थित्वाऽस्योमंतकालेपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥७२॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोग शास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवाद सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ हे पृथापुत्रअर्जुन ! यह जो निष्कामकर्मरूप मैंने कही सो ब्रह्ममाशि- कारक स्थिति है इसको पाके नहीं मोहको पावताहै इसमें अंतकाल- में भी स्थितहोके ब्रह्मसहशैमुक्ति पावै अर्थात् जो सर्वकाल ऐसाही रहै उसकी मुक्तिको संदेह क्या है ॥ ७२ ॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रप्तादविरचितायां गीतामृततरंगिण्यांद्वितीयाऽध्यायप्रवाहः॥२॥ अर्जुन उवाच। ज्यायसी चैत्कर्मणस्ते मँता बुद्धिर्जनार्दन ॥ तत्किं कर्मणि 'घोरे माँ नियोजयसि केशवं ॥१॥ ऐसे श्रीकृष्णके वाक्य सुनके अर्जुनने विचार किया कि, भग- वाचने प्रथम मेरेको 'अशोच्यानन्वशोचस्त्वं' इत्यादिवाक्योंकरके ज्ञा- नयोग उपदेश किया. फिर 'बुद्धियोगेत्विमांशृणु' इत्यादिकरके क. मयोग उपदेश किया उसमें भी 'श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यतिनि- अला' इत्यादिकरके निकामकर्मसे आत्मज्ञानहीकी प्राप्ति कही इस " (५३) तृतीयः ३.]. सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । से निश्चय होताहै कि, कर्मयोगसे जो पीछे आत्मज्ञान कहा सोई श्रेष्ठहै ऐसे विचारके अर्जुन भगवानसे कहने लगे कि, हेजनार्दन ! जोकि कर्मयोगसे ज्ञानयोगही तुमने श्रेष्ठं मानांहोय तो हे केशव! घोर कर्ममें मेरेको क्यों युक्तकरतेहो ॥ १ ॥ व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयंसीव में । तदेकं वैद निश्चित्ययेन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ २॥ ऐसे मिश्रित वाक्यंकरके मेरी बुद्धिको मोहतेसे हो जिसकरके मैं कल्याणको प्राप्तहोउ सो एक निश्चयकरके कहो॥२॥ श्रीभगवानुवाच । लोकेऽस्मिन द्विविधा निष्ठा पुरों प्रोक्ताँ मयाऽनघ ॥ ज्ञानयोगेन सांख्यांनी कर्मयोगेनं योगिनीम् ॥३॥ ऐसे अर्जुनके वाक्य सुनके श्रीकृष्णभगवान बोलते भये हनिष्पाप अर्जुन ! इस लोकमें पूर्वकालमें मैंने दोप्रकारकी निष्ठा कहींहै सो सां- ख्येवालोंको ज्ञानयोगकरके और योगिनको कर्मयोगकरके ॥३॥ न कर्मणामनारंभान्नैष्कयं पुरुषोऽश्नुते ॥ नं च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥४॥ शास्त्रोक्तंकोंके किये विनों पुरुष निष्कर्मता जो सवैद्रियवि- षयनिवृत्तिपूर्वकज्ञाननिष्ठा उसको नहीं प्राप्तहोताहै और कर्मके न करनेसेभी सिद्धिको नहीं प्राप्तहोता है॥४॥ न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ॥ कार्यते यवंशः कर्म सर्वैः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥५॥ कोईकालमें क्षणभरंभी कमकियेविना कोईभीपुरुष निश्चये- - (५१) भगवद्गीता। [अध्याय:- करके नहीं रहता है क्योंकि सर्व सैत्वादिप्रकृतिके गुणोंकरके पर- वंश कर्म करनेही पैरता है ॥५॥ कमंद्रियाणि संयम्य यं आँस्ते मनसा स्मरन् । इंद्रियार्था विमूढात्मां मिथ्याचारः स उच्यते॥६॥ जो ज्ञानयोगमें प्रवन्होनेको कर्मेंद्रियोंको हठसे संयममें रखके इंद्रियविषयोंको मनकरके सुमिरतासुमिरता रहता है सो मूढ- मति मिथ्याँचार याने वृथायोगी कहाती है ॥६॥ यस्त्विंद्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेद्रियैः कर्मयोगमसक्तः से विशिष्यते ॥ ७॥ और जो इंद्रियोंको मनसे नियममें रखके विषयोंमें आसक न भयाहुवा कर्मेंद्रियोंकरके कर्मयोगको करतो है हे अर्जुन । सो" श्रेष्ट है ॥७॥ नियंतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।। शरीरयात्रापि च ते" नसिध्येदकर्मणः॥ ८॥ तिससे तुम स्ववर्णउचित कर्म करो क्योंकि कर्म न करनेसे कर्म करना श्रेष्ट है और कर्म विना तुम्हारा ज्ञानयोग करनेको शरीर निर्या- भी ने सिद्ध होगा ॥ ८॥ यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः ॥ तदर्थं कर्म कौंतेयं मुक्तसंगः समाचर ॥९॥ जो कर्मसे बंधन कहाहै सो ऐसा कि, जो यज्ञार्थकर्म है उससे न्यंत्र कर्म करनेसे यह मनुष्र्ण्य कर्मबंधनको प्राप्त होता है हेकुंतीपुत्र ! तुम फलासंग छोडेभये उस यहीके अर्थ कर्म करो ॥९॥ सहयज्ञाः पंजाः सृष्ट्वा पुरोवाचं प्रजापतिः। अनेन प्रसविप्यध्वम वोऽस्त्विष्टकामधुक ॥१०॥ ६२ 93 तृतीयः ३.] सान्वयं-अमृततरंगिणी भा० टी० । (५५) प्रजापति जो परमात्मा सो पुरा याने सृष्टिकालमें यज्ञसहित प्रजाको उत्पन्न करके बोले कि, इस यज्ञकरके तुम वृद्धिको प्राप्तहोउ यह यज्ञ तुम्हारे इच्छित कामनाओंको पूरनेवाला होउँ॥ १० ॥ देवान्भावयताऽनेन ते देवां भावयं वः ॥ परस्परं भावयतः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥ इस यज्ञकरके तुम देवताओंको पूजिके उनको बढावा वे तुम्हारे पूजे बढायेभये देव तुम्हारा मनोरथ पूरतेभये तुमको बढावेंगे ऐसे परस्पर ब- ढोतेभये तुम और देवता दोनों श्रेष्ठ कल्याणको प्राप्तहोवोंगे ॥ ११ ॥ इष्टॉन्भोगन्हि वो देवा दास्यते यज्ञभाविताः ॥ तैर्दत्तानप्रदाय यो यो भुक्ते स्तेन एवं सः ।। १२॥ जो यज्ञ करोगे उसकरके वद्धितकियेभये देव तुमको इच्छित भोग निश्चयकरके देंगे उनकरके दियेभये भोगोंको उनको दियेविनी जो भोगेगा सो" निश्चयकरके चोर है इससे चोरतुल्य दंड पावेगा ॥१२॥ यज्ञशिष्टांशिनः संतो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । भुंजते ते बघ पापा ये पंचंत्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥ देवादिपूजनरूप यज्ञका शेष याने उबरेभये अनादिकके भोगनेवाले सत्पुरुष सर्वपापोंकरकै मुक्त होते हैं और जो आपहीकेवास्ते अन्नको पातेहैं वे पापी पाप जैसाहोय तैसा ही खातेहैं।॥ १३॥ अन्नाद्भवंति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः ॥ यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुंद्भवः ॥ १४ ॥ कर्मब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।। तस्मात्सर्वगतं ब्राँ नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ १२ भगवद्गीता। [अध्याय- एवं प्रवर्तितंचक्रं नानुवर्तयतीह यः॥ अघायुरिद्रियारामो मोघं पार्थ जीवति ॥१६॥ अब दिखाते हैं कि लोकदृष्टि और शास्त्रदृष्टिसे भी सर्वका मूल या ही है सो ऐसे कि,सर्व भूतप्राणि अन्नसे होतेहैं अन्नकी उत्पत्ति वर्षांसे है सो लोकप्रसिद्ध देखनेमें आताह वर्षा यज्ञसे होतीहै यह शास्त्रप्रसिद्ध है सो यह श्रोक ॥ "अग्नौप्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठति॥आदित्या- जायते वृष्टिर्घटेरनं ततःप्रजाः॥१॥यज्ञकी उत्पत्ति यज्ञकतीके किये भये कर्मसे होतीहै सो कर्मब्रह्मसे होताहै ऐसे जानो ब्रह्म नाम प्रकृति इहां प्रकृतिहीका रूप शरीर ब्रह्म जानना तहां प्रथम श्रुतिः'तदेतद्रा नाम रूपमन्नं च जायते"तथा इहां भी कहेंगे"मम योनिमहद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम्" इत्यादिप्रमाणों से यहां यही अर्थ है कि, प्रकृतिको ब्रह्म कह- ते हैं उसीका परिणाम यह शरीर इससे कर्म होताहै यह शरीर अक्षरस- मुद्भव याने अक्षर जो जीव तिसकरके सहित उत्पन्न होताहै याने सजीव शरीर कर्मका कारक है जिससे कि, शरीरही कर्मकारक है इसीसे सर्वग- त याने सर्वाधिकारयोग्य शरीर यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित है याने यज्ञका मूलकारण है ऐसे यह ईश्वरकरके प्रवर्तमान इस चक्रकोजो कर्माधि- कारी किंवा ज्ञानकर्माधिकारी नहीं अनुवर्त्तताहै याने यज्ञविना शरीर पोपताहै हेअर्जुन!सो इंद्रियाराम पापायुष्य वृथा जीवता है जो चन कहा उसका खुलासा यह कि,अन्नसे शरीर, अन्न वर्षासे, वर्षा यज्ञरे, यज्ञ कर्मसे, कर्म शरीरसे, शरीर अन्नसे, ऐसे प्रवर्त है॥१४॥१६॥१६॥ यस्त्वात्मरतिरेव स्यांदात्मतृप्तश्च मानवः ।। आत्मन्येवं च संतुष्टस्तस्यै कार्य न वियते ।। १७ ।। नैव तस्य कृतेनार्थों"नाकृतेनेह कश्चन ।। नै चास्य सर्वभूते कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥ 1 , ६ तृतीयः ३.7 सान्वय: अमृततरंगिणी भा० टी०। (५७.) कर्म न करनेसे किसको दोष नहीं सो कहते हैं सो ऐसा कि, जो मनुष्य आत्मरति हो यानेआत्मस्वरूपहीमें आनंदहोय और आत्मस्व- हूपहीसे तृप्त हो अन्नादिकसे प्रयोजन नहीं और आत्माही में संतुष्टहो उसके कर्तव्यता नहीं है उसके कर्मकरनेसे न करनेसे भी यहां कुछ प्रयोजन नहीं है और इसके सर्वभूतप्राणिनमें कोई ऐसा भी नहीं जि- ससे कुछ प्रयोजन होय तात्पर्य ऐसा मनुष्य कर्म करै अथवा न करै तो चिंता नहीं ॥ १७ ॥१८॥ तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म सचिर ।। असक्तो ह्याचर, कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥ १९ ॥ जिससे कि, ऐसेको दोष नहीं तुम तो द्रव्यकुटुंबादिसे रतहो इससे कर्म में असक्त न भयेहुये करनेयोग्य स्ववर्णोचित कर्मको निरंतर करो क्यों कि फलेच्छारहित कर्म करते करते पुरुष परमात्माको प्राप्त होताहै ॥ १९॥ कर्मणैव हि संसिद्धिमांस्थिता जनकादयः॥ लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कर्तुमर्हसि ॥२०॥ अब यह दिखातेहैं कि, ज्ञानीको भी कर्मही श्रेष्ठहै सो ऐसे जिससे कि, जनकादिक ज्ञानी भी कर्मकरकेही मोक्षको प्राप्तभये वैसे तुमभी लोकसंग्रहको भी देखतेभये कर्म करनेको योग्य हैं ॥२०॥ यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।। सं यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ २१ ॥ यहां कारण यह हैं कि, श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरणकरतेहैं दूसरे लोग भी वैसाही आचरणकरते हैं सो श्रेष्ठपुरुष जो प्रमाणे कर ताहै सर्वलोगभी वही प्रमाणकरने लगतेहैं ॥ २१ ॥ नं में पार्थाऽस्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन ॥
(५८) भगवद्गीता। [ अध्याय:- नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एवं च कर्मणि ॥ २२ ॥ हे पृथीपुत्र अर्जुन ! तीनों लोकों में मेरेको कुछ कर्तव्य नहीं है ती नहीं प्राप्त ऐसाभी नहीं और प्राप्तहोय ऐसा भी नहीं अर्थात् सर्व मेरा ही है तथापि कर्ममें निश्चयकरके वर्तमान रहताहूं याने लोगोंको सिखाने को कर्म करता रहताहौं ॥२२॥ यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ॥ मम वर्मांनुवर्त्तते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२३॥ हे अर्जुन ! जो कदाचित् सावधानभैयाहुआ मैं कर्म में न वर्तमान रही तो निश्चयकरिकै सर्व मनुष्य मेरी ही रीतिपर चलनेल- याने वे. भी निरर्थ मानके कर्म न करें॥२३॥ उत्सीदेयुरिमे लोका नं कुर्यां कम चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्याँखुपहन्यामिमाः प्रजाः॥२४॥ जो कदाचित् मैं कर्म न करें तो ये लोक भी ऐसे जानेंगे कि, जो की श्रेष्ट होता तो श्रीकृष्ण करते इससे कर्म तुच्छा है ऐसा जानके कर्म छोडके नष्ट होंगे तब मैं वर्णसंकरका की होउंगा और इस प्रजाको मारनेवाला होउंगा॥२४॥ सक्ता कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वति भारत ॥ कुर्याद्रिांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुलोकसंग्रहय ॥२५॥ हे अर्जुन ! जैसे अविद्वान लोग कर्म में आसक्तंभमेहुये कर्म करतेहैं तेसे विद्वान् आसक्तंनभयाहुआलोकसंग्रहको करनेकी इच्छा कियेभये कर्म करे ॥२५॥ ने बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ।। जोपयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरम् ॥ २६ ॥ जो ज्ञानी है सो ज्ञानयोगयुक्तभयाहुआ कर्मकरताकरता जो कर्म- तृतीयः ३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (६९) संगी अज्ञानीहें उनको सर्वकर्मोंकी प्रीति उपजावै याने उनसे प्रशंसा करके कर्म करावे और बुद्धिभेद याने कर्ममें अश्रद्धा ने करावै ॥२६॥ प्रकृतेः क्रियाणानि गुणैः कौणि सर्वशः॥ अहंकारविमूढात्मा केहिमिति मन्यते ॥ २७ ॥ तत्त्ववित्तुं महाबाहो गुणकर्मविभौगयोः ॥ गुणों गुणेषु वर्त्तत इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥ हे अर्जुन ! सर्व कर्म प्रकृतिके सत्वादिगुणोंकरके कियेभयेहैं जो अहं- कारसे मूढचित्त है सो में कई ऐसे मानताह और जो सत्वादि- क गुण और उनके कर्मके तत्त्वका ज्ञाताहै सो जानताहै कि, सत्वा- दि गुण आपआपके कार्योंमें वर्तमान हैं ऐसौं जानके आत नहीं होताहै ॥ २७ ॥२८॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जते गुणकर्मसु ॥ तनिक- स्नविदो मंदान् कृत्स्नविन विचालयेत् ॥ २९ ॥ प्रकृतिके सत्वादिकगुणकार्योंकरके भूलेभये जो पुरुष वे सत्यादिगु- णकर्मफलोंमें आसक्त होतेहैं उनै अल्पज्ञमंदोंकों सर्वज्ञपुरुष कर्ममार्गसे चलायमान न करै ॥ २९॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याऽध्यात्मचेतसा ॥ निरांशीनिममो भूत्वा युध्यस्वे विगतज्वरः ॥ ३० ॥ हे अर्जुनाअध्यात्म जो स्वभाव स्वभावोऽध्यात्म उच्यते” इस प्रमाणसे क्षत्रियका जोशूरत्वादिक स्वभाव है उसमें चित्तको लगायेभये उसकरके सर्व कर्म मेरेमें अर्पणकरके निरांशी याने फलाशारहित निर्मम याने कर्त्तापनका ममत्व छोड़के कर्मबंधनभयरूपरयो छुटेभो युद्धं करो ॥३०॥ ये में मंतमिदं नित्यमनुतिष्ठति मानवाः भगवद्गीता [अध्यायः- श्रद्धावंतोऽनसूयंतो मुंच्यते तेपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ ये" खेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठंति मे मतम ॥ सवज्ञानविस्टोस्तीन्विद्धि नष्टीनचेतसः ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य इस मेरे मतको नित्यं धारण करतेहैं और जो इसमें श्रद्धा ही रखते हैं और जो इसकी निंदारहित हैं वे भी कमबंधनोंसे छुटेंगे और जो इस "मेरे मैतकी निंदाकरतेभये इसको ग्रहण नहीं करतेहैं वे सर्व- ज्ञानविषयमें मूढ उँन अज्ञौनिनको नष्टंभये जानो ॥३१ ॥ ३२ ॥ सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ॥ प्रकृति यति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ जो ज्ञानवान् है सो भी आपके जातिस्वभावके सहर्श चेष्टाकरताहे अज्ञकरे तो शंकाही क्या है?सर्वभूतप्राणी आपके जातिस्वभावको अनु- सरतहैं यहां निग्रह क्या करेगा ॥३३॥ इंद्रियस्येद्रियस्यार्थे रांगद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥ तैयौन वंशमागच्छेत्तौ होस्य परिपंथिनौ ॥ ३४ ॥ जब कर्म स्वभावहीसे है और उसका निग्रह नहीं तव उपाय क्या सो कहते हैं कमेंद्रिय और ज्ञानेंद्रिय इनके निमित्त राग द्वेष युक्त हैं ति- नके वश न होना क्यों कि, वे इसके शत्रु हैं याने जीवके बंधनकारक रागद्वेपही हैं ॥ ३४॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्टितात् ॥ . स्बंध निधनं श्रेयः परधर्मों भयावहः ॥ ३५॥ जो रागद्वेपके वश होनेसे स्वधर्मका त्याग और परधर्ममें निष्ठा होतीहै उसका निवारण करतेभये श्रीकृष्ण कहते हैं सो ऐसे कि, नेत्रादिइंद्रियोंकी प्रीतिसे अर्जुन स्वधर्मीको त्यागने लगे कि, इन स्वजनोंको देखके मेरे दया मातीहै इससे युद्ध न कहींगा भीख मागि खाउंगा सो निवारते हैं जैसे कि, श्रेष्ठक- .
तृतीयः ३. सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी । (६१) मारंभ अन्यके धर्मसे स्वधर्म न्यू भी कल्याणकारक है स्वधर्ममें मरना कल्याणदायक है परधर्ममें मरनेसे भी अतिभयकारक है ॥३५॥ अर्जुन उवाच । अर्थ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ॥ अनिच्छन्नपि वार्ष्णेयं बलाँदिवं नियोजितः ॥ ३६ ॥ अर्जुन भगवानसे पूछते हैं कि, हे वृष्णिवंशोत्पन्न कृष्ण! आपने कहा स्वधर्मही श्रेष्ठ है अन्यधर्म भयदायक है ऐसा जो जानताभी है और स्वधर्मपूर्वक ज्ञानयोगमें प्रवर्तहोके विषय भी त्यागेहैं तौभी फिर यह पुरुष विषयइच्छा नकरता भी बलात्कार विषयोंमें युक्तकिया सरीखो किसका प्रेरीभया पापोंको करता है ॥ ३६॥ श्रीभगवानुवाच । काम एर्ष क्रोधं एष रजोगुणसमुद्भवः॥ महाशनो महाँपाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम् ॥ ३७॥ अर्जुनका प्रश्न सुनके श्रीकृष्णभगवान् कहतेहैं कि,जो यह रजोगु- णसे प्रगट काम याने कामना सोबड़ा पापी अतिविषयसेवनरूप बेडे आहारका करनेवाला यही क्रोधरूप होताहै इसको इस ज्ञानविषयमें वैरी जानों ॥ ३७॥ धूमेनावियते वह्नियथादर्शो मलेन च ॥ यथोल्वेनावृतो गर्भस्तथों ते नेर्दैमावृतम् ॥ ३८॥ जैसे अग्नि धुवाँकरके ढकता है और मलकरके दर्पण ढकताहै जैसे गर्भ जराकरके आवृत तैसे यह ज्ञान उसकामनाकरके ढका है ॥ ३८॥ आँवृतं ज्ञानमेतेनं ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ॥
(६२)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
कामरूपेण कौंतेयं दुःयूरेणानलेन च ॥३९॥
कुंतीपुत्र! इस ज्ञानीका वित्यैदेशी दुःखसे भी नभरसके इससे अप-
रिपूर्ण और इच्नचारी ऐले इस कामकरके ज्ञान ढकरहाहै काम याने
विषयवासना।२९॥
इंद्रियाणि मंनो बुद्धिरस्याऽधिष्ठानमुच्यते ॥
एलैर्विमोहयत्येपं ज्ञानमात्य देहिनम् ॥ ४०॥
पव शत्रुको जीतना होय तब प्रथम उसके स्थान स्वाधीन करना
इससे इस कामनाके स्थान कहतेहैं सो वे ये कि, सर्व इंद्रिये मैन और
बुद्धि ये कामनाके स्थान कहतेहैं यहँ ईनहींकरके ज्ञानको आच्छादि-
तकरके जीवको मोहित करता है ॥ ४०॥
तस्मात्लेमिंद्रियाण्यादौ निययं भरतर्षभ ।
पामांनं प्रजहि ह्येनं ज्ञान विज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥
हेभरतवंशिनमें श्रेष्ट ! तिससे तुम प्रथम इंद्रियोंको संयममें कर-
के स्वरूपज्ञान और विज्ञान जो भक्ति इनके नाशनेवाले इस काँम
पापीको निश्चय मारो॥४१॥
इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परंमनः ॥
मनसस्तु परा बुद्धियों वुद्धः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥
जो ज्ञान के विरोधीहैं उनमें विद्वान् लोग इंद्रियों को प्रवेल कहते हैं
इंद्रियोंसे मन प्रबलहै और मनसे बुद्धि प्रबलहे और जो"धुद्धिसे
प्रलह सो"वह कामनाहै ॥१२॥
एवं बुद्धेः परं बुद्धा-संस्तभ्यात्मानमात्मना ।।
जहि शत्रु महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥४३॥
चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (६३)
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगोनाम
तृतीयोऽध्यायः॥३॥
हे महाभुज अर्जुन ! ऐसे बुद्धिसे प्रबल स्वेच्छाचारी दुःसह कामना-
रूप शत्रुको जानके फिर मनको बुद्धिकरके रोकके इस शत्रु-
को मोरो ॥४३॥
इतिश्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता-
यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांतृतीयाध्यायप्रवाहः॥३॥
प्रकृतिसंसर्गी मुमुक्षु सहसा ज्ञानयोगाधिकारी नहीं होसकता
है इससे तीसरे अध्यायमें उसको कर्म करनाही उपदेशा तथा
ज्ञानयोगीकोभी कर्तृत्वत्यागपूर्वक कर्म करनाही उत्तम कहा और
जनसंग्रहके वास्ते भी कर्म करनाही श्रेष्ठ कहा. अब जो जगत्
उद्धारके वास्ते मन्वंतरके आदिमें इसी कर्मयोगका उपदेश किया था
उसीको इस चौथे अध्यायमें दृढ करते हैं. ज्ञानयोग भी इसीके
अंतर्गत है। इससे इसकी ज्ञानयोगाकारता दिखायके कर्मयोगका
स्वरूप और भेद तथा उसमें ज्ञानांशकी प्रधानता तथा इसीप्रसं-
गसे भगवदवतारनिश्चय भी कहते हैं ।
श्रीभगवानुवाच ।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तानहमव्यं धत् ।।
विवस्वान्मन॑वे प्राहं मनुरिक्ष्वाकवे वीत॥ १ ॥
श्रीकृष्णभगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि ओबह योग मैंने तुमसे
कहा सो केवल अब युद्धोत्साह बढानेको तहस नहीं कहा
इसको कल्पकी आदिमें भी कहा है सो सुन धाम इस अव्यय
कर्मयोगैंको सूर्यसे कहतार्भया सूर्य वैवस्वत महसकहतेभये मैंनु
इक्ष्वाकुसे कहतेभये ॥१॥
(६४)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ॥
सं कालेनेह महता योगो नष्टः परंतपं ॥२॥
ऐसेही परंपरासे प्राप्त इसको राजऋपि जानतेभये हेपरंतप ! सो यह
योग इससमयमें बहुत कालकरके नष्टंभया था॥२॥
संएवाऽयं भया 'तेऽयं योगः प्रोक्तः पुरातनः॥
भक्तोसि "से सखाँ चे "ति रहस्यं ह्येतदुत्तमम ॥३॥
सोई येह पुरातन योग मैंने तुम्हारेसे आज कहाँ क्योंकि तुम
मेरे भक्त और सखौ हो" यह उत्तम रहस्य है ॥३॥
अर्जुन उवाच।
अपरं भवतो जन्मे परं जन्म विवस्वतः ॥
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥ ४॥
ऐसे सुनिक अर्जुन कहने लगेकि, तुम्हारा जन्म अभी भैया विव-
स्वानका जन्म प्रथमर्भया तुम आदिमें उनको कहतेभये ऐसे
इसको हम कैसे जानें ॥४॥
श्रीभगवानुवाच।
बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तवं चाँर्जुन ।
तान्यहं वेझिं सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥
अर्जुनके प्रश्नका श्रीकृष्ण भगवान् उत्तर देते हैं इसमें आपके
अवतारका भी प्रयोजन कहेंगे सो ऐसे कि, हे परंतप ! याने शत्रुनको
संतापित करनेवाले अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत जन्म व्यतीतभयेहैं
उन सवैको "मैं जानताही तुम नहीं जानतेहो ॥५॥
अजोर्पि सँन्नव्ययात्मा भूतानांमीचरोपि सन् ॥
प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥
चतुर्थः ४.] : सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (६५) यहां कारण यह है कि, मैं अविनाशी सर्वांतर्यामी हूं सर्वभूतोंका भी ईश्वर भयाहुवा तथा अजन्मा भयाँहुवा भी मेरो स्वभाव जो सौशील्य वात्सल्य शरणागतरक्षकत्व इत्यादिक तिसको आश्रितकरके याने उ- स स्वभावहीसे आपके ज्ञानसहित अवतारलेताहूं जीवको ज्ञान नहीं रहताहै मेरा ज्ञान अखंडहै मैं केवल स्वभक्त स्वसेतुरक्षणार्थ अवतार लेताहूं इसका कारण अगाड़ीके श्लोकोंमें है ॥६॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥ हे भारत ! जब जब निश्चयपूर्वक धर्मकी हानि अधर्मकी वृद्धि होती है तब मैं" रूपको धारणकरताहूं ॥७॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ॥ धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥ ८॥ जो स्वस्वभावसे अवतार कहा वह स्पष्ट करतेहैं धर्महानि अधर्म- द्धि देखके मैं साधुनके संरक्षणके वास्ते और दुष्ट के विनाशके वास्ते युग युगमें धर्मस्थापनके वास्ते अवतार लेताहूं ॥८॥ जन्म कर्म च मे दिय॑मेवं यो वेत्ति तत्त्वतः॥ त्यक्त्वों देह पुनर्जन्म नै "ति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥ हे अर्जुन ! मेरे जन्म और कर्म दिव्य याने प्राकृत नहीं हैं ऐसे जो निश्चयकरके जानता है सो" देहेको त्यागिके फिरिके जन्में नहीं लेता है अर्थात् मेरे को प्राप्तहोताहै ॥ ९ ॥ वीतरांगभयक्रोधा मन्मयों मामुपाश्रिताः॥ बहवो ज्ञानंतपसा पूतां मविमागताः ॥ १० ॥ N 1 (६६) भगवद्गीता। [ अध्यायः- व्यतीत भये हैं सांसारिक अनुराग भय और क्रोध जिनके तथा सर्वत्र मेरेहीको जानते हैं और जो मेरे ही आश्रितहैं ऐसे बहुत मेरे स्व- रूपज्ञानरूप तपकरके पवित्रंभयेहुये मेरी सहर्शताको प्राप्तभये हैं।॥१०॥ ये यथां मी प्रपद्यते तास्तथैर्वं भजाम्यहम् ॥ मम वत्मानुवर्त्तते मनुष्याः पार्थं सर्वशः ॥ ११ ॥ हे पृथांपुत्र अर्जुन ! सर्व मनुष्य ममवर्त्म याने जो जो सकामनिष्का- ग वेदमें मार्ग कहहैं वे मेरेही कहे मार्ग हैं. उन्हीं मांर्गोके आश्रित कर्मक- रंतहैं तहां जो मेरेको जैसे भजतेहैं मैं उनको धैसे ही भेजता हूं; याने जो सकाम इंद्रादिरूप मेरेको भजतेहैं उनको 'तदेवाग्निस्तत्सूर्य अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता' इत्यादि प्रमाणसे इंद्रादिलोक पुत्रादिकाम- ना देता हूं और जो निष्काम मेरेको सर्वेश्वर जानके सर्वकर्म 'कायेन वाचा मनसेंद्रियैवी' इत्यादि प्रमाणोंसे मेरे अर्पण करतेहैं उनको मेरे स्वरूपवैभवको प्राप्त करताहूं ॥ ११ ॥ कांक्षतः कर्मणां सिद्धिं यजंतं इह देवताः॥ क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥ १२ ॥ जो काँकी सिद्धिकी इच्छा करतेभये इस लोकमें देवताओंका यजन करतहैं उनकी निश्चयकरके शीघ्र मनुष्यलोकमें कर्मसे उत्पन्न सिद्धि होती है ॥ १२॥ चातुर्वयं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः॥ तस्य करिमपि मां विद्धयकतारमव्ययम् ॥ १३ ॥ गुणकर्मविभागसे जाने सत्त्वगुणप्रधान ब्राह्मण उनके शमदमादि कर्म सत्वरजःप्रधान क्षत्रिय उनके शूरत्वादि कर्म रजस्तमः प्रधान वैश्य १५ १७ ११ १२ १४ १६ चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (६७) उनके कृषिवाणिज्यादि कर्म तम प्रधान शूद्र उनके परिचर्यात्मक कर्म ऐसे गुणकर्मविभागकरके चातुर्वर्ण्य यह संसार मैंने सृर्जा है उसका अविनाशी कर्त्ता भी मेरेको अती जानो ॥१३॥ नं माँ कर्माणि लिम्पति न मे कर्मफले स्टहाँ ॥ जो प्रथम कहा कि, मेरेको अकर्ता जानो उसका कारण कहतेहैं सो ऐसा कि, मेरेको कर्मफलेमें इच्छा नहीं इससे मेरे कर्म नहीं लिप्तहोतेहैं ऐसा मेरेको" जो" जानती है सो काँकरके नहीं बंधती है।॥ १४॥ ऍवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूरपि मुमुक्षुभिः॥ कुरुकमा तस्मात्त्वं पूर्वः पूर्वतरं कृतम् ॥ १५ ॥ पूर्वसमयके मनु इत्यादिक मुसुक्षुजनोंने भी ऐसें जानके कर्म कियाँ है तिससे तुम पूर्व मुमुक्षु करके पूर्वकालमें किये भये कर्म हो को करो॥ १६॥ कि कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यंत्र मोहिताः। तत्ते कर्मप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञौत्वा मोक्ष्यसेऽशुभीत् १६ कर्म क्या है और अकर्म क्या है. ऐसे इसविषयमें कविजन भी मोहते भये सो" कर्म मैं तुम्हारेको कहूंगी जिसको जानके संसार मुक्त होगे ॥१६॥ कर्मणो ह्यापि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ॥ अकर्मणश्चं वोव्यं गहनों कर्मणो गतिः॥ १७॥ जिसवास्ते कि, कर्म याने करने योग्य कर्म उसका रूप भी जाना चाहिये और विकर्म जिस एककर्मों विविध प्रकार है उसका रूप भी जानना चाहिये और अकर्म जोनिश्चयात्मक बुद्धिकरके केवल ई-धामा .
(६८)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
धनार्थ निष्काम कर्म उसकाभी रूप जानना चाहिये इसवास्ते कर्मकी
गति दुर्गम है ॥ १७॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येदैकमणि चं कर्म यः॥
सं बुद्धिमान्मनुष्येषु से युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८॥
अब कर्म और अकर्मका स्वरूप जानना कहतेहैं जो प्रारंभित
कर्ममें अकर्म याने आत्मज्ञान देखे याने इस निष्कामकर्महीसे ज्ञान
होयगा इससे यह ज्ञानही है और जो मनुष्य अकर्म जो आत्मज्ञान
उसमें कर्म याने यह कर्मसे भया कर्म ही है ऐसा देखनेवाला मनुष्य
मनुप्योंमें बुद्धिमान है सो योगी और सोई .सर्वकर्मोंका करने-
वाला है ॥ १८॥
यस्य सर्वे समारंभाः कामसंकल्पवर्जिताः ॥
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडित बुधाः ॥ १९ ॥
जो कर्म प्रत्यक्ष कररहेहैं उसकी ज्ञानाकारता कैसी होगी सो कहते
हैं सो ऐसी कि, जिसके सैव लौकिक वैदिककाँके आरंभ कामना सं-
कल्परहित हैं ज्ञानरूप अग्निकरके दग्धभयेहैं बंधक कर्म जिसके उसको
विद्वान्जन पंडित कहतेहैं ॥ १९ ॥
त्यक्त्वा कर्मफेलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रयः॥
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैवं किंचित् करोति सः ॥२०॥
जो कर्म फलेका संबंध छोड़के निरंतर आत्मस्वरूपहीमें तृप्त
नश्वर संसारके आश्रयरहित कर्म में प्रवृत्त भी है तोभी सो कुछ नहीं
करती है ॥२०॥
निरोशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति" किल्विपम् ॥ २१ ॥
चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (६९) जो कर्मफलकी आशारहितचित्त और मन जिसका संयममें हो जिसने परमात्मप्रीतिविना और सर्व उपासना त्यागी हो सो केवल शरीरसंबंधी कर्मको करताभया कर्मबंधनरूप पीडाँको नहीं प्राप्तहोता है ॥२१॥ यदृच्छालामसंतुष्टो द्वंद्वातीतो विमत्सरः॥ समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥ २२॥ जोआपही आयमिले इतनेही लाभसे संतुष्ट हो और जो सुखदुःख लाभालाभ जय पराजय हर्ष शोक इत्यादिक द्वंद्रोंकरके रहित होये मत्सर जो दूसरेका मुख न सहना उसकरके रहित कार्यकी सिद्धि और असिद्धिमें समबुद्धि सो कर्म करके भी नहीं बंधनपावै ॥२२॥ गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः॥ यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥ २३॥ निवृत्तभयाहै आत्मानंदविना संग जिसका और संसारवासनारे मुक्त है और आत्मज्ञानमें अवस्थित है चित्त जिसका. सो जो यज्ञके अर्थ कर्म करे तो उसके बंधनकारक सर्व प्राचीन कर्म नाश होतेहैं।।२३। ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुर्तम् ॥ ब्रह्मैव तेन गंतव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥ निष्कामकर्मसे ज्ञान होताहै इस भेदसे कर्मकी ज्ञानाकारता कही अब परमात्माके अनुसंधानसे उसी निष्कामकर्मकी ज्ञानाकारता कह तेहैं सो ऐसे कि, जिसकरके हव्य अर्पणकरते हैं वह सुवादिक वस्तु ब्रह्म है याने ब्रह्महीका कार्यहै घृतादिक हव्य भी ब्रह्महीहै ब्रह्मरूप अग्नि यह ब्रह्मरूप हव्य ब्रह्मरूप होताकरके होमाजातीहै ऐसे यह सर्व ब्रह्मरू पहै तिस ब्रह्मकर्मनियमकरके ब्रह्मही प्राप्त होनेयोग्य है ॥२४॥ दैवमेवापरे' यज्ञं योगिनः पर्युपासते॥ .
. (७०) भगवद्गीता। [अध्याय:- ब्रह्माग्नापरे यज्ञं यज्ञेनैवोपैंजुह्वति ॥ २५ ॥ ऐसे कर्मयोगकी ज्ञानाकारता कहके अब कर्मयोगके भेद कहतेहैं अपरे 'भकारो वै विष्णुः' इस श्रुतिप्रमाणसे जो विष्णुपरायण हैं वे योगी देवयज्ञही याने प्रतिमापूजनरूप यज्ञ करतेहैं इनसे और भी ऐसही योगी ब्रह्मात्मक अग्निमें यज्ञंसाधन सामग्रीकरके हवनात्मक यही को हवन करतेहैं ॥२२॥ श्रोत्रांदीनींद्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुहति ॥ शब्दादीविषयानन्ये इंद्रियाग्निषु जुहति ॥ २६॥ और कितने योगी श्रोत्रादिक इंद्रियोंको संयमरूपं अग्निमें होमतेहैं अर्थात् श्रोत्रादिकोंको हरिकीर्तिश्रवणादिकहीमें युक्त करतहैं और कि- लेनेक शब्दाँदिकविषयोंको इंद्रियरूप अग्निमें होमते हैं याने हरिकी- नविना और श्रवणादिक नहीं करतेहैं ॥२६॥ सर्वाणींद्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ॥ आत्मसंयमयोगानौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥ और कितने योगी सर्व इंद्रियनके कर्मोंको और प्रोणोंके कर्मीको ज्ञानकरके प्रदीप्त ऐसे मनके संयमरूप अग्निमें होमतेहैं अर्थात् मनकर- के इंद्रिय प्राण कर्म वृत्तिनको संसारविपयसे निवारणकरके आत्मज्ञान- में लगानेका यत्न करतेहैं ॥२७॥ द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तापरे ॥ स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयःशंसितव्रताः ॥ २८ ॥ और कितने योगी द्रव्यसे यज्ञकरतेहैं. याने दानादिक करतेहैं. कि- तनेक उपवासादि तपरूप यज्ञ करतेहैं. तसेही और कितनेक पुण्यक्षे- चादिक वासरूप योग करते हैं और कितने हूँढवती यती याने यत्नशील वे वेदाध्ययन वेदार्थविचाररूप यज्ञ करतहैं ॥२८॥ ' - चतुर्थः ४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (७१) अपने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपान तथा परे । प्राणापानगती सुद्धा प्राणायामपरायणाः ॥ २९ ॥ अपरे नियंताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुट्ठति ॥ सर्वेऽयेते" यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ३० ॥ यज्ञशिष्टाऽमृतभुजो याति ब्रह्म सनातनम् ॥ नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम३१।। और कितनेक कर्मयोगी प्रमाणसे आहार करनेवाले जैसे कि, आधा पेट अन्नसे भरे चौथाई जलसे और चौथाई वायुसंचारनिमित्त खाली राखै ऐसे और प्राणायाम परायण हैं ऐसे योगी अपानवें प्राणको होमतेहैं याने पूरक करतेहैं; तैसेही कितनेक प्राणवायुमें अपानको होमतेहैं याने रेचक करतेहैं. ऐसेही और प्राण अपान दोनोंकी गति को रोकके प्रोणोंको प्राणनही में होम तेहैं याने कुंभक करतेहैं; इतने ये सर्व भी यज्ञके जाननेवाले यज्ञकरके पापरहित यज्ञ- हीका शेष अमृतरूप अन्नके खानेवाले सैनातन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं. हे कुरुवंशिनमें श्रेष्टुं अर्जुन! जो यज्ञ नहीं करताहै उसको यह लोकभी नहीं है और परलोक तो कैसे होयगा ॥ २९॥३०॥३१॥ एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुंखे ॥ कर्मजान्विद्धि तान्सानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥३२॥ ऐसे बहुतै प्रकारके यज्ञ ब्रह्मके मुंखमें याने वेदमें विस्तारसे कहहैं उन सबको कर्म जानो याने वे कर्महीसे होते हैं, ऐसे जानिके कर्म करके मुक्त होवोगे ॥३२॥ श्रेयोन्द्रव्यमयांद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप ॥ सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ हे परतपः! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञै श्रेष्ठ है, कारण कि द्रव्य-
(७०)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
यज्ञकाभी फल ज्ञानही है हे पार्थ ! फलँसहित सर्व कर्म ज्ञान में समाप्त
होताह याने इस ज्ञानहीके वास्ते यज्ञ करतेहैं ॥३३॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवयाँ ।
उपदेक्ष्यति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥
सो ज्ञान तत्त्वदर्शी ज्ञानीजन तुमको उपदेशेंगे तुम उनकी सेवा
करके और सत्कारपूर्वक नमस्कार करके उनसे प्रश्न करके
जानो। यहां श्रीकृष्णभगवानने केवल ज्ञानीजनोंकी प्रशंसानिमित्त
यह वाक्य कहाहै और " अविनाशि तु तद्विद्धि” यहांसे लेके "एपा
तेभिहिता सांख्ये” यहां पर्यंत ज्ञान उपदेश तो करही चुकेहैं ॥ ३४ ॥
यज्ज्ञात्वा न पुर्नर्मोहवं यास्यसि पांडव ॥
येनं भूतोन्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥ ३५॥
हे पांडुपुत्रं ! जिस ज्ञानको जानिके ऐसे मोहको फिर नहीं प्राप्त
होगे. जिसज्ञानकरके सर्व भूतप्राणिमात्रको औपसदृश देखोगे.
जैसे कि, प्रकृतिसे भिन्न ये परज्ञानाकारतासे सर्वसमान हैं आपसंदेश
देखे पीछे फिर मेरेसमान देखोगे याने ज्ञान प्राप्तभये जीव मेरी समता-
को प्राप्तहोतेहैं सो आगे कहेंगेभी “ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्य
मागताः॥” यहां ब्रह्मसूत्र भी प्रमाणहै "भोगमात्रसाम्यलिंगाच" ऐसे
ही श्रुतिभी प्रमाण है "तथा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमां शां.
तिमुपैति ॥” इत्यादिप्रमाणोंसे नामरूपरहित याने सूक्ष्मावस्थामें आ-
स्मा और परमात्माकी स्वरूपसमता निश्चय होतीहै ॥ ३५॥
अपि चेदर्सि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः॥
सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ॥ ३६ ॥
जो कि, सर्व पापिनसे भी तुम बड़े पापकारक होउगे तो भी इस
ज्ञानरूप नौका करकेही संब दुःखसमुद्रको तरोगे ॥ ३६ ॥
(७३) चतुर्थः ४.]. सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ॥ ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥ ३७॥ हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि इंधनेको समयभस्मकरताहै तैसे विज्ञानरूप अग्नि सर्वकर्मबंधनको समग्र भस्मकरताहै ॥ ३७॥ न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह वियते ॥ तस्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विदेति ॥ ३८॥ इसलोकमें निश्चयकरके ज्ञान के सदृश पवित्र नहीं है उस ज्ञानको कुछकाल कर्म करते करते कर्मयोगसे सिद्धिभयाहुँदा ऑपहीमें आप ही प्राप्तहोताहै ॥ ३८॥ श्रद्धावॉल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेंद्रियः ॥ ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति ॥ ३९ ॥ ज्ञानप्राप्तिमें लगांभया इंद्रियोंको संयममें कियेभये श्रद्धावान पुरुष ज्ञानको प्राप्तहोते हैं उसज्ञानको पाईके थोड़ेहीकालमें परमशांति को प्राप्त होताहै ॥ ३९॥ अश्विाऽश्रद्दधाना संशयात्मा विनश्यति ॥ नायं लोकोस्ति न परो सुखं संशयात्मनः॥४०॥ जो अज्ञानहै और ज्ञानप्राप्तिमें श्रद्धाको भी नहीं धारण कियेहैं और मनमें संशय रखताहै सो नष्टभ्रष्ट संसारमें भ्रमताहै जिसके मनमें संशय है उसको यह लोक सुखदायक नहीं है परलोक भी नहीं है उसको कहीं भी सुख नहीं है ॥४०॥ योगसंन्यस्तंकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ॥ आत्मवंतं न कर्माणि निवघ्नति धनंजय ॥ ४१ ॥ हे अर्जुन ! परमेश्वराराधनरूप जो निष्काम कर्मयोग उस योगकरके
(७४)
भगवद्गीता।
[ अध्यायः--
परमात्माके अर्पण कियेहैं कर्म जिसने और ज्ञानकरके संछिन्नभये हैं
संशय जिसके ऐसे स्थिरचित्त ज्ञानीको कर्म नहीं बंधनकरतेहैं ॥४१॥
तस्मांदज्ञानसंभूतं हृत्स्यं ज्ञानांसिनात्मनः ॥
छित्त्वैन संशयं योगैमौतिष्टोत्तिष्टं भारत ॥४२॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां
योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यास-
योगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
हेभरतवंशोत्पन्ने अर्जुन ! तिससे जो अज्ञानसे उत्पन्न तुम्हारे हृदय-
में स्थित ऐसे इस आपके संशयको ज्ञानखंगसे छेदनकरके उठो
और कर्मयोगमें प्रवृत्त होउ याने क्षत्रियका कर्म युद्ध करो ॥ ४२ ॥
इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता-
यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यां चतुर्थाऽध्यायप्रवाहः ॥ ४ ॥
अर्जुन उवाच।
संन्यासं कर्मणां कृष्णं पुनर्योगं च शंसँसि ॥
यच्छ्रेय एतयोरेक तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥ १ ॥
श्रीकृष्णको अर्जुन पूंछते हैं कि, हे कृष्ण! कर्मोंको संन्यास जो ज्ञान-
योग उसको और फिर कर्मयोगको कहतेहो इन दोनों में एक 'जो नि-
श्चय कियाभया श्रेष्ट होय उसीको मुझे कहो जैसे कि, दूसरे अध्याय
में कहा कि, मुमुक्षु प्रथम कर्मकरके अंतःकरण शुद्धभयेपर ज्ञानयोग
करके आत्मदर्शनका उपायकरे तीसरे चौथेमें ज्ञानीको भी कर्म करना
ही श्रेष्ठ कहा, ऐसे दोनों कहते हो जो इन दोनों में श्रेष्ट हो सोई कहो।।१॥
श्रीभगवानुवाच।
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसंकरावुभौ ॥
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २ ॥
३ पंचमः ५.11 सान्वय-अमृततरंगिणीभा० टी०। (७५) जब अर्जुनने प्रार्थना की तब श्रीकृष्ण भगवान बोले सो ऐसे कि, संन्यास जो कर्मका त्याग और कर्मयोग ये दोनों कल्याणकारक हैं. तिनमेंसे भी कर्मके त्यागसे कर्मयोग विशेष श्रेष्ठ है ॥२॥ ज्ञेयः सँ नित्यसंन्यासी यो नै टेष्टिं ने कांक्षति ॥ निद्वंद्वो हि" महाबाहो सुखं बंधात्प्रमुच्यते॥३॥ हे महाबाहो ! जो न कोई वस्तुसे द्वेष करै, न चाहनाकरै, से सुखदुःखादि द्वंदरहित नित्यसंन्यासी जानना वह सुखपूर्वक निश्चय बंधनसे मुक्त होताहै ॥३॥ सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदंति नं पंडिताः॥ एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोविंदते फलमें ॥४॥ जो मुर्ख हैं वे सांख्ययोगोंको याने ज्ञानकर्मोंको न्यौरे कहतेहैं पंडित नहींकहतेहैं. इन दोनोंमेंसे एकमें भी अच्छीतरहसे स्थितरहाभया दोनोंके फलेको पाता है ॥४॥ यत्साँख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यो गैरपि गम्यते ॥ एक सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥५॥ जो स्थान ज्ञानकरिके प्राप्तहोता है सोई कर्मकरिकेभी प्राप्तहो- ता है। इससे ज्ञानेको और कर्म को जो एक जानताहै, सो जानता है याने विद्वान् है ॥५॥ संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः॥ योगयुक्तो मुंनिब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति ॥६॥ हे महाबाहो! यह संन्यास कर्मविना प्राप्तहोनेको दुर्गम है याने होने- (७६) भगवद्गीता। [अध्याय:- हीका नहीं और जो कर्मयोगयुक्त आत्मज्ञानमें मैंनलगाये है सो थोड़ेही बालमें नहाँको प्राप्तहोताहै ॥६॥ योगेयुक्तो विशुद्धांत्मा विजितात्मा जितेंद्रियः॥ सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥७॥ जो कर्मयोगयुक्त है याने निष्काम कर्म करताहै और वाणी जिसकी शुद्ध है याने वाणीसे हरिकीर्तन करताहै और मन शुद्ध है याने मनसे हरिस्मरण करताहै और जितेंद्रिय है याने इंद्रियविषयको श्रेष्ठ नहीं जा- नता है और सर्वभूतप्राणीका आत्मा अंतर्यामीमें है आत्मा मन जिसका सो पुरुप कर्म करताभया भी नहीं लिप्त होता है ॥७॥ नै व किंचित्करोमीति" युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ॥ पश्यञ्छृण्वन्स्टैंशञ्जिवनश्नन्गच्छन्स्वपञ्फुसँन् ॥८॥ प्रलेपन्विसृजन्गृह्णन्मिपन्निमिपन्नपि ॥ इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्त्तत इति धारयन् ॥९॥ इंद्रियनके विषयों में इंद्रियां वर्तमान रहती हैं ऐसे धारणकरेभये त- त्वज्ञानी कर्मयोगी देखता, सुनती, स्पर्शता, सूर्धता, खाती, चलता, सोता, श्वासलेता, बोलता, छोड़ता, पकरता, नेत्रखोलता, मीचंता भयोभी मैं कुछ भी नहीं करताहूं ऐसे मानताहै ॥ ८॥९॥ ब्रह्मण्याधायें कर्माणि संगं त्यक्त्वा करोति यः ॥ लिप्यते न सं पापेनं पापत्रमिवाभसा ॥ १० ॥ जो शरीरमें याने शरीरस्थ इंद्रियने में कौको धारणकरके याने कर्मकरनेवाली इंद्रियां है ऐसे जानिके कर्मफलासक्तिको त्यागिके कर्म. करताँ हैं सो पापकरके नहीं लिप्त होताहै, जलकरके कमलप- सरीखा ॥ १० ॥ " ॥
पंचमः ५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०। (७७) कायेन मनसा बुद्धयाँ केवलैरिं द्रियैरपि । योगिनःकम कुर्वति संगं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११ ॥ जो योगी हैं वे फलसंग त्यागिके आत्मशुद्धिके वास्ते याने आत्म- गत प्राचीन कर्मबंधन छूटनेके वास्ते शरीरकरके, मनकरके, बुद्धि- करके, केवल इंद्रियोंकरके भी कर्म करते हैं ॥११॥ युक्त कर्मफेलं त्यक्त्वा शांतिमाप्नोति नैष्टिकीम् ॥ अयुक्तः कामकारेण फैले सक्तो निबद्धयते ॥ १२ ॥ युक्त याने आत्मज्ञान योगयुक्त पुरुष कर्मफलको त्यागिके ईश्वर- निष्ट शांतिको प्राप्तहोताहै जो आत्मज्ञान योगरहित है सो यथेष्ट करण- करके फलविषे आँसक्तभया ऐसा जो जीव सो बैदहोय ॥ १२॥ सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वेशी ॥ नवद्वारे पुरे देही कुर्वन्न कारयन् ॥१३॥ वशी याने जिसका चित्त वंशहै ऐसा देही देहधारी जीव सो नवदार- का पुर जोदेहँ तिसमें मनसे सब कौंको स्थापितकरके न करतों ने करीता भया सुखे जैसे होय तैसे ही रहता है ॥ १३॥ न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः॥ न कर्मफलंसंयोग स्वभाँवस्तु प्रवर्त्तते ॥१४॥ प्रभु याने अविनाशी आत्मा लोक जो देवादिक शरीर तिसकाने कपिन नं कर्म न कर्मफलके संयोगको सिरजंताहै क्योंकि, यह स्वभाव याने अनादिकाल प्रकृतिसंसर्गकी वासना प्रवृत्त है ॥ १४॥ नार्दत्ते कस्यचित्पापं ने चैव सुकृतं विभुः ॥ अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यति जंतवः ॥ १५॥ जैसे कि, कर्तृत्व और कौको नहीं उत्पन्नकरताहै इसीसे यह जी- १३
"
(७८)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
वात्मा किसी शरीरसंबंधी पापको भी नहीं ग्रहणकरता है और सुकृत
को भी नहीं ग्रहणकरता है क्योंकि, जिनका ज्ञान अज्ञानकरके ढके-
रहाहे उस करके वे जीव मोहको प्राप्त होतेहैं याने अज्ञानकरके देहा-
दिकमें आसक्ति और उससे दुःख होताहै ॥ १५॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ॥
तेपामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परमैं ॥ १६ ॥
परंतु जिनका आत्मसंबंधी ज्ञानकरके वह अज्ञान नष्ट याहै उनका वह
श्रेष्टं ज्ञान सूर्यसहशै प्रकाश करताहै याने वे संसारदुःखरहित मुक्तहैं १६
तंबवयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ॥
गच्छंत्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिधूतकल्मषाः ॥१७॥
उस आत्मज्ञानहींमें है बुद्धि जिनकी उसीमें है मन जिनको उसीमें
है निष्ठा जिनकी और वही है श्रेष्ठस्थान जिनका इसतरहसे ज्ञानकरके
नष्ट भये हैं मनके विकार जिनके वे पुरुष मुक्तिको पावतेहैं।॥ १७॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ॥
शुनि चैवं श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः ॥ १८॥
विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें, गऊँमें, हाथीमें और कुत्तेमें और
चांडाल में भी पंडितजन समदर्शी होतेहैं याने आत्माको आपसहश
जानते हैं ॥ १८॥
इहैव तैर्जितः सर्गों येषां साम्ये स्थितं मनः ॥
निदोपं हि" समं ब्रौ तस्माद्रीणि ते स्थिताः १९॥
जिनका मन ऐसी समतामें स्थितहै उन्होंने इही ही संसार जीता
है. जिसवास्ते कि, ब्रम निपि सर्वत्र समान है ति सीसे वे ब्रह्माप्ति-
निमित्त स्थित हैं ॥ १९॥
पंचमः५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी। (७९) नं प्रहष्येत्प्रियं प्राप्यं नोदिजेत्प्राप्य चांप्रिंयम् ॥ स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्राँणि स्थितः॥२०॥ प्रियवस्तुको पायके हर्षना नहीं और अप्रियको पायके व्याकुल न होना; ऐसा स्थिरबुद्धि, विचारशील ब्रह्मेका ज्ञाता ब्रह्मप्राप्तिनिमित्त स्थितहै ॥२०॥ बाह्यस्पर्शष्वसत्तात्मा विदत्यात्मनि यत्सुखम् ।। सँ ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१ ॥ जो शब्दादिक विषयोंमें अनासक्तभयाहुंआ जो आत्मामें सुखको पार्वताहै सो ब्रह्मप्राप्ति उपायचित्तवाला पुरुष अक्षय सुखको पावताहै याने मोक्ष पाताहै. ॥२१॥ यहि संस्पर्शजा भोगा दुःखयो य एंव ते॥ आँधंतवंतः कौंतेयं न तेषु रमते बुधः ॥ २२ ॥ हे कुंतीपुत्र! जे शब्दस्पर्शादिक भोग हैं वे दुःखके कारण आयत- वंत याने होतेजाते रहते हैं अर्थात् अल्पसुख हैं इस निश्चयंसे उनमें पंडितजन नहीं रमते हैं ॥२२॥ शक्नोती है यः सोढुं प्राक् शरीरविमोक्षणात् ॥ कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तःस सुखी नरः॥२३॥ जो मनुष्य कामक्रोधके वेगको शरीरसे निकलने के प्रथम उस वे. गको सहनेको सकताहै सो योगी है सो मनुष्य इसे ही लोकमें सुखीहै ॥२३॥ योतःसुखोऽतरारामस्तथांतज्योतिरेवं यः ॥ सँ योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥२४॥ जो आत्माहीमें सुखी और आत्माहीमें है विश्राम जिनको तैसे (८०) भगवद्गीता। | अध्याय:- ही जो अंतज्योति याने आत्मज्ञान ही करके प्रकाशितहै सोई योगी ब्रह्मप्राप्ति उपायतत्पर ब्रह्मवत् मुक्तिको प्राप्तहोताहै ॥ २४॥ लभंते ब्रीनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ॥ छिन्नद्वैधा यंतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥ जिनके लाभ अलाभ सुखदुःखादिक दो दो उपद्रव नष्ट भयेहैं जिनका मन ईश्वरमें लगा है और सर्वभूतप्राणिमात्रके हितमें रहतेहैं इससे उनके पाप क्षीणं भयेहैं ऐसे ऋषिजन ब्रह्मसमान मुक्तिको पातेहैं ॥२५॥ कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ॥ अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥ नो कामक्रोधरहित हैं और ईश्वरप्राप्तिके यत्नकरनेवाले हैं और चित्त जिनके वैश हैं ऐसे आत्मज्ञानिनको सर्वप्रकारसे ब्रह्मसुर्ख वर्त- मान होरहाहै ।। २६॥ स्पेन्कृित्वा वहिर्वाह्यांश्चक्षुश्चैवांतरे (वोः॥ प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यंतरचारिणौ ॥ २७॥ यतेंद्रियमनोईद्धिर्मुनि र्मोक्षपरायणः ॥ विगतेच्छाभर्यक्रोधो यःसंदा मुंक्त एंव सैंः ॥२८॥ बाह्यइंद्रियोंके स्पर्श जो शब्दादिक विपय तिनको वौहर याने त्याग करके फिर भौंहोंके मध्य में दृष्टिको करके नासिकाके भीतरही संचार करें ऐसे प्राणापानोंको सैम करके जो मुनि याने मननशील पुरुप इंद्रिय, मन और बुद्धिको वश कर मोक्षहीमें आसक्त इच्छा, भय और क्रोधक- रके रहित होय सो"सदा मुक्तही है ॥ २७॥२८॥ भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ॥ सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वाँ मां शातिमृच्छति ॥२९॥ अब और भी अतिसुगम मुक्तिका उपाय कहतेहैं सर्व यज्ञऔर तपोका . षष्ठः ६.] .. सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (८१). भोक्ता सर्वलोकोंका महेश्वर याने लोकेश्वरोंका भी ईश्वर सर्वभूता- णिनका सुहृद ऐसा मेरेको जानिके भी मुक्तिको प्राप्तहोता है ॥२९॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतामूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो- नाम पंचमोऽध्यायः॥५॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां गीतामृततरंगिण्यां पंचमाध्यायप्रवाहः ॥५॥ अनाश्रितः कर्मफलें कार्य कर्म करोति यः॥ सँसंन्यासी च योगी च न निरैग्निर्न चाँक्रियः ॥१॥ कर्मयोग कहिके अब ज्ञानकर्मसाध्य आत्मदर्शनरूप योगाभ्यास कहतेहैं. तहां कर्मयोगकी अपेक्षारहित योगसाधनत्व दृढकरनेको ज्ञानाकार कर्मयोगको योगशिरोमणि कहतेहैं सो ऐसे कि, जो कर्म- फलको नचाहताभया स्ववर्णाश्रमोचित करनेयोग्य कर्मको करताहै सो संन्यासी है और योगीहै और जिसने अग्निकर्मको त्यागाहै सो संन्यासी और योगी नहीं है और जिसने क्रियाकर्मको त्यागाहै सोभी संन्यासी योगी नहींहै ।। यहां श्रीकृष्णका एक अभिप्राय औरभी दीखताहै कि, कलियु- गमें संन्यासका निर्वाह होगानहीं. क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि चंचल होगी. सो देखनेमेंभी आता है कि, जो घर छोड़ते हैं तो संन्यासी हके मठ बांधिके व्यापार करते हैं. जो स्त्री विवाहित नहीं तौ परस्त्री- गमन करते हैं. पुत्रोंकी जगह शिष्य करते हैं। ऐसेही औरभी सामान्यगृहस्थोंसे अधिक रखके केवल प्रपंचरत होते हैं इससे श्रीकृष्णने निष्कामकर्मकर्ताहीको संन्यासी योगी कहा है और अग्निकर्म तथा क्रियात्यागनेका निषेध किया है ॥ १ ॥ 1 ६ (८२) भगवद्गीता। [ अध्यायः- यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धिं पांडवे ॥ नै ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥२॥ अब कहेभये कर्मयोगमें ज्ञानभी दिखातेहैं. हेपांडुपुत्र ! जिसको संन्यास कहतेहैं उसको अभेर्दकरके योग जाँनो जिसवास्ते किं, कर्मफल संकल्प त्यागेविना कोईभी" योगी नहीं होता है. अर्थात् कर्मफलको ईश्वरार्पण कियेविना योगी संन्यासी होता नहीं. जो कर्मफलको ईश्वरार्पण करताहै वही योगी और संन्यासी है ॥ २ ॥ आरुरुक्षोर्मुनर्योग कम कारणमुच्यते॥ योगारूंढस्य तस्यैवै शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥ आत्मज्ञानकी प्राप्ति चाहनेवाले मननशीलको ज्ञानप्राप्तिकारण कर्म कहाँहै उसी ज्ञानप्राप्तंभयेको मुक्तिकारण संकल्पविकल्पत्या- गपूर्वक कर्म ही कहाहै ॥३॥ यदा हि नेंद्रियार्थेषु नै कर्मस्वनुपज्जते ॥ सर्वसंकल्पसंन्यासी योगीरूढस्तदोच्यते ॥४॥ जर्व ने इंद्रियोंके विषयनमें न काँमें आसक्तहोय तब सर्वसंक- ल्पोंका त्यागी योगारूढं कहाताहै इससे कर्मकरना अवश्यहै ॥ ४ ॥ उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ॥ आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥५॥ ऐसे आपके वश मनकरके आपको उद्धारकरना, आपका अव- सांद याने घात याने अधोगति नकरना. कारण कि, आपका मन ही आपका मित्र है और वह मन ही आपका शत्रु है ॥५॥ बंधुरात्मात्मनस्तस्य॑ येनात्मैवात्मना जिंतः ॥ अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥६॥ M षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८३) जिसने बुद्धिकरके निश्चय मन जीताहै उस जीवात्माँका मर्न मित्र है और जिसने मन नहीं जीताहै उसका मन ही" शव॑त्वमें शत्रुस- रखा होता है ॥६॥ जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः ।। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥७॥ शीत उष्ण सुख और दुःखमें तैसेही मान अपमानोंमें जीताह मन जिसने ऐसे शांतकी बुद्धि अतिशय परिपूर्ण रहतीहै ॥७॥ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेंद्रियः॥ युक्तं इत्युच्यते योगी समलोष्ठाश्मकांचनः ॥ ८॥ ज्ञान जो आत्मज्ञान विज्ञान जो विशेषज्ञान याने अनात्म आ- त्मविवेक इन करके जिसका मन तृप्त होय कूटस्थ याने सर्वशरी- रोंमें आत्माको समान जानिके निर्विकार इसीसे जितेंद्रियत्वसे जो ठीकरी पत्थर और सोना इनको सम जान रहाहै ऐसा योगी युक्त याने आत्मदर्शनयोगयुक्त कहाँताहै ॥ ८॥ सुहृन्मित्रायुदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु । साधुष्वपि च पापेएं समबुद्धिर्विशिष्यते ॥९॥ सुहृद् जो प्रत्युपकारविना हितकारक मित्रः परस्पर उपकारी अरि शत्रु उदासीन जो प्रीति वैररहित मध्यस्थ जो सर्वकाल प्रीति वैर समान द्वेष्य जो सदा ईर्षा करता होय सो जो सदाहितेच्छु सो बंधु जो. धर्मशील सो साधु और जो पापशील सो पापी इन सबों भी जो सम- बुद्धि होयं सो श्रेष्ट है ॥ ९॥ योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ॥ एकांकी यतचिंत्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥ एकही बैठा स्ववशचित्तमैनवाला सांसारिक आशारहित आत्म-
(८४)
भगवद्गीता ।
[..
विना परिग्रहरहित ऐसा योगी एकांतमें बैठाभया मनको निरंतर
त्मामें लगातारहै ॥ १०॥
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरैमासनमात्मनः ॥
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलोजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥
तत्रैकाँग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः॥
उपविश्यासने युज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥
अब योगाभ्यासमें आसननियम कहतेहैं. जैसे कि, पवित्र स्थानमें
न अति उंचा न अति नीचा कुशासनपर मृगचर्मादिक उसपर वस्त्र
ऐसा और थिरै आपकाँ आसन बिछोइके उस आसनपर बैठिके मनको
एकाग्र करके चित्त और इंद्रियोंके कर्म स्वर्वशकिये भया अपना
बंधन छुटनेके वास्ते योगको करें" ॥ ११॥ १२॥
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नंचलं स्थिरम् ॥
संप्रेक्ष्यं नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥
प्रशांतात्मा विगतभीब्रह्मचारिāते स्थितः॥
मनःसंयम्य मैच्चित्तोयुक्त आसीत मत्परः ॥१४॥
अव वैठनेका नेम कहतेहैं-काया जो मध्यशरीर शिर और ग्रीवा
इनको अचल थिर और सम राखेभये आपके नासिकाँग्रको देखिके
और और और नदेखताभया प्रशांतचित्त भयरहित ब्रह्मचर्यत्रंतमें
स्थित मेरेमें चिर्तलगाये भये मैंनको नियमितकरके आत्मनिष्ट पुरुप
मेरेमें लीनभयाहुआ बैठारहै ॥ १३॥ १४॥
युअन्नैवं सदात्मानं योगी नियतमानसः॥
शांतिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥
ऐसे नियममें मनहै जिसका ऐसा योगी ऐसेही सर्वकालमें मनको
मेरेमें लगातांभया आनंद है परम जिसमें ऐसी मेरेसदृश शांतिको
पविताह ॥ १५॥
षष्ठः ६.] १५ * सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८५) नात्यनंतस्तुयोगोऽस्ति न चैकाँतमनश्नतः॥ न चौतिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नै वे चौर्जुन ॥१६॥ अब योगीके आहारादिकोंका नियम कहतेहैं-जैसे कि, हे अर्जुन ! जो अति भोजन करताहै उसका योग नहीं सिद्धहोताहै; और जो कुछभी भोजन नकरै उसकाभी योग नहीं सिद्धहोताहै और अति- सोनेवालेका योग नहीं सिद्धहोताहै; और अतिजागनेवालेकौं भी योग नहीं सिद्धहोताहै ॥ १६॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वनाऽवबोधस्य योगो भँवति दुःखहा ॥ १७ ॥ जो आहार और स्त्रीप्रसंग प्रमाणमें करैगो " आहारका प्रमाण यह कि, आधापेट अन्नसे और चौथाई जलसे भरके चौथाई पवनसं- चारके वास्ते खाली राखै, स्त्रीप्रसंगप्रमाण यह कि, अतिकामकी इच्छा होनेसे स्त्रीसंग करै, जो कोई यहां शंका करै कि, योगीको तो ब्रह्म- चर्य कहि आये हैं-जैसे कि, इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें कहाहै सो सत्य है; परंतु "ऋतौभार्यामुपेयात्” इस श्रुतिप्रमाणसे ऋतु- समयमें स्त्रीप्रसंग करनेमेंभी एक ब्रह्मचर्य है; औरभी कहाहै कि, "इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तत इति धारयन् ॥ कर्मेंद्रियाणि मनसा निय- म्यारभतेऽर्जुन" इत्यादि तथा कहेंगे कि, " अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्" तो जो योगी स्त्रीप्रसंग न करेगा तो उसके कुलमें जन्म कैसे होगा ? इत्यादि प्रमाणोंसे योगी स्त्रीप्रसंग प्रमाणसे करे यह विहारशब्दका अर्थ सिद्धहै । ऐसेही कर्ममेंभी चेष्टा प्रमाणहीसे करै अति परिश्रम नकरना यहाँ भागवतका प्रमाणदेतेहैं "सिद्धेऽ- न्यथार्थे न यतेत तत्र परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः" ऐसा द्वितीयस्कंधके ܩܢ भगवद्गीता। [ अध्याय:- दूसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहाहै ऐसेही जो प्रमाणसे सोवै और प्रमाणहीसे जागै उसका दुःखनाशक योग सिद्ध होता है ॥ १७॥ यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ॥ निस्टहःसर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥१८॥ जब आत्माहीमें अतिनिश्चल चित्त लगरहताहै तब सर्वकामना- और निःस्पृहहुआभया वह पुरुष युक्त ऐसी कहाताहै ॥ १८॥ यथा दीपो निवातस्थो नेगते सोपमा स्मृता ॥ योगिनो यतचित्तस्य युंजतो योगमात्मनः ॥ १९ ॥ जैसे निवातस्थानमें धराभया दीपक नहीं हालता तथा डोलँताहै तसेही वाहै चित्त जिसका ऐसे योगके करनेवाले योगीके मनकी उपमा सोई कहीहै ॥ १९॥ यंत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ॥ यत्रं चै वात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥२०॥ योगसेवन करके विषयोंसे रोकाभया चित्त जहां विश्रामको प्राप्त होता है और जहां बुद्धिकरके आत्मस्वरूपको निश्चय करता भैया मन हीमें संतुष्ट होय ॥२०॥ सुखेमात्यंतिकं यत्तद्भुद्धिंग्राहामतींद्रियम् ॥ वेत्तिं यत्र न चैवाय स्थितश्चलैंति तत्वतः ॥ २१ ॥ जो इंद्रियोंके जाननेमें नआवै बुद्धिकरके ग्रहणकरनेमें आवै ऐसा अत्यंत सुखं उसको जिसयोगमें स्थितभयाहुँआ यह पुरुष जानहै ऐसा निश्चय और फिर आत्मस्वरूपसे न चलायमान होय ॥२१॥ यं लब्ध्वा चाऽपरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ॥ यस्मिन्स्थितो नै दुःखेनै गुरुणापि धिचाल्यते ॥२२॥ -- -
१२१
षष्ठः ६.]
(८७)
सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
जिसको पायके फिर उससे अधिक श्रेष्ठं लाभ नहीं मानताहै जिसमें
प्रैवर्त भौरी भी दुःखकरके नहीं थेंबराताहै ॥२२॥
तं विद्याहुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ॥
संनिश्चयेनयोक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३॥
उसको दुःखसंयोगवियोगकारक योगनालक जानना सो योग
निर्विकल्पचित्तसे निश्चयकरके करनेही योग्य है ॥ २३ ॥
संकल्पप्रभवान्कामांस्त्या सर्वानशेषतः ॥
मनसैवेंद्रियग्राम विनियम्य समंततः ॥ २४ ॥
शनैःशनैरुपरमेत् बुद्धया धृतिगृहीतया ॥
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा . किंचिदपि चिंतयेत् ॥२५॥
स्पर्शजन्य और संकल्पज ऐसे भेदसे कामना दोप्रकारकी
तिनमें स्पर्शज शीत उष्णादिक, संकल्पज पुत्रवित्तादिक इनमें स्पर्श-
जका त्याग स्वरूपसे नहींहोसकता इससे संकल्पज सर्व कामनाओंको
समग्रतासे मनहीसे त्यागि के सर्व इंद्रियोंको सर्वत्र से नियमित करके
विवेकशुद्ध वुद्धिकरके धीरे धीरे विश्रामको प्रातहोना फिर मनको
आत्मस्वरूपमें स्थिर करके आत्मस्वरूपविना किसीकाभी न
चितवनकरना ॥ २४ ॥२५॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चंचलमस्थिरम् ॥
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येवें वैशं नयेत् ॥ २६ ॥
यह मन चंचल है इसीसे आत्मस्वरूपमें थिर नहीं रहताहै. सो
यह मैन जहां जहां लगै तहांतहां से इसको फिरायके आत्मस्वरूपे-
"हीमें लगाना ॥२६॥
प्रशांतमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ॥
उपैतिशांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम् ॥ २७ ॥
भगवद्गीता। [ अध्याय:- कारणे कि, जिसका मन आत्मस्वरूपमें स्थिर है उसीसे उसका रजोगुणभी नष्टंभयाहै, उससे वह निष्पापहै, उससे वह आपके स्वपमें स्थिरहे ऐसे इस योगीको उत्तम याने आत्मानुभवरूप सुखै. प्राप्त होताहे ॥२७॥ गुंजन्नेवें संदात्मानं योगी विगतकल्मषः ॥ सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमँत्यंत सुखमश्नुते ॥ २८॥ ऐसे निष्पाप योगी इसीतरह सर्वदा मनको स्वरूपज्ञानमें युक्त करताकरता ब्रह्मानुभवरूपं अत्यंत सुखको सुखेसे पावताहै ॥२८॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ॥ ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र संमदर्शनः ॥ २९ ॥ सर्वत्र शत्रुमित्रादिकोंमें समदृष्टियोग जो "द्वासुपर्णासयुजा सखा- या" इस श्रुतिप्रमाणसे सखित्वरूप संयोग उसमें लगायाहै मन. जिसने सो आपरूपको आकाशादि सर्वभूतोंमें स्थित और उनका आकाशादि सर्वभूतोंको आँपमें देखताहै ॥ २९ ॥ यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व चं माँये पश्यति ॥ तस्याहं ने प्रणयामि सँ च में" नैं प्रणश्यति ॥३०॥ ऐसे जो मेरेको सर्वत्र मालाके मणिकोंमें सूत्रकीतरह देखता है और सर्वजगत सूत्रमें मणियोंकी तरह मेरेमें देखता है मैं उसके अह- श्य नहीं होताहूं और वह मेरे" नहीं अदृश्य है ॥३०॥ सर्वभूतस्थित यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ॥ सर्वथा वर्तमानोपि सं योगी मैयि वर्त्तते ॥ ३१ ॥ जो एकत्व याने सर्वसे मित्रभाव, ( एकत्वका अर्थ जो स्वरूपकी एकताकरे तो भजन किसका करै ? इससे मित्रताही अर्थ है. वाल्मीकी- य मंदरकांडमें भी“ रामसुग्रीवयारक्यं देव्येवं समनायत इस त षष्ठः ६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (८९) हनुमानके वाक्य करके एकताका अर्थ मित्रता ही सिद्ध होताहै इस से) जो सर्वकी मित्रतामें रहाभया सर्वभूतों में व्यापक मेरेको भेज- ताहै निश्चय सो योगी सर्व आचरण करताभया मेरेमें वर्तमानहै याने मेरे हृदयमें वसता रहताहै ॥३१॥ आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ॥ सुखं वा यदि वा दुःखं से योगी परमो मतः॥ ३२ ॥ हे अर्जुन ! जो सुख अथवा दुःखको आपके समत्व करके सर्वत्र समान देखता है सो योगी उत्तम है. यह श्लोक उनतिसवे श्लोकका खुलासा करनेवाला है ।। ३२॥ अर्जुन उवाच । योऽयं योगैस्त्वयां प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन॥ एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थिति स्थिराम३३ श्रीकृष्णके वाक्य सुनके अर्जुन बोलते भये कि, हे मधुसूदन ! जो यह योग समताकरके तुमने कहाँ सो मनके चंचलत्वसे में इस की स्थैिर स्थिति नहीं देखताहूं ॥३३॥ चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढम् ॥ तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ३४ ॥ हे कृष्णं जिससे कि, यह मन चंचल इंद्रियोंका क्षोभक दृढ बली है • मैं इसको रोकना पवनका रोकना जैसी दुष्कर मानताहूं ॥ ३४॥ श्रीभगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ॥ अभ्यासेन तु कौंतेय वैराग्येण च गृह्यते ॥३५॥ ऐसा सुन श्रीकृष्णभगवान बोले कि, हे महाबाहो ! यह मन चंचल है इसीसे रोकने में आना कठिन है. यहां संशय नहीं तोभी हे कुंती-
(२०)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
पुत्र ! अभ्यास करके और वैराग्यकरके रोकनमें आताहे ॥ ३५ ॥
अंसंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मंतिः॥
वश्यात्मना तुं यतता शक्योऽवाप्त पायतः ॥ ३६ ॥
यह योग जिसने मन वश न किया उसकरके प्राप्त होनेका नहीं
सी मेरी मति है और जिनने मनको वश कियाहै उसकरके यत्न
करते करते उपायसे प्राप्ति होनेको संकताहै ॥३६॥
अर्जुन उवाच ।
अयंतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ॥
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७॥
"नेहाभिकमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते" इत्यादि वाक्यों-
करके योगमाहात्म्य सुना था तो भी विशेषज्ञानके वास्ते फिर पूंछ-
ते हैं जैसे कि हे कृष्ण!जो श्रद्धाकरके युक्तं और यत्न न करसका इस
से योगसे मन चलायमान भया इससे योगसिद्धिको न पायके किस
गतिको जाताहै ॥३७॥
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ॥
अप्रतिष्टो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥ ३८ ॥
हे महाबाहो ! वेदके मार्गमें भूलाभया याने स्वर्गादिप्राप्तिनिमित्त
कर्मत्यागके निष्कामकर्मरूप योगको भी न प्राप्तभया इसीसे वह
अप्रतिष्टितं और उभयभ्रष्टुं याने स्वर्गादिप्राप्तिकारक कर्मभी छोडा
और योगभी नमिला इसीसे कदाचित् छिन्नाभ्रकी तरह जैसे बडे
मेघमेंसे निकसिके मेवका टुकडा दूसरे मेघको न प्राप्त होके बीच-
हीमें नहहोताहै तैसे न नष्टहाई ॥३८॥
एतन्मे संशयं कृष्ण च्छेत्तुमर्हस्यशेषतः ॥
त्वदन्यः संशयस्यास्य च्छेत्ता नयुपपर्यंते ॥ ३९ ॥
षष्ठः ६.1 सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (९१) हेकृष्ण ! इसे मेर संशयको अच्छीतरहसे छेदन करनेको योग्यहो क्योंकि, इस संशयका छेदनेवाला तुमविन दूसरा नहीं मिलेगा ॥३९॥ श्रीभगवानुवाच । पार्थ नै वे है नामुत्रं विनाशस्तस्य विद्यते ॥ न हि कल्याणकृत्कश्चिहुँगति तात गच्छति ॥४०॥ अर्जुनके वाक्य सुनिके कृष्ण बोले कि, हे पार्थ ! उस योगीका नाश न इस लोकमें ही न परलोकमें होता है, क्योंकि हेतात ! शुभ- का कोई भी दुर्गतिको नहीं पाताहै ॥४०॥ प्राप्य पुण्यकृतॉल्लोकानुषित्वाँ शाश्वतीः समाः ॥ शुचीनां श्रीमतां गेहे" योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥४१॥ जो योग पूराभयेविना मरजाय तो भी वह योगभ्रष्ट पुण्यकरके उपार्जित लोकोंको प्राप्तहोके वहां अनेक वर्षे रहिके पवित्र और धन- वालोंके घरमें जन्मताहै॥४१॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ॥ एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥ ४२ ॥ अथवा बुद्धिमान योगिनके कुलमें ही जन्मताहै, जो ऐसा यह जन्म सो इस लोक में निश्चय दुर्लभहै ॥ १२ ॥ तत्र त बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदैहिकम् ॥ यतते च ततो भूयः संसिटौ कुरुनंदन ॥ ४३ ॥ हे कुरुनंदन ! वहां जन्मलेके वही पूर्व देहसंबंधि बुद्धिसंयोगको पावताहै और उसपीछे फिरभी उस सिद्धिनिमित्त यत्न करताहै ॥४३॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोपि सः॥ जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्त्तते ॥४४॥ जो न करना चाहै इंद्रियजित न होय तो भी वह पुरुष उसी भगवद्गीता। [अध्याय:- पूर्वाभ्यासकरके ही उसीको प्राप्तहोताहै. क्योंकि जो योगेके जाननेकी भी इच्छाकरे तो भी शन्दैब्रह्म ताने देवादिनाम शब्दयुक्त जो प्रकृति उसको उल्लंघन करजाताहै याने मुक्त होता है ॥४४॥ प्रयत्नांद्यतमांनस्तुं योगी संशुद्धकिल्बिषः ॥ अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यांति परां गतिम् ॥ ४५ ॥ ऐसे प्रयत्नसे योगकरता करता निष्पाप भैयाहुआ योगी अनेक जन्मोंकरके सिद्धर्भया तर उत्तम मुक्तिको प्रोप्तहोताहै ॥ ४५ ॥ तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिंकः॥ कमिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥४६॥ हे अर्जुन ! योगी जो निष्काम कर्म कर्त्ता सो सकामिक तपस्विनसे अधिक माना है, ज्ञानिनसे भी अधिक है और सकाम कर्म करने- वालोंसे भी योगी" अधिकहै; तिससे तुम योगी" हो" याने निष्काम होके स्वधर्मरूप क्षत्रियकर्म युद्ध करो ॥ ४६॥ योगिनामपि सर्वषां मद्गतेनांतरात्मना ॥ श्रद्धावान्भर्जते यो मां सँ में युक्ततमो मतः॥४७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अभ्यास- योगोनाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥ जो श्रद्धावाने पुरुष मेरेमें लगारहै जो चित्त ऐसे चित्तकरके मेरेको भजताहै सो सँव योगिनमें भी श्रेष्टं योगी है ऐसा मेरी अभि- प्राय है ॥४७॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता यांश्रीमद्भगवद्गीतामृततगंगिण्यां षष्टाध्यायप्रवाहः ॥६॥ इति प्रथमं पट्कं समाप्तम्। - सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (९३.) अथ द्वितीयषट्कं प्रारभ्यते ॥ प्रथम पट्कमें याने प्रथमके छ: अध्यायनमें ईश्वरप्राप्तिका उपायरूप भक्तियोगका अंग आत्मस्व- रूपज्ञानकी प्राप्ति ज्ञानयोग कर्मयोगसे कही...अब मध्यषट्कमें याने छःसे बारहपर्यंत छः अध्यायनमें परमात्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान और उस ज्ञानके माहात्म्यपूर्वक भगवान्की उपासना याने भक्ति इसीको प्रतिपादन करते हैं. इसका खुलासा अठारवहें अध्या- यमें पैंतालिस श्लोकपीछे “यतःप्रवृत्तिः यहाँसे लेके "मद्भक्तिं लभते परां" इस चौअनवें श्लोकपर्यंत कहेंगे. अब सातवें अध्यायमें भगवान् आपका स्वरूपवैभव वर्णन करेंगे । श्रीभगवानुवाच । मय्यांसक्तमनाः पार्थ योग गुंजन्मश्रियः॥ असंशयं समग्रं मी यथाँ ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १ ॥ हे पृथापुत्र अर्जुन ! तुम मेरेमें चित्तलगायेभैये मेरे आश्रित भयेहुये योगमें युक्तभये हुये जैसें संशयरहित समग्र याने विभूति बलसहित मेरे को जानोगे सो सुनो॥१॥ ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः॥ यज्ज्ञात्वा ने" है भूयोन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥२॥ मैं तुम्हारेको इस विज्ञानसहित ज्ञानेको संपूर्णकरके कहता हूं जिसको जानके फिर इस लोकमें और जाननेयोग्य नहीं रहता है।॥२॥ मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्युतति सिद्धये । यतामपि सिद्धानां कैश्चिन्माँ वेत्ति तत्वतैः ॥ ३ ॥ मनुष्यों के हजारोंमें याने अनेक हजारमनुष्यों में आत्मज्ञानसि- दिके वास्ते कोई एक यत्नकरताहै यत्नकरनेवाले सिद्धों में भी .
- (१४) भगवद्गीता। [अध्याया- कोई एक मेरे को निश्चयकरके जानताहै अर्थात् ऐसा जानने- वालाही दुर्लभ है ॥३॥ भूमिरापोऽनलो वायु:खं मनोर्बुद्धिरेव च ॥ अहंकार इतीयं" मे" भिन्नौ प्रकृतिरष्टधा ॥४॥ अपरेयॉमितस्त्वन्या प्रकृतिं विद्धि में पराम् ॥ जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥५॥ हेमहावाहो ! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे आठ प्रकारकरके न्यारीन्यारीभैयी यह जो मेरी प्रकृति सो यह अपरा याने जड है और इससे और जीवरू- पको मेरी पैरा याने चेतन प्रकृति जानो जिस प्रकृतिकरिके यह जगत् धारण भयाहै ॥४॥५॥ एतद्योनीनि भूतानि सेर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ सर्वभूत प्राणीमात्र इन्ही दोनोंसे प्रगट होतेहैं ऐसाँ जानो. मैं सव जगत्का उत्पत्तिस्थान वा प्रलयस्थान भी हूं ॥६॥ मंत्तः परतरं किं चिन्नान्यदस्ति धनंजय॥ मयि सर्वमिदं प्रोत संत्रे मणिगणा इव ॥७॥ सूत्रमें मालाके मेणियोंकी तरह मेरेमें यह सर्वजगत पोहाँ है इसीसे हे धनंजय मेरेसे न्यारा और कुछभी नहीं है ॥७॥ रसोऽहमप्मु कौंतेय प्रभाँस्मि शर्शिसूर्ययोः ।। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुपं नृषु ॥ ८॥ "सूत्रे मणिगणा इव" इसीको दिखातेहैं. हे कुंतीपुत्र ! जलेमें स:- चंद्रमर्यकी कांति सर्ववेदों में ओंकार आकाशमें शब्दं पुरुपोंमें पुरु- पार्थ में "हूं याने इन जलादिकोंके सार जो रसादिक उनकाभी शरी-
सप्तमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
री मैं और वे मेरे शरीर हैं ऐसे अहंशब्दका अर्थ सर्वत्र शरीरशरी-
रीसंबंधसे जानना ॥ ८॥
पुण्यो गंधष्टथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ॥
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥९॥
पृथिवीमें पवित्र गंध और अग्निमें तेज मैही हूं सर्वभूतप्रोणिनमें
आयुष्य और तपस्विनमें तप मैं हूं ॥९॥
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ॥
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १० ॥
हे पार्थ ! सर्वभूतोंकोसनातन उत्पत्तिकारण मेरेको जानो मैं बुद्धि-
मानों में बुद्धि तेजस्विनमें तेज हौं ॥ १० ॥
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माऽविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११ ॥
हे भरतर्षभ ! मैं जो वस्तु प्राप्त नहीं उनकी कामना और प्राप्त
वस्तुमें जो अनुराग इन कामरागोंविना बलवंतोंका बलं और भूत
प्राणिनमें धर्मसे अविरुद्ध काम हूँ ॥११॥
ये चैर्वे सात्विका भावा राजसास्तामसार्च ये ॥
मत्त एवेति तान्विद्धि न लें हैं तेथें ते” मैयि॥१२॥
जो शमादिक सात्विक भाव और द्वेषादिक राजस और जं.
मोहादिक तामस भाव हैं वे मेरेसे ही हैं ऐसे उनको जानो और
मैं उनमें नहीं याने उनके स्वाधीन नहीं हूं वे मेरेमें हैं. याने मेरे
स्वाधीन हैं ॥ १२॥
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ॥
मोहित नाभिजानाति मामेभ्यःपरमव्ययम् ॥ १३॥
(९६) भगवद्गीता। [अध्यायः- इन तीनों गुणमय भावोंकरके मोहित यह सर्व जगत् इनसे पर अविनाशी मेरेको नहीं जानता है ॥ १३॥ देवी ोपा गुणमयी मम मार्या दुरत्यया॥ मामेवं ये प्रपद्यते मायामेती तरंति ते" ॥१४॥ जिसंवास्ते कि, यह गुणमयी दैवी याने मेरे संबंधिनी मेरी माया दुरत्यय है इसीसे जो मेरे शरण होतेहैं वे" इस मायाँको तरते हैं।॥१४॥ ने माँ दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यते नराधमाः ॥ माययापहृतंज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥१५॥ मायाकरके हरागयाहै ज्ञान जिनका ऐसे मनुष्य वे असुरनके धर्म- को प्राप्तहोरहे निंदित कर्मकरनेवाले नरनमें अधम मूर्ख मेरेको नहीं भजतेहैं ॥ १५॥ चतुर्विधा भजते माँ जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ॥ आर्तो जिज्ञासुंरार्थी ज्ञानी च भैरतर्षभ ॥ १६ ॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ॥ प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहंच सँ च में प्रियः॥१७॥ हे अर्जुन ! एकप्रकारके जो संसारसे दुःखी दूसरे जाननेकी इच्छा करनेवाले तीसरे धनादिक चाहनेवाले और चौथे ज्ञानी याने स्वरूप- ज्ञाता ऐसे चार प्रकारके सुकृती जन मेरे को भजतेहैं. हे भातर्षभ ! तिनमें ज्ञानी नित्ययोगयुक्त मेरी मुख्यभक्तिवाला श्रेष्ट है कारण कि, ज्ञानीक "मैं अत्यंत प्रियहूं और सो मेरे अतिशय प्रिय है।॥ १६॥ १७॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञांनी त्वात्मैव में मतम्॥ आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमांगतिम्१८॥ वे सर्व ही उदार हैं तो भी ज्ञांनी आत्माही मेरेको पुत्रवत् प्रियहै, सप्तमः ७.].: सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । ( ९७) ऐसा मेरा अभिप्राय है कारण कि, वह मेरेहीमें चित्तको युक्तकिये भये सर्वोत्तम गति मेरेही को ध्यावताहै ॥ १८॥ बहूनां जन्मनामते ज्ञानवान्मीं प्रपद्यते ॥ वासुदेवः समिति से महात्मा सेंदुर्लभः ॥ १९ ॥ अनेक जन्मोंके अंतमें सर्वजगत् वासुदेवरूप है ऐसे ज्ञानवान होताहै याने वासुदेवात्मक जानिके ईर्षादिरहित होताहै. तब मेरेको भजताहै सो महात्मा अति दुर्लभ है याने कोट्यावधीनमें कोईएक होता है ॥ १९॥ कामैस्तैस्तैहतज्ञानाः पद्यतेऽन्यदेवताः ॥ तं नियममास्थाय प्रंकृत्या नियताःस्वयो॥२० ॥ दूसरे सर्व तो आपकी राजस तामस प्रकृतिकरके राजस तामस "कौमें लगेभये उनउँन कामनोंकरके नष्टज्ञानभयेहुये उनउन पु- त्रादिनिमित्त नियमोंको धारणकरके अन्यदेवोंको भजते हैं ॥२०॥ यो यो यांयाँ तनुं भक्तः श्रद्धयाचितुमिच्छति ॥ तस्य तस्याचैलां श्रद्धांतामेव विदधाम्यहम् ॥ २१ ॥ मैं तया श्रद्धया युक्तस्तस्यारीधनमीहते ॥ लभते , ततःकामान्मयैव विहितान्हितान् ॥ २२ ॥ अंतवत्तुं फैलं तेषों तद्भव॑त्यल्पमेधैंसाम् ॥ देवान्देवयजो याति मद्भक्तों याति मामपि ॥२३॥ " तदेवानिस्तत्सूर्यस्तदुचंद्रमाः" इत्यादि श्रुतिनके अर्थको खुलासा करनेवाली जो “ यस्यादित्यः शरीरं' इत्यादि श्रुतिनके अर्थरूप इन श्लोकोंकरके अन्य देवतोंको भी भगवान् आपहीके शरीरभूत दिखातेहैं. जैसे कि, जोजो भक्तं जिस जिस इंद्रादिरूप मेरे ७
.
(९८)
भगवद्गीता ।
[अध्याय:--
शरीरको श्रद्धाकरके अर्चनेको चाहता है उसउस भक्तंको में ही
अचले श्रद्धा धारणकरातीहूं "सो भक्त उसी श्रद्धोकरके युक्त उसी
इंद्रादिरूप मेरी मूर्तिका आराधेन करताहै. और उसीसे मेरे ही
करके नियमित किये)ये हित कॉमनोंको प्राप्तहोताहै; परंतु उने
अल्पबुद्धिनके वह फैल नाशैवान् होताहै. जैसे कि, इंद्रादिदे-
व पूजनेवाले इंद्रादि देवोंको प्राप्तहोतेहैं मेरे भैक्त निश्चय में रेको प्राप्त
होते हैं ॥२१॥२२॥२३॥
अव्यक्तं व्यक्तिमार्पन्नं मैन्यंते मामबुद्धयः ॥
परंभामजानंतो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४ ॥
मेरे अविनाशी सर्वोत्तम परस्वरूपको न जाननेवाले मूर्खलोग
जो मैं सर्वके हृदयमें मूर्तिमान प्राप्त तिस मेरेको अव्यक्तं याने अमू-
त्ति मानत. तात्पर्य इसीसे अन्यदेवोंको भजते हैं ॥२४॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।।
मूढोऽयं नौभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥२५॥
यहां न जाननेका कारण कि, योगमायाकरके आच्छादित मैं
सर्वको दीखता नहीं हूँ इसीसे यह मूर्ख जन अजन्मा अविनाशी
मेरे को नहीं जानता है ॥२५॥
वेदांहं समंतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ॥
भविष्याणि च भूतानि मी तुं वेर्दै न कश्चन ॥२६॥
हे अर्जुन ! मैं जो प्रथम भये उनको और हैं तिनंको और होयंगे
उन सर्वभूतप्राणीमात्रोंको जानतांहूं, परंतु मेरेको" कोई भी नहीं
जानताहै ।। २६॥
इच्छाद्वेपसमुत्थेन द्वंदमोहेन भारत ॥
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यांति परंतप॥२७॥
1 उस ब्राँको और सर्व अध्यात्मको सर्व कर्मको जानतेहैं इन' सतमः ७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (९९) हेभारत ! हेपरंतप ! इच्छा और द्वेषकरके उत्पन्नभये सुख दुःख लाभ अलाभादि द्वंद्वरूप मोहॅकरके सर्वभूतप्राणिसंसारमें मोहको प्राप्त होतेहैं। येषां त्वंर्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥ ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजते माँ दृढव्रताः॥२८॥ और जिन पुण्यकर्मवाले मनुष्योंका पाप नाशको प्राप्तभयाहे में दमोहसे छुटेभये हेढवती मेरेको भजते हैं ॥२८॥ जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतंति ये॥ ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्म कर्मचाखिलम्॥२९॥ जो मेरे आश्रितहोके जरामरण छूटनेके वास्ते यत्नेकरतेहैं वे ब्दादिकोंका खुलासा आठवें अध्यायमें होगा ॥ २९ ॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ॥ प्रंयाणकालेपि च मां ते विद्युक्तंचेतसः॥३०॥ इति श्रीमद्भगवहीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥७॥ जो मेरेको अधिभूत और अधिदेवसहित और अधियज्ञसहित जानतेहैं वे मनुष्य ही मेरेमें नित्य चित्तलगायेभये मरणकालमें भी मेरे को जानते हैं ॥३०॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यां श्रीगीतामृततरंगिण्यांसप्तमोऽध्यायप्रवाहः॥७॥ अर्जुन उवाच । किं तब्रह्म किंमध्यात्म कि कर्म पुरुषोत्तम ॥
(१००)
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
अधिभूतं चं किं' प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१॥
जो सातवें अध्यायमें कहा था कि, जो जरामरणसे मुक्त होनेके
वान्ते मेग आसरा करके यत्न करतेहैं वे उस ब्रह्मको तथा सर्व
अध्यात्मको और सर्व कर्मको जानते हैं इत्यादि सुनिके अर्जुन
कृष्णसे पूंछते हैं कि, हे पुरुषोत्तम ! जो आपने कहा वह ब्रह्म कौर्ने
है, अध्यात्म कोनहै, कर्म क्याहै और अधिर्भूत कौन कहातीहै और
अधिदेव कौन कहाँताहै ? ॥१॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्रं देहेऽस्मिन्मधुसूदन ॥
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥२॥
हे मधुसूदन ! इसे देहेमें अधिया कैसेभया और कौन है और
इसलोकमें मरणकालमें जिसने मन जीताह उसकरके कैसे जाने-
नेमें आतेहो ? ॥२॥
श्रीभगवानुवाच।
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते॥
भृतभावोद्भवकरो विसँगः कर्मसंज्ञितः ॥३॥
ऐसे अर्जुनके वचन सुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोले कि, परदे
प्रकृति जिससे याने प्रकृतिमुक्त जो अक्षर याने मुक्तजीव सोब्रह्म
स्वभाव अध्यात्म कहाँताहै जो सर्व भूतप्राणिनकी उत्पत्ति करने-
वाला विसर्ग याने सृष्टि सो कर्मसंज्ञक है ॥३॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुपश्चाँधिदैवर्तम् ।।
अधियज्ञोऽहमेवात्रं देहे देहभृतांवर ॥४॥
जो क्षर भाव याने नाशवान देहादिक सो अधिभूतहै और पुरुप
जो सूर्यमंडलवर्ती मेराही एकरूपं सो अधिदेवत है. हे देहधारिनमें श्रेष्ठ
अर्जुन ! इस दहमें अधियज्ञ में ही हूं याने जीवका पूज्य मैं हूं ॥ ४ ॥
॥७॥ अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भाटी। (१०१) अंतकाले च मामेवं स्मरन्मुंक्त्वा कलेवरम् ॥ यःप्रेयाति से मौवं याति नास्त्यत्र संशयः॥५॥ और जो पुरुष अंतसमयमें मेरे हीको सुमिरतासुमिरता देहको त्याँगिके इसलोकसे जोताहै सो मेरी समताको प्राप्त होताहै यही संशय नहीं ॥ ६॥ यं यं वापि स्मरन् भाँवं त्यजत्यंते कलेवरम् ॥ ततमे वैति कौंतेय सदा तद्भावभावितः॥६॥ जो मेरा सदा और अंतकालहीमें स्मरण करतेकरते शरीर त्याग सो तो मेरेहीको पावै. अथवा जो जो भाँव याने वस्तु अथवा कोई प्राणीको सुमिरतासुमिरता सदा उसीमें लवलीन भंयाहुँआ अंतमें देहको त्यागता है, सो हे कुंतीपुत्र ! उसी उसीको ही प्राप्तहोताहै ॥६॥ तस्मात्सर्वेषु कालेघु मिनुस्मर युद्धय च ॥ मम्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥ ७॥ तिससे सर्व कालमें मेरेको सुमिरो और युद्धको ऐसे में रेमें मन अभ्यासयोगयुक्तेन चैतसा नाऽन्यगामिना ॥ परमं पुरुषं दिव्यं योति पार्थानुचितयन् ॥ ८॥ हे पृथापुत्र ! सदा अभ्यासयोगयुक्त आत्मस्वरूपविना दूसरे में नहीं जानेवाला ऐसे चित्तकरके मेरा चितवन करताकरता देदीप्यमान अति- उत्तम ऐसा जो परमपुरुष मैं उस मेरेको प्राप्त होताहै. ॥८॥ कविं पुराणमनुशासितारमँणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः । सर्वस्य धातारमचित्यरूपमादित्यवर्ण तमसःपर- (१२) भगवद्गीता। [अध्याय:- स्तात् ॥ ९॥ प्रयाणकाले मनसाऽचलेन भक्त्यायु तो योगवलेन चैव । भ्रुवोमध्ये प्राणमावेश्यसम्यक सं तं परं पुरुपमुपैति दिव्यम् ॥ १०॥ जोकोई भक्तिकरके युक्त पुरुप मरणसमयमें अचेल मनकरके आर योगवर्लंकरके भौंहोंके मध्यमें निश्चल अच्छीतरहसे प्राणोंको प्रवेशकरके अर्थात् कुंभककरके जो सर्वज्ञ, पुरातन, सर्वका शिक्षक, सूक्ष्मसे सूक्ष्म, सर्वका पालनेवाला, नहीं चितवनमें आताहै रूपै जिस- का, सूर्यसरीखा प्रकाशमान जो पुरुष और प्रकृतिसे पैरै उसको सुमि- रताहे सो उस पर देदीप्यमान पुरुपको प्राप्तहोताहै ॥९॥१०॥ यदक्षरं वेदविदो वदंति विशति यद्यर्तयो वीतरागाः ॥ यदिच्छं तोब्रह्मचर्य चरति तत्ते पदं संपँहेण प्रवक्ष्ये११ वेदके जाननेवाले जिसको अक्षर कहँ तेहैं, वीतराग ईश्वरप्राप्तिका यत्न करनेवाले जिसको प्रातहोतेहैं; जिसको चाहनेवाले ब्रह्मचर्यको आचरतेहैं, उस पर्दैको तुम्हारेसे संक्षेपैकरके कहूंगा ॥११॥ सर्वद्वाराणि संयम्यं मनो हँदि निरुध्य च ॥ मध्यांधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजंन्देहं से यौति परमां गतिम् ॥ १३॥ जो योगी देहको त्यागतात्यागता सर्व इंद्रियोंको संयममें करके और हृदयमें मनको रोकके आपके प्राणों को मस्तकैमें चढायके योगधारणा में थिर भयाँहुआ 'ॐ' इस एकअक्षर ब्रह्मका उच्चारण करताकरता मेरेको सुमिरतीसुमिरता देहत्यागिके जोताहै सो अतिउँत्तम गतिको प्राप्तहोती हे ॥ १२ ॥१३॥ raper .
(१०३) अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः॥ तस्याहं सुलभैः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४॥ हे पृथापुत्र ! जो अनन्यचित्त मेरेको नित्य निरंतर सुमिरताहै उस नित्य मेरे संयोग चाहनेवाले योगी को "मैं सुलभ हूँ॥ १४ ॥ मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ॥ नाप्नुवंति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥१५॥ यहांसे अध्यायसमाप्तिपर्यंत ज्ञानी जो कैवल्यार्थी उसकी मुक्ति और ऐश्वर्य चाहनेवालेकी पुनरावृत्ति कहतेहैं सो ऐसे कि, जो मेरी उपासनारूप परमसिद्धिको प्राप्तभयेहैं. वे महात्माजन मेरेको प्राप्त होके फिर दुःखका घर नाशमान जन्मको नहीं प्राप्तहोतेहैं ॥ १५॥ आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन॥ मामुपेत्य । कौंतेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥१६॥ हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यंत सर्वलोक, पुनरावर्ती है और हे कुंती पुत्र ! मेरेको प्राप्तहोके फिर जन्में नहीं होतीहै ॥ १६॥ सहस्रयुगपर्यंतमहयद्रह्मणो विदुः ॥ रात्रिं युगसहस्रांतांतेऽहोरात्रंविदो जनोः ॥ १७ ॥ ब्रह्मलोकपर्यंत पुनरावृत्ति देखनेको ब्रह्माके दिनरात्रिका प्रमाण दिखातेभये उसको जाननेवालोंकी श्रेष्ठता कहतेहैं-जो ब्रह्माका हजार चतुर्युगीपर्यंत दिन और हजार चतुर्युगीपर्यंत रात्रिको जानतेहैं में मनुष्य दिनरातिके जाननेवाले हैं, याने दीर्घदर्शी हैं ॥ १७॥ अव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवत्यहरागमे ॥ राागमे प्रलीयते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥ दीर्वदर्शित्व दिखातेहैं सो ऐसे कि, ब्रह्माके दिनके आगममें ब्रह्माके (१०१) भगवद्गीता। [अध्याय:- गिरस से जीवों के शरीर होतेहैं रात्रिके आगममें उसी ब्रह्माके शरीरमें लीन हात हें ॥ १८॥ भृतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ॥ रांच्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहीँगमे ॥ १९॥ हे पृथापुत्र ! सोई यह भूतप्राणीसमूह कर्मपरवर्श भया हुआ सदा ह ह के रात्रिके आँगममें लीन होताहै, दिनके आगममें उत्पन्न होताहै ॥ १९॥ परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तीत्सनातनः ।। यः सं सर्वेषु भूतेपु नयत्स्वपिनँ नश्यति ॥ २० ॥ उसे ब्रह्माके जडप्रकृतिशरीरसे श्रेष्ठं और जो अव्यक्त सनातन भाव है याने शुद्धचेतन है सो सर्व आकाशादि और शरीर नष्टंहोने- से भी नहीं नष्टहोताहै ॥२०॥ अव्यक्तोऽक्षरं इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्॥ यं प्राप्य नै निवर्तते तद्धाम परमं मम ॥ २१ ॥ वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहाहै 'कूटस्थोऽक्षर उच्यते' उसको परम गति कहतेहैं जिस शुद्धरूपको प्राप्तहोके नहीं जन्मतेहैं वह मेरी सर्वोत्तम धाम है; याने जैसे प्रकृतिमें मेरा शरीर है और जीवभी मेरा शरीर हे परंतु जसे सर्व घर किसी पुरुपका है उसमें निजमंदिर श्रेष्ठहो- ताहे तसे जीवकृतिमें और मैं जीवमें रहताहूं इससे वह मेरा मुख्य- शरीर है. यह कैवल्यमुक्ति कही, अब ऐश्वर्य प्राप्ति कहतेहैं ॥२१॥ पुरुपः से पैरः पार्थ भक्त्यालभ्यस्त्वनन्यया॥ यस्यांत स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥ २२ ॥ ई पृथापुत्र ! ये सर्व भूतप्राणि जिसके अंतस्थ हैं और यह सर्व (१०५) अष्टमः ८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। जगत् जिसँकरके विस्तरितहै सो पैर पुरुष याने परमात्मा अनन्य- भक्ति करके प्राप्तहोने योग्यहै ॥२२॥ यत्र कालत्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।। प्रयाता यांति त कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥ हे पुरुषनमें श्रेष्ट ! जिस कालमें देहत्यागिके गयेभये योगी अना- वृत्तिको और आवृत्तिको जाँतेहैं उस कालको मैं कहतीहूं ॥ २३ ॥ अग्निज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ॥ तत्रं प्रयाता गच्छंति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥ जिसकालमें अग्नि प्रकाशक है तथा दिन शुक्लपक्षहै ऐसे छ महीने उत्तरायण उसमें गये भये ब्रह्मज्ञानी जनै ब्राँको प्राप्तहोतेहैं ॥ २४ ॥ धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।। तत्रं चांद्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५॥ जिसकालमें धूम रोति तथा कृष्णपक्ष छमहीने दक्षिणायन इसमें गया या योगी चांद्रमस ज्योति को याने स्वर्गपायके यज्ञादि फलभोगिके फिर यहाँ जन्मलेताहै ॥ २५ ॥ शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतःशावते मते॥ एकया यात्यनार्वृत्तिमन्ययावतते पुनः ॥ २६ ॥ ये शुक्लकृष्ण मार्ग जगत्के सनातन नियमितहैं एककरके मुक्तिको जाताहै दूसरेकरके फिर जन्मता है ॥२६॥ नैं ते सुती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ॥ तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥ हे पृथापुत्र ! इनं मागको जानताभया कोईभी योगी नहीं मोह- ताहै.हे अर्जुन ! तिससे सर्व कालमें योगयुक्त हो ॥२७॥ YA (१०६) भगवद्गीता। [अध्यायः- वेदेषु यज्ञेयुं तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं. प्रेदिष्टम् ॥ अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थान, पैति चायम् ॥२८॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योग शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगोनाम अष्टमोऽध्यायः॥८॥ मनुष्य इसको जानिके फिर जो पुण्यफल वेदाध्ययनमें, यईमें, तपमें और दान में कहा है उसे सर्वको अतिक्रमणकरताहै याने उससेभी अधिकफल पाताहै, फिर योगी होके सर्वोत्तम आदि स्था- नको पाताहै, याने मुक्तहोताहै ॥२८॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीगीतामृततरंगिण्यामष्टमोऽध्यायप्रवाहः ॥ ८॥ इदं तु तेगुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूर्यवे ॥ ज्ञानं विज्ञानसहितं य॑ज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १॥ सप्तम और अष्टम अध्यायोंमें आपकी स्वरूपप्राप्ति भक्तिहीसे कही हैं.अब नवममें आपका सर्वोत्तम प्रभाव और भक्तिका भी प्रभाव कह- तहें सो ऐसे कि, हे अर्जुन ! यह अतिगुप्तकरनेयोग्य विज्ञानसहित ज्ञानको, असूया जो पराये गुणमें दोष लगाना उसकरके रहित जो तुम तिनसे कहूंगा। जिसको जानिके संसारदुःखसे छूटोगे ॥१॥ राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ॥ प्रत्यक्षावगमं धयं मुसुखं कर्तुमध्ययम् ॥२॥ यह भक्ति ज्ञान विद्या और गोप्यवस्तुंनमें सर्वोत्तम पवित्र अति उत्तम - . -- नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१०७) प्रत्यक्षर्फलरूप धर्मयुक्त करनेकोभी अतिसुगम और अविनाशी है॥२॥ अश्रद्दधानाः पुरुषां धर्मस्यास्य परंतप । अप्राप्य मां निवर्तते मृत्युसंसारवमनि ॥३॥ हे परंतप अर्जुन ! इस धर्मसंबंधी श्रद्धाको न धारणकरनेवाले पुरुष मेरेको प्राप्तभयेविना मृत्युरूपसंसारमार्गमें फिरतेरहतेहैं ॥३॥ मयाँ ततमिदं सर्व जगदव्यक्तमूर्तिना ॥ मत्स्थानि सर्वभूतानि नै चाह तेष्ववस्थितः॥४॥ न च मत्स्थानि भूतानि पैश्य में योगैमैश्वरम् ॥ भूतभृन्न चे भूतस्थो मैमात्माँ भूतभावनः ॥५॥ यह सर्व जगत् अतिसूक्ष्म अंतर्यामीरूप मेरे करके व्याप्त है। इससे सर्वभूतप्राणी मेरे स्वाधीनहैं और मैं उनमें नहीं स्थितहूं याने उनके स्वाधीन नहींहूं और वे भूतप्राणी मेरेमें स्थित नहीं है याने जैसे घडेम जल तैसे नहीं हैं मेरे ईश्वरसंबंधी इस योगको देखो भूतोंका भरने पोषनेवाला भी मेरी आत्माँ याने मेरा शरीरभूत जीवात्मा भूतोंको धारणकरनेवाला और भूतोंमें स्थित नहीं है॥४॥५॥ यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ॥ तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥६॥ जैसे महान वायु नित्यही आकाशमें रहाभया मेरे आधारसे सर्व- त्रं विचरताहै तसही सर्व भूत मेरे आधार हैं ऐसे निश्चयकरो ॥६॥ सर्वभूतानि कौंतेयं प्रकृति यांति मामिकॉम् ॥ कल्पक्षये पॅनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥ ७॥ हे कुंतीपुत्र ! प्रलयकालमें सर्वभूतप्राणी मेरी प्रकृतिमें लीन होतेहैं कल्पकी आँदिमें मैं उनको फिर अनेक प्रकारके उत्पन्न करता हूं ॥ ७॥ ॥
। -- (१०८) भगवद्गीता। [अध्यायः- प्रकृति स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ॥ भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं य॒कृतेर्वशात् ॥ ८॥ अपनी प्रकृतिको आश्रयदेके प्राचीनस्वभावके वशंसे परवंश संपूर्ण इस भूतप्राणीसमूहको वारंवार सृजती हूं ॥८॥ ने चं मां तांनि कर्माणि निवनंति धनंजय ॥ उदासीनवदासीनमसतं तेषु कर्मसु ॥९॥ हेअर्जुन ! जो कहोगे कि, ऐसे विपमसृष्टि सृजनेवालेको विषम- ताके वैपम्य निर्दयत्वदोप क्यों न लगेंगे तहाँ सुनो, जो मैं सृष्टयादि- ककर्म करताहूं उन काँमें असक्त और उदासीनसरीखा स्थित ऐसे मेरेको वे कर्म नहीं बंधनकरतेहैं ॥९॥ मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिःमूयते सचराचरम् ॥ हेतुनानेन को तेय जगद्विपरिवर्त्तते ॥ १० हे कुंतीपुत्र ! जब मैं अध्यक्ष याने सर्वकृत्यका सम्हारनेवाला होता हूं तब मेरे करके प्रकृति चराचरंजगत्को उत्पन्नकरती है इस कारण करके जगत् उत्पन्नहोताहै ॥ १० ॥ अवजानति मी मुंढा मानुपी तनुमास्थितम् ॥ परंभावमजानंतो मम भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥ मोघाँशामोधकर्माणो मोवज्ञाना विचेतसः ॥ राक्षसीमासुरी चैर्वं प्रकृति मोहिनीं श्रिताः ॥ १२ ॥ जो गक्षेसी और आसँग आपसरीखी मोहकारक प्रकृतिको धारण करम्हह याने ऐसे स्वभाववाले, निष्फल आशीवाले, निष्फले फर्मवाले, निष्फलंज्ञानवाले वे भ्रष्टचित्तं पुरुप, जो सर्व भूतोंके ॥ - . --- J नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। ( १०९) ईश्वरोंका भी ईश्वर ऐसे मेरे प्रभावको न जानतेभये मूर्ख अति- करुणासे मनुष्यरूप शरीरमें स्थित मेरी अवज्ञाकरतेहैं ॥ ११॥१२॥ महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः ॥ भैजंत्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥ १३॥ हे पृथाधुत्र ! दैवी प्रकृतिको प्राप्तभये?ये महात्माजन मेरेको सर्वभूतोंका. ऑदि और अविनाशी जानिके अनन्यमनवाले भयेहुए मेरेही को भजतेहैं ॥१३॥ सततं कीर्तयंतो माँ यतंतश्च दृढव्रताः॥ नमस्यंतश्च माँ भत्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥१४॥ अब महात्मनके भजनकी रीति कहतेहैं जैसे कि, निरंतर मेरो कीर्तनकरतेभये और दृढसंकल्पकियेभये मेरी प्राप्तिके वास्ते यत्नकरतेभये और भक्तिकरके मेरेको नमस्कार करतेभये नित्य मेरे समागमकी इच्छा करनेवाले मेरी उपासना करते हैं ॥१४॥ ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजंतोमामुपासते ॥ एकत्वेनं पृथक्त्वेन बहुंधा विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ और कितनेक महात्मा एकत्वकरके याने सख्यभावसे और कितनेक पृथक्त्वसे याने दास्यभावसे ऐसे बहुधा याने कोई वात्सल्य और कोई शृंगार इत्यादि भावनाकरके सर्वतोमुख याने सर्वव्यापी मेरेको इत्यादि ज्ञानयज्ञकरके पूजतेभये उपासना करते हैं ॥ १५ ॥ अहंऋतुहं यज्ञः स्वधाऽहमहमौषधम् ॥ मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुँतम् ॥ १६ ॥ अब आपका सर्वव्यापित्व दिखातेहैं सो ऐसे कि भगवान् कह- तेहैं कि, ऋतु याने अग्निष्टोमादिक श्रौतयज्ञ मैं हौं, यज्ञ जो स्मात पंचमहायज्ञ सो मैं हौँ स्वधा जो पितॄनके श्राद्धादिकर्म सो मैं हौं
(१०)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
मापंध याने अन्न सो में हों, मंत्र मैं हौं",आज्य याने धृत सो मैं हौं,
अग्नि में हो, होम में हो" यह निश्चय है ॥ १६॥
पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पिर्तामहः ॥
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक साम यजुरेव च ॥ १७॥
गैतिर्भती प्रभुःसाक्षी निवासःशरणं सुहँत् ॥
प्रभवः प्रलयस्थानं निधानं वीजमव्ययम् ॥ १८॥
इस जगतका पिता, माता, धाता पितामह जो जाननेयोग्यं सो
और पवित्र सो और ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद इस
जगत्की गति, पालनकर्त्ता, स्वामी, शुभाशुभकर्मनका साक्षी, रहनेका
स्थान इच्छितवस्तु देनेवाला और अनिष्टका निवारक सुहृदै उत्पत्ति
और नाशका स्थान धारणकरनेवाला अविनाशी उत्पत्तिकारण सर्व
मैं ही हौं॥१७॥१८॥
तपोम्यहमह वर्ष निहायुत्सृजामि च ॥
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥
हे अर्जुन ! अग्नि और सूर्यरूप होके में ही तपाताहों, मेंही ग्री-
प्मादिऋतुनमें वर्षाको वंदकरताहौं और वर्षाऋतुमें वर्षांताहौं, अमृत
'और मृत्यु और सत् और असत् मैं निश्चय हौं ॥ १९ ॥
विद्या मी सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिट्वा स्वर्गति
प्रार्थयते ॥ ते पुण्यमासाद्य सुरेंद्रलोकमश्नति
दिव्यान दिवि देवभोगान्॥२०॥ते त भुक्त्वों स्व-
र्गलोकं विशॉलं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशंति ॥
एवं त्रयोधर्ममनुप्रपन्नों गतागतं कामकामा
लैभंते ॥२१॥
नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०॥ (१११.) इसतरहसे महात्मा ज्ञानिनका व्यवहार और आपका वैभव कहा अब सकाम जनोंकी रहनि रीति कहतेहैं। जैसे कि, त्रैविद्या याने ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदोक्त इंद्रादिदेवनिमित्त यज्ञ करनेवाले सोमपान कियेभये पापरहित यज्ञोंकरके इंद्रादिरूप मेरेको आर्रा- धिके स्वर्गकी प्राप्ति मानते हैं वे पुण्यरूँप इंद्रलोकमें प्राप्तहोके वहां स्वर्गमें दिव्य देवभोगोंको भोगते हैं. फिर वे उस विशाल स्वर्गलोकको भोगिके पुण्य क्षीण होनेसे इस मनुष्यलोकमें प्राप्तहोते हैं, ऐसे वेदयोधर्मको केवल वारंवार करतेभये सकामीजन गता- गत याने स्वर्गजाना मनुष्यलोकको आना फिर जाना फिर आना ऐसे फलको पाते हैं ॥२०॥२१॥ अनन्यौश्चितयंतो मां ये जनाः पर्युपासते ॥ तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥ २२ ॥ जो मनुष्य अनन्यभयेहुये मेरी चितवन करते करते मेरेको भजते हैं उन नित्य मेरे संयोग चाहने वालोंका योग जो धनादिककी और मेरी प्राप्ति क्षेम जो धनादि संरक्षण और अपुनरावृत्ति इनको मैं प्राप्तकरताहौं ॥२२॥ येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ॥ तेपि मामेव कौंतेय यजंत्यविधिपूर्वकम् ॥२३ ॥ जोकि और देवतोंके भक्त उनका श्रद्धायुक्त पूजन करतेहैं वेभी मेराही.पूजन करतेहैं; परंतु हे कुंतीपुत्र । वे अविधिपूर्वक पूजन करतेहैं याने विधिपूर्वक नहीं ॥२३॥ अंहं हिं सर्वयज्ञानां भोक्ताँ च प्रभुरेव च ॥ नै तु मामभिजीनति तत्त्वेनाऽतथ्यवति ते ॥२४॥ मैं निश्चय करके सर्वयज्ञोंका भोक्ता और स्वामी भी हौं परंतु . भगवद्गीता। [अध्याय:- वे सकामिक जन मेरेको ऐसे निश्चयकरके नहीं जानतेहैं इससे जन्म मरणको प्राप्त होतहें ॥२४॥ यांति देवव्रता देवानं पितॄन्यांति पिर्तृव्रताः॥ भूतानियोंति भूतेज्याँ योति मद्याजिनोऽपि"मौम्२५ अहो जो कहोगे कि, एकही कर्ममें संकल्पमात्रसे कैसे भेद भया तहां सुनो जो इंद्रादिदेवनको भक्तिपूर्वक आराधते हैं तो उनहींको प्राप्त होतेहैं, पितृभक्त पितृनको प्राप्त होतेहैं; जो कोईसे भी राजा साधू चोर इत्यादि भूत प्राणिकी सेवा संगतिकरतेहैं वे उन- हीकी समताको प्राप्त होतहैं; जो मेरी भक्तिकरतेहैं वे निश्चय मेरे को प्राप्त होते हैं याने मेरी समताको पाते हैं ॥२५॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भत्त्या प्रयच्छति ॥ तदेहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रेयतात्मनः ॥ २६॥ जो कहोगे कि, बडेनके प्रसन्न करनेको बड़े उपाय चाहिये तहाँ सुनो जो कोई पत्र, पुष्प, फल, जल मेरेको भक्तिकरके युक्त अर्पण करताह में उस शुद्धचित्तभक्तका भक्तिपूर्वक अर्पणकियेभये उस पत्रादिक पदार्थको स्वीकार करताहीं ॥२६॥ यत्करोपि यदनांसि यज्जुहोपि ददासि यत् ॥ यत्तपस्यसि कौंतेय तत्कुरुवं मैदर्पणम् ॥ २७ ॥ शुभाशुभफलैरे मोक्ष्यसे कर्मबंधनैः॥ संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥ हे कुंतीपुत्र ! मेरेको ऐसा सुलभ जानिके जो कुछभी तुमकरो, जो खाउँ, जो होमी, जो देउ, जो तपकरौ उसको मेरे अर्पण किये भये करो ऐसे करतेभये जो कर्म बंधनकारक हैं उन शुभाशुभ फल कमीकरके छुटोगे. ऐसही इस कर्मफलअर्पण संन्यासयोगयुक्त चित्तवाले तुम मुक्त भये हुये मेरेको प्राप्तहोवोगे ॥ २७ ॥२८॥ M नवमः ९.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (११३) संमोहं सर्वभूतेषु न में ट्रेध्योऽस्ति लँप्रियः॥ ये" अंजंति तु माँ भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहमें२९ मैं सर्वभूतोपर संग हौं मेरे नै अप्रियं न कोई प्रिय है. परंतु जो मेरेको भक्तिकरके भजतेहैं वे" मेरे हृदयमें और उनके हृद- यो निश्चयकरके मैं रहताहौं ॥२९॥ अपि चेत्सुदुराचारो भर्जते मॉमनन्यभाक् ॥ साँधुरेव स मंतव्यः सभ्यव्यवसितो हि सः॥३०॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छांतिं निगच्छति ॥ कौंतेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ जो कदाचित् कोई पुरुष अतिदुराचारी भी होई और वह मेरेको अनन्यभाक् याने औरको न भाग देताभया सर्वत्र मेरेहीको जानिके सर्व मेरे अर्पण करतार्भया भजताहोय सो साँधूही है ऐसे मानना चाहिये, जिससे कि वह सम्यक् निश्चय कियेहै उससे वह शीघेही धर्मात्मा होयगा और मोक्षहीको प्राप्तहोयगा. हे कुंतीपुत्र ! तुम यह निश्चय जानो कि, मेरों भक्त नहीं नाशको पावताहै याने मुक्तही होताहै ॥३०॥३१॥ मी हिं पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयो- नयः ॥ स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेपि" याति पैरां गतिम् ॥ किं पुनर्वाह्मणाः पुण्या भक्तों राजर्षयस्तथी ॥ अनित्यमसुखं लोकमिम प्राप्य भजस्व मौम् ॥ ३२ ॥३३॥ हे पृथापुत्र ! निश्चयपूर्वक मेरेको आश्रय करके जो पापयोनी भी होय तथा स्त्री शुद्र वैश्य वे" भी उत्तम मोक्षको जाते हैं. जो पवित्र 6 (282) [ अध्यायः- भगवद्गीता। नाह्मण तथा क्षेत्रिय भक्त हैं उनकी मोक्षको फिर क्या शंकाहै ? इससे अनित्यं दुःखरूप इस लोकको पइिके मेरेको भेजो ॥३२॥३३॥ मत्सना भव मद्भक्तो माजी मां नमस्कुरु॥ मामेवप्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परौयणः ॥ ३४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्यारा- जगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः ॥९॥ भजनरीति यह कि, मेरेहीमें मनको युक्त कियेभये रहो मेरेही भक्त मेराही पूजन करनेवाले होउँ, मेरेहीको नमस्कार करो ऐसे मनको मेरेमें युक्तकरके मेरेही पैरायण भयेहुये मेरेही को प्राप्तहोवोगे ॥३४॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिताया श्रीगीतामृततरंगिण्यां नवमोऽध्यायप्रवाहः ॥९॥ सप्तमादिक तीनों अध्यायोंमें श्रीकृष्णजीने आपका भगवत्तत्त्व और विभूति वर्णन की. जैसे कि, सप्तममें “ नसोहमसु कौंतेय इत्यादि, अष्टममें “ अधियज्ञोऽहमेवात्र ” इत्यादि, नवममें “अहं मानुः" इत्यादिकरके संक्षेपसे कही. उनको और भक्तिकी आव- श्यकता अब दशमाध्यायमें विस्तारसे कहते हैं । श्रीभगवानुवाच । सूयं एंव महाबाहो श्रृणु में परमं वर्चः ॥ सत्तेऽहं" प्रीयमाण्य वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥१॥ श्रीकृष्णभगवान कहतेभ्ये कि, हे महाबाहो मेरी सर्वोत्तम पायं फिर भी सुनो, जो वाक्य प्रीतियुक्त जो तुम तिन तुंगसे तुम्हारे हितके वास्ते में कहताहीं ॥१॥ 11 , दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । न में विद्ःसुरगणाः प्रभवं ने महर्षयः॥ अहाँदिर्हिदेवानामहर्षीणांचे सर्वशः ॥२॥ मेरो जन्मभंया ऐसा न देवता ने महर्षी जानते हैं। कारण कि, मैं देवनकों और सेव महर्षिनकामी ऑदि हौं ॥२॥ योमामजमनादि चें वेत्ति लोकमहेश्वरम् ॥ असंमूढः सं मत्र्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥३॥ जो मेरेको अजन्मा और अनादि लोकमहेश्वर जानता है सो मनुष्यों में ज्ञानी है और सर्वपापोंकरके छुटाहै ॥३॥ बुद्धिनिमसंमोहः क्षमाँ सत्यं दमःशमः ॥ सुखं दुःखं भवो भावो भयं चाभयमेव च ॥४॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशैः ॥ अवंति भावी भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥५॥ बुद्धि, ज्ञान, अव्याकुलता, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुर्ख, दुःखे, उत्पत्ति, नौश, भय और अभयभी और अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश, अयशै ये न्यारे न्यारे भूतोंके भाव मेरेहीसे होते हैं ॥४॥५॥ महर्षयः सप्त पूर्वं चत्वारो मनर्वस्तथा ॥ मद्भावाँ मानसाँ जातो येषां लोक इमाः प्रजाः॥६॥ सात महाऋषी याने मरीचि वसिष्ठादिक महाऋषि चार इनके भी पूर्वज याने सनकादिक ऋपि तथा चौदह मनु मेरे संकल्पज मन इच्छा प्रमाणं उत्पन्नहोतेभये जिनके लोकमें ये प्रजा हैं ॥६॥ एती विभूति योगं च मम यो वेत्तिँ तत्त्वतः ॥ सोऽविकंपन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥७॥ जो पुरुष मेरी महर्षी इत्यादिकोंकी उत्पत्तिरूप इस विभूतिको २७ २६
(२१६)
भगवदीता।
अध्याय:-
और कल्याणगुणादिरूप योगको तत्वसे जाना है सो अचल भक्तियो-
गरके युक्त होताह इसमें संशय नहींहै ॥७॥
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्व प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजते मा बुधा भावसमन्विताः॥८॥
में सर्वका उत्पतिस्थान हौं मेरसे सर्व प्रवर्त्तहोताहै ऐसा मेरेको
मानिके भावसंयुक्त ज्ञानीजन मेरेको" भजतेहैं ॥८॥
मच्चित्ता मदतप्राणा बोधयंतः परस्परम् ।।
कथयंतश्च मां नित्यं तुप्यति च रैमंति च ॥९॥
उनका भजन प्रकार यह कि, मेरेहीमें जिनका चित्त है श्वासो-
च्यासपर मेरा स्मरण करते रहते हैं. परस्पर एक दूसरेको उपदेश
करते ये निश्चयपूर्वक मेरेको याने मेरेही गुणगणनको कहते
कहते निरंतर संतुष्ट होतहैं और मेरी करीभई क्रीडा करने
लगतहें ॥९॥
तेपी सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ॥
ददाँमि बुद्धियोगं ते येन मामुपयाति ते ॥१०॥
ऐसे वे निरंतर मेरे संगी मेरेको प्रीतिपूर्वक भजनेवाले तिनको उस
बुद्धियोगको देताहों कि, जिसकरके वे मेरेको प्राप्त होते हैं ॥ १० ॥
तेपामेवानुकंपार्थमहमज्ञानजं तमः ॥
नोशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वंता॥ ११ ॥
उनहींकी दयाके वास्ते उनकी मनोवृत्तिमें रहार्भया में प्रकाशित
ज्ञानरूप दीपकरके उनके अज्ञानजन्य तिमिरका नाशकरताहौं ॥११॥
अर्जुन उवाच ।
परं वन्न परं धाम पवित्रं परमं भवान् ॥
पुमपं शाश्वतं दिव्यमादिदेवजं विभुम् ॥ १२ ॥
(११७)
दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०।
बहुस्त्वामृपयः सर्वे देवर्षिनारदस्तथा ॥
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैं वै ब्रैवीषि में ॥१३॥
ऐसे श्रीकृष्णजीके वाक्य सुनिके अर्जुन बोले कि, आप परब्रह्म
हो श्रेष्ठप्रभाव हो परम पवित्र हो; सर्व ऋषिजन ऑपको अविनाशी
दिव्य पुरुष आदिदेव अंजन्म व्यापक ऐसे कहते हैं, वे ये जैसे कि,
देवऋषि नारद तथा असित देवल. व्यास और ऑप भी मेरेसे
कहतेहो ॥ १२ ॥ १३॥
सर्वमेततं मन्ये यन्मां वदसि केशवं ॥
न हि ते" भगवन व्यक्ति विदुर्देवा न दानवाः॥१४॥
हे केशव ! जो मेरेसे कहतेहों यह सर्व सत्य मानताहौं, कार-
पंकि, हे भगवन् ! तुम्हारी उत्पत्तिको न देवता जानते हैं न दानव
जानतेहैं ॥१४॥
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ॥
भूतभावन भूतेश देवदेवं जगत्पते ॥ १५॥
हे पुरुषोत्तम ! हे भूतभावनं ! हे भूतेश ! हे देवदेव ! हे जगत्पते
आप आँपको आपहीकी बुद्धि से ऑपही जानतेहो ॥१५॥
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः॥
याँभिर्विभूतिभिर्लोकानिमास्वं व्याप्य तिष्ठसि॥१६॥
जो दिव्य औपकी विभूती हैं उनको समग्रतासे कहनेको योग्य हो
कारण कि, जिन विभूतिनकरके इन लोकोंमें आप व्यापिके
रहेहो ॥१६॥
कथं विद्यामहं योगी त्वांसपिरिचितयन् ।।
केषु केषु च भावेषु चिंत्योसि भगवन्मया ॥१७॥
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
में भक्तियोगयुक्तभयाआआपको सर्दी ध्यावताभया कैसे जॉनी.
मार हेभगवन् ! आप मेरेकरके कौन कौनसे रूपोंमें ध्यावनयो-
ग्य हो॥ १७॥
विस्तरेणात्मनो योग विभूति चे जनार्दन ।
भूयः कथंय तृप्तिहिँ शृण्वतोनॉस्ति में"ऽमृतम्॥१८॥
हेजनार्दन ! आपको प्राप्ति उपाय और विभूति याने वैभव सोवि-
स्तारसे फिर कहो. याने संक्षेप कहा अब विस्तार कहो क्योंकि, इस
समृतरूप माहात्म्यको सुनते सुनते मेरे तृप्ति नहीं होतीहै ॥ १८॥
श्रीभगवानुवाच ।
देत ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ॥
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ट नौस्त्यंतो विस्तरस्य में।।१९॥
ऐसे सुनिके भगवान बोले कि, हंत याने हे अर्जुन ! तुम्हारेसे दिव्य
विभूति को प्रधानतासे याने मुख्य मुख्य कहींगा क्योंकि,
पुरुश्रेष्ठ ! मेरे विस्तारका अंत नहीं है ॥ १९॥
अंहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशंयस्थितः।
अहंमादिश्च मध्यं च भूतानामत एव च ॥२०॥
हे गुडाकेश ! सर्वभूतोंके अंतःकरणमें रहांभया में सर्वभूतोंका
अंतर्यागी हों और मैंही आदि और मध्य और अंतभी हौं, अब
यहांत में मैं कहते जायंगे यहां ऐसा अर्थ करना कि, जैसे आदित्य-
नमें विष्णुनाम आदित्य में हों ऐसे कहनेसे यह भया कि, विष्णु
साहित्य मेरी श्रेष्ट विभूति है याने उसमें मेरी शक्ति जादा है ऐसाही
का भी हो शब्द आवै तहां समझना विशेप गीतावाक्यार्थयो-
चिनी कारगने लिखाद वहां श्रुतिस्मृतिनका भी प्रमाण दियाहै सो
देसलेना॥२०॥
,
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दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (११९)
आदित्यानामहं विष्णुंज्योतिषां रविरंशुमान् ॥
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामह शशी ॥ २१ ॥
बादश आदित्यनमें विष्णुनाम आदित्य मैं हौ, ज्योति में किर-
णवंत सूर्य उनचास मरुतनमें मरीचिमरुत् नक्षत्रों में चंद्रमा
" हौं ॥२१॥
वेदानां सोमवेदोऽस्मि देवानाममि वासर्वः ॥
इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥ २२ ॥
वेदनमें सोमवेद हैं, देवनमें इंद्र है। और इंद्रियों में मन हौं
भूतप्राणिनमें चेतेना हौं ॥२२॥
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ॥
वसूनां पविकश्वास्मैि मेरुः शिखरिणामहम् ॥ २३ ॥
रुद्रनमें शंकर हौ और यक्षराक्षसोंमें कुबेर, और अष्टवसुनमें अमि
शिखरवालोंमें मेरुपर्वत मैं हौ ॥२३॥
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।।
सेनानीनामहं स्कंदः सरसामस्मि सागरः ॥ २४ ॥
हे पृथापुत्र! पुरोहितेनमें मुख्य बृहस्पति मेरेहीको जानो और सेना-
पतिनमें कार्तिकस्वामी, सरोवरनमें समुद्र में ही हौं ॥२४॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ॥
यज्ञानां जेपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥ २५॥
महर्षिनमें भृगु, वाक्यनमें एक अक्षर याने "ओम्" मैं हों यज्ञ-
नमें जपयज्ञे, स्थावरोंमें हिमाचल हौं ॥२५॥
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ॥
गंधर्वाणां चित्ररथः सिंद्वानां कपिलो मुनिः ॥ २६ ॥
( १२०) भगवद्गीता। [अध्यायः-- सर्वसनमें पीपर और देवांपेनमें नारद, गंधर्वनमें चित्ररथ सिद्धनमें कपिलमुनि हीं ॥२६॥ उच्चैःश्रेवसमश्वानां विद्धि मांममृतोद्भवम् ॥ ऐरांवतं गजेंद्राणां नराणां च नराधिपम् ॥ २७॥ घोडोंमें अमृतसे उत्पन्न उच्चैःश्रवाको, हाँथिनमें ऐरावतको और मनुष्यों में राजा मेरेहीको जानो ॥२७॥ आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मिं कामधुक् ॥ प्रजनश्चीस्मि कंदपः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥२८॥ आयुध में वैज्र, धेनुनमें कामधेनु मैं हौं उत्पत्तिकारक काम- देव हों और ऐकशिरवाले सर्पनमें वासुकीसर्प मैं हौ" ॥२८॥ अनंतश्चास्मि नागानां वरुणो याँदसामहम् ॥ पितॄणामर्यमा चास्मैि यमः संयमैतामहम् ॥ २९ ॥ और अनेक शिरवाले सपा में शेषजी में हों; जलजीवनमें मैं वरुण ही पितॄनमें अर्यमों और शासनकरनेवालोंमें मैं यम हौं ॥ २९॥ प्रहादश्चास्मि दैत्यानां कॉलः कलयतामहम् ॥ मुंगाणां च मृगेंद्रोऽ हवैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥३०॥ दैत्यनेमें प्रबाद हों और अनर्थकारककी गनतीकारकोंमें मैं काल हो और मृगोंमें मैं" "हों और पक्षिन में गरुड हौं ॥३०॥ पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ॥ झंपाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥ ३१ ।। पवित्रकारकोंमें पवन ही शस्त्रधारीन में राम साक्षात् मैं ही, यहाँ मन्त्रधारणमात्र विभूति है मच्छनमें मकर हों और प्रवाहवालोंमें श्रीभी गीरथी हा"।।३३॥
दशमः १०.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१२१) संर्गाणामांदिरंतश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ॥ अध्यात्मविद्याविद्यानां वादः प्रवदतीमहम् ॥ ३२ ॥ सँगै जो ब्रह्माके दिवस उनमें आदि उत्पत्तिकारक और अंत प्रलय- कारक और मध्य याने रक्षक मैं ही हों. हे अर्जुन ! सर्वविद्यानमें अध्या- त्मविद्या वादकरनेवालोंमें वाद याने सिद्धांत मैं हौं ॥ ३२॥ अक्षराणामकारोस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताह विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥ अक्षरों में अकार हो समासनमें द्वंद्वसमास और अक्षय काल में चौतरफ मुंख जिसके ऐसा सर्वनका भरनेपोषनेवाला मैं ही हौं॥३३॥ मृत्युः सर्वहरचाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ॥ कीर्तिःश्रीवाक्चें नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिःक्षमा॥३४॥ सर्वका हरनेवाली मृत्यु मैं और आपकी बढती चाहनेवालोंमें उद्भव याने बढती मैं हौं स्त्रीजनों में कीर्ति, श्री, वाक, स्मृति, मेधी, धृति और क्षमा मैं हौं ॥ ३४ ॥ बृहत्साम तथा सौम्नां गायत्री छंदसामहम् ॥ माँसानां मार्गशीर्षोऽहमृतूंनां कुसुमाकरः॥ ३५ ॥ तैसे' सामवेदेके मंत्रोंमें बृहत्साम, छंदोंमें गायत्रीमंत्र में हौं महीनोंमें मार्गशीर्ष ऋतुनमें वसत मैं हौं ॥ ३५ ॥ चूतं छलयतामस्मि तेज॑स्तेजस्विनामहम् ॥ जयोस्मि व्यवसायोस्मैि सैत्वं सत्ववैतामहम् ॥३६॥ छलंकारिनमें जुवा तेजस्विनमें तेज मैं हौं । जीतनेवालोंमें जय हौं, निश्चयवालोंमें निश्चय, हौं उदारनमें उदारती मैं हौं ॥३६॥ वृष्णीनांवासुदेवोस्मिं पांडवानां धनंजयः ॥ १
२२)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुर्शना कैविः ॥ ३७ ॥
अगिवंशिनमें वासुदेव यहां वसुदेवपुत्रत्व मात्र विभूति जानना
पांडवमें अर्जुन तुम हो सो श्रेष्ट विभूति हो इससे तुमभी मैं हों, मुनि-
नमें व्यासजी में हो, केवि जो शास्त्रदर्शी उनमें शुक्राचार्य
कोवि में हो ॥३७॥
दंडो दमयंतामस्मि नीतिरस्मिं जिगीषताम् ॥
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवैतामहम् ।। ३८॥
स्ववशकर्तन में दंड हौं, जयं चाहनेवालोंमें नीति हो, गुप्तकर-
नेके उपायोंमें मौन हौं, ज्ञानिनमें मैं" ज्ञान हौं ॥३८॥
यंचापि सर्वभूतानां बीजं तैदहमर्जुनै ।।
न तदस्ति विनायत्स्यान्मयाभूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
हे अर्जुन ! सर्वभूतोंका जो आदिकारण है सो में हौं जो चराचर
भृतं "मेरे विना होय सो" नहीं है ॥ ३९ ॥
नीतोऽस्ति ममं दिव्यानां विभूतीनां परंतपं ॥
एवं तूदेशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मयों ॥४०॥
हे अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतिनका अंत नहीं है परंतु यह विभू-
तिको विस्तार मैंने २ संकेतमात्रसे कहाहै ॥४०॥
यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदर्जितमेव वा ।।
तत्तदेवाऽवगच्छे त्वं मम तेजोंशसंभवम् ॥ ४१ ॥
जो जो प्राणी ऐश्वर्यवान्, शोभायमान अथवा बडा होय साँसो
मेर तेजके अंशयुक्त है ऐसे तुम जानो ॥४१॥
अथवां बर्हनतेनं किं ज्ञातेन तवार्जुने ।।
विटभ्याहमिदं कृत्स्नमकांशेन स्थितो जगत् ॥४२॥
एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१२३) इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो- गशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ हेअर्जुन ! अथवा इस बहुत जानकरके तुम्हारे क्या प्रयोजन है मैं इस सवे जगतको एक अंशकरके धारण कियेभयेस्थित हौं ॥४२॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीगीतामृततरांगण्यां दशमोऽध्यायप्रवाहः ॥ १० ॥ अर्जुन उवाच । मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ॥ यत्वयोक्तं वचस्तेने भो होऽयं विगतो मम ॥ १ ॥ जब भगवान्ने आपकी विभूति कही और उसमें आपका स्वरूप - वर्णन किया तब सुनिके अर्जुन देखनेकी इच्छा करके बोले कि, भगवन् ! मेरे अनुग्रहके वास्ते सर्वोत्तम गोप्य अध्यात्मसंज्ञित याने आत्मज्ञानविषयक जो वचन आपने कहा उसकरके मेरा यह मोह गया ॥१॥ भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया। त्वत्तः कमलपत्राक्षे माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २॥ कारण कि, हे कमलदलैनयन! भूतप्राणिनके उत्पत्ति प्रलय आपसे मैंने विस्तारपूर्वक सुने और आपको अक्षयमाहात्म्य भी सुना।।२।। एवमेतद्यथात्थे त्वमात्मानं परमेश्वर ॥ ट्रेष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥३॥ हे परमेश्वर! तुम आपको जैसे कहतेहो यह ऐसाही है हे पुरु- वोत्तम ! तुम्हारे ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, तेज, इन छहों ऐश्वर्ययुक्त रूपको देखनेको चौहताहौं ॥३॥ .
(१२४)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुंमिति प्रभो॥
योगेश्वर तंतो में त्वं देशयात्मानमव्ययम्॥४॥
हे प्रभो ! जो वहरूप मेरेकरके देखनेको योग्य है ऐसा मानते हो
दे योगेश्वरं! तो तुम अविनाशी आपके रूपको मेरेको "दिखावो॥४॥
श्रीभगवानुवाच ।
पैश्य में पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानांवर्णाकृतीनि च ॥५॥
ऐसे वचन सुनिके भगवान बोले कि, हे पृथापुत्र! सैकडों फिरे
हजारों अनेकप्रकारके दिव्य और अनेकवर्ण आकारके मेरे रूपोंको
देखो ॥५॥
पश्यांदित्यान् वसूनं रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथी॥
वहून्यदृष्टपूर्वाणि पैश्याश्चर्याणि भारत॥६॥
इहकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याये सचराचरम् ।।
ममं देहे गुडौंकेश यच्चान्यद्रष्टुमिच्छसि ॥७॥
है भारत ! मेरी देहेमें द्वादशसूर्य अष्टवसु ११ रुद्र अश्विनीकु-
मार ४९ मरुत् देखो तथा जो प्रथम न देखे ऐसे बहुत आश्चर्य
देखो हे गुडाकेश ! इस मेरे देहमें सचराचर सर्व जगत् एकही ठिकाने
इकडेको आज देखी और जो और भी देखनेको चाहतेहो उसे
भी देखो ॥६॥७॥
नं तु मां शय॑से द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुपां।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम् ॥८॥
इस आपकी दृष्टिकरके मेरेको देखनेको नं समर्थ होवेंगे इससे
तुमको दिव्य नेत्रं देताही तिसकरके मेरे ईश्वरसंबंधी योगको
देखो॥ ८॥
एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१२५) संजय उवाच । एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः॥ दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहतेभये कि, हे राजन् ! महायोगेश्वर श्रीकृष्ण ऐ से कहिके. फिर सर्वोत्तम ईश्वरसंबंधी रूप अर्जुनको दिखाते भये ॥९॥ अनेकवक्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ॥ अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ जिसरूपमें अनेक मुख और नेत्र हैं और अनेक अद्भुत दर्शन अनेक दिव्य आभूषणयुक्त है और दिव्य अनेक उगाये हैं आयुध जिसमें ॥१०॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥ सर्वांश्चर्यमयं देवमनंतं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ दिव्य माला और वस्त्रधारणकियेहैं दिव्य चंदनादि गंधका लेपन किये हैं सर्व आश्चर्यमय प्रकाशमान अंतर्हित और सब और जिसमें मुख हैं ऐसा रूप अर्जुनको दिखातेभये ॥११॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेयुगप॑दुत्थिता॥ यदि भौः सदृशी साँस्यौद्भासंस्तस्यं महात्मनः॥१२॥ जो आकाशैमें हजारों सूर्यनका एक समयमें उत्पन्नभयाहुआ तेज़ होय सो तेज उन महात्मा भगवानके तेजके समान होय ॥ १२ ॥ तत्रैकॅस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ॥ अपश्यदेवदेवस्य शरीरे पांडवस्तदा ॥ १३ ॥ उस देवनकेभी प्रकाशक कृष्णके शरीरमें उस समय में अनेक .. - (१२६) भगवद्गीता। [ अध्यायः- प्रकारका न्यारा न्यारा एकही ठेकाने इकटा ऐसे सर्व जगतको मंजुन देखतेभये ॥१३॥ से विस्मयाविष्टी हष्टोमा धनंजयः ।। प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरभाषत ॥१४॥ तेव विस्मय करके व्यात रोमांचयुक्त वह अर्जुन कृष्णको मस्तकसे प्रणामकरके हाथ जोरभये वोले ॥१४॥ अर्जुन उवाच । पश्यामि देवास्तव देव दे हे सर्वीस्ता भूतवि- शेपसंघान् ॥ ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थऋषीं- चे सर्वानुरगाँश्च दिव्याने ॥ १९ ॥ अर्जुन कहते हैं कि, हे देव ! तुम्हारे शरीरमें देवनको तथा सर्व भूतप्राणिनके समूहोंको तथा बल्लाको और कमलासन जो ब्रह्मा उनमें स्थित जो ईश्वर याने आपही तिनको और सर्व पिनको और दिव्य सर्पनको देखताहौं ॥ १५ ॥ अनेकवाँहूदरवक्रनेत्रं पश्यामि त्वा सर्वतोऽनंत- रूपम् ॥ नातं नै मध्यं न र्पुलस्तवादि पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६॥ हे विश्वेश्वर ! हे विश्वरूप ! तुमको सर्व ओरसे अनेक भुजा उदर मुख और नेत्रवाले अनंतरूप देखताहीं तुम्हारा ने अंत ने मध्य ने फिर ऑदि देखताहीं ॥ १६॥ किरीटिनं गैदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमंतम् ॥ पश्यामि त्वां दुनिरीक्ष्यं समंतां- हीप्तानलोकश्रुतिमप्रमेयम् ॥ १७ ॥ .
एका ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१२७) तुमको किरीटनान् गदावान् चक्रवान और तेजकी राशि सब ओरो प्रकाशवान सब ओरसे दुनिरीक्ष्य प्रदीप्त अग्नि और सूर्यनकी क्रांतिसरीखी कांतिमान् और अपरिमितरूप देखैताहौं ॥ १७॥. त्वमक्षरं परमं वेदितव्य खेमस्यं विश्वस्य पर निधान ॥ त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनात- नस्त्वं पुरुषो मैंतो में" ॥१८॥ जो मुमुक्षु जनोंकरके जानने योग्य सर्वोत्तम विष्णु आप हो इस विश्वके श्रेष्ठं आधार आप हो सनातनधर्मके रक्षक अविनाशी आप हो सनातन पुरुष आप हो यह मैंने जाना है ।। १८॥ अनादिमध्यातमनंतवीर्यमनंतबाहुं शशियने- नम् ॥ पश्यामि त्वां दीप्तहुताशर्वकं स्वते- जसा विश्वमिदं ततम् ॥ १९॥ नहीं है आदि, मध्य और अंत जिनके अनंत है पराक्रमे जिनका अनंत है भुजा जिनके चंद्र सूर्य हैं नेत्र जिनके प्रदीप्त अग्निसहा मुख जिनके जो आपके तेजकरके इस विश्वको तपायमान करर- हेहो ऐसे तुमको देखता हौं ॥ १९॥ वाशिष्योरिदमंतरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशा सर्वाः ॥ दृष्ट्वाऽद्भुतं रुपKग्रं तवेद" लोकन व्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥ है महाशरीर ! यावापृथिवीका यह अंतर याने इस ब्रह्मांडका पोल आप इस करके व्याप्त है और सर्व दिशा व्याप्त हैं अर्थात् ऊंचाई करके ब्रह्मांड पोल और चौड़ाई करके सर्व दिशा पूरगई हैं ऐसे (१२८) भगवद्गीता। [अध्याय- आपके इस अद्वैत उग्र रूपको देखिके तीनों लोक याने तीनों लोकोंके निवासी देव मनुष्यादिक व्याकुल हैं ॥२०॥ अंमी हि त्वां सुरसंघा विशंति केचिद्भीताः प्रा. जलयो गृणंति ॥ स्वस्तीत्युकी महर्षिसिद्धसं- घाः स्तुवंति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥ ये देवतनके समूह आपके समीपं प्राप्तभयेहैं कितनेक भयभीत हाथ जोरेभैये तुम्हारे गुण नाम उच्चारण करतेहैं महर्षी और सिद्धन- के समूह स्वस्ति ऐसे कहिके तुह्मारी अनेक प्रकारकी स्तुतिन करके स्तुति करतहैं ॥२१॥ रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वश्विनी म- रुतश्चोप्पाच ॥ गंधर्वयक्षासुरसिद्धसंघों वी क्ष- ते वा विस्मिताश्चैव सर्वे ॥२२॥ एकादश रुद्र द्वादश आदित्य अष्ट वसु और जो साध्य नामक उपदेव तेरह विश्वेदेव दो अश्विनीकुमार उंचासँ मरुत् और पितर और गंधर्व यक्ष देवता और सिद्ध इनके समूह ये सर्व विस्मित भये हए तुमको ही देखिर हेहैं ॥ २२ ॥ रूपं महत्ते वहुवक्रनेत्रं महाबाहो बहुवाहरुपा- दम् ॥ बहूदरं बहुदंष्ट्राकरांलं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाँहम् ॥ २३॥ हे गहाय हो ! बहुत हैं मुखं और नेत्र जिसमें तथा बहुत हैं भुजा जांबा और नागा जिसमें बहुत है उदर जिसमें बहुत दाढों करके -- एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१२९) विकराल ऐसे तुम्हारे महत् रूपको देखिके लोक व्याकुल हैं तैसेही" मैं भी व्याकुल हूं ॥२३॥ नभःस्टंशं दीप्तमनेकवर्ण व्यत्तिाननं दीप्तवि- शालनेत्रम् ॥ दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितांतरात्मा धृति न विदामि शमं च विष्णो ॥ २४ ॥ दंष्ट्रा- करालानि च ने मुंखानि हैष्ट्वैव कालानलसन्नि- भानि ॥ दिशो न जाने न लेंभे च शर्म प्रसीद देवेश जगनिवास ॥ २५॥ अमी चे त्वां ("हवा दिशो नँ जाँनंति शर्म न लभंते इति पूर्वेण पंच- विंशतितमेन पद्येनान्वयः") धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंधैः॥ भीष्मो द्रोणः सूत: पुत्रस्तथाऽसौ सहाऽस्मदीयैरपि योधर्मुख्यैः ॥ ॥ २६ ॥ वैवाणि ते त्वरमाणौ विशति दंष्ट्री- करालानि भयानकानि ॥ के चिद्रिलग्ना दश- नांतरेषु सदृश्यते चूर्णितैरुत्तमांगैः ॥ २७ ॥ हे विष्णो ! नभ जो प्रकृतिसे परे परम आकाश वैकुंठ तहांपर्यंत है स्पर्श जिनका जो प्रकाशमान अनेक वर्णयुक्त रूप तथा मुख फैलाये प्रदीप्त और विशाल नेत्र ऐसे आपको देखिके जिससे कि, मैं व्याकुलचित्त भयाहुआ धीरजको और शांतिको नहीं प्राप्त होताहूं और दो हैं कराल जिनमें और कालानलके तुल्य हैं ऐसे तुम्हारे मुंखोंको देखि के ही दिशाओंको नहीं जानताहूं और सुखको भी नहीं प्राप्तहोताहूं और राजोंके समूहोंकरके सहित सर्व धृतराष्ट्रके पुत्र तथा भीष्म द्रोण यह कर्ण और हमारे जोधनमें मुख्य जो हैं - (३८) भगवद्गीता। [अध्याय:- तिनकरके सहित तुमको ("देखिके दिशौओंको नहीं जानते हैं और सुखको नहीं प्राप्तहोते हैं ऐसे प्रथमके पच्चीसवें श्लोककरके अन्वय है")। ये सर्व अतिवेगको प्राप्तमये डोटें हैं कराल जिनमें ऐसे भयानक आपके सुखोंमें प्रवेश करते हैं कितनेक चूर्णितभयेहुये मस्तकोंकरके सहित तुम्हारे दांतोंकी संधिनमें पटकभये दीखते इससे हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप कृपा करो याने हम सब डरते इससे आपप्रथमसरीखे सीम्यरूपको धारणकरो॥२४॥२५॥२६॥२७॥ येथा नदीनां वहवोऽम्बुंवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवंति ॥ तथा तवामी नरलोकवीरा विशति बँकाण्यमितो ज्वलंति ॥ २८॥ जसे नैदिनके बहुतसे पानीके वेग समुद्रहीके संमुख धावते हैं तैसे ये नैरलोकवीर तुम्हारे सर्व ओर प्रज्वलित मुंखोंमें प्रवेश करतेहैं ॥२८॥ यथा प्रेदीप्तं ज्वलनं पतंगा विशंति नाशाय स- मृद्धवेगाः॥ तथैव नौशाय विशंति" लोकांस्त- वापि" वक्रोणि समृद्धवेगाः ॥ २९ ॥ जैसे अतिवेगवंत पतंगे आपके नाशके वास्ते प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश करतेहैं तैसेंही अतिवेगवंतं ये लोग भी अपने विनाशके वास्ते तुम्हारे मुंखोंमें प्रवेश करते हैं ॥२९॥ लेलिासे ग्रंसमानः समंतालोकान्समग्रान्वदै- नैज्वलंद्भिः ॥ तेजोभिरापूर्य जगत्समैं भी- सस्तेवोग्राः पंतपंति विष्णो॥३०॥ विष्णो ! प्रज्वलित अपने मुखकाके सर्व लोगोंको सब पोरस घेरतेभये चाटेजातेहो याने खायेजानेहो तुम्हारे उग्र प्रकाश NAA १७ एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१.३१) सर्व जगत्को अपने तेजकारके परिपूरित करिके तैपरहेहैं ॥ ३० ॥ आख्याहि में को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ॥ विज्ञातुमिच्छामि भवंतमाचं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ हे देववर ! ऐसे उग्ररूप आप कौन हो सो मेरेसे कहो क्योंकि, तुम्हारी प्रवृत्तिको मैं नहीं जानताहूं जो आप आदिहो उनको जानने- की इच्छा करताहूं आप कृपाकरो तुम्हारेको नमस्कार होउँ ॥३१॥ श्रीभगवानुवाच । कॉलोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाह- तुमिह प्रवृत्तः ॥ तेऽपि त्वां न भविष्यति से- वे येऽवस्थिती प्रत्यनीकेषु योधाः ॥ ३२ ॥ ऐसे सुनिके श्रीकृष्ण भगवान बोले कि, मैं इन लोगोंके क्षयके वास्ते बढाभया कोल हूँ यही इन लोगोंका संहार करनेके वास्ते प्रवर्त भयाहूं जो ये जोधा तुम्हारी शत्रुसेनाओंमें खड़े हैं ये सब तुम्हारे विना निश्चयपूर्वक न रहेंगे ॥ ३२॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुं- क्ष्व राज्यं समृद्धम् ॥ मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन ॥ ३३॥ हे सव्यसाचिन् ! हे अर्जुन ! जिससे कि ये मरहीगे तिससे तुम उठ यश लेउ शत्रुनको जीतिकै समृद्ध राज्यको भोगो" प्रथमही ये सब मैंने" मार खेहैं तुम तो निमित्तमात्र होउँ ॥ ३३ ॥ द्रोणं च भीष्मं , जयद्रथं च कर्ण तथाऽन्यानपि मगवद्गीता। [अध्यायः- योधवीरान ॥ मैया हतांस्त्वं हि मी व्यथिष्टा युध्यस्व जैतासि रणे सपत्नान् ॥ ३४ ॥ द्रोणे और भीष्म और जयद्रथ और कर्ण तां औरंभी शूरवीर इनको मेरे मारेभयेनको तुम मारो, मैति दुःखित होउ रणमें शत्रून- को जीतोगे युद्धकैरो॥३४॥ संजय उवाच । एतच्छत्वा वर्चनं केशवस्य कृतांजलिवैपमानः किरीटी ॥ नमस्कृत्वा भूयएवाह कृष्णं संगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥ ३५॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि, किरीटी जो अर्जुन सो . श्रीकृष्ण के इतने वचन सुनिके कांपते कांपते हाथ जोड़ेभये नमस्कार करके फिरभी भयभीत प्रणाम करके गद्दकंठयुक्त श्रीकृष्णसे, बोलतेभये ॥३५॥ अर्जुन उवाच । स्थाने हषीकेश तव प्रकीर्त्यां जगत्प्रहष्यत्यनु- रज्यते च ॥ रक्षांसि भीतानि दिशो वंति स- वें नमस्यंति चे सिईसंघाः॥३६॥ अर्जुन कहते हैं कि, हे हपीकेश ! तुम्हारी उत्तम कीर्तिकरके ज- गत आनंदित होताहै और आपसे प्रीति करताहै राक्षस भयको प्राप्तभयेहैये सवैदिशाओंको भागतेहैं और सर्व सिद्धसमूह नम- स्कार करते हैं सो यह योग्यही है ॥३६॥ कस्माच्च ते न नमेरन् महात्मने गरीयसे ब्रह्म- णोऽप्यादिकत्रे ॥ अनंत देवेश जगन्निवास त्व- मक्षरं सदसत्तैत्परं यत् ॥३७॥ - एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१३३) हे महात्मन् ! ब्रह्मासे भी बडे आदिकर्ती जो आप तिन तुमको वे क्यों न नमन करै अर्थात् करेहीकरें. हे अनंत ! हे देवेश ! हे जंग- निवास ! जो अक्षर याने जीवतत्त्व सत् जो कार्य स्थूलप्रकृति असत् जो सूक्ष्मप्रकृति कारण तत्पर जो शुद्ध आत्मा सो सब आप हो याने सबके अंतर्यामी हो ॥३७॥ त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥ वेत्तासि वेद्यं च परं चै धाम त्वया ततं विश्वमनंतरूप ॥ ३८॥ आप आदिदेव पुराण पुरुष हो तुम इस विश्वके परम आधार हो इसके जाननेवाले और जानने योग्य और इसके सर्वोत्तम वास- स्थान हो" हे अनंतरूंप ! यह विश्व तुमकरके व्याप्त है ॥ ३८॥ : वायुयमोग्निवणः शशांकः पितामहस्त्वं प्रपि- तामहश्च ॥ नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते ॥ ३९॥ पवन अग्नि यम वरुण चंद्रे पितामह और प्रपितामह तुम हो इससे तुमको हजारोंवार नमोनमः होउँ फिर और: फिरभी तुमको नमोनमः ॥३९॥ नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ॥ अनंतवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ४० ॥ हे सर्व ! तुमको अगारीसे और पिछारीसे नमस्कार और तुमको सब ओरसे भी नमस्कार होउँ अनंत बल और अमित परीक्रम तुम सर्वमें व्यापक हो इसीसे तुम सर्वरूप हो ॥१०॥ सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव १४
१२
(१३४,
भगवद्गीता।
[ अध्याय:--
हे संखेति ॥ अजानता महिमानं तवेर्दै मया
प्रमादात्प्रणयेनं वापि ॥ ४१ ॥ यच्चीवहीं-
सार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषू ॥
एकोऽथवाँप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामैये त्वामै-
हममेयम् ॥४२॥
हे अच्युतं ! तुम्हारे महिमाको और इस विश्वरूपको न जानने-
पला जो मैं तिसं मैंने प्रमादसे अथवा प्रणयसे भी सखा ऐसे
सैनिके हे कृष्ण! हे यादव ! हे सखे ! ऐसे हैंठसे जो कहाहोर्य और
कडा शयन आसन तथा भोजनकालमें अकेला अथवा और उन
सखोंके संमुख इसीके वास्ते जो आपका अपमान किया होय सो
परमितिरहित जो आपतिनैं आपसे में क्षमा करताहूं ॥४१॥४२॥
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूँज्यश्चं
गुरुंगरीयान् ॥ न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः
कुतोन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रंतिमप्रभावः ॥ ४३ ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं 4सादये त्वाम-
हमीशमीयम् ॥ पितेव॑ ए॒त्रस्य संखेव संख्युः
प्रियः प्रियायाहसिं देव सोहुँम् ॥४४॥
हे सर्वोत्तमप्रभाव ! आप इस चराचर लोकके पिता हो और सर्व
गुरुनसे बडे गुरु हो इसीसे पूज्य हो तीनों लोकमें भी आप समान
और नहीं है तो कहांसे और अधिक होयगा तिसँसे मैं शरीरके
पृथिवीपर धारणकियेभये प्रणामकरके ईश्वर इसीसे स्तुतिकरने
योग्य आपको प्रसन्न करूंहूं हे देखें ! पुत्रके प्रियके वास्ते पिता जै
संखाके प्रियके वास्ते सँखा जैसे ऐसे मेरे प्रिय आप हो सो में
पारके वास्ते मेरे अपराध सहनेको योग्य हो ॥४३॥४४॥
१४
एका० ११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
अंदृष्टपूर्व हषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं
मैंनो मे ॥ तदेव मे देर्शय देव रूपंप्रैसीद देवे-
जैगन्निवास ॥४५॥
जो रूप मैंने और किसीनेभी प्रथम नहीं देखा था उसको देखिके
चकित भयाहूं और भयेसे मेरा मन व्याकुल भयाहै हे देवे ! मेरे-
को वही प्रथमका रूप दिखावो हे देवेश । हे जगन्निवास ! आप
मेरेपर प्रसन्न होउ ॥४६॥
किरीटिन गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टु-
महं तथैव ॥ तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन संहस्र-
बाहो भर्वं विश्वमूर्ते ॥ ४६॥
हे सहस्रवाहो ! हे विश्वमूतॆ ! मैं वैसाही किरीटयुक्त गदायुक्त
चहस्त आँपको देखनेको चाहता हूं इसवास्ते उस ही चतुर्भुज
रूपैकरके युक्त होउँ ॥ ४६॥
श्रीभगवानुवाच ।
मैया |सन्नेन तँवार्जुनेदं रूपं पैर दर्शितमात्म-
योगात् ॥ तेजोमयं विश्वमनंतमाद्यं यन्मे त्वंद-
न्येन नै दृष्टंपूर्वम् ॥४७॥
ऐसी अर्जुनकी प्रार्थना सुनिके भगवान बोले कि, हे अर्जुन ! जो
मेरो तेजोमयं विश्वरूप अंतर्हित सर्वका आदि तुम्हारे विना और
किसीने नहीं प्रथम देखा सों यह पैर रुप प्रसन्न होके मैंने आपके
सत्यसंकल्परूपयोगसे तुमको दिखाया ॥४७॥
न वेद्यज्ञाऽध्ययनैन दोनैन" चे क्रियाभिन"
तपोभित्रैः ॥ एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं
त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८॥
(१३६) भगवद्गीता। [ अध्याय:- हे कुरुवंशिनमें श्रेष्टवीर । ऐसे रूपका मैं इस मनुष्यलोकमें तुम्हारे बिना औरके न वेदपाठ यज्ञ और मंत्रजपँकरके न दानकरके मार ने योगक्रियाकरके ने उग्र तपकरके देखनेको योग्यहूं ॥४८॥ मां ते व्यर्थी मा चे विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोर- मी ममेदम् ॥ व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं पश्य ॥४९॥ ऐसे घोर मेरे इस रूपको देखिके तुमको व्यथा मैति होउ और मोहेभाव भी मति होउ भयरहित प्रसन्नमन तुम वही यह मेरी हंप फिर देखो ॥४९॥ संजय उवाच । इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्कों स्वकं रूपं देर्शया- मास भूयः ॥ आश्वासयामास च भीतीनं भृत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्माँ ॥ ५० ॥ संजय धृतराष्ट्रसे कहते हैं कि, वसुदेवपुत्र कृष्णं ऐसे अर्जुनको कहिके वैसा ही पूर्ववत् आपके रूपको फिर दिखातेभये और जो अंडेशरीरयुक्त थे सो सौम्यरूप होके फिर भयभीत अर्जुनको आश्वासते भये ॥५०॥ अर्जुन उवाच । हेवेदं मापं रूपं तवं सौम्यं जनार्दन । ईदानीमस्मि संघृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१॥ तब अर्जुन बोले कि, हेजनार्दनं । तुम्हारे इस सौम्य मानुपरूपको देखि के व सचेतंभयाहुआ आपके स्वभावको प्राप्तभया सावधान हूं ॥५॥ श्रीभगवानुवाच । मुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।।
एका०११.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१३७)
देवां अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाक्षिणः ॥५२॥
अर्जुनके वाक्य सुनिके श्रीकृष्ण बोले कि, हे अर्जुन ! जो अंति-
दुर्लभदर्शन इस मेरे रूपको तुम देखतेभये इस रूपके देवता भी
निरंतर दर्शनाभिलाषी रहाकरते हैं ॥१२॥
नाँह' वेर्दै ने तपसा नै दानेन नै चे" ज्यया ॥
शक्य एवंविधी द्रष्टुं दृष्टवानसि माँ यथा ॥ ५३ ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुनं ॥
ज्ञातुं ट्रैष्टुं चै तत्त्वेन प्रवेष्टुं चै परंतपै ॥ ५४ ॥
हे अर्जुन ! जैसे मेरेको तुम देखते ये इसप्रकारका मैं न वेदों-
करके ने तपकरके ने दोनकरके और न यज्ञकरके देखें नेको
सँकताही क्योंकि हे परंतप ऐसों में अनन्य भक्तिकरके निश्चयपूर्वक
जाननेको और देखनेको समी प्राप्तहोनेको भी सकताहों।॥५३॥५४॥
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः॥
निर्वैः सर्वभूतेषु यः स मामेति" पांडव ॥ ५५ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शन-
योगो नाम एकादशोऽध्यायः॥ ११ ॥
हे पांडव ! जो मनुष्य मेरेनिमित्त लौकिक वैदिक सर्व कर्म
करताहै मेरेहीको सर्वसे. अतिउत्तम मान रहाहै मेरा ही भक्त है
मेरे संबंध विना और संगोंकरके रहितहै और सर्वभूतप्राणिनमें
निर्वैर है. सो मेरे को प्राप्तहोताहै ॥ ५५॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां
श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यामकादशाध्यायप्रवाहः ॥ ११ ॥
(१६८) भगवद्गीता। [अध्याय:- अर्जुन उवाच । एवं सततयुक्ता ये भक्तांस्त्वां पर्युपासते ॥ ये चाँप्यारमव्यक्तं तेषों के योगवित्तमाः ॥१॥ ऐसे प्रथम आत्मज्ञानकी महिमा श्रीकृष्णजीने वर्णन की फिर भक्तिहीसे जानने देखनेमें और प्राप्तहोनेमें आताही सो दोनोंको सुनिके अर्जुन पूंछते हैं कि, निरंतर भक्तियोगयुक्तभयेहुए जो भक्त ऐसे जो आप पीछे अध्यायके अंतमें कहा तैसे आपकी उपासना करते हैं और जो इंद्रियोंके अदृश्य अक्षर याने आत्मस्वरूप उसकी उपासना करतेहैं उन दोनोंमें अतिश्रेष्ट कौन है याने आत्मज्ञानी श्रेष्ट है कि, आपके उपासक श्रेष्ट हैं सो कहो ॥१॥ श्रीभगवानुवाच। मंय्यावश्यं मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ॥ श्रईया परयोपतास्ते में युक्ततमा मताः ॥२॥ ऐसा अर्जुनका प्रश्न सुनिके श्रीकृष्णभगवान् बोले कि, जो' निरंतर भक्तियोगयुक्त मेरेमें मनको लगायके परम श्रद्धाकरके युक्त मेरेको भेजते हैं वे" योगिने में श्रेष्ठ मेरे मान्य हैं ॥ २॥ येत्वारमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ॥ सर्वत्र- गमैचिंत्यं च कूटस्थमचेल ध्रुवम् ॥ सैन्निय- म्येंद्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः॥ते प्राप्नुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ केशोऽधिकतरस्ते- पामव्यक्तांसक्तचेतसाम् ॥ अव्यक्ता हि गति- दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥३॥ ४॥५॥ जो कोई इंद्रियसंमृहको नियममें रौखिके सर्वत्र समद्धि सर्वभू- तोके हितमें रतहुयेभये निर्देश्य याने देवादि शरीरशब्दोंकरके कह-
द्वाद० १२.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१३९)
नेमें न आवे ऐसे अव्यक्त याने इंद्रियगोचर नहीं “सर्वत्रग"याने सर्वत्र
देवादिशरीरों में रहनेवाला औचित्य याने ध्यानमें न आवे और कूट-
स्थ याने सर्वत्र एकसा रहे अंचल याने स्वस्वरूपहीमें स्थिर ईसीसे
नित्य ऐसे अक्षरको याने आत्मस्वरूपको भजते हैं याने आत्मस्व-
रूपहीका अनुसंधान करते हैं वेभी मेरेहीको प्राप्तहोते हैं. परंतु
आत्मज्ञाने देशा दुःखपूर्वक देहधारिनकरके प्राप्तहोताहै इससे
उन अव्यक्तासक्तचित्तनको केश अतिशय है ॥३॥४॥५॥
ये सर्वाणि कर्माणि मंयि संन्यस्य॑ मत्पराः ॥
अनन्येनैव योगेन मी ध्यायंत उपासते ॥६॥
तेषामहं समुद्धतां मृत्युसंसारसागरात् ॥
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७॥
हे पृथापुत्र ! जो कोई सर्व काँको मेरेमें अर्पणकरके मेरेही
शरणभयेहुये अनन्य भक्तियोगकरके मेरे को ध्यावते पूंजते हैं ऐसे
"मेरेमें लगायाहै चित्त जिनने उनका मैं थोडे ही कालमें मृत्युदुःख-
रूप संसारसागरसे उद्धारकर्ता होउंगा ॥६॥७॥
मय्येव मनै आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशयं ॥
निवसिष्यसि मय्येव अतऊर्ध्व न संशयः॥ ८॥
इससे तुम मेरेहीमें मैनको लगावो मेरे हीमें बुद्धिको लगावो
इस मन,बुद्धिलगाये पीछे मेरेही समीप रहोगे इसमें संशय नहीं है।॥८॥
अर्थ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ॥
अभ्यासयोगेनं ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥९॥
हे अर्जुन ! जो कदाचित् मेरेमें चित्तको स्थिर समाधानकरने
को नहीं सकँते हो तो अभ्यासयोगकरके मेरे" प्राप्तहोनेको इच्छ-
तेरहो ॥ ९॥
. (१४०) भगवद्गीता। [अध्याय:- अभ्यासप्यसमर्थोसि मत्कर्मपरमो भवं ॥ मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥ जो अभ्यासमेंभी असमर्थ होउँ तो मेरे पूजनादिक कौमें मुख्य स्थिर होउँ मेरे अर्थ भी कर्मोको करतेकरते मेरी प्राप्तिरूप सिद्धिको प्राप्त होवोगे ॥१०॥ अर्थतदप्यशक्तोऽसि केतु मद्योगमाश्रितः॥ सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥ जोकि, तुम यहभी करनेको अर्शक्त होउँ ईससे मनको सावधान कियेभये मेरे भक्तियोगका आश्रय कियेभये सर्व कर्मफलका त्याग करो॥११॥ श्रेयो हि' ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञांनाहयानं विशिष्यते ॥ ध्यानाकर्मफलत्यागस्त्यागाच्छाँतिरनंतर ॥१२॥ जिससे कि, अभ्याससे कल्याणकारक ज्ञान होताहै ज्ञानसे विचार होताहे विचारसे कर्मफलका त्यागं होताहै कर्मफलके त्यागसे फिरे' शांति याने संसारसे वैराग्य होताहै ॥ १२॥ अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ॥ निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखःक्षमी ॥ १३ ॥ संतष्टःसततं योगी यंतात्मा दृढनिश्चयः ॥ मैय्यर्पित॑मनोबुद्धिोमद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥ जो सर्वभृतोंका ने द्वेपकारक होय और सबका मित्र होय और दयाल भी होय ममतारहित अहंकाररहित सुखदुःखमें सम क्षमावान वैधालामसंतुष्ट निरंतर भक्ति योगवान् जितचित्त दृढनिश्चय मेरेमें मन बुद्धिको लगायेहोई सो मेरौ भक्त मेरे को प्रिय है ॥१३॥१४॥ म १६
द्वाद० १२.] - सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१४१)
यस्मानोदिजते लोको लोकान्नोजिते च यः ॥
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
जिससे कोई भी जंतु त्रास नपावै और जो किसीसे भी दुःख न पावै
और जो हर्ष, ईर्षा,भय और उद्वेगोंकरके रहित होय सो मेरो प्रिय है १५
अनपेक्षः शुचिर्दर्श उदासीनो गंतव्यथः ॥
सर्वांरंभपरित्यागी यो मद्भक्तः स में प्रियः॥ १६ ॥
जो मनुष्य मेरे संबंधविना सर्वत्र अपेक्षारहित शुचि याने शुद्ध-
आहारी और बाहर मृत्तिका जलादिकरके और अंदर चित्तकी
शुद्धताकरके पवित्र स्वधर्मअनुष्ठानमें चतुर शत्रुमित्रादिभेदरहित
शास्त्रोक्त कर्म करनेमें व्यथारहित सर्व आरंभोंके फल और ममता :
का त्यागी ऐसा मेरा भक्त सो मेरे को प्रिय है ॥ १६॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टिं नैशोचति नकांक्षति ॥
शुभाशुभपरित्यागी भंक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥१७॥
जो सुखकारक वस्तु पायके नै हर्षे दुःखकारक पायके न द्वेषकरे
शोकनिमित्तमें न शोककर और हर्षकारककी न इच्छाकैरै जो शुभा-
शुभं कर्मफलोंका त्यागीहुआभया भक्त होय सो मेरे प्रिय है ॥१७॥
संमः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ॥
शीतोष्णसुखदुःखेषु संमः संगविवर्जितः॥तुल्यनि-
दौस्तुतिमौ ना संतुष्टो येनकेनचित् ॥ अनिकेतः
स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥१८॥ १९॥
शत्रु और मित्रमें सम तैसा ही मानः अपमानमें और शीतउ-
ष्ण सुखदुःखोंमें सम होय. विषयोंकी आसक्तिरहित निंदा स्तुति
तुल्यमाने मितीषी जो स्वतःप्राप्तहोई इंसीकरके संतुष्ट घरमें
अनासक्त स्थिरबुद्धि भक्तिमान मनुष्य मेरो प्रिय है ॥ ३८ ॥ १९॥
(१५२) भगवद्गीता। [ अध्यायः- यतुं धामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ॥ श्रद्दधांना मंत्परमा भक्तास्तेऽतीव में प्रियाः॥२०॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ जो कोई अंबा धारेभये मेरेहीको सर्वोत्तम जाननेवाले भक्त इस यथोक्त धर्मरूप अमृतको याने मेरेमें मन लगाना इत्यादि धर्मरूप अमृतको सेवते हैं वे मनुष्य मेरे" अतिशय प्रिय हैं ॥२०॥ इति श्रीमत्सुकुलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यां श्रीगीतामृततरंगिण्यांद्वादशाऽध्यायप्रवाहः ॥१२॥ इति द्वितीयं पट्कम् । अथ तृतीयं षट्कम् । श्रीभगवानुवाच । इदं शरीरं कौंतेयं क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥ एतद्यो वेति तं प्राहुँः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ १ ॥ प्रथमके छः अध्यायोंमें ईश्वरप्राप्तिका उपायभूत उपासना और . उपासनाका अंगभूत आत्मस्वरूपज्ञान कहा और उस आत्मस्वरूप- ज्ञानकी प्राप्ति ज्ञानयोगकर्मयोगनिष्टासे होती है ऐसे कहा ॥ मध्यके छःअध्यायोंमें परमात्मस्वरूपका यथार्थ ज्ञान और उसके माहात्म्य ज्ञानपूर्वक उपासना जिस उपासनाको भक्ति भी कहते हैं सो कहते भये ॥ व अंतके छः अध्यायों में प्रकृतिपुरुपका निरूपण और इस. . प्रपंचका प्रकृतिपुरुपसंयोगसे होना कहेंगे और प्रथम बारह अध्या- योंमें जो परमात्मस्वरूपका यथार्थ निश्चय और कर्मज्ञानभक्ति- .
१३ त्रयो० १३:] सात्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१४३.) स्वरूप और इनके ग्रहणके न्यारेन्यारे प्रकार कहेंगे। तहां तेरहवें अध्यायमें देह और आत्माके स्वरूप और आत्मस्वरूपप्राप्तिका उपाय तथा प्रकृतिमुक्त आत्माका स्वरूप और उसके प्रकृतिसंबं- धका कारण और प्रकृतिपुरुषविवेकका अनुसंधानप्रकार कहेंगे। श्रीकृष्णभगवान् कहते हैं कि हे कुंतीपुत्र ! यह शरीर क्षेत्र ऐसो कहाहै जो इसको जानताहै उसको देहात्मज्ञौनिजन क्षेत्रज्ञ ऐसे कहते हैं याने देह क्षेत्र और आत्मा क्षेत्रज्ञ है ॥१॥ क्षेत्रंशं चापि माँ विद्धिं सर्वक्षेत्रेषु भारत ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोनि यतज्ज्ञानं मतं मम ॥२॥ हे भारत ! सेवेक्षेत्रोंमें याने सर्वदेहोंमें क्षेत्रज्ञ जो जीव और मैं जो परमात्मा तिस मेरेको भी जानो जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ज्ञान याने इनका विवेक ज्ञान है सो ज्ञान मेरेको अंगीकार है । यहां जो शरीरोंमें आत्मा परमात्मा दोनों कहे उसपर श्रुति प्रमाण है सो यह "द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते॥तयोरन्यः पिप्प- लं स्वाद्वत्त्यनननन्योऽभिचाकशीति ॥” अर्थ-दोपक्षी संगसंग रह- नेवाले परस्पर सखा एक सहश वृक्षपर रहतेहैं उनमेंसे एक उस वृ क्षके स्वादु फल खाताहै दूसरा खाएविना प्रकाशताहै । अर्थात् ईश्वर और जीव सदा संग रहते हैं परस्पर सखा एकसरीखे हमें रहतेहैं तिनमें जीव शरीरजन्य कर्मफलोंका भोक्ता है और ईश्वर साक्षी- मात्र प्रकाशक है दूसरा यह अर्थ होताहै कि, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ मैंही हौं अर्थात् इन दोनोंका अंतर्यामी हौं तो भी देहांतर्यामी जीव जीवां- तर्यामी परमात्मा ऐसे भी वही अर्थ सिद्धभया जो यहां जीव और ईश्वर एकही कहते हैं उनको “ उत्तमःपुरुषस्त्वन्यः” यहां अर्थकी पंचाइत होनेकी शंका आती है अंतर्यामित्वमें तौ“ईश्वरःसर्वभूतानां हृद्दे- शेर्जुन तिष्ठति ॥ नतदस्तिविनायत्स्यान्मया भूतं चराचरम्" और - ए (१४४) भगवद्गीता। [अध्यायः- "यस्यात्मा शरीरं यआत्मनि तिष्ठन् य आत्मानमंतरो यमयति यमात्मा न वेद स ते आत्मा अमृत" इत्यादिक श्रुति भी प्रमाण हैं ॥२॥ तत्क्षेत्रं यचं याचं यद्विकारि यतेश्चयत् ॥ से चै यो यत्प्रभावश्च तत्समाँसेन में शृणु ॥३॥ सो क्षेत्र जिस द्रव्यका है और जिनके आश्रयभूत है और जिन विकारोंकरके और जिस प्रयोजनकेवास्ते उत्पन्न भयाहै और जिसरूपसे वर्तमान है और वह क्षेत्रज्ञ जो है याने जैसे रूपयुक्त है और जैसे प्रभाववाला है 'सो संक्षेपकरके मेरे से सुनो॥३॥ ऋषिभिधा गीतं छंदोभिर्विविधैः पृथक् ॥ ब्रह्मसूत्रपदैश्चैवं हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥४॥ वह क्षेत्र क्षेत्रज्ञका यथास्वरूप बहुत प्रकारकरके पराशेरादिक ऋपिनने और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ऐसे अनेक प्रकार वेदोंने और ब्रह्मके प्रतिपादन करनेवाले जो ब्रह्मसूत्र याने व्यासकृत शारीरक सूत्ररूप पदोंने जो कारणंयुक्त निश्चय याने सिद्धांतकरने- वाले रनने भी क्षेत्रक्षेत्रज्ञके स्वरूपको न्यारान्यारा कहाहै सो मैं संक्षे. पसे कहाँगा तुम मेरेसे सुनो॥४॥ महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ॥ इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेंद्रियगोचराः॥५॥ इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतनाँ धृतिः ॥ एतत्क्षे त्रं समासेन सविकारमुँदाहृतम् ॥६॥ पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि याने महत्तत्व और अव्यक्त याने सूक्ष्मरूप प्रकृति ये क्षेत्रके उत्पत्तिकारक द्रव्य हैं अब विकार याने ... कार्य कहते हैं देश और एक ऐसे ग्यारह इंद्रियां हैं जैसे कि, कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नासिका ये पांच ज्ञानइंद्रियां वाणी, हाथ, पाँव, । .
प्रयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१४५) गुदा और लिंग ये पांच कर्मइंद्रियां एक मन ऐसे ग्यारह इंद्रियों और शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ये पांच इंद्रियोंके विषय हैं ये सोलह विकारहैं इच्छौ, द्वेष, सुख, दुःख, संघात याने सविकार- भूतसमूह चेतना जो ज्ञानशक्ति धृति जो धीरज ऐसे संक्षेपैसे विकारसहित यह क्षेत्र कहा ॥५॥६॥ अमानित्वमदर्भित्वमहिंसा क्षांतिराजवम् ॥ आचार्योपासनं शौच स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥७॥ अब क्षेत्रकार्यों में आत्मज्ञानसाधनके वास्ते ग्रहण करनेके गुण कहतेहैं जैसे कि, श्रेष्ठ जनोंमें मानका न चाहनां लोक दिखानेको धर्म कर्मरूप दंभ न करना, परपीडारूप हिंसाका न करना, अपनेसे बलहीनके अपराध सहनरूप क्षमा राखना, सर्वसे सरलस्वभाव रहना, मन, वचन, कर्म करके गुरुकी सेवा करना, मृत्तिका जलादिसे बाहर और शुद्धचित्तसे ईश्वरस्मरणरूप अंतर ऐसा शौच करना आत्म- ज्ञानमें स्थिर रहना,मनको सर्वत्रसे निवारणकरके ईश्वरमें लगाना॥७॥ इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८॥ इंद्रियविषयोंमें गुणबुद्धि नै करना और देहमें और देहसंबंधी पदार्थोंमें अहंबुद्धिभी न करना, जन्म मृत्यु वृद्धावस्था अनेक रोग ऐसे शरीरमें इन दुःखरूप दोषोंका विचारना ॥८॥ असक्तिरनभिध्वंगः पुत्रदारगृहादिषु ॥ नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥९॥ आत्माविना अन्यत्र आसक्तिरहित पुत्र स्त्री और घर इत्यादि- कमें अति मिलाप न रखना और इष्ट और अनिष्टवस्तुकी प्राप्तिमें निरंतर समचित्त रहना ॥९॥ १० TI
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(१४६)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
मंयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ॥
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥
मेरेमें अनन्ययोगकरके अखंड भक्ति और एकांत रहनेमें प्रीति
जनसभामें अग्रीति ॥१०॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्॥
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥११॥
आत्मसंबंधी ज्ञानकी नित्यता तत्वज्ञानके प्रयोजनका विचारनी
ऐसे यह ज्ञान कहाँ जो इससे अन्यथा है सो अज्ञान है ॥ ११॥
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते ॥
अनादिमत्परं ब्रह्म नै सत्तन्नीसदुच्यते ॥ १२॥
जो जाननेयोग्यहै सौ कहताहूं जिसको जानिके मोक्षको पाताहै
घह ऐसा है कि, अनादि याने जन्मरहित है मत्पर याने उससे श्रेष्ठ
मेंही हूं वह केवल मेरे स्वाधीन है ब्रह्म याने प्रकृतिमुक्त शुद्ध चैतन्य
जीवात्मा है वह आत्मों ने सत् नै असत् कहनेमें आताहै याने कार्य-
कारण दोनों अवस्थाओंकरके रहित है ॥ १२॥
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १३॥
वह जीवात्मा सब ओरसे हाथपाँववाला है सब ओरसे नेत्र मस्तक
और मुखवालाहै सब ओरसे कानवालाहै लोकमें वस्तुमात्रमें
व्यापक होके रहताहै यह स्वरूप मुक्तजीवका कहा मुक्तदशामें
जीवकी समता परमात्माके सरीखी है सो यहां गीतामेभी कहेंगे
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः " सूत्रभी है " भोगमा-
घसाम्यलिंगाच" और " तथाविद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजन
परमं साम्यमुपेति" ऐसे जो परमात्माकी समता कही है तो परमा-
स्मासरीखा स्वरूप होने में क्या शंक है ॥ १३ ॥
और अज्ञानमा लादेिशरीरोंमें देवादिशरीरोंके सहश दीखता है. प्रयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१४७) सर्वेद्रियगुणाभासं सर्वेद्रियविवर्जितम् ॥ असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्त च ॥ १४ ॥ सर्व इंद्रियनकी वृत्तिनकरके भी विषयनको जाननेमें समर्थ हैं और आप स्वभावसे सर्वइंद्रियोंकरके रहित भी हैं याने इंद्रियनकी वृत्तिनविना भी विषयनको जानने में समर्थ हैं आप स्वयं देवादि श- रीरोंमें आसक्त नहीं हैं और सर्व देवादिशरीरोंका धारणकरनेवालाहै सत्वादिगुणरहित और गुणोंका भोगनेवाला है ॥१४॥ बहिरंतश्च भूतानामचरं चरमेव च ॥ सूक्ष्मत्वातंदविज्ञेय दूरस्थं चौतिके च तत् ॥ १५॥ वह आत्मा मुक्तावस्थामें पृथिव्यादिभूतोंके बाहर और बद्धाव- स्थामें भीतर रहता है स्वयं आप अंचर है और देहसंयोगसे चरहो- ता है सूक्ष्म है इससे जाननेयोग्य नहीं है वह अज्ञानिनको दूर और ज्ञानिनको समीप है ॥ १६॥ अविभक्तं च भूतेषू विभक्तमिव च स्थितम् ।। र्भूतभर्तृ च तज्ज्ञे ये ग्रसिष्णुं प्रभविष्णु चें ॥ १६ ॥ वह पृथिव्यादि भूतविकार देवादि शरीरोंमें एकरस रहता है कि, यह देव यह मनुष्य पशु इत्यादिक विभक्तसरीखा स्थित दीख- ता है और सर्वभूतोंका पोषक है और अन्नादिक भूतोंका भक्षक है देहरूपसे आहारकरनेवाला है और उसी अन्नादिविकारसे उत्पत्ति- कर्ताभी है ऐसे जाननेयोग्य है ॥ १६॥ ज्योतिषांमपि तज्ज्योतिस्तमर्सः परमुर्च्यते ॥ ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हदि सर्वस्य धिष्टितम् ॥ १७॥ वह सूर्यादिक ज्योतिनको भी प्रकाशक है सूक्ष्मकारणरूप प्रकृ- (११८) भगवद्गीता। [अध्याय:- तेसे पर याने न्यारा कहाता है ज्ञानरूप जाननेयोग्यं ज्ञानसे प्राप्त- हान योग्य सर्वके हृदयमें रहता है याने सर्व देव, मनुष्य, पशु, पक्ष्यादि शरीरोंके हृदय में रहता है ॥ १७॥ इति क्षेत्र तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः॥ मद्भक्त एतद्विज्ञायें मद्भवायोपपद्यते ॥ १८ ॥ ऐसे "महाभूतान्यहंकारः" यहांसे लेके, “संघातश्चेतनाधृतिः"यहां- पर्यत क्षेत्र कहा तथा “अमानित्वं" यहांसे लेके "तत्वज्ञानार्थदर्शन' यहांपर्यंत ज्ञान कहा और "अनादिमत्परं" यहांसे लेके "हदि सर्वस्य घिटित" यहांपर्यंत ज्ञेय याने जाननेयोग्य आत्मस्वरूप कहाँ ऐसे यह संक्षेपसे कहा यौनेको जोनि मेरों भक्तहोके मेरेसरीखे स्वरूपको प्राप्तहोय ॥ १८॥ प्रकृति पुरुष चैवं विद्वयनोंदी उँभावपि । विकारांश्च गुणांश्चैवं विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥ १९ ॥ प्रकृतिको और पुरुपंको याने जीवको इन दोनोंको भी अनादि याने सनातनं जानों जो बंधनकारक इच्छा द्वेष सुख दुःखादिक विकार उनको और मोक्षकारक अमानित्व अदंभित्वे गुण उनको निश्चयपूर्वक प्रकृतिसंभव जोनो अर्थात् इच्छादिविकारयुक्त प्रकृ. ति पुरुपकी बंधनकारक और अमानित्वगुणयुक्त मोक्षदायक होती है ॥ १९॥ कार्यकारणकर्तृवे हेतुः प्रकृतिरुर्च्यते ॥ (रुपः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥२०॥ अब एकसंग रहेभये प्रकृतिपुरुपोंके कार्यभेद कहते हैं जैसे कि, कार्य जो प्रकृतिपरिणाम देहकारण मनसहित इंद्रियां इनका व्यापार कानमें कारणं प्रकृति कही है सुखदुःखोंके भोक्तापनेमें कारण है त्रयोद० १३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१४९ पुरुष कहाँ है याने भोगसाधनकर्मकी आश्रय प्रकृतिपरिणाम और पुरुषयुक्त देह तथा सुखादिभोक्तृत्वआश्रय पुरुष है ॥२०॥ पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुंक्ते प्रकृतिजान्गुणान् ॥ कारणं गुणसंगोऽस्यं सदसधोनिर्जन्मसु ॥ २१ ॥ जिसवास्ते कि, यह पुरुष प्रकृतिहीमें रहाभयो प्रकृतिजन्य गुणोंको भोगताहै तिसीसे इसका ऊंचनीचयोनि में जन्मलेनमें कारण प्रकृतिगुणोंका याने सत्वादिगुणोंका संगही है अर्थात् उन गुणनकी आसक्तिहीसे ऊंच नीच जन्म होते हैं ॥२१॥ उपद्रष्टाऽनुमंता चं मर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चौप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परैः॥ २२॥ इस देहेमें यह पुरुष देखनेवाला है याने चौकसी करनेवाला और अनुमोदन देनेवाला याने सलाह देनेवाला है और इस देहका पोषनेवाला है और भोगनेवाला है और इसका महेश्वर है जैसे कि, इस देहमें ईश्वर इंद्रिय मन इत्यादि हैं उनका भी ईश्वर है. ऐसे इस देहसे यह जीव न्यारीभी है तौभी अज्ञानसे केवल यह देह ऐसा कहाताहै ॥२२॥ य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।। सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोऽभिजायते ॥२३॥ जो ऐसे इस जीवको और गुणोंकरके सहित प्रकृतिको जानता है सो सर्व प्रकारसे संसारमें रहताहै तौभी फिर नहीं उत्पन्न होताहै ॥२३॥ ध्यानेनात्मनि पश्यंति केचिदात्मानमात्मना।। अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥२४॥ अन्ये वेवैमजानंतः श्रुत्वाऽन्येभ्य उपासते ।।
२१
( १५0 )
भगवद्गीता।
[अध्यायः-
तपि' चाति तरत्येव मृत्युं श्रुतिपरायणीः॥२५॥
कितनेक पुरुप आपके अंतःकरणमें बुद्धि से विचारकरके इस
जीवात्माको जानतेहैं और कितनेक सांख्यं योगकरके जानतेहैं और
कितनके कर्मयोग करके याने ईश्वरार्पणकर्म करते करते जान-
तहें और कितनेक और ऐसे नहीं जानतेभये दूसरोंसे सुनिके
उपासना करतहैं याने सुनिके प्रथमसरीखे उपाय करके जानतेहैं
और कितनेक केवल श्रद्धायुक्त श्रवणही करते रहते हैं तो वे भी
संसारको तरतेहैं ॥ २४ ॥२५॥
यांवत्संजायते किंचित्सत्वं स्थावरजंगमम् ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
हे भरतवंशिनमें श्रेष्टं अर्जुन ! जितना कुछ थावर और जंगम
प्रोणी उत्पन्न होता है उसको क्षेत्र और क्षेत्रके संयोगसे याने
शरीर और जीवके संयोगसे जोनो॥२६॥
संमं सर्वेपुं भूतेपु तिष्टतं परमीश्वरम् ॥
विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति॥२७॥
जो कोई सर्व भूतोंमें सम रहेभये केवल मन इंद्रियादिकोंके
ईश्वर इस जीवको इन इंद्रियादिकोंके नाशहोतेभी इसको नाशर-
हिते दीखताहै याने जानताहै सोई जानताहै ॥२७॥
समं पश्यन् हि सर्वत्रं समवस्थितंमीश्वरम् ॥
नंहिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति पैरां गतिम्॥२८॥
सेव देवादिशरीरोंमें एकसरीखे रहेभये इस मन इंद्रियादिकोंके
ईश्वर जीवात्माको सम देखताभयाँ जो कि, बुद्धिपूर्वक आपको नहीं
हताह याने संसारमें नहीं गिराताहै उससे वह परम गतिको याने
मुक्तिको पावताहे ॥२८॥
प्रयोद०.१३.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१५१) पंकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।। यः पश्यति तथाँत्मनिर्मकार से पश्यति ॥ २९ ॥ जो सर्व कर्मोंको प्रकृतिहीकरके याने प्रकृतिविकार इंद्रियों- करके ही करेभये जानता और तैसेही आपको अकर्ता जानताहै 'सो जानतीहै ॥ २९॥ यदा भूतप्पथग्भावमकस्थमनुश्यति ॥ तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपंद्यते तदा ॥ ३० ॥ जब भूतोंका पृथग्भाव याने देवमनुष्यादिक शरीरोंकी छोटाई बड़ाई मोटाई पतराई इत्यादिक न्यारेन्यारे भावोंको एकस्थ याने एकप्रकृति में देखताहै और उसी प्रकृतिमें पुत्रादिरूप विस्तारको देखताहै तवं शुद्धस्वरूपको प्राप्तहोताहै ।। ३० ।। अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।। शरीरस्थोपि कौंतेयं न करोति नै लिप्यते ॥ ३१ ॥ हे कुंतीपुत्र ! यह जीवात्मा अनादिपनेसे अविनाशी है केवल शरीरमें रहाँभया भी निर्गुणपनेसे ने कुछ कर्मनको करताहै, ने उन कर्मफलोंकरके लिप्त होताहै ॥३१॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यांदाकाशं नोपंलिप्यते॥ सर्वत्रावस्थितो देहे तात्मों 'नोपॅलिप्यते॥३२॥ जैसे सर्वत्र प्राप्त भयाहुआ आकांश सूक्ष्मतासे उन भूतोंके गुणोंकरके लिप्त नहीं होता है तैसे सर्वदेवदिशरीरोंमें रहा या जीवात्मा देहगुणोंकरके नहीं लिप्तहोता है ॥ ३२ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।। क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारतं ॥ ३३ ॥ १२
भगवदगीता।
[अध्याय:-
, भारत ! जैसे एक सूर्य इस सर्व लोकको प्रकाशताहे
यह जीव सेव शरीरको प्रकाशताहै ॥३३॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमंतर ज्ञानचक्षुषा ॥
भृतंप्रकृतिमोक्षं चं ये विदुर्योति ते परम् ॥ ३४ ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतामूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे प्रकृतिपुरुषविवे-
कयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥
जोकोई ज्ञानरएिकरके क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ऐसे अंतरंको और
भूतप्रकृतिके मोक्षको जानतेहैं वे मेरे को प्राप्तहोतेहैं ॥ ३४॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां
श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांत्रयोदशाध्यायप्रवाहः॥ १३॥
पर भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानांना निमुत्तमम् ।।
यज्ज्ञात्वाँसुनयः सर्वे पैरां "सिदिमितो गताः॥१॥
श्रीकृष्णभगवान अर्जुनसे कहतेहैं कि, सर्वज्ञानों में उत्तम प्रसिद्ध
भयाआ ज्ञान फिर कहताहों जिसँको जानि सर्व मुनिजन
यहांसे श्रेष्ट सिद्धिको याने परमपदको जातेभये ।।१।।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमार्गताः ॥
सर्गेऽपि नोपंजायते प्रलये न व्यथंति च ॥ २॥
जो कहताही इस ज्ञानको प्राप्तहोके मेरौं सधर्मताको याने मेरे
सम्पनरूप वभवो वे मुनिजन प्राप्तहोतेभये वे उत्पत्तिकालँमें न
उत्पन्न होताह और प्रलयम न दुःखी होते हैं ।।२।।
ममं योनिमहद्रा तस्मिन्गर्भ दधाम्यहम् ।।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥३॥
चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१५३) हे भारत ! मम महद्ब्रह्म याने मेरी प्रकृति सर्वभूतोंका योनि याने उत्पत्तिस्थान है मैं उस प्रकृतिमें जीवरूपगर्भको धारण करता हौं तब उससे सर्वभूतोंकी उत्पत्ति होतीहै" ॥३॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवंति याः॥ तासां ब्रम महद्योनिरहं बीजप्रदैः पितों ॥४॥ हे कुंतीपुत्र ! देवमनुष्यादि सर्व योनि में जो देहै उत्पन्नहोतेहैं उन सबकी महत् ब्रह्म याने प्रकृति कारण है मैं चेतनरूप. बीजका देने- घाली पितो हौं ॥४॥ सत्वं रजस्तैम इंति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ॥ निबध्नति महाबाहो दे हे देहिनमव्ययम् ॥५॥ हे महाबाहो ! सत्वर्गुण रजोगुण और तमोगुण ये प्रकृतिसे उत्पन्न गुणं इस देहमें अविनाशी जीवको बंधनकरतेहैं ॥५॥ तत्रं सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकर्मनामयम् ॥ सुखसंगेन बनाँति ज्ञानसंगेन चाँऽनघे ॥६॥ हे निष्पाप ! उनगुणोंमें सत्वगुंण निर्मलतासे प्रकाशंक याने शु. भाशुभकर्मीका दिखानेवाला रोगरहित है इसीसे यह सुखकी आस- क्तिसे और ज्ञानके संगे करके बांधताहै याने ज्ञानसुखसे शुभकर्म शुभकर्मसे स्वर्गादि फिर उत्तमकुलमें जन्म फिर ज्ञानसुख ऐसे बांधताहै ॥६॥ रजोराँगात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् ॥ तन्निबध्नाति कौंतेय कर्मसंगेनं देहिनम् ॥ ७॥ हे कुंतीपुत्र ! तृष्णा और स्त्री धनादिनमें आसक्तिका करनेवालो रजोगुण विषयादिकमें प्रीति उपजानेवाला जानो वह जीवको कर्म भगवद्गीता । [अध्याय:- मग बांधता जसे प्रीत्यात्मक कर्मसे उन कर्मसंगिनमें जन्म फिर कर्म फिर जन्म पर ॥७॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ॥ प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८॥ हे भारत ! सर्वदेहधारी जीवोंका मोहनेवाला तमोगुण अज्ञानका कारणं जानो और वह प्रमाद आलस और निद्राकरके बंधन करतहि ॥८॥ संत्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ॥ ज्ञानमांकृत्य तु तमः प्रेमादे संजयत्युत ॥९॥ हे भारत ! सत्वगुण मनुष्यको सुखमें लगाता है रजोगुण कर्ममें तमोगुण ज्ञानको दकिके फिर प्रेमादमें लगाताहै ॥ ९ ॥ रजस्तमश्चाभिभूयं संत्वं भवति भारत ॥ रजः सत्वं तमश्चैव तमः सत्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ हे भारत ! यद्यपि ये गुण प्रकृतिके हैं तोभी विपरीतताका कारण यह कि, रजोगुण और तमोगुणको जीतिके सत्वगुण प्रवल होताहै और रजोगुण सत्वगुणको जीतिके तमोगुण प्रबल होताहै तैसाही तमो- गुण सत्वगुणको जीतिक रजोगुण प्रवल होताहै यहां कारण प्राचीन कर्म और नित्य आहारादिक हैं ॥१०॥ संर्वद्वारेपु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ॥ ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारंभः कर्मणामशमः स्टहाँ ॥ रजस्येतानि जायते विधुढे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ हे भरतवंशिनमें श्रेष्ट ! इस देहमें जर्व सर्वनेत्रादिद्वारों में प्रकाश या- ने वस्तुका यथार्थ निश्चय सोई ज्ञान उत्पन्नहोय तवे सत्वगुण बैटोहै पमा जानना और रजोगुणके बैढनेसे लोभ जो धनादिक खनारचेवि चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१५५) और मिलनेकी इच्छा प्रवृत्ति याने प्रयोजनविना चंचलता कर्मनका आरंभ इंद्रियलोलुपतो विषयइच्छौ इतने उत्पन्न होतेहैं ॥११॥१२॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ॥ तमस्येतानि जायते विवृद्धे कुरुनंदन ॥ १३ ॥ हे कुरुनंदन ! तमोगुणके बढ़नेसे विवेककी हानि निरुंधमता और न करनेका करना और विपरीतेज्ञान इतने ये होते हैं" ॥१३॥ यदा संत्वे प्रवृद्ध तु प्रलयं याति देहभृत् ॥ तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ जब सत्वगुणके बढनेके समयमें देहधारी प्रलय याने मृत्युको प्राप्त- होय तवं आत्मज्ञानिनके शुद्ध लोकोंको" प्राप्तहोताहै अर्थात आत्मज्ञानिनके कुलमें आत्मज्ञान जाननेयोग्य शरीरोंको प्राप्तहोताहै लोकस्तुभुवनेजने" इसप्रमाणसे यहाँ लोकशब्द जनवाचीहै ॥१४॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते ॥ तां प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ रजोगुणकी वृद्धि में मृत्युको प्राप्त होके कर्मसंगिर्नमें जन्म लेता है याने उनमें जन्म लेके सकामकर्म करके स्वर्ग जाताहै. फिर उनहीमें जन्म लेके फिर कर्म करके स्वर्ग ऐसेही फिरता रहताहै. तथा तमो- गुणमें मरा या नीचेयोनिमें जन्मताहै. वहाँभी वैसाही क्रम जानना ॥ १५॥ कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् ॥ रजसंस्तु फेलं दुःखमज्ञानं तैमसः फलम् ॥ १६ ॥ सुकृत कर्मको फल सात्विक निर्मले कहते हैं याने उसके करते करते कोई जन्ममें मुक्तहोताहै और रजोगुणी कर्मका फेल दुःख याने उस सकामसे स्वर्ग स्वर्गसे मृत्युलोक फिर स्वर्ग ऐसे संसारदुःख ही है A {१६) भगवनीता। [अध्याय:- तमोगनीकमको फल अज्ञान है याने उससे नरक ही है ॥ १६ ॥ सत्वात्संजायते ज्ञानं रजंसो लोभ एव च ॥ प्रमार्दमोहो तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥ साविककमसे ज्ञान होता और राजससे लोभही होताहै ताम- समे अज्ञान और मोह होतहैं और अज्ञान भी होताहै ॥ १७॥ ऊध्र्व गच्छंति सत्वस्था मंध्ये तिष्ठति राजसाः॥ जघन्यगुणवृत्तिस्था अंधो गच्छंति तामसाः ॥१८॥ सात्विककर्म करनेवाले. मुक्तिको पातेहैं राँजसकर्मवाले मध्यमें (वर्ग मृत्यु लोकहीमें) रहते हैं जैसे पुण्यसे स्वर्ग पुण्य क्षीण होनेसे मनुष्यलोक फिर पुण्यसे स्वर्ग ऐसे वारंवार मध्यहीमें रहतेहैं तमोगुणी नीचगुणकी वृत्तिमें वर्तनवाँले तामसी नीचांति पशुकीटादिकमें जन्मते रहतेहैं ॥ १८॥ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यंदाद्रष्टाऽनुपश्यति ॥ गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥१९॥ जवं विवेकी पुरुष सत्यादिशुणोंके विना और किसीको कसी नहीं जानता है और आपको गुणोंसे न्यारों जानती है तब सो मेरी सौम्य- ताको प्राप्तहोताहे ॥ १९॥ गुणांनेतांनंतीत्य त्रीन्देही देहंसमुद्भवान् ॥ जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ यह देहधारी जीव देहमें उत्पन्नभये इन सत्वादि तीनि गुणोंको उल्लंघन करके जन्म मृत्यु और जरापनके दुःखोंकरके छुटामयाँ मोक्षको पाताहे गुणयुक्त नहीं ॥२०॥ अर्जुन उवाच । कलिंगेनीन गुणानेतानंतीतो भवति प्रभो॥
चतुर्द० १४.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१५७) किमाचारः कथं चै" तस्त्रिीन्गुणा तिवर्त्तते ॥२१॥ ऐसे सुनिके अर्जुन पूंछते हैं कि, हे प्रभो ! कौनसे चिह्नोंकरके ईन तीन गुणोंको उल्लंघन किया या होताहै वह कैसे आचरणकाला होताहै और इन तीनों गुणोंको कैसे" उल्लंघन करै ॥२१॥ . श्रीभगवानुवाच। प्रकाशं चे प्रवृत्तिं च मोहमेव च पांडवं ॥ ने देष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तीनि कांक्षति ॥ २२ ॥ उदासीनवदासीनो यो गुणैन विचाल्यते ॥ गुणों वर्तत इत्येवं योतिष्ठति ने गते ॥ २३ ॥ समदुःखसुखः स्वस्थैः समलोष्टाश्मकांचनः ॥ तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः॥२४॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रॉरिपक्षयोः॥ सरिंभपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥२५॥ अर्जुनका प्रश्न सुनिके भगवान् कहते हैं कि, हे पांडुपुत्र ! जो पुरुष प्रकाश याने आरोग्यादिक सत्वगुणके कार्य और प्रवृत्ति याने रजोगुणके कार्य और मोह याने तमोगुणके कार्य ये जो प्रवृ. त्तहो तो इनको नहीं त्यागचाहता है और निवर्तभये इनको ने चाहता है उदासीनसरीखी स्थित भैयाहुआ गुणोंकरके नहीं चला- यमान होता है आप आपके कार्यों में गुण ही वर्तमान हैं ऐसे जो स्थिर है चलायमान नहीं होताहै सुखदुःखमें सम स्वस्थ ठीकरी कंकर पत्थर और सोना जिसके सम हैं. तुल्य हैं प्रिय अप्रिय जिसके धर इसीसे आपकी निंदा स्तुति समान जौनताहै मान और अप- १२. १३ { १५८) भगवद्गीता। [अध्यायः- मान तुल्य मित्रशत्रुपक्षमें तुल्य मेरे सेवनादिकविना सर्व आरंभोंकी व्यागी सो गुणातीत कहाताहै ॥ २२ ॥२३॥२४॥२५॥ मां चं योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ॥ से गुणान्समैतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥ ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याय॑यस्य च ॥ शाश्वतस्य चं धर्मस्य सुखस्यैकांतिकस्य च ॥२७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतामूपनिपत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयवि- भागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ जिसवास्ते कि मरणधर्मरहितं और इसीसे अविनाशी जो ब्रह्म याने मुक्तजीव उसका और सनातन धर्म जो भक्तियोग उसका और मुंख्य सुख जो स्वस्वरूपकी प्राप्ति उसका मैं आधारहूं इसीसे जो अखंडित भक्तियोगकरके मेरेको भैजताहै सो इन गुणोंको उल्लंधन करके मेरी समताको प्राप्त होताहै ॥२६॥२७॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचिता- यां श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यांचतुर्दशाध्यायप्रवाहः ॥१४॥ श्रीभगवानुवाच । अवमूलमधशाखमश्वत्थं प्राहुरळयम् ॥ छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तै वेद से वेदवित् ॥ १ ॥ तरहवें अध्यायमें क्षेत्ररूप प्रकृति और क्षेत्रज्ञ पुरुपयाने जीव इनका न्वरूप कहा, शुद्धनीवात्माके भी प्रकृतिसंबंधी गुणोंके प्रवाहनिमित्त देवादिक आकारसे परिणामको प्रातभई जो प्रकृति उसका संबंध अनादि कहा, चौदहवें अध्यायमें कदा कि, इस जीवको जो कार्य और पंचद० १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१५९) कारण अवस्थानमें यह गुणसंगप्रवाह मूलप्रकृतिसंबंध सो भगवान हीने किया है ऐसे कहिके विस्तारसहित गुणसंगप्रकारको कहिके कहा कि, गुणसंगनिवृत्तिपूर्वक स्वस्वरूपकी प्राप्ति भगवद्भक्तिमूल ही है. अब पंद्रहवें अध्यायमें जो भजने योग्य भगवान् आपके कल्याण- गुणादिकोंकरके बद्ध मुक्त दोनों प्रकारके जीवोंसे विलक्षण ( न्यारे ) उनका पुरुषोत्तमत्व कहनेको जो यह बंधन आकारसे विस्तरित प्रकृतिका परिणाम विशेषसंसार उसको पीपरवृक्षरूप कल्पित करके श्रीकृष्ण भगवान् बोलतेभये कि, जिसके वेदै पत्ते अर्थात् जैसे पत्तोंकरके वृक्ष बढताहै तैसे यह संसाररूप वृक्ष वेदोक्तकर्म करके बढताहै इससे वेद पत्तारूप हैं ऊर्ध्वमूल याने सत्यलोकमें ब्रह्मा जिसका मूल है अधःशाख याने सत्यलोकसे नीचे जो देव म- नुष्य कीट पतंगपर्यंत शरीर ये उसकी शाखा हैं ऐसा अव्यय याने सम्यक् ज्ञानप्राप्ति होनेसे प्रथम अज्ञानदशामें प्रवाहरूप. करके छेदनेके अयोग्य इसीसे. अज्ञानिनके अविनाशी हैं ऐसा इस सं- सारको अश्वत्थ याने पीपरवृक्षरूप श्रुति कहती हैं तिसको जो जानताहै "सो वेदका जाननेवाला है अर्थात् वेद इस संसारके छेदने- का उपाय कहताहै तो जो इसको जानेगा तो छेदनेका भी उपाय जानेगा इससे वह वेदजाननेवाला है ॥१॥ अर्धश्चोर्व प्रसृतास्तस्य शाखाँ गुणप्रवृद्धा वि- षयप्रवालः ॥ अधश्च मूलान्य संततानि कर्मा- नुबंधीनि मनुष्यलोके ॥२॥ अब उस संसारवृक्षकी और भी विलक्षणता कहते हैं जैसे कि, स- स्वादिगुणोंकरके बढीभई और शब्दादिक विषय जिनके प्रवाले याने (१६०) भगवद्गीता। [अध्याय:- कोपल यांने जो नये एक दिनके निकसेभये पत्ते वैसे पत्ते जिनके विषय है ऐसी उसे वृक्षकी शाखायें नीचे मनुष्यलोकमें और ऊपर देव गंपादिलोकोंमें फेलँरही हैं अर्थात् नीचकर्मसे नीचे मनुष्योंसे भी नीच पधादिशरीर ऊपर उत्तमकर्मसे उत्तम देवादिशरीररूप शाखें फलरही है नीचे मनुष्यलोकमें भी उसकी कर्मानुसारी मूलें फैली- रही हैं अर्थात् मनुष्यलोकमें जो ऊंच नीच कर्म वही मूलरूप हैं ऊंच नीच पदवी कर्मविना नहीं कर्म मनुष्यशरीरविना नहीं होताहै ॥ २ ॥ नरूपमस्येह तथोपलभ्यते नांतो ने चांदिन – संप्रतिष्ठा । अश्वत्थमे नं सुविरूँढमूलमंसं- गशस्त्रेण हूँढेन छित्त्वा ॥३॥ततः पैदं तत्परिमा- गितव्यं यस्मिन्गौँ नै निवर्त्तति भूयः ॥ तमेव चाचं पुँरुपं पद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृती पुराणी ॥४॥ इस संसारवृक्षका इस लोक में जैसा कहा है तैसा रूप अज्ञानीजनों करके नहीं जाननेमें आताहै नं उसका अंत और नै औदि और ने स्थिति जाननेमें आतीहै ऐसे दृढमूल ईस पीपरबृक्षको अतिहँढ बराम्यहप शस्त्रसे छेदन करके फिर जिससे यह प्राचीन प्रवृत्ति यांने गुणमय भोगरूप संसारप्रवाह विस्तरितहै ईसी ऑदि पुरुपके शेरणागत होके उस पैदको ढूँढना कि, जिसमें गयेभये मुनिजन फिर इस संसार में नहीं आतेहैं ॥३॥४॥. निमीनमोहां जितसंगदोषां अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ॥ द्वंद्वैविमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्ग- छत्यमूढाः पैदमव्ययं तत् ॥५॥ जो मानमोहकरके रहित हैं और जिनने संगदे पोंको जीताहै और जो अध्यात्मशात्रहीमें नित्य वर्तमान में और जिनकी कामना निवृत्त १२ पंचद० १५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१६१ है जो सुखदुःखसंज्ञक इंद्रोंसे छुटेभये हैं वही ज्ञानीजन उस अविनाशी पैदको प्राप्त होतेहैं याने स्वस्वरूपको प्राप्त होतेहैं ॥५॥ नं तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः॥ यद्त्वा न निवर्त्तते तैद्धाम परमं मम ॥६॥ सूर्य उस आत्माको नहीं प्रकाशिसकताहै ने चन्द्रमा और ने अग्नि प्रकाशिसकताहै. जिसंरूपको याने शुद्धआत्मस्वरूपको प्राप्त होके नहीं संसारमें आतेहैं वह मेरा परम धाम है याने मेरे रहनेका मुख्य स्थान मेरा शरीर है इस जगह “यस्यात्मा शरीर" यह श्रुति भी प्रमाण है ॥६॥ ममैवांशो जीर्वलोके जीवभूतः सनातनः ॥ मनःषष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कति ॥७॥ जो यह ऐसा वर्णन किया सो यह मेरोही सनातन अंश है याने जैसे प्रकृति और अनंत जीव मेरेही हैं उनमें यह एक मेराही है मेरी ही विभूति है सो यह इस जीवलोङमें जीवभूत याने अति संकुचितज्ञान- भयाहुआ पांच ज्ञानेंद्रिय और एक मन ऐसे मनसहित छः प्रकृतिवि- कार इस देहमें रहीभयों इंद्रियोंको बँचता फिरताहै ॥ ७॥ शरीरं यदवाप्नोति यंचाँप्युत्क्रामतीश्वरः ॥ गृहीत्वैतानि संयाँति वायुगंधीनिवाशयात् ॥ ८॥ जैव यह जीव शरीरको प्राप्तहोताहै और जब वर्तमान शरीरसे जाताहै तब यह मन इंद्रियोंकाँ ईश्वर आपकी सेनारूप इन इंद्रियों को, पवन पुष्पादिक गंधस्थानसे गंधों को जैसे तैसे ग्रहणकरके जाताहै ॥८॥ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं चे रसनं घ्राणमेव च ॥ १३ ११
है
११ ०
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
अधिष्ठाय मनश्चीयं विपयानुपैसेवते ॥९॥
यह जीवात्मा श्रोत्रइंद्रियं याने कान नेत्र और स्पर्शन जो त्वचा-
नियमसना जो निता और प्राण जो नासिका और मैंन ईनको आश्र-
यकरके विषयों को सेवती है ॥९॥
उत्क्रामंतं स्थितं बॉपिं झुंजान वा गुणान्वितम् ।
विमूढी नांनुपश्यति पश्यति ज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यह जो गुणांकरके युक्त आत्मा तिसको देहत्यागतेको अथवा
देहमें रहते भयेको अथवा विषयभोगतेभयेको भी अज्ञानीजन नहीं
देखतह जिनके ज्ञानदृष्टि है वे देखते हैं ।। १०॥
यंतंतो योगिनश्चैनं पश्यंत्यात्मन्यवस्थितम् ॥
यततोऽप्यकृतात्मानो नै नं पश्यत्यचेतसः ॥११॥
योगीजेन जतन करते करते आपके अंतःकरणमें रहेभो इस
आत्माको देखतहे और जो विपयासक्त हैं वे जो शास्त्रद्वारा उपाय करें
तोभी वे अज्ञानी इस आत्माको नै देखिसके ॥११॥
येदादित्यगतं तेजो जंगद्भासयतेऽचिलम् ॥
यंच्चंद्रमस्ति यच्चानी तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥१२॥
जो सूर्यमें रहाभया तेज सर्व जगत्को प्रकाशिरहा है और जो तेज
चंद्रगामें और जो अग्निमें है उस तेजको मेराही तेज जानो ॥ १२ ॥
गांमोविश्य च भूतांनि धारयाम्यहमोजसा ॥
पुणानि चापंधीः सर्वाःसोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३॥
में पृथिवीमें प्रविष्टहोके अपने अचिंत्य सामर्थ्यकरके सर्वभूतों-
को धारण करना और अमृतमयं चंद्"होके सर्व ओपैधिनको
पोलताई ॥३३॥
१२
मेरेसे होतेहैं और सर्व वेदोंकरके मैं
पंचद० १५.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१६३)
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः॥
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४॥
में जठराग्नि होके सर्वप्राणिनके देहेमें रहाभां प्राण और अपान-
संयुक्त भक्ष्य, भोज्य, लेह्य,पेय ऐसे चारप्रकारके अत्रको पंचाताहूं१४
सर्वस्यं चाहं हदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिनि-
मपोहनं च ॥ "वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदांत-
कृढ़ेदविदेवं चाहम् ॥ १५॥
मैं' सर्वके हृदयमें प्रविष्टहूं और सर्वके स्मृति ज्ञान और विचार
दांतका कर्ता और वेदका जाननेवाला मैं ही हूं" ॥ १५ ॥
विमौ पुरुषौ लोके क्षरंश्चाक्षर एव च ॥
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ॥
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥१७॥
इस लोकमें क्षर और अक्षर ऐसे ये दोप्रकारके पुरुष हैं तिनमें
सर्व शरीरधारी भूतप्राणी क्षर और मुक्तजीव अक्षर कहाताहै इन
दोनोंसे उत्तम पुरुष और जो परमात्मा ऐसे कहाताहै जो अ-
विनाशी ईश्वर त्रिलोकीमें प्रवेशकरके सर्व त्रिलोकीका भरण पोषण
करता है ॥ १६॥ १७॥
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरीदपि चोत्तमः॥
अतोऽस्मि लोके वेदे" च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८॥
जिसास्ते कि, मैं बद्धावस्थ जीवसे श्रेष्ठं और मुक्तसेभी उत्तम
हूं इससे स्मृति और वेदमें भी पुरुषोत्तम प्रसिद्धंहूं ॥ १८ ॥
(१६५)
भगवद्गीता।
[ अध्यायः-
यो मोमेमसंमृटो जानाति पुरुषोत्तमम् ॥
संसर्वविद्भजति मा सर्वभावेन भारत ॥ १९॥
है भारत ! जो सम्यक ज्ञानीपुरुष ऐसे मेरेको पुरुषोत्तम
जीनता हे सो सर्वज्ञहै इसीसे वह सर्वभाव याने माता पिता सुहृद्
धनादिक मेरेको जानिके मेरेहीको भेजताहै ॥ १९॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयांऽनघे ॥
एतद्वैवा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्चै भारत ॥ २० ॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग-
शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुरुषोत्तमयो-
गोनाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५॥
हे निप्पाप ! ऐसे यह अतिगोप्य शास्त्र मैंने कहा हे भारत ।
इसको जानिके बुद्धिमान् और कृतकृत्य होताहै ॥२०॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां
श्रीमद्भगवद्गीताऽमृततरंगिण्यां पंचदशाध्यायप्रवाहः ॥१५॥
ऐसे तेरवहें अध्यायसे पंद्रहके समाप्तिपर्यंत क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका वि-
वेक और गुणत्रयका विभाग और क्षराक्षर याने बद्ध मुक्त जीवोंका
स्वरूप तथा परमात्माका पुरुषोत्तमत्व और सामर्थ्य कहते भो अब
सोरहें अध्यायमें जीवकी शास्त्रवश्यताऔर दैवासुरसंपत्तिविभाग कहेगे।
श्रीभगवानुवाच ।
अभयं सर्वसंशुद्विानयोगव्यवस्थितिः ॥
दाँनं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्त आर्जवम् ॥ १॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शातिरपैशुनम् ॥
दयों भूतेप्वलोलत्वं मदिवं हीरचापलम् ॥ २ ॥
२१ षोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१६९) तेजः क्षमा धृतिःशौचमैद्रोहो नातिमानिता ॥ भवंति संपदं दैवीमंभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥ श्रीकृष्ण भगवान् अर्जुनसे कहतेहैं कि, हे भारत ! दैवी संपदाको प्राप्त भये मनुष्यको निर्भय रहना अंतःकरणकी शुद्धि प्रकृतिसे भिन्न आत्मा है ऐसी निष्ठा सुपात्रको कुछ देना और मनको विष योंसे निवृत्त करना और निष्कामतासे भगवानके पूजनरूप पंचम हायज्ञोंका करना बेदमंत्रादिकोंदेश जप एकादशीव्रतादिरूप तप सर्वसे सरल रहना जीवमात्रको पीडा न देना हित और यथार्थ भाषण क्रोधैंका न करना उदारता शांति याने इंद्रियोंको वशकरना चुगली न करना भूतप्राणिमात्रपरे दैया परस्त्रीधनादिपर इच्छा न करना अक्रूरता लैजा व्यर्थकामका न करना तेजें क्षमा याने सहन- शीलता धीरज पवित्रता द्रोहको न करना मानप्राप्तिके वास्ते अति- मानका न करना ये २६ गुण दैवीसपदाके होतेहैं ॥ १ ॥२॥३॥ दंभो दोऽभिमानश्च क्रोधः पौरुष्यमेव च ॥ अज्ञानं चाँभिजातस्य पार्थ संपदमांसुरीम् ॥ ४॥ हे पृथापुत्र ! आँसुरी संपदाको प्राप्तभये मनुष्यके दंभ, दर्प और अभिमान क्रोध और कैटुभाषण और अज्ञान ये लक्षण होतेहैं ॥४॥ दैवीसंपद्विमोक्षाय निबंधायासुरी मता ॥ मौ शुः संपदं दैवीमंभिजातोसि पांडव ॥५॥ हे पांडुपुत्र ! दैवीसंपदा मोक्षके वास्ते है आसुरी बंधनके वास्ते निश्चय कीगई है तुम देवीसंपदाको प्राप्तभयेहो मैति शोचो ॥६ द्वौ भूतसौ लोकेऽस्मिन्दैवं आसुरंएव च ॥ दैवो विस्वरशः प्रोक्त औसुरं पार्थ में शृणु ॥६॥ 13 ।
भगवनीता। [ अध्याय:- हे पार्थ ! इस लोकमें दो प्रकारके प्राणी हैं एक देवं और दूसरे आसुर देवे विस्तारसे कहा और मुझसे आसुरको सुनो ॥६॥ प्रहति च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।। नं शीचं नोऽपि" चौचौरो न सत्यं तेषु विचते ॥७॥ असुरस्वभाववाले मनुप्य संसारसोधन और मोक्षसाधनभी नहीं जानतह उनमें में शुचिता और न शास्त्रीय आचरण में सत्यमी रहेताहे ॥७॥ असत्यमप्रतिष्टं ते' जगंदाहुरनीश्वरम् ॥ अपरस्परसंभृतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥ ८॥ वे अगुरप्रेकृति मनुष्य इस जगतको कोई तो असत्य याने मिथ्यो और भ्रम कहत हैं कोई अप्रतिष्टं याने इसका कोई आधार नहीं ऐसा कहत कोई अनीश्वर कहते हैं स्त्रीपुरुषके परस्परसंयोगसे भये विना और जगत् क्या है केवल कामहीके निमित्तले याने स्त्रीपुरुषके संयोग- हीसे होताह ऐसा कहतहैं ॥ ८ ॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्यं नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ॥ प्रभवत्युवकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥९॥ वे अज्ञानी जन खानपानादिक अल्पपदार्थमें बुद्धिवाले ऐसी समुझे को ग्रहणकरके उग्रकर्मकरनेवाले याने परस्त्रीधन पुत्रादिकोंके हरण करनेवाले सर्व सहित जगत के नाशके वास्ते प्रवृत्त होते हैं।॥ ९॥ कामंमाश्रित्य दुःपूरं दंभमानमदॉन्विताः ॥ मोहोहीत्वाऽसदाहन्प्रिवर्ततेऽशुचिव्रताः ॥१०॥ जो दुःखसे भी न पूरी होय ऐसी कामनाको आश्रितहोके दंभ मान और मदयुक्त भयेहुये मोहस असग्राहोंको ग्रहणकरके याने
षोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा०टी०।
(१६७)
.
मारण मोहन वशीकरणके उपाय करना ऐसे भ्रष्टआचारनको स्वीकार
करके अपवित्रत भूतादि सेवनेवाले भयेहुए उनही कामों में प्रवृत्त
होतेहैं ॥ १०॥
चिंतामपरिमेयां चं प्रलयांतांमुपाश्रिताः ॥
कामोपभोगपरमा एतादिति निश्चिताः॥ ११ ॥
अपार और मरणांत चिताको प्राप्तभये हुये कालोपभोगमें तत्पर
इतनाही सुखहै ऐसे निश्चयकियेभये ॥११॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ॥
इहते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयर्यान् ॥ १२ ॥
सैकडों आशाकी फाँसिनकरके बँधेभैये काम और कोपके स्वाधी-
न भये कामभोगके वास्ते अन्यायकरके द्रव्यसंचर्यको उपायकरते
रहते हैं ॥१२॥
इदमद्यं मयां लब्धंमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ॥
इदमस्तीदमपि में भविष्यति ऍनर्धनम् ॥ १३ ॥
मैंने आज यह पाया इस मनोरथको पाबूगाँ मेरे यह धन है" फिर
यहभी होयगा ॥१३॥
अंसौ मयाँ हतः शत्रुहनिष्ये चापरानपि ॥
ईश्वरोहमह भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
मैंने यह वैरी मारा और औरनकोभी मारूंगा में ईश्वरहूं "मैं
भोगीहूं मैं सिद्धहूं मैं बलवानहूं मैं सुखीहूं ॥१४॥
आंढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ॥
यक्ष्ये दास्यामि मोदिध्ये इत्यज्ञानविमोहिताः॥१६॥
भगवद्गीता। [अध्याय:- में योग्यहूं उत्तम कुलमें जन्मांहूं मेरे' समान और कौन है यज्ञ किंगा दोन देउंगा आनंद करूंगा ऐसे अज्ञानमें "मोहेरहतेहैं॥१६॥ अनेकचित्तविभ्रांतो मोहजालसमावृताः ॥ प्रसक्ताः कामभोगेपु पतति नरकेऽशुचौ ॥ १६ ॥ अनेकजगह चित्त लगनेसे भ्रमिष्टे मोहके जाल में फंसेभये कामभोग- में आँसक्त वे अपवित्र नरक में पड़तेहैं ॥१६॥ औत्मसंभाविताः स्तब्धां धनमानमदान्विताः॥ यते नामयज्ञैस्ते दंभेनाऽविधिपूर्वकम् ॥ १७॥ जो आपको आपही श्रेष्ट मानिरहेहैं और अनम्र हैं धन मान मदयु. क व दंर्भसे अविधिपूर्वक नाममात्र यज्ञोंकरके यजन करतेहैं।।१७॥ अहंकारं वलं दर्प कॉम क्रोधं च संश्रिताः॥ मांमात्मपरदेहेर्पा पेंद्विपंतोऽभ्यसूयकाः ॥ १८॥ अहंकार वल हैर्प कॉम और क्रोधका आश्रयकर रहेहैं ऐसे वे भीपके और औरोंके देहोंमें रहेभये मेरेसे द्वेप करतेभये मेरी निंदा करत ॥ १८॥ तीनहं द्विपतः क्रूरॉन्संसारपुं नराधमान् ॥ क्षिपाम्यजत्रमशुभांनासुरीप्वेवं योनिषु ॥ १९ ॥ में उन द्वेषकरनेवाले क्रूर अशुभ नराधमोंको संसारमें आसुरीही योनिनमें वारंवार पटकैताहूं ॥१९॥ आसुरी योनिमापन्ना मूढो जन्मनि जन्मनि ॥ मॉमप्राप्यैवं कौतेयं ततो यात्यधमां गतिम् ॥ २० ॥ हे कुंतीपुत्र ! वे मूर्ख जन्मजन्ममें आँसुरी योनिको प्राप्तभयेहुये. मरेको न प्राप्तहोके फिर अधम गतिको प्राप्तहोतहैं ॥२०॥ त्रिविध नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।।
षोडशः १६.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। ( १६९) कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतयं त्यजेत्॥२१॥ कामना, क्रोध तथा लोभ यह तीन प्रकारका नरकका द्वार ओ. पका नाशनेवालाहै याने संसारमें भ्रमानेवालाहै इससे इन तीनोंको- त्यांगना ॥ २१ ॥ ऐतैर्विमुक्तः कौंतेयं तमोरारैत्रिंभिर्नरः ॥ आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो यौति परां गतिम् ॥ २२॥ हे कुंतीपुत्र ! इन तीनों नरकद्वारोंकरके छुटाभया मनुष्य आपके कल्याण का साधन करताहै उससे परम पैदको प्राप्तहोताहै ॥ २२ ॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्त्तते कामकारतः ॥ नं से सिद्धिमाप्नोति नै सुखं ने परांगतिम् ॥ २३॥ जो शास्त्रविधिको त्यागि के स्वइच्छाप्रमाण चलताहै सो न सि- द्धिको पावताहै नै सुखको नै मोक्षको पावताहै ॥२३॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाण ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।। ज्ञात्वा शास्त्रंविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतामूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसंपद्वि- भागयोगो नामषोडशोऽध्यायः॥ १६॥ इससे तुमको कार्याकार्यव्यवस्था में शास्त्रहीप्रमाणहै यह जानिके इस लोकमें शास्त्रविधानोक्तं कर्म करनेको योग्यहो ॥ २४ ॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचि- तायां श्रीमद्गीतामृततरांगण्यां षोडशाध्यायप्रवाहः ॥१६॥ अर्जुन उवाच । ये शास्त्रंविधिमुत्सृज्य यजते श्रद्धयान्विताः ।।
(१०) भगवद्गीता। [अध्याय:- तपां निष्टां तु का कृष्ण सत्त्वमौहो रजस्तमः ॥ १ ॥ सोहि अन्यायमें ईश्वरतत्त्वका ज्ञान और ईश्वरप्राप्तिका उपाय इनके कारण मृल वेदहीं हैं ऐसे कहा और अंतमें कहा कि, शास्त्रवि- विहीन कर्म करनेवालेको सुखादिक नहीं सो सुनिके अर्जुन बोले कि, हे कृष्ण ! नो शास्त्रविधिको त्यौगिके श्रद्धांकरके युक्त यजन करतह उनकी क्या निष्टाह सत्वगुण है किंवा रजोगुण है या तमो- गुण है ॥१॥ श्रीभगवानुवाच । त्रिविधा भवति श्रद्धां देहिनां सौ स्वभावजा। सात्विकी राजसी चैवं तामंसी चैंति तो शृणें ॥२॥ अर्जुनका प्रश्न सुनिके श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि, सात्विकी और राजसी जोर तामसी ऐसे तीनप्रकारकी निश्चय श्रद्धा होती 'सो देहधारिनकी स्वभावहीसे होतीहै उसको सुनो॥२॥ सत्वानुरूंपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्राहार्मयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रईः संएव सः ॥३॥ हे भारत ! सबकी श्रद्धा अंतःकरणके अनुरूप होतीहै यह पुरुपं श्रद्धामयहै जो जिसश्रद्धावाला होताहै सो वही होता है जैसे सात्विकी श्रद्धावाला सात्विक इत्यादि ॥३॥ यजते सात्विका देवान्यक्षरक्षासिराजाः ॥ प्रेतान्भृतगंणांश्चान्ये यजते तामसां जनाः॥४॥ सात्विक पुरुप देवतानको पूजतेहैं राजसी यक्षरीक्षसोंको और मार तामसी जने त भूतगणोंको पूजते हैं ॥४॥ अशात्रंविहितं घोरं तप्यते ये तपो जनाः ।।
१६
नेवाले हृदयेका वर्दक ऐसे आहार साहिल
(१७१)
सप्तद० १७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० ।
दंभाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥५॥
कर्शयंतः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ॥
माँ चै वांतःशरीरस्थं तन्विद्धयासुरनिश्चयान॥६॥
दंभ और अहंकारसंयुक्त कामना और विषयानुराग इनहीकी
सेनायुक्त 'जे मनुष्य के अशास्त्रविहित याने जो शास्त्रप्रसिद्ध नहीं
ऐसे घोर तपको तपतेहैं वे अज्ञानी जैन शरीरमें रहे ये भूत-
समूहको और अंदर शरीरमें स्थित मेरेको भी दुःख देते हैं
नको आसुरनिश्चय याने असुरपनेमें निश्चय जिनका ऐसे उनको
जानो॥५॥६॥
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवंति प्रियः॥
यहस्तपैस्तथा दानं तेषां भेदैमिमं शृणु ॥७॥
आहार भी सर्वका तीनप्रकारका प्रिय होता है और यज्ञ तथा तप
दान येभी तीनि प्रकारके हैं तिनका भेद यह सुनो ॥७॥
आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्द्धनाः॥ रस्याः
स्निग्धाःस्थिरों हया आहाराः सात्विकप्रिभाँ॥८॥
जो आहार आयुष्य होशियारी बल आरोग्य सुख और प्रीतिके
बढानेवाले हो मधुरादिरसयुक्त स्निग्ध स्थिर याने बहुतकाल रह-
कदम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ॥
आहारा राजसंस्थेष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥९॥
अतिकटु जैसे बहुत मिर्चवाला पदार्थ अतिखट्टा अतिलोन-
पाला वडावगैरे अति गरमागरम अतितीक्ष्ण राईवगैरह मिश्रित अति
रूखे और दाहकारक राजसिनके प्रिय आहार दुःख शोक और
रोगोंके देनेवाले होतहैं ॥९॥
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
यातयाम गतरंसं पूँति पर्युषितं च यत् ॥
उच्छिष्टमपि चाँमेध्यं भोजनंतामसप्रियम् ॥१०॥
जिसे भातवगैरेको एक पहर विता होय वह ठंढा पदार्थ रसवि-
हीने दुगंध वाला और वासी और उच्छिष्ट भी ऐसा अपवित्र भोजन
तामप्तिनको प्रिय होताहै ॥ १०॥
अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ॥
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्विकः ॥ ११॥
यज्ञकरनाही योग्यहै ऐसे मनको समाधानकरके फल-इच्छा
रहित मनुष्योंने विधिपूर्वक जो यह कियाहोय सो" यज्ञ सात्विकै ११
अभिसंधार्य तुं फलं दंभार्थमपि चैव यंत् ॥
इज्यते भरतश्रेष्टं तं यज्ञं विद्धि" राजसम् ॥ १२ ॥
है भरतश्रेष्ट ! जो फल की इच्छाँकरके और दंभके वास्तेभी
यज्ञ करे उस यज्ञको रौंजस जानो ॥ १२॥
विधिहीनेमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् ॥
अंडाविरहितं यज्ञ तामसं परिचक्षते ॥ १३॥
जो यज्ञ विधिहीन उचित अन्नहीन मंत्रहीन दक्षिणारहित और
श्रद्धारहित यज्ञ तामसँ कहांहै ॥ १३ ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजन शौचमर्जिवम् ॥
ब्राँचर्यमहिंसां चं शारीरं तर्प उच्यते ॥ १४ ॥
देव ब्राह्मण गुरु और विद्वानोंका पूजन शुचिंता सरलता ब्रह्म-
वर्य और परपीडावर्जन यह शरीरसंबंधी तपं कहाहै ॥ १४ ॥
अनुद्रेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ॥
स्वाध्यायाझ्यसनं चैव वाङ्मयं तपे उच्यते॥१५॥
. सप्तद०१७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० (१७३) जो वचनं उद्वेगकारक न होय और सत्य प्रिय हितहोय और वेद- पाठ मंत्रजपादिकका अभ्यास यह वाणीमय तप कहाँ है ॥ १५॥ मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ॥ भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ मनकी प्रसन्नता सदयपना याने क्रूर न होना मितभाषण मनको वश करना और अंतःकरणकी शुद्धता यह इतना तप मानस कहांताहै ॥१६॥ श्रद्धया परयाँ तप्तं तपेस्तैत्रिविधं नरैः ॥ अफलांकांक्षिभिर्युक्तैः सौखिक परिचक्षते ॥ १७ ॥ फलकी इच्छा नकरनेवाले योग्य पुरुष तिनकरके परम श्रद्धा- करके तपार्भया से तीनों प्रकारका याने मानस, कायिक, वाचिक तप सात्विक कहहि ॥ १७॥ सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेन चैवं यत् ॥ क्रियते तदिहे प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८॥ जो तैप सत्कार मान और पूजाके वास्ते और दंभकरके भी किया जाताहै सो यहां शास्त्रमें राजस चले और नाशमान कहाहै १८ मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ॥ परस्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहतम् ॥ १९ ॥ जो तप दुराग्रह करके आपकी पीड़ाका निमित्त अथवा दूस: रेके विगाडके वास्ते कियाहोय सो तामस कहाहै ॥ १९॥ दातव्यमिति यदानं दीयतेऽनुपकारिणे ॥ देशे काले च पात्रे च तदानं साँत्विकं स्मृतम् २०॥ जो दान देनाही चाहिये ऐसी बुद्धिकरके कुरुक्षेत्रादि देशमें और ग्रहणादिककालमें जिससे फिर कुछ अपना उपकार न होय
(202)
भगवद्गीता।
[अध्याय:-
सिको तया यह पात्र याने तपःस्वाध्यायकरके रक्षक होय उसको
दियानाने से दान सात्विक कहा ॥ २० ॥
यत् प्रत्युपकारार्थ फलॅमुदिश्यं वो पुर्नः ॥
दीयते च परिक्लिष्टं तन्द्राजसैमुदाहृतम् ॥ २१ ॥
जो प्रत्युपकारके वास्ते अथवा फलके निमित्तकरके फिर भी
राहुवगेरह हनिमित्त उपदान दियाजाय खो राजस कहाहै ॥ २१॥
अदेशकाले येद्दालमपात्रेभ्यश्च दीयते ॥
असत्कृतमवज्ञातं तलामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥
जो दान तिरस्कार अवज्ञापूर्वक देशकालविना और कुपा-
प्रोको दिया जाताह सो दोन ताबस कहाहै ॥२२॥
ओं तत्सदिति लिदेशो ब्रह्माणस्त्रिंविधः स्मृतः॥
ब्राह्मणांस्तेनं वेदाश्च याश्च विहिताः पुरीं ॥ २३ ॥
ओं तत् सत् ऐसे तीन प्रकारका नेर्दका निश्चय जानागाँ है
"याने ओशब्दसे कर्मका स्वीकार करना उचित है तत् शब्दसे तदर्थ
याने परमेश्वरार्थ करना उचित है सत्से श्रेष्ठकर्म साधुवृत्तिले करना
ऐसा वेदका निश्चय है" उसी निश्चयकरके युक्त ब्राह्मण याने वेदकर्म
करनेवाले तीनों वर्ण कर्मस्वीकारार्थ और वेद जो ईश्वरार्थकर्मको
प्रतिपादन करते हैं और यज्ञ दान जो सत्कर्म ये मैं ने पूर्वकालमें
स्थापितकिये हैं ॥२३॥
तस्मादोमित्युदाहृत्यं यज्ञदानतपःकियाः॥
प्रवर्त्तते विधालोक्ताः सततं ब्रह्मवादिना ॥२४॥
जिससे कि, वेदवादी तीनोंवर्गकर्म स्वीकारार्थ हैं तिससे ओं ऐसे
कहिके याने कर्मस्वीकार करके वेदवादी तीनोंवों की विधि से कहीं-
भई यज्ञ दान तपकी क्रियायें निरंतर प्रवृत्त होती हैं ॥ २४ ॥
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सप्तद० १७.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। ( १७५.)
तंदित्यनभिसंधार्य फलं यज्ञतपःक्रियाः ॥
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियते मोक्षकांक्षिभिः ॥२५॥
तत् याने कर्म तदर्थहै. याने परमेश्वरार्थहै ऐसी बुदिसे फलका
अनुसंधान नहीं करके यज्ञ, दान, तप, क्रिया और अनेकप्रकारको
दानक्रिया मोक्षके चाहनेवालों केरके कीजातीहै ॥ २५ ॥
सद्भावे साधुभावे च संदित्येतत्प्रयुज्यते ॥
प्रशस्ते कैमणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥
हे अर्जुन ! श्रेष्ठपेनमें और साधुभावमें शत् ऐसा यह शब्द युक्त
करतेहैं तथा श्रेष्ट कर्ममेंभी संतशब्द युक्तकरते हैं ॥२६॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः संदिति चोयते ॥
कर्म चैव तदर्थीयं सैदित्येवाऽभिधीयते ॥२७॥
जो यज्ञमें, तपमें और दानमें स्थिति है सो सत् ऐसे कहाँतीहै
और जो ईश्वरार्थ कमैहै सो सत् निश्चयह ऐसे कहतेहैं इन
चारों श्लोकोंमें ओतत् सत् इनका खुलासा कियाहै ॥२७॥
अश्रद्धयाँ हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्यै नो इह ॥२८॥
इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां यो-
गशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभाग-
योगोनाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
हे पृथापुत्र ! जो श्रद्धाविना होमाँभया हवन दिया भया दोन तपार्भया
तप और कियाभया कर्महै 'सो असत् ऐसा कहाताहै और सो नैं पर
लोकमें न इस लोकमें सुखदायक है ॥२८॥
इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां
श्रीमद्भगवद्गीतामृततरंगिण्यां सप्तदशाध्यायप्रवाहः ॥ १७॥
अर्जुन उवाच ।
संन्यामस्य महावाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥
त्यागस्यं चं हंपीकेश पृथकेशिनिदैन ॥ १ ॥
अब इस अठारहवें अध्यायमें सर्वगीताका सारांश निरूपण होय.
तहां अर्जुन प्रश्नकरतेहैं कि, हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनि-
पदन ! संन्यासका और त्यागका तत्त्व न्यारा न्यारा जाननेको
चाहतीहूं ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ॥
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यांग विचक्षणाः ॥२॥
ऐसा अर्जुनका प्रश्न सुनिके श्रीकृष्ण भगवान् बोलते भये कि, के-
वि जो सारासारविवेकी वे कामनावाले कर्मोंके छोड़नेको संन्यास ,
जानतहें और विचक्षण जो तत्त्वज्ञानी हैं वे सर्व कर्मोंके फलत्यागको
त्याग कहतहैं ॥२॥
त्यांज्यं दोपवंदित्येके कर्म प्राहुँर्मनीषिणः ॥
यज्ञदानतः कर्म न त्याज्यमिति चाँपरे ॥ ३ ॥
कोईएक ज्ञानिपुरुप दोपवाला कर्म त्यागनींचाहिये ऐसे कहते
हैं और कितनेक और आचार्य यज्ञ, दान, तप कर्म नहीं त्यागना
चाहिये ऐसे कहते हैं ॥३॥
निश्चयं शृणु में तत्रं त्यांगे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुपव्याघ्र त्रिविधः परिकीर्तितः॥४॥
यज्ञदानतपैः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ॥
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥५॥
अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । (१७७) हे भरतसत्तम । उस त्यागमें मेरा निश्चय सुनो हे पुरुषलमें श्रेष्ठ ! जिससे कि, त्याग तीनि प्रकारको कहा है ति सीसे यज्ञ, दान, तपरूँप कर्म नहीं त्यागना, करनाही. योग्य है यज्ञ, दान और तप ये ज्ञानिनको भी पवित्र करनेवाले हैं ॥४॥६॥ एतान्यपि तु कौणि संगं त्यक्त्वा फलानि च ॥ कर्तव्यानीति में" पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥६॥ हे पार्थ ! ये यज्ञादिकभी कर्म ममता और फलोंको त्यागि के करनेयोग्य हैं ऐसा निश्चय कियाभयाँ मेरा उत्तम मत ॥६॥ नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते॥ मोहाँत्तस्यं परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७॥ कारण कि, जो नियमित संध्यादि पंचमहायज्ञादिकहें उन कर्मका है त्याग नहीं होसकताहै जो मोहँसे उसका त्यागे किया सो ताम कहाताहै ॥७॥ दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । सं कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८॥ जो कर्म दुःख ऐसे शरीरक्लेशके भयसे ही त्याग सो राजस त्यागको करके त्यागफैलको नहीं पावताहै ॥८॥ कार्यमित्येवं यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ॥ संगं त्यक्त्वा फलं चैवै सै त्यागः सात्त्विको मतः॥९॥ हे अर्जुन ! जो कर्म करनेयोग्य ऐसी बुद्धिसेही ममता और फलको त्योगिके नियमित याने उचित ऐसीही बुद्धिसे करै सो त्याम सात्त्विक मानाहै ॥ ९॥ न द्वेष्टर्यकुशलं कर्म कुंशले नानुषजते ॥
(12) भगवद्गीता। [अध्यायः- त्यांगी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥ 'जो सत्त्वगुणयुक्त बुद्धिमान् संशयरहित कर्मफलत्यागी है सो भकुशलको याने संसारकारक कर्मको न निदताहै ने कुशल याने यज्ञादिकै तिनमें आसक्त होताहै ॥१०॥ नं हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ॥ यस्तुं कर्मफलत्यागी सै त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ जिसवास्ते कि, देहधारीकरके सर्व कर्म त्यांगनेको नहीं होसक. ताह तिससे जो कर्मफलका त्यागीहै सो"त्यांगी ऐसा कहाताहै।।११॥ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ॥ भवत्यत्यागिनां प्रेत्ये न च संन्यासिनां क्वचित्॥१२॥ अप्रिय, प्रिय और मिश्रित ऐसे कर्मको तीन प्रकारका फल कर्मफलानुरागिनको मरेपरे होताहै और कर्मफलत्यागिनेंको कहीं भी नहीं ॥ १२॥ पञ्चैतानि महावाहो कारणानि निबोध में ॥ सांख्ये कृतांते प्रोक्तांनि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१३॥ हे महाबाहो ! सर्वकर्मीकी सिद्धिके वास्ते ये पांच कारण सांख्यसिद्धांतमें कहेभये मेरेसे" सुनो ॥१३॥ अधिष्टानं तथा कत्ती करणं च पृथग्विधम् ॥ विविधांश्च पृथक् चेष्टा दैवं चै" वात्र पंचमम् ॥१४॥ वे ये कि, अधिष्टान याने आधार अर्थात् शरीर तथा कर्त्ता याने जीवे इस जीवके कर्त्तापनमें "ज्ञातएवचक शास्त्रार्थत्वात्" यह ब्रह्ममूत्र प्रमाणहै और न्यारे न्यारे प्रकारके करण याने मनसहित पंच इंद्रियोंके व्यापार और अनेकप्रकारकी न्यारी न्यारी चेष्टी याने पांच (१७९) अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी० । प्राणवायुनकी चेष्टा और यहां पांचवां दैव याने अंतर्यामी अर्थात में हूं इस विषयमें “परात्तुतच्छ्रुतेः” यह ब्रह्मसूत्रभी प्रमाणहै यहां शंकासमाधान वाक्यार्थबोधिनीमें किया है ॥ १४॥ शरीरवाड़नोभियंत्कर्म प्रारभतेऽर्जुनं ॥ न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचै"ते" तस्य हेतवः॥१५॥ हे अर्जुन ! शरीर वाणी और मन करके जो न्यायँ अथवा अ- न्यायं जो कर्म प्रारंभ करा जाताहै तिसके ये पाँचे कारण हैं ॥१५॥ तत्रैवं संति करिमात्मानं केवलं तु यः ॥ पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्नं से पैश्यति दुर्मतिः॥ १६॥ ऐसे सिद्धांत होनेपर भी तहां जो केवल आत्माको कर्ता जान- ताहै सो दुर्बुद्धिपुरुषं अकृतबुद्धित्व से याने यथार्थ निश्चयकारक 3 बुद्धिहीन है तिससे नहीं जानताहै ॥ १६॥ यस्य नहिंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ॥ हैत्वापि से इमॉल्लोकान हंति नै निबध्यते॥१७॥ जिसके आपके कर्त्तापनका भाव नहीं है जिसकी बुद्धि कर्ममें नहीं लिप्तहोतीहै सो ईन लोकनको मौरके भी न मारताहै न पापमें यताहै तात्पर्य कि, तुम भीष्मादिके वधसे डरते हो तहां जो मनुष्य ममता अहंतारहित होके स्वधर्माचरण करताहै उसको उस 2 कर्मजन्य पापपुण्यका भय नहीं ॥ १७ ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।। करणं कर्म कति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥१८॥ ज्ञान जो कर्त्तव्यकर्मका जानना ज्ञेय जो वह कर्म परिज्ञाता उस. के सम्यक् जाननेवाला ऐसे तीन प्रकारका शास्त्रविधान है तहां करणं (१८०) मगवद्गीता। [ अध्यायः- जो कर्मकरनेकी साधनसामग्री जैसे यज्ञमें सुवादिक युद्धमें शस्त्रादिक कम जो करना होय कर्ता करनेवाला ऐसे तीनि प्रकारका कर्मके वास्ते संग्रह है अर्थात् इनहीसे होसकेगा इन विना नहीं ॥ १८॥ ज्ञानं कर्म चे कर्तेति त्रिधैर्वं गुणभेदतः ॥ प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१९॥ ज्ञान कम और कर्ता ऐसे ये गुणभेदकरके सायशास्त्रमें तीन प्रकारहीके कहहें उनको भी यथावत् मुंनो ॥ १९॥ सर्वभूतेषु येनैक भावमव्ययमीक्षते ॥ अविभक्तं विभक्तपुं तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥२०॥ जिस ज्ञानकरके ब्राह्मणक्षत्रियादि विभागयुक्त सर्वभूतोंमें विभाग- रहित याने आत्मा सर्वमें समान है ऐसा अविनाशी एक भावको देखताहो उसे ज्ञानको सात्त्विक जानना ॥२०॥ पृथक्केन तु यज्ज्ञानं नानाभावान पृथग्विधान ॥ वेर्ति सर्वेपुं भूतेपु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१॥ और जो सर्वभूतोंमें अनेक ब्राह्मणादिक छोटे बडे उत्तम मध्यम भेदयुक्त आत्मनकोभी उत्तम मध्यम न्यारे न्यारे जानता है ऐसा जो न्यारेपनेकरके जो ज्ञान है उस ज्ञानको रोजस जानो ॥ २१ ॥ येत्तु कृत्स्नवंदेकस्मिन्कायें संक्तमहैतुर्कम् ।। अतत्त्वार्थवदल्पं चं तत्तौमसमुदाहँतम् ॥ २२ ॥ जो कि एकही कर्ममें सक्त याने आसक्त सर्वफलयुक्त जाने और वह निरर्थ होय कारण कि, जिसमें तत्त्वार्थ नहीं और तुच्छे याने भूतादि भाराधनरूप ज्ञान सो" तामस कहाँहै ।। २२॥ नियंतं संगरहितमरागद्वेपतः कृतम् ।।
अर्थ-
का सात्त्विक कहाँताहै ॥ २६
अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१८१)
अफलप्रेप्सुनां कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥२३॥
जो कर्मफलकी इच्छा न करनेवालेने नियत याने कर्त्तव्यं फला-
संगरहित और रागद्वेषविना किया होय सो सात्त्विक कहाहै ॥२३॥
यत्तु कामेप्सुनों कर्म सहिंकारेण वा पुनः ।।
क्रियते बहुलायासं तद्रांजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
वा फिर अहंकारसहित कियाहोय सो राजसें कहाहै ॥२४॥
अनुबंध क्षयं हिंसामनवेक्ष्यं च पौरुषम् ।।
मोहाँदारभते कर्म यंत्तत्तौमसमुच्यते ॥ २५ ॥
कर्मके परिणामको दुःख द्रव्यादिकका क्षय उस कर्ममें प्राणि-
पीडा और आपके पुरुषार्थको न देखि के मोहसे जो कर्म आरंभ
कियाजाताहै सो" तामस कहाताहै ॥२५॥
मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः
सिद्धयसिद्धयोनिर्विकारः कर्ती साँत्त्विक उच्यते२६
जो पुरुष कर्मफलासक्तिरहित मैं कर्ता हूं ऐसे न कहनेवाला
धीरज और उत्साहयुक्त सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकारहोय सो
रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः॥
हर्षशोकान्वितः कर्त्ता जिसः परिकीर्तितः ॥२७॥
जो कर्ममें आसक्तः कर्मफलके चाहनेवालों लोभी याने कर्ममें
यथार्थ खर्चका न करनेवाला प्राणिपीडा करनेवाला अपवित्रं हर्षशो-
कयुक्त सो को रॉजस कहाहै ॥२७॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शंठो नैष्कृतिकोऽलसः ॥
विषादा दीर्घसूत्री चं कर्ता तामस उच्यते ॥२८॥
(१८) भगवद्गीता। [ अध्याय:- जो शास्त्रोक्त कर्मके अयोग्य विद्याहीनं अनम्र सारणादिकर्मत- त्वर टंग आलसी विपाद करनेवालाँ और घड़ीके काममें एक दिन बितानवालों सो तोमस कहाताहै ॥२८॥ बुद्धभेद धृतेश्चैवं गुणतंत्रिविधं शृणें ॥ प्रोच्यमानसशेपेणं पृथक्केन धनंजय ॥ २९ ॥ है धनंजय ! संपूर्णपनेकरके मेरा कहाँलया न्यारा न्यारों गुणोंक- रके तीनिप्रकारका बुद्धिकाँ और धीरजको भेर्दै मुंनो ॥ २९ ॥ प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।। बध मोक्षं" चै यो वेत्ति बुद्धिःसौं पार्थ सात्त्विकी३०॥ हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिको और निवृत्तिको कार्य अकार्यको और भय अभयको बंधको और मोक्षको जानता है सो सात्त्विकी ॥३०॥ ययां धर्ममधर्म च कार्य चाकार्यमेव च ॥ अयथावताजानौति बुद्धिः सौ पार्थ राजसी ॥३१॥ हे पृथापुत्र ! जिस बुद्धिकरके धर्मको और अधर्मको तैसे' कार्यको और अकार्यको भी उलटा जानै सो धुद्धि राजसी ॥३१॥ अंधर्म धर्ममिति याँ मन्यते तमसावृतां ॥ सर्वार्थाविपरीतांश्च बुद्धिःसौ. पार्थ तामसी॥ ३२॥ पार्थ ! जो बुद्धि अज्ञानकरके ढकीभई अधर्मको धर्म ऐसी भाग आरे सर्व अथाको उलेटे मान सो तामसी ॥३२॥ धृत्या ययां धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ॥ योगेनांव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी३३ पार्थ ! जिस अखंडमोक्षसाधनरूप धारणाकरके योगबलसे मन प्राण और इंद्रियनकी क्रियोंको धारणकरे सो धारणा सात्विकी॥३३॥ ययां तु धर्मकामार्थान्धृत्यां धारयते नरः ॥ !
१८ ( १८३) अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। प्रसंगेन फलोकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥ हे पार्थ ! फलकी इच्छा करनेवाला पुरुष फलइच्छाप्रसंगसे जिसे धारणाकरके धर्म अर्थ कामोंको धारणकरै सो धारणा राजसी ॥ ३४॥ यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ॥ नं विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सौ तामसी मता ॥ ३५ ॥ दुष्टबुद्धिपुरुष जिस धारणाकरके स्वप्न भयं शोक विर्षाद और मद इनको नहीं त्यागताहै सो धारणा तामसी मानतेहैं॥३५॥ सुखं विंदानी त्रिविधं शृणु में भरतर्षभ। अभ्यासांद्रमते यत्र दुःखतिं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ यत्तदैग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७॥ हे भरतश्रेष्ठ ! अब सुखभी तीनप्रकारका मेरेसे सुनो सो ऐसे कि, जिस सुखमें अभ्यासकरनेसे मन रमताहै और दुःखकानाश होताहै जो उसके प्रथम विषतुल्य अंत में अमृततुल्य सुख वह आत्मबुद्धि- की प्रसन्नतासे उत्पन्न सुख सात्त्विक कहाहै ॥३६॥३७॥ विषयेंद्रियसंयोगांद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ॥ परिणामे विषमिव तत्सुखं राजेसं स्मृतम् ॥ ३८॥ जो विषयेद्रियके संयोगसे प्रारंभमें अमृततुल्य अंतमें विषतुल्य सो सुख राजस कहाहै ॥ ३८॥ यदंग्रे चाबंधे च सुखं मोहर्नमात्मनः । निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ जो प्रारंभमें और अंतमें भी आपका मोहक सो निद्दा आलस औ- र प्रमादसे उत्पन्न सुखे तामस कहाहै ॥ ३९ ॥ नै तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ॥
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भगवनीता।
[ अध्याय:-
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्रिंभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
जो वस्तु प्रकृतिसे उत्पन्न इन सत्त्वादि तीन गुणोंकरके मुक्त
घीय सो पृथिवीम" अथवा स्वर्गमें अथवा फिर वहांही देवनमें
नही है ॥४०॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतपं ॥
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ११ ॥
हे परंतप ! ब्राहाण क्षत्रिय वैश्योंके और शूद्रोंके स्वभावसे उत्पन्न
गुणोंकरके कर्म न्यारे न्यारे कियेहैं ॥४१॥
शेमो दमस्तपः शौचं शांतिरार्जवमेव च ॥
ज्ञान विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥ ४२ ॥
शम जो बाह्यइंद्रियोंका संयम दम अंतःकरणका संयम तप शा
स्रोक्त व्रतादिक शौच बाह्य और आभ्यंतर क्षमा और सरलता ज्ञान
स्वस्वरूप परस्वरूपका जानना विज्ञान जो स्वरूपज्ञानभये पर
ईश्वरभक्तिकरना आस्तिक्यं जो वेदशास्त्रवाक्योंमें विश्वास ये ब्राह्मण
के कर्म स्वभावही से हैं ॥४२॥
शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्य युद्धे चाप्यपलायनम् ॥
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
शुरपना तेज याने जिसप्ते दूसरे डरे धीरज चतुराई और युद्ध में
भागना नहीं उदारता और प्रजाको स्वाधीन रखना यह क्षत्रियका
कर्म स्वभावज है ॥४३॥
कृपिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ॥
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
खेती गोपालना वाणिज्य करना यह वेश्यकर्म स्वभावसे हैं तीनों
वर्गकी सेवाइप कर्म का स्वभावसे है ॥४४॥
अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१८५) स्वे' स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः॥ स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विदति तच्छृणु ॥४५॥ ऐसे आपआपके कर्ममें तत्परभयाहुआ मनुष्य सिद्धिको याने मोक्षको प्राप्तहोताहै स्वकर्मनिष्ठ पुरुष जैसे मुक्तिको पाताहै सो' सुनो ॥४५॥ यतः प्रत्तिभूतानां येन सर्वमिदं ततम् ॥ स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विदति मानवः ॥४६॥ जिस ईश्वरसे भूतप्राणिनकी उत्पत्ति रक्षण है जिसकरके यह सर्व व्याप्त है उस ईश्वरको आपके स्वभावज कर्मकरके पूजिके मनुष्य मोक्षको प्राप्तहोताहै ॥ ४६॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ॥ स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति" किल्बिषम् ॥४७॥ अतिउत्तम परधर्मसे आपकाधर्म गुणहीनभी कल्याणकारक है आपके जातिविहित कर्म करतार्भया पापको नहीं प्राप्तहोताहै तात्प- र्य तुम्हारा हिंसात्मक भी धर्म है तो भी तुम्हारा कल्याण उसीसे है४७॥ सहजं कर्म कौंतेयं सदोषमपि ने त्यजेत् ॥ सरिंभा हिँ दोषेणं धूमेनाग्नि"रिवावृताः॥४८॥ हेकुंतीपुत्र ! दोषयुक्तंभी आपके वर्णोचित धर्मको न त्यागनी क्योंकि, सर्व ज्ञानकर्मादिक आरंभ दोपकरके धुवाँकरके अग्नि ऐसे युक्त हैं ॥४८॥ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्टहः ॥ नैष्कर्म्यसिद्धि परमां संन्यासेनाँधिगच्छति ॥ ४९ ॥ सर्वकर्मों में बुद्धिको आसक्त न करना मनको वश किये भये १२ (24) भगवद्गीता। [अध्याय:- बांधाहित पुरुष परमं नैष्कर्म्यसिद्धिको याने आत्मज्ञानको फल त्यागकरके प्रातहोताहे ॥१९॥ सिद्धि प्रोप्तो या ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ॥ समासेनैव कौतय निष्टा ज्ञानस्य यों परों ॥ ५० ॥ है कुंतीपुत्रं ! उस आत्मज्ञानको प्राप्तभयाहुआ जैसे ब्राँको प्राप्तहोताहे तेसे संक्षेपकरके मेरेसे सुनो जो" ध्यानात्मज्ञानकी पैरम निष्टा है याने उपायकी सीमा है ॥१०॥ बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।। शब्दादीन्विपयाँस्त्यत्वा रागद्वेषौ व्युदस्य चै ॥५१॥ विविक्तसेवी लैंधवाशी यतवाकायमानसः ॥ ध्यानयोगपैरो नित्यं वैरीग्यं समुपाश्रितः ॥५२ ॥ अहंकारं बलं दैप काम क्रोधं परिग्रहम् ॥ विसुच्य निर्ममः शांतो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३॥ सो जैसे कि, शुद्धबुद्धिकरके युक्त और धारणासे पनको वश क- रके शब्दादिक विषयोंको त्यौगिक और रोंगदेषोंको त्यागिक पकांत वेठाभयाँ अल्पाहारी शरीर वाणी और मनको वशकियेभये नित्य ध्यानयोगपरायण वैराग्यको धारणकियेभये अहंकार चले देप कॉम क्रोध ममता इन सबको त्यागिके निमम शांत ऐसा पुरुप आत्मज्ञानमय होताहै ॥५१॥५२॥५३॥ ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ॥ समः सर्वेषु भूतेपु मैद्भक्तिं लभते परामें ॥ ५४॥ ऐसे आत्मज्ञानमय भयाहुआं प्रसन्नमनयुक्तं न कोई वस्तु मेरे सिवा-.. जोगई तो उसको शोचता है ले चाहताहै सर्व सूतोंमें समहाष्टिभया- आं अतिउत्तंग मेरी भक्तिको प्राप्तहोता है याने सर्व जगत्को (१८७) अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। मेरे शरीरभूत मेरी परमविभूति जानिके पक्षपातरहित सर्वमें मेरे- होको देखतामया मेराही स्मरण उनमें करताहै कि, ये सब मेरे स्वामीके हैं यही परमभक्ति है ॥५४॥ भक्या मामभिजानाति यावान्यश्चस्मि तत्त्वतः॥ ततो माँ तत्त्वतो ज्ञौत्वा विर्शते तदनंतरम् ॥ ५५ ॥ मैं जितना और जो हौं तितना और तिस मेरेको भक्तिकरके निश्चयपूर्वक जानताहै फिर मेरेको" निश्चयपूर्वक जानिके मेरेहीको उसैपीछे प्राप्तहोताहै ॥५५॥ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्यपाश्रयः॥ मत्प्रसादांदवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ मेश आश्रितजन सर्व लौकिक वैदिक कर्सनकोभी सदा करता- भया मेरे अनुग्रहसे सनातन नाशरहित पदको प्राप्तहोताहै ॥ ५६॥ चेतसां सर्वकर्माणि मंयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं अवै ॥ १७ ॥ मेरे परायण भयेहुये चित्तकरके सर्वकर्मोंको मेरेमें स्थापितक- एके याने मेरे अर्पणकरके ज्ञानयोगका आश्रयकरके निरंतर मेरेमें चित्तको लगायेभये स्थितरहो ॥ १७॥ मच्चित्तः सर्वद्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ॥ अर्थ चेक़महंकारान्न श्रोष्यसि विनक्ष्यसि ॥५८॥ मेरेमें चित्तलगायेभये मेरे अनुग्रहसे सर्वसंसारदुःखोंको तरोगे जो कैदाचित् तुम अहंकारसे मेग उपदेशन सुनोगे तो नष्टहोउंगे।।५८॥ यदहंकारमाश्रित्य ने योत्स्य इति मन्यसे । मिथ्यैवव्यवसायंस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥२९॥ जो अहंकारको आश्रयकरके न युद्धकरोंगा ऐसे मानोगे सो भी (142) भगवद्गीता। [अध्यायः- तुम्हार्ग निश्चयं वृथा होयगा क्योंकि, तुमको तुम्हारा जातिस्वभी- वही युद्ध में लगायदेयगों ॥ ५९॥ स्वभावजेन कौतेय निबद्धः स्वेनं कर्मणा ॥ कंत्त नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवंशोपि तत् ६० हे कुंनीपुत्र! जोयुद्ध मोहसे करनेको नहीं चाहते हो सो आपके क्षत्रि- यस्वभावजन्य आपके कर्मकरके बंधेभये परवर्शभये भी करोगे॥६०॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ॥ भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ हे अर्जुन ! ईश्वरं आपकी मायाकरके यंत्र जो शरीर तिनमें रहेभये सर्वभूतोंको भ्रमाताभर्या सर्व तोंके हृदयस्थलमें स्थित है ॥६३ ॥ तमेवं शरणं गच्छं सर्वभावेनं भारतं ॥ तत्प्रसादात्परांशांति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम६२ हेभारत ! सर्वभावनाकरके उसी परमात्माके शरण हो उसीके अनुग्रहसे परम शांति और सनातनं स्थानको प्राप्तहोवोगे ॥ १२ ॥ इंति ते ज्ञानर्माख्यातं गुह्यानह्यतरं मया ॥ विमृश्यैतेंदशेपेण यथेच्छसि तथौं कुरु ॥ ६३ ॥ मैंने यह गोप्यसेभी गोप्य ज्ञान तुमको कहाँ इसको अच्छीत- हमे विचारके जैसा चाहो तैसी करो। ६३॥ सर्वगुह्यतमं भूयः शृंणु में परमं वचः ॥ इष्टोसि में दृहमतिस्ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥४॥ सर्वगोप्यनमें भी अतिगोप्य मेरा परम वाक्यं फिर सेनो मेरे अति प्रिय हो तिसँसे तुमको यह हित उपदेश करताहूं ॥ ६४ ॥ सन्मनां भव मद्भक्तो मद्यांजी मां नमस्कुरु ।। ममिवैष्यसि सत्यं ते अंतिजाने प्रियोऽसि मे ६५॥
मेरेको और आपको एकही जानो इस एकताज्ञानरूप भक्ति करो अष्टाद०१८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०। (१८९) मेरेमें मनको लगावो मेरे भक्त होउँ मेरा पूजन करनेवाले होई मेरेको नमन करो और ऐसे करनेसे मेरेको ही प्राप्तहोउंगे तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करतौहूं क्योंकि, मेरे प्रियही ॥ ६९ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्य मोमेक शरणं व्रज ॥ अहं त्वां सेर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥ हे अर्जुन ! तुम सर्वधर्मोको परित्यागि के याने सर्वधर्मोंके फलको त्यागिके अर्थात् “यत्करोषि यदनासि इत्यारभ्य तत्कुरुष्व मदर्पणम्" इस रीतिसे मेरे अर्पणकरके मुख्य मेरे शरण प्राप्त होई अर्थात "स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धिं विदति मानवः” इस प्रमाणसे मेरेको पूज्य और मेरेको प्राप्य जानिक मेरी आज्ञा करो याने मेरा पूजन जानिके स्वधर्मरूप युद्ध करो मैं तुमको इन भीष्मादिकोंको युद्धमें मारने इत्यादिक सर्वपापोंसे मुक्तकरौंगा तुम मति शोचकरों यहां इस श्लोकमें कोई विद्वद्भूषण अर्थ करते हैं कि, चातुर्मास्ययाग श्राद्ध पितृतर्पण इत्यादिकर्मरूप धर्मोको त्यागिके मेरे शरण होउ याने तब विचारना चाहिये कि, प्रथम तो "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मे- त्युदाहृतः' इत्यादिप्रमाणसे जीवब्रह्मकी स्वरूपएकता नहीं होसक- तीहै मुक्तभयेपरभी “मम साधर्म्यमागताः” और “भोगमात्रसाम्यलिं गाच"तथा "निरंजनः परमं साम्यमुपैति' इत्यादिक गीताब्रह्मसूत्र और श्रुतिप्रमाणसे भी भोगादिकमें समता होती है एकता नहीं जहां एकता भी कहीहै तहां अंतर्यामिभावसे अथवा "द्वासुपर्णा" इत्यादिश्रुतिप्रमा- ण सखापनसे कहीहै दूसरे भज सेवायां धातुका भक्ति शब्द होताहै भक्ति याने सेवा सो भी एकतामें बननेकी नहीं इससे जीव परमात्मासे न्यारे परमात्माके स्वाधीन हैं यह सिद्ध भया तब जो अर्थ किया कि, शेगी और आपकी एकतारूप भक्तिकरो सो यह अर्थ तो सिद्धर्भया नहीं अब जो धर्मको त्यागनेका अर्थ किया तहां धर्मसंस्थापना- ाय संभवामि युगयुगे। श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः । स्वधर्मे निधनं श्रेयः”
.
२०)
भगवद्गीता।
[ अध्याय:-
इत्यादि वाक्यों में विराधे आताहै इसवास्ते सर्वधर्मोका फलत्यागिके
निष्काम और ईश्वरपूजनइप जानिके करना यही सिद्धहोताहै यहां
इसी अध्यायमें प्रमाणहै "निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागा हि पुरुपच्यान विविधः परिकीर्तितः" यहांसे लेके "संग त्यका
फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ यस्तु कर्मफलत्यागी सत्यागीत्य-
भिधीयते" इत्यादि और भी कहेहैं ग्रंथवढनेके भयसे नहीं लिखते हैं
सुज्ञजन इतनेहीमें समुझिके धर्माचरण करेंगे ॥६६॥
इंद ते नातपस्काय नाऽभक्ताय कदाचन ॥
नचाऽशुश्रूपवे वाच्यं नचमी योऽभ्यसूयति ॥६७॥
हे अर्जुन ! यह मेरा गोप्य उपदेश तुम जिसने तप नकियाहोय उ-
सको नै कहना तथा कभी भी मेरा और मेरे जनोंका भक्त न होय
उसको न कहना और जो गीताउपदेष्टाकी सेना नकरै उसको भी न
फहना और जो मेरी" निदाकरै उसको तुम न कहना ॥१७॥
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिर्धास्यति ।
मंक्ति मयि परां कृत्वा मोमवैष्यत्यसंशयः ॥६८ ॥
जो इस परमै गोप्यं गीताशास्त्रको मेरे भक्तों में प्रसिद्ध करेगा वह
मेरेमें सर्वोत्तम भक्ति करके मेरेहा को प्राप्तहोगा इसमें संशयनहीं ६८
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्में प्रियकृत्तमः ॥
भविता ने च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥६९ ॥
उस गीताको भक्तोंमें प्रसिद्धकरनेवालेसे अधिक मेरी प्रियंका-
रेक पृथिवीमें दूसरा मनुष्योंमें को ईभी नहीं है और न उसकी
वगेवर और मेरे को प्रिय होगा ॥ ६९ ॥
अध्येप्यते च य इमं धयं संवादमावयोः ॥
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति में मैंतिः ॥ ७० ॥
जो मर तुम्हारे इस धर्मवर्द्धक संवादरूप गीताका अध्ययन करेगा
समर में ज्ञानयज्ञसे पृजित होउंगा ऐसा मैं मानताहूं ॥ ७० ॥
(१९१)
अष्टाद० १८.] सान्वय-अमृततरंगिणी भा० टी०
श्रद्धावाननसूयुश्च शृणुयादपि यो नरः॥
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ७१
जो निंदारहित और श्रद्धायुक्त श्रवणभी करेगा सोभी संसारसे मुक्त
होके पुण्यकर्म करनेवालोंके सुखद लोकों को प्राप्त होयगा ॥ ७१ ॥
कञ्चिदेतच्छुतं पार्थ त्वयैकाँग्रेण चेतसा ॥
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रणष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥
भगवान पूंछतेहैं कि, हे पृथीपुत्र ! इस ज्ञानको तुमने एकाग्र
चित्तसे सुना कि नहीं, और हे धनंजय ! जो सुना होय तो अज्ञानजन्य
मोह तुम्हारा नष्ट भया कि नहीं सो कहो ॥ ७२ ॥
अर्जुन उवाच ।
नष्टो मोहः स्मृतिलब्धा त्वत्प्रेसादान्मयाच्युत ॥
स्थितोऽस्मि गर्तंसंदेहः करिष्ये वचनं तव ।। ७३ ।।
श्रीकृष्णके वचन सुनिके अर्जुन कहतेहैं कि, हे अच्युत । तुम्हारे
अनुग्रहसे मोहे नष्टंभया और मैंने ज्ञान प्राप्तकिया अब संदेहरहित
स्थित हूँ" आपका वचन जो स्वधर्मरूप युद्धकरनेकी आज्ञा सो
करोगा। ७३॥
संजय उवाच ।
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः॥
संवादमिर्ममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
संजय धृतराष्ट्रसे कहतेहैं कि, हेराजन् ! ऐसा यह श्रीकृष्ण और
महात्मा अर्जुनका अतिअहुँत रोमांचकारक संवाद मैं सुनतीभया ७४
कयासप्रसादाच्छुतवानेतेवामहं परम् ॥
योग योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ७५
में यई अत्यन्त गोप्य प्रत्यक्ष स्वयंही योग कहतेभये योगेश्वर
श्रीणचे मुखसे घेदव्यासजीके अनुग्रहसे सुनतीभया ॥ ७९ ॥
(१०२) भगवद्गीता। [अष्टादशोऽध्यायः १८] राजेन् संस्मृत्य संस्कृत्य संवादमिममद्भुतम् ॥ केशवार्जुनयोः पुण्यं हृप्यामि च मुहेर्मुहुः ॥ ७६ ॥ हेराजन् ! इस श्रीकृष्ण और अर्जुनके अद्भुत पुण्यदायक संवा- दको सुमिरि सुमिरिके वारंवार हर्पितहोताहौं ॥ ७६ ॥ तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः॥ विस्मयो में महान राजन हँप्यामि चै पुनःपुन:७७ हेराजन् ! उस अद्भुत भगवान के रूपकोभी मुमिरिसुमिरिके मेरे वडी विस्मय होताहै और वारंवार हर्पित होताहीं ॥ ७७॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थों धनुर्धरः॥ तत्र श्रीविजयो मूतिधुवा नीतिमतिर्मम ॥ ७८॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योग- शास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसंन्यासयोगो नास अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ हेराजन् ! जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहां अर्जुन धनुर्धारी हैं तहांही अचल संपदा अचल विजय अचलवैभव और अचल नीति है यह मेरो निश्चय मत है ।। ७८ ॥ इति श्रीमत्सुकलसीतारामात्मजपंडितरघुनाथप्रसादविरचितायां श्रीमद्भगवद्गीताऽमृततरंगिण्यामष्टादशाध्यायप्रवाहः ॥१८॥ अंबगब्ध्यंकभूसंख्येविक्रमार्कस्यसंवदि ॥ माघमासेदलेशुभ्रेद्वि तीयायांतिथौबुधे ॥ १ ॥ इयंसंपूर्णतायातागीताऽमृततरंगिणी श्रीमद्भागवताचार्यानुग्रहात्सगुरुर्मम ॥२॥ समातोऽयं ग्रंथः। पुस्तकमिलनेका पता-खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवटेश्वर" (स्टीम् ) यन्त्रालयक मालिक-मुंबई.
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