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Dwadashanupreksha
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ॐ
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सनातन जैनग्रंथमाला।
२३
श्रीसोमदेवसूरि विरचित
द्वादशानुप्रेक्षा।
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यशस्तिलकचम्पू काव्यसे
उद्धृत.
--10dwar
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वसंततिलका छंद ।
उत्सृज्य जीवितजलं बाहिन्तरेते
रिक्ता विशति महतो जलयंत्रकल्पा।
एकोद्यम जरति यूनि महत्यणोंच
सर्वकषः पुनरयं यतते कृतान्तः॥
अर्थ:-जिसमकार, अरहटको घडीके पडे कूएके भीतर
से जल भरकर लाते हैं और उसे बाहर फेंककर खाली
.
द्वादशानुप्रेक्षा।
होकर फिर जल भरनेके लिए भीतर चले जाते हैं उसीप्रकार
यह श्वासोच्छवासकी वायु भीतरसे जीवनरूपी जलको भर
कर काती है और उसे बाहर फेंककर खाली होकर फिर
उसी जीवनरूपी जलंको भरने के लिये भीतर चली जाती है।
उसका यह क्रम रात दिन प्रतिक्षण चलता रहता है और
इसमकार प्रतिक्षण जीवन घटता रहता है । सबको दुःख
देनेवाला दावानल अग्निके समान, और संवको प्रत्यक्ष
होनेवाला यह यमराज. पूढोंको, जवानोंको, राजा महाराजा
आदि महा पुरुषोंको और दरिद्री आदि छोटे पुरुषोंको
नाश करनेके लिये ही एक मात्र सदा प्रयत्न करता रहता
है। इसके सिवाय उसे और कुछ काम है ही नहीं।
भावार्य- हमलोगोंका जो श्वासोच्छवास प्रतिक्षण
चलता रहता है उसीके द्वारा हम लोगोंकी आयु प्रतिक्षण
कम होती जाती है जोकि एक दिन अवश्य पूरी हो जायगी
इसके सिवाय यमराज प्रतिक्षा जीवोंको भक्षण करनेके
उद्योगमें लगा रहता है, भायु पूरी होने पर वो वह उठा ही
ले जाता है परन्तु कभी-२ वह बिना भायु पूरो हुए भी
उठा ले जाता है इसलिये प्रत्येक प्राणीको मरनेके लिये
सदा तैयार रहना चाहिये। इसे मनुष्य जन्मको पाकर सबसे
पहिले रत्नत्रयकी प्राप्ति कर लेना चाहिये जिससे कि चीच
में भी पर्याय बदले जाने पर किसी प्रकारका दुःख न हो
और मनुष्य जन्म सफल हो जाये क्योंकि रत्नत्रयकी प्राप्ति
३ अनित्यानुप्रेक्षा। से ही यह जीव अनन्त सुखी हो सकता है अन्यया नहीं। इस श्लोकमें जीवनका अनित्यपना दिखलाया है। लावण्ययोवनमनोहरणीयतायाः कायेष्वमी यदि गुणाश्चिरमावसन्ति । सन्तो न जातु रमणीरमणीयसारं संसारमेनमवधीरायतुं यतन्ते ॥२॥ अर्थ- यदि इस शरीरमें कावग्य, यौवन, सुन्दरता, रूप, सौभाग्य आदि प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले गुण सदावने रहते, न न होते. तो सुन्दर स्त्रियों के द्वारा अत्यन्त मनोहर दिखाई देनेवाले इस प्रत्यक्ष संसारको सजन लोग कभी छोडनेका प्रयत्न नहीं करते । भावार्थ-लावण्य यौन 'प्रादि शरीरके गुण इस शरीरमें सदा नहीं रहते, वे हाथकी अनलिके जलके समान क्षण क्षणमें नष्ट होते. रहते हैं और -नष्ट होकर फिर ये कभी दिखाई नहीं देते । इसीलिए तीर्थ- कर प्रादि सज्जन. पुरुष ऊपरसे मनोहर दिखाई देनेवाले पर पास्तवमें अत्यन्त घृणित इस संसारको छोडकर.मोतो.जा. विराजमान हुये हैं । यही समझकर भव्य जीवोंको संसारको छोडनेका सदा प्रयत्न करते रहना चाहिये । इस श्लोकमें रूप लावगयपना आदिको प्रनित्य दिखलाया है। उच्चैः पदं नयति जंतुमधः पुनस्तं वात्येव रेणुनिचर्य चपला विभूतिः। ...
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10
मादशानुप्रेक्षा।
श्राम्यत्यतीव जननीवनितासुखाय
ताः सूतवत्करगता अपि विप्लवन्ते ॥३॥
अर्थ-जिसप्रकार वेगवाला वायुका समूह धुलिके
समूहको पहिले वो उड़ाकर ऊंचा ले जाता है और फिर
उसे नीचे गिरा देता है उसी प्रकार यह चंचल विभूति
चंचल ऐश्वर्य ) इस प्राणीको पहले तो राज्यादिक पदमें
स्थापन कर बहुत ऊंचा चढा देती है और फिर रंक दरिद्र
बनाकर वा नरकमें ढकेलकर बहुत नीचा गिरा देती है ।
येसंसारके प्राणी उत्तम खियोंसे उत्पन होने वाले सुखकेलिये
अत्यन्त दुःखी होते हैं उसके लिये सेवा खेती व्यापार आदि
संसारके व्यापार धंधे करते हैं और रातदिन दुखी होते हैं।
परंतु वे स्त्रियां बडे प्रयत्नसे मुट्ठीमें बांधे हुए पारेके समान
हाथमें रहते हुए भी नष्ट हो जाती हैं। मावार्थ-जिस प्रकार
राज्यादिक कक्ष्मी स्थिर नहीं रहती उसी प्रकार इन्द्रियों के
सुख भी स्थिा नहीं रहते। ये दोनों ही विजलीके समान
बहुत श्रीन नष्ट हो जाते हैं । इस श्लोकमें राज्यादिक
लक्ष्मीको और ऐंद्रियक सुखोंको अनित्य बतलाया है ।।
शूरं विनीतमिवः सज्जनवकुलीन,
विद्यामहान्तमिव धार्मिकमुत्सृजन्ती
चिन्ताज्वरप्रसवभूमिरियं हि लोक
लक्ष्मी ललक्षणसखौ कलुषीकरोति ॥ ५॥
.. अनित्यानुप्रेक्षा! अर्थ-लक्ष्मी जिस प्रकार विनय करनेवाले पुरुषको छोड देती है उसी प्रकार सहसमट लक्षमट और कोटिभर (हजार, लाख और करोड मनुष्यों के समान बल रखनेवाले) पुरुषोंको हरा देनेवाले (नष्ट कर देनेवाले) अत्यंत शुरवीर पुरुपको छोड देती है अर्थात् यह विनयवानको भी छोड़ देती है और शूरवीरको भी छोड देती है तथा जिसप्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए पुरुपको छोड देती है उसी मकार परोपकारी सज्जनको भी छोड देती है। जिस प्रकार विद्यावानको सबसे बडे विद्वानको छोड देती है उसी प्रकार धर्मात्माको छोड देती है । भावार्य-पह लक्ष्मी शूरवीर, विनयवान, सजन, कुलीन, विद्वान्, धार्षिक पादि सवको छोड़ देती है किसी उचम पुरुषके पास भी नहीं ठहरती । इसके सिवाय यह लक्ष्मी चिता वा आतध्यानसे उत्पन हुए ज्वर वा संतापको उत्पन्न करनेकी भूमि है । जिस प्रकार भूमिसे सब धान्य उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार इस लक्ष्मीसे ही सब प्रकारकी चिंताएं सब प्रकारके आर्तध्यान उत्पन्न होते हैं जिससे यह जीव सदा संसप्त वर चढेके अपान नितांत दुखी बना रहता है। इतना होने पर भी यह लक्ष्मी ठहरती नहीं, दुष्ट पुरुषकी मित्रताके समान थोडी देरसक ही प्रेम रखती है । लिखा भी है"अभ्र- छाया तृणादग्निः खले प्रीतिः स्यले जलम् । वेश्यारागः ऋमित्रं च पढेते बुबुदोपया.।" अर्थात बादलकी छाया, 40 द्वादशानुप्रेक्षा। तणकी अग्नि , दुष्टमें किया हुमा प्रेम, मूखीभूमिपर पड़ा हुआ जल, वेश्याका अनुराग और कुमित्र ये सब बुढाके समान हैं । भावार्थ-यह लक्ष्मी सब उत्तम पुरुषोंको छोड देती है, चिंता आदिके द्वारा इस जीवको सदा दुखी करती रहती है और फिर भी क्षणभरमें नष्ट हो जाती है ऐसी यह लक्ष्मी. लोगोंको व्यर्थ ही पापी बना रही है क्योंकि 'लोभ- मूलानि पापानि पाप सब लोभसे ही होते हैं। यह जीव लक्ष्मीके लिये लोभ करता है और लोमसे अनेक पाप करता है फिर भी वह लक्ष्मी उसे सदा सन्तप्त किये रहती है और छोडकर शीघ्र चली जाती है। ऐसी लक्ष्मीके लिये बार बार धिक्कार हो। वाचि भ्रुवोर्डशि गतावलकावलीषु यासां मन कुटिलतास्तटिनीतरंगाः। अन्तर्न मान्त इव दृष्टिपथे प्रयाता: कस्ता करोतु सरलास्तरलायताक्षीः॥५॥ अर्थ-भरे ! जिन स्त्रियोंके मनकी कुटिळतारूपी नदी. की लहरें उनके अन्तरंग,-हृदयमें न समासकीं इसीलिए के. उनके बचनोंमें, मोहोंमें, नेत्रोंमें, गमनमें, और केश पाशोंमें प्रत्यक्ष दिखाई देने लगी ऐसी उन चंचल और दीर्षनेत्रवाली लियोंको भला ऐसा कौन पुरुष है जो सरल कर.सके.
अनित्यानुप्रताः। भावार्थ-स्त्रियोंका हृदय कृटिलतारूपी लहरोंसे लबालब भरा हुआ.है तिसपर वह कुटिलता इतनी भरी, हुई है कि हंदियों न समा सकनेके कारण वचन, मोह, नेत्र, गमन, केश आदि सबमें भर गई है जोकि लोगोंको प्रत्यक्ष दिखाई देती है। ऐसी स्त्रियोंको भला कौन सरल कर सकता है अथवा उनसे फौन सुखी हो सकता है ? कोई नहीं। इसीलिये ऐसी इन कुटिल स्त्रियों से अलग रहना ही अच्छा है इसीमें मनुष्यका सुनवाहित है। संहारबद्धकवलस्य यमस्य लोके कः पश्यतोहराविधेरवधि प्रयातः। यस्माजगत्रयपुरीपरमेश्वरोऽपि । तत्राहितोद्यमगुणे विधुरावधानः ॥६॥ अर्थ-यह यमराज जीवोंका संहार करने के लिये उन्हें खाने के लिये अपनी पांचों अंगुली पिलाकर गस्सा बनाये सदा तैयार बैठा रहता है इसके सिवाय उसने सुनारके समान देखते देखते चुराने का काम प्रारम्भ कर रक्खा है। यह देखते देखते रक्षा करते करते जीवोंको उठा ले जाता है ऐसे इस यमराजकी सीमा तकः भला कौन पुरुष इस संसारमें पहुंच सकता है कोई नहीं। क्योंकि जिस समय यह यमराज अपना उत्साह गुण प्रगट करता है, तैयार होता है, उस समय तीनों लोक स्वामी भगवान तीर्थंकर परमदेवको प्रयत्न भी निष्फल हो जाता है।
८ द्वादशातुप्रेक्षा भावार्थ- इस संसार में कोई भी जीव यमराजकी सीमाके वाहर नहीं जा सकता यहां तककि तीयकर- परमदेव भी इससे नहीं बच सकते, इसके सामने सबको अपना मस्तक झुकाना पड़ता है और चुपचाप इसके साथ हो लेना पड़ता है। यहां पर इतना और समझ लेना चाहिये कि भायु कर्म का अन्त होना ही यमराज कहलाता है । यमराज कोई और देव वा राक्षस नहीं है । आयुके अन्त होने पर सबको पर्या- यांतर होना ही पड़ता है ।।६।। इत्यं क्षणक्षयहुताशमुखे पतन्ति वस्तूनि वीक्ष्य परितः सुकृती यतात्मा। तत्कर्म किंचिदनुसतुमयं यतेत यस्मिन्नसौ नयनगोचरतां न याति ॥७॥ अर्थ-इस प्रकार पहिले कहे अनुसार संसारके यौवन शरीर आदि समस्त पदार्थों को चारों ओरसे यमराज रूपी प्रलयकालकी अनिमें पड़ते हुए देखकर हेय और उपादेयका विवेक रखनेवाले प्रमादरहित पुरुषोंको कोई भी अनिवर्च- नीय (जो वचनसे न कहा जा सके अथवा जिसे योगी ही जान सके) ऐसे काम . करनेका प्रयत्न करना चाहिये कि.जिसके करनेसे यह यमराज फिर कभी भी दिखाई न दे। भावार्य-पहिले दिखला चुके हैं कि संसारके समस्त पदार्थ अनित्य है नित्य वा सदा रहनेवाला कोई भी पदार्थ मशरणानुप्रेक्षा। नहीं है । येड़ो समझकर युद्धिपानोंको पोक्ष प्राप्त करनेका प्रयत्न करना चाहिये निससे कि भनित्य पदार्थोके नाश होनेपर भी इसे कभी किसी प्रकारका दुःख प्राप्त न हो । भावार्य-पहिले दिखला चुके हैं कि संसारके समस्त पदार्थ भनित्य हैं नित्य व सदा रहनेवाला कोई भी पदार्य नहीं है यही समझकर बुद्धिमानोंको मोक्ष प्राप्त करनेका प्रयत्न करना चाहिये जिससे कि अनित्य पदार्थोंके नाश होने पर भी इसे कभी किसी प्रकारका दुःख प्राप्त न हो ।। ७ ॥ इति अनित्यानुप्रेक्षा। 2999cceo. . दचोदयेथीनचये हृदये स्वकार्ये सर्वः समाहितमतिः पुरतः समास्ते । जाते त्वंपायसमयेऽम्बुपतौ पतत्रेः पोतादिव द्रुतवतः शरणं न तेऽस्ति ॥८॥ अर्थ-हे जीव ! देख जिस समय तैरे बहुतसे धनका उदय होता है-पुण्यके उदयसे बहुतसा धन होता है और अन्य जीवोंके हृदयमें उस धनसे कुछ काम लेनेकी इच्छा होती है उस समय संसारके सब प्राणी तेरे सामने सेवकके समान सावधान होकर बैठते हैं । अर्थात् सब तेरी सेवा करते हैं परन्तु जब मृत्युका समय मा उपस्थित होता है तब कोई भी प्राणी तेरी रक्षा नहीं कर सकता । जिस प्रकार १० द्वादशानुप्रेक्षा। कि समुद्र में वेगसे जाते हुए जहाजसे छूटे हुए पक्षीकी कोई रक्षा नहीं कर सकता। भावार्थ-जिस प्रकार किसी वेगसे जाते हुए जहाजसे कोई पक्षी उह जाय और जहाजके आगे निकल जाने पर वह छूट जाय तो उसके लिये फिर कोई शरण नहीं है उडते उडते थककर अन्तमें उसे वहीं उसी समुद्रमें डूबकर मरना पड़ता है उसी प्रकार मृत्यु के बाजाने पर इस जीवको भी मरना ही पटता है उस समय कोई भी इसकी रक्षा नहीं कर सकता। बन्धुवजैः सुभटकोटिमिरासवर्ग- मंत्रास्त्रतंत्रविधिभिः परिरक्ष्यमाणः । जंतुर्बलादधिबलोऽपि कृतांतदृतै- रानीयते यमवशाय वराक एकः॥९॥ अर्थ-चाहे.अनेक कुटुम्बी लोग इसकी रक्षा करते हों, चाहे सहस्रमट लक्षमट कोटीभट आदि करोडों योद्धा इसकी रक्षा करते हों, चाहे पिता, मता, मन्त्री, पुरोहित, गुरु, उपा. ध्याय आदि. बडे पुरुष इनकी रक्षा करते हों, और चाहे. मन्त्र यन्त्र मादिकी विधिसे खोंसे तलवार आदि शस्त्रोसे और घेर कर खडी हुई चारों प्रकारकी सेनासे इसकी रक्षा की जाती हो तथा चाहें यह जीव सर्व सेनासे भी अधिक .
. अशरणानुप्रेक्षा। पराक्रमी हो तथापि यमराजके दूत इस असहाय-अकेले मुद्र जीवको यमराजके आधीन करनेकेलिये ले हो जाते हैं। भावार्थ-यह जीव चाहे जितना बलवान हो और चाहे जितनी तरहसे इसकी रक्षा की जाती हो तथापि इसे यमराज के आधीन होना ही पड़ता है-मरना ही पड़ता है उस समय कोई भी इसकी रक्षा नहीं कर सकता। संसीदतस्तव न जातु समस्ति शास्ता त्वचः परः परमवाससमग्रबोधेः। तस्यां स्थिते त्वयि यतो दुरितोपताप । सेनेयमेव सुविध विधुराश्रया स्यात् ॥१०॥ धर्थ-हे सम्यक चरित्रको धारण करनेवाले प्रात्मा तू जो इस संसारमें दुखी हो रहा है सो उस दुःखसे बचानेके लिये तेरी रक्षा करनेवाला वास्तवमें अन्य कोई नहीं है पूर्ण सम्यग्दर्शन सम्पज्ञान सम्यग्चरित्रको धारण करनेवाला तु ही अपना रक्षक है । क्योंकि जिससमय तु सम्यग्दर्शन सम्य-. झान सम्पकचारित्ररूप रत्नत्रयको धारण करेगा. उससमय यह पाप और संतापोंकी सेना निराश्रय हो जायगी अर्थात् पर जायगी। भावार्य-यदि तुझे यमराजसे अपनी रक्षा करनी है-जन्म मरणके दुखोंसे बचना है तो तु रत्नत्रयको धारण कर । रत्नत्रयको धारण कर ही तू अपने आप अपनी रक्षा कर ।
१२ द्वादशानुप्रेक्षा। सकता है और सब तरहके पाप और संतापोंसे बच सकता है अन्यथा नहीं। इति अशरणानुप्रेक्षा। कार्पितं क्रमगतिः पुरुषः शरीर- मेकं त्यजत्यपरमाभजते भवाब्धौ । शैलूपयोषिदिवं संसृतरेनमेषा नाना विडम्बयति चित्रकरैः प्रपंचैः॥ ११ ॥ पर्थ-संसाररूपी . समुद्र में यह जीव एक: गतिको छोडकर दूसरी गति धारण करता है और दूसरीको छोड कर तीसरी गति धारण करता है. इस प्रकार परिभ्रमण करता हुआ यह जीव कोके द्वारा प्राप्त हुए एक शरीरको छोडता है, दूसरा शरीर धारण करता है और फिर दुसरेको छोडकर तीसरा धारण करता है इस प्रकार यह जीव इस संसाररूपी समुद्रमें सदा परिभ्रमण किया करता है। यह प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला संसार, नटीके समान है जो समस्त लोगोंको चित्ता और पाश्चर्य उत्पन्न करनेवाले अनेक मेषोंसे इस प्रात्माको चिडचित किया करता है। भावार्थ-यह जीव इस संसाररूपी समुद्रमें सदा परि- भ्रमण किया करता है और अनेक गतियों में अनेक प्रकारके ..
१
संसारानुप्रेक्षा।
१३,
शरीर धारण किया करता है जिस मकार नटी अपने अनेक.
रूप बनाकर लोगों को इसाती है उसी प्रकार यह आत्मा
अपने अनेक रूप बनाकर अपनी विडंबना किया करता है।
दैवाद्धनेष्वषिगतेषु पटुन कायः
काये पटीन पुनरायुरवातविनं।
इत्थं परस्परहतात्मभिरात्मधर्मे--
लोक सुदुःखयति जन्मकरः प्रबन्धः ।।
भर्थ-कदाचित शुभ कर्मके उदयसे धन प्राप्त हो जाय तो
शरीर उपम वानीरोग नहीं रहता, कदाचित् शुभ कर्मके
उदयसे शरीर नीरोग मिलनाय तो धनसे परिपूर्ण आयुकी
प्राप्ति नहीं होती। इस प्रकार परस्पर एक दुसरेके स्वभावको
नाश करनेवाले अपने अपने स्वभावोंसे यह जन्म मरण
उत्पन्न करनेवाला प्रकृति स्थिति अनुभाग और प्रदेशरूप
चारों प्रकारका काँका बंध संसारी जीवोंको अत्यन्त दुःख
दिया करता है।
भावार्य-संसारी जीवोंको दुःख देनेगला कर्माका
बंध ही है, उसका स्वभाव ही दुःख देना है इसलिये वहः
अपने स्वभावोंसे सदा जीवोंको दुःख दिया करता है। पर:
उसका स्वभाव सदा एकसा, नहीं रहता यदि किसी एक
शुभ कर्मका. उदय होता है तो उसी समय दूसरे अशुभः
.
१४ + द्वादशानुप्रेक्षा। कर्मका ऐसा उदय होता है जिससे उस शुभ . कर्मका उदय भी वेकार हो जाता है जैसे शुभ कर्मके उदयसे धन तो मिल गया परन्तु अशुभ कर्मके उदयसे शरीर नीरोग नहीं रहने के कारण उस घनसे सुख नहीं भोग सकता । यदि अन्य शुभ कर्मोके उदयसे शरीर नीरोग होजाय तो इतने में आयु समाप्त हो जाती है या धन नष्ट हो जाता है अभिप्राय यह है कि किसी शुभ कर्मका उदय होते हुए भी अन्य अशुभ कर्मोंका उदय उसे. बेकार बना देता है और इस प्रकार वह जीवोंको सदा दुःखीही बनाये रखता है इसलिए -संसारमें कोई भी जीव सुखी नहीं है सबंदुःखी ही दुःखी हैं। आस्तां भवान्तरविधौ सुविपर्ययोय- मत्रैव जन्मनि नृणामघरोंचभावः। अल्पः पृथुः पृथुरपि क्षणतोऽल्प एवं स्वामी भवत्यनुचरः स तत्पदाईः॥ अर्थ--यह प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला विपर्यय दूसरा जन्म धारण करनेके कारण होता है यह बात तो अलंग ही रहे ऐसा होने में कोई भाश्चर्यकी बात नहीं हैं परन्तु मनु प्योंके ऊंच नीच भाव इसी जन्ममें बदल जाते हैं । भाजजो -दरिद्र है कल वही धनी हो जाता है। जो धनी है वह क्षण मरमें ही दरिद्री होनाता है। आज जो स्वामी है वह सेनके संसारानुप्रेता। १५ हो जाता है और आज जो सेवक है वह दसेरे ही दिन स्वामी धन जाता है। भावार्थ--यह ऊपर लिखी उलट पलट इसी जन्ममें प्रत्यक्ष दिखाई देती है फिर भला जन्मान्तरमें ऐसी उलट पलट होने में तो कोई भाचर्य हो नहीं है। वैचित्र्यमित्यमनुभूय. भवाम्बुराशे-- रातकबाडवविडम्बितजन्तुबारे। को नाम जन्मविषपादपपुष्पकल्पः स्वं मोहयेन्मृगदृशां कृतधीः कटाक्षः॥१४॥ अर्थ-शीघ्र ही प्राणोंको हरण करनेवाली ध्याधियों को भातक कहते हैं इस संसार में ऐसी अनेक व्याधियां भरी हुई हैं उन व्याधिरूपी बडवानल मग्निके द्वारा इस असार समुद्र में भरा हुआ प्राणियोंका समूहरूपी जल बार बार कदार्थित किया जाता है अर्थात उन व्याधियोंके द्वारा ये संसारके प्राणी बार बार दुःखी किये जाते हैं ऐसे इस संसाररूपी समुद्र में ऊपर लिखे अनुसार आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली अनेक प्रकारको दवाभोंका अनुभव करता हुमा ऐसा कौन विवेकी पुरुष है जो संसाररूपी विषक्षोंके पुष्पोंके समान लियोंके कटाक्षोंसे मोहित होजाय ? भावार्थ--पह संसार षिक्षके समान है क्योंकि जिस प्रकार विपक्ष . दुःख देनेवाला है उसी प्रकार यह -- द्वादशानुप्रेक्षा। संसार मी प्राणीमात्रको दुःख देनेवाला है। तया हिरणके. नेत्रों के समान सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियोंके कटाक्ष उन विष: वृक्षोंके फूलोंके समान है क्योंकि जिस प्रकार उन विषक्षके -फूलोंको सूंघकर मनुष्य मोहित वा : बेहोश होजाता है उसी मकार इन स्त्रियों के कटाक्षोंसे भी यह मनुष्य मोहित होजाता है सप्त समय यह अपने पापको सर्वथा भूल जाता है। इसलिये आचार्य कहते हैं कि जिन्हें हेय उपादेयका ज्ञान है जो समझते हैं कि हमारे लिये यह हित है यह अहित है तथा जो बार बार सदा दुःख देनेवाले इस संसारका स्वरूप समझते हैं. और इस संसारमें होनेवाली आत्माकी अनेक दुःखमयी अवस्थाओंका अनुभव करते हैं उन्हें त्रियोंके विय- मय कटाशोंसे कभी मोहित नहीं होना चाहिये। उन्हें तो इस संसारसे अलग रहकर-इस संसारको छोड़कर अपने आत्माके निज स्वभावका चितवन करना चाहिये। इति संसारानुप्रेक्षा। :: एकस्त्वमाविशसि जन्मनि संक्षये च भोक्तुं स्वयं स्वकृतकर्मफलानुबन्धम् अन्योन जातु सुखदुःखावधौ सहायः स्वाजीवनाय मिलितं विटंपेटकं ते ॥ १५॥ -
पकत्वानुप्रेक्षा।
अर्थ है जीव! तूने जो अपने पाप कर्म किये हैं।
उनका सुख दुःखरूपो फल भोगनेके लिये तू अकेला ही
अपने आप जन्म लेता है और अकेला ही अपने भाप मरण
करता है। तेरे इस सुख दुःखमें अन्य कोई सहायक नहीं
होता इन कुटुंबियों में से भी तेरा कोई सहायी नहीं होता ये
तो केवल अपनी आजीविकाकेलिये ही अपना जीवन विताने
केलिये ही सब शत्रु मिलकर इकट्ठे हुये हैं। भावार्थ-स्वयं
कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते । स्वयं भ्रमति संसारे
स्वयं तस्माद्विमुच्यते । अर्थात्-यह जीवं अपने पाप अच्छे
बुरे कर्म करता है अपने आप उनका सुख दुःख फल भोगता
है नपने आप संसारमें परिभ्रमण करता है और अपने
आप उससे छूटकर मुक्त होता है । इस प्रकार यह जीव
अपने आप कर्म करता है और अपने आप उनका फल.
भोगता है उनके फल भोगनेके लिये ही यह अकेला ही
जन्म लेता है और अकेला ही परता है। इसमें कोई दूसरा
सहायक नहीं होता। लोग कुटवियोंको सहायक समझते हैं।
परन्तु वास्तवमें वे सहायक नहीं हैं वे तो इसके शत्रु हैं जो
केवल अपना पेट भरनेके लिये इससे अनेक प्रकारके पाप
उत्पन्न कराते हैं यदि कुटम्ब न हो तो यह किसके लिये
पाप करे। भले ही यह पाप दूसरों के लिये करे परन्तु उसका
फल उसे अकेले ही भोगना पडता है क्योंकि वह पाप उसने
अकेले ही तो किया है।
द्वादशानुप्रेक्षा। वाह्यः परिग्रहविधिस्तव दूरमास्तां देहोयमेति न समं सहसंभवोऽपि । किं ताम्यसि त्वमनिशं क्षणदृष्टनष्टै- दारात्मजद्रविणमन्दिरमोहपाशैः॥१६॥ अर्थ-हे जीव ! स्त्री पुत्र मित्र भादि तेरे नाहरके पदार्थ वो दूर ही रहो यह तेरे साथ उत्पन्न होनेवाला शरीर भी तेरे साथ नहीं जाता। इसलिए हे जीव ! क्षणभरमें दिखाई देनेवाले और दूसरे हो क्षणमें नष्ट होनेवाले इन स्त्री, पुत्र, धन, घर प्रादिके मोहरूपी बन्धनोंसे तू अपने प्रात्माको निरन्तर क्यों बांधुता रहता है। भावार्थ-खी पुत्र धन घर भादि वाह्य पदार्थोंमें मोह वा ममत्व करनेसे केवल कौका बघ होता है क्योंकि इनमेंसे कोई साथ तो जाता नहीं यहां तक कि साथ उत्पन्न होनेवाला शरीर भी साथ नहीं जाता इस जीवने जैसा पुण्य पाप किया है उसके अनुसार इसे अकेला ही जाना पड़ता है अकेला ही सुख. दुःख भोगना पडता है इसलिये वाह्य पदार्थोंसे ममत्व करनेमें सिवाय हानि के कोई किसी प्रकारका लाभ नहीं है। अतएव जीवोंको चाहिए कि धीरे २ अभ्यास करते हुए बाहरके सब पदा- यौका ममत्व छोड दें, केवल अपने आत्मासे ममत्व करे जिससे अपना कल्याण हो। संशोच्य शोकविवशो दिवसं तमेक- मन्येयुरादरपरः स्वजनस्तवार्थे ।
संसारानुप्रेक्षा। १६ कायोपि भस्म भवति प्रचयाचिताग्नेः संसारयन्त्रपटिकाघटने त्वमेकः ॥१७॥ अर्थ-हे जीव ! तु विचार तो कर कि जिस दिन तु मरता है केवल उसी दिन शोकसे विवश होकर तेरे कुट- बके लोग शोक करते हैं दूसरे दिन तो पे तेरा धन बाटने में लग जाते हैं और यह तेरा शरीर जलती हुई चिताकी 'अग्निमें भस्म हो जाता है इसप्रकार सब लोग तुझसे अलग हो जाते हैं इस संसाररूपी मरहटकी घडीको चलाने के लिए तुझे अकेला ही जुतना पडता है । भावार्थ-तेरे मरनेके पीछे कुटुंबी लोग जो शोक करते हैं वह तेरे लिए नहीं करते, किंतु तेरे मरनेसे उनका स्वार्थ नष्ट होता है इसलिये शोक करते हैं यदि वह शोक तेरे लिये होता तो कुछ देरतक तो ठहरता परन्तु वह तो दूसरे दिन या उसी दिन तेरा धन बांटनेमें परिणत हो जाता है। इसलिये ऐसे कुंटुम्बके लिये तो मोड करना व्यर्थ ही है । अंब रहा शरीर सो भी 'अग्निमें जल जाता है इसलिये इसके लिये भी मोह करना व्यर्थ है । इनके मोह कानेसे ही तुझे इस संसारमें परिभ्रमण करना पडता है । और अकेले ही अनेक प्रकारके दुःख भो. गने पड़ते हैं । इसलिये हे जीव! तू इन सबसे मोह छोटकर आत्मामें लीन हो जिससे तेरा संसारका दुःख दूर हो और तुझे आमसुखकी प्राप्ति हो।
द्वादशानुप्रेक्षा। एष स्वयं तमचलैननु कर्मजाले- लूतेव वेष्टयति नष्टमतिः स्वमेका पुण्यात्पुनः प्रशमतंतुकृतावलम्ब- स्तद्धाम धावति विधूतसमस्तवाधम् ॥१८॥ अर्थ---यह निर्वृद्धि - विवेकरहित जीव मकडीके समान अकेला ही अपने आप अपने आत्माको वजलेप के समान कौके समूहोंसे बांध लेता है। तदनन्तर किसी समय पुण्य कर्मके उदयसे कर्मोंके उपनम होनेरूप तंतुओंका सहारा लेकर समस्त बाधाओंसे रहित ऐसे - मोक्ष स्थानमें जा विराजमान होता है। भावार्य-जिसप्रकार मकडी अपने आप अपनेको बांध लेती है उसीप्रकार हेयोपादेय बुद्धिसे रहित यह प्रात्मा भी अपने भाप कर्मोके समूहसे पन्ध जाता है और अनेक प्रकारके दुःख भोगता रहता है । कदाचित, पुण्य कर्मोका उदय होनेसे कुछ कर्मोंका उपशम होता है जिससे इसका स्वभाव प्रगट होता है और निज स्वभाव प्रगट होनेसे हेयोपादेयका ज्ञान वा स्वपर विवेक प्रगट होता हैं। उसीसे यह जीव सब तरह के दुःखोंसे रहित ऐसे मोक्ष स्थानमें जा विराजमान होता है । इसलिये इस जीवको सदा पुण्य कर्म करते रहना चाहिये जिससे अशुभ काँका उपशम वा नाश हो, स्वपर विवेक प्रगट हो और पूर्ण सुख- मय मोक्ष प्राप्त हो। इति एकत्याचप्रेक्षा। ..
२१ पृथक्त्वानुप्रेक्षा। देहात्मकोऽहमिति चेतसि माकृथास्त्वं त्वचो यतोऽस्य वपुषः परमो विवेकः । खं धर्मशर्मवसतिः परितोऽवसायः कायः पुनर्जडतया गतीनिकायः ॥१९॥ अर्य-हे जीव ! हे आत्मा! तू अपने हृदयमें ऐसा संकल्प मत कर कि मैं देवरूप हूँ शरीरमय है क्योंकि तुझ में और इस शरीरमें तो बडा भारी अन्तर है यह शरीर जो तुझसे सर्वथा अलग है और इसका भी कारण यह है कि तु अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त वीर्य, और अनन्त सुख रूप चैतन्य धर्मोका तथा परमानन्दरूप आत्मसुखका निवास स्थान है और संगि चेतना स्वभाव है परन्तु यह शरीर जह होनेके कारण ज्ञान दर्शनसे रहित अचेतन है। भावार्य हे आत्मन् ? तु चैतन्य स्वरूप है और शरीर जह है अचेतन है इसलिये तु शरीरसे सर्वथा भिन्न है यही भावना सर्वदा करता रह। आसीदति खयि सति प्रतनोति कायः : क्रांत तिरोभवति भूपवनादिरूपैः । भूतात्मकस्य मृतवन्न सुखादिभाव- स्तस्मात्कृती करणतः पृथगेव जीवः ॥२०॥ ... अर्थ-हे आत्मन् ! तेरे रहते हुए ही यह शरीर स्थिर
ર
द्वादशानुप्रेक्षा।
रहता है और तेरे रहते हुये ही बढता है । जब तू इसमेंसे
निकल जाता है तो फिर उसी समय यह शरीर पृथ्वी मल
अग्नि वायु रूपमें परिणत हो जाता है । यह धरीर पृथ्वी
जल अग्नि और वायुरूप है इसकारण मरे हुएशरीरके समान
इसे सुख दुख आदिका अनुभव कभी नहीं होता है यह अनु-
भव केवल मात्माको ही होता है इसलिये मानना चाहिये
कि यह पुण्यवान आत्मा शरीरसे सर्वया भिन्न ही है। भावार्थ-
जिसप्रकार मृतक शरीरको सुख दुखका अनुभव नहीं होता
क्योंकि वह जड है उसमेंसे आत्मा निकल गया है इससे
सिद्ध होता है कि सुख दुखका अनुभव केवल आत्माको
ही होता है शरीरको नहीं। यदि शरीरको सुख दुःख होता
है तो मृतक शरीरको भी होना चाहिये परन्तु मृतक शरीर
को होता नहीं इसलिये वह अनुभव केवल आत्माको ही हो
होता है । इसप्रकार सिद्ध होता है कि आत्मा शरीरसे
सर्वधा भिन्न है ! प्रात्मा चेतनरूप है ज्ञान दर्शनमय है और
शरीर जड है । इससे भी आत्माकी शरीरसे बिल्कुल भिन्नता
सिद्ध होती है।
सानन्दमव्ययमनादिमनन्तशक्ति-
मुद्यातिनं निरुपलेपगुणं प्रकृत्या।
कृत्वा जडाश्रयमिमं पुरुषं समृद्धाः
सन्तापयन्ति रसवदुरिताग्नयोऽमी ॥२१॥
२३ पृथक्त्वानुप्रेक्षा। अर्थ-यह स्वानुभूतिसे प्रत्यक्ष होनेवाला आत्मा अनन्त सुखसे विराजमान है इसकी कमी मृत्यु वा नाश नहीं होता, यह आदिरहित है अनादिसे ज्योंका त्यों चला आ रहा है, केवलज्ञान केवल दर्शनके द्वारा यह अनन्त पदार्थोके स्वरूपको यहण करता इसलिये यह अनन्त शक्तिवाला है, लोक अलोक दोनोंके स्वरूपको प्रभावित करने वाला है और निश्चयनयसे कर्ममल कलंकसे रहित है ऐसे इस आत्मा को पारेके समान शरीर आश्रय (पारेके पक्षमें, गन्धक वा सीसाका आश्रय लेकर ) बनाकर यह जलती हुई पापरूप चा कर्मरूप अग्नि सदा सन्तप्त करती रहती है। भावार्य- जिसप्रकार अग्नि पारेको गन्धक वा सीसामें मिलाकर संतप्त करती है वह अकेले पारेको नहीं जला सकती उसीप्रकार यह कर्मरूपी अग्नि शरीरसहित आत्माको जलाती है वह अशरीर आत्माको कभी नहीं जला सकती इससे सिद्ध होता है कि यह प्रात्मा शरीरसे सर्वथा भिन्न है और इस प्रात्मा को दुःख देनेवाला यह शरीर ही है। यदि शरीर न हो तो यह आत्या कमी दुखी नहीं हो सकता इसलिये इस आत्माको सबसे भिन्न समझकर सपसे ममत्व छोड देना चाहिये। कर्मासवानुभवनात्पुरुषः परोऽपि प्राप्नोति पातमशुभासुं भवावनीषु । तस्मात्योः परमभेदविदो विदग्धाः 'द्वादशानुप्रेक्षा! श्रेयस्तदा दधतु यत्रन जन्मयोगः ॥२२॥ अर्थ-यद्यपि यह प्रात्मा सबसे उत्तम है तथापि कर्म- रूपी मयके सेवन करनेसे चांडालादिक अत्यंत अपवित्र और पापरूप अशुभ योनियोंमें गिर पडता है। इसलिये शरीर और मात्मामें अत्यन्त भेद समझनेवाले भात्माको शरीरसे सर्वथा भिन्न माननेवाले और हेय उपादेयका ज्ञान रखने वाले चतुर पुरुषों को अपनी आत्माका ऐसा कल्याण करना चाहिये कि जिससे फिर कभी भी जन्म न धारण करना पडे । भावार्थ-जिसप्रकार उत्तम पुरुष भी मयके सेवन करनेसे अपवित्र और प्रशमस्थानों में गिरते पडते रहते हैं उसी प्रकार यह आत्मा सर्वोत्तम होनेपर भी केवल क के संबंधसे चांडाल वा नरक आदि पापरूप अशुभ योनियों में शरीर धारण करता रहता है। लिखा भी है-"कर्मकोद्रवरसेन हि. पत्तः किकिमेत्यशुभ धाम न जीवः" अर्थात् कर्मरूपी कोदोंके रससे उन्मत्त हुआ यह जीव कौन कौनसे . अशुभ स्थानों में उत्पन्न नहीं होता है, भावार्थ-उसे सव ही अशुभ स्थानोंमें उत्पन्न होना पडता है । इसलिये आत्माको शरीर और कर्म सबसे भिन्न समझना चाहिये । लिखा भी है "क्षीर- नीरवदेवत्र स्थितयोहदेहिनोः । भेदो यदि.ततोऽन्यत्र कल. प्रादिषु का कया" अर्थात् यद्यपि यह आत्मा और शरीर द्ध पानीके समान मिलकर एकरूप हो रहा है तथापि वह शरीर मे नया भिन्न है जब वह अपने साथ मिलकर एकरूप होने प्रशुचित्वानुप्रेक्षा। २५ वाले शरीरसे ही भिन्न है तब फिर वह आत्मा सर्वथा जुदे दिखाई देनेवाले स्त्री पुत्र प्रादिकसे तो भिन्न है ही इसमें कोई संदेह नहीं है। यही समझकर सबसे ममत्व छोड तपश्चरण करना चाहिये जिससे कि सब कर्म नष्ट होकर आत्मा मुक्त हो जाय और फिर इसे जन्म मरणके दुःख कभी न भोगने पडें ॥ २२॥ इति पृथक्त्वानुप्रेक्षा। wrmudae आधीयते यदिह वस्तु गुणाय कांतं काये तदेव मुहुरेत्यपवित्रभाव। छायाप्रतारितमतिर्मलरंधूबन्धं किं जीव ! लालयसि भंगुरमेतदंगम् ॥२३॥ अर्थ-हे जीव! इस शरीरको सुगंधित वा सुशोभित बनानेके लिये इसपर कपूर चंदन केशर श्रादि जो जो अत्यंत मनोहर पदार्थ लगाये जाते हैं वे पदार्थ उसीसमय अत्यंत अपवित्र हो जाते हैं यह शरीर इतना अपवित्र है फिर भी तेरी बुद्धि हलके गोरे वा श्याम 'चमडेको देखकर ठगाईमें आ जाती है.इसीलिये तो तु. अपने पाप अवश्य नष्ट होने गले और मल मूत्र मादि अत्यन्त अपवित्र पदार्थोके निक- खनेकी मोरियोंका समुदायरूप इस शरीरको पालन पोषण करता है परन्तु इसका पालन पोषण करना सरासर तेरी २६ द्वादशानुप्रेक्षा। भूल है । भावार्थ-यह शरीर इतना अपवित्र है कि चन्दन केशर अदि अत्यंत पवित्र पदार्थ भी इसके सम्बंघसे अपवित्र अत्यंत अपवित्र हो जाते हैं इसके सिवाय यह मल मूत्र आदिकी मोरियोंका समुदाय है इसके नाक कान मुंह आदि उत्तम माने जानेवाले स्थानोंसे मी कफ आदि अपवित्र पदार्थ ही निकलते हैं यहां तककि इसके रोम रोममेसे अपवित्र पसीना निकलता है और फिर भी यह ठहरता नहीं अपने आप नष्ट हो जाता है फिर भी यह जीव इससे ममत्व करता है इसका पालन पोषण करता है यह रडे आश्चर्यको बात है ॥ २३॥ योषिद्धिराहतकरं कृतमंडनश्री- यः कामचामररुचिस्तव केशपाशः। सोऽयं त्वयि श्रवणगोचरतां प्रयाते घेतावनीषु वनवायसवासगोऽभूत् ॥२४॥ अर्थ-हे जीव ! देख तो यह जो तेरा केशोंका समूह काम देवके चपरोंकी शोभा धारण करता है और कोमल करकमलों- बाली सुंदर स्त्रियोंने बडे श्रादरके साथ सुगंधित तेल लगा कर तथा चम्पा चमेली वेला आदिके फूलोंसे सजाकर जिस की शोभा बढाई है वही केशोंका समूह तेरे मर जानेपर श्मशानमें पड़ा हुआ काले कौओंका भोजन बन जाता है। भावार्थ-इस शरीरकी यही दशा है, जबतक इससे ममत्व १ अशुचित्वानुप्रेक्षा। है तब तक इसके प्रत्येक अंगकी शोभा बढाई जाती है परन्तु मरनेके बाद ही यह सड़ने लगता है फिर यह क्षण भर मी पहिलेकी अवस्था में नहीं ठहर सकता । बीज जो सुन्दर जान पडता है कल वही मरनेपर भयानक दिखाई देता है आज जिसे वस्त्राभूषणोंसे सजाते हैं और देख देख प्रसन्न होते हैं कल मरनेपर वही जला दिया जाता है गाह दिया जाता है सड़ जाता है या उसे चील कौए खा जाते हैं, शरीरका यह स्वभाव ही है वह कमी छूट नहीं सकता ॥ २४ ॥ अन्तर्वहिर्यदि भवेद्वपुषः शरीरं दैवाचदानुभवनं ननु दुरमास्ताम् । कौतूहलादपि यदीक्षितुमुत्सहेत कुर्याचदाभिरतिमत्र भवाशरीरे ॥२५॥ अर्थ-- हे जीव ! देख तो ( जिस शरीर पर तू रीझता है या उसका पालन पोषण करता है) उस शरीर का भीतरी भाग यदि दैवयोगसे भी अकस्मात् बाहर हो जाय तो फिर उसका अनुभव करना, उसपर रोमना तो बहुत दूर रहा यदि उस समय उसपर कौतुहलसे भी ष्टि पड जाय तो उसीसमय उसी शरीरके सामने तेरा मरण हो जाय । भावार्थ-इस शरीरके भीतर अत्यन्त घृणित पदार्थ भरे हुए हैं वे सब बाहरके चमडेसे ढके हुए हैं यदि शरीरका भाग उलट दिया जाय, चमडा भीतर कर दिया जाय तो + २८ द्वादशानुप्रेक्षा। फिर उसकी ओर कोई आंख उठगकर भी नहीं देख सकता शरीर ऐसाही अपवित्र और घृणितस्वभाव है ॥२१॥ तस्मानिसर्गमलिनादपि लब्धतत्त्वाः कीनाशकलिमनवाप्तधियोऽचिराय । कायादतः किमपि तत्फलमर्जयन्तु यस्मादनन्तसुखसस्याविभूतिरेषा ॥२६॥ अर्थ-इसलिये हेय उपादेयका विवेक रखनेवाले 'पुरुषोंको मृत्यु होनेके पहिले पहिले वहुत शीघ्र इस स्वभाव से ही अपवित्र और घृणित शरीरसे भी कोई ऐसा अनिर्व- चनीय लाभ उठालेना चाहिये जिससे कि अनन्त सुखरूपी ऐश्वर्य प्राप्त हो जाय । भावार्थ-यह शरीर स्वभावसे ही अपवित्र और घृणित तो है ही तिसपर भी यह अपने आप 'अवश्य ही नष्ट होजाता है इसलिये बुद्धिमानोंको चाहिये कि ऐसे इस शरीरको पाकर तपश्चरण करे जिससे मोक्षकी प्राप्ति हो और फिर कभी भी ऐसा अपवित्र और घृणित शरीर धारण न करना पडे ॥ २६ ॥ इति अशुचित्वानुप्रेक्षा। अन्तःकषायकलुषोऽशुभयोगसंगा- स्कमाण्युपार्जयसि बन्धनिबन्धनानि ।
भावानुप्रेक्षा। रज्जूः करेणुवशगः करटी यथैता- स्त्वं जीव मुंच तदिमानि दुरीहितानि ॥ अर्थ हे जीव ! देख । जिस प्रकार हाथी हथिनी के साथ लंपटता धारण कर राजा महाराजाओंकी बडी बडी जंजीरों से जकडा जाता है उसीप्रकार कोध मान माया आदि लोभ कषायोंसे अंतरंगमें मलिन होकर तू भी मन वचन कायके भशुभ योगोंके संबंधसे प्रकृति स्थिति अनुभाग प्रदेशरूप धके कारण ऐसे कर्मोको हर समय उत्पन्न करता रहता है और उनसे वंधता रहता है इसलिये. हे जीव ! अब तु इनपाए.' रूप कर्मोको छोड । भावार्थ-कषाय और योगोंके द्वारा इस जीवके प्रत्येक समय में कर्म आते रहते हैं जो कि अत्यन्त दुखके कारण हैं. इसलिये पाते हुए कर्मोको रोकना वा. मिथ्यात्व अविरति प्रमाद कपाय योग आदि प्रास्रवके . कारणों का हंटाना ही इस जीवको कल्याणकारी है। इनके . हटाने से ही यह जीव अत्यन्त सुख प्राप्त कर सकता है। संकल्पकल्पतरुसंश्रयणात्वदीयं . . चेतो निमजति मनोरथसागरेऽस्मिन् । तत्रार्थतस्तव चकास्तिन किंचनापि पक्षे परं भवसि कल्मषसंश्रयस्य ॥२०॥ अर्थ हे जीव.! " मैं यो : करूंगा यों करूंगा इस
३०
द्वादशानुप्रेक्षा।
प्रकार करनेसे मुझे यह मिल जायगा वह मिल जायगा"
इसप्रकारके संकल्परूपी कल्पक्षोंके प्राश्रयसे तेरा हृदय इस
मनोरथरूपी महासागरमें डूब रहा है। उसमें गोते खा रहा
है तू चाहता है कि जो मैं संकल्प करता हूं वह सब मुझे
मिल जायगा परन्तु वास्तव में देखा जाय तो उस संकल्पके
अनुसार धन धान्य स्त्री पुत्र आदि कुछ भी प्राप्त नहीं होता
है। हां ! उस संकल्पसे पापोंका भाव अवश्य होता है।
भावार्थ-इष्ट पदार्थोकी प्राप्ति तो पुण्य कमौके उदयके
आधीन है। वह संकल्प करने मात्रसे कभी नहीं मिल
सकती । ऐसे ऐसे संकल्प करनेसे तो केवल पाप कर्मोका
आश्रव होता है जो कि अंत में महादुख देता है इसलिये
ऐसे संकल्प करना सर्वयाछोड देना चाहिये । लिखा भी है-
दठूण परकलचं राग मा वहसि हिययमज्झम्मि।
पावेण पाच लिप्पसि पावं मावह सि त्वं च सुद्धो हि ॥१॥
अर्थात--परस्त्रीको देखकर तु अपने हृदयमें राग मत कर
कणे क पाप करनेसे तू पापोंसे लिप्त हो जायगा परन्तु
निश्चय नयसे तु शुद्ध है इसलिये तू पाप पत कर ।
सेयं विभूतिषु मनीषितसंश्रयाणां
चक्षुर्भवत्तव निजाचिषु मोघवाञ्छम् ।
पापागमाय परमेव भवेद्विमूढ
कामात्कुतः सुकृतदूरवतां हि तानि ॥२९॥
३१ आस्त्रवानुमेक्षा। अर्थ- हे जीव ! अपनी इच्छानुसार स्वर्गादिके सुख देनेवाले ऐश्वयोंमें ईया रखनेवाला और सदा फळकी इच्छा रखनेवाला यह तेरा हृदय अनेक पदार्थोकी श्राका- क्षाओंमें लगा रहता है परन्तु हृदयके इसप्रकार आकांक्षाओं में लगे रहनेसे केवल पापोंका ही आगमन होता है । अरे मूर्ख ! विचार तो कर कि पुरषहीन पुरुषोंके केवल इच्छा. करने मात्रसे सुख किस प्रकार मिल सकता है ? भावार्थ-सुखकी प्राप्ति पुण्य कर्मके उदयसे होती है, इच्छा करनेसे नहीं। यदि पुण्य कर्मका उदय है तो विना इच्छाओंके भी सुख की सामग्री-मिल जाती है और यदि पुण्य कर्मका उदय नहीं है तो वह लाख इच्छाएं करनेपर भी माप्त नहीं होती किंतु विना पुण्योदयके केवल इच्छा करनेमानसे पाप कोका भाव ही होता है । इसलिये इच्छायें करना दुखका कारण है। ऐसी इच्छाओंको रोकना ही भात्माका कल्याण करनेवाला है ।। २६ ॥ दौर्विध्यदग्धमनसोऽन्तरुपाचमुक्ते- श्चित्तं यथोल्लसति ते स्फुरितोचरंगम् । धाम्नि स्फुरेद्यदि तथा परमात्मसंज्ञ कौतस्कृती तव भवेतिफला प्रसूतिः॥३०॥ अर्थ-हे जोव निधनताके कारण तेरा हृदप भस्म हो रहा है और इसीलिये उसमें अनेक उत्कट मनोरय रूपी ૨૨ द्वादशानुप्रेक्षा। लहरें सदा लहरें मारा करती हैं और वह संकल्पपूर्वक भागो- पभोगोंके ग्रहण करनेकी सदा इच्छा किया करता है. परन्तु जितप्रकार वह भोगोपभागोंकी इच्छामें लगा रहता है उसी प्रकार यदि वह परमात्मारूपी ज्ञान ज्योतिके स्थानमें लगे रहनेकी चेष्टा करे तो फिर तेरा जन्म किसी प्रकार भी व्यर्थ. नहीं हो सकता । फिर तू अपना जन्म सर्वथा सफल ही समझ । भावार्थ-निर्धनताके कारण अनेक इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं और उन इच्छाओंसे अन्य अनेक पाप कर्माका आस्रव होता रहता है इसप्रकार यह जीव जिस सुखकी. सामग्रीको चाहता है वह उससे और दूर हटती जाती है । इसलिये श्राचार्य कहते हैं कि भाई ! इच्छा करनेसे कोई लाभः नहीं । यदि तुझे अपना हृदय लगाना ही है तो इच्छाओंमें : वा भोगोपभोगकी सामग्रीमें मत लगा, तू उसे परमात्मामें. लगा ! अपना हृदय परमात्मामें लगानेसे पुण्य कर्मकी माप्ति, होगी, पुण्यकर्मके उदयसे रत्नत्रयकी माप्ति होगी और रत्न- यसे अनन्त सुख प्राप्त होगा। इसप्रकार करनेसे यह तेरा जन्म सर्वथा सफल समझा जायगा। इति माखवाजुप्रेक्षा -10: आगच्छतोऽभिनवकार्मणरेणुराशे. जीवः करोति यदवस्खलनं वितन्द्रः ।
३ संवरानुप्रेक्षा। सत्त्वचामरधरैः प्रणिधानहस्तैः संतो विदुस्तमिह संवरमात्मनीनम् ॥३१॥ अर्थ-जिसप्रकार अपने घरमें कोई आता है और उसे हम रोकना चाहते हैं वो उसे हाथ हिलाकर रोक देते हैं उसीप्रकार नवीन कर्म बंधनेकेलिये जो प्रति समय पुद्गल परमाणुओंका समूह भाता है उसे यह यात्मा प्रमादरहित सावधान होकर भात्मतत्त्वरूपी चमरको धारण करनेवाले शुभ ध्यान रूपी हाथोंसे जो रोक देता है, नहीं आने देता है उसे सज्जन लोग संवर कहते हैं । इस संसार में यह संवर ही आत्माका हित करनेवाला है । भावार्थ-आते हुए कर्मोको रोकना ही संवर है । इस जीवके प्रति समयमें कर्म भाते रहते हैं जोकि अनेक प्रकारके दुःख दिया करते हैं वे कर्म मिध्यात्व अविरति प्रादि कारणोंसे ही आते हैं और गुप्ति समिति आदि शुभ ध्यानसे रुक जाते हैं। जब यह आत्मा गुप्ति समिति आदि शुभ ध्यानसे उन कर्मोको रोक देता है, नहीं आने देता तब वह उनके दुःखरूप फलोंसे भी बच जाता है इस प्रकार भी संवरसे प्रात्माका हित होता है। तथा नवीन कर्म जब भानेसे रुक जायगे और पहिले के कर्म प्रतिप्समय निर्जरित होवे रहेंगे तो किसी न किसी दिन अवश्य सब कर्म नष्ट हो जायगे और फिर यह प्रात्मा अनन्त सुखी होकर मोसमें जा विराजमान होगा इसप्रकार से भी संवर दी आत्माका हितकारी है। ३ द्वादशानुप्रेक्षा। यस्त्वांविचिन्तयति संचरते विचारै- श्वावी चिनोति परिमुंचति चंडभावं। चेतो निकुंचति समंचति वृत्तमुचैः स क्षेत्रनाथ विरुणद्धि कृतीरजांसि ॥३२॥ अर्थ-हे पात्मन् ! जो आत्मा अपने प्रात्माका ध्यान करता है, जो आत्मा अपने भेद बानके द्वारा अपने ही आत्मामें विहार करता है, जो आत्मा अपनी ज्ञानस्वरूप बुद्धिको फैलाता है, जो प्रात्मा कोषरूप उमभावोंका त्याग कर देता है, जो आत्मा विषय कपायोंमें जाते हुये मनको रोक लेता है और जो प्रात्मा उत्तम चारित्र धारण करता है वही पुण्यवान भामा आते हुए पाप कर्मोको रोक देता है, भावार्य-श्रात्माका ध्यान करना कषायोंका त्याग करना, स्वात्मानुभूतिको प्रकाशित कर उसे शुद्ध करना और उत्तम चारित्र धारण करना ही संवरके कारण हैं । इन्हींसे आते हुप कर्म रुकते हैं। नीरन्ध्रसंधिरवधीरितनीरपूरः पोतः सरित्पतिमुपैति यथानपायः । जीवस्तथा क्षपितपूर्वतमः प्रतानः क्षीणास्रवश्च परमं पदमाश्रयेत ॥ ३३ ॥ अर्थ-जिसमकार जिस जहाजमें कोई छिद्र नहीं है लोकानुप्रेक्षा। पानी पानेका कोई मार्ग नहीं है और जिसका पहिले पाया हुआ पानी सब निकाल दिया गया है ऐसा जहाज विना किसी विघ्नके समुद्रके पार हो जाता है उसीप्रकार संवर धारण करने के कारण जिसके नवीन कर्म आते नहीं और पहिलेके कर्मोंका समूह सब जिसने नष्ट कर दिया है ऐसा यह भात्मा मोक्षरूप परम पदमें जा विराजमान होता है। भावार्थ-संवर ही मोक्षका कारण है क्योंकि संवर धारण करनेसे नवीन कर्म तो भावेंगे नहीं और पहिलेके विद्यमान कर्म प्रतिक्षा निजरित होनेसे नष्ट हो ही जायगे या तप- श्चरमादिके द्वारा शीघ्र नष्ट कर दिये जायगे इसप्रकार केवल संवर धारण करनेसे ही यह आत्मा शीघ्र मुक्त हो जायगा । इति संवरानुप्रेक्षा ॥6॥ अध्यांघरो_रचनः पवनत्रयान्त- स्तुल्यः स्थितेन जघनस्थकरेण पुंसा । एकस्थितिस्तव निकेतनमेष लोक- सस्यन्निकीणजठराऽअनिषण्णमोक्षः ॥३॥ अर्थ है जीव ! पइ प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला: लोक धनवात घनोदधिवात और तनुपात तीन प्रकारकी वायु- ओंसे घिरा हुआ है जिसप्रकार चारों ओरकी वायुके भीतर कोई पदार्थ पड जानवर सह ज्योंका त्यों स्थिर बना रहता
३६
द्वादशानुप्रेक्षा।
है, हिल नहीं सकता उसीप्रकार साठ साठ इजार योजन
मोटी ऊपर लिखी तीनों प्रकारकी वायु इस लोकके चारों
ओर लोकाकाशमें ही निराधार विद्यमान हैं क्योंकि वायु
आकाशमें निराधार रहती ही है उसी वायुके आधार पर यह
लोक स्थिर है। इधर उधर कहीं भी हिल नहीं सकता ?
क्योंकि वायु चारों ओर है उसी लोकके तीन भाग हैं मनुष्य
लोक पा तिर्यग्लोकको मध्य लोक कहते हैं, स्वर्ग लोकको
ऊर्व लोक कहते हैं और नीचेकी नरकोंकी सात पृथिवियों
को अधोलोक कहते हैं इसकी अनादि कालकी ऐसी ही
रचना है। जिसमकार कोई पुरुष कमस्पर दोनों हाथ रख
कर पैर फैलाकर खडा हो उस समय जैसा उसका प्राकार
होता है ठीक वैसा ही पाकार इस लोकका है। यह लोक
एक महा स्कन्ध है, इसका सब मध्यभाग जीवोंसे भरा हुआ
है अथवा इसका नाडीप मध्यभाग त्रस जीनोंसे भरा
हुआ है और इसके ऊपरी भागपर पैंतालीस लाख योजन
प्रमाण मोक्षस्थान विराजमान है । हे जीव ! ऐसा यह लोक
तेरा निवासस्थान है। यही तेरा घर है। भावार्थ-ईसी
लोकाकाशमें तू अनादि कालसे परिभ्रमण करता चला
प्राया है और जव तक मोक्ष प्राप्त न होगी तबतक वरावर
इसीमें परिभ्रमण करता रहेगा। इसलिये उस दुःखरूप परि-
भ्रमणसे बचनेके लिये शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त करनेका उपायः
करना चाहिये ।। ३४॥
लोकानुप्रेक्षा। कर्ता न तावदिह कोऽपि धियेच्छया वा दृष्टोऽन्यथा कटकृतावपि स प्रसंगः। कार्य किमत्र सदनादिषु तक्षकाये- राहृत्य चेत्रिभुवनं पुरुषः करोति ॥३५॥ अर्थ- हे जीव ! देख ! इच्छा वा बुद्धिपूर्वक करने: चाला इस जगतका कोई कर्ता नहीं है। यदि कदाचित् बुद्धि- पूर्वक इस जगतका कोई कर्ता होता तो इच्छा होते ही तृणादिकके रहते हुए चटाई अपने भाप वन जानी चाहिये अथवा मकान आदिके वनवाने में शिलावर राज भादिकी भी भावष्यकता नहीं होनी चाहिये क्योंकि जो कोई पुरुष सामग्री इकट्ठी कर तीनों लोकोंको पनाता है उसके लिये मकान भादि बनाना कौनसी वही बात है। भावार्थ-इस जगतको इच्छापूर्वक किसीने नहीं बनाया है यदि किसीके इच्छा करनेमात्रसे ही जगत बन जाय तो इच्छा करनेमात्रसे, हमारा हार वा घर वन जाना चाहिये जिसने इच्छा फरनेमात्रसे जगमको बना डाला है उसके लिये हार वा मकान बनाना कौनसा कठिन काम है। परन्तु हार चा मकान अपने आप बनते नहीं इसलिये जगतका कर्ता मानना भी मिध्या ही है। यह जगत अनादि अनंत है सदासे चला आया है और अनंत काल तक बना रहेगा। कोई भी नवीन पदार्थ विना पहिलेकी सामग्रीके नहीं वनता तथा ३८ द्वादशानुप्रेक्षा। पहिलेकी सामग्री भी किसी दूसरी सामग्रीसे विगढ़ कर बनी होगी इसमकार भी यह जगत् अनादि कालका ही सिद्ध होता है । इसलिये इसका कर्ता कोई नहीं है॥३५॥ वं कल्मषावृतमतिनिरये तिरश्चि पुण्योचितो दिवि नृषु द्वयकर्मयोगात् । इत्थं निषीदसि जगत्त्रयमंदिरेऽस्मिन् स्वैरं प्रचारविधये तव लोक एषः॥३६॥ अर्थ--हे जीव ! जब तेरी बुद्धि पाप कर्मोंसे घिरी रहती है अर्थात् पाप कर्मका अधिक उदय होता है तब तुझे नरक वा तिर्यच गतिमें रहना पड़ता है। जब तेरे पुण्य कर्मका उदय होता है तब तू सर्वार्थसिद्धि तक स्वर्गों में उत्पन्न होता है अथवा वहां निवास करता है और जब पाप पुण्य दोनों कर्मोंका उदय होता है तब तुझे मनुष्य गतिमें निवास करना पडता है । इसमकार तुझे इन तीनों लोकों में निवास करना पड़ता है । यह प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाला लोक इसप्रकार तेरी इच्छानुसार तैरे परिभ्रमण करनेके ही काममें आता है । भावार्थ-बहुतसे लोग नरक स्वर्ग नहीं मानते । परन्तु उन्हे यह विचार करना चाहिये इस संसारमें पुण्य पापं तो सबको मानना पडता है क्योंकि अच्छे बुरे कौका फल ही पुण्य पाप है उस पुण्य पापकी चार भव- स्थायें हो जाती हैं एक पुण्यरूप, दुसरा पापरूप, तीसरा: - लोकानुप्रेक्षा। ३६ पुण्पपापका मिलाप जिसमें पुण्यकी मात्रा कुछ अधिक हो और चौया पापपुण्यका मिलाप जिसमें पापकी मात्रा अधिक हो । इन चारोंका फल भोगनेके लिये ही चार गतियां हैं, पुण्यका फल स्वर्गमें मिलता है, पापका फल नरकमें मिलता है, पुण्यपापका फळ मनुष्य गतिमें भोगना पड़ता है और पापपुण्यका फल वियच गतिमें भोगना पड़ता है। इस इलोकमें जो वियच गतिको पापका फल बतलाया है वह निगोदादिककी अपेक्षासे बतलाया है । इसप्रकार स्वर्ग नरक माने बिना किसीका काम चळ नहि सकता। क्योंकि ऊपर लिखे अनुसार इस जीवको चारो गतियों में परिभ्रमण करना ही पड़ता है। यही इस श्लोकमें बतलाया है॥३६॥ अनास्ति जीव ! न च किंचिदभुक्तमुकं स्थानं त्वया निखिलतः परिशीलनेन। तत्केवलं विगलिताखिलकर्मजालं स्पृष्टं कुतूहलधियापि न जातु धाम ॥३७॥ अर्थ-हे जीव ! इस लोकमें ऐसा कोई स्थान नहीं है जो तूने अनन्त पार परिभ्रमणके द्वारा बिना भोगे ही छोर दिया हो । अर्थात् इसलोकमें कोई ऐसा स्थान नहीं है जहां तेने अनंत पार. जन्म मरण धारण न किया हो इसके प्रत्येक प्रदेशपर तेने अनंतवार जन्म मरण धारण किया है। परंतु समस्त कौके समूहसे रहित केवल मोक्षस्थान ही एक ४० - द्वादशानुप्रता। ऐसा स्थान है जो तेने आज तक कभी कौतुहल मात्रसे भी . स्पर्श नहीं किया है। भावार्थ--इस जीरने भाजतक केवल मोक्षस्थानका ही पश नहीं किया है वाकीके लोकाकाशके पदेशोंमें तो इसने अनंतवार जन्म मरण धारण किया है इसलिये अब मोक्ष प्राप्त करनेकेलिये प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि इस जीवके लिये यही एक नवीन स्थान है वाकीके सब स्थान तो भोगे हुए उच्छिष्ट हैं उनका तो त्याग करना ही उचम है ॥ ३७॥ इति लोकानुप्रेक्षा ॥९॥ . आपातरम्यवचनर्विरसावसानै- जन्मोद्भवैः सुखलवैः स्खलितान्तरंगः। दुःखानुषंगकरमर्जितवान्यदेन- स्तत्त्वं सहस्व हतजीव नवप्रयातम् ॥३८॥ अर्थ हे पापी हसजीव । देखा ये स्त्री भादि भोगो पभोगोंके थोडेसे सुख केवल अनुभव करते समय मनोहर जान पड़ते हैं परन्तु इनका अंत अत्यंत ही कडवा और नीरस. है तथा वह सुख स्त्री माला चंदन आदि संसारके पदार्थों से उत्पन्न होता है अथवा वह सुख जन्म मरण रूप संसारको पदानेवाला है सुखदायी नहीं है ऐसे इस थोडेसे सुखसे तेरा -
निर्जरानुप्रेक्षा।
४१
हृदय चलायमान होगया है इसीलिये तू शारीरिक मानसिक
और भागन्तुक दुःखोंको उत्पन्न करनेवाला पाप उपार्जन
करता रहता है अतएव उन उगर्जन किये हुए नवीन कर्मोंक
फलको भी तु ही सहन कर। भावार्थ--ये इंद्रियोंके सुख
भोगते समय अच्छे जान पड़ते हैं परंतु इनका फल अत्यंत
दुःख रूप है यह जानता हुआ भी तू उन पापोंको वारवार
उपार्जन करता है इसलिये यदि उन दुःखोंसे बचना है तो
इंद्रियोंके सुखोंमें लीन मत हो । अनंत सुखमय आत्मामें लीन
हो जिससे निरन्तर रहनेवाले अनन्त सुखकी प्राप्ति हो ।
कालुष्यमेषि यदिह स्वयमात्मकामो
जागर्ति तत्र ननु कर्म पुरातनं ते।
योऽहिं विवर्धयति कोऽपि विमुग्धबुद्धिः
स्वस्योदयाय स नरः प्रवरः कथं स्यात् ॥
हे जीव ! इस संसार में विषयोंकी अभिलाषा करता हुआ
तु जो अपने परिणामों में कलुपता धारण करता है उसमें भी
तेरे पहिलेके इकट्ठे किये हुए कर्मोंका उदय ही कारण है।
यदि पहिलेके अशुभ कर्मोंका उदय न होता तो परिणामों में
कलुपता नहीं होती । सो. ठीक ही है क्योंकि जो महा
अज्ञानी वा मूर्ख पुरुष दुध आदि पिलाकर केवल अपना
भला चाहनेकेलिये सर्पका पालन पोषण करता है वह पुरुष
भला. श्रेष्ठ किस प्रकार कहा जा सकता है ? भावार्थ--
४२ द्वादशानुप्रेक्षा। जिस प्रकार सर्पके पालन पोषण करनेसे प्रात्माका भला नही होता उसी प्रकार कौके उपार्जन करनेसे आत्माका कभी कल्पाण नहीं होता। वे कर्म उदयमें पाकर दुःख देते हैं उस दुःखसे अशुभ परिणाम होते हैं उन अशुभ परिणामोंसे फिर अशुभ कर्मोंका बंध होता है। यदि शुभ कर्मोंका उदय हुआ तो उससे अनेक प्रकारको इच्छाएं लाल- साएं उत्पन्न होती हैं जिससे कि फिर अशुभ कर्मोका हो बंध होता है। इसलिये कोका नाश करना ही प्रात्माको कल्याणकारी है। कर्मोंके नाशसे ही आत्माको अनंत सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ३६॥ आतंकपावकशिखाः सरसावलेखाः स्वस्थे मनाग्मनसि ते लघु विस्मरन्ति । तत्कालजातमतिविस्फुरितानि पश्चा- जीवान्यथा यदि भवन्ति कुतोऽप्रियते॥ अर्थ-हे जीव! तु थोडा ही नीरोग वा सुखी होने पर अपने मन में नवीन नवीन अनुभवमें आई हुई उन रोग रूपी अग्निकी ज्वालाओंको बहुत ही शीघ्र भूल जाता है यदि तू उस रोगके समय उत्पन्न हुए विचारोंको “ यदि मैं अबकी बार इस रोगसे छूट जाऊंगा तो अवश्य ही धर्मका सेवन करूंगा" इन विचारोंको न भूल जाय, ये विचार तुके. सुखके समयमें भी याद रहें.तो फिर तुझसे.
४३ धर्मानुप्रेक्षा। पापोंका उपार्जन कमी हो ही नहीं सकेगा। भावार्थ-यह जीप दुःख वा रोगके समय तो विचार करता है कि यदि में इस दुःखसे छूट जाऊंगा तो अवश्य ही धर्मका सेवन करुंगा परन्तु ज्योंही वह दुःख चला जाता है त्योंही उसके साथ ही उन विचारोंको भी भूल जाता है, और फिर इंद्रियों के सुखोंमें तल्लीन हो जाता है यदि दुःख छूट जानेके समय भी इस जीवके ये विचार स्थिर बने रहें और उसके अनु. सार यह धर्म सेवन करता रहे तो फिर यह जीव न तो, फभी पापोंका उपार्जन कर सकता है और न कभी दुःखी हो सकता है। फिर तो यह जीव शीघ्र ही कर्मोंको नाशकर अनंत सुख प्राप्त कर सकता है इसलिये धर्म सेवन करनेकी वांछा इस जीवको सदा अपने हृदयमें धारण करना चाहिये और उसके अनुसार सदा धर्मका सेवन करते रहना, चाहिये ॥४०॥ इति निजराप्रेक्षा ॥१०॥ -- श्रद्धाभिसन्धिरवधूतबहिः समीह-- स्तत्त्वावसायसलिलाहितमूलबन्धः । आत्मायमात्मनि तनोति फलद्वयार्थी धर्म तमाहुरमृतोपमसस्यमाप्ताः ॥४॥ अर्थ-हे जीव जो आत्मा सम्यग्दर्शनको धारण किये
द्वादशानुप्रेक्षा।
हुए है, पंचेंद्रियों के विषयोंकी इच्छा सब जिसने दूर कर दी
है अर्थात् पापरूपी क्रियाओं के त्याग करने रूप चारित्रको
जिसने धारणकर रक्खा है तथा सात तत्व, नौ पदार्थ,
छह द्रव्य पांच अस्तिकाय आदि तखोंके सम्यग्ज्ञानरूपी
संसारकी तृष्णाको दूर करनेवाले जलके द्वारा जिसने अपनी
जड़ सींच रक्खी है अर्थात् जिसने सम्यग्दर्शनसहित
सम्यग्ज्ञान धारण कर रक्खा है और जो स्वर्ग मोक्ष इन
दोनोंकी प्राप्ति रूप फलको ही चाहता है, जो कुछ करता है
वह सब स्वर्ग मोक्षकी इच्छासे ही करता है अन्य किसी
संसारी कार्योकी इच्छासे नहीं। ऐसा यह प्रात्मा अपने आत्मा
में जो कुछ क्रिया करता है उसीको सर्वज्ञ देव धर्म कहते हैं
वही धर्म अमृतके समान फल देनेवाला है।
मागर्थ-सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्रको
धारण करनेवाला आत्मा केवळ स्वर्ग मोक्षकी इच्छासे अपने
मात्मामें लीन होकर जो कुछ ध्यान आदि क्रिया करता है
उसीको सर्वज्ञ देव धर्म कहते हैं ऐसे धर्मको धारण करनेसे
ही यह जीव समस्त कर्पोको नाशकर अजर अमर पद प्राप्त
कर लेता है और अनंतसुखी हो जाता, है ॥ ४१ ।।
मैत्रीदयादमशमागमनिर्भूतानां
बाह्येन्द्रियप्रसरवर्जितमानसानाम् ।
विद्यापभातहतमोहमहाग्रहाणां
धर्मः परापरफलः सुलभो नराणाम् ॥
धर्मानुप्रेक्षा। अर्थ-मुझसे सब जीव सुखी रहे ऐसे भावोंको मैत्री कहते हैं, दूसरोंके हित करनेकी प्रवृत्तिको दया कहते हैं, पंचेंद्रियोंको जीतना वशमें रखना दम है, उत्तम क्षपाको शम कहते हैं और भगवान सर्वज्ञः देवके वचनोंको भागम. कहते हैं। जो जीव मैत्री दया दम शम और आगमको धारण कर- नेसे अत्यन्त मानन्दको प्राप्त हुए हैं अथवा मैत्री दया. दम यमको मागमके अनुसार धारण कर जो परम आनन्दको. प्राप्त हुए हैं तथा जिनका मन स्पर्श रस गंध वर्ण शब्द आदि पांचों इंद्रियों के विषयों में पांचों इंद्रियोंकी प्रवृत्तियोंको कभी नहीं झेने देता और जिन्होंने सर्वज्ञपणीत शास्त्रोंके माहा- म्यसे मोह वा अमानरूपी महा पिशाचको नाश कर दिया है ऐसे मनुष्य मोक्ष और सांसारिक सुख देनेवाले धर्मको वडी अच्छी तरहसे सुगमताके साथ धारण कर लेते हैं। भावार्थ-स्वर्ग मोक्ष देनेवाला यह धर्म ऐसे ही मनुष्यों के द्वारा धारण किया जाता है जो सब जीवोंमें मैत्रीभाव धारण करते हैं, दया पालन करते हैं, इन्द्रियोंको वशमें रखते हैं उत्तम क्षमा धारण करते हैं, शास्त्रोंका अभ्यास करते हैं अपनी इन्द्रियोंको किसी भी विषयमें नहीं लगने देते और जो बालोंका पठन पाठन कर अज्ञान और मोहको हटा देते हैं ।। इच्छाः फलैः कलयति प्ररुणद्धि बांधाः सृष्टेरसाम्यविभुरभ्युदयादिमियः।
. , द्वादशानुप्रेक्षा। ज्योतीष दूतयति चात्मसमीहितेषु. धर्मः स शर्मनिधिरस्तु सतां हिताय । अर्थ-जो धर्म स्त्री पुत्र धन धान्य आरोग्य आदि शुभ फल देकर जीवोंके मनोरयोंको पूर्ण करता है, जो शारी- रिक मानसिक और आगंतुक दुःखोंको दूर करता है जो राज्य आदि विभूतियोंको देकर संसारमें अपनी अनुपम सामध्यको प्रगट करता है जो आत्माको इष्ट अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंतसुख, अनंतवीर्य रूप अनंत चतुष्टयोंकेलिए श्रुतज्ञान, भवधिज्ञान, मनः पर्यय ज्ञानरूपी दूसोंको भेजता है और जो सुखोंका निधि है ऐसा वह जगतप्रसिद्ध धर्म सजन व विद्वान् लोगोंको मोक्ष देनेवाला है। भावार्थ- यह धर्म ही सव इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला है, धर्म ही संब दुखोंको दूर करनेवाला है, धर्म ही सामर्थ्य प्रगट करनेवाला है, धर्म ही सुखका निधि है और धर्म ही ऋद्धियां तथा अनंत चतुष्टयको प्राप्त करानेवाला है, सज्जन लोगोंको अवश्य ऐसा धर्म धारण करना चाहिये जिससे कि उन्हें शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त हो जाय। देहोपहारकुतपैः स्वपरोपतापैः कृत्वाध्वरेश्वरामिषं विदलन्मनीषाः ।.. धमैषिणो य इह केचन मान्धमाज-- .. स्ते जातजीवितधियो. विषमापिबन्ति ॥
धर्मानुप्रेक्षा। अर्थ-इस संसारमें कितने ही बुद्धिहीन जडरूप मनुष्य ऐसे हैं जो कहने सुननेवाले और करनेवाले सबको दुःख देनेवाले ऐसे तलवारके द्वारा स्त्री पुरुष वा पशुओंको मार कर चढाना अथवा घेदोंको प्रमाण मानकर यज्ञादिकमें यशु. ओंको होमना आदि पापरूप क्रियों के द्वारा यज्ञ करने वा महादेवकी पूजा करनेके वहानेसे ही धर्मात्मा बनना चहते हैं परन्तु वास्तवमें देखा जाय तो मनुष्य जीनेकी इच्छा रखकर विषको पीते हैं। भावार्थ-यज्ञमें किसी जीवको होमनाया किसी देव या देवीपर किसी पशुको वा पक्षीको चदाना पाप है धर्म नहीं है क्योंकि हिंसा करनेसे कभी धर्म नहीं हो सकता । हिंसासे तो पाप ही होता है अथवा यों कहना चाहिये कि हिंसा सब पापोंकी जड है जो लोग किसी भी प्रकारसे हिंसा को धर्म मानते हैं ये जीनेकी इच्छासे विष पीना चाहते हैं। इसलिए अहिंसारूप धर्म ही प्रात्माका कल्याण करनेवाला है अन्य नहीं। येऽन्यत्र मन्त्रमहिमेक्षणमुग्धबोधाः शवैषिणः पुनरतः शिवतां गृणन्ति । ते नावि तारणहशो दृशदोऽवलम्ब्य दुष्पारगम्बुधिजलं परिलंघयन्ति॥१५॥ अर्थ-जो पुरुष सर्वच बीवरागको छोटकर. अन्य
द्वादशानुप्रेक्षा।
पतोंमें मंत्रोंकी महिमा देखकर मोहित वा अज्ञानी हो जाते हैं
और शिव मतको वा अन्य मतोंको मानने लगते हैं तथा
फिर उन्हींसे स्वयं मुक्त होनेको इच्छा करते हैं वे पुरुष नाव
मनुष्योंको पार कर सकती है ऐसी बुद्धि रखकर केवल
पत्थरका सहारा लेकर अपार महासागरके जलको पार
करना चाहते हैं। भावार्थ-जिसप्रकार यह मनुष्य पत्थर
का सहारा लेकर समुद्रसे पार नहीं हो सकता. उसीप्रकार
कोई भी जीव वीतराग सर्वज्ञ देवके कहे हुए मतको छोड
कर. अन्य हिंसारूप धर्पको माननेवाले मतोंको पालन करने
से कभी मुक्त नहीं हो सकता । इसका भी कारण यह है कि
वीतराग हुए चिना कभी कषाय वा विकार छूट नहीं सकते
और कषायोंके छुटे बिना यह जीव कभी पापोंसे नहीं वच
सकता। इसलिये पापोंसे वचनेका एक मात्र उपाय कषा-
गोंका त्याग करना है। समस्त कषायोंका नाश होनेपर यह
जीव वीतराग होता है. और वीतराग होनेपर सर्वज्ञ होता है,
उसी अवस्थामें यह अनन्त सुखी होता है। तया मिथ्या-
भाषण वा मिथ्या उपदेश अज्ञान वा राग द्वेषसे होता है
जो वीसराग और सर्वज्ञ है उसका उपदेश कभी मिथ्या नहीं
हो सकता वह यथार्थ ही होगा। इसलिये सर्वज्ञ वीतरागका
कहा हुआ मोक्षका मार्ग ही यथार्थ मार्ग है उसीसे इस
जीवका कल्याण हो सकता है अन्यसे नहीं । सर्वज्ञ वीतराग
सर्वज्ञ वीतराग होनेका ही उपदेवा देगा और वही , सुखमय
४६ धर्मानुप्रेक्षा। अवस्था है इसलिये वही मत यथार्थ है उसीको पालन कर- नेसे जीवका कल्याण हो सकता है अन्यसे नहीं। धर्मश्रुतेरिह परत्र च येऽविचाराः संदिह्य तामसदृशः सततं यतन्ते। दुग्धाभिधानसमताविलबुद्धयस्ते नूनं गवाकरसपानपरा भवन्तु ॥ ४६॥ अर्थ--जो श्रीजिनद्रदेवके अनुयायी कहलाकर भी उसको यथार्य रूपसे नहीं मानते, रात दिन धर्म श्रवण करते दुए भी परहंत देवके कहे हुए मतमें और अन्य मतोंमें यथेष्ट अन्तर नहीं समझते, उसमें सदा संदेह करते रहते हैं और फिर भी वे मिथ्याष्टि उसीरूपमें धर्म पालन करनेकी चेष्टा करते हैं वे केवल नामसे ही दुधकी समानतारूप भ्रष्टं बुद्धिको धारण करते हुए अवश्य ही गायके दूधके- भरोसे आकका दूध पीनेमें तत्पर होजाते हैं। भावार्थ-जो पुरुप केवल दूध यह नाम सुनकर ही और सफेद पतलेको देख कर ही गाय के दूधके बदले आकको द्ध पीते हैं वे अवश्य ही भूख और भविचारी कहलाने योग्य हैं इसी प्रकार जो मनुष्य भरहन्तदेवके कहे हुए धर्ममें और अन्यः . धौमें कुछ अन्तर नहीं समझते "इनमें से कौनसा धर्म अच्छा है यह वा वह अभधा दोनों: इसप्रकारका जो संदेह करते रहते हैं वास्तबमें वे भी मिध्यादृष्टि हैं उस अवस्थाम: .
. ५० द्वादशानुप्रेक्षा। उनका धर्म पालन करना भी कुछ कार्यकारी नहीं | इ8-. लिये आत्मकल्याण चाहनेवाले पुरुषोंको सर्वन चीतराग- देवका कहा हुआ धर्मका पालन करना चाहिये क्योंकि यही यथार्थ मोक्षमार्गको बतलानेवाला है अन्य नहीं। अज्ञस्य शक्तिरसमर्थविधेनिवोध- स्तौ चारुचेरियममू तुदती न किंचित् । अन्धांत्रिहीनहतवांछितमानसानां दृष्टा न जातु हितवृचिरनन्तराया ॥१७॥ अर्थ-अज्ञानी वा मिध्याज्ञानी पुरुषकै गरित्र नहीं हो सकता तया चारित्रहीन पुरुषके सम्परज्ञान और सम्पन्- चारित्र नहीं हो सकता । यह मिथ्यादर्शन सम्पाज्ञान और न दोनोंको पीड़ित करता है अर्थात् दोनोंको नहीं होने देता । जिसप्रकार कि अधे लंगडे और इच्छा रहित मनुष्यों का हित निर्विधन रीतिसे कमी देखनेमें नहीं आता। भावार्य-जिस प्रकार अंधा लंपदा और आलसी या इच्छारहित मनुष्यका हित निर्विघ्न रीविसे नहीं में सकता उसीमकार विध्यादर्शन मिथ्यावान और मिथ्या- चारित्र धारण करनेवालेको अयवा सम्यग्दर्शनरहित सभ्य- खान रहित और सम्पचारित्ररहित पुरुषको मोक्षाकी भाति कमी नहीं हो सकती। मोजकी प्राप्ति इन तीनों रत्नोंकी पूर्णतासे होती है । वह नो केरल, सम्यग्दर्शनसे मिक C धर्मानुप्रेता ५१ सकती है, न केवल सम्यग्ज्ञानसे मिल सकती है और न केवल सम्यकचारित्रसे मिल सकती है इन तीनोंके मिलकर पूर्ण होनेसे ही मिल सकती है इनके विपरीत मिध्यादर्शन मियाज्ञान और मिथ्याचारित्रसे तो कभी किसी तरहसे नहीं मिल सकती । इससे सिद्ध होता है धर्मका स्वरूप रत्नत्रय ही है अन्य नहीं ॥४७॥ चायां रुचौ तदुचिता चरणे च नृणां दृष्टार्थसिद्धिरगदादिनिषेवेणषु । तस्मात्परापरफलपदधर्मकामा सन्तत्रयावगमनीतिपरा भवन्तु ॥४॥ अर्थ-जिसप्रकार कोई रोगी पुरुष उस रोगको दूर करनेवाली औषधिको अच्छी तरह जानता हो, रुचिपूर्वक उस कडवी औषधिको भी पीनेकी इच्छा रखता हो और फिर रुचिपूर्वक उसे पीता हो तमी वह अपने रोगको दूर कर सकता है अन्यया नहीं उसीप्रकार सम्यग्दर्शन सम्य- • ज्ञान और सम्यकचारित्र इन तीनों के होने पर ही मोक्षरूप कार्यकी सिद्धि हो सकती है अन्यथा नहीं । इसलिये जो पुरुष इस स्वर्गमोक्ष देनेवाले धर्मको पाकन करना चाहते हैं उन्हें सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यश्चारित्रइन तीनोंका स्वरूप अच्छी तरह जान लेना चाहिये । भावार्थ- बनशिखिनि मृतोन्धः 'संचरन् वाढमंत्रि- ५२ द्वादशानुप्रेक्षा। द्वितवधिकलमूर्तिर्वीक्ष्यमाणोऽपि पंगुः । अपि सनयनपादोऽश्रयानश्च तस्माद् हगवगमचरित्रः संयुतैरव सिद्धिः ॥ अर्थात्-जिसप्रकार जलते हुए वनमें अकेला अंधा पुरुष भी नहीं बच सकता, न दोनों पैरोंसे रहित लंगडा उस अग्निको देखता हुआ भी वच सकता है और उस अग्निपर अविश्वास रखनेवाला पैर आंख दोनोंके रहते हुए भी बच सकता है उसीमकार न अकेले सम्यग्दर्शनसे कर्म नष्ट हो सकते हैं न सम्यग्ज्ञानसे और न अकेले सम्यकूचा- रित्रसे किंतु सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र इन तीनोंके मिलने से पूर्ण होनेसे ही मोक्षकी प्राप्ति हो सकती है अन्यथा नहीं ॥४८॥ इति धर्मानुप्रेक्षा। सासारसागरमिमं भ्रमता. नितान्तं जीवेन मानवभवः समवापि दैवात् ।। तत्रापि यद्भुक्नमान्यकुले प्रसूतिः सत्संगतिश्च तदिहान्धकवर्तकीयम् ॥१९॥ अर्थ-प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले चतुर्गतिरूप- संसार सागरमें अत्यंत परिभ्रमणः करते हुए इस. जीवको यह बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा। ५३. मनुष्यजन्म बडे पुण्यकर्मोंके सदयसे प्राप्त हुआ है उस मनुष्य जन्मके पालेनेपर भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य इन उत्तम कुलोंमें जन्म होना और महामुनि ऐसे सजन पुरुषोंका समागम मिलना इस संसारमें अंधेके हाथ बटेर ज्ञानेके समान अत्यंत दुर्लभ है। भावार्थ-इस संसारमें प्रथम तो मनुष्य जन्म ही अत्यंत दुर्लभ है क्योंकि संसारमें अनंत जीवशशि भरी हुई है उसमें यह मनुष्य जन्म ही उत्तम है जोकि बढे पुण्य कर्मके उदयसे प्राप्त होता है । कदाचित ऐसे ही किसी 'पुण्य कर्मके उदयसे वह मनुष्य जन्म प्राप्त भी हो जाय तो जिस प्रकार कोई अंधा पुरुष दोनों हाथोंसे ताली बजावे और उसके दोनों हाथोंके मध्यमें नटेर पक्षी पाजाय इस प्रकार अंधेके हाथ वटेरका लगना अत्यंत कठिन है उसी प्रकार उत्तम कुलमें जन्म होना. और मुनियों का समागम मिलना भी अत्यंत कठिन है, अत्यंत दुर्लभ है। कृच्छ्रादनस्पतिगतेश्च्युत एष जीवः श्वभ्रेषु कल्मषवशेन पुनः प्रयाति । तेभ्यः परस्परविरोधिमृगप्रसूता- वस्याः पशुप्रतिनिभेषु कुमानवेषु ॥५०॥ अर्थ-यद्यपि यह प्रात्मा स्वानुभूतिसे. प्रत्यक्ष होने- वाला है तथापि तिपच गतिमें परिभ्रमण करते हुये इसे अनंत काल बीत जाता है वहांसे निकलना इसके लिये अत्यंत कठिन - - ५४ द्वादशानुमेक्षा। हो जाता है कदाचित् वडी कठिनतासे वहांसे निकल मी आवे तो फिर पाप कर्मके उदयसे नरकमें जा पडता है और कितनी ही वार तिर्यच होकर फिर सातों नरकोंके घोर दुखोंका अनुभव करता है। फिर वहांसे निकलकर सिंह हाथी, चाप, हिरण, विल्ली, चूहा, न्योला, सर्प, मयूर, वाज, कबूतर, आदि परस्पर विरोध रखनेवाले. जातिविरोधी तियच गतिके जीवों में जन्म लेता है और फिर वहांसे भी निकलकर पशुओं के समान रहनेवाले कुभोग भूमियोंके म्लेच्छ मनुष्यों में जन्म लेता है । भावार्थ-प्रथम तो निगोदसे नि- कलना ही अत्यंत कठिन है फिर पृथिवी जलं तेज वायु वन- स्पति कायोंसे निकल कर बस पर्याय मिलना अत्यंत दुर्लभ है, उस पर्यायमें भी दोइन्द्रिय तेइंद्रिय चौइंद्रिय और पंचेंद्रिय पशु. ओंमें बहुत दिनतक परिभ्रमण करता रहता है वहांसे नि- कला तो फिर नरकमें जा पड़ता है वहांसे फिर सिर्यच होता है फिर नरकमें जाता है फिर जातिविरोधी जीवोंमें जन्म: लेता है फिर नरक जाता है इन दोनों गतियोंसे निकलनाः अत्यन्त कठिन है कदाचित् निकला और मनुष्य गति मात' हुई तो पशुओं के समान रहनेवाले कुभोग भूमियोंमें जा उत्पन्न होता है इसमकार यह जीव चारों गतियों में परिभ्रमण किया करता है॥५०॥ संसारयन्त्रमुदयास्तघटीपरीत सातानतामसगुणं भृतमाधितोयः।
बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा। इत्यं चतुर्गतिसरित्परिवर्तमध्य- मावाहयेत्स्वकृतकर्मफलानि भोक्तुम् ।। अर्थ-यह संसार एक प्रकारको परइटको घडीका यंत्र है इसके चारों ओर सूर्यके उदय और प्रस्तरूपी घड़ियां (पानी भरनेके छोटे बड़े ) लगी हुई हैं। बहुत बड़ा पापोंका समूह ही इसके चलाने की लंबी और मोटी रस्सी ( वरत) है। पानसिक दुःखरूपी भगाध जलसे यह भरा हुआ है और नरक तिर्यंच मनुष्य देव इन चारों गतिरूप नदीके भंवरके मध्य भागमें यह यन्त्र लगा हुआ है ऐसे संसाररूपी अरहट की घडीके इस यंत्रको अपने किये हुए पुण्य पापप कौके सुख दुखरूप फलोंको भोगनेकेलिये अपरके ५० श्लोक में कहे अनुसार चारों गतियोंमें परिभ्रमण करता हुमा यह जीव सदा चलाया करता है। भावार्थ-यह नीव जो चारों गतियों में परिभ्रमण किया करता है वह मानों इस संसार यंत्रको चलाया करता है यदि इसका यह परिभ्रमण बन्द हो जाय तो इसका जन्म मरण रूप संसार वा संसारके दुख सर बंद हो जाय । इसलिये उन दुःखोसे वचनेके लिये इस 'जीवको चाहिये कि वह आगे लिखे अनुसार रत्नत्रयकी प्राप्तिका उपाय करे। चिना रत्नत्रयको प्राप्त किये वह कभी अनंतसुखी नहीं हो सकता ॥ ११ ॥ आतंकशोकभयभोगकलनपुत्र- यः खेदयेन्मनुजजन्ममनोरथाप्तम् । L - ५६ द्वादशानुप्रेक्षा। नूनं स भस्मकृतधीरिह रत्नराशि- मुद्दीपयेदतनुमोहमलीमसात्मा ॥५२॥. अर्थ-यह मनुष्य जन्म अनेक मनोरथोंसे प्राप्त हुआ है जो मनुष्य इस मनुष्य जन्मको पाकर भी केवल रोग शोक भय, धन धान्यादिक भोग, स्त्री, पुत्र प्रादिके द्वारा गंवा देता है समझना चाहिये कि उसका आत्मा प्रबल मोइसे अत्यन्त मलिन हो रहा है और वह केवल भस्मके लिये बहु- मूल्य अनेक रत्नोंकी राशियोंको जला देता है। भावार्थ- इस संसारमें मनुष्य जन्मकी प्राप्ति ही अत्यंत दुर्लभ है इसको पाकर भी जो मोक्षमार्गमें नहीं लगते, धर्म सेवन नहीं करते. केवल धन कमाने वा परिवारके पालन पोषणहीमें लगे रहते हैं वे सबसे अधिक मूर्ख हैं । अत्यन्त प्रवल मोहनीय कर्मके उदयसे ही थे इसमकार जन्मको खो रहे हैं परन्तु उनका. इसप्रकार मनुष्य जन्मका खोना केवल भस्मके लिये बहुमूल्य रत्नोंको जलाना है। क्योंकि एकवार निकल जानेपर फिर यह मनुष्य जन्म थोडे ही मिलता है । इसलिये इस. मनुष्य. जन्मको. पाकर धर्म सेवन करना और रत्नत्रयकी प्राप्ति करना ही इस मनुष्यका कर्तव्यः है : इसीसे यह मनुष्यजन्म सफल हो सकता है अन्यथा नहीं ॥ ५२।।. बाह्यप्रपंचविमुखस्य शमोन्मुखस्यः भूतानुकम्पनरुच प्रियतत्त्ववाच । ::
. ५७० बोधिदुर्लभानुप्रेक्षा प्रत्यक्प्रवृत्तहृदयस्य जितेन्द्रियस्य भव्यस्य बोधिरियमस्तु पदाय तस्मै ॥ अर्थ-जो भव्य जीव विषय पायरूपी वाह्य प्रपंचोंसे परान्मुख है जिसका आत्मा शांत है अथवा जिसके पाप कर्म (दर्शन मोहनीय कर्म) उपशम होनेवाला है, जो समस्त प्राणियोंकी दया पालन करनेमें गाढ श्रद्धा रखता है, जिसकी वाणी कानोंको अमृत के समान मधुर लगती है और यथार्थः तत्वोंका निरूपण करती है, जिसका हृदय परमात्मा स्वरू- पमें ही लगा रहता है और जिसने अपनी सब इन्द्रियां वशम कर ली है ऐसे भव्य जीवकेलिये यह रत्नत्रयकी प्राप्ति उस जगतप्रसिद्ध मोक्षरूप परमपदको देनेवाली हो । भावार्थ-इस संसारमें रत्नत्रयकी प्राप्ति होना ही अत्यन्त दुर्लभ है और वह ऊपर लिखे गुणोंसे विभूषित भव्य जीवको ही प्राप्त होती है इसलिये रत्नत्रय प्राप्त करनेके लिये इस मनु- ज्यको विषयकषाय छोड देने चाहिये, सर्व जीवोंमें दया रखनी चाहिये, आगमके अनुसार बचन कहने चाहिये, जितेन्द्रिय वनना चाहिये और परमात्मा स्वरूपका ध्यान करना चाहिये। ऐसा करनेसे ही इसको रत्नत्रयकी प्राप्ति होगी और रत्नत्रयसे मोक्ष प्राप्त होकर यह जीव सदाकै लिए. अनंत सुखी हो जायगा ॥ ५३॥ इति वोधिदुर्लभानुप्रेक्षा ॥१२॥ इति द्वादशानुप्रेक्षा समाप्ता। :.
1) . 111) 1) संस्थाके छपे हुये भाषाटीका सहित उत्तमोचम जैन शास्त्र। परीक्षामुख संस्कृतप्रवेशिनी-दोनों भाग -संस्कृतप्रवेशिनी-द्वितीय भाग 1) जैनबालबोधक द्वितीय भाग तत्वज्ञानतरंगिणी १०) जैनवालबोधक तृतीय माग, सुभाषितरत्नसंदोह खुलेपत्र २) असहमतसंगम मकरध्वजपराजय-हिन्दी, काम और जिनदेवका युद्ध कच्ची जिल्दका पक्की जिल्दका परमाध्यात्मतरंगिणी-संस्कृत और भाषाटीका सहित (थोडी है ) २) 'जिनदत्तचरित्र भाषावचनिका ॥) जिल्दका ॥) विनतीसंग्रह भाराधनासार सजिल्द १) तत्वार्थसार भाषाटीका '४) पात्रकेशरीस्तोत्र भाषाटीका सहित ।) तीर्थयात्रा दर्शक गोम्मटसारणी-दोनोंकांड पूर्ण, और लब्धिसार क्षपणासार सहित खुलेपन ४००० पृष्ठ ५१) प्रन्यत्रयी ॥) जिल्दकी ॥५) रविव्रत कथा -) गोम्मटसारजी-कर्मकांड पूर्ण, लब्धिसार क्षपणासारजी, और भाषा संदृष्टि सहित ३४) · चारित्रसार २) धर्मपरीक्षा लब्धिसार क्षपणांसारजी भाषाटीका संदृष्टि सहित १२॥ अव्यसंग्रह सान्वयार्थ २) छहढाला संग्रह "स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा सजिल्द M जैनकथा संग्रह सजिल्द । भदैया पूजा संग्रह 1) शीलकथा दर्शनकथा ) दानकथा विशेष जानने के लिये बडा सूचीपत्र मंगाकर देखिये। मिलनेका पता- श्रीलाल जैन, मंत्री-भारतीयजैनसिद्धांतप्रकाशिनी संस्था, विश्वकोष लेन, बाघवाजार कलकत्ता । . -