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Kavi Shri Mala Sindhi

Bewashi,kishanchand · 2010/12

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कहि-श्री माला
सिन्धी
पवि
फिशिनचम्द अवसि
सम्पारक-मनुमारक
देवदस पृन्दाराम शर्मा
प
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा

प्रासक
मोहनतात मा
मन्त्री
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति
हिदीनमर, वर्ग
सविकार गुरमित
प्रपम संस्करण-1...
मई, १९९२
मूस्प---
मोहनलालभर
राष्ट्रमाता प्रेस
हिन्दीमगर, पर्ण

मामुस मक का विषय है कि राप्दावा-प्रचार-ममिति पर्धा अपने कार्यम् पर्व मन् १९८१ में ये का गौ। म उफ्लपमें मनाये जाया रजत जयन्ती मझोरमको अपम्म म म मरतीय मापाप्रोके मान्य कवियोग क्या अपने उत्कृष्ट काव्यच परिचय रवि-भी माल पम पुम्सकों मिट गवमुपद मम्ति मात्रा कामी मोबनाके अन्तर्गत प्रस्तुत मत्व पाठमो मम आ रहा है। सबपि किमी मी पाने मपीठ काव्य-मईयन निश्चममा कठिन वर्ष। फिर भी अपनी सौमामाको ध्यान रखते हुए गम्यमान्य उन-उस बाओके विसकी यम्स ही कुपवर पाई सम्मान किया गया। प्रत्येक पुमतको असम्म जिस माके कविधी रफाऑफर चयन किया गया। उम एक मारिस्पना परिचय और प्रति विपन्न परिचय दिया गया। जिस मापाको पविमोच पुन्प्रत किया गया है उनका पुण्य करते समय मन १९२० मे पूर्वका मामिस्व और ११२. मे बस मास्यि-कम तराम एक विमानन म प्यानमै सी गई है। इसका पारप पाठ किममम मम् १९२० के पूर्ववत १९२० के बाद मामिस्यमें प्रवामित विचा-बाराम एक विशेष प्रसारण अध्याव- प्रया माता है। मन्धी कुछ ऐमी विनिष्ट पनियामो देवनागरी विम नहीं है। प्पनियको प्रस्तुत पुस्तकमे Aम्पमित रूपमे व्यक्त किया गया है।- म-मघोप अत्पाप अन्त-म्फुटित कोमल-ताटय म्प पनि, पया-मेठ। -मोष अत्यान, अन्तमपुटित महिम-प्रष्ट्य म्पर्क संपर्क यपा-अ। र-सोप आपाप अन्ताम्फुटित मूर्धग्म म्फोटक म्पन; पप-ये । -मधेर अपम्प, अनाटित रोहन मन ययानचे। मी देवदत पुण्यम शर्माजाने प्रस्तुत पुस्तकमे मालित मारित्यको पुक्ने करमालको सम्पति नपा अदिल का स्मी मामा म्म मपम प्रस्तुत क्रमेमे मायोग दिया है। पुस्तम्मे संगलिस पित्र म्लक सम्पक पन्दुस्तान (सिन्धी धनका कि मदम्पत्यमे उपलाया है। यादी आवरप मियागोमवा में श्रीराम P. प्रारकरी म, म पम्टीटयूट आफ अपार मार्ट, बर्मा) म उपर सायोग मिल्यो अमोहित समिति समीकी मारी।। जम्के अतिरिक्त हा या अन्यान्प दृष्टिपास बिम-विगत प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष सम्योग मिथ । उनले प्रति मी समिति अमीता व्यक्त करती है। आन, पाव मंगा पाठमोझे सपिन्न एवं उम्पोगो मोत होमा। hildarin & मत्रो, राष्ट्रमापा मारममिति मार्ग

अनुक्रमणिका
पृष्ठांक
१
सिन्धी-साहित्य परिचय
परि-परिचय
काम्प-सत्रय

कवि-श्री माछा
सिन्धी
फिशिनबन्द
अवसि'

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सिन्धी साहित्य परिचय

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सिन्धी भापा और उसका साहित्य बाराक मिम्मी मापामें मिश्री माहिप हिमपर कोई पुम्मा प्रकाशित नही हुई। भी मिरी मुहम्मरममणने पापक विशाम दो भागोंमें पुण मिवे है निमा माप मित्र भूपी मन पार मानुन मतीफ दी पुसिमामे रे पिया पया है, मरिणाम १९२ के पहनामपियोराही मामाम मात्र है। १९२ म मेर मारा मिन्धी मापारेपायों पवि इन क्षेत्रा मम ममममा एमपिन १९.हममेकर मार तपालको हम हिलोकी टण मसापहीसे मोकि इम मपिम पचनी भरेसा पका ही बोलबाला है। मार मिश्रीम पप मी प्रपुर मात्रा उपमाप है, फिर भी हमें करना ही पडेगा कि यह सुग 'मयमा युग' मपरा बापुनि पुमके मामम हो ममापित पिया ना मरता है गपात का आरम्म बोन मिपार १m में पिय पा। भम्प मारपारि माप मामान माहिती बार भी मामा मेपिन न दिनों मिली भापार लिए को निश्चित मिपि निलिम पी। मुभनमान इस मापारी परमी मपमा मरगीमें ४ M . मिला करते थे मौर माधण नामरीम स्त्रियां मुम्मुवीमे तवा प्यापारी मुगा ( बिना मात्रामो पाली) पिपिमें मिया करते थे। १९५॥ में सिन्धी मापाके लिए सिपि निर्धारित की गई मौर तबसे सिन्धी मापा साहित्य निर्माण छिटपुर प्रयल पा ऐ है। सर्वप्रथम पिया विमापकी मोरसे पाठप पुस्तकोंकी रचना हुई मीर पुस्तके हिन्दी मौर फारसासे मनूदित की गई। १५५ से १९ • टन गो साहित्य निर्माण हुमा उसे हम समान कामीन पाहिम कह सकते है। चिालोका मत है कि मारम्भमें मपकी की पुस्तके वनापरी पिपिमे म्बिी गामी परम्तु मरदी सिपि सिन्धीको लिपि बन मानेके कारण रेवनागरी मिपिको बड़ी ही पति पहुँची। बब सारा सरकारी कार्य इस मिपिम होने कपा । मत मौकरियां भी उन्हें मिलने सभी को इस मिपिक मानकार थे। ही पारमोसे देवनागरीम इस्तमिश्रित पुस्तकें पाने भगी निमोके समयम यो देवनागरीम पुत पी उनमेसे निम्नलिखित गुण पुस्तकों कमी-कभी दर्पन हो जाता है (१) सिन्धी मिस पिनरी -कैप्टन संक (बम्बईम मुशित) १८९५ (२) सिन्धी बोलीम मोबामण प्रधी म्पावरम मन्तिम पृष्ठोपर माषानी परिपाच ऐ सोरठि की प्पी है मो सायद सिन्दी साहित्यकी पहली कहानी है। (1) 'मती (पॉस्पत माफ मैप्पू) मिन्धी अनुवार-कैप्टनस १८१. (४) मिस सिम्मी मिनरी (कैप्टन स्टैक) बम्पद १८४९ (५) सिन्धी मोहीम जो प्रामक (ग ट्रिम्प सावन और सीपनिगम पपी १०२) मरबी सिपि बनने पाप मी पुल पुस्तके देवनापरी शिपिमें पी। (१) इमिया-सिन्धी रिमयनरी (पयरपे) १८५ (७) सिन्धी-मिठा मिशनरी (रेपर पर्ट उपाराम बापरवास बोस सफ मिर्ग १८७१) (२) मवर धातू (सिन्धीके परत भूष भानु ) रबरामर्ट (१) सिन्धी प्रामर (मी ममटमल) १९९२ (१) Dictionary of Sindhi derivativea (ममरमा मास्मा} १८९२ मारि। इसके महावा सिम्मी पापी मा तरको पाठप पुस्तमें सरकार सारा देव नागरी सिपिमे भी जन्ती पौ। मियतम धर्म सभा शिकारपुरवातोंमे भी बनागरी लिपिम मन्याकि लिए पाप-गुम्न प्रकासित कराई। सन् १.४ में पुमाम हसन मपम्मद कामिम करेगीने मगे पमीवार पी गारि सैय्पर मी मुरम्मर पाइने मुमारे ऐं प्रपातरे यी गास्ति' (१८५५) ५ पा मुफौर बम सरिया । (१८६१) मामक पुग्न सिवी। ये तीनों पुस्तके हन्दीसे अनूरिट की गई पी। मुगगी मन्दीराम मीरानीने तारीख मैमूमी पा प्रारमीमे बनुवार मिया पा। १८६५ में सिरके रिपरी एजूकेशन इम्पेकर भी रापन बमनाप (महाराष्ट्र निवासी) ने सिधु गो निरिपार मामक मौलिक म्तक मिती। १९९२ई में दीवान कोकोमात पापनमतने कोसम्बस पी तारीत' मक पुस्तकमा अपनीमे मनुवार पिया मोर स्त्री शिक्षाके लिए एको' नामक एक मौमिक पुमा किवी। १८७ ई में साधू नवराप तपा मुसी उपाराम रचन्वामीने पसेपास मामा पुम्सका अंग्रेगोस मनुवाद किया तपा मुन्धी पापमने मप मावायू नामक पुस्तक भी मिथी। १८६४ से १८०० तक मान बारामने बड़ी मुन्दर भापाम पन्थ मूविती गुरमम' मार गुरु शकर' नामक तीन मौसिक प्रम्य मिले। १८७९ में मिलीप देगने Bacons Essays हा महामात मम हिकमत के नाममे मनुबा किया। १८८ से मेकर १९१४ तक गिन-गिन विज्ञाननि रचनाएँ की उनको मी हम मूह मही सकते। यह काम मनुवार नाम ना। पिकारपुरके पी गोरराम बापरदाम सावरक पी हरीसिंह तवा रामाद (सिन्ध) भी विनोमम मसरममने प्रकारको रुपम न पुस्तकें मनूवित रिपाकर उपवाई। समस पृण दुनी हुई पुम्सुक हातिमठाई चार रमेश मुरूवमानसी तासमठ ममूर मारिई। इस मतावा भी ठारबास मामूरोमहने परमाणा' या 'भूतनाव का प्रकाशन परलेके लिए अपना प्रेस वोहा। ये पुस्तके पूर्व बिकी। पमपाता मौर मूतमा एक साप प्ररामित न होकर कई मामॉम प्रमाणित हो की मी झोगोंमें बनना धैर्य मही पा किये छपने एक उग भागोंपी प्रतीमा करें। मनसोगाने इन उपम्यामोंका पनेक मिए हिनी सीचना बारम्भ कर दिया। इसमें मस्युमित महागी कि रही उपम्पासोको पाने के लिए कई मिग्रियाने स्विी सीवी। मेकिन साहित्यको दृष्टिमे हमरा इसना मूस्प नही पा! प्रपम उस्मान-काल (पोगममनप्तीच वेग कास) मी कोदोमस मौर मिर्रा कमीच देगके माहिएय-अत्रम पराग परमेसे ही माहिरवमें नप रेतना माई। बारम्भ भी कहोमत पमनमा (मि निवामी ) ने मग्मारकी मोरमे पाप पुन मिती। यही यह पार उस्लेखनीय है कि भी पौधोमरी बह्म ममाम प्रभाषित थे। मा नबामण्य उपा माषु हीपनग्गी (मान हप) ने ही मिन्धर्म गए ममागही मोर रती मोर पी सोमममी उनके ममिम्म मित्र पे। उन दिनों इन पातापने यूमियम एमामी नामस्मसी स्पापना की निमम गार प्रमिउ प्रम-ममारी भी बह पाग्यम सम्योपाध्याय (गो बारम निषियन हो गए थे।) प्रचारप या बम्पार होकर हए मोकको माए थे। इनकी प्रेरमासे हो भी रसीन्द्रनाप ठाकुरकै बो भाई भी मतीमची हसराबादमे सेशन्स बम होकर माए थे। उन्हेंनि यहाँ बह्म-समाना पाटन महर्च किया था। इन बाद भी केसवचन सेनके मतीने मी मन्दसास सेन माए। ऐसे महानुमाबोकी प्रेरमासे ही सिन्धीके मेवा तैयार हुए। भी कहोममगीने जगमन । पुस्तके मिची मिनों का वो अनूदित ।। पाकी १-१२ पुस्तक उनकी मौलिक रचनाएँ है। उनकी सबसे बड़ी सेगा है सिन्धी भापाको साहिरियक ममिप्यम्बमाके मनुस्प बनाना। यद्यपि उनके पाढे राबपि रयाराम मिमम (सेसम्म बब) तमा बी वठरामने इस पियामें प्रयत्न किए फिर मी सफमता भी कौमेमनमो ही मिली। सावू नवसाय तवा साधू हीरानाला प्रमाबके कारन श्री कौडामबनी स्मो धिमाके प्रेमी बन गए, मत नन्होंने बाम मारी परिण पा पो १ लिबार इस रिमा सर्वप्रथम स्तुप प्रयास किया। पदि भी कौडोममयी विभिन्न स्थानसि मुस्मुवी मिपिम लिये एपषित करके न पाते तो सामी नामसे प्रसिग सामी पानरायमा काम्म र मालूम फिस अन्धकारमय गर्त में पड़ा एला। भी कोहीमहने पश्मि गापूजी टीम पोटी कहानियोरा बरी परत मौर मुन्बर सिन्धीमे बनुवार किया। मिर्गा सीप बेग मिर्चा कमीच बेसी गगना सर्वतोमुखी प्रतिभा माले साहित्यकामि की वा सपती है। इनाने अपने गौवन-पतमै कम-से-कम दो सौ पुस्तके सिपी। पपपि इनकी भषिकाय पुस्तके अनुपाव ही है, फिर भी इनकी मौखिक रचनाएँ भी कम नही है। यदि इयाने 'पागात उमर बप्पामका' म्ाार्योम ही मनुगार किया तो मौरसुनिनी पुनी मी व्यायाम ही म्विी। पहें काम्प-चमत्मे प्रथम मलाईमार होलेका पौरप प्राप्त है। इन्होंने दो मौलिक उपम्पास रिताराम (१८८८) या बीमत (१८९ ) मिले। पूछ विद्यानोका मन कि ये मनुमान है फिर भी उनका रस प मौरपा बिनम सिन्धी ही पता। उन दिनों भामरपान वानीने युवकापणे ता मी निभाषण गो" उपम्पास (१५९ मे) से अनूनि पिए। मापूर मुल्क मनाइने गुम वान मौर बान मालिम नामक रपम्पास लिये। मुम्मर मिरीक मुमाफिरन महर बानू तपा मुख्यान मामा उपम्पास लिये। रीवान प्रीतमदाम कमा रापने मनीष भट मामक मौमिक उपम्याम मिता। श्री कालपर अमर रिनाममने हर मवीम या (१९.१) या 'पौरि नो पर' (१९४) नामको मौलिल उपन्याप्त मिवे। भी भेगमम महरचन मारपानीले मानन मुनरी तया मोहिनी बाई रो मौमिक उपन्याम लिने इमपासका ममिम मौनिक गम्माम हाँ गुरबानी डारा लिपित बहाम है। मुमतार एममार - नारम्भिक कामके नाटक माटकराराम भी मिस नीच बेगरा नाम मप्रथम पिया बा मच्या होंने कई नाम हिने जिनमेमे मला मगन (१८८०) मोर दरगीर नामक दो नाटक रङ्गमम्मपर भी वम मा पुके ह। इन्होने १८९६ में परन्दमा नाटकका भी अनुवाद किया। श्री काहोमसने १८८८ में हरेक रचित रस्तारमी नामक नारका बड़ी मुनर बौर मुहावरेदार मापा मनुवाद किया। १८९४ में से मिम्म कामेत्र (परोनी) के प्रिम्मिपम पी गमन सा गरमी प्रोमर पा चा प्रयत्नाम मिन्ध मालेग ममेम्भर बिटिक मामाइटों की स्पापनामिऔर मिन्त्रीका पहला रङ्गमध्य स्थापित हुमा। इस गमञ्चार रोलगने मिए सन् १८९४ में भी बेठानन वितगासने नम दमयन्ती मामा मप्रपम नाटक सिखा। इसके बार इस रङ्गमम्मपर बेमने के लिए दोबान मीतागममिहने रिपन (१८९४) और प्रोपरी (१.५) मामा रो मारक डिवे मिनमा कपानक महाभारतम लिया गया था। उन्होंने रामायन (१८९५) मामक मार लिया मो बनतात का प्रिय मया। इनके महाना मुर्मन राधा (१८९५) मौर 'मोरन वारिका नामक दो मासिक नाटर और सिये। इमपार मी रङ्गमम्मपर रोममेरे लिए मिलीप बेगनेमक्सपियर कई माटका मगार विमा सपिल उनके पानी के नाम का स्थान बार उम् मित्री परे रिया गया। ये नाटम इन प्रकार है (१) हम्मा दिनमार" (१८९७) Aferchant of Venice का (२) “पाह एसिया (१९.) King lear अनुमा (३) “फेरोज रिलमरोग (१९.२) मोटिनके उपन्याम 'Night and Morning का नारकीरम 'गमभार मर पाना" (१९८) Cymbelive रा मनुमा । (२) "मीर ऐं परीफ" (१९.९) Two Gentlemen of Verona ा मनुवार (१) “पुनमार गुलनार (१९०९) Romeo and Juliet पा मनुवार (3) “हमारा रुपम" (१९११) Hamlet मनुपात (८) की एसी" (१९११) एक नई माम्मे मस्ति मो भाषा मी भेगमन महाबादने यि गान (hing John) मामा पेशगिर प्रमापीने रीना पिमरों (Pizaro) मामा मामा मन् १९२६ म भनुसार रिया। इस प्रपम उत्पान मानो मन्कि माटापार ६ भी वानवम् दर्यानी भी पे जिन्होंने रला यमीरी गुस्म 'नमाने पी लहिर सपा गुरा पो पिकार नामक पार मौमिक नाटक मिले। भी सामन्द ममर रिनोमलले सामाजिक बुराइयोंका रिशमन कराने के लिए मा पर्म (१९५) तया सेण कौन देग नामको मौष्कि एकांकी सिये। सिम्मी भाषाका साहित्यिक रूप में पहले ही लिय गुम हूँ कि परपि रयाराम मिमम तवा मी कौडोमम्ने चिन्मी भापाहो साहित्यिक सबनेका प्रपल किया किन्नु इस रिणमें भी भेरमात महरपत ठया उनसे भी गाकर श्री परमामन्द मेवारामने सिनदी मापाको सरह तमा साहिरिपक मभिम्पम्मनाके योग्य बनानेरा सफा प्रयल किया। दोंने ग्रह- बान्धव बरपोपाम्मारके साप ईसाई धर्म पहन किया मौर उस धर्म के प्रचारक लिए जोति मामक सिन्धी साप्ताहिक पत्रिका १९९१ में निकामी यो ४ गो तक सिन्धी मापापी सेवाकर रही। ईसाई धर्मकी बातोने महापाकई मम्य रिपोपर भी मुम्बर मेरहपते ऐ. निमकी मापा गरी प्राम्यहमार माचित रहती थी। हास्य रसके कई छोटे-छोटे पुटपुरे रसमे एपठे थे। उन सब पुटपुमोरा सहकर १९१२ में रिव्यहार मामक पुस्तक (चार मागी) में प्रवामिती मई। इसके माया को सुपर निबता मोति में अपठे उनका भी सामान भी परमाननगीने गुरुफ मामक पुष्पक ( दो भापों) में प्रथापित किया। सिन्धी मापाकी सबसे बड़ी पवा यो श्री परमानन्द मेपारामनाने की मा भी उनकी सिम्मी कोप की न। इसके लिए उन्होंने अपने गीपनका पा भाष मपित किया। सिन्धी भापाका पदि कोई प्रामाभिक कोप है कि समयके कपमें स्वीकार म्मिा पाता है तो वह इन्हीका 'सिम्मी कोप' है। इन्होंने एक यी सिम्पी कोप' भी तैयार किया। धार्मिक साहित्य सिग्नी मापा धार्मि-साहित्य भी काफी मात्रा प्रतिमा है। पाँचीके भी तेगूपम धर्माती सनातन धर्म पत्रिका की बोरसे भीमदभम पौवा प्रीमभाषत तुलसीहत एमापम' बारिक धार्मिक पुस्तके प्राषित हुई। उम्होने गए सामागिर उपम्पास भी शामित कराये। सबसे पहले परपि बापम पिडूमने सिम्बामे मौवा हवा पातम्यत पोप वनपर शिवापूर्ण रीचाएँ सिम्ती। मिग साहित्य के पप गी साहब मा मुखमनी नामपर भी रोपाएँ निवी। इसरे अमावा मात दीही निमें मन पापा पर मामा पुसः मिती जिसमें पोरम मोर पाश्चात्य वन-सास्कोपर सी बारीकी से रिसतारपनिमय रिया गया है।

फाइमन्द मेंबराबने हैदराबाद गुरु संपत की मोरस सिख धर्म विमान् मी भी 'गुर' मन्ब साहबका 'मुस्खामी' नामक मासिक पत्रिकाके माध्यमसे ३० बकि बपक परिपमसे मिन्धीमे मनुबार प्रकामित किया। भारत-रिमामना पहले बह मप्राप्पो ममा पा मन पी मासचन्दगी पुनवाणीने बा गुरमपन वारा उसका पुननबीकरण पिया है। तीसरे है साथ् पापाणीगी गिम्हरि विमायनो पहल ही भीमभपषद् माता तथा मन्तों मार पन्य साहयकी वापीपर प्रचुर मात्राम साहित्य प्रकाशित किया मा मौर विमानक मार भी सफ्ट मीरा मातम पूनाडी मोरसे इस कार्यको मुचार कसे निभा ए। प्रिन्सिपम मानकराम पनामी द्वारा किया गया भीममगमत् पोता का पप बर मनुगा बड़ा हा मुरर वन पड़ा है। पवारा प्रमाव यमुबीन सोल्माम्प तिहरो पी एस्प मुनर अनुगार किया है। मारोग यह कि मिन्धी भाषाम मुमतमानी तमा हि मार्मिम्-साहित्य प्रचुर मामाम उपहम्म है। प्रपम परमान-काल (सिम्धी भापाकी पत्र पत्रिकाएँ) मिनी पत्र तथा पत्रिकामान भी मिम्मी साहित्यकी मच्छी सेवा की है। मर्यप्रथम मन् १८५४ ई म मिषु मुपार मामा निकाला। साधु होरानन्दने सरम्पती नामक मामिक पत्रिका निकामना गुरु को गिमम पार्मिष मामागिर पारिबिर या पमणिक विषयोपर मुम्बर निबन्ध पपने प। १८९१ में भी मेवराय दिसाकपन बापाने प्रभात मामा साप्ताहिक पषिरा निकासनी मारम्भ की। समग इन्ही दिनों रांचीसे मनातन पम पत्रिका (मासिक) प्रमाणित हाने लगी। १८९६ में भी परमानन मबारामने नाति मामा पाक्षिक समाचार पत्र निकामा। १९१२ महापराम मयनाराम ममान देवनागरी लिपिम मिनु माम्पर मामक पामिक पवित्रा निकाली भारम्भ की। उमी रिनों पी गुन्दनमा पीपचन निमामानीने मानन नामक बार्मिक पषिरा निरामी। पी पाताराम बानापान माना नामक राष्ट्रीय परिषा निगपी। राष्ट्रीय साहित्य इम पास मोम्माय निमारा नितिन पुम्निा मनुमारिता को िमाहित्य र पम्प नहीं है। यह छोरी मिसापी। पुनः एप्तही मनुवारस 4 मोगन गर्मा प्रभागर भी मममी तपा निम्टा भी पीएममीमा मिरपगार कासिता पया। परिणामम्मस्पतारोपप तपादो मर मियाको वाग्मतीन पापगरपारापामराया गया। १८१ में १० निबनम साहित्य सिग्धीम निबन्ध-साहित्य इतनी प्रचुर मात्राम उपाय नही है फिर भी थी कीनाराम प्रमबाब तथा श्री दयाराम बलगमा मीरचन्दानीने का मेवाको निबन्ध एकषित कर सन् १९७ मे मुतमस्ता मामा नियन्ध-समर छपवाया । इस पातके निबन्धमारोमे निम्नलिवित हिानोके नाम उस्लेखनीय है. १-रागपि दयाराम २-बी केबहराम सप्तामतराम -भी मारायण जगमाल 4 (महाराष्ट्र) ४-श्री उधाराम परिशस ५-साधु मसराम -सामु हीरानन्द -भी कीड़ोमक -मिफसीप बम ९-श्री परमानन्द मेवाराम १-पी निर्ममदाप फजापन ११-पी मेरमन मारपद मावि। द्वितीय उरपाम-काम (मेठमल-लारूपन्द मुग) सन् १९१४-१९४७ बितीय उत्लाम-कास सिन्धी साहित्यके लिए उत्साहवर्मक पास माना पाता है। सन् १९१४ में सिम्बी साहित्य मोमाइटीको मीर रखी गई। श्री पठमा परमराम गुप्तांगानी तथा भी कातपाय अमर दिनोभत बगस्यानी इमके मुख्य कार्यपा। इस सोसापटीको मोरसे प्रति माह एक-म-एक मुन्दर पुम्वर पती पी। रामपि बयाएमके मुपुष मी केवलरामगीने एक बड़ी रकम सिन्धी कामोरी नामक संस्थाको एर सो सुन्दर मौर बम्म उत्तम पुस्तक सिए प्रधान की। पीठमानी इस संस्थाकी मारमा प। श्री ठमसजीका बाम १९८१ में रागामें हुमा पा। पपपि इन्होंने मैट्रिक क ही सम्पयन किया वा फिर भी प्रोफसर बन गए। इन्होंने सिन्धी-माहित्यकी मनुपम सेवा की। सिम्पी सायरीकी मोरसे एक सौ पुस्तके प्रसिस नेश मरल पम्हाने पूरा म्मिा। य से अनुपम मेवा मे ही मनोखे प्यास्पाता भी। ये पियॉमाफिरपे। में एनीबसम्म समयमइन्होने मान म्यानपानौ उषा भारतमासी नामक पत्रिका बारा सारे सिम्पमें एक मए उत्मारकी नार फैला दी। भाप दिनी भी अन्ह पानभर थे। मूरपामके प्प समन्धी परोमे इनको बड़ा प्रेम बा। के रिन भूमाप नहीं गा मस्ते बग पियामाफियम बागमें पप्प परक पर गवा-गमाकर उनकी मुदर पाम्या करते थे। मपिपरके दो उपम्यामोगा (मसेट मौर तुमन के नाममै मनुगार किया। मापने धर्मनाक धिन मठीरे फाम का मनुषार धी रिया। इसके ममाया मापने कई धार्मिक पुस्तके मी निती निमें मान पाहे कोन माय जानी ऐप मनु हिए महानो बप जी साहसपर टौरा" भारि मुत्य है। मापने इमरे भी कई सय लिये। मापकी भापा मामा तपाही भोगस्विनी पी। रिसायनो बा १.४ में भापम तान्न कमि हुमा। पर्म से नेम पूरब बोनी सायचन्द ममर विनोमस भी सामचन्दबी भी इस काम्के मुस्प म्म्म माने जाते है। मापका जन्म २५ मनपरी १८८५ मे हैदराबापम बापा। मापको साहित्यसे या प्रेम पा। माप मागीवन साहित्यकी साधनामे गे । पी बेठमबीके मापी बमकर बापने सिन्धी साहित्य सोसामटी मौर मिन्धी कारी के लिए यूर पुस्तके सिबार उनका हाथ बटाया। मापने उपन्यास माटक कहानियां निबन्ध तथा समालोचनाम्मक पुम्स मिली। १९२१ में रवीन्द्रनाप ठाकुर सोसायटीमा बम हमा। साहित्य प्रकासनके साप-माय रबि मारके नामपर रगमनका भी मायामन हुआ। इस रंगमंचपरगने मिए इन्होने उमर मार्ग मामक नाटक शिक्षा मोगड़ी मफलता पूर्वक बेमा गया। सिन्ध विभाजनके बार माप बमई माए। यहाँपर भी इनकी माहित्य साधना पम्ती रही। मागीवन ममापनका कार्य करते हे। बाम पी हाइस्कूल फार मिम्बीर सपा कई यूनिवर्सिटी के लिए परीक्षापी तैयार करसे रहे। सन् १९२२ में गांधीनी मान्दोलनके ममम पामा बेसमे यार भी इन्होंने र पुस्तके मिची। इनका म्यक्तित्व महा प्रभावशाली पा। १९ वर्षकी भरम्बाम भापमा सन् १९५४ ई म बम्बईम स्वगबाम एमा। रचनाएं -मि धो १-माए २-सच ३-गुम इन तीन परियो पर बापने समालोचनारमक निबन्ध लिये। इन नियन्प्रधि ममाया बिभिन्न विपयोपर भी मापने का निबन्म मिते है। मम्प रचनाएँ -१-चोपि गाना २-मरा नुमार, -मन मा सरिक ४-मोम बळ निम्मू -किधिनी म जो कष्ट, १-फलनि मुठि तो दुवनि रवी निवगी ९-छर मतीम या १.-राम बारिमा ११-प्रेम गो बन, १२-माहाणो णा १५-यरत मुहम्मर रमून १४-मत्रम् मारो १५-मुमाफिरी म यो मरो १६–मामिपनि ने दिलदारी। परक -१-उमद मावई, २-मुहिमी मेर 1-मेमनी बेप ४-मका धर्म। मम्प पब-१-मुर केहोरो २- नानि मा म -करमारती ४-पाराना मुस ५-माभिक माती मात मारि तमा मग्य कई प्रम मिन। नमस मी पूछ मप्रापित है। इस कासके मम्प सेशक ने होतबा मुहचान पुरखम्मामी ( गम्म १८८५ मृत्यू १.४५) मेरी ये मिाम पामेनर प्रिम्मिपम । मापने कार्यो नग पूनिवर्मिीकी परीपारि लिए मिग्धी मापाको म्यान दिमाया। मापने मित्रोमे पार भानुल सतीफ पर टी-सब मिले।

मपि इनका भेम्मत महरचम (बाम १८०८ मृत्यु १९५ ) वर्णन पहले हो चुका है फिर भी इस उत्पान-काठम मापने मी का पुस्ठ सिन्धी चिनमसे मुस्स सिधीहीम मी तारीख मनस टॉम्स पेगिन (Uncle Tom. Cabin) का गोठनि या पूनर भामसे समिप्र मनुषार तपा सिषु यो सैलानी । मरम्मा तिदौड मैम माप ट्रेनिंग पामेबके प्रिन्सिपत्त । आपको रचनाएँ इस प्रकार है --१-सारीक ताहिरीम बी इन्त वायु २--मनमून मबीसी ३-हयातीय गो रु ४-सिम्मीब पी मरवी ठारीप (केबर पर)। माचार्य गिरणाची (बरम १८९ मृत्यु १९५५) आपका पूरा नाम है मामूदोमा टेकचन पिस्वामी। ये माक्सफोर्ड यूनिवसिटीसे एम ए ए थे। इडियन एम्पूकेममत सर्भिसमे इलाहबार सरकारी कामेयो का बोता प्रोफेसर है। उसके बाद पौधीमी १९२१ बाले मान्दोसनमें मान मेनेके कारन प्रेस मी गए वगा महमरामायके राष्ट्रीय कॉमरके प्रिन्सिपल होने के कारण मानायके नामसे प्रसिदए। पी गिवनामोगरीने मम्प पुस्तकले असावा काहिरासरे पुषम 'मालविकाग्निमित्र' या विमोपी का सिन्धीमे संक्षिप्त अनुगार प्रस्तुत पिया मोर र मामा मामा पुजा तिी। इन पुस्तकति मतिरिग इन्होंने कुछ निबन्ध भी कि प्रोफेसर मारामपरास रतममा माकापी एम ए उत्तीर्ण करनेके बार भावार्य पातानीके सापी बाप मुजफरपुर पामेव (बिहार) में करो तक प्रोफेसर रहे। सन् १९२११ में नौकरी छोड़कर माप पांधीगीर भान्दोरममें पामित और कई बार देम हो माए। गांधीनीकी मानानुसार १९१ मे सिन्धमें बाप रचनात्मक काम किए मोट माए। बों तक माप सित राष्ट्रमापा प्रचार समिति गम्यम रहे। मापकी मापा बड़ी ही प्राम्बामौर मैगी है। परिमापको ग्रामीण मापाका विप जाता को दो वत्पत्ति न होगी। मागका माप राम्प- मभा (एम पी ) साम्य है तथा भारत सेवक समाके मम्प स्तम्भ माने पाते है। रचनाएं -रिव पथ -१ मि स्पराम्प २ महात्मा बीपीम पी मारम हामी । बाहिर जीवनी। मौमिक - गौठापी पदिर में प्रामीम भापामै पापभे प्रामीगोका सिनन सी ही मोगस्पिनी मापामे दिया है। परोलिए- दाराप्यू होम्यू मीरज संप मनारराना तथा गुगल। चास-साहित्य पाराम बसपमा मीरापी (पग्म मा १८.) मे १२ पो तक मसारी गिमा-विभाग बनत अभ्यापकए।मापने करापार प्रमिउ नारायण - बाप अपमान मसारी हाइम्यूमर मुस्याम्पाप पामे पकान पाम किया। मिम्मी मापाको देवनागरी लिपिमें सिवने समर्थक है। रचनाएँ मिम्मी पामर ममौ हिसाब उमा सिन्धी नमुर । सामरार निर्मपात (सम्ममात सन् १८८१६) पे हिन्दी बार फारमोरे भने विधान है। लेग मिपू' 'गुष समीर सपा मालेब मनमन' में वर उपले थे। इनकी स्माती ममका मामा पपड पुस्मक प्रभागिता हुई थी। मंबाराम रपाराम पाकापी (बम १८९५) मारत सिमागमसे बपी पारी में भाग्नमें विभिन्न म्पान में प्रोफेमर पके है। मागका महन कामग बममें प्रोफेमर है। सिन्धके बाहर एकर भी इन्होने सिम्धी मायिकी मच्छी मेवा ही है। बाप मिन्धी प्रमिर एकाकीकार भामका मामोपनामा मारिग्म प्रकामित कराने पिनेर चि रखते है। इन्होंने भी रवि बाकी 'मोसाद'का गर्म मुगर मनुवार किया है। इस कासो फुटकर सेमक रचनाएँ मामीमा सहो पर टीपा प्ण मागा। २ मामराम पर्मरास मीरवारानी रचनाएँ -मेपठका पप-बर मनुवार तथा पोटे-पगरे नाटक। ती बसन्त पनाएं -रपि बाकी चित्रा पा मुम्बर मापा अनुवार। बिपि ५ निवन-पम्प (मिग्म मरसार रापुरमना) माहिर पीपनी पबवाहरलालजीकी मान्म-कवाका भनुगार। ४ पीपल तितोगतम ५. होनाराम ठास्मत मारोगाची नोंने कई नाटक लिये है। करत मुम्बाराम पर्मा मानम् मा मनुमार मरदार बम माई परेकी मक्षिण पोषनी तमा बाल-सारित्यपर ईव। मा कारनामा तमा कानियो। का प्रतार यमुरी पत्रमात (वीन माग) होकमाम्प तिमयकी मीता उपान्य पुनरें। पहानी साहित्य पी मासषाने हुर मग्रीम ग , हिशिनीम पा रप्ट मिनकर निम्मी पहानीरा मारम्म पिया। कैप्टन ने बनापरी लिपि ममात मेगा द्वारा लिपी मागासी राइरियाच पी मामे पाहत प्रागित कई पी। भी भेम्पक महरपनने प्रेम गा माला तसा भी निर्ममाम फारसे सचिनी मामा पानी मिली। पाग्नि भिम इस कालो प्रमुष कहानीकार यों है १ मासानर मामतोय-समूफ २ ममटमा भावनानी-~ीरी ऐ पवित्र प्रेम ३ मानकराम धर्मास--- धर्मा पौ बही मापति यो गम उसी समय हैदराबादसे भी मेताराम बास्वामीने मुनर साहित्य नामा मासिक पत्रिका निकामनी बारम्भ की। इसमें भारत के प्रसिर कहानी- कास्की कहानियाँ भनूदित होने मी निमर्म मुस्प कहानीकार रविवार रणवीर मुपर्यन उवा मुम्पी प्रेमचन्दगीरे मो सिम्मी पाठकों के लिए विपेप मोकप्रिय बन गए। १९१ में भी पूमपान रामपाम्ने सिन्धु नामक मासिष्ट पमिका प्रकाषित करती मारम्भ की। वही सोम यही एक पत्रिका दी जिसका साहित्यिक मुस्पाकन पिमा मा समस्या है। भाप मेखक साब इसम कहानियां भी अपने पी बिनमें का मौमिक पी। इनके मुख्य सेवक पे-सर्पभी मरफ मस्ता गायो मिर्ग नापिर अंग प्रभवास मीरपवानी ठपा मासानन्द मामचोरा। इसके महापा १-जन २-परमी ५- बासा ४.-'भारत रीबन साहित्म मपस नामक पत्रिकाएँ भी पूरा महानियां प्रमापित करने ममा। साप यह कि सन् १९२ से मेबर १९mar सिम्पीमें सैकहाँ कहानिमा अनूषित हई। इस बीच का मौलिक कहानियां पुस्तक रूपमें भी प्रभानित हुई। यहाँ स्थानाभावसे सेबाक नार्मोह ही उस्मेव किया जाता है. - पमिकापोश बाबा मन्दरममिमा १-पीजेठमा परसराम -श्री प्रमुरास 1-धी उसमागमती अनसारी ४--श्रीवासानन मामतोरा 1- भिमारिरमम (-श्री गोविन पम्माषी --पी बिहारी जाविसपा --भीम बिस्पापी -पीभवन पगमापी १.पी कीरतुवामापी ११-पी मछिमन एयपास १२-श्रीमानन मोहाण ११--पौ बीपनुमरियानी १४-धी अपार १५-पीस मारेपानी जामति-प्रेम ऐ पाप हाम्y मिस पस्तमगा ऐ मोहिनी सईया रेगिस्तानी फर मिधा कहा मदरी कोहिनि मे नमो नमानो धमान रोम विमिमी मामोरी निबन्म हम पातम का नियन्मार हुए, उनमम कामा नाम तो बा चुके हैं सपिन कुछ ऐस स्वर रह गए है जिनका रिशेप स्पसे उस्मय होना चाहिए। इनके माम इम प्रार १-प्रोमर साहमिह मरवाणी २-पी फनापन बाम्बामी पी मेवाराम (मगीय) ४--पी मोपिनयम भारपा मादि। नास-साहिस्प हम माम दाम माहिरप भी पान मात्रा प्रमाणित हुना। मी मेधाराम पास्वामीने गुरु फुड' नामक मामिक पुम्निका सारा श्रीमती नमना हीरानम् वा पालनि जी बारी बारा निकलनेपानी मामिड-पषिराने इम क्षेत्रमें कई ग- अंग पुस्तिकाएँ प्रकापित की है। राष्ट्रीय साहिस्म बम काबमें विभिन्न मारा रचित पुग्नका महापराबाद के कौमी साहित्य माम्ने बिमके सवाला मी भेगमम नपत्यानी ये परममनोंडी बीवनियाँ पपाई मा उम समय तक मिल हुए विभिन्न काबियों हारा रचित राष्ट्रीय माताको मंगमित कर पाया। इमई माया मी प्रभुराम ब्रह्मचारी तपा श्री रीपचन्दने भी कुछ पुना नगीवन माहित्य माठ द्वारा प्रकाशित की। धामिन साहित्य इस कालमें मार्मिक माहित्यका भी प्रपुर मात्रामे प्रमापन हुमा। अन्य धामिक पुम्मको मतामा मामी विवेरानव तमा म्वामी रामतीर्पगरी पुनकोश भी मनुवाद हुमा। इस ऐप मुम्प लगा है-पीपान पान मारपी भी याराम मामूराम सील पीठमम पामयम पं तमूराम मर्मा पारका प्रमारार्मा यी फाहप- मेषरार माबिम मावा निम्मभिनित प्रसन मप हमरे पिए प्रयाम्नास -१ थी पानरार दाट, • ब्रह्म रिचा माला 1 मनातम मम ममा ४ गुर मगन मोममाय । माय ममार पिया- नाँचगम मामायी बादि-आदि। नितीम स्पान-कापरे रवि मिर्गनाच परावर्मन मैने चार डीर बामी पुम्मिनाम पर हरिया है। श्री मिगिनकन गमि' मा बर्मन माप सामने प्रस्तुत ही है। इस पाम ऐप कपिसोपा मक्षेपमें पर्मन इस प्रकार है- १८ ल पत्रिकामा अपित कहानियों और भारावाहिक उपम्पावि माता मौलिक पहानियां उपम्याप वा विविध विषयोपर मिल प्रशामिल होने को। स्वर मममेर, रिस्ती पमपुर, भामराबार मादि स्थानों में भी साहिस्पिद प्रमति पर पकने व्यी और बब वो मह रहते हुए वर्ष होता है कि सिन्धीक सामियकार सममहो रेषकर सतक भौष माग हो गए है। बिना साहित्य सिम्वम मिमिव हो पुरा पा उस सीमा तक पहुंचानेमे कोई कोर-कसर नही पती गई है। कहानी साहित्य भारतमें मानके वार सिग्बी मापामे प्रपर मात्रा धनिया सिधी मई है। बनूषित मानियो माहारा भी २ •-३.. मौमिक कहानियाँ उपसा है। माँ मरित पानिपोषा वर्मन न करते हुए, मौलिक कहानीभरोकी लालिमा मात्र ही पीमा पी। इस काम मौलिक हानीकारत प्रकार सरप्री-बानमा बोलागी मुमत बाहमा पोटी होपननवादी कीरतु गागनी बगतु मारियाबी भासानन्द मामठोरा ममरणा हिजोपनी सम्मिनु एबपाक गोविन्द मादी तारा मौरपानानी मुन्दरी उत्तम पनामी मोती प्रनाथ अप्प राही वा मचिम रिमोर पहा उत्तम रेतनु मागपासा बासु तालि गुरु मासिनाणी मुरसी मुवी नापयन मनागी मात्माराम कालवानी फन्न पुरमगामी माययपुधारती पहा प्रकाप मोहन पापना विमिन वटवामी मनोहर मह राम परवामी होकनाय बेटा हरीया मारि सिम्मी साहित्यके मौलिक पानीका रूपमै प्रमित है। भागकी मिन्धीकी मानी अपना साहित्यिा स्प समीचीनता और नुनलाते पहन कर पीई। नायक वनुष्प मापा भी गलती ना ही है। मामका कहानी- कार भाव तमा रमा पसम सामञ्जस्य मानेमें सतर्क है। नए कहानीकार को बिभागनबार हिमाकी गार पर गौर अपने पुराने बानीकारोके परम मिहोपर पहार हिन्दी पनि साब फारसी धम्म मौहम पर है रनकी मापा पुसमगोर ह पाती है। ग्भर फारसी तमा परी कमॉक प्रयोग करणेकी नहरती बम कड़ी है और पुराना साहित्यकार ऐम दी मानीदारोंकोसता है जिससे मारपीस मन भन नए सेगा महम-मरमपर इम पेषम पदार्पण पलेरा माहम है। य प्रमनतारी बात है कि भान हम पेयमे गहने मी तर भारतना ही नहीं महीनही पनि-पत्लिने मी साहित्य मृगनमें सपना योर दिया है। मिधीपी माली भी गोपनके निमार मा दी है। मेगा शिपिट रिपयापर गनी वा है। मामाणित गनिए अन्तर्राष्म पोयम प्रगनियार मारिबोप विषयोपर मुग्गर रपमाएं हो पी। मित्रमे माल मानेर मारकम्पों मापा - मम्प म्पानोंपर मिन्नी कोम पिन कम मुगरह मनमा मपनी मियकी स्मृति मिन मानि कहानियों मिली है, उममें १-गामिडो २-~सिन्हीम या गत गोर पनि मि मादिमानियार सपा भी मानद गोगावी प्रधान है। मम्प मुम्प पातीकार गौर उनकी एनिमॉकी मूली इस प्रकार है कोरत बाबानी-१५ पुणे पो मा उदरामु का मासो' २ मुली । प्रवा पा ४ बम्बई भाममी पर्व गोरिति ममानी न मम्यो हम मिनबीम गोबार . नए बग बापमाराम ८. महमद राम मादि। मोमि माम्ही-१ बर्षि काममाणिकरा मनायो मा ३ पाप को पहो ? मानाणी मनिगम सरिक यी दम्पा मादि। होगमापरते-१ पामती म २ पाप मस ४ माडी गाविद तीर्थमाना। मारामन भारती-जमम बरी मजमिभचे। एक ऐम भी सम्मति पाइम क्षेत्रमें मिम्बुमार मागे जा रह है उनम मुस्प म प्राई मुमारी रत्तमचयापी और गमरे पति मो रत्तम-१ मिन्धूम या गप, २ ममता मानापार ४ मपी मुने र यहिपए। ५ फोगानु 1 बग्पनु . कामीरी सारी ८ मारक म बारित पो रत्ता- पावन मापी २ बात नौ बमिनारी । पापबाट। कता प्रा-बर २ ममी मिराह मास सरा या पूम ४ मिम्मत मारे जीनेमें मार ५ मामा मारि। तारा मरिचमानी-१ गोमु ऐं होग, २ रीपार, पर इन भाषा पोपरी होराना-पीन नमाने पमपौन पहा । रामु पंजवानी-पार पाडूं। चत मापाता-मिन्त्री गगन परा। माटर मालमें भाकर मिकी माहिरपणाने मारपीमार पम म्मान दिया है। मन मभिर माटरी पम बिनि मनुवार भी पमही रिए है। श्री पू म ममानी नामसार: दोर मी इम और सम पान दिया है। परी मोमय मागारों माम नया पनाती मृती प्रती मानी है राम नापी-मिगु गा मा माटिक मोर पूष पाती । रात ताति-मुर्मा गा मा और निपर्टी में मेट्रो । चेतन मुगरापीमाफ । - र गही- माहो । मोर पग-रण काँहयो । भूविष मनुराम-जीयन ऐमा । पोपरी होरामपानी-पामोष परियादु । उपम्पाम विमानन बार भारतमें मानेपर सामीकी ए उपन्यास भी मनुवार भारम्म हो गया। भी गत मारपानीने मपना झनी मासिए पमिका माम बसर कहानी माधिस माता" रखा मोर प्रतिवर्ष छह मुम्बर मरित उपन्यास प्रमपित इलेकगे। उपम्यासो लिए निम्नलिविय प्रापन महाने सो कपनके साथ पराम शिरीडावियनि-बम साहित्य मामा"। बैठानन मायामाने ईवयमापसे निकम्मेपासी भात वीरन मामा" का पुनर्मल मुरू किया। इस रिण "स्वान पिसाव पर पानि सबसे बड़ा पोम दिया। इसके अलावा पूमा मममेर, बमपुर तवा पिम्ती बारिमें भी कुण प्रकापन पर स्थापित हुएई पो इस विधा को सतास काम कर है। यहाँ मै मनूदित पुस्तकों का मन कर मोहियोगारेमही मिना। मनुरित उपन्पादि बारेमें इतना मना ही पर्याप्त होगा कि भारत के मुस्प मुस्म पपन्यासकारों-बीवनार अर, ममम मुन्धी प्रेमपनर बना बारिसे रपम्पाम मा म एमग और प्रमापासी पपासमारों मुम्प मुस रचनाएँ सिम्पी भाषा बभूषित हो चुकी । निम्न प्रान्तम बापर बचनेबारे हिन्दीपकाने उन मास्तोंकी रिप रचनामोंकी भोर भी प्यान रिया मोर धीरे-धीरे उन पनाराका मनुवार हो रहा है। भाख मानेके बार प्रभारी डा0 मौरपानाधीने इमापर कली मामक पहला मौलिक उपम्पास सिता। १९१२ से ही मौलिक उपन्यासकार भारम्भ हो गया। श्री गोविन्द मासी को पाने पानीकार के मब उपम्मामार बन गए मोर भाग मेष्ट सपम्मामारोंकी कगारम नापको सपना होती है। पौ बोषित माह पह एपम्पास शिदीमें नौ मणिपुरे है। इस वर्ष ही पनि १-मा २- रिपीमचे ण मौर - जीवन भाषी नामा तीन गान्बाम मिले। एमी बर्ष भी यप पनागीने मिनो या मर मामा उपम्पात १.३ में प्री मोषित माहीने मन यो मौनु या पली मा बलर पानिपुरिया नामक वा सम्पाम मिले। मुनरी रत्तमचन्नीका फिराप पास मामक या उपायाम निम्हापा। हम उपपाम पार पामती मुन्। उनमनामाने उपन्यास मगम सफा पात्रपूर्व सान बना लिया है और पर कहने में कोई पुन होगी कि मुन्दरी भाग मापा मोर कला वारि विचारम इम क्षेपमें अनुपम है। यपि भी गोविन्द माम्ही पेप्सम सपम्पामशार फिर भी मुनरी स्पान पिपिटही है। इसका प्रमाण यह है कि पप भन्दा इम उपग्याम दो सम्बरण नियम है। इस वर्षमा अन्तिम उप पाम भी शिको रामपामा बारा सिविन गुमान पा लिम "भारत बीवन" यामाने प्रकापिनमा। १९५४ मैं पूर • मभिर उपन्यास मिडल। म्पानामाबमे यहाँ गत पम्पामकारा नाम तया रचनामांकी मूषी ही प्रस्तुत की गाती है. सम्पास प्रध्यमम गृह १ पारित मारही रायी प्रशमन मह - मोरिन्दमाही पषत निमाई भारत तीन वह १ मोती प्रणाम मन्यापउनामा रिममिम गृह ४ मानलमायामा मानी गर ५.मुतामिव पीत मरपम यूह १ मोएन परमा मगर भारत गृह ७ मोहनकम्माण भारत र ८. पान पमिहामी महिनी पारी भारतमा इस बारा "मारर सारिप याना"ता "प्रमान माहिरय माना पप्रपापित किनारा और ममपटनाारा रचित पति पापी माहे और रिन्पो मामा दो मषिक उपम्पाम निकल पुर। प्रसान पहा मनापा माणादिक और मौलिक पपिसामिग हो मुनर निग्य है यदि उना मंचन पिया बाए तालिम प्राप पार दो मध है। ऐनी विकायम “लिवामी" माणाहिक मुस्स है। ११...परिया है। नई दुनिया मामा एमार साप्ताहिक है। लोक पोत सोचलीता मं करत. मी माग्यप पारती नुप प्रपन र है। रनोभागीर जमी पर-पतिामा हपए है, पुस ममी एक नही पर है।

२२ फुटकर-साहित्य बम्बहसे निकल्नेबारे हिन्दुस्ताम निक पोस्टिमों की मोरसे रितुस्वान साहित्य माला का पाच-वसि प्रकापन हो पा है। इस मागी हाय विभिन्न विपर्योपर मुहर पुस्तपदोई। मममेरकी सिन्ध पशिक्षिय सोसायी तथा सुन्दर साहित्य मातोने सरकार द्वारा प्राप्त सहामवासे एक मई योजना तैयार की है. निसरा मरी सिन्धी वा देवनागरी लिपिमें पाप ही पुस्ठ पकर प्राप्ति होगी। सबसे मुम्प प्रकासन है हिन्दी-अमिमा सिम्धी कोप (देवमामरी लिपिमें ) इसके सम्पारक है सर्पपी दीपचनची देवरत्ती सपा प्रमुगसमी बमबारी। यह कोस पापही प्रकाशित होकर बनताके सामने मानवाला है। बा-साहित्य भारत के विभिन्न स्वासि पास-साहित्य प्रकापित हो पहा है। मी गोर्थन महबूबानी भारती" को मायूँ नामक मुम्दर चिसि मुसरिया संगीत सबपर ...) पएका प्रसार हारा पुरस्कार मिम पुस । पी फतहमान पास्मानीको भी मारत पर्पन पर ५ .) रपऐरा पुरस्कार सरकार परामिण पुत्र है। इसके मामा यी रोगो सागीने बनकि किए गोही मुन्दर पीट मिले है। मगमेरकी बामानिनी पारी में फुलबाही नामा मासिक पत्रिका विमागरी लिपिमें प्रकासित होती है। देवनागरी लिपिमें सिन्धी पुस्तकें अगमेरकी "सिम्म परिधिम सोसाइटी बारा सिमिनायामक लिए विभिन्न विषयोंर पाठप पुस्तक पुकी है। भारत वर्णन' का रेवनागरी मिति सम्परप प पा है। बाकी हिदुस्तान साहित्य माना" मा पार स्थित भकमग हाईस्का" रा का पुत्र प पुकी है। सबसे बड़ी प्रसन्नताकी बात यह है कि रिस्ती सूमीवसिय की मोरसे माठ पुस्तक बनापरी लिपिमें पप ही। पर हमारे माहित्यकारी किए गई गर्षकी बानि पुरानोका अनुसार हिन्दी गुगरानी मराठी या मंपिलीम भी हो पुत्र है। ममें मुगम सावकारई-पर्यपी मुबारी उत्तपनाची उत्तम करितु मापापी पोखिम्प माही बोविन्द पमाची मुल बाहमा तवा मोर " भारती । म मनापा एप-यो हेवको पत्र पारिस्तान मामाने में भी प्रमाणित परामे है।

२३ भारत सरकारका सहयोग का मिशानोंकी पुस्तकें भारत सरकार मैपना पुरु ट्रस् या बारमी द्वारा प्रकापित तथा पुरमत हो की है। ५...) का सबसे बड़ा पुरस्कार पी ती बसवमो प्राप्त हुआ है या ५ .) ह का पुरस्कार भी पोगन मायामी श्री फाइम पास्त्राणी हया थी परसराम मिया' को मित पुपा है। सिम्मी-साहित्य सम्मेलन भारतम मामेदे पार सिग्मी-साहित्य सम्मेलनको म्पापना हुई है। यपि सम्बत् २... में बादमें विक्रम मम्मेहनके बक्सरपर मिन्धी-साहित्य सम्मेलन भी मामरानीगी सभापतित्वमें हुमा पा फिर भी भारत इसका उद्गम-म्पान माना जाएगा। इसके अधिवेशन सम्मा, पिली मागपुर, मांधीधाम मौर भोपाम माश्मि कम पर्वधी अपरामदास स्तराम प्रोसर मारायणराम मस्कानी प्रो एम मस्कामी प्रो साससिह बरवामी माविको मारनामे हो चुके है। पाकिस्तानमें साहित्य-सृजन विमाननके पार सिग्य ( परिराम ) में भी माहित्यकी पर्वतोमुवी उमति है। सिम्धी-भरपी मोसाइटीने बिना किसी भेद भावके हिनौं बारा मिवित मप्राप्प पुम्जोका पोर्गोशार किया है माद उई मए मिरेसे प्रमाणित गराया है। सिन्धा-परवी-पोति महावा मुस्लिम प्रायो- मोमाइग भी इस दिगामें काम पर पी है। अम्प मामिक पत्रिपात्रोके पहाण मोर भई विगगी माम मामिक पत्रिकाएँ बिगर उस्मेवनीय है। मनाबा यह स्वीकार करने में कोई मस्युक्ति न होगी कि जिवना मारिप मिग्राम भापी ताम्मीमें प्रकाशित नहीं हो सम रतना माहिश्य यहाँ १५ पर्पो बदर निधी विधाोंने प्रमागिपराया है। प्रमाणस्वस्प १९५१ मरम्पर, दिलीमें माहिस्प मारमीने मरसार तारा र १४ मापामा मारिस्परा प्रश्न गिन्या पा रममें एक राम मिन्धी भापारे पुस्तकों भी पा गिममें रिमिन्न विषयोपर पुनी हुई र पुप ली हुई पी। परि तौरमे पान-चीनी पाए, हो रिति होना fr पर प हमारमे स्पा पुम्रे मिनी भापाम पी।

२४ इस प्रकार हम देखते है कि बाब सिन्धीमारिल पिरिम विकासोन्मुख ही है। बार ऐसे बने मेहर सिन्धौ पापामें सामने माऐ है जिनसे हमें निष्ट भविष्यमें कुल भूतपून साहित्याचे उपसम्धिको बामा है।

किशिनचन्द 'वेवसि' [कषि-परिचय ]

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किशिनचन्द 'घेवसि' - फिर भी यह मिन्धी काम-समम मूडी सन्तों तवा मेदान्ती माधुर्मोको काम्प-मुरमरिक प्रवाहित होने के बार पो तक एक चुप्पी रही। बीच-बीच में बो करि पिटी-पिटाई मातोंडी ही ममिम्मम्ममा करते थे। १.भी पनाम्दी मम्पम पुण्यपियोन पोर लिया यह उई पर्योकी मामी की पिसमें एक- मियागी मरवा पाए मौनर्यकी ही परमार दी। -मप-मानसिम कारप राष्ट्रीय समेग भारतके परिचमी मम्बाके कोने पाहुए सिम्म तक भी पनामा फलस्वरुप तोलाराम काकानी तपा नाचम विवामियके राष्ट्रीय बीतोंकी प्रतिपनि मुनाई परी। कानमें मत्पति महोगी कि दिसिनपा देगमि के काम-क्षेत्र में पराम परम मिनी-सम्पमें कई चेतना मा गई। मम ही भाषा इतनी पमिशामिनी तपा मोठयपूर्ण है कि परि इनका बन्म किसी म्पतम्म रेसम हुमा होता मपमा पाँ कहिए कि इनके निहिके लिए सरकारी मोठरीमे मतग किमी सनात्र पृत्तिका महारा होता तो इनकी मापा र माग रनम्तो गो सार प्रान्त नवयुवकोंमें एक नया ही पोल पर ली। एसे पारिको याम रेनका मामाम्य मिग्यको प्राप्त हुमा। पिभिनय पमि' पूषर मुस्ताममे माफर मित्रमें बसे गहाँ मायामा मगर २५ परपरी १९५६ में विपिनपनीमा सम्म हुवा। माप बम दुनिग मत (सिम्मी पापा) की पढ़ाई ममाज पर मम्यापको स्प नरकारी मौरीम प्रविष्ट ए और मन ना मिम्मो गामि मम्मा, रहर मापन पेन्मन प्राप्त की।

३० बसि प्रेम बेबसि माई मे मद्यपि अपने मन्तिम बस पर्पोमे बिचना बन्दर पिपा पा फिर मी बोको नमुना सके। न मन्तिम पोम इन्होने बाँके थिए यो ही सिषा पर पौत मिले है। मण चिमको सारी बाप बमोके मार भतीत हुई हो बह पन्नों को कैसे मुमा सकता पा! इमकी में रचनाएं पोरी पेर में पीई पिसे सरकाले उसे पाठप पुस्तपः स्पर्म स्मीत किया था। पियारी नामा कविता में बच्चों पारा पहम्माते मसी बालक माहपू तुहिमा पिता परमात्मा गामा, निराम ने बि बोम्मू निराला या बनी नामा पनि मोस्पनि ऐकोमियत जो मार्ग मोजाता? हकीकत मसा भार पिता कि वो ताला | [१ परमात्मा । हम तुमारे ही बाहर है। मठे ही निपी मापाएँ निपसी पन-सहन मार पामार मेश्मि इन पो भापामों और पातियो कारन हममें भेद फिसलिए! बास्तबम हम सब भाई-भाई है और एक ही प्रम पारा पिता है!] मामे दिखते है पाति परम रंग पदो साईन अटिमा क्षेत्र हारहि सा रो रोम की मां पर। [प्रभु पाम पाति वर्म र समा एपका कोई भेष मही है। में सबके साप प्रेम ही रखते है उनके पास परमारोपका नाम तक नहीं है। सन् १९२१- सर्वस्व समर्पनका मन इन्होंने बहुत पासे रेवा वा। २६ में सिपीको नाम परिवाम मापने पिता विहान में बार में मई मान न म पनु बाहि गाडी त मेरा ये मनु + मत माहि मुशासित भरिप रे तमु मतम् - तबानो हो त मिलिट्री बबन मपरिकी। की तोते रियो बस मिा परमो का विमो बार।

[यदि तुम्हारे पास धन है, तो गरीबोंको बोट दो मदि मन पर्याप्त नही है ता मनकी भेंट रो मरि मन ठीक नही है वो तम अर्पित करो मोर मदि तन मी सम्म मही है जो मी पपा बोष्ठो। फेकिन तुर्म पुन पुण्मा बम है और परोपकारक लिए भाम्प ही अपनेको म्पोजर करना है।] स्वगवास सर्पमास होनेमे १० वर्ष पहले बेबमि सार मे एक प्रकारस पानप्रस्म हो हसिया था। पाहर बहुत ही कम निकाले मौर परपर पर ही अपना पदक म्पबसाय बाद होम्पापी इमार करते थे। पपि सके पिता हाम्पोप म होकर पूनानी हकीम थे। फिर भी ऐसा कहने में मरमुषित नही होगी हिसार करता उमका पैदा स्पषमाम पा। इन बम पोमें इन्होने अपने इष्टदेव भगवान भीरममें चूर मन रमाया मौर मन-मास्त्रका गहरा बम्पमन रिमा पा। उन दिनों प्रति रविवारको भार महरके किनारे बस हुए मानवायमें पीमा भमबीता बबबा गुरमेषको साबना मौर गीताम्ममि पर प्रवचन मा करते। 'बसि साइ'ने यचापि तुमे भाम परनविक मान्दोहनम माम नहीं किया फिर भी रमके वयम साम्प-प्राप्तिकी पाप गारी पैठी हुई थी। स्वर्गगामसे पहा माप पौर महीनेको सम्बी अवधि तक बीमार एं। सन्तोपका विपय यही हा कि मापने अपनी मृत्युसे पहले भारतको स्पनर रेख लिया। २३ रिसम्पर सन् १९४७की शामको माप सर्पबासी हुए। रचनाएँ -पारु देपछि २ पारी पाए ३ भौजी मौत (बन्नी लिप) ४ गुरु मानर जीवन कविता। कपिने अपने विपममें स्वयं इस प्रकार डिवा है - मेर मामा मुसु को हासि होतम बासिते माहिरिरत पा मियत कामिन बीसर स कर। [पुफ मोर मा निमियोंको विमन प्रभारप पोसनक मिए प्राति महाकविराय पुम्मी ममपित परली है।] इमो पवन तुमार पमि साहबन अपने अमिम नि भारतीय और मृगी तान-यापकी परिषयो मुनमाने म्पतीत पिए, फसमस्प मामूही मिर मोर पंमा हरि नामर पबिना प्रराम माइ। इनरा वर्णन माग रिया पाएमा।

मिन्द सिर मिान प्रोमर पालसिंह जपानी मिले है- ममिफ से और 'पद्रकान्ता रोगसे निकले ए मुमतानों मोर दम सानो बोसमन और ममीर हमाँ तारमा माँ पहार परमो बनायालयों मीर बनुमन बारामों मम्म परिवों मोर महनि एक तरफ दिमाग पर किया पाती इसरी परफ ऐयारों भौर तिमसो गवानों और गुण कमेटियों वषा पिजीके ननि रितको मागम कर दिया पा उस समय मंतिम उमा मागू पिव पहाडको रचनामोंने मेरे लिए सम्बोपनीमा काम किया। उसी प्रकार पर मा बौर परमाना गुप्त मौर गुप्त स्म भूसिफ मोर पाम माहो माब मोर ताल मार और नियाम बहार और पराप बारि पोपी रपमा और मकाने बैत बानी मनुप्रासों तमा ने माना सिरीफों (l) ने मनको पुखी कर रिया था ठप साकामा निससी एक परीर मप्यापक मी लिपिन- पार तीदास बत्रीम देवसि नामसे यपुर पोतों सुनर भजनों मोर मुखिमत्ता पून सनकों ( सामूंगे सि! ) बारा एपित बापु मगरको मुर किमा बौर निराणामस बापागल प्रष्ट की। पाह सम्हयका प्रमाब मैने मी बेगसि साई को बीवनीमें रियाया है कि मारम्पमें उनपर सारसमुह सतीप सपट तपा मामी बाधिकाधिोका प्रमाण पाये सर्व इस बातको इस प्रकार प्रकट करते है माहि हाहि त गरि परि पारी प्रिति श्री हर तोकसातिम ता मंच तरी मतियार बाहिद बापे-माहीम मा मिली प्पो गई गुरु को को परो, अपना देवति ममिति वा ईतो हविकार माहि। [पाद अमुक वीफो काम्पो बारेमे जिनते है कि प्रत्येक दोहे में प्रेमी पहा है और प्रत्येक मती ताति (कसरप) मे प्रेमकी ही समार(मधुर सम्भार) पनी है। मरिणाम उचान में मुझे भी फूलकी पतरी मिल गई। उम फूलकी परीमा पौरम उनकी गोति सवार कुरित 'सूरी सभा मारिका पवितामाम मुरित है। हम्न नाम गौतमे लिखते है दारो संसार पो परिमिनिये मम्पा दाम दिये माग गुरु, हार वं मतुर को मुहापि रिप मोस मानि या भणे मारता पहिराम रिपे १३ सात, पासून रतन सौन, पो मामि रिये पानी हर मिन्स बपी तूह में सरकार मात ताया हर रिति हा हल सरिकार मपपी। [ सारा संसार सौर्य सी पद्मिनीको दान दे रहा है बाग फल माझाएँ पाइसकी मुगन्ध मर्पित करता है समुद्र पर जामनपूर्वक मोतियांनी गोलियां मर-मरकर देता है मौर बान रेती है माल मा सोना गांधी मारि। प्रत्येक वस्तु इस नौन्दर्यक सरसरके माममे बमुसि भरपर माती है मौर इम इनकी सरकारी कामे प्रत्येक हपकी सीमाएँ पमीभूत है। ] - पपि निम्नमिचिन पंक्तियोगरा सस्वम (प्रम) का मामास प्राप्त करता है। था पिसानीमचे मे मुहिब सरी भूरत में, मुंह 'सि' पाहकोकीम मा तमीलित में का बिना नई मुझे पान न थी तिरत में बाबा हस्त थे सका पूरत में को सपे मार को हवासिनि मत को परे र हरि बीबमें रिम्पार बो बोर करे। [पो मानव मिगानी (माप प्रेमी) को अपने प्रेमी (दलित) में मातामही मानन हकीडी (प्रमु-प्रेमी ) सम्पूर्ण प्रानि मनुभव करवाई उसे इम मृप्टिमें प्रमुषी मुनरसारे मतिरित किमी मम्प पस्तुका मामाम नही होवा। परि कोई.इन नियोंकि सामनमे मुक्त हो सके तो सत्य ही प प्रत्या बस्तुप्रियतमा न पा पाए।] माग पर तम इन्द्रियों बनीभूत' त इमिमानीठ माननक मुता मनुमन नही कर पाता। मानर माया ममीभूत होकर बिरामना पह मस्य सबम्बम्पनी मप तया मनेर मम्मुमार पोमें एक ही पराका पद अनुभव नहीं कर पाता पिन प्रभु मीतामय है। सम तो नए-मए रंप रपारही विविध मौर विपि सोनामो बारा मपने प्रेमी मिाना नागा है। 'पमि' माई भने गोनि नाम: गीतम मिना मपारी भाति प्रापी पोरसी मति बिना मा पी बरंगी रचाई रमपुर में रंग म्यारा दो। [ मनारिबार मनन्त होनेपर भी तुम मानी ग्पना (भूषि) हाग म्परा होते हो। रमी (गप दिन) द्वार भी गपुर (पत मूटि) में मप-मए पात मिली कि- - 1

तिफती बेस में साई! पसी पो हस्त मातीमधे
रचे पहियत मनो कसिरत करीबा पतारा हो।
[ऐ स्वामी! सिफाती (म्प और गर्न ) बेगम माप मादी हस्त (वम्यान
सौन्दर्य ) का मानन मेते हो मौर एक्ससे बनेकत की सृष्टिका कितना प्रसार
करते हो!]
कप ममर में यहाए प्रेमबी मगिनी
रिपन सा माप बाती रवी रितिमा एमारा दो।
[ हे प्रभु, माप निराकार होकर भी रूप मम्बिर प्रेमको मम्नि बहाकर,
मफ्नी माति राममेरे लिए हरपके हारेका निर्मान करते हो।]
भमबानको भी इस सीझारा मानव भी प्राप्त होता बरबह मपनी
मावि देता है।
इस मीमाममी मुष्टि हारा ही भगवान ममुप्यको सपना मेर मषा
रहस्य बताता है। यपपि कफिसी सायरने कहा भी है
दिया सब मपरमपना मुराग दिया।
[भगवान सब पर भी अपना मेर मही दिया।]
केमिन 'बसि' इन्सान नामक मौतम बताते है
का तुहिये के बरे नर मो सिम हा 4m,
मेसिन हा मेर बताइप बो दिया।
[ऐ मनुप्र!
उसे यहि अपने भेद बहानेका विचार न होता तो यह
तुमपनी बह (मारमा) से पोर उत्पन परता। हफिनमा मेष प्रेम
सिवाय प्राप्त होनही सम्दा।]
तो में यमा गई प्रेम भरी रिक्ति पे भरी,
हो तरह मार को मेति मिहागबो बिमात ।
[तुमको भगवानने या प्रेमपूर्ण हदयसे मरा दम तुम्हें अपनेसे विमुक्त कर
(मरर) अपनेमें हीन कालरा पिचार पा क्योकि
एक पारी न हने रिति, मत कहिगी,
हो न ताम्न सा को पिरत मे गाव मो नियात
[मा मिपा रिमी मम्पमा हरपपर पामन हो मही मम्ता उस मफ्नी
एसिहारा तु पाने विचार नही पा।]

+- - परि भमबान तुममे प्रेमकी ममिहापा रखना है तो वह भी तुमपर ही अपना प्रेम करिव करता है तुहिये रविना त रस्मो हुन हा मान बोर हिने ते गप्पो प्रिति पचाइनमो निपात। [ तुम्हरे निर्मापपर ही मौर्य पराणाप्य पर पहुंचा तुम्हारी सृष्टि कारा ही प्रम मपने प्रेमको परिपसागस्वामें पहुंचाना विचार करो पे।] प्रकृति-वमन पपपि गमि महिने प्रातिका खुमार वर्मन नहीं किया है फिर भी यहाँ वहाँ रमो डीट हृदयको प्रपुस्तिय करते है। बेगम' महिने प्रत्येक विषयपर मपनी रचनाएँ कीह पायर ही कोई ऐमा विषय हो जो उनमेए पापा हो फिर भी इतना ला पोमा प्रित्येक विषय पर बना करते हुए भी उनका बारम्प मपमा प्राधुर्म मही है। केबस उनकी मार्मिकला स्पप तक ही अपनी सबनीको सीमित माह। अणु। रपानका वर्णन करते हुए दे किरह- कुसारि कह मारो पुतनि बी पूम धाम काम काम ते शिपा गुरु सानु मामु सामु पो, पुहार रिपे पिरस नाम पानम् बताए गौर मी, मोरनि मुठ मुशाम् । (बाप बहार') [ उपान पूर्ण परिममें पूप रम फूलको बाहर का मई, प्रर्पक पावापर सास फूवित रठ में मार पुलगा दृष्टिको उपहार सस्प माफिया प्रदान पर है और हिमकण पोम्मे मोतियों मुहीम पर भरकर का एहै।] समी माता के मार्ग चमक मेरे पुतनि का, बस्यो पुलमारि में गाई, मार को सोन मिनियो। पुतानी रमा प्यासा रिमा मगित रे सोपा ने मतगता, जब महाप महानि हो। [माता साती पर या है, मेरे चमक या है। ऐमा मासूम होताबीच पांकी पारिण हो उठी है। नया मोड़ श्री गमि और मृमीरपरिवार मध्यवर्ती मा भरपी बार पारमाही पनों और ममनविपके प्रभार पारग मायरामें गेमूत्रे दिसा मार मात्र समरती दमाश पी। मिग्री मम्यता या मनिषापामोपी निर मी पार न पा ममर पी 'मेचमि' ने पार लगामें मग मोर उपमा पिया।

- जनरे कामका अध्ययन करनेसे पता बसता है कि पारसी भाषा तमा छन्द-पार पाता। यपि पाहातनि पाइहातक बन्धनमें बको ये फिर भी उन नियमोके न तो की ही बने बोरममिवारीही। बक पर भाषावपमें माते तो 'बरन' 'बार' 'काफिया' और 'पारमारि परे ही प बाते और भारों की मबीडी तह तटोको तोरकर बप्रसर होते। मी बमि कहींगही 'मुन मोर मयुत को भी नहीं भूने मपर गर्ने भी उन्होने गए गसे ही प्रस्तुत किया पारी तरिवार रति बिति तन्तु विक्ति सम्पायु माहि, पुल्यम्पनि माँ बाप मन बन पुठो रे ग माह। बगहाँ बापटक का कठोर हरप है यहां युक्ति किस कामझी। भार सवानमें निचय ही युसर साथ भत्याचार मगर उमी समझमें ही मियत 1-]- अभि सका दुनिया मई ता हाहि बरसी गायु मुख रर्स कार दुनिया, रितिस्बा रिति मावि माहि सतरसि ताबह देवति माह ताबा तो कमे, मा मामिनि कारि सुरा मावा माहि। [प्रसन्नतापून संसारले मुबसे अबसारपूर्ण मावरनको हटा दो क्योंकि पो इसका मुतापर्म बर्मन करते है उनके लिए अप्सरा दुनिया प्रियतमा बार मसम्म आया है। मनमुष ही 'वेबसि मे निपणापारियों मार संसारको दुयपूर्ण मामनेवालों लिए माया मार मानमा साग दिया है। मालूम क्या मममार उरहोंने अपने लिए बम पा उपमाम बुमा मास्तबमें रेपो मबत माणधारी। मामक पीतमे बाप मिलते का दिमागे न पटक माहिबसिन बनी माहि दुनिया मगरि धूम मचाण बो सिपात। [परि ममारम धम मचानेरा तुम्हारा विचार है तो तुम्हारे सामने कोई पामा टिक बी मस्ती। हो यदि सपोको बम (विवा) मानो।] जीवनका बारेम दो हमारी पुरा भावनाएं है उनरा परित्याग करनेका परामम ले हए गिणी पबिग र मुनयनात है हिनारे बहिर माहे तुहिनी बातो पिसी मा नोगे ना दो तिती दिएपी। [मुमारा यमन सीबम बिना किनारोगा मागर है सिमका दुलाला बोर मापवान मान बैठायममुष माय मारप मोर ममर है!]

७ भूमि परिवी विकिय हो पम मिगु सातिमु मुगाण, तो पो मितिर्पत सते बरि सुमाती मिली। [पप्पी मीठर दबकर भी बीर मुहर मोर सनक मा ममि तुमने मत निमृत पौधेमे ही जीवन पहचाना।] जिस्मानी भुसाए म मो पी र मागावी छ न छाती मिली। [रिस समम परीरिक काराको कापर या गीवन मानापमें उपमा है, तो स्वतन्त्र होनेपर क्या-या नही कर पाता1] परमि पीवनको पारमत मानते है मौर सार-साप पुनसम्मके प्रति भी सस्थापान है हरि हपाती मम्मी पुन हार हस्त में पपी माहि होम हिकिलो पात हायम हयातो गिरमी। [मस्तित्वकी मालाम प्रत्येक जीवन-पुष्प क्षेत्रीय स्माम पहन करता है, यह प्रस्तुत पीवन ही केवल एक जीवन महो।] मृत्युको भी ये पीरमका एक परिवठित ही मानते है. बम हा मेस्तीन ऐं नाहि में गाम मौतु हर दुनिया मध्ये हा हिन तहि सा मामु मौत, बिबपीममाम हा प्यो राति बीमारानु मौतु मो ममरता को मुगाए मुद्रह सौ पैमामु मौतु बिरीमी रोम रोमनु नितु नमामि पो मनों राति से परें के रोरो मोरिनु पर्मा। (नौतु) [मपि मरपुषा मन्तिम रुप नापला मोर माम्निमें ही होता तो मंसारमें मापदम प्रसार माधारक होती। जीपन-मच्याफे लिए एपिम ही मृत्युम्पी विधाम है और प्रभान ही ममरावा मम्ममरेजा है। सरा मरा प्रभापून यह प्राचीनतम भोर निरप नूतनम भी मूतन मूर्य पिम प्ररार पनि परेको पीला इमा बाहर निकलता है।] सार बिमि मापने भी प्रममतारा ही अनुभव करते है मौत बो मुहिमो महाक माहि रहिमत थे समानि परि नुमाईम ए पाप है कम परिणी समान पहन तातोम बट हातीर मे मुताए बमुमान, पृष्म पेशानी से माने नब नियात बो निभानु रमिरि बहिरे तो, पति मुंग पो मेरे मेह परि गामात पे बेसरि सो बोटेमा [ प्रसार पूर्ण है यह मृत्यु पो मुम्पर देवगत पारुपता मोर सापेपर पठोर अनुप वाने हुए है पो बप मारसे मुकी हुई प्राचीनण मोर पुस्ताको निरषम ही भुप्ता देता है जो वायुके नहोसे पोपलापन मिटाकर, पुष्प स्पी स्पपर भावपके चित प्रकट करता है और साथ-साप विस्मृति बाप स नामाको मिटा देता है। नवीनताके उपासक हमसे प्रापीमताके पुमारी तवा पानि मनसे इमोपासक तारा भबीमता साप सामन्जस्य स्थापित करनेवाले बेबसि पिमा पार सन्तानको मममुगकी नवीनताके पार मप्रसर होनेका सन्रेस नेमे ये कधीही पिणे पनि इसमे ही उमतिके साधनों का सम्मान करते हुए मगाई पीवमें उन्होंने लिया है। मा हुनिक तोबो नमूने में कों पाप, मी निबानीम में ममरि पर्त पुराना । [नही कमो नमूनेमें मया गम पा गया उसकी बानी वो मगीन हो लेकिन उसमें प्राचीनताको पुट हो।] कवि इस बारेमें चना बारेमा पराकमा सौवर्षकी भी मबीनवाया नुवापेनी मानता में महरि मा हपी छाप मनाई पहिबी हुस्न बोने में रिते र पराई पहनी। [ऐ नगीनवा! परि तू प्रत्येक वस्तुपर मपनी आप नहीं मानी तो सौर भी अपने महत्वको विपत्तिम पड़ा मा पना।] मामै सितो है सह वो रोग रिए पिहिता पान मनीम नाममा म नमो मामामत को भीम तब मुहिनी र पोत माहे तो हकीम मा परमो म हमे तहिलो बी हातति प्ये तगम मी निरिम पाईम ने न सरे साहनी तरिसर पड़ी चोर है 'देवप्ति' भी रि।

[प्रातहात ही नि निस्य प्रति हमें एक मरान् मन्नेग रेता एनाई- मे भीमम भी मीमतम तया प्रापानम भी प्राचीनमम है वह विज्ञान अपात्रानी नहीं मिमन मेरे इस गम्पो ममममा मौरयो मेरे माय नहीं पहना उसकी पी रफ्नीय हो गाती है। पनाकार हाफर परिमवीनता मालनम भावनिन नहीं होता ता उममा माम्प परम मीमापर पार भी मिर जाता है। ] गांधीवारका प्रभाव पियमय बापूपी मूर्यगे भाप्तीय बामपर उरित होत ही प्रत्येक बस्तु तया भावनाएँ उनके भागोमे अनभित हा सध। ऐसी ममम्पा पराब मिग्पर ये मापुक पपि ममा फैमे मपूरे रह मने पे। माँ भारती इन भावुफ पुत्री हेवनी मी रन्मुक्त होकर पाम्पमपमें विचरने हपी मार मिनी फरिया मिए उमने एक नया पप प्रशस्त पिया। किमी ममय र्यि पम्पमा राम्यामिपेकपर रा ११४ निष-युग्मे मेरीकी मायनामें गीत हिवनेमामे मार राष्ट्रीयताके अमर गायक हो उठे मौर साप-माम इमी पाबन र्गमा मायमन कर मोरपूर्ण भाषामे रबमा करना है भए पषियोको नि सम्म रिया रयस हरो पन में गैर हिन्दी तमुका कानु मरिने पर पति की प्रकी परिभाागे। [परि मे कफनमें एक भी महिनी तन्नुहीमा तो मारे बार मेरी माग पपित होकर परमा गाएगी।] - Tो पट्टमिप्य भी पराम 'गायत गुनगुना उरे नाम मुहियो रात, बरे मामा हिनुस्तान में प्पे मत मुहिमो मर माशारि हिमुस्तानमें [मेरी माग मात्र पारतमें हो उठे और प्रमु एमी ना करे कि मेरी मुस्प वी मोर महान भारदमें न हो!] और पाम्ममम मातण भारतमें माप होनेरी भी मि नी की इम्सा पूर्ण । गांधीगीली घरपैक रिपार पाराको मार उनकी रचनाता। 'ग्निान' 'मगार प्रनपाना मम्याप' 'मगरकी मोपड़ी निधार हाय' मात्रता भारी नवीनता 'मागरमतीनमार मारि पनिामों द्वारा में गोपीनाकी रिचारपारा भामाम मिलता है। रिम मम पितो है प्रस! मो म गाल परीपनि री मूपिको (प्रभु! म परागंदी माडियोको मारामाने सा') उम ममप रनमा Yo सहानुभूतिपूर्ण मौर मीकि दुबर्मे दुर्गम सिमटकर उनकी मोपरिमोमें समापा हमा प्टियोपर होता है। मांधीनी बीपर्श मा पाशाम तक नही पाच पामे ये वार साबरमवीरें हो न वादोलनोंकी इमा पर हो की उस समय ही अपनी बाप्टिसे कषि पापाजीकी पाक्तिको पाप मए मोर उनको इंगित कर पिने भिवा है पहिब मारिबो मारो परि समाले पोर सा माहि तहको ही इशारो भासि बी और सो में हसी स्पोम राहि मुशामिप तोर घी हिसागर में हिमाम्य हिरा मह मोर हो हिन गारे। रिनि ! अब मम्मूणहठि विरो, हिन हमारे ते पनि यो सम्पु हठि हिरोए। [ऐ मामीनी बड़ी पायमानीसाब मपनी पुमीका इसारा करो मीकि तुमाए यह सारा ईश्वरीम पति बारा प्रेरित है मार किसी भी तरह तुम्हारी यह माझा प्रचारित हो तो हिन्दसापर और हिमाम्म बो गोरसे टकरा उठे। तुम्हारे इस इणरेकी मोर भाग म्पिासठ करो माँ सीता मौर इस हमारेपर ज्मिावठ करो भुगाएं उपरको उठेगी। ] - पौ बसि बीकामाधीबीम इचना विश्वास पाकिबापूजी साबरमतीय हीरे कि उन्हें निषय हो गया ना कि भारत माता को सवा पा मार पहनाएंने वो बापूगी ही ताम मावा पुरे मारत स ताहोली माहि हितामर का तापीय मी [भारत मान तुम्हारे ही हापो स्वत प्रताप मार धारण करना चाहता है, उसे इस मोटीबानेपर पड़ा गई !] उस समय इनको रचनामि सोर-भक्ति मौर राष्ट्रीयताको मन बाई पाती है। उन्होने प्रयासे यमकी सराहना की- सामान नि सा ताहो बोरबी पाए पनि बी पते रतली बम तुहिरे । (नुमारी इन बरर मुगबारे पारम हो नितम परित माती है मौर तुम्हारे पूनम सी बौर परीफ (मत) पापित होती है।] माहितने बोधि में पॉमिन सी ? वाहने रितिभा परि मारिम सी रवा' - [ऐ मगपूर | इस स्वामित्व कोहम पेरा बाना और उसी पर मपने ही एयफी पीगसे पीड़ित होना कहाँ तक पितt] ये मरिमको शक्ति करते हुए कहते है तू पहिच गई दो रस्तनि बाएँ सी बो एक पी हमाहिनि बार होइन का ही नितु मुन्तविर, हस्त मे हातति में बपिनी बरि निगपनि दो नि निभानु, पर रखी बेग, मनु मर्म के मस्मत समानु [तुम रास्तौके परमर रोती हो और पहा काटती हो और मनहरिण बनकर मार नठानके लिए उत्कष्ठित पती हो। मुन्दर स्पबामी होने की भरस्था, यपि तुम प्टियोंका पिकार बनती हो फिर भी स्वपके प्रतीत्यके समान तुम अपने माँचाको निष्पक रखती हो (यह क्या कम मौरपाकी बात है!)] दौस पर्प पाठे या सर्योदयकी पंग मही उठी पी तब बसि की इतनी साय हो उठी भी पर मा विकिपरी- चिफ मा भी पो मामि मन वृत्तीम में पेरो-विपकी मी यहाँ [इस संसारमें अपने हृदयको विणात बनामो वीर अपनी मनोवृत्ति परत दो निसचे तुम मी यो मौर में भी एं।] पहिले पाही महत मा परि ने की हि कोठिकी में ममे बहो का पराग ठहो सो भूपिड़ी। करि क्षमता पटि तिरीवि पुमो मी पहा। [परित बपन विसात प्रासारसे एक कमरा भी पानी कर देया तो मेरे जैसे निरापित लिए सुदर छोपड़ी बन पाएमा। मत बपनी ती को सीमित करो जिसमे तुम भी हो मौर में भी ए1] । साकारको फरार बताते हुए पनि कहता है माहिरिरामाने रह हीहो महिमाहागि मा? तास राहत दो बजे पोराहरे तन्तुनि तात्र मा। हि प्यो तो नरम के मुतु पाम माहिरा? बाहि सा पापि गरीयो नार्म भामत यो भिकार। [ए अमवान् ! तुम्हारा यह विकासपूम बोचक पिमा माई मपोंम भीमा इमाई मौर यह माननकी तात्री रिसड़ी वात उननम बम पी मौर रिसन तुम-नये मर मरवको मुफ्तखार और भवानी बनाया ? रेखित है- यह मुठ मरिचमना है, गोपीकाम पाहा पिपरपनी हर ! मियरत्तरमें

विधी इमरत मारत सा बधामा हरि रिकार
तुहिये पहिकमि है हमारे पात्म माहिनि माक बार।
[पापपूर्भ विनासी स्वमायके कारन तुममे प्रत्येक विकारको प्रोत्साहित
किया है तुमारी न ठहाकोसे भरी हुई हसासे सहर्मो मा बधुपूर्ण हो उठती है।]
पे सब बाते बसिनीने उन दिनों मिवी पी पर सिम्मी पापा
प्रगतिवारकी कम पी
पियन बीरी गि बारी धर्म रामनि बासिते?
बो किस्तानी का पोतात रिडिहा कहे।
[धर्म और राम्पोके नामपर मुर क्यों न होगे? पा सम्बॉपी करके
कारप बह ( परमात्मा) हमारे इस सिंहासनोंसे रखर पाता है।
प्यो मा रिति बो मारा पिगियर बोबा रानु माहि
कामु रामा चिति बी, मिर्म राम चाप है?
मिरे गयका मन्दिर उगा यया और प्रियतमका पर भी पीरान हो पया।
पहापर कामरामा निमास हो वहाँ पधारा 'राम' से ए सस्ता है!]
भौतिकवारके इस मम्पायको रेबार भगवान भी उनसे स्ठ पगा
गरम परोनि - फवा' भूपिy मानिनु दुर्भ
पो महीम, मसगिरि मर गति, रिकामे की है।
[मार भगवान परीबों को पास-फूसको टिमि पसर या पा है।
बह मदिरों मसगिरों मारिसे पर भार पा है।
भिमानकी मोर पिन कराए पनि सिलो-
राहिली तस्वीर पेक्षा कौम को पार बसे
तुहिने परिपार मा मेरो पार पो।
[नुमारी तम्पारसे ही तुम्हारे अर पाति बारा
बरपाय प्राट हो पाई। तुमारी श्रीमार बम्पायका बाप प्रकट हो रहा है।
परीगोंदी पीपीपोतरा वर्णन करते हुए परमात
मना! मरे म पात परीमि की मूपिड़ी।
[है प्रभु !इन परीरोपी मोपहियाँ बाप तक न भाए।]
उम ममप मोहम्पकी मम्पूर्ण महानुभूति मिनाकर परीके लिए माघार
हो उसी

कहि में ममो मपे पो मिठे हो कुमारि ते साग गुगरा रिसे न हबीबनि बार है, पोड़पो विले पो पापि बरेरी बमार है पाहिए परे र हिमाम मे नुमार पति मिते बनाए न चिन्ता श्री चिकी महा। मो म पात मरोबनि यो मूपिड़ी। [मिम (मोपड़ी में मारकी रोटीपर ही बानगर मनाया जाता है मौषा-माश पीवन निर्वाह करके कारण गिर्ने कमी पाका मुंह नहीं बना पाता बसि यम करनेके पारम मिनकी बायु पर बाती है मार गिनः मानवी मम्मीपर बिठाम कभी हानी नही होता पहा बिना पी चिनगारी नही समाती-है प्रम्, म गरीबकी मोपदीको माँच वर न माए।] गोगनके लिए मोगमा पो र मापता है उनका प्रदिपार करते हुए इमान मामक बीतम पगि हिता माहि संसारमे हम्मान ! साहो तोता तो माहि महा पाम माहान बो लिया ? काहि मारो ममरक माहिरे बसि बी महि दुनिया में मरि पूम मचाप बो हिपात [ए मामष! यह मंमार तुम्हीम प्राणित है सा कर खिानेरा मुम्हारा रिपार नही है। परि ममारमें तुम्हारा धूम मचानेगा पिपर है वो तुमारे मामन काई मी पापा उपम्ति नही हो मानोराही परि नुम मपनको बाम (पिग मरमा सार) म मममो।] जिग्मी' नामक पीतमें पपिसिनाt नि हपाएनि सौ बीबपि वा मा मुरा पर तो हुई मिारत मापाती मिली। [जीवनकी मीमाओं नवामप ममारमे ममग हा मया यथापि तुम बाणारे पदमी-बीवना मौमाप प्रा पा !] दिति हो समरिनु काहि गुमाप तो पो मिसिन समे मरि मुभाती गिणी। [कृपा भीतर बार मी बीन गिन प्रभार मया और माम पा! तुमने नाबासिमापारीवरही सीरमका परवाना।]

काम्प-चीवनम प्रौ किधिनपद बबसि मे पाते पहन सि-मन्दना तमा प्राकृतिक सौन्दर्यपर ही सेवनी चलाई। पाँधी-युपके प्रभाषसे अभिभूत होकर इनकी सिवनीने अपभक्ति मौर राष्ट्रीयताकी बाग उगगै लेकिन महिसारे पुजारी बनकर कषि साबरमदीके संत में लिखा है-विस समय पुरुषप्टो कारण पश्चिमी ससार रो रहा था उनके बायोसे मासुमोकी माप प्रवाहित पी मोर पस्मेसि रस्त गाहामा उस समय उनके पानोमें मोवीनीकी यह बागान बाई कामियाबीम का कोहे पन हारप बोपन्म तेर सोनि ता मरव दोन मारष बोपमा [सफलताके लिए न तो पून मिरामेकी भारम्यता है और न भयानक सोर्पोस मरमे सपना मारनकी।] मो के तुहिये तहिरकते मा म्सी कमर तुहिने हरुवा फिरे मी बासि दुनिया बी नगद माहि बारह हिन माभिमुरे बो समय सोमहिनी सहिरा संसार हार चुमि पर अगियो प्रितिप्त बी बियणो माहि इन मा हातिमो का दिमाहो बीन बस में माहरू बो दिमो। [तुमारे इम बान्दोमनकी मोर सूर्य मौर पर भी निम्मित नबनोसे ताक ये। मौर सारे संसारसी माय इस मोर मी हुई है। मविप्यपर इस प्रयोमका प्रभाव होनेगाना और तुमारी विजय इस हांफते हुए संसारके लिए मापना रुपमे है। अगर इमाके सामरिक ारा नष्ट हॉपी पौषि को भी पष्ट चापायपूर्ण पत-पातका रत्तरापित नही लेगा।] हिसा मोर पापोवारका यदि सिग्बम प्रचार किया तो मेवामि' और उनके मिप्या मिनीर और "दुवारत रा- पापही पुनिया हामि माती महिला मनमोम मसूप्स, ऐगमिक मिमोले ता मत प्रसाबा सामानु गांधी। [मा ममार सय ही बहिमा समस्प मिसान्तको मीरार करेगा, बाप्पा ऐ मोधी । उनः लिए एयमियमम प्रमपरा सामान होपा।] - परि मानहमारे सत्याप लिए मानवम समर्पी मोमा परलो मी भगानी नग भयाना निल गमन करणे एनेका समेग मौन है कप ममरमें बताए प्रेममा ममिनी, बियप का माप बानी रो रितिमा एमारा दो।

।
[रम्प मौर रेप हिल (निर्गुन) प्रभु! तुम इस सपनाम (मगुष)
मनिरमें प्रमको पनि प्रतापर, अपनी माइति लेके लिए पयरे पार
बनाने हो।
महाँ एकमोर गमि पर बापूगीका प्रभाव पड़ा ता इमरी मार विपकषि
बीमनाप टापुरक परसरामनुमरन करनम भी पीछे नहीं है। रपिसाबके मन्य
मिब मुगर की ममा उनक पाप गहाँ महा प्रो। उनॉन अपने गौवनः
अन्तिम निमिष दान मौर तमाम (मूम्रबार) की मुश्चिमा मुनमानेमें ही मपने
ममयका ममा पिपा। पगावी नहरों मौर ममुद्रको प्रतिपा में य भाष
पा-महा बियो हुए है।
प्रापना मामा मीतमें सिखो ह
चिो भोहबो पिसा हरि गैगमें तहिं मोचिटो
महिती चितम परि विमिनार मा हामि ।
[ हे प्रभु! तू मोसम या ग्योल्मा म्योतिष्ठा जिममे में तुम्हारा
ममारोह प्रत्येक पम्युम म्पप कपमे ए म₹1] क्योंकि देवनार कि
गोग, बप तप सापना मपिता ममापी मान में
पोहणे ही मास्तु मापा बो ममर मडिया कि
[गार पनप ममाधि मारमा बौर महार मादिम भी यह मापारा
मनमनगर मा पाटना पता है।]
इममा प्रतिकार वा हम प्रेमकी पीड़ा द्वारा ही र मात
मोर पारी पोर माहे, पोट गिनु मछे समोर
दिनु भमोरे माहि पीरो, गई माहि रित पाक का।
[पण मिया पीका उत्पम नही होती मोर पीडा मिनाय नमीर पंग
मही शे माना और नमी मिपाप पाती (म) पा नही मानी।
सपमुष पीड़ा ही हमको पवित्र बनानेपानी है।]
प्रम सागरमें पवन मामना मिहिनी ई
लि परितिरि बल गरि गा पापणी परिमो
[प्रम मापरय गाता याम ममस मिट पसा मौर म पवित्र गमन
भरगाान पानम पानी गही मप्र हो गई।] तो प्रियसमा लिए मयूर
और पानसरोज बनना होगा

गौक मा बसर रिसिबी पम्स तबरेजी मबी
मूहिब का मास्तर यी रामारि रतनो भयो
[ऐ साफ! पर रिप होकर प्रम्स तबरेज पथका मानन मूटो मौर
प्रियतम सिए मामूर बनकर रस्त बहाना वामद सूटो।]
नियत्वको मिटानेमे ही यह बामन माएपा -
मिति स्पर्म तो पूरी मिरिनी प.पानि में बो
कीमियापर पूर्व माहे मोह हह पारमु पाप ।
[प्रमो स्पसि ही पुरी ( ममत्व) मिट कर बुराई (प्रमु म) न
पाती । प्रेम मोहेके लिए पारस । कीमियागर है।]
उपनिपळे महावाक्यानुसार
'यतो बाचो निवर्तम्ले मप्राप्य मनसा सह
बसि भी बतापते है
सये बाचाबधि भाभी बरोबाची निता पिरिये
मोरोमनु पाप तहते भान को बायोगी ?
[मिसे पापी वर्णन नही कर सकती मुनि बान मही सस्ती की स्म
प्रकापिठ उसके लिए मानका प्रकास क्यों। तो फिर उसे से माना पा
सपता है?]
माम बात तो पयेबाम बन पातस सदी
नस मपानमए सिरि, मुति तागाई मरे।
[ मनातरा गान परि बात बारा प्राप्त हो पाए, वो नए मिरेसे नपनाम
प्रमाण ममा पाए, मौर मुरति उसमूत हो मा]
मम रिलतमतावनिता रिछा मारि रिम
हूँ हरे में मटम् मनमीत रामाई मधे।
मामा परि मीमापाय यो पनि हो पाए, ही शाम मेरे
बन्दर भय सामन मा पाए।]
उमे मोर भी इस प्रकार पटले है

४
में पता पामेम में बाकी ना हरिपा
मुमित को प्रसार वपमें सर्प सपाई मये।
[परि उस मापका म्ममें हो रन और मिनार में ही अविमान
वर्षान पा पाऊँ तो ससार-काराम मुक्ति | वियप मामन्द मा माए।]
इससे प्रकार है कि बस मसातको मातारा मोर निमको सभुग
बारा ही प्रार्म हाना पाहते हैं। मेकिन इनकी निराकारकी साधना समुन हारा
होते हुए भी आत्मीय पौरा न होकर पर पीमा निहित है।
कीमती होरे कनीमो माहि तिरोडीमती
नमो हार्यत पर सा पर पपरमें पारिते।
[अमूस्य होरेकी पनीसे बह वूमका कारा पिसप मुस्पबान है, यो दुसरेके
'पसीने () सिए मिराया पाया है। फिर भी पा निप्पस नहीं
बावा
बार परितीम तो बियस बरबहारी भी बरे,
पी मरे पहिलो दिनो, पान का नामत मिली।
[पृप्पीपरसे उठी हा बाप्प बानदायक एवं बनकर कोरठी है। अपने
हापोह यस्तु मन लिए नियामत (ब) बन पाती है।]
जारा यि प्रसार प्रमु मोठा पाता है अपना मोव एकत्व
वा अन्य कारान्त वमा तममुफ विपयोंको हार देवमि साईकी रचना
'वैयमिन अपने सुबकी भावनार्मोपी काही मुम्बर रंगम अमिम्पक्निकी है।
उमर कसा पप भषमा भाष पन्नो बारेम इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि उनकी
रमिता कोई ऐमी डोस मही है रिसपर सुपरनामे मोप रकम चोट करले गाएँ,फिर
उमम महेही ममुना मौरप मापार क्यों म निमसे। उनमा काम्प मारपेस्ट्राके
समान है, जिमम मिनार दीन पहनाई मुरम बादि कई मा समावण पता
है और निमममे सामन्यम्पपूर्ण स्वर निनालि को लिए गात ही मित्र मार गुर
बनारसी भावस्परता है।

कषि-मो मामा-
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५. कादरत मारा।
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(तुरु-तिता)
समु फनि तहिनी सारह-विरत बारा!
निमम मोती मूर निमारा।
कोटा होटि बमाया परिर-सहमें सिम पर तारा कतिपू,
मिनि गो मन्तु, पारा-कृविरत पारा ॥१॥
गुप्तमि अंबरि पुरहागि घरी भो, मोरपुनि सो महिराम मरी पो
हीरा सात हनारा-रिस्त पारा ॥२॥
महिं अनि से बात अवे पो-पम पन मा परिमाउ अथे पो
दिम पिम मा घिमिकारा-विरत मारा ||३||
हिब पतुनि ऐं घोहमि मोसी, इसिसि पोममि बोसे बोली
मोर मचमि नामियारा-कृषिरत बारा
अगा यमाया विमिस्पू भारत-मरस बरस फनि पामसि,
पामट कमि बसिकारा-परिरत बारा |1
मुमु मिषियोई मगर माहे-मागो समगे अररि आहे
मेहुनि मप्ति सुमारा-करिरत पारा
सास मेगरि मो सासु पये पो, 'बेबसि मनहरि मा पो पो,
मौरस मीहं महारा-फरिरत पारा
॥७॥

-सिपी १ स्रष्टा! (स्बर- निसंप ) यो सप्टा! सब तुम्हारी प्रगम्ति कर रहे है। यो निमस ग्याति! आ प्रयारा द्रप्टा। । तुमने मोटि-कोटि लोगोंगी सुमन रचना की। ओ मप्टा सहन्ना मूर्य पर ममत्र और मह उपनाये जिनका अन्त नहीं ह ।।१।। मुमनामें सौरममा मप्यार परत हा मोतियोमे समुद्रको भर देखे हो । उपजात हो, हजागे होरे और साह मो सप्टा! ॥२॥ जब वृक्षोंपर समीरण दौर एमाप्ता है, तब पन-पत्तेस छम-छमसी प्रतिध्वनि उनी है मो सप्ा। ॥३॥ कोर कायम और बुलबुलान तुम्हारी प्रपसामें पोंच खोस दी है। मुम्दर मसूर नाच रहे हैं वो सप्टा! Iml विचित्र विजसरी मौर मपोंगा सूने निर्माण किया है। + घरस बरसकर टम पहुँचा रही हैं वादल साफ रह ह मो सप्टा यह मारा विश्व ही मन्दिर है जिममें धागा (म्बामो) प्रस्पकर हृदय में विगममान है प्रत्यर परीरपी मन्दिर बना हुआ है ओ मष्टा ।।६।। प्वामा अदर गो प्रश्याम उम्वमित है वह अनहया नाद बन रहा है मौर बज रही है स्नहर्नसम्म भरियां को सप्ट्य ॥५॥ | कवि-मी माला- सूई सिम में सोमिरो ऐं चर में बांगगि हूं, सूह ऐं सोमा गुमनि में, पुमि सुगंघि सुरहाणि तू । बारमनि मा पो पों पर्साति 5 बमो तेनु विजसीम को तम्मतो ऐं ककर काराणि तूं ॥१॥ घा पटापटि रसठि में दो बजे तहिनो सकाउ, सुबह में पिए सोग रंगो, माम में पादाणि तूं ॥२॥ पुरु करी पो पाम सौ पोलार हिम ससार बो, पो पिह, तारा, सितारा ऐ म नोसानि तू ॥३॥ थो सभी सहिपनि मपा, घोम्यूमि मपी एसो बती समुन्नी सम्सी चित, महिरागनी माठानि तूं ।।४।। ते तुहिनो पार, बाके तिये फ्रान में, होर में हतिकाणि तूं, ऐं बाफ में माहामि तू ।।५।। माफ मोल्युमि हार पो सींगा सम्सीम गो परी, तूं नवाहिर में ससक मानि मारि सामागि तू ॥६॥ सर्स तो साहिब सरी माहे सिफति साराह चा पासि पूम्युनि गो ससामो ऐ गुनिजी माणि तूं ॥७॥ विरह वेबसि । यो उमे हर प मा तुहियो रंगी तागि सू महिनी तसव के पारि पहिले माणि तूं ।

सिम्धी
तू ही मूयम प्रमाश ह पद्रमाको पम्बिका है।
तू ही फूलामें सौरभ सपा सौन्दर्य है।
तू ही माँफी दें यनकर बरसता है। विद्युत्का सोव प्रकाश तू ही
है और तू ही है मेपाली श्यामरता ॥१॥
इम्प्रधनुपर्ने रग-बिरंग आवग्मोमें तुम्हारा हो सौन्दर्य भएकता है
तू उपाको स्वर्णिम विभा है मौर सभ्याको रक्तिम सग भी तू ही है ।।२।।
इस समारफे पोसार (माकाप)को सू ही अपनेमे ओतप्रोत करता
है। मसम्म तार ग्रह-नक्षत्र और मीस सध्या आमा सू ही है ॥३॥
तू ही लहरोंपर दोसायमान मोर उछमित है। समुद्रको कठोरता
भी तू है और महार्मवकी शान्ति भी तू ही है ।
बायु पारयापक और तूफानम तरी ही तोवता है । समीरम हसमा
पन भी तू है तथा याप्पको मानसा भी तू ही है ॥५॥
हिम यिम्दुओंफी मासा बनकर हरित पीधोंपा गङ्गार परने हो।
तू चबाहरॉगी पोति बीर लासाकी मामी है ॥६॥
हे प्रभु! तू अवर्णनीय तथा प्रास्तिस परे है। तू विशिष्ट निधि
तपा गुणारा मागार है ।।७।।
-
हे मए रग रचनवास ! तरे प्रत्यक मपम गिरह उत्पन्न होता है।
बत मरी उस्मुश्तागो मारर्पित कर मुम अपन मिरट म आ ॥८॥

कवि-भी माला
" होतु
आहे मशहर आमिम में, लफ्रा तुहियो, मा महिनी,
हकीकत में मगरि माहे वा हिंगो, मझा मुहिगी।
हमारे बाम रोमन सां, बची तारमि सितारमि सा,
सबहिं भी पिसि करत हो, न दो माहे सक्रा मुहिनो ॥१॥
निमकु तहियो समा बाई, मिमिति तुहिने म बियां पाई,
नमत में माहिहीम बाई, ससा तुहिनो, पता महिनी ॥२॥
कर्यो सोंगार सौ साई, मिसन लाइ होतु हिरिचाईमि,
म पर पेरो अन्तरि पाई, रिसो पटि चाहिना मुहिनी ॥३॥
शिकारी शोर म्यो पैरा, रूपा सिर वेबमाननि ना
रसाया तो त म मार्या, रमा सम्हगी हवा महिनी ॥
मुनि में साफ निसिरी प्य, दुखनि में यारि मत मस पे,
सहि मी राति रातर विमें, ता, मे बहमा महिनी ॥५॥
कहाँ कहिनी पषो मुहिनी, हो रहिनी मगरि सपिणी,
यामि तामहिम बहिणी, पी वेबसि बासिना महिनी ॥६॥

२७
-सिधी
प्रियतम
सारे नियमें तुम्हारी कठोरता और मेरी विश्वास पात्रता प्रसिट
है लगिन वास्तवमें सुगौलता तुम्हारी है मार मठोरता मेरो।
सहस्रों उद्भासित मयनास ग्रह और नक्षत्रोंके रूपमें आते हो,
फिर भो मरा हृदय ईर्ष्या रहित नहीं हो सका है ।।१।।
सदा तुम्हारा ममकवानपर मीसुम्हारे निमित एक कौड़ी भी नहीं देता।
ससारमें निदमय हो तुम्हारी उवारसा यार मेरा अपराध प्रसिद्ध है ।।२।।
प्रियतम ! तुम्हें रिमाना रिए सैकड़ों प्रकारक पगार करते हैं
एपिन मरी साससाको पमीपे कारण तुम भीतर पांव तक नहीं
धरते हो ॥३॥
मरे हृदयम धातका मोर पंदा इषा और मूक प्राणियान सर
फटे। तुमम उपगाए और मन मारे। इससे तुम्हारी दया भौर मेरी
हिंसा मृत्ति प्राट होती है ॥४॥
मुबोंमें विस्मृत हो गए और मप्टोम भाकर याद आए, तथापि
हे दाना! तुम अजन दान दिए भावे हो फिर भी म निरीग्य हूँ ॥५॥
वा तावडी मुम्दर-मुम्बर करता हू ऐकिन मरा मापार तय्य
रहित है। भरी वासना महार और प्रमरे मशीभूत हो गई है ॥६॥

कवि प्रो मामा- ५. साबरमतीम जो सन्तु तूं किरोस हितुपास्ममि बेनिवाननि यो निबान, हिंगो पामोशी बताए तेतु सूफानी मयान, मुर्कमें तहिने समायत सर्स परिषी पास्तान, तुहिने पेशानोम मंशा सापितु सबाईम मो निभानु पाग ते परिक्षा वठी पोह की बिकहिनीम सां कहीं, सोचवणु चाही न ये पे मो म पू.पि रहिमीम पी ॥१॥ बोर दुर्गामी मार में वर्ष में देवीम अगिया, घा म घा भेटा घरी तो शौक ऐं मा मना, विलि, विमागु ऐं बम बधी, निशु बानि पाडिया वाह सा, माल मिस्कियत ऐं कुटयु परिवार मुस्को प्यार तो, मार्श मोबो बम हीरो हयातीम को रखो, सूर सेजा त पाहावत भी मिठी माती बची ॥२।। तो मरहिं गानो गुलामीम ने मुसियस तस्वीर ले, कारिगरि मातीन को समिमेर या ततिरीर माठि सौ मेटणु भुर्यो तविबीर सो सक्रिदीर थे, रमिग सा टोरण धुर्यो, हिम मुल्म में मोर , जोर मिस्मानी व तो रायु ग्रहानो सम्मो, ऐं महिसा मो मो हपियार हैरानी सस्यो ।।३।। मगिरयो दुनिया हनी पेगि पू सविस्यूं सझो, मोर मपनि मा पो थ, मवमनि मां बहो, मिनि सपा पी अंगि पे पाड़ा पटण Bा पे पहो भोपितो मावान ही कन से मची तिमि ने रायो, कामिपानीम माइ होम्हे तन हारण भो मम्म, सेनु तोपनि सा मरण जो ए न मारग मो ससद | १ ९ -सिन्धी ५. साबरमतीका सन्त सुम कोटि-कोटि मूक भारतीयोंकी वागी हो । तुम्हारी शान्ति तीन प्रमचनका आगमन है। तुम्हारी मुसमराहटमें पीड़ित होंपी गया समाई हुई है। तुम्हारे सप्लाटमे सत्यताके चिह्न प्रकरित है। अपने ऊपर प्रयोग करन वाद ही वाणीसे मुछ कहत हो। जिमपर स्वप आचरण नहीं किया वह यात किसी अन्यसे रहना नहीं चाहते ॥१॥ - हे मीर ! तुमने वलि मन्दिग्में पीग दवीफे बागे प्रया मोर प्रेमम क्या-क्या भेंट न रवी! हदय मस्तिष्क बल बुद्धि तन मन पम सपा मुटुम्ब परिवार आदिकी मेंट पाई। देश प्रेमको वलि-वेलीपर क्या क्या म्पोछापर नहीं किया ? अमूल्य जीवन-हीरमरो आदर्भ बनाकर शूम शम्यासे पशिगानो मधु (शहर) का भाम्पादन निमा ।।२।। तुमने अब पराधीनताकी उपप्पी हुई सस्वोरको परख परी तय सुमने तमबार और मापण आदियो अनुपयुक्त सममा सब गान्तिक द्वारा ही भाम्पको पुनि तपा पम द्वारा पसटना पाहा। तुमन इन मयामी यूद्धम्गमाको पातुर्यपूर्ण युक्तिस सोडना चाहा। शारीरिक पस्तिका रयाग पर तुमने माश्मिक गतिका मार्ग प्रवर्णित किया और अहिंसाका मापनपजना नया मस्त्र ववमाया ।।६।। जब पश्चिमरे मोग युटरे पप्या पारण त्राहि त्राहि कर उठ पे जिनकी मात्रामे मधु-धाग और पार्कोसे खून टपक रहा या जो गुटबन्दी कर युरका मामूल उ मूमन परनक लिए विचार विमर्ग मर रहे पे अपामय उना कानाम यह बापान पढेपी- सफलता प्राप्तिा लिए म तो पून गिरानेको आवश्यकता है और म तेत्र तोपोंमे मग्न मोर मारनकी। Irel कवि-मो माला- ५६ ५. साबरमतीम जो सन्तु तूं किरो हिमास्यूमि बेमिवाममि बी सिवान, तुहिनी पामोशी बसाए से फ्रानी बयान मुर्कमें तुहिने समायल सतुं परिवी पास्तान, तहिने पेशामीम महा सावितु सचाईम बो निशानु पाण ते परिमा पठी पोह की चि कहिमोम सा व्ही, सो पबनु चाही मम्मे मो न पनि रहिमीम रही ॥१॥ पोर कुर्वानी मार में वर्ष में देवीम अगिया, पा न घा मेटा घरी तो मौक ऐं भया मामा, विनि, दिमाग ऐबत मधो निहु नानि पाड़िया चाह सो, मातु मिस्किपस ऐं पुटर परिवार मुस्को प्यार तो, मारी मोबो अमुल हीरो हयातीम गो रखी सूर सेगा तो शहाबत भी मिठी मातो पो ॥२॥ तो पर्वाह जाबो गुलामीम पे मुनियम तस्वीर थे, कारिपरि मातो न को शामिझोर या तहिरीर में माठि सा मेटग भुर्यो तदिवीर सा सक्रिगोर , रमिन् सा टोमण पुर्पो हिन मुस्म के बमोर , जोर जिस्मानी पर तो रायु हानी सस्यो, एं महिसा जो मर्मो हपियार हरानी सस्यो ।॥२॥ मगिरयो दुनिया नो पे अपि पू सवित्y सयो, मोर मपनि मा पो पे तमु पवमनि मा बहो, मिनि ममा पो पगि से पाय फ्टग सा पे पो मोचितो मावाय ही कन ते मषी सिनि ने एशो, कामिपायोम का रीम्ह पूम हारण यो महक, सेयु तोबमि सो मरण बो ऐंमारग मो वह ॥४॥ ,

-सिग्दी
५. साबरमतीका सन्त
तुम कोटि-कोटि मूफ भारतीयोंकी बागी हो । तुम्हारी शान्ति तीव्र
प्रभवनका आगमन है। तुम्हारी मुसकराहटमें पीडित बर्योमी कया
समाई हुई है। तुम्हारे एप्लाटसे सस्यता चिह्न प्रकरित है। अपन ऊपर
प्रयोग करने बाद ही वाणीसे पुछ कहते हो। जिसपर स्वय आचरण
नहीं किया वह वास किसी अन्यसे कहना नहीं चाहते ।।१।।
हमीर । तुमने मलि-मन्दिरमें पीड़ा दवीफे आग श्रया और प्रेमसे
क्या-क्या में नहीं रखी हृदय मस्तिप्प घर बुद्धि तन मन धन तथा
कुदमा परिवार, मारियो में पढ़ाई। देश प्रेमको यसि वदीपर क्या
क्या न्यौछावर नहीं दिया? ममूल्य जीवन-होसको आपस बनाकर,
पूल शय्यामे पसिवानरे मधु (पहर) मा पास्वादन मिया ॥२।।
सुमने जय पराधीमताकी उमप्ती हुई तस्वीरसी परख की तब
सुममे सलवार और मापग मादिगो अनुपयुक्त सममा तव पान्तिक धारा
ही भाग्यको युक्ति तपा श्रम द्वारा पस्टना पाहा। तुमन इन अन्यापरी
युद्धसामोको पातुर्यपूण मुक्तिसे सोहना चाहा। पारीरिक पनि
त्याग कर सुमने आरिमक शक्तिका मार्ग प्रदगित किया और महिला
बापर्यजनक मपा अस्त्र पतसाया ।।६।।
जब पविमरे लोग युटो पणा पारप बाहिरी
पे मिनरी मौशम मधु-धारा घोर पापोंमे जून या गr
गुटबली कर युटका मामूग उ मूसन परला णि विr-
पे अचाना उनके पानोंमें यह आवाज पहुँपो-र-
म तो यून गिरानेरी पारश्यकता है और ना कर
मारमरी।' ॥४॥

कवि-भी मासा- यो तके तहिये ताहिरक ते मा शम्सो कमर तुहिये हसबल ते फिरे पी पासि दुनिया मी मसर, माहि आईरह ते हिम ई आमिमूरे बो मसर, सोम हिनी सहिकाए संसार मातरि शिपबर, मगिनू फ्रितिरत नो पियमो आहि उन मा पातिमो, का विशाही कोन बनी दुम माहिक मो सिमो ॥५॥ सुहिमे हिम्मत ने अगियो मुरिफत न पचणु कोहकात, हिजो हामोगी तरीको सुमिरेशीम के विमाफ तहिमें पासे प्रेम ऐं पारेविगी, इन्साफ साफ, सुहिने साम्पुनि की सफ़ाई माहि शोभे को शफाफ चोट सुहिजो माहि कहि मी पासि सौ या माम सt, पो की आता मसूसनि ते सिरिश्ते पाम सौ ॥६॥ पहिली मारि बो इमारो करि समासे गौर सां, माहि ही तहिबो इशारो भासि बी चोर सा, बेहती स्पो हम हेकर कहिं मुशासित तौर सt, हिनु सायद ऐं हिमासम रहिरवा शह शोर सां, हिम इशारे में विसनि प्' भन्नु मर' पाहठि किरोग, हिन इशारे ते पनि गाई सम धाठि किरोड ७॥ बहिने हानी एतिमें माहि देवसि' सारिणी, पहिले पहिरे में बम मा माहि तादां सानिगो अहिले पसिात में म कहिं सामफिरती मारासिंगी, माहि तहि साबरमतीम ने सस्तनी मासादिगो, तान मातारी पुरे भारतु कणु तुहिने हो, माहि हिमुस्तान से मनु तार लगोटिये मां 111 -सियो तुम्हारे द्वारा प्रवर्तित माटोलनपर मूर्य और घर टफ्टमी गाए हैं मौर तुम्हारी हरूपसपर ससारको विप र पसे दृष्टि गरी ई है म्पोंकि तुम्हारे इस प्रयागका प्रभाव मविप्यपर पडनयाला है। म्हारी विजय हांफने हुए समारस रिए गुम मूचना है। इसके द्वारा हो मरिक उपद्रवाना अन्त हानवाला है। पोई भी राष्ट्र अमायपूम खून- घरामीमा उत्तरापिरव महीं गा ॥५॥ तुम्हार उस्मारक बाग कोहफाफ ( एक पवत विप ) पर पहेपना बठिन नहीं है। तुम्हारा शान्तिपूर्ण तरीका खून-खराबीक विरल है। महार पफर्म प्रम पवित्रता और न्याय हैं। तुम्हार सामियाकी पार्यदसता पसे भी मधिक पारदर्शी है। तुम्हारा विराध मिमी वास (पिगप) अपना आम (माधारण ) म नही है। तुम उस आदर्णोपर स्टकर न्यायपूर्ण पदसियोंसे मात हा ॥६॥ सोच-ममनपर ही अपनी उँगलीस मक्त कग क्याधि तुम्हार गितके पीछ वरीय पति है। परि तुम्हारे इस पगारका खामा फिसीरे पिरोधमें पटी गई ता फिर हिन्द सागर और हिमाष्पय पाही शोरफ साप टकरा उठेंगे । तुम्हारे हम समेतकी मार आर छियासठ परोप माल उठी हुई है। इस गितपर छियासठ करा मुजाएँ उठ गडी होंगी। तुम्हारी रहम-महनमें सादगी समाई हुई है। सुम्हारे पहरेपर तामगीकी पमा रोमन ह निमम मामय जाति सिए न पृणा है, म रापह। उम माबरमतीक सन्नी ही यह स्बा ता है। भारत आम तुम्हारे ही हापा म्यासतापा मुकुट पहनना पाहता है। आज भारसको गारीबा पर बड़ा गई है १८॥

कवि-भी मामा- ६शाहरु तो में हर रिति टिकण साह समणु भार पे, हर बमाने मी गना तो में बियण साह पे, पेमगी पिसि त गरम लाा वि मोम्याइ पपे, बोका तहिये सो हममु होम मि हमिराठ सपे, महिने निको प्यो हों तहि सेई बेतरि प्यो वी, मा सपे गण ग गने, महिलो तू गणगोत गीं ॥१॥ मोर बोलण पी लगे तो मां मियानुमि जो बा, में क्यानीम पे मिसे तुहिमे वसीमे पो बर्या, गुप्त इसिरार करी बजे पर्व मो मर्या, आणी सागर से पो सागर में, करौं मूमिया, बोध-स्पा ने माहि पियस कहिली? अहिंसा हरि निम्स बने सान सुरोसे महिनी ।।२।। - में, पाण सा पर प्यो सपी, साणु म पर पाणु पर्णी, पहिने गरयुनि को या पुरिनुनि मो म कुम माणु पों, साय संसार में मुरनि मो सबर सामु सी, म रिसिस प्योंगशीम सा म मगरि बोग पणो, मागि मार्प में मोति मगा मग रोशिनी देह के दो, मामि बसाए अग में ॥३॥ सहिर बिमसोम बी तिमो पहिये ना बनिवमि में भरौं, संहिसा हिक मार तो हरि माह दो फैसाउ करी, जिस्म मुह में विहिक वारि मा जामि मरों, हर सहिरक में समां सोये, मर्मा हूं परों, तुहिनो बोधार ऐं पाणी एकम् सम् राफसो, जाति मी गति सहो तो मा परे मामु मसो in -सिग्धी ६ कवि तुममें प्रत्या हृदयमें स्थित हानस लिए स्थान अपमित है और अपक्षित ह प्रत्यक युगको भोग्य सामग्री आरमसात् परनको पक्ति। यदि काई हृदय तारता हा ता त्सम मिलानम लिए मोमिया (मरहम) भी चाहिए, तुम्हार आवशले माप सद्बुद्धिका ममायण भी अपक्षिन ह। मुम्हारा म्यग भी म्पृहणीय हा कठिनताम समप्नमें मानवारी वस्तुका भी प्रहण अग्नी बुद्धि सुमम अपसित है ॥१॥ मूफ पस्तियापी पाणी सुम्हार दाग ही वारती ह। अवर्णनीयको तुम्हार दाग ही गणित हानका अवलम्ब मिलता है। गुप्त पमस्कारा पगसक परम तुम्ही प्रमट परन हो। मागरका गागर (प्याल) में भरपर सीवनी वना दम हा । तुम्हारी बुटि-स्पमका मी पौन-सी का प्राप्त ह मिममे प्रत्यक वम्मु मधुर वाघमा तरह मात हा सी है ॥२॥ । परमा अपन माप बहन पिय पात हा सपिन अपनको लमा भूल जात हा । मपनी गम्छामा और भाव पावाप्रामा परिमाण नर माय मही एन हा। ममारका यदनाओमा माप-माप मिप पस्त हाबी प्रमाननाम हृदयर रममा उरमर्ग करत हा फिर मा सुम्ह "ममा मान नही हाता। म्यमीयता और महको आग लगाकर ममाग्म ग्याति गाते हा। पहम अपनी जान बणार ममारमा प्रकाराम पूर्ण परमे गिलम भी वग पूर्ण रहर अपन भाषाम भग्नेहा । उमा द्वारा एक हाम्पानम मर्वत्र प्रमारण पमहा। एक बार मृत प्रापीम भा नव- जीवनमा मम्पार रहा। प्रयक आदाग्नमें युग तुम्हारी आर और सुम युगी मार मुमत हो। तुम्हार मार पाणी और पम ममी मफम ६ वर कि तुम मम दान (प्रग्णा) पर जनतापा पम्याण पणे हा ॥

कविपी मामा-
१४
अहिले कहि मौगि सो सहिने एपनी दुनिया
हिं कशि सो न मिर्ता माहि महण भी दुनिया,
माहि मण बाफ, अचम् तहिले पहम यो दुनिया,
काहि म पहिबार ये पाहा में पहण की दुनिया,
राति पोरसि भी पिटी या कि मासी कहिली
भारी मोत्युमि में पुष्पा सागो तलाशो बहिरी ॥१
साकि पेरमिनी फलकु तहिने पुमण साा मचे,
होर हुमिकार मरो तोसा घुमण मा मचे,
मोद-सेना ते मका तोसो सुम्हम मा भये,
बगा ऐं रक्तु वि 'पपसि
पो भुमण मा अचे,
रिमि परिपाम में सा मौन ए मम्तो म मे,
कप शाहरबी समाने में ने हस्ती नहुने ॥६॥

-सिधी सुम्हारे निवासका यह ससार उन्नतिकी उस पराकाप्टाको पहुँच गया 'नहाँस वह किमी मी यापर्पणसे निम्न गामी नहीं हो सकता । तुम्हारे स्तरसी दुनिया अचसमी तरह अविस हो गई है यह म्यवहारसे किसी की प्रवाहम प्रमाहित हानवासी नहीं है । पूर्णिमाको पन्द्रिका पूर्ण अथवा रमावस्याको तम पूर्ण तमिन्ना ही क्यो न हो सेपिन तुम गहरे समुद्रम ठार मोतियोंकी पाय जारी रखते हो ॥५॥ स्वग भी तुम्हारा पर-रज पूमनरे लिए माता ह। सौरम पूर्ण पुमीरण तुम्हारे साप विचरण करनेके लिए पाता है । मृत्यु पय्यापर ममरता तुम्हारे माप मानना आती है। चाह नृत्य हो पाहे समाधि दोनों ही तुम्हारे साप मूमनमा याती ह हृदय मागरमें वह भानन्द नीर मस्ती ही म आती यदि युगमें महाकविका अस्तित्व पहाता ॥६॥ मिनी पि-1 कवि-श्री माता ६ . पदी दिलि S करि दुनिया में रिलि परेरी-सबिय मो भी हो, मामि मा तीन में फेरी-तू बिफ मा भी हो, अम मसागत वा म माहे, शख्सियस में बाद, रिक्ति में कहि हमियर मा में मला पोरो त, तुहिनी मुहिनो करि मकेरी, तूं दिएमा भी हो ॥१॥ गरिचे हमि बतनी म माही, येस वाप्ती पी गुजारि, रेस वासोमा परो, दुनिया वासी पी निहारि, घरि नसर पुरती परी, तू दिए मां भी पहा ॥२॥ तगि ममहब में म मा, क्रोमियत में पाए थे, भापीम, इन्सानियत, सहानियत में पार परि दुमि नो बोर मेरी-तूं पि ए मा मो हो । पहिले शाही महित मां, यटि मे करे हिक मोमिी, वे असे मू महिरे मा, पनी ठही सौ पिड़ी करि तमन्ना घटि तिरो, तूं मि' मा भी रहा । राहिले बस्तर बान तो बको गमे महिरा मो, बासतिसूमोम पे हा मेकी थिमे परिवार पो, तहिते करि चौकसि पारी-तूं विद मा भी हो ॥३॥ गिरती प्यासे मां तुहिने पूर मे हिहिती बचे, हर बाणा मन मा पो त गरिबा में मचे, पिए बपति यात भतेरो-सू बि ए मा भी हो ॥ भाग अशिरस तहिने मां ने पर कानि मा पनि, में भिस्मुनि भूर्गान मिनि जार पी मोदा पनि, समुस र सासिम सरी-तू बि ए मो मो रहा ॥७॥ मुस्क पोरीन भी हदसि ? हिम पेट धिम्ता समे । मदारण बी इच्छा? बेबसि सम्पता बेसमे! रोग रोगन में अधेरो! तूं विरह मा भो रहा ॥८

-सिम्धी
.
G
पिशाल दम
ससारमें रहकर मपने हृदयको मिस वमामा । तुम भी रहा मौर
म भी एं। अपनी मनावृत्तिम परिवर्तन सायो-सुम भी रहा मैं भी हूँ।
यदि कोम्बिक सम्बन्ध न होने कारण तुम्हारे गयक्तिक जीवनमें
स्थान नहीं, तो भी सहानुभूतिपूर्ण हदय के किसी पोनमें पोहा (स्थान) वा
यो। 'तेरी भोर मेरोमो कुछ सीमित पर 'तुम' भी रहो, मै भोर ॥१॥
यदि प्रान्तमासी नहीं हो, तो भसा दसवासी बनकर रहा।
देशवासीसे वार विश्ववासीका दृष्टिकोण धारण करा। अपनी
दृष्टिकोन और विश्वास-पूर्ण बनाओ । 'तुम' भो रहो 'म' भी रई। ॥२॥
संग मनहबॉमें सीमित न हो पापो। राष्ट्रीयताका स्थान दो,घातृत्व,
मानवता सपा आरिमकताको स्पाम दो। दैत भावनाकी मलिन दृष्टिका
रयाग मगे। 'तुम' भी रहा 'मैं' भी रई ॥३॥
पदि मपन विगास प्रासादमें एक काठरी भो वाली पर दागे,
तो वह मर जैस निराभितरे लिए एक मोपरी मन भाएगी। मत अपनी
सीम सृष्णाकोपरा सीमित करो। 'तुम' भी रहो में भी ”।
तुम्हारे भोजनक पीकेसे वो पप परा पाता है अपम्यमय
पारण को गुरु परमाद होता ह उसपर ठीकम चौकसी रखा। 'सुम' मी
रहा, 'म' भी डूं।
सुम्हार विसामी प्यारेम यदि एए यूंद भी आप रह जाए तो
यह मनाया दान बनकर पिसी गरीबको वा सामग्री बन जाएंगे। यह
गपत मुन्दर बरगान बन पाएगी। 'तुम' भी रहा मै भा रहूँ॥६॥
तुम्हार मय बीर बिमास पूग वगोरस पदि मोट बौर सवार हो
पाएँ तापविना दीवारोंको मोपग्यिोंक लिए पर बन जाएंगे। मत
अपनी समभ मम्नुमित मौर मन्त्री ग्यो। 'तुम' भो रहा 'म भी रहे 111311
गोंगा हाप करमको तृप्पा! जब पेटकी पिम्ता सता रही
है एस पातकी छा! सम्पताक युपमें! प्रमाण पूण दिनमें यह
माधरा'! 'तुम' भी रहा 'म' भी रहूँ।
1T11
॥८॥

कवि-भी माता- ६८ इन्सानु मेहने वातिहा पामु छिपारण मो पियात, कीन हरगिम हा करे तोपे बनाइम यो लिया। मह तहिने पे फरे मूर मा फिर्म हा पगा, पे हुये सि न हा मेर बमाण को नियाम् ॥१॥ शिफिति आईने मा तुहिने मी रीत बी बचे, माहे ही पाण विना पाग पसाइप बो पिपाषु ॥२॥ पी मुमवर पे नहिं मोति मो मदा बधी, हो तरहिं पाकि में रशीय समाइग पो निमासु ॥३॥ सो में पवर्ग महि प्रेम मरी रिति पे मरी हो तबहिं पार करे पेसि मिसाग जो लियाम् ॥ मक धारा न हमे रिमि से हहमत कहिनी, हो म ताहत सो को कृरित वाण बो निमाम् ।। तुहिने रविमा ते रस्मो हुस्न पे छा ऐन नमाम, मोर तुहिने ते रप्यो प्रिति पचााण को पियाम ॥६॥ बरम हस्सीम पे मिती गति ऐं रीना तोबा, तोते पो मौगि रस्पो प रवाइम बो लियास ॥७॥ सारी मपसा में मापिरमें तो इन्सान मपो, मा साबितु कयो सरताग सगाम बो पिपातु ॥ माहि संसारमें रमातो तोचो, तो पो माहि मला पाणु महााम बो पिपास ! ॥९॥ का गि मागे न मटा माहियेगसि'म नों, माहि दुमिपा मगरि धुम मचाइप जो लियात ॥१०॥ इम्सान 1

-सिम्धी
मानव
॥४॥
यदि परब्रह्मको मपन आपको मप्रकट रखनेका ही विचार होता,
सो वह पदापि तुम्हें निर्मित करनेका विचार हो नहीं रखा!
सुम्हारी आरमाको अपने प्रकाप्रसे वह क्यों उत्पन्न करता यदि
उसे अपना रहस्य खोमनेका विचार म होता। ॥१॥
तुम्हारे हो दर्पणसे सप्टाका रूप मुबरिस हो रहा है तो क्या
इससे अपने पापको प्रकट करनेका उसका विचार नही मसमता? ॥२॥
मग उसकी ज्योतिसे मानव मुखि प्रकाशित हो उठी तब सूर्यका
विचार रज-पोंमें समानेका पा। ।।३।।
प्रमुने पव तुममें प्रमपूर्ण हदय भरा तब तुम्हें निन्छिन कर
अपने आपमें समामेका विधार था।
प्रणयके सिवाय फिसीका भी हृदयपर शासन महीं पस सकता।
इसमें पाक्ति द्वारा प्रातिको मन करनेका विचार नपा। ।।५।।
तुम्हारे निर्माणसे सौन्दर्य पराकाष्ठापर पहुंच गया । सप्टाका तुम्हारी
सृष्टि धारा ही प्रेमको परिपायावस्पामें पहुंपानेका विचार पा ॥६॥
तुम्हारे द्वारा ही इस सृष्टिको शान-शौकत मौर मोगस्विता प्राप्त हुई है
बोरतुम्हारे द्वाराहो (सीसामयकी) सीतारपमेका विचार उभर उठा ।।७।।
ऐ मानब! सारी सृप्टिके मन्तमें तुमने उत्पन्न होकर मुकुट-
मणि होनका विचार प्रमाणित कर दिया ॥८॥
ऐ मानव! तुमसे ही इस ससारमें माता उद्भासित है,
भसा कभी तुम्हें मपमेको सफ्म यमानेका विचार आया ! ॥९॥
परि तुम्हारा विचार समारमें धूम मचानका है तो कोई भी
साधा तुम्हारे सामने टिक नहीं सकती, यदि तुम अपनेको 'देवस
(सागर) म बना दो ॥१०॥

कवि-धी मासा
..पोहचत
थो कणे मां केच मागे तहिलो सातो हमु बरी
रस्सकारात्र में रितापत माहि हो । हगिरी हरी
पतो पानि मां तुहिने थोर को पार फि
पो पो रत से रवी पून ते हिंजे रीफ़,
सरि सराइत मो उपाए पाम पो में मार रही,
बेगिरहि गरि नहीं एंबे समर पर रहीं ॥१॥
समा
बाइकरते,
वाम मारे म बोझो सहिने सोही मानि
वे रिस्पा बादल करण भी कोन म फ्रान
माहि सरिबियुमि बा सियाग्दो तो असा साम
पो सपे कोरे न गरिम्पनि मो असर ईमान
मसि पपा हिमयो है पा पर सो बसगे रहे,
मा मपरि हसंग रहे, हर हाल में गसो रहे ॥२॥
पी पतंगु पो जानि सा
परि रही मग तो मांगी मौन मुहागर ते,
गुत परे बेरिति ते भेटा, पशि रही प.दिपार ते,
तोले सुरितीम रसायो माहि हामवि चार ते,
तहिबी महिमत अपनर से माहि पिपमपाको बलि
महि रस्मो तोपे मुकाम ऐं पाण के सामो मवति ॥३॥
माउ! बिमुमोतिष नसर सो पोसि हिम हमनी तरी,
अहिं सवा संसारमें हिंदी म ममताई सरी,
fri - माहे परत ये हितरि निमि सा मरी,
मास, पन, गित माहे सोम सोम ग्मनी सरसरी
गए, ग्मी बाण भसरि सो परि मसीबनि ते नगर
मा गमा, पूरब-पाएम में माहि पोगपती पबर ॥४॥

सिमी
श्रमिक
मो मजदूर! तुम्हारा यह पवित्र दायां हाय मनों कनस पैदा
करता है। हे वीर! तुम्हारी इन प्रसादपूण मुजाओंसे ही बलहीन
पक्ति प्राप्त करता है, तुम्हारे ही रक्तस री मरोफमा पोपण होता
है। इस पती-बारीसे खूब धन उत्पन्न करनेपर मी तुम निर्धन ही रहते
हो। तुम बेगारमें पिसते हो बोर निराश्रित होकर बेघर वने
हो। ॥१॥
सुम्हार इस माह कार्यको वायु तथा वनगर विपरित नहीं कर सके।
तुम्हें कायर और उदासीन बनानेका तूफान में दम नहीं है हे विचित्र प्राणी
गिभिर भौर हमस्तकी ठिठुरन तुम्हें कम्पित नहीं कर सकती और न
भीपण पोष्म ही तुम्हारे विश्वासकोरिगा सकता है। भले हो पसीनस
तर क्या न हो चामो अपवा भूसलाधार वर्षा होती रहे, फिर भी
तुम्हारा मुख हँसता ही रहता ह और शरीर यमसे पिसता रहता है ।।२।।
पलंग मनकर साहूकार रूपी प्रमापर तुमने अपनेको जरा मला।
स्वय दुवी रहार तुमन पूंजीपतिरे लिए आनन्द उपाया। तुम हवय-
होनपर पूमोंकी भेंट पाकर स्वयं काटॉपर हो प्रसन्न रहसे हो । अमानने
ही तुम्हें इस अन्यायपूण मवम्पा गल पिया ह । तुम्हारे परियम -पी
पेपर मस्यानापोली येलने अधिकार कर लिया है जिसन तुम्हारा पोपण
पिया मोर म्पर्य हरी भरी बनी रही। ॥३॥
इम दाएं हापको हपली वासकर अपनी मांगोंमे ज्योतिप दम्रो
मिमा बिना इम मसारमें ग्मिीका भी निर्वाह नहीं हो सकता पिस
प्रकार यह मोनाम्यपूर्ण पिढ्नॉम मुगामित है। मौर देखो कि वैमर
धन मौर मम्मान पर उमने विजय प्राप्त परमी है। उठा और उठार
प्रान-पूण दृष्मेि अपने माम्यपर दृष्टिपात परो। भान पूर्व बीर
पदिसमके प्रत्येक स्पानमें अमिकी ही पर्वा है।
॥४॥

कपि-पी मासा- १० हात हारी! तुहिजे तस्वोर मंशा क्रोम बो कुम्पार तहिने फ़रियार मो पेवारि बो बर्ताठ बजे तुहिने बरिहास मां माम को गित माठि तहिने मा प्रमबिनाकु मो गोगार बजे, बानि गिर पहिली अफ्रानि में पधारे गारी, तथि रिमापद पी बर्मा रिकि न तो हारी, हारी! ॥१॥ पी उमो म्यो तो बमि में की चेम्हि कुबी, पेर पापीम में टुबिया, मामि पसीने में दुबी, निरगी संहिनी निसायत सपानि में समी, जिस्म से साफ करण मार म साबुनो सुनी, मूखी मर्ममि में पई मौत जो सबतो पी शिकाय, प्यो सनोमीम सबवितो में बाउनि मा भिकार तो रिना पोये पगा, पर म पया दूत कना, जे रदा म रमण बा से पर्दया सातु चणा, तुहिने गुरियुनि में घिम मार पपाई हा पगा, मात पानी प्यो, एपा गाको तुहनि मा के कमा, महिने रत साण रवी, म सा पसिये पो रोज़ हा। सूत रहे पान सो हमिरी ऐं हरोफ़। ॥३॥ पहन तुहिने वा मौवाद सबा माहि परे, बोट गरिने समे पारि परेरो बो करे, छोत चन परित सरसि तोला सबार पी न सरे मम टिपाग सा मेयो तोर्स रिसासमि सौ मरे, पहिलो तापत सो माणु म हारो सोने, फ्र पातों पो, हामि माण म हारी तोपे! ॥

-सिपी १०. हाय किसान! तुम्हार पाविसे तुमपर गाति द्वारा किया हमा अन्याय हरक रहा है। तुम्हारो फरियादम तुमपर किया हुषा अन्यायपूम याद ससक रहा है । तुम्हारी दुवमा बाम लोगा द्वारा सुझे दिया हुआ कप्ट मला रहा है । तुम्हारी चुप्पीम भयानर मावान ठठ रही है। सुमने यपना धन सपा जीवन परिषम पिपाकर गल दिया तब भी हिम्मत रखकर ए किसान! तुमने अपना मन नहीं मम्रोसा ॥१॥ तुमने सीधे पर हार भौर मुजफर रापनमें अपनी कमर सीकर दी। तुम्हार पाव पानीम व भोर गरीर पमीनास तर होगमा । सुम्हारा चौपन गन्दगीमी पपत घाता रहा। गरीरको समग्छ रम्बनके लिए तुम्हें सावुन तक नहीं प्राप्त हुमा । भयानक बीमारियोंमे पिरसर तुम्हें माता पिकार बनना पर । गरीवीके कारण तुम यादो मी भिकारन लगे ॥२॥ बो-पोकर तुमने बहवोंको अमाज दिया सकिन अपने पापणक लिए तुम पूरा पाना भी मुरक्षित न रख सः। तुम्हें कठोर बने ही पमान पर । तुम्हारे मसिहानोंमें मुसनर लिए बहुत सोग म मास तो साफ हो गया और सुम्हार लिए भूमी मौर छिसक ही पपे। पिसा सतसे ग्बी मोर वर्गफमा पोषण हावा है। अफसोस यह परियमी रिना पानमा ही रह जाता है। समीर तुम्हारी पहुंचम बहुत दूर है ऐग्नि पोट मौर अंगारके समय यह तुम्हें पूर्व पाद कावा है क्यापि उस समय तुम्हारे बिना उसका नाम नहीं पा सकता। अपना नाम निकालनर सिए वह तुम्हें तरह-तपको सिमाएँ देता है। ह किमान! तुम्हें अपनी गतिका निम्वित् भी बाघ नहीं है । तुम मपने कम्पमा पासन का करते हो ऐगिन तुम्हें अपने अधिकारोंग मान ठप नहीं है।

कपि-भी माता-
७१
प
घोर यहि के बिनहि पेट में मकान बसे,
सरसतु पर सोत, यो सूफान को इमकान से,
गई, हर पहिनी रूपे, मु मा को को पसे,
बासि 'बेवसि ' ते गम्यो बस्तु भो कुपिरत मो रसे,
वो तामाकास मन्ता पर्यशा बापस पा मथानि,
महिर बो मीह बपो मर्नया बाबत पा मनि । ॥

-सिग्धी
पोर मघकारके अन्त करणमें हो तो प्रमाग वन्द रहता है। हमाके
एक मानेपर पब सम्म गरमी पड़ती है तो तूफानका अन्वया रहता है।
दुध मपनी सीमापार करनेपर ही स्पाम्प्या रूप दखता है। नितान्त
वस मममा निरुपायकी सहायता लिये ही कुदरतका सहायक हाप
पहुचता है । तुम्हारे सिए यामाधो गरजते हुए बालकमा रहे है दयाको
दृष्टि सिए गरजते हुए बादसा रह है ॥५॥

कवि-भी मासा-
२१ किये इतिहा?
एकसा ना रेविता। तुहिनो सही मम्मद किपे?
महिमें इतिहावी उमातो माहि सो अरह किये ?
परिवरि प्यो शमा तो बिम् नमेनि मो महास,
भावारीम मा आहे बठको बेरह किये? ॥१॥
यास
म्यो मबी सूफ्रानु सिही, समुं छोसी मार प्यो,
फिर्म मितनि मम्सर मा मोती, शान्ति-यह सामर किये? ॥२॥
शिर्ष सारी पन को क्रोमियत ने क्रम मो,
नम्स से मरतर किये पारियान ते पंचर किये ? ॥३॥
समुन्न साहिह ते तमीसी ए दिमाग्री चोट से,
पो पुगी पहुये बंगण मा सोम यो अभिगर किये ? ॥४॥
मघ मा पोपा बापा पुरि गर्स चश्ममि में मपो,
बिल महा मसर में " पर किये ऐ पर किये ? ।।५।।
महिर पाहाणा फिरनि पा मप्तिमबो महिबर से,
माहि मखित्यारीम ने बाकनि में पाईम र किपे ॥६॥
हि मां गुखिरी माम मो मासूरिगोम में प्ये गुनर,
रिमिनिवाशीम मो महान में सो पपासू पर किपे ।७।।
मासु पयेबारा तुहिनो पा तकिनि माकास तां,
से पहिनि मा पनि प्या" भहित पिड़ो मह किपे? ॥८॥
बस्ती तासीर मुहिबत सौ करे पो सोह, परि,
प्रिति नो पारसु पहण सो दुबीम्याग मि? ॥९॥
यो मिसाए मुफनि ऐ मुवी मसाप में,
सोहबमस पतनीम मो अवसि नसिबो ऐ मोहर किये ॥१०॥

-सिप्पी एकता कहीं। हे एक्यो देव । मैं तुम्हारा मन्दिर महाँ पाऊँ ? पह हृदय नहीं है जिस अन्दर एक्पका प्रयास है ? ऐ मास! तुम्हार विना बाधाओंका बहाव भटक गया है। स्मत जवाफे रिए मागाऐं सो उठ रहोह सेक्नि मगर गरनेके रिये बन्दरगाह कहाँ है? ॥१॥ को ही पोरका सूफान उठा है समुद्रको लहरें उमस रही है। सकिन उद्देश्य के मोती नसे प्राप्त हो सकते हैं क्योंकि शान्तिपूर्ण सागरकहाँ है ॥२॥ राष्ट्रीयताके परारसे यह विपान रक्त कैसे दूर होगा? कमांकि नग बीर नारिपार रिये मस्तर कहा है ॥३॥ पुर दुटि सचरित्रता बीर मस्तिष्कमी सदात्ततापर भी माम रुपी बनगर हावी हा गावा tim स्वार्षी मातोपर अधारका परदा पा गया है फिर भला अपना मौर पराया क्योंकर दृष्टि गापर हो ! ॥५॥ स्थापकी धुरीपर राष्ट्रोंगी धिपा भी पलट रही है। मधिकाराके गोर-गुलक सामन बानको टक कहाँ ॥६॥ जिसमे जनताको मानीरिकाका मुखपूर्वक निर्वाह हो सके, मनःप्रमापा ममाग्में एसा पा पूर्ण पार कहाँ है? ॥७॥ मालामम परवास सुम्हारे मामपर अति गहाय वैठ है। अपनी सेज पोंगाम मह रहे है कहीं सरल-मरते ममे ही मर गाओ।'|| अपनीप्रमापूर्ण मैत्रो प्रभावमेजोलाहमा साना बनाता है। प्रेममा बह पारम परमर और प्रममा मह रामायनिक (पीमियागर)महाँ है?।।९।। जो मनगरपमें एकस्व म्पापित परे यह स्प-म प्रेमका पजपा मौर बोहर महाँ है 11.11 ? -

कवि-भी माना-
म.
१२ सौ
शान्ति पहिरतरे मपी बो शौढ़ यो इनिहार मो,
हुस्न हिरिसारण ला पहियों पाम पोसो मारियो।
पुस्पु महती ठही जाती सिफ़ातीज मा पिया,
प्यो समाशो तुतु पारो गीर ऐं दीगर बो॥१॥
पो मसोमी हीर मारो मुहिवती मुणिपू टिपy,
बस्त को पाने बर्यो प्यो सिससिसो ससार नो ॥२॥
पस्टिमी प्यो पिति नो पीपो सियारह हिक तरफ्रि,
प्यो प्रसानो मनु समानो मे इसरार जो ॥३॥
सूह भो सोने मण्ये में मम मो मोती बापो,
कम् निशाक्तार यो प्यो बस्स ने बीमार मो॥४॥
प्पो मुखासिफ मुहिदु मारी सोर को शारि हो,
मामिझो मुश्कित मी म्यो सोम यो ऐं हार मो॥५।।
हिक भवर मे बोट केर्या कोट मगिती हान जा,
सो बम अमन पा स्यारह हस्म महपियार मो॥६॥
बरियर भी बाहि मडिको, प्यो सत्या सागर पुती,
हिक सहिरं साता.मो, प्यो तार वसि परिकार मो॥७॥
पोतिनी पुगि प्यो बितोरो बोट को मम बीतु हो,
पर सरया में पोट पहिमगि पेन म्यो विगु बार मो॥८॥
ा मरामि ममासि माहे पद मणि मो पगे,
तामु विमिसोम पणे ग्यारह वेब ने तमिवारि भो ॥९॥
स्त्रीम से गुप्यु परिवनिमें पगो महो मसर,
पो कटे रिसीचे सिरफ मा मोतो मितु वोबार मो॥1॥

१ -सिम्पी १२. स्त्री - जब ब्रह्मको अपने आपको प्रकट परनको सारसा उत्पन्न हुई तव सौन्दय से एमानेके के लिए उसने स्त्री वश धारण किया। निराकार और साकारसे सम्मिसनसे पुरुष और प्रकृतिका प्रादुर्भाव हुमा, जिससे शीप ही द्रप्टा बौर दृप्त्यका समारम्भ आरम्भ हो गया ।।१।। प्राधी से मलयानिस के बहने से प्रमिर मर मुकुलित हो उठे । संयोगकी विजय हुई और ससारका समारम्भ हुआ ॥२॥ प्रम का पसा एम मार विशप स्प से झुका और नारी हृदय प्रेम के पमस्कारकी मिधि बन गया ॥३॥ सौन्दर्य में म्वर्णाभूपण में लज्जास्पी मौक्तिक मिजरित हुआ मौर संयोगमौक्ति-धनमा कार्य वियप स्पसे निवर उठा ॥४॥ वह और अम्पायपा विरोधी सपर्प आरम्भ हो गया जिमस विनय मौर परामयमा म्यापार कठोर हो उठा ।।२।। दृप्टिके एक ही पापातसे भक्ति मौर ज्ञान प्रापीर का पतन हमा। सीम्दर्य के अस्त्र की शक्ति पर्मन-बम स मी पक्तियासिनो सिट हुई ॥६॥ पब पाप-दृष्टि की बाग भरकी वो सतीत्वका सागर आलोहित हो उठा। एक ही महरसे घोर घान्त हो गया मोर शान्त हो गई पापीकी पपाला मी ॥७॥ यपि पितारका मोय दुर्ग विषित हो गया फिर भी पद्मिनी सतीत्व के दुगका गास तर भी पाना म हुआ ।।८।। पाप पूण वासनाकी हस्ती ही स्पा रिमो सतीपर व सम उठा समे। सती के तेज गपी यग का प्रकाग बिमसी से भी भघिन है।।९।। भारी पी गुप्त भावनाएं बड़ी आगस्पिनी होती है। वह अपने हृदय-शुक्नुिस निरप नए मोती उपनाती ह ।।१०।। कमिपी रि- कषि-मी माहा प२ M - मेह मा रोशन रिया की पाग मा पिरिपट करे, पो मंधारो गुम् करे मान में मधिकार मो॥११॥ प्रेम-बल मवात मो निर्मम् कवस बो गुह रहे, रिति मिनस मा मासु बिये नितु हम्मेहुविकार नो ।।१२॥ गर्मबन्सो गर्भ धारे पतोम नी मूरिती, रिमु पिता सा पो मिसे मकसिरि मुहारी बार भो ।।१३।। कुर सो पुर्बान महमें बानि पो घोों युमे, मस भर्यो रमनो बोअणु 'अबसिसा उपकार भो ॥१४॥ -

-सिपी
वह अपने भीतरसे ससासे प्रकाशमान दीप-स्तम्भ प्रकट करती है
और मझान अन्धकारका विनाश करती है ।।११॥
उज्वल प्रेम-बसर ऊपर निर्मस कमसपा वास रहता हाउसका सहानु-
भूविपूर्ण कोमल हृदय प्रेमको सुगधसे ससारको सुवासित करता है ।।१२।।
गर्भावस्पाम गममें बह पतिको ही प्रेमपूम प्रतिमा धारण
परती है, जिससे प्राय पुत्रमा स्प पिताके सदृण ही हुमा करता है ॥१३॥
वह प्रेमकी यति वेदीपर अपने भापको प्रेमपूर्वक न्यौछावर करती हुई
गिपरण करती है 'सि' कहते है कि उसका नित्य उपकारपूर्ण बीवन
यशस्वी है ॥१४॥

करि-भी माता- १३ शाहूकार कामु प्यो हिजो दुशातो, कहिले सोहू छागि मा, पारिति कहियो बये पो, तुहिने गिम माहापि मा, माहि तरि रामाने अशिरत कहिले भारी मासामि मा, सासु राहत नो बमे पो कहिले तम्तुनि ताम मा, कहि कयो तो भरम के मुफ्त पास मामिमा ? आहि सा गाफिल गरीबो, शर्म कामतमो शिकार ॥१॥ किम न रत-से नौर पे हो? प्यो साई सरे, प्रम ऐप जो करे परिणी बिल्यू वासी छ, पूम में सोम साप ही युनि हरियनि पारो गरे, भोग महम शाहिर पो रिपती रागो यर, माहि परपर दिसि नो पाहिए-गई पत्पर मार मो, सोयु मुर सुर में समायत सई सुर ने पास दो ॥२॥ तमम हर हरिपू सबरि, गास थिए ऐ कनिवार तुहिने मसुवाड़ो मुहिबत, पे उपापा और भार, फाहिनी मगिरत मे आरत सो पपायुर हर विकार, तुहिने रहिनि ते हमारे परम माहिनि माक बार, मिम बप्पो पन, माम् पतियो दानु पाहूकार मो, तिम पम्यो दुनिया में बाइस बार मे भागार मो ॥३॥ फूस फत सो प्रतिस्बर दिसु पयो होम पेट पात, मिति बणे पविणी, पनी, उति योटिकहिली मगाम, तोल सापरि रप्पो मुरिपस-मुगारे दो मुबान, तहिने प्रति गर्गाप्रपई पीवति भोमन एगि पंगास, होर बघि पोड से सोदो पो तो सो, सा, सिर सटिपा सहसे सहोमी, परिव सोही सोहि स iixn

-सिग्पी
१३ घनपान
तुम्हारा यह लास दुपट्टा किसके पूनसे सुन्दर बना है?
तुम्हारे पास गालोंकी मालीसे किसके हृदयका पून प्रकट हो रहा है?
किसकी मार्योंकी आवासे तुम्हारे इस वैभवका पस्ता तर है? किसकी
सांतोंके तननेसे तुम्हारा यह मानन्दपूर्ण साजबन रहा है ? ऐ मुफ्तखोर !
सुम पैसे मर मक्यो (शहर) को किसन वैभवशाली बमामा? यह
है मोघ विपन्नता पो लम्मा मौर विपस्तिका शिकार बनी हुई है ॥१॥
भाश्पर्य है कि इस रक्त पूसनेवाली गोंकको सामी' के
नामसे सम्बोधित किया पाता है यह वह है गो दुचपूर्ण हदयोंका खून
चूसकर बासी कर दता है । यह रिश्वत म्पी राम नकी लासीसे कममोर
हरियोंका चूना मिलाकर नगरके नए-नए धीश महम निर्मित कर रहा है।
उन्हीं बने हुए प्रासार्दोके परपर उसके पापाण हृदय होनेमी सापी दे
रहे है और साली दे रही है प्रत्येष स्वरमें समायी हुई ठणी बाहें ।।२।।
सवहारा वृत्ति के कारण तुमने गरी>को कगाप्त और ऋणी वमा
रिया । सुम्हारी इस मकान किराये की मुहम्बतने नामीको पपर भोर
निराश्रित मना दिया । इन्द्रिय भोगोंके सुख पनकी मादतसे तुमने कई विकार
पदानिए, सुम्हारे इन ठहार्यो पारम हमारों मति मधु पूम है गर्यो-ग्यों
घनमानसा धन माल पर और धान-गौकत यादि बड़े स्यो-रयों
ससारमें वे बयाय पूर्ण माप्टकि कारण बन गए ।।३।।
फ्ला-फूलोंस सदी उदर पूर्ति करानवासी इम पृप्पोको देखो,
यहाँ एक बोनसे बरपा पर पैदा हो जाता है यहाँ पमी को क्या मगास!
सुम्हारे कारण ही शायद आजीविकाकी समस्या कठिन हो गई है। तुम्हारे
ही स्वार्थने जीवन निर्वाह पठोर कर दिया है। आवश्यकतासे अधिर
संग्रहकी इमासे तुमने मोगॉो वंग पर दिया है और मावस्यकता रूपी
मोहेमी छा तुमन हमारों गरीबोके सर पर दे मारी है ॥४॥

कषि-भी-माता-
कर्मपोपी पी न तो दि कर्म श्री कुरिरत रिठी,
पियम पकावट बन पेसाही बठी, फहत रिठी,
किम बसर युग में मिठा मागे म सा मसत रिठी,
तदुरुस्तीम के म सालिम निर भी नामत विठी,
ने रसे मजदूर बेबसि कहि बोरे राग से,
पहिय परि उतरावर ते सोये रे ।।।।

सिन्धी
पमयोगी बनकर सुमने कमी कर्मकी कृपा ही न देवी मोर
परियमके कारण हुई पकावटसे माराम मेकर, तुमने कमी आनन्द ही
महों लिया। किस प्रकार भूखम प्याज भी मीठी लगती है इसका
रसास्वाद ही नहीं किया मोर न कमी स्वास्थ्यको गहरी निद्राका मया
ही चबा ॥५॥

EE
कवि-भी माता-
२७ हमियर्व गोढो
भषामा पो विसि मररि मारियू
मम पार्या पंधर में पिया सा
कमि बह मा पारिसू चुस्त,
समे राहिबद या कि पूरन गुरु
सची राह रोझनु सधे दो सप्ते,
हदूरीम में पूंचे पठी को हसे ॥१॥
पताए रस्पो मौत-रिति परिवरि,
हे पी मरर में हाई पचर
नमा फियो भी बनी पशि पबर
निहायुमि पनो को म मायो नवर,
बुधण मा पणो मू कया कम पड़ा,
मगरिकह बि सरनी म पहुती सरा ॥२॥
मटाधारी मोगी मपानकि मबियो
सारे सो मोरे सिपो महिं सरियो,
धपाई बिना योग पारो म म्यो,
सिवनु पोगु तहिते पारी पियो,
पमा सास पारे ठिमि योग में,
मगरि मनु हो साम्यो विषय भोगमे ।।३॥
परी
ब्रह्मनानी मिप्तो सन्तु म्यो,
पयाई बिना मान रस्तो म पो",
उहीम प बि सतिसानु सिपिणो पियो,
मान में रातिौहीं पियो,
रहीम राहमे पुगि म राहत मिप्ती
मगी एप में । कपा जी पिसी ॥४॥

-सिन्धी
१४ सहानुभूतिपूर्ण प्रश्न-पिन्दु
अकस्मात् मेरे वयमें यह इच्छा प्रकट हुई - विशेप
असमरसमें न परकर प्रियतमम सम्मुख गाऊँ ।' अप्त वरी उत्कृष्ठासे मैन
पारों मोर खोग की कि मुझे कोई पप प्रदर्शन अपपा सच्चा गुरु मिस
यो मुझे प्रकापा पूर्व सस्य माग दिखमा सक मौर मुझे मेरे प्रियतमक
परोंमें उपस्थित कर सके ॥१॥
हृदयकी मेरी इस उत्कण्ठाने मुझे दरबदर कर दिया। हृदयमें
यही मारसा बनी हुई है। मने बहुत दूदा, देखा ऐकिन कुछ दिखाई
म पा मोर नहींस भी यह सुसमाचार प्राप्त नहीं हुआ। सुननने
सिए मैने अपने कानोंको खूब सतर्क किया सेकिन मेरे बुमानेपर भी
यहीसे आवाज नहीं आई ॥२॥
मघामक एर पटाधारी साधु मिल गया जिसने इशारेसे
मुम्स अपनी बोर गुसाया मोर कहा कि योग सिवा का दूसरा मार्ग नहीं
ह। मत योग सीखना मेरे लिए आवश्यक हो गया। बहुत पोता
मैने योगी साधनाएँ की मेकिन मन फिर भी विषयोंमें हो रमा
रहा ॥३॥
-
फिर कहीम एक ब्रह्म ज्ञानी सन्त मिस गया। उसन महा-
जानके सिवा अन्य मार्ग नहीं है।" उससे भी मने सझानगी दीसा सी
और गत दिन मान पर्चाम हो बिताने पया । मापासा उपदे पार
मी मुम उस मार्गमे आनन्द प्राप्त नहीं हुआ ॥४॥

कवि-भी मासा- १० . - बरी। कर्मकाण्डी पियो को मिसी, “किया शुटि पे पी निसो, तकरि मो विसि तीर्थमि ते टिसी कमि राम, इनान, अपु तपु विसी, पर्यों कोन बितमि ऐं संताप मा, टी दीम मि, हार बिपि मां I || परी शोक मा य्युसि भगत पटि हसी, चपात 'मगिसी समिनिमें मसी गई पोइ त भगिम में रिति पे असो, मगरि राह पूरी म भगितीम सही, करे बाई रों पपुमि "पा का ?' पता हीम वनो कहिने पर ते धर्या ? ॥५॥ मचानक मं हिकु पुर-सुरिको अपो, बुधग सा हमियतुं गोदो गर्यो, रहो माब पो हो मो हि फुहो समापन फो में सो सर हो। उहीम समुंग्में " पाणु महिनो यो। गगन में पियो गा पूबर-गगे ! ॥७॥ पे पृषि रवा, पुगे पुतमें पी मना मिसे मारे, तो में पे रहे पी , मां ऐं न मंगा मुरमा, बमो माप्त पसि' निपटु नासु पी पुरी नुरीम में करे पामु पो । पिये बक्रा त -सिम्पो फिर एक कर्मकाण्डीसे परिचय हुमा उसमे कहा- कवर मुट किया अपना पमाणारी आवश्यकता है।" भीम ही में तीप यात्राके सिए निकल पड़ा। वहाँ पहुँच कर जप तप ध्याम स्नान तथा प्रम-पूर्वक रान भी किया, मकिन प्रतों और प्रायश्चित्तसे भी कुछ सिटन हुआ और संसारको हाय-हायसे गान नहीं छूटी ॥५॥ फिर बरे ही प्रेमस एक मक्तरे पास गया । उसने कहा- भक्ति ही सबसे उत्तम है। बॉं भक्तिमें अपन हृदयको रमाता रहा सेमिन भक्तिने भी पूरा मार्ग-दर्शन नहीं किया तव दुसपून निःश्वास लकर पहना पड़ा मा क्या करे? यह प्वना में किसके दरवाजपर पाकर गाड़ ॥६॥ मनानक मने मिमीको काप्ट पूर्ण कराह मुनी-मुनते ही एक सहानुभूति-पूग अधु विन्दु सरफ पाया । यद्यपि यह एप पानीपी हीद पी, मरिन उसमें समाया हुआ पा मारा समुद्र! उस समुद्रम मरा महम्' सूब गया मौर यह दुख-पूर्ण गुड़िया गगनमें समा गई 115।। बन दुम सीमाको पार कर गाता है तो वही मौपधि मन पाता है । म्पष्टि सममि ममा (फना) पर ही पाबत बनता है। तू' में ममा जाता हतब मि मीमता आ गाती भीर वामनाएं ममाप्त हो जाती हैं और आपका निराकरण होमर 'महम् , ब्रह्म' में एरोन हो जाता है ।।८।। तबममरम कवि-भीमासा- १५ भाजादिगी बावरी कानि मा तुहियो गुगल-भानारिंगी । तो बसायो सस्तु सो फ्रोमा पर मागारिगी। चहिने टोरण मा खपे ठिो जिगिह-मागाविगी। कहिं मुसीबत मो न पिये बंहिते मस-भावाविमी। मस्तु पी तुहिने मा इसानु प्ये पो बोपो को बणी परिबानो रे पो तेनु मातक्षि में स्पो ॥१५॥ पाठिसयत बी गुप्त पारतो तो बिना निकिरे मपी, फार वाई चिरगी, इम्सान बी मिसिरे ममी, रोगिमाई रहनी नहि मता उमिरे नपी, कौमियत नाकारिंग पी कोहि तरह मुधिरे मपी पाण ते मारण ऐ मुरीम मो पो युगु मासु पिपे, यात्मिक उन्नतीम सेरो, हिक पासि गुम पो मासु पिये ।।२।। रम् म्यात निघंटु घुटपन, तो बिनु बकर मसाट माहि रामियानी रमिट साइम्साफ मो मा काटि माहि, पारस र बी पेनी अशागत पाट माहि टिमिका, फरि फरिस पोति मीरत साट वाहि, पार या रगिसी वर्ग पो, पई रिस रंजूर में, असम रिसि माहिए पिये पो, मेटि सो नापूर में पूर मा दुरी ग्ये पो चाहि सौ मीमो हणी मा बताए मानि के परिवात मू पिगिगू हमी, मिर्म मुपातिक बाउ टिक, सिम परे तेयो पभी कीन ठापुर पिपे, धमे शेती म रहिमत पी कनी साठिमी भातो रहे हिन हि सौ बाति मो, मिर्म मंधारीम सौ तास! मा सहामि राति पो ।

-सिम्मी १३ १५ स्वतन्त्रता हे स्वत्रते ! बबूसक माटों से होकर तुम्हारा मार्ग गया ह । हे स्वतन्त्रत | तुमने वयका पर बसाया है जिसको तोग्नेके लिए मजबूत हवय चाहिए जिसपर क्सिीका भी प्रभाव न हो सा। मनुप्म तुम्हारे कपर मुग्ध होकर निर्भय बन पाता है और पतग वनकर तीव्र स्वासामें पूब पस्ता है ॥१॥ तुम्हारे बिना म्पक्तित्वको गुप्त शक्ति प्रकटित नहीं होती मानर बीवन प्रस्फुटित होकर निसृत नहीं होता अंधेरसे निकलकर मारिमक ज्योति प्रज्वलित महीं होती और तुम्हारे बिना राष्ट्रीयता असफल होकर सुधरती नहीं । तुम्हारे विना सावरम्बनका वीज ही नप्ट हो जाता है मौर बारिमा उन्नतिका गुण विशेप मी मप्ट हो पाता है ॥२॥ सुम्हारे बिना बफरेको तरह दम और गला मुटता रहता है तमा रानतिर पतुरताके कारण न्यायकी सही फट पाती है । तुम्हारे विना न्यायके साथ सम्पायका सम्बन्ध निकट हो जाता ह मौर तुम्हारे बिना जीवन टिमटिमाती और फाफडाती सौ के समाम है । वममसे पीरित होकर हृदयकी पीड़ा दब जाती है और वह हृदयका पाव एक दिन नामूरके रूपमें प्रकट होता है ॥३॥ सरस्वत पताकी मग्नि बरे वेगसे ममा उठती है तो मावनामोंकी पिनगारियोंसे परीरसो मुसस देती है। ग्यों-ज्यों विरोधी वायु बसती है त्यों-स्यों यह वेज पन्ने ममती है। जब तक पा-वृष्टि नहीं होती तब तक यह (मम्नि) पान्त नहीं होती। इस अग्निम बारिशका समय उचित ही रहता है पिस प्रकार बम्धसारसे पन्द्रिमापूर्ण रात्रिका Iril

कृषिमी माला-
मोरि माता में मिस्या दातारबो ना पाति माहि,
ऐ सम्म ते महिने का हकिरार इन्सान वाति माहि,
महिना बषि संसारमें सुमराम का सोमाति माहि,
तहिये नितु रोपे रखा पसि म कहिंगो गाति माहि
अर्भ पारा फर्श ते ग मार मुखिफ़ी पणो,
ख पारीम रहिं परि गहु मागीरो धणी ॥५॥

सिग्यो
माताकी गोदसे ही गो वरदाम प्रभु द्वारा प्राप्त है मौर मो
मनुप्यका गम सिट अधिकार है जिसम पढ़कर ससारमें मौर कोई
दूसरा उपहार नहीं उसको सवाके लिए रोज रखना किसीके शकी
पात नहीं है अर्शवासे (स्वगः) देवता गुह्य सहायता सेकर फर्म
(पृथ्वी) पर पहेगे बौर दुख पूम पाहपर स्वयं भगवान म्याय
सरसाएंगे ॥५॥

कवि-भी माला-
१६ पूजा मन्दर
मुहिनो मबह दि उते र सो
मिति रेरो,
गर्नु नहि भार फिदै महियो रतेई फेरो,
पिटु मारे मा मिठीम निट मा अध राति सपा,
गेरी रति वस्तु पुजा गर्व यो महिनार पेरो। ॥१॥
बेहो हर मासु नि कमि बाम में विशिमतमें भये,
धोन कोरे ऐं कपे मास बिया चौफेरो।
॥२॥
सोर से माह ततस तो ना गसण रिसि न मगे,
प्यो शर्म उनमो पहिण पोन बरो सरिसेरो।
पाणु माकाग दोगा ये सापा अहियो,
मिसिमि अनका म ममे महिनो कि मायेपे।
तमा हमिरा भो एरोत शोरो पिर. पिये
हिमो हरिगाइ भिए मार म पगार निषि पेरो ॥it
सारिणी साग, सबाय स ए देवसि पिमिके।
रिसि कंपस कहि बि मराईम सा म पिए शा मेरो। ॥६॥
॥४॥

२७ -सिम्धी १५ पूजा-मन्दिर मेरा मन्दिर भी नहीं है यहाँ पीराका निवास है। महाँ-वहाँ दुप विधमान है, यहाँ-वहाँ में विचरता हूं। भई रात्रिको बचानक मीठी नीवसे अगकर दौड़कर मैं वहाँ पहुँच पाऊँ यहाँ पीड़ामे अपने पांव ममाए है।।१।। यदि यह मेरा मास मौर बस्तियां बनताको सेवाके काम आएं वो क्यों न मै उन्हें काटकर उनपर न्यौछावर कर दूं ! ॥२॥ दुःखपूर्ण, सन्तप्त कराहसे यो हपय जल नहीं उम्ता, उसमें मौर परपरमें किंचित् मात्र भी मन्तर नहीं है ।।३।। में सेवाक वाकागमें इतनी ऊँची उड़ान संकि अनका' (पक्षी विशेप यो पृथ्वीपर महीं बैठता।) की तरह मेरा कहीं पोंसला ही म मिले ।।४।। सहानुभूतिपूण हरयका इतना विशाल क्षेत्र वम पाए कि उसका पेन्द्र सर्वत्र हो मोर माधिकारिकता कहीं न हो ॥५॥ ऐ बेबसि', सादगी, सच्चाईसे चमक उठ, जिससे हृदय-कमल किसी भी पुरी भावमासे मसिन न हो ॥६॥ कम्पिीरि-

कमि-भी मामा
१५
१० गरीपनि जी मूपिठी
जा माहि पार न बसें बबाला वो,
पोरी नरिबारिमा गिरिवी अभे ध्यास बा,
खोमो म जहिये आहिको बोचे जगाम पो,
हस्को ऐ मा हियाम ते सवतो संमास वां,
मेहि में प्रदरे सरि म सरासरि सपे पिड़ी,
मसा! मरे म शास परीपनि मी मूपिड़ी ॥११॥
पा पर वर्ग पी बीत हि मानिक नफ्रोस पो
मागी हे पा मधु-गुबारे में रस्युमि को,
पुमि भी पनाहमें रहे-हासिर हरीस व
बारे न पासि पौफ को जूनी पपीरा खो,
ये दुर्फ ए को ऐ सोधी सकिती,
महा! मुरे म शास सरोवमि थी मूपिड़ी ॥२॥
यांग एना अरिया जो मामुनि सबमि माता,
सारो ममो सिटपा पुरागनि पनि मला,
कारो कापारिख मे पामनि परामि मा,
पोदियो पिटपा पाम ऐं सरितनि सपनि मंशा
मुपती मरर त माया मषी मुसि पी मिट्टी,
मसा! मुरे म पात परीपनि जी मूपिको ॥३॥
हिते म मन साय तो मानु पो रहे,
राटो, सण, म मोहते को मोहाय पो बहे
धूमे, पपर या सिर को न सिरि पार मा सहे,
"महिम्म बाद माह में हेठा म मा गहे,
ममुगा वे मुहारमी माहे न गा पिट्टी
मसा ! मुरे म पास परीयमि भी मूपिडी ॥४॥

२९ -लिम्पी व गरीबोंकी झोपड़ी यो पायदाद अपना रिमोडी पपांनी हानमे रहित है, यो गिरपी भी नहीं रखी जा सकती बारिमी धनिष्टमी मासकामे भी मुक्त ह, पो रक्षाके विचारसे हमारे हृदयो टिए माग्म्मम्प महीं है और जिसमें धन-मयका पर्द भी प्रविष्ट नहीं हो सकता है प्रभु! ऐमी गरीबी सोपीको आप वर मम्गे 11 जो कामल मोर मृदुम मम्माम दूर भागती है का मेमर- पूम मानीपिकाके प्रलोभनाम मुमत है जाय और ईपम रहित है, निम पिसी धूनी और दुराचारीका भय नहीं और यो ताल आदिम हिन होनेपर भी मुरक्षित है प्रभु! एमी गरोगॉपी मापदोरा बोच तक मग ॥२॥ छाटी-घाटी टहनियोका काटकर घाटा-मा पर बनाया गया है, पास-फूम मौर दिनकों द्वारा साधारण आभम बनाया गया है, निमो मिर्मागर्म स्वय उन्होंने और उनके मित्रान पग्यिम पिया है मीर रिना पोई मूल्य सिर मित्रान दो-दोषार महामना की ह प्रभु ! एमी गरीबोंकी प्रोपोगा बांधता मग ॥ ॥ जिसपर नवा नगा सार ही इसराना है मा म गर वाई अपना महार ही निमपर पग्यिम पनाह पापर, इट अयबा भूनका भारया मिरपर नहीं उठाती और गागहन (House Tax); भारसे पीडित महीं है जा बमुरम्मत पिरापार गिम रखी हुई नहीं है, इप्रमु । एमी गरीवॉरी मोपडीरा याच सर न सगे ।

कधिश्री माता-
सिम्बर वान पो मिले बहिये विम्युनि मर्मा,
तिरिक्यो मनि पा तिरिबिरातारनिकरपुनि मंशा,
भूमिका करी भने हना नहिंने मिरमुनि ममा,
छिपिकार माई पो करे छुटिको रियुनि ममा
गरिरत संबी कमास, सिहत कार मिड़ी,
मसा! मुरे म पास परीबनि बी मूपिड़ी ॥५॥

१.१ -सिम्बी जिसके विपरोस सूर्य और चन्द्रमा किते है मौर ग्रह नमत्रोंकी किरणे फिसाकर भीतर माती है जिसकी दीवारोंसे वायु सनसनाती हुई दौड़ती है वर्षा निसको छतोंसे घुसकर हिसकाव करती है, यो स्वास्प्यके लिए सुन्दर मेंट है, हे प्रभु ! गरीयोंकी ऐसी झोपड़ीको मांब तक म ममे ॥१॥ जिसमें मार अपना पायरेकी स्वादिष्ट रोटीमें ही आनन्द माना पाता है और जिसमें सादा जीवन व्यतीत करने के कारण किसी पंप हकीमपी बस्रत नहीं पड़ती। परिश्रम उनको दीर्घायु बना देता है। उनकी आनन्वोन्मत्ततापर तृष्णा मधिकार नहीं करती, यहाँ चिन्ताको बग्नि मनुष्यको नहीं बलाती, हे प्रमु! ऐसी गरीर्वोकी झोपड़ीको माप कम मगे ॥६॥ - कक्-िपी माता- (०२ १० नवाई - तुहिनी दुनिया में नवाईम नो सा माहे नाम, महिने सटिके ते ऐ मौगमें हरि रिनि पो मपन, साफ सवमी पी गुरार Bा मगे रह कठन, प्यो भराईम ऐं पा सा बि मियण साई बतन, महिकी दुनिया को मिते मौत को मार पो बजे ने नपाई नहुने हुंच हनी हरि को भने ।।१।। हुस्म को माही गमाने में तूं मदिरो हथियार, तुहिने हस्तीम ते हे सूहे ने हस्तीम जो मगर, स्प राग मायो माहों सुरीसी तू सताप हर मिगार भी मगर नूरे नवाईम रेमिकाए, मे म हरि पाते हनी छाप मबाई पहिनी, हरन गोवे में रिसे हर पाई पहिलो ॥२॥ पो सचाईम ते भवामि जो परहि रंग परे, सोन मुगगेम में तहिं गोया को होरो पो गरे, मारिहरु सो को नमूने में ममों पादु पड़े मी सिवामोर में मगरि पर्त पुराई पहे, प्यो पुरानप ते मबाईम मो जाहि रेसु बगो, परि मूनो हो गुरो, पर सो महिए मगो ॥३॥ हपि मा माहि रहो काह हुई मगिरत अहिणे, इस्म हो माह, पनि अम या बहालत बहिये ऐ पापरि प्पे सुमा, मग पो निशक्त महिणे सा दिप पीर म तमोस को मारत हिते, गरि परि गति सीक्रीम में फेरो पो मने, झा तपि र सपाईम में समेरो पो मचे In -सिम्मी १८ नवीनता -- तुम्हार समारमें सदा मीनताका समारोह छाया हुआ है गिसक सासिस्यस प्रत्येक हृदय आनन्दम मग्न रहता है। इस संसारमें शुद मौर सरलतापूर्वक जीवन-निर्वाह कठिन हो गया है। जिसमें जीने के सिए कठोरता पूम पस्न दिय जा रहे हैं यहाँ प्रति क्षण मृत्युका मार माला बन रहा है ऐसे ससारमें यदि नबीनता न होती तो प्रत्येक म्यक्ति पुनी हो जाता ॥१॥ मुमार मीन्दगा तू ही जबरदस्त धम्प है। तुम्हारे अस्तिस्यपर हो मौन का अस्तित्व मडएम्बित है। रूप और राग मागे तुम हो मुरीमी पोणा हो क्योंकि प्रत्यक दृ"यकी मुन्दरता नवीनतारे प्रमाण मिषा निकम्मी है। ओ नबीमते | यदि तुम प्ररया यस्तुपर अपनी छाप नहीं एगाती तो सौन्दर्य अपन महत्वको भी विपत्तिमें पग हुआ देवता ।।२ पर सत्यपर ममीनताका रग पड़ता है उस समय मानो मर्ग मुद्रा माई हीरा जादता है। क्श वही है जो ममूनमें नई गठन गढ़ रे मेफिन नबोन वाणीम भी प्राचानतारा पाठ पढ़ाए। प्राचीनतापर जब मवीनतापा मावरण पाता है तब यह गुड़िया पुरानो हानपर भी बरी प्यारी सगती है।॥३॥ पान वही निस्तार है, जिसपर बस मारपर्य प्रकट किया गा रहा पा! जापलता मान मममा गाता मा पारवही अमान माना जा रहा ह कम पायद यही दोप माना गाए, मार जिसे मुकुमारता प्राप्त है। वह बम्नु हो कहाँ है मिसमें परिवानगीसता न हो? यपपि म्पयं नाव हीडी (बह्म) में कोई परिवतन नहीं होता फिर भी मिलती (मागार) अवम्याम उमरम्पर्म गरा परिवर्तन हा गाता है ।

कषि-मी मासा- ॥२ १८ नवाई . तुहिनी दुमिया में नवाईभ भो सा माहे मान, अहिले सटिके ते रहे मौनमें हरि रिसि पी ममम, साफ सबसी पी गुसर सार मगे रह कछन्, म्यो परामि ऐं वा सो वि विपर्ण साई मतनु, माहिती पुनिया वो मिते मौत नो मार पो बजे मे नवाई रहने ईर हनी हरि को म ।।१।। हुस्न बो माही इमाने में तूं जबिरो हपियाय, तुम्हंगे हस्तीय ते हे सूह ने हस्तीम बो मार, रूपये राग भग्यो माही सुरीसी तू सतार हर निमार भी मगर मूरे मवाईम रे निकार, ने महरि पाते हनी छाप मपाई पहिली हन नोचे में रिसे हर बनाई पहिलो ॥२॥ पो सचामि ते मवामि जो गहि गु ब, सोन मुहीम में तरहिं गोया को होरो पो जो, मारि हर सो मो नमूने में नो पाटु पड़े मी शिवानीम में मगरि पत पुराई पर, प्यो पुरापप ते मबाईम गो गहि वे वगो, गरिपे भूमो हो गुरो, प.! सो महिना मगो ॥३॥ हदि मम माहि रहो कारह हुई मविरत पहिले, स्म हो काह, पनि मन पा नहालत गंहिते ऐन पारि प्ये मुर्मा, मग पो निगमत महिणे सा निधीग, म तमोल भी भारत पहिणे, गरि परिगति होक्रोम में फेरो मो मये, फ्रो तयि हप सफाईम में ममेरो पो म In -सिम्मी ३ नवीनता तुम्हारे सम्रारमें सदा नवीनताका समारोह छाया हुआ है गिसके साहित्यसे प्रत्येक हृदय आमन्दमें मग्न रहता है। इस ससारमें शुरु और सरलतापूर्वक जीवन-निर्वाह पठिन हो गया है। जिसमें पीने सिए कठोरता पूण यस्न पिये जा रहे हैं वहाँ प्रति क्षण मृत्युका मार वाजा बन रहा है ऐसे ससारमें पदि मवीनता म होती तो प्रत्येक व्यक्ति दुखी हो पाता ।।१॥ ससारम सौन्दयका तू ही गबरदस्त शस्त्र है। तुम्हारे अस्तित्वपर हो सौन्दर्यका मस्तित्व मपरमित है। स्पषौर राग मागे तुम ही सुरीली पीगा हो क्योंकि प्रत्येक दृश्यकी सुन्दरता नवीनता प्रकाशक सिवा निकम्मी है। लो नबीनते! यदि तुम प्रत्येक वस्तुपर अपनी छाप नहीं समाती, तो सौन्दर्य भपने महत्वको भी विपत्तिमें पग हुआ देखता ।।२।। गव सत्यपर मयीनताका रंग पड़ता है उस समय मानो स्वर्ण मुबाम गोई हीरा गा देता है। कसा बही है गो नमूनेमें नई गठन गढ़ २ सकिन नवीन पामोमें भी प्रापीनताका पाठ पढ़ाए। प्राचीनतापर अब नगीनवापा वापरण पाता है तब यह गुरिया पुरानी हानेपर भी नही प्पा मगती है ॥३॥ मान वहो निस्सार है, जिसपर पल बाइपर्य प्रपट पित्या मा रहा पा! जो कम तामान सममा पातामा आरमही यशान माना जा रहा इ. कल गायद यही दोप माना गाए, आव जिसे मूहमारता प्राप्त है । मह बस्तु हो कहाँ है जिसमें परिवर्तनगीसता न हो? यपपि समयं पात सोही (वह) में कोई परिवर्तन नहीं होता फिर भी सिफाती (सागर) मवम्पा उसलपमेंगा परिवर्तन हो जाता है ।।४।।

पादि-मी माला-
१०६
१९. गोताने जो सुधारो
भारत में गए एम को पानी मिगारो, गोठमि जो सुधारो।
हिन या साठाहीयो नमूमोइ नियारो-गोठनि गो सुपारो।
मन्वायु परोपक बो गोठनि में बसे पो-स्युनिमें बसे पो
भागोंगे मसी मेकिलो मारममें उगारो-गोठमि भो मुधारो।।१॥
रगिया हुनिर हिन मा-पन्या मे पिकाना
मागाए परी तिनि थे सिमारों दुबारो-गोठनि बो सुभारो।।२।।
बोस्म पनि मैप में--.रि मुस्क मे अनि यो
सस्तोम माम, को दुरि मेधारो-गोठनि भो मुपाये
।।
बापू विपरिष पूटि हवा, पर म सफाई-बीमारि मनाई
नम सिहत को होपनि पे समारो-गोठनि मो सुधारो।।
गोपेट परे पेट स्पो, मंग रमाहो-जोमम में कुराहो
कुहिमीम तुरो मई मतारो-मोठनि यो मुधारो।
पांचाति में जा गिरिमी घटि पी मागे, ठिक ताममें सगि
भेताप हिपत मा करो तहिण किनारो-गोनि मो मुधारो
मन-वृत्ती पुलामीम नोहारोरिया सा, स्वराग्य सिल्या सौ
माता पिपातील प्रो बनाइरो नगारो-गोनि को सुधारो।।७।।
पति पोहोरो जहि रसम पुराणो कारिता पापो,
पर पो पातु ए पो म पियारोगोठनि जो मुगारो।

१०७ -सिम्पी १९, ग्राम-सुधार ग्राम-सुधार भारतमें नए रंगका दृश्य उपस्थित कर देगा। ग्राम-सुधार इस देशको नए साँचे में ही बदल देगा। मारतीयोंकी बड़ी सस्मा गांवों मौर मस्तियोंमें ही रहती है और प्राम-मुषार अस्सी प्रतिधत बनतामें सुधार भाएमा ।।१।। भारतकी जो कमाऐं उजड़ गईमौर बो धन्धे नष्ट हो गए, विस्मृप्त हो गए, ग्राम-सुधार उन्हें फिर दुपारा जगापर जीवन-दान देगा ।।२।। विचा-हीन होकर यो अपने देशको अवस्थासे अनभिज्ञ हो गए है और समाचार पत्रोंकी जानकारी से दूर हो गए हैं प्राम-सुधार वम्हें विणा-यान रेफर प्रकाश देगा ॥३॥ मकान भी गर है वायु भी समन्छ है कि सफाई म होनेके कारण वीमारियां फैल गई है, ऐसे कमजोरोंको प्राम-सुधार स्वाम्प्यके निपमास परिचित परापर शक्तिमान बनाएगा ॥४॥ मपनी नती-बारी करते हुए भी गो किसान भूधा मौर मगा है, पनामीमें ही पूरा यम गया है एसे किसानो ग्राम मुधार अधादि दार इप्ट-पुष्ट बना दगा ॥५॥ यो पसायोंमें फूट मौरींपतान पैदा करती है उस तगदिसीको पाम मुधार मिसाप और मुहय्यतमे दूर करगा।।। पाम-सुधार विद्या द्वारा गुसामीवी मनावृत्ति दूर करेगा और स्पराग्पनी शिक्षा द्वारा मागाद पिचारारा नगाड़ा बगाएगा ॥७॥ बेबस (मापार) होरर पर यह उन पुरानी नियोंरो बजार समाप्तगर स्यागपरेगा तब बहमपना प्यारा समय मौर धन प्यप बरबान मकरेगा- -ग्राम मुधार ॥

कषि-भी मासा-
२० देसी हुनिर
हिमुनास्पनि हुनिर हरि तरहि हिमिपाइयो,
पहिने मुस्की मास थे। मुस्कमें मप्तिाइयो,
मुंखे मुहिबत माहि हरि पहिले प्यारे स सा
बेस ने घधे हनिर हरि कारि हिमिबाइयो ।।१।।
बात महिले विर्तु घार्यों या दिवशी माह मो,
मुस्क को पानी मिठो, पारो पूतीम सो पाइयो ॥२॥
मसि हुने सारो पुम्हो महि साबनी हो हमे,
रेस पोहने नो पपो, पहरो प्र.शीम सा पायो ॥३॥
हिमुवास्पुनि जी मुग्पस का मामधे मुपसर हुने,
कीम म कोम काटे समोरम शाह बिना किमाइयो ॥४॥
मेहुनिर वे हिनुबासी, पी किरो प्या कगाम,
तिमि पे मायूसी रे, बाराबो पहिसायो ।।।।
ने उम्पत हरी कफन में प्रेर हिम्मी तमुका
माशु मरिमे4रि 'देवसि पो की, पारिमारबो ॥६॥

-सिम्पी
१०१
२० स्वदेशी हुनर
भारतीमोंकी कमाको हर तरह से सलाहित किया जाएगा। अपने
स्वदेगकी वस्तुओंका ही देशम प्रयोग किया जाएगा।
हमें अपने देशसे मत्यन्त प्रेम है। मत देणको काम हुनर मौर
प्रत्येर कामको उस्साहित किया जाएगा ॥१॥
हमने पिदेपी बस्तुर्मोक प्रयोग न करनका व्रत धारण किया है।
देसनी बारी बस्तुको भी मीठा समानकर उसे काममें माया माएगा ॥२॥
पाहे काटा कम्बस हो या सोई अपने देशकी वस्तु मानकर उसे
प्रसनतासे मोड़ा जाएगा ॥३॥
भारतीयों द्वारा निर्मित वस्तु यदि मप्राप्य हो, फिर भी उसके
बिना पिसी तरह समय काट सिया पाएगा I४॥
जो भारतीय हुनर होनेक कारग कगास बन गए हैं उन्हें
कोई न कोई काम देकर पालन-पोपण किया जाएगा ॥५॥
मपि हमारे कफनमें एक भी बमारतीय सन्तु बुनी हुई होगी, तो
मरमा बाद इमारी मास मरियत होकर परमा गाएमी ॥६॥

वि-श्री मासा- एए गंगा महिए भो सियो' जाणो सगो 'डा सियो ससितं, कासि पूरी बांसुरी, फर्की गस . पंषु करण मूगो पुने, पाट पठी हत तु, वाम मर्या वस्तू, हिन अवसि' ऐं के बोर मो॥१॥ तो गस फूषया फूक मा, मुं बस का पूरी, काटे कर कसूर मा, गामि गर गरो, स्वाहिदा पनि प्र.मर भी, मितर भी भोरी, मपी होत होरी, करि हित में हेग सा॥२॥ धन पसामे पासि मा, मापस पून पणी, ते भंगरि चाह मा, मोषी चिन्त भणो, कोप बुग्या घे पोहता, हा हा एरियमि हमो, कोमतगरि कपी, मू कगिका करिकाए का जासत तो सहने पये मम मातम पी माण, गुम्या रिसि पी पसिनो, रिनियर रसम कोणि माणे पो मुख से प, बहिरे मो बगिनि, पाकस यो काराम, पहिरिए दुख से dil म पो महिबब सा मतम यो मामो, मनो रिपार मोषितो, मुहबत मायाणो, पसी वितो में पियो सहिनि को टागो परोस चालो, घोगो लिफिरे पित मां | -सिन्पी ११ श गंगाकी लहरें किस प्रकार सिदूं'-मानता हूँ। क्या लिखू ?' सिर्फ इसे ही तुम बता दो। मैं बसी यगाऊँगा लकिन मेरे गाल तुम ही फुलाओगे। में राह बस सकता हूँ लेकिन तुम मार्ग प्रदर्शन करो। हापानिधे । तू ही इस बेवस और निर्मलका वस हे ||१|| बांसुरी पनाने के लिए तुमने मेर कपोस प्रफुस्रित किए और मने बाँसुरी वनाई । मन मपन हृदयसे सारा कल्प घोगला । हे त्रिपतम ! भव आकर मरे हृदयमें सोम्सास होली चलो ॥२॥ विधिप्ट धन निधिसे बड़ी चाह और चेसमासे अति सुन्दर चिन्ता मणि से आया हूँ किन्तु अपसोस ! सोसारिक मायास आकृप्ट होकर मैंने उमे फेंक दिया। हाय मैन इस अमूल्य मणिक टुकड़े पर दिए ! ॥३॥ सातसे नसावा महल ही मान हो जाता है। प्रियतमके वर्णनके लिए ससार रूपी हदय मपुर है। स्पम्मिा ही मुख प्रदान करती है मोर ससारका दुखमय दवनवामेपो पाहिमा ही दिखाई पड़ती है ॥४॥ मन अपने प्रियतममे मस्पनरे मिए मान दिया, मेरिन उसन तो अपामा प्रेमनी मपानी ही डास दी। आमोहन मारम्भ हो गया मौर म गपा ठहाका समा। प्रभु ऐसा परे कि मस्यनकी खासी वही रसी निपरु पाए ।

भिन्मी माता
विछोड़े ते पसुस दो, नहि बर्यो पान,
महिबत मागाई कई, सिकन बिगायो सार,
वेदिचा विसो रहो, पूरीम को घधिकार,
पासीम में रसु पाउ, त मानो गाय मंर में॥६॥
महरि ने ब्रह्मांडमें, बहिनो मन्तु म पार
मटम सप्टो मेम सां, बधो बहि ससार,
रिसिरे ते बप्पो तो बुरि बम बार
इरफ अब इसिराय, मीहं बथो हो नाप 11७11
ता
मू गा दुनिया भाई,
सूरत सुपेयां,
मम्पुनि मा मधिकार था, कटर में का,
सामहि समुस सही कर्यो, जे सुमरिणी सोर्या,
मन-ममियो फेर्या, तरिसि पर्सम में बौर में ॥८॥
'मां'पैरामी 'मां मना, मानर मा माजे,
मोह विजापो मिति , माहि मा प्यो माउं
पर्ता परिवानीम संबो, राडो रिप्पो पराउ,
ग गरापुरियो गाउं, पो एफन बहि छिन में परियो ।।९।।
'मा पैरापी 'मो ममा माई मशारा भार
मारो मायसि मार्ग , प्यो पाछी से मा,
बाप-बार अग्रवार भ्यो,
मुनगद पुष गा,
किपि हंसरान रिपु का छा मोतो, मघु जो ॥१०॥

-सिम्मी वियोगपर सब सयोगका अधिकार हुमा सो प्रमने हुप्पी साध ली। उत्सुकताने मुम येहार बना दिया, मिक्टसे भी निराप दूरीका भय बना रहा। यदि गतीपरके आममें छटोर भर रस है तो पाप्ती' में पाव भर रस छसकता है ॥६॥ r मसोम ब्रह्माणमें जिसका न मावि है न अन्त । रिसने मृप्टिमें मटा मियमसे ससारको माघ सिया वही हृदय मन्दिरम भवोध गिगुकी सरह वैध पर बैठ गया। प्रमका विचित्र पमत्कार है । स्नहन ही नापको घांधा पा 10 निसे मने ससार समना वह तो मेरे प्रियतमका रूप है। यदि आवासे भग्धकारका दुराग्रह दूर कर दूं मुवि और शाम (प्रतीति) को सन्तुरित पर यदि मासा फे (बाहरको मासा छोरकर) मनपा मनपा फर तो हदय दर्शनके आनन्दमें समा जाए 15॥ 'में उत्पन्न हुमा अहम् ' में और मानन्दम मरा प्रादुर्भाव हुषा । स्नेहमे निरति को दूर कर लिया मौर 'नाम्ति पर ही नाममा माधान हमा। पर्माने बलिदान करनका बगही विचित्र नगरमा जिसमें पर प्रसन्नतापा गांव ही त्याग रिया ॥९॥ 'में उत्पन्न हुमा अहम् मे मीर में आरम से उत्पन्न हमा। पव मने मारम का विरोध किया तो पेषत माम ही रह गया। माग दाद (म्यायफा बाग) बगदाद (मम्याय) हुमा और मुशनगर दुरानगर मन गया। वहाँ रामहम मौर नही पाप या मोती भौर क्या दुगग्य युक्त विप्रा । ॥१०॥ करमाको मृपी पाममें समर पाया मा नाम । ६.मिपोhिr-

कमिपी मासा-
पापा पापा कीमकी, मड़िया अमांगे,
पारि न पाहता तारि मा, तर्या मताप,
सहप्स म मारा सोर ते, साह संबे सोणे,
ममतापा माघे, सहिनि मोरे मोडिया ॥११॥
ई परपी हीनको, तूं हए करि गिरी,
हिम्पो ठहिकनि कोम पा, पूंगर ऐं गुखिरी,
सामगिरी सो साम at, बा साइत सब सुधिरी,
अवसि' नाति सुपिरो, पर रहिणीम हेलि रामो रहे ॥१२॥

सिपी
पड़े हुए विद्वान पर न सके। उसटे अस्संघमीयमें मर गए।
साहसे पार न पहुस सरे और छिछमें मी तर म पाए । सहयों मृत्युके
मयसे प्रवाह तक ही म पहुंचे कई पद-दमित हो गए भौर कइयोंको लहान
दुबो दिया ॥११॥
पीता हमा समय सीटकर महीं पाता ।
अत भविष्यको
उगवत मनानेका प्रयत्न करते रहने में ही पुठिमानी ह। बीता हुमा
जीरन और आमेवासा भविष्य ये जीवनके ऐसे दो छोर हैं जिन्हें जोड़ा
नहीं पा सकता । मह सत्य सदियोसे यों ही पसा आ रहा है। ऐसी
स्पितिमें 'बेबसि' बी का यही कहना ह कि ममुप्पको सत्प्रयरनोर्मे
सतत सीन रहना पाहिए ॥१२॥

कषि-मी मासा
१२. फना में बका
नबुम्मुक्ति हुस्म गुप्त ते भुत बहारी वेबका माहे,
मियाकत रग रोनाह मो, पड़ीम दिन मा सफा माहे।
चिमन में पेट पो पहि पहि बटे के रोग ही बहि यहि,
पिना बरी करे टहि टहि, फना पाहे फ्रना माहे ॥१॥
मी पी सार मो सास्यू, विरह वायूँ करे मास्यू,
विछोरेन परियू ररयू सफा परि 'मता माहे ॥२॥
पुकारे पो प्रमु पाती, हमेगह नाहि पशिहाप्ती,
फिरो सम्पायु पे, माही अन परिको कमा माह ॥३॥
पटे रिमु गाह मा पतिरो, मर्या महि माफ जो कतिरो,
ससोगे सिरणो प्रतिरो, न हस्तीम चे मटा माहे ॥४॥
पुहिब मुल्युसि रिसो कचो भयो पुत "हाइ बेगरी !
हाहीही दश मारि भी, मिजासोम दो मुरया माहे ॥५॥
जमानो माहि मार्गान मा बहार्यो बागु गगन सा
भयो बुत्युक्ति निमापनि तर, धपल गुम में बगा माहे ।।६।।
फो में समुद्र म्यो साही, हे मानीम मारि माक्री
फिर 'बेबसि एगो पाहीमारि सातो सग आहे ॥७॥

२१७
-सिग्मी
२२. नरापरतामें अनवरता
ऐ बुलायुस! फूलक सौन्दर्यपर मत भूल। यह मानन्द नश्वर है।
सुकुमार और रग-विरगो एटामा वषिश्य क्षण भरके लिए है।
वगीचे में सन्तपी चपापांघ दो-पार दिनोंके लिए है फिर
पतमा ठहाका मारपर रहेगा कि यह सब फना है नश्वर है ।।१।।
वो ही लाइये साप चहक रही हो और विरहकी वातें पर रही हो,
तव वियोगमी सम्मी-पम्नी रावें सप्ट कहेंगी-यह सब जफा है ।।२।।
बाली पिंजरा मह रहा है कि वमय और समृटि सदा नहीं
रहती। माली वन्मार आपटक वमकर फिर रहा है। पापपर्य!
यह मृत्यु बड़ी भयानक है ।।३।।
पिसी ओस बिन्दु युक्त घाम पासको उठाकर देखो। वह वताएगा
'मि जीवनको भय एगा रहता है मौर बस्तिस्यकी स्पिरता नहीं है ।।४।।
बुलवस्मी पाप पी पंचीको देवार फूषम कहा- हाय
कलारता । इस हकीको ( प्रभु प्रेम ) में भी मिजागी।
पमाना कोमॉो पिए है और बगीपा भी मप्टोंने सिए ही
फूमा है। गुलयुलने पहा--अमागोंक लिए फूलमें भी घाबा है ।।६।।
ए सापी बूंदमें हो ममा समाया हुआ है। नवरताम ही
अनवरता शेप है। बसि' होणकी (मरयु मोफ वासी) वनगर विपर
रहा है मगर जाती (प्रम) मित्य है ।।७।।
।

कवि-भी मासा-
११८
ए३ सामुंडी सिप
बियों पृक्ष
गुप्त गंगा प्यान नो पी अमृती से पहे
मो सचो टोगो हुने सो मसि असुन मोती महे।
कोम म पोरी गि पारी, धम रामनि पासिते?
मो किताबो कर मा, पो तस्त मिसिने तो महे! ॥१॥
मनु त पागीम ना हमेमह बहुक हेाही बठे
पर विवेको पम्प सो रविनी मपाहीस ते बहे ॥२॥
प्पो उना. निसि भो मम रिसिबर जो पप रानु माहि,
कामु राजा मिति पसे किर्य रामु बेपारो रहे? ॥३॥
सन्तु पिह बर्सासि में कहिं राति समिमि मा ग्पी,
रिपु त बाहिरिने अममि मा सा छा दो बहे ! |
मी रेवो करे पी मनुष्य मासा उत्तम,
पिए पनि बो मन्नु मागो गाह में मिम गिम गहे ॥४॥
मन परोमि यूँ कपा' मूपिपू मामिछु पुमे,
पो महोज मसिगिर, ममर, रेवति टिकाने बोटहे ॥६॥
बूपि चक्कर में चरनि उन्नतीम संो इमिझानु पा,
मक्सिरे बहितरि ठहण का पानी पी रहे
मारमा पी मरर में पी ममह मोती जगे,
कोष एहिना प्या परिसिनि मौतु पी मिट्टी सहे
में पचाए पासि गोड़ा और बा मोती कया
नमसराम्रो परिण पति, कीरि मही कोरिपू बहे ॥९॥
एसत गुम ताया टियत पनि मग्यो 'वति घy,
कोम एमागप्त, कमो पो पुष्षु ठाकुर साहे ॥१०॥
T
I७॥
॥८॥

११ -सिम्धी २३ समुद्र-शक्तियों सनक दूसरी अमृत वला (प्रात कास) में गान गंगाको गुप्त धारा प्रवाहित ती है । सन्चे गोताखोरको असली मोती प्राप्त होते है। धम मोर राम्पोंके नामपर पुर क्यों न छिरेंगे? पोंकी वम बन्द होकर ( मानवको) हदय सिंहासनसे उतारते है ।।१।। मन तो पानीकी तरह सदा निम्मगामी रहता है सकिन विग्रेस पी पम्प बोरसे ऊंचाईपर उठसा है ।।२।। हरय-मन्दिर गार हो गया है और प्रियतमका पर वीरान है । जहाँ म (तप्मा) रामापा निगास हो,पहाँ पेपारा राम से रह सकता है।३।। किसी रात सस्त सर्वी और वारिसमें अपनी सौर (सिहाफ) से उठकर यो कि पाहर मिरापितोंके ऊपर क्या-क्या अत्याचार हो रहे हैं। दर्यकी देवी ही मनुष्यको उच्च बनाती है। तुपासे अन्न तमी सग होता है पर यह मोड़ा पार पप्ट सहता है ॥५॥ भाज प्रभु गरीबोकी पास-फूसकी झोपडिपोमें पूम रहा है मौरमन्दिर, समिद टिकाने • रेवत बोर मड़ी आदि से विरत हो गया है ।।६।। योनियों मकर में उन्नति की सम्भावना मानी जाती है। (राना मगान सुन्दर ममने लिए ही टूटता है ।।७।। हत्यमें पारमारपी ममर ज्योति जग रही है पुराने कोग(मावरण) मित रहते है मृत्यु तो मिट्टी (परीर) ही प्राप्त करती है ।।८।। मन विपोप मममीको पकाकर ही काम्पके मोती निर्मित किए हैं। मूस्पोकन वो सराफा हार है पाहे यह उसे मूल्यमाम समझे या दो कोरियामा रहे॥९॥ पसो, ताजे पिसे हुए फूल परणोंमें मर्पित करें, मुरमाया हुमा फूम पा मरिकसित पुप्प ठाकुरको मपित परना उचित नहीं है ॥१०॥ विधिमा मह पूगवान पिसमें गुरु मामारे 'मुर पाबमारी तारमा गौगातीने टिपाने विशिष्ट मामने पुरा माता है।

कवि-भी मासा
१२२
सेहाँ पूर
B
छाको तस्बिीर उति, मिति सन्तु मिति तयार पाहि,
अम्बम्पनि सो पाप में मन अम पुछो बेग माहि,
र शबनम में बिसो मासो हमातीम को मिसी,
मिरगी कहिले हरि भावातु ऐं परिवार माहि ।।१।।
मासि सागापो तो जो इक आमोम में बग्यो,
सो गरनु दुमिमा विही जो पब में मायागु माहि ॥२॥
मम वे परे मा निकिती बोह मारिनु पर दी,
कहिली कहिको तहिने हेठा ऐ प्रसा फरियार माहि ॥३॥
प्याम जो मुरिलो पने वा मायरमें घूम सौ
अगलगिरिरामन सोयो ! भयों सो पा आहि ॥
पाम रोमम
मा हरिणा फैमसूतो पी मधे,
एनसरी अघि सा मरिश्रो मिसायी वा माहि ॥५॥
प्रित सो फोमा को हर हपि शीरों पी ममे
पर मतों में तो निहो अभियो कि फरिहार ! माहि ॥६॥
पशि हा दुनिया मुंहं तो माहि जुए यत्ती माय
सुवर्स सार निपा रिमिएमा सिसि पारि माहि ।।७।।
जा संरसि तवीह पिप्ति तार्या से कने,
राप्रपा मागिानि सा पनि पूरा मावार माहि ॥८॥

-सिम्पो १२३ सनक तेरहवीं महाँ मारवटा वग कछार हृदय है वहाँ युक्ति किस कामको । यार सवार साय निश्चम हो या अत्याचार ह । बोसकणमें नकली जीवनका आभास देखा। मह जीवन एक ही क्षणमें पावाद और एक ही क्षणमें घरवाद हा जाता ह ॥१॥ विषप मबघा त्याग कर पा विश्व प्रमम मग्न ह वह गह- साक बौर परसाका बन्धनोंसे मुक्न ह ॥२॥ रहस्यके परदम ददको यही मुकामल कराह निरसी। ए आगा! न मारम तुम्हार नीच क्या-क्या फरियाद है! ॥६॥ सवार मन्दिरमें वही ही घूममे श्यामकी मुग्नी बज रही है सफिन उद्धव बाज बम्गवनमें यह न्याय नहीं है l जानकी मांगों सिए प्रत्या म्यानमें दागनिम्ता नाच रही ह सेपिन एनककी आवाराक मिए प्रन्पोंका विठामार है।।५।। यदि ध्यान आर पिन्नाम गाजली जाए सा प्रत्यक बस्नुम माधुय मिलता हेमरिन ए फरहार तुम्हारी जमीभावुकता और जनया हममें पहाँ ॥६॥ हम मुवपूण ममाग मुखमे दुमपूर्ण भाषण हटा दें तो यह ममार मपी प्रमिम अप्सरा आनम्ममय है ॥७॥ क्या उसकी उपमा पन्द्रमामे दी जाए' सरिन प्रमियोंग सिए मुनतम प्रमु स्वय विराजमान है॥॥

कवि-मी माता-
१२४
पोरिहों पूर
त
गुप्तु घेर रिति ने मम्बर में प्रेम पूना पासिते,
सानु सणु मया फुसनि मुठि भोग भेटा वासिते।
मिम इसी महराय ने मुहतान ने महिस्यान में,
गोति का पर्यो दुखी रिसि स्याम शेगा बासिते ॥१॥
कांग दुनिया ते न हप हीरे कणी चिन्तामणी,
बम मिस्यो मारम बय मातम उत्तमता वासिते ॥२॥
ममम ममहब मुहितरफ यो पणि मंदरि पबिराइली,
वाग दुनिया मा नवा गुस स॒हं सोम्या बासिते ।।३।।
रों पड़ी तो तुर्तु सरहीं म नहिं बटपूंबई,
माहे वोमाई
पश्म पीना बासिते ।
चाह करे घोट तो फेरे पी फोटो बोट में
माहि हवाहित में पराबी मोट मगा वासिते ॥३॥
हर रवि मंडरि हसमु परिकारि हरिकारि में
तो मिना हर पीर पुनिया बह चिन्ता वासिते ।।
वीर दूरी भी पसाए पर येदि ते बहे
फोन यो पर मुझे हिन बिर मोत्या पासिते ॥
माम मंदरि साम हो मामन मिकाए मिल सपे,
मा उम्त माना जो, ग्पो मा माया पारिते।
सारे इमिवान पो तूं मामरानु बाहिरि रही,
माहि मापेरो म कहि मी मा मनका पासिते ।।९।।
पुरु हामि पुर्म मरि माइप्सामि भो निगान,
फ्रि देवप्ति' परि फना तनयो तमना बासिने ॥१०॥

१२५ -सिन्धी सनक चौरहवीं मसार रूपी प्रेम-पूजा लिए हृदय मन्दिरमें मई गुप्त प्रवेश-पार है भोग धरने पौर मेंटके लिए अपने साथ यदारी पुप्पाम्बमि लो। महाराज (प्रभ) से किसी गरीवको आवश्यकता पूर्तिमें ही पलकर मिसो। श्यामरी सबाके रिए किसी दर्द भरे पीड़ित विस्कायो ।।१।। इस काम मपी संसारपर चिन्तामणि स्पी हीरा कभी मत फको दम प्राप्त होमेपर ही आदम बने हो आरिमा उनतिके सिए ।।२।। मिभिन्न धर्मोका बाहुल्य देवार न भवरात्रो। बगीचे भिम-भिन्न फूस सामा और सुम्दताने सिए है ।।।। जव मैने दोनो(मिबाजी आंख बन्द मी तय सून मरासीसरा ना(प्रज्ञाचक्षु) पोस दिया । शाम-प्रसुओं द्वारा ही सच्चा दृश्य दृष्टिगोचर होता ह ।।४।। तपणा ऊपर उठाकर फर दती है और राहों यानियामें घुमाती रहती है। मनुष्यका गिरानबासरी वासना हो तो पुरी है ।।५।। प्रश्यप कार्यप बन्दर सृष्णा और पासना समाई हुई ह । तुम्हार सिमाय प्रत्यक वस्तुपी इच्छा तृष्णा पी चिन्तार रिए है ।।६।। दृष्टि दूरीको ही दिनाती है निस्टताको नहीं । मुम हम मानिया बिन्दर लिए कोई औपघि मही मूमनी ।।७।। सामा बन्दर भी पार पा रिस साए (प्रियतम) छिपा न समाप्यिा उद्भव) उसा मानन्गी सरग है और माया उसमानम्दा माम है ।।८।। ऐ वपर (स्मानहीन ) ! तु स्पाम र परमे याहर है। अनदा' पीरे सिए न तो नहीं पॉसरा है मौर न म्पान ॥९॥ नमी पुउन मांगा, पापि म माग (माप परवा) अगरी मिप्यता पिन हात तप्कामोर पामनामाफ्ना (मा)मादो।।१०।।

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Kavi Shri Mala Sindhi

Author
Bewashi,kishanchand
Title
Kavi Shri Mala Sindhi
File name
Kavi Shri Mala Sindhi
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2010/12
Publisher
Vardha,rasth Bhasha Pracharak Samiti
Language
Sanskrit
Pages
124
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514753
Barcode
4990010022439.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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w7qDoR8G1nW
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