Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Prabandhachintamani (hindi Bhashantar)
Front matter
सिंघी जैन ग्रन्थमाला
जैन भागमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, गनिहामिक, कयामक-इत्यादि विविधविषयगुम्फित
प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, प्राचीनगूर्जर, राजस्थानी आदि नाना भाषानिबद्ध
बहु उपयुक्त पुरातनवाद्यय तथा नवीन संशोधनामक
माहिन्यप्रकामिनी जैन ग्रन्थावलि ।
कलकत्तानिवासी स्वर्गस्य श्रीमद् ढालचन्दजी सिंघी की पुण्यस्मृतिनिमित्त
तसुपुत्र श्रीमान् वहादुरसिंहजी सिंघी कर्तृक
संस्थापित तथा प्रकाशित
सम्पादक तथा सजानक
जिन विजय मुनि
[सम्मान्य समामदभाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर पूना, तया गुजरात साहित्यसमा अहमदावाद;
भूतपूर्वाचार्य-गुजरात पुरातत्वमन्दिर अहमदाबाद, जैनवाडमयाध्यापक विश्वमारती, शान्तिनिकेतन
प्रकृतभार दि-प्रधानाध्यापक मारतीय विद्या भवन बरई, तथा, जैन साहित्यसंशोधक अन्यावनि--
पुरातत्वमन्दिर ग्रन्यानि भारतीय विद्या ग्रन्थावलि अन्तर्गत संस्कृत-पकृत-पाली-
अपभ्रश-प्राचीनगर-हिन्दी-आदि भाषामय अनेकानेक अन्य सशोधक-सम्पादक।]
ग्रन्थांक ३
प्राप्तिस्थान
व्यवस्थापक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला
२. शनेमात पशिदासापरमनी, arreगरियाबाट पीट,दन पालीज
अहमदावाद
मर्वाधिकार संरक्षित
[वि.सं. १९८९
श्री मेस्तुगाचार्यविरचित
प्रबन्धचिन्तामणि
संस्कृत ग्रन्थका
हिन्दी भाषान्तर
अनुवादक
पं० हजारीप्रसादजी द्विवेदी
[ आचार्य-हिन्दी शिक्षापीठ, विश्वभारती, शान्तिनिकेतन ]
सम्पादक
जिन विजय मुनि
[प्राकृत भाषादि प्रधानाध्यापक-भारतीय विद्या भवन, बम्बई
सम्पादक भारतीय विद्या प्रेमासिक पत्रिका-इत्यादि ]
प्रकाशन-फर्ता
संचालक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला
अहमदाबाद-कलकत्ता
प्रबन्धचिन्तामणिकी संकलना। इस ग्रन्थका संकलन और प्रकाशन निम्न प्रकारसे, ५ भागोंमें, पूर्ण होगा। (१) प्रथम भाग- भिन्न भिन्न प्रतियोंके आधारपर संशोधित-विविध पाठान्तर समवेत - मूल ग्रन्या १ परिशिष्ट; मूलमन्य और परिशिष्टमें आये हुये संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषामय पद्योंकी अकारादिक्रमानुसार सूचि; पाट संशोधनके लिये काममें लाई गई पुरातन प्रतियोंका सचित्र वर्णन । (छप गया) (२) द्वितीय भाग- प्रबन्धचिन्तामणिगत प्रबन्धोंके साय सम्बन्ध और समानता रखनेवाले अनेकानेक पुरातन प्रबन्धोंका संग्रह; पद्यानुक्रमसूचि; विशेषनामानुक्रम; विस्तृत प्रस्तावना और प्रबन्ध संग्रहोंकी मूल प्रतियोंका सचित्र परिचय । (छप गया ) (३) तृतीय भाग- प्रबन्ध चिन्तामणिके मूल संस्कृतका शुद्ध और सरल संपूर्ण हिन्दी भाषान्तर, विशिष्ट प्रास्ताविक वक्तव्यके साय । (प्रस्तुत ग्रन्थ ) (४) चतुर्य भाग- पुरातन-प्रबन्ध-संग्रह नामक द्वितीय मागका संपूर्ण हिन्दी भाषान्तर । (छप रहा है) (५) पञ्चम भाग-दो विभागाम (१) पहले विभागमें-शिलालेख, ताम्रपत्र, पुस्तक प्रशस्ति आदि जितने समकालीन साधन और ऐतिझ प्रमाण उपलब्ध होते हैं उनका एकत्र संग्रह और तत्परिचायक उपयुक्त विस्तृत विवेचन; प्राक्कालीन और पश्चात्कालीन अन्यान्य प्रन्योंमें उपलब्ध प्रमाणभूत प्रकरणों, उल्लेखों और अपतरणोंका संग्रह; कुछ शिलालेख, ताम्रपत्र और प्राचीन ताडपत्रों के चित्र -इत्यादि । (२) दुमरे दिमागमें - प्रबन्धचिन्तामणिप्रथित सब विषयोंका विवेचन करनेवाली विस्तृत प्रस्तावना-जिसमें तत्कालीन ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक और राजकीय परिस्थितिका सविशेष उहापोह और सिंहावलोकन किया जायगा । सायमें प्राचीन मन्दिर, मूर्तियां, पोथिया इत्यादिक अनेक चित्र भी दिये जायेंगे । .
समर्पण
*
परमधामप्रस्थित
पितृपादकी पुण्यप्रतिमाको
प्रणति पूर्वक
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प्रबन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम .... .... .... .... .... .... .... १. .... .... .... .... .... .... .... प्रास्ताविक वक्तव्य -प्रथम प्रकाश- प्रारभिक मंगलादि कथन १ विक्रमार्क राजाका प्रयन्ध (१) महाकवि कालिदासको उत्पत्तिका प्रबन्ध (२) सुवर्णपुरुपकी सिद्धिका प्रबन्ध (३) विक्रमादित्यके सत्त्वका प्रबन्ध (४) सत्वपरीक्षाका प्रबन्ध (५) विद्यासिद्रिका प्रबन्ध (६) निर्गताका प्रबन्ध २ सातवाहन राजाका प्रयन्ध ३ शीलवतके विपयमें भूयराजका प्रबन्ध ४ वनराजादि प्रपन्ध चारदा यंशकी राग्यसंवत्सरावलि -चौलुक्य वंशका प्रारंभ- मूलराजका प्रयन्ध लाखाकी उत्पत्ति और विपत्तिका प्र. भूलराजफे यंशजोंकी राज्यसंवत्सरावलि ६ मुंजराज प्रपन्य -दुसरा प्रकाश- ७ मोज और भीमका प्रयन्ध (१) भोजका विधाविलास (२) भोनको गुजरात के राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्धा राना मोजकी गुजरातपर आक्रमण करनेकी इस (१) गियर उचन्द्रको सेनापति बनाना (५) कुलचन्द्रको गुजरातपर चदाई (६) मदापि मापका प्रबन्ध (७) माफी धनपाटका प्रबन्ध (८) सपनाम सपमार्गकी पृच्या .... .... .... .... ११ २३. .... .... .... .... २१ - ३ .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... ४५ .... ... .. . ----- -- प्रबन्धचिन्तामणि ५४ 2000 .... .... .... . ५९ .... .... .... .... .... " .... .... " ६० .... .... .... " .... ६३ .... .... ६४ .... ६५ ६६ ६७ .... (१०) मयूर, बाण और मानतुगाचार्यका प्र० .... (११) गूर्जर देशकी विदग्धताका प्र. (१२) अनित्यता संबंधी ४ श्लोकोंका प्र० (१३) भोजका भीमके पास ४ वस्तुयें माँगना (१४) बिजौरे नीबूका प्र. (१५) एक अच्छा नहीं है। प्र० (१६) इक्षुरसका प्रबन्ध (१७) घुडसवारीका प्रबन्ध (१८) गोपगृहिणीका प्रबन्ध (१९) भोज और कर्णका संघर्ष (२०) कर्णसे भीमका आधा भाग लेना -तीसरा प्रकाश- ८ सिद्धराजादि प्रयन्ध (१) मूलराज कुमारकी प्रजावत्सलताका प्रबन्ध (२) कर्णराजा और मयणला देवीका वृत्तान्त (३) सिद्धराज जयसिंहका जन्म (४) सिद्धराजका राज्य-वर्णन-लीला वैद्यका प्रबन्ध (५) उदयन मंत्रीका प्रबन्ध (६) सान्तू मंत्रीका प्रबन्ध (७) मयणल्ला देवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना (८) सिद्धराजका मालवाके साथ संघर्ष (९) सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मीलन (१०) सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय बनवाना (११) पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनयाना (१२) 'सौराष्टके राजा खंगारको विजय करना (१३) शध्रुजयकी यात्रा करना (१४) वादी श्रीदेवरिका चरित्र वर्णन (१५) पत्तनके वसाह आभडका वृत्तान्त (१६) सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समान दृष्टि (१७) सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार (१८) लक्षाधिपतिको क्रोडपति बना देना (१९) सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना (२०) वाराहीके पटेलोंको ब्रूचाका विरुद देना (२१) ठहाके प्रामणिोंसे वार्तालाप .... .... .... .... .... .... .... .... " .... ७३ ७६ .... ७७ .... .... .... ७८-८२ .... .... .... .... .... " 4.. .... .... ... " प्रवन्धचिन्तामणि विषयानुक्रम .... .... .... .... .... .... ." .... " .... - .... (२२) झालासामन्त मोगूको शूरताका वर्णन (२३) सिद्धराजकी सभा म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन (२४) सिद्धराजका कोल्हापुरके राजाको चमत्कारके भ्रममें डालना (२५) कौतुकी सीलणकी वाक्चातुरी (२६) काशीराज जयचन्द्रकी समामें सिद्धराजके दूतकी वाक्पटुता ८८ मयणलादेवीके पिताकी मृत्युवातर्ता (२८) पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना (२९) सान्तू मंत्रीकी बुद्धिमत्ताका एक प्रसंग (३०) सिद्धराजके एक सेवकके भाग्यका वृत्तान्त (३१) सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पथ -चतुर्थ प्रकाश ९ कुमारपालादि प्रबन्ध ९३-१२१ (१) कुमारपालके पूर्वजादि (२) सिद्धराजके भयसे कुमारपालका मारे मारे फिरना (३) कुमारपालका राजगादीपर बैठना (४) कुमारपालने राजद्रोहियोंका उच्छेद किया (५) कुमारपालका चाहमान राजा आनाकके साथ युद्ध ,.... (६) कुमारपालका उपकारियोंको सत्कृत करना (७) गायक सोलाककी कलाप्रवीणता (८) कोंकणके राजा मल्लिकार्जुनका मंत्री आबड द्वारा उच्छेद (९) कुमारपालके साथ हेमचन्द्राचार्यकै समागमका प्रसंग (१०) हेमाचार्यके समागमसे कुमारपालके पुरोहितका विद्वेष (११) कुमारपालका सोमेश्वर तीर्थके जीर्णोद्धारका प्रारंभ करवाना १०० (१२) उदयनमंत्रीसे हेमाचार्यका जीवनवृत्तान्त पूछना १०१ (१३) सोमश्वरके उद्धारकी समाप्ति के निमित्त नियम लेना १०२ (१४) हेमचन्द्राचार्यका सोमेश्वरकी यात्रानिमित्त कुमारपालके साथ जाना (१५) हेमाचार्यका शिवकी स्तुति-पूजा करना (१६) कुमारपालकी तत्त्वजिज्ञासा और हेमाचार्यका शिवको प्रत्यक्ष करना १०३ (१७) कुमारपालका परमाईत श्रावक बनना १०४ (१८) मंत्री उदयनका सौराष्ट्रके युद्ध में मारा जाना (१९) मंत्री वाहडका शत्रुजयतीर्योद्धार करवाना १०५ (२०) मंत्री आम्रमटका शकुनिकाविहारका उद्धार करवाना १०६ (२१) आघमटका शाकिनीग्रस्त होना .... ... .... .... .... .... .... .... " .... .... .... .... " .... .... ....
प्रवन्धचिन्तामणि १०७ .... .... .... " .... १०२ १०९ ११० .... .... " १११ .... .... ११२ .... " " (२२) कुमारपालका विद्याध्ययन करना (२३) बनारसके विश्वेश्वर कविका पत्तनमें आना (२४) हेमचन्द्रसूरिका समस्यापूरण करना (२५) आचार्य और मंत्रीके बीचमें 'हरडइ' का याग्विलास (२६) उर्वशी शब्दकी व्युत्पत्ति (२७) सपादलक्षके राजाके नामका अर्थखंडन (२८) पं. उदयचन्द्रका प्रबन्ध (२९) कुमारपालका अभक्ष्य भक्षणके निमित्त प्रायश्चित्त करना (३०) कुमारपालका अन्यान्य विहारोंका वनवाना (३१) यूकाविहारका प्रबन्ध (३२) सालिगवसहिकाके उद्धारका प्रबन्ध (३३) मठपति वृहस्पतिका अविनय (३४) मंत्री आलिगकी स्पष्टवादिता (३५) पं. वामराशिको क्षमाप्रदान करना (३६) सोरठके दो चारणोंकी कविताविषयक स्पर्धा (३७) कुमारपालका तीर्थयात्रा करना (३८) स्वर्णसिद्धिकी इच्छा करना (३९) मंत्री चाहडका दानीपना (४०) कुमारपाल द्वारा राणा लवणप्रसादका भविष्यकथन (४१) हेमचन्द्रसूरिको लूतारोग लगना .... (४२) हेमचन्द्रसूरि और कुमारपालका स्वर्गवास (१३) अजयपालका राज्याभिषेक (४४) जैन मन्दिरोंका नाश करवाना कपर्दी मंत्रीको मरवा डालना (४६) महाकवि रामचन्द्रकी हत्या (४७) मंत्री आम्रभटका लडते हुए मरना (१८) अजयपालकी सन्तानोंका उल्लेख (४९) वीरधवल का प्रादुर्भाव १० मंत्री वस्तुपाल-तेजपालका प्रबन्ध (१) वस्तुपाल-तेजपाठकी जन्मपार्ता (२) वीरधवलका तेजपालको अपना मंत्री बनाना (३) मंत्री तेजपालका धर्मभावसम्मुख होना (४) वस्तुपालकी तीर्थयात्राका वर्णन (५) मंत्री तेजपालका आबुपर मन्दिर बनवाना (६) वस्तुपालका शंखराजके साथ युद्ध करना ... ... ११४ ११५ " .... .... ११८ .... .... " .... .... " .... .... १२० .... १२१ " .... .... " .... .... .... १२३ १२५ १२६ ....
प्रबन्धविन्तामाण विषयानुक्रम .... " - .... .... .... .... .... .... .... (७) मंत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्रीका सम्बन्ध बान्धना १२७ (८) अनुपमाकी दानशीलता १२८ (९) वीरधवलकी रणशूरता (१०) वीरधवलकी मृत्यु १२९ (११) अनुपमाकी मृत्यु (१२) वस्तुपालकी मृत्यु --पंचम प्रकाश- ११ प्रकीर्णक प्रवन्ध १३१-१५२ (१) विक्रमादित्यकी पात्र परीक्षा १३१ (२) मरे हुए नन्दका पुनर्जीवन (३) राजा शिलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रबन्ध १३२ (४) बौद्ध और जैनोंमें वाद-विवाद .... (५) वलभी नगरीके विनाशकी कथा १३३ (६) श्री पुंजराजकी उत्पत्ति १३४ श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन १३५ (८) चोड देशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण १३६ (९) पुण्यसार राजाका वृत्तान्त .... १३७ (१०) कर्मसार राजाका प्रबन्ध (११) राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबन्ध १३८ (१२) काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध १३९ (१३) जगद्देव क्षत्रियका प्रबन्ध १४१ (१४) पृथ्वीराजके तुंग सुभटका प्रबन्ध १४३ (१५) पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना (१६) कौंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई १४५ (१७) ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रबन्ध (१८) सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त १४७ (१९) स्तंमनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव १४८ (२०) कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन (२१) वाग्भट वैद्यका प्रबन्ध (२२) गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्बर-दिगम्बर में लड़ाई १५० (२३) सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना (२४) पूर्वजन्मका किया भोगना (२५) जिन पूजाका माहात्म्य १५२ -ग्रन्यकारकी मशस्ति परिशिष्ट-युमारपाटफा अहिंसाके साथ पाणिग्रहणका रूपकात्मक प्रबन्ध १५३-१५६ .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... ... " पुरातन प्रवन्ध संग्रह प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिके भाषान्तरके साथ पुरातन-प्रबन्ध- संग्रहका भाषान्तर भी विद्वानोंको अवश्य अवलोकनीय है । इस संग्रहमें, ऐसे अनेक छोटे-छोटे और-और प्रबन्ध भी संगृहीत हैं जो प्र. चिं. में बिल्कुल नहीं है; अथवा जिनमेंकी ऐतिहासिक बातें विशेष ज्ञातव्य हैं और जो प्र० चि० की पूरक हैं । खास करके वस्तुपाल-तेजपाल प्रबन्धके साथ सम्बन्ध रखनेवाली कितनाक बहुत ही महत्त्वकी ऐतिहासिक घटनाओंका इसमें सविशेष वर्णन किया गया है। वीरधवलकी मृत्यु के बाद किस तरह वीसलदेवको राजगादी मिली और किस तरह मंत्री तेजपालने उसको गुजरातके साम्राज्यका स्वामी बनाया यह बात इसमें बड़ी स्पष्टता और विश्वसनीय ढगसे बताई गई है । तदुपरान्त, नाडोलके राव लाखण, काशीके राजा जयचन्द्र, दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहान आदिके विषयके भी कितने ही महत्त्वके उल्लेख इस संग्रहमें प्राप्त होते हैं | इस तरह प्र० चि० वर्णित व्यक्तियों के विषयकी कई नवीन बातें इस संग्रहके अबलोकनसे ज्ञात होगी। अतएव इतिहासके अभ्यासि- योंके लिय यह संग्रह अवश्य अवलोकनीय है । " प्रास्ताविक वक्तव्य । । श्री मेरुतुङ्गाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि नामक प्रसिद्ध ऐतिहासिक-प्रबन्ध-संग्रहात्मक संस्कृत प्रन्थका यह हिन्दी भाषान्तर, आज सहर्ष हम हिन्दी भाषाभाषियोंकी सेवामें उपस्थित करते हैं। १. प्रबन्धचिन्तामणिका महत्व और प्रामाण्य । - गुजरातके प्राचीन इतिहासकी विशिष्ट श्रुति और स्मृतिके आधारभूत जितने भी प्रबन्धात्मक और चरित्रात्मक ग्रन्थ-निवन्ध इत्यादि प्राकृत, संस्कृत या प्राचीन देशी भाषामें रचे हुए उपलब्ध होते हैं, उन सबमें इस प्रबन्धचिन्तामणिका स्थान सबसे विशिष्ट और अधिक महत्वका है । उस प्राचीन समयसे ही- जबसे इसकी रचना हुई है तबसे ही- इस ग्रन्थकी प्रतिष्ठा विद्वानोंमें खूब अच्छी तरह हो गई थी और जिनको कुछ ऐतिहासिक वृत्तान्तोंके जाननेकी उत्कण्ठा होती थी वे प्रायः इसका वाचन ओर अध्ययन किया करते थे। पिछले कई ग्रन्थकारोंने इस ग्रन्थका अपनी रचनाओंमें अच्छा उपयोग भी किया है, और आदरपूर्वक इसका उल्लेख भी किया है । इन ग्रन्थकारोंमें, सबसे पहले शायद जिनप्रभ सूरि हैं जो प्रायः इनके समकालीन थे। यद्यपि उन्होंने इनका कहीं नामोल्लेख नहीं किया है तथापि अपने महत्त्वके ग्रन्थ, विविधतीर्थकल्पमें, जैसा कि हमने उसकी प्रस्तावनामें (पृ. ३, पंक्ति ४-५ पर ) सूचित किया है, इस ग्रन्थका सर्व प्रथम उपयोग किया है । इसके बाद, इन जिनप्रभ सूरिके उत्तरावस्थाके समकालीन और इन्हीं के पास कुछ गहन शास्त्रोंका अध्ययन भी करनेवाले मलवारी राजशेखर सूरिने, अपने प्रबन्धकोषमें, इस ग्रन्थका जैसा उपयोग किया है, उसका परिचय हमने, प्रबन्धकोषकी प्रस्तावनामें, भवन्ध. चिन्तामणि और प्रबन्धकोप' इस शीर्षकके नीचे (पृ० २, कण्डिका ४ में ) कराया है । राजशेखर सूरिने तो प्रकट रूपसे इस ग्रन्थका नामोल्लेख भी किया है,। हेमचन्द्र सूरिके वृत्तान्तमें उन्होंने कहा है कि- इन आचार्यके जीवन के सम्बन्धमें जो जो बातें प्रबन्धचिन्तामणि प्रन्थमें लिखी गई हैं, उनका वर्णन हम यहां पर नहीं करना चाहते । ऐसा करना चर्वितचर्वण मात्र होगा।'-इत्यादि । (देखो, प्र० को० पृ० ४७, प्रकरण ५७, पंक्ति १२-१६ ). संवत् १४२२ में समाप्त होनेवाले जयसिंह-सूरि-रचित कुमारपालचरितमें, तथा संवत् १४६४ के पूर्वमें लिखे गये कुमारपालपबोधप्रबन्ध (-यह प्रन्थ शीघ्र ही प्रस्तुत ग्रन्थमालामें प्रकाशित होनेवाला है ); और संवत् १४९२ में संकलित, जिनमण्डनोपाध्यायके कुमारपालप्रवन्धमें, प्रन्थका खूब उपयोग किया गया है। सं० १४९७ में परिपूर्ण होनेवाले जिनहर्षगणीकृत वस्तुपालचरित्रमें मी इसका यथेट आधार लिया गया है । सं० १५०० के बाद, प्रायः १०-१५ वर्षके बीचमें जिसकी रचना हुई जान पड़ती है, उस उपदेशतरंगिणी नामक ग्रन्थमें तो इस ग्रन्थमेसे प्रायः सैंकडों ही पध उद्धृत किये गये हैं और इसके अने प्रबन्धोंका बहुत कुछ सार लिया गया है । एक जगह तो ग्रन्थकारने इसका प्रकट नामनिर्देश भी कर दिया है और लिख दिया है कि-' सर्वेऽपि प्रबन्धाः प्रवन्धचिन्तामणितो ज्ञेयाः।' (बनारस आवृत्ति, पृ० ५८). इसके बादके श्राद्धविधि, उपदेशसप्ततिका आदि १६ वीं शताब्दीमें बने हुए प्रन्थोंमें, उनके कर्ताओंने भी अपने अपने प्रन्यों में इस प्रन्यका जहा-तहां आधार लिया है और इसमें वर्णित ऐतिहासिक उल्लेखोंका सार उदृत किया है। १७ वी सदीमें, अकबरके समयमें होनेवाले हीरविजय सूरिके प्रसिद्ध सहपाठी और अनुगामी विद्वान् महोपाध्याय धर्मसागर गणीने अपनी सुप्रचलित तपागच्छपहावलि और अन्य प्रन्योंमें भी - इस - ख प्रबन्धचिन्तामणि इस ग्रन्थके कई उल्लेखों का आधार लिया है । इसी तरह १८ वीं शताब्दीमें बने हुए यस्तुपालरास, कुमारपाल- रास आदि भाषा ग्रन्थोंके रचयिताओंने भी अपनी अपनी कृतियोंमें इस प्रन्थका बहुत कुछ उपयोग किया है, जिनका विशेष वर्णन करना आवश्यक नहीं है। इस कथनसे ज्ञात होता है कि उस पुरातन समयसे ही मेस्तुग सूरिके इस महत्त्वके ग्रन्थकी अच्छी ख्याति और उपयोगिता स्थापित हो गई थी। २. प्रयन्धचिन्तामणिकी वर्तमान नवीन युगमें प्रसिद्धि और उपयोगिता। प्रवर्तमान नवीन कालके प्रारंभमें, सबसे पहले इंग्रेज विद्वान् श्री एलेक्झेंडर किन्लॉक फॉस साहबको इसका परिचय हुआ और उन्होंने गुजरातके इतिहास विषयकी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक 'रासमाला' में इसका सर्वप्रथम उपयोग किया। अपने प्रन्थमें लिखे गये गुजरातके प्राचीन इतिहासका मुख्य ढाचा उन्होंने इसी अन्थ परसे तैयार किया। वे अपने ग्रन्थमे, इस ग्रन्थका पद पद पर उल्लेख करते हैं और इसमें लिखी गई बातोंका संपूर्ण उपयोग करते हैं । उनके पीछे, भारतीय पुरातत्त्वके प्रखर पण्डित, जर्मन विद्वान् , डॉ० ब्युहलरने इस प्रन्थका खूब बारीकीके साथ अध्ययन किया और इसमें वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंका सविशेष ऊहापोह किया। 'इन्डियन ऐन्टीकरी' नामक भारतीय-विद्या विषयक सुप्रसिद्ध पत्रिकाके सन् १८७७ के जुलाई मासके अंकमे उन्होंने 'अनहिलबाडके चालुक्योंके ११ दानपत्र' (Eleven land-grants of the Chalukyas of Anhilvad) इस शीर्षक नीचे, अणहिलपुरके राजकीय इतिहास पर प्रकाश डालनेवाला एक महत्त्वका लेख लिखा जिसमें इस प्रबन्धचिन्तामणि कथित बातोंका अच्छा अवलोकन किया। फिर उसके बादमें, डॉ० व्युहलरने, जर्मन भाषामें Uber das Leben des Jaina Afonches Henacandra इस नामसे, आचार्य हेमचन्द्रका सविस्तर जीवन चरित्र लिखा, जिसमें उन्होंने प्रस्तुत प्रबन्धचिन्तामणिका पूरा पूरा उपयोग किया । इसके बाद, बंबई सरकारने, बॉम्बे गेझेटियरके लिये जब गुजरातका प्राचीन इतिहास तैयार करवाया, तो उसके संकलनकर्ता प्रसिद्ध गुजराती पुरातत्वज्ञ डॉ० भगवानलाल इन्द्रजीने, इस प्रन्थका बहुत सूक्ष्मताके साथ सागोपाग निरीक्षण किया और गुजरातके राजकीय इतिहासके साथ संबन्ध रखने वाली प्रायः सारी ऐतिह्य उक्तियों और श्रुतियोंका जो जो इसमें निर्देश मिलता है उन सबका ठीक ठीक पर्यालोचन कर, यथायोग्य उनका उपयोग किया । तदुपरान्त, गुजरातके इतिहास विषयक भिन्न भिन्न प्रकारके पुस्तकों और निबन्धोंके रचयिता एतद्देशीय और विदेशीय सैंकडो ही विद्वानोंने जहा-तहा इस ग्रन्थका अनेकशः आधार लिया है और उल्लेख किया है। इस प्रत्यकी ऐसी सार्वजनिक उपयोगिताको लक्ष्य कर, रासमालाके कर्ता विद्वान् फॉर्बस् साहबकी, और तदनुसार डॉ० न्युहलरकी भी, यह खास इच्छा रही कि विस्तृत टीका-टिप्पणियों के साथ इस अन्धका संपूर्ण इंग्रेजी अनुवाद किया जाय । डॉ० व्युहलरकी इस इच्छाको, कथासरित्सागर आदि प्रसिद्ध संस्कृत कथामन्थोंके सिद्धहस्त इंप्रेजी अनुवादफ, इंग्रेज विद्वान् , श्रीयुत सी. एच. टॉनी, एम्. ए. ने पूरा किया। उन्होंने इस मन्थका सुन्दर और संपूर्ण इंग्रजी अनुवाद किया जिसको कलकत्ताकी एसियाटिक सोसाइटीने सन् १९०१ में छपा कर प्रकाशित किया। डॉ० न्युहलरकी उत्कण्ठा थी कि ये टॉनीके इस भाषान्तरके साथ, ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयोंकी परि- चायक ऐसी अपनी टीका-टिप्पणियाँ दे कर, इस ग्रन्थकी उपादेयताका महत्व बहावेंगे; पर दुर्दैवसे इस कार्यके पूर्ण होनेके पहले ही उनका स्वर्गवास हो गया और उनकी वह इच्छा यो ही अपूर्ण रह गई। विद्वान् टॉनीने , अपने इंग्रेजी अनुपादकी प्रस्तावनाके प्रारंभमें, जो इस बारेमें कुछ लिखा है, उसका भावार्थ यह है- * डॉ. म्युहलरका यह बहे महत्त्वका ग्रन्थ है। इसका इंग्रेजी अनुवाद The Life of Hemacandracarya इस नामसे, हमने अपने सहकारी मित्र डॉ. मणिलाल पटेल Ph. D. (मारबुर्ग-जर्मनी) द्वारा करवा कर, इसी सिंघी जैन ग्रन्थ- मालाके १२३ नंबर प्रकाशित किया है। प्रेजी शता विद्वानों के लिये यह अन्य अवश्य पठनीय है।
प्रास्ताविक वक्तव्य [ग " राजतरंगिणीके अकेले अपवादको बाद किया जाय तो, संस्कृत साहित्यमें ऐतिहासिक कहलाने लायक एक भी कोई अन्य नहीं है-ऐसा जो आक्षेप वारंवार किया जाता है, वह इस प्रबन्धचिन्तामणि जैसे अन्यके अस्तित्वसे, किसी अंशमें भीटा पाडा जा सकता है । इस आक्षेपको निःसार सिद्ध करना यह स्वर्गगत हो फ्राय प्रोफेसर व्युहलरकी जीवन भरकी अभिलाषा थी। ग्रन्डरिस्स् डेर इन्डो-आरिशेन फिटोलोगी (Grundriss der Indo-Arischen Philologie) नामक अन्य- मालाके लिये, डॉ. न्युहलरकी रसप्रद जीवन कथाका आलेखन करनेवाले प्रो० जोलीने (Jolly), ई० स० १८७७ में श्रीयुत न्योल्डेके ( Noldeke ) नामक विद्वान् पर लिखे हुए न्युहलरके एक पत्रमेसे अवतरण दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा था कि- 'भारतवासियोंके पास कुछ भी ऐतिहासिक साहित्य नहीं है इस प्रकारकी मान्यता रखनेमें आपलोग, वर्तमान समयसे कुछ थोडेसे पिछडे हुए मालूम दे रहे हैं। पिछले बीस वर्षोंमें ठीक ठीक विस्तृत ऐसे पाँच ऐतिहासिक अन्य मिल आये हैं, जो उनमें वर्णित घटनाओंके समकालीन ग्रन्थकारों के बनाये हुए हैं। इनमेंसे ४ तो, जिनके नाम विक्रमांकचरित, गउडवहो, पृथ्वीराज- दिग्विजय और कीर्तिकौमुदी है, खुद मैंने खोज निकाले हैं। और एक डझनसे भी अधिक अन्य और अन्य खोज निकालनेकी तलाशमै हूँ।' यह प्रोफेसर ब्युहलर-ही-के श्रमका फल है कि जो इतने सारे ऐतिहासिक वृत्तांत, इतने ऐतिहासिक काव्य और इतनी ऐतिहासिक कथायें संपादित हो सकी । इस ग्रन्यके इग्रेजी अनुवादके करनेका काम जो मैंने हायमें लिया वह भी हो न्युहलर-ही-की सूचनाका परिणाम है; और जो कोई पाठक मेरी टिप्पणियोंके पढ़नेका कष्ट उठायेगा उसे स्पष्ट शात हो जायगा, कि उन्हींक उत्तेजन और साहाय्यके विना मेरा यह काम अपने अन्तको न प्राप्त कर सकता । इस अनुवादके साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक विषयों की पूर्ति करनेवाली टिप्पणियाँ लिखनेका उनका खास इरादा था। अगर यह बन पाता तो इस ग्रन्थकी उपयोगितामें खूब महत्त्वकी वृद्धि हो पाती; पर इस विचारके, कार्यरूपमें परिणत होने के पहले ही, दुर्दैवसे उनका अवसान हो गया और अब यह बात 'मनकी बात मनमें ही रही' जैसी कहावतके योग्य हो गई । भारतके इतिहास विषयक साहित्यके पारेमें और उसमें भी खास करके गुजरात के इतिहास के साथ संबद्ध साहित्यके संबन्धमें, हरएक इंग्रेज विद्यार्थीको एक और नामका स्मरण हो आना चाहिए और वह नाम है रासमालाके कर्ता श्री एलेक्जेंडर फिन्लॉक फॉर्वस्का । मि. ए. जे. नैर्ने, बी. सी. एस. (Mr. A. J. Nairne, B. C. s.) ने फॉर्चस् साहबका जीवनचरित लिखा है, जो कर्नल वॉटसन द्वारा संपादित और सन् १८७८ में प्रकाशित, रासमालाकी आवृत्ति के प्रारममें मुद्रित है। श्री फॉर्वर साहब एक ऐसे इन्डियन सिवीलियन थे, जिनको अपने भाग्यका पासा जिन लोगों के साथ डाला गया हो उन लोगोंके इतिहास, वाङ्मय और पुरातत्त्व विषयों पूरा रस रहता हो। इस विषयकी उनकी, उत्कण्ठा और सत्यनिष्ठापूर्ण अध्ययनशीलताकी प्रतीति, रासमालाके प्रत्येक पृष्ठ पर होती रहती है । जिन अनेक मूलभूत आधारों के ऊपरसे उन्होंने अपना ग्रन्थ तैयार किया, उनमेंका यह एक प्रबन्धचिन्तामणि है। इस ऐतिहासिक ग्रन्यका उन्होंने इतना तो संपूर्ण उपयोग किया है कि जिसे देख कर मेरे मनमें, अपने इस अनुवादके करते समय, वारंवार यह उठ आता या कि मैं निरर्थक ही यह श्रम कर रहा हूँ। किन्तु प्रो० न्युहलरने मुझसे कहा था कि इस ग्रन्यका संपूर्ण इग्रेजी अनुवाद हो ऐसी इच्छा स्वयं फॉर्मस्ने अनेक बार प्रदर्शित की थी । और यही मेरे इस परिश्रमकी उपयोगिताका आधार है । लेकिन, मैं अपने मनको इस तरह भी प्रोत्साहित रखना चाहता हूँ कि-मध्यकालीन इस जैन यतिने लिख रखी हुई इन श्रुतपरंपराओंमें, जिनका विवरण या संक्षिप्तीकरण करनेसे इनके मूलमें रही हुई आघी मोहकता नष्ट हो जाती है, न केवल भारतके इतिहासके अभ्यासियों- ही-को, किन्तु तदुपरान्त लोककथाओंके शाताओंको और मानव-नीति-शास्त्र के विद्वानों को भी, रस प्राप्त होगा। ग्रन्यकार स्वयं भी कहता है कि-इस रचनाके करनेमें मेरा उद्देश जनमन रंजन करनेका है।" इत्यादि । * ३. प्रपन्धचिन्तामणिके मूल संस्कृत ग्रन्थका प्रथम प्रकाशन और गुजराती भाषान्तर । जैसा कि हमने, अपनी मूल आवृत्तिके प्रारम्भमें दिये हुए 'किंचित् प्रास्ताविक' शीर्षक वक्तव्यमें लिखा है, इस प्रन्यके संस्कृत मूलका प्रथम प्रकाशन, गुजरातके शास्त्री रामचन्द्र दीनानाथ नामक विद्वान्ने, संवत् * फॉर्चस् साहबकी ऐसी इच्छा ही नहीं थी, बल्कि उन्होंने तो इसका पूरा इग्रेजी अनुवाद खुद ही सबसे पहले कर लिया था और फिर उसका उपयोग रासमालामें किया था; ऐसा बाईकी फॉस् समामें जो उनका प्रन्यसंग्रह विद्यमान है उससे मालूम होता है । बाईक इस सग्रहमें पॉबस् साहबड़ी हायकी लिखी हुई एक नोटबुक है जिसमें इस अन्यके ३,४ और ५३ प्रकाशका इंग्रजी भाषान्तर लिखा हुआ है । पहले दो प्रकाशॆका माषान्तर, शायद किसी दूसरी नोटबुकमे लिखा हुआ होगा जो अर उपलब्ध नहीं है। श्री टॉनीको इसकी खबर न होनेसे, शायद उन्होंने वैसा लिसा होगा। अपवा वह मायान्तर वैसा पूर्ण और शुद्ध न होगा जिससे पॉस्को संतोष रहा हो, और इसीलिये उन्होंने इसका एक उत्तम मागन्तर, योग्य संस्कृतश पण्डितके हमसे हो, ऐसी राग म्युालरके आगे प्रदर्शित की हो। .
घ] प्रवन्याचन्तामणि - १९४४ में, बम्बईसे किया था। उसीके साथ उन्होंने, इसका गुजराती भाषा अनुवाद भी छपवा कर प्रकाशित किया था। शास्त्रीजीका यह अनुवाद -जिसे अनुवाद नहीं लेकिन एक तरहका विवरण कहना चाहिए-पुराने ढंगसे और पुरानी शैलीको भाषामें किया गया था और इसमें उन्होंने अपनी तरफसे भी बहुतसे वाक्य और विचार, जो मूलमें सर्वथा नहीं थे, खूब फैला फैला कर लिख दिये थे । परन्तु साथमें कोई ऐतिहासिक पर्यालोचनकी दृष्टि से उपयुक्त ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया था। अनुवादमें-खास करके प्राकृत गाथाओं और सुभाषित रूपसे उद्धृत पद्योंके भापान्तरमें - तो अनेकानेक बड़ी बड़ी भद्दी भूलें भी की गई हैं, जिनका यहाँ पर दिग्दर्शन कराना निरर्थक है । यहाँ पर इतना यह अवश्य कहना चाहिये कि इस उपयोगी ग्रन्थको सर्वसाधारणके लिये सुलभ बनानेका श्रेयस्कर कार्य, सबसे प्रथम उन्हीं शास्त्रीजीने किया और तदर्थ उनको स्मृति सदैव आदरकी दृष्टिसे की जानी चाहिए। जैसा कि, प्रथम भागरूप मूल ग्रन्थकी प्रस्तावनामें सूचित किया है, गुजरातके इतिहासकी दृष्टिसे इस अन्धका महत्त्व लक्ष्यमें रख कर, हमने अहमदाबादके गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी ओरसे - जिसके कि हम सर्व प्रधान संचालक और नियामक थे- इसकी एक सर्वांगपूर्ण सुविस्तृत आवृत्ति, विशुद्ध मूल और उत्तम गुजराती भाषान्तर आदिके साथ, प्रकट करनेका प्रयत्न करना शुरू किया था। यथानुक्रम, मूलका कुछ भाग संशोषित और संपादित कर, बम्बईके सुप्रसिद्ध कर्णाटक प्रेसमें छपनेको भी भेज दिया था और उसमें प्रायः प्रथमके दो प्रकाश जितना माग छप भी चुका था। उसी बीचमें हमारा युरोप जाना हुआ और वह कार्य कुछ समय के लिये स्थगित रहा । करीब दो वर्षके बाद, वहाँसे हम जब वापस आये तो, देशमें राष्ट्रीय आन्दोलन बड़े जोरोंसे शुरू हुआ और हम भी उसमें संलग्न हो गये । सन् १९३० के अप्रेल में, धारासणाके विख्यात नमक-सत्याग्रहमें सम्मीलित होनेके लिये, अहमदाबादसे ६०-७० जितने सत्याग्रहियोंकी एक जबर्दस्त टोली ले कर हमने प्रस्थान किया । पर अहमदाबादसे दूसरे ही स्टेशन पर, सरकारने हमको गिरफ्तार कर लिया और वहीं जंगल-ही-में मॅजिस्ट्रेटने हमको छ महिनेकी सजा दे कर, पहले बम्बई और फिर वहाँसे नासिफ जेल में भेज दिया । इधर पौडेसे, गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरको भी-गुजरात विद्यापीठके साथ - सरकारने कब्जे कर, उसके विशाल प्रन्थसमूहको जब्त कर लिया और उसकी यह सब स्थिति छिन्न-भिन्न हो गई। इस तरह प्रवन्धचिन्तामणिके विस्तृत प्रकाशनका जो आयोजन हमने गुजरात पुरातत्त्व मन्दिरकी औरसे किया था, वह एक प्रकारसे उन्मूलित हो गया। इस परिस्थितिको जान कर, बबईकी ' फॉर्वस् गुजराती साहित्य सभा'ने, जिसका भी प्रधान ध्येय गुजरातकी प्राचीन संस्कृतिक विविध साधनोंको प्रकाशमें लानेका है, इस प्रन्थके प्रकाशनका कार्य हाथमें लिया और हमारे विद्वान् मित्र एवं गुजरातके इतिहासके एक विशिष्ट अभ्यासी, साक्षर श्रीदुर्गाशंकर केवलराम शास्त्रीको वह कार्य सौंपा गया। यह जान कर हमने शास्त्रीजीको हमारे मूल के छपे हुए उक्त उन दो प्रकाशोंके एडवान्स फार्म भी उनके उपयोग के लिये भेज दिये । शास्त्रीजीने यथाशक्ति परिश्रम कर, पहले प्रन्थका मूल भाग तैयार कर उसे प्रकट करवाया और फिर उसका शुद्ध गुजराती भाषान्तर, कितनीक ऐतिहासिक टीका-टिप्पणियों के साय संपादित कर, उक्त समाकी ही औरसे प्रकाशित कराया। ४. प्रबन्धचिन्तामणिका हमारा प्रकाशन । जेलनिवाससे मुक्त होने पर कैसे दानवीर बाबू श्री बहादुरसिंहजीकी प्रियकर प्रेरणासे हमारा जाना शान्ति- निकेतन-विश्वमारतीमें हुआ और वहाँ पर रहते हुए कैसे इस 'सिंघी जैन ग्रन्थमाला' के प्रकाशनका कार्य प्रारंभ किया गया-इयादि.बातें हमने, संक्षेपमें, इसके पहले मागमें उल्लिखित कर दी हैं जिनको यहाँ पर दुहरानेको आवश्यकता नहीं है।
प्रास्ताविक वक्तव्य [6 उक्त सतिसे फॉर्वस् समाकी ओरसे इस प्रन्यका, गुजराती भाषान्तर समेत, प्रकाशन होना चालू था, तब भी हमारे मनमें इसके प्रकाशनकी वह जो पूर्व कल्पना थी और इसके लिये जो साधन-सामग्री हमने बीसों वर्षांसे इकट्ठी करनी शुरू की थी, उसका खयाल कर, हमने अपने उसी ढंगसे, इस ग्रन्थका पुनः संपादन करना प्रारम्भ किया । और चूंकि इसका गुजराती भाषान्तर, हमारे साक्षरमित्र श्री दुर्गाशंकर शास्त्री कर चुके हैं, इसलिये हमने इसका हिन्दी भाषान्तर प्रकट करनेका मनोरथ किया। हिन्दी भाषा, यों भी सबसे अधिक व्यापक भाषा है और फिर अब तो यह राष्ट्रको सर्व प्रधान भाषा बन रही है, इसलिये सिंघी जैन ग्रन्थमालाके कार्यका लक्ष्य हिन्दीकी और ही अधिक रखा गया है । इंग्रेजी और गुजराती एकसे अधिक भापान्तर होने पर भी हिन्दीमें इसका कोई भाषान्तर आज तक नहीं हुआ था; और इसकी कमी कई हिन्दी भाषाभाषी विज्ञजनोंको बहुत अर्सेसे खटक भी रही थी। हिन्दीके स्वर्गवासी प्रसिद्ध पण्डित और पुरातत्त्वज्ञ विद्वान् , चन्द्रधर शर्मा गुलेरीने बहुत वर्ष पहले हमसे अनुरोध किया था, और शायद नागरीप्रचारिणी पत्रिकाके एक टेखमें उन्होंने लिखा भी था, कि इस ग्रन्थका हिन्दी अनुवाद होना आवश्यक है । आशा है गुलेरीजीकी स्वर्गस्थित आत्मा आज इसे देख कर प्रसन्न होगी। * ५. प्रस्तुत हिन्दी भापान्तर । पाठकोंके हाथमें जो हिन्दी भाषन्तर उपस्थित किया जा रहा है, इसका प्राथमिक कच्चा खर्रा, जब हम शान्तिनिकेतनमें थे तब (सन् १९३२ में), वहाँके हिन्दी शिक्षापीठके विद्वान् आचार्य और हमारे सहृदय मित्र पं० श्रीहजारी प्रसादजी द्विवेदीने किया था, जिसको हमने अपने ढंगसे यथेष्ट रूपमें संशोधित-परिवर्तित कर वर्तमान रूप दिया है । इससे संभव है कि विज्ञ पाठकोंको इसमें कहीं कहीं भाषाविषयक शैलीका कुछ सूक्ष्म भिन्नत्य मालूम दे । हमारा प्रयत्न इस बातकी ओर रहा है कि भाषा जहाँ तक हो, सरल और सबको सुबोध हो; और जिनकी मातृभाषा खास हिन्दी न हो उनको भी इसके समझनेमें कोई कठिनाई न हो । इसलिये हमने इसमें ऐसे शब्दोंका बहुत ही कम प्रयोग किया है कि जो खास हिंदीका विशेष परिचय न रखनेवाले- राग्यस्थानी या गुजराती भाषाभाषी-जनोंको बिल्कुल अपरिचित माल्म दे । इस प्रन्यके संस्कृत मूलकी टेखशैली कुछ संकीर्ण और समास-बहुल है । वाक्य बड़े लंबे लंबे और कुछ जटिटसे हैं । क्रियापदोंका व्यवहार इसमें बहुत कम किया गया है । रचना कहीं तो शिथिलसी और कहीं निबिड बन्धवाटी है । इसलिये भाषान्तरमें भी हमें कही कही, मूलके अनुसार, कुछ लंबे पानय रखने पड़े हैं। भाषान्तरको हमने प्रायः संपूर्ण मूलानुसारी बनानेका लक्ष्य रखा है । मूलका कोई एक शब्द मी प्रायः छोड़ा नहीं गया है और ना ही विशेष स्पष्टीकरणकी दृष्टिसे कोई अधिक शब्द या वाक्यांश बढाया गया है । जहाँ कहीं मूलके संक्षिप्त सूचन या अध्याहृत कथनमें, पाठकोंके स्पष्टावबोधके लिये, किसी अधिक शन्द या याक्यांशके पूर्तिकी विशेष आरश्यकता माम दी, वहाँ उसे [ ] ऐसे पूरक धैकेटमें समाविष्ट किया गया है। किसी खास शन्दका पर्याय वाचक दूसरा विशेष परिचित शन्द या उसका अर्थ वतटानेकी कही जरूरत दिपाई दी उसे । , ऐसे गोल मैकेटमें दिया गया है। प्रकरणोंकी कण्डिकाओंके प्रारंभमें जो '१)२) ३)' ऐसे इकेरे गोल अकेटके साय क्रमांक दिये गये हैं ये, हमारी मूल प्रन्यकी आवृत्तिमें, इस ग्रन्थका अनुसन्धान बतलानेवाली कण्डिकाओके जो क्रमाक हमने दिये हैं, उसीके वोधक है। मूलमें जो संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश मापाके अनेकानेक प्राचीन पप उद्धृत किये गये हैं उनको हमने दो भागोंमें विभक्त किया है। एक थे जो प्रायः सब प्रतियोंमें समान संख्यामें मिलते हैं और दूसरे ये जो खास कोई एकाध ही प्रतिमें - प्रवन्धचिन्तामणि -- { } ऐसे अथवा । मिलते हैं । इस पिछले प्रकारके पद्योंको हमने पीछेसे लिखे गये अर्थात् प्रक्षिप्त माना है; और बाकीको मौलिक । इन दोनों तरहके पयोंके लिये हमने दो प्रकारके क्रमांक दिये हैं । जो मौलिक हैं वे १.२. ३. इस प्रकारके चालू अंकोंसे सूचित किये गये हैं और जो प्रक्षिप्त हैं वे । '[१]-[२] [३] इस प्रकार चोकौनी डबल ब्रैकेटवाले अंकोंसे बताये गये हैं। पद्योंकी तरह, मूल प्रन्थमें, कुछ गद्य प्रकरण-कण्डिकायें भी प्रक्षिप्त हैं, जिनको हमने अपनी उस मूलावृत्तिमें तो जुदा तरहके टाईपोंमें और ] ऐसे ब्रैकेटोंके बीचमें मुद्रित की हैं । यहाँ, इस भाषान्तरमें वे कण्डिकायें जुदा टाईपोंमें न छाप कर, शीर्फ उनके ऊपर, ब्लेक टाईपमें ( ) ऐसे गोल ब्रैकेटमें, अथवा चालू टाईपमें [ J ऐसे चौकोनी ब्रैकेटमें, उसकी झापक पंक्तियाँ लिख कर, उल्लिखित कर दी हैं। (-देखो, पृष्ठ १६, २०, ४८, ४९ इत्यादि । ). इस ग्रन्थमें जहाँ-वहाँ, जो प्रसङ्गोचित पद्य उद्धृत किये गये हैं उनमेंसे कुछ तो ऐतिहासिक घटना बताने- वाले हैं और कुछ सुभाषित स्वरूप हैं । इनमेंके कुछ पद्य द्विअर्थी अर्थात् श्लेषार्थक हैं जिनका स्वारस्य संस्कृत या प्राकृत भाषा-ही-में ठीक आस्वादित हो सकता है । हिन्दीमें उसका अर्थ ठीक अनूदित नहीं हो पाता । ऐसे पयोंके अर्थक विषयमें जहाँ तक हो सका, तदन्तर्गत मुख्य भावार्थ बतलानेका ही प्रयत्न किया गया है। कोई कोई पद्य ऐसे भी दुरवबोध मालूम देते हैं जिनका तात्पर्य ठीक ठीक समझमें नहीं आता । ऐसे स्थानोंमें जो अर्थ दिये गये हैं वे शंकित ही समझे जायें- जैसा कि पृ. ७७ आदि पर सूचित किया गया है कहीं कहीं गद्य कथनमें भी ऐसी दुरवबोधता और अस्पष्टार्यता प्रतीत होती है और उसका ठीक ठीक तात्पर्य नहीं जाना जा सकता-जैसा कि पृ. ९४ परकी टिप्पणीमें सूचित किया गया है। प्रन्थकारने कहीं कहीं ऐसे अपरिचित शब्दोंका प्रयोग किया है जो शुद्ध संस्कृतके न हो कर देश्य भाषाके हैं और जिनका अर्थ ठीक ठीक समझमें नहीं आता। ऐसे शब्दोंके दिये गये अर्थ भी सर्वथा निर्धान्त नहीं कहे जा सकते । इन सब शंकित स्थानों और अर्थोके विषयमें पाठक हमें कोई दोष न दें ऐसी विज्ञप्ति है। , जब यह भाषान्तर छपाना शुरू किया गया तब हमारी इच्छा थी, कि हम इसके साथ, इस ग्रन्थमें वर्णित विशेष विशेष ऐतिहासिक और भोगौलिक नामोंके बारेमें, अन्यान्य साधनोंद्वारा उपलब्ध या ज्ञात बातोंका परिचय करानेवाली विस्तृत टिप्पणियाँ दें; और इसमें जो कुछ पारिभाषिक शब्दसमूह और लोकोक्तिरूप वाक्य-विन्यास उपलब्ध होते हैं उनको स्फुट करनेवाली व्याख्यामक पंक्तियाँ भी लिखें । किन्तु, जब हमने कुछ ऐसी टिप्प णियों और पंक्तियाँ लिखनी प्रारंभ की तो उनका कलेवर इतना बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा जो मूल मन्यसे मी कही अधिक बढ जाने की आशंका कराने लगा। और ये सब टिप्पणियाँ लिखनेका तो हमारा उत्कट लोम है। क्यों कि इन्ही टिप्पणियों द्वारा तो इस ग्रन्थका सारा महत्त्व प्रकट होनेवाला है । इसलिये फिर हमने यह विचार किया कि इन टिप्पणियों आदिका संकलनवाला एक पर्यालोचनात्मक पूरा भाग ही अलग निकाला जाय; जिसमे भाषान्तरवाला यह भाग अनपेक्षित रूपसे विस्तृत न हो; और जिनको केवल प्रबन्धचिन्तामणिका मूलगत प्रन्यसार मात्र ही पदना-समझना अपेक्षित हो उनको इसके पढ़ने में कोई कठिनता प्रतीत न हो। इसीलिये हमने पृष्ठ ३, ११, १८ आदि पर जो टिप्पणियाँ दी है उनमें यह सूचित कर दिया है कि इन बातोंका विशेष चिन या उहापोह इसके अगले भागमें किया जायगा - इत्यादि । यह अगटा माग, पुरातनप्रयन्धसंग्रह नामक, मूल प्रन्थके पूरकात्मक द्वितीय भागके, इसी तरहके प्रास्ताविक वक्तव्य [छ हिन्दी भाषान्तरके प्रकट होनेके बाद, ( जो अब शीघ्र ही प्रेसमें जानेवाला है) प्रकट होगा-अर्थात् हमारी संकल्पित योजनाके अनुसार, वह इस प्रबन्धचिन्तामणका ५ वाँ भाग होगा। - " ६. प्रवन्धचिन्तामणि वर्णित ऐतिहासिक तथ्योंके विषय में कुछ स्वाभिप्राय ज्ञापन । इस ग्रन्थके पढ़नेवाले पाठकोंको यह बात लक्ष्यमें रखनी चाहिये कि-यद्यपि ग्रन्थ प्रधानतया ऐतिहासिक प्रबन्धोंका संग्रहात्मक है, तथापि इसके सब-के-सत्र प्रबन्ध ऐतिहासिक नहीं हैं । खास करके अन्तिम प्रकाशमें जो पुण्यसार, कर्मसार, वासना, कृपाणिका इत्यादि शीर्पक ५-७ प्रबन्ध हैं वे पौराणिक ढंगके कथात्मक रूप हैं। उनमें ऐतिहासिकता खोज निकालना निरर्थक है । वाकीके अन्य बहुतसे-प्रायः सब ही-ऐतिहासिक माने जा सकते हैं, पर इनमें से भी कुछ प्रबन्धों में वर्णित व्यक्तियों के विषयमें, अभी तक इतिहासविदोंमें थोड़ा बहुत मतभेद अवश्य दृष्टान्तके तौरपर, प्रथम प्रकाशमें प्रारंभ-ही-में दिये गये विक्रमार्क राजाके व्यक्तित्वके विषयमें विद्वानों में अभी तक कोई एक निर्णयात्मक विचार स्थिर नहीं हो पाया । वह राजा कौन था और कब हो गया इसके विषयमें अभी तक अनेक तर्क-वितर्क किये जा रहे हैं । नामके अतिरिक्त प्रबन्ध कथित और सब बातें तो एक कहानीकी अपेक्षा अन्य कोई अधिक महत्त्व नहीं रखती।" यही बात सातवाहनवाले प्रबन्धके विषयमें कही जा सकती है। सातवाहन राजाका नाम यद्यपि शिलालेखों वगैरहमें उपलब्ध होता है, पर इस नामके कई राजा हो जानेसे और प्रबन्धमें वर्णित घटनाका कोई ऐतिहासिकत्व प्रतीत न होनेसे उसके विषयमें भी नामके अतिरिक्त प्रबन्धकथित समूचा वर्णन कल्पनात्मक ही मानना चाहिए। "सातवाहनके बाद भूयराजका जो प्रवन्ध है, उसके अस्तित्वके विषयका अभीतक अन्य कोई ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है, पर उसके ऐतिहासिक पुरुप होनेका संभव माना जा सकता है।" इस तरह इन कुछ दो चार नामोंकी व्यक्तियोंको छोड़ कर, बाकी जितने भी नाम इस ग्रन्थमें आये हुए हैं वे सब प्रायः ऐतिहासिक पुरुष हैं । हाँ उनमेंसे कुछ कुछ व्यक्तियोंका संबन्ध, परस्पर एक दूसरेके साथ, इस तरह जोड दिया गया है जो भ्रमात्मक है । उदाहरणके तौरपर, भोज-भीमके वर्णनवाले दूसरे प्रकाशमें, धाराके परमार राजा भोजदेवके साथ खास करके महाकवि बाण, मयूर, मानतुङ्ग और माघ आदिका जो परस्पर सम्बन्ध और समकालीनत्व वर्णन किया गया है वह सर्वया भ्रान्त और निराधार है । प्रन्यकारके पूर्ववर्ती और प्रसिद्ध विद्वान् प्रभाचन्द्र सूरिने, अपने प्रभावकचरित्रमें, इन व्यक्तियोंका वर्णन और ही राजाओंके समयमें दिया है और वह कुछ प्रमाणभूत भी सिद्ध होता है। तब फिर न मालूम मेरुतुङ्ग सूरिने किस आधार पर, ऐसा भ्रान्तिपूर्ण यह वर्णन अपने इस महत्वके अन्यमें प्रथित कर डाला है, सो समझमें नहीं आता। भोजप्रबन्धकी ये बहुतसी बातें कल्पनाप्रसूत और लोककथायें जैसी प्रतीत होती हैं । ग्रन्थकारने ये बातें किसी पुरातन प्रबन्ध आदिके आधार पर लिखी हैं या किसीके मुखसे सुन कर लिखी हैं इसके जाननेका कोई साधन अभीतक ज्ञात नहीं हुआ। - सिद्धराज और कुमारपालके समयके जितने वर्णन इसमें प्रथित हैं वे प्रायः सब-के-सव ऐतिहासिक और आधारभूत हैं । उनके घटनाक्रममें कुछ आगे-पीछे पनका संभव हो सकता है पर उनमेंका कोई वर्णन सर्वथा निर्मूल हो ऐसा नहीं माना जा सकता। / मेरुतुल सूरिके इस ग्रन्थमें, ऐतिहासिक दृष्टिसे, जो सबसे अधिक विशेष महत्त्वका उल्लेख पाया गया है ज السا प्रबन्धचिन्तामणि वह है अणहिलपुरके राजाओंक समयका कालक्रम-ज्ञापक निश्चित निर्देश । अहिलपुरके राज्यसिंहासन पर, कौन राजा कत्र गद्दीपर बैठा और उसने फितने वर्ष राज्य किया इसका जो उल्लेख इस ग्रन्थमें किया गया है वैसा उल्लेख, पूर्वके अन्य किसी अन्यमें नहीं मिलता । यद्यपि इस उल्लेखमें चावडा (चापोत्कट) वंशके जो संवत्सर निर्दिष्ट किये गये है उनकी निश्चिति के निर्णायक और समर्थक अन्य कोई वैसे प्रमाण अभीतक उपलब्ध नहीं हो पाये, तथापि उनके वावक भी पैसे कोई प्रमाण अभीतक उपस्थित नहीं हुए। और चौलुक्य वंशके राजाओंके राज्यकालकी जो संवत्सरापलि इसमें दी गई है यह तो शिलालेख आदि अन्यान्य अनेक प्रमाणोंसे प्रायः सर्वथा निर्धान्त सिद्ध हो चुकी है। इसलिये इसमें दी गई यह राजसंसरामलि बडे ही महत्तकी ओर एक अद्वितीय ऐतिय वस्तु माबित हुई है। ७. प्रयन्धचिन्तामणिकी रचना कय और क्यों की गई। मेहतुग सूरिने यह ग्रन्य कब और कहा बनाया इमका उल्लेख उन्होंने अन्य के अन्तमें स्पष्ट कर ही दिया है । इस उल्लेखसे ज्ञात होता है, कि वि० सं० १३६१ में, काठियावाडके वर्तमान वढवान शहरमें उन्होंने इस ग्रन्थको पूर्ण किया । यह वह समय है, जब गुजरात के स्वाधीनत्य और स्वराज्यका सर्वनाश हुआ और विधर्मी यवनराज्य और पारवश्यका प्रादुर्मान हुआ । मेरुतुह्नके सामने ही अणहिलपुरका वह चौलुक्य वंश नामशेष हुआ, जिसके स्थापफ पुरुपसे ले कर अन्तिम पुरुपके समय तककी गुजरात के राजकीय, सामाजिक और धार्मिक जीवनकी कुछ विशिष्ठ स्मृतियां लिपिवद्ध करनेका उन्होंने इस ग्रन्थमें मौलिक प्रयत्न किया है । मेरुतुङ्ग सूरिके विचारसे, गुजरातमें - अपहिलपुर पाटनमें - वीरप्रकृति राजा वीरधवल और उसके विचक्षण मंत्री वस्तुपाल-तेजपालके वाद और कोई वैसा स्मरणीय पुरुष पैदा नहीं हुआ जिसका नामनिर्देश ये अपने इस ग्रन्थमें करते । यद्यपि वरिधवलके बाद उसके वंशजोंने प्रायः ५०.५५ वर्षतक अणहिलपुरमें राज्यसिंहासनका उपभोग किया, पर उनका शासन प्रायः निष्प्राण और निस्तेजसा ही रहा । मेहतुग सूरिको उस शासनकालमें कोई महत्व नहीं मालूम दिया और इसलिये उन्होंने उस समयकी किसी भी घटनाका उछेख अपने ग्रन्थमें नहीं आने दिया। उनके अभिप्रायमें, वीरधयल और वस्तुपाट-तेजपाल के साथ गुजरातके ज्योतिर्मय जीवनकी समाप्ति हो गई। चाहे मेहतुङ्ग सूरिको, इतिहास के आत्माका दिव्य दर्शन हुआ हो या न हुआ हो, पर इसमें कोई शक नहीं कि उनका यह अन्यलेखन, सचमुच, इतिहासदर्शनकी एक अस्पष्ट पर सूक्ष्म कलाके आमासका उत्तम सूचन करता है । जब हम गुजरात के भूतकालीन राष्ट्रीय जीवन पर एक गहरी दृष्टि डालते हैं, तब हमें यह बहुत स्पष्टताके साथ दिखाई देता है, कि यथार्थ ही, गुजरातके भाग्याकाशमें वीरधवल और वस्तुपाल-तेजपाल के बाद, अब तक, वैसा कोई ज्योतिर्वर तेजस्वी तारक उदित नहीं हुआ। और जब तक गुजरातमें पुनः वैसा पूर्ण स्वराज्य स्थापित नहीं हो पाता तब तक हम इस अन्तर्दाहक अनुभूतिको मिटा नहीं सकते । मेरुनु मरिने इस प्रन्यकी रचना किस लिये की-यह भी उन्होंने प्रत्यके प्रारम्भमें और अन्तमें, संश्चिम रूपमे सूचित किया है । ये कहते हैं कि-" वारंवार सुनी जाने के कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानों के मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पाती । इमठिये में निकटवती स पुरुषों के वृत्तान्तोस [ संकठिन ऐसे ] इस प्रबन्ध- चिन्तामगि मन्यकी रचना कर रहा हूं।"(-देखो पृ० २, पच ६ का अनुवाद ). इस कथनके भावको स्पष्ट करनेके लिये, इसके नीचे एक टिप्पणी दे कर हमने उसमें कहा है कि-" पुराने जमाने में व्याख्यानकार और कथाकार प्रायः सदा उन्हीं कथा-यार्ताओं को सुनाया करते थे जो महाभारत और रामायण आदि पुराण अन्योंमें प्रास्ताविक वक्तव्य [ झ . प्रसिद्ध हैं। एक-की-एक ही कथा वारंवार सुननेमें विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता यह सर्वानुभव सिद्ध बात है । मेरुतुह्न सूरिने इस बातका विचार कर, लोगोंका मनरंजन करनेके लिये, कथाकारोंको, कुछ नई सामग्री प्राप्त हो इस उद्देशसे, कितनेएक इतिहास-वृत्तान्तोंसे अलंकृत ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की।" प्रन्थके अन्तमें थे, इस रचना करनेमें एक दूसरा भी कारण बतलाते हुए लिखते हैं कि बहुश्रुत और गुणवान ऐसे वृद्धजनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं । इस कारणसे तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषों के प्रबन्धोंका संघटन रूप यह ग्रन्थ मैंने बनाया है।" मेरुतुङ्ग सूरिका यह कथन बहुत अनुभवपूर्ण और भावि परिस्थितिका द्योतक है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि मेरुतुङ्ग सूरि इस ग्रन्धकी रचना द्वारा, इन पुरातन ऐतिह्य श्रुतियोंका, यह विशिष्ट संग्रह न कर जाते तो, आज हमें, उस जमानेकी इन इनीगिनी वातोंके जाननेका भी और कोई साधन उपलब्ध नहीं होता।यह सब-किसीको मंजूर करना पडेगा कि जैन धर्मके उस मध्यकालीन इतिहासकी जो अनेकानेक विश्वसनीय और प्रमाणभूत बातें, इस ग्रन्थमें उपलब्ध होती हैं और उसके साथ ही गुजरातके समूचे राष्ट्रीय इतिहासकी भी बहुत आधारभूत जो कथायें इसमें दृष्टिगोचर होती हैं, वैसी और किसी प्रन्थमें विद्यमान नहीं हैं।" ८. प्रवन्धचिन्तामणिके उल्लेखों पर कुछ विद्वानोंके मिथ्या आक्षेप । कुछ कुछ विद्वानोंका खयाल है कि- ग्रन्थकार जैनधर्मी हानेसे, उसने इस ग्रन्थमें अपने धर्मका प्रभाव बतलानेकी दृष्टिसे, बहुत कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कथन किया है; और उसके साथ अन्य धर्मकी-खास करके शैयधर्म और ब्राह्मण संप्रदायकी- लघुता बताने का भी प्रयत्न किया है। इस ग्रन्यके उक्त इंग्रेजी अनुवादक मि. टॉनीने अपनी प्रस्तावनामें, इस बारेमें लिखा है कि- 'जिस तरह, एक्झीटर स्ट्रीटके एक छप्परके नीचेके कोनेमें बैठ कर, पार्लियामेंटके संभाषणोंको लेखबद्ध करते समय, डॉ० होनसन् इस बातकी पूरी सावचेती रखता था कि 'व्हीगके प्रतिपक्षी उसमें से किसी तरहका कोई लाभ न उठा पावें '- इसी तरह सभी शंकास्पद स्थानोंमें, यह अमर्षशील जैन ग्रन्थकार, स्पष्ट रूपसे महावीरके धर्मके दृढ श्रद्धालु अनुयायियों ( अर्थात् जैनों) के पक्षकी ओर झुकता है; और जैन लोक, शैवोंकी तुलनामें कहीं नीचे न दिखाई दें इसकी सावधानी रखता है।' इत्यादि । इसमें कोई शक नहीं कि- प्रन्यकार जैन धर्मका एक विद्वान् धर्माचार्य है और इस प्रन्यकी रचनामें उसका प्रधान उद्देश जैन धर्मकी पुरातन महत्ता और गौरव गाथाको, कालके कुटिल और प्रबल प्रवाहके कारण नष्ट होनेसे बचा रखनेका है। अतएव वह इसमें अपने धर्मका उत्कर्ष बतानेवाली श्रुतियों और उक्तियोंका ययेष्ट उपयोग करे, यह स्वाभाविक ही है। उस पुराने जमानेमें, जब धार्मिक वाद-विवादकी बडी प्रतिष्ठा थी और उसका खूब जोरदार प्रचार था; एवं सभी धोके और संप्रदायोंके अप्रणी विद्वान् गण अपनी अपनी विद्याका प्रभार और पराक्रम बतलानेके लिये, राजसभाओंमें, नामी पहलवानोंके मुष्टि-प्रहारोंको नाई, वाक्प्र- हारोंकी बड़ी सख्त कुस्ती किया करते थे, तब उन विद्वान् प्रन्थकारोंकी तद्विषयक रचनाओंमें, ऐसी अमर्पशील भावना और लेखन-शैलीका दृष्टिगोचर होना नितान्त स्वाभाविक ही है । केवल जैन अन्यकार ही इसमें अधिक उल्लेखनीय हैं सो बात नहीं है । संसारके सभी धर्मों, संप्रदायों, मतों और मंतव्योंके लेखक इससे मुक्त नहीं है। मेस्तुग सूरि भी उन्हीं का एक स्वधर्मप्रिय लेखक है, अतः उसके लेखमें, अपने धर्मको नीचा दिखाने- .
- । " प्रबन्धचिन्तामणि वाली किसी उक्तिके न आने देनेकी सावचेतीका रखना, उसका कर्तव्य है । ब्राह्मण और शैव प्रन्यकारोंने भी वैसा ही किया है; मुसलमान और ईसाई इतिहास-लेखकोंने भी वैसा ही किया है - और अब भी सब वैसा ही करते रहते हैं। इसलिये इसमें जैनधर्मक महत्व के प्रतिपादनका होना कोई खास दूषण नहीं है । रही बात अति- शयोक्तिकी-सो विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे किसी भी प्रकारकी अतिशयोक्ति अवश्य ही आलोचनाय है और उसकी प्रामाणिकता विचारणीय है । पर जैसा कि हमने पहले ही सूचित कर दिया है, यह ग्रन्थ कोई विशुद्ध इतिहास प्रन्य नहीं है । यह तो कुछ पुरातन प्रकीर्ण पोथियोंमें यत्र-तत्र लिखित और कुछ कुछ वृद्ध जनोंके मुन्वते यथा-तथा श्रुत ऐसी इतिहासविषयक कथा-वार्ताओं का एकन्न संकलनवाला एक संग्रह मात्र है । अत: इसमें की कुछ उक्तियाँ अथवा घटनाएँ, विशुद्ध इतिहासकी दृष्टिसे, यदि भ्रान्तिपूर्ण, अतिशयोक्तिपूर्ण अथवा निर्मूलप्राय मी सिद्ध हों तो उसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है । और खुद ग्रन्थकारको भी इस विषयमें कुछ आशंका हुई है, कि उनके इस संकलनमें, विद्वानोंको कुछ बातें संदिग्ध या भिन्नभाववाली मालूम दें । इसलिये उन्होंने ग्रन्थारंभमें यह बात भी इस तरह कह दी है कि-" यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना] से कहे गये प्रबन्ध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावोंगले अवश्य होते हैं, तथापि इस ग्रन्यकी रचना सुसंप्रदाय ( योग्य परंपरा) के आधार पर की गई है। इसलिये चतुर जनोंको [ इसके विषयमें ] वैसी चर्चा न करनी चाहिए। इस कथनको स्पष्ट करनेके इरादेसे इसके नीचे जो टिप्पणी हमने दी है उसमें लिखा है कि- " मेस्तुङ्ग सूरिने इस ग्रन्थकी संकटना करने में कुछ तो पुराने प्रबन्ध-प्रन्थों की सहायता ली और कुछ परंपरा चली आती हुई मौखिक वातोंका आधार लिया । इस प्रकार परंपरासे सुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करनेमें विद्वानों को अवश्य ही उनमें कुछ-न-कुछ भिन्न मात्र मालूम पडता रहता है । मेरुतुङ्ग सूरिको भी अपनी इस रचनामें कहीं कहीं ऐसा भिन्न मात्र मालूम हुआ है । इस भिन्न मायके निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन था और न कोई उनको उसकी वैसी आवश्यकता थी । उन्होंने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि हमने जो बातें इस प्रन्यमें संकलित की हैं वे एक सुसंप्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई है। इसलिये इनके तथ्यातथ्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं। प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बातें ऐतिहासिक दृष्टिसे सर्वया भ्रान्त मी मालूम होता है लेकिन मेरुतुङ्ग सूरि उनके लिये निष्पक्ष और निराग्रह है।" 'यद्यपि यह बात ठीक है कि मेस्तुङ्ग सूरिका मुख्य लक्ष्य जैन धर्मके महत्त्वकी ओर रहा है; तथापि उन्होंने अन्य धर्मोकी निन्दा करने की दृष्टि से या अन्य धार्मिक जनोंकी हीनता बतानेकी मारनासे इसमें कुछ भी नहीं लिया है । वल्कि प्रसङ्गोपात्त अन्य-धर्म-विषयक कुछ महत्वकी बातें भी उन्होंने उसी आदरकी दृष्टिसे, लिखी है, जैसी अपने धर्मकी लिखी हैं । उदाहरणके तौरपर, मूलराजके प्रबन्धमें जो शिवपूजाका प्रभार और शेराचार्य कंथडी नामक तपस्वीके तपकी महिमामा वर्णन किया गया है, यह सर्वथा वैसा ही आदरयुक्त पंक्तियोंमें | लिखा गया है, जैसा जिनपूजा या किसी जैन आचार्यके वारेमें लिखा गया हो । इसी तरह सिद्धराजकी माता मयणल्लासी शिवमाक्तिके विषयमें जो उल्लेख किया गया है यह मी वैसा ही निप्पक्ष भारसे भरा हुआ है । अगर मेरुतुग मूरिको शिवधर्मकी महत्ताके बारेमें अनादर होता तो ये इन उल्लेखोंको इसमें स्थान ही क्यों देते।' मुख्यतपा जैन श्रोताओं ( धारकों ) के सम्मुख, व्याख्यान सभामें, जैन साधुओं-यतियोंके वाचने निमित, इस प्रन्यकी रचना की गई है। इसलिये इसमें जैन व्यक्तियोंका और उनके कार्यकलापोंका ही अधिक वर्णन होना स्वाभाविक है । पर, उसके साथ ही मेस्तुह त्रिको, गुजरातके सर्व सामान्य प्रजाकीय और राष्ट्रीय जीवनकी उन्नायक इतर व्यक्तियों और उनकी कार्य-स्मृतियोंके तरफ भी अनुराग है, और इसलिये उन्होंने अपने इस संप्रझमें, उन इतर व्यक्तियोंकी जीवन-स्मृतियोंके भी, यथाश्रुत और यथाज्ञात वृत्तान्तोंको, जहाँ-वहाँ अथित प्रास्ताविक वक्तव्य [ट कर लेनेमें कोई संकोच नहीं किया। भोज-भीमप्रबन्धकी बहुतसी स्मृतियाँ इसी दृष्टिसे संगृहीत की गई हैं। सिद्धराजके प्रबन्धकी भी बहुतसी बातें इसी आशयसे लिखी गई हैं। * ९. मेस्तुङ्ग सूरिकी इतिहास-प्रियता । मालूम देता है कि मेरुतुङ्ग सूरिको ऐतिहासिक बातोंमें कुछ अधिक रस था और ऐतिहासिक तथ्यपर पक्षपात था। इसलिये उन्होंने सिद्धराज और कुमारपालके जीवन विषयकी वैसी भी कुछ तथ्यभूत बातें उल्लिखित कर दी हैं जिससे उन व्यक्तियोंके, कुछ चरित्र-दुर्बलता और स्वभाव-कृपणता आदि दोपोंकी भी, हमको झांकी हो जाती है । हेमचन्द्र सूरि आदि विद्वानोंने अपनी रचनाओंमें ऐसे दोपोंका बिल्कुल भी आभास नहीं आने दिया है।' * इस विषयमें, मेरुतुङ्ग सूरिने सबसे अधिक महत्वको जो सत्य ऐतिहासिक वात लिख डाली है यह है मंत्रीवर यस्तुपाल-तेजपालकी माता कुमारदेवीके पुनर्लग्नकी । तत्कालीन सामाजिक और धार्मिक नीतिको भाव- नाकी दृष्टि से कुमारदेवीका वह पुनर्लग्न अवश्य निन्दनीय और हीन कार्य समझा जाता था। वैसे कार्यको समाज बडी हलकी दृष्टिसे देखता था और उस कार्यके करनेवाली व्यक्तिको बडे कठोर भावसे समाजसे बहिष्कृत और तिरस्कृत किये करता था। यह तो उस एक-अद्वितीय भाग्यवती कुमारदेवीका लोकोत्तर पुण्यकर्म ही था, जिसके प्रभावसे उसकी कुक्षीमें ऐसे प्रभावशाली पुत्ररत्न पैदा हुए जिनकी समता रखनेवाले पुरुष, सारे संसारके इतिहासमें भी इने-गिने ही दिखाई देंगे । इन पुत्र-पुङ्गयों के प्रतापके कारण कुमारदेवी तत्कालीन समाजमें बड़ी भारी प्रतिष्ठाकी पुण्यभूमि बन सकी और सारे देशके जनोंसे बडी श्रद्धाके साथ पूजी और प्रशंसी गई । वडे-से-बडे धर्माचार्योने, बडे-से-बड़े कवियोंने, बडे-से-बडे राष्ट्रपुरुषोंने उसकी प्रतिमाकी पूजा की और उसके नामकी स्तुतियाँ गाई । पर उसके जीवनका यह महत् प्रेमकार्य, जिसके यश हो कर उस णहिलपुरके एक बड़े खानदानके प्राग्वाट कुटुंबके पराक्रमी युवक ठकुर आसराजके साथ पुनर्लन किया था, उसकी स्मृतिका किंचित् आमास भी उन समकालीन कवियों और प्रन्यकरोंने अपनी कृतियोंमें न आने दिया । क्यों कि वह कार्य समाज और धर्मको नापसन्द था। उसकी स्मृतिको जीवित रखना अप्रिय था। श्रद्धेय और पूजनीय माता कुमारदेवीके पुण्य जीवनकी उस मानी गई कृष्णकलाका सूचन करना उन कवियों के लिये बडा पातक कार्य था। महामात्य वस्तुपाल-तेजपाल जैसे जगत्श्रेष्ठ, पुण्यप्रभावक और धर्मावतार नरशिरोमाणि विधवा-विवाहसे प्रसूत पुत्ररत्न थे, इस विचारको स्मृतिमें लाना भी उन ग्रन्यकारों के लिये, शायद वडा दुश्वद और दुर्विचारक कर्तव्य था। इसलिये उन्होंने अपनी कृतियों में इसकी कहीं मी स्मृति नहीं होने दी। उन्हींफा अनुगमन करनेवाले, वस्तुपाल-तेजपालके अन्यान्य पिछले प्रसिद्ध चरित्रकारोंने भी उस यातका कही सूचन नहीं होने दिया। परंतु मेरुनुगने अपने अन्यमें इस बातका बहुत ही संक्षेपमें पर बडे स्पष्ट रूपसे उल्लेख कर दिया । ऐसा ही एक मरा स्पष्ट उल्लेख उन्होंने राणा वीरधवलकी माताकै विषयमें भी किया है, जो भी इसी तरहका एक सामाजिक अपवादका ज्ञापक हो कर भी ऐतिहामिक तथ्य था । इन उल्लेखोंसे मेरुतुन सूरिकी सची इतिहास-प्रियताका हमको अन्या आभास हो जाता है। वाकी उस समयके प्रत्यकारों के विषयमें, इससे अधिक विशुद्ध इतिहास-टिकी अपेक्षाकी कल्पना करना और उनमें धार्मिक या साप्रदायिक माग्नाके पौषरुपिचारोंका दोषारोप कर, उनके अबाधित कयनोंको भी उपेक्षा- की घटिस देखना, एक प्रकारको निजकी ऐतिहासिक दृष्टिकी विपर्यासताका बोध कराना है।
ठ] प्रवन्धचिन्तामणि १०. ग्रन्थकारके जीवनके विषपमें। प्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिके जीवन आदिके विषयों कोई विशेष वस्तु ज्ञात नहीं होती । ये नागेन्द्र गच्छके आचार्य थे और इनके गुरुका नाम चन्द्रप्रम सूरि था । धर्मदेव नामक विद्वान् - जो शायद इनके वृद्ध गुरुभ्राता या अन्य कोई गच्छवासी स्थविर साधु-पुरुष थे- उनके पाससे इन्होंने, इस प्रन्यकी रचनामें बहुत कुछ ऐतिह्य सामग्री प्राम की थी । गुणचन्द्र नामक इनका प्रधान शिष्य था जिसने इस प्रन्यकी पहली संपूर्ण प्रातीलपि लिख कर तैयार की यी इनकी एक और अन्यकृति उपलब्ध होती है जिसका नाम महापुरुपचरित है । इस ग्रन्थमें ऋषभदेव, शान्तिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महागीर-इस प्रकार पाँच तीर्थंकरोंका संक्षिप्त चरित वर्णन है। इसके अतिरिक्त और कोई इनकी कृति हमें अभीतक ज्ञात नहीं हुई। * अन्तमें हम आशा करते हैं कि हिन्दी-मापा-भापी जिज्ञास्नु जन, इस ग्रन्यके वाचन-मननसे अपने प्राचीन इतिहास विषयक ज्ञानमें उचित वृद्धि करेंगें; और खुद ग्रन्यकारने, ग्रन्थान्तमें जो नम्र निवेदन किया है उसकी तरफ लक्ष्य रखनेकी सूचना कर, उसी कथनको उद्धृत करते हुए, हम अपना यह प्रास्ताविक वक्तव्य समान करते हैं। ययाश्रुतं सङ्कलितः प्रबन्धैर्ग्रन्यो मया मन्दधियापि यत्नात् । मात्सर्यमुत्सार्य सुधीभिरेप प्रज्ञोदुरैरून्नतिमेव नेयः ।। मार्गशीर्षपूर्णिमा, वि० स० १९९७ भारतीय विद्या भवन आनगिरि (अन्धेरी), बम्बई. --जिनविजय श्रीमरुतुङ्गाचार्यविरचित प्रबन्धचिन्तामणि ॥ ॐ नमः सर्वज्ञाय ॥ श्रीनाभिभूर्जिनः पातु परमेष्ठी भवान्तकृत् । श्रीभारत्योश्चतुरिमुचितं यच्चतुर्मुखी ॥ १ ॥ नृणामुपलतुल्यानां यस्य द्रावकरः करः। ध्यायामि तं कलावन्तं गुरुं चन्द्रमभं प्रभुम् ॥ २॥ गुम्फान् विधूय विविधान् सुखेवाधाय धीमताम् । श्रीमरुतुङ्गस्तद्द्यबन्धाद् ग्रन्यं तनोत्यमुम् ॥३॥ रत्नाकरात् सद्गुरुसम्पदायात् प्रवन्धचिन्तामणिमुद्दिधीो । श्रीधर्मदेवः शतधोदितेतिवृत्तैश्च साहाय्यमिव व्यधत्त ॥ ४ ॥ श्रीगुणचन्द्रगणेशः प्रवन्धचिन्तामणिं नवं ग्रन्थम् । भारतमिवाभिरामं प्रथमादर्शन दर्शितवान् ॥ ५॥ भृशं श्रुतत्वान्न कथाः पुराणाः मीणन्ति चेतांसि तथा युधानाम् । वृत्तस्तदासन्नसतां प्रबन्धचिन्तामणिग्रन्थमहं तनोमि ॥ ६ ॥ युधैः प्रबन्धाः स्वधियोच्यमाना भवन्त्यवश्यं यदि भिन्नभावाः । ग्रन्ये तथाप्यत्र सुसम्प्रदायाद् दृव्धे न चर्चा चतुरैर्विधेया ॥७॥ ।। ॐ सर्वज्ञको नमस्कार हो । जिनकी चतुर्मुखी ( चार मुख ) लक्ष्मी और सरस्वतीका उचित द्वार है, और जो भवका अन्त करनेवाले हैं ऐसे श्री नाभि भू, परमेष्ठी जिन (ऋपम नाथ ) रक्षा करे' ॥१॥ उस कलागन् प्रमु चन्द्रप्रभ नामक गुरुका मैं ध्यान करता हूं जिनका कर ( हाथ, किरण) पत्थरके समान मनुष्योंको भी द्रवित करनेवाला है ॥२॥ १ इस ऋोकमै प्रन्यकारने ब्रह्मा और जिनदेव ऋपम नाय की एक साथ स्तुति की है । बमाके चार मुख होनेसे ये चतुर्मुसके नामसे प्रसिद्ध है । जैन शास्त्रोंमें वर्णन है कि भगवान् ऋषभदेव जब धर्मोपदेश देते ये तर वे भी श्रोताओंगो चार मुखवाले दिखाई देते थे । इस लिये जिन भगरानको भी चतुर्मुसका विशेरण दिया जाता है । ब्रह्मा भी परमेष्ठी पदमे प्रसिद्ध हैं और जिन भगवान् मी परमेटी कहलाते हैं 1 मा विष्णु के नाभिटमटमे पैदा हुए ऐसी पुराणों में प्रसिद्धि है इसलिये वे नामिभू को जाते हैं और जिनदेव ऋरमनायके रितारा नाम ना भिराज था इस लिये वे भी नाभिभू कहे जाते हैं। २इस मयेक ग्रन्थकारने अपने गुरको नमस्कार किया है जिनका नाम चन्द्र प्रमथा चन्द्रप्रम शम्दका कार्य करते हुए गुरुकी तुलना चन्द्रमाके साप की है।चन्द्रमा अग्नी १६ कटाभोंके कारण कलाान्न कहलाता है, प्रत्यकारके गुरु भी अनेक रिया-पलाभोंमे अलात दोनेके कारण कलावन्त थे । चन्द्रमाके कर पाने किरा चन्द्रकान्न मनिको-जो एक प्रकारका पत्थर हद-द्रगि(जनपिन्तु युक्त) करते है; मेरी चन्द्रमम गुरके कर याने एप यदि पपरतुच मनुष्य के मलिक कार मी पडते हैं तो उसको भी ये इति(भाद,-कोमविच) मनाते हैं। .
प्रयन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश विविध प्रकारके ग्रन्थों और प्रबन्धोंको छोड़ कर बुद्धिमानोंको मुखसे जिनका बोध हो सके इसलिये गद्यरचना द्वारा ही मैं मे रु तुंग इस ग्रन्थकी रचना करना चाहता हूँ ॥ ३॥ रत्नाकर ( समुद्र ) समान सद्गुरु सम्प्रदायसे, जब मेरी इस प्रबंधरूप चिन्तामणि (रत्न) के उद्धार करनेको इच्छा हुई तो श्रीधर्मदेव ने सैंकडो वार इतिहासकी बातें कह कहकर मानों मेरी सहायता की ॥१॥ जिस प्रकार म हा भार त ग्रन्थका प्रथम आदर्श (पहली नकल) गणेश (गजाननने ) तैयार किया, उसी प्रकार इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक नये ग्रंथका प्रथम आदर्श गुण चन्द्र नामक गणेश (गच्छपति ) ने सुन्दर रितिसे तैयार किया ॥ ५॥ वारंवार सुनी जानेके कारण पुरानी कथायें बुद्धिमानोंके मनको वैसा प्रसन्न नहीं कर पातीं। इस लिये में निकटवर्ती सत्पुरुपोंके वृत्तान्तोंसे [ संकलित ऐसे ] इस प्रबंधचिन्तामणि अन्धकी रचना कर रहा हूं ॥ ६॥ यद्यपि विद्वानों द्वारा अपनी बुद्धि [ संकलना ] से कहे गये प्रबंध [ कुछ कुछ ] भिन्न भिन्न भावों वाले अपश्य होते हैं; तथापि इस ग्रंथकी रचना सुसम्प्रदाय ( योग्य परंपरा) के आधारपर की गई है। इसलिये चतुर जनोंको [ इसके विषयमें ] वैसी चर्चा न करनी चाहिये ॥ ७॥ ३ मे रु तुग सूरि ने इस प्रथकी रचना की उसके पूर्व, कुछ गद्य और कुछ पामें, कुछ प्राकृत और कुछ सस्कृतमें, धुछ पुरातन अपभ्रश और कुछ अर्वाचीन देश्य भाषामें, इस प्रकारके कई छोटे बड़े प्रबन्धात्मक ग्रन्थ विद्यमान थे | उन प्रन्यों से अपनी मनोरचिके अनुसार क्तिने एक विषय चुनकर मे रु तुंग ने सरल संस्कृत गद्य रचना द्वारा इस ग्रन्थका संकलन किया । ४ ग्रन्थकार मेरुनुंगररिके धर्मदेव नामक कोई वृद्ध गुरुभ्राता अथवा गुरुजन थे जिन्होंने समय समय पर इतिहासकी सैंकडों पुरानी बातें सुना मुनाकर इस ग्रन्थकी रचना सामग्रीमें यथेष्ट सहायता दी। इस लिये अन्यकारने अपने गुरुके बाद उनका भी सम्मानपूर्वक इस श्लोक द्वारा स्मरण और उपकृत माव प्रदर्शित किया है। ५ जैन ग्रन्यों में यति मुनियोंके समुदायको गण नामसे भी उल्लिखित किया जाता है । गणका नायक जो सरि- आचार्य होता है उसे गणेश-गणपति-गणनायक-आदि शन्दोंसे सम्बोधित किया जाता है । प्रबन्धचिन्तामणिका प्रथम आदर्श तैयार करनेवाले गुण चन्द्र नामक गणी ये जो शायद मेरुतुगसूरिके प्रधान शिष्य हों और उनके बाद उनके पट्टधर गणनायक बने हौ । गणेश शब्दसे, ग्रंथकारने पुराण प्रसिद्ध देव गणपति (गजानन विनायक) जिन्होंने वेद व्यास कथित महामारतकी प्रथम नकल की, उसके साथ यहा पर भोपार्य र अर्थ घटना बताई है। ६ पुराने जमानेमें व्याख्यानकार और क्याचार प्रायः सदा उन्हीं क्या-वार्ताओंको सुनाया करते थे जो महामारत और रामायण आदि पुराण अन्योंमें प्रसिद्ध हैं। एककी एकही कथा वारंवार सुनकर विज्ञ मनुष्योंके मनको विशेष आनन्द नहीं आता यह सर्वानुमत्र सिद्ध बात है। मेस्तुगमरिने इस बातका विचार कर, कथाकारोंको, लोगोंका मनोरजन करनेके लिए कुछ नई सामग्री प्राप्त हो इस उद्देश्यसे, कितने एक इतिहास प्रसिद्ध और निकट समयवर्ती श्रेष्ठ पुरुषों के ऐतिहासिक वृत्तान्तोसे अलंकृत ऐसे इस प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थकी रचना की। ग्रन्थकारका यह कयन खास ध्यान देने योग्य है। ७ मेरुनुगमरिने इस ग्रन्यकी सकलना करनेमें कुछ तो पुराने प्रबन्ध-ग्रन्योंकी सहायता ली और कुछ परंपरासे चली आती हुई मौखिक बातोंका आधार लिया। इस प्रकार परपरसे मुनी हुई बातोंका परस्पर मिलान करनेमें विद्वानोंको अवश्य ही उनमें कुछ न कुछ मिन्नमार मालूम पड़ता रहता है। मेरुनुगसरिको भी अपनी इस रचनामे और दूसरी अन्यकृत रचनामें कहीं कहीं ऐसा मिनमाव मालूम हुआ है। इस भिनमारका निराकरण करनेका या खुलासा करनेका उनके पास न तो कोई साधन या और न कोई उनको उसकी आवश्यक्ता थी। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त समझा कि-हमने जो बाते इस अन्यमें सकलित की हैं ये एक मुमप्रदाय द्वारा प्राप्त की हुई हैं। इस लिये इनके तथ्यातय्यके बारेमें चतुर मनुष्योंको चर्चा करनेसे कोई लाभ नहीं। प्रबन्धचिन्तामणिकी कुछ बार्ने ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वथा भ्रान्त भी मालूम होती हैं लेकिन मेरुतुंगसूरि उनके लिये निष्पक्ष और निरापद -यह बात इस मोकगत कपनसे सूचित होती है।
प्रकरण १] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [ १. विक्रमार्क राजाका प्रवन्ध । , १. इस पृथ्वीतल पर विक्र मा दित्य [ कालक्रमसे ] अन्तिम राजा होते हुए भी, अपने शौर्य औदार्य आदि गुणोंसे वह प्रथम और अद्वितीय राजा हुआ। श्रोताओंके कानोंमें अमृतकासा आसिंचन करनेवाला उस राजाका इतिवृत्त बहुत कुछ विस्तृत है । हम यहां पर, ग्रंथकी आदिमें उसीका संक्षेपमें कुछ वर्णन करते हैं । १) वह इस प्रकार है-अवन्ति देश के सुप्रतिष्ठान' नामक नगरमें असम साहसका एक मात्र निधि; दिव्य लक्षणों (चिह्नों) से लक्षित; सत्कर्म, पराक्रम इत्यादि गुणोंसे भरपूर ऐसा एक विक्रम नामक राजपूत ( राजपुत्र ) था। आजन्म दरिद्रतासे तंग होता हुआ भी वह अति नीति-परायण था; सैंकड़ों उपाय करके भी जब धन नहीं प्राप्त कर सका तो एक बार भदृ मात्र नामक मित्र के साथ रोहणपर्वत को चला । उसके निकटवर्ती प्रय र नामक नगरमें [ एक ] कुम्हारके घर विश्राम करके प्रातःकाल उस कुम्हारसे भट्ट मात्र ने कुदाल मांगा । उसने कहा-इस जगह खानके भीतर जाकर प्रातःकाल पुण्यात्मक नामका श्रवण करके, ललाटको हथेलीसे स्पर्श कर 'हा दैव !' ऐसा कहकर चोट मारनेसे, दुर्भागी मनुष्यको भी अपनी प्राप्तिके अनुसार रन मिलते हैं। उस भट्ट मात्र ने कुम्हारसे इस वृत्तान्तको भली भाँति सुन लिया पर विक्रम से इस प्रकारको दीनता करानेमें वह असमर्थ था । उन साधनोंको साथ लेकर विक्रम जब उस स्थानमें कुदालका प्रहार करनेको उद्यत हुआ तो उस उसम उसने [ अकस्मात् ] विक्रमसे इस प्रकार कहा कि- अवन्ती से आए हुए किसी वैदेशिकसे घरका कुशल समाचार पूछने पर उसने आपकी माताका मरण बताया है !' इस तप्त वज्र-शूची ( हीरा छैदनेकी सुई- हीराकणी ) के समान वचनको सुनकर विक्रम ने हथेलीसे माथा ठोंककर ' हा दैव!' ऐसा कहा और कुदालको हाथसे फेंक दिया । उस कुदालके अग्रभागसे फटी हुई जमीनमेंसे सवा लाख मूल्यका चमकता हुआ रत्न (होरा ) प्रादुर्भूत हुआ । भट्ट मात्र उसे लेकर १ मध्यकालीन प्रबन्धकारोंकी यह मान्यता थी कि विक्रमादित्यके बाद उसके जैसा पराक्रमी, शूर, वीर, उदार चेता और कोई राजा नहीं हुआ। उसके पहलेके युग; यद्यपि पुराणप्रसिद्ध अनेक राजा हुए जो इन गुणोंसे यथेष्ट अलंकृत थे, तथापि वे भी विक्रमके जैसे सपूर्ण आदर्श नृपति नहीं थे । इसलिये इन गुणोंकी दृष्टि से विक्रम उन राजाओंमें भी सर्व प्रथम स्थान प्राप्त करता है और इसीलिये इस पद्यमें, प्रयकारने उसको कालकमसे अन्तिम होनेपर भी गुणक्रममें वह सर्व प्रथम था, ऐसा कहा है। प्रबन्धचिन्तामणिका इग्रेजी भाषामें जो अनुवाद टॉनी नामक इग्रेज विद्वान्ने किया है, उसमें उसने अन्त्य इस शन्दका अर्थ अन्त्यज-हीन जातीय (of Lowest rank) ऐसा किया है, लेकिन वह भ्रमात्मक है । विक्रम हीन जातीय था ऐसा कहीं भी कोई उल्लेख नहीं मिलता । प्रबन्धोंमें विक्रमका कहीं तो राजपूत जातिके परमार वंश में उत्पन्न होना लिखा है और कहीं हुण वश में; ये दोनों ही प्रसिद्ध राजवंश है । इस विषयकी विशेष चर्चा हम अगले मागमें करेंगे। * इस प्रबन्धचिन्तामणिकी रचनाके पूर्व, विक्रमविषयक कई चरित्र और प्रबन्ध बने हुए विद्यमान थे । ये चरित्र प्रबन्ध बहुत कुछ विस्तृत और विविध वर्णनवाले ये । उनमेंसे कुछ थोडेसे वर्णन, सक्षेप करके, मेस्तुंगरिने यहापर प्रथित किये हैं । विक्रम विषयक इस विविध साहित्यका विशेष परिचय हम यथास्थान अगले अन्यमें लिखेंगे। २ वर्तमान मालवेका प्राचीन नाम अवन्ती था । ३ मा ल वा याने अवन्तीमें सुप्रतिष्ठान नामक कोई नगरका उल्लेख कहीं नहीं मिलता । अवन्तीकी राजधानी प्राचीन काल ही से उजयिनी प्रख्यात है और विक्रमकी राजधानी यही उयिनी थी। इसलिये संभव है कि अपकारने इसी उजयिनी को सुप्रतिष्ठान-जिसका प्रतिष्ठान स्थापन खूब दृढ़ है-इस विशेषणसे उल्लिखित किया हो । उजयिनीके विश्वाला आदि और भी उपनाम थे, इसलिये यह भी समर है कि यह मुप्रतिष्ठान भी उसका एक उपनाम हो । दचिण अर्थात् महाराष्ट्र की पुरानी राजधानी प्रतिमान नगरी थी-जो वर्तमानमें निजाम राज्यमें गोदावरी के काँठेपर पैठण नामक क्सवेसे प्रसिद्ध है- उसकी प्रतिस्पर्धामें भी शायद उयिनीको सुप्रतिष्ठान नाम प्रदान किया गया हो ।
४] प्रयन्धचिन्तामणि [प्रयम प्रकाश विक्रम के साथ लौट आया। फिर उसके शोकरूपी शंकुकी शंकाको दूर करनेके लिये, भमात्र ने खानका वृत्तान्त बताते हुए, तत्काल ही उसकी माताका कुशल समाचार कहा । विक्रम ने इसे मह मात्र की सहज लोलुपता समझकर उसके हाथसे रत्न छीन लिया, और फिर खानके पास पहुँचा और बोला- २. गरीबोंके दरिद्रतारूप घावको भरनेवाले इस रोहण गिरि को धिक्कार है जो [ इस प्रकार ] अर्थिजनों [ याचकों ] से 'हा दैव !' ऐसा कहलाकर फिर रत्न देता है। यह कह कर उसने सब लोगोंके सामने उस रनको वहीं फेंक दिया । फिर देशान्तर भ्रमण करता हुआ अवन्ती की सीमामें पहुँचा । वहां पर, नगारेकी मनोरम ध्वनि सुनकर और उसके कारणका वृत्तान्त जानकर उसका स्पर्श किया । फिर उस भट्ट मात्र के साथ वह राजमन्दिरमें आया । [ ज्योतिपीसे ] विना पूछे हुए उसी मुहूर्तमें दिनभरके लिये मंत्रियोंने उसे राज-पदपर अभिषिक्त किया । उसने अपनी दूरदर्शितासे समझ लिया कि इस राज्यपर कोई प्रबल राक्षस या देवता क्रुद्ध होकर प्रतिदिन एक एक राजाका संहार करता है और राजाके अभावमें देशका विनाश करता है । इसलिये भक्ति या शक्तिसे उसका अनुनय करना उचित है। यह सोच, नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य आदि बनवाकर, सायंकाल चंद्रशाला (राजमहलका ऊपरी हिस्सा) में सब कुछ सजा कर रखा । रातकी आरती हो जानेके बाद, अंगरक्षकोंसे भारशृंखलामें लटकते हुए पलँगपर अपने पड़-दुकूल आदिसे आच्छादित तकियाको रखवाकर, स्वयं प्रदीपच्छायामें-अर्थात् ऐसी जगहपर जहाँ प्रदीपका प्रकाश नहीं पड़ता था,-जाकर बैठ गया । हाथोंमें तलवार धारण किये हुए, और धैर्यमें जिसने तीनों लोकको जीत लिया पैसा वह चारों ओर [ तीक्ष्ण दृष्टिसे ] देखता रहा । एकाएक घोर अर्द्धरात्रिको खिड़कीके रास्ते पहले धुआँ उठा, फिर ज्वाला निकली और बादको साक्षात् प्रेतकी प्रतिमूर्तिके समान एक विकराल बेतालको उसने आते देखा । भूखसे उस बेतालका पेट फक हो रहा था, [ इसलिये पहले ] उसने खूब इच्छापूर्वक उन भोज्य द्रव्योंको खाया, फिर गंध द्रव्योंको शरीरमें लगाया और पान खाकर सन्तुष्ट होकर फिर वहीं पलँगपर वह बैठ गया और विक्रमादित्य से बोला- अरे मनुष्य ! मेरा नाम अनि बे ताल है, देवराज ( इन्द्र) के प्रतीहार रूपसे मैं प्रसिद्ध हूं। मैं प्रतिदिन एक एक राजाको मारता हूं। पर [ आज ] तुम्हारी इस भक्ति से संतुष्ट होकर मैंने तुम्हें अभयदानपूर्वक यह राज्य दे दिया है । पर इतना भक्ष्य-भोज्य मुझे सदैव देना । इस प्रकार दोनोंमें तै होनेके बाद, कुछ काल बीतनेपर, विक्र म राजा ने [उससे ] अपनी आयु पूछी । तब वह यह कहकर चला गया कि- मैं तो नहीं जानता पर स्वामी (इन्द्र ) से जानकर तुम्हें बताऊँगा।' फिर दूसरी रातको वह आया और वि क म से बोला कि-' इन्द्रने तुम्हारी आयु सौ सालकी बताई है।' राजाने अपने मित्रधर्मका अधिक आरोप करके इस प्रकार अनुरोध किया कि-'इन्द्रसे मेरी आयु सौ वर्षसे एक वर्ष आधिक या कम करा दो !' उसने यह अंगीकार किया और फिर दूसरे दिन आकर यह बात कही-' महेन्द्रके किये भी [ तुम्हारी आयु ] निन्यानवे या एक सौ एक वर्ष नहीं होगी।' इस निर्णयके जान लेनेपर, राजा दूसरे दिन उसके लिये भक्ष्य-भोग्य न बनवाकरके, लड़ाई के लिये सजित होकर रातमें तैयार रहा । वह वेताल भी यथाराति आकर उन भक्ष्य- भोज्योंको न पाकर क्रुद्ध हुआ और उसने राजा ऊपर आक्रमण किया । बड़ी देरतक उन दोनोंमें युद्ध होता १ प्राचीन कालमें यह प्रथा थी कि राज्यकी ओरसे किसी साहस या दुष्कर कार्यके करने करवानेकी घोषणा जब क्राई जाती थी, तब एक विशिष्ट राजपुरुष, कुछ अन्य यजकर्मचारियों-सैनिकों आदिको साथ लेकर, नगरके प्रधान प्रधान राजमार्गसि दोल या नगारा बजवाता हुआ घूमता फिरता और मुख्य मुख्य स्थानोंपर खड़ा होकर जो कार्य करना करवाना हो उसकी उद्घोषणा करता । जिस मनुष्यको वह कार्य करना अभीष्ट होता वह उस घोषणाके बाद उस दोल या नगारेको अपना हाथ लगाता, जिससे वे गजकर्मचारी यह समझ लेते कि इस मनुष्यको यह कार्य करना सम्मत है । फिर उस मनुष्यको वे सम्मानके -साथ प्रधान या पजाके पास ले जाते।
प्रकरण २] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध [५ रहा। बादको पुण्यबलके सहायसे राजाने उसे पृथ्वी तलपर पटक दिया, और उसकी छातीपर पैर रखकर कहा कि-' इष्ट देवताका स्मरण करो!' तब वह बोला कि- मैं तुम्हारे अद्भुत साहससे संतुष्ट हूँ। तुम जो करनेको कहो उस आदेशका पालन करनेवाला में अग्नि नामक बेताल तुम्हें सिद्ध हुआ।' ऐसा होनेपर उसका राज्य निष्कंटक हुआ । इसी तरह अपने पराक्रमसे दिग्मण्डलको आक्रान्त करनेवाले उस राजाने छानबे प्रतिद्वन्द्वी राजाओंके राज्यको अपने अधिकारमें किया। ३. जंगली हाथी, तुम्हारे शत्रुओंके [ उज्जड पड़े हुए ] घरोंकी स्फटिक निर्मित दीवालपर दूरसे अपनी परछाई देखकर, उसे प्रतिद्वंद्वी हाथी समझकर, क्रोधसे आघात करता है । [उस आघातके कारण ] फिर जब उसका दाँत टूट जाता है तो उसे ही हथिनी समझकर धीरे धीरे साहस' के साथ उसका स्पर्श करता है। इस प्रकार, का लि दा सा दि महाकवियों द्वारा की हुई स्तुति (प्रशंसा ) से अलंकृत होते हुए उसने 'चिरकाल तक विशाल साम्राज्यका उपभोग किया । अव यहाँपर प्रसंगसे महाकवि कालिदास की उत्पत्ति संक्षेपमें कहते हैं- २) अवन्ती नामक नगरीमें राजा विक्र मा दित्य की लड़की प्रियं गुमंजरी थी। वह अध्ययनके 'लिये वररुचि नामक पंडितको समर्पण की गई । बुद्धिमती होनेके कारण सभी शास्त्रोंको उसने उस पंडितसे कुछ ही दिनोंमें पढ़ लिया । यह पूर्ण यौवनावस्था प्राप्त कर चुकी थी, और नित्य अपने पिताकी सेवा करती थी। किसी समय, वसन्त कालमें दोपहरको-जब कि सूर्य सिरपर आगया था, वह खिड़कीके सामने एक सुखासन ( सोफा ) पर बैठी हुई थी, इसी समय उपाध्याय ( वर रुचि) रास्तेमें चलते हुए खिड़कीकी छायामें कुछ विश्राम लेने खडे रहे । कुमारीने उन्हें देखा और खूब पके हुए आमके फलोंको दिखाया । उसने समझा कि वे ( उपाध्याय ) उन फलोंके लोलुप हैं, और बोली-' आपको ये फल ठंडे रुचेंगे या गरम !' उसकी इस बातकी चातुरीको न समझते हुए उस ( उपाध्याय ) ने कहा कि- गरम ही चाहते हैं ' इस प्रकार कह कर, उस उपाध्यायने अपना वस्त्र फैलाया जिसमें उसने ऊपरसे वे फल नीचे फेंके । लेकिन फल पृथ्वीपर गिर पडे और उससे उनमें धूल लग गई । व र रुचि हाथ में लेकर मुँहसे झंक फूंक कर उस धूलको झाड़ने लगा । राजकन्याने उपहासके साथ कहा- क्या ये बहुत गरम हैं कि जिससे मुंहसे इंक कर ठंडा कर रहे हो ?' उसकी इस बातसे चिढ़कर उस ब्राह्मणने कहा-'ऐ अपनेको चतुर समझनेवाली अभिमानिनि ! तूं गुरुके साथ ऐसा मज़ाक कर रही है; जा तुझको पशुपाल पति मिलो'। इस प्रकार उनका शाप सुनकर उसने कहा- आप तो त्रैविध हैं, लेकिन मैं तो, आपसे अधिक विद्यावान् होने के कारण जो आदमी आपका भी गुरु होगा, उसासे विवाह करूंगी।' उसने इस प्रकार प्रतिज्ञा की । इसके बाद विक्रमादित्य जब कन्याके लिये उचित श्रेष्ठ वर पाने की चिन्तारूपी समुद्रमें डूब रहे थे, तो वह पंडित जिसे राजाने अभिलषित वर की खोज करनेका आप्रहपूर्वक आदेश कर रखा था, एक बार एक जंगल में घूमता हुआ पिपासासे व्याकुल हुआ । जब १ मूलमें यहापर 'साहसाङ्कः' ऐसा सविभक्तिक पाठ है इसलिये इसे हायीका विशेषण मान कर यह अर्थ किया गया है। प्रत्यंतरोंमें 'साहसाङ्क' ऐसा निर्विभक्तिक पाठ भी मिलता है जो अर्थदृष्टिसे संबोधनात्मक हो सकता है । उस अर्थमें यह 'हे !' ऐसा विक्रमका विशेषण हो सकता है । विक्रम का उपनाम सा ह साङ्क था, इसके यथेष्ट प्रमाण मिलते हैं। २ यह जो राजाकी स्तुतिका पद्य उद्धृत किया गया है वह महाकवि कालिदास का बनाया हुआ है, ऐसा मेरतुंगका मंतव्य मालूम देता है। साहसाङ्क ६] प्रबन्धविन्तामणि [ प्रथम प्रकाश चारों ओर कहीं जल नहीं मिला तो एक पशुपालको देखकर उससे जल मांगा । उसने जलके अभावमें दूध पानेको कहा और बोला कि-करचंडी' करो। उसके ऐसा कहने पर वररुचि वही चिन्तामें पड़ गया, क्यों कि उसने इसके पहले यह शब्द किसी भी कोष ग्रंथमें नहीं पढा सुना था । उस पशुपालने उसके मस्तक पर हाथ रखकर और भैसके नीचे विठाकर, दोनों हथेलियों को जोड़कर 'करचंडी' नामक मुद्रा बताकर, उसे पेट मर कर दूध पिलाया। उस ( उपाध्याय )ने अपने मस्तक पर हाथ रखनेके कारण और एक 'करचंडी' इस विशेष शब्दके बतानेके कारण, उसे गुरुके समान समझा और फिर उसको ही उस राजकुमारीका समुचित पति निश्चित किया । भैसोंसे हटाकर उसे अपने महलमें ले आया और ६ महिने तक उसके शरीरकी शुश्रूषा करते हुए " ओं नमः शिवाय " इस आशीर्वादको पढ़ाया । ६ महिने बाद जब पण्डितने समझ लिया कि ये अक्षर उसे कण्ठस्थ हो गये है तो एक दिन शुभ मुहूर्तमें उसको अच्छी तरह श्रृंगार कराके उसे राजसमामें ले गया । राजाको आशीर्वाद देते समय, बहुत बारका अभ्यस्त वह आशीर्वाद भी, सभाक्षोमके कारण "उ शरट" इस प्रकारके शब्दमें बोल गया। उसकी इस ऊटपटांग बातसे राजा विस्मित हुआ । वररुचि ने उसकी [ मूर्खता छिपाने और ] चतुरता बतानेके लिये राजाके सामने कहा- ४. उमाके साथ रुद्र जो, शङ्कर और शूलपाणि है रक्षा करें तुम्हारी हे राजन्, टंकारके वलसे जो गर्वित है ॥ इम प्रसिद्ध श्लोकद्वारा [ जिसके चारों चरणोंके प्रथमाक्षरोंसे ' उशरट' शब्द बनता है ] वर रुचि ने उसके पाण्डित्यकी गंभीरताका विस्तारपूर्वक विवेचन किया । उसकी वातसे प्रसन्न होकर, राजाने उस भैस चरानेवालेसे अपनी पुत्रीका विवाह कर दिया। पर पण्डितके सिखानेसे यह सदा मौन ही रहा करता। राजकन्याने उसकी चतुरता जाननेके लिये, कोई नई लिखी हुई पुस्तकके संशोधनका उससे अनुरोध किया। उसने उस पुस्तकको हथेलीपर रखकर, नहरनी लेकर, सारे अक्षरोंको विंदु और मागासे रहित कर दिया । उसे ऐसा करते देख राजपुत्रीने निर्णय किया कि यह तो मूर्ख है । तबसे सत्र ही 'जा मा तृ शु द्वि" की कहावत प्रचटित हुई। एक बार दीपाल परके चित्रमें भैसोंका झुण्ड देखकर, आनंदित होकर, वह अपनी प्रतिष्ठा भूल गया और उनके बुलानेकी विकृत बोली बोलने टगा । तब राजकुमारीने निश्चय किया कि यह निरा पशुपाल-भैंसोंका घरवाया है। फिर यह ( चरवाहा ) राजकन्याकी अवज्ञा देखकर विद्वत्ताके लिये कालिकाकी आराधना करने रगा। अपनी पुनीके वैधव्यसे शंकित होकर राजाने रातके समय गुम वेशमें दासीको भेजा । उसने यह कहकर कि-'मैं तुझे तुटमान हुई हूँ' ज्यों ही उठाने लगी त्यों ही विप्लवकी आशंकासे, स्वयं कालिका देवीने ही प्रत्यक्ष होकर उसे अनुगृहीत किया । इम वृत्तान्तको सुनकर राजकुमारी प्रमुदित हुई और आकर बोली कि- क्या कुछ विशेष याणी प्रान हुई है !' उसके ऐसा कहनेपर वह तमीसे का लिदास नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसने कुमार संभव प्रमृति ३ महाकाव्य और ६ प्रबंध बनाये । -इस प्रकार यह कालिदासको उत्पत्तिका प्रबंध है ॥ १॥ . . १ आमा 'की पहराया रिक्ष या गुजराती मागमें प्रचलित हो ऐसा शत नहीं हुआ, लेकिन मराटी माग 'जार गोर' नामक रात प्रचत्रिविरमकी और और कपोंमें भी इसका उस मिया है इससे शात होता है पुगने ममदमें मापात गुजरात आदि देणे में भी प्रचलि होगी। २ पुर्व पय प्रान होनेशी राम राम इमयि दुई कि यह पागल आमरणात उपराम करने की प्रतिज्ञा करके वासी भागपना करने पेटा पा । मेरनुगारिका यान्य गुत ही सशिम शैलीमें रिसा हुआ है, इसलिये इसमें बहुतसी बातें सपल पी मोनिकाय में ये बाते सुमेरे सापसी मिली है।
प्रकरण ३-७] विक्रमार्कराजाका प्रबन्ध ३) एक वार, उस नगरका निवासी दां ता नामक सेठ, हाथमें भेंट लेकर आया और सभामें बैठे हुए विक्र मा दित्य को प्रणाम करके कहने लगा- महाराज, मैंने शुभ मुहूर्तमें प्रधान बदइयोंसे एक धवलगृह ( महल ) बनवाया, और उसमें बड़े उत्सबके साथ प्रवेश किया । मै जब रातको उसमें पलँग- पर पड़ा हुआ, आधा-सोया, आधा-जागा वाली अवस्थामें था उस समय : गिरता हूँ' इस प्रकारकी मैने आकस्मिक वाणी सुनी । मैं मारे डरके ' मत गिरो' यह कहता हुआ उसी समय वहाँसे भाग निकला। उस मकानके बनवानेके संबंध ज्योतिषियों और कारीगरोंको समय समय पर जो धन दान किया गया है वह मेरे ऊपर वृथा दण्ड ही हुआ ! अब इस विषयमें महाराज जो उचित समझें करें!' राजाने उस सेठकी वात भली भाँति सुनकर, उस धवलगृहका मूल्य जो तीन लाख उसने बताया, वह उसे चुकाकर, उसको स्वायत्त कर लिया । सायंकाल होनेपर; सर्वावसर' यानि राजसभामें बैठकर, तत्संबंधी सब कार्योंसे निवृत्त होकर, उस घरमें सुखपूर्वक जा सोया । उसी ' गिरता हूँ' इस वाणीको सुनकर वह असम साहसी राजा बोला कि ' जल्दी गिरो!' और उसके ऐसा कहते ही पास ही गिरे हुए सुवर्ण पुरुषको उसने प्राप्त किया। -इस तरह यह सुवर्ण पुरुपकी सिद्धिका प्रबन्ध है ॥२॥ ४) एक दूसरे अवसरपर कोई अभागा पुरुष, अपने हाथसे बनाये हुए एक लोहेका दुबला पतला दरिद्र नामक पुतला लेकर द्वारपर आया । जब द्वारपाल उसे राजाके पास ले गया तो उसने कहा कि-' महाराज, आप जैसे स्वामीसे शासित इस अवन्ती पुरी में सभी चीजें जल्दी बिक जाती हैं और मिल जाती हैं, ऐसी प्रसिद्धि जानकर मैंने चौरासी चौहटोंपर विक्रयके लिये इस दरिद्र-पुतलेको घुमाया, लेकिन किसीने इसे नहीं खरीदा और उलटी मेरी भर्त्सना की गई। आपकी इस नगरीका यह कलंक यथार्थ रीतिसे आपको बताकर, क्या मैं जैसे आया था वैसे ही चला जाऊं ! यह आपसे पूछने आया हूँ।' उसकी इस घटनाको पुरीका एक महान् कलंक समझकर राजाने उसी समय उसे एक लाख दीनार देकर, लोहेके उस दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया और अपने खजानेमें रखवा दिया। ऐसा करनेपर उसी रातको, सुख पूर्वक सोये हुए राजाके निकट, पहले पहरमें हाथियोंकी अधिष्ठात्री देवता, दूसरेमें घोड़ोंकी अधिष्ठात्री देवता और तीसरेमें लक्ष्मीने आविर्भूत होकर कहा कि- * महाराजने जब दरिद्र-पुतलेको खरीद लिया है तो, फिर हमारा यहाँ रहना उचित नहीं है '- यह कह, अनुज्ञा लेकर ये चले जानेको पूछने आये, तो राजाने अपना साहस भंग न हो इसलिये उनको जानेकी अनुमति दे दी। चौथे पहरमें कोई दिव्य तेजःसम्पन्न उदार पुरुष प्रकट हुआ और बोला कि-'मैं सत्व (साहस) हूँ, जानेके लिये आपकी अनुज्ञा चाहता हूँ'। उसके ऐसा पूछनेपर राजा हाथमें तलवार लेकर जब आत्मघात करनेको उद्यत हुआ तो फिर उसने हाथ पकड़कर कहा कि- मैं तुष्टमान हुआ' और राजाको उस कृत्यसे रोका । सत्त्वके वहीं रहनेपर हाथी आदिकी तीनों अधिष्ठात्री देवतायें लौटकर राजासे बोली-'जाने के संकेतको नष्ट करके सत्वने हमें धोखा दिया है । इसलिये राजाको छोड़कर हम लोगोंका जाना अब उचित नहीं है। इस प्रकार वे भी बिना किसी यतके ही स्थिर होकर रह गई। [१] तभीतक धन है, तभीतक गुण है, और तभीतक समुज्ज्वल कीर्ति है, जबतक हे सत्त्व (साहस)! तुम चित्तरूपी नगरमें खेल रहे हो। . ॥ १ सर्वावसर उस जगहका नाम है जहा राजा अपने मुख्य सिंहासन पर बैठकर सब कोई प्रजाजन और राजकीय पुरुषोंकी मुलाकात लेता देता है और राज्यके सब कार्योंका विचार करता है। दिवान-ए-आम या दरबार-ए-आम यह उर्दु शन्द इसका प्रायः समानार्थक हो सकता है ।
८] प्रबन्धचिन्तामणि. [प्रयम प्रकाश [२] राज्य भी जाय, स्त्रियां भी जाय और इस लोकसे यश भी चला जाय; किन्तु हे सत्य ! हम तुम्हारे जानेकी अनुमति आजीवन नहीं दे सकते । -इस प्रकार यह विक्रमादित्यके सत्त्वका प्रबंध है ॥३॥ ५) एक दूसरे अवसरपर, कोई विदेशी सामुद्रिक शास्त्रज्ञ द्वारपालके द्वारा सभामें बैठे हुए विक्रमादि- त्य के पास ले जाया गया। प्रवेश करते ही राजाके लक्षणोंको देखकर वह सिर पीटने लगा। राजाने विपादका कारण पूछा, तो बोला-' महाराज, सभी अपलक्षणोंके निधान होनेपर मी तुम्हें छानवे देशोंकी साम्राज्य लक्ष्मीको भोगते हुए देखकर, सामुद्रिक शास्त्रके ऊपर मेरा विराग हो गया है। मैं तुम्हारे अन्दर ऐसी कोई काबरी (चितकबरी) आंत नहीं देख रहा हूं जिसके प्रभावसे तुम भी कोई राज्यकर्ता बनो । उसके इस वाक्यके सुनते ही विक्रमादित्य तलवार खींचकर जब अपने पेटमें मारने लगा तो उस (सामुद्रिका ) ने पूछा कि यह क्या ? ' इस पर विक्रम ने कहा-' पेट फाड़कर तुम्हें उसी प्रकारकी ( काबरी ) आंत दिखाता हूं। तब उसने कहा कि-'मैने पहले नहीं समझा था कि, तुम्हारा यह सत्त्वरूपी महालक्षण बत्तीस टक्षणोंसे भी बढ़कर है । इसपर राजाने उसे पारितोषिक देकर विदा किया । -इस प्रकार यह सत्त्वपरीक्षाका प्रबंध है ॥४॥ ६) इसके बाद एक अवसरपर, विक्रम ने सुना कि दूसरेके शरीरमें प्रवेश करनेवाली विद्यासे तिर- स्कृत होकर अन्य सारी कलायें निष्फल-सी हैं । यह सुनकर उस विद्याकी प्राप्तिके लिये श्रीपर्वत पर भै र या- नन्द योगीके पास जाकर उसने चिरकाल तक उस ( योगी ) की सेवा करनी शुरू की । योगीके पूर्व सेवक किसी ब्राह्मणने [ राजासे यह कहा कि-तुम ] मुझे छोड़कर ( अकेले ) गुरुसे पर-काय-प्रवेश विद्या न लेना। राजाने उसका अनुरोध मान लिया। जब गुरु विद्या देनेको उद्यत हुए तो उनसे कहा कि पहले इस ब्राह्मणको विद्या दीजिये, वादको मुझे'। 'राजन् ! यह ( ब्राह्मण ) विद्याके सर्वथा अयोग्य है.' ऐसा गुरुके कहनेपर भी बार वार विक्रम अनुरोध करता रहा । तब गुरुने यह उपदेश देकर कि-'पीछे तुम पछताओगे' उस ब्राह्मणको मी विद्या दी। बादमें लौटकर दोनों उज्जयिनी पहुंचे । वहां पट्टस्ताके मर जानेसे राजपुरुषोंको उदास देखकर और स्वयं परकाय प्रवेश विद्याका अनुभव करनेके निमित्त, राजाने उस हाथोके शरीरमें अपनी आत्माका प्रवेश कराया । [ इस प्रसंगका वर्णन करनेवाला यह एक पद्य है-1 ५. ब्राह्मणको अंगरक्षक बनाकर राजा ( परकाय-प्रवेश ) विद्याके द्वारा अपने हाथीके शरीरमें प्रविष्ट हुआ। [ बादमें ] ब्राह्मण राजाके शरीरमें पैठ गया । तब राजा क्रीड़ा-शुक (महलके पीजरेमेंका तोता) हुआ । वादमें (शुकरूपी) राजाने छिपकली के शरीरमें प्रवेश किया तो रानीने उसकी मृत्यु समझी । ( इस पर ) ब्राह्मणने ( जो राजाके शरीरमें प्रविष्ट हुआ बैठा था) शुरुको जिलाया और विक्रम ने फिर अपना शरीर पाया ॥ ५॥ इस तरह विक्रम को परकाय प्रवेश विद्या सिद्ध हुई। -इस प्रकार यह विद्यासिद्धिका प्रबंध है ।। ५ ॥ ७) फिर एक दूसरे अवसरपर, विक्रमा दित्य राजपाटिका' (बहिर्धमण) में जा रहा था तब मार्गमें सिद्धसेन सूरिको आते देखा । उस नगरका ( जैन ) संघ उनके पीछे पीछे आरहा था और बन्दी जन 'गजाटिका' यह प्राकृत 'रायडिया' और देश्य रहवाडी' शन्दा सस्कृत भाषातर है। पुराने समयमें राजा आदि राज्यनायक पुरुष प्रायः मध्यान्होतर तीसरे प्रहरके अतमें या चतुर्थ प्रहरमें, राजमहल से अनुचर आदिके खास परिवारके साथ निकल कर, प्रधान राजमार्गसे होते हुए नगर या गारके बाहर जो राजकीय उद्यानादि स्थान होते थे उनमें जाते थे और वहापर घटे-दो घटे टहर कर, सध्याकाल होते समय वारस निवासस्थान पर आते थे । राजाओंका यह इस प्रकार टहलने या हवाखानेके लिये जो महल बाहर जाना होता या उसको राज पाटि का कहते थे।
. - ' प्रकरण ८-११ ८-११] विक्रमार्कराजाका प्रवन्ध ६९ 'सर्वज्ञ पुत्र' कह कर उनकी स्तुति कर रहे थे। 'सर्वज्ञ पुत्र' इस विरुदसे कुपित होकर विक्रमादित्य ने उनकी सर्वज्ञताकी परीक्षाके लिये मन-ही-मन प्रणाम किया । सिद्धसेन ने भी पूर्वगत श्रुतज्ञानके द्वारा राजाका मनोगत भाव समझकर, दाहिना हाथ उठाकर धर्म लाभ का आशीर्वाद दिया । राजाने जब आशीर्वाद देनेका कारण पूछा, तो महर्षिने कहा कि- तुम्हारे मानस नमस्कारके लिये यह आशीर्वाद दिया गया है । इस पर उनके ज्ञानसे चकित होकर राजाने उनके पारितोषिक निमित्त एक करोड़ सुवर्ण वितरण किया । ८) एक बार, एक दूसरे अवसरपर, राजाने कोशाध्यक्षसे अपने दिलाए हुए सुवर्णका वृत्तान्त पूछा, तो वह बोला कि-धर्मकी बहीमें मैंने श्लोक बनाकर सुवर्णका वृत्तान्त लिखा है; जो इस प्रकार है ६. दूर-ही-से हाथ उठाकर 'धर्म लाभ हो' इस प्रकार कहनेवाले सिद्ध सेन सूरिको राजाने एक कोटि [सुवर्ण ] दिया । इसके बाद श्री सिद्ध से न सूरिको सभामें बुलाकर राजाने जब कहा कि-उस सुवर्णको ग्रहण कीजिये । तो उन्होंने कहा कि-खाये हुए को खिलाना वृथा है । उसी सुवर्णसे ऋणमस्ता पृथ्वीको ऋणमुक्त कीजिये। इस प्रकारका उपदेश मिलनेपर, सूरिके सन्तोषसे सन्तुष्ट होकर राजाने उस वातको स्वीकार किया । ९) उसी रातको राजा वीरचर्या निमित्त नगरमें घूम रहा था, उस समय एक तेलीको बारबार इस (श्लोकार्ध) को पढ़ते सुना- ७. 'हमारा संदेश नारद ! कृष्णको कहना। राजा सवेरा होनेतक रुका रहा पर उत्तरार्ध न सुन सका । उदास होकर राजमहलमें आकर सो गया । सवेरे सामयिक कृत्य करके राजाने उस तेलीको बुलाकर उत्तरार्ध पूछा । उसने कहा- जगत् दारिद्रयसे दुःखित है [ इस लिये ] बलिके बन्धनको छोडो ॥ ७ ॥' यह सुनकर सिद्ध से न सूरिके उपदेशको फिरसे कहा हुआ समझकर पृथ्वीको ऋणमुक्त करना शुरू किया। [उ जयिनी में राजा विक्रमादित्य भट्ट मात्र के साथ गुप्त वेश धारण करके महाकालके मंदिरमें नाटक देखने गया । कुछ समयके बाद नागरिकके लड़के द्वारा कराये जानेवाले नाटकमें सूत्रधारके मुखसे उसका वर्णन सुनकर राजाने भी उस नागरिकका धन ले लेने के लिये मन-ही-मन लोभ किया । बादको कुछ समय बीतनेपर वह प्यासा होकर मुख्य वेश्याके घर परसे भट्टके पाससे पानी मंगवाया। वहां बुढ़िया वेश्या प्रधान पुरुषोंसे कह कर उसके लिये ईखका रस लेनेके लिये उपवनमें गई । काटनेवालोंसे ईख कटयाकर उसका रस निकलवाया पर उससे घड़िया बिलकुल नहीं भरी तो मनमें दुखी होकर ऊपरका शकोरा भर कर ही बहुत देरसे आई । राजाके रस पी लेनेपर भट्ट मात्र ने उसकी देरी और उदासीका कारण पूछा । वह बोली-और और दिन तो एक ही ईखसे घड़ा और शकोरा दोनों भर जाते थे लेकिन आज तो घड़ा भी नहीं भरा। इसका कारण समझमें नहीं आता । भट्ट मात्र ने फिर पूछा कि-तुम लोग तो बडी पकी बुद्धिवाली होती हो इसलिये इसका कारण जानकर और विचारकरके बताओ । फिर वेश्या बोली कि-पृथ्वीके मालिक ( राजा ) का मन प्रजाके प्रति विरुद्ध होगया है, इसलिये पृथ्वीका रस भी क्षीण होगया है । यह कारण उसने निवेदन किया तो राजा भी उसके बुद्धिकौशलसे चकित हुआ। वह फिर अपने घरकी शय्यापर सोया हुआ इस प्रकार विचार करने लगा कि- प्रजा-पीड़न किये बिना, केवल विरुद्ध चिन्ता मात्रसे ही पृथ्वीके रसकी इस प्रकार हानि हुई। तो १ वीरच र्या-उस जमानेके राजा अपनी प्रजाके सुख दुःखोंकी बातें स्वयं जानने-सुननेके लिये कमी कभी गतके समय, एकाकी गुप्तवेशमें महलोंसे बाहर निकल जाते ये और दो चार घंटे इधर उधर घूम फिर कर नगर चर्चाका प्रत्यक्ष अनुभव करते थे। इसका नाम वीरचर्या है ।
१०] प्रयन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश में अब प्रजाको पीड़ा नहीं पहुँचाऊंगा । ऐसा निश्चय करके राजा दूसरी रातको प्यासका बहाना करके परीक्षाके लिये फिर उसके घर गया। वह शीघ्र ही ईखका रस ले आई और राजाको दिया जिसे पीकर यह [ अपने महलमें आया और ] शय्यापर सो गया । भट्ट मात्र के पूंछनेपर वेश्याने भी [ उसी तरह ] निवेदन किया (बताया ) कि-[ आज ] राजाका मन प्रजापर प्रसन्न है । राजाने भी रातवाली अपनी बात बताकर, परके चित्तको इस प्रकार पहचान लेनेके कारण, सन्तुष्ट होकर उस वृद्ध वेश्याको [ पारितोषिकके ढंगपर ] हार दिया ।- इस प्रकार यह राजाके मनके अनुसार होनेवाले पृथ्वीरसका प्रबंध है।] १०) इसके बाद एक बार श्री सिद्ध सेन सूरिने, यह पूछे जानेपर कि-'मुझ (विक्रम ) के समान क्या कोई [ और भी ] जैन राजा होगा?' कहा- ८. एक हजार एक सौ निन्यानवे वर्ष पूर्ण होनेपर तुझ विक्रमादित्य के समान एक कुमार [पाल] नामक राजा होगा। ११) इसके बाद, एक दूसरे अवसरपर, जब राजा जगत्को ऋणमुक कर रहा था, अपने औदार्य गुणका अहंकार करते हुए उसने सोचा कि-'प्रातःकाल एक कीति-स्तम्भ वनवाऊँगा । [ उसी दिन ] रातको चीरचर्या निमिच चतुष्पयमें घूम रहा था कि दो सांद लड़ते हुए सामने आये । उनसे डर कर राजा किसी दारियग्रस्त ब्राह्मणकी पुरानी गोशालाके एक खंभेपर चढ़ गया। वे दोनों सांद भी सींगसे वारंवार उसी खंभेपर प्रहार करने लगे । इसी बीच उस ब्राह्मणने अकस्मात् जग कर, आकाशमें शुक्र और बृहस्पतिसे अवरुद्ध चन्द्र- मण्डलको देखकर, गृहिणीको उठाया और चन्द्रमण्डलसे सूचित होनेवाले राजाका प्राणभय जान कर कहा कि- उसकी शान्तिके लिये हवनीय द्रव्यसे हवन करूंगा । राजा कान लगा कर यह बात सुन रहा था । गृहिणीने उससे कहा- इस राजाने सारी पृथ्वीको तो ऋणमुक्त किया है, लेकिन मेरी सात कन्याओंके वियाहार्थ तो कुछ द्रव्य नहीं दिया । तो फिर शान्तिकर्म करके उसे व्यसन (संकट ) से मुक्त करनेमें क्या लाभ है ? ' इस प्रकार उसकी बात सुन कर वह सर्वथा गर्वसे रहित हुआ और उस संकटसे छूटकर और उस कीर्तिस्तम्मकी बातको भूलकर चिरकाल तक राज्य करता रहा । -इस प्रकार यह विक्रमादित्य की निर्गताका प्रबन्ध है ॥६॥ [ इसके बाद एक दूसरी रातको एक धोबिनसे राजाने पूछा कि-'वत्रोंमें वाळू क्यों लगी रहती है और घे गन्दे क्यों हैं !' उसने कहा- [३] हे महाराज, यह जो दक्षिण समुद्ररूपी दक्षिण नायककी वधू, रेवाकी प्रतिस्पर्धिनी, गोदावरी नामक प्रसिद्ध नदी, जिसका तट गोविन्दके प्रिय गोकुलोंसे आकुल है, उसका जल, वर्षाकाल बीत जानेपर भी आपकी सेनाके हाथियों के दाँतरूपी मूसलसे प्रक्षोभित धूलिके कारण, स्वच्छ नहीं हुआ। उस राजाओंके राजाने धोबिनकी वह बात सुन कर भूक्षेप मात्रमें अपने शरीरके आभूषणोंके साथ एक लाख [ का दान ] दे दिया। [५] राजा विक्रमादित्य ने चोर, मागध (भाट), ब्राह्मण और धोबिनसे कविता सुन कर [ रातके ] चारों पहर दान दिया। इस प्रकार यहापर विक्रमके संबंधके [ और भी ] विविध प्रबंध, परंपरा द्वारा जानलेने चाहिए । १ इस पक्तिके लेखसे मेरुतु गरि यह सूचित करना चाहते हैं कि विक्रम के विषयके जैसे ये प्रबन्ध हमने यहा लिखे हैं, वैसे और भी अनेक प्रबन्ध है, जिनका शान अन्यान्य ग्रयों प्रबन्धों द्वारा प्राप्त करना चाहिए। हमने तो यहा पर कुछ दिग्दर्शन करनेके लिये ही ये योडेसे प्रबन्ध लिख दिये हैं। , [ " प्रकरण १२ ] विक्रमार्फराजाका प्रवन्ध [११ १२) एक वार, आयुके अन्तमें विक्रमादित्य का शरीर कुछ कमजोर हुआ तो एक वैद्यने उपदेश दिया कि, कौवेका मांस खानेसे रोगकी शान्ति होगी । जब राजा उसे पकवाने लगा तो इससे वैद्यने राजाका प्रकृति-व्यत्यय देखकर कहा-इस समय धर्मोषध ही बलवान है । क्यों कि प्रकृतिको विकृति होनेसे उत्पात होता है। जीवनके लोभसे लोकोत्तर सत्त्व-प्रकृतिका त्याग करके काकमांस खाकर आप किसी तरह भी न जियेंगे । वैद्यके ऐसा कहनेपर उसको 'परमार्थवान्धव' कह कर राजाने उसकी प्रशंसा की और पारितोपिक देनेके लिये कहा। फिर और हाथी, घोड़ा, कोश इत्यादि सर्वस्त्र याचकोंको देकर, राजपुरुषों और नागरिकोंसे विदा लेकर, धवल गृहके किसी निर्जन प्रान्तमें तत्कालोचित दान और देव-पूजन करके कुशासनपर बैठ गया और सोच ही रहा था कि ब्रह्मद्वारसे प्राणों को निकाल दूं; अकस्मात् आविर्भूत अप्सराओं के समूहको देखा । राजाने हाथ जोड़कर प्रणाम करके उनसे पूछा कि- तुम लोग कौन है ? ' इस पर अप्सराओंने कहा कि-विस्तारके साथ कुछ कहनेका यह अवसर नहीं है; हम तो विदा लेनेके लिये ही यहां आई हैं। इस प्रकार कहकर जाती हुई अप्सराओंसे राजाने फिर कहा- नवीन ब्रह्माने आप लोगोंको एक अद्वितीय रूप दे कर बनाया है। फिर भी जानना चाहता हूं कि, यह अद्वितीय रूप नासिकाहीन क्यों है ? ' इस पर वे ताली बजाकर हँसती हुई वोलीं-- अपने ही अपराधको हमारे ऊपर डाल रहे हो ?' ऐसा कह कर वे चुप हो गई। तब राजाने कहा-आप लोग तो स्वर्ग लोकमें रहती हैं। आपके ऊपर मेरे अपराधकी सम्भावना कैसे हो सकती है ! इस तरह राजाका वचन समाप्त होनेपर उनमें की मुख्य सुमुखीने कहा-'हे राजन्, पूर्वतन पुण्यके प्रभावसे नव निषियोंने तुम्हारे मइलमें अवतार ग्रहण किया था, हम लोग उन्हींकी अधिष्ठात्री देवतायें हैं। आपने जन्मसे महादान देते हुए भी एक ही निधिसे इतना ही मात्र दिया है कि जिससे आप नासान देख नहीं सकते।' इस प्रकारका उनका कयन सुनकर हापसे सिर ठोकते हुए राजाने कहा कि- यदि मैं जानता कि नव निधियां अवतीर्ण हुई हैं तो उन्हें नौ ही पुरुपोंको दे देता । दैवने अज्ञान भावसे मुझे वञ्चित किया।' उसके ऐसा कहते समय उन्होंने यह कह कर आश्वासित किया, कि-कलियुगमें तो आप ही एकमात्र उदार हैं। और वह परलोक प्राप्त हुआ। उसी दिनसे उस विक्रमादित्य का संवत्सर प्रवृत्त हुआ जो आज भी जगत्में वर्तमान है। ॥ श्रीविक्रमादित्यके दान विषयक ये विविध प्रबंध पूरे हुए ।
२२] प्रयन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश २. सातवाहन राजाका प्रवन्ध । । १३) दान और विद्वत्ताके विषयमें श्री सा त वाहन की कथा परम्परागत यथाश्रुतिके अनुसार जानना चाहिये । ' उसके पूर्व जन्मकी कथा इस प्रकार है-प्रतिष्टा न पुर में सातवाहन राजा जब राजपाटिका (वहिर्भमण) करने जा रहा था तो नगरके निकट नदीमें एक मछलीको हँसते देखा, जिसे लहरोंने पानीके किनारे फेंक दिया था | इस अस्वाभाविक वातको देखकर राजाको भय हुआ। उसने सभी पंडितोंसे इस सन्देहको पूछते हुए एक ज्ञान सागर नामक जैन मुनिसे भी पूछा । अपने अतिशय ज्ञानके बलसे उसने राजाके पूर्वजन्मको जानकर इस प्रकार उपदेश दिया कि-'पिछले जन्ममें तुम इसी नगरमें रहते थे। तुम्हारे कुल-वंशमें कोई नहीं था। और तुम्हारी जीवनवृत्ति एकमात्र ठकहीका बोझ ढोना था । तुम नित्य ही भोजनके अवसर पर इसी नदीके निकटवर्ती शिलातलपर बैठकर पानीसे सत्तू सानकर खाया करते थे। किसी दिन, 'एक महीनेके उपवासको पारणाके लिये नगरमें जाते हुए एक जैन मुनिको बुलाकर वह सत्तूका पिंड उनको दानकर दिया । उस पात्रदानके माहात्म्यसे तुम सा त वाहन नामक राजा हुए और वह मुनि देवता हुआ। चही देवता अपने अधिष्ठान वश होकर, उस काष्ठभारवाही जीवको तुझे इस राजाके रूपमें पहचानकर, प्रमादके कारण हँस पड़ा।' इस कथागत वस्तुका संग्रह सूचक यह [ पुरातन ] काव्य है- ९. मछलीके मुंहके हँसनेपर जो सात वाहन राजा भयभीत होगया था उससे मुनिने कहा कि जिसने सत्तूसे मुनिको पूर्व जन्ममें जो पारणा कराया था वही आप हैं और दैवात् मछलीने आपको पहचान लिया इसलिये वह हँस रही। वह सात वाहन उस पूर्व जन्मके वृत्तान्तको जातिस्मृतिसे प्रत्यक्ष करके उस दिनसे दानधर्मकी आराधना करता हुआ सब महाकवियों और विद्वानोंका संग्रह करता रहा। उसने चार करोड़ सुवर्णसे चार गाथाओंको खरीदा और सात सौ गाथाओंबाला 'सातवाहन' नामक संग्रह गाथा कोश शास्त्र निर्माण कराया। इस प्रकार वह नाना सद्गुणोंका निधि बनकर चिरकाल तक राज्य करता रहा ये चारों गाथायें ये हैं। जैसे- [प्रबन्धचिन्तामणिकी मूल पाठकी जो आवृत्ति हमने तैयार की है उसमें यहा पर (देखो पृष्ठ ११) १. प्राकृत गाथायें दी हुई हैं। इन गाथाओंके प्रम आदिके विषयमें पुरानी प्रतियोंमें बहुत कुछ गडबह मालूम देती है । कोई प्रतिम तो ये गाथायें सर्वथा नहीं दी गई हैं और — गाथाचतुष्टयमेतद्' (अर्थात्-ये चार गायायें इस प्रकार हैं ) इस वाक्यके बदले 'तद्गाथाचतुष्टय बहुश्रुतेभ्यो शेय' (अर्थात्-ये चार गायायें बहुश्रुत विद्वानों द्वारा जाननी चाहिए ) ऐसा वाक्य है; और कुछ प्रतियोंमें पहली ५ गाथायें लिखी हुई मिलती हैं, कुछमें दूसरी ५ गाथायें, कुछमें दसों गायायें मिलती हैं। हमने मूलमें, सग्रहकी दृष्टिसे इन दो गाथाओंका पाठ दे दिया हैं। इनमें पहला गाया-पचक है वह श्रृंगार विषयक वस्तुका वर्णनवाला है; दूसरा गाथा-पचक अन्योक्तिद्वारा सत्पुरुषोंके परोपकार मावका वर्णन करता है । इन गायाओंका अर्थ इस प्रकार है-] १०'हार, 'खट्वोद्गालि' और 'ताल' इन ४ वस्तुओं का वर्णन करनेवाली ४ गाथायें सालाहन राजाने दसकोडि [ सुवर्ण ] दे कर ग्रहण की ॥१॥ १ विक्रमकी तरह सात वाहन राजाकी भी बहुतसी कथायें परंपग्रसे चली आती है। विक्रम चरित के समान सात वाहन चरित भी बना हुआ है । संस्कृतके कयासरित्सागर नामक प्रसिद्ध प्रथमें सात वाहन की बहुतसी कथायें गूगी हुई हैं । वे सत्र कयायें मेरुतुंगसूरिके समयमें बहुत प्रचालित थीं और लोक-प्रसिद्ध यी इसलिये उन्होंने उन कयाओंको इस ग्रंयमें संकलित नहीं किया। विक्रम के बाद सात वाहन प्रसिद्ध ऐतिहासिक दानशील राजा हो गया और उसने भी विद्वानोंको खूब धन दान किया, इसलिये सिर्फ उसका नाम निर्देश करनेके निमित्त ही यह इतना-सा वृत्तात उसके विषयमें मेस्तुगरिने लिख दिया है। इसकी विशेष चर्चा अगले ऐतिहासिक विवेचनवाले भागमें की जायगी। वेणीदंड, .
. प्रकरण १३ ] सातवाहन राजका प्रबन्ध [१३ [हारका वर्णन करनेवाली गायाका अर्थ, इस प्रकार है-] : ११. खूब पुष्ट और ऊंचे ऊठे हुए स्तनोंवाली स्त्रीके वक्षस्थलपर रहा हुआ [ मोतीयोंका ] हार स्थिर होकर रहनेकी ठीक जगह न मिलनेसे छातीपर उद्विग्न अथवा उन्मुख होकर इधर उधर फिरता रहता है-जैसे यमुना नदीके प्रवाहमें पानी के फेनके बुद्बुदे इधर उधर फिरते रहते हैं। ['वेणीदण्ड का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १२. हे सुन्दरि, तेरा यह कृष्णकांति वेणीदण्ड नितम्ब-बिम्बपर जो शोभ रहा है वह मानों ऐसा लगता है कि सुरतस्थानरूप महानिधिकी रक्षा करनेवाला कोई मुजंग है। ['खट्वोद्गालि के वर्णनवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १३. सुरत-संभोगके समय जो संतोषदायक सुंदर सुखानुभव हुआ, उसका विरह होनेसे, हे प्रिय सखि ! यह खाट चूं चूं ऐसा शब्द कर रही है । ['ताल' का वर्णन करनेवाली गाथाका अर्थ इस प्रकार है-] १४. हे शुक ! तूं इसे चांचके लगाने-ही-से गिर जानेवाला पका हुआ आम्रफल मत समझ । यह तो जरठ हो जानेसे वेस्वादवाला और उभडा हुआ तालफल है। [दूसरा गाथा-पंचक है उसमें 'कदली वृक्ष', 'विध्य गिरी', 'स्नेहाधार' और 'चन्दन वृक्ष' इन ४ वस्तुओंका अन्योक्तिमय वर्णन है। इसकी आखिरी १.वीं गाथामें कहा गया है कि सालीवाहन राजाने ये गायाय ९ कोडि (प्रत्यंतरमें ४ कोडि) देकर ग्रहण की । इनका अर्थ क्रमशः इस प्रकार है-] १५. जो पुरुष, केलके झाडके समान, दूसरोंको फल देते हुए अपना विनाशका भी विचार नहीं करते, उनके सामने मरना भी वांछनीय है। १६. जिस तरह विन्ध्याचल पर्वत सदा सरस (हरे भरे ) वृक्षोंको धारण करता है वैसे ही शुष्क- (निकम्मे ) वृक्षोंको भी धारण करता है । उसी तरह बड़े पुरुष अपने उत्संगवती-समीपवर्ती निर्मू- णोंका भी त्याग नहीं करते । १७. ये मुज्झार' जिन्होंने तृपित होकर प्रथम ही प्रथम जो स्नेहाधार( जलधारा )का जैसे तैसे करके पान किया है वे फिर आजन्म अन्य पानकी इच्छा नहीं करते। १८. शुष्क हो जानेपर भी जिस चन्दनके वृक्षका, सब जनोंको आनन्द देनेवाला ऐसा सुरभि गन्ध है वह जब सरस भाववाला (हरा फूला ) होगा तब तो फिर कैसा ही होगा। . , १ यह 'मुमार' क्या यस्तु है इसका अर्थ हम रूट नहीं हुआ। यह शब्द भी पद है या नहीं इसने हमें शंख है। फोर बगेर प्रयों में यह सन्द में नहीं मिला।
१४]
प्रबन्धचिन्तामणि
[प्रथम प्रकाश
३. शीलवतके विषयमें भूयराजका प्रबंध ।
.
१४) यह प्रबंध इस प्रकार है-कान्यकुब्ज देशमें, जो छत्तीस लाख गाँवोंका प्रगणा है, 'कल्याण
कटक' नामक राजधानीमें भूयराज नामक राजा राज्य कर रहा था। किसी दिन प्रभात कालमें जब कि
वह राजपाटिका करनेके लिये जा रहा था, उस समय खिड़की पर बैठी हुई किसी मृग-नयनीको देखता हुआ
उसका अपहरण करनेके लिये अपने पानीयके अधिकारी पुरुपको आदेश किया । उसने उसे राज-भवनमें लाकर
किसी संकेत स्थलपर रखकर राजाको निवेदन किया । वहां आकर राजाने उसका हाथ पकडकर खींचना चाहा
तो इसपर वह राजासे बोली- स्वामिन् , आप तो सर्व देवताके अवतार हैं; अफसोस कि आपका इस नीच नारामें
क्यों अमिलाप है ?' उसके इस वाक्यसे राजाकी कामाग्नि कुछ शान्त हुई, और वह बोला कि-'तुम कौन हो?'
उसके यह कहनेपर कि 'मैं आपकी दासी हूं'-राजाने कहा कि यह बात क्या ठीक कह रही हो !' तो उसने
बताया कि 'आपका दास जो पानीयका अधिकारी है, मैं उसकी स्त्री, और आपकी दासानुदासी हूं!' उसकी
वातसे राजा चकित हुआ और उसकी कामपीडा सर्वथा विलीन हो गयी । उसको अपनी पुत्री मानकर उसे
विदा किया । उस (स्त्री) के शरीरमें हमारे हाथ लगे हैं, यह सोचकर उनके निग्रह (नष्ट करने) की इच्छासे
रातको यह भ्रान्ति जन्माकर कि खिड़कीके रास्ते कोई प्रवेश कर रहा है, अपने ही पहरेदारोंसे अपने दोनों ही
हाथ कटवा डाले । सबेरे पहरेदारोंको मंत्रीलोग दण्ड देने लगे तो उन्हें रोककर मा ल व मण्डल में महाकाल
देवके प्रासाद ( मन्दिर ) में जाकर उनकी आराधना करता रहा । देवताके आदेशसे जब दोनों मुजायें लग
गई तो अपने अन्तःपुरके साथ सारा माल व देश उसी देवको समर्पण कर दिया और परमार [जातिके]
राजपूतोंको उसकी रक्षाके अधिकारी नियुक्त करके स्वयं तापसी दीक्षा ग्रहण की।
-इस प्रकार शीलवत विषयक यह भूयराजका प्रबन्ध है ॥ ९ ॥
प्रकरण १४-२०] वनराज-आदिका प्रवन्ध [१५ ४. वनराजादि प्रवन्ध । . . १५) उसी कान्य कुन देशके [ अधिकारमें ] गुर्ज र धरित्री (गुजरात) मी एक प्रांतरूप है । उस गुजरात के व दीयार नामक देशके पश्चाश र ग्राममें चा पोत्कट वंशमें जन्म लेनेवाले एक बालकको उसकी माता झोलीमें रखकर और उसे ' वण' नामक वृक्षमें लटकाकर लकड़ी चुन रही थी। कार्यवश वहां आये हुये श्री शील गुण सूरि नामक जैनाचार्यने यह देखकर कि, अपराहमें (दोपहरके बाद) भी उस वृक्षकी छाया नहीं झुक ही है, सोचा कि इस झोलीवाले वालकके पुण्यका ही यह प्रभाव है; और इस आशासे कि [भविष्यमें] यह जैन धर्मका प्रभावक पुरुप होगा, उसकी माताकी वृत्तिका उचित प्रबन्ध करवाकर उस बालकको उससे अपने अधीन ले लिया । वीरमती ग णि नी नामक एक आर्या बालकका पालन करने लगी। गुरुने उसका नाम वन राज रखा। जब वह आठ वर्षका हुआ तो गुरुने देवपूजाके द्रव्योंको नष्ट करनेवाले चूहोंसे उस द्रव्यकी रक्षा करनेके काममें उसे नियुक्त किया। वह तो उन्हें वाणोंसे मारने लगा। गुरुके निषेध करने पर उसने कहा कि-'ये चूहे तो चौथे उपाय यानि दण्डसे ही साध्य है।' उसके जातक (जन्मकुण्डली ) में राजयोग देखकर और यह निर्णय करके कि यह महा नृपति होनेवाला है, गुरुने उसे फिर उसकी माताको सौंप दिया। वह माताके साथ किसी पल्ली (गाँव) में रहने लगा। वहां उसका मामा रहता था जो डकैती करता था, उसका वह आदरपात्र बन गया और उसके साथ गाँवों और नगरोंमें, अपने पौरुपका आतंक बतलाता हुआ, चारों और लूट-पाट करने लगा। १६) एकवार का कर नामके गाँवमें किसी व्यवहारीकै घरमें सेंध मारा और धन चुराते समय उसका हाथ दहीके भाण्डमें पड़ गया। तब यह सोचकर कि मैंने इस घरमें खाया है, सब कुछ वहीं छोड़कर निकल गया । दूसरे दिन उस व्यवहारीकी बहन श्री देवी ने, रातको गुप्तरूपसे, उसे भाईके समान स्नेह बतला- कर अपने यहाँ बुलाया और पूछा- मेरे घरमें प्रवेश करके तुमने सत्र सार ग्रहण करके भी इस तरह क्यों छोड़ दिया !' उसने कहा- २०. कोप करनेका निमित्त मिलने पर भी उस मनुप्यके प्रति कैसे पापविचार किया जाय जिसके घरमें उत्पलदल (कमलपत्र ) के समान सुकुमार हाथको गोला बनाया हो । उस स्त्रीने भी उसकी बात सुनकर और उसके चरित्रसे चमत्कृत होकर भोजन और वन आदिसे उसका उपकार किया। वन राज ने उसके बदलेमें प्रतिज्ञा की कि मेरे पट्टाभिषेकके समय तुम्ही वहन होकर टीका देना। १७) इसके बार, एक दूसरे अवसरपर जब यह डकैती करने जा रहा था उस समय [ उसके साथी ) चोरोंने किसी एक जंगलमें जाम्बा नामक बनियेको जा घेरा । ये चोर जो तीन थे उनको देखकर बनियेने अपने पासके पांच वाणोंमेंसे दोको तोड़ डाले। चोरोंके पूछनेपर बोला कि तुम तो तीन ही जन हो, इसलिये उससे अधिक दो वाण व्यर्थ है । ऐसा कहकर उसने उनके बताए हुए एक चटते टस्पको अपने वाणसे वीध दिसापा । उसके इस लक्ष्यवेधसे सन्तुष्ट होकर, ये उसे अपने साथ ले गये। उसकी ऐसी युद्ध-रिघासे चकित होकर श्री वनराज ने यह आदेश देकर विदा किया कि मेरे पाभिषेकके समय तुम महामन्त्री होगे। -हाय गीला बनाने वापर भोजन करने से है।
प्रवन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश १८) दादमें कान्य कुन देशसे एक पञ्चकुल (कर वसूल करनेवाला) गुजरात देश का कर उगाहने आया । यह गुजरात देश उस कान्यकुब्ज देशके राजाने अपनी 'मह.ण का' नामक कन्याको दहेजमें दे दिया था। इस पञ्चकुटने उस वन राज नामक पुरुषको अपना सेल्लभृत् ( शखाधिकारी) बनाया है। छ महीने तक देशसे कर वसूल कर २४ लाख पारूयक द्रम (चाँदीके सिक्के ! ) और ४ हजार अच्छी नस्लके तेजवान् घोड़े लेकर जब वह पञ्चकुल अपने देशको चला तो वन राज ने सौराष्ट्र नामक घाटपर उसे मार डाला और फिर उस राजाके भयसे साल भर तक किसी वनमें जाकर छिपा रहा। १९) इसके बाद, अपने राज्याभिषेकके लिये राजधानीका नगर बसानेकी इच्छासे एक अच्छी भूमि खोजने लगा। पीपल ला सरोवरके किनारे, भणहिल नामका भारू या इ साख का लड़का जो सुखपूर्वक बेटा था, उसने पूछा कि-'तुम यहांपर क्या देख रहे हो!' उसके प्रधानों के यह कहनेपर कि नगर वसानेके योग्य अच्छी भूमि देखी जा रही है। यह वोला कि- यदि उस नगरको मेरे नामपर बसाओ तो मैं वैसी भूमि बताऊँ ।' यह कहकर वह जालि वृक्षके पास गया और वहां जितनी भूमिमें खरगोशके द्वारा कुत्ता प्रासित होता रहता था उतनी भूमिको उसने बताया । उसी भूमिमें वनराजने अण हिलपुर इस नामसे नया नगर यसापा। [यहाँपर, एक नामक प्रतिमें अणहिल्लपुरकी प्रशंसा बतलानेवाले निम्नलिखित पथ लिखे हुए मिलते हैं- [६] जो ( नगर ) हारका अनुकरण करनेवाले प्राकार (खाई ) से प्रकाशित हो रहा है, यह ऐसा लग रहा है मानों सत्ययुग वृत्ताकार होकर कालिसे उसकी रक्षा कर रहा है। [७] जिस नगरमें रातके आरंभमें चन्द्रशाला ( ऊपरी तल ) में खेलती हुई स्त्रियोंके मुखको शोमासे आकाश ऐसा जान पड़ता है कि उसमें सैकड़ों चन्द्रमा उदय हुए हैं। [८-९] जिस नगरी विजयी गुणके सामने लंका को शंका हो गई, चम्पा कांपने लगी, विदिशा कृश हो गई, काशी की सम्पत्ति नष्ट हो गई, मिथिला का आदर शिथिल हो गया, त्रिपुरी की शोमा पिपरीत हो गई, मथुरा की आकृति मन्यर (सुस्त, फीकी) पड़ गई और धारा मी निराधार हो गई। [१०] जिस नगरफे खीजन और कौरवेश्वरके सैन्यमें हम कोई अन्तर नहीं देखते क्यों कि दोनों ही 'गागेय-कर्ण' (त्री-पक्षमें सोना है कानमें जिनके; और सेना-पक्षमें भीष्म और कर्ण है जिनमें) हैं। [११] निसके आगे प्रौद शोमापाली अलकापुरीको पुलक नहीं होता (आनंदित नहीं होती), लं का अति शंकावुला हो उटती है, उन यिनी की मी कभी जीत नहीं होती, चम्पा अति फारती रहती है, कान्ति पुरी कान्तिविभूषिता नहीं होती, अयोध्या अतियोप्या हो जाती है, ऐसा यह अद्यत पत्तन (अहिलपुर) नगर है जिसमें लक्ष्मी सदा नाच करती रहती है। इम नगरकी जय हो। २०) श्रीशिमामादिस्य के संगत् ८०२ आठ सौ दोम-प्रत्यंतरमें, संवत् ८०२ के शाप सुदी दूज, सोमगारपो-उस जाउि वृक्षके नीचे यहा माग राजप्रासाद बनाकर राज्याभिषेक टपके समय श्री यनराज ने का कर मामकी रहनेवाली उस प्रतिज्ञात बदन श्रीदे यी को बुलाकर उसके हापसे तिलक करयाया। उस समय उसकी आयु पयाम यकी थी। यह जांया नामा यणिक महामंत्री बनाया गया। पघासर प्रामसे श्रीशी गुनारको मडिके साथ ले जाकर घर गृहमें मरने मिहासनगर ठाया और सतहोंमें श्रेष्ठ दोनेक पारण THE TR उन्दै समग किया । उन निःपृ गरिने उसका पार पार निषेध किया। किन्तु उसने . । . । प्रकरण २१-२३] वनराज-श्रादिका प्रवन्ध उनके प्रत्युपकारकी बुद्धिसे उन्हींकी आज्ञासे श्री पार्श्वनाथकी प्रतिमासे अलंकृत पश्चासर नामक चैत्य वनवाया और उसमें देवकी आराधना करती हुई अपनी निजकी मूर्ति भी स्थापित की | धवल गृहमें कण्टेश्वरी देवीका भी मन्दिर बनवाया। २१. वन राज के समयसे ही गूर्जरोंका यह राज्य जैन मंत्रों द्वारा स्थापित हुआ है इसलिये इसका द्वेषी कभी भी आनंद प्राप्त नहीं कर सकता। २१) संवत् ८०२ से लेकर ५९ वर्ष २ मास २१ दिन तक श्री वन राज ने राज्य किया। श्री व नराज की पूरी आयु १०९ वर्ष २ मास २१ दिन की थी। संवत् ८६२ की आपाद सुदी तृतीयाको अश्विनी नक्षत्र और सिंह लग्नके बीतते समय श्री वन राज के पुत्र श्री योग राज का राज्याभिषेक हुआ। [ B.P. प्रतिमें " संवत् ८०२ से लेकर ६० वर्ष तक श्री वनराजने राज्य किया । संवत् ८६२ वर्षमें श्री योगराजका राज्यभिषेक हुआ ( P. प्रतिमें श्री योगराजने राज्य अलंकृत किया )," इतना ही पाठ है।] २२) उस राजा ( योगराज ) के तीन लड़के हुए। किसी समय क्षेम राज नामक कुमारने राजाको इस प्रकार सूचित किया कि एक अन्य देशीय राजाके प्रवहण (जहाज ) वयंडरमें पड़कर तितर बितर हो गये हैं। वे अन्यान्य बंदरगाहोंसे हटकर श्री सोमेश्वर पत्तन में आ लगे हैं। उनमें १० हजार तेजस्वी घोड़े और १८ सौ (१) हाथी, तया एक करोड किंमतवाली और और चीजे हैं। यह सब संपत्ति हमारे देशसे होकर अपने देशको जायगी। यदि महाराजकी आज्ञा हो तो उसे ले आया जाय । उसके ऐसी विज्ञप्ती करने पर राजाने वैसा करनेका निषेध किया । उसके बाद जब वह सब स्वदेशकी अन्तिम सीमाके प्रान्तमें पहुँचा, तो वृद्धावस्थाके कारण राजाकी विकलताका विचार कर, तीनों कुमार अपनी सेना सजाकर उसपर टूट पड़े, और अज्ञात चौर वृत्तिसे, उसके पाससे सब कुछ छीनकर अपने पिताके पास ले आये | भीतर-ही-भीतर कुपित किन्तु ऊपरसे मौन धारण किये हुए राजाने उनसे कुछ नहीं कहा । वह सब कुछ राजाको भेंटकर जब पूछा गया कि क्षेमराज कुमारने यह अच्छा किया या बुरा ! तो राजा बोला-यदि कहूं कि अच्छा किया तो दूसरेके धन लूटनेका पाप लगता है और यदि फहूं कि अच्छा नहीं किया तो तुम लोगोंके मनमें बुरा लगता है। इससे यही सिद्ध होता है कि मौन ही रहना अच्छा है । फिर और भी सुनो! तुमारे प्रथम प्रश्नके उचरमें, दूसरेके धनके हरण करनेका जो मैंने निषेध किया था उसका कारण यह है कि-और और देशों में राजेगण, अन्यान्य राजाओंकी जब प्रशंसा करते हैं, तब गूर्जर देश में चोरोंझा राज्य है ऐसा कहकर वे नित्य उपहास किया करते हैं। जब हमारे स्थान पुरुप (प्रतिनिधि) इन बातोंके समाचार हमें देते हैं तो हमें सुनकर दुःख होता है और हमारे पूर्वजोंने कुछ इस तरहकी बातें की थी, इसकी हमें ग्लानि होती है। पूर्वजोंका यह कटक यदि लोगोंके हृदयसे भूल जाय तो, अन्य सब राजाओंकी पंक्तिमें हम भी राज शब्दका सम्मान पावें । किंचित् धन लोभसे लुब्ध होकर तुम लोगोंने पूर्वजोंके इस कलंकको मांज-मुंजकर फिरसे ताजा बना दिया। इसके बाद राजाने शस्त्रागारसे अपना धनुष्य मॅगाकर यह आज्ञा दी कि तुम लोगोंमेंसे जो वटवान् हों वह इस धनुष्यको चढ़ावे । यथाक्रम सभी उठे पर जब कोई न चदा सका तो राजाने खेटकी भांति उसे चढा दिया और कहा- २२. राजाकी आज्ञाफा भंग करना, नौकरोंका वेतन काट टेना और खियोंको अलग शय्या देना- निना शस्त्र ही से हत्या करना कहलाता है। - - प्रयन्यचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश इस प्रकार नीतिशास्त्रके उपदेशानुसार, मेरी आज्ञा भंग करके विना शस्त्रके वध करनेवाले तुम पुत्रोंको में क्या दंड दूं ! इसके बाद राजाने आयुके १२० वें वर्षमें प्रायोपवेशन (अन्न जटका त्याग) कर चितामें प्रवेश किया । इस राजाने भट्टारिका श्री योगीश्वरी का मन्दिर बनाया। २३) इस [ योगराज नामक ] राजाने ३५ वर्ष राज्य किया। सं० ८९७ से लेकर २५ वर्ष श्री क्षेमराज ने राज्य किया। सं० ९२२ से लेकर २९ वर्ष तक श्री भूयड़ ने राज्य किया । इसने श्री पत्तन नगरमें भूयडे श्व र का मन्दिर बनवाया। सं० ९५१ से लेकर २५ वर्ष तक श्री वैर सिंह ने राज्य किया । सं० ९७६ से लेकर १५ वर्ष तक श्री रत्नादित्य ने राज्य किया । सं०९९१ से लेकर ७ वर्ष तक श्री सामन्त सिंह ने राज्य किया। इस प्रकार चापोरकट वंशमें सात राजा हुए । विक्र मा दित्य संवत् ९९८ वर्ष तक [इस वंशका राम्य रहा [A प्रति और उसके साथ प्रायः मिटती हुई D प्रतिमें यह राजारली निम्नलिखित रूपसे मिलती है1] सं० *८...(?) श्रावण मुदी ४ से १० वर्ष १ मास १ दिन श्री योगराज ने राज्य किया। सं० ८....श्रावण मुदी ५ उत्तरापादा नक्षत्र और धनुष लग्नमें रत्ना दित्य का राज्याभिषेक हुआ। सं० ८....कार्तिक सुदी ९ से लेकर ३ वर्ष ३ मास ४ दिनतक इस राजाने राज्य किया। सं० ८....कार्निक सुदी ९ रविवारको मया नक्षत्र और वृषलग्नमें श्री वैर सिंह राज्यपर बैठा । सं० ८....ज्येष्ठ सुदी १० शुक्रबारसे लेकर १२ वर्ष ७ मास २ दिनतक इस राजाने राज्य किया । सं० ८....ज्येष्ट सुदी १३ को हस्त नक्षत्र और सिंह लग्नमें श्रीक्षे म राजदेव का राज्याभिषेक हुआ। सं० ९३....मादों सुदी १५ रविवारको, इस राजाको राज्य करते, ३८ वर्ष ३ महीना १० दिन व्यतीत हुए थे। सं० ९३५ वर्षमें आश्विन मुदी १ सोमवारको रोहिणी नक्षत्र और कुम्म लग्नमें श्री चा मुण्ड राज देव का पट्टाभिषेक हुआ। सं० ९....माव बदी ३ सोमवारसे लेकर १३ वर्ष ४ मास १७ दिनतक इस राजाने राज्य किया । सं० ९३८ (?) माव बदी ४ मंगलवारको स्वाती नक्षत्र और सिंह लग्नमें श्री आ ग ह देव राज्यपर बैठा । इमने कर्करापुरी में आग देशर और कण्ट केश्वरी के मंदिर बनवाये । सं० ९६५ पौष मुदी ९ वुधबारसे लेकर २६ वर्ष १ मास २० दिनतक इसने राज्य किया । सं० ९....पीय सुदी १० गुरुवारको आही नक्षत्र और कुम्भ टग्नमें भूय गददेव राज्यपर बैठा । इस राजाने भूय ग डे सर का मंदिर और श्रीपत्तन में प्रकार बनवाया । सं०९....वर्षसे आपाढ़ सुदी १५ से टेकर २७ वर्ष ६ महिने ५ दिनतक इसने राज्य किया। इस प्रकार चापोत्कट वंश ८ पुरुष हुए। १९० वर्ष, २ मास, सात दिनतक इस वंशके राजाओंने राम्य किया। "जिन प्रतियोंमें यह पाठ मिलता है उनमें इन सवत् सूचक अर्कोके विषयमें बदी गड़बड़ी है। कहीं कोई अंक लिया हुआ मिलता है और कहीं कोई । पत्तियों में जो वर्ष मास आदि दिये गये हैं उनका इन थोके साय कोई मेल नहीं मिलता। इसलिये हमने इन अकों के स्थान शून्य ही रखे हैं। आगेके भागमें ओ ऐतिहासिक विवेचन किया गया है उससे इन अंकोंकी निरर्थकता मालूम हो जायगी।
प्रकरण २४-२५ ] मूलराजका प्रयन्ध , चौलुक्यवंशका प्रारंभ। २३. हाथी ( मातङ्ग होनेके कारण) सेवाके योग्य नहीं रहे, पहाड़ोंके पर गिर गये, कच्छप जड़ प्रीतिवाला है, शेषनागको दो जामें हैं, इसलिये पृथ्वीको कौन धारण करने योग्य है-इस तरह चिन्ता करनेवाले विधाताकी सायंकालीन संध्या चुल्लूसे कोई तलवारधारी वह मुभट उत्पन्न हुआ [जिससे चौलुक्यवंशका प्रारंभ हुआ।] [ यह पद्य लेपायांत्मक है और उस अर्थ ही में इसका कवित्व है। एक समय अझदेव सन्ध्या-कृत्य कर रहे ये उस समय पृथ्वीकी दवारा उन्हें विचार आया । पृथ्वीको धारण करने योग्य कौन कौन पदार्थ है इसका , विचार करते हुए उनके मनमे दिग्गजोंका खयाल आया-लेकिन वे असेव्य मालूम दिये क्योंकि वे मातंग कहलाते हैं। (संस्कृत भाषामें मातंग शन्दके दो अर्थ है-१ हाथी, और २ चंडाल)। फिर उन्हें कुलाचल पर्वतोंका खयाल आया, लेकिन पक्ष विहीन मालूम दिये। (पुराणों में पर्वतोंके पक्ष यानि पर इन्द्रने काट डाले ऐसी कथा प्रचलित है।) संस्कृतमें पक्ष शन्दका अर्थ पाख भी होता है। फिर ब्रह्माका खयाल कूर्म यानि कन्धरकी ओर गया, लेकिन वह जडप्रीनिवाला मालूम दिया । जो जडके छाप प्रीति रखता हो वह पृथ्वीको धारण करने जैसा महान कार्य करने योग्य कैसे हो सकता है ? (संस्कृतमें जद यानि मूर्व और जलपानी ऐसे दो अर्थ के होते हैं। कच्छपकी प्रीति जल यानि पानीके साप होती ही है। इसके बाद ब्रह्माका ध्यान फणिपति शेषनागकी तरफ गया लेकिन वह उन्हें दो-जीमा मालूम दिया। सर्पके दो जीमें होती ही हैं। (संस्कृतमें द्विजिह-दो-जांभेका अर्थ चुगलखोर ऐसा निन्दात्मक भी होता है।) इसलिये जो दो-जीमा हो यह पृथ्वीका भार उठाने लायक नहीं हो सकता। इस प्रकार ब्रह्मा इनकी अयोग्यताका सयाल कर चिन्तामग्न हो रहे थे ओर चुल्लूमें पानी भरकर संध्याञ्जलि देने का विचार कर रहे थे, उतनेमें उस सुल्लूमेंसे, हायमें तलवार धारण किये हुए एक सुमट बाहर निकला और ब्रह्मदेवने उसे ही पृथ्वीका भार वहन करने में समर्थ और योग्य समझ कर उसे पृथ्वीका शासक नियत किया । उसकी जो संतान हुई वह चौ लुक्य वंश के नामसे प्रसिद्ध हुई । ] ५. मूलराजका प्रबंध। २४) पूर्वोक्त श्री भूपरानके वंशज मुंजा ल देव के तीन पुत्र हुए जिनका नाम राज, बीज और दण्ड क था। ये तीनों भाई तीर्थयात्राके लिये निकले। श्री सोमेश्वर को नमस्कार करके वहांसे लोटते हुए अण हि ल्ल पुर में आए । वहां पर वे सामन्त सिंह राजाकी घुड़दौड़ देख रहे थे । राजाने बिना ही फारण घोडेको कोदा मारा जिसे देखकर, राज नामक क्षत्रियने, जो कार्पटिक (कापड़िये) का वेश धारण किये हुए या, पीदित होकर अपना सिर हिलाते हुए, आह ! आह । ऐसा शब्द कहा । राजाके उसका कारण पूछने पर उसने कहा कि, घोडेकी यह अत्युत्तम विशेष चाल जो न्युंछन करने योग्य है, उसको न समझकर आपने जो फोड़ा मारा यह मुझे जैसे अपने ही मर्मपर लगा अनुभूत हुआ । उसको इस बातसे चकित होकर राजाने यह घोड़ा उसीको चदनेके लिये दिया । घोड़ा और घुइसपर दोनोंका साश योग देखकर उसने पद पर पर उनका न्युछन किया, और उसके इस आचरणसे किसी महत् कुल्लपाटा उसे समशकर, अपनी टीटा दे यी नामक बहनका उसके साथ न्याह कर दिया । कुछ समय बाद जब यह गर्भरती हुई तो अफाटमें ही उसकी मृत्यु हो गई । मंत्रियोंने, गर्भस्य सन्तानका मरण न हो जाय इस विचारसे उसका पेट धीरफर सन्तानफा उद्धार किया । भूल नक्षत्रमें जन्म होनेके कारण उसका नाम म्ल राज रखा गया । उदय. फाटीन सूर्य की भांति जन्मसे ही तेजोमय होने के कारण यह सबका आदरपात्र हो गया | अपने पराक्रमसे यह मामाके राज्यको पदाता रहा । सामंत सिह मदमत्त होकर उसको कमी राम्यामनपर बिठा देता था और फिर १सर पर मोर पंशकी आप उरानि गुना है। किमी छ चियालय में यह लिया गरा मान्म देना है। नगर पुदमे दम पाराम पुरुष पेश हुभा और इसीलिये हम बरा नाम चौडार दुआ, यह भाट लेगोंडी नारे और माविहासिक महत्व नही है या भगने मागसे रस रोगपगा। - २०] प्रयन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश होशमें आकर उठा देता था। तमीसे चा पोकं टों का दान उपहासके रूपमें मशहूर हुआ । वह इस प्रकार बार धार चिढ़ाया जानेपर एक दिन उसने अपने नौकरोंको तैयार किया और जन मामाने वेहोशीमें राज्यासनपर बिठाया तो उसे मारकर सचमुच ही वह राजा बन गया । २५) सं० ९९३ के आपाढ़ सुदी १५ बृहस्पति वारको, अश्विनी नक्षत्र और सिंह लग्नमें, जन्मसे इक्कीसवें वर्षमें मूल राज का राज्याभिषेक हुआ । [B. P. आदर्शमें सं० ९९८ में श्री मूल राज का राज्याभिषेक हुआ ऐसा पाठ मिलता है। २४. 'शास्त्रमें तो सुना जाता है कि मूलार्क (मूल नक्षत्रका सूर्य ) सब प्रकारका कल्याण करता है। लेकिन आश्चर्य है कि वर्तमान में तो मूलराज ही ने ऐसा योग कर दिया है । [१२] *उस विमुने स्वममें आकर कहा कि चा पोत्कट वंशके राजा है ह य भूपतिके वंशमें वंशो- उज्वला कन्या है। अगर तुमको यह दान की जाय तो निःशंक भावसे उसके साथ विवाह कर टेना क्यों कि वह मृगाक्षी अपने उदरमें सार्वभौम (चक्रवर्ती ) राजाको धारण करेगी। [१३ ] श्री गुर्जर मण्डल में उसकी कुक्षिसे श्री राजि राज का पुत्र राजा श्री म ल राज पैदा हुआ। अपने अद्भुत महाप्रभावसे, जब वह दिग्विजयके लिये उद्यम करता था तो उस समय केवल पृथ्वी ही नहीं काँप उठती थी परंतु उसके साथ उसके स्वामी राजाओं के दिल मी काँप उठते थे। [श्रीसौराष्ट्र मण्डलमें श्री सा....सिंहके साथ युद्ध हुआ यह प्रबंध प्रसिद्ध हैx1] [१४] जिसने अपने शत्रुओंको जीत लिया ऐसे उस राजाको गूर्जरेश्वरों की राज्यश्री, उसके गुणोंसे आवर्जित होकर वाणरिपु (विष्णु) को टक्ष्मीकी तरह, स्वयं वरनेको आई । [१५] उस महा इच्छावाले राजाने कच्छ के राजा लक्ष को, शत्रुको बुरी तरह घायल करनेवाले अपने वाणोंका लक्ष्य बनाया। [१६] उस असामान्य पराक्रमीने लाटेश्वर के दुर्वारणीय सेनानायक वाण (र) को मारकर हाथियोंको ग्रहण किया था। १ गूजरातमें, उस जमाने में शायद यह एक लोकोक्ति प्रचलित थी कि-'यह तो चाउडों का दान है। किया हुआ दान मिलेगा या नहीं और मिलनेपर भी वह स्थिर रूपसे रहेगा या नहीं-ऐसा जिस दान पर विश्वास नहीं किया जाता उसे लोग चाउौंका दान कहकर उसका उपहास किया करते थे। २ मूल राज शन्द पर यह शेष है । इसका दूसरा अर्थ मूलराज यानि मूल चद्र यह निकाला गया। राज शब्द चद्रमाका भी वाचक है । ज्योतिष शास्त्र के विधानानुसार सूर्य जब मूल नक्षमें आना है तब वह मूलार्क योग कहलाता है। यह योग अनेक तरहके शुभ कल्याणोंका करनेवाला माना जाता है। लेकिन यह राजा तो मूलार्क नहीं है मूलराज (मूलचद्र) है, वो भी इसने अपने उदयकालमें वैसे ही अनेक कल्याणकारक योग कर बतलाए हैं, इसलिये यह खास आश्चर्यकी बात है। * १२ और १३ अक वाले ये दोनों पद्य किसी पुरानी प्रशस्तिमैसे उधृत किये गये मालूम देते हैं। पहले पदमें यह बनलाया गया है कि-शायद शमु या अन्य किसी देवने मूल राज के पिता रा जिराज को स्वप्नमें आकर यह कहा कि चा पोत्कट धशका राजा, जो है हय वश का है, उसकी गुणवती कन्यासे विवाह करनेके लिये तुझसे कहा जाय तो उसे निःशंक होकर ग्याह लेना । क्यों कि उसकी कोख में ऐसा गर्भ उत्पन्न होगा जो सार्वभौम राजा बनेगा । यह पद्य ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्वका है। इसमें चापोत्कट वराको है हय वश कहा है | चावडाओंके मूल ववका विचार करने के लिये यह एक नया उल्लेख है । विशेष विचारके लिये अगला विरेचनात्मक माग देखना चाहिए। X यह पक्ति, मूल प्रतिम अपूर्ण ही प्राप्त हुई है । इसका सट कथन क्या है सो शत नहीं होता । सौराष्ट्र के किसी एजाके साथ मूलगजके युद्ध होनेका इसमें उल्लेख किया गया मालूम देता है । यह पक्ति दूसरी दूसरी प्रतियोंमें नहीं मिलती। - । प्रकरण २५-२७ मूलराजका.प्रवन्धः [२१ [१७ ] जिसने दानसे दारिद्रयको नष्ट किया, शौर्यसे दुर्जनोंका दमन किया और कीर्तिसे रामचंद्रको भी म्लानकर दिया ऐसे उस राजाने चिरकाल तक राज्यका उपभोग किया । इत्यादि स्तुतियों द्वारा पंडित लोगोंसे प्रशंसित होता हुआ वह इस प्रकार साम्राज्य कर रहा था, तब किसी अवसरपर सपादलक्ष देशका राजा, मूल राज पर चढ़ाई करनेके लिये गूर्ज र देश की सीमापर आया । दूसरी ओर, उसी समय तिलंग देश के राजाका वारप नामक सेनापति भी चढ़ आया । इन दोनों से किसी एकके -साथ जब युद्ध शुरू होगा, तब दूसरी ओरसे दूसरा शत्रु आक्रमण कर बैठेगा; ऐसी परिस्थितिमें क्या करना चाहिए इसका विचार मूल राज अपने मंत्रियोंके साथ करने लगा, तो उन्होंने कहा कि कुछ समय कन्या दुर्ग में बैठकर व्यतीत कर देना अच्छा है; और जब नवरात्र आनेपर सपादलक्ष का राजा अपनी कुलदेवीकी आरा- धनाके किये चला जाय, तब अवसर पाकर वारप नामक सेनापतिको जीत लिया जाय । और इसके बाद वापस आनेवाले स पाद लक्ष के राजाका भी पराजय किया जाय । उनके इस प्रकारके विचार सुनकर राजा बोला कि ऐसा करनेपर क्या लोगोंमें मेरे भाग निकलनेकी निंदा न होगी ! । इसपर ये मंत्री बोले- २५. [ परस्परके द्वन्द-युद्धभे ] भेड़ा जो पीछे हटता है वह प्रहार करनेके लिये है, और सिंह भी आक्रमण करते समय क्रोधसे संकुचित होता है । हृदयमें वैरभावको भर रखनेवाले और गूढ़ यंत्र चलानेवाले बुद्धिमान लोग किसी अवगणनाकी परवा न करके [ सब कुछ ] सह लेते हैं । इस प्रकार उनकी बात सुनकर मूल राज ने कन्या दुर्ग में जाकर आश्रय लिया । इधर सपादलक्ष के राजाने गूर्ज र देशमें ही सारा वर्षाकाल बिताया और जब नवरात्रके दिन आए तो उस रणभूमिमें ही शाकम्भरी नगरकी स्थापना कर गोत्रदेवी भी वहीं मँगा ली और वहीं नवरात्रकी पूजाका समारम्भ किया । मूल राज ने यह हाल सुनकर मंत्रियोंके बतलाए हुए उपायको निरर्थक समझा । उसको तत्काल एक मति सूझ आई । राजकीय भेट-सौगाद भेजनेके बहाने उसने अपने सब आसपासके सामंतोंको बुलवा भेजा और फिर जासुसी काम करनेवाले अधिकारियोंके पाससे सभी राजपूतों और सैनिकोंको, वंश और चरित्रसे, पहचान कर उन्हें यथोचित दान आदिसे सम्मानित किया और समयका संकेत वताकर उन सबको सपाद लक्ष देशके राजाके शिबिरके आसपास तैनात कर दिया। निश्चित दिनपर स्वयं, अपनी प्रधान साँढनीपर बैठकर उसके पालकके साथ बहुत सी भूमि पार करके, प्रातःकाल जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सके उस तरह, सपादलक्ष नृपतिको छावणीमें जा पहुँचा । सांढनी परसे उतरकर हाथमें तलवार लेकर मूल राज ने अकेले ही वहाँ पहुँचकर द्वारपालसे कहा-इस समय राजा किस काममें होते हैं । । जाकर अपने स्वामीको कहो कि मूलराज राजद्वारमें प्रवेश कर रहा है । यह कहता हुआ [ द्वारपालने कुछ आनाकानी की तो ] अपने भुजदण्डके बलसे उसे द्वारपरसे हटा दिया। फिर जब वह ' यह श्री मूल राज द्वारमें प्रवेश कर रहे हैं। इस प्रकार पुकार हो रहा था कि उतनेमें तो वह, उस राजाके तंबूके भीतर प्रवेश करके, राजाके पलंग पर ही स्वयं जा बैठा। यह देखकर क्षणभर तो वह राजा भयभीत होकर मौन ही रहा । फिर कुछ भय दूर करके उसने पूछा कि-'क्या आप ही श्री मूल राज है !'। मूल राज के मुंहसे 'हाँ' यह शब्द सुन कर जितनेमें वह कुछ समयोचित बोटना चाहता था, उतनेमें तो पूर्व संकेतित चार हजार सैनिकोंने उस राजाके बडे डेरे (तंबू ) को चारों ओरसे घेर लिया। इसके बाद मूल राज ने उस राजासे इस प्रकार कहा-इस भूमण्डलमें, ऐसा कोई युद्धवीर राजा, जो मेरे सामने लड़ाईमें टिक सके, है या नहीं इसका मैं सोच किया करता था और कोई वैसा वीर निकल आवे उसके लिये में सैकडों मिनते मनाता या । भाग्ययोगसे आप १२] प्रबन्धविन्तामणि [प्रथम प्रकाश उपस्थित हुए हैं। किन्तु भोजनके समय मक्खी पड़ जानेके समान, इस ति लड्न देश के तै लिप नामक राजाके सेनापतिको, जो मुझे जीतनेके लिये आया है, जब तक शिक्षा न दे छं तब तक आप पीछेसे हमला इत्यादि न करके रुक जाइये, यही अनुरोध करने मैं आपके पास आया हूं। मूल राज ने जब ऐसा कहा तो उस राजाने इस प्रकार कहा-राजा होकर भी अपने प्राणोकी परवा न करके, सामान्य सैनिककी भाँति अकेले ही इस प्रकार शत्रुगृहमें प्रवेश करके चले आये इसलिये [ मैं तुम्हारे साहससे मुग्ध हूँ और ] जब तक जीऊंगा तब तक तुम्हारे साथ हमारी सन्धि बनी रहेगी । उस राजाके ऐसा कहने पर 'ऐसा मत कहो, ऐसा मत कहो' इस प्रकार निवारण करता हुआ, उसके द्वारा भोजनार्थ निमंत्रित होनेपर, अवज्ञापूर्वक अस्वीकार करके, वह हाथमें तलवार लेकर उठ चला और उसी सांढनीपर सवार होकर, अपनी उस सेनासे परिवृत होकर उस वारप सेनापतिकी सेनापर टूट पड़ा । उसे मारकर उसके दस हज़ार घोड़े और १८ सौ हाथी छीन कर, जितनेमें पड़ाव डालनेकी तैयारी कर रहा था, उतनेमें तो अपने गुप्तचरोंसे यह सब हाल सुनकर वह सपादलक्ष का राजा वहाँसे भाग निकला। २६) उस राजाने पत्तन में श्री मूल राज वस हि का [ नामक जैन मन्दिर ] और श्री मुखाल दे च स्वामी (शिव) का प्रासाद बनवाया । वह प्रति सोमवारको शिवकी भक्ति करनेके निमित्त सोमेश्वर पत्तन ( सोमनाथ पाटन ) की यात्राको जाता था । उसकी इस प्रकारकी भकिसे सन्तुष्ट होकर सोमनाथ उपदेश देकर म ण्ड ली न गरी में आये । उस राजाने वहाँ ' मूलेश्वर' नामका मन्दिर बनवाया । नमस्कार करनेकी इच्छासे हर्षित होकर यहाँपर नित्य आनेवाले उस राजाकी, उस प्रकारकी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर, सोमनाथ ने यह कहा कि मैं समुद्र के साथ तुम्हारे नगरमें अवतीर्ण हूँगा। यह कहकर सोमेश्वर अण हि छ- पुर में अवतीर्ण हुए। आये हुए समुद्र की सूचना मिले इसलिये नगरके सभी जलाशयोंका पानी खारा होगया । उस राजाने वहाँपर त्रिपुरुष प्रासाद नामक शिवका मन्दिर बनवाया । २७) इसके बाद, वह उस प्रासादके प्रबंधक होने योग्य किसी उचित तपस्वीकी खोज करते हुए उसने एक कान्य डी नामक तपस्वीका नाम सुना, जो सरस्वती नदीके किनारे, एकान्तर दिनको उपवास किया करता था और पारणाके दिन अनिर्दिष्ट भिक्षाके पाँच ग्रासका आहार किया करता था। जब राजा उसकी वन्दना करने गया, तो उस समय उसे तीन दिनका ज्वर था। उसने अपने ज्वरको कथामें संका मित कर दिया । राजाने उसे देखकर पूछा कि-यह कन्था ( गुदड़ी ) काँप क्यों रही है । राजाके साथ बात करनेमें असमर्थ होनेके कारण मैंने ज्वरको उसमें संक्रामित किया है-ऐसा कहनेपर, राजा बोला-यदि इतनी शक्ति है तो फिर ज्वरको सर्वथा दूर क्यों नहीं कर देते ! । राजाके यों कहनेपर उसने- २६. पूर्वजन्मके सञ्चित हमारे जो कोई भी रोग हों वे अब उपस्थित हों। मैं उनसे अनृण होकर शिवके उस परम पदको प्राप्त होना चाहता हूँ। शिव पुराण के इस वचनको कह कर बताया कि-'कर्म भोगे विना क्षय नहीं होते' यह जानते हुए में इसे कैसे दूर कर सकूँ । राजाने फिर त्रिपुरुष धर्म स्थान क के प्रबंधक होनेके लिये उससे प्रार्थना की। २७. अधिकार मिलनेसे तीन महीनोंमें, और मठका महन्त बननेसे तीन दिनोंमें [ नरक प्राप्त होता है ]; और अगर शीघ्र ही नरकप्रातिको इच्छा हो तो एक दिन पुरोहित बन जाओ। इस स्मृति-वाश्यके तत्वको जानते हुए, तपरूपी नौकासे संसार सागरको पार करके मैं फिर इस गोष्प- दमें कैसे इबना चाहूं। इस वाक्यसे निषिद्ध होकर राजाने [ और कोई उपाय न सोच कर ] तान-शासनको [२३ " प्रकरण २७-२९ ] मूलराजका प्रवन्ध मण्डक (परोंठे) में वेष्टित करके भिक्षाके लिये आये हुए उस तपस्वीके पत्रपुटमें छोड़ दिया। वह उसे न जानता हुआ लेकर वहाँसे लौट गया । यद्यपि सरस्वती नदीने पहले तो उसे मार्ग दे दिया था, पर इस वार बढ़ जानेसे जब उसे मार्ग नहीं मिला, तो वह जन्मकालसे लेकर अपने दोपोंका विचार करने लगा। तात्कालिक भिक्षा संबंधी दोपको जाननेके लिये जब उसे देखता है, तो उसमें उस राजाका दिया हुआ ताम्र-शासन मालूम दिया । इससे तपस्त्रीको क्रुद्ध जानकर, राजा वहाँ आया और उसकी सान्त्वनाके लिये वह जब अनुनय विनय करने लगा, तो उसने यह कह कर कि-मैंने स्वयं जो दाहिने हाथसे दान ग्रहण किया है वह अन्यथा कैसे होगा; अपने शिष्य व यजलदेव को राजाको सौंपा । उस व यजल देव ने कहा कि-शरीरमें उबटनके लिये हमको प्रतिदिन आठ पल उत्तम जातिका चंदन, चार पल कस्तूरी, एक पल कपूर तथा बत्तीस वारांग- नाएँ, और जागीरके साथ श्वेत छत्र प्रदान करो; तो मैं प्रबंधकका पद स्वीकार करूँगा। राजाने सब देनेका स्वीकार कर, त्रिपुरुप धर्म स्थान में उसे 'तपस्वियोंका राजा' के पदपर अभिषिक्त किया। वह 'के कू लोल' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ । इस प्रकारके भोगोंको भोगते हुए भी वह अकुटिल भावसे ब्रह्मचर्य व्रतमें निरत रहा । एक बार रातको मूल राज की रानी उसकी परीक्षा लेने लगी तो उसे पानका बीडा मार कर कुष्ठिनी बना दिया और फिर अनुनीत होकर उसे अपने उबटनके लेपसे और स्नानके मैले जलसे स्नान करवा कर नीरोग किया। यहांपर लाखाककी उत्पत्ति और विपत्तिका प्रबंध भी दिया जाता है- २८) प्राचीन कालमें, किसी परमार वंशमें, राजा की ति राज देवकी का म ल ता नामकी लड़की थी। यह बाल्यकालमें, सखियोंके साथ, किसी महलके आंगनमें खेल रही थी। सखियोंने कहा कि अपना अपना वर वरण करो । घोर अन्धकारमें उस का मल ता की आँखोंका मार्ग बंद हो जानेसे, उसने फूलड़ नामक पशुपालका, जो उस महलके एक खंभेकी ओटमें खड़ा हुआ था और जिसे यह कुछ भी वृत्तान्त मालूम नहीं था, चरण कर लिया। इसके अनन्तर, कुछ वर्षों के बाद, जब किसी अच्छे वरोंकी खोज उसके लिये की जाने लगी, तो पतिव्रता-व्रतके निर्वाहके विचारसे, उसने अपने माता पितासे अनुज्ञा लेकर उसी (पशुपाल )से विवाह किया । उन दोनोंका पुत्र लाखा क हुआ । वह कच्छ देश का राजा वना । यशोराज को उसने [ अपने पराक्रमसे ] खुश किया था और उसकी बड़ी कृपासे वह सबसे अजेय हो गया था । उसने ग्यारह वार मूल- राज की सेनाको त्रासित किया था। एक बार, जब कि वह ला खा, कपिल को ट के किलेमें रहा हुआ था उसी समय, राजा (मूल राज) ने स्वयं जाकर उसे घेर लिया । वह लक्ष (ला खा क) अपने माहे च नामक एक परम साहसी सुभटके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा-जिसको कि उसने कहीं धाइ पाइनेके लिये भेजा था। यह वात जानकर मूल राज ने उसके आगमनके मार्ग घेर लिये । कार्य समाप्त करके आते हुए उस मृत्यसे राजपुरुषोंने कहा 'हथियार रख दो !'। अपने स्वामीके कार्यकी सिद्धि के लिये उसने वैसा ही करके युद्धके लिये प्रस्तुत ला खा क के पास आकर प्रणाम किया । इसके बाद संग्रामके अवसरपर- २८. 'ऊगे हुए सूर्यने जो प्रताप नहीं बताया तो हेला खा 1 वह दिन निकृष्ट कहा जाता है। गिनती करनेसे तो आठ कि दस दिन मिल सकते हैं । १ इस वचनका भावार्थ यह मालूम देता है कि सूर्यका उदय होनेपर भी यदि जिस दिन उसका तेज नहीं दिखाई देवा-अर्यात् कुहासा छाया रहता है तो लोक उस दिनको निकृष्ट दुर्दिन मानते हैं । वीर पुरुष या तेजस्वी पुरुष उत्पन्न होकर भी यदि अपना कोई तेज नहीं बतलावे तो उसका उत्पन्न होना निरर्थक ही समझा जाता है । २ इस दूसरे वचनका भावार्थ यह शात होता है कि-चीर पुरुषको समय प्राप्त होनेपर शीघ्र ही अपना पयक्रम बतलानेके लिये उद्यत हो जाना चाहिए 1 दिनों की गिनती करते रहने से तो कुछ लाभ नहीं होता।
२४1 प्रबन्धचिन्तामणि [प्रयम प्रकाश इत्यादि प्रकारके बहुतसे बोध-वाक्य उस मृत्यके सुनकर और उसकी उत्कट वीरता देखकर' लक्ष का साइस खूब बढ़ा और उसने म्ल राज के साथ बराबर तीन दिन तक द्वन्द-युद्ध किया । मूलराज ने उसकी अजेयता देखकर चौथे दिन सो मेश्वर का स्मरण किया। रुद्रकी कला जब उसके अन्दर अवतीर्ण हुई, तो [ उसके प्रभावसे ] उसने लाखा को मार डाला । बादमें ला खा की देह जब पृथ्वीपर गिरी हुई पड़ी थी तब हवाके संचारसे उसकी हिलती हुई दादीको मूल राज ने पैरसे छुआ । इसपर लक्ष की माताने कुपित होकर यह शाप दिया कि तुम्हारा वंश लूति (कुष्ठ ) रोगसे मरा करेगा। २९. मूल राज ने अपने प्रतापामिमें लक्ष को होम करके उसकी स्त्रियोंके आँसूओंकी धाराको उन्मुक किया । ३०. सहसा लंबे जालमें आये हुए लक्ष रूपी कच्छप ( कछुआ और कच्छका राजा ) को मारकर जिसने संग्रामरूपी सागरमें अपनी धी-बरताका परिचय दिया +। ३१. हे मूल राज ! दानरूपी टता, बलि के समयमें पृथ्वीमें पैदा हुई, दधीचि के समय उसकी जड़ जमी, राम के होनेपर उसमें अंकुर उगे, कर्ण के समय उसमें डाल और टहनियां निकलीं, नागार्जुन के समय कलियाँ प्रकट हुई, विक्रमादित्य के समय फली और तुम्हारे समयमें आमूल फलवती हुई। ३२. तुम्हारे शत्रुओंके सूने ] महल, जो वर्षाकाटमें, वादलोंके पानीसे मान करते हैं, उनके ऊपर जो तृण उग आये हैं उसके बहाने मानों वे कुश लिये हुए हैं, नाटीके पानीसे मानों श्राद्धकी अञ्जलि दे रहे है, और दीवालके ढोंकोंके गिरनेके मिससे पिण्डदान करते हैं। इस प्रकार अपने स्वामीके प्रेतके लिये ये प्रतिदिन श्राद्ध कर रहे हैं। -इस प्रकार लाखा फूलोतकी उत्पत्ति और विपत्ति का यह प्रबंध है ॥ ११ ॥ २९) इस प्रकार उस राजाने पचपन वर्ष तक निष्कण्टक राज्य किया। एक बार सायंकालकी आरतीके' अनन्तर राजाने एक दासको इनाममें पानका बीडा दिया। उसने हाथमें लेकर देखा तो उसमें कृमि दिखाई दिये। राजाके आग्रह पूर्वक पूछनेपर उसने यह बात कही। इससे राजाको वैराग्य आया और उसने संन्यास ग्रहण' किया और दाहिने पैरके अंगूठेमें अनि प्रज्वलित कर, आठ दिनतक गज दान इत्यादि महादान देता रहा । ३३. एकमात्र विनय भावके वशी भूत होकर उसने पैरमें लगी हुई उप्दूमकेश अग्मिको सहन किया। अन्य प्रतापियोंकी तो बात ही क्या है, उसने सूर्यके मण्डलको भी भेद दिया। इस प्रकारकी स्तुतियोंसे स्तुत होते हुए उसने स्वर्गारोहण किया। सं० ९९८ से लेकर ५५ वर्ष श्री मूल राज ने राम्य किया। ॥ श्रीमूलराज प्रबंध समाप्त ॥ १ यह रोक पायवाला हे लक्ष होम के दो अर्थ होते हैं-सक्ष-शस्ता राजाका होम, और लर-एक राख वार होम | माकाशमै बादशी टिका किसी कारणसे जब स्वार हो जाता है तो उसके प्रतिकारके लिये एक लाख आहुतियों वाला होम परनेका वैदिक शानमें विधान है। पर, साकी रानियां, जो कभी रुदन नहीं करती थीं, उनके आयूरूपी वृष्टिका प्रवार पालू करने के लिये, मूल्यम्ने अपने प्रतापरूपी अग्रिम सावाको होम दिया-भस्म कर दिया । +हम को 'क' और 'पीपरता' शम्द पर प है । मूल्यजने कम्पकपनि सवराजको मारकर मस्ती धीरला बुद्धिमत्तारा परिचय दिया। दूसरा अयं कन्याल यानि एक साल पुए, और उस अर्धमे धीरका भयं मछीमार मा दिया गया है। ।
प्रकरण ३०-३४ ] मूलराजादिका प्रबन्ध [२५ मूलराजके वंशज। [१८] अपने सारे शत्रुओंको समाप्त करके जब वह-(मूल राज )-कथाशेप होगया ( मृत्युको प्राप्त हुआ) तो उसके बाद पृथ्वीमण्डलका आभूषण ऐसा चामुण्ड राज राजा हुआ। [१९] उसकी सेनाका साज, शत्रुओंकी स्त्रियोंके मनको संतप्त होनेकी विद्या सिखानेमें निपुण पण्डित था और उसके सैन्यने इन्द्रको भी भयभीत कर दिया था। २०] उसके हाथरूपी कमलमें रहनेवाली, कोश (१ म्यान; २ कमल) में विलास करनेसे चमकती हुई तलबार रूपी भौरोंकी श्रेणीने राजाओंके वंशोंको भिन्न कर दिया। ३०) संवत् १०५३ से लेकर १३ वर्षतक चामुण्ड राज ने राज्य किया । [२१] जिसकी कीर्ति तीनों लोकोंमें प्रकाशित हो रही है, और जो महीपतियोंमें श्रेष्ठ माना जाता है ऐसा वच्छ भ राज नामक उसका पुत्र राजा हुआ। [ २२ ] वह दृढ़ पौरुपयाला राजा शत्रुओंकी नगरियोंको घेरे रहता था इसलिये विशेषज्ञोंने उसका नाम 'जगत-झम्पन' रक्खा था। ३१) सं० १०६६ से लेकर ६ महीने तक राजा बल्लभ राज ने राज्य किया। [२३ ] जिसमें रजोगुण और तमोगुणका अभाव था और जिसके जैसा यश प्राप्त करना औरोंके लिये अत्यंत दुर्लभ था, ऐसा दुर्लभ राज नामका उसका छोटा भाई [उसके बाद ] राजा हुआ। [२४ ] सौंपकी भाँति, काल करवाल ( कठिन तलवार ) से सुरक्षित होकर उसका राज्य, निधानके समान, अन्यों ( शत्रुओं का भोग न हो सका। [२५] सौभाग्यसे प्रकाशमान उस राजाका कर (१ हाय; और २ मालगुजारी ) सर्वथा अनुपभोग्य ऐसी परस्त्री पर और ब्राह्मणोंको प्रदान की हुई भूमिपर, कमी नहीं पड़ा। ३२) सं० १०६६ से लेकर ११ साल ६ महीने तक श्री दुर्ल भरा जने राज्य किया। इस राजा दुर्लभ ने पत्तन में 'दुर्लम सर' नामक सरोवर बनवाया । [२६] फिर, उसके भाईका लड़का 'भीम' नामक राजा हुआ जिसकी प्रवृत्ति तीनों जगत्को अमीष्ट फल देनेवाली हुई। * [ यहाँ A आदर्शका अनुसरण करनेवाली मुदित पुस्तकमें, यह समय-सूचक पाठ इस प्रकार है- [ इसके बाद सं० १५० (! १०५२) श्रावण मुदी ११ शुक्रवारको पुष्य नक्षत्र और वृप टामें श्री चामुण्ड राज का राज्यारोहण हुआ। इसने पत्तन में चन्द्र नाथ देव और चा चिणेश्वर के मन्दिर बनाये। सं० ५५ (! १०६५) आश्विन सुदी ५से लेकर १३ वर्ष १ मास २४ दिन राज्य किया। सं० १०५५ (१०६५) आश्विन शुदी ६ मंगळवार, ज्येष्ठा नक्षत्र, मिथुन लग्नमें श्री वल्लम राजदेव गद्दी पर बैठा। इस राजाने जब मा ल वा देशकी धारान गरी के प्राकार (किटेको) घेर रखा था उसी समय शाली रोगसे इसकी मृत्यु हुई। इसके दो विरुद थे-राज मदन शंकर' (राजारूपी कामदेवके लिये शिय) और 'जगज्झम्पन'। सं० १० (१०६६) चैत्र मुरी ५ से लेकर ५ महीने २९ दिन तक इस राजाने राज्य किया।
२६] प्रयन्धचिन्तामणि [प्रयम प्रकाश सं० १५५ (१०६६) चैत्र सुदी ६ गुरुवारको, उत्तरापादा नक्षत्र और मकर लग्नमें, दुर्ल मराज नामक उसका भाई राज्यपर अभिषिक्त हुआ। इसने पत्तन में व्ययकरण ( कचहरी), हस्तिशाला और घटी- गृह युक्त सात तल्लेवाला धवलगृह ( राजप्रासाद) बनवाया । अपने भाई व ल म राज के कल्याणार्थ मदनशङ्कर प्रासाद बनवाया और दुर्लभ स र नामक सरोवर भी बनवाया । इस तरह बारह वर्ष इसने राज्य किया । ] [प्रबन्धचिन्तामणिकी इस A संशवाली प्रतिमें चौलुक्य वंश के इन राजाओंका कालश्रम आदि कुछ मिन्न क्रमसे लिखा हुआ मिलता है जिसका भी संग्रह करना ऐतिहासिक दृष्टिमे कुछ उपयोगी होगा ऐसा समझ कर हमने इन कोष्ठकान्तर्गत कहिकाओंमें उसे मुद्रित किया है। यह कालक्रम सूचक पाठ मी चावडों के कालक्रम सूचक उस द्वितीय पाठके समान अपूर्ण और अन्यवस्थित है। हमारा अनुमान होता है कि ग्रंथकारने पहले पहल जब यह कालक्रमके बतलानेवाले उल्लेखों और संवर्वोका संग्रह करना शुरू किया होगा और वृद्ध जोंसे तया अन्यान्य लेखोसे इस विषयके प्रमाण एकनित करने प्रारम किये होंगे, उस समयका लिखा हुआ जो प्राथमिक असंशोधित आदर्श रहा होगा उस परसे यह A संशक आदर्श (तथा उसके समान जातीय अन्य आदर्श) की प्रतिलिपि हुई होगी और इसलिये इनमें यह असंशोधित कालक्रमवाला पाठ वैसाका वैसा नकल होता हुआ चला आया हुआ होना चाहिए । सोधित पाठ वही है जो ऊपर मूलमें दिया गया है।] * ३३) इसके बाद [ A D प्रतिके अनुसार 'सं० १०५ (१०७८) ज्येष्ठ सुदी १२ मंगलवारको अश्विनी नक्षत्र, मकर लग्नमें '] श्री भी म नामक अपने पुत्रका राज्याभिषेक करके स्वयं तीर्थोपासनाकी वास. नासे वा णारसी के प्रति प्रस्थान किया । मा ल य क मण्डल में पहुँचनेपर वहांके महाराजा मुझने रोक कर इस प्रकार कहा कि-'छत्रचामरादि राज-चिन्होंका परित्याग करके कार्पटिक (संन्यासी) की भाँति आगे जाओ, नहीं तो युद्ध करो। बीच ही में उत्पन्न ऐसा इसे धार्मिक विन समझकर, यह वृत्तान्त भीम राज को कहलाया और स्वयं कार्पटिकका वेश पहन कर तीर्थयात्रा की; और वहींपर परलोक साधन किया। ३४) इसीके दाद मा ल या के राजाओं के साथ गूज रात के राजाओंका दृढमूल ऐसा विरोधका बंधन चंध गया।
प्रकरण ३५-३७ ] मुजराज प्रवन्ध [२७ ६. मुञ्जराज प्रवन्ध । ३५) अब यहांपर प्रसङ्कसे आया हुआ, मा ल वा मण्डल के मण्डनरूप श्री मुख राज का चरित्र वर्णन किया जाता है -प्राचीन कालमें, उस मण्डलका परमार वंशी राजा, जिसका नाम श्री सिंह भट था, राजपाटी निमित्त परिभ्रमण करते हुए, उसने मुंजके वनमें एक सद्यःजात अति रूपवान् वालकको देखा और स्वकीय पुत्रके समान वात्सल्य भाव धारण करके उसे उठा लिया और महलमें लाकर रानीको समर्पण किया। मुंजके वनमें प्राप्त होनेके कारण उसका नाम मुझ रक्खा । बादमें उसके एक सीन्य ल नामक ओरस पुत्र भी पैदा हुआ। [एक समय ] निःशेप राजगुणोंके समूहसे भूषित ऐसे उस मुअ का राज्याभिषेक करनेकी इच्छासे राजा उसके महलमें गया । मुअ अपनी स्त्रीको, जो उस समय वहां उपस्थित थी, किसी एक वेत्रासनकी ओटमें बिठाकर, प्रणाम पूर्वक राजाकी सेवा करने लगा । राजाने उस प्रदेशको निर्जन देखकर प्रारंमसे लेकर उसके जन्म आदिका वृत्तान्त कह सुनाया और फिर कहा कि-तुम्हारी भक्तिसे सन्तुष्ट होकर अपने ओरस पुत्रको छोड़कर, तुम्हें राज्य दे रहा हूँ पर इस सीन्ध ल नामक भाईके साथ प्रे प्रेमके व्यवहारके साथ वर्तना । इस प्रकारकी आज्ञा देकर राजाने उसका अभिषेक किया । कहीं, अपने जन्मका यह गुप्त वृत्तान्त बाहर न फैल जाय इस आशंकासे उसने अपनी उस स्त्रीको मार डाला । बादमें उसने अपने पराक्रमसे सारे भूतलको आक्रान्त किया और समस्त विद्वजनोंके चक्रवती जैसे रुद्रादित्य नामक पंडितको महामंत्री बनाकर अपने राज्यकी चिन्ताका समस्त भार उसे सौंपा । उस सीन्ध ल नामक भाईको, जिसने अपने उत्कट स्वभावके कारण राजाका कुछ भाज्ञामंग किया था, स्वदेशसे निर्वासित कर, चिरकाल तक निष्कंटक राज्य करता रहा । ३६) यह सीन्ध ल गूजरात दे श में आकर, अर्बुद पर्वतकी तलहटीमें का शहद नगरके निकट अपना एक छोटा सा गाँव वसा कर रहने लगा। दीवालीको रातको शिकार खेलने निकला । चोरोंको वध करनेवाली भूमिके निकट एक सूअरको चरते देख, उसने सूलीपरसे गिरे हुए एक चोरके शवको न देख कर, उसे घुटनोंसे दवा कर, जब वह अपना वाण चलाने लगा, तो उस शबने [ मारनेका ] संकेत किया । उसे हाय लगा कर मना करते हुए, उस वाणसे सूअरको मार गिराया। बादमें जब सूअरको अपनी ओर खींचने लगा तो वह शव जोरोंका अट्टहास करके उठ खड़ा हुआ । इस पर सीन्धुल ने कहा-तुम्हारे किये हुए संकेतके समय सूअरपर प्रहार करना उचित था, या समझ बूझकर जो मैंने प्रहार किया यह ठीक था ?" उसके इस वाक्यके पूरा होनेपर, वह छिद्रान्वेषी प्रेत, उसके ऐसे निःसीम साहससे सन्तुष्ट होकर बोला कि वरदान मांगो।' ऐसा कहनेपर- मेरे बाण जमीनपर न गिरें' ऐसा माँगा; उस शबने कहा ' और भी कुछ मांगो।' इसपर उसने कहा कि-'मेरी मुनाओंमें सारी लक्ष्मी स्वाधीन हो।' उसके साहससे चकित होकर उस प्रेतने कहा कि-तुम मा ल य म ण्डल में जाओ। यहाँ मुख राजाका विनाश निकट है, इसलिये तुम वहीं जाकर रहो। तुम्हारे ही वंशमें वहाँराग्य रहेगा । इस प्रकार उसके कथनानुसार यह वहाँ गया और मुख राजासे कोई एक संपत् शाली प्रदेश प्राप्त कर, कुछ काल बाद, फिर उसी प्रकार उद्धत भावसे वर्तने लगा। एक बार एक तेलीसे कुदा मांगी। उसने नहीं दी । इसपर कुपित होकर, बलात्कार पूर्वक छान कर, और उसे मरोड कर उसके गटेमें डाल दी। तेलीने राजाके आगे पुकार की ! राजाने समझा बुझाकर उसे सीधी करवाई । उसके ऐसे उत्कट वलसे राजा मुच भयभीत हो गया। इसके बाद, मालिश करनेमें बड़े कुराल ऐसे कुछ कलावन्त विदेशसे वहॉपर आये । ये राजासे मिले । राजा उनसे अपने शरीरमें मालिश कराने टगा । वे मो अपनी कलासे हाथ पैर आदि अंग .
, २८] प्रवन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश उतार कर फिरसे पैसे चढा देते थे। इस प्रकार दो तीन बार कराया। प्रसन्न होकर राजा सीधल का भी इसी प्रकारका मर्दन करवाने लगा। उसके अंगोंके उतार लेनेपर जब यह निश्चेष्ट हो गया तो आंखें निकलवा लौं। [क्यों कि ] सुसजित अवस्थामें तो उसकी आँख निकालनेमें कौन समर्थ हो सकता था। अतः इस प्रकार मुख ने उसकी आँखे निकलवा ली और फिर उसे काठके पीजरे में बंद करा दिया। उसके भोज नामक पुत्रका जन्म हुआ । उस पुत्रने सभी शास्त्रोंका खूब अभ्यास किया। छत्तीस प्रकारके आयुधोंका आकलन कर, बहत्तर कलारूपी समुद्रका पारगामी वना । इस तरह सभी लक्षणोंसे युक्त होकर वह बडा होने लगा। उसके जन्म समय किसी निमित्तज्ञ ज्योतिषीने जन्मकुण्डली बना कर दी [ जिसमें लिखा था कि-] ३४. पचपन वर्ष, सात मास, तीन दिनतक भोज राजा गौड़ देशके साथ दक्षिणापथका भोक्ता होगा। इस श्लोकके अर्थको जब मुख राज ने समझा, तो सोचा कि इसके रहनेपर मेरे लड़केको राज्य नहीं होगा; इस आशंकासे उसने भोज को, वध करनेके लिये अन्त्यजोंके सुपुर्द किया। उन्होंने रातको उसकी मधूर मूर्ति देखकर, अनुकम्पाके साथ कापते हुए कहा कि-अपने इष्ट देवताको याद करो। इसपर भोज ने निम्नलिखित काव्य, पत्रपर लिखकर, मुख राज को देनेके लिये समर्पण किया। ३५. सत्ययुगके अलंकारके समान वह राजा मान्धाता चला गया । जिस रावण के शत्रु राम चन्द्र ने महासागरमें सेतु बांधा था वह भी आज कहां है ! और फिर युधिछि र प्रभृति अनेक राजा जो आपके समय तक हो गये हैं, सब चले गये; पर यह पृथ्वी किसीके भी साथ नहीं गई ! पर मैं समझता हूं, तुम्हारे साथ तो जायगी! राजा उसे पढकर मनमें अत्यन्त खिन्न हुआ और बालहत्या करनेवाले अपने आपकी निन्दा करने लगा। [२७ ] हाय, हे भोज ! मरण कालमें कहा हुआ तुम्हारा काव्य हृदय वेध रहा है । दौभाग्यके स्थान समान मुझ पापी, दुष्टको तुम्ही शरण हो । [२८] हे गुणागार भोज ! तुझ चिना इस राज्यसे मुझे क्या काम है ! अरे कोई चिता सजा दो, ता- कि मैं मरकर जाकर भोजसे मिळू । तब मंत्रियोंने राजाको प्रबोधित करते हुए यह वाक्य कहा- [२९] हे स्वामिन् । यह अति अज्ञान सूचक है जो इस तरह अब आप बोल रहे हैं । जानना वही प्रमाण है जो ऐसी कर्थनाका कारण न हो। - इस प्रकार वारंवार विलाप करने लगा।] ३७) बादमें, उनके पाससे अत्यन्त आदरके साथ बुलवाकर उसे युवराजकी पदवी देकर सम्मानित किया। तेलिप देव नामक तिलङ्ग देश के राजाने सेना भेज फर उस ( मुस) पर आक्रमण किया । उस समय रुद्रादित्य नामक महामंत्री रोगग्रस्त था। उसके बारंबार निषेध करनेपर भी मु अ ने उसके ऊपर चढाई करना चाहा । [ मंत्रीने कहा- [३०] हे महाराज ! हमारी सीख मान लीजिये, अबहेला न कीजिये । तुम्हारे उधर चले जानेपर इस (मुझ ) मंत्रीको भीख मांगनी पडेगी। [३१] तुम्हारे बैठे रहनेपर और मेरे लाँघ ( चले ) जानेपर राजाका राप्य रुल जायगा । ऐसा होनेपर बडा ही अकाज होगा और उसकेलिये नुम माल्यके धनी जानो।
. प्रकरण ३७] मुजराज प्रबन्ध [२९ [३२] हे स्वामिन् ! यह महेता (महत्तम-महामात्य) विनति करता है कि अब हमारा यह आखिरी जुहार (नमस्कार) हो । हमें [ जानेका ] आदेश हो । क्यों कि हम तुम्हारे सिरपर राख पडती देख रहे हैं। इस प्रकार मंत्री निषेध करने पर भी यह सेनाके साथ चला।] [मंत्रीने आखिरमें कहा कि-] गोदावरी नदीको सीमा मान उसे लाँघकर आगे प्रयाण न कीजियेगा। इस प्रकार मंत्रीने शपय देकर आगे न जानेके लिये रोका था; तथापि मुख ने यह विचार कर कि पहले छ चार उसे जीता है, जोशमें आकर उस नदीको पार करके, सामने किनारे जाकर पड़ाव डाला । रुद्रा दित्य ने जब राजाके उस वृत्तान्तको सुना, तो उसकी अविनयशीलताके कारण कोई भावी विपद आनेवाली है, यह सोचकर स्वयं चिताग्निमें प्रवेश किया। इसके अनन्तर तै लिपने छल और वलसे उसकी सेनाको तितर-बितर कर मुझ राजा को गिरफ्तार कर लिया और मूंजकी रस्सीसे बाँध उसे कारागारमें बन्द कर दिया । काठके पिंजड़ेमें उसे रक्खा गया था और राजा ते लिप की बहन मृणाल व ती उसकी परिचर्या करती रहती थी। मुअ का उसके साथ पत्नीका-सा स्नेह सम्बन्ध हो गया। उधर पीछे रहे हुए उसके मंत्रियोंने एक सुरंग खुदाई और उसके जरिये मुख को संकेत करवाया। इतनेमें, एक बार जब वह दर्पणमें अपना प्रतिरिव देख रहा था, तो उसी समय मृणाल व ती, अनजानमें, पीछे आ खड़ी हुई । उसने भी दर्पणमें अपने बुढापेके जर्जर मुखको देखा और फिर देखा कि युवक मुख राज के मुंहके पास उसका मुँह अत्यन्त भद्दा दिखाई दे रहा है। इसलिये उसे उदास होते देख मुख ने कहा- ३६. मुख कहता है कि-ऐ मृणालयती ! गये हुए यौवनको झुरो मत; यदि सक्करकी डली पीसी जा कर सैकड़ों टुकड़ोंमें छिन्न-भिन्न हो जाय, तो भी वह मीठी चूर ही लगती है। इस प्रकार कह कर [ उसे शान्त बनानेका प्रयत्न किया ], वादमें अपने स्थानको जानेकी इच्छा- याला होते हुए भी मृणाल व ती का विरह वह नहीं सह सकता था, और मयसे उसे वह वृत्तान्त भी कह नहीं सकता था। बार वार [मृणाल व ती के] पूछनेपर भी, अपनी चिन्ता न कह सका। बिना नमककी और अधिक नमक दी हुई रसोई खाकर भी जब वह उसका स्वाद नहीं जान सका तो, मृणाल यतीने अत्यंत आग्रह और प्रेमपूर्वक पूछा; तब बोला कि मैं इस सुरङ्गाके रास्ते अपने घर जानेवाला हूँ। यदि तुम भी यहाँ चलो तो मैं तुम्हें पटरानीके पदपर अभिषिक्त करके अपने प्रसादका फल दिखाऊं । इसपर उसने कहा कि क्षणमर प्रतीक्षा करो; तब तक मैं अपने गहनोंकी सन्दूक ले आऊं। यह कहकर उस कात्यायिनी ( ढलती उमरकी विधवा ) ने सोचा कि यह वहाँ जाकर मुझे छोड़ देगा, अपने भाई राजासे वह वृत्तान्त जाकर कह दिया । इस पर यह राजा, उसकी विशेष विडम्बना करनेके लिये, उसको बन्धनमें बाँधकर प्रतिदिन भिक्षाटन कराने लगा। वह घर घर घूमता हुआ, खिन्न होकर उदासीके इन वचनोंको बोला करता । जैसे कि- ३७. वे नर मूर्ख है जो खीपर विश्वास करते हैं; जिस स्त्रीके चिदमें सौ, मनमें साठ, और हृदयमें बत्तीस आदमी बसा करते है। और भी- ३८. यह मुख जो इस प्रकार रस्सीमें बन्धा हुआ बंदरकी तरह घुमाया जा रहा है, वह बचपन-ही में झोटीके टूट जाने से गिरकर क्यों न मर गया, या आगमें जल कर राख क्यों न हो गया । तब किन्हीं सजन पुरुषोंने दिलासा देते हुए कहा कि- ।
३०] प्रवन्यविन्तामणि [प्रथम प्रकाश [३३] हे रनाकर, हे गुणपुअ मुख! चित्तमें इस प्रकार विषाद न करो। क्यों कि जिस प्रकार विधाता ढोल वजाता है उसी तरह मनुष्यको नाचना पड़ता है। फिर किसी और दयाचित्त सजनने कहा- [३४] हे मुझ ! इस प्रकार खेद न करो। क्यों कि भाग्यक्षय होनेपर वह रावण भी नष्ट हो गया, जिसका गढ़ तो लंका था और जिस गदकी खाई खुद समुद्र था और उस गदका मालिक खुद रावण दस मायेवाटा था। इसी प्रकार- ३९. हाथी गये, रथ गये, घोड़े गये, पायक और मृत्य भी चले गये । महता (महामात्य ) रुद्रादित्य भी स्वर्ग में बैठा आमंत्रण कर रहा है। बादमें, एक अवसरपर, किसी गृहस्थके घरपर यह भिक्षाके लिये ले जाया गया | उसकी स्त्री उस समय छोटे पाईको छास पिला रही थी। उसने उसको मिक्षाके लिये खड़ा देख कर गर्व से कन्धा ऊँचा किया और भीख देनेका इन्कार किया । इसपर मुख बोला- ४०. हे भोली मुग्धे । इन छोटेसे पाडों (भैसके बच्चों) को देख कर ऐसा गर्व न कर । मु अ के तो चौदह सौ और छहत्तर हाथी थे, पर वे भी चले गये । उसने इस प्रकार उत्तर दिया- [३५] जिसके घर चार वैल हैं, दो गायें हैं और मीठा बोलने वाली ऐसी [ में ] स्त्री हूँ, उस कुटुंबी (कणवी=किसान ) को अपने घरपर हाथी बॉबनेकी क्या जरूरत है ! एक दूसरी बार जब कि मुख को इस प्रकार इधर उधर घुमाया जा रहा था, तब, राजा किसी बावडी पर बैठा हुआ उसे देख कर हँसने लगा। इस पर वह बोला- [३६] ऐ धनके अन्धे मूढ़ ! मुझे विपत्तिप्रस्त देखकर हँसता क्या है ?-लक्ष्मी कभी कहीं स्थिर- होती देखी है ! तूं क्या इस जलयंत्र चक्र ( अरहट) की घटियोंको नहीं देखता जो क्रमसे खाली होती हैं, मरती है और फिर खाली होती है। तरह पीछे लगकर चिढ़ानेवाले आदमियोंको देखकर उसने कहा- (३७ ] मैं उन पर वारी जाता हूँ जो गोदावरी नदीके ऊपर ही अटक गये (मर गये), जिन्होंने न इन दुर्जनोंकी ऋद्धि देखी और न इस विहल मुझ को देखा। फिर अपनी मन्दबुद्धिताका स्मरण करता हुआ इस प्रकार बोला- [३८] दाप्तीको कमी प्रेम नहीं होता यह निश्चित जानना चाहिए । देखो, दासीने राजा मुझे स्वर को घर घर भीख माँगता करवाया। [३९] और जो लोग अपना बढप्पन छोड़कर घेश्या और दासियोंमें राचते हैं वे मुख राजा के समान बहुत ही अनादर सहन करते हैं । [४०] हे * महंट (बंदर)! इसलिये तुम अफसोस न करो कि मैं इस खाके द्वारा खंडित किया जा रहा हूँ। राम, रावण, और मुझ आदि कैसे कैसे टोग स्त्रियोंसे खंडित नहीं हुए ? * मदारी लेग बदर और बंदरियाका जब खेल करते हैं तब, बदरिया रूठकर बदरका अपमान करती है और बंदरसे पानी मरवाना चक्की चलपाना आदि काम करवाती है। बदर अपमानित होकर मुँह पर बैठ जाता है और हायसे अपने सिरको पीटता है। इस दृश्यपर किसीकी यह उक्ति है।
प्रकरण ३७-३८ ] मुजराज प्रवन्ध [३१ [४१] ऐ यन्त्र, +चरखा ! तुम इसलिये न गेओ कि मैं इस खी द्वारा भमाया (घुमाया ) जा रहा हूँ। ये तो कटाक्ष फेंक कर ही ( मनुष्योंको ) घुमाया करती हैं, तो फिर हाथसे खींचने पर की बातका तो कहना ही क्या है? [४२] मुञ्ज कहता है कि, हे मृणालवती ! जो बुद्धि पीछे उत्पन्न होती है, वह अगर पहले ही हो जाय तो कोई विघ्न आकर घेर नहीं सकता। [४३ ] जो राजा दशरथ देवताओंके राजा (इन्द्र) के तो मित्र थे, और यज्ञ पुरुषके तेजःअंशके समान रामके पिता थे, वही पुत्रविरहके दुःखसे शय्यापर ही पडे पडे मर गये, उनका शरीर जलते हुए तेलके मटकेमें रक्खा गया और बहुत दिनोंके बाद उसका संस्कार हुआ । हाय, कर्मकी गति टेढ़ी है। [४४ ] सिरपर विधु x(चंद्रमा और विधाता ) के वक्र हो कर आ बैठने पर, शिवके सदृश जो सब देवताओंके गुरु हैं उनका मी कैसा हाल हो गया है सो तो देखो । उनके पास अलंकारमें तो मात्र नर-कपाल है जिसे देखते ही डर लगता है, परिवारमें जिसका सारा शरीर छिन्न भिन्न है ऐसा एक मुंगी है, और सम्पत्तिमें एक ढलती ऊमरका बूदा वैल है ! फिर हम लोगोंके सिरपर जो विधि यानि विधाता वक्र हो कर आ बैठे तो क्या क्या हाल न हो। इस प्रकार चिरकाल तक भिक्षा मँगवाने वाद राजाकी आज्ञासे मुख को यध्य-भूमिमें ले गये। वहाँ पहले पहननका उसका वस्त्र ले लिया गया । तब वह बोला- [१५] यह कमर जो हमेशां मतवाले हाथीके ऊपर ही वैठकर चलनेवाली थी, जो सदा विचित्र सिंहासनपर ही बैठती थी और जो अनेक रमणियोंके जघनस्थल पर लालित होती थी, वह आज इस प्रकार विधिवश बिना वस्त्रकी कर दी गई ! तब मुअ ने पूछा कि-' किस प्रकार मुझे मारोगे !' [ उत्तर मिला ] ' वृक्षकी शाखामें लटका कर ।' तब वह बोला- [१६] कहाँ तो यह महावनमें रहा हुआ वृक्ष है और कहाँ हम संसारका पालन करनेवाले राजाओंके पुत्र ! अहो, कमी न घट सकनेवाली बातको घटाने में पटु ऐसा यह विधिका चरित्र बड़ा दुरबोध है। उन्होंने कहा कि 'इष्ट देवताको याद करो' इस पर वह बोला- ११. इस यशके पुंजके समान मुख के गत होनेपर, लक्ष्मी है सो तो विष्णुके पास चली नायगी और वीरश्री है वह योर मन्दिरमें चली जायगी; किन्तु [ और कोई आश्रयस्थान न मिलनेसे ] सरस्वती है सो निराश्रित हो जायगी। +स्त्री जब चरसा चलाती है तब उसमेंसे रूँ......इस प्रकारकी अवाज निकलती है। उस अवाजपर यह किसीकी अन्योक्ति है । स्त्री अपने हायसे चरखेको खूब धुमा रही है इसलिये मानों चरखा रो रहा है। कवि कहता है कि, भाई चरखा तूं ये मत | सीके वो कटाक्ष मात्रसे भी मनुष्य घूमने लगते हैं, तो फिर तुझे तो यह अपने हायसे किरा रही है। ४ यहापर 'विधी यके मनि' इस वाक्याश पर लेप है । संस्कृतमें 'विधु' भन्द चंद्रका याचक है और 'विधि विघाताका । इन दोनों शन्का सप्तमी विभक्ति एक वचनमें 'विधी' ऐमा रूप बनता है ।शिवके पश्में 'विधुके या होनेपर और दूसरे पक्ष 'विधिके वफ होनेपर' ऐसा अयं घटाया गया है।
३२] प्रयन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश इस तरह के उसके अन्य बहुत वाक्य हैं जो परम्पराके अनुसार जानने चाहिये। बादमें उस मुख को मारकर उसका सिर सूलीमें पिरोकर अपने आँगन में रखवाया और उसमें रोज दही लगवा लगवाकर अपने अमर्पका पोषण करता रहा। ४२. जो मुख यशका पुञ्ज था, हाथियोंका पति था, अवन्ती का स्वामी था, सरस्वतीका पुत्र था, प्राचीन कालके जैसा कृती पुरुष था; वही कर्णाट देश के राजाके द्वारा अपने मंत्रीकी कुबुद्धिसे पकड़ा गया और सूलीपर चढ़ा दिया गया। हाय, कर्मकी गति कैसी विषम है। ३८) उसके बाद, माल वा मण्डल के मंत्रियोंने जब यह वृत्तान्त सुना तो, उन्होंने फिर उसके भतीजे मोज को राज्य पदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार श्रीमेरुतुङ्गाचार्य रचित प्रबंधचिन्तामणि प्रन्यका 'राजा श्रीविक्रमादित्य प्रभृति महासाहसिक और परोपकार-आदि गुणरूपी रत्नोंसे अलंकृत राजाओंके चरित्र' नामक यह पहला प्रकाश समाप्त हुआ। * मालूम होता है मुंजकी यह करुण कया उस जमानेमें बहुव लोक प्रसिद्ध और लोक साहित्यकी विशिष्ट वस्तु बनी हुई पी । मेनुनसरिने जो यहाँ पर ये कुछ संस्कृत, प्राकृत और देश्य पद्य दिये है वे या तो भिन्न भिन्न कर्तृक मुंज विषयक प्रबर्मेिसे उद्धृत किये गये हैं; या परपरासे सुनकर लिख लिये गये हैं। मुजकी इस क्यामें एक तो सपत्तिकी अस्थिरता और दूसरी स्त्रीकी अविश्वसनीयता और तीसरी मुंज जैसे महावद्धिवान् शतिवान् राजाकी, दुदमनके द्वारा की गई त्रासोत्पादक विटंबना- इन तीन बातोंका विचित्र संघटन हो जानेसे उपदेशों को अपने उपदेशलिये यह एक वास्तविक घटनाका बतलानेवाला करुण रसका दोघदायक आख्यान ही मिल गया। अभी तक निश्चय नहीं हो सका कि इस क्यामें ऐतिहासिक तथ्य कितना है और प्रबन्धकारोंकी बनावट कितनी है। यहाँपर जो पद्य दिये गये हैं वे तो प्रबन्धकार्येकी उपदेशात्मक उक्तियाँ मात्र हैं। कुछ पद्य तो मेस्तुसरिके भी पीछेके बने हुए हैं और किसीने प्रसगोचित समझकर इस अयमें प्रक्षिप्त कर दिये हैं। १. दही लगवाने का मतलब यह कि उसे देखकर कौए आवे और उस मस्तकपर बैठे। किसी दुश्मनका बहुत ही मुरा चाहना होता है तब रोग बोला करते हैं कि उसके सिरपर तो कोए बैठेंगे। उसी लोकोक्तिका सूचक यह कयन है। - प्रकरण ३९-४२ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [३३ ७. भोज और भीमका प्रवन्ध । ३९) इसके बाद [सं० १०७८ के साल ] जब मा ल वं मण्डल में श्री भोज राज राज्य करता था, तब इधर गूर्जर भूमि में चौ लु क्य चक्रवर्ति भी म पृथिवीका शासन करता था। एक रात्रिके अन्तमें राजा भोज ने, अपने चित्तमें लक्ष्मीकी अस्थिरताको विचारते हुए और अपने जीवनको भी तरंगकी भाँति चञ्चल समझते हुए, प्रातः कृत्यके बाद, दानमण्डपमें बैठकर नौकरोंके द्वारा याचकोंको बुला, यथेच्छ सुवर्ण टंकोंका ( सोनेकी मोहरोंका) दान देना प्रारंभ किया। ४०) इस पर, रोह क नामक उसके मंत्रीने, खजानेका नाश होता देख, राजाके औदार्य गुणको दोष समझते हुए उसे रोकनेके लिये अन्य उपायोंसे समर्थ न होकर, एक दिन सर्वावसर (न्याय सभा) के उठ जाने बाद सभामण्डपके भारपट्ट पर खड़ियासे इन अक्षरोंको लिख दिया-आपत्ति कालके लिये धनकी रक्षा करनी चाहिए। प्रातः काल यथा समय राजाने उन अक्षरों को पढ़ा | सभी परिजनों में से किसीने भी जब उस कार्यके करनेका स्वीकार नहीं किया तो राजाने उसके साथ यह लिख दिया-भाग्यवानको आपत्ति कहां है। इस पर मंत्रीने जबापमें लिखा कि-कभी दैव कुपित हो जाय तो । इस पर राजाने फिर उसके सामने लिख दिया कि-[ तब तो ] सञ्चित भी विनष्ट हो जायगा । इससे निरुत्तर होकर उस मंत्रीने अभय वचन माँगकर उस कथनको अपना लिखा बताया। बादमें राजाने कहा, कि मेरे मनरूपी हाथीको ज्ञानरूप अंकुशसे वशमें रखनेके लिये महामात्रके समान ५०० पण्डितोंका यह समूह यथेच्छ रूपसे अपना अपना ग्रास प्राप्त किया करें। राजाने अपने जीवनका ध्येय सूचित करनेवाली ऐसी चार आर्याओंको अपने कङ्कणपर खुदवाई जिनका अर्थ यह है- ४४. यही उपकार करनेका अवसर है; जब तक कि स्वभावतः ही चञ्चल ऐसी यह सम्पत्ति विद्यमान है। फिर वह विपत्ति कि जिसका उदय भी निश्चित है, उसके आनेपर उपकार करनेका अवसर कहाँ रहेगा । ४५. हे पूर्णिमाके चन्द्रमा ! अपने किरण-समूहकी समृद्धिसे अभी आज इस सारे भुवनको उज्ज्वल कर दे। [ फिर यह मौका न मिलेगा, क्यों कि ] निर्दय विधाता चिरकाल तक किसीका सुस्थिर होना सह नहीं सकता। ४६. ऐ सरोबर ! दिन और रात याचकोंका उपकार करनेका यही अवसर है । यह जल तो उन पुराने बादलोंके उदय होनेपर फिर सर्व-सुलभ ही है। ४७. ऐ किनारेके वृक्षोंको गिरा देनेवाली नदी ! यह सुदूर तक उन्नत दिखाई देनेवाला पानीका पूर तो कुछ ही दिनों तक ठहरेगा; पर यह एक पातक (पेड़का गिरा देना ) तो चिरस्थायी होकर रहेगा। और फिर- १ इसका मतलब यह है कि राजा भोजने अपने पास ५०० पडित रक्खे थे जिनके निर्वाह के लिये राज्यकी ओरसे स्थायी प्रासका प्रबन्ध कर दिया गया था। २ पुराने जमानेमें यह एक प्रथा थी कि-विचारशील लोग, जिस किसी सद्विचारको अपना जीवन-ध्येय यना लेते ये उसका सतत स्मरण रहा करे इसलिये उस विचारके सूत्रको अपने हायके कंकणपर उत्तीर्ग कय (खुदा) लेते थे और उसका सदैव अवलोकन किया करते थे। वस्तुपाल आदि अन्य भी महापुरुषोंने अपने जीवनसून कंकणपर खुदवा रक्खे थे।
३४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ४८. सूर्यके अस्त होनेके पहले जो धन याचकोंको नहीं दे दिया गया, मैं नहीं जानता, वह धन प्रातःकाल किसका होगा। इस प्रकार अपना ही बनाया हुआ यह श्लोफ जो मेरे कण्ठका आमरण-सा होगया है उसको इष्ट मंत्रकी तरह जपता हुआ, हे मनिन् ! मैं आप जैसे प्रेतके समान [ लोभी ] पुरुषप्ते कैसे ठगा जा सकता हूँ। ४१) एक दूसरे अपप्तरपर, राजा राजपाटिकामें घूमता हुआ नदी के किनारे जा खडा हुआ। वहाँ सिरपर काठका भारा उठाए हुए और पानीको लाँच कर आते हुए किसी दरिद्री ब्राह्मणको देखा। उससे उसने पूछा कि- १९. 'कितना है पानी ब्राह्मण !' उसने कहा-'घुटने तक हे राजा।' राजाने फिर पूछा- तेरी अवस्था ऐसी क्यों ? ' यह बोला-' आप जैसे सब कहीं नहीं !" उसके इस वाक्यको सुनकर राजाने जो पारितोषिक उसे दिया, मंत्रीने धर्म-खातमें इस प्रकार लिख रखा- ५०. " जानुदन" ( जानुतक ) फहनेवाले ब्राह्मणको सन्तुष्ट होकर भोजने एक लाख, फिर एक लाख, फिर एक लाख; और उसपर दस मतवाले हाथी; इस प्रकार दान दिया। ४२) एक दूसरी बार रातमें, आधीरातको राजाकी अचानक नींद खुली । उस समय आकाशमण्डलमें चंद्रमा नया ही उदित हुआ था । उसे देखकर वह अपने विद्यारूपी समुद्रके उठते हुए तरंगके जैसा यह काव्या बोलने लगा- ५१. यह चंद्रमाके भीतर, बादल के टुकड़ेकी-सी जो लीला कर रहा है लोग उसे शशक (खर- गोश ) कहते हैं, किन्तु मुझे वह ऐसा नहीं मालूम देता । रानाके पारंवार ऐसा कहनेपर, कोई चोर जो उसी समय सेंध मारकर, कोशगृहमें घुसा था, अपने प्रतिमाके वेगको रोकनेमें असमर्थ होकर बोल उठा- ' में तो चंद्रमाको ऐसा समझता हूँ कि तुम्हारे शत्रुओंकी विरहाकान्त तरुणियों (स्त्रियों ) के कटाक्षरूपी उल्कापातके सैकड़ों व्रणके चिन्हसे यह अंकित हो रहा है।' उसके ऐसा बोल पड़ने पर, अंगरक्षकोंने उसे पकड़ लिया और कारागारमें बंद कर दिया। इसके बाद प्रातःकाल, समाने ले आये हुए उस चोरको राजाने जिस पारितोषिकसे पुरस्कृत किया, उसे धर्म-खाताके फाममें नियुक्त अविकारीने इस प्रकार लिखा-- ५२. उस चोरको, जिसे मृत्युका भय लगा हुआ था, राजाने ऊपर लिखे दो चरणोंके लिये प्रसन्न होकर यह दान दिया-दस करोड़ सुवर्ण मुद्रायें और ऊपर आठ हाथी, जो दाँतोंके आघातसे पर्वतका भेदन करते थे और जिनके मदसे मुदित हो कर भौरे गुञ्जारव किया करते थे । [किर एक बार खिड़की की जालीसे आते हुए चंद्रमाको देख कर बोला- ४७] हे मुझु ! खिड़कीकी जालीमेंसे प्रवेश करनेके कारण जिसकी चाँदनी खंड खंड हो गई है, यह चंद्रमा, तुम्हारे वक्षःस्थल पर आकर विराज रहा उसी समय घरमें प्रवेश करनेवाले चौरने कहा- ' यह चन्द्रमा मानों तुम्हारे स्तनके संगफी आसक्तिके यश होकर आकाश से झपापात कर नीचे कूदा दे और दूरमे गिरनेके कारण खंड खंड हो गया है।' इस चोरको मी उसी तरहका दान दिया गया और उसे धर्मवहीमें लिग लिया गया।] .
प्रकरण ४३-४४ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [३५ ४३) इसके बाद, एक बार, जब वह बही [ राजाके आगे] वांची जाने लगी तो राजा अपनेको बड़ा उदार दानी मानकर घमंडरूपी भूतसे आविष्ट होनेकी भाँति- ५३. मैंने वह किया जो किसीने नहीं किया, वह दिया जो किसीने नहीं दिया, वह साधना की जो असाध्य थी, इसलिये [अब ] हमारा चित्त दुःखित नहीं है। इस प्रकार वारंवार अपने भाग्यकी प्रशंसा करने लगा । तब किसी पुराने मंत्रीने, उसके अभिमानको 'दूर करनेकी इच्छासे, श्री विक्र मा दित्य को धर्म-वही राजाको दिखाई । उसके ऊपरवाले विभागमें शुरूमें ही पहला काव्य इस प्रकार था- ५४. तुम्हारे मुखकमलमें 'सरस्वती' वसती है, ' शोण' तो तुम्हारा अधर ही है, और रामचन्द्रके वीर्यको स्मृति दिलानेमें पटु ऐसी तुम्हारी दक्षिण भुजा ' समुद्र' है । ये वाहिनियाँ (सेना और नदियाँ) सदा तुम्हारे पास रहती हैं; क्षणभर भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ती; और फिर तुम्हारे अंदर ही यह स्वच्छ मानस (मानसरोवर, मन ) है; तो फिर हे राजन् , तुम्हें जलपानकी अभि- लाषा क्यों हो?' इस काव्यके पारितोषिकमें राजाने इस प्रकार दान दिया था- ५५. आठ करोड़ स्वर्णमुद्रा, ९३ तुला मोती, मदमत्त भौरोंके कारण क्रोधसे उद्धत ऐसे ५० हाथी, चलने में चतुर ऐसे दस हजार घोड़े और सौ वैश्यायें;-यह सब जो पाण्डय राजाने दण्डके स्वरूपमें विक्रम राजाको भेट किया था, वह उसने उस वैतालिकको दानमें दे दिया। इस प्रकार उस कान्यके अर्थको जानकर, विक्रम की उदारतासे अपने सारे गर्व सर्वस्वको पराजित मानकर, उस बही की पूजा करके उसे यथास्थान रखवा दिया। ४४) एक समय, प्रतीहारने आकर सूचित किया-' महाराजके दर्शनके लिये उत्सुक ऐसा एक सरस्वती-कुटुम्ब द्वारपर खडा है । ' शीघ्र प्रवेश कराओ' राजाकी ऐसी आज्ञा होनेपर पहले उसकी दासीने प्रवेश करके कहा- ५६. बाप भी विद्वान् है, बापका बेटा भी विद्वान् है, माँ भी विदुषी है, मॉकी लड़की भी विदुषी है; जो उनकी बिचारी कानी दासी है वह भी विदुषी है; इसलिये हे राजन् ! मैं समझती हूँ कि यह सारा कुटुम्ब ही विद्याका एक पुञ्ज उसके इस हास्यकर वचनसे राजाने जरा हँसकर, उनमेंके सबसे बड़े पुरुषको बुलाया और यह समस्या दी-' असारसे सारका उद्धार करना चाहिये ।' [ उसने इसकी पूर्ति इस तरह की-] ५७. धनसे दान, वचनसे सत्य, और वैसे ही आयुसे धर्म और कीर्ति तथा शरीरसे परोपकार-इस प्रकार असारसे सारका उद्धार करना चाहिये । १ किसी समय विक्रम राजाने अपने नोकरसे पीनेको पानी मागा तब पासमें बैठे हुए किसी कविने यह पद्य बनाया और राजाको सुनाया । इसमें, सरस्वती, शोण, दक्षिण समुद्र, मानस और वाहिनी इतने शन्दोंपर श्लेष है । ये सब शन्द धर्यक हैं, जिनमें एक अर्थ प्रसिद्ध जलाश्रय वाचक है और दूसरा अन्याय वाचक है । यथा-सरस्वती-१ नदी, २ विद्यादेवी शोण= १ नद, २ लालवर्ण; दक्षिण समुद्र=१ महासागर, २ मुद्रावाला हाथ; वाहिनी-१ सेना, २ नदी; मानस-१ सरोवर, २ मन । २ इस पद्यमें जो सामग्री वर्णित की गई है वह विक्रम राजाको दक्षिणके पाण्डय राजाने दण्डके रूपमें दी थी और उसी सामग्रीको विक्रमने किसी वैतालिक यानि स्तुतिपाठक कविको, उक्त श्लोकके कहनेपर पारितोषिकके रूपमें-दानमें दे दिया; यह इसका तात्पर्य है। .
? ३६] प्रवन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश इसके बाद राजाने उसके पुत्रको [ यह समस्या दी ]-'हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है ! - 'प्रवाल (राणाकुर)की शय्याको शरीरका शरण' बनाया। राजाके इस वाक्यको सुनकर उसने उत्तर दिया- ५८. वह जो हिमालय नामक पर्वतोंका राजा है, तुम्हारे प्रतापरूपी अग्निसे पिवळ रहा है; और रिरहसे आतुर बनी हुई भेना (हिमाट्य-पन्नी मेनका) अपने शरीरको प्रयाल (तृणांकुरों) की शय्याके गरण कर रही है। इस प्रकार उसके समस्या पूरी कर देनेपर, ज्येष्टकी पत्नीको राजाने समस्याका यह पद अर्पित किया- किससे पिलाऊँ दूध ५९. जब रावण पैदा हुआ तो उसके एक शरीरपर दस मुँह देख कर उसकी माता बड़ी विस्मित हुई और सोचने टगी कि कौनसे मुँहसे इमे दूध पिलाऊँ ! -उसने इस प्रकार यह समस्या पूरी की। इसके बाद राजाने दासीसे भी इस प्रकारका पद सयस्याके लिये दिया-'कंठमें काफ लटक रहा है।' ६०. पतिविरहसे कराल बनी हुई किसी स्त्रीने उस बेचारे कौवेको उडाया तो, बड़ा आश्चर्य मैंने है सखि ! यह देखा कि वह काफ उसके कंटमें स्टक रहा *। उसने इस तरह पूरा किया। राजाने उस कुटुंबमेंझी लड़कीको भूटकर, अन्य सबको सत्कार करके विदा किया। बादमें राजाने जब सर्वारसर ( राजसमा ) का विसर्जन किया और स्वयं चन्द्रशाला (चाँदनी महलके ऊपरकी छत ) की भूमिमें छत्र धारण करके टहल रहा था, तब द्वारपालने उस लड़कीका वृत्तान्त कहा । राजाने उसे [ बुटाकर ] कहा-'कुछ बोलो'नो वह बोली कि- ६१. हे राजन् , हे मुचकुङके दीपक, हे समस्त पृथ्वीके पालक, राजाओंके चूडामणि ! इस भवनमें रातमे भी, तुम इस प्रकार टन धारण करते हो वह उचित ही है। इससे न तो तुम्हारे मुखकी कारिको देखकर चंद्रमाको लजित होना पड़ता है और न भगवती अरुन्धतीको (पर पुरुषके मुखदर्शनसे) दुःशीलताका माजन होना पड़ता है। उसके इस वाक्यके अनन्तर राजाने, जिसके चिचको उसके सौन्दर्य और चातुर्यने हरण कर लिया था, उमसे रिवाह करके अपनी मोगिनी बनाया। . * इस पद्य ' काउ' इस देश्य शन्दपर श्लेप है। काउ काग-का-कोआ वाचक तो प्रसिद्ध है ही-इसके सिवा गलेमें जो एक स्टक्ता टुआ छोटामा मामरिंड है उसका नाम मी काक-काग (गूजराती-कागहा ) है। कोई विहिनी स्त्रीका शरीर इतना कृश होगया है कि जिसमे उसके कटमें लटकता हुआ काम सटवया बहार दिखाई देता है। उसके घरके सामने आ आकर कोमा बोलता है, जिसका यह अर्थ समझा जाता है कि, उसका स्वजन आनेवाला है। लेकिन उसके बारबार ऐसा बोलने पर भी वह जर नहीं आता मालूम देता है तो फिर वह विरहिनी चिढकर उस कौवेको उहा देती है। इस कौवेके उडाते समय उसके पाममें बेटी हुई सम्मिको उसके दुर्वन्ट कटमका वह काग नजर आया । इस अयंकी घटना बतलाने के लिये कविने इस पदम 'काउ' शब्दका प्रयोग कर उसकी समस्यापूर्ति बनाई है। इस ग्रंथके गुजराती और इंग्रजी मापातरकारोंने इन पद्योंके कुछ पुछ उटपटाग अर्थ किये है।
प्रकरण ४५-४६ ] भोज और भीमका प्रवन्ध [३७ भीम के पास भोजकी गूजरातके राजा भीमके प्रति प्रतिस्पर्धा । ४५) इसके बाद, एक समय, संधिपत्रके होते हुए भी, सन्धिमें दोप उत्पादनके विचारसे भोज राजा ने गूर्जर देश की बुद्धिमत्ताका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे अपने सान्धिविग्रहिकके हाथ, यह [प्राकृत ] गाथा लिख भेजी- ६२. क्रीडा मात्रमें जिसने हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण किया हो और चारों दिशामें जिसका प्रताप फैल रहा हो उस सिंहका, मृगके साथ तो विग्रह ही [शोभता है और न सन्धि ही रहती है। भीम ने इस गाथाका उत्तर देनेके लिये सब महाकवियों ने गाथा माँगी। पर उनकी बनाई सब गाथाओंको निःसारार्थक देखकर वह सोचमें पड़ गया। उसी समय नगरमेंके जैन मन्दिरके अन्दर नाचनेके लिये सज बनी हुई नर्तकीको खंभेके पास खडी हुई देखकर मंत्रीने यहीं बैठे हुए किसी आचार्य-शिष्यसे स्तंभ-वर्णनके लिये कहा । वह बोला- [४८ ] हे स्तंभ ! तुम जो इस मृगनयनी नवयौवनाकी, कंकणाभरण आदिसे सजित बाहुलतासे [वेष्टित होकर भी ] न स्वेद-युक्त होते हो, न हिलते हो और न काँपते हो; सो सचमुच ही तुम पत्थरके बने हो यह निश्चित होता है। [आचार्य-शिष्यकी विद्वत्ताकी यह बात जब मंत्रीने राजासे कही तो राजाने [उसके गुरु ] आचार्यको चुलाकर उस विषयमें पूछा- ६३. विधाताने भीम को अन्ध क के * पुत्रों को मारनेके लिये ही निर्माण किया है । जिस भी मने सौ [ अन्धक पुत्रों ] को कुछ नहीं गिना उसके सामने तुझ अफेलेकी क्या गणना है।" इस प्रकार गोविन्दा चार्य की बनाई हुई चित्तको चमत्कृत कर देनेवाली इस गाथाको दूतके हाथ भेजकर, सन्धिके दोपको दूर किया । ४६) बादमें किसी एक रातको, जाइके दिनोंमें, राजा जब वीरच में घूम रहा था, तो किसी मन्दिरके सामने, किसी पुरुषको यह पढ़ते सुना- ६४. मेरा पेट भूखसे व्याकुल है, ओंठ फट गये हैं, ऐसी अवस्थामें इंकते इंफते आग ठंडी हो गई है, चिन्ताके समुद्र में डूब रहा हूँ, शीतसे मापके फटकी तरह सिकुड़ गया हूँ। निद्रा अपमानिता स्त्रीको भाँति कहीं दूर चली गई है; और सत्पात्रमें दी गई लक्ष्मीकी भाँति रात भी खतम नहीं हो रही है। यह सुनकर रात बिताकर सपेरे उसे बुलाकर पूछा- किस प्रकार तुमने रात्रिशेपमें शीतका अत्यन्त उपद्रव सहन किया !'' सपात्रमें दी गई लक्ष्मी ' इत्यादि कथनकी ओर संकेत करके उसने कहा था । [ यह बोला-] 'महाराज ! मैं खूब गादे तीन यत्रोंसे जाड़ा काटता हूँ।' राजाने पूछा कि तुम्हारे ये तीन यस क्या है तब उसने फिर कहा- ६५. रानमें घुटने, दिनमें सूर्य और दोनों शामको आग, इस प्रकार हे राजन् ! घुटने, सूर्य और आगके वलपर में शीत काटता हूँ। जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने उसे तीन लाखका दान देकर सन्तुष्ट किया। ६६. तुमने अपनी आमाको धारण करके बलि, कर्ण आदि उन त्यागमती धनवान पुरुषोंको मुक्कार • यहार 'अन्धक' स सन्दसर भी है। कौरवोंका रिता धृतराष्ट्र अन्या या इमान्टिये उसको मन्धक का है। भोजका निशा मधुर भी अन्धा या इसलिये उसका विशेषग भी अन्यक सार्थक है। ।
३८] प्रयन्यचिन्तामणि [द्वितीय प्रकार दिया, जो सबनोंके चित्तरूपी कैदखानेमें आवद्ध थे। इस प्रकार जब वह सारवान् काव्यका उहार प्रकट कर रहा था तो राजाने उसका परितोषिक देनेमें अपनेको असमर्थ समझ कर अनुरोधपूर्वक रोक दिया। [ यहाँ P. B. नापक प्रतिमें निम्नांकित वर्णन अधिक पाया जाता है-] [१९] शीतसे रक्षा करनेके लिये पटी ( वन ) नहीं है, आग सुलगाने के लिये सगड़ी नहीं है। कमर भूमिपर घिस गई है-सोनेको शय्या नहीं है, कुटियामें हवाफे रोकनेका कोई उपाय नहीं है, खानेको मुट्टीमर चावट नहीं है, घडीभर भी मनमें संतोष नहीं है, शृंगार की कोई वृत्ति नहीं है, मनको प्रसन्न करनेवाली कोई प्रिया नहीं है, लेनदारोंसे संकटमें पडा हूँ; ऐसी दशामें है भोजराज ! तुम्हारे कृपारूपी हायी द्वारा ही मेरी इस आपदाकी तटीका नाश हो सकता है। इस श्लोरमें आई हुई ग्यारह टी' के हिसाबसे मोजराजा ने उसे ११ लाखका दान दिया। एक वार, किसी विद्वत् कुलके निवासके लिये घर देखे जा रहे थे। उनके न मिलनेपर राजाने कहा कि जुलाहों और मच्छीमारोंको उजाइ दिया जाय । जब राजपुस्प टन्हें उजाइने लगे तो एक जुटाहा उन्हें रोककर रानाके पास गया, और वोडा कि-महाराज ! क्यों हमें उजाड़ रहे हैं ! तो राजाने पूंछा क्या तूं कविता करता है। वह बोला- [५० ] जिसके चरणोंपर राजाओंके मुकुटके मणि लोटते रहते हैं ऐसे हे साह सां क महाराज! मैं काव्य तो करता हूँ पर मुन्दर नहीं कर पाता । जैसा-तैसा करता हूँ पर सिद्ध नहीं होता। मैं उसका क्या करूँ ? में करिता करता हूँ, कपडा बुनता हूँ और अब जाता हूँ। धीवरकी बहू मी हायमें माँस टेकर राजाके पास गई और बोली- [५१] 'महाराज, तुम्हारी जय हो!'-'तू कौन है ?'-' लुब्धक (धीर) की बहू ।'-'हायमें यह क्या है !'-'मांस !'-'सूखा क्यों है ?'-'यो ही'-और यदि महाराज! आपको कौतुक हो तो कहती हूँ कि तुम्हारे शत्रुओंकी प्रियाओंके ऑमूकी नदीके किनारे सिद्धोंकी स्त्रियाँ गान करती है । गीतमें अन्धे होकर हरिण चरते नहीं । इसलिये उनका यह मांस दुर्बल हो गया है । इस प्रकार उक्ति-प्रयुक्तिमय ये दो काव्य मुनकर राजाने उन्हें नगरके भीतर स्थापन किया। एक वार, कोई विद्वान् , जो गर्वोद्वत था, उस नगरके निवामियोंको घरमें ही गरजनेगले समझकर अवज्ञापूर्वक वादके लिये आया । नगरके समीप किसी पुरुषसे (धोबीसे) जो वन धो रहा था बोला-'अरे साड़ीका मैल धोनेनाले ! नगरमें क्या हालचाल हो रहा है!' वह बोटा- [५२] घोहे तोरण टगे हुए मकानों ढोते है, गाय केसरके सहित कमलोंको चरती है, दही यहाँ- पर पीला मिटता है, तिलोमें यहाँ तैल नहीं होता और मकानोंके दरवाजेके शिखरपर हिरण चरा करते है। इसके बाद, फिसी बाटिकासे पूछा-'तू कौन है?' तो वह बोटी- [५३] मरे हुए जहाँ जीदा होते हैं, जिनकी आयु वीत गई है वे उच्चासत होते हैं और अपने गोत्रमें जहाँ कलह होता है, मैं उस कुटकी वाटिका हूँ। इमका बर्थ न समझकर उसने विचार किया, कि जहाँ बाटिका भी इस तरहकी विद्यावाटी है यहाँके विद्वान् कैसे होंगे, बह उठे पा टौट गया। १ इम ऋयेकी 2'निमके यंतमें है ऐसे पटी, कटी, कुटी, घटी, वटी इत्यादि ११ शब्द आये हैं उन शब्दोंको गिनासा भी बने उस कविको दान दिया ऐमा इसका तात्पर्य है। .
प्रकरण ४७-५० ] भोज और भीमका प्रवन्ध [३९ . . १७) इसके बाद, एक दूसरे अवसरमें, राजा राजपाटीमें भ्रमणार्थ हाथीपर चढ़कर नगरके भीतर जा रहा था। उस समस किसी भिक्षुकको, पृथिवीपर गिरे हुए अन्न-कणोंको चुनते हुए देखकर बोला- ६७. अपना पेट भरनेमें भी जो असमर्थ है उनके जन्म लेनेसे क्या है? -इस प्रकार उसके पूर्वार्ध कहनेपर; सुसमर्थ होकर भी जो परोपकारी नहीं उनके [जन्म लेने ) से भी क्या है ! ६८. 'उनके [ जन्म लेने ] से भी क्या है' यह कहनेपर, दानशूर भोज नरेन्द्र ने उसको सौ हाथी और एक करोड़ सुवर्ण मुद्रायें दीं। उसके इस वचनके अन्तमें [राजाने कहा- ६९. हे जननि ! ऐसा पुत्र न जन जो दूसरोंके आगे प्रार्थना किया करें। उसके इस वाक्यके पश्चात् [भिक्षुक बोला]- उसको भी उदरमें न धारण कर जो दूसरोंकी प्रार्थनाका भंग करें। जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाने पूछा- तुम कौन हो ?' इस पर नगरके प्रधान पुरुषोंने कहा, कि आपके यहाँ, नाना भाँतिके विद्वानोंकी घटामें जब अन्य किसी उपायसे प्रवेश न पा सका तो इसी प्रपञ्चसे स्वामिदर्शनकी इच्छा रखनेवाला यह [ व्यक्ति ] राजशेखर है । उसको उचित महादानोंसे पुरस्कृत करनेपर उस राजशेखर ने ये कवितायें पढ़ी- [५४ ] अच्छृखल मेवोंके नादसे नाचती हुई: मयूरियोंकी उन्नत आवाज़से आकुल, मेघागमन कालमें (वर्षामें ) तो जमीनपर भी जल सुविधासे मिल जाया करता है । लेकिन, इस भयानक उष्णता भरे ग्रीष्म कालमें करुणासे एक दूमरेकी ओर देखनेवाली और इधर उधर ताकती हुई मछलियोंका यदि तू पालन नहीं करता, तो, रे कासार ( तालाब ) तेरी फिर सारता ही क्या है ! जिस सरोवरमें, मेंढ़क मरे हुओंको भाँति कोटरोंमें गये थे, कछुए पृथ्वीमें छिप गये थे, और गाढ़े पंकके ऊपर लोटनेसे मछलियाँ वारंवार मूर्छित हो रही थी, उसी तालाबमें, अकालके मेघने उतरकर ऐसा किया कि उसमें कुंभस्थल तक इवे हुए हाथियों के झुंड पानी पी रहे हैं । इस प्रकार अ का ल ज ल द राज शेखर की यह उक्ति है। * राजा भोजकी गूजरातपर आक्रमण करनेकी इच्छा। ४८) इसके बाद, किसी साल, वर्षा न होनेके कारण राजा भी म के देशमें (गूजरात में) जब, कण और तृण भी नहीं मिलता था ऐसे कुसमयमें, राजपुरुषोंने भोज का आना बताया ( अर्थात्-भोजराजाने गूजरात पर चढाई करनेकी बात चलाई )। यह सुनकर भीम को चिन्ता हुई और उसने अपने दाम र नामक सान्धि- विग्रहिकको आदेश किया कि कुछ दण्ड देकर इस साल भोज को यहाँ आनेसे रोको । उसका यह आदेश पाकर वह वहाँ गया । वह दामर अत्यंत कुरूप समझा जाता था। भोजने [ उसका उपहास करनेकी दृष्टिसे ] कहा- ७१. ' हे ब्राह्मण ! तुम्हारे स्वामीके सन्धि-विग्रह पदपर तुम्हारे जैसे कितने दूत हैं ? [उत्तर- । यों तो बहुत ही है, हे मालव-नरेश ! पर वे सब गुणको दृष्टिसे तीन प्रकारके हैं-अधम, मध्यम और उत्तम । [ इनमें ] जो जिस गुणके योग्य होता है उसीके अनुसार ये दूत उन उन 4 । ४०] प्रयन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश राज्यों में भेजे जाते हैं।' इस प्रकार भीतर ही भीतर हँसते हुए उत्तर देकर उसने धारा के स्वामी ( भोज ) को प्रसन्न किया । इस प्रकार उसकी वचन-चातुरीसे राजा चमकृत हुआ। गूर्जर देश के प्रति प्रयाण करनेका राजाने नगाड़ा बजवाया । प्रयाण के समय वंदीने यह स्तुतिपाठ किया- ७२. चौह [ का राजा ] समुद्रकी गोदमें प्रवेश कर रहा है और आन्ध्र [ पति ] पर्वतकी खोहमें निवास कर रहा है, कीट का राजा पट्ट बंध ( पगड़ी बाँधना ) नहीं करता है, गूर्जर [ का राजा ] निर्झरका आश्रय लेता है, चेदि [ नरेश ] अस्त्रोंसे म्टान होगया है और राजाओंमें सुमट समान कान्य कुम्न कूबड़ा होगया है-हे भोज! तुम्हारे मात्र मेनातंत्रके प्रसारके भयसे हो सभी राजा लोक व्याकुल हो रहे हैं। ७३. को क ण [ का राजा ] कोनमें, लाट ( नरेश ) दरवाजे के पास, कलिङ्ग [ पति ] आँगनमें सोया करते हैं । अरे को शल [ नरेश ), तू अभी नया है, मेरे पिता भी इस आसनपर सोया करते थे । इस प्रकार जिस ( भोज ) के कारागृहमें रातमें प्रत्यर्थियोंमें स्थानप्रापिके लिये उठा हुआ पारस्परिक विरोध निरंतर बढ़ाता रहता है। प्रयाण के लिये नगाड़े बजवाये जानेके बाद, रातको समस्त राजाओंकी दुर्दशाका दृश्य दिखलानेराला नाटक अभिनीत होने लगा। उसमें कोई क्रुद्र राजा, कारागारके भीतर सामनेकी ज़मीनपर मुस्थ भारसे सोय हुए तै लिप राजाको उठाने टगा । तै लिप ने उससे कहा- मैं तो यहाँ पुस्त-दर-पुश्तसे वास कर रहा हूँ, आप जैसे नये आये हुए राजाकी बातसे अपना पद कैसे छोड़ दूं!' राजा भोज ने हँसकर दाम र से नाटकके रसारतारकी प्रशंसा की। इसपर वह बोटा-महाराज ! यद्यपि नाटकमें रसकी जमावट बहुत उत्तम है तथापि इस नटकी, कथानायकके वृत्तान्तसे जो नितान्त अनभिज्ञता है वह विक है । क्यों कि राजा तै लिप देव सूलीपर चढ़ाये हुए मुख के सिरसे पहचाना जाता है । समाके सामने जब उसने इस प्रकार कहा तो राजाको उसकी निर्भर्त्सनापर क्रोष हो आया और उसी समय उस सामग्री के साथ, जो दूसरोंके जुटाये न जुट सकती थी, तिलग देशके प्रति प्रयाण किया । ४९) बादमें तैलि पदेव को बड़ी भारी सेनाके साथ आता हुआ सुनकर भोज व्याकुल हुआ। उतनेमें उसे दामर ने [ अपने ] राजाके यहाँसे आये हुए एक कल्पित (जाली) आदेशको दिखाकर कहा कि मी म मी चढकर मोग पुर तक आगया है । जलेपर नामक छिड़कनेके समान उसकी उस वातसे राजा मोज खूब सचिंत हो गया। उसने दामरसे कहा-इस वर्ष किसी तरह तुम अपने स्वामीको यहाँ आनेसे रोको । उसने बार बार इस प्रकार दीनताके साथ कहा और उस अबसरके जाननेवाले [दा मर] को हाथी के साथ हथिनी भेंट दी । उनको लेकर वह पत्तन में आया और भी म को परितुष्ट किया । ५०) एक बार, जब वह धर्मशास्त्र सुन रहा था, उस समय अर्जुनका राया-वेब (मत्स्य-वेध ) मुनकर सोचा कि ' अभ्यास करनेपर क्या कठिन है।' फिर वरावर अभ्यास करके उस विश्वविदित राधावेधको उसने सिद्ध किया और उसकी सारे नगरवासियों को जान हो इसलिये नगरमें खूब सजावट कराई। किन्तु एक तैली और एक दीके, अमज्ञासे उत्सबमें कोई भाग न लेने पर, रजाको उसकी खबर की गई। तैलाने चंद्रशाला (ऊपरी छन ) पर खड़े होकर, पृथ्वीपर रखे हुए संकडे मुँह के पात्रमें तेल डालकर; और दान पृथ्वीपर खड़े होकर ऊपरकी ओर उठाये सूतके दोरेके अग्रमागको आकाशसे पड़ती हुई मुईके छेदमें प्रकरण ५१-५५ ] भोज और भीमका प्रबन्ध [४१ पिरो कर अपने अभ्यास-कौशलका परिचय दिया; और फिर राजासे 'यदि शक्ति है तो स्वामी भी ऐसा कर दिखा ऐसा कह कर राजाका गर्व खंडित किया । [उसका राधावेध करना देखकर किसो कविने उसकी प्रशंसामें कहा-] हे भोजराज ! मैंने राधा-वेध र मत्स्य-वेध ) का कारण जान लिया । वह यह कि आप 'धारा' के विपरीत ( राधा) को नहीं सह सकते । ५१) विद्वानों द्वारा इस प्रकार प्रशंसित होते हुए उस राजाको नया नगर वसानेकी इच्छा हुई तो उसने पटह बजगया । उस समय धारा नामक एक वेश्या अपने अग्नि वे ताल नामक पतिके साथ लं का जाकर उस नगरका निवेश देख आई; और उसने यह कह कर कि नगरको मेरा नाम देना, लंका का प्रतिच्छन्द पट (मानचित्र ) राजाको दिया । उसके अनुसार राजाने नई धारा नगरी वसाई । दिगंबर कुलचन्द्रको सेनापति बनाना । ५२) किसी दिन वह राजा सायंकालके सर्वावसरके बाद अपने नगरके भीतर [ वीरचर्या निमित्त ] घूम रहा था, उसी समय किसी दिगंबर विद्वान्को यह कविता पढ़ते सुना- ७५. न किसी सुभटके सिरपर खड्ग के टुकड़े किये, न तेजी घोड़ोंपर सवारी ही की और न गौरी स्त्रीको गले ही लगाई-इस प्रकार निरर्थक ही यह नग्न जन्म चला गया । राजाने सवेरे ही उसको बुलाकर और वह संकेत सुनाकर उसकी शक्ति पूंछी । वह बोला- ७६. महाराज ! रमणीय दीपोत्सबके बीत जानेपर जब हाथियोंका मद झरने लगेगा तो मैं अपनी शक्तिसे गौड देश के साथ सारे दाक्षिणा पथ को एक छत्र नीचे कर दूंगा। उसने अपना ऐसा पौरुष प्रकट किया तो राजाने उसे [ योग्य समझकर ] सेनापतिके पद पर अभिषिक्त किया। कुलचन्द्रकी गुजरातपर चढ़ाई। ५३) इधर, जब राजा भीम सिन्धु देश की विजयमें रुका हुआ था, [ वह दिगम्बर ] सारे सामन्तोंके साथ, अण हिल पुर पर आक्रमण करके, उसके धवलगृहके घटिकाद्वार पर, कौड़ियाँ वपन कराकर उसने जयपत्र ग्रहण किया। तबसे सर्वत्र " कुलचन्द्रने लूट लिया " [ कहावत ] की प्रसिद्धि हुई । वह जयपत्र लेकर मा छ वा में गया । श्री भोज़ को यह वृत्तान्त विदित किया । ' तुमने वहाँपर कोयला क्यों नहीं बोया : [ इन कौडियोंके बोनेसे तो यह सूचित होता है कि भविष्यमें ] यहाँसे कर वसूल होकर गूर्जर देश में जायगा।' इस प्रकार सरस्वती-कण्ठा भरण श्री भोज ने [ यह भविष्यवचन ] कहा। ५४) एक बार चन्द्रातप ( चाँदनी ) में श्री भोज राजा बैठे थे, पास ही में कुल चंद्र भी था । पूर्ण चन्द्रमण्डलको देखकर [ पुनः पुनः उसकी ओर देखकर ] (राजाने ) यह पढ़ा- ७७. जिन लोगोंका रात प्रियाके साथ क्षणभरकी तरह व्यतीत हो जाती है, चन्द्रमा उनके लिये शीतल है; किन्तु विरहियों के लिये तो उल्काके समान सन्तापदायक है। उस करिके इस प्रकार आधा कहनेपर कुल चन्द्र बोला- हम लोगोंके न तो प्रिया है और न विरह है, इसलिये दोनों ओरसे भ्रष्ट होनेके कारण हमको तो चंद्रमा दर्पगकी आकृतिके समान दिखाई देता है । न वह उष्ण है, न शीतल । ऐसा कहनेके अनन्तर ही उसे पुरस्कारमें एक वेश्या प्रदान की गई। * ११-१२ ४२] प्रबन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश ५५) इसके बाद, माल व मण्डल से लौटे हुए दामर नामक सन्धि-विग्रहिकने भोज की सभाका वर्णन करते हुए [ सबको ] बहुत आश्चर्य उत्पन्न किया । और वहाँ ( माल वा में ) जाकर भीम के अलौकिक रूप सौन्दर्यके वर्णनसे भोज को उसे देखनेकी इच्छासे चञ्चल कर दिया । भोज ने अनुरोध किया कि या तो भीम को यहाँ ले आओ या मुझे वहाँ ले चलो।' इसी तरह भोज की सभाको देखनेके लिये उत्कण्ठित भीम ने भी वैसा ही अनुरोध किया । किसी एक समय, उपायोंका जाननेवाला वह (दामर) बहुतसा उपहार लेकर भीम को, जो विप्रका वेश धारण किए हुए था और हाथमें पानदान लिये था, साथ लेकर भोज की सभा गया। प्रणाम करते हुए उस दामर को [भोज ने भी म के ] ले आनेके वृत्तान्तके बारेमे पूछा। उसने कहा- • हमारे स्वामी स्वतन्त्र हैं, जो काम उनको अभिमत नहीं उसे जबर्दस्ती कौन करा सकता है। महाराजको ऐसी दुराशा सर्वथा धारण नहीं करना चाहिये । ' भोज ने भीम की उम्र, वर्ण और आकृति पूछी। दाम र ने समामें बैठे हुए लोगोंके देखते हुए, पान-दान धारण करनेवालेको लक्ष्य करके कहा-स्वामिन् ! ७८. यही आकृति है, यही वर्ण है, यही रूप और यही अवस्था । इसमें और उस राजामें अन्तर केवल काच और मणिके समान है। इस प्रकार उसके बतानेपर, चतुर चक्रवर्ती भोज ने सामुद्रिक शास्त्रके आधारपर, उस निश्चल दृष्टि- थालेको हो राजा [ यही भीम है ऐसा ] जब समझ लिया तो, उपायन वस्तुयें ( भेंटकी चीजें ) ले आनेके बहानेसे उस सन्धि-विहिक ( दामर ) ने उसे बहार भेज दिया। जब वे ( भेंटकी ) चीजें आ गई तो दामर ने उनका गुण वर्णन करके तथा इधर उधरकी बातें करके बहुत-सा काल काट दिया। जब राजाने कहा कि वह पान-दानवाला अभीतक क्यों नहीं आया, कितना विलम्ब करता है!" तो उस (दामर) ने बताया कि वही तो भी म था। तब राजा उसके पीछे सैन्य दौडाने लगा। इसपर दाम र ने कहा-बारह बारह योजनके अन्तरपर सवारीके घोड़े खड़े हैं, और एक घडीमें योजनभर चली जानेवाली करभियाँ (साँढनियाँ) रखी है । इन सारी सामग्रियोंसे भी म प्रतिक्षण बहुत-सी भूमि तै करता चला जा रहा है। आप उसे कैसे पकडेंगे !' उसके ऐसा बतानेपर वह देर तक हाथ मलता रहा। [यहांपर Pb संशक आदर्शमें निम्नलिखित प्रकरण अधिक पाये जाते हैं-] इसके बाद एक दूसरे साल, भीम उस डामर को माल व म ण्ड ल में भेजनेकी इच्छासे वार्ता आदि (नीति ) सिग्वा रहा था। डा मरने उठकर यत्र झाड़ लिया। तब भीम ने [ कारण ] पूछा । यह बोला- आपका सिग्वाया हुआ यहीं छोड़ जाता हूँ । क्यों कि वहाँ जाकर तो मुझे स्वयं ही अवसरोचित बोलना पड़ेगा। दूमरेका सिवाया कितना काम आ सकता है। इसके बाद राजाने उसकी अवसरोचित चातुरी जानने के लिये, प्रच्छन्न मापसे, सोनेके डिब्बेको राखसे भरकर उसके हाथमें, यह सिखाकर भेंट देनेको कहा कि भोजको समा सिरा अन्यत्र कहीं भी इसे न खोलना । उसे लेकर यह माल वा में गया । भोज की सभामें जाकर उस हिन्धको, जो अनेक रेशमी वस्त्रोंसे चेष्टित था, राजाको भेंट किया । जब राजाने उसे खोलकर देखा तो भीतर राखका पुभ था। तब राजाने कहा-' अजी, यह कैसी भेंट है!' हाजिर जवाब डामर ने तत्काल कहा-महाराज श्री भीम ने एक कोटिहोम कराया है। यह उसीकी रक्षा है, जो तीर्थक समान परित्र है। प्रीति-सम्बन्धसे उन्होंने आपको भेंट किया है।' उसके ऐसा कहनेपर, राजाने प्रसन्न होकर, अपने हापसे सब टोगोंको यह थोड़ी थोड़ी दी। उन सबोंने उससे तिलक करके उसका वंदन किया। मन्तःपुरमें मी यह रक्षा भेजी गई। बादमें यह डामर सम्मानित होकर, प्रति-प्रामृतके (भेंटके बदमें दी हुई भेटके) साप टौट आया। भीम को जब यह वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो उसने भी उसकी पूजा (सम्मानना) की।
प्रकरण ५६ ] महाकवि मायका प्रबन्ध [४३ पुनः एक बार भी म के चित्तमें कौतुक उत्पन्न हुआ। उसने एक वार डामर के हाथमें अपनी मुद्रासे मुद्रित ( मुहर किया हुआ) लेख दिया और हाथमें भेंटकी सामग्री देकर उसे माल या में भेजा । उसने उस भेटके साथ वह लेख राजाको दिया । राजाने जब खोलकर पढ़ा तो, उसमें लिखा मिला कि-' इसको आप शीघ्र ही मार डालिये ।' तब विस्मयके साथ राजाने पूछा- अजी, इसमें यह क्या लिखा है ? तब उस शीघ्रबुद्धिने कहा-महाराज 1 मेरी जन्म-पत्रिकामें ऐसा लिखा है कि जहाँ इसका रुधिर पड़ेगा वहाँ बारह वर्षतक अकाल पड़ेगा । यही जानकर भी मने, 'स्वदेशके विनाशसे भीत होकर, प्रच्छन्न लेखके साथ मुझे यहाँ भेजा है । ऐसी स्थिति होनेपर आप अपनी रुचिके अनुसार करें ।' उसके ऐसा कहनेपर राजाने कहा- मैं अपने देशकी प्रजाको अनर्थमें नहीं पड़ने दूंगा।' इसके बाद, उसका सम्मान करके उसे विदा किया और वह अपने देशमें आया। उसकी बुद्धिके कौशलसे चमत्कृत होकर भी म उसे बहुत मानने लगा। महाकवि माधका प्रवन्ध । ५६) इसके बाद, भोज राजा माघ पंडितकी विद्वत्ता और पुण्यवत्ताको सदा सुनकर उसके दर्शनकी उत्सुकतासे अनेक राजकीय आदेश बारंबार भेजकर श्री मा ल न गर से जाड़ेके दिनोंमें उसे अपने यहाँ बुलाया और अत्यन्त मानके साथ भोजनादिसे उसका सत्कार किया। बादमें राजोचित विनोदोंको दिखाकर और रातकी आरतीके अनन्तर अपने निकट ही, अपने ही समान पलंगपर सुलाकर, उसे अपनी निजकी शीतरक्षिका ( रजाई, लिहाफ़) ओढने दी और चिरकाल तक उसके साथ प्रिय आलाप करता हुआ सुखपूर्वक सो गया । प्रातःकाल मागल्य तुर्यनादसे जब राजाकी नींद खुली तो माघ पंडितने घर जानेके लिये बिदा माँगी। गजाने विस्मित होकर अगले दिनके भोजन आच्छादन आदिके सुखकी बात पूँछी । उसने कहा- उस अच्छे. बुरे अन्नकी बात रहने दीजिये । ' और कहा कि शीतरक्षिका ( रजाई ) के भारसे तो मैं थक-सा गया । राजाने अपना खेद प्रकट करते हुए किसी प्रकार जानेकी अनुज्ञा दी । नगरके उपवन तक राजाने अनुगमन किया । माघ पंडितने भी कहा कि कभी अपने आगमनसे मुझे भी धन्य करें। राजाकी अनुज्ञा लेकर माघ पंडित अपने स्थानपर आया । उसके बाद, कितनेएक दिन बीतनेपर, भोज राजा उसकी विभव- सामग्री देखनेकी इच्छासे श्री मा ल न ग र में आया । माघ पंडितके द्वारा अगवानी आदिसे यथोचित सत्कृत होकर वह अपनी सारी सेनाके साथ उसकी धुइसालमें ठहरा । फिर वह अकेला माघ पंडितके महल में गया । वहाँ उसने सञ्चारक भूमि ( महलमें जानेकी पगडंडी ) को काचसे जड़ी देखी । स्नान करने के बाद, देवताके मन्दिरमें जानेपर, यहाँकी भूमिपर, जिसका गच मरकतका था, शैवाल सहित जलकी भ्रान्तिसे धोती और चादरको समेटने लगा । तब पुरोहितने उसका सरूप बतलाया । फिर देवताकी पूजा की । बाद जब मंत्रावसर समाप्त हुआ तो, भोजनके समय आई हुई रसोईका आस्वादन किया । ऐसे ऐसे व्यंजनों और फलों को देखकर, जो उस काल और उस देशमें नहीं होते थे, वह चित्तमें बड़ा विन्मित हुआ। संस्कार किये दूध और चावलकी बनी रसोईका आकण्ठ उपभोग किया। भोजनके अन्तमें चन्द्रशालापर आरोहण करके, ऐसे ऐसे कायों, कथाओं, इतिहासों और नाटकोंको देखा, जिन्हें इसके पहले कहीं देखा या सुना नहीं था । जाड़ेके दिनोंमें भी उसे अकस्मात् उप्र प्रीष्म ऋतु हो जानेको भ्रान्ति हुई। उस समय सफेद स्वच्छ वस्त्र पहने, हायमें तालके पंखे लिये हुए अनुचर उसको हवा करने लगे। उसके यत्रो सुन्दर चन्दन लेप दिया गया और उस रातको उसने क्षणभरकी नाई बिता दी । सबेरे जब शंखके नादसे राजाको नींद खुली तो माघ पंडितने शीतकालमें अफ- स्मात् कैसे प्राप्म ऋतु उतर आई इसका स्वरूप समझाया। इस प्रकार प्रत्येक क्षण विस्मयके साथ बिताता हुआ - ४४] प्रयन्धचिन्तामणि [ प्रथम प्रकाश कुछ दिनोंतक वहाँ रहकर ] स्वदेशगमनके लिये विदा माँगते हुए, अपने बनाये हुए नये भोज स्वामी मन्दिर के पुण्यको उसे समर्पण कर माल व मण्ड ल को प्रस्थान किया । माघ के जन्म दिनके समय उसके पिताने ज्योतिषीसे जन्मपत्र बनवाया था। ज्योतिषीने उसमें लिखा था कि पहले तो इसकी समृद्धि बराबर बढ़ती जायगी, पर बाद में (पिछली अवस्थामें ) विभव नष्ट हो जायगा और चरणोंमें कुछ सूजन आ कर मृत्यु प्राप्त करेगा । माघ के पिताने अपने विभव-सम्भारसे ग्रहदशाका निवारण करना चाहा और यह सोचा कि मनुष्यको आयु यदि सौ वर्ष की होगी, तो ३६ हज़ार दिन होंगे, एक नया कोश (निधि) वनवा कर उसमें उतनी ही संख्याके मणियोंका हार बनाकर रख दिया। इससे सैकडों गुनी अधिक और समृद्धि रख दी। लड़केका नाम माघ रखा और अपने कुलके उचित शिक्षा दे कर और यह समझ कर कि मैंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया, वह मर गया। इसके बाद माघ कुबेरकी भाँति विशाल समृद्धि- साम्राज्य पाकर, विद्वजनों को उनकी इच्छाके अनुसार धन देने लगा । अपरिमित दानसे अर्थि-जनोंको कृतार्थ करते हुए और भोगकी विविसे अपनेको अमानुषकी भाँति दिखाते हुए, उसने शिशुपाल वध' नामक महा काव्य बनाया। इस काव्यको देखकर विद्वानोंका मन चमत्कृत हो गया। अन्तमें पुण्य-क्षय होने पर जब उसका धन क्षीण हो गया और विपत्तिका समय आ गया, तो उसने अपने देशमै रहना अयुक्त समझ कर, अपनी स्त्रीके साथ माल व मण्डल में जा कर धारा नगरी में वास किया। राजा भोज के पास पत्नीको यह कह कर भेजा कि मेरा पुस्तक है उसे बंधक रख कर, राजाके पाससे कुछ भी द्रव्य ले आओ। स्वयं उसकी आशामें चिरकाल तक बैठा रहा । उधर भोज ने उसकी स्त्रीकी वह अपस्था देखकर सभ्रमके साथ उस पुस्तकको हाथमें लिया और उसकी शलाका निकाल कर उस खोला तो उसमें पहला ही यह काव्य देखा- ७९. कुमुदवनकी शोभा नष्ट हो गई और कमलोंका समूह शोभान्वित हो उठा । धूक हर्ष छोड़ रहा है और चकका प्रतिमान हो रहा है। सूर्यका उदय हो रहा है और चन्द्रमाका अस्त ! अहो, दुर्भाग्यके खेलका परिणाम 'ही' विचित्र है ! काव्यका मर्म समझकर भोज ने कहा कि सारे ग्रंथकी तो बात ही क्या है, इसी एक काव्यके मूल्यके लिये पृथ्वी भी दे दी जाय तो वह कम है । समयोचित और अनुच्छिए इस 'ही' शब्दके पारितोषिकमें ही एक लाख रुपये दे कर राजाने उसे विदा किया । वह मी जब वहसि चटी तो याचकोंने उसे मा घ की पत्नी समझकर मांगना शुरू किया । इस पर उसने यह सारा-का-सारा पारितोषिक उन याचकोंको दे दिया और स्वयं ज्यों की स्यों घर लौटी। उमने अपने पतिको, जिसके चरनमें कुछ सूजन हो आई थी, उस वृत्तान्तको कह सुनाया। इस पर मा घने यह कह कर उसकी प्रशंसा की फि-'तुम्ही मेरी शरीर-धारिणी कीर्ति हो।' इसी समय एक भिक्षुकको, जो उसके घरपर आया था, देखा । घरमें उसे देने योग्य कुछ न देखकर दुःखके साथ यह बोला- ८०. धनतो है नहीं, और दुराशा भी मुझे छोड़नी नहीं । में बुरी तरहसे यहका हुआ हूँ और फिर त्यागसे हाय भी संकुचित नहीं होता । याचना करना रघुताका कारण है और आत्महत्यामें पाप उगता है । अतः हे प्राणों ! तुम स्वयं चले जाओ तो अछा है। मुझे इस प्रकार दुःप देनेसे स्या होगा। ८१. दारिधी आगका जो सन्ताप था वह तो सन्तोष रूपी जलसे शान्त हो गया; किन्तु दीन जनोंकी बाशा भंग करनेमे जो [ सन्तार ] पैदा हुआ है, यह किममे शान्त होगा। ८२. अकाटमें भिशा पदा ! युरी अपस्याटोको ऋण क्योंकर मि ! भू-स्वामियोंसे काम क्योंकर , ।
. प्रकरण ५६-५७] भोज और भीमका प्रवन्ध [१९ करावें [ 1 और दान भी कौन देना चाहे, जब कि ] बिना दान दिये यह सूर्य भी अस्त हो जाता है। [इस प्रकार ] हे गृहिणी ! कहाँ जायें, और क्या करें ? जीवन-विधि बड़ा गहन हो गया है। ८३. भूखते कातर बना हुआ यह पथिक मेरा घर पूछते पूछते कहींसे आया है, सो हे गृहिणी ! क्या कुछ है कि इस बुभुक्षितको खानेको दिया जाय !'-पत्नीने वचनसे तो 'है' यह कहा लेकिन फिर नहीं है यह वात बिना अक्षरोंके ही, चंचल नेत्रोंसे टपकते हुए बड़े बड़े अश्रुबिन्दुओस सूचित की। ८४. हे प्राणों ! जाओ, याचकके व्यर्थ लौट जानेपर, चले जाओ; बादको भी तो जाना है; 'फिर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा!' 'फिर ऐसा साथी कहाँ मिलेगा !'-इस वाक्यके बोलते ही मा घ पण्डितकी मृत्यु हो गई। प्रातःकाल राजा भोज ने उस वृत्तान्तको सुनकर, श्री मा ल नगर में [ अनेक ] धनवान् सजातियोंके रहते हुए भी, जो ऐसा पुरुप-रत्न क्षुधापीड़ित हो कर मर गया, इसलिये उसने उस जातिका नाम 'भिल्ल मा ल' * ऐसा रख दिया । इस प्रकार श्री मायपण्डितका प्रबन्ध समाप्त हुआ। . महाकवि धनपालका प्रवन्ध । ५७) प्राचीन कालमें, समृद्धिसे विशाल ऐसी विशाला (उज यिनी) नामक नगरीमें, मध्यदेशोत्पन्न संका श्य गोत्रीय सर्च देव नामक ब्राह्मण वास करता था। जैनदर्शनके संसर्गसे उसका मिथ्यात्व प्रायः शान्त हो गया था । उसके दो पुत्र थे जिनका नाम ध न पाल और शोभन था । एक बार श्रीवर्द्ध मा न सूरि वहाँ आये। गुणानुरागी होने के कारण सर्वदेव ने उन्हें अपने उपाश्रयमें निवास कराया और अपनी अनन्य भक्ति से उन्हें सन्तुष्ट किया। उन्हें 'सर्व ज्ञ-पुत्र क' जानकर गुम | जानेवाली पूर्वजोंकी निधिके बारेमें पूछा। उन्होंने वचन- चातुरीसे पुत्रोंका आधा हिस्सा मांग लिया । संकेत बतानेपर निधि मिली । जब यह आधा भाग देने लगा तो सूरिने दोनों पुत्रों से आधा हिस्सा माँगा । धन पाल ने, जिसकी मति मिथ्यात्वके कारण अन्धी हो रही थी, जैन मार्गको निन्दा करते हुए नहीं कर दी। छोटे लड़के शोभन पर कृपा-परायण हो कर, पिताने उसको देना नहीं चाहा । इसपर उसने अपनी प्रतिज्ञाके भंग होनेके पापको तीर्थ में जाकर प्रक्षालन करनेकी इच्छासे, तीर्थों के प्रति प्रस्थान करना निश्चित किया । पितृभक्त शोभन नामक छोटे पुत्रने, उसको उस आग्रहसे रोककर, पिताकी प्रतिज्ञाका पालन करनेके लिये जैन दीक्षाबत ग्रहण कर स्वयं गुरुका अनुसरण किया। धन पाल समस्त विद्याओंका अध्ययन करके श्री भोज के प्रसाद-प्राप्त समस्त पंडित-मण्डलमें सुप्रतिष्ठ हुआ और फिर अपने सहोदरको ईर्ष्यासे बारह वर्षतक अपने देशमें जैन दर्शनियोंका आगमन निषिद्ध कराया । * श्रीमाल नगरका दूसरा नाम मिाल माल भी है । वर्तमानमें वह स्थान इसी नामसे प्रसिद्ध है । श्रीमाली जातिके वैश्य और सामग कुल इसी स्थानसे निकले हुए हैं। श्री माल का दूसरा नाम भितमा ल ऐमा कर और क्यों पड़ा इसका अन्य कोई दूसरा ऐतिहासिक उल्लेस अभी तक प्राप्त नहीं हुआ। महाकवि माघकी जन्मभूमि श्री माल थी यह गाव विके कपन ही से सिद्ध होती है, लेकिन उसकी मृत्युका जो यह करण वृत्तान्त मैनुलाचायने लिखा है और उसी प्रसंग परमे भोज राजाने भी माल का नाम मिलमाल रस्त दिया यह जो उल्लेख किया है, इसकी सत्यता के लिये और कोई मुनिभित प्रमाण जबतक प्राप्त न हो तरतक इस कपनको एक किंवदन्तीके रूपमें ही समझना चाहिए । माघ और मोजयी समकालीनता भी सन्दिग्ध है । और कम से कम यह भोज प्रमिद पायपति परमारयंशीय राजा मोज तो किसी तरह संमति नहीं है। इसकी विनर विवेचना अगले ऐतिहासिक अवरोकनवाले संस्में की जायगी।
प्रयन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश उम देशके उपासकों द्वारा अन्यन्त अभ्यर्थना के साथ गुरुको बुलानेपर, सकल शाबरूपी समुद्रके पारको प्राप्त कर देनेवाला वह शो मन नामक तपोवन गुरुसे अनुमति लेकर वहाँ आया । धारा में प्रवेश करते ही, पंडित धन पाटने, जो उस समय राजपाटिकामें [ राजाके साय ] भ्रमणमें जा रहा था, उसे न पहचान कर, उपदामके माय कहा-गर्दमदन्त (गवेके समान दाँतमाले ) भदन्त, 'तुमको नमस्कार !' इसपर उसने- कपिके वृषणके समान मुँहवाले मित्र, तुम्हें मुख हो!' [इस प्रकार प्रत्युत्तर दिया। तब चमत्कृत होकर धन पाल ने सोचा कि मैंने तो दिल्लगीमें भी ‘नमस्ते' कहा और इसने तो 'मित्र तुम्हें सुख हो'] इतना ही कहकर अपनी बचन-चातुरीसे मुझे जीत लिया । फिर ध न पाल के यह कहने पर कि आप किसके अतिथि है !' शो मन मुनि ने कहा-'हमें आपके हो अतिथि समझिये !' उसकी यह बात सुनकर एक विद्यार्थीके साय उन्हें अपने स्थानपर भेजकर वहीं टहराया । स्वयं घर आकर धन पाल ने प्रिय आलापोंके साथ उसे सपरिकर भोजन के लिये निमंत्रित किया । पर वे तपोवन तो प्रासुक ( अनुदिष्ट ) आहार भोजी थे इसलिये उन्होंने निषेध किया । आप्रहपूर्वक जब उसने दोषका हेतु पूँछा तो कहा- ८५. मुनि म्लेच्छ कुलसे भी मधुकरी वृत्तिके साथ भिक्षा ग्रहण करे परन्तु वृहस्पति के समान श्रेष्ठ कुलीन एक ही गृहस्थ के वहाँ भोजन न करे । इसी प्रकार जैन धर्मके द श 2 का लिक सूरमें भी कथन है- ८६. जो अनिश्रित हो कर मधुकरके समान नाना स्थानों से अपना भिक्षापिण्ड प्राप्त करते हैं उन्हीं युद्ध और दान्त भिक्षुओंको साधु कहते हैं । इस प्रकार, अपने धर्ममे और परधर्मसे भी, निषिद्ध ऐसे कल्पित आहारको त्याग करके हम लोग शुद्ध भोजन प्रक्षण करते हैं । धन पाल उनके चरित्रमे चकित होकर चुप हो रहा और उठकर स्नान करने चला गया । स्नानके आरम्भमें ही अचानक भिक्षाचर्या के लिये आये हुए उन दो मुनियोंको देखा। उन्हें एक ब्राह्मणी, रमोई तैयार न होने के कारण, दही देने लगी । मुनियोंने पूछा कि दही कितने दिनोंका है ! तो धन पाल ने मनाक करते हुए कहा 'क्या कोई उसमें कीड़े पड़ गये हैं !' प्राम्हणाने जबाव दिया कि इसे दो दिन बीत चुके है। यह सुनकर दोनों मुनि बोले कि-हाँ कीड़े पड़ गये हैं ! यह सुनकर धन पाल उसे देखनेके लिये स्नानसे उठकर यहाँ आया । पारमें रखे हुए दहीके पास ही एक महावर (लाग्य) का ढेला रखा जिस पर उन जीवोंने चढ़कर उस दहीके समान ही सफेद कर दिया । धन पाट ने यह देखा और सोचा कि जैन धर्ममें जीवरक्षाकी ही प्रधानता है और उसमें भी जीवोपति विषयक ज्ञानका वैदाय्य [ विशिष्ट प्रकारका ] है। जैसा कि कहा है- ८७. मंग और उड़द इत्यादि द्विदल धान्य जो यमे गोरसमें परे तो उसमें श्रम (विरिन्द्रियादि) जीवोंकी उत्पत्ति होती है, और तीन दीनके बाद दहीमें भी जीवोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है। यह यात एक जैन शासमें ही कही गई है । ऐसा निश्चय करके शो मन मुनि के शुभोपदेशसै सम्यक् विचाम पूर्वक उसने मम्पार (न धर्म) प्रहण किया। [ इतने दिनों के बाद अपने मिथ्या को समझते हुए, शोभन से ही पूछा कि मेरे भाईको भी कदा देखा है! शोभन ने यय, आत्या और गुण आदिमें अपने-ही-से उसकी तुटना पी। इसपर उमने अनुमानमे ममज्ञा कि यही मेरा भाई है। यह नियय करके आनन्दाशु स्याग परने हर उमे आलिंगन करके अपने सडकेको भेज कर उसके गुरुको भी युटयाया।] स्वमारतः ही धन पाठ वा पुद्धिमान था अनएर कर्म प्रगति प्रभी जैन-विचार-अंधोंमें भी यहा प्रयोग हुआ। प्रति दिन सधेरै दिन पूनाके अस्त- . --- - प्रकरण ५७ महाकवि धनपालका प्रवन्ध [१७ ८८. अहो ! मैंने इसके पहले मोहवश, कुछ ही नगरोंके स्वामीका, जो शरीर दे देनेपर भी दुर्ग्रहणीय है, मति-दान करते हुए अनुसरण किया। इस समय ऐसे त्रिभुवनपति प्रभु मिल गये हैं जो बुद्धि-ही-से आराध्य हैं और जो अपना पद तक दे देनेवाले हैं । इससे उन प्राचीन दिनोंका बीत जाना खेदकारक हो रहा है। ८९. हे जिन ! जबतक मैने तुम्हारा धर्म नहीं जाना था तबतक समझता था कि धर्म सब कहीं है। जिस प्रकार धतूरेके विषसे आतुर रोगीको सब कुछ सोना (पीतवर्ण) ही सोना दिखाई देता है। और कोई सफेद वस्तु नजर नहीं आती। [५५ ] धासके जैसे निःसार ऐसे उन करोडों श्लोकोंको पढ लेनेसे भी क्या होता है-यदि जिससे 'दूसरेको पीडा न पहुँचाना ' इतना भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता । [५६ ] देशका मालिक [ तुष्ट होनेसे ] एक गाँव देता है, गाँवका मालिक एक खेत देता है, खेतका मालिक शिम्बिका (सेम, छीमी) देता है परन्तु सार्व (सर्वज्ञ जिन) तो सन्तुष्ट होकर अपनी सारी सम्पद दे देते हैं। इत्यादि वाक्योंको पढ़ा करता । एक दिन राजाने ध न पाल को शिकार खेलनेके लिये साथ ले लिया । राजाने जब बाणसे मृगको विद्ध किया, तो उसके वर्णनके लिये धन पाल के मुँहकी ओर देखा । धन पाल बोला- ९०. इस तरहका पौरुष रसातलको चला जाय । यह कुनीति है कि निर्दोष और शरणागतको मारा जाय । बलवान् भी जब दुर्बलको मारते हैं तो यह बडे दुःखकी बात है । जगत् अराजक हो गया। उसकी इस निर्भर्सनासे क्रुद्ध राजाके यह पूछने पर कि यह क्या बात है- ९१. प्राणान्तके समय यदि तृण भक्षण करना चाहे तो वैरी भी छोड दिया जाता है, तो फिर ये पशु तो सदा तृण ही खाकर जीते रहते हैं, ये क्यों मारे जाते हैं ? राजाको इस कथनसे अद्भुत कृपा उत्पन्न हुई । उसने धनुष्य बाणके भंगको स्वीकार करके आजीवनके लिये मृगयाका त्याग किया । बादमें नगरकी ओर जब लौट रहा था, तो यज्ञमण्डपके यज्ञस्तंभमें बँधे हुए छाग (बकरे) की दीन वानी सुनकर पूछा कि यह पशु क्या कह रहा है ? इस पर ध न पाल ने कहा कि सुनिये- ९२. हे साधो, मैं स्वर्गफलको भोगने के लिये तृषित नहीं हूँ, मैंने [ इसके लिये ] तुमसे प्रार्थना भी नहीं की। मैं तो केवल तृण खाकर ही सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं । यदि तुम्हारे द्वारा यज्ञमें मारे हुए प्राणी निश्चय ही स्वर्गगामी होते हैं तो फिर अपने माता-पिता और पुत्रों तथा बाँधवोंका यज्ञ (बलिदान ) क्यों नहीं करते ! उसके इस वाक्यके अनन्तर जब राजाने कहा कि इसका क्या मतलब है? तो फिर बोला कि- ९३. यूप ( यज्ञ) करके, पशु मारकर और खूनका कीचड़ बना कर यदि स्वर्गमें जाया जाता है तो फिर नरकमें कैसे जाया जाता है ? ९४. सनातन यज्ञ तो उसका नाम है, जिसमें सत्य तो यूप हो, तप ही अग्नि हो और अपने सारे कर्म समिधू ( काष्ठ ) हो, अहिंसाकी [ उसमें ] आहुति दी जाय । इस प्रकार, शु क संवाद में कहे हुए वचनोंको उसने राजाके सामने पढ़ा और [ ब्राह्मणोंको ] जो हिंसा- शास्त्रके उपदेशक और हिंस-प्रकृति हैं, ब्रह्मरूपमें राक्षस बताते हुए, राजाको अर्हद्धर्म (जैन धर्म ) की और प्रवृत्त किया।
४८] प्रबन्धचिन्तामणि [प्रथम प्रकाश [ इस जगह PI) आदर्शमें तो मूल ही में, पर B आदर्शके हाशियेपर निम्नलिखित कथोपकथन अधिक लिखा हुआ पाया जाता है।] इसके बाद जब राजा गौकी बन्दना करने लगा तो धन पाल भैंसको नमस्कार करता हुआ बोला- [५७ ] अपवित्र वस्तु खाती है, विवेक-शून्य है, आसक्त होकर अपने पुत्रसे ही रति करती है, सुराम और सींगसे जीवोंको मारती है । हे राजन् ! ऐसी यह गौ किप्त गुणसे वन्दनीय है ।। [ ५८ ] दूध देनेके सामर्थ्यसे अगर यह गौ वन्दनीय है तो, भैंस क्यों नहीं है ! भैससे इसमें थोड़ी भी तो विशेषता नहीं दिखाई देती। [५९ ] अमेव्य भक्षण करनेवाली गायोंका स्पर्श पाएको हरनेवाला है, चेतनाहीन वृक्ष वन्दनीय है, ठागका वध करनेसे स्वर्ग मिलता है, ब्राह्मणोंको खिलाया हुआ अन्न पितरोंको स्वर्ग में पहुँचता है, छल-कपटपरायण देवता आप्त पुरुष है, अग्निमें हवन किया हुआ हवि देवताओंको प्रीत करता - इस प्रकारको स्पष्ट दोपयुक्त और व्यर्थ श्रुतियों के वचनोंकी लीलाको कौन ठीक मान सकता है ! [६०] मिनका [प्राणी-] वय तो धर्म है, जल तीर्थ है, गौ वन्दनीय है, गृहस्थ गुरु है, अग्नि देवता है, और ब्राह्मण पात्र है उनके साथ परिचय रखनेसे फल ही क्या हो! एक बार, जिनपूजा करनेमें, दूमरोसे पंडित (ध न पाल) की विशेष एकाग्रता जानकर राजाने इलकी डारी देते हुए कहा कि देवोंकी पूजा करो। ध न पाल शिव आदि देवताओंके स्थानों पर यों ही घूमकर जिन देवकी पूना फरके चला आया । चार पुरुपके मुँइसे रानाने सारा वृत्तान्त जानकर पूजाका हाल पूछ।। उसने कहा कि • महाराज ! जहाँ [पूजाका उचित ] अवसर हुआ यहाँ पूजा की । राजाने पूछा- अपसर कहाँ नहीं हुआ !" पण्डित बोला-विष्णु के पास एकान्त कला होनेसे; रुद्र के आधे शरीरमें पार्वती रहनेसे; ब्रह्माके यहाँ इस भपसे कि कहीं ध्यानभंग होने के कारण शाप न दे दें; विनायकके यहाँ इमलिये कि ये थालीभर मोदक खा रहे थे, उनका पर्श मैंने रोका; चण्डिकाके यहाँ उनके शूलास्त्रसे संत्रस्त महिप मेरे सामने न आ जाय इस भयसे, हनुमानके यहाँ उन्हें कोपपूर्ण देखकर यह भय हुआ कि कहीं चपेटादान न कर बैठे; इस तरह, [ इन देयोंके स्थानमें ] कही मी अवसर नहीं हुआ। और भी [ शिरलिगको देखकर तो मनमें विचार आया कि-] [११] इसके शिरके पिना पुष्पमाला व्यर्थ है, और जब ललाट ही नहीं है तो पह बन्ध कैसे हो ! जिसके कान और ऑग्व नहीं है उसके लिये गीत और नृत्य फैसे ! और जिसके पैर ही नही उसको मेरा प्रणाम कैसा! श्यादि बातें कहने पर, राजाने फहा-'किर अआप्तर हुआ मी कहीं !" तब पंडितने 'प्रशमरसनिमग्न' और 'नो सारसुधा' इयादि (पचन यौटकर ) और इसी प्रकारकी बातें कह कर अन्तमें कहा कि [ इस प्रकार ] जैनालय में मा असर रहता है, अतः वही मैने पूजा की। [१२] इसके बाद एक दम दिन, शिवमन्दिरके द्वारदेशमें मुंगीगणको देय कर राजाने धन पाल से पूछा कि-पद दुर्वर पो है ! यह योग-[ मंगी शियको निग्न प्रकारका विचित्र ] टीलायें देखकर सोचता [६३] यदि यह (शिय) in है सो इसको धनुष्यसे क्या काम है ! अगर धनुष्य है हो तो भरम क्यों ! पार मम्म मौसा मोगी क्यों ! और यदिखी है तो फिर कामसे देश क्यों है!-इस प्रकारली याने सामान पर विरुद घेटाओंको देखकर [ यद मुंगी दान होता है और भाटिये शिालोमे गाट य हुए अम्भि-दोष शरीरको धारण कर रहा है।
. प्रकरण ५८-५९ ] महाकवि धनपालका प्रवन्ध [४९ ५८).इसके अनन्तर एक बार राजा सरस्वती क ण्ठा भरण नामक प्रासादमें जा रहा था। उस समय धनपाल पंडितसे, जो सदा सर्वज्ञ-शासन (जैन धर्म) की प्रशंसा किया करता था, पूछा कि 'सर्वज्ञ तो कभी एक बार हुए थे। पर अब भी उस धर्ममें क्या कुछ ज्ञानातिशय है ?' उसके ऐसा कहनेपर [धन पाल बोला-] 'अर्हत् विरचित (उपदिष्ट) अर्हन्त श्री चूड़ामणि नामक ग्रन्थमें त्रैलोक्यके तीनों कालके वस्तु विषयके स्वरूपका परिज्ञान आज भी वर्तमान है। उसके ऐसा कहनेपर राजाने पूछा कि 'हम लोग अभी इस तीन दरवाजेके मण्डपमें स्थित हैं। किस रास्ते होकर यहाँसे वहार निकलेंगे?' राजाको इस प्रकार शास्त्रपर कलंक लगानेको उद्यत होते देखकर उसने 'बुद्धि यह तेरहवीं मात्रा है' इस लोकोक्तिको सत्य करते हुए, भोजपत्रपर राजाके प्रश्नका निर्णय लिख कर उसे मिट्टीके गोलेमें रख दिया, और उसे ताम्बूलवाहकको सोंपकर राजासे 'बोला कि ' महाराज, पधारिये !' राजाने अपनेको उसकी बुद्धिके जालमें फँसा समझा और सोचा कि इसने तीनमेंसे ही किसीका निर्णय किया होगा, इसलिये बढ़इयोंको बुलाकर मण्डपकी पद्मशिलाको हटवा दिया और उसी मार्गसे बहार निकला। फिर उस मिट्टीके गोलेको तोड़कर उसके लिखित अक्षरों में, निकलने के लिये उसी मार्गके निर्णयको पढ़कर कौतुकसे चित्तमें चकित होता हुआ जैन धर्मको ही प्रशंसा की। (यहाँ D पुस्तकमें निम्नलिखित पद्य अधिक पाये जाते हैं-) [६४ ] जो चीज़ विष्णु दो आँखोंसे, शिव तीनसे, ब्रह्मा आठसे, कार्तिकेय बारहसे, रावण बीससे, इन्द्र दस सौसे और जनता असंख्य नेत्रोंसे भी नहीं देख पाती, बुद्धिमान पुरुष उसीको एक प्रज्ञा- (बुद्धि) रूपी नेत्रसे स्पष्ट देख लेता है। (Pb आदर्शमें यहाँ निम्नलिखित एक और कथन अधिक पाया जाता है-) एक बार जलाश्रय (तालाब) के अच्छे-बुरे-पनके विपयमें पूछ हुई तो पण्डितने कहा-] [६५] सचमुच ही तालाबोंमेंका टंडा और चंद्रमाकी किरणोंसे श्वेत बना हुआ जल खूब पी करके प्राणियोंकी सारी तृष्णा नष्ट हो जाती है और वे मनमें प्रमुदित होते हैं, परन्तु जब सूर्यकी किरणें उसे सोख देती है तो [उसमेंके ] अनन्त प्राणी विनष्ट हो जाते हैं और इसीलिये मुनि- लोग कुआँ बावड़ी आदिके वननिके विषयमें उदासीन भाव प्रकट करते हैं । एक बार राजा अपने बनवाये हुए बहुत बड़े नये तालाबके पास गया। वहाँ पण्डितसे पूछा कि यह धर्मस्थान कैसा है। ध न पाल बोला- [६६ ] तड़ागके बहाने यह आपकी [एक ] दानशाला है जिसमें सदा ही मछली आदि जलजन्तु अच्छी तरहकी रसोई है और जिस स्थानपर वक, सारस, चक्रवाक आदि [मत्स्य भोजी दान प्रहण करनेवाले ] पान है; यहाँ कितना पुण्य होता होगा सो तो हम नहीं जान सकते । इससे राजा [ मनमें ] कुपित हुआ । नगरको आते समय वालिकाके साथ एक बुढ़ियाको वृद्धावस्थासे सिर धुनती हुई देखकर राजाने पूछा- यह सिर क्यों धुन रही है ! ' तब धनपाल वोटा- [६७ ] क्या यह नंदी है, या विष्णु ! क्या कामदेव है या चंद्रमा ! क्या विधाता है अथवा विचाधर है ! क्या इन्द्र है, कि नल है, कि कुवेर है ! ना, ना, यह नहीं है, यह भी नहीं है, यह भी नहीं है, बिल्कुल यह नहीं, यह मी नहीं, वह भी नहीं, और वह भी नहीं, यह तो कोदा करनेमें प्रवृत्त ऐसा है सपे ! स्वयं राजा भोज देव है। [ इसके सिरके धुननेका यह मतलब है-ऐमा कह कर ] इस श्लोकसे रुट राजा को सन्तुष्ट किया।
प्रवन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकारा . " "पयःप्रदान ५९) इसके बाद, धनपाल ने अपभ-पचा शि का स्तुति की रचना की। सरस्वती क ण्टा भरण आसाद में उसकी बनाई प्रशस्ति-पट्टि कामें किसी समय राजाने [ यह काव्य पढा-] ९५. इमने [ अपने जन्ममें ] पृथ्वीका उद्धार किया, शत्रुके वक्षःस्थलको विदारण किया, और बलिकी राजलक्ष्मी (विष्णुके पक्षमें बलि नामक राजा और मोजके पक्षमें बलशाली राजा) को आत्मसात् किया। इस प्रकार इस युवकने ये काम एक ही जन्ममें किये जो पुराण पुरुष (विष्णु) ने तीन जन्ममें किये थे। इस काव्यको पढ़कर उसके पारितोषिकमें एक सोनेका कलश दिया । उस प्रासादसे निकलकर उसीके द्वारके खंभोंपर मूर्तिमान् मदनको, जो रतिके साथ हस्तताल ( ताली) दे रहा था, देखकर राजाने धन पाल से उनके हंसनेका कारण पूंछा । इस पर पंडित बोला- ९६. यह है त्रिभुवनमें संयमके लिये विख्यात ऐसा वह शिव, जो इस समय विरहकातर हो कर अपने गरीरमें ही स्त्रीको धारण किये है। इसीने हमें एक समय जीता था ! इस प्रकार प्रियांके हाथसे अपने हाथको यज्ञाता हुआ और हंसता हुआ यह मदनदेव जयवान् हो रहा है । [ यहाँ D पुस्तक " अन्नदिणे सिवभवणे"" दिग्यासा यदि तस्मिस्य धनुपा० " "अमेध्यमभाति. " " असत्युत्तमाङ्गे” इत्यादि पय पाये जाते हैं । पर चूँकि ये यहाँ अप्रासगिक हैं और Pb आदर्शके अनुसार इसके पहले ही उलिखित हो चुके हैं इसलिये पिर उदृत नहीं किये गये। ९७. पाणिग्रहणके समय शिक्का जो भूतिभूपित शरीर पुलकित हुआ उसकी जय हो-जिप्त गरीरमें [पुलकके वहाने ] भस्मानशेष मदन मानों फिर अंकुरित हुआ है । इस प्रकारके तथा इसीतरहके, अन्य अन्य प्रसिद्ध और सिद्ध सारस्वतकारियों के काव्योंको कह कह कर जब ध न पाठ राजाको रजित कर रहा था, उसी समय द्वारपालने एक व्यापारीका आना निवेदन किया । सभामें प्रवेश करके, राजाको नमस्कार कर, उसने मोमकी बनी पट्टीपर लिखे हुए कुछ काव्योंको दिखाया। राजाके उसके प्राप्तिस्थानके बोरमें पूछने पर वह बोला कि-' मेरा जहाज अकस्मात् समुद्र में एक जगह रुक गया, जहानियोंने खोज करके देखा तो यहाँ एक शिवमन्दिन मिला, जिसके ऊपर चारों ओर जल टहरा है पर भीतर पानीका अभाव है। उन्होंने उसकी एक दीवाल पर अक्षर देसफर उसे जाननेकी इच्छासे उसपर मोमकी पट्टी लगा दी । उसी के उमडे हुए अक्षर इम पट्टीपर हैं। राजाने जब यह सुना तो, उसपर [वैसी ही ] मिट्टीकी पट्टी लागना कर, उसपर पड़े हुए उलटे अक्षरोंको पंडितोंसे पढ़वाया । ९८. लड़कपनसे ही, मेरी प्रापिके कारण ही यह उन्नतिकी परा कोटिको प्राप्त हुआ है, और इस समय मेरी ही बातसे यह राजगका लड़का लजाता है।' इस प्रकार खिन्न होकर अपने पुत्ररूपी यशसे अवलंब दिया आकर वृद्ध 'गुणोंका समूह' समुद्रके तौरपर तपस्याके लिये चला गया । ९९. जो धनुर्धारी प्रतिद्वंद्वियों की स्त्रियोंको वैवव्य बत देनेवाला है ऐसे उस राजाके दिग्विजयके लिये उद्यत होनेपर और क्रुद्ध होकर प्रति दिशामें उसके भ्रमण करनेपर, और स्त्रियोंकी तो बात ही क्या स्वयं रति मी मारे उरके अपने पतिको, मदान्ध भ्रमरियोंका नील चोला धारण किये हुए पुष्पधनुष्यको [ मी हायमें ] नहीं लेने देती। १००. चिन्तारूपी गंभीर कृषपर महाशोफरूपी चलती अरघट्ट (घहारी) परसे निःश्वास फेंककर अपने वही बड़ी आँखरूपी घटीयंत्रसे छोड़े हुए अश्रुधारको और नासिकाकी वंशप्रणालीके - . प्रकरण ६०-६१ ] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [ ५१ विषम पथसे गिरते हुए इस वाप्प रूपी पानीयको, हे महाराज, तुम्हारे शत्रुओंकी स्त्रियाँ अविराम भावसे स्तनरूपी दो कटशोंमें ढोया करती हैं। इस प्रकार काव्योंके पूरा पढ़े जानेपर [ आगे यह आधा काव्य मिठा-] १०१. 'अहो ! पूर्वकृत कर्माका परिणाम प्राणियोंके लिये सचमुच ही बड़ा विषम होता है।' इस काव्यका उत्तरार्द्ध छित्त प प्रभृति सैकड़ों पंडितोंके पूरा करनेपर भी ठीक नहीं जमता था तब राजाने धन पाल पंडितसे पूछा [ तो उसने अपनी प्रतिमाके वलसे यह यथार्थ पाठ कहा ]-" हरेहरे ! जो सिर शिवके सिर पर विराज रहे थे वे गधोके पैरोंसे लुण्ठित हो रहे हैं "।' यही उत्तरार्द्ध ठीक जमता है' इस प्रकार जब राजाने कहा तो पंडित घोटा-'यदि पदबन्ध और अर्थ दोनों ही, श्री रामेश्वर प्रासाद की दीवालपर ये इसीप्रकार न हों तो, इसके बाद आजीवन मैं कविताका त्याग कर दूं।' उसकी इस प्रतिज्ञाके सुननेके साथ ही राजाने जहाजके यात्रियोंको उसी समुद्र में गोता लगवाकर मंदिरको खोज निकालनेकी आज्ञा दी। ६ महिने बाद उसे ढूंढ निकाला और उसपर फिरसे मोमको पट्टी लगा कर [लेखकी नकल ली ] उसमें यही उत्तरार्द्ध निकला । यह देखकर [ राजाने ] उसके उपयुक्त पारितोषिक दिया। इस प्रकार, इस खण्ड प्रशस्ति के अनेक काव्य परंपराके अनुसार समझने चाहिये । ६०) एक बार राजाने सेवामें ढोल-ढाल होनेका कारण पंडितसे पूंछा । उसने अपनी तिलक मंजरी [ नामक कथा ] की रचनाको व्यग्रताका कारण बताया । शीतकालकी एक रात्रिके अन्तिम प्रहरमें राजाको कोई विनोद नहीं मिल रहा था । उसने पंडितको बुला कर, स्वयं उसकी उस ति ल क मंजरी कथाको पढ़ने लगा और पंडित उसकी व्याख्या करने लगा। राजाने उसके । के गिरनेके भयसे उसके नीचे सोनेकी थालीमें कच्चोलक ( कटोरा ) रखा और इस तरह [ बडे चावके साथ ] समाप्त किया । उस अद्भुत काव्यसे चित्तमें चमत्कृत होकर राजाने कहा कि- यदि मुझे इस काव्यका कथानायक बनाओ और विनीता के स्थानमें अयन्ती का नाम रखो, तथा श का व तार तीर्थकी जगह महा काठ को उल्लिखित करो तो जो माँगो यहाँ मैं तुम्हें दूंगा।' राजाके ऐसा कहने पर उसने कहा कि जिस प्रकार खद्योत और सूर्यमें, सरसों और सुमेरुमें, काच और काञ्चनमें, तथा धतूरे और कल्पवृक्षमें महान् अन्तर है उसी तरह तुममें और उनमें है। ऐसा कहता हुआ- १०२. हे दो मुँहवाली, निरक्षर, लोहेकी तराजू ! तुझे क्या कहूँ ? जो तू गुंजाके साथ सोनेको तौटते समय पाताल नहीं चली गई। इस प्रकार जब पंडित झिड़क रहा था, तो राजाने उस मूल प्रतिको जटती आगमें इन्धन बना दिया। इस प्रकार वह द्विधा निर्वेद * होकर और द्विथा अवामुख x होकर अपने मकानके पिछले मागमें एक पुराने मञ्चपर जा बैठा और नीसासे डालता हुआ लंबा होकर सो गया। वाटपटिता ऐसी उसकी लड़कीने उसे भक्तिपूर्वक उठाकर स्नान-पान-भोजन आदि कराके, ति ठ क मजरी को प्रथम प्रतिके लेखनका स्मरण कर करके आधा ग्रंथ लिखा दिया। फिर पण्डितने उत्तरार्द्ध नया लिखकर ग्रंथ संपूर्ण किया। [यहाँ पर इसके आगे Pb आदर्शमें निम्न लिखित कथन पाया जाता है-] पंडितने ग्रंथ संपूर्ण किया और फिर रुट होकर ना णा गाँव में चला गया। एक बार भी ज की सभामें धर्म नामक वादी आया। उस समय यहाँ ऐसा कोई विद्वान् नहीं था, जो उसके साथ प्रतिवाद करनेका साहस करता। * द्विधा निर्वेदका मतलय दोनों तरहसे निर्वेद हुआ। १ निर्वेद-विन्न हुआ; २ निद-जानशून्य हुआ। x द्विघा अगइमुख -नीचा मुलगाला २-वागीशुन्य मुखवाला) . रस .
प्रयन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकारा तब भोज ने बहन मानके साथ धन पाल को बुलाया। उसे आते मुन कर ही वह वादी माग गया। लोगोंने हंसकर कहा-धर्मश्य त्वरिता गतिः धर्मको गनि ग्रीन होती है। [इस कहावतको उसने चरितार्थ किया ] राजाने सम्मान किया....और यहाँपर योगक्षेमा निर्वाह (गुज़र ) की क्या हाटत थी सो पूछी। पंडित बोटा- [२] हे राजन् , इम समय हमारा और आपका घर समान है, क्योंकि दोनों ही पृथु कार्त स्वर पात्र ( १ गंभीर आर्तनादका पात्र, और २ विपुल मुवर्णपानवाला) हैं, दोनों ही भूपित निःशेप परिजन है ( १ अलंकारहीन परिजनबाठा, और २ सारे परिजन जिसमें भूपित है, ऐसा ) है, और दोनों ही दिल स करेणुगहना (१ धृटिपूर्ण, और २ हाथियों मुसत्रित) हैं। (यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित और विशेष पंक्तियाँ पाई जाती है-) एक बार उसने मौज की समामें यह कान्य पढ़ा- [६९] हे धाराके अधीश्वर ! पृथ्वी राजाओंकी गणनामें कौलवान् होकर इस ब्रह्माने आकाशमें दियामे टकीर ग्वीच खींचकर तुम्हारी ही (अलेकी) गणना की। वहीं रेयायें यह स्वगंगा हो गई है और तुम्हारे समान पृथ्वीम अन्य भूमिश्व (राजा) का अमार होनेसे उसने उस खुटियाको फेंक दिया वही यह हिमाठय बना है। अन्य पंडित इस काव्य [को अयुक्ति पर हंसे । पर धन पाल ने कहा- [७०] वाल्मीकि ने वानरोंमें आहत (भंगवाये गये) पर्वतोमे समुदको बनाया और व्यास ने अर्जुन के वागोस । तयारि उनकी बाते अयुक्ति नहीं समझी जाती। हम तो कुछ प्रस्तुत विषय ही कहते हैं, नयापिलोग मुंद फाई कर हसने हैं ! इसलिये हे प्रतिष्ठे, तुझे नमस्कार है। एक बार किमी पन्डितकै यह पहनेपर फि-हे राजन् , महामारनको कथा मुनिये, उसपर परम आहेत पंडितने कहा- [०१] कानीन (कुमारी कन्या के पुत्र-व्यान) मुनि, जो अपनी भ्रातृवधूके वैधव्यका विध्वंस करने वाटा है, उमरी रचना, जिसमें गोठक (विधवा पुर) के पाँच पुत्र पाडर नेता है, जो स्वयं कुंठ (जापितानिका श्रीक अन्य उपरतिसे उत्पन्न पुत्र) है। कहा गया है कि ये पाँचो ममान जानिक है। दनका संकनिन करना भी यदि पुण्य-कर और कन्याग-कारक हो तो फिर पानी इमरी कौन मी गति होगी! ६) गो मन मुनि की शोमन च तुशि निकासति' प्रमिद ही है। इम ममय था कोई ना] प्रबंध आदि दिरा जा रहा है!' राजाके यह पूछने पर धनपाल ने पहा- [७२) गमें उतरनेवाटी गरम पानीमे, 13 जानेकी आशंका कारण सरस्वती मेरे मुंहले निकट कर घटी गई है । इमटिये धारयों की समीके फेस करने में व्या हायवाडे महाराज ! मेरे पाम अब कास्य नहीं रहा। गाने (प्रमन्न दौर दूध पानेके टिर] मी गार दिल्टराई । रामाने जब यह पूरा कि 'गायें मिटी!'सा- [७३}नरपर! ये मी तो इस देती नहीं है और ना ही इन मौन में एकको भी है। इन सौमी वही मुभिटो पासमा गाती२. गाय घासक पहुँच सकती! २स प्रकार पनपासने [उन युही और बेकार गायो] बात कही। .
प्रकरण ६२-६४] महाकवि धनपालका प्रबन्ध [५३ [७४ ] धन पाल कविका सरस वचन और मलयगिरिका सरस चन्दन, हृदयमें रखकर कौन निर्वत (शान्त) नहीं होता। [इबर शो म न मुनि स्तुति करनेके ध्यानमें लीन होनेसे ] एक खौके घर तीन वार [भिक्षा लेने ] गया। इससे उस त्रीका दृष्टिदोप लगा और वह मर गया । उसने अपने माईसे अन्त समयमें ९६ स्तुतियोंकी वृति कराके अनशनपूर्वक सौधर्म स्वर्ग प्राप्त किया।] -इस प्रकार यह धनपाल पंडिनका प्रबंध पूर्ण हुआ। ६२) कभी, उस नगरका निवासी कोई ब्राह्मण, जिसकी वृत्ति केवल भिक्षा ही थी, एक पर्व दिनमें नगरके सब लोगोंके स्नानमें व्यस्त रहने के कारण भिक्षा न पाकर खाली ताम्र-पात्रके साथ ही घर लौट आया। इसलिये ब्राह्मणी उसे फटकारने टगी। झगड़ा वढा और ब्राह्मणने उसपर प्रहार किया | आरक्षक पुरुप (नगररक्षक=पुलीस ) उसे कैद करके राजमंदिरमें लाये । राजाके पूछने पर उसने यह श्लोक पढ़ा- १०३. माँ मुझसे सन्तुष्ट नहीं रहती, और अपनी पतोहसे मी सन्तुष्ट नहीं रहती; वह (वह) भी न मुझसे और न माँस [ सन्तुष्ट ] है । मैं भी न उस (माँ) से और न उस (स्त्री) से [ सन्तुष्ट रहता हूँ] | हे राजन् ! बताओ इसमें दोष किसका है ? इसका अर्थ पंडितोंके न समझने पर, राजाने अपनी बुद्धिसे उसके अभिप्रायको प्रायः समझ कर, उसे तीन लाख [दानमें ] दिलवाये । और श्रोकके अर्थका व्याख्यान करते हुए कहा कि दारिद्य ही कलहका मूल है। सय दर्शनोंसे सत्यमार्गकी पृच्छा। ६३) वादमें, किसी समय, एक बार सब दर्शनोंको एकत्र बुलाकर राजाने मुक्तिका मार्ग पूछा। ये अपने अपने दर्शनका पक्षपात करने लगे । सन्यमार्ग जाननेकी इच्छासे राजाने उन सत्रको एकमत होनेको कहा । वे सब ६ महीने तक शारदाके आराधनमें लगे रहे । किसी रात्रिके अन्तमें शारदाने यह कहकर कि जागते हो?' राजाको उठाया और १०१. सौगत (बौद्ध) धर्म है सो तो सुनने लायक है (अर्थात् उसके सिद्धान्त सुननेमें अच्छे हैं); और आईत (जैन) धर्म है सो करने लायक है। व्यवहारमें वैदिक धर्मका अनुसरण करना योग्य है और परम पदकी प्राप्ति के लिए शिवका ध्यान धरना उचित है। (अथवा-अक्षय पदका ध्यान करना चाहिए ) राजाको तथा दर्शनों (सत्र मतवाले पण्डितों) को यह श्लोक मुनाकर श्रीभारती तिरोहित हुई। १०५. ' अहिंसा' जिसका मुख्य लक्षण है वहीं धर्म है । भारती (सरस्वती) है वही सबकी मान्य देवी है । ध्यानसे मुक्ति प्राप्त होती है यही सब दर्शनोंका मंतव्य है। इन दो श्लोकोंको बनाकर उन्होंने राजाको मुक्तिका निर्णय वताया। शीता पण्डिताका प्रयन्ध । ६४) बादमें, उस नगरकी निवासिनी शोता नामक रन्बनी (रसोई बनानेवाली) को किसी विदेशी- कार्पटिकने सूर्य पर्वकै दिन भोजन बनानेके लिए अन्न दे कर, स्वयं जलाशयमें स्नान करते समय कंगुनीके तेलका पान कर जानेसे, उसके घरपर आते ही, वमन करके मृत्यु प्राप्त हुआ। उसे देखकर, अपनेको द्रव्यक निमिच मार डालनेका कलंक लगनेकी आशंकामे उस धनीने मरनेके लिए उसी अन्नको ग्वा लिया। यह [ उसके पेटमें ] टिक गया। और उसके प्रमावसे उसको प्रतिमाका बड़ा विमव प्रादुर्भूत हुआ । तीनों ५४] प्रबन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रसार विद्याओंका कुछ अभ्यास करके विज या नामक अपनी नत्र युवती कन्याके साथ श्री भोज की सभाको मुशोभित करती हुई श्री भोज से बोली- १०६. श्रीमन्महाराज भोज की शूरताकी सीमा तो शत्रुओंके कुलोंका क्षय करने तक है, यशकी सीमा ठेठ ब्रह्माण्डरूपी भाण्ड तक है, पृथ्वीकी सीमा समुद्रके तट तक है, श्रद्धाकी सीमा पार्वती-पति (शिय) के चरणद्वन्द्वमें प्रणाम करने तक है, लेकिन वाकी जो अन्य गुण है उनकी तो कोई सीमा ही नहीं है। इसके बाद विनोद-प्रिय राजाने कुच-वर्णनके लिए विज या को आज्ञा दी। यह बोली- १०७. उस पतले शरीरवाली रमणीक स्तनमण्डलकी यदि, ऊँचाई चिवुक तक है; उत्पत्ति मुजलताके मूल तक है; विस्तार हृदय तक है और संइति कमलिनी सूत तक है; वर्णकी सीमा स्वर्णकी कसोटी तक है; और कठिनताकी सीमा होरेकी पानवाटी भूमि तक है तो उसका लावण्य अस्त समय (जीवनकी समाप्ति) तक है । उसके इस वर्णनको सुनकर, उस आधे कवि राजाने कहा- [७५) उस कमल-नयना दोनों कुचोंका क्या वर्णन किया जाय ?'-इसपर उसने आधा श्लोक यह कहा- सात द्वीपके 'कर' (महसूल) ग्रहण करनेवाले आप जैसे जहाँ कर (हाय) देते है । राजाने एक और आधा काय पढा-- [७६] 'आधात किये हुए मुरजके समान गंभीर घनियाले और भ्रमरों के समान नौल [वर्णवाले ] बादलोंसे यह दिशा रुद्ध-सी क्यों हो गई है?' इसके उत्तरार्धमें उसने कहा- [' इस लिये कि ] प्रथम विरहके खेदसे म्लान बनी हुई वाला, जिसका मुख आँखोंके उगले हुए आँसुओंसे धो गया है, वह यहाँ वास करती है। १०८. 'जगत्को आनंद देनेवाले उस सुरतको नमस्कार है '-इस प्रकार राजाके कहनेपर [क्यों कि ] ' जिसके आनुपंगिक फल हे भोजराज, आप जैसे पुरुप हैं।' विज या के इस विजयशाली वाक्यको सुनकर राजाने लज्जित होकर मुँह नीचा कर लिया । तब राजाने उसे [ अपनी ] भोगिनी बनाई। एक बार उसने जालके भीतरसे आते हुए चन्द्र-कर (किरण) के स्पर्श होनेपर [काव्य ] पदा- [७७ ] हे कलंकके शृंगारवाले चन्द्र! बस करो इस करस्पर्शनको लीलाको । तुम तो शिवके. निर्माल्य हो, इससे तुम्हारा स्पर्श करना उचित नहीं । [७८] अनुद्यम परायण (आलसी) राजाओंके समान, क्षणभरमें तारायें क्षीण हो गई; ग्राम्य जनोंकी समामें पंडितकी पण्डिताईके समान चन्द्रमाको कान्ति म्टान हो गई; जैसे मानों पारेने सोना खा लिया हो वैसी प्राची दिशा पिंगलवर्णा हो गई और निर्धन पुरुषोंके गुणकी तरह ये दीपक भी शोभा नहीं प्राप्त करते । [७९] कलिकालमें स्वजनोंकी भाँति तारायें विरल हो गई, मुनिके मनकी नाई आकाश सर्वत्र प्रसन्न हो गया, सज्जनोंके चित्तसे दुर्जनकी तरह अन्धकार दूर हो रहा है और निरुद्यमियोंकी लक्ष्मीकी तरह रात जल्दी जल्दी बीत रही है। इस प्रकार यहाँ पर बहुत कुछ वक्तव्य (काव्य आदि कहने लायक) है जो परंपरा द्वारा जान लेना चाहिए। -इस प्रकार शीता पंडिताका प्रबंध समाप्त हुआ। * ܀ प्रकरण ६५-६७ ] मयूर, वाण और मानतुङ्गाचार्यका प्रवन्ध , [५५ मयूर, वाण और मानतुङ्गाचार्यका प्रवन्ध । ६५) मयूर और वाण नामक दो साला-बहनोई पंडित, अपनी विद्वत्तासे एक दूसरेके साथ स्पर्धा करते हुए भोज की सभामें लब्धप्रतिष्ठ हुए। एक बार बाण पण्डित बहनसे मिलने गया और उसके घर जाकर रातको द्वारपर सो गया । | उस रातको रूठी हुई ] उसकी मानवती वहनको बहनोई द्वारा मनाती सुना। [बाण नै ] उसपर ध्यान दिया तो उसने यह सुना- १.९. हे तन्वंगी, प्रायः [सारी ] रात वीत चली, चन्द्रमा क्षीणसा हो रहा है, यह प्रदीप मानों निद्राके अधीन होकर झूम रहा है, और मानकी सीमा तो प्रणाम करने तक ही होती है, अहो ! तो भी तुम क्रोध नहीं छोड़ रही हो?- [काव्यके ] ये तीन पद वारंवार उसे कहते सुनकर [ यह चौथा पाद इस प्रकार बोल उठा-] 'हे चण्डि ! कुचोंके निकटवर्ती होनेसे तुम्हारा हृदय भी [ उनके जैसा ] कठिन हो गया है !" भाईके मुँहसे यह चौथा पाद सुनकर वह लजित हो गई और कुपित होकर उसे शाप दिया कि 'तुम कुष्ठी हो!' उस पतिव्रताके व्रतके प्रभावसे उसे उसी समय कुछ रोग उत्पन्न हो गया । प्रातःकाल शालसे शरीर ढककर राजसभामें आया । मयूर ने मयूरकी भाँति कोमल वाणीसे उसे । वरको ढ़ी यह प्राकृत शब्द कहा । इसपर चतुर चक्रवर्ती राजाने उसकी ओर विस्मयके साथ देखा । प्रसंगान्तर उठनेपर वाण ने देवताराधनका विचार किया और लजित भावसे वहाँसे उठकर नगरकी सीमापर गया। वहाँ पर एक स्तंभ खडा कर नीचे खदिर काठके अंगारसे भरा हुआ कुंड वनवाया । स्तंभके सिरेपर लटकाए हुए छीकेपर स्वयं बैठ गया। वहा सूर्यदेवकी स्तुति वनाना प्रारम्भ किया। प्रति काव्यके अन्तमें छीफेकी एक एक रस्सी चाकूसे काटने लगा । इस प्रकार पाँच काव्योंके अन्तमें उसने पाँच रस्सिया काट दी। इसके बाद छींकेके अग्रभागमें लगा रहकर उसने छठे काव्यसे सूर्यदेवको प्रत्यक्ष किया । उसके प्रसादसे तत्काल ही वह तेजवान् काञ्चनकी कान्तिवाला हो गया । दूसरे दिन उत्तम वर्णके चन्दनका शरीरमें लेप करके और दिव्य श्वेत वस्त्र लपेट कर [राजसभामें ] गया। उसके शरीरसौन्दर्यको [ पूर्ववत् ] राजाने देखा तो मयूर ने सूर्यके वरका फल बताया। यह सुनकर वाण ने बाणकी भाँति इस वाणीसे मयूर का मर्म वेध किया कि ' यदि देवारावन इतना सरल है तो तुम भी कुछ कोई विचित्र कार्य करके दिखा ओ न ?' उसके ऐसा कहनेपर मयूरने जवाब दिया कि- 'नीरोग आदीको वैद्यसे क्या काम ? फिर भी तुम्हारी वातको सच कर दिखाने के लिए अपने हाथ-पैर छुरीसे काट देता हूँ और तुमने तो छठे काव्यमें सूर्यको प्रसन्न किया है, परन्तु मैं प्रथम काव्यके छठे अक्षरमें ही भवानी- को प्रसन्न करता हूँ।' यह प्रतिज्ञा कर सुखासनपर बैठकर चण्डिकाके मंदिरके पिछवाडे जाकर बैठ गया। वहाँ 'मा भांक्षीविभ्रमम् ' (ऐसे आदि वाक्यवाली चण्डिका-स्तुति प्रारम्भ की) इसके छठे अक्षरपर ही चण्डिका प्रत्यक्ष हुई और उसकी कृपासे उसका शरीरपल्ला प्रत्यन तक सुन्दर हो गया। अपने सामने ही उस प्रसादको देखकर राजा और अन्य राजपुरुषोंने सामने आकर उसका जय-जय-कार किया और बड़े समारोह के साथ उसका नगरमें प्रवेश कराया। 'वरकोदी' यह प्राकृत शब्द द्वि-अर्थी है। वर कोटी' और 'वरक ओढी' ऐसा इसका पदच्छेद किया जाता है। पहले पदमें वर-अच्छा, कोढी चुष्टी अर्थात् अच्छे कुष्ठी (कुष्ठरोगी) यने ऐसा व्यंग्य है । दूसरे पदमें वरक शाल ओढी-पर डाली अर्थात् 'शाल ओढकर आये हो!' ऐसा आश्चर्यद्योतक वचन है।
५६] प्रबन्धचिन्तामणि. [द्वितीय प्रकाश ६६) इसी अवसर पर, मिध्यादृष्टि वालोंके धर्मको इस प्रकार विजयी होते देख, सम्यग्दर्शन (जैन) द्वेषी कुछ प्रधान पुरुषोंने राजासे कहा- यदि जैनधर्ममें भी कोई ऐसा प्रभाव बतलाने वाला हो तो श्वेताबर स्वदेशमें रहे, नहीं तो शीघ्र ही निर्वासित कर दिये जायें।' इस प्रकार उनके वचनके पश्चात् श्रीमान तुंगा चार्य को वहाँ बुलाकर राजाने कहा कि अपने देवताओंके कुछ चमत्कार दिखाइये | वे बोले- हमारे देवता तो मुक्त हैं, उनके चमत्कार क्या हो सकते हैं; तथापि उनके किंकर देवताओं के प्रभावका आविर्भाव देखिये । ' इस प्रकार कहके अपने शरीरको चवालीस हथकड़ियों और बेड़ियोंसे कसवाकर उस नगरके श्री- युगादि देवके मंदिरके पिछले भागमें बैठ गये ।' भक्तामर' इस आदि वाक्यवाली मंत्रगर्भ नई स्तुति बनाने लगे । इसके प्रति काव्यके अन्तमें एक एक बेड़ी टूटती जाती थी। बेड़ियोंकी संख्याके बराबर काव्य बनाकर स्तव पूरा किया और उस मंदिरको अपने सम्मुख परिवर्तित कर शासनका प्रभाव दिखाया । -इस प्रकार श्रीमानतुङ्गाचार्यका प्रबन्ध पूर्ण हुआ। . * गूर्जर देशकी विदग्धताका प्रबन्ध । ६७) बादमें, किसी एक अवसर पर, राजा अपने देशके पंडितोंके पांडित्यकी प्रशंसा करता हुआ गूर्जर देश के पण्डितोंको अविदग्ध ( असहृदय ) कह कर निन्दा करने लगा। इस पर वहाँके स्थानीय [ गूर्जर ] पुरुषने कहा कि हमारे देशके तो स्त्रियाँ और ग्पाला लोकके साथ भी आपके देशका कोई बड़ा पंडित तक समानता नहीं कर सकता। जब उसने ऐसी बात कही तो राजा उसे मिध्याभाषी बनानेकी इच्छासे अपना मनोभाव छिपा कर, कुछ दिन तक चुप-चाप रहा। इधर उस स्थान-पुरुषने भीम को यह वृत्तान्त कहलाया। भीम ने स्वदेशकी सीमा पर कुछ रसिक वेश्याओं और कुछ ग्वाल-वेष-धारी पंडितोंको नियुक्त किया । कोई वैसा गोप प्रताप देवी नामक वेश्याको साथ लेकर रसिक जनोंके लिये अमृतकी सार-भूत ऐसी धारा नगरी के निकट आया । यहाँ उस वेश्याको सजानेके लिये छोड़कर, सबेरे ही गोप [राजसभाके समीप पहुँचा] राजदीवारिकने उसको राजाके सम्मुख उपस्थित किया । श्री भोज ने कहा कि ' कुछ कहो ' इस पर- ११०. हे भोज दे व ! यह तुम्हारे गलेमें जो कण्ठा पडा है वह मुझे बहुत अच्छा लग रहा है । मालूम दे रहा है कि तुम्हारे मुखमें जो सरस्वती और वक्षःस्थलमें लक्ष्मी वस रही है उन दोनोंकी सीमा इसने विभक्त कर दी है। इस प्रकार उसकी उक्ति सुनकर विस्मयसे मनमें चकित होकर उसके सामने देख रहा था कि उतनेमें उस उत्तम परिच्छद धारिणी वेश्याको भी देखा। उसके प्रति भोज ने यह आकस्मिक वचन कहा- यहाँ क्या !'। इसके अनन्तर वह बुद्धि-निधि सुमुखी, जो स्वजाति ( स्त्री जाति) को होनेके कारण मानों सरस्वतीको खास कृपा-पात्र थी और शरीरधारिणी प्रतिभाकी भाँति [दिखाई देती थी ], राजाके गंभीर वचनके भी तत्त्वको समझकर उसको [ प्रारत भाषामें ] जवाब दिया कि पूछते हैं ' उसके इस उचित वचनसे भोज का मुख-कमल विकसित हो गया । उसको कोशाध्यक्षसे तीन लाख दिलवानेको कहा पर वह ( कोशाध्यक्ष ) इस तत्वको न समझकर तीन बार कहने पर भी चुप-चाप बैठा रहा। जब वह नहीं देने लगा तो राजा प्रकाश ही बोला, कि देशको परिस्थिति और स्वभावकी कृपणताके कारण इसे तीन ही लाख दिला रहा हूं, यदि उदारताके साथ दिया जाय तो इतना बड़ा साम्राज्य भी देना कम ही है। इस आदेशको मुनकर समस्त राजलोकने राजासे प्रार्थना की कि उन दो वाक्योंका अन्य क्या है ? इस पर वह बोला- *इसके कटाक्षोंकी दोनों अंजन रेखाओंको कान तक फैली हुई देखकर मैंने कहा कि 'यहाँ क्या ! इसने - प्रकरण ६६-६९] मोजका भीमके पास चार यस्तुयें मांगना [५७ जवाब दिया कि-'दोनों नेत्र कान तक फैली हुई अंजन रेखाके बहाने कानोंके पास यह निर्णय करने गये हैं कि क्या यह वही श्री भोज हैं जिनके बारेमें आप लोगोंने पहले सुन रखा है ? यही वात ये पूछते हैं।' प्राकृत भाषामें, व्याकरणके नियमसे द्विवचनका प्रयोग बहुवचनसे होता है। इसी बातकी आशंका करके इसने 'पुच्छंति' ऐसा जवाब दिया है। अपनी बुद्धिसे वृहस्पतिकी भी अवज्ञा करनेवाले ऐसे जो पण्डित हैं उनके लिये भी जो अर्थ अविषयीभूत है, उसे सहसा ही कहती हुई यह मानों प्रत्यक्षरूपा भारती ही है। सो इसके पारितोपिकमें तीन लाख क्या चीज है । इसके बाद तीन बार 'तीन लक्ष' देनेके लिये कहनेके कारण अपने सामने ही उसे नव लाख दिलवाया। इस तरह राजा भोज को गूर्ज र जनोंकी चतुरता मालूम हो गई तो उसने कहा-'विवेक तो गूर्जर देश ही में है।' [और तब राजाने ' माल वी य पंडित और गूर्जर गोपाल समान हैं ' इस वृद्धजनोंकी वाणीको सत्य मानकर उन्हें विदा किया।] इस प्रकार यह वेश्या और गोपका प्रवन्ध है। * ६८) यह राजा लड़कपनसे ही १११. मनुष्य यदि मृत्युको सिरपर बैठी हुई देखे तो उसे आहार भी अच्छा न लगे; तो फिर अकृत्य (अनुचित कार्य) करनेकी तो बात ही कहाँ हो। इस तत्वको जाननेके कारण धर्म कार्यमें अप्रमत्त रहता । एक बार [रातको ] निद्रा भंगके अनन्तर कोई विद्वान् आ कर [कहता है कि एक तेज घोड़ेपर सवार हो कर तुम्हारे पास प्रेतपति ( यमराज) आ रहा है, इस लिए उसके अनुसार धर्म-कर्मके लिए सजित हो जाइए ' इस वचनको बोलनेके लिए नियुक्त किये हुए पंडितको प्रतिदिन उचित दान देता रहा । एक बार अपराहमें राजा सिंहासन पर बैठा हुआ पान देनेवालेके दिये हुए बीड़ेसे पानके पत्तेको पहले ही मुँहमें डाल लिया । जब नीतिविदोंने उसका कारण पूछा तो इस प्रकार कहा- यमराजके दाँतके भीतर पड़े हुए मनुष्यों के लिये वही वस्तु अपनी है जो या तो दान कर दी गई है, या उपभोगमें ली गई है । और तो संशयवाली है। तथा और भी- ११२. [ मनुष्यको ] नित्य ही उठ उठ कर विचारना चाहिये कि आज मैंने कौनसा सुकृत किया । [ दिनके पूरा होने पर ] आयुका एक टुकड़ा ले कर रवि अस्त हो जायगा । ११३. लोग मुझे पूछते रहते हैं कि आपका शरीर तो कुशल है। [ लेकिन यह नहीं सोचते कि-] हम लोगोंको कुशल कैसे ! आयु तो दिन-प्रतिदिन बीतती ही जा रही है। १११. [ इस लिये ] फल जो करना है उसे आज ही कर लेना चाहिये, जो दोपहरके वाद करना है उसे उसके पहले ही कर लेना चाहिये । मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने किया है या नहीं किया। ११५. क्या मृत्युकी मौत हो गई है, बुढ़ापा यूढा हो गया है, विपत्तियाँ विपदामें पड़ गई हैं और व्याधियाँ बीमार हो गई है जो ये आदमी दर्प करते रहते हैं! इस प्रकार अनित्यता संबंधी चार श्लोकाँका यह मरंध है। * मोजका भीमके पास चार यस्तुयें माँगना । ६९) अन्य किसी दिन भोजने भीम राजाके पास दूतके मुग्यसे चार चीजें मांगी। एक यम्नु यह जो यहाँ है, यहाँ नहीं;' दूसरी 'वहॉ है, यहाँ नहीं; ' तीसरी ' जो दोनों जगह है;' और चौथी जो ५८] प्रवन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकाश कहीं भी नहीं है।' विद्वानोंके लिये भी इसका अर्थ समझना सन्दिग्ध होनेसे अण हिल्लपुर में इसके लिये दौडी पिटवाई जा रही थी तब किसी गणिकाने उस दौडीको छू कर विज्ञापित किया कि-(१) गणिका, (२) तपस्वी, (३) दानेश्वर और (४) जुआड़ी रूप इन चार चीज़ोंको भेज दीजिये। उसके कहने पर राजाने उस दूतको ये चीजें सौंप दी। ऐसा ही होना चाहिये ' यह कह कर दूत चारों चीजें ले कर जैसे आया था वैसे ही वापस चला गया । इस प्रकार चार वस्तुओंका यह प्रबंध है। * ७०) एक बार राजा भोज वीरचर्यामें घूम रहा था। उस समय किसी अभागेकी स्त्रीको- ११६. लोकमें तो ऐसा सुना जाता है कि मनुष्यको [ अपनी आयुमें ] दश दशायें आती हैं । पर मेरे पतिकी तो एक ही [दरिद्र ] दशा [ सदा बनी रहती ] है, सो मालूम देता है कि बाकीको चोरोने चुरा लिया है। यह पढ़ते सुन कर उसकी दुरवस्था पर राजाको दया आई और प्रातःकाल उसके पतिको सभा बुला कर उसका कुछ भी अच्छा भविष्य सोच कर, दो बिजौरे नीबुओंको, जिनमेंसे प्रत्येकमें एक एक लाखकी कीमत- के रत्न गुप्त भावसे रखवा कर, उसे इनाममें दे दिये । उसने भी इस वृत्तान्तको कुछ न समझ कर, कुछ दाम कर, साग-भाजीकी दूकान पर जा कर बेच दिये । उस ( दूकानदार ) ने भी उसका हाल न जान कर उन दोनों नाबुओंको किसीको भेंट दे दिया । उस आदमीने फिर से उन्हें उसी राजा भोज को भेंट किया । ११७. समुद्रवेलाकी चञ्चल तरंगोंसे घसीटा हुआ यदि कोई रत्न पहाड़ी नदीमें आ भी जाय तो वह फिरसे उसी मार्गसे उसी रत्नाकर ( समुद्र ) में ही चला जाता है । इस अनुभवसे राजाने [ इस उदाहरणमें ] भाग्य ही को तथ्य माना । क्यों कि, कहा भी है कि- ११८. वर्षा कालमें अशेप जगत्के प्रीत होने पर भी चातक तो जलका एक बूंद भी नहीं पाता । सच है, अलभ्य वस्तु कैसे मिल सकती है। इस प्रकार यह बिजौरे नीबूका प्रबंध है । - ७१) अन्य किसी एक रातको, राजाने अपने क्रीडा-शुक ( तोते ) को गुप्त रूपसे एक अच्छा नहीं है। यह बात पढ़ा कर उसे सिखाया कि तुम प्रातःकाल सभा यही वाक्य उच्चारण करना। बादमें जब उस तौते- ने वैसा ही कहा तो राजाने पंडितोंसे उसका मतलर पूछा। वे उसका मतलब न जानते हुए, उसके जाननेके लिये, उन्होंने ६ महीनेकी मुहलत मांगी। इसके बाद उनका मुख्य वररुचि इसका मतलब समझनेके लिये देशान्तरमें भ्रमण करने लगा। वहां किसी पशुपालने उससे कहा कि मैं इसका मतलब आपके स्वााको बता सकता हूं। पर मैं अपने इस कुत्ते के बच्चैको, बूढा होनेके कारण, न तो ढो सकता हूं,-और बड़ा प्रिय होनेके कारण, ना ही छोड़ सकता हूं। उसके ऐसा कहने पर उसे साथ लेनेकी इच्छासे वररुचि ने उस कुत्तेको कपड़ेमें टपेट कर अपने कन्धे पर रख लिया और उस पशुपालको साथ ले कर राजाकी सभा गया। यहाँ उसको उत्तर देनेवाला बताया। इसके बाद, राजाने उस पशुपालसे उसी बातको पूछा। [उसने जवाब दिया-] महाराज, इस जीयलोकमें लोम ही 'एक अच्छा नहीं है। रानाने फिर पूछा- कैसे !' यह बोला-इसलिये कि यह प्रकरण ७०-७३ ] इक्षुरस, तथा धुड़सवारोंका प्रबन्ध [५९ ब्राह्मण इस कुत्तेको, जो यद्यपि अस्पृश्य है, तथापि उसे कन्धे पर ढोता है, वह लोभ ही की लीला है। इसलिये लोभ ही एक अच्छा नहीं है। इस प्रकार यह एक अच्छा नहीं है.' प्रबन्ध पूरा हुआ। * . ७२) अन्य किसी समय, केवल मित्रको साथ ले कर राजा रातमें घूम रहा था, तो उसे बड़े जोरको प्यास लगी। तब उसने एक वेश्याके घर जा कर मित्रके मुखसे जल माँगा। तब बड़े प्रेमके साथ शं भली नामक दासी बड़ी देर करके, ईखके रससे भरा पात्र, कुछ खेदके साथ ले आई। मित्रने जो खेदका कारण पूछा, तो वोली कि पहले ईखकी एक ही लट्ठीमसे, जब यह शूलसे छेदी जाती थी तो, इतना रस निकल आता था कि घड़के साथ पुरवा (शकोरा) भी भर जाता था; पर इस समय राजाका मन प्रजाके विरुद्ध हो रहा है, इसलिये बड़ी देरके वाद भी केवल पुरवा ही भर पाया है। यही इस खेदका कारण है। राजाने उसके खेदके कारण को सुन कर विचार किया कि जिस वणिकने शिव मन्दिरमें वह वडा नाटक करवाया है उसको मैंने अपने मन टूटनेका विचार किया था; इसलिये इसकी यह बात ठीक ही समझनी चाहिए। बादमें लोट कर अपने स्थान पर आ कर सो गया। दूसरे दिन प्रजा पर वत्सल भाव मनमें रखता हुआ राजा वेश्याके घर गया उस दिन उसने यह कह कर राजाको सन्तुष्ट किया कि आज राजा प्रजाके प्रति कृपावान् है, क्यों कि आज ईखसे बहुत रस निकटा है। इस प्रकार यह इथुरसका प्रबंध पूर्ण हुआ। ही मन, * ७३) अन्य किसी एक अवसर पर, धारा नगरी के शाखापुरमें एक गोत्र देवीका मंदिर था जिसमें नमस्कार करने के लिये ( राजा ] नित्य आया करता था, उसमें कुछ वेलाका व्यतिक्रम हो गया। इससे वह देवता प्रत्यक्ष हो कर द्वार पर आ कर उस राजाको देखने लगी, जो उस समय बहुत थोड़े नौकरोंके साथ द्वार- देश पर आ पहुंचा था। राजाको देख कर ससंभ्रम वह अपने आसन पर बैठनेकी गड़बड़में,निजका आसन टांध गई। राजाने प्रणाम करके इस वृत्तान्तको पूछा । देवताने निकट ही शत्रुसेनाका आना बता कर कहा कि शीन जाओ ! कुछ ही समयमें राजाने अपनेको गूर्जर सैन्यसे विरा पाया । वेगवान् घोडेपर चढ़कर तेजीसे जाता हुआ यह धारा नगरीके फाटक पर पहुंचा, तो उस समय आलू या और कोल् या नामके दो गुजराती सकारोंने उसके फंटमें धनुष्य फेंके और यह कह कर उसे छोड़ दिया कि 'तुम इतने-ही-से मार डाले जाते !' ११९. जिसके 'गुण'-यान् धनुषने, मानों यह समझ कर ही कि यह भोज 'गुणी' है मागते हुए उस राजाको घोडेसे [ नीचे] नहीं गिराया। इस प्रकार यह घुड़सवारीका प्रबन्ध पूर्ण हुआ। * [इसके मागे Pा प्रतिमें निम्नांकित प्रयंघ पाया जाता है-] अन्यदा एक बार रातमें जग फर राजा भोज ने अपनी समृद्धिके विस्तारको अपने हृदय में सोच कर कान्यके ये तीन चरण पदे- * या सुरगवाला प्रल्प हिणी प्रतिमें, विक्रम या सामन्य निगा मा मिठा है और इसलिये इस पले, पर भी यह भाया हुभा है, लेग्नि पाँया प्रधिम माम देता है।
. ६.] प्रयन्धचिन्तामणि [ द्वितीय प्रकाश [८०] मनोहर युवतियाँ, अनुकूल स्वजन, अच्छे बांधव और प्रेममय वचन बोलनेवाले नौकर हैं। [ द्वार पर ] हाथियों के झुंड गरज रहे हैं, और तरल (तेज़ ) घोड़े [ हिनहिना रहे हैं - इस प्रकार राजा जब यह वारंवार बोल रहा था और चौथे चरणके लिये अक्षर ढूंद रहा था, उसी समय कोई वेश्याव्यसनी विद्वान् , जो अपनी वेश्याके वचनसे रानीके दो कुण्डल चुराने के लिये राजाके महलमें चौर वन कर घुसा था, उसने उन तीन चरणोंको सुना । तब उसने सोचा कि 'जो होना हो सो हो, पर जो चौथा चरण मनमें स्फुरित हो आया है उसे कैसे दवा रखू ?" और वह बोला- • आंखोंके मीच जाने पर [इनमेंसे फिर ] कुछ भी नहीं है।' राजाने सन्तुष्ट हो कर कुण्डलके साथ उसको मनोवांछित दिया । ७४) अन्य समय, एक बार, वही राजा, राजपाटीसे लौट कर नगरके गोपुरमें [जब आ रहा था तब ] एक बिना लगामका घोड़ा दौड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देख कर लोक आकुल-व्याकुल हो कर इधर उधर भागने लगे। उनमें एक तक विक्रय करनेवाली ग्याटिन भी सपाटमें आ गई और उसके सिरपर जो छॉलसे भरी हुई हंडिया थी वह नीचे गिर पड़ी । उसमेंसे नदीके प्रवाहकी तरह गोरस निकल कर बह चला, जिसे देख कर उसका मुख-कमल खिल उठा। भोज ने यह देख कर पूछा कि विषादके समय मी तुम्हारे इस हर्षका कारण क्या है ? राजाके यह पूछने पर वह बोली- १२०. राजाको मार कर, पतिको सांपसे काटा हुआ देख कर, मैं विविवश परदेशमें वेश्या हुई। पुत्रको [ अपने साथ ] वेश्यागामी पा कर मैं चितामें प्रविष्ट हुई। इसके बाद, गोपकी गृहिणी वनी; तो फिर आज मैं इस तऋके लिये क्या शोच करूं? [ वह इस प्रकार वोली । उस प्रदेशसे एक बड़ी नदी प्रादुर्भूत हुई, जिसका नाम म ही पड़ा। इस प्रकार गोपगृहिणीका यह प्रबंध समाप्त हुआ। ? * ७५) एक बार, प्रातःकाल, श्री भोज एक उपशिला (छोटे पत्थर ) को लक्ष्य करके आनन्दपूर्वक धनुर्वेदका अभ्यास कर रहा था, उसी समय श्वेताम्बर वेशधारी श्री चंदनाचार्य ने अपनी तत्कालोत्पन्न प्रतिभाकी मुन्दरतासे इस उचित पयको कहा- १२१. यह खविडत शिला चाहे खण्डित हो जाओ, पर हे राजन् ! इसके बाद क्रीड़ा करना वस कर दीजिये; और देय ! प्रसन्न हो कर पापाणवेधके व्यसनकी यह रसिकता छोड़िये । क्यों कि अगर यह श्रीड़ा बदी तो बड़े बड़े पर्वतोंको चेध करोगे और यह धरती यस्ताधारा (आधार जिसका ध्वंस हो गया है) हो कर, हे नृपतिटक! पातालके मूलमें चली जायगी। उनकी इस प्रकारका करिताके चमकारसे चमकृत हो कर मी राजाने कुछ सोच कर कहा-सत्र- शाख-पारंगत हो कर भी आपने जो 'घस्ता धारा ' यह पढ़ा उससे कोई उत्पात सूचित होता है।' भोज और कर्णका संघर्ष । ७६) इधर, दाहट देश के राजाकी देम ति नामक रानी महा योगिनी थी । एक बार, जब कि वह आसन्न प्रसाधी, सदेव ज्योतिषियोंसे यह पूछा करती थी कि किस शुभ लग्नमें उत्पन्न पुत्र सार्वमीम (सम्राट) होता है!' इसके बाद, उन्होंने अच्छी तरह विचार कर बताया कि जब शुभ प्रह उच्च राशि, और केन्द्र (प्रथम .
, , - प्रकरण ७४-७६] भोज और कर्णका संघर्ष चतुर्थ, सप्तम, और दशम) में हों, तथा पप ग्रह तृतीय, पष्ठ और एकादशमें हों, तो जो पुत्र होगा वह सार्वभौम राजा होगा। यह सुन कर, निश्चित प्रसव समयके बाद,१६ पहर तक, योगकी युक्तिसे गर्भस्तंम करके ज्योतिषीके निर्णात लग्नमें कर्ण नामक पुत्रको उसने जन्म दिया। उस गर्भधारणके दोपसे पुत्रप्रसबके अनन्तर आठवें पहरमें वह मर गई । सुलग्नमें जन्म होनेके कारण कर्ण ने अपने पराक्रमसे दिग्मण्डलको आक्रान्त किया । एक सौ छत्तीस राजाओंके, रिके समान काले-काले केश-कलापसे उसके दोनों विमल चरण-कमल पूजे जाते थे और चारों प्रकारको राजविद्याओंमें परम प्रवीणता प्राप्त करके, विद्या पति प्रमृति महाकवियोंसे वह स्तुत होता था । जैसे [ एक बार कर्पूर कवि ने कहा- १२२. + जिनके मुँहमें तो हारावाप्ति" है, आँखोंमें 'कंकणभार'' है, नितंबमें 'पत्रावली' है, और दोनों हाय 'सतिलक' है-हे श्री कर्ण ! तुम्हारे शत्रुओंको स्त्रियोंको, विविवश, वनमें, इस समय भूषण पहननेकी यह कैसी [ विलक्षण ] रीति ग्रहण करनी पड़ी है ! ऐसा कहने पर चतुर चक्रवर्ती राजाने कहा- यदि · विधि वश ऐसा हुआ तो फिर वर्णनीय राजाका क्या रहा ? देवने भी जिस बातकी चिन्ता नहीं की वह हो।' अतएव राजाको इसमें कुछ भी चमत्कार नहीं जान पड़ा और उसे विना कुछ दिये ही विदा कर दिया । घर जाने पर भार्याने पूछा- क्या दिया राजाने ?' उसने कहा- वही वृत्तस्वरूप !' ( अर्थात् श्लोकमें जो वर्णन किया गया है वही स्वरूप ) वह बोली- यदि 'विधियशात्' की जगह 'तव वशात् ' कहा गया होता तो वह सब कुछ दिलाता । तब फिर ना चिराज कविने कर्ण नृपकी स्तुति की । जैसे- [८१ ] गोपियोंके पीन पयोधरसे विष्णुका हृदय [ रूपी कमल ] आहत हो गया है इसलिये मैं समझता हूँ कि लक्ष्मी कमलकी आशंकासे तुम्हारे नेत्रोंमें ही अब विश्राम कर रही है। इसलिये है श्रीमन् कर्ण नरेश ! जहाँ तुम्हारी भ्रूलता चलती है वहाँ भयभ्रान्त हो कर दारिद्यकी मुद्रा टूट जाती है। इससे अत्यन्त तुष्ट हो कर राजाने हाथके सांकले इत्यादिके उचित दानसे उसे पुरस्कृत किया । इस प्रकार जब वह मार्गमें आ रहा था, तो कर्पूर क विने स्त्रीसे कहा कि राजाने इसे जो कुछ दिया है उसे, अब मैं अपने घर ले आता हूं। यह कह कर वह उसके सामने गया । [२२] हे कन्ये ! तूं कौन है ?'--'कर्पूर कवि ! क्या तूं मुझे नहीं पहचानता ?'-'क्या भारती है ?-' 'सच है'-'तूं विधुरा क्यों है !'मैं लूट ली गई!'-'माँ किसके द्वारा ?'-'दुष्ट विधाताके द्वारा- • उसने तुम्हारा क्या ले लिया ?'-' मुञ्ज और भोज रूपी दोनों आँख'-'तो जी कैसे रही हो?' -- ' क्यों कि दीर्घायु श्री ना चि राज कवि अन्धेकी लकड़ी रूप बने होनेसे ।' ना चिराज कविने इस काव्यसे सन्तुष्ट हो कर कर्णराज से जो कुछ स्वर्ण, दुकूल आदि प्राप्त किया था वह सब कर्पूर कविको दे दिया । कर्ण नरेन्द्रने यह सुना, तो कर्पूर को बुलाके पूछा कि- हे कवे ! भोज के विद्यमान रहते 'मुख-भोज' यह पद कैसे उदाहृत किया !' वह बोला-'महाराज, जल्दी में हर्ष- मुस' की जगह मुस-भोज मुँहसे निकल गया ।' तब राजाने सोचा कि यह बात भोज का अमंगल सूचित करती है। [ ८३ ] श्रीमत् कर्ण नरेन्द्रने मान और विभवसे सब याचकोंका मनोरय पूर्ण कर दिया, इसलिये चिन्तामणिके आँगनमें शिखावाली दुर्वायें हमेशा श्यामल हो रही है । कल्पतरुके शून्य तलमें निमाक हो कर पशु-पक्षी खेल रहे हैं। और कामधेनु निकट ही स्कंदको बैठा कर आलससे निद्रा ले रही है। + इस पद्यमें शन्दोंके लेप द्वारा दो भिन्न अयं निकाले गये हैं। १ हारावासिन्दारकी प्राप्ति और 'हा' ऐसे 'यव शब्दकी प्राप्ति । २ कंकण-आपका आभूषण और कंपानी उसका कण-अश्रुरिंदु । यों तो पत्राली स्तन पर बांधी जानी है, लेकिन इन स्त्रियों को तो पहनने के लिये पूरे वत्र नहीं है इस लिये पत्रावलीसे नितंत्र प्रदेशको दांकना पड़ा है। तिलक तो कपाल होता है लेकिन इन स्त्रियोंके तो अब हाथ ही सतिलक-दिलवाले हैं।
६२] 'प्रबन्धचिन्तामणि [द्वितीय प्रकारा ७७) इस प्रकार महाकवि गण उसके नाना यशकी स्तुति करते थे। एक बार उस कर्ण राजाने श्री. भोज के प्रति प्रधानोंको भेज कर [यह कहलाया-] ' आपकी नगरीमें आपके बनाये हुए १०४ मन्दिर है, इतने ही आपके गीत-प्रबंध और इतने ही विरुद हैं; इसलिये, या चतुरंग [ सेना ] की लड़ाईमें, या द्वन्द्व युद्धमें, या चारों विद्याओंका शास्त्रार्थ करनेमें, या त्यागमें मुझे जीत कर एक सौ पांच विरुदोंके पात्र बनो। नहीं तो मैं तुम्हें जीत कर १३७ राजाओंका स्वामी बनूंगा।' इस प्रकार उसके प्रभारके आवि: भर्भावसे भोज का मुखकमल किंचित् म्यान हो गया। वह काशी नगरी के स्वामीको सब प्रकारसे जीत जाने योग्य समझ कर और अपनेको पराजित मान कर, अनुरोवपूर्वक उसकी अभ्यर्थना करके इस प्रकार उससे स्वीकार कराया कि-' में अवन्ती में, और श्री कर्ण वाणारसी में एक ही लग्नमें नींव दे कर स्पके साथ ऐसे मंदिर बनवायें जो ५० हाथ ऊंचे हो । जहाँके प्रासादमें प्रथम कलश धजारोपणका उत्सव हो उसमें दूसरा राजा छत्रचामर छोड़ कर, हाथी पर बैठ कर वहाँ आये। इस प्रकार भोज के यथा-रुचि अंगीकार करनेकी बात जब कर्ण के कानों पहुँची तो वह यद्यपि क्रुद्ध हुआ तथापि भोज को उस तरह भी नीचा दिखानेके लिये [उद्यत हुआ]। एक ही लग्नमें अलग अलग दोनों जगह जब प्रासाद आरंभ किये गये तो, सारी तैयारी करके, सूबधारोंसे कर्ण ने अपने प्रासादको बनाते समय पूछा कि-'बताओ एक दिनमें, सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच कितना काम किया जा सकता है !' इसके जवाबमें उन्होंने, चतुर्दशाके अनध्यायके दिन, सात हाय ऊंचे ग्यारह मन्दिर, सूर्योदयमें आरम्भ करके शामको कलश तक बना कर राजाको दिखा दिये । उस सारी सामग्रोस राजाने प्रसन्न हो, आलस्य छोड कर, भोज के मन्दिरका जब मुंडेरा वाया जा रहा था तभी अपने मंदिर पर कलश स्थापित करा दिया; और पजारोपणका लग्न निर्णय कर, दूत भेज कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिये श्री भोज को निमंत्रित किया । तब मा ल या मण्डल का अधिपति मोज अपनी प्रतिज्ञा भंग होनेके भयसे, उस तरह जानेमें असमर्थ हो कर चुप हो रहा । इसके बाद प्रासाद पर घजारोपण हो जाने के बाद, पुरातन कणके नवीन अवतारके समान उस कर्ण राजाने उतने ही राजाओं के साथ प्रयाण करके श्री मोज के ऊपर आक्रमण किया । उस अवसर पर श्री भोज के राज्यका आधा हिस्सा देनेकी प्रतिज्ञा करके श्री कर्ण ने मा ल य मण्डल पर पूंट पीठमे आक्रमण करने के लिये श्री मीम को आमंत्रित किया । इस तरह उन दो राजाओंसे आकान्त होने पर राजा भोज का दर्प, मंत्रमे आक्रान्त सके विपकी भाँति दूर हो गया । अकस्मात् उसी समय भोज का स्वास्थ्य विगह गया जिसको वहाँ यालोंने छुपा रखा, और नियुक्त मनुष्यों द्वारा सभी घाटोंके रास्ते रोक दिये गये तथा अन्यदेशीय पुरुषों का प्रवेश एकदम अटका दिया गया । तब भी मने अपने सन्धिविग्रहिक दामर को, जो उस समप कर्ण के पास था, भोज का वृत्तान्त जानने के लिये अपने आदमी भेज कर पूछा । उसने भी उस पुरुषको एफ गाया पदा कर भेजा, जिसने श्री भीम की समामें आ कर कह सुनाया। यथा- १२३. आमका फल [अब ] पक गया है, वृन्त शिथिल हो गया है, आँधी जोरोसे चल रही है और शामा कापने लगी है। और आगे हम नहीं जानते कि इस कार्यका परिणाम क्या होगा। इस गापाके रहस्यको जान कर राना मी म पुर हो रहा। श्री भोज के परलोक-मार्ग की यात्रा जब निकट बाई तो उसने उपयुक धर्मत्य किया और समस्त रामपुरुषोंको राम्पानुशासन दे फर और यह आदेश देकर कि मेरे हाप विमानके बाहर रगना, [२ ] अरे ! पुत्र, करन और पुत्रियोंको क्या कर रहे हो और खेती बाहीको भी क्या फर दो! मनुस्यको तो अपने हाय पग दोनों शाइफर अकेले ही माना है और अकेले दी जाना है। भोज के श्म यायको पाने योगासे पक्ष । वर्ग गया।
प्रकरण ७७-७८ ] भोज और कर्णका संघर्ष . [६३ - कर्णसे भीमका आधा भाग लेना। ७८) [इसके बाद, जब वह राजा भोज स्वर्गगामी हुआ ] तो उस वृत्तान्तको जान कर कर्ण ने उसके दुर्गम दुर्गको तोड़ कर भोज की सारी लक्ष्मी हस्तगत की। तब श्री भी मने दाम र को आदेश किया कि- 'तुम या तो श्री कर्ण से मेरा प्राप्य आधा राज्य ले आओ या अपना सिर ले आओ।' इस प्रकार राजादेश 'पालन करनेकी इच्छासे, ३२ पदातियोंके साथ, उसने राजाके तंबूमें घुसकर मध्याह्न कालमें सोये हुए श्री कर्ण को बन्दीरूपमें गिरफ्तार किया। इसके बाद उस राजाने राज्य-ऋद्धिके दो विभागों से एकमें शिव, शालिग्राम, गणेश इत्यादि देवताओंको रखा और दूसरेमें राज्यकी अन्य सारी वस्तुओंको रखा। ' अपनी इच्छाके अनुसार इन दोमेंसे एक हिस्सा ले लो।' उसके ऐसा कहने पर, वह सोलह प्रहर तक तो वैसे ही पडा रहा, फिर भीम की आज्ञा [ आने पर ] देवताओं के भंडारको ले कर ही उन्हें श्री भीम को भेंट किया। इस प्रबन्धका सारा इतिहास इन दो काव्योंमें संग्रहीत है । जैसे- १२४. पचास हाथ प्रमाणके दो शिवमंदिर एक ही लग्नमें प्रारम्भ किये गये । यह स्थिर हुआ कि जिस राजाके मंदिर पर पहले कलशारोपण होगा, उसके पास दूसरा राजा छत्र और चामर रहित हो कर आयगा। इस संवादमें राजा भोज की बुद्धि व्ययसे विमुख हो गई और इस प्रकार वह कर्ण देव के द्वारा जीता गया । १२५. भोज राजाके स्वर्ग जानेके बाद अतिबली कर्ण ने जो धारापुरी के भंग करनेका उपाय किया तो राजा भीम को सहायक बनाया। उसके भृत्य दा मरने बंदी किये हुए कर्ण से गणपतिके सहित नीलकंठेश्वरको सोनेकी पालखीके साथ ग्रहण किया । १२६. कवियों और कामियोंमें, योगियों और भोगियोंमें, धन देनेवालों और सजनोंका उपकार करनेवालोंमें, तथा धनी, धनुर्धर और धार्मिकोमें भो ज जसा राजा पृथ्वी तलपर नहीं हुआ। १२७. राजा भोज ने अपने त्यागोंके कारण कल्पवृक्षके समान अशेष दुःखोंको त्रासित किया, साक्षात् बृहस्पतिकी नाई शीघ्रतापूर्वक नाना प्रबंधोंकी रचना की । राधा-वेध ( मत्स्य-वैध ) करने में वह अर्जुनके समान [ सिद्ध ] था । इसीलिये बहुत दिनोंसे, उसकी कीर्तिसे उत्सुक-चित्त देवताओं के द्वारा निमंत्रित हो कर वह स्वर्ग गया। इस प्रकार भोज के अनेक प्रबन्ध हैं जो परंपराके अनुसार जानने चाहिये । . * इस प्रकार श्रीमेरुतुङ्गाचार्यरवित प्रवन्धचिन्तामणि ग्रन्थका 'श्रीभोजराज और श्रीभीमराजके नाना यशोंका वर्णन' नामक यह दूसरा प्रकाश समाप्त हुआ।
प्रवन्धचिन्तामणि [नृतीय प्रकारा . ८. सिद्धराजादि प्रबन्ध । । मूलराज कुमारकी प्रजावत्सलताका प्रबन्ध । ७९) इसके बाद, किसी समय, गूर्जर देशमें अनावृष्टिके कारण जब वर्षा नहीं हुई तो विशोप क (1) दण्डा हि देशके ग्रामोंके कुटुम्बी (कुनबी-किसान) जनोंके राजाका कर (भाग) देनेमें असमर्थ हो जाने पर राजनियुक्त व्यापारियों ( कर्मचारियों ) ने उस देशके सभी लोगोंको, उनके धन और जनके साथ, पत्तन में ले आकर राजा भीम के सामने निवेदित किया । एक दिन सबेरे श्री मूल राज कुमारने टहलते टहलते देखा कि राज्यके आदमी फसलका दाण ( कर ) वसूल करनेके लिये सभी लोगोंको व्याकुल कर रहे हैं । अपने निकटके आदमियोंसे उस सारे वृत्तान्तके जानने पर उसकी आँखोंमें करुणाके कुछ आँसू आ गये । बादमें घुड़दौड़के मैदानमें उसने अपनी अनुपम कला दिखा कर राजाको सन्तुष्ट किया । उसपर राजाने आदेश दिया कि ' वर माँगो'। उसने [ राजाको ] सूचित किया कि- यह वरदान अमी भाण्डागार ही में रखा रहे । राजाने जब कहा कि-' अभी क्यों नहीं कुछ माग लेते ?' तो उसने कहा कि-' प्राप्ति होनेका कोई प्रमाण दिखाई नहीं देता-इसलिये । ' राजाके उसका अनुरोध पूर्वक खुलासा पूछने पर, उन कुटुंबियोंका लगान माफ कर देनेका उसने वर माँगा । तब हर्षके कारण जिसकी आँखें आँसुओंसे गद्गद् हो गई हैं ऐसे उस राजाने ऐसा ही हो ' कह कर ' और भी कुछ माँगो' यह कहा । १२८. केवल अपना ही भरण-पोपण करनेवाले क्षुद्र पुरुष तो हजारों हैं पर जिसका परार्थ ही स्वार्थ है ऐसा सजनोंका अगुआ पुरुष तो [ हजारोंमें ] कोई एक होता है । चाडव अग्नि समुद्रको अपने दुप्पूरणीय पेटको भरनेके लिये पीता है पर बादल तो पीता है प्रीप्मके तापसे तपे हुए जगतका सन्ताप दूर करनेके लिये। इस प्रकार इस काव्यापके भावको समझ कर, अविक लोमका निग्रह करके फिर और कुछ नहीं माँगा । इस तरह मानोन्नत हो कर वह अपने स्थान पर गया । उसके द्वारा, इस तरह बन्धन-विमुक्त बने हुए वे लोग देवताकी भाँति उसकी पूजा और स्तुति करने लगे। दैववशात् तीसरे ही दिन, उनके सन्तोषकी दृष्टि से स्तुत होता हुआ [ वह राजकुमार ] मृत्यु प्राप्त कर स्वर्ग लोकको चला गया। राजा, राजपुरुष और बन्धन-विमुक्त वे सब प्रजाजन उस शोकसागरमें डूब गये जिन्हें [ अन्यान्य ] समझदार लोगोंने, अनेक प्रकारके बोधवचन सुना सुना कर, कितने ही दिनोंके बाद उनको शोक-विमुक्त किया । इसके बाद, दूसरे साल, यथेष्ट वृष्टि होनेके कारण खूब फसल पैदा हुई । इससे वे किसान लोग अत्यन्त हर्षित हो कर, उस वर्षका और बीते हुए वर्षका भी, लगान देनेको तत्पर हुए पर राजाने उसे ग्रहण नहीं किया । तब उन्होंने एक उत्तर-सभाका सम्मेलन किया। सभा और सभ्योंका लक्षण यह है- १२९. वह समा ही नहीं जिसमें वृद्ध न हों, और वे वृद्ध नहीं जो धर्मका कथन नहीं करते। वह धर्म नहीं है जिसमें सत्य नहीं और वह सत्य नहीं है जो कल्पितसे अनुविद्ध हो । ऐसा [ शास्त्र] निर्णय कर सभ्योंने राजाले गत साल और उस सालका लगान ग्रहण करवाया। राजाने उस द्रव्यसे तथा खजानेमेंसे और कुछ द्रव्य मिला कर मूल राज कुमारके कल्याणार्थ नया त्रिपुरुष प्रासाद [ नामक शिवमन्दिर ] बनवाया ।
प्रकरण ७९-८४] कर्णराजा और मयणलादेवीका वृत्तान्त [६५ ८८०) इसने पतन में श्री भीमेश्वर देव और भट्टारिका (पटरानी ) भी रु आणी के [ नामसे शिवके ] प्रासाद बनवाये । संवत् १०७७ से लेकर ४२ वर्ष १० मास ९ दिन राज्य किया । ( B. P. प्रतियोंमें - संवत् १०६५ से आरंभ कर ४२ वर्ष राज्य किया ) कर्णराजा और मयणलादेवीका वृत्तान्त । ८१) उसकी रानीने जिसका नाम उदय मति था [ और जो नर वाहन खंगार की लड़की थी ], पत्तन में एक बहुत बडी नयी वापी ( बावडी) बनवाई, जो स ह स लिंग सरोवरसे भी कही अधिक आकर्षक थी। ८२) इसके वाद, सं० ११२० चैत्र वदि ७ सोमवार, हस्त नक्षत्र, मीन लग्नमें श्री कर्ण दे व का राज्याभिषेक हुआ। ८३) इधर, शुभ के शी नामक कर्नाट देश का राजा घोड़ेसे [ जिसको अपने काबूमें न रख सकनेके कारण ] उडाया जा कर किसी घने जंगलमें जा पडा । वहाँ पत्र फलसे भरे किसी वृक्षकी छायाका उसने आश्रय लिया। उसके पास ही दावाग्नि लगी । जिस वृक्षने [ अपनी छायामें ] विश्राम दे कर उपकार किया था उसे, कृतज्ञताके कारण छोड कर चले जानेकी उसकी इच्छा न हुई । और इसलिये, उसीके साथ दावानलमें उसने अपने प्राणोंकी आहुति दे दी। फिर इसके वाद, मंत्रियोंने उसके पुत्र ज य के शी को राज-पद पर अभिषिक्त किया । क्रमशः उसके एक म य ण ला देवी नामकी पुत्री पैदा हुई । शिवभक्तोंने उसके सामने [ किसी समय] ज्यों ही सो मेश्वर का नाम लिया त्यों ही उसको अपने पूर्व जन्मका स्मरण हो आया कि- ' मैं पूर्व जन्ममें ब्राह्मणी थी। बारहों मासके उपवास करके प्रत्येकके उद्यापनकै समय बारह वस्तुओंका दान किया करती थी। [ इसके बाद ] श्री सोमेश्वर को प्रणाम करनेके लिये प्रस्थान करके वाहु लोड न गर में आई । वहाँपर कर देनेमें असमर्थ हो [आगे ] न जा सकी । उसीके शोकमें, यह प्रतिज्ञा करके कि 'भविष्य जन्ममें मैं इस करको मिटादेने वाली बनूं'-मर कर इस कुलमें पैदा हुई । ऐसी यह उसे पूर्व जन्मकी स्मृति हुई । इसके अनुसार बाहु लोड के करको हटा देनेकी इच्छासे उसने गूर्जर नरेश जैसे श्रेष्ठ वरकी कामना करके अपने पितासे यह सब वृत्तांत कहा। ज य के शी राजाने यह व्यतिकर जान कर अपने प्रधान पुरुषोंके द्वारा, श्री कर्ण से अपनी पुत्री श्री म य ण ला देवी को [ पत्नीरूपमें ग्रहण करनेकी ] स्वीकृति माँगी। श्री कर्ण ने जब उसकी कुरूपताकी बात सुनी तो वह उदासीन हो गया । पर उस कन्याका मन उसीमें लगा देख कर पिताने म यणला देवी को उसके वहाँ, स्वयंवरा रूपमें-जिसने स्वयं अपना घर चुन लिया है-उसीके पास भेज दिया । इधर कर्ण गुप्तरूपसे स्वयं ही उसे कुरूपा देख कर उसके प्रति सर्वथा निरादर हो गया । राजाके इस प्रकार त्यागके कारण अपनी आठ सखियोंके साथ म यण ल्ला देवी को प्राणत्याग करनेकी इच्छुक जान कर श्री कर्ण की माता उ द य म ति रानीने, उनकी यह विपद देखनेमें असमर्थ हो कर, उन्हींके साथ प्राणत्यागका सकल्प किया । क्यों कि- १३०. महान् लोग अपनी विपत्तिसे उतने दुःखी नहीं होते जितने दूसरोंकी विपत्तिसे । अपने ऊपर आघात होने पर पृथ्वी अचल रहती है वही दूसरोंकी रिपद देख कर काँपने लगती है। इसके बाद महा उपद्रव उपस्थित हुआ जान कर मातृभक्तिवश श्री कर्ण ने उससे विवाह कर लिया। पर बादमें [ बहुत समय तक ] उसकी ओर नज़र उठा कर ताका मी नहीं। ८४) एक बार मुखाट मंत्रीको कन्चुकीसे यह माझ्म हुआ कि राजाका मन किसी अधम खीके प्रति सामिलाप है । [ यह जान कर ] उसने ऋतुस्नाता म यण सादेवी को, उसीका रूप धारण कराके एकान्तमें १७-१८ प्रपन्चचिन्तामणि [ नीर प्रकार दमके पास भेनारगनाने यह समस फर कि यह महीना है, उसके साथ सप्रेम उपभोग किया और उससे टसको गर्मा मान दो गाजिर टमले सहरा बनाने के लिये राजाके हायसे उसकी नामाक्षित अटी टे टी और अपनी अधिमें परन ची। बादमें प्रात:काल, उस दुटिसके कारण राजाको ग्यानि हुई और उस रहस्यमय यास्तविक वृदातको न जानने र उमने प्राण पाग करने का संकलन किया । स्मृनिशानियो, तविकी बनी हुई प्रम नाक मार गिन करनेमे इसका प्रायधित हो जाएगा, ऐमा विरान बतानेसे गनाने टमी प्रकार करनेकी रडा की। सब ठम मंत्री ने यह मारी यान जेमी बनी थी मी कह सुनाई। (इस अगद प्रतिमें निम्नलिखित नोक मिलने-) [८५)[ अग्ने ] भारी पराक्रमके कारण तो यह पिता [ मीम ] के ममान हुआ । और रमणीय आकारके कारण यह राना अपने पुत्र [ जयनिह-सिदराज के समान हुभा । [८६ मिना कर्म (गजाके) फेबी-नेत्रों को कही भी रनि (प्रानि ) नहीं प्रास होती थी मी कि उन (पी-नेत्रों) की प्रति कर्ण (फान ) तक दुई। ( अर्थात् इसी टिय मानो त्रिपोंके नेत्र काननक र दोनेटगे।) 1८७) मानों क. और बन के उस पुराने पैरको स्मरण करने पर ही, उस कपंने [अग्ने] अन (27) पराको देशान्तरमें पहुंचा दिया। सिद्धराज जयसिंहका जन्म । [ ८८ प्रशाददारय के पुत्र मनोदर गुगोसे युक्त श्री राम हुए उसी प्रकार इम [क] पा जगजिपीमा जय नानक पुरा हुभा। ८५) अ टन ( ) में हुए उप पुत्र का नाम रानाने जमरा रा यर याक मन परा पा उनी ममप ममपाक तुमारों के माप मेटना आ निझामनार आम्द हो गया । इस पER सिर गम फर गनाने ग्वानिरिक्षामे पूजा उन्होंने निरेदन किया कि प []भा पुरविक गाने उगी ममप उम पुरका गाभिषेक करा दिया। ८६). ११५.पौर निगर, अमन नभर, 7 सप्रने, साजिदरानका पालिका। ८७), ETA नाम माग गदनेगळे आशा मामा माटो र गुटके लिए पा. गागदेव न होने पर, पोरस नामक देवारा मंदिर बनाया और Antanायक अरिति उग भागी नगर और उप प्रामा में नमनी , कर्णधा देणारा मदर और पनमा गरमागाणे गुमोनित कनीयती girl गुरका | उगमाने पन में घी कमेर नामा माया पनपा। म. ११२.१, ० ११५.र) २१, २९८ माग २१न "Hamal गिरगना गायन-टीला पैगा प्रपन्य। 14 niry हो गया 21 मा amr xtuat MITRA RE५ो,-पिता: En im rearrantu चन-नार म.ग.गति - प्रकरण ८५-९.] उदयन मंत्रीका प्रबन्ध [६७ , करते थे-अपने महलमें बुलाया । शरीरमें बनावटी रोग बतला कर नाडी दिखाई । वैद्यने उपयुक्त पथ्यका सेवन करना बतलाया तो [उस मदन पाल ने कहा ] 'वही तो नहीं है । ' और इसीलिये मैंने तुम्हें बुलाया है। [किमी और प्रकारका ] पथ्य दे कर भूख शान्त करनेके लिये तुम्हें नहीं बुलाया है ] । इसलिये वत्तीस हजार [रुपये ] हाजर करो, यह कह कर उसे वंदी कर लिया। उसने यह सब वैसा करके (अर्थात् उसका मांगा हुआ द्रव्य दे-दिटा कर ) फिर इस तरहका अभिग्रह (नियम) ग्रहण किया कि-'में इसके बाद प्रतीकारके लिये राजाका घर छोड़ कर अन्यत्र कहीं नहीं जाऊँगा। इसके बाद परम आतुर रोगियोंका प्रश्रवण (पैशाब) मात्र देख कर ही वह उनका निदान और चिकित्सा करता रहा। [ एक समय ] किसी मायावीने, कल्पित रोगकी चिकित्सा कौशलको जाननेकी इच्छासे एक बैलका मूत्र दिखाया । उसने अच्छी तरह उसे देख कर सिर हिलाते हुए कहा- यह बैल बहुत खानेके कारण फल गया है । इसलिये शीघ्र ही इसे तेटकी नाली दो । नहीं तो मर जायगा।' ऐसा कह कर उसने उसके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न किया। एक बार राजाने अपनी गर्दनकी पीडाका प्रतीकार पूछा । उसके यह कहने पर कि, दो पल भर कस्तूरीको भिगो कर टेप करनेसे रोग शान्त होगा, वैसा ही किया गया । गर्दन ठीक हो गई । फिर राजाकी पाटकी ढोनेवाले किसी गरीब मनुष्यने प्रीवा ( गर्दन) की पीड़ाकी दवा पूछी । उससे कहा कि ' करीरकी जड़ घिस कर उसके रसमें उसी जगहकी मिट्टी मिला कर उसका लेप करो।' तब राजाने पूछा कि यह क्या बात है ! । इस पर उसने बताया कि ' आयुर्वेदज्ञ लोग देश, काल, बल, शरीर और प्रकृति देख कर चिकित्सा किया करते हैं।' एक बार, कुछ धूर्त एक मत हो कर दो दोकी संख्या में पृथक् पृथक् हो गये। पहले दोने बाजारके रास्तेमें पूछा कि क्या बात है कि आप शरीरसे खिन्न दिखाई देते हैं।' दूसरे दोने श्री मुसा ट स्वामी प्रासादके सोपान पर [ यही बात ] पूछी । तीसरे दोने राजद्वार पर और चौथे दोने द्वारतोरण पर यही बात पूछी । इस प्रकार वार यार पूछनेसे उसे [ अपने स्वास्थ्यके विषयमें बड़ी ] शंका उत्पन्न हो गई और तत्काल ही उसे माहेन्द्र ज्वर हो गया । [ और उससे ] तेरहवें दिन यह वैद्य मर गया। इस प्रकार यह ठ० लीला वैद्यका प्रबंध समाप्त हुआ। * ८९) इसके बाद, सान्तू नामक मंत्री, काटकी नाई अन्यायी उस मदन पाल को मारनेको इच्छासे किसी समय, कर्ण के पुत्र-कुमार ज य सिंह-को हाथी पर चढ़ा कर राजपाटिकाके बहाने उसके घर ले गया और यहाँ [बुछ दूकान मचया कर ] वीरोंके हायसे उसको मरवा डाला। * - उदयन मंत्रीका प्रयन्ध । ९०) इधर, मरु देश का रहनेवाला कोई श्री माट वंशीय यणिक् जिसका नाम 'उदा' था, अष्टा घो खरीदनेके लिये, वर्षाकालकी अधेरी रातमें कही जा रहा था। वहाँ जंगल में उसने देखा कि कुछ कर्मचारी किसी खेतमें एक क्यारीसे दूसरी क्यारीमें जल भर रहे हैं। उनसे पूछा कि तुम लोग फोन हो । उन्होंने जत्र फहा कि 'हम फला आदमीकै कामुक (हितचिन्तक) है' तो उसने पूछा कि मेरे भी कही है। इस पर उनके यह बताने पर कि 'फर्णाय तो में है। यह सकुटुंब [ उस स्थानको छोड़ कर ] यहाँ (फर्णा यती) पहुँचा। यहाँ पर पाय टीय जिन मन्दिरमें [ देवदर्शन करते हुए उसको ] किमी टाहि' नामक एक लिपिका प्राविकाने, उसे साधर्मिक जान कर प्रणाम किया। उसके यह पूटने पर कि आर किमके अतिथि है ![उदाने कहा कि] 'मैं विदेशी , आर ही का अतिथि समशिर!' यह मन कर उसने उसको अपने साप टे जा फर, किसी यनि- - ६८] प्रयन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश क्के घर भोजन बनवा कर उसे खिलाया और अपने घरके नीचे तल्लेमें खाट बिछया कर रहनेकी जगह दी। कालक्रमसे उसके पास खूब सम्पत्ति हो गई। फिर उसने अपना निजका ईटोका घर बनानेकी इच्छा की। उसकी नीव खोदते समय [जमीनमेंसे ] अपरिमित धन निकल आया। वह उस स्त्रीको बुला कर उस निधिको जब देने लगा तो उसने अस्वीकार किया । उसी निधिक प्रभावसे, वहाँ पर, वह उ द य न मंत्रीके नामसे प्रसिद्ध हुआ। ९१) [ फिर उस धनसे ] उसने कर्णा व ती में अतीत, भविष्य और वर्तमानके चौबीस चौवीस जिनोंसे सुशोभित श्री उदय न विहार [ नामक मन्दिर ] बनवाया । ९२) उसको भिन्न भिन्न मातासे उत्पन्न ऐसे चार पुत्र हुए, जिनके नाम चा हड, आम्ब ड, वा हड और सोला क इस प्रकार थे। सान्तृ मंत्रीका प्रयन्ध ९३) एक दूसरे अवसर पर, सान्तू नामक महामंत्री हाथी पर चढ़ कर राजपाटिकामें जा कर लौटा और अपनी ही बनवाई हुई सान्तू य स हि का में देवयन्दन करनेकी इच्छासे उसमें प्रवेश करते हुए, उसने, किसी चेत्ययासी श्वेताबर यतिको, वार-वेश्याके कंधे पर हाथ रखे हुए देखा । मंत्रीने हाथोसे उतर कर उत्तरासन करके, पञ्चाङ्ग प्रणामके द्वारा, गौ त म मुनिकी भाँति, उसको प्रणाम किया। वहाँ पर क्षणभर ठहर कर, फिर उसे प्रणाम करके, वह चला गया । वह यति तो लाजके मारे मुँह नीचा किये पातालमें गड़ा-सा जाने लगा और फिर तत्काल सब छोड़-छाड़ कर ' मल धारी श्री हेम सूरि के पास उपसम्पदा ग्रहण करके, संवेग रससे पूर्ण हो शत्रुज य पर्वत पर चला गया और बारह वर्षतक वहाँ तप किया। किसी समय वही मंत्री श्री श घुस य पर देवचरणोंकी यात्राके लिये गया तब वहाँ उस मुनिको अपरिचितकी नाई देख कर, उसके चरित्रसे मनमें चकित हो कर, उसका गुरुकुल आदि पूछा। 'असल में तो आप ही गुरु हैं'-उसके ऐसा कहने पर कान बंद करके मंत्रीने कहा- नहीं, नहीं, ऐसा मत कहिये ।' असल बात न जाननेके कारण ऐसा कहते हुए उस मंत्रीसे उसने कहा- १३१. चाहे गृही हो चाहे त्यागी, जो जिसको शुद्ध धर्ममें स्थापित करता है वही उसका धर्मगुरु होता है। इस प्रकार उसे मूल वृत्तान्त बता कर उसकी धर्ममें दृढ़ता निर्माण की। इस प्रकार यह मन्त्री सान्तूकी दृढ़धर्मताका प्रबंध समाप्त हुआ। * . मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना। ९४) उसके बाद, श्री म यणलादेवी ने, अपने पूर्व जन्मकी स्मृतिके ज्ञानसे जाना हुआ, पूर्वभवका यह वृत्तात, जब सिद्ध राज से कह बताया, तो वह श्री सोमनाथ के योग्य सवा करोड़ मूल्यकी सुवर्णमयी पूजा- सामग्री साथ ले कर यात्राके लिये माताके साथ चला । वह इस प्रकार, वाहु लोड़ नगर पहुँची, तो वहां पर, पञ्चकुल - कर वसूल करने वाले राजपुरुष - के द्वारा, कापडी आदिप्रवासी भिक्षुक गण, कर देने के लिये पीडित किये जा कर, उनकी अवहेलना की गई। ये आँखों में, आंसू भर कर पीछे लौटने लगे। मयणल्ला देवी ने जो यह बनार देखा तो उसके दर्पणसे [ स्वच्छ ] हृदयमें उनकी पीडा संक्रान्त हो गई। यह भी [उनके साथ याना किये बिना ] पीछे लौटने लगी। तब सिद्धराज ने बीचमें पड कर कहा-'स्वामिनि ! आपका यह कैसा संभ्रम है ! आप क्यों पीछे लौट रही हैं !' राजाके ऐसा कहने पर [ उसने कहा-] जभी यह कर सर्वथा बन्द कर दिया जायगा तभी मैं सोमेश्वर को प्रणाम करूँगी, अन्यथा नहीं। और तो क्या, इसके बाद भोजन और पानका भी मुझे नियम है।' यह मुन कर राजाने पञ्चकुलको बुलाया और उसका हिसाब पूछा, तो उसमें ७२ प्रकरण ९१-९६ ] मयणलादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना [६९ -लाखकी आमदनी माम दी। राजाने उस करके पट्टेको फाड कर, माताके कल्याणार्थ उस करको उठा दिया और अंजलीमें जल ले कर उसकी प्रतिज्ञा की । इसके बाद उस ( म य ण ला देवी ) ने सो मे श्वर के पास जा कर उस सुवर्णसे पूजा की; तथा तुलापुरुषदान, गजदान आदि अनेक महादान दिये । ,रातको वह ऐसे गर्वके साथ कि मेरे समान संसारमें न कोई हुई और न कोई होने वाली है ' गादी नीदमें सो गई । तपस्वी वेप धारण करके उसी देव ( सो मेश्वर ) ने [ स्वप्नमें प्रत्यक्ष हो कर के ] कहा- यहीं मेरे देवालयमें एक कार्पटिक स्त्री -यात्राके लिये आई है । तुम्हें उसका पुण्य माँगना चाहिये। ऐसा आदेश करके जब वह देवता अन्तर्धान हो गये तो [फिर प्रातःकाल ] राजपुरुषोंसे खोज करा कर उस स्त्रीको उसने बुलवाया। उसके पुण्यको माँगने पर भी वह किसी तरह जब देनेको तत्पर न हुई तो उससे पूछा कि 'यात्रामें तुमने क्या [द्रव्य ] व्यय किया है ?' तो यह बोली कि मैं भीख भाँग माँग कर १०० योजन दूरसे, कई देश पार करके, कलके दिन यहाँ देवालयमें आई हूँ। तीर्थोपवास करके, पारणामें किसी सुकृति के यहाँसे, मैं निर्भागिनी थोडासा पिण्याक (खली ) प्राप्त करके, उसके एक टुकड़ेसे मैंने श्री सोमेश्वर की पूजा की, एक टुकड़ा अतिथिको दिया और एक टुकड़ा स्वयं खा कर उपवासका पारणा किया। आप तो बड़ी पुण्यवती हैं-जिसके पिता, भाई, पति और पुत्र राजा है । आपने यह वा हु लोड कर, जो ७२ लाखका था, उठवा दिया है । सवा करोड़ मूल्यकी सामग्रीस देवकी पूजा कर अगणित पुण्य अर्जन किया है। आप मेरे इस क्षुद्र पुण्य पर क्यों लोम करती हैं ! और यदि क्रोध न करें तो कुछ कहूँ । असलमें तुम्हारे पुण्यसे मेरा पुण्य अधिक है । क्यों कि- १३२. संपत्ति होने पर नियम करना, शक्ति रहते सहन करना, यौवनावस्थामें व्रत लेना और दरिद्रा- वस्थामें दान देना, यह सब बहुत थोडा होने पर भी अधिक पुण्यका कारण होता है । इस प्रकारके युक्ति-युक्त वाक्यसे उसने उसके गर्वका निराकरण किया। . * ९५) इसके बाद, सिद्धराज जब समुद्र के किनारे खडा हो कर उसको देख रहा था तब एक चारणने आ कर इस प्रकार स्तुति की- १३३. हे चक्रवर्ती नाथ ! तुम्हारे चित्तको तो कौन जानता है, लेकिन मैं समझता हूँ कि हे कर्ण पुत्रं आप शीघ्र ही लंका लेना चाहते हैं और उसीके लिये यहाँ खडे खडे मार्ग देख रहे हैं। [ तब एक ] दूसरे चारणने कहा- १३४. हे जेसल (जय सिंह)! यह समुद्र दौड कर तुम्हारे पैर धो रहा है। इसलिये कि तुमने और तो सब राजाओंको जीत लिया है और सिर्फ एक मेरा विभीषण राजा बाकी रह गया है; सो उसको छोड़ दीजिए। * सिद्धराजका मालवाके साथ संघर्प। ९६) राजा जब इस प्रकार यात्रामें व्यस्त था, उसी समय माल या का छलान्येपो राजा यशोवर्मा गूर्जर देश में [ आ कर ] उपद्रय करने लगा। सान्तू मंत्री ने पूछा कि 'भलाँ, आप कैसे इस चढाईसे निवृत्त हो सकते हैं!' उसने कहा कि 'यदि तुम अपने स्वामीकी सो मेश्वर देव की यात्राका पुण्य मुझे दे दो तो।' ऐसा कहने पर उस मंत्रीने उसके चरण धो कर, उस पुण्यदानके निदानरूप जलको चुन्टमें ले कर उसके हाथ पर छोड़ दिया और ऐसा करके उसको [ गूर्जर देश से ] यापस लौटाया । [यानासे टोट कर] श्री सिद्धराज जब नगरमें आया और मंत्री और माल व नरेशके उस वृत्तान्तको सुना तो यह बड़ा क्रुद्ध हुआ। मंत्रीने उससे ७०] प्रयन्धचिन्तामाणि [तृतीय प्रकाश . [शांत करते हुए] यों कहा-'स्वामिन् ! यदि मेरे देनेसे तुम्हारा पुण्य चला जाता है तो मैं उसका तथा अन्य पुण्यरानोंका पुण्य इसी तरह आपको भी दे देता हूँ। और असलमें तो बात यह थी कि जिस-किसी भी उपायसे शत्रुमेनाको स्वदेशमें प्रवेश करनेसे रोकनी जरूर थी।' ऐसा कह कर उसने नृपतिका अनुनय किया। इसके बाद इसी अमर्यवश उसने मा ल य म ण्ड ल पर चढ़ाई करनेकी इच्छा की। स ह स लिंग [ सरोवरादि ] धर्म- स्थानके कार्यका जो आरंभ किया गया था उसकी देखरेखका काम मंत्रियों और शिल्पियों (कारीगरों) को सौंपा। वड़ी शीघ्रता के साथ उसका काम चलने पर राजाने युद्धके लिये प्रयाण किया । वहाँ जय-जयकारके साथ वारह वर्ष तक युद्ध होता रहा । फिर भी जब किसी प्रकार धारा [ नगरी ] का किला नहीं टूटता दिखाई दिया तो [एक दिन राजाने यह ] प्रतिज्ञा की कि धारा के किलेको तोड़े बिना आज अन्न ही न खाऊँगा । सार्यकाल हो जाने पर भी ऐसा करनेमें असमर्थ होनेके कारण, सचियोंने आटेकी बनावटी धारा वनवा कर और वहाँ पर परमार राजपुत्रको अपने सैनिकों द्वारा मरवा कर, उस प्रतिज्ञाका निर्वाह कराया। इस प्रकार प्रपञ्चसे राजाने प्रतिज्ञा तो पूरी की, लेकिन कार्यमें सफलता प्राप्त न होनेसे वापस लौटनेकी अपनी इच्छा मु झा ठ नामक मंत्रीको बताई। उसने अपने गुप्तचरोंको तीन रास्ते, चौराहे और चबूतरे इत्यादिक स्थानों पर भेज कर, धारा के किले के मंग होनेकी बातें जाननी चाही। लोगोंके परस्पर वार्तालाप करते हुए, धारा के रहने वाले किसी [ जानकार ] पुरुपने कहा कि ' दक्षिण दिशाके दरवाजेकी औरसे शत्रुसेना हमला करे तब ही कहीं धारा के फिलेका तोड़ना सफल हो सकता है, अन्यथा नहीं।' यह बात सुन कर [उन गुप्त चर लोगोंने ] मंत्रीको सूचित किया। उसने इस वृत्तान्तको गुप्तरूपसे राजाको विज्ञापित किया। राजाने भी यह वृत्तान्त जान कर उधर ही से सेनाफे साथ आक्रमण किया। तो भी दुर्गको बड़ा दुर्गम समझ कर राजा स्वयं यशःप टह' नामक अपने प्रधान बटवान् पर हाथी पर चढ़ा। उसके पीछे सामल नामक महावत खड़ा रहा । त्रिपोलिया दरवाजेके दोनों किवाडौंको, जिनके अंदर लोहेकी जबर्दस्त अर्गला लगी हुई थी, तोडनेके लिये उस हार्थाने अपना सर्व सामर्थ्य खर्च कर दिया। किवाड तो टूट गये लेकिन हाथीकी हड्डी भी साथमें टूट गई। महावतने सिद्धराज को उस परसे उतारा और ज्यों ही वह स्वयं उस पर चढ़नेको उद्यत हुआ त्यों ही वह हाथी पृथ्वी पर गिर पड़ा। यह हाथी बड़ा वीर होने के कारण मर कर अपने यशसे धवल हो कर पड सर प्राममें य शोध चल नाम ग्रहण करके बिनायक रूपसे अवतीर्ण हुआ। १३५. सिद्धिके स्तनरूप शैलके तटदेशके आघातके कारण मानों जिसका दूसरा दांत टूट गया है, वह एक दाँत धारण करनेवाला गजवदन (विनायक ) तुम्हारा श्रेय करे । इस तरह उसकी स्तुति [की जाती है । इस प्रकार दुर्गका भंग करने पर युद्धमें आरूढ़ य शोवर्मा को [ सन्धि-विप्रहादि] ६ गुणोंसे बाँध कर, उस जगह पर अपनी जगन्मान्य आज्ञाकी उद्घोषणा करवाई और यशोधर्म [राजाको वन्दि बना कर अपने साथ ले ] पत्तन में आया । [तब करियोंने ऐसी स्तुतियां पढ़ी-] [८९] अरे क्षत्रियो, ऐसा न समझो कि इस सिद्धराज के कृपाणने अनेक राजाओंका सेनाका नाश किया है इसलिये अब इसकी धार कुंठित हो गई है। नहीं नहीं; प्रबल प्रतापरूप अनिके ऊपर आरूढ हो कर यह सम्प्राप्तधार (=१ जिसने धारा नगरीको ग्राम किया है, २ जिसने तेज़दार धार पाई है) कृपाण चिरकाल तक मा ट व रमणियोंका अश्रुजल पी कर और अधिक तेज होगा [९०] हे महाराज ! आपने शत्रुओंके विजय करनेमें दूधको धाराके समान जो उम्पल यश प्राम किया है उसके कारण आपकी तय्यार तो उम्घल ही थी पर इन मा ल य-नारियोंके काजल मिश्रित अश्रुजल ] पी पी कर, इसने, उसकी महिमा सूचक, यह कालिमा धारण कर ली है।।
प्रकरण ९६-९७ ] सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन [७१ सिद्धराज और हेमचन्द्राचार्यका मिलन । ९७) प्रति दिन सब दर्शन [ के आचार्यो ] को आशीर्वाद और दानके लिये धुलाये जाने पर, यथावसर बुलाये गये श्री हेम चन्द्र प्रभृति जैनाचार्य श्री सिद्धराज के पास गये । राजाके दुकूल आदि दे कर उनका सत्कार करने पर, उन सभी अप्रतिम प्रतिभा पूर्ण पंडितों द्वारा दोनों तरह पुरस्कृत हो कर हेम चन्द्रा चार्य ने राजाको इस प्रकार आशीर्वाद दिया- १३६. हे कामधेनु ! तूं अपने गोमयके रससे भूमिका आसेचन कर, हे समुद्रो ! तुम अपने मोतियोंसे स्वस्तिक बनाओ, हे चन्द्र! तूं पूर्णकुंभ बन जा और हे दिग्गजो! तुम अपने सरल गुंडोंसे कल्पवृक्षके पत्ते तोड़ कर उनके तोरण सजाओ-क्यों कि संसारका विजय करके सिद्ध राज आ रहा है। इस प्रकार निष्प्रपंच ( सरल ) काव्यके विवेचन करने पर उनकी वचन-चातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर राजाने [ यथेष्ट ] प्रशंसा की । इस पर कुछ असहिष्णुओंके-- अर्थात् ब्राह्मणोंके- यह कहने पर कि हमारे शास्त्रोंके- अर्थात् पाणिन्यादि व्याकरण ग्रंथोंके- अध्ययनके वल पर ही इन (जैनों) की विद्वत्ता है।' राजाने श्री हेम चंद्र आचार्यसे पूछा । [उन्होंने कहा-] प्राचीन कालमें श्री जिनेन्द्र महा वीर ने अपने शैशव कालमें इन्द्रके सामने जिसकी व्याख्या की थी उसी जैनेन्द्र व्या कर ण को हम लोग पढ़ते हैं। उनके ऐसा कहने पर उस पिशुनने कहा कि इन पुरानी बातोंको तो छोड़ दो और हमारे समयके ही किसी तुम्हारे व्याकरण कर्ताका पता बता सकते हो तो वताओ । इस पर वे राजासे बोले कि यदि महाराज श्री सिद्ध राज सहायक हों तो, मैं ही स्वयं कुछ दिनों में ही पञ्चाङ्ग पूर्ण नूतन व्याकरण तैयार कर सकता हूँ। राजाने कहा- मैंने [ साहाय्य करना ] स्वीकार किया । आप अपने वचनका निर्वाह करें । ऐसा कह कर उसने सब सूरियोंको बिदा किया । वे भी अपने अपने स्थानको गये। राजाने [ पहले ही यह एक ] प्रतिज्ञा कर ली थी कि यशो व मी के हाथमें विना म्यानकी छुरी देकर और उसको अपने पीछे बिठा कर हाथी पर सवार हो कर हम नगरमें प्रोश करेंगे । राजाकी इस प्रतिज्ञाको सुन कर मुजाल नामक मंत्री [ असंतुष्ट बना और उस ] ने प्रधान पद छोड़ दिया । राजाके बार बार कारण पूछने पर १३७. राजा लोक चाहे सन्धि [ करना] न जाने और विग्रह भी [करना] न जाने पर यदि वे [मंत्रियोंका ] आख्यात ( कहा हुआ ) ही सुनते रहें तो इसीसे वे पण्डित हो सकते हैं। इस प्रकारका नीतिशास्त्रका उपदेश है। महाराजने स्वयं अपनी बुद्धिसे जो यह प्रतिज्ञा की है, भविष्यमें चह बिल्कुल ही हितकर न होगी। राजाने प्रतिज्ञाभंग होनेके भयसे भीत हो कर कहा कि 'प्राणोंका त्याग करना अच्छा है । किन्तु विश्वविदित इस प्रतिज्ञाका नहीं।' इस पर मंत्रीने काठकी छुरी बना कर शालवृक्षके पाण्डुरंगके गोंदसे उसे परिमार्जित कर, पीछेके आसन पर बैठे हुए यशोवर्मा के हाथमें दी। उसके आगेके आसन पर राजा सिद्धराज बैठा और खूब समारोहके साथ उसने अण हिलपुर में प्रवेश किया । प्रावेशिक मंगलकी धूमधाम समाप्त हो जाने पर राजाने व्याकरण वृत्तान्तकी याद दिलाई। इस पर बहुतसे देशोंके तज्ज्ञ पंडितोंके साथ सभी व्याकरणोंको नगरमें मंगवा कर श्री हे म चंद्राचार्य ने श्री सिद्ध है म नामक नूतन पञ्चाङ्ग व्याकरण एक वर्षमें तैयार किया। इसका ग्रंथप्रमाण सवालाख श्लोक था। राजाके निजके वैठनेके हाथी पर उस पुस्तकको रख कर उसका जुलूस निकाला गया। उसके ऊपर श्वेतच्छत्र लगवाया गया और दो चामरमाहिणियां चामर झलने लगी। इस प्रकार उस ग्रंथकी महिमा करके उसे कोशागारमें रखा। फिर राजाको ७२] प्रयन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश आज्ञासे अन्य व्याकरणोंको छोड़ कर लोग सब उसीका अध्ययन करने लगे। इस पर फिसी मत्सरीने राजासे कहा कि 'इस व्याकरणमें आपके वंशका तो कोई उल्लेख ही नहीं है ।' इससे राजाके मनमें क्रोध हुआ। यह बात किसी राजपुरुपसे जान कर श्री हे मा चार्य ने [तत्क्षण ] बत्तीस श्लोक नूतन निर्माण करके बत्तीस ही सूत्रपादोंके अन्तमें उन्हें संलग्न कर दिया । प्रातःकाल जब राजसभामें व्याकरण बांचा गया तो- १३८. हरिकी भाँति बलि वंधकर (-१ वटिको बाँधनेवाला, २ बलियोंको बंदी करनेवाला), शिवकी नाई त्रिशक्कियुक्त, और ब्रह्माकी तरह कमलाश्रय (=१ कमलका आश्रय लेनेवाला, और २ कमला- लक्ष्मीका आश्रय ) श्री मूल राज नृपकी जय हो । इत्यादि, चौ लुक्य वंश की स्तुतियाले बत्तीस श्लोक बत्तीस सूत्रपादोंके अन्तमें आये सुन कर राजा मनमें प्रमुदित हुआ और उस व्याकरणका उसने खूब प्रचार कराया। इसी प्रकार श्री सिद्धराज के दिग्विजय वर्णनमें [हे मा चार्य ने] द्याश्रय नामक [ काव्य ] ग्रंथ बनाया। [हे मा चार्य के बनाए इस सिद्ध है म व्याकरण के विषयमें विद्वानोंने ऐसी उक्तियाँ कही हैं-] १३९. हे भाई! पाणिनि के प्रलापको बंद करो, का तंत्र का चीथड़ा मत फाडो शा कटा य न के कटु वचनको मत पदो, और क्षुद्र चा द्रव्या क र ण से क्या मतलब है, भलाँ, और क ण्ठा भरण आदि व्याकरणोंसे अपने आपको कोई क्यों मुटायेगा, जब कि अर्थमधुर ऐसी श्री सिद्ध है म की उक्तियाँ सुननेको मिलती हैं। ९८) इसके बाद,श्री सिद्धराज ने पत्तन में यशोवर्म राजा को, त्रिपुरुप प्रभृति सभी राजप्रासादों और स ह स लिंग प्रभृति धर्मस्थानोंको दिखा कर बताया कि-[ हमारे राज्यमें ] प्रतिवर्ष देवदायमें एक करोड़ द्रव्य व्यय किया जाता है ! 1 और फिर उससे पूछा कि 'यह सुंदर है या असुंदर। वह बोला-मैं तो अहारह लाख संख्यााले (!) मा ल व देश का राजा हूँ, तो भी मैं तुमसे पराजित कैसे हुआ है। पर यह देश तो पहले ही महा काल देव को अर्पण कर दिया गया है और उसी देवद्रव्यका हम मा ल वी लोग उपभोग कर रहे हैं; और इसीलिये हमारा उदय और अस्त होता रहता है | आपके वंशयाले राजा भी इतना देवदन्य व्यय करने में असमर्थ हो कर उसका लोप करेंगे और फिर सारा देवदाय बंद हो जानेपर इसी प्रकार धे विपत्तिग्रस्त हो कर समूल नष्ट हो जायेंगें। सिद्धराजका सिद्धपुरमें रुद्रमहालय यनवाना। ९९) इसके पश्चात्, एक वार श्री सिद्धराज ने सिद्धपुर में रुद्रमहा ल य का प्रासाद बनवाना चाहा । किसी [प्रसिद्ध ] स्थपति ( कारीगर ) को अपने पास रख कर, प्रासादके प्रारंभ होने के समय उसकी केटासिकामो-जो उसने किसी साहुकारके यहाँ एक लाखमें बंधक रखी थी-छुदा कर उसको दिलवाई। यह यांसकी कमाचियोंकी बनी हुई थी। उसे देख कर राजाने पूछा कि क्या बात है? इस पर उस स्यपतिने कहा कि मैंने महाराजकी उदारताकी परीक्षाके लिये ऐसा किया है। फिर उस द्रव्यको राजाकी अनिच्छा रहते हुए भी लोटा दिया । फिर क्रमानुसार २३ हाथ ऊँचा सांगपूर्ण प्रासाद बनाया | उस प्रासादमें अश्वपति, गनपति, नरपति प्रमृति बड़े बड़े राजाओंकी मूर्तियाँ बनया कर रखी और उनके सामने हाथ जोड़े हुए अपनी मूर्ति भी बन गई। [जिसका आशय यह है कि राना] उनसे यर माँगता है कि देशका भग करते हुए भी इस पामादफा कोई मंग न करें। उस मंदिर पर पजारोपका उत्सर करते समय सभी जैन प्रासादोंकी पताफायें उतरया दी गई। जैसे मा ल य देश के महाकाल के मंदिरमें जब वैजयंती चदाई जाती है तब जैन प्रासादोंमें मनारोपण नदी होने पाता। १या कामिका नाममा कारीगरराई भोवार है जिसका टीक अर्थ समर में नहीं आना।
. - प्रकरण ९९-१.१] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । [७३ सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना । १००) एक बार, सिद्धराज ने मा ल व क मण्डल के प्रति जाना चाहा तब किसी व्यवहारीने [जो उस काममें नियुक्त आधिकारी था ] सहस्र लिंग सरोवरके कारखाने के लिये कुछ द्रव्य और भाग माँगा । राजा उसे कुछ भी दिये विना चला गया। कुछ दिनोंके बाद व्याभावसे उस कामके चलनेमें देरी होते देख, उस व्यवहारी ( अधिकारी) ने अपने लड़कसे किसी धनाढ्य पुरुषकी स्त्रीका ताडंक ( करन फूल) चुरवा लिया, और फिर स्वयं उसके दण्डस्वरूप तीन लाख द्रव्य दे दिया। उससे वह काम पूरा हो गया। यह बात मा ल व मण्डल में, वर्षाकालमें ठहरे हुए राजाने सुनी । सुन कर उसे जो आनन्द हुआ उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसके बाद वर्षाकालकी घनी वृष्टिसे जब सारी पृथ्वी एक समुद्रकी भाँति जलमय हो गई तो प्रधान पुरुषोंने राजाको बधाई देनेके लिये किसी म रु दे श यासीको भेजा । उसने [ जा कर ] राजाके सामने विस्तार पूर्वक वर्षाका स्वरूप कहना आरम्भ किया । इसी बीच, उसी समय आया हुआ कोई धूर्त गुजराती जल्दीसे बोल उठा-' महाराज बधाई ! सहसलिं ग सरोवर [ जलसे परिपूर्ण ] भर गया है । उसके ऐसा कहने के साथ ही राजाने उस गुजराती को अपने शरीरके सारे आभरण दे दिये । वह म रु वा सी छोकेसे गिरे हुए मार्जार की भाँति देखता ही रह गया। १०१) इसके बाद, वर्षा बीतते ही, राजा वहाँसे लौटा। [रास्तेमें] न गर महा स्था न (व ड न गर) में डेरा डाला और वहाँ वनवाये गए मंच-मंडपमें राजसभाको बैठक की गई। नगर के प्रासादोंमें धज लगे हुए देख कर ब्राह्मणोंसे पूछा कि 'ये कौनसे प्रासाद हैं ?' उन्होंने जब यहाँके जिन और ब्रह्माके मंदिरोंका हाल बताया तो क्रुद्ध हो कर राजाने कहा कि ' जब मैंने गूर्जर मडल में, जैन मंदिरों में पताका लगानेका निषेध किया है, तो फिर आप लोगोंके इस नगरमें इन जैन मंदिरों पर ये पताकायें क्यों उड रही हैं !' उन्होंने कहा कि-' सुनिये, कृतयुगके प्रारंभमें श्रीमन्महादेवने इस महा स्थान की स्थापना करते हुए श्री ऋषभनाथ और श्री ब्रह्मदेवके प्रासाद स्वयं बनवाये और उन पर घजायें चढाई । सो इन दोनों प्रासादोंका सुकृतियों द्वारा उद्धार होते रहने पर ये चार युग बीत गये। दूसरी बात यह है कि पहले यह नगर शत्रुझ य महागिरिकी उपत्यका भूमि था । क्यों कि नगर पुराण में भी कहा है कि- १४०. कहा जाता है कि आदिकालमें इस जिनेश्वरके पर्वतकी मूलभूमिका विस्तार पचास योजन था ऊपरकी भूमिका विस्तार दश योजन था और ऊँचाई आठ योजन थी। कृतयुगमें आदिदेव श्री ऋषभदेव के पुत्र भरत नामक हुए । उन्हींके नामसे यह 'भरत खण्ड' प्रसिद्ध हुआ। १४१. नाभि और [ उनकी पत्नी ] मरु देवी के पुत्र श्री वृ पम (ऋपम देव ) हुए जिन्होंने समहक् हो कर मुनियोग्य चर्याका आचरण किया । वे स्वच्छ, प्रशान्त अन्तःकरण, समहक और मुधी थे। ऋषिगण उनके अईत पदको मानते हैं। १४२. म रुदे वी के गर्भसे नाभि के (श्री ऋषभदेव) पुत्र हुए जो अष्टम [ विष्णु के अवतार स्वरूप] थे और सब आश्रमसे नमस्कृत थे। जिन्होंने धीरोंको अथवा वीरोंको [ मोक्षका ] मार्ग दिखाया। ( यहां P प्रतिमें निम्नलिखित-अनुवादवाले-श्लोक अधिक पाये जाते हैं-) [९१] स्वायंभुव मनु के पुत्र प्रियव्र त नामक हुए; उनके पुत्र हुए अग्नीन्द, उनके नाभि और उनके पुत्र ऋपम। १९-२. , . ७४ ] प्रयन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [९२] मोक्षधर्मका विधान करनेकी इच्छासे वासुदेव ही अंशरूपसे अवतीर्ण हुए हैं, यह बात उनके विषयमें [मुनियोंने ] कही है । उनके सौ पुत्र हुए जो सभी ब्रह्मपारंगत थे। {९३] उनमें सबसे ज्येष्ठ मरत थे जो नारायणके भक्त थे। जिनके नामसे यह अद्भुत ऐसा भारतवर्ष विख्यात हुआ। [९४] अईन, शिव, भय, विष्णु, सिद्ध, बुध, परमात्मा, और पर-ये सभी शब्द एक ही अर्थके याचक हैं। [९५] मनीषियोंने जैन, बौद्ध, ब्राह्म, शैव, कापिल और नास्तिक इन छहों को दर्शन कहा है। [९६} उसमें, इन सबके कुलके आदि बीज वि म ल वाहन हैं। मरु देय और नाभि ये भरत खंड में कुल-सत्तम ( कुलश्रेष्ठ ) हुए। इत्यादि पुराण वाक्योंको सुना कर, विशेष विश्वासके लिए श्रीवृपमदेवके मन्दिरके भण्डारमेंसे, राजा भरत के नामसे अंकित, पाँच आदमियों द्वारा उठाये जाने लायक काँसका बड़ा ताल ले आ कर राजाको ब्राह्मणोंने दिखाया । और इस प्रकार जैनधर्मका आदिधर्म होना उन्होंने सिद्ध किया । इसके बाद खेदसे मनमें खिन्न हो कर राजाने, एक वर्षके वाद, जैन मंदिरों पर पुनः पजारोपण करवाये । १०२) तदुपरान्त, पत्तन में पहुँचने पर राजाको जब सरोवरके खर्चका हिसाब बताया गया तो व्यवहारीके उस अपराधी पुत्रसे दण्डस्वरूप तीन लाख लिये जानेकी भी बात सुनी । वह तीन लाख उसके घर भिजवा दिया। इसके बाद वह व्यवहारी राजाके लिये हाथमें भेंट ले कर उसके समीप आया और बोला कि यह आपने क्या किया?' तब फिर उस कर्मस्थायके अधिकारी व्यवहारीसे राजाने कहा-'जो व्यवहारी कोटीध्यज है वह ताडङ्कका चोरनेवाला कैसे हो सकता है ! तुमने इस धर्मस्थानके बनवानेमें कुछ धर्ममाग मागा था, लेकिन उसके न मिलने पर प्रपञ्चमें चतुर--तथा मुँहसे मृग और भीतरसे व्याकी वृत्तिवाले, ऊपरसे खूब सरल और अंतरसे शठभाववाले मनुष्यको तरह-तुम्होंने यह कर्म ( ताडकको चौरी) करवाया है।' [ इस प्रकारकी और भी कितनी ही बात कह कर उसे खूब लजित किया। ] १४३. जिस सरोवरके भीतर, शिवके मन्दिरके दीपक प्रतिविवित हो कर पातालमें सोके सिरपरके मणियों की भाँति शोभा पाते हैं। १४४. सिद्ध राज के इस सरोवरके शोभित रहते, मेरा मन मानसरोवरमें नहीं रमता, पम्पा सर उसक आनंद सम्पादन नहीं करता और अच्छोद सरोवर, जिसका जल बहुत ही अच्छा है, वह भी असार ( जान पड़ता ) है। एक वार श्री सिद्धराज ने राम चन्द्र [ कवि ] से पूछा ' प्राप्म ऋतुमें दिन क्यों बड़े होते हैं।' राम चन्द्र ने कहा- [९७] हे श्री गिरिदुर्ग के मल्ल महाराज ! आपके दिग्विजयके उत्सवमें दौड़ते हुए वीरोंके घोडोंकी टाप्से पृथ्वीमण्डल खोद डाला गया है और हवासे उड़ी हुई उसकी धूलने जा कर आकाशगंगामें मिल कर उसे पंकस्थलीके रूपमें परिणत कर दिया है। इससे उसमें दूर्वा उग गई है और उसे सूर्यके घोड़े चरने लग गये हैं। इसी लिए यह दिन बड़ा हो गया है।
प्रकरण १०२-१०३ ] सिद्धराजका पाटनमें सहस्रलिंग सरोवर बनवाना [७५ [९८ ] मार्गणोंने तुम्हारे शत्रुओंके पास लक्ष (निशाना ) पा लिया है और तुम्हारे पास ये विलक्ष (निशानेसे रहित ) हो कर रहे हैं। फिर भी हे सिद्धराज ! तुम्हारा 'दाता'पनका जो यश है वह ऊपर सिर उठाये रह रहा है-बढ़ता चला जाता है! इसके बाद, एक बार राजाने प्रथिलाचार्य ज य मङ्गल सूरि से नगरवर्णन करनेको कहा । उन्होंने कहा- [९९] मालूम होता है कि इस नगरीकी नागरिकाओंके चातुर्यसे निर्जित हो कर सरस्वती देवी है सो हक्की-बकी-सी हो कर अपनी कच्छपी नामक वीणाको अपने वाहुसे उतार कर यहाँ पर छोड़ दी है और स्वयं पानी वहन करने लगी है । उसकी इस वीणाका यह स ह स लिंग सरोवर तो मानों तुंचा है और कीर्ति स्तंभ मानों उसका उच्च दण्ड है। १०३) इसके बाद, जब श्रीपाल कवि की रची हुई स ह स्र लिङ्ग सरोवर की प्रशस्ति, पट्टिका पर लिखी गई तो उसके संशोधनके लिये सर्व दर्शनके ( आचार्योंके ) बुलाये जाने पर श्री हे म चंद्राचार्य ने [ अपने प्रधान शिष्य ] राम चंद्र पण्डितको यह कह कर भेजा कि ' प्रशस्ति काव्य जो सभी विद्वानोंको अनुमत हो तो उसमें अपना कुछ भी पाण्डित्य मत दिखाना ।' फिर उन सब विद्वानोंने प्रशस्ति काव्यको शोधनेकी दृष्टि से पढा और राजाके अनुरोधसे तथा श्री पाल कवि के चतुरतापूर्ण पाण्डित्यसे प्रसन्न हो कर सारे काव्यको मान्य किया। उसमें भी उन सभीने निम्नलिखित काव्यकी विशेष प्रशंसा की- १४५. " कोशसे युक्त होते हुए भी तथा दल (१ पत्ता, २ सेना ) से समृद्ध हो कर भी यह कमल अपने ही कण्टकोंके समूहको उच्छिन्न करनेमें असमर्थ है और इसके अतिरिक्त पुंस्त्व भी नहीं धारण करता। (कमल शब्द पुंल्लिंग नहीं है) [ दूसरी ओर सिद्धराज का जो कृपाण है ] यह अकेला ही विना कोश- ( म्यान ) के भी भूतलको निष्फण्टक कर रहा है, ऐसा समझ कर लक्ष्मीने [ अपने उस निवासस्थान रूप ] कमलको छोड कर इसके कृपाणका आश्रय लिया है। इस विषयमें श्री सिद्धराज ने राम चन्द्र से खास पूछा तो उसने कहा कि 'यह कुछ सदोष है।' उन सभी पंडितोंसे पूछे जाने पर [ उसने कहा कि ] ' इस काव्यमें सेनाका याचक ' शब्द और कमल शब्दका 'नित्यल्लीवत्व' ये दो दोष चिन्तनीय हैं । तब उन सभी पंडितोंसे अनुरोध करके राजाने ' दल' शब्दको तो सेनाके अर्थमें प्रमाणित कराया। किन्तु कमल शब्दका नित्यक्लीवत्व' जो लिङ्गानुशासनसे असिद्ध है उसे कौन प्रमाणित कर सकता। इसलिये 'पुंस्त्वं च धत्ते न वा' (कभी पुंस्त्व धारण करता है, कभी नहीं) इस प्रकार इस पदमें अक्षरभेद करवाया [ जिससे वह अशुद्धि दूर हो गई ] । उस समय राम चन्द्र को सिद्ध राज का दृष्टिदोप लगा और वह ज्यों ही वसतिमें प्रवेश करने लगा त्यों ही उसकी एक आँख नष्ट हो गई। दल * . - १ इस श्लोकमें 'मार्गण' और 'ला' शन्द पर लेप है । 'मार्गण' का एक अर्थ है वाण और दूसरा अर्थ है मंगन याचक । 'ल' का एक अर्थ है लाख संख्या परिमित द्रव्य और दूसरा अर्थ है लश्य=निशाना |मार्गणका अर्थ जब वाण ऐसा विवक्षित है तब उसके साथ लक्षका अपं निशाना लेना होगा; और जब मंगन याचक ऐसा अर्थ अपेक्षित होगा तब लाका अर्थ लास द्रव्य लेना होगा। सिदराज के मार्गग याने बाण विश्व याने शत्रुके पशमें लपलत्य-निशाना प्राप्त करनेगले -होते हैं, कभी व्यर्थ नहीं जाते; और ये ही वाण (युके पेंके हुए) सिदराज के पक्ष में विलश-लक्ष्यभर हो कर रह जाते हैं। इससे विपरीत, मार्गग याने याचक लोक हैं वे सिदराज के पास लन्धलश याने लाखोंका द्रव्य प्राप्त करते हैं और आठ राजाओं के पास पिलश याने विगतलश-विनाही प्राप्तिके रह जाते हैं।
७६] प्रयग्यचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश १०४) किसी समय, सान्धिविप्रहिकों द्वारा डाह ल देश के राजाका निम्न लिखित श्लोक, जो यमल पत्र ( मित्रताका संबंध सूचक पत्र )पर लिखा हुआ था, मनाया गया- । १४६. आ-युक्त हो कर टोकमें प्राणदान करता है, वि-युक्त हो कर मुनियोंको प्रिय होता है, सं-युक्त हो कर सर्वथा अनिष्ट कारक बनता है और केवट-अकेला होने पर स्त्रियोंका प्रिय बनता है। राजाने पूछा कि इसमें क्या बात है !' उन्होंने कहा- आपके देशमें एक-से-एक प्रधान ऐसे बहुतसे विद्वान् रहते हैं । सो उनसे इस दुर्बोध्य श्लोककी व्याख्या कराइये । ' उनकी यह बात सुन कर समी विद्वान् उसका अर्थ सोचने लगे पर किसीकी समझमें नहीं आया । राजाने आचार्य हे म चन्द्र से पूछा । उन्होंने इस प्रकार च्यात्या की इसमें 'हार' शब्दका अव्याहार है। उसके साथ ' आ ' उपसर्गका योग होनेसे आहार बनता है जो सब जीवोंको प्राण देता है। पि' उपसर्गके योगसे 'विहार' बन कर दोनों तरहसे यतियोंका प्रिय होता है। सं' के योगसे 'संहार' बनता है जो सर्वया अनिष्ट लगता है और बिना किसी उपसर्गके स्त्रियोंका प्रिय आभूषण गटेका 'हार' होता है।' 1 * १०५) एक दूमरी वार, सपादलक्ष देशके राजाने 'उगी हुई चन्द्रकला तो गारीफे मुखकमटका अनुहार नहीं कर सकती।' इस प्रकारकी समस्यागाला आया दोहा यहाँ पर (पाटन में ) भेजा । अन्यान्य उन कवियों के उसकी पूर्ति न करने पर (और) जो न देवी गई वैसी प्रतिपदाकी चन्द्रकलाको उपमा दो कैसे जाय ।' इस प्रकारका उत्तराई कह कर मुनीन्द्र हे म चन्द्र ने उसको पूर्ण किया। . * सिद्धराजका सौराष्ट्र के राजा ग्वंगारको विजय करना । १०६) श्री मिद राजने, न बघण नामक आ मीर राणाका निग्रह करनेमें, पहले ग्यारह बार अपनी सेनाका पराजित होना जान कर, घई मा न (वढयाण ) आदि नगरोंमें बड़े बड़े प्राकार बनवा कर, स्वयम् ही उसके लिये प्रयाण किया। उस (न व घन) के भगिनी पुत्रने [किटेका रहस्य आदि बतलानेवाले ] संकेत देते समय यह यचन दिया था कि 'फिलेका फन्जा करते समय इस नव घन को सिर्फ द्रव्यमारसे मारना ( अर्थात् भारी दण्ड दे कर द्रव्य वसूल करना ), लेकिन किसी शरफे मारसे नहीं मारना।' [राजाके किल सर कर टेने पर ] उस न व घन को उसकी स्त्रीने फहीं अन्दर छुपा दिया जिसको राजाने उस विशाट महलमैसे बदार वीच निकाला और धनके भरे हुए बर्तनोंमे उमे पीट पीट कर मार डाला | उसकी स्त्रीको यह कह कर कि इमको दमने द्रव्यो मारमे ही मारा है ' अपने यच नका पाटन बनाया और उसे शात किया । शोकमे निमन उसकी रानी [मून ट दे या ] के ये वाक्य कहे जाने है- १४८. यह रागा म्यघरमें नही है । न कोई उमे लाया है, न कोई टायेगा । वंगार के साथ में स्वयं अपने प्राग अग्निमें क्यों न होमहूँ। १५९. और सब रागा तो यनिय है और उनमें यह जे मट (जय सिंह) बडा सेट है। हमारे गढके मारे इमने यह फेमा योशर मांड रखा है। १५०.२ गौरवशादी गिरनार सेने क्यों मनमें ममर धारण कर लिया है! गंगार के मरने पर सेने अपना एक शियर मीनही गिराया।
प्रकरण १०४-१०८ ] सिद्धराजका शत्रुजयकी यात्रा करना [७७ [१०१] हे गरवा गिरनार ! तुम पर वारि जाती हूँ। [खं गार के लिये ] लंबा बुलावा आया है। इसके जैसा भारक्षम (समर्थ) सजन फिर दूसरी बार तुझे नहीं मिलेगा। [१०२] मुझको इतने-ही-से संतोष होगा, जो प्रभु (स्वामी) के पगोंमें [ मेरा भी शरीर अग्निद्वारा ] प्रदीप्त हो । न मुझे रानीपनकी चाहना है, न रोप है। ये दोनों खंगार के साथ चले गये। [१०३] हे मन ! अब तंबोल मत माँगो, खुल्ले मुँह मत झांको । दे उल वा डे के संग्राममें खंगार के साथ वह सब चला गया है। [१०४ ] हे जे स ल ! मेरी बाँह मत मोडो और वारंवार विरूप भाव न बताओ । न व घन के बिना नदीमें नया प्रवाह नहीं आता। [१०५] हे व ढ वाण ! मैं तुझसे क्या लडूं- भूल जाना चाहती हूँ लेकिन भूल नहीं सकती। हे भोगावा ( व ढ वा ण के पासकी नदी) तेंने सोनाके समान प्राणोंका भोग लिया। इस प्रकारके बहुतसे वाक्य [ कहे जाते ] हैं। वे यथाप्रसंग जानलेने योग्य हैं। १०७) इसके बाद, महं० जाम्ब के वंशज दण्डाधिपति सज्ज न की योग्यता देख कर उसे सु राष्ट्र देश का प्रबन्धक ( गवर्नर ) नियुक्त किया। उसने स्वामीको विना सूचन किये ही, तीन वर्षके वसूल किये हुए [ राजकीय ] द्रव्यसे श्री उज यन्त ( गिरनार ) पर्वत पर स्थित नेमिनाथके काठके बने हुए जीर्ण मन्दिरको उखाड़ कर उसके स्थानमें नया पत्थरका मन्दिर बनवाया। चौथे वर्ष चार सामंतोंको भेज कर राजाने सजन दण्डाधिपतिको पत्त न में घुलवाया । उससे [ पिछले ] तीन वर्षका वसूल किया हुआ द्रव्य माँगने पर, साथमें लाये हुए उसी देशके व्यवहारियोंसे उतना ही धन ले कर देता हुआ वह बोला- 'महाराज ! श्री उ जयन्त के मंदिरके जीर्णोद्धारका पुण्य अथवा यह धन इन दोनोंमेंसे चाहे सो एक ले लें ।' उसके ऐसा बताने पर उसकी अतुलनीय बुद्धिसे चित्तमें चमत्कृत हो कर सिद्ध राज ने तीर्थोद्धारका पुण्य लेना ही स्वीकार किया। वह सज्ज न फिर उसी देशका अधिकार पा कर, उसने शत्रुज य और उज्ज यन्त इन दोनों तीर्थोमें उनके बीचके वारह योजन विस्तृत अन्तरके जितना ही लंबा दुकूलका बना हुआ महाध्वज चढ़ाया । इस प्रकार यह रैवतकोद्धार प्रबन्ध समाप्त हुआ। * सिद्धराजका शत्रुजयकी यात्रा करना । १०८) इसके बाद, एक बार फिर सो मेश्वर की यात्रा कर वापस लौटते समय श्री सिद्ध रा ज ने, रैवतक गिरि की उपत्यकामें डेरा डाल कर, अपना कीर्तन ( मन्दिरादि धर्मस्थान ) देखना चाहा । उसी समय मत्सरपरायण ब्राह्मणोंने यह कह कर पिशुनवाक्योंसे उसे रोका कि 'यह पर्वत सजलाधार लिंगके आकारका है, इसलिये इसे पैरोंसे स्पर्श करना उचित नहीं है । ' राजाने वहाँ पर पूजा भिजवा कर प्रस्थान किया और श त्रु अ य महातीर्थ के पास आ कर पड़ाव डाला । वहाँ पर भी उन्हीं निर्दय चुगलखोर ब्राह्मणोंने हाथमें कृपाण ले कर तीर्थ पर जानेका मार्ग रोका । उनके ऐसा करने पर श्री सिद्धराज ने सवेरा होनेके पहले ही, कापड़ीका वेप बना कर, और जिसके दोनों ओर गंगाजलके पात्र रखे हुए हैं ऐसी वहंगी कंधे पर रख कर, खुद इन ब्राह्मणों के बीचमें हो कर पर्वत पर चढ़ गया । किसीने उसके स्वरूपको नहीं जाना । [ ऊपर जा कर ] ' गंगाजलसे श्री युगादि देव (ऋषभनाथ ) को स्नान कराया और पर्वतके पासके बारह गाँवोंका शासन उस १ ये जो वाक्य उपर अनूदित किये गये हैं, उनमेंका कितनाक कयन अस्पष्ट और अस्फुटार्यक है । जो अर्थ यहा पर दिया गया है वह निभ्रांन्त हे ऐसा नहीं कह सकते।
७८] प्रबन्धचिन्तामणि [तीय प्रकाश देवको दान कर दिया। तीर्थका दर्शन कर यह उन्मुदित-लोचन हुआ और अमृताभिषिक्त होनेकी नॉई खडा रह गया। [ पर्वतकी रमणीयता देख कर ] सोचने लगा कि ' इस सल्लकी यन और नदियोंसे परिपूर्ण यहीं, [ नये विंध्यवनकी रचना करूँगा' - इस प्रकारकी जो सफल प्रतिज्ञा [ पहले की थी और तदनुसार ] हाथियोंका झुंड पानेके लिये जो मेरा मन बेहाय हो गया था, उस मनोरथसे मैंने इस तीर्थकी पवित्रताका ध्वंस करनेवाला मानस पाप किया है और इसलिये मुझ पापीको धिक्कार है।' इस प्रकार श्री देव- पादके सामने राजलोक द्वारा विदित अपने आपकी निंदा करता हुआ यह आनंदके साथ पर्वत पर से नीचे उतरा। पर्वत पर, * । वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन । १०९) अब यहाँ पर देव सूरि का चरित्र वर्णन करेंगे। - उस अवसर पर कुमुदचंद्र नामक दिगम्बर [विद्वान् ] भिन्न भिन्न देशोंके चौरासी वादियोंको वादमें जीत कर, कर्नाटक देशसे गूर्जर देशको जीतनेकी इच्छासे की व ती नगरमें आया । वहाँ भट्टारक श्री देव सूरि चतुर्मास करके रहे हुए थे। एक बार श्री अरिष्टनेमिके मंदिरमें जब वे धर्मशास्त्रका व्याख्यान कर रहे थे तो उस दिगंबरके साथी पंडितोंने उनकी वह अनुच्छिट ( मौलिक, विशुद्ध ) वाणी सुनी। उन्होंने जा कर वह वृत्तान्त कुमुद चन्द्र से कहा तो उसने उनके उपाश्रयमें तृणके साथ जल प्रक्षेप कराया। पर, खण्डन, तर्क आदि प्रमाण शास्त्रों में प्रवीण ऐसे उस महर्षि पंडितने जब इस पर कुछ ध्यान न दे कर उसकी अवज्ञा की, तो उस दिगम्बरने श्री देवा चार्य की बहन तपोधना शीट सुन्दरी को चेटकाधिष्टित करके, नाच, जलानयन आदि अनेक विडंबनाओंसे उसे विडंबित किया। चेटक (टोना आदि ) के दूर होने पर यह जब स्वस्थ हुई तो उस उत्कट परामवसे दुःखित हो कर वह अपने आचार्यकी खूब भर्सना करने लगी। उसे रोक कर आचार्य चिन्तामग्न हो रहे । (यहाँ पर P प्रतिमें इस विषय के निम्नलिखित पद्य पाये जाते हैं-) [१०३ ] हा ! मैं किसके आगे पुकार करूँ ! मेरे प्रभु तो कर्णरहित हैं। इनसे तो वह सुगत (बुद्ध) देव ही अच्छा है जो अपने शासनका तिरस्कार होने पर [ उसका प्रतिकार करनेकी इच्छासे ] अवतार धारण करता है। { साध्वीके इस वाक्यको सुन कर आचार्य मनमें सोचने लगे-] [१०४ ] आः ! गुरुजनके प्रमाणोंकी व्याख्याका श्रम मेरे पास केवल उनके कंठके सुखा देने भरका पुष्ट फल देनेवाला मात्र हुआ-गुरुओंका मुझे पढ़ानेके लिये किया गया परिश्रम व्यर्थ ही हुआ। जो मैं उनके शासन (धर्म संप्रदाय ) के प्रति की गई इस प्रकारको विडंबनाओंके डंबरको शान्त मनसे सुन रहता हूँ। [ देवसूरिके द्वारा कही गई यह उक्ति सुन कर उस श्रेष्ठ आर्याने कहा-] (१०५] दुष्ट वादियोंके निर्दलनमें अंकुश जैसी श्री देवी, जो श्वेताबरोंमें अभ्युदयके लिये मंगलमयी कोमल दुर्वा जैसी है, गुरुवर श्री देव सूरि के ललाट पट्ट पर प्रथमावतारकी स्थिति लावे । श्री देव सूरिने [दिगम्बर विद्वान्से ] कहा-'वादविद्यापिनोद (शास्त्रार्थ-विनोद) के लिये आप पत्त न चलें । वहाँ राज-सभामें आपके साथ वाद करेंगे।' उनके ऐसा आदेश करने पर वह दिगंबर अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ पत्तन को पहुँचा। [ उसका आना सुन कर ] श्री सिद्धराज ने, जिसके मातामहका वह विद्वान् गुरु था, सामने जा कर उसका योग्य सत्कार किया। वह वही डेरा डाल कर ठहरा । सिद्धराज ने .
प्रकरण १०८-१०९ ] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [७२ श्री हेमा चार्य से यादमें निष्णात ऐसे आचार्यकी बात पूछी। उन्होंने चारों विद्याओंमें परम प्रवीणता प्राप्त, जैन मुनिरूप हाथियोंके यूथपति, श्वेतांबर शासनके लिये वज्रके प्राकार जैसे मानेजानेवाले, राजसमाके शृंगारहार, कर्णा य ती में [ चातुर्मास ] रहे हुए, वादविद्याके पारगामी, वादिहस्तियोंके लिये सिंहस्वरूप श्री देवा चार्य को बताया। इसके बाद उनको बुलाने के लिये, श्री संघके लेखके साथ राजाकी विज्ञातिका वहां पहुंची। उसे पा कर दे वसूरि पत्तन में आये और राजाके अनुरोधसे वाग्देवीकी आराधना की। उस देवाने आदेश दिया कि- बाद करते समय, वा दि वेता ली य श्री शान्ति सूरि विरचित उत्तराध्य यन बृहद्वृत्ति में उल्लिखित दिगंवर वादस्थल विषयक चौरासी विकल्प जालका उपन्यास करके, उसे प्रपंचित करोगे तो दिगंबरके मुखमें मुद्रा लग जायगी।' देवीके इस आदेशके बाद, गुप्त मावसे कुमुद चंद्र के पास पंडितोंको यह जाननेके लिये भेजा कि किस शास्त्र में इसकी विशेष कुशलता है। उनके द्वारा उसकी यह निम्न लिखित उक्ति सुनी- १५३. हे देव! आदेश कीजिये मैं सहसा क्या करूं? लंकाको यही ले आऊं, या जंबूद्वीपको यहाँसे ले जाऊं, क्या समुद्रको सुखा दूं, या उस उच्च पर्वतको, जिसकी चोटीका एक पत्थर कैलास है, उसे खेल-ही-में उखाड़ कर समुद्रको बाँध दूं, कि जिसके प्रक्षेपसे क्षुब्ध हो कर समुद्रका पानी बढ़ जाय । इस उक्तिको सुन कर, श्रीदे वा चार्य और श्री हे मा चार्य दोनों उसकी सिद्धान्तविषयक बहुत अल्प कुशलता समझ कर उसे अपने मनमें 'जीत लिया, जीत लिया' ऐसा मान बडे प्रसन्न हुए । इसके बाद दे व सू रि आचार्यका प्रधान शिष्य रत्न प्रभ, प्रथम रात्रिमें गुप्त वेप करके कुमुद चंद्र के डेरेमें गया। उसने (कुमुदचंद्रने ) तुम कौन हो?'; ' मैं देव हूँ'; 'देव कौन ?'; ' मैं '; ' मैं कौन ?'; 'तुम कुत्ते कुत्ता कौन ?', 'तुम', 'तुम कौन ?'; 'मैं देव'; [' तुम कहाँसे आये ?'; 'स्वर्गसे' 'स्वर्ग में क्या वात चल रही है ! ', ' कुमुदचन्द्रका सिर ९५ पल है ', ' इसमें प्रमाण क्या है ? ' ' काट कर तौल लो'] इस प्रकारकी उसकी उक्ति-प्रत्युक्तिके बंधनमें जब वह चाककी तरह चक्कर खाने लगा, तो अपनेको देय और दिगम्बरको श्वान बना कर, जैसे गया था वैसे ही लौट आया। [पोछेसे ] उस चक्रदोपको ठीक ठीक समझा तो मनमें अतिशय विषण्ण हो कर, इस प्रकारकी उचित कविता वना कर उस मायावी कुमुद चन्द्र ने दे व सूरि के . पूछा कि- . . पास भेजी- १५४. अरे श्वेताम्बरो! इस प्रकारके विकटाटोप वचनोंके द्वारा, संसार वृक्षके अतिविकट कोटरमें, इस मुग्ध जन-समूहको क्यों गिराते हो ! यदि तत्त्वातत्त्वके विचारमें आप लोगोंको थोड़ीसी भी कामना हो तो सचमुच ही कुमुद चन्द्र के दोनों चरणोंका रात-दिन ध्यान किया करो। इसके बाद श्री देव सूरि के चरणका परम परमाणु (विनीत शिष्य ), बुद्विवैभवसे चाणाक्य का भी उपहास करनेवाले पंडित माणिक्य ने निम्नलिखित श्लोक उसके पास भेजा- १५५. अरे वह कौन है जो सिंहके केसजालको पैरोसे छूना चाहता है ! वह कौन है जो तेज भाटेकी नोकसे अपनी आँख खुजालना चाहता है ! वह कौन है जो नागराजके सिर परकी मणिको अपनी शोभाके लिये उतारना चा है ! जो यह करना चाहता है वही वंदनीय ऐसे श्वेतांबर शासनको निन्दा करना चाहता है। फिर रत्नाकर पंडितने भी इस श्लोकको कुमुदचंद्र के पास उपहासके सहित भेजा- १५६. नंगों (दिगम्बरों) ने जो युवतियोंकी मुक्तिका निरोध किया है इसमें क्या तत्त्व है यह तो प्रकट ही है। फिर वृया ही कर्कश तकके लिये यह अनर्थमूलक अभिलाषा क्यों करते हो!
. ८०] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश श्री हे म चं द्राचार्य ने सुना कि श्री म यणल्ला देवी कुमुद चंद्र की पक्षपातिनी है और सभाके अपने संपर्कथाले सभ्योंसे उसकी जयके लिये नित्य अनुरोध कर रही है, तो उन्होंने, उन्हीं सभासदोंसे यह वृत्तान्त कहलवाया कि 'वादस्थल पर दिगंबर लोक तो स्त्रीकृत सुकृत्यको अप्रमाणित करेंगे और श्वेताम्बर प्रमाणित करेंगे।' यह सुन कर रानीने व्यवहारबहिर्मुख उस दिगंबर परसे अपना पक्षपात हटा लिया। इसके बाद, भाषोचर (वादका विषय) लिखानेके लिये कुमुद चंद्र तो पालकीमें बैठ कर, और पण्डित रल प्रभ पैदल ही चल कर, राजाके अक्षपटल (न्यायविभाग) कार्यालयमें आये। वहांके अधिकारियोंको कुमुद चंद्र ने अपनी यह भाषा ( यादके विषयमें निजकी प्रतिज्ञा ) लिखवाई- १५७. केवली होने पर [ मनुष्य ] भोजन नहीं करता, चीवर सहित [ मनुष्य ] निर्वाण नहीं पाता और स्त्रीजन्ममें मुक्ति नहीं मिलती। श्वेतांबरोंका इसके विरुद्ध यह उत्तर था- १५८. केवली होने पर भी [ मनुष्य ] भोजन करता है, सचीवर [मनुष्य ] को भी निर्वाण मिलता है, और स्त्रीजन्ममें भी मुक्ति होती है - यह देव सूरि का मत है। इस प्रकार भाषा और उत्तर लिख लेनेके अनंतर वादका स्थान और समय निर्णीत हुआ। उसमें सिद्ध राज के सभापतित्वमें, षड्दर्शन-प्रमाणको जाननेवाले सभ्यलोग जब उपस्थित हुए तो, तो सुखासन (पालकी) में बैठ कर, सिरपर श्वेत छत्र धारण किये हुए और जयडिंडिम बजाते हुए, यादी कुमुद चन्द्र ने सभामें प्रवेश किया। उसके आगे बांशके सिरेपर, उसके प्राप्त किये हुए जयपत्र लटक रहे थे। सिद्धराज ने उसके बैठनेके लिये सिंहासन दिलवाया । प्रभु श्री देव सूरिने मुनीन्द्र श्री हेम चंद्र के साथ सभामें एक ही आसनको अलंकृत किया । फिर, वादी कुमुद चंद्र ने, जो अवस्थासे वृद्ध था, श्री हेम चंद्र से-जिनकी शैशवावस्था कुछ ही समय पहले व्यतीत हुई थी; अर्थात् जो अब भी पूर्ण युवा नहीं हुए थे – कहा कि आपके द्वारा तक क्या पात है ! अर्थात्-आपने तक (छांस) पो है? '। इस पर श्री हे म चंद्र ने उससे कहा-'क्या वृद्धावस्थाके कारण तुम्हारी बुद्धि अस्थिर गई है ? जो ऐसा अनाप-सनाप बोल रहे हो! तक श्वेत होता है, पीत तो हल्दी होती है।' इस वाक्यसे नीचा मुँह हो कर उसने पूछा कि- आप दोनोंमे वादी कौन है?' श्री सूरिने उसका कुछ तिरस्कार करनेके इरादेसे [ अपनेको लक्ष्य कर लेकिन शब्दभेदके साथ ] कहा 'यह आपका प्रतिवादी है। ऐसा कहने पर कुमुद चंद्र [ उसके मर्मको ठीक न समझ कर ] बोला- मुझ वृद्धका इस शिशुके साथ क्या वाद हो सकता है ?' उसको यह बात सुन कर [ आचार्य हेम चन्द्र ने कहा-] 'वृद्ध तो मैं हूँ और आप तो शिशु ही है-जो अब तक भी कंदोरा बान्धना नहीं जानते और वस्त्र नहीं पहनते ।' राजाके इन दोनोंकी इस प्रकारकी वितंडाका निषेध करने पर, परस्पर इस प्रकारकी प्रतिज्ञा निश्चित हुई-"पराजित होने पर श्वेतांवर तो दिगंबर हो जायंगे, और [ उसके विरुद्ध] दिगंबर देशत्याग करेंगे।" प्रतिज्ञा निश्चित हो जाने पर स्वदेशके कलंकसे डरनेवाले देवा चार्य ने, सर्वानुवादका परिहार करके और देशानुवादका अनुसरण करके, कुमुद चंद्र से कहा कि पहले आप ही अपना पक्ष स्थापित करें।' उनके ऐसा कहने पर कुमुद चंद्र ने राजाको पहले यह आशीर्वाद दिया- १५९. हे राजन् ! आपके यशके स्मरण होने पर सूर्य खद्योतकी चमक जैसा प्रतीत होता है, चन्द्रमा पुराने मकड़ाके जालकी भाँति फीका जान पड़ता है और (हिमाच्छादित) पर्वत मशकसे जान पड़ते हैं। आकाश उसमें मारे जैसा हो जाती है और इसके बाद तो वाणा बन्द हो जाती है ।
प्रकरण १०८-१०९ ] वादी श्रीदेवसूरिका चरित्रवर्णन [८१ उसके इस अपशब्दको सुन कर कि 'वाणी बंद हो जाती है '-- सभ्य लोग उसे अपने ही हाथों बंधा समझ कर बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद देवा चार्य ने राजाको, यह आशीर्वाद दिया- १६०, हे चालुक्य महाराज ! तुम्हारा यह राज्य और यह जिनशासन चिरकाल तक प्रवर्तित रहें। ( राज्यपक्षमें पहला अर्थ-) जो राज्य शत्रुओंको शान्ति नहीं प्राप्त करने देता है, उज्वल आकाशकी-सी उल्लसित कीर्तिकी प्रभासे जो मनोहर हो रहा है, न्यायमार्गके प्रसारकी पद्धतियोंका जो गृह बना हुआ है और जिसमें परपक्षके हाथियोंका सदैव मद उतारनेवाले ऐसे कौन हाथी बलवान् नहीं है। (जिनशासनपक्षमें दूसरा अर्थ-) जो जिनशासन नारियों ( स्त्रियों) को मुक्तिपद प्रदान करता है, श्वेतवस्त्रोंको धारण करनेवाले यतियोंको उल्लसित कीर्तिसे मनोहर लग रहा है, नय मार्ग ( जैन तत्त्व पद्धति ) के विविध प्रस्तार और भाङ्गियोंका गृहरूप है और जिसमें अन्य मतवादियोंके गर्वका जय करनेवाले केवलज्ञानी कभी भी भोजन नहीं करते ऐसा विधान नहीं है वह जिनशासन चिरंजीव रहो। इसके बाद, यादी कुमुद चंद्र ने केवलि-मुक्ति, स्त्री-मुक्ति और चीवर-सिद्धिके निराकरण रूप अपने पक्षके उपन्यासमें, कबूतर पक्षीकी भाँति मन्द मन्द और बार बार स्खलित वाणीसे बोलना शुरू किया। इसे देख कर सम्यलोग, ऊपरसे तो उसे उत्साहपरक वचन कह रहे थे और अन्दर दिलमें हंस रहे थे। इस प्रकार कितनाक उपन्यास (स्वपक्ष स्थापन ) करनेके बाद, अन्तमें [दे वा चार्य को लक्ष्य करके कहा कि ] 'अब आप बोलिये'। देवा चार्य ने प्रलय कालमें उन्मीलित प्रचण्ड पवनसे विक्षुब्ध समुद्रके तरंगाघातके समान गंभीर वाणीसे, उत्तराध्य यन सूत्र की वृहद्वृत्तिमें कथन किये हुए चौरासी विकल्पोंका उपन्यास करना प्रारंभ किया। इसे देख कर, भास्वत् प्रकाशके प्रसारसे म्लान हो जाने वाले कुमुद-रात्रियिकासी कमल-की भाँति निष्प्रभ हृदय कुमुद चंद्र ने भयसे चित्तमें भ्रान्त हो कर, उस वातको समझनेमें असमर्थ वन कर, फिरसे उसी उपन्यासके दुहरानेकी प्रार्थना की। श्री सिद्धराज के तथा और सभ्योंके निषेध करने पर भी, उन्होंने उसे अप्रमेय प्रमेय लहरियोंके द्वारा प्रमाण-समुद्रमें डुबोना शुरू किया। इस तरह निरंतर वाक्प्रवाह चलने पर, सोलहवें दिन अकस्मात् देवा चार्य का कण्ठ रुद्ध हो गया । तब मंत्रशास्त्रविद् श्री यशोभद्र सूरि ने, जिन्होंने कुरु कुल्ला देवी के मंदिरमें अतुलनीय वर प्राप्त किया हुआ था, उनकी कण्ठनालीसे क्षणभरमें क्षपणक (दिगंबर )के किये गये अभिचारके प्रभावसे पड़ा हुआ केशोंका गुच्छा बाहर निकाल दिया। इस विचित्र व्यापारके निरीक्षणसे चतुर लोगोंने श्री यशोभद्र सूरि की भूरि प्रशंसा की और कुमुद चंद्र की खूब निंदा की। इस प्रकार ( पहलेने ) प्रमोद और ( दूसरेने ) विपाद धारण किया। इसके बाद, देव सूरिने पक्षके उपन्यासके उपक्रममें 'कोटाकोटि' शब्द कहा। कुमुद चंद्र ने उस शब्दकी व्युत्पति पूछी । तब का क ल पंडित ने, जिसके कण्ठमें आठों व्याकरण लोट रहे थे, शा कटा य न व्या क रण में कहे हुए 'टाप् टीप्' स्त्रसे निष्पन 'कोटाकोटिः' 'कोटीकोटि कोटिकोटिः' इन तीनों सिद्ध शब्दोंका निर्णय सुनाया। पहले-ही-से 'वाचस्ततो मुद्रिता' इस कहे हुए अपशब्दके प्रभावसे उसका मुख मुद्रित (बन्द ) हो गया और फिर स्वयं ही बोला कि- में श्री दे या चाय से जीता गया। श्री सिद्धराज ने उसे पराजित कह कर अपद्वारसे बाहर कर दिया। इस पराभवके कारण उसका सिर फट गया और वह मर गया । इसके अनन्तर श्री सिद्धराज ने आनन्द उल्लसित मनसे दे वा चार्य के प्रभावकी ख्याति करनेकी इच्छा की । उनके सिर पर चार घेतछत्र धारण करवाये गये, खूब सुंदर चामर ढलवाये गये, शंखोंके युगल +- २१-२२ - ८२] प्रयन्यचिन्तामणि [नृतीय प्रकाश बनाये गये, दंकोंकी चोटसे मानों आकाशका पेट गुडगुडा रहा था और उत्तम प्रकारको दुंदुभियोंके नादसे दिगंतराठ मरा जा रहा था। राजाने स्वयं अपने हाथका अपलंगन दे कर, हे वादि चक्रपती, पधारिये!' ऐमी स्तुनिपूर्वक उन्हें राजसभासे प्रस्थान करयाया । चाहट नामक उपासकने उस समय तीन लाख [द्रम्म] याधकों को दान किये । इस तरह जगत्के आनंद स्वरूप कन्द (मूल ) के कन्दल ( अंकुर ) समान मंगटके वारंवार उपारित होने पर, उसी या हड द्वारा बनवाये गये श्रीमहावीर देवके प्रासाद (मन्दिर ) में, देवको नमस्कार करने वाद, उसीकी वसति ( उपाय) में जा कर उन्होंने आश्रय लिया । सूरिकी अनिष्ठा होने पर भी राजाने उनको पारितोषिकके रूपमें छाला आदि बारह गांव भेंट दिये। [ भिन्न भिन्न समर्थ आचार्यो द्वारा की गई ] उनकी स्तुति के कुछ श्लोक इस प्रकार है- १६१. जिनके प्रमाद-दी-का मानों मुग्वप्रश्न के समय दर्शन (श्वेतांबर संप्रदाय) उचारण करता है, उन यसप्रनिष्टाचार्य श्रीदेवम् रिको नमस्कार है। इस प्रकार श्रीप्र पुसा चार्य ने कहा । १६२. यदि मूर्यके ममान दे या चार्य, कुमुद चंद्र को न जीत पाते तो कौन घेतांबर, संसारमें कटिमें यन पहनने पाता -इस प्रकार हेमा चार्य ने कहा। १६३. निस नमने फीनिम्पी कंथा उपार्जन करके अपना व्रतभंग किया था, देय सूरिने उस कंथाको छीन कर उसे निर्भय (नंगा) कर दिया। इस प्रकार श्री उदय प्रम देय ने कहा । १६१. अभी तक मी जिन्होंने लेग-शाडाका स्याग नहीं किया उन देवमूरि (वृहस्पति) के यारियायो जानने वाले प्रमु देय सूरि की, 'तुटना कैसे की जाय 1- इस प्रकार श्री मुनि दे या चार्य ने कहा। १६५. निनकी प्रतिमाके घाम-तेजमे [अन्त हो कर ] कानिकपी योगवनका स्याग कर देने वाले (उस ] ना [दिगंबर ] को भारतीने मानों टानके कारण छोर दिया, यह देय सूरि तुम्हारा फन्पाग करें। १६६. भोर फेवतियोंकी मुक्ति स्थापन कर जो साकार बने तथा सियोंकी मुक्तिके पुरत उत्तर द्वारा मोश तीर्थ बने, और नमको जीन ऐने पर भेताम्रशासनके प्रतिष्ठागुरु यने, उन प्रमु श्रीदेवमूरिकी महिमा, देयता और गुरुको अपेक्षा भी अपरिमित है। इस प्रकार दो रोक थामेर गरिने पदे । इस प्रकार या देवरिका अन्य समाप्त हुमा । साय, पत्तन यसाद आभएका वृत्तान्त । ११.) इसके बार, पचनमा रहने याठा, जिसका शरम हो गया है २मा, बामद नामक एफ पनि समान पर, गागर किनेका काम करता था। ठोषहान पारका ! ना शादिन उगवान पान कर, दोनों शाम प्री ममूरिक परनोंक पास कर सिनसिरमा पा। समाराम चनुर रोनेके कारण उमरे अगम्भीर बोरमा आरके 'एनपीपा और एRNIोर निकटकर उसमें दस हो गया। किसी समय, गुनिस्ट आने, पनामा कारन, प्रभाग परिमा-गरिमाग का नियम लेना परिचा जानकार अपुरे मन के भाप मा गए प्रगार होना जान कर सीन anramin से RARUN म बार पूरा भरार प्रकरण ११०-१११] पत्तनके वसाह आमडका वृत्तान्त । [८३ । करने लगा। किसी अवसर पर, वह किसी गाँवको जा रहा था, तो उसने रास्तमें बकरियोंका एक झुंड जाते देखा। उसमें एक बकरीके गलेमें पापाणका एक खण्ड बन्धा देखा, जिसको रत्नपरीक्षक होनेके कारण, परीक्षा करके देखा तो वह सच्चा रत्न मालूम दिया। फिर उस रत्नके लोभसे, मूल्य दे कर उस बकरीको उसने खरीद लिया। मणिकार ( मणियारे) के पाससे उस रत्नको सान पर चढवा कर उसे देदीप्यमान बनवाया और फिर श्री सिद्धराज के मुकुट बनानेके अवसर पर, एक लाख मूल्य पर राजा-ही-को दे दिया। उसी मूल धनसे उसने एक बार बिकनेको आये हुए मंजिष्ठाके कई बोरे खरीदे और जब बेचनेके समय उन्हें खोलकर देखा तो समुद्रके चौरोंसे छिपाने के लिए, व्यापारियोंने उनमें सोनेकी पट्टियाँ छिपा रखी हुई मालूम दी। फिर उसने सब बोरे खोल कर उनमेंसे वे पट्टियाँ निकला ली। इस तरह फिर वह सारे नगरमें मुख्य ऐसा सिद्ध राज का मान्य ( नगर सेठ ) और जिन-धर्मकी प्रभावना करने वाला [प्रसिद्ध ] श्रावक हुआ । प्रति दिन, प्रति वर्ष, स्वेच्छा- नुसार जैन मुनियोंको अन्न वन आदि दिया करता और गुप्तरूपसे स्वदेश और विदेशमें नये नये धर्मस्थान बन- वाता तथा पुराने धर्मस्थानोंका जीर्णोद्धार करवाता रहा । पर किसी पर उसने अपनी प्रशस्ति नहीं लिखवाई । [ कहा भी है कि - १६७. लतासे आच्छन्न वृक्षकी नाई और मृत्तिकासे आच्छादित बीजकी नाई प्रच्छन्न (गुप्तरूपसे) किया हुआ सुकृत कर्म प्रायः सैंकड़ों शाखाओंवाला विस्तृत हो जाता है। इस प्रकार यह वसाह आभडका प्रवन्ध समाप्त हुआ। सिद्धराजकी तत्त्वजिज्ञासा और सर्वदर्शन प्रति समानदृष्टि । १११) एक दूसरी बार, श्री सिद्ध राज संसार सागरको पार करनेकी इच्छासे, सर्व देशके सर्व दर्शनों से, प्रत्येकसे देवतत्व, धर्मतत्त्व, और पात्रतत्त्वकी जिज्ञासासे पूछने लगा, तो मालूम हुआ कि, वे प्रत्येक अपनी स्तुति और दूसरेकी निंदा कर रहे हैं। इससे उसका मन [ खूब ] संदेह-दोलारूढ़ हो गया। श्री हे मा चार्य को बुला कर उनसे विचारणीय कार्यको पूंछा। आचार्य ने चतुर्दश विद्याओंके रहस्यका विचार करके, इस प्रकार एक पौराणिक निर्णय कह सुनाया कि-' पहले ज़माने में किसी व्यवहारी [गृहस्थ ] ने अपनी पहली परिणीत पत्नीको छोड़ कर किसी रखेलिनको अपना सर्वस्व दे दिया। इससे उसकी पूर्व पत्नी, सर्वदा ही, उसको अपने वशमें करनेके लिये अभिचार (मंत्र-तंत्र आदि) के उपाय पूछा करती । किसी गौड (बंगाल) देशीय [ जादुगर] ने बताया कि-" तुम्हारे पतिको मैं ऐसा कर दूँ कि तुम उसे फिर रस्सीमें बाँधे रखो" ऐसा कह कर, उसने कोई एक ऐसी अचिन्त्यवीर्य औषधि ला दी और कहा कि-" इसे भोजनमें खिला देना"। ऐसा कह कर यह चला गया। कुछ दिनोंके बाद जब क्षयाह ( श्राद्धका दिन ) आया तो उस स्त्रीने वैसा ही किया-पतिको यह आपधि खिला दी। फलस्वरूप वह (पति) साक्षात् बैल हो गया। उसका फिर कोई प्रतीकार न जान कर वह, सारी दुनियाकी झिइकियाँ सहती हुई, अपने दुश्चरितके ऊपर शोक करने लगी। एक बार [प्रीष्म कालके ] दोपहर के समय, सूर्य के फठोर किरणोंसे खूब संतप्त हो कर भी, किसी शादल भूमिमें यह अपने उस पशुरूप पतिको चरा रही थी और किसी वृक्षके नीचे बैठ कर खूब निर्भर मावसे विटाप कर रही थी। अकस्मात् उसने आकाशमें कुछ आलाप सुना । पशुपति (शिव) भवानीके साथ विमानमें बैठे हुए उस समय यहाँसे निकले । भवानीने उसके दुःखका कारण पूछा । इस पर शिवने यह कृति ज्यों का क्यों कह सुनाया । फिर भवानीके आग्रह फरने पर शियने यह भी बताया कि, उसी वृक्षकी छाया में, पुरुप बननेकी औषधि है;
८४] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश और वे अन्तर्धान हो गये। फिर वह स्त्री उस वृक्षकी छायाको रेखांकित करके, उसके भीतर पड़ने वाली [सभी ] औषधियोंके अंकुरोंको उखाड़ उखाड़ कर वृपमके मुँहमें डालने लगी। उस अज्ञात स्वरूप औपधिक मुँहमें पड़ते ही वह बैल फिर मनुष्य हो गया । अज्ञात स्वरूप हो कर भी, औषधिने जैसे अभीष्ट कार्य किया, वैसे ही कलियुगमें मोहके कारण, वह पात्र-परिज्ञान तिरोहित होने पर भी, मकियुक्त हो कर सब दर्शनोंका आराधन करनेसे, अविदित स्वरूप-ही-से मुकिदायक हो जाता है, यह निश्चय है । इस प्रकार श्री हे म चंद्राचार्य ने जब सर्व दर्शनके सम्मत होनेका उपदेश दिया तो श्री सिद्धराज ने फिर सब धर्मोका समान आराधन किया। इस प्रकार यह सर्व दर्शन मान्यता प्रबंध समाप्त हुआ। * - सिद्धराजका प्रजाजनोंके साथ उदार व्यवहार । ११२) एफ दूसरी बार रातमें, राजा कर्ण मे रु प्रासादमें नाटक देख रहा था। वहाँ पर कोई चना वेचने वाला एक गरीब बनिया भी चला आया और वह राजाके कन्धे पर हाथ रख कर देखने लगा। राजा उसके इस अभिनय ( व्यवहार ) से मनमें प्रसन्न हो रहा, और बार बार उसका दिया हुआ कर्पूर मिश्रित पानका बीड़ा आनंदके साथ लेता रहा । नाटकके विसर्जन होने पर, राजाने अनुचरोंके द्वारा उसका घर आदि अच्छी तरह जान लिया और फिर अपने महलमें आ कर सो गया । सबेरे उठ कर प्रातःकृत्य कर लेने वाद, सविसर (राजसभा) के मिलने पर, राजाने सभामंडपको अलंकृत किया और उस चना बेचने वाले बनियेको बुलाया । राजाने उससे [व्यंगमें ] कहा कि-'रातमें तुमने जो मेरे कन्धे पर हाय रखा था उससे मेरी गर्दनमें दर्द हो रहा है तो उस तत्कालोत्पन्न मति वाले (हाज़िर जवाब ) बनियेने कहा कि-' महाराज ! आसमुद्र विस्तृत ऐसी पृथ्वीके भारको कन्धे पर उठा रखनेसे यदि स्वामीके कन्धेमें कोई पीडा नहीं होती तो मुझ समान तृण-मानसे निर्जीव बनियेके भारसे स्वामीके कन्धोंमें क्या पीड़ा होगी!' उसके इस उचित उत्तरको सुन कर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ और बदलेमें उसको इनाम दे कर विदा किया । इस तरह यह चना वेचनेवाले पनियेका प्रबंध समाप्त हुआ। * लक्षाधिपतिको क्रोडपति बना देना । ११३) एक दूसरी रातको, राजा कर्ण मे रु प्रासादसे नाटक देख कर लौट रहा था, तब [ राजमार्गमें ] किसी व्यवहारीके घर पर बहुत-से दीपक जलते हुए देख कर पूछा कि-'यह क्या है ?' उसने कहा कि ये लक्षप्रदीप हैं। राजाने उसको धन्य कहा और वह अपने महलमें चला गया। रात्रिको व्यतीत कर [ अपने नगरमें ऐसे प्रजाजन है इस विचारसे] अपनेको धन्य मानता हुआ, सवेरे उसे राजसमामें बुला कर आदेश किया कि-' इन प्रदीपोंको सदा जलाते रहनेसे तुमको सदा ही अग्निका मय रहता है, तो कहो कि तुमारे पास कितने लाखका धन है। उत्तरमें उसने निवेदन किया कि वर्तमानमें चौरासी लाख है'। इस पर मनमें अनुकंपित हो कर राजाने कृपापूर्वक अपने खजानेसे १६ लाख निकाल कर दे दिया और उसके मकान पर [ दीपकोंके बदले ] क्रोडपति होनेका सूचक कोटिध्वज फहराया गया। इस तरह यह पोडशलक्षप्रसाद प्रबंध समाप्त हुआ। * प्रकरण.११२-११६ ] सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना। सिंहपुरके ब्राह्मणोंका कर माफ करना । ११४) एक दूसरी बार, राजाने वाला क देश की दुर्गभूमि (पहाड़ी जमीन ) में सिंहपुर नामका प्रदेश ब्राह्मणोंको रहनेके लिये दे दिया और उसके अधीन १०६ ग्राम दान कर दिये । पर वहां पर सिंहका डर देख कर ब्राह्मणोंने सिद्ध राज से प्रार्थना की कि, उन्हें कहीं देशके भीतर निवास दिया जाय । इस परसे राजाने उनको साभ्र म ती के तौर परका आ सां बि ली ग्राम दे दिया, और सिंह पुरसे धान्य लानेमें जो आते जाते कर लगता था उसे माफ कर दिया गया । वाराहीके पटेलोंको बेचाका विरुद देना । ११५) बादमें, राजा सिद्ध राज ने किसी समय, मा ल व देश की यात्राके लिये प्रयाण किया । रास्तेमें चारा ही ग्राम के पास जब वह आया तो उस गाँवके पटेलों ( मुखियों ) को बुला कर, उनकी चतुरताकी 'परीक्षाके लिये, अपनी एक प्रधान पालकी, उनको अपने पास थातीके रूपमें रखनेके लिये दी। राजाके आगे प्रयाण कर जाने पर उन सभीने मिल कर, उसके एक एक हिस्सेको अलग अलग कर, यथोचित रूपसे सबने अपने अपने घर पर संभालके रखा। यात्रासे लौटते समय राजाने अपनी रखी हुई उस थातीको जब उनसे माँगी, तो उन्होंने अलग अलग किये हुए उसके वे सब टुकडे टाके दिये । यह देख कर राजाने कि - यह क्या बात है ?' तो उन्होंने विज्ञापना की कि- ' महाराज ! [ हममेंसे ] कोई एक आदमी तो इसकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं हो सकता | कमी चौर और अग्नि आदिका उपद्रव हो जाय तो फिर स्वामीके सामने कौन जवाबदेह हो- यही सोच कर हम लोगोंने यह ऐसा किया है।' तब राजा मनमें खूब आश्चर्यचकित हुआ और उनको 'ब्रूच *' ऐसा बिरुद उसने दिया । इस प्रकार यह वाराहीय च प्रबंध समाप्त हुआ। आश्चर्य से पूछा । - उझाके ग्रामीणोंसे वार्तालाप । ११६) इसके बाद, एक बार राजा श्री जय सिंह देव, मा ल व विजय करके लौट रहे थे तब रास्तेमें पडने वाले उझा मा म में खीमे डाले गये | वहांके ग्रामीणोंने, जिनको राजा मामा कहा करता था, दूधसे मरे हुए हंडों आदिके उचित सत्कारसे राजाको सन्तुष्ट किया । उसी रातको, राजा गुप्त वेप करके उनके दुख- मुख जाननेकी इच्छासे, किसी प्रामीणके घर पर चला गया । वह (ग्रामीण) गाय दुहने आदिके कामोंमें व्यस्त होता हुआ भी, उसने पूछा कि- 'तुम कौन हो?' [ इत्यादि । इसके उत्तरमें उसने ] कहा कि- मैं श्री सोमेश्वरका कार्पटिक (यात्री) हूं; महाराष्ट्र देश का रहने वाला हूं।' उसने फिर उससे महाराष्ट्र देश और उसके राजाके गुण-दोष आदि पूछे । उसने वहांके राजाके ९६ गुणोंको प्रशंसा करते हुए, उस प्रामीणसे गूर्जर देश के राजाके गुण-दोष पूछे । इस पर वह श्री सिद्ध राज के प्रजा-पालन-दक्षत्व और सेवकों पर अनुपम प्रेम इत्यादि गुणोंका वर्णन करने लगा। तब बीचमें उसने राजाका कोई कृत्रिम दोप बताना चाहा, तो वह ऑसू गिराता हुआ वोला कि-'हम लोगोंके मंद भाग्यसे राजाको कोई पुत्र नहीं है और यही उसमें एक दोप है'। इस प्रकार निष्कपट भावसे उसने उससे सब कह कर उसे संतुष्ट किया । फिर प्रभात कालमें सब लोक मिल कर राजाके - * यह 'बूच' कोई देश्य शब्द है । हिंदीमें इसके जैसा बूचा सन्द है जिसका अर्थ ' कानकटा हुआ' ऐसा होता है। इन पटेलोने गजाकी पालकीके अंग-प्रत्यंग काट डाले ये इस लिए इनको 'यूचा' कहा गया प्रतीत होता है। गुजरातीमें बूचाका अर्थ मोला 1-मुग्ध ऐसा भी होता है। इससे राजाने उनके इस मोलेपनको देख कर उन्हें 'धूचा' ऐसा सम्बोधन किया हो ।
प्रयन्धचिन्तामणि [वीय प्रकाश दर्शनके लिये उत्कंठित हो कर उसके निवासस्थानमें गये और राजाको प्रणामादि करके उसके अनुपम ऐसे पलंग पर ही बैठ गये । आसन देने के लिये नियुक्त नोकरनि उनको अलग आसन पर बैठनेको कहा तो वे लोग अपने हाथोंसे उस पलंगकी कोमल शय्याका स्पर्श करते हुए [ भोले मावसे ] हम लोग यहीं बड़े आरामसे बैठे हैं '-ऐसा कहते हुए वहीं बैठ रहे। [यह देख कर] राजाका मुख मुस्कुराहटसे कमलकी भाँति खिल उठा। इस प्रकार उञ्झावासी ग्रामीणोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * झाला सामंत माँगकी शूरताका वर्णन | ११७) किसी समय, झा ला जाति का मा ङ्गु नामक क्षत्रिय श्री सिद्धराज की सेवाके लिये सभामें आया करता था। वह रोज ही दो पराची (लोहेकी भारी कुसी) जमीनमें गाड़ कर बैठता और फिर उन दोनोंको उखाड़ कर ऊठता । उसके भोजनमें घीसे भरा एक कुतुप ( कुडवा-धी तेल भरनेका घडेके जैसा चमडेका भाजन ) खर्च होता था । घी लगी हुई उसकी दादीके धोने पर भी उसमें सोलहवाँ हिस्सा घी बच जाता था। किसी समय उसके शरीरमें रोग होने पर, पथ्यके लिये यवागू ( जौकी पतली मॉड ) खानेको वैधने कहा तो, वह ५ माणक (करीब ४ शेर कच्चे नाप जितनी) खा गया । इस पर वैद्यने डाँट कर कहा कि आधा भोजन कर लेने पर बीचमें अमृतोदक क्यों नहीं पिया ! ' क्यों कि कहा है कि १६८. जब तक सूर्योदय न हो जाय तब तक एक हजार घड़ा मी पानी पिया जा सकता है, पर जब सूर्योदय हो जाता है तो फिर एक बूंद भी एक घड़ेके बराबर हो जाता है। रातकी पिछली चार घड़ीमें, सूर्योदय न होने तक, जो जल पिया जाता है-जो जल प्रयोग किया जाता है उसे वजोदक कहते हैं (वह अमृतोदक भी कहाता है)। सूर्योदय हो जाने पर विना अन्न खाये, जो पानी दिया जाता है, वह विष है। इस लिये एक बूंद भी वह पानी सी घड़ोंके बराबर हो जाता है। आधा भोजन करने पर, वीचमें जो जल पिया जाता है वह अमृत कहलाता है, और भोजनान्तमें तत्काल पिया जाता हुआ जल छत्र या छत्रौदक कहलाता है। उस माँगूने, यह सुन कर कहा कि- 'यदि ऐसा है, तो पहले जो अन्न खाया है उसे आधा आहार कल्पना कर लिया जाय, और इस समय अब पानी पी कर फिर उतना ही आहार और कर लें!' ऐसा कह कर वह फिर खानेकी तैयारी करने लगा, लेकिन वैद्यने उसे वैसा करनेसे रोक दिया। किसी समय राजाने उसके निःशस्त्र रहनेका कारण पूछा। उसने कहा कि- 'मेरा हथियार तो समयोचित होता है। फिर एक बार उसके स्नान करते समय, किसी महावत्त द्वारा चलाये हुए हाथीको अपने ऊपर आता देख, नज़दीकमें रहे हुए कुचेको पकड कर उसकी सूड पर फेंक मारा । मर्मस्थान पर चोट लगनेके कारण निपीडित ऐसे उस हाथी को खींचा, तो उसके अतुल वलसे वह हाथी भीतर-ही-भीतर नसोंमेंसे टूट गया और उस महावतके नीचे उतरने पर, वह जमीन पर गिरते ही प्राणोंसे मुक्त हो गया। गूर्जर दे श पर आयी हुई म्लेच्छोंकी सेनाको देख कर राजाके पलायन कर जाने पर, वह अपनी इच्छासे उस सेनाका उच्छेद करता हुआ, युद्धमें जिस स्थान पर मारा गया, उस जगहकी, पचन में अब भी 'माङ्गुस्थण्डिल ' के नामसे प्रसिद्धि चल आ रही है । इस मकार यह माँग प्रबंध समाप्त हुआ।
[८७ प्रकरण ११७-११९ ] सिद्धराजकी सभामें म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन । सिद्धराजकी सभा म्लेच्छराजके दूतोंका आगमन । ११८) एक दूसरी वार, म्लेच्छराजके प्रधानोंके आने पर, मध्यदेशसे आये हुए वेपकारोंको बुला कर कुछ रहस्य दिखलानेका आदेश दे कर विसर्जित किया। इसके बाद दूसरे दिन, सायंकाल, प्रलय कालके समान प्रचण्ड पवनके आने पर, राजा सुधर्मा सभाके समान राजसभामें सिंहासन पर बैठ कर जो देखता है, तो अन्तरीक्षसे दो राक्षस उतर रहे हैं-जिनके मस्तक पर सोनेकी दो ईंटें रखी हुई हैं और जो सुवर्ण जैसी कान्ति धारण कर रहे हैं। उन्हें देख कर सारी सभा भयसे भ्रांत हो उठी। इसके बाद, उन्होंने राजाके चरणपीठ पर वह उपहार रख दिया और फिर पृथ्वीतल पर लठित होते हुए, प्रणाम करके कहा कि- 'आज लं का न गरी में महाराजाधिराज बिभीषण ने देवपूजा करते समय राज्यस्थापनाचार्य रघुकुल-तिलक श्री रामचन्द्रके उत्तम गुणप्रामोंको स्मरण करते हुए, ज्ञानमय दृष्टिसे जाना कि- आजकल उनके स्वामी (रामचन्द्र) चालुक्य कुल तिलक श्री सिद्धराज के रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इस लिये उन्होंने यह (सन्देश ) कह कर हम दोनोंको भेजा है कि- ' मैं प्रभुको प्रणाम करनेके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित मनवाला हो रहा हूं, सो क्या मैं ही वहाँ प्रणाम करनेको उपस्थित होऊँ या प्रभु ही यहाँ आ कर मुझे अनुगृहीत करेंगे !- इसका निर्णय महाराज स्वयं अपने श्रीमुखसे करें ।' उनकी यह बात सुन कर, राजाने मन-ही-मन कुछ सोच कर उनसे इस प्रकार कहा- 'प्रफुल्ल आनंद लहरीसे प्रेरित हो कर मैं ही खुद अपने अनुकूल समय पर, विभीषणसे मिलने आ जाऊँगा।' ऐसा कह कर, अपने कण्ठका श्रृंगारभूत ऐसा एकावली हार उनको प्रत्युपहारके रूपमें दे दिया। जाते समय 'प्रभुके अन्य दूत पठानेके अवसर पर, हमें भुला न दें' इस प्रकारको विशेष विज्ञप्ति करके अन्तरीक्ष मार्गसे वे दोनों राक्षस तिरोहित हो गये । उसी समय वे म्लेच्छोंके प्रधान पुरुष बुलाये गये तो, भयभीत हो कर अपना पौरुप छोड़, राजाके सामने आ कर उपस्थित हुए और भक्तियुक्त वचन कह कर राजाको खुश करने लगे। राजाने फिर उनके राजाके लिये उचित भेट दे कर उनको विदा किया । इस प्रकार यह म्लेच्छागमनिपेध प्रबंध समाप्त हुआ। * सिद्धराजका कोल्हापुरके राजाको चमत्कारके भ्रममें डालना । ११९) वादमें, किसी समय, कोल्हापुर नगरके राजाकी सभा बन्दियोंने श्री सिद्धराज की कीर्तिका गान किया । उस राजाने कहा कि-'सिद्धराज को हम ऐसा तब मानेंगे जब हमें भी कोई वह प्रत्यक्ष चम- कार दिखायेगा।' राजाके इस कयनसे पराभूत हो कर, उन्होंने सिद्ध राज को यह वृत्तांत कह सुनाया। इस पर राजाने जब सभामें नजर फिराई तो उसके मनकी बात समझने वाले किसी सेवकने हाय जोड़ फर अपना अभिप्राय प्रकट किया । राजाने उसे एकान्तमें बुला कर उसका कारण पूछा। उसने राजाके आशयको कह बतलाया और विशेपमें कहा कि-'तीन लाखके व्ययसे यह काम सिद्ध होने योग्य है ।' फिर उसी समय, ज्योतिपीके बताये हुए मुहूर्तमें राजासे तीन लाख ले कर, यह व्यापारी बनिया बन कर सब प्रकार के मालका संग्रह करके, सिद्धके संकेत हि पाली रत्न जड़ी हुई दो सोनेकी खड़ाऊँ, एक अतुलनीय योगदण्ड, दो मणिके बने हुए कुण्डल, उसी प्रकारके योगका सूचक योगपट, तथा सूर्यको किरणोंके जैसा चमकदार एक चन्द्रातक उसने सायमें लिया, और रास्ता ते करके कुछ दिनों में यहाँ (कोल्हापुर) जा कर डेरा डाला। समीपस्थ दारापलीकी रातको, उस नगरके रानाकी रानियों महालक्ष्मी देवीकी पूजाके दिए आकुल-व्याकुल हो कर देवो मन्दिरमें जब आई, तो वह बना हुआ सिद्ध पुरुष, उसी सिद्धनेपसे अलंकृत हो कर और खूब अच्छी तरह कूदना सीखे हुए किसी वर जातिके ८८] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश मनुष्यको साथ ले कर, अकस्मात् उस देवी मंदिर में प्रादुर्भूत हुआ । उसने देवीकी रत्न, सुवर्ण और कर्पूरसे पूजा अर्चा की और उस राजाकी रानियोंको उसी प्रकारके उत्तम पानके बीड़े दिये । फिर श्री सिद्धराज का नामाकित वह सिद्धवेष पूजाके बहाने वहीं रख कर, उसी बर्बरके कंधेपर चढ़कर, उडता हुआसा जैसे आया था वैसे ही चला गया। रातके अन्तमें रानियोंने उस विरोधी राजाको वह वृत्तान्त कह सुनाया तो, भयभ्रान्त हो कर उसने, उस उपहारको, अपने प्रधान पुरुषोंके द्वारा सिद्ध राज के पास पहुँचा दिया। इधर उस सेवकने अपने मालके क्रय-विक्रयका संकोच करके शीघ्रगामी पुरुपके साथ यह खबर भिजवा दी कि-'जब तक मैं न आऊँ तब तक इन प्रधान पुरुषोंको दर्शन न दीजियेगा।' फिर स्वयं जल्दी जल्दी चल कर कुछ ही दिनोंमें यहाँ पहुँच गया। उसके अपने कियेका पूरा वर्णन करने पर, राजाने उन प्रधानोंका यथोचित स्वागतादि किया। इस प्रकार यह कोल्हापुर प्रबंध समाप्त हुआ। * कौतुकी सीलणकी वाक्चातुरी। १२०) श्री सिद्ध राज, मा ल व मंडल से य शो वर्मा राजाको जब बाँध लाया, तब उसके निमित किये जाने वाले उत्सव पर सीलण नामक कौतुकीने कहा कि-' अहो बेडा (नाव ) में समुद्र डूब गया। तब उसके पीछे स्थित किसी गायन ( गान करनेवाले ) ने ' तुम अपशब्द कह रहे हो'-ऐसा कह कर उसकी तर्जना की । तब उसने अर्धापत्तिसे इस प्रकार विरोधालङ्कारका परिहार करके बताया कि- वेडाके समान इस गूर्जर भूमि में समुद्र जैसा यह मा ल व • नरेश डूब गया।' [इस पर उसने ] राजासे सोनेकी जीभ प्राप्त की। इस प्रकार यह कौतुकी सीलणका प्रबंध समाप्त हुआ। * काशीपति जयचन्द्रकी समाम सिद्धराजके इतकी वाक्पटुता १२१) किसी समय, सिद्धराज के एक वाचाल सान्धिविग्रहिक (दूत ) से काशी के राजा ज य चंद्र ने अण हि छपुर के प्रासाद, प्रपा ( बावडी ) और निपान ( कूए) आदिका स्वरूप पूछते समय [ उसकी विशेष शोमा सुन कर, ईर्ष्यावश राजाने ] यह दोप बताया कि-'सहसलिंग सरोवर का जल शिव-निर्माल्य होनेके कारण अस्पृश्य है। उसका सेवन करने वाले दोनों लोकसे विरुद्ध व्यवहार करते हैं। अतः वहाँके लोग, उदित प्रभाव वाले कैसे हो : सिद्धराज ने सहस्र लिंग सरोवर बना कर यह अनुचित कार्य किया है।' राजाकी इस बातसे मन-ही-मन कुपित हो कर उसने राजासे पूछा कि-[आपकी] 'इस वाराणसी में कहाँका जल पिया जाता है ?' राजाके 'गंगाजल' ऐसा कहने पर उसने कहा-'क्या गंगाजल शिव निर्माल्य नहीं है तो और क्या है ! शिवका सिर ही तो गंगाकी निवास-भूमि है।' इस प्रकार जयचंद्र राजाके साथ गूर्नरके प्रधानकी उक्तिमत्युक्तिका प्रबंध समाप्त हुआ। * मयणल्लादेवीके पिताकी मृत्युवार्ता । १२२) किसी समय, कर्णाट देश से आये हुए सान्धिविग्रहिकसे म यहा देवी ने अपने पिता जय के शी का कुशल समाचार पूछा तो उसने अश्रुपूर्ण आँखोंसे कहा कि-'स्वामिनि, प्रख्यातनामा महाराज श्री जय केशी भोजन के समय पिंजरेसे तोतेको युटा रहे थे । उसके 'मार्जार' (बिल्ली) बैठी है, ऐसा कहने पर, राजाने चारों ओर देख कर-किंतु अपने मोजनके पात्रके [चौकाके ] नीचे छिपे हुए मार्जारको न देख कर- प्रकरण १२३-१२५ ] पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरीकी यात्रा करना। [८९ प्रतिज्ञा पूर्वक बोल उठे कि- यदि बिल्ली के हाथ तुम्हारी मृत्यु होगी तो मैं मी तुम्हारे ही साथ मरूंगा'। वह तोता ज्यों ही पिंजडेसे उड़ कर उस सोनेके थाल पर आ कर बैठा त्यों ही उस बिल्लीने [लपक कर] भेड़िये जैसे दाँतोंसे उसे मार डाला । राजाने उसे मरा देख कर भोजनका पास छोड़ दिया, और उक्ति-प्रत्युक्ति जानने वाले गजपुरुषोंके [बहुत कुछ ] निषेध करने पर भी कहा- १६९. राज्य चला जाय, श्री चली जाय, और क्षणभरमें प्राण भी भले ही चले जाय, किन्तु जो वात मैंने स्वयं कही है वह शाश्वती वाणी न जाय । इस प्रकार इष्ट देवताकी भाँति इसी वाणीका जाप करता हुआ, काष्टकी चिता बनवा कर, उस तोतेको साथ ले, उसमें प्रवेश कर गया। इस वाक्यको सुन कर म यण ला देवी शोकसागरमें डूब गई। विद्वज्जनोंने विशेष प्रकारके धर्मोपदेशरूपी हस्तावलंबन दे कर उसका उद्धार किया। * पिताके पुण्यार्थ मयणल्लादेवीका सोमेश्वरकी यात्रा करना। १२३) बादमें, पिताके कल्याणार्थ श्री सोमेश्वर पत्तन की यात्राको वह गई, और वहाँ उस सतीने किसी त्रिवेदी ब्राह्मणको बुला कर उसे जलांजलि देना चाहा । उसने अंजलि में जल ले कर कहा कि- यदि तीन जन्मका पाप देना मंजूर करो तो मैं यह लेंगा, नहीं तो नहीं।' उसकी इस वातसे अत्यन्त सन्तुष्ट हो कर, हाथी, घोड़ा, सोना आदिके दानके साथ, उसे पापघटका दान किया। उसने वह सब अन्य ब्राह्मणोंको दे दिया । देवीके यह पूछने पर कि 'ऐसा क्यों किया !'; बोला कि-'पूर्व जन्मकी पुण्य-वृद्धिके कारण तो आप इस जन्ममें राजरानी और राजमाता हुई हैं। और फिर इन लोकोत्तर दानोंके पुण्यसे भविष्य जन्म भी श्रेयस्कर ही होगा। यही सोच कर मैंने तीन जन्मका पाप ग्रहण किया है। आपने जो इस पापघटके दानका उपक्रम किया है, इसे तो कोई अधम ब्राह्मण ले कर खुदको और आपको भी भव-सागरमें डूबो दे। मैंने तो पहले ही सब धनका त्याग कर दिया है और फिर इस धनको ले कर भी दान कर दिया है, इस लिये जो मैंने त्याग किया उससे आठ गुना अधिक श्रेयः संग्रह किया है। इस प्रकार यह पापघटका प्रबंध समाप्त हुआ। * सान्तू मंत्रीकी बुद्धिमत्ताका एक प्रसंग । १२४) किसी समय, मा ल व मण्ड ल से विग्रह करके स्वदेशको लौटते समय सिद्ध राज को मालूम हुआ कि [ गुजरात और मालवेके मध्यमें बसनेवाले ] अनुपम बलशाली भिल्लोंने उसका रास्ता धेर लिया है सान्त मंत्री को [पतन में] इसके समाचार मिले, तो उसने प्रति प्राम और प्रति नगरसे घोड़े इकडे किये, और प्रत्येक बैटको भी पटानसे सज करके बडा भारी दलबल इकट्ठा किया । फिर उस दलके बटसे मिल्लोको प्रासित फर सिद्धराज को मुखपूर्वक स्वदेशमें ले आया । इस प्रकार सान्तू मंत्रीकी युद्धिका यह मबंध समाप्त हुआ। सिद्धराजके एक सेयकके भाग्यका वृत्तांत । १२५) किसी एक रातको दो बुद्धिमान मृत्य श्री सिद्धराज के पैर दवा रहे थे। उनमें से एकने, राजाको नांदके कारण आँखें बंद किया हुआ समझ कर, उसफी प्रशंसा करते कहा कि-'महाराज सिद्धराज कृपा और कोपमें [ एकसे ] समर्थ, सेवकोंके ठिये कल्पवृक्ष और राजोचित समी गुणोंके आटप हैं। दूसरेने, राजाके इस २३-२४ ९०] प्रवन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश महान् राज्यका कारण मी प्राक्तन कर्म को बता कर [कर्म ही की ] प्रशंसा की । राजाने इस वृत्तान्तको सुन कर कर्मकी प्रशंसाको विफल करनेके विचारसे, प्रशंसा करनेवाले चाकरको एक दिन, उसे कुछ मी रहस्य न जता कर, यह प्रसाद-लेख दे कर महामंत्री सान्तू के पास भेजा कि-' इस चाकरको एक सौ घोड़ेका सामंत बना दिया जाय'। वह चाफर इस लेखको ले कर जब चंद्रशालाकी सीढ़ियोंसे नीचे उतर रहा था, तब पैर फिसल जानेसे गिर गया और उसका अंग भंग हो गया । उसीके पीछे चले आने वाले दूसरे चाकरने पूछा कि- यह क्या बात है?' तो उसने अपनी बात बताई। वह तो फिर खाटमें बैठ कर अपने घर गया और उस दूसरे [अपने साथी ] को वह राजाका लेख दे कर मंत्री के पास जानेको कहा। मंत्रीने उस लेखमें की गई आज्ञानुसार उस चाकरको सौ घुडसवारों वाला सामंतपद प्रदान किया । यह सब बात सुन कर राजाने भी कर्मको ही बलवान माना। १७०. न तो आकृति, न कुल, न शील, न विद्या और न मनुष्योंकी की हुई सेवा कुछ फल देती है। पूर्व जन्ममें तपस्यासे संचित किये हुए पुण्य कर्म ही मनुष्यको समय पा कर वृक्षोंकी तरह फल देते हैं। इस तरह यह वण्ठकर्म प्राधान्य-प्रबंध समाप्त हुआ। * सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । १७१. तीन भुवनके बीच में यह जे स ल ( ज य सिंह-सिद्ध राज ) राजा [ एक बडा ] कूट बरुड * है जिसने अनेक राजवंशोका छेदन कर [ अपना ] एक छत्र [ राज्य ] बनाया है । इसकी जय हो । १७२. महालय, महा-यात्रा महास्थान और महासरोवर, जैसे सिद्धराज ने किये वैसे किसीने नहीं किये। १७३. जिगीषु जन ( एक अर्थ- गानेकी इच्छा रखने वाले दूसरा अर्थ-विजयकी इच्छा रखने वाले) एक मात्राका भी अधिक होना सह नहीं सकते, मानों इसी लिये हे धरानाथ ( पृथ्वीनाय)! तुमने धारानाय (धा रान गरी के नाय) को नष्ट किया है। [ क्यों कि 'धरानाथ' की अपेक्षा : धारा-नाथ में एक मात्रा अधिक है] १७४. हे सरस्वती, मान छोड़ दो, हे गंगा, तुम भी अपने सोहागकी मंगीको छोड़ो; अरी यमुने, अब तेरी कुटिलता वृथा है; रे रेवा, तूं वेगको छोड़ दे; क्यों कि अब समुद्र, श्री सिद्धराज के कृपाणसे कटे हुए शत्रुस्कंधों से उछलने वाली रक्तकी धारासे बनी हुई नदीरूपी नवीन स्त्रीसे रक्त ( १ लाल वर्ण, २ अनुरक्त- प्रेमी) हो गया है। १७५. हे विजयी राजाओंमें सिंह ( जयसिंह ) महाराज, सचमुच ही तुम्हारे जय-यात्राके समय, हाथियोंके कारण जलाशयोंके सूख जानेकी चिंतासे; वीरोंके घावकी आमाक्षासे; तथा, अपने पतियोंके विनाशकी आशंकासे; क्रमशः मछली रोती है, मक्खी हँसती है, और स्त्रियाँ अशुभका ध्यान करती हैं। * वड या बरह उस जातिका नाम है जो बाँसको चीर-छोल कर उससे येकरी, करडक और छाता आदि बनाये करते हैं। कहीं कहीं 'गंछ' भी इनशे कहा है । इस पाम, राजवश और छर ये शब्द श्लेषात्मक है। इस पद्य सिद्धराजके ४ महाकार्य बतलाये गये हैं-जिनमें महालयसे दो सिद्पुरके रुद्रमहालयका सूचन होता है महायात्रासे बहुत करके सोमेश्वर तीर्थकी की हुई बड़ी यात्राका सूचन होता है। किसीके खयालो सिदराजने जो मालवे पर विजय प्राप्त किया था उस विजययात्राका इसमें सूचन किया गया है । महासरोवरसे पाटनके सहसलिंग सरोवरका निर्देश किया गया है। ४ ये महारपानसे किस वस्तुका सूचन होता है यह टीक शात नहीं होता | कहते हैं कि सिद्धयजने कई बड़े बड़े किले भी बनाये ये और को स्थान भी रसाये थे। संभव है उन्हीमसे किसीका कोई सूचन इसमें किया गया हो।
प्रकरण १२५ ] सिद्धराजकी स्तुतिके कुछ फुटकर पद्य । [९१ १७६. हे सिद्ध राज, नत हो जाने पर तो तुमने आ ना क भूपको अनेक लाखोंके साथ सपादलक्ष [जैसा देश ] मी दे दिया और दृप्त ऐसे यशोवर्मा के पास मालव (मालवा देश; श्लेषार्थ मा लक्ष्मीका लव टेशमात्र ) का होना भी तुमने सहन नहीं किया इत्यादि बहुतसी स्तुतियां और प्रबंध उसके बारेमें हैं जो अन्यान्तरोंसे ] जानने योग्य हैं। सं० ११५० से ले कर[११९९ तक ] १९ वर्ष तक श्री सिद्धराज जय सिंह देव ने राज्य किया। इस प्रकार श्री मेस्तुगाचार्यके बनाये हुए प्रबंध चिन्तामणिमें श्री कर्ण और श्री सिद्धराजका चरित्र वर्णन नामक यह तीसरा प्रकाश समाप्त हुआ। यहाँ पर P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं। ये लोक सोमेश्वर देव रचित कीर्ति- कौमुदी के हैं और इनमें संक्षेपमें सिद्धराज के जीवनके महत्त्वके सभी वीर कार्योका सूचन किया गया है- [१०६ ] जिसने, वालक होते हुए भी, इंद्रकी वीरवृत्तिको भी लांच जाने वाले अपने कोपके प्रभावसे दुष्ट राजाओंको आज्ञाधीन बनाया। [१०७ ] अपार पौरुषके उद्गारवाले सौराष्ट्रीय खंगार को भी, जिस गुरुमत्सरने युद्ध में इस प्रकार पीस डाला, जैसे सिंह हाथीको पीसता है। [१०८ ] जिसने रामचंद्रकी तरह असंख्य घोड़ोंकी सेना ले कर और अनेक राजाओंको नष्ट करके ( रामके पक्षमें-पर्वतोंको उखाड कर ) सिन्धुपतिको (सिद्धराजके पक्षमें -सिन्धु राज नामका राजा, रामके पक्षमें सिन्धु-समुद्र ) वाँध लिया। [१०९ ] मनमें अमर्प करके विपक्षीय उभृित् (एक अर्थ-पर्वत, दूसरा-राजा) के उन्नत होने पर, जिसने अगस्त्य मुनिकी माँति, शीर्घ ही अर्णोराज (एक अर्थ-समुद्रदूसरा-शा कं भरी का चाह मान राजा ) को शुष्क कर डाला। [११० ] विष्णुने तो अर्णोराज (समुद्र ) की पुत्री ले ली थी, किन्तु इसने तो अर्णोराजको अपनी पुत्री दे दी* | विष्णु और इस सिद राज में एक यही अंतर है। [१११ ] शत्रुओंके कटे हुए सिर देख कर शाकंभरी के ईश ने भी शंकित हो कर इसके चरणोंमें अपना सिर झुका दिया। [११२] स्वयं अत्यंत लक्ष्मीवान् और अपरमार (दूसरोंको न मारनेवाला ) हो कर भी युद्ध में जिसने मालवस्वामी ( एक अर्थ- मालव देशका राजा, दूमरा श्लेपार्य-सक्षमीका किंचित् मोका) परमारको मार डाला। [११३ ] जिसने धारा-नरेश को राज-गुकफी तरह काट-पधर (काटके पिंजरे) में रख कर अपनी कार्तिरूपी राजहंसीको काटा-पधर (दिक्चक्रबाट ) में छोड़ दिया। [११] जिसने नर वर्मा राजाकी तो केवल एक ही नगरी जो धारा यी यह ले टी, पर उसकी वधुओंको [ वदलेमें ] हजारों अश्रु-धारायें दे दी। • शमी (अरमेर ) चारमान राजा अगोगमधे, निमका देश्य नाम आनाक दा थाना पा, सिद्धयग्ने पुर करेले दो अपना आहाधीन गवा बनाया और सिर पीसे उसकी मन्नी पुत्री म्यादी दी। इसीका सूमन इस पाने है।
- ९२] प्रयन्यचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश [११५] धारा-मंगके प्रसंगको देख कर, जिसके समीप आनेकी ही आशंकासे, प्राघूर्णकके बहाने जिसको महोदय राजने दण्ड दिया । [११६] जिस शत्रुने, अमृतकी भाँति, इसकी पृथ्वीके ठेनेकी इच्छा की, उसीको तरवारसे उल्लसित इसके बाहुने राह बना दिया ( अर्थात् राहुके समान उसे सिरकटा बना दिया)। [:११७ ] लोगोंने तो इसको कुमार (कार्तिकेय ) की ही तरह शक्तिमान् अपना स्वामी माना था, लेकिन यह तो ताम्रचूडध्वज * था और वह केकिध्वज * था ( यही इनमें अंतर था)। [११८] ऐसा कोई राजा नहीं था, जिसको विश्वके इस एकमात्र वीरने जीता न हो; और ऐसी कोई दिशा न थी जो इसके यशसे शोभित न हुई हो। [ ११९] गणेशकी तरह जिस अग्रपुष्फर और वृपस्थितिको, मोदककी तरह, गौड राजा आज्यसार और करस्य हो गया। [१२० ] श्मशानमें वर्वर नामक राक्षसेन्द्रको बाँध करके राजाओंकी श्रेणीमें जो राजचंद्र सिद्धराज हो गया । [१२१ ] जिसने, लहाईसे ऊठी हुई धूलसै पहले जिस आकाशको मलिन कर दिया था, उसने पीडेसे उसी आकाशको अपनी कीर्तिटहीसे धो कर उज्ज्वल कर दिया । [ १२२ ) उस पृथ्वी मंडलके सूर्यके लोकान्तर होने पर चन्द्रसमान श्रीमान् राजा, कुमार पाल ने प्रजाका रञ्जन किया। -सिदराज प ताम्रचूर याने कारका विह पा इस लिए वह ताम्राषन करता था। कुमार (कार्तिकेय) पामे केली मयं मयूरका चिद्ध था । मयूरकी पोश अट अयिक बयान रोता है, इस लिये कुम्परसे मी आधिक प्रियापतिमान हेना इस पद पनित किया गया है। १.गोरा परमे-आगेरापीकी र हिममें; राह पम आगे है बाग बिमके। २ गोसके पचम-भूपकर RRB मितीगगरे में पर्मर पति बिमकी । ३ मोदको अपने आमामारवाना, गजके अर्य-पुसार मात्र । ४ मेदार मर्प राय या मा; राम अर्यमें कर दण्ड देनेवाला। रमण देशप समिदयो कर देने वाला बना या मरम पदम्पनित किया गया।
- ९. कुमारपालादि प्रवन्ध । - कुमारपालके पूर्वजादि। १२६) अब परम आईत श्री कुमार पाल का प्रबंध प्रारंभ किया जाता है-अण हि छ पुर नगरमें जब कि महाराज बड़े भी मदे व राज्य शासन कर रहे थे, उस समय श्री भीमेश्वरके नगरमें ( अर्थात् पत्तनमें) चकुला देवी' नामकी एक वेश्या रहती थी जो नगर प्रसिद्ध रूप और गुणकी पात्र थी। कुलवधूओंसे भी उसकी अधिक शीलमर्यादा कही जाती थी। राजाने यह सुना तो उसकी परीक्षा लेनेके विचारसे उसे अपने अनुचरोंके द्वारा सवालाख कीमतको एक कटारी, अपनी रक्षिता बनानेके इरादेसे, इनामके तौर पर भिजवाई। [कार्यान्तरकी] उत्सुकता वश राजाने उसी रातको बाहर जा कर प्रस्थान (यात्राके) लग्नको सिद्ध किया। विग्रह (युद्ध ) के निमित्त दो वर्ष तक उसको मा व ल देश में रहना पड़ा । पर वह व कु ला देवी, उसके भेजे हुए उक्त इनामके अनुसार, अन्य सब पुरुपोंको छोड़ कर शील आचारका पालन करती रही। निस्सीम पराक्रमशाली भीम ने तृतीय वर्षमें अपने स्थान पर आ कर जनपरंपरासे उसकी इस प्रवृत्तिको सुन कर उसे अपने अन्तःपुरमें दाखिल कर लिया। उसको एक पुत्र हुआ जिसका नाम हरिपाल देव था। उसका पुत्र त्रिभुवन पाल दे व हुआ और उसका पुत्र श्री कुमार पाल देव। वह जब धर्मका जानने वाला न था तब भी कृपालु और परस्त्रियोंका भाई बना हुआ था। सिद्धराज से सामुद्रिक जानने वालोंने कहा था कि-'आपके बाद यही राजा होगा। इससे वह उसे हीन जातीय मान कर, उसके प्रति असहिष्णु बन, सदा उसके विनाशका अवसर खोजा करता । वह कुमार पाल इस घातको कुछ कुछ समझ कर, राजासे मनमें शंकित बना हुआ, तापसवेप धारण कर, नाना प्रकारसे, देशान्तरों में भ्रमण करता रहा। कुछ साल इस तरह बिता कर फिर नगरमें आया और किसी मठमें ठहरा । सिद्धराजके भयसे कुमारपालका मारे मारे फिरना । १२७) इसके अनन्तर, श्री कर्ण देव के श्राद्धके अवसर पर श्रद्धालु सिद्धराज ने सब तपस्वियोंको [भोजनके लिये ] निमंत्रित किया । उनमेंसे प्रत्येकके पैर धोते समय, कुमार पाल नामक तपस्वीके भी कोमल चरणतलको हायसे स्पर्श करता दुआ, उसमेंकी ऊर्च रेखा आदि चिन्होंसे उसने जाना कि- यही वह राजा होने योग्य है'-और इस लिये निश्वल दृष्टिसे उसे देखता रहा । उसकी इस चेष्टासे [ अपने प्रति ] उसे विरुद्ध समश कर, उसी समय येप बदल करके, कौवेकी भाँति, यह अदृश्य हो गया और आ लिग नामक कुम्हारके घरमें जा छिपा । वहां मिट्टीफे वर्तन पकाने के लिये आवा बनाया जा रहा था, उसीमें कुम्हारने छिपा कर, पीछा फरने याले राजपुरुषोंसे उसे बचाया । फिर यहाँसे धीरे धीरे आगे चला तो, उसने खोजनेके लिये आये हुए राजपुरुषोंको सामने देखा । उससे त्रासित हो कर, नजदीकमें कोई दुर्गम ऐसी छिपने टायफ भूमिको न पा कर किसीएफ खेतमें जा खड़ा हुआ। वहाँ पर, ग्वेतके रखयालोंने, खेतकी रक्षाके लिये कांटेदार वृक्षोंकी डालियों काट कर जो इकही कर रखी थी, उन्हीं के बीच में उसे छिपा दिया और वे अपनी जगह पर आ कर बैट गये । इसके नाममें कुछ उमेद मिलता है-रिसी प्रतिमें 'चउला देवी' ऐमा भी पा जाता है परन्तु यर'' और 'च'के भी लिम्बने पालोंके प्रमके कारण हुआ मान्म देता है।'पालादेरी' का अरय उपार 'पउन्मादेवी रोगाऔर 'की जगर'च'पटनेसे 'चउलादेवी नान बन गया मालूम देता है। अधिकतर प्रतियों में यात्रदेवी नाम ही मिलता है और यही एक प्रवीत रोता है। .
९४ ] प्रबन्धचिन्तामणि [तृतीय प्रकाश राजाके आदमी पैरोंके चिह्नके अनुसार वहाँ पहुँचे, परन्तु उसका वहाँ पाना असंभव जान कर और भालेकी नोकको उसमें खोंच कर देखने पर भी कुछ न मालूम कर, वे वहाँसे वापस लौट गये । दूसरे दिन खेतवालोंने उस स्थानसे उसे बहार निकाला । वह सवेरे ही वहाँसे आगे चलता हुआ एक वृक्षकी छायामें बैठ कर विश्राम लेने लगा, तो क्या देखता है कि, एक चूहा निमृतभावसे बिउमें से चाँदीका सिक्का बाहर ला कर रख रहा है । जब वह इस प्रकार इक्कीस सिक्के निकाल चुका, तो उनमेंसे फिर एक वापस उठा कर वह बिलमें ले गया। उसके बिलमें घुसने पर बाकीके सब सिक्के उठा कर कुमार पाल ने ले लिये और वह ज्यों ही एकान्तमें जा कर देखता हैं तो वह चूहा बाहर आ कर उन सिक्कोंको न पा कर वहीं छटपटा कर मर गया। कुमार पाल उसके शोकसे मनमें बड़ा व्याकुल हो कर चिरकाल तक परिताप करता रहा । फिर आगे चलते हुए रास्तेमें किसी [धनी पुरुष] की बहूने, जो ससुरालसे पीहर जा रही थी, देखा कि राहखर्चके अभावमें तीन दिनसे भूखे मरते उसका पेट फक पड़ गया है । उसने भाईकी तरह स्नेहसे कर्पूरकीसी सुगंधियाले चावल के करंबेसे उसको मतृप्त किया। १२८) बादमें, विविध देशान्तरोंका भ्रमण करता हुआ, यह स्तंभ तीर्थ में महं० श्री उ द य न के पास कुछ मार्गखर्च माँगनेके लिये आया । यह सुन कर कि वह पौषधशालामें है, तो वह वहाँ आया। उसे देख कर उदयन ने हे म चंद्राचार्य से [ उसके बारेमें ] पूछा । उन्होंने कहा कि-इसके अंगके लक्षण लोकोत्तर हैं। यह भविष्यमें चक्रवर्ती राजा होगा। आजन्म दरिद्रतासे सताये हुए उस क्षत्रियने जब इस बातको असंभव कहा, तो उन्होंने यह लिख कर एक पत्रक मंत्रीको और एक उसको दिया कि- यदि सं० ११९९ कार्तिक वदि ( B. P सुदि ) २ रविवार हस्त नक्षत्रमें, आपका पट्टाभिषेक न हों तो, इसके बाद, मैं शकुन देखना ही त्याग दूंगा।' फिर वह क्षत्रिय उनकी इस कला-कौशल वाली चातुरीसे मनमें चकित हो कर बोला कि- 'य बात सच हुई तो, आप ही राजा रहेंगे और मैं आपका चरणरेणु हो कर रहूँगा'- और इसकी प्रतिज्ञा की । श्री हे मा चार्य ने कहा कि-'नरकरूप अन्तिम फल देनेवाली राज्यलिप्सासे हमें कोई मतलब नहीं है। आप कृतज्ञ हो कर यह बात न भूलियेगा और जैन शासनका भक्त हो कर सदा रहियेगा।' इस अनुशासनको सिर माये रख कर और आज्ञा कर फिर मंत्रीके साथ उसके घर गया। वहां स्नान, पान, भोजन आदिसे सत्कृत हो कर और राह-खर्च पा कर, विदा ले मा ल व देश में आया । वहाँ कु डङ्गेश्वर प्रासादमें पट्टिका पर १७७. संवत् ११९९ का वर्ष पूर्ण होने पर, हे विक्र मा दित्य, तुम्हारे ही समान एक कुमार पाल नामक राजा [जैन धर्मका पालन करने वाला ] होगा। इस प्रकारको गाथा लिखी हुई देख कर मनमें बडा विस्मित हुआ। [इस समय] गूर्ज राधि पति सिद्ध- राज का स्वर्गवास सुन कर वहाँसे लौटा । उसका सब खर्च समाप्त हो चुका था। उसी नगरमें, किसी बनियेकी दूकान पर [बिना कुछ दिये] भोजन करनेके बाद उसको बंदी किया गया। वह व्याकुल हो कर रोने लगा तो, फिर नगरके लोगोंके इकट्ठा होने पर दोनोंका मरण होगा यह जान कर उस बनियेने कहा कि-'मेरी बनावटी मूर्छा है इसे तुम दूर करनेका प्रयत्न करने लगो' उसके इस प्रकारके बुद्धिवैमवसे अपनेको प्रत्युजीवित मान- कर, कुमार पाल ने वैसा किया और उस उपायसे अपना कष्ट छुटा कर वह अण हिल्लपुर में रातके समय पहुँचा। पासमें कुछ न होनेके कारण कंदोईकी दूकान पर जा कर, उसका दिया हुआ कुछ खाया । बादमें अपने बहनोई राजकुल श्री कान्ह ह देव के घर गया । जब कान्हड़देव राजमंदिरसे आया तो उसे आगे आगे करके घरके मीतर ले गया । फिर अच्छा खाना आदि खा कर स्वस्थ हो कर सो गया। .'यदि यह , * १ यहा पर यह क्या बात कही गई है सो ठीक समझमें नहीं आती । ग्रंयकारका लेख बहुत अस्पष्ट और सक्षित है ।
'प्रकरण १२८-१३१ ] कुमारपालादि प्रयन्ध [९५ कुमारपालका राजगादीपर बैठना। १२९) प्रातःकाल वह बहनोई अपना सैन्य तैयार करके, उसके साथ, उसको राजाके महलमें ले आया। अभिषेककी परीक्षाके लिये पहले एक कुमारको पट्टे पर बैठाया । उसको चादरके आँचलोंको भी ठीक सम्हालते न देख फिर एक दूसरेको बैठाया । उसको हाथ जोड़ कर बैठा हुआ देख कर उसे भी अप्रमाणित किया। फिर कान्हड़देव की अनुज्ञासे कु मा र पाल, वन संवरण करके ऊँचेसे श्वास लेता हुआ और हायमें तलवार कॅपाता हुआ, सिंहासन पर जा बैठा । पुरोहितने मंगलाचार किया, नगाड़े बजे । श्रीमान् कान्हड़देव ने पंचांगोंसे 'पृथ्वी चूम कर प्रणाम किया। उस समय उसकी अवस्था पचास वर्षकी हुई थी। * कहा- . कुमारपालने राजद्रोहियोंका उच्छेद किया। १३०) कुमार पाल स्वयं प्रौद होनेके कारण, तथा देशान्तर भ्रमणसे विशेष निपुणता प्राप्त करनेके कारण, सत्र राज्यशासन स्वयं करने लगा। राज-वृद्धोंको यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने मिल कर उप्ते मारना चाहा और अन्धकार वाले दरवाजेमें घातकोंको रख दिया। पूर्वजन्मके शुभ कर्मासे प्रेरित किसी आतने उस वृत्तान्तको बता कर उसे अन्य द्वारसे मकानमें प्रवेश कराया । वादमें उन प्रधानोंको उसने शीघ्र यमपुरीको भेज दिया । यह भावुक मण्डलेश्वर ( का न्ह ड देव ), राजा अपना साला होने के कारण, तथा अपने आपको राज- प्रतिष्ठाचार्य समझ कर, राजाकी दुरवस्थाके [ उन पिछले ] मर्मीको कहा करता । इस पर किसी समय राजाने हे भावुक, तुम्हें इस प्रकार राज-दरबारमें सर्वदा पुरानी दुरवस्थाके मौका मजाक नहीं करना चाहिये। अबसे ऐसी बातें सभामें न कहना, विजनमें चाहे यथेच्छ कहते रहना ।' राजाके इस प्रकार उपरोध करने पर भी, उत्कट अवज्ञावश हो कर वह बोला कि- “रे अनात्मज्ञ ! अभी इतनेहीमें अपने पैर उखाड रहा है !' इस प्रकार बकता हुआ, मानों मोतहीकी इच्छासे, औषधकी भाँति उसके पथ्य वचनको भी उसने ग्रहण नहीं किया । [ उस क्षण तो ] राजाने अपने भावका संवरण करके अपनी मनोवृत्ति छिपा ली । दूसरे दिन राजाके संकेत प्राप्त मल्लोंने उसका अंग तोड़ मरोड़ कर, दोनों आँखें निकाल ली और उसे उसके मकान पर भिजवा दिया। १७८. इस विचारसे कि पहले मैंने ही इसे जलाया है अत: तिरस्कार करने पर भी यह मुझे नहीं जटायेगा, इस भ्रमके वश हो कर दीपककी तरह, राजाको कोई अंगुलिके पोरसे भी न छुए । यह विचार कर, सामन्त लोग, उस दिनसे अत्यधिक मयचकित चित्त हो कर, प्रतिपद पर उसकी सेवा करने लगे। १३१) राजाने पूर्वमें उपकार करने वाले उदयन के पुत्र वाग्मट देय को अपना महामात्य बनाया और आलिग को तथा मई० उदयन देघ को (वृद्ध) प्रधान बनाये। कुमारपालका चाहमान राजा आनाकके साथ युद्ध । १३२) चाहर नामक एक कुमार सिद्धराज का प्रतिपन (माना हुआ) पुत्र था। यह कुमार पाल देय की आज्ञा न मान कर सपादलक्ष के राजाके पास सैनिक हो कर चला गया। वह श्री कुमारपाल के साथ रिमह करनेकी इच्छासे, यहाँक सभी सामन्त लोगोंको लाँच (रिश्वत ) आदिके द्वारा अपने पशमें फरफे, प्रबल सेनाफे साथ सपादलक्ष के राजाको ले कर [गूर्जर ] देशकी सीमा पर चढ़ आया। अब, चौलस्य चक्राता (कुमारपाल) ने भी, प्रनिशत्रु बन कर, उस सैन्यके सामने अपना सैन्यसमूह जमा किया। जव दाईका दिन से हुआ और सीमा निष्कंटक की गई तया चतुरन सेना सजित की गई, तो उसी समय पर ९६] प्रबन्धचिन्तामणि [ तृतीय प्रकाश इस्तीके च उलिग नामक महायतने, किसी अपराधमें राजासे फटकार पा कर, क्रोधसे अंकुश-त्याग कर दिया। इसके बाद, अनेक गुणके पात्र ऐसे सा मल नामक महावतको खूब वस्त्र और धन आदि दे कर उस पद पर नियुक्त किया। उसने 'कल ह पश्चानन' (युद्धका सिंह) नामक हाथीको सजा करके उसके ऊपर राजाका आसन रखा । ३६ प्रकारके अस्त्रोंको वहां जमा कर, फिर राजाको बैठाया और सब कला-कलापसे पूर्ण ऐसा वह स्वयं भी कलापकै पर पैर रख कर हाथी पर चढ़ा। उस आसन पर बैठ कर चौलुक्य चक्रवर्ती (कुमार पाल) ने देखा, तो मालूम हुआ कि, संग्रामके नायक पुरुषोंसे उठाये जाने पर भी, चा हड कुमार के किये हुए भेदके कारण (फुट जानेसे), सामन्त लोग उसकी आज्ञाको नहीं मान रहे हैं । इस प्रकार सेनामें कुछ विप्लव देख कर उसने महावतको [ आगे बढनेका ] आदेश किया । सामनेकी सेनामें हाथी परका छन देख कर अनुमान किया कि वह सपादलक्ष का राजा [ आ रहा ] है । और यह निश्चय करके कि, सेनाके विघटित (विमुख ) हो जाने पर मुझे अकेलेहीको लडना आवश्यक है, उस महावतको, सामनेके हायीके पास, अपने हाथीको ले चलनेकी आज्ञा दी । पर उसे भी पैसा न करते देख बोला कि- 'क्या तू भी फूट गया है ?' इस पर उसने कहा- ' महाराज ! कल ह पञ्चा न न हाथी और सा म ल नामक महावत ये दोनों युगान्तमें भी फूटने वाले नहीं है, किन्तु सामनेके हाथी पर जो चाह ड नामक कुमार चढा हुआ है यह ऐसी गंभीर आवाज़ कर रहा है कि जिसकी हाँकके डरसे हाथी भी भाग छूटते हैं । यह सुन कर राजाने [ अपनी बुद्धिमत्तासे सोच कर ] हाथीके दोनों कानोंको चादरसे बंद कर दिया और फिर शत्रुके हाथीसे जा भिड़ाया। इधर चा हड़ ने, यह जान कर कि वह च उलिग नामक महावत ही-जिसे उसने पहलेहीसे अपने वशमें कर लिया है-राजाके हाथी पर बैठा है, कुमार पाल को मारनेकी इच्छासे हाथमें कृपाण ले कर अपने हाथी परसे कूद कर ' कलहपंचानन ' हाथ के कुंभस्थल पर पैर रखा । इतनेमें महावतने [ बडी चालाकीसे ] हाथीको पीछे हटा दिया। इससे वह चाह ड कु मार पृथ्वी पर गिर पड़ा और नीचे खडे हुए पैदल सैनिकोंने उसे पकड़ लिया। इसके बाद चौ ल क्य राज ने श्री आ ना क नामक सपादलक्ष देशके राजासे कहा कि-'हथियार संभालो!' ऐसा कह कर उसके मुख-कमल पर उचित समझ शिलीमुख ( बाण ) फेंकने लगा। ( उचित इसलिये कि शिलीमुख भौरेका भी नाम है और भौरोंका कमलकी ओर जाना उचित ही है।) 'तुम बड़े प्रधान क्षत्रिय हो न '- इस प्रकार उपहासके साथ प्रशंसा करते हुए, उसे भुलावेमें डाल कर, जो बाण मारा तो उससे घायल हो कर वह हाथीके कुंभस्थलसे गिर गया। जीत लिया, जीत लिया। कहते हुए जाराने स्वयं सारी सेनामें अपने हाधीको इधरसे उधर घूमाया और जो सब सामंत थे उनके घोड़ों पर आक्रमण करके उनको कैद किया। इस प्रकार यह चाइड कुमारका प्रबंध समाप्त हुआ। * कुमारपालका उपकारियोंको सत्कृत करना । १३३) तत्पश्चाद, कृतज्ञ-सम्राट् चौलुक्यराजने आ लिग कुम्हारको सातौं गाँवयाली विचित्र चित्रकूट पहिफा (चिचोड, मेगडकी भूमि ) दी। वे अपने वंशके कारण लजित हो कर आज भी अपनेको 'सगर' (!) कहते हैं। जिन्होंने कटे हुए बबूलकी डालोंमें छिपा कर राजाको रक्षा की थी चे अंगरक्षकके पदपर रखे गये। - - १ हामीपर चढने के लिये रस्सीका बना हुआ काम।
९८] प्रबन्धचिन्तामाणि [चतुर्थ प्रकाश धारण कर और फारही संमें निवास करता सुआ [पत्तन आया ] यहाँ पर चौलस्य भूपाल (कुमार पाठ) ने उसे इस इंगमें देखा तो पूछा कि यह फिसका सैन्य पड़ा है।' इस पर उसे कहा गया कि फोकणसे लौटे हुए पराजित सेनापति आम्बफे सैन्यका यह पडाव है।' उसकी ऐसी लनाशीलतासे चित्तमें चमत्कृत यो कर, प्रसनारिसे उसे आदरके साथ धुरगया और फिर अन्यान्य बलवान् सामन्तोंके साथ मछि कार्जुन को जीतनेके ये उसीको राजाने फिर भेजा। [वह इस बार कौङ्कण देशमें पहुँच कर ] उस नदीको उतर कर उस पर पुर बैंधवाया और फिर उस परसे सारे सैन्यको पार करके पड़ी सावधानी के साथ युद्धको ब्यवस्था की । घमासान गुरु शुरू होने पर उस सुभट आम्मडने हाथोके फन्धे पर सवार मछि कार्जुन को दो लक्षित फरके, बडी गीरथरिके साथ उसके हाधीकै दौतरूपी मुशलकी सौसे, उसके कुंभस्थल पर वह बैठा । उदाम रण- शौर्यसे मतवाला हो कर बोला कि-'पहले प्रहार करो, या इए देवताका स्मरण करो।' यह कह कर [ उसके सम्हनते ही अपनी धारार तलनारके प्रहारसे मल्लिकार्जुन को पृथ्वी पर गिरा दिया। उधर सामन्त लोग नगर फ्टनेमें संबा थे, इधर इसने रोलहीमें, जैसे सिंहशावफ हाथीको [ मार डालता है वैसे ही [ मल्लिकार्जुनको] मार डाला। फिर उसके मस्तफको सोने [ के पतरे से लपेट कर, उस देशमें चौलस्य चक्रवर्तीको आज्ञाकी घोषणा फरता तुआ, अणदिछपुर जा कर, बहत्तर सामन्तोंके साथ सभामें बैठे हुए अपने स्वामी कुमार पाल उपातिके परणोंकी, उसके सिररूपी फमउसे पूजा की तथा ये ४ चीजें भेंट की-१ शंगारकोसी नामक साशी २ माणिक नामक पिछोडा, ३ पापक्षय नामक हार, और १ संयोगसिसि नामक सिमा । इनके सिवा ३२ कुंभ सुवर्ण, ६ मूडा मोती, चार दोतवाला घेत हाथी, १२० पान ( वायगना ) और १४॥ कोटी सुवर्ण दण्डके रूपमें उपस्थित किया। इससे अति प्रसन्न होकर राजाने श्री आम्बड नामक महामण्डलेघरको श्रीमुखसे [ उस मालिकार्जुन का धारण किया हुआ यह ] 'राज-विसा मह विरुष समर्पण किया। इस मकार यह मंत्री आम्बडका प्रबंध समाप्त हुआ। M कुमारपालके साथ हेमचन्द्राचार्यके समागमका प्रसंग । १३८) एफ बार, अपहिलपुर में भारक श्री हेमचंद्र सूरि ने अपनी पाहिणि नामक माताको, कि जिसने दीक्षा की हुई थी, परलोक मासिके समय कोटि नमस्कारके पुण्यका दान किया। मृत्युके बाद [ संघजन ] जब उसका संस्कार महोत्सव करने जा रहे थे, तब त्रिपुरुष धर्मस्थानके निकट [ उसका शवस्मिान पहुंचा तो ] यहाँफे तपखियोंने स्वाभाविक मत्सरतावश, उस विमानका भंग करके आचार्यका राष अपमान किया । उसको उत्तराक्रिया करवा कर, उस अपमानके आपातसे कुपित हो कर उन्होंने [ उस समय ] मा पिस कुमारपाल भूपतिके स्कंधावार (सेनानिवेश) को अलंकृत किया। १७९. मनुष्यको [ अभीष कार्यसिदि प्राप्त करने के लिये ] या तो स्वयं राजा बनना चाहिये या किसी राजाको हायमें करना चाहिये। [ इन दो रास्तोंके सिरा ] कामके सिद्ध करनेका तीसरा रास्ता नहीं है। इस वपनफे ततका विचार कर उन्होंने ऐसा किया। उनके इस तरह आनेका समाचार उदयन मंत्री ने राजाको सुनाया तो फराज्ञोंके शिरोमगि उस राजाने परम अनुरोध के साथ उन्हें अपने महलमें बुलवाया। राध पानेके शकुन ज्ञानको स्मरण करते हुए राजाने अनुरोध करके कहा कि- आप सर्वदा देवताअनके अपसर पर यहां पापा फरें। इस पर रिने कहा- प्रकरण १३८-१३९] कुमारपालादि प्रबन्ध [९९ १८०. हम लोग भिक्षा माँग कर तो भोजन करते हैं, जूने-पुराने वस्त्र पहनते हैं और अकेली जमीन पर सो रहते हैं, तब फिर हम लोगोंको राजाओंसे क्या करना है। उनके ऐसा कहने पर राजाने कहा १८१. मित्र एक ही [ होना चाहिये ], राजा या यति; भार्या एक ही [ होनी चाहिये] सुन्दरी रमणी या दरी ( कंदरा ); शास्त्र एक ही [ होना चाहिये ], वेद या अध्यात्म और देवता भी एक ही [ होना चाहिये ] केशव या जिन । महाकविके इस कथनके अनुसार मैं परलोककी साधनाके लिये आपकी मित्रता चाहता हूं। बातका निषेध न करना उसे स्वीकार कर लेना है' - इस उक्तिके कथनानुसार, सूरिके कुछ न कहने पर उस महर्षिकी चित्तवृत्तिको पहचान लेने वाले उस राजाने, लोगोंके आने जानेमें बाधा देने वाले द्वारपालोंको, श्रीमुखसे आज्ञा दी कि इन महर्षिको किसी भी समय आनेमें बाधा न दी जाय । किसी * हेमाचार्यके समागमसे कुमारपालके पुरोहितका विद्वेष । १३९) बादमें सूरिको वहाँ आते जाते देख और राजाको उनके गुणका गान करते देख, विरोध भावसे पुरोहित आलिग ने कहा- १८२. विश्वामित्र, पराशर आदि तथा अन्य ऋषिगण, जो केवल जल और पत्ता खा कर रहते थे, वे भी स्त्रीके सुंदर मुखकमलको देख कर मोहित हो गये, तो फिर जो मनुष्य घी, दूध और दहीका आहार करते रहते हैं उनका इन्द्रियनिग्रह कैसा हो सकता है। अहो, यह इनका दम्भ तो देखिये। उसके ऐसा कहने पर हेम चंद्र ने कहा- १८३. हाथी और सूअरका मांस खाने वाला ऐसा जो बलवान् सिंह है वह, सुना जाता है कि वर्षमें केवल एक ही वक्त रति करता है; पर कर्कश शिलाकणको खाने वाला कबूतर रोज रोज कामी बना रहता है ! इसमें क्या कारण है, सो तो बताओ?' उसका मुँह बंद कर देने वाले इस प्रत्युत्तरके बाद ही किसी [ और ] मत्सरीने कहा, कि ये श्वेतांवर तो सूर्यको भी नहीं मानते । उसके ऐसा कहने पर- १८४. लोकको धारण करने वाले सूर्यको । वास्तवमें ] हमी लोग हृदयमें धारण करते हैं। क्यों कि उसको अस्तगमन रूप संकट उपस्थित होने पर [हम तो] अन्न-जल भी छोड़ देते हैं। इस प्रमाणकी निपुणताके आधार पर, हमीं लोग वस्तुतः सूर्यभक्त हैं, ये नहीं [ यह सिद्ध कर दिया] । इससे उसका मुँह बन्द हो गया। फिर एक बार देवतावसर ( देवपूजाकी समाप्ति ) हो जाने पर, मोहान्धकारको नष्ट करनेमें चंद्रमाके समान श्री हेम चंद्र के आने पर यश चंद्र गणिने रजोहरणके द्वारा आसन पट्टको साफ कर वहाँ कम्बल विछाया, तो राजाने [ उसका ] तत्व न समझते हुए पूछा कि 'क्या बात है?" उन्होंने कहा- 'कदाचित् यहाँ कोई जन्तु हो, इस लिये उसको हटा देनेके लिये यह प्रयत्न होता है। राजाने इस पर यह युक्ति-युक्त बात कही कि- यदि प्रत्यक्ष कोई जन्तु देखा जाय तो ऐसा करना उचित है; न कि यों ही वृथा प्रयास करना ठीक होता है।' इस पर उन सूरिने कहा-'आप क्या [ अपनी ] हाथी घोड़ेकी सेनाको शत्रु राजाके चढ़ आने पर ही तैय्यार करते हैं, या पहले भी !' जैसे वह राजव्यवहार है वैसे ही यह धर्म व्यवहार है। उनके इस प्रकारके गुणोंसे हृदयमें रंजितं हो कर राजा, अपनी पहले की दुई प्रतिज्ञाके .
१०.] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्य प्रकार अनुसार, उन्हें अपना राज्य देने लगा, तो उन्होंने सर्व शास्त्रका विरोधहेतु बतलाते हुए उसका अस्वीकार किया । क्यों कि कहा है कि १८५. हे युधिष्ठिर, जैसे जले हुए वीजका पुनः उद्गम नहीं होता वैसे राज-प्रतिमहसे ( राजाके दिये हुए दानसे) दम्य हुए ब्राह्मणोंका [ फिर ब्राह्मण कुलमें ] पुनर्जन्म नहीं होता। यह पुराणमें कहा गया है । उसी प्रकार जैन शास्त्र भी [ कहते हैं ] - 'गृहस्थके वहाँ भिक्षा मिलती हो तो फिर 'राजपिण्ड' (राजाके दान ) की इच्छा क्यों करनी चाहिए। इस प्रकार [ प्रभु हेम चन्दा चार्य का कहा हुआ सुन कर ] उक्त विषयके ज्ञानसे चित्तमें चमत्कृत हुआ और वह पत्तन पहुँचा । कुमारपालका सोमेश्वर तीर्थके जीर्णोद्धारका प्रारंभ करवाना । १४०) एक वार, राजाने मुनिसे पूछा- 'क्या किसी तरह मेरा भी यशका प्रसार कल्पान्त-स्थायी हो सकता है !' उसकी इस बातको सुन कर उन्होंने कहा-[यह दो तरहसे हो सकता है-] या तो विक्रमादित्य के समान संसारको अनृण करनेसे, या सोमेश्वर का काष्टमय मंदिर, जो समुद्रके पानीकी छाटोंसे शीर्णप्राय हो गया है, उसका उद्धार करनेसे कार्ति युगान्त तक स्थायी हो सकती है। इस प्रकार चन्द्रमाकी चाँदनीको भाँति श्री हेम चंद्र की वाणी सुन कर उल्लसित आनंदके समुद्रसे उस राजाने उसी महर्षिको पिता, गुरु और देवता मानते हुए और विजातीय अन्य ब्राह्मणोंकी निंदा करते हुए, प्रासादके उद्धारके लिये, उसी समय ज्योतिपीसे शुभ लग्न ले कर, पञ्चकुलको वहाँ भेजा और प्रासादके उद्धारका आरंभ कराया * कुमारपालका उदयनसे मंत्री हेमचन्द्राचार्यका जीवनवृत्तान्त पूछना । १४१) एक दूसरी बार, श्री हेम चंद्र के लोकोचर गुणोंसे हृत-हृदय हो कर राजाने मंत्री उदयन से पूछा कि-' इस प्रकारका यह पुरुष-रत्न, सकल वंशोंके भूषणरूप ऐसे किस वंशमें, समस्त पुण्यके प्रवेशवाले किस देशमें और सब गुणोंके आकर समान किस नगरमें पैदा हुआ है !' राजाके इस आदेश पर उस मंत्रीने जन्मसे आरंभ करके उनका पवित्र चरित्र इस प्रकार कह सुनाया-'अर्धाष्टम नामक देशके धुन्धु का नामक नगरमें मोढ वंश के चा चि ग नामक व्यवहारीकी, सतियोंमें श्रेष्ठ और जैनधर्मकी शासन देवता समान साक्षात् लक्ष्मी जैसी पाहिणि नामक सहधर्मचारिणीके ये पुत्र हैं। चामुण्डा नामक गोत्र देवीके आद्याक्षरके नाम पर चांगदेव इनका नाम रखा गया था । इनकी अवस्था जब आठ वर्षकी थी, उस समय [इनके गुरु ] श्री देवचन्द्राचार्य पत्तनसे तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान कर धुन्धुक्कक गावमें गये । वहाँ मोढ वस हिका में देवको नमस्कार करने जब गये तो यह लड़का समवयस्क वालकोंके साथ खेलता हुआ, अचानक सिंहासनके पास रखी दुई उन आचार्यकी गद्दी पर जा बैठा । इस वालरुकै अंग-प्रत्यंगमें संसारसे विलक्षण लक्षणोंको देख कर उन्होंने (देवचन्द्रा चार्य ने ) कहा- यह यदि क्षत्रिय कुलमें पैदा हुआ है तो सार्वभौम चक्रवर्ती होगा, यदि वणिक् या ब्राह्मण कुलमें पैदा हुआ होगा तो महामंत्री होगा और यदि दर्शन (संप्रदाय =धर्ममत) का स्वीकार करेगा तो युग-प्रधानकी नाई कलि-कालमें भी सत्ययुग ले आयेगा'। आचार्यने यह सोच कर, उसको प्राप्त करने की इच्छासे उस नगरके रहने वाले व्यवहारियोंको साथ ले, वे चाचिग के घर गये । वह उस समय अन्य प्रानमें गया हुआ था । उसकी विवेकवती पत्नीने स्वागत-सत्कारसे उन्हें सन्तुष्ट किया । उनके यह कहने पर कि-श्रीसंच (गाँवका मुख्य श्रावक समूह) तुम्हारे पुत्रको माँगने यहाँ आया है।' उसने हर्षके आँसू । , प्रकरण १४०-१४२ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१०१ बहा कर अपनेको रत्नगर्भा माना । तीर्थंकरोंको भी माननीय ऐसा संघ मेरे पुत्रको माँग रहा है, यह बडे हर्पकी बात है, फिर भी मुझे विषाद होता है । क्यों कि इसका पिता नितांत मिथ्या-दृष्टि (जैन धर्ममें अश्रद्धाल) है और वैसा हो कर भी वह इस समय गाँवमें नहीं है । उन व्यवहारियोंने कहा कि [ उसका कुछ विचार न कर इस पुत्रको ] तुम दे दो । उनके ऐसा कहने पर, माताने अपना दोप उतार देनेकी इच्छासे, दाक्षिण्यके वश हो कर अमात्र-गुणपात्र ऐसे अपने उस पुत्रको उन गुरुको दे दिया। तदनन्तर उस (माँ) ने जाना कि उन (आचार्य) का नाम दे व चंद्र सूरि हैं। गुरुने उस वालकसे पूछा कि- 'तुम शिष्य बनोगे? तो उसने 'हाँ' ऐसा कहा और वह लौटते हुए गुरुके साथ चल पड़ा। वहाँसे वे कर्णा व तो शहरमें आये। वहाँ पर उदयन मंत्रीके पुत्रोंके साथ वह वालक पालकों द्वारा पाला जाने लगा। इतनेमें बाहर गाँवसे आये हुए चाचि गने वह सारा वृत्तान्त सुना तो, जब तक पुत्रका मुँह न देखने मिले तब तक, अन्नका त्याग कर उन गुरुका नाम पूछता हुआ कर्णावती पहुँचा । आचार्यके वसतिस्थानमें जा कर उस कुपित पिताने कुछ थोडासा प्रणाम किया । गुरुने पुत्रके अनुहारेसे उसे पहचान लिया, और फिर विचक्षणताके साथ विविध प्रकारके सत्कारोंसे उसे आवर्जित कर, उदयन मंत्रीको वहाँ बुलाया । धर्मबन्धु कह कर वह उसे अपने भवनमें ले गया और बडे भाईकी तरह भक्तिपूर्वक उसे भोजन कराया। फिर चांगदे व नामक उस लडकेको उसकी गोदमें रख कर पञ्चाङ्ग पुरस्कारके साथ तीन दुकूल (बहुमूल्य वस्त्र ) और तीन लाख रोकड द्रव्य भक्ति के साथ भेंट किया। उस (उदयन ) से चा चि ग ने कहा- 'एक क्षत्रियके मूल्यमें १ हजार अस्सी, घोडेके मूल्यमें १७५०, और अत्यन्त मामूली भी बनियेके मूल्यमें ९९ हाथी, अर्थात् ९९ लाख होते हैं। तुम तो तीन लाख दे कर उदारताके बहाने कृपणता बता रहे हो । पर मेरा पुत्र तो अमूल्य है और उस पर तुम्हारी भक्ति अमूल्यतम है । सो इसके मूल्यमें वह भक्ति ही मुझे वस है । द्रव्यसंचय मेरे लिये शिवनिर्माल्यकी भाँति अस्पृश्य है।' चा चिग के इस प्रकार कहने पर अत्यन्त आनन्दित चित्तसे उत्कंठित हो कर उस मंत्रीने आलिंगन करके उसे धन्यवाद दिया, और फिर बोला कि-'अपने पुत्रको मुझे समर्पित करनेसे तो, यह बालक मदाड़ीके वानरकी नाई सब लोगोंको नमस्कार करता रहेगा और केवल अपमानका पात्र बनेगा। परंतु, गुरु महाराजको दे देने पर बालचंद्रमाकी भाँति त्रिलोकके नमस्कार योग्य होगा। अतः यथा-उचित विचार करके कहो।' ऐसा आदेश पा कर उसने कहा कि-' आपका जो विचार हो वहीं मुझे मान्य है।' ऐसा कहने पर उसको वह मंत्री गुरुके पास ले गया और उसने पुत्रको गुरुको समर्पित कर दिया। फिर तो चा चि ग ने स्वयं उसके प्रबजित होनेका उत्सव किया। बादमें [वह बालक ] अप्रतिम प्रतिभायुक्त होनेके कारण, अगस्त्यकी नाई समस्त वाड्मय रूप समुद्रको चुल्लूमें रख कर पी गया। समस्त विद्यास्थानोंका अभ्यास कर गुरुके दिये हुए 'हे म चंद्र' नामसे प्रसिद्ध हुआ। सकल सिद्धान्त और उपनिपत्का पारगामी और छत्तीस ही सूरिगुणोंसे अलंकृत समझ कर गुरुने उसे सूरि पद पर अभिषिक्त किया।' इस प्रकार उदयन मंत्री की कही हुई हे मा चार्य के जन्मादिकी यह प्रवृत्ति सुन कर राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। कुमारपालका सोमेश्वरके उद्धारकी समाप्तिके निमित्त नियम लेना । १४२) फिर श्री सोमनाथ देव के प्रासादके आरंभके लिये जब दृढ शिलाका आरोपण हो गया तो राजाने श्री हेमचंद्र गुरुको पंचकुलकी भेजी दुई वर्धापना ( वधाई ) को विज्ञप्ति दिखाते हुए कहा कि-'यह प्रासादारंभ किस प्रकार निर्वितरूपसे समाप्त हो [ सो उपाय बताइए] । राजाके कहने पर श्री गुरुने कुछ विचार कर कहा कि-' इस धर्मकार्यमें कोई विन न उत्पन्न हो उसके लिये दो-मेंसे एक काम करना होगा- , १०२] प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश या तो घजारोप हो तब तक शुद्ध भावसे ब्रह्मचर्य पालन करना या मद्य-मांसका नियम लेना (त्याग करना) ऐसा कहने पर, उनकी बात सुन कर मय-मांसके नियमकी अभिलाषा करते हुए, उसने शिवके ऊपर जल छोड़ कर उक्त शपथको ग्रहण किया । दो वर्षके बाद, जब कि, उस मंदिरमें कलश और ध्वजका आरोपण कार्य पूरा हुआ, उसन नियमसे मुक्त होने की अनुज्ञा पानेके लिये गुरुसे कहा। उन्होंने कहा कि-' अपने इस समुद्धृत कीर्तन (मन्दिर) के साथ यदि चंद्रचूड (शिव) के दर्शन करनेकी इच्छा हो तो यात्रा करनेके बाद ही नियम छोड़ना उचित होगा।' ऐसा कह कर मुनिवर हे म चंद्र वहांसे चले गये । उनके गुणोंसे नीलीके रंगकी भाँति. दृढरूपसे हृदयमें अनुरक हो कर वह राजा सभामें केवल उन्होंकी प्रशंसा करने लगा। * हेमचन्द्राचार्यका सोमेश्वरकी यात्रा निमित्त कुमारपालके साथ जाना। तब, निष्कारण वैरी ऐसा कोई परिजन उनके तेजःपुञ्जको न सह कर, इस मसलके अनुसार कि- १८६. उज्ज्वल गुणवालेको अभ्युदित होता देख कर क्षुद्र मनुष्य किसी तरह उसे नहीं सहन कर सकता । जैसे पतिंगा अपने शरीरको जला कर भी दीप्त दीपशिखाको बुझा देना चाहता है। पीठका मांस भक्षण करनेके दोषको अंगीकार करके (पीठ पीछे चुगली खा करके) भी उनका अपवाद करने लगा कि- ' यह बड़ा चालाक, हां जी हा करने वाला और सेवाधर्म कुशल है, जो केवल महारानकी मरजीकी ही बात कहता रहता है। यदि ऐसा नहीं है, तो प्रातःकाल आप सोमेश्वर की यात्रामें साथ चलनेको उससे कहें। आपके ऐसा कहने पर वह परधर्मके तीर्थका परिहार करके किसी कारण यहाँ नहीं आवेगा। और हम लोगोंका मत ही प्रमाणभूत मालूम देगा।' राजाने उसकी बातका स्वीकार करके प्रातःकाल जब, श्री हेम चंद्राचार्य आये तो, सो मे श्वर की यात्रामें साथ चलनेके लिये उनसे अभ्यर्थना की। इस पर श्री सूरि बोले कि 'बुभुक्षित (भूखे) के लिये निमंत्रणकी क्या जरूरत है] और उत्कंठित के लिये केकारवके श्रवणके कहनेकी क्या आवश्यकता है- इस कहावतके अनुसार उन तपस्वियोंके लिये, जिनका तीर्थयात्रा करना तो एक अधिकारसा धर्म है, उन्हें गजाके आमहका क्या प्रयोजन !' इस तरह जब गुरुने अंगीकार किया, तो राजाने कहा कि- • आपके लिये पाठकी आदि क्या सवारी दी जाय:' गुरुने कहा कि- 'हम लोग पावोंसे चल कर ही पुण्य प्राप्त करते हैं । फिन्तु हम थोडे थोडे चल कर श्री शश्रृंज य, उजयंत (गिरनार ) आदि तीयोंको नमस्कार करते हुए आपसे [सोमनाथ) पत्तन में प्रवेश करनेके समय आ मिलेंगे।' ऐसा कह कर उन्होंने पैसा ही किया। राजा अपनी सारी राज्यऋद्धिके साथ प्रस्थान कर कुछ पहायोंके बाद पत्तन को पहुँचा। वहाँ श्री हेम चन्द्र मुनीन्द्र भी आ मिले जिससे यह अत्यन्त प्रसन्न हुआ । गण्ड० श्री वृहस्पति ने सम्मुख आ कर अगवानी की और महोत्सबके साथ उनको नगरमें प्रवेश कराया। श्री सोम नाय के प्रासादकी सीदियों पर चढ़ कर, जमीन पर टेट कर उसे प्रणाम करनेके बाद, चिरकालसे दर्शनकी उत्कट आकांक्षाकै कारण सोमेश्वर के लिंगका गाद आलिंगन किया। हेमाचार्यका शिवकी पूजा-स्तुति करना । जैनधर्मसे टेप रराने याटोंके मुंहसे यह कथन सुन कर कि 'ये जिन देवके अतिरिक अन्य देवताओंको नमस्कार नही करते' धात चित्त बाले रानाने हेमचन्द्रसे यह बात कही कि-'यदि योग्य मादम दे तो इन मनोहर उपरोसे आप श्री सोमेशर देयकी पूजा करें।' अछी बात है' ऐसा फद करके उन्होंने शीम राजा कोरासे आये कमनीय अरंकारोंसे अलंकृत होकर, पजामी आज्ञासे श्री वृहस्पति द्वारा हाथका सहारा . - प्रकरण १४२ ] कुमारपालादि प्रवन्ध [१०३ पा कर [ मूल ] प्रासादकी चौकट पर चढ़ गये। मनमें कुछ सोच कर प्रकाशमें बोले कि-' इस प्रासादमें साक्षात् कैलासवासी महादेव रहते हैं, इस लिये रोमांचकंटकित शरीरको धारण करते हुए, उपहारको दूना कर दिया जाय!' ऐसा आदेश करके शिवपुराण में कहे हुए दीक्षा-विधिके अनुसार आव्हान - अवगुंठन - मुद्रा - मंत्रन्यास- विसर्जन आदि स्वरूप, पंचोपचार विधिसे शिवकी पूजा की । अन्तमें इस प्रकार स्तुति की- १८७. जिस किसी धर्ममतमें, जिस किसी नामसे, तुम जो कोई भी हो, लेकिन दोष और कलुपतासे रहित ऐसे तुम एक ही भगवान् हो और इस लिये हे भगवन् ! तुम्हें नमस्कार है। १८८. पुनर्जन्मके अंकुरको पैदा करनेवाले राग आदि जिसके नष्ट हो गये हैं वह ब्रह्मा हो, विष्णु हो या शिव हो- उसे हमारा नमस्कार है। इत्यादि स्तुतियाँ करते हुए, सब राजपुरुपोंके साथ विस्मययुक्त हो कर राजाके देखते रहने पर, हे मा चार्य दण्डवत् प्रणाम करके स्थित हुए। फिर वृहस्पति की वतलाई हुई पूजाविधिके अनुसार सामिलाप भावसे राजाने शिवका पूजन किया । इसके अनन्तर धर्मशिलामें बैठ कर तुलापुरुषदान, गनदान आदि महादान दे करके कर्पूरकी आरती उतारी। कुमारपालकी तत्त्वजिज्ञासा और हेमाचार्यका शिवको प्रत्यक्ष करना । फिर सभी राजपुरुपोंको हटा कर, शिवके गर्भगृहके अन्दर प्रवेश करके राजा बोला कि-'न महादेवके समान देव है, न मेरे समान राजा है ओर न आपके समान महर्षि । भाग्यवश इन तीनोंका सहज संयोग हुआ है। इस लिये, नाना दर्शनोंके भिन्न भिन्न प्रमाणोंके कारण जिस देवतत्त्वके वारेमें चित्त संदिग्ध हो रहा है, उस मुक्तिदायक सच्चे देवका वास्तविक स्वरूप, इस तीर्थभूमिमें आप सत्य सत्य रूपसे मुझे वताइये । यह सुन कर श्री हे म चंद्र ने बुद्धिसे कुछ सोच कर राजासे कहा-'इन दर्शनोंके पुराने कथनोंको छोड दीजिए । मैं श्री सोमेश्वर देवको ही आपके प्रत्यक्ष कर देता हूँ। उन्हींके मुखसे मुक्तिमार्ग क्या है सो जान लीजिये । ' यह याक्य सुन कर बोला--' क्या यह भी संभव है ?' इस तरह राजाके विस्मित होने पर [ सूरिने कहा ]- 'निश्चय ही यहाँ पर तिरोहित भावसे दैवत वर्तमान है । और हम दोनों गुरुके कथनके अनुसार इनके निश्चल आराधक हैं । तो फिर इस प्रकार, इस द्वन्द्वके सिद्ध होनेके कारण देवताका प्रादुर्भाव होना सरल है । मैं प्रणिधान (ध्यान ) करता हूँ और आप कृष्ण अगुरुका उत्क्षेप (धूप) करें । और वह उत्क्षेप तव बन्द करियेगा, जव प्रत्यक्ष शिव आ कर निषेध करें।' इसके बाद दोनोंके इस प्रकार करने पर जब गर्भगृह धुंएसे भर कर अन्धकारमय हो गया और नक्षत्रमालाके समान उज्ज्वल प्रदीत दीपक जब बुझ गये, तो फिर अकस्मात् , जैसे मानों बारहों सूर्यका तेज फैल रहा हो ऐसा प्रकाश दिखाई देने लगा। उसे देख कर संभ्रमवश राजा अपनी आँखें मलता हुआ देखने लगा तो, जलाधारके ऊपर श्रेष्ठ जंवूनद (सुवर्ण) के समान द्युतिवाले, चक्षुसे दुरालोक्य, अपरूप असंभव स्वरूपवाले एक तपस्वी दिखाई दिये । उसको पैरफे अँगूठेसे ले कर जटाजूट तक स्पर्श करके देवताका अवतार निश्चित किया और पंचाङ्गसे पृथ्वीतल पर लुठित हो कर प्रणाम करके भकिसे राजाने विज्ञप्ति की कि-'जगदीश ! आपका दर्शन करके आँखें कृतार्थ हुई, अब आदेशका प्रसाद कर कर्णयुगलको कृतार्थ करो। 'ऐसा कह कर राजाके चुप हो जाने पर, मोहरात्रिके लिये सूर्य स्वरूप उनके मुखसे, यह दिव्य वाणी प्रकट हुई- 'राजन् ! यह महर्षि सब देवताके अवतार हैं । पूर्ण परब्रह्मके अवलोकनसे, करतलमें रहे दुए मुक्ताफलकी तरह इन्हें त्रिकालका स्वरूप विज्ञात हैं । इस लिये इनका बताया हुआ मुकिमार्ग ही असंदिग्ध मुक्तिमार्ग है।' ऐसा कह कर शिव जब अन्तर्धान हो गये तो, प्राणायाम पवनका रेचन कर और आसन बंधको शिथिल करके ज्यों ही श्री हेम चंद्र ने 'राजन् ।' यह शन्द कहा, तो तत्काल इष्ट - १०४ प्रयन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश देवताके संकेतसे राज्याभिमानको छोड़ कर उसने कहा-'जीर! पधारिये !' इस प्रकार विनयसे सिर वाता हुआ हाथ जोड़ कर बोला कि 'जो आज्ञा हो सो कहिये ।' इसके बाद वहीं पर उसे यावजीवन मद्य-मासके त्यागका नियम दिया और वहाँसे टोट कर ये दोनों क्षमापति (मुनि तो क्षमा क्षान्तिके पति, राजा क्षमा पृथ्वीके पति) अहिलपुर आये। कुमारपालका परमार्हत श्रावक बनना । १४३) श्री जिनमुखसे निःसृत पवित्र वचनोंके श्रवण द्वारा प्रतिबुद्ध हो कर राजाने ‘परमाई त' विरुदको धारण किया । उमसे अभ्यर्थित हो कर प्रभु (हेमचंद्र)ने 'त्रिपटिश टा का पुरूप चरित' तथा वीस 'बीत राग-स्तुति यौँ' से युक्त पवित्र । गशास्त्र' की रचना की। उनका आदेश पा कर अपने आज्ञानुवर्ती अटारह देशोंमें, चौदह वर्ष तक, सर्व प्रकारकी जीव-हत्याका निवारण किया। [१२३] सतत आकाशमें विचरण करने वाले सप्तर्षिगण एक मृगीको भी व्याधोंके पाशसे मुक्त नहीं कर सके। परन्तु प्रमु श्री हेम सूरि अकेटने ही चिरकाल तक पृथ्वी पर जीपवध होनेका निषेध कर दिया। [१२४ ] [ आकारा स्थित ] कलाकलाप पूर्ण ऐसे चन्द्रमासे [ पृथ्वी स्थित ] हे म चन्द्र सूरि अधिक उग्यटकीति है । क्यों कि, चन्द्रमाने तो केरल एक ही मृगका [अपनी गोदमें ले कर ] रक्षण किया है जब हे म चन्द्र ने तो सब ही मृगोका ( सारे पशुगणका) रक्षण किया है। राजाने उन उन देशोंमें १४४० नये मिहार (जैन मन्दिर ) वनवाये । सम्यक्र मूलक १२ व्रतोंको अंगीकार किया। अदत्तादान -पिरमण - स्वरूप तीसरे व्रतको व्याख्या सुन कर रुदती ( रोती हुई विधवा नारियों के ) धनका प्रहण पापोंका कारण है ऐसा समझ कर, उस कामके अधिकारी पंचकुला (कर्मचारी गण) को बुला कर उसके आयपदको, जिसका [ वार्षिक ] प्रमाण ७२ लाख था, फाड़ कर, उस करको बन्द कर दिया । उस करके छोड़ देने पर विद्वानोंने इस प्रकार स्तुति की- १८९. जिस रुदतीपिचको, कृतयुगमें पैदा होने वाले रघु-नहुप-नाभाग-भरत आदि जैसे राजा लोग भी छोड़ नहीं सके, उसे करणाश हो कर मुक्त करने वाले कुमार पाल ! तुम महापुरुषों के मुउट-मणि हो। प्रभु हे मसूरिने भी इस तरह राजाका अनुमोदन किया कि- १९०. अपुर पुरुषोंका धन प्रहण करके अन्य रामा तो पुत्र होता है। किन्तु सन्तोषपूर्वक उसका त्याग करने वाले तुम तो सचमुच राज-पितामह हो । । मंत्री उदयनका सौराष्ट्रके युद्ध में मारा जाना । १४५) किर, सुरा देश के सउंसर [ टापुर ] से युद्ध करने के यि उदयन मंत्री को दलका नायक बना कर सारी सेना के साथ भेजा गया । यह वईमान पुर (आधुनिक यट वान) में पहुँच कर [नदीमहीने रहे दुर शगुंजय पहार पर ] श्री गुगादिदेवको नमस्कार करने की इच्छासे, समस्त मंडले- मरों को आगे धरनेकी बम्पर्थना कर, सुर विमल गिरि (सगुंजय) आया। रिशुद्ध श्रद्धा के साथ देव- परनों की पूजा करके भयो हो कि त्यांदना करने उगा, स्यों को एक एक (हा) नक्षत्रमालासी प्रदीत दीमाटाने एक दौरसर्तिका (विकी जलती हुई बाट) को ले कर फाटके बने उस प्रासादफे किसी विश करने या सोदेके अंगरक्षांने उसे छुरापा। इसे देख कर उस मंग्रीका समाधिभंग हो गया प्रकरण १४३-१४५ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१०५ और इस प्रकार उस काष्ठमय देवप्रासादका कभी विध्वंस होना सोच कर उसने उस मंदिरका जीर्णोद्धार करवाना चाहा । इस इच्छासे देवके सामने ही एकभक्त (एकाशन करने ) आदिके नियम ग्रहण किये । फिर वहाँसे प्रयाण करके अपने पड़ाव पर आया । उस प्रत्यर्थी (शत्रु) के साथ युद्ध शुरू होने पर शत्रुद्वारा राजाकी सेनाका पराजित होना देख कर उदयन स्वयं युद्ध के लिये उठा । वह प्रहारोंसे जर्जरशरीर हो गया तो फिर निवासमें ले आया गया । [ जीवनान्त समीप जान कर वह ] सकरुण स्वरसे रोने लगा। स्वजनोंने इसका कारण पूछा, तो उसने कहा कि, मृत्यु निकट आ गया है और शत्रुञ्ज य और शकुनि का विहार के जीर्णो- द्धारकी इच्छाका देवऋण पीठ पर लगा रह गया | इस पर उन्होंने कहा-'आपके वाग्भट और आम्र भट नामक दोनों पुत्र अभिग्रह ले कर तीर्थोद्धार करेंगे । हम लोग इसके लिये प्रतिभू ( जामीन ) बनते हैं।' उनके इस प्रकार अंगीकार करनेसे अपनेको धन्य समझता हुआ वह मंत्री अन्त्याराधनाके लिये किसी चारित्र- धारीको खोजने लगा । वहाँ पर कोई चारित्री न मिलनेसे किसी एक नौकरको साधुवेपमें ले आ कर उसको निवेदित करने पर, मंत्री उसके चरणोंको ललाटसे स्पर्श करता हुआ, उसीके सामने दस प्रकारकी आराधना करके यह श्रीमान् उद य न परलोक प्राप्त हुआ। पीछेसे, चंदन वृक्षके परिमलसे वासित क्षुद्र वृक्षकी नाई उस वंठ ( नौकर )ने अनशन व्रत ले कर रैवतक पर्वत पर अपने जीवनका अन्त कर दिया। मंत्री बाहडका शत्रुञ्जयतीर्थोद्धार कराना । १४५) तत्पश्चात्, अण हि ल्ल पुर पहुँच कर उन स्वजनोंने यह बात वाग्भट और आम्र भट को सुनाई । उन्होंने वैसा ही नियम ग्रहण करके जीर्णोद्धारका कार्य आरंभ किया। दो वर्षमें श्री शत्रुज य का वह प्रासाद बन कर तैयार हुआ और उसकी खबर देनेके लिये आये हुए मनुष्यके वधाई देने बाद ही दूसरा मनुष्य आया जिसने कहा कि 'प्रासाद तो फट गया है ! ' तपे हुए सीसेके जैसी उसकी वाणीको कानोंमें सुन कर श्री कुमार पाल भूपालसे आज्ञा ले कर मंत्री स्वयं वहां जानेको उद्यत हुआ । श्रीकरणकी जो अपनी मुद्रा (मंत्रीके पदकी मुहर) थी वह महं क पदी को समर्पित की और स्वयं ४ सहस्र घोड़े ले कर शत्रुज य की उप- त्यकामें पहुँचा । वहाँ अपने नामसे बाह ड पुर नामका नया नगर वसाया । शिल्पियोंने प्रासादके फट जानेका कारण बताते हुए कहा कि सभ्रम प्रासादमें पवन घुस कर निकलता नहीं, इस लिये मन्दिर फट जाता है; और जो प्रासाद भ्रमहीन बनाया जाय तो बनाने वाला नियंश हो जाता है [ ऐसा शास्त्रका विधान है ] | मंत्रीने यह सुन कर ऐसा विचार किया कि निवेश होना अच्छा है। इससे धर्म कार्य ही हमारा वंश होगा और पूर्व कालमें जीर्णोद्धार कराने वाले भरत आदिको पंक्तिमें हमारा भी नाम उल्लिखित होगा। इस प्रकार अपनी दीर्धदर्शिनी बुद्धिसे सोच कर उस मंत्रीने भ्रम और दीवालके बीच में पत्थर भरवा दिये और प्रासादको निर्धम बनवाया। तीन वर्षमें प्रासाद पूरा हुआ। उसके कलश दण्ड आदिकी प्रतिष्ठाके समय पतन के संघको निमंत्रित किया और महामहोत्सवके साथ सं० १२११ में मंत्रीने ध्वजारोपण कराया। पाषाणमय बिंब (मूर्ति) का परिकर मम्मा णी की खानमेंके किंमती पत्थरका बनवा कर स्थापित किया। श्री वाह डपुर में राजाके पिताके नामसे श्री त्रिभुवनपाल विहार बनवा कर उसमें पार्श्वनाथकी स्थापना कराई । तीर्थपूजाके लिये नगरके चारों ओर २४ बागीचे बनवाये, नगरका पक्का कोट बनवाया और देवके पूजारियोंके ग्रास और वास आदिकी व्यवस्था कर, वह सब कार्य पूरा किया । इस तीर्थोद्धारके व्ययमें [ यह बात प्रसिद्ध है कि ]- १९१. जिसके, मंदिर बनानेमें १ करोड ६० लाख व्यय हुआ है, विद्वान् लोग उस श्री वाग्भटदेव की [ पूरी ] वर्णना कैसे करें। इस प्रकार शत्रुञ्जयके उद्धारका यह प्रबंध समाप्त हुआ। २७-२८ १०६ ] प्रयन्धचिन्तामणि [चतुर्थ प्रकाश मंत्री आम्रभटका शकुनिका विहारका उद्धार करवाना ! १४६) इसके बाद, समस्त विश्वके एक अद्वितीय ऐसे सुभट आम्र भटने पिताके कल्याणार्थ भृगुपुर (भरूच ) में शकुनि का विहार प्रासादके उद्धारका कार्य प्रारंभ किया | उसके लिये गहरी नींव खोदते समय, नर्मदा नदी के निकट होनेके कारण अकस्मात् वह नीव धंस पड़ी और काम करने वाले मजदूर उसमें दव गये । उसने यह देख, कृपा-परवश हो कर, अपनी अत्यन्त निन्दा करते हुए, उसीमें अपने आपको भी गिरा दिया। इस अनुपम साहसके प्रभावसे वह विन शान्त हो गया (सब लोक बच गये)। इसके बाद, शिलान्यासपूर्वक सारा प्रासाद तीन वर्षमें पूरा हुआ। कलश-दण्डकी प्रतिष्ठाका अवसर आने पर समस्त नगरोंके संघोंको निमंत्रण दे कर बुलाया गया और उन सबको यथोचित वस्त्र और आभरण आदि दे कर सत्कृत किया गया और फिर सबको यथास्थान वापस पहुँचाया गया। टन समयके निकट आने पर भट्टारक श्री हेम- चंद्रसूरि के नेतृत्वमें राजाके साथ अण हि लपुर के संघको निमंत्रित कर उसे अतुलित वात्सल्यादि तथा भूषण आदि दानों द्वारा सन्तुष्ट करके, ध्वजाधिरोपणके लिये घरसे चला । इस समय अपने सारे घरको मानों याचक- जनोंसे लुटवा दिया। श्री सुव्रतदेवके प्रासादमें महाध्वजके साथ वजारोपण करके, अत्यधिक हपके कारण, वह अनालस्य भावसे नाच करता रहा । अन्तमें राजाकी अभ्यर्थना पर, उसने आरती उतारी । अपना घोड़ा द्वारपालको दान कर दिया । राजाने स्वयं उसको तिलक किया । बहत्तर सामन्त चामर और पुष्प वर्षा आदिसे उत्साह बढ़ा रहे थे । उस समय आये हुए बंदीको अपना कंकण दे दिया । अन्तमें राजाने हाथ पकड़ कर जबर्दस्ती उसे बैठाया और आरती और मंगल प्रदीप उतरवाये । श्री मुक्तदेवके तथा गुरूके चरणमें प्रणाम करके, वन्धुओंको बन्दना आदि करके, राजासे शीव आरती उतरवानेका कारण पूछा। राजाने कहा-'कि जैसे जुआडि अत्यधिक धूत-रसके आवेशमें अपने सिरको भी दाँव पर रख देता है, वैसे ही तुम भी इसके बाद कहीं अर्थियों के माँगनेसे त्यागके आवेशमें आ कर अपना सिर भी उन्हें न दे डालो। राजाके इस प्रकार कह चुकने पर, उसके लोकोत्तर चरित्रसे हृत-हृदय हो कर श्री हे मा चार्य ने भी, जिन्होंने जन्मकालसे ही किसी मनुष्यकी स्तुति नहीं की थी, कहा- १९२. उस कृतयुगसे [हमें ] क्या [ मतलब ] है जिसमें तुम नहीं थे। और जिसमें तुम [ विद्यमान ] हो वह कलि कैसा । और यदि कलिहीमें तुमारा जन्म होता है तो वह कलि ही सदा रहो- कृतसे क्या मतलब है। इस प्रकार आत्रभट की अनुमोदना करके दोनों क्षमापति, जैसे आये थे वैसे ही वापस गये। आम्रभटका शाकिनीग्रस्त होना। १४७) इसके बाद, जब हेम चंद्र अपने स्थान पर पहुँचे तो उन्हें यह विज्ञप्ति मिली कि आकस्मिक रीतिसे देवी (शाकिनी) के दोपसे ग्रस्त हो कर आनभट की अन्तिम दशा उपस्थित हो गई है और आपको शीम धुलाया गया है। उन्होंने तत्काल ही समझ लिया कि वह महामना जब प्रासादके शिखर पर नृत्य कर रहा था उसी समय मिथ्याष्टि देवियोंका कुछ दोष उसे हुआ है।' यह सोच कर, सायंकाल ही को तपोधन यश चन्द्र को साथ ले, आकाशगामिनी शकिसे उड़ कर निमेषमात्रमें, भृगुपुर की प्रान्तभूमिको अलंकृत किया और सैन्ध वा दे वी का अनुनय करनेके लिये कायोत्सर्ग किया । उस देवीने जीभ निकाल कर उनका अपमान किया । तर उखलमें शालि-चावल डाल कर यशश्चन्द्र गणि ने मालसे प्रहार करना शुरू किया । पहली बारके प्रहारमें प्रासाद काँपने लगा, दूसरी बार प्रहार ट्रेने पर वह देवी ही अपने स्थानसे उखड़ कर-'इस वज- "- प्रकरण १४६-१४९] कुमारपालादि प्रयन्ध [१०७ पाणिके वज्रप्रहारसे बचाओ-बचाओ' कहती हुई प्रभुके चरणों पर आ कर गिर गई.। इस तरह अपनी अनिन्द्य विद्याके बल पर उस दोषके मूलभूत मिथ्याष्टिवाले व्यन्तरों, ( भूत पिशाचों) का निग्रह करके श्री सुव्रतदेवके प्रासादमें आये। वहाँ पर- १९३. संसाररूप समुद्रके लिये सेतु, कल्याण-पथकी यात्राके लिये दीप-शिखा, विश्वके आधारके लिये आलंबन यष्टि, परमतके व्यामोहके लिये केतुका उदय, अथवा हमारे मनरूपी हाथियोंके बन्धनके लिये दृढ़ आलान रूप लीलाको धारण करने वाले ऐसे श्री सुव्रतस्वामीके चरणोंकी नख-रश्मियाँ [सबकी] रक्षा करें। इस प्रकारकी स्तुतियोंसे श्री मुनिसुव्रतकी उपासना करके, श्री आम्र भट को उल्लाघ स्नानसे सुस्थ करके, जैसे गये थे वैसे ही अपने स्थान पर ] लौट आये । श्री उदय न चैत्य शकुनि का विहार के घटी गृहमें राजाने कौङ्कण नृपति के [छीने हुए ] तीन कलश तीन जगह स्थापित किये। इस प्रकार यह राज-पितामह श्री आम्रभटका प्रबंध समाप्त हुआ। , * कुमारपालका विद्याध्ययन करना। १४८) इसके बाद, एक दूसरी वार, कपर्दी मंत्री का अनुमत कोई विद्वान् , राजा कुमार पाल के भोजन कर लेनेके बाद का मन्द की य नीति शास्त्र के इस श्लोकको पढ़ रहा था- १९४. राजा मेघकी नाई समस्त भूत-मात्रका आधार है । मेघके विकल होने पर भी जीवन धारण किया जा सकता है पर राजाके विकल होने पर नहीं। तब, इस वाक्यको सुन कर राजाने कहा कि-' अहो राजाको मेघकी । ऊपम्या!' इस पर सभी सामाजिक लोक राजाका न्युछन करने लगे । पर उस समय कपर्दी मंत्री ने अपना सिर नीचा कर लिया। यह देख कर राजाने एकान्तमें उससे [ कारण ] पूछा। उसने कहा -' महाराजने जो । ऊपम्या' शब्दका उच्चारण किया वह सब व्याकरणोंकी दृष्टिसे अपशब्द (अशुद्ध) है; और इस पर भी इन खुशामती अनुवर्तियोंने न्युछन किया। उनके ऐसा करने पर मेरा तो दोनों प्रकार सिर नीचा करना ही समुचित है । शत्रु राजाओंमें इस प्रकारकी अपकीर्ति फैलती है कि 'अराजक जगत्का होना अच्छा है किन्तु मूर्ख राजाका होना अच्छा नहीं ।' जिस अर्थमें आपने यह शब्द कहा है उस अर्थमें उपमान, उपमेय, औपम्य, उपमा इत्यादि शब्द कहे जाते हैं । उसकी इस बातको [ आदरके साथ ] हृदयमें ग्रहण करके, अनन्तर, ५० वर्षकी उम्रमें, उस राजाने शब्द व्युत्पत्तिका ज्ञान करनेके लिये किसी उपाध्यायके निकट मात्रिका- पाठसे आरंभ कर (अआसे लेकर ) शास्त्र पढ़ना आरंभ किया और एक वर्षके भीतर [ व्याकरणकी ] तीनों वृत्ति और तीनों काव्य पद डाले । और फिर पण्डितोंसे 'विचार-चतुर्मुख' यह विरुद प्राप्त किया । इस प्रकार विचारचतुर्मुख कुमारपालके अध्ययनका प्रबंध समाप्त हुआ। यनारसके विश्वेश्वर कविका पत्तनमें आना। १४९) किसी अवसर पर, विश्वेश्वर नामक कवि वाराणसी से पचन में आ कर प्रभु श्री हेमस् रिकी सभामें पहुँचा । वहाँ कुमारपाल राजाको विद्यमान देख कर उसने- १०८ प्रवन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश १९५. कंबल और दंड वाला यह हेम तुम्हारी रक्षा करें। इस प्रकार कह कर वह ठहर गया। राजाने उसे क्रोधकी दृष्टि से देखा । तब फिर- जो पड्दर्शन रूप पशुओंको जैन-गोचर (चरागाह ) में चरा रहे हैं। यह उत्तराई पढ़ा जिसे सुन कर सारी सभा प्रसन्न हुई। फिर कविने रामचन्द्रादि [ कवियों ] को समस्यायें पूर्ण करनेको दी । 'व्यापिद्धा नयने०' इस चरणवाली एक समस्याकी पूर्ति महामात्य कपदीने इस प्रकार की १९६. 'इसकी ये सरल ( बड़ी बड़ी ) आखें दोनों हथेलियोंसे ढाकी नहीं जा सकती, और अपने मुखरूपी चन्द्रमाकी चांदनीके प्रकाशसे यह सब कहीं दिखाई दिया करती है- इस लिये आँख मिचौनीके खेल में अपनी चारों ओर रही हुई सखियोंके बीचमें बैठी हुई वह बाला [ खेलनेसे ] रोक दी गई है और इस लिये वह अपने मुख और आँखोंको रो रही है।' {इस समस्यापूर्तिकी प्रतिभासे प्रसन्न हो कर ] उस कविने पचास हजारकी कीमतका अपने गलेका हार निकाल कर कपदी के कण्ठमें यह कहते हुए डाल दिया कि 'यह तो श्रीभारतीका पद ( स्थान ) है ।' उसकी सहृदयतास चमत्कृत हो कर राजा उसे अपने पास रखने लगा, तो वह यह कह कर, राजा द्वारा सत्कृत हो कर, यथास्थान चला गया कि- १९७. कर्णकी कथा तो अब शेप मात्र रह गई है । काशी न गरी मनुष्यों की कमीके कारण क्षीणप्राय हो गई है। पूर्व (या उत्तर ) दिशामें हम्मीर (म्लेच्छ ) के घोडे सहर्ष हिनहिना रहे हैं । इससे यह मेरा हृदय तो अब, सरस्वतीके आलिंगनमें प्रवृत्त क्षारसमुद्र के साथ स्नेहवाले प्रभास क्षेत्र के लिये उत्कण्ठित हो रहा है। * हेमचन्द्रसूरिका समस्या पूरण करना। १५०) किसी समय कुमार विहार देवमन्दिरमें राजा द्वारा आमंत्रित हो कर प्रभु श्री हे म चंद्र, कपदी मंत्री द्वारा हाथका सहारा पा कर, जब सोपान पर चढ़ रहे थे [ यहा पर नृत्योधत ] नर्तकीफे कञ्चककी कसनीको तनती हुई देख कर कपदीने यह कहा- १९८. हे सखि तेरा यह कञ्चक सौभाग्यशाली है इस लिये इसका यह तनना युक ही है। यह कह कर उसे जब आगे बोलने में विलंब करते देखा तो प्रभुने उत्तरार्ध इस प्रकार कह दिया-- जिसके गुणका प्रहण पीठपीछे तरुणीजन करता है। * आचार्य और मंत्रीके वीचमें 'हरडइ'का वाग्विलास । १५१) एक बार, सबेरे कपर्दी मंत्री ने श्री सूरिको प्रणाम करनेके बाद [ उसके हाथमें कोई चीज देख कर उन्होंने पूछा- यह क्या चीज है !' उसने प्राकृत (देशी) भाषामें कहा--'हरडइ'- अर्थात् 'हरे'। प्रमुने कहा- क्या अब भी!'। तर वह अपनी अनाहत प्रतिभा (प्रखर बुद्धि) के कारण उनके व- चन (व्यंग्य) को समझ कर बोला-'अब तो नहीं'। क्यों कि अन्तिम होने पर भी वह आदिम हो गया और एक मात्रा अधिक भी हो गया । हाच पूर्ण आँखोंसे प्रभुने राम चंद्र आदिके सामने उसकी चतुराईको प्रशंसा की। उन्होंने (रामचन्दादिने) तप न समझ कर पूछा कि 'बात क्या है!' प्रभुने कहा कि हरडइ' इसमें सन्दष्ट से यह अर्थ रप करके निकाला गया कि 'हराइ' अर्थात् हकार रोता (गुजराती रडता) प्रकरण १५०-१५४ ] कुमारपालोदि प्रवन्ध [१०९ है । हमने इस पर कहा कि 'क्या अब भी !' यह कहते ही शब्दतत्वको जानने वाले इसने कहा कि 'अव तो नहीं। क्यों कि पहले मातृका-शास्त्र ( वर्णमाला ) में हकार सबके अंतमें पढ़ा जाता था, अतएव वह रडता रोता था; किन्तु अब तो मेरे नाम ( हे म चंद्र) में वह पहले आ गया है और एक मात्रा अधिक भी हो गया है। इस प्रकार यह हरडइ प्रबंध समाप्त हुआ। उर्वशी शब्दकी व्युत्पत्ति । १५२) एक बार, किसी पंडितने पूछा कि 'उर्वशी' शब्दका शकार तालव्य है या दन्य । इस पर प्रभु (हे म चंद्र) कुछ सोच कर कहने जा रहे थे कि कपर्दी ने पत्र पर यह लिख कर उनके अंकमें फेंक दिया कि उरौ शेते उर्चशी' अर्थात् जो उरुमें शयन करे वह उर्वशी । इसीको प्रामाण्य समझ कर प्रभुने उस पंडितके आगे तालव्य शकार होनेका निर्णय कह सुनाया। इस प्रकार यह उर्वशी-शब्द-प्रबंध समाप्त हुआ। . . सपादलक्षके राजाके नामका अर्थखण्डन । १५३) अन्य किसी समय, सपाद लक्ष के राजाका कोई सान्धिविग्रहिक कुमार पाल राजाकी सभामें आया । राजाने पूछा कि 'आपके स्वामी कुशल तो हैं ?' अपनेको महापंडित समझने वाला वह मिथ्याभिमानी बोला-'विश्वको जो ले ले वह 'विश्वल' कहलाता है (- यह सपादलक्ष के राजाका नाम था)। इस लिए उसकी विजयमें क्या सन्देह है ?' राजाका इशारा पा कर श्रीमान् क प दी मंत्री ने कहा कि- 'वल वल धातु तो शीघ्र गत्यर्थक है । इसी श्वल धातुसे यह शब्द बना है, अतः इसका अर्थ तो यह हुआ कि-वि अर्थात् पक्षीकी भाँति जो श्वलन करता है - भाग जाता है वह · विश्वल ' है।' इसके बाद, उस प्रधानके द्वारा इस नाममें दोष समझ कर उस राजाने पंडितोंके पास निर्णय कराके — विग्रह राज' ऐसा दूसरा नाम धारण किया। दूसरे वर्ष उसी प्रधानने कु मार पाल नृपतिके सामने 'विग्रह राज' यह नाम बताया। मंत्री क पीने [ यह अर्थ किया]-विनविगतनासिक-नासिकाहीन; ह-राज अर्थात् रुद्र और नारायण । रुद्र और नारायणको जिसने नासिका हीन किया है यह इस 'विग्रहराज' का अर्थ है। तदनन्तर कपर्दी के नामखण्डनके भयसे उस राजाने ' कवि-वान्धव' ऐसा नाम धारण किया। - १५४) एक दूसरी बार, कुमार पाल जा के आगे योग शास्त्र का व्याख्यान हो रहा था उसमें जब पञ्चदश कर्मादानका पाठ पढा जाने लगा तव "दन्तकेशनखास्थित्वग्रोम्णां ग्रहणमाकरे " प्रभुके रचे हुए इस मूल पाठमें पंडित उदय चन्द्र बार बार ' रोम्णां ग्रहणम् रोभ्णा ग्रहणम् ' यह पाठ बोलने लगा। तो प्रभुने पूछा कि- 'क्या लिपि-भेद (अशुद्ध पाठ) हो गया है ? ' । उसने कहा-'पाणितुर्याङ्गाणाम् ' इस व्याकरण सूत्रसे तो एकत्व सिद्ध होता है, [सो यहाँ पर वैसा होना चाहिए]' ऐसे लक्षणविशेषको वता कर, प्रभु द्वारा प्रशंसित हुआ और राजाने न्युछन करके उसकी संभवाना की। इस प्रकार पं० उदयचंद्रका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * . ११०] प्रबन्धविन्तामाणि [ चतुर्थ प्रकाश कुमारपालका अभक्ष्यभक्षणक निमित्त प्रायश्चित्त करना। १५५) इसके बाद, वह राजर्षि एक समय घेवरका भक्षण कर रहा था। उस समय कुछ विचार मनमें आ गया जिससे उसने वह सारा आहार छोड़-छाड़ कर, पवित्र हो कर, प्रभुसे जा कर पूछा कि-'हमें धेवरका भक्षण करना चाहिये या नहीं ?' इस पर प्रभुने कहा-'वणिक् और ब्राह्मणको तो इसका भक्षण उचित है किन्तु जिस क्षत्रियने अभक्ष्यमक्षणका नियम किया है उसे नहीं करना चाहिए; क्यों कि उससे मांसाहारका स्मरण हो आता है।' राजाने कहा ' यह बिल्कुल ठीक है ' और फिर पूर्व भक्षित अभक्ष्यका प्रायश्चित्त पूछा । [ आचार्यने कहा- 1 ३२ दाँतोंके निमित्त ३२ जैन मंदिर एक पीठस्थान पर बनवा देने चाहिए । राजाने वैसा ही किया। प्रभुके दिये हुए प्रतिष्टालग्नमें प्रासादके मूल नायककी प्रतिष्टा करानेके लिये, व टपद्र क से कान्हू नामक व्यवहारी पत्तन में आया । उसने उस नगरके मुख्य प्रासादमें अपने विबको रख दिया और उपहारादि ले कर बाहरसे जब वापस आया तो राजाके आरक्षकोंने द्वार पर उसे रोक दिया। कुछ समय बाद जब द्वारपाल उठ गये और प्रतिष्ठोत्सव भी समाप्त हो गया, तो वह भीतर प्रवेश करके प्रभु (हेमचन्द्र ) के चरण-मूलमें लग कर, उपालंभ पूर्वक, खूब रोने लगा। और किसी तरह उसके दुःखका दूर होना न जान कर वे रंगमंडपसे बाहर आये और नक्षत्र-चार देखने लगे, तो देखा कि उनका दिया हुआ लग्न तो आकाशमें अब उदित हुआ है। खोटी घडीके हिसाबसे ज्योतिपीने जो पहले लग्नमुहूर्त दिया है [वह अशुद्ध है ] और उस लग्नमें प्रतिष्ठित मूर्तियोंकी आयु तीन ही वर्षकी है। अब जो इस समय लग्न वर्तमान है उसमें विवकी प्रतिष्ठा होगी वह चिरायु होगा । उसने उसी समय अपने बिंबकी प्रतिष्ठा कराई । प्रभुने जैसा कहा था वैसा ही बादमें हुआ । इस प्रकार अभक्ष्य-भक्षणके प्रायश्चित्तका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * कुमारपालका अन्यान्य विहारोंका बनवाना । १५६) [ राजाने यह स्मरण करके कि ] मेरे अपहृत धनसे एक चूहा [ उस समय ] मर गया था। इस लिये उसका प्रायश्चित्त पूछा तो प्रभुने उसके कल्याणार्थ उसीके नामका एक बिहार बनवानेको कहा सो उसने वह [ प क विहार ] वनवाया। १५७) इसी प्रकार, किसी व्यवहारीकी उस वधूने, जिसके जाति, नाम, प्राम, संबंध कुछ भी उसे नहीं मालूम हुए, रास्तेमें तीन दिन तक बुभुक्षित नुपतिको चावल के करंबेसे सन्तुष्ट कर रक्षा की थी, उसकी कृतज्ञताके निमित्त, उसके पुण्यकी अभिवृद्धिके लिये पत्तन में राजाने करम्ब क विहार' बनवाया। १५८) इसी तरह, यूका विहार भी इस प्रकार बिना)-सपादलक्ष देशमें कोई अविवेकी धनी था। उसकी प्रियाने केश-संमार्जनके अवसर पर उसकी हथेली पर एक यूका (f.) पकड कर रखी । उसने उस पीडाकारिणीको तर्जन करके, मसल कर मार डाला । निकटवर्ती अमारिकारी पंचकुल (जीवहिंसा प्रतिबन्धकी देखभाल करनेवाले अधिकारी) ने उसे पकड़ कर अण हिलपुर में राजाके सामने ले आ कर निवेदित किया। इसके बाद प्रभुके आदेशसे उसके दण्डस्वरूप उसका सर्वत्र ले कर वहीं पर ( उसी गावमें !) यु का विहार बनवाया। इस प्रकार युका विहारका मध समाप्त हुआ।
प्रकरण १५५-१६२] कुमारपालादि प्रयन्ध [१११ १५९) इसके बाद, स्तंभ तीर्थ के सामान्य सा लि ग व स हि का नामक प्रासादका, जिसमें प्रभुकी दीक्षा हुई थी, रत्नमय बिबसे अलंकृत कर, अनुपम जीर्णोद्धार कराया । इस प्रकार सालिगवसहिकाके उद्धारका प्रबंध समाप्त हुआ। * - मठपति बृहस्पतिका अविनय । १६०) बादमें, सो मेश्वर पत्तन के कु मार-विहार -प्रासाद में वृहस्पति नामक गण्ड (मठाधिपति), कोई अप्रिय कार्य करनेके कारण, प्रभु ( हेमसूरि ) की अप्रसन्नताका पात्र हुआ और वह पदभ्रष्ट किया गया । बादमें, अण हि ल पुर में आ कर, षड्विध आवश्यक क्रिया करता हुआ सन्मानका पात्र हो कर प्रभुकी सेवा करने लगा। एक बार चातुर्मासिक पारणके समय प्रमुके चरणों में द्वादशावर्त वंदना करके वोला १९९. हे नाथ, चार मास तक आपके चरणयुगके पास बैठ कर कषाय (राग द्वेष रूप क्लेश) का नाश करनेके लिए विकृतिपरिहार (रसवाले अन्नका त्याग) रूप व्रत मैंने किया है। अब, हे मुनितिलक ! आपके चरण कमलने निर्लोठित कर दिया है उद्भेदक कलि जिसका, ऐसे मुझको, पानांसे भीगे हुए अन्न ही की वृत्ति मिला करे । वह ऐसी विज्ञप्ति कर रहा था कि उसी समय राजा वहाँ आ गया और उसने प्रभुको प्रसन्न देख कर, उसे पुनः अपने पद पर प्रतिष्ठित कर दिया । इस प्रकार यह बृहस्पति-प्रबंध समाप्त हुआ। * मंत्री आलिगकी स्पष्टवादिता । १६१) एक बार, सर्वावसर (राजसभा) में बैठे हुए राजाने आलिग नामक [ वृद्ध ] प्रधान पुरुपसे पूछा कि- 'मैं [गुणादिमें ] सिद्ध राज से हीन हूँ, अधिक हूँ या समान हूँ।' उसने, किसी प्रकारके छल भावका विचार न करनेकी प्रार्थना करके कहा कि-'श्री सिद्ध राज में ९८ तो गुण थे और दो दोष थे; और महाराजमें दो गुण हैं और ९८ दोष हैं।' उसके ऐसा निवेदन करने पर राजा अपने आपको दोषपूर्ण जान कर, अपने जीवन पर विरक्त हो उठा और आँखोंमें छुरी भोंकना (जीवनका अन्त कर देना ) चाहा तो उसके आशयको समझ कर उस वृद्धने कहा कि-'श्री सिद्ध राज के जो ९८ गुण थे, वे संग्राममें कायरता और स्त्रीलम्पटताके इन दो दोपोंमें छिप जाते थे। आपके जो कृपणता आदि दोप हैं, वे युद्ध में दिखाई देनेवाली शूरता और परस्त्रीके विषयमें रही हुई सहोदरताके इन दो [ महान् ] गुणोंमें ढंक जाते हैं'-उसके इस वचनसे राजा फिर स्वस्थ हुआ। इस प्रकार यह आलिगप्रबंध समाप्त हुआ। पं० वामराशिको क्षमा प्रदान करना। १६२) पहले, सिद्धराज के राज्य समयमें, पॉडित्यकी स्पा सामना करने वाला वा मराशि नामक ब्राह्मण, प्रभु (हेमचंद ) की इस विशिष्ट प्रतिष्ठाको सहन न कर निंदा करते हुए } बोला कि- २००. जिसके (शरीर पर) लटकते हुए कम्बलमें करोड़ों यूकाओंकी पंक्ति किलबिला रही है, दाँतोंकी मलमंडलीकी दुर्गधसे जिसका मुंह भरा हुआ है, जिसके नासा-वंशके निरोधसे पाठकी प्रतिष्टा गिनगिनाट कर रही है और जिसके सिरकी टाल पिलपिला रही है वह 'हेमड' नामक ११२] प्रबन्धचिन्तामणि [चतुय प्रकाश । सेवड (श्वेताम्बर साधु) आ रहा है । इस प्रकारका अत्यधिक निंदास्पद कथन सुन कर, अन्तःकुटिल पर बाहरसे सरल दिखाई देनेवाले तिरस्कार पूर्ण वचनसे प्रभुने कहा कि-'रे पंडित ! तुमने क्या यह भी नहीं पढा कि विशेषणका प्रयोग पहले किया जाना चाहिए। अब से 'सेवड-हेमड' ऐसा कहना (हेमड-सेवड ) नहीं । सेवकोंने [ यह सुन कर ] उसे भालेकी नोंकसे घोदा कर छोड़ दिया । राजा कुमार पाल के राज्यमें शस्त्रवध नहीं किया जाता था, इस लिये उसकी वृत्तिका छैद कर दिया गया। इसके बाद, कण-कणकी भीख माँग कर अपना प्राण धारण करता हुआ वह प्रभुकी पोपधशालाके सामने आ कर बैठा । उस समय वहाँ पर अनादि भूपति नामक मठके तपस्वियों द्वारा अधीयमान योग शास्त्र का श्रवण करके, उसने फिर सचे हृदयसे यह काव्य कहा कि- २०१. जिन अकारण दारुण मनुष्योंके मुँहसे आतंकका कारण ऐसा गाली-रूपी गरल (विष ) निकला है उन जटा धारण करने वाले फटाधरों (सो) के मंडलका, यह योगशास्त्र का वचनामृत अब उद्धार कर रहा है । ऐसे अमृतके समान मीठे उसके वचनसे, प्रभुका वह उपताप शान्त हुआ और उसकी वृत्ति फिर दुगुनी कर उसे प्रसादित किया। इस प्रकार यह वामराशि-प्रबंध समाप्त हुआ। सोरठके दो चारणोंकी कविताविषयक स्पर्धा । १६३) फिर कभी, एक वार, सुराष्ट्र मंडठके रहने वाले दो चारण, परस्पर दूहा- विद्या (दोहा छन्दकी रचना करनेमें ) स्पर्धा करते हुए यह प्रतिज्ञा करके अण हि ल्ल पुर में पहुँचे कि-'हेम चंद्राचार्य जिसके दोहाफी सराहना करेंगे, उसे दूसरा हर्जाना देगा।' फिर उनमेंसे एकने, प्रभुको सभामें आ कर यह दोहा कहा- २०२. हे हे मसूरि ! मैं तुम्हारे मुँह पर वारी जाऊं । लक्ष्मी और वाणी (सरस्वती) का जो सापल्य (वैर ) भाव था वह, इसने नष्ट कर दिया । क्यों कि हेम चंद्र सूरि की सभामें तो जो पण्डित है ये ही समीयान् है। ऐसा कह कर, उसके चुप हो जाने पर, फिर श्री कुमार विहार में आरतीके अवसर पर राजा जब प्रगाम कर रहा था और प्रभुने उसकी पीठ पर हाय रसा हुआ था, उसी समय वहाँ प्रवेश करके दूसरे चारणने यह कहा- २०३. हे हे मसूरि। मैं तुम्हारे इस हाथ पर बारी जाऊं-जिसमें अद्भुत ऋद्धि रही हुई है। नीचे नमे हुए जिस मुख उपर यह पढता है उसके ऊपर सिद्धि आ बैठती है। इस प्रकारफे अनुन्टि (मौलिक) भाराले उसके वचनसे मनमें चमकत हो कर राजा इसी दोहेको सर यार बुलाने लगा। तीन बार बोलने वाद उसने कहा कि क्या एक एक बार बोलने पर एक एक लाख दोगे !'-इस पर राजाने उसे ३ लास दिलाया। इस प्रकार यह दो चारणीका प्रबंध समाप्त हुआ। * प्रकरण १६३-१६५] कुमारपालादि प्रबन्ध। [११३ कुमारपालका तीर्थयात्रा करना । १६४) एक वार, राजा श्री कुमार पाल ने संघाधिपति हो कर तीर्थयात्राके लिये महोत्सवपूर्वक संघ निकालना निश्चित किया और उसके देवालयका प्रस्थान-मुहूर्त साधित किया । इतनेमें देशान्तरसे आये हुए चर युगलने कहा कि-' डा ह ल देश का राजा कर्ण आप पर चढ़ाई करके आ रहा है।' [इसको सुन कर ] राजाके ललाट देश पर [ पसीनेके ] स्वेद विंदु झलकने लगे। संघाधिपत्यके पदको प्राप्तिका मनोरथ नष्ट हो जानेके भयसे वाग्भट मंत्री के साथ आ कर प्रभुके चरणों पर गिर पड़ा और अपनी निंदा करने लगा। राजाके आगे इस प्रकार महाभयका उपस्थित होना जान कर, प्रभुने कुछ सोच कर कहा कि वारह पहरमें ही इस भयको निवृत्ति हो जायगी [ इस लिये कुछ चिन्ता न करो] । राजा विदा हो कर, किं - कर्तव्यविमूहसा बना हुआ ज्यों ही बैठा था त्यों ही निति समय पर आये हुए दूसरे चरयुगलने समाचार दिया कि- ' श्री कर्ण राज का [ अकस्मात् ] स्वर्गवास हो गया । ' राजाने मुँहसे पानका त्याग करते हुए पूछा- सो कैसे ?' उन्होंने कहा -'हाथीके होदे पर बैठ कर राजा कर्ण रातको प्रवास कर रहा था तब उसकी नींदसे आँखें बन्द हो गई। गलेमें लटकता हुआ सोनेका हार एक बरगदके दरख्तको डाटीमें उलझ गया और उससे खींचा जा कर राजा मर गया। हम दोनों उसके अग्निसंस्कारके अनन्तर वहाँसे चले हैं। उनके ऐसा कहने पर, राजा तत्काल पौषधशालामें आया और सूरिकी अत्यन्त ही प्रशंसा करने लगा जिसको किसी तरह उन्होंने रोका। फिर, ७२ सामंत और संपूर्ण संघके साथ, प्रभुके बताये हुर [धर्म और प्रवासके ] दोनों प्रकारके मार्गसे धुन्धु क नगर में आया । वहाँ पर प्रभु के जन्मस्थानमें स्वयं बनाये हुए १७ हाथ ऊँचे झोलि का विहार में उत्सवादिका विधान करने पर जातिपिशुन ब्राह्मणोंने विघ्न किया तो, उन्हें देश निकाला दिया गया और फिर शत्रुज य की उपासना की । वहाँ ' दुक्खखओ कम्मक्खओ' ( दुःखक्षयः, कर्मक्षयः ) इस प्रकारके प्रणिधान दण्डक ( सूत्रपाठ ) का उच्चारण करता हुआ देवके पास विविध प्रार्थना करनेके अवसर पर किसी चारणके मुंहसे यह कथन सुना- २०४. अहो यह जिनदेवका कितना भोलापन है ! जो एक झटके वदलेमें मुक्तिका सुख दे देता है। इसके साथ किस वातका सौदा किया जाय । उसके नौ वार इस दोहेके पढ़ने पर, राजाने उसे नौ हजारका दान किया। इसके बाद जब वह उज यन्त (गि र नार) के पास आया तो अकस्मात् पर्वतमें कंप हुआ देखा । तब श्री हे मा चार्य ने राजासे कहा-' वृद्धोंकी यह परंपरागत बात है कि, एक ही साथ दो पुण्यवन्त पुरुष इस पर चढते हैं तो यह छत्रशिला गिर पडती है । यदि यह बात कहीं सत्य हो तो लोकापवाद होगा, क्यों कि हम दोनों ही [ एकसे ] पुण्यवान हैं । इस लिये आप ही [ पर्वत पर ] नमस्कार करने जॉय, हम नहीं।' पर राजाने आग्रह करके प्रभुको ही संघके सहित ऊपर भेजा। स्वयं नहीं गया। श्री वाग्भ टदेव को छत्रशिलाके उस रास्तेको छोड़ कर जीर्ण प्राकार (जू ना गद) के रास्तेसे नई पद्या (पत्थरकी सीदी) बनवानेके लिये आदेश दिया। पद्याके बनानेमें ६३ लाख दाम लगे। इस प्रकार तीर्थयात्रामवंध समाप्त हुआ। कुमारपालका वर्णसिद्धिकी प्राप्तिकी इच्छा करना। १६५) एक बार, पृथ्वीको अनृण करनेकी इच्छासे, राजाने स्वर्णसिद्धिकी प्राप्ति के लिये श्री हेम चंद्राचार्य के उपदेशसे उनके गुरु श्री देव चन्द्रा चार्य को, श्री संघ और राजाकी विज्ञति भिजवा कर वहां वुलवाये । के २९-३० ११४ प्रयन्धचिन्तामणि [चयं प्रकाश उस समय तीत्र व्रतमें टगे हुए थे तो भी यह समझ कर कि संघका कोई वडा कार्य होगा, निविर्वक विहार करते हुए और रास्तेमें किसीसे बात न हो कर अपनी ही [ पुरानी ] पोपयशालामें आ कर ठहर गये । राजा तो उनकी अगवानी करनेके टिये सजावट करा रहा था इतनमें सूरिने उसे सूचित किया तो वह वहाँ पर आया। तब राजा प्रभृति समस्त श्रावकों के साथ प्रभुने द्वादशारर्त पूर्वक उन गुरुको प्रणाम किया। उन्होंने जो उपदेश-वचन कहे वे उन दोनोंने ( राजा और सूरिने ) सुने । फिर गुरुने संघका कार्य पूछा। इस पर सभा विसर्जन करके पर्देकी ओटमें श्री हे मा चार्य और राजाने उनके चरणों पर गिर कर मुवर्ग-सिद्धिके बताने की याचना की। श्री हे मा चार्य ने कहा कि-जब मैं वालक था तब आपने किसी काठ ढोने वाले के पास एक वल्ली (लता) ली थी और आपके आदेशसे, अग्निमें जलाए हुए ताके टुकड़ेको उसके रसमें भिगोने पर, यह सोना हो गया था। उस लताका नाम और संकेत आदि बताने की कृपा कीजिये ।' उनके ऐसा करने पर गुरुने श्री हे म चंद्र को क्रोधसे दूर टेल दिया और बोले कि तू इस योग्य नहीं । पहले मंगके जूम (मंगकी दाटके पानीके) समान जो [ हलकी ] विद्या तुझे दी यो उसीसे तुझे [ इतना ] अजीर्ण हो गया है, तो फिर तुझसे मंदाग्नि रोगीको यह मोदक जैसी [ भारी ] विद्या कैसे दूं!' इस प्रकार उन्हें निषेध करके, राजासे कहा-- 'तुम्हारा ऐसा भाग्य नहीं है कि संसारको अनृण करने वाली विद्या सिद्ध हो जाय । और फिर, जीव- हिंसाका निवारना और पृथ्वीको जिनमन्दिरोंसे मंडित करना आदि पुण्यकार्योसे तुम्हारे दोनों टोक सफल बन गये है, अब इससे अधिक और क्या चाहते हो?' यह कह करके, उसी समय वे वहाँसे विहार कर गये। इस प्रकार सुवर्णसिद्धिक निषेपका यह प्रबंध समाप्त हुआ। एक बार राजाके पूछनेपर प्रभुने उसके पूर्व जन्मका सारा वृत्तान्त कहा। मंत्री चाहडका दानी पना। १६६) इसके बाद, किसी समय, राजाने संपाद लक्ष के राजा पर चढाई ले जानेके लिए सेना सत्रित की। श्री वाम्म ट मंत्रीके छोटे भाई चा ह ट मंत्री को, अत्यधिक दान करते रहने के कारण दोष-युक होने पर भी उसे खुब सिखामन दे कर, सेनापति बनाया। वह प्रयाण करके दो-तीन पढाव दूर गया ही था कि बहुत से याचक इकडे हो कर उसके पास आये तो उसने कोपाध्यक्ष (खजांची) से १ लाख मुद्रायें माँगी । पर राजाकी आज्ञा न होनेसे जब वह नहीं देने लगा, तो सेनापतिने उसे चाबुकके प्रहासे मार कर सेनासे निर्वासित कर दिया और फिर स्वयं यथेच्छ दान दे करके याचकोंको प्रसन्न किया। चौदह सौ साढनियों पर चढं हुए २८०० मुमटोंको साथ ले कर रास्ते कुछ ही पडाव करके वम्बेरा नगर के किलेको जा वेरा। वहाँ पर नागरिकोंसे यह सुन कर, कि उसी रातको सात सौ कन्याओं के विवाह होने वाले हैं, उस रातको वसा ही पड़ा रहा। दूसरे दिन किले पर दखल कर लिया। वहाँ पर सात करोडका सोना तथा ग्यारह हज़ार घोड़ियोंकी प्राप्ति दुई जिसकी सूचना शीतगामी आदमियों द्वारा राजाके पास भिजवा दी। स्वयं उस देशमें कुमार पाठ राजाकी आज्ञा किरा कर और अपने अधिकारी नियुक करके लौट आया। पचन में प्रवेश करके राजमहलमें आ कर राजाको प्रणाम किया। राजाने समुचित आलापके साथ, उसके गुणसे रवित हो कर भी, इस तरह कहा कि- * पूर्व जमके वृत्तान्दवाला यह प्रबन्ध इस ग्रन्थमें नहीं दिया गया । यह पति एक ही पुरानी प्रतिमें लिखी हुई मिली है जिसका सूनन शास्त्री दीनानायने अम्नी उस पुरानी आदिमें किया है। पुरातन प्रबन्धसाह, प्रत्यकोर, कुमारसाठचरित्र संग्रह आदि मन्यों में यह मध मिलता है।
. प्रकरण १६६-१६८] कुमारपालंादि प्रबन्ध [११५ 'तुममें जो यह स्थूल-लक्ष्यता वाला वडा भारी दोष है वही एक प्रकारसे तुम्हारा रक्षामंत्र है। नहीं तो लोगोंकी नजर लग कर तुम खड़े ही खड़े फट पडो । तुम जो व्यय करते हो वह तो मैं भी कर सकनेमें समर्थ नहीं हूँ।' राजाकी यह बात सुन कर उसने कहा कि- 'महाराजने जो कहा वह यथार्थ ही है । ऐसा व्यय महाराज सचमुच नहीं कर सकते । क्यों कि महाराज पितृपरंपरासे तो राजाके पुत्र हैं नहीं। और में तो खुद महाराजका पुत्र हूँ। अतः मैं इतना अधिक अर्थव्यय कर सकता हूँ।' उसकी इस बातसे चाहे राजा खुश हुआ हो या नाराज,- वह तो कसौटी पर कसे हुए सुवर्णको कान्तिको धारण करता हुआ, अनमोल हो कर, राजासे विदा ले कर अपने स्थान पर पहुँच गया। इस प्रकार यह राजघरट्ट चाइडका प्रबंध समाप्त हुआ। १६७) उसी प्रकार उसका छोटा भाई, जिसका नाम सोला क था, उसने मण्डलीक सत्रागार' ऐसा विरुद धारण किया था। कुमारपाल द्वारा राणा लवणप्रसादका भविष्य कथन । १६८) इसके बाद, एक वार, आ ना क नामक अपने मौसेरे भाईके सेवागुणसे सन्तुष्ट हो कर राजाने उसे सामान्त-पद प्रदान किया। तो भी वह तो उसी तरह सेवा करता रहा। एक बार, दो पहरके समय, राजा जब चन्द्रशालामें पलंग पर बैठा हुआ था तब वह भी उसके सामने बैठा था। उस समय सहसा किसी नौकरको वहाँ आते देख राजाने पूछा कि -'यह कौन है !' आ ना क ने देखा तो वह उसीका नौकर मालूम दिया । उस नौकरका इशारा पा कर वह वहाँसे बाहर निकल कर कुशल समाचार पूछने लगा, तो नौकरने उससे पुत्रजन्मको बधाई माँगी । इस समाचारसे उसका चेहरा सूर्य जैसा चमक उठा और फिर उसे विदा करके अपने स्थान पर आ बैठा । राजाके यह पूछने पर कि क्या बात है ! तो उसने कहा कि-'महाराजके [ सेवकके] घर पुत्र हुआ है । यह सुन, राजा अपने मनमें कुछ सोच कर, प्रकाश भावसे वोला-'पुत्रजन्म निवेदन करनेके लिये यह चाकर जो वेत्रधारियोंकी विना बाधाके ही यहाँ तक आ पहुँचा सो इससे जाना जाता है कि अपने पुण्यके प्रभावसे यह गूर्जर देश का राजा होगा, पर इस नगरमें और इस धवलगृहमें ( राजमहलमें ) नहीं । क्यों कि तुम्हें इस स्थानसे उठा कर इसने पुत्रोत्पत्तिकी वधाई दी है इस लिये इस नगरका राजा नहीं होगा।' इस प्रकार विचार चतुर्मुख श्री कुमारपाल देवद्वारा निर्णीत लवणमसाद राणाका प्रबंध समाप्त हुआ। * २०५. अपने आज्ञावती ऐसे अटारह वहे देशोंमें, संपूर्ण चौहद वर्ष तक जीवहत्याका निवारण करके, और अपनी फीतिक स्तंभके समान १४ सौ जैन विहारोंका निर्माण करके जैन राजा कुमार पाउने अपने सब पापोंको क्षय कर दिया। [१२५-७ ] कर्नाटक, गूर्जर, टाट, सौराष्ट्र, कप, सिन्धु, उम्र, भंभेरी, मरुदेश, माख्य, कोंकण, फीर, जांगटक, सपादटक्ष, मेवाद, दीठी (दिही) और बालंधर इतने देशोंमें कुमारपाउ राजाने प्राणियोंको अभयदान दिया और सातों व्यसनोका निषेध किया । रुदतीवन (अपुत्र कुटुम्बके धन)का महण मना किया और न्यायपाटा वजा कर प्रनाको संतुष्ट किया ।
१९६] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश हेमचन्द्र सूरिको लूता रोग लगना । १६९) अब एक बार, कच्छप राज लक्ष राज की महासती माताने जो मूल राज को शाप दिया या कि उसके वंशजोंको लूना रोग हो जाया करेगा; तदनुसार, कुमार पाल ने जब गृहस्थ धर्म (श्रावकपन) के व्रत ग्रहण किये तब उसने अपना राज्य गुरु श्री हे म चन्द्र को समर्पण कर दिया था, इसलिये उसी छिद्रसे (इस राज्यसम्बन्धके छलसे) सूरिको भी यह छूता रोग संक्रामित हुआ। इसे देख सभी राजलोकके साथ राजा दुःखित हुआ, तब प्रभुने प्रणिधानसे अपनी आयु प्रबल समझ कर अपाङ्ग योगाभ्यासके द्वारा, लीला (क्रीडा) के साथ उस रोगको नष्ट कर दिया । १७०) किसी समय, कदली पत्र पर आरूद किसी योगीको देख कर विस्मित बने हुए राजाको प्रभुने भूमिसे चार अंगुल ऊपर अधर रह कर ब्रह्मरनसे निकलता हुआ तेजःपुञ्ज दिखाया। हेमचन्द्रसूरि और कुमारपालका स्वर्गवास । १७१) चौरासी वर्ष की अवस्थाके अंतमें प्रमुने अपना अंतिम दिन समीप आया समझ कर, अनशन पूर्वक अन्त्याराधन क्रिया प्रारंभ की। उसे देख कर दुःखित हुए राजाको प्रभुने कहा कि - - तुम्हारी आयु भी अब ६ महीना ही वाकी है। सन्तानामावके कारण अपने वर्तमान रहते ही अपनी सब उत्तर क्रिया कर-करा लेना ।' यह आदेश दे कर दशम द्वारसे उन्होंने अपना प्राणत्याग कर दिया। फिर इसके बाद प्रभुके संस्कार स्थान पर, यह समझ कर कि, उनके देहकी भस्म भी पवित्र है, राजाने तिलक करके नमस्कार किया। इसके बाद सभी सामंत और नागरिक लोगोंने वहाँ की मिट्टी ले ले कर तिलक करना शुरू किया जिससे वहां पर गद्दा हो गया। वह गड्डा आज भी 'हेम खड्ड' नामसे प्रसिद्ध है। १७२) अब फिर, राजा प्रमुफे शोकमें विफल हो कर आँखोंमें आँसू भर भर रोने लगा जिस पर मंत्रियोंने उसे वैसा न करनेकी विज्ञप्ति की, तो वह बोला- 'मैं उन प्रभुके लिये शोफ नहीं कर रहा हूँ जिन्होंने अपने पुण्यसे उत्तमसे उत्तम लोक अर्जित किया है। मैं तो अपने इस सर्वथा त्याज्य ऐसे सप्ताङ्ग राज्यके लिये शोक कर रहा हूँ, कि राज्यपिण्ड दोषसे दूपित होनेके कारण मेरा पानी भी इन जगद्गुरुके अंगमें नहीं लगा-- इस प्रकार प्रभुके गुणोंको स्मरण करता हुआ चिरकाल तक विलाप करते रहा और अन्तमें प्रभुके कहे हुए दिन पर उन्हींकी उपदिष्ट विधिसे समाधि पूर्वक मर कर उस राजाने स्वर्गलोक अलंकृत किया। . * यहाँ पर P प्रतिमें निम्नोद्धृत श्लोक अधिक प्राप्त होते हैं-जो सोमेश्वरकी कीर्तिकौमुदीके हैं- [१२८ ] पृथु आदि पूर्व राजाओंने स्वर्ग जाते समय जिस राजाके पास अपने गुणरूपी रत्नोंको मानों न्यासके रूपमें रख दिया था । [१२९ ] इस राजाने न केवल युद्धक्षेत्रमें अपने बाणोंसे मात्र शत्रुओंको ही जीत लिया था, किंतु अपने लोकप्रीतिकर गुणोंसे इसने पूर्वजोंको भी जीत लिया। [ १३० ] राग और रतिसे रहित, ऐसे ( अथवा वीतरागमें प्रीतिनाले ) इस नृदेवकी, मृतोंके धनको छोड़ देनेके कारण, देवताकी नाई अमृतार्थता सिद्ध हुई । (क्यों कि देवता अमृतके अर्थी होते है, और यह मृतका अर्थ नहीं लेता था।) [१३१ ] इस राजाने तलवारकी धारमें नहाई हुई वीरोंकी श्री (लक्ष्मी) ही ग्रहण की, किंतु आँसूकी धारासे धुली हुई कायरोंकी ( और निरपत्य जनोंकी) श्री नहीं ली।
Iળ ૧ - I મા પારિ ધni [ [૨૨૨ ] ને જાતે જ મ પાને પાને ૧ મકા, ભી વિન ને તો જ બાના d tી બીપા મા તે મા ! [ ૨૨ ] હા (1) જો પ ળ વાળી જાત છે , ની કે il કામા I m (1 k ki wali ! (૨૨૪ ] ml 7 ના / ખેરવા, છે રે મ મ માની લે છે કે આ મિ નામ તો મા ને બાને બાળા છે જો કે AિTI [ ૨૫ ] મારા પિતાનાને મુળ વાળ ગીત 1 નાનો બિ, બારી; i gift of Hiળ IિT 1,૨૩૧] ન રમિ રગ રગાવ ની છે smil i d (inી ) inળ ને , Mી ને શા ળેિ uિ a ai tr બિરાજે -નિમિi | ( ૧૧ ) શri ni jodi ann (food) કે મને ઈ- મછો waધતા (મન) ના નામ | [ ૨૫૮ ] ને ભાળ મળril Jognil In નવલે પાગી | Nilam d ઈ Jai MUા તો જ ! ૨૧) ૨૨૧૧ ને ૨૨૨૦ dri | ૨૨ (૧ થી ૫ મે ૨ | ૧) જે ૨૨૫૦ માં તેના ભાઈને પગ ( in minયા જ થી વાર પાને નાd --) [૬૧ ) / ૧પ ] મત જા મન જ ના માળ શા મા બનri si & રિવા | [૨]ને and ( ) ) ( જ જઈ ને નાના હતા. ( ઈડલી. કલા full) ધોથી થાળી માં ! ( ૧૨ ) કાળ ૧ ના ભnil જાણે છે કે જેના પગ , માત htો પણ ઈ બુકીને ઘોતિfill nત | [૨] 1 ની છે ( , , 1 )ળ નળ, મ ગાગો જ ન બી વન ઈિ બી, નાળ જ ! (૪૨) ની પાળ પર છે તે પણ બા) 1 (4) [ બળ જ વાગે છે ) ન માન ( નામ) " "વ અને મને num નિrint Apr ૨) ના મન નવ બની જાળ માં જળ ના નો, માતાને નાwill rખા " , મને d ( Mi Ali ન છે, બળ અને જીપ ११८] प्रबन्धचिन्तामणि [ चतुर्थ प्रकाश देवमंदिर पुत्रोंके हवाले किये और यह कहा कि-'मेरे मरे बाद भक्तिपूर्वक इनकी खूब देख भाल रखना' - ऐसा कह कर ज्यों ही वह अन्तिम दशाको प्रतीक्षा करता है त्यों ही उसके छोटे लडकेने उन मन्दिरोंको तोड-फोड डाला । तब उसका शब्द सुन कर वह बोला-'अरे पुत्राधम, श्रीमान् अजय देव ने भी पिताके परलोक जानेके बाद, उनके बनाये धर्मस्थानोंको तुस्वाया, और तू तो अभी मेरे जाते ही इन्हें तोड़ रहा है। इस लिये तू तो अधमसे भी अधम दुआ'। उसका यह प्रसङ्गोचित आलाप सुन कर राजा लजित हुआ और उस कुकार्यसे निवृत्त हुआ। उस दिनके बाद बचे हुए श्री कुमार पाल के [ कुछ ] विहार आज भी दिखाई देते हैं। श्री तारङ्ग दुर्ग में (तारंगा पहाड) के अजितनाथको अजय पाल के नामसे अंकित कर धूर्तीने (:) इस उपायसे बचाया। . - अजयपालका कपर्दी मंत्रीको भरवा डालना। १७६) बादमें अजय देव ने कपर्दी मंत्री को महामात्यका पद लेनेके लिये अत्यन्त प्रार्थना की। उसने यह कह कर कि - 'प्रातःकाल शकुन देख कर उसकी अनुमतिसे प्रभुके आदेशका पालन करूँगा' वह शकुन गृहमें गया। फिर दुर्गादेवीसे माँगे सतविध शकुनको पा कर पुष अक्षत आदिसे देवांकी पूजा की। अपने आपको कृतकृत्य समझ कर जब नगरके दरवाजे के पास आया तो ईशान कोणमें वृषभको नाद करते देखा। यह देख कर मनमें अत्यन्त प्रसन्न हुआ और अपने निवास स्थान पर आया। भोजन करने वाद, उसके मरुदेशीय वृद्ध अंगरक्षकने शकुनका स्वरूप पूंछा। इस पर कपर्दीने उन शकुनोंका स्वरूप कहा और उनकी प्रशंसा की। तब मरुवृद्धने कहा- २०६. नदीको उतरते समय, विपम मार्गमें चलते समय, दुर्गमें, आसन भयके अवसर पर; खी विषयक कार्यों, लड़ाईमें और व्याधिमें शकुनोंकी विपरीतता श्रेष्ठ कही जाती है। इस प्रमाणसे, आतन संकटके कारण मतिभ्रंश हो कर आप प्रतिकूलको भी अनुकूल समझ रहे हैं। वृषभको आपने शुभ मान लिया है, पर वह भी, आपकी मृत्युसे शिव [ धर्म ] का अभ्युदय होना समझ कर उनका वाहन होनेके कारण गर्जा है। उसकी इस [ सब ] बातकी उसने उपेक्षा की तो वह [ खिन्न हो कर] उससे विदा ले कर तीर्थयात्राके लिये चला गया। फिर कपदी राजाकी दी हुई [महामात्य पदकी ] मुद्रा प्रहण करके महान् उत्सरके साथ अपने घर आया। राजाने रातको विश्राम करते हुए उसे गिरफ्तार किया और समानप्रतिष्ठा वालोंने उसका अपमान करना शुरू किया । २०७. जो सिंह कभी हाथी के कुंभस्थल पर पोर दे कर गजमुकाओंका दलन करता था, वही विधिवश आज भृगालोको टातोंका अपमान सहता है। यह सोचता हुआ, (तत टोहके ] कदाहमें दाले जाने पर वह पंदित इस प्रकार काव्य पदते परते मार राया गया- २०८. पाचर्कोको फरोडोंकी कीमतके, दीपकके समान कपिश वर्णवाले सुवर्णका दान दिया प्रतिवादियोंकी शायके अर्थ गर्भित ऐसी वाणीको शाखायों में जीत लिया; उखाड़ फर फिरसे राज्य पर बिठाये दुए राजाओंसे शतरंजकी तरह मीना की-[इस तरह ] मने अपना कर्तव्य कर लिया है। मन अगर विधिको [ ऐसी ] याचना है तो उसके लिये भी हम तैयार है। इस प्रकार या मंत्री श्री फपर्दीका मन्ध समाप्त हुआ।
प्रकरण १७६-१७९ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [ ११९ महाकवि रामचन्द्रकी हत्या । १७७) इसके वाद, सौ प्रबन्धोंका कर्ता [महाकवि ] राम चंद्र उस नीच राजाके द्वारा [ मार डालनेके लिये ] जलती हुई ताम्रपट्टिका पर बिठाया जाने लगा तो उसी अवस्थामें वह यह कहता हुआ कि- २०९. जिसने सचराचर पृथ्वोपीठके सिर पर पैर रखा उस सूर्यका अब अस्तगमन होता है तो वह चिरकालके लिये हो। अपने दाँतोंसे जीभ काट कर मृत्यु प्राप्त हुआ और फिर उस मरे हुएको ही उसने मार डाला। इस प्रकार रामचंद्रका प्रवन्ध समाप्त हुआ। * मंत्री आम्रभटका लडते हुए मरना। १७८) इसके वाद, राज पिता मह श्री मान् आम्रभ ट के तेजको न सह सकने वाले सामन्तोंने अवसर पा कर उसकी निन्दा करते हुए राजाको उससे प्रणाम करवाने के लिये वाधित किया तो उसने यों कहा कि- 'देव-बुद्धिसे श्री वीतराग जिनेंद्रको, गुरु-बुद्धिसे श्री हे मा चार्य महर्पिको, और स्वामि-बुद्धिसे श्री कुमार पाठ को ही इस जन्ममें मेरा नमस्कार हो सकता है ।' उस [वीरके ], जिसके शरीरके सातों धातु जैन धर्मसे वासित थे, ऐसा कहने पर, राजा रुष्ट हुआ और उसने कहा कि-'लड़ने के लिये तैय्यार हो जाओ। उसकी यह वात सुन कर, मंत्रीने जिनदेवकी पूजा करके [ मनमें ] अनशन व्रत ग्रहण किया और संग्रामदीक्षाका स्वीकार करके अपने योधाओंके साथ मकानसे वाहर निकला । फिर राजाके आदमियोंको भूसेकी तरह उड़ाता हुआ घटिकागृह (राजद्वार) तक आया और उन पापियोंके संसर्गसे जनित कल्मपको धारातीर्थ धो कर स्वर्ग -लोक सिधार गया । उस समय वहाँ उसको देखनेके लिये आई हुई अप्सरायें 'मैं पहले वरूंगी, मैं पहले '- इस तरह कह रही थी। २१०. धन पाने के लिये-भाट होना अच्छा है, रंडीबाज होना अच्छा है, वेश्याचार्य होना अच्छा है और पूरा दगाबाज होना भी अच्छा है, पर दानके समुद्र उदयन के पुत्र (आम्र भट) की मृत्युके बाद चतुर आदमियोंको भूमण्डल पर किसी तरह भी विद्वान् होना अच्छा नहीं । २११. मनुष्य अपने अत्युन पुण्य और पापका फल, यहीं पर, तीन वर्षमें, तीन मासमें, तीन पक्षमें या तीन दिनमें ही प्राप्त कर लेता है। इस पुराणके प्रमाणानुसार उस दुष्ट राजाको [एक दिन ] व यजल देव नामक प्रतीहारने छुरा भोक कर मार डाला । वह धर्मस्थानोंको गिराने वाला पापी कीडे मकोड़ों द्वारा भक्षित हो कर प्रत्यक्ष नरकका अनुभव करके मर गया। सं० १२३० से ले कर [ १२३३ तक ] तीन वर्ष इस अजयदेव ने राज्य किया। - * १७९) सं० १२३३ से ले कर [ १२३५ तक ] २ वर्ष बाल मूल राज ने यम्य किया । इसकी माता नाइफि देवी ने, जो परमी राजाकी टड़की थी, गोदमें अपने पुत्र-शिशु राजा-को, ले कर 'गादरार घर' नामक घाट पर म्लेच्छ राजासे युद्ध किया और सौभाग्य वश अकालमें ही आकाशमें वादल हो आनेके कारण उसको देवी सहायता मिल गई जिससे शत्रु पराजित हो गया। [१४४ ] समर-भूमिमें रेंकते हुए जिस राजाने मानों वाल्य काठकी चपटतासे ही नुरुम्फराजकी सेनाको छिन्न-भिन कर दिया ।
१२०] प्रबन्धचिन्तामणि [चतुर्थ प्राय [१४५] जिसके काटे हुए म्लेच्छ कंकारके स्थट की ऊंचाईको देखता हुआ अबु द गिरि अपने पिता प्रायगिरि (हिमाटय) को याद भूल जाता है । [१४६ ] विधाताके, उस कल्पद्रुमके अंकुरको शीघ्र ही नष्ट करने के बाद, उसका छोटा भाई श्री भीम नामक [ नया] पौधा उगा। १८०) सं० १२३३ ते ले कर [ १२९६ तक ] ६३ वर्ष श्री भीम देव ने राज्य किया। [१४७] यह भीम राजा, जो राजहंसोंका दमन करने वाला है कदापि उस भीमसेन के समान नहीं कहा जाता जो बकापकारी ( वकामुरका नाश करने वाला) था। यह राजा जब राज्य कर रहा था तो सोइड नामक माल व देश का राजा गूर्जर देश को विध्वंस करनेके लिये सीमान्त पर आया । तब इसके प्रधानने सामने जा कर इस प्रकार कहा- २१२. हे राज-मूर्य ( तुम्हारा) प्रताप पूर्व [दिशा ] में ही शोभित होता है। पश्चिम दिशामें आने पर तुम्हारा वह प्रताप अस्त हो जाता है । इस विरुद्ध वागीको सुन कर वइ वापत टोट गया। इसके बाद उसने अपने लड़केसे, जिसका नाम श्रीमान् अर्जुन देव था, गूर्जर देश का भंग करारा। * - वीरधवलका प्रादुर्भाव । १८१) श्री भीम देव के राज्यको चिन्ता करने वाला ( राज्य व्यवस्था संभालने वाला) व्यापही य नानसे प्रसिद्ध श्रीमान् आ ना क का पुत्र लवण प्रसाद चिरकाठ तक राम करता रहा । साम्राज्यके भारको धारण करने वाला उसका पुत्र हुआ श्री वीर धवल । उसकी माता मदन राज्ञीने, अग्नी बहनको मृत्युके बाद यह सुनकर कि अपने देवराज नानक पकिक (पटेल ) अनोई मिती बढी भारी आमदनी है टेकिन अ बिसका निभार नहीं हो रहा है, राजा ल व णप्रसाद से पूंछ कर अपने शिशुपुत्र वीर धवल को साय ले कर यहाँ गई । उस बहनोईन उनके गुग और आकृतिको स्पृहाय देख कर, उसे अपनी ही गृहिनी बना लिया । उप प्रसाद ने जो यह वृत्तान्त मुना, तो उसे मार डालने के लिये रातको उसके घरमें घुसा और एकान्तमें हिर कर जब यह असर खोज रहा था, तब यह पटेट भोजन करनेके लिये वैटा और [ पासमें बोलाउको न देग कर अपनी गृहिणीने यह कहने टगा कि वीर धवल के बिना में नहीं पाऊंगा । इस तरह सूर शामइके बाद उसे ठे आ कर एक ही थाटीने उसके साथ साने टगा । तब अकस्मात् , साक्षात् तान्तकी तरह सामने उपस्थित उस आरमाको देश भर से उसका मुंह काला हो गया। पर उस (टपगाप्रसाद) ने पढ़ा कि-मत उरो, म तुम्ही को मारने आया या पर इस मेरे वीरधवल धड़के पर, तुम्हारी ऐसो पामुसा आनी साशात् ऑगोसे देश का, उस आमइको मन त्याग दिया है। ऐसा कह कर उसके द्वारा सात दो फरस आपा था वैसे ही पटा गया। १८२) र के उस र मिनाये उन सांगण, भामुणराज श्रादि पदादांशीय भाई हुए अनेकौर से भुस्नत मिलात एए । •मो गुम्म alkutaमिरस दात nि गरा। मामाम गबदि PRO माटो समयसमा।
प्रकरण १८१-१८६ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१२१ १८३) इसके बाद, वह वीर धवल क्षत्रिय, जब कुछ कुछ समझने लायक हुआ तो अपनी माताका यह वृत्तान्त जान कर लजित हुआ और अपने ही पिताकी सेवामें आ कर रहा । वह जन्मसे ही उदारता, गंभीरता, स्थिरता, नीति, विनय, औचित्य, दया, दान और चतुरता आदि गुणोंसे युक्त था । उसने अपनी शालीनतासे किसी कंटक प्रस्त भूमिको अपने अधिकारमें किया और फिर पिताने भी कृपा करके कुछ देश दे दिया । चा हड नामक ब्राह्मणको मंत्री बना कर वह राजकारभार चलाने लगा। वहाँ पर, उस समय, आये हुए प्राग्वा टवंशी पत्तन निवासी मंत्री तेजपाल के साथ उसकी मित्रता हुई। मंत्रीश्वर वस्तुपाल तेजपालका प्रयन्ध । १८४) अब इस प्रकरणमें मंत्री तेज पाल के जन्म वृत्तान्तका प्रबंध प्रस्तुत किया जाता है। एक वार, पचन में भट्टारक श्री हरिभद्रसूरि का व्याख्यान हो रहा था। वहीं पर मंत्री आ शराज बैठा हुआ था। उस समय एक कु मारदेवी नामकी अतीव रूपवती वालविधवा स्त्री वहा पर आई जिसको वे आचार्य वारंबार देखने लगे । इससे आशराजका चित्त उस पर आकर्पित हुआ । व्याख्यानके विसर्जन होनेके अनन्तर मंत्रीकी प्रार्थना पर गुरुने इष्ट देवताके आदेशसे कहा कि-' इसके गर्भसे सूर्य और चंद्रमाके भावी अवतारको देखता हूं, इस लिये इसके सामुद्रिकको वारंवार देख रहा था ।' गुरुसे इस तत्त्वको जान कर मंत्रीने उसका अपहरण करके उसे अपनी प्रेयसी (पत्नी) बनाया । क्रमशः उसके पेटसे ज्योतिपेन्द्र ( सूर्य और चंद्र) जैसे वस्तु पाठ और तेजपाल नामक वे दोनों मंत्री अवतीर्ण हुए। वीरधवलका तेजपालको अपना मंत्री बनाना। १८५) किसी समय श्री वीरधवल ने अपने राजकीय व्यापारके भारको ग्रहण करनेके लिये उस तेज पाल की अभ्यर्थना की, तो उसने पहले राजाको उसकी पत्नीके साथ अपने मकान पर भोजनके लिये निमंत्रित किया; और उस समय अनुप मा ने राजपत्नी ज य त ल दे यी को करके बने हुए अपने दोनों ताडक (कर्णश्ल) तथा सोनेके बने हुए और बीच बीचमें मोती और मणियोंसे जड़े हुए कर्पूरमय, एकावली हारको उपहार रूपमें दिया। मंत्री जव उपहार देने लगा तो उसका निषेध करके, वीरधवल अपना राज्यकार्यभार उसके हाथोंमें समर्पण करता हुआ बोला कि- 'इस समय तुम्हारे पास जो धन है उसे, कुपित होने पर भी,म विश्वास पूर्वक कहता हूं कि कभी ग्रहण न करूंगा।' इस प्रकार पत्र पर प्रतिज्ञालेख लिख कर तेजपाल को राज्यव्यापार संबंधी पश्चाग-प्रसाद प्रदान किया। २१३. जो विना करके खजाना बढ़ाये, विना मनुष्य-वध किये देश रक्षा करे और विना युद्ध किये देशवृद्धि करे वही मंत्री बुद्धिमान् कहलाता है। मंत्री तेजपालका धर्मभावसम्मुख होना । १८६) संपूर्ण नीतिशास्त्र और उपनिषत्में वृद्धिको निविष्ट रखने वाला वह मन्त्री अपने स्वामीका यशोवृद्धि करता हुआ, सूर्योदय काठमें विधिपूर्वक श्री जिनकी पूजा करता, और फिर चंदन और करिसे गुरुकी पूजा करता । अनन्तर वादश आवर्तन करके यथाऽप्रसर प्रत्याख्यान ले कर रोज गुरुसे एक एक अर्व श्लोक पदा फरता। राजकार्य करने के बाद ताजी बनी हुई रसोईका आहार करता । एक बार, मुशाल नामक महोपासक, जो उसका निजी लेखक (गुमास्ता ) था, एकान्तमें पूछने उगा कि-'स्वामी सबैरे क्या टंदी रसोई खाते हैं या ताजी !' उसके ऐसा पूछने पर वह मंत्री समझा कि यह गवार है। दो तीन बार उसके ऐसा पूछने पर ३१-१२ ९२२] 'प्रबन्धचिन्तामणि }: ['चतुर्ष प्रकाश एक बार बड़े क्रोधसे 'पशुपाल' कह कर उसे अपमानित किया। वह धैर्य धारण करके बोला-'दोनोंमेंसे कोई एक तो होगा ही। ( अर्थात् या तो मैं गँवार हूं या मेरी बातको नहीं समझने वाले आप गँवार होंगे) उसकी वचनचातुरीसे चित्तमें चमत्कृत हो कर मंत्रीने कहा - 'विज्ञ ! तुम्हारे उपदेशकी ध्वनिको मैं समझ नहीं सका। अब यथार्थ बात बताओ।' ऐसा आदेश पा कर वह वाम्मी बोला कि-'जिस रसमयी ताजी रसोईको आप खाते हैं वह पूर्वजन्मके पुण्यका फल है अतएव मैं उसे अत्यन्त शीतल समझता हूं। जो हो, ये तो मैंने गुरुके संदेश वाक्य ही कहे हैं । तत्त्व तो वे ही जानते हैं, अतः वहीं पधारिये ।' उसकी यह बात सुन कर तेजपाल मंत्री अपने कुलगुरु भट्टारक श्री विजय से न सूरिके पास गया। गुरुसे गृहस्थ धर्मका विधि-विधान पूछ। । उन्होंने उपासक दशा नामक सप्तमाङ्गसे जिनकथित देवपूजा, आवश्यक क्रिया, यतिदान आदि गृहस्थ धर्मका उपदेश दिया। तब उसने विशेषतापूर्वक देवपूजा, जैन मुनियोंको दान आदि देनेवाला धर्मकृत्य आरंभ किया। पूजाके' समय चढाये हुए तीन वर्षतकके द्रव्यको निकाला तो ३६ हजार हुआ उससे श्री नेमीनाथका प्रासाद बनवाया। (यहाँ P प्रतिमें, निम्न लिखित, विशेष श्लोक लिखे हुए पाये जाते हैं-) [१४८ ] मनुष्योंका अपहरण करने वाले समुद्रप्रवासो जनोंका निषेध करके जिसने पृथ्वी पर अपने धर्मका उदाहरण उपस्थित किया । [१४९ ] छुआ-छूतके निवारणके लिये अलग अलग हदवाली वेदी बना कर जिस ( मंत्री ) ने इस (स्तंभ तीर्थ) नगरमें छांछके बेंचनेका विप्लव दूर किया । [१५० ] जिसने, जहाँ पर जो कुछ भी न्यून और जो कुछ भी नष्ट था उसे वहाँ पर पूरा किया । क्यों कि उत्तम पुरुषोंका जन्म रिक्त स्थानोंको पूरा करनेके लिये ही तो होता है। [१५१ ] देवताओंके लिये जिसने ऐसे अनेक उपवन दान कर दिये थे जहाँ पर कामदेवको शिवके नेत्रोंकी अग्निका ताप स्मरण नहीं होता था । [१५२ ] रंभा (१ केला, २ अप्सरा विशेष ) से संभावित, वृषसे निषेवित तथा मनोज्ञ ( १ सुंदर, २ मनको जाननेवाले ) सुमनों (१ श्लों, २ देवताओं) के वर्गसे सुशोभित जिसके वनोंने स्वर्गके सौन्दर्यको ग्रहण किया था। [१५३] हारीत (१ पक्षी विशेष, २ स्मृतिकार ऋपि विशेष ) शुक (१ तोता, २ भागवतका ऋषि) चित्र-शिखण्डी (१ मोर, २ महाभारतका एक वीर) द्वारा संग्रहीत जिसके उपान धर्मशाखफे सधर्मा हो कर मुशोभित हुए। [१५४ ] इसने सुमनोभाव ( १ सुंदर मनोभाव, २ फूलका भात्र ) तथा अतुलनीय श्रीमचाको दिखाते हुए, स्वबंधुके यनोंको (बधुकजातिके पुोंके वनोंको) अपने बन्धुओंकी नाई कर दिया । [१५५ ] जिसके बनाये हुए तालारो से पानी ग्रहण करते हुए कासारगण (भेंस बैठ आदि पशु) समुदसे पानी लेते हुए बादलकी नाई शोभा देते थे । [१५६ ] जिस क्रियानिष्ठ पुण्यात्माने ऐसी कितनी ही बावटियों बनवाई जिनके मीठे जलोंने अमृतको भी तिरस्कृत कर दिया। [१५७ ] उसने पानी पीनेके लिये ऐसे पाठ बनवाये कि जिनका जल.पी कर पायकॉक मुसतो तृप्त हो जाते थे किंतु उनकी शोभा देख कर आँखें कभी तात नहीं होती थीं। य - : 7 प्रकरण १८७] कुमारपालादि प्रयन्ध। [ १२३ [ १५८ ] जिसने यहाँ पर (स्थमतीर्थमें ) भवसागरको पार करनेके लिये नौकाल्प ब्रह्मपुरी वनवाई जिसमें पुरुष तो सामगान करते थे और नारियाँ उसका यशोगान करती थीं। [१५९ ] अपने शुभ्र.ऐसे कीर्तिकट रूप पटसे, दसों दिशाओंका वेष्टन करते हुए स्पष्ट रूपसे, इसने मानों दसों दिशाओंको श्वेतांवर व्रती वनाया। [१६० जिस तारितात्माने ऐसी पौषधशालायें बनाई जो मीतरसे तो श्वेतांबरोंसे (वेताम्बर यतियोंके निवाससे ) और वाहर सुधा (चूनापोती) से विशुद्ध थीं। [१६१ ] जिसकी पौषधशालाओंमें स्त्रीविरहित ऐसे यति वास करते हैं जिनको आत्मभू (पुत्रजन्म तथा पुनर्जन्म ) की कोई संभावना ही नहीं है। [१६२] वाग्देवीने प्रसन्नतापूर्वक जिस मंत्रीको ज्ञानकी ऐसी आंख दी थी कि जिससे यह धर्मकी सूक्ष्म गतिको भी नित्य ही देखा करता था। वस्तुपालकी तीर्थयात्राका वर्णन । १८७) इसके बाद, सं० १२७७ सालमें सरस्वतीकण्ठामरण, लघुभोजराज, महाकवि, महाऽमाय श्री वस्तु पाल ने महायात्रा प्रारंभ की । गुरुके बताये हुए लग्नमें, उन्होंक द्वारा संघाधिपति रूपसे अभिषिक्त हो कर वह जब देवालयके प्रस्थानका उपक्रम कर रहा था, तब दाहिनी ओरसे दुर्गादेवीका स्वर सुनाई दिया, जिसे स्वयं कुछ समझ कर, शकुन शास्त्रके जानकारसे उसका विचार पूछा । मरु देश के एक वृद्ध ( शाकुनिक) ने कहा कि शकुन तो बड़ा भारी हुआ है''शकुनसे भी शन्द बलवान् होता है' यह विचार करके नगरके बाहर आवास (तंबू ) में देवालयको स्थापित किया । फिर उससे शकुनका विचार पूछने पर उस वृद्धने बताया कि, मार्गकी विषमता विपरीत शकुन श्रेष्ठ कहा जाता है ! [ वर्तमानमें ] राजकीय अन्धाधुन्दीकै कारण तार्थ यात्राका मार्ग विषम हो रहा है । तथा जहां पर वह दुर्गा देख पड़ी थी, वहाँ किसी चतुर पुरुपको भेज कर उस प्रदेशको दिखवाइये । वैसा ही करने पर उस पुरुपने बताया कि-'यह जो वंडी (वाडेकी मीत) नई बनाई जा रही है उसके १३॥ हवे थर पर यह दुर्गा वैठी थी। यह सुन कर उस महवृद्धने कहा कि-' देवी आपको सादी तेरह यात्रा करनेकी सूचना करती है।' अन्तिन आधी.यात्राका कारण पूछने पर उसने कहा कि-'इस अतुलनीय मंगटके अवसर पर वह कहना ठीक नहीं है । यथा समय सब निवेदन करूंगा।' इस वाक्यके अनन्तर संघके साथ मंत्रीने आगे प्रयाण किया । उस संवकी सद संख्या यों थो-४॥ हजार वाहन, २१ सौ स्वेतांवर, तीन सौ दिगम्बर, संघकी रक्षाके लिये १ हजार घोड़े, सात सौ टाल सांदनियां और संघरक्षाके अधिकारी चार महासामन्त थे। इस प्रकार सारी सामग्रीक साय मार्ग तै करके, श्रीपाद लितपुरके अपने ही बनाये हुए श्रीमन् महावीर देवके चैत्यसे अलंकृत ललिता सरोवर के मैदानमें डेरा दिया। उस तीर्य पर यथाविधि तीर्थराधना करके मूल प्रासादमें सोनेका कल्दा, दो प्रौद बिन मतियाँ, श्री मोदेरपुरावतार श्री मन्न- हावीर चैत्य तथा उसके आराधक (यक्ष) की मूर्ति और देवकुलिका, मूल मण्डपके दोनों ओर दो दो चौकीकी कतार, शकुनिका विहार तथा सत्यपुरावतार चैत्यके सामने चाँदीके तोरण, प्रासंघके योग्य कई मठ, सात बहनोंकी ७ देव कुटिकायें, नन्दीश्वरावतार-प्रासाद, इन्द्र मण्डप और उसमें हाथी पर चढ़े हुए लवण प्रसाद और वीरधवल की मूर्तियों, वहीं पर घोड़े पर चदी सात पूर्वजोंकी मूर्तियाँ, सात गुरुमतियों, उसाचे निकटकी चौकीमें अपने दो बड़े माई महं० मा ठदेव और गिग की बारावक मूर्तियाँ, प्रोटी, अनुसमा सरोवर, कपर्दि यक्ष नन्हप और तोरण आदि बदुतसे धनस्थान बनवाये । इसी तरह नन्दीश्वरके कनठाने (.कारखाने) के लिये कंटेलिया ।
१२४ ] प्रयन्यचिन्तामणि [चतुर्थ प्रकाश पापाणके बने हुए सोलह खवे पायक पर्वत परसे जलमार्ग द्वारा मँगाये । जवाये खंबे समुद्र के किनारे उतारे जाने लगे तो उनमें से एक स्तंभ इस प्रकार कीघडमें इव गया कि खोजने पर भी न मिला । उसके बदले अन्य पापाणका स्तंभ टगा कर वह प्रासाद पूरा किया गया । दूसरे साल समुद्रके पानीको भरतीके सबबसे यही खंबा कीचडसे बाहर निकल आया। मंत्रीकी आज्ञास.वह खंबा उसकी जगह पर लागाया जाने लगा तो किसी पुरुषने आ कर कहा कि- प्रासाद फट गया है। यह निवेदन करनेको आये हुए पुरुषको भी उस मंगने सोने की जीम इनाममें दी। चतुर आदमियोंने पूछा कि 'यह क्या बात है।' इस पर मंत्रीने कहा कि इसके बाद अब धर्मस्थान ऐसे न बनवाऊँगा कि युगान्तमें भी उनका पतन नहीं होगा । इसी लिये इसे परितोपिक दिया गया है।' फिर तीसरी वार मूल समेत उखाड कर यह प्रासाद बनाया गया जो [ अब भी ] वर्तमान है। श्री पारीताणा में भी उसने एक विशाल पौषधशाला बनवाई। फिर श्रीसंघके साथ यह मंत्री उजयन्त (गिरनार ) पहुँचा । वहा उसकी उपत्यकामें तेजलपुर में स्वयं एक नया वर (परकोटा) बनवाया और उसीमें श्रीमद् आश राज विहार नाममा मन्दिर तथा कुमार देवी नामका सरोवर भी बनवाया । उस निरुपम सरोवरको देखने वाद, जब नियुक्त पुरुषोंने कहा कि 'धवलगृह (महल) में पधारिये ' तो मंत्रीने कहा कि श्री गुरुमहाराजके योग्य पापधशाला भी है या नहीं !' यह सुन कर कि वह बनाई जा रही है, तो वह पिनयके अतिक्रमणमें भी गुरुके साथ, बाहर हो दिये गये आवास (डेरे) में ठहरा । प्रातःकाल उजयन्त पर आरोहण करके श्री शैवेय (नेमिनाथ ) के चरणयुगलकी भली भाँति पूजा कर, स्वयं बनाये हुए श्री शg. जयाय तार तीर्थमें खूब प्रभावनायें कर, तया कल्याण त्रय चैत्यमें श्रेष्ठ पूजोपचारसे अर्चना करके यह मंत्री जब नीचे उतरा इन दो दिनोंमें वह पौषधशाला तैयार हो चुकी थी । मंत्री गुरुको अपने साथ वहाँ ले आया । उन्होंने उन बनाने वालोंकी प्रशंसा की और पारितोषिक दान दे कर उनको अनुगृहीत किया। श्री पचन में प्रभास क्षेत्र में चन्द्रप्रभ देवको प्रणाम करके प्रभावनाके साथ यथोचित पूजा की । फिर अपने बनाये हुए अशाद प्रासाद पर सोनेके कलशका समारोपण करके, देवके पूजारियों को दान दिया । वहाँक ११५ वर्षकी अआस्था या वृद्ध पूनारी के मुंहसे यह सुन कर कि-' यहाँ पर प्रभुश्री हेमाचार्य ने कुमारपाल नृपतिके सामने श्री सोमेश्वर देवको जगविदित रूपसे प्रत्यक्ष क्रिया या उन (प्रभु ) के चरित्रसे मनमें चकित हो कर यहाँस टोटा। रास्तेमें लिंगधारियों के असदाचारको देख कर उन्हें अन्न देने का निषेध किया । यह सुन कर या पटीय ग के श्री निनद चरि ने इस बातसे उसका अपयश समझ कर, अपने उपासकके पाससे उन्हें अन्नदान दिलाया । यह सुन कर यह मंत्री उनके दर्शन और अनुनयके लिये आया तो उन्होंने उसे उपदेश दिया कि २१४. क्षार के समान इन लिंगधारियों की परिपूर्णता हो तो यह शासन (धर्म) रूप समुद्र गंभीरमाको धारण कर रहा है। २१५. संविन साधु भी इन लिंगधारियोंकी अनुपन्दना करते है तो फिर धार्मिक और भाभीक पुरुषको उनकी पूनाको पर्धा क्यों करनी चाहिए । २१६. प्रतिमापारी ( थारू) भी इनके सामने रिपपका स्वाग फरते हैंइस दिये पियगळे इन गिपारियोंकी मात्र मना करना तो रिपेयवाटी बात है। २१७. यो मांग, गिोरियों की बारमा (तिरस्कार) करते है दुराप दर्शन (संप्रदाय) उपासेसि होते हैं।
प्रकरण १८७-१८८] कुमारपालादि प्रबन्ध [ १२५ - . आवश्यक - वंदना नियुक्तिमें कहा है कि- २१८. तीर्थंकरोंके गुण उनकी प्रतिमा ( मूर्ति ) में नहीं है, यह निःशंसय जानता हुआ भी यह तीर्थकर है ऐसा मान कर उसको नमस्कार करने वाला विपुल कर्मनिर्जरा ( कर्मका, नाश) प्राप्त करता है। २१९. इसी प्रकार, जिन देवके प्रज्ञापन किये हुए लिंग (वेप) को नमस्कार करना भी विपुल निर्जराका हेतु है । यद्यपि यह गुणहीन होता है तथापि अध्यात्म शुद्धिके लिये उसे वन्दन करना उचित है। इस प्रकार उनके उपदेशसे अपने सम्यक्त्व रूप दर्पणको मांज कर विशेष रूपसे दर्शन ( संप्रदाय) की पूजामें परायण हो, स्वस्थान पर आ कर ठहरा । मंत्री तेजपालका आबू पर मन्दिर बनवाना । १८८) ज्येष्ठ भ्राता मं० लूणि गने परलोक प्रयाणके अवसर पर यह धर्मव्यय माँगा था कि - अर्बुद गिरि पर विमल व स हि का में मेरे योग्य एक देवकुलिका बनवाना ।' उसके मरने पर, वहाँके गोठियों (पुजारियों) से उस मंदिरमें भूमि न पा कर, विमल व स हि का के समीप ही चन्द्रा व ती के स्वामीसे नई भूमि ले कर वहीं पर तीनों भुवनके चैत्योंमें ( मन्दिरोंमें) शलाका (अग्रगण्य ) जैसा लू णि ग व स हि का प्रासाद बनवाया । उसमें श्री नेमिनाथके विवकी स्थापना करके उसकी प्रतिष्ठा कराई। उस मन्दिरके गुण-दोषका विचारणा करनेके लिये जा वा लिपुर से श्री य शो वीर मंत्रीको बुला कर मंत्री तेज पाल ने प्रासादके विषयों अभिप्राय पूछा । उसने प्रासादके बनानेवाले स्थपति ( कारीगर ) शोभन दे व से कहा . रंगमण्डपमें शालभंजिका (पुतली ) की जोड़ीकी विलास-घटना, तीर्थकरके प्रासादमें सर्वथा अनुचित और वास्तुशास्त्रसे निषिद्ध है। इसी तरह भीतरी गृहके प्रवेश द्वारमें सिंहोंका यह तोरण देवताकी विशेष पूजाका विनाश करने वाला है। तथा पूर्वज पुरुषोंकी मूर्तियोंसे युक्त हाथियोंके सम्मुख प्रासादका होना, बनाने वालेके भविष्यके विनाशका सूचक होता है। इस विज्ञ कारीगरके हाथसे भी जो इस प्रकारके अप्रतीकार्य ये तीन दोप हो गये, यह भावी कर्मका दोष है।' ऐसा निर्णय करके वह जैसे आया था वैसे ही चला गया। उसकी स्तुतिके ये श्लोक हैं - २२०. हे यशोवीर, यह जो चंद्रमा है वह तुम्हारे यशरूपी मोतियोंका मानों शिखर है; और इसमें जो लांछन है वह इस यशकी रक्षाके लिये (किसीकी नजर न लग जाय इस लिये ) किया गया रक्षा (राख) का 'श्री' कार है। २२१. हे यशोवीर, शून्य जिनके मध्यमें हैं ऐसे ये बिन्दु यों तो निरर्थक ही हैं; पर तुम रूप एक (अंक) के साथ हो जानेसे ये संख्यावान बन जाते हैं। २२२. हे यशोवीर, जब विधाताने चंद्रमामें तुम्हारा नाम लिखना आरंभ किया तो उसके पहलेके दो अक्षर ( यशः) ही भुवनमें नहीं समा सके। [१६३ ] यशोवीरके निकट न कोई [कवि] माघ की प्रशंसा करता है न कोई अभिनंद का अभिनंदन -करता है; और कालिदास भी उसके पास कलाहीन (निस्तेज ) माल्म देता है। [१६४ ] यशोवीर मंत्रीने सज्जनोंके साक्षात् ( सम्मुख ), मुखमें रही दांतोंकी ज्योतिके बहाने माझी ( सरस्वती) को और हाथमें रही हुई सोनेकी मुद्राके बहाने श्री ( लक्ष्मी ) को प्रकाशित किया। - [१६५] इस चौहान नरेन्द्र के मंत्रीने वैसे गुण अर्जन किये जिनसे ब्रह्मा और समुद्रको पुत्रियों ( लक्ष्मी और सरस्वती) को भी नियंत्रित कर दिया।
२२६ ] प्रवन्धचिन्तामणि. [चतुर्थ प्रकाश [१६६ जहाँ लक्ष्मी है वहाँ सरस्वती नहीं है, जहाँ ये दोनों है वहाँ विनय नहीं है। पर हे यशोवीर, यह बड़ा आश्चर्य है कि तुममें ये तीनों विद्यमान है। [१६७] वस्तु पाठ और य शो वीर ये दोनों सचमुच ही वाग्देवता ( सरखती ) के पुत्र नहीं तो फिर इन दोनोंका दान करनेमें एक ही जैसा स्वभाव कैसे होता । इस प्रकार श्री शकुंजयादि तीर्थोकी यात्राका प्रबंध समाप्त हुआ। * । वस्तुपालका शंखराजके साथ युद्ध करना। १८९) स्तंभ तीर्थ में, स इद (सय्यद) नामक नौवित्तिक (जहाजी व्यापारी) से श्री वस्तु पाल की लड़ाई होने पर उसने भृगुपुर से शंख नामक महा-सावनिकको वस्तु पाठ के विरुद्ध वालरूप कालको बुलाया। वह समुद्र किनारे डेरा डाल कर रहा । उसने देखा कि नगरका प्रवेशमार्ग शंकुसे (जन समूहसे ) संकीर्ण है और व्यापारियोंके जहाज धनसे भरे हुए हैं। अपने बंदी ( दूत ) को भेज कर वस्तु पाल के साथ लड़ाईके दिनका निश्चय किया। जब उसने चतुरंग सेना सजाई तो वस्तुपाठ ने गुड जातिके भूण पाठ नामक सुभटको आगे किया । भूण पाल ने प्रतिज्ञा की कि- 'शंख के सिवा यदि दूसरे पर प्रहार करूं तो मैं उसे कपिला गौपर ही प्रहार करना मानूंगा'। फिर बोला कि ' अरे शंख कौन है !' इस वचनके उत्तर में प्रतिभट ( शत्रुके सैनिक ) ने कहा कि ' में शंख हूं तो उसे तलवारकी धारसे मार गिराया; फिर इसी रातिसे दूसरे और तीसरेको भी गिरा देनेके बाद बोला कि- 'समुद्रके नजदीक होनेसे क्या शंखों की संख्या बढ़ गई है!' तो महासाधनिक शंखने ही उसकी मुभटताकी प्रशंसा करते हुए बुलाया | उसने फिर भालेके अग्रभागसे उस पर प्रहार करते हुए एक ही प्रहारमें घोड़ेके साथ उसे मार डाला। इसके बाद, समरभूमिके प्रेमी श्री वस्तु पालने, सिंहकिशोर जैसे गजयूथको त्रासित करता है वैसे, शंखके सैन्यको त्रस्त बना कर दसों दिशाओंमें भगा दिया । [पीछे सइद नौविचिक भी मार डाला गया। ] फिर भूण पाल की मृत्यु के स्थान पर मंत्रीने भूणपालेश्वर प्रासाद बनवाया। ( यहाँ P प्रतिमें निम्नलिखित श्लोक अधिक पाये जाते हैं-), [१६८ ) धनुपकी प्रत्यश्चासे काण्डों ( वाणों) की तो सन्धि (सुलह और योग) दुई पर उन वीरप्रकाण्डोंमें परस्पर विग्रह हुआ। [ १६९ ] बार्गाने स्पष्ट ही दुर्जनोंकी सी चेष्टा की । क्यों कि, ये कानमें तो दूसरेके लगते थे और जीवननाश दूसरेका करते थे। [ १७० ] तरकसको छोड़ कर बाण वेगसे धनुष पर आ जाते थे। यही तो सपक्षोंका ( १ अपने पक्षवालोंका, २ पक्षसहितों-बाणीका ) चिह है कि विपत्कालमें आगे रहते हैं। [ १७१ ] विपक्षीय वैरियोंके वक्षःस्थलमें लग कर वाण पार निकल गये। [ सो ठीक ही है ] क्यों कि धारोंके हृदयमें निर्गुणोंको चिर अवस्थान नहीं प्राप्त होता | . :: [.१७२ ] मंत्रीशके हाथके संसर्गसे तलवार भी मानों दान के लिये उघत हो कर, बदष्टि होते हुए भी, क्षण भरमें कोश (१ म्यान, २ खजाना) का, उत्सर्ग ( १, त्याग, २ दान ) किया। [१७३ ] पोरोंके चरण और हाथ रूपी कमलसे पूजित हो कर रणभूमि भी मानों दूर्वारूपी केशोंके साथ सिररूपी फलोंका दान करने उगी1 , * - प्रकरण १८९-१९१] कुमारपालादि प्रबन्ध [१२७६ : १९०) इसके बाद, एक दूसरे अवसर पर,.श्री सोमेश्वर कवि ने यह, काव्य :कहा- २२३. हे सचिव ! आपका [वनाया हुआ] तड़ाग जिसमें चक्रवाक पक्षी चल रहे हैं, और आति ( एक प्रकारके पक्षी जिसको देशभाषामें आड कहते हैं ) क्रीडा कर रहे हैं, वह, अत्यन्त प्रशंसिता ऐसे हंसोंसे, कमल को छू कर हिलोलें लेती हुई तरंगोंसे, अन्तर्गंभीर जलोंसे, और चंचल वकोंके पास होने के भयसे छिपे हुए मत्स्योंसे, तथा किनारे पर उगे हुए वृक्षोंके नीचे मुखपूर्वक शयन' किये हुई स्त्रियोंके गाये हुए गीतोंसे शोभित हो रहा है इसमें प्रयुक्त आति' शब्दके पारितोषिकमें' मंत्रीने कविको सोलह हजार द्रम्मका दान दिया । कभी फिर (किसी समय ) मंत्री चिन्तातुर हो कर नीचे जमीनकी ओर देख रहे थे तब सोमेश्वरने यह यह समयोचित पद्य पढ़ा- २२४. वाग्देवीके मुखकमलके तिलकसमान हे वस्तु पाल ! 'तुम्ही एक मात्र भुवनके उपकारक हो'-ऐसी सजनोंकी बात सुन कर जो लन्नासे सिर झुका कर तुम पृथ्वीतलकी ओर देख रहे हो, सो मैं मानता हूं कि, अब स्वयं पातालसे बलिका उद्धार करनेके लिये कोई मार्ग ढूंद रहे हो। मंत्रीने इस काव्यके पारितोषिकमें आठ हजार दिया। इसी तरह पंडितोंके बार बार इस श्लोकके ये तीन चरण पदने पर कि- २२५. ' कर्णने दानमें चर्म दिया, शिविने मांस दिया, जीमूतवाहनने जीव और दधीचि ने अस्थि दिये'- इस पर पण्डित ज यदे व ने समस्या पदकी नाई [ चौथा पद ] कहा-'और वस्तु पालने वसु (धन) दिया। ऐसा कहने पर उसने ४ सहस्र पाया। इसी प्रकार सूरि ( अपने धर्मगुरु ) के शिष्योंकी प्रतिलाभनाके अवसर पर, किसी दरिद्र ब्राह्मणने याचना की, तो उसके नियुक्त आदमियोंसे उसे एक वन मिला; जिसे पा कर उसने मंत्रीके आगे यह समयोचित 'पप पढा- २२६. हे देव ! कहीं रुई, कहीं सूत, और कहीं कपासके बीज लगी हुई यह हमारी पटी (पिछोडी) तुम्हारे शत्रुओंकी त्रियोंकी कुटीकी तरह दिखाई दे रही है। इसके पारितोषिकमें मंत्रीने १५ सौ दिया । इसी तरह वालचंद्र नामक पंडितने मंत्रीके प्रति यों कहा- २२७. हे मंत्रीश्वर ! गौरी तुम्हारे ऊपर अनुरागवती है, वृष तुम्हारा आदर करता है, भूतिसे तुम युक्त हो और गुणवान् शुभगण तुम्हारे पास हैं । सो निश्चय ही ईश्वर (शिव) की सभी कलाओंसे युक्त ऐसे तुम्हें अब बालचंद्रको ऊंचा स्थान देना उचित है।तुमसे बढ़ कर समर्थ और कौन है। [ गौरी, वृप, भूति, गण, और वालचंद्र-इन शन्दोंके प्रसिद्ध अर्थक अतिरिक्त, गौरी स्त्री, धर्म, वैभव, सेना और बोलने वाला कवि ये क्रमशः श्लेपके अर्थ हैं।] कविके ऐसा कहने पर मंत्रीने उसके आचार्य पदकी स्थापनाके लिये चार हजार दम्म खर्च किया। मंत्रीका मुसलमान सुलतानके साथ मैत्री संयन्ध यांधना। १९१) किसी समय म्लेच्छराज (मुसलमान) सुलतानके गुरु मालिम (मौलवी) को मख (मका) तीर्थको यात्राके लिये वहाँ आया हुआ जान कर उसे पकड़नेके इच्छुक श्रीउवणप्रसाद और वीरधवल ने मंत्री तेज पाठ से सलाह पूछो । उसने इस प्रकार बतापा- १ या मावि छन्द प्रायः संस्कृत साहित्यमें कहीं नहीं प्रयुक्त हुआ है इसलिये इसका अभिनव प्रयोग लिया गया रेसर मंत्रीने सादान दिया मासूम देता है। , । १२८ प्रयत्यचिन्तामणि [चतुर्थ प्रकाश २२८. धर्मछलका प्रयोग करके जो राजालोक ऋद्धि प्राप्त करते हैं, वह मांके शरीरको बेंच कर पैसा कमानेके समान होती है। इस नीतिशास्त्र के उपदेशद्वारा, उन वृक (भडियों) जैसके मुंह से उस छाग (बकरे) को छुड़ा कर और पाथेयादिसे सत्कृत कर, तीर्थयात्रा करनेके लिये रवाना किया । कुछ साल के बाद, वह जब वापस लौट कर आया तो मंत्रीने फिर उचित सत्कारसे उसका आदर किया। इससे वह अपने स्थान पर पहुंच कर अपने सुलतानके सामने ] तीर्थ यात्राका बखान करनेके बदले श्री वस्तु पाल के गुणोंका ही बखान करने लगा। इसके बाद वह सुलतान प्रति- वर्ष मंत्रीके पास यमलकपत्र ( सन्धिपत्र ) भेज कर अनुरोध करता रहा कि-'हमारे देशके आप ही अध्यक्ष हैं, और हम तो आपके सेलभृत् (सामंत) हैं। सो हमें किसी करणीय कार्यका आदेश दे करके सदा अनुगृहीत किया करें। मंत्रीने शत्रुज य तीर्थक भूमिगृहमें रखनेके लिये सुलतानकी अनुज्ञासे, उसके देशमेंकी मम्मा णी नामक खानमेंसे, सैकड़ों प्रयत्न करके युगादि जिनकी एक मूर्ति बनवा कर मंगवाई। सुलतानने अपनेको धन्य मानते हुए वह कार्य करने दिया। वह मूर्ति जब पर्वत पर चढ़ाई जा रही थी तो मूलनायकके अमर्षसे पर्वत पर बिजली गिरी। इसके बाद मंत्रीश्वरको फिर जीवनान्त तक शत्रुजय देवके दर्शन नहीं हुए। अनुपमाकी दानशीलता। १९२) किसी पर्वके अवसर पर, अनुपमा देवी मुनियोंको यथेच्छ निरुपम दान दे रही थी। तब किसी राजकार्यकी उत्सुकताके कारण स्वयं वीरधवल देव उस समय वहा आ पहुंचा तो उसने देखा कि श्वेतांबर साधु-यतियोंकी भीड़से मकान का दरवाजा मानों दटा हुआ है। तब विस्मयसे मनमें चकित हो कर वह मंत्रीसे बोला-- 'हे मंत्री, अभिमत देवताकी भाँति, सदा ही इन साधुओंका इस तरह सत्कार क्यों नहीं किया करते अगर तुमसे न हो सकता हो तो आधा हिस्सा मेरा रहे। मेरा ही सदा दिया जाय - ऐसा तो इस कारणसे नहीं कहता कि वैसा करने पर तो फिर तुमको यह वृथा ही परिश्रम करने जैसा लगे। उसके मुखचंद्रसे इस प्रकार वाणीरूप किरणके निकलने पर मंत्रीके मनका संताप दूर हुआ ओर वह बोला- 'स्वामीका आधा हिस्सा क्या : सब कुछ तो आप ही का है।' यह कह कर उसने वन निछावर किया । १९३) एक दूसरी बार, यतिदानके अवसर पर, अनेक मुनियोंकी भीडके कारण नमन करती हुई श्रीमती अनुपमा की पीठ पर घीसे भरा हुआ एक पात्र गिर पड़ा। यह देख कर मंत्री तेज पाल बड़ा कुपित हुआ । उसे कुपित देख कर अनुपमा ने यह कह कर सान्त्वना की कि-'आप जैसे स्वामी के प्रमावसे ही तो मुनिजन द्वारा गिराये गये पारके घीसे मेरा यह अभ्पन (घृतस्नान ) हुआ।' इस प्रकार उसकी पूर्णदानफी विधिसे चमत्कृत हो कर, मंत्रीने पञ्चाङ्ग प्रसाद पूर्वक उसकी इस उचित उक्तिसे प्रशंसा की- २२९. प्रिय बागीपूर्वक दान, गर्वरहित ज्ञान, क्षमायुक्त शूरता और त्यागसहित धन, ये चार भद्र (मले ) कार्य दुर्लभ है। इस प्रकारकी अनेक दानवार्ताओं से प्रसिद्धी पाने वाली उस देवीकी जैनाचार्याने इस तरह स्तुति की- २३०. समी चचला है, शिवा चण्डी ( कोपना ) है, शची सौतदोपसे दूषित है, गंगा निम्नगामिनी है और सरस्वती याचाल है। इस लिये अनुपमा तो सब तरहसे अनुपमा ही है.। न वीरधवलकी रणशूरता १९०) एक दूसरी बार, लवणप्रसाद और वीरपवळ पंचनामके स्वामी के साथ संग्राम करने पर-तुळे। तब यो वीरयल की पत्नी जपत उदेषी सन्धिविधानकी इच्छासे अपने पिता प्रतीहार वंशीय.श्री यह प्रकरण १९१-१९७ ] कुमारपालादि प्रबन्ध [१२९ शोभनदेव के पास गई तो उसने कहा कि क्या-' वैधव्यसे डर कर सन्धि कराने आई हो ! तब अपने वारचूड़ामणि पति वीर धवल को उन्नत वनाती हुई वह बोली-'केवल पितृकुलके विनाशकी आशंकासे मैं बारंबार ऐसा कह रही हूं। जब वह वीर घोड़े पर चढ़ेगा तो ऐसा कौन सुभट है जो उसके सामने खड़ा रहेगा!' कह कर वह सकोध चली गई। लड़ाई छिड़ने पर वीरधवल को [ एक सख्त ] प्रहार लग गया और उसकी व्यथासे व्याकुल हो कर वह जमीन पर गिर पड़ा । तब सुभटोंका दिल कुछ हिम्मत हारता हुआ देख, लवण- प्रसाद ने अपनी सेनाको यह कह कर उत्साहित किया कि- 'अरे! यह तो केवल एक ही सैनिक गिरा है ऐसा कह कर समस्त शत्रुसेनाका खेलमें ही समूल घस कर दिया । सत्त्वगुणसे दीप्त वह वीरधवल [ इस प्रकार ] रणरसिकताके वश हो कर इक्कीस वार अपने पिताके आगे गिरा था। वीरधवलकी २३१. वह भीम जैसा पराक्रमशाली ( वीरधवल ) पञ्च प्राम की समरभूमिमें घावोंके लगने पर घोड़ेकी पीठ परसे गिरा, पर गर्वसे नहीं । १९५) वीरधवल की आयुके अन्तमें, प्रतितीर्थ (परलोक ) को प्रस्थान करने वालेको दान करनेसे एकका हजार गुणा मिलता है, इस रूदिके अनुसार ते ज पाल ने अपने सारे जन्मका पुण्य दान कर दिया । फिर जब वह स्वामी चल बसा तो उसके सौभाग्यके अतिशयसे १२० सेवकोंने सहगमन किया । तब तेजपाल ने प्रेतवनमें पहरेदारोंको बिठा कर लोगोंको उस आग्रइसे निपिद्ध किया । २३२. अन्यान्य ऋतु तो आती-जाती रहती हैं पर ये दो ऋतु आ कर फिर नहीं गई । वीरधवल वीरके विना प्रजाओंकी आंखोंमें वर्षा और हृदयमें प्रोप्म [ सदाके लिये रह गई।] १९६) इसके बाद, मंत्रीने वीरधवल के पुत्र वी स ल देव को राजपद पर अभिपित किया। मृत्यु। अनुपमाकी मृत्यु । श्री अनुपमा देवी की मृत्यु के बाद श्री तेजपाल के हृदयमें जो शोककी गांठ बंध गई वह किसी तरह छूटती नहीं जान कर, वहां पर आये हुए श्री विजय से न सूरिसम समर्थ पुरुषके द्वारा वह विपत्ति शान्त कराई गई । कुछ चेतना होने पर लज्जित तेजपाल से सूरिने कहा- हम इस अवसर पर तुम्हारी लीला देखने आये थे । तो वस्तु पाल ने पूछा कि-' वह क्या ?' इस पर गुरुने कहा-'हमने शिशु तेजपाल को न्याहने के लिये जब धरणि ग के पाससे उसकी कन्या इस अनुपमा की मंगनी की थी, तब स्थिरपत्र-दानके पश्चात् एकान्तमें उस कन्याको विरूपताकी बात सुन कर, इसने उसका संबंध भंग होनेके लिये चन्द्रप्रभके मन्दिरके आहातेमें प्रतिष्ठित क्षेत्राधिपतिको आठ द्रम्म का भोग चढाना माना था।और इस समय उसके वियोगमें पागल हो गये हैं । इन दोनों वृत्तान्तों से कौनसी बात सच्ची है ? ' इस प्रकार उस पुराने संकेतसे तेज पाल ने अपने हृदयको दृढ़ किया। वस्तुपालकी मृत्यु । १९७) फिर दूसरी बार, जब मंत्री वस्तु पाल पूर्णायु हुए तो शत्रुज य की यात्राको इच्छा की । यह जान कर पुरोहित सोमेश्वर देव वहाँ आया! अमूल्य आसन देने पर भी जब वह नहीं बैठना चाहा तो कारण पूछने पर बोला- १३०] प्रयन्धचिन्तामणि, [चतुर्थ प्रकाश २३३. श्री वस्तु पाल के अन्न-दान, जल-पान, और धर्मस्थानोंसे तो पृथ्वीतल, और यशसे सारा आकाश-मंडल ढंक गया है। इसलिये स्थानाभावके कारण नहीं बैठ रहा हूं। उसकी इस वाणीके निमित्त उचित पारितोषिक दे कर, उससे विदा मांग कर, मंत्रीने रास्तेमें प्रस्थान किया। आं के वाली या प्रामकी एक गंवार झोपडीमें दाभकी चटाई पर बैठा हुआ, गुरुद्वारा आराधना करता हुआ आहारका त्याग करके, अन्तिम आराधनासे कलिमलका ध्वंस किया और अन्तमें युगादिदेवका ही जाप करता हुआ- २३४. सज्जनोंके स्मरण करने लायक ऐसा कुछ भी सुकृत नहीं किया। केवल मनोरथ ही करते हुए हमारी यह आयु चली गई। इस वाक्यके अन्तमें ' नमोऽईद्भ्यः नमोऽहद्भ्यः' ( अर्हतोको नमस्कार ) इन अक्षरोंके उच्चारणके साथ ही सप्तधातुबद्ध इस शरीरका त्याग करके, स्वकृत उत्तम पुण्यफलको भोगनेके लिये, उसने स्वर्ग लोकको अलंकृत किया। उसके संस्कार स्थान पर छोटे भाई तेजपाल और पुत्र जै त्रसिंह ने श्री युगादि देवकी दीक्षावस्थाकी मूर्तिसे अलंकृत स्वर्गारोहण प्रासाद बनवाया । २३५. आज, मेरे पिताकी आशा फलपती हुई, माताके आशीर्वादका अंकुर उगा, जो मैं इस प्रकार अखिन्नभावसे युगादि देवकी यात्रा करनेवाले लोगोंको [अपनी शक्ति-भक्तिस] संतुष्ट कर रहा हूं। २३६. जिन लोगोंने राजाकी सेवाके पापसे कुछ भी पुण्यार्जन नहीं किया उन्हें हम धूलिधावक (धूलके ढोहनेवाले) लोगोंसे भी अधमतर समझते हैं । ये तथा अन्य काव्य स्वयं वस्तु पाल महाकविके रचित हैं। २३७. स्वामिके गुणोंसे पूर्ण वह वीरधवल एक निस्सीम प्रभु हुआ, विद्वानों द्वारा भोजराजका बिरुद प्राप्त करने वाला वस्तु पाल एक अद्वितीय कवि हुआ, प्रधानवर्गमें वह ते ज पाल अद्वितीय मंत्रीश्यर हुआ और गुणोंसे अनुपम ऐसी अनुपमा उसकी स्त्री एक साक्षात् लक्ष्मी हुई। * इस प्रकार श्री मेरुतुंगाचार्यविरचित प्रबंधचिन्तामणिमें श्री कुमारपाल भूपाल प्रमुख-मंत्रीश्वर वस्तुपाल और तेजःपालतकके महापुरुपोंके यशका वर्णन करनेवाला यह चौथा प्रकाश समाप्त हुमा ।
११. प्रकीर्णक प्रवन्ध। अब, यहाँपर पूर्वोक महापुरुषोंके चरित्रके वर्णनमें जो रह गये हैं उन तथा [वैसे ही ] अन्य चरित्रोंका वर्णन इस प्रकीर्णक-प्रकाशमें प्रारंभ किया जाता है। वे इस प्रकार हैं- विक्रमादित्यकी पात्रपरीक्षा। १९८) उस अवन्ती पुरी में, जिसके निकट ही सि प्रा नदी वह रही है, प्राचीन कालमें श्री विक्रमादित्य राजा राज्य करता था। उसने सुना कि उसके सत्रागारमें विदेशी लोग भोजनके अनन्तर जो सो जाते हैं वे फिर नहीं उठ पाते (अर्थात् मर जाते हैं ); इससे विस्मयसे मनमें चकित हो कर राजाने कारण जानना चाहा । उन सभी पथिकोंको दूसरे दिन वस्त्रसे ढंकवा दिया और उस चिरनिद्राकी वातको गुप्त रखनेकी आज्ञा दी। फिर दूसरे दिन आये हुए अन्य पथिकोंको उसी तरह भोजन कराया और सायंकाल उनको उष्ण जल तथा चरणोंमें लगानेके लिये तेल दिया गया। जब वे सब सो गये तो, महानिशामें राजा अपने हाथमें कृपाण ले कर स्वयं एकान्त जगहमें छिप कर खडा रहा । वहाँ कोनेमें पहले धुआँ निकला, फिर आगकी लपट और फिर प्रकाशित फणाकी रत्नप्रभासे अलंकृत सहस्रफण ऐसे नागको निकलते देखा । आश्चर्यसे चमत्कृत हो कर राजा जव सवि. स्मय उसे देखता है, तो वह फणींद्र उस दिनके सोये हुए प्रत्येक पथिकसे पूछने लगा कि वह किस चीज़का पात्र है ! उनमेंसे प्रत्येकने, किसीने अपनेको धर्म-पात्र, गुण-पात्र, तपःपात्र, रूप-पात्र, काम-पात्र या कीर्ति-पात्र इत्यादि इत्यादि बताया । अज्ञान और यदृच्छावश उसके शापसे उन्हें मरते देख श्री विक्रम ने आगे बढ़ कर हाथ जोड़ कर कहा- २३८. हे भोगीन्द्र (नागराज ), पृथ्वीपर बहुधा गुणके योगसे पात्र हुआ करते हैं। किन्तु शुद्ध श्रद्धा- से जो पवित्र बना हुआ मन है वही परम पात्र है । इस प्रकार नागराजने अपने ही आशयको कहनेवाले वि क मा दित्य के प्रति कहा कि ' वर माँगो'। श्री विक्रमादित्य ने कहा कि ' इन पथिकोंको जीवित वनाओ' । इस प्रकारका वरदान माँगने पर उसने फिर विशेप भावसे उसे संतुष्ट किया । इस प्रकार श्री विक्रमकी पात्रपरीक्षाका यह प्रबंध समाप्त हुआ। . मरे हुए नंदका पुनर्जीवन । १९९) एक वार, पाटलीपुत्र नगरमें, अत्यन्त आनन्दपरायण ऐसे नंद राजाकी मृत्यु होनेपर, उसी समय एक कोई ब्राह्मण वहाँ आया और दूसरेके शरीरमें प्रवेश करनेवाली विद्याके द्वारा राजाके शरीरमें प्रवेश कर गया । उसीके संकेतसे एक दूसरा ब्राह्मण राजाके द्वारपर आ कर वेदोच्चार करने लगा, जिससे राजा जी उठा और फिर उसने अपने कोपाध्यक्षोंसे उसको एक लाख स्वर्ण दिलाया। इस वृत्तान्तको जान कर महामंत्रीने सोचा कि यह नंद पहले तो बड़ा कृपण था और इस समय बड़ा उदार हो रहा है सो यह बात चिंतनीय है । ऐसा जान कर उस ब्राह्मणको पकड़वा लिया और पर-काय-प्रवेशकारी विदेशीको सर्वत्र हुँदवाया तो यह माझ्म पड़ा कि, कहीं पर एक मुर्देकी, कोई एक आदमी रखवाली कर रहा है । तो उसे चितापर चदवा कर भस्म करवा दिया। अपने अतुलनीय मतिवमवसे उस पूर्व नंदको ही अपने महान् साम्राज्यमें फिर निमा लिया। इस तरह यह नंद प्रबंध समाप्त हुआ। * १३२] प्रयन्धचिन्तामणि [पंचम प्राय राजा शिलादित्य और मल्लवादी सूरिका प्रवन्ध । २००) खेड़ा नामक महास्थानमें, देवा दित्य नामक ब्राह्मणकी अति रूपवती वालविधया सुभ गा नामक पुत्री, प्रातःकाल सूर्यको अर्घ्यकी अञ्जलि दान किया करती थी। तब, अज्ञातरूपसे सूर्यसे उसका संयोग हो गया और वह भोगरूप हो कर उससे उसको गर्भ रह गया। माँ बापने किसी तरह इस असमंजस कार्यको जब जाना तो उसे कुछ कह-सुन कर अपने स्वजनोंद्वारा कल भी नगरीके पास छुड़वा दिया । वहाँ उसको पुत्र पैदा हुआ, जो क्रमशः बड़ा हो कर, समवयस्क शिशुओंके साथ खेलते समय, इस प्रकार अपमानित किया जाने लगा कि, वह बिना वापका है । तब, मौके पास आ कर उसने अपने पिताके बारेमें पूछा तो उसने कहा कि में कुछ नहीं जानती'। इससे अपने जीवनसे विरक्त हो कर उसने मर जाना चाहा, तो फिर सूर्यने प्रत्यक्ष हो कर हाथमें कंकह दे कर उसकी सान्चना की। उन्होंने कहा कि-'तुम्हारी मातासे सम्पर्क करनेवाला में सूर्य तुम्हारा पिता हूँ। यह कंकड़ अगर अपने किसी पराभव-कारीपर फेंकोगे तो शिलारूप हो कर उसको लगेगा; पर किसी निरपराधको मारोगे तो फिर तुम्हारा ही अनर्थ करेगा। यह कह कर सूर्य तिरोधान हो गये। फिर अपने कितने एक पराभवकारियोंको मारता हुआ वह ' शिला दित्य ' इस सार्थक नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस नगरके राजाने उसकी परीक्षा करनी चाही । तो उसी शिलासे उसे मार कर वह स्वयं राजा बन गया । सूर्य नारायणके प्रसादसे प्राप्त ऐसे अश्वपर चढ़ कर वह सदैव आकाश-चारीकी नाई खेच्छया विहार करता हुआ अपने पराक्रमसे दिगन्तको आक्रान्त कर रहा । फिर चिर कालतक राज्य करके, जैन मुनियोंके संसर्गसे उसने सम्यक्व रत्नको प्राप्त किया और श्री शत्रुज य तीर्थकी अपरिमित महिमाको जान कर उसका जीर्णोद्धार किया । चौद्धों और जैनोंमें वाद-विवाद । २०१) एक बार, उस शिलादित्य के सभापतित्वमें, बौद्धों ओर [जैन ] श्वेताबरोंने परस्पर इस शर्तपर शास्त्रार्थ किया कि-जो [ पक्ष] पराजित होगा उसको देश-त्याग करना पड़ेगा। खेतांबरोंके पराजित होनेपर शिलादित्य ने उन सबको अपने देशसे निकाल दिया; पर अपरिमित गुणवान् ऐसे उसके भानजे मल्ल नामक क्षुल्लकको उपेक्षा दृष्टि से देखते हुए बौद्धोंने उसे वहीं रहने दिया । और इस प्रकार अपनेको विजयी मानते हुए वे शत्रुज य तीर्थपरके श्रीयुगादि देवको बौद्ध रूपसे पूजने लगे। क्षत्रिय कुलमें उत्पन्न होनेके कारण उस मल्ल के दिलमें वह वैरभाव बस रहा, और वह उसका प्रतीकार सोचता रहा। जैन दर्शन (आचार्यो) के अभावमें उन्हींके पास वह अध्ययन करने लगा और दिन रात उसी में चित्त लबटीन रखने लगा। एक बार, बड़ी गमीकी अर्द्ध रात्रिको, जब समस्त नागरिक लोग नांदसे ऑखें बंद किये हुए थे, यह दिनमें अभ्यस्त शाखको जोर-जोरसे याद करने लगा। उसी समय आकाशमार्गसे जाती दुई श्री भारती देवीने पूछा कि- मीठे क्या हैं !' उसने चारों और देख कर, बोलनेवालेको न पा कर उत्तर दिया । वल्ल'। फिर ६ महीनेके बाद उसी समय लोटती हुई चाग्देवीने फिर पूछा ' किसके साथ !'; तब पुरानी बातको स्मरण करके उसने प्रत्युत्तर दिया कि 'धी और गुहके साथ '। उसकी स्मरण रखनेकी इस अद्भुत शकिसे चमत्कृत हो कर [ भारतीने ] आदेश दिया कि 'वर माँगो'। उसने इस श्राशपकी याचना की कि ' सौगों (बौद्धों) को पराजित करनेके लिये किसी प्रमाण शास्त्रके देनेकी कृपा करो।' इसपर भारतीने नय-चक्र' प्रन्य अर्पण करके उसे अनुगृहीत किया। इसके बाद भारतीके प्रसादसे तत्व समझ कर शिलादित्य की अनुज्ञास, बौद्धोंके मठमें 'तृणोदक ' फेंक कर, राजसभामें पूर्वोक शर्तके साथ उनसे शासर्थ किया। जिसके कण्ठपीठमें वाग्देवता अवतीर्ण हुई थी ऐसे उस श्रीमछने शीघ्र ही उन्हें निरुचर कर दिया। बादमें राजाज्ञासे उन सब बौद्धाको देशमसे निकाला गया और जैनाचार्योको बुलाया गया। इस प्रकार बौदोंको जीतने के बाद वह मन वादी' कहलाने टगा और फिर राजाको प्रार्थनापर - प्रकरण २००-२०३] प्रकीर्णक प्रवन्ध । [१३३ गुरुने उसे सूरिपद दिया । तबसे उनका नाम हुआ श्री मल्ल वा दी सूरि । गणभृतके समान वे प्रभावक हुए। अतएव श्री संघने, नवाझवृत्तिकार श्री अभय देव सूरिने जिसको प्रकट किया उस स्तम्भ न क तीर्थ की विशेष उन्नतिके लिये, उनको चिन्तायक (व्यवस्थापक) रूपमें नियुक्त किया। इस प्रकार यह मल्लयादि प्रबंध समाप्त हुआ। . वलभी नगरीके विनाशकी कथा । २०२) मरु म ण्ड ल के पल्ली ग्राम में काकू और पाता क नामक दो भाई रहते थे । उनमें जो छोटा था वह धनवान् था और जेठा उसीके घर नौकर था । किसी समय, वर्षा ऋतुके निशीथ कालमें, दिनभरमें किये हुए कामसे थक कर का कू सोया हुआ था। छोटेने कहा-'भैया, अपनी [खेतकी ] क्यारियोंमें पानी भर गया है, उनकी मेंड टूट गई है और तुम निश्चिंत वैठे हो' यह कह कर उसे फटकारा । वह उसी समय, बिछौना छोड़ कर और फंधेपर कुद्दाल रख कर, अपने नसीवकी निंदा करता हुआ जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि कई मजदूर टूटी हुई मेंडोंकी मरम्मत कर रहे हैं। उन्हें ऐसा करते देख उसने पूछा कि 'तुम लोग कौन हो?' उन्होंने कहा कि 'आपके भाईके चाकर हैं।' इसपर उसने पूछा कि ' भला मेरे भी कोई चाकर कहीं है ? तो उन्होंने कहा कि ' व ल भी न गरी में हैं । वह फिर अवसर पा कर अपने सर्वस्वको गहड़में बाँध कर, उसे सिरपर उठा कर, व ल भी में आया। वहाँ सदर दरवाज़ेके समीपवर्ती आभीरोंके पास निवास करने लगा । उन्होंने अत्यन्त गरीब समझ कर उसे 'रंक' कहना शुरू किया । रंक घासकी झोपड़ी बना कर, और घासहीसे उसे छा कर रहने लगा । उसी समय कोई कार्पटिक (जोगी) कल्प-पुस्तकके आधारसे, रैवत शैलसे एक तुंबेमें सिद्धरस कर, मार्ग अतिक्रम करता हुआ [ चला आ रहा था । अचानक ] उस तुंवेमेंसे ' काकूय तुम्बडी ' ( काकूकी तुम्बड़ी ) इस प्रकारकी अशरीरिणी वाणी हुई; जिसे सुन कर वह वड़ा विस्मित हुआ; और फिर डरता हुआ उस छिपे हुए बनियेक घरमें, यह सुन कर कि वह एक रंक है, निश्शङ्क-भावसे उस रसवाले तुवेको थातीके रूपमें रख दिया । यहाँसे वह सोमेश्वर की यात्राके लिये चला गया। एक दिन [रंकने ] किसी पर्वके अवसरपर देखा कि, पाक करनेके लिये चूल्हेपर चढ़ाई हुई कड़ाहीमें, तुंबेसे निकले हुए रसके गिरनेसे वह सोनेकी हो गई है । इससे उस बनियेने मनमें निर्णय किया कि यह सिद्धरस है । तब उसने उस तुंबेके साथ अपने घरका सब कुछ सामान अन्यत्र पहुँचा कर घरको आग लगा कर भस्म कर दिया । नगरके दूसरे दरवाजेपर बड़ा मकान बनवा कर वहीं रहने लगा । एक वार, किसी घी वेचनेवालीसे घी खरीद रहा था। खुद ही तौल करते हुए उसने देखा कि उसमेंसे घी खूटता ही नहीं है । नीचे देखा तो घौके पात्रके नीचे कृष्ण चित्रक [लता ] की कुण्डलिका नज़र आई । फिर किसी प्रकार छल करके उसे उठा लिया और इस प्रकार उसे चित्रक सिद्धि प्राप्त हो गई । इसी तरह अगणित पुण्यके प्रभावसे उसे सुवर्णपुरुषको सिद्धि भी प्राप्त हुई । इस प्रकार तीनों प्रकारकी सिद्धिसे कोटि-कोटि संख्या धन एकत्र करके भी, उसने अत्यन्त कृपणतावश, किसी सत्पात्र या तीर्थमें उदारता पूर्वक उसका खर्च करना तो दूर रहा, बल्कि सब लोगोंके सर्वस्वके हरण करनेकी इच्छासे, उस लक्ष्मीको सफल विश्वके लिये कालरात्रिके समान प्रकट किया। २०३) ऐसेमें, राजाने अपनी लड़कीके लिये, उसकी लड़कीकी रलखचित सुवर्णकी कंघीको जबर्दस्ती उससे छिनवा ली । इससे विरोधी हो कर वह स्वयं म्लेच्छ मण्डल में गया और वलभीके राज्यका नाश करानके लिये, करोडोंका सोना दे कर, वहाँके वलवान गजाको देशपर चढा लाया । उस (रंक) के द्वारा अनुपकृत, उस रानाके एक उत्रधरने, रात्रिके शेप भागमें, जब कि राजा सुप्त जाग्रत अवस्थामें या, पहटेसे ही ठीक किये हुए, १३४ ] प्रवन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश किसी पुरुपके साथ इस प्रकार वात-चीत करने लगा कि-'हमारे स्वामीको अच्छी सलाह देनेमें कोई चूहा भी नहीं दिखाई देता; जिससे यह अश्वपति महीमहेन्द्र ( राजा) एक मामूली वनियेके कहनेसे-जिसका न तो कोई कुल- शील ही मालूम है और न यही मालूम है कि वह कोई अच्छा आदमी है या बुरा; और फिर जो नामसे भी और कर्मसे भी रंक बना हुआ है-सूर्यपुत्र शिलादित्य के प्रति चल पड़े हैं !' उसकी इस यथार्थ पध्य वातको सुन कर, चिचमें कुछ विचार करके, राजाने उस दिन आगे प्रयाण करनेमें विलंब किया । तब, उस सशंक रंकने, इस बातकों निपुणभावसे जान कर, उस छत्रधरको काञ्चन-दान दे कर सन्तुष्ट किया । तब फिर दूसरे दिन [ वहीं छत्रधर बोला ] चाहे विचार करके या विना विचारे ही यह राजा प्रयाण करके चल पड़ा हो; पर अब 'सिंहके उठाये हुए पैरकी नाई' इस कहावतके अनुसार आगे चठनपर ही इसकी शोभा है। क्यों कि- २३९. खेल ही में जिसने हाथियों का दलन किया है उस सिंहको, लोग चाहे मृगेन्द्र कहें चाहे मृगारि, ये दोनों बातें सिंहके लिये तो लजाजनक ही हैं। और फिर इस पराक्रमशाटीके सामने ठहर भी कौन सकेगा ?' उसकी ऐसी बातोंसे उत्साहित हो कर, भेरी के निनादसे पृथ्वी और आकाशके अंतरालको बधिर करते हुए उस म्लेच्छराजने आगे प्रयाण किया । इधर उस अवसरपर व ल भी स्थित चन्द्रप्रभका विव, अम्बा और क्षेत्रपाल के साथ, अधिष्ठायक देवताके वलसे आकाश मार्ग द्वारा शिवपत्तन (सोम नाथ)की भूमिको प्राप्त हुआ। रथपर अधिरूढ श्री वर्धमानकी अनुपम प्रतिमाने, अदृश्य भावसे, अधिष्टात देवताके वलसे रास्तेमें चलते हुए आश्विनी ( आश्विन मासकी) पूर्णिमाके दिन श्री माल पुर को अलंकृत किया। अन्य अतिशयाली देवमूर्तियोंने भी यथोचित भूभागको अलंकृत किया । उस नगरकी अधिष्ठातृ देवताने श्री वर्ध मा न सूरिके साथ, उत्पातज्ञापन के समय [ इस तरहकी बातें की ]- २४०. 'हे देवीके सदृश सुंदरि, तुम किस कारणसे रो रही हो सो वताओ'; ' हे भगवन् , मैं व ल भी पुर का भंग देख रही हूँ । इमका प्रमाण यह है कि आपके साधु लोग भिक्षामें जो दूध पापेंगे वह तब रक्त हो जायगा 1 [ फिर यहाँसे जा कर ] मुनियोंको उसी स्थानपर रहना चाहिये जहाँ पानी भी दूध हो जाय । इसके बाद, जब वह उत्पात दुआ और नगरीके पास म्लेच्छ सेना आ गई, तो देशभंगके पापपंसमें फसे हुए रंक ने धन दे कर, पंच शन्दवाले वायोंके वजानेवालोंको अच्छी तरह फोड लिया। जब शिलादित्य घोहे- पर चढ़ने लगा तो उन्होंने ऐसा प्रतिशब्द किया, जिससे वह घोड़ा, गरुड़की भाँति आकाशमें उह गया । यह देख कर राजा शिलादिस्य किंकर्तव्यमूह हो रहा ओर उन म्लेच्छोंने उसे मार डाला | फिर तो म्लेच्छोंने खेल ही में व उभी शहरको तहस-नहस कर दिया । २४१. विक्रमादित्य के समयसे ३७५ वर्ष बाद, वल भी न गरी का यह भंग हुआ। इस प्रकार शिलादित्य राजाकी उत्पति, रककी उत्पत्ति और उसके द्वारा किये गये वलभी-भंगका यह प्रबन्ध समाप्त हुआ। श्रीपुंजराजकी उत्पत्ति। २०४) श्रीरलमाल नगर में रल शेखर नामक राजा हुआ। वह किसी समय, दिग्विजयसंबंधी यानासे वापस लौट कर अपने नगरमें आया। प्रवेशके महोत्सव के समयमें, वाजारकी शोभाकी सजावट देखता हुआ जब ना रहा था, तब एक हाटमें काठके पात्र (कठीत) सहित कुदालको रखे हुए देखा । महटमें प्रवेश करने के बाद जब महानन टोग उपहार कर आये तो उनसे पूछा कि 'आप सब लोग मुखी तो हैं तो उन्होंने कहा- प्रकरण २०३-५] प्रकीर्णक प्रबन्ध [ १३५ यह ' नहीं महाराज, हम लोग सुखी नहीं हैं।' उनके ऐसा कहनेपर विभ्रमसे भ्रान्तचित्त हो कर उनको विदा किया; और फिर कभी किसी बातकी विचारणाके समय नगरके प्रधान जनोंको बुला कर पूछा कि 'आप लोग क्यों सुखी नहीं हैं !' और साथ ही काठके पात्रके साथ उस कुदालको ऊंचा करके पैसे रखनेका कारण भी पूछा । उन्होंने कहा कि-'जहाँपर स्वामीने काष्ठपात्र आदि देखा है वह धनी, अपने धनकी गिनती न जान कर, कठौतसे ही उसकी नापको जतानेका संकेत करता है। और हम लोग सुखी नहीं हैं सो तो आपके सन्तानाभावसे । यह नगर कोटिध्वजोंसे भरा है। आपने चिर कालतक इसका लालन किया है, पर अव कौन इसे उन्नत बनावेगा?' सुन कर राजाने अपने अंत:पुरकी पुरानी रानियोंको बंच्या समझ कर नई रानीक करनेकी इच्छा की। तब उसकी अनुमति पा कर वे लोग, पुष्य नक्षत्रवाले रविवारके दिन,पुण्यार्क योगमें, किसी बडे शकुन शास्त्रज्ञके साथ शकुनागारमें गये। वहाँ पर, एक मात्र लकड़ीका बोझ उठा कर अपना पेट भरनेवाली ऐसी कंगालिन स्त्रीको देखी जिसके सिरपर दुर्गा बैठी थी और जो आसनप्रसववाली स्थितिमें थी । शकुनइने उसकी अक्षतादिसे पूजा की। उन लोगोंने कारण पूछा तो उसने कहा कि अगर वृहस्पतिका मंतव्य सच है, तो इसके गर्भ में जो कोई लड़का है वही यहाँका भावी राजा होगा। इस बातको असंभव समझ कर उन्होंने लौट कर मानोन्नत उस राजाको, ज्यों की त्यों, वह सब बात कह सुनाई । राजाने इससे मनमें खिन्न हो कर, अपने निजी मनुष्यों को भेज कर, उस स्त्रीको जमीनमें गाड़ देनेकी आज्ञा की। उन्होंने जा कर उससे कहा कि ' इष्ट देवताका स्मरण कर लो। उनके ऐसा कहनेपर वह मरणभयसे व्याकुल हो उठी । इतनेमें संध्याके हो जानेसे उनकी अनुज्ञा ले कर वह शौच जानेके लिये गई, तो चहीं उसको पुत्रका प्रसव हो गया । वह उसे वहीं छोड़ कर लौट आई। फिर उसको जमीनमें गाड़ कर उन मनुष्योंने राजाको उसकी सूचना दी । इधर एक हिरनी उस बालकको, नित्य दोनों शाम दूध पिला कर, बड़ा करने लगी। उस समय, महालक्ष्मी देवीके सामनेको टंकशालामें जो नया शिक्का पडने लगा उसमें हिरनीक चार पैरके नीचे एक बालककी प्रतिकृति पडती हुई देखी गई, जिसके कारण लोगोंमें यह बात फैलने लगी कि कोई नया राजा उत्पन्न हुआ है। इससे उस रत्न शेखरने पता लगवा कर उस बच्चेको मरवा डालने के लिये चारों ओर अपने सैनिक भेजे । उन्होंने प्रयत्न करके उस वालकको प्राप्त किया। लेकिन बाल-हत्याके भयसे स्वयं उसे न मार कर, नगरके सदर दरवाजेके रास्तेमें इस तरह रख दिया, कि जिससे सार्यकालके समयमें, उस मार्गसे निकलनेवाली गायोंकी खुरीकी चोटोंसे आप ही आप यह मर जाय और लोकमें कोई अपवाद न हो। उसे वहाँ छोड़ कर, कुछ दूर खड़े हुए, वे जब देखने लगे तो उतनेमें वहाँ गायोंका एक झुंड आता उन्हें दिखाई दिया । पर, मानों मूर्तिमंत पुण्यके पुंजकी नाई उस बालकको देख कर वे सब गायें, पैरोंसे स्तंभितकी नाई, खड़ी रह गई। इसके बाद, पीछेसे आगे आ कर एक साँडने, वृषभ जैसे ही तेजस्वी उस वालकको, अपने पैरोंके बीचमें रख कर, सब गायोंको आगे चलनके लिये प्रेरित किया। बादमें, इस वृत्तान्तको सुन कर, राजा उन सामन्त और नगर लोकोंके द्वारा, उस वालकको मॅगा कर, अपने पुत्रकी नाई उसका पालन करने लगा। श्री पुख' ऐसा उसका नाम रखा गया । । . * श्रीमाताकी उत्पत्तिका वर्णन । २०५) इसके बाद, जब वह रत्न शेख र राजा स्वर्गगामी हुआ तो श्री पुत्र का अभिषेक हुआ। कुछ दिन राज्य करनेपर उसके एक पुत्री पैदा हुई । यद्यपि वह सर्वाग सुन्दर थी पर मुँह उसका वानरका-सा था । इससे वह विषयविमुख हो कर वैराग्यके साथ रहने लगी और श्री माता के नामसे प्रसिद्ध हुई। एक बार उसे अपने 'पूर्व जन्मका स्मरण हो आया । पिताके सामने उसने उसे निवेदन किया कि-' में पूर्व जन्ममें अर्बुद १३६ ] प्रबन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश गिरि पर बानरकी स्त्री यौ । वहां पर किसी एक वृक्षको, एक शाखासे दूसरी शाखापर कूदते हुए, कोई अगम्य शल्यसे तालमें विद्ध हो कर मैं मर गई । उसीके नीचे कामिक नामक तीर्थका कुण्ड था जिसमें मेरा धड़ गिर पड़ा। उस तीर्थक पुण्य-प्रभावसे मेरा यह शरीर तो मनुष्यका हो गया; किन्तु वह मेरा मस्तक अभी तक वैसे ही पड़ा है इसलिये मैं बानरके मुखवाली हुई हूं। श्री पुंज ने यह सुन कर अपने विश्वसनीय आदमियोंको [वहाँ भेज कर] उसके शिरको कुण्डमें डाल देनेके लिये आदेश दिया। उन्होंने जा कर चिर कालसे उसी प्रकार पड़े हुए मुखको वैसा ही देखा और फिर उसे कुण्डमें डाला | तब वह श्री माता मनुष्यके मुखवाली हो गई। फिर माता-पिताकी अनुज्ञा ले कर अचूदजितनी संख्यावाले गुणोंको धारक वह, उस अर्बुद पर्वत पर जा कर तपस्या करने लगी। एक बार, एक आकाशचारी योगीने उसे देखा तो वह उसके सौन्दर्यसे हृत-हृदय हो कर आकाशसे नीचे उतरा और प्रेमालाप-पूर्वक उससे कहने लगा कि 'तुम मुझसे ब्याह क्यों नहीं कर लेती है। उसके ऐसा पूछनेपर वह बोली कि-' इस समय रात्रिका पहला पहर व्यतीत हुआ है; चौथे पहरमें-जब तक मुर्गा न बोल उठे तब तकमें--अगर किसी विद्याके बलसे तुम बड़ी सुंदर ऐसी बारह पद्या (पत्थरकी सीढियाँ ) बनवा दो तो मैं तुमको वर लँगी'। उसके ऐसा कहनेपर, तुरन्त ही उस कार्यके लिये उसने अपने चेटकोंके झुंडको नियुक्त किया और दो ही पहरमें ये सब पद्यायें बनवा दी। पर इधर श्री माता ने उतनेहीमें मुर्गेको बनावटी आवाज कर दी। उसने आ कर कहा कि [पद्या तैयार है इससे अब] 'विवाहके लिये तैयार हो जाओ तो इसपर श्री माता ने कहा कि 'जब वे बन रही थी तभी मुर्गेकी आवाज़ हो गई थी। तो उसने कहा 'वह तो तुम्हारी मायाजालके बनाये हुए बनावटी मुर्गेकी पनि थी; सो इसको कौन नहीं जानता। ऐसा उत्तर देते हुए, नदीके किनारे अपनी बहनके द्वारा, विवाहका उपहार उपस्थित कराया । श्री मा ताने 'सब विद्याओंका मूल जो यह त्रिशूल है इसे यहीं छोड़ कर विवाहके लिये तैयार रहो' ऐसा कह कर उसे वहां बुलाया। प्रेमके वशमे हृतचित्त हो कर वह वैसा ही करके उसके समीप आया। श्री मा ताने बनावटी कुत्ते बना कर उसके पैरों पर छोड़ दिये और हृदयमें त्रिशूलका आघात करके उसे मार डाला । इस प्रकार निःसीम शीलके साथ उसने अपनी सारी जिन्दगी बिताई । उस अखण्ड शीलाको मृत्यु के बाद, श्री पुञ्ज राजाने वहाँपर शिखरके बिनाका एक प्रासाद बनवाया । क्यों कि ६-६ हीने के बाद, उस पर्वतके अधोभागमें रहनेवाला अर्बुद नाग जब हिलता है तो वह पहाड़ कॉपने लगता है। इसलिये वहाँके सभी प्रासाद शिखर रहित [बनाये जाते ] है। इस प्रकार श्री पुञ्जराज और उसकी पुत्री श्रीमाताका यह प्रबन्ध समाप्त हुआ। . चौडदेशके गोवर्धन राजाकी न्यायप्रियताका उदाहरण । २०६) चौड देश में एक गोवर्धन नामक राजा हुआ । उसके वहाँ, सभामंडपके सामनेके खंभेमें न्याय घंटा बंधी हुई थी जो न्याय करानेके प्रार्थीजनों के द्वारा बाजाई जा कर निनाद किया करती। एकबार उसके इकलौते कुमारके रथारुद हो कर कहीं जाते समय, रास्तेमें अज्ञातभावसे एक गोका बछड़ा मर गया। उसकी माता गायने, आँखोंसे अजन ऑसू वर्षति हुए, अपने पराभव के प्रतीकारार्थ सांगोंसे वह न्याय-घंटा बजाई।अर्जुनके समान कीर्तिगाडे उस राजाने, घंटाका झंकार सुन कर, गायका समूल वृत्तान्त जाना और अपने न्यायकी प्रतिष्ठाके लिये, प्रातःकाल रथारुद हो कर, उस अपने एकमात्र प्रिय पुत्रको, उसी रास्तेमें रख कर, उस धेनु के समक्ष उसपर अपना रथ घुमाया । उस राजाके ऐसे सच और परम भाग्यसे रथका चक्र (पहिया) उपर हो उठा और यह कुमार नहीं मरा। इस प्रकार यह गोवर्धननृपपरंप समाप्त हुआ।
• प्रकरण २०५-२०८ ] प्रकीर्णक प्रवन्ध [.१३७ पुण्यसार राजाका वृत्तांत । २०७) कान्ती पुरी में, प्राचीन कालमें, कोई पुराण नृपति, निरभिमान भावसे राज्य कर रहा था। एक बार वह राजपाटिकामें जानेके लिये निकला; तो उसके पीछे पीछे उसका परम-मित्र म ति सागर नामक महामात्य भी चला । रास्तमें घोड़ा बिगड़ उठा और वह राजाको दूर ले भगा । साथकी चतुरंग सेना क्रमशः दूर दूर रह जाने लगी । पर अत्यंत वेगवाले घोड़ेपर चढ़ कर वह मंत्री उसके पीछे पीछे बहुत दूर तक चला गया। कितनी ही दूर चले जानेपर, राजा मार्ग लाँघनेके श्रमसे बिल्कुल थक गया और सुकुमारताके कारण रुधिरके दबावसे वहीं मर गया। मंत्रीने उसका अन्तकृत्य करके, उसके घोड़ेको और उसके वेशको साथ ले आ कर सायंकाल नगरमें प्रवेश किया । सीमान्तमें रहे हुए शत्रु राजाओंके भयसे राज्यको निर्विघ्न रखनेकी इच्छासे, उस राजा-ही-की उम्रके और रूपके जैसे एक कुम्हारको राजाका वह पोशाक पहना कर और उसी घोड़ेपर चढ़ा कर महलमें प्रवेश कराया। फिर रानीको सारा हाल बत्ता कर, सचिवने पुण्य सार नाम दे कर उसीको राजा बनाया । इस प्रकार कितनाक काल बीत जानेपर, वह मंत्री सेनाका बड़ा समूह ले कर किसी शत्रु राजाके ऊपर चढ़ाई ले गया और अपने एक खूब विश्वस्त सहायकको राजाकी सेवामें रख गया । वादमें वह राजा निरंकुश हो कर, वेश्यापतिकी तरह, स्वैर विहार करता हुआ समस्त कुम्हारोंको अपने पास बुला और मिट्टीके हाथी, घोड़े, बैल आदि बना कर उनके साथ चिर काल तक खेला करने लगा। ऐसा करनेपर समस्त राजलोक उसकी अवहेलना करने लगे जिसको सुन कर स्कंधावारसे ( लड़ाईके मैदानसे) कुछ नौकरोंको साथ ले कर मंत्री वहाँ आया और राजासे इस प्रकार बोला कि-'यदि अपने स्वभावकी चल-विचलताके कारण, तुम उस कुम्हारपनकी बातको न भूल कर किसी मर्यादाको नहीं मानोगे तो मैं तुम्हें देशसे निकाल कर किसी अन्य कुम्हारके बालकको राजा बना दूंगा'। उसकी इस उक्तिसे क्रुद्ध हो कर राजा बोला-'अरे, कौन है यहाँ ?' उसके ऐसा कहते ही वे मिट्टीके पुतले सजीव हो उठे और मंत्रीको चिपट पड़े। इस असंभव जैसे महान् आश्चर्यको देख कर और राजाके प्रकट प्रभावसे विस्मित हो कर मंत्री उसके चरणोंपर गिर पड़ा और अपनेको छुड़ानेकी अभ्यर्थना करने लगा। फिर राजाके वैसा ही करने (छुड़ा देने ) पर भक्ति-पूर्वक मंत्रीने कहा- 'आपको साम्राज्य देनेमें मैं निमित्त मात्र हूँ। आपके पुण्यप्रभावसे पुतले सचेतन हो कर इस प्रकार आज्ञाकारी हो रहे हैं, सो इसमें पूर्वजन्मके कर्म ही कारण हैं; और इसलिये आपका यह जो पुण्य सार नाम है वह सार्थक है। इस प्रकार यह पुण्यसारका प्रबंध समाप्त हुआ। , कर्मसार राजाका प्रवन्ध । २०८) प्राचीन कालमें, कुसुमपुर नगरका नंदिवर्धन नामक राजकुमार, देशान्तर भ्रमणके कौतुकसे माता-पितासे बिना पूछे ही अपने छत्रधरके साथ चल पड़ा । यदृच्छासे घूमता हुआ, एक प्रातः कालमें, किसी गाँवमें जा पहुँचा। वहाँ, पुत्रहीन राजा मर गया था, इससे सचिवोंने अभिषिक्त करके पट्टहस्तीको किसी नये राजाकी तलाशमें सारे नगरमें घुमाया। संयोगवश वह वहांपर आया और उस निकटस्थ नृप कुमारको, दुःस्वमकी नाई भूल कर, ससंभ्रम उस हाथीने छत्रधरका अभिषेक किया। प्रधानोंने बड़े महोत्सवके साथ उसको नगरमें प्रवेश कराया। उसने राजकुमारको भी वैसे ही ठाठके साथ अपने साथ ले कर महलमें प्रवेश किया। बादमें-- मैं राजलोकका स्वामी हूं, लेकिन तुम मेरे स्वामी हो' इस प्रकारके अन्तरंग वचनोंसे वह उस राजकुमारकी आराधना करता रहा । पर वह राजा राजगुणोंके अयोग्य था और बेहद बेवकूफ था। वर्णाश्रम धर्मके पालनके परिश्रममें अनभिज्ञ और प्रजाका पीड़क हो कर ज्यों ज्यों वह राज्य करता था त्यों त्यों, शंकरके १३८] प्रवन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाश शिरमें रहे हुए चंद्रमाकी तरह, वह प्रतिदिन क्षीण होता जाता था । उस कुमारको वैसा देख कर, किसी समय राजाने दुर्बलताका कारण पूछा तो उसने कहा कि दुर्बुद्धिके कारण तुम जो प्रजाको पीड़ा दे रहे हो यह अत्यन्त अनुचित कर्म है और इस कारण मैं कृश होता जा रहा हूं। २४२. जिसे मूर्खाके बीच वास करना पड़े तथा जिसके स्वामिके कानोंके पास दुर्जनोंकी जीभ लगती हो, उसका यदि जीवन बना रहे तो उसे ही लाभदायक समझना चाहिए; क्षीण होनेमें तो विस्मय ही काहेका। सो मैंने इस गाथाके अर्थको सत्य कर बताया है। उसके इस कथनके अनन्तर राजाने कहा कि-' इस पापनिरत प्रजाके अपुण्योदयने ही तो, निश्चय करके भविष्यमें इसको पीड़ित करनेके लिये, मुझे राजा बनाया है । यदि विधाता इस प्रजाके भाग्यमें परिपालना लिखता तो उस समय पट्ट हस्ती तुम्हारा ही अभिषेक करता।' उसकी इस उक्ति और युक्ति रूप औषधोंसे उस कुमारका वह रोग दूर हो गया और वह शरीरसे पुष्ट होने लगा। इस प्रकार यह कर्मसार प्रबंध समाप्त हुआ। राजा लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका प्रबंध । २०९) गौडदेशकी लखणावती नगरीमें लक्ष्मण सेन नामक राजा अपने उमापतिधर नामक सर्वबुद्धिनिधान ऐसे सचिवके साथ, सारी राज्य व्यवस्थाका विचार करते हुए, राज्य करता था । बादमें वह, मानों अनेक मातंग (हाथी ) के सैन्यके संगसे मदान्धता धारण करके, किसी वेश्याके संगरूप कलङ्कपंकमें इब गया । उमापति धरने यह व्यतिकर जाना तो, प्रकृतिसे क्रूर होनेके कारण स्वामीको वैकाबू समझ कर, प्रकारा- न्तरसे उसे समझानेके लिये, उसने सभामंडपके भारपट्टपर, गुप्त-भावसे इन कविताओंको लिख दिया - २४३. हे जल 1 शीतलता तो तुम्हारा ही गुण है, और फिर तुम्हारी स्वाभाविकी स्वच्छताकी तो वात ही क्या कही जाय-तुम्हारे ही स्पर्शसे अन्य अपवित्र वस्तुयें पवित्र होती हैं। इससे बढ़कर और तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है कि तुम्ही तो शरीरधारियोंके जीव हो। फिर अगर तुम्ही नीच पथसे जाते हो तो तुम्हें रोकने में कौन समर्थ है ? २४४. हे शिव ! तुम अगर छोटे बैल पर चढते हो तो उससे दिग्गजोंकी क्या हानि है ! तुम अगर साँपोंका आभूषण पहनते हो तो इससे सोनेका क्या नुकसान है ! अगर अपने शिरपर इस जड़ किरण चन्द्रमाको धारण करते हो तो उससे त्रैलोक्य के दीपक सूर्यका क्या बिगड़ता है ! तुम जगत्के ईश हो तो फिर हम तुम्हें क्या कहें ! २४५. यद्यपि कटे हुए ब्रह्मशिरको वह धारण करता है, यद्यपि प्रेतोंसे उसकी मित्रता है, यद्यपि रक्ताक्ष हो कर मातृकाओंके साथ वह क्रीडा करता है, यद्यपि स्मशानमें वह प्रीति रखता है और यद्यपि सृष्टि करके वह उसका संहार कर देता है, तो भी, मैं उसमें मन लगा कर भक्ति-पूर्वक सेवा करता हूँ। क्यों कि त्रिलोक शून्य है और वह जगतका एक-मात्र ईश्वर है । २४६. इस महान् प्रदोपकालमें तुम्ही एक मात्र राजा (चंद्र) हो, और इसी लिये तो क्या कमलोंकी रक्ष्मीको बंद करके कुमुदोंकी श्रीको बढ़ा नहीं रहे ! पर इसमें जो ब्रह्माका निवास है और पुष्पोंकी पंक्तिमें इसकी जो प्रतिष्टा है उसको दूर करनेवाले तुम कौन हो? क्यों कि वह तो स्वयं विधाता भी करनेमें समर्थ नहीं है।
प्रकरण २०९-२१०] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१३९ २४७. हे हार ! तुम सद्वृत्त, सद्गुण, महाई, और अमूल्य हो कर प्रियाके घन ऐसे स्तनतटके उपयुक्त तुम्हारी सुंदर मूर्ति है । किन्तु हाय, पामरीके कठोर कंठमें लग कर टूट जानेसे तुमने अपनी वह गुणिता खो दी है। किसी राजासभाके अवसरपर आये हुए राजाने इन कविताओंको देखा और उनका अर्थ समझ कर भीतर ही भीतर मंत्रीसे द्वेष धारण करने लगा । क्यों कि- २४८. आजकल प्रायः सन्मार्गका उपदेश करना, उसी तरह कोपका कारण होता है, जैसे नकटेको दर्पण दिखाना। इस न्यायसे कुपित हो कर राजाने उसे पदभ्रष्ट कर दिया । इसके बाद. उस राजाने, एक वार, राज- पाटिकासे लौटते हुए रास्ते दुर्गतिप्रस्त, निरुपाय और एकाको ऐसे उस उ मापति धर को देखा, तो क्रोधपूर्वक उसे मार डालने के लिये, हस्तिपालके द्वारा उस पर हाथी चलवा दिया । तब उसने महावतसे कहा कि-'जब तक, मैं राजाके सामने कुछ कह पाऊँ तव तक, तुम वेगसे हाथीको जरा थाम रखो। उसकी बात सुन कर उसने वैसा ही किया; तो फिर वह उमापतिधर बोला- २४९. जिसको, सज्जन ऐसे गुरु लोग उपदेश नहीं देते उस शिवका कैसा हाल हो रहा है ?-नंगा फिरता है, शरीरमें धूल लगाता है, बैलकी पीठपर चढ़ता है, साँपोंसे खेला करता है, और जिसमेंसे लोहू टपकता है ऐसे हाथीके चमडेको पहन कर नाचता है । इस प्रकारके आचारबाह्य तथा अन्य कई प्रकारके [ निंद्य ] आचरणोंसे वह प्रेम रखे करता है। इस प्रकार उसके विज्ञानरूपी वचनाकुशसे उस राजाका मनरूपी हाथी वश हुआ, और वह अपने चरित्रके विषयमें पश्चात्ताप करता हुआ अपनी खूब निंदा करने लगा । धीरे धीरे उस वासनासे मुक्त हो कर उसने फिरसे उसे अपना प्रधान बनाया। इस प्रकार लक्ष्मणसेन और उमापतिधरका यह प्रबंध समाप्त हुआ। . काशीके जयचन्द्र राजाका प्रबन्ध । २१०) का शी नगरी में ज य चन्द्र नामक राजा, महती साम्राज्य लक्ष्मीका पालन करता हुआ, पंगु ( लंगड़ा ) इस विरुदको धारण करता था । कारण यह था कि बडे भारी सैन्य समूहसे व्याकुलित होनेके कारण, वह गंगा-यमुना नदीरूप लाठीके सहारे विना कहीं आ-जा नहीं सकता था । वहाँ रहनेवाले किसी शालापतिकी सूह व नामक पत्नी, जिसने अपने सौन्दर्यसे तीनों लोकके स्त्रोजनोंको जीत लिया था, किसी समय भयानक प्राप्म ऋतुमें जलकेलि करके गंगाके किनारे खडी थी। तब उस खञ्जननयनाने देखा कि एक सॉपके शिरपर खंजन पक्षी बैठा है। वहीं पर नहानेके लिए आये हुए किसी ब्राह्मणके पैरों पड़ कर उसने उस असंभव शकुनका विचार पूछा । उस नैमित्तिकने कहा कि-'अगर मेरा सदा आदेश मानना मंजूर करो तो मैं इसका विचार निवेदन करूँ, नहीं तो नहीं' ।उसने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की, तो ब्राह्मणने कहा कि- आजसे सातवें दिन तुम इस राजाकी पटरानी होंगी'-ऐसा कह-सुन कर वे दोनों यथा-स्थान चले गये। जिस दिनके लिये निमित्तज्ञने निर्णय दिया था उसी दिन राजपाटिकासे लौटते हुए राजाने, किसी एक गल्लीमें अगण्य लावण्यसे सुभग अंगवाली उस शालापतिकी स्त्रीको खड़े देखा। उसे अपने चित्तका सर्वस्व चोरनेवाली १ इस पद्यमें प्रयुक्त सद्वृत्त, सगुण और गुणित्व ये शन्द प्रसिद्ध अर्थके अतिरिक्त श्लेषसे हारके पक्षमें इन अयोंकि वाचक है-सवृच अच्छी गोलाईवाला; सगुण-अच्छे पागेवाला; गुणित्व-घागेकी बनावटवाला।
१४.] प्रयन्धचिन्तामणि [पंचम प्रकाय - समझ कर उसने अपने पास रख लिया और पटरानी बनाया । इसके बाद उस कृतज्ञाने ब्राह्मणके प्रति की हुई अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके राजासे उस विद्याधर नामक ब्राह्मणको बुलाने के लिये प्रार्थना की । राजाने डुग्गी पिटवा कर विद्याधर नामक ब्राह्मणको बुलवाया तो उस नामके सात सौ ब्राह्मण आ कर उपस्थित हुए। उनमेंसे उस एकको पहिचान कर अलग बैठाया और बाकी सबको यथोचित सत्कारके साथ विदा किया गया। बादमें उस विपतिग्रस्त विद्याधरसे राजाने कहा कि जो इच्छा हो माँगो'। राजाके आदेशसे प्रमुदित हो कर उस ब्राह्मणने सदैव उसकी अंगसेवा' की प्रार्थना की । राजाने स्वीकार करके, उसके असीम चातुर्यकी पर्यालोचना करते हुए उसे सर्वाधिकारके भारका धारण करनेवाला धुल्यर पद दिया। वह क्रमशः सम्पत्तिशाली बन गया। अपने अन्तःपुरकी बत्तीस सुंदरियोंके लिये ऊँची जातिके करके बने हुए नित्य नये आभरण बनवाता और यह कह कर कि पुराने आभरण निर्माल्य है उन्हें एक छोटी कुईमें डलवा देता । इस प्रकार साक्षात् देवता- वतारकी नाई दिल्य भोगोंको भोगता हुआ [ नित्य ] अट्ठारह हजार ब्राह्मगोंको यथेच्छ भोजन दान करनेके पश्चात् स्वयं भोजन करता। २११) इसके बाद, विदेशी राजाके ऊपर चढ़ाई करनेके लिये राजाझी आज्ञासे, चतुर्दश विद्याओंके ज्ञाता वि या धरने नाना देशोंमें घूमते हुए, एकबार एक ऐसे देशमें जा कर डेरा दिया जहाँ जलाने के लिये इन्धन (लाही आदि ) नहीं था। तब उन ब्राह्मणोंकी रसोई के समय, रसोईयोंके वस्त्र तेलमें भिगो कर उन्हींको इन्धन बना कर नित्यकी भाँति ही उनको भोजन कराया। इस तरह शत्रुओंको जीत कर जब वह लौट कर वापस नगरके समीप आया तो मालूम हुआ कि, पिण्याक ( भोजन ) के बनानेकी इच्छासे जो दुकूङ जलाये गये, उससे राजा कुपित हो गया है । इससे उसने अपने घरको तो याचकोंके द्वारा लुटवा दिया और स्वयं तीर्थयात्राके लिये निकल पड़ा। राजा भी फिर पीछे जा कर उसका अनुनय करने लगा, पर उसने स्वाभिमानक्श, अपनी उस (भोजन बनानेकी ) इच्छाके कारण राजाका वैसा आशय (क्रोधयुक भाव ) हो गया था यह बता कर, जैसे तैसे उसकी अनुमति ले कर अपना अन्त साधन किया। २१२) अनन्तर, सूह व देवी ने राजासे अपने पुत्र के लिये युवराज पदवी माँगी। राजाने कहा कि- ' रखेलिनके लड़केको हमारे वंशमें राज्य नहीं दिया जाता। इससे उसने राजाको मारनेके लिये म्लेच्छोंको बुलवाया । उस स्थान पर रहनेवाले पुरुषों ( राजदूतों) से इस वातका हाल जान कर, राजाने एक दिगंबर भिक्षुकसे, जिसने पद्मावतीसे वर प्राप्त किया हुआ था, सादर निमित्त (कोई मात्रिक उपाय ) पूछा। उसने राजाको विश्वास पूर्वक कहा कि-'पद्मावतीका आदेश म्लेच्छागमनके विरुद्ध है। इसके अनन्तर कुछ दिनके बाद, यह सुन कर कि म्लेच्छ नजदीक आ गये हैं, राजाने उस दिगम्बरसे फिर पूछा कि यह ' क्या बात है?' तो उसने उसी रातको राजाके सामने ही पद्मावतीको होमादि देना आरम्भ किया । तब उसकी उस उत्तम आकर्षण-विद्याके बलसे, होमकुण्डकी ज्वालाओंमें प्रत्यक्ष हो कर, पमारतीने तुरुष्कों ( तुर्को) आगमनका निषेध ही बताया । तब फिर उस क्रुद्ध दिगम्बरने उसके कान पकड़ कर अत्यन्त क्रोबसे कहा कि-'म्लेच्छ सेनाके निकट आ जानेपर भी ऐसी मिथ्या बात बोल रही है। इस तरह फटकारी जानेपर उसने कहा कि-'तूं जिस पद्मावतीको अति भक्तिके साथ यह पूछ रहा है यह तो हमारे प्रतापके वलसे कहीं भाग गई है। मैं तो उस म्लेच्छराजकी कुलदेवी हूं। मिथ्या बोल कर लोगों विश्वास पैदा करके, उन्हें म्लेच्छोंके द्वारा श्वास (प्राण-हित ) कराती रहती हूं'। ऐसा कह कर वह तिरोहित हो गई। बादमें प्रातःकालमें ही म्लेच्छ सेना द्वारा वाणा र सी नगरीका घिरा जाना राजाने जान पाया । उनके धनुष्योंके टंकारोंमें, राजाके चौदह सौ नगाडोंकी आवाज कहीं इब गई और म्लेच्छ सेनाके भयसे २१०-२१३ ] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१४१ मनमें व्याकुल हो कर उस सूह व देवी के पुत्रको अपने हाथीपर बैठा कर ( उसके साथ ) राजा गंगाके जलमें डूब मरा। इस प्रकार यह जयचन्द्रका प्रबंध समाप्त हुआ। जगद्देव क्षत्रियका प्रबंध । २१३) त्रिविध वीरश्रेष्ठत्वको धारण करनेवाला जगदे व नामक एक क्षत्रिय वीर हुआ। वह श्री सिद्धरानके द्वारा खूब सम्मानित होता था। फिर भी उसके गुणरूप मंत्रके वशीभूत हो कर शत्रुमर्दन ऐसे राजा परमर्दीने जब उसे आग्रहपूर्वक अपने यहां बुलाया, तो पृथ्वीरूप रमणीके केशकलापके समान उस कुन्त ल देश में वह गया । दरवाजेपर पहुँच कर जब उसने राजाको अपने आनेकी खबर भिजवाई उस समय [राजाके आगे ] एक वेश्या, नंगी हो कर 'पुष्पवलन' नृत्य कर रही थी। वह तत्काल ही लजित हो कर अपनी चादर ओढ कर वहीं बैठ गई । जब राजाके द्वारपालने जगदे व को प्रवेश कराया तो राजाने उठकर आलिंगन दिया और प्रिय आलापं आदि किया। इस सम्मानके बाद, फिर उसे प्रधान परिधानदुकूल और लाखोंकी कीमतके अतुलनीय ऐसे दो अन्य वस्त्र भेंट स्वरूप दिये । बादमें जगदेव के महामूल्यवान आसन पर बैठ जानेपर सभाका संभ्रम जब दूर हुआ, तो राजाने उस वेश्याको नाचनेका आदेश किया । तब उस उचितज्ञा चतुर नारीने कहा कि--- संसारके एकमात्र पुरुप श्री जगदे व नामक अब यहांपर विद्यमान है इसलिये इनके सामने बिना वस्त्रके नाचते में लजाती हूं । त्रियां स्त्रियों के सामने ही यथेष्ट चेष्टा कर सकती है। उसकी इस लोकोचर प्रशंसासे मनमें प्रमुदित हो कर ज गद्दे व ने राजाके दिये हुए उन दोनों पक्षों को उसे दे डाला। इसके बाद, जब परमदर्दी के प्रासादसे ज ग व को किसी एक देशका आधिपत्य मिला तो उसे सुन- कर उसका ऋणग्रस्त उपाध्याय उससे मिलने आया । उसने यह काव्य भेंट किया- २५०. हम दो आदमीके पुण्यको मानते हैं-एक तो अक्षत्रिय विविसे वालिको मारनेवाले किसी भगवान् ( रामचंद्र) के, और दूसरे संगीतमें आसक कुन्त ल पति के । इनमेंसे एक (रामचंद्र) ने तो महत्तनय (हनुमान् ) की दोनों सुंदर मुनाओं रूप कामधेनुका दोहन किया और दूसरे (कुन्तलपति) ने, हे प्रतिपक्ष (शत्रु) के लिये प्रत्यक्ष परशुराम, आप जैसे चिन्तामणिको प्राप्त किया। इस कान्यके पारितोपिकमें उस स्थूललक्ष (टक्षण-सम्पन्न ) ने आधा लाख दिया। २५१. चकवेने पाथ (मुसाफिर ) से पूछा कि ' हे मित्र ! वताओ पृथ्वीमें बसने ठायक वह कौनसा देश है जहाँपर चिर कालतरु रात्रि नहीं होती ! ' (इसपर पांथने कहा कि) श्री जगदेव नामक पुरुष जो सुवर्णदान कर रहा है उससे थोडे ही दिनों में मेरु पर्वत समाप्त हो जायगा । और फिर सूर्यका छिपना बंद हो कर एक मात्र अद्वैत ऐसा (विना रात्रिका) दिन ही बना रहेगा। २५२. पृथ्वीकी रक्षा करनेमें दक्ष ऐसे दाहिना हायवाले, दाक्षिण्यकी शिक्षा देने में गुरुके समान, कल्याणके स्थान और धन्यजन्म ऐसे जगद्दाता जगदेव के विधमान होनेपर, विद्वानों के घर भी ऐसे बन गये हैं कि जिनमें प्रतिदिन, मतवाले हाथी और घोड़ों के वांधने योग्य वृक्षों की रस्सियां नौकर लोग ब्याकुल बने रहते हैं। २५३. तुम्हारे जीवित रहते बलि, कर्ण और दधीचि जीते हैं और हमारे जीवित रहते दारिद्य जीता है। टूट जानेके कारण, . १४२ ] प्रवन्धचिन्तामणि [पचम प्रकाश २५४. हे जग देव ! हम नहीं जानते कि किसका हाथ थक जायगा-दरिद्रोंको रचते रचते ब्रह्माका या उन्हें कृतार्थ करते करते तुम्हारा । २५५. हे जग देव! इस जगद्रूप देवमंदिर में प्रतिष्ठित तुम्हारे यशरूपी शिवलिंगके ऊपर [आकाशके] नक्षत्रोंने अक्षतका रूप धारण किया है। [ १७४ ] हे ज ग देव ! चारों समुद्रोंमें डुबकी मारनेके कारण तुम्हारी कीर्ति मानों ठंडीसे जकड गई है, इसलिये अब ताप लेनेके निमित्त वह सूर्य-मण्डलको चली है। [१७५ ] क्षत्रियदेव श्री ज गद्दे व भूपालका कल्याण हो! जिसके यशरूपी कमलमें आकाशने, भ्रमरका रूप धारण किया। [१७६ ] पृथ्वीमण्डलपर सुवर्ण वितरण करनेवाला तो एकमात्र ज गद्दे व ही है और उसके मागनेवालोंकी संख्या हजारोंकी है-ऐसा सोच कर, ऐ मेरे मन विषाद मत करो। सूर्य कितने हैं और प्रबल अन्धकारराशिमें डूबते हुए जन-समूहकी प्राणरक्षाके लिये यात्रामें प्रवृत्त उनके घोड़ोंके खुरसे खुदा हुआ यह दिङमण्डल कितना विस्तृत है ! जगदेव की दी हुई 'न नवम् ' ( नया नहीं है ) इस समस्याकी पूर्ति एक पंडितने इस प्रकार की-- २५६. समुद्र अगाध है, पृथ्वीमण्डल विशाल है, आकाश विभु है, मेरु पर्वत ऊँचा है, विष्णु प्रथित- महिमा है, कल्पवृक्ष उदार है, गंगा पवित्र है, चंद्रमा अमृतवपी है और जगद्देव वीर है-ये सब (विशेषण-युक्त विशेष्य ) नये नहीं हैं। [१७७ ] तुझ समान जगद्दाता जग हे व के विद्यमान होनेपर, अब लोक साहसाक राजाके चरितके आश्चर्यों में भी मन्दादर हो गये हैं तो फिर पार्थकी उस सच्ची कथाका कहना तो वृथा यह पृथ्वीमें बलि है, यह भूचर शक है। कृष्णको किसीने देखा नहीं, पृथ्वीमंडल कल्पवृक्षसे शून्य है। कामदेवका शोच न करना चाहिए। (- इस पधका भाव कुछ स्पष्ट नहीं ज्ञात होता.) [१७८ ] हे ज गद्दे व ! तुम्हारा यशोरूप दुर्वार चंद्रमा जब निरंतर ही अपनी किरणश्रेणीको दसों दिशाओंमें विकीर्ण करने लगा, तब सारे भुवनको राकाके लिये भयका स्थान समझ कर, 'कुहू' शब्द है सो एक मात्र कोकिलके कंठका शरणभूत हो कर रहा । ('कु' का एक अर्थ अमावस्याकी रात्रि है, और दूसरा कोकिलका शब्द है । जगदेवके यशरूपी चंद्रमाका निरंतर प्रकाश बना रहनेसे अमावस्याका अभाव हो गया, इसलिये कुहू शब्दका व्यवहार केवल, कोकिलके शब्दमें रह गया।) [ १७९ ] हे प्रभु जग हे व ! तुम्हारे रूपमें मुग्ध हो कर, वातायन पर स्थित सुभ्रू ( सुंदर भ्रुवों वाली) रमणियोंकी कमलदलसे द्रोह करनेवाली नाचती हुई आँखें सभय, सालस, सगर्व, साई, तिरछी, चकित, भ्रान्त और आर्त की नाई, कहा नहीं पड़ती हैं। इस प्रकारके बहुतसे काव्य हैं जो यथाश्रुत जानने चाहिये। राजा श्री परमर्दीराज की पट्टदेवीको जग देव ने अपनी भगिनी माना था। एक बार, राजाने सीमान्त भूपालको हरानेके लिए श्री ज ग देव को भेजा । वह, वहाँ जब देवार्चन कर रहा था उसी समय छल करके आघात करनेवाले शगुने उसकी सेनामें उपद्रव मचाया। इसका हाल सुन कर भी वह ज ग दे व उस देवपूजासे वाहर नहीं निकला । प्रणिधि पुरुपोंके मुँइसे राजाने जगदेव का पराजय हुआ मुना तो यह अश्नुतपूर्व बात सुन कर है। . । ।
प्रकरण २१३-२१५ ] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१४३ अपनी रानीसे परमर्दी ने [ व्यंग्य करते हुए कहा कि-'तुम्हारा भाई समरवीरताका तो बडा अहंकार धारण करता है लेकिन शत्रुओं द्वारा आक्रान्त हो कर वह वहाँसें भाग भी नहीं सका। राजाकी इस मर्मभेदिनी परिहास वाणीको सुन कर रानीने प्रातःकालमें पश्चिमकी ओर देखा । राजाने पूछा ' क्या देखती हो ?' इस पर रानीने कहा कि ' सूर्योदय' । तब राजाने कहा 'पगली, क्या कभी पश्चिम दिशामें भी सूर्योदय होता है।' इसपर वह बोली- पश्चिममें सूर्योदयका होना असंभव हो कर भी, कभी विधि विधानके विरुद्धका होना संभव है पर क्षत्रियोंमें देव जैसे जगद्दे व का पराजय होना तो संभव ही नहीं। इस प्रकार उस दम्पतीका प्रिय आलाप हो रहा था। इधर, देवपूजाके बाद जगद्दे व ने ५०० सुभटोंके साथ उठ कर, उस शत्रु राजाकी सेनाका क्रीडामात्र-ही-में इस तरह दलन कर डाला, जिस तरह सूर्य अन्धकारके समूहका, सिंह-शाय गजयूथका और प्रचण्ड अन्धड़ धनघोर मेघमालाका दलन करता है। २१४) वह परमी राजा, जगतमें एक उदाहरणभूत ऐसे परम ऐश्वर्यका अनुभव करता हुआ, एक निद्राके अवसरको छोड कर, दिनरात अपने ओजके प्रकाशका करनेवाला छुरिका-अभ्यास (छुरी चलानेकी कलाका परिश्रम ) किये करता था । भोजनके अवसर पर रसोई परोसनेमें व्यस्त ऐसे एक एक रसोईयेको नित्य ही निर्दय भावसे उस छुरिकासे काट डालता था । इस प्रकार सालमें ३६० रसोईयोंका वह संहार करता हुआ 'कोप-कालानल 'के बिरुदसे प्रसिद्ध हो गया । २५७. हे आकाश, तुम फैल जाओ; दिशाओ, तुम आगे बढ़ो; हे पृथ्वी, तुम और भी चौड़ी हो जाओ; आदिकालके राजाओंके यशका उज्जृभण तो तुम लोगोंने प्रत्यक्ष किया ही है; अव परमदी राजाके यशोराशिका विकाश होनेसे देखो कि यह ब्रह्माण्ड, प्रस्फुटित बीजोंके कारण, फटे हुए दाडिमकी दशाको प्राप्त हो रहा है। इत्यादि स्तुतियोंसे स्तुत हो कर वह राजा चिर कालतक साम्राज्यके सुखका अनुभव करता रहा । २१५) उसका, सपाद लक्ष के राजा पृथ्वी राज के साथ युद्ध हुआ और संग्रामाङ्गणमें वह अपने सैन्यके पराजित होने पर, दिग्विमूढ़ हो कर, किसी एक दिशासे भागता हुआ अपनी राजधानी में आया । उस परमी राजाके द्वारा पूर्वमें अपमानित कोई सेवक, देश निकालेकी सजा पा कर पृथ्वीराज की सभामें आया। उसके प्रणाम करनेके वाद राजाने उससे पूछा कि-'परमर्दी के नगरमें सुकृती लोग विशेप करके किस देवताकी पूजा करते रहते हैं ! ' इस प्रकार स्वामिके पूछनेपर उसने शीघ्र ही यह तत्कालोचित पद्य पदा- २५८. शिवकी पूजा करनेमें वह मंद है, कृष्णार्चन करनेकी उसे कोई तृष्णा नहीं है, दुर्गाको प्रणाम करनेमें वह स्तब्ध रहता है, विधाता रूपी ग्रह [ उसके यहाँ पूजा न पानेसे ] व्यप्र रहता है । ' हमारा स्वामी परमर्दी इसीको मुंहमें रख कर पृथ्वी राज नरपतिसे रक्षा पा सका है इस बातको सोच कर वहाँकी प्रजा तृण ही की पूजा किये करती है। इस स्तुतिसे प्रसन्न हो कर राजाने उसे यथेष्ट पारितोषिक दे कर अनुगृहीत किया। उसने (पृथ्वीराज ) इक्कीस वार म्लेच्छराजाको हराया था। तब बाईसवीं बार वही म्लेच्छराज अपनी दुर्धर सेनाके साथ चढ़ कर पृथ्वी राज की राजधानीके पास आकर ठहरा । मक्खीकी तरह बारबार उड़ा देनेपर भी, इस प्रकार, शत्रुको फिर फिर आते देख उसकी तरफ राजाकी उपेक्षाका होना जाना, तो स्वामीकी असीम कृपाका पात्र और उसके दूसरे शरीरके जैसा वह तुंग नामक क्षात्रतेजधारी वीरश्रेष्ठ, अपनी छायाके जैसे पुत्र के साथ म्लेच्छ- राजकी सेनामें जा घुसा । रातके समय उसने देखा कि उस शत्रुके तंयूके चारों ओर एक खाई खुदी हुई है जिसमें खैरकी लकड़ीकी आग धधक रही है । यह देख वह अपने पुत्रसे बोला-'मैं इस खाईमें कूद पड़ता हूं; , ।
२४४) प्रबन्धचिन्तामणि [पचम प्रकार तुम मेरी पाठपर पैर रख कर जा कर म्लेच्छराजको मार डायेपिताके ऐसा आदेश करनेपर उसने कहा कि- 'यह काम मेरे लिये साध्य नहीं है कि अपने जीवनको आकांक्षासे में पिताकी मृत्यु देखें, सो में ही इसमें पड़ता इं और आर ही मेरी पीटपर पैर रख कर उसका अन्त कर डालें । उसके वैसा करनेपर, स्वामी के कार्यको सिद्ध. प्राय हुआ मान कर आसान से उसने शत्रुको मार डाला और फिर जैसे आया था वैसे ही घर लौट गया। जब प्रभात होने को आया तो आने स्वामीको मरा देख कर वह म्लेच्छ सैना दीन हो कर भाग गई। गंभीरप्रकृति होने के कारण उस तुंग मुभटने राजाको वह कुछ भी हाल नहीं बताया। किसी समय, राजमान्य होनेके कारण अत्यंत परिचित ऐसी उस तुंग सुभटकी पुत्रवधूको मंगलदर्शक हस्तकंकणसे रहित देख कर, राजाने संभ्रममावसे उसका कारण पूछा । समुद्रकी नाई गंभीर होने के कारण, मौनमर्यादाके साथ प्रथम तो उसने कुछ भी नहीं बताया । तव राजाने अपनी शपथ दे कर पूछा । इस पर उसने यह कह कर कि-' यद्यपि अपना गुण कथन करना मेरे लिये दुष्कर कार्य है तथापि आज्ञा होने निवेदन करना पड़ता है' ऐसा कह कर प्रत्युपकारभारु हो कर उसने वह वृत्तान्त जैसा घटा था वैसा ही निवेदन किया। २५९. उच्च बुद्धिवाले मनुष्यों चितकी यह कोई वही ही अलौकिक कठोरता है कि किसीका उपकार करके फिर वे दूसरेसे प्रत्युपकार पानके भयसे उन निःस्पृह हो रहते हैं। इस प्रकार यह तुंगमुभट प्रबंध समाप्त हुआ। पृथ्वीराजका म्लेच्छोंके हाथ मारा जाना। २१६) इसके अनन्तर, फिर कभी, उस म्लेष्ठराजका पुत्र पिताका र स्मरण करके सपादलसके राजा पृथ्वीराज के साथ युद्ध करनेको इन्छासे बड़ी तैयारीके सहित चढ़ कर आया | पृष्वी राज की सेनाके वीर धनुगम, वर्षाकाटकी भूमधार पृष्टिकी नाई बरसते हुए, बागोंकी मारसे यह स-सन्य भगा दिया गया और फिर पृथ्वीरानने उसका पास किया । इस समय भोजन-रिमागके अधिकारी पञ्चकुलने कहा कि- 'सात सौ साढनियां जो भोजनकी सामग्री ढोती है ये पर्याप नहीं है, इसलिये महाराज कुछ और सांदनियां देनेकी फा करें। राना यह सुन कर बोला कि - 'म्लेयराजको मार कर उसके ऊँटोका र फजे किया नायगा, और सिर तुम्हें मांगी दुई साढनियां देनेका प्रबन्ध किया जायगा'। ऐसा कर कर उसे समता दिया और फिर जब आगे प्रयाण करने लगा तो सो मेसर नामक प्रधानने पारंवार निषेध किया ! गगने इस भमसे कि यह उस (म्ठेच्छ) के पक्षमें है, उसके फान फाट लिये । इस अत्यन्त पराभव के कारण, यह अपने सामान कुरीत होकर उसम्लेम्पति के पास चला गया। उसको अपना परामवनतान्त कह कर, उसके मनमें विास रिटाया और उसको पृषीराज के पार पास ले आया। पृषीराज एकादशीक पारणाके पवाद सोपा हुआ था तो उसकी सेनाके योग के साय म्ठेनको टाई गिरा दी। राना गादी नामें सो रहा था। उसी आया तुझौने उसे कैद कर लिया और वे अपने स्थानमें ले गये। फिर दूम एकादशी के पारगा असरपर, र यह राना (कीकी हास] देव-पूना कर रहा था, उस समय सबने था मम पर पार (दोन) रमरा कर उस में निवाया। उसके देवनाने भ्यस्त होने के कारण, एस कुवा आकर उसमस उटा डे गाता पहरेदारोंने कहा कि इसकी रक्षा क्यों नहीं करते!' सार समानामि-20नि भोजनमामी को कमी सात सौ सोनिया मी टॉफ तह नही हो सकती थी, उसी मोरनबार परमादसवार अनार को कर कोनुकले देसरा उन्होंने कहा 12-'म अभी 3 IME कि वायदे!' तो उसने का पति में अपने स्थानमा पर५ प्रकरण ११६-२१८] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१४५ तो अपनी शारीरिक ताकात कैसी है सो दिखा दूं'। पहरेदारोंने यह बात उस म्लेच्छराजको जा कर कहीं तो वह उसके साहसको देखनेकी इच्छासे, उसे उसकी राजधानीमें आया और राज-भवनमें ले जा कर उसको गादीपर विठाया । बादमें ज्यों ही उन्होंने देखा तो उसके महलकी चित्रशालामें ऐसे चित्र बने हुए नजर आये जिनमें सूअर म्लेच्छोंको मार रहे हैं । यह दृश्य देख वह तुर्कोका राजा अपने मनमें अत्यन्त पीड़ित हुआ और वहीं पर उसने कुठार द्वारा पृथ्वी राज का सिर काट कर उसका संहार कर डाला। इस प्रकार नृपति परमर्दी, जगदेव और पृथ्वीराज इन तीनोंका यह प्रबंध समाप्त हुआ। . कोंकण देशकी उत्पत्ति कैसे हुई। २१७) जहाँ समुद्र ही जिसको परिखा (खाई) है ऐसे श ता नन्द पुर में म हा नंद नामक राजा हुआ। उसकी रानीका नाम था मदन रे खा । अन्तःपुर [ में स्त्रियों ] की प्रचुरता होनेसे राजा उसके प्रति विरक रहता था । इसलिये पतिको वशीभूत करनेकी इच्छासे यह नानाविध विदेशी जनों और कलाविदोंसे इस बारेमें पूछा करती । तब एक यथार्थवादी विश्वसनीय तात्रिकने उसे कुछ सिद्धयोग वताया। उसके प्रयोग करनेके अवसरपर उसे इस वाक्यका अनुस्मरण हो आया कि ' मंत्रमूलके वलपर की हुई प्रीतिको पतिद्रोह कहते है। तो उस योगचूर्णको समुद्रमें फेंक दिया। कहा है कि ' मंत्र और औषधिका प्रभाव अचिन्त्य होता है'-इस लिये औषधके माहात्म्यसे वशीभूत हुआ समुद्र ही उसका वशवती हो कर, मूर्तरूप (मनुष्यस्वरूप ) बना कर उसके साथ रातमें आ कर रतिरमण करने लगा। इससे वह गर्भवती हो गई। तब उसके ऐसे चिन्होंको देख कर राजा कुपित हो कर उसे किसी प्रवास आदिका दण्ड देनेकी तदबीर सोचने लगा। इससे उसकी मृत्यु निकट समझ कर समुद्रदेव प्रत्यक्ष दुया और अपना परिचय देते हुए बोला कि- मैं समुद्रका अधिष्ठाता देव हूँ, इसलिये डरना मत'। फिर वह राजासे बोला- २६०. शीलवती कुलीन कन्याको, विवाह करके, जो सम-दृष्टिसे नहीं देखता, वह बड़ा भारी पापिष्ठ कहा गया है। इसलिये इस स्त्रीकी अवज्ञा करनेवाले ऐसे तुझको मैं अन्तःपुर और परिवार के साथ अगाध जटमें हुयो दूंगा'। यह सुन कर वह भयभ्रान्ता रानी उसका अनुनय करने लगी। इस पर समुद्रने यह कह कर कि- यह मेरा ही लड़का होगा और इसलिये मैं ही कहीं कहींका जल हटा कर इसे साम्राग्यके योग्य नई भूमि दूंगा'--ऐसा कह कर फिर उसने कहीं कहींसे जल हटा कर अन्तरीप (बेट ) वना दिये जो लोगोंमें सब 'कोकण' नामसे प्रसिद्ध हुए। इस प्रकार यह कांफण प्रबंध समाप्त हुआ। * ज्योतिषी वराहमिहिरका प्रयन्ध । २१८) पाटलीपुत्र नगरमें वराह नामक एक बाझगका उदका था जो जन्मसे ही शकुन शानमें श्रद्धालु था! गरीब होने के कारण पशु चरा कर अपना निर्वाह किये करता था । एक दिन [ जंगलमें ] किसी एक पत्थर पर टन टिरा कर उसे बिना मिटाये ही घर लौट आया । यथासमय उचित एत्य कर टेनेके याद रातमें भोजन करनेको बैठा तो उस टाके विसर्जन न करनेका स्मरण हो आया । तब उसी समय निर्भर भावसे यहाँ गया तो देखा कि उसपर एक सिंह बेटा है। उसने इसकी भी परवा न की और उसके पेटके नीचे ३७-१८ प्रवन्धचिन्तामणि [ पचम प्रकाश हाथ डाल कर लग्न मिटाने लगा। तब इसके अनन्तर वह सिंहका रूप त्याग करके सूर्यरूपमें प्रत्यक्ष हुआ और कहने लगा ' वर माँगो'। तब उसने माँगा कि- 'मुझे समस्त नक्षत्र मह-मंडलको [प्रत्यक्ष ] दिखा दो। यह सुन सूर्य उसे अपने विमानपर चढ़ा कर ले गया और [ सारा प्रहचार बता कर ] एक वर्ष बाद वहीं ले आ कर छोड़ गया । इस तरह वह ग्रहोंके वक, अतिचार, उदय, अस्त आदिकी प्रत्यक्ष परीक्षा करके पुनः अपने स्थानमें आया। मिहिर (सूर्य) का प्रसाद प्राप्त होनेसे वराह मिहिर इस नामसे प्रसिद्ध हो कर वह श्री नन्द नामक नृपतिका परम मान्य हुआ और उसने 'याराही संहिता' नामक एक नया ज्योतिषशास्त्र बनाया । २१९) एक बार, अपने पुत्र जन्मके अवसरपर, उसने अपने घरमें घटिका रख कर उससे जन्मकालका शुद्ध लग्न ले कर जातक ग्रंथके प्रमाणसे ज्योतिष (जन्मपत्र) बनाया। स्वयं प्रत्यक्ष किये हुए ग्रहचक्रके ज्ञानके वलपर उस पुत्रकी आयु एक सौ वर्षकी निर्णीत की। उस महोत्सवमें, श्रीभद्रबाहु नामक एक जैनाचार्य-जो उसके छोटे भाई थे-को छोड़ कर, राजासे ले कर रंक तक कोई ऐसा नहीं रहा था जो कुछ उपहार हाथमें ले कर उसके यहां नहीं गया हो । तब उस नैमित्तिकने जिनभक्त श क टाल मंत्री के आगे, उन सूरिके न आनेके बारेमें उलाहनेके तौरपर कहा । तब उस मंत्रीने, उन महात्माको, जो संपूर्ण शास्त्रके ज्ञाता थे और त्रिकालके भावोंको हथेलीपर रखे हुए ऑवलेके फलकी तरह जानते थे, यह बात कह सुनाई। तो उन्होंने कहा कि-' आजसे बीसवें दिन उस लड़केकी, बिल्लीके निमित्तसे, मृत्यु होगी इसलिये यह समझ कर हम नहीं आये'। उनकी यह उपदेश-वाणी वराह मिहिर से कही गई । तब उसने अपने कुटुंबको, उस बालककी भावी विपदसे आवश्यक रक्षा करनेके लिये कहा और बिल्लोसे वचा रखने के लिये सौ सौ उपाय करने लगा। फिर भी निर्णीत दिनकी रातको उस वालकके सिरपर अर्गला (दरवाजेको बंद करनेके लिये लकडी या लोहेकी बनी हुई एक पट्टी) गिर जानेसे अचानक वह मर गया । फिर उस शोकशंकुसे उसका उद्धार करनेकी इच्छासे श्रीभद्र वा हु उसके घर आये । वहाँ उन्होंने देखा कि उसके घरके आँगनमें ज्योतिपकी सभी पुस्तकें इकट्ठी करके जलानेके लिये रखी पड़ी हैं। तब उन्होंने पूछा कि ' यह क्या बात है?' तो उस सांवत्सर (ज्योतिपी) ने बड़े दुःखके साथ, उन जैनमुनिको उपाळंम देते हुए कहा- 'ये पुस्तके बड़े मारी मोहान्धकारको उत्पन्न करनेवाली हैं इसलिये अब निश्चय ही इन्हें जला दूंगा; क्यों कि इन्होंने मुझे धोकेमें डाला है। उसके ऐसा कहनेपर अपने शास्त्रज्ञानके बलसे बालकका जन्मलग्न ठीक तरह निकाल कर उन्होंने सूक्ष्म दृष्टिसे उसका ग्रह-बल बताया तो वह बीस ही दिनका आया। इस प्रकार उसकी शास्त्रविरक्ति जब दूर की गई तो वह ज्योतिषी वोला कि - आपने जो बिडालसे मृत्यु बताई वह तो ठीक नहीं सावीत हुई। तब उन्होंने उस अर्गलाको वहाँ मंगवाई, जिसके गिरनेसे मृत्यु हुई थी, तो उसमें बिडालकी आकृति खुदी हुई पाई गई।' क्या भवितव्यतामें भी कभी कुछ परिवर्तन है?' ऐसे उस महर्षिने कहते हुए कहा कि- २६१. किस बातके लिये रोया जाय ! यह शरीर क्या चीज़ है ! ये परमाणु तो अविनाशी हैं । यदि संस्थान-विशेपके लिये ही शोक करना है, तब तो कभी भी प्रसन्न ही नहीं होना चाहिये । २६२. यह सब भाव ( अस्तित्व ) अभावोत्पन्न है और मायाके विभवसे संभावित है । इसका अंत भी अभाव ही में संस्थित है। इस बातके ज्ञानसे सजनोंको भ्रम नहीं पैदा होता । -इस प्रकारकी युक्तिपूर्वक उक्तिसे उसे समझा कर वे महर्षि अपने स्थानपर आये। इस तरह समझाये जाने- पर भी वह, मिथ्याच रूप धत्तरके प्रभावसे सच्चे सुवर्णमें भ्रान्तिवाला हो कर, उनके प्रति द्वेषभाव धारण कर रहा । अतः [ ईविश ] अभिचार कर्मसे, उनके भक्तों और उपासकों से किसीको कष्ट पहुंचाने लगा और . सकता प्रकीर्णक प्रवन्ध प्रकरण २१९-२२० ] [१४७ किसीको मारने लगा। अपने प्रौद ज्ञानके द्वारा इन लोगोंका यह वृत्तान्त नान कर उन्होंने विप्नकी शान्तिकेलिये 'उपसग्गहरं पासं ' इस नूतन स्तोत्रकी रचना की। इस तरह यह वराहमिहिर-प्रबंध समाप्त हुआ। * । सिद्धयोगी नागार्जुनका वृत्तान्त । २२०) ढंक नामक पर्वत पर रहनेवाले रण सिंह नामक राजपूतको एक भूपल नामकी पुत्री थी जिसने अपने सौन्दर्यसे नागलोककी वालाओंको भी जीत लिया था । उसे देख कर वा सु कि नागका उस पर अनुराग हो गया। उसने उसके साथ संभोग किया और उससे नागार्जुन नामक पुत्र पैदा हुआ। उस पाताल पाल (नाग) ने पुत्रस्नेहसे मोहित हो कर उसे सभी औपधियोंके फल, मूल और पत्रोंका भक्षण कराया। इन औपधियोंके प्रभावसे वह महासिद्धियोंसे अलङ्कृत हुआ। सिद्धपुरुप होनेके कारण पृथ्वी-पर्यटन करता हुआ वह शा त वाह न नृपतिके पास गया, जहाँ उसे राजाके कलागुरु होनेकी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। तो भी वह गगन-गामिनी विद्याका अध्ययन करनेकेलिये श्री पाद लिप्ता चार्य के पास पाद लिप्त पुर गया। निरभिमान हो कर उनकी सेवा करने लगा। भोजनके समय, पादलेपके द्वारा आकाशमें उड कर अष्टापद आदि तीर्थीको नमस्कार करके वे आचार्य वापस आये, तो उनके चरण धो कर रस, वर्ण और गन्धकी परीक्षासे उसमें १०७ महौषधियोंका होना उसने जाना । बादमें गुरुको आज्ञाकी परवा न करके उसने स्वयं वैसा ही पादलेप किया। इससे मुर्गे और मोरकी नाई कुछ कुछ उड़ता हुआ वह एक खड्डेमें गिर पडा और चोट लगनेसे उसका सारा शरीर जर्जरित हो गया। तब गुरुने पूछा कि 'यह क्या बात है?' तो फिर उसने वह सब वृत्तान्त यथावत् निवेदन किया । उसकी इस चतुरतासे चकित हो कर उसके सिरपर अपना करकमल रखते हुए उन्होंने कहा कि-'साठी चावल के पानी में उन औषधोंको मिलाकर पादलेप करो और इस तरह आकाश मामी वनो'। इस तरह उनके अनुग्रहसे उसे वह सिद्धि प्राप्त हुई। उन्हींके मुंहसे यह भी सुना कि श्री पार्श्वनाथ की मूर्तिके सामने समस्त-स्त्रीलक्षणयुक्त पतिव्रताके हाथसे विमर्दित हो कर जो रस सिद्ध किया जाता है वह कोटिवेधी होता है । [ उसने उस मूर्तिकी गवेषणा करते हुए जाना कि-] पूर्व कालमें समुद्र विजय दशाई ( यादव ) ने त्रिकालवेदी श्री नमिनाथके मुखसे सुन कर, महातिशायी श्री पार्श्वनाथका एक रत्नमय विंब निर्माण करके द्वारावती के प्रासादमें स्थापित किया था। द्वारावती के जटनेक वाद, जबसे वह पुरी समुद्र में डूब गई तबसे, वह विंव समुद्र में वैसे ही विद्यमान रहा। बादमें देवताके प्रभावसे धन पति नामक जहाजी व्यापारीका जहाज टकराया। यहाँ पर एक जिनविध है ' ऐसी देवताकी वाणी सुन कर ध न पति ने वहाँ नाविकोंको उसे निकालनेको कहा। उन्होंने सात कच्चे धागोंसे बांध कर उसे बाहर निकाला और उसके प्रभावसे चिन्तितसे भी अधिक लाभ प्राप्त हुआ जान, उसे अपनी नगरी में ले आ कर अपने बनाये हुए प्रासादमें स्थापित किया । नागार्जुन ने उस सर्वातिशायी विबको, अपने सिद्धरसकी सिद्धिके लिये चुरा कर, से ढी नदी के किनारे ला कर रखा । उस विंबके सामने, श्री शा त वा ह न राजाकी एक मात्र पत्नी चंद्र ले खा को, सिद्धव्यन्तरके द्वारा उडवा कर रोज उससे रसमर्दन करवाता । इस प्रकार वहाँ वारंवार आने- जानेके कारण उसके साथ घनिष्ठ बंधुभाव पैदा गया । इससे उसने नागार्जुन से इस रस-मईनका हेतु पूछा। उसने भी अपनी कल्पनासे कोटिवेध रसका वह यथावत् वृत्तान्त कहा और वर्णनातीत रूपसे उसका सम्मान करके उसके प्रति अनन्यसामान्य सौजन्य बताया। इसके बाद एक दिन उसने अपने पुत्रोंसे यह वृत्तान्त कहा। वे दोनों इसके लोभी हो कर राज्य त्याग करके नागार्जुन द्वारा अलंकृत उस भूमिमें आ कर गुप्त वेश बना कर रहे। उस रसके ग्रहण करनेकी इच्छासे, जिसके यहाँ नागार्जुन भोजन किये करता था, उसे अर्थदान करके अपने १४८] प्रवन्धचिन्तामाणि [पंचम प्रकाश वशमें कर, उसकी वात पूछने लगे। वह भी इस वातके जाननेकी इच्छासे, नागार्जुन के लिये नमक ज्यादा दे कर रसोई बनाती । इस तरह ६ महीना बीत जानेपर रसोईमें खारापनका अनुभव करते हुए नागार्जुनने उसका दोष निकाला । तब उसने इशारेसे उन्हें सूचित किया कि अब रस सिद्ध हो गया है । भानजे बने हुए इन लड़कोंने उस रसको उड़ा लेनेकी लालसासे,-परम्परा द्वारा यह जान कर कि वासुकिने इसका मृत्यु कुशके शस्त्रसे होना बताया है, उसी शस्त्रसे उसे मार डाला। पर वह रस तो सुप्रतिष्ठ देवताधिष्ठित होनेके कारण तिरोहित हो गया। जहाँ वह रस स्तंभित किया गया था वहीं पर स्तंभ न क नामक श्री पार्श्वनाथका तीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जो रसको भी मात करनेवाला, सकल लोकका अभिलषित फलदाता है । बादमें कुछ कालके व्यतीत होनेपर वह मूर्ति, मुखमात्र जितने भागको छोड कर वाकी भूमिके अंदर दब गई। स्तंभनक पार्श्वनाथका प्रादुर्भाव । २२१) इसके अनन्तर, श्री अभय देव सू रिने शासन देवताकै आदेशसे, ६ महीनेतक माया रहित हो कर आचाम्लका व्रत करके, खड़िया (पट्टीपर लिखनेको धोली मिट्टीकी डलिया) के प्रयोगसे जब नवाङ्ग वृत्तिको रचना समाप्त की तो उनके शरीरमें भारी कुष्ठ रोग प्रादुर्भूत हो गया। तब पातालका पालक धरणेन्द्र नामक नागराज सफेद सर्पका रूप बना कर आया और उनके शरीरको जीभसे चाट कर उन्हें नीरोग किया । फिर श्रीमान् अभ यदे व सूरि को उस तीर्थकी यात्राका उपदेश दिया। उन्होंने श्रीसंघके साथ वहाँ आ कर गोपाल वालकोंके द्वारा उस भूमिका पता लगाया, जहाँ एक गाय रोज दूधको धारा छोड़े करती थी। वहाँ जा कर एक उत्तम ऐसे नये द्वात्रिंशतिका स्तवनकी रचना की । उसके ३३ वें पदकी रचना होनेपर श्री पार्श्वनाथका वह बिंब प्रकट हुआ। फिर देवताके कथनसे उन्होंने उस पयको गुप्त रखा। २६३. जो स्वामी, अपने जन्मके चार सहस्र वर्ष पूर्व ही इंद्र, वासुदेव और वरुणके द्वारा अपने वास स्थानपर पूजे गये, इसके बाद कान्ती के धनिक ध ने स्व र द्वारा तथा फिर महान् नागार्जुन द्वारा जिनकी पूजा की गई, वे स्तंभन कपुर में स्थित श्री पार्श्वनाथ जिन तुम्हारी रक्षा करें। इस प्रकार नागार्जुनकी उत्पचि तथा स्तंभनक तीर्थ के अवतारका यह प्रबंध समाप्त हुआ। कवि भर्तृहरिकी उत्पत्तिका वर्णन । २२२) प्राचीन कालमें, अवन्ति पुरी में कोई ब्राह्मण पाणि निव्या करण के अध्यापनका कार्य करता था। वह नियमसे नित्य सि प्रा नदी के तटपर स्थित चिन्तामणि गणेशको प्रणाम किये करता था। किसी समय विद्या- थियोंने फलिका-व्याख्यान आदिके प्रश्नोंसे उसे उद्विग्न कर दिया था, इसलिये वर्षाकालमें जब यह नदी भर कर बह रही थी तो वह उसमें कूद पड़ा। दैवयोगसे एक उखड़े हुए वृक्षका मूल उसके हाथमें आ गया जिसका सहारापा कर वह तीरपर पहुँच गया। यहाँपर साक्षात् परशुरामको देख कर प्रणाम किया। उसके उत्साहके ऐसे अनुष्ठानसे प्रसन्न हो कर बोले कि इच्छा हो सो मांगो'। उसने पाणि नि के व्या क र ण का संपूर्ण रहस्यज्ञान मागा। उन्होंने उसका देना स्वीकार किया और उसे 'खडिया' प्रदान की। उससे उसने प्रतिदिन व्याकरणकी व्याख्या बनानी शुरू की जो उह महिने के अंतमें समाप्त हुई। फिर शीघ्र ही गणेशकी अनुज्ञा ले कर, उस प्रथम आदर्शके साथ, यह पुरीमें प्रविष्ट हुआ।[रातको] नगरके किसी एक महालेके चौकमें बैठा ही बैठा सो गया। तब सबेरे उसे वहाँ उस तरह पड़ा देख किसी एक वेश्याकी दासियोंने, वेश्यासे उसका हाल कहा । उसने उन्हीसे उसे मंगवा कर अपने हिंडोलेकी खाटपर रखराया। तीन दिन और रातके बाद जब उसकी नींद कुछ कुछ खुली तो उस चित्रशालाकी आचर्यजनक चित्रकारीको देख कर वह अपने को स्वर्गलोसमें उत्पन्न हुआ समझा। तब उस प्रकरण २२१-२२४ ] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१४९ . कर वेश्याने सब वृन्तान्त कहा और स्थान-पान-भोजन आदिसे उसे सन्तुष्ट किया । फिर वह राजसभामें गया। वहां पर पाणिनि व्याकरण की यथावस्थित व्याख्या कर बतानेपर राजा तथा अन्य पंडितोंने उसका बड़ा सत्कार किया । वहाँ जो कुछ पुरस्कार रूपमें उसे मिला वह सब उसने उस वेश्याको समर्पण कर दिया । २२३) फिर उसके क्रमशः चारों वर्णोको चार स्त्रियाँ हुई। इनमेंसे क्षत्रियाणीके गर्भसे विक्रमादित्य तथा शूद्राके गर्भसे भर्तृह रि पुत्र हुआ। हीनजातिका होनेके कारण भर्तृहरिको रज्जुके संकेतसे भूमिगृहमें बैठा गुप्त वृत्तिसे पढ़ाया जाता था । अन्य तीनों लड़कों को प्रत्यक्ष ( पासमें बैठा कर ) पढ़ाया जाता था। उन्हें इस तरह पढाते हुए- २६४. दान भोग और नाश- द्रव्यकी ये तीन गति हैं। [ और जो न देता है न भोग करता उसके द्रव्यकी तीसरी ही गति ( नाश ) होती है। ] यह जब पढ़ाया गया तो भर्तृहरि ने रज्जुका संकेत नहीं किया और उन तीनों प्रत्यक्ष छात्रोंने आगेके उत्तरार्धका पाठ पूछा । तब कुपित होकर उस उपाध्यायने कहा- 'अरे वेश्यापुत्र, अभी तक रस्सीको क्यों नहीं हिलाता ? ' तब वह प्रत्यक्ष आ कर कुछ कर शासकी निंदा करता हुआ कहने लगा- २६५. सौ सौ प्रयास करके प्राप्त किये हुए और प्राणोंसे भी अधिक मूल्यवान् ऐसे धनकी एक दान ही गति हो सकती है । अन्य तो [ गति नहीं ] विपत्ति है। इस पाठसे [ उन सबने ] वित्तकी फिर एक ही गति मानी । उस भर्तृहरि ने वैराग्य शतक आदि अनेक प्रबंध बनाये। इस प्रकार भर्तृहरिकी उत्पत्तिका यह प्रबंध समाप्त हुआ। * वाग्भट वैद्यका प्रबंध । २२४) धारान गरी में, माल व म ण्ड ल के भूषणरूप श्री भोजराज का एक आयुर्वेदज्ञ वैद्य वाग्भट नामक था । उसने आयुर्वेदोक्त कुपथ्य करके, उसके प्रभाव से पहले रोग उत्पन्न किया और फिर सुश्रुत कथित पथ्य औषधोंसे उसका निग्रह किया । पानी के बिना कितने समय तक जिया जा सकता है इस बातकी परीक्षाके लिये जल छोड़ दिया। तीन दिन के बाद प्याससे तालु और ओठ सूख गये । तब उसने इस प्रकार कहा- २६६. कहीं गर्म, कहीं ठंडा, कहीं गर्म करके ठंडा किया हुआ और कहीं औपचके साथ [ इस प्रकार पानी सब हालतमें दिया जाता है ] पानी कहीं भी मना नहीं किया गया है। इस प्रकार पानीके सत्कारका उसने यह वाक्य पदा । उसने अपना अनुभूत 'वाग्भट' नामक ग्रंथ बनाया । उसका जामाता जो लघु वा हड कहलाता था वह भी एक समय, अपने श्वसुर ऐसे उस वृद्ध वा हड के साथ राजमंदिर गया । सवेरे ही श्री भोजराज के शरीरको देख भाल कर वृद्ध वा हड ( वाग्भट ) ने कहा कि- आज आपका शरीर नीरोग है ' । तो यह सुन कर लघु वा हडने मुंह मरोडा । तब श्री भोज के उसका कारण पूछनेपर उसने कहा कि- 'आज स्वामीके शरीरमें, रात्रिके शेपमें राजयक्ष्माका प्रवेश हुआ है, जो कृष्णच्छायासे सूचित होता है'। इस प्रकार देवताके आदेशसे अतीन्द्रिय भाव बतला देने के कारण राजा उसके कला-कलापसे चमत्कृत हुआ और न्याधिका उससे प्रतीकार पूछा । तब उसने तीन लाखके मन्यसे बननेवाले रसायनका प्रयोग बताया । ६ महीनेके बाद उतना द्रव्य व्यय करके यह रसायन सिद्ध किया गया और सायंकाल काचकी कुप्पीमें भर कर उस रसायनको राजाके विस्तरके पास रख दिया। सोर देवतार्थनके बाद राजाने जब वह रसायन खाना चाहा तो उस रसायनको पूजा-पुरस्कार आदि सब सामग्री तैयार की गई।
१५०] प्रवन्धचिन्तामणि [पचम प्रकारा . पर उस लघु वैद्यने, किसी कारणवश, उस काची कुप्पीको भूमिपर पटक कर तोड़ दिया। राजाके यह कहनेपर कि अ: यह क्या किया ?' उसने कहा- रसायनकी सुगंधिसे ही व्याधि भाग गई है। अब व्याधिके अभावमें इस धातुक्षयकारी औषधका रखना व्यर्थ है। आज रात्रि के अंतमें वह कृष्णछाया महाराजके शरीरको छोड कर कहीं दूर चली गई दिखाई दी है और इसमें खुद आप ही प्रमाण हैं। उसके इस प्रत्यय (विश्वास ) से सन्तुष्ट हो कर राजाने दरिद्रताको दूर करने वाला [ भारी ] पारितोपिक उसे दिया। २२५) इसके बाद, उन सभी व्याधियोंको उस वैद्यने भूतलसे नष्ट कर दिया। तब उन्होंने जा कर स्वर्ग लोकके वैद्य अश्विनी कुमारोंसे अपना यह पराभव वृत्तान्त कहा । ये दोनों इस वृत्तान्तसे मनमें आश्चर्य चकित हो कर नीलवर्णके पक्षीका रूप बना कर, व्याधियोंके लिये प्रतिभट जैसे लधु वाग्भ ट के धवलगृह (मकान) की खिड़कीके नीचे वलभी (टोडे) पर बैठ कर ' कोऽहम् ' (कौन नीरोग है ! ) ऐसा शब्द बोले । उस आयुर्वेदज्ञने अपने समीपहीमें सुने जानेवाले इस शब्दको साभिप्राय समझ कर चिर काटतक उसका विचार करके कहा- २६७. अल्प शाक खानेवाला, चाधलके साथ घी लेनेवाला, दूधके रसोंका व्यवहार करनेवाला, पानी ज्यादह नहीं पीनेवाला, प्रकृति के विरुद्ध - वातकारक और विदाही (जलन पैदा करनेवाले ) पदार्थीको न खानेवाला, अस्थिर भावसे न खानेवाला, खाये हुएके जीर्ण होने (पच जाने ) पर खानेवाला और अल्प भोजन करनेवाला ' अरुक् ' अर्थात् नीरोग होता है । ऐसा सुन कर मनमें कुछ चकित हो कर वे चले गये । फिर दूसरे दिन, दूसरी वेलामें, उसी प्रकारका पक्षीका रूप बना कर, वैसा ही पुराना शब्द करते हुए, वे वैद्यके घर पर आये । फिर उनकी बातके उत्तरमें वैद्यने कहा- २६८. वर्षामें जो स्थिर रहता है (अर्थात् यात्रा नहीं करता ), शरत्कालमें पेय पदार्थोका सेवन करता है, हेमन्त और शिशिरमें खूब भोजन करता है, वसन्तमें मदमस्त बनता है और प्रीप्ममें [दिनको ] शयन करता है, हे पक्षी, वही पुरुष नीरोग होता है । ऐसा कहनेपर वे फिर चले गये। तीसरे दीन, योगीका रूप बना कर उसके घर गये और वे बोले --- २६९. हे वैद्य, वह कौनसी ऐसी औषधि है जो न पृथ्वी में उत्पन्न होती है, न आकाशमें; न बाजारमें मिलती है, न पानी में पैदा होती है। और फिर सर्व शास्त्रोंको सम्मत है। इसपर वैद्यने कहा- २७०. पृथ्वी या आकाशमें न होनेवाली, पथ्य तथा रसवर्जित ऐसी महौषधि पूर्वाचार्यों द्वारा बताई हुई लंघन ( उपवास ) रूप है। इस प्रकार अपने अभिप्रायके ठीक अनुकूल प्रत्युत्तर पा कर वे दोनों वैद्य चमत्कृत हुए और फिर प्रत्यक्ष हो कर यथाभितम वर प्रदान कर अपने स्थानपर चले गये । इस प्रकार वैद्य वाग्भटका यह प्रबंध समाप्त हुआ। गिरनार तीर्थके निमित्त श्वेताम्यर-दिगम्बरमें लड़ाई । २२६) धामण उ लि प्राममें वसनेवाला धारा नामक कोई नैगम (व्यवहारी), जो अपनी लक्ष्मीसे वैस्रवण देवकी भी स्पर्धा करनेवाला था, संघाविपति हो कर, प्रचु द्रल्यका व्यय करके जीवलोकको जिलाता हुआ, अपने पाँच पुत्रों के साथ, श्रीरैवतक गिरि की उपत्यका ( तलहट्टी) में जा कर निवास किया। दिगंबर संप्रदायके भक्त ऐसे गिरिन गरके राजाने, उसे से तो वर भक्त समझ कर यात्रासे अटकाना प्रकरण २२५-२२९ ] प्रकीर्णक प्रवन्ध [१५१ चाहा । इस पर दोनोंके सैनिकोंमें लड़ाई छिड़ गई । असीम युद्धसे जूझते हुए, अतिप्रिय ऐसी देवभक्तिसे उत्साहित हो कर उसके पाँचों पुत्र, वहां मारे गये और वे मर कर पाँच क्षेत्रपाल हुए । उनके क्रमशः ये नाम हुए-१ कालमेघ, २ मेवनाद, ३ भैरव, ४ एकपद, और ५ त्रैलोक्यपाद । तीर्थके विरोधियोंको मृत्यु के मुँह पहुँचाते हुए वे पाँचों विजयी हो कर पर्वतके चारों ओर वर्तमान है। २२७) फिर उनका धारा नामक पिता जो अकेला ही बच रहा था, उसने कान्यकुब्ज देशमें जा कर श्री बप्प भट्टसूरि के व्याख्यानके अवसरपर श्री संघकी आन दे कर यह कहा कि- रैवतक तीर्थमें दिगंबरोंने अपनी वसति बना ली है और श्वेताम्बरोंको पाखंडो कह कर पर्वतपर चढ़ने नहीं देते हैं । इस लिये उनको जीतकर उस तीर्थका उद्धार कीजिये और अपने दर्शनकी प्रतिष्ठा करके तब फिर ये व्याख्यान दीजिए। उसके ऐसे वचन रूप इंधनसे जिनकी क्रोधरूप अग्नि प्रज्वलित हो उठी वेसे वे आचार्य उस आम राजा को साथ ले कर, उसी श्रेष्ठीके साथ, पर्वतकी उपत्यकामें पहुँचे । सात दिनोंमें, वादस्थानमें दिगंबरोंको पराजित करके संघके सामने श्री अम्बिकाको प्रत्यक्ष किया । 'इक्कोवि नमुक्कारों' और 'उज्जिन्तसेलसिहरे ये दो गाथायें अम्बिकाके मुखसे सुन कर सितावर दर्शनकी प्रतिष्ठा सिद्ध हुई और फिर वे पराजित दिगंबर 'वला- नक मंडपसे' झम्पापात करके नीचे गिर पड़े। इस प्रकार यह क्षेत्राधिपोत्पत्तिका प्रबंध समाप्त हुआ। सोमेश्वरका अपने भक्तोंकी परीक्षा करना। २२८) एक बार, भवानीने शिवसे पूछा कि-'तुम कितने कार्पटिकोंको राज्य देते रहते हो?'-उसके ऐसा पूछनेपर [ शिवने कहा-] 'इन लाखों यात्रियोंमें जो कोई एक पूरा भक्ति-परायण होता है उसीको मैं राज्य देता हूँ' । इस बातकी परीक्षाके लिये, गौरी (पार्वती)को पंकमग्न बूढ़ी गाय बना कर और स्वयं मनुष्यरूप धारण कर, शिवजी तटस्थ खड़े रहे और कीचड़मेसे गायका उद्धार करनेके लिये पथिकोंको बुलाने लगे। वे सब लोक तो सोमेश्वर नजदीक होनेसे उसके दर्शनके लिये बडे उत्कंठित थे, इसलिये उन्होंने उसका उपहास किया । पर पथिकोंका कोई एक दल कृपाल हो कर उसके उद्धारका प्रयत्न करने लगा तो शिवजी सिंहरूप धारण करके उन्हें डराने लगे । तब उनमेंसे एक ही ऐसा पथिक निकला जो मृत्युकी भी परवा न करके उस गायके समीप पहुँचा। उसीको अलग बतला करके शिवने पार्वतीको बताया कि वही एक राज्यके योग्य है। इस प्रकार यह वासनाका प्रबंध समाप्त हुआ। पूर्वजन्मका किया भोगना । २२९) सो मेश्वर की यात्राको जाता हुआ एक कार्पटिक रास्तेमें किसी लोहारके घर सोया। उस लोहारकी स्त्रीने अपने पतिको मार कर कृपाणिकाको उस कार्पटिकके सिरहाने रख दी और फिर चिल्लाने लगी। आरक्षक ( राज्यके सिपाही ) ने वहाँ आ कर उस अपराधीके हाथ काट डाले। इससे वह सदैव उस देवको उपालंभन दिया करता । एक रातको देव प्रत्यक्ष हो कर बोला-'तुम अपने पूर्व-जन्मकी बात सुनो । एक बार दो भाइयोंमेंसे एकने एक बकरी के दोनों हाथोंसे कान पकड़े और दूसरेने उसे मार डाला । उसके बाद वह वकरी मर कर यह स्त्री हुई । जिसने इसे मारा था वह इस समय इसका पति हुआ। तुमने जो इसके कान पकड़े थे, इससे तुम्हारा समागम होनेपर, तुम्हारे हाथ काटे गये । सो इसमें मुझे क्यों उपाळंम देते हो? इस प्रकार यह कृपाणिका-प्रबंध समाप्त हुआ।
प्रवन्धचिन्तामणि [ पचम प्रकाश जिनपूजाका माहात्म्य। २३०) प्राचीन कालमें, शंखपुर नामक नगरमें शंख नामका राजा था। वहाँ पर, नाम और कर्म दोनाहीस 'धन द' (धन देने वाला) नामका एक सेठ था । उसने एक बार सोचा कि लक्ष्मी हाथी के समान चंचल है, अतः वह हाथमें उपहार ले कर राजाके पास आया और उसे संतुष्ट किया । राजाकी दी हुई भूमिमें, अपने चार पुत्रों के साथ सलाह करके, शुभलग्नमें उसने एक जिनमंदिर बनवाया। उसमें, प्रतिष्ठित वियोंकी स्थापना करके उस प्रासादके व्यय-निर्वाहके लिये आमदनीके अनेक मद कायम किये। उसकी पूजाके लिये अनेक पुष्प, वृक्ष, लता आदिसे अलंकृत एक सुंदर बागीचा बनवा दिया और उसके कार्यचिन्तक गोठिक नियुक्त किये । इसके अनन्तर, पूर्वकृत दुष्फर्मके फलके उदयसे क्रमशः उसकी लक्ष्मी घट गई और वह कर्जदार हो गया। मान- प्रतिष्ठाके म्लान हो जानेके कारण वह किसी गाँवमें जा कर रहने लगा। नगरमें जा-आ कर लड़के जो कुछ पैदा करते उसीपर गुज़र करता हुआ वह काल व्यतीत करने लगा। एक बार, जब चातुर्मासिक पर्व निकट आया तो वहाँ जानेवाले पुत्रोंके साथ वह ध न द भी शंख पुर पहुँचा । वहाँ अपने बनाये हुए प्रासादकी सीढ़ियों पर चढते, उसके उद्यानकी पुष्प चुननेवाली (मालिन) ने उसे फूलोंकी डाली भेंट की। परमानंद निर्भर हो कर उसीसे उसने जिनेंद्रकी पूजा की । रातमें गुरुके सामने अपनी दुरवस्थाकी बड़ी निंदा करने लगा। तब उन्होंने उसे कपर्दी यक्षका आराधन करनेके लिये मंत्र दिया । फिर एक कृष्ण चतुर्दशीकी रातको उस मंत्रकी आराधना करके कपर्दी यक्षको प्रत्यक्ष किया । गुरुके उपदेशानुसार उससे, चातुर्मासिक दिनके अवसर पर जो पुष्प-चतुःसरिका ( फूलकी चौसरी लड़ी ) से जिनेशकी पूजा की थी उसके पुण्यफलकी याचना की। उसने कहा कि-'एक फूलकी पूजाका पुण्यफल भी, बिना सर्मज्ञके, मैं देनेमें असमर्थ हूं'। फिर भी उस कपर्दी यक्षने, उस साधर्मिकके प्रति अतुल्य वात्सल्यभाव धारण करके, उसके घरके चारों कोनोंमें, सुवर्णपूर्ण चार कलश निधिरूपमें रख दिये, और वह तिरोहित हो गया । प्रातःकाल वह अपने घर आया और धर्मकी निंदा करनेवाले उन पुत्रोंको वह धन समर्पण किया । वे भी आग्रहके साथ पितासे उस धनलाभका कारण पूछने लगे । इसपर, उनके हृदयमें धर्मके प्रभावका आविर्भाव करनेके लिये, जिनपूजाके प्रभावसे संतुष्ट हुए कपर्दी यक्ष द्वारा, इस संपत्ति के प्राप्त होनेकी बात कह सुनाई । वे भी सम्पत्ति पा कर फिर उसी जन्मस्थानमें जा कर रहे और अपने धर्मस्थानोंका व्ययनिर्वाह करने लगे। फिर विविध भाँति जिन शासनकी प्रभावना करते हुए वे विधर्मियों के मनोंमें भी जैन धर्मके प्रभावको स्थापित करते रहे । इस प्रकार जिनपूजा संबंधी यह धनदका प्रबंध समाप्त हुआ। * , श्री मेहतुंगाचार्य विरचित प्रबंधचिन्तामणिमें, विक्रमादित्यके कहे हुए पात्रविवेचनसे ले कर जिनपूजासंबंधी धनदके प्रबंध तकका वर्णनवाला, यह प्रकीर्णनामक पाँचवाँ प्रकाश समर्थित हुआ। [ इस प्रकाशकी ग्रंथसंख्या ७७४ है । समग्र ग्रंथकी श्लोक संख्या ३१५० है ] ग्रन्थकारकी प्रशस्ति । बहुश्रुत और गुणवान् ऐसे वृद्ध जनोंकी प्राप्ति प्रायः दुर्लभ हो रही है और शिष्योंमें भी प्रतिभाका वैसा योग न होनेसे शास्त्र प्रायः नष्ट हो रहे हैं। इस कारणसे, तथा भावी बुद्धिमानोंको उपकारक हो ऐसी परम इच्छासे, सुधासत्रके जैसा, सत्पुरुषोंके प्रबन्धोंका संघटनरूप यह अन्य मैंने बनाया है ॥ १॥ यह, प्रबन्धसंग्रहका चिन्तामणि, चिरकाल तक हाथपर रहनेसे स्यमन्तक मणिका भ्रम पैदा करता है और हृदयमें स्थापन करनेपर प्रशंसनीय ऐसे विमल कौस्तुभ मणिकी कलाका सृजन करता है। सो इस ग्रन्थके अध्ययनसे विद्वान् लोग श्रीपति ( विष्णु ) की नाई शोभित होते हैं ॥२॥ मन्दबुद्धि हो कर भी, मैंने जैसा सुना वैसा ही, प्रबन्धोंका संकलन करके यह ग्रन्थ बनाया है। पण्डित लोग मत्सरताका त्याग करके, अपनी प्रज्ञाके उन्मेषसे इसकी उन्नति ही करें ॥ ३ ॥ ग्रहों रूपी कोड़ियोंसे जब तक धुलोकमें सूर्य और चन्द्रमा, जुआड़ीकी तरह क्रीड़ा करते रहें तब तक आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह प्रन्थ विद्यमान रहो ॥ ४ ॥ विक्रमादित्य संवत्के १३६१ वर्ष बीतनेपर, वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन यह ग्रन्थ समाप्त हुआ॥५॥ [ गधर्मे फिर यही कथन ] राजा श्री विक्रमके समयसे १३६१ वर्ष बीतनेपर वैशाख सुदि १५ रवि वारको, आज यहाँ श्री वर्द्ध मा न (काठियावाडके आधुनिक वढ वा न नगर ) में यह प्रबन्धचिन्तामणि प्रन्थ समाप्त किया गया। -:0:- परिशिष्ट कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-संयन्धका रूपकात्मक प्रबन्ध* श्रीमान् हेम चन्द्र के समान तो गुरु और श्रीमान् कुमार पाल के समान जिनभक्त राजा न तो हुआ और न [ अब कभी ] होगा ॥१॥ प्रभु श्री हेमाचार्य के पास ज्ञान-दान प्राप्त करके उसके पश्चात् श्री चौलुक्यचक्रवर्ती कुमारपालने जो हिंसाका निवारण किया था उसका [रूपकात्मक] प्रबन्ध इस प्रकार है- एक अवसर पर, अणहिल्लपुरमें, श्री कुमारपाल नागक राजाने, घुड़दौड़की क्रीडा करनेके लिये जाते समय, एक ऐसी बालिकाको देखा जिसने अपने सौन्दर्य से सुरसुन्दरियोंको भी मात कर दिया था और जिसका मुख वाल-चन्द्रमाके समान मनोहर था । यद्यपि वह * टिप्पणी-यह परिशिष्टात्मक प्रवन्ध, इस प्रन्यकी बहुसख्यक पोयियोंमें लिखा हुआ मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि ग्रन्थकार मेरुतुङ्ग सूरिने ही इसकी रचना की है पर ऐतिहासिक न हो कर यह एक रूपकात्मक प्रबन्ध है इसलिये इसको परिशिष्टके रूपमें ग्रन्थके अन्तमें जोड़ दिया मालूम देता है। कुमारपाल ने अपने धर्मगुरु आचार्य हेमचन्द्र सूरि के पास जैनधर्मकी गृहस्य दीक्षा (भावकधर्मवत ) स्वीकार करते समय, सबसे पहले जब अहिंसा व्रतका स्वीकार किया, उस समयको लक्ष्य करके इस रूपकात्मक प्रबन्धका प्रणयन किया गया है। इसमें अहिंसाको एक राजकन्या बनाई है जो आचार्य हेमचन्द्र के आश्रममें पलकर बसी उम्रवाली- वृद्धकुमारी हो गई है। अन्यान्य गजाओंके अधार्मिक आचरण देख कर वह किसीके साथ विवाह करना नहीं चाहती; किन्तु, कुमारपाल जो आचार्य हेमचन्द्रका शिष्य बना है उसके धर्ममावसे मुग्ध हो कर, आचार्यके आदेशसे वह उसका पाणिग्रहण कर लेती है-बस यही इस प्रबन्धका सायर्य है।
प्रवन्धचिन्तामणि सदाचार-प्रसरण-शीला थी फिर भी धीमी चालसे चटनेवाली थी । वह मुनियोंके साथ क्रीड़ा किया करती थी। अपनी सुकोमल वाणीके प्रपञ्चसे उसने त्रैलोक्यको चमत्कृत कर दिया था, और उसकी आकृति मन्द मुसकानसे खूब मधुर हो रही थी। इस बालिकाको देख कर उसके रूपसे हृत-चित्त हो कर राजाने किसी निकटस्थ प्रसन्नचित्त (साधुजन) से पूंछा कि-'भला यह लड़की कोन है ?' उसने कहा कि-'अपार ऐसे शास्त्र-सागरके पारको देख लेनेके कारण जिन्होंने किलिकाल सर्वज्ञ'की प्रसिद्धि प्राप्त की है। द्वादश भेदोंवाली तपस्याकी आराधनाके द्वारा, अष्ट महासिद्धियोंको जिन्होंने वशमें कर लिया है; समग्र भूपालोंके शिरःप्रदेशको मणियोंने जिनके चरणोंका चुंबन किया है। उन्हीं महर्पि भगवान् आचार्य श्री हेमचंद्रके आश्रममें रहनेवाली यह अहिंसा नामक कन्या है । इसके यथार्थ रूपमा निरूपण करनेमें स्मृति और पुराणके वचन तो पर्याप्त नहीं है, किन्तु समस्त जंतुओंके पितृ-स्वरूप श्री जिनेन्द्र देवके उपदिष्ट स्पष्ट मिद्धान्तों और उपनिपदों द्वारा आवासित हृदयवाले किसी मुनिश्रेष्टने इसकी स्थितिकी रीतिका पूरा निरूपण किया है- अन्य किसीने वैसा नहीं किया । यह वचन सुन कर राजा अपने आवासमें ठौट आया। पर उस कन्याका स्वरूप जान कर, उसका अंगीकार करनेके लिये परम उत्सुक वह राजा, उसके पाणिग्रहणके द्वारा अपनी भाग्य-सम्पद आदिको कृतार्थ करनेकी कामनासे, अपने 'विवेक' नामक परम मित्रके बताये हुए मार्गसे उन मुनियोंके आश्रममें जा पहुंचा। उस कन्याके सामने उसीका ‘स दा चार' नामक भाई खेल रहा था। उसीने जा कर सम-चित्तवृत्तिवाले महर्षि श्री हेमचंद्र सूरि को राजाके आगमनका वृत्तान्त बतलाया । राजाने पृथ्वीतलपर मस्तक टेक कर, उन्हें भकि और हर्पके साथ, प्रणाम किया और फिर उस कन्याका स्वरूप पूंछा । इस पर वे बोले-' हे नरपुंगत्र ! सुनो, त्रैलोक्यके एकमात्र सम्राट् श्री अहद्धर्मको पट्ट महादेवी श्रीमती अनुकंपा देवीकै कुक्षि-सरोवरकी राजहंसी जैसो, निःसीम सुन्दरी यह अहिंसा' नामक कन्या है । जिस लग्नमें यह कन्या पैदा हुई थी उस लग्न प्रहबलको इसके सर्वज्ञ पिताने इस प्रकार निर्दिष्ट किया था- यह अतीव पुण्यवती, सुदतियोंकी शिरोमणि कन्या है। पुत्रजन्मोत्सवसे भी अधिक प्रशंसनीय इसका जन्म है । क्यों कि- लक्ष्मी [ रूप कन्यासे ] समुद्रको और वाग्देवी [ रूप कन्यासे ] ब्रह्माको विश्रुत देख कर, कुपुत्रके दुःखसे सूर्य और चन्द्रमा ताप और कलंकका त्याग नहीं करते हैं ॥ २॥ इस लिये क्रमशः बढ़ती हुई यह कन्या अपने अनुरूप धर न पानेके कारण वृद्ध-कुमारी हो जाने पर किसी अनुरूप राजासे साग्रह विवाहित होगी। इस प्रकार सतियोंमें श्रेष्ठ यह कन्या अपने पति और पिता दोनोंको उन्नतिकी पराकाष्टापर पहुँचा देगी। और इसते विवाह करनेवाला यह पुरुष भी खेलहीमें महा-मोह नामक राजाको जीत कर परमानन्दका भाजन बनेगा ।' यह सुन कर राजा बोला- 'प्रभो ! यह अईद्धर्मकी पुत्री इस समय आपके ही चरण कमलोंकी उपासना करती है, अतः इसका विवाह आपहीके कहनेसे होगा, अन्य किसीसे नहीं। सो पूज्य-पाद मुझपर प्रसन्न हों, विषादगण विषण्ण हों, महामोहका विजय करना प्रारंभ हो, और [ उससे ] में परमानन्द प्राप्त करू ।' उसके इस कथनके बाद गुरु बोले- यह वृद्धा कुमारी है, इसका संकल्प दुष्पूरणीय है। यह संकल्प इसीके मुंहसे सुन कर विवाह करना चाहिये, अन्यथा नहीं।' इस प्रकार उनकी अमृतमी जैसी यह वाणी सुन कर, उसने कन्याके पास सु बुद्धि नामक दासी भेज कर उसे बुलवाया । वह दासी उस कन्याके पास जा कर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके बोली-'स्वामिनि, राजकन्ये, [आज] तुम धन्यतमा हो, जो तुम्हें, अारह देशोंके सम्राट्, और समस्त सामन्तोंके मस्तक-मणियोंकी फिरण-मालासे जिनका चरण अलंकृत है वह चौलम्य-चक्ररती तुम्हारे साथ चिाह करना चाहते हैं ।' उसकी इस बातसे कुछ मुँह बना कर, उपहासके उखासके साथ, उसने कहा- समि, जिस महान् साम्राभ्यका अन्त नरक है उसके लोभकी बातफा विस्तार 1 कुमारपाल राजाका अहिंसाके साथ विवाह-संवन्धका रूपकात्मक प्रवन्ध [१५५ ७॥ करना रहने दे ! मैं तो अनुकूल प्रेमीको चाहती हूँ। पुरुप प्रायः परुप आशयवाले, और नाना प्रकारके अनुरागवाले होते हैं; उनसे मेरा क्या काम है। क्यों कि- रूप यौवन सम्पन्ना कन्याका अविवाहित भी रहना वरन् अच्छा है, किन्तु कलाहीन, अननुकूल, कु-पतिसे विडंवित होना [ अच्छा ] नहीं ॥ ३ ॥ पर सुनो,-अगर दरिद्र हो कर भी पति जो प्रियकारी हो तो उससे विवाहित स्त्रीको जैसा सुख होता है वैसा सुख ईश्वर (बड़े धनसंपन्न ) से भी नहीं प्राप्त होता । [ देखो न ] भागीरथी (गंगा) को शिव तो शिरपर धारण करते हैं, पर लक्ष्मीके पति (विष्णु) उसे पैरसे भी नहीं छूते ! सो मुझे वरण करनेकी अभिलाषा तो वृथा ही समझो । क्यों कि मेरी प्रतिज्ञाका किसी महाराजासे भी पूरा होना कठिन है ।' ऐसा कहनेवाली उस युवतीसे वह (दासी) बोली-'सखि ! मैं तुम्हारी प्रियकारिणी सखी हूँ, कुछ अपलाप तो करनेकी नहीं; सो तुम अपना अभिमत मुझे स्पष्ट कह बताओ। मेरा भी नाम सुबुद्धि है, मैं तुम्हारी प्रतिज्ञा उस कुमारपाल राजासे पूरी कराऊंगी।' ऐसा कहनेपर वह बोली- सत्यवक्ता, परलक्ष्मीका त्यागी, समस्त जीवोंको अभय-दाता, और सदा अपनी ही स्त्रीसे सन्तुष्ट, [ ऐसा जो पुरुष होगा ] वही मेरा पति होगा ॥ ५॥ दुर्गतिके बन्धु जैसे दूत स्वभाववाले सात पुरुषों ( अर्थात् , सात व्यसनों ) को जो अपने चित्तसे दूर निकाल फेंक देगा वही मेरा पति होगा ॥६॥ मेरे सहोदर भाई सदा चार को अपने हृदयासनपर बैठा कर एक चित्तसे जो उसकी सेवा करेगा वही मेरा पति होगा उसकी इस वातको सुन कर वह बोली- ऐ सुलोचने ! सुनो, मैं यथार्थनामा ( सुबुद्धि ) तव हूँगी जब तुम्हारी प्रतिज्ञाको पूरा करने के लिये, श्री हेममूरिको आगे कर, समस्त लोकके सामने, तुम्हारे इन प्रतिज्ञात अर्थीका समर्थन करा कर, तुम्हें परिणीत कराऊँगी । और तभी, तुम मुझे अपनी चतुर सखी मानना, नहीं तो तिनकेसे भी गयी बीति समझना ।' यह कह कर, फिर राजाकी सभामें जा कर उसने उसकी वह कठिन प्रतिज्ञा कह सुनाई। उसकी इस अप्रज्ञाभरी प्रतिज्ञाके कठोर भावसे हृदयमें सन्तत हो कर राजा वडी वेचेनी धारण करने लगा। तव सुबुद्धिने कहा-' हे श्रीनिधे ! धीरज धरो, पौरुप-शालियोंको दुष्कर क्या है ? और इस बाधाके दूर करने के उपाय भी तो है । महर्षि हेमचन्द्रका अनुरसरण करो और उनका उपदेश सुनो!' इस प्रकार उसकी बात सुन कर विनय का सहारा पा कर वह राजा सूरिके पास गया। उनके पद-पोंमें प्रणाम कर उनकी कन्याको उस प्रतिज्ञाका वृत्तान्त कहा । [ सूरि बोले-] ' वत्स ! यदि परिणयनकी चाह है तो फिर उसकी प्रतिज्ञा पूरी करो। यह कन्या अपने पतिकी निःसीम उन्नतिके लिये होगी । क्यों कि- उत्तम वंशोत्पन्न, धन्य और गुणाधिका सती कन्यासे विवाह करके कोन प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त करता ! लक्ष्मी और पार्वतीके साथ विवाह कर गोप (कृष्ण ) और उम्र (शिव ) ने जिस तरह [ प्रतिष्ठा ] पाई थी। ॥ ८॥ उनकी यह बात सुन कर, दुरित समूहको दूर कर देनेवाली ऐसी हस्ताञ्जली किये हुए उस राजाने, अनेक प्रकारके अभिग्रह धारण करके, उस कन्याका वाग्दान प्राप्त किया और वह बड़ा प्रमुदित हुआ । सं० १२१६ मार्गशीर्ष सुदि द्वितीयाको, बलवान् लग्नमें, संग नामक हाथीपर आरूढ हो, सनत्रयसे अलंकृत, शुभमनरूप यन्त्र धारण करके, दक्षिण हस्तमें कंकण बाँध कर, यह [हेमसूरिकी] पौषधशालाके द्वारपर आया। उस समय श्वेतन्छन द्वारा उसका आतप निवारण किया जा रहा था; श्रद्धा नामक बहन उसकी लवण-आरती उतार रही थी।
१५६ ] प्रवन्धचिन्तामणि गुरुभक्ति, देशविरति, समिति, गुप्ति आदि सखियाँ वरातिन वन कर मंगल गान कर रही थीं; अमारि-घोषणाके पटह बजे रहे थे; परिग्रह-परिमाणरूप व्रतके मिपसे याचक जनोंको यथेष्ट दान दिया जा रहा था पापरूप कचरेको दूर हठाया जा रहा था; सद्वोध पुष्पोंसे सन्यायकी राजवीथियाँ सुगंधित की जा रही थीं, तब कन्याको माँ अनुकंपा महा देवी ने श्रीअईन के साक्षी रहते प्रोक्षण किया। इस प्रकार उस राजाने अहिंसाका पाणिग्रहण किया। उस समय, तारामेटक पर्वमें परमानन्द हुआ। इसके बाद, नवागवेदी महोत्सवके स्थानमें, ३६ हजार श्लोक प्रन्यपरिमाण, हे म सू रिकृत त्रिपष्टिशलाकापुरुषचरित्र नामक शाख स्थापित किया गया। वेदीके पात्र-स्थापन और पाँच कपर्दक (कोडियों) के स्थापनकी जगह; वीस-संख्यक वीतरागस्तव स्थापित किये गये । शमी काष्टके स्थानपर द्वादश प्रकाशात्मक योगशास्त्र अन्य स्थापित किया गया। उसके परिकरके रूपमें, हे मसूरि के अन्यान्य लक्षण, साहित्य, तर्क और इतिहास प्रमुख शास्त्रोंकी रचना हुई । मूलगुण और उत्तर गुणों से इस वेदिकाको दृढ़ करके, उसमें ज्ञानरूप अग्नि जलाई गई, और चचास्मिंगल ' रूप इस मांगलिक सूत्रके उच्चारणसे मंगल किया गया। उस समय उस कन्याके मुखमण्डनके लिये, राजाने ७२ लाख रुपयोंकी आमदनीवाला 'रुदती कर' (अर्यात् निःसन्तान विधया त्रियोंके राज्यप्राह्य धन ) का त्याग करने रूप दान किया । उसी समय उसका पट्टबन्ध किया गया (-उसे पट महादेवी बनाया गया), और उसके पिताके निवास-योग्य १४४४ विहार बनवाये गये। फिर हिंसा (जो राजाकी पूर्वपत्नी थी) अपनी सौत अहिंसाकी इस प्रकारकी उन्नतिको देख कर, अपना पराभव निवेदन करनेके लिये, अपने पिता विधाताके पास गई । बहुत दिन बाद देखने के कारण तथा पराभव के दुःखसे विरूपसी बनी हुई उसको न पहचान, पिताने उससे पूंछा कि- ' सुंदरी ! तुम कौन हो ?'-' हे तात विधाता ! मैं तुम्हारी प्रिय पुत्री हिंसा हूं!'-'तूं ऐसी दीनकी तरह क्यों है !'-'पराभवके कारण ।'-'वह (पराभव ) किससे हुआ?'- क्या बताऊं ! 'कहो न'- हेमाचार्यके कहनेसे, उस परम गुणवान् कुमारपाल नृपातने मुझे अपने हृदय, मुंह, हाथ और उदरसे उतार कर, पृथ्वीतलसे निकाल दिया ॥९॥ उसकी यह बात सुन कर ब्रह्मा वोठे कि-'सत्यप्रतिज्ञ ऐसा कुमारपाल देव जो पहले तुझमें अनुरक हो कर भी, उस भेषधारी साधुके कथनको सुन कर, अब विरक्त हो गया है, तो फिर में अब तेरे लिये कोई ऐसा अच्छा पति ढूंढ निकालेंगा जो तेरा ही एकच्छत्र राज्य कर देगा। इसलिये तुम धीर धरो' 'यह कह कर उसे अपने समीप रखा । अहिंसा देवीकै साथ श्री कुमारपाल नृपति अपने इस जीवन-ही-में अतुलित महानन्दका अनुभव फरता हुआ, चौदह वर्ष तक, सुख पूर्वक राज्य करता रहा । इसके बाद उसकी एक पहली प्रिया जो कीर्ति थी उसको देशान्तरमें पठा कर, जब उसने स्वर्गको अलंकृत किया, तो उसी समय उसके प्रेमको प्रसादपूर्ण क्रौदा- ओंका स्मरण करती हुई वह अहिंसा देवी मी, कलिमटिन जनोंके पापस्पर्शका परिहार करनेको इन्छासे, उसके साथ 'सहगमन ' कर गई। इस प्रकार श्री कुमारपालका अहिंसाके साय विवाह-संबन्ध बतानेवाला यह परिशिष्टात्मक प्रबन्ध समाप्त हुआ। .
5 1 10 15 । अंगविजापइपणयं [२एण्णचरि तं सव्यमणुगंतूण पुण्णामसममादिसे । एत्तो पुण्णामिकं धण्णं किचयिस्सामऽतो परं ॥ १८२ ॥ साली वीही तिलो व चि कोहया वैरक चि या । उसलका चीण-मुग्गा णिप्फावा जप-गोधुमा ॥१८॥ मासा मूढत्य-चणका कुलस्य त्ति सग ति वा । एवं पुण्णामिका सद्दा वोच्छं घणमदो परं ।। १८४ ॥ सुषण्णमासको व तिवहा रययमासओ। दीणारमासको व तितधोगाणं च मासको ।।१८५॥ काँहापणो सत्चपको पुराणो ति व जो वदे । सतेरको त्ति तं सव्यं पुण्णामसममादिसे ।। १८६ ॥ एवमेवऽयंतो दिढं पुण्णामं पि य लक्सगं । सत्यमेवाणुगंतूणं पुण्णामसममादिसे ॥ १८७ ॥ पुण्णामधेये मक्सचे देवते पणिधिम्मि य । रक्खे पुष्फ-फले देसे णगरे गाम-गिहे वधा ।। १८८।। पुरिसे पउप्पदे या वि पक्सिम्मि उदके घरे । कीडे किपिलके या वि परिसप्पे तपेय य ।। १८९॥ पाणे य भोयणे चेन तथा आमरणेसु य 1 आसणे सयणे जाणे भंडोरगरणेसु य ॥ १९० ॥ लोहेसु थावि सध्वेसु सन्चेसु रयणेसु य । मणीमु यावि सब्वेसु सव्य-धण्ण-धणेसु य ॥ १९१ ।। एतम्मि पेक्खितामासे सद्दे रूवे तघेव य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो यूयांगचिंतको ।। १९२ ।। ॥ पुण्णामाणि सम्मत्वाणि । द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ छ । [२पण्णचरि थीणामा ] पण्णत्तरि तु थीणामा मणिम्मि परिकित्तिया । छगली सिहा य गंडा य उमयो कण्णचलिगा ॥ १९३ ॥ मुमका अक्खिगुलिका वारका अक्सिवत्तिणी । णासिका कण्णपालीओ थूणा सीता य वालुका ॥ १९४ ॥ दाढाओ दंववेढीओ वट्टी जिन्मा हणू वघा । यह-ककाडिको गीवा कडि पट्ठी फिजा गुदा ॥ १९५॥ पओढा पाहुणालीयो चूंचुका थणपालीओ । णामी य लोमवासी य जंघाओ थूरका वधा ।। १९६ ॥ कंहरा पण्डिका लंका सोलसंगुलिओ क्या । लेहा छिरा य घमणी य बलीओ सिव्यणी तथा ॥ १९७ ॥ सरीरे जाणि वऽण्णागि थीणामाणि मवंति हि । ताणि थीणामधेजेसु गिहिसे अंगचिंतओ ॥ १९८ ॥ अत्यं वद्धिं जयं लाम पुच्छे एवाणि आमसं । र्याणिमित्तं ति तं यूया इतरं पत्थि ति गिदिसे ॥ १९९ ।। पुरिसं च परिपुच्छेन अधण्णो दूभगो ति य । असिद्धत्यो त्ति घूया थीणामं पुण गिदिसे ॥ २००॥ अप्पमागो य भवति अप्पसेसे फिलेसवं । पावो य आइलो णिचं भोगे दुक्खेण मुंजति ॥ २०१ ॥ इत्यि या परिपुच्छेन अघण्णा दूमग त्ति य 1 अप्पसेसा असिद्धत्या कुटुंबस्स अणिरसरी ॥ २०२।। अरसामिणी य अत्याणं आणा जस्स ण पट्टति । आइला घट्ठमंतक्खा पतिं च प जयिस्सति ॥ २०३ ।। कणं च परिपुच्छेज तिस्से सव्यत्यमादिसे । अज्झावक फलं सव्यं ण लहूं पुण णिग्गमे ॥ २०४॥ अप्पसेसा माग य कुटुंबस्स य णीहणी । निञ्च पतिरस वस्साय अविधेयो पती य से ॥ २०५॥ गन्मं च परिपुच्छेज णत्यि गमो त्ति णिहिसे । गन्मिणी तु किलेसेण दारिकं तु पजाहिति ॥ २०६ ॥ णि" अपञ्चधमणं पुच्छे कण्णास ढावरा । दारकाऽरस ण जायंति जाताणं मनुतो भयं ॥ २०७।। पुरुसो जति पुच्छेज थीणिमित्वं समागमं । भविस्सति ति संवूया "थीया गत्यि समागमो । २०८॥ विनामिगमणं सिप्पं कम्मारंमं परिग्गई । यवहारं च लामं या मित्त-णातिसमागमो ॥ २०९॥ १°पयामकं . त• बिना ॥२°स्सामितो हं. त• बिना ॥३ चकरत्तिसं ३ पु•॥ ४ हस्तन्चिमध्यवर्ती पाठ है .. एवं वर्तते॥५ काहपको है• त• विना ॥ ६त्य उद्दिट्ट ६० त०॥ ७ दंतचेटीयो वही जि है• त• ॥ ८ अवत्तक सं३ पु.। अपभूक सि•॥९°का भीपा सम•॥ १० युचूका हं. त•॥११ ओ पूरका है. त• । ओ सरका सि. ॥ १२ अस्य च निजय सि.॥ १३ सवा हं. त• ॥ १४ स्सरा है.. विना ॥ १५ अमग्गा है. त०॥ १६ अविधेया सप• ॥ १७ णिटुं अपचयमणं ह.तु.॥ १८ मो.पु. विनाऽन्यत्र-स्स टायरा सं० ठी। °स्स थायरा ह.त.। "स्स वावरा ति ।। १९सीया है. तु.॥ 20 । 25 30 . + 5 10 । 16 थीणामा] णवमो अंगमणी णाम अन्झामो .६७ रायप्पसातं अधिगारं थीणामे ण पसरसते । थीसंपयोगो थीलामो थियाणं तु पसस्सते ।। २१०॥ कामिगं कामिगा संसं सढिकं केसवाणियं । अव्माकारियं लद्धमवलद्धं वा वि णिदिसे ॥ २११॥ देविकोदुविकं वा वि महाणसिकमेव य । णाडकायरियं या वि तथा पट्टोसकं पि वा ॥ २१२।। थीसेवकपेसण गणिकापविचारकं । थीअलंकारगं चेव थीगं व दन्यसाधकं ॥ २१३ ।। पवासे पुच्छिते पत्थि पउत्यो य गिरत्यकं । थीसंपउत्तं आगमणं पउत्यस्स वियागरे ॥ २१४ ॥ वंधं च परिपुच्छेज णत्यि बंधो त्ति णिद्दिसे । बद्धस्स मोक्खं पुच्छेज मोक्खं तस्स वियागरे ॥ २१५ ॥ पद्धस्स या वि पुच्छेज पुरिसस्स पवासणं । पुच्छिते णिदिसे तरस भविस्सति पवासणं ॥ २१६ ॥ भयं च परिपुच्छेज अत्यि तेवं वियागरे । खेमं च परिपुच्छेज गत्यि खेमं वियागरे ॥ २१७ ॥ संधि वा परिपुच्छेज विभाहं तस्स णिदिसे । विग्गहं परिपुच्छेज विवादं तस्स णिदिसे ॥ २१८ ॥ विवादे वा जयं पुच्छे णत्यि त्तेयं पवेदये । अरोग पडिपुच्छेजा णत्यि त्तेवं वियागरे ॥ २१९ ॥ कोवं च परिपुच्छेज अस्थि त्तेवं वियागरे । मरणं च परिपुच्छेज मरणं तत्य णिदिसे ॥ २२० ।। जीवितं परिपुच्छेन पत्थि तेवं वियागरे । आयाधितं च पुच्छेज ण समुद्धेहिति त्ति तं ॥ २२१ ।। णिव्याणं परिपुच्छेज अणेन्याणि पवेदये । संपत्रिं परिपुच्छेज असंपत्तिं पवेदये ।। २२२ ॥ उस्सवभूतं जं पुच्छे णत्यि तेवं वियागरे । दीणं सोकं च पुच्छेज अस्थि त्तेवं वियागरे । २२३ ॥ अणावुद्धिं च पुच्छेन अत्यि त्तेवं वियागरे । वस्सारतं च पुच्छेज मझिमो त्ति वियागरे ॥ २२४ ।। अपातपं च पुच्छेज अस्थि तेवं वियागरे । कता यासं वि वा चूया काले वासं ति णिदिसे ॥ २२५ ॥ दिवा रत्ति ति वा धूया रत्तिं ति य वियागरे । सरसरस वापदं पुच्छे अत्यि तवं वियागरे ॥ २२६ ॥ सस्सरस संपयं पुच्छे मझिम ति वियागरे । सतिं च जति पुच्छेन्ज सई तत्य पवेदये ॥ २२७ ॥ यीणामधेय जं घऽणं पभूतमिति णिहिसे । णहं ति परिपुच्छेन्ज णत्यी षष्ठं ति णिदिसे ॥ २२८ ॥ गट्ठमाधारइत्ताणं थीणाममिति णिहिसे । पहस्स लामं पुच्छेन्ज गयि लाभो ति णिरिसे ।। २२९ ।। [............. 1] पलातसंगम पुच्छे णत्यि तेवं वियागरे ॥ २३० ॥ गिधाण निधितं पुच्छे णत्यि तेवं वियागरे । - णिगिलंमं पुच्छेज णस्थि लमो त्ति णिदिसे ॥२३१॥ सेवाणिमित्तं पुच्छेज णत्यि सेव त्ति णिदिसे | रायप्पसादं पुच्छेज णस्थि त्वं वियागरे ।। २३२ ॥ रायतो णिबुर्ति पुच्छे यल्लमत्तं च पुच्छति । भोगलंमं वघा[]गं या सर्व गत्यि ति गिदिसे ॥ २३३ ॥ वघाऽधिकरणे सिद्धि लाम पुच्छति कम्मिको । वघा पतिद्वं छायं या सव्वं णत्यि चि गिदिसे ।। २३४ ॥ 25 मामि प परिपुच्छेन अधण्यो पायकम्मिको । फुलं मणि णिमित्तं च अवसिद्धेण संसितो ॥ २३५ ॥ अच्छादणं च पुच्छेन अधणे पावकं ति य । अच्छादणनिमित्तं च कुलस्साऽऽयासमादिसे ।। २३६॥ भूसगं परिपुच्छेज अघण्णं पायकं ति य । अप्पसत्यं च तं चूया फुलस्साऽऽयासकारणं ॥ २३७ ।। परप्पवेसं पुच्छेन अघणं पायकं ति य । अणिव्युतिकरं पावं पलं णेच पसस्सते ॥ २३८ ॥ गिचयं भंडलामं च देवरस य स गिब्बुति । याधि लंमं च एतेसु णत्यि ते वियागरे ॥ २३९ ॥ दासकम्मर पुच्छे अधणे पावकं यदे । आएमकारकं गिनं उगतं प य काहिति ।। २४० ॥ पुण्यामपेयं किंचि सव्यं त्यि ति निहिसे । पीगामवेयं किंचि सश्रमत्यि ति गिरिसे ।। २४१ ॥ १ कारिफलद य ल या विह. त• पिना ॥ २दोसक है. त• दिना ॥ ३ ८ एनधिामप्पगई .. मानि ४ निहाणलार्मर...॥ ५ लामो है. त.॥ ६अघणो ह.त.॥ ७ दश्यस्स प सनिधिपाधि ११ पुसदस्यसेय य ससिधियाधि मिला 20 30 ६८ । 10 15 अंगविजापइण्णय [२पण्णचरि पुरिसो गपुंसको इत्यी इत्यित्ति [य] वियागरे । धणं धणं च पुच्छेज सव्यं मंझिमगं वदे ॥ २४२ ॥ जं किंचि पसत्यं सा सव्यं गस्थि त्ति णिद्दिसे । अप्पसत्यं च पुच्छेज अत्यि त्तेवं वियागरे ॥ २४३ ॥ वघा खेत्तं तथा वन्यं सव्यं णस्थि ति णिदिसे । सव्वे (समे) सद्दे य जाणेज थीणामा जे भवंति य ॥२४॥ अहोमहिल त्ति या वूया महिला सुमहिल त्ति या । अहोइथि त्ति का बूया मुइत्थी इत्थिमेव य ॥२४५।। दारिया वालिया व त्ति सिंगिका पिल्लिक त्ति या । वच्छिका तण्णिका वत्ति पोतिक त्ति व जो वदे ॥२४६।। कण्ण त्ति वा कुमारि त्ति धिजा पैत्ति वधु त्ति या । वधू उपयधू व ति इत्थिया पमद त्ति या ॥ २४७ ॥ अंगणा महिला णारी पोट्टी जुवति त्ति या । जोसिता पणिता व त्ति विलक त्ति विलासिणी ॥ २५८ ॥ इट्ठा कंता पिया व ती मणामा हितइच्छिवा । इस्सरी सामिणी व चि तधा वल्लभिक त्ति या ॥ २४९ ॥ पजिया अजिया व त्ति र नौनिका मह-मातुया । मावा या चुल्लमावा वा माउस्सिय पितुस्सिया ॥२५०॥ भजा जारि सही व त्ति धूता णत्ति पणत्तिणी । रेमा त सुण्ड सायत्ती सल्लिका मेधुण त्ति वा ॥ २५१ ॥ भातुजाय त्ति या धूया सगोता भगिणि त्ति था । भागिणेने त्ति भज त्ति तधा कोडंविणि त्ति वा ॥२५२।। पितुस्सहा माउस्सहा वाजधा गेयातुकासहा । एतासं कितणेणं ना थीणामं सव्यमादिसे ।। २५३ ।। इत्यारयणं ति या चूया महादेवि त्ति वा पुणो । रायपत्ति त्ति वा बूया रायग्गमहिसि त्ति था ॥ २५४ ॥ रायोपजायपत्ति त्ति "सेणायपतिणि त्ति या । भोयणी तलवरी व त्ति रहिणी गामिणि त्ति था ॥ २५५ ॥ अमधी देल्लमी व त्ति पडिहारि या पुणो । तधिस्सरिगिणी व तधा भोई त्तिया ॥ २५६ ॥ छायाकरणठाणेण ठाविता 'जे सऽधिरसरा । जे यत्याणजीते पुरिसा माता भज्जा वि सिं तथा ॥ २५७ ॥ परिणी सत्यवाहि त्ति इल्मी या भोगमित्ति या । मडी डी कारगिणी तथा सहिगिणी त्ति वा ॥ २५८॥ लाडी [वा] जोणिका व त्ति चिलाती ववरि ति वा । सपरि त्ति पुलिंदि त्ति अंधी दिमिलि त्ति वा २५९ जाति-रस-देस-कम्माणं विजा-सिप्पकमेण वा । ये यत्याणजीते पुरिसा ताओ वि य तधेय सि ॥ २६०॥ जं जो समाचरे कम्मं जंजातीको ब्व जो भवे । तेसिं भन्ना वि णातव्या तेणेवाभिजणेण तु ॥ २६१ ॥ गणणामा लाजिका व त्ति उवधाइणि त्ति वा । दासी कम्मकरी व ति पेसि त्ति नत्तिक त्ति वा ॥ २६२ ॥ पयावति त्ति या यूया अणे भोति ति वा पुणो । भोति ति माणिणी व त्ति मातुरम ति व जो यदे ।।२६३॥ वंभणी सत्तियाणि त्ति वेस्सी सुद्दि त्ति वा पुणो। चातुव्वण्णविघाणेण णामतो जं जधुचते ॥ २६४ ॥ ओवातिक त्ति वा घूया सामोवात ति या पुणो। कॉलस्साम त्ति सौम त्ति » कालकति व जो वदे ॥२६५॥ दिग्या महिया व त्ति चतुरस्स ति वा पुणो। धतुररसा वाऽऽयता व त्ति खुजा मडहिक त्ति वा ॥२६६॥ थूल त्ति तणुकी व त्ति तथा मज्झिमक ति वा । सरला असरला व त्ति कोण त्ति सहु त्ति वा ॥ २६७ ॥ ततेपुरिका व ति अभोगाकरिणि त्ति वा । तथा सयणपालि त्ति भंडाकारिकिणि त्ति वा ॥ २६८ ।। "जं घडणं एवमादीयं थीकलाकम्मणं ति वा । तासं संकित्तणासद्दा थीणामसमलक्खणा ॥ २६९ ॥ १ वासिया ई. त• बिना ॥ २त्ति पत्तिक चि है. त.॥ ३त्ति विजा सप्र.॥ ४ एत्ति दधु त्ति है. त.॥ ५ षणिता सर• ॥ ६ पिया पची सि० विना ॥ एतचिहगतः पाठ. ह. त• नास्ति । नामिका सप्र• ॥ ८ चुण्णमाता सप्र. ॥ ९ रमते सुबह सप.॥ १. भगणि ई. त• विना ॥ ११ सघाई. त• विना ॥ १२°त्तणेणचा सप्र० ॥ १३ स- पणाय ह.त. सि.।। १४ यल्लभी ई० त०॥ १५ जे जह तिस्सरा है. त० । जे तु घिस्सरा सि.॥ है.त.विना॥ १७ 'यत्यागजाते' यत्स्थानजाता इत्यर्थः ॥ १८ चिलाते सप्र.॥ १९ जाए पु . त• ॥ २० दस्सकरी २१ भोतिकत्ति सं३ पु.। उत्तिकति सि.॥ २२ आणे ई. त• विना ॥ २३ माउस्सेति घ ई. त• ।। २४ फालेस्साम से ३ पु. । कलिस्साम सि.॥२५॥ एतचिहगतः पाठः ई. त० नास्ति ।। २६ कोण चि है. तविना ॥ २७ मामागाकिरिणि है. त.॥ २८ जं चण्णं पयत्थिकाला कम्मिणश्यति । तासं सं ३ पु.।जं चाणं पवत्थिकाला परमण य चि तासं है. ताजे चणे पचमादीय त्यिकाला कम्मिण व ति। तासं सि.॥ 20 25 १६ जित्था स३ पु.॥
5 10 श्रीणामा] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ : थीणामा माणुसा सद्दा इच्छेते परिकित्तिता । एतो अमाणुसे सद्दे कित्तयिस्सं अतो परं ।। २७० ॥ असुरी असुरभजा वा असुरकण्ण त्ति वा पुणो । णागी [वा] पागकण्या वा जा चऽण्णा भवणालया ॥२७॥ गंधल्वी रक्खसी व त्ति जक्खी किन्नरक त्ति वा । वणप्फति दिसा व त्ति तारक त्ति व जो वदे ॥ २७२ ॥ हिरी सिरि ति लच्छि ति कित्ति मेधा सति ति य । धिती सधि ति तु बुद्धि त्ति इला सीत ति वा पुणो ।। २७३ ॥ विजा वा विजता व त्ति चंदलेह ति वा पुणो । उक्कोससत्ति वा बूया अब्भराय त्ति वा पुणो ॥ २७४ ॥ अहोदेवि त्ति वा घूया देवी वा देवत त्ति वा । देवकण्ण त्ति वा धूया असुरकण्ण त्ति वा पुणो॥२७५ ॥ इंदैग्गमहिसी व त्ति असुरग्गमहिसि त्ति वा । तधा अइरिका व त्ति तथा भगवति त्ति वा ॥ २७६ ॥ अलंचुसा मिसकेसी मीणका मियेदंसणा । अचला अणादिता व त्ति अइराणि त्ति वा वदे ॥ २७७ ॥ रंभ तिमिरसकेसि त्ति तिधिणी सालिमालिणी । तिलोत्तमा चित्तरधा चित्तलेह त्ति उन्वसी ॥ २७८ ॥ जा वऽण्णा एवमादीया अच्छरायि वि सूयते । णामसंकित्तणे तासिं थीणामं सव्वमादिसे ॥ २७९ ।। प्रमाणुसाणि एवाणि थीणामाणि वियाणिया । चतुष्पदेसु कित्तिसं थीगामाणि अतो परं ॥ २८० ॥ कणेरु हथिणी व ति गावि ति महिसि त्ति या । वडव त्ति किसोरि त्ति घोडिक त्ति अजाऽविला ॥२८॥ कण्हेरी रोहिती व त्ति एणिका पसति त्ति वा । कुरंगि त्ति मिगी व त्ति भलुकी सुणहि या॥२८२ ॥ सीही वग्धी "विकी व त्ति अच्छभल्लि ति वा पुणो। मज्जारी "मुंगसी व ति उहाली अडिल त्ति वा ॥२८३।। 15 मूसिका "छुछिका व ति ओवुलीक त्ति उंदुरी । वाराही सुवरी कोली खारका घरकोइला ॥ २८४ ॥ जं चऽणं एवमादीयं थीणामं तु चतुप्पदं । णामसंकित्तणे सद्दे थीणामं सब्वमादिसे ॥ २८५ ॥ चतुप्पदाणि एताणि थीणामाणि भवंतिह । थीणामधेये पैक्खीओ कित्तयिरसमतो परं ।। २८६ ।। विहरी रायहंसि त्ति कलहंसि त्ति वा पुणो । “कोकि ति सालिया व ति पूतणा सकुणि त्ति वा ॥२८॥ गिद्धी सेणि ति काकि त्ति घूकी या गंतुक त्ति या। उलुकी मालुका व त्ति सेणी सीपिंजुल त्ति वा ॥ २८८।। 20 कीरी मदणसलाग ति सालाका कोकिल त्ति वा । पिरिली कुडपूरि चि मारहाइ ति वा पुणो ॥ २८९ ॥ लोविका घट्टिका व त्ति सेण्ही वा कुक्कुडि त्ति वा । पैलाडीक त्ति पोटाकी सउणीग त्ति वा पुणो ॥ २९० ।। आडा टिट्टिभिका व त्ति णडिकुक्कुडिक त्ति वा । सडिक त्ति बलाक त्ति चकवायि त्ति वा पुणो ॥ २९१ ।। एवं थीनामका पक्खी समासेण तु कित्तिया । परिसप्पगते वोच्छं थीणामेण अतो परं ।। २९२ ।। मैलुंडी अहिणूक त्ति अलूका अहिणि त्ति वा । योमीक त्ति सिकूवाली कुलीरा कच्छभि ति वा ॥२९३॥ 25 वत्तणासी सिगिला य सिकुत्थी वरइ ति वा । ओवातिक त्ति मंडुकी सुसुमारि असालिका ॥ २९४ ॥ एचमादी समासेण थीणामा जे जलचरा । णामतो समुदीरति थीणामसमका हि ते॥ २९५ ॥ गोधा गोमि त्ति वा दूया तथा मंडलिकोरिका । भिंगारी अरका व ति" वचाई इंदगोविगी ।। २९६ ॥ 12 एतचिहगतः पाठः ६० त० नास्ति ॥ २० एतचिह्नमध्यगतः सार्दश्येकः १० त० नास्ति ॥ ३ इंदत्तमहिसी च ति मसुर ति मह चिया है. त.॥ ४ अइरका है. त.॥ ५वियदसणा है० त० विना ॥ ६ अप(य)ला है. त• विना ॥ ७ तिघणि हं. त. विना ॥ ८ राति वि १० त० ॥ ९ कण्हेणारो है. त• विना ।। १० पकी है.त.॥ २१ अंगुली यत्ति है. त० ॥ १२ मुटुका वत्ति उंमुलीक है• तः ॥ १३ पक्खीतुहं० त० विना ॥ १४ क्रिष्णरी है. त• सि.॥ १५ जाजि चि है. त० ॥१६ सालिमा घ सप्र० ॥१७ पूणा सकुझि चि है. त• ॥ १८ मेणा सीपिंजलि ति है. त.॥ १९ लीहिका चहिका यत्ति सण्ही वा कुखुडि है. त• ॥ २० पोलाहिक ति पोताकी है. त•॥ २१ मलडी है. ॥ २२ फुलरी ई० त० ॥ २३ सिकुण्डी सि.। सिकुही है. त•॥ २४ असासिका है. त• विना ॥ २५ कारिमा सं३ पु.॥ २६ अरवा कति बचाई है. त• दिना।। २७ त्ति पंधयाई इंदुगोधिगा है. त• ॥
..७० - 6 10 15 अंगविजापइण्णय [२पण्णचरि तूंका लिक्खा फुसी व त्ति तथा मुमुलक त्ति वा । जाला लुत त्ति वा चूया भिउडी 'किणिहि प्तधा ॥२९॥ तला कॅभेइका व त्ति उपहणाभि त्ति वा पुणो । कोणटिट्टि ति वा बूया मयंसल-किपिल्लिका ।। २९८ ॥ जा वऽण्णा किमिजातीणं सुहुमा वादरा इ वा । थीणामा य उदीरति थीणामसमका हि ते ॥ २९९ ।। इच्छेते पाणलोणीयं थीणामा जे पवेदिता ! मूलजोणिगता सदा थीणामसमका इमे ।। ३०० ॥ तत्थ- रुक्सजोणि[ग]ए रुक्खे थीणामे परिकित्तिये । थीणामधेजेहिं समा ते वि सदा विधीयते ॥ ३०१ ॥ पिपरी वेडसी जंवू तथा ते परिकित्तिता । वधा अंविलिका व ति दे चिंचिणिक त्ति वा ॥ ३०२ ।। तघा मंडि त्ति सीवण्णि कजूरी केतमि त्ति वा । कहकीका विंबुरुकी धकंटिवेल्लरितेरणिं ॥ ३०३ ॥ अरलूसाऽऽमली सेवपूति लंवा(चा पलि त्ति वा । सीकवल्लोकि लिंगिच्छी हिंछाघोड त्ति वा पुणो ।।३०४।। टफारी वेजयंति त्ति कंगूका सीसवत्तिया । अंफोतिका धवासि त्ति "सिंदीवासि त्ति वा पुणो ।। ३०५ ॥ सघा समुद्दवल्लि ति कप्पासी रुचिक त्ति वा । उंगुणी मातुर्लिगि त्ति णीहू वा आफकि ति वा ॥ ३०६ ॥ तथाऽरंजरवल्लि त्ति उद्गवल्लि त्ति वा पुणो । कूमंडी तवुसी व ति मवे पल्लालुक त्ति वा ॥ ३०७ ।। तुंबी कालिंगी वालुंकी [तघा] कक्खारुणि त्ति वा । नलिणी परमिणी व त्ति तथा कमलिणि त्ति वा ।।३०८॥ उप्पलिणी [.... ........ ] पिंडालुकि ति या ॥ ३०९॥ घोसाडकि त्ति घा बूया ससविंदुकिणि त्ति या । तथा भंजुलिका घ त्ति कसकी कारिअल्लिका ॥ ३१० ।। पीलि त्ति कालिका व त्ति अंजणेकसक त्ति वा । लता लहि त्ति या यूया छमिणी काणवि त्ति वा ।। ३११।। दुम-गुम्म-लता व ति लोए थीणामका व ये। भवंति एवमादीणि यीणामसमकाणि ते ॥ ३१२ ॥ लता यल्लि-दुमाणं च लोए गुम्माणमेव य । पुष्पाणि य पवक्खामि थीणामाणि अतो परं ॥ ३१३ ॥ जाति पयजाति ति महाजाति ति या पुणो । सुषण्णजूधिगा व त्ति जूधिक त्ति व जो घदे ॥ ३१४ ।। तकुली सलुसी व ति वासंती वासुल ति वा । यइंदबुद्धि काल ति जयसमण त्ति वा पुणो ॥ ३१५ ॥ र्णयमल्लिका मल्लिक ति णितष्णिक ति वा पुणो । तिनिच्छि पीतिका व ति तघेव म[ग]यंतिका ॥ ३१६ ॥ पियंगुफ त्ति था यूया फंगुक ति य जो यदे । कुरुडूक ति व वदे णति त्ति व जो वदे ॥ ३१७ ।। सघंगमंजरी य त्ति जा यऽण्णा पुष्फमंजरी । पुप्फपिडिया वूया पुप्फगोच्छि त्ति या पुणो ॥ ३१८ ॥ इथेते पुफैजोणीय मीणामा परिकित्तिता । यीणामं पुप्फसंजोगं कित्तयिस्सं अतो परं ॥ ३१९ ॥ धंदा तीसालिका व ति पारिहत्यि ति वा पुणो । धुभिंधि धम्मि जागि ति तघेव य विलिंजरं ॥३२०॥ पाहालिका वैजयंति तथा मनणमालिका । जंगमाल त्ति या यूया तथा सोलकमालिका ॥ ३२१ ॥ पुष्फलोणी समासेण इथेसा परिकित्तिता । धीणामाणि फलाणिं तु कित्तयिरसमतो परं ॥ ३२२ ॥ "मुंदिका घलिका चेय तधेय य फसेरुका । मुणालिक त्ति या यूया तथा विधित्तिक त्ति या ॥ ३२३ ।। १लूका •त.॥२ मुम्मुलिफ है• त•॥ ३ किणिदिरहा है. त•॥ ४ कमेरका यत्ति उंटेणामि है.त.॥५काणो रिदिति ..॥ ६ पदे वियिणिक ति या सं १ पु. सि.यदे वियिलिक ति था . त• ॥ ७ कहकीका तियरकी परिपरिपरनिह..॥ ८ सेट्रपति ऐयापति त्ति है. त•॥ ९ महोति है. त॥ १० सिंदी या सिणि या पुणोत. ॥ ११ माट(८) कि..॥ १२ कासिक है. त.॥ १३ मधये से 1 पु.लि.1मर्कचय.. १.५ १४ का दिते •॥ १५ जाति घए जाति त्ति से पु. मि.जोइययमाति त्ति है. स. १६ तकुटी है. त•॥ १७"पुदि पालागि जय मि.पिना॥ १८णयमालिका मलिकति तिणितित्तिकति या • त• विना । १९ यमपि सि.तु.. २० 'जोणीयार..॥ २१ फुमिनियम्मिजागत. ॥ २२ सयेयं विलिज • •॥ २३ पादानिय.. २४ मुदिका विचलित• चिना ॥ । 20 25 10 । 16 थीणामा] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ तधा लोमसिका व त्ति अक्खोल त्ति व जो वदे । तधा कुक्कुडिगा व त्ति तथा संगलिक त्ति वा ॥ ३२४ ॥ फलपिडि त्ति वा बूया फलगोच्छो त्ति था पुणो । फला फलिक ति वा बूया फलमाल त्ति वा पुणो ॥३२५॥ तघेव फलमिजोसु फलाणं पेसिकासु या । एवमादीसु सन्वेसु थीणामममिणिदिसे ॥ ३२६ ।। फलजोणी समासेण इचेसा परिकित्तिता । थीणामधेये आहारे कित्तयिस्सं अतो परं ॥ ३२७ ॥ दुहिक त्ति वा बूया तघेव उदक(कु)हिका । समगुहिक त्ति वा बूया जागु त्ति कसरि ति वा ॥३२८॥ अवेलि त्ति व जो बूया पत्तंवेल्लि [त्ति] या पुणो । बालकल्लि त्ति या घूया तक्कुलि त्ति व जो यदे ॥ ३२९ ॥ तथा कुंम्मासपिंडि त्ति सपिडि त्ति वा पुणो । तथा तप्पणपिंडि त्ति इतिपिंडि त्ति या पुणो ।। ३३० ॥ सधा ओदणपिंडि ति तिलपिंडि त्ति वा पुणो । 'पीढपिंड त्ति वा धूया रच्छाभि(भत्तिं व जो यदे ॥ ३३१ ॥ रसाल त्ति व जो धूया पडमढे ति वा पुणो । 'चोरालि त्ति व जो धूया "अंबपिडि ति वा पुणो ॥ ३३२ ॥ तधा "अंबकधूवि त्ति तधा उल्लूरधूविता । अंबाडगधूवि त्ति" जा घण्णा धूपिता भवे ॥ ३३३ ॥ चतुम्विहम्मि आहारे जं जं थीणामकं भवे । णामसंकित्तणे तस्स थीणामसममादिसे ॥ ३३४ ॥ थीणामधेजा आहारा इच्छेते परिकित्तिया । अच्छादणं तु थीणामं कित्तयिरसमतो परं ॥ ३३५ ॥ पउण्ण त्ति पएणि त्ति वण्णा सोमित्तिकि त्ति वा । अद्धकोसिज्जिका व तितधा कोसेजिका पि वा ॥३३६॥ पसरादि ति वा बूया पिगाणादियवंतरा । लेख त्ति पाउौणि त्ति तथा वेलविक त्ति वा ॥ ३३७ ॥ व तया - परत्तिका व चि भवे माहिसिक त्ति वा । इल्ली कटुवरी व त्ति तथा जामिलिक त्ति पा च ॥ ३३८॥ सहा थूल त्ति या घूया सुवुता दुन्दुत ति वा । अप्पग्या या महग्या या अहता धोतिक त्ति घा ॥ ३३९॥ जं चऽणं एवमादीयं लोए थीणामकं भवे । त्यसंकित्तणे तासं थीणामसममादिसे ॥ ३४०॥ अच्छादणं तु थीणाम इचेतं परिकित्तितं । भूसणाणि तु कित्तेसं थीणामाणि अतो परं ।। ३४१ ॥ सिरीसमालिका व त्ति तथा गलियमालिका । तथा मकरिका व त्ति ओराणि ति वा मुणो ॥ ३४२ ॥ पुप्फितिक त्ति वा बूया मैंकण्णी लकड त्ति या । वालिका कण्णवल्लीका कण्णिका कुंडमालिका ॥ ३४३ ॥ सिद्धस्थिक त्ति या यूया तथा अंगुलिमंदिका । तघऽक्खमालिका व ति तथा वा संघमालिका ॥ ३४४ ॥ पयुका णितरिंगि ति तथा कंटकमालिका । घणपिच्छिलिका व त्ति तथा वा वि विकालिका ॥ ३४५ ॥ एकापलिका व त्ति तथा पिप्पलमालिका । हारावलि त्ति या घूया अधा मुत्तावलि त्ति वा ॥ ३४६ ॥ कंची व रसणा पत्ति जंबूका मेखल त्ति या । "कंटिक त्ति व जो घूया तथा संपडिक चि वा ॥ ३४७ ।। 26 पौमुहिक त्ति वा यूया चम्मिका पाअसूंचिका । तथा पौघट्टिका व ति तथा सिंखिणिक ति वा ।। ३४८ ॥ जं घण्ण एवमादीये थीणाम भूसणं भवे । णामसंकित्तणे तेसिं थीणामं सव्यमादिसे ॥ ३४९ ॥ भूसणाणि तु सव्वाणि थीणामाणि समांसत । सयणा-ऽऽसणाणि जाणाणि कित्तयिस्समतो परं ।। ३५० ।। १ नामसिका है. त• ॥२°मिजेसु ह. त० ॥३ दुद्धहि ई० त०॥ ४ सम्मिगुम्मिक है. त० ॥ ५ ताल हत०॥ ६तकुलि है. त०॥ ७कम्मास' सप्र.॥ ८पिंडपिंड है. त. विना ॥ ९यारालि है. त• विना ।। १० अंधपिहि है. त• ॥ ११ अंधफवि है. त० ॥ १२ तिगा जा है• त• ॥ १३ पत्तुण्ण त्ति पपण ति है. तविना ॥ १४ "काण ति ई. स. विना ॥ १५॥ एतचिद्वगतः पाठ है. त• नास्ति । १६ हसचिदान्तर्गतः पाठः ई. त. एव वर्तते ॥ १७ आचया घोधिक हं• त•॥ १८ मकणी लकुड हं. त• विना ॥ १९ मुहिका है. त.॥ २० पेयुका णितिरिगि ६० त० ॥ २१ अघ है. त• ॥ २२ फंटक है. त• विना ॥ २३ जामुदि है. त० ॥ २४ °सूरिका है. त• विना ।। २५ पाटिका पु• ॥ २६°सओ है.त.॥ 20 ।
- 10 अंगविजापइण्णय [३ अट्ठावणं सेना सट्टा भिसी व त्ति आसंदी पेटिक त्ति वा । महिसाहा सिला व त्ति फलकी ईट्टक ति वा ॥३५१॥ साहि ति व जो धूया सफडीक ति वा पुणो । थिली गिल्लि त्ति या चूया सिविका संदमाणिका ।। ३५२ ।। सयणा-ऽऽमण-जागाणि यीणामाणि समासत । क्रित्तियाणि पचक्सामि भायणाणि समासत ।। ३५३ ॥ करोडी कंसपत्ति त्ति पालिका सरिक त्ति या । मिंगारिका कंचणिका तथा कवचिक त्ति वा ॥ ३५४ ॥ जं चाणं एवमादीयं चीणाम भायणं भवे । जामसंकित्तणे तेसिं थीगामसममादिसे ।। ३५५ ।। मायणाणि तु बुचाणि थीणामाणि समासत । यीणामाणि पवक्सामि भंडोवगरणाणि तु ॥ ३५६ ॥ अदिक त्ति पत्ति ति उक्सली थालिक त्ति या । कालंची करकी व त्ति कुठारीक त्ति या पुणो ॥३५॥ थाली मंडी घडी व्वी केला उट्टिक-माणिका । जिसका आयमणी चुली फूमणाली समंकणी ॥ ३५८ ॥ मंसिका मुद्दिका ये सलाकंजणि पेल्लिका 1 धूतुष्टिक त्ति [...] व त्ति पिच्छोला फणिका पि वा ॥ ३५९ ॥ दोणी उकुलिणी पाणि अमिल त्ति बुध ति वा । तथा पहालिका व त्ति तवि वत्थरिक ति य ॥ ३६० ।। जंपण्णमवि धीणामं भंडोयगरणं भवे । णामसंकित्तणे तेसिं थीणामं सव्यमादिसे ॥ ३६१ ।। मंडोवगरणं ऐतं थीणामं परिकित्तिर्य । आयुधाणि पवक्खामि यीणामागि अतो परं ॥ ३६२ ।। (दालि ति मुठारि त्ति वासि ति छुरिक ति य । दव्वी तघ कवली य दीविक त्ति' कडच्छकी ॥३६३।। जंघऽण्णमपि यीणामं दव्यं लोहमयं भवे । णामसंकित्तणे तासं थीणामसममादिसे ॥ ३६४ ॥ मणीमु यावि सन्वेसु सम्वेसु रयणेसु त । जं जं थीणामकं भवति तं तं धीलक्खणं भवे ॥ ३६५ ।। सुवष्णकाकणी व ति तथा मासककाकणी । तघा सुवष्णगुंज त्ति दीणारि त्ति व जो वदे ॥ ३६६ ।। हिरण्णम्मि तु सबम्मि जंज यीणामकं भवे । जामसंकित्तणे तासं यीणामसमलक्सणं ।। ३६७ ।। तथा सब्वेमु धन्नेसु जं जं धीणामकं भवे । णामसंकित्तणे तेसं सव्यं थीणामकं भवे ॥ ३६८ ॥ परमेतेसु सन्वेसु पवित्तिसु यपफर्म । जं जं थीणामकं भवति सव्यं तं समलपत्रणं ॥ ३६९।। धीणामधेजे पत्ते देवते पणिधिम्मि वा । पुप्फे फले व देसे या णगरे गामे गिहे पिया ।। ३७० ॥ पुरिसे चतुष्पदे धेर पक्सिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लके वा वि परिसप्पे तघेव य ।। ३७१ ।। पाणे या भोयणे या वि वघेवाऽऽभरणेसु य । आसणे सयणे जाणे भंडोरगरणे तधा ।। ३७२ ।। लोहेसु यावि सम्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणि[सु] या वि सव्वेसु सम्बधण्ण-धणेसु य ।। ३७३ ॥ [तम्मि पेक्सिवामासे सहे रूवे तघेव य । ] सव्वमेवाणुगंतूगं ततो चूया अंगचिंतको ॥ ३७४ ।। थीणामाणि सम्मत्ताणि ॥२॥ छ। ॥ 15 20 25 30 [३ अट्ठावण्णं णपुंसका] पहारगं तु णातव्या पुरिसंगे णपुंसका । उदेसंवरमागा य अंघोरूगं जे भवे ।। ३७५ ॥ अगिहमाणि फुक्वंतर- मुमंतरं । अंगुली अंनराणि च अंगे पिण्णाणि जाणि य ।। ३७६ ।। फेस-मंमु-गई लोमं अंगाणि मन्झिमाणि य । एते अंगम्मि णातव्या अट्टावण्णं नपुंसका ।। ३७७ ॥ ममणि जागंगे अण्गाणि वि मनिह । गपुंसरहिं ताणिं पि णिदिसे अंगचिंतओ ।। ३७८ ॥ एनानि आमसं पुच्छे अत्यलाभ जयं तघा । जंकिंचि पसत्यं सा समं पत्यि चि णिरिसे ॥ ३७९ ।। १.१०॥ २पाली गिति तथाली गिदि ति सं ३ पु ••. ३ मलिंदक नि.॥ ४ करवी ..॥५ा उदिक माणियार• त.॥ ६ मसिका मुदिका य सणा कंजणि पेलिया • त• बिना। ८कदाति ..ग्निा ९सि य दुष्की •त.॥ १० चतुरसटगर्नु पूर्णमिदं प्रतिषु नासि ।। १चमचे...ना॥
७३ 5 10 - 15 गपुंसकाणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ पुरिसं च परिपुच्छेज अधण्णो दूभगो त्ति य । असिद्धत्यो ति तं यूया एतेसामुपवेसणे ॥ ३८० ॥ असेसो आइलो चेव वयोगतमणो णरो। परिकिलेसामिगते भोगे अप्पे तु भुजति ॥ ३८१ ।। इत्यिं वा परिपुच्छेज अधण्णा दूभग त्ति य । असिद्धत्या असेसा य इत्यीयमिति णिदिसे ॥ ३८२ ॥ अणीसरी कुडुवस्स ण य कस्सति सामिणी । आइला सपरिफेसा भोगे भुंजे जंधेच्छया ॥ ३८३ ।। अविधेयो य से भत्ता सा य भत्तु वसे भवे । बहुरोगा अप्परोगा बहुपञ्चत्थिका भवे ॥ ३८४ ॥ कण्णं च परिपुच्छेज्ज अधण्णा दूभग त्ति य । असिद्धत्या असेसा य विजते अचिरेण य ॥ ३८५ ॥ तं पंडगं समासेण पंडगस्स वियाणिया । विजस्सति त्ति तं बूया सेवितम्मि णपुंसके ।। ३८६ ॥ गम्भं पुच्छे ण भविस्सति त्ति जाणे णपुंसकं च तं । इत्थी वा पुरिसो वा वि एगमेगसमागमं ॥ ३८७ ॥ णत्यत्ति तं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ । रहे संजोगपुच्छायं थीपुमसेण पसरसते ॥ ३८८ ॥ दव्याभिगमणं णत्थि यवहारो णिरत्थको । पंडकरस य कम्माणि जाणि तस्स परस्स वा ॥ ३८९ ॥ कम्मपुच्छाय णिद्देसे एवमादि फलं वदे । पवासो पुच्छिते णत्थि पउत्यो य णिरत्यकं ॥ ३९० ॥ विवादे या जयं पुच्छे जयो णत्यि ति णिदिसे । आरोग्गं परिपुच्छेज्जा णत्यि तेवं वियागरे ॥ ३९१ ॥ रोगं च परिपुच्छेज्जा अत्थि त्तेवं वियागरे । मरणं च परिपुच्छेज्जा अत्यि त्तेवं वियागरे ।। ३९२ ॥ जीवितं परिपुच्छेजा णत्यि त्तेवं वियागरे । आवाधितं च पुच्छेज्जा ण समुहिहिति त्ति सो॥३९३ ॥ अणावुद्धिं च पुच्छेज अत्थि त्वं वियागरे । वासारत्तं च पुच्छेज्ज जहण्यो त्ति वियागरे ॥ ३९४ ॥ अपातपं च पुच्छेज अत्यि तेवं वियागरे । वासं च परिपुच्छेज मोहं मेहं वियागरे ॥ ३९५ ॥ संस्सरस संपयं पुच्छे जहण्णा सस्ससंपया । बासस्सस्स वापदं पुच्छे अत्यि त्तेवं वियागरे ।१३९६॥ णटुं च परिपुच्छेजा णत्थि णहँ ति णिहिसे 1 णट्ठमाधारए तं च णिरत्यं गट्ठमादिसे ॥ ३९७ ।। पुरुसो णपुंसको इत्थी णपुंसो त्ति वियागरे । धणं धणं ति पुच्छेजा अधणं ति वियागरे।। ३९८॥ जं [प] किंचि पसत्थं [सा] सव्वं गत्यि त्ति णिद्दिसे । जं किंचि अप्पसत्यं च सव्यमत्यि ति णिदिसे ॥ ३९९ ॥ सधा खेत्तं तथा वत्युं सव्यं णत्यि त्ति णिदिसे । सम्वे सद्दे य जाणेजा जे भवंति णपुंसका ॥ ४०० ।। नपुंसको अपुरुसो 'चिल्लिको सीतलो ति या । पंडको वातिको वा वि किलिमो या संकरोत्ति वा ॥ ४०१ ॥ कुंमीकपंडकं जाणे इस्सापंडकमेव य । पक्खापक्खि ध विक्खो य संढो पा चि गरेतरो ॥ ४०२॥ एते गपुंसका सदा णक्खत्ताणंतरे तधा । णक्खत्तदेवंतरए कीलेयेयंतरे तया ॥ ४०३ ।। भायणंतरते या वि वत्थमाभरणंतरे । उवकरणमंतरे चेव धण-धणंतरे वधा ।। ४०४ ।। एतम्मि पेक्खियामासे सहे रूवे तघेव य । सव्यमेवाणुगंतव्यं ततो धूयांगचिंतओ ॥ ४०५॥ ॥णपुंसकाणि सम्मत्ताणि ॥ ३॥ छ। [४ सत्तरस दक्खिणाणि] सत्तरस दक्खिणाणंगे पवक्तामऽणुपुष्यसो । सीसस्स दक्सिगो भागो १ कण्णो यो या वि दक्षिणो२॥४०६ 50 अक्खी ३ भमू ४ हणू वा वि५ गंडो जो यावि दक्खिणो६ । गीया ७ असो य८ थाहू य ९ थणो १० हत्यो य दक्सिगो ११ ।। ४०७॥ पस्सं १२ वसणो १३ ॐरू य १४ जाणू १५ जंघा य दक्षिणा १६। पादो य दक्षिणो यो १७ एवं सप्तरसाऽऽहिया ॥ ४०८॥ १जयिन्छया ह• •॥ २हसचिहान्तर्गत पूर्वाद है. त• एष वर्तते ॥ ३ हस्तचिहान्तर्गतमुत्तराई है.. एव पाते। ४चिकोह. त• ॥ ५°संबरो ह.त.॥ ६ मंतणे क्षेत्र है. त•॥ ७ जतू य है. त•॥ 20 25 मंग०१० । 5 । io - 15 अंगविनापइण्णय [४ सत्तरस दक्षिणाणि एतागि आमसं पुच्छे अत्थलाम जयं वघा । पसत्यं जत्तियं किंचि सव्यमस्थि ति णिदिसे ॥ ४०९॥ पुरसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । दाहिणाचारभागी य पुरुसोऽयमिति णिदिसे ॥ ४१० ॥ इत्यि वा परिपुच्छेज सिद्धत्या सुभग त्ति य । दक्सिणाचारमागी य इत्यीयमिति णिदिसे ॥ ४११ ॥ पुरुसस्सऽहविधं पुच्छे यूया वं तु पदक्खिणं । थियो अट्टविधं पुच्छे आदितो तं पयक्सिणं ॥ ४१२ ॥ कगं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य । धण्णा य मुहभागी य ण खिप्पं तु गमिस्सति ॥ ४१३ ॥ गर्म ध परिपुच्छेज अत्यि गम्भो त्ति णिदिसे । गम्भिणी परिपुच्छेन्न इमं पक्खं पजाहिति ॥ ४१४ ॥ पुत्तलामं च पुच्छेज दक्षिणो य भविस्सति । कम्मं च परिपुच्छेज रौयमन्मतरं भवे ॥ ४१५ ॥ पवासं परिपुच्छेन पासो सँफ्लो भवे । पउत्थं परिपुच्छेन इमं पक्खं स पहिति ।। ४१६ ।। चच परिपुच्छेन पत्थि यो ति णिदिसे । बंधस्स मोक्खं पुच्छेज अस्थि मोक्लो ति णिदिसे ।। ४१७ ॥ पवासं परिपुच्छेज गत्यि तेवं वियागरे । पतिद्वं परिपुच्छेज अत्यि तेवं वियागरे ॥ ४१८॥ भयं च परिपुच्छेन मयं त्यि चि णिहिसे । खेमं च परिपुच्छेज अस्थि खेम ति णिदिसे ॥ ४१९॥ पैसत्यं परिपुच्छेज - अत्यि अस्थि ति णिदिसे । विग्गई परिपुच्छेज गत्यि त्तेवं वियागरे ॥ ४२० ॥ जयं च परिपुच्छेन जयो अस्थि ति णिदिसे । आरोगं परिपुच्छेज जीरोगो त्ति वियागरे ॥ ४२१ ॥ रोगं च परिपुच्छेज णस्थि रोगो ति णिहिसे । मरणं च परिपुच्छेज णस्थि त्तेयं वियागरे ।। ४२२ ॥ जीवितं परिपुच्छेज अत्यि से वियागरे । असमाहिं परिपुच्छेज समुद्दोणं समुद्दिसे ।। ४२३ ॥ षणा िच पुच्छेज णत्यि सेनं वियागरे । यासारत्तं च पुच्छेन उत्तमो त्ति वियागरे । ४२४ ॥ अपातपं च पुच्छेज णत्यि तेत्रं वियागरे । वासं घ परिपुच्छेज अणुपुन्धि वियागरे । ४२५ ॥ कदा वासं ति या यूया इमं पक्वं ति णिदिसे । दिवा रत्तिं ति या धूया दिवा यासं विणिदिसे ॥४२६ ॥ EF संस्सरस सं(वा)पयं पुच्छे णत्यि तित्ति वियागरे। हम सस्सस्स संपयं पुच्छे उत्तमा सस्ससंपया ॥४२७॥ णद्वं च परिपुच्छेन लामं तस्स विणिहिसे । णमाघारए च दक्षिणं सव्यमादिसे ।। ४२८ ॥ फदा णहं वि वा धूया इमं पसं ति णिदिसे । कदा "दित्सिहिति तं च इमं पक्सं ति णिद्दिसे ॥ ४२९ ।। ग्राम व दक्सिगं व त्ति दक्षिणं ति वियागरे । धणं धणं च पुच्छेन्न घेणं ति [य] वियागरे ॥ ४३० ॥ जंप किंचि पसत्यं तं सब्यमत्यि ति गिदिसे । अप्पसत्यं च सं किंचि ण वं अत्यि ति णिदिसे ॥ ४३१ ।। सत्तमाभिसणं कम्मं थायारं च विसेसतो । सद्दे पदाक्सिणे सव्यं सं घऽष्णमवि एरिसं ॥ ४३२ ।। सब्बकालं पसत्यं तु सव्वत्येसु य पूर्तियं । पुण्णामधेये हि फलं दक्षिणाणं पि गिदिसे ॥ ४३३ । । तथा सेतं तथा यत्युं सव्यमत्यि ति गिद्दिसे । सम्वे सद्दे य जाणेजा दक्सिणा जे भयंतिह ॥ ४३४ ॥ अतिदविसणं दविसमतोमवे यावि पुव्यक्तिर्ण अतिदक्सिणं समति तयेव उवादलिणं (उबदक्षिणं)॥४३५॥ [............ ...] दक्सिणं ति व जो वदे । पदसिणं ति या धूया जं चऽयं दक्सिगं भवे ॥४३६।। गरसत्ते 'इपिसणदारे देवते पणिधिम्मि या । पुप्फे पले य देसे य णगरे गाम गिहे वि या ॥ ४३७ ।। पुरसे धतुप्पदे घेर पक्सिम्मि दगेचरे । "कीडे किमिल्लिके या वि परिसप्पगते तथा ॥ ४३८ ॥ १दविसणा' है. त. २ठिया अत्य. १. त. विना ॥ ३ रायगन्मं है.॥ ४ सहलो ई. त•॥ ५६सचिहगतः पाठः है• त एव वति ॥ ६संधिं च परिपुच्छेज अत्यि संधि ति णिद्दिसे । इति पाठः स्यात् ।। ७-4 एतथिहमप्यत पूर्वाद तनाति॥ ८"माहित परि' है. तविना ॥ ९'हाणं गिद्दिसे है• त• विना ।। १०हसचिहगत पाद त. एव व ॥ ९ दिस्सहिएतं च . ता ॥ १२ति है. त• विना ॥ १३ घण्णं ति है। त.॥ १४ दक्षिणे दारे.. विना ॥१५ कोटे केमि है.त. विना 7 20 25 30 ५सत्तरस वामाणि] णवमो अंगमणी णाम अन्झाओ ... पाणे वा भोयणे वा वि वत्थे आभरणे तधा। आसणे सयणे जाणे भंडोयगरणेसु य ॥ ४३९ ॥ लोहेसु यावि सम्वेसु सम्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सन्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ॥ ४४० ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सद्दे रूवे तथैव च । सव्यमेवाणुगंतूर्ण ततो वूयांगचिंतओ॥ ४४१ ॥ ॥ दक्षिणाणि सम्मत्ताणि ॥ ४॥ छ । 5 10 15 [५ सत्तरस वामाणि] सचरस वामाणंगे कित्तयिस्समणुपुव्वसो । सीसस्स वामगो भागो १ कण्णो जो यावि वामको २ ॥ ४४२ ।। अखि ३ भुमा ४ हणू वा वि५ गंडो यो यावि वामको ६ । गीवा ७ अंसो य ८ पाहू य ९ थणो १० हत्यो य वामको ११ ॥ ४४३ ॥ पस्सं १२ वसण १३ अरू य १४ जाणू १५ जंघा य वामिका १६ । वामगो य तथा पाओ १७ एवं सत्तरसाऽऽहिता ॥ ४४४ ।। एताणि आमसं पुच्छे अत्थलाभं जयं दधा । जं किंचि वि पुच्छेज सव्वं गत्थि त्ति णिदिसे ॥ ४४५ ।। पुरिसं च परिपुच्छेन अधण्णो दूभगो ति य । वामाचारभागी य पुरिसोऽयमिति णिदिसे ॥ ४४६ ॥ इत्थं वा परिपुच्छेन अधण्णा दूभग त्ति य । वामाचारभागी य इयमित्यि ति गिद्दिसे ।। ४४७ ।। पुरिसऽहविधं पुच्छे वाम चेव वियागरे । इत्यऽवविधं पुच्छे वामं चेव वियागरे ।। ४४८ ।। कण्णं च परिपुच्छेज अधण्णा दूभग त्ति य । असिद्धत्य त्ति तं यूया खिप्पं विजेहिति त्ति य ।। ४४९ ॥ गन्भं च परिपुच्छेज णत्यि गम्भो त्ति णिदिसे । गम्भिणी परिपुच्छेज मतं सत्तं पयाहिति ।। ४५०॥ कम्मं च परिपुच्छेज किच्छवित्ति भविस्सति । मित्ताणं च पडिकूलो सव्वत्थेहि य बाहिरो ॥ ४५१ ।। पवासं परिपुच्छेज णिरत्यो त्ति वियागरे । महतो य आवद्धंसो खिप्पमेय भविस्सति ॥ ४५२ ।। पउत्थं परिपुच्छेज - चिरेणाऽऽगमणं भवे । णिरत्यकं पवासं च पउत्यस्स वियागरे ॥ ४५३ ।। बंध था परिपुच्छेन्ज अस्थि यंधो त्ति गिद्दिसे । पंधरस मोक्खं पुच्छेज चिरा मोक्खो भविस्सति ॥ ४५४ ।। 20 पवासं परिपुच्छेज अत्यि तेवं वियागरे । पतिद्वं परिपुच्छेज णत्यि तेवं वियागरे ।। ४५५ ॥ सम्माणं संपयोग वा णिव्याणं मोक्खमेव य । भोगलाभं सुहिस्सरियं सव्यं णत्थि त्ति णिदिसे ॥ ४५६ ॥ भयं[च] परिपुच्छेज अस्यि त्तेवं वियागरे । खेमं च परिपुच्छेज गैत्थि खेमं ति णिदिसे ॥ ४५७ ॥ संधि च परिपुच्छेज हाणत्थि त्तेवं वियागरे । विगहं परिपुच्छेज अत्यि त्तेवं वियागरे ॥ ४५८ ॥ जयं च परिपुच्छेन्ज जयो पत्थि ति णिद्दिसे । आरोगं परिपुच्छेज णत्यि त्तेवं वियागरे ॥ ४५९ ।। रोगं च परिपुच्छेज अस्थि रोगो त्ति णिदिसे । मरणं च परिपुच्छेज अत्यि त्तेवं वियागरे ।। ४६० ।। जीवितं परिपुच्छेज णत्थि त्तेवं वियागरे । आधाधितं च पुच्छेज ण समुढेहिति त्ति सो ॥ ४६१ ।। अणावुट्टि ति पुच्छेन अत्यि त्तेवं वियागरे । वैस्सारत्तं च पुच्छेज पावको त्ति वियागरे ॥ ४६२ ।। अपातयं च पुच्छेज अस्थि सेवं वियागरे । वासं च परिपुच्छेन कटुकं ति विआगरे ॥ ४६३ ।। संस्सरस धापदं पुच्छे अत्यि त्तेवं वियागरे । सस्सस्स संपयं पुच्छे गिकिट्ठा सस्ससंपया ॥ ४६४ ॥ पहुँच परिपुच्छेज णत्यि ति गिद्दिसे । णट्ठमाधारइत्वा य वामपक्सस्स णिदिसे ॥ ४६५ ॥ घामं च दक्सिगं यत्ति बाम चेर वियागरे । घणं घणं ति पुच्छेन अघण्णमिति णिदिसे ॥४६६ ।। १जतू य ई• त• ॥ २१ एतचिहगतः पाठः ह• त• नास्ति ॥ ३ हसचिहगतः पाठः ह• त• एवं वर्तते ॥ ४ आयाविहं च परिपुच्छेज है. त•॥ ५ यासारवं है. त.॥ 25 1 30 - 10 15 ७६ अंगविजापइण्णय [सत्तरस जं[च] किंचि पसत्यं तं सव्वं णत्यि त्ति णिहिसे । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्वमत्यि त्ति णिरिसे ॥४६७।। सत्तमाभिजणं जाति आयारं विगर्यक्रमं । असुभ अप्पसत्यं च वामभागेसु णिदिसे ॥ ४६८ ॥ जधा थीणामधेयागं फलं वुत्तं सुभा-ऽसुभं । तेधेव सव्वं यामाणं फलं बूया सुभा-ऽसुभं ॥ ४६९ ।। तधा खेत्तं तधा वत्थु सव्वं गत्यि ति णिदिसे । समे सद्दे य जाणेजा वामे जे मणिके मया ॥ ४७० ॥ उत्तरं ति व वाम ति वामावट्टो त्ति वा पुणो । वामसीलो त्ति वा चूया वामायारो त्ति का पुणो ॥ ४७१ ।। वामपक्खं ति वा बूया [वामदेसं ति वा] पुणो । वामभागं ति वा घूया चामतो ति व जो वदे ॥ ४७२ ।। अपवामं ति या बूया अपसव्वं ति वा वदे । अपसव्वं ति वा बूया अप्पग्छ ति वा पुणो ॥ ४७३ ॥ जं चऽण्णं एवमादीयं समासेण य वासतो। ये वऽण्णे यामतो सदा वामतो मणिके मता ॥ ४७४ ॥ णक्खत्ते उत्तरदारे देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गाम-गिहे वि वा ॥ ४७५ ॥ पुरुसे चतुष्पदे वा वि पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे विपिल्लके वा वि परिसप्पे तघेव य ॥४७६ ॥ पाणे वा भोयणे वा वि पत्ये आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणेसु य ॥ ४७७ ।। लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रतणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ ४७८ ॥ एतम्मि पेक्खियामासे सहे रूवे तधेय य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो धूयांगचिंतओ ॥ ४७९ ।। ॥वामाणि सम्मत्वाणि ॥५॥ छ। [६ सत्तरस मज्झिमाणि] सत्तरस मज्झिमाणंगे पयसामऽणुपुष्यसो । मत्थको पढम वुत्तो १ ततो सीमंतको भवे २॥ ४८० ॥ ललाई ३ भूमकंतरयसो ४ तधा णासाय पुत्तको ५।णासा ६ ओहाय ८ भवे उरो ९ जधुत्तरं तथा १० ॥४८॥ हिदयं ११ थणंतरं १२ णाणी १३ लोमवासी १४ तधोदरं १५ । मेहणं १६ वस्थिसीसं च १७ मज्झिमाणाऽऽभवंतिह ॥ ४८२ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तधा । जं [1] किंचि पसत्थं [सा] सव्वमत्यि ति गिहिसे ।। ४८३ ॥ पुरिसं परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो ति य । धण्णो य सुहभागी य भातीण मज्झिमो भवे ॥ ४८४ ॥ रायमंती भवे सो य णातीणं मज्झिमो भवे । मज्झत्थसीलमायारो सव्वत्थेसु भवे णरो ॥ ४८५ ॥ इत्यि प परिपुच्छेज सिद्धत्था अपरायिता । धपणा य सुहभागी य भगिणीसु य मज्झिमा ।। ४८६ ।। णातीसु मज्झिमं लभते भत्तारम्मि य वल्लभा । मज्झत्यसीलमायारा सव्यत्येसु य सा भवे ॥ ४८७ ॥ पुरिसस्सऽत्यविधि पुच्छे मज्झिमं ति वियागरे। [थिया अत्यविधि पुच्छे मज्झिमं ति वियागरे । ४८८॥] फणं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य । धण्णा य सुहभागी य ण य खिप्पं निग्गमिस्सति ॥ ४८९ ॥ गन्भं च परिपुच्छेज अस्थि गम्भो त्ति णिरिसे । गम्भिणि परिपुच्छेज खिष्पं सा पयाहिति ॥ ४९० ॥ फता पयाहिती व त्ति पक्खसंघिम्मि णिदिसे । कम्मं च परिपुच्छेज रायमभंवरं वदे ॥ ४९१ ।। पवासं परिपुच्छेज सफलं ति वियागरे । पउत्यं परिपुच्छेन सधणो आगमिस्सति ॥ ४९२ ॥ सवि पायासिकं पुच्छे फता सो आगमिस्सति । अंगवी आगमं तस्स पक्खसंधिम्मि णिदिसे ॥ ४९३ ॥ धं च परिपुच्छेज गत्थि पंधो त्ति णिदिसे ।- बंधस्स मोक्खं पुच्छेज अत्यि मोक्खो त्ति णिरिसे ॥४९४॥ कता मुचिहिती घ ति जो णरो परिपुच्छति । अंगवी तस्स मोक्खं तु पक्खसंधिम्मि णिदिसे ॥ ४९५ ॥ पवासं परिपुच्छेन णत्यि तेवं वियागरे । पतिद्वं परिपुच्छेज अस्थि त्वं वियागरे ॥ ४९६ ॥ पतिलु णिव्युर्वि पीति संजोगं च समागमं । ज इट्ट परिपुच्छेज सव्यमत्यि त्ति णिदिसे ॥ ४९७ ॥ १°यक्खम ..त.चिना॥२ घेय सव्यवामा है. त.॥३अपभ्याम है..विना॥४भयसय्यरत-विना ।। ५- एतथिहगत पूर्व-त. नास्ति ॥६सनामक है. त.॥ 20 25 30 - 5 10 मज्झिमाणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ संधि च परिपुच्छेज अस्थि संधि ति णिहिसे । विगहं परिपुच्छेज णस्थि त्तेवं वियागरे ॥ ४९८ ॥ जयं च परिपुच्छेज जयो अत्यि ति गिदिसे । आरोग्ग परिपुच्छेज समुट्ठाणऽस्स णिदिसे ॥ ४९९ ॥ अणावुहिं च पुच्छेज णत्थि त्तेवं वियागरे । वस्सारत्तं च पुच्छेज मझिमो त्ति वियागरे ॥ ५००॥ अपातयं च पुच्छेज णत्यि तेवं वियागरे । यासं च परिपुच्छेज मज्झिमो त्ति वियागरे ॥ ५०१ ॥ कता यासं ति वा बूया पक्खसंधिम्मि णिदिसे । दिवा रत्ति ति वा बूया संझाकाले विणिदिसे ॥ ५०२ ॥ सस्सस्स वापदं पुच्छेज णत्थि त्तेवं वियागरे । सस्सस्स संपयं पुच्छेज मज्झिमा सस्ससंपदा ॥ ५०३ ॥ लामं च परिपुच्छेज मज्झिम लाभमादिसे । णटुं च परिपुच्छेज मझिमं तं च लभति ॥ ५०४ ॥ वाम-दक्खिणमझम्मि मज्झिमं ति वियागरे । धणं धणं च पुच्छेज मज्झिमो त्ति वियागरे ॥ ५०५॥ जं [] किंचि पसत्यं [सा] सबमत्थि त्ति णिदिसे । अप्पसत्थं च जं किंचि सव्वं नत्थि त्ति णिदिसे ॥५०६॥ वधा खेत्तं तधा चैत्युं सव्यमत्यि ति गिहिसे । समे सद्दे य जाणेजा मज्झिमा जे भवंतिह ॥ ५०७ ।। मझि मछतिको मझो मज्झिमो त्ति व यो वदे । पुर-देस-भागमझो गोट्ठी-सेणागमस्स वा ॥ ५०८ ॥ वयस्स मज्झो सुहमज्झो सयणमझं ति वा वदे । घरमझ गाममझो अरण्गस्साऽडवीय वा ॥ ५०९॥ णीयसंवैरिमझम्मि मित्तमझो त्ति वा वदे । अंमित्तमझो गोमझो णातिमझो त्ति वा वदे ॥ ५१० ॥ सुमझो तणुमझो त्ति चोरमझो त्ति वा वदे । जवमझो कीडमझो लद्धमझो त्ति वा वदे ॥ ५११ ।। समुदस्स य मैज्झं ति अब्भमझं ति वा वदे । उद्गरस व मझो ति अग्गिमझो ति वा पुणो ॥ ५१२ ॥ 16 चउप्पदाणं सव्वेसि विपदाणं तघेव य । अंगोवंगेसु सन्वेसु मझस्स उ उदीरणा ॥ ५१३ ॥ भातीण मज्झिमं व ति र मेझिमं भयणीण - वा । मज्झागतं ति वा बूया मज्झसारं ति वा वदे ॥५१४॥ ममं सारं ति या घूया तथा उद्धममझिमं । उक्कट्ठमज्झिमं व त्ति तथा सम्मझिमं ति वा ॥ ५१५ ॥ कित्तियंति य जे सहा जंचऽणं मज्झिमं भवे । एते उत्ता समा सद्दा मज्झिमा जे भयंति य ॥ ५१६ ॥ सह-रूव-रसे गंधे फासे मज्झिमकम्मि य । पुप्फे फले व देसे या णगरे गामे गिहे वि वा ।। ५१७॥ पुरुसे चतुप्पदे या वि पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तधेय य॥ ५१८ ॥ पाणे या भोयणे वा वि पत्थे आभरणे तथा । मणीसु यावि सन्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ॥ ५१९ ॥ आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणेसु य । लोहेसु यावि सव्वेसु सन्वेसु रयणेसु य ॥ ५२० ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सद्द-रूप-रसे तथा । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो घूयांगचिंतओ ।। ५२१ ॥ ॥ मज्झिमाणि सम्मत्ताणि ॥६॥छ । - 20 25 [७ अट्ठावीसं दढाणि] अट्ठावीसं दढाणंगे पवक्खामऽणुपुव्यसो । सिरं १ णिडालं २ जतूणि ४ उरो ५ परसाणि वे भवे ७॥५२२।। बे"बाहुणालिमझाणि ९ बाहुमज्झा य वे भवे ११ । जंघोरूणं च मज्झाणि १५ तधेव पादपहिओ १७॥५२३॥ दंता १९ संखा य २१ गंडा य २३ करमझो तघेव य २५ । संधो [य] २६ जैतुमझो य २८ दढाणेवाणि णिदिसे ॥ ५२४ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तधा । जं [] किंचि पसत्यं ते सव्यमत्यि ति णिदिसे ।। ५२५ ।। 30 १० मज्झं ति महं.त. विना ॥ २ सव्वमस्थि ह. त॥ ३वत्थं हं. त• विना ॥ ४ ममिको है. त.॥ ५ संबंधे मन्झं ति मित्त है. त• विना ॥ ६अचिच ई. त.॥ ७ मन्झम्मि में है. त• सि.॥ ८भावाणं हं.। भावीणं त० ॥९- एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त• नास्ति ॥ १० भंतहा है. त• ॥ ११ जे या है. त•॥ १२ जत्तुमज्यो ई. त.॥
७८ 5 । 10 16 अंगविजापइण्णयं [७ अट्ठावीसं दढाणि पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । घण्णो य सुहभागी य दढो य वलयं ति यं ॥ ५२६ ॥ इत्यिं च परिपुच्छेज सिद्धत्या सुमग त्ति य । घण्णा य सुहभागी य दढा य वलिका ति य ॥ ५२७ ।। पुरिसस्सऽढविवं पुच्छे दढमिचेव णिदिसे । थियो अट्ठविधि पुच्छे दढमिञ्चेव गिदिसे ॥ ५२८ ॥ कण्णं च परिपुच्छेज सिद्धत्या सुभग ति य 1 घण्णा य सुहभागी ये ण तु सिप्पं गमिस्सति ।। ५२९ ॥ गन्मं च परिपुच्छेन अस्यि गम्भो ति णिदिसे । गम्मिणिं परिपुच्छेजा चिरा पुत्तं पयाहिति ॥ ५३० ॥ कम्मं च परिपुच्छेन दढं कम्मं तु णिद्दिसे । पयासं परिपुच्छेज सफलमिति णिदिसे ॥ ५३१ ।। पउत्यं परिपुच्छेन्न संघणो आगमिस्सति । दढो ति य वियाणेना पुच्छितो अंगचिंतको ।। ५३२ ॥ , धंधं च परिपुच्छेने नयि बंधो ति णिदिसे । यंघरस मोक्खं पुच्छेज चिरा मोक्सो भविस्सति ॥ ५३३ ।। पवासं परिपुच्छेज णत्यि एवं वियागरे । पंइ8 परिपुच्छेन अस्थि त्तेवं वियागरे ॥ ५३४ ॥ हा समागमं संपयोग थाणमिस्मरियं जसं । जं जं पसत्यं पुच्छेन सबमत्यि ति णिदिसे ॥ ५३५ ।। भयं च परिपुच्छेन्न णत्यि त्तेवं वियागरे । खेमं च परिपुच्छेज अत्यि खेमं ति णिदिसे ॥ ५३६ ॥ संधि च परिपुच्छेज अस्थि संधि ति णिदिसे । विग्गई परिपुच्छेज पत्थि त्तेवं वियागरे । ५३७ ॥ जयं च परिपुच्छेज जयो अत्यि त्ति णिदिसे । आरोग्गं परिपुच्छेज आरोग्गमिति णिदिसे ॥ ५३८ ॥ रोगं च परिपुच्छेन णस्थि रोगं ति णिद्दिसे । मरणं च परिपुच्छेन णत्यि तेवं वियागरे ।। ५३९ ।।. जीवितं परिपुच्छेन अत्यि तेवं वियागरे । आयाधितं च पुच्छेज समुट्ठाणऽरस णिदिसे ।। ५४० ॥ अणावुहि प पुच्छेज णत्यि तेवं वियागरे । वस्सारत्तं च पुच्छेज सोमणो त्ति वियागरे ।। ५४१ ।। अपातवं च पुच्छेन पत्थि तेवं वियागरे । वासं च परिपुच्छेज पभूतमिति णिदिसे ॥ ५४२ ॥ सस्सरम संपर्य पुच्छे सोमणा सरससंपदा । सस्सस्स यापदं पुच्छे णत्यि त्तेवं वियागरे ॥ ५४३ ॥ पटं घ परिपुच्छेज अस्थि गहुँ ति णिदिसे । णट्ठमाधारये तं च दढमिश्चय णिदिसे ॥ ५४४ ॥ सन्नी या वि मिनी गहमाघारये जति । सन्जीवमिति तं धूया एवं तु दढ-दुबले ।। ५४५ ॥ ददं या दुव्यलं या वि दढमित्त णिद्दिसे । धणं धणं ति पुच्छेज घण्णं चे वियागरे । ५४६ ।। जं [प] किंचि पसत्यं तं सयमत्यि त्ति णिदिसे । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्यं णत्यि त्ति णिदिसे ॥५४॥ जघा पुण्यामधेयेमु अत्यो सब्बो सुमा-ऽमुभो । एवं दद्वेमु सन्चेसु पुण्णामसमकाऽऽहिते ।। ५४८ ।। तथा रोत्तं तया पत्युं सचमत्थि ति गिद्दिसे । समे सदे य जाणेना दढा जे मणिके मता ॥ ५४९ ।। अचलं घुवं तथा ठाणं सैस्सतं मसिलं ति या । अजरामरं ति या धूया णियतं ति अपत्थितं ।। ५५० ।। हिमांतो ति या यूया महाहिमस्तो त्ति या । णिसँदो अघया रमी मेरू वा मंदरो ति या ॥ ५५१ ॥ गेलरंतो त्ति केलासो तथा परमधरो चि या । वेयट्ठो अच्छदंतो त्ति सन्झो विंझो त्ति या स यदे ~ ॥५५२॥ "मंतो सि मलयो य ति पारित्तो त्ति या पुगो । महिंदो चित्ताटो त्ति यदे अंबासणो त्ति वा ॥ ५५३ ।। नगो त्ति पव्यनो यत्ति गिरिमेरो ति वा । सेलो सिलोभयो यत्ति पचतो सिहरि त्ति या ॥ ५५४ ।। पामागो पत्यरो यत्ति उपलो त्ति मणि त्ति या । सिलापट्टो त्ति वा यूया गंडसेलो ति या पुणो ॥ ५५५ ।। णामतो गिरिको यति तदा पञ्चतरो त्ति या । सेलो पहरो ति या यूया मेको मरुभूतिको ।। ५५६ ।। १.मित्येय • त• मि• ॥२ इत्थिया यि अट्टविधं पुच्छे ददामि ई•त. ॥ ३ बलं च ई• त.॥४यणेतु है• त•॥ ५गम्मिपी परिपुच्छेनात. ॥ ६मपणो • त॥ ७°ज अस्थि है• त• विना ।। ८'जयत्थिते है. त•॥ निगमुराई है. • मि. एव पत्तते ॥ १० मियेय ह. त•॥ ११ सध्यमत्यि है. त• ॥ १२ यत्यं . त• पिना ॥ १३ गसम..विना ॥ १४ अपष्टिय है. स.॥१५ समो महया • तमि.॥ १६वएतचिहमध्यगत पर्द १.१.मामि १७मयो सि...॥१८'रियसो है..॥ 20 20 ८ अट्ठावीसं चलाणि] णवमों अंगमणी णाम अज्झाओ धुवको अचलितो व त्ति वधा थावरको ति वा । सिवणामो गुत्तणामो भयो त्ति अभवो त्ति वा ॥ ५५७ ।। थितो त्ति सुत्थितो व त्ति तथा ठाणहितो त्ति वा । अकंपो णिप्पकंपो ति णिव्वरो मुंहते ति वा ।। ५५८ ॥ अण्णे वेवंविधा सदा जे अण्णे अचला भवे । एते उत्ता समा सद्दा दढा जे मणिके मता ॥ ५५९ ॥ थावरम्मि य गक्खत्ते देवते पणिधिम्मि त । पुप्फे फले य देसे य णगरे गाम गिहे वि वा ।। ५६० ॥ पुरुसे चउप्पदे चेव पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे किपिल्लगे या वि परिसप्पे तघेव य ॥ ५६१ ।। पाणे य भोयणे यावि वत्थे आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तधा ॥ ५६२ ॥ सव्वेसु यावि लोहेसु सम्वेसु रतणेसु य । मणी[सु] यावि सव्वेसु सबधण्ण-धणेसु य ॥ ५६३ ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सद्दे रूवे तघेच य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो यूयांगचिंतओ ।। ५६४ ॥ ॥ ढाणि सम्मत्ताणि ॥७॥छ । [८ अट्ठावीसं चलाणि] अट्ठावीसं चलाणंगे पवक्खामऽणुपुव्यसो । कण्णासंधी भुमासंधी [ ...................॥ ५६५॥ 10 15 R 20 C. - ] कमतलाणं च अट्ठावीसं चलाणि तु ॥ ५६७ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तथा । जं [च] किंचि पसत्यं तं सव्यं णत्थि त्ति णिदिसे ॥ ५६८।। पुरिसं परिपुच्छेज अधण्णो दूभगो त्ति य । असिद्धत्यो त्ति तं वूया ऍतेसिं उपसेवणे ॥ ५६९ ॥ इत्थिं च परिपुच्छेन्ज अंधण्णा दूभग त्ति य । असिद्धत्य त्ति तं धूया एतेसमुपसेवणे ॥ ५७० ॥ पुरिसंस्सऽत्थविधं पुच्छे चलमिश्चेव गिद्दिसे । अत्यविधं इत्थीसु य चलमिचेव णिदिसे ॥ ५७१ ॥ कण्णं च परिपुच्छेज अधण्णा दूभग ति य । असिद्धत्य ति तं चूया खिप्पं विजेहिति त्ति य ॥ ५७२ ॥ गम्भं च परिपुच्छेज णत्यि गम्भो त्ति णिद्दिसे । गन्भिणि परिपुच्छेज मतं सत्तं पजाहिति ॥ ५७३ ॥ गन्भिणी चलमामासं पुच्छे गन्भो सो चलो भवे । चले वितियमालद्धे गम्भो हणति मातरं ॥ ५७४ ।। छित्ते चलम्मि तिक्खुत्तो गम्भो तु पितरं हणे । चउखुत्तो चले छित्ते भातरं तु वधिस्सति ।। ५७५ ।। पंचखुत्तो चैले छित्ते कुल सो तु वधिस्सति । गम्भिणी य परामासे इच्चैवमुवधारये ॥ ५७६ ॥ पडिहारकं च दूतं च जंघावाणियकं पि वा । दिसावाणियगं वा वि छत्तंसासणहारणं ॥ ५७७ ॥ तधा पेसणियं जाणे तधा आदिट्ठभूमियं । तधा गिजामकं जाणे तधा वा कुक्खिधारकं ॥ ५७८ ।। तधेव णाविकं जाणे तथा डुपकहारकं । तथा पग्गाहर्क जाणे तधा कंतिकवाहकं ।। ५७९ ।। तंबाधायकं जाणे अमाकारिकमेव य । कम्मपुच्छाय णिइसे एयमादि फलं वदे ॥ ५८० ॥ पवासं परिपुच्छेज णिरत्यं ति वियागरे । पउत्यं परिपुच्छेज परओ सो गमिस्सति ॥ ५८१ ॥ वंधं च परिपुच्छेज गत्थि वंधो ति णिहिसे । वैद्धस्स मोक्खं पुच्छेज सिप्पं मोक्खो ति गिद्दिसे ॥ ५८२ ॥ पवासं परिपुच्छेज अस्थि त्तेवं वियागरे । 'पतिद्वं परिपुच्छेज अस्थि तेवं वियागरे ॥ ५८३ ॥ पतिद्वं परिपुच्छेज णत्यि ते वियागरे । संधिं च परिपुच्छेज णत्थि संधि ति णिदिसे ॥ ५८४ ।। विग्गहं परिपुच्छेन अत्यि तेवं वियागरे । भयं च परिपुच्छेज मयमत्यि ति णिदिसे ॥ ५८५ ॥ खेमं च परिपुच्छेज णत्थि खेमं ति णिदिसे । जयं व परिपुच्छेन जयो णत्यि ति णिदिसे ॥ ५८६ ॥ आरोग्गं परिपुच्छेज पत्थि तेवं वियागरे । रोगं च परिपुच्छेज अत्यि रोगो ति णिदिसे ॥ ५८७ ।। १ भव्वो त्ति अभव्यो ति हं० त० ॥ २ ठिओ त्ति सुटिओ व त्ति है. त० ॥ ३ सहिति त्ति ह. त•॥ ४ घणो दू' है. त० ॥ ५ पतेसं तु पवेसणे ह० त० ॥ ६ अघणा हं० त०॥ ७चले खित्ते फुल सो उच' है. त.॥ ८ अज्झाका हं. त०॥ ९परितो ई० त० विना ॥ १० बंधस्स है. त० ॥११- एतचिहन्तर्गतः पाठः है. त. नास्ति । १२थारागं है.त.॥ 25 30 " 5 10 अंगविजापदण्णर्य [C अट्ठावीसं चलाणि भरणं परिपुच्छेन्न अस्थि सेवं वियागरे । जीवितं परिपुच्छेन त्यि त्तेवं वियागरे । ५८८ ।। आयाधिवं च पुच्छेत्र ण समुढेहिति त्ति सो ! अणावुद्धिं च पुच्छेन अस्थि तेवं वियागरे । ५८९ ।। वासं च परिपुच्छेज हीणमेव वियागरे । अपादयं च पुच्छेन अयि तेयं वियागरे ॥ ५९० ॥ जासं च परिपुच्छेज अस्थि त्वं वियागरे । छा यासं तु परिपुच्छेन अप्पयासं तु णिदिसे ॥ ५९१ ॥ EF संस्सस्स वापदं पुच्छे अस्थि त्वं वियागरे । हम सस्सस्स संपयं पुच्छे जहण्णा सस्ससंपदा ॥ ५९२ ।। गडं च परिपुच्छेजा गस्थि गढ़ति गिद्दिसे । णट्ठमाधारये तं च चिरणहं वियागरे । ५९३ ॥ सजीव वा वि णिजीव णट्ठमाघारए जति । अनीयमिति वं वूया एवं अदढदुव्बले ॥ ५९४ ॥ दृढं चलं ति या बूया चलमिश्क्षेत्र णिहिसे । घणं घणं ति वा चूया अघणं ति वियागरे ॥ ५९५ ॥ जं [च] किंचि पसत्यं तं सव्यं णत्यि ति गिद्दिसे । अप्पसत्यं च नं किंचि सव्नमत्यि ति णिद्दिसे ।। ५९६ ।। समागमं संपयोग याणमिस्सरियं जसं । जंज इट प पुच्छेज सव्वं णत्यि त्ति णिदिसे ॥ ५९७ ।। रोग या मरणं वा वि अप्पतिहमणिब्युति । विनादं विप्पयोगं या सव्यमत्यि ति णिदिसे ॥ ५९८ ॥ चलाणेवाणि वुत्ताणि जम्मि अत्ये गपुंसको । णपुंसक विमागेणं चलाणि वि वियागरे ॥ ५९९ ।। तधा खेत्तं तघा वत्यु सव्वं गत्यि त्ति णिदिसे । चले सदे य जाणेजो घला ये मणिके मया ॥ ६०० ।। चलितं विचलित वा वि पलं ति चलियं ति या । तथा च चलजाति चि घापति त्ति व जो पदे ।। ६०१ ।। पैधावति त्ति' या धूया संघावति य विधावति । परिधावति त्ति वा बूया तथा गिद्धावति ति वा ६०२ ओषायति त्ति या बूया अहिधावति गोलति । विघोलॅते ति या धूया अधवा विप्पघोलवि ।। ६०३ ।। परिचेति ति या बूया तथा विपरिघट्टते । परिपत्तते ति या वूया त्या विष्परिवतते ।। ६०४ ॥ विचले अघुवे व त्ति ओघुते संधुते त्ति वा । 4 अधुवे त्ति गए व त्ति - आधुते त्ति धुवे त्ति वा ॥६०५।। गलियं ति व जो बूया तथा पगलियं ति वा । गलियं विगलितं व त्ति तथा पगलियं ति वा ।। ६०६ ।। सधा मिक्सिन्न विक्सिन्नं णिक्सिन्नं विसलाइ । पकिष्णं विप्पकिरणं ति उहितं परिसाढियं ।। ६०७॥ फुलितं दालितं दलिय छहितं परिसाहित । मग्गं ति वाम पति छल्लिग्गं ति वा पुणो ।। ६०८॥ अंदोलंति ति या धूया तथा इंदोलको त्ति या । घुमति त्ति परिघुमति ममते व परिममे ॥ ६०९ ॥ गिटुंघति ति या धूया णिकड्डति विकट्ठति । उक्टुति त्ति वा धूया कड्डिति त्ति व जो वदे ।। ६१० ।। अण्णे चेविधा सदानं चयपि चलं भवे । एते उत्ता समा सदा चला जे मणिके मवा ।। ६११ ॥ चले सिप्पे य णसत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे व णगरे गाम गिहे वि वा ॥ ६१२ ॥ पुरिसे घटप्पदे चेर पक्सिम्मि उदकेचरे । कीडे किविहिगे यावि परिसप्पे दवेव य ॥ ६१३ ॥ पाणे य भोयणे या वि पत्ये आमरणे वधा । आसणे सयणे जाणे मंडोयगरणेसु य ॥ ६१४ ॥ लोहेसु यावि सब्वेमु सव्वेसु रयणेमु य 1 मणीसु यावि सव्वेसु सव्यघण्ण-धणेमु य ॥ ६१५ ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सद्दे रूवे तपेय य । सव्यमेवाणुगंगं ततो यूयांगचिंतको ॥ ६१६ ॥ चलाणि सम्मत्ताणि neon 15 । 20 25 50 १-२ चिम्मघ्यगत पूर्वाधयुगलं है. तएव व ॥ ३ एतत् श्वेकपूर्वार्धमेव नि. नास्ति ॥ ४ हसचिहगतः पाठः ह त एव दते ॥५रियोलए अदजर मधधा है• त• लि. पयोलते अडजए मधया स ३ पु.॥६परिचायति चिसय ।। ७८एलविद्वान्तर्गत चरण है. त• नास्ति। ८घुम्मति है. त• विना ॥
। 5 10 15 ९ सोलस अतिवत्ताणि], णवमो अंगमणी णाम भन्झाओ [९ सोलस अतिवत्ताणि] सोलसेवऽतिवत्ताणि पवक्खामऽणुपुचसो । सीसस्स पच्छिमो भागो गीवा पट्ठी य पच्छिमा ॥ ६१७ ॥ बाहुणाली-उवत्थाणं फिजोरूणं च पच्छिमं । जंघाणं पण्हिकाणं च अतिवत्ताणि सोलस ६१८ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तथा । जं किंचि पसत्यं तं सव्वं णस्थि ति णिदिसे ॥ ६१९ ॥ पुरिसं च परिपुच्छेज अधण्णो दूभगो त्ति य । असिद्धत्थो त्ति तं धूया अतिवत्तम्मि सेविते ॥ ६२० ॥ इत्थिं च परिपुच्छेज अधन्ना दूभग त्ति य । असिद्धत्थ त्ति तं घूया अतिवत्तम्मि सेविते ६२१ ॥ पुरिसत्यविधि पुच्छे अतिवत्तं वियागरे । इत्यिअत्यविधि पुच्छे अतिवत्तं वियागरे ॥ ६२२ ॥ कणं च परिपुच्छेज अधण्णा दूभग ति य । असिद्धत्थ त्ति तं घूया खिप्पं विजिहिते त्ति य ॥ ६२३ ।। गन्मं च परिपुच्छेज णथि गम्भो ति गिहिसे । गम्भिणि परिपुच्छेन मतं सत्तं पयाहिति ॥ ६२४ ॥ उक्खित्तविकं वा वि तथा वाहिरतवियं । पक्खच्छयकं व जाणीया कैवुडं आसणहारकं ।। ६२५ ॥ भागहारकमेवावि मधवा साधिगक्खरं । कम्मपुच्छाय णिद्देसे एवमादि फलं पदे ॥ ६२६ ॥ पवासं परिपुच्छेज अफलो त्ति वियागरे । पा(पवा)सितं परिपुच्छेज पैरतो सो गमिस्सति ॥ ६२७ ॥ बंधं च परिपुच्छेज णस्थि वंधो ति णिदिसे । बंधस्स मोक्खं पुच्छेज मोक्खं तस्स वियागरे ॥ ६२८ ॥ पवासं परिपुच्छेज अस्थि त्तेवं वियागरे । पतिद्वं परिपुच्छेज णत्यि तेवं वियागरे ।। ६२९ ॥ भयं च परिपुच्छेन अस्थि त्तेवं वियागरे । खेमं च परिपुच्छेज णत्यि खेमं ति णिदिसे ॥ ६३० ॥ संधि च परिपुच्छेज णत्थि संधि त्ति णिदिसे । विग्गहं परिपुच्छेज अस्थि त्तेयं वियागरे ॥ ६३१ ॥ जयं च परिपुच्छेज जयो णथि त्ति णिदिसे । आरोगं परिपुच्छेज णत्थि त्तेवं वियागरे ॥ ६३२ ।। रोगं च परिपुच्छेज अस्थि रोगो त्ति णिदिसे । मरणं च परिपुच्छेज अस्थि त्वं वियागरे ॥ ६३३ ॥ जीवितं परिपुच्छेज्ज णत्थि त्तेवं वियागरे । आवाधितं च पुच्छेज ण समुढेहिति त्ति सो ।। ६३४ ॥ अणावुद्धिं च पुच्छेज अस्थि त्तेवं वियागरे । वस्सारत्तं च पुच्छेन णिकिट्ठो त्ति वियागरे ॥ ६३५ ॥ अपातयं च पुच्छेन्ज अस्थि तेवं वियागरे । वासं च परिपुच्छेज अप्पं वासं वियागरे ॥ ६३६ ॥ सस्सस्स वापदं पुच्छे अस्थि तेवं वियागरे । सस्सस्स संपदं पुच्छे णस्थि त्तेवं वियागरे ॥ ६३७ ॥ णहूं च परिपुच्छेज णत्यि गह्र ति णिद्दिसे । गट्ठमाधारतित्ता णं चिरण8 वियागरे ॥ ६३८ ।। संपता-ऽणागता-ऽतीतं अतीतं ति वियागरे । धणं धणं ति पुच्छेज अधणं ति वियागरे ॥ ६३९ ।। समागमं संपयोगं ठाणमिस्सरियं जसं । जं जं इ8 च पुच्छेज सव्यं णस्थि ति णिदिसे ॥ ६४० ॥ रोगं च मरणं याधि अप्पतिहमणिव्वुति । विप्पओगं विवादं वा सव्वमत्थि त्ति णिदिसे ॥ ६४१ ॥ जं किंचि पसत्यं तं सव्वं णत्थि ति णिदिसे । अप्पसत्यं च ज किंचि सव्यमस्थि त्ति णिदिसे ॥ ६४२ ॥ तघा खेत्तं तथा यत्युं सव्वं पत्थि ति णिहिसे । समे सद्दे य जाणेजा अतियत्ता भवंति जे ॥ ६४३ ॥ अतिवत्तमतिकतं गतं ति य विणिग्गतं । विणियत्तं पुराणं ति जुण्णं ओपुप्फ गिप्फलं ॥ ६४४ ॥ सुक्खं मलितं विसिगं ति उवउत्तं झीणमेव य । सइतं पितं ति वा मुत्तं णिट्टितं ति कतं ति या ॥ ६४५ ॥ 50 सम्मदितं अतीतं ति समतिच्छियमतिच्छियं । ओहिज्जतं ओहसितं पहीणं ति पहिचते ॥ ६४६ ॥ पहातं व मजियं वा वि ओलोलित पलोलियं । पलोहितं ति या यूया तथा सम्मजितं ति या ॥ ६४७ ॥ णचितं वाइयं गीयं लासितं पढितं ति वा । वेलंवितं ति वा यूया वधा वत्तुस्सयं ति या ॥ ६४८ ॥ १°चगुंठिक है. त• विना ॥ २ गुंठिय है. त• विना ॥ ३ कधुई है० त० विना ॥ ४ मरे है. त॥५परितो है. त• विना ।। ६ तिमे है. त• विना । ७ भोहिझियं ओह' ई० त०॥ ८ पठिनए है.त.॥ अंग०११ - । 20 - 25 - . २ अंगविजापडण्णय [१०सोलस घचमाणाणि गियतं भूतपुव्यं ति कतपुश्यं ति या पुगो । तथा रयितपुव्यं ति अणुमूतं ति या पुणो ॥ ६४९ ॥ गतपुष्वं तिचा चूया रयपुव्वं ति वा पुगो । तथा माणितपुन्यं ति यचपुल्यं ति या पुणो ॥ ६५० ॥ गतगंधा गतरसा तथा गतवयो त्ति वा । एते उत्ता समा सदा अतिवत्ता मांति जे ॥ ६५१ ॥ .. अतियत्तम्मि णक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले य देसे य णगरे गाम गिहे वि वा ।। ६५२ ।। पाणे व भोयणे या वि यत्थे आभरणे तथा । आसणे सयणे जाणे भंडोयगरणेसु य ।। ६५३ ।। पुरुसे चतुप्पदे वा वि पक्सिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तघेय य ॥ ६५४ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सन्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सन्येमु सव्य-धण्ण-धणेमु य ।। ६५५ ॥ एतम्मि पेक्सियामासे सद्दे रूवे तधेव य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो घूयांगचिंतओ ।। ६५६ ।। ॥ अतियत्ताणि सम्मत्वाणि ॥९॥छ। । s 10 20 [१० सोलस यत्तमाणाणि] पत्तमाणाणि वक्खामि सोलसंगे जघा तथा । वे चे सीसपस्साणि २ फण्णा ४ गंडा तघेव य६॥ ६५७ ।। वे थाहणालिपस्साणि ८ घाइपस्साणि वे तथा १० । जंपो १२ २१४ पादपस्साणि १६ वत्तमाणाणि सोलस ।। ६५८ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाम जयं तथा । जं किंचि पसत्यं तं सव्वमत्यि ति णिदिसे ॥,६५९ ॥ पुरिसं घ परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो ति य । धण्णो य सुहभागी य पुरुसोऽयमिति णिदिसे ॥ ६६० ॥ इत्यि या परिपुच्छेज सिद्धत्या सुभग ति य । घण्णा य सुहभागी य इत्थीयमिति गिदिसे ॥ ६६१ ॥ पुरिसत्थविधं पुच्छे वत्तमाणं वियागरे । ५ इस्थिरसऽत्यविधं पुच्छे पत्तमाण वियागरे ॥ ६६२ ।। कण्णं च परिपुच्छेन सिद्धत्या सुभग त्ति य । घण्णा य सुहभागा य सिप्पं विजिहिति ति य ॥ ६६३ ।। गम्भं च परिपुच्छेज अत्यि गम्भो ति गिद्दिसे । गम्भिणी परिपुच्छेज खिप्पं सा पयाहिति ॥ ६६४ ॥ कम्मं च परिपुच्छेज सद्दे रूवेहिं णिहिसे । वत्तमाणं पसत्यं च सुभं लाभं च णिदिसे ॥ ६६५ ॥ पवासं परिपुच्छेज सफलो त्ति वियागरे । पउत्थं परिपुच्छेन सफलो पंधि यत्तते ।। ६६६ ॥ बंधं च परिपुच्छेन पत्यि त्तेवं वियागरे । पद्धस्स मोक्तं पुच्छेन खिमं मोक्खं वियागरे ॥ ६६७ ।। पवासं परिपुच्छेज णत्थि त्तेवं वियागरे । पतिद्वं परिपुच्छेज अत्यि क्षेत्र वियागरे ॥ ६६८ ॥, समागम संपयोग थाणमिस्सरियं जसं । इटुं च परिपुच्छेज सव्यममि त्ति णिद्दिसे ॥ ६६९ ॥ . अपमाणमसकारं गिरातारमणिव्वुतिं । विप्पयोगं विवादं च सव्यं णस्थि ति गिद्दिसे ॥ ६७० ॥ भयं च परिपुच्छेन भयं णत्यि ति णिदिसे । सेमं च परिपुच्छेज सेममत्थि ति णिदिसे ॥ ६७१ ।। संधि या परिपुच्छेज अत्यि संधि त्ति णिदिसे । विग्गहं परिपुच्छिज पत्थि तेवं वियागरे ॥ ६७२ ।। जयं या परिपुच्छेज जयो अत्यि ति णिदिसे । आरोग्गं परिपुच्छेज आरोग्गमिति णिदिसे ॥ ६७३ ।। रोगं च परिपुच्छेज पत्थि त्तेवं वियागरे । मरणं च परिपुच्छेज णत्थि वेवं वियागरे ।। ६७४ ।। जीवितं परिपुच्छेज अस्थि तेवं वियागरे । असमाधि च पुच्छेज्ञ समुट्ठाणंऽस णिदिसे ॥६७५ । । अणावुद्धिं च पुच्छेज णत्यि तेवं वियागरे । वासारत्तं च पुच्छेज ण सो पढमकप्पितो ॥ ६७६ ॥ अपातयं च पुच्छेज णस्थि त्तेचे वियागरे । वासं च परिपुच्छेज वासमासवमादिसे ॥६७७॥ . सस्सस्स यापदं पुच्छे नत्थि तेवं वियागरे । सस्सस्स संपयं पुच्छे ण सो पढमकप्पिगो ॥ ६७८ ॥ १-- एतचिहमध्यगतमुत्तरार्थ है• त. नास्ति ।। २ पवियुत्तमोहत• । 'पधि' पथि मार्गे इत्यर्थः ॥ ३ सतवादिसे •स• विना ॥ 25 - । 1 30 ११ सोलस अणागताणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ संपता-ऽणागता-ऽतीतं वत्तमाणं वियागरे । धणं घणं च पुच्छेजा तं तु मझगतं वदे ॥ ६७९ ॥ वत्तमाणं पसत्थं च सव्वंमत्यि ति णिहिसे । अप्पसत्यं च ज किंचि सव्वं णत्यि त्ति णिदिसे ॥ ६८० ॥ तघा खेत्तं तथा पत्थु सव्वमत्यि ति णिदिसे । समे सद्दे य जाणेजो पत्तमाणा भवंति जे ॥ ६८१ ॥ वत्तते.त्ति व जो घूया वैत्तमाणं ति वा पुणो । णिव्यत्तते त्ति वा वूया तथा संपतिवत्तते ॥ ६८२ ॥ संजायते संभवति तथा संचिट्ठते ति वा । आसते सयते व त्ति बुझते पडिबुझते ।। ६८३ ।। उम्पज्जते.त्ति वा बूया दिसते सूयते त्ति वा । अग्यायते त्ति वा धूया अस्साएति त्ति घा पुणो॥ ६८४ ॥ फरिसायते त्ति वा यूया सुहं वेदयते त्ति वा । दलायते त्ति वा घूया सुहं वा दायते त्ति वा ॥ ६८५ ॥ तथा चिंतेति मंतेति गायते हसते त्ति या । तधा पढति पाढेति वेलंवेति त्ति पञ्चति ॥ ६८६ ॥ मजति त्ति व जो बूया आर्हिचति विलिंपति । भरेति कुसुमाणीति आवंधति वासितं ॥ ६८७ ॥ अलंकारेति अप्पाणं पसायति त्ति वा पुणो । पाउणेति निवेसेति तथा ओ.क्खति त्ति वा ॥ ६८८ ।। मुंजति ति व जो बूया तथा पिबति भेदति । आहारेति त्ति वा बूया कल्लाणं पावति त्ति वा ॥ ६८९ ।। आचिक्खति कधेति त्ति जंपति भणति त्ति वा । विजाणेति त्ति वा वूया तधा संजाणति त्ति वा ॥ ६९० ॥ आणेति व देति व उवणामेति त्ति वा पुणो । एवमादी य जे केयि बत्तमाणा भवंति ते ॥ ६९१ ॥ वृत्तमाणम्मि णक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गाम गिहे वि वा ॥ ६९२ ।। पुरुसे चतुष्पदे चेव पक्खिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तघेव य ।। ६९३ ॥ पाणे व भोयणे वा वि वत्ये आभरणे तथा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणेसु य ॥ ६९४ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सन्वेसु रयणेसु त । मणीसु यावि सम्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ ६९५ ॥ एतम्मि पेक्खियामासे सहे रूवे तधेव य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो चूयांगचिंतओ ॥ ६९६ ॥ ॥ यत्तमाणाणि सम्मत्ताणि ॥१०॥ छ । 10 - 1b. 20 25 [११ सोलस अणागताणि] अणागताणि वक्खामि सोलसंगे जधा तधा।मुहं १ गिडालं २ कंठो य३ हिदेयं ४ जंतुवरं ६ तघा ॥६९७॥ उरस्स ७ बाहुणालीणं ९ वत्यी १० सीसो ११ दरस्स य १२ ॥ जंघो १४ रूणं च १६ पुरिमाणि सोलसंगे अणागता ॥ ६९८ ।। एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तथा । जं किंचि पसत्थं सा सव्वं घूया अणागतं ॥ ६९९ ॥ पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । धण्णो य एसकल्लाणो पुरिसोऽयमिति णिदिसे ॥ ७०० ॥ इत्थिं च परिपुच्छेन्ज सिद्धत्था सुभग त्ति य । घण्णा य एस्सकल्लाणा इत्यीयमिति णिदिसे ॥ ७०१॥ पुरिसस्सऽत्थविधं पुच्छे भविस्सति अणागतं । थिया अत्यविधं पुच्छे वदे तं पि अणागतं ॥ ७०२॥ कण्णं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य । घण्णा य एस्सकल्लाणा विजिस्सति चिरेण तु ॥७०३ ॥ गम्भं च परिपुच्छेज अस्थि गब्भो त्ति णिहिसे । गम्भिणी परिपुच्छेन दारकं सा पयाहिति ॥ ७०४ ॥ कम्मं च परिपुच्छेज ज कम्मं स समाचरे । तं तं कालंतरेणेव अणागतफलं भवे ॥ ७०५॥ पवासं परिपुच्छेज सफलं ति वियागरे । पउत्थं परिपुच्छेज्ज सधणो आगमिरसति ॥ ७०६ ॥ बंधं च परिपुच्छेज णत्यि बंधो त्ति गिद्दिसे । बद्धस्स मोसं पुच्छेज अस्थि मोक्खो ति गिद्दिसे ।। ७०७॥ १ सव्यमस्थि है. त• विना ॥ २ वत्तमण्णं ति सं ३ पु० सि.। वत्तं मण्णं ति है• तः॥ ३पाउणाति हं. त.॥ ४ उच्चकति है. त.॥ ५ हिदय यंतुतरं सं ३ पु. सि. । हिदयं जं उत्तरं हं. त०॥ 30 - 5 । । 10 प्राविजापदण्णय [११ पन्नास मयं प परिपुच्छेत्र गत्यि यं वियागरे । सेमं च परिपुच्छेन्न खेममत्यिं ति णिदिसे ॥७०८॥ संधि प परिपुच्छेत्र अत्यि संधि ति गिदिसे । विग्गहं परिपुच्छेन्न णत्यि वेवं वियागरे । ७०९ ॥ अयं प परिपुच्छेत्र बयो बत्यि ति गिदिसे । आरोगं परिपुच्छेन आरोगमिति णिरिसे ।। ७१०॥ रोग घ परिपुच्छेन परिय रोगो त्ति मिदिसे । मरणं परिपुच्छेत्र पत्थि तेवं वियागरे । ७११ ॥ जीवितं परिपुच्छेत्र अस्थि चे वियागरे । आयाधितं परिपुच्छेज समुट्ठाण'इस णिदिसे ॥ ७१२ ॥ अणावुहिं प पुच्छेन्न पत्यि तेवं वियागरे । यस्सारत्तं च पुच्छेज मोमगो त्ति भविस्सति ।। ७१३ ॥ थपसारं प पुच्छेन्न गत्यि सेयं वियागरे । यासंघ परिपुच्छेत्र चिरं यासं वियागरे ॥ ७१४ ॥ सरसरम यापयं पुच्छे गत्यि से वियागरे । सरसरस संपयं पुच्छे सोमणो ति वियागरे ॥ ७१५ ॥ गलुप परिपुच्छेन यत्यि णटं ति णिहिसे । णमाधारतिचा गं पुरिमपक्सं ति णिदिसे ॥ ७१६ ।। संपता-Sणागता-ऽतीनं आगामि चि वियागरे । घण्णं धर्ण ति पुच्छेन घेणं वेयं वियागरे ।। ७१७ ॥ संकिंचि पसत्यं सव्यमत्यि ति णिदिसे । अप्पसत्यं पकिंचि सव्वं गत्यित्ति णिदिसे ॥ १८ ॥ सपा सेवं वधा यत्यु सव्यं यूया अणागतं । समे सहे य जाणेनो जे भवंति अणागता ॥ ७१९ ॥ अपात बहिदिति पत्रिदिति होमसति । भविस्सते ऑगहिति वधा आगच्छते ति या॥७२०॥ एहिती यत्ति या यूया या दाहिति काहिति । मुंजिरसति ति या यूया वधा साहिति पाहिति ॥ ७२१ ॥ सघा सिक्सिहिते व ति आगमेहिति पेच्छति । हाधिति त्ति या यूया दक्सिणं दाहिति त्ति या ॥ ७२२ ।। समा थभिहिते घ ति तथा दिरसहिति ति या । अंग्याहिति ति पा यूया अरसादेहिति य चि या ॥७२३ ।। फरिसादिति ति या यूया या चिंतेहिति त्ति या । मतेहिति ति या घूया गिच्छयं गाहिति ति पा ॥२४॥ पंनिहिते गिनिहित यायेहिति धादिति । ल्हासेदिति ति या पूया तथा पदिदिति ति था ।। ७२५ ॥ पादित चिचिलिंपिहिति पहागं आहेच्छिति ति या सिरं मरहते पत्ति आविधिहिति पासितं ।। ७२६ ।। गियसिद्धिति पत्यागि तपा पांगुहिति त्ति या । पसाहिति त्ति पटये भूसणाणि "विणेच्छिति ।। ७२७ ।। अटफारदिते यति पढिकम्म फाहिति त्ति या । माणेदिति ति या पच्छा तथा "सोभिहिते ति या ||२८|| पाधिगंसिवि ति या पूया समेदिति रमेदिति । एते सत्ता समा सदा जे भांति अणागता ।। ७२९ ॥ अगागम्मि पम देयते पगिधिम्मि य । पुफे पले ५ देसे या गगरे गाम गिहे विया ॥३०॥ पुरिसे पनुप्पदे पेय परिसम्मि एगेवरे । की किविल्लगे यावि परिसप्पे यय य ॥ ३१ ॥ पागे पा भोपने पा वि पत्ये थामरणे वया । आसगे सपणे जाणे भंडोषगरणे सपा ।। ७३२॥ सोय पापि सम्मु मध्येमु रपणेमु य । मणीमु यायि मध्येमु सध्यपग-पगेमु य ॥ ३३ ॥ एनम्मि पेरिगतामासे मर रूपे तपेय य । राव्यमेयाणुगनूगं तो धूयांगतिलो ।। ७३५॥ भनागनाजिसम्मधानि 16 30 0 [१२ पण्णासं मम्मंतराणि] भरमंतराणि परत परामरायगो । गरीरत्यागि जागंगे सरीरापादिराति य ॥ ३५॥ स-सामिणा पोरम्मंग याग पिग-पगमार्ग प मामीय मेजरग य ।। ७३६ ॥ friet....२ भामि ..पण.. ४ परिदले .... ५.ति मोरसति नितिन REETn...मी ७ महिने ... पाहिले १० ...पपिए गराईर पा.....पारिदिन...मादेशिगितिपादिन महिले. ...नि.गोमात...
5 । । 10 - 16 - अन्तराणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ हितयस्सावि समूहस्सं कण्णाणं णासिकाय यां वाहुणालीय हत्याणं सोणीआ व गुदाय यं ॥७३७ ॥ मत्थकस्स णिडालस्स गीया-गंडाणमेव य । भुमगाणं चेव जंतूणं उरस्स उदरस्स य ॥ ७३८ ॥ [............... एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभ जयं तधा । जं किंचि वि पसत्यं तं सव्यमत्यि त्ति णिदिसे ॥ ७३९ ।। पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य स धण्णो य सुहभागीय अभंतरको त्ति य ॥ ७४०॥ इत्थिं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य 1- धण्णा य सुहभागी य अभंतरयभारिया ॥ ७४१ ॥ पुरिसस्स विधं पुच्छे घूया अभंतरं ति य । पमदाय विधं पुच्छे तं पि अभंतरं यदे ॥ ७४२ ॥ कण्णं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य । रायन्नंतरकस्सायं कण्णा विजिहिते लहुं ॥ ७४३ ॥ गन्मं च परिपुच्छेज अस्थि गमो त्ति णिदिसे । गम्भिणिं परिपुच्छेज चिरा पुत्तं पयाहिति ।। ७४४ ॥ कम्मं च परिपुच्छेज राजपोरेसमादिसे । रणो य अन्भतरको भवे सव्वरहस्सिको ।। ७४५ ॥ पवासं परिपुच्छेज्ज चिरा मोक्खो भविस्सति । [ पउत्थं परिपुच्छेज्ज .........] ॥ ७४६॥ भयं च परिपुच्छेन भयं णत्यि ति णिहिसे । खेमं च परिपुच्छेज्ज खेममत्यि त्ति णिदिसे ॥ ७४७ ॥ संधि या परिपुच्छेज्ज अत्थि संधि त्ति णिदिसे । विग्गहं परिपुच्छेन्ज णत्यि तेवं वियागरे ॥ ७४८॥ जयं च परिपुच्छेन्ज जयो अत्थि ति गिद्दिसे । आरोगं परिपुच्छेज आरोगमिति णिदिसे ॥ ७४९ ॥ रोगं च परिपुच्छेन णत्यि त्तेयं वियागरे । मरणं च परिपुच्छेज णत्यि मरणं ति णिदिसे ।। ७५० ॥ जीवितं परिपुच्छेज अत्यि त्तेवं वियागरे । आवाधितं च पुच्छेज्ञ समुहाणंऽस णिदिसे ॥ ७५१ ॥ अणावुहि च पुच्छेज गत्यि तेवं वियागरे । वासारत्तं च पुच्छेज उत्तमो त्ति वियागरे ।। ७५२ ।। अपातयं च पुच्छेज णत्यि तेवं वियागरे । वासं च परिपुच्छेज्ज महामेह उवद्वितो ॥ ७५३ ।। सस्सस्स यापयं पुच्छे णत्यि त्तेवं वियागरे । सस्सस्स संपयं पुच्छे उत्तमा सस्ससंपदा ।। ७५४ ॥ गडं च परिपुच्छेज लामं तस्स वियागरे । णट्ठमाधारइत्ताणं तकं अभंतरं भवे ।। ७५५ ।। बाहिरऽमंतरं पुच्छे अभंतरगमादिसे । धणं धणं ति पुच्छेज धणं ति य वियागरे ॥ ७५६ ॥ जं किंचि पसत्यं तं सव्यमत्यि त्ति णिहिसे । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्यं णस्थि ति णिदिसे ॥ ७५७ ॥ तथा खेत्तं तथा यत्युं तथा दंडं वघा मणि । विपदं चतुप्पदं सव्यं धण्णमथि त्ति यं वदे ॥ ७५८ ॥ वत्थमाभरणं भंड अंतेपुरवरं जणं । सुवण्ण-रुप्प-मणि-रत्तं थिरमन्मंतरं वदे ॥ ७५९ ॥ जधा पुण्णामधेयेसु सव्यो अत्यो सुभा-ऽसुभो । तथा सुभा-ऽसुमं सव्यं यदे अन्भतरेसु वि ॥ ७६० ॥ अन्भतरे य जाणेजो समा सद्दा भवंति जे । अन्मवरं ति या यूया वधा अंतेपुरं ति वा ॥ ७६१ ॥ अन्मंतरं या गामे ति पुरे अमंतरं ति वा । अन्तरं या खेडे ति घरं अमितरं ति वा ।। ७६२॥ अंतोगामे त्ति या यूया वधंतोणगरे त्ति या । अंतोखेडे त्ति वा चूया तधंतोपरे त्ति वा ॥ ७६३ ॥ अभिवरं देवकुले अंतोदेवकुले ति वा । अन्मंतरे मुहे व त्ति तपंतोमुहे त्ति या ॥ ७६४ ॥ अभंतरं तु पारीय अंतोवारीय वा पुणो । अन्तरं कोत्यलगे अंतोकोत्यटके त्ति या ।। ७६५ ।। जम्मि फम्मियि भंडम्मि अंतो अभंतरं ति या । एते उत्ता समा सदा जे तु अभंतरा मवे ॥ ७६६ ।। अन्मंतरम्मि णक्सत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे य गरे गामे गिहे विया ॥ ७६७ ।। पुरिसे पतुष्पदे व पक्सिम्मि उदगेचरे । कोहे किविल्लिगे यावि परिसप्पे तधेय य ।। ७६८ ॥ १५ एतचिहान्तर्गते उत्तरार्ध-पूर्वार्धे हैं. ३. न सः॥ २ पोहसमा ह..॥ 1- एतचिहान्तर्गतमुत्तराध है. स.मासि॥४' रममियः । 20 25 30 ३ अंगविजापइण्णय [१३ पण्णासं अभंतरमंतराणि पाणे य मोयणे या वि पत्ये आमरणे तया । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे वधा ।। ७६९ ॥ लोहेसु यावि सव्येसु सव्वेसु रयणेसु थ । मणीसु यावि सन्वेसु सव्यघण्ण-धणेसु य ॥ ७७० ॥ एतम्मि पेसियामासे सद्दे रूवे तघेव य । सन्यमेवाणुरांतूणं ततो व्यांगचिंतओ.॥ ७७१ ।।... ॥ अभंतरं सम्मत्तं ॥ १२॥छ। 10 15 [१३ पण्णासं अन्भंतरमंतराणि ] अभंतरं तु जे युत्ता ते उम्मढे वियाणिया । अभंतरअन्भंतरके फलं तैत्य वदे सुभं ।। ७७२ ।। अत्यविद्धिं लयं लामं जं चऽयं पि सुमं भवे । एताणि आमसं पुच्छे अभंतरतरं वदे ।। ७७३ ।।' पुरिसं परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो ति य । अन्मंतरमंतरको रण्यो गिधं सुही भवे ।। ७७४ ।। इत्यिं च परिपुच्छेज सिद्धत्या सुभग ति य । रायन्नंतरकरसायं मना तु भविरसति ।। ७७५ ॥ पुरुसद्वविधं पुच्छे अभंवरतरं वदे । थिए अत्यविघं पुच्छे अन्मंतरवरं वदे ॥ ७७६ ॥ फणं च परिपुच्छेज सिद्धत्या सुमग ति य । अन्मंतरमंतरको रणो होहिति सेयगो ॥ ७७७ ॥ फम्मं घ परिपुच्छेज रायवल्लभको भवे । अभंतरमंतरको रण्णो सव्यरहस्सिवो ॥ ७७८ ॥ पवासं परिपुच्छेज णत्यि तेयं वियागरे । पउत्थं परिपुच्छेन सघणो खिप्पमेहिति ।। ७७९ ॥ पंधं च परिपुच्छेज गत्यि त्तेवं वियागरे । पद्धस्स मोक्सं पुच्छेज चिरा मोक्सो भविरसति ।। ७८०॥ भयं च परिपुच्छेन मयं णत्यि त्ति णिदिसे । खेमं च परिपुच्छेज सेममत्यि ति गिदिसे ॥ ७८१॥ संधि च परिपुच्छेज अस्थि संधि ति गिद्दिसे । विग्गई परिपुच्छेज णत्यि चे वियागरे ।। ७८२ ।। जयं च परिपुच्छेन जयो अत्यि ति णिदिसे । आरोग्गं परिपुच्छेज आरोग्गमिति णिदिसे ॥ ७८३ ॥ रोगं च परिपुच्छेन त्यि त्तेयं वियागरे । मरणं परिपुच्छेन गथि से वियागरे । ७८४ ।। जीवितं परिपुच्छेन सुइरं उत्तमं भवे । आवाधिवं च पुच्छेन समुहागऽस णिदिसे ॥ ७८५ ॥ अणावुद्धिं च पुच्छेज णत्यि त्तेवं वियागरे । यरसारत्तं च पुच्छेज गिहिसे उत्तमुत्तमं ।। ७८६ ।। अपावयं च पुच्छेज णत्यि तेवं वियागरे । वासं च परिपुच्छेज उत्तमं वासमादिसे ॥ ७८७ ॥ सस्सस्स यापदं पुच्छे त्यि वेचं चियागरे । सस्सस्स संपयं पुच्छे गिदिसे उत्तमुत्तमं ।। ७८८।। टुं च परिपुच्छेत्र लामं तस्स वियागरे । भट्ठमाधारये च अभंवरतरं वदे ॥ ७८९ ॥ याहिरम्भंवर व चि अन्मंतरमंतरं वदे । घणं घ पुरिपुच्छेन घणं तेण वियागरे ॥ ७९०॥ जं किंचि पसत्यं तं सन्यमस्थि ति णिदिसे । [अप्पसत्यं च जं किंचि सव्यं णत्यि ति णिदिसे ॥ ७९१॥ पत्यमाभरणं मई अंतेपुरवर जणो । मुरण्ण-रुप्प-मणि-मुत्तं अम्मंदरतरं घिरं ॥ ७९२ ।। वघा सेत्तं वधा वत्युं सगं दंड वषेव य । सयं सजीर-णिनीरं घण्णमयि ति णिदिसे ।। ७९३ ॥ अभंवरतरं एतं विमावेतूण अंगी । पुण्णामधेये हि फलं विसिट्टतरकं वदे ।। ७९४ ।। एवमेवं जया बुत्तं विमचीसु वियागरे । समे सद्दे य जाणेनो अम्मतरतरा हि जे ॥ ७९५ ॥ अन्मंतरमंतरतो अंतो तो ति या पुगो । वधा आहारमाहारे अन्मंवरतरं ति वा ।। ७९६ ।। पविट्ठो चि घ यो यूया क्या अतिगतो ति या । क्याऽतिसरितो व त्ति तथा ठीणो ति या पुगो ॥ ७९७ ।। तेघा एफट्टमोरुट्टो अरोरट्टे ति या पुणो । तथा ओगूढमुबगूढो तथा वहमनल्लभो ।। ७९८ ॥ सचिहगतोऽयं पारः ६. त• एक दांते ।। २ यत्य है. त• दिना ॥ ३सि ह. त.॥ ४ एतदुतरा सर्वामु प्रदिषु मारित । ५ तदा उमट्टमोटो भद्योकिटे ति• त.॥ 20 25 30 २४पण्णासं वाहिरव्मंतराणि]. णवमो अंगमणी णाम अन्झाओ अतिदूरे पविठ्ठो त्ति अतिगतो त्ति व दूरत । दूरातिसरितो व त्ति दूरोगाढो त्ति वा पुणो । ७९९ ।। तथा अणुपविट्ठो त्ति तथा अतिगतो त्ति या । तघा गाढोपगूढे ति गाढलीणं ति वा वदे ।। ८०० ॥ तथा अल्लीणमल्लीणो अञ्चल्लीणो त्ति या वदे । अभंतरभंवरगो एते सद्दा समा भवे ॥ ८०१ ॥ अक्कप्पविहे णक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गामे गिहे विया ॥ ८०२ पुरिसे चतुष्पदे चेव पक्खिम्मि उदकेचरे । कीडे किविल्लगे व परिसप्पे तघेव य ॥ ८०३ ।। पाणे वा भोयणे वा वि वत्ये आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणेसु य ।। ८०४ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सम्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ ८०५ ॥ एतम्मि पेक्खियामासे सहे रूवे तघेव य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो यूयांगचिंतओ ॥ ८०६ ।। ॥ अभंतरमंतराणि सम्मत्ताणि ॥ १३॥ छ । C: 10 16 . 20 [१४ पण्णासं वाहिरभंतराणि] 'अन्भंतरा तु निम्मट्ठा बाहिरभंतरा तु ते । अभंतराणंतरिया अध वुत्ता सुभा-ऽसुभा ॥ ८०७ ॥ अत्यलाम जयं पद्धिं जं चऽणं सुभं भवे । एताणि आमसं पुच्छे वाहिरव्मंतरं वदे ।। ८०८।। पुरिसं च परिपुच्छेज बाहिर-मंतरं भवे । इत्यिं च परिपुच्छेज बाहिरन्मंतरा भवे ॥ ८०९ ।। पुरिसस्सऽत्यविधं पुच्छे बाहिर-मंतरं भवे । थिया अत्यविधं पुच्छे बाहिरमंतरं पदे ॥ ८१०॥ कणं च परिपुच्छेज बाहिरमंतरस्स तु । खिप्पं विजिहिति कण्णा एवं बूयांगचिंतको ।। ८११ ।। गन्भं च परिपुच्छेन्ज अत्यि गन्मो त्ति णिदिसे । गम्भिणी परिपुच्छेज खिप्पं पुत्तं पयाहिति ॥ ८१२ ॥ कम्मं च परिपुच्छेन्न चाहिरभंतरं वदे । पडिहारं संधिवालं या तथा अत्योपणायकं ।। ८१३ ॥ पवासं परिपुच्छेज सफलोऽयमिति णिहिसे । पउत्यं परिपुच्छेज सधणो आगमिस्सति ॥ ८१४ ।। बंधं च परिपुच्छेज णत्यि बंधो ति णिदिसे । पद्धस्स मोक्खं पुच्छेन मोक्खं तस्स वियागरे ॥ ८१५ ॥ मयं च परिपुच्छेञ भयो गयि त्ति णिदिसे । खेमं च परिपुच्छेज्ञ खेममत्यि ति णिदिसे ॥ ८१६ ॥ संधि या परिपुच्छेज अस्थि संधि त्ति णिदिसे । विग्गहं परिपुच्छेज गत्यि तेवं वियागरे ॥ ८१७ ॥ जयं च परिपुच्छेज जयो अत्यि ति णिदिसे | आरोग्गं परिपुच्छेज आरोग्गमिति णिदिसे ॥ ८१८ ।। रोगं च परिपुच्छेज गयि रोगो त्ति णिदिसे । मरणं घ जति पुच्छेन्न गयि तेवं वियागरे ॥ ८१९ ॥ जीवितं परिपुच्छेन अत्यि त्वं वियागरे । आयाधितं च पुच्छेन समुहाणंऽस णिदिसे ॥ ८२० ॥ अणावुट्टि प पुच्छेज गत्यि तेवं वियागरे । यस्सारत्तं च पुच्छेन मझिमो त्ति वियागरे । ८२१ ।। अपातयं च पुच्छेज गत्यि त्वं वियागरे । वासंघ परिपुच्छेज मन्झिमं यासमादिसे ॥ ८२२॥ क्या यासं ति या यूया संधीदिवसेसु गिदिसे । दिवा रत्तिं ति या घूया संझाकाले ति णिदिसे ॥ ८२३ ॥ सस्सस्स यापदं पुच्छे णत्यि तेवं वियागरे । सस्सस्स संपर्य पुच्छे मन्झिमा सस्ससंपदा ।। ८२४ ॥ पहुं प परिपुच्छेज लामं तस्स वियागरे । गहमाघारयिचा य याहिरमंतरं पदे ।। ८२५ ।। अन्मंतरं ति यझं ति पाहिरमंतरं यदे । धगं घण्गं ति पुच्छेन्न मन्झिमं ति वियागरे ।। ८२६ ।। अंकिंचि पसत्यं सं सत्यमलि तिमिरिसे । अप्पसत्यं च किंचि सव्यं परिप ति गिरिसे ।। ८२७ ।। सपा खेत्तं वघा पत्युं सगं दंड मगि तपा । सव्वं सन्नीर-निनीय मशागतमत्यि य ।। ८२८ ॥ - 25 30 अंगविजापइण्णय [१५ पण्णासं अग्मंतरवाहिरावि यत्यमाभरणं मंह अंतेपुरवरं जणं ! रुप्पं मणि रयणं मझागममत्थि य ॥ ८२९ ॥ एवमेव विमावित्ता णिहिसे अंगचितओ। समे सद्दे य जाणेजा वाहिरब्भतरा हि जे ।। ८३० ॥ बाहिर-मंतरा सदा समुदीरंति मिस्सका । अन्भतरा बहुला वाहिरभंवरा तु ते ॥ ८३१ ।। णक्सत्ते देवते यावि वधा णक्खत्तदेवते । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गाम गिहे वि वा ॥ ८३२॥ पुरिसे चतुष्पदे चेय पक्खिम्मि उदकेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तथैव य ॥ ८३३ ।। पाणे वा भोयणे या वि वत्ये आमरणे तथा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तथा ॥ ८३४ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ ८३५ ॥ एतम्मि पेक्सिदामासे सदे रूवे तव य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो थांगचिंतओ ।। ८३६ ॥ ॥ वाहिरमंतराणि ॥ १४॥ छ । 10 15 20 [१५ पण्णासं अभंतरवाहिराणि] अभंतराणि सेवित्ता वाहिराणि णिसेवति । अभंतरवज्झा ते सन्वत्थे ण पसस्सते ॥ ८३७ ।। एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाम जयं तथा । जं किंचि पसत्यं तं सव्वं णत्यि ति णिदिसे ।। ८३८ ।। पुरिसं च परिपुच्छेज अधण्णो दूभगो त्ति य । असिद्धत्यो त्ति तं वूया अन्मंतरवाहिरो ।। ८३९ ।। इत्यिं वा परिपुच्छेज अघण्णा दूभग त्ति य । असिद्धत्य त्ति तं घूया अन्भितरवाहिरा ।। ८४०॥ पुरिसत्यविधं पुच्छे पदे अमितरवाहिरं । थिया अत्यविधं पुच्छे अभितरवाहिरं वदे ।। ८४१ ॥ कण्णामवि असिद्धत्या अधण्णा दूभग त्ति य । अन्भतरवज्झस्स खिप्पं विजहिए ति य ॥८४२|| कम्मं च परिपुच्छेज अमितरवाहिरं वदे । पढिहारि संधिवालं या अव्भागारिगमेव य ॥ ८४३ ॥ पयासे पुच्छिते अस्थि पोसिते य पिरत्थगो । बंधो य पुच्छिते णत्यि बद्धो खिप्पं मुञ्चति ।। ८४४ ।। मयं अयि त्ति वा घूया णत्यि खेमं ति पुच्छिते । संधि पुच्छे णे भवति विग्गहो य गिरत्यगो ।। ८४५ ।। औरोगो यऽत्य ण मवे रोगं मरणं च णिद्दिसे । णथि त्ति जीवियं चूया ण समुद्रुति आतुरो ॥ ८४६ ।। अपावयमणावुद्घि सस्सयापत्तिमेव य । णत्यि ति णिदिसे सव्वं गहुँ तत्य प दीसति ॥ ८४७ ॥ वस्सारत्तं च यासं च णहस्स व ण दंसणं । तधा खेत्तं तथा पत्थु सव्वं णत्यि ति णिदिसे ॥ ८४८॥ अन्मंतर ति घम्झं ति अम्भितरवाहिरं वदे । घणं घणं च पुच्छेज अधण्णमिति गिदिसे ॥ ८४९ ॥ जं किंचि पसत्यं तं सव्वं गत्यि ति गिहिसे । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्वमत्यि ति णिदिसे ॥ ८५० ॥ अन्तरयाहिरका सदा सूतति मिस्सगा ! अभंतरहिका ते तु अभंतरवाहिरा भवे ।। ८५१ ।। आदि र णसत्ते यामिस्से देवतेमु य । 'तित्थे पुप्फ फले देसे णगरे गाम गिहेसु य ।। ८५२ ॥ पुरुसे चतुष्पदे यावि पक्सिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविल्लए यावि परिसप्पे तघेव य ।। ८५३ ।। पाणे या भोयणे या वि पत्ये आमरणे तथा । आसणे सयणे जाणे भंडोरगरणेसु य ॥ ८५४ ॥ लोहेमु यावि सव्वेमु सम्वेसु रयणेमु य । मणीमु यावि सन्वेसु सव्यधण्ण-घणेसु य ॥ ८५५ ॥ एतम्मि पेक्सिवामासे सदे स्वे तथैव य । सव्यमेवाणुगतूणं ततो यूयांगचिंतओ ।। ८५६ ॥ ॥ अम्भितरवाहिराई सम्मत्ताई ॥१५॥ छ । 25 30 १ मरिरगतमुत्तरार्ध. तवासि ॥२ण या यूया दिग्गहोति.।ण [.........] विग्गहोस ३ पु० ॥ ३ अरोगो १. द.॥ ४ भूनंति • त•n ५तिघि पुष्कर. त• विना ॥
- 10 १६ पण्णासं दाहिराणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ [१६ पण्णासं वाहिराणि] एतेसामेव सव्वेसि पडिपक्खे वाहिराणि तु । सेवमाणो जया पुच्छे पसत्थं णाभिनिदिसे ॥ ८५७ ॥ एतेसं सेवणे जंतु कम्मपुच्छं वियागरे । वणकम्मिकं व णाविकम्मं वाहिरं कट्टहारकं ॥ ८५८ ॥ आरामपालकं जाणे उज्जाणस्स वणरस या । पुप्फुचागं फलुच्चागं वत्तणीपालकं वहा ।। ८५९ ॥ . पुरिसं इत्यिं च अत्यं च गम्भं पोसितमागमं । तधा खेमं च संधिं वा जयाऽऽरोग्गं च जीवितं ।। ८६० ।। वरसारत्तं च वासं च सस्सं गट्ठरस देसणं । खेत्त वत्थु धणं धणं मेत्ती संजोगमेव य ॥ ८६१ ।। खग्गं वम्मं च » चम्मं च दंडं अच्छादणं मणि । जं किंचि पसत्यं सा सव् नत्यि ति णिदिसे ॥८६२॥ पवासं जिग्गमं मोक्खं गम्भिणीय पजायणं । कण्णापवाहणं वा वि भयं वद्धस्स मोक्खगं ।। ८६३ ॥ विग्गहं मरणं रोग अणावुहिँ अपातयं ! सस्सस्स वापदि णासं अप्पतिहमणिव्वुतिं ।। ८६४ ।। अपमाणमसकारं गिराकार पराजयं । अप्पसत्यं च जं किंचि सबमत्थि ति णिदिसे ॥ ८६५ ॥ अभंतर ति वझं ति बाहिरं ति वियागरे । धणं धगं ति पुच्छेन्ज अंधणं ति वियागरे ।। ८६६ ।। पसत्यं णत्यि तं सव्यं अप्पसत्यं च अस्थि तं । समे सद्दे य जाणेनो पाहिरा जे भवंतिह ॥ ८६७ ।। बाहिर ति व जो बूया परिवाहिरकं ति वा । अंते वझं ति वा वूया अंतपालो त्ति वा पुणो ।। ८६८ ॥ गामस्स बज्झतो व त्ति बज्झतो णगररस या । खेडस्स वझतो व ति वझतो वा परस्स तु ।। ८६९ ।। पचतो त्ति वा बूया पञ्चवसति त्ति वा । तधा पञ्चंतपालो त्ति एकतो ति व यं वदे ॥ ८७० ।। बाहिंवाहिं ति वा धूया वाहिरेणं ति वा पुणो । एते उत्ता समा सदा बाहिरा जे भवंतिह ॥ ८७१ ।। णक्खत्ते पच्छिमदारे देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गामे गिहे वि वा ।। ८७२ ॥ पुरिसे चतुप्पदे चेव पक्सिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तधेय य ।। ८७३ ।। पाणे वा भोयणे या वि वत्थे आभरणे तथा । आसणे सयणे जाणे मंडोवगरणे तधा ॥ ८७४ ॥ लोहेसु थावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ।। ८७५ ।। एतम्मि पेक्खितामासे सद्दे रूवे तधेय य । सम्वमेवाणुगंतूणं ततो यूयांगचिंततो ॥ ८७६ ।। ॥ वाहिराणि ॥ १६ ॥ छ। 15 20 25 । [१७ पण्णासं वाहिरवाहिराणि] जिम्मढे वाहिरे यूया सव्ववाहिरवाहिरे । ते सेयमाणो पुच्छेन्न बाहिरत्यं वियागरे ॥ ८७७ ।। पुरिसं च परिपुच्छेन अंधण्णो दूभगो ति य । असिद्धत्यो त्ति तं यूया वाहिरो ति य णिदिसे ॥ ८७८ ।। इत्यी य परिपुच्छेज अघण्णा दूभग त्ति य । असिद्धत्य ति तं धूया चाहिर त्ति य गिदिसे ॥ ८७९ ॥ पुरिसस्सऽत्यविधं पुच्छे वाहिर त्ति वियागरे । थिया अत्यविधं पुच्छे याहिर ति वियागरे । ८८० ॥ कणं च परिपुच्छेज अघण्णा दूभग ति य । असिद्धत्य त्ति तं वूया खिप्पं विजिहिति ति य ॥ ८८१ ॥ गम्भं च परिपुच्छेन णत्यि गम्भो त्ति गिदिसे । गम्भिणी परिपुच्छेज मतं सा जणयिस्सति ।। ८८२ ॥ १एपसिमेव है. त.॥ २ सेवमाणो य पुच्छेन पसत्यं णत्यि तं भये हैं. त• विना ॥ ३ पुव्वं • तविना॥ ४ मारामसालं जाणेज सस्सवण्णस्स वा पिया.त•॥ ५तं हं० त०॥ ६ वापति ह• त०॥ ७ अप्पमाणपिरसमारं सं ३ पु० सि.। अप्पमायमसकारं है. त०॥ ८'कारं च अवयं है. त०॥ ९ति मग्गं ति ह• त• ॥ १० अघणं ति है. त• विना ॥११ पकतो चि व जो घदे है. त•॥ १२ चेय है. त•॥ १३ अघणो है. त.॥ भंग०१२ । अंगविजापइण्णयं [२८ पण्णासं ओवातानि कम्मं च परिपुच्छेज वत्तणीपालमग्गियं । 'तुंबरस मग्गित वा वि तथा बाहिरंतुंबियं ॥ ८८३ ॥ पवासं परिपुच्छेज अफलो ति वियागरे । पउत्थं परिपुच्छेज परओ सो गमिस्सति ।। ८८४ ।। बंधं च परिपुच्छेन णिरत्यं वधमादिसे । बद्धस्स मोक्सं पुच्छेत्र मोक्सो तस्स पयासणे ॥ ८८५ ।। भयं पुच्छे भयं भवति खेमं पुच्छे ण होहिति । संधि पुच्छे ण भवति विग्गही य गिरत्थगो ।। ८८६ ।। जयं पुच्छे ण भवति आरोगो वि ण होहिति । रोगं च मरणं चेव अस्थि त्वं वियागरे । ८८७ ॥ जीवितं परिपुच्छेन्न गरिय तेवं वियागरे । आयाधितं च पुच्छेज मतप्पाओ मतो त्ति या || ८८८ ॥ अपातयमणावुहिँ सस्सवापत्तिमेय य । अप्पसत्थं च ज किंचि सव्यमस्थि ति गिदिसे ॥ ८८९ ।। घस्सारत्तं च पासं च सव्यं णट्ठस्स देसणं । तधा खेत्तं तथा पत्थु सव्यं णत्यि ति णिदिसे ॥ ८९०॥ धणं धणं ति पुच्छेज अधण्णं ति वियागरे । समे सद्दे तु जाणेजो जे तु वाहिरयाहिरा ।। ८९१ ॥ तधा णिच्छुद्धणिच्छुद्धं तथा णिग्गतणिग्गतं । तधा णीहारणीहारे तथा गतगते त्ति या ॥ ८९२ ।। [तथा] वर्णवणं व त्ति अहवीअडवि त्ति या । परतो-परतो व त्ति परंपरगतो ति वा ॥८९३ ।। वझवझं ति या वृया तथा वाहिरवाहिरं । एते उत्ता समा सदा जे तु वाहिरवाहिरा ॥ ८९४ ॥ वज्झमंडलचारिम्मि णक्खत्ते देवते तथा । पुप्फे फले व देसे या णगरे गाम गिहे वि वा ॥ ८९५ ॥ पुरिसे चतुप्पदे या वि पक्सिम्मि उदगेवरे । कीडे किविल्लगे वा वि परिसप्पे तथैव य ।। ८९६ ॥ पाणे या भोयणे या वि वत्यमामरणे तधा । भासणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तथा ।। ८९७ ॥ लोहेसु यावि सन्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ॥ ८९८ ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सहे रूबे तपेय य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो घूयांगचिंतओ ।। ८९९ ।। ॥ याहिरवाहिराणि सम्माणि ॥ १७ छ । 10 16 20 25 [१८ पण्णासं ओवाताणि] ओवाताणि पणास पवक्सामऽणुपुव्यसो । अन्भंतराणि सव्याणि उमट्ठाणि जता भवे ॥ ९००॥ एवाणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तधा । जं किंचि पसत्यं तं सव्वमत्यि ति णिदिसे ॥ ९०१ ॥ पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो ति य । धण्णो य सुहभागी य पुरिसोऽयमिति निदिसे ॥ ९०२॥ इत्यि च परिपुच्छेज सिद्धत्या सुभग ति य । धण्णा य सुहभागी य इत्थीयमिति णिदिसे ॥ ९०३ ॥ कणं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग ति य । ओवातकरस पुरिसरस कण्णा विनिहिति ति य ॥ ९०४ ॥ जं किंचि सत्यं सा सव्यमथि त्ति णिदिसे । अप्पसत्यं च ज किंचि सव्यं णत्थि ति णिदिसे ॥ ९०५॥ कम्मं च परिपुच्छेज सुद्धकम्मं वियागरे । उल्लायको सिको या सुद्धाकारी थ होक्सति ॥ ९०६ ॥ अधामयं ति वा बूया ओवातो त्ति सैसि त्ति वा । सेतं ति पंडर व त्ति विमलं णिम्मलं ति वा ॥ ९०७ ॥ सुद्धं ति वाऽतिविसुद्धं ति तथा वितिमिरं ति या। सप्पमं सुचिमं ति ति पिर्तयणं ति पीतकं ॥ ९०८ ॥ पउमकेसरवणं ति तिगिच्छसरिसं ति वा । कोरेंट चंपको वत्ति कणिकार असितं ति वा ॥ ९०९ ॥ जं च पीत गिद्धं जं या वि रजतप्मभं । तेसं संकित्तणासदा ओघातेहि समा भवे ।। ९१० ॥ जधा अध्मंतरे सुत्तं सव्यं दिहं सुभा-ऽसुभं । तधोवातेसु सव्वेसु फलं बूया सुभा-ऽसुभं ।। ९११ ॥ तधोपातम्मि णक्सत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे या गरे गाम गिहे ति या ९१२ ।। - 30 १ गुंटस्स है. त. विना ॥ २'रगुंठितं है. त० विना ॥ ३ परितो स ३ पु०॥ ४ घण्णं धण्णं व ई. तः॥ ५अलार्यको ई. त• विना ॥ ६ मायागयं है. त• ॥ ७ समित्ति है. त•॥ ८ पियमण्णं है. त०॥ ९ अतिगं ई० त० ॥
१९ पण्णासं सामोवाताणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ पुरिसे चतुष्पदे वा वि पक्सिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविल्लके यावि परिसप्पे तघेव य ॥ ९१३ ॥ पाणे वा भोयणे वा [वि] वत्थे आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे सधा ॥ ९१४ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु त । मणीसु यावि सम्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ॥ ९१५ ॥ एतम्मि पेक्खियामासे सहे रूवे तघेव य । सब्वमेवाणुगंतूगं ततो बूयांगचिंतओ ॥ ९१६ ।। ॥ ओवाताणि सम्मत्ताणि ॥ १८॥ छ । 5 10 [१९ पण्णासं सामोवाताणि] सामोवाताणि पण्णासं जाणि अभंतराणि तु । अवत्थिताणि सव्वाणि सव्वत्थेसु पसरसते ॥ ९१७ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अस्थलाभं जयं तधा । जं किंचि पसत्यं सा सव्वमथि ति णिदिसे ॥ ९१८ ॥ पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो ति य । धण्णो य सुहभागी य पुरिसोऽयमिति णिदिसे ॥ ९१९ ।। इत्थिं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य । धण्णा य सुहभागी य इत्यीयमिति णिदिसे ॥ ९२० ॥ कण्णं च परिपुच्छेज धण्णा विजिहिते लहुं । चण्णं च परिपुच्छेज सामोवातं वियागरे ॥ ९२१ ॥ जं किंचि पसत्थं तं सव्वमत्थि ति णिदिसे । अप्पसत्यं च ज किंचि सव्यं णथि त्ति णिदिसे ॥ ९२२ ।। अभंतरेसु सव्वेसु जधा दिहं सुभा-ऽसुमं । सामोयातेसु वि तहा फलं बूया सुभा-ऽसुभं ॥ ९२३ ॥ कम्मं च परिपुच्छेज तत्य अभंतरं वदे । दीविकाधारकं वा वि ॥ ९२४ ॥ • उज्जालकं वा जाणेजा जं चऽष्णं एरिसं भवे । कम्मपुच्छाय णिद्देसे एवमादि फलं वैदे ॥ ९२५ ।। सुद्धंसुतसामं आम अरुणाभमरुणं ति वा । अरुणस्स देसकालो त्ति अरुणे उन्नते त्ति वा ।। ९२६ ।। अरुणोदये त्ति का बूया अरुणो उँदितो त्ति वा । एते उत्ता समा सद्दा सामोधाता भवंति जे ॥ ९२७ ॥ सामोवातम्मि णक्खत्ते देवते पणिविम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गाम-गिहेसु वा ॥ ९२८॥ पुरिसे चतुप्पदे यावि पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तघेव य ॥ ९२९ ॥ पाणे वा भोयणे वा वि चत्थे आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तथा ॥ ९३० ।। लोहेसु यावि सम्वेसु सन्वेसु रतणेसु य । मणीसु यावि सन्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ।। ९३१ एतम्मि पेक्खियामासे सद्दे रूवे तघेव य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो बूयांगचिंततो ॥ ९३२ ॥ ॥ स(सा)मोवाताणि सम्मत्ताणि ॥ १९ ॥ छ। 15 20 25 [२० पण्णासं सामाणि] बाहिरब्भंतरा सव्वे साम त्तेवं वियागरे । तेसु अत्यं च वद्धिं च सुई लाभं च णिदिसे ॥ ९३३ ।। पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । इत्थिं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग ति य ।। ९३४ ।। कण्णं च परिपुच्छेज धण्णा विजिहिते हुं । धणं च परिपुच्छेज सामा तत्थ वियागरे ॥ ९३५ ।। दीविकाहारिका णावा तधा पादीविकं पि वा । उजालकं कौवकर गितकारिं च णिदिसे ॥ ९३६ ।। ताणि धम्मवणहाणि सव्वाणेव करिस्सति । सव्वभंडेसु कुसलो णट्टको वा वि होक्खति ॥ ९३७ ।। अग्गिको जाणको वा वि आजीवणिको वधा । कम्मपुच्छाय णिदेसे एवमादि फलं दे ॥ ९३८ ॥ सामं गीतं ति या चूया अधवा गीत-वाइतं । गाअको गाणकं व त्ति गीतकं मधुरं ति वा ९३९ ॥ हुँतासिणा सिहा व त्ति तथा अमिसिह त्ति वा । तथा दीवसिहा व त्ति ओदीवसिह ति वा ॥ ९४० ॥ १धनं च ई. त• विना ॥२ सण्णाविजि विया' है• त• विना ॥ ३ भवे हं. त• ॥ ४ सुद्धसुयसाम अ° है. त.॥ ५ उदचे ति है. त•॥ ६ 'कावकर काव्यश्रमिति अर्थः सम्भाव्यते ॥ ७ भवे हं० त०॥ ८ हुयासणा है. त.॥ 30 - अंगविजापइण्णयं [२१-२२ पण्णासं सामकण्हाणि कण्हाणिय दीविगाय सिहा व ति चुडिलीय सिहि त्ति वा । एते उत्ता समा सद्दा मझं एतेसु णिदिसे ॥ ९४१ ॥ तथा सामम्मि णक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गाम-गिहेसु वा ॥ ९४२॥ पुरिसे चतुष्पदे यावि पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लके यावि परिसप्पे तयेव य ॥ ९४३ ।। पाणे या भोयणे वा वि वत्थे आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तधा ॥ ९४४ ।। लोहेसु यावि सव्वेसु सन्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ ९४५ ।। एतम्मि पेक्खियामासे सद्दे रूवे तथैव य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो धूयांगचिंतओ ।। ९४६ ॥ ॥ सामाणि समत्ताणि ॥२०॥ छ॥ 5 10 16 [२१-२२ पण्णासं सामकण्हाणि कण्हाणि य] पण्णासं सामकण्हाणि बाहिराणि वियागरे । समप्फलाणि झेहिं पसत्येण प्पसस्सति ॥ ९४७ ॥ जाणेव बज्झवज्झाणि ताणि कण्हाणि णिहिसे । अप्पसत्थाणि सव्याणि सव्यत्येसु वियागरे ॥ ९४८ ॥ पुरिसं च परिपुच्छेज अधण्णो दूभगो त्ति य । इस्थिं च परिपुच्छेज अधण्णा दूभग ति य ॥ ९४९ ।। कण्णामवि य सिद्धत्था अधण्णा दूभग ति य । वणं च परिपुच्छेज कालको ति वियागरे ॥ ९५० ॥ कम्मं च परिपुच्छेज इमं कम्मं वियागरे । णीलीकारकं वा वि तधा इंगालकारकं ॥ ९५१ ।। णीलहारककम्मं वा तधा इंगालहारकं । णीलवाणियकं वा वि तधा इंगालवाणियं ॥ ९५२ ।। अप्पसत्यं च किंचि सव्वमथि ति णिदिसे । जं किंचि पसत्यं तं सव्वं पत्थि ति णिदिसे ।। ९५३ ॥ जधा तु पज्झवज्झेसु सव्वं दिदं सुभासुभं । तधेय कण्हेसु वदे फलं सव्वं सुभासुभं ।। ९५४ ।। कण्हं णीलं ति वा धूया कालकं असितं ति वा । असितं किसिणं व त्ति हरितं ति च जो वदे ॥ ९५५ ॥ अंजणं कजलं व ति सँगणं भंगमुत्तमं । खंजणं भिंगपत्तं ति गवलं ति व जो वदे ॥ ९५६ ॥ सूगर ति कोकिला व ति गोपेच्छेलको ति वा । भमरो मोरकंठो त्ति वायसो त्ति व जो पदे ॥ ९५७ ॥ मातंगो ति मतिंगो त्ति गयो ति महिसो ति वा । बलाहको त्ति मेघो त्ति तथा जलहरो तिघा ॥ ९५८ ॥ तधा कण्दकरालो त्ति कण्हतुलसि त्ति वा पुण । बाणं णीलुप्पलं व त्ति पामेच्छा लकंठेको ॥ ९५९ ।। मसी आरिद्वको व त्ति कण्हालो कण्हमोयको । जे वरुण्णे एवमादीया सदा कण्हसमा भवे ।। ९६० ।। णक्वत्ते देवते यावि तथा णक्खत्तदेवते । पुप्फे फले व देसे या णगरे गाम गिहे वि वा ॥ ९६१ ॥ पुरिसे भतुप्पदे यावि पक्खिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तथैव य ॥ ९६२ ।। पाणे या भोयणे वा वि वत्थे आभरणे तथा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तथा ॥ ९६३ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु थावि सन्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ ९६४ ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सहे रूवे तघेव य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो यूयांगचिंतओ ॥ ९६५ ॥ ॥ सामकाहाणि - कंण्हाणि - [य] ॥ २१ ॥ २२॥ छ। ["पण्णास अझोआताणि २३ पण्णासं अतिकण्हाणि २४" इति द्वारद्वयव्याख्यानं सर्वावपि प्रतिषु नास्ति ।] 20 १रजेहिं . त.॥ २सयमस्थि है.. विना ॥ ३ मगणं है. त• विना ।। ४ मिगणपति ति है. त॥ ५गोपेच्छेलगो तिर..॥ ६ मुर्तिगो है. ता॥ ७कटको से ३ पु.॥ ८ सामफण्हाणि सम्माणि सि•॥ ९. तोपान्तर्गतः पाठः १. तनाति ॥
5 10. - 15 । २५ वीसति उत्तमाणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ [२५ वीसति उत्तमाणि] वीसति उत्तमागंगे पवक्खामऽणुपुव्यसो । मत्थको १ सीस २ संखा य ४ णिडालं ५ कण्णपुत्तका ७ ॥ ९६६ ॥ कण्णा ९ गंडो ११ ४ १३ दंता य १४ णासा १५ णासपुडा तथा १६ । कणवीरका १८ अपंगा य २० वीसतिं हॉति उत्तमा ॥ ९६७ ।। एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तधा । जं च किंचि पसत्यं सा उत्तमं ति वियागरे ॥९६८ ॥ पुरुसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । धण्णो य सुंहभागी य उत्तमो त्ति वियागरे । ९६९ ।। इत्यिं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य । धण्णा य सुहभागी य उत्तम ति वियागरे ॥ ९७० ॥ [पुरिसस्सऽत्यविधं पुच्छे उत्तमं ति वियागरे ] | थिया अत्थविधं पुच्छे उत्तमं ति वियागरे । ९७१ ।। कण्णं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग त्ति य । पुरिसस्स जुत्तामासायं कण्णा विनिहिते त्ति य ॥ ९७२ ॥ गम्भं च परिपुच्छेज अत्यि गम्भो त्ति णिदिसे । गम्भिणी परिपुच्छेन्ज उत्तम पुत्तमादिसे ॥ ९७३ ॥ कम्मं च परिपुच्छेज उत्तम कम्ममादिसे । राया वा रायमचो वा वित्तीतोसं करिस्सति ॥ ९७४ ।। पवासं परिपुच्छेज सफलो ति वियागरे । पउत्थं परिपुच्छेज सधणो आगमिस्सति ॥ ९७५ ॥ बंधं च परिपुच्छेन्ज णत्यि त्तेवं वियागरे । वद्धस्स मोक्खं पुच्छेज मोक्खं थाणं च णिदिसे ॥ ९७६ ॥ भयं च परिपुच्छेज्ज मयं णत्यि त्ति णिदिसे । खेमं च परिपुच्छेज उत्तम खेममादिसे ॥ ९७७ ॥ संधिं च परिपुच्छेज अस्थि त्वं वियागरे । विग्गहं परिपुच्छेज णत्थि त्तेवं वियागरे ॥ ९७८ ॥ जयं च परिपुच्छेन्ज उत्तमं जयमादिसे । आरोग्गं परिपुच्छेज उत्तमं ति वियागरे ॥ ९७९ ॥ रोगं च परिपुच्छेज पत्थि त्तेवं वियागरे । पुच्छिते उत्तम जीयं अकालस्स य उग्गमं ॥ ९८०॥ अपातयमणावुद्धिं सस्सवापत्तिमेव य । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्वं गत्थि ति णिहिसे ।। ९८१ ।। वस्सारत्तं च वासं च सस्सं जस्स दसणं । खेत्तं वत्युं धणं घण्णं पसत्यं सव्वमैत्थि य ॥ ९८२ ।। धण्णं धणं ति पुच्छेज धणं ति य वियागरे । समे सद्दे य जाणेजो उत्तमा जे भवंतिह ।। ९८३ ।। उत्तमं ति व जो धूया तधुत्तमतरं ति वा । तधुत्तिमुत्तमं वा वि उत्तमा उत्तमं ति वा ॥ ९८४ ॥ पवर ति व जो बूया तथा पवरतरं ति या । पयराणं पवरं च त्ति पवरातिपवरं ति वा ॥ ९८५ ॥ विसिह ति व जो घूया विसिद्वैतरकं ति वा । तं विसिटुंविसिह ति विसिद्वैतरकं ति वा ।। ९८६ ॥ वरिटं ति व जो बूया वरिद्वैतरकं ति वा । तं वरिटुंवरिष्ठं ति चरिहतेरकं ति वा ॥ ९८७ ॥ उदारं ति व जो बूया उदारतरकं ति वा । तंधुदारमुदारं ति उदारपवरं ति वा ॥ ९८८ ॥ पधाणं ति व जो घूया पाणतरकं ति वा । तं पधाणपधागं ति पधाणपवरं ति वा ॥ ९८९ ॥ जेहँ ति व जो घूया तथा जेट्टतरं ति वा । तथा जेहातिजेटुं वा जेट्ठागं जेट्टकं ति वा ॥ ९९० ॥ उक्कुटुं ति व जो बूया उकुट्टतरकं ति वा । तघा उकुहमुकुटुं समा सद्दा उ उत्तमा ॥ ९९१ ।। उत्तमम्मि य णक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले या देसे वा णगरे गामे गिद्दे वि वा ।। ९९२।। पुरिसे चतुप्पदे वा वि पक्खिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तघेव य ।। ९९३ ।। पाणे वा भोयणे या वि वत्थे आभरणे तथा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तथा ॥ ९९४ ॥ लोहेसु यावि सन्वेसु सव्वेसु रतणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ॥ ९९५ ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सई रूवे तथैव य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो यूयांगचिंतओ।। ९९६ ॥, ॥ उत्तमाणि ॥ २५॥ छ । १-२ सुभमागी . त० ॥ ३ एतत् पूर्वाद प्रतिषु नास्ति ॥ ४ गीय है त०॥५°मादि य है• त.॥ ६-७ यिसिट्टतरफं है. त• विना ॥ ८-९ वरिटुंतरक है. त. विना ॥ १० पधाणंतरफ ई. त• विना ॥ ११ जेटुंतरं है.. दिना ॥ १२ उतरफ है. त• विना ॥ 20- - 25. 30 5 अंगविजापइण्णयं [२८ दस जहण्णामि [२६ चोइस मज्झिमाणि] मज्झिमाणि पवक्खिस्सं चोदसंगे जघा तथा । जत्तु १ थणंतर २ हिययं ३ उदरं वा वि जाणिया ४ ॥ ९९७ ।। अंसा ६ वाहू ८ पवाहू य १० हत्या १२ हत्थतला तथा १४। चोद्दसेताणि जाणीया मझिमत्ये पसस्सते ॥९९८॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं नधा । जं च किंचि पसत्यं सा मज्झिमत्यं वियागरे ।। ९९९ ।। पुरिसं इत्यिं च अत्यं च कणं गम्भं च गम्भिणि । कम्मं पवासं पावासिं बंधं मोक्खं भया-ऽभयं ॥१०००। संधि जयमारोग्ग जीवितं आतुरं खमं । यासारत्तं च वासं च ससं गढस्स दंसगं ।। १००१ ।। खेत्तं यत्) मणि दंडं छत्तं सम्गं तधेव य । जं किंचि पसत्यं सा मज्झिमं ति वियागरे ।। १००२ ।। अपातपमणावुहिं सरसवापत्तिमेव य । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्वं णथि त्ति मिदिसे ॥ १००३ ।। धणं धणं ति पुच्छेजा मज्झिम ति वियागरे । समे सद्दे य जाणेजो मज्झिमा जे भवंतिह ॥ १००४ ॥ 'वधित्ता मज्झिमा अंगे जे सदा तेसु कित्तिया । एतेसु वि तथा चेव मझिमेसु वियागरे ।। १००५॥ णक्सत्ते मज्झजोगम्मि देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गामे गिहे वि वा ॥ १००६॥ पुरिसे चतुप्पदे चेव पक्सिम्मि उदकेचरे । कीडे किविल्लये वा वि परिसप्पे तव य ॥ १००७ ।। पाणे या भोयणे वा वि कथे आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तधा ॥ १००८ ।। लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सम्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ १००९ ॥ एतम्मि पेक्सियामासे सहे रूवे तथैव य । सव्यमेवाणुगंतूर्ण ततो घूयांगचिंतओ ।। १०१० ।। । मज्झिमाणि ॥ २६ ॥ छ। । 10 । 15 20 [२७ चोद्दस मज्झिमाणतराणि] मझिमाणं तु पडिवक्सा मज्झिमाणंतराणि । उत्तमे अप्पसत्याणि मज्झिमत्थे पसस्सते ॥ १०११ ॥ कडी कडियपस्साणि वत्थी सीसं समेहणं । यसणा ऊरू य जंघा य मन्झिमाणतराणिह ॥ १०१२ ॥ मझिमेसु जघा दिट्ठो अत्यो तत्तो अणंतरं । मज्झिमाणंतराणं पि फलं बूया सुभासुमं ॥ १०१३ ॥ ने सदा मन्दिमा उत्ता तेसिं साराणुमायिक । मझिमाणंतराणं पि समे सहे तु कप्पये ॥१०१४ ॥ ॥ मज्झिमाणंतराणि ॥ २७॥ छ॥ [२८ दस जहण्णाणि] अंगुहा २ पादपण्हीओ ४ जंघा ६ गुप्फा तघेव य ८॥दसेताणि जहण्णाणि पादाणि ९ हितयाणि या १० १०१५ एनाणि भामसं पुच्छे अत्यलाभ जयं तथा । जं च किंचि पसत्यं सा जणं सबमादिसे ।। १०१६ ।। पुरिसं हास्यं च अत्यं च कणं गन्मं च गम्मिणि । कम्मं पयासं पावासिं बंध-मोक्सं भया-ऽभयं ॥१.१४॥ संधि च निग्गई थेर पेस्सं जय-पराजयं । रोगा-रोगं च मरणं च जीवितं याधितं दधा ॥१०१८॥ यरसारत्तमणायुटिं यासं पा वि अपातपं । सस्मरस यापदि संपदि च णहरस दसणं ॥ १०१९ ॥ सेत्तं यत्युं माण दंड संगां चम्मं ससम्मगंधणं धगं च छायं च जं घऽणं समादिसे ।। १०२०।। मिचि पसत्यं सा मत्र्यं णत्यि ति णिहिसे । अप्पसत्यं च जं किंचि सयं अत्यि ति गिरिसे ॥१०२१।। १परिता मन्झिमा अण्णे जे. त•॥ २ पादाणा (णी) हि लि• विना ॥ ३सग्गधम्मस्सपस्सर्ग ३ पु.। राग्गरम्मस्मयम्मर्ग. ताराग्गधम्मसयम्मर्ग नि.॥ ४च जातं च सं ३ पु.॥ 3 6 २९ दुवे उत्तिममज्झिमसाधारणाणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ धणं धणं ति पुच्छेज अधणं ति वियागरे । समे सद्दे य जाणेजो जहण्णा जे भवंतिह ॥ १०२२ ॥ 'जहणं ति चेव जे यूया जहण्णतरकं ति वा । जहण्णं ति जहणं ति जहण्णं फुच्छितं ति पा ॥१०२३॥ अधमं ति व जो बूया तधा अधमतरं ति वा । अधमाधमं ति वा घूया अधमाणं अधर्म ति पा ॥१०२४ ॥ अपमतं ति व जो यूया तधा अपमतरं ति वा । अपमयापमयं ति वा घूया अपमाणतरं ति वा ॥ १०२५ ॥ हीण ति व जो घूया तधा हीणतरं ति वा । हीणहीणं ति वा बूया हीणहीगतरं ति या ॥१०२६ ॥ थोयं ति व जो घूया तधा थोर्वतरं ति वा । थोवथोवं ति वा बूया थोथोवतरं ति या १०२७ ॥ णिक ति व जो धूया णिकट्ठतरकं ति वा । णिकट्ठातिणिकटं ति तथा णिकट्ठणिकट्ठगं ।। १०२८ ॥ मंगुलं ति व जो बूया तं मंगुलतरं ति वा । अतिमंगुलं ति वा बूया तथा मंगुलमंगुलं ॥ १०२९ ॥ पावकं ति व जो बूया तधा पावतरं ति वा । अतिपावकं ति वा धूया तथा पायकपावकं ॥ १०३० ॥ दुगुंछितं ति वा बूया दुगुंछिततरं ति वा । तथा पञ्चवरं च त्ति अतिपञ्चवरं ति वा ॥ १०३१ ॥ जं चऽणं एवमादीयं जहण्णं परिकित्तितं । तेसं संकित्तणा सदा जधण्णसमकाऽऽहिया ॥ १०३२ ॥ अप्पावसेसे गक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गामे गिहे वि वा ॥ १०३३ ।। पुरिसे चतुष्पदे चेव पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लगे वा वि परिसप्पे तघेव य ।। १०३४ ॥ पाणे वा भोयणे वा वि पत्थे आभरणे तथा । आसणे सयणे जाणे मंडोवगरणे तधा ॥ १०३५॥ लोहेसु यावि सन्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ॥ १०३६ ॥ एतम्मि पेक्खियामासे सद्दे रूवे तघेव य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो धूयांगचिंतओ ॥ १०३७ ॥ ॥ जहण्णाणि ॥२८॥ छ॥ 10 16 20 - [२९ दुवे उत्तिममज्झिमसाधारणाणि] मज्झिमाणुत्तमाणं च मझे साधारणाणि तु । अत्तूणि वे वियाणीया उत्तमत्थे पसस्सते ॥ १०३८॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभ जयं तथा । जं किंचि पसत्थं सा सव्वं साधारणं वदे ॥ १०३९ ।। पुरिसं च इत्थं अत्थं च धणं धणं तघेव थ । कण्णं च परिपुच्छेज सव्वं साधारणं वदे ।। १०४०॥ गम्भं च परिपुच्छेजा अस्थि गम्भो त्ति णिदिसे । गम्भिणिं परिपुच्छेज जमलाणि प्पयाहिति ॥ १०४१ ॥ कम्म साधारणं यूया बंधं णत्थि ति णिदिसे । चिराय मुञ्चते बद्धो भयं खेमं च मिस्सकं ॥ १०४२ ॥ संधि अस्थि त्ति जाणीया विग्गहो णत्थि दारुणो । जया-ऽऽरोग्गं च रोगं च सव्यं साधारणं यदे ॥ १०४३॥ ॐ भैरणं च अणावुर्हि आययं सरसवापदं । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्यमत्यि ति णिदिसे ॥ १०४४ ॥ 25 जीवितं बंध-मोक्खं च वस्सारत्तं सवासकं । सस्सं च नहलामं च सव्यं साधारणं यदे ॥ १०४५ ॥ खेत्तं यत्युं धणं धणं संग चम्म सयम्मकं । छत्तं दंडं मणिं यत्यं सव्यं साहारणं वदे ॥ १०४६ ।। जं किंचि पसत्थं सा सव्वमत्थि त्ति णिदिसे । अप्पसत्यं च जं किंचि सव्यं णत्थि त्ति णिदिसे ॥ १०४७॥ धणं धणं ति पुच्छेना सव्यं साधारणं वदे । समे सद्दे य जाणीया अंगे साधारणा तु जे ॥ १०४८ ॥ जे सद्दा उत्तमा वुत्ता मज्झिमा जे उदाहिता । ते चामिस्सा उदीरता साधारणसमा भवे ॥ १०४९ ॥ १ अधणं है. त• विना ॥ २ अप्पमाणंतरं है. त०॥ ३-४ हीणंतरं ० त०॥ ५थोवंतरं ति सम्॥ ६ थोवंतरं है.त. विना॥ ७ थोकत्यो ति ई० त० विना ॥ ८ थोकत्थोकतरं है. त• विना ॥ ९ थोयथोचे ति जो सं३ पु.। पोवयोवंतरं जो ह• ताथोवंतरं ति जो सि०॥ १०णिफटुंतरफ सप्र• ॥ ११°मका हि ते . त• विना ।। १२ भम्पबसेसे सम•॥ १३ जंतृणि प्पक्सियाणीसो उत्त है. त॥ १४ हस्तचिहान्तर्गत लोकरितयं है. एष यते ॥ १५सागं घम् च धम्म ई. त॥ 30 अंगविज्ञापइण्णयं [३२ दुवे मज्झिमाणंतरजण्णसाभारणात साधारणम्मि णक्सचे देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फळे व देसे वा णगरे गामे गिहे वि वा ॥ १०५० ।। पुरिसे चतुप्पदे चेय पक्सिम्मि उदगेचरे । कीडे फिविल्लये या वि परिसप्पे वघेव य ॥ १०५१ ॥ पाणे वा भोयणे चा वि वत्ये आभरणे तथा । आसणे सयणे जाणे मंडोरगरणे तया ॥ १०५२ ।। लोहेसु यावि सम्वेसु सन्चेमु रयणेमु य । मणीसु यावि सन्चेसु सयधण्ण-धणेमु य ।। १८५३ ।। एतम्मि पेक्सियामासे सद्दे रूवे वघेव य । सत्यमेवाणुगंतूणं ततो यूयांगचिंतओ॥ १०५४ ।। ॥ उत्चममझिमसाधारणाणि ॥ २९ ॥ छ । 5 [३० दुवे मज्झिममझिमसाधारणाणि] साधारणा तु अंगम्मि मञ्झे मझाणमेव तु । ठाणा दुवे पसरसते सोभणे तेसु गिदिसे ॥ १०५५ ।। मझिमाणुत्तमाणं च फलं साधारणं सुभं । मझे साधारगाणं पि तमेव फलमादिसे ॥ १०५६ ॥ जे सदा मझिमा वुत्ता उत्तमाणंतरा य जे । ते यामिरसा उदीरंता मन्झसाधारणे समा ॥ १०५७ ।। साधारणम्मि णक्सचे जं चेतेसं समुत्तरं । सब्यमेवाणुगंपूर्ण ततो यूयांगचिंतओ ।। १०५८ ।। मन्तिममझिमसाधारणाणि ॥ ३०॥ छ॥ 10 16 20 [३१ दुवे मज्झिमाणवरमझिमसाधारणाणि] मन्झिमाणंतराणं च मज्झिमाणं चे वक्सणा । मज्झे साधारणा वुत्ता मन्झिमत्ये पसस्सते ॥ १०५९ ।। एवाणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तपा। जं किंचि पसत्यं सा मझिमत्थे पसस्मठे ।। १०६० ॥ पुरिसं इयिं च अत्यं वा कणं गर्म च गम्मिणि । कम्म पयासं पावासिं बंधं मोक्खं मया-ऽमयं ।।१०६॥ रोगा-ऽऽरोगं घ मरणं च जीविता वाधिकं तथा । वासारत्तमणावुटिं वासं या वि अपातपं ।। १०६२ ।। सस्सयापत्ति-संपत्तिं जहरम दंसणं । खेत्तं यत्युं धणं घण्णं सर्ग चम्मं संयम्मकं ॥ १०६३ ।। धुदिहम्मि एवम्मि पसत्यं जत्तियं भवे । मन्झिमाणंतरं सव्वं अप्पसत्यं हि गल्थि य ।।१०६४ ॥ जे सदा मज्झिमा बुचा मन्झिमागंवरा य जे। ते यामिस्सा उदीरंता मन्झिमाणंतरे समा ।। १०६५।। साधारणम्मि णक्सत्तेज चेतेसं समुत्तरं । तं सचमणुगतूणं ततो वूयांगचिंतओ ॥ १०६६ ॥ मज्झिमाणतरमज्झिमसाधारणाणि सम्मत्ताणि ॥३१॥ छ। [३२ दुवे मज्झिमाणतरजहष्णसाधारणाणि] मझिमाणंतराणं च जहण्णाणं च अंतरा । मञ्झे साधारणा वुचा गोप्फा तेसु ण सोमणं ॥ १०६७ ।। एवाणि आमसं पुच्छे अत्यलाम जयं तथा । घ किंचि पसत्थं सा जपणं सत्यमादिसे ॥ १०६८ ।। पुरिमादीकाणि यत्यूणि पंविचाणि तु जाणिह । वाणि खेत्तप्पघाणाणि जहण्याणि वियागरे ॥ १०६९॥ मन्झिमागंतरा सदा जहन्ना जे य कित्तिया । ते यामिस्सा उदीरता जघन्ना समका भवे ।। १०७० ॥ साधारणम्मि पक्सचे देवते पगिधिम्मि य। [घुप्फे फले व देसे या णगरे गाम गिहे वि वा ॥१०७१।] साधारणम्मि णक्सत्ते जंचतेसं समुत्तरं । तं सचमणुगंतूगं ततो वूयांगचिंतओ ॥ १०७२ ।। ॥ मन्दिमाणंतरजहण्णसाधारणाणि सम्माणि ॥ ३२॥ छ । - 30 १रला तहाई. त•n २ च चम्सुणा है• त० ॥ ३ सचम्मकं सर•॥ ४जमोदिटुंसि पयम्मि है. त• ॥ ५ पत्तो से समु ३ पु. मि. युचा से समुहै. द.॥ ६ पतवाणि हं. १० विना ॥ ७ उत्तरार्ध सर्वामु प्रतिपु नास्ति ।
२७ ३३ दस वालेयाणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ [३३ दस वालेयाणि] पादंगुटुं २ गुली ४ गोप्फा ६ जंघा ८ पादतलाणि य १० । एते वाला पसस्संते पाला थीणामगेसु य ॥१०७३॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्थलाभं जयं तधा | च किंचि पसत्थं सा सव्वमत्यि ति णिदिसे ॥ १०७४ ॥ गंभ पुच्छे वदे अत्थि पुण्णामेसु य दारकं दारिगं इत्थिणामेसु वालेयेसु वियागरे ॥ १०७५ ॥ जं बालसंसितं चऽण्णं सध्यमस्थि त्ति णिदिसे । समे सद्दे य जाणेजो वाला ये समा भवे ॥१०७६ ॥ बालको दारको वत्ति [सिंगको पिल्लको तिवा] वच्छको तैण्णको वत्ति पोतको कलभो त्ति वा १०७७ वालको त्ति व जो चूया तहा बालतरोत्ति वा। अतिवालको त्ति वा बूया तथा बालगवालगो॥१०७८।। दारको त्ति व जो बूया तथा दारगदारगो । अतिदारको त्ति वा बूया दारगस्स य दारगो ॥ १०७९ ॥ सिंगको त्ति व जो बूया तथा सिंगकसिंगको । अतिसिंगको त्ति वा घूया सिंगकस्स व सिंगको ॥ १०८० ॥ पिल्लको त्ति व जो बूया तथा पिल्लतरो ति वा । अतिपिल्लको ति वा बूया पिल्लकरस व पिल्लको ॥ १०८१ ।। 10 घच्छको त्ति व जो बूया तथा वच्छकवच्छको । अतिवच्छको त्ति वा वूया वच्छकरस व वच्छको ॥१०८२॥ तण्णको त्ति व जो बूया तधा तण्णकतण्णको । अतितण्णको त्ति वा घूया तण्णकस्स व तण्णको ॥ १०८३ ॥ पोतको त्ति घ जो घूया तथा पोर्तकपोतको । अतिपोतको त्ति वा बूया पोतकस्स व पोतको ॥ १०८४ ॥ [फैलभो त्ति व जो बूया तथा कलभकलभको । अतिकलभो त्ति का बूया कलभस्स घ कलभको ॥१०८५॥] बालकं जाणक वत्ति तथा ठियपडिय त्ति वा । तधा पंचमिका व ति तथा सत्तमिक त्ति वा ॥१०८६॥ 15 उहाण; ति वा घूया मासपूरणकं ति वा । 'पिंडे बद्धणकं व त्ति उवणिग्गमणं ति वा ॥ १०८७ ॥ पादपेसणकं यत्ति परंगणकमेव वा । पदक्कमणकं व त्ति पञ्चाहरणकं ति वा ।। १०८८ ॥ चोलकं ति घ जो बूया उपणयणं ति वा पुणो । लेहणिक्खिवणं व ति गणितापढपणकं ति वा ॥ १०८९ ।। वालेयोपक्खराणं च बालोवकरणस्स य । तेसं संकित्तणे सदा पालेयसममादिसे ॥ १०९०.॥ वालजम्मणणक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । बाले पुप्फफले देसे णगरे गामे गिहे वि वा ॥ १०९१ ।। वाले चतुप्पदे यावि पक्खिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तघेव य ॥ १०९२ ।। पाणे वा भोयणे वा वि वत्थे आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे भंडोवकरणे तधा ॥ १०९३ ॥ हम लोहेसु यावि सव्वेसु सम्वेसु रतणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ १०९४ ॥ एतम्मि पेक्खियामासे सद्दे रूवे तघेव य । सन्यमेवाणुगंतूणं ततो धूयांगचिंतओ ॥ १०९५ ॥ ॥यालेयाणि ॥ ३३॥ छ। [३४ चोदस जोवणत्याणि] उदरं १ कडी य२ णामी य ३ कडीपस्साणि वे तथा ५ । पद्विपस्साणि"७ मझो य ८ लोमवासी तथैव य ९॥ १०९६ ।। मेहणं १० वत्यि ११ सीसं च १२ फलं वे वि य जाणिया १४ । जोवणत्येसु एतेसु जोव्वणत्यं विजाणिया ॥ १०९७ ।। १ चतुरस्त्रकोष्ठकगतं चरण सर्वामु प्रतिषु नास्ति । २ मल्लको है. त•॥ ३१- एतचिहान्तर्गतः पाठः ह. स. नास्ति । ४ हस्तचिहमध्यगतः पाठः है. त. एव वर्तते ॥ ५ यूया पोतफस्स व पोतको हं. त• विना ॥ ६ पोत्तिकपोतको है. त. ७ चतुरस्रोष्टमान्तर्गत पर्व सर्वामु प्रदिषु नास्ति, किन्तु सम्बन्धानुमारेशानुसंधितमस्ति । ८पंडयद्ध है. त०॥ ९ पादापे है. तदिना ॥ १० गतिताप से ३ पु०॥ ११ हसचिहान्तर्गतमुत्तरार्ध है. 1. एव पते ॥ १२.णि ७ सल्लोय है. त.॥ १३ वियागरे है. त.॥ 20 25 30 बिना। भंग १३ 10 15 अंगविज्ञापइण्णयं [३४ चोद्दस जोवणत्थाणि एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभं जयं तथा । जं च किंचि पसत्यं सा सव्यमस्थि त्ति णिदिसे ॥१०९८॥ पुरिसं च परिपुच्छेन्ज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । सहत्यकारी दन्छो य सरत्येसु पुमं भवे ।। १०९९ ।। इन्थीं या परिपुच्छेन सिद्धत्था सुभग त्ति य । संहत्यकारी दच्छा य सव्यत्येसु पदाक्सिणा ॥ ११००॥ पुरिसत्यविहं पुच्छे सिग्धमत्यो भविस्सति । थिया अत्यविहं पुच्छे खिप्पमत्थो भविस्सति ॥ ११०१॥ कणं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभग ति य । हा घण्णा य सुहभागी य खिष्पं विलिहिते ति य ॥११०२।। गन्मं च परिपुच्छेज अत्थि गम्भो त्ति णिदिसे । गम्भिणि परिपुच्छेज खिप्पं पुत्तं पयाहिति ॥ ११०३ ॥ कम्मं च परिपुच्छेज खिप्पं कम्मं वियागरे । परिस्समेण यऽप्पेण खिप्पं अत्थं लभिस्सति ॥ ११०४ ।। पचास परिपुच्छेन्न सफलो त्ति वियागरे । परस्थं परिपुच्छेन सफलो खिप्पमेहिति ॥ ११०५ ॥ विवादं विग्गहं बंधं रोगं मरणमेव यं । अपातयमणावुहिँ सस्सवापत्तिमेव य ॥ ११०६ ।। गहरस विप्पणासं च पलाणस्स अणागमं । धणक्खयं वियोगं च सव्यं णत्यि त्ति णिदिसे ॥११०७ ।। पद्धस्स मोयणं सिप्पं संधि संपीतिमेव य । जयाऽऽरोगं च आयुं च उत्थाणं वाधितरस य ॥ ११०८॥ वस्सारत्तं च वासं च सस्सं णहस्स देसणं । हितस्स पैडिलाभं च पलातरस य आगमं ।। ११०९।। समागम संपयोग थाणमिरसरियं जसं । धणलाभं कम्मसिद्धिं वा सव्यमत्यि ति णिदिसे ॥१११० ॥ वयं च परिपुच्छेजा जोल्यणत्यो ति णिदिसे । धणं धणं ति पुच्छेज धणं तेवं वियागरे ।। ११११ ।। जहा पुण्यामधेएसु सव्वं दिहं सुभा-ऽसुमं । [.. ] ॥ १११२ ॥ वहा खित्तं तदा वत्थु सव्यमस्थि ति णिदिसे । समे सद्दे य जाणेजो जोव्यणत्था भवंति जे ॥ १११३ ॥ जोयणं ति व जो बूया दहा जोव्वणकं ति या । जोव्वणत्ये ति जो बूया जुवाणो त्ति व जो बदे ॥१११४॥ वरुणं ति व जो घूया तहा तरुणतरं वि या । तरुणो त्ति व जो धूया वरुणा तरुणको त्ति वा ॥ १११५ ।। डहरो त्ति व जो हा धूया घयत्यो ति व जो वदे । पयत्तो त्ति उदग्गो त्ति पोोंडो त्ति व जो वदे ॥१११६।। गुलभक्सगं ति या बूया याढकारो त्ति वा पुणो । समासेयणकं व त्ति णियो वा सुणिक त्ति वा ॥१११७।। उपमाणकं वि वा वूया वत्य गोसम्गण्हाणकं । पडियज्झकं ति या धूया तधा गिव्यहणं ति वा ॥ १११८ ॥ अधिकमणकं व त्ति वोप्पारुमणाति या । पातिनं ति व यो यूया णवणं पंचमेजणं ॥ १११९ ॥ वारेनं ति व जो यूया अण्णोणं ति व जो यदे । तधा जामातुकीयं ति दसमीण्हाणकं ति वा ॥ ११२० ॥ 'उस्सउ चि समास त्ति तथा अण्णजणे त्ति वा । वधा अन्मुदयो व ति भोजं मनणकं ति वा ॥ ११२१ ।। जं घऽयं एवमादीयं जोव्यणस्स य संसि । तस्सुदाहरणं सन्चं जोन्यणत्यिसमं भवे ॥ ११२२ ॥ णक्सत्ते जोगे संपुष्णे देवते पणिधिम्मि य । पुस्फे फले व देसे या णगरे गाम गिहे वि वा ॥ ११२३।। पुरिसे चतुप्पदे यावि पक्सिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविद्धगे या वि परिसप्पे वघेव य ।। ११२४ ॥ पाणे या मोयणे या वि यत्ये आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे मंडोरगरणेसु य ।। ११२५ ॥ लोहेमु यावि सव्येमु सव्वेमु रयणेमु य । मणीमु यावि सम्वेमु सव्यधण्ण-धणेमु य ।। ११२६ ।। एतम्मि पेक्सियामासे सहे रूबे तघेर य । सव्यमेवाणुगंतूर्ण ततो धूयांगचिंतओ॥ ११२७ ॥ ॥जोग्यणत्याणि ॥ ३४॥ छ । । 20 - 35 ३० १६मचिदानन मेहयमित- सन्दर्भ १.त. एस यति ॥ २सिय सिन्झिहिए ति या है..॥ ३ पहिलंम है. त••n४मचिगनर्गतीयधिः पाठरान्दर्भ ई. त• एव वर्तवे॥५पोभंडो है. त.॥ ६ पतिज ति है. त• बिना। ७पर.रु.॥ ८ सपणो . तमिना ! ९ तदा तेमाउकीयं है. ता॥ .१० उन्झउ ति समाउ चि तधा अप्पाउt.• बिना ॥ ११ तस्सापहरणं ह..॥
- 6 10 - । 15 २५ चोइस मज्झिमवयाणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ [३५ चोइंस मज्झिमवयाणि] बाहाओ २ वाहुणालीओ४ हत्थमंगुलिकोदरो ५ । हत्थमंगुट्ठका ७ हत्था ९ अंसवीकाणिए तथा १० ॥११२८॥ जैतूणि १२ थणावुभये १४ एते मज्झिमये वये । सबमज्झिमकं अत्थं लाभं चऽत्य वियागरे ॥ ११२९ ॥ पुरिसं च परिपुच्छेज मज्झिमो सारतो भवे । मज्झिमो आउतो चेव भातूणं वा वि मज्झिमो ॥ ११३० इत्थिं च परिपुच्छेन मज्झिमा सारतो भवे । मज्झिमा आउतो वा वि भगिणीणं च मझिमा ॥ ११३१ ॥ पुरिसस्सऽस्थविधं पुच्छे मज्झिमं ति वियागरे। थिया अत्थविहं पुच्छे मझिमं ति वियागरे ॥११३२॥ कण्णं च परिपुच्छेज मज्झकल्लाणसोभणा । भातूणं मज्झिमा सा वि खिप्पं विजिहिति त्ति य ॥ ११३३ ॥ गन्भं च परिपुच्छेज गत्यि गब्भो त्ति णिदिसे । गम्मिणिं परिपुच्छेज संसयेण पजाहिति ॥ ११३४ ।। कम्मं च परिपुच्छेज कम्मं मझगतं वदे । लाभं च परिपुच्छेज मज्झिमं लाभमादिसे ॥ ११३५ ॥ पवासं परिपुच्छेज्ज मझिमं फलमादिसे । पोसितो मज्झकालेण मज्झलाभेण एहिति ॥ ११३६ ।। बंधं पुच्छे ण भवति वद्धो मुचिहिति त्ति य । भयं खेमं च संधिं वा विग्गहो पा वि मज्झिमो ॥ ११३७ ।। रोगं च मरणं चेव अणावुटि अपातयं । सस्सस्स य वापर्ति सव्वं णत्थि त्ति णिदिसे ॥ ११३८ ॥ जयं जीवितमारोग्गं उत्थाणं वाधितस्स य । वस्सारतं च वासं च पदे सरसं च मज्झिमं ॥ ११३९ ।। वयं च परिपुच्छेज्न मन्झिमो त्ति वियागरे। धणं धणं च पुच्छेज मज्झिमं ति वियागरे ॥ ११४०।। पवत्ता मज्झिमा जे तु फलं जं तेसु कित्तितं । तथैव य फलं सव्वं घूया मझवयेसु वि ॥ ११४१॥ तधा खेत्तं तधा वत्थु सव्यमत्थि ति णिदिसे। समे सद्दे य जाणेजो मझिमा जे भवंतिह ॥ ११४२ ॥ मज्झिमेसु य जे सद्दा मज्झसारेसु आहिता । ते चेव मझिमवये णिहिसे अंगचिंतओ ॥ ११४३ ॥ मज्झणक्खत्तजोगम्भि देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे या णगरे गामे गिहे वि वा ॥ ११४४ ॥ पुरिसे चउप्पये यावि पक्सिम्मि उद्गेचरे । कीडे किविल्लगे यावि परिसप्पे तय य ॥ ११४५ ॥ पाणे वा भोयणे वा वि वत्ये आभरणे तथा । आसणे संयणे जाणे भंडोवगरणे तथा ॥ ११४६॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सन्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ॥ ११४७ ॥ एतम्मि पेक्खितामासे सहे रूवे तथैव य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो बूयांगचिंतओ ॥ ११४८ ॥ ॥ मज्झिमाणि (मज्झिमवयाणि) ॥ ३५ ॥ छ । [३६ वीसं महन्वयाणि] गीवा हणू य दंतोटं णासा णासपुडावुभो । गंडा कवोला य तथा भुमकाणं अंतरं च जं ॥ ११४९ ।। णिडालं च सिरं चेव एवमेताणि वीसतिं । महब्बताणि जाणीया अंगविचाविसारतो ।। ११५० ।। एताणि आमसं पुच्छे महंतं अस्थमादिसे । जयं लाभं पसत्यं च एतं णाविचिरं भवे ।। ११५१ ॥ पुरिसं च परिपुच्छेन्न गरं चूया महव्यतं । इत्थं वा परिपुच्छेज धूया तं पि महव्वयं ॥ ११५२ ।। पुरिसत्थविधं पुच्छे महंतं अत्यमादिसे । थिया अत्थविधं पुच्छे उत्तमत्यं वियागरे । ११५३ ॥ कण्णं च परिपुच्छेज कणं धूया महव्वयं । महळ्ययस्स पुरिसस्स चिरं विनिहिते ति या ॥ ११५४ ।। गम्भं च परिपुच्छेज पत्थि गम्भो त्ति णिदिसे । गम्भिणि परिपुच्छेन मतं सा जणयिरसति ॥ ११५५ ॥ कम्मं च परिपुच्छेन बुंट्टकम्म वियागरे । अप्पप्फलं बहुफेसं तं च कम्मं दुगुंछितं ॥ ११५६ ।। पवासो पुच्छिते पत्थि णाऽऽगच्छति पंवासितो । बंधं पुच्छे ण भवति यद्धो खिप्पं च मुश्चिहि ॥ ११५७ । १°लिकाउरो ह. त• विना ॥ २°फाणि थे तथा • त• विना ॥ ३जणि है• त•॥ ४ हसचिदान्तर्गतः पाठः है. तएवं यते ॥ ५ अंतरं पलं हं. त• ॥ ६ मयं ई० त०॥ ७ घुहकम्मि है. त• ८ याखेम ई•• पवस्सिमो हं..॥ 20 - 30 अंगविजापइण्णय [३७-३९ वयसाधारणा खेम पुच्छे ण भवति भयमत्यि ति णिदिसे । संधि पुच्छे ण भवति विग्गहो य णिरत्यगो ॥ ११५८ ॥ रोग मरणमणावुद्धि आतयं सरसवापदं । अत्यहाणि वियोगं च सव्यमत्थि त्ति णिदिसे ॥ ११५९ ॥ जयारोग्ग च आयुं या उत्याणं आतुरस्स य ! गट्ठस्स दसणं चेर सव्यं णत्यि त्ति णिदिसे ॥ ११६०॥ वयं च परिपुच्छेज ततो धूया महळ्यतं । धणं धणे ति पुच्छेन्ज अधण्णं ति वियागरे । ११६१ ॥ जं किंचि पसत्यं सा सव्यं णयित्ति णिहिसे अपसत्यं च नं किंचि सव्वमस्थिति णिहिसे या ॥११६२।। तथा सेत्तं तधा पत्थु सव्यं णत्यि त्ति णिदिसे । महव्ययसमे वा वि इमे सद्दे विभावये ॥ ११६३ ॥ मेहव्ययो त्ति वा बूया तथा जुण्णवयो ति या । तधा तीतवयो व त्ति तथा गतवयो त्ति वा ॥ ११६४ ॥ •थेरो जुष्णो त्ति या वूया वुलो परिणतो ति वा । रातुरो त्ति या धूया खीणवंसो त्ति जो यदे ॥ ११६५ ।। वैत्तुरसयो त्ति या चूया णिव्यत्त ति व यो वदे । ववुत्तं ति वा वूया झीणं वा णिहितं ति या ॥ ११६६ ॥ वातं ति मलितं वत्ति तथा परिमलितं ति वा । मिलाणं परिसुक्सं ति तथा परिसडितं ति था ॥ ११६७ ।। तुच्छे ति रित्तकं व त्ति असारं झुसिरं ति वा । घुद्धिततरं व त्ति गतगंध-रसं ति वा ॥ ११६८ ।। जं चणं एवमादीयं जिण्णातीतययस्सिय । तस्स संकित्तणासदा महावयसमा भवे ॥ ११६९ ।। अप्पायसेसे णक्वत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे या गगरे गाम गिहे वि वा ॥ ११७० ।। पुरिसे चतुष्पदे चेव पक्सिम्मि उद्गेचरे । कीडे क्रिविल्लये या वि परिसप्पे तव य ।। ११७१ ।। पाणे या भोयणे वा वि पत्ये आभरणे तघा । आसणे सयणे जाणे भंडोवगरणे तथा ।। ११७२ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ॥ ११७३ ।। एतम्मि पेक्सियामासे सटे रूवे तघेव य । सव्वमेवाणुगंतूणं ततो धूयांगचिंतओ ।। ११७४ ॥ ॥ माहव्ययाणि ॥ ३६॥ छ । 10 18 20 [३७-३९ वयसाधारणा] [३७ दुवे घालजोवणत्यसाधारणाणि ] उम्महेसु वियाणीया दुवे णेये च वक्खणे । बालजीच्यणसामणे तं चेव य फलं धुवं ॥ ११७५ ।। पालेयज्ञोव्यणत्याणं जे संरा पुन्वकित्तिता । यालेयजोव्यणत्याण सम्मिस्से समके वदे ॥११७६॥ [३८ दुवे जोव्यणत्यमज्झिमवयसाधारणाणि] तारुण्णमन्झिमाणंगे वयसाधारणा थणा । उम्महा थ पसस्संते तं चेत्र य फलं वदे ॥ ११७७ ।। तारंण्णमझिमणम्मि जे सदा पुवकित्तिवा । वारुण्णमन्झिमाणंगे मिस्से साधारणे वदे ॥ ११७८ ॥ [२९ दुवे मज्झिमवयमहव्वयसाधारणाणि] मझिममहव्ययाणं मम्झे साधारणा भवे । उम्मट्ठा जैतुणो तेसु पुव्युत्तं फलमादिसे ॥ ११७९ ॥ मन्झिममहनवागं पि जे सहा पुथ्यकित्तिदा । ते यामिस्सा उदीरता साधारणसमा भवे ॥ ११८०५ ॥वयसाधारणा॥ ३७-३८-३९ ॥छ। 25 १ विहान्नर्गतः पार ९• त• र यति ॥२ महाययो हं. त• ॥ ३ लिपिमेदानुसारेण चैदन चनुस्सयो इति पाठः क्रियेत हापि सम्यगत पार॥ ४ उयगु मि. उपगुत् से ३ पु० ॥ ५ णित्यियं है. त• ॥ ६ मुसिरं है. त• ॥ ७नयुद्धिततर ८गाम-गिदिमु या है. त•॥ ९च घरगुणा • त•॥ १० इसचिहान्तर्गत पाठः है. त• एवं वर्तते ॥ १ मिस्मे... १२°मार्ण विजेत. विना ॥ १३ जंतुणो है• त• जमुणो शि......"
१०१ । 6 १० बीसंबंमेयाणि] पवमो अंगमणी णाम अज्झाओ [४० वीसं बंभेयाणि] दंतो १ ९ ३ कणं ५ गंडा य ७ करोल ९ऽक्खि ११ भुमाणि य १३ । णासा १४ णिडाल १५ संखा य १७ सिरं १८ वे बाहु २० वीसति ॥ ११८१ ॥ मेयोवक्खरे चेव बंभणोपकरणेसु य । वंभणो त्ति वियाणीया तस्सद्दोदीरणेण य ॥ ११८२ ॥ पितामहो त्ति वा बूया तधा बंभ ति वा पुणो। सयंभु त्ति व जो चूया तथैव य पयावति ॥ ११८३ ।। वंभणो ति वियाणीया तथा भरिसि त्ति वा । वंभवत्यो त्ति या घूया वंभण्णू पिअवंभणो ॥ ११८४ ।। दिजाति ति व जो धूया दिजातीवसभो त्ति था । दिजातीपुंगयो व त्ति दिजाईपवरो त्ति वा ॥ ११८५ ।। विप्पो व त्ति व जो घूया तधा विप्परिसि त्ति वा । तधा विप्पगुणोवेओ विप्पाणं पवरो त्ति वा ।। ११८६ ।। जण्णो कतो त्ति वा बूया जण्णकारि त्ति वा पुणो। जैट्ठो पढमजण्णो त्ति जण्णमुंडो त्ति वा पुणो ॥ ११८७ ।। सोमो त्ति व जो बूया सोमपाइ त्ति वा पुणो । सोमपा इति वा धूया सोमणामं च बाहरे ॥ ११८८ ॥ अग्निहोत्तं ति वा बूया आहितग्गि त्ति वा पुणो । अग्गिहोत्तरती व त्ति अग्निहोत्तं हुतं ति वा ॥ ११८९ ॥" वेदो त्ति व जो घूया वेदज्झाइ त्ति वा पुणो। वेदाणं पारको व त्ति चतुवेदो त्ति वा पुणो ॥ ११९० ॥ वारिसं पुव्वमासं ति चतुम्मासं ति वा पुणो । जूवो चिति त्ति वा धूया अग्गीणं चयणि त्ति वा ॥ ११९१ ॥ करणे कमंडलू य त्ति दब्भा सजा भिसि त्ति वा । दंडं कहें ति वा धूया जण्णोपइतकं ति या ॥ ११९२ ।। यऽणे एवमादीया सद्दा दिजवरस्सिता । णामसंकित्तणे तेसिं वभेयसममादिसे ॥ ११९३ ॥ ॥ वंमेयाणि ॥४०॥छ। 10 16 20 [४१ चोद्दस खत्तेयाणि] खं, २सपीढ ३ बाहू य ५ जनुं ७ उर ८थणा तथा १०। हिययं ११ पस्साणि १३ पट्टी य १४ खत्तेयाणि वियागरे ॥ ११९४ ॥ खत्तेयोवखरे चेव खत्तिओयकरणेसु य । खत्तिओ त्ति वियाणीया तस्सद्दोदीरणेण य ॥ ११९५॥ इंदो त्ति व जो धूया तथा इंदमहो ति य । इंदकेउ त्ति वा वूया इंदणामं च वाहरे ॥ ११९६ ।। ‘दवड्डइसद्देणं इंदोवकरणं ति वा । इंदसयणं ति वा घूया जं चऽण्णं इंदसंतियं ॥ ११९७ ॥ खत्तिओ ति व जो घूया तथा खत्तियसंतिओ । वधा खत्तियराय त्ति खत्तियाधिपति त्ति वा ॥ ११९८॥ जे यऽण्णे एवमादीया सदा खत्तियसंसिता । णामसंकित्तणे तेसिं सत्तेयसममादिसे ॥ ११९९ ।। ॥ खत्तेयाई समत्ताई॥४१॥ छ॥ । 25 [४२ चोइस वेस्सेयाणि] कुक्खीपस्सा २ कडीपस्सा ४ उदरो ५ रु ७ मेड्ड ८ वक्खणा १० । वत्थि ११ सीसं १२ फले चेव १४ वेस्सेयाणि वियागरे ॥ १२०० ॥ वेस्सेयोवक्खरे व वेरसोवकरणेसु य । वेरसो त्ति वियाणीया तरसहोदीरणेण य ॥ १२०१ ॥ वेस्सो त्ति व जो धूया तथा वेस्सफुलं ति वा । वेस्सैप्पकतिओ व त्ति बेस्सो सो जीवति त्ति या ॥ १२०२ ॥ 30. जातो वेस्सकुले व त्ति जाती य वित्ति सो ति वा । वेरसमित् ति या घूया घेरसोपकरणं ति या ॥ १२०३ ॥ १पण ५दंता य है. त• विना ॥ २णिलाड साहा यह त.॥ ३ जिट्टो पढमकण्णो है• त•॥ ४°याई सम्मत्ताणि है. त.॥५°स्सपाफत्तिमओ है..॥६जातीया पेत्ति है. त. विना ॥ + अंगविजापइण्णयं [४५-४६ चातुबण्णविधा वेस्सकम्मं ति वा धूया वेस्सारंभो त्ति वा पुणो । वेस्साणं धंणकं व त्ति वेस्साणं उस्सओ त्ति वा ॥ १२०४ ॥ जे यऽणे एचमादीया सदा ये वेस्ससंसिया । णामसंकित्तणे तेसिं वेसेजसममादिसे ॥ १२०५॥ ॥ वेस्सेयाणि ॥ ४२॥ छ॥ 5 10 [४३ दस सुद्देयाणि] पादंगुटुं २ गुली ४ गोप्फा ६ जंघा ८ पादतलाणि य १० । दसेताणि विजाणीया सुद्देयाणि वियागरे ॥ १२०६ ।। सुयोबक्सरे चेव सुंदोबकरणेसु य । मुद्दो त्ति विज्ञाणीया तस्सद्दोदीरणेण य ॥ १२०७ ।। सुद्दो त्ति व जो यूया मुँद्दलोगो त्ति या पुणो । तधा मुद्दकुलं व ति सुद्दजाति त्ति या पुणो ॥ १२०८ ॥ जातो सुदकुले व त्ति सुद्दजोगि त्ति वा पुणो । सुद्दमित्तं ति या धूया सुदवित्तिकरो त्ति वा ॥ १२०९ ॥ मुद्दकम्मं ति या बूया सुदारंभो त्ति या पुणो । सुद्देहि ययहारो ति सुदेहि ति व जीवति ।। १२१० ॥ जे यऽण्णे एयमादीया सदा सुद्देयसंसिता । णामसंकित्तणे तेसिं सुद्देयसममादिसे ॥ १२११ ।। ॥ सुद्देयाणि ॥४३॥ छ॥ [४४-४५-४६ चातुम्बण्णविधाणं ] [४४ दुवे बंभेजखत्तेजाणि] वंभेयाणि णिसेविचा बंभेयाणि गिसेवति । भणो त्ति व जाणीया तस्सद्दोदीरणेण य ॥ १२१२ ।। वंभेयाणि जिसेवित्ता सत्तेयाणि गिसेवति । भखत्ते त्ति जाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ॥ १२१३ ।। सत्तेयाणि जिसेवित्ता वभेयाणि णिसेवति । खत्तभं वियाणीया पुच्छितो अंगचिंतओ ॥ १२१४ ॥ भेपाणि जिसेविचा वेस्सेयाणि गिसेवति । वंभवेस्सं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ।। १२१५ ।। वेस्सेयाणि जिसेवित्ता वंभेयाणि णिसेवति । बेस्सर्वमं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ।। १२१६ ।। चंभेयाणि गिसेविचा मुद्देयाणि णिसेयति । वंभमुदं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२१७ ॥ मुद्देयाणि गिसेवित्ता यंभेयाणि गिसेवति । सुदर्भ वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२१८ ॥ सत्तेयाणि गिसेवित्ता सत्तेयाणि गिसेवति । सत्तिको त्ति विजाणीया तस्सद्दोदीरणेण य ॥१२१९॥ सत्तेयाणि मिसेवित्ता वंभेयाणि गिसेवति । खत्तमं वियाणीवर पुच्छिओ अंगचितओ । १२२० । यंभेयाणि जिसेवित्ता सत्तेयाणि गिसेवति । भसत्वं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२२१ ॥ 15 20 - 25 - [४५ दुवे खत्वेजयेस्सेजाणि] पत्तेयाणि जिसेवित्ता विस्सेयाणि गिसेवति । सत्तवेर वियाणीया पुच्छिो अंगचिंतको ।। १२२२ ।। वेस्मेनाणि गिसेवित्ता सतेयाणि गिसेवति । वेस्सखत्तं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंततो ।। १२२३ ।। गतेयाणि गिसेवित्ता मुद्देयाणि णिसेयति । सत्तसुदं वियाणीया पुच्छितो अंगचिंतओ ॥ १२२४ ।। मुध्याणि गिसेविचा यत्याणि गिसेवति । मुद्दसत्तं वियाणीया पुच्छिओ अंगतिओ ।। १२२५ ॥ बेस्सेमानि मिसेवित्ता विस्मयागि भिमेवति । घेरसं तं तु वियाणीया वस्महोदीरणेण य ।। १२२६ ।। धेसमागि निसेवित्ता यंभेयानि पिसेयति । बेस्सर्वमं बियाणीवा पुच्छिमओ अंगचिंतओ ।। १२२७ ।। पण ..॥ २ उस्मुतो ति • • बिना ॥ ३गुपक्यक है..।। ४सुदो लोगोई त.. ५-०पटरिशान्तर्गतम्..माधि। 30 - ५४ धावतरि सुकावण्णपडीभागा] णवमो अंगमगी णाम अज्झाओ १०३ भेयाणि जिसेवित्ता वेसेजाणि णिसेवति । भविस्सं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंततो।। १२२८ ।। विस्सेजाणि जिसेवित्ता खत्तेयाणि गिसेवति । वेस्सखत्तं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२२९ ॥ खत्तेयाणि जिसेवित्ता वेस्सेयाणि गिसेवति । खत्तवेस्सं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२३०॥ - 5 [४६ दुवे वेसेजसुद्देजाणि] विस्सेयाणि णिसेवित्ता सुद्देज्जाणि गिसेवति । विस्ससुदं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२३१ ।। सुद्देयाणि जिसेवित्ता विस्सेयाणि णिसेवति । सुद्दवेसं वियाणीया पुच्छितो अंगचिंतओ ॥ १२३२ ।। सुद्देयाणि णिसेवित्ता सुद्देयाणि गिसेवति । सुदं तं तु वियाणीया तस्सदोदीरणेण य ॥ १२३३ ॥ सुद्देयाणि जिसेवित्ता भैयाणि णिसेवति । सुद्दवंभं वियागीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२३४॥ बंभेयाणि णिसेवित्ता सुद्देयाणि गिसेवति । बंभसुदं वियाणीया पुच्छितो अंगचिंतओ ॥ १२३५ ॥ सुदेयाणि णिसेवित्ता खत्तेयाणि गिसेवति । सुद्दखत्तं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२३६ ।। खत्तेयाणि णिसेवित्ता सुइयाणि गिसेवति । खत्तसुई वियाणीया पुच्छितो अंगचिंततो ॥ १२३७ ।। सुद्देयाणि णिसेवित्ता वेस्सेज्जाणि णिसेवति । सुद्दवेस्सं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंततो ॥ १२३८ ॥ [वैसेजाणि जिसेवित्ता सुद्देयाणि णिसेवति । वेस्ससुदं वियाणीया पुच्छिओ अंगचिंतओ ॥ १२३९ ।।।।] यं घाऽऽज्जमामसित्ताणं आमसे वितियं पुणो । तेण तम्मिरसकं यण्णं णिहिसे अंगचिंततो ॥ १२४० ॥ चातुव्वण्णं च इच्चेतं सम्ममामसजोणिया । जधा तमणुगंतूणं ततो घूयांगचिंतओ ॥ १२४१ ॥ ॥ चौतुव्यपणविधाणं ॥ ४४-४५-४६ ॥ छ । 10 16 20 [४७-५३ आयुप्पमाणणिद्देसो-चत्तालीसतिमं पडलं] आयुप्पमाणणिद्देसो उत्तमेसु सयं भवे । पण्णत्तरि च वस्साणि मज्झिमेसु वियागरे ॥ १२४२ ॥ पण्णासं तु णातव्या मज्झिमाणंतरेसु य । जहण्णे पण्णवीसा तु आयुवस्साणि णिदिसे ॥ १२४३ ॥ साधारणेसु सव्वेसु गोप्फ जाणु-थणेसु य । जत्तूसु यावि वग्गाणं तं तु साधारण वदे ॥ १२४४ ॥ आयुप्पमाणमिञ्चेतं सुसाधारणमंगवी । असम्मूढो विभावेत्ता जघुत्तमभिणिदिसे ॥ १२४५ ॥ ॥ मायुप्पमाणणिद्देसो सम्मत्तो ॥१७-५३ ॥ छ । पडलं चत्तालीसतिमं ॥४०॥ छ॥ [५४ धावत्तरि सुक्कयण्णपडीभागा] उम्मट्ठा तु दढा सव्वे २८ पुरिमंगाणि ४४ णखाणि य ६४ । हितयं ६५ थण ६७ दंता य ६८ गीया ६९ संधो ७० ऽक्खिमेव य ७२ ॥ १२४६ ॥ एते सुक्कपडीभागा अंगे वायत्तरि मता । अपीलिता तु उम्मट्ठा सब्बत्येसु पसरसते ॥ १२४७ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभ जयं तथा । जं किंचि पसत्यं सा सव्यमलि ति ॥ १२४८॥ पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । धण्णो य सुहभागी य 1 सुद्धभावी य• सो भवे ॥१२४९।। इत्धि च परिपुच्छेज सिद्धत्या सुभग ति य । धण्णा य सुहभागी य सुद्धभागि त्ति यं वदे ॥ १२५० ।। कणं च परिपुच्छेज सिद्धत्या सुभग ति य । धण्णा य मुहभागी य खिप्पं विजिहिते ति य ॥ १२५१ ॥ चतुरसकोष्ठकान्तर्गतः शेषः सर्वामु प्रतिषु नास्ति । १चउवण्ण है. त.॥ २ तु मुणेतमा सि.॥ ३ आयय है• त॥ ४ जतूस है. त•॥ ५ - एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त• नाखि ॥ 25 30 * १०४ - 10 18 अंगविजापइण्णय [६३-७३ ठियामासवण्णजोणीपडलं पण च परिपुच्छेज्ज सुकिलो त्ति वियागरे । तधा आमिजणं पुच्छे सुकमामिजणं वदे ।। १२५२ ।। जं किंचि पसत्थं तं सव्वमथि ति णिदिसे । अप्पसत्यं च जं किंचि सम्यं णत्थि त्ति णिदिसे ।। १२५३ ।। जधा पुण्णामधेयेसु आदेसो तु विधीयते । तधा सुकेसु णातव्यं विसिहतरकं फलं ॥ १२५४ ।। कम्मं च परिपुच्छेज सुकं कम्मरस णिद्दिसे । संखिकं संसवाणियकं तथा वलयवाणियं ॥ १२५५।। मणि-मुत्तवाणियं वा विजं चऽण्णं सुक्किलं भवे । कम्मपुच्छाय गिद्देसे एवमादि फलं वदे ॥ १२५६ ।। तधा खेत्तं तधा वत्युं सव्यमथि त्ति णिदिसे । समे सद्दे य जाणेजो सुकिला जे भवंतिह ॥ १२५७ ।। सुको वहस्सती व त्ति चंदो व त्ति सणिचरो। बलाका घलदेवो त्ति मुंकणंदवणं ति या ॥ १२५८॥ संखो संखवलयं ति संखणामि त्ति या पुणो । तधा संखमलो व त्ति संखचुण्णं ति वा पुणो ।। १२५९॥ छुहा सेडि ति वा यूया चुण्णको त्ति पलेवगो । कडसकर त्ति वा पूया तधा णेलकितं ति वा ॥ १२६० ।। दंतो सेडकणवीरो या वासंति यासुल त्ति वा। वेइलपुप्फिका जाँती लाणी जूधिक त्ति या ॥ १२६१ ॥ णवमालिका मल्लिका व त्ति चंपकालि त्ति वा पुणो । तेणसोल्लिक त्ति वा वूया सेड्डकफलिक त्ति वा॥१२६२॥ पुंडरीक त्ति वा वूया सेडगद्दभकं ति वा । तघा सेडककंदो त्ति सिंधुवारो त्ति वा पुणो ॥ १२६३ ॥ दुद्धं दधिं या बूया वधा दधिसरो त्ति या । णवणीतं ति या यूया सतधोतं धनं ति वा ।। १२६४ ॥ धोतक मधुसित्यं ति जोण्हा धवलपडो ति वा । दंतो त्ति दंतचुण्णो त्ति रयतं मुत्तिकं ति वा ।। १२६५ ।। जं चऽणं एवमादीयं सजीव-जीवकं भवे । मुक्किलं ति सैंए सद्दे सुकिलस्स तु तं समं ॥ ११६६ ॥ तधा सुक्कपडीमागे णक्सत्त देवते तधा । पुप्फे फले या देसे वा णगरे गाम गिहे वि वा ॥ १२६७ ॥ पुरिसे चतुप्पदे यावि पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लये यावि परिसप्पे तधेय य ॥ १२६८ ।। पाणे या भोयणे वा वि आसणे सयणे तथा । पत्थे आभरणे यावि भंढोरगरणे तघा ॥ १२६९॥ लोहेसु यावि सम्वेसु सव्येसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्वधण्ण-धणेसु य ।। १२७०॥ एतम्मि पेक्सियामासे सद्दे रूवे तघेच य । सव्यमेवाणुगंतूणं ततो बूयांगचिंतओ ॥ १२७१ ॥ ॥ सुक्यण्णपडीभागा ॥ ५४॥ छ । [५५-६२ वण्णपडीभागपडलं] अभंतरं अयंगे उ अक्खीण वे विणिद्दिसे । एते पंडुपडीमागे अभंतरफले वदे ॥ १२७२ ॥ तधा णीलपडीभागा अप्पसत्ये वियागरे। दढाणं पडिपक्खा जे णपुंसकफला उ ते ॥ १२७३ ॥ दस कण्हपडीमागे णिम्मद्वेसु वियागरे। वालेयेसु सम्वेसु पुच्छिते ण प्पसस्सते ॥ १२७४ ।। ॥वण्णपडीमागा॥ ५५-६२॥ छ । [६३-७३ ठियामासवण्णजोणीपडलं ] सव्वे जाय ठियामासा याहिरप्पडिरूविगा । जो जरस वण्णपटिरूवो वणं तं तेण णिदिसे ॥ १२७५ ॥ कण्हेण कण्हं जाणीया णीलकं गीलकेण य । रत्तेण र जाणीया पीतकेण य पीतकं ॥ १२७६ ।। सेतेण सेतं जाणीया पंडुमेव य पंदुणा । मेचक मेकेणेव ठियामासं वियागरे ।। १२७७ ॥ १ भये है. सविना ॥ २मकर्ण है. त॥ ३ पइल सप्र.॥ ४ जाती पाली जू सि.॥ ५घण है. त.॥ ६ धातक है. त• चिना ॥ ७ सते हैं. त• विना ॥ ८ मुकलप है. त०॥ ९ अदमवधेयम् एतद् वण्णपडीमागपडलं अप्रेतनं च ठियामासवण्णजोणीपडलं क्यचित् समानविषयकमिति मिश्रीमावेन तव्यावर्णनमत्र दृश्यते । अत एवान पटलद्वये द्वारसाहर्यमपि वर्नत । तिचिकारापरामर्शस्वत्र मुगमत्वात् सम्भाव्यते । दारक्रमभः पुनर्प्रन्यकृदिच्छामनुवर्तत इति । १०°णं वणि ई. त.॥ ११ भार्ग मम्मतरफल है. त• विना ॥ १२ भागो है. त. विना ॥ १३ °भागा है. त• विना ।। 20 25 30 5 ७४-७९ गिद्धलूहपडलं] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ गयतालुकवणं च तव्वण्रोण वियागरे । काकंडकवण्णं च तथा गोमुत्तकं विदु ॥ १२७८ ॥ सूरेण सूरुग्गमिकं पदुमाभेण पदुमकं । मणोसिलाय य तधा मणोसिलाणिभं वदे ॥ १२७९ ॥ हरितालेण जाणेनो हरितालसमप्पभं । तधा हिंगुलके यावि बूया हिंगुलकप्पभं ॥ १२८० ॥ णिद्धं गिद्धेण जाणेजो लुक्खं लुक्खेण णिदिसे । मिस्सकं मिरसकेणे चित्तवण्णं च चित्तले ॥ १२८१ ॥ एवमादी ठियामासे सवण्णेहिं वियाणिया । बाहिरप्पडिरूवेहिं गिहिसे अंगचिंतओ।। १२८२ ।। बाहिरंगगता एते ठियामासा विआहिता । एते चेर पुणो सव्वे अंगामासेहि णिदिसे ॥ १२८३ ॥ वक्खणा गोष्फणा जाणू य कण्णा य हरिता भवे । गीना पीता तधा पंडू अपंगे वे तधोदरं ॥ १२८४॥ जिब्भोह-तालुका रत्ता बंभवण्गा तधऽक्खिणो । सुक्का दंत-गहा असिता बज्झतं केस-लोमय ॥ १२८५ ॥ अभंतरा य अच्छीण भागा गीवा य पीतिका । सम्मदिया य हरिता णिम्मट्ठा होति पंडुणो ॥ १२८६ ॥ कणवीरका अवंगा य पाद-पाणितला तथा । जिब्मोह-तालु-कंठोल्ला दंतमंसं तधेव य ॥ १२८७ ।। - रत्तवण्णपडीभागा विष्णेया दस पंच य । जधुत्तमणुगंतूणं ततो बूयांगचिंतओ ।। १२८८ ।। रत्त-सेतसमामासे णिदिसे गयतालुकं । सेत-रत्तसमामासे बंभरागं वियागरे ॥ १२८९ ॥ रत्त-पीतसमामासे वणं सुजुग्गमं यदे । पीत-रत्तसमामासे - मणोसिलाणिभं वदे ॥ १२९० ।। कण्ह-सेयसमामासे मेचकं वण्णमादिसे । सेत-कण्हसमामासे कोरेंटकणिभं वदे ।। १२९१ ॥ णिद्ध-लुक्खममामासे णिद्धलुक्खं तु णिदिसे।लुक्ख-णि?समामासे लुक्खणिद्धाणि णिहिसे ।। १२९२ ।। पुप्फाणि च फलाणिं च तया पत्ताणिमेव य । णिज्जासा चेव सारा य मूलजोणिगतस्स य ।। १२९३ ।। वालाणं अंगलोमाणं चम्माणं च पिधप्पिधं । मासाणं रुधिराणं च पित्तस्स य कफस्स य १२९४॥ मुत्ताणं च पुरीसाणं सुक्क मेद-वसाय य । अट्ठीणं अद्विमिंजाय णेहाणं पाणजोगिया ॥ १२९५ ॥ - जे यऽण्णे धातुजोणीया वण्णरागा पिपिधं । तेसिं संकित्तणासदा विभावेऊण अंगवी ॥ १२९६ ।। सुकादयो सव्ववण्णा ये एते परिकित्तिया । तजोणीवण्णसद्देहिं ते पत्तगं वियागरे ॥ १२९७ ॥ ॥ठियामासकता वपणजोणी ॥ ६३-७३ छ॥ 10 15 20 25 [७४-७९ गिद्धल्हपडलं] [७४ दस णिद्धाणि] मुई १ णासापुडा ३ कण्णा ५ मेड्ड ६ मऽक्खी ८ थणावुभो १० । एताणि दस णिद्धाणि उम्महाणि पसरसते ॥ १२९८ ॥ जधा पुण्णामधेजेसु आदेसा परिकित्तिता । तधा गिद्धेसु मव्वेसु विसिट्टतरकं फलं ॥ १२९९ ।। एताणि आमसंती य गम्भिणी जति पुच्छति । इमो तस्सा भवे अण्णो विसेसो उत्तरुत्तरो ॥ १३०० ।। उदग्गमाणसा हट्ठा सव्यकामसमण्णिता । सुहेण सुलता पुत्तं धणं णारी पयाहिति ॥ १३०१ ।। बंभणो जति पुच्छेना उदिधे वेदपारतो । अभिरूयो सुहिनो णिच भवे य घण-धण्णया ॥ १३०२ ।। वेरसो जति पुच्छर्जा सिद्धऽच्छादण भोयणो । अड्डो य सुहभागी य वसुमंतो य सो भवे ॥ १३०३ ॥छ ।। 30 १°तरो ये अच्छीणं भागा सं३ पु.।तरो य अच्छीणं भागी ६० त० ॥२ पीयिका है. त॥३°लुकमेल्ला है.त. विना ४ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः ६० त० एव वर्तते ॥ ५°दमणिद्धाणि लुक्स सप्र० ॥ ६ सुध है• त.॥ ७तिजोणी इंत.॥ ८°जा मिच्छच्छा ३ पु. सि.॥ भंग०१४ 5 10 16 अंगविजापइण्णय [७४-७९ गिद्धल्हपडलं [७५ दस णिद्धणिद्धाणि] एताणि चेव णिद्धाणि गिद्धणिद्धाणि णिदिसे । दूंरम्मट्ठाणि सव्याणि विसिट्ठफलदाणि य ।। १३०४ ॥ भक्खितं ति व जो बूया तं मक्सिततरं ति वा। [ तिमक्खितं ति वा चूया मक्खितमक्खितं ति वा ॥१३०५॥ गिद्ध ति व जो बूया तं णिद्धतरकं ति वा । ] अतिगिद्धं ति वा बूया गिद्धगिद्धं ति या पुणो॥ १३०६ ॥ किलिगं ति य जो बूया किलिण्णतरकं ति वा । तधा अतिकिलिण्णं ति किलिण्णकिलिण्णं ति वा ।।.१३०७॥ रोहितं ति व जो बूया तं णेहिततरं ति वा । अतिणेहितं ति या यूँया रोहितणेहितं ति वा ।। १३०८ ॥ णेहुकडं ति वा धूया णेहुकडतरं ति वा । अतिणेहुकडं व ति बहुणेहुकडं ति वा ॥ १३०९ ।। गेहुत्तरं ति वा बूया णेहुत्तरतरं ति वा । अतिणेहुत्तरं ॐ त्ति बूया बहुणेहुत्तरं जाति वा ।.१३१० ।। हागाढं ति वा बूया णेहागाढतरं ति वा । अतिणेहागाढं ति तथा वहुणेहागाढतरं ति वा ।। १३११ ॥ दुद्धं दधिं सरो णवणीतं घयं ति वा । तेलं मधु ति वा घूया वसा मज ति वा पुणो॥ १३१२ ॥ जं चऽण्णं एवमादीयं दव्यं णेहोवकं भवे । तस्स संकित्तणासहा सव्वे गेहसमा भवे ॥ १३१३ ॥ छ । [७६ दस लुक्खाणि] णिम्मद्वाणि य णिद्धाणि दस लुक्खाणि णिद्दिसे । अधा णपुंसका अंगे विण्णेया फलतो तथा ॥ १३१४॥छ। [७७ दस लुक्खलुक्खाणि] एताणि चेव लुक्खाणि दूरं गिम्मन्जिताणि तु । लुक्खलुक्खाणि जाणीया फलं पावतरं च से ।। १३१५ ॥ लहं ति व जो बूया तधा लहतरं ति वा । अतिलूहं ति वा बूया लूहालूहतरं ति वा ॥ १३१६ ॥ फुलं ति व जो बूया वधा छुट्टतरं ति वा । ॐ अंतिफुटं ति वा बूया फुट्टफुट्टतरं ति वा ॥ १३१७ ॥ फरसं ति व जो घूया तथा फरुसतरं ति वा । तथाऽतिफरसं व त्ति फरुसातिफरुसं ति वा ॥ १३१८॥ कयारो त्ति व जो बूया पंसुको त्ति व जो वदे । धूली रयो त्ति रेणु ति सरो सुको त्ति वा पुणो ॥१३१९॥ इंगालछारिगण व ति भूती भस्सो ति वा पुणो । तुस त्ति गुलिकं व त्ति चुण्णं रोट्टो त्ति घा पुणो ॥ १३२० ॥ गोब्बरो ति फरीसो ति सुक्खं वा छराणं पुणो । तण-कट्ट-पलालं ति सुक्खपुप्फ-फलं ति वा ॥ १३२१ ॥ सुक्खपत्तं ति या धूया तघा सुक्खफलं ति वा । तुस त्ति कोंटको व ति ककुसो तप्पणो त्ति वा ।। १३२२ ।।- दूई ति लहितं ती वा विलूहितविलहितं । उल्लोहितं उव्वलितं तथा उच्छाडितं ति वा ॥ १३२३ ॥ णिज्भामितं णिग्गलितं अन्मुक्कढितं ति वा । णिणेहकं अणेहं या फुढे ति फरुसं वि वा ॥ १३२४ ॥ खफुहं ति व जो यूया सपल्लापाडणं ति वा । णिछोडणं णिव्वलकं तधा णिल्लिक्खणं ति या ॥ १३२५ ॥ वधा पलिहितं व ति "णिद्धोतं ति व जो वदे । पोल्ल ति झुसिरं व त्ति सधूलीक सरेणुकं ॥ १३२६ ॥ जं चऽणं एवमादीय लोए लुक्खोपकं भवे । तस्स संकित्तणासहा सव्वे लूहसमा भवे ॥ १३२७॥ छ । [७८ दस लुक्खणिद्धा ७९ दस णिद्धलूहा य] टुक्खणिद्धा य एतेवं गिद्धा सम्मजिता भवे । साधारण तेसु वदे अत्यलाभं सुभा-ऽसुमं ॥ १३२८ ।। १दूरम • त•॥ २ विसुद्धफ° • •॥ ३ चतुरस्रकोष्टकान्तर्गतोऽयं खण्डितपाठ' सम्बन्धानुसारेण पूरितोऽस्ति । या यहणेदकई ति या राप्र• ॥ ५ मतिणेदितं ति पा यूया पहुणेहपढे ति या सपा ॥ ६ हस्तचिहगतः पाठ है.ह. एव वर्तते ॥ ७हसचिहान्तर्गतमुत्तराई है. त. एव वर्तते ॥ ८ फुझसो ह. त•॥ ९ उद्याडियं हं. त.॥ '१० भम्भुकंदितं . त• विना ।। ११ णियोडणं है. त•॥ १२ णिहायम्मि य जो है. त• ॥ १३ लुफ्ते परं भने •. १४ साहारण पसु पदे सम्र्य अत्र्य सुमा-ऽसुर्म है..॥ 20 26 ४ - ---- 10 । -- . 16 ८१-८५णीहारपडलं] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ २०७४ निद्धा लूहा उ एतेवं संविमट्ठा जता भवे । साधारण तेसु वदे अत्थं सव्वं सुभासुभं ॥ १३२९॥ लूहणिद्धं व अं अंगे गिद्धलूहं वजं भवे । तेर्सि वामिस्ससदेहिं साधारणगुणं वदे ॥ १३३०॥". ॥ गिद्धलूहाणि ॥ ७४-७२ ॥ छ॥ [८० दस आहारा] चक्खु १ सोत्तेण २ घाणेण ३ देहफरिसेण ४ जिन्भया ५। हत्य ६ पादेण ७ सीसेंण ८ वाहूर्हि ९ भमुहाहि य १० ॥ १३३१ ।। । : आहारं कुरुते चेव उवयोगेहि जेहि तु । सधा य होति आहारे दसेताणुवधारये ॥ १३३२॥ सुणेती १ पेर्खती यावि २ गंधं वा 'केवि घायति ३ । ओढसंदसणे वेव.४ गिरिगण्णाऽऽसाइतम्मि य ५ ॥ १३३३ ॥ अतिहारे य जिब्भायं ओहाणं परिलेहणे ६ । तधेव मुहिकरणे अंगुलीपेंडणेसु य ७ ॥१३३४ ॥ हत्यपादोवसंहीरे ८ सिरेण ९ भुमकाहि य १० । आहारे णीहिते यावि सव्यं आहारमादिसे ।। १३३५ ॥ जधा पुग्णामधेयेसु आदेसो तु विधीयति । आहारेसु वि एमेव फलं वूया सुभाऽसुमं ॥ १३३६ ॥ आहारे त्ति ध जो बूया खजापनं (खज-पेजं) ति वा पुणो। आहारेति आहारेंति तथा अतिहरंति या ॥ १३३७ ।। समाहरंति त्ति वा बूया वप्पा वाहरति त्ति वा । एति या [आ]गतो व त्ति तथा अतिगतो त्ति वा ॥ १३३८ ॥ पवेसितो पविठ्ठो.त्ति आणीयं ति [व] आणितो। सुण]ते ति णिसामेति आगण्णेति त्ति वा पुणो ।। १३३९ ॥ पेक्खत्ते पेच्छते व ति णिज्झायति [व] पेक्खति । णियक्खेति त्ति या बूया णिरिक्खति णिलिक्खति ॥१३४० अग्घायते त्ति वा घूया उवग्याय त्ति वा पुणो । आचिक्खति त्ति वा बूया • तथा उच्चपति त्ति या ॥ १३४१ ॥ 20: रसायते त्ति वा धूया अस्सायेति त्ति या पुणो । तधा विगिलते घ त्ति तथा आतिअति] त्ति वा ॥ १३४२ ॥ जेमेति भुंजते र हि आहारं कुरुते ति य । अण्हेते यत्ति वा धूया भक्षते खाति सम्पति १५ १३४३ ।। फरिसायते त्ति वा वूया उवप्फरिसते ति वा । सुहफरिसं ति वा बूया फस्सं वेदयति त्ति वा ॥ १३४४ ॥ आँगारेति त्ति वा बूया तथा वाहरति त्ति वा । राते त्ति व जो घूया तथा एमि वा पुणो ।। १३४५ ॥ जे वऽण्णे एवमादीया सद्दा आहारसंसिता । तेसिं संकित्तणासद्दा आहारसममादिसे ॥ १३४६ ॥ अभंतरेसु जे सद्दा अब्भतरतरेसु य । ते वि आहारसदेहिं तुल्लत्ये उवधारए ॥ १३४७ ।। ॥ आहारसम्मति ॥ ८०॥ छ । [८१-८५ णीहारपडलं] [८१ दस णीहारा] चक्खु-१ सोत्तेण २ घाणेण ३ देहफरिसेण ४ जिम्भया ५। 30. हत्य ६ पादेश ७ सीसेण ८ पाहूहिं ९ भमुहाहि य १० ॥१३४८॥ ग्रीहारं कुस्ते चेत्र उपयोगेहिं जेहि तु । जघा य होति णीहारो दसेताणुरधारए ॥ १३४९ ।। १ केति ,६० त० ॥ २ संघारे हं• त० ॥ ३॥ एतचिहान्तर्गतः श्रोकसन्दर्भः ६० त० नास्ति ॥ ४ तहाऽतिगि::: ५सुद्धफ है० त० ॥ ६ अंगा' सं ३ पु• ति । अगा है. त० ॥ ७ चिक्खसों है. त• विना ।। - 4 25 ।
१०८ 5 अंगविज्ञापइण्णय [८६-२५ दिसापडले दिसते सहरूवेण गिस्संघति पुणो पुणो । विणिटुंते गिस्ससति ओढ णिवोल्लए तथा ।। १३५० ॥ "णि लेउ जिम्मं तु मुहि वा वि पमुञ्चति । विक्खिये अंगुलीओ य दंताणं च विसोधह ॥ १३५१ ॥ हत्य-पादं पसारेति सिरेण भुमकाहि य । आकारेण विसजेति णीहारमिति णिदिसे ॥ १३५२ ॥ चलाणं वाहिराणं च यज्झयज्झाणमेव य । सुभा-ऽसुभफलं जं जंणीहारेसु वितं यदे ॥ १३५३ ॥ णीहारेति णीहरति ति अवकट्ठति णिकड्डति । णिसारेति [णिसरति ] गिखुस्सति चिकड्डति ॥ १३५४ ॥ गिच्छुढे णिग्गते छुद्धे उक्कड्डिय विकड्डिते । अयफट्टिते पराहूते पराजित परम्मुहे ॥ १३५५ ।। णिरसारिते णिसरिते अवञ्चत पसारिते । विप्पसारित वाविद्धे उव्वेल्लित पसारिते ॥ १३५६ ।। वघा विक्रिष्ण णिक्खिण्णे विपकिण्णे विणासिते । अवकिपणे परिमीते अपमाणित विमाणिते ॥ १३५७ ॥ पल-बझ-याहिरा []ये सद्दा पुन्यकित्तिता । ते विमे य उदीरता णीदारसमका भवे ॥ १३५८ ॥ छ । [८२-८५ दस आहाराहारा आहारणीहारा णीहाराहाराइ ] आहारियम्मि आहारे आहारो अति जायति । एतं आहारमाहारं वियाणे अंगचिंतओ ॥ १३५९ ॥ आहारियम्मि थाहारे णीहारो जति जायति । एतं आहारणीहारं वियाणे अंगचिंतओ ।। १३६० ।। पाहारितम्मि णीहारे आहारो जति जायति । एतं णीहारआहारं वियोणे अंगचितओ ॥ १३६१ ॥ आहारियम्मि णीहारे णीहारो जति जायति । एतं णीहारणीहारं वियाणे अंगचिंतओ ॥ १३६२ ।। यहयो आहार-जीहारा मिस्सका जति जायति । तमाहारं जहित्ता गं अण्णमाधारए पुणो ॥ १३६३ ।। पुरिमेण पुरिमं जाणे पच्छिमेण य पच्छिमं । यत्तमाणम्मि आहारे वत्तमाणं वियागरे ॥ १३६४ ॥ पुण्यामम्मि य आहारे पुरिसत्यं वियागरे । थीणामे य थिया अत्यं पपुंसं च णपुंसके ५ १३६५ ।। उत्तमम्मि य आहारे उत्तमत्थं वियागरे । मज्झिमे मज्झिमं अत्यं होणे हीणत्यमादिसे ॥ १३६६ ।। थाहारम्मि य आहारे पसत्यं अत्यमादिसे । पीहारम्मि य आहारे अत्यं पुरुष वियागरे ।। १३६७ ।। ॥णीहारपडलं सम्मत्तं ॥ ८१-८५॥ छ। 10 - - 16 20 25 [८६-९५ दिसापडलं] [८६ सोलस पुरथिमाणि] पुरस्थिमाणि यक्सामि सौलसंगे जघा तधा । अणागताणि आणेव पसत्यं तत्यऽणागतं ॥ १३६८ अत्यलाभं जयं यदि पुच्छे एताणि आमसं । पुरत्यिमं आगमिस्सं समत्यि ति णिदिसे ॥ १३६९ ॥ अागामिमदं पुरिस एस्सकल्लाणमादिसे । - तहाऽऽगमेसमदं च पयमाणं पि णिदिसे ॥ १३७० ।। पुरिसस्सऽत्यविई पुच्छे यूया तं पुरस्थिमं । सिआ अत्यविहं पुच्छे तं पि घूया पुरत्यिमं ।। १३७१ ॥ हाऽऽगमेसमदा य गम्भिणीणं पुरथिमा । पुरत्यिम व भातूगं कण्या तु लभते वरं ॥ १३७२ ॥ गम्मं च परिपुच्छेज गम्भमागामिमादिसे । जगन्भिणि परिपुच्छेज चिरा पुसं पयाहिति ।। १३७३ ॥ फम्मं च परिपुच्छेन उत्तम कम्ममादिसे । फलं तस्स य कम्मरस आगामी लमते परो॥ १३७४ ॥ पास परिपुच्ऐन चिरा तु गमणं यदे । पोमितस्स सगमरस चिरेणाऽऽगमणं यदे ॥ १३७५ ।। धं यपं पाधि मधु अणायुटिं अपातपं । सस्सस्स या वि वापत्ति सहयं णत्यि ति णिदिसे ॥ १३७६ ।। १.णिद्रुमे णि..॥ २ गिल्लेणेतु जि है. त• बिना ॥ ३ विक्से है. त• विना ॥ ४ णिसस्सति.त.॥ ५नियुदे जिग्गते पुदे. त• पिना । ६ हिस्सरति है. तलि. || ७ विक्खित्त णिक्खिचे है . तबिना ८-५विपारेर..दिना ॥ १० जाणियह तबिना ॥ ११ हसचिशान्तर्गत. पयसन्दर्म. हं. त• एवं वत्तते ॥ 30 10 15 ८६-९५ दिसापडलं] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ वद्धस्स मोक्खं खेमं च संधि च जयमेव य । आरोग्गं 'जीवितं व त्ति यस्सारत्तो य उत्तमो ॥ १३७७ ॥ वस्सारत्तं च पुच्छेज यूया वासमणागतं । पुरथिमे महामेवा महावासं करिस्सति ॥ १३७८ ॥ णटुं च परिपुच्छेजा अत्यि पढे ति गिहिसे । गट्ठमाधारइत्ता य घूया पहँ पुरत्यतो ।। १३७९ ॥ कतिमि दिसं ति वा यूया पुरिमं ति वियागरे। धणं धगं ति पुच्छेञ धणं तेवं वियागरे ॥ १३८०॥ जं किंचि पसत्थं सा सव्वमत्यि त्ति णिहिसे । [जं किंचि अप्पसत्यं च सव्वं गत्यि ति णिदिसे ॥ १३८१ ॥] 6 उवातं गिद्दिसे धगं दिसं घूया पुरथिमं । साधारणं वदे अत्यं थी-पुमंसस्सऽणागतं ॥ १३८२ ॥ जघा पुण्णामधेयेसु सव्यो अत्यो सुभा-ऽसुभो । एवमेतेसु पुरिमेसु सव्यं यूया अणागतं ।। १३८३ ॥ अणागतेसु सद्दा जे पुर्व संपरिकित्तिता। ते चेय सद्दा पुरिमाणं जाणे तुल्ले फलेण तु ॥ १३८४ ।। ॥ पुरथिमाणि समत्ताणि ॥ ८६॥ छ॥ [८७ सोलस पच्छिमाणि] सोलस पच्छिमाणंगे अतिवत्ताणि जाणि तु । ताणि साधारणे अत्ये अतीते णर-णारिणं ॥ १३८५ ॥ अत्यलाभ जयं वा वि वद्धिं वा जति पुच्छति । पच्छतो य तमल्यि त्ति सेसं णत्यि त्ति णिदिसे ।। १३८६ ॥ पुरिसंघ परिपुच्छेज भातूणं पच्छिमो भवे । इत्यिं च परिपुच्छेजा भगिणीगं पच्छिमा भवे ॥ १३८७ ॥ पुरिसत्यविधं पुच्छे पच्छतो त्ति वियागरे । घिया अत्यविहं पुच्छे पच्छतो ति वियागरे॥१३८साब कणं च परिपुच्छेजा भगिणीगं पच्छिमा भवे । पच्छिमं चेव भातूणं खिप्पं च लभते वरं ।। १३८९ ॥ गभं च परिपुच्छेज णत्यि गम्भो त्ति गिहिसे । गम्भिणि परिपुच्छेज वियागं पच्छिमं वदे ॥ १३९० ॥ फम्मं च परिपुच्छेज पच्छा कम्मं वियागरे । अप्पाफलं पहुकेसं णराणं कम्ममादिसे ॥ १३९१ ॥ पवासो' पुच्छिते णत्यि पोसितो पच्छओ गओ। गिरत्यकं च तं घूया चिरायाऽऽगमणं घदे ॥ १३९२ ॥ धंधं पुच्छे ण भवति पद्धो खिप्पं च मुधति । भयं खेमं च संधि या विग्गहो य णिरत्यको ॥ १३९३ ॥ रोगं मरणमणावुद्धिं आतवं सरसयापदं । विप्पयोगं विवादं च सव्यमस्थि ति णिरिसे ।। १३९४ ॥ जीवित जयमारोग्गं घस्सारत्तं सपासकं । पट्टिकं सरससंपत्तिं सत्यं णत्थि ति गिदिसे ॥ १३९५ ॥ फतमि दिसं ति या धूया पच्छिमं ति वियागरे । धणं घगं ति पुच्छेन अधणं ति वियागरे ।। १३९६ ।। अप्पसत्यं च किंचि सव्वमरिय त्ति गिरिसे। किंचि पसत्यं सा सव्वं गत्यि ति गिहिसे ।। १३९७ ॥ यण्णतो फालगं यूया पच्छिमं दिसमादिसे । अप्पसत्यं वदे अत्यं अतीतं गर-णारिणं ॥ १३९८ ॥ अवियत्तेसु आदेसो जघा दिह्रो सुमा-ऽसुभो । पच्छिमेसु वि पमेव फलं यूया सुमा-ऽसुभ ॥ १३९९ ।। अतिपत्तेसु जे सरा पुव्यं तु परिकित्तिता । पैच्छिमेसु वि एमेर तुह्त्ये फलतो पदे ॥ १४००॥ ॥ पच्छिमाणि ॥ ८७॥ छ। [८८ सत्तरस दक्सिणा] जागेय दक्खिणागंगे वाणेर दसिणाणि तु । पुरिसत्ये पसत्यागि गिदिसे दस सच य ।। १४०१ ॥ सामोरातं यदे ययं दक्सिगं दिसमादिसे । यचमागं मुभं अत्यं पुरिसागं पवेदये ।। १४०२ ।। दकिरणेमु उपा दिहो सयो अत्यो मुमा-ऽमुभो । दक्सिणेमु वि एमेय फलं यूया सुमा-ऽमुमं ॥१४०३।। १जीवितं मयि यस्सा..॥ २ कतिम • त•॥ ३ पनरन्तर्गतः पारः गम्भपानुमारेशानुगन्पिटोऽमि ४ समान्तर्गतमुत्तराई •त. एर यावे ॥ ५°सो पछिमे परिय. त.॥ ६ पच्छितोगतो .. पिना। पच्छिमेय तु पमेय सत्र ।। ८दपियोण तु से 15•॥ ९पर..॥ 20 - 25 10 । -- 16 अंगविज्ञापइण्णयं [८६-९५ दिसापडले, [४९ सत्तरस उत्तरा] जाणेव होति यामाणि ताणेय उत्तराणि तु । धीगं कल्याणभागीणं णराणं ण पसरसते ॥ १४०४ ॥ सामं कालं वदे वणं उत्तरं णिदिसे दिसं । वत्तमागं सुभं अत्यं पमदाणं पवेदये ॥ १४०५ ॥ नधा वामेसु सम्वेसु अत्यो सदिट्ठो सुभा-ऽसुभो । उत्तरेसु वि एमेव फलं घूया सुभा-ऽसुमं ।। १४०६ ।। वामभागेसु जे सदा पुव्यमेव तु कित्तिया । उत्तरेसु वि ते चेय सद्दे तुल्लफ्ले वदे ।। १४०७ ॥ छ । [९० सत्तरस दक्खिणपुरच्छिमा] पुरिमाणं दक्सिणाणं च मज्झे अंगाणि जाणि तु । पुव्यदक्षिणभागाणि पसत्याणि वियागरे । १४०८॥ अत्यलाभं जयं या वि पद्धिं च परिपुच्छति । साधारणं यदे अत्थं फलतो पुरिमक्सिणं ॥ १४०९ ।। पुरिसं इस्थि च अत्थं च पुच्छे एताणि आम । पुरिमाणं दक्सिणाणं च फलं वामिरसमादिसे ॥ १४१० ॥ कणं च परिपुच्छेज सिद्धत्था सुभगति य । धण्णाय सुहभागी य खिप्पं विजेहिते ति य ॥ १४११ ।। गम्भमस्थि त्ति जाणीया गम्भिणी दारकम्मि य । खिप्पं पजायते णारी कम्मं साधारणं वदे ॥ १४१२॥ प्रयासो पुच्छिते सफलो पउत्यं पुव्वदक्सिणं । दिसं गतो त्ति जाणीया सधणो खिप्पमेहिति ॥,१४१३ ।। बंधं भयं विग्गहं रोगं मरणं आतयं तथा । अवुहि सरसयापत्ती सस्सं(सव्यं) णत्यि ति णिदिसे ॥.१४१४ ।। चंद्धस्स मोक्खं खेमं च संधि जयमेव य । आरोग्गं जीवितं चेव उग्गाहं वाधितरस,य ॥ १४१५ ॥ वरसारत्तं च वासं च सव्यं नहस्स दसणं । वहां सित्तं तदा पत्युं हय सव्यमत्यि ति णिदिसे ॥ १४१६ ।। कतम दिसं ति वा वूया वदे पुरिमदक्खिणं । धणं धणं ति पुच्छेना घदे उक्कट्ठमझिमं ॥ १४१७ ।। जंकिंचि पसत्थं सा सव्यमत्यि ति णिदिसे । अप्पसत्थं च जं किंचि सव्वं णस्थि ति णिदिसे १.१४१८॥ उपाते गिहिसे वेगं दिसं पुरिमदक्सिणं । अत्थं अणागतं सव्यं पसत्यं णिहिसे सता ॥ १४१९ ।। अणागतेसु जे सदा जे सद्दा दक्षिणेसु यं । पुदक्षिणसदाणं ते सदे णिदिसे समे ॥ १४२० ॥ छ ।। [९१ सत्तरस दक्षिणपञ्चत्धिमा ] दक्खिणाणं च सव्यास पच्छिमाण व अंतरां । अंगां ण पसरसते जधा अत्यो णपुंसको ।। १४२१ ॥ अत्यलाभ जयं यदि एताणि जति पुच्छति । जं किंचि पसत्यं सा सव्वं गस्थि ति णिदिसे ॥ १४२२ ।। अधणं भगं या वि अणवजं परं वदे । एवमेय य णारीगं गिरत्यं अत्यमादिसे ॥ १४२३ ॥ गम्भं पुच्छे ण भवति गम्भिणी उणये मतं । कम्मपुच्छाय णिसे णिरत्ये कम्ममादिसे ॥ १४२४ ।। णिरत्यकं पासं च पोसियं पणिरत्थर्क गर्न अवरदक्सिणठो चिरकाले य णिदिसे ॥ १४२५ ॥ वंध पुच्छे ण भवति यद्धो सिप्पं च मुचर्ति । बद्धस याचि मुत्तस्स पयासो सिग्यमेव उ ॥ १४२६ ।। रोमं पुच्छे ण भाति भयं पुच्छे भविस्सति । संधि पुच्छे ण भवति विग्गही बहुसो भवे ।। १४२७ ।। जीवितं जयमारोग्गं उग्गाहं आतुररस य । यस्सारतं च यासं च सस्सं गट्ठरस दंसणं ।। १४२८॥ ऐत्तं यत्थु धग धगं थाणमिस्मरियं जसं । जंप किंचि पसत्यं सा सम्बं णत्यि ति णिदिसे ॥ १४२९ ॥ पराजयमगायुर्हि रोगं मरणमात । सरसरम या वि आपत्तिं त्यि ते वियागरे ॥ १४३०।। वनमं दिसं ति या यूया यदे अयरदरियगं । ध धणं ति पुच्छेना अधणं ति वियागरे.।। १४३१ ।। मामोगानं यदे पण रिसं अवरदक्पिगं | अप्पमत्वं यदे अत्यं अतीनं पर गारिणं ॥ १४३२॥ परिणेमु य जे सदा अतीतेमु य जे भरे । दक्सिणापरसदाणं ते सरे णिदिसे समे ॥ १४३३ ॥ छ । १५-एलानर्गत पाट. १. तनामि॥ २परमदक्सिणं है. त.॥ ३च पयसप.॥ ४हतचिहान्तर्गतः। पतली ॥ ५घण्णं ..॥ ६ यति अह.त.॥ 20 । 25 30 । .
। 5 १६-१९ पसरणा-ऽपर्सण्णपडलं] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ [९२ सत्तरस उत्तरपञ्चत्थिमा] पच्छिमाणं च सव्वेसिं उत्तराणं च अंतरा । अप्पसत्या भवंतेते जधा अत्ये गपुंसके ॥ १४३४ ॥ 'आदेसो तु जधा दिट्ठो [पुव्यं] दक्षिणपच्छिमे । तथैव सव्यमादेसं चूया उत्तरपच्छिमें ॥ १४३५ ॥ : वण्णतो कालतं बूया दिसं च अवरोत्तरं । अप्पसत्यं च णारीणं अत्यं यूया अतिच्छियं ॥ १४३६ ॥ छ । [९३ सत्तरस उत्तरपुरत्थिमा] उत्तराणं च जे अंगा पुरिमाणं च अंतरा । थीणामत्ये पसत्था तु विण्णेया दस,सत्त य ॥ १४३७ ॥ पुन्यदक्खिणतो दिवो जधा अत्थो सुभा-ऽसुभो । तथैव पुव्युत्तरत्तो सव्यं वूया सुभा-ऽसुभं ॥ १४३८ ॥ सामकालं वदे वणं दिसं च पुरिमुत्तरं । अणागतं सुभं अत्थं णारीणं तं पवेदये ॥ १४३९ ।। अणागता य जे सद्दा जे य चामेसु कित्तिता । पुरिमुत्तरसदाणं एते सद्दे समे वदे ॥ १४४० ॥ छ । [९४ दुवालस उद्धभागा] पुरिमेण उच्च जाणेजो पच्छिमे' हरसमादिसे । वामदक्खिगतो वा वि चतुरस्सं वियागरे ॥ १४४१ ।। पुरिमेण थूलं जाणेजो पच्छिमेण किसं वदे । समोवयितगत्तं च वामदक्षिणतो वदे ॥ १४४२ ।।... उल्लोकितम्मि सव्वम्मि आमट्ठम्मि सिरम्मि य । उम्मजिताभिमढे य दूरम्महे तघेव य ॥ १४४३ ॥ उद्विते सस्सिते यावि उक्खित्तुन्वरितम्मि य । उष्णते उण्णमंते य सद्दे आकासकम्मि य ॥ १४४४.॥ जं चऽणं एवमादीयं आकासपडिरूवितं । एतम्मि सदरूवम्मि दिसं उर्दु वियागरे ।। १४४५ ॥ छ । . 10 15 । 20 [९५ तेरस अधोभागा] ओलोकिते य सव्वम्मि अवमट्ठा-ऽपमजिते । णिम्मजिते य णिम्महे सव्यमोसारितम्मि य ॥ १४४६ ।। णिक्खित्ते णिहिते यावि ओतिण्णोतारितम्मि य । उम्मढे ये णिवुड्ढे य सव्वभूमिगतम्मि य ॥ १४४७ ॥ जं चऽणं एवमादीयं अधोभागं विधीयते । एतम्मि संदरूयम्मि दिसं घूया तु हेट्ठिमं ॥ १४४८ ॥ ॥ दिसापडलं ॥ ८८-९५॥ छ । [९६-९९ पसण्णा-ऽपसण्णपडलं ] [९६ पण्णासं पसण्णा] अभंतरे य उम्महे पसण्णते वियागरे । अन्भंतरत्येण यदे विसिट्टतरकं फलं ॥ १४४९ ॥ एताणि आमसं पुच्छे अत्यलाभ जयं तथा । च किंचि पसत्यं तं सव्वमत्यि त्ति णिदिसे ॥ १४५०॥ पुरिसं च परिपुच्छेज सिद्धत्यो सुभगो त्ति य । धण्णो य सुहभागी य सामोईवहुलो भवे ॥ १४५१ ।। इत्थिं च परिपुच्छेज्जा सिद्धत्या सुमग ति य । धण्णा य सुहभागी य सम्मोईबहुला भवे ॥ १४५२॥ पुरिसस्सऽत्यविधं पुच्छे सम्मोईसु मविस्सइ थियो अत्यविहं पुच्छे सम्मोई य भविस्सइ ।। १४५३ ॥ कण्णं च परिपुच्छेजा धण्णा विजिहिते लहूं । रण्णो य अभंवरगं भत्तारं सा लमिस्सति ॥ १४५४ ॥ गम्भं च परिपुच्छेज अत्यि गम्भो त्ति मिदिसे । गम्मिणि परिपुच्छेना जणये पुत्तमुत्तमं ।। १४५५ ।। कम्मं च परिपुच्छेजा रणो अभंतरं वदे । महाजणस्स णिसं करिस्सति य कम्मणा ॥ १४५६ ॥, पवासं परिपुच्छेजा सफलो त्ति वियागरे । पउत्यं परिपुच्छेना संघणो खिप्पमेहिति ॥ १४५७ ॥ १० च ५० ई. त.॥ २ "मेरस्स है० त०॥ ३ ओणते है. त०॥ ४ °सजम्मि ई. त•॥ ५या.णिबुद्धे य है. त०॥ ६ सद्दलूयम्मि है. त• ॥ ७ सोमाई सं ३ पु० ॥ ८ हम्दचिहान्तर्गतमुत्तरार्द्ध है. तएवं वर्तते ॥ ९संघण्णो ई. त-विना॥ 25 93 - । 16 - अंगविजापइण्णयं [१००-१०३ वामपडलं वंधं भयं विगहं [च] रोगं मचु य वासकं । अपातयं सरसवापत्तिं सव्यं णस्थि ति णिदिसे ॥ १४५८ ॥ घद्धस्स मोक्ख गासं विजयाऽऽरोग्गं च जीवितं । आतुरस्स समुट्ठाणं वस्सारत्तं सवासकं ॥ १४५९ ॥ गट्ठरस दसणं वा वि सस्ससंपत्तिमुत्तमं । मित्ति सम्मोइ संपीति सव्यमत्यि त्ति मिदिसे ॥ १४६० ॥ जं च किंचि पसत्यं सा सव्वमस्थि ति णिदिसे । अप्पसत्थं च ज किंचि सनं णयि ति णिदिसे ॥१४६१॥ सव्यमन्मतरत्यं च पुण्णामत्थो य जो भवे । जधुत्तमणुगंतूणं पसण्णेसु वि' तं वदे ।। १४६२ ॥ छ । [९७ पण्णासं अप्पसण्णा] अभंतरे य णिम्मढे अप्पसण्णे वियागरे । अत्थहागि विणासं च सव्यं च असुमं वदे ॥ १४६३ ।। णमो अरहताणं, णमो आयरियागं, णमो 'ऋरिक्सुन्ताणं, जे एकपदं द्विपदं बहुपदं वा विजामंतपयं धारयंति तेसिं णमोकारइत्ता इमं विजा पजोजयिस्सं, सा मे विजा समिझतु, णमो अरहतो वद्धमाणस्स, जधा भगवती अंगदेवी 10 सहस्सपरिवारा समणं भगवंत महावीर पुब्धि सच्चपतिट्ठिए लोए तेणं सञ्चययणेणं सा में अंगदेवी उत्थातु, जघा दक्खि- णस्स अद्धलोगस्स मघवं देवाणं इंदे आधिपञ्चं पोरेपञ्चं कारयति एतेण सच्चवयणेण सा मं अंगदेवी उपस्थायतु, उत्तरस्स पद्धलोगस्स ईसाणे महाराया आधिपञ्चं पोरेपचं कारयति एतेण सञ्चवयणेण सामं अंगदेवी उपत्यायतु, तघेव देविंदुस्स पचारि लोगपाला देवा य वयणेणमुपगता एतेण सच्चवयणेण अमुको अत्यो सिज्झतु त्ति । मणम्मि सिक्खिते पढितव्वा । छद्वग्गणी एस विजा ॥ नपुंसकाणं जो अत्थो बाहिरत्थो य जो भवे । तं सव्वं अप्पसण्णेसु तधेव फलमादिसे ॥ १४६४ ॥छ॥ [९८-९९ पण्णासं अप्पसण्णपसण्णा पसण्णअप्पसण्णाणि य] अप्पसन्ने पसन्ने य पण्णासं चेव णिदिसे । अभंतरा संविमट्ठा ण ते पढमकप्पिता ॥ १४६५ ।। पसन्ने अप्पसन्ने य पण्णासं चेव णिहिसे । अभंतरा तु अपमहा अप्पसन्ना भवंति ते ॥ १४६६ ॥ अन्भतरा तु पण्णासं आमट्ठा जे अवस्थिता । पैसत्ये ते वियाणेजा पसन्नतरका हि ते ॥ १४६७ ॥ अभंतरा य पण्णासं विमट्ठा जे पुणो पुणो । अप्पसत्थे वियाणीया अप्पसपणतरा हि ते ॥ १४६८ ॥ ॥पसण्ण-अप्पसण्णाणि ९६-९९ ॥ छ । [१००-३ वामपडलं] [१००-१०३ सोलस यामा पाणहरा इच्चाइ ] अच्छीणि कन्ना संसा य हितयं णाभी कडी तथा । पस्सं संधितला सव्वे घामा पाणहरा भवे ॥ १४६९ ।। हिययं १ याहुसंधी य ३ कक्सा ५ हत्या ७ कमाडिका ८ । गोप्फा १० अक्सीणिकण्णा य १२ संसा १४ पादा य १६ सोलस ॥ १४७०॥ एते तु पीलिता सव्ये वामा धणहरा भवे । अपीलिता य उम्मट्ठा सोलसेव धणाहरा ॥ १४७१ ॥ णपुंसका तु जिम्मट्ठा यामा सोवद्दया मता। णपुंसके हि पावतरं फलं तेहि वियागरे ॥ १४७२ ॥ छ ।। अंगुहा ४ अंगुठीओ य २० वाला ३० णिम्मजिता तथा । तीसं तु साहा वामे अंगे एते वियागरे ॥ १४७३ ।। संसायामेसु पतेमु धीणा बूया उपहवं । बहुसाधारणं अत्यं एतप्पञ्चयमादिसे ॥ १४७४ ।। पुरिसंघ परिपुच्छन्न यहुसाधारणं यदे। महाजणं च पोसेति पेसेति य महाजणं ॥ १४७५॥ इत्यिं प परिपुच्छेन यासाधारणं यदे । महाजणं या पोसेति पेसेति य महाजणं ॥ १४७६ ।। पुरिमरमध्यविधं पुच्छे तं साधारणमादिसे । थिया अत्यविधं पुच्छे तं पि साधारणं यदे ॥ १४७७ ॥ १रयो जयो मयेर त• ॥२ यि यं यदेत॥ ३ शरिषभुत्ताणं सं ३ पु. झारिकपुवाणं सि• ॥ पसण्णो पपिया...॥५°सणेतरा.स. दिनाभर अक्षिणी वर्णी च इति भिन्नपदविधाने मादशातसंख्या भवति, भनिटा बागो, माः 'भविष्यों भी राम्भाम्य मपपीणिकण्णा इति एयरत्न स्थापितमति, भवा तसा एवं प्रमाणम् ॥ 20 25 - 30 - १०५ एकारस थूला] पावमो अंगमणी णाम अज्झाओ (· कण्णं च परिपुच्छेज सिग्धं अमिवरा भवे । महाणपेसकं वा पि समिद्धं लभते बरं ॥ १४७८ ॥ गम्भं च परिपुच्छेजा यहुसो तु पजायति । गम्भिणी परिपुच्छेज्जा वामणं जणयिस्सति ॥ १४७९ ।। कम्मं च परिपुच्छेजा वहुसाधारणं यदे । महप्फलेण कम्मेण तोसेहिति महाजणं ॥ १४८० ॥ पवासं परिपुच्छेजा भविस्सति बहुप्फलो । पोसितं परिपुच्छेजा लभिस्सति पहुं धणं ॥ १४८१ ॥ बंध चे परिपुच्छेजा बहुसो वज्झति ति य । वद्धरस मोक्खं पुच्छेना प्पिं मुचिरसते ति य ॥ १४८२ ॥ । भयं च परिपुच्छेज्जा बहुसो त्ति वियागरे । खेमं च परिपुच्छेना चिरं खेमं भविस्सति ॥१४८३ ।। संधि च परिपुच्छेजा साधारणमादिसे । विग्गहं परिपुच्छेज महाणेण तु विग्गहो ।। १४८४ ॥ जयं च परिपुच्छेज जयिस्सति महाजणं 1 आरोग्गं परिपुच्छेज आरोग्गं सउवद्दवं ।। १४८५ ॥ रोगं च परिपुच्छेज बहुरोगो भविस्सति । मरणं च परिपुच्छेज परिकिट्ठो मरिस्सति ॥ १४८६ ।। जीवितं परिपुच्छेज सरोगं जीवितं चिरं । आवाधितं च पुच्छेना समुट्ठाणं चिरा भवे ।। १४८७ ॥ अणावुद्धि च पुच्छेना पत्थि तेवं वियागरे । वस्सारत्तं च पुच्छेजा बहुमेघ वियागरे ॥ १४८८ ।। अपातयं च पुच्छेज गत्थि त्तेवं वियागरे । वासं च परिपुच्छेन चिरं वासं तु णिदिसे ॥ १४८९ ॥ EF सस्सस्स यापयं पुच्छे णत्थि त्तेवं वियागरे । चा सस्सस्स संपयं पुच्छे विचित्ता सस्ससंपया ॥१४९०॥ अप्पसत्थं च ज किंचि सव्यं णत्थि त्ति णिदिसे । जं च किंचि पसत्यं सा सव्यं साधारणं यदे ॥ १४९१॥ वधा खेत्तं तथा वयं सव्वं साधारणं वदे । धणे धणं ति पुच्छेना तं पि साधारणं वदे ॥ १४९२ ॥ साधारणम्मि णक्खत्ते देवते पणिधिम्मि य । पुप्फे फले व देसे वा णगरे गाम गिहे वि वा ॥ १४९३ ।। पुरिसे चतुप्पदे वा वि पक्खिम्मि उदगेचरे । कीडे किविल्लगे वा वि परिसप्पे तधेव य ॥ १४९४ ॥ पाणे या भोयणे वा वि पत्ये आभरणे तधा । आसणे सयणे जाणे मंडोरगरणे तथा ॥ १४९५ ॥ लोहेसु यावि सव्वेसु सव्वेसु रयणेसु य । मणीसु यावि सव्वेसु सव्यधण्ण-धणेसु य ।। १४९६ ।। एतम्मि पेक्खियामासे सद्दे रूवे तघेव य । सचमेवाणुगतूणं ततो बूयांगचिंतओ ॥ १४९७ ।। ॥यामा सम्मत्ता ॥१००-१०३॥छ। । 10 15 20 [१०४ एकारस सिवा] पिडालं १ दस णिद्धाणि ११ उम्मट्ठाणि जया भवे । एकारस सिवा एते पुच्छितम्मि पसरसते ॥ १४९८ ॥ जधा पुण्यामधेयेसु आदेसो तु विधीयते । विसिट्ठतरगं अत्यं तधा घूया सियेसु वि ॥ १४९९ ॥ छ । [१०५ एकारस थूला] उँभो ऊरु २ रो३ पट्टी४ सिरं५ गंडा ७ यणा ९ फिओ ११ । एते थुल्ला पसरसते थुलं वऽत्यं वियागरे ॥ १५०० ॥ एवाणि आमसं पुच्छे पुरिसं थी पपुंसकं । उदगेचर परीसप्पं मच्छ पक्सि चतुष्पदं ॥ १५०१ ॥ कीडं किविल्लगं या विचऽणं जंगलं भवे । सव्यथुलं वियाणीया युलं यऽयं वियागरे॥ १५०२ ।। सजीयं जीयमाघारे सजीवमिति गिदिसे । थुलो किसो ति या यूगा (डो तेयं वियागरे ।। १५०३ ।। अपं पहुं ति आदारे यदु सेवं वियागरे । समे सद्दे य जाणेजा धुला जे मणिके मता ॥ १५०४ ॥ १ पेसिर्फ..॥ २ महाफलेण है. त•॥ ३च यदुपु . द.॥ ४सिग्छ.तु.॥ ५निविद्यन्तर्गत दरता एवं वर्तते ॥ ६ रणम्मिय ०.७उमो हुंरदरो. रु.॥ ८°लो पपंरत• ॥ मंग०१५ 6 10 16 अंगविजापइण्णय [११२ छन्वीसं दिग्यां थूलं वरदं ति परिवूह ति या पुणो । पीणं उपचितं व त्ति पीचरं मांसलं ति वा पुणो ॥ १५०५॥ महासारं महाकायं अविकायं ति या पुणो । मडं ति यहलं व त्ति पुत्यव्या मेदितं ति [वा] ॥ १५०६ ।। रूढं वि समतुवं वि उद्बुमा ति या पुणो । सम्मत् अतिऍण्णं ति अव्यंगं ति व जो वदे ।। १५०७॥ ने यऽन्ने एवमादीया पत्नया शुद्धसंसिता । वस्स संकित्तणासद्दा त शुल्लसममादिसे ॥ १५०८॥ छ । [१०६ णव उपथूला ] जंघा २ सिरो ३ ऽपरा ५ पाहू ७ हत्थपादा तय य ९ उपयूलाणि एताणि उम्मट्ठाणि पसरसते ॥ १५०९॥ छ। [१०७ पणुवीसं जुत्तोपचया ] अंगुहा ४ अंगुलीओ य२० पिडालं २१ चिबुकोहयो २४ । णासा य २५ जुत्तोपचया जधुत्तेणं वियागरे ॥ १५१०॥ छ । [१०८-१०९ वीसं अप्पोवघया वीसं णातिकिसा य] ते व अप्पोवचया वे य णातिक्रिसा मवा । अंगुट्ठा ४ अंगुलीओ य २० जघुत्तेण वियागरे । १५११॥छ। [११० सत्तरस किसा] गोप्फा २ जण्णुगसंधी य४ मणियंघा ६ उपत्यगा । [......] संघी ९ मुमासंघी ११ संसा १३ पट्टी य १४ कुफुटा १५ ॥ १५१२ ॥ अवहू १७ सचरसा उत्ता किसे एते वियाणिया । पलं वझं मुहं यत्यं कैस्सं उत्तं वियागरे ॥ १५१३ ॥ युद्धं किसं वि वा यूया फैसं वेयं वियागरे । समे सद्दे य जाणेनो 'किसा ये मणिके मता ॥ १५१४ ॥ सं परिकसं व त्ति अणुं ति अणुळं ति या । दुबलो त्ति किसो व त्ति उल्लुत्तो ति" व जो घदे ॥ १५१५ ।। जिम्मसको त्ति या यूया वधा यहिकलेचरं । अहिक चम्मणद्धं ति तथा अट्टिकसंकला ।। १५१६ ॥ {क्लो त्ति य जो बूया णिस्सुको त्ति र जो वदे । "ओझीणं परिहीणं ति मातं ति मलितं ति वा ॥१५१७॥ ने यऽणे एवमादीया पध्वया फिससंसिता । णामसंकित्तणे तेसिं किसेहि सममादिसे ॥ १५१८॥ छ । [१११ एकारस परंपरकिसा] परंपरकिसा रत्ता खेलका २ जाणुरू ४ टेरिका ६ । कोप्परा ८ फेस ९ रोग(रोम) १० हणं ११ अप्पसत्या मांति ते ॥१५१९॥ पूलेस यूछमत्यं उचथूले अणुत्तरं । जुत्तोपचये जुत्तत्या ततो यूया अणुत्तरं ॥ १५२० ॥ छ। [११२ छवीसं दिग्धा] या( २ पपाहू ४ जंघो ६ रु ८ सोलसंगुलिओ २४ वघा । केसे २५ पट्टी य २६ जाणीया दीहाणेवाणि अंगवी ॥ १५२१ ।। दीहाणेनागि एब्धीमं उम्माणि जता भवे । पुच्छितम्मि पसरसते इत्येगममिणिदिसे ॥ १५२२ ।। १५ परर्द ति परिमद. 8.॥२ मंदं ति पलं य चि पुच्छया में है. त• ॥ ३ संस राप्र॥ ४'पुचं तिर.॥ ५ पुर्व सम° सेनिस धूल सम है. त.॥ ६ जनुग° ई. त• रिना ॥ ७ फस्सं ते वि... तसं जरी मि.सिंह.. बिना ९पसात.॥ १०फस परिकस व सत्रः॥ ११ मण्णं दि मण नि .. १२ति दिया मो यदे • तु.॥ १३ चम्मलिट्ठ र ३ पु. । धम्मणटुं है. त•॥ १५ सुपखल्लो ति पूषा मिस्मुक्योति • तबिना ॥ १५ थोरी है. त• मोहीणं • ॥ १६ मलिन चि है. स. ॥१७ सुलका १.१० धना ॥ १८कोसप्टोगह... १९२० मातरं • त• विना ॥ २१ इन्दैणत• बिना। - 20 24. - १ ११६ दस परिमंडला] णवमो अंगमणी णाम अज्दाओ दीहो पंथो दीहमायुं दीहकालं च णिदिसे । दीहं थीपुमंसव्वमेत्ती पेम्मं च स मिदिसे ॥ १५२३॥ दीहं च पीतिसंजोग संधी जोगं च णिदिसे । समे सद्दे य जाणेजा दीहा जे मणिके मता ॥१५२४ ॥ दीहमुच्चं महतं ति रज्जूको रण्हको त्ति वा । केआ अंछणिका व त्ति वरत्त त्ति अहि त्ति वा ॥ १५२५ ॥ वसो खलु धयो व त्ति जुगमत्यो त्ति वा पुणो । मुसलं दंडको लट्ठी णारायो तोमरो त्ति वा ॥ १५२६ ॥ चाप त्ति हडिका व ति कोतं कंडं ति वा पुगो । असिलही तरच त्ति घेणुभाग त्ति वा पुणों ॥ १५२७ ।।। जे यऽणे एषमादीया पायया (पज्जया) दिग्पसंसिवा । तेसिं संकित्तणासहा ते दिग्घसमका मवे. १५२८॥ ॥दिग्घा[णि] सम्मत्वाणि ॥ १२॥ छ। 10 3 - [११३ छब्धीसं जुत्तप्पमाणदिग्या ] मुम २ ऽक्सि४ णासा ६ जत्तूणि ८ मेंढ ९ त्यविका ११ सिरो १२ ऽधरा १४ । जिन्म १५ गुंटुग १९ लोमाणि २० पाणिलेहा २६ तवेव व ॥ १५२९ ॥ जुत्तप्पमाणदीहा तु एते छन्वीसमाहिता । अपीलिता अणुम्मट्ठा पुच्छिवम्मि पसरसवे ।। १५३० ॥ छ । [११४ सोलस हस्सा किंचि दिग्या ] हस्साय किंचि दिग्या य सोलसंगे वियाहिया। पुरिमा किंचि उम्मट्ठा पुच्छितम्मि पंसस्सते ।। १५३१॥छ॥ [११५ सोलस हस्सा] हस्सा य सोलसंगम्मि गिम्मट्ठा तु पुरस्थिमा । पुच्छिते ण प्पसस्ते हस्सं चऽत्य वियागरे ॥ १५३२ ॥ 15 दीहेसु जं फलं वुत्तं हूस्सं हस्सेसु तं वदे । समे सद्दे य जाणेजो हुस्सा जे मणिके मता ॥ १५३३ ॥ रहस्सं मडकं वत्ति संवित्तं खुडितं ति वा । रुद्धं ति सण्णिरुद्धं ति.संपीलितं ण पीलितं ॥ १५३४॥ संपिंडित पेंडितं ति सन्नद्धं सन्निकासियं । अप्पं योवं वि किंचि ति अतिथोयं ति वा पुणो ।। १५३५॥ आकुंडित संहितं ति वघा संवेल्लितं ति वा । उस्सारितं ति गिम्मटुं अवमट्ठाऽपमनियं ॥ १५३६॥ जे याने एवमादीया पायवा(पञ्जया) ससंसिता । तेसिं संकित्तणासहा ते हरससमका भवे ॥ १५३७ ॥ छ । [११६ दस परिमंडला] मत्यगो १ थाहुसीसाणि ३ जाणसिरसाणि वे वघा ५ । यणा ७ णामी ८ फिओ चेव १० दसेते परिमंडला ॥१५३८ ॥ सिर १ ललाट २ गंडा य ४ संखे ६ कन्ने य ८ करतले १० । केयि एते यवस्संति दसेव परिमंडले ।। १५३९ ॥ एते सव्वे पसरसंति उम्महा परिमंडला । परिमंडळसदे य तुहत्ये उबधारए ।। १५४०॥ मंडलं ति व जो वूया परिमंडलमेव वा । अदागमंडलं व त्ति अधया मंडलस्सवि ॥ १५४१॥ पक्सत्तमंडलं व ति अधवा जोइसमंडलं ! आदित्तमंडलं व ति य अधया चकमंडलं ॥१५४२॥ समयमंडलं यति तदेव रिसिमंडलं । जं मंडलं ति या यूया अघवा चकमंडलं ॥१५४३ ॥ 90 । १°मायं ० त• पिना॥ २ संधं योग है. त• विना ॥ ३ दीदं मुझं महत्तं ति सप्र.॥ ४ रजको ई.त. १५ फेसाअं है. त•॥ ६ययो सप्र.॥ ७°मच्छो ति है. तविना ॥ ८ति कायकं ति है..॥ ९धर्म- माग है..॥ १० अण्णे है. त• ॥११ पादोया है. त• ॥ १२ गुटुंगरोमागि • तु.॥ १३ रस्साय कीवित. १४ मकुंठित है. त•॥ १५ ओसारितं सं३ पु.॥ १६ हुस्स है त.॥ १७ हसपिरान्तर्गतः पाठः .. एक वर्तते ।
अंगविजापइण्णयं [१९९ वारस पुणि संस्खमंडळके व त्ति तथा मंडलेको त्ति या । णापुण्णमंडलं व ति अधवा अट्टमंडलं ।। १५४४ ॥ मंडलासं ति या यूया अधवा छेत्तम.लं । उवलेवमंडलं व त्ति किमिमंडलिकारिका ॥ १५४५ ॥ पंचमंडलिको यत्ति तवेवापंचमंडलं । माकणीकण्णिकं वत्ति लक उद्धलक त्ति था ॥ १५४६ ॥ तलकणिक त्ति वा वूया पद्धको तलपत्तकं । परिहेरकं ति तलमं ति कण्णरलयकं ति वा ॥ १५४७ ॥ खंदुकं मुंदिका बत्ति वेढको कण्यपालिको 1 णीपुरं ति व जो धूया कण्णुप्पलकं ति वा ॥ १५४८ ॥ पण्णेलिक ति वा धूया तथा सकडपट्टको । तथा पल्लत्यिकापट्टो वधा अकरपट्टको । १५४९॥ वघासमंडलं व त्ति लोममंडलकं ति था । याहुमंडलकं व त्ति हत्यमंडलकं वि या ॥ १५५० ॥ वघा चकमंडलं व त्ति वावचक्षकमंडलं । झल्लरीमंडलं व त्ति लेहपट्टिकमंडलं ॥ १५५१ ।। जे यऽने एवमादीया रोए मंडलपचया । णामसंकित्तणे तेसिं परिमंडलसमं भवे ॥१५५२ ॥ छ । [११७ चोदस करणमंडला] करणोपसंहिता यऽपणे भवंति परिमंडला। ते उधा होति णायच्या कित्तयिस्सामि तं विधि ॥ १५५३॥ दक्सिगरस य पाहुस्स मंटले १ वामकरस य२ । एताणि" वे ततियं च बाहुसंघावमंडलं ३ ॥१५५४ ॥ एतो घतत्यं विण्णेयं सत्यिसंघावमंडलं ४ । करे करे य चचारि अंगुलीमंडलाणि य १२ ॥ १५५५ ॥ हत्याणं घ दोण्हं पि अंगुठेहंगुलीहि य । संघायमंडलाइं दो सालेक्खकरणेण य १४ ॥ १५५६ ॥ परिमंडलेमु पुवुत्तं सम्मठेमु तु जं फलं । फलं अणंतरं तत्तो बूया करणमंडले ॥ १५५७ ।। ॥ परिमंडलाणि फरणमंडलाणि ॥ १६ ॥११७ ॥ छ । 10 । 16 20 [११८ वीसं वट्टा] हत्य-पादंगुलीपच्या २० वीसं वियागरे । अभिमुद्दा पसरसते अप्पसत्या परम्मुद्दा ॥ १५५८॥ पहं ति य जो भूया तघा पट्टतरं वि का । अतिवटै ति या घूया अहोवर्ट ति या पुणो ॥ १५५९ ।। आधगम्यहो ति यदृसेलणको ति या। मुखुरो ति या घूया तथा वट्टमुहो त्ति या ।। १५६० ॥ [. । ] पट्टसीसो त्ति या घूया वट्टमत्यो त्ति वा पुणो ॥ १५६१ ।। संघऽयं एयमादीय पट्टोदाहरणं भवे । तस्स संकित्तणासहा ते यट्टसमका भवे ।। १५६२ ॥ घहल्यायो । १९८॥ छ। [११९ पारस पुणि] स्रो१रलाई २ पट्टी य३ पाद-पाणितलाणि य । फपीदाणि ९ गंढा य ११ जिम्मा य १२ पिधुलानि तु ॥ १५६३ ॥ पुपूणि पारसेतागि सम्माणि पमरमते । समे सद्दे य जाणेजो ने पु५ मणिके मवा ॥ १५६४ ॥ पुjी पुशुलं यत्ति रोत्तं यत्यं ति या पुणो । तसं ति आयतं य ति चतुरस्सं ति या पुणो ॥ १५६५॥ तरसायन लिथा घ्या पतुरंमायनं ति पा । अत्युतं पत्युतं पति संथितं संथढियं ति पा ॥ १५६६ ।। 25 1 १साप - मा.स. २'लपी त्ति.त.॥ ३-४ मंहलाई.. दिना ॥ ५ तये यार.. ६"पातिपतिरप. दलकट सि.१.७चोत्तला.त• चिना ॥ ८परिदेरिकः पिलम ..॥ गु.ल. पिना । १. पुद्धिका .., १५ फाणपीलको ..॥ १२ पण्णालिपाणि या वि.. पारिसिपा...॥ १३ पधारतn १५ णि रतिय • रा•॥ १५पादनात अग्रभागाः माम्यन्ठे । १६ पसायदयो नि पोल...॥ १७ पहपरो.त.॥
5 ( २२५ चे अणि १२६ पक्के परमाणू य] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ ११७ वित्थिनं वित्थतं व ति यत्यितं ति व जो वदे । विततं वियाणक व त्ति तथा पत्थरियं ति वा ॥ १५६७ ।। ये घऽण्णे एवमादीया पन्जया पुधुसंसिता । णामसंकित्तणे तेसिं पुहिं सममादिसे ॥ १५६८॥ ॥ पुणि ॥ ११९॥ छ। [१२० एकतालीसं चउरंसा] गिडालं १ णिडालपस्साणि ३ पाद-पाणितलाणि ७ य । पण्हीतला ९ कडीय तला ११ तीसं मध्यंतरंगुला ४१ ॥ १५६९॥ चउरंसा उंकरालीसं उम्मट्ठभतरा जघा ! पुच्छितम्मि पसरसते चतुरस्सं च णिदिसे ॥ १५७० ।। ॥ चतुरस्साणि ॥ १२० ॥ छ॥ [१२१ वे तंसा] वत्थी १ सीसं २ भवे तसं साकारो य जोऽवरो। खुजंगे पक्सपेंडं ति तं पि तंसं वियागरे ॥ १५७१॥ छ ।110 [१२२ पंच काया ] थूला चेव वधूमट्ठा कायवंतो भयंतिह १ । तथा मज्झिमकाया तु उवथूला भवंतिह २ ॥ १५७२ ॥ मज्झिमाणंतरा काया जुत्तोपचया भवंतिह ३ । तधा जधण्णकाया य कसेहि अभिणिदिसे ॥ १५७३ ॥ जधपणतरका काया परंपरकिसा भवे ५ । एवं पंचविधे काए वियाणेजंगचिंतओ॥ १५७४ ॥ याणमिस्सरियं दव्वं लाभमायुं सुहाणि य । कालं चंउंगम्मि वि भवे कायेहेतेहिं पंचहि ।। १५७५ ।। थूलेसु धूया उकटं उवथूले अणंतरं । एवं सेसेसु कायेसु धूया कच्छंतरेण तु ॥ १५७६ ॥ ॥थूलाणि (काया) ॥ १२२॥ छ । [१२३ सत्तावीसं तणू १२४ एगवीसं परमतणू य] पाद-पाणितला ४ कैण्णा ६ जिब्भा चे ७ णहाणि य २७ । सत्तावीसं तणू उत्ता थीगामत्ये पसरसते ॥१५७७॥ अग्गणहाणि सव्याणि २० अग्गकेसा तवेव य २१ । एगवीसं परमतणू पुच्छिते ण पसरसते ॥ १५७८ ॥ 20 तणुकं ति व जो घूया वघा तणुकतरं ति वा । तधाऽतितणुऊं य त्ति तणुकातितणुकं ति वा ।। १५७९॥ पयणू ति व जो यूया तहा पयणुतरं ति वा । तघाऽति[प]तणुकं व त्ति पतणुं पत' ति वा ।। १५८० ॥ तणुत्तयो तणुणदो तणुलोमो त्ति या पुणो । तणुमज्झं ति या यूया तघाऽतितणुको त्ति वा ।। १५८१ ॥ जे यऽण्णे एवमादीया पन्ना वणुसंसिता । तेसिं संकित्तणे सहा ते वणूहिं समे यदे ।। १५८२ ।। ॥ तणूणि ॥ १२३ ॥ १२४ ॥ छ । 15 . - 25 [१२५ ये अणूणि १२६ एफे परमाणू य] केस-लोम-गहा मंसा चे अणूणि विधीयते । पुच्छिते ण पसरसते अणुं ति य वियागरे ॥ १५८३ ॥ अग्गफेसऽग्गलोमाणि पिम्मट्ठाणि यदा भवे । परमाणू बियाणीया पुच्छितेग पसरसते ॥ १५८४ ॥ परमाणू एकको उत्तो थूला गिम्मट्ठसंजुता । अयसेसा ने भयंगे ते मझत्ये वियागरे । १५८५ ॥ छ । १ उकतालीसं मि.। उपतीलासं संपु.॥ २ जो परो है. त.॥ ३ फण्णा...............निय सं३ पु. फण्णा जिम्मा मोट्ठा य मंगुली जि.॥ ४ मूलवारेए एमपीसं परंपरतण १२४ पवि नाम पते ॥
११८ । 10 16 । अंगविज्ञापण्णय [१३१ दुवालस आकासावि [१२७ पंच हितयाणि] पाद-पाणितलाणं च हितयाणि ४ हितयं च जं५ । पंच एताणि हितयाणि पुच्छितम्मि पसरसते ॥ १५८६ ॥ हितिकं ति व जो वूया वधा हितिकतरं ति वा । तथाऽतिहितिकं च त्ति हिविकं हितिकं वि वा ॥ १५८७ ।। सुहितं वि व जो बूया तथा सुहिततरं ति वा । तधाऽतिसुहित व ति सोहि सोहितं ति या ॥ १५८८ ॥ हितयं ति व जो घूया हिवयत्यं ति या पुणो । हितयरस पिया व ति हितयाकूतं ति या पुणो ॥ १५८९ ।। जे यण्णे एवमादीया पादवा हितयसंसिता । तेसिं संकित्तणासद्दा हितयस्स समा भवे ॥ १५९० ॥ छ । [१२८ पंच गहणाणि] फेस १ मंसु २ अघोमंसु ४ उभो कक्सा ५ तघेव य । गहणाणि पंर जाणीया अधुत्तं च वियागरे ।। १५९१ ॥ किलेसबहुलं अत्यं गहणेसु वियाणिया । वाधि-सोग पैरिकेसं गहणं च तं णिदिसे ॥ १५९२ ।। गणं ति व जो धूया तथा गहणतरं ति वा । तहाऽतिगहणं व चि गणं गहणं ति वा ।। १५९३ ।। विरूढं ति व जो बूया विरूढतरकं ति वा । तधा अतिविरूढं ति विरूद्ध विरूढं ति वा ॥ १५९४ ।। रूढं ति व जो बूया तथा रूढतरं ति वा । अतिरूढं ति या वूया रूढं रूढं ति वा पुणो ॥ १५९५ ॥ घणकटतं या बूया अतिघणकैडतं ति वा । तधा संझडित व त्ति अतिसंझडितं ति वा ॥ १५९६ ।। गहणं वणं ति या वूया रत्नं य गहणं ति वा । गहणा अडवी व ति पदी गहणं ति य ।। १५९७॥ जे यऽन्ने एवमादीया पादया गहणस्तिता । तेसिं संकित्तणे सदा ते गहणसमा भवे ॥ १५९८ ॥ छ। [१२९ पंच उपग्गहणाणि] मुमा वे २ अक्सिपम्हाणि ४ लोमवासि ५ वघेव य । पंचोपग्गहणे जाणे जधुत्तं च वियागरे ॥ १५९९ ।। गहणेसु जघा दिहो सव्यो अत्यो सुभाऽसुभो । घोपग्गहणेसु फलं णिहिसे तु अणंतरं ॥ १६०० ॥ छ । [१३० छप्पण्णं रमणिजाणि] ओहारता ४ गिडालू ५ पाद-पाणितला ९ उरो१०वीसमंगुलिपोहाणि ३० वीसति च णहाणितु ५०॥१६०१॥ णासा ५१ णासपुढो५२ क्षेत्र सोमी ५३ कण्णा ५५ समेहणा ५६ छप्पण्णं रमणिजाणि यधुत्तेण वियागरे ॥ १६०२॥ अभंतरत्यो य जया आगासत्यो य जो भये । रमणीयविसिद्वतरो एवमादि फलं वदे ।। १६०३ ।। रम्मं वि व जो यूया तथा रम्मतरं वि या । अविरम्म ति या यूया रम्मरम्मं ति वा पुणो ।। १६०४ ॥ रमणीयं वि या बूया रमणीयतरं ति या । वधाऽतिरमणीयं ति रमणीयमहो त्ति या ॥ १६०५ ॥ अंभिरामं ति या भूया अभिरामतर ति वा । अतीच अभिरामं ति अभिरामं अहो ति या ॥ १६०६ ।। जं घडगं एवमादीयं रमणीयस्सितं भवे । तरस संकित्तणासदा रमणीयतरं यदे ॥ १६०७ ।। छ । [१३१ दुवालस आकासाणि] पिडालं १ असपीढाणि ३ जाणूहं ५ जाणुपच्छिमं ७ ॥ पाद-माणिवला ११ पट्ठी १२ आकासाणि दुवालस ॥ १६०८।। आगास नि य जो घूया आकासवर ति या । तर अतिआकासं आकासं अहो ति या ॥ १६०९ भागसको चि या यूया आकासं गमो त्ति वा । तपेय बाकासचरो त्या भागाससंसितो ॥ १६१० ॥ १ परिपसं.त. पिना, २-३ वटित ह.त.॥ ४ परिमणीय सं३ पु.॥ ५अमिरम्म ति रात्र.॥ 20 30 । 6 १३७-३८ पेस्सेयाणि] पवमो अंगमणी णाम भज्झाओ आगासं पइरिक ति आकासवियडं ति वा । आकासं विमलं व ति आकासं सोभति त्ति वा ॥ १६११ ॥ यो वऽण्णा एवमादीया कहा आकाससंसिता । तिस्से कहिज्जमाणीय आकाससममादिसे ॥ १६१२ ॥ छ । [१३२ छप्पण्णं दहरचला १३३ छप्पण्णं दहरथावरेज्जा] हत्य-पादंगुली पव्या दहरचला भवंति ते । तेसिं पन्वंतरा सव्वे दहरत्थावरा हि ते ॥ १६१३ ॥ एने चेव तु गिम्मट्ठा दहरचला भवंतिह । अधुत्तं पुन्धमत्वं तु तं सव्यं चलमादिसे ॥ १६१४ ॥ जंघोस्वाहुमज्झे य पट्टी पस्से कर-कमे । दहरे थावरे अंगे एते इच्छंति केयि तु ॥ १६१५ ॥ थिरमत्य वियाणीया सव्यमेव अणागतं । एवमेतेसु सव्वेसु दहरत्यावरेसु तु ॥ १६१६ ॥ हहरो ति व जो बूया तथा डहरतरो त्ति वा । तधाऽतिडहरो व ति डहरातिडहरो त्ति वा ॥ १६१७ ॥ डहराको त्ति वाचूया डहराकतरको ति वा । अतिडहराको व त्ति डहराको अहो त्ति वा ॥ १६१८ ॥ अहोडहरो त्ति वा चूया अतीवडहरो त्ति वा । किहें ता डहराको त्ति जो एस डहरो त्ति वा ॥ १६१९ ॥ o जे यऽण्णे एवमादीया पादपा (पजया) डहरस्सिता । तेसिं संकित्तणे सद्दे डहरत्यावरे समा ॥ १६२०॥ एते य एवमादीया जे सद्दा चलसंसिवा । विभावेतूण ते सम्म डहरचलसमे वदे ॥ १६२१ ।। एते य एवमादीया जे सद्दा थावरस्सिता । विभावेतूण विण्णेया डहरा थावरे समा ॥ १६२२ ॥ [१३४ दस इस्सरा १३५ दस अणिस्सरा य] सिरोऽधरा य ओहं (पओह)तु भवंति दस इस्सरा । णामतो ते पवक्खामि दस चेव अणिस्सरे ॥ १६२३ ।। 15 णिडालं १ मत्थको २ सीसं ३ कण्णा ४ गंडा ५ मुमंतरं ६ । दंतो७४८ णासा ९ जिन्मा य १० उम्मट्ठा दस इस्सरा ॥ १६२४ ॥ एते सव्वे पसस्सते उम्मट्ठा दस ईस्सरा । अणिस्सरे य गिम्मढे एते चेय चियागरे ॥ १६२५ ॥ सव्यमत्यं पसत्यं तु इस्सरेसु वियागरे । थाणमिस्सरियं यदि भोग-लाभ-सुहाणि य ॥१६२६ ॥ इस्सरोपक्सरे चेय इस्सरोवकरणेसु य । इस्सरो त्ति वियाणीया तस्सदोदीरणे, य ॥ १६२७॥ इस्सराणं च आमासे ईसराणं घ आगमे । इस्सराणं घ सरेसु इस्सराणं च कित्तणे ॥ १६२८॥ तधिस्सरगतीणं च सह-रूवकतेसु य । वधिस्सरोवकरणाणं सह-रूवकतेसु य ॥ १६२९ ॥ न पडणं एयमादीयं लोए इस्सरलक्खणं । तस्सद-रूबसलावे ते इस्सरसमे यदे ॥ १६३० ॥ छ । [१३६ चोदस इस्सरभूता] एतो इस्सरभूते तु उ8 णामीय णिदिसे । ते उम्महे वियाणीया इस्सरत्मम्मि अंगवी ॥ १६३१ ॥ छ । [१३७ पण्णासं पेस्सेजा १३८ पण्णासं पेस्सभूया ] पादंगुली १० पादणहा २० पादमंगुलिंपोट्टिया ३० । तला ३२ पम्ही ३४ खुला ३६ गोप्फा ३८ फंडरा ४२ संघ ४४ पेंडिका ४६ ॥ १६३२ ।। जाणि य ४८ फिओ ५० चे पेस्सेज्जाणि वियागरे । पेस्समेतेहि जाणीया पेरसोरकरणेहि य ॥ १६३३ ॥ अन्मंतरे तु जिम्मढे पेस्सेए ति वियागरे । ते" ये किंचि गिम्मट्टे पेस्सभूए वियागरे ।।१६३४|| "480 उर्दु जाहि पामि नि पेस्सभूते वियागरे । अघे जाहि पाद त्ति पेस्सभूते वियागरे ॥ १६३५ ।। १ माशससोमिते ति से ३ पु. सि.॥ २ये या एपमादीया जया मा ह. ह. पिना ।। ३ अ६९.त. ४किय ती डद... त• विना ।। ५सरोरायउत्य तु है. • पिना॥ ६-७ ईसरा...॥ ८ पसरसं तु.॥ ९णेण यत.॥ १० कमेसु है. त•n ११ विधानामुरादरह. एष यते । (0. +20 1 25 पिना । . 10 U अंगविज्ञापइण्णय [१४१ छब्बीसं ममत्याणि पवासं निगम कम्मं पेरसोरकरणाणि य । पेस्सलामं च पेस्सेसु एवमादि फलं घदे ।। १६३६ ॥ पेस्मोत्ति वजो यूया तधा पेरसतरोति वा । अतिपेरसो त्ति या घूया पेरसपेरसोति या पुणो ॥१६३७॥ तपा पेस्सपिको यत्ति पेरसणीकतरो त्ति या । अतिपेसणिको च त्ति अहोपेसणिकि ति वा ।। १६३८ ॥ पढिचारको त्ति या यूया पडिचारकतरो त्ति या । अतिपडिचारको व त्ति अहोपडिचारको त्ति या ।। १६३९ ।। ने यऽणे एवमादीया पजना पेरससंसिता । तेसिं संफित्तणासद्दा पेरसेयसमका भवे ।। १६४० ।। ॥ पेस्सेयाणि । १३७ ॥ १३८॥ छ। [१३९ छचीसं पिया १४० उयीसं वेस्सा य] णिहालं १ मत्यको २ सीसं ३ संसा ५ कण्ण ७ऽविस ९ णासिका १० । दंतो १२ ११४ जिन्म १५ गंडा य १७ उरो १८ थणक २० थणंतर २१ ॥ १६४१॥ इत्ययंगुहका २३ हत्या २५ णाभि २६ ओमजिता पिता। वेस्सा गिमबिया एते ठियामहा अपीलिता ॥ १६४२॥ तथा पिउ त्ति या यूया तघा पिअतरो त्ति या । तथा अतिप्पिओ व त्ति वधा पिअप्पिओ त्ति वा ॥१६४३।। हो ति य जो यूया वधा इट्टतरो ति या । अतिइट्ठो त्ति या यूया इट्टा इट्ठो त्ति या पुणो ॥ १६४४ ॥ दहतो ति य जो यूया तधा दइवतरो त्ति या । अतिदइतो त्ति या बूया दइवातिदइतो ति या ।। १६४५ ।। अभिप्पेवो ति या घूया अभिप्पेततरो ति या । तधा अतिअभिप्पेतो अभिप्पेतो अति त्ति वा ॥ १६४६ ॥ मणामो ति य जो यूया छलिको (छंदको) त्ति व जो वदे । पियदंसगो ति या यूया वधा मायस्सिओ त्ति या ।। १६४७ ॥ जे यऽणे एयमादीया पना पेम्मसंसिता । तेसिं संफित्तणासहा ते प्पिएहि समे यदे ॥ १६४८॥ वेरसो ति प जो यूया तथा वेस्सतरो त्ति या। अतिवेस्सो त्ति या यूया अधोवेस्सो त्ति वा पुणो । १६४९॥ अपिहो ति प जो यूया अगिट्टतरको त्ति या । वघा अतिअणिढो त्ति अहो अणिहो ति या पुणो ॥ १६५०॥ अगभिप्पेतो ति या धूया अणभिप्पेततरो त्ति या। अतीय अणभिप्पेओ अणभिप्पेतो अहो ति या ॥ १६५१ ॥ पहिलो ति या यूया पडिफूलतरो ति या । तथा अतिपहिलो पडिक्लो अहो ति पा ॥ १६५२ ।। अप्पिभोतिय जो पूर्ण अप्तिअतरकोतिया। अतिअप्पिओत्ति या यूया अप्पियाणऽप्पिओ त्ति या ॥ १६५३॥ अफनो ति प जो यूपा अपंततरफो ति या । अति घर पम्सुमार्फतो अफंतो तु अहो ति वा ॥ १६५४ ।। अमगामो ति पा पूया अमंदिको ति या पुणो । अप्पिओ दंसणे य चि विदिहो इसणे ति था ॥ १६५५ ॥ ले पडणे एपमादीया पमया वेरससंसिता । तसिं संफित्तणासहा वेस्सेहि समका भवे ॥ १६५६॥ छ ।। [१४१ छन्चीसं मन्झत्याणि]] गुमंतर पर सो ५२ मत्यको ३ णासिका ४ मुहं ५ । रो६ यगंवर ७ दितयं ८ ..[महत्वाणि वियागरे ॥ १६५८ ॥ मसात्यो सिजो पूर्ण महात्यतरफोति पा । तधेय पतिमात्यो मझत्यो पनि ति या ।। १६५९ ।। भरपितो नि पा पूरा भपत्धिनतरोमि पा । नेपाऽवस्थितो पति अतीय य अपत्यितो ॥ १६६०॥ निगिरोनिया पूर्ण निधिगलरोलिया। समातिनिध्यिकारोनि निदियरो अहो ति य ॥ १६६१ ।। Pratri ...॥ २'रयर्मगु...॥ ३ पागि मुमसिता (जामधिना) 1-1.fna निसिपा tor.freen ना पिपतरो... गलो... ७ गाना पपपिपास in tी अपरिगानी माग गरेप 13 । 8 ८रापापापym..
5 10 15 - १५२ पण्णासंदीणा] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ १२१ मज्झत्यमुदाहरणा जे यऽन्ने एवमादीया । तेसिं संकित्तणासहा मझत्थसममादिसे ॥ १६६२ ॥ छ । [१४२-१४६ वारस पुढविकाइकाईणि] पुषसु पुर्वि जाणे दगं गिद्धेसु णिहिसे । अग्गेये सप्पभे उण्हे अग्गिमो(मे)तेसु णिदिसे ॥ १६६३ ॥ वायुणेयेसु सव्वेसु वातं वातमणेसु य । वणप्फती तु णातव्या गहणोपगहणेसु य ॥ १६६४ ॥ छ । [१४७ वीस जंगमाणि] चले १ अस्सास २ पस्सासे ३ आउंटण ४ पसारणे ५ । उवेहु ६ हित ७ संचिढे ८ गमणा९ऽऽगमणेसु य १०॥ १६६५ ॥ फदिते ११ चलिते १२ यावि गिविल्लु १३ म्मिल्लितम्मि १४ य । तसकायोवलद्धीयं २० जंगमं ति वियागरे ॥ १६६६ ॥ [१४८ तेत्तीसं आतिमूलिकाणि] पादंगुहा य २ पादा य४ गोप्फा ६ जंघो८ रु १० जाणुका १२ । अंसा १४ वाहू १६ पवाहू य १८ बाहुसंधी २० तघेव य ॥ १६६७ ॥ उदरं २१ कडी २२ कडीपस्सा २४ लोमवासी २५ तधेय य । उरो २६ सिरा २७ ऽधरा २९ जत्तुं ३० मुहं ३१ सीसं ३२ तला ३३ तथा ॥ १६६८॥ एते सव्वे जता होंति उम्मट्ठा तु अपीलिता । तेत्तीसं आतिमूलीया सव्यत्येसु पसरसते ॥ १६६९ ॥ अँधा पुण्णामधेयेसु आदेसो तु विधीयते । एवं एतेसु सव्वेसु आतिमूलेसु णिदिसे ॥ १६७० ॥ छ । [१४९ तेत्तीसं मन्झविगाढाणि] एते चेव समामहा जवा होति अपीलिता । मझे विगाढा तेत्तीसं पुच्छितम्मि पसस्सते ॥ १६७१ ॥ तथा मझे विगावेसु तेत्तीसायं पि अंगवी । पुण्णामधेयेहि फलं विसिद्धवरकं वदे ॥ १६७२ ॥ छ ।। १५० तेत्तीसं अंता] अंगुली २० केस २१ लोमगं२२ कन्न २४ णासग्गमेव २६ य । कोप्परा २८ पण्हिक ३० फिजा ३२ तहेव य फकाडिका ३३ ॥ १६७३ ।। एते तेत्तीसतिं अंता णिम्मट्ठा य जया भवे । पसत्ये ण पसरसते णिरत्येसु पसस्सते ॥ १६७४ ॥छ । [१५१ पण्णासं मुदिता १५२ पण्णासं दीणा य] अभितरंगा मुदिता याहिरंगा य पीलिता । पुणो अभितरा चेव 'संविमट्टा तु दीणगा ॥ १६७५ ॥ मुदिते [या] पमोदं पा हासं पीतिं य णिदिसे । जणं छणुस्सयं सव्वं जं याऽमुदइकं भवे ॥ १६७६ ।। 'दीणेसु धाधि सोग घ परिफेसं च णिद्दिसे । जघा णपुंसफाअत्ये एवमेसु फलं वदे ॥ १६७७ ॥ मुदितो ति य जो यूया तथा पमुदितो त्ति या । हट्टो तुट्ठो पहहो त्ति उदत्तो सुमणो चिया ॥ १६७८ ॥ णिव्वुते सुहिते य त्ति आरोगो पीणितो ति या । फतत्यो कतफनो ति संवत्तमणोरघो ति या ॥ १६७९ ।। उसयो ति समासो ति विहि जण्यो छणो त्ति या । पालोपणयणं याधुम्नं अधिषमणकं ति पा ॥ १६८० ॥ 30 जं पऽण्णं उत्सयपरं सव्यन्मुदइकं प ज । तस्म संकित्तणासदा मुदितेहि सममादिसे ॥ १६८१ ।। दीगो ति दुम्मणो पत्ति परितंतो ति या पुगो । चहितो ति सोफत्तो चिंता-झाणपरो तिघा ॥ १६८२ ॥ अगिब्बुतो आतुरो ति पैरायिवणिरागतो । अफवत्यो असिद्धत्यो अहमो पियमसमतो॥ १६८३ ।। हितो पडितो यत्ति भिण्यो मंतुलितो ति या । पिपासितो परिस्संतो छातो तण्याइतो त्ति या ॥ १६८४ ।। १ अरे चिन्लम्-यायुणेयालि दादा, पातमणाः पुनपनार दवि गंग्याप्रमाणविरोध इति ॥ २ टिप पिलिप पा यि मिप्यतु.. ॥ ३तुत.॥ ४ जता मुष्णा' ग॥ ५समा सदा जदा दौति ..॥ ६संधिमा ७पाणेसु यायि(पि)योग यई. स.॥ ८'मेपमु पि पलं ..॥ ९ति तिघे जणो.. मिना ॥ १० उपठितो.. पिना । १९परायत...॥ 20 25 ₹..चिना ॥ भंग०१६ 6 10 15 अंगविजापइण्णयं [१५३ वीसं तिक्लो अलद्धलामो उव्यातो असंपत्तमणोरधो । विहलो विपडतो त्ति विहतो ति विचेयणो ॥ १६८५ ॥ जे यऽणे एवमादीया पन्जवा दीणसंसिता । सिं संकित्तणासद्दा दीणेहि समका भवे ॥ १६८६ ॥ छ । [१५३ वीसं तिक्खा] तिक्सग्गदंतर्गहणा अग्गदंता तु सूयिता । समे सद्दे य जाणेजो तिक्खा जे मणिके मता ॥ १६८७ ॥ तिक्सं ति व जो बूया तधा तिक्सतरं ति या । अतितिक्खं ति वा यूया तिक्खतिक्खं ति वा पुणो ॥१६८८॥ तिक्सलोहं ति या धूया तिसं आयुधं ति यो । सत्यकं अतितिक्खं ति जं चऽण्णं तिक्खणामकं ॥ १६८९ ॥ आउधाणं च सव्वेसि सत्थकाणं च सव्यसो । लोहोपकरणाणं च सव्वेसिं तिखणासणे ॥ १६९० ॥ जे यऽन्ने एवमादीया पदे या तिक्खसंसिता । णामसंकित्तणे तेसिं तं तिक्ससममादिसे ॥ १६९१ ॥ छ । [१५४ पण्णत्तरि उवटुता १५५ पण्णत्तरि वापण्णा य] पुण्णामा पीलिता सव्ये एते होति उबैदुता । उवत्ता य विछिन्ना य यापन्न त्ति वियागरे ।। १६९२॥ पापण्णा य णिग्गहिता वापण्णा होति पावका । एतेसिं च वग्गाणं तिण्हं पि फलमादिसे ॥ १६९३ ॥ जघा दीणे आदेसो अप्पसत्यो पवेदितो । उवहुतेसु वि तथा सव्यं असुभमादिसे ॥ १६९४ ।। वापण्णेसु विणासं च सरीरं वापदं तथा । सव्वत्थागं च यापत्ति दुभिक्खं या वियागरे ।। १६९५ ॥ छ । [१५६ दुवे दुग्गंधा १५७ दुवे सुगंधा य] दुग्गंधेसु परीतावं आयासं घ वियागरे । सयणा दुकुंठं च अयमाणं च णिदिसे ॥ १६९६ ॥ णासापुटा य पिहिता दुग्गंधा वे ण पूयिता । अयंगुता सुगंधा य पुच्छितम्मि य पूयिता ॥१६९७ ॥ छ । [१५८ णव युद्धीरमणा १५९ चत्तारि अबुद्धीरमणा य] हत्य २ पाद ४ भूम ६ ऽक्सि ८ मुहं ९ बुद्धीरमण ति णिदिसे । पस्सो २ दरं ३ च पट्टी य ४ अयुद्धीरमणा भवे ॥ १६९८ ।। गाणं युद्धीरमणेसु मति मेधं च णिदिसे । अवुद्धीरमणेसु घदे मोहं मुक्सत्तमेव य ॥ १६९९ ॥ पुद्धीमंतो त्ति या थूया बुद्धिमततरो त्ति या । अतीय बुद्धिमंतो त्ति बुद्धिमंतो अहो त्ति था ॥ १७०० ॥ मतिमंतो त्ति या यूया मतिमंततरो त्ति या । अतीव मतिमंतो त्ति मतिमंतो अहो त्ति था ॥ १७०१ ॥ मुयुद्धियो ति या यूया सुबुद्धिमंतो त्ति या पुणो । तथा पसण्णबुद्धि त्ति वितबुद्धि त्ति या पुणो ॥ १७०२॥ जे यऽणे एवमादीया 'पदे या चुद्धिसंसिता । तेसिं संकित्तणे सहा ते बुद्धिरमणे समा ॥ १७०३ ॥ छ । [१६० एफारस महापरिग्गहा १६१ चत्तारि अप्पपरिग्गहा य] उदर १ हत्यं ३ पादं घ५ फण्या ७ णासं ८ सिणो १० मुहं ११ । महापरिग्गहा एते सामिद्धि पऽत्य णिदिसे ॥ १७०४ ॥ छ । फेस १ लोम २ णदं ३ मंसुं ४ एते अप्पपरिग्गहा। पुच्छिते ण प्पसस्ते दारिदं पऽत्य गिरिसे ॥१७०५॥छ।। [१६२ एकूणयीसं पद्धा १६३ सत्तापीसं मोक्सा य] एत्य पादं सिदा फणा 5 पऽ किचि पंधति । ददेसु यावि सम्मु एते पंपे वियागरे ॥ १७०६ ।। छ। हत्य पाई सिदा कण्या सं पsviffपि गुंधति । घलेसु यावि सव्येमु एत्य मोक्सं वियागरे ॥१७०७॥७॥ १"मजोरम १.६.॥ २'गणदा अगानिा ॥ ३ या पुणो । सत्य है • पिना। ४"पखणे खणे ५ उपरपा(•• ६ उपात्ता.. ७"सुदितधा •त.॥ ८°दि सम्प प.त.॥ कितिमि... १० पायपा पुग्या १..॥ 20 23 20 5 10 15 १८१ वारस पिण्णाणि] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ १२३ [१६४ पण्णासं सका १६५ पण्णासं परका १६६ पण्णासं सकपरक्का य] दढा बंधा चला मोक्खा सका अभंतरा भवे । परका वाहिरा मिस्सा वाहिरभंतरा भवे ॥१७०८॥ [१६७-१७२ दुवे सद्देया दुवे स्वेया इच्चाइ] सद्देया कण्णसोता वे २ णयणा दंसणिया दुवे २। णासापुडा २ य गंधेयं रसेयं जिम्भमादिसे १ ॥१७०९॥ तयं च १ पोरिसं २ चे फासेयाणि वियागरे । मणेयं हितयं १ जाणे अंगविजाविसारओ।। १७१०॥ सद्देयेसु पिओ लोए इढे सद्दे सुणेति य । विस्सुतो य महाणम्मि महं च लभते जसं ॥ १७११ ।। दसणीयेसु कंतो य सव्वस्स पिअदसणो । गुणप्पगासो लोगम्मि पियाणि पि य पावति ॥ १७१२ ।।. गंधेयेसु यसभागी इट्टे गंधे य पावति । सम्मतो यावि लोकस्स णारीसु सुभगो वि य ॥ १७१३ ॥ रसेयेसु मणुण्णाणि भोयणाणि तु भुंजति । गहितवक्को य सद्धेयो सम्वत्थ य विसारदो ॥ १७१४ ॥ सयणा-ऽऽसण-जाणाणि वाहणाणि य पावति । थिओ य भूसणाई च फासेयम्मि पिसेपति ॥ १७१५ ॥ मणेयम्मि ट्ठियामहे सव्वविजाविसारतो । पंडितं बुद्धिमंतं च गिद्दिसे सुबहुस्सुतं ॥ १७१६ ॥ छ । [१७३ चत्तारि वातमणा १७४ दुवे सद्दमणा १७५ दस व्रण्णेया य]. मुई १ णासग २ कण्णा य ४ एते वातमणा भवे । गुदो य १ मेहणं चेव २ एते सदमणा भवे ।। १७१७॥ केसमंसु १ उरो२ पट्टी ३ जंघा ५ कक्खा उभो ७ तथा । वत्थिसीसं च ८ संखा य १० चण्णेयाणि वियागरे ॥ १७१८॥ जो पुव्यमुत्तो आदेसो गहणेसु विधीयते । वण्णेयेसु वि एमेव आदेसं संपकप्पते ॥ १७१९॥ छ । [१७६ दस अग्गेया] मुहम १ऽच्छी ३ उरो ४ हितयं ५ तले ७ जिब्झ ८ तिके १० वि तु । एते अग्गेययं णेया इथेस दुविधो गमो ॥ १७२० ॥ अक्खीणि २ णासिका ३ कण्णा ५ णिडालं ६ मुह ७ मत्यगो ८। फण्णुप्परिका य ९ सिरस १० अग्गेयां दस पूयिता ।। १७२१ ॥ गणेस्सरिकलाभेसु अग्गेये अग्गिकम्मसु । पुण्णामधेयेसु फलं विसिद्धवरकं यदे ॥ १७२२ ॥ छ । [१७७ दस जण्णेया] सिरोमुहस्सयामासे अग्गेया य भवंति जे । जण्णेया दस वक्साता पसत्या तत्य पुच्छिते ॥ १७२३ ॥छ । [१७८ दुवे दसणीयाणि १७९ दुवे अदंसणीयाणि य] दसणीयाणि वे पक्खू १ सोणी य २ पसस्सते । अदंसणीया य दुवे उणिय १ विकूणिवा २ ॥१७२४॥छ।। [१८० दस घलाणि] मत्यको य१णिडालं घ२ गंडा य४ हिवयं ५ रो६ । फर-फमवला १० चेव धलाणि दस मिदिसे ॥ १७२५॥छ । [१८१ वारस णिण्णाणि] णिण्णाणि यक्सणा२ कक्सा ४ अक्सिकहाणि वे तपा ६ । अंतो य फण्गसोवाणि ८ च गीगा य हेहवो १० ॥१७२६॥ फुटो ११ प णामी य १२ एवं पिण्णानि यारम । पुच्छिते न पसरसते गिगं पऽत्य वियागरे ॥ १७२७ ॥ छ । १ मूलदारेषु दुधे रुयेया १६८ इति नाम वर्तते ॥ २ मूल्दारेषु दस जम्मा १७५शी नाम रसो॥ ३ लाटेमुपाणे १.त.॥ ४ या सम्यपु.१० २. पिना । ५ मि चम्गुणाई..॥ 20 25 30 5 ॥ 10 - 16 अंगविजापइण्णयं [१८२णव गमीरा [१८२ णय गंमीरा १८३ णव परिणिण्णगंमीरा] गंभीरे तु मुहं १ पास ३ कण्णे ५ वाहुं ९ च णिदिसे । ते चेय णिण्णगंभीरे अंतिमढे वियागरे ॥ १७२८॥ [१८४-१८९ पण्णरस विसमा चोद्दस उण्णता इच्चाइ ] णासं १ ऽसपीढा ३ सवसणा ५ फिओ७ कोप्पर ९ जउँगा ११ । खलुका १३ मणिबंधा य १५ विसमा पण्णरसाऽऽहिया ॥ १७२९ ॥ मत्थको सीसफूडाणि विसमा जे य कित्तिया । णासावंसो य ऍगूगं उण्णत ति वियागरे ॥ १७३०॥ जे पुधू ते समा होति अग्गेया उसिणा भवे । जे णिद्धा ते भवे सीता सीतला आवुजोणिया ॥१७३१॥ जघा गिद्धेसु सम्वेसु आदेसो तु विधीयते । सँघाऽऽपुणेएसु फलं विसिद्वतरकं वदे ॥ १७३२ ॥ छ । [१९० चउरासीतिं पुण्णा १९१ पण्णत्तरि तुच्छा य] गंडा २ थणो ४ दरं ५ आसं ६ अंजली ८ मुहमेव ९ य । पुण्णामा ८४ ते वओम्मट्ठा एते पुण्ण ति णिदिसे ॥ १७३३ ॥ णपुंसकाणि सव्याणि परंपरकिसा य जे । तुच्छाणेताणि जाणीया अप्पसत्थाणि णिहिसे ॥ १७३४ ॥छ॥ [१९२-२३८ एकूणवीसं विवरा इच्चाइ] मुई १ पालुं च २ मेढें घ ३ अंगुलीअंतराणि य १९ । एकूणवीसं विवरे वियाणे अंगचिंतओ ॥१७३५॥१९२॥ एते चेय जधुत्ता तु संपेंडितसंपुडा । अंगे अपी(वि)वरा होंति ते बियाणेज्ज अंगवी ॥ १७३६ ॥ १९३ ॥ अक्खीणि २ हत्य ४ पादं च ६ दो७ मेढें८ तव य । अटेच एते जाणेजो अंगे विअडसंवुडे ॥ १७३७ ॥ १९४ ।। जिम्मा १ अक्खीणि ३ अरू य५ पाल ६ मेहणमेय य७ । सुकुमालाणि सत्तेव वियाणे अंगचिंतओ ॥ १७३८ ॥ १९५ ॥ अबुद्धीरमणा अंगे जे पुज्यं परिफित्तिता । ते चेव दारुणे जाणे सव्वेए अंगचिंतओ ॥ १७३९ ॥ १९६ ॥ निभा १ ओहा ३ थणा ५ गंडा ७ सत्तेय मदुका भवे । जघुसमणुगंतूणं ततो घूयांगचिंतओ ॥ १७४०॥१९७ ॥ दारुणाणिय पत्तारि पुन्युत्ताणि तुयाणिह । पत्थीणाणि तु साणेव वियाणे अंगचितओ॥१७४१ ॥ १९८॥ रमणीया जे तु अंगम्मि पुव्यं तु परिकित्तिया । ते चेव सण्हा णातव्या जधुत्तं च वियागरे ॥ १७४२॥१९९॥ सब्वे गहसिहाओ य२० कोप्परा २२ जण्णुकाणि य २४ । चतुव्वीसं खरा एते वियाणे अंगचितओ ॥ १७४३ ।।२०।। पादाणं अंगुलीओ य १० कुडिल त्ति धियागरे २०१ । एत्याणं अंगुलीओ य १० उजुकं ति वियागरे ॥ १७४४ ॥२०२॥ गिटालं १ अग्गकण्णा य ३ भुमो ५ हा७ दंतसेदिका ८ । संसा ये १० कण्णपालीओ १२ अंगुहांगुलिभिरसह ३२ ॥ १७४५॥ फक्सा ३४ णासापुटा घेय ३६ एते चंडाणता भवे । तीसं हु णातव्या अधुत्तं पवियागरे ॥ १७४६ ॥ २०३।। २ पाप.त. रिना ॥ २ भति' • तपिना ॥ ३ जुण्णगा • ता॥ ४ पपूर्ण १० त• पिना ॥ ५ भाउजो ...तमा पुग्णपशु पर. ॥ ७ पधुम्म • त• गया। ८ गुदो मदररेष पत•॥ ९मरचीणाणि t... १०ीस..॥ 20 25 30 6 10 15 २२७ बारस महंतकाई णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ अंघो २ रु ४ बाहु ५ एताणि आयताणि वियागरे । २०४। जंघा २ [फि]यो ये ४ णातव्वा आयता मुद्दियाणि तु ॥ १७४७ ॥२०५॥ उत्तमाणि तु जाणंगे ताणि दिव्याणि णिदिसे ॥ २०६॥ जाणेव मंज्झिमाणंगे ताणि माणुस्सकाणि तु ॥ १७४८ ॥ २०७ ।। तिरिच्छजोणिया अंगे मज्झिमाणंतराणि तु । २०८ । जधण्णाणि तु जाणंगे ताणि णेरइकाणि तु ॥ १७४९ ॥ २०९ ॥ णहसेढी-दंतसेढीओ पहा दंतसिहा य जा । उवदुता य ७५ तिक्खा य ९५ एते रुद्दे वियागरे ॥ १७५० ॥ २१० ॥ पीती १ णिज्झाइतं या वि २ दुवे सोम्मे वियाणिया । पुच्छितम्मि पसस्संते सोतव्यं चऽत्थ णिदिसे ॥ १७५१ ॥ २११ ॥ ओहँ २ गुह ६ गुलीओ य २२ मिदुभागे वियाणिया । जधुत्तमणुगंतूणं ततो वूयांगचिंतओ ॥ १७५२ ॥ २१२ ॥ अंगुट्ठा २ होति पुत्तेया २१३ कण्णा होंति कणिल्लिका २ । २१४ । अणामिका २ मज्झिमियो ४ थिया होति ण संसयो ॥ १७५३ ॥ २१५ ॥ पदेसिणीहि २ विण्णेया जुवतीयो ण संसयो । थिया तु तिविधा एवं अंगुलीहिं विभावये ॥ १७५४ ॥ २१६ ॥ णिम्मजिताणि दीहाणि णिग्गहीताणि ताणि तु । दुग्गट्ठाणाणि एताणि जधुत्तेणं वियागरे ॥ १७५५ ।। २१७ ॥ पाद-पाणितला ४ ओट्ठा ६ अपंगा ८ जिब्भ ९ तालुका १०। कणवीरका १२ तधंगुहा १४ तंबाणेताणि चोद्दस ॥ १७५६ ॥ २१८ ॥ फेस १ लोम २ णहं ३ मंसुं ४ एते रोगमणा भवे । पुच्छिते ण पसरसंति बहुरोग' च णिदिसे ॥ १७५७ ॥२१९॥ 20 कक्खा २ पसणंतरं ४ चेव अधिट्ठाणं ५ समेहणं ६ । एताणि पूतीणि भवे जधुत्तेण वियागरे।। १७५८ ॥ २२० ॥ उभो हत्या २ उभो पादा ४ उभो य णयणाणि तु ६ । एताणि छ व्यियाणीया चवलाणंगचिंतओ।। १७५९ ॥२२१॥ सिर १ ललाडं २ पट्ठी य ३ पस्साणि ५ उदरं ६ उरो७ । एते अचवले सत्त जघुत्तेण वियागरे ॥ १७६० ।। २२२ ॥ गोज्झाणि मेहणं १ पालुं २ वसणे य ४ वियागरे । रहोसंजोगपुच्छायं थी-पुमसे पसस्सते ॥ १७६१ ॥ २२३ ।। हत्या २ मुहं च ३ अक्खीणि ५ उत्ताणुम्मत्यकाणि तु। जघुत्तमणुगंतूणं गिद्दिसे अंगचिंतओ॥१७६२।२२४॥ कण्णसकुलिओ २ कण्णा ४ फिओ ६ जंघो ८ रु १० पेंडिका १२ । तताणेवाणि जाणीया जधुत्तं च वियागरे ॥ १७६३ ॥ २२५ ॥ जाणि लुक्खाणि १० ताणेव दूरं गिम्मजिताणि तु । मताणेताणि जाणीया अप्पसत्यं च गिदिसे ॥१७६४ ॥ २२६ ॥ थूले चैव तघुम्महे महंताणि वियागरे । महंतकं इस्सरियं अत्यं भोगे य णिदिसे ॥ १७६५ ॥ २२७ ॥ १माणालिका है. त•॥ २ रोममणा सं३ पु.॥ ३ रोमं च से ३ पु.॥ 25 80 - 5 10 15 १२६ अंगविज्ञापइण्णय [२२८ अट्ठावीसं मुयि दंढाणुम्मजियाणि तु सुचिकाणि वियागरे। पुच्छितम्मि पसस्संते सोयवं चऽत्य णिदिसे ॥ १७६६ ॥२२८॥ पूतीणि जाणि अंगम्मि ६ केस ७ लोम ८ णहं च ज १० । संविमट्ठाणि' चउंगम्मि किलिट्ठाणि वियागरे ॥ १७६७ ॥ २२९ ।। अंगे पुण्णामधेयाणि वराणि पवराणि य । तम्मि सव्यम्मि अत्यं तु पसत्यं संपवेदये ॥ १७६८ ॥ २३० ।। ताणि चेव णिमित्तस्स णायकाणि विधीयते । तौणऽधिहाणभूयाणि आदेसरस सुभाणि तु ।। १७६९ ।। २३१ ।। णिमित्ते सव्ववत्थूणं सव्वणीया णपुंसका । तेण इटेहिं अत्येहि सव्यकालं वियजिया ॥ १७७० ॥ २३२ ।। जाणेय वज्झबज्झाणि ताणि अणार्यकाणि तु ।। २३३ ॥ अणुं च परमाणुं च णिरत्थे त्ति वियागरे । १७७१ ॥ २३४ ॥ अण्णेयाणि तु अंगम्मि पुण्णामाणि तु णिहिसे । जेसु पुण्णो सुभो अत्यो ण कोति पतिसिन्झति ॥ १७७२ ॥ २३५ ॥ मुजोरुमंगुलीणं च अंतराणंतराणि तु । जधा गुज्झेसु आदेसो अंतरेसु वि तं वदे ॥ १७७३ ॥ २३६ ॥ दंत १ हत्यणहाणि ११ च एते सूर ति णिदिसे ।। २३७ ॥ अच्छीणि २ हितयं चेव ३ तयो भीरु वियागरे ।। १७७४ ॥ २३८ ॥ [२३९ पण्णासं एक्ककाणि] एकसिं चेव आमटे एगं भेकुंगुलीय य । एगाभरणेकवारीसु एगोपकरणम्मि य ॥ १७७५ ॥ छ । [ २४० पणुवीसं विकाणि] मिधुणे विअंगुलीगहणे एकेकेसु य वीसु तु । जमलाभरणे चे जमलोवकरणे विकं ॥ १७७६ ॥ छ । [२४१ दस तिकाणि] तिंगुलिग्गहणे चेव एकेकेसु तिसु तथा । तिसिके य तिकोडीके तंसेसु य तिकेसु य ॥ १७७७ ।। भुमसंगयचूलायं णासायं च तिकम्मि य । पोरसे य सणालम्मि तिकण्णम्मि य तिणि तु ॥ १७७८ ॥ छ । [२४२ अट्ट चतुक्काणि] चतुरस्सेसु सव्वेसु चटप्पयगतेसु य । घउफेसु य सम्वेसु चउग्गुण चतु पदे ॥ १७७९ ॥ चउसंगुलीसु चत्तारि घउसु एकेकेसु य । वधा करतले चेव तधा पादतलम्मि य ॥ १७८० ॥ छ । [२४३ छ पंचकाणि ] फिजंसपीढे दो श्चेव समुढिकरणे थणे । पंचंगुलीणं गहणे सणरे सैयणासणे ॥ १७८१ ॥ पंच तस्से पंच काये एकेकेसु य पंचसु । सन्वपंचकसंजोगे पमाणं पंचकं वदे ॥ १७८२ ।। छ । [२४४ छक्कए ठिआमासे] चउके विगसंजुत्ते वेसुं चेन तिकेसु तु । तिसु विकेसु छक्के य पंचके चेकसंजुते ॥ १७८३ ॥ मणिबंधण गोप्फे य विणरे सयणाऽऽसणे । सव्वइकगते चेन अंगवी छक्कसादिसे ॥ १७८४ ॥ छ । [२४५ सत्तए ठिआमासे] - पस्से य सोणि फण्णे य जंघायं पाहुणालीयं । कुक्सिम्मि संत्तके चेय चतुक्कसहिते तिगे ॥ १७८५ ।। सयणाऽऽसणे सपुरिसे विगाढे वा चतुप्पदे । सव्यसत्तकसंजोगे पमाणं सत्तकं तिग ॥ १७८६ ॥ छ । १ व्वाणु सं ३ पु० ॥ २"णि रंगम्मि सं ३ पु० । "णि घागम्मि ६० त॥ ३ ताणि वि ठाण' है. त० ॥ ४ यतणाणि तु सप्र•॥ ५ मूलद्वारेषु पण्णासं अण्णजणाई २३५ इति नाम दृश्यते ॥ ६सूरित्ति है. ० विना । ७सजणा सत्र.॥ ८सबछवगए चेन है. त. विना॥ ९ सस्थत ह. त० विना ।। 20 25 30 - 6 10 ३७०एगे अपरिमिते] णवमो अंगमणी णाम अज्झाओ १२७ [२४६ अट्ठए ठिआमासे] हितये ऊरू य मझे य णाभी पाणितलम्मि य । णिडाले चेव कण्णे य विचउक्के ये पिंड़िते ॥ १७८७ ॥ सयणासणे य जमले जमले य चतुप्पदे । सव्वमट्ठकसंजोगे पुच्छं अट्ठाहमादिसे ॥ १७८८ ॥ अटुंगुलमईसे तघऽहाकारणम्मि य । बूया अट्ठाहिकं पुच्छं वीसु पादतलेसु य ।। १७८९ ॥ छ । ..[ २४७ णवए ठिआमासे] णवसंगुलीसु णवके य णवसेककेसु य । णवंसि णवभिद्दीसु णवणक्खसिहासु य ॥ १७९० ॥ अट्ठगे एगसहिते सचतुके य पंचगे । छक्के तिगसंजुत्ते णवाहं तिरियपेक्खिते ॥ १७९१ ॥ छ । [ २४८ दसए ठिआमासे ] पिंडितेसु य पादेसु उवाहणा-पादुकासु य । तधंजलिकच्छभके विहत्यी उवणामिते ॥ १७९२ ॥ विपंचके वा सहिते अट्ठके विकसंजुते । सत्तगे तिगसंजुत्ते दुसाहो उजुपेक्सिते ॥ १७९३ ॥ छ । [२४९-२७० वे पण्णरसवग्गा जाव एगे अपरिमिते] तिपंचके य सहिते दसक्खे य सपंचके । तघेव पादजंघे य चूया पण्णरसेव तु ॥ १७९४ ॥ छ ।) वीसं तु असफलके जण्णुके कोप्परेसु य । वेसु चेव दसक्खेसु चउकेसु य पंचसु ॥ १७९५ ॥ छ । जणूम वीसं मझे य ऊरू वे पणुवीसका। तीसं कडीय पणतीसं णिहिसे अंतरोदरे ॥ १७९६ ॥ चत्तालीसं च णामीयं णामीय उवरिं पुणो । पणतालीसं ति या घूया पंचासं हितयम्मि य॥ १७९७ ॥ 16 थणंतरे पंचवण्णा उरे सहि वियागरे । जैत्तूसु पंचसहि [ ] ॥ १७९८ ॥ असे य सत्तर धूया गीवायं पंचसत्तरि । हणुकायं सहोहाय, असीर्ति पुणमादिसे ॥ १७९९ ॥ णासायं पंचासीति णवती भूमकासु य । पिडाले पंचणउति सिरम्मि सतमादिसे ॥ १८०० ॥ एवं एतेसु ठाणेसु पंच पंच समारभे । पिट्ठोदरे सपिटुंते सहस्सं वाहु-तालुके ॥ १८०१ ॥ पुणं सतसहस्सं तु संवुतम्मि मुहे भवे । अवंगुते मुहे कोडी विप्पेतविजिब्भिते ॥ १८०२ ॥ तधा छिद्देसु सम्वेसु तं अपरिमितं वदे । जधण्णेसु य सव्वेसु हणुकायं तघेव य ॥ १८०३ ॥ केसमंसूसु लोमेसु भिण्णं तु सतमादिसे । भिणं सहस्सं जाणीया मज्झिमाणंतरेसु य ।। १८०४ ॥ सहस्साणं पमाणं तु मज्झिमेसु वियाणिया । तधा सतसहस्साणि कायवंतेसु गिदिसे ॥ १८०५ ॥ ऍतं चतुरसु कायेसु पमाणं उपलक्खये । संहारे काययंताणं कोडिं यूयांगचिंतओ॥ १८०६ ॥ काययंते य उम्महे दढे य अमितं धणं । अन्भतरे दढे गिद्ध पुण्णे पुण्णामसुकिले ॥ १८०७ ॥ [ 1] समेसु यावि सन्वेसु समं वूयांगचिंतओ ॥ १८०८ ॥ भिन्ने दसक्समाधारे वे या चत्तारि अट्ट वा । आधारिते सते यावि अट्ठ पत्तारि वा घदे ॥ १८०९।। अणुमाणेण सव्वेण सहस्साणि वियागरे । तथा सतसहस्साणि कोडिं या अंगवी वदे ॥ १८१० ॥ एते[हिं] चेव सव्वेहिं अंगवीजपदेहि तु । गिउणं संपधारेतो यूया अपरिमितं विधि ॥ १८११ ।। एत्तो विविधमाहारं जघन्नं मज्झिमुत्तमं । जुत्तं तदुभयामासे लक्सये तु इमं गमं ॥ १८१२ ।। उत्तमं अयडं गीवं हितयं पट्ठीं घ मज्झिमं ! फटि-वक्खणे जघण्णे तु एवेस तिविधो गमो ॥ १८१३ ।। एवं भिण्णसतादीयं गमेणेतेण अंगवी । समे य विसमे चेव विण्णातूण वियागरे ॥ १८१४ ॥ छ । ... 20 25 ......... 30 1 । १ जिम्मूले है. त•॥ २ गुलिमदंसे है• त. विना ॥ ३ 'मिडीमुहै. त.॥ ४ जतूसु है• त॥ ५°सट्टियं एवं ठाणस्सुणुकम्मे ॥ वि०॥ ६ पंचणियुति सं २ पु.॥ ७एवं ह. तु.॥ ८ कायर्यतेमु उम्मटे से ३ पु.॥ ९ अधा सम•॥
। 10 15 ૧૨૮ अंगविनापदण्णायं [उक्संहाये दक्सिणागि तु सव्वाणि सव्वाणेव दढाणि तु । अणागताणि सव्यागि क्या अभंवराणि य ॥ १८१५।। अन्तरतराणि या अन्योयतागि यागि य । याताणुत्तमाणि च उचमागतराणि य । १८१६ ।। जागिं च जोत्र्यणत्याणि भेत्राणि य सव्यसो । मुकपण्डपडीमागा गिद्धगिद्धतराणि च ॥ १८१७ ॥ आहाराणि य सञ्चाणि आहारतरकागि य । वधा पुरत्यिमाणि या पुन्बदक्षिणकागि य ।। १८१८ ॥ सव्याणि [य] पसन्नागि पसण्णतरकाणि य । जे य यामद्धणाहाय [.....................॥ १८१९॥1 सियाणि बघ थूलागि दीहाणुम्मनिताणि य । परिमंडला य उम्मट्टा बट्टा चेत्र अभिमुद्दा ॥ १८२० ।। चतुरस्सा य उम्मट्ठा उम्मट्टा पुघुला य जे । कायरतो य आमहा हिवयागुम्मनितागि य ।। १८२१ ॥ रमणीया य उम्मट्ठा हरा थावराणि य । इस्सराणि य सव्याणि पियाणि य विसेसतो।। १८२२ ॥ ववेय आतिमूलीया मझगाढा तवेय य । मुदितागि सुगंधागि सेबुद्धिरमणागि य ॥ १८२३ ॥ महापरिग्गहागिं च सकाणिं च वषेव य । सद्देया दंसणीया य गया उ वर्षय य ॥ १८२४ ॥ फासेया य रसेया य टम्महा जया मवे । क्या अग्गयया या याणि य तय य ।। १८२५ ॥ भावुणेयाणि पुण्याणि उन्नुकाणि वय य । दिव्याणि घ सव्याणि सोमाणि य मितूगि य ॥ १८२६ ।। पुत्तेयाणि य बागि उचाणागि सूर्याणि य । वराणि णायकाणि च आणेयाणि महाणि य ।। १८२७ ।। बघा पुण्यामधेयेमु सव्यं दिदं सुभासुमं । वघा एतेमु सब्वेमु सव्यं बूया मुमासुमं ॥ १८२८ ॥ छ ।। मझिमाणि य सच्यागि यचमाणागि जागि य । वहिरन्मंतराणि च अन्मंतरवाहिराणि य ॥ १८२९ ॥ सामोनावाणि सोमाणि कण्हा मझिमकाणि य । मन्झिमार्गतराणि च सत्त्वेस्साणि जाणि य ।। १८३० ।। विणा य कण्हणीलहिं पडिमागा तु सेसगा । सन्चे बेर टियामासा कण्हलुक्सेहिं जे विणा ॥ १८३१ ।। गिद्धलुक्साणि सव्वाणि लुक्सगिद्धाणि जागि य । वधा आहारणीहारा णीद्दाराहारसंजुता ।। १८३२ ॥ पॅरिमुत्तरागि सव्याणि पसण्णा मिरमका य जे । उवयूलागि जागंगे जुत्तोपचयागि य ॥ १८३३ ।। जुचप्पमाणदीहाणि दीहजुत्चागि जागि य । परिमंडलागि जागंगे भवे करणोवसंहिता ॥ १८३४ ॥ वया मझिमझाया य मन्झिमाणतरा य ने । आकासाणि य सव्याणि ईस्सराणंतराणि य ।। १८३५ ।। वामिस्म-सक-परकाणि सीटण्हाणि समाणि य । मुकुमाले य अंगम्मि तथा वियहसंवुडे ।। २८३६ ॥ संहाणि मद्रुकाणि च [ग्नुकाणिं च] जाणि तु ! माणुस्सकागि सव्यागि कण्णेयाणि य जाणि[तु] ॥ १८३७ ॥ जुरतेयानि सन्याणि धीमागाणि जाणि तु । तया अचवलाई च तथा गोझाणि जाणि य ॥ १८३८ ॥ जया पीणामषेत्रेमु सव्यं वुचं मुमा-मुमं । तया एतेमु सव्वेमु फलं चूया सुमा-ऽमुमं ॥ २८३९ ॥ छ । वामाई च चलाई च अतिश्चागि जाणि य । वाहिराणि य सत्र्याणि वझवझंवराणि य ॥ १८४० ॥ फण्हामि अतिकण्हागि जघण्याणि य जाणि तु । महठ्ययाणि सव्यागि आदेयागि वधेब य ।। १८४१ ॥ कण्हणीटपडीमागा टियामासा वर य । लुकमागि लुक्सलुक्साणि णीहारा जे य कित्तिता ।। १८४२ ।। त्या पादहारणीहारा तथा पच्छिमक्सिगा। तर पच्छिमाई घ तत्र पच्छिमुत्तरा ।। १८४३ ।। अन्मसम्यागि जागंगे अममणेतरा य । य पाणहरा यामा यामा धणहा य जे ॥ १८४४ ॥ मंग्यायम्माणि जागंगे अंगे( अग्गे )याणि किमागि य । परंपरकिमाई च तथा इस्माणि जाणि य ।। १८४५ ॥ मा जहण्यसाया य बघण्गनरका य जे 1 व परंपरतणू परमाणू अणू य ॥ १८४६॥ १जन्मानयागि है..॥ २°माणुत्तराई..॥ ३ आहारी गेयसव्याणि पियाणि य रिसेसटो तथा पुर.. पिना उम्मट्टाति ॥ ५ मुथुद्धि है. त•॥ ६ कच्छा मच्छिमकाणि य सर. ॥ ७ परिमुत्ताणि स ३ पु• मि. ॥ ८इम्सराणिवरानि है. तु.॥ ९यामिस्सं सको प्पर सत्र० ॥ १० सम्माणि महुकाणि च जागिन्तु अंगचितो.॥ - 20 29 30 उवसंहारो] णवमोअंगमणी णाम अज्झाओ गहणोपगहणा जे य तथा डहरचलाणि य । अणिस्सरा य पेरसा य पेस्सभूया य अप्पिया ।। १८४७ ॥ अंता दीणा य तिण्हा य वापण्णोपडुता य जे । अबुद्धिरमणा दुग्गंधा तधा अप्पपरिगहा ॥ १८४८ ॥ वंध-मोक्खा परका य सह-बातमणा य जे । अदंसणीया पिण्णा य गंभीरा दुविधा य जे ॥ १८४९ ॥ विसमाणि य तुच्छाणि विवरा दारुणा य जे । पत्थीणाई खराई च कुडिला चंडाणता य जे ॥ १८५० ॥ आयता मुद्दियाणिं च तिजजोणिगताणि य । दुग्गट्ठाणाणि रुद्वाणि तधा रोगमणाणि य ॥१८५१॥ पयलाइताणि चंगम्मि सधा ओमत्थकाणि य । मताणि जाणि चंउंगम्मि तधा पूतीणि जाणि य ॥ १८५२ ।। किलिहाणि य जाणिं तु तथा णीयाणि जाणि य । तधा अण्णजणाणिं या णिरत्थाणंतराणि य ॥ १८५३ ॥ जधा णपुंसकाणं तु फलं दिडं सुभासुभं । तधा एतेसु सव्वेसु फलं घूया सुभासुभं ॥ १८५४ ॥ छ । एवं समुचिता एते मणिणो तिण्णि रासयो । पुण्णाम-त्यी-णपुंसेहि छ 'णिदिलं च जहकमं ।। १८५५॥ तत्य जो दक्खिणा दीगो रासी अंगम्मि कित्तितो। सो तु सम्यो जधुदिह्रो पुण्णामेहि समप्फलो॥१८५६॥ 10 वितियो मज्झिमादीयो रासी पुब्धं पकित्तितो । सो वि सव्यो जधुठ्ठिो धीणामेहिं समप्फलो ॥ १८५७ ॥ ततितो यामभागो तु जो रासी पुव्यकित्तितो । सो वि सव्वो जधुट्ठिो णपुंसकसमप्फलो ॥ १८५८ ।। एवमेते जधुद्दिट्ठा तिधा तिण्णि जधझमं । पुण्णाम-थी-पुंसेहिं विण्णातव्या समप्फला ॥ १८५९ ॥ मणीसमुच्चयो णाम अज्झायो तिविहष्फलो । सतसाहो सहस्सक्खो दारसतसहस्सिओ ॥ १८६० ॥ [............. .] महापुरिसदिण्णाए समक्खातो महामणी ॥ १८६१ ॥ केवलं अंगविजाए मणिओ अस्थि दीवणो । अंग-रसरविणिव्वत्तो अंगस्स रयणं मणि ॥ १८६२ ॥ मणिओ अंगहिययं णिमित्तहिययं तथा । ततियलोकहितयं तस्स णामं विधीयति ॥ १८६३ ॥ तंपियसज्झायरओ णिचमाधारए णरो । अणण्णमतिमं दच्छो तरे वागरणोदधिं ॥ १८६४ ॥ णागतण्णुमसिरस व णापुत् णासहरसतं । ण अणातभूतं पायेजो भगवंतं महामणि ॥ १८६५ ॥ एतमासन हि गरो अगंर्तमतिचक्खुमं । अजिणो जिणसंकासो पचक्खं देवतं भवे ॥ १८६६ ॥ हिता-ऽहिताण अत्थाणं दिव्यमाणुसकाण य । संपया-ऽणागता-ऽतीताण विण्णाया भवतंगवी ॥ १८६७ ।। धियाधारो सूयी सूरो दच्छो सुप्पतिभाणवं । आमास-सह-रूवण्णू जियो विय वियागरे ॥ १८६८ ॥ ॥णमो अरहंताणं । णमो सवसिद्धाणं । णमो भगवतीए महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय समुद्देसो मणिसव्यकारणणिद्देसो मणी नाम नवमो अन्झाओ सम्मत्तो ॥९॥छ॥ 15 20 23 सहसचिहान्तर्गतमुत्तरार. तु. एर पर्दते ॥ २६सविधानमंडः पाठः १. त• एव पर्न ॥ ३ 'मागी तुर... दिना । ४'वसति..पिना। अंग०१७ १३ एचिमा परे.त. माति १४अच्छायप 5 संयाधगते सव्यरोधगते सव्यविवादकडे व्यविम्गहकडे र कूडमासके कूडणाणके कूडलेक्खे कूडपाउम्भावे "लंकारे या सव्वकीड-किविल्लकपादुब्भावे वा एवंविहसा-रुव- पले या मले या भूसणे या सव्यअत्थगते सव्यअत्योपयारगते सव्वअत्यपुष्णामपहट्ठ-पसत्य-परघ पचगतपुप्फे या 20 सम्यअत्यभोयणगते एवंविघसर-रूयपाउन्भावे अत्यत्थिगताय आगतो सि त्ति पयो सव्यववहारगते सम्बसामिद्विगते दढामासे अभंतरामासे गिद्धामासे मुद्धामासे पुण्णामासे पुण्णामधेजामासे मुदितामासे तत्य सव्यं सन्यचलामासे पादुम्माये सव्यगजीयपरामासे - सव्यसनीरसरगते सव्यसम्बीरउयकरणपादुम्भाये खसजीवगते सम्बसजीव- मध्यसनीय उपकरणसदगते सव्यसनीयउयपरणणामधेशोदारणे अंकुर-परोहगते पत्तुदग-पुप्फउसजीवसकरणपरामासे पदुम्माये सभी अत्यं पूया १ । सत्य परशामासे फण्डामासे रस्सामासे मतामासे सलगते एविधसा-रूप- पपाटगरो मोमि रिक्ततुरटगते सव्यसरीरमायणगते धाउगए एयंविधसा-रूयपादुम्माये अजीयोह-पुष्फ फल-तय- [दसमो आगमणज्झाओ] णमो भगवतो अरहतो यसवतो महापुरिसस्स महावीरवद्धमाणस्स । अधापुव्यं खलु भो! महापुरिसदिष्णा अंगविज्ञाय आगमणणामाज्झायो। [तं खलु भो! तमणुवक्खस्सामि]। तं जहा-तत्य पंचविधं आगमणं जाणित भरति । तं जधा-णिरत्थयं १ दंसणट्ठयाय २ विण्णासणठ्ठयाय ३ आयरणट्ठयाय ४ - अस्थत्थिकत्थताय चेति । तत्य वझामासे घलामासे तुच्छामासे कण्हामासे णिम्मजिते गिल्लिखिते कासिते खुधिते लुचिते परमुडे पपुढे पंमुते अधोमुहे अवलोकिते अवसरिते ओलोकिते ओसारिते सव्वअसक्कारिते सव्वअसारगते तुच्छके रित्तके कुंवल्यणायं था एवंविधसद-रूपपादुभावे गिरत्थकं आगतो सि त्ति यूया १। तत्थ हितयामासे णयणामासे मुमंतरामासे माता-पितु-भाउ-भगिणि-सोरी-मित्व-संबंधिगते सव्यमित्तगते सव्वदेवगते सव्यपेच्छागते सव्वरंगावचरगते सब्यविक्षगए सव्यरूवगए सव्ययुद्धवण्णरागगते सव्वदंसणीयगते एवंविधसद-रूवपादुब्भावे दंसणट्ठयाय आगतो सि त्ति बूया २ । 10 तत्य भमुसुक्खेवणे अच्छिणि कासिते अंतोमुहे इसिते दरकडाय वा विजायं दरकडे या सिप्पे दरकडे या उपकरणे दरसलाविते वा सव्वदरकडे वा जूते वा जणवाए वा वादसलावे वा सव्वमायागते सव्वउवधिगते वा सन्च चित्तविजागते या सव्यपुच्छणागते वा सव्वग्गणगते वा सम्वतिसंधणागते वा एवंविधसहरूबपादुभावे विणा- सणहताय आगतो सि त्ति घूया ३ । तत्व गडिलोमेसु गतेसु विकूणिते ओढणिकुंजेणे सीसविकंपणे सव्ययालगते सन्च 18 या पण्णे पुप्फे फले या मल्ले या भोयणे या घरमा पादुम्भावे आयरणद्वताय आगतो सि त्ति यूया ४ । तत्य रामा दामासे गिद्धामासे सुद्धामासे पुण्या अच्छाइते पागुते परिहिते अणुलित्ते अलंकिते सेसग्गहणे जणयालोरमले वा भूसणे या उद्दोगिते अमिहढे अभिनडे सत्य अत्ये पुष्याधारिते सय्यमत्यं दुविधमाधारए-सजी १ अजीयं पेय । पगगते मध्यमत्रीयपाउमापे सम्पअधीयपरामासे सन्यअञ्जीवणामधेनोदीरणे सव्ययातंपुर गरय मानी अत्ये पुख्याधारिते सन्नीयमत्यं दुविधमाधारये-मणुरसजोणिगतं घेर १ तिरियच्या २. नाप उनकामागे अनुगो शुभाषगते सध्यमपुरसपाउभाये सव्यमणुसपरामासे सध्यमणुरससइगते सात पेर २. ११- एशि पर.... नामि २ पम्मुने । पु.॥३ कर...॥४°दरीए ५ गोष... पिना सम्पगुदं पदयात.. fनाn७ 'गुपपोत• Rना ne •imir... या १०शितः पार... एष पते ॥ ११ १२ गुला... १५ माघे पुण्यापारे से राशीप.... १६५ एपि "मामा.... राजीवगते सम्बनी- १ मसिना Artha एलमि दसमो आगमणज्झाओ घेञोदीरणे संव्यमणुसरूवागितिपादुब्भावे सव्यमणुरसरूवागितिपरामासे सेव्यमणुस्सरूंवागितिसदगते या सव्वमणुस्सरुवागितिणामधेळोदीरणे वा एवंविधसद्द-रूवपाउन्भावे मणुस्सं चूया १ । तत्य तिरियामासे तिरियगते तिरि- यविलोकिते सव्यतिरिक्खजोणिपादुभावे सव्यतिरिक्खजोगीकपरामासे सव्यतिरिक्खजोणिकसद्दगते सव्यतिरिक्खनोणि- कणामधेजोदीरणे सव्यतिरिक्खजोणिकरूवागितिपाउभावे सव्यतिरिक्खजोणिकरूवागितिपरामासे पा सव्यतिरिक्खजो- गिकरूवा गतिसदगते वा सव्यतिरिक्खजोणिकरूयागितिणामधेजोदीरणे वा सव्यतिरिक्खजोणिकउयकरणपादुन्भावे या सव्यतिरिक्सजोणिकउवकरणपरामासे वा सव्यतिरिक्खजोणिकउवकरणसद्दगते या सव्यतिरिक्सजोणियउयकरणणामधे- जोदीरणे सव्यतिरिक्खजोणिकथी-पुरिसणामधेजोदीरणे था एवंविधसह-रूवपादुन्भावे तिरिक्खजोणि चूया २ । तत्थ मणुस्से पुव्याधारिते अजो १ पेस्सो २ त्ति पुणरवि आधारयितव्यं भवति । तत्य ॐ उद्धं णामीय गत्तेसु डा उद्धं णामीय गत्तोवकरणे सव्यअजसमाचारगते सव्वअजगते सव्यअजपादुभावे सव्यअजपरामासे सव्यअञसद्दगते [ सव्वअजणामधेजोदीरणे सव्वअजरूवागितिपादुभावे ] सव्वअन्जरूवागितिपरामासे या संव्यअन- 10 रूयागितिसद्दगते सव्यअज रूवागितिणामधेनोदीरणे वा संव्यअजउवगरणपाउम्भावे हा सव्वअजउवकरण- परामासे सव्वअजउवकरणसदगते सव्वअजउयकरणणामधेजोदीरणे या सव्वअजयीपुरिसणागवेजोदीरणे एवंविधसद्द- रूवपाउन्भावे अजं मणुरसं बूया १ । तत्य अधोणामीगत्तामासे अधोणामीगत्तोपकरणे संव्यपेरसगते सयपेस्सो- घयारगए सबपेरसपादुभावे सव्यपेस्सपरामासे सव्यपेस्ससहगते सब्बपेरसणामधेनोदीरणे सन्चपेरसरूवागिति- पादुन्भावे सव्यपेस्सरूवागितिपरामासे सव्यपेरसरूवागितिसद्दगते सव्यपेस्सरुयागितिणामधेजोदीरणे सव्यपेस्सउयकरण- 15 पादुन्भावे सव्यपेस्सउवकरणपरामासे सव्यपेस्सउवकरणसद्दगते सव्वपेस्सउपकरणणामधेजोदीरणे सन्यपेस्सथी-पुरिसणा- मधेजोदीरणे एवंविधसद्द-रूपपाउमावे पेस्सं मणुस्सं चूया २ । सत्य अजो पेस्से त्ति पुव्यमुपधारिते इत्थी १ पुरिसो २ त्ति पुणरविआधारयितव्वं भवति । तत्थ दाहिणामासे पुण्णामधेजगत्तामासे पुरिसपाउमावे पुरिसपरामासे पुरिससदगते पुरिसणामधेनोदीरणे पुरिसरुवागितिपाउम्भावे पुरिसरुवागितिपरामासे पुरिसरूवागितिसद्दगते पुरिसरूवागितिणामधेनोदीरणे पुरिसणामधेनोवकरणपाउम्भावे - पुरि-20 सणामधेजोवकरणपरामासे या पुरिसणामधेजोयकरणसद्दगते पुरिसणामधेजाउयकरणणामधेनोदीरणे पुरिसणामधेज- दिव्बजोणिगतपादुभावे या पुंरिसणामधेजदिव्यजोगिगयपरामासे हा पुरिसणामधेनदिव्वजोणिगतसद्दगते पुरि- सणामधेनदिव्यजोगितणामधेञोदीरणे पुरिसणामवेजपाणजोणिगतपादुब्भावे पुरिसणामघेजपाणजोणिगतपरामासे पुरि- सणामधेजपाणजोणिगतसद्दगते पुरिसणामधेजपागजोणिगतणामधेञोदीरणे ॐ पुरिसनामधेजधाउजोगिगयपाउन्भावे पुरिसनामधेनधाउजोणिगयपरामासे पुरिमनामपेजधाउनोणिगयसद्दगए का पुरिसणामपेजधातुनोणिगतणामधेनोदीरणे 25 पुरिसणामधेनमूलजोणिगतपाउभावे पुरिसणामधेनमूलजोणिगतपरामासे » पुरिसणामपेजमूलजोणिगतसदगते पुरिसणामपेजमूलजोणिगतणामधेनोदीरणे सव्यपुरिमोरकरणे या सव्यपुरिसोयचारगते या पुण्णामधेने पुप्फे या फले या भूसणे या भायणे वा एवंविधसद्द-रूवपाइन्भावे पुरिसं धूया १ । तत्य यामामासे धीगामवेजगत्तामासे थींपाउन्भाये थीपरामासे धीसदगते धीणामधेनोदीरणे धीरूयागितिपादुन्मावे शीरूयागितिरामासे खा "यीस्यागिति- सदगते - धीरूयागितिगामधेनोदीरणे धीरूवागितिउरकरणपाउम्भावे धीरूयागितिउरकरणपरामासे धीरूयागितिश्यकर- 30 सदगते • धीरूवागितियकरणगामधेनोदीरणे धीग्यमधेनदिव्यजोगिगनपादुभावे थीगामपनदिन्यजोणितपरामासे धीणामधेनदिव्यतोनिगतमदगते थांगामधेनदिव्यजोगिगतगामधेनोदीरणे यीणामपेजधातुजोगिगनादुभाष धीगा- ११:- एपिहान्तर्गतः पाठः ९• त• नास्ति ॥ २ मस्सो पेस्से ति पुण... त• ॥ ३ हाचिनर्गतः पाठः . त. एव पर। ४ गते घेय सव्य' ह. स. ॥ ५ चतुरसम्गतः पाठः सामु प्रतिए नाति ।। ६ सम्पमतम्यागि. तिणामपेजोदीरणे या सय्यमजरूयागिति सदगते रस म्पलगस्पेन सामु प्रति पये याति ॥ ७-८-२-१-११- विन्दर्गतः पठ. है.त. एस बरवे ॥ १२ लबिहानर्गतः पाठः १. त• नामि॥ १३ हम पिना पाठ...त. एपग ॥ १४८- एननिर्गतः पाठःत. नामि।
१३२ भंगविजापइण्णय मपेजधातुजोणिगतपरामासे । यीणामधेजधातुजोणिगतसद्दगते - धीणामपेजधातुजोणिगतणामधेनोदीरणे यीणा- मवेजपाणजोणिगयपाउमावे म घीणामवेजपाणजोणिगतपरामासे थीगामवेजपाणजोगिगतसद्दगते यीणामवेजपा- णजोणिगतणामधेजोदीरणे यीणामपेजमूलजोणिगयपाउभावे हा धीगामधेजमूलजोणिगतपरामासे थीणाम- घेजमूलजोणिगतसदगते थीणामपेजमूलजोणिगतउपकरणणामधेजोदीरणे सव्वइत्यिसमायारगते इत्थीवेसगते इत्थीगामे B पुप्फे फले या भूसणे वा भायणे या एवंविधसद्द-रूबपाउन्भावे इत्यी वूया २ । इति सजीना समणुगता। तत्य दिव्यजोणिगते दिव्यत्वी-पुरिसपाउभावे चा परामासे [वा] सदगते या णामपेनोदीरणे या उपकरणगते वा दिव्यत्यी-पुरिसे एवंगतं जं भवति इति सनीनो अत्यि दिव्य-माणुस्सको थी-पुरिसगतो विण्णायव्यो भवति । तत्य सजीवे अत्थे पुव्याधारित तिरिक्खजोणिगते तिरिक्सजोणिगतं अत्यं तिविधमाधारये। तं जधा-चतुप्पदगतं १ पक्खिगतं २ परिसप्पगतं ३ चेति । तत्य चउप्पदेसु चतुरस्सेसु चउकेसु सव्वचउप्पयगते सव्यचउप्पयपादुद्भावे सब्य- 10 चउप्पयपरामासे सव्यचउप्पयसद्दगते सव्वचउप्पयणामधेजोदीरणे सव्यचउप्पयरूवागितिपादुन्भावे सव्वचउप्पदरूनागि- विपरामासे सव्वचउप्पदरूयागितिसद्दगते सव्यचतुप्पदरूयागिविणामधेञोदीरणे सव्यचतुप्पद्उपकरणपाउन्भावे सव्यचउ- प्पयउपकरणपरामासे सव्वचउप्पयउपकरणसद्दगते सव्यचउप्पयउपकरणणामधेनोदीरणे सव्यचउप्पय 83 'थी-पुमंस छ णामवेजोदीरणे एवंविधसद-रूवपाउटभावे चउप्पयगतं अत्यं संचिंतियं ति यूया १ । तत्थ उद्धं गीवाय सिरोमुहामासे उद्धं गीवा-सिरो-मुद्दोवकरणउलोगिते उरिसते उच्चारित उद्धंभागे सव्यपक्रिसपाउभावे सव्वपक्सिपरामासे सव्वपक्सि- 16 सदगते सव्यपक्सिणामधेनोदीरणे सव्वपक्सिरूवागितिपाउन्भावे सयपक्सिरूवागितिपरामासे सव्यपक्खिस्यागिति- सदगए सव्यपक्खिस्यागितिणामधेजोदीरणे सव्वपक्सिउवकरणपाउन्भावे सव्य [पक्सि] उपकरणपरामासे सव्वपक्खि- उपकरणसदगए सव्यपक्सिउबफरणणामधेनोदीरणे सेव्यपक्खिणामधेनोदीरणे थी-पुरिसगते एवंविधसद्द-रूयपाउ- मावे पक्खिगयं सजीयं अत्यं घूया २ । तत्थ दोहेसु सव्यपरिसप्पपाउन्भावे सव्यपरिसप्प का परामासे सव्यपरि- सप्पसहगते सव्यपरिसप्पणामधेजोदोरणे सध्यपरिसप्परूवागितिपाउव्भावे सव्यपरिसप्परूयागितिपरामासे सम्बपरिसप्प- ५० रूयागितिसद्दगते सव्यपरिसप्परूयागितिणामघेजोदीरणे सव्वपरिसप्पऽयगरणपाउन्मावे सव्यपरिसप्पउवगरणपरामासे सन्यपरिसप्पउयगरणसद्दगते सव्यपरिसप्पउयगरणणामधेनोदीरणे सव्यपरिसम्पत्थि-पुरिसणामधेजोदीरणे एवंविधसद्द-रूप- पाउम्भावे परिसप्पकतं सजीव अत्थं यूया ३ । तत्य तिरियसजोणिकते [अत्ये] पुव्यमाधारित तिरिक्सजोणिकतं तिरिक्सं दुविधमाधारये-पुरिसो तिरिक्सजोणी १ इत्थी तिरिक्खजोणी तत्य दक्षिणामासे पुण्णामधेजामासे पुरिसपादुभावे पुरिसपरामासे पुरिससद्दकते 25 पुरिसणामधेजोदीरणे पुरिसरूयागितिपाउब्भावे एवंविधसद्द-रूयपाउभावे पुरिसं तिरिक्खजोणिगतं घूया १ । तत्य वामामासे सरीरयीणामजामासे सरीरत्यीणामधेनोदीरणे व ईत्यीपादुद्भावे » इत्थीपरामासे इत्यिसदगते इत्यीणाम- घेनोदीरणे इत्थियागितिपादुघ्भावे इत्यिसमायागते इत्यावेसगते एवंविधसद्द-रूवपाउदभावे इत्थीतिरिक्खजोगिगतं वूया २ । तथा मणुस्सेसु थी-पुरिस-पपुंसकप्पविभागो तथा तिरिक्सजोणीयं पि आमास-सह-रुवपविभागेहिं पुबुद्दिष्टेहि णातव्यं मयति । इति सजीयो अत्यो विष्णेयो। तत्य अजीवे अत्थे पुन्यमाधारिते अजीयमत्यं तिविधमाधारये । तं जहा-पाणजोणिगतं १ मूलजोगिगतं २ धातुजोणिगतं ३ चेति । तत्य पलामासे २ सेव्यपाणजोणिपरामासे - सव्वपाणजोणिपादुव्भावे सव्यपाणजोणिगतप- रामासे सव्यपाणजोणिगतसदगते सव्वपाणजोणिगतणामधेनोदीरणे सव्यपाणजोगिथी-पुरिसगते पाणजोगिमयं अजी वूया १- एनचिहान्तर्गतः पाठः १. त• नास्ति ॥ २-३-४ हस्तविहान्तर्गतः पाठः है. त• एव वरते॥ पाठगन्दर्भः १. स. एव वर्तते । निगए है. त• ॥ ७ हसचिहान्तर्गतः पाटा है• त• एव वर्तते ॥ ८ एतचिहान्तर्गतः ५हस्तचिहान्तर्गत. ९ पुंसुदिट्टे सं३ पु.॥ १०८०- एतचिहान्तर्गतः पाठः है.त. सि. नास्ति । । 30 १ पाठःई..माति॥
दसंमो आगमणज्झाओ १। तत्य दृढामासे सव्यधातुजोणिगते सम्बधातुजोणिपाउभावे सव्यधातुजोणिगतपरामासे सव्वधातुजोणिगयस- द्दगए जा सव्यधातुजोणिगतणामघेजोदीरणे सव्वधातुमये या उपकरणे सम्बधातुजोणीथी-पुरिसगते एवंविधसद-रुवपा- दुव्भावे धातुजोणिगतं अज्जीवमत्यं वूया २ । तत्थ गहणेसु केस-मंसु लोमगते सव्वमूलजोणिपादुभावे सव्यमूलजो- पिपरामासे सव्वमूलजोगिसद्दगते । सेव्यमूलजोगिणामधेजोदीरणे - सव्यमूलजोणिमए उपकरणे सव्यमूलजोणिगए णामधेजे उपकरणे एवंविधसद्द-रूवपादुन्मावे थी-पुरिसगयं अत्यं अज्जीचं बूया ३ । स तत्थ पाणजोणिगतणामपेज- 5 उपकरणे * एवंविधसद्द-रूवपाउभावे णपुंसकगतं * अत्यं अन्नीवं बूया । - तत्य पाणजोणिगते अत्ये पुन्चमाधारिते पाणजोणिगतं अत्यं दुविधमाधारए-आहारगतं उवकरणगतं चेव १ मूलजोणिगतं उवगरणगतं चेव २ । तत्थ अभंतरामासे ढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे आहार-मुह-गीवाय दंतोडे गंडे कवोल-जिब्भ-तालुके परसपदे सहितय-कुक्खि-उदरपरामासे उछित्ते परिलीढे णिग्गिणे अस्साविते सँस्साविते सव्यमो. यणगते सव्वपाणगते सव्वपाण-भोयणभायणगते सव्वआहारगते पुष्फफले पत्त-पवाले भक्खपक्खिचतुष्पदे परिसप्पगते 10 एवंविधसद्द-रूवपादुभावे पाणजोणिगतं अजीवआहारगतं अत्यं घूया । तत्य सव्वउवगरणगते सव्वकारुकगते सव्वसि- पिगगते सव्व ण्णाहारगते पाणजोणिगतं अजीवउवकरणगतं अत्यं घूया १ । तत्थ पाणजोणिमये आहारगते अजी- वमत्थे पुन्वमाधारिते पाणजोणिगतो अजीवो आहारगतो अत्यो दुद्धं दधिं णवणीतं तकं घेतं मांसं वसा मजमिति, इति पाणजोणिगतो अत्यो आहारगतो त्ति चूया । तत्थ पाणजोणिगते अजीवे उपकरणगते अत्ये पुव्यमाधारिते अजीवो पाणजोगिगतो उवकरणगतो अत्थो अद्विगतो दंतगओ सिंगगतो चम्मगतो व्हायुगतो लोमगतो वालगतो 15 तंतुगतो सोणियगतो चेति, इति पाणजोणिगतो उवकरणगतो अज्जीवो अत्यो २ । तत्थ धातुजोणिगते अत्थे । पुव्यमाधारिए धातुजोणिगयं अत्यं दुविहमाहारए-अग्गेयं १ अणग्गेयं २ चेति । तत्थ सव्वअग्गेयेसु उण्हेसु सध्वअग्गिपाउम्भावे सव्वअग्गिपरामासे सव्वअग्गिसहगए सव्यअग्गिणामधिजोदीरणे सब्बरतेसु सव्यअग्गिजीवणेसु सव्वअग्गिजीवणोपकरणेसु य अग्गेयं घूया १ । तत्थ सव्वअणग्गेएसु सव्वसीयलेसु सव्य- उपकवरेसु (सव्वउवकरणेसु) सव्वअणग्गिजीवणेसु अणग्गेयोवजीवणोवकरणेसु य अणग्गेयं धाउजोणिगयं अत्थं यूया 20 २ । तत्थ अग्गेये धाउजोणिगए अत्ये पुव्यमाहारिए सबलोहाणि खारलोहाणि अग्गेयं च मणिधाउकयं धूया । तत्थ अणग्गेये धातुजोणिगते अत्ये पुब्वाधारिते अणग्गेयं धातुजोणिगतं वण्णधातुगतं कठिणधातुगतं अत्यं पुढविधातुगतं अणग्गेयं च मणिधातुगतं रसधातुगतं घूया । इति धातुजोणिगतो अणग्गेयो अंग्गयोदुविधो अत्यो भवति । तत्थ मूलजोणिगते अत्थे पुव्वाधारिते मूलजोणिगतं अत्यं तिविधमाधारये-मूलगतं १ खंधगतं २ अग्गगतं ३ 25 चेति । तत्य अधोभागेसु अघेणामीय उपकरणे सव्यमूलजोणिपाउन्भावे सव्यमूलजोणिपरामासे सव्यमूलजोणिसदगते सव्वमूलजोणीणामधेनोदीरणे सव्वमूलजोणिउवकरणपादुद्भावे सव्यमूलजोणिउवकरणपरामासे सव्यमूलजोणिउवगरण- सद्दगते सव्यमूलजोणिउवकरणणामधेजोदीरणे एवंविधसद्द-रूपपादुब्भाचे मूलगतं अत्यं धूया १ । वत्य सव्यसमाणे सम- १ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः हं० त० एव वर्तते ॥ २-३-4 एतचिहान्तर्गदः पाठः १. १० नास्ति । पुण्यन्तर्गतः पाठः सि• एव वर्तते । सं३ पु० प्रतिषु रिकं स्थानं वर्तते । ५ उट्टमिए परि' है. त०॥ ६ संसाविते . त• विना ॥ ७ अजीचं आहा है. त। अजीवमाहा सि० ॥ ८°यणाहार' है. त• बिना ॥ ९०णिगते आहा है. त•॥ १० घतमासवमांसमधुमिति है• विना ॥ ११ उत्थिगतो है• त.॥ १२ हस्तचिन्तर्गतः पाठः है. त• एव पते। नं ३ पु• ति• प्रतिषु पुनरेतत्स्थाने पुबमाधारित धातुजोणिगणेसु य भणग्गेयं धातुजोगिगतं अत्यं व्या । तत्य भग्गेये धातुजोणिगते अत्ये पुचमाधारिते सव्वलोहाणि खारलोहागि सारलोणाहि अग्गेयं च मणिधातुकं यूया । तन्य यणग्गेये इति रूपः पाटो वर्तते । १३-4- एतचिहान्तर्गत पर्द है. तु. नाति । १४ य सवदुरिजो अत्यो है. ता॥
भंगविजापदण्णंयं, समाणोपकरणेसु सव्यसमभागोपलद्धीयं सव्यसंधगते सव्यखंधपाउन्माचे सव्यसंधपरांमासे सव्यखंधसदगते सनसंधणाम- धेजोदीरणे सव्वसंधईफासोवलद्धीयं सब्यसमभागोयलद्धीयं सव्यखंधमये उपकरणे सव्यसंधोवकरणे एवंविधसद-रूयपा- उन्भाचे खंधगयं यूया २ । तत्थ उद्धंभागेसु उद्धंगत्तोपकरणे सव्यपुप्फ-फल पत्त]पादुन्भावे सव्यपुष्फ-फल-पत्तपरामासे सयपुप्फ-फल-पत्तसद्दगते सव्यपुप्फ-फल-पत्तणामधेजोदीरणे सव्यपुप्फ-फल-पत्त उपकरणपाउन्भावे सध्यपुष्फ-फल-पत्त- । उयकरणपरामासे सव्यपुप्फ-फल-पत्तउयकरणसहगए हा सव्यपुप्फ-फल-पत्तउपकरणणामपेजोदीरणे एवंविधस- द-रूयपादुद्भावे अग्गगतं मूलजोणिगतं अत्यं घूया ३ 1 इति मूलजोणिगतो तिविधो अत्यो भवति । तत्य चलेर्मु णटं वा पायासिकं वा आतुरं या बूया-तत्थ अभंतरे चलेसु णडं यूया, वाहिरेसु चलेसु पावासिक घूया, विमझेसु चलेसु आतुरं यूया । बढेसु बद्धं वूया । मोक्सेसु मोक्सं यूया । तत्य हियय-कुक्रिस-णाभि-उदर- उच्छंग-पोरुस-अंगुट्ठक-कणेटिकापरामासे पयं पयं अंतरेण पुर्छितुं आगतो सि ति यूया । पुण्णामोपलद्धीयं पुत्तं यूया । 10 धीणामोवलद्धीयं दारिकं घूया । पुण्णामधेजेसु पुरिसं अंतरेण पुच्छिउँ आगतो सि त्ति यूया। थीणामधेजेसु इत्यीमंतरेण पुच्छिदं आगतो सि त्ति घूया । णपुंसकेमु णपुंसकमंतरेण पुच्छिउँ आगतो सि त्ति बूया । दढेसु सारिकोपकरण- मंतरेण [पुच्छिउं] आगो सि त्ति यूया । कण्हेसु सारिकोपकरणमंतरेण पुच्छिउँ आगतो सि सि धूया । संवेमु रत्तोपलद्धीयं च सुवण्णकं वूया । सुक्षेसु सारवंतेसु य मझकं धूया । सव्यधणोपलद्धीयं धणं घूया । गिरत्थफेसु णिरत्यकं घूया । तत्थ गिद्धेसु कूर्व घा णदिं या समुदं या पुच्छिउँ आगतो सि त्ति धूया-तत्थ उम्बिद्धेसु पूर्व 16 चूया, दीदेसु णदि धूया, महापरिगहेसु परिक्खेवेसु य समुदं यूया । तत्थ कसेसु सुत्तं वा अच्छादणं वा कसं वा थी-पुरिसं अंतरेण पुच्छिउं आगतो सि त्ति बूया । तत्य कसेसु अजवेसु केस-मंसु-लोमगते सुत्तं या तंतुं वा विततं वा धूया । तत्थ वत्ये वित्थते परिहिते पागुते वेढणे वा अच्छादणं यूया । तत्य सजीवेसु पुण्णामेसु पुरिसं घूया । यीणामेसु सनीवेस इत्यिकं घूया । णपुंसके णापुंसकं बूया । तत्य थलेसु उण्णतेसु पव्ययं या पासायं या उण्णतं चूया । तत्थ गणेसु रणं यूया । उपग्गहणेसु आरामं यूया वणरासिं या वूया । परिमंडलेसु भायणं यूया । पुधूसु य पुर्वि 20 वा निलंजं या वूया । जण्णेयेसु जण्णं वा वाजं वा धूया । अग्गेयेसु अग्गी धूया । गिद्धेसु उद्गं घा धुट्टि या आहारं वा बूया-उबरिट्टिमेसु गिद्धे सु वासं वूया, समभागेसु गिद्धेसु आहारं वूया, अघेभागेसु गिद्धेसु उदगं घूया । चतुरस्सेसु घउप्पयं वा खेत्तं या घूया । वझेसु पावासिकं यूया । यज्झेसु परस्म अत्याय पुन्छिउं आगतो सि त्ति यूया । पुरिमेमु अप्पणो अत्याय पुच्छिउं आगतो सि त्ति धूया । यझंतरेसु अप्पणो य परस्म य अंतरेण पुच्छिउँ आगतो सि त्ति धूया । पुरिमेसु अणागतं यूया । पच्छिमेसु अतियत्तं घूया। घामद- 2 रिसणेमु गत्तेमु घत्तमाण बूया । मतेसु मतं वा मतकप्पं वा वूया । लुक्खेसु चारिकमंतरेणं पुच्छिउँ आगतो सि ति घूया । सेतेसु गिद्धेमु य रम वूया । चउरंसेसु गिद्धेमु चित्तेसु दढेसु य काहावणं बूया। किण्हेसु अंसकोवकरणमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि ति यूया । सामेसु आभरणमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि त्ति धूया । दोहेसु दरियमंतरेण पुच्छिउँ आगतो सि त्ति बूया । तरसेमु पुप्फ-फलमंतरेण पुच्छिउं आगओ सि ति बूया । रमणीयेसु ईरिणं वा भडं वा रमणिनं या देसं घूया । मुदितेसु उस्सयं या समायं या अंतरेणं पुच्छिउं आगतो सि त्ति यूया । दीगेसु उपसग्गसलद्धं 30 अंतरेण पुच्छिर भागतो सि त्ति यूया । पुण्णेसु पसण्णेसु उस्सयं वा यारेज या घूया। उद्धंभागेसु दिव्यजोणिगर्त यूया । कण्णपट्टे सन्यवादणगते चतुप्पदगतं वा अंतरेण पुच्छिउं आगतो सि त्ति बूया । तिखेसु जोग-क्रोमं वूया । तत्य केस-मंसु-लोमगते मूरजोणिगतं अत्यमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि ति वूया । अणूसु सव्यधन्नगतं वूया । सामेमु संपयोगेमु मेधुणमंतरेण पुच्छि आगनो सि त्ति यूया । वंभेयेसु यमणमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि चि बूया । १°संधगते हैं. त• पिना ॥२ पसासोंस ३ पु० ॥ ३ हस्तचिहगतः पाठः हं. त• एव वर्तते ॥ ४"सु णिद्धं पाई. त-विना॥ ५विमहिम रातः ॥ ६°च्छितुजे आ° सप्र०॥ ७ पण्णेसु या पाया है० त० ॥ ८ईरिणं है. त०॥
वूया। एकादंसमो पुच्छितज्झाओ १२५ - ख़त्तेयेसु खत्तियमंतरेण पुच्छिउं, आगतो सि त्ति या । छ वेस्सेजेसु वेस्समंतरेण पुच्छिउँ आगतो सि त्ति चूया । सुद्देजेसु सुहमंतरेणं पुच्छिउं आगतो सि त्ति बूया । वालेयेसु बालमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि ति जोधगत्येसु जोधणमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि त्ति यूया । मज्झिमक्येसु मज्झिमवयमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि त्ति यूया । महन्वयेसु महव्वयमंतरेण पुच्छिउं आगतो सि ति बूया । उत्तमेसु उत्तमं चूया । उत्तमसाधारणेसु उत्तम- साधारणं चूया । मन्झिमेसु मज्झिमं यूया । मज्झिमसाधारणेसु मज्झिमसाधारणं चूया । जघण्णेसु जधणं चूया ।। जधण्णसाधारणेसु जधण्णसाधारणं वूया । पुरस्थिमेसु अभिकंखितं बूया । पच्छिमेसु उवभुत्तं चूया । वामदक्खिणेसु उवभुन्नमाणं अत्यं अंतरेण अत्यं पुच्छिउं आगतो सि त्ति बूया । एवं सव्वेसु आमासेसु अंतरंगे चाहिरंगे य अधापडिरूवेण सद्द-रूव-गंध-फास-रसगतेण सव्यं समणुगंतव्यं भवति ।। ॥ आगमणो नामझायो दसमो सम्मत्तो ॥ १० ॥ छ । [एकादसमो पुच्छितज्झाओ] 10 । णमो भगवतो अरहतो यसवतो महापुरिसस्स महावीरवद्धमाणस्स । अधापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पुच्छितं णामाज्झातं । तं खलु भो! तमणुवक्खयिरसामि । तं जहा-अप्पाणं ताव दसधा परिक्खेन । तं जधा-हिट्ठतं १ दीणतं २ आतुरतं ३ आरोग्गतं ४ कुद्धतं ५ पसण्णतं ६ छाततं ७ पीणियततं ८ एकग्गमणतं ९ विखित्तमणतं १० चेति । तत्य हिढे अप्पणि पहिहमत्थं यागरे । दीणे अप्पणि दीणमत्यं अणेव्याणिं च वियागरे । कुद्धे अप्पणि आधि 15 कलहं च वियागरे । पसण्णे अप्पणि सम्मोई संपीतिं च. वियागरे । आतुरे अप्पणि आतुरं उवगुतं च वियागरे । आरोग्गे अप्पणि आरोग वियागरे । छाते अप्पणि दुभिक्खं तत्थ णिद्दिसे । पीणिते अप्पणि धातकं अण्णलामं च वियागरे । एकग्गमणसे अप्पणि मगोणिबुर्ति मणोतुहिं च वियागरे । विक्सित्तचित्ते अप्पणि विक्खित्तचित्तभावं अप्पसण्णभावं अत्यहाणि च वियागरे ॥ छ ।। अतो परं परस्स पुच्छितं वक्खाइस्सामो । तं जघा-गच्छंतो या पुच्छेन, ठिओ वा पुच्छेन, फुदुको वा 20 पुच्छेज, परिसकंतो वा पुच्छेन्ज, या उवेसंतो वा पुच्छेज, णिवण्णो वा पुच्छेन्ज, अप्पत्यद्धो वा पुच्छेज, Bण- वत्थद्धो वा पुन्छेज, हा उच्चासणगतो वा पुच्छेन, णीयासणगतो या पुच्छेञ, पुरतो या पुच्छेज, पच्छतो या पुच्छेज, यामतो या पुच्छेज, दक्षिणतो या पुच्छेज, अभिमुहो या पुच्छेज, परम्मुहो वा पुच्छेजा, उपसर्फतो या पुच्छेन्न, अवसकतो वा पुच्छेन, का संहरंतो या गत्तागि पुच्छेन्न, विसिवंतो या गत्ताणि पुच्छेज, उहितो या पुच्छेन, ओणमंतो वा पुच्छेन, उण्णमंतो या पुच्छेन, उत्तरंतो वा पुच्छेन, आरुहंतो वा पुच्छेञ, विणमंतो या पुच्छेज, णीहरतो वा पुच्छेज, पल्लत्यीकाकतो वा पुच्छेज, पक्सपेंडकतो या पुच्छेज, कासमाणो या पुच्छेन, छीयमाणो या पुच्छेन, पैयलायमाणो या पुच्छेन, गिसिंघेमाणो या पुच्छेन, गिट्ठभंतो वा पुच्छेञ, णिस्मसंतो वा पुच्छेन्न, जमायमाणो या पुच्छेज, 'छेलंतो वा पुच्छेन, पचहतो पुच्छेज, रोदंतो वा पुच्छेज, हसंतो या पुच्छेन, हारेमाणो या पुच्छेन, छद्देमाणो या पुच्छेन, सकारेमाणो या पुच्छेन, असफारेण या पुच्छेज, भिउडीय वा पुच्छेन्न, मुहि १ हखचिहान्तर्गतः पाठः हं. तएव वर्तते ॥ २ागमणोऽज्झाओ॥ छ॥ है. त• विना ॥ ३ हिट्टयं दीण आउरयं आरोग्गयं फुद्धयं पसण्णयं छाययं पीणिमयं एफग्गमणय विपिसत्तमणयं चेति है. त०॥ ४ 'ग्गं णिस्ययं वियागरे । छाते अप्पणि विच्छार्य दुन्मि सि०॥ ५-६-७ हम्मचिहान्तर्गतः पाट है. त• एवं वर्तते ॥ ८ पलायमाणो है. • विग ॥ ९छलयंतो है. ह. विना ॥ १० उन्नेमाणो है• त• विना ॥
अंगविजापदण्णय या फरेमालो पुच्छेन्न, मुत्तं या करेमागो पुच्छन्न, पुरीसं वा करेमाणो पुच्छेत्र, वातं वा करेमाणों पुच्छेत्र, चंदतो वा पुच्छेन, सब्बेमु वा जाण-वाहणेमु संतो पुच्छेन, कोहके या संतो पुच्छेत्र, अंगगे या संतो पुच्छेन, परंउरमूले या पुच्छेन, गन्मगिहे या पुच्छेन, अन्मंतरगिहे वा पुच्छेन, भत्तगिहे या पुच्छेन्न, वगिहे या पुच्छेन, णकूई या पुच्छेन, उद्गगिहे या पुच्छन्न, अग्गिगिहे वा पुच्छेन, रक्समूले या पुच्छेन्न, भूमिगिहे या पुच्छेन, विमागे वा पुच्छेत्र, गगगगनो वा पुच्छेन, चञ्चरे या पुच्छेन्न, संघीसु वा पुच्छेन, समरे वा पुच्छेन, फडिकनोरणे या पुच्छेन, पागारे या पुच्छेन, चरिकामु या पुच्छेत्र, वेतीमु या पुच्छेन, गययारीसु वा पुच्छेत्र, संम्मेमु या पुच्छेन, संयणेमु या पुच्छेन्न, हा वटमीमु वा पुच्छेन, सीम वा पुच्छेन्न, " पंसूमु या पुच्छेन, गिद्धमणेमु या पुच्छेन, गिल्डेमु या पुच्छेन, फलिसायं या पुच्छेत्र, पावीरे वा पुच्छेत्र, पेटिकामु या पुच्छेन्न, मोहणगिहे' वा पुच्छेन, ओसरे या पुच्छेन, संकमे या पुच्चे सोमाणत्यगतो वा 10 पुच्छेन, अन्मंतरपरियरणे या पुच्छेन, वाहिरायं दुवारसालायं या पुच्छेत्र, धाहिरायं वा गिदुवारवाहायं पुच्छेन, उपहाणजालगिहे या पुच्छेन्न, अच्छगो या पुच्छेन, सिप्पगिहे या पुच्छेन, कम्मगिहे या पुच्छेन, रयतगिहे या पुच्छेत्र, 'ओधिगिह या पुच्छेन, उप्पल(टपल)गिहे या पुच्छेत्र, -- हिमगिहे या पुच्छेन, आदंसगिहे या पुच्छेन, तलगिहे या पुच्छेन, आँगमगिहे या पुच्छेन, चतुकगिहे या पुच्छेन, रच्छागिहे वा पुच्छेन, दंतगिद्दे या पुच्छेन, कंसगिहे या पुच्छेन, पढिकम्मगिहे या पुच्छेन्न, फंकसालायं या पुच्छेन, आवयगिहे या 1. पुच्छेन, पणियगिहे. या पुच्छेज, भासगगिहे वा पुच्छेन, भोयगगिहे या पुच्छेन, रसोतीगिहे या पुच्छेन, हपगिहे या पुच्छेन, रथगिद्दे या पुच्छेन, गयगिहे या पुच्छेन, पुष्फगिहे. या पुच्छेन, जूतगिहे. या पुच्छेन, पातयगिह या पुन्छेन, गलिणगिहे वा पुच्छेन, यंगगिहे या पुच्छेत्र, 7 जागगिहे या पुच्छेन, जाणगिहे या संतो पुगेन ॥७॥ अभिमुहो या पुच्छेन अभिमुहसप्पणीयकं अणागतं अत्थं चिंतेसि त्ति बूया । परम्मुद्दो पुच्छेन अप्पगीय २७ अत्यं परम्मुई अंतरेण पुच्छि आगतो सि ति यूया । उसमांतो पुच्छेन अत्यो खिवं भविस्सति ति यूग। अपरानो पुच्छेन अत्यो सिमं ग मविस्मति त्ति घूया । अयमपंचो पुच्छेन अत्यो सिग्यं रिगस्मिदिति त्ति यूया । सहरमागो अंगाणि पुच्छेन संजोगं या समागमं या अंतरेण पुच्छिउँ थागतो सि त्ति यूया । विक्सिबमागो अंग्दनि पुच्छेन विष्मयोगमवरेण पुच्छसि सि चूया । इटेनो पुच्छेन चलमत्यमनरेण पुच्छसि चि पूग । नियमतो पुन्ऐन घुयन्यायरमत्थमंदरेण पुच्चसि ति यूया । दण्णमंतो पुच्छेत्र वियद्धीमंतरेण पुसि नि पूया । ओगमंतो पुन्टेन हागीमंतरेण पुच्छि थागतो मि त्ति यूग । आरमंतो पुच्छेन आगमेरमो अत्यो मपिग्मति सि पूग । उत्तरंतो पुग्न आयायमनरेणं पुच्छि आगतो सि नि यूगा । विगानो अंगागि पुच्छेत्र दुपमा अत्यो भरिम्मति ति यूगा । जीरेनो अंगानि पुच्छेन निरागारमंतरेणं पुच्छसि ति पूया । पहत्यिकासंपउत्तो पुप्लेन पंधं पा पायाममंदर पुच्छमिति पूरी । पपगाय पुच्छेन अत्यहाणीमंतरेण पुच्चमि ति यूया । गिनुभमान पुन अनियमतरल पुमि त्ति पूपा । भीमसंदो पुच्छेन थापाममंतरेण पुच्छसि ति यूया । जंभा- पमा पुन पंटरमंतरेग पुग्छमि नि पूया । पपलायमानो पुरछेन अत्यं दुहतं अंतरेन पुच्छसि सि यूया । परती पुन भरपरिणाममनरेज पुगि नि यूगा । रोदनो पुच्छेन रियं पागं भवरेनं पुच्चसि चि पूया । ter ... ॥ २ला पर...॥ ३'गिदेगु या..." ४ामपाया." ५'परिपरले ... ६ उपनिदे... प... rina समागम्ममिद (..hu १५ममागि.. नि १०मानतः पट - । एकादसमो पुच्छितऽझाओ हसंतो पुच्छेज रतीसंपयुत्तं अत्यमंतरेणं पुच्छसि त्ति बूया । आहारेमाणो पुच्छेजा भागविवद्धिमंतरेणं पुच्छसि त्ति बूया । छद्देमाणो पुच्छेन हाणीसंपयुत्तं अत्यं पुच्छसि त्ति चूया । सकारेण पुच्छेज खिप्पं सुहेण अत्यं पाविहिसि त्ति बूया । असक्कारेण पुच्छेन दुक्खेणं अत्यं ण पाविहिसि त्ति बूया । भिउडी करेमाणो पुच्छेज कोवमंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । सुद्धिं करेमाणो पुच्छेज संजोगमंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । हा मुत्तं करेमाणो पुच्छेन पयाअपायमंतरेण पुच्छसि त्ति वूया । पुरीसं करेमाणो पुच्छेज अस्थावायमंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । वातं करेमाणो पुच्छेन मतं वा । मतकप्पं वा अंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । वंदतो पुच्छेज इस्सरियं वा उवचयं वा अंतरेण पुच्छसि त्ति वूया । कोहए पुच्छेज णिग्गमं अंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । अंगणे पुच्छेन्ज महाजणमंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । णिकडे पुच्छेज अरह- स्समंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । A उंदगगिहे पुच्छेन आरोग्ग-हास-सिणेहमंतरेण पुच्छसि त्ति बूया । गम्भगिहे पुच्छेन णिव्युती-रतीसंपउत्तमत्थमंतरेण त्ति बूया । भग्गगिहे पुच्छेन्न अणिज्युतिमंतरेणं ति बूया । अग्गिगिहे पुच्छेन सरीर- परितावणमंतरेणं ति चूया 1 » रुक्खमूले पुच्छेज सरीरसोक्खमंतरेण पसत्यमत्थमंतरेण यत्ति यूया । भूमिगिहे पुच्छेज 10 अरहस्सैमत्थमंतरेणं ति वूया । विमाणे पुच्छमाणो सुह्मत्थमंतरेणं ति यूया । गगणे संतो पुच्छेज अव्वत्तमत्थमंतरेणं ति वूया । उवलगिहे पुच्छेज णिसुहमंतरेणं ति बूया । णरविवुद्धवाहणे पुच्छेज इस्सरियमंतरेणं ति घूया। सयणासणगतो पुच्छेज सोक्खमंतरेणं ति बूया । रासीसु विपुलइरसरिय-आधिपञ्चकारणलाभायं पुच्छसि त्ति पावेहिसि त्ति घूया । वियडप्पकासे पुच्छेज दुरुषवण्णमत्थं ति यूया । रायपधे पुच्छेज चलं महाजणासाधारणं रायत्थमंतरेणं ति घूया । सिंघाडग-चच्चरेसु पुच्छेज चतुप्पदरूंवचारीमंतरेणं ति घूया । दुवारे पुच्छेज पुरिसस्स पिगमणमंतरेणं पुच्छसि त्ति वूया । खेत्ते पुच्छेन 15 पच्छण्णं पलायमंतरेणं ति वूया । अट्टालए पुच्छेज भयमंतरेणं ति यूया । गैंयवारीय पुच्छेज सत्तुभयमंतरेणं ति बूया । संघिसमरेसु पुच्छेज ५ देसंती - देसंतरगमणमंतरेणं ति यूया । सयणे संतो पुच्छेन्ज भजामंतरेणं ति चूया । पलमीसु दसणीयरतिविहारसंपयुत्तं अस्थमंतरेणं ति वूया । उद्गपघेसु अमणुण्णणिराससंपयुत्तमंतरेण पुच्छसि त्ति यूग । वयेसु पुच्छेज दुप्पावणीयं रायत्थं पुरिससंपयुत्तं ति बूया । रासीसु पुच्छेज सरीरअभिवद्धिमंतरेण पुच्छसि त्ति चूया । वप्पेसु सुभिक्खमंतरेणं ति बूया । गिद्धमणेसु पुच्छेज अमणुण्णमत्थमंतरेणं ति बूया । फलिहासु पुच्छेज रायमंतरेणं ति वूया । 20 पउलीसु पुच्छेज सिद्धदुवारमंतरेणं ति घूया । कोहके पुच्छेज णीहारपावासिकणिग्गमणमंतरेणं ति चूया । अरसमोहणके पुच्छेन मोहणमंतरेणं ति बूया । ओसरकेसु पुच्छेज घाहिरसाधारणं ति वूया । मंचिकासु पुच्छेज वेस्समंतरेणं ति घूया । सोवाणेसु पुच्छेज अद्धाणमंतरेणं ति वूया। खंभेसु पुच्छेज थावरमंतरेणं ति घूया । " अन्मंतरदुवारे पुच्छेज आगमणसंरोध[मंतरे]णं ति घूया । याहिरदुवारे पुच्छेज णिग्गमणमंतरेणं ति बूया । दुवारसालाय वाहिराय पुच्छेन पुरुसअभंतरघरप्पयासागमणपतिपुत्तलाभं च त्ति घूया । अभितरे चिरहे जिग्गमणं, बाहिरे व दुवारे दुवारवाहायं 25 खिप्पं पवासागमणं, गम्भिणीय य पजायणं ति धूया । अभितरगिहे पुच्छेज गोज्झरतिसंपयोगमंतरेणं ति घूया । चतुरस्सके पुच्छेज पाणरतिविहारसंपयुत्तं ति यूया । जलगिहे होसमुहविहारमंतरेणं पुच्छसि चि यूया। महाणसगिहे पुच्छेज विष्पवंचणासंपयुत्तं ति यूया । अच्छणके पुच्छेज कम्मणिच्छेदणं घूया। सिप्पगिहे पुच्छेन विनालाभमंतरेणं ति यूया । कम्मगिहे पुच्छेजें कम्मारंभमंतरेणं ति घूया । रयणगिहे पुच्छेज रजाभिसेकछायाभिगमणमंतरेणं ति यूया। भंड- गिहे पुच्छेज संचयमंतरेणं ति वूया । ओसधगिहे पुच्छेन सरीरसंतावमंतरेणं ति घूया । उपलगिहे पुच्छेज गुरुचलसंसितं 30 अत्यमंतरेण ति यूया । हिमगिहे पुच्छेन णेव्याणिसंसितं अस्थमंतरेणं ति वूया । चित्तगिहे मणोवितकामंतरेणं ति पुच्छसि १ हसचिहान्तर्गतः पाठमन्दर्भः ६० तएव वर्तते ॥२१ एतच्चिद्वान्तर्गतः पाठसन्दर्भ है. त. नास्ति ॥ ३ मग्गगिहे सं३ पु. अभिग्गिहे सि• ॥ ४ "स्समंत है. त• ॥५ णिमुहुमंत है• त• ॥ ६ जणसाधा है. त• सि• ॥ ७ रूपधारी हं० त० ॥ ८ गपचारीय है. त•॥९- एतचिन्तिर्गत पर्द ह. त• नाति ॥ १० हस्तचिहान्तर्गतः पार ई. स. एर वर्तते ॥ ११ - एतचिहान्तर्गतं पदं है. त० नासि ॥ १२ हासमुह १० त• विना ॥ १३ यिप्पपंधणा • त॥ १४°णिव्येदर्ण है.त. विना ।। १५'ज महप्पभायमंत' है. त• विना । भंग०१८ - - :: अंगविजापइणयं, चि बूया । आदंसगिहे पुच्छेज महप्पभायमंवरेणं ति यूया । लतागिहे पुच्छेज धीरतीसंपयोगमंतरेणं ति बूया । आग- मगिहे पुच्छेन अयरसरतिसंपयुत्तं ति यूया । चतुक्कगिहे पुच्छेन्न असारसंतायमंतरेणं वि धूग । जाणगिहे पुच्छेन्न रायत्थवियद्धिमंतरेणं ति यूया । दगकोहगे पुच्छेज उत्तममहाजणसुहसंपयोगमंतरेणं ति बूया । कोसगिहे पुच्छेज अत्यय- घासमंतरेणं ति यूया । पडिकम्मगिहे पुच्छेज तरुणसंपयोगमंतरेणं ति यूया । कंकसालायं पुच्छेज सरीरविसुद्धिमंतरेणं ति 5 बूया । आतवगिहे पुच्छेन विजयं या हासदुक्सपरिमोक्खं व त्ति घूया । पणियगिहे पुच्छेज पाणधारगं आयुप्पमाण व त्ति बूया । पाणगिहे पुच्छेज पमादं या विभमं व त्ति यूया । आसणगिहे पुच्छेज ठाणमंतरेणं ति वूया । भोयण- गिहे पुच्छेज बलविवद्धिं आरोग्गं च अंतरेणं ति घूया । सयणगिहे पुच्छेन सरीरोयचयमतरेणे ति बूया । इयगिहे पुच्छेज पंथगमणमिस्सरियसाधारणं ति घूया । गयसालायं पुच्छेज संगामविजयसाधारणं रायमंतरेणं ति यूया । वत्थगिहे पुच्छेज .सोभग्गमंतरेणं ति घूया। रथसालाय पुच्छेज संगामविजय-रतिविहारमंतरेणं ति चूया । पुप्फगिहे पुच्छेन 10 आभरणालंकारमंत]रेणं ति घूया । जूतसालायं पुच्छेज उयधि-णिकहिपीलामंतरेणं ति यूया । पाणवगिहे पुच्छेज वहारमंतरेणं ति चूया । लेवणगिहे पुच्छेज कलमंतरेणं ति धूया । तलगिहे पुच्छेज उवदेस-गुरुसंजोगमंतरेणं ति यूया । सेवणगिहे पुच्छेज चौधुजसंरोधमतरेणं ति यूया । उजाणगिहे पुच्छेञ कामरतिसहाससंपयुत्तं ति बूया । जाणसालाय पुच्छेज भयसंरोधमंतरेणं ति घूया । आएसणे पुच्छेज सरीरस्स कम्मलाभमंतरेणं ति यूया। मंडवे पुच्छेन दारिदमंतरेणं ति यूया। लेवणगिहे पुच्छेज महाजणसाधारणपरिरक्खणायं ति घूया । वेसगिहे पुच्छेन्ज 16 वयकम्मवंचणयाय त्ति यूया । कोढाकारे पुच्छेज़ धण-घण्णमंतरेणं ति घूया । पचासु पुच्छेज दाणविसग्गमंतरेणं ति बूया । सेतुकम्मे पुच्छेज परलोगगमणमंतरेणं ति यूया । जणके पुच्छेज दाससंखरणामंतरेणं ति घूया । पहाणगिहे पुच्छेज सरीरसोक्खमंतरेणं ति बूया । वश्चगिहे पुच्छेज अमणुण्णसंजोगमंतरेणं ति वूया । अंगणगिहे पुच्छेज अंगण- गतं सम्मोहप्पयुत्तं ति यूया । आतुरगिहे पुच्छेज बाधिपरिमोक्खमंतरेणं ति बूया । संसरणगिहे पुच्छेन रायत्थविवाद व ति यूया । सुंकसालायं पुच्छेज अत्यचिंतमंतरेणं ति यूया । करणसालायं पुच्छेज आयुधेयमंतरेणं ति धूया । 20 पणितगिहे पुच्छेन कुडुंववद्धीमंतरेणं वि धूया । परोहडे पुच्छेज संपेसणमंतरेणं ति घूया ॥ छ । सेसाणि गिहाणि पहिरूवपडिपोग्गलेहिं णातव्याणि भयंति, तं अधा-आसणाणि पश्यत्थिकाओ आमासहसतं अपस्सयाणि ठिताणि पुच्छिताणि वंदिताणि आगताणि सलाविताणि चुंविताणि आलिंगिताणि उपदासिताणि णिवण्णाणि सेविताणि । जया एताणि सव्याणि आमास-सह-रूव-इंगितागारमावेहिं आधारयित्ता विण्णातव्याणि भवंति, एवं पुच्छितज्झायो(2) एतेहि व सामास-सह-रूवपादुभावेहि आधारयित्ता विण्णातव्याणि भवति ।। ॥च्छितनामऽज्झायो एकादसमो सम्मत्तो ॥ ११॥ छ । [यारसमो जोणीअज्झाओ] 25 अधापुव्यं खलु भो! महापुरिसदिण्णाए अंगविजाए जोणी णामझायो । तं सलु भो! तमणुवस्ख- सामि ।[तं जहा-] तस्थ सब्बअपरिग्गहेसु सव्यपासंडगते सव्वपासंटोवकरणे सजधम्मपयुत्तगते सव्वधम्मोपगरणे ५ धम्मजोणी यूया। तत्य सव्वमहापरिग्गहेसु सव्वअत्य गते सव्वत्थ - त्तमाणेसु थी-पुरिसेसु सव्वत्यैसव्वागते य 30 अत्यज्ञोणी घूया । तत्य सव्यसामेसु सव्या मगते सव्वसामोयिगते सव्यकामोचारगते य गंध-मल्ल-हाणा-ऽणुलेवण-आ- १'कारेति व्या से ३ पु० ॥ २ संघण है. त• विना ।। ३ वावज है. त•॥ ४ ईवण ६० त०॥ ५°म्मविषण्णया है. त.॥ ६°च पधणमंत ई. तक॥ ७°म्मे पु. है• त.॥ ८°चा णातवं भवति है. त. ॥१पुच्छितऽज्झामओ ॥छा है."त. बिना ॥ १०°क्खयिस्सामि ह. त• ॥ ११॥ एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त. नास्ति ।। १२°यण्णमा है. त• विना ॥ १३ 'त्यगसव्यगए है. त• ॥ १४ रामिगते ई• त• विना ।। १५ सव्वसम्मोईगते है• त• ॥
वारसमो जोणीअल्झाओ भरणगते ये कामजोणिं यूया । तत्थ पुण्णेसु उद्धभागे य विवद्धमाणेसु य थी-पुरिसेसु सव्यविवद्धीयं जुत्तेसु विवद्धिं बूया । तत्थ तुच्छेसु अघेभागेसु हायमाणेसु य थी-पुरिसेसु सव्वहाणिसंपयुत्तेसु य हाणिं वूया । तत्य समागतेसु गत्तेसु य मल्लाभरणगतेसु य मैल्लोपकरणेसु य मिधुणचरेसु य सत्तेसु सव्वसंगमगतेसु य संगमजोणिं वूया । तत्य एकंगेसु गत्तेसु विखित्तेसु य एकाभरणे एकचारिसु गत्तेसु विखिप्पमाणेसु सधविप्पयोगेसु विप्पयोगजोणि वूया । तत्थ पसण्णेसु गत्तेसु सनपसण्णगतेसु य सम्वमित्तगए य सव्वसम्मोयीगते य मिचजोणि चूया । तत्य अप्पसण्णेसु गत्तेसु सव्वअप्पसण्णगते । यॐ सव्यअमित्तगए य सव्यअत्थगए य हा सव्यजोधगते य सव्वसंगामणामधेजोदीरणे उण्हससुकागउलूगगते अहि-गउलगगते विवादजोणि बूया । तत्य णीहारेसु चलेसु गाम-णगर-णिगम-जाणपय-पट्टण-णिवेस-सैण्णाखधावार-अड. वि-पव्ययदेस-संजाण-जाणगते दूत-संधियाल-पावासिकगते उदाहिते पावासिकजोणि बूया । एतेसामेव ठितसाधारणेसु पवुत्थजोणिं घूया । एतेसामेव आहारोदीरणे आगमणजोणिं वूया । तत्थ णीहारिसु मुदितेसु कण्हेसु णिग्गमजोणि वूया। तत्थ आहारेसु मुदितेसु आगमजोणि बूया । तत्य उत्तमेसु रायोककरणेसु रायजोणिं घूया । तत्य उत्तमेसु रायाणुपाय- 10 जोणि बूया । इस्सरेसु रायपुरिसागतेसु य रायपुरिसजोणिं चूया । तत्य दढेसु सव्यवणियगतेसु य वणियप्पधजोणिं घूया तत्य चलेसु सब्यकारुगगते य सन्वकारुकोपकरणे कारुकाजोणिं यूया । तत्य सव्वअणूसु सव्यकसेसु सब्बकासिकोपकरणे सव्वत्यीगगते य अणुयोगजोणि बूया । तत्थ उद्धं णाभिउवकरणगते य सव्यअजगते य सव्यअजोपचये अजजोणि धूया । तत्य अघेणामिगते उड्ढे जाणुगते सिस्सजोणिं यूया । तत्थ पाद-जंघा-पैरस-पव्यपेरसगते य पेरसजोणि बूया । तत्य सोत्तपडिप्पिधाणे णेत्तपडिप्पिधाणे मुहपडिप्पिहाणे अप्पाणपडिप्पिहाणे से पंडिप्पिधाणे सव्वयंघेसु य धंधणजोणि 15 बूया । तत्थ एतेसु सव्वेसु आहारसंपयुत्तेसु बंधणजोणि बूया। तत्य एतेसु चेव णीहारेसु य जुत्तेसु य चलेसु सेव्यमोक्खेसु य मोक्खजोणि बूया । तत्य मुदितेसु सव्वसाधारणेसु य आरोग्गपवत्तिं यूया। तत्य उत्तमेसु आहारसंपउत्तेसु मुदितजोणि चूया । तत्थ उद्धंभागेसु आहारेसु उवहुतेसु पीडिते साधारणे आतुरजोणिं घूया । तत्य पच्छिमेसु णिम्मढेसु अधोभागेसु य मरणजोणिं चूया । तत्य उद्धंभागेसु आहारसंपयुत्तेसु य सयितव्यसाधारणेसु य सयितव्यजोणि चूया । तत्य व्यत्यगते छेदणेसु य छिण्णजोणि धूया। तत्य सोत्तपडिप्पिघाणे णेत्तपडिप्पिधाणे मुहपडिप्पिधाणे अप्पाणपडिप्पिधाणे 20 णिधाणपडिप्पिधाणे मिक्सित्त-पम्हुदृगते य णट्ठजोणि वूया । तत्य सम्बत्य आहारगते विणयजोणि यूया । तत्य सब- भेजेसु वंभचारिगजोणि बूया । तत्य सव्ययंमणेसु सव्वयंभणोपकरणे य यंभणजोगिं घूया । तत्य सब्यखत्तयेसु आयुधभंडे य सत्तियजोणिं घूया । तत्य सव्ववेस्सेजेसु वेस्सजोणि बूया । तत्य [सब]मुद्देजेसु सुद्दजोणि बूया । तत्य सव्ववालेयेसु बालजोगि यूया । तत्थ सन्यजोव्वणत्येसु जोव्यणत्यजोणि चूया । वत्य सव्यवुड्डेसु वुड्डजोणि बूया । तत्य सव्यमझिमेसु मज्झिमजोणिं बूया । तत्य सव्वउत्तमेसु उत्तमजोगि यूया। तत्य सम्बपञ्चवरेसु पायरजोणि 25 वूया । तत्य सन्यअन्भंतरेसु अभंतरजोणि यूया । तत्य सव्ययाहिरेसु बाहिरजोणि यूया। बाहिरभंतरेसु सकपरफ- साधारणेसु साधारणजोणि यूया । तत्य णपुंसकेसु णपुंसकजोणिं यूया । तत्य पुण्णामेसु पुण्णामजोणि यूया । यीणामेसु यीणामजोणिं चूया । तत्य पुरथिमेसु गत्तेसु अणागतेसु य सद्देसु अणागतजोगिं बूया । तत्य पच्छिमेसु गत्तेमु अतियत्तेसु य सदेसु अतिकंतजोणि बूया 1 [तत्य] वामदक्सिणेसु गत्तेमु यत्तमाणेसु य सद्देसु वचमाणजोणिं धूया तत्य पुरत्यिमेसु गित्तेसु] पुरस्थिमजोणिं घूया । तत्य उत्तरेसु गतेमु उच्चरजोणि चूया । तत्य पच्छिमेसु गत्तेसु पच्छि- 30 मजोणि बूया । तत्य दक्खिणेसु गत्तेसु दक्सिणजोणि यूया । तत्य दक्षिणपच्छिमेमु गत्तेमु दक्सिणपच्छिमजोणि घूया । तत्य पच्छिमुत्तरेसु गत्तेसु पच्छिमुत्तरजोणि यूया । वत्य पुबुचरेसु गत्तेसु पुड्युत्तरजोगि यूया । तत्य पुत्र्य- १ जुदेसु राप्र• ॥ २मलोप ह. त• विना ॥ ३ हसचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव ते ॥ ४°रणे अण्वसमुछा- कडलगगते है. त.॥ ५°मुण्णा • त• ॥ ६ सम्बोसेसु है. त•॥ जाणगते सि• पिना ॥ ८ ते पाद सर.॥ ९पस्सगते या पेयस्सजो है. त• पिना ॥ १० °धाणे घाणपटिप्पिधाणे मुह ई. . मि.॥ ११ पप्पडिदाणे १. त•॥ १२ सव्यसोक्सेमु य सोक्स है. त• दिना ॥ १३ °सु अत्येमु अणा • त• विना ।।
१४० अंगविजापइण्णय दक्सिणेसु गत्तेसु पुष्यदक्खिणजोणि यूया । [तत्य] उपरिहिमेसु उपरिहिमजोणिं बूया । तत्थ हेडिमेसु हेटिमजोणि वूया । तत्थ आहारेसु आहारजोणिं धूया । [तत्थ] णीहारेसु णीहारजोणिं वूया । तत्थ आहारणीहारेसु आहारणी- हारजोणि धूया। तत्थ पीहाराहारेसु पीहाराहारजोणिं वूया । तत्थ पाणजोणियं पाणजोणिं घूया । तत्थ धातुजो- णीयं धातुजोणी बूया । तत्य मूलजोणियं मूलजोणिं घूया । तत्थ सव्वसामेसु आभरणजोणि बूया । तत्थ अणूसु 5 धगजोणिं यूया । तत्थ तणूसु वत्थजोणि वूया । तत्थ गहणेसु रैण्णजोणि धूया | तत्थ उपग्गहणेसु आरामजोणि वूया । तत्थ उत्तमेसु उत्तमजोणि वूया । तत्थ अधमेसु अधमजोणि धूया । तत्थ उण्णतेसु उण्णतजोगिं घूया । तत्य णिण्णेसु गिण्णजोणि धूया । तत्य रसेसु रसजोणिं चूया । तत्थ वण्णेसु यण्णजोणिं वूया । [तत्थ] गंधेसु गंधजोगि बूया । ॐ तत्थ छहिं उहिँ उडुजोणि चूया । तत्थ अभंतरामासे सयम्मि - सव्यमस्थि त्ति घूया तत्थ वाहिरामासे सव्यम्मि सव्यं णत्थि त्ति बूया । तत्थ सव्वेहिं इंदियेहिं इंदियत्या विण्यातव्या भवंतीति ॥ ॥जोणी णामझायो वारसमो सम्मत्तो ॥ १२॥ छ । 10 [तेरसमो जोणिलक्खणवागरणज्झायो] णमो महापुरिसरस पद्धमाणस्स । अधापुत्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय जोणिलक्खणवागरणो णामऽज्झायो । तं सलु भो! तमणुवक्खस्सामि । तं जधा-तत्य तिविधा जोणी सज्जीवा १ णिज्जीवा २ सज्जीणिजीवा ३ चेति । तिविधं लक्सणं-दीणोदत्तं १ दीणं २ उदत्तं ३ चेति । तत्य इमाणि उदत्ताणि-उत्तमाणि पुण्णामाणि दृढाणि 15 दक्सिणाणि सुकाणि आहारीणि दीहाणि थूलाणि पुधणि मधंताणि मंडलाणि लोहिताणि परिमंडलाणि थलाणि मोक्साणि पसण्णाणि उच्चाणि पुण्णाणि आयुजोणीयाणि वट्टाणि अग्गेयाणि हिदयाणि पत्तेयाणि दसणीयाणि, उदत्तलक्षणाणि चक्साताणि १ । तत्थ इमाणि दीणलक्खणाणि-गपुंसकाणि चलाणि लुक्साणि णीहारीणि हस्साणि किसाणि तिक्त्राणि दहरचलाणि मताणि पिण्णाणि यट्टाणि अप्पसण्णाणि तुच्छाणि अणूणि याउजोणीकाणि मताणि अदंसणीयाणि इति दीणाणि २। सत्य इमाणि दीणोदत्ताणि-धीणामाणि समाणि दहरत्थावरेजाणि गहणाणि उपग्गहणाणि तणूणि अंताणि 20 अंतिमदीणोदत्ता सहरस-गंध-फासा घेति दीणोदत्वाणि भवति ३ । तत्य घडव्यिधा पुच्छणहा भवंति-अस्थाणुगता १ [कामाणुगता २] धम्माणुगता ३ वीमंसाणुगता ४ चेति । दीणोदत्ता सेवते सततसद्दाणि दीणाणि या उदत्ताणि वा दीणोदत्ताणि या, दीणोदत्तो या सेवते घायते गंधाणि दीणाणि वा उदत्ताणि या दीगोदत्ताणि या, उदत्तो या दीणो या दीणो उदत्तो वा सेवते चक्खुतो रूवाणि दीगाणि या उदत्तागि या दीगोदत्ताणि या, दीगो या उदत्तो वा सेयते तयतो फासाणि दीणाणि या उदत्ताणि वा दीणोदत्ताणि या । दीगो 2B या उदत्तो या दीगोदत्तो यो सेयते यं तत्य पढमं भवति उत्थ भावोऽणुरजति तेण तं णिद्दिसे । पढमं च से पटिपोग्गलो तत्य वेत्तणइंदियत्थेमु य इंदियपण्णाय उयधारयित्ता ततो यूयांगचिंतओ। उदत्तो उदत्तागारो विण्णातव्यो, दीगोदचागारो विण्णातव्यो, र दत्तो दीणागारो विण्यातव्यो । तत्य पण्णापरं यालो बालधिप्पायो विण्णातव्यो, पालो तरणाधिप्पायो विण्णातव्यो । वत्य सव्यत्यो दुविधो पुच्छणहो दीणोदत्तो चेति । तत्य इमाणि उदत्तस्स णिन्य- त्तिकारणागि भांति--तुहं में पुच्छति, पमण्णं मं पुच्चति, पीणितं मं पुच्छति, आरोग मं पुच्छति, अविकिसत्तं मं पुच्छति, उर्स पृच्छति, सहरिस में 'दति, पदुम त ति मं उत्तयत्यामरणो उदत्तमलाणुलेवगो उदत्तवेसालंकारी, १रतजोणि है.. विना । २ अयमेसु अयम...॥ ३६सचिहान्तर्गतः पाठ... त• एव पती ॥ ४-40 एवियन्तर्गत पाटः.स. मासिक ५दीणाणि है एव ॥ ६ मईताणित.॥ ७षा सेवने या सेयने से पु.॥ ८-40- एशिन्तर्गतः पाठःt..मास्ति । ९पंपखति है.8.1१04-श्तशिधन्तर्गतः पाठः है-त. गास्ति।
तेरसमो जोणिलखणवागरणज्झायो 10 ......... 15 उदत्तसयणासणो दक्खिणायत णिविट्ठो उजुमुंहो पेक्खति, उजुमुक्खो उल्लोकेति, चतुरक्खि वंदति, पूर्यतो वा पुच्छति, अवस्थितं अव्भुप्पयति उम्मजति अन्मुत्तिट्ठति, उदत्ते वेसे उदत्ते गंधे जपणे वा छणे वा उस्सये वा उदत्ते समाये वा उदत्ते पडिपोग्गले या उदत्ते सद्द-रूवम्मि रस-गंध-फासे णिमंतणम्मि य आगमे भक्ख-भोजआमंतणम्मि य । तत्य इमाणि आहारलक्खणाणि भवंति, तं जधा-पवासागमणं कण्णाय अमिवणं अत्थरस विविधस्स लाभं धणस लामं कामलामो विविधविजालाभो जं च अण्णं पसत्थं परसेन तरस सव्यस्स लाभो भविस्सति त्ति घूया । तत्थ उदत्तस्स . पुच्छणहो भवति-एकसिरीयं लाभो ति पुरिसस्स लाभो, पुरिसरस इत्थीलाभो हिरण्णस्स लाभो पत्थलाभो 1 अण्णलामो पाणलाभो धातगलामो इस्सरितलाभो उत्तमजोणीय आमासो आहारम्मि य उत्तमे । पुण्णामधेजे सुक्के [य] दढे गिद्धे य लोहिते । उदत्तेसु असणलाभे य पत्थे आभरणेसु य ॥१॥ गंध-मल्लेसु फासे य सद्द-रूवे य वाहिरे । एरिसे उत्तमे दित्ते इरसरियलाभं वियागरे ॥ २ ॥ एतेसामेव णीहारे अमगुण्णे आगमम्मि य । अमणुण्णे सद्द-रूवम्मि इस्सरिये चलणं धुवं ।। ३॥ [....... । मणुण्णे सह-रूवम्मि] रस-गंधे य उत्तमे ॥४॥ उत्तमेसु य फासेसु तज्जातपडिपोग्गले । धुवो भूमीय लाभो तथा चेव उ पेसणे ॥५॥ एतेसामेव णीहारे अमणुष्णे य आगमे । णिटुते य किलिहे [य] भूमीय चलणं धुर्व ॥ ६ ॥ कण्णा गंडा उर ओढा दंता अंगुट्ठके तधा । याहूदरे य पादे य पुरिसणामं च जं भवे ॥ ७ ॥ एतेसु सद्द-रूवेसु आहारेसु य कित्तिते । हसिते णट्टे य गीये य यादिते कामसंसिते ॥ ८ ॥ मधुरे आलाप-संलावे आसिते मदणे अय । सुगंधे पहाण-मल्लम्मि गंधम्मि असुगंधिगे ॥९॥ 4 असुगंधि - अणुलेवणे सव्याभरणे (1)। अतिमासे य सव्वस्थ गोझस्स चेव दंसणे ॥ १० ॥ पाणिणा पाणलामम्मि सिचकतस्स मुंचणे । एरिसे सद्द-रूवम्मि पुरिसलामो थिया भवे ॥ ११ ॥ एतेसामेव णीहारे अमणुण्णे आगमम्मि य । अमणुण्णे सद्द-रूपम्मि धुवो से असमागमो ॥ १२ ॥ कण्णपाली भुमा णासा जिभा गीवा तधंगुली । सोणी णामी य कुक्खी य अरहस्साणि य आमसे ।। १३ ।। 20 अतिमासे य सव्यम्मि वियागरे वेसकम्मि य । अलंकारे य सव्वम्मि सव्वेसाऽऽमरणेसु य ॥ १४ ॥ पहाण-महेसु गंधेसु सुगंधे अणुलेयणे । कामुके कामसंलावे उम्मिते गीत-बादिते ॥ १५ ॥ पारावत-वफ्याया य हंस-कागं च किण्णरा । विपदा चउप्पदा या वि जे वऽण्णे मिधुणचारिणो ॥ १६ ॥ मधुरे आलावसंलावे कामरस अणुलोमके । आलिंगिते चुंविते य सामग्गीय समागमे ॥ १७ ॥ वधुजभटकपरिकित्तणाय तलियं ति वियण्णके या । मणुण्णे सद्द-रूवम्मि रस-गंधे य उत्तमे ॥ १८ ॥ फासे य मणुग्णम्मि आहारे य अणुमते । पडिपोग्गलेसु एतेसु थिया लाभो ति णिहिसे ॥ १९ ॥ एतेसामेव णीहारे अमणुण्णे आगमम्मि य । गिम्म? णिहुते लित्ते ण थिया य समागमो ॥ २० ॥ पासाणं सफरं लोणं [वघा] रयतमंजणं । दंतसिप्पिपडलं....... ..अट्ठिअक्सते (१) ॥ २१ ॥ मणिरूवालिका लोहं हिरणपडिपोग्गले । आमासे य मणुण्णाणं [.....................॥ २२ ॥] उत्तमम्मि य आमासे [...............1] उदचम्मि य पुच्छंते हिरण्णलामं धुवं वदे ॥ २३ ।। एतेसामेव णीहारे अंमणुण्णे आगमम्मि य । गिम्महे गिहुते पलिते गासो होति हिरण्यके ।। २४ ॥ लक्सा हरिदा मंजिट्ठा हरिताल मणसिला । कोरटेक सिरियकं मणोज गुत्तमालकं ॥ २५ ॥ १"मुह पेक्वति सन०॥ २सम्भप्पय उम्मई. त• विना ॥ ३त्थीहिर है..॥ ४-- एतविशन्तर्गतः पाठःहै.त. नास्ति। ५मसुगंघिम्मि है. त• विना । --एनचिहान्तर्गतः पाळत. नालि॥ ७गीयाय अंगुटी है. त०॥ ८ महरस्साणि है. त•॥ ९मणुस्साणं सत्र• ॥ १० अमणुष्णम्मि य भागमे १.६॥ ११ टकेसरियर्फ सि॥ - 25 30 । 5 10 " 15 શ્વર अंगविजापदण्णय अग्गेयाणि य अगी य जिम्माणिटं च सप्पों । गिद्ध-लोहितके दुव्वे सुवण्गपडिपोग्गले ॥ २६ ॥ एतेमु सद्द-रूवेसु मणुण्णाणं च आगमे । उदत्तम्मि य पुच्छंते धुवो लामो सुवण्णके ॥ २७ ॥ एतेसामेय णीहारे अमणुण्णे आगमम्मि य । णिम्महे गिद्रुते चलिते धुवो णासो सुवण्णके ॥ २८ ॥ धणं पुरिसो गेण्हित्ता गोमयं उदफमट्टिका । पुणे गिद्धे मुहामासे आहारे उत्तमम्मि य ॥ २९॥ [.. .........। ] तिण-तुस-करीसाणि मुहं च परिमद्दति ॥ ३० ॥ आहारम्मि य सव्यम्मि तन्त्रातपडिपोग्गले । रसाणं दसणे उदिते पीणियरस ये मुंगे ॥ ३१ ॥ एतेमु सह-रूवेसु मणुण्णाणं च आगमे । धावक अण्णलाभं च एतस्स दसणे धुनो ॥ ३२ ॥ अण्ण-पाणे विसंजुत्ते बहुखित्तपिपासिते । जायमाणे अलामम्मि परिविलु भाइतं ति वा ।। ३३ ।। अण्ण-पाणस्स णीहारे अमणुन्ने आगमम्मि य । छातकं अण्ण-पाणं च धुवं पत्थि वियागरे ।। ३४ ॥ दारकम्मि गिहीतम्मि अक्सिम्मि अंजितम्मि य । दारकाणं च कीलणके दारकाभरणे तथा ॥ ३५ ॥ पच्छके पुत्तके चेति पोतके पिल्लके तघा । सिंगके [तण्णके व ति] घत-दुद्धदरिसणे ॥३६॥ .. पुफे पराले तरुणे विरूढे तरुगंकुरें। जोगियालिकं दिहा पुन्नामेसु पालको ।। ३७ ॥ एतेसामेव णीहारे अमणुण्णाणं च दरिसणे । गिम्म? णिहुते चलिते पुत्तणासं वियागरे ॥ ३८ ॥ चतुप्पदं गामे दुप्पदे चतुप्पयं उयकरणे चतुष्पददरिसणे वा गहणे चेय वाहिते जोइतम्मि य ।। एतेमु सद्दरूचेमु मणुण्णाणं च भागमे । उदत्तम्मि य पुच्छंते धुवो लाभो चतुप्पदे ॥ ३९ ॥ एतेमु चेर णीहारेसु अमणुण्णाणं च भागमे । णिम्मद्वे णिहुते चलिते घुयो णासो चतुष्पदे ॥ ४०॥ पलाणि मुसलं सुप्पं पीढकं पंडाका झयो। पाद-ऽच्छि-पाणि-घटफो केसा सोपाणपादुका ॥४१॥. पादपुंछणं उपाणहा आभरणं सव्यपादोरकं च यं 1 रुगीं चलोढो वणिसया.. .उक्सली (1)॥ ४२ ॥ [. 1] उत्तमम्मि य पुच्छंते पेस्सलामं घुवं यदे ॥ ४३ ।। एतेसामेव जीहारे अमणुण्णे य आगमे । 'गिम्महे गिद्दुते पलिते पेरसणासं धुवं यदे ॥ ४४ ॥ पासाण मट्टिया लेटुं कामयालं पिधुला सिला । सव्वलोहे य पुघुले खेत्त-यत्युपरिर्गहे ।। ४५ ॥ ] अत्युते पुधुले दढे ॥ ४६ ॥ उदगम्मि य आमासे सह-रूवे य उत्तमे । उदतम्मि य पुच्छते यत्युलामं वियागरे ॥ ४७ ॥ र 'ऐतेसामेय णीहारे अमणुण्गाणं घ आगमे । णिम्महे णिद्रुते पलिते यत्युणासं वियागरे । ४८ ॥ परधम्मपलामाणि याला कुसुमालिका । चीरं घ यासगं चेय पतुण्या पालकाणि या ॥४९॥ उपगरूयं प फापासं विदं अयकेमु य । वेष्टिका यफमंहं प विचम्मि अणूमु य ॥ ५० ॥ एएमु सर-रूवेसु मणुगाणं च आगमे । उदचम्मि य पुच्छंते यत्थलाम वियागरे । ५१ ॥ जय प्रतेसामेष णीहारे अमणुणाणं घ आगमे । गिम्म? गिटुते पलिते पत्यहाणि घ णिदिसे ॥ ५२ ॥ अम्मतरामासे पढामासे गिद्धामासे पुण्यामासे पुण्णामधेनामासे परिणामासे सव्यपणितगते सध्यसिप्पिया- 39 सगुगले सय्यभंदगने सत्यमियोपकरणे सत्यसिप्पिगदसणे फारकसंलापरम्मि किहिते मुंगयपहिच्छत्ते उदासि- जिसमासदरिमणे। 1 ....... 20 C 23 १५ मुंष्ण पु.॥ २वायक..॥ ३ 'गियालिक दिहात. पिना॥४पडकोपयो..बिना। ५पी पासो पोयति ॥ ६ मिटुन गिदुते चलिने ३ पु. Hि• • 1 गिटुए चलिए पलिए . एव ॥ ७ पासाणि नगद ॥ ४५० मरधुने पुल पर दई म उदरम्मि य । आमामे सह-रये य उत्तमे व पिसेसमो। पनि प.पु. भारे पापरं पुथुले द... ॥१० हलभितर्गतः गन्दर्भ रत. एर बडे । ११ मि पनि । १२ गुशि ॥ सुपरिने ! पु.॥
1 तेरसमो जोणिलक्खणवागरणज्झायो एतेसु सद्दपडिरूवेसु मणुगाणं'च आगमे- उदत्तम्मि य पुच्छंते आहारम्मि य पुच्छिते । एतेसु सह-रुवेसु कम्मलामं वियाणिया ॥ ५३॥ एतेसामेव णीहारे अमगुण्णम्मि य आगमे । णिम्मढे गिट्ठते चलिते कम्मणासं वियागरे ॥ ५४ ॥ अन्भंतरामासे गिद्धामासे पुण्णामासे [पुण्णामवेजामासे] दक्खिगामासे अपत्थित-गंमीर-थिमिते आवम्गिते अदीणसंत्तसव्वणाणगकित्तणे 'लोक-वेय-सामयिके आभिरामिके अभिधम्मीयसुतणाणाणुकित्तणे लिपि-गणित-रूप-रायविना- 5 परिकित्तणे अंग-सर लक्खण-बंजण-सुविण भोमुप्पात-अंतलिक्खअणुकित्तणे । एतेसु सहरूवेसु मणुण्णाणं च आगमे । उदत्तम्मि य आहारे पुच्छते उदत्तम्मि य । विजालाभं वियाणीया उत्तम जीविकारणं ॥ ५५॥ एतेसामेव णीहारे अमणुष्णागं त आगमे । णिम्मढे गिद्दुते चलिते विजाणासं वियागरे । ५६ ॥ अभंतरामासे सुद्धामासे पुण्णामासे पुण्यामधेजामासे दक्खिणामासे पुप्फ-फलसद्द-उवभोगसद्द-ओसधीपडिपो-10 गलेसु उदत्ते भक्ख-भोजे य पेज-लेज्झकित्तणे य । एतेसु सह-रूवेसु आगमे उत्तमम्मि य । धातकं [धण्णलाभं च] अत्थलाभं च गिदिसे ॥ ५७ ॥ एतेसामेव णीहारे अमणुण्णे आगमम्मि य । णिम्महे णिहुते चलिते छायकं तत्थ णिदिसे ॥ ५८॥ अभंतरामासे णिद्धामासे सुद्धामासे दढामासे पुण्णामासे पुण्णामधेजामासे उदत्तथी-पुरिसदसणपादुमावे जण्णे वा छणे वा उस्सये या समाये या याधुळे या चोलके या उपणये या पसत्य-विस्सत्य-विमुत्तसुखासणभावे रतिहासे 15 पडिरूवेण णिदिसे। एतेसामेव णीहारे अमणुण्णाणं वा आगमे । णिम्महे णिहुते चलिते भयं तत्थ वियागरे ।। ५९ ॥ तत्थ इमाणि दीसत्यरस णिव्यत्तीकारणाणि भवंति । तं जधा -दीणं मं पुन्छति, अगलं मं पुच्छति, छातकं मं पुच्छति, विखित्तं मं पुच्छति, दीणं मं उपसर्कति, दीणं पेक्खति, दीणमधीतं पुच्छति, दविणं बहुमन्नते, किलिडे पत्या-ऽऽभरणं किलिट्ठमल्ला-ऽणुलेवणो अणज्जवेसा-ऽलंकारो अणुदत्तसयणा-ऽऽसणो या उत्तरामिमुहासणाभिग्गहो पा 20 समुजतो णिवेट्टो तिरियम्मुहो ओलोकेंतो तिरियम्मुंहो पेक्खति, नीयम्मुखो णिज्झायति, हेटामुहो यंदति", सिसतो अणय- स्थितं पुच्छति, परावत्तो गिम्मैजति ओगमति, अपसर्फतो आभासिनते अणुदत्ते दीणपडिपोग्गले दीणे सह-सवे रस-गंध- फासे अणुलेपणे सरे य सध्यम्मि दीणे अणुदत्ते किलिट्टे दीपमाणसे । तत्य इमागि दीगलक्खणाणि भवंति । तं जधा- अपसक्किते १ अपगते २ अपणामिते ३ जिम्मढे ४ णिहिते ५ । गिट्टितम्मि य आहारे अमणुण्णाणं च आगमे ॥ ६० ॥ णीहारे सह-रूवाणं फासे गंधे रसम्मि य । पचासागमणे चेव कण्णाणिव्वहणं च ॥६१ ॥ विविधो य अत्यपचयधम्मरस कामुकरस सओ सव्वेसिं चेव अत्याणं अलामो त्ति, नत्य इमं दिसं पुच्छगहा भवंति । जघा-अप्पसत्यस्स अत्यरस अलाभो विणासो विद्दयो विप्पयोगो आतंको आतुरो मरणं छविच्छेयो पंधो पवासगमणं पराजयो धणापचयो अणावुट्ठी अकम्मं सोभा छातकं पतिमयं चेति । किंचि अप्पसत्यं सवं एतं दीणस्स पुच्छमाणेसु पयुढेसु पसुसु य णेफेर्मु जुद्धाय परिते भवे पहिते आहतम्मि य मुट्टिणा मिउडीयं च वग्गणे अतिपातिते 50 विवादे विगहे त्ति य फलई तत्य वियागरे। उकंपिते झपिते खित्ते ओयाधितम्मि य संरुद्ध उपधार्यते य रोदंते केलई धुयं । १ लोकवेसाम सं. ३ वि.पु. । लोकएसाम° है• त•॥ २ मामिध • त• ॥ ३ 'सरक्सण. . दिना ॥ ४ घातकं पुत्तलामं च अत्य' सि•॥ ५ दीणमत्य है. त• विना ॥ ६ कमंति है. त.॥ ७ पुच्छा पंदति यह ई. त• पिना॥ ८ दत्तसमगो या उन सं३ पु.॥ ९ यामपुजुत्तो हं• त.॥ १० तीरियम्मुसो ह..॥ २१ "ति सितो अण' है. त.॥२ किमजति है. त• ॥ १३ मासासिजते है• • ॥ १४ अप्पसत्यस्स लामोनि.॥ २५पराजगोपचयो सं३ पु.॥ १६ 'मु यदाय यरिप है. तु.॥ १७ फलहो..॥ 25 क १४४ भंगविज्ञापदण्णय पाचियाकेचिको कलहो तालिते पहरेहि य । सस्थम्मि रुधिरुपाया छइच्छेदं वियागरे ।। ६२ ।। संगामे जुद्धसद्देसु अन्भातलपलाइते । सन्नाहे जुद्धसंरागे [रायविजाभये भयं ।। ६३ ।। जंघापादे य छत्तचोपादधिकाणि य । जुत्तं च जाणवासं च पंथं च पडिपोग्गेलं ।। ६४॥ पवासगमणे सने कंतार गहणासु य । संपत्थिते पदग्गाहे भंदडग्गाहणासु य ।। ६५ ।। लोहेसु पव्वतम्गणे तं तिरिययसितियं वा पत्ािताणं य दंसणे कोसल्लपुण्णपाते य पपासा आगतो चेति पसत्यपधासागामी य परातं च णिहिते । एतेसु सद्द-रूवेसु पवासा आगमम्मि य । आहारेसु य सव्वेसु पवासा आगमं वदे ॥६६॥ 'थिते साधारणे चेव पर्यत्तं तत्य णिदिसे । गीदारे य णिवटेति गहुँ तत्य विणिदिसे ॥ ६ ॥ जीहारे य मणुण्णे य कण्णाणिव्वर्ण पदे । आहारे य मणुण्णे य कण्णायावहणं वदे ॥ ६८ ॥ णीहारे चेय पीहारे दीगंसि मुदिते वि वा । पडिरूवेण पस्सित्ता ततो सम्मं वियागरे ॥ ६९ ॥ ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय जोणीलक्खणवागरणो णामझाया तेरसमो सम्मत्तो ॥ १३ ॥ छ । [चोदसमो लाभदारज्झाओ] 10 अधापुज्यं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय लाभदारं णामऽज्झायं। तं खलु भो ! तमणुवक्खस्सामि। 18 जधा-अत्थदारं १ समागमदारं २ पयादारं ३ आरोग्गदारं ४ जीवितदारं ५ कामदारं ६ वुहिदारं ७ विजयद्दारमिति ८ । अतो अत्यहारं । तं जधा-अनंतरामासे दढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे मुदितामासे पुण्णामधेजामासे दक्सिणामासे आहारे उत्तमे पुप्फगते फलगते हरितगते परग्धयत्या-ऽऽभरण-मणि-मुत्त-कंचण-प्पवाल-भायण-सयण-भक्ख-भोयणगते परपउयकरणगते पहाणा-ऽणुलेवण-विभूसिय-पहट्ठणर-णारिपादुब्भावे एताणि पेक्समाणो वा भासमाणो या आमसंतो पा एतेर्सि या वाहिरे पादुम्भावे सद्द-रूवे पुच्छेज अत्यलाभं वा खेमं या पुत्तं वा णिचर्य वा जाणं या जुर्ग या 20 सयणं या आसणं या भो(भा)या या भूसर्ग वा जं किंचि पसत्थमत्यं पुच्छेज लाभमंतरेण एवमेवं भविस्सति त्ति यत्तव्यं । एताणि चेच पेक्समाणो वा भासमाणो या आमसंतो या एतेसिं का वाहिरे सदस्वपादुभावे पुच्छेन्ज अत्याणि या सयं या विणासं या किलेसं वा अणत्थसिद्धि या जं किंचि अप्पसत्यं पुच्छेज अलाभमंतरेण भविस्सति त्ति बूया । एनाणि चेव अकमंतो पुच्छेज लाभमंतरेण ण भवरसतीति यूया । एतागि चेर अकमंतो पुच्छेज अलाभमंतरेण सन्यं भविस्सति त्ति यूया । एताणि चेव छिंदतो पा भिदंतो वा स फालेंतो वा » 25 दिराडेतो या णिवतो या पुच्छेज अत्यहाणि या सयं या विणासं या किलेसं या अणत्यसिद्धिं या जं किंचि अप्प- सत्यं पुच्छेन लाममंतरेण तिउणो अवायो भविस्सतीति वत्तव्यं । एताणि चेव उवकतो पुच्छेन अत्यलाभं या खेमं पा पुत्तं वा गिचयं वा जाणं या जुर्ग वा सयणं वा आसणं वा भायणं या भूसणं वाजं किंचि पसत्यमत्यं पुच्छेन्न याममंतरेणं एवमेतं भविस्सतीति तिगुणो लाभो यूया । एताणि चेव उपकटुंतो पुच्छेज अत्यहाणि या सयं या विर्गासं पा फिलेसं या अणत्यसिद्धिं या जं विचि अप्पसत्यं पुच्छेज ण भविस्सतीति यूया । एताणि अपकटुंतो पुच्छेन एक- मादीगं लामो ण भविस्सतीति यूया, जं च पुच्छेन तस्स तिगुणो अपायो भविस्सतीति घूया । एठाणि घेर अपकटुंतो १पहरेट्टिया • त.। परिहरेहि य सि•॥२ संगामजुद्धे सहेमु हत• ॥ ३ अम्मालतप सं. ३ पु.सि. ४पचापापाद नि.॥ ५ पोग्गला है. त•॥ ६ हणेसु य है. त• पिना । ७ हणेतू तंतरियय' है. त• ॥ ८परिययणाण दंसणे • त•॥ ९सिते • त•॥ १०पयुक्त है. त•॥ १९ अत्यं पा टाम • त. सिः ।। १२ या जोगत दिना १३ एपमेयं म.त.॥ १४ एतचित्रान्तर्गतः पाठः है.त. नाति । पा.१.॥ १६ अत्यलाम't..॥ १७ दिणासणं घाई..॥ १५ णिस्खंतो 5 अट्ठारसमो जीवितदारज्याओ पुच्छेन एवमादीणं लामो ण भविरसतीति चूयां । एताणि चेव उपकड्डित्ता अपकड्डेजा ततो पुच्छेज एवमादीणं पुव्व लाभो भवित्ता पच्छा अलाभो भविस्सतीति बूया । एवमादीणि जेव अपकड्ढेत्ता उपकड्डेजा ततो पुच्छेन्ज पुव्वं अलाभो भविस्सति पच्छा लाभो भविस्सतीति बूया ॥ ॥ इति लाभदारं ॥ १४ ॥ छ । [पन्नरसमो समागमद्दारज्झाओ] समागमदारं वक्खस्सामो। तं जधा-हंस-कुरर-चक्कयाक-कारंडव-कातंव-काकाक मेञ्जकामिधुणचतुरेसु सत्तेसु मेधुणं समाचरतेसु तेसु आलिंगितं चुंबितं हसितं गीत-वादित-मदग्गहणे वधू-यरसदसणे सयणा-ऽऽसण-सव्वसगुण-तिरि- क्खजोणीउपचारे सकुणे णिदिसे चचर-मधापध-सव्वदारसमयतित्थोदुपाणआभोगपणितगते तेसं परिकित्तणासु सागर- णदी-पट्टण-गोत्तमेसुसमागते सव्वसमागमागमगते यसव्वसंजोगगते सव्वहरिसपादुन्भावे एताणि पेक्खमाणो वा भासमाणो वा आमसंतो वा एतेसिं वा बाहिरे सह-रूवपादुभावे पुच्छेज समागम वा सम्मोई वा संपीतिं वा मित्तसंगम वा 10 वीवाहं वा जं च किंचि पसत्थमत्थं पुच्छेज समागममंतरेणं एवमेतं भविरसतीति बूया ॥ ॥ समागमदारं ॥ १५ ॥ छ । [सोलसमो पयादारज्झाओ] अध पयादारं धक्खस्सामो । तं जधा-दारकपादुभावे कीलणके दारकाण अभिगव्वे पुष्फ-फल-पवाल-परोहगते सप्पक सीहक-वच्छयच्छके तरुणपादपके अण्णं वा यं किंचि वालकं बालसमाचारं वा एताणि पेक्खमाणो 15 या भासमाणो वा आमसंतो वा एतेसं वा वाहिरे सह-रूवपादुब्भावे पुच्छेज पयामंतरेण पुच्छसीति वत्तव्यं, भजा ते भविस्सतीति धूया । एताणि चेव पेक्खमाणो वा भासमाणो या आमसंतो वा एतेसिं या पाहिरे सद्द-रूवपादुन्भावे या पुच्छेज पयाविप्पयोगो ण भविस्सतीति वूया । उदरपडणं या पुत्तमरणं वा जं किंचि अप्पसत्यं पुच्छेज पयावि- प्पयोगो ण भविस्सतीति वूया ।। ॥ पयादारं सम्मत्तं ॥ १६ ॥ छ। [सत्तरसमो आरोग्गदारज्झाओ] आरोग्गदारं वक्खरसामो -तत्थ अभंतरामासे ढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे मुदितामासे पुण्णामघेजामासे दक्सिणामासे उत्तमामासे पहट्टपुष्फ-फलामासे परग्यवत्था-ऽऽभरणे भूसणगते अन्मुत्थिते उवविहे हसिते भणिते गीते वादिते अप्फालिते पेक्सिते गजिते मुदिते णारीगणसमुदिते पसु-पक्सिसंदसणे उदग्गवत्या-ऽऽभरण-सयणा-ऽऽसणगते एवं विहसद्द-रूवपादुन्भावे पुच्छेज आरोग या पमोदं वा सोमणसं या जं किंचि पसत्यमत्यं पुच्छेज आरोगमंतरेणं 25 एवमेतं भविस्सतीति यूया । एताणि चेव पेक्समाणो धा भासमाणो या आमसंतो पा एतेसिं या पाहिरे सह-रूप- पादुम्भावे पुच्छेज रोग या विणासं या मरणं पा जं च किंचि अप्पसत्यं पुच्छेज रोगमंतरेणं ण भविस्सतीति यूया ॥ ॥ आरोग्गदारं सम्मचं ॥ १७॥ छ । [अट्ठारसमो जीवितदारज्झाओ] जीवितहारं वक्सरसामो । तं जपा-तत्य अन्मंतरामासे दढामासे गिद्धामासे मुद्धामासे पुण्यामधेनामासे 50 अणुपहुतामासे आहारे उत्तमे सुपसण्णे सूरे उदग्गे उत्तमे उपविढे उल्लोकिते इसिते उनहे गजिते अप्पलिते पच्छेलिए - एतचिहान्तर्गतः पाठ है. त• नास्ति। २ मेत्रका है. त•॥ ३ सफुणणिद्दे चचरमहाप' है. त•॥ ४'समागमगते है..॥ ५पयामतरेण भवि० है.त. पयायिप्पयोगेण मवि मि.॥ ६पेसिते है..॥ ७ उफट्टिए गझिए है...॥ ८ अफाडिवे पच्छलिए सं . पु.॥ 20 भंग०१९ 10 15 २४६ अंगविजापदण्णर्य गीते यादिते तल-ताल-फाससमुदिते पर-णारिपादुद्भावे सरत्यपरम्पगते सव्वणिक्ष-धुवपादुम्माये एताणि पेक्समायो चा भासमाणो.या आमसंतो या एतेसिं या याहिरे सद्द-स्वपादुभावे पुच्छेज मरणं या णिनाणं [वा] वह पा] वाई वा किंचि अप्पसत्यं मरणमंवरेणं पुच्छेन्न ण भविस्सतीति वूया । ॥ जीवितहारं सम्मत्तं ॥ १८ ॥ छ । [एगूणवीसइमो कम्मद्दारज्झाओ ] कम्मदारं णाम यक्सरसामो । तं जधा-रायोपजीवीसु फारुकोपक्सरोपकरणेसु य उदग्गपुप्फ-फलगते पच्छेलिते मुदितणारि-णरगते यं किंचि पसरथमत्यं पुच्छेज पणियमंतरेण एवमेतं भविस्सतीति घूया । एताणि न्नेव पेक्समाणो या भासमाणो या आमसंतो या एतेसं या वाहिरे सह-रूवपादुभावे पुच्छेन्ज कम्महाणि या फम्मणासं या पणियविणासं पाजं किंचि अप्पसत्यमत्यं पुच्छेन्ज कम्ममंतरेणे ण भविस्सतीति यूया ।। ॥ कम्मदारं सम्मत्तं ॥ १९ ॥ छ । [ पीसइमो बुट्टिदारज्झाओ] वुट्ठिदारं णाम यक्सरसामो । तत्य गिद्धामासे जलामासे गिहुँढे णिस्संघिते मुत्त-यश्वकरणे सेदपरामासे उदगदसणे उद्गचरसत्तपादुभावे णाया- कोटिंघ-डआलुए पदुमुप्पल-जलय पुष्फ फल-कंद-मूलसंदसणे सयजलोबकरणे सव्यजलोपजीविसंदसणे सव्वजलपादुन्मावे तेल-पत-<द्ध-मधुपाणगते वुट्टि-थणित-मेहगन्नित-विजुतपादुम्मावे णदी- समुद्द-कूप-तलाक-विकरण-पत्सवणोपलंभे एताणि पेक्समाणो या भासमाणो या । आमसमाणो का एतेसिं या बाहिरे सह-रूवपादुभावे पुच्छेज बुद्धिं वा यासारत्तं वा उदकं या सरसणिप्फत्ति सस्स[संप]दं या एयमादी यं किंचि पसत्यमत्यं पुच्छेज धुट्ठीमंतरेणं एवमेतं भविस्सतीति वूया । एताणि जेय पेक्समाणो या भासमाणो या आमसंतो वा एतेसिं या बाहिरे सद-रूवपादुभावे पुच्छेज दुवुहिं या अपम्हं या सस्सविणासं या सरसवापत्ति या जं च किंचि अप्पसत्यं पुच्छेज सस्समंतरेणं यासारत्तमंतरेण वा भविस्सतीति बूया ॥ ॥ वुद्विदारं ॥ २०॥ छ । [एगीसइमो विजयद्दारज्झाओ] तत्य विजयद्दारं णाम यक्सरसामो । तं जघा-तालवेंट-भिंगार-वेजयंति-जयविजय-पुस्समाणव-सिविका-रध- पादुभावे परग्यवत्य-मल्लाभरणपादुभावे परग्घयत्य-मल्ला-ऽऽभरणअप्पडियसंस-भेरि-दुंदुभि-परसद्द-रूप-रस-गंध-फासपा- दुभाव सेणालंभे अडवी-पररह-संघावारणिनातलद्धअधिगते पमुदिते पादुव्भावे पुण्ण-सुद्ध-णिद्ध-दृढ-अभंतर-पुण्णा- 23 मवेजामासे अपराजितसद्द-रूव-रस-गंध-फासपादुन्भाचे पुच्छेज विजयं वा पररथमदणं वा सत्तुपराजयं या जं च किंचि पसस्थमप्पसत्यं वा पुच्छेज विजयमंतरेणं एवमेतं भविस्सतीति वूया । एताणि नेब पेक्समाणो वा भासमाणो वा आमसंतो या एतेसिं जेय वाहिरे सद्द-रूयपादुभावे पुन्छेज रायमरणं या रायहाणिं वा रायविप्पलोयं वा रायभंग या संगामपराजयं वा जं किंचि अप्पसत्यमत्थं पुच्छेज पराजयमंतरेण ण भविस्सतीति बूया । जघा पढमं पडलं परिवारितं तधा सव्याणि पडलाणि परियारेतव्याणि ॥ ॥ विजयद्दारं णामं ॥ २१॥ छ । [ यावीसइमो पसत्यज्झाओ] अधापुव्यं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पसत्थं णामाज्झायं । तं सलु भो! बक्सरसामो । तं जधा-तत्थ कय-विक्रय-लाभसंपदाय कम्मागतलाभसंपैदाय कित्ति-वंदण-माणण-पूयणासु उक्ट्ठिपहसद्दपादुन्मावे केस- १ णिव्याणं या यांघर्ष या जं है• त• विना ॥ २ रेण भवि' है. तः विना ।। ३णिदुट्टे णिसं १० त०॥ ४'कोहिमुआलुए है. त• विना । ५ "दुइमुद्धपाण' हं• १० विना ॥ ६ विकरपस्स ई. त• विना ॥ एतचिहान्तर्गतः पाठः ह.त. नास्ति । ८खलु हो धक्स है.त.॥ ९ पदा-कित्ति है. त• विना ॥ 20 30 यावीसइमो पसत्यज्झाओ मोलिकरणे केसांमिवद्धणे कण्णाकण्णविवाहे अक्खलियसव्वविजापयोगसिद्धिसु खत्तियसोत्तिउपयोगे 'खितिउवचयसद्द- -पाउन्भावे इक्खुवण-सस्स-फल-हरियक-सस्साणं च दंसणे खेत्तसुभिक्ख-महावंधुजणसमागम-वंदणेसु गेजकव्व-पौदवंधपैट्ठ- कव्यसंपूयणासु गोणा-वलक्ख-मिग-गर-णारि-सयण रक्खासु गंध-मल्ल-भायण-भूसणसंजोयणासु घण-विजुत-बच्छ-गोच्छक- -जाणा-ऽऽसण-सयणे सव्वमिधुणचर-कमलवण-भमर-विहग-द्रुमसमागमेसु घात-वध-बंध-रोध-परिरोध-हासभाव-पेतपरिमोय- -ण-दसणेसु घिसुम-हेमंत-वसंत-सरद-पाउस-पासारत्तयतरासपूयणासु'ओघट्टपरकमोसोपकमच्छदसणेअग्धेयमणप्पसादणेसु । घोडदाढिकरवंधणेसु घंटिक-चक्किक-सत्यिक-वेतालिक-मंगलवायणेसु यस्सकसमिद्धसासकगहणे अचापचचणगंध-मल्ला- ऽगरुभरणे चिरप्पयाँसगतसिद्धयत्तसंबंधिसमागमेसु भूताधिपञ्चपुणोप्पत्तीसु चेतियमहामहिकतुरियस सुती-दसणेसु चोरहित- भट्ट-गट्ठ-पतिलाभणेसु चिट्ठयकणचीणकरघणोदीरणेसु छत्तोपाहण-भिंगारसंपदाणेसु रच्छाहसंपदाहस्समुप्पत्तीसु छिंदति मासातिमासे इच्छूपपन्नहाससमुष्पत्तीसु छेगसमावयण-संपूयणा-ऽभिवणासु अच्छोदकडप्पण्णीपतिभंगदसणामु छंद- मणोरहसकपसत्थैकमुपपत्तीसु जलभायणजलासयपूरणेसु जातकम्मादिपसत्थजलणपन्जालणेसु जीवित-धैंण-कण-कणग- 10 रयण-भायण-भूसण-परिधाण-भवण-सुहसरणसंपदासु उलअन्नवसाधुसंपूयणासु जेट्टाणुजेहसंथाणथावणासु जोति-जलण- विजु-वज-मणि-रतणतप्पणासणेसु जम्मणपरिवंदणवालमंडलेसु अजजण-सम्माणण-पूयणासु झाणसमाराधणसमारंभेसु झीण-परिक्खीण-विणड-पुणलाभ-पुराणणवीकरणेसु अज्झप्पगतिजखिप्पसंदसणे आज्ञयणीयसामिसामिद्धयागपञ्चवदाणासे झणितणीवारदसणे झंझणितभूसणणिरसणसद्दे ततो पञ्चवदाणे तणिते तिरिणे तुच्छापूरिते तेसं तेसं च भावाणं पसत्थाणं दसणेसु अंतोमुहचुंबणे अंतट्टिणा रंगसमापेण थलज-जलजपुप्फ फल-हरित-कंद-मूल-सरसवतारणेसु थलपंथ- 15 सलिलपंथभंडावतारणेसु थिताथितसद-सिद्धसाधुभुत्त-गय-तुरय-वसभ-मुदितणर-णारी-गट्ट-गीत-वादित-लंभूसौंससद्दुप्पत्ती- सु थुति-संथव-सिद्धकम्माणुकित्तणेसुअत्थेस्सरियभोगवद्धणेसु थोकाभिवद्धणे थंभासण-सयण-पुरिस-दुमसंसयेसु दहुम्मणे वा पिज्जाँदीविगुणसंपयोगसिद्धीसु दुम-भवण-तुरंग-पव्यतारोहणेसु उद्देस-देस-पुर-गामवेद्धणेसु संदेहधीवेसणेसु घदंसक-मुकुड- कुंडला-ऽऽभरणविविधपिणेंधणे" वरतालघणे उद्धविते अधिजमाणे उद्बुजमाणे - उद्धे कते अणुमते धातदाणसंप- दाणेण व कते मंडिते णिवेसिते अणुचारिते अणंगजणसतपहिहसमागमे अण्णोण्णसंपदाणेण आणदितदसणे पचग्गरूव- 20 जोव्वण-फल-हरितदसणे याहिरउक्कट्ठपहट्ठसद्दपादुभावे पीतिकरविहकसंकीलणेसु पुण्णभोयणेसुदंसणे पेंडिजमाणधण-रयण- पुप्फ-फलदसणे योधणे रुद्दोपघातकरजलजलणविचय-सव्वभयमोक्खणदसणेसु पंचरस-बण्ण-फासोपपण्णधाणसुद्दमणुव्वे- गर्दसणेसु फलसंपदासु फासितसुत्तत्थपतिग्गहे फीतसव्वकित्तणदसणेसु फुल्लॅतकमलुप्पलदसणे उड्डससंभमायफमेसु अड्डोदितहिसद्दसमुद्भवेसु अप्पंसितपरिकमसिद्धीसु बलि-मंगल-यागहरण-सेसापादुभावे वालालंकितवलवलम्याहण- दसणेसु पिवतिसरिसरिसकम्मसंपयुत्तेसु बुझंतकमलवणवखगमिगणरणारिदसणेसु वेस्सप्पसादकरणे बोधिजमाणणरदेय- 25 तुरियणिणिस्सणेसु वंधणागारमोक्खणेसु आभरणपिणिंधणेसु भावपादुन्मावे अभिमुहपदक्सिणासणणिव्यसप्पतासु गिरि- क्सणेसु भमुहुरखेपणे उन्भेदसमुद्भावे भोयणोकारणिस्सणे भंडकरंटगैपतिपूरणदसणे मत्तमातंगदंसणे गिस्सणे माणि- १खत्तिउप हं. त• ॥२°कच्छपा सम० ॥ ३ पाययंचपव्वकदृसंपू है. त•॥ ४ पट्टफचसं सं ३ पु० ॥ ५°सुणाणाचल' है० त०॥ ६ जाणसयणासणे ह. त.॥ ७°दुगसमा सं ३ पु०। दुग्गसमा सि०॥ ८ सणासु सं ३ पु.॥ ९ उग्घट्टपरममोसाप सं ३ पु. । उग्घुट्टपरक्रमासोप ति• ॥ १० °चासागयासिद्ध ह. त॥ ११ °मु धुवाधि है. त•॥ १२°सुवीदंस' है. त० विना ॥ १३ चिंतठय° सं ३ पु० ॥ १४ °कवीणयकर' है. त• ॥ १५°मुत्त. त्योपदाण सि० ॥ १६ °संपादणेसु ह. त• ॥ १७ इशूपप है. त० ॥ १८ °वंदणेसु है. त० ॥ १९ °पत्तिमंग १० त. विना ॥ २० 'त्यसमुप सि० ॥२१ जलाजलस' ह. त• पिना॥ २२ घणकणग' सं १ पु• सि.॥ २३ °उजमनय' . तः ।। २४ °णकालमंडणेसु ई० त० ॥ २५ °सु झासियणी है. त॥ २६ अंतदिणा • त• ॥ २७ °सायसह हं. त•॥२८°माणे दीपि . त.॥ २९ पदाणे १. त.॥ ३०°णे धर' है..॥ --एनधिला. गन्तर्गतः पाठः १० त० नान्ति ॥ ३२°लयाह है. त• मिना । ३३"तचलयलयफयाहाणहै. त•॥ ३५ कतिम- रिसफम्म है. त•॥ ३५°जमाणे परह. तु.॥ ३६ °यणिम्मट्टेमु है• •॥ ३७ गस्स पति' ..॥
10 । अंगविजापइण्णर्य जमाणे मिघुणसमागमे मुदितणट्ट-गीत-वाइयसदसणे अमेझपखालियसुद्धदंसणे अमोघविचेट्टिते मंचातिमंचकरेंगेऽधिरोहणे जलधरमधुरगयमत्तजयघोसणिग्योसे यत्ताणुयत्तणिद्देसपतिछंदे वइर-मणि-प्पवाल-मुत्तासंजोयणे जूव-चिति-सेतुबंधणमाय- तणकिरियासु जे य पसत्था सकसि देहसि फंदरेदे योगियोगसिद्धिसु यण्णेजामासे यण्णदसणे हस्सवद्धणे रासिपद्धणे रिपुद्दडपचाणयणे रहविरुद्धदसणे रोयितपुरभावणप्पवेसणे सुरोरूवलणरिंदसस्थसंसिद्धसमुप्पयाणेसु रग्मुजाण-सलिलय- तागमणप्पवेसणेसु अलसदसणे उल्लालिते आलिंगिते लुलितप्पसादिते उल्लंहिते उलोकिते उल्लंपिते वरवधूकित्तणे वारमो- क्खाधिकारसंदसणे विलंधिते वूहिते उव्वेहासिते योसट्टमाणे भायणपूरणे वंदितसत्थवरहसंथवे उस्ससिते आसासणे उस्सिंघिते सुद्धमल्ल-बत्योदण-वलिकम्मगहण-दसणे सेवलिकायत्तकट्ठकित्तणा-गति-दसणेसु सोवञ्चसप्पण्णफासुकाहारसंपदासु संघायसम्मोदणासु हैसितोपहसिते आहारे गतेहित-समीहितसंपयासु हुतहुतासणच्चिसंभवे हेम-मणि-मुत्त-प्पवालसजोयणेसु अहोणिसा-मास-पक्स-[3]दु-यासादिसु हंस-कुरर-चक्कवाफ-सरभोतुककालपञ्चागमोपसमादिसु । यं लोके पूयितं किंचि मणो यत्थ य रजति । यमिंदियाणमिटं च पसत्यं तम्मि णिदिसे ॥ १॥ ॥ इति महापुरिसदिण्णाय० पसत्थो णौमझायो वाधीसइमो सम्मत्तो ॥ २२ ॥ छ । [ तेवीसइमो अप्पसत्थऽज्झाओ] अधापुव्यं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय० उप्पातिकमप्पसत्थमज्झायं वक्खस्सामि। तं जधा-तत्य में हाणी पुरेक्सटा ण पुंछा अलाभेसु सुहे जीविते बद्धीयं जसे विजाय समागमे जये इति उप्पाया अप्पसत्था भवति । 15 तं जघा-कड्डिते कासिते किलेसिते उकृणिते केसणिम्मजणे अकोडिते उर्फदिते खलिते अक्खारिते सिंसिते खुधिते खुसिते खोटिते संहिते उग्गहिते गालिते गिद्ध-सिगालदसणे गृहिते गोययोरसभुज-चरण-मुखाणे गोविते गंदिते ओपट्टिते उग्याडिते पिंघिणोपिते घुण्णिते घेयअमेझपादुमावे घोरमहव्ययदंसणे घंसिते चलिते चालिते चित्तविन्भमे वुच्छदड्ढे चेतिविणासणे चोरभयोदीरणे चंदप्पभोपघातिते पच्छादिते पंच्छादाणछिन्ने छुन्ने छेलितछादिते छंदाभिलासअसंपत्तीय अजरिते जालिंकरे जीवितसंसये जुगुच्छितअणिट्ठोपसहदसणे जेयहितसहपादुन्भावे जोतिसापणासणे जंभिते झुपिते 20 झामिते झीणे झुझुरायिते अज्झेणणासिते झोसिते उज्झते तमूभावे तासिते णिक्खिते तुच्छिते तेणिते तोमरविद्धे तंडिते उत्थते थाणपघायणे थितोपवेसणे णिटुंते थेव्यिद्धे थभिते उद्दविते दालिते दीणमुहामासे उहुते देसपपतणे दोभग्गे दंड- फसा-लेहुधाते धमिते धाविते धिक्कारकरणे धुते ओधुते घेणववच्छपघातणे अधोपाणे धंसिते णद्वे ओणामिते णिहिते पूणे गामपतणे अन्नोसफिते गंदीउपपाते अणंतसोके पन्भटे पातिते पीलिते पूतियापण्णदंसणे पेंडित विच्छोभणे पोकत्तदुरंत- पादुम्भा पंडफदसणे फल-पुष्फणासणे फालिते फियावाहिरकपरामासे फुतिते फोडिते घधिरंध-मूय-जलमत्तपादुदभावे 25 पाधायविमूविणासणे धुद्धिउपपाते वेरसदसणे ओलिते बंधुजणविप्पयोगे भट्टे भामिते भिन्ने भुक्सिते भेदिते भोयण-पाण- भक्सवापहासुमंते मलिते उम्मनिते ओणिपीलिते उम्मुक्के उन्महिते मोघविद्धिते उम्मत्थिते यतिविणासेयगविणासे- यिविअसबारे जंगभंगे अये पडिसेधिते अयोग्गेयं तस्स य हाणिसु रतिविघाते रायपराजये ओरिके ओरुढे रेचिते "ओरेचिते रंधिते ललितोपपाते अलातक्सोभणे गुलखिते लुचिते पघातणे ओलकिते ओलंबिते उवदिते ओबारिते विणासिते घूहभेदणे वेसाणरविझापणे योकसिते संचिते ससिते ओसारिते ओसुद्धे सेदणिम्मजणे सोणितपादुभावे 50 संसरिते ओहते हारिते हिसेते हुंहिते हेहिते अहोणिसाधिकरे हंस-चकवाकसब्यमिहुणविप्पयोगे चेति एवंविधसह- १ रणोधि सप्र.॥ २°दसणे हरसपणे रिपुहडपचाणयणे राहविरुद्धदसणे हस्सयद्धणे रासि इतिरूपो दिरा- तः पाठः राताम्यपि प्रतिषु वर्तते ॥ ३ समुप्पयारेसु है. त• । समुप्पायणेसु नि.॥ ४ हसतो सन.॥ ५णामाज्झा •स•॥ ६॥ पुच्छामि ॥ ७ सोडते सि• विना ॥ ८ पच्छादणे छिपणे घुण्णे रेलिते छंदामिलासे असं सि० ॥ .९ °तिसापुणासणे अपिते है । 'तिसणासणे जंपिते त•॥ १० मासि तएव । १५ णिच्छुये थेचिचे मिप उदासिने त. एव॥ १२°यिहयि त एव॥ १३ °विचेटिए उम्मच्छिए तिणासैयागयिणासे पेट्टअस ह• त०॥ १४ ओरो- चिते...• पिना । १५ गुलिपिते है. त• विना ।
पणुवीसहमो गोचज्झाओ रूवपादुभावे अप्पणा आधारिते परेण वा पुच्छिते पसत्ये अत्थे णत्थि चत्तव्यं, अप्पसत्थे पुच्छिते खिप्पं भविस्स- तीति बत्तव्यं । भवंति चऽत्य सिलोगा- असुयीणं च सव्वेसि किलिहाणं च दंसणे । असुभेसु य सद्देसु हीणमत्थं वियागरे ॥ १॥ संस्वेण य तरुवं तण्णिभेण य तण्णिभं । णिमं च णिभमत्तेण तष्णिभोपणिभेण य ।। पसत्थमप्पसत्यं च उप्पातं समुपेक्खिया। वियागरेज मित्ती तज्जातपडिपोग्गला ॥ ३ ॥ ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्जाय अप्पसत्वज्झायो तेवीसइमो सम्मत्तो ॥२शाछ।। [चउवीसइमो जातीविजयज्झाओ] ॥ . - अधापुव्वं खलु भो! महापुरिसदिन्नाय अंगविजाय जातीविजयो णामाज्झायो। तं खलु भो! वक्खस्सामि। तं जधा-तत्य अजो मिलक्खु ति पुव्वमाधारयितव्यं भवति । तत्थ अभंतरामासे दढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे अजो त्ति बूया । तत्य वज्झामासे पलामासे कण्हामासे लुक्खामासे तुच्छामासे मिलक्खु त्ति चूया । तत्थ अजे 10 पुव्यमाधारिते अकं तिविधमाधारये, तं जधा-यंभणं १ खत्तियं २ वेस्समिति ३१ तत्थ भेजेसु सुक्केसु य यंभणा विनेया १ । तत्थ खत्तेजेसु रत्तेसु य खत्तिया विनेया २ । तत्थ वेस्सेजेसु पीतेसु य वेस्सा विनेया ३। तत्य सुद्देयेसु कण्हेसु य सुद्दा सव्वमिलक्खू य विनेया। तत्य अन्जेसु मिलक्खूसु वा अणंतरेसु वा पुव्वमाधारितेसु सुक्कामासे सुद्धवण्णा विन्नेया । सामेसु सामामासे सामा विण्णेया । तत्थ कालामासे कालका विष्णेया। महाकायेसु महाकाया चिन्नेया। मज्झिमकायेसु मञ्झिमकाया 15 विन्नेया भवंति। पचंवरकायेसु पचंवरकाया विनेया । तत्थ चलेसु सव्यववहारगते य ववहारोपजीवी विनेया। तिक्खेसु संव्यसत्यगते य सत्योपजीवी विन्नेया। तत्य पुघूसु खेत्तोपजीवी विन्नेया। णिक्खुडेसु णिक्खुडवासिणो विण्णेया । दुढेसु उन्नतेसु य पव्य[त] वासिणो विण्णेया। तत्य गिद्धेसु आपुणेयेसु य दीववासिणो विन्नेया। तत्य रमणेसु जणपदवासिणो विष्णेया । गहणेसु रण्णवासिणो विनेया। चलेसु चकचरा विण्णेया। परिमंडलेसु य चउरस्सेसु य णगरवासिणो विन्नेया। तत्थ सव्ययण्णपरिवद्धणेसु य सव्यपाणपतिवद्धणेसु य चेट्टितका विण्णेया। मूलजोणिगते 20 आपेलचिंधा विष्णेया । गहणेसु कण्हा विण्णेया । संवुते कंचुकचिंधा विण्णेया । उपगहणेसु सामा विण्णेया । सुका- मासेसु रमणीयेसु ओवाता विष्णेया । पुरथिमेसु गत्तेसु पुरस्थिमदेसीया विण्णेया। दक्सिणेसु दक्खिणदेसीया विण्णेया । पच्छिमेसु पच्छिमदेसीया विण्णेया । वामेसु उत्तरदेसीया विण्णेया । गम्मेसु अजदेसणिस्सिते बूया । गम्माणतरेसु अञ्जदेसंतरेसु यूया । णिक्खुडेसु मिक्खुटदेसिने अम(ण)जदेसिजा विष्णेया ।। ॥ इति महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय जातीविजयो नामऽज्झायो चउवीसइमोसम्मत्तो॥२४॥छ।। [पणुवीसइमो गोत्तज्झायो] अधापुन्वं सलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञाय गोत्तनाम अज्झायं । तमणुक्क्सस्सामो। जथा- तत्य गोत्तं दुविधं, गहपतिकगोत्तं चेय १ दिजातीगोत्तं चैव २ । तत्य माढ-गोल-हारित-चंडक-सफित-(कसित)-यासुल-यच्छ-कोच्छ-कोसिक्युंडा चेति गहपतिकगोत्ताणि १। तत्य थूलेसु माढा पिनेया । सव्यसगुणगते य चतुरस्सेसु गोला विण्णेया। सब्बचतुप्पयगते य गिद्धेमु हाटा so विण्णेया। सव्यमदगते चेत्र परिमंडलेसु चांडिका विनेया । सध्यईसीयेसु चेय फसेसु फसिता विष्णेया । सन्यमीजगते चेव पुण्णेसु यासुला विण्णेया। सयपुप्फ फलगते पेव दटेमु यच्छा विष्णेया। सव्यधातुगते घेर घले कोच्छा विग्नेया। सव्यपाणजोणीगते घेव दीहे कोसिका विग्नेया । सन्यपरिसप्पगते य इस्से कोंडा विग्नेया। सभ्यमूलजोणिगते १ पत्तव्ये गप्प राप्र० ॥ २ सल्यगते य पसत्यो . हा सव्यत्यगते य सत्यो सं३ पु. मि. ॥ ३ रमणिबेसुरा •n४- एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त• नाति ॥ ५°फंडा सम॥ 25 - - अंगविजापदण्णयं वत्य एतेसिं गोचाणं जं गोत्तं इत्यी पुरिसो वा भवति तं गोत्तं विण्णावधं भवति । तत्य बंभणगोत्ताणि चतुविधाणि भवंति । तं जधा-सगोवा १ सकविगतगोचा २ वंभचारिका ३ पररा ४ चेति । वत्य अभंवरेसु सकगोत्ता विष्णेया । वंकेसु सगविगतगोत्ता विन्नेया । उद्धेसु बंभचारिका विण्णेया । उत्तमेसे पररा विष्णेया । उद्धंभागेसु मंडवा विन्नेया। समभागेसु पुघूसु वा सेहिणो। हस्सेसु वासिहा । इहरचलेसु संडिल्ला । डहरथाव- रेसु कुंभा । उण्णतेसु माह्की । तिरियंभागेसु कस्मवा । अधोभागेसु गोतमा । अग्गेयेसु अग्गिरसा । दढेसु भगवा । चलेमु भागवता । दीहेसु दढेसु सद्दया । गिद्धेर्स ओयमा । णीहारेसु हारिता । तणूसु लोकक्सिणो । उपहुतेसु कचक्खी । सुकेसु चारायणा विनेया। परिमंडलेसु पारावणा विन्नेया। जण्णेजेसु अग्गिवेस्सा विनेया । हस्सेसु मोग्गल्ला विन्नेया । अभंतरअन्भतरेसु अद्विसेणा । बाहिरवाहिरेसु गहणेसु पूरिमंसा । फरसेसु गद्दमा । उपग्गणेसु वराहा । कण्हेसु टोईला । णिक्खुडेसु कंडूसी । तिरिच्छाणेसु मागवाती 1 उत्ताणेसु काकुरुडी । णिकुनेसु कष्णा । 10 मल्झिमेमु मझंदीणा । वामेसु वरका । कायतेसु मूलगोत्ता। संसासु संसागोतं, केस मंसु-गह-लोमगते पसन्नेसुय भेदाणुजोगगोत्तं घूया। दारुणेसु कढा । 'किन्नेसु कलवा । चतुरस्सेसु पालंया । सेतेसु सेतस्सतरा । आतिमूलिकेमु तेतिरिका । मन्झविगाढेसु मझरसा । अंतेसु वझसा णेया । सामेसु छंदोगा । ज्युभागेसु पसन्नेसु मुजायणा । अप्प- सन्धेमु कत्थलायणा । सारवंतेसु गहिका । असारेसु रिता । कुटिलेसु यमचा । अच्छतेसु काप्पायणा । विच्छिन्नेसु कप्पा । आपुणेयेसु अप्पसत्यभा। पंडाणयेसु सालंकायणा । सामेसु यणाणा । विसमेसु आमोसला । सामुग्गेमु 15 साकिजा । परिमंडलेसु उपयति । उण्णतेमु डोभी। उद्धमागेसु थंभायणा । मुदितेसु जीतायणा । वेरेसु दृढका। णातियत्तेसु धणजाया। बुद्धिरमणेमु संखेणा।अयुद्धीरमणेसु लोहिया। वितेतुं अंतभागा पियोभागा। सद्देयेसु संडिहा। दुंदुभिघोसे पव्ययवा । जीणाधिगतेसु आपुरायणा | "विविहेसु पायदारी । संवुते यग्धपदा । सतेसु पिला। उत्तमेमु जीयसाधारणेसु देवहञ्चा । वभेयेसु आपुणेयेसु बारिणीला । दट्ठोदरेसु सुघरा । सब्यधणगते चेव सव्यसिडागते संव्यटुगते सघाणसेसु य मूलगोत्तं चेव । हत्य-पादसंजमे चेव धीणवे । सब- 20 अपरिग्गहेसु चेव सव्यसत्तेसु वेयाकरणं यूया । गणावलोफणे मीमंसका । जत्य (तत्य) पमाणे छंदोको । विछिण्ण- विमहिते सविडगते पण्गायिकं यूया | ओजासणे ककितजाणे । यण्णेनेसु यणिकं घूया । सण्हेसु तिक्सकं यूया अग्गेयेसु जोतिसिकं यूया। पतिलोमेसु इतिहासं यूया । संयंयेसु रहस्सं यूया। पुरथिमेसु सुयवेदं यूया । सामेसु सामवेदं धूया । संग्बतेमु यजुव्वेदं यूया । दारणे अहम्वेदं यूया। समभागेसु एकवेदं यूया । उद्धंभागेसु दुवेदं यूया । ठद्धंमागेमु आहारेमु य तिवेदं घूया । उद्धंभागे आहारमंगेसु सयदै यूया । परिहितेसु छलंगवी वूया । महावकासेसु 25 सेणिका । लुक्खेमु गिरागति । अंतेमु वेदपुढे यूया। मंतरेमु सोत्तिया । घोसयंतेमु अझायो । कन्नेसु आचरियो । मुदितेमु जायको । अणुलोमपतिलोमे णगत्ति । उत्तमंगे वामपारा ॥ ॥ इति गोत्तम्झायो नाम पंचचीसइमो समत्तो ॥ २५ ॥ छ । [छचासइमो णामझायो] नमो भगानो य अरहतो यसतो महापुरिसरस महावीरवद्धमाणम्स । णमो भगवतीय महापुरिमदिण्णाय 50 अगविनाय । अधापुत्र्यं गलु मो! महापुरिमदिनाय अंगविनाय णामग्झायं । तं सलु भो! तमणुरक्सा- चिस्मामो ।नं जपा- यदक्षरमिदं प्रोक्तं, महर्षिप्रविचिन्तितम् । अंगविनावमुं रत्तनामाध्यायं प्रचक्ष्महे ॥ १ ॥ ऋषयो येन बुध्यन्ते 'लोरे नामगतं पथं । तदहं प्रोदाहरिष्यामि, सद्धे नामसहदम् ॥ २॥ १.शिकयगोत. एव ॥ २ "मु पचारात.॥ ३गोत्तमा स.॥ ४ णिसु नि. विना ॥ ५प्रियंसा १.7.1 ६काहला. त•॥ ७णिण्णेमुहै• त.॥ ८मद्या . . विन्य। ९ दोला है..॥ १०सितमु.॥ ११ जणा'. तपिना ॥ १२ विपछि १. स. १३ सप्यपदुगए सवाणरेयसु ..॥ २४ कामपाराt.c• पिना ॥ १५ सोशाना मुग मि.॥ - - 5 10 - 15 छव्वीसइमो णामझाओ गते यो वाऽनुभापेत, पढ़तो य विसेसतो । जीवमज्जीवसंसह दुविधं नामपग्गहं ॥३॥ सममक्षरसङ्घातं भवेद् वा विसमक्षरम् । ससंजोगमसंजोगं गुणा-ऽभिप्पायकं तधा ॥४॥ सरादि १ व्यञ्जनादि बा २ सव्वणामगतं ३ तिधा । उष्मान्तं १ व्यञ्जनान्तं वा २ खरान्तमिति' ३ तत् त्रिधा ॥ ५॥ थीणामधेयं १ पुण्णामं २ णपुंसकमिति ३ तिधा । एकभस्सं १ दुभस्सं च बहुभस्समिति ३ तिधा ॥६॥ अतीता १ ऽणागता काले २ वत्तमाणं च ३ तं तिधा । [ उपसग्ग १ णिपाताणं २ णामा ३ऽक्खायं च ४ भागसो । विणिच्छितं महेसीणं भस्समेतं चतुषिधं ॥ ८ ॥ सचं १ चेवालितं चेव २ तथा सञ्चालितं भवे ३ । ण सच्चा णालिता या वि ४ गिरा लोके चतुविधा ॥९॥ अंतरिक्खं १ सलिल २ पत्थिवं ३ पाणनं ४ तधा । मग्गा य तस्स अक्खाता णामं जेहिं पवत्तते ॥१०॥ णक्खत्ताणं गहाणं च ताराणं चंद-सूरयो । विधीणं मंडलाणाय दिसाणं गयणस्स य ॥ ११ ॥ उक्काणं परिवेसाणं तधा पुव्वगतस्स य । सतहुताणं मेताणं पक्खिलं(णं) जे णभालया ॥ १२ ॥ कहा-मग्गा-ऽऽलवाणं च गयणस्स णिसाय य । उदूणं च समाणं च तथा मास-ऽद्धमासयो ॥ १३ ॥ णिस्सितं वा वि णक्खत्तं तधा णक्खत्तदेवतं । यं णामधेयं भवति सव्वमाकासपिस्सितं १॥ १४ ॥ कूपाणं उद्पाणाणं णदीणं सागरस्स य । ह्रद-पुक्खरणीणं च णागाणं वरुणस्स य ॥ १५॥ समुद्द-पट्टणाणं च दण्णपाणं च सरसो । सव्ववारिचराणं च द्विजा वारिचरा य ने ॥१६॥ णदीरुहा य जे रुक्खा जले जं चाभिरोहति । यदस्सियं णामधेनं सव्यं सलिलसंभवं २ ॥ १७ ॥ दुमाणं च लताणं च सव्वपुप्फ फलस्स य । देवाणं णगराणं च णातूणं जं जतो भवे ॥ १८ ॥ जत्तु देवणिभं किंचि वसुधामभिणिस्सितं । धातुरत्तगतं या वि सव्वं तं पुढविसंभवं ३ ॥ १९॥ सुराणं असुराणं च मणुस्साणं च सव्यसो । चतुप्पदाणं पक्खीणं कीडाणं किमिणं तथा ॥ २० ॥ जदस्सितं णामधेनं जं किंचेवंविधं भवे । बहुप्पदाणं अपदाणं सव्वं तं पागसंभवं ४ ॥२१॥ सव्ववत्थ-भूसण-जाणा --ऽऽसँण- सयण-पाण-भोयण-आवरण-पहरण-पुक्खरगतं चेति, जंचेदं तदपि किंचि एता- रिसं सव्वं तदपि जीवं सव्यणेरयिक-तिज्जजोणिगत-मणुस्स-देया-ऽसुर-पिसाय-जक्स-रक्सस-किन्नर-किंपुरिस-गंधब्य-णाग. सुवण्णा चेति, जंघऽण्णदपि किंचिदपि एतारिसं दिव्यसंठाणणामधेनं तं जीवसंसह । तदेक-ति-पंच-सत्त-णवेकादसक्खराणि, जाणि घऽण्णाणि' चेव समक्खरसंघाताणि णामधेजाणि, ततो परमेतारिसाणि विसमक्सरसंघातं ततो द्वि-चतुर्थ- अष्ट-दश-द्वादशाक्षराणि, जाणि वि अण्णाणि विसमक्सरसंघाताणि णामधेजाणि, अत परमेतारिसाणि समरसरसंघातं 25 से तत इदं सेध संकरिसण-मदण-सिव-वेसमण-वरुण-जम-चंदा-ऽऽदिच्च-ऽग्गि-मारुत-दिवस-रयणि-रोर्दुम-विहंगणाग- सुवण्ण-देवा-ऽसुर-मणुय-वसुधंतरिक्स-पब्बत-समुद-वसुधाधिप-रत्तणिये, एतंजं चऽण्णदपि किंचि एतारिसं णाम-गोत्तं चेति णिघुटके उभयोरवि णिपयण्णगोष्णं तं तं णक्सत्तदेययणामधेनेसु जं किंचि दीहसरीरादितं सरादिवं पंजणादितं तहा उस्सातं तधा यंजणात स्वरांताणि भवंति । जघा-धी-पुं-पपुंसकणामधेचाणि एक द्वि-बहुवचनानि अतीत-सांप्रता-ऽनागतानि सवन्नेरेव विष्णेयाणि भवंति उच्चारितरसमुम्मट्टे तथा उल्लोकित-उन्मुत्थियसमाचारे येदिझं विमंसमुसितमिति 30 सवणणक्पत्तदेवताणिस्सितेसु थी-पुंसयो णामधेनेसु णसत्तं घूया । एतेसामेय संघिउदीरणे णक्सत्तणिस्सितं णामधेन १यापि सम सप्र.॥ २ ति त्रिधा - विना ।। ३ “एक्माष्य द्विभाष्यं च यहुमाप्यमिति' एकवचन दिवचन पावरनं ४ एतचिहान्तर्गत पर्द है. त. नास्ति। ५ मि. विनाऽन्यत्र-'गि वियिहसमरससंघा • त । गि यियिसमक्खरसंघा सं३ पु.॥ ६णि यं विसंघातं से ३ पु.॥ संतत द सेंटर्स...॥ स•॥ ९ यदिए पि.त. पिना। 20 पत्रः॥ ८'रोदम'.
- ૨૫૨ भंगविजापइण्णय घूया । एतेसामेव जमकोदीरणे णसत्तदेववणामधेनं घूया । एतेसामेव जमकोदीरणे सहारे णक्सचणिस्सिा णामधेनं बूया । एतेसामेव सव्यत्तोदीरणे अत्यमितणक्खच-चंदा-ऽऽदिच्चगामवेनं बूया । तेसामेव चलोदीरणे अयहत्यिसु समगमारतणामधेनं यूया। तेसामेव चलोदीरणे संहारे अजहत्यिसु समगमारुतगिस्सितं णामधेनं घूया । अवत्यितोदीरणेसु णक्सत्तणामधेनं चूया । तेसामेव च उदीरणे संहारे मुणक्यत्तदेवतणिस्सितं णामधेनं घूया । एतेसामेव अवकरिसणो- 5 दीरणे वा पत्र्यत-सागर मेदिणी-णदी-वेतिया-ऽऽयागणामधेनं घूया । तेसामेवावकरिसणे या अघरोदीरणे पा संहारे पच्यत-सागर मेदिणी-गदी-देविया-ऽऽयागणिस्सितं थी-पुमंसयो णामधेनं बूयादिति । तत्य सम्बतिनजोणिगते तत सव्यतिबज्ञोणीगते थी-पुमंसयो णामधेने तिनजोगीणामयेनं यूया। तेसामेव संहारोदीरणे तिझज्ञोणीपिस्सितं पणामधेनं धूया । तेसामेव य उदीरणे थायरतिबनोणिणिस्सितं णामधेनं थूया । 7 तेसामेव च उद्धमागोदीरणे विहगणामधेनं घूया । यतेसामेव उद्धंभागोदीरणे संहारे विहगणिस्सियं नामधेनं वूया । स तेसोमेव उद्धंभागोदीरणे 10 संहारे परिसप्पणिस्सितं णामधेनं यूया । - तेसामेव विरोदीरणे संहारे परिसप्पणिरिसतं णामधेनं वूया । तेसामेय सव्यतोदीरणे मच्छणामधेनं यूया। तेसामेव सव्वतोदीरणे संहारे मच्छणिस्सिवं [णामधेनं] बूया । तेसामेव अप- करिसणोदीरणे या कीहिकिपिलकणामधेनं यूया। णिम्मजित-बाहिव-पोरुपविद्धा-ऽवलोकिते णिक्सयसव्वभयण गीते सव्वधरगते चेति । तत सव्यणेरयिकैसु दाणवयगतेमु अधरणामधेनं वूया । तेसामेव जमकोदीरणे णिक्सणामधेनं धूया। तेसामेव जमकोदीरणे संहारे णिरयाणिरया-णिरिसतं वा । हिंसाणिस्सियं पा : णामधेनं घूया । तेसामेय 18 तिनमागोदीरणे संहारे जागणिस्मितं णामधेनं यूया । तेसामेय च उद्धंभागोदीरणे दाणवणिस्सितं णामधेनं यूया । तेसामेय उद्धंभागोदीरणे संहारे दाणवनिस्सितं णामधेनं घूया धी-पुंसयोरिति । तत्य गक्रसत्तणामधेनं दुविधं-णग्यत्तणिस्सितं चेव १ गक्सत्तदेववणिस्सितं चेर २ । तत्य मणुस्सणामधेनं पंचविथं, तं अधा-गोत्तणामधेनं १ अयणामकं २ कम्मणामधेनं ३ सरीरणाम ४ करणणामं ५ चेति । तत्य गोचणामपेनं गइपतिकगोत्तणामपन्नं दिजीतीगोत्तणामधेनं चेति। वत्य गहपतिकगोत्तणामधेनं वे जधा- माढ-गोल-हार-चंटिफ-सक्ति( कसित यामुल यच्छ-कोसिका चेति । अतो परसुद्धं धमणगोचणामधेनं भवति । तत्य अषणामकं समीमु सीसगौम अपि पिन्नक-फरक-उशिवक-उहितका पेति । याणि यऽण्णागि वि काणिचि- देयजुत्तागि २ तत्य फम्मणामपेनं पंचममाधिरणकाइपयोगेरसिमाभिगिस्सितं, जं घण्गदपि सिंचिदेवारिसं कम्माधिकरण- 20 उत्तं से फम्मन्यमय ३॥ सत्य सरीरणामधेनं पमत्यमपसत्यं घ दुविधं-सम्ममदोसजुत्तं प उपदयदोसजुत्तं च । "संड-विका-सरह- गाहार-विपिग आधारे उदफे यायि देवभूतिपलायममाणुरद्धी समपमीगापि अपरिपमा। इत्ये मिचयग्गे व गोत्तगामे य मम । संजोगमु य सम्मु मित्तं यूया परिमं ॥ १॥ मंदीप दिप गंदगो नंदिको सधा । धुमके अगदिक गिक्सित्ते सेंणिहिते ॥ २॥ १ समागमारुपनि...॥ २६ पिशान्त..... एक पावे ॥ ३- एतविहान्नानः प. ४ 'पादिप-पोरपपिपिट्टाऽय... पिना । ५ एतदिहान्तर्गतः पा.त..नास्ति। अमरदीरणे मंदारे पाग में । पु• ॥ ७पागनिस्सितं नामपे प्या। सामेप सप्यतोदीरणे संहारे मनिरिंगत जाम पूया । सामेष य उद' राम.. ८विजाती...॥ ९ पाममपि ..॥ १. 'मामिरिगत र..frin ११ ताप सरीरसर' ग.। १२ संदविका-सया'..॥ १५ समागुपदी. परामप.६.१४सणसी.. १५ महिने..रिमा । छब्बीसइमो णामझाओ परिकमाणा विण्णेया जे जे पधदुप्पते इति पप्परूवं कोणो वेति, जाणि वरुण्याणि वि काणि वि एतारिसाणि तल्लक्खणदोससंजुत्तं । तत सरीरोपद्दवजुत्तं, तं जधा-खंडसीस-काण-पिल्लक-कुज-यामणक कैविक-सवल-खंज-बडमो वेति, जाणि वऽण्णाणि वि एरिसाणि तं सरीरोपद्दवजुत्तं । पागयभासाय तत्थ पसत्यं ति विविधं, तं जधा-चण्णगुणजुत्तं चेव सरीगणजुत्तं चेव । तत्थ पण गुण] जुत्तं तिविधं, तं जघा-सुद्धे सामे कण्हे चेति । तत्य सुद्धेसु अवदातको सेडो सेडिलो चेति पागयभासाय । सामे सामा सामली सामकसामला चेति पागयभासाय । तत्य कण्हे कालककालिका 5 चेति पागयभासाय । तत्तो तम्मि पादगोरा चेति इति वण्णणामधेजाणि । ततो सरीरगुणजुत्तं सुमुह-सुदंसण-सुरूव-जात- सुगता चेति । तत्थ सरीरजमभिणिस्सियं चयं चसित्तं वालकवालक-डहरक-मझिम-थविर-थेरसमाजुत्ताणि चयो जं सरीरजं चेति ।। तत्थ करणणामधेनं जं किंचि संपरिक्कम । ततो परिकमा तिविधा-एकक्खरा दुक्खरा तिअक्खरा चेति । तत्य एकखरा चतुविधा, तं जधा-ककार-लकार-सुकार-णिकारा चेति । तत्थ दुक्खरो परिकमो दुविधो-सव्यगुरू चैवं 10 पधमक्खरलघू पच्छिमक्खरगुरू । तत्य दुक्खरो परिक्कमो सम्वगुरू, तं जधा-तात-दत्त-दिण्ण-देव-मिच गुत्त-भूत-पाल- पालि सम्म-यास-रात-घोस-भाणु-विद्धि-नंदि-नंद-माना चेति । तत्य पढमक्खरलघयो पच्छिमेकक्खरगुरू दुक्खरपरिकमा तं जधा-संचसिरियवलधरसहवगिरिरिति । अथातधा उक्खरा परिकर्मी विविधा-मझिमेकक्सरलघवो चेव पच्छिमेक- क्खरगुरवो चेव । तत्य उक्खरा मज्झिमेकक्स्वरलघवो तं जधा-उत्तरा-पालित-क्खिय-णंदण-गदिक-णंदका चेति । तत्य उक्खरा पच्छिमेकक्खरगुरवो तं जधा-सहितमहका चेति इति छविधा । एकचत्वारीसं परिकमा भवंतीति ॥छ ।। 15 तत्य एवमणुगंतूणं सकणामधेनं पढ़तेणं इदं तदिति नन्नतअक्सरेरिति । तत्य छव्विधमक्खरं-सरा १ फरिसा २ "अंतत्या ३ जोगवहा ४ अजोगवहा ५ यमा ६ चेति । तत्य अकारादयो औकारणिधणा सरा । ककारादयो मकारणिधणा फरिसा । य-र-ल-या इति "अंतत्था । चत्तारो श-प-स-हेति उष्माणश्चल्यारो योगवहा । तथा विसर्जनीयो उपध्मानीयो जिह्वामूलीयो अनुस्वारोऽनुनासिका चेति तत्थ पंच [अ]योगवहा:-अः इति विसर्जनीयः, डू क इति जिह्वामूलीयः, ७ इत्युपध्मानीयः, अं इत्यनुवारः, ला (लाँ) इति नासिका । क स ग घ इति यमा चचारि । अत्र अकारादीणि" 20 लकारनिधनानि समाणक्खराणि अट्ट, दस इच्चेके । वत्थ ए ऐ ओ औ इति चत्तारो संधिअक्खराणि । अकार-आ- कारवजा नामिस्सरा, तानेव तु अक्खराणि । ककारादयो मकारणिधणा फरिसा । तत्य क-च-ट-त-पा स-छ-ठ-ध-फा श-प-सा चेति त्रयोदश अघोसा । ग-ज-द-ड या घ-झ-ढ-ध-भा ड-ब-ण-न-मा य-रलन्या हकारो य वीसति घोसवंतो, हकारेण सह एकविंशति । हु-ब-ण-न-मा अनुनासिका यमा चेति एकादशानुनासिका । सन्छ-ठ-ध-फा द्वितीया घ-झ-द-ध-भा चत्तारो योगवहा । यमनिधना छव्यिया । पंचसहि सव्ययायोगते भवंति भगवानाइ रहा 25 महापुरिस इति । ततो विसर्जनीयो हकारो चेति उरे विण्णेयो सोप्मसवण्णे चेति । अकार आकारा कंठे विण्णेया मवणे चेति । कार-ऋकार-कवर्गो जिताम्लीयो चेति हतु(नामूलनिहामूलीयो विष्णेयो सपणे चेति । इकार-ईशारो एकार- ऐकारो चवर्गो यकारो शकारो चेति तालुको विण्णेयो सयण्णे चेति । पकारो मझिमो टवग्गो चेति सिरसि विण्णेयो १ परममाण विह. त. पिना ॥ २ रूयाकाणो है• त• ॥ ३ °फुधिक है. त• पिना ॥ ४ °तको सेगसेडिलो. त• विना ॥ ५ सासणी है. त.॥ ६ घयं घस्सियं या' है. त• ॥ ७ सम्म है. त• ॥ ८ सपरफार्म है. स. पिना॥ ९एमि.मरा पसरा तिसरा है. त.॥ १० चैव पघमासागुरू ह..॥ ११ पालयालिसम्मतास ई. स.विना॥ १२ सव्यसरियघलयरसह १. तु.॥ १३ महातहाई. त•॥ १४°मा तिबिधा सम॥ १५ उत्तर- पालित-रिक्तियणदिकांदिका घेति है. त• दिना ॥ १६ अनस्या ३ योगयदा ४ भयोग •त. दिना ॥ १७ मंतस्था ६. त• पिना ॥ १८ स्थाति ३ पु.। स्वारः ग्ला तिमि•॥ १९ जमा है. तु.॥ २० शिपकार रा॥ २१ तातेय अपए से 1 पु. तानेय अफ्र वि०॥ २२ मार सकार मकार फयगा.. - भंग०२० . ॥ अंगविजापइण्णयं संयण्णे चेति । लेकारो तवर्गो सकारो लकारो चेति दंतेसु विष्णेयो सवण्णे चेति । उकार ऊकार ओकारे ओकार पवर्ग उपध्मानीय धकारो चेति ओट्टयो विण्णेयो सवण्णे चेति । दंतमूले रेफो विष्णेयो सवण्णे चेति । अत्तवितसंदिद्वे सतरूपे लकारो विण्णेयो सयण्णे चेति । तत्थ उद्धंभागेसु इकार-ईकारा एकार-ऐकारा ओकार-औकारा विष्णेया सपण्णा चेति । प्रजुभागेसु अवस्थितेसु अकार-आकारो विण्णेयो सवण्णे चेति । संवुतेसु उद्धंभागेसु अवत्यितेसु कारो विण्णेयो 5 सवण्णे चेति । ओकार-औकायै अघेभागेसु विण्णेया सवण्णा चेति । संधिसु संधिअक्सराणि हत्थ-पाद-गुप्फ-जाणु- जंपोरु यसण-फिज-कुक्खि-पस्स-हत्थतल-बाहु-सणुगंड-ओहसवण्णेण नाम चेति समाणेसु ! मिधुणचरेसु य सत्तेसु य मलाभरणके चेव समागं विण्णेयं सवण्णे चेव । उद्धंभागा-ऽधरभागेसु णामिणो विण्णेया सवण्णा चेव । णिखित्ते पहिकुंडिते चेव सवितुं विण्णेयं सघण्णे चेव । तत्थ वझेसु अभंतरेसु य णीहारेसु पकिण्णेसु एकवंजणमसंजोगं विण्णेयं सवण्णे चेय । तत्थ समाणेसु मिधुणचरेसु य सत्तेसु य मेलाभरणेसु य मलोपकरणेसु य संजोगं विण्णेयं 10 सरिससंयोग चेव । आहारेसु सरं धूया णीहारे बजणाणि तु । णीहारा-ऽऽहार-मिस्सेसु संपभिण्णं पवेदये ॥१॥ फवम्गमसितेसीऽऽहु यकार या विणिव्वदा । पडिरूवेसु कण्हेसु जकारं तत्थ णिदिसे ॥ २ ॥ हवग्गो य-रकारो श-प-सा थेय पंडरे । चित्ते लकारो विण्णेयो ससंजोगं च णिदिसे ॥ ३ ॥ पचम्मो य लकारो य हकारं चापि तंयसु । णीले पवग्गो विण्णेयो सघग्गो या वि पीतके ॥ ४ ॥ थूले डवग्गो विष्णेयो मकारो यायि मज्झिमे । उपध्मानीयो विण्णेयो जिह्वामूलीव एव य ॥५॥ फयग्गो य रकारो | गकारो य फणीयसो । तवग्गो य लकारो | फसेसेते पकित्तिया ॥६॥ पयग्गो थे यकारो य यकार या वि जेहगं । णातिथूलेसु योद्धव्या तथा णातिकसेसु य ॥ ७ ॥ पतुरस्सेसु सम्वेसु सव्वचतुप्पदेसु य । चतुकेसु य सव्वेसु तुपह्रयणेसु य ॥ ८ ॥ ओकारं वा एकारं या घूया घण्णेसु वण्णवि । परम्मुहे वा तिनं या चकारोऽवत्थितेसु य ॥ ९ ॥ हकारोऽभिमुहो यो औकारो सवणिको । आयुधेसु य सव्येसु सन्यजोगागतेसु य ॥ १०॥ ऐकारे या यफार या धूया सव्वक्सरेस्विधी । एकारमुद्धभागेसु जकारमधरेसु य ॥ ११ ॥ यूया एकारमाहारे यत "णीहारलक्सणे । शिरो गंडे तथा णामी जाणु-गुप्फे तथा द्विजा ॥ १२ ॥ मायणेसु य सव्येसु यं किंचि परिमंडलं । दव्योपकरणं लोके यं यर्ट दिसते पचि ॥ १३ ॥ पकार या प्रकार या घूया यण्णेसु थण्यवि । पट्टे दम्योपकरणे यदणासी भने कचि ॥ १४ ॥ हफारो सत्य विष्णेयो धेयारो पेतरेम वि । रसदव्यो तथा दव्ये मुयपासकडेच्छुके ॥ १५ ॥ पादरिसे या सुयायं या यं यट्टरस तु अंततो । पुष्पं फलं च यं किंचि दीयह भने फचि ॥ १६॥ यकार पा पगार या पूया सव्यक्सरेसु वि । आहारे सति मूलेसु धकारमभिणिदिसे ॥ १७ ॥ णीदारेमु घपारो सो सबैसंसगतेमु य । णसत्तेमु य सव्येमु वथा णरसतदेयते ॥ १८ ॥ - 10 20 25 । १६पारो स२०॥ २ अपरिपसंदितु सनरूपे •स• ॥ ३°सु प्रवारो है. त• पिना ॥ ४ पिससे पणिपुर .. विवा॥ ५महाम...॥ ६ मलोप...॥ ७पंजण तु... विना ।। ८ साहू..॥ रचायिय यमु... १०य सकारो ...शिना । ११ य सेसेए है..॥ १२५ जारोप सवार २३ पउपाणे. त१४ आप . त• १५ एपारं पायकारं या यूया सम्पखरे मिय t... १६ पपारमपुरे.. पिना ॥ १७जीपा(धा)..॥ १८ सदा टिपा.त. ॥१९पकारोt..॥ २० सपो दर 6. पिना ॥ २१ 'पायुफोराको त.॥ २२ राति भूलेगु १० त०॥ २३ सा मोसंगतेमु t...रापसंगतपु.॥
। 10 - 15 छव्वीसइमो णामझाओ १५५ जिभग्गे दंतपजं च पंजजत्तुणिसेवणे । केसंते कण्णसकुलं कण्णपालीय य तंधा ॥ १९॥ अवत्तं वा वि यं घट्ट अट्ठदंताण तं चयं । णमोक्ते वंदिते वा पूयितुल्लोकितें तथा ॥२०॥ चंदणक्खत्तघोसे य डकारमभिणिदिसे । भूसंघाते य णिण्णे य गत्तेयमविणामिते ॥२१॥ विनामितायं जिन्भायं जं किंचि विणतं भवे । विणतेसु य सव्वेसु दव्योपकरणेसु य ॥२२॥ चपसंथाणरूपेसु हकारमभिणिदिसे । पत्थिसीसे तिके चेव चिवुके संमुमन्तरे ।। २३ ।। तिकुजं वा वि जं किंचि कारं तत्थ णिदिसे । कुंचितेसु य केसेसु मंसु-लोमे य कुंचिते ॥ २४ ॥ कुडिलेहुँ य दव्वेसु सव्ववलीगतेसु य । आकुंचितासंगुलीसु गत्तेसाऽऽचितेसु य ॥ २५ ॥ आकुंचितायं जिव्भायं जं किंचि कुंडलं भवे । आविढे चेट्टिते चेव भामिते सव्यसप्पसु ॥ २६ ॥ ठेकार या हकारं वा बूया सव्यक्खरेसु वि । विधत्तेसु कारो स (सा) हकारे संवुतेसु य ॥ २७ ॥ पंडरेसु कारो सा चमुतेसु णिव्वदा । आकुंचिताणं गत्ताणं जं किंचि वाहिरं भवे ॥ २८ ॥ कुंडिलं नाम जं किंचि नयीकुंचितं भवे । छिन्ने मिन्ने य भग्गे य कुट्टिते या वि गियरी ॥ २९ ॥ कारं या लकारं या घूया सव्वक्सरेसु वि । तैतवजेसु सव्वेसु दकारमभिणिदिसे ॥ ३०॥ पंडरेसु दकारो स्सा संधिसुत्तेसु णिव्यदा । पुते दु९पिलकाय वणे खते तिलकालके ॥ ३१ ॥ चम्मक्खीले तदोसे य पलिते य तधा पुणो । पुरीसमुत्ते सद्दे य अँसीवे कण्णगूधके ॥ ३२ ॥ पूतिके रुधिचीके य णिहुते खुथिए तधा । विकूणिते कूविते य रुण्ण विकंदिते तथा ॥ ३३ ।। कासिते जंभिते चेव वेविते परिदेविते । पयलाइते पसुत्ते य पतिते विप्पलोहिते ॥ ३४ ॥ णिव्याहिते णिस्ससिते "रोगे संधाणिदंसणे । उबहुते फले पुप्फे पावन्ने पाण-भोयणे ॥ ३५ ॥ उबहुतेसु सव्वेसु हकारमभिणिदिसे । ऋजुकेसु उजुलेहासु रकारमभिणिदिसे ।। ३६ ॥ वालेसु सन्यवीयेसु जकारमभिणिदिसे । णामप्पयोगे संव्यत्त मुदितेसु य सव्यसो ॥ ३७ ।। । सत्यिकाकाररुपेसु मकारमभिणिदिसे ॥ ३८ ॥ उत्ताणेसु य वत्तेसु सयणेसाऽऽसणेसु य । उकूजे सयणे वत्ये दव्योपकरणे तथा ।। ३९ ।। ध-भकारो ढहुतं तकारो पैदमा तधा । उद्धमुहे रकार या मकारं वा वि मझिमं ॥ ४० ॥ तिजाणतेसु गत्तेसु सयणेसाऽऽसणेसु य । तिनंमागासणे वत्थे दव्योपकरणे तथा ॥ ४१ ॥ द-धैकारो यकारो य हाऊणापणमेव य । लघवो पंचवण्णा जे गुरवो से य कित्तिता ॥ ४२ ॥ लघयो यावि जे वण्णा सेसा बक्सामि गोरवं । यमा य योगगाहा य संयोगा यायि फेवला ॥ ४३ ॥ पंच वार्यतगिद्धं ति पुत्ररूवगुरू भवे । वंजणपचयरो सतवंजणमुत्तमं ॥ ४४ ॥ "संजोगकद्धणामस्स संजोगेसु य छब्धिधं । गत्ताणामादिम्लेसु पढमं तत्य णिदिसे ॥ ४५ ॥ पढमेसु य सव्येसु दव्योपकरणेमु य । गत्तागामद्धदेसेमु ततियं तत्थ णिदिसे ॥ ४६॥ १ पणुजंतुणि° ई. त•॥ २यं यदं अट्ठदंताण संचयं है. त• ॥ ३ गत्तेयमिति नामिए है. त• विना । ४ यिणितं है. त• विना ॥ ५चयसंथाणरुवेसु दकारमि.॥ ६पकारं. त.॥ ७°ले सव्यव्येसु त. पिना ८ कुंडिलं है. त. लि. ॥९टकारं वा हुंकारं है• त•॥ १० टकारोई. त•॥ ११ टकारो सांचमुएमु पिच्छदार त.॥ १२ कुचिए भये ई. त• ॥ १३ णिच्छदा है. तु. ॥ १४ इंकारं है त. पिना ॥ १५ तयवत्येसु ई ता ॥ १६ जपुग्घे टु यिलकाय चरणे यते हैं. त•॥ १७ सपुरी • • ॥ १८ असीये णका' है. त• ॥ १९ मोगे •त.॥२० सम्र्य च है. त•॥ २१ थाफारोई.त.॥ २२ पदमा तथा । उट्टमुरकार ह..॥ २३ यकारो जगारी यह. त• ॥ २५ जमा य जोगवपणा य संजोगाई..॥ २५ तणिर्ट ति १.४०॥ २६ दुर्यजण • •॥ २७ संजऑर्ग पट्टणामस्स..पिना। २८ गत्तापमट्टदेसेमु० त०५:. 20 ।
5 10 15 अंगविजापइण्णय' , ततियेसु य सव्वेसु देव्याणं मझिमेसु य । गत्ताणामंतदेसेसु जे तथा तत्य णिदिसे ॥ ४७ ॥ पच्छिमेसु थ सम्वेसु दव्योवकरणेसु य । आदि मन्झधिगादेसु वितियं तत्थ णिदिसे ॥४८॥ मझिमाणं विमरिसेसु चउत्यं तत्थ णिदिसे । यदक्खरं णामधेनं पुरत्या समुदीरितं ॥ ४९ ॥ वणक्खरं नामधेनं भागाभागं पवेदये । थीणामधेनं थीणामे तुल्लातुलं पवेदये ॥ ५० ॥ पुतं णामगते गस्थि गेयेण पंतगायणं । अधीयतां सामवेदं विप्पाणं तप्पुयं भवे ।। ५१ ॥ सव्वेसेतेसु रूवेसु पंडरं अभिणिहिसे । पुरत्यिमेसु गत्तेसु सद्द-रूवे पुरथिमे ॥ ५२ ॥ दक्खिणेसु य गत्तेसु दक्खिणं दारमादिसे । दक्षिणेसु य सम्वेसु पीते रूवे य दक्खिणे ॥ ५३ ॥ सव्वकण्हेसु रुवेसु पच्छिमं दारमादिसे । पच्छिमेसु य सद्देसु सद्दे रूवे य पच्छिमे ।। ५४ ॥ सबमेतेसु गत्तेसु उत्तरं दारमादिसे । उत्तरेसु य गत्तेसु सद्दे रूवे य वामतो ॥ ५५ ॥ णासायंसे भुमंगुट्टे ओढे गंडे सपोरिसे । अंगुलीसु य सव्वासु गंतं भागे पवेदये ॥ ५६ ॥ गंतं चरेसु पक्खीसु सव्यचतुष्पदेसु य । गंतं चरेसु सव्वेसु गंतभागं पवेदये ॥ ५७ ॥ हत्थयो पादपो चेच अंघयोरूरयो तथा । गीवायं वा वि बद्धो च पुव्यंभागं पवेदये ।। ५८॥ मझिमेसु य पक्खीसु सव्वचतुप्पदेसु य । मन्झिमेसु य सव्वेसु पहिवापुदरे तधा ॥ ५९॥ कर्ट परसोदरं वा वि कुच्छीसु सिरसी तथा । मुहे य दुपधोभागे णक्खत्तं अभिणिदिसे ॥६० ॥ फाययंतेसु पक्खीसु सव्वचतुप्पदेसु य । काययंतेसु सन्वेसु महाखेतं पवेदये ॥ ६१ ॥ फेस-मंसु-णहग्गेसु तणूरु-गणेसु य । डहरे चले थावरे वा अप्पखेत्तं पवेदये ॥ ६२॥ सव्यवीयगते या वि वधा कीड-किविल्लगे । अणूसु सव्यसुहुमेसु अप्पखेत्तं पवेदये ॥ ६३ ॥ दारुणेसु य सम्वेसु सव्वपक्खि-चतुष्पदे । सव्वेसु यावि दुग्गेसु दारुणंगाणि णिदिसे ॥ ६४ ॥ घलेसु पलसंधीसु णिहिसे थावरेसु य । सव्वेसु थापरण्णे य थावरेसु य णिहिसे ।। ६५ ।। आसिलेसा तथा मेत्तं भेयं विस्सदेवतं । सतमिसावजमेतेसु वंजणंताणि गिद्दिसे ॥ ६६ ॥ अदा पूसो य साती य महा मूलं च पंचमं । ठेकुरं सव्वगुरुकं पढमेगलघु तथा ॥ ६॥ संदाना तधऽस्सिलेसा संसमत्ते [.........] | कित्तिका रोहिणी चेर फरगुणी रेवती तथा ॥ ६८ ॥ ॥त्वक्षरं मज्झिमं ॥ छ । द्वितीये गुरुं णेयं पयापति संतपतो। [".........] एव गुरु णेयं महीवूधो ।। ६९ [...] मिदेयमितिगुत्तघोसगिरियधि तथा । परिकमा से देवतेते विण्णेया कण्डसंभवा ।। ७०॥ सम्मसेण करति यो रक्सितो * रोजविमाहा * | "रतिणेयो [य] सूरो य सहो य सहितसिरि ॥१॥ मित्तौगापलो भूति भाणु मित्त महा वधा । पालितो पालिपालो य महितो महिको तथा ॥ २ ॥ नीले पतिरूवेमु योरसेते परिकमा । धक्सरगत [व] लकारो ताम्रसंभो ॥ ७३ ॥ सतो दत्तो य दिण्णो य गंदणो णदिको धरो । देवदासो य पीतेसु णिकारो गंदको तथा ॥ ७४ ॥ दी गाते तपा "पे तथा जमलभूसणे । परिकमा ससंजोगा शेतमिन्नाश्रयं तथा ।। ७५ ॥ १ तियेमु इलय शेषः पु. प्रविण दिशा परते, मया तु है• • • प्रवीराश्रित्य राघदेव आरतः ॥२ दव्योयकर मुपसि ॥ ३ ज्झविगारेगु • •॥ ४ पदी च पुच्छ भार्ग है. त• पिना ॥ ५ पढिसापु त•॥ ६ थायरेने पु.॥रारं ...॥ ८ सझानाययस्सिलेसा संसामते हैं. ता ९ उक्षरं • •॥१० सयकए .त. १५ [......] प गुर है. त• पिना ॥ १२ सम्मासेण .. दिना । १३. एतवान्तर्गतः पारी• एष पति ॥ १५ रतिपेतिणेयो एपे..॥ १५ "मागो पलो वृतिमाउमिल है. त• ॥ १६ द्वादसेते . ता दिना ।। १७एकपसरर...॥ १८ घरो..॥ १९ भये तमा ..॥ २०पातमित्ताया। 20 25 30 5 10. - 15 छब्बीसइमो णामझाओ १५७ सत्ये सत्योपजीवीसु परफमकधासु य । ताओ गुत्तो य सेणो य रक्खितो य परिक्कमा ॥ ७६ ।। संरोघेसु य सव्वेसु वधा बाहुपरिगहे । परिक्खेवेसु सव्वेसु संवाधे बंधणेसु य ॥ ७७ ॥ चलवता तथा गुत्तो पालि पालोयणी तधा ! पालितो रक्खितो चेव विनेया गुंत्त-रक्खिते ॥ ७८ ॥ गंदी गंदो वलो मित्तो गंदणो णंदको सिरि । सामेसु मुदिते चेव महन्यमहकारिणि ॥ ७९ ॥ हत्थयो भासणे चेव सव्वदाणपरिग्गहे । दत्तो दिण्णो य विण्णेया पासंडेसु य सबसो ॥ ८ ॥ उत्तमे सक्कतो चेव वंदिए पूतिए तथा । देवो भूति जसो घोसो भाणू णेया महासिरि ।। ८१ ॥ महितो यावि विण्णेयो सिरिमुहविभूसणे । दढे धातुगते यावि गिरि यो धरोऽचलो ॥ ८२ ॥ पाद-जंघागते णिचं पादुकोपाहणे तधा । पेस्सोवकरणे यावि दासं यूया परिकमे ।। ८३ ॥ आहारे वोदके या[वि] देव भूति वलो यसो । भाणू वद्धी य सम्मं च सरपीतपरिकमा ।। ८४ ॥ हितये च मित्तवग्गे य गोत्तणामे य सव्यसो । सेसं जोगेसु सव्वेसु मित्तं घूया परिकमं ॥ ८५ ॥ गंदी गंदो य दिण्णो य गंदणो णंदको तधा । णपुंसकेसु णंदिकर गिक्खित्ते सण्णिकुट्टिते ॥ ८६॥ णीहारेसु य सव्वेसु पाहिरेसु चलेसु य । णिज्जीवेसु य सव्वेसु णामं णिज्जीवमादिसे ॥ ८७ ॥ आहारेसु य सव्वेसु दढेसऽन्मंतरेसु य । गोणरूवेसु सन्वेसु गोणणामं पवेदये ॥ ८८ ॥ णीहारेसु य सव्वेसु बज्झेसु य चलेसु य । आमिप्पायिकणामेसु आभिप्पायिकमादिसे ॥ ८९ ।। अभिहारेसु सव्वेसु दढेसऽभंतरेसु य । समणामेसु सव्वेसु णामं वूया समक्खरं ॥ ९० ।। समणामेसु सव्वेसु जमलाभरणेसु य । द्वंद्वे दव्योपकरणे य समं जोगं पवेदये ॥ ९१ ॥ एकेकेसु य गत्तेसु एकाभरणकेवले । वंजणेसु य सव्वेसु वंजणंतं पवेदये ॥ ९२ ।। णीहारा-ऽऽहार-मीसेसु वझ-ऽन्भंतरमिस्सिते । उम्मत्तेसु य सव्वेसु उम्मत्तं तत्थ णिदिसे ।। ९३ ।। आहारेसु य सव्वेसु दढेसऽन्भंतरेसु य । पुण्णामेसु य सव्वेसु पुण्णामं तत्थ णिदिसे ॥ ९४ ।। णीहार-मिस्सेसु तथा वझेसऽभंतरेसु य । णपुंसकेसु सव्वेसु णामं यूया णपुंसकं ॥ ९५ ॥ एक्केकेसु य सव्वेसु एकोपकरणेसु य । एक्कभस्से य सबम्मि एक्कभस्सं पवेदये ॥ ९६ ॥ समाणेसु य सम्वेसु जमलाभरणे वधा । तथा विवयणे यावि विभस्समभिणिदिसे ॥ ९७ ॥ उपसरपभितीगणेसु बहूपकरणेसु य । बहुमत्सेसु सम्धेसु बहुमस्सं पवेदये ॥ ९८॥ पच्छिमेसु य गत्तेसु सह-रूवे य पच्छिमे । अतीतवयणे यावि अतीतवयणं भवे ।। ९९ ॥ वाम-दक्खिणगत्तेसु सद्दे रूवे तथैव य । संपतेसु य सव्वेसु वत्तमाणं पवेदये ॥ १० ॥ पुरस्थिमेसु गत्तेसु सद्दे रूवे पुरथिमे । अणागते य वयणे यकं घूया अणागतं ।। १०१ ।। उवहुतेसु गत्तेसु सद्दे रूवे उवद्दुते । सोयसग्गे य सव्यम्मि सोवसगं पवेदये ॥ १०२ ।। हिम्मजिते णिलिहिते छिण्णे भिण्णे णिजिते । णिपातेसु य सव्वेसु गिपातमभिणिदिसे ॥ १०३ ॥ दढामासेसु सव्वेसु थावरेसु य सव्यसो | RD सब्बनामगए चेव यूया नामगयं विमुं ॥ १०४ ॥ हिमजिया पमजिया य संधिमट्ठिभिमजिए । आखाए या वि सव्यत्त आखातमभिणिदिसे ॥ १०५॥ उद्धमागेसु सन्वेसु सनभंगेसु सव्यसो । उद्धभूए य वयणे सत्यमेवामिगिदिसे ॥ १०६ ॥ अहोभागेसु गत्तेसु कुहिएमु य सव्यसो। विवरीते य ययणे विवधं तत्थ गिदिसे ॥ १०७॥ १सत्यो सत्यो है. त.॥ २ ततो गत्तो हं. त० विना ॥ ३ परिखातेसु है । परिक्खेचेसुत.॥ ४ चलवंता है. त•॥ ५मुत्त है. त•॥ ६ महिणाया वि चण्णेया सिरिमुहविभूसणा। दढे धातुमए यावि गिरे यो परोऽचलो ..॥ ७ नंदिणो नंदिको है. त•॥ ८णीहारीम है. उविना ॥ ९ अक्सर है• त• हम्लपिान्तर्गतः धेकसन्दर्मः है. त• एव वर्तते ॥ 20 25 - 30 . अंगविजापइएणयं उद्धाधर-विमीसेसु कुडिला-ऽकुर्डिलेसु य । भूता-ऽभूते य क्यणे यूया सव्याणितं गिरं ॥ १० ॥ गत्ताणं छिदेसेहि देव्यणामंतरेसु य । अवत्तेसु य सद्देसु असव्वणतमादिसे ॥ १०९ ॥ उद्धंभागेमु सत्तेसु चंदपकसत्तसंगहे । अंतरिक्खे य सन्यत्त अंतरिक्वं पवेदये ॥ ११० ॥ आपुणेयेसु गत्तेसु जलेयेसु य सम्रसो । सञ्चमत्थगवे यावि चारिजं तत्थ गिदिसे ।। १.११ ।। दवामासेमु सन्चेमु थावरेसु य णिशसो । सब्बचातुप्पदे यावि पत्थियं णाममादिसे ।। ११२ ॥ , घलामासेसु सव्वेसु लालायं णिग्गमेसु य । सजीवेसु य सन्वेसु पाणनं णाममादिसे ॥ ११३ ।। संगहे एकसण्णा । सत्य एकस्सरणामवेजाणि-श्रीः श्रिया स्त्रीः स्त्रियाः पागिति वाचा गोरिति णावा समिति आकासं, जाणि घऽण्णाणि एवंविधाणि णामधेचाणि तदेकक्सरं णाम । तत्थ प्लवा चउविधा-द्वक्सरा यक्सरा चतुरक्षरा पंचक्सरा । तत्र द्वक्सरा प्ठया द्विविधा-सब्वगुरु चेव पढमक्खरलघको चेय पच्छिमक्खरगुरखो। 'चेति । 10 तत्थ द्वरसरगुरखो - प्लया णक्सत्तेमु तं अधा-अद्दा पूसो हत्यो चित्ता साती जेट्ठा मूलो मघा इति, तत्थ णक्सत्ते देवतेसु चंदो रदो सप्यो अजो तट्टो वायू मित्ता इंदो तोयं विस्से प्राजा धंभा विण्डू पुग्मा इति एक्सत्तदेयतेमु, कण्हों रामो संयो पजुण्गो भाणु इति ‘दसारणिस्सितेसु, लक्ष्मी भूती वेदी नदी इति घीणामधेनेमु । तत्य परिक्मेसें प्रात-दत्त-देव-मित्त-गुत्त-पाल-पालित-सम्म-सेण-दास-रात-घोस. भाग-वृद्धिमात्रा वेति परिकमेखिति, अनेन परिक्मेण संवत्थाणुगंतव्यं भरतीति । तत्य पढमक्सरलथयो 1: पच्छिमसरगरयो सब्यगुरयो चेति । तत्य पच्छिमक्सरलघयो त्र्यक्षरलयो णक्सत्तेसु-अभिजि सपणो भरणी अदिती सविना णिरिती यरुण इति, सत्तदेवतेमु सहितमहिंतरतिका चेति परिश्मेसु इत्येतेन प्लवेनानुगन्तव्यं भवति । तत्थ मदरसरलघयो प्लया-कत्तिका रोहिणी पासिका मूसिका वाणिजो मगधा मधुरा प्रातिका चेति णक्सत्तेसु, वे फग्गुणीयो रेयती अस्मयाविति णक्यत्तेमु, अजमा अश्विनाविति णक्सत्तदेवतेसु इति अनेन प्लवेनानुगन्तव्यं भवति । तत्य पढमक्सरलपोप्टया-बिसाहा आसाठा दुषे पणिहा इति जसत्तेसु, ईदगिरीति पक्खत्तदेवतेस्थिति अनेन प्लवेनानुग- 2. नव्यं भवति । तत्य चतुरक्सरप्लया सव्यगुरयो तृतीयलघवो प्रथमलयको प्रथमद्वितीयलयो । तत्थ सम्यगुरयो तं अधा-रोहनातो पुम्सतातो फग्गुबातो हत्यत्रातो अरसत्रातो इति देयते, अपच्छिमगुरवो-ऋघसिल श्रयणिल पृथिविल इति । अमष्टय मसित्रात पितृवात भवनात यसुत्रात अंजुनात यमत्रात इति प्रथमलघुरिति । शिवदत्त रिदत्त भगदत्त यमुदत्त अजुदत्त यमदत्त इति विपच्छिमे गुरणि पुणव्यमु णम्सत्तेसु । प्रजापति धृहस्पति शतक्रतुरिति देयनेमु इमि, अनेर प्ठोनानुगन्तव्यं भवनि । "संधानेन संपानं प्रमाणेन प्रमागं परिपमेण परिषम प्लवेन प्लयं 2 मध्यताणुगंतव्यं भरति। इति अपररणाममिदं मव्यं पामपिपिच्छयं । सभस्सं जनयं लक्ष्मी यमो य "चिटोविद्धारिति ।। ११४॥ ॥ इति सलु भो ! महापुरिमदिण्णाय अंगविनाय गोमम्झायो छीसतिमो सम्मत्तो ॥ २६ ॥ छ॥ - एम्पाणाम'...॥ २दक्षाध्यक्षरा यानुसग यक्षरातत्र भरा • •॥ ३-६ एपिालन: ...मnu ४'मान't.ru ५सच्यायोऽणु ग• ॥ ६ पसरलमयो पेति ..॥ पर .... समाधिपारयो १० ॥ ९पितिल पुरिसिल भय'..॥ १० अजत्रात..॥ भनnt... ॥ १२ Tr.ra ॥ १३ मंगान पाय प्रमागेन •ि॥ १४ विष्णुली .. पिना । १५जामामा...
अट्ठावीसंइमो कम्मजोणिअज्झाओ .[ सत्तावीसइमो ठाणज्झायो]. खलु णमो महापुरिसवद्धमाणस। इन अधापुव्यं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय ठाणं णामऽज्झार्य, तं भो ! तमणुवक्खस्सामो । तं जधा-तत्थ उद्धंभागेसु सिरोमुहामासे संव्यउद्धंभागे पडिरूवे चेव रायाणं या रायकम्मिकं या अमचं वा अमञ्चकम्मिकं वा चूया । अक्खीसु णायकं चूया । कण्णेसु आसणत्यं घूया । दंतेसु भांडा- गारिकं घूया । णासायं अव्भागारिकं घूया । जिन्भायं आहारपडिरूवगते य महाणसिकं बूया । थणेसु ग्याधियकसं । घूया । पुणरवि य णासायं आहारेसु य मजपरियं बूया । गिद्धेसु पागियघरियं वूया णावाधियखं धा बूया । अग्गे- येसु सुवण्णाधियक्खं वूया । सव्वचतुप्पयपडिरूवगते य हथिअधिगतं वा चूया अस्सअधिगतं वा योग्गायरियं या गोयं- यक्खं वा बूया । संवुतेसु पडिहारं घूया । धीणामेसु अभागारिगं गणिकखंसं वा चूया । पुण्णामेसु वलगणकं या णायकं वा चूया । णपुंसकेसु वरिसधरं यूया । दढेसु वत्थुपारिसदं वा आरामपालं या पञ्चंतपालं वा धूया । चलेसु दूतं वा संधिपालं वा घूया । अभितरेसु अभागारिकं घूया सीसारखं वा बूया । वाहिरभंतरेसु पतिआरक्खं चूया । 10 आहारेसु सुंकसालियं धूया । णीहारेसु र दिनायरेसु रज्जकं वा पैधवावतं वा बूया । उवग्गहणेसु आइविकं चूया । परिमंडलेसु णगराधियक्खं चूया । मतेसुं सुसाणवावतं या सूणावावतं वा वूया । संरोधवंधणेसु चारकपालं यूया । पुण्णेसु महाणसिकं वा फलाधियक्खं वा धूया । मुदितेसु पुप्फाधियक्खं चूया ! जण्णेयेसु पुरोहितं घूया । तिक्खेसु आयुधाकारिकं घूया । पुषूसु सेणापतिं घूया । अणूसु कोट्ठाकारिकं घूया ॥ ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय० ठाणज्झायो नाम सत्तावीसतिमो सम्मत्तो ॥ २७॥छ । । 15 [अट्ठावीसइमो कम्मजोणिअज्झाओ] अधापुव्यं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय कमजोणीणामझायो । तं जघा-तत्थ अत्यि कम्म णत्थि कम्मं । ति पुव्यमांधारयितव्वं भवति । तत्थ अभंतरामासे दढामासे णिद्धामासे अत्यि कम्मं ति घूया । तत्य वज्झामासे चलामासे लुक्खामासे तुच्छामासे णत्यि कम्मं ति यूया । तत्थ कम्मं पंचविधं पुव्वाधारयितव्यं भवति । तं जधा-रायपोरिसं ववहारे कसिगोरक्खं कारुककम्मं भतिकम्मं पंचम भवति । तत्थ उत्तमेसु इस्सरितेसु य रायपोरिसं 20 बूया । गहणोपगहणेसु सव्यगो-वलिबद्दगते य कसिगोरक्खं वूया । तत्य महापरिग्गहेसु सव्वदाणपंतिग्गहेसु य वाणियककम्म यूया। तत्य घलामासेसु सव्यकारुकोपकरणपरिग्गहेसु य कारुककम्मं यूया । तत्थ सव्यवझेसु सव्वतेसु य सव्यवेट्ठि- ककम्मकरपयोगे य भतिकम्मकारकं यूया । तत्थ रायपोरिसे पुव्यमाधारिते उत्तमेसु य रायाणं वा रायमचं वा धूया। सव्य- राजोपकरणे चेव तत्थ उपोत्तमेसु अमचं वा अस्सवारिकं चूया। वाहिरेसु सव्यचतुप्पदगते य आसयारियं यूया । अक्खीसु णायकं धूया । अभंतरेसु अन्भंतरावचरं यूया। धीगामेसु अब्भाकारियं यूया। "संयुसेसु भांडागारियं बूया। सीसकोपकरणे 25 सीसारखं वूया । चलेसु आहारणीहारेसु य पडिहारकं वूया । उदरे कुक्सिम्मि मुहे गीवायं सन्वआहारगते य सूतं वा महाणसिकं या यूया । आपुणेयेसु सव्यपाणगते य मजपरियं घूया पाणीयपरितं या चूया । सव्यचतुकेमु चतुरस्सेसु हत्याधियक्खं वा महामत्तं वा हत्यिमेंट या अस्साधियक्सं या अस्सारोधं या अरसबंधकं वा छागलिकं या गोपालं या १ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः १० त. एवं वर्तते ॥ २ संजुचेमुहं. त.॥ ३ सुफआलिंग हं• त०॥ हान्तर्गतः पाठः हं. त• नास्ति । ५पचवारयं या हं० त०॥ ६८ एतचिहान्तर्गतः पाठः है.त. नास्ति। रयियब है. त० । माघारेतन्यं ति ॥ ८°माहारयियवं है. त० ॥ ९मवति काररुकम्मं पंचमं सत्र० ॥ १० परिग्ग ह० त०॥ ११ भवतिकम्म ह. त• विना ॥ १२ संधुपसु १० त०॥ ४-4एतचि- ७°माहा- अंगविज्ञापण्णय महिसीपालं या उट्टपालं या यूया, मगलुद्धगं या ओरम्भिकं या अहिनिपं या यूया । तत्य रायपोरिसगताणि अस्साति- यक्सो याद हत्याधियक्सो वा हत्यारोहो या हथिमहामत्तो वा गोसंखी या गजाधिपति त्ति वा । तत्थ सुकेसु साहिरण्गकारेसु चेय भांडागारिकं या कोसरसं या बूया । महापरिग्गहेसु सन्चाधिकतं चूया। अंगुलीसु सव्वलि पिगते चेत्र लेसकं चूया । जिन्भाय हितये सम्पबुद्धिरमणेसु य गणकं धूया । सव्यसत्थगते सव्यदेवगते य पुरोहितं । चूया । गिद्धेसु पक्रासु य संयच्छरं यूया । अंतिअसिणिग्गमेसु दाराधिगतं वा दारपालं या घूया । ॐ पुण्णामेसु पटगग यूया 'हा सेणापति या धूया । थीगामेसु अभागारिकं या गणिकासंसकं या बूया । पुंसफेम परिसघरं यूया । दढेसु यत्युसु यत्याधिगतं वूया जगरगुत्तियं वा धूया । चलेहुँ दूतं या जइणकं वा यूया पेसणकारकं या पविदारकं या यूया। गिद्धेसु तरपअर्से या णवाधिगतं या तित्यपालं या पाणियपरियं या हाणपरियं या सुरापरितं वा पूया । लुक्सेसु फटाधिकनं या सणाधिगनं या "वीतपालं या यूया । अभितरेमें ओपेसेजिकं या सीसारखं या यूया । 10 पाहिरेसु धारामाधिगतं यूआ। याहिरमंतरेसु नगररक्सं वा अन्भागारियं या यूया । कण्हेसु असोरुवणिकापालं धूया यागाधिगनं या । सामेसु आभरणागत पूया । तत्य यवहारिणं आपुणेयेसु उदक,कि या मच्छबंध वा नौविकं या पाविरं या पूया । तयेसु सुपण्णकार अलितककारकं या रचरनकं या देवह उण्णाणियं सुत्तवाणियं जतुकार चित्तरं पित्तवोजी वैति । मुमु तहकार सुद्धरजकं या यूया । संडिते ठिण्णे भिण्णे सुयण्णकारे लोहकारे सीतपेट्टफे जतुगरे कुंभकारा य विष्णेया । ददेर मणिकार संसकारं च विनेयं । थूलेसु कंसकार-पट्टकार-दुस्सिर-रयक-कोसेन- 18 याग-देवासा(मा)ति पिण्णेया।थूलेसु ओरम्भिक महिसपातका विष्णेया । दीहेसु उसिणिकामत्तं छत्तकारक-यत्योपजीविका विण्गेया । इस्सेमु रसेसु फलयाणिय-मूलपाणिय-धण्णयाणिया विण्णेया । सयआहगते ओदनिक-मंस-कम्मासयाणि- -तप्पण-लोगमागिना-ऽऽपूर्षिक-पानकारका विष्णेया। तत्य सम्यगहणेसु पणिक फलयागियका विष्णेया। उपरगहणेसु सिंगरेयाणिया विष्णेया । सिरसि राया या अमयो या अस्सवारिको या छत्तधारको या छत्तफारको पा सीमारक्सो पा पसाघको या विष्णेया। गिटाले हत्यिसंसं या अरससंसे पति घूया । अच्छीमु २० अग्गिउपजीविं या आदितरिंग या पूया । फण्णेसु मुरण्णकारो या फुसीलको [था] रंगाचरो या विष्णेया । गामायं गंधिको मालाकारो घुण्गिकारो या, जिम्मायं सूतमागधं पुरसमाग पुरोहितं धम्म महामं गण गधिकगायक दपकार भदुरमयं या, गीयायं मणिकारं सुषण्णकारं कोटाकं घट्टकि या पूया । पाहूमु पत्थ- पाटकं पाण्यापतिक मंति भंडापतं तित्ययापन आरामवायतं या यूया । सत्य उरे अधिगतं या रयकार या दारक- भाभिकारिपा विग्णेया । उदरे महारसिक पासून या ओदनिकं या पूमा । कडीयं सामेलासं या गपिकापस पा प्पा । ऊम्मु हत्यारोई पा अरसारोहं या धूया । अंपा, दूतं पेरसं या पूया । मुलुपेमु पंधं या पंधनागरियं या पूर्ण । पादेगु पोरलोदारा विण्णेया । मन्यमूलोणीगते मूलापाणय-गलिक-मूलकामा विण्णेया। तिसिसु सध्या सफा पिग्गेया। सारयतेमु हेरग्गिा-मुग्गिर-पद-दुस्मिक-संजुकारका देवडा येति विण्णेया। पादिरेमु कम्मा- अपने दिन गन्यपानयातमु समभूमीगते य गोपसभतिघरपा य विनया । पलेमु य यासारेमु य आविटे १'मुगभारतिया..॥२१:- पतित: पारः .. मामि॥ ३ कोतारपणे ॥ मादिप राrt.in ५मिमगनिगमेमु अतिमणिग्गमेर दा• •॥ ६समितान्तर्ग:: प ... उप या जगाकर..." ८परिहारसपी प्यार..॥ ९णाधिगय पा..॥ १. पीपग... ११२ भारपा पु.॥१२ प..॥१५माधि पायाधिस यार.. १५'रमर tru १० गुणनियं.. fan १७ जायेसेगु ति गणेश १८गुमर... रागातिकमे उत्त'.. दिना ॥ २० भादारणले .. २१ दरिय. Hd mmtart... २२ गुन्जियोपा • • frru २३ गायिकर ... २४ मारा .....५पाrt.ron २६ मामनरपा... १३' पेरगर.. २८ मा Twit... २..शि....भसाप भापिटेशम उपाय... - एगणतीसइमो णगरविजयज्झाओ य ओयकार-ओड्डा य विष्णेया। णिण्णेसु मूलखाणक कुंभकारिक-इडकार-बालेपतुंद-सुत्तवत्त-कंसकारक-चित्तकारका विण्णेया । ओकिन्नेसु रूवपक्खर-फलकारका विनेया। सबवद्धमाणेसु सीकाहारकममुहारका विण्णेया । तत्थ अप्पणा पहतेसु कोसज्जवायका दिअंडकंबलवायका कोलिका चेव विण्णेया । उपहुतेसु सबओसधगते य वेजा विण्णेया । कायस्स परिमासे कॉयतेगिच्छका विण्णेया । थणेसु य सव्वसत्थगते सल्लकत्ता विण्णेया । अच्छिगते सोलाकी, सव्व- देवगते भूतविजिका, वालेजेसु कोमारभिचा विण्णेया । सव्वपरिसप्पगते विसतिथिका विष्णेया। अब्भंतरेसु सिप्पै- पारगतं बूया । बाहिरमंतरेसु मज्झिमं घूया । सव्यपाणजोणिगते वेज-चम्मकार-हाविय-ओरम्भिक-गोहातक-चोरघाता विण्णेया । बाहिरेसु वि दढं घूया। सिवेसु मायाकारकं वा गोरीपाढकं वा लंखक-मुहिक-लासक-लंबक-गंडक- घोसकं बूया । सव्यछिद्देसु सव्वउपहुतेसु मोघं सिप्पं बूया । अवस्थितेसु उटुंभागेसु सफलं सिप्पं बूया । अधोभागेसु निप्फलं सिप्पं घूया ।। ॥ इति भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय कम्मजोणी णाम अट्ठावीसतिमो अज्झाओ सम्मत्तो ॥२८॥छ। 10 [एगूणतीसइमो णगरविजयज्झाओ] अधापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय णगरविजयो णामाज्झायो। तं खलु भो ! तमणुव- क्खस्सामो। तं जधा-तत्थ अस्थि णगरं णत्थि णगरं ति पुवोधारयितव्यं भवति। तत्थ अभंतरामासे दढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे मुदितामासे पुण्णामधेजे सव्वआहारगते य अत्थि णगरं ति बूया । तत्थ बज्झामासे सव्वीहारगते ये मंत्थि णगरं ति बूया । तत्थ णगरे पुव्वमाधारिते समिद्धं न समिद्धं ति आधारयितव्वं भवति । तत्थ 15 अभंतरामासादीसु समिद्धं णगरमिति बूया । तत्थ बज्झामासादिसु ण समिद्धं णगरं ति बूया । तत्थ णगरे पुव्यमाधारिते बंभेयेसु सव्यबंभणपढिरूवगते य बंभणज्झोसियं घूया, घंभणोसण्णं वा णगरं ति घूया । तत्थ खत्तेयेसु सव्वखत्तगते य सव्वखत्तपडिरूवगते खत्तियझोसियं वा खत्तिकोसण्णं वा णगरं ति यूया । वेस्सेजसु सव्यवेस्सपडिरूवगते य वैइरसझोसितं वा वेस्सोसण्णं वा णगरं ति घूया । सुद्देयेसु सव्यसुद्दपडिरूवगते य सुद्दज्झोसियं वा सुद्दोसण्णं वा णगरं ति बूया । तत्य णगरे पुव्यमाधारिते थीणामं पुण्णामं ति पुव्याँधारयितव्यं भवति । तत्थ पुण्णामेसु 20 सव्वपुरिसपडिरूवगते य पुण्णामधेनं रायहाणि धूया । थीणामेसु सव्वइत्थिपडिरूवगते य थीणामधेनं साखानगरं वा घूया । दढेसु चिरनिविद्वं नगरं ति बूया। चलेसु अचिरनिविटुं णगरं ति घूया । गिद्धेसु बहुउदगं वा बहुबुट्ठीकं वा णगरं ति घूया । लुक्खेसु अप्पोदगं या अप्पवुढीगं वा णगरं ति बूया । बझेसु सव्वचोरपडिरूयगते य चोरयासो णगरं ति घूया । अभंतरेसु सव्यअजपडिरूवगते य अजो वासो णगरे त्ति बूया । आहारेसु अप्पणो णगरं ति घूया । णीहारेसु परणगर ति बूया। दीहेसु दीहं णगरं ति बूया । परिमंडलेसु परिमंडलं ति यूया। चतुरस्सेसु चतुरस्सं ति बूया । कैसेसु सव्यमूलजोणीगते 25 य कट्ठपागारपरिगतं णगरं ति बूया । Vलेसु इट्टगपागारं ति बूया । दक्षिणेसु दक्खिणोदागं णगरं ति यूया । यामेसु वामोद्दागं णगरं ति बूआ । मज्झिमेसु पविलु णगरं ति बूआ। पुधूसु वित्यिण्णं णगरं ति वूआ। गहणेसु गहणणिविद्वं गगरं ति यूआ । उपग्गहणेसु आरामबहुलं णगरं ति यूया । उद्धंभागेसु उद्धनिविलु पव्वते व ति बूया । पिण्णेसु णिण्णे वा निधिगंदि पाणुष्पविटुं वा णगरं ति यूया । (ढेसु बहुवाधीतं वा गंगरं ति बूया । मोक्सेसु अन्याधित वा १°कारछावेपबुंद है. त० ॥ २°कनट्टहा है. त० ॥ ३ उपदयेसु है. त०॥ ४ कायरगिच्छका है. त. ॥ ५ सालकी, सत्तदेवगते भूयवेधिका, यालेयेसु ६० त० ॥ ६°समत्थिका है. त.॥ ७०८पकार' है. त.॥ ८°यकगंतुकयोसकं है. त० ॥ ९ माहारियव्वं ई० त०॥ १० णस्थि घरं ति सप्र.॥ ११ आहारियव्वं हं. त.॥ १२ गते पुण्णामधेनं तं चा खत्तिकोसणं है. त० विना ॥ १३ यइस्सिज्झो' सप्र.॥ १४°माहारियव्य ई. त.॥ १५ केसेंसु है. त॥ १६ मूलेसु है. त.॥ १७ उशनिवि ह. त• विना ॥ १८ पट्टेसु सं ३ पु• सि. 1 यहेसुई. त.॥ अग०२१ १६२ अंगविजापाणये अप्पुज्जोगं व त्ति चूया । पसन्नेसु अतिक्खदंडं अप्पपरिक्खेसं या णगरं ति घूया । अप्पसन्नेसु बहुविग्ग बहुपरिक्खेसकारा- मणं ति व बूया । पुरस्थिमेसु गत्तेसु पुरत्यिमेसु ये सह-रूवेसु पुरथिमायं दिसायं णगरं ति चूया । पच्छिमेसु य गत्तेसु पच्छिमेसु । य सह-रूवेसु पच्छिमायं दिसायं ति यूया । दक्षिणेसु सद्द-स्वेसु दक्खिणेसु य गत्तेसु दक्खिगायं दिसायं ति बूया । यामेसु गत्तेसु वामेसु य सद्द-रूवेसु उत्तरायं दिसायं ति यूया । पुण्णेसु बहु अण्णपाण [ णगरं ] ति धूया । "तुच्छेसु अप्पअण्णपाणं णगर ति यूया । वायव्वेसु बहुवातकं बहुबातोवद्दवं च णगर ति यूया । अग्गेयेसु बहुउण्डं आलीपणगबहुलं व ति वूया । आपुजोणीयेसु बहूदकं बहुवुट्टिकं बहूदकवाहनं पा णगर ति बूया । लण्हेसु बहुमकसक या संस्थप्पातबहुलं व त्ति बूया । आदिमूलिकेसु आसण्णे णगरं ति बूया । मज्झविगाढेसु जुत्तोपकट्ठणगरं ति चूया । अंतेसु दूरे पचंतिमणगरं ति यूया । अयोगखेमपडिरूवगते सुभिक्खयोगक्खेमगतं अणभिवुत्तं वा णगरं ति वूया । सद्देयेसु विस्सुयकित्तियं ति बूया । दंसणीयेसु दिट्ठपुव्यं वा रमणीयं वा णगरं ति घूया ।। - ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय णगरविजयो णामाज्झायो एगणतीसतिमो सम्मत्तो ।। २९ ॥ छ । 10 [तीसइमों आभरणजोणीअज्झाओ] अधापुव्यं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञाय आभरणजोणी णामाज्झायो । तं खलु भो ! [स]मणु- वक्खस्सामो । तं जधा-तत्थ अस्थि आभरणं णथि आभरणं ति पुन्वाधारयितव्वं भवति । तत्थ अभंतरामासे 15 दढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे आवद्धे मल्ले या भूसणे वा हसिते वा गीते वादितगते सव्वाभरणगते आवद्धं आभरणं घूया । तत्थ वज्झामासे चलामासे लुक्खामासे सुच्छामासे कासिते खुहिते णिम्मजिते गिल्लिखिते णिभग्गे गिद्दुते ओमुके मल्ले या भूसणे वा अच्छादणे वा रुग्णे वा कंदिते या कुंजिते वा सव्वउपहुतेसु य अणावद्धं आभरणं धूया। तत्थ याभरणं तिविधमाधारयितव्यं भवति-पाणजोगीगतं धातुजोणीगतं मूलजोणीगतं । तत्थ पाणजोणीयं चलेसु य पाण- जोणीयं विष्णेयं । सव्यमूलगते मूलजोणीगतं विण्णेयं । ॐ धाउजोणीगए धाउजोणीगयं विष्णेयं । छातत्य 20 पाणजोणीमय संसमयं मुत्तामयं दंतमयं गवलमयं वालमयं अट्ठमयं चेति । तत्थ मूलजोणीमयं कट्ठमयं पुप्फमयं फलमयं पत्तमयं चेति । तत्थ धातुमयं सोवण्णमयं रुप्पमयं तंवमयं सीसमयं लोहमयं तपुमयं काललोहमयं आरकुडमयं सब- मणिमयं गोमेयक लोहितक्खो पयालकं रत्तक्सारमणि लोहितकं चेति । तत्य सेतेसु रुप्पमयं संखमयं मुत्तामयं सुफ फलिकविमलकसेतक्यारमणी विण्णेया । तत्थ कालकेसु सीसक-काललोह-अंजणमूलक कालक्खारमणी वेति । णीलेसु सरसक णीलखारमणी चेति । अग्गेयेसु सुवण्ण-रुप्प-सव्वलोहमयं लोहितक्ख-मसारकल्लखारमणी चेति । अणग्गेयेसु 25 अवसेसाणि चूया । कोट्टिते सव्वलोहमयं विण्णेयं । णिरिसते सव्वक्सारमयं विण्णेयं । घट्टेसु सव्यमणिमयं विष्णेयं संखग पवालगतं या घूया । विसुद्धेसु ओमधिए परिमहिते मुत्ता चिण्णेया। तत्थ सिरसि ओचूलका-दिविणद्धक-अपलो- कणिका-सीसोपकाणि य ाभरणानि यूया । फैण्णेसु तलपत्तका-ऽऽवद्धक पलिकामदुधनक-कुंडल-जणक-ओकासक-क- ण्णेपूरक-कण्णुप्पीलकाणि य धूया । अक्खीसु अंजणं, भमुहासु मसी, गंडेसु हरिताल-हिंगुलुय-मणस्सिला विण्णेया । ओढेसु अलत्तको विष्णेयो। कण्णेसु घण्णसुत्तकं तिपिसाचकं विमाधारकं असीमालिका-हार-ऽद्धहार-पुच्छलक-श्रावलि- १ अप्पजोग है• त.॥२°रिकेस' है. त• विना ॥ ३ एतचिहान्तर्गत. पाठः है. त. नास्ति ॥ ४ यदुअणं उण्हं है. •॥ ५ सत्युप्पा ६० त०॥ ६°माहारपियव्य है. ता॥ ७ सुक्खा है. तविना॥ ८वा कंजिए या ई. ९ हस्तचिहान्तर्गतः पाठ. ह. त• एव वति ॥ १० °णीगर्य सं' है. त•॥ ११ आकुरड है. त•॥ १२ चलेस है..बिना ॥
एगतीसइमो धत्थजोणी अज्झाओ फा-मणिसोमाणक-अट्ठमंगलक-पेचुका-वायुमुत्ता-चुप्पसुत्त-पहिसराखारमणी कडेवट्टका वैति आभरणजोणी यूया । बाहूसु अंगयाणि तुडियाणि सन्यवाहोवकाणि वूया । हत्येसु हत्थकडगाणि कडग-रुचक सूचीका यानि या तानि हत्योपकाणि वा घूया । हत्थेसु अंगुलीसु य अंगुलेयकं मुद्देयकं वेंटकं जाणि य अन्नाणि अंगुलेयकाणि ताणि बूया । कडीयं कंचिक- लापकं मेखलिका कडिउपकाणि य चूया । जंघासु गंडूपयकं णीपुराणि परिहेरकाणि आभरणाणि य वूया। पादेसु खिखिणिक-खत्तियधम्मका पादमुद्दिका पादोपकाणि य आभरणाणि वूया ॥ ॥ इति खलु भो महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय आभरणजोणी नामझायो तीसतिमो सम्मचो॥३०॥छ। 6 [एगतीसहमो वत्थजोणी अज्झाओ] - अघापुलं खलु भो ! महापुरिसदिन्नाय अंगविनाय वत्थजोणी णामझाओ। तं सलु भो ! तमणुवक्सस्सामो। तं जधा-तत्य अस्थि यत्यं नत्यि वत्थं ति पुख्वमाधारयितव्वं भवति । तत्थ अभंतरामासे दढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे मुदितामासे पुण्णामधिजे सव्वआहारगते य सव्ववत्यपडिरूवगते य अत्थि वत्यं ति यूया । 10 तत्य पज्झामासे चलामासे तुच्छामासादिके हि गत्यि वत्यं ति यूया। तत्थ वत्ये पुव्याधारिते पत्यं तिविध- माधारयितव्यं भवति-धातुजोणिगतं मूलजोणिगतं पाणजोणिगतं चेति । तत्य घलामासे सव्यपाणजोणिगते य पाणजोणिगतं घूया । सत्य दढामासे सव्यधातुजोणीगते य पातुजोणीगतं धूया । तत्य सम्यकेस-मंसुगते सव्यमूलगते य मूलजोणिं यूया । तत्य पाणजोणीगते पत्थे पुव्यमाधारिते पाणजोणिगतं पत्यं तिविधमाधारये- कोसेजं पैतुनं आविकं चेति । तत्य सव्वचतुष्पदगते सव्यचतुप्पयपटिरूंयगए य सव्याविकं यूया । वत्य 15 सव्यकीडगते सम्यकीडपडिरूवगते य कोसेजं या पेत्तुण्णं वा बूया । सत्य मूलजोणीगते पुव्याधारिते मूलजोणिगतं वत्यं चतुविधमाधारये-सोमं दुकुलं चीणपढें सव्यकप्पासिकं चेति । तत्य सव्यतयागने सव्यवफागते सध्यसंघगने य सोमं वा दुकुलं वा चीणं या पट्ट या यूया । तस्य सव्यफलगते सम्मअग्गगते य सव्यपम्हगते य कप्पासिकं धूया । तत्य धातुगते पत्थे पुबमाधारित धातुगतं यत्यं तिविधमाघारये-लोहजालिका सुवण्णपट्टा सुवण्णससितं चेति । तत्य कण्हपडिरूयगते य सव्यकाललोहजालिकं यूया । सत्य सव्यपीतके सव्वपीतपढिरूवगते य मुवण्णपी मुवण्णससितं 20 धूया । तत्य दढामासे अहतं पत्थं यूया । चलामासे परिजुण्णं चूया । मन्मंतरेसु परग्धं चूया । याहिरेमु जुत्तग्धं बूया । पाहिरयाहिरेसु समग्यं ति यूया । थूलेसु थूलं, अणूसु अणुकं, दीहेसु दीदं यूया, हस्सेसु हसं यूया। अंगु- लीमु सकलदेसदं यूया । गहेसु यहितं दस पूया । पलेसु छिन्नदसं यूया । अंगुलीयंतरेसु विवादितं यूया। पणेमु "सिवितं यूया । छिद्देसु छिदं यूया । गहणेसु पावारकं या कोतयकं या उण्णिकं या अत्यरफ घूया । उपग्गबणेमु एयाणं पेय तणुलोमाणि हरसलोमाणि या यूया । मुदिएमु यध्य पत्याणि यूया । दीणेमु मतेमु य मतकयत्याणि विलातों या 35 यूया । अभंतरेसु सकं यत्यं घूया । घाहिरम्भंवरेसु आतक्तिकं यूया । पाहिरेमु परफ पूया । ददे मिक्सितं यत्यं मूया । पलेसु अपहिवं यूया । आहारेमु याचितकं यूया । पीहारेसु पूया। अतिगमेमु लद्धं यूया । नत्य अम्मंतरामासे सव्यसेतयण्णपहिरूवगते य सेयं यूगा । फण्हेमु फाटकं यूया । जिन्मा-तालु-ओह-करतल परणतलम- व्यरत्तपडिरूयगडे य रतं यूया । ओमहिते पीतयण्गपडिरूयगते य पीयकं यूया । वत्य सव्याहारगने सेयाट यूया । १"पेसुशापायुमसासुपसुस्त • •॥ २ रया'.. दिना ॥ ३ मंगुली मुहीकं..त. शिना, ४प्पा मप एप दरपोवकागि व्या । कडीय • •n ५पामाप्यायो • • पिना ॥ ६ पोसेढे १० तबिना। ७पउने आधिकत•॥ ८रुषेयत. मिना ।। ९ पप्... १.पचिर्य ...॥ ५रस्मेमु रस्सं..॥ १२ दफ॥ १३सिम्पियंत.॥ १५ पिलयो पा..॥ १५'मुनिमि...
२६४ "अंगविजापइण्णय EF केस-मंसुगते सेवालकं बूया । ध्य सव्वसंधीसु अक्खके उदरे तंप-सेतसाधारणे मयूरंगीयं घूया । सेतकण्ह- साधारणेसु फरेणूयकं वूया ! अक्खीसु वित्तं वूया । 'सीतपीतसमामासे साधारणे कप्पासिकं पुप्फकं विण्णेयं । सेतरत्त- ‘साधारणे पयुमरत्तकं विण्णेयं । रत्तपीतसाधारणे मणोसिलकं विण्णेयं । तंबकण्हसाधारणेसु मेचकं विण्णेयं । उत्तमेसु उत्तमरागं विष्णेयं । मझिमेसु मझिमरोग विण्णेयं । मज्झिमाणतरकायेसु ण जघामाणसिकं धूया ! पेचवरकायेसु । विरतं या अद्धरत्तं था बूया । तत्थ अभंतरेसु जातीपट्टणुग्गतं वूया । वाहिरव्भंतरेसु जातीपडिरूंपकं चूया | वाहिरेसु अपट्टणुगतं धूया । उद्धंगीवासिरोमुहामासे मुंहोपकरणे उद्धंभागेसु य जालक या स पैट्टिकं वा • र्यढणं वा सीसे. फरणं वा बूया । उद्धं णामीय गत्तेसु उद्धं णामीय उपकरणेसु सव्वउत्तरिज्जगतेसु य उत्तरिजं बूया । अधोहेडा णामीय गत्तेसु अधोगत्तोपकरणे अंतरिनं वूया । पट्ठीय पञ्चत्थरणं बूया । उलोकिते उभागेसु य विताणकं बूया । तिरियंभागेसु परिसरणकं बूया ।। ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिन्नाय अंगविजाय वत्थजोणी णाम ज्झाओ एगतीसतिमो सम्मत्तो ॥ ३१॥छ । 10 [ यत्तीसइमो धण्णजोणी अज्झाओ] अधापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय धण्णजोणी णामाज्झायो। [तं खलु भो ! तं अणुव- क्सयिस्सामि । ] तंजधा-तत्थ अस्थि धणं णत्यि धण्णं ति पुवमाधारयितव्यं भवति । तत्थ अन्भंतरामासे 1 ढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे मुदितामासे पुण्णामघेज्जामासे आहारगते य अस्थि धण्णं ति बूया। तत्य सध्यघण्णगते सव्यववहारगते अत्यि धण्णं ति बूया । तत्थ पज्झामासे चलामासे लुक्खामासे तुच्छामासे दीणामासे णपुंसकामासे सव्यणीहारगते य णत्यि धणं ति बूया । तत्य धण्णाणि सालि वीहि कोद्दवा कंगू रालका तिला मासा मुग्गा चणका कलाया णिप्फाया कुलत्था यया गोधूमा कुसुंभा अतसीयो मसूरा रायसरसव ति । तत्येकण्णेसु पुन्वमाधारिते पुव्यणं अवरणं ति पुष्वमाधारयितव्य 20 भवति । तत्थ पुरिमेसु गत्तेमु पुरिमेसु य सर-रुवेसु पुव्यण्णं घूया । तत्थ पच्छिमेसु गत्तेसु पच्छिमेसु य सह-रूवेसु अपरणं यूया । तत्य पुव्वण्णेसु पुष्यमाधारिते सालि वीहि कोहवा रालका कंगू चरका तिला वेति । तत्थ अवरण्णे पुख्यमाधारिते मासा मुग्गा निष्फारा घणया फलाया कुलत्या यव-गोधूमा कुसुंभा अतसीयो मसूरा रायसस्सव ति बूया। तत्य पुचणे पुव्वमाधारिते गिद्धेसु साली वीही तिला या विण्णेया। लुक्खेसु कोद्दया रालका यरका वा विण्णेया। गिद्धलुससाधारणेसु वीही या फंगू या विण्णेया । सेतेसु सालि सेतवीही या सेततिला या धूया । रत्तेसु रत्तसालि 25 या कोड्या या फंगू या रत्तवीही या रत्ततिला या विण्णेया। पीवकेसु रालके वा बूया । कण्हेसु कण्वीही या फदालके या फण्हतिले या चूया । * सामेसु परके यूया । मधुरेसु साली फंगू तिले या यूया । अंबेसु रालके यूया। फसायेमु धीही या कोडवे या यूया । तत्थ संवुतेसु कोसिधण्णगते सव्वकोसीगते सव्यसंगलिकागते सव्यसंगलिकापुप्फे रक्सेसु सरफलसमुगैतविकागते सवसिंगिगते तिला यूया । तत्य सत्यविमुकेसु सम्रपरिकिण्णेसु बाहिरेसु सव्यअ. फोसिधण्यागते सव्यअसंगलिकाफ्लेमु रक्खेसु सव्यसंगीगते य साली या वीही या कोहवे या वरके या रालके या १सचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव पति। २भस्सीसु उदरे .. विना ।। ३सेयपीयस है. त•॥' ४'रार्ग यूपा । मन्झि है..॥ ५"दिरुचिक है..॥ ६ सुदो ह.त.७ एतविहान्तर्गतः पाठः है. स. नास्ति। ८पदणं •• पिना ॥ ९नामाझा' है...॥ १०.. एतचिहान्तर्वती पाठः सर्वामु प्रतिषु दिरातोय । अस्माभिट सो सीरतोऽस्ति ॥ १ 'काफलेमुद...n १२ गहवि है• • गयि •ि॥
- तेचीसइमोजाणजोणीअज्झाओ कंगू वा धूया । तत्य रत्तेसु धणेसु आचितेसु सव्यपसूतेसु सव्यपंधगगते वरालकं या कंगू वा यूया । वत्य संधगते सव्य- विसालगते य विले चूया । तत्य सन्चअखंघगते सव्यअविसालगते य साली वा वीही वा यूया। परिमंडलेसु पट्टेसु कोदवा या रालके या घूया । वत्य घुप्फगए अपुप्फगए ति । तत्य पुप्फतेसु कोहवे गुओ गलके परफे या बूया । तत्थ अव्यत्तपुप्फेसु साली वीही या यूया। सुव्यत्तपुप्फेसु तिला घूया । इति पुव्यधण्णं (पुल्यण्गं) वक्खातं । वत्य अवरण्हे पुव्यमाधारित जवे या मासे या अतसीयो या कुसुंभे वा सस्सवे चूया । तत्य सुक्खेमु गिफाय-5 मुग्गे घणवे कुलत्ये मसूरे या बूया । गिद्धलुक्वेसु साधारणेसु गोधूमे या कलाये या यूया। सेतेसु यवे या सेतणिप्फावे वा कुसुंभे या घूया। रत्तेसु गोधूमे या कुलत्ये वा अतसीयो वा घरके या कंगू वा [यूया] । पुधूसु तिला यूया। दीद्देसु साली वा वीही या घूया । परिमंडलेसु रत्तसासवे या रत्तणिप्फावे वा यूया । पीवकेसु चणके फलाये या यूया। कण्हेसु मासा वा मुग्गे वा कण्हतिले या बूया । णीलेसु हारीखणिप्फावे वा बूया । सामेसु मसूरे वा घूया । मधुरेसु जवे या मासे या कलाये या मसूरे वा घूया । अवेसु चणवे या गोधूमे चा कुलत्ये या यूया । कसायेसु मुग्गे धूया । 10 तित्तफेसु णिप्फावे वा कुमुंभे या वूयां । कदुकेसु सस्सवे घूया । तत्य सव्यसंवुतेसु कोसीधण्णगते यूया । सव्यसंगलि- कागते सव्यसंगलिकापलेसु रुक्खेसु सव्यफलसमुगधविकागते य सव्यसिंगिसु य मासे मुग्गे चणवे या कलाये या णिप्फावे या मसूरे या कुलत्ये या घूया । तत्य सव्वघणेसु सव्वाचितेसु सव्यपधगगते सव्यमंजरिंगते य ज था गोधूमे या चूया । तत्य सव्यगुम्म(गुप्फ)गते सव्वगोप्फयण्णगते य कुसुंभे वा सस्सवे या अवसीको या यूया । तत्य सव्ययल्लीगते सव्यवद्धिधण्णगते य गिप्फावे वा कुलत्ये वा वूया । वत्य सव्वगुम्मगते सव्वगुम्मघण्णगते ।। य मुग्गे वा मासे या कलाये या मसूरे या चणए या घूया । तत्य सव्यसंघगते सव्यखंघमये धण्णगते सत्सए या कुसुभे का अवसीओ का घूया । वत्य सव्यअक्सखंधगते जवे वा गोधूमे था चूया । सत्य सत्यपुधूम णिप्फावे या कुलत्थे या मसूरे या घूया । यद्देसु चणए वा मुग्गे मासे वा फुसुभे या सस्सपे वा चूया । दीहेमु जवे या गोधूमे या यूया । वत्य संव्यत्तपुप्फेसु मुग्गे या मासे या घणए या गिफ्फावे या मसूरे या अतसीको या सस्सए या फुमुंभे या यूया। अन्यत्तपुप्फेसु जवे या गोधूमे या चूया । थूलेसु णिम्फावे या चूया । मन्झिमकायेमु जवे या गोधूमे या यूया फुसुंभे वा मासे या मुग्गे या चणगे या फलाये या यूया । पश्चयरकायेमु अवसीको पा सरमवे या मसूरे या धूया । तत्य णिद्वेसु अतिगमेसु य भायणगत धणं यूया । काययंतेमु मंजूमागत पल्लागवं चूया । घलेमु जाणगतं यूया । अभंतरेसु णिवेसणगतं यूया । अन्मंतरमंतरेसु ओगारिंगतं बूया । बाहिरेसु याहिरो घण्णं चूया । याहिरयाहिरेसु अरणगतं यूया । आहारेमु कीतं घूया । णीहारेसु विकीतं घूया । अन्मंतरमंतरेसु सकं यूया । अन्म- तरेसु मित्तधणं यूया । घाहिरण्मंतरे जाचितकं घूया । याहिरेसु णिक्रोव]परिगत यूया। घाहिरयाहिरेमु अपरि-25 हियं यूया ! महापफासेसु महापरिग्गहेमु य घटुं यूया । अप्पपफासे अप्पपरिग्गहेमु य अपं यूया । परिजुम्नेनु पोराणं यूया । पालेर्मु पयं चूया ॥ ॥ इति महापुरिसदिनाय अंगविजाय धण्णजोणी णामाग्झायो बत्तीसतिमो सम्मत्तो ।। ३२॥छ॥ [तेत्तीसइमोजाणजोणीअज्झायो] 20 अपापुर सङ भो ! महापुरिसदिनाय अंगविनाय जाणजोणी मान्झायो । तं जया-तत्य अत्यि ज्ञान पत्य जागं नि पुन्यमाधारपिवयं मपति । वत्य अमंदरामासे निशामासे मुद्धामासे पुष्णामासे पुण्यामषेत्रामासे १ पचपसु..॥ २-३ 'पिलासगने..बिना ।। ४ पुष्फगते पलगते चि.. ना ॥ ५कंग रा... ६ मुयण्णा..॥ ७ पुष्यपणे..॥ ८ गते सप्यगुप्फपण्णगए प मुग्गेरत..९वण्णमए सस्सये..॥१० सुपण्पगुप्फे या समुग्गे..॥ ११ अयगुप्पेमु.६०॥ १२अपहरियं 6.6. ॥१३ मु यण्ण..॥ १४पामरक्षा...॥ १५"मादारपियर्य ..॥ १६ मासे दसरामासे निशा.
१६६ अंगविजापहष्णय सम्पाहारगते अत्यि जाणं ति यूया । तत्य वझामासे घलामासे लुक्सामासे तुच्छामासे दीणामासे गपुंसकामासे सव्वणीहारगते य णत्थि जाणं ति बूया । तत्य जाणे पुव्यमाधारिते जागं दुविधमाधारये सन्नी णित्रीवं चेति । तत्य सन्नीयोवलद्धीयं सनीवं बूया । तत्य अजीबोवलद्धीयं अजीवं । तं दुविधमाधारये-जलयरं थलयरं चेति । तत्य सेव्यथलोपलद्धीय थल विष्णातव्यं भवति। तत्य सव्यआपुणेयेसु जलयरं विण्णातव्यं भवति । तत्य थलचरे सिविका मदासणं पर्वकसिका रखो संदमागिका गिल्लि लँग गोलिंगो सकई सफडी चेति । तत्य पुण्णामेहि पुण्यामं वि वूया । पीणामेहि थीणामं ति वूया । तत्य उत्तमेसु सिपिका भदासणं पा विण्णेयं-पुण्णामेसु महासणं, थीणामेसु सिविका । सव्यसत्यगते सव्यसंगामगते य रघो विण्णेयो। तत्य सव्यसयणगते पल्लंकसिका विष्णेया। तत्य विपुलेसु विपुलं चूया । संवुतेम संबुतं धूया । महळ्ययेसु सकडं वा संदमाणिकं या गिल्लिं वा यूया । मज्झिमकायेसु सकर्टि 10वूया । पञ्चंवरकायेसु रवं गोलि[ग] या घूया | - तेत्य उद्धंभागेसु उहायितं यूया। अधोभागेसु अणुलायितं बूया तत्य दीहेसु सकई वा गिल्लिं या जुर्ग वा सकहिं या यूया । परिमंहलेसु भद्दासणं या रथं पा गोलिकं वा वूया । इति थलचराणि अजीपाणि जाणाणि यूया । तत्य णिनीयाणि जलचराणि-णावा पोतो कोट्टियो सालिका तप्पको प्लयो पिंडिका कंडे वेल तुंबो कुंभो दती चेति । तस्य पुण्णामेसु पुण्णामाणि । पीणामेसु यीणामाणि । तत्य महावकासेसु णाका पोतो या विन्नेया। मज्झिमका- 15 येसु कोहियो सालिका संघाटो प्लयो तप्पको वा विष्णेयो। मझिमागंवरेसु की या वेल या विण्णेयो । पञ्चवरकायेसु तुंबो या कुंभो वा दती वा विष्णेया । इति गिजीवाणि जलचराणि भवति । तत्य सजीवा जाणतोणी-अस्सा हत्यी उट्टा गो महिसा सरा अयेलका मका चेति । तत्य उद्धंमागेसु सम्वसिं- गिसु य सव्वसंगलिकागते य संगलिकार्यत्येसु सव्यगोसिघण्णगते य सिंगी विष्णेया । तत्य अघोमागे सव्यअसंगलिकागते य फल-बच्छेसु या सव्यअकोसीधण्णगते य असिंगी विण्णेया । तत्य महायकासेसु हत्यी उट्टा महिसा वा विनेया । 20 मज्झिमकायेसु अरसा वलियद्दा या विन्नेया। मन्झिमाणतरकायेसु मगे वा खरे वा वूया । पञ्चनरफायेसु अए या एलके वा वूया । तत्य सञ्चहत्यिगते इत्यिउपजीविसु हत्यिउपकरणे हत्यिपडिरूवगते य सव्यहत्यिपादुभावे हत्यिं धूया । तत्य सम्पअस्सगते सव्वअस्सोपकरणे सव्यअस्सोपलद्धीय अस्सपादुभावे य अस्सं वूया । तत्य सम्बगोगते सव्वगो- उपजीविसु सब्बगोउपकरणगते सव्यगोउपकरणणामधेनोदीरणे सव्यगोपादुन्मावे य वलिवई चूया । तत्थ सव्यमहि- सोपलद्धीयं महिससहरूबपादुभावे य एवमेव महिसं यूया । एवमेव सत्र्यउट्टोपलद्धीयं उट्टो विनेयो। सन्यखरोपल- 25 द्धीय खरो विन्नेयो । सब्यअयेलकोपलद्धीयं अयेलको विण्णेयो । एवमेव सव्यमगोपलद्धीयं मका विनेया। तत्य गहणेसु अयेलकं विष्णेयं । उपम्गहणेसु य अवसेसा विष्णेया । तत्य अभंतरमंतरेमु सकं जाणं विष्णेयं । बाहिरभं- तरेसु याचितकं जाणं वूया । बाहिरेर्मु आधावितकं जाणं । बाहिरबाहिरेसु अपहरितकं जाणं । तत्य वयत्येसु अभिरामेसुय ण वूया । अणमिरामेसु महव्यएमु य जुण्णं वूया । छिद्देसु दुट्टितं जाणं । घणेसु सुहितं जाणं वूया । आहारेसु कीतकं वूया, णीदारेसु विकीनं वूया । सामेमु पटिरूवं जागं ति वूया ॥ ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिन्नाय अंगविजाय जाणजोणी णीमान्झायो तेत्तीसतिमो सम्मत्तो॥ ३३ ॥ छ । - 1 30 १ सम्योपल सं ३ पु. सि.। सय्यबलोपल है. त• ॥ २ जलचरे सप्र० ॥ ३ जुग्गगोसंकडसंकडी है• त. मिना ॥४-१- एतचिटान्तर्गत; पाठः है. त• नासि ॥ ५ कोडियो. ह. त•॥ ६ वच्छेस ह. त.॥ ७"सु महा- वियतनामन्दा है. तु.॥
१६५ चउतीसइमो.संलावजोणी अज्झाओ [ चउतीसइमो संलापंजोंणी अज्झाओं] अधापुच्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञाय संलापजोणी णामाज्झायो । तं खलु भो ! तमणुव- क्खस्सामो । तं जधा-तत्थ वत्तो संलायो ण वत्तो त्ति पुव्यमाधारयितव्यं भवति । तत्थ अभंतरामासे दढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे पुण्णामधेजामासे वत्तो संलाको त्ति घूया । तत्थ बज्झामासे लुक्खामासे तुच्छामासे पुवामासे ण वत्तो संलायो ति बूया । तत्थ सन्जीवेसु सन्जीवमंतरेणं पत्तो संलावो त्ति वूया । तत्थ गिद्धामासे 8 सुद्धामासे पुण्णामासे घोसवंतेसु य सजीवमंतरेणं यत्तो संलाको त्ति यूया । तत्थ वज्झामासे चलामासे सुक्खामासे लुक्खामासे तुच्छामासे अघोसवंतेसु य अज्जीवमंतरेणं वत्तो संलायो ति बूया । तत्य जीवंगतं तिविधं-दिव्वं माणुस्सं तिरिक्खजोणीगयं चेति । तत्थ उद्धंभागेसु दिव्यमंतरेण यत्तो संलायो त्ति घूया । उजुभागेसु थीणामामासेसु माणुस्सोपकरणगते य माणुसमंतरेणं यत्तो संलायो त्ति घूया । तत्तो चतुरस्सेसु चतुप्पदोपकरणेसु य चतुष्पदमंतरेणं वत्तो संलायो त्ति बूया । तत्थ उद्धंभागेसु सव्यपक्खिगते य पक्खि-10 मंतरेणं यत्तो संलावो त्ति बूया । तत्थ दीहेसु सव्वेसु सव्वपरिसप्पगते - य' परिसप्पमंतरेणं वत्तो संलावो त्ति बूया । आयुजोणीयेसु जलचरेसु य जलचरमंतरेणं वत्तो संलावो त्ति घूया। 7 अणूसु सन्वखुडसिरीसिवगए य खुडसिरी- सिवमंतरेणं वत्तो संलायो ति बूया । तत्थं पुण्णामासेसु पुरिसमंतरेण वत्तो संलावो त्ति धूया । थीणामधेजेसु थीणाममंतरेण वत्तो संलाको त्ति घूया । णपुंसकेसु णपुंसकमंतरेण वत्तो संलावो त्ति बूया । भेयेसु बंभणमंतरेणं वत्तो संलायो त्ति घूया । खत्तेयेसु खत्तियमंतरेणं वत्तो संलायो त्ति घूया । वेसेजेसु वेस्समंतरेणं वत्तो संलावो त्ति 15 धूया । सुद्देयेसु सुहमंतरेण वत्तो संलावो त्ति घूया । उड्ढे णामीय उत्तममंतरेण वत्तो संलावो त्ति धूया । अधो णामीयं उद्धं जाणुकेहि अघे दीणकमंतरेण वत्तो संलावो त्ति घूया । अहे जाणूणं पायजंघेसु .पेस्समंतरेणं व्रत्तो संलायो त्ति बूया । अणूसु पत्थमंतरेणं. यत्तो संलावो त्ति घूया । सामेसु आभरणमंतरेणं वत्तो संलायो त्ति घूया । बढेसु बद्धं चावारकमंतरेणं वा वत्तो संलावो त्ति बूया । चलेसु जीणमंतरेणं वत्तो संलायो त्ति चूया । उद्धंभागेसु पासादं वा चंदं वा सूरं या णक्खत्तस्स वा अंतरेणं वत्तो संलाको त्ति घूया । अधोमागेसु कूप-गदीमं- 20 तरेणं वा वत्तो संलावो त्ति बूया । तिण्हेसु सम्बसत्थगते य आयुधाकारस्स वा आयुधभंडस्स या अंतरेणं वत्तो संलावो त्ति चूया । एतेसु जेव जोधस्स या खंधावाररस वा संगामस्स या अंतरेण वत्तो संलायो ति बूया । सव्वकामुकप- यत्तेसु चलेसु य अंतरेसु य वेसिकं वा गणिकायं वा गूढिकायं वा कामुकरस वा कामिणीयं या अंतरेणं पत्तो संलायो त्ति बूया । तत्थ ददेसु णगररस वा जणपदस्स या सण्णिवेसरस वा खेत्तस्स या खेडस्स वा आरामस्स वा अंतरेणं वत्तो संलायो त्ति यूया । गिद्धेसु तलाकरस या णदीयं वा सरस्स वा पोक्खरणीय 25 वा उँउपाणस्स या अंतरेण वत्तो संलावो त्ति बूया । लुक्खेसु कंटकरस वा सुसाणस्स या सुण्णघरस्स या उहितपद्रवस्स या अण्णणगर-गाम-जणपदस्स या गिहस्स या अंतरेणं यत्तो संलायो त्ति बूया । णपुंसकेसु णिरत्यकं पत्तो संलायो त्ति चूया । बझेसु दूरजणपद-णगरमंतरेण वत्तो संलाको त्ति घूया । बाहिरभंतरेसु इमरस जणपदरस अंतरेण पत्तो संलावो त्ति बूया । अभंतरेसु संकरस वा जणकरस या उपकरणस्स या अंतरेणं यत्तो संलावो त्ति घूया । णीहारेतु बज्झरस वा जणस्स अण्णातकस्स का उपकरणस्स या अंतरेण वत्तो संलायो ति यूया। BF दीहे दीहकालं यत्तो 30 संलायो त्ति बूया । हा रस्सेसु रस्सकालं वत्तो संलावो त्ति घूया । थूलेसु हथिस्स या 4 महिसस्स या मच्छस्स १नामऽज्झा है. त० ॥ २तं जहा खलु है• त•॥ ३जीवमयं है. त॥ ४ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः ई. तएव ५पढेसुबई याया है. त•॥ ६ जालम है. त.॥ ७चा मूढि है. त•॥ ८ उदुपाण' है..॥ ९ लुक्खस्स फं है. तविना ॥ १० सफस्स या उपकारणवचो से ३ पुसफस या जणसफस्स या उपकरण या उपकरेण पत्तो सि.॥ ११ हस्तविहान्तर्गतः पाठ है. त• एव वर्तते ॥ १२-4 एतचिहान्तर्गतः पाट..नास्ति । वर्तते ॥
अंगविजापइण्णय या » थूलपक्खि-परिसप्पथी-पुरिसमंत्तरेण वा पत्तो संलायो ति वूया ! कसेसु खुड्डाकसत्तमंतरेण वत्तो संलाबो त्ति धूया । पुधूसु चैत्युमंतरेण यत्तो संलायो ति बूया खेत्तमंतरेण वा चूया । गहणेसु आराममंतरेणं पत्तो सेलायो चि धूया । उपग्गहणेसु खेचसीमामंतरेणं यत्तो संलायो त्ति घूया । परिमंडलेसु भायणमंतरेणं बत्तो संलावो त्ति घूया । मतेसु मतमंतरेणं यत्तो संलाको त्ति घूया । उण्णतेसु उलुकमंतरेणं पव्चतमंतरेण वा यत्तो संलायो त्ति यूया । पसण्णेसु दाणमंतरेण या बंदणमंतरेण या 3 पैतिग्गहमंतरेण वा सम्मोईमंतरेण वा यत्तो संलायो त्ति घूया । अप्पसण्णेसु निच्छोममंतरेण वा गिराकारमंतरेण वा पत्तो संलावो त्ति बूया । पुण्णेसु आहारमंतरेणं पत्तो संलाबो त्ति धूया । तुच्छेसु छुधामंतरेण यत्तो संलायो त्ति बूया । अग्गेयेसु अग्गीमंतरेण वा औलीपणकमंतरेण या पत्तो संलावो त्ति वूया । जण्णेयेसु उस्सयमंतरेण या समवायमंतरेण था यत्तो संलायो ति बूया । दंसणीयेसु चंदा.ऽऽदिश्च-गह-तारारूवसमिद्धसामिद्धिं गाम-जणपद-गगर-उस्सयसमायमंतरेण वा यत्तो संलायो त्ति यूया । अणागतेसु 10 अणागतमंतरेण या वत्तो संलायो त्ति बूया । वामदक्षिणेसु वत्तमाणमत्थमंतरेण वत्तो संलावो त्ति बूया । पच्छिमेसु गत्तेसु अतीतमयमंतरेण रत्तो संलायो ति बूया ।। ॥ इति महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय संलावजोणी नामाज्झायो चउतीसतिमो सम्मत्तो ॥३४॥छ।। [पणतीसइमो पयाविसुद्धीअज्झाओ ] अधापुज्यं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पयाविसुद्धी गोमाञ्झायो। तं जधा-तत्य अस्थि पया 15 णत्यि पय त्ति पुष्वाधारयितव्वं भवति । तत्य अभंतरामासे दढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे दक्खिणामासे मुदिता- मासे पुण्णामासे पुण्णामधेनामासे सव्वआहारगते य अत्यि पय त्ति घूया । तत्थ उँलोइते उस्सिते उच्चारिते उण्णामिते उत्थिते उपसारित उपयप्पिते उपलोलिते उपकट्टिते उपयत्ते उपर्णते उपणद्धे उपलद्धे उपसारित एवंविधसद्द-रूवपादुन्भावे अत्थि पय ति बूया । तत्य माता-पितु-भगिणि-सोदरिय-मित्त-बंधुजणसमागमे समाणिते अभिसंगते अभिगंदिते उपदासिते उपगृहिते चुंविते अच्छायिते पागुते परिहिते अणुलित्ते अलंक्तेि वा एवंविधसह-स्वपादुम्भावे अस्थि पय त्ति 20 घूया । तत्थ उकुटे अप्फोडिते पच्छोलिते गजिते पयादिते सेसाऽऽयाग-यलिहरेंगते णव-पुण्ण-पसस्थ-पहट्ट-परग्ध-पैश्चउद- गगीये पुप्फे या फले या मल्ले या भूसणे या अच्छादणे वा आसणे वा सयणे या न जाणे वा बाहणे वा उपकरणे या रयणगते या धण्णगते वा धणे वा पाणे वा भोयणे या उपणामित-पडिच्छिते या एवंविधसह-रूवपादुम्भावे अयि पय त्ति वूया । तत्थ उक्लद्ध-संत-भूत-अत्यिसद्दपादुभावे अस्थि पय ति यूया । तत्य धातीकुमारदारकसव्य- अपञ्चपादुन्भावे य अत्यि पय त्ति वूया । तत्य वझामासे चलामासे कण्हामासे लुक्खामासे तुच्छामासे दीणामासे 23 'पपुंसकामासे सव्यणीहारगते य णत्थि पय त्ति वूया । तत्थ कासिते छीते भिते रुदिते परिदेविते भग्गे मिण्णे विगढे विपाहिते विक्खिन्ने विच्छुद्धे विच्छित्ते "गिलुचिते विणासिते "विसंधिते रूवाकडे फुमिते विज्झविते भंते या एवंविधसद-रूवपादुमावे णत्यि पय त्ति घूया । तत्य णिम्मझिते गिल्लिसिते गिस्सारिते पिण्णामिते गिद्धाडिते गिलोलिते गिपट्टिते णिप्फीलिते गिलालिते णिक्सिते णिच्छुद्धे गिब्वाडिते णिसित्ते णिचिते णिच्छोलिते गिरससिते १पत्थर्म.त.॥ २हसचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एल वर्तते ॥ ३आलापक. त। ४ नामोऽज्दा है. न.॥ ५णामऽज्झा है. त. हारयिय है. त• ॥ ७ उल्लोकिए है. त• ॥ ८॥ते र] उपसारिते है. स.पिना । ९ उपटे ह• त•॥ १० पच्छिलिते ह• त• विना ॥ ११°लिदूर है. स. ॥ १२°पथा- 'दग्गीये . त• पिना ॥ १३ हम्नचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव वर्तते ॥ १४ घण्णे या ई. त.॥ १५ णितुंचिते हैं। • पिटुयिप है..॥ १६ विघसिते गि०० १७ णिलोडिए णिकट्ठिए है• त• ॥ १८ मिच्छोलिए णिपिद्धे णिव्युरे है..॥ १५णियोलिए...॥
१६१ पणतीसइमो पयाविसुद्धीअज्झाओ णिस्सरिते णिपतिते णिप्फाडिते 'णिड्डीले णिजिते णिव्यामिते गिराकते णिराणते चेति एवंविधसहरूवपादुभावे णत्थि पय त्ति वूया । तत्थ पम्हुढे पैमुक्के पन्भटे पकिण्णे पैविसिते पमुच्छिते पलोलिते परावत्ते परिसडिते परिसोहिते पंडिसिद्धे पप्फोडिते पडिणायिते पैडिहरिते पडिदिन्ने पडिछुद्धे पडिते परिवद्धिते पडिलोलिते पडिसरिते पंडिओधुते एवंविधसद्दरूवपादुभावे णत्थि पय त्ति बूया । तत्थ अपमढे अपलोलिते अपसारिते अपणासिते अपकड्डिते अपणते अपछुद्धे अँपहिते अप्फिटिते चेति एवंविधसहरूवपादुब्भावे णस्थि पय त्ति बूया । तत्थ ओलोकिते ओसरिते ओमथिते । ओणोमिते ओवट्टिते ओलोलिते ओड्डिते ओवत्ते ओणते ओछुद्धे ओतारिए ओमुक्के मल्ले या भूसणे वा अच्छादणे वा एवंविधसहरूबपादुद्भावे णत्थि पय त्ति घूया । तत्थ आयरणे असंत-पत्थिसद्दपादुद्भावे णत्थि पय त्ति बूया । तत्य वंझा-संढक-अणवच्च-पासंडगते संदसणे य णत्थि पय त्ति बूया । तत्थ णवणीत-तेल्ल-घत-दधि-गोरसदसणे यच्छक-पुत्तक- पिल्लक-वप्पक-सिंगक-खुड्डक-बालक-साडक-मोहणक-अंकुर-परोह-पुप्फ-फल-पादप-पवाल-हरिताल-हिंगुलुक-मणसिल-सब्ब- समालभणकगते बालकपरिणदिते जं किंचि वालसमाचारं या एताणि पेक्खमाणो वा भासमाणो वा आमसंतो वा एतेसिंवा 10 वाहिरे सहरूवपाउभावे पयं या पयालाभं या पयासामग्गी वा उदरं वा पुत्तलाभं वा इमं से भविस्सतीति धूया। एतेसामेव "अंतरोरुकरणे अप्पणो गम्भो त्ति बूया। एताणि चेव तिलेमाणो पुच्छेज ससल्ला गम्भिणी मरिरसति त्ति बूया । एताणि चैव अक्कमंती पुच्छेज पैया से विणस्सिस्सति त्ति बूया । एताणि चेव पतिगिण्हती पुच्छेज पैया से भविस्सति त्ति तं बूया। एताणि चेव पणामयंती [पुच्छेन] पया ते परिहायिस्सति त्ति णं बूया । एताणि चेव उपकडूंती पुच्छेज व पैया से भविसति त्ति णं बूया । एताणि चेव अपकड्ढिती पुच्छेज पया से ण भविरसति त्ति णं बूया । एताणि चेव उपकड्डित्ता अपकढुंती 15 पुच्छेज पया ते भवित्ता ण भविस्सति त्ति बूया । एताणि चेव अपकड्डित्ता उपकड्ढेिती पुच्छेज पया ते ण भवित्ता ण भविस्सति त्ति बूया । एताणि चेव छिंदंती वा गिक्खणंती वा फालेंती या विवाडेती वा पुच्छेज पया ते विणस्सि- रसति त्ति यूया । एतेसामेव आदिमूलगहणेसु उयजिव्वा ते पया भविस्सति त्ति चूया । एतेसामेव मज्झगणेसु जुत्तोपचया ते [पया ] भविस्सति त्ति बूया । एतेसामेव अंतगहणे गिरोपजिव्या ते पया भविस्सति त्ति धूया । तत्थ पयायं पुव्याधारितायं वावण्णा अवावण्ण त्ति आधारयितव्यं भवतीति । तत्थ यावण्णामासे अप्पसत्था- 20 मासे दीणामासे वापण्णे वा पुप्फे वा फले वा पाणे या भोयणे वा सव्यवापण्णेसु घा वापण्णे त्ति यूया । अवावण्णामासे अणुपद्दुतामासे सुगंधामासे पसण्णामासे मुदितामासे अव्यापण्णे पुप्फे फले वा पाणे वा भोयणे या भायणे वा सव्वअव्यापण्णेसु य अव्वापण्ण त्ति बूया। तत्थ पयायं पुव्याधारितायं विकतं अविकतं पजायिरसति त्ति पुणो आधारयितव्यं भवति। तत्थ उज्जुकामासे उज्जुभायगते उजुउल्लोयिते य सव्वमणुरसजोणीपादुब्भावे य सव्यमणु- स्सजोणीणामधेजोदीरणे यसव्वमणुस्सरूपागितिपादुभावे य सव्वमणुस्सरूपागितिणामधेजोदीरणे सव्वमणुरससरीरोपकर- 25 णणामधेजोदीरणे सव्वमणुस्सगते सचमणुस्सवेसँगते सव्वमणुस्सकम्मोवारगते सव्वमणुस्सोपलद्धीयं च अविगतं वूया । तत्थ तिरियामासे तिरियगते तिरियविलोकिते सव्वतिरियजोणिपादुभावे सव्यतिरियजोणीणामधेजोदीरणे सध्यतिरियजोणी- उपकरणे तिरिक्सरुपागितिपादुद्भावे तिरिक्खरूपागितिणामधेजोदीरणे तिरिक्सजोणीमये उवकरणे णामधेजोदीरणे सन्य- तिरिक्सजोणिगते विगतं वूया । तत्थ पैयातं पुबमाधारियायं कण्णा कुमारो त्ति आधारयितव्यं भवति। तत्य अभंतरामासे दक्सिणामासे पुण्यामधेजामासे पुण्णामे पुप्फे [वा] फले या पाणे या भोयणे वा सव्वकुमारोपलद्धीयं च कुमारं 30 यूया । तत्य वज्झामासे यामामासे थीणामधेजामासे "श्रीणामे - पुप्फे वा फले या भायणे वा भोयणे वा उप- १ णिड्डीणा णिकु है. त• विना ॥ २ पम्हुके सप्र० ॥ ३ पसविते १० त० ॥ ४ परिसिट्टे हं. त० ॥ ५ परिहरिते है. त० ॥ ६ परिवट्टिते हं० त० ॥ ७ पडिभुए एवं ई० त० ॥ ८ अपट्टिते हैत० ॥ ९ उपणामिते सि० ॥ १० उकट्टिते हं. त०॥ ११ अहरोरु ६० त०॥ १२ पया ते वि० ० त०॥ १३ पया ते भ ई. त॥ १४.1 एतचित्रान्तर्गतः १५ आहारयियध्वं ह. त•॥ १६ आहारयियन्वं हं. त० ॥ १७ वेस्सगते ह. त. विना ।। १८पयायं हं. त•॥ १९ आहारयियव्यं है. त.॥ २०40 एतचिहान्तर्गतं पदं ई० त० नास्ति । पाठ: ह.त. नास्ति ।। अंग०२२ अंगविज्ञापइण्णय करणे या सव्यइत्यीउपलद्धीयं च कणं यूया । तत्य पजायं घुव्यमाधारितायं एक दुवे पजाइस्सति त्ति आधारयितव्यं भवति । तत्थ एककेसु गत्तेसु पकाभैरणे एकोपकरणे एकचारिमु सत्तेमु सयएफमाधारणगते य एवं पजातिस्मति त्ति धूया । तत्थ विएमु गत्तेसु य मल्लाभरणके य मेलोपकरणे मिधुणचरेसु सत्तेमु सव्यत्रिसाहागते य दुवे पजातिस्सति ति बूया । तत्थ यहवेमु गत्तेसु वहूपकरणके वहूकोपकरणके संघचारिसु सत्तेसु सव्यवहुसाहागते य वहयो पजाति- । स्सति त्ति वूया । त सत्य कण्हामासे कण्ट्यण्णपतिरूवगते य सव्वणिप्पभावगते य उल्लोकिते य कालो पजातिस्मति त्ति धूया । तत्थ मुकामा से सुकवण्णपहिस्वगते य सव्यसप्पमा[व]गते य उलोकिते दक्सिणामासे पुण्णामधेजामासे सब्यदिवाचारिसु सत्तेसु सव्यदिवसोपलद्धीयं च दिया पजातिस्सति त्ति चूया । तत्थ कण्हामासे कण्यण्णपहिस्वगते य सव्वणिप्पभावे ओलोकिते घामामासे थीणामधेनामासे सव्यरत्तीचारिसु सत्तेसु सत्यरत्तीउपलद्धीयं च रत्तिं पजातिरसति त्ति घूया । सुक्काणि आमसित्ता सुक्काणि आमसती पुणो जोण्हे दिया पजायिरसति ति चूया । कण्हाणि आमसित्ता 10 कण्हाणि आमसती पुणो काले रत्ति पजातिरसति ति यूया ।। ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पयाविसुद्धी पामग्झायो पंचतीसतिमो सम्मचो ॥ ३५ ॥ छ ।। [छत्तीसइमो दोहलज्झाओ] अघापुव्यं सलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय दोहलो णामाऽज्झायो । तं जधा-अत्यि दोहलो 16 णत्थि दोहलो ति पुव्यमांधारयितव्यं भवति । तत्य अध्मंतरामासे दढामासे णिद्धामासे मुद्धामासे पुण्णामासे पुण्णामधेजामासे सव्याहारगते य अत्यि दोहलो ति बूया । तत्य उहोकिते डेस्सिते उच्चारिते टण्णामिते उत्यिते उपसारिते उपणामिते उपविढे उपलोलिते उपयत्ते उपणते उपणद्वे टपलद्धे उपसरिते उपविढे एवंविधसह-रूयपाउम्भावे अत्यि दोहलो त्ति यूया । तत्य माता-पितु-भगिणि- संबंधिजणसमागमे समाणिते साविजिते पहिच्छिते अभिणंदिते अभिसंथुते उपदासिते चुंविते अच्छाइते पागुते 20 परिहिते अणुलित्ते अलंकिते एवंविधसद्द-रूवपादुन्मावे रस-मांध-फासपादुव्भावे अस्थि दोहलो त्ति धूया । तत्य उपढे अप्फोहिते पच्छेलिते पवायिते सेसागहणे बलिहरणगते एवंविधसह-रूवपादुमावे अत्यि दोहलो त्ति यूया । तत्य णव- पुण्ण-पसत्थ-पहट्ट-परप-पश्चदग्गे पुप्फे वा फले वा पत्ते वा पयाले या मल्ले या भूसणे या आसगे या सयणे वा विसयणे या जाणे या वाणे वा मायणे या उपकरणे वा घण्णे या धणे या पाणे या भोयणे वा उपणामिते पडिच्छिते एवंविधसद्द-रूवपादुन्मावे अत्यि दोहलो त्ति या यूया । तत्थ उपलद्धे अत्यिसद्दपादुम्भावे अस्थि दोहलो त्ति घूया । 25 तत्य धाती-कुमार-दारक-यहु-अपच्चसद्द-स्थपादुन्भावे अस्थि दोहलो त्ति धूया । वत्य णवणीत-दुद्ध-घत-परिसप्पक-अटक- सप्पा-वच्छक बालक-साडक-बालक-मोहणके घालाभरके अंकुर-परोह-बाल-पुप्फ फलपादुम्भावे परामासे या हरिताल. हिंगुलुक-मणोसिला-हाण-समालमणकगते वाटकपरिवंदितके ये किंचि वालं पालचारं वा एताणि आमसंतो या का पेक्समाणो या भासमाणो या एतेसिं या वाहिरे आमाससह-रुवपादुम्भावे अयि दोहलो त्ति चूया । तत्य वम्झामासे घटामासे लुक्सामासे कण्हामासे तुच्छामासे दीणामासे णपुंसकामासे सव्यणीहारगते य 50 पत्यि दोहलो त्ति धूया । तत्य कासितेण खुधितेण संमितेण रदितेण परिदेवितेण भग्गे छिण्णे मिण्णे विणासिते १ पुष्यं धारियायं ० तु.॥ २ आहारयियध्यं है. त.॥ ३°भरणके हं. त.. ४मलाम' ह. त•विना ॥ ५मलोप है. तु. विना ॥ ६ पक्खकोप' ह. त०॥ ७१ एतचिहान्तर्गतः पाठः हं. त• नाति ॥ ८ सव्वदीवचा है. त•॥९नामाज्यामओह. त• ॥१० नामऽज्या है. त•॥ ११ आहारयियव्य है. त.॥ ११ उस्ससिते है. त•॥ १३ उपयेप..
छत्तीसइमो दोहलज्झायो १७१ विपाडिते विक्खिन्ने विच्छुद्धे विच्छिन्ने विणढे वंते सिंवितालिते रूयकडे पूँसिते विझविते एवंविधसद्द-रूवपादुम्भावे णत्यि दोहलो त्ति घूया । तत्थ णिम्मजिते निल्लक्खिते णिस्सारिते णिव्यट्टिते णिलुलिते णिकट्टिते गिद्धाडिते णिस्साविते णिप्फाविते जिच्छोलिते णिक्खण्णे णिन्धिढे णिच्छुद्धे विच्छुद्धे णिस्सिते णिल्लुविते णिवोहिते णित्यणिते णिस्ससिते णिसिंघिते णिहुते णित्थुद्धे णिरसरिते णिफेडिते णिद्दीणे पिण्णीते णिजिते णिव्यासिते णीरकए गिराणंदे एवंविधसद्द-रूवपादुव्भावे णस्थि दोहलो त्ति घूया । तत्थ पैमुढे पम्हुते पकिण्णे पन्भटे पसंखित्ते पमुच्छिते पलोलिते । परावत्ते परिसाडिते पडिसिद्धे पैप्फढिते पडिगामिते पंडिहारिते पडिदिण्णे पडिबुद्धे पडिते पडिमुंडिते पडिलोलिते पडि- सरिते पंडिछुद्धे एवंविधसद्द-रूवपादुभावे णस्थि दोहलो त्ति चूया । तत्थ अपमट्टे अपलिखिते अपसारिते अपणा- मिते अपट्टिते अपलोलिते अपवत्ते अपणते अपहिते अपविढे अपछुद्वे आपडिते एवंविधसद्द-रूवपादुभावे णस्थि दोलो त्ति बूया । तत्थ ओलोकिते ओसारिते ओमत्थिते ओणामिते ओवट्टिते ओलोकिते ओकहिते ओयत्ते ओणते उग्गहिते उच्छुद्धे ओतारिते ओतिण्णे उक्खित्ते ओमुक्के मल्ले वा भूसणे वा अच्छादणे वा एवंविधसद्द-रूवपादुन्भावे 10 पत्थि दोहलो त्ति वूया । तत्थ आयरणाणतणत्यिभूतपादुभावे णत्थि दोहलो त्ति बूया । तत्य यंझा-पंडक-अण- पञ्चसद्द-रूवपादुन्भावे णस्थि दोहलो त्ति वूया | तत्थ परिजुण्णे परिसुक्के या परिखडे वा वापण्णे वा पुप्फे या फले वा भूसणे या अच्छादणे वा आसणे वा सयणे वा जाणे या वाहणे वा उपकरणे वा रयणगते या धण्णे या धणे वा पाणे वा भोयणे या सव्ययापण्णेसु वा वापण्णं दोहलं वूया । तत्थ दोहले पुबमाधारिते दोहलकं पंचविधमाधारये । तं जधा-सद्दगतो गंधगतो रूवगतो रसगतो फासगतो 15 चेति । तत्थ सद्देयेसु सव्यसद्दपडिरूवगते य सद्देयो दोहलो विण्णेयो । तत्थ गंधेयेसु सव्यगंधपडिरूबगते य गंधेयो दोहलो विष्णेयो । तत्थ समरूवगते सव्वदसणीयगते य रूपगतो दोहलो विण्णेयो । तत्य र संव्यफासगते » सब- फासपडिरूवगते य फासगतो दोहलो विण्णेयो । तत्थ सब्बरसगते सव्यरसपडिख्यगते य रसगतो दोहलो विण्णेयो । तत्य रूपगते दोहले पुव्यमाधारिते रूवगतो दोहलो मणुस्सगतो चतुप्पदगतो पक्खिगतो परिसप्पगतो कीडकिविल्ल- गतो पुप्फगतो विद्धिगतोणदीगतो समुद्दगतो तलागगतो वापिगतो पुक्खरणिगतो अरण्णगतो भूमीगतो णगरगतो संधावारगतो 20 जुद्धगतो किड्डागतो । तत्थ मणुस्सजोणीपडिरूवगते मणुस्सजोणि बूया । सव्यपक्खिाडिरूवगते पक्सिजोगी] विष्णेया। चतुष्पदजोगीपडिरूवगते य चतुप्पदजोणी विण्णेया । सव्यपरिसप्पपडिरूवगते सव्यपरिसप्पजोगी विण्णेया । अंतोडहर- चलेसु कीड-किमिगते य कीड-क्रिविल्लगगतो विण्णेयो । मुदितेसु सव्वपुप्फगते य पुष्फगतो विण्णेयो । पुण्णेसु सन्य- फलगते य फलगतो विण्णेयो । दीहेसु गिद्धेसु य णदीगतो विण्णेयो । गिद्धेसु परिमंडलेसु महापकासेसु समुद्दगतो विण्णेयो । गिद्धेसु सण्णिरुद्धेसु तलागगतो विण्णेयो । गिद्धेसु वित्यिण्णेसु महासरगतो विष्णेयो । दढेसु पुधमु य 25 पुढवीगतो विष्णेयो । ददेमु उद्धंभागेसु य महापोहेसु य पव्यतगतो विण्णेयो । गणेसु रणगतो विष्णेयो । उपग्गहणेसु आरामगवो विण्णेयो । चतुरस्सेसु संरुद्धेमु परिमंडलेसु संसतेसु णगरगतो विण्णेयो । विमुत्तेसु महायकासेमु पुधूमु य देवगतो विष्णेयो । सव्यसत्यअन्मुनोगगते संरुद्धेमु य संघावारगतो विण्णेयो । संजोगगते सव्यकिदागते य किडागतो विण्णेयो । तिरिक्सेसु आकोहिते य संगामगतो विष्णेयो । इति स्वगतो दोहलो। तत्थ सद्दगते दोहले पुन्याधारिते सद्दगतो दोहलो, २ जधा-मणुरससद्दगतो पक्सिमद्दगतो पतुप्पदमदगतो 30 परिसप्पसदगतो दिव्यपोसगतो व यादित्तपोसगतो- आभरणपोसगतो । तत्य मणुम्सजोणीगते मणुस्मजोणीपहिरूयगते य मणुरसजोगी विष्णेय । सधपक्सिपडिस्वगते पक्सिगनो विण्णेयो । समचतुष्पदलोणीपटिश्यगते चतुपदाणीगतो १सिरिताते हैं. त• विना ॥ २ पूमिए है• त•॥ ३ पम्हढे १० त• बिना ॥ ४ पुष्ाहिते . त•॥ ५परि- हरिते परिदिपणे है. उ• ॥ ६ पहियुद्धे ह. त• विना। ७ अपयुद्धे है. त• विना ॥ ८ मोलुदे. • ९ मत है. स. पिना ॥ १०॥ एतचिहान्तर्गतः पाठ • • नाति ॥ ११°गादेमु. त• ॥ १२ एतविशन्तर्गनः पाठा है.त. नाति॥
૬૭૨ अंगविजापइण्णय विष्णेयो । [सव्वपरिसप्पजोगीपडिरूवंगते परिसप्पजोणीगतो विण्णेयो ।] सव्वसंखडगते धादित्तगतो विष्णेयो । सव्वसामेसु आभरणघोसगतो विण्णेयो । दिव्येसु उत्तमेसु दिव्वघोसगतो दोहलो विण्णेयो । इति सद्दगतो । तत्थ गंधगते दोहले पुज्यमाधारिते गंधगतो दोहलो । तं जधा-हाणगतो अणुलेवणगतो अधिवासगतो पघंसगतो धूपगतो मल्लगतो पुप्फगतो फलगतो पत्तगतो आहारगतो चेति । उत्तमेसु पहाणगतो विष्णेयो । समभागेसु अणुलेवणगतो ॐ विष्णेयो । अग्गेयेसु धूवगतो विष्णेयो पघंसगतो चुण्णगतो। तणूसु सव्वत्थगते य अधिवासगतो विण्णेयो । पुण्णेसु सवपुप्फ-फलगते य [पुप्फ-Jफलगतो विष्णेयो । । ईति गंधगओ । सत्य रसगए दोहले पुत्वमाधारिते - रसगतो दोहलो। तं जधा-पाणगतो भोयणगतो सजगतो लेझगतो चेति । तत्थ गिद्धेसु सव्यपाणगते य पाणगतो दोहलो विष्णेयो । सव्यभोयणगते सरभोयण-भायणगते य भोयणगतो दोहलो विण्णेयो। सव्यडहरचलेसु सव्वभक्खगते य सव्वभक्ख-भोयणगते य भक्खगतो दोहलो विण्णेयो। इति आहार- 10 गतो दोहलो विष्णेयो। तत्थ फासगते दोहले पुव्वमाधारिते फासगतो। तं जधा-आसणगतो सयणगतो पाहणमतो गहगतो वत्थगतो आभरणगतो विष्णेयो। सव्वसयणपडिरूवगते सयणगतो विण्णेयो। तत्थ सव्वआसणगते सव्य ऑसण पडि- रूवगते य आसणगतो विष्णेयो । चलामासेसु सव्यजाण-वाहणपडिरूवगते य जाण-वाहणगतो विष्णेयो । तत्थ दढेसु सजगहगते य गहगतो दोहलो विण्णेयो । तत्थ तणूसु सव्ववत्यगते य सव्ववत्थपडिरूघगते य वत्थगतो दोहलो 16 विण्णेयो। सामेसु सव्वआभरणगते सव्वआभरणपढिरूवगते य आभरणगतो दोहलो विण्णेयो। इति फासगतो दोहलो । तत्य दोहले पुव्यमाधारिते कता पत्तो दोहलो विण्णेयो भवति ?। तत्थ पसन्नेसु सव्वसरदपडिरूवगते य सरदे वत्तो दोहलो त्ति विण्णेयो । तत्थ कण्हेसु रुक्खसाधारणेसु सव्वगिम्हपडिरूवगते य गिम्हे वत्तं दोहलं ति बूया । तत्थ णिरुद्धेसु थालेसु य पाउसे यत्तो दोहलो त्ति बूया । तत्थ गिद्धेसु यासारतपडिरूवगते य वासारत्ते पत्तो दोहलो त्ति बूया । संवुतेसु सव्वहेमंतपडिरूवगते य हेमंते वत्तो दोहलो त्ति बूया । तत्थ सामेसु मुदितेसु सव्यवसंतपडिरूवगते य 20 वसंते यत्तो दोहलो त्ति बूया । तत्य सुकेसु सव्यसुकपडिरूवगते य सुक्कपक्खे क्त्तो दोहलो त्ति बूया । तत्थ कण्हेसु सव्यकण्हपडिरूवगते य कालपक्खे वत्तो दोहलो त्ति बूया । सामेसु पक्खसंधिसु वत्तो दोहलो त्ति बूया । अतिमुल्ली- येसु अभंतरपंचमी वत्तो दोहलो त्ति बूया । मझिमविगाढेसु परं पंचमि वत्तो दोहलो त्ति घूया । अभंतरेसु अभं- तरं दसमीय दोहलो पत्तो त्ति धूया । अन्भंतरभंतरेसु परं दसमीतो वत्तो दोहलो त्ति बूया । सुकेसु अतिमुल्लेयेसु पायरासे थत्तो दोदलो त्ति यूया । कण्हेयेसु अतिमूलेयेसु पदोसे वत्तो दोहलो ति बूया । सुकेसु मन्झिमविगाढेसु 25 मज्झंतिके वत्तो दोहलो त्ति बूया । कण्हेसु मज्झिमविगाढेसु अड्डरत्ते वत्तो दोहलो त्ति धूया । सुकेसु अतेसु अपरण्हे यत्तो दोहलो ति यूया । कण्हेसु अंतेसु पदोसे यत्तो दोहलो ति यूया । पच्छिमेसु गत्तेसु अतियत्तेसु य सद्देसु अतियत्तं बूया । पुरथिमेसु गत्तेसु अणागतेसु य सद्देसु अणागतं घूया । घामक्खिणेसु गत्तेसु वत्तमाणेसु य सहरू- वेसु संपतं यत्तमाणं दोहलं बूया ।। ॥ इति महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय दोहलो णामाग्झायो छत्तीसतिमो सम्मत्तो ॥ ३६ ॥ छ॥ सप्पड .त.॥ २ दिन्मिएम है. त•॥ ३ धूमपगतो सप्र.॥ ४'गतो दोहलो विष्णेयो है. स. चिना ॥ ५सव्यपण्णफल°•॥ ६ हस्तचिहान्तर्गत. पाठ है. त• एव वर्तते ॥ ७१ एतचिहान्तर्गत पर्द • त• नास्ति ।। ८"रतेमु परिरुयते य यासरते है. त• विना ॥ ९ वित्तो है. ह.॥ १० कण्हेमु ई. त• ॥
सत्ततीसइमो लक्खणज्झाओ [सत्ततीसइमो लक्खणज्झाओ] 10 बण्ण- अधापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय लक्षणो णामाज्झायो। तं जधा-तत्य अभंतरामासे दुढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे पसत्यलक्खणं ति यूया। तत्थ वज्झामासे चलामासेछ लुक्खामासे खाणपुं- सकामासे असुमं लक्खणं ति घूया । । तत्थ पुव्यं सुभाणि आमसित्ता पच्छा असुभाणि आमसति सुभाणि पुरिम- खेत्ताणि असुभाणि पच्छिमाणि त्ति घूया । - तत्थ पुव्वं असुभाणि आमसित्ता पच्छा सुभाणि आमसति असुभाणि । पुरिमखेत्ताणि पच्छिमाणि सुभाणि त्ति बूया । तत्थ लक्खणं वारसविधं । तं जधा-यण्णो १ सरो २ गति ३ संठाणं ४ संघतणं ५ माणं ६ उम्माणं ७ सत्तं ८ आणुकं ९ पगति १० छाया ११ सारो १२ वेति । तत्थ वण्णसंपण्णे अंजण-हरिताल-मणसिला-हिंगुलुक रयत-कंचण-पवाल-संख- मणि-वइर-सुत्तिका-ऽगलु-चंदण-सयणा-ऽऽसण-जाणेसप्पभागते वण्णसंपण्णं बूया । तत्थ चंदा-ऽऽदिच-णक्वत्त-गह- तारारूप-उन-विजुता-मेघ-जलण-सलिल-इंदीवर-इंदगोपक-अद्दारिट्ठक-पिअंगु-पियदसणे वण्णसंपण्णं घूया । तत्थ पुष्फ फल-पवाल-पत्त-घत-मंड-तेलवर-सुर-पसण्ण-पदुमुप्पल-पुंडरीक-कोरेंटदाम-चंपक-परग्घमल्लाभरणविविधसमाउत्ते संपण्णं यूया। तत्थ यण्णसंपण्णे थी-पुरिसे वा चतुष्पदे या परिसप्पे वा पक्खिम्मि वा पियरिसणे यण्णसंपण्णं घूया। सव्यवण्णगते पाणजोणीयं या धातुजोणीयं वा मूलजोणीयं वा वण्णसंपण्णं घूया। तत्थ सव्ययण्णगते अप्पियदसणे अबुद्धवण्णरागे अवण्णसंपण्णं चूया १ । तत्थ सरसंपन्ने हिरन-मेघ-दुंदुभि-वसभ-गय-सीह-सद्दूल-भमर-रधणेमिघोस-सारस-कोकिल-उकोस-कोंच-र्चकाक- 15 हंस-कुरर-वरिहिण-तंतीसर-गीत-वाइत-तलतालघोस-उछुट्ट-छेलित-फोडित-खिंखिणिमहुरघोसपादुन्भावे सरसंपण्णं यूया । तत्थ थी-पुरिस-चतुप्पदे या परिसप्पे या पक्खिम्मि वा सरसंपन्ने सरसंपन्नं घूया । तत्य अमहुरकडुकमणितेसु एवंविधपादुभावे असरसंपण्णं चूया । २ तत्य सीह-यग्ध-उसभ-गय-मजार-यरिहिण-सुक-चक्कयाक-हंस-भासय-बलाक-याल-दडुरसव्वगतिसंपन्ने थी-पुरिसे या चतुप्पदे या परिसप्पे वा पक्खिम्मि या गतिसंपण्णं यूया । तत्य सव्यम्मि अगतिसंपन्नं वूया ३ । तत्थ दृढामासे सव्वधातुगते सव्वसंघातसंपन्ने वा थी-पुरिसे या चतुष्पदे या परिसप्पे वा पक्सिम्मि वा संपातसंपन्नं घूया । तत्य चलामासे अप्पसारेसु असंघातोपगते असंघातसंपन्नं यूया ४ । तत्य सव्वअविभत्तगते संठाणोपगतेसु य पियरूवेसु संठाणसंपण्णं चूया। दुविभत्तसंठाणोपगतेसु संठाणहीणं चूया ५ । तत्य जुत्तप्पमाणे सव्यमाणगते सव्यपासंडगते य माणसंपन्नं धूया। तत्थ अयुत्तप्पमाणेसु अपमाणसंपणं यूया ६ । तत्थ अभंतरामासे सव्यगारवोपगते सव्वमहासारेसु य सव्यपरम्पेमु य उम्माणसंपणं यूया । तत्य पन्झामासे 25 सव्वअसारेसु य सव्वअसारोपपेतेसु सव्यअप्पग्घेसु सव्य र ईम्माणदीणे य » उम्माणहीणं यूया ७ । तत्य उत्तमेसु सव्वउत्तमगत्तेसु सन्चमहाभोगगते थी-पुरिस-चतुष्पद-पक्सिपरिसप्पगते य सूर-यवसायि-महापर- फमगते य सत्तसंपन्नं घूया । तस्य पचयरकायेसु सव्यणिप्पभागते य थी-पुरिस-चतुप्पद-परिसप्प-पक्सिम्मि या अन्य- घसिते परपमहीणे य सत्तहीणं चूया ८ । 20 १नामऽज्झा है. त•॥ २ हम्नचिहान्तर्गतं पदं है. त• एव दवे ॥ ३ एतविद्वान्तर्गतः पाठः ९. त• नासि ॥ ४संघयणं . त• ॥ ५ णतप्प . त• ॥ ६°चमवाय-हंस' है. त•॥ ७°मासपयाला • • बिना ॥ ८1 एतपिहान्तर्गतः पाठः है। त• नास्ति ।
१७४ अंगविजापइण्णय सत्य आणूकं—आणूकलद्धी तिविधा आधारेतव्या भवति, वं जघा-दिव्या १ माणुसा २ तिरिक्खगता ३ चेति। तत्य देयाणूकाणि दिव्योपलद्धीयं उबलद्धव्याणि भयंति ! तत्थ देवाणूके पुव्याधारिते देवाणूकविधि दिव्या असुरा गंधव्या जक्सा रक्ससा णागा किन्नरा गरुला महोरगा एवमादयो सकाहि उवलद्धीहिं उवलद्धव्या भवति । तत्य माणुसाणूक गस्थि विधि २। तिरिक्सजोणीकाणूके पुव्याधारित तिविधमाधारये, तं जधा-पक्खी परिसप्पा चतुष्पदा चेति । ताणि सकाहि उपलद्धीहि उवलभितव्याणि भवंति उत्तमा-ऽधम-मझिमाणि ३।९। तत्य चंदा-ऽऽदिञ्च-नक्सत्त-गह-सारारूव-अग्गि-विजूसव्वपाणगते य छायासंपन्नं धूया । सव्वणिप्पभागते सपअच्छायागते य छायाहीणं चूया १० । तत्य अन्मंतरामासे दढामासे मधुरेसु गिद्धेसु सुकेसु उद्धं जत्तगते सेम्हपडिस्वगते य सेम्हपगति बूया । तत्थ यज्झामासे कडुकेसु कसायेसु सव्वअधोभागगते य वातप्पगति घूया । तत्थ उण्हेसु तिखेसु पीतकेसु अंवेसु वा 10 यापण्णेसु या सव्वसमाभागेसु पित्तप्पगति बूया । तत्थ याते पित्ते सेंभे या मिस्सपगतिं वूया ११ । तत्थ सारवंतपडिलवे सव्यसारयतेसु य सारवंतं वूया । तत्य सव्वअसारयतेसु असारवंतं धूया १२ । तत्य घण्णसंपन्नस्स फलं पहाणा-ऽणुलेवणभागी मल्लालंकारभागी सुभगो सुहभागी भवति, यण्णहीणे तेर्सि विपत्ति । सरसंपणे इस्सरियं इस्सरियसमाणं कित्ति-जससंपण्णं च गहियवक विजाभागी य सरसंपण्णे भवति, सरहीणे एतेसि विवत्ति । गतिसंपण्णे महाजणपरियारो गणपकडको महापक्खजणसमित्तो य भवति, अगतिसंपण्णे तेसिं विवत्ति । 15 संठाणसंपण्णे धक्खुरमणतं महाजणपियत्तणं च छायामणोरघसंपत्ती संठाणे भवंति, असंठाणजुत्ते तेसि वियत्ति । संघातसंपण्णे आउसमत्यो घलविरियसमत्यो भवति, असंघातसंपण्णे एसि वियत्ति । माणसंपन्ने माणरिहो माणणीओ य मरति, माणही तेसिं विवत्ति । उम्मरणसंपण्णे आयुगारवं साधीणं एत ब्लेव य विपुलतरं फलं भवति, उम्मापाहीगे तेसिं विपत्ति । सत्तसंपण्णे सूरो यवसायी, सत्तहीणे मीरू अव्यवसिते य । आणूके जवाणूकं फलं । छायासंपण्णे- सुरभोगं यूया, छायाहीणे तेसिं विपत्ति । पगतीसु । जैधापगतं घूया । - सारवंते सारवंतं वूया, असारयतेसु - 20 असारयंतं धूया ॥ ।। इति महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय लक्षणो णामान्झायो सत्ततीसतिमो सम्मत्तो ।। ३७॥ छ । [ अहतीसइमो वंजणज्झाओ] - अधापुष्यं सलु भो ! महापुरिसदिनाय अंगविनाय बंजणो णामाग्झायो । तं जधा-तत्य दरिसगतो पुरिसरस पमन्यं, यामनो इत्यीय । तत्य दपिसगेमु परसेमु दक्सिणगते पंजणं ति यूया, पामेसु गत्तेमु यामपस्से पंजणं ति यूया : पुरिमेमु गतेमु पुरिमे यंजणं ति यूया, पन्छिमेसु गत्तेमु पच्छिमे पस्से पंजगं ति यूया । उभागेसु उद्धं यंजणं ति यूया, अधोमागेमु अधो पंजणं ति यूगा । पुण्णामेमु पुण्याम पंजगं नि पूया, थीगामेमु धीगामं यंजणं ति यूया । दढामासे दहेगु गतेगु पंजणं ति पूपा । पटामासे घलेमु गत्तेमु पंजणं यूया । गिद्धामासे गिदेमु गतेसु पंजगं ति पूया । गुरगामासे नुक्रोमु गतेमु पंजग लि पूपा । मध्यमत्यागनेमु सत्याभिनं पंजणं ति पूया । मव्यमूलगते फहाभिहतं पंतति यूया । मय्यभायुग्ने पामाणलेटुनगराभिनं पंजणं ति पूया । अभिने अभिपानं यूया, हिमेसु सितं गुण, पगेगु पर्ग पूया, इलेमु पिला यूया, सत्यधानुगते पुगिगदं यूया, मूलधातुम्ने पुगिगई फलातं पूया, पण्डेगु शिमा पम्मी पा पूपा, उसंगीपाय रमलामाय, पाइम सध्याधिकरणलामाय, परे रायपरिमलंभाय, अक्सिमु परिप्यापिपि या मसुरारत.॥ २00 एपिान्तर्गतः पाठः १. स. माशि एगूणचत्तालीसहमो कण्णावासणज्झाओ १७५ णायकलंभाय, थणंतरे धणलंभाय, सामेसु आभरणलंभाय, वझेसु जंघासु वा पवासाय, चलेसु जागलंभाय, थीणामेसु थीलंभाय, पुण्यामेसु मणुस्सलंभाय, अंगुट्ठ-कणेट्ठिकार्य थण-हितय-कुक्खि-पोरिससमामासे सव्यवझेसु य अपञ्चलभाय यूया । बंधेसु बंधं वूया, मोक्खेसु मोक्खं चूया, तणूसु वत्थलाभ बूया, अणूसु धण्णलाभ घूया, वित्यिण्णेसु भूमीलाभ वूया, ओढे सुलभाय, अण्णेसु रोगं घूया, महंतेसु रण्णं वूया, महापरिग्गहेसु महापरिग्गहं, अपरिगहेसु अपरिग्गई, पसंतेसु पमोदं, अप्पसण्णेसु विवादं, मतेसु मरणं, आहारेसु आहार, सिवेसु आरोग, मुदितेसु हासं, दीणेसैं सोकं, 5 सामेसु मेधुणसंजोगं ॥ ॥ इति महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय वंजणऽज्झायोऽहतीसतिमो सम्मत्तो ॥ ३८॥ छ । [एगूणचत्तालीसइमो कण्णावासणज्झाओ] , - अधापुव्वं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय कण्णावासगो गामान्झायो। तं जघा-तत्य कण्णा पिजि- स्सति ण विजिसति त्ति पुश्वमाधारयितव्यं भवति । तत्थ वज्झामासे चलामासे णीहारेसु मुइतसाधारणेसु कण्णा 10 विजिस्सति ति यूया। तत्थ धणु-चाप-सर-पायरणक-आभरण-मल्ल-तलिए वाधुजभंड-घरवास-पकरणे आलिंगिते चुंविते पहाणा-ऽणुलेवणे विसेसकिपेस्समाणयणे य मलाभरणे य मिधुणचरेसु सत्तेसु पक्खी-चतुप्पदेसु कीड-किविल्लगेसु मिधुणसंपयुत्तेसु कण्णा विजिरसति त्ति यूया । तत्थ पुण्णामधेजामासे पुण्णे व चले गिद्धे दक्खिणे य कन्ना विजिस्सति त्ति बूया । तत्थ आहारेसु अभंतरामासे दढामासे दीणेसु दीणसाधारणेसु वा कण्णा विजिस्सति त्ति घूया । तत्थ लुक्खेसु सुक्खेसु तुच्छेसु कण्णा ण विजिस्सति त्ति यूया । तत्य विजिस्सति त्ति पुव्याधारिते पुण्णामेसु 18 रायपुरिसस्स या सूररस वा उत्तमरस वा विजिरसति त्ति घूया । णपुंसकेसु किलिहस्स विजिस्सते, से य किलिहे खिप्पं मरिस्सतीति बूया । थीणामेसु ण ताय विजिस्सवि, जता य विजिस्सति ५ संसपत्तं विजिस्सति - त्ति धूया । दढेसु बामेसु चिरा विजिस्सति जिणाती वा णिपुण्णो भविस्सति । दक्षिणेसु दक्सिणाचारवेसस्स विजिरसति त्ति धूया । पुण्णेसु बहुअण्ण-पाण-भोयणस्स विजिस्सति त्ति यूया ! तुच्छेसु अप्पण्ण-पाणं कुलं गमिस्सति त्ति चूया । मुइनेसु अधण्णमुइतं कुठं गमिस्सति ति यूया । दीणेसु अञ्चंतदीणं कुलं गमिस्सति त्ति चूया । जण्णेयेसु 20 घहुउरसयं कुलं गमिरसति त्ति घूया । सद्देयेसु विस्सुयकित्तियं कुलं गमिरसति त्ति घूया। दंसणीयेसु दरि- सणीयस्स विजिरसति त्ति यूया । गंधेयेसु णिचसुगंधस्स विजिस्सति त्ति घूया । रसेन्जेमु पभूतण्ण-पाणरस विजिस्सति त्ति यूया। फासेजेसु पभूतच्छादणा-ऽणुलेवणस्स विजिस्सति त्ति घूया । मेतेयेसु इट्ठा इट्टरस विजिस्सति त्ति बूया । उपहुतेसु घटुरोगस्स दिजिस्सति ति घूया । सामेसु रतिपयाणरस दिजिस्सति त्ति घूया । पुत्तेयेसु बहुपुत्तरस दिन्जिस्सति त्ति पूया । कन्नेयेमु बहुक्न्नागस्स दिनिस्सति त्ति यूया । घले यमलोदीरणे 25 एकपतिम्मि पतिद्वा भविरसति त्ति घूया । जतिसु अंगेसु पला यमलोदीरणा भवति ततिमु पतिमु पतिहा भविस्मति त्ति यूया । चैलजमलोदीरणे परंपरगते या पीहारोदीरणे ण कहिंचि सातिहिस्सति ति यूया, पहुजलचरा य भविस्मति त्ति यूया । असारेसु अप्पकसे पंचपव्ययं "रोजयिस्सति त्ति बूया । पुण्णामधेजे यमलोदीरणे" पति-देवरेसु संचिहिस्मति त्ति पूया । पुण्णामपेजे घलोदीरणे फण्णा दुसिस्सति ति यूया । उद्धं णामीय इस्सरियं कारयिस्मति ति यूया । अधोणामीयं उद्धं जाणं वेस्सगोचरा भविस्सति ति यूया । पाजंघे दासत्तं कारयिस्सति चि यूया । जमकींगामो-30 १पनेमु है. उ• चिना ॥ २धीनामलभाय ह. स. ॥ ३ "रिससमासे है. त• विना ॥ ४ नामऽज्यात.॥ ५-६ यिनस्सति .त.॥ ७'सरपाचणफआमरणमदतलिपयामुजमंड...॥ 24 एतविहान्ततः पाठः ६. तनासि ॥ ९स्सति जणायाचिणीपुणो • • ॥ १० कित्तीयं ई• त• ॥ ११ सुजला य मल्लोदी • त.॥ २२ जलजम ...॥ १३ पंचपयन रोज..॥ १४ राजयि. १५ दीरणे न पतिदेयरेणु संतिहस्सति है. • पिना॥
अंगविज्ञापडण्णयं दीरणे समपत्तं विनिरसति त्ति वूया । जतिथं यमकं थीगामधेनं भवति ततिमु सपत्तिमु संविहिरमति ति चूया । अधोमागेमु पेस्सजातीयरम विनिस्मति त्ति यूया । उरुभागेम थीणामेमु तुल्लनातीयस्स विजिरसति चि बूया । उद्धंभा- गेमु पुण्यामधेनेमु उत्तमतरागम्म विनिम्मति ति घूया | यंभेन्नेसु वंभगरम विनिस्मनि ति यूया । सत्तेयेमु सत्ति- थरस विजिस्सति त्ति बूया । वेस्सेनेमु वेम्मम्म विनिस्सति त्ति घूया । मुद्देनेमु मुदस्स विजिस्मति ति व्या । । मव्ययेमु महव्ययस्म, मज्झिमवयेमु मझिमययरम, जोधपत्येमु जोधणत्यरस, यालेजेसु वालस्म विजिस्मति त्ति चूया । अंतेमु विद्धिकरस्म, चलेमु कारकरम, कारकोपकरणेमु य दृढेमु याणियकरम, इम्मरिएमु इस्मरोपकरणेमु य इस्मरस्म विजिस्मति त्ति वूया ॥ ॥ इति महापुरिसदिन्नाय अंगविजाय कण्णावासणो णामाग्झायो एगूणचत्तालीसतिमो सम्मत्तो ॥३९॥छ। [चत्तालीसहमो भोयणज्झाओ] 10 णमो भगवतो अरह्तो जसयतो महापुरिसस्स महावीरवद्धमाणरस । अधापुव्वं सलु भो ! महापुरिसदिन्नाय अंगविनाय भोयंणो णामझायो । तं सलु भो ! तमणुवक्सस्मामो । तं जधा-तत्य अत्यि मोयणं णत्थि भोयगं नि पुन्यमाघारयितव्यं भवति । तत्य अन्मंतरामासे णिद्धामासे मुद्धामासे पुण्णामासे पुण्णामधेनामासे मुदितामासे दढामासे टल्लोगिते उहस्मिते माता-पितुभावणे उपहे अप्फोहिते सव्यपुण्णपादुन्मावणे दंतोह-निन्म सालुक-गल- कयोलपरामासे आदारितं यूया । तत्थ उलोगिते णिग्गिणे अस्माते संपाविते परिलीडे आहारितं वूया । तत्थ 15 णामोरं यच्छंगे कुन्सि-पस्मोदरपरामासे आहारितं यूया । तत्य सम्बआहार-भायणगते मूलगते या संधगते या पत्तगते या पुष्फगते या फलगते या आहारितं यूया । तत्य बझामासे चलामासे लुक्सामासे कण्हामासे तुच्छामासे स दामासे - गपुंसकामासे सब्बीहारगते अणादारितं यूया । वत्य उकासिते खुविते जमिते णिम्मनिते गिटूहिते थपमहे अपमजिते अंबलोणिते पम्हढे पमुक्के ओलोकिते ओसारिते अणाहारितं वूया। तत्य अभंतरामासे भाणितव्यं । तत्य आहारे पुव्यमाधारिते आहारं तिविधमाधारये, वं जधा-पाणजोगीगतं मूलजोणीगतं धातुजोणीगतं । तत्य 20 चलामासे सयपाणगते सव्यपाणोरकरणे सव्यपाणमए. उचकरणे सव्यपात्रोणीणामवेजबकरणे सव्यपाणजोणीणाम- धिनायी-पुरिमगते सत्र्यपाणजोगीपटिरूवगते य एवंविधसद-रूवरमांधपादुभावे पाणजोणी बूया । तत्थ केस-लोम- महगते मंमुगते सव्यमूलगते सव्यमूलजोणीगते सत्र्यमूलजोणीउपकरणे सत्र्यमूलजोणीमए उपकरणे सव्यमूलजोणिणामधिन- उपकरणे सन्चमूलजोगिणामयनोदीरणे थी-पुरिसगते एवंविधसह-रूयपादुदभावे मूलजोगीगतं यूया । तत्य सबढामासे मव्यधातुगते सयधातुज्ञोणीगते उपकरणे हा सव्यधातुजोणिणामयजे 'उपकरणे सत्र्यधातुज्ञोणीणामधेनोदीरणे 25 धी-पुरिसगते एवंविधसद-रूप-रस-गंध-फासपाटुम्भावे धातुजोगीगां बूया । नत्य पायजोर्णागते पुत्र्याधारिते पाणडोणीगतो आहारो दुद्धं दधि णवणीतं तकं घतं मंसं वसा मधु ति । तत्व पाणजोगीगो आहारो संसओ असंसओ त्ति पुयमांधारइयव्ययं भवइ । तस्य ५ संसैए » संसयं धूया, असंख्ये असंचयं धूया । तन्य संसयं दुद्धं दधि मधु त्ति । तस्य संखयाणि दुद्धं या दधि वा सोतगुलं सकरा या अण्णेहिं दन्वेदि संयनाणि अण्णे मधु ति । तस्य अम्गेय मणग्गेयं वा ति पुत्र्यमाचारइयव्यं भवइ । वत्य अग्गेयेसु १'वीरस्म य..तु.॥२मोतणो Tमऽज्या त.॥ ३"उच्छंगे है. तपिना। ४ एनचिहा- नगन. पाटः १.त. नामि। ५रकोसित है. त• चिना ॥ ६ ययलोकिते पह. त० । अवले अवजिते पनि० ॥ ७ पम्गुमे है. त• पिना॥ ८हमचिहान्नर्गतः पार है. तएव वति ॥ ९णीमो ..॥ १०°माहारयिय भयति.द.॥ ११- एतचिहान्नगतं पदं है. त० नामि ॥ १२ हसचिदान्तर्गत पदं है. त• एवं वर्तते ।। १३ 'माहा. रयियव्यं मयति ई.तु.॥
घूया। चचालीसइमो मोयणज्झायो अग्गेयं धूया, अणगोयेसु अणग्गेयं घूया । तत्य अग्गेयाणि पयं या मंसं वा दुद्धं वा सिद्धं पसा वा । तत्य अणग्गे- याणि दुई वा ससत्तं दधि णवणीतं मधु ति । तत्थ सुकेसु सुक्कवण्णपडिरूवगए य दुद्धं वा दधिं वा तेफ वा का णवणीयं वा [वूया ] । तत्य पीतके पीतवण्णपडिरूवगए य घेयं चूया या तत्थ अरसेसु तिक्खदारुणेसु सव्वसत्यगए य मंसं चूया । ॐ तत्थ सामेसु वसं मधु वा घूया । च तत्य मधुरेसु धयं वा दुद्धं वा बूया । तत्य यालेयेसु दुद्धं धूया । तत्य सिद्धेसु घयं धूया । तत्थ अंविलेसु दधि वा तकं या णवणीयं वा बूया | सत्य घणेसु सुद्धेयेसु दहिं वूया । सारवंतेसु णवणीयं चूया । असारवंतेसु तकं घूया । दुग्गंवेसु वसं यूया । छ मुइतेसु वसं घूया । य इति पाणजोणीगतो आहारों। तत्य मूलजोणिगए आहारे (व्याधारिए मूलजोगीगतं आधारं तिविधमाधारये-मूलगतं खंधगतं अग्गगत चेति । तत्थ अधोभागेसु गत्तेसु अघोभागगतोपकरणे सबमूलगते - लोपकरणे सव्यमूलमये उपकरणे 23. सेव्यमूलजोणीनामधिजोपकरणे व सध्यमूलजोणीणामधेयोदीरणे थी-पुरिसगते एवंविघसद्द-रूवरस-गंध-फास- 10 पादुब्भावे मूलगतं चूया । तत्य मूलगते पुव्याधारिते मूलगतं तिविधमाधारये-मूलगतं कंदगवं तजगतं चेति । तत्य मूलगते मूलगयं, फंदगते कंदगतं, तयागते तयागयं यूया । तत्य सव्यमाणेसु गत्तेसु सव्वमाणगतोपकरणे सव्वखंधगते सव्यखंघोपकरणे संन्यखंधगते उवगरणे सवखंघ- णामधेने उपकरणे सव्वखंधगयणामधेजोदीरणे थी-पुरिसगते एवंविधसह-रूप-रस-गंध-फासपादुभाव संधगयं चूया । तत्थ संघगते पुन्याधारिते संधगयं दुविधमाधारये-खंधगयं णिजासगत "चेव सव्वखंघर्गए सब्बसारगते - य 15 संधगयं नत्य सिरिविट्ठकसद्द-लया-सल्लईहिं कास-सोणिय-पूक-लसिया सव्वणिज्जासगते य गिजासम्तं यूया । तत्य उद्धगते अधोसिरमुहामासे उद्धजैतुसिरोमुहोपकरणे सध्यैअग्गंगए सव्वअग्गोपकरणे च सव्व- अग्गमए उपकरणे सव्वअग्गणामधेजे उपकरणे सव्यअंगणामधेजोदीरणे थी-पुरिसगते य एवंविघसद-रुव-रस-गंधपाडव्मावे अग्गगतं यूया। तत्य अग्गगते पुन्याधारिते अग्गगतं तिविधमाधारये, तं जधा-पत्तगतं पुष्फगतं फलगतं चेति । वत्य अणूसु सयपुधूसु य सव्यपत्तगते य पत्तगतं घूया । तत्य पत्तगते पुव्याधारिते पत्तगवं विविधमाधारये-तरुणं वयत्यं 20 पंडु चेति । तत्थ वालेजेसु वरुणं पत्तं [यूया, तत्य वयत्येसु ययत्यं पत्तं यूया, तत्थ महव्ययेसु य महव्ययं भूया । तत्य सव्यमुदितेसु सन्यपुष्फगते य पुष्फगयं घूया । तस्य पुप्फगए पुयाहारिए पुष्फगयं तिविहमाहारए- पत्तेगपुप्फ गुलकपुप्फ मंजरीपुष्पं चेति । तत्य एकामासे एककेसु खाएकाभरणे एकोपकरणे एकचारिमु सत्तेसु एकसाहागते एफंगुलिगणे य पत्तेकपुष्फ यूया । वत्य पहुकेसु गत्तेसु यहाभरणक-यहोपकरणे संपचारिसु सत्तेमु पहुसादागते य पहुअंगुलिग्गहणे य गुलुकपुर्फ बूया । तत्य दीहेसु सव्वमंजरिगते य मंजरीपुष्पं घूया । इति 25 पुष्फगतं । तत्य पुण्णामेसु सञ्यफलगते य फलगवं यूया । वत्य फलगते पुव्याधारिते फलगर्ल चतुव्यिधमाधार, तं जधा-रक्सगतं गुम्मगतं 'टिगतं छुपगतं चेति । तत्य उqभागेमु फाययंतेमु सव्यरक्सगते य रक्सफउगतं धूया । तत्य दोहेमु युडिलेमु य समयहिगते य यहिफलग पूया । वत्य मन्झिमाणवरकायेसु सव्यगुम्मगते य गुम्मफलंग पूया । वत्य पर्यवरकायेसु सयपगते य छुरफलं पूया । १-२-३-४-५ मचिहान्तर्गतः पाठ • त• एप यावे ॥ ६ पुग्यमादारिपत.॥ ७मादारं..॥ ८.42 एतपिान्तर्गतः पाठःहै. त• मामि॥ ९इसचिहान्तर्गतः पाठः त. एर पाते। १०पेति.त.॥ ११ गए सम्यगए सव्यसार • ॥ १२१ एपिहान्तर्गतः पाठः है. तनामि॥ १३ तस्य सिरे चिट्टपसलहरा..॥ १४ जयसि...॥ १५ सम्मचिहान्न पाट• त• एप बने । १६ एमपितान्दर्गतः गन्दर्भः... रो १७°लुच्छा..॥ १८ यतिचाप सत्र•॥ 30 भंग०२३ १७८ । 10 अंगविज्ञापइण्णय तत्य अणूमु सन्चधण्गगते य घण्णगतं घूया। तत्य धण्णेसु पुख्याधारितेसु सबधणं दुविधमाधारए, तं जघा- पुल्यण्णं अवरगं चेति । तत्य पुरथिमेसु गत्तेसु पुरत्यिमेसु य सद्द-रूवेसु पुयण्णगते य पुरणं यूया, तत्य पच्छिमेमु गत्तेसु पच्छिमेसु य सद्द-रूवेसु यि सव्यअवरण्णगते य अवरगं घूया । तत्य पुज्यण्णे पुव्याधारिते पुव्यण्णं अट्ठविधमाधारये, लं उधा-साली कोद्दया वीही कंगू रालका घरका सामाग(गा) तिला वेति । वत्य दीहेसु साली या वीही था, पुषूसु तिले चूया। तत्य कसेसु कोद्दवो कंगू या रालके या परके घा सामाकं यूया । वत्य रत्तेसु कंगू वा कोद्दवे घा बूया । तत्य पीतेसु रालके घूया । फरसेसु सामाकं घूया । सामेसु परफे यूया । गिद्धसु सालिं या वीहिं वा कंगुं वा तिले वा धूया । वत्य लुक्खेसु कोदवे या रालके या परके वा सामाकं या बूया । तत्य मुसलसमाहतगते साली वा वीही या कंगू वा रालके वा परके या सामागं या बूया । वत्यै घहे या मामिठे या कोद्दवे यूया । तत्य पिढे वा पीलिते वा विले धूया । इति पुव्यगं । तत्य अवरपणे पुव्याधारिते अवरणं तेरसविधमाघारये । तं जधा-मासा मुग्गा चणका कलावा गिटफावा मसूरा कुलत्या तुपरयो यया गोधूमा कुसुमा सासवा अतसीओ त्ति । तत्य पीतेसु चणके वा कलाए वा तुरीओ या भूया । तत्य कालेसु मासा या मुग्गा या बूया । तत्थ सेतेसु णिप्फावे [बूया ] । तत्य कडुकेसु सासवे यूया । सत्य कसायेसु गोधूमे चूया । वत्य अंबेसु घणके कुलत्ये वा धूया । इति अवार]ष्णं । तत्थ सन्यधण्णगनं चतुव्यिधमाधारये, तं जधा-संघगवं वल्लिगतं तणगनं छुभगनं चेति । तत्य मधुरेसु मासा 15 या मुग्ण वा मसूरा या कलावा [वा] घूया । तैएसु णिप्फाया कुसुंभा वा अतसीओ या तुयरीओ या घूया । तत्य खंघगते तिले या कुमुंभे या तुवरीओ या अतसीओ या सासवे वा वूया । तत्य वल्लिगते गिफ्फावे वा फुलत्ये वा मसूरे वा घूया । तत्य गुम्मगते (छुभगते) मासे वा मुग्गे वा घणके या कलाये या घूया । तत्य भाणगते (तगगते) साली या वीही या कोदवे या रालक वा जचे या गोधूमे वा यरके या वूया । सं पुण सन्मघेण्णगते दुविधमाधारये-कोसीधणे चे अकोसीधण्णं चेर ! वत्य 'अंगुलीगते णहगते 20 पेलागते धविकागते पसिव्यिकागते सव्यमुग्गागते सव्यसुसंवलिकाफ्लेमु सन्यसिंगिगते य कोसीपणं घूया, तिला मासा मुग्गा घणका फटाया गिफाया फुलत्या मसूरा तुपरीओ चि । अयसेसागि अकोसीधण्णाणि । इति । जधा- - गगयं। - सत्य सव्यमाहारं छबिघमाधारये, तं जघा-मदुरं तित्तं फसायं अविलं फटुकं लवणमिति । तस्य अमंतरामासे सबमधुरगते मधुरं यूया । तत्य तिक्खामासे सव्यकहुकगते य फडकं यूया। तत्य विर्घटेसु सम्सायोपलद्धीयं कसायं 25 यूया । तत्य पापण्णेमु सव्यविठोपलद्धीयं अयं धूया । वत्य अक्सिगूधके कण्णगूपके दंतगूधके मुणासगते य यूमागगते य रेतगते सेयमलगते य सन्चलपणे 4 लयणं यूया । वत्य घलामासे सत्यविचगते य तितकं यूया । सत्य आधारे पुत्र्यापारिए आधार पतुविधमाधारये, तं जया-मोयणगतं पाणगय मस्सग लेझगर्न चेति । सत्य पुण्यामपेमामामे सबमोयणगते मध्यमोयणपहिरुपगते य भोयणं यूया 1 तत्य गिद्धामासे सव्यपाणियेमु सन्च- पानगरं सत्यपा-मोयग-मायणगते य पागा यूया । वत्य टहरल्यापरेमु दृहरचलेमु य सयमस्वगते य सव्यमक्स- 10 संमयेगु य संधीमु य भासगतं यूया । तत्य सय्यमनस-पागमीसेम टेन्झगते य लेग्झं पूया । १विहान्तर्गत पर.त. पाते। २प घहे या मासिए या है. त.॥ ३ तत्थपमुई. द. चिना ॥ ४"पण पादुपित.॥ ५मभिधान्तर्गतः पाठः है। त. एव वाते ॥ ६ भेगुटीगते घणगोपलगए चयिनगर परिविकागए मप्यमुग्गगए सव्यमुसंयलिशाफलेमु सप्यसिरिगए य कोमीपण...॥ ७ मगर्ग • त. ८ पिपरा....पागगते. ६.॥ १०य सन्यसय..॥
- चत्तालीसइमो भोयणमाओ तत्थ भोयणे पुत्राधारिते भोयणं विविधमाधारये-विसयगतं चेवर घेणगतं चेव । तत्थ सव्यविसयकडे - सव्वरासिकडे - सव्वपुंजकडे सव्वउस्सयकडे सैन्यविवद्धीकडे सव्वविसयकडे य विसयं घूया । तत्य सव्वघणकडे सव्यपाणिकडे सव्वधुंधुकडे सव्ववित्थडकडे सव्यघणण्णकडे य घणण्णं घूया । तत्य विसयकडे पुबमाधारिते विस्सोदणं वा अतिकूरकं वा गुलकूरकं वा घतकूरकं वा » बूया । तत्थ सव्यविसयोपलद्धीयं विसयोदणं चूया । उम्मट्ठम्मढेसु य आहाराहारेसु सव्यअतिमासकडे य अतिकूर वूया । तत्थ सव्वणेहोपलद्धीयं सव्वघतोपलद्धीयं च घतकूरकं यूया 1 5 वस्थ सव्वमधुरोपलद्धीयं सव्वगुलोपलद्धीयं च गुलकूरं धूया । तत्थ घणन्नकडे पुन्याधारिते विलेपि वा पायसं वा कसरि वा दधितावं या तक्कुलिं वा अंवेल्लिं वा वूया। तत्थ महुरोपलद्धीयं विलेपि वा पायसं वा कसरिं वा बूया । तत्थ अविलोपलद्धीयं दधितावं वा तकुल्लिं वा अंवेल्लिं वा बूया । तत्थ मधुरेसु पुत्वाधारितेसु आपुणेयेसैं विलेपि वा बूया । तत्य बालेयेसु सव्वदुद्धकडे य पायसं बूया तत्थ कण्हेसु संखतेसु य कसरं बूया । तत्य अंवेसु पुव्वाधारितेसु दधितापं वा तकुल्लिं वा अंवेल्लिं या बूया । तत्यं 10 सारेसु दधितायं चूया । असारेसु तकुल्लिं बूया । तत्थ पागतेसु आसेतेसु असारेसु य अंवेल्लिं बूया । तत्थ भोयणरस सव्योपलद्धीयं सालि-वीही-कोद्दव-कंगु-रालक-जय-गोधूम-घरक-सामागो त्ति जधुत्ताहिं उपलद्धीहिं उपलद्धन्वा भवंति । तत्थ अधण्णोपलद्धीयं मुग्गा मासा चणका कलया णिप्फावा मसूरा तुवरीओ वेति जधुत्ताहिं उपलद्धीयं उपलद्धव्या भवतीति । [तत्य] भोयणरस होपलद्धीयं पाणजोणीगता - मूल- जोणीगता हा चेति । तत्य भोयणस्स उपसेकोपलद्धीयं रसो जूसो कुलत्थो खलको दघि दुद्धं तकं अंबिलकं पालीको त्ति । सो उप- सेको दुविधो-पाणजोणीसंभवो चे छ मूलजोणिसंभवो चेव । म सो पुण दुविधो-अंबो चेव मधुरो चेव । सो पुण दुविधो-अग्गेयो चेव अणग्गेयो चेव । सो पुण दुविधो-लवणो चेव 8 अलवणो चेव । " तत्थ भोय- णस्स उपसेकोपलद्धीयं मूलगता चेव अग्गगता चेव । तत्थ मूलगता सव्वपक्खिमये उपकरणे सव्वपक्खिणामझे उपकरणे सव्वपक्खिणामधेजोदीरणे थी-पुरिसगते 20 एवंविधसह-रूप-स-गंध-फासपादुब्भावे पक्खिमंसं यूया। तत्थ सव्वपरिसप्पगते सव्वपरिसप्पोपकरणे सव्वपरिसप्पमते उपकरणे सव्यपरिसप्पणामधिजे उपकरणे इन सव्यपरिसप्पणामधेजोदीरणे थी-पुरिसगते एवंविधसद्द-रूप-रस- गंध-फासपादुम्भावे परिसप्पमंसं घूया । तत्थ चउप्पए पुत्वाधारिए घउप्पयं तिविहमाहारये, तं जहा-गम्मा रण्णा [गामारण्णा चेति । तत्थ अभंतरेसु गत्तेसु अभंतरगाम-णगरगए [य अभंतरगाम-णगरचतुष्पदे य] एवंविहसह- रूव-रस-गंध-फासपाउन्भावे ला चउप्पदमंसं यूया । तत्य वाहिरव्भंवरेसु गत्तेसु सव्यवाहिरभंतरगते य सव्वगाम- 25 रण्णचतुप्पदे य एवंविधसद्द-रूव-रस-गंध-फासपादुभावे गामारनगतं घूया । सव्ववाहिरेसु गत्तेमु सव्यआरनगते य सव्यआरण्णपडिरूवगते य एवंविधसद्द-रूव-रस-गंध-फासपादुभावे आरनं यूया। तत्थ चतुष्पदमंसे पुव्याधारिते उद्धंभागेसु उद्धगीवा-सिरो-मुहामासे सव्यसिंगिगते सव्यसंगलिकागतेमु धन्नेसु सव्वसंगलिकाफलेसु वच्छेसु सिंगीणं चतुप्पदाणं मंसं यूया । सत्य अधोभागेसु सव्यअंगगते सव्यअसंगलिताफ्लेमु घच्छेसु असिंगीणं चतुप्पदाणं मंसं यूया । 15 30 १-२१ एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त० नास्ति ॥ ३ सव्यतिपट्टीकडे सं ३ पु.॥ ४ पुडकडे • त॥ ५- एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त• नास्ति । ६किसरि ह. त.॥ ७°मु येलिपि है. त• विना ।। ८ फण्णेनु संसवेसु है. त•॥ ९तत्य ससा है. त.॥ १० यहुल्लिं या यूया ह• त• ॥ ११ असेतेनु है. त• पिना । १२-१३-१४-१५-१६ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. तु. एव वर्तते ॥
अंगविजापदण्णय तस्य चतुप्पदेसु परिमिताटपलद्धीए-तत्य कायमंतेसु कायमंचा विणेया। मज्झिमकायेसु मन्झिमकाया विन्नेया। मझिमागंतरकायेसु मन्झिमार्गतरकाया विनेया । पञ्चवरकायेसु पचयरकाया विण्णेया। सेतेहि सीता, पीतेसु पीता, रत्तेसु रत्ता, कण्हेसु कण्हा, णीलेसु णीला, पंडुरेसु पंडुरा, फरसेहिं फरसा, चित्तेहिं चित्ता, घोसवंतेहिं घोसवंता, मधुरघोसेहिं मधुरघोसा, महुररूवैहि मधुररूवा, पियदंसणेहि पियदसणा, थीणामेहि थीणामा, पुण्णामेहिं पुष्णामा, पपुंसकेहि नपुंसका विण्णेया । इति चतुप्पयजोणी। तत्य पक्सिगते पुन्याधारिते थलयरा जलयरा पुव्यमाधारयितव्यं भवति । तत्य सब्यस्थलेसु सव्वणिण्णेसु सयजलगते सव्यथलगते सव्वजलोपजीविसु सव्यजलयेसु सव्य लोपकरणेसु य जलयरं चूया । तस्थ पक्सिसु पुण्या- धारितेमु पक्खी तिविधमाधारये-पुष्फ-फलमोगी मंस-रहिरभोगी धण्णभोगी - चेति । तत्थ मुदितेसु सत्यपुप्फ-फल- गैते य पुप्फ फलभोगी यूया । तत्थ सव्यसत्यगते सव्यरुधिरभोगिसु सम्पमंसरघिरगते य मंसरधिरभोगी यूया । तथं 10 अणूसु मव्यधण्णगते य धण्णमोगी यूगा । सत्य पक्सिसु अपरिमियांतो उपलद्धीतो तत्य अधुत्तण उपलद्धव्वं भवति । तत्थ काययंते, पुण्णेमु सव्यफलगते य उवलद्धीहिं सव्वपक्सि उपलद्धव्या भवंति । इति पर्सिंगयं मंसं यूया । सत्य परिसप्पे पुब्बाधारिते थलयरा जलयर ति पुणरवि आधारयितव्यं भवति । अधुत्ताहिं उपलद्धीहिं थलयरा जलयरा उपलव्या मांति । काययंताहि बलद्धीहिं हा कायवंतो परिसप्पा उवलद्धन्या. वण्णोपलद्धीहिं वण्ण- यंतो परिसप्पा उपलद्धच्या इति परिसप्पं मंसं घूया | तत्य सव्यं दुविधमाधारये, तं जधा-अहमंसं सुक्कमंसं चेति । 1 वत्य गिद्धेमु सव्वदगते य अदमंसं यूया । तत्य सव्वलुक्खेसु सव्यसुक्खमंसगते य सुक्खमंसं वूया । इति मंसगतं । तत्य मुदितेसु धरसये मोयणं ति यूया । तत्य दीणेसु उवद्दुतेसु य मतकमोयणं क यो सहकभोयणं या छ यूया । वत्य अयत्यितेमु ण वि दीणेसु ण वि मुदितेसु य दासीणं भोयणे यूया । वत्थ पालेयेसु उत्थाणके या सत्तादि- कायं या पालोपणयणे या मुत्तं यूया । वत्य सव्यकामोपलद्धीयं सव्यकाममुपजुत्ते सयबंधुनोपलद्धीयं च बंधुने मुत्तं यूया । तस्य सव्यदेवगते सयदेवोरलद्धीय देययागे मुत्तं घूया । तत्य सेव्यधम्मोपलद्धीयं जातीयं जण्णे या मंतगदणे 20 या मंतसर्मावणे या विनागहणे या विजासमत्तीयं या मुत्तं यूया । तत्य मुदितेसु अभिणवेसु य अभिणयमोयणं घूया । पापण्णेमु सीतभोयणं धूया । तत्य लुक्सामासे भिक्सोदणं यूया । तत्थ विमुत्तेसु असामण्णेमु असामण्णपहिरूयगते य असामण्णं मुत्तं यूया । तत्य सामण्णेसु सव्यसामण्णपहिरूपगते य परेण सह मुत्तं धूया। तत्य अंधावातेण वा जधा- संठाणेग या संठाणं रूपेण पण्णेण या जाणिवव्यं भवति 1 जातिकुलेणं फुलं, कम्मेण कम्मं, अणुभावेण [अणुभावं,] पीणामेण धींगामा, य पुण्णामेण पुण्यामा य, गपुंसकेण णपुंसका य, एवं समणुगंवव्यं भवति । तस्य सहचरेसु परेण 29 परिविद्वा भवति । एयमेय जातीहिं सव्यमणुगंतव्यं मरति । तत्य भोयगरस भोयणगतं तिविधमाधारयितव्यं भवति, सं जधा-पाणजोगीमयं धातुनोणीमयं मूलजोणीमयं । अधुचाहि उरलद्धीहिं उपलव्याणि भांति । तत्य पाणलोणीमये पुन्याधारिते पाणजोगीमयं सिपिपुडं संसमयं च एयमादीहिं उपलद्धीहिं उपलव्यं भवति । तत्य मूलजोणीमये पुव्याधारिते मूलजोणीमयं फहमयं फलमयं पत्तमयं थेति जा आदि उपलद्धीहिं उपलद्धव्यं भवति । तत्य धातुलोणीमये भायणे पुन्याधारिते धातुजोगीमयं मुयण्णमयं 20 रप्पमयं संयमयं पंसमयं फाललोहमयं सेलमयं मत्तियामयं ति जधुत्तादि सईयलद्धीहिं -- उपलक्ष्य भाति । एवं सध्यमायणागि उपटल्याणि भांति। "माहापियध्य १. १० ॥२ सम्बजलचरगने है. त.॥३'जलयोए..॥४ पुव्यमाहारयिपसु ई.स.॥ ५ गतेगु पुणः .. दिना ॥ ६ रप सध्यममु १. १० ॥ ७ तेहिं पु... ॥ ८'सिमंसं • • विना ॥ भादारीयपम्य ...॥ १०इसपिहान्तर्गतः पार है. त• एवं वति ॥ ११ मुससंगते है. ह.॥ १२सकि- भर्गक पार... एरवठे ॥ १३ पु उदासीणामायण 1. । "मु दासीप मोवर्ण •ि ॥१४ मध्यपजोपलसीर्य घपायु मुल... १५ सम्यसयपम्मोपजातीय जपेत. बिना ॥ १६ मारणे.त. विना ॥ १७ अपा- पाग पा जपासंगण पाजपासटाण..पना १८-4 एनगिन्तर्गतः पाठः है. त• नास्ति। - - 16 चत्तालीसइमो भोयणज्झाओ तत्य अमंतरेसु संगिहे भुत्तं ति घूया । वाहिरमंतरेसु मित्तकुले भुत्तं ति घूया । बाहिरेसु उजाणघरे जिमितं ति बूया । मुदितेसु सकारपडिरूवेणं सक्कारेणं भुत्तं ति घूया । दारुणेसु भीतपडिरूवे य मीतेगं भुत्तं घूया । दढेसु अवस्थितेणं मुत्तं [ चूया] । चलेसु उप्पुत्तेणं भुत्तं चूया । पसण्णेसु पसण्णपडिरूवगते य पसण्णेणं भुत्तं ति घूया । अप्पसण्णेसु अप्पसण्णपडिरूयगते य अप्पसण्णेण भुत्तं ति बूया । तत्थ अक्खोडिय-परिविडिय-सव्यकोधपडिरूबगते य कुद्धेणं भुत्तं ति यूया । तत्य पुरत्थिमेसु गत्तेसु पुरथिमेसु य सद्द रूवेसु पुरस्थिममुद्देणं भुत्तं ति घूया । एवं सव्या दिसा 5 समणुगंतव्याओ। इति भोयणगते त्ति । तत्थ पाणगते पुन्यमाधारिते पाणगतं तिविधमाधारये-पाणजोणीगतं मूलजोणीगतं धातुजोणीगतं चेति । जहुत्ताहिं उवलद्धीहिं तिविधमपि उवलद्धव्यं भवति । तत्य पाणजोणीगतं पाणगं दुद्धं दधि तक रसो घतं या विततं यसा या वितता यधुत्ताहिं उवलद्धीहिं उवलद्धव्याणि भयंति । तत्य मूलजोणीगते पुव्याधारिते मज्जगतं जयातूगयं फलरसगतं वा वूया । तत्य मुदितेसु सव्यखंधपडिरूवगते य उच्छुरसं वा गोलोयं वा बूया । तत्थ पुधूसु सव्यपत्तगते य पत्तरसं 10 धूया । तत्थ मुदितेसु सव्यपुष्फपडिरूयगते य पुप्फरसं घूया । तत्य पुण्णेसु सव्वफलपटिस्वगते य फलरसं चूया । तत्य अणूसु सव्वधण्णगते य धष्णरसं चूया । तत्थ धातुगते पाणीयं घूया । तत्य मजगतेसु पुव्याधारितेसु यया पसणं वा अयसं वा अरिटं या महुं वा चूया । तत्य 'ओधुतेसु सयोसधीपडिरूयगते य अरिहं घूया । सत्य पीतेसु सव्यफलाहिरूयगते य मधु बूया । तत्थ पसण्णेसु सव्यपसण्णपहिरूवगते य पसगं यूया । सेतेसु सेतसुरं चूया । इति मज्जगतं । तत्य वागूपुव्याधारितेसु दुद्धजवाणु वा घेयजवाणू या सा तेलजवाणू या अंविलजयागुं वा उहिर्भ या ओसधजवाणू या बूया । तत्थ यालेयेसु पाणजोणिगते सुकेसु मधुरेसु दुद्धजयागुं या यूया । तत्य गिद्धेसु पीतेसु य पतजवाणू पा घूया । तत्थ गिद्धेसु समेसु तेल्लजयागुं वा घूया । तत्य वापण्णेमु अविलोपलद्धीयं या अविलजयागुं या घूया । तत्य आपुणेयेसु उण्हेसु य उण्हितं यूया । तत्य उदुतेसु सव्योसधोपलद्धीयं च ओसधजयागुं या यूया । तत्य पुष्फ-फलसमाणेसु पाणगतं या सालयगयं या यूया । तत्य सव्यधण्णजोणीयं जहुत्ताय सव्वधण्गरसगते 120 उपलव्या । इति पाणजोणिगतो। तत्य भैक्सगते पुन्याधारिते भैक्सगतं दुविधमाधारये-पाणजोणीमयं [मूलजोणीमय) चेति । तत्य जघुत्तादि उपलद्धीहिं दुविधा उपलद्धच्या भयंति । तत्य पाणजोगीगते जधुत्ताहिं मंसोयलद्धीहिं उयलद्धन्याणि भवंति । इति पाणजोणीगतं । तत्य मूलजोणिगते पुख्याधारिते मूलगत संधगतं णिजासगतं पत्तगतं फलगतमिति जघुतादि उपलद्धीदि उयल- 25 च्याणि । तत्य मूलगते पुव्याधारिते आलुकं या कसेरकं या सिंपाडकाणि या भिसं या भिसमुगालं पा पायं या एपमादी फंदमूलगतो समणुगंतव्यो भवति । तत्य संघगते उच्र्छ या अगं या संधगतं यूया । सत्य गिनासगते सपर या मच्छंडिकं या गुलं या पूरा । सत्य जघण्णेमु य?सु गुलं यूया । तत्य पसणेसु सारयतेमु मीतलेमु य सफर पूया । सत्य पकिण्णेमु मच्छंडिकं यूया । मुदितेमु सनगगुलं यूया । उधण्गेमु पट्टेसु गुलं घूया ! अरोरोग अपगेये य इकासं पूया । अधुत्ताहि उयलद्धीहिं पत्तगवं पुप्फगतं फलगत धण्यगतं भर यूया। सत्य सव्यमूलगते रुपरागते पहिगतं गुग्मगतं छुभगतं वगगतमिति । साय उदंमागेमु पुण्यामेमु दक्षिणेमु पायर्यतेनु सम्मपरसगते य युफ्सगां पूया । सत्य दीदेमु पुहिलेमु यामेमु पीगामेसु सम्रपतिगो य पलिप १यपानगते । • पिना॥ २ उपसुर••॥ ३ जयायुपु • • ४एशिरा पर.. सपा ॥ ५ उते. तमिना ६-७ परत.. 30 अंगविजापइण्णय चूया । वत्थ मन्झिमाणवरकायेसु गहणेसु सम्बगुम्मगए य गुम्मफलं घूया। तत्य पञ्चवरकायेसु उपग्गहणेसु सव्वछुम- तणोपलद्धीयं च छुभगतं दूया । तत्य जधुत्ताहिं घण्णोपलद्धीहिं फलोपलद्धीहि य भक्खोपलद्धीओ उपलव्याओ भवंति । तत्थ पिट्ठगते चुण्णगते य तप्पणा पदरचुण्णं या विकसं या चुण्णं वा उपलव्या भवंति । तत्थ भक्सगते पकिण्णगते य कलायभजियं या मुग्ग- 5 मभियं वा जयभजियं या गोधूमभजियं या सालिभत्रियं वा तिलभजियं या एयमादीणि भन्जितकाणि धूया । वत्य भक्सगतं चाव्यिघमाधारये-गुलगवं लवणगत अगोलीयं लवणमिति । वत्थ लवणगतं दुविधं-अग्गेयं च अणग्गेयं च । [तत्य] अणग्गेयं सामुई वा सेंघवं या सोवच्चलं वा पंसुखारे वा । तत्य अणग्गेयाणि जवखारो वा सोवधिका वा पिप्पली वा सारलवणं या यूया । तत्य सञ्चगुलगते सफर का मच्छंडिकं वा गुलेण वा गुलगतं जघुत्ताहिं [उपलद्धीहिं] उपलद्धव्याणि भवति । 10 तत्य वट्टेण सव्वयट्टपडिरूवगते य मोदका या पेंटिका या पप्पडे या मोरेंडकाणि या सालाकालिकं या अंवट्टिकं वा एवमादीकाणि पट्टाणि उबलद्धयाणि भवंति । तत्य पुघूसु वित्थडेसु सञ्ववित्यतपडिरूवगते य पोवलिकं या कोधितर्फ वा पोलके या पप्पडे या सङ्कुलिकाओ वा पै या फेणके या अक्खपूपे वा अपहिहते का पवितलके का देलातिको या पत्तमजिताणि या उलोपिको वा सिद्धयिका या बीयकाणि वा उक्कारिका वा मंडिल्लका या एवमादीकाणि वूया । तत्य दीहेसु दीहसक्कुलिकं या सारयट्टिका वा सोडके वा दीवालिकाणि वा दसीरिका वा मिसकंटकं या मैत्य- 15 तकं या, जाणि यऽण्णाणि एवमादीणि धूया । तत्थ गुलोपलद्धीयं गोलिकं घूया । लोणोपलद्धीयं लोणितकं वूया । [भस्सोपलद्धी] भक्सगतं यूया । आँधायणेणं अलयणमगोलिकं वूया । इति भक्खगयं । तत्य लेझगते पुबाधारिते लेझगतं दुविधमाधारये-पाणजोणीगतं मूलजोणीगवं चेति । वत्थ जघुत्ताहिं पाण- जोगीयं उपलद्धयाण पाणजोणीगत लेझगनं उबलद्धव्यं भवति । तत्य लेझं या पाणजोगीगयं घयं नवणीयं वसा मधु ति यधुत्ताहिँ उनलद्धीहिं उपलद्धव्यं । इति पाणजोणीगतं लेझं । तत्य जधुत्तायं मूलजोणीयं उवलद्धीयं मूलजोणीगवं 20 लेहं उपलद्धव्यं भवति । तत्य मूलजोणीगते लेझे पुन्याधारिते फाणितं या ककवं या विलक्खली या पलालं वा संवारागो वा लेझचुण वा वूया । तत्थ गुलोबलद्धीयं ककवं या फाणितं वा उबलद्धयं भवति । तिलोवलद्धीयं पललं था तिलक्सठी या उपलद्धच्या । एवं कटुकेसु रागलेझा उपलद्धळ्या भयति । इति भोयणं भक्सं लेझं पाणं घडव्यिह- मवि समणुगंतव्यं भवति । ॥ इति भोयणो नामाज्झायो चत्तालीसइमो सम्मत्तो ॥४०॥ छ । [एगचत्तालीसहमो वरियगंडियज्झाओ] 25 णमो भगवतो महावीरवद्धमाणस्स । णमो भगवतो जैसस्तो महापुरिसस्स महावीरवद्धमाणस । अहापुवं सलु भो ! महापुरिसदिण्गाय अंगविज्ञाय परियगंडिया नाम अरहस्समझायं । तं सलु भो ! तमणुवक्सरसामो। तं उघा-तन्य तं र ति पुयमांधारयितव्यं माति । तत्य अनंतरामासे गिद्धामासे छिद्दामासे अतिमासे सव्यपारगते मीते पलं ति चूया । तत्य यन्झामासे चलामासे लुक्सामासे च णलं वि यूया । वत्य सन्चअन्मवर- १ मोरंड. त॥ २पोवलिया है. तयिना ॥ ३ पूर्णफेणके है. त• पिना ॥ ४ बेलातिकामो धा पर भनियाणि या उटोपिकामो या • त.॥ ५मंडल्लिका है. त• विना ॥ ६ च दीवलि है. त• विना ॥ ७ मच्छत्तक १.त.॥ ८ अदापणेणं है. त•॥ ९णामाम्यायो है. त• चिना ॥ १०यसयओह..॥ ११ स्सामित.॥ १२'मादारपियव्य है..॥ १३ °व्यसंपार.तु. विना एगचत्तालीसइमो वरियगंडियज्झाओ गते सव्यमल्लगते सरगते पुक्खरगते गीत-वादितगते संलाब-हसित-तालगते चुंविता-ऽऽलिंगित-पाण-भोयण-भक्ख लेझ- गते संयणा-ऽऽसणगते य रतं ति वूया । विकणिते णिकाणिते छिविते जंभिते णिटुभिते अविमुत्ते मल्ले वा भूसणे या पकिण्णे वा अपपातिते अपलोलिते ण रतं ति यूया । तत्थ पुण्णामेसु पुरिसेण रतं ति चूया, थीणामेसु थिया रतं ति बूया, णपुंसकेसु चुंचित-आलिंगितरतं ति, ण पुण सेवणारतं ति बूया | तत्थ रते पुव्याधारिते पुण्णामेसु अभारिकेग पुरिसेण रतं ति, थिया वा अपतिकाय । थीणामेसु सभारिकेण पुरिसेण रतं, थिया या संपतिकाय । णपुंसकेसुक अणवत्येण( वञ्चेण) पुरिसेण रतं, थिया वा वंझाय । तत्थ तिविहं रतं-दिव्यं माणुस्सं तिरिक्खजोणियं चेति । तत्थ उद्धंभागेसु सिरोमुहे य ऐकस्सिकायं अंजलीक- रणे पायुकोपाहणाअधमुंचणे अभिवंदिते आसण-सयणसंपदाणे पहाणा-ऽणुलेवणे गंध-मल्लगते छत्त-भिंगार-लाउलोपिके वासकडक-लोमहत्थे जक्खोपयाणे समिधजोगपञ्चपयणेसु य दिव्वं रतं ति घूया । तत्य उद्धंभागेसु सुकेसु अच्छराय रतं ति बूया, थिया य वा देवेण रतं ति बूया । गिद्धेसु णागकन्नाय रतं ति चूया, थिया या णागेण रतं ति घूया । तिरियं भागेसु 10 किण्णरीय रतं ति वूया, थिया वा किण्णरेण रतं बूया । तत्थ तिरियजोणीगते विगताभिरामेसु य हस्सेसु पिसायीअरतं बूया, थिया वा पिसाएण रतं ति। दारुणेसु रक्खसीअ रतं ति घूया, थिया वा रक्खसेण रतं ति बूया | EN सव्वगंधव्वेसु गंधव्वीय रयं ति बूया, थिया वा गंधव्वेण रतं । अधोभागेसु असुरकन्नाय रतं ति, थिया वा असुरेण रतं ति यूया । तत्थे दुपदजोणीगते सव्वअजीवगते वियाकरणे मतकपडिमाय रतं ति घूया । असारेसु पत्थिवपडिमाय रतं ति धूया । सारवंतेसु मुत्तिकापडिमाय रतं ति चूया । पुधूसु चित्तपडिमाय रतं ति बूया । इति दुपदजोणी अजीवा । 15 तत्थ तिरियजोणीगते तिरियजोणीरतं ति धूया । तं दुविधं-सागुणं वा चतुप्पदं चेति । [तत्थ ] उद्धंभागेसु सव्यसगुणपाउभावगते य सगुणीय रतं बूया । चित्तसिहे कक्कडीयं रतं घूया । अमधुरघोसेसु टिटिभीय रतं ति बूया । चित्ते असिहे पारेवतीय रतं ति यूया । विगतदारुणेसु छिन्नगालीय रतं । इति पक्खिगतरतं ति । तत्थ सव्यचतुष्पदेसु चतुष्पदेण रतं बूया । तत्थ सेव्यसिंगिगए य ा सबसिंगीकोसीधण्णगते य गो-महिस-अयेलकेण रतं ति घूया । मज्झिमकायेसु गो-महिसेण रतं ति बूया । मज्झिमाणतरकायेसु अयेलकेण अस्सतरीहिं वा रतं ति यूया । दारुणेसु 20 सुणिकाय रतं ति बूया । साधारणेसु वराहीय रतं ति यूया । वायव्येसु वलवाय रतं ति बूया । विणतेसु उट्टीय रतं ति बूया । फरुसेसु गद्दभीय रतं ति धूया । चित्तेसैं गावीय रतं ति बूया। कण्हेसु महिसीय रतं ति बूया । इति चतुप्पयगतं रतं ति। तत्य माणुसं तिविध-थिया पुरिसा णपुंसका चेति । थीणामे थिया रतं, पुण्णामेसु पुरिसरतं ति यूया, णपुंसकेसु णपुंसकरतं ति वूया। तत्थ रतं दुविधं-विगतं अविगतं चेति । तत्य माणुसेसु माणुसं उभागेसु उवरि गीवाय पासितं विज्ञा। 25 तत्य सव्यसयणा-ऽऽसणगते परिधाण-पादकलापक-पादकिंकणिका-खत्तिर्य-धम्मक-पायुकोपाणह-सव्वजाणगते सव्यजाणोव- करणे य माणुसं रतं घूया । तत्थ सव्यमल्ल-मुकुडउद्धगते कूचफणलीखायण-व्हाण-पधोयण-विसेसकियाओकुंतणक हरिताल- हिंगुलक मणसिला-अंजण-चुण्णक अलत्तकनगंध-वण्णक-कण्णसोधणक-अंजणीसजाका-कुवठावण-कुंच-सूची-धूपण-गंधवि- धि-सव्यआहारगते सव्यभोयणगते भोयण-भायणगते भक्स-हरित-पुप्फ-फलगते सासा-सम्मिका-यतंसक ओयास-कण्णपी- लंक कण्णपूरक-गंदीविर्गद्धक कुलीयंधक-तिलक कुंडल-वल्लिका-तलपत्तक-मधुरक-मुहयासक-चंदे-सुज-णक्सत्त-गह-तारागण 30 पडिरू भावे भुत्तपीते चेति एवंविधसहरूवपादुम्भावे पासियं यूया। तत्थमगुस्सरतं पुव्याधारित द्धितं अवेट वेति। १°सु आमिसारिकेण है. त• विना ॥ २°सुभसारिकेण है. त• ॥३सपालिकाय है. त• चिना ॥ ४°क्खजोणि- गये है. त॥ ५ एकम्मिकाय ह. त•॥ ६ पाउको है. त• ॥ ७ य सहस्से है. त• विना ।। ८ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है• त एव वर्तते ॥९°त्य चउप्पदजो है. त०॥१० वियागरे मत है. त.॥११ °सु मच्छिका है. त• ॥ १२-१३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है• त• एवं वर्तते ॥ १४ °यचम्मक° ई० त० ॥ १५ °सक्किपाउकंतूणक' . त॥ १६ °सलाकी- फुच है. त• विना ॥ १७ णट्ठकफुरीएवतिलक ई० त० ॥ १८ °महयासक-चंदमुदणखग्गहलरोगहणपडि है. व०॥ १९ चंद-सजु-गक्खत्तह-गई है. त• विना ॥ २० पोसितं . त•॥ २१ उद्वितं मवेढें ई० त० ॥ - - १८४ भगविजापदण्णय तत्य उद्धंमागेसु उस्सितेसु य उहिवाय रतं वि व्या । वत्य सबसयणासणगते जाणि वऽण्याणि माणुसरस रतस्स मुवलिंगाणि एतेमु उवविद्वाय र ति घूया। सब्यसयणासणगते संविट्ठाय रतं ति यूया। सब्यावस्सयगते अवत्यद्धाय रख ति यूया। संविट्ठरते पुयाधारिते दक्सिणेसु य गत्तेसु देक्सिणाय विलोकिते दिसणे यावि सदम्मि पडिरूवम्मि दक्खिणे दक्खिणेण पस्सेण रलं ति बूया । यामेसु य गत्तेमु योमम्मि य विलोकिते वामे पसारिते यावि वामम्मि पडिपोग्गले वामेण रतं ति बूया । • तत्थ पट्टीयं सयणासणगते उकुजमायणम्मि यत्ये वा सह-रूव-गंधपादुम्भावे या एवंविधे तुत्ताणाय रतं वि दूया । तत्य गिकुने सयणासणे गिकुनमायण-भूसणे या पत्ये या समम्मि व पडिगते णिकुने य सद्द-रूवपादुन्मावे वा णिकुनाय सं ति चूया । वत्य सव्यचतुप्पदगते अधोमागेसु संधीसु वाहिरेसु ओगते ओलोइते ओसन्ने चेय एवंविधसह- स्वादुमावे ओणताइ र ति यूया । तत्य उयारितेसु गत्तेमु विसारितेसु गत्तेसु उम्भाय रयं ति वूया । तत्व एक.सु गत्तेसु एकामरणे एककोपकरणे एककपरामासे एकसाहागते चेव एकन्भगायं रतं ति बूया । पैसलिएसु 10 उप्पाएमु पडिरूवेमु पंसल्लिएसु पसल्लियवेलुफालिय रतं ति बूया । तत्य उत्ताणरतं तिविहं-उमयोसंविहं अद्धसंविट्ठ एकापविहति । तत्य सन्यापस्मिते उमयोसंविट्ठरतं, उरोपविहेसु अद्धसंविट्ठरतं, उदभागेसु उपविहरतं । तत्य पणतं तिविध-कडीगहितं चतुप्पदरतं रघजातं ति । सत्य जाणगते आसणगते पादगते जहण्णे पगते अघोणामीय गत्तामासे य फडीगहिताय र ति यूया । तत्य सन्धत्यरणगते सव्यचतुप्पयगते य चतुप्पयरत ति यूया । तत्य सिरोमुहोपकरणे सव्यआहारगते य रथप्पयाँतकं या रतकं ति] यूया । तत्य उपविठ्ठरयं चतुन्यिधं-सयणावत्यद्धं आसणावत्यद्धं साहा- 3 यत्पदं यरसावत्यद्धं चेति । तस्य स[यगोपकरणोपलद्धीयं घ सयणावत्यद्वरतं ति बूया । सब्बासणगते कडीयं वा आसगायत्यद्धरतं ति यूया । सव्यसाहागतेमु साहाअवस्सिताय रतं वि वूया । सव्वमूलगते सव्वमूलजोणीगते असेसु पाये हैं यक्सापत्यदाय रतं ति भूया। तत्य एकामासे एकोपकरणे एकचरेसु सत्तेसु एकपादुष्माये य सद-रूवाणं एवसि रतं ति यूया। तत्य सामाणेसु गत्तेसु यमलामरणके मिघुणचरेसु सत्तेसु बिसद-रूयपादुन्माचे विक्खुत्तो रतं ति यूया । तत्य भयंतरेसु नासातिके 20 पीसीसे तालुके हणुमंधिसु विकूणिए निकुने कोसिते लिविते जंभिते ओणामिते णिम्मजिते ओलोकिते तिके सिंघा- टके सम्पतिकसद-रूयपादुन्मा य तिश्युत्तो रतं ति यूया । तत्य पादवल-करतले मैं चतुरस्सेसु घउफेमु चतुरंगलिग्गहणे हमिते आविद्धमल-भूमणे उपसफिते उवेहे सव्यमोयण-सयणा-ऽऽमणपउरस्से पच्छेलिते आलिंगिते घुबिते मुत्ते पीते, चतुष्पदोपकरणे पनुप्पदणामधेने थी-पुरिसगते पतुष्पदरूयपादुम्माचे चतुक्युत्तो रतं ति यूया। सत्य हत्य-पाद-जाणु- समामासे मुट्ठीररणे इत्यामरणे पंचकसहपाउम्भावे य पंचसुत्तो रतं ति । तत्य "गंड-मणियंध-गुप्फामासे जिमलोदारणे एकके पंचकमहिए एपमापहिरूयगते य व्युत्तो रतं ति। तत्य छम पा एकमहिएमु पंचसु या दुगसहिएसु पउनु मा तिगसहिएम दोमु या विगेमु एकासहिएमु निदुगेमु एमागसहिएमु सत्तए या सह-रूयपाउम्भावे गतगुतो रन वि यूया । सत्य सलाहमम्झे परमझा एकेकअहकोदीरणे अट्टफे या आमामसर-रूपपादुम्माचे महसुत्तो लं पूया । मत्य पग-पंचकोरणे ठिक-एफलोदीरणे रिक-मत्तकोदीरणे एषा-अट्ठयोदीरणे गयसर-रूपपादुन्माये या गामुगो लंति पूया ! सत्य सिरो-पाद-अंजलिकरणे फच्छमारणे पादसमागणे जमलांचफोदीरणे पड़पा-उपयो. दीरणे गणरणकोदारणे तिअ-मोदीरणे पियअहकोदारगे दसए या आमासमर-रुटिपोग्गलपाउम्भावे दसयुधो १९पिरागे य... ॥ २ यामसि २ • •॥ ३ मोपारितेसु ..॥ ४ एकमग्गार्य 1. त•n ५पगसिएरा गुणापुरत.॥ ६ पासहिर्ग १ • ॥ ७°यायकयारय घ्या ...॥ ८ सापाय' • त. मागमजोर... पिना १. पगियापार..॥ १मरोगु... मिना ॥ १२ सुमयर' रा." १५गिर शिपिए...॥ १४° परपर गै। पु.॥ १५ पयेति ३ पु.॥ १६ 'रामागमामाले 1. १७ गपमान... १८ पयागरपारम्माये .. विना मलित पार 1.स. २० 'परिपुष्पा't.c.in , एगतालीसइमो वरियगंडियन्झाओ रतं ति चूया । अतो उद्धं अण्णेण समाजोगेण विकप्पणाय आमास-सद्द-रूव-पडिपोग्गलपाउभावेहि गणणापरिसंखाणि रतेसु वा जोजयितव्यं भवति । तत्थ विगतेण वीभत्येण परिमंडले गुदे रतं ति बूया । परिमंडले गाभीय रतं ति यूया । उण्णते थगंतरे रतं ति बूया । हत्थगते थिग्गलगते य पाणिणा रतं ति । इति विगतरताणि। तत्थ उवाएसु उवाताय रत, सामेसु सामाय रतं, कण्हेसु कालिकाय रतं, दीहेसु दीहाय रतं, रस्सेसु रस्साय रतं, थूलेसु थूलाय रतं, किसेसु किसाय रतं ।। बालेसु वालाय रतं, ययत्थेसु घयत्थाय रतं, मझिमेसु मज्झिमाय रतं, महव्ययेसु महव्ययाय रतं । वंभेजेसु भणीय रतं, खत्तेजेसु खत्तिकाय रतं ति यूया, वेसेजेसु वेस्सीय रतं, सुद्देजेसु सुद्दीय रतं, मूल- जोणीगते कसिगोरक्खभजाय रतं, दढेसु कारुकभजाय सह रतं, थलेसु ववहारीभजाय सह रतं । पुण्णामेसु सपतिकाय सह रतं, थीणामेसु ससपतिकाय सह रतं, णपुंसकेसु पउत्थपतिकाय सह रतं । दढेसु अविधवाय सह रतं, अमुकाय अवहिताय सह रतं, चलेसु अणवत्थिताय सह रतं चलचित्ताय त्ति । णिद्धे उदुणीय सह रतं, चु(लोक्खेसु 10 अणुदुणीय सह रतं, ति चूया, लुक्खाय विसदाय [व] रतं धूया। 50 कण्हेसु दुस्सीलाय सह रतं तणूसु सुकेसु अद्धसंयुताय रतं । अन्भंतरेसु अभंतराय सकाय थिया रतं, बाहिरेसु परभजाय रतं ति, वाहिरभंतरेसु मित्त- भजाय सह रतं ति बूया । रायचिंघेसु पडिरूवेसु रायपुरिसपडिरूवेसु य रायपुरिसपडिपोग्गले य रायपुरिसभारिकाय सह रतं । जस्स जं चिंध पडिपोग्गलपडिरूवं या तेण तस्सोवजीवकभारिकाय सह रतं । राणीहारे परिचारिकाय सह रतं । » गहणेसु परूढणख-कक्खरोमाय रतं, उपग्गहणेसु अचिरपरूढनह-रोमाय रतं, आकासेसु रमणीयेसु 15 सुपरिमजितणह-कक्ख-वत्थिसीसाय रतं ति वूया । पुधूसु पुधुउपधाय रतं, संखित्तेसु संखित्तभगाय सह रतं, परिमंडलेसु परिमंडलभगाय सह रतं, चउरस्सेसु चउरस्सभगाय, रातिअंसेसु - तिअंसभगाय सह रतं । असंख- तेसु अमेहलाय रतं, संखतेसु समेहलाय रतं । कण्णेयेसु कुमारीय सह संकेतो ति, जुवतेयेसु जुवतीय - सह - रतं ति, अतिवत्तेसु विविधाय रतं । र उत्ताणेसु उत्ताणभगाय सहरतं, गिण्णेसु णिण्णभगाय सह रतं । पसण्णेसु पसण्णा- य सह रतं, अपसण्णेसु कुद्धाय रतं । सद्देयेसु चित्ताय या मुदिताय या विस्सुयकित्तीय वा पक्खाताय या सह 20 रतं ति बूया । दसणीयेसु सुरूवेसु दंसणीयरूवसंपण्णाय सह रतं, गंधेयेसु सुगंधाय पहाणा-ऽणुलेयण-मल्ल-गंधसंपुण्णाय सह रतं ति बूया । रसेयेसु मधुराय मधुरलयणाय रतिरसगुणसमण्णागयाय बहुभक्ख-पेय-रसगुणसमण्णागतं रतं ति यूया। फासेजेसु फासाय फासगुणसमण्णागयं रयं । मणेयेसु इट्ठाय थियाय सह रत, भुमकाय भिउडीरतं, अक्खिसु णिकाणितं यूया, मुहे चुंवितं घूया, ओढेसु खयं यूया, वाहूसु आलिंगियं धूया, उच्छंगेसु उपविढं यूया, पहेसु णक्खपदं यूया, दंतेसु दंतपरिमंडलं दंतखयं वा धूया । तणेसु सयं चूया, समेसु घोसवंतेसु य गीतरतं घूया, सद्देयेसु 25 हसियं चूया, आहारोपगएसु आहारियं वूया, णिमिसिएंसु कण्हेसु पुसुयं चूया, तिक्खेसु सोणियओघायणं घूया, तुच्छेसु सुदाय रतं यूया, कण्णेसु पडियाय रतं वूया, अप्पसण्णेसु विवादं घूया, अभिकोमेसु रतं चूया । तत्य काले पुव्याधारिए कंसि काले रतं ? ति-कण्हेसु रत्तिरतं ति, सुकेसु दिवा रतं ति वूया, सामेसु संझाकाले रतं यूया, कण्हेसु आदिमूलीयेसु पदोसे रत, सुकेसु आदिमूलीयेसु अवरण्हेसु रतं, सुकमन्झविगाढेसु ममंतियए. रतं बूया, कण्हेसु मज्झविगाढेसु अद्धरत्ते रतं, सुकेसु अंतेसु अवरण्हे रतं घूया, कण्हेसु संतेसु पसे रतं । तत्य आधारयितू आधारयितू रयण(णि)रतं ति केण या सह रतं ? देवेण या देवीय या ? मणुस्सेण या मणु- स्सीय या १ तिरिक्सजोगिएण वा तिरिक्सजोणीगीय वा? किंजोतीयेण किंरुवेण किंवयेणं किंअलंकारेणं किंसील-मावा- - 30 १ यालायेसु है. त• विना ॥ २ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. व. एव वर्तते ॥ ३ एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त. नास्ति। ४ पहिट्ठाय रत है. त०॥ ५ 'सु फट्टाय हं• त.॥ ६ व्या, अद्धेसु है. त• विना ।। ७°सिप करणेमु भुसुनुं यूया है. त•॥ ८ फण्हेसु ति०॥ ९ मिक्सामे ति॥ १०°मूलेन • तविना ॥ ११ 'मु अंतेसुप है. त. विना ॥ १२ रयित्तु आधारयित्तु रय'. त• विना । १३ जाईतेण है.. विना ।। अंग०२४ मंगपिनापहाय चारलं ? फवं मेरितं मेरगागार-गिता-ऽगितमेरणा यत्ति ? सि देससि आसग-संयग-अपरसयविधीमु या ? गीत- पात-मित संसारिप-आलिंगित चुंविर मदतरसम्गादप-आगारविगारविहिं या सह-रूप-रस-गंध फास-पडिभोग-इहा. नियति या १ मम्मोह-विणद-अभिप्रेत अगाभिमेय-पडित-मुद्दय-अणुलोम-अगणुलोमतादिकानि विविधानि तानि फेवनियुनो या ? 'मि या कालंसि तंति ? । एतागि सम्यागि ठागाणि अणेगेवियभेद-गमानि अगादि दानदीदि उपलब्धानि मनि । आमाम-मह-रूप-रम-संधपहियोगलेहिं सम्माणि अणुगंतवाणि भांति ।। ॥ इति मलु भो ! महापुरिसदिप्णाय अंगविनाय रहस्सपंडलो णामझाओ एगतालीसइमा सम्मत्तो ॥४१॥छ । [पापालीसइमो सुविणज्ज्ञाओ] नमो महारपद्धमानाय । नमो भगवतो जमाती महापुरिमरम । अधापुञ्यं मलु भो ! महापुरिमदिपाय 10 भरिताय मुग्गिो पामझायो । तं गतु भो ! यस्गरमागि । तन्य दिटो मुविणो ण दियो अपत्तदिवो सुविगो' प्यमापारविषयं भी । सत्य अन्मंदरामामे ददामासे निद्वामासे मुदामाम पयलाइए पमुत्ते पाच- परामागे नि यिनं मुचित ति यूया । नन्य पम्झामागे पलामामे लुग्गामासे फपदामासे पनिटो मुरिगो ति पूपा । दन्य पादिरम्भनरम्मि टपटम्मि निदाटुग्यग्नि पीहाराहारमिति अव्यत्तं हिं मुवि ति यूग । सत्य परगुन्नि मांगनीगु य मन्यमानामु य मन्यगर गोरोगेमु य दिहं मुविगं यूया । मुभेगु मुभं अमुभेगु अनुमं 1st गुपितं पूा। गय करमुढे कोटिए फिटस्लिादिए मेपैडयायामामरणहिरण-गीय-याइय-ती-नल-गाल-मन्य- भास्त्री नगरोन्नती गगरोगनिमुपलमने मन्य मुग्गेि मुंतं पूा, हं गुनं यूया, अगिटेमु भनित गुरं पूनमा गिपिने सिम्मिपिते पोभरमग मगंधाग्ने गवाजोगीगने गवगंध- मोजामिने य पार गंध मुगे पूग, गुभेगु मुभं गंधं पानं पूरी, अगुभेमु अशुभं गं पानं पूरा । सत्य अली--पर-सरमा दलित अगागिरी मंगविने परिलीट पानी-पराग-नि-ग. मागे मराठी गापाररियर पा माहारि गुम पूग, गुभेगु मुभं भादरि, अनुभेगु समुभं पूरा मागे गार गागागाने मरगनागमो समसामदिरापाने र पागमा मुहिम पूज, शुभ गुमं पाग गुमे भगुभ परयामामे नगामाम] परमामागे गुलामागे दंगरा- मिमा प्रगगमा हिमादिरामामे गारवानियतं गुपित Eritreी मानक पून। मिगु मामागु भार गरी पूल । भोट मागु गु य ग ग ग पूल । मेगु गर. Hi Teri T। मागु गfers friftiगुन । भागेगु Trferrittyfie Kri पूनरिमाग गरि mili ग'... bra न .. ३ ताािtor : viinit... * * * * * * "Maitman't.rurn पपिmt.ru Rt...tra ! ... in turt १६.ra-mrit...mi.. २५ गुप... गंगे 10'Nort.r.furs Hum...irs 5 वायालीसइमो सुविणज्झाओ १८७ सुविणं दिडं चूया । थीणा[मा]मासे थीणामामासेसु सव्वेसु सव्वत्थीपडिरूवगते य थीदिदं बूया, " पुण्णामेसु पुरिसदिढं सुविणे वूया, णपुंसकेसु णपुंसकदिलै बूया । तत्थ दिव्वेसु पुव्वाधारितेसु देवो देवि त्ति पुव्यमाधारयितव्यं भवति । तत्थ पुण्णामेसु देवो दिह्रो सुविणे त्ति धूया । थीणामेसु दिव्वपादुन्भावेसु देवी दिवा सुविणे त्ति बूया । देवोपलद्धीहि य सैद्द-रूवपादुब्भावेहि य णातव्याणि भवंति । इति दिव्योपलद्धिसुविणे दिट्ठा उपलद्धव्या भवंति । तत्थ माणुसे पुव्याधारिते माणुसा तिविधा, तं जधा-मता संपदा अणागतं त्ति । तत्थ पच्छिमेसु गत्तेसु १ मतेसु » य मतं मणुस्सं सुविणे दिढं चूया । वामदक्खिणेसु गत्तेसु वत्तमाणेसु य सह-रूवेसु जीवंतं मणुस्सं सुविणे दिर्से बूया । पुरिमेसु गत्तेसु अणागतेसु य सद्द-रूवपादुब्भावेसु अणागतं मणुस्सं सुविणे दिडं चूया । तत्थ तिविधा-थीओ पुरिसा णपुंसका इति । तत्थ थीणामे थियं धूया, पुण्णामेसु पुरिसं बूया, णपुंसकेसु णपुंसका विण्णेया। तत्थ थी-पुरिससिरोमुहामासे वंभणं सुविणे दिडं घूया, वाहूअंतरेसु खत्तियं, पट्ठोदरे वेस्सं सुविणे दिढ बूया, पाद-जंघेसु 10 सुदं दिलु बूया । तत्य घये पुव्याधारिते पाद-जंघासु बालं दिढं यूया, वाहूसु अंतरंसे य मज्झिमवयं दिहं धूया, सिरोमुहे महव्वयं दिढं बूया । अवदातेसु अवदातवण्णं दिलु वूया, सामेसु सामवण्णं दिहं बूया, कण्हेसु कालक दिलु बृया, ठियामासेसु मिस्सकेहि तधावण्णसाधारणं दिळं बूया । तत्थ ठाणे पुव्याधारिते उद्धं णाभीय अजवाणं इस्सरं दिलं घूया, अधत्था णाभीयं उवार जाणूसु अवत्तपेस्सं दिडं बूया, पाद-जंघासु पेस्समेव दिटुं यूया, पादेसु दासं दिढं बूया, “य उवरि थणेहिं अधत्था गीवाय अजवाणं विसिहं घूया । जो तु गुरुत्थाणे उपरि ग्गीवाय 15 अधत्था भमुहाय अन्नवाणं गुरुत्याणीतं दिडं धूया, एताणं उद्धं गुरुणो गुरुदिढं बूया । वामेसु पुण्णामेसु थीसणाम दिलं बूया, वामेसु थीणामेसु थीसामण्णयं थीगमेव दिलं यूया, दक्खिणेसु पुण्णामेसु पुरिससामण्णयं पुरिसं यूया, दक्खिणेसु थीणामेसु पुरिससामण्णयं महिलं धूया । पुरिसणामे पुरिसणामेसु अधोभागेसु पुत्तं दिळं बूया, पुरिसणामेसु पुरिसभागेसु पयत्तेसु उद्धंभागे पितरं यूया, पुरिसणामा पुरिसणामेसु पयत्तेसु समभागेसु भातरं घूया, पुरिसणामा थीणामेसु पवत्तेसु अधोभागेसु दुहितरं वूया, पुरिसणामा थीणामेसु पवत्तेसु समभागेसु भगिणिं वूया, पुण्णामा थीणा- 20 मेसु पवत्तेसु उद्धंभागेसु मातरं धूया। थीणामेसु पयत्तेसु थीणामा उद्धंभागेसु थिया मातरं बूया, थीगामा थीगामेसु पयत्तेर्स थीसमभागेसु थिया भगिनि दिद्वं बूया, थीणामा थीणामेसु पयत्तेसु अधोभागेसु थिया दुहितरं चूया । तत्य थीणामा पुण्णामेसु पयत्तेसु अधोभागेहुँ जामातरं घूया, तत्थ थीणामा पुण्णामेसु पयत्तेसु समभागेसु भगिणिपतिं दिडं घूया, थीणामा पुण्णामेसु पवत्तेसु उद्धंभागेसु सँसुरं यूया । थीसंसहेसु आमासेसु पुणो पुणो आवलिं वूया-थीसंसहेसु पुण्णामेसु वाले यूया, अभंतरेसु अभंतरं दिढं बूया, वाहिरव्भंतरेसु मित्तं दिदं धूया, पाहिरवाहिरेसु जणं दिळं 25 बूया । इति मणुस्सं सुविणे दिहँ आमास-सह-रूवेहिं यूया । तत्य तिरिक्खजोणियं पुव्याधारित तिरिक्खजोणि पंचविधमाधारये, तं जधा-पक्सिगतं चतुप्पदगतं परिसप्पगतं जलचरगतं कीड-किविल्लग-दंस-मसगगतं ति । तत्थ उद्धं गीवाय सिरोमुहामासे उल्लोगिते उद्धंभागेसु सव्यसगुणगते सव्व- सगुणोपकरणे सव्यसगुणमये उपकरणे सव्यसगुणोपकरणणामधेने सव्वसगुणणामधेने य थी-पुरिसगते एवंविधसह-रूप- प्रादुन्भावे सगुणं दिहं सुविणं धूया । ते दुविधा-जलचरा थलचरा वेति । तत्य आपुणेयेसु सम्रउदगचर-उद्कोपकरणपा- 30 दुभावे जलचरा दिहा विण्णेया। लुक्खेसु थलेसु थलजेसु थलचरेसु थलोपकरणे थलोपकरण-थलज-धलजरणामधेने सद्द-रूवपादुद्भावे य थलजा पक्खी सुविणे दिहा भयंति, सुभेसु सुभो असुभेसु असुभो पक्खी दिट्ठो भरति । । . १ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. त० एव वर्तते ।। २ सद्दपडिरुचपा है• त.। सहरूपपडिरूयपा शि.॥ ३ याहुभंत' है. त•॥ ४'या, विसामा' है. त•॥ ५ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः ई. त• एव वर्तते ॥ ६ "सु सम है. त-विना ।। ७"सु मातरं हं. त.॥ ८ ससरं है. त•॥ ९ उद्धंगए मासेसु है. त०॥
१८८ -- 6 अंगविजापइण्णयं तत्य चतुष्पदेसु चतुरस्सेसु चउक्केसु चतुप्पदउवकरणे चतुप्पयमयेउवकरणे चउप्पयणामधेजउवकरणथी-पुरिस- सद्दपादुभावे चतुष्पदं दिखै सुविणे चूया । ते दुविधा-थलजा जलजा चेति जधुत्ताहिं उपलद्धीहिं उपलव्या भवति । ते तिविधा पुणरवि उपलव्या-गम्मा गम्भारण्णा आरण्णा चेति । ते यधुत्ताहिं उपलद्धीहिं उबलद्धब्बा भवंति संठाण-वण्ण-घोस-आहार परिभोगविहि य उपलभिउं सुविणे दिढें घूया । तत्य दीहेसु चलेसु तिरियभागेसु य सव्यपरिसप्पगते सव्यपरिसप्पउवकरणगते परिसप्पमये उवकरणे परिसप्प- णामधेजे उपकरणे धी-पुरिससद्दपाउम्भावे या परिसप्पं बूया । ते दुविधा-थलजा जलजा य । जधुत्ताहिं उबलद्धीहिं संठाण-वण्ण-संघात-घोस-विरिय-आहार-परिभोगविधीहि य उपलभितुं सुविणे दिळं वूया । तत्य अणूसु चलेसु सव्यखुद्दपाणेसु खुद्दपाणणामधेने उपकरणे थी-पुरिसगते सह-रूवपादुद्भावे य कीड-किवि- लग-दंसमसगे सुविणे दिडं यूया । ते दुविधा-थलजा जलजा चेव । अधुत्ताहि उयलद्धीहिं संठाण-वण्ण-घोस-पडिभोग- 10 विधीहि य उपलभिउं सुविणे दिहं यूया । दिव्य-माणुस-तिरिक्खजोणियसाधारणोपलद्धीहिं साधारणे दिढे यूया। मिस्स- गामासेहिं दिव्य-तिरिक्सजोणिगेहिं मिस्से विट्ठो धूया । तत्य रूया-ऽरूवगते अजीये सुविणे पुव्यमाधारिते रूयगतं अजीवं तिविधमाधारये-पाणजोणीगतं मूलजोणीगतं धातुजोणीगतं । तत्य घलामासे पाणजोणिगते पाणजोणीउवकरणे पाणजोणीमये उवकरणे व पाणजोणी णामधेजे उपकरणे थी-पुरिससदपाउदभावे पाणजोणीगतं अजीयं रूवगतं सिविणे दिडं चूया। तत्थ केस-मंसु-लोमगते सव्यमूल- 10 जोणीगते मूलजोणीउपकरणे मूलजोणीणामधेने उपकरणे थी-पुरिसगते य सद-रूवपादुभावे या मूलजोणीगतं अजीय- रूयगतं सिविणं दिदं यूया । तत्य दढामासे सव्यधातुगते सव्वधातुजोणीगते य सबधातुजोणीउपकरणे धातुजोणीमये उयकरणे धातुनोणीउवकरणे धातुजोणीणामपेजे उपकरणे थी-पुरिसगते या धातुजोणीगतं अजीवरूवगतं सुविणे दिडं घूया। तत्य सदगते मुविणे पुज्वाधारिते सदगतं सिविणं तिविधमाधारये, तं जधा-भासासहगतं आतोजसइगतं परा- घातसहगतं चेति । तत्य तिविधमाधारये-जीवसमाजुत्तं 7 अजीयसमाजुत्तं च जीवाजीयसमाजुत्तं चेति । तत्थ 20 सरेयेहिं भासासरे आतोजसदे परापाते य भेद-संघायसमुत्थितेहिं सद्देहिं पहिवेहिं आतोन्जउयकरणपादुन्भावेहि य उयलभिडं सदगतं इहा-ऽणिसदगतं सुविणं दिदं घूया । तत्य गंधगते मुविणे पुत्र्याधारिते गंधगतं मुविणं दुविधमाधारये-सुमगंधं असुभगंधं चेति । तत्य मुगंधपरामासे मुगंधसाद-रूयपादुम्माये य मुभं गं, मुविणे पातं ति यूया । दुग्गंधपरामासे 4 किलिहपरामासे - दुग्गंधसह- रूपपादुम्भारे य अमुमं गंध मुविणे घायं । तत्य गंधं पुणरवि मुमा ऽसुभ तिविधमाघारये-पाणलोणीगतं मूलजोगीगतं 25 धातुजोणीगतं ति । सत्य अधुत्ताहि पाणलोणी मूलजोणी-धातुजोणीउपलद्धीहिं उपलभितुं सद-रूवपादुन्भावेहि य विविधजोगीयं गं, मुभा-ऽमुभं मुपिणे दिदं घूया । तत्य रमगते मुषिणे पुख्याधारिते - रमगते - सुविणे तिविधमाधारये, तं जपा-पाणनोणिगतं मूलजोणिगर्न पातुजोगिगतं । सत्य अधुत्तादि उपलद्धीदि तिविहजोणिो रसो उपलक्ष्यो भवति । अव्यापण्गजोणीआमास-सर-रूप- पारमायेगं अचारण्यो रमो उपलव्यो भवति मुभो। यायण्णजोगीआमास-सह-रूयपादुम्मायेण यावण्णरसो उपलद्धच्यो 0भयारी भगुभो । सन्य रमे निविषज्ञोणीयं पुणरवि एविधमाधारये, तं उधा-तितकं अपिलं लपणं पटु पसायं मधुर- गिणी। नत्य सम्भंतपमासे ददामामे गिटामारो गपुरेमु यमद-स्यपादुम्मायेसु मधुरं यूया । सत्य तिरसामासे दारुणामासे पमामासे पटुगेगु य सर-स्यपाउमायेगु पदुगं सूया। घायण्गेमु आमासेमु अयिलेमु सा-रूपपाउन्माषेमु अपिलरमं गुपिग गयि यूग। सत्य पागापरामागे आसगारामासे पोरमपरामासे सध्यमापुगेयेमु अमुगल-सिंपागग-परमपण-गव्य- भारपणा. एरवी २८ एपिान्तर्गतः पाठः ..माति।। ३ पारिशान्तर्गत पार.... र ४' पगदि .1 +६०-ललित परत माता ७ मामासमोणीमामार... - 15 यायालीसइमो सुविणज्झाओ सोयदूसिकापरामासे लवणरसंसद्दपादुब्भावे य लवणरसं सुविणे सेवितं बूया। तत्थ विमुत्तेसु विसयेसु परिवहेसु य सव्यक- सायसद्द-रूवपादुन्भावेसु कसायं रसं सुविणे पडिसेवितं धूया । तत्थ चलामासे अंतेसु य सव्यतित्तकसद-रूयपादुभावेसु य तित्तकरसं सुविणे सेवितं चूया । एवंविधजोणीयं रसं छव्विधं जधुत्ताहिं उवलद्धीहिं उबलद्धव्यं सुविणे दिळं वूया । तत्य फासगते सुविणे पुव्वाधारिते फासगतं सुविणं तिविधमाधारये, तं जधा-सजीवफासगतं १ अजीवफासगतं २ मिस्सकं जीवाजीवसंजुत्तं ३ चेति । तत्य सजीवेसु चलामासेसु य सजीवसद्द-रूवपादुभावेसु य सजीवं फासं । [सुविणे सेवितं ] बूया। अजीवेसु मयेसु य अजीवसद्द-रूवपादुम्भावे य अज्जीवं फासं सुविणे सेवितं चूया । वामिरसामासे सज्जीवअजीवेसु य सद्द-रूवपादुभावे मिस्सकं फासं सुविणे सेवितं यूया । तत्य सजीवो फासो दिव्य-माणुस्स-तिरिक्खजोणिकादीहिं जीवजोणीहि उवलद्धव्यो भवति । अजीवो फासो अजीयोपलद्धीहि पाण- जोगी-मूलजोणी-धातुजोणीआदीहिं उपलव्यो । मिस्सको फासो मिस्सकोपलद्धीहिं मिरसको उवलद्धव्यो भवति । तत्थ फासो पुणरपि अट्ठविधो' उवलद्धव्यो, तं जधा-कक्खडो मउको गुरुको लहुको सीतो उसिणो गिद्धो 10 लुक्खो चेति । तत्थ दढामासे तिक्खामासे दारुणामासे सव्यकक्खडपडिरूव-सद्दपादुद्भावे कक्खडं फासं वूया । तत्य मउकामासे सव्यमउकसद-पडिरूवपादुभावे मउकं फासं सुविणे सेवितं चूया । तत्थ अभंतरामासे दढामासे उत्तमामासे सव्यसारगते य सव्यसारमंतपडिरूव-सद्दपादुभावे गुरु-गारवसह-रूयपादुभावेसु य गुरुफासं सुविणे सेवितं बूया । तत्थ बज्झामासे चलामासे तुच्छामासे जैहण्णामासे सव्वीहारगते सव्यक-लहुस-तुच्छसारजम्मपडिरूव- सद्दपादुल्भावे य लहुकं फासं सुविणे सेवितं वूया । तत्थ गिद्धामासे सव्वणिद्धफासपडिरूवसद्दपाउभावे णिद्धं फासं सुविणे सेवितं ति बूया । तत्थ लुक्खामासे सव्वलुक्खपडिरुव-सद्दपाउन्भावे य लुक्खं फासं सुविणे सेवियं घूया । तत्य सब्बआपुणेयेसु सव्वसीयफासदव्योपकरणे पडिरूव-सद्दपाउब्भावे सुपिहिऐ पागुए उवगूढे पाविविए लुक्खसिए हेमंत- उज्जसदभयमाणेसु य आहारोपकरण-सयणा-ऽऽसणपरिच्छदपरिभोगपाउभावेसु सद्द-रूवेसु य एवंविघेसु सीतं फासं सुविणे सेवियं बूया। तत्थ अग्गेयेसु सव्वअग्गिगए सव्यउसुमागए छा सबउँसुणागए सव्यउसुणसद्द-पडिरूयपाउन्मावे य उसुणं फासं सुविणे सेवितं धूया । एवं जधुत्ताहिं उवलद्धीहिं सह-रूव-रस-गंध-फासगताहिं क सुंभा-ऽसुभाहिं 20 आहारयिर्ड सद्द-रूव-रस-गंध-फासगयाओ का सुविणे सेवणाओ विष्णेया भवंति। इति विसयगतो विण्णेयो सुविणो ति। तत्य चलेसु णटुं वा पावासिकं आउरं वा सुविणे दिडं बूया । तत्य अभंतरेसु चलेसु य पहं चूया। बाहिरेसु चलेसु य पावासिकं दिटुं वूया। पुण्णामेसु पुरिसं दिढं यूया। सम्मे सम्मदितेसु चलेसु आउर दिदं वूया। पद्धेसु पद्धं दिहं, मोक्खेसु मोक्खं दिदं धूया । तणफय-कुक्सि-गाभि-उच्छंग-पोरुस-अंगुट्ठ-कणेटिकापरामासे पयासंतरेण दिदं धूया। - पुण्णामेसु पुरिसं दिलं वूया । थीणामेसु थियं दिटुं धूया । णपुंसकेसु णपुंसकं दिटुं चूया । दढेसु सारिउपकरणं 25 दिडं चूया । ~ कण्हेसु असारिउपकरणं दिहं चूया । तंवेसु सुवण्णकं दिदं वृया । सुक्के रुप्प वा कोहायणे या घूया । सुकेसु दढेसु रुप्पं चूया । चित्तेसु सुकेसु दढेसु य कौहावणे चूया । णपुंसकेसु णिरत्यकं सुविणं दिदं चूया । णीदारेसु हाणिं सुविणे दिदं वूया । आहारेसु यद्धिं सुविणे दिहं वूया। घेण्णउचलद्धीयं सव्यवण्णगए य रणं दिडं घूया । जा णिण्णेसु णर्दि या कूर्म वा तलागं वा पुक्सराणिं वा वार्षि वा समुदं वा दिहं चूया । उहिसु फू दिलं धूया। जाणिणेहुँ वित्थिण्णेसु सण्णिरुद्धेसु य वलागं दिदं वूया। चउरस्सेसु मुदितेसु य पुक्सरणिं वूया। परस्सेसु 50 १'सोयग से ३ पु०॥ २°घो णातव्यो सि० ॥ ३ जण्हामा ६० तचिना ॥ ४ सय्यलफलफुसतुच्छ- सारसम्म . त०॥ ५°हिए सुवगूढे पधिगते उलुकुसिते हेमंतउपसद्द है. त• विना ॥ ६ हम्नचिटान्तर्गतः पाठः है. स. एव वर्तते ॥ ७-८-९ उसुण स्थाने हं. त• विना उसण इति पाये वसते ॥ १० हस्तचिहान्तर्गतः पाठः .त. एव वर्तते ॥ १-4 एतचिहान्तर्गतः सन्दर्भःहै. त• नाखि॥ १२-१३ कहा है. त• विना ॥ १४-१५ दलविहान्तर्गदः पादः है. त• एव वर्तते ॥ २६°मु विच्छेसु रट्टेसु य है• त.॥
-- १९० अंगविज्ञापइण्णय वापि यूया । महायकासेसु य समुदं दिदं बूया । कसे सुत्तं वा अच्छादणं वा किसं वा थी-पुरिसं दिडं घूया । तत्य अजीवेसु केस-मंसु-लोमगतेसु सुत्तं या तंतुवितं वा दिदं वूया । तत्य वित्यतेसु अत्युतेसु परिहिते पाउते विट्ठणे व त्ति अच्छादणं दिलु घूया। थलेसु उण्णतं वा पञ्चतं या दिहं बूया । तत्य महावकासेसु दढेसु य पव्ययं दिदं बूया । गद्दणेसु अरणं वा पयतं या चूया । तत्य उण्णएसु गहणेसु पव्ययं चूया । णिणेसु 5 कंदरं वा दरि या चूया । समेसु समं गहणं दिदं वूया । उपग्गहणेसु रामं वा वणराई या दिद्वं घूया । परिमंडलेसु भायणं । पुधूसु किलंजं वा पुचि या दिढें धूया । तत्य पुधूसु दढेसु पुद्दविं बूया । जगेये जगं वा याधुजं वा दिढ घूया । अग्गेयेसु अग्गि दिडं चूया । गिद्धेसु उदकं या बुहि वा आहारं वा दिदं यूया । वत्य उपरिमेसु गिद्धेसु बुट्टि यूया । समभागेसु णिद्वेसु आहारं चूया । अधोभागेसु गिद्धेमु उदकं घूया । चउरस्सेमु चउप्पयं वा खेत्तं वा सुविणे दिडं चूया । तत्य चउरस्सेसु चलेसु चतुष्पदं यूया। चतुरस्सेसु दढेमु खेत्तं यूया । 10 वझेसु पावासियं यूया । पच्छिमेसु परस्स सुविणं दिहं घूया । पुरथिमेसु अप्पणो सुविगं दिडं बूया । वज्झन्भंतरेसु अप्पणो थ परस्स य सुविणं दिदं यूया । पुणरवि आधारिते अतिकंतो सुविणो अणागतो यत्तमाणो चि। पुरथिमेसु अणागतं सुविगं यूया । पच्छिमेसु अतितं सुविणं धूया वामदक्सिणेसु गत्तेसु वत्तमाणं संपदाकालियं सुविगं अणंतरं दिढं बूया । मतेसु मतकप्पं या मतं या दिडं चूया । रक्सेसु चोरियं दिढे सुविणं वूया । बामेसु आमरणं दिदं वूया । दीहेसु अडपिं दिलं चूया । हस्सेसु पुप्फफलं दिहं यूया । रमणीयेसु 1 इरिणं वा भहं या रमणीयं वा देसं दिदं सुविणे वूया । मुदितेसु उस्सयं वा समायं वा दिहं बूया । दीणेसु उपसरग वा दणि वा धी-पुरिसं दिडं चूया | पैरसतेसु उरसयं या याधुज़ या दिई बूया । उद्धंभागेसु दिव्यं दिई वूया । कण्णपवेसु सव्यवाहणगतं चतुप्पदं या दिढं बूया । तिखिणेसु जोग-खेमं दिडं चूया । केस-मंसु-लोमगतेसु मूलजोणिगवं वूया । अंतेसु सबंधण्णगतं यूया । सामेसु संपयोगेसु मेधुणं दिडं धूया । वालेयेसु घालं दिळं वूया । जोवणत्थेसु जोयणत्यं दिहं यूया । मझिमवयेसु मझिमवयं दिढे यूया । मझिमसाधारणेसु मझिमसाधारणं 20 दिदं वूया । जघण्णेसु जघण्णं घूया । जधण्णसाघारणेसु जघण्णसाधारणं वूया। तत्थ पुणरवि पुरथिमेसु अमिकं- खिवं दिदं बूया । पच्छिमेसु अणुमुत्तं चूया । वामदकिरणेसु उयभुञ्जमाणं दिदं चूया ! पुणरवि पसण्णेसु सयसम्मो- इगते य सम्मोई मुविणं दिहं घूया । वियादेमु दीणेसु सव्यविग्गहगते विग्गई वा विराई वा सुमिणे दिदं यूया । उबहुतेसु सबछेजगते य छेनं घूया । अभवरेसु अप्पणो सुविणं दिदं यूया। बाहिरेसु चाहिरेण सुविगं दिदं यूया। तत्य कंसि देसे सुविगो दिहो ? ति पुव्यमाधारिते अभंतरेमु अमंतरणगरे सुविणं दिलं घूया । अभंतरमंतरेसु 25 अन्मंतरणिवेसणे सुविणं दिदं धूया । वाहिरेसु बाहिरिकायं सुविणं दिडं बूया । ॐ घोहिरवाहिरेसु बाहिरिकार्य सुविणं दिहं बूया । हुन [तत्य] दिसासु आधारितासु पंसि दिसायं दिट्ठो सुविणो ? । तत्य पुरथिमेसु पुरथिमायं दिसायं [दिहो] सुविणो त्ति चूया । पच्छिमेसु पच्छिमायं दिसायं दिवो सुविगो । दक्सिणेसु दक्सिणायं दिसायं दिट्ठो, यामेसु उत्तरायं । दिसाओ विदिसाओ य वामदक्सिणेहिं पुरत्यिमपच्छिमेहि य साधारणेहिं णातव्याओ आमासेसु भवति । तत्य काले पुयाधारिते कंसि काले दिह्रो सुविणो ? ति । तत्य कण्हेसु रर्ति सुविणो दिहो त्ति । सुकेसु संव्यप्रभागते य दिया दिट्टो मुविणो त्ति यूया। कण्हेमु आदिमूलेमु पदोसे मुविणो दिट्ठो न्ति । कण्हेसु] मैझिमवि- गाटेमु अद्धरत्तकालं दिवो त्ति । फण्हेसु अंतेमु पसे मुविणो दिहो। सुकेमु आदिमूलेसु पुष्यण्हे सुविगो दिट्ठो त्ति थूया । भज्झविगादेसु मुके मझण्हे दिट्टो मुविणो त्ति । सुकेमु अंतेमु अवरहकाले दिहो सुविगो त्ति बूया १पा कसि या हं. त•॥ २ या सब्बतं हं. त• विना ॥ ३ उस्मयं है. त• विना ॥ ४ या दिट्टणं या है. त• ॥ ५पसंतेसु ह. त•॥ ६ कण्हप इं. त•॥ ८°रवि सस्सेसु सभ्य . त•॥ ९ हस्त- विद्वान्तर्गतः पाठःहत. एव वर्तते ॥ १० सप्पमा है. त-॥ ११ मन्झवि लि०॥ १२ मज्झिमगा है. त.॥ 30 - -- ७°व्याण्ण° ई.त.॥
तेयालीसइमो पवासज्झाओ एवं पक्खोपलद्धीहिं सुक्कपक्ख-कण्हपक्खा उबलद्धव्या भवंति जघा पुन्यमुद्दिढ । उतुउपलद्धीहिं उदू उप- लद्धव्या छप्पि भवंति जधा पुव्यमुवदिढं। एवं सव्याहिं आमास-सह-रूप-रस-गंध-फासपडिरूवोवलद्धीहिं आधारयितुं मुविणे सैव्यत्ताणुगंतव्यं भवति ॥ ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय सुविणो णामाज्झायो वायालीसतिमो सम्मत्तो ॥४२॥ छ । 5 [तेयालीसहमो पवासज्झाओ] । णमो भगवंतो जसवओ महापुरिसस्स । अधापुव्वं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पवासो णामा- ज्झायो । तं खलु भो ! वक्खस्सामि । तं जघा-तत्य अत्यि पवासो णत्यि पवासो त्ति पुचमाहारियव्वं भवति । तत्थ वज्झामासे चलामासे सव्वणीहारगते सबैमोक्खगते उवाहण-छत्तगते सव्यवाहणगते सब्बजाणगते पत्थित-पधित- पधावितसव्वचतुप्पद-पक्खि-सिरीसिव-बारिचर-कीड-किविल्लगगते उवाहणआवंधणे छत्तकग्गर्हणे तप्पण-कत्तरिका-कुंटि- 10 कुक्खलिकापादुब्भावे पंथ-पवा-गदी-पव्वत-तलाग-गाम-गगर-जणपद-पट्टण-सन्निवेसे असमरंगावचर-पासंड-दूतपरिधावके एवंविधसद्द-रुवपाउन्भावे अत्यि पवासो त्ति वूया । तत्थ अभंतरामासे दृढामासे सव्यआहारगते सव्यसंवाधगते सव्वत्यावरगते सव्यणिवेसितगते सव्यअपरिधावकगते एवंविधसद-रूबपादुन्भावे त्थि पवासोत्ति बूया। तत्य पाद-जंघ- पादुकोपाणहच्छत्तकएवंविधसह-रूयपादुम्भावे पादेहिं पवासं गमिस्सति त्ति यूया । तत्य उद्धंभागेसु चलेसु सव्यजाणगते सव्यवाहणगते सब्बजाण-वाहणोपगरणगते जाणेण वा वाहणेण या पवासं गमिस्सति त्ति धूया। तत्य 15 मुदिएसु मुदितमाणसो पयासं गमिस्सति त्ति बूया । तत्य पवासे पुव्याधारिए दीहेसु दीहं पयासं गमिरसति ति घूया । ॐ रस्सेसु रस्सपवासं गमिस्सति त्ति चूया। च पुण्णामेसु राजपोरुसेण पवासं गमिरसति त्ति बूया। थीणामेसु थीपवासे लमिस्सति त्ति घूया । णपुंसकेसु णिरत्यकं पवासं गमिरसति त्ति घूया । - दढेसु तत्थेव गंतुं वाहिसि त्ति यूया । चलेसु खिप्पं पवासा आगमिस्सति त्ति धूया। विविये चलामासे परेण परं गमिस्ससि त्ति बूया । चा सुक्केसु पवासे महंतं धणखधं लमिस्सति ति 20 बूया । रत्तेसु पीतकेसु वा दढेसु सुयण्णलाभं पासे लभिस्सति त्ति वूया । कण्हेसु परिकिलेसं पवासे गिफलं पावि- स्ससि त्ति बूया। आहारेसु कतकनो खिप्पं आगमिस्ससि त्ति वूया । णीहारेसु अकवकजो चिरा आगमिस्सति ति वूया । थूलेसु णिव्याधिको पैच्छत्तो पवासा आगमिस्ससि त्ति चूया । कसेसु बाधिपरिकिट्ठो किसच्छादणो पयासा आगमि- स्ससि त्ति बूया । गहणेसु अरण्णदेसं गमिस्ससि त्ति चूया । उपरगहणेसु आरामबहुलं रमणीय देसं गमिस्ससि त्ति वूया । आगासेसु रमणीयदेसं णिरुक्सगं गमिस्ससि त्ति यूया । परिमंडलेसु णगरं गमिस्ससि त्ति चूया । तणूसु जणपदं 25 गमिस्ससि त्ति वूया । मतेसु पयासे मरिस्ससि ति यूया। उर्दुते पवासे उपद्दवं पाविरसति त्ति वूया । बंधेसु बंधं पाविस्ससि त्ति यूया । मोक्खेसु पंचासो असंगो भविरसति त्ति वूया, पंथं सेमं गमिस्सति त्ति धूया । पसण्णेसु पयासे १ पुष्यदिढ त० ॥ २ पुबदिहें ई० त० विना ॥ ३ सव्यमणु' है० त० ॥ ४°वतो महावीरमहा सं ३ पु०॥ ५'व्यसोम्स' ह. त. विना ॥ ६ गते वाहणछत्तगते सव्य ह• त• विना ॥ ७°हणे धपाणकोत्त है. त०॥८°पट्टण- रजपमुहट्ठागेसु परिघा सि.॥ ९ °व्यणिवेसगते हं० त० ॥ १० जाण-चाहणपवासं १० त० विना ।। ११ हतचि- हान्तर्गतः पाठः है. तएवं वर्तते ॥ १२-4 एतचिहान्तर्गतः पाठः ई. त. नाति ॥ १३ हस्तचिहान्तर्गतः पाटः है. त. एव वर्तते ॥ १४ पच्छण्णोप है० त० ॥ १५ णिरस्सम ग° • त• विना ॥ १६ ६० त• विनाऽन्यत्र-इते हा......... ...बघेलु सं ३ पु० । हुते हाणिं गमिस्सति ति सव्यया वूया बंधेसु सि• ॥ १७ पवासासंगो है. त• विना ॥ ।
१९२ अंगविजापइण्णय मित्तं पाविरससि त्ति वूया 1 अप्पसण्णेसु पवासे विग्गई वा विवादं या पाविसति त्ति वूया । उद्धंभागेर्मु मूलेसु य पव्य[य]बहुलं देसं वेहायसं गमिरससि त्ति यूया। अधेहिमे णिण्णेसु य गिणं देसं अडवीबहुलं गमिस्ससि चि चूया । तुच्छेसु पासे उदृझिहिसि त्ति धूण । पुण्णेसु पवासे परस्स हरितं धणं पाविस्ससि ति बूया । आपुणेयेसु पयासे अंतरा अधियसिस्सति त्ति यूया । अग्गेयेसु पयासे आलीवणकं पाविरससि त्ति बूया । वायव्येसु पवासे घाउब्यातिकं 5 पाविससि त्ति वूया । अण्णेयेसु उस्सयं पाविस्ससि त्ति वूया, जिऐणुवबहुलं चेव देसं गमिस्ससि त्ति बूया । सद्देयेसु विस्सुयजणपदं गीत-याइतबहुलं गमिस्ससि त्ति वूया । दसणीयेसु बहुजणाभिप्पेतं दसणीयजणपदं गमिरससि त्ति बूया। गंधेयेसु गंधुपयोग गधोपभोगबहुलं जणपदं गमिस्ससि त्ति यूया। रसेयेसु विविधपाघेज-बहुअण्ण-पाण-रसिंगपरिभोगं देसं गमिस्ससि त्ति चूया। फासेजेसु जाणगतो पाहणगतो वा उदुसुसं उदुसुहफासं देसं गमिस्ससि त्ति चूया । मणेयेसु णिव्वुतम- णसो अभिन्जियगिव्वुत हु]लं देसं गमिरससि त्ति बूया।तिण्हेसु अंतरा संगामं पाविस्ससि त्ति वूया। दक्सिणेसु दक्षिणायं 10 दिसायं पयासं गमिस्ससि त्ति [वूया ] । दक्मिणपुरत्थिभेसु गत्तेसु दक्षिणपुरथिमायं दिसायं पासं गमिस्ससि ति घूया । दैक्खिणपच्छिमेसु गत्तेसु दक्मिणपच्छिमायं दिसायं पवासं गमिस्ससि त्ति धूया । - पच्छिमउत्तरेसु गत्तेसु पच्छिमुत्तरायं दिसायं पयासं गमिस्ससि त्ति बूया । धामपुरस्थिमेसु गत्तेसु पुव्वुत्तरायं दिसायं पवासं गमिस्ससि त्ति बूया एवं सपदिसाओ आधारयितुं उपलव्याओ भवंति । अधाकालकालोपलद्धीहिं आधारयितुं कालो पयासे विष्णेयो भवति । जथा लाभा-इलाभे जीवित-मरणे सुह-दुक्से सुकाल-दुधाल-भया-ऽभयादी य भावा आमास-सद्द- 15 पहिरूप-रस-गंध-फासउवलद्धीहिं 5 आहारयितुं जहुत्ताहि उवलद्धीहिं छापवासे सब्वे उयलद्धब्बा भवंति ।। ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पवासो णामाज्झायो तेयालीसइमो सम्मत्तो॥४३॥ छ ।। [चउयालीसइमो पवासद्धकालज्झाओ] णमो भगवतो यसयतो महावीरवद्धमाणस्स । अधापुव्यं सलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पवासस्स 20 अद्धाकालं णामाज्झायं । तं सलु भो! वक्सायिस्सामि । तं जधा--- तत्य पुरत्यिमायं दिसायं अन्यत्तसह-सवे वा अद्धमासे या पवासं गमिस्ससि त्ति वूया । दक्खिणायं दिसायं अन्यत्ते या सद्दे या रूवे या पक्सगणणायं पयासं गमिरससि त्ति यूया । अव्यचेसु सद्द-रूवेसु दिवसगणणाय पवासं गमिस्ससि त्ति धूया । पच्छिमायं दिसायं अध्यत्तेसु सद्द-रूयपाउन्मावेसु वस्सगणणाय पयासं गमिरससि ति [वूया] - अन्यत्तेसु सह-रूवपादुन्मावेसें मासगणणाय पवासं गमिस्ससि त्ति घूया । पायं (उत्तरायं) दिसायं अव्यवसद्द-रूया 25 पादुभावे यस्सगगणाय पचासं गमिरससि त्ति घूया । अन्नत्तेसु सह-रूवपादुभावेसु मासगणणाय पवासं गमिस्ससि त्ति धूया । एएसु चेव एकवीसाय मासाणं पवासं गमिस्ससि त्ति घूया । तत्य आहारनीहारेसु आगम्म पडिगमिस्ससि चि धूया । अणूसु गाउयं पवासं गमिस्ससि त्ति यूया । साधारणे य अद्धजोयणं पास गमिस्ससि ति यूया । अभंवरेसु इसरो रायन्नंतरो पचासो त्ति बूया । अभंतरमंतरेसु देस- मंतरो" पचासो त्ति बूया । वाहिरन्भंतरेमु षणंतरं रजंतरं गमिस्ससि त्ति धूया । थाहिरेसु रज्जतरं गमिरससि त्ति चूया । 30 बाहिरवाहिरेसु अस्सुयं गमिस्ससि त्ति चूया । पुघूसु जणपदं गमिस्ससि त्ति । परिमंडले णगरं गमिस्ससि त्ति । थाव- १°सुथूलेसु य यहुलदेसं है. त• विना ॥२ अधिणिणे है. त• विना ।। ३ यहुयं है. त• विना ॥ ४ पयासेतु उहन्मि है. तविना ॥ ५ जित्तु सं ३ पु. ॥ ६°सु टाणगतो है• त• ॥७- एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त- एव वर्तते ॥ ८ मागास है• त.॥९ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है• त• एव वर्तते ॥ १० पुरिमाय सि०॥ ११-१२'सु समाग है• • विना ।। १३ अट्टजो १० त• ॥ १४°स्सरे रा है. त• पिना ॥ १५'तरे प है. त• विना ॥ १६ अस्मुर्ति ग है• त विना॥ - पणयालीसइमो पवेसज्झाओ १९३ रेसु पट्टणाणि गमिस्ससि त्ति वूया । डहरत्यावरेसु खेडाणि गमिस्ससि त्ति । लेसु खंघावारं गमिस्ससि त्ति । डहर- चलेसु गामं गमिस्ससि त्ति चूया । इस्सरेसु रण्गो मूलं गमिस्ससि त्ति घूया । उवउत्तमेसु अमञ्चस्स मूलं गमिस्ससि त्ति । पुण्णामधेजेसु रायपुरिससकासं गमिस्ससि त्ति । दढेसु संसट्टेसु ववहारं गमिस्ससि त्ति यूया । अन्मंतरेसु अप्पणो अत्येण पवासं गमिस्ससि त्ति बूया । बाहिरेसु पररस अत्येण पवासं गमिस्ससि त्ति । वाहिरभंतरेसु मित्तरस अत्येण पवासं गमिस्ससि ति घूया । बाहिरबाहिरेसु णेव अप्पणो णेव पररस १ अत्थेगं पवासं गमिस्स • सि । त्ति वूया ।। ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पवासज्झायस्स वि अद्धाकालं णामझायो चउयालीसतिमो सम्मत्तो ॥४४॥ छ । [पणयालीसइमो पवेसज्झाओ] णमो भगवतो यसवतो महापुरिसस्स महावीरवद्धमाणस्स । अधापुव्यं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगवि-10 जाय पवेसं णामाज्झातं तं खलु भो! वक्सरसामि। तंजधा-अन्मंतरामासे गिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे पुण्णामधे- जामासे उम्मढे उल्लोगिते अभिग्गहिते भुत्ते पीते खइते लीढे कण्णतेल्लअभंगणे हरिताल-हिंगुलुक-मणस्सिला-अंजण- समालभणकगते अलत्तक-कलंजक-वण्णक चुण्णग-अंगरागगते उसिंघण-भक्षण-ऽन्भंग []-उच्छंदण-उव्वट्टण-पघंस- [M]-हाण-पधोवण-पव्यासेण-अणुलेवण-विसेसकायधूमाधिवाससंजोयणपादुभावेसु परिधाण-उत्तरासंग-सोणिसुत्त-वर- मल्ल-सुरभिजोगसंविधाणक-आभरणविविधभूसणसंजोयणासु अलंकारमंडणासु य सद्द-रूवेसु य एवंविवेसु पुच्छेज 15 आगमो भविस्सतीति घूया । तत्थ सिविका-रध-जाण-जुग्ग-कट्ठमुह-गिल्लि-संदण-सकड-सकडि-वाहिजविविवअधिरोह- णासु हय-गज-बलियद्द-करभ-अस्सतर-सर-अयेलक-गर-मरुत-हरित-महिरुह-पासाद-विमाग-सयणाधिरोधणासु धय-तोरण- गोपुर-ऽट्टालग-पतागासु समारोधण-समुरसवणे वा पुच्छेज आगमो भविरसतीति बूया । तत्थ हत्यसमाणयणे सव्यं- गसमाणयणे य आगमो भविस्सतीति बूया । तत्थ दुद्ध-दधि-सप्पि-णवणीत-तेल्ल-गुल-लवण-मधु-मच्छ-मंस-सेव्यमेद- समामासे आगमो भविस्सतीति । तत्थ पुढविन्दग-अग्गि-वायु-पुप्फ-धण्ण- बीच य-सम्बरयणदव्यसमाधिअणे आगमो 20 भविस्सतीति बूया । तत्य अंकुर-परोह-पत्त-किसलय-पवाल-तण-कट्ठ-लेटुक-सकर-उपल-विविहसत्थ-सत्याभरणोउपकरणग- रुविअलोह-मणिसुत्त-रयत-वैरसमावण्णेसुचेव आगमो भविस्सतीति बूया । तत्थ उक्खुलि-पिट्ठरग-दविउलंक रसदबीसु य छत्तोपाणह-पाउग-उम्भुभंड-उभिखणफणखपसाणगकुब्वटुं च वणपेलिका-विवट्टणग-अजणी-पसाणग-आईसग-सरग- पतिभोयण-वाधुज्जोपकरण-मालागते या उपसकिते या उववसिते वा आबद्धे या माला-ऽलंकारभूसणे वा पयसिते या परिहिते वा पाउते वा अच्छादणे या पुच्छिन्नमाणे वा अभिमुहे या आलिंगिते वा उवणीए या एतेसिं या एचमादीणं 25 पडिपोग्गलाणं संपदग्गहणे पुच्छिजमाणे आधारित्रमाणे वा एवंविधसहरूवपादुब्भावे आगमो भविस्सतीति चूया । तत्य अभंतरेसु य सजीवेसु य सजी पवेक्खति त्ति बूया । तत्य वझेसु सबअजीवेसु य अजी पवेक्सति ति बूया । तत्य सजीवेसु पुवाधारिते सजीवं तिविधमाधारये-दिव्यं माणुसं तिरिक्खजोणियं चेति । तत्य उद्धमागेसु भिंगार-छत्त-पतागा-लोवत्यपाणियपादुभावे चेव दिव्वं पवेक्खति ति यूया। तत्य उजुकामासे समभागेस सव्वमणुस्सगते य माणुसं पवेक्खति त्ति । तत्य तिरियामासे सव्यतिरिक्खगते य तिरिक्खजोणियं पवेक्खति तिso १ रत्तेसु गंधाहै. त॥ २ सम्मूढेसु सि.॥ ३ गउच्छवण हं. त•॥ ४ हिणवणा हं.त॥ ५ सजमेद ६० त• विना ॥ ६ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव वर्तते ॥ ७ गरेति है. त• विना ८चा पवेसिते है.त.॥ ९या पावासिए या ई.त.॥ १० अच्छोदणे है. त• विना ॥ ११ आगच्छन्ते पा है. त•॥ १२ थप- हाणिय ई. त•॥ भंग०२५ . - भंगविजापइण्णयं घूया। वत्य पुण्णामषेत्रामासे दक्सि गामासे सयपुरिसगते य पुरिमो पवेक्सति ति । पुण्णामे पुव्याधारिए पुण्णा मादि- पाउन्मावेहि पुरिमा समणुगंतव्या भांति । पुण्णामेमु उत्तमेसु गुरुजोणि पवेक्पति ति, सममागेसु तुल्लोणी पवेक्सति त्ति धूया, पञ्चवरकायेमु वालजोगिं पवेवसंति त्ति घूया | पाद-जंघसयपेरसगते सव्वपेस्सोवकरणे पेस्सो पर्वकसति त्ति । वत्य चण्णे पुब्याधारिते उवाते उवातो पवेक्सति ति, काले कालो, सामे सामो, थूले थूलो, किसे 5 किसो दीहे दीहो, रस्से रम्सो । अन्र्भतरेसु सकं, घाहिरेसु परकं । यभेनेमु सत्तेजेसु - वेस्सेजेसु सुद्देम्बेसु य यंभण- सत्तिय वेस्स-सुद्दडोणीयो यत्तव्यातो । पुरिसे पुब्याधारिते पुण्णामेमु पुरिसो पवेक्खति त्ति, धीणामेसु थी पर्वक्सति, पघुमरेमु नपुंम पवेक्सति त्ति चूया । तत्य चतुरस्सेमु समचतुष्पदैपादुन्भावे य चतुष्पदपडिख्य-सहरसपाटुल्मावेसु घेर चतुष्पदं पपेक्सति त्ति । दीहेमु कण्हेसु य सयपरिसप्पगए य परिमप्पपटिरूवपाउन्मावे य परिसप्पं पवेक्सति त्ति घूया । घलेमु उद्धंमागेसु सन्चपम्सिगए पक्खिपटिरूव-सहपादुमावे चेव पक्सि पवेक्सति त्ति । आपुणेयेसु 1७ घलेसु य सबजलयरपहिरूयपादुव्मावेसु जलयरं पवेक्सति त्ति बूया । परिमंडलेमु भायणं पवेखति ति, तेणू- [मरत्वं पवेसति ति, हा चतुरस्सेमु चित्तेसु सारयंतेमु य पाहावणे पवेसति ति। रत्तेसु पीतेमु य सारयंतेसु मुषणकं पवेखति त्ति, सेवेमु सारवतेसु य रुप्पं पवेक्पति त्ति, सुफेम अणग्गेयेसु सीवलेसु मुत्ता पवेक्सति ति धूया । घणेमु सारयतेमु सव्यप्पमागते य मणी पवेक्सति त्ति । मिस्सितेसु संरतेमु सव्यप्पभागते य सारमणी पवे- कापति त्ति यूया। घहेमु सन्धमणिगर्न सकेहिं चॅण्णेहिं विण्णायं भवतीति । कोहिते सव्वलोहगतं पवेक्सति त्ति । 15 गिद्धेमु सन्चपाणं पयेक्सति त्ति । पुण्णेमु आहार पवेक्सति त्ति IB विहेमु सत्यं पवेक्सति त्ति । तिण्हेमु सत्यं पवैसति त्ति । EA अंतेमु उनकरणं पवेक्सति त्ति । घीणामेसु वझसाधारणेमु ण्डसं पवेक्सति त्ति । पुण्णामेसु पीहारेसु य परम्दमापयिता पवेस्पति त्ति । धीणामेसु णीहारेसु य विधवा पवेक्स्यति त्ति बूया । यीणामेसु अप्पसण्णेमु विधा पवेति ति। धीगामेमु दढेसु कण्या पवैक्सति त्ति यूया। पीणामेसु चलेमु जुपती पवेसिति ति । थीगामेसु घलेमु मुदितेमु य पवियाता पवेरपति त्ति । धीणा[मा]मासे पियामासे - वेरसा पवेक्सति त्ति । यीणामेसु 20 गिदेमु मगा पवेति त्ति । लुक्सेमु निरागता पवेसति ति, कण्हेमु असारा पवेसिति ति यूया । मतेमु अणाधा पवेसति ति । पसण्गेमु मुदिता पवेसिति त्ति । कण्णेयेमु मुतीसीलममायारा फण्णा पोसति ति । सद्देयेमु विरमु- साल-परा-ऽऽासा पवेक्रराति त्ति । दसणीयेमु पतिरूया पवेस्सयित्ति। गंवेयेमु गंधरती पवेक्सति त्ति। रसेयेमु रसगुण- संजुत्ता रमयती परेकग्रति त्ति धूया । फासेयेमु फासरती पवेक्सयि त्ति । मणेयेमु इटा पवेसयित्ति । " तत्य पायासिगगमणे पुण्यामधेनेमु अपरछामेण आगमिस्मीति । यीणामवैनेसु समन्नो आगमिस्ससि त्ति । नपुंसकेमु 25 गिरत्यगो आगमिरससि सि यूया । दृढेमु णेदागिं आगमेस्ससि ति । जलेमु सिप्पं आगमिरमसि त्ति । गिदेमु कत- भोगों यागमिरम सि त्ति यूया । टुसमु गिरीगतो आगमिस्समि त्ति चूया । मुझेमु सघणो आगमिरमसि त्ति । मामेमु मुई आगमिरममि नि यूया । पोमु पहुअंतरागो आगमिरससि त्ति धूया । आहारेसु आययहुलो आगमिरम- मिति । पीहारे दितमारो आगमिरमसि त्ति यूया । मते, आमतमतो मरिग्मति त्ति । तुच्छेमु आमतमतो याधि पाविरमनि नि । पुण्णेमु मया जोगो आगमिरमति ति यूया, मागर्म या वि आयं पाविस्मति सि यूया ।। ॥ इति सलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञाय पयासो णामझायो पणयालीसतिमो सम्मत्तौ ।। ४५ ॥ छ । - २० 1- गन्ना पटत. मामि॥२"दवाणीपा • ॥ ३ एपिरान्तर्गत पर ने। ४पिदिशि म...ना। ५-५-७ विमानतः पा... निरागमो त..९पग्गेर ••RE... 'सुप भादिन ... ११'सुप आगमममोम .. १२ भागमभो यात.. , छायालीसइमो पवेसणज्झाओ [ छायालीसइमो पवेसणज्झाओ] 5 - 10 16 णमो भगवतो यसवतो महापुरिसरस । अधापुव्वं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पवेसों णामा- ज्झायो । तं जधा- गिहं पविसतो वा वि जं जं पस्से सुभा-ऽसुभं । सव्यं हितयेण गेण्हित्ता णिदिसे अंगचिंतओ ॥ १॥ बलिपदा यावि अस्सा या उट्टा वा गद्दमा वि वा । सुओ मदणसलाका वा कवी मोरा व दिसते ॥२॥ एताणि कोट्ठये दिस्स अंगणं पविसे ततो । अणाइलो असंदिद्धो दिट्ठीसु य समाहितो ॥ ३ ॥ यंभत्थलम्मि यं पस्से जं वा पस्से अरंजरे । उव्वरे वा उवहाणे आसंणगहणे तधा ॥४॥ उदुक्खलस्स सालायं कवाडे दौरकण्णये । आसणरस य दिण्णस्स अंजलीकरणम्मि य ॥५॥ महाणसम्मि जं पस्से भत्ताकारीय वा पुणो । तत्थ भत्तघरे या वि जे य वत्थुस्स णिकुँडा ॥ ६॥ "ओकट्टितम्मि णेवम्मि ओभग्गे ओपणिव्यए । बाहिरत्थरस वायत्तिं अंगवी इति लक्खए ॥७॥ कंवासु विप्पमुकासु ओसरिता मल्लका जति । वियडे उत्तमाकारे कुलभंग वियागरे ॥ ८ ॥ वेदणं या सिएणिएहिं दास-कम्मकरेहि वा । अणेन्याणी व अत्येहि णिहिसे अंगचिंतओ ॥९॥ दधि-मंगल-पुप्फ-फलं अक्खते सारतंदुले । विदू सम्मजिते दिहा वद्धिं तत्य वियागरे ॥ १० ॥ तुसेहिं वा समोखिण्णं पंसुरण व दिस्सति । अंगारच्छारिओखिण्णं हाणिं तत्थ वियागरे ॥ ११ ॥ अध रुक्सम्मि भग्गम्मि अधवा जज्जरीकते । विमुक्केसु य संधीसु कुलभंगं वियागरे ॥ १२ ॥ दारुवण्णकसंपाते संधी जस्स चलाचला । अणेव्याणि कुडुंबरंस अत्यं वा वि चलाचलं ॥ १३ ॥ पुरिसस्स दक्खिणे पासे थिया वामे पवेदये । खंडित पडिते भिण्णे पडिरूवेण णिदिसे ॥ १४ ॥ संधिम्मि विप्पमुकम्मि भग्गे वा उत्तरंबरे । जमत्यमभिकखेज तमत्थं 'हीणमादिसे ॥ १५ ॥ उग्घाडो वा कवाडं वा दारं समणुवत्तति । दुक्खेण अंजितो अत्यो सयो होति णिरत्ययो ।॥ १६ ॥ अधरुत्तरुम्मिरे यावि ओभग्गे विप्पकैट्टिते । वासवण्णकसंपाते गिहे धूया अणिव्वुति ॥ १७ ॥ सन्वतो विप्पमुक्तम्मि ओभग्गे एकपस्सिते । कुद्दुविणो अणेव्याणि अत्यहाणिं च निदिसे ॥ १८॥ तिलवेल्लवयाका वा कोहते होंति अच्छुया । पिवीलिया या दिस्संति याधिं तस्य वियागरे ॥ १९ ॥ एलओ को?ए पद्धो वाहरे विगतं जया । अकारणे विरत्तम्मि कुडुंवे भयमादिसे ॥ २० ॥ अस्सो कोहए बद्धो फडं बुपति पच्छतो। णिपंसते गिडालं या फुडुंवं स विणस्सति ॥ २१ ॥ पक्खी य कोहए जत्य लूणपक्खोऽन्य दिस्सति । दासा गिगलवद्धा या हाणिं तत्थ वियागरे ॥ २२ ॥ उदग्गा दिरसते पक्खि मोदंताणि देखें ति य । उदग्गत्यपुमंसा य यद्धिं तत्थ वियागरे ॥ २३ ॥ एताणि कोट्ठए दिरस पविट्ठो अंगणम्मि वि । अणाइलो असंदितो ततो पेक्खेज लक्खणं ॥ २४ ॥ विर (विदू) सम्मजितं दिस्स पक्खुस्सं प वियाणिया । कतं पुप्फोययारं प पद्धिं तत्य वियागरे ॥२५॥ दारका जति दिस्संति पलोट्टा धरणीतले । मुत्तं पुरीसमोगाढा हाणि तत्य वियागरे ॥ २६ ॥ दारका जति दिस्संति अलंकित-विभूसिया । हिहा तुहा पमोदंवा यदि तत्य वियागरे ॥ २७ ॥ 20 26 30 १ असंयिटोत.॥२°सणे ग° वि• ॥ ३ दारफामए है. त•॥ ४ गिरता है. •॥ ५ उपट्टितस्मि है। त•॥६का जिया (जया). त• ॥ ७ स्स हत्यं है• •॥ ८ उत्तरस्सरे है..॥ ९दीण विना ।। १० आपितो है. • विना ॥ १५ पट्टिते है. त.॥ १२ दारयण्ण' है. त• पिना । १३ भटुवा हर दिन २४ पुट्टओलसोई. त. १५दर्दति . त• विना ॥ १६ पिट्ठस्सम्म १.४. विना ।। ..
6 10 15 अंगविजापइण्णय अंगणे जत्य पस्सेज येण्यं पुष्फ फलाणि या । गिणिनमाणं णीहारं हाणि तत्य वियागरे ॥ २८ ॥ अंगणे जत्य पस्सेज वैगं पुष्फ फलाणि वा । अंतणिजमाणं आहारं वद्धिं तत्थ वियागरे ।॥ २९ ॥ अंगगे जत्य पासेन 'रोदंतो वझतोमुहं । परिदेवमाणं कलुणं हाणिं तत्य वियागरे ॥ ३० ॥ मंगणे जत्य पासेज रममाण अभिमुहं । उदगवेसं मुदितं पद्धिं तत्य वियागरे ॥ ३१॥ अंगणे जत्थ पासेज रिजमाणे य गंतए । मइले विषण्ण-वियले हाणि सोयं च गिदिसे ॥ ३२ ॥ अंगणे जत्थ पासेन सुफिले कंवले सुयि । वासिते य मणुणे य यदि लामं च णिदिसे ॥ ३३ ।। भायगाणि य भिण्याणि अंगणे जत्य दिस्सते । पलोहिताणि तुच्छाणि हाणि रोगं च निद्दिसे ॥ ३४ ॥ भायणाणि य दिस्संति पहिपुण्याणि अंगणे । चक्खुसाणि असंडाणि आयं लामं च गिदिसे ॥ ३५ ॥ अंगणे जत्य दीसंति पोत्ती तकविक्ला । आसंदका य संभम्पा हाणि रोगं च णिदिसे ॥ ३६ ॥ पविद्वो अंगगं साधु पस्सेज णर-णारिओ । अलंरिते सुयी हिहे संपीति-लाममादिसे ॥ ३७॥ अंगणे जति दीसेज खिनंतं रोसणं नरं ! पुर जो अजिओ अत्यो सन्यो दम्मि विणरसति ॥ ३८॥ ॐ फैला तु उक्टरसा अंगणे जति दिरसति । पुण्गामा य मणुण्णा य फुडुंबी घरिणिं जिया ॥ ३९ ॥ फला उ टपहरसा अंगणे जति दीसति । थीणामा य मणुण्णा य फुडुवी(वि) परिणी जये ॥ ४० ॥ पुण्णामधेना छिजते मिजंते य फला जति । याला तत्य विवजते दम्मि उप्पायरिसणे ॥४१॥ योगामा जति छिजंते पयालागि फलाणि या । दारियाओ विवनंते तम्मि उप्पायरिसणे ॥ ४२ ॥ समणो यंभणो या वि गेहे जस्म पलायति । उपायं तारिसं दिस हाणि तत्य वियागरे । ४३ ॥ पुण्णो परंजरो जस्म विवभेज अणाहतो। फुटुंयस्स विणासाय गिहिसे अंगचिंततो ॥४४॥ तुच्छो अरंजरो जत्य विग्नेश अणाहतो । युइंविणो विणासाय गिहिसे अंगचिततो ॥ ४५ ॥ - कागा परंजरे पपरे भुगका या पारभत्तिया । परिणी तत्य कुटुंयरस जणेण परिमुभति ॥ ४६॥ पलिओ अरंजरो जत्य दुबला जस्म पेढिया । पुरिसरस पुण्णं जाणेभ अप्पपुण्णा फुडुपिणी ॥४७॥ पलिया पेदिया जत्य दुयलो य अरंजरो। परिणीय पुष्णं जाणेजा अप्पपुण्यो फुटुंविओ॥४८॥ पंमत्यटम्मि भिण्गम्मि णामं जाणं पुडुषिणो । पियविप्पयोग-मरणं अत्यहानि प णिदिसे ॥ ४९ ॥ समगम्म आसगे विष्णे फीलिहे अत्युते पडे । पुदुंबियरस संपत्ती सह भारियाए गिरिसे ॥ ५० ॥ समगम आसगे दिणे मुबिले पत्युते पडे । पुयियस्स संपत्ती सह मनाए णिदिसे ॥ ५१ ॥ अपया मागेम्नि ममगो पास टभे । पडिउनमाणे घूमेण कलई हाणि पणिहिसे ।। ५२ ॥ सिद्धमनं वियागेमो 5 उपा जारिस भये । [मिति उपधारेता दीगोदत्तेग गिरिसे।। ५३ ।। "संवेगमुत्तरयनं गुद्धं विमलं प परिमया । यमगं सुधाय च मुयिमोदणमादिमे ॥ ५४॥ कापुरेगु य पण्णेगु यामिम्स ओदणं पदे । जो उस्स यण्णारियो संसधा अण्ण(अत्य)मादिसे ॥ ५५ ॥ उसंतुलन प.लदं मुधितो रोगमादिसे । अगेन्याणि पश्यग्मि दहें जीवितसंसयं ।। ५६ ॥ बुधितो पक्षको तिलो पर गिदो दिया मरे । यहूए परिधाए य तं पिगासाय लयमा ॥ ५७ ।। विषयो अपगारो या निहिलो याति औरणो । मुटुंगियो विगामाप ओदणेश पवेदये ॥ ५८ ।। रिविकार दीगती उपुने मा मा वि पा! मतागु मरगं पूया जीतीमु उपायं ॥ ५९ ।। १.२प ..fmu ३ मतिनिधमा ना.. रोमीनो.. मिना ॥ ५पोपी ...मायनो भागो..UMAnt... ८रसार... R..वि... १०. पिन tet.m.nn १५ पनि उन'.. १२मनुगर...'पाप'... हिमो... 20 - .
b - 10 1 15 छायालीसइमो पवेसणज्झाओ केसे दिट्टे परिकसं सकराय उवहवं । पराजयमसक्कार कंडगम्मि वियागरे ॥६०॥ सुत्ते पसारिते दिढे अट्ठाणतेण गिहिसे । तमेव सुत्तं पलिमूढे बंधणंतेग णिदिसे ॥ ६१ ॥ तणं च जति दिस्सेज कुडुवे जं समीहती । सव्वं णिरत्यकं भवति जति सुक्खं ओदणं भवे ॥ ६२॥ जवणीयं च पुच्छेज पहसंती परम्मुही। वेधव्यं सा लभित्तागं पच्छा रूवेग जीवति ६३ ॥ जवणीयं च पुच्छंती समणं जा उ अभिम्मुही। वत्थे वा वि पलिमूढा पुण्णेज पवडेज वा ॥ ६४ ॥ कुडुंविणो असंपत्ती तिस्से थीया पवेदये । अभंतरेण पक्खस्स बंधणे सा विरुभति ॥ ६५ ॥ जवणीयं च पुच्छंती समणं जा उ अभिम्मुही । संधितं अंजलिं कुजा णिव्वुति तत्थ णिदिसे ॥ ६६ ॥ दक्खिणे पुत्तलाभाय "धिती लाभं च वामतो। सक्कारे सुहभागी य असक्कारे अणेन्दुतिं ।। ६७ ।। संखिप्पे वा खिवे' हत्ये पुव्वं भागी वियागरे । विखिप्प संखिवे हत्थे पच्छा भई वियागरे ॥ ६८॥ उजुयं अंजलि कुजा विपुला अत्य संपदा । विणतं अंजलि कुजा अत्यहाणि वियागरे ॥ ६९ ॥ अंतो महाणसे सेसं साकं सूवोदणं दधिं । तन्भावपडिरूवेणं अंगवी उवलक्खये ॥ ७० ॥ ददं च अंगमामसति तिधा उट्ठाय आमसे । अभिमुही य भणति अण्णमस्थि त्ति णिदिसे ॥ ७१ ॥ उल्लोयिते उम्मटे आणिते उवणामिते । हितयोदराणं आमासे अण्णमथि त्ति णिदिसे ।। ७२ ॥ चले चलं अंगमामसति बाहिराणि 'गिसेवति । णिम्मढेसु य गत्तेसु अण्णं णत्थि ति णिदिसे ॥ ७३ ॥ रित्तकाणि पदिरसंति भायणाणि समंततो । पलोट्टिताणि भिण्णाणि अण्णं णत्थि त्ति णिदिसे ॥ ७४ ॥ तंदुले य पदिस्संति पणालीय गेलेज य । परिमजकं च दखूणं अत्थि मजं ति णिदिसे ॥ ७५ ॥ पसुत्ता जति दीसंति मोरा वट्टक-लावका । तेसिं रुता-ऽरुतं सोचा सागुणामऽभिणिदिसे ॥ ७६ ॥ ओसुद्धे णिहुते छुद्धे णिसुद्धे 'धंसिते धुते । कलहं व दिह्रो पालाणं मंसमत्थि ति णिदिसे ॥ ७ ॥ रित्तकाणि पदीसंति घंड-कुड-अरंजरा । पलोट्टिता य भिण्णा य णस्थि मजं ति णिदिसे ॥ ७८ ॥ जलयरेसु य सत्तेसु जलपस्संदणेसु य । उदकेसु य भंडेसु मच्छमत्थि ति णिदिसे ॥ ७९ ॥ दम्भे कुसे य दणं अद्दपुष्फ-फलाणि य । हरितंकुर-पवालाणि सागं हरितकं यदे ॥ ८ ॥ 'फलाणि जति दीसंति णिद्धाणि मधुराणि य । दन्तोह-जिब्भआमासे फल-सागाणि णिदिसे ॥ ८१ ॥ वामिस्सोदीरणे वण्णा यामिस्सोदीरणे रसा । यामिस्साणि तु सागाणि णिहिसे अंगचिंतओ ॥ ८२ ।। अस्थि अन्भंतरामासे यज्झामासेसु णत्थि य । आमाससंजोगविधि अंगवी इति लक्खये ॥ ८३ ॥ मच्छमाणं दखूणं तकमच्छंविलं तधा । परिकिण्णसद्देसु तथा दवम्मि रसकं वदे ॥ ८४ ॥ समणं पत्थितं संतं णिग्गतं वज्झतोमुहं । जो ठवेतूण पुच्छेज्ज अप्पसत्यं पवेदये ॥ ८५ ॥ पवेङ्कामं पुच्छेन अस्थि आगमणं धुवं । निग्गंतुकामं पुच्छेज पवासा णिगमं वदे ॥ ८६ ॥ कोट्टकम्मि व पुच्छेज पन्झत्यं तं पवेदये । सफारेण य पुच्छंते अत्थि अत्यो ति णिदिसे ॥ ८७ ।। तं चेव अत्यं पुच्छेज असकारेण अंगविं । जाणे असुभं अत्थं वाहिरं अंगचिंतको ।। ८८ ।। समणं पजुवासंतो अंतो या जति या वहिं । महिला होति असम्मूढा पुरिसा तत्थ वटुंति ॥ ८९ ।। समणं पजुवासंतो अंतो वा जति या यहिं । पुरिसा होति असम्मूढा इथिओ तत्थ वटुंति ॥ ९० ॥ पेम्म रागं च दोसं च अवणेत्ता वियक्खणो। आधारयित्ता अंगेगं अंगविं अभिणिदिसे ॥ ९१ ॥ छ । ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पवेसणो णामाज्झायो खेटुचत्तालीसतिमो सम्मत्तो ॥ ४६ ॥ छ ।। १ अभिमुही है. त• ॥२°स्स यंभणे सा विरुभए है• त• ॥ ३ अमिमुही है. त• ॥ ४ थिती याम च यासए है. त०॥ ५०वे सुहत्यि ई० त• विना ॥ ६ अजयं हं. त• विना ॥ ७ तहा उद्धार है. त•॥ ८ णिसति है. ता॥ ९गपसु य ई० त० ॥१० सिए बुओ ई• त• ॥ ११ दिटुं . तविना ॥ १२ घरकुंड • त• बिना ॥ १३५ छिन्नं मर्ज है. त•॥ १४ पट्चत्ता' है. त• विना ।। 20 25 30 अंगविज्ञापदण्णय [सीयालीसइमो जत्तज्झाओ] णमो भगवतो उसवतो महापुरिसरस महावीरवद्धमाणस्स । अधापुव्यं सलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय जचा णामझायो । सलु मो! तमणुक्साइस्सामो । तं जया-अस्थि जत्ता पत्थि जत्त ति पुव्यमाधारयि- तव्यं मनति । तं जया-अभंवरामासे घुवे थितामासे दढामासे दक्सिणगतामासे णपुंसकामासे पच्छिमगतामासे । उम्मजिते उपकसिते उपट्टिए आरंडिते 'संबिहे भयरिसते पल्लत्यियागते छिदापिधाणे पिहिते उग्गहिते पञ्चालविते पहियुहे पडिसिद्धे पवेसिते विक्सित्ते ठविते ठावरथितीए लंइते णिकायिते एतेसु आमास-सवण-दसणपादुन्मावेसु पत्यि जत्त ति यूया । तत्य छत्ते या भिंगारे या वियणियं या तालवेटे वा सत्ये वा पहरणे या आयुधे या आवरणे या पम्मे या कवये या अभिणीयमाणे या पवेसियमाणे यो णिखिप्पमाणे या पडिसामिजमाणे या वियाजिजमाणे या विगासिन्नमाणे या पथालंबित्रमाणे वा अयनेयमाणे वा णत्यि जत्त त्ति धूया । अन्भदेरम्मुहे एयंपकारये या जाणे या 10 याहणे या उपणाहणे (इयवादणे) या ओमुंचणे वा अतिणयणे था पत्यि जत्त त्ति दूया । सन्बेसु य णत्यिकारसर- पादुम्मामु णत्यि जत्त त्ति घूया । तत्य यन्झामासे चलामासे चलणामासे यामगत्तामासे पंसारितामासे गत्तपंचगओ- मजिते निम्मजिते अपमन्निते उपविहे उहित्ते पत्थिते वा जिग्गते वा पिल्लोकिते का गिल्लोलिते वा - मिल्लिसिते या अयसारिते अवसाफ्तेि अपयजाते या विप्पमुंचणे अपंगुते पिकहिते पिण्णेते "णिकिटे वा कोसीगते या गमणलिंग- दमण-सरणपादुम्माये सनीप-णिनीवाणं च दव्याणं एवंविधाकारपादुम्भावे अस्थि जत्त ति यूया । तत्य छत्ते 15 या भिंगारे या वीयणीयं या तालबोटं या अन्मुत्यिते या पीणिते या पहरणे या आयुषे वा आयरणे था यम्मे पा फरये या सण्गाहपटे या उदीरमाणे या पीणीयमाणे यो गेय पाहिरंतो या जत्तामुहे या फजमाणे ५ सजे या मन्निन्नमाणे या अत्यि जत्त त्ति यूया । तत्य जाणे या पयाहणे या याहणे या जुत्ते या जोयित्रमाणे या "संसित्रमाणे या निग्गते या गिजायते या गियहित्रमाणे या गिव्यट्टिते या पादुपाहणाणं या गहणे आयंधणे या गिण्णपणे या आगमगलिंग-सरपादुन्मावेस या अत्यि जत्त त्ति यूया । विपद-घउप्पद-छप्पद-यमुपद-अपदाणं या 20 सचागं गमणसंयाणसर-स्यपादुन्मावे अत्यि जत्त त्ति थूया । यत्य पुण्णामधेनेमु विजयिका जचा भविरसतीति [यूया ] 1 पीणामधेनेसु सम्मोदी जत्ता भविरसतीति यूया । एंमोमु गिरस्थिफा जसा मविरसतीति । पढेमु चिरं जत्ता मविरसतीति । चलेमु ण चिरं जचा भविस्मतीति । मुद्देसु महाफला जचा मविरसतीति पूया । कण्हेसु पशुपरिपेसा जत्ता भविस्सतीति यूया । सामेमु मुदितेमु य पहुउस्सयसमीया अशा मविग्मतीवि यूया, अवि य पमादयती जत्ता मविरसतीति यूया, मुरेमु य पभूतऽपग-पाणा । यासत्र-पेनजता मविरमतीति पूया, पटमदुला यावि जचा भविस्सति ति । आहारे आययाला उत्ता भविस्सतीति यूया । जीहारेम अपायपाला उत्ता मविरसीवि धूया । धूलेमु महम्मया जत्ता मविरमतीति यूया । रिसेमु अप्पजोगा जसा भविस्सतीति पूपा । पुमु जगपदलंमाय सता भविस्मनीति यूया । परिमंडलेमु गगरलंमाय उता मविरसतीति पूया । रहरपलेस मामलं माप जया भविपनि । हरयायरेट सेटलंमाय जपा भविरसति । गहणेमु अरण्यदेमगमगमूपिहा अशा भवि. 'पyar...२ सामि ॥३'रपिययं • त•॥ ४ोयि?.. गिना ॥५संघिt...॥ सामानिम...॥ ७मादार..॥ भतिणीयमाणा या पयासिय १.त. पारिhिa १. मरवान'rth.p १५'तरे मुद्दे • त. १२ या मोचणे.... १३ परिसारितामा गपर... १४ भरपि उम्पिने परिप..fron १५-६ एपिान्तर्गतः पार... भागि। २९ मरापार.. नितिन निदिने... १८ गिर... सिमित पारा ••ka २० ग्वारपमा... साप पादिरमो अचा... २२ समिम ... गि... २५ मियादिन... २५ मया लिंग.. २६ "मापपा..
अडयालीसइमो जयज्झाओ स्सति । उवग्गहणेसु आरामदेसगमणभूयिट्ठा जत्ता भविस्सति । णिण्णेसु णिण्णदेसभागगमणबहुला जत्ता भविस्सति । बद्ध-रुद्ध-वइतेसु गाम-णगर-सण्णिवेसरोधाय जत्ता भविरसति । मोक्खेसु सुकेसु अपंगुतेसु य णगररोधविप्पमोक्खाय जत्ता भविस्सति, णगरं रुद्धं विप्पमुच्चिरसति त्ति । पसादेसु पसण्णेसु य विजयाय जत्ता भविस्सति चि बूया, पसाद- लंभाय जत्ता भविस्सति त्ति । अप्पसण्णेसु अप्पसादेसु य पराजयाय विवादबहुला यावि जत्ता भविरसति त्ति । णवेसु पञ्चुग्गेसु य णवो अपुव्यो जयो जत्तायं भविस्सति त्ति । अधोभागेसु पराजयो जत्तायं भविस्सति त्ति । जे उर्द्ध- भागेसु वेसिकाविजयाय जत्ता भविस्सति । समझिमेसु समागमं उभयतो समेण जत्ता भविस्सति त्ति । विव- द्धीसु चतुप्पद-विपदेसु वाहणागार-सह-रूवपादुब्भावेसु य वाणलाभजुत्ता य जत्ता भविरसति । जण्णेयेसु वालेयेसु य जाणलाभाय जत्ता भविस्सति । तिक्खेसु सत्यसण्णिवायवहुला जत्ता भविस्सति, संगामबहुला यावि जत्ता भविस्सति त्ति । उवहुतेसु उवद्दवबहुला जत्ता भविरसति । 'संसयितेसु सरसयिता जत्ता भविस्सति त्ति । साहाधम्मेसु साहाधम्मप्प- हारवहुला जत्ता भविस्सति । मुदितेसु णिरुयदुता जत्ता भविस्सति । अन्भंतरेसु उत्तमेसु य सयं अत्यवति जत्तं गमि- 10 रसति त्ति बूया । बाहिरेसु बाहिरपरिवारो भूयिटै अत्यवतिस्स जत्तं गमिस्ससि त्ति । बाहिरब्मंतरेसु बाहिरभंतरो भूयिटै अत्यवतिस्स जत्तं गमिस्सति त्ति । पाहिरभंतरा बाहिरा बाहिरवाहिरा य आमासपादुभावा उत्तम-मज्झिम-पञ्चवर-साधारणेसु णायका परिवारो य जत्तायं आधारयित्ता सकाहिं उवलद्धीहिं उवलद्धव्यं भवति । तत्थ णीहारेसु णीहारबहुला जत्ता भविरसति त्ति । णीहारणीहारेसु अपयाता अभुत्थिता णिवत्तिस्सति त्ति । पुरत्थिमेसु पुरत्थिमं जत्ता भविस्सति । दक्खिगेसु दक्खिणं 15 अत्ता भविस्सति । पच्छिमेसु पच्छिमेण जत्ता भविस्सति । वामेसु उत्तरेण जत्ता भविस्सति । आपुणेयेसु परिसारत्ते जत्ता भविस्सति त्ति । "विसिमेतेसु पसण्णेसु य सरदे जत्ता भविस्सति । संवुतेसु सीतलेसु य हेमंते जत्ता भविस्सति । अलंकितेसु चित्तेसु य सुरमीसु य वसंते जत्ता भविस्सति । अग्गेयेसु उण्हेसु य धिंसुमे जत्ता भविरसति त्ति । उवणि- द्धेसु बालेसु य पाउसे जत्ता भविस्सति त्ति वूया ॥ ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय जत्ताऽज्झायो नाम "सीतालीसतिमो सम्मत्तो ॥४७॥ छ । - - 20 [अडयालीसइमो जयज्झाओ] णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स । अधापुव्यं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञाय जयो णामाज्झायो। तमणुयक्खाइस्सामि । तं जधा-तत्थ अस्थि जयो णत्यि जयो त्ति पुसमाधारयितव्यं भवति । तत्य अभंतरामासे दुढामासे गिद्धामासे लद्धाभासे स पुण्णामासे - मुदितामासे दक्खिणामासे पुण्णामधेजामासे इस्सरामासे उत्तमामासे 25 उद्धंभागामासे पसण्णामासे अणुपहुँतामासे उम्मजिते उल्लोगिते उदत्तेसु सद्द-रूव-रस-गंध-फासपादुभावे य अयि जयो त्ति बूया । तत्थ रगं या रायकुलं वा गणाणं या गगराणे या णिगमाणं वा पट्टणाणं या खेडाणं या आगराणं या गमाणं या सन्नि- वेसाणं वा विपद्धीसंपयुत्तासु कहासु उदाहरणोदीरणेसु वा एयमादीण सदाणं अस्थि जयोति यूया । तत्य उदुकाले उस्सये या रुक्खाणं या गुम्माणं वा लताणं या वहीणं या पुप्फ-फल-तय-पत्त-पवाल-परोहउदग्गपहवसह-रूवपादुम्भावेसु पक्सि- : चतुप्पद-परिसप्प-जलयराणं मंदोदग्गसंपयोगे य कधासु वा एवमादीसु पडिरूवेसु या अस्थि जयोति बूया। तत्य णव-पुण्ण-अहिणयपुप्फ-फल-पत्त-पवाल-मूल-कंदगतेसु वत्था-ऽऽभरण-भायण-सयणा-ऽऽसण-जाण-वाहणपरिच्छद-यत्या- १ पभदझेसु य हूं. त• विना ॥ २ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः ई. तएव ते ॥ ३ समासम है. त.नि.॥ ४संसंतितेसु ई. त• नि• ॥ ५ विसिमिते ॥ ६ उण्हेयेसु है• तु.॥ ७ सत्ताली है. त.॥ चिहान्तर्गतः पाठ है. त• नास्ति ।। ९उत्तरामासे है.त.॥ १० महोदग्ग है. त॥ ८ - २०० अंगविजापदण्णयं ऽऽभरणोपकरणसमग्ग-उदत्त-परग्धपादुन्भावेसु चेव अत्यि जयो त्ति धूया | तत्थ धण-धण्णगह-गाम-णगरलद्ध-अधि. द्वितपमुत्त-जातसद्दपादुम्भावेण खंघाचारअक्खुजंतउदग्गविजितणिचयपादुब्भावेण सम्मकनारंभपुरिसकारणिब्वेस- फलपादुब्भावेण अस्थि विजयो ति बूया । तत्थ छत्त-भिंगार-ज्झयविअणि-सिविका-रध-पासादसह-रूवपादुमावेसु असण-पाण-साइम-साइमणव-पचुदग्ग-मणुनपादुभावे गाम-णगर-खेड-पट्टणा-ऽऽगर-अंतेपुर-गिह-खेत्त-सण्णिवेससंथा- 5 पणमापणासु आराम-तलाग-सब्यसेतुसंथावणमापण-सन्निवेसेसु एवंविहेसु सद-रूवपादुब्भावेसु अस्थि विजयो त्ति बूया । एवमादीसुमणुण्णोदत्तेसु अभंतरवाहिरेसु आमास-सह-रूवपादुब्भावेसु विजयं वूया । तत्य बज्झामासे चलामासे कण्हामासे तुच्छामासे दीहामासे यामामासे णपुंसकामासे पेरसामासे जधण्णामासे अधोभागामासे अप्पसण्णामासे उहुयामासे ओमजिते ओलोगिते अणुदत्तेसु य सद्द-रूय-गंध-रस-फासपादुभावेसु णत्यि जयो त्ति धूया । तत्थे धणं वा रायकुलाणं वा गणागं या देसाणं या णिगमाणं वा गराणं वा पट्टणाणं वा खेडाणं या आगराणं वा गामाणं वा सण्णिवेसागं या 10 एवमादीणं अण्णेसि पि हाणीसंपयुत्ता[सु] कधासु णस्थि विजयो त्ति बूया । तत्थ उट्टणं या मासाणं या समयाणं घा रुक्साणं या गुम्माणं या लताणं वा वल्लीगं या पक्खीणं वा चतुष्पदाणं या परिसप्पाणं या कीड-किविल्लगाणं वा थीणं या पुरिसाणं या उदुकाल-मद-जोव्यण-पहास-पमुदित-घल वीरिय-अतिपत्त-हीणदीणसद्द-रूवपादुब्भावसु णस्थि विजयो त्ति । तत्थ परिदीणोबहुत-चावण्णपुप्फ-फल-पयाल अंकुर-परोह-पाण-भोयण-वत्था-ऽऽभरणोपकरण-सयणाऽऽसण-जाण-वाहणपरि- च्छद-आसार-परिविहल-मिण्ण-जज्जरपादुद्भावेसु एतेसिं वा एवमादीणं दव्योवकरणाणं विणास-विसंजोयणादिसु सद- 10 रूपपादुभावेसु णस्थि विजयो ति । तत्थ धण-धण्ण-तणसंचयपरिहाणि-विणास-विप्पलोवणसह-रूवपादुब्भावेसु णस्थि विजयो त्ति थूया। तत्य धय-छत्त-सत्ति-पास-चीयणी-भद्दासण-सिविक-संदण-रध-बलमी-पदोलि-पवणभग्ग-मैंधित-पडित- विप्पजोयित-ओणामिव-लग्ग-लयित-अपविद्ध-छुद्ध-सदिवारित-पहत-परावत्तिय एवंविधसद्द-रूवपादुब्भावेसु णत्यि विजयो ति यूया । तत्य खंधापारपराजय-विणिपातितजोध-विविधताहण-पडह-तुरिय-वैजयंति-घंटा अणुदत्त-हीण-खामसर-मीत- वाचक-पलातविविधएवंविधसद-रूवपादुभावे गस्थि जयो ति यूया । तत्य अभंतरेसु सयं परकमेण विजयं वूया। याहिरमंतरेसु सयं परकमेण संमुच्चविजयं वूया । वाहिरेसु परसं- सयपरफमेण विजयो भविस्सति त्ति बूया । पुण्णामेसु परफमेण विजयो भविस्सतीति घूया । यीणामेसु संतेण विजयो भवि- रसतीति । पपुंसएमु अपुरिसकारेणं विजयो भविस्सतीति । गिद्धेसु समुदितरस सामिद्धीयं विजयो भविस्सतीति धूया । लुक्रोम गियगयरस अदसंसाय विजयो भविस्सतीति । अमंतरेसु रजत्यस्स विजयो भविस्सतीति यूया। अभंतरमंतरेसु रायपाणितं णगरगतस्स विजयो भविस्सतीति यूया। घाहिरमंतरेसु रजंतरगतस्प विजयो भविस्सति त्ति । याहिरेसु. 25 परविसयं गंता विजयो भयिरसतीति । याहिरयाहिरेसु परविसयगतरस परो विजयो भविस्सतीति यूया। आहारेसु आययठुलो विभयो भविस्सतीति । णीहारेसु जोगिबहुलो विजयो भविरसतीति । थूलेसु महाविजयो मविरसती ति यूया । किसेसु अप्पो विनयो भविस्सतीति । तिम्रोमु महता सत्यणियातेग विजयो भविस्मतीति । मतेसु पाणायाययहुलो विजयो भविस्सतीति बूया । मुदितेमु पदिसाय मुदितस्स विजयो भविस्सतीति यूया । पुरस्थिमेसु गत्तेमु पुरथिमायं दिसायं विजयो भविस्सतीति पूग । दक्सिगेमु दरियणायं दिसायं विजयो मविस्सतीति । पच्छिमेमु गोमु पच्छिमायं दिसायं ० दिनयो मयिरसतीति । पामेमु गतेमु उत्तरायं दिमायं विजयो भविरसति ति । पंसि काले विजयो भविस्सतीति । पुसमाधारिते उधुत्तादि पालोपलद्धीदि उदु-पास-मुण-कार- १'मपर 1.।'मग्प' fi•n २रय पणयण •त. मम्ममुतउद' पु. भामुखतउद Fron vrप पर्ण पा पयलं पा गहण या ...॥ ५ मद्वित'.६.१ ६"मु आपस्स पु.॥ जाणी.. पिना राविहन्ततः पार... 20 एगणपण्णासइमो पराजयज्झाओ २०१ पुव्वण्ह-मंज्झण्डा-ऽवरण्ह-पदो-सऽटुंरत्त-पचुसोपलद्धीहिं उवलद्धव्या भवति । पुव्वं जये आधारिते करस कधं कसि खेतसि केण गुणोपजयेण कंसि कालंसि त्ति एवमादीआओ उवलद्धीओ आधारयित्ता आधारयित्ता जयमंतरेण जधुत्ताहिं उबलद्धीहिं उबलभिडं वियाकरे तव्याओ भवति ।। ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय जयो णामाज्झायो अडयालीसतिमो सम्मत्तो ॥ ४॥ छ । 5 [एगूणपण्णासइमो पराजयज्झाओ] - णमो भगवनो जसवतो महापुरिसस्स । अघापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पराजयो णामा- ज्झायो । तमणुवक्खरसामि । तं जधा-तत्य अत्थि पराजयो णत्यि पराजयो ति पुवमाधारयितव्यं भवति । तत्थ अब्भंतरामासे दढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे पुण्णामधेजामासे दक्खिणगत्तामासे इस्सरियामासे उत्तमा- मासे उद्धंभागामासे अभिमजितामासे मुदितामासे पसण्णामासे णत्यि पराजयो त्ति यूया । तत्य उदूर्ण या कच्छाणं 10 वा लताणं वा गुम्माणं वा वल्लीणं वा पक्खीणं वा चतुप्पदाणं वा परिसप्पाणं वा जलचराणं या कीडकिविल्लगाणं या इत्थीगं वा उदुकालहासं समुदयउदग्गसमायुत्तासु कधासु पडिरूव-सद्दपादुब्भावेसु य णत्थि पराजयो त्ति बूया । तत्थ णव-परिपुण्ण-अविणहरुक्ख-पुप्फ फल-पत्त-मूल-पवाल-पाण-भोयण-वस्था-ऽऽभरण-भायण-जाण-याण-वत्था-ऽऽभरणोव- करणपादुभावे सदोदीरणे वा गत्यि पराजयो त्ति चूया । तत्थ बझामासे चलामासे लुक्खामासे किलिहामासे तुच्छामासे णपुंसकामासे वामगत्तामासे जधण्णामासे अधोगत्तामासे णिम्मजिते अपमन्जिते दीणामासे अप्पसण्णामासे 18 मतामासे उबद्दुतामासे दुग्गंधामासे पराजयो भविस्सतीति वूया । तेत्य अरणं या रायकुलं या देसाणं या गिगमाणं वा नगराणं वा पट्टणाणं या खेडाणं वा आगराणं वा गामाणं वा सन्निवेसाणं वा हाणी-उहाण-विणासपाउ- भावे एवंजुत्तासु कहासु य पराजयो भविस्सतीति बूया । या तत्य णीहारेसु उदूर्ण वा उस्सयाणं या रुक्साणं या गुम्माणं वा लताणं या पक्खीणं वा चतुप्पदाणं वा परिसप्पाणं वा जलचराणं या कीडकिविल्लगाणं वा पुरिसाणं वा इत्थीगं वा उदुकाल-हास-जोव्यण-मंदोदग्ग-अतिवत्त-खीणपादुद्भावेसु पराजयो भविस्सतीति चूया । तत्य रयणविणासे रजविणासे 20 रायविणासे रायकुलविणासे देसविणासे रायपाणिविणासे णगरविगासे भिगमविणासे पट्टण खेड-आगर-गाम-सण्णिवेस- पासाद-गिह-खित्त-आराम-तलाग-सब्यसेतु-विणासपादुभावे चेव एवंजुत्तासु य कधासु पराजयो भविसतीवि वूया । तत्थ परिजिण्ण-खंड-हीणोपदुत-हित-विण-घायण्णोपकपुप्फ-फल-पत्त-पवाल-कंद-मूल-अंकुर-परोहगते पाण-भोयण यत्या- ऽऽभरण-जाण-वाहण-भायण-सयणा-ऽऽसण-वत्या-ऽऽभरणउयकरणविणासपाउन्भावे पराजयो भविस्सतीति वृया । तत्य धण-धण्णरतणसंचय-सयणा-ऽऽसण-जाण-याहण-वत्था-ऽऽभरणपरिच्छद-सत्यावरण-सव्योपकरणामासेमु उत्याणकरण-25 असं-पत्ति-असक्कार-परिभय-अवमाणा-ऽवसिद्धि-असंपत्त-अणिव्युतिपादुमावेसु एवंजुत्तेमु या उदाहरण-सद्दपादुन्मावेमु पराजयो भविस्सतीति बूया । तत्य अभंतरे सयं पराजयो भविस्सतीति चूया । बाहिरभंतरेमु अण्णेहिं सह पराजयो भविरसतीति यूया । वाहिरेसु परसंसितो पराजयो भविस्सतीति यूया । पुण्गामेसु परधामेण पराजयो भविरसतीति : वूया । थीगा- मेसु संतेण पराजयो भविस्सतीति । पुसएमु अपुरिसक्कारेण पराजयो भविस्सतीति यूया । दहेमु एकद्वाणहिवाणं 50 पराजयो भविस्सतीति । चलेसु परिघार्यवाणं पराजयो भविस्सतीति यूया । गिद्धमु मुदिताणं पराजयो भविरमतीवि यूया। १जयंत ई.स.नि. विना । २पामझाम.॥ ३°यालातीसति' ह. त•n ४ माहारियचं ..त.॥ ५हस्तचिहान्तर्गतः पाठसन्दर्भः है. त• एव वर्तते ॥ ६°महोदग्ग है. तु.॥ ७हमचिरान्तर्गतः पाठः है. त• एवं वर्तम मंग०२५ 1 २०२० अंगविजापइण्णय लुखेसु निरागताणं पराजयो भविस्सतीति बूया । अभंतरेसु रायत्यस्स पराजयो भविस्सतीति । अभंतरेसु राय- हाणीगंयस्स पराजयो भविस्सति त्ति या धूया । वाहिरभंतरेसु रज्जसंधीगतस्स पराजयो . भविस्सतीति । घाहिरेसु अरण्णगवस्स पराजयो भविस्सति ति । ॐ वाहिरेसु अरण्णगयस्स पराजयो भविस्सति त्ति । न पाहिरवाहिरेसु परविसयगयस्स पराजयो भविस्सति त्ति । आहारेसु सलामो पराजयो भविस्सति त्ति । णीहारेसु अफलो पराजयो 5 भविस्सति त्ति । थूलेसु महापराजयो भविस्सति त्ति । कसेसु अप्पो पराजयो भविस्सतीति वूया । कण्हेसु बहुक्खतो पराजयो भविस्सतीति बूया । सुक्केसु अत्यलाभसमाउत्तो पराजयो भविस्सतीति । तिक्खेसु सत्थपातबहुलो पराजयो भविस्सतीति । मतेसु पाणपातवहुलो पराजयो भविस्सतीति । अप्पसण्णेसु अप्पियपराजयो भविस्सति त्ति । पुरस्थिमेसु पुरथिमायं दिसायं पराजयो भविरसतीति । दक्षिणेसु गत्तेसु दक्खिणायं दिसायं पराजयो भविस्सति त्ति । पच्छिमेसु गत्तेसु पच्छिमायं दिसायं पराजयो भविस्सति त्ति । वामेसु गत्तेसु उत्तरायं दिसायं पराजयो भविस्सति त्ति । एवं पराजये पुन्वाधारित उत्पन्ने पादुभावे अत्थि पराजयस्स पुणरवि कधं पराजयो भविस्सति ति फैध कस्स कस्स पराजयो भविस्सति ति " कंसि देसंसि पराजयो भविस्सति ति सि कालंसि पराजयो भवि- स्सति ति फेसि दिसायं पराजयो भविस्सति तिला आधारइत्ता अणुपुव्वसो आमास-सद्द-रूवरस-गंध-फासपादु- भावेसु अभंतर-बाहिरत्थावणाहि य एवमादीहि यधोत्ताहिं उवलद्धीहिं पराजयो समणुगंतव्यो भवति ॥ ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पराजयो णामाज्झायो एंगोणपण्णासतिमो समणुगंतव्वो भवति ॥ ४९॥ छ । 10 15 [पण्णासइमो उबहुतज्झाओ] पामो भगवतो जसयतो महापुरिसस्स अधापुव्वं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय उवदुतं नामऽज्झातो। तं खलु भो ! तमणुवक्सरसामि । [तं जधा-] तत्य सोवद्दयो निरुवयो ति पुष्यमांधारयितव्वं भवति । तत्य उवहुतामासे दुगंधामासे किलिट्ठामासे कण्हामासे लुक्खामासे अप्पसण्णामासे दीणामासे तिक्खामासे सव्यसत्यगते 20 सन्वछिरगते सन्यखंडगते सव्ववजगते सव्वउपद्दवगते सव्यउपहुतणर-णारि-पक्सि चउप्पद-परिसप्प-जलचर-कीडकिवि- सक-पुष्फ-फल-रुपरस-गुम्म-लता-बल्लि-पत्त-पयाल अंकुर-परोहगते यत्या-ऽऽभरण-सयणा-ऽऽसण-जाण-थाहण-भायणपरि- छद-दव्योवकरण-धण-धण्ण-रयणगते भिण्ण-विन-सविकार-सवाहत-उवहित-फूह-कम्मपाससमाउत्तपादुभावे एतारिसे सोयरवे सोनावं यूया । तस्य अणुबहुतामासे अव्वापण्णामासे सुगंधामासे अकिट्ठामासे सुकामासे गिद्धामासे पैसण्णा. मासे मुदितामासे सन्यअच्छिण्ण-असंड-अणयज-अणुबहुतगते सव्यअणुपहुतमुदितणर-णारि-पक्खि-घउप्पद-जलयर- 23 कोदकिविल्लगगते गर-पुणपुप्फ-फल-रुक्स-गुच्छ-गुम्म-टता-यणे(वहिपत्त-पवाल-अंकुर-परोहगते उदप्तवत्था-ऽऽभरण- सयगा-ऽऽसण-जाण-याण-मायणपरिच्छद-दव्योपकरण-घण-धण्ण रयणगते अभिण्ण अविज्ञ-अविकार-अव्याहत-अफुडित- अफूडकम्मदोसविप्पमुपादुन्भाचे मणुण्ण-पगुदग्गऽष्ण-पाण-भोयणपादुमावेसु घेव एवंविहेमु भामास-सह-रूप-रस- गंप पासपादुन्मावेमु उदत्तेमु पिरुबहुतेमु निरूपहुतो त्ति घूया । उपरवे पुष्पगपारित उपण्णयापादुमावेसु सोयडयो कीरिसो ति पुव्यमाघारपिवयं भवति । तत्य सव्यत्यगते 10 ऐनं भूया । सन्यपिण्णेमु विलकं यूया । कण्हेमु तिलकालकं सूया । गणेमु पत्थर्फ यूया ! उयमाहणेमु तणं यूगा । १-२ सपिान्तर्गतम् पाठः १०. एव पाटे ॥ ३ पहुफूलो परत.॥ ४-५ स्वविहान्तर्गतः पाठ- • • an भपिस्सति • • पिना ॥ ७पगूण है..॥ ८'माहारयिपव्य है..॥ ९पण्णामासे.. मिना १. पाहायपु.॥
पण्णासइमो उवहुतज्झाओ २०३ अप्पसण्णेसु चलं वूया । वावण्णेसु किडिभक सरं कुणिणखाणि णयणविकारो वा विण्णेया। गंठीसु गंठी बूया। वणेसु वणं बूया । अदंसणीयेसु काणं वा अंध वा घूया । सद्देयेसु बहिरं वा कण्णछेनं वा बूया। गंधेयेसु णासारोगं वा णासा- छेनं वा [वूया ] । रसेयेसु जिन्भारोगं वा जिब्भाछेनं वा बूया । फासेयेसु तयादोसं वा फासोवघातं वा बूया । तत्य उवहुतो अणुबहुतो पुव्वमाधारिते इमे संखेवा-उबहुते पडिपोग्गला उवलद्धव्या भवंति । तत्थ काणं वा अंधं वा कुंटं वा गंडीपादं या खंजं वा कुणीकं वा आतुरं वा उवद्दुतं वा विकलं वा दिट्ठा पडिरूवे उबहुतो ति । बूया । तत्थ पलितं वा खरडं वा विपण्णा वा तिलकालकं वा चम्मक्खीलं वा दटुं वा किडिग' वा किलासं वा क8 वा सिमं वा कुणिणहं वा खतं वा अरुभं वा अण्णतरं वा सोवहवं दव्यमामसति उबहुतो त्ति जाणितव्वो भवति । तत्य तेल्ल-दधि-दुद्ध-मधु-पुप्फरस फलरस-मंस-सोणित-पूव-बसा-मुत्त-पुरीस-खेल-सिंघाणक-अक्खि- गूधक-कण्णगूधकादीणि एवंविधाणि आमसेजो उवहुतो ति जाणितव्यो भवति । तत्य किलिहेसु किलिट्ठमल्लाणुलेवण-किलिट्ठपुप्फ-फल-पवाल-मूल-परोह-अंकुरकिलिट्ठ-पमिलातपादुम्भावे वापण्णदुद्ध- 10 दधि-घत-बापण्णपाणभोयण-परिजिण्णवत्थभोयणजज्जर-परिभिण्ण-खंडव्योपकरणे चेव एवंविधे पेक्खितामासे सह-रूव- गंध-फास-रसपाउन्मावेसु उवहुतो त्ति बूया । तत्थ उवहुते पुव्वाधारिते उप्पण्णे पादुन्भावे कीरिसो उवद्दयो ति पुव्वा- धारिते तत्थ सुक्केसु सबलं घूया, 'तं चेव सुणवारकं घूया। पीतेसु कामलं वूया। वापण्णेसु वापण्णं धूया । णीलेसु णीलं यूया । कण्हेसु कण्हतिलं यूया । गहणेसु गच्छकं घूया । उपग्गहणेसु तूणं घूया । सव्वणिद्धेसु पिलकं चम्मखीलं वा गलुकं वा बूया । पिलकाय पिलकं चम्मक्खीलं, गलुणा गलुकं, 'गंडेण गंडं पडिरूवेण जाणितव्वं भवति । तत्थ 15 अग्गेयेसु द8 बूया । कोढे कोढिकं, कोट्टिते कोट्टितं, आपडितेण आपडितं, वणेण धणं, तनातपडिरूवेण एवमादि अणु- गंतव्वं भवति । तत्य पहेसु कुणिणहं, पोरिसेण पातंड वा अम्हरिं वा, वसणेसु वावंडेअरिसं वा भगंदलं वा, उदरे कुच्छिरोगं वा वातगुम्मं वा सूलं वा, हितये छहि वा, उरे हिकं वा, कंठे अवयिं वा गलगंडं वा फंसालुकं (कंठमालकं ) या, 'कंकेसु अवयिं, पट्ठीये पहिरोगं, सव्वाहारगते खंडोहँ वा गुरुलं वा करलं वा यूया । मूकं या खंडदंतं वा स सोमदंतं वा आमासपडिरूवेहिं आधारयितूण पत्तेगं पत्तेगं सव्यं गीवाय गीवरोगं अवयिं वा गलगंडं 20 वा घूया । हत्थेसु हत्थछेनं वा अंगुलिछेनं वा अत्योवद्दवं था । पडिरूयोपलद्धीहिं आमासेहि य उवलद्धिं यूया । पादेसु पाइछेनं वा अंगुलिछेनं वा पादोवद्दवं वा बूया । सीसे सीसवाधयो घूया । अक्खिसु अक्खिवाधयो बूया । तत्य वातिको पेत्तिको संभिको सण्णिवातिको त्ति रोगा पुन्वमाधारयितव्वा भवंति । वस्य सव्ववायव्येसु सुक्केसु कसायरसपादुव्भावेसु वा सव्वप्पयोगेसु सव्यचेहागते य वातिक रोगं बूया । वत्य अग्गेयेसु पीयरस- पादुन्भावेसु पण्णे अंबिलरसपादुभावेसु लवणरसपादुम्भावेसु सव्वउसुणपरिदाहगते य पेत्तिकं रोगं बूया । आपुणेयेसु 25 दढेसु सीतलेसु मधुर-पेसलरसपादुभावेसु चेव सेंमिकं रोगं घूया । तत्थ अधोगामीयं गत्तामासे अघोणामीगत्तोपकरणेसु य वातिकं रोगं घूया । अधोहितयस्स जाव णामीतो ति एतेसिं गत्ताणं संपरामासे एतेसिं चे उवकरणसर-रुवपादु- भावे पेत्तिकं रोगं यूया । उद्धंहितयगत्तेसु संपरामटेसु एतेसिं चेव गत्तोवकरणेसु धूमणेचादिसु पादुम्भीवेसु य पुण्णा- मेसु य सद्द-रूवेसु सेंभिगं रोगं घूया । आमेसु अणग्गेयेसु य आमा[स]यगतं रोग बूया । पकेसु अग्गेयेसु य पक्षासय- - समुप्पण्णं रोगं वूया। 30 १"डिलं या ह.त. विना । २ अरूयं वा ई० त० ॥ ३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. त० एव धर्गते ॥ ४ गंडयेण है. त• ॥ ५°डपरिहत•॥ ६फङसाहै. त०॥ ७ ककेस है. त. दिना ॥ ८ या मुलं वा फरणं या हं. त• चिना ॥ ९॥ एतच्चिद्वान्तर्गतः पाठः है. तनास्ति ॥ १० हत्येनं हं. त•॥ ११ गंधामासे है..॥ १२ घेव करण' है. त• विना ॥ १३ °भावेहि सुतण्णामे है. तविना ॥
२०२० - भंगविज्रापण्णाय लुक्खेमु निरागताणं पराजयो मविस्सीवि यूया। अभंवरेसु रायत्यस्स पराजयो भविस्सतीति । 7 अभंवरेसु राय- हाणीगंयस्स पराजयो भविस्सति ति यूया । बाहिरमंतरेसु रत्नसंधीगतस्स पराजयो भविस्सतीति । बाहिरेस अरण्गगतस्स पराजयो भविस्सति ति । स वाहिरेसु अरण्णगयरस पराजयो भविस्सति ति। वाहिरवाहिरेसु परविसयगयस्म पराजयो भविस्सति त्ति । माहारेसु सलामो पराजयो भविरसति ति । णीहारेसु अफलो पराजयो । भविस्सति चि । थूलेमु महापराजयो भविस्सति त्ति । कसेसु अप्पो पराजयो भविस्सतीति बूया । कण्हेसु बहुक्सतो पराजयो भविस्सतीति यूया। मुकेमु अत्यलामसमाउचो पराजयो भविस्सतीति । तिखेमु सत्यपातबहुलो पराजयो भविस्सतीति । मतेसु पाणपातबहुलो पराजयो भविस्सतीति । अप्पसण्णेसु अप्पियपराजयो भविस्सति त्ति । पुरथिमेसु पुरस्थिमायं दिसायं पराजयो भविस्सतीति । दक्सिगेसु गत्तेसु दक्सिणायं दिसायं पराजयो भविस्सति त्ति । पच्छिमेसु गत्तेमु पच्छिमायं दिसायं पराजयो भविस्सति त्ति । यामेसु गत्तेसु उत्तरायं दिसायं पराजयो भविस्सति त्ति । एवं पराजये पुन्याधारिते उप्पन्न पादुव्मावे अत्यि पराजयस्स पुणरवि कधं पराजयो मविस्सति त्ति कॅधं कस्स फस्स पराजयो भविस्सति त्ति राज्य कसि देसंसि पराजयो भविस्सति त्ति कंसि कालंसि पराजयो भवि- स्सविति सि दिसायं पराजयो भविस्सति त्ति हा आधारइचा अणुपुव्यसो आमास-सह-रूव-रस-गंध-फासपादु- न्मावेसु अभंवर-याहिरत्थावणाहि य एवमादीहि यघोचाहिं उपलद्धीहिं पराजयो समणुगंतव्यो भवति ।। ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्जाय पराजयो णामाज्झायो एगोणपण्णासतिमो समणुगंतव्यो भवति ॥ ४९॥ छ । 10 13 [पण्णासइमो उवहुतज्झाओ] णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स अधापुव्यं सलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविनाय स्वहुतं नामऽझातो। तं राल भो ! वमणुयक्सस्सामि । [तं जया-7 तत्य सोबयो निरुवद्दयो ति पुत्र्याधारयितव्यं भवति । तत्य उबहुतामासे दुगंधामासे किलिहामासे कण्दामासे लुक्सामासे अप्पसण्यामासे दीणामासे तिस्सामासे सव्यसत्यगते 20 सम्बटिगते सव्यखंडगते सव्वयनगते सव्यउपयगते सव्यउपद्रुतणर-गारि-पक्सि-पउप्पद-परिसप्प-जलचर-कीटकिवि- एक-पुष्प-पल एक्स-गुम्म-रवा-यल्लि-पत्त-पपाल-अंकुर-परोहगते यत्या-ऽऽमरण-सयणा-ऽऽसण-जाण-याण-मायणपरि- घर-दव्योरकरण-धण-पण्ण-रयणगते भिण्ण-विन-सविकार-सपाहत-उपहित-फूह-कम्मपाससमाउचपादुन्मावे एतारिसे सोरवे सोयएवं धूया । तत्य अणुरगुतामासे अव्यापण्णामासे सुगंधामासे अकिट्ठामासे मुक्कामासे गिद्धामासे पैसण्या- मासे मुदितामासे सव्यमच्छिण्ण-असंह-अणपन-अणुउद्दुतगते सव्वअणुपद्रुतमुदिवणर-गारि-पक्सिचउपद-जलयर- 23 कीरकिवितगगते पर-पुर्णपुप्फ-फल-रवरस-गुच्छ-गुम्म-टता-यणे(यपित्त-पयाल-अंकुर-परोहगते उत्तरत्या-ऽऽमरण- सपगा-जमग-जाग-याण-मायणपरिच्छद-दव्योपकरण-घण-घण्ण-रयगगते अभिण्ण-अविन-अविकार-अव्याहत-अपुडित- अहरफम्मदोमविममुपादुम्माचे मणुण्ग-पगुदग्गऽय-परण-मोयणपादुन्मावेमु घेर एयविहेमु मामास-सर-रूय-रस- गंप सागरादुम्मायेमु उदत्तेमु गिम्यदुतेमु गिरबहुतो त्ति पूया । एयरवे पुराधारित उपग्णयापादुम्मायेमु सोहयो कीरिसो ति पुल्यमाधारयितव्यं भवति । तस्य सव्यत्यगते ऐनं पूया । सध्यनिण्णेमु विलकं यूग । कण्हेसु तिलकालकं यूया । गहणेमु पत्य यूया ! उपाहणेमु सणं पूया । १-२ लभान्तर्गत पारः १. त• एन । ३ परफूलो पर • • ४-५ राशिान्तर्गतः पाठः . . ६ मरिम्मसित भिना । ७पण...॥ ८'मादापयियय • ६. ॥ ९पण्णामासे.. मा...'सहर't..॥
पण्णासहमो उवहुतज्ज्ञाओ २०३ अप्पसण्णेसु चलं बूया । वावण्णेसु किडिभक सरं कुणिणखाणि णयणविकारो वा विण्णेया। गंठीसु गंठी बूया । वणेसु वणं बूया । अदसणीयेसु काणं वा अंध वा घूया। सद्देयेसु बहिरं वा कण्णछेनं वा बूया। गंवेयेसु णासारोगं वा णासा- छेनं वा [वूया ] । रसेयेसु जिन्भारोगं या जिभाछेनं वा चूया । फासेयेसु तयादोसं वा फासोवघातं वा बूया । तत्थ उवदुतो अणुवहुतो पुन्वमाधारिते इमे संखेवा-उवहुते पडिपोग्गला उवलद्धच्या भवंति ! तत्य काणं या अंधं वा कुंट वा गंडीपादं वा खंजं वा कुणीकं या आतुरं वा उवद्दुतं वा विकलं वा दिट्ठा पडिरूवे उबहुतो त्ति । बूया । तत्य' पलितं वा खरडं पा विपण्णा या तिलकालकं वा चम्मक्खीलं या दुटुं वा किडिंग: वा किलासं या कटं वा सिमं वा कुणिणहं या खतं या अरुअं या अण्णतरं वा सोवद्दवं व्वमामसति उवहुतो त्ति जाणितव्यो भवति । तत्थ तेस-दधि-दुद्ध-मधु-पुप्फरस-फलरस-मंस-सोणित-पूव-यसा-मुत्त-पुरीस-खेल-सिंघाणक-अक्खि- गूधक-कण्णगूधकादीणि एवंविधाणि आमसेजो उवहुतो त्ति जाणितव्यो भवति । तत्य किलिहेसु किलिट्ठमटाणुलेवण-किलिट्ठपुप्फ-फल-पवाल-मूल-परोह-अंकुरकिलिट्ठ-पमिलातपादुद्भावे वापण्णदुद्ध- 10 दधि-घत-वापण्णपाणभोयण-परिजिण्णवत्यभोयणजजर-परिभिण्ण-खंडवोपकरणे चेव एवंविधे पेक्खितामासे सह-रूव- गंध-फास-रसपाउन्मावेसु उवहुतो त्ति बूया । वत्य उवद्दुते पुख्याधारिते उप्पण्णे पादुभावे कीरिसो उवद्दयो चि पुवा- धारिते तत्य सुकेसु सवलं घूया, तं चैव सुणयारकं यूया। पीतेसु कामलं यूया। पापण्णेसु वापगं वूया । णीलेसु णीलं यूया । कण्हेसु कण्हतिलं यूया । गहणेसु णच्छकं घूया । उवग्गहणेसु तूणं घूया । सव्वणि सु पिलकं घम्मखीलं या गलुकं वा बूया । पिलकाय पिलकं चम्मक्खीलं, गलुणा गलुकं, 'गंडेण गंडं पडिरूवेण जाणितव्यं भवति । तत्य 15 अग्गेयेसु द8 बूया । कोढे कोढिकं, कोट्टिते कोट्टितं, आपडितेण आपडितं, वणेण वणं, तज्जातपडिरूवेण एवमादि अणु- गंतव्वं भवति । तत्थ णहेसु कुणिणहं, पोरिसेण यातंर्ड वा अम्हरिं वा, वसणेसु वातंडेअरिसं या भगंदलं वा, उदरे कुच्छिरोगं वा वातगुम्म वा सूलं वा, हितये छहि वा, उरे हिकं वा, कंठे अवयिं वा गलगंडं या कैसालुकं (कंठमालकं ) वा, कंकेसु अवयि, पट्ठीये पहिरोगं, सव्वाहारगते खंडोह यी गुरुलं या करलं या घूया । मूकं वा खंडदंतं वा । सोमदंतं वा आमासपडिरूवेहिं आधारयितूण पत्तेगं पत्तेगं सव्वं गीवाय गीवरोगं अवयिं वा गलगंड 20 वा बूया । इत्येसु हत्यछेनं वा अंगुलिछेनं वा अत्योयहवं वा । पडिरूयोपलद्धीहिं आमासेहि य उपलद्धिं चूया । पादेसु पादछेज्जं वा अंगुलिछेजं वा पादोवद्दवं वा बूया । सीसे सीसवाधयो चूया । अक्सिसु अक्खिवाधयो घूया । तत्य यातिको पेत्तिको संभिको सण्णिवातिको त्ति रोगा पुल्वमाधारयितव्या भवति । वत्थ सबवायव्वेसु सुक्केसु कसायरसपादुभावेसु वा सबप्पयोगेसु सब्बचेद्वागते य वातिक रोग बूया । तत्य अग्गेयेसु पीयरस- पादुन्भावेसु पण्णे अविलरसपादुन्मावेसु लवणरसपादुन्भावसु सबउसुणपरिदाहगते य पेत्तिकं रोगं घूया। मापुणेयेसु 23 दढेसु सीतलेसु मधुर-पेसलरसपादुम्भावेसु चेव सेंमिकं रोगं घूया । वत्य अधोगामीयं गत्तामासे अघोणामीगत्तोपकरणेसु य वातिक रोगं चूया । अधोहितयस्स जाव णामीतो त्ति एतेसि गत्ताणं संपरामासे एतेसिं चे उपकरणसर-रुवपादु- भावे पेत्तिकं रोगं चूया । उद्धंहितयगत्तेसु संपरामहेसु एतेसिं चेव गत्तोवकरणेसु धूमणेत्तादिसु पादुभीवेसु य पुण्णा- मेसु य सद्द-रूवेसु सेंभिगं रोगं धूया । आमेसु अणग्गेयेसु य आमासि]यगतं रोगं घूया । पक्केसु अग्गेयेसु य पासय- समुप्पणं रोग घूया। 30 १"डिलं या है. त• विना ।। २ अरूवं या ई० त०॥ ३ हतचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव वर्तते ॥ ४ गंडयेण १० त०॥ ५°डपरिर है.त.॥ ७ फकेमु है. त• विना ॥ ८या मुलं या करणं या है. त. विना॥ ९4- एतचिहान्तर्गतः पाठः ह. त• नालि॥ १० हत्येनं . तु.॥ ११ गधामासे है. तु.॥ १२ चेय करण' है. त• विना ॥ १३°मावेहि सुतण्णामे है. त• विना ॥ ६कटुसा' है. त.॥
२०४ अंगविजापदण्णायं एवं यातपित्त-सिंमोपलद्धीहिं अभिघातसयोपलद्धीहि आमासयं-पकासदोपलद्धीहिं वात-पित्त-सिमोपलद्धीहि उपलन्म मामास-सह-रूवपादुमावेहिं य संगहतो वातिक-पित्तिक-सेंभिक सन्नियांतिका यं चउब्विहा भेदसो अणेगा- गाय आधारयितूर्ण जघुत्ताहिं उवलद्धीहिं उपलव्या भवति । तत्य तिलकालकं या चम्मकीलं वा दटुं वा पिलकं वा तूगं या णत्यकं वा वणं या एवमादि सुद्धभागेमु आमटेसु उद्धंगीवाय विण्णेयाणि भवंति । अधोमागेसु अधोकडीयं विण्याणि मयंति। सममागेसु गत्तेमु आमहेसु अंतरकाये विष्णेया मांति पंसि देसे पुव्याधारितेमु दक्सिणेमु दक्खिणेसु चेर गत्तेमु विष्णेयाणि भवति । वामेमु वामेमु चेर गचेमु विष्णेयाणि । यामदक्सिणेसु वामदक्खिणेसु गत्तेमु विष्णेयाणि । मझिमे र यामुणेर दक्सिणेसु मझिमेसु चेन गत्तेमु विण्णेयाणि । पुण्णामेसु गत्तेमु पुण्णामेसु चे विण्णेयाणि । धाणामेमु गत्तेमु ीणामेमु चेव विष्णेयाणि मति । नपुंसकेमु अंतसंघिच्छेदेसु विण्णेयाणि । दढेसु ददेसु कक्सडगत्तेसु विष्णेयाणि । घलेमु चलेसु चेय गत्तमु विण्णेयाणि । गिद्धेसु अच्छीसु कण्णेसु वा णासायं या मुहे या पोरिसे या 10 विष्णेयाणि । लुक्रोमु महेनु विण्णेयाणि । फण्हेसु केसंते या उत्तरोहे वा भुमकामु वा । सुकेसु णामीयं वा यत्यिसीसे या विष्णेयामि । सामेमु थणपालीमु विण्णेयाणि भांति । किसेसु मुयीसु या दंतेसु विण्णेयाणि । वाहिरेसु बाहिरेसु पेर गतेमु विष्णेयाणि । अन्मंतरेमु अन्तरेसु चे गत्तेमु विण्णेयाणि । दीहेसु दोहेसु चेक गत्तेमु विण्णेयाणि । रस्सेसु रम्सेमु चेर गत्तेमु विण्णेयाणि । थूलेमु थूलेमु चेर गत्तेमु विष्णेयागि । किसेसु किसेमु चेव जाणेनो । गिलोडे गंडेमु कण्णेमु पादवलेमु फरतलेमु चेय विण्णेयाणि भांति । डहरचलेमु चेव अंगुलीसंधीमु जाणेजो। हहरथावरेसु अंगुली- 18 पव्वेमु नाणेनो । गहणेमु सिरसि फसेसु वा पत्यिसीसे या विण्णेया । उबग्गहेसु भमुहामु अच्छीसु था जाणेनो । परिमंडलेमु सिसि गडे या विण्णेया । थलेमु उण्णतेमु जाणेञो । वायव्येसु णासायं या मुहे या अवाणे वा विण्णेया । अग्गेयेमु अग्गेयेमु घेर जाणेनो। तिक्लेमु दंतेसु वा पहेमु या जाणेजो। आदिमूलिएमु आदिमूलिएमु चेन जाणिनो। मझिमविगाडेमु मझिमविगादेमु चेर जाणेनो। अंतेमु अंतेमु चेव जाणेज्ञो। तवे वंवेमु चेय जाणेजो। दंसणिनेमु दंसगिन्नेमु चेर जाणेनो ॥ ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय उवहुतो णामाञ्झायो पण्णासतिमी सम्मत्तो॥छ॥५०॥ [एगपण्णासइमो देवताविजयज्झाओ] - 1 20 नमो भगरतो यसमो महापुरिसरस महावीरवद्धमागसामिस्म । अधापुष्यं सलु भो! महापुरिसदिनाय अंग- पिनाय देवताविजयो णामाग्झायो । सड भो! तमणुयक्साइस्सामि। तं जघा-उद्धंभागेमु मुरा, अधोमागेमु मुरा, 25 सुपीमु जयरा, मध्येमु गंधया, चलेमु पितरो, मतेमु पेता, मचलेमु दारुणेमु य दारणा विग्नेया । सारमंतेमु यसया, पगेयेमु धादिया, चतुरस्मेमु अस्मिगो, 'गिव्हमु अव्यायाधा, सामेनु देयदूता, कण्हेसु परिहा, पुद्धिरमणेमु मारण्मदा, पोममंतेमु गहतोया, पगतिमु पण्हिणो, यीगामेमु अच्छरातो, सेतेमु यरुगाइया, पच्छिमेमु दरिसमु मसेमु य पेनका, अमारवंतेमु य उत्तरेमु वैसमणमाइया जम्मा, अमायेमु पुररियमेमु य अग्गिमाइया सोमकाइया य विग्गेया । घलेगु कंदमदम्मेमु य हिमु पस्मत्त-ह-पंद-नाराज्यागि विनेयाणि भांति । अग्सिमु पंदा-ss- कषा-सत्य आयेगु थादिया पीतेमु रमु य विमेया, सीतलेमु मुमु य दो विश्णेयो, संसतेमु णपस. लागि, संरतेमु इसनेमु प सातदेयवाणि, यदेमु गहा विष्णेया । सयेमु सामण्णेमु य पलदेष-यामुदेया गियरममा गा-यमाचा अगिमारया य विम्य मति । सयहिं समादि मास-मर-रूप-पटिहयोरलीडिं १पा पममाए । पु. सुमा... २निसालेमु.. दिना दिसत .. तीसगिमो पायामोमपति । ५०nt... ५निगडे... ६ पदेसु मुस्से... - - एगपण्णांसइमो देवताविजयज्झाओ णिद्धेहिं सागरो या गदी वा विण्णेया-तत्य परिक्खेवेसु सागरा विण्णेया, दीहेसु णदी विण्णेया । लुक्खेसु अग्गि इंदग्गि या विष्णेया । संप्पभेसु आदियो । उण्हेसु अग्गी । उत्तमसाधारणेसु उण्हेसु य इंदुग्गि विण्णेयो । मत्थए बंभा उत्तमेसु या विण्णेया । निडालेसु इंदो इस्सरेसु य विण्णेयो । उत्तरेसु उदो सम्बपरफमगते य विण्णेयो । वाहूसु बलदेवो वा यासुदेवो वा सव्वघलदेवगते य विण्णेया । सामेसु कामो विण्णेयो । सव्व- कामपउत्ते सव्वरतिपयुत्ते चेव संधिसु उदलादला विण्णेया । दढेसु गिरी विण्णेया। सिवेसु सियो विष्णेयो ।। वहुरूवेसु य लिंगपादुभावेसु जमेसु य जमो विण्णेयो । सारवंतेसु वेस्सवणो विष्णेयो । सुकेसु य उत्तमेसु य वरुणो विण्णेयो । सोमेसु सोमपादुन्मावेसु य सोमो विण्णेयो । कण्हेसु रत्ती विण्णेया । सुकेसु दिवसो विष्णेयो। सिसि सिरी विण्णेया । मुदितेसु कामपजुत्तेसु य अइराणी विण्णेया । महावकासेसु पुघवी विण्णेया । सामेसु एकणासा विण्णेया। दंसणीयेसु णवमिगा विण्णेया । गिद्धेसु सुरादेवी विण्णेया । कण्हेसु पिण्णेसु सम्बपरि- सप्पपादुन्भावे य णागी विण्णेया । उद्धंभागेसु चलेसु य वण्णवतेसु सुबदणेसु सव्वपक्खि-पवकपादुन्भावे य सुवण्णा 10 विष्णेया । गरुलवाहणपादुद्भावे य तत्य अधोभागेसु णिण्णे य अधोलोकोपवण्णा विण्णेया, असुरा या णागा वा सुवण्णा वा विण्णेया भवंति, सकाहिं सकाहिं उक्लद्धीहिं विण्णेया । तत्थ तिरियंभागेसु उद्धंणामीय अधोगीवाय तिरियामासे तिरियविलोकिते तिरियसद्दपादुभावे य तिरिउवपपातिका दीवकुमारा समुद्दकुमारा दिसाकुमारा अग्गिकुमारा पाउकुमारा थणितकुमारा विजुकुमारा पिसाय-भूत-जक्ख-रक्खस-गंधव्या चंदिम-सूरिय-गहगण-णक्खत्त-तारारूवा य सकाहि सकाहिं उवलद्धीहिं आधारयितूर्ण आधारयितूणं आमास-सह-रूवपादुमावेहिं विण्णेया भवति । उद्धंभागेसु छत्त-वीयणि-भिंगार- 15 पादुन्मावेहिं उद्धं पक्खित्तंसि उद्धंभागोवकरणेसु य एयमादीसु य पडिरूव-सद्दपादुन्भावेसु उद्धंलोकोपपण्णा वैमाणिका देवा विण्णेया कप्पसण्णाहिं विधिआधारणाहिं लेस्सादिआधारणाहिं चेय भवति । तत्य उत्तमेसु इस्सरेसु चेव अधिपती विष्णेया । सामाणेसु दंडेसु सामाणपादुद्भावे य सामाणिया विण्णेया । पेस्सेसु आभियोगिका परिसोववण्णा विण्णेया । तत्य सव्ववाहणगते सव्ववाहणजोणीगते य आभिजोगिका विष्णेया । सव्वपरिसागते सव्वपरिवारगते य परिसोवयण्णा विण्णेया । तत्थ सव्वसगुणगते सुचण्णा पुण्णामेसु, थीणामेसु सुवण्णकण्णका जाणितव्या भवंति । दीहेसु गिद्धेसु णागा 20 पुण्णामेसु, थीणामेसु णागीदेवी विण्णेया। घणगते वयहारगते सारवंतेसु य वेस्सवणो विण्णेयो । सुक्केसु गिद्धेसु इस्स- रेसु समुदायकपादुद्भावेसु य वरुणो विष्णेयो। ५ इस्सरेसु उत्तमेसु सब्बरायपडिरूवेसु य इंदो विष्णेयो । मतेसु सव्यपेतपडिरूवेसु इस्सरेसु य जमो विण्णेयो । गो-महिस-गवेलकपादुब्भावे रुदेसु य सिवं बूया । कुकुड-मयू- रपादुद्भावे सेणावति [विण्णेयो] ! कुमारपादुभावेसु य खंदो विष्णेयो । छगल-मेंढक कुमार-असिपाटुमावे य विसाहो विष्णेयो । दंडेसु सव्यजोधपादुव्भावेसु य वण्ही विण्णेयो। उण्हेसु अग्गी विण्णेयो । सव्यदव्योयकरणपादु-25 भावे य चलेसु तालखंड-धीजणकादिसु य पादुभावेसु यातं यूया। दारणेसु रक्खसा विण्णेया । विभित-रुद्द-भय-हासेसु पिसाय-भूता चेव विष्णेया, थीणामेसु एतेसु चेव पादुन्मावेसु रक्खसीओ पिसाईओ भूतकण्णा देवीओ विण्णेयाओ भवंति । सव्वगंधव्यगते तंति-तल-तालणिग्योसे गंधव्या विण्णेया, थीणामेसु गंधव्यकण्णाओ विष्णेया । मधुर- घोसेसु पक्खिसु पडिरुवपादुभावेसु किन्नरा किंपुरिसा य विष्णेया, थीणामेसु किन्नरीओ किंपुरिसकण्णका विण्णेया। सुयीसु पुण्णेसु यक्खा विण्णेया, थीणामेसु जक्सिपिओ विष्णेयाओ । मूलजोणीगते वण्णस्सतीकण्णाओ 30 विण्णेयाओ। धातुजोणीगते पब्बतदेवता विण्णेया। गिद्धेसु पाणज्ञोणीगए य समुद्द-नदी-कूब-तलाग-पल्ललदेवयातो विण्णेया- [तत्थ ] णिण्णेसु परिक्खेवेसु समुद्ददेवताओ, स तत्य दोहे णदीदेवताओ, - णिण्णेसु उबढेसु परिमंडलेमु य १ 1व- देवता विण्णेया, पिण्णेसु परिमंडलेसु य - समुद्ददेवताओ विष्णेयाओ, विवेक्सिते दिसादेवताओ विष्णेया । तथाऽणुपुव्वं दिसोपलद्धीहिं उवलद्धव्यं भवति । इटेहिं सिरी विष्णेया । बुद्धिरमणेमु घुद्धि-मेहाओ विष्णेयाओ। १ सपादेसु है. त•॥ २"सु भयोणामीय ह. त• विना । ३ एतचिहान्तर्गतः पाठःहै. त• नाति ॥ ४या है. स. विना ॥ ५ यायो वि है. त•॥ ६-७-4 एतचिहान्तर्गतः पाठः है .. मास्ति ।। -- - भंगविजापाण्णय अमंतरेसु लवादेवताओ विण्णेयाओ। दढेसु दैत्युदेवताणि विष्णेयाणि । परिमंडलेसु गंगरदेवताणि विष्णेयाणि । मते, मुसाणदेवतागि विण्णेयाणि । दुग्गंयेसु यञ्चदेववाणि उगुडिकदेववाणि य । उत्तमेसु उत्तमाणि, मझिमेहिं मझिमाणि, पथररेदि पञ्चयराणि । आरियोपलद्धीहि आरियदेवताणि, मिलक्खूपलद्धीहिं मिलक्खहि मिलक्सदेवताणि । विमुत्तेमु अपरिग्गहेसु नुएमु य च सप्पभेसु पसण्णेसु य सम्ममाविताणि । अविमुत्तेसु बकसु णिप्पभेसु परिगहयतेमु आरभेसु य मिच्छमावियाणि । पुण्णामेसु पुरिसा विण्णेया, थीणामेसु थिओ विष्णेयाओ भवंति । कण्ह- नील-कापोत-पत्त-पीय-मुक्लेिहिं घण्णपडिस्वेहि ठियामासेहि य कण्हणील-काउ-तेउ-यम-सुकाओ लेस्साओ सहि यण्गपटिरुवेहिं आधारयित्ता आधारयित्ता देवताणं विष्णेयाओ भवंति ।। ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय देवताविजयो णामाज्झायो एगपण्णासतिमो यक्खातो भवति ।। ५१॥ छ। 10 [पापंचासइमो णक्खत्तविजयज्झाओ] णमो भगवतो जसयतो महापुरिसरस महावीरस्स । अधापुव्यं सलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञाय णक्वत्तविजयो णामाग्झायो । तं सलु भो ! वक्सरसामि । जपा-उलोगिते उम्मन्निते 'सीमुम्मनणे परिसदसणे इंदघणु-विताण-विन्नु-थगित-चंदा-ऽऽदिन-पक्सत्त-गहगण-तारागणजोगा-ऽजोगा उदय- ऽत्यमग-अयामस्सा-पुण्णमासी-मंडल वीपी वि जारिसं थाणं जुग-संयच्छर-उदु-मास-पक्स-सव्यतिषि-अघोरत्त-सण-लय- " मुत्त-उपापात-दिसादाह-संझाईसण-गवसत्तणाम-धी-पुरिस-पक्सि-चउप्पद-दबोरकरणगते एनंविदसह-रूवपादुम्भावे जोविसं पुच्छसि त्ति घूया । तत्य सुक्कामासे चंदं घूया । णिहाले चेर चंदं बूया । अक्सिम मुहे चेय आदिथं यूया । संधिमु णासत्तं यूया । ददामासेसु गहं यूया । पकिण्णामासे तारकाओ घूया । ओमग्निए ओलोकिए अत्यमणाणि भूया ! उद्योकिए उम्मग्नि इम्मट्टिए य उदयं यूया । घलेसु वियारं घूया । दढामासेसु आहारेसु य गहणं यूया । जीहारेमु पलेमु मोम्यं यूया । परिमंडलेसु परिमंडलाचारं यूया । दीहेमु विधीचारं यूया । आधारेसु पर्वसं यूया । 30 नीहारेमु गिग्गमणं यूया । यझेमु याहिरमंडलायारं यूया, सामेसु मज्झिममंडलायारं धूया - अन्भेनरेमु अभंतर- मंदलापार घूया । तत्य दीहेमु पहरसति यूया । सुरेमु मुझं यूया । रत्तेसु लोकं धूया । मंडलेसु सगिच्छरं घूया । पयलाइएमु 'निमिल्लियंसि य राष्टुं यूया । उपहुएमु घूमके यूया । पंहम विमुद्धेमु यं यं यूया । सत्य पुरिमेमु गत्तेमु कत्तिकादीणि अंसलेसपत्रसाणाणि पुण्यदारिकागि सत्त नसत्वाणि यूया । दक्सिणेसु गनेमु महादीकानि विसादारजयमाणाणि मत्त नश्सवानि दक्सिगदारिकाणि यूया ! पच्छिमेसु गत्तेमु अणुराधादागि 25 मात्रयमानानि सत्त नबगत्तागि पच्छिमदारितानि यूया । यामेमु गत्तेसु धजिहादीराणि भरणीपत्रमागाणि मत्त नामतागि उत्तरदारिवानि यूया । हत्य पुलामेमु पुण्णाम पुगत्र्यमुं या पुस्म या पुयदारेमु यूया । इत्यं या माति या दक्विगदारेस पूया । मूलं पा धर्मा" या मयगं या पचिएमवारेमु यूया । उत्तरदारेमु णत्यि पुण्णामाणि णमत्तागि । सन्यानि उत्तरागि पीगामानि शानियल्यागि मनि । अयसैमानि ममतागि धीमामानि एकवीसं जानियव्यानि भयंति । - १पाप..॥२ दुग्गले... 'सिनिदेय... रिला मीसाणा...॥ ५८य हिदि ..॥ ६-एमानः परत. माधि। ७ लोक । लोहित ८निमगिरि . १. ना ९५ पुष...॥ १०अस्सिटेसत. अभीपि पा समर्न वापंचासइमो पक्वत्तविजयज्झाओ २०७ तत्थ हत्थ-पाद-जंघोरु पाहु-णामीसु तीसं मुहुत्ताणि बूया । सत्य पट्ठोदर-खंध-वच्छेसु सिरंसि च पणयालीसति- मुहुत्ताणि धूया । तत्थ केस-मंसु-लोम-णह-सव्वंगुलीगए अंगुढेसु चेव पण्णरसमुहुत्ताणि बूया । एतेसामेवादेसंग्गहणे तूणपण्णरसमुहुत्तं अमीयिं घूया । तत्थ तीसतिमुहुत्तेसु पुव्वदारेसु कत्तिग मिगसंठाणं पुस्सं ति तिण्णि णक्खत्ताणि बूया । दक्खिणदारेसु महा पुव्याफग्गुणी हत्यो चित्तं च चत्तारि णक्खत्ताणि बूया । अवरहारेसु अणुराधा मूलो पुष्यासाढाओ सवणो चत्तारि । गक्खत्ताणि बूया । उत्तरदारेसु धणिहा पुव्वापोट्टपदाओ रेवती अस्सिणी य चत्तारि णखत्ताणि धूया । एयाणि तीसमुहुत्ताणि पण्णरस नक्खत्ताणि बूया । तत्थ पणतालीसमुहुत्ताणि पुव्वदारेसु रोहिणी पुणव्वसुं च दुवे णक्खत्ताणि जाणीया । दक्खिणदारेसु उत्तराफग्गुणीओ विसाहा चेव दुवे णक्खत्ताणि जाणीया । पच्छिमदारेसु उत्तरासाढा एगं णक्खत्तं जाणिया। उत्तरदारेसु उत्तरापोट्ठपदा एकं णक्खत्तं जाणीया । एवमेयाणि पणयालीसमुहुत्ताणि छ णक्खत्ताणि बूया । तत्थ पण्णरसमुहुत्ते पुव्वदारिए अई असिलेसं च दुवे णक्खत्ताणि जाणिया । दक्खिणदारेसु एकं 10 साई णक्खत्तं धूया । पच्छिमहारेसु जेहँ एकं णक्खत्तं बूया । उत्तरदारेसु सयभिसया भरणी य दुवे णक्खत्ताणि जाणिया । एयाणि पण्णरसमुहुत्ताणि छ णक्खत्ताणि यूया । अवरदारेसु जणं पण्णरसमुहुत्तं अभितिं णक्खत्तं एक णवमुहुत्तं सत्तावीसं चै [सत्त]सट्ठिभागा मुहत्तस्स जाणिया । तत्थ तीसमुहुत्ताणि समखेत्ताणि पनरस णक्खत्ताणि उवलद्धीहिं समखेत्तोपलद्धीहिं उपलद्धव्वाणि भवंति । पणयालीसमुहुत्ताणि छ णक्खत्ताणि दिवड्डखेत्ताणि दिवड्डखेत्तोवलद्धीहिं उवलद्धव्याणि भवंति । र्पण्णरसमुहुत्ताणि अद्ध-15 खेत्ताणि छ णक्खत्ताणि अद्धखेत्तोवलद्धीहिं उवलद्धव्वाणि भवंति । तूणपण्णरसमुहुत्तं तूणपण्णरसमुदुत्तोवलद्धीहिं उवल- द्धन्वं भवति । एयाणि अट्ठावीस णक्खत्ताणि दारतो खेत्तपविभत्तीहि य आधारयितुं आधारयितुं उक्लद्धव्याणि भवंति । तत्थ चलेसु चलाणि खिप्पाणि वा बूया-तत्थ चलाणि पुणन्वसू सवणो धणिहा सतभिसय त्ति, तत्थ खिप्पेसु पुरसो हत्थो अभियी अस्सिणीउ त्ति चत्तारि णक्खत्ताणि धूया । तत्य दढामासे रोहिणीओ तिणि उत्तराणि चत्तारि णक्खत्ताणि बूया । दारुणेसु दारुणाणि बूया, तिण्णि पुवाओ महा चेति । तत्थं चत्वारि नक्खत्ताणि सव्यसत्थगताणि उग्गाणि 20 बूया, उग्गाणि पुण अस्सेस जेट्ठा मूलो अदा भरणी चेति पंच णक्खत्ताणि भवंति । तत्थ मिदूसु सव्वमित्तगते पसण्णेसु य मुदूणि धूया, तत्थ मुदूणि मिगसिरो चित्ता अणुराधा रेवति चत्तारि णक्खत्ताणि धूया । तत्थ साधारणेसु साधार- णाणि बूया, साधारणाणि पुण कित्तिया विसाहा चेति दुवे णक्खत्ताणि धूया । तत्थ बंभेयेसु सव्वयंभणपडिरूवगते य अभियिं बूया । सत्य सव्ववण्हिगते सव्यवहिपडिरूवगते य सवणं बूया । तत्थ सव्ववसुगते धण-रयणगते य पसु-धण- रतणपडिरूवगते य धणिडं बूया । तत्थ सव्वमद्गते सव्वमदमजपडिरूवगते य सतभिसं यूया। तत्य सव्वअयगते सव्व- 25 अयपडिरूवगते य पोट्ठवदं वूया । तत्थ विवद्धिसंपयुत्ते सव्वविद्धिगते सव्वअभिवद्धिपडिरूवगते य उत्तरपोट्टपदं धूया । तत्थ सव्वदाणगते विग्गहगते सव्वदाण-विसर्गपंडिरूव-सहपादुभावगते चेव रेवतिं धूया । तत्य सत्याविगच्छोवलद्धीहिं सव्वअरसगते सव्यअस्सपडिरूवोयकरणगते य सबअरसोपजीवीहि य एतेसामेव पडिरूव-सद्दपादुभावे अस्सिाणं घूया । तत्थ दीणं मदोवलद्धीहिं सव्वजमगते य जमपडिरूय-सद्दपादुभावे चैव भरणीओ बूया । तत्य सव्वअग्गेयेसु अगिगते अग्गीउपलद्धीयं सम्बअग्गेयोपकरणे सव्वअग्गिदेवताए य अग्गिउवकरणे सव्यकंटइरुक्सगते एवंविषेसु सर- 30 रूवपादुभावे कत्तियाओ बूया । तत्य पयापुत्तोपलद्धीयं पयावतिसद्द-रूपपादुम्भावसु चेव सव्वधण्णगते सव्यकासकगते १रयंधु ह• त• विना ॥२ साणिग्गह है. त• विना ॥ ३°चाणि पप्णरसमुदुत्वाणि पण्णरस है• त• विना ॥ ४ "चन्द्रस्याभिजिता योगे मुहूर्ता मव कीर्तिताः । सप्तपष्टिभुवोऽशाय मौहः सतविंशतिः । लोकमका सर्गः २८ श्येकः ३२३ पर्व ३८.॥ ५च अट्ठभागा है. त•॥ ६ पण्णरस गपखत्ताणि अट्टणक्खचाणि छ गफ्स है. त• विना ।। पत्ताणि णक्ख' है. त०॥ ८'सत्याणि गताणि वूया सि.॥ ९°गते दाणयिग्ग' है..॥ १० °पडिसहरूषपा ई.स.विना ॥
२०४ भंगविजापइण्णय सबकासकोपकरणगते कासकोपलद्धीयं सव्वरूढगते चेव रोहिणी 'यूया ।' तत्य सव्वसोमगते सव्यसोमोपलद्धीयं संबसोमकम्मोवयारगते चेव सव्वसोमकम्मोपलद्धीयं सव्यसाधारणगते सव्यकोसीधण्णगते सव्वसंगलिकागते सव्वखीरवच्छगते एतेसिं चेव पडिरूव-सद्दपादुन्मावेसु मिगसिरं धूया । तत्य सव्वरुद्दगते । संव्वणिधाणगते सम्बरुद्दोवकरणे सव्वरुद्दोपयारकम्मगते एतेसिं चेत्र पडिरूय-सद्दपादुन्मावेहिं अहं धूया । तत्य पुणरावत्तिएसु 5 सहेसु पुणगते 'य सव्यअदितिगते सम्बअदितिकम्मोपचारगते सव्यअदितिउवलीयं एवंविघेसु पडिरूव-सह- पादुम्भावसु पुणव्यसुं घूया । तत्य सबबुद्धिगते सव्वबुद्धिकम्मगते 7 सव्यवहस्सतिगए राज्य सव्ववहस्सति- पुस्सकम्मोवयारगते सव्यवहस्सतिपुस्सोवलद्धीसु एतेसिं चेव पडिरूय-सद्दपादुभावेसु पुस्सं घूया । तत्य सव्यसमगते सबसप्पोबलद्धीयं सव्वसप्पोबजीविरते सव्यविसगते सव्यअस्सिलेसोपलद्धीयं एतेसिं चेत्र पडिरूव-सद्दपादुन्भावे असिलेसं चूया । तत्थ पितुकजकिञ्चपेतकिञ्चगते सव्यसदगते समाधगते सव्यपि किचोपलद्धीसु सव्वपितुउपलद्धीसु 10 एतेसिं चेव पडिरूव-सहपादुच्भावसु भधाओ बूया 1 वत्य सव्यसोभग्ग-सोभग्गिय सुभगगते सव्वरूपोक्जीविगते सव्यवे- सियागते सव्ववेसियाउयकरणगते सव्यसोभग्गियकम्मोपयारगते सत्र्यवेसोक्लद्धीयं एतेसिं चेव पडिरूयसहपादुन्भावेसु पुत्र्याओ फग्गुणीओ धूया । तत्य सव्वउजगते सव्वसञ्चगते सव्वधम्मगते सव्यधम्मिगगते एतेसि जेव पडिरूय-सह- पादुम्भावेसु उत्तराओ फग्गुणीओ बूया । तत्थ सव्यहत्थिगते सव्वहत्यिपडिरूवगते य सव्वहत्यिउपकरणगते सव्व- हत्यिकम्मोपचारगते सव्यहत्थिउपजीविगते आदिञ्चकम्मोवयारे आदिच्चोवलद्धीयं सव्वकारुकोपलद्धीयं एतेसिं चे पडि- 10 रूव-सद्दपाउब्भावसु हत्यं वूया । तत्य सत्र्यदसणीयेसु रूपकार-चित्तकार-कढकार-सव्वरूवकारोवकरणे सबअलंकारि- यगते सव्यालंकारेसु अलंकारकम्मोयगरणेसु - अलंकारकम्मोवयारेसु एतेसिं चेव पडिरूव-सद्दपादुन्मावेसु चित्त बूया । तत्थ वायव्वेसु सव्वयायगते वीयणक-तालवेंटगते उखेयगते फूमिते वीजणकम्मोचयारेसु वातयत्तकी- योपचारेसु एतेसिं चेव पटिरूय-सद्दपादुभावे साति यूया । तत्थ यणस्सतीसु सव्यदव्यगते सव्यसामण्णगते विसाई यूया । तत्य सब्बणानिमित्तसंबंधिगते सव्वमेत्तिउवयारगते पसण्णेसु य एतेसिं चेव पडिरूव-सद्दपादुम्भावेसु 20 अणुराधं चूया । तत्य इस्सरेसु सव्यजेट्टगते सव्वइंदकम्मोवयारगते इंदोपलद्धीयं एतेसिं चेव पडिरूयगते सद्दपादुन्भावेसु जिहें यूया । तत्य सव्यमूलजोणीगते सव्यवीसभूतगते सञ्यमूलकम्मगते सबालोवयारगते एतेसिं चेव पडिरूव-सह- पादुन्भावे मूलं वूया । तत्य आपुणेयेसु सव्यआपुणजोगीसु सव्वजलगते सव्वजलचरगते सव्वजलोयजीविगते सञ्ब- जलायगादीगते पयपोतोचकरणे एतेसिं चेव पहिरूब-सद्दपादुभावेसु पुठ्यासाढा यूया । तत्थ उय एक सत्ताउवलू- लकहाधसंलापजोणीसु : णिहुँरकम्मोवयारेसु । णिहुलपडिरूव-सहपादुभावेसु य उत्तरासाढा चूया । 25 1 तत्य अग्गेयेसु कत्तियं या विसाहं या घूया। -- असाधारणेसु अग्गेयेसु कत्तियं वूया । साधारणेसु अग्गेयेसु विसाई मूया । आपुणेयेसु अदं या पुष्यासाढं वा सतविसयं वा चूया । तत्य सव्वचतुप्पदगते चतुकेसु रोहिगिं या मिरसिरं या हत्यं वा अस्सिणीओ पा धूया । मतेसु मधं या भरणीयो पा घूया । मूलजोणीपहिरूपगते रोहिणी वा मूलं वा घूया । तत्य सव्वजाणपडिरूवगते हा कत्तियं या रोहिणि वा यूया । तत्य सन्यायोपललीयं पुस्सं या जेहें या बूया । कंटकीरुक्खागते फत्तियं बूया । सगडजाणगते रोहिणि चूया। खीररक्खेसु 50 चंदोपलद्धीयं मिगसिरपहिरूवे य मिगसिरं यूया । मुदितेसु पुस्सं वा सतविसयं वा घूया । तत्य असगोपलद्धीयं अहं या पुख्खासाढा ससचिसयं पा धूया । वत्य सव्यपरिसप्पगते असिलेसं चूया । वत्थ कोसीधण्णगते विसाई पा मिगसिरं था बूया । तत्य सव्यजोगग्ते फम्मोवलद्धीयं च मघा या पुष्यफग्गुणीओ या धूया । मतेसु पेतोपलद्धीयं मघा विष्णेया! सोभागीसोभिकोपचारेसु स्योपजीविउपलद्धीसु य पुथ्याओ फग्गुणीओ यूया। सव्यसिप्पिगते हत्यं यूया। चित्तेसु १६सचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव वते ॥ २ पिउकजोप है. त.॥ ३ चेव है• त•॥४-4 एतचिहान्तर्गतः पोट • • भासि ॥ ५°वीजंजीयगते है. त• विना ॥ ६-७ हलविद्वान्तर्गतः पाट. त• एव वर्तते ॥ ८-4 एतथिहा- ९हसचिहान्तर्गतः पाठः है.त. एव वति॥ ग्दर्गतः पार ..नासि॥
चउपण्णासहमो सारासारज्झाओ २११ चूया। तति)जंभागेसु तिरिक्खजोणीगतं उप्पायं धूया । - सव्वचउप्पदेसु य चउरस्सेसु य चउक्केसु चतुप्पदोपकरणे चतुप्पदणामधेजे थी-पुरिसउवकरणगते चतुप्पयगतं उप्पायं घूया । तत्य उद्धंभागेसु चलेसु य सव्वपक्सिगते उवकरणे पक्खिउवकरणेसु पक्खिणामधेजे थी-पुरिसउपकरणगते पक्खिगतं उम्पायं बूया । तत्य दीहेसु कण्हेसु सम्बपरिसप्पोव- करणे परिसप्पणामधेजयी-पुरिसउवकरणगते चेव परिसप्पगतं उप्पायं धूया । गिद्धेसु सव्वजलचरेसु सन्बमच्छेसु सव्वजलेसु थी-पुरिसउवकरणगते चेव मच्छगतं वूया । सव्वत्रीयगते कीडकिविद्वगगए कीडकिविल्लगगतं उपायं घूया । । तत्य पालेयेसु पजातं उम्पायं वूया । वत्य छिण्ण-भिण्ण-कोटेंतसद्दे पासाद-गोपुर-ऽट्टालग-इंदघय-तोरणगतं वा उप्पायं वूया । अग्गेयेसु पागार-गोपुर-ऽट्टालग-कोडागारी-ऽऽयुधाकार-आयतण-चेतिएँसु अग्गि-जलण-धूमपादुन्भावेण विजु- पतणगत उप्पातं वूया । णि सु उदकवाहकअणादके उदकपादुभावेण अपयातक-अकालवुढे अणंतवुटुं अणंततिमिर- पादुन्भावेणं या यूया। पुघूसु अजीवेसु सव्वमायणपडिरूवगयं चैव भायणगतं उप्पावं वूया । जाणेसु सव्वजाणोपलद्धीयं जाणगतं उप्पायं बूया । किसेसु वत्थ-परिच्छद्गतं उप्पायं वूया । थूलेसु थलगतं या पलंकगतं या उप्पायं उट्टिकगवं 10 अरंजरगतं पा बूया । सामेसु सव्वआभरणगते य आभरणगतं उप्मायं घूया । तिखेसु सम्वसत्यगते चेव सत्यगतं उप्पातं वूया ! अभंतरेसु णगरगतं उप्पायं घूया। अभंवरभंवरेसु अंतेपुरगतं उप्पायं बूया । बाहिर- मंतरेसु बाहिरिकागतं उप्पायं घूया । वाहिरेसु जणपदगतं उप्पायं धूया । गहणेसु आरण्णगतं उप्पायं बूया । उबग्गहणेसु आरामगतं उप्पायं घूया । एवं आमास-सह-रूव-रस-गंध-फासपाउन्मावेसु अंतलिक्ख-भोम्मा पब्बियो उप्पातो आधार- यित्ता आधारयित्ता यधुत्ताहिं उवलद्धीहिं उवलद्धव्यो भवति । ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय उप्पातो णामाज्झायो तिपण्णासतिमो सम्मत्तो ॥ ५३॥ छ । 15 [चउपपणासइमो सारासारज्झाओ] णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स । अधापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञार्य सारासारो णामाज्झायो । तं खलु भो ! तमणुवक्खायिस्सामि । तं जघा-तत्य अत्यि सारो गत्यि सारो चि पुन्यमाघारयि- 20 तन्वं भवति । तत्य अभंवरामासे दढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे पुण्णामधेजामासे सारवंतो ति यूया । तत्य बाहिरामासे चलामासे लुक्खामासे कण्हामासे तुच्छामासे णपुंसकामासे असारवंतो त्ति घूया । तत्य सारगते पुव्याधारिते सारं चतुविधमाधारये-धणसारं १ मित्तसारं २ इस्सरियसारं ३ विज्ञासारमिति ४ । तत्य अब्भतरेसु धणमंतेसु य धणसारं घूया १ । वत्य महापरिग्गहेसु सव्यमित्तगते य मित्तसारं घूया २ तत्य सव्य- इस्सरियगए सन्यरायगए सव्यविजयगए य इस्सरियसारं यूया ३ । धावत्य बुद्धिरमणेसु सव्यसत्यबुद्धिगते य 25 विजासारं बूया ४ । वत्य उत्तमेसु उत्तमो धणसारो वा मित्तसारो का इस्सरियसारो वा - विनासारो या विण्णेयो। ॐ मझिमेसु र मझिमो धणसारो वा मित्तसारो या इस्सरियसारो वा विनासारो या विष्णेयो। मन्तिमाणंतरेसु मज्झिमाणतरो थणसारो वा मित्तसारो या इरसरियसारो वा विजासारो वा विण्णेयो। तत्य पचवरे पञ्चवरो धणसारो वा मिसारो या हम इस्सरियसारो या विनासारो वा विष्णेयो । १- एतचिहान्तर्गतः पाठः ई. त. नास्ति । २°सगते उवकरणे गते हैं. त• विना ॥ ३ रायमकाराआयय- पचेति है. त• विना ॥ ४ एसु वण्णजलण तिः । एसु धीयजलण° सं ३ पु०॥ ५°हर्क अणोद ह. तु.॥ ६ याहिरगतं है. त.॥ ७°य सारो णामा १. तु.॥ ८ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. तएव वर्तते ॥ ९-4-एनधिहा- न्तर्गतः पाठः ६० त० नास्ति ॥ १० हस्तचिहान्तर्गतः पाठः १० त० एव वर्तते ॥ ११ एतचिन्तर्गतः पाठः है.. नाभि ।। १२ हस्खचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव पते ॥
२१० भंगविजापइण्णय - [तिपंचासइमो उप्पातणज्झाओ] णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स महावीरवद्धमाणस्स । अधापुव्वं खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविनाय उप्पातणामझायो । तं सलु भो! वमणुर्यक्सस्सामि । तं जधा-उद्धं णामीय उभागेसु अन्तलिक्खगतं उप्पायं विज्ञा। अधो णामीयं अघोमागेसु भोम्म उप्पायं चूया । तत्य अंतलिक्खेसु पुव्याधारितेसु उप्पातेसु परिमंडल 5 गतेसु चंदा-ऽऽदिश्वगत उप्पायं बूया | कण्हेसु धूमकेतु-राहुगतं उप्पायं घूया । दीहेसु वहस्सतिगतं उप्पार्य यूया । अंतरेसु धूमकेतु-सुक युधगतं उप्पायं वृया । सुद्धसुकेसु सुक्गतं उप्पायं धूया। दसणीयेसु बुधगयं उप्पायं वूया । किलिहेसु घूमकेतुगत उप्पायं वूया ! 'मदेसु सणिच्छरगतं उप्पायं धूया । - थावरेसु बुध-सणि-घर-वहस्सतिगत टप्पायं धूया । घलेसु सुकमालोहित-धूमकेतु-राहुगतं उप्पातं घूया । अग्गेयेसु आदिञ्चगतं, [उपायं बूया ] । लोहिाके उकागतं टप्पायं यूया । कण्हेसु रत्तिगतं उप्पायं चूया । संधिसु संझागयं उप्पायं चूया । सुकेसु आदिमूलीयेसु 10 पुयादगत टप्पायं वूया । सुकेसु मझिमविगाढेसु अद्धरत्तगतं उप्पायं घूया । सुकेसु अंतेसु अवरण्हगतं उप्पायं धूया । फण्हेसु आदिमूलीयेसु पदोसगतं उप्पायं घूया । कण्हेसु मझिमविगाढेसु अद्धरत्तगवं उप्पायं धूया । कण्हेसु अंतेसु पसगनं उप्पायं थूया । अमंतरेसु अन्भंवरमग्गगत उप्पायं धूया । बाहिरभंवरेसु सामेसु य मन्झिमवीचीगतं एप्पार्य वूया । बाहिरेसु बेस्सागरपधगतं टप्पायं [वूया ] । पुरथिमेसु पुरत्थिमायं दिसायं उप्पायं धूया । दक्षिणेसु गत्तेसु दक्सिणायं दिसायं उपायं धूया । पच्छिमेसु गत्तेसु पच्छिमायं दिसायं उप्पायं बूया । वामेसु गत्तेसु उत्तरायं दिसार्य 15 उप्पायं यूया। गिद्धेसु उपरिहिमेसु मेघगतं उप्पायं घूया । घलेसु पभागतेसु य विजुगत उप्पायं घूया । फरुसेसु पंसुषुहिगत उप्पायं यूया । कण्हेसु धूमकोपेतं रत्तिगवं उप्पायं घूया । अग्गेयेसु दिसादाहगतं उप्पायं धूया । गिद्धेमु चलेसु बुद्धिगतं टप्पायं घूया । गिद्धेसु घलेसु रत्तेसु य मंस-सोणितवुद्विगतं उप्पायं वूया । एवं पडिरूयोबलद्धीहिं पत्तेकसो पचेकसो वुहि-उप्पावा तेल-पत-दुद्ध-वसा-विच्छिक-सप्प-परिसप्प-कीड-किविलगते वा उपलव्या भवति । इति अंत- लिक्सगता उप्पाता धक्सावा भांति । तत्य भोम्मा उप्पाया भवंति माणुसा चतुष्पदा परिसप्पगता मच्छगता खुसिरीसिवगता वणप्फतिगता गिरिण- दि-गगगता भायदण-उपकरण-सयणा-ऽऽसण-जाण-याण-मायणगता चेव भवति । तत्य फेस-मंसु-लोमगते वणम्फविगतं उपायं यूया । वत्य अपत्ते काले पाणे या भोयणे वा आभरणे या हसिते या मणिते या गीते या पट्टे वा वादिते या अप्पत्तकाले पेक्सिम्मि वा घउप्पदे वा परिसप्प वा सप्पे या खुसिरीसिवे या आहारे का इंसणे या पयाणे या अपत्तराले पुष्फ-फले उप्पातं थूया । सत्य यणपतीसु एतेसु र अतिपत्तफालेसु एतेसु चेव पुन्यदिउसु पडिरूवेसु 25 अविरक्षकाले यणपतीगत यूया । वत्य पाण-भोयण-वत्या-ऽऽभरण-सयणा-ऽऽसण-पुष्फ फल-घण्ण-प्पकरण-विविधविपरी- यदसणे विगताभिगमे या अभूतपुव्यपुप्फ फलपादुम्माचे विगतस्यवणाफती उप्पायं वूया । वत्य उद्धं गीवाय सिरो मुहामासे अंजलिकरणे एकंसाधारणे उपायणोमुंपणे णमोकार यदिव-पूविय-छत्त-भिंगार-साउलोयिक यासण-कडग लोमहत्य-उस्मय-समाय-महामागगते घेय देयतागतं गहगतं उपाय चूया । ददेसु पयत-गाम-दुग्ग-गगरगतं यूया । संरा- सेमु गामगा उमायं घूया । अम्मंवरेसु वित्यडेमु पगरगत टप्पावं यूया । क पोहिरेसु वित्यहेमु जणपदगयं 50 उप्पायं यूया । उधमेमु उष्णएमु य पव्यतगयं टप्पायं घूया । दीहेमु गिद्धेमु य गदीगवं उप्पावं धूया । गिदेसु परिक्रोमु य समुरगत टप्पा पूया | निदेर्मु सण्णिरुद्धेमु फूयगयं उप्पायं घूया । घलेमु पाणनोणीगते सत्र्यपागनोणीगर - सय्यपाणजोणीउपकरणे पेय पाणलोणीगतं वृया । उजुमागेमु मगुस्मजोणीगतं स्पायं १ 'प्पापणा पामा त॥ २ पत्याइस्सा पु. यसमिस्सा मि. ॥ ३-4 एतशिान्तर्गतः weet... मास्ति । ४ करणे एकसाकरणे उपाहणोधुपणे पमो° FB.1 फरणे उपायणोउधणे णमो' है• त• ॥ ५६-७शिन्तर्गतः पाठः..एरवठे। 20 पणपण्णासइमो णिधाण झायो ૨૨૨ रितेसु य सव्वप्पसूतेसु पुष्फ-फलेसु पुरिसेसु य पुत्तसारं यूया । एतेसु चेव थीगानेसु कण्णेयेसु कण्णासारं घूया । इति मिचसारो विण्णेयो भवति । तत्य इस्सरियसारे पुव्वाधारित इस्सरियसारं दुविधं आधारए-अव्वत्तं सुव्यत्तं चेति । तत्य सुन्नत्तो अधिकरणं णायकचं अमञ्चत्तं रायत्तं वेति । तत्य अव्वत्ते इस्सरियसारे पेसाणं रायपुरिसरस य पेस्सत्तं घूया। तत्य अव्यत्तेसु पञ्चवरकायेसु चेव संसयं मज्झिमाणवरेसु पेस्साणं रायपुरिसस्स पिस्सियं इस्सरियसारं वूया । मज्झिमकायेसु थाणप्पत्तं । अधिकरणत्यं वूया । कायमतेसु सेणापतिं वा अमचं वा णायकं वा वूया । एतेसु चेव आहारेसु रायिणं घूया । जघु- चाहि य थाणझाये थाणोवलद्धीहिं इस्सरियसारं घूया । इति इस्सरियसारो विण्णेयो । तत्य विजासारे पुन्याधारिते सव्वबुद्धिरमणेसु सव्यविजासत्यगते य पडिरूव-सद्दपादुद्भावेसु चेव विष्णेयाणं सत्याणं या विज्ञासारं घूया । वत्य कायमतेसु विज्ञासारं गतं बूया । मज्झिमकायेसु उत्तमागंवरेसु य विजाविस्सुयं बूया । मज्झिमेसु मझिमं घूया । मज्झिमाणतरकायेसु मझिमजहण्णसारेसु य असमत्तविजं यूया । पञ्चवरकायेसु 10 जहणेसु य विजाविलंवितं यूया, विज्ञाछित्तं वा यूया । इति विज्ञासारो विण्णेयो॥ ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिण्णाए अंगविज्जाए [सारा सारो णामाग्झातो वक्खातो चउपन्नासतिमो सम्मत्तो ॥५४॥ छ । [पणपण्णासहमो णिधाणज्झाओ ] णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स । अधापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय णिधाणं णाम- 15 ज्झायं । तं खलु वक्खायिस्सामि । तं जघा- तेत्य अत्यि गिहाणं गत्यि णिहाणं ति पुन्चमाहारयियन्नं भवति । तत्य अभंतरामासे दुढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे अत्यि णिहाणं ति चूया । तत्य बझामासे चलामासे लुक्खामासे कण्हामासे तुच्छामासे अत्यि (पत्थि) णिहाणं ति धूया । या तत्य अत्यि णिधितं ति पुव्वमाधारिते गिधितमट्ठविधमादिसे । तं जधा-भिण्णसतपमाणं भिण्णसहस्सपमागं - सैयसहस्सपमाणं च कोडिपमाणं अपरिमियपमाणमिति । कायमंतेसु उम्मढेसु अपरिमियगिहाणं वूया। वैत्य 20 अपुण्णामेसु अन्मंतरामासे दुढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे य समं घूया । भिण्णे दसक्खे पुव्याधारिते दो या चत्तारि वा अट्ट वा धूया । समे पुव्वाधारिते दसक्खे वीसं वा [चत्तालीसं वा] सहि वा असीति वा वूया। वीसासु समासु पुज्वाधारितासु दो वा चत्तारि वा छ वा अट्ठ वा सवाणि बूया । वघा सहस्साणि तथा सयसहस्साणि तथा कोडीओ वधा अपरिमिते एतेण वीयगमेण दसक्सभिण्णादी जाव अपरिमितो ति सव्वं समे आधारिते समणु- गंतव्यं भवति । सत्य थीणामेसु चलेसु लुक्खेसु वझेसु सुक्खेसु णीहारेसु समग्गेसु चेव सद्द-रुवपादुन्मावेसु विसमो-25 पलद्धीसु चेव विसमं चूया । तत्य भिण्णे दुसक्खे विसमे पुवाधारिते एकं वा तिणि वा पंच वा सत्त वा णव वा घृया । दसक्खे पुन्याधारिते दस वा तीसं वा पण्णासं वा सत्तरि वा पति वा वूया । एवं भिण्ण- सतप्पमाणे विगले दसक्खेसु पुत्वाधारितेसु सन्यमणुगंतव्वं भवति । तत्य सवप्पमाणे विगले पुन्चमाधारिते सयं वा तिण्णि वा सवाणि पर्च वा सताणि - सत्त वा सयाणि णव वा सयाणि चूया । एवं भिण्णसहस्स- 'प्पमाणविगलेसु एतेसु पुख्याधारितेसु समणुगंतव्वं भवति । एवं विगलसहस्सप्पमागं भिण्णसहस्सप्पमाणं भिण्ण- so १ रायित्त्रं है. त• ॥ २-३ हस्तचिवान्तर्गतः पाठसन्दर्भः ६० त० एव वर्तते ॥ ४ तत्थ पु नि० ॥ ५ वीयरागेण ई. त•॥६- एतचिहान्तर्गतः पाठः ई. त• नाति ॥
૨૨૨ अंगविजापइण्णय तत्य धणसारो भूमीगतो खेत्तगतो आरामगतो गोमगतो रगतो त्ति भूमीगतो एस सारो पुच्चमाधार- विवथ्यो भवति । वत्य महावकासेमु अवत्तेमु भूमीसारो विण्णेयो। तत्य सयणा-ऽऽसण-पाण-भोयण-वत्था-ऽऽमरणगते मिहसारं धूया । तत्य चतुरस्सेसु खेत्तसारं धूया । उबग्गइणेसु आरामसारं वूया । रायगते विजयगते अव्वत्ते गामसारं घूया । रायगते विजयगते अव्बत्ते णगरसारं चूया । एतेसामेव जमकोदीरणे रत्नसारं धूया । इति भूमीगतो धणसारो विण्णेयो। दत्य पाणसारो धणसारो दुविधो आधारयितव्यो भवति-मणुस्ससारो१तिरिक्सजोणियसारो चेव रावत्य सब्यसनीवगते पागसारं घूया । तत्य उजुमागेसु सन्चमणुस्सगते य मणुस्ससद-रूयपादुमावेसु य मणुस्ससारं घूया । तत्य तिरियामासे सव्यतिरियजोणिगते सव्यतिरिक्सजोणियसह-स्वपादुभावे तिरिक्खजोणिगतं सारं यूया । तत्य तिरिक्सजोणियगतो सारो णातव्यो भवति-अस्सा हत्यी गो-महिसं अयेलकं सरोट्टमिति विण्णेयं । तत्य 10 सव्यासिंगिगते सिंगिपहिस्य-सद्दपादुव्भाव हत्यि-गो-माहिसं अयेलकमिति विष्णेयं भवति । तत्य तिणमोयिसु तिणमोयी विण्णेया । मंस-रघिरमोयीसु हत्यी विण्णेया। कण्हेसु हत्यी वा मासा वा विण्णेया । खत्तिसु हत्यी वा अस्सा या पसू या विण्णेया । सेतेसु खरा विण्णेया । सामेसु उट्टा विण्णेया। गणेसु अयेलकं विष्णेयं । उपग्गहणेसु अस्सा गो-माहिसं उट्ट-सरे बूया । आकासेसु अगहणेसु य काययंतेसु हत्यी विण्णेया । मज्झिमकायेसु अस्सा गो-माहिसा उद्या य विण्णेया 1 मज्झिमाणतरकायेसु सरा विण्णेया । पञ्चयरकायेसु अयेलका विष्णेया । इति तिरिक्सजोणिगतो 18 मणुस्सगतो दुपद-चतुप्पदगतो पागसारो विष्णेयो भवति । तत्य धणसारो अनीरो सन्जीयो य दुविधो विण्णेयो। वित्यरतो एक्का(वा)रसविधो भवति-वित्तसारो १ सुवण्ण- सारो २ रुप्पसारो ३ मणिसारो ४ मुत्तासारो ५ वत्यसारो ६ आभरणसारो ७ सयणासणसारो ८ भायणसारो ९ दव्योप- करणसारो १० अन्मुपैहजसारो ११ घण(ण)सारो १२ । इति घणसारो विष्णेयो। तत्य सव्यसंघातेसु वित्तेमु चतुरस्सेसुय काहावणसारो विण्णेयो भवति । पीतकेसु तवेसु य सुवण्णसारो विण्णेयो । सेतेसु अग्गेयेसु य रुप्पसारो विण्णेयो ३। 20 अगग्गयेसु ० मणिसारो विण्णेयो ४। आपुणेयेसु » मुत्तासारो दिण्णेयो ५। किसेसु वित्यतेसु पुधूसु य सव्वयस्थगते सव्यरंतुगते चेय वत्थसाये विण्णेयो ६। सामेसु सव्यआभरणगते य आमरणसारो विण्णेयो ७) धतुरस्सेसु कडीयं घ आसणसारो विष्णेयो, पट्टेसु ( पट्टेसु) सबसचेमु य सयणसारो विष्णेयो ८१ पुधूमु सव्यभायणपडिरूवगते य मायण- सारो विण्णेयो ९१ हत्य-पादपरामासे सव्वसिप्पिकगते य उपकरणगते य उवकरणसारो विष्णेयो १०। आहारेसु सव्वेसु सन्मुपहजेमु सह-रूवेसु य अमुपहजाणं अमुपहजसारो विष्णेयो ११॥ अणूमु सव्यघण्णगते य घण्णसारो 25 विष्णेयो १२। चलेसु पाद-जंघे य जाणसारो विष्णेयो। इति घण्ण(ण)सारो सन्नीयो अजीरो य दुविधो विष्णेयो एकारसविधो (यारसवियों) वित्यरेण यक्सानो भवति । तत्य मित्तसारो पंचविधो आधारयितव्यो भवति । वं जधा-संबंधिसु १ मित्ताणि २ वयस्सा ३ थिया ४ कम्म- कर-मिश्वग्गे ५ चेति । तत्य अन्मंतरमंतरेसु सब्यसंबंधिगते य संबंधिणो विण्णेयो १ । वाहिरष्मवरेसु सामेसु य मित्ता विण्णेया रासामे ययस्सा विण्णेया ३१ पीणामेसु चिया विण्णेया था पेस्सेसु अंतेवासी विण्णेया, घाहिरेसु पाहिरो 90 कम्मकर-मिञ्चयगो ति विष्णेयो ५ । तत्य धीसु पुव्याधारितासु समागमेसु भन्नायग्गो विष्णेयो । सामेसु गमेसु अंतेमु सहियग्गो विण्गेयो । पञ्चवरकायेसु दासिगो कम्मकरवग्गो त्ति या विष्णेयो। तत्य मन्नामु पुयाधारितामु पालेयेसु यणेसु य कोमारीगं भन्नाणं सारं यूया । घलेमु पुगन्भयाण मन्त्राणं सारं धूया । सत्य पुरिसेसु संबंधिसु य पुव्वाधा- १- एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त. नाखि ॥ २ माहारियव्यो ह..॥ ३हत्य सप्र० ॥ ४या मसा है• •॥ ५ पदेन है... बिना ॥ ६ एनुचिहान्तर्गतः पाठः १०४. नासि ॥ ७ अण्णेसु है. व.॥ ८समागमेसु है.द.दिना।।
पणपण्णांसहमो णिधाणझामो रितेसु य सव्वप्पसूतेसु पुष्फ-फलेसु पुरिसेसु य पुत्तसारं वूया । एतेसु चेव थीणामेसु कण्णेयेसु कण्णासारं घूया । इति मित्तसारो विण्णेयो भवति । तत्य इस्सरियसारे पुव्वाधारिते इस्सरियसारं दुविधं आधारए-अव्वत्तं सुव्वत्तं चेति । तत्थ सुव्वत्तो अधिकरणं णायकत्तं अमच्चत्तं रायत्तं वेति । तत्थ अव्वत्ते इस्सरियसारे पेस्साणं रायपुरिसस्स य पेस्सत्तं बूया। तत्य अव्वत्तेसु पञ्चवरकायेसु चेव संसयं मज्झिमाणंतरेसु पेस्साणं रायपुरिसस्स गिस्सियं इस्सरियसारं बूया । मज्झिमकायेसु थाणपत्तं 5 अधिकरणत्यं बूया । कायमंतेसु सेणापति वा अमञ्चं वा णायकं वा बूया । एतेसु चेव आहारेसु रायिणं वूया । जधु- ताहि य थाणज्झाये थाणोवलद्धीहिं इस्सरियसारं घूया । इति इस्सरियसारो विण्णेयो । तत्थ विजासारे पुव्याधारिते सव्वबुद्धिरमणेसु सव्वविज्जासत्थगते य पडिरूव-सद्दपादुब्भावसु चेव विण्णेयाणं सत्थाणं या विजासारं.बूया । तत्थ कायमंतेसु विजासारं गतं बूया । मज्झिमकायेसु उत्तमाणंतरेसु य विजाविस्सुयं बूया । मज्झिमेसु मज्झिमं वूया । मज्झिमाणतरकायेसु मज्झिमजहण्णसारेसु य असमत्तविजं घूया । पञ्चवरकायेसु 10 जहण्णेसु य विजाविलंवितं चूया, विजाछित्तं पा घूया । इति विजासारो विण्णेयो । ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिण्णाए अंगविजाए [सारा सारो णामाज्झातो वक्खातो चउपन्नासतिमो सम्मत्तो ॥५४॥ छ । [पणपण्णासइमो णिधाणज्झाओ] । णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स । अधापुव्वं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय णिधाणं णाम- 15 ज्झायं । तं खलु वक्खायिरसामि । तं जघा- तैत्य अत्थि णिहाणं णत्यि णिहाणं ति पुत्रमाहारयियव्यं भवति । तत्थ अभंतरामासे दुढामासे गिद्धामासे सुद्धामासे अस्थि णिहाणं ति बूया । तत्थ बज्झामासे चलामासे लुक्खामासे कण्हामासे तुच्छामासे अत्यि (णस्थि) णिहाणं ति बूया । A तत्य अत्यि णिधितं ति पुव्वमाधारिते णिधितमट्ठविधमादिसे । तं जधा-भिण्णसतपमाणं भिण्णसहस्सपमाणं ॐ सैयसहस्सपमाणं च कोडिपमाणं अपरिमियपमाणमिति । कायमंतेसु उम्महेसु अपरिमियणिहाणं वूया । तत्य 20 अपुण्णामेसु अन्मंतरामासे दुढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे य समं घूया । भिण्णे दुसफ्खे पुव्वाधारिते दो वा पत्तारि या अट्ट वा बूया । समे पुव्वाधारिते दसक्खे वीसं वा [चत्तालीसं वा] सहि वा असीतिं या बूया । वीसासु समासु पुव्वाधारितासु दो वा चत्तारि या छ वा अट्ठ वा सताणि घूया । तघा सहरसाणि तधा सयसहस्साणि -सधा कोडीओ तथा अपरिमिते एतेण 'वीयगमेण दसक्खभिण्णादी जाव अपरिमितो ति सव्वं समे आधारिते समणु- गंतव्वं भवति । तत्थ थीणामेसु चलेसु लुक्खेसु वज्झेसु सुक्खेसु णीहारेसु समग्गेसु चेव सद्द-रूवपादुन्भावेसु विसमो- 25 पलद्धीसु चेव विसमं घूया । तत्य भिण्णे दसक्खे विसमे पुव्याधारिते एकं वा तिण्णि वा पंच वा सत्त वा णय वा घूया । दसक्खे पुख्याधारिते दस या तीसं वा पण्णासं वा सत्तरि वा णउतिं वा घूया । एवं भिण्ण- सतप्पमाणे विगले दसक्खेसु पुव्याधारितेसु सव्वमणुगंतव्यं भवति । तत्य सतप्पमाणे विगले पुब्बमाधारिते सय या तिणि वा सवाणि 4 पंर्च वा सताणि - सत्त वा सयाणि णव वा सयाणि चूया । एवं भिण्णसहस्स- 'पमाणविगलेसु एतेसु पुन्याधारितेसु समणुगंतव्यं भवति । एवं विगलसहस्सप्पमाणं भिण्णसहस्सप्पमाणं भिण्ण- 30 १ रायित्न है. त•॥ २-३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठसन्दर्भः ६० त० एव वर्तते ॥ ४ तत्थ पु सि•॥ ५ धीयरागेण ई.स.॥६-4 एतचिहान्तर्गतः पाठः हं. तनास्ति ।
२१४ 3: भंगविजापइण्णय सवसहस्सप्पमाणं भिण्णकोडीप्पमागं अपरिमितं च विगलप्पमाणं एतेण कमेण 'जघुत्ताहिं उक्लद्धीहि उवलम्भ सव्वमेवे विगलम्पमाणं समणुगंतव्यं भवति । तत्य कंसि देखें सि णिधाणं पुच्चमाधारितं ? ति इमाहिं उबलद्धीहिं समणुगंतव्वं भवति-तत्य उझोगिते पासायगतं धूया मालगतं या पट्टीवंसगतं वा आलग्ग[गत] वा पागारगतं वा गोपुरगतं वा अट्टालगयं वा रुक्खगतं 5 या छापव्यवगवं या धूया । वत्थ असंखयेसु रुक्खगतं वा पव्यतगयं वा बूया । संखतेसु आमास-सह-पडिरूव- पादुन्मावेसु अबसेसाणि धूया । तत्य सव्यजोधगते सव्यरायगतेसु य पागारगोपुर-ऽहालक-धयगतं घूया । गिग्गमपधेमु धारगयं वूया । सण्णिरुदेसु पागारगतं यूया । पविट्ठेसु अट्टालगगतं यूया। सयणासणे उवविह्र-संविद्वेसु पासावगवं यूया । सव्यदिव्यजोणिगते देवतायतणगतं घूया । केस-मंसु-सव्यमूलगते य गिनिस्सिवं घूया । गिद्धेसु कूविप्रणिधितं बूया । गंमीरेसु कूवियणिधितं वूया । उपहृतेसु उट्ठिवपट्टे रणे वा णिधितं घूया । गहणेसु गहसि 10 अरण्णगतं णिधितं यूया । उपग्गहणेसु आरामगतं णिधिनं धूया । आकासेसु आकासे णिधितं धूया । गहणाणं आका- साण य सैमामासे जणपदगतं या अरण्णाणं या सीमंतिकासु या आरामसीमंतिकासु वाणिधिनं घूया । चतुरस्सेसु संम्वेसु खेत्तगवं णिधितं बूया । इति थावराणि णिधिताणि यूया । अन्भतरेसु गत्तेसु दीहेसु रच्छागतं णिधितं [वूया ] ! परिमंडलेसु णिवेसणंसि णिधितं बूया । पुरिमेसु रायमग्गे णिधितं यूया । कायमंठेसु रायमग्गे णिधित यूया । मन्तिमकायेसु रायमग्गसमासु रच्छासु णिधितं चूया । मन्झिमाणतरकायेसु खुडिकासु रच्छासु णिधितं यूया । 18 पर्षयरकायेसु गिफुटरच्छासु गिधितं वूया । अभंतरमंतरेसु अन्भंतर-मंतरे गिवेसणे गिधितं बूया । मत्यकेसु मालगत घूया । कण्हेसु आलग्गगतं धूया । उद्धेसु फुइगतं घूया । फेसेसु णिवंगतं [भूया ]। णासायं णत्यणपोरुसे वा पणालीगत पूया । अंतेसु गंभीरेसु फुपी गोयं ति यूया। पादम्मि दुहेसु य वच्चाहगतं. ति यूया । उदरे मुखे या गभगिहगवं [यूया] । पुरत्यिमेसु अंगणावं यूया । ( पेच्छिमेसु पच्छायत्युगत घूया । कंसि भायणसि पुव्यमाधारियसि ?-तत्य मूलजोणिते कहभायणगतं यूया । घातुजोणीयं सारमंतेसु य 20 लोहीगतं या फडाहगवं पा थरंजरगतं या कुंडगत या उक्खलिगतं या रकिगतं या लोहीवारगतं वा यूया। तत्य महाव- फासेमु ट्टि या लोहिं या फडाहकं या यूया । मज्झिमकायेसु कुंडगतं या उक्सलिगतं या यारगत या लोहयारगतं पा पूया । पचयरफायेसु आयमणी या सत्यिआयमणी पौ घरुकगतं या कलुडिगतं या गिधाणं यूया । एतेसामेय विहं सणियाणाणं ददामासेमु तत्य विविधं पि य मायणं यूया । तत्य पडिरूवेहिं आमासेहि य भूलजोणी-धातु- जोगीउयलद्धीहिं संठाणेहि य भायणगतं धूया । वित्थडेसु भूमीयं गिधितं यूया । सत्य ओमजितेसु अणाहारेसु अण्णेहिं. 25 हरितं निषियं पूपा । टितामासेसु पच्छा जीहारेसु निधिटाणा विप्पणढ़ गया । केवलणीहारेसु गरिय गिधितं ति पूया । अन्मंतरामासे देदामासे गिद्धामासे मुद्धामासे पप्पे गिधितं ति यूया । वत्य यज्झामासे पलामासे लुक्सा- मासे एण्यामासे अप्पपे गिधितं ति यूया । मुभा-ऽमुभेमु पत्तं णिधि अप्रोहिं हरितं ति यूया । असुभेसु पुष्य- पादुन्मायेमु पच्छा सुभेमु पुव्यमपरिकिहो णारासो पाविहिसि" णिधिं ति घूया । एवं गगणापरिसंसाय देस-भागो- पलदीदि भाजगोपटसीयं दिसाउयलद्रीयं अप्पणीयक परातकोपलद्धीहिं लंभ-विप्पणास-गह-पडिलंमोपलद्धीहि य सभामास-गर-रूपादुम्मायेहिं सम्यं समणुगंन मरति ॥ ॥ इति सलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय पिधाणो णामाग्झाती यस्सातो भवति पणपण्णासतिमो सम्मत्तो ।। ५५॥४॥ Pान्तर्गत परत. एर यते ॥ २ "हार्ण सं... १ ३ समासेण ज... ॥ ४ मशिलता ए.एस पते ॥ ५राहिए ... पिना ॥ ६ निमगत • •॥ टीसगत १० त• पिना ॥ ८ दुरा ...तपानका कारः .त. नाशि ॥१० मदिक पासोदिया••॥ ९या धारक- गत पा पुतु...॥ १२ रुटामास. १३ गिधित ति•n छप्पण्णासइमो णिब्बिसुतज्झाओ [छप्पण्णासइमो णिब्बिसुत्तज्झाओ] णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स । अधापुव्वं खलु मो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय णिन्निसुत्तं णामा- ज्झायं । तं खलु भो! तमणुवक्खस्सामि । वं जधा-सत्य अस्थि पद्धं णत्यि पद्धं ति पुन्वमाधारयितव्यं भवति । तत्य अभंतरामासे दढामासे उल्लोगिते ओहसिते माता-पितिसद्द-रूवपादुभावे उकुढे अप्फोडिते णयपुण्णामपह-तु-पक्षुद्ग्गे पुप्फे फले वा उवलद्ध-संव-अत्यिसहपादुभावे अत्यि बद्धं ति यूया । तत्य बझामासे चलामासे उकासिते खुधिते । णिम्मजिते णिल्लिखिते' पकुढे पम्मुए अवमट्टे अवलोयिते ओलोगिते ओसारिते अणुदत्ते अपधुदग्गे अपहढे पुप्फे फले वा पादुभूते एवंविधे वा पैडिरूव-सद्दपादुव्भावे आवरण-असंत-गत्यिसद्द य पाउन्मावे णत्यि पद्धं ति वूया । तत्य बद्धे पुव्याधारित पद्धं विविधमाधारये-पाणजोणीगतं १ मूलजोणीगतं २ धातुजोणीगतं ३ । तत्य जघुचाहिं पाणजोगी-मूलजोगी-धातुजोगीडवलद्धीहिं पाणजोणी य [ मूलजोगी य] धातुजोगी य उवलद्धव्या भवति । तत्य पाण- जोणीगते पुन्वाधारिते मुत्तिक संखभंड गवलमंडं वालमयं दंतमयं अहिकमयमिति उबलद्धन्वं भवति । एताणि 10 सव्वाणि आधारयित्ता पत्तेगं जधुत्ताहिं सवलद्धीहिं - आमास-सह-रूवोपलद्धीहिं उपलद्धन्वाणि भवंति । मूलजोणीगते पुन्याधारिते तं चतुविधमाधारये-मूलगत संघगतं अग्गगतं पत्तगतमिति फलगतमिति । एतं एवमादि चतुविधं मूलजोणीगतं जधुत्ताहिं उक्लद्धीहिं पचेकसो पत्तेकसो आधारयित्ता आधारयिचा सव्वं समणु- गंतव्वं भवति । तत्य धातुजोणिगते पुन्याधारिते तं दुविधमाधारये-मणिधातुगतं चेव च लोहेधातुगतं वेव। तत्य सबलोहधातुपडिरूवेण तस्सद्दपादुभावेण चेव लोहधातुगतं उवलद्धव्यं भवति । तत्य सव्वमणिधातुपडिरूवेण 15 सबमणिधातुगतं उवलद्धव्वं भवति । पुणरवि धातुगत दुविधमाघारयितव्यं भवति-अग्गेयमणग्गेयं चेति । दुविधमवि जधुत्ताहिं उवलद्धीहिं उपलद्धव्यं भवति-तत्य अग्गेयाणि सव्यलोहगयाणि लोहियक्खो पुलओ गोमेदओ मसारगल्लो खार- मणी अवसेसाणि धातु अणग्गेयेसु उपलद्ध भवंति । वत्य अधुत्ताहिं उवलद्धीहिं सव्यलोहाइं सव्यमणीसु य उवलद्धव्याणि भवंति । तत्य घटेसु मणि या संखमंडं या पवालयं वा धूया। ओमत्यिते पर(रि)मस्थिते सव्यविद्ध- पडिरूवे य विद्धभंडं धूया । मुत्ताओ य आधायिवेण अविर्द्धभंडं घूया । तत्थ सामेसु सन्यामरणगते चेव आमरणगवं 20 चूया । वत्य कोडिते खोडिते दंतणहे अंजण-पासाण-सफारा-लेटुक-ढेल्लिया मच्छक-फहादिसु सव्यकढिणगते सयकडगए सव्यचुण्णगते सम्बंधणपडिरूवउवकरणगते चेव धणं वूया । उद्धं णामीय काहावणे घूया । अधो णामीय णाणकं घूया । -तत्य अभंतरामासे सव्वसारगते सव्वकाहायणोपकरणगते य काहावणे चूया । तत्थ काहायणेसु पुन्याधारितेसु उत्तमेसु उत्तमयत्तिए चूया, मझिमेसु मज्झिमयत्तिए यूया, जहाणेसु जहण्णयत्तिए पूया, साधारणेसु उत्तममझिम- जैहणेसु साधारणयत्तिए बूया, आदिमूलेसु पुराणे यूया, वालेसु णवाए बूया । तत्य वज्झामासेसु असारगते य 25 सव्वणाणकपडिख्यगते य णाणकं चूया । तत्य णाणए पुत्र्याधारिते कायमंतेसु सब्बमासकपडिरूवगते य मासए घूय, मझिमकाएसु अद्धमासकपडिरूव-सद्दपादुम्भावे य अद्धमासए घूया, मज्झिमाणतरकारसु सव्वकाकणिपटिरूवगते य काकर्णि धूया, पचवरकाएसु सव्यअष्ट्रपडिरूवगते य अट्ठातो वूया । तत्य असंतरेसु छेए यूया, पाहिर तरे पत्तेये यूया, याहिरेसु बाहिराहियं घूया, कण्हेसु लोहं यूया, फालितेसु गढं यूया, दृढेसु सारमंते यूया, पलेसु अप्पसारं यूया, चतुरस्सेसु चतुरसं बूया, बट्टेसु पढें घूया, लेहागते लेहाग चित्तं घूया, सण्हेसु अप्पलक्सणं वूया, 50 थलेसु उत्ताणलक्सणं यूया, उविद्धसु उविद्धलक्खणं घूया । एतेसु अक्सठाणाणि भवति । १ ते पम्हुत्ते अव ह. त• ॥ २ पादुम्भावे पर्व ह• त• ॥ ३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव पर्वते ॥ ४-५ एत- चिहान्तर्गतः पाठः है. त. नास्ति। ६-७-८ विट्ठभं है. त.॥ ९°व्यडंफग' है. स. नि. ॥ १० व्यवण्णप.स. प्यधण्णपति ॥ ११ वणं हंत० ॥ १२ हण्णसाधा है• त• ॥ १३ 'सु यत्तिये 'धूया, पाहिरवाहिरे हतं बूया, ई. स. विना ॥ १४ अप्पासाह. त•विन्द्र । . - २१६ अंगविजापइंग्णय एत्थं एककेसु गत्तेसु एक्काभरणे एकोपकरणे एक्कचरेसु सत्तेसु एकवीणियं एकंगुलिग्गहणे एकसाहागते य एक बूया । तत्य दंडेसु गतेसु जमलाभरणे जमलोवकरणे मिधुणचरेसु सत्तेसु बिअंगुलिग्गणे विसाहागते सव्वविगपडिरूवगते य दुवे घूया । तत्थ तिए भमुहासंगयए गोसाचूलायं पोरिसे. तियंगुलिग्गहणे सव्वतियपडिरूव-सद्दपादुभावे य तिण्णि बूया । तत्य चतुरस्सेसु चतुकेसु सव्यचतुष्पदेसु चतुरंगुलिम्गहणे. पादतल-पाणितलेसु सन्वचतुसाहागते सव्य- 5 चतुकपडिरूवे य चत्तारि बूया । तत्थ दंतेसु थणेसु असे मुट्ठीकरणे फियग्गहणे पंचकपरामासे पंचकपडिरूवेसु य पंच यूया । तत्थ गंडे मणिबंधणे गोप्फासु छक्कपडिरूवे य छ बूया । तत्थ सोणीयं कण्णेसु पस्सेसु कुक्खीसु च सत्तकपडिरूवे य सत्तकं वूया । तत्थ णिडाले कण्हे उरमझे हिदए णाभीयं अट्ठकपडिरूवे य अट्ठकं बूया । तत्य चतुक-पंचकपरा- मासे एक्कके अगसहिए बिए सत्तगसहिए तिए छक्कासहिते णयगपडिरूव-सद्दपादुब्भावे य णव बूया । तत्थ पंचगदंडो- दीरणे पंचकजुवलकपरामासे एक्कए णवकसहिते बिए अगसहिते चउक्के छक्कासहिते दस घूया । एवं एक्कारसकसहिते 10 वारसक-तेरसक-चोइसक-पण्णरसक-सोलसक-सत्तरसक-अट्ठारसक-एकूणवीसाका वग्गा आमास-पडिरूवसंजोगेहि पडि- रूप-सह-आकारपादुभावेहि य एक्कुत्तरवड्डीय तव्वा भवंति । तत्थ असफलए कोप्परे जण्णूसु वीसं बूया । तूरुमज्झे पणुवीसं धूया। पट्ठीयं तीसं बूया । अंतरोदरेण पणतीसं वूया । णामीयं चत्तालीसं घूया। उपरि णामीय पणतालीसं घूया । उपरि णामीयं अंगुलेसु पण्णासं धूया । हेट्ठा हितयस्स पंचावण्णं बूया । हियए सहि घूया। उपरि हिययस्स पंचमाहि बूया । अक्खए सत्तरि बूया । गीवामझे पण्णत्तरि घूया । हणु-कवोले असीर्ति बूया । उत्तरो? 16 पंचासीति बूया । भमूसु णउति धूया । णिडाले पंचाणउति बूया । सीसे संतं बूया । बाहुमज्झे उरमझे य तीससयं बूया । तालये जिब्भायं वासंते मुहे ति सहस्सं बूया । गीते विपेक्खिते विजमिते सहस्समेतं घूया । पुँव्वदिटेण चेव कमेण अक्खडाणाणि यधुद्दिद्वाणि एकुत्तरियाय बड्डीय समत्त-भिण्णोवलद्धीहिं चेव आधारयित्ता आधारयित्ता काहावणा णाणकोवलद्धीओ य आमास-पडिरूवसंजोगोपलद्धीहि आकार-सण्णा-सह-रूवपादुन्भावेहिं सव्वं समणुगंतव्य भवति । 20 तत्य 'कंसि पद्धं ' पुव्यमाधारिते णासायं थणेसु पोरिसे त्ति थैविकाय त्ति बूया । मुखे पिढते णामीयं अक्लीसु त्ति चम्मकोसगतं बूया । अवहत्येसु कुक्खीसु पोट्टलिकागतं घूया । दृढेसु बद्धं घूया । चलेसु सुकं घूया । ओवेदिय-परिवेढिते अट्टियगतं धूया । केस-मंसुगते सुत्तबद्धं यूया । अंगुलीसु चक्कवद्धं घूया । तणूस हेत्तिबद्धं भूया । अभंतरेसु सकं घूया । बाहिरेसु परकं बूया । वाहिरभंतरेसु सक-परफसाधारणं बूया । कायमंतेसु सुवण्णप्पमाणं बूया। मझिमकायेसु अहसुवण्णप्पमाणं गया । मन्झिमाणतरकायेसु सुवण्णमासकप्पमाणं बूया । पचवरकायेसु 25 सुषण्णकाकणि बूया । अभंतरेसु पलप्पमाणं घूया । बाहिरब्भंतरेसु मिण्णपलप्रमाणं बूया । अणिन्वुतेसु अपरिणिन्दुर्ति थूया । णिन्दुएस गिव्यं बूया । णिव्वुएसु णिब्वियं बूया। हा आहारेसु अचिरलद्धं धूया । णीहारेस षयगयं यूया । थीमेसु अद्वद्धितमेव चूया ।। ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय णिसुत्तो णामान्झायो पक्खातो भवति छप्पण्णासतिमो ॥५६॥ छ । १पए है ..॥ २ णासाभूयालं पो. त.॥ ३ पुव्युदिट्टेण है. त॥ ४चयिकाय • त.॥ ५ भोयेद्वित-परियेट्टिते उअट्टि • त• पिना ॥ ६ अणिजुत्तेषु भपरिणिव्युति ३ पु.। अणिम्पएमु अपरिमिव्ययं है •॥ ७हयरितान्तर्गतः पाठः १.१. एक पते ॥ ८°सु चय' है. त• ॥ ९ अद्धदियं मेयं . त• ॥
२१७ सत्तपण्णासइमो पट्टकोसयज्झाओ [सत्तपपणासइमो णट्टकोसयज्झायो] णमो भगवतो यसयतो महापुरिसस्स बद्धमाणस्स । अधापुव्यं खलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविनाए णडाणट्ठो णामाझायो । वं खलु भो ! तमणुवैक्खाइस्सामि । तत्य णहूँ ण णट्ठमिति पुव्यमाधारयितव्यं भवति । तत्य णेनैपडिपिधणे सोत्तपडिप्पिधणे पाणपडिप्पिधणे पुहपडिप्पिधणे अट्ठाणपटिप्पिघणे छिदपडिप्पिधणे यज्झामासे चैलामासे अणामिकागणे पल्लत्थे पसंखित्ते मुत्ते पकिण्णे णिक्सित्ते उवादिण्णे बद्धमुत्ते अवसक्किते अवणामिते विणासिते । गह-हरियसद्दपादुन्भावे पडं चूया । तत्य अभंतरामासे दढामासे णिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामासे आहारेसु अणट्ठ-हरितपादुन्भावे चेव ण णडं ति वूया । तत्य गढे पुव्याधारिते णटुं तिविधमाधारये-णटं वा पम्हुढं या हरितं वा । तत्य अणामिकागहणे वंधणमोक्खणे दाणापत्तिगते मिक्खेवउपावणे पझे णट्ठो त्ति यूया। तत्थ सोत्तपडिप्पिधाणे णेत्तपडिप्पिहाणे 3 घाणपडि- प्पिहाणे य णफडिते मुत्ते सयं भट्टे पलोलिते पम्हुढं ति वूया । वत्य चलामासे णीहारेसु य सब्बचोरपडिरूव- 10 सद्दपादुव्भावेसु य हरितं बूया । तत्य गहें दुविधं-सजीवं अजीयं चेति । तत्य अन्भंतरामासे चलामासे णिद्धामासे पुण्णामासे सब्यसजीवगते चेय सजीव णटुं बूया । तत्य वझामासे दृढामासे लुक्खामासे तुच्छामासे सव्यअनीवगते चेव अजी जहं बूया । तत्थ सजीवे णढे पुन्याधारिते सज्जीवं णडं दुविधमाधारये-मणुस्सजोणीगतं तिरिक्सजोणिगतं चेय । तत्य तिरियामासे तिरियगते तिरियविलोगिते सव्वतिरिक्खजोणिगते पडिरूव-सद्दपादुन्माचे सव्यतिरिक्खजोणी- 15 परामासे सव्यतिरिक्खजोणीसद्दगते सव्यतिरिक्खजोणीणामोदीरणे तिरिक्खजोणीणामयेने थी-पुरिसगते विरिक्खजो. णीणामधेजे उवकरणे तिरिक्खजोणीउवकरणे चेव तिरिक्खजोणी गढ़ बूया । सत्य तिरिक्सजोणीयं पुख्याधारितार्य तिरिक्खजोणिं तिविधमाधारये-पक्विगतं चतुप्पदगतं परिसप्पगतं चेति । तत्थ उद्धंगीवा-सिरो-मुहामासे णखत-चंद- सूर-गह-तारागणपडिरूय-सद्दपादुन्भावे उद्धंभागागते सव्वपक्खिपादुन्भावे सयपक्खिपरामासे सव्यपक्खिसहगते सव्वपक्खिणामधेजोदीरणे सव्वपक्खिगामधेने थी-पुरिसगए व सधपक्षिणामधेजोवकरणदव्वगते सध- 20 पक्खीउयकरणे चेव पक्खि नह वूया । तत्य सम्बचतुरस्सेसु वा चतुप्पदेसु या चतुप्पदपादुभावे चतुष्पदपरामासे चतुष्पदसद्दगते य चतुष्पदणामधिनोदीरणे चतुप्पयमये उवकरणे चतुष्पदोपकरणे चतुप्पदणामधेजे थी-पुरिसे चतुप्पद- उपकरणदव्यगते चउप्पदसद्द-रूवपादुभावेसु चउप्पयं णटें यूया । तत्य कण्हेसु सव्वदीहेसु सबपरिसप्पपादुमावे परिसप्पपरामासे परिसप्पसद्दगते सञ्चपरिसप्पणामोदीरणे परिसप्पमये उपकरणे परिसप्पउपकरणगते परिसप्पणामधेजे थी-पुरिससद्दोपकरणे परिसप्पसद-रूवपादुभावे चेय परिसप्पं नहँ ति घूया । तत्य पक्खिसु णहेसु पुव्याधारितेसु जलचरं थलचरं ति पुब्वमाधारयितव्यं । वत्य आपुणेयेसु सबजलयेसु सबजलचरेसु जलचरजलयपरामासे जलचरजलयणामोदीरणे जलचरजलयणामयेने उवकरणे थी-परिसद्व्योवकरणे सद्द-रूवपादुन्भावसु जलचरं पक्खि नहुँ ति बूया ! तत्य लुक्खेसु यलेसु य थलयेसु य थलचरेसु य सत्तेसु थलय- थलचरपरामासे थलयथलचरसद्दणामोदीरणे थलयथलचरउपकरणपादुव्भावे सव्यथलयथलचरणामधेने उवकरणे थी-पुरिसे य थलचरउवकरणसद्द-रूवपादुघ्भावे थलचरं पक्सि पढें घूया । तत्य अन्मंतरेसु आहारेसु सव्वगामेसु 50 १°वक्खस्सा है. त.॥ २णेत्तपडिप्पिधणे मुहपडिप्पिधणे अवाणपडिप्पिधणे यज्झा ० त• बिना ॥ ३ एलामासे ई० त०॥ ४ वद्धमिते ६० त० ॥ ५ पाणणे ई० त० दिना ॥ ६ इस्त्रचिहान्तर्गतः पाठः . त• एवं वर्तते । ७ भद्दे प है. त• विना ॥ ८ हस्तचिहान्तर्गतः पाठ है. त. एवं वर्तते ॥ ९°धेजेसु य थी' है.॥ अंग०२८ 25 अंगविनापदण्णायं य गानापिय पहुं यूग । तत्व बदामु नीटारेमु य सयभारण्णेमु आरण्गपादुव्मावेमु य आरण्यं पक्सि पहँ घूया । नन्ध फायतेनु गायन, मनिमयायेमु मझिमसायं, मझिमाणतरकायेमु मन्झिमाणतरकायं, परकायेमु पभरका पनि महं ति यूया । सेदेमु सेदं, तथा लंब, पीतेमु पीतं, सेपालएमु सेवालयं, पीलेमु पीलं, फरसेम फरगं, चितमु चित्तं, रियमगेमु पियदंसगं, अदंसणीयेमु असणीयं, घोमरतेमु घोसतं, अयोमरतेमु अघोमनं । परिज पटं वि यूया । मधुरम्तमु मधुरतं, कडुयन्तेमु कडुयग्नं, दारणे दारुणं, मसु म,, अविदेमुमविदं, मममधिरभोपींमु मन-महिरमोयि, पुःफ-फलमोयीमु पुष्फ-फलमोयिं, अणूमु धण्गभोयिं पढे ति यूया । इति पक्सि- पदं पूग । , - नत्य पर पदमु पटेमु गम्म धारण ति दुविधा आदारा पीतआहारा पीत ब चेति । तत्य अन्मंतरेमु आहारगु मन्यगम्मेमु य गम्मपउनदं जहँ ति यूया। तत्य यन्दोमु नीहारेमु सबआरण्णेमु आरण्णचतुष्पदं नह 10नि पूग । तस्य मन्वनेमु मिगीमु फोसिबलगते य सिंगीचनुप्पदं पलु ति यूया । तत्य अधोभागेम असिं- गी अमिगि चतुष्पदं पहं यूया । अमंगमिरागते यणपतीमु असिंगियनुप्पदं पहं यूया । तत्य फायतेमु पाय- यंत, गदिमयायेगु मन्दिमकाय, महिमा तरकायेनु मन्सिमागंतरसायं यूया। पगरयायेमु पयवसायं चतुष्पदं ति या । सय मेतेमु सेनं, तयेमु तयं, पीतेमु पीतं, सेयालयेमु सेवालयं, पैहूम - पाटुं, पीलमु पीलं, फर्गमु फाएं, फरगेमु फरम, चित्तेमु चिनं चतुष्पदं नहें ति यूया । धीगामेमु धीणाम, पुण्गामेमु पुण्गाम, गघुम- 18 प्मु मगर पतुम पहंति पूया ! इनि पनुभदन्तं पह। राप परिमये पट्ठ पुन्याधारित निविधमाधारये-दल्लीपर मंहलि राणां चेति । तत्य यायम्मु दण्वीयरं ति पूा । परिमंडला परिमंटलिगो पटे यूगा । तिरिन्टीगराईमु तिरिन्छीगराइयो पढे त्ति यूया। उद्धेमु उद्धरादगो जत्ति पूा । दय पारमनेमु पायमंना, मन्झिमकायेमु मन्मिमाया, मझिमागंवरायेमु मनिझमागंतरराया, पगरकायेमु पररपाये परिगर हंसि यूग । सेतेमु मेता, नया नया, पीतेगु पीता, रोगालेमु सेयाला, पण्डम पण्डू, गिजामा, फदेगु फदा, फग्गेमु फामा, वित्तमु चित्ता, धीनामेमु थीगामा, पुण्यामेमु पुण्णामा, नपुंमएमु गरा परिणाम प्रोटे पि यूपा । इति परिमाण मटं नि पूगा । इति निरिकमजोगिग गढ़। ४५ मामलोनी पुन्गपारिनार उनुमा उपेरिपने पुत्रोदते मन्यनगते य मशुग्मं । पूजय मम्मे पुष्पापानि अनी पेरमो ति पुनमापारमित भयो । मत्य उद्धं पानीयं गत्यसमागते व अन पूल । नय अधो पानीयं मयोरगाने य पेरगावानं पहा पूया । पुण्यामेगु परमेमु दाग दी पूIE मे पेमेगु दाग हा पूल । .7 गगने पुण्यापानि माययं भनी । माने पु मतो गल्तिी यामी गुरो पि पुष्पमापारपिन भी । गत्म मिनेगु पभेषण पंम जमा ! गण गण । अंग्गेमु पेग्मं ी पून । मुगु गुरं की पू । पणेगु पुमारिलंगु Timi , गुप, मागु गानं, पालामामु पानगगाम, मुरगामेनु मुभरगाम, पालिका PATNA पूजा गधावि दिगु दीर, गुहाग, शुभमु गर, रिगेमुगिं, पान मार, अपायेगु प, ममि महिमा, मागु गरम पूग। rearrinो मारमा गुरगुती पागे गि मनु गमारी-मरप अनी भारागु rint पूज, दिगो पूज, भागुन पूल, भाभारम्भलोग भलो पानी प.पmfarmir writ गुगामात गप गुरमोनी पूना। अपमा rrent re...1.::-Artstore verterntre .. - .
। - सत्तपण्णालीसइमो णट्टकोसयज्झाओ २१९ गीवाय उद्धं कडीय तुल्लजोणीयं घूया । अघत्था कडीय पञ्चवरजातीयं धूया । तत्थ गुरुजोणीयं पुव्वाधारितायं अजयं वा पितरं वा आयरियं वा पढे ति बूया । पुण्णामेसु दंडेसु पेतिनं वा मातुलं वा उवज्झायं वा गहुँ वूया ! थीणामेसु दंडेसु मातुस्सियं या पितुस्सियं वा उवज्झायभगिणिं वा णडं ति बूया । पुणो विसेसितेसु दंडेसु थीणामेसु चुल्लमातुयं था उवज्झायं वा बूया । अभंतरेसु दंडे पितुस्सियं वा उवज्झायभगिणिं वा णडं घूया । बाहिरेसु दंडेसु थीणामेसु पितुजातिं वा उवज्झायजाति वा बूया । तत्य उत्तमुत्तमेसु अभंतरभंतरेसु य पुण्णामपेजेसु अञ्जकं वा उवज्झायं 5 वा पहें चूया । उत्तमुत्तमेसु थीणामेसु अजियं या उवज्झायमातरं या उवज्झायउवज्झायिणि वा गळं वूया । इति गुरुजोणी गट्ठा वक्खाता भवति । तत्थ तुल्लजोणीसु भाता वा वयस्सो वा भगिणिं वा 'संलो या भगिणिं वा पति वा मेधुणो वा देवरो वा पतिजेठो वा भातुवयस्सो वा जैस्स(वयस्स)वयस्सो वा य गट्ठो विण्णेयो भवति । तत्थ 'दंडेसु भाता विण्णेयो। वामेसु पुण्णामेसु भगिणिपति विण्णेयो । दक्खिणेसु पुण्णामधेजेसु मातुलपुत्तो विण्णेयो । वामेसु पुण्यामधेजेसु 10 मातुस्सियापुत्तो विण्णेयो । चलेसु वझेयेसु य पुण्यामेसु वयस्सो विष्णेयो । 'दंडेसु चलेसु पुण्णामधेजेसु य भातु- वयस्सो विष्णेयो। वाहिरवाहिरेसु चलेसु पुण्णामेसु य वयस्सवयस्सो विण्णेयो । तत्थ थीणामेसु तुल्लजोणीयं भज वा सोलिं वा भगिणिं या मातुस्सियाधीतरं वा पितुस्सियाधीतरं वा पित्तियधीतरं वा जातरं वा गणंदरं या सहिं वा जारि वा जाणिय । तत्थ अभंतरेसु चलेसु भुजा वा भातुजा वा विण्णेया भवति । बाहिरभंतरेसु चलेसु य सही वा सल्ली वा विण्णेया । बाहिरेसु चलेसु य थीणामेसु जारि विष्णेया । तत्थ 'दंडेसु भगिणि वा भगिणिगतं धा बूया । 15 तत्य पुण्णामधेजेसु सोदर या महपितुकधीतरं वा पित्तियधीतरं या मातुलधीतरं या जोणिभगिर्णि वा बूया । तत्य अभंतरेसु सोदरियं भगिणि बूया । उम्मजितेसु पुण्णामेसु महपितुयधीतरं भगिणिं बूया । उम्मजितेसु पुण्णामेसु णामेसु पितियधीतरं भगिणि बूया । थीणामपेजेसु सोदरियं भगिणि वूया । थीसाधारणेसु पुण्णामेसु मातुल- धीतरं बूया । बाहिरेसु घलेसु य जोणिभगिणिं घूया । वाहिरेसु थीसाधारणेसु पितुस्सियाधीतरि बूया, मातुस्सिया- धीतरिं वा । दक्खिणेसु थीणामेसु पितुस्सियावीतरिं धूया । उदरेसु सोदरिउग्गमेव यूया, दक्षिणपस्से भायरो, वाम- 20 पस्से भगिणीओ धूया । दक्खिगपस्से उदरस्स उम्मजिते जेट्ठो भाया, ओमजिए कणेहो भाता, थितामासे जमल- भातरो विण्णेया । वामपस्से उदरस्स उम्मजिते जेहँ भगिणिं यूया, ओमज्जिते कणिहभगिणीं वूया, थितामासे जमलम- गिणीओ बूया । इति तुल्लजोणीणहूँ वक्खातं भवति । तत्थ पंचवरजोणीपुण्णामधेजेसु पुत्तो वा जामाता वा जामातुयभाया था ण्हुसा वा भाया या भागिणेजो वा वयस्सपुत्तो या जोणीपुत्तो वा भैत्तिओ या । तत्थऽन्भंतरेसु पुत्ता विण्णेया । बाहिरभंतरेसु दंडेसु भातुपुत्ता विष्णेया । 25 थीणामेसु दंडेसु भगिणीपुत्तो विण्णेया । बज्झेसु थीणामेसु जोणिपुत्ता विण्णेया । वझेसु चलेसु वयस्सपुत्ता विण्णेया । तत्य पञ्चवरजोणीयं थीणामधेजेसु थिया जोणी धीया या विण्णेया । तत्थ अभंतरेसु थीणामधेजेसु धीतरं वूया। पाहि- रम्भंतरेसु धीणामधेजेसु भातुधीतरं घूया । जमगीणामोदीरणे भगिणिधीतरं चूया । वझसण्णितेसु थीणामवेजेसु जोणिभगिणीधीतरं बूया । थीणामेसु वज्झेसु चलेसु य वयस्सघीतरं बूया । थीणामपेजसाधारणे जामातरं ण्डसं वा वूया । पुण्णामेसु अन्मंतरेसु ण्हुसं वूया । इति पञ्चवरजोणी णढे वैक्खाया भवति । एतेसिं पञ्चवरजोणीयं समुद्दिट्टायं अण्णतरंसि आधारिए अण्णत्तरं पढें घूया । तत्थ 'केण हरितं ?? ति आधारितंसि तत्य णटं आहारेसु । अन्भंतरेसु य अभंतरेण हरितं ति बूया । अभंतरेसु यमगामासेसु य जो पुच्छेन - - 30 १संभो वा हं. त.॥ २ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः ६० त० एव वर्तते ।। ३-४ ददेसु है० त० विना ॥ ५सल्लिं या है. त॥ ६ दंतेसु ह. तविना ॥ ७ पञ्चत्तर ह. त०॥ ८या जायाभाया जामाउयजाया या ण्हुसा है. त॥ ९भवत्तिओ ई० त०॥ १० वक्खातो है. त. विना ।। ११ यमगामामगामासेसु है त.॥
२२० । अंगविजापइण्णय तेणेच हरितं ति यूया.। वाहिरभंवरेसु णीहारेसु बाहिं वसंतेण हरितं अभंतरेण त्ति बूया | अभितरवाहिरेसु आहार- णीहारेसु अण्णहिं यसतेण वाहिरेणं हरियं ति बूया । वाहिरेसु अण्णहिं वसंतेन दिद्वपुण हरितं ति यूया। चाहिरवाहिरेसु अण्णहिं यसतेण अदिषुब्वेण हरितं ति घूया । तत्य गिसणे पुबांधारिते अभंतरेसु णिवेसणगतं, यूया, अभंतरमंतरेसु उव्वरकगवं यूया, वाहिरभंतरेसु पडिवेसघरगतं धूया, वाहिरेसु घहिद्धा णिवेसणस्स त्ति यूया, 5 बाहिरवाहिरेसु बहिदा णगरस्स चूया । तत्थ वहिं वा णिवेसणरस त्ति पुन्याधारिते अभंतरे, गगरे -पुव्याधारिते अर्भ- तरेसु णगरगयं चूया, अभंतरमंतरेसु पडिवेसघरगतं वूया, अभंतरवाहिरेसु पाहिरियागते वूया, बाहिरेसु आरामगतं चूया, वाहिरबाहिरेसु अरण्णगतं घूया । पुरस्थिमेसु गत्तेसु पुरस्थिमायं दिसायं वूया । दक्सिणपुरथिमेसु दक्षिणपुरस्थि- मायं दिसायं ति वूया । दक्खिणेसु दक्सिणायं दिसायं ति यूया दक्खिगपच्छिमेसु दक्षिणपच्छिमायं, दिसायं ति बूया । पच्छिमेसु गत्तेसु पच्छिमायं दिसायं ति धूया । उत्तरपच्छिमेसु गत्तेसु उत्तरपच्छिमायं दिसायं ति धूया । 10 उत्तरेसु गत्तेसु उत्तरायं दिसायं ति धूया । उत्तरपुरस्थिमेसु गत्तेसु उत्तरपुरस्थिमायं दिसायं ति चूया । तत्थ उद्धेसु मालगतं या स्क्वगतं वा पव्यतगतं वा आरुभितकं वा चूया । अधोभागेसु कूवगवं वा यावीगतं वा तलांगगतं वा पयाणगतं या णदीगतं वा भूमीगतं या भूमीघरगतं या पिण्णे या णिधितं चूया । तत्य अजीवपंगति अणेकाकारा भवति थाणेण वा णिधाणेण या। सा तिविधा उपलद्धा-पाणजोगींगता मूलजोणीगता धातुजोगीगता वेति । तत्थ चलामासेमु पाणलोणी विण्णेया सव्यपाणपडिरूवगते य । फेस-मंसु-नह- 15 लोमगते मूलजोणी विष्णेया सव्यमूलपडिरूयगते चैव । दढामासेसु सव्वधातुपहिरूवगते चेव धातुजोणी विष्णेया । सा दुविधा विण्णेया-संखता असंसता चेव । तत्थ संखते संखता विण्णेया । असंसते असंखता । सा पुणरवि दुविधा विण्णेया-अग्गेया अणग्गेय त्ति । तत्थ अग्गेयेसु अग्गेया विण्णेया । [अणग्गेयेसु अणग्गेया विण्णेया।] सा पुणरवि दुविधा विण्णेया आहारे उपकरणे चेव । तत्य आहारेसु आहारो विण्णेयो । सव्यमोयणपडिरूवगते चेय णीहारेसु उवकरणं विण्णेयं सव्यउवक्खरगतं चेय । वत्थ पाणजोणीए आहारे दुद्धं दधि तक णवणीतं कूचियं आमधितं 20 गुलदधि - रसालादहि या मधुं परमणं दधितावो तक्कोदणो अतिकूरको मंसं रुधिरं वसा वेति । अवसेसाणि ऍन्युद्दिवाणि असंखताणि, दुद्धं दधिं वेति असंखताणि । तत्थ गिद्धेसु पाणीयं, गिद्धसाधारणेसु परमण्णं, अणिद्धेसु दधितायो तक्कोदगो वा विष्णेयो । अलुक्खेसु अतिकूरको मंसं ति विष्णेयं । लुक्खेसु वल्लूरं विष्णेयं एवमादी । इति पाणजोणीगते आहारो विष्णेयो भवति । तत्य मूलजोणीगते आहारे साली वीही कोद्दया कंगू रालका वरका जब-गोधूमा मासा मुग्गा अलसंदका 28 घणका णिप्फावा कुलत्या चणविकाओ मसूरा तिला अतसीओ कुसुंभा सामाका वेति । तत्य आहारेसु अंतेसु धण्ण- गतमेव णहूँ बूया । जधुत्ताहिं पुव्योपलद्धीहिं अणूसु संखतेसु मूलजोणीय आहार णडं बूया। जधुत्ताहि भोयणपडले आहारोवलद्धीहिं तत्य सेते साली वीही सेततिला कुसुंभा सेतसासया चेति विण्णेया। सामेसु अदसी विण्णेया । तंवेसु कोहया गोधूमा तंवनिप्फावा तिला कुलत्या वा रायसासवा विण्णेया । सत्य सन्मण्णगतं तिविधं-तणगतं गुम्मगतं वहिगतं ति। तत्थ तणगतं साली वीही कोदवा कंगू रालका सामाका 30 तणफलं चेति विण्णेयाणि भांति । तत्थ गुम्मगते अदसी तिला सासवा चेति विण्णेयाणि । तत्थ वल्लीगते मुग्गा मासा चणका घणविकाओ अलसंदे वा निम्फावा कुलत्या वेति विण्णेया भवंति । इति आहारगवं णडं ति बूया । तत्थ उपणिद्धेसु फुसणगतं विण्णेयं मास-मुमा-अलसंदकावणविकातं भवति । तत्य कोलयो कंवलिको साकरसो थूर्णिकारसलो दुद्धं दहिं तथं अंबिलं ति विष्णेया उपसेका । तत्य सेतेसु मधुरेसु असंखयेसु य दुई विष्णेया। १हसचिहान्तर्गतः पार हं. त• एव वर्तते ॥२पमाति है. त• विना । ३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठःहै. त. एव वर्तते । ४ पुष्यदिट्ठा है•स• ॥ ५ काल है. त•॥ ६सारफसो ह..॥ ७°का दुई हं. त. विना ॥ ८ उपसिको - १.त-विना॥
-- सत्तपण्णासइमो णट्टकोसयज्झाओ २२१ अंवेसु घणेसु असंखतेसु दधिं विण्णेयं भवति । तंवेसु संखतेसु य तर्फ विण्गेयं । पाणजोणीगते सोपरत्ते सोपहुते रस- गत विण्णेयं भवति ।। मूलजोणीगते संखयेसु जूसो विण्णेयो । अच्छेसु कंवलिको विष्णेयो । चापण्णेसु अविलं ति विण्णेयं तत्थं सव्वकोसगए सव्यकोसीधण्णगते सबसिंगिगते सव्वसुद्धचूलागते सब्बचेद्वितसिहंडिगते सव्यसंपुड- पेला-पेलिकगते करंडगगते संकोसकगते पणसक-थइआ-पसेव्यकगते सगलिकारसं घूया । तत्थ सन्यवालेयेसु थूणिका- रसं वूया । सव्वअंतेसु सागरसं घूया। मुदितेसु पुप्फरसं वूया । पुण्णेमु फलरसं वूया । तत्थ सागगते एतेहिं जेय । पादुभावे णेतव्या सबहेडिमेहिं मूलंगतं विन्नेयं । संव्यमूलजोगीपडिरुबगते य पा(वा)लेयेसु थूणिकारसो विष्णेयो तणूसु सागगते चेव सागरसो विण्णेयो।। मुदितेसु पुप्फगते य पुप्फरसो विण्णेयो । पुण्णेसु फ्लेसु फलगते चेव फल. रसो विष्णेयो। इति फलजोणी वक्खाता भवति । तत्थ पसण्णा गिट्टिता मधुरको आसवो जगलं मधुरेसेरको अरिठ्ठो अट्ठकालिका आसयासवो सुरा कुसुकुंडी जयकालिका चेति पाणगतं आधारयित्ता आधारयित्ता उवलद्धीहिं जधुत्ताहिं उवलद्धव्यं भवति । तत्थ पसण्णेसु 10 पसण्णा विण्णेया । सेतेसु फुसकुंडी णिहिता जगलं वेति विण्णेया भवंति-तत्थ सारवंतेसु णिहिता, मधुरेसु कुसुकुंडी, सद्देसु जगलं विण्णेयं भवति । तत्य मधुरेसु संवेसु य आसवो विण्णेयो । संवेसु कण्हसाधारणेसु कसायेसु य मधुरं विष्णेयं । इति एतेसिं एकतरं मजं गडं ति वूया । एवं मूलजोणी बक्खातो भवति । पाणजोगी गवा आहारजोणी गता चेति । तत्य धातुगते णत्थि आहारो त्ति बूया । तत्थ धाउजोणीगते उपकरणं आभरणं या विण्णेयं । तत्थ उपकरणं तिविधं-पाणजोणीजं मूलजोणीजं धातुजोणियं चेति । तत्थ पाणजोणियं मुत्तिकं संखागवलमयं दंतमयं सिंगमयं अट्टिक- 15 मयं वालमयं लोहमैयं अहिकमयं सिंगमयं चम्ममयं वालमयं चेति भाजणगतं विष्णेयं । तत्थ अच्छादणाणि कोसेजकं आयिकं अविकपत्तुण्णा अजिणपट्टा अजिणप्पवेणी चम्मसाडीओ वालवीरा चेति । इति पाणजोणीआणि उवकरण-भाय- ण-भूसण-ऽच्छादणाणि आधारयित्ता आधारयित्ता सकाहिं उयलद्धीहिं उपलद्धव्याणि भयंति । तत्य मूलजोणीआभरणाणि कहमयं पुप्फमयं फलमयं पत्तमयं चेति । तत्थ मूलजोणीभायणाणि कट्ठमयं पुप्फमयं फलमयं पत्तमयं चेति । तत्य मूलजोणियो अच्छादो कप्पासिकं 8 वैक्कभंडं वेलुमयं न चेति । एवमेव उयकरणं मूलजोणियं समणुगंतव्यं 20 भवति । इति मूलजोगिओ अंच्छादो आभरणाणि भायणाणि उयकरणाणि य सव्यं समणुगंतव्यं भवति । तस्थ धातु- जोगिमयं आभरणं सुवण्णमयं रुप्पमयं संयमयं हारकूडमयं तपुमयं सीसकमयं काललोहमयं वट्टलोहमयं सेलमयं मत्तिकामयं । तत्य धातुजोणिमयो आच्छादो सुवण्णपट्टो सुवण्णखयितो अच्छादो लोहजालिका वेति । एतेसिं एत्तो “एगतरं आधारयित्ता आधारयित्ता जधुत्ताहिं उबलद्धीहिं उबलद्धव्यं भवति । तत्य गिद्धेहिं रसगतं गडं घूया । सुक्खेसु सुक्खं णहूं वूया ! चलेसु सनीयं णडं वूया। दसु धातुगतं गहें 25 यूया । पुण्णामधेजेसु पुरिसं वूया । धीणामधेनेसु इत्यि णडं यूया 1 णपुंसकेसु णपुंसक नह धूया । तेणूमु पत्यं नहें घूया । सव्वतंतुगते चेव सामेसु आभरणं णडं घूया । सुकेमु घउरस्सेसु चित्तेमु सारयतेसु य काहावणे णहे यूया। परिमंडलेसु भायणं णडं चूया । चलणीहारेसु जाणं णडं यूया । पुण्णेमु आहारं यूया । तिम्रोसु सत्यं णडं यूया । अंतेसु उपकरणं णडं घूया । तंवेमु पीतकेमु य सुवण्णकं पाहू यूया । बुद्धीरमणेसु विनासत्यगतं यह यूया । उत्तमेसु उत्तमं गडं घूया । मन्झिमेसु मन्झिमं णटं यूया । जहण्णेसु जहणं णहं यूया। तत्य पहेसु पुव्याधारिते अभंवरणिवेसर्गसि कंसि देसंसि मायसि ? ति। तत्य धूलंसि अरंजरंसि उहि- आगतं या पटगतं या यूया । उपथूलेमु फुहगतं या फिबरगनं या एसलिकागवं या यूया। गातियूलेमु जातिकसेसु १ परिते हैं.. विना ॥ २ रमेरको अरिठ्ठो यि भरिटुका है. त• पिना ॥ ३ "मयं यमाटिफ. त•॥ ४ आच्छादोई. • पिना ॥ ५हसचिहान्तर्गतः पाट १.३. एव पते ॥ ६-७-८ आच्छादो • त• ॥ पण्णेनु यत्य..॥ । 30 २२० घूया अंगविज्ञापइण्णय तेणेव हरितं ति धूया । वाहिरभंवरेसु णीहारे पाहि वसंतेण हरितं अभंतरेण त्ति बूया । अभिवरवाहिरैसु आहार- णीहारेसु अण्णहिं वसंतेण वाहिरेण हरियं ति यूया । ' वाहिरेसु अण्णहिं वसंतेण दिडपुग्वेण हरितं ति घूया। चाहिरवाहिरेसु अण्णहि वसंतेण अदिपुब्वेण हरितं ति यूया । तत्थ गिवेसणे पुव्यांधारिते अभंतरेसु णिवेसणगतं, यूपा, अभंतरमंतरेसु उव्यरकगतं चूया, वाहिर भतरेसु पडिवेसघरगतं वूया, वाहिरेसु यहिद्धा णिवेसणंस त्ति यूया, । याहिरयाहिरेसु वहिद्धा णगरस्स बूया । तत्थ पहिं था णिवेसणस्स त्ति पुयाधारिते अभंतरे णगरे -पुव्याधारिते अभं- तरेसु णगरगयं चूया, अभंतरमंतरेमु पडिवेसघरगतं वूया, अभंतरवाहिरेसु याहिरियागतं धूया, बाहिरेसुआरामगतं वूया, वाहिरवाहिरेसु अरणगतं घूया । पुरथिमेसु गत्तेसु पुरथिमायं दिसायं चूया। दक्सिणपुरस्थिमेसु दक्षिणपुरस्थि. मायं दिसायं वि वूया । दक्षिणेसु दक्सिणायं दिसायं ति बूया । दक्मिणपच्छिमेसु दक्षिणपच्छिमायं, दिसायं ति । पच्छिमेसु गत्तेसु पच्छिमायं दिसायं ति यूया । उत्तरपच्छिमेसु गतेसु उत्तरपच्छिमायं दिसायं ति यूया । 10 उत्तरेमु गत्तेमु उत्तरायं दिसायं ति चूया । उत्तरपुरस्थिमेसु गत्तेसु उत्तरपुरस्थिमायं दिसायं ति बूया । तत्य उद्धेसु मालगतं वा रक्सगतं वा पचतगतं वा आरुभितकं वा घूया । अधोभागेसु कूवगतं वा यावीगत या सलागग या पयाणगतं या पदीगतं या भूमीगतं या भूमीघरगतं वा पिण्णे या णिधितं चूया । सत्य अजीवपंगति अणेकाकारा भवति थाणेण वाणिधाणेण वा। सा तिविधा उवलद्धा-पाणजोणीगता मूलजोणीगता धातुजोगीगता वेति । तत्य चलामासेसु पाणजोणी विण्णेया सव्यपाणपडिरूवगते य । केस-मंसु-नह- 15 लोमगते मूलजोणी विष्णेया सव्यमूलपडिरुयगते चेय । दढामासेसु सव्वधातुपडिरूवगते चेव धातुजोणी विण्णेया । सा दुविधा विष्णेया-संसता असंसता चेव । तत्थ संसते संसता विण्णेया । असंसते असंखता । सा पुणरवि दुविधा विण्णेया-अग्गेया अणग्गेय ति । तत्य अग्गेयेसु अग्गेया विण्णेया । [अणग्गेयेसु अणग्गेया विण्णेया । ] सा पुणरवि दुविधा विष्णेया--आहारे उवकरणे चेय । तत्थ आहारेसु आहारो विण्णेयो । सबभोयणपडिरूवगते चेय णीहारेसु उपकरणं विष्णेयं सव्यउवक्सरगतं चेव । वत्य पाणजोणीए आहारे दुद्धं दधि तकं णवणीत फूचियं आमधितं 20 गुलदधि रसालादहि राजा मथु परमणं दधितायो तक्कोदणो अतिकूरको मंसं रुधिरं यसा वेति । अवसेसाणि पुँब्युदिद्वाणि असंसताणि, दुद्धं दधिं चेति असंसवाणि । तत्य गिद्धेसु पाणीयं, गिद्धसाधारणेसु परमण्णं, अणि सु दधितायो तहोदगो वा विष्णेयो । अलुक्खेसु अतिकूरको मंसं ति विष्णेयं । लुक्खेसु यारं विष्णेयं एवमादी । इति पाणजोणीगते आहारो विष्णेयो भवति । सत्य मूलजोणीगते आहारे साली वीही कोहया कंगू रालका यरका जय-गोधूमा मासा मुग्गा अलसंदका 25 पणका गिफाया पुलत्या पणविकाओ मसूरा तिला अतसीओ कुमुंभा सामाका वेति । तत्य आहारेसु अंतेसु धण्ण- गतमेर गहुँ पूया । जधुत्ताहिं पुव्योपलद्धीहिं अणूमु संसतेमु मूलजोणीय आहारं गहुँ घूया । जधुत्ताहि भोयणपडले आधारोपसद्धीदि वत्य सेते साली वीही सेततिला पुमुंभा सेतसासया चेति विष्णेया। सामेमु अदसी विष्णेया। तयेसु फोरया गोधमा यनिष्फाया तिला फुलत्या या रायसासपा विण्णेया । नत्य सव्यण्णगनं तिविधं-तणगत गुम्मगतं वल्लिगतं ति। तत्य तणगतं साली वीही कोहया फंगू रालका सामाका 10 वगफलं पति विष्णेयाणि मति । तत्य गुम्मगते अदसी तिला सासया चेति विण्णेयाणि । तत्य यल्लीगते मुग्गा मासा पगमा परविकाओ थलसँदै पा निःफाया फुलत्या वेति विण्णेया भयंति । इति आहाररावं गहँ ति यूया । वत्य उयगिद्धेमु पुसणगत विण्णेयं मास-मुग्ग-अलसंदका-यणविकातं भवति । तत्य कोलयो कंयलिको माफरमो यूगिकारालो दुद्ध दहि वर्श अथिलं ति विष्णेया उपसेका । सत्य सेतेमु मधुरेसु असंसयेमु य दुद्धं विष्णेया। १परिधान पार...एवढे ॥२पमाति १.४.विना ॥ ३सचिहान्तर्गतः पाठःहै.त. एव पते ॥ ४ पुष्यदिहा ..॥ ५ फालत. ६सारफसो..॥ ७°का दुवं ..विना ॥ ८ उपसिको - है..मिना २२३ अट्ठवण्णासइमो चिंतितज्झाओ [अट्टवण्णासइमोचिंतितज्झाओ] णमो भगवतो जसवतो महापुरिसस्स बद्धमाणस्स । अधापुण्यं सलु भो ! महापुरिसदिण्णाए अंगविजाए चिंति- तं णामाज्झातो। तं खलु भो ! तमणुवक्खायिस्सामि । तं जधा-तत्थ चिंतितमचिंतितं ति पुव्यमाधारयितव्यं भवति । तत्थ परित्ता-ऽणंतप्पमाणोपदेसा अणंतमपारगमसंजुत्तं चिंतितमुदाहरिस्सामि । तत्थ अभंतरामासे व दंढामासे- णिद्धामासे सुद्धामासे पुण्णामधेजामासे सव्यआहारगते एक्कग्गणयण-माणसे सुप्पणिहितिंदिय-अवस्थितसरीरमणोपया-5 रगते चेव चिंतितं ति चूया । तत्थ वज्झामासे कण्हामासे क्रिलिट्ठामासे णपुंसकामासे सव्यणीहारगते अणेकरगणयण- माणसे उचावय-चल-इंगितागार-अणवत्थितसरीरमणोपयारे ण चिंतितं ति बूया । तत्थ दुविधा चिंता पवत्तति संगहतो तिविधा-जीवचिंता अजीवचिंता तदुभयचिंत चि । जीवचिंता दुविधा- संसारसमावण्णजीवचिंता य असंसारसमावण्णजीयचिंता य । तत्थ सव्यजीगते सव्यजीयआमासगते जीवणाम- सह-रूपपादुभावे चलामासेसु य जीवं चिंतितं घूया । तत्थ चिंतिते पुत्वाधारिते सव्वअजीवगते अजीवआमासेसु 10 अजीवणामसद-रुवपादुभावेसु अजीवं चिंतितं चूया । एतेसु चेव यामिस्सेसु आमास-सद्दपादुभावेसु जीवा-ऽजीव- समायुत्तं चिंतितं वूया। तत्थ जीवचिंतायं जीवचिंतं दुविधमाधारये-संसारसमायण्णजीवचिंता चेव असंसारसमावण्णजीवचिंता चेय । तत्थ उत्तमेसु उम्मजितेसु सव्ययंध-मोक्खेसु सम्बनिग्गमेसु सध्यमुय(त्त-)सिद्ध-अंतगड-तिण्ण-मुद्धपादुम्भावसु चेव असं- सारसमावण्णं जीवं चिंतितं ति घूया । तत्थ सव्यआहारेसु सव्यवंधेसु सव्यसंजोगेसु सव्यकामभोगेसु सव्यकामभोग- 15 सद्दपादुद्भावेसु जायणविवद्धि-पडिभोगकम्म-चे?-आवाह-विवाह-चोलोपणयण-तिधि-उस्सय-समाय-जण्णएयमादियलोइ. यसब-रूयपादुभावेसु संसारसमावण्णं जीवं चिंतितं ति वूया । तत्थ संसारसमावण्णजीयचिंतं चउव्यिधमाधारयितव्यं भवति-दिव्यं माणुस तिरिक्सजोणिगतं गैरइयसंसारसमावण्णजीयं चिंतितं चेति । तत्य सव्येसु उर्दुभागेसु एवं याकरणे वंदिते पूयिते संथुते अभुस्थिते उलोगिते पादुकोपाहणामुंचणे छत्त-पडागा- वासण-कडग-लोमहत्य-वीयणि-चामरपाहाणगते सैव्यदेवगते हा सव्वदेवायतणगते सेसाय गहणे उत्सय-समाय- 20 अभुदय-उदु-पव्य-देवपादुब्भावे देवणामकम्मोपचारसद्द-रूयपादुद्भावे चेव देवं चिंतितं धूया । तत्थ सब्यसकुणगते सुवणं चिंतितं यूया सुवणित्थि या । यीणामेसु उटुंभागेसु य घणगते ववहारगते य वेस्समणं चिंतिवं घूया । दंतेमु वेष्टुं चिंतितं वूया । सव्वजोधपहिरूवगते य गो-महिस-अय-एलएसु रुदेसु सिवं चिंतितं चूया । सउणगते यालेयेसु कुमारोयकरणे चेर तस्सद्द-रूवपादुन्भावे चेय संदं चिंतितं यूया । तरुणफच्छाएकगए असिपटिहवे य विसाई चिंतितं ति वूया । तत्थ पुण्णामेसु देवेमु बंभा बलदेवो वामुदेवो पन्नुण्यो वेस्समणो संदो विसाहो पव्यतो णागो मुयण्गो 25 एवमादीया उबलद्धव्या भवंति । धीणामेमु णदी अलगा अंजा अइराणी माउया सरणी एकाणंसा सिरी बुद्धी मेधा फित्ती सरस्सती एवमादीयाओ उपलव्यामो भवंति । तत्य उण्हेसु अगि चिंतितं घूया अग्गिपरं या । गिद्धेमु गागं गागघरं या, यीणामेमु गिद्धेमु णागि चिंतितं चूया । दारणेमु रकमसं, थीगामेमु दारणेमु रस्ममि चिवित बूया । विगतभयं कंदप्प-भय-हस्सेमु [अमुरं, धीगामेमु] अमुरकण्या चिंतितं यूया । मन्यगंधव्यगते तंतीमरगते तलतालयोसेमु य गंधव्यं चिंतितं ति यूया, धीगामेमु गंपञ्ची - यूंया » । मधुरपोसेमु परिसमु किंपुरिमं यूया, यीगा-30 मेमु किंपुरिमाणं यूया । मुयीमु पुण्गामेमु य जक्सो, धीगामेमु य [जसी यूया । ... ममोगरगामि- ११ एतषियन्तर्गतः पाठः है. त• नासि ॥ २ प्ययुतसिद्ध है. त• विना ।। ३°काममहमोगपादु • त.॥ ४ यण्णाजपण ... रिना । ५हमचिनान्तर्गतः पाठः त. एर पावे ॥ ६सजा १..। अनास पु.नि.॥ ७मिचाई... ८-९-- एनरिहान्तर्गतः पाहत. माथि ।
२२२ । अंगविजापदण्णय घडभायणगतं चूया । कसेसु खड्डभायणगतं [ बूया ] । पुधूसु पेलितागतं वूया । आसन्नेसु पेलिकागतं या करंडगगतं या बूया । चतुरस्सेसु सयणा-ऽऽसणगतं बूया । उभागेसु मालगतं धूया । अक्खिसु वातपाणगतं वूया चम्मकोसगतं वा बूया। णिडाले कुडगतं बूया । कण्णछिद्देसु विलगतं यूया । णासायं णालीगतं वूया । गीवाय थंभगतं धूया | भमुहासु अंतरियागतं वूया । गंडेसु पसंतरियागतं बूया । थणंतरेसु कोट्ठागारगतं घूया । उदरे भत्तघरगतं धूया । हियए 5 वासघरगतं घूया । तंवेसु अरस्सगतं घूया । पसण्णेसु पडिकम्मघरगतं घूया । गहणोवगहणेसु असोयवणियागतं धूया । 'पोरिसे आवुपधगतं पणालीगतं वा यूया। णामीयं उदकचारगतं वूया । अवाणे वचाडकगतं धूया। उबहुतेसु अरि- हगहणगतं घूया । सामेसु चित्तगिहगतं [वूया ] । सुकेसु सिरिघरगतं यूया । कण्हेसु अग्निहोत्तगतं धूया । गिद्धेसु पहाणघरगतं यूया। उत्तमेसु पुस्सघरगतं यूया । जैहण्णेसु दासिघरगयं धूया । छा इति वेसणगतं णटं ति वूया। तत्थ णगरे पुव्याधारिते मत्थए अतेपुरगत घूया । णिडाले अंतेपुरगतं घूया । णासायं भुमंतरे वा तिए धूया । 10 पोरिसे सिंघाडगगतं वूया । उरे पादतल-करतलेसु वा चउक्कातं धूया । दीहेसु रायपधगतं बूया । जुत्तप्पमाणदीहेसु महारच्छागतं धूया । किंचिदीहेसु उस्साहियागतं घूया । उद्धंभागेसु पासादगतं वा गोपुरगतं या अट्टालगगतं या पकंठागतं वा घूया । तत्थ अभंतरेसु पासादगतं बूया । मुदितेसु तोरणगतं धूया। संखतेसु धण्णगतं बूया । णिग्ग- मातिगमेसु वारगतं चूया । दढेसु पव्यतगतं घूया । उबहुतेसु वासुरुलगतं धूया । मतेसु थूभगतं वा एलयगतं वा धूया, मुदितसाधारथूभगतं वा यूया । दीहेसु पणालीगतं वूया । अधोपभागेसु पयातगतं या वप्पगतं था तलाकगतं 15 या दहफलिहागतं या णदीगतं वा धूया । तत्थ दीहेसु णिण्णेसु गदीगतं वा फलिहागतं वा घूया । णिद्धेसु णदीगतं धूया । संखतेसु फलिहागतं बूया । चतुरस्सेसु वाहिगतं बूया । चंदाणतेसु तलागगतं यूया । उस्सितेसु अट्टालगतं धूया । दीहेसु परिक्खेवेसु मंडलेसु य पाकारगतं घूया । थलेसु वयगतं धूया । णिण्णेसु परिखागतं बूया । तत्थ बज्झगतो णगरस्स त्ति पुन्वाधारिते उटुंभागेसु धयगतं वा । तोरणगतं वा » देयागारगतं वा (खगत वा पव्यतगतं या मालगतं वा थंभगतं वा एलुगगतं वा पालीगतं या बूया । तत्थ मुदितेसु तोरणगतं बूया । उत्तमेसु 20 देवागारगतं यूया । मूलजोणीगतेसु रुक्खगतं वूया । वट्टेसु तलागगतं बूया । तणूसु साधारणेसु चउक्केसु य पप्पगतं घूया। उपग्गहणेसु आरामगतं चूया । आगासेसु आगसणिधितं ति यूया । मतेसु उवहुतेसु य सुसाणे णिधितं धूया । तुच्छेसु सुक्करुक्खगतं वा सुंकतलागगतं या बूया । घायव्वेसु बच्चभूमीयं णिधितं ति चूया, मंडलभूमीगतं वा यूया, जतो वाओ वायति तम्मि देसे निधितं ति बूया । आपुणेयेसु पवा-उदुपाणं वा णदी-तलागं वा बूया । अग्गेयेसु दृढयणं वा उठ्ठियपट्टगं वा धूया, जतो या आदियो तम्मि देसे णिधितं ति यूया। जण्णेयेसु जण्णवाडगतं घा देवाय- 25 तणगतं वा बूया, जतो वो तुसरिदो (तुरियसदो) सम्मि देसे णिधितं ति बूया । तिक्खेसु संगामभूमीयं वा णिधितं ति बूया, जतो वा बाधितो तम्मि देसे णिधितं ति बूया । सद्देयेसु सुतप्पयत्तिकं गडं ति घूया । दसणीयेसु दिहचेहें ति चूया ॥ ॥ इति खलु भो ! महापुरिसदिण्णाए अंगविजाए णट्ठकोसयो णामझातो सत्तावण्णो वक्खातो भवति ।। ५७ ॥ छ । १पारिसेजादुपवगचं ई. त• ॥२ आवणे वधाहक है. त० । चाणे घाघाडफ से ३ पु. सि. ॥३ स्सघर' है.त.॥ ४ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः १० तएव वर्तते ॥ ५भुमुचरे है. त०॥ ६°सुसुपण्ण' है. त०॥ ७- एतचिहान्तर्गत पर्द है. त• नास्ति ॥ ८ तुस है. त.। ९ सुमपलगगतं है. त• विना ॥ १० पा जो या है• त. बिना ॥ ११ उहितपहगतं या ई. त• विना ॥ १२ या पुरिसहो ह. त• विना ॥ १३ सतह. त.विना।
२२५ - अट्टवण्णासइमो चिंतितज्झाओ चिंतियं ति बूया । दक्खिणेसु पुण्णामेसु पुरिससमण्गयं पुरिसमेव चिंतितं ति बूया । पुरिसणामा पुरिसणामेसु पयत्तेसु उद्धंभागेसु पितरं चिंतितं घूया । पुरिसणामा पुरिसणामेसु पयत्तेसु समभागेसु भायरं घूया । पुरिसणामा पुरिसणामेसु पवत्तेसु अधोभागेसु पुत्तं धूया । पुरिसणामा धीगामेसु पयत्तेसु उद्धंभागेसु मातरं धूया । पुरिसणामा धीगामेसु पयचेसु समभागेसु भगिणि बूया । पुरिसणामा थीणामेसु पयत्तेसु उद्धंभागेसु दुहितरं यूया । थीगामा थीगामेसु पयत्तेसु उद्धंभागेसु 'थीमातरं घूया । थीसमभागेसु थिया भगिणिं चिंतितं चूया । यीणामा धीणामेसु पवत्तेसु अधोभागेसु । थिया दुहितरं चूया 1 थीणामा पुण्णामेसु पयत्तेसु अधोभागेसु जायामातरं वूया । थीणामेसु पुण्यामेसु पयत्तेसु समभागेसु भगिणिपति वूया। थीणामा पुण्णामेसु पयत्तेसु र अधोभागेसु » उद्धगीवाय ससुरं वूया । थीसंसिद्धेसु पुगो पुणो संलि चूया । थीसंसिद्धेसु पुण्णामेसु संलि यूया । अभंतरेसु अभंतरं बंधवं यूया । बाहिरभंतरेसु मित्तं वूया । बाहिर- वाहिरेसु जणं धूया । तत्थ मणुरसजोणीवण्णविसेसेहिं धी-पुरिस-णपुंसकादेसेहिं अन्न-पेस्सोवलद्धीहिं संठाण-यण्ण- वयप्पमाणेहिं सम्मण्णय-संवद्धगवेसणाहिं गुरुजोणि-तुल्लजोणी-पचंवरजोणीहिं उपलद्धीहिं यज्झ-ऽन्भंतरपवियएहिं 10 एव जधुत्ताहिं आमास-सह-रूवपादुभावोपलद्धीहि य गट्ठकोसए उवदिहतेहिं उवलद्धिविचारविसेसेहिं माणुसजोणी समणुगंतव्या भवति । इति मणुरसजोणी वक्खावा भवति । तत्य तिरियामासे तिरियविलोइते तिरियगते सव्यतिरिक्खजोणीमते उपकरणे तिरिक्सजोणिउवकरणे तिरिक्स- जोणीसद्दगते तिरिक्खजोगीणामोदीरणे तिरिक्खजोणीमए उवकरणे धी-पुरिससद्द-रूवपादुभावे एवंविचे सह-रूवपादु- भावे तिरिक्खजोणि चूया । तत्य तिरिक्सजोणि संगहेण दुविधा-तसगता थावरगता चे । तत्थ तसोलद्धीय तस- 10 गता विष्णेया । थावरोवलद्धीय थावरा विण्णेया । सा वित्यरतो छविधा आधारयितव्या भवति । तं जधा-पक्सिगता १ चतुप्पदगता २ परिसप्पगता ३ उदकचरगता ४ कीड-पयंगक-किविल्लकगता चेव ५ एकिंदियथायरकायगता ६ चेति । सत्य उद्धंगीवाय सिरोमुहामासे उल्लोइते उद्धंभागेसु सव्यसगुणगते सव्यसउणमते उपकरणे सव्यसउगोवफरणे सउगोप- फरणे सउणसहगते सणणामधेजोदीरणेसु सउणणामधेजे थी-पुरिससद-दव्योवकरणपादुम्माये एवंविधै पेक्सितामासे सद्द-रूयपादुभावेसु पक्खी विष्णेया । ते दुविधा आधारयितव्या-थलयरा जलयरा चेति, अधया जलना थलना 20 चेति । तत्य आपुणेयेसु मिण्णेसु य जलजा पक्खि विण्णेया चिंतितं ति यूया । लुक्खेमु थलेसु थलजेसु य थलजा पक्खी चिंतिय ति घूया । तत्य सेतेसु हंसा सेडिका य पिण्णेया । पेण्हर्स चका-चकमाकयीएमु य विष्णेया । चित्तेमु आही देटियालको गचूहका नदीसुत्तका कारंडया य विण्णेया । कालेसु फाकमजुका कावा जदीकुडीको विष्णेया । आरुणेसु उफोसा कोंचा गीवा रोहिणिका समुद्दकाफ त्ति विण्णेया। फरुसेसु यक-इंस-चाराका पिण्णेया। अयसेसा जलजा सगुगो पडिरूयाहारओ य विण्गेया । मंसरुधिरभोयीसु मंसरधिरभोयी चिंतित त्ति । मुद्धं चूलेमु 23 फातंया रोहिणिका बलाक ति विष्णेया। घीणामेसु सेडिका रोहिणिका णदीकुकुहिका आढाओ टिट्टिमी पो ति विण्णेया। तत्य कायतेसु कुररा पारिप्पया उफोसा रोहिणिका वेति विण्णेया । मन्झिमकायेमु हंसा पपनाका विण्णेया । मन्झिमागंतरफायेसु आहा सेडिका गदीफुकुडिकाओ फारंडया चेति पिण्णेया । पचंपरफाये, टेहिपालको गएका णदीपुत्तका एबमादयो विण्णेया। अणुलोम-पहिलोमेमु गतेसु उदमागेमु अधोमागेमु य उद्धरायिमु उद्धरायी विण्गेया। सेतेमु सेता, एवमादीहिं यण्गेहिं सुवण्णा विण्णेया । तत्य असतेमु सव्येमु अतिमासेमु या आसीविसा विण्गेया । 30 विण्हेसु तिणविसा विण्णेया । विपशायत्तितेमु निदुसाधारणेसु मंदविसा पिण्णेया । यापण्गेमु अविसा चिंतेसि चि पूया । ते दुविधा-संसरधिरभोजी अमंसरुधिरभोजी र । इति जलजा परियगो जलपर ति विण्गेया । १ सु महोभा' है. स. ॥ २ थीनामयरं पू. १०॥ ३ दीहिं ययण • • ॥ ४°णीगने •ि ॥ ५पंहमु सं ३० । पंडरेसु नि. ॥ ६°सु यमयापी पीनेसु य है. त• दिना ॥ ७ अदात• पिना॥ ८ रा रेटिया... ९हसािन्तर्गतः पाटा.त. पति॥१०'मु देहिया ..पिना ॥११ मतिसामेमु.. ॥१२तिपदेपु पा..॥ मंग०२९ - । २२४ ... अंगविजापइण्णायं...: रामेसु देवं वैमाणितं चिंतितं वूया । यीणामासु अच्छरसाओ, मूलजोणीगतेसु अजोपगते वेति अनाधिउत्यं व चिंतिवं वूया, थीणामेसु देवीसु वुक्खाधिउत्था चिंतिवं ति चूया । धातुजोणीगए पच्यतदेवतं चिंतितं ति बूया, थीणामेसु गिरिकुमारि धूया । णि सु परिक्खेवेमु य समुई चा समुद्दकुमारं चा चिंतितं वूया, थीणामेसु समुद्दकुमारि वूया महापकासेमु पुघूमु परिक्सेवेसु य दीयकुमारं चिंतिवं घूया, थीणामेसु दीयकुमारि चिंतितं वूया । चतुष्पदगते घग्य- 6 सीह-हत्थि-यसभपडिमाधिउत्यं चिंतितं बूया । दीहेसु उवणि सु य गागं चिंतितं घूया । मुद्धणि यंभ चिंतितं । उद्धं- मागेमु धणगते य वेसमणो । सप्पभेसु चंदा-ऽऽदिचा गह-णक्खत्त-तारागणे चिंतिते वूया IEF थैलेसु मारुतं चिंतियं यूया । हा श्रीणामेसु पातकण्णाओ चिंतिताओ घूया । मतेसु जमं धूया । आपुणेयेसु उद्धंभागेसु सुकयण्णपडिरूयगते य यरुणं चिंतितं यूया । सोम्मेसु सब्यसोम्मगते य सव्यसोम्मपादुमावेसु चेय सोमं चिंतितं चूया । इस्सरेमु इंदं वूया । पुधूसु पुर्वि यूया । विवेक्खितेसु दिसाकुमारीओ वूया, दिसाओ वा धूया । इहेसु सिरिं चिंतितं 10 घूया। बुद्धीरमणेसु मेधं बुद्धिं सत्थंधिवुत्याओ चिंतिताओ वूया। विमुत्तेसु णिप्परिग्गहेसु य मोक्सं विज्ञासत्याहियुच्छाओ चिंतिताओ वूया । अन्मंतरेसु कुलदेवताओ यूया। दढेसु वत्थुदेवताणि चिंतियाणि बूया । दुग्गंधेसु बञ्चदेवताणि वूया । मतेमु सुसाणदेवताणि चूया । पच्छिमेसु पितुदेवताणि बूया । माणुसदिव्यसाधारणेसु विजाघरे विज्ञासिद्धे वा चारणे चिंतिते वूया । धीगामेसु दिव्वसाधारणेसु माणुसेसु विज्ञाघरीओ चिंतिताओ घूया । बुद्धिरमणेसु दिव्वसाधारणेसु. सव्यविनादेवताओ वूया । धीणामेसु विनादेवताओ बूया । पुण्णामेसु देवविनाहिवुत्थे चिंतिते बूया । 'दिव्वेसु 15 सुरेसु य महरिसयो यूया । एवमादीदेवताहिं जघुचाहिं देवताझाये उवलद्धीहिं देवताणामेहिं देवसंठाणेहिं देवआम-- रण-पहरण-कम्मोरयारपादुभावेहिं आमास-सह-रूपपादुभावेहिं जधा देववाझाये उयदिदं तथा णातव्यं भवति । इति देवतागता चिंता यक्साता भवति । तत्थ उजुकामासे एजुकविलोइते उपेक्सिते उजुभावगते सव्यर्माणुरसगते णाम-सह-रूप-उबकरणपादुष्भावे य मणुस्सजोगीगतं चिंतितं बूया । तत्य मणुस्सेमु पुत्र्याधारितेसु मणुस्सेसु विविधमाधारये-थिओ पुरिसे गपुंसके ति । तत्य 20 थीगामेमु थिओ चिंतियाओ त्ति यूया । पुण्णामेसु पुरिसे चिंतिते बूया । णपुंसकेसु णपुंसके चिंतिते वूया । तत्य पापुं- सके पुत्र्याधारिते ीणामेसु इस्सापंडका विष्णेया । पुण्णामेसु आसेका विष्णेया। नपुंसकेसु अञ्चतोपहता आदिपं. इका विष्णेया । चामदक्सिणेसु पक्सापक्सिणो विष्णेया । तुच्छेसु अणुप्पवी विण्णेया चिंतिता भवति । इति णपुं- सकलोणी यक्साता भवति । तत्य थी-पुरिस-पपुंसकोपलद्धीयं उचलद्धाय मणो सत्तिओ वेस्सो मुद्दो त्ति । तत्य सिरो. मुद्दामासे यमणो, धासु सत्तिओ, पट्टोदरे वेस्सो, पाद-जंघेसु सुद्दो उवलद्धव्या भवंति । तत्य यये पुव्याधारिते 25 पाजंघे यालो, पहोदरे वएगो, बाहूमु अंतरंसे य मझिमययो, सिरोमुद्दामासे महव्ययो चिंतिते ति महव्यय-मझि- मयय-यालेयसाधारणोपलद्धी वा यया उपलद्धा मांति । वत्य पणे पुत्र्याधारित अवदातेमु अवदातं थी-पुरिस-णपुं- सकं यूया, सामेमु सामं घूया, कण्हेसु कण्डं घूया । अजो पेस्सो त्ति पुन्यमाधारिते तत्य उद्धं णामीयं अन्नप्पाणं चिंतिवं ति यूया । अधो णामीयं उद्धं जाणूणं अव्यत्तं पेस्सं यूया। पादजंघेमु पेस्समेन यूया। पादेमु अपत्य पेरस- पेरमं दासं चिंतितं पूया । वत्य अन्ने पाणे पुत्र्याधारिते पुणरवि 4 गुरुजोणी तुलजोगी पश्चंवरजोणि चि विविध- 30 माधारयितव्यं भवति । तत्य उपरिहा गीयाय अभो भुमकाणं गुरुजोणि, अतो उद्धं गुरुगो गुरु चिंतितो त्ति घूया । अपत्या गीगाय उद्धं फडीय तुजोणीयं यूया । अपत्या कडीयं पश्चररजोगीयं अनपाणं वितितं वि धूया । सत्य ममण्णय-संयढे पुत्र्याधारिते यामेमु पुष्णामेमु थासमण्गयं पुरिसं चिंतिनं ति यूया । यीगणमेसु पुरिससमण्णय इल्यि १साविशन्तर्गत पाठहै.. एक वति ॥ 'मारि चिंतितं यू त• विना ॥ ३ इसचिहान्तर्गतः पाठः ह..एक पते ॥ ४ सोमेसु • • ॥ ५दित्तेस सूरमुह. स० विना ॥ ६°मणुस्सगते है. त• ॥ ७°लद्धय्यायं . त विना ।। ८'प्यायति। तस्य है..॥ ९ अर्थत है..॥ १०॥ एतविहान्तर्गवः पाठः है.व. नास्ति॥ ११ रथा गीपाप की..
अट्टयण्णासइमो चिंतितज्झाओ २२५ चिंतियं ति वूया । दक्खिणेसु पुण्णामेसु पुरिससमण्णय पुरिसमेव चिंतितं ति बूया । पुरिसणामा पुरिसणामेसु पयत्तेसु उद्धंभागेसु पितरं चिंतितं वूया । पुरिसणामा पुरिसणामेसु पवत्तेसु समभागेसु भायरं चूया । पुरिसणामा पुरिसणामेसु पवत्तेसु अधोभागेसु पुत्तं चूया । पुरिसणामा थीणामेसु पयत्तेसु उद्धंभागेसु मातरं घूया । पुरिसणामा थीगामेसु पयत्तेसु समभागेमु भगिणि वूया । पुरिसणामा थीणामेसु पवत्तेसु उद्धंभागेसु दुहितरं वूया । थीगामा धीगामेसु पवत्तेसु उद्धंभागेस थीमातरं बूया । थीसमभागेसु थिया भगिणिं चिंतितं वूया ! यीणामा थीणामेसु पवत्तेसु अधोभागेसुरू थिया दुहितरं यूया। थीणामा पुण्णामेसु पयत्तेसु अधोभागेसु जायामातरं घूया। धीमेसु पुण्यामेसु पयत्तेसु समभागेसु भगिणिपतिं घूया । थीणामा पुण्णामेसु पयत्तेसु र अधोभागेसु » उद्धंगीयाय ससुर वूया । थीसंसिद्धेसु पुगो पुणो संलि बूया । थीसंसिद्धेसु पुण्णामेसु संलि घूया । अभंतरेसु अभंतरं बंधवं वूया । वाहिरन्भतरेसु मित्तं घूया । बाहिर- वाहिरेसु जणं धूया । तत्य मणुरसजोणीवण्णविसेसेहिं थी-पुरिस-णपुंसकादेसेहिं अज-पेस्सोवलद्धीहिं संठाण-वण्ण- वयप्पमाणेहिं सम्मण्णय-संवद्धगवेसणाहिं गुरुजोगि-तुल्लजोणी-पञ्चंवरजोणीहिं उचलद्धीहिं वन्झ-ऽन्भंतरपवियएहिं 10 एव जघुचाहिँ आमास-सद-रूपपादुब्भायोपलद्धीहि य णहकोसए उबदिटुंतेहिं उपलद्विविचारविसेसेहिं माणुसजोणी समणुगंतव्या भवति । इति मणुस्सजोणी वक्खाता भवति । तत्य तिरियामासे तिरियविलोइते तिरियगते सव्यतिरिक्सजोणीमते उवकरणे तिरिक्पजोणिउवकरणे तिरिक्स- जोणीसगते तिरिक्खजोणीणामोदीरणे तिरिक्खजोणीमए उवकरणे थी-पुरिससद्द-रूयपादुभावे एवंविचे सद-रूवपादु- म्भावे तिरिक्खजोणिं बूया । तत्थ तिरिक्सजोणि संगहेण दुविधा-तसगता थावरगता चेव । तत्य वसोरलद्धीय वस- 15 गता विष्णेया। थावरोवलद्धीय थावरा विण्णेया। सा वित्थरतो छविधा आधारयितव्या भवति । तं जधा-परिखगता १ चतुष्पदगता २ परिसप्पगता ३ उदकचरगता ४ कीड-पयंगक-क्रिवितरगता चेव ५ एकिंदियथायरकायगता ६ चेति । तत्य उद्धंगीवाय सिरोमुद्दामासे उल्लोइते उद्धंभागेसु सव्यसगुणगते सव्यसउणमते उपकरणे सव्यसउगोवकरणे सउगोप- करणे सउणसद्दगते सउणणामधेजोदीरणेसु सउणणामवेजे थी-पुरिससद-दव्योवकरणपादुमावे एवंविधे पेक्सितामासे सद्द-रूवपादुभावेसु पक्खी विण्णेया । ते दुविधा आधारयितव्या-घलयरा जलयरा चेति, अधरा जलजा थलजा 20 चेति । तत्य आपुणेयेसु गिण्णेसु य जलजा पक्सि विण्णेया चिंतितं ति घूया । लुक्सेमु थलेमु थलजेमु य यलजा परखी चिंतिय त्ति घूया । तत्थ सेतेसु हंसा सेडिका य विण्णेया । पैडूर्मु चयापा-चकापाकयीएमु य विण्गेया । चितेमु आडी देटियालको णवूहफा गदीमुत्तका कारंडया य पिण्णेया । कालेसु काफमनुका काया णदीकुकुडीको यिण्गेया। आरणेसु उफोसा कोंचा गीया रोहिगिका समुद्दकाफ त्ति विण्णेया। 17 फेरुसेमु पक-इंस-चशयाका विण्गेया । अवसेसा जलजा सगुगो पहिरूबआहारओ य विण्गेया । मंसरुविरमोयीसु मंसरविरभोयी चिंतित त्ति । मुद्धं पूलेमु 23 कार्तया रोहिणिका बलाक ति विष्णेया। धीगामेसु सेडिका रोहिणिका गदीशुहिका आटाओ टिट्टिमी ति विण्णेया । तत्य फाययंतेसु फुररा पारिप्पया उकोसा रोहिणिका वेति विण्णेया । मन्झिमकायेमु हंसा घपलामा विण्गेया । मझिमाणतरफायेमु आटा सेडिका गीष्टिकाओ कारंडया चेति विण्गेया । पचंचरफाये, टैटियालको गवूइका पादीपुत्तका एवमादयो विण्णेया । अणुलोम-पहिलोमेमु गत्तेमु उद्धंमागेमु अधोमागेमु य उद्धरायिमु उद्धरायी विण्या। सेतेमु सेता, एवमादीहिं धण्णेहिं मुरण्णा पिण्णेया । वत्य अक्सते सव्येमु अतिमामेसु या आसीविसा विश्गेया । 30 विहेमु तिण्इपिसा विष्णेया । विपयायत्तितेमु मिदुसाधारणेमु मंदविता विग्गेया । यापण्गेमु अविसा पिवेसि ति यूया । ते दुविधा-मंसरधिरमोजी अमंसरधिरभोजी घेर । इवि जलता पम्पिगो जलपर ति विण्गेया । १°सु मदोमा' है. ॥ २ धीनामपरं १• त• ॥ ३ 'सोहिं पण • • ॥ ४ नीगने १० ॥ ५पदर १. पंडरेसुति ॥ ६°मु चमयापी पीनेसु यरत पिना ॥ ७ भारत, बिना रिया..॥ ९सपिरान्तर्गतः पारस पते १० सु देहिया .. दिना ॥ ११ मतिसामेमु.१०॥ १२ तिपदेसुप"t..॥ - -- - मंग०९ २२६ अंगविजापइण्णय तत्य थलजा पक्खी तिविधा आधारयितव्या-म्मा रण्णा गम्मारण्णा चेति । तत्थ अभंतरामासे गामेसु चेव पादुन्भावेसु गम्मा विण्णेया । वाहिरामासेसु आरण्णेसु य पादुदभावेसु आरण्णा विण्णेया । बाहिरभंतरेसु गम्मारण्ण- पादुन्भायेसु चेय गम्मारण्णा पक्खी चिंतिय ति विण्णेया । थीणामेसु थीगामा, पुण्णामेसु पुण्णामा, पपुंसकेसु णपुंसका विण्णेया । सेतेसु सेता, रत्तेसुरत्ता, पीतेसु पीता, णीलेसु णीला, कण्हेसु कण्हा, आरुणेसु आरुणा, पंडुसु पंडू, कविलेसु 5 कविला, फरुसेसु फरसा, चित्तेसु चित्ता, जधाप(ब)ण्णपडिरुषतो वण्णे आधारिते पक्खिणो चिंतित त्ति बूया । काययंतेसु काययंता मयूरा कंका छिण्णालिंगाओ सुवण्णाओ चेति, एवमादीका कायतेसु चिंतित त्ति धूया । तत्थ मज्झिमका येसु गद्धा धीरला सेणा उल्का चेति एवमादयो विण्णेया। मज्झिमाणतरकायेसु सालका कपोता वायसा सुका कोकिला वित्तिरा चेर विष्णेया । पञ्चवरकायेसु यातिका तेल्लपातिका सगुणीका परसउणिका चम्मडिला एवमादी विण्णेया । एवं चतुविधकायो पडिरूयतो आमासेहिं य पिण्णेया। उँरसरगते पाणगतेसु य र सेव्यसउणा - विण्णेया। चित्तेसु तित्तिरा 10 चित्तकपोतका वणकुकुडा ह्यकाओ य विष्णेया । घोसवंतेसु घोसवंता विण्णेया । दारुणेसु मंसरुधिरभोयी विष्णेया । अणूसु धण्णभोयी विण्णेया । अघोसर्वतेसु अघोसयंता विण्णेया । मधुररुतेसु महुररुता । कटुकरुतेसु कडुकरुता विण्णेया । तधा अव्यत्तघोसेसु अव्बत्तघोसा चिंतितं ति विष्णेया। एवमादीहिं संठाण-वण्ण-थी-पुरिस-गपुंसकोपलद्धीहिं. आहार-घोस-पडिरूव-सद्दपादुभावेहिं जलया थलया य पक्खिणो आधारयित्ता आधारयित्ता जधुत्ताहिं उबलद्धीहिं आमास-सद्द-पडिरूयपादुब्भावेहिं उबलद्धना भवंति । इति पक्खिगतो जलय-थलयपक्खिसमायुत्ता दुविधा चिंता १७ वक्सावा जीवचिंता भवतीति । तस्थ चतुष्पदे घउरस्सेसु य चउप्पदमए उवकरणे चतुप्पदोरकरणे चतुष्पदसद्दगते चतुष्पदणामोदीरणे चतुष्पद- णामधेने थी-पुरिसउपकरणगते एविधपक्खित्तामासे सह-रस-रूवपादुभावे चतुष्पदं चिंतितं ति धूया । ते दुविधा आधारये-पजा जलचरा चेन, अधवा थलचरा जलचरा चेति । तत्थ सव्वआपुणेयेसु सचजलेसु जलचरेसु य जलचरा विण्णेया । तं जधा-संसुमारा उदफकच्छम त्ति मच्छगये विण्णेया भवंति । तत्थ पुणरवि चतुप्पदा आधारयितव्या 20 भांति-गम्मा अरण्णा गम्भारण्णा चेति । तत्य अभंतरेसु सव्यगम्म ५ गते चेव गम्मा - विण्णेया। याहिरामासेसु सब- भारण्यगतपादुभावेसु चे आरण्णा चतुष्पदा चिं त्ति यूया । अभितरघाहिरेसु गम्मारण्णेसु तस्सद्द-स्वपादुभावे य गम्मारण्णा विण्णेया । तत्य गो-महिस-अयेलकोट्ट-सर-सुणका चेव एवमादी गम्मा विण्णेया। सीह-बग्घ-तरच्छ-ऽच्छ- मल्ल-दीविरुनगेज-चमरीओ सग्गा चेति विष्णेया, एयमादयो आरण्णा विण्णेया । सत्य जे फेयि आरणगा भुत्ता गम्मा भयंति एते गम्मारणा भति । तत्थ हत्यी अस्सा वराहा वगा सियाला मुंगुसा णउला उंदुरी कालका पयला फातो- दूधा सरता घरघुला चेति एवमादयो गम्मारण्णा विण्णेया। तत्थ घउप्पदा पुणरयि दुविहा आहारयियया भवंति-घउ- पदा पेर परिसप्पा चेय । तत्थ घउप्पदगए सन्यउद्धंभागेसु सध्यपरिसप्पचउप्पदगते चेय परिसप्पचउम्पदा विष्णेया । अजगरं असालिका गोधा तोडुका सैरंता मुंगुसा णकुला पयलाका अहिणुका घडोपला "उंदुरा घेति । सत्य पुणरचि तिविधा चतुष्पदा आधारयितव्या-थलचरा चुम्सचरा मिलसाइ ति । तत्थ पस्थिएमु - थलेगु » घटपरेमु य थलचरा चिंतित ति यूया । उद्धंभागेमु मूललोणीगते र धुक्समरा पतुप्पदा चिंतित ति 50 यूया । सत्यधिदेसु अधोभागेमु य विलसायी पिण्णेया । तत्य युस्सचरा विराला उंदुरा सालका घरपूपला अहिणुग मोरा य पचलाका यति एयमादयो चिंतिता विण्णेया भाति । तत्य विलासया दुविधा-सेलपिलासया भूमिविलासया १ हिमालि • • पिना २ गुफा का फो° t• त.०३ चम्महि पय है. 6. पिना ॥ ४ उरपुर ३ पु• . उपर .. ५.एनधिहमनः पाठः १. त• नामि ॥ ६यहाशा.त.॥ ७ अहातर्थतयो । ८ अपंतपो...॥ ९ गय: (गयल) यम... दिना ॥ १० रा पापपला फागोहका सरंपा परत ११सरसामु.. १२ उपरा...॥ १-१४ नुस्चरा.स.॥ १५ पालकार...॥
२२७ - अट्टवण्णासइमो चिंतितज्झाओ चेव । तत्य दढेसु अधोभागेसु सेलविलासया विण्णेया। थूलेसु भूमिविलासया विण्णेया। तत्य सेलविलासया दीहवग्या अच्छभल्ला तरच्छा सालिभी सेधका दीपिका विलालु अजिणविलाला सलमा गोधा उंदुरा अयकरा वैति विण्णेया भवंति । तत्थ भूमिविलासयेमु लोपका णउला गोधा अहिणूका तोड्डका ताडका चेति एवमादयो विष्णेया। माणुसतिरि- क्खजोणीसाधारणेसु वाणरा णरसीहा अस्सपूतणा वेति विण्णेया । तत्य वायुमु चलेसु साहागते अणवत्थियसभावगते य वाणरा विण्णेया । सारवंतेसु सूरेसु य णरसीहा । दारुणेसु विणादेमु य अस्सपूतणा विण्णेया । असमूलकाययंतेसु । असालिका र अयकरा - हत्यिणो एयमादयो चिंतिता विण्णेया । मन्झिमकायेसु सीह-यग्य-अच्छमस-तर- च्छ-णीलमिग-गयगोकण्णा गो-महिस-सरोहा य एवमादयो विण्णेया । मज्झिमाणतरकायेसु दीपिका-तरच्छ-कोच-यग-मग- अयेलकमिति एवमादयो विण्णेया भवति । पञ्चवरकायेसु सुणग-सिगाल-मजार-सस-मंगुस-उलएचमादी चिंठिया विण्णेया । अणूसु उंदुरा सालका तोडेका अहिणूका वेति एवमादयो विण्णेया । गो-माहिस-सरोह-अस्सा हत्यि वेति वाहणेसु विण्णेया । तणादेहि तणादा, 7 मंसें-रुधिरमोयिसु सु मंसरुधिरभोयी विण्णेया । सेतेसु सेता, पीतेसु 10 पीता, रत्तेसु रत्ता, गीलेसु णीला, कण्हेसु कण्हा, पुंडेसु पुंडा, पडूहि पंडू, आरण्णेहिं आरण्णा, चित्तेहिं चित्ता, फरु- सेहिं फरसा, वणतो आधारित चिंतिता विण्णेया भवंति । पुण्यामेहिं पुण्णामा, थीगामेहिं धीगामा, पपुंसकेहिं णपुंसका, मिधुणचरेहिं मिधुणचरा, गगचरेहिं गगचरा विष्णेया, एकचरेहिं एकचरा चतुप्पदा पक्खी या । एवमादी पजएहिं आधारयित्ता आधारयित्ता सव्वमेव समणुगंतव्यं भवति । तत्य परिसप्पजोणी तिविहा-दव्यीकरा मंडलिणो रायिमंता चेति संगहेण आधारयितव्यं भवतीति। तत्य तिरिच्छा-16 णराइणो रत्तराइणो सेत-पीत-चित्त-सेवालका कण्हा अणजपुष्फयण्णगा पंचाणुरत्ता वेति वित्यारतो वामविसेसेहिं आधा- रयितव्या भवंति । तत्य आयतेसु वायव्वेसु य दव्वीकरा चिंतिता विण्णेया । मंडलेमु मंडलियो विण्णेया । तिरियामासे तिरियविलोगिते चेर तिरिच्छाणराइणो चिंतिता विण्णेया । अणुलोम-पडिलोमितेसु गत्तेसु उद्धंभागेमु य उद्धराइणो विष्णेया । सेवादीका वण्णसमायोगा य सवण्णपडिरूवेसु परिसप्पाण वयो आधारिते विण्णेया चिंतिता भवतीति । तत्य अक्सयेसु सब्बेसु अतिमासेसु वा आसीविसा घूया । तिण्हेसु तिण्हविसा विण्णेया। विण्हेमु पंचोयतियेसु मिदु-20 साधारणेसु यातंदविसा यूया । पण्णेसु णिन्यिसे घूया । ते दुविधा आधारयितव्या भवंति-थलजा जलना चेति । तत्य आपुणेयेसु जलजा विण्णेया । तत्य कद्दमग-हित्थिय-कच्छभक-आणायचरणिग-पदुमा भिगंगाग-यमारक-राजमहो- रक-जलचर-सवलाहिका कुकुडा देवपुत्तका समाणाहिएँ ति जलजेमु चोदिता । वत्य अंतलिक्सपरिसप्पा घलेमु उद्धंभा- गेमु विण्णेया भांति 'तलिका पगती । अवसेसा थलचरा । ते चतुप्पदा अपदा बहुपदा चेति पुणरवि आधारयिवव्यं भाति । तत्य चतुष्पदेसु पतुरस्सेसु चतुष्पदमदे उवकरणे चउप्पदोपकरणे चतुष्पदसद्दोदीरणे पउप्पदणामोदीरणे चतु- प्पदणामयेने धी-पुरिसरयकरणगते चेर एवंविधे पेक्सितामासे सद्द-रूबपादुभावे चतुष्पदपरिमप्पं चिंतितं यूया, अयर-सोहक गोधा-सरंट-अहिणूका चेति तत्व यहुपदेहिं केस-मंमु-णहर्समामासेमु चेय घटुपदमद-पहिरूयपादु- भावेसु घेर बहुपदा विण्णेया, गोम्मि सनपदि इंदगोविका पमपिका चेति एवमादिणो भाति । अयसैमा दीडममा. मासेमु विण्गेया भाति । यीगामेमु धीगामा, पुण्गामेमु पुण्गामा, पपुंमोमु घुमका । संठाग-यण्गविसं आहार- विधार-जोगिकादीकागि य जघुत्ताहिं उपलद्धीहिं आधारयित्ता परिमपा उपलव्या मांति । इति परिमापजोगीगने 50 चिंता यक्साता भरति । - 25 ६'भा सेयकात.॥२याडका.त.॥ ३स्सायेति १. तु.॥ ४माविशन्तर्गतः पार... एस पवे । ५पण्दि पण्ड, या १० त०॥ ६ अरिधि)मा • •॥ ७°सु यण्णायित. ८ पयोमयति । ६. ॥९यापण.. स.॥ १० भयंतीति • गिना।। ११ अपार' ह. त• रिना ॥ १२मिमगागयमीरफराजमा पपदारक है. स. १३ दिये ति ... रिना । १४ तिस • • पिना n १५ करोडक..॥ १६ सामासामसु.॥ १७'सतापट्टि इंदगोधिा परनिका है...॥
२२८ 15 अंगविज्ञापडण्णायं तत्य आपुणेयेसु जलचरेसु एवंरूवेसु चेव पडिरूय-सद्दपादुव्भावेसु चेव जलचरे चिंतिते चूया । तत्य उदकचरा चतुविधा आधारयितव्या-दुपदा १ चउप्पदा २ बहुपदा ३ अपदा दीहपदा(हा) ४ वेति । तत्थ दुपदेसु दुपदसद्दपटिरूवे चेव दुपदं चिंतितं धूया, हथिमच्छा मगमच्छा गोमच्छा अस्समच्छा - गरमच्छा णदीपुत्तका सम्बचरा चेति। तत्य चतुष्पदेसु चतुकेसु चतुष्पदसद-रुवपादुन्भाये चेव चतुष्पदा विण्णेया, कच्छमा सुसुमारा मंदुका उदकायो चेति 5 एवमादयो भवति । तत्य केस-मंसु-णह-लोमपरामासे बहुपदपडिस्यगते चेव बहुपदा विण्णेया कुमारीला सकुचिकादयो भांति । तत्थ दीहामासे सनदीहपहपडिरूषगते य दीपदा(हा) विण्णेया, चैम्मिरा घोहणुमच्छा यइरमच्छादयो भवंति, एवमादयो अपदा । तस्य दारुणेसु गाहा विण्णेया । सव्यआहारगते चेर सव्याहारगते आहारोपका विष्णेया। अधोभागगतेसु कूवगता विण्णेया । णिण्णेसु सर-पुक्सरणिगता विण्णेया । सण्णिरुद्धेमु तन्मागगता विण्णेया । थीगामेसु दीहेसु पिण्णेसु य णदीगता से विण्णेया - 1 महावकासेसु परंपरगंभीरेसु परिक्खेवेसु य समुद्दगता विण्णेया । महाकायेसु तिमितिमिगिला 10 विष्णेया । मज्झिमकायेसु वालीणा सुंसुमारा कच्छभमगरा गद्दमकप्पमाणा चिंतित त्ति बूया । मझिमाणतरकायेसु रोहित-पिचक-णल मीणे-चम्मिराजो विण्णेया। पचयरकायेसु कल्लाईक-सीकुंडी-उप्पातिका-इंचका-कुडुकालक-सित्यमच्छका वेति चिंतित त्ति घूया । सेतेसु सेता, रत्तेसु रत्ता सवण्णपडिरूयपादुब्भावहिं जधण्णामासे ईसणीयपादुव्भावे य दिठ्ठपुग्यो चिंतित त्ति धूया । णयणपडिप्पिधाणे य दंसणीयाणं पतिवग्गामेव अदिट्टपुच्या विण्णेया। सोत्तामासे सव्वघोसर्वतेसु य सुयपुव्या भवंति। सोत्तपडिप्पिधाणे घोसवंतविभामे य अरसुतपुव्या विण्णेया । इति जलचरजोगी वक्खाता भवति । तत्य सम्बपञ्चयरकायेसु अणूसु य कीडकिविल्लकजोणी चिंतिता विण्णेया । यण्णे आधारिते सेतेसु सेता, रत्तेसु रत्ता, पीतेसु पीता, णीलेसु णीला, कण्हेसु कण्हा, सेवालकेसु सेवालका, पण्हूसु पण्हू, फरसेसु फरसा, चित्तेसु चित्ता, सवण्णपडिरूवतो विण्णेया । थीणामेसु थीणामा, पुण्णामेसु पुण्णामा, णपुंसकेसु णपुंसका, एकचरेसु एकचरा, मिघुण- चरेसु मिधुणचरा, गणचरेसु गगचरा चिंतित त्ति विण्णेया । इति कीड-पतंग-किविल्लिकागता तिरिक्खजोणी पडिरूप- पादुन्मावेहिं उवलद्धव्या । इति कीट-पतंगगता तिरिक्खजोणी वक्खाता भवति चिंतिता। तत्य थावरतिरिक्सजोगी पंचविधा आधारयितव्या भवति । तं जधा-पुढविकाइगगता आवुकाइगगता तेउक्का- इगगता वाउचाइगगत वणप्फतिमाइगगता वेति । तत्य सव्यदढेसु पुढवीपाउम्भावेसु धातुजोणिगते य पुढविकाइकं थावरं चिंतितं ति घूया । आपुणेयेसु उदकपादुय्भावे आवुजोगीगते चेय आयुकायिका थावरा चिंतित त्ति बूया । अग्गेयेसु अग्गिपादुब्भावे अग्गेयेसु सद्द-रूवपादुभावेसु अग्गिउयकरणगते चेव तेवुकाइका थायरा चिंतित त्ति धूया । वायव्येसु वायपादुम्भाचेसु चेव उवकरणसद्दपादुव्भावसु चेव यायुकायिकं थायरं चिंतितं ति यूया । सम्यगहणेसु ॐ सब्यसरणहरितक-पुप्फ-फल-पत्तपादुद्भावे चेय मूलजोणीगतेसु चेव सद्द-रूव-उपकरणपाउभावे चेय एवंविधवणापती- कायिकथावरं चिंतितं ति वृया । इति थावरगया तिरिक्सजोणीकगता चिंता वक्खाया भवति । तत्य अधोभागेसु जहण्णेसु किण्हेसु संकिलिहेसु उवद्दुतेसु अदंसणीयेसु अबुद्धीरमणेसु चेय एवमादीकेसु आमा- सेसु सद-रूवेसु चेर एवंरूवेसु णेरइकपडिरूयेसु णेरइकसद्दपादुन्मावेसु चे रइयं चिंतित ति धूया । इति गैरइकगता चिंता धक्साता भति। तत्य सव्यपाणा पुणरवि सत्तविया आधारयितव्या भवति । तंजधा-एकपदा १ विपदा २ चतुप्पदा ३[छप्पदा४] बहपदा ५ बहुपदा ६ अपदा ७ चेति । तत्य एकपादुभावे एकपदा विण्णेया एंकरका भयंति १ । दुगपादुभावे दुपदका भयंति । ते दुविधा-माणुसा पक्खी ॐ माणुसतिरिक्सजोणी वेति । ते तिविधा-क्रिण्णा किंपुरिसा अरसमुहीओ १हमचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव वर्तवे ॥ २ कुरीला ई० त० विना ॥ ३ तम्मिरा योह' ह. त० ॥ ४ °सु पाटीणा ५ मीलच है• त• पिना ॥ ६°डकुसीकुंडिओपातिकाईयकाकुटुकालकमित्यमच्छका है• त• विना ॥ ७ अण्णेसु है. त•॥ ८°ता तणयण' है. त•॥ ९मयति उप्पया 1 तत्थ हं. त• विना ।। १० एकारका है. त.॥ सहसचिहान्तर्गतः पाठः... एव दर्तते ॥ 20 - 30 सं ३ पु.॥
२२९ 10 अट्ठवण्णासइमो चिंतितज्झाओ वेति माणुसा हा तिरिक्ख माणुस - जोणीसाधारणे विपदा भवंति । तत्य सव्यं उद्धंभागेसु पक्खी दुपदो विण्णेयो। सव्ववित्थडामासेसु माणुसोपकरणेसु चेव माणुस्सदुपदजोणी विण्णेया। मणुरसतिरिक्सजोणीसाधारणेसु किन्नरा किंपुरिसा अरसमुहीओ वेति । तत्य दुपदे थीणामेसु चेव अस्समुहीओ विण्णेयाओ भवंति । सव्वरुतेसु सव्यसउणगते चेय किन्नरा किंपुरिसा विण्णेया । इति माणुसतिरिक्खजोणीसाधारणेसु तिरिक्सजोणी विण्णेया भवति २। तस्य सव्वचतुप्पदे सब्बचतुष्पदपडिरूवगते य चतुक्वग्गगतेणं चेव उवलद्धव्या भवंति ३ । तत्य छप्पदा छकवग्गोबलद्धीहिं पडिल्यगते उव- लद्धव्या भवंति । तं जधा-भमरा मधुकरीओ मसगा मक्खिकाओ चेति । तस्य मुदितेसु भमर-मधुकरा विण्णेया । सव्यमूलगते चेय दारुणेसु मसका मक्खिकाओ य विण्णेया । धीगामेसु मधुकरीओ मक्खिकाओ चेव विण्णेया । पुण्यामेसु भमरा मसका चेव विण्णेया ४ । तत्य अट्ठपदा अट्टकरगपादुभावेण अट्ठकपडिरूवेण चेव उवलद्धव्या भवंति ५ । केस-मंसु-णह-लोमपरामासे वहुपदपडिरुवे चेव चहुपदा विण्णेया भांति ६ । अपदेहिं पैरिमंटलेहिं दीहपादु- व्मावेहिं अपदे वि त्ति जाणिय त्ति ७ । तत्य अट्ठपदा बहुपदा कीडकिविल्लगे इमेहिं विण्णेया भवंति । तं जधा-किविल्लकाओ ओपविका कुंथू इंदंगोपका पसलचित्ता कण्हकीटिका त यूका मंकुणा उप्पातका रोहिणिका चेति एवमादयो । तत्य उण्हेसु जुगलिका कण्डपिपी- लिका » कण्हविच्छिका चेति विण्णेया, जे यऽण्णे उपहा । रत्तेसु रत्ता रोहिणिका इंदगोपगो, जे यऽण्णे रत्ता पिपी- लिका जगलिका । पत्थिवेसु किविल्लका इंदगोपका चेति विण्णेया। ढेसु किविल्लका जंगलिका विण्णेया । दीहेसु पिपीलिका जंगलिका विष्णेया । परिमंडलेसु इंदगोपका मंकुगा य । गामेसु यूका मंकुणा य विण्णेया । गम्मा-15 रण्णेसु घुणा विण्णेया । अवसेसा भूमीणिस्सितेसु । अंतलिक्खेसु संताणका उंडणाही धुकभरधा वि वा विण्णेया । पक्खिगते अग्गिकीड-पतंगा मक्खिकाओ भमर-मधुकरा चेय विण्णेया । इति छप्पदा जोणी बहुपदलोणी अपदजोणी चेव फीडकिविल्लगगता वक्साता चिंता भवतीति । तत्य सत्तविधा पाणा पुणरवि आधारयितव्या भयंति दुविधा जलचरा थलचरा चेति । तत्य आपुणेयेसु जलचरेसु सव्वजलचरपडिरूवे व जलचरा विष्णेया भयंति । सत्य घलेसु लुक्खेमु उण्णतेसु य सव्यथलयरगते 20 चेय थलचारी चिंतितं ति घूया । तत्य उदकचरा विष्णेया उभिजा विलासया अभितचरा चेति । तत्य उदिमजा संखणा काकुंथिका वडका सिरिवेट्टका करिण्डका पैयुमका सद्दा तीलका इति । उभिजेसु एते उम्मढे आमास-सह- पढिरूवेण उपलव्या भवंति उम्भिय त्ति । तत्थ बिलासयेसु कण्हगुलिका सेतगुलिका खुल्लिका आहाहका कसका यातकुरीला यावंसु पुतिपि एवमादयो अधोभागेर्मु छिन्नेसु यण्ण-आयार-पडिरवेणं चेव एतेसु विलासया भवति । इति पिलासया । तत्य अमितचरेसु इलिका-सीणिक-दि-उभणामी संतुवायका णदीमच्छका जलायुमच्छका वेति यहुपदेहि 25 एते सकेहि पडिरूयपाठन्मावेहिं जयोपदिद्वेहि उपलव्या भवति । तत्य अपदा दुविधा-परिसप्पा चे किमिका चेर । तत्य महायकासेमु परिमप्पा विण्णेया । तत्य किमिगना आसातिका किमिका घुरु गुण्डु( गंडू )पया य सयट्टका सूकमिंडा चेति स एषमादयो सविण्णेया मति । सत्य णीलेसु णीला, चित्तेसु चित्ता, संविफहपाणरिसतेमु आसातिका किमि (रुउ ति विष्णेया। भूमीणिरिसते, गंटूपका १लपिहान्तर्गतः पाठः है.त. नानि ।। २ च्यण्णोय • त•॥ ३यपरिमंडलदीह • त.॥ ४ उपधिका •स•॥ ५पमटचिंता है. त• विना ।। ६ एतभिन्नर्गतः पाठः ६.त. नानि । ७पच्छिएमु १. त•॥ ८६सचिहान्तर्गतः पाठः है.ह. एव पते ॥ ९संगिका है. त• पिना ॥ १० 'ता पिता म... त• ॥ ११ फाकुंचिका घंदफा है..॥ १२ येडका है. स. विना ॥ १३ पयुसरका सदा तालुका है. त•॥ १४ फरणेपुलिया..॥ १५ आमांडका फसफश • • ॥ १६ मुछित्तेनु है..॥ १७ रुयेसुपं घेय पर्व मिला है. त•n १८ गण्टु- पया...॥ १९ हसविशन्तर्गतः पाठः १. एव पते ॥ २० मिपको तिt. •n २१°सु रूपका..
- - २३० अंगविजापइण्णय विण्णेया। मूलजोणीणिरिसतेसु लिच्छा संबुट्टिका संकमिदा ति विण्णेया । इति अपदजोणीयं वक्खाता भवति । इति सत्तविधा पाणजोणी वक्खाता । सजीवपडिरूय-आमास-सद्दपादुम्भावेहिं चितायं भवतीति । तत्य अजीवा तिविधा-पाणजोणीसंभवा मूलजोणीसंभवा धातुजोणीसंभवा चेति। तत्थ चलामासेसु सव्यपाणजो- जीगते चेव पाणजोणी विष्णेया। केस-मंसु-लोम-गहगते य सव्वमूलगते चेव मूलजोणी विण्णेया। तत्य दढामासेसु सन्ध- । धातुगते चेव धातुजोणी विण्णेया । तत्थ पाणजोणी दुविधा-संखता असंखता चेष, अग्गेया ॐ अंणग्गेया चेव दुविधा आधारयितव्या भवति । तत्य अग्गेयेसु अग्गेया विण्णेया । अणग्गेयेसु अणग्गेया विण्णेया भवति । सा दसविधा आधारयितव्या भवति, तं जधा-केसगता र सिंगंगता लोमगता अस्थिगता [मंसगता रुधिरगता] मजागता चम्मगता ण्हाउगता मेदगता वेति । उपजोगीणक पंचविधा, तं जधा-पित्तगता सिभगता दुद्धगता मुत्तगता रेतगता चेति । तत्थो- बलद्धीओ केसगता लोमगता सिगगता चेति आहारमए उवकरणे उवलद्धव्या भवंति । अंजणी-फणिका-चीर्जणी-दंडाओ 10 धूमणत्तं समग्गपाउकामये आसंदक-पल्लंक-कोडिलक्खणकआसणगते चेव विष्णेया भवंति, इति केसगता । तत्थ लोम- गतं सजीव-पत्तुण्ण-अजिणप्पवेणि इति पकिण्णक वीजणिया चामरं अजीणकंबलो बालसाडि वालमुंडिका बालव्य- (व्यि)यणी या एवमादीणि विण्णेयाणि । तत्थ चम्मगते उपाणहा अस्सभंडं भच्छा दितिका अजीणं अजीणप्पवेणिका वीणा मसूरका पखरगतं दद्दरका आलिंगा मुरव त्ति एयमादयो विण्णेया भवंति पडिरूवपादुन्भावेगं सएहिं आमास- पडिरूवेहिं चेव । तत्थ मंसगते आहारो विण्णेयो भवति । तत्थ ऐहावुणीगतं दुविध-हीरगतं गंडिगतं चेव । तत्थ 15 हीरगतं तत-वितता व ता विक्खाता या गुणगतं विण्णेयं भवति । तत्थ अद्विगतं संकुगतं खीलिगतं सिप्पिपुडगतं 7 संखभायणगतं विष्णेयं भवति । रुधिरगते अद्विगतं कियागतं विण्णेयं भवति । तधा धातुगतं तधा वैसा- गते पुरिसगते कियागतं विण्णेयं भवति ओसहाहारगतं वा । तत्थ आपुणेयेसु वसागतं रुधिरगत पित्तगतं दुद्धगतं विण्णेयं भवति । तत्य रत्तेसु रुधिरगतं विण्णेयं । सेतेसु दुद्धगतं रेतगत या विण्णेयं भवति । तत्थ घालेयेसु दुद्धगतं विण्णेयं । मुदितेसु विण्डेसु य सुकं विण्णेयं भवति । सेतेसु चेव कडुकेसु पित्तं विण्णेयं च भवति ।- पीतेसु चित्तेसु थूलेसु 20 रुधिर-पसा विष्णेया । अणूसु फेस-मंसु-लोमगतं विण्णेयं । उद्धंभागेसु सिंगगतं चिण्णेयं । केसगतेसु चेव अग्गेएसु पुरी-दुद्धगतं विष्णेयं । 1 तणूसु वस्सगयं विष्णेयं । " दारुणेसु रुधिर-हार-अट्ठि-मेदो विण्णेया । सव्यवहलगते दुवं विण्णेयं । परिजिण्णेसु वघेसु य मुत्त-पुरीसं विण्णेयं । तत्य आहारेसु पाणजोणी चम्मगता वत्थिगती अहि अट्टि- मना । जे अद्विगता दुद्धं वसा रुधिरमिति । दोहेसु हारुगतं विष्णेयं । वायव्वेसु वत्थिगत विष्णेयं भवति । तत्थ आहार-पाणजोणीओ चम्मगता मंसगता वत्थिगता व अहि » अहिमिजागता य । अद्विगता दुद्धं वसा रुधिरमिति । 25 तस्य भायणगते सिप्पिगतं संखमयं दंतमयं गरलमयं विण्णेयं भवति । तत्थ अहिमये आभरणलोहितिका विष्णेया भवति । तत्य घम्मे वत्थी आहारगते विण्णेया भवति, दंतभायणगते विण्णेया । अजिणपट्टे अजिणप्पवेणी अजिणग- कंचुका घेर वत्थगते विण्णेया भति, चम्मसाडीओ य विण्णेया भवति । मूलगते लोमगतं अच्छादणं विण्णेयं भवति । इति पाणजोणिपडिरूव-सहपादुन्मावेहि समास-बासतो उबलद्धव्यं भवतीति । इति पाणजोणी बक्साता भाति चिताया अजीवति । तत्य मूलजोणी तिविधामाधारयितव्यं भवति-मूलगता संधगता भग्गगता चेति । तत्थ पाद-जंघे मूलजोगी सब्य- पातुगते य उद्धं फडीयं अधो गीगाय संघ जोगीसंघगतेसु य उजुयगेसु य उद्धं गीयाय अग्गजोणी उद्धंभागेसु चेव । तत्थ १ सूरीमदा है.त.॥२विहार्य हत॥ ३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एव वर्तते ॥ ४-4 एतचिहान्तर्गतः पाठ. ई. त• नास्ति ॥ ५ मते सं ३ पु. । गते सि• ॥ ६ जणीओ दंडाओ भूमणतं है. त• ॥ ७ °पलंका है• त• विना • ८कपतुण्ण°•त.॥ ९हावणी है. त• विना ॥ १०°विपया मा वि है.त.॥ ११ हस्तचित्रान्तर्गतः पाठः है. त. एव पते ॥ १२ पासुगते ... विना । १३ हसचिहान्तर्गतः पाठ है.त. एव पते ॥ १४ ता पहिअहि.स. fना ॥ १५ -4- एतविहगने पर • तनास्ति ॥ १६ उजुमागेसु उद्धं उद्धं गीयाय उद्धे भागेसु है• त• विना ॥ - 30 अट्टवण्णासइमो चिंतितज्झाओ २३१ मूलजोणी एकविधा विष्णेया। संघलोणी दुविधा-तयार गता सारगवा चेति। तत्थ तणूसु तयागता विण्णेया तयागता चेव । सारगता सारगते विष्णेया भवंति धातुगते चेव । तत्य अग्गगता तिविधा-पत्तगता पुप्फगता फलगता वेति । तत्थ पत्तगया तिविधा-तरुणा मन्झिमा जरढा चेति । तत्थ पत्तगया ति(वि)विहा-पुधूसु तणूसु य । पुप्फगते पुप्फगता विण्णेया मुदितेसु चेव । फलगते फलगता विण्णेया पुण्णेसु सारवंतेसु य । तत्थ फलगतं पंचविधं-सेतं रत्तं पीतं नीलं कण्हमिति । एताणि सवण्णेहिं विण्णेयाणि भवंति । तत्य फलं पंचरसं आधारयित्ता जधारसं विण्णेयं भवति । । तत्थ मूलजोणी दुविधा-सजीवा चेव अजीवा चेव । तत्थ सजीवगते सजीवा विण्णेया । अज्जीवगते अजीवा विण्णेया । तत्थ सजीया तिविधा-गम्मा १ अरण्णा - गम्मारण्णा चेति । तत्थ अभंतरेसु गम्मा यणप्फतयो विष्णेया । गम्मेसु चेव सव्यवझेसु वणष्फतयो आरण्णा विण्णेया । वज्झमंतरेसु गम्मारण्णा विण्णेया वणप्फतयो । सव्यगम्मारणेसु चेव तिविधा-धीणामा पुण्णामा णपुंसकणामा चेति । तत्य थीणामेसु थीणामा, पुण्णामेसु पुण्णामा, णपुंसकणामेसु णपुंसकणामा विण्णेया वणप्फतयो । आपुणेयेसु गदीरहा । णिण्णेसु य थलेसु थलजा विण्णेया । 10 सुक्खेसु चेच ढेसु सपन्यतविरुहा विष्णेया । पव्यतपडिरुवेसु य पव्यतरुहेसु चेव ते चतुबिधा-पुप्फसाली १ पुप्फफलसाली २ २ फैलसाली चेव ३ [ग] पुप्फसाली ण फलसाली ४ चेति । तत्थ पुप्फसालिणो तिविधा आधारयितव्या भवंति-पत्तेकपुप्फा गुलुकपुप्फा मंजरिणो ! तत्थ एककेसु गत्तेसु एककपादुब्भावे चेव पत्तेकपुप्फा विण्णेया । पत्तेकपुप्फेसु चेव परिमंडलेसु गुलुकपुष्फा विण्णेया । गुलुकपुप्फेसु चेव दीहेसु मंजरिणो विण्णेया । मंजरिपुप्फेसु चेय मंजरिपुप्फेसु ते पंचविधा-सेतपुप्फा 15 रत्तपुप्फा पीतपुप्फा णीलपुप्फा कण्हपुप्फा चेति । एते सवण्णतो आधारयित्ता आधारयित्ता विण्णेया-सेतेसु सेता पुप्फा, रत्तेसु रत्तपुप्फा, पीतेसु पीतपुप्फा, णीलेसु णीलपुप्फा, कण्हेसु कण्हपुप्फा विण्णेया । एते तिविधं आधारयित्ता सुगंधपुप्फा दुग्गंधपुप्फा अञ्चंतगंधपुप्फा चेति । तत्थ सुगंधेसु सुगंधपुप्फा, दुग्गंधेसु दुग्गंधपुप्फा, अचंतगंधेसु अचंतगंधपुप्फा विण्णेया १। तत्य फलसाली चतुविधा-कायवंतफला मज्झिमकायफला मज्झिमाणतरकायफला पञ्चवरकायफला चेति । 20 तत्थ काययंतफला पणसा तुंचा कूभंडपुप्फ-फलप्पमाणफला विण्णेया भवंति । मन्झिमकायवंतफला कवियविल्लप्पमाणा विष्णेया भवंति । मज्झिमाणंतरकायफला अंध-अंबाडक-गीप-तिंदुक-उदुंबरप्पमाणा विण्णेया । पञ्चवरकायफला अस्सो- स्थ-बड-पील-पियाल-फरुस-चेम्मणडोला-कोलक-करमंद-कलायसंबीयप्पमाणाणि । ते पंचविधा-सेतफला रत्तफला पीत- फला णीलफला कण्हफला चेति । जधापडिरूवेहिं वण्णतो कायप्पमाणतो चेव आधारयित्ता आधारयित्ता उपलव्या भयंति भक्खफलगता अभक्खफलगता चेव । तत्थ सव्यआहारगते भक्खफला विण्णेया । अणाहारगते अभक्ख- 25 फला विण्णेया । ते तिविधा आधारयितव्या-सुगंधा दुग्गंधा अञ्चतगंधा चेय । सुगंधेसु सुगंधफला, दुग्गंधेसु दुग्गंधफला, अञ्चंतगंधेसु अचंवगंधफला विण्णेया । ते पंचविधा रसफला आधारयितव्या मवंति, तं जधा-तित्तफला कडुकफला अविलफला कसायफला मधुरफला चेति । एते जधुत्ताहि रसोपलद्धीहिं रसतो उपलब्या भवति २ । तत्थ जे पुप्फेण णनंति ण फलेण [ते पुप्फसालिणो, ] तं जधा-असोग-गागरुक्सा सत्तियण्णा तिलका सिंदुवार त्ति, जे यऽण्णे एवंविधा वेति । तत्य जे फलेण उवभुनंते ते फलसालियो । तत्थ इमे फलेण णचंते, ते 30 जधा-पणसा पारेवता लउचा मातुलुंगा उदुंबरा, जे यऽण्णे एवमादयो। तत्य इमे पुप्फेणे फलेण चेय गर्जते पुष्फ-फलोपगा, तं जधा-अंबा अंबाडगा णीच-उल-जंतु-दालिमा, जे य अण्णे एवंविधा भवंति । पुप्फ-फलतो य जे उवयुजंति ते चिंतिता विष्णेया भवंति पुप्फ[ फल ]सालिगो ति३ । १-२-३-4 एतचिहान्तर्गत पाठः ह. त. नास्ति । ४'त्थफलप्प है. त• विना ॥ ५°धम्मण ६० त० विना । ६ संधीय १० त०॥ ७°णाणग है. त०॥ ८ माउसगा हं० १०॥ ९°ण जंते फ है. त०॥ १०°लोय जे चळतिए चिंति है. १० ॥ - - - 10 - 15 २३२ अंगविज्ञापइण्णर्य तत्य जे ण पुप्फेण फलेण व उपजुजते ते णेय पुप्फसालिणो [णेच ] फलसालिणो त्ति विण्णेया । तं जघा- खदिरा धवा अयकण्णा पूतिकरंजो अहिमारो पूतिला कुंभकंडका चेति एवमादयो विण्णेया । जे य अण्णे एवंविधा, ते व पुप्फसालिणो [णेव फलसालिणो] चतुत्था पगती रक्खाणं विण्णेया इति ४ । एते जधुत्ताहि सकाहिं उपलद्धीहिं उपलभित्ता चतुविधा उपलद्धच्या । ते सव्वे चतुविधा-काययंती मन्झि- 5 मकाया मज्झिमाणतरकाया पचंवरकाया चेति तत्थ सव्यरुक्खा विण्णेया । उद्धंभागेसु लता विष्णेया । कुडिलेसु य वामभागेसु मज्झिमकायेसु गुम्मा विष्णेया । गहणेसु य तिरियपञ्चयरकायेसु तणा विण्णेया उवग्गहणेसु य । तत्य सव्वबीयाणि तणेसु विष्णेयाणि । बीयाणि अधुत्ताहिं उवलद्धीहिं जहायण्णजोणीयं उवलद्धव्याणि भवंति । तत्य खंधेयेसु उच्छू विण्णेया, सव्यं चेव गुलगतं । तत्थ कंदजाणि सव्याणि धूवणाणि विण्णेयाणि भयंति । अग्गेयेसु धूवणाणि विष्णे- याणि भवंति । उद्धंसिरोमुहामासे ण्हाणोपलेषणकेण पधोवणविसेसकिता विण्णेया । मझिमकायेसु अणुलेवणं विष्णेयं । मज्झिमकायं च ण्हाणागलु-अलत्तक-कालेयक-देवदारुगतं व गंधे विण्णेयं । मूलगता गंधा विष्णेया मूलगते । खंधगता गंधा विण्णेया खंधगते । तयगता गंधा विण्णेया तयगते । सारगता गंधा विण्णेया सारगते । गिजासगता गंधा विण्णेया णिजासगते । तणूसु पुधूसु य पत्तगते य पत्तगया गंधा विण्णेया । पुण्णेसु सव्वफलगते चेय फलगता गंधा विण्णेया। मुदितेसु पुष्फगते य सयपुप्फगता गंधा विण्णेया । पुण्णेसु गिद्धेसु य सम्वरसगते य रसगता गंधर विण्णेया । तत्थ गुग्गुलविगतं सजलसं इकासो सिरिवेट्टको चंदणरसो तेलवणिकरसो कालेयकरसो सहकाररसो मातुलुंग- रसो करमंदरसो सालफलरसो सव्वरसा चेति रसगते विण्णेया भवंति । जधुट्ठिाहिं सकाहिं उपलद्धीहिं आधारयित्ता उवलद्धव्वा भवंति एवमादयो रसा चेति । तत्थ तेल्हेसु कुसुंभतेलं अतसीतेलं रुचिकातेल्लं करंजतेलं उण्हिपुण्णामतेल्लं बिल्लतल्लं उसणीतेलं वल्लीतेलं सासयतेलं पूतिकरंजतेलं सिगुकतेल्लं कपित्थतेलं तुरुफ्तेलं मूलकतेलं व अतिमुत्तकतेल्लं । एवमादीणि तिल्लाणि रुक्ख-गुम्मवल्लि- 20 गुच्छ-वलयफलणिव्यत्ताणि विण्णेयाणि भवंति । जधुत्ताहिं रूवोवलद्धीहिं । गुम्मोवलद्धीहि » य चत्तारि तेल्ला विष्णेया-तिलतेल्लं अतसीतेल्लं सासवतेलं कुसुभतेल्लं चेति पञ्चंवरकायेसु चेव विण्णेयाणि भवंति । रुचिकातेल्लं इंगु- णि(दि)तेलं सिंगुग्गुतेलं चेति एवमादीणि मज्झिमाणतरकायेसु विण्णेया भवंति । अतिमुत्तकतेल्लं पधकलीतेलं चेति मझि- मकायेसु विण्णेयाणि भवंति । अवसेसाणि कायवंतेसु-विष्णेयाणि तिल्लाणि भवंति । तत्थ चंपक-चंदणिकापुस्सतेलं अतिमुत्तकतेल्लं जातीतेल्लं पीलुतेल्लं यूधिकातेलं जैसधतेल्लाणि चेव उवद्दुतेसु विण्णेयाणि भवति । मुदितेसु गंधतेल्लाणि 25 विण्णेयाणि भवंति । मधुरेसु चंदणिकतेल्लं विण्णेयं । तिण्हेसु वक्तिकतेल्लं विण्णेयं । अग्गेयेसु पुस्ततेल्लं विष्णेयं । पीलित- परिमंडितादीसु उवलद्धीहिं पडिरूवतो आमासतो य जधुत्तं तथा उक्लद्धव्यं भवति । इति तेल्लाणि वक्खाताणि भवति । तत्थ मूलजोणी साली वीही कोदवा कंगू रालका वरका मुग्गा मासा णिप्फावा चणका कुलत्था मसूरा अदसीओ कुसुंभा सासवा चेति आहारगता विण्णेया सव्य अणूसु चेव । तत्थ सेतेसु साली जवा सेततिला सेतणि फाया कुसुंभा वेति विण्णेया । रत्तेसु वीही कोदवा रत्तणिप्फावा कुलत्था मसूरा सरसवा वेति विण्णेया। पीतेसु कंगू रालगा 30 सिद्धत्यका चेति एयमादयो विण्णेया भवंति । आपुणेयेसु अतसी फुसुंभा तिला सासवा वेति छ आहारगया । विण्णेया । अयसेसाणि जधुत्ताहिं उवलद्धीहि उवलद्धव्वाणि भवंति । तत्य उवग्गणगते मूलजोगीगते वत्थाणि खोमकं दुगुल्लं जग्गिक चीणपट्टा वागपट्टा कप्पासिक चेति विष्णेयं भवति । जधुत्ताहिं वत्योपलद्धीहिं उवलद्धव्याणि भवंति । तत्थ जघा वत्थजोणीयं उपदिडं ति । १°या रति गह है. त• विना ॥ २-३ - एतचिहान्तर्गतः पाठः है.त. नास्ति ॥ ४.१ एतच्चिद्वान्तर्गतः पाठसन्दर्भ है. त• नास्ति ॥ ५उसवते है.त.॥ ६ इस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. त. एवं वर्तते ॥ - - ।
- - अट्ठवण्णासइमो चिंतितज्झाओ २३३ तत्थ मूलजोणीयाणि भायणाणि कट्ठमयं फलमयं पत्तमयं चेलमयं इति एवमादीयाणि विण्णेयाणि भवंति । तत्य खंघगते कट्ठमयं विण्णेयं सव्यकट्ठपडिरूवे चेव । पुण्णेसु फलमयं विण्णेयं सव्वफलपडिरूवे चेव । तणूसु पुधूसु य पत्तमयं विण्णेयं सव्यपत्तपडिरूवगते चेव । किसेसु वित्थडेसु ये चेलमयं विण्णेयं सब्बवत्थपडिरूवगते चेव । एवमादीहिं सकाहिं सकाहिं उबलद्धीहिं उवलद्धव्याणि च भायणाणि >> भवंति । इति मूलजोणीऑ भायणं । तत्थ मूलजोणीयं आभरणं पुष्फमयं फलमयं पत्तमयं कट्ठमयं चेति । तत्य मुदितेसु पुप्फमयं विण्णेयं । पुण्णेसु । फलमयं विण्णेयं । तणूसु पुघूसु य पन्तमयं विष्णेयं । खंधगते सारगते चेव कट्ठमयं विण्णेयं भवति । इति मूलजोणीयं आमरणं चिंतियायं वक्खातं भवति । तत्य धातुजोणी सारगता वण्णगता चेव । तत्थ सारगता धातुजोणी सारगता विण्णेया । वेण्णगता वण्ण- गते विण्णेया भवति । - तत्य सारगता दुविधा--विलयगता चेव घणगता चेव । तत्थ विलयगता णवविधा, तं जधा- सुवण्णकं तवुकं तंवगं सीसकं काललोहं वट्टलोहं कंसलोहं हारकूडगं रूविअगमिति एवमादीणि विण्णेयाणि भवंति । 10 तत्थ पीतकेसु सुवण्णकं हारकूडकं चैव विण्णेयं । उत्तमेसु दंसणीयेसु थ सुवणं विण्णेयं । पञ्चवरेसु सोवहवेसु य पीतएसु हारफूडकं विण्णेयं । तंवेसु सुवण्णकं वा तंबकं वा हारकूडकं वा विण्णेयं । उत्तमेसु रत्तेसु सुवणं, मज्झिमेसु तंबकं, उवहुतेसु हारफूडकं, सेतेसु रुप्पं या तवुकं वा कंसलोहं या विण्णेयं । सारमंतेसु सुफिलेसु रुप्पं, असारेसु तवुकं, सप्पभेसु कंसलोहं विण्णेयं । कण्हेसु सीसकं काललोहं चेति । तत्य कढिणेसु काललोहं विण्णेयं । मुंदितेसु सीसकलोहं विण्णेयं । वट्टलोहं विण्णेयं । भायणोपकरणेसु काललोह-कंसलोहाणि विण्णेयाणि । सप्पभेसु 15 कंसलोहं, सव्यच्छायागते चेव तिक्खेसु काललोह, सव्यसत्थगते चेव जण्णेयेसु सुवण्णकं या तंवकं वा कंसलोहं वा वट्टलोहं वा विण्णेयं भवति । इत्येसु तंबकं या सुवण्णकं या काललोहं वा विण्णेयं भवति । इति धातुजोगी विलयगता विष्णेया । तत्थ घणजोणी धातुगता वेरुलिय-फालिय-मसारकल्ला लोहितक्खा अंजणमू(पु)लका गोमेदका अंको मलका सासका सिलप्पवाला पवालका वरं मरगतं विविधा खारमणी वेति । एवमादी पाणजोणी धातुजोणीगता यधुत्ताहिं उक्लद्धीहिं आमास-वण्ण-पडिरूब-सद्दोपकरणेहि सिप्पिकपादुम्भावेहिं जाति-विजातीहिं अग्गेय-अणग्गेयोपलद्धीहिं 20 उवलद्धव्या भवंति । इति सारगता चिंता विण्णेया भवति । वण्णजोणीगता ततं जधा-सुधा सेडिका पलेपको णेलकता कडसकरा वेति । रत्तेसु गेरुग-मणोसिला पत्तंगे हिंगुलुकं पजणी वणमत्तिका इति विण्णेया भवति । पीतएसु हरितालं मणोसिला वण्णकमत्तिका चेति विण्णेया । णीलेसु णीलकधातुको सस्सकचुण्णकमिति एवमादी विण्णेयं । कण्हेसु अंजर्ण कण्हमत्तिका चेति । पण्हूसु पण्हुमत्तिका वण्णमत्तिका चेति वा वण्णेसु । खेत्तभूमीए पहभूमीओ विण्णेयाओ। णिद्वेसु णदीमत्तिका विण्णेया । पाणलोणीगते 35 संगमत्तिका विसाणमत्तिका विण्णेया । उवद्दुतेसु विसाणमत्तिका । मुदितेसु देवताययणमत्तिका विण्णेया । तत्य पुणरवि मत्तिका बहुविधा भवति, तं जधा-कण्हमत्तिका पंडुमत्तिका तंवभूमी मुरुषो कडसकरा सुवणं जावरूवं मणस्सिला गोकंटको खीरपको अभवालुका लवणं सुद्धभूमी चेति आधारयितव्यं भवति सकाहिं । उवलद्धीहिं तत्य सेतेसु लवणं खीरपओ गोकंडको अब्भवालुका वेति । दृढेसु मणसिला विण्णेया । मिदूसु कण्हमत्तिका गुरुयो तंबो वेति विण्णेया । इति धातुजोणीगता चिंता वण्णधातुगता वेति वक्खाता भवति । तत्य विगता घातुजोणी भूमीसंजुत्ता, तं जघा-खेत्तं वत्यु गाम-णगर-सण्णिवेस-आवास-कुंड-गदी-तलाग-पुक्ख- पणि-कूव-सर-फैलिह-सेउ-पागारो पेंडपाली एलुको 'चेति पया पंथा पव्रता चेति एवमादीयं विण्णेयं भवति । तत्य १ स्थगंधग° ई० त०॥ २य वेउमयं है. त•॥ ३0 एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त• नाति ॥ ४णी मा है. त•॥ ५ एतचिहान्तर्गतः पाठः है. त• मास्ति ॥ ६-७ वियलगता है. त.॥ ८ रहियगमिति है. त.॥ ९ कण्णेसु है. त•॥ १० हस्तचिहान्तर्गतः पाठः है. त• एवं वर्तते ॥ ११ सच्छाया' है. त•॥ १२°का यमल है.त. विना॥ १३ क-चाडफ-सा है. तु०॥ १४ मल्लिका ई० १०॥ १५मुंडयो करस है. उ. दिना ॥ १६ मुसंयो वेति है. त• विना ॥ १७ राकूब है• त विना ॥ १८ °फलिहासतपा' . तविना ॥ १९ 'वैति चैत्यम् इत्यर्थः ।। 30 भंग०३० २३४ अंगविजापइण्णयं उद्धंभागेसु उण्णतेसु पंव्यत-पंधा(वा)-पाली-चेति-एलुकमिति, जं च किंचि उण्णतं तं सव्यं विण्णेयं भवति । णिण्णेसु णदी-तलाग-पुक्खरणी-वाची-फूय-उदुपाण-सर-फलिहा एवमादयो विण्णेया भवंति । सण्णिरुद्धेसु तलाग-पुक्खरणी-वावी- गाम-णगर-णिगम-सन्निवेसाद्यो उवलद्धव्या भवंति । दीहेसु गदी विण्णेया । चतुरस्सेसु वावी पुक्खरिणी खेत्तं या विष्णेयं भवति । असंसतेसु णदी पव्यता विण्णेया भवंति । महायकासेसु भूमी वा पंचता वा 'जा विण्णेया । 5 पुधूसु महावकासेसु भूमी विण्णेया, उद्धंभागेसु दढेसु य पव्यता विण्णेया । उभागेसु मतेसु य एलुको विण्णेयो। उद्धंभागेसु जिण्णेयेसु य चीती विण्णेया । पादजंघासु दीहेसु य पंधा विण्णेया । इति भूमिपयुत्ता धातुजोणी । तत्य धातुजोणीओ आभरणजोणी जधुत्ता आभरणजोणीयं तथा विण्णेयं भवति इति धातुजोणीआभरणजोणि- चिंताय उबलद्धव्या भवति । तत्थ धातुजोणिजा वस्थजोणी लोहजालिका सुवण्णपट्टो खचितं वेति जधुत्तं यत्थजोणीयं तघा धातुजोणीगतं वत्थं विष्णेयं भवति इति धातुजोणिवत्थजोणिलं चिंताय उपलद्धव्यं भवति । तत्थ धातुजोणिया 10 भायणजोणी पुधूसु धातुजोणिगतेसु सव्यभायणपडिरूवगते चेव मत्तिकामए चेव लोहमये मणिमये सेलमये जधुत्ताहिं जधुत्ताहि भूमी-सेल-लोह-मणिशोणीहिं समणुगंतव्यं भवति इति धातुजोणिजा भायणा जोगीचिंतायं उपलद्धच्या भयंति। तत्य धातुजोणिजो सयणासणजोणी लोहमयी सिलप्पवालमयी मणिमयी सेलमयी भूमी वेति जधुत्ताहिं धातुजोणीहिं ज्वलद्धीहिं सयणासणोयलद्धीहिं चेव समणुगम्म उवलद्धव्या भवंति । तत्थ महावकासेसु भूमी विण्णेया । अग्गेयेसु इट्टका, समेसु पेढिका, दढेसु सिलापट्टपासाणा, चतुरस्सेसु सिलापट्टा, दढेसु चेय परिमंडलेसु सिलापट्टा, चतुरस्सेसु 15 परिमंडलेसु या अग्गेयेसु इट्टका । तत्थ तिविधमेव धातु तिविधमेव आसणं सयणं या संठाणतो उत्तम-जधण्ण-मज्झि- माहिं चेय ज्वलद्धीहिं उयलद्धव्या भवंति इति धातुजोणिजं सयणासणं चिंताय उपलद्धव्यं भवति । इति धातुजोणी- चिंता चक्खाता भवति। तत्थ पाणजोणी मूलजोणीसाधारणा, पाणजोणी धातुजोणीसाधारणा, मूलजोणी पाणजोणीसाधारणा, मूळजोगी धातुजोणीसाधारणा, धातुजोणी पाणजोणीसाधारणा, धातुजोणी मूलजोगीसाधारणा, पाणजोगी-धातुजोणीसमभागा 20 समणुगंतव्या भवति । एपमादी चिंता जीव-अजीवसमायुत्ता दिव्य-माणुस्स-तिरिक्स-गेरइयसंसारसमायुत्ता सिद्धसमा- युत्ता य एयमादी जीवचिंता अजीवचिंता चेव सद्दगता रूवगता रसगता गंधगता फासगता गाम-गगर-खेड-पट्टण-जण- पद-पव्यत-गिह-सण्णिवेस-खेत्त-खल-भूमि-वत्थुगता सलाग-पुक्खरणि-कूव-सर-णदी-समुद्द-धण-धण्ण-रतण-उपकरण-जाण- वाहण-सयणा-ऽऽसण-पत्थ-परिच्छद-भायणगता पाणजोणिगता मूलजोणिगता धातुजोणिगता अतिता-ऽणागतकाल- संपतसमायुत्ता गणणा-परिसंसा-असंखेजसमायुत्ता य विजासुत्तसमायुत्ता य सजीव-अज्जीवसमायुत्ता दुविधा 2 समासेण उदत्ता अणुदत्ता चेति आमास-सर-पडिरूयपादुन्मावेहिं जधुत्ताहिं उवलद्धीहिं आधारयित्ता आधारयित्ता सव्यं समणुगंतव्यं भवतीति । इति खलु भो महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय चिंतितो गामाज्झायो अणंतागमसंजुत्तो जिणाणंतरणाणिपवरगुणाणंतपंवरागमसंयुत्ताय मणोगतभावप्पकासणकराय- मंगविजाय णमोकारयित्ता णमो भगतोयसवतो महतिमहावीर- यद्धमाणाय अभिप्पसण्णाय अंगविजाय चिंता णामझायो अट्ठावण्णो सम्मत्तो॥५८॥छ । .0 १पदापा...॥२६सचिहान्तर्गतः पाठः १. स. एव वर्तते ॥३जिणेये है..पिना ॥४पया वि••॥ ५°णीमर्प सप्यमणु..॥ ६4- सविनामुत्तत्थसत्यसमा • त•॥ ७ तिराणि प है. त• चिना ॥ ८पराग...रिना ।।
૨૨૧ एगूणसट्टिमो कालज्झामो [ एगूणसहिमो कालज्झाओ] 10 [पढमं पडलं] उसभादी तित्थकरे सिरसा वंदित्तु वीरणिच्छेवे । विजं महापुरिसदेसितं च णाणं च पाणी य ॥१॥ पंचविहो जो कालो महापुरिसदेसिताय विजाय । सो गाधाहिं णिवद्धो अणुजोगत्यं चियेतूणं ॥२॥ पंचविधो पुण कालो मुहुत्तमादी दिवसा य पक्खा य । मासे मासा वसं वस्साणि य दिग्धकालो य ॥ ३॥ जं पुच्छितं मुहुत्तविसए मुहुत्ता तहिं गणेतव्या । जं दिवसाणं विसेणय (विसयो) तहिं तु दिवसा गणेतव्या ॥४॥ पक्खेसु य ते पक्खा एकारसमासिकं च मासेसु । वस्साणं जो विसयो तहिं तु वरसा गणेतव्या ॥ ५ ॥ अट्ठागते य कच्छागते य वित्यारिमे य गणिमे य । माणुम्माण-पमाणे काले वेलागते चेव ॥ ६ ॥ सम्वम्मि अंतिम्मत्ते समाणजोगा य समगिरेसम्मि । ओलमितदुक्खलक्खे चिरणिफण्णे य चिरकालो॥७॥ अहागते य फच्छागते य वित्यारिमे य गणिमे य । माणुम्माण-पमाणे काले वेलागते चेव ॥ ८॥ एतेसिं भावाणं मज्झिमजोगेण मन्झिमो कालो । अढे संपुष्णा-अणधिकम्मि लेहट्टकाले य ॥ ९ ॥ अहागते य कच्छागते य वित्यारिमे य गणिमे य । माणुम्माणपमाणे काले वेलागते चेव ॥१०॥ एतेसि भावाणं पतणुकभावे य थोवभावे य । खुडलक-हस्सभावे आसण्ण-पसण्णभावे य ॥ ११ ॥ लहुकह-लहुणिफण्णे लहुलोभे [......] आगते सिग्छ । अपरिकेसेण य उवगतम्मि सिग्यो हवति कालो ॥१२॥ वासाणि दीहकालो मासा पक्खा य मझिमो कालो। दिवस-मुहुत्ता हस्सम्मि होति कालप्पमाणम्मि ॥ १३ ॥ 15 वस्सेण व वस्सेहि व अयमत्यो होहिति ति उप्पण्णे । यस्साणि विजाणेजो तस्सुप्पादस्स लडीए ॥ १४ ॥ मासेण व मासेहि व अयमत्यो होहिति ति उँप्पण्णे । मासे त्ति विजाणेजो तस्सुप्पादरस लद्धीए ॥ १५ ॥ पक्खेण व पक्खेहि व अयमत्यो होहिति त्ति उप्पण्णे । पक्से ति विजाणेजो तस्सुप्पादस्स लद्धीय ॥ १६॥ दिवसेण व दिवसेहि व अयमत्यो होहिति त्ति उप्पण्णे । दिवसे ति विजाणेजो तस्सुप्पादरस लडीए ॥ १७ ॥ किंचि क्सगं मुहुत्तं अयमत्यो होहिति त्ति उप्पण्णे । जाणसु वत्य मुहुत्ते वस्सुपादरस लदीए ॥ १८ ॥ 20 समतिकते दिवसे मासे संवच्छरे व जाणाहि । णिव्यत्ते अणुतुरिते कडे य मुत्ते अतीते य ॥१९॥ संपतकाले दिवसे वत्तंते यत्तमाणदिवसे य । वत्तं वासं यच्छरं तु मुण पत्तमाणेसु ॥२०॥ दिवसे मासे संवच्छरे व पुरतो अणागते जाणे । सव्वम्मि अणुप्पण्णे उपजिहिति ति विप्रेणातो ॥ २१ ॥ समतिकते दिवसे मासे संवच्छरे य जाणेत्रो । गिब्बचे अणुभूते कडे य भूते अतीवे य ।। २२ ॥ अतियत्तेसु ण चूया अणागतं ण वि य यत्तमाणाइ । संपतमतियत्ताणि य ण वागरे यत्तमाणेमु ॥ २३ ॥ उप्पण्णमतीतेसुं अविवत्तं जाण सव्वमावेसु । उप्पणवत्तमाणे अ वत्तमाणो हयति कालो ॥ २४ ॥ सबम्मि अणुप्पण्णे उप्पजिहिति त्ति णागतो कालो । उत्पन्नतेसु अणागतं व मुग यत्तमागं या ।। २५ ॥ उपुप्फ झीणफले मलिणले [वह य] मलिण-सुक्सवणे। मुक्सपत्ते व जुत्ते मते य यत्तुस्सए य कालो अतिफनो ॥ २६ ॥ मुण पचमाणकालं गणिन्नमाणे तिरिच्छमाणे या दिजंते मुनते पाढत्ते कीरमाणे या ॥ २७ ॥ १ अतिस्सप • • ॥ २ तलपसदुपसे है. द. रिना ॥ ३ अदाग है• •॥ ४ पुण अपविकस्मि ले. ५अच्छागते य क .त.॥ ६-८ उप्पण्णो है..॥ ९पिण्णेतो. तु.॥ १०'फले मसिणफले मलिणमुसवणो मुपपचे य मुत्ते मचे य यत्यस्स है• •॥ ११°माणे थियिन्त्रमाणे • तु.॥ 30 २३६ संगरिजापइण्णय [तइयं पडलं पुप्फ-फल-सस्स-उदयसमुदए य वत्तमाणम्मि । णरजोवणकस्सेसु चेय मुग संपदं कालं ॥ २८ ॥ पुष्फ फलागं सस्से अचिरा ओतरति या सुबो सरदो । ठायंति वंधवत्या होहिति दुक्खणे भोवव्यं ॥ २९ ॥ एहिति दाहिति काहिति होहिति दिनिहिति लभिहिती व ति। दरसामो कस्सामो ति होति तु अणागतो कालो ३० संपदाणागतमतिच्छिते व एकतरगम्मि भावम्मि । उपयुत्ते पुच्टते सो कालो होइ योधरो ॥३१॥ आधारे तत्य वाहिरेण तम्मि तु तज्ञायअविभत्तो ति । तिण्डं पि य कालागं [ • ॥३२॥ पंचिंदिपहिं पंचहि सद्द-फरिस-रस-रूप-गंधा तु । जे फुड विष्णाता वत्य ते उप्पाता गणेयव्या ॥३३॥ ॥ पढमं पडलं ॥१॥छ। ........ 10 15 20 [वितियं पडलं] केयि नातिविसेसा गझा केयिच्च रूयसो गझा। केयी चण्णविसेसा केयि चि रसा रसविसेसा ॥१॥ केयि त्याणविसेसा गझा केयि त्ति जीवितविसेसा । केयि प्रणामविसेसा केपि तु बलाबलविसेसा ॥२॥ सारगुणा सीलगुणा केयिं कम्मगुणतो सुगेझ ति । मिदु-कढिण-णिद्ध-रक्सा सी-उण्हगुणा य केयिं तु ॥३॥ तेतेण सन्जमावा गझं तु भावविधिविसेसेण । इट्टचणं उगता विण्णेया माणुसे लोए ॥४॥ जे पाणजोणिया मूलजोणिया धातुजोगिया वा वि । उप्माया उप्पण्णा एताय विधीय णावया ॥५॥ सवोर्स भायागं अकित्तिमाणं च कित्तिमाणं च । इट्टत्तमणिहत्तं मझिमं च विविधं पुणो णेयं ॥ ६ ॥ इहेसु दिग्धकालो महेिसु वि य मझिमो कालो । दोसमलिट्ठमसारेसु चेव अप्पो हयति कालो ॥ ७ ॥ पुण्यामा सारजुवा मझिमसारा य होति पीणामा । जे तु णपुंसकणामा ते तु असारेसु बोधव्या ।। ८॥ कालो तु महासारेसु महंवो मझो य मझसारेसु । अप्यो य हववि कालो असारवंतेसु सव्वेसु ॥ ९॥ जध णामा तध रूया सद्दा गंधा रसा ये फासा य । पंचविधा उप्पाया एतेग गमेण णावया ॥ १०॥ उप्पत्ति-विपत्तिसुभा दो वि [य] जे संभवंति व्याणं । एगमहोरत्तेण तु तेसु मुहुत्ता सुगावव्वा ।। ११ ॥ उत्पत्ति(त्ती य) विपत्ती य उदया जे भवि भावाणं । - वस्सेहिं तेहिं वस्साणि होति उप्पत्रमाणेहिं ॥१२॥ निमिसंवरसुरसासा कट्ठा व लया कला व वीसं तु । कालस्स एस आदी एगमुहुत्ता समक्खाता ॥ १३ ॥ एते तीसं संसा तु मुहुत्ता जायते अहोरत्तं । एसो तु परो कालो भवति मुहुत्तप्पमाणस्स ॥ १४ ॥ एतेसुप्पातविधी मुहुत्तपम्गस्स बन्नयिस्सामि । जेसु समुदीरमाणेसु मुहुत्ता होवि वोधन्वा ॥ १५ ॥ जे य परंपरकिसा परमाणू वा सथावरा उच्चा । जीवा-जीवणिकाया सव्ये उ मुहुत्वसंसावा ॥ १६ ॥ ॥ उप्पातविधिपरिक्वायं उप्पत्तिता अपित्तपं अधुपदेसं पडलं द्वितीयं ॥२॥ छ । [तइयं पडलं] प्यातविधि तु जहकमेण बोच्छ दिवसबग्गरस । एप्पातविधि च पुणो मुहुचवम्गरस वोच्छामि ॥ १॥ परखुप्पातविधि पि य वविकं आगमं बोच्छ । मासुप्पावविधि पि य वोच्छामि चतुत्यवम्गस ॥२॥ वस्साशं पि य उत्पातविधि सव्वं जहङ्कम थोच्छं । संवच्छरं कुचोलि दीवो त्ति प्रमाणरासिस्स ॥३॥ एतो अपरिमितविधि अपरिमितस्स तु पुणो वि कालस्स । कालमण च पुणो गिरुद्धकालं च वण्गेस्सं ॥४॥ उदु-यस्स-मास-पक्वं दियसे मुहुत्तरगं च । मंडलवित्यारेहि य कोलणकउवक्सरविधीहिं ॥५॥ १°कससेसु त. १२ ण होयचं ह० त० ॥ ३ गाहम्मि ६० त० ॥ ४ देवजुते है. तु० ॥ ५कजिनाविविसेसा १.तु.॥ ६ केयित्ति चण्ण' ह.त.॥ ७ तेपण सध्यभागा है..॥ ८"झिमेसुहं तबिना ॥९-- एक- बिहान्तर्गतःश्रद्धयाधिकः पाठः ई.त. नाति॥ १० दीये ति है. त• विना 25 30 पंचमं पडलं] एगूणसट्ठिमो कालज्झाओ २३७ "बारसमासे संवच्छरे य जोतिसगतीय वण्णेस्सं । वारसमासे य पुणो उदुपेयालेण वण्णेस्सं ॥६॥ एगाह-दुग-तिगा चउका पंचके च्छाहा सत्तरत्तं च । अट्ठ णवके दसाहे पण्णरसाहे य वोच्छामि ॥७॥ कालं जोण्हं च पुणो दिवसं रचि च यण्गएस्सामि । एकमहोरत्तं वा वेलाणं वण्णइस्सामि ॥ ८ ॥ एत्तो वुट्ठीगंडय पुणो अग्घगंडय अग्गिगंडयं । पंचहि वि मूलवत्थूहि जधुत्तं कित्तयिस्सामि ॥ ९ ॥ एकेकीअ य गाधा य मुहुत्ते य दिवसे य पक्खे य । मासे य पुणो वोच्छं मझिमकालप्पमाणम्मि ॥१०॥ तण्णामे तरूवेहिं चेव तब्भावविधिविसेसेहिं । एत्तो कालपमाणं अपच्छिमं वण्णयिस्सामि ॥ ११ ॥ ॥भगवतीय महापुरिसदिष्णाय अंगविजाय कालणामावलिकायामध्यायस्तृतीयः ॥ ३॥ छ । - 10 16 [चउत्थं पडलं] अंडसुहुमे य वीयसुहुमे य पणकसुहुमे सिणेहे य । चायू सद्दे गंधै सुहुमे सुहुमेसु सव्वेसु ॥ १ ॥ खुड्डलक-थोक-डहरक-अणुक-सुहुम-केस-मंसु-रोमेसु । एत्थ भयंति मुहुत्ता अभंतरतो अहोरत्ते ॥ २॥ खुल्लक वराड-संखणग-सिप्पि-गंडूपदे जलूका य । आसालिका पारवत्ते पाण्णयिका मुकेसु पट्टेसु ॥ ३ ॥ धिंकुण-लिक्खा-घुण-चम्मकीड-फलकीड-धण्णकीडा [य] । सुत्तजगलिका कुंथू उरणी सुयम्मुत्ता ॥ ४ ॥ एवमादिका जीव(वा) विदिका तिंदिका य तसकाया । सुकुमालका डहरका सव्वे तु मुहुत्तसंखाता ॥ ५॥ पुप्फ-फलं धण-धण्णं सह-प्फरिस-रस-रूव-गंधा य । सुकुमालका सुहुमका सव्वे तु मुहुत्तसंखाता ॥ ६॥ कंगू-रालकासामाक-चरक-सिद्धस्थका-सरिसवेसु । एत्थ मुहुत्ता णेया सुहुमेसु य सव्ववीयेसु ॥ ७ ॥ धण्णरते ४ घण्णरते » पंसुरये छारिका दगरये य । चुण्णेसु अंजणेसु य पदुमरयकतम्मि य मुहुत्ता ॥८॥ सुकुमालका सुहुमका तिइंदिगा जे तु तेसु तु मुहुत्ता । थूलसरीरेसु तिइंदियेसु दिवसा विधीयते ॥९॥ खुड्डलकेसु तु चतुरिदिएसु दिवसा भवंति णातव्या । थूलसरीरे चतुरिंदिकेसु पक्खा विधीयते ॥१०॥ खुड्डलकेसु तु पंचेंदिकेसु दिवसा व होति पक्खा या । संवच्छर-मासा वा पंचेंदिकथूलकायेसु ॥ ११ ॥ खुडुलकेसु तु पंचेंदिएसु एत्थ दिवसा व होति पक्खा वा । संवच्छर-मासा वा थूलसरीरेसु पक्खीसु ॥ १२ ॥ 20 सिग्ध-चवलेसु मदु-सुहुमकेसु पुप्फेसु अप्पसारेसु | आसण्ण-पसण्णेसु य एत्थ मुहुत्ता उ बोधव्या ॥ १३ ॥ किंचि क्खणं मुहुत्तं विंदु थोगं विपञ्चते 'सिटुं । वड्डीयते पडिच्छह एवं तु मुहुत्तिओ कालो ॥ १४ ॥ अणुसुहुमम्मि य काए जति काया पेंडिता व गणिता वा । तति तु मुहुत्ता णेया होति मुहुत्तप्पमाणम्मि ॥१५॥ ॥ महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय कालप्पमाणो चउत्यो॥४॥छ । 25 [पंचमं पडलं] भुम-णयण-कण्ण-णासोह-पोरसंगोह-अंगुलिग्गहणे । एतेसि भागाणं उपकरण-उवक्सरविधीसु ॥ १ ॥ अतिसुहुमे मोत्तूणं खुडुलकेसु वि य सव्वसत्तेसु । आमास-सह-दसण-कक्खेसु दिवसा मुणेतव्या ॥२॥ जलुका-लूता-कोलिक-घरपोपलिकासु चेय अहिल्का । भिंगारी आलकासु चेव दिवसा विधीयते ॥ ३ ॥ भमरा मधुकर तोडा पतंग तथ मच्छिका मगसकेसु । चउरिदियतसपाणेसु एत्य दिवसा विधीयते ॥ ४ ॥ कडुकालमच्छसिकुवालिका तध विकलका व पलकेसु । छिर-कुरिल-सिगिलि-मंद्रुकलिआसु य तये ॥ ५ ॥. 30 १ धारवल्ले प्पा है. त• विना ॥ २ सुझप हं. त• विना ॥ ३°के तु प° • त• विना ॥ ४ सिद्ध हैं. त• विना ॥ ५ अल°है.त.॥ ६ 'ल-कुभिगिल-मं है. त• विना । - 5 मंगचित्रापरणयं [उटुं पहले गोम्नी-कीडग-विच्छिय-मुरंगोपक-इंदकाइयामु वि य । इंदुर-सरह-क्सालगन्बुहटग-चतुप्पदे दिवसा ॥ ६ ॥ पंयोलग-यतिभेदग-हकंदुक-युमिगरीमामु वि य । चोलाडिगामु पुलिंगएमु केमु दिवमा विधीयते ॥ ७ ॥ धन्मनगटगं दामएमु आमलग-अंबुलम्फलेमु । अंबाहर-करमंदे सीमण्णे उंबरफलेमु ॥ ८॥ राना नोटण मीडा-लरमु-तुंचुर-पिप्पटपलेमु । सेलुपल-कोरफल-यारमहिएमु य वघेव ॥ ९ ॥ परिफलं करिलेग-लोमसिग-विडाटमु य तयेर । चालिंगा-याटुंगेमु चे दिवसा विधीयते ॥ १० ॥ पूगफल-कशेलग-रंग-जावीफलेमु य क्षेत्र । मुदीगा-मरा-पिप्पलि मरिएमु य तय ॥ ११ ॥ मालगने मुदत्ता गुम्मफलेमु दिनमा मुगेयया । वल्लिपलेमु य पक्सा मासा रक्खे विधीयते ॥ १२ ॥ एत्य रिवी हालिमविस्यएमु पसा हयति मामा या । य?मु य हस्सेमु य फलेमु दिवसा विधीयते ॥ १३ ॥ बन ब दिनोऽमिरे नियहियं गेर रित्तिदिरमा तु । वदेसि-तगियोगेमु चेर दिवमा विधीयते ।। १४ ।। पाहिरदाती[था विधीमु पारदमारमागेमु । दिवसपरिकित्तणाय तु एत्य तु दिवसा मुणेवव्या ।। १५ ।। पालगम पालगमोहणते पालगामरणए य । पालम्मि य पुष्फफ्ले एन्य तु दिवसा विधीयते ॥ १६ ॥ मुहटकाया तब जातिका पेंडिना व गणिता या । तति दिवसा णातव्या होति तु दिवसप्पमाणेगं ॥ १७ ॥ पडलं पंचमछ। 10 15 20 [छट्ठ पडलं अंपोर यानीआमासे तय सहत्य पादागं । उपकरण-भूमगरतेमु घेर वह पक्सिमो काटो ॥ १ ॥ धमगार-पारिगणे वगारयेमु पि य सत्यमत्तेमु । मन्झिमकायेमु पतुप्पदेमु पक्रा विधीयते ॥ २॥ भय-अनिल-मुगग-मूअर-मग-पसत-विलालजातीमु । यागर-मम-लोपामु न पा विधीयते ॥ ३ ॥ वित्तिर-यहर लायक परमुन-मुम् मालका-रिकिसिमेमु । फाक-कपोवेमु पपिंजलेमु पक्मा विधीयते ॥ ४ ॥ पच्छ-योहवाम-मतपत्र-यंजुल कलहिनीमु पि य । सूरुरिका-मंचुलोमु घेर पश्मा विधीयते ॥ ५॥ पायर का मेनुर सेडीया-रेहि बाटोमु पि य । दुडिग-याटयरेम पा विधीयते ।। यासिकामु फलामु दिम्लेमु मेरफलेमु य तयेय । मगरच्छर-सिंगालोमु पम्पा विधीयते ॥ ७ ॥ अपम्दादिम-तीतिनि-विष्टि-पहाडेयेययमम् । मूल-फयमारूप तयुसमु पक्रया विपर्याप्ते ॥ ८॥ भनिगमरे पुस्पले मम्मियायेमु धेर दवेमु ! अहाग्ने य कच्छागते य पक्सा विधीयते ॥ ९॥ र डाग पागे पछि पघुमरे लागे। पुरिमम्मि जान मासं मिथुगजुगले अहोरनं ॥१०॥ दर्पमु धनमारे पाहिरासूनो मी पयो । आचरितमहासारामु यीमु ते पायमो जाग ॥ ११ ॥ मुरपामरा उमम्मे सरीरमठि । पहिलो ति माग्यो ति पगपादो सिया पपम्गे ॥१२॥ भटो नि बदमागे जालिम गरीरमलंगापुर-पदाम य पदं देसद्ध मंडलंदं च ॥ १३ ॥ पाया नियोगेन भाग पा र गामि रोग व कीरति सेना परग विधीयते ॥ १४ ॥ मनिममपगुना दी पापाffलाया था। मी पापा नया मांति परनमामि ॥१५॥ : 30 १....मे... मागे पनिटीगार...पगुमानपान .... ५ नुरेगु... पामिय... मपरंगु... ८ मग्गामाउ.. AIR ..rr. : १.मा...
- 5 -ट्ठमं पडलं] एगूणसट्ठिमो कालझाओ [सत्तमं पडलं कडि-उदर-पहि-उरसी-सीसामासे य मासिको कालो । आभरणपक्खरगते एतेसिं चेव भागाणं ॥१॥ हय-गय-खरोट्ट-गो-माहिसेसु सत्तेसु कायवंतेसु । मासा विण्णातव्या सव्वेसु महासरीरेसु ॥ २ ॥ वग्घ-ऽच्छ[ मल्ल-]दीपिक-तरच्छ-खग्ग-वगसावदेसु पि य । रोहित-पसत-वराहेसु चेव मासा विधीयते ॥३॥ विपुलणदीमच्छेसु व मझिमकेसु य समुद्दमच्छेसु । मासा विण्णावया गाह-मगर-सुंसुमारेसु ॥ ४ ॥ हंस-कोंचेसु किण्णरेसु कुकुड-मयूर-कलहंसे । मासा विण्णातव्या पारेवत-चक्कबागेसु ॥ ५ ॥ भासकुग-महासकुगा दिग्घग्गीवा य दिग्धपादा य । मासेसु समक्खाता पारिप्पव-ढंकरालीओ ॥ ६ ॥ गद्दो कुरलो दलुका भासा वीरल्ल-ससघाती । मासेसु समक्खाता छिण्णंगाला ककीओ य ॥ ७॥ . सम्वे य दीहकीली दव्चीकर-मोलिणो य णातव्या । मासेसु समक्खाता भिंगारी गोणसा चेव ॥ ८ ॥ उग्गविसेसु मुहुत्ता सप्पेसु हयंति विसविसेसेण । सप्पेसु तु मंदविसेसु एत्थ मासा समक्खाता ॥ ९ ॥ सेतेसु होति जोण्हा कालो पुण होति कण्हसप्पेसु । चित्तेसु माससंधि संझा पुण होति लोहितके ॥ १० ॥ तलपैक-गालि केसुक-पिट्ठ-लकुलेसु चेव पणसेसु । - कालिंग-तुंब-कूभंडगेसु मासा विधीयते ॥ ११ ॥ पेंडीसु य गोच्छेसु य पुप्फ-फलेसु य सर्वेट-णालेसु । पोट्टलकभारवद्धे जमलकवद्धे ठियामासे ॥ १२ ॥ भंडेसुवकरणेसु य पुप्फ-फलेसु वि य कार्ययंतेसु । दीहेसु वित्थतेसु य महासरीरेसु पि य मासा ॥ १३ ॥ 'वेतोपकरण-पुराण-सुत्तेरक-सुतीसोपकेसु सव्वेसु । रुप्पियमासेसु सुवण्णमासके मासमो बूया ॥ १४ ॥ [.........] पायगहणे य दोहं पि वाहुणं जाण । उभयोपक्खाय समागतम्मि मासा विधीयते ॥ १५ ॥ सवमहाकायेसु वि जावतिया पिंडिता व गणिता वा । तति मासा णातव्या होति मासप्पमाणेणं ॥ १६ ॥ ॥पडलं सम्मत्तं (सत्तमं)॥७॥ छ । 10 ।. 15 20 - [ अट्ठमं पडलं] एतेसु चेय अतिकायेसु तु भवंति वस्साणि । कुल-जाति-माण-रूवाधिके य बहुमुल्लूसारे य ॥१॥ उम्मजितूणमंगे उम्मढेसु वि य सम्बगत्तेसु । विच्छिण्णथितामासे उडुंगाणं व आमासे ॥२॥ देविंदो णागिंदो असुरिंद-महिंद-नरवरिंदो त्ति । सीहो यो गयो णरवरो त्ति संवच्छरुप्पाया ॥ ३ ॥ सुरवति धणपति जलपति पोतयती गरवती णइयति त्ति । तारापती गहवती जोतिपती जोतिसपति त्ति ॥ ४ ॥ आयरिय-उवज्झाया अम्मा-पिउ-गुरुजणे य सव्यम्मि । देवा रिसयो त्ति य साधयो त्ति संवच्छरप्पाया ॥५॥ जगपति गणपति कुलपति जूहपती मिगपति त्ति वरसाणि । गोपति पयापति ति य वरसाणि भवंति एतेसु ॥ ६॥ 25 जंबुद्दीवकधासु य अत्थगिरीसु उयवाणणायं च । यस्सधर-यस्सपरिकित्तणाय यस्साणि जाणेजो ॥ ७ ॥ दीयो ति समुद्दो त्ति य अकम्मभूमि त्ति कम्मभूमि त्ति । तेलोकं पुढवी पव्यतो त्ति संघच्छरुप्पाता ॥ ८॥ अतिदूरं अतिदिग्धं अतिम्महंतेसु अतिमहग्घेसु । लंगे कोट्टित-धणिते धर्णितवद्ध य यस्साणि ॥ ९ ॥ चिर-दीह-सरसत-विमहितेहिं संवच्छरेहिं जाणाहि । थिर-वलिक-घुयकारे अतिवहुमच्चत्यकारे य ॥ १० ॥ सव्वेसिं भावाणं चिरणिव्यत्तीय जाण वरसाणि । जोतिसमंडल-पुढवीमंडलं एकपके य ॥ ११ ॥ णगरणिवेसकतेसु य पासादुद्धी-गदीकधायं वा । हत्यीणं व पदेसू भवंति संवच्छरुप्पाता ।। १२ ।। १ रद्धो कु ह० त० ॥ २ 'कीडा य द है. त• विना ॥ ३ °पच्छणा ई० त० ॥ ४°यवंघेसु है. तः विना ॥ ५ वेयोचयफपु ६० त० ॥ ६°सु उभयं ति च है. त० ॥७ गययई जोगवई जोतिस है. त० ॥ ८ जलपति है. त० ॥ ९'तपणिए वणि १० त०॥ 30 २४० 5 - 10 - अंगविज्ञापइणयं [णबम पडलं हत्यी पव्वतमत्तो असे य भवंति मालवंतो त्ति । यसमो य हत्यिमेत्तो त्ति पेंति संवच्छरुप्पाता ॥ १३ ॥ पक्खीसु माणुसेसु य कीडेसु चतुप्पदेसु य वघेव । पुष्फफ्ले दवेमु य वस्साणि अतिप्पमाणेसु ॥ १४ ॥ अतिकायेसु वि य तथा जति काया पिंडिता व गणिता वा । तति वरसा तव्या भवंति वस्सप्पमाणम्मि ।।१५।। वस्मगगणाविभंग पण्णरसविघं पुणो वि वोच्छामि । पंचहि वि मूलपत्यू एकेण तथा विभंगेणं ॥ १६ ॥ मिण्णदसम्खमाणं वरसाण पुणो मुहुत्तवम्गम्मि । दस चत्तारि य वरसाणि जाण दिवसप्पमाणेसु ॥ १७ ॥ पण्गरम चेर यस्सा पक्वपमाणेण होति णातव्या । मासपमाणे तीसा पत्ता पण्णा य सही य ॥ १८॥ सही व सत्तरी वा असिती परती सयं च जाणेनो । यस्सपमाणुप्पाते वरसाण सहस्सयग्गे वा ॥१९॥ मुदुत्तप्पमाणमसारे तिण्णेव भयंति वस्साणि । छम्मासमसारेसु तु तध य महासारवंतेसु ॥ २० ॥ दिवसप्पमाणमसारे दस यस्साणि तु भवंति णेयाणि । चोइस मज्झिमसारे वीसा य भवे महासारे ॥ २१ ॥ पक्सपमाणमसारे पण्णरसेव तु हवंति वरसाणि । तीसं व मझसारे पणतालीसा महासारे ॥ २२ ॥ मासं पमाणसारे तीसा पत्ता य मन्झसारम्मि । पण्णासा सट्ठी या मासपमाणे महासारे ॥ २३ ।। परसपमाणमसारे सही या सत्तरि व्य यासाणि । मन्झिमकम्मि असीती युती व सतं महासारे ॥ २४ ॥ कोडी अपरिमिनं या अपरिमितेहिं मुण सव्वभावेहिं । ऊणाधिको दसाहो संजोगविहीहिं योघन्यो ।॥ २५ ॥ जे पुर्व उप्पण्णा पंचविधा विसमकं उदीरंति । जे आसण्णा बहुका धुया य ते वग्गमूलाणि ॥ २६ ॥ ति मिस्सा उग्घाया पंचविहा विसमकं उदीरति । जे आसण्णा बहुका घुना य ते यग्गमूलाणि ॥२७॥ जे योगा जे तुला दूरे पच्छा य जे उदीरति । ते यस्सदसक्साणं वगग्गं होति णातव्यं ॥ २८ ॥ पस्सपमाणुप्पाता जति वति यरसाणि होति अंगेसु । जति मूले विण्णाते पुगरवि एते उदीरति ॥ २९ ।। मासपमाणुप्पाता जति तति मासा हवंति अंगेसु । जति मूले विण्याते पुणरवि एते उदीरति ॥ ३०॥ सपमाणुप्पाया जति तति पक्सा हवंति अंगेसु । जति मूले विण्णाए पुणरवि एए उदीरति ॥३१।। " वियसपमाणुष्पाता जति तति दिवसा हवंति अंगेसु । जति दिवसदससाणं पुणरवि एते उदीरति ॥ ३२ ॥ जति तु मुहत्वपमाणा पति तु मुहुत्ता हवंति अंगेसु । जति वरसदसक्साणं पुणरवि एते उदीरति ।। ३३ ।। मूटदसखे ऊणे दसऽह यस्साणि अग्गकं होति । मासा या पक्सा या दिवस-मुहत्ता य णातव्या ।। ३४ ॥ पस्माणि य विष्याते फेयविया फेत्तियाणि वि पुणो वि । वायतिया गावन्या कतम्मि पण्णाविसेसम्मि ॥ ३५ ॥ मुमाणि पादराणि य जति दव्याणि गणगागते होति । तति यस्सा णातव्या परसा दियसा मुहत्ता पा ॥३६॥ जप कालो धघ लामो वध य सुहं जीवियं तप य दिग्धं । तप दव्याण सारो वध ठाणगुणा य योपव्या ॥३७॥ ॥ पडलं८॥ छ । a - 30 [णवमं पडलं] पामुत्त निर्माचं ति य मोग निसदो तपेय यिमियं ति । मंतो अरदम्स ति य अपरिमितो जायते पालो॥१॥ दुपगं पर यतिरिपतनि गुपितं वि । एयादीण सरा पहिल्या दिग्पकालरम ॥२॥ पग-पग-परासी र जुटे प मध्यराणा । अपरिमिता उमाया पपरिगिवे होवि फालम्निम ॥३॥ मोटो बेहो ममयो परयो पामो दधेष कामो लि । अपरिमिवा पोपच्या अस्मित्तममासयग्गेमु ।। ४ ।। पर गंपोलियो महानगो बाउ नियोति। एवं देगो ति य जगादो ति कालो अपरिमेत्रो।। ५ ।। "मामा...:२पतम्या...॥ लिपिनोऽम भो... एपरतले. ४गरिधानो २०१...र. ५मिग..ना: पपिए परिपाई तिमपि1...
- दसमं पडलं] एगूणसट्ठिमो कालज्झाओ २५१. चिंता मोरधो ति य हितयागूतं ति अंधकारो ति । ठड्याऽऽवरितं अंतेपुर ति सुद्धी समग्गो त्ति ॥६॥ वीयं रासी पेयोलितं ति भरित ति संत ति । अणुमाणं संकं ति य अपरिमितो जायते कालो ॥ ७ ॥ सब्वे जीवणिकाया अचला य अविकपिणो चेव । अपरिमिता णातव्या कायसमासोवलद्धीयं ॥ ८॥ पुदवि दगं गणि मारुय आकासं सह (तह) य मूलजोणीओ। अपरिमिता णातव्या कायसमासोवलद्धीयं ॥ ९॥ निबट्टणा विभत्ता एते ज्वेव तु भवंति संखेजा । अविभत्ता य अणियट्टिता य ते चेव संखेना ॥ १० ॥ देविड्डी देवजुती पलितोयम सागरोयमं व त्ति । कोसो [य] णिधि त्ति महाणिधि त्ति कालो अपरिमेनो ॥११॥ अतिअग्गी अतिवातो अतिवासं भेदितं डमरितं ति । सजीव-जीवाणं अतिउदयं सम्बदव्याणं ॥ १२ ॥ अतिपेम्ममतिपदोसो अतिथुति-अतिर्गजियकधासु । अंतिसदे - अतिअव्याउले य कालो अपरिमेजो ॥१३॥ अलसमभारों मीलं अतिक्मिणो मंथरो त्ति वा सद्दो । मज्झत्यो चि पमत्तो चि पंगुलो दिग्धपस्सि त्ति ॥१४॥ 10 एवतिया सव्वे चिरकारी जे चिराहि व भवंति । एतेसिं उप्पत्तीय दीहकालो हवइ यो ॥ १५ ॥ साहसिको मेंहावी लहुको सद्धो त्ति मुक्कइत्यो त्ति । चंडो सूरो दच्छो ति चेव सिग्यो हवति कालो ॥१६॥ आदि गिधणं च जस्स तु ण णजते रणज्जते - य वृत्तंतो। एरिसका उप्पाता विण्णातव्या अगंतत्ते ॥१७॥ गम्भा सुद्धो मासे जावजीवे तवे य नियमे य । कोमारवंभचेरे य अणंतं णिहिसे कालं ॥ १८ ॥ पाली मेरा सीमंतिक त्ति सुगति चि छिण्णाथो त्ति । पागारो फलिहो ति य वति त्ति कालो गिरुरो ति ॥१९॥ 15 फालम्मिणिरुद्धम्मि उ विटं आगत समागतं घी वि। लद्धं वा उप्पण्णं तं वा वि स आगते पुच्छियं सव्वं ॥ २० ॥ जं जापतितं लभती मागति तं च दिसती ताघे । जं इच्छति तं उपजते य पडिपुच्छणाकाले ॥ २१ ॥ " चिच्छते करेति य कम्मं सिप्पं णयं विभंग वा । [............] णिप्पधं च गाणामिगेमणं वा ॥२२॥ आहारे णीहारे सरीरमभंवरे व मज्झे या । सयमप्पणो पररस व मित्तममित्तत्स वा किंचि ।। २३ ॥ इच्छति विसयगुणं वा कंचि धम्म-ऽत्थ-कामजोगं वा । अगं वा सुभमसुमं तं चेत्र णामं च तवेलं ॥ २४ ॥ सबम्मि कडे दिण्णे दिखे सम्माणिते या वि । मणदुक्खं णिच्छिण्णं संपत्तिं इच्छितं जाण ॥ २५ ॥ इच्छितसंपत्तीसु वि तसकायाणं च थावराण च । तंवेलमुवणतासु तु उबवण्गत्यं वियाणेजा ॥ २६ ॥ सजीय-जीवेसु य उपभोगेसु वि य माणुसाणं पि । तवेलमुवणतेसु य उपवण्णत्थं वियाणेनो ॥ २७ ॥ ॥ पडलं [णवमे] ॥९॥छ॥ 20 25 [दसमं पडलं] संयच्छरं महामंडलेसु मन्झिमगमंडले मासं । खुइलगमंडलेसु य अहोरत्तं वियाणेनो ॥ १ ॥ पक्सत्तमंडले दागमंडले चंदमंडले मासा । [ .] सूरमंडले" वत्समो जाणे ॥ २ ॥ जाणेघ मंडलेसु तिविधेसु खुडलग-मझिम-महंते । दिवसं पक्वं छम्मासमेव वित्यारजोगेगं ॥३॥ १ पुरम्मि सु . १०॥ २ वेया है. त• ॥ ३°तं निसंमंति है. त• विना ॥ ४ अग्गिमा हरिना। ५°णिजं ठियायए पेय है. त.॥६°गन्धिय हत•॥ ७- एतचिहान्तर्गतः पाठ- ह.त. नाति ॥ ८ मटारो है.त. विना ॥ ९चंदो है. त• बिना। १०- एलबिहान्तर्गत पदे है. द. नास्ति । ११ सुमगम्मिछि.त.॥ १२ या यि । आगते पुच्उियं सव्यं लामालामं वियागरे ॥ २० ॥ जंजाय वि.॥ १३ हसचिहान्तर्गतः पास है.त. एप पर्वते ॥ १४ जं तिच्छते है. ६. विना ॥ १५ मिमतणं सं ३ पु.॥ १६°लदासम है• त• ॥ १७ ले पुदामंडले पस्सन.॥ १८'मणसे ह. स.विना । भंग०३१ 1 २४२ 1 । 10 अंगविजापइण्णय [एक्कारसमे पडलं दारगकीलणगेसु वि चतुचकीया भवेज यवत्ती । चत्तारि अहोरत्ते व जाण चत्तारि वा मासे ॥ ४ ॥ दारककीलणगेसु वि वे चक्कलगाणि होति पुत्ताणि । वे होति का अहोरत्ता वे वा मासा विधीयते ॥ ५॥ पहंकैक-चालगे दिवसे मासे व जाण चत्वारि । धाडीचके मासो वस्सं तु भवे सकडचक्के ॥ ६॥ एतेग कारणेण तु मूलं कालस्स सुद्दु कातव्यं । जम्मि भांति मुहुत्ता दिवसा मासा व वस्सा वा ॥ ७॥ पुष्फ-फल-भूसण-उच्छादणे य उपकरण भत्त पाणे वा । सजीवा-ऽजीवं वा उप्पजति जं णिमित्तम्मि ॥ ८ ॥ उघ तू रससंभूतं जघ य महग्धं जहाँ महासारं । जध जाती अविसिढे तध दिग्धं णिहिसे कालं ॥ ९ ॥ जे फसका जे य विपुलसरीरा ते रसदीहकालभूया । विपुलसरीरेसु य जे कसका दिग्घसकालजुता ॥ १० ॥ सिग्घमणिहप्पाते ओयवति सिग्घमो अणिहरस । अभिलसितसिग्घेलभो सिग्धं इट्टोपपत्तीसु ॥ ११ ॥ जंघ मूलं तघ योगं जध य समग्धं अजातिमंतं वा । जघ सुलभमपसारं तध थोगं णिहिसे कालं ॥ १२ ॥ पीतिकरे अणुबद्धो भवति धणइधणसुइरस ! दुक्खस्स वि अणुबंधो भवति अणिढाणुबंधेसु ॥ १३ ॥ परग्ग-सरस-णप-तरुणगेसु दिवसा हवंति पैसा या । परिणतजुण्णगते रसेसु मास-संवच्छरे जाण ॥ १४ ॥ मासपमाणे य महुम्मि उत्तविसमं व यमलिते मासा । विसमेघेसु तु पक्खा समागमागमसैमेसु वस्साणि ॥१५॥ जं दिस्सते छलंसं उज्यंते छ उदू वि जाणेजा । जं वा सणणा असितं तं वा तं ते उदुं जाण ॥ १६ ॥ "चुंभलया पेलगमुकुडवेढणे मालिकासु वट्टासु । सीसायकम्मि सव्यम्मि उत्तमत्यं विजाणीया ॥ १७ ॥ पुमिसु तु पुप्फोरफेस मासा व होति घासा या । पुष्फोयफत्थिणामे रातीओ होति पक्खा पा || १८ ॥ संयच्छरे, कुडवेढणेमु साराणुसारतं य पदे । पुष्फोयकेसु मासा पसा दिवसा य णातव्या ॥ १९ ॥ असे मल्ले सव्वम्मि मुहुत्ता अहसरभावेणं । परिमलिव-मिलाणेण य विलंवितं कालमो जाण ॥ २० ॥ एसेय सव्यव्येसु गमो पाणे व भोयणे या वि । सहे या रुवे वा एएण गमेण गंतव्यं ॥ २१ ॥ ॥ [पडलं दसमं] ॥ १०॥ छ॥ 15 20 [एकारसमं पडलं पुरिमंगाणामासे पुव्यदिसाए य ओपलद्धीए । फत्तिय मग्गसिर-पोसमासेसु जाणीया ॥ १॥ संबच्याटीयं भग्गेयं मम्गसीस पोसं पा। [जाणे ] संघच्छरमो पुनदिसि पुरस्थिमंगेसु ॥ २॥ दरिगगतामासे पुणो य दक्सिगदिसोरटद्धीयं । 6 माहं - फरगुण चेत्तं वेसाई या पदे मासं ॥३॥ संयच्छरसदीयं संयच्छर-माह-फरगुणं या वि । चेत्तं पेसाई या दक्सिगदिसि दरिसगंगेसु ॥४॥ पच्छिमगत्तामासे अपरदिसायं च ओयलद्धीयं । जेद्वामूला-ऽऽसाढा-सावणमासं च मासेम् ॥ ५ ॥ संयएरलद्धीयं संपच्यरमिंद विरस विष्टुं या । संयच्छरमो पूया पच्छिमदिसि पच्छिमंगेमु ॥ ६ ॥ पामे गामागे पुमो य उत्तरदिसोयलदीयं । पोहपरसोनं या मासं मासेमु जाणीया ।। ७ ॥ पोहपदं पा संप तु संपच्चरं च परसोय । संयच्छरलद्धीयं पारदिसि पामगोमु ॥ ८॥ १उपनिरनिा ॥ २ पिन्वर्ग: पामता बने । ३ °काच...॥ ४पपपरसा पार.. ॥ ५'दा सदामामे t...॥६'रजुना • ना ७ पलामा सि..॥ ८ जघुमूलतप. योगजप..ना ९मयति रायणि..॥१० पश्यो..॥ ११°सम घपमलिए मासात-पिना। १२ गमपए... १३'सगुर..॥ १४ असितं पाया ..॥ १५ गुपल पायेल...." २९ मामासे तु. T• HDदुर'..॥ १८ गणे म... दिना ॥ ९अण्णसर.. ना २.-:-.त• म २१ पसेरोए त वारसमं पडलं] एगूणसट्ठिमो कालज्झाओ २४३ उद्धंगाणामासे पादुभावे य थावराणं तु । फग्गुणमासाढं या पोट्ठपदं वा वदे मासं ॥९ संवच्छरलद्धीय फग्गुणमासाढ पोट्टपादो वा । संवच्छरमो बूया दढ-थावर-सासते भावे ॥१०॥ चलमंगाणामासे पादुब्भावे य चंचलाणं तु । सावणमासं चूया मासुप्पातोपलद्धीय ॥ ११ ॥ चलमंगाणामासे पादुब्भावे य चंचलाणं च । संवच्छरलद्धीयं सावणसंवच्छरं वूया ॥ १२ ॥ सावण पोट्ठपदं वा अस्सोयं कत्तियं च मासेसु । पुण्णदगभायणेसु य निद्धंगाणं च आमासे ॥ १३ ॥ 5 सावण पोट्ठपदं वा अस्सोयं कत्तियं च जाणीया । संवच्छरमो बूया गिद्धे वासोवलिंगे य ॥ १४ ॥ चेत्तं वेसाहं या जेट्ठामूलं तथैव आसाढं । मासं मासेसु पदे रुक्खे गिम्होवलिंगे य ॥ १५ ॥ मग्गसिर पोसमासं माहं वा फरगुणं व जाणीया । मासेसु सीतभावे तघेव हेमंतलिंगे य ॥ १६ ॥ तं चेव जधुद्दिढे संवच्छरलद्धियं च जाणेजो । संवच्छरे तु चउरो सीते हेमंतलिंगे य ॥ १७ ॥ णीहारेसु तु पक्खा उजुभावेसु पुण संथिते मासा । अहोरत्ते [ पुण] पक्खं वदे तु पक्खप्पमाणम्मि ||१८|| 10 ॥[पडलं एकारसमं] ॥ ११॥ छ । 16 20 [वारसमं पडलं] तैरुणंकुर-किसल-पत्तलकेहि अंडकित-जालकेहि वि य । आसित-पोसित-ओकुंभआगमे पाउसं जाणे ॥ १ ॥ अञ्जण-कुडय-कतंचे सिलिंध-कंदलि-कुडुवके चेव । दडुर-मयूरंगजितपडिरूवे पाउसं यूया ॥ २ ॥ 'खेत्तप्पवत्तणे वीजणिग्गमे वीयवावणे यावि । गहकरण-पजणेसु य उदगपरणालिकरणे य ॥ ३ ॥ वासारत्तिकभंडगहसुयणकावरुत्तकहणेसु । घाहणपडिसामण्णेसु य जलं ति णवपाउसं वूया ॥ ४ ॥ साढिकसीहलंबंधयतववेसिसगणिअगणिकक्खदिसेसु । गिट्ठलसंलावेसु य आसाढं मासमो वूया ॥ ५ ॥ हरितं व सहलं ति व पविरूढतणं ति जातसस्सं ति । णिद्दिज्जति सस्सं ति य सावणमासं विजाणीया ॥६॥ पुण्णपलोस्थितदकमायणेसु अच्छायकुप्पवट्टे य । यद्दलफअच्छाणीक ति पोहपादो भवति मासो ॥ ७ ॥ मज्झविगाढे ४ उलुवितो वीलणि" ति य किलिण्णे | अभिवद्धमागगेण य पोट्ठपदं मासमो जाणे ॥ ८॥ इंदसयणे य इंदमहभंडके इंदमोवकरणे य । इंदधणुइंदगामेण पोट्टपादो भवति मासो ॥९॥ साली गम्भणिका च त्ति तित्ति सुज्जते य वीहित्तिकं । चूया पक्क ति य तिला य ओपुष्फित ति वदे ॥१०॥ अरसाइस्सेइ णयमिक त्ति णीरोणिका पीयं ति । अस्सोयं पुण मासं अब्मुत्थाणे णरपतीणं ।। ११ ॥ दारग्याडैि कत्तिय अभया माहातयो सजीयंती । बहुलं मासं चूया वधमोक्खे बंधमोखे य ॥ १२ ॥ उयवासो दाणं ति य देवतपूय त्ति साधुपूय त्ति । वहुलं मासं घूया उदुंबरमुयो विबुद्धो ति ॥ १३ ॥ णिव्यहमच्छमुदगं विमलणभं सारसा सुरा सरदो । दीवा हसति तध दंतिक ति दाणं वतोयवासो त्ति ॥१४॥ देवस्स या वि थेवणं उदुंवरभूयो विवुद्धो त्ति । यसागाघा उवरि उपयुत्ते पुच्छंते सो कालो होति योपव्यो ॥१५॥ आधारेतव्यं चाहिरेण तम्मि तु भवंति जे भावा । तज्जाता संख्या भवंति ते" तं पि कालाण ॥ १६ ॥ पंचिंदिएहिं पंचहिं सद्द-फरिस-रस-रूव-गंवेहिं । अग्गिकते अग्गिम्मि य बहुलं मासं विज्ञाणेनो ॥ १७ ॥ पच्छा जक्सो धणकं सुरयितपडदीवरुक्सो त्ति । मुण मम्गसीसमासं इल्लिमकडे धमकमदे ॥ १८॥ १भागे है. त.. २ हसचिहान्तर्गतोऽयं श्येक है. त• एवं वर्तते ॥ ३ 'मासे है. त• विना ॥ ४'मासे है. त.॥ ५तरुणकिलरसकिलपत्तकेहि है. त•॥ ६°रमजि' ई. त•॥ ७ सत्तप्पवणे . त.॥ ८°पहणा. त•॥ ९°सुतणकाधमत्तगह •• विना ॥ १० लवघलयविसेअगणिक ह.व. मिना ॥ १.णिह. त• पिना। २२ लणेति य है. द. विना ।। १३ सालीगमणकारसितंति सु...त.॥ १४°स्सा अले. त.॥ १५पोरा. स.॥ १६ लाणं तिह.स.॥ १७ सहो. त• पिना ॥ १८ जाणं १. तु. विना ॥ १९ सेयं पि.तु.॥ । 25 । 30 ४४ 5 10 अंगविजापइण्णय [तेरस पडल संगलिग खीरदुमे चतुप्पदे खीरिणीसु खीरेसु । मुण मग्गसीसमास सोम्मे या सोम्मणामे या ॥ १९॥ जाणपट्टण-यत्तप्पवणे पुरसरसमलगे य । मुण मगसीसमासं गिरिजण्णे भूमिजागे य ॥२०॥ सीतं हिमं ति वा सीवलं ति दीहमहिला णिसा दीहा । थीउत्तरे जुगलगे य एत्थ पोसो भवति मासो ॥२१॥ इंगालसगडिका-अम्गिचुल्लके तावणे य अग्गिम्मि । गम्भघर-कंवलणिसेवणे य पोसो हवति मासो ॥ २२ ॥ थीणं महाजणे पुरिसद्धणे माहमासमो यूया ! 'पोतकधमासिकत्ये सद्धे ओछाडिते चेव ॥ २३ ॥ सव्वम्मि सीतभावे सायं गीत-अग्गिसेवणाए य । एत्य वि माहो मासो अणोजवासं विसेसो वा ॥२४॥ पर-णारीमिधुणेगवस्स उत्सवे मेधुणप्पसंगेसु । दित्तेसु य मुदितेसु य फरगुणमासं वियाणेज्जा ॥ २५ ॥ सीतक्खयपरिणामे उवगमेसु वि य उहभावरस । णभुण्हा सीतेसु य फग्गुणमासं वियाणीया ॥२६ ।। आपाणगप्पमोदे उकुहे गीत वादिते हसिते । परमुयसद्दे चूतकुसुमे य मुंण फग्गुणं मासं ॥२७॥ जवकिंदीवर-सामाककुसुम-अंदोलका वसंतो त्ति । फग्गुणमासं धूया मत्तो अंदोलति जणो ति ॥२८॥ मिधुणसमागम-मेधुणकधासु सन्वेसु कोमलंगीसु । फग्गुणमासं वूया छणरतमंडणासु वि य ॥२९॥ उस्सयमत्तुम्मत्ते वसंतलिंगे य कामलिंगे य । एत्य वि चेत्तो मासो समे य पुण्णाम-थीणामे ॥३०॥ समुदयमणुषद्धेसु य वसंतलिंगे य कामलिंगे य । चेत्तं मासं धूया समे य थीणाम-पुण्णामे ॥ ३१ ॥ यत्थगते रुवगते चितगते चित्तयण्णजोगे य । चेत्तं मासं बूया चेत्तो विविध यऽलंकारे ॥ ३२ ॥ पुरसुत्तरे जुगलगे अव-गोधुमसंगहे गहपतीणं । मुण वेसाहं मासं णिदाघमासे उवणतम्मि ॥ ३३ ॥ पाडल-मल्लिक-वट्टिक-सीतजलनिसेवणेसु य गराणं । मुण बेसाहं मासं वीयणके वालवेटे य ॥ ३४ ॥ णिहड्डधण्णतावे अतिउण्हो वा पवाति पातो त्ति । तण्डा मगतह चिय जेट्टामूलो हयति मासो ॥ ३५॥ तुच्छेसु ये लुक्खेसु य दगमायण-गट्ठभायणेसु वि य । णदि-फूष-वलागेसु वि जेवामूलो हवति कालो ॥३६॥ अण्दिकरकउत्योऽभितप्पणे छत्ते पायाक्सयं । आपक्खये व णेहक्खए व जेहो त्ति वा मासो ॥३७ ।। गिद्धे यासारत्तं हेमंतं व मुण सीतवातं सीवभावणं । उण्हेहि य लुक्खेहि य गिम्हं सुहेहि य मुणेहिं ॥ ३८॥ जे जम्मि तम्मि भावे ससकाया थापरा व सव्वे वि । तेसिं पादुन्भावेण येय तं तं उर्दु जाण ॥३९॥ पुष्फ-फल-भूसण-उच्छादणेहि उवकरण-भत्त-पाणेहिं । तं तं उदुं वियाणे जे जम्मि उदुम्मि भयमाणं ॥४०॥ देव-मगुस्सा पक्ती चतुप्पदा जलचरा थलचरा य । जे जं सोम॑ति उदुं तेहि तु तं तं उर्दु जाण ॥४१॥ सनीया-जीनाणं एवलद्धीय वि उ सव्यभावाणं । तं तं उदुं वियाणे जं जस्स उदुस्स भयमाणं ॥ ४२ ॥ ॥पटलं यारसमे ॥१२॥छ॥ 16 20 - 25 30 [तेरसमं पडलं] मध्ये रूयविसेसा न घणविसेसा - य पतिविसेसेणं । सुनत्तमविण्णावा भरंति कालरस पडिरूवं ।। १ ॥ मव्ये यणविसेसा स्थविसेसा य पतिविभागणं । अतं विष्णाता भांति जोण्हस्स पहिरूयं ॥ २॥ असीणि पंद-सूरा पग्गी दीयो पभंकरा सव्वे । णाणुनोगे तेयो पम त्ति जोहस्स पडिरूयं ॥ ३ ॥ पक्सुपणासे जोती पगरसते पंद-सूरमत्यमणे । अण्णावमविण्यातेण य कालरस पडिरूयं ॥ ४ ॥ मुझे ति पंढरं वि य विमलं उनोतितं पमा यति । दियसो त्ति पीरयो ति य पडिरूयं जोण्डपक्सरस ॥५॥ मागोलवियाला पभमंति-नीलं तिमिरंधर ति। रत्ती सत्तासो ति य पडिरूयं कालपक्सस्स ॥६॥ १पतकधमसिस्टे..॥ २ यासं ति भस्सोय है. त• पिना ॥ ३ पौडयम..॥४य सुण्देउ य ...॥ ५८ प पार .. मिना ॥ ६५ एक्षिान्तर्गत पद १.१. मास्ति ।
6 -- 10 14.. पण्णारंसमं पडलं.] एगूणसट्रिमो कालज्झाओ २४५ थकितं रित्तं ति व लंछितं ति पडिसामित ति गिक्खितं । अव्यत्तमदेसं ति य पडिरूवं कालपक्सस्स ॥७॥ उभिण्णं मुकमवंगुतं ति पागडियं दंसियं चहिद्धं वा । सुव्वत्तं दिसति पागडं ति जोण्हरस पडिरूवं ॥ ८॥ खुन्यति मारमरीति सुज्झतित्ति जोण्हैस्स [जाण] पट्टवणं । विमलं सुद्धं परिमजितं ति जोण्हस्स पडिरूवं ॥९॥ मइलतिकेणं कितकालगो त्ति कालरस जाण पट्ठमणं । मइले कालकियं ति य भवंति संपुण्णकालरस ॥ १० ॥ ॥ पडलं [तेरसमं] ॥१३॥ छ । [चोइसमं पडलं] एगदिवसप्पमाणे एगंगे एगमाभरणगते ये । एकंगियउपकरणे सत्तेसु य एकचारीसु ॥ १ ॥ 'विंगुलिगहणे विसु एक्कएसु आभरणएसु जमलेसु । मिधुणचरसत्तजमले जुवकरणे वेडिओ कालो ॥२॥ भुमगंतर-णासग्गे तिक-हणु-मज्झक्खयंतरे चेव । पोरिसि संवस्थि-सीसे लिंगुलिगहणे तियं वूया ॥ ३ ॥ ओणतमुत्थितमन्जियते य उल्लोइते [य] हसिते य । गट्टे गीते घाइते चउके य चतुरंता ॥ ४ ॥ चउरंगुलिगहणेसु य [............] चउपुडागते य । पादतल-करतले विजुगलेसु चतुरत्तिओ कालो ॥५॥ पंचंगुलिगणेण ये जणहितयाणं व गहणजोगेण । सयणा-ऽऽसणे सपुरिसे य पंचरत्तो भवति कालो ॥ ६ ॥ गुप्फ मणिवैधगहणेसु विसु य तिगेसु य तधेव जाणीया । विअसहिते य चउके वियाण छरत्तियं कालं ॥ ७॥ तियसहिते [य] चउक्के वितिकम्मि य एक्कएण सहितम्मि । एकसहितेसु तिसु वा बिएसु सत्ताहिओ कालो ॥८॥ अहसु य एकएसुं विसु य चउकेसु घउसु व विएसु ।। ॥९115 1] तिगतिगुणे णवगणणे कते य जाणे णवाई ति ॥ १० ॥ पंचविगेसु दसाहो दसाहिभागे दसक्खगणिते य । कच्छचकंजलिकरणे उँवणीवदुहत्थलभे य॥ ११ ॥ पंचसहिते दसक्खे मासद्धे पक्खिते य पक्खे य । पण्णरसाई जाणे पण रस]सु एक्कगणतेसु ॥ १२ ॥ ॥ पडलं [चोद्दसमं] ॥ १४॥ छ । [पण्णरसमं पडलं] पुण्णामेसु य दिवसं थीणामेहि रयणिं वियाणेजो। दिवसं दिवाचरेहि य रची रतिविचारेहि ॥१॥ दिवसकरेण तु दिवसं रयणिकरेण रयणि वियाणेनो । सुजोदएण दिवसं रत्तिं चंदोदए जाण ॥२॥ उण्हेण जाण दिवसं रत्तिं सीतेण संविजाणेजो। उज्जोवेण य दिवसं रत्तिं पुण अंधकारेणं ॥३॥ सुजपरिवेस-इंदघणु-रायिवासेण दिवसकं जाणे । सोमपरिवेस-विजुत-उक्कापातेण रत्तिं तु ॥४॥ पासंडजणोक्यारोपलद्धीय दिवसमो वियाणेजो। चोराऽऽरक्खिगचरितोपलद्धीयं रत्तिमो जाण ॥ ५॥ समगजंण-सावकजणस्साऽऽहारे दिवसमो वियाणेजो । आजीवकआहारोवलद्धीयं रत्तिमो जाण ॥६॥ दिवसाहारविधी अग्गिज ति दिवसो त्ति संवियाणीया । कजोयदीविकदीवतारकादंसणे रत्तिं ॥७॥ पढिसामित-णिक्खित्ते ठइया-ऽऽवरितं ति रत्तिमो जाण । मुक्कमपंगुत-पागडिय-दंसिते दिवसमो जाण ॥ ८॥ पयलाइत पासुत्ते सयिते रत्तिं वियाणेजो । वुहुट्टितेसु दिवसं दिवसकडे कम्मजोगे य ॥९॥ दिवरत्ति भूतरत्ती तघेय आणंदुसव्वरत्ति त्ति । रयणि ति सव्यरि त्ति य णिस ति सणता णिवियरत्ति ॥१०॥ 30 पुरिसे पुरिसोवकपुरिर दियसमो जाणे । "महिलाभरणे दुव्वेसु महिलिका भवति रत्तिमुहं ॥११॥ दिवसको दिवसकम्मकं ति णिन्यायदिवसो ति । आय-व्ययदिवसो ति य दिवसेसु सम चिये सदा ॥१२॥ ॥ पडलं [पण्णरसमं] ॥ १५॥ छ । 20 25 - १ छकिये है० त० ॥२-1- एतचिहान्तर्गतः पाठः है• त• नास्ति ॥ ३ विपुलि° • त॥ ४पादगलकर' सप.॥ ५य घट्ठिययाणे है० त०॥ ६ उयकरणीचउहत्य ६० त०॥ ७ पण्णगेसु दि° • त• ॥ ८ मुजदिपरियसईदवणु है. त• ॥ ९ तुझुट्टियेसु है. त•॥ १० गहियाम है. त•॥
२४६ 5 । अंगविजापइण्णय [सत्तरसमं पडलं [सोलसमं पडलं] पारस मासा संवच्छरो ति भागेसु तीसती मासो । पण्णरसेव तु पक्खो तीसं भागे अहोरत्तं ॥१॥ एतस्स अहोरत्तस्स पुणो तीसतिविधस्स णातव्यं । राति-दिवसपरिवडी हाणी य पुणो गणेयव्वा ॥२॥ राती दिवसं च पुणो वड्डी हाणी य सुटु णातूणं । सव्वे वि अहोरत्ता वेलाहि पुणो गणेतव्वा ॥ ३ ॥ एत्तो तिण्हि मुहुत्ता वेसंझाउढिओ य मझहो । छ प्पुव्वण्हो वुत्तो छ अवरण्हो मुहुत्तो उ ॥ ४॥ विमुहुत्तो मागधओ विमुद्दत्तो हवति पातरासो वि । अणुमज्झण्हो विमुहुत्तमो त्ति तिविधो य पुव्वण्हो ॥५॥ किं वा वत्ते सूरम्मि दिवाभातो वि हवति विमुहुत्तो । अवरण्हो बिमुहुत्तोणिये सूरो विबिमुहुत्तो॥६॥ संजोगेति तिमिरहा उर्सेतो दिणकरो दिसं पुवं । तेण मुणे पुचण्डं पुव्यदिसायोवलद्धीय ॥ ७ ॥ संजोगेति तिमिरहा मज्झण्हे दक्खिणेण पञ्चतो । तेण मुणे मज्झण्हं तु दक्खिणदिसोवलद्धीय ॥ ८॥ संजोयेति तिमिरहा अवरदिसं दक्खिणेण वचंतो । तेण मुणे अवरण्हं अवरदिसायोवलद्धीय ॥ ९॥ पुव्वदिसाए इंदो तस्सुवलंभेण जाण पुव्यण्डं । अवरदिसाए वरुणो तस्सुवलंभेण अवरण्हं ॥१०॥ दक्खिणतो पेयवती उत्तरतो धणवती दिसाधिवती । एतेसिं उवलद्धीय जाण मज्झतियं वेलं ॥ ११ ॥ जं जिस्से उप्पज्जति दिसाय बिपदं चतुप्पदं वा वि । पुप्फ फलं दव्याणि च तेण तु तं तं दिसं जाण ॥ १२॥ ॥ पडलं [सोलसमं] ॥ १६॥ छ । 10 । 16 20 23 [सत्तरसमं पडलं] मइलब्भे रत्तकदसणम्मि संझं तु पच्छिमं जाण । अभिणवरत्तकसंदसणम्मि पुन्या भवति संझा ॥१॥ रत्तच्छादणापावघडिकुंभे धेरत्तकंवलाणं च । पुष्फ-फल-रत्तमणिकेण कुंभेण य जाण सूरुदयं ॥२॥ रत्तंवरुत्तरिजे य दारगे रत्तमजणिजोगो । रत्तणियत्याउपणिग्गमे य सुजोया वेला ॥३॥ पुण्गामाणुगमणे पुण्णामेण खचिते य थीणामे । ओणायकवाहुपावियाय सुनोदयणवेला ॥ ४ ॥ संदीवियग्गजलणे य जाण आलोकणे वणदवस्स । रण्यो वि य आगमणेण जाण सुजोदयणवेलं ॥५॥ पालतिलकं घ कण्णतिलगे य तवणिज-पदुमतिलके य । उदितं सूरं जाणे उचणीते रत्तमल्ले य ॥ ६॥ एसाऽऽगतो गरिंदो त्ति सामिको सुपुरिसो त्ति वा बूया । जातं दाणि सणाधं ति जाण अइरुग्गतं सूरं ॥ ७ ॥ देवतपूया-बलिमंगलकरणे सथीवायणकदेवा । विजुद्दीवेण अन्झापणे य मुण मागधं वेलं ॥ ८ ॥ विपणीए सारणेण य पट्ठवणेसु चि य दिवसकम्माणं । भत्तेवत्थोभे दोसिकम्मि मुण माग, वेलं ॥९॥ पालपतपजणेसु य मुद्दधोवण-मुंडकाणुदासेसु । समगजपपारणासु य जाणेजो मागधं घेलं ॥१०॥ ओलिहणंजण-तिलकरण-केसमंडण-पसाधणविधीसु । बालजुवतीजणस्स तु मागधियं वैलमो जाण ॥११॥ सम्मि पातरासे सिद्धवणीते य मुजमाणे य । दुर्बुण्ड्कि-दधिताये अंवेल्सि-विलेपिकादीसु ॥ १२ ॥ फफरपिंडगगंगावत्तगचुचितकयप्पड़ीसु वि य । अंयविकघतउण्हे पोयलिकासिद्धिविद्वीसु ॥ १३ ॥ भतरुजगसिप्पिकजपारसाहारे तरुमजणपातरासे य । मुण पातरासवेलं मझिमिया कूरवेल ति ॥ १४ ॥ जूनाजूनकआढयकसेयकाणं च पातरासो त्ति । फजपसि पातरासे य अणुमज्झण्डं वियाणेनो॥१५॥ मुद्धिकरवसभागमणे यंधचे इति अत्यवेल ति । मग्गो उपहरण ति य अणुमझण्डं बियाणेजो ॥१६॥ आतवछत्तरगहणे जुत्तपसूर्ग विमोयणेगं च । तण्हाइत-मक्ताहासु चेय मम्झण्डवेलं तु ॥ १७ ॥ गिरहति य आदिशो उण्डं मदत्ति गिरससति भूमि । उपहो य याति यातो ति एय मप्रतियं जाणे ॥१८॥ १ मे घेय पाएकंप है. त•॥ २ ओयाणक्यागुप्पतियाय है. त• पिना । ३°उण्णे पोयलिकासित्ति पिट्ठीर. रिना ॥ ४ सयक..॥ 30 एगूणवीसइमं पडलं ] एगूणसट्ठिमो कालज्झाओ २४७ डझंतभूसति कढतु तिरियं ति वणदयग्गिजालो त्ति । रूवाविधो संतप्पते त्ति मझतिक वेलं ॥ १९ ॥ मझो ति मझिमो त्ति य मज्झत्यो मझदेसकं व त्ति । मज्झण्हो मज्झठिय तत त्ति मज्झण्हमेतेहिं ॥२०॥ तत्तस्स य णिव्यवणे सरितोमद्धकपिते पसण्णे य । सिद्धार्वतारणे मज्झिते य उव्वत्तमज्झण्हे ॥ २१ ॥ सव्वणियमहिताणं कयहिकाणं तु भोयणाकाले । पञोवत्तं सूरं जाणे एकसत्तरत्तेसु ॥ २२॥ पहिणगरकम्मजणके ससिद्धकवलिकम्मकरणे य । उजाणभोजभत्तिककते य अवरणहमो जाण ॥ २३ ॥ निग्गंथकयाहारे पञ्चक्खाणे पडिते घेणायं च । पासंडालयवसधीकते य मुण पच्छिमं वेलं ॥२४॥ सम्वदिवाचारीणं पसु-पक्खीणं तु वसतिमधिगमणे 1 पुण्णामाणं च खयेण जाण सूरत्थमणवेलं ॥२५॥ रत्ते पुप्फ-फले भूसणे य अच्छादणे य रत्तम्मि । थीणामेसु य रत्तेसु जाण संझागतं वेलं ॥२६॥ पडलं [सत्तरसमं] ॥ १७॥ छ । 6 10 16 [अट्ठारसमं पडलं] घालाहारविधीहि य मागधियं भत्तवेलिकं जाण । आतुरओसधपाणेसु चेचे मुण भागधं वेलं ॥१॥ खमगजणपारणाअ य जाणेजो दुद्धवेलिका यत्ति । समणजणवायरासे आलोलीवेलिकायं वा ॥२॥ सेडकपढमाहारे जाणेजो आणुतासलं ति । भतकजणपातरासे जाणेजो कूरवेलं ति ॥३॥ वुड्डरसावक-भिक्खुकजणे य मुण पातरासवेलं ति । भिक्खूणाऽऽहारेण य गंडीवेलं वियाणाहि ॥४॥ किंचोवत्तं सूरं णिगंथजणस्स भत्तवेल त्ति । जागु त्ति अण्णपाणे पधिकाणं कासकाणं च ॥ ५ ॥ अच्छादण-पणियगते अपरण्हे (वा)सलिक जाण । णागेहिं णागवेलं पसूहि पसुवेलिकं जाण ॥ ६ ॥ रागेण सायवेलं दीदेहि य दीववेलिकं जाणे । आजीविकमहासारे सामासं वेलिकं जाणे ॥ ७ ॥ 'सुंभलक-सुरा-पुप्फे फले हरितकाण चुण्णणवसेसु । कामुकलिंगोपगतेसु चेव मुण आपदोसो त्ति ॥ ८॥ णिव्वहणे य वधूर्ण जति भूतबलिकम्मकरणे य । पातिढे य बघूर्ण जाणेज्जो आपदोसो ति ॥ ९॥ जामेण जामवेलं भिणं अंविसारिकाहि जाणेजो। चोरेहिं चोरवेलं महापदोसं च रक्खेहिं ॥ १० ॥ पासुत्त-णिसीधं ति य मोण-णिसई तघेव थिमितं ति । मंते अरहस्सं ति य थितडरत्तं वियाणेजो ॥ ११ ॥ उच्छुप्पीलणके मोग्गरसदे जंत-मुसलसद्दे य । मंदिरमंथणगागरसद्दे [य] वियाण गोसगं ॥ १२ ॥ गो-माहिसणिग्गमणे पच्छा(स्था)णे य पधिग-प्पयासीणं । सारइयसालिमद्दणपंतीसह य गोसरगं ॥ १३ ॥ गरदेव-देवपडिबोधणासु संख-पडहायणादेसु । पच्छिमजामं कुक्कुडसहे या जाण गोसग्गं ॥ १४ ॥ मंगलिक-सस्थिवाचक-गोसगिकसंखभाणकेसु वि य । देवथुतिमंगलेसु य तयोधणे चेय तु विभत्तं ॥ १५ ॥ ॥पडलं [अट्ठारसम]॥ १८॥ छ । 20 25 [एगूणवीसइमं पडलं] सीसकलोहेण तु पुहसीसिका अरुणमो य दव्या वि । तंवे तु पुव्यसंझं वियाण सुजोदयं वा वि ॥१॥ तपणिज्न-सुवण्णेण तु सूरमुदॆतमुदितं य जाणेजो । नवकणक-सुयण्णेसु य पुवण्ठं पातरासं था ॥२॥ १ देसमज्झम्मि। मज्झ है. त०॥ २°वचारणे मज्झिते य ओवत्तमज्झण्हो है. त• विना । ३ सव्वतियम- ट्टियाण कयण्दिकालं तु है० त०॥ ४ धयाणं च • त• ॥ ५चैव पुण्णमागयं घेलं ह• त•॥ ६ कासवाणं है• त.॥ ७ वुस है. त• विना । ८चुंभल है. त• विना ।। ९जडिभूत है. त• विना ॥ १० अवसा . तविना ।। ११ चेच ति मध्य • त•॥ १२ तु फुसीसका हं. तविना ॥
२४८ अंगयिजापइण्णय [घीसम पडलं मज्झतिकहितं कंसलोहकेणं व कसभाणे वा । किंचोवत्तं सूरं आमइले कंसलोहम्मि ॥ ३ ॥ उयावरणहमेव तु पावरुप्पिकेण संविजाणाहि । आमइले रुप्पिकके तुपुकेण व जाण अवरहं ॥४॥ अस्थमणवेलकं पि य जाणेजो वट्टलोहेणं । वेकंतकलोहेण य जाणेजो णागवेल त्ति ॥५॥ अरकूडकेण संझं अत्यमितं जाण काललोहेणं । मुदए आपदोस थितऽड्डरत्तं च विक्खणं ॥ ६॥ परिवत्तंगो समां जाणीया पाणकेण सव्वेपा । घंटासद्देण पुणो य जाण गोसगकालं ति ॥ ७॥ ॥ पडलं [एगूणवीसइमं] ॥ १९॥ छ॥ 10 10 S 20. [पीसइमं पडलं] जं जिस्से वेलायं दिसति विपदं चतुप्पदं वा वि । पुरिसो वा इत्थी या सा वेला तेण णातव्या ॥१॥ जो जिस्से वेलाए सही उप्पजति सुव्वती या वि । सा वेला णातव्या तस्सुप्पत्तीय सहस्स ॥२॥ जो जिस्से वेलाए गंधो उप्पजति दिस्सती या वि | सा वेला णातव्या तस्सुप्पत्तीय गंधस्स ॥ ३॥ जंजिस्से वेलाए एवं उप्पजति दिस्सती वा वि । सा वेला णातव्या तस्सुप्पत्तीय रूपस्स ॥ ४ ॥ जो जिस्से वेलाए भक्खो उप्पज्जति लब्भती वा वि । सा वेला णातव्या तस्सुप्पत्तीय भक्खस्स ॥५॥ जंजिस्से वेलाए पाणं उम्पज्जती लभती वा वि । सा वेला णातव्या तस्सुप्पत्तीय पाणस्स ॥ ६॥ जं जीसे लाए दव्वं उप्पजति दिरसती वा वि । सा वेला णातव्वा तस्सुप्पत्तीय दुव्वस्स ॥७॥ जं जीसे वेलाए भंडं उप्पजति दिरसती वा वि । सा वेला णातव्या तस्सुप्पत्तीय भंडस्स ॥ ८॥ जंजीसे वेलाए रयणं उप्पजति दिरसते वा वि । सा वेला णातव्वा तस्सुप्पातरस लद्धीए ॥ ९ ॥ जं जीसे वेलाए पणितं उप्पजति दिरसती वा वि । सा वेला गातव्या तस्सुप्पत्तीय पणितस्स ॥ १० ॥ जं उवकरणं णर-णारीणं उप्पजते [य] जं वेलं । सा वेला णातव्या तस्सुवकरणस्स लद्धीए ॥ ११॥ अब्भतरबाहिरका यं देसं सेक्ते मणुया । सा वेला णातव्वा तस्सुद्देसस्स लद्धीए ॥ १२ ॥ लेई रूवं गणितं विजाथाणाणि सत्थणीतीओ । इस्सत्थत्थरूवगतं जुद्धं चऽतिकिच्छयाणि वि य ॥ १३ ॥ जं जीसे वेलार्य तु मणूसा यं कालं अधीयते । सा वेला णातव्वा तस्सुप्पातस्स लद्धीय ॥ १४ ॥ घंभणवेदज्झयणे पासंडाणं च ससमयज्झयणे । णिगंथाणं च सुयम्मि कालके रासिबद्धेयं ॥ १५॥ जं जिस्से वेलायं यंभण-समणा सुतं अधीयते । सा वेला णातव्या तस्सुप्पातस्स लद्धीए ॥ १६॥ कामगुणे मणुयगुणे सह-प्फरिस-रस-रूव-गंधे य । मदु-कढिग-णिद्ध-रुक्खे फासे सुहे सीतमुण्डे य ॥ १७ ॥ ज़े जिस्से वेलाए णर-णारिगणा सुहं अणुमवंति । सा वेला णातव्वा विसयसुहाणोपपत्तीय ॥१८॥ उपसित-गीताइयाइ-गट्टाइविलसियाणं च । णाडिजित-वैलंबिय-पढिताणि परूवणाओ य ॥ १९॥ जं जिस्से वेलाए कीडं णर-णारिओ णिसेवंति । सा वेला णातव्या तस्सुप्पातरस लद्धीय ॥ २०॥ रामायण-भारधिका तु कहाओ जा य अरहता वत्ता । रायपुरिसाण य जा परकमगुणा य सूराणं ॥ २१ ॥ एता पोराणाओ कधाओ जा जम्मि देस-कालम्मि । वत्ता तु कधीयते सा चेला तेण बोधव्वा ॥ २२ ॥ जं सयमणुमूतं णर-णारिगणेहिं जं च सेसेहिं । लाभा-ऽलाभ जीवित-मरणं दुक्खं सुई वा वि ।। २३ ॥ जं जीसे वेलाए परेण सुयमप्पणा व अणुभूतं । सा वेला णातव्या तस्सुपायरस लद्धीय ॥ २४ ॥ बहिणगरकणिग्गमणे समिद्धजोक-बलिकम्मकरणे य । उज्जाण-भोज-भत्तिक-जत्तागमणेसु य णराणं ॥ २५ ॥ जं जीसे वेलाए उजाणगुणे णरा अणुमति । सा वेला णातव्या जत्तागमणेण तु णराणं ॥ २६ ॥ १संधिया हूँ. त.॥ २चंतयलो' है. त• ॥ ३ असूणडकेण हं. त०॥ ४- एतचित्रान्तर्गते उत्तरार्ध-पूर्वाध है. त•न व 25 30 एकवीसइमं पडलं] एगूणसट्ठिमो कालज्झाओ मनविधी खज्जविधी फल-हरितक-सुसिप्पिककडे वा । सुभमसुभे वाऽऽहारे उत्तममासे जहण्णे य ॥ २७ ॥ जं जिस्से वेलायं आहारविधि णिसेवए मणुया । सा वेला णातव्या तस्साऽऽहारस्स लद्धीय ॥ २८ ॥ देवतसेतूणं वा णवकरणं वा वि उज्जवगिका वा । वय-णियमाणं गहणे दाण-विसग्गे य साधूणं ॥ २९ ॥ जं जीसे वेलायं पारत्तहितं णरा समीहति । सा वेला णातव्या तस्सुपातस्स लद्धीयं ॥ ३० ॥ वाणियववहारगते दिवसववहारे ठिते य ववहारे । भंडपणियस्स कय-विक्कए य णियए विसग्गे य ॥ ३१ ॥ जंजीसे वेलायं यवहारं तु वणिया समीहंति । सा वेला णातव्या गहण-विसग्गेण भंडाणं ।। ३२ ।। कस्सेण कासकाणं वापण्णे खेत्त-खलकम्मजोगे थे । धण्णाणं गहणे संगहे य वेला तु जा जत्थ ॥ ३३ ॥ जं जीसे वेलायं कम्मारंभ तु कासका कुणते । सा वेला णातव्या तस्सुपायरस लद्धीय ॥ ३४ ॥ जं वेलं जं कम्मं सुभमसुभं माणुसा णिसेवेति । सा वेला णातव्या कम्मुप्पत्तीय पुरिसाणं ॥ ३५ ॥ थीणं पि सव्वकम्मेसु जाण रंधणक-भोयणादीसु । जं वेलं जं कम्मं करेति वं वेलमो जाण ॥ ३६॥ ॥ पडलं [वीसइम] ॥ २०॥ छ । 10 [एकवीसइमं पडलं] तदिवस जातकं दिस्स दारकं जाण सूरमुग्गमणं । किंचुग्गयम्मि सूरे गोरे उत्ताणसेजम्मि ॥१॥ ओसूतकं कडिगेज्झकं दारकं दिस्स अचिरुहितं सूरं घूया। ओवातं दारकं दिस परिच्चकम्मतं पातरासलं घूया। ओवातं दारकं लेहिचकं दिरस उच्चपातरार्स बूया । ओवातं दारकं तरुणजुवाणं दिस्स पुव्यण्डं चूया। ओवातं तरुणं 15 दिस्स जुवाणं अणुमज्झण्ई धूया । ओवातं पुरिसं मैज्झवयं दिस्स मज्झतियं वेलं बूया । ओवातं पुरिसं पवत्तपलितं दिस्स उव्यत्तमझण्हवेलं बूया। ओवातं पुरिसं मिस्सपलितं दिस्स उच्चापरण्हवेलं बूया। ओवातं पुरिसं दिस्स पब्वपलितं अयरण्हं. बूया । ओवातं पुरिसं दढपकम्महत्यं दिस्स ओलंयमाणं सूरं धूया । ओवातं पुरिसं खट्टासमारूढं दिस्स अत्थ- मितं आदिचं धूया । उत्ताणपस्सिकं दारिकं दिस्स संझावेलियं घूया । कडिगेझिकं दारिकं दिस्स दीववेलियं घूया पंचकम्मतिकं [ दारिकं] दिस्स पार्फतरं ति यूया । वत्तवोलिकं दारिकं दिस्स पाकडितणक्खत्त-तारं धूया । उभिन्न- 20 माणथणिकं दारिकं दिस जामवेलिकं बूया । जोव्वणवत्तं दारिकं दिस्स तिण्णयामं घूया । महाकुमारिं दारिकं दिस्स अड्डरत्तं जाणीया । मझिममहिलं पविआतं दिस्स वत्तवरत्तं चूया । बहुप्पयानं जुष्णं दिस्स महागोसग्गं घूया । वुटुं गिव्वियातं दिस्स विधवं चा पासंडवद्धं महिलगोसम्गं वेलं वूया । ओवाते[स] पुरिसेसु जोण्हपक्खं घूया । कालकेसु पुरिसेसु कालदिवसे यूया । सामेसु पुरिसेसु मिस्ससंधिं यूया । ओवातासु इथिकासु जोहरत्तिं यूया । कालिकासु इथिकासु कालरत्ति बूया । सामासु इथिकासु मिरसा पुण्णमासद्धरति बूया । ओवातसामेसु पुरिसेसु जाव जोण्ड-23 पडिपदातो जोपट्टमित्तो ति जोण्हदिवसे बूया । ओयातेसु पुरिसेसु जोण्हट्टमीतो पाय याव जोण्हपुण्णमासीतो दिवसे धूया । कालसामेसु पुरिसेसु जाव कालहमीतो पाय याव चतुद्दसातो त्ति कालदिवसे यूया । ओवातसामाय इत्यिकाय जाय जोण्हट्ठमीतो ति जोहरत्तिं चूया । ओवातासु इथिकासु जोण्हट्ठमीतो पाय जाव पुण्णमासीतो त्ति जोहरति धूया । कालसामासु इथिकासु कालट्ठमीतो त्ति कालरत्तिं वूया । कालिकासु इथिकासु कालमीतो पाय जाय काल- चाउद्दसातो ति कालरति वूया । ओवातं उत्ताणसेजं दिस जोहपडिपदं वूया। ओवातदारकरस सरीरजोधण-30 परिवड्डीय जाव तरुणसम्मत्तजोपणादो ति य दारकपरिवड्डीय जाप पुण्णमासीतो त्ति वत्तव्यं । एवमेव कालकदारफ- परियड्डीय कालपरिषष्टी यूया। १ गते दीसवयहारे भिए य है. त• ॥२ दिव्यपरश्चकंतपा' है. त• ॥ ३ मझगयं दिस्स मल्झम्मियं ६० त.॥ ४°स्सायो संधि रति है. त. विना॥ अंग०३२ २५०. अंगविज्ञापइण्णय [यावीसंइमं पडलं जघा मणुस्सेसु तधा चउपदेसु तथा पक्खीसु तधा परिसप्पेसु तधा कीड-किविल्लकेसु वधा पुप्फ-फलेसु भोय- णेसु तघा अच्छादणेसु तथा भूसणा-सण-मल्ला-गुलेवणकरणेसु तथा लोहेसु (सव्यसाधुसु) सव्यधातुसु य तथा सव्ध ण्णेसु य वघा सव्वभंडोपक्सर-उयकरणेसु तथा सजीव-णिजीवेसु सव्वदव्येसु समणुगंतव्यं । जघा मणुस्साणं यय- परिणामेणं दिवस रत्तिपरिणामेणं एवं सव्वव्याणं पुरिसजुण्णपरिणामेण दिवस-रत्तिपरिणामो विण्यातव्यो-पुण्णामेसु दिवसाणं, थीणामेणं रत्तीगं । चण्णविसेसेणं जोण्हा कालो वा विण्णातव्यो-सुकिलेसु सप्पभेसु ओबातेसु जोण्डा णातव्यो, कालयण्णेसु गिप्पभेसु मइलेसु अचक्खुविसयकेसु कालपक्खं वूया ॥ ॥ पडलं [एगवीसइम] ॥२॥छ॥ 10 15 1 20 [वावीसइमं पडलं] थग्यस्स तु परिव४ि ओसरणं व पुण सव्वभंडाणं । देसिय-मुहुत्त-पक्सिय-मासिक-यरसप्पमाणेहिं ॥ १ ॥ अतिवत्ते अविवचो अग्यो हवति णिचयेसु भंडाणं । अणुपालणा ण समते भवति धुयो छेदको एत्यं ॥२॥ एमेव वत्तमाणेसु जाणयो संपदं भवति अग्यो । वत्ससतरस तु अंतो एतस्स तु एत्तिओ अग्यो ॥३॥ खमति णिचयो गिचेतुं खमति य अणुपालणा गहीतस्स । सव्यमणागतभावे इतु य मणामिलसिते य ॥ ४ ॥ [. 1] खमति णिचयो णिचेतुं घड्ढीसु य सव्वभंडाणं ॥५॥ वट्टीसु समुदएसु य तसकायाणं च थावराणं च । इच्छासंपत्तीसु य लाभस्स वि होति संपत्ती ॥ ६ ॥ सव्यम्मि वि वसकाये थायरकायेसु चेव सव्वेसु 1 पुप्फ-फल-भोयण-ऽच्छादणेसु दव्योवकरणे य ॥७॥ एत्य तु जे मंगलिया ते धन्ना ते तु लामिया होति । एतेसिं उप्पती भंडणिचए यति लाभो ॥ ८ ॥ धणसंपत्तिघाए महाधणाणं कुटुंविणं चेत्र । कोसपरिवद्धणासु य रुप्प-हिरण्णे सुपण्णे य ॥ ९॥ जुझजये पणियजये विजासिद्धीसु कम्मसिद्धीसु । आरंमाणं सिद्धीसु चे णिचये धुनो लाभो ॥१०॥ उवणतमणोरधाणं टप्पचीए य मणमिलसियाणं । अदिसिरीए चिय लाभे लामस्स संपत्ती ॥ ११ ॥ जध विपुलो उप्पातो जातिविसिट्ठो य सारमंतो य । जघ जुत्तमपरिवोसो वध णिचये लामओ बहुओ ॥ १२ ॥ अप्पो उप्पातो ति य अजातिमंतो य अप्पसारो य । जय यऽप्यो परितोसो तघ णिचये लाभओ अप्पो ।। १३ ॥ जध वागविगो पडिलामणा य उप्पजते परीतोसो । अप्पो या बहुओ वा वध गिचये लाभओ होति ॥ १४ ॥ पट्टिकर पीतिकरं णिव्याणिकरं च मंगलिकं च । इट्ठा आणंदकरं च लामिया होति उप्पाता ॥ १५ ॥ लुक्खे तुच्छेसु णपुंसकेमु कसकेसु बाहिरंगेसु । वावण्णेसु चलेसु व ण मंडणिचया पसस्सति ॥ १६ ॥ आरंभ-विवत्तीसु य छेअवितेहि वि य सव्यमंडेहिं । मोहपरिघावितेसु य अफलं च कडे पुरिसकारे ॥ १७ ॥ टन्झीयति विझीयति हायति त्ति परिहायति ति यो सद्दे। णढ-हित-पलाते दूसिते विणढे विपण्णे वा ॥१८॥ असणिहते विजुदते उडूढे जित-पराजिते विहले । भग्गो त्ति दुग्गतो किस्सते अणत्तो अगाधो ति ॥ १९ ॥ किरण-धणीमक-पेस्सजण-सव्यपासंडअस्समगते य । अधणेसु दुग्गतेसु व परिहार्यतेसु व अलाभं ॥२०॥ अभिरसितस्स अलाभे आसामंगेय पणयभंगे य । पडिसिद्धणिराकारे य जायणायं अलाभे य ।। २१ ।। उपहतमुवद्दुते या अभिजुते गहिय-यद्ध-रुद्धे या । अब य मयसेवासु य धुववायत्ती उ णिचयस्स ॥ २२ ॥ १ पुरिसजसपरि है. त•॥ २°मासकहत-विना ।। ३°वत्तेसु अति° ई० त• विना ॥ ४ पत्तियमं. सणिव ये हवंति लामो सत्र•॥ ५°कहासु य महा है. त•॥ ६ अग्यो उप्पाओ थिय ई. त॥७°परिहाविएसु १.त.॥ ८ कारोई. त• ॥९या भद्दे है. त•॥ १० असिणिहते हैं. त.॥ ११ य पाणमंगे हं. त•॥ १२ अव- चय मयसेया है. त• बिना। 25 30 5 - वावीसइमं पडलं] एगूणसटिमो कालज्झाओ देवदंड रायदंडे व चोरदंडे व अग्गिदंडे वा । इहाणं च अलाभे उववत्तीए अगिहाणं ॥ २३ ॥ दमग-वणीवग-छातक अणसितेहि दुकालमो जाण । भुत्त-हसित-पहिढे मुदिते सुभिक्खं सुबुट्टीयं ॥ २४ ॥ आहारेसु दढ-थावरेसु अणुपालणं पसंसति । मोहा व णिग्गमो विक्कयो व ण पसरसते एत्यं ॥२५॥ मोक्खे चल-णीहारिसु विक्कयो सिग्यमेव कातव्यो। अणुपालणा ण सहते भवति धुयो छेदओ एत्थं ॥ २६ ॥ गंतागंतुवणित्तेण णामग्गेया पडिभण्णति । अक्खोडिते उवक्खलिते णिकिण्णे ण वि विक्तेि ॥ २७ ॥ गिद्धे यो यंतिते हंती उच्छाहे जीव चिट्ठते । णर-णारीयोऽभिणदंति ण [विणे] विकिणे वि वा ॥ २८॥ लाभस्स छेकस्स य परिमाणं पुण पुणो वि वोच्छामि । तस्स पमाणुप्पाते भवंति बहुका महंता य ॥२९॥ मासिक-पक्खपमाणे मज्झिमको छेअको व लाभो य । अप्पो छेअक-लामो दिवस-मुहुत्तप्पमाणे या ॥ ३०॥ पक्खेयो वा ण भवति पक्खेवो पंचभागसेसो वा । मासपमाणुनातेसु अप्पसत्थेसु सम्वेसु ॥ ३१ ।। पक्खेवो वा सण भवति पक्खेवो या - तिभागसेसो तु । पक्खपमाणुप्पातेसु अप्पसत्येसु सन्वेसु ॥ ३२॥ 10 पक्खेयो वा ण भवति चउत्यभागो य छेयको भवति । दिवसपमाणुप्पाते सव्वेसु तु अप्पसत्येसु ॥ ३३ ॥ पक्खयो या ण भवति पंचमभागो व छेदको भवति । सव्वम्मि पणियमंडे असुभम्मि मुहुत्तवग्गम्मि ॥ ३४ ॥ सव्यपमाणुप्पाता तु लामिका जति अणागता होति । पंचगुणो व वहुगुणो व भंडणिचये भवति लाभो ॥३५॥ मासपमाणुप्पाता तु लामिका जति अणागता होति । तिगुणो चतुग्गुगो वा वि भंडणिचये भवति लाभो ॥३६॥ पक्खपमाणुप्पाता तु लामिका जति अणागता होति । विगुणो तिगुणो व चतुग्गुणो व भंडगिचये भरति लाभो॥३७॥ 16 दिवसपमाणुप्पाता तु लामिका जति अणागता होति । एकगुणो विउणो वा भंडणिचये भवति लाभो ॥ ३८॥ होति मुहुत्तुप्पाता तु लामिका जति अणागते कालो । किंचि च्छोका सग्धं व मंडणिचये भवति लामो ॥ ३९॥ अञ्चग्घे विण्णाते दसक्खवट्ठी तहिं गणेतव्यं । जध वस्सपमाणेण तु णीतसक्खा सया होति ॥ ४० ॥ सतयगरस पवद्धी एव सहस्साति संगणेतच्वं । यद्धिसहस्से यग्गरस सतसहस्सं ति णातव्या ।। ४१ ।। जध कोडी दोण्णि विवद्धी भवति सहरसवग्गरस । कोडीय तु बद्धीय तु अपरीमाणा गणेतव्या ॥ ४२ ॥ एसऽग्घे परिवड्डी एवतिकेसु मुण सव्यपणिएसु । कारणमासजित्ता भवति वहुगुणा असारे वि ।। ४३ ॥ जोग-खेमं वढेि आसजित्ता खयं च भंडाणं । आकाले असंते धड्डी उ भवति अपरिमेया ।। ४४ ॥ कइक-च्छेअकलामो ति पुच्छितेण तु पुणो वि णातव्यं । लामो व छेयको या सिग्घसिग्धं पडुप्पण्णो ॥ ४५ ॥ कइक-च्छेयकलाभो ति पुच्छितेण तु पुणो वि णातव्यं । लामो व छेयको वा चिरेण तु चिरं पदुप्पन्ने ॥ ४६॥ सिग्धं दिवस-मुहुचा मासा पक्खा य मज्झिमे काले 1 चिरदुक्खं पडुपण्णेहिं जाण संवच्छरे एत्यं ॥ ४० ॥ 25 सुद्दु वि य लामवंतं अतिवत्तेसु तु अणागतो कालो। छिण्ण-खये वा ण भवति सम्वेसु य अप्पसत्येसु ॥४८॥ जं जिस्से उवयोगं तिरिक्सजोणीय माणुसाणं वा । तेसिं अंभागमणे पियकारो तस्स भंडस्स ॥४९॥ जं सेसं उपयोग तिरिक्सजोणीय माणुसाणं वा । तेसिं णीहारगते अणिग्गमो तस्म भंडस्स ॥५०॥ णिप्फत्तिमणिप्फत्तिं समणाकालेसु वुट्ठि-दुछुट्टी । कइके व अकइके या अग्धमणग्धं तथा वूया ॥ ५१ ॥ पुण्णामचलामासे खय-णीहारे य पुरिसणामाणं । अग्घखयं णासं या घूया पुण्णामधेयाणं ॥५२॥ पुण्णामाणामासे जयमाहारे य पुरिसणामागं । णिप्फत्ती लाभो आगमो य पुण्णामधेजाणं ॥५३॥ थीणामसयामासे जयमाहारे य इस्थिणामाणं । गिप्फत्ती लाभो आगमो य थीणामजागं ।। ५४ ॥ थीणामखयामासे सय-णीहारे य इत्यिणामागं । अग्यसयं णासं वा चूया थीगामधेजाणं ॥ ५५ ॥ १ सुवुद्धीयं हं. तविना ॥ २°तु णिन्यतेण . त. पिना । ३°डिहण्ण' हं० त० विना ।। ४ यववाहिए उवखद्धिए विकिपणे न वियक्किए हैं. त०॥ ५ जालं पटुंते सं ३ पु.! जायं रट्टत्ते है. त०॥ ६ छेदफारस्स यं परि' ह. त॥ ७ एतचिहान्तर्गतः पाठः हं. त. नास्ति । ८यचाग ई. तु.॥ - 20 1 90 २१२ . 10 15 अंगविजापइण्णयं [धावीसइम पडलं भोयणदव्याणं पि य चल-णीहारे सये अलाभे य । अग्घखयं णासं या घूया आहारदव्यागं ॥ ५६ ॥ भोयणदव्यागं पि स उदये लाभे तधेय आहारे । णिप्फत्ती लाभो आगमो य आहारदव्याणं ।। ५७ ॥ मुकंगचलामासे सय-णीहारे य सुफिलाणं तु । अग्घसयं णासो या दव्याणं सुकिलाणं तु ॥ ५८ ॥ मुकंगढामासे आहारगते य सुफिलाणं तु । गिफत्ती लाभं आगमं य मुण सुकिलागं तु ॥ ५९ ।। रत्तंगचलामासे सय-णीहारे य सव्वरत्ताणं । अग्घसयं णास वा दव्याणं रत्तवण्णागं ॥६॥ रत्तंगड्ढामासे आहारगते य सव्यरत्ताणं । णिप्फत्ती लाभं आगमं व मुण सव्यरत्ताणं ।। ६१ ॥ कण्हंगचलामासे सय-णीहारे य कालकाणं तु । अग्घखयं णासं या व्याणं फालकाणं तु ॥ ६२॥ कण्हंगददामासे आहार घेर फालकाणं तु । णिप्फत्ती लाभं आगमं च मुण कालकाणं तु ।। ६३ ।। अग्गेयरलामासे सय-जीहारे य अग्गिफनाणं । अग्गिखयं णासं या जाणे अग्गेयणामाणं ॥ ६४ ॥ अग्गेयदढामासे आहारगए य अग्गिदव्याणं । गिफत्ती लामं आगमं प अग्गेयदयाणं ।। ६५ ॥ पुधुलंगचलामासे खय-णीहारे य पुधुलव्याणं । अग्घसयं णासं पा जाणेजो पुधुविद्व्याणं ॥ ६६ ॥ पुंलिंगचलामासे आहारगमे य पुढविदव्याण । जाणिस्फत्ति लाभ आगमं च मुण पुधुलव्याणं ॥६७॥ निद्धंगचलामासे सय-णीहारे य आपजोणीय | ET अंग्घखयं नासं या जाणेजो आपजोणीयं ॥ ६८॥ निदंगचलामासे आहारगते य आपजोणीयं । जनिष्फत्ति लाभ [आगमं] मुग ऑपजोणीयं ।। ६९ ॥ पायव्यचलामासे सय-णीदारे य वायजोणीयं । अग्घखयं णासं घा वायव्याणं मुणसु तत्य ॥ ७० ॥ यायव्यदढामासे आहारगते य योयुजोणीयं । गिप्पचि लाभं आगमं च मुण पातलोणीयं ॥ ७१ ।। छिदंगपलामासे राय-णीहारे य झुसिरदव्याणं । अग्घरसयं णासं वा जाणेनो झुसिरदव्याणं ॥ ७२ ॥ छिदंगदढामासे आहारगते य मुसिरदत्राणं । णिप्फत्ति लाभो आगमो य सुसिराण ब्यागं ॥ ७३ ।। तिरियंगचलामासे णीहारे घेर तिरियजोणीयं । अग्घरसयं णासं या जाणेजो तिरियजोणीयं ॥७४ ॥ विरियंगददामासे आहारगते य तिरियलोणीयं । गिप्पत्ति लामं आगमं व मुण तिरियजोणीयं ॥ ७५ ॥ ददमंगचटामासे राय-णीहारे य धातुजोगीयं । अग्घसयं णासं या वियागरे धातुजोणीयं ॥ ७६ ॥ उटुंगद्दामासे आहारगते य धातुजोणीयं । णिपत्तिं लाभं आगमं य मुण धातुजोणीयं ॥ ७७॥ मूलजोगियलामासे सय-णीदारे य मूलजोणीयं । अग्घरसयं णासं या जाणेभो मूलोणीयं ॥ ७८ ॥ मूलजोणिददामासे आदारगते य मूलजोणीयं । निष्पत्ति लामं आगमं घ गुण मूलगोणीयं ॥ ७९ ॥ पाणजोगिपलामासे राय-णीहारे य पाणलोणीय । अग्पसयं णासं या बाणेनो पाणजोणीय ॥ ८० ॥ पाणजोणिदढामासे आहारगते य पाणजोणीयं । णिपत्ति लाम मागर्म प मुग पाणजोणीयं ॥ ८१ ॥ उत्तमंगपामासे राय-णीहारे य उत्तमंगा। अम्पसयं णासं पा जाणेनो उत्तमंगाणं ।। ८२॥ उत्तमंगददामासे आहारगते य उत्तमंगागं । निष्पत्ति साभं आगमं च मुण उत्तमंगाणं ॥ ८॥ मसंगपटामासे सपाणीदार य मन्तिमंगाणं । अम्परायं णारा पा मनिझमजणउपभोग्गाणं ॥ ८४ ॥ मगददामारो आहारगजे य मन्ससाणं । गिफाति लाभं आगमं च मुण मगासागं ।। ८५॥ पसांगपटामागे गय-मीदारे य परसयग्गरम । अम्पयं णासं या दव्याण पेस्सणामागं ॥ ८६ ॥ पेस्गंगरामागे आहारगते व पेरमपग्गरस । गिफनि टाम बागमं य गुण पेस्समोगाणं ॥ ८७॥ पोप पंपनु रमेगु गमो पाणेमु भोषणेमु चि य । याये आमरण एयरमो यसप गंप मच ॥ ८८ ॥ लपि श्रेप..एर परमायुजों .त. एहसपिहानाते उत्तराधि..एर पो । Vागमो... ५ पापजो...॥ १५मण एसिरदयार्ण • • 15. भात R 3 5 10 बावीसंइमं पडलं] पगूणसटिमो काटज्झाओ २५३ तेल्ल-घते गुल-वण्णे एसेव गमो तु सव्वधण्णेसु । मणिमुत्ते यणेसु य रुप्प हिरण्णे सुवण्णे य ॥ ८९ ॥ पंचविधो य अवायो यो गहण-णिचयेसु भंडाणं । अग्गी उदकं चोरा राया य तिरिक्खजोगीयं ॥१०॥ दिव्यो भवति अवाओ उसुण हिम अग्गि मारुतो आपं । मणुयगतम्मि य राया चोरा सयणो परजणो य ॥ ९१॥ सम्वेसु अप्पसत्येसु अपायो पुव्यवण्णितेसु भवे । णट्ठविणट्टे जोणिंगते य [......] अवहिते घेव ॥ ९२ ॥ पुन्यपरिकित्तिएसु तु वासुप्पावेसु अप्पसत्येसु । उदकातो हु अपायो एत्य णिस्संकितो बूया ॥ ९३ ॥ मुण य तिरिक्खजोणी तिरिक्खजोणीगओ अपाओ त्ति । दंसणपादुब्भावे असुभा य तिरिक्खजोणीए ॥ ९४ ॥ रायदंडे कोडे य आणकोवतणे य पणए य । रायग्गहेसु य कयकए य मुण रायदंडो ति ९५ ॥ गाहण-कालक्खवणा खया पाणपराभियोगेसु । गुत्ति अंदु-णिगलेसु बद्ध-रुद्धेसु सन्वेसु ॥ ९६ ॥ पंचमहाकारणकारणेसु सव्वेसु रायदिहेसु । रायभये सबम्मि तु रायकुलगतो अपायो तु ॥ ९७ ॥ उण्हे वा णिस्ससिते मणसंतावे य अंगदाहे य । हक्कार-रुदित-कंदित-भयडुते रुद्धमावद्धे ॥ १८ ॥ उण्हहते व उदके व कुथिते तध तुच्छ दड्डे वा । अगीतो हु अपायो धूमाणुगते य आहारे ॥ १९ ॥ तिरियंगाणामासे तिरिक्खजोणीगते य सव्वम्मि । उवकरणोयखरगते तिरिक्खजोणीय संदेहो ॥१०॥ उंदुर-मुत्तोली या अथिला कीडा किविल्लिकाओ य । दाढी णंगली संगिणो य णहि-सजवाला य ॥ १०१॥ जलचर-थलचर-खगचारिणो य पक्खी चतुप्पदा चेव । अवर झंति णराणं असुभा जे अप्पसत्या य ॥ १०२॥ सेसिं पादुभावे सद्दे रूवे दुवक्खरकते य । तेरिक्खिसु य अवायो चि एव णिस्संसयं देहि ॥ १०३ ।। इथिअतिसंघणायं णियडी-कवडेसु वंचणादीसु । चोरुप्पत्तिं बूया हित-महिताविझणायं च ॥ १०४ ॥ कूडतुल-फूडमाणं फूडहिरण्णे य कूडलेहे य । चोरुप्पत्विं घूया आयरणायं च सञ्चायं ॥ १०५ ॥ सव्वेसु पावकम्मिसु हिंसके होढकेसु य गरेसु । वीसत्यपाणहरणे य अवार्य चोरतो विजा ॥ १०६ ॥ अवि धावह कूवित-कंदितेसु हित-आरिते य छिण्णे य । चोरुप्पचिं घूया सन्चेसु य चोरलिंगेसु ॥ १०७ ॥ जध विपुला उप्पाता तध विपुलं णिहिसे अपायं ति । मज्झिमके मज्झिमकं अप्पसारेसु अप्यं तु ॥ १०८।। 20 दिण्ण-परिविट्ठ-यत्तुस्सयम्मि झीणे य भोज-पेयम्मि । गढे पम्हट्ट पडिसामिते य प्रडिसाहूण्ययं च ॥ १०९॥ वेस्से दोमग्गे अप्पिते य णिश्यक्तेि य चकिते य । उकंठिय परितंते व छेड्या सव्यभंड़ेसु ॥ ११०॥ एवं अग्धपमाणं एतेण गमेण सव्यभंडाणं । सव्यपणितेसु य वधा विविधो सारो मुणेयव्यो ।। १११ ॥ तं जधा-साली-वीही जव-गोधूमादिसु सणसत्तरसेसु धण्णेसु अग्धपमाणं विण्णातव्यं भवति । एवमेव पुप्फ- फलेसु, तेल्ल-घतादिसु णेहेसु, लवणादिसु छसु रसेसु, कप्पासादिसु य सव्यछादणेसु, रुप्प-सुवण्णादिसु य सव्यलोहेसु, 25 चइर-वेरुलिकादिसु य सव्वरतणेसु, मणसिलादिसु सव्यधातुसु, अगुरु-चंदणादिसु सव्यसंखितेसु, सव्वमूलजोणिसु सव्वतण-कट्टेसु य, मणुस्सादिसु य सव्यपाणजोणिसु, सव्यम्मि चेव परिणभंड-पणितगते समणुगंतव्वं भवति । उत्तरं च सविसेसं सुवुट्ठीपडिपोग्गलं दुमिक्खपडिपुरंगलं च धण्णग्मं घूया । सुबुद्धिपडिपोग्गलं च दगमायणेहि सुक्खेहि तिरोगेहिं आपजोणिक्खयेण गिद्ध-लुक्खत्तणेण उल्लाणं सुक्सत्तणेण तण्हाइत-पिपासिताणं च अपाणलंभेणं अवुद्धिं यूया । अवुट्टीयं पुण जावतिकाणि बुद्धिसंभवाणि धण्णादीकाणि सव्वमूलजोगीकाणि एतेसिं अणिप्फत्ती पियंकरं च धूया ॥ ॥ एवं भगवतीय अंगविजाय महापुरिसदिण्णाय [यावीसइम ] अग्यप्पमाणं [पडलं] सम्म ॥ २२॥ छ । 15 30 १ वातुप्पा' ह. त• विना ॥ २°माविटे ई० त० विना ॥ ३ भुच्छद हत• विना ॥ ४°विजयाणं च है. त०॥ ५अमिधाहव फूह. त• विना ॥ ६ गलतं घण्णय वूया है• त.॥ ७°हिं गिरोगेहिं हं. स. विना ॥ ८"पित- ग्गेण है. त..
२५४ १ 5 10 । 15 अंगविजापइण्णयं [चउचीसइम पंडलं [ तेवीसइमं पडलं] अग्गिस्स संभवं पि य अग्गेयेहि मुण सव्वदव्वेहिं । घूमो ति व अग्गित्ति व आलीवणकं वणवो ति ॥१॥ संतत्ये वा कोलाहलं च डमरे विलुप्पमाणे या । अवि धावध सद्दे या आलीवणकं वियाणेज्जा ।। २ ।। इंगालकोटकिंगालसकडिका कटुच्छ-धूपघडिका य । धूमकरडाकधूमणाण पिसायके धूमणेत्ते य ॥३॥ छगणि-छारि-क्खारापको त्ति वीजणक-धूमणालीसु । होमाहुतिकये अग्गिकारिके अम्गिकुंडे य ॥ ४॥ जग्गंतको त्ति संदीपणं ति दारु समिध त्ति या सदा । आहुति हुणियति वित्तिय उपक्खरे यऽम्गि होतेरस - 1५॥ दीयो ति दीयक त्ति य चुडली मधअग्गि चुल्लके व त्ति । विजु त्ति विजुता आययो त्ति कजोपको व त्ति ॥६॥ अणलि त्ति व चुल्लित्ति व चितक ति व फुफुक क्ति वा सदा । एत्थ उ अग्घुप्पत्ती अग्गिटे अग्गिकुंडे य ॥७॥ अहिमकरिक-अग्गिपखंडकेसु अग्गिस जाण उम्पत्तिं । रुद्धापिते य संतापिते य संतप्पमाणे य ॥८॥ उदगे य घातउहाहते य कुथिते व वुत्थ दड्डे वा । धूमायतम्मि य भोयणम्मि अग्गिरस उप्पत्ती ॥ ९॥ दृज्झति सुस्सति भजिजते त्ति उक्खलिते पखलिते त्ति । कढउत्तरीयतेत्ति य अग्गुप्पत्ति वियाणाहिं ॥ १० ॥ अग्गिउवजीवणे अग्गिमेंढपव्वेसु अग्गिकम्मेसु । उवकरणेसु य अग्गिरस जाण अग्गिस्स उप्पत्तिं ।। ११ ।। उण्हे यातुम्मामे फरसे या अग्गिसंभवं जाणे । उम्मुक्कपरिकूलेसु य अंगारे छारिकायं च ॥ १२॥ रत्तम्मि य पुप्फ-फले रुधिरणिपाते य सव्वसत्ताणं । तिक्खरसे सारेसु य अग्गुप्पत्तिं वियाणेजो ॥ १३ ॥ अगणि पुण जाततेओ अणलो वा हुतयहो ति जलगो त्ति । पवणो ति य जोति त्ति य अग्गिरस भवंति णामाणि ॥ १४ ॥ वस्सपमाणुप्पाते अग्गेयेसु पुण अप्पसत्येसु । वित्थिण्णरस णिवेसस्स झावणं सण्णिवेससा ॥ १५ ॥ मासपमाणुप्पाते अग्गेयेसु वि य अप्पसत्थेसु । मझिमरस णिवेसरस झावणं मझसारस्स ॥ १६ ॥ पक्सपमाणुप्पाते अग्गेयेसु वि य अप्पसत्थेसु । वाहासु सण्णिवेसस्स झामणं मज्झसारस्स ।। १७ ॥ दिवसपमाणुप्पाते अग्गेयेसु वि य अप्पसत्थेसु । गिहझामणिकं यूया ततिमगिहा जति य दव्याणि ॥ १८ ॥ मोहुत्तिकप्पमाणं अग्गेयेसु मुण अप्पसत्येसु । जत्थुप्पजति अग्गी तत्थेव पसम्मते सिग्धं ॥ १९ ।। संवट्टका य पाता उपहा लुक्खा गिहाणि भंति । सुमहं अग्गुप्पातो जति भवति उ पुच्छणाकाले ॥ २०॥ वस-थावरसोभाणिव्वुतेसु वाते सुखेम यायंते । सुभिग्गंधा याता य मणुण्णा खेमभावाय ॥ २१ ॥ ॥ पटलं [तेवीसइमं] ।। २३॥ छ । [चउवीसइमं पडलं] पंदित्तु सन्यसिद्धे सजो बुर्हि तथा अवुहिं च । वासारत्तविभागं पासपमाणं च योच्छामि ॥१॥ यासं तिघ सव्वे ति य णागा यरुगो जलाधिपो व त्ति । णागिंद गइंदो सागरो समुद्दो त्ति वा बूया ॥ २॥ एतेसिं देवाणं णामे या भूसणोवकरणे या । सामुद्दकेसु भंडेमु चेर वासरस उप्पत्ती ॥३॥ दघणु-इंदफेतुग्गमेसु गिद्धासु इंदराईसु । कीहिंदायिका इंदगोपका इंदरक्सा य ॥४॥ गिद्धाणं फलिहाणं गिद्धागं युग्गमेण मेहाणं । दुमसंड-मच्छ-कच्छम-गय-गगसंठाणरूवेहिं ।। ५ ।। गिद्ध-घणे अच्छिरे परियेसे यावि चंद-सूराणं । उदय-ऽत्यमणेसु समागमेसु तारा-गदाणं तु ॥६॥ गिद्धाय संझायं णिद्धासु य सूरियरस रस्सीसु । सूर-पटिसूरएमु य आरयदमुरसेते य ॥७॥ १°पफोयिदीजण १.स.॥ २६- एतथिद्धान्तर्गन पदं है. त. नास्ति। ३घुस्सति सं३ पु.। मुस्सति ४ फतुरीयलिय है. त.॥ ५पम्मुक है. त.॥ ६°कम्माणि पसस्सयारणं मन्स' है. स.॥ भूसणे पपरणे.त.॥ ८त्ययणे..॥ -20 25 30 २५५ 157 चंउवीसइमं पडलं] एगूणसट्टिमो कालज्झाओ लोह-गुलाणं झरणे लोहकलंके य णिदिसे वासं । कंडकण्णकग्गहणे पुढविठिते उण्हमुदके यं ॥८॥ तसकायाणं गन्भे जावणे रोहणे य वीयाणं । अंडग[प] पूरणम्मि य पिपीलिकाणं थलारुमणं ॥९॥ गंडूपदणिक्खमणे कुलीर-मंडूक-कच्छभाणं च । उत्थलमारभणे या मच्छाणं कच्छभाणं च ॥ १० ॥ मच्छ-महंतमहोरग-समुद्दकाका तघेव वम्मीका । कासार-समुद्दच्छेणके य जलफेणके चेव ॥ ११ ॥ मेहे विजुत-गजित-फुसिते वा पगलिते पवढे या । जलसत्तपमोदे वा दारुकवासेलिकाकरणके वा ॥ १२॥ आपाणकप्पमोदे सोदकउक्कोसणे पपतणे वा । मत्त-पंण?-पलो? कट्टित-पासासकरणे वा ॥ १३ ॥ उल्लपडसाडके केसपीलणे आसिते सर्वते य । उक्कापतणे पुढविजओलुविले णिव्विले चेव ॥ १४ ॥ धोवंतो वा पुच्छति हत्थं पादं मुहं व दूसं वा । उवकरण भायणं वा सज्जो वुहि विजाणेजो ॥ १५ ॥ तेल्ल-घत-दुद्ध-दधि-मजपाणिते बहुविध मधूसु तथा । रस-णिज्जासे गेहेसु चेव बासस्स उप्पत्ती ॥ १६॥ सागर-गदी-तडागेसु चेव यावि-दह-कूव-चरणेसु । पुण्णेसु अत्थि वासं वासति पुण भिजमाणेसु ॥ १७ ॥ 10 फुड-घडग-sरंजरुदिक-आचमणिक-करक-कुंडिकासु वि य । पुण्णेसु अत्थि वासं वासति य पलोट्टमाणेसु ॥ १८॥ 'णिस्सें घियाणि दुढेसु मुत्त-पुरीसकरणेसु य काणे । सेआइयपसण्णे सव्वम्मि सरीरनीहारे ॥१९॥ एएसु अस्थि वासं वुट्ठी पडिपोग्गलेसु सव्वेसु । म लुक्खेसु थ तुच्छेसु य सुक्खेसु य आतवं बूया ॥२०॥ हिस्संघिते सवाते वाति जति सगजितं तहिं वासं । रुदितेसु विजुपतणं उक्कापातं सणिद्धटे ॥२१॥ पासासम्मि पवढे खेले सिंघाणके य मुक्कासं । रुदितं पि य अणुबद्धं उच्चारगते महावासं ॥ २२ ॥ घलिका वि असेआइते उल्लपडसाडकेसु । वि य वालेसेउसु पवट्टितेसु पयट्टिमं यासं ॥२३॥ दगअसणि-दंगतुच्छलकेसु मजघर-पाणभूमीसु । वच्छच्छगणम्मि य सद्दले य गिद्धे महितले य ॥२४॥ जातम्मि जलचरे जलउवक्खरे जलयरेसु सत्तेसु । पुप्फे फले य जलजे जलोयजीवीसु य णरेसु ॥२५॥ उदइकद्ग-वड्डगि-णाविग-जलकम्मि-वाणिकाणं च । तेसिं कम्मुप्पत्तीसु चेव वासस्स उप्पत्ति ॥ २६ ॥ उद्गपधउदकसंकामणाय पणालीकोरणे य सव्वम्मि । दगजंतककुप्पलेसु चेव वासस्स उप्पत्तिं ॥ २७॥ देवाणं ण्हाणेसु य रायीणं पि य महाभिसेगेसु । दगसेविगमज्जणके मजणग उवक्खरविधीसु ॥ २८॥ वरमजणे वधूमजणे य गोसांगण्हाणके चेव । यरपंचमजणे मजणे य तेरिक्खजोणीय ॥ २९॥ एतेसु बुद्धिपडिपोग्गलेसु दित्तेसु सोभमाणेसु । मुदितेसु उदत्तेसु य वुटिमुदत्तं वियागेजो ॥३०॥ एतेसिं लाभे आगमे य उवगमण उवगमो वा वि । पादुब्भावे या धारिते य वासस्स उप्पत्ती ॥ ३१ ॥ एतेसिं धूखणसेणे व्य हरणे व सण्णिरुद्धे वा । एतेसिं च अलाभेण चेव जाणे अणावुहि ॥ ३२॥ विपुलुत्तमेसु विपुलं मझिमसारेसु मज्झिमं वासं । अप्पं च भवति वासं अजातिमंते असारे य ॥ ३३ ॥ फरुसँकिदुकसराय तिरिक्खजोणीय माणुसेसु वि य । कडुकासु य णासासु य फरुसासु भवे अणावुट्टी ॥३४॥ अभिजुत्तमभग्ग-हते लग्गे या बद्ध रुद्धे वा । गिस्ससित-छीत-कासित-जंभार्यते अणावुद्धिं ॥ ३५॥ गिप्पीलिते णिगलिते झीणे झविते य लुक्ख-तुच्छे य । तुस-केतलिछारिका-चुण्णछारिकायं चऽणावुट्टी ॥ ३६ ।। जति दिवसा आभोगे रोधणकमभिम्गहे व आतम्मि । दुक्खस्स य सहितव्या तति दिवसे आहवं चूया ॥३७॥ 306 जतिहि दिवसेहिं मुञ्चति इटेहिं समेहिं इच्छितं लभति । 5 वेलं च विमुञ्चति तं वेलं णिहिसे वासं ॥ ३८ ॥ १ फंडकसगहणे है. त• ॥ २ णद्धपलोइयहेछटियपासा है. त.॥ ३ हस्तचिहान्तर्गतः सार्धश्लोकः है. त. एव वर्तते ॥ ४ सासासम्मि पबद्ध है. त० ॥ ५ दगवुधुल' है. त• विना ॥ ६ पाणजोणीसु ह. त॥ ७ तु खणासणो च सपिण इं. ते विना ॥ ८°सकतुगसरा हं. त• विना ॥ ९ कवलि है. त॥ १० आतवं हं. त•विना ॥ ११मपति है. त०॥ 20 25 - 10 13 मंगविजापदण्ण चिउवीसइमं पडर्ट पासुपाते इहे निच्याणिकरे सुभे पसत्य य । इच्छापूरमपीडाकरेसु यासं सुभं यूया ॥ ३९ ॥ वासुप्पातमणिहे अणिन्युतिकरे, य अप्पसत्ये य । पीलाकरे य असुभे वासं पीलाकरं बूया ॥ ४०॥ यामुप्माते अप्पे अपं विपुले मवे महावासं । अणुपद्धे अणुपद्धं दिट्ठपणहे य पुग णासो ।। ४१ ॥ देवतपूताणियमे समिद्धजाग-धलिफम्मकरणे या । जारिसया सा संपति तारिसकं गिहिसे पास ।। ४२॥ जण्णे ण्णुरसए या याधुजे तघ घोल-उवणयणे । उजाणभोज-भत्तिय-जण्णागमणेसु य णराणं ॥४३॥ आहारमुप्पत्ती गंयेमु वि य सघ गंधसंपत्ति । । 'विविधालंकारेसु वि जारिसिया रूयसंपत्ती ।। ४४ ॥ एतेमु तु मणतही गुणसंपत्तीय जारिसी भवति । हासजगणी गराणं तारिसिया वाससंपत्ती ॥४५॥ देव-मणुस्सा पक्खी चतुष्पदा जलपरा यलपरा य । दीसंति लद्धलाभा यधलाभो तारिसं यासं ॥ ४६॥ इच्छासपचीर्य वसकायागं व थापरागं च । जारिसिया संपची तारिसिकं निहिसे यासं ॥४७॥ इण्यापसीसमागमेसु धम्म-ऽत्य-कामजोगाणं । जारिसिया तु णराणं संपत्ती तारिसं यासं ॥४८॥ अत्यफसे संपसी फम्मकतम्मि य रतीय संपत्ती । धम्मत्ये य समाधी आरिसिया तारिसं यासं ॥ १९॥ रामु इरसरेसु म महाधगाणे कुटुंबिणं घेय । यहुरयणसंचयाणं गगराणं जणपदाणं च ॥ ५० ॥ इट्टिगुणा रायगुण आरंभगुणा फुटुंविणं येय । जगरगुणी गयराणं गिफत्तिगुणा जणपदाणं ।। ५१ ॥ जारिसिया सुयते कधामु या जारिसा फधिजति । आहारम्मि य यसे तारिसकं णिहिसे देयं ॥५२॥ फच्छाय जेहिकाय जति सिद्धी जेट्टकं भवति यासं । मझिमिकासु य मग्मं कणिद्विकायं कणिहं च ॥ ५३॥ कच्छागतेमु जय सघ जातिविसेसे वि समणुगंतव्यं । थाणविसेसेसु तथा सारा-ऽसारेसु य नराणं ॥ ५४॥ फच्याते ये फागं सेहिमतत्ये कामगोगेसु । जारिसिया सिद्धीओ तारिसकं निहिसे देवं ।। ५५ ।। नुसनये पणितजये विजासिद्धीसु कम्मसिद्धीमु । जारिसिया सिद्धीओ तारिसकं गिहिसे देवं ॥५६॥ जातीय उचना होगमुचम उत्तमं च कच्छायं । सारम्मि उचमे पा यि उत्तम णिहिसे यास ।। ५७ ॥ पतो एकतरम्मि विजघ सिद्धी पारिस भवति यासं । जति वुत्तमसंजोगा ताय गुणं उत्तमं यासं ॥ ५८ ॥ पुण्यामा पुण्यामा दपिग्मगा य गिद्धा य मंगलिमा य । पद्धिकरा नंदिकरा य एरिमा होति उप्पाता ॥५९॥ मचे मधुरा य मगोदरा य इहा य पिठ्युविकरा य । चित्ता आगंदफरा य परिसिया होति उप्पावा ॥ ६॥ जाती रूपं यण्गो समारो पलं व तेयो य । गाणं विष्णाणं यिफमो य पगती सभायो य ।। ६१ ।। एतानि मणुरमागं जप पयराणुत्तमागि प मपंति । पासधरे समुदीरिवम्मि सम उत्तमं पास ॥ १२ ॥ मे आप पा लभ परमारी य एपमेशम्मि । पीती पाहुमागोयनको पेम्माणुरागो य॥ ६३॥ पोम परिपक्सम्मि पास पिग्गहे मुवे तेसं । एतेसिं प अलाभे णीहारमसंपदायं प॥ ६४ ॥ जारिगिया मेरमी सर-परिस-रम-रूप-गंधागं । गुणजपा पीविकरी तारिस गिदिसे यासं ॥६५॥ पुमिमानि मुटनेमु त मुपास परियमप्पमागम्मि । परसेगु तु अणुरदं मासरमाणे विरेय पुरा ।। ६६ ।। मेपरपमागेमु गरिरगं सोरपूरो य । पुण्यो पंदो तो मेमा पामनि संपन्टरमाता ॥ ६॥ दुपसंग नमसपा पापरफारा य पुष्फ फसा । एपसा य दगम्यागा पानो य मरे अयुट्टीयं ॥ ६८ ॥ गिरंग माया पायरवाया य लिम्पुरकरला । गिला य दम्यागा यातो य भये मुहीयं ।। ६५॥ मिगिर-गानिारा गुप-पल-गीनमुंग्सगं । पन्गुस्ये सीमोमागु पर भीगोममो पूग ॥ ७० ॥ पापानिप..२ एपिgrost. naianाय परार्ण इ. १० ॥ ४ भापारम्मि परित... an ५पाय महिमपाये ...rima ६जशिवराम..॥ ७'रापना। ८'नाtt... .गुरुदान.... 23 " - 5 -- 10 - चवीसइमं पडलं] एगूणसट्टिमो कालझाओ २५७: उदुसोभा य उपहत्ता सीतं उण्डं फलं व पुप्फ च । उद्येसु ण सोभंते तदा अहिं वियाणीया ॥७१॥ सव्या दिसा वितिमिरा चंदा-ऽऽदिचा गहा सणक्वत्ता । विमला विपुलसरीरा दीसंति णभे सुवुट्ठीयं ॥७२॥ तिमिराकुला दिसाओ चंदा-ऽऽदिया गहा सणक्खत्ता । फरुसा किसा विपण्णा दीसंति णभे अवुट्ठीयं ॥७३॥ सम्मं चरंति णक्खत्ता उदू पुप्फ-फलाणि या । सम्मं चंदो य सूरो य सम्मं देवोऽत्य वासति ।। ७४ ।। विसमं चरति णक्खत्ता फलं पुप्फ अणोदुगं । एवमादि जधाकालं काले वासति वासवो ॥७५ ॥ जुजति य जोतिसं सम्म उदू पुप्फ-फलाणि य । जघाकालं जघासुत्तं काले यासति वासयो ।। ७६ ।। णक्खत्तजोगा उदुणो दुमा पुप्फ-फलाणि य । ण भवंति जधाकाले पच्छा देवो ति वासति ॥ ७७.॥ पुण्णे पुण्णामे दक्खिणे य गिद्धे य आमसित्ताणं । एतेसिं पडिपक्खं पुणरवि पच्छा परामसति ॥ ७८॥ पुरिमे मासे वासति आसारो पच्छिमेसु मासेसु । और बहुं परिमसते जं चहुकं तं पहुं चूया ॥ ७९ ॥ लुक्खे णपुंसके तुच्छके य वामकडुके य दीणे य । पुव्वं परामसित्ता पडिपक्खं से परामसति ।। ८० ॥ पुरिमे मासे उँग्गंतो पच्छा वासति य पच्छिमे मासे । जं च बहुं परिमसती जं बहुकं तं वहुं घूया ।। ८१ ॥ एसेव सव्वदन्वेसु गमो सद्द-रस-रूप-गंधेसु । सजीवे णिजीवे य ज वहुं तं गहेतव्यं ॥ ८२ ॥ जवमझा उप्पाता मुतिंगमज्झा य जे उदीरति । मज्झपसत्या अंतेसै गरिता पुरिमणिच्छेवा ।। ८३ ॥ एतेसु मझवासं मासे अस्सोय-पोट्ठपादेसु । सावणबहुलामासेसु दोसु आसारमो बूया ॥ ८४ ॥ जे होति पणयमझा किविल्लका बैज-मुसलमझा वा । मझम्मि पलित्ता अंतकेसु विपुला पसत्या य ।। ८५।। 15 एवं पुरिमं वास मज्झे पच्छा व होति णातव्यं । तध पुरिम-पच्छिमं या मझं वा जेण पुण जुन्जे ॥ ८६ ॥ सिसवेसयसव्वे वि सोभमाणा सव्वकालिकपसत्या । सव्वे वि अप्पसत्या तदा अवुद्धिं वियाणेजो ॥ ८७॥ दिवस-मुहुत्तपमाणे वासारत्तो तु हवति दोमासो । फूसल्लि यस्थ वासति ण य होतित्य सारधण्गाणि ।। ८८ ॥ पक्खपमाणुप्पाते वासारत्तो तु हवति तेमासो । फूसल्लि एत्य वासति ण य होंति तेलालपुरत्या ॥ ८९ ॥ चातुम्मासं वासति वासपमाणे तु मज्झिमं यासं । मझिमिका एत्य भवे णिप्फत्ती सव्वघण्णाणं ॥ ९॥ वासति य पंचमासे यासपमाणे तु उत्तम वासं । णिप्फजते य सस्सा अधिगं सई सारधण्णाणं ।। ९१ ।। पुण्णामे पुण्णेसु य णीरोगेसुवचितेसु णि सु । मुदितेसु उदत्तेसु य णिप्फत्ती सव्यधण्णाणं ॥ ९२ ।। लुक्खे णपुंसकेसु य तुच्छेसु किसेसु अप्पसारेसु । थाणेसुबहुतेसु य इति घूया अवुहिं वा ।। ९३ ॥ पुण्णेसु सुवुट्टि धातकं च अधिगं सई य धण्णाणं । तुच्छेण अवुडिं छातकं च सइ सस्तगासाय ।। ९४ ॥ पुण्णामे गिफत्ती पुण्णामाणं तु सव्वघण्णाणं । थीगामे गिप्फत्ती थीणामागं च घण्णाणं ॥ ९५ ॥ पुण्णामा थीणामा य णत्यि सरसा णपुंसके केयि । वासच्छिदं च भवे रित्तफला जायते सरसा ॥ ९६ ॥ उत्तममंगामासे पादुभावे य उत्तमाणं तु । उत्तमया भौगाणं णिप्फत्ती सत्रघण्णाणं ॥ ९७ ॥ मझिमगाणामासे पादुन्भावे य मज्झिमागं तु । मझिमजहण्गगाणं णिप्फत्ती सव्यपण्णाणं ॥ ९८॥ पेस्संगाणामासे पादुन्भावे य पेस्सवग्गस्सा 1 गिप्फति घण्णागं पेस्सजणस्सेय भोगाणं ।। ९९॥ पुण्णामा थीणामा उत्तम-मझिम-जहण्णवग्गा य । गिरुडुता उवचिता य जति य होति पसण्णा या ॥१०॥ 30 तण्णामा तव्यण्णा तं ताणि य जणामोपभोगा या । निष्फजते य सस्सा अधिकं च सईमणा होवि ॥११॥ ॥ पडलं चोवीसतिमं ॥ छ। - 20 26 १पव्या देवोऽस्य या ई. त• विना ॥ २ वासे वासति आकारो ६० त० ॥ ३ जो बहुं है. त• विना ॥ ४ तु अंतो है. त• विना ॥ ५°सु मरि ई. त•॥ ६मग्झमुसलयम्झा • त.॥ ७ अंघोसु हत.॥ ८णिसापत सव्वे है. त• विना ॥ ९ अधिसगई है. त• ॥ १०'गं सिई हं• त• विना ॥ ११ मागेणं हं• त• ॥ भंग०३३ . 5 10 15 अंगविज्ञापइण्णायं [पणुवीसइमं पडलं [पणुवीसइमं पडलं] देवागं तु पणामेण मुहुत्ता बंदितेण दिवसा तु । अभिसंथुतीए पक्सा ओरयित-णमंसिते मासा ॥१॥ धूमो चुण्गेमु कतो ति मुहुत्ता मुफपुप्फयो दिवसा । कंठेगुणेसु पक्सा मासा तु समिद्धजोगेसु ॥ २॥ लामस्स तु धुवकारे एवं कालो तु एस योघव्यो । दुक्सरस उ आगमणे पडिलोमो एस बोधयो ॥३॥ अम्मा-पितीमु मासा पसा तु मति मातुरग्गम्मि । पुत्तेसु होति दिवसा अप्पसरीरम्मि य मुहुत्ता ॥ ४ ॥ अप्पत्यम्मि मुहुत्ता पुत्तत्यम्मि दिवसे वियाणेजो । मित्तत्यम्मि य पक्सा मासा य महाजणत्यम्मि ॥ ५॥ रायत्यो त्ति मुद्दुत्ता मदतरकत्यो त्ति दिवसमो जाणे । निगमत्था वि य पक्खामासा य भवे जणपदत्ये ॥६॥ रायागं ति मुद्दुत्ता महतरकाणं ति दिवसमो जाणे । गिगमाणं ति य पक्सा मासा गामरस आणं ती ॥ ७॥ सेहिपसादे मुहत्ता दिवमा जाण पगतीपसादम्मि | १ मंतिसादे पक्सा मासा रायप्पसादम्मि ।। ८ ॥ इंदगि त्ति मुहुत्ता पक्षणगि त्ति दिवसा विधीयते । उदरग्गि ति य पक्सा मासा आदिवमगि त्ति ॥ ९॥ विजुपवणे मुटुत्ता अग्गिणिपाते य दिपसमो जाणे । सूरणिपाते पक्पा मासा धुट्ठीणिपातम्मि ।। १०॥ घोरपरोये मुहुत्ता यामुवरोवेण दियसमो जाणे । मित्तुयरोचे पक्सा मासा रातोररोधम्मि ॥ ११ ॥ समतिच्चिए मुझुत्ता वितम्मि दिवसा उवेक्सते पक्सा | मासा य णिवण्णम्मि तु वासा य भवे पसुत्तम्मि ११२॥ संपत्यितो त्ति मासा अद्धपधं आगतो ति सपक्सा तु। एकरसघित्ति दिवसा अतीति ऐते त्ति य मुहुत्ता ॥१३॥ परमजा ति मुटुत्ता दिवसा पणितमहिल त्ति णातव्या । मित्तमिधुगं व पक्खा मासा य सक सु पत्तीसु ॥१४॥ अंतो यारमहत्ता दियसा अभितरे उपहाणे । परसा य आतिकासु तु मासा पुण अंगणे होति ॥ १५ ॥ अंतोनिवसणे होति मुद्दत्ता कोटके तथा दिवसा 1 उपरकम्मि य पक्सा मासा य भवे पडिहारे ॥ १६ ॥ सारीमुद्देमु तु दिवसा मुद्भुत्ता गिवेसणरस दारम्मि । सारीमु होति पक्रा मासा पुण रायमग्गम्मि ॥१७॥ अंतोपुरे मुटुत्ता अंतोगगरे य दिवसमो यूया । बाहिरकायं पक्या मासा गामंतरगयम्मि ॥ १८॥ सीमागते मुदुत्ता दियसहागम्मि दियममो जाणे । परसा परसहाणे मासा पुण दिवसमहाणे ॥१९॥ मंडयको ति मुहुचा दियमा उदयमंडपरफेमु । धणमालामु य पासा मासा य परे समालम्भि ।। २०॥ रायगिहेमु तु मामा पासा तेमगिहेमु णातव्या । फारूगगिहेमु दिवसा पधिकणिलयेमु तु मुदुत्ता ॥ २१ ॥ संयारो ति मुटुत्ता दियसा मामेमु छोति णातव्या । सेडेमु होति पक्सा मासा गरेसु णातव्या ॥२२॥ सम्येमु किच्छवित्तिमु मुटुत्ता फारगेमु दियसा तु । पक्सा पटपासेमु तु मासा सामाइयजणम्मि ॥२३॥ अण्ण-रणपरिणेमु पत्य पामाणि होति मासा या। गिधनिपामगगेमु तु दिवसा पसा य णातव्या ॥२४॥ परमणिक नि मुटुत्ता थित पोति दियमा विधीयते । मायगमुराय परसा मासा आपागो होति ॥ २५॥ पाणीयम्मि गुमा गुलपाणीयं प प दियसा तु । पटुपिट्टीयं परसा जातिपसण्या अरिटे य ॥ २६ ॥ मत्रमयो नि मुहमा इम्मरियमयेमु याममो यूया । पिनामयो ति परसा मासे आगे कुलमयो ति ॥ २७॥ पीपारम्मि माता दियमा कोट्यउरालमनेमु । योहीम होनि परसा मामा सालीम पातव्या ॥ २८॥ साबित मुहमा दियमा यापूमु होति पानव्या । पक्रया अयेष्टिविटेवियम्मि मासा य उम्मि ॥२९॥ दुदेल गुममा विमा दधिमम्मि पनि पाठया। रयणरमम्मि य पररा मासा मधुरे रसे होति ॥३०॥ भिरग्गरंतु मुरगा दियमा पुन पहितो होति । परियमगत परम्ग मासा भो ति पालथ्या ॥ ३१॥ पानं पुषी मुना मगरलदागर दिपमा । मण्यादम्मि पपमा मामा य दिरणदामम्मि ।। ३२॥ १४- FIL.R. Ann2-4-मार्ग पर-त. माfru ३ प चिय... ४ मा एम'.... ५ पर..मना ६दान युवक... 1 20 35 30 । 10 पणुवीसइमं पडलं] एगूणसट्ठिमो कालज्झाओ २५९ उत्ताणसेजगे होति मुहुत्ता रिंगमाणके दिवसा । तरुणययम्मि य पक्खा मासा पुण मज्झिमवयम्मि ॥ ३३॥ संझायं तु मुहुत्ता दिवसा पढमिल्लके पदोसम्मि । पक्खा तु मासवेलं मासा तु ठितद्धरत्तम्मि ॥ ३४ ॥ मासा चेव पयत्तिगतम्मि लेहागमे तु पक्खा तु । दिवसा गतागमणे तस्स णिग्गमणम्मि य मुहुत्ता ॥ ३५ ॥ अरुणोदये मुहुत्ता दिवसा सुजोदये विधीयते । पुव्यण्हम्मि य पक्खा मासा य भवंति अवरण्हे ॥ ३६॥ लोहरजे तुच मुहुत्ता - दिवसा तवु-सीसगेसु लोहेसु । पक्खा य तंवहारं कूडके सुवण्णे तधा मासा ॥३७॥ । दुविधम्मि काललोहे मासे संवच्छरे य जाणेज्जो । मासा तु तिक्खलोहे वस्साणि तु मुंडलोहम्मि ॥ ३८ ॥ अट्ठागते हिरणम्मि मुहुत्ता पाणकम्मि दिवसा तु ! पण्णरसद्दे पक्खा मासा तीसोबके होति ।। ३९ ।। अट्ठाकयाकये होति मुहुत्ता मासकैकये दिवसा । अड्डक्ये य पक्खा मासा पडिकैकये होंति ॥ ४० ॥ काहापणा यति कयक्यम्मि मासा तु तत्तिया होति । जति होति सताणि कयाकयस्स तति होति वस्साणि ॥४१॥ तीसतिभागो सुहुमम्मि मुहुत्ता होति सुहुमछेदे त्ति । खुड्डलकमागछेदो मितिभागे दिवसमो जाण ॥ ४२ ॥ पण्णरसमम्मि भागे मज्झिमकायेसु पक्खमो जाण । वारसभागम्मि य कइकेसु मासो भवति कालो ।। ४३ ।। अचत्थमहासारे वारसभागम्मि वस्समो जाणे । तति यस्सा णातव्या हवंति जति भागलद्धीओ ॥ ४४ ॥ अत्थस्थिकागमणम्मि पुण्णहत्थम्मि लाभमो बूया । रित्तक-तुच्छकहत्यम्मि आगते णत्थि संपत्ती ॥ ४५ ॥ उच्छंगभायणे होति मुहुत्ता दिवसमो तु पुडिकासु । पक्खा तु विअलमाणे मासा पुण लोहभाणम्मि ॥ ४६ ॥ वरसपुप्फिते मुहुत्ता दियसा किंचि पट्टिते होति । पक्खा बद्दलिकाया मासा ये भवे विरजसूरे ॥ ४७ ॥ उल्लोकिते मुहुत्ता णक्खत्तेसु दिवसा विधीयते । तारा-गहेसु पक्खा मासा पुण चंद-सूरेसु ॥ ४८ ॥ एक्कग्गामे एकणगरे व एक्कम्मि निवेसणे या वि । मासा पक्खा व भवे वहुजणसाधारणे देसे ॥४९॥ एकघर-एकासेजा-एक्कासण-एकमायणगते य । एकोऽत्थ अहोरत्तो अच्चासण्णे य मलितम्मि ॥ ५० ॥ एतेसिं भावाणं पसत्यगुणसंथवे सुभो लाभो । णिदित-दोसगरहणासु चेव असुभो भवति लाभो ॥५१॥ पुप्फरतम्मि मुहुत्ता दिवसा पुण होति सुकपुप्फम्मि । गुच्छेसु होति पक्खा भुंभलक-उरच्छके मासा ॥५२॥ 20 आपेलगेसु दिवसा पक्खा पुण मालिकासु गीतव्वा । वट्टापेले मासा मुकुडेसु भवंति वस्साणि ॥ ५३॥ अवरण्हे श्रृण्णेसु य दिवसा मासा व होति सकलेसु । कणलीकतेसु पक्खा चुण्णाणि कतेसु य मुहुत्ता ॥ ५४॥ देवेसु य रायीसु य मासा संवच्छरा य णातव्या । पक्खा या मासा वा सेसेसु मणुस्सभागेसु ॥ ५५॥ आयरिय उपज्झाये अम्मा-पितु-गुरुजणे य सव्वम्मि । थाणत्थिते य सम्वम्मि मासे संवच्छरे जाणे ॥५६॥ एतेणऽणुमाणेण तु कालं मुण सव्वद्व्वेसु । थाणत्थाणविसेसेहिं चेव मुण माणुसाणं पि ।। ५७ ॥ जघ कालो वध लामो तथा सुहं तह य जीवितं "देहं । तध दव्याणं सारो तघ ठाणगुणो य बोधव्यो ॥५८॥ लामो कालविभंगो सारा-ऽसारे य पुच्छगट्ठरस । एगणिमित्तण वि अणुगतम्मि जुत्तेण चोधव्यं ॥ ५९॥ आधारणासु वहुसु विजति सो चेव अणुवंधए भावे । ण य अण्णा उप्पजति तेग उ सव्यं वयसियव्यं ॥६॥ वामिस्सेसुं हम बहुसु वि णाणत्येसु समुदीरमाणेसु । जे तब्भावणुबंधी तजोणीया य ते गन्झा ॥ ६१ ॥ ॥ पडलं [पणुवीसइमं ॥२५] ॥ छ । 15 । 30 ११- एतचिहान्तर्गतं पदं ह.त. नाति ॥ २-३ 'ककसे ई. तः॥ ४ अम्मत्थ ई. त.॥ ५य रुधे विरजमूले है• त. ॥६णेयधा है. त• ॥ ७ घण्णेसु ६० तविना ॥ ८ फसणीक' है. त• विना ॥ ९ पुण्णा' है.. विना ॥ १० फूलो ह. त• ॥ ११ दीहं है. त•॥ १२ हस्तचिहान्तर्गतः श्रपरिमितः पाठः है. त. एव वर्तते ।।
२६० -5 अंगविजापइण्णयं [सत्तावीसइमं पडलं [छब्बीसइमं पडलं] दिवम्मि आगतम्मि य लद्धे थोवतरके मुहुत्तग्गे । दीवस्स य णिव्वामण एकदिवसो मुणेतव्यो ॥१॥ एकजुगलम्मि पुरि[स]त्यिसंगमे एकमो अहोरत्तं । रत्तंबरखुच्छेहि य परिवुत्थं होयहोरत्तं ॥२॥ जति मिधुणकाणि संपेंडिताणि तति णिहिसे अहोरत्ते । जति पुण्णामाणि समागताणि तति णिदिसे दिवसे ॥३॥ जं अतिहि अहोरत्तेहि होति जं जतिहि भवति दिवसेहिं । पक्खेहिं व मासेहि व तस्सुप्पत्तीय सो कालो ॥४॥ जो जत्तिएण कालेण जाति जातं च भवति णिप्फण्णं । सो कालो पातव्यो तस्सुप्पायरस लद्धीय ॥५॥ जं जत्तिएण कालेण कीरते जस्स देसकालस्स । जम्मि व कीरति काले सो कालो तेण णातव्यो ॥६॥ कतणिहितम्मैि दव्वे यालाभमुपहितम्मि कालेण । जेण य तं निफजति सो कालो तेण बोधव्यो॥७॥ आगतमेत्ते व समागते व दिण्णम्मि णिहिते लद्धे । सिग्धं च पडुप्पण्णे संपत्ती तत्तियं वेलं ॥ ८॥ एहिति दाहिति काहिति कम्मं होहिति व मा वतूरित्थ । दुखेण व परिगणितम्मि दिग्घकालो भवति कालो ॥९॥ थोयं सेसं सिद्धं विपश्यते थाहि ता मुहुत्तागं । दूरागतो पचे या गतेहिं दिवसा मुहुत्ता वा ॥ १० ॥ पुण्णेसु समत्तेसु य मासं संवच्छर ति जाणेजो। सबढेसु य पक्खो दिवसो य चतुत्थभागेसु ॥ ११ ॥ जुण्ण-विमदित-खलित-विलिहिते दीहेण भवति कालेण । णव-तरुण-सरस-लहुसंपदासु थोवो भवति कालो ॥१२॥ सव्वेसिं दवाणं अकत्तिमाणं च कत्तिमाणं च । इद्वत्त-मझिममणिहता य तिविधा गती गेया ॥ १३ ॥ पुष्णामा सारजुता मज्झिमसारा य होंति थीणामा । जे तु णपुंसकणामा ते तु असारेसु बोधव्या ॥ १४॥ कालो तु महासारेसु महंतो मझो य मञ्झसारेसु । अप्पो य यति कालो असारवंतेसु सव्वेसु ॥ १५ ॥ जघ णामा तध रूवा सदा गंधा रसा य फासा य । पंचविधा उप्पाता एतेण गमेण बोधव्वा ।। १६ ॥ ॥ भगवतीय महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय फालझायो पडलं ॥ २६ ॥ छ । 10 16 20 [सत्तावीसइमं पडलं] अधापुव्वं सलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय कालप्पविभागं णामझायं वक्सस्सामि । तं जधा-सत्य कालो पंचविधो भवति । तं जधा-मुहत्तप्पमाणं दिवसप्पमाणं पक्सप्पमाणे मासप्पमाणं संवच्छरप्पमाणमिति । मुहूत्तप्पमाणं व 'तिविधं-- दिवसप्पमाणं रत्तिप्पमाणं मिण्णरत्ति-दिवसप्पमाणमिति । तत्य दिवसप्पमाण विविध-पंचरत्तप्पमाणं दसरत्तप्पमाणं पण्णरसरत्तप्पमाणमिति । वस्थ पक्खप्पमाणं विविधं-एकपक्सप्पमाणं विपक्सप्प- माणमिति । तत्य मासप्पमाणं एफारसविध-एक्मासप्पमाणं विमासप्पमागं तिमासप्पमाणं चतुमासप्पमाणं पंचमास- 20 पमाणं छम्मासप्पमाणं सत्तमासप्पमाणं अहमासप्पमाणं णवमासप्पमाणं दसमासप्पमाणं एकारसमासप्पमाण 'मिति । दत्य संयच्छरपमाणं अपरिमितविधं भवति । सत्य फेस-मंमु-गह-लोमसमामासे खुइसत्तेसु अणूमु टिएमु अच्छरफोडणे अंगुलिप्फोडणे य मुटुत्तप्पमाणं यूया। सत्य का पासा मुमका णयग-जिन्मोह-दंत-पोरिसपरिमासे अंगुहवंगुलिग्गहणे मन्झिमाणतरकायेसु घेव पुष्फ-फलेमु दियसम्पमागं एवं यया । तत्य जंघोर-दत्य-पाद-याहु-गीवा-अंस-कोप्पर-फिजागणे मन्झिमकायेसु सत्तेसु महिम- 10 कायेमु पुष्प-पलेमु पेय पक्सप्पमागं यूया । वत्य पट्टी-उदर-फड़ी-उर-सीससमामासे पाययंतेमु सत्तेमु पेय पुप्फ-फलेमु मासप्पमागं पूया । एते घेर उद्धंभागेमु उम्महेमु यासं संरचरपमागं यूया । सत्य अपदातेमु सुपारखं दिपस पा १पापेज.ना ॥ २ मधियान्तर्गतमुजरा... एव यतते ॥ ३°म्मि दिपसे घालारसु पहि.स.॥ ४ रापो सम्मसोnt.. पिना ॥ ५4- एतशिान्तर्गत पद है. तनासि ॥ ६८ एपिहान्तर्गतः पठन्दर्भ..माशि।
- सत्तावीसइमं पडलं] एगूणसहिमो कालज्झाओ धूया । कण्हेसु कालपक्खं रतिं वा वूया 1 सामेसु संझं वा पक्खसंधिं या बूया । गिद्धेसु वासारत्तं धूया, कण्हेसु वि वासारत्तं बूया । सुक्केसु सरदं धूया, पसण्णेसु वि सरदं घूया । सीते हेमंतं चूया, संतेसु य हेमतं घूया । - [......सिसिरं वूया, ...वि सिसिरं चूया।] सामेसु वसंत बूया, मुदितेसु वि वसंतं धूया । लुक्खेसु गिम्हं धूया, उण्हेसु वि गिम्हं बूया । वालेयेसु पाउसं चूया, उपणिद्धेसु गिद्धेसु वा पाउसं वूया । एवं रत्तीयं वा दिवसे वा सुक्कपक्खे वा कालपक्खे या अण्णतररिस वा छण्हं उदूर्ण उदुसि आधारितसि संझा-पक्खसंधीसु वा उदुसंघीसु था. आधारितेसु एतेहिं जधुत्तेहिं आमासेहिं उवलद्धव्यं भवति, सह-रूवपादुव्भावेसु चेव समणुगंतव्यं भवति । तस्थ मासेसु पुव्याधारितेसु कतमो मासो ? ति । तत्थ पुरिमेसु गत्तेसु कत्तियं वा मग्गसिरं वा पोसं वा बूया, संवच्छरे पुव्याधारिते अग्गेयं वा सोमं वा पोसं वा संवच्छरं घूया । दक्खिणेसु गत्तेसु माहं वा फग्गुणं वा चेत्तं वा वेसाहं या मासं यूया, संवच्छरे पुव्याधारित - माहं वा फग्गुणं वा चेत्तं वा वेसाहं पा संघच्छरं धूया । पच्छिमेसु गत्तेसु जेहामूलं वा आसाढं या सावणं वा मासं धूया, संवच्छरे पुख्याधारिते जेट्ठामूलं वा आसाढं या 10. सावणं वा संवच्छरं धूया । वामेसु गत्तेसु पोट्टपदं वा अस्सयुजं वा मासं धूया, संवच्छरे पुव्याधारिते पोट्ठपदं वा अस्सोजं वा संवच्छरं यूया । दढेसु गत्तेसु फग्गुणं वा आसाढं वा पोट्टपदं वा मासं यूया, संवच्छरे पुव्वाधारिते फग्गुणं वा आसाढं या पोट्ठपदं वा संपच्छरं बूया । चलेसु सावणमासं यूया, संवच्छरे पुत्वाधारिते सावणं संव- च्छरं घूया । निद्धेसु सावणं वा पोट्ठपदं वा अस्सोजं वा कत्तियं वा बूया, संयच्छरे पुख्याधारिते सावणं वा पोहपदं वा अस्सोजं वा कत्तियं वा संवच्छरं घूया । लुक्खेसु चेत्तं वा वेसाहं वा जेट्ठामूलं वा आसाढं वा मासं यूया, 15 संयच्छरे पुव्याधारिते चेत्तं वा वेसाहं वा जेट्ठामूलं वा आसाढं वा संवच्छरं धूया । सीतेसु संवुतेसु य मग्गसिरं वा पोसं वा माहं वा मासं चूया । संवच्छरे पुव्वाधारिते मग्गसिरं वा पोसं का माहं वा संवच्छरं धूया । एवं आमास- सह-रूयपादुभावेसु उदुउपचारेहिं कम्म-चेट्टापविचारेहिं पक्खत्तदेवयकम्मोवयारेहि उवलद्धीहिं चेय जधोपदिद्वेहि आधारयित्ता आधारयित्ता मास-संवच्छरोपलद्धीहिं कमसो पवासमणुगंतव्यं भवति । इति मासपरिसंखा । संवैच्छरपरिसंखा पमाणाणिचेव णामतो देवतोपलद्धीहिं उदुप्पविभागेहिं चेव धक्खातं भवतीति । तस्य पक्खे 20 पुव्याधारिते णीहारेसु पक्खप्पमाणं घूया । उजुभागेमु अवस्थितेसु मासप्पमाणं घूया । आहारेसु तिपक्सप्पमाणं चूया । दिवसे पुव्याधारिते एक्कगत्ते एकाभरणके एकोपकरणे एकचरेसु सत्तेसु एकसाहागते चेव एकाहिकप्पमाणं घूया। सत्य दंडेसु गत्तेसु विअंगुलिग्गहणे यमलाभरणके यमलोपकरणे मिधुणचरेसु चेव सत्तेसु विहप्पमाणं घूया । तत्य तिअंगुलीग्गहणे भुमकंतरे णासग्गे तिके अपदूयं अखत्तरे पोरिसे वस्थिसीसे तियमलोपकरणे तिकसद्दपडिरूव-आकार: पादुन्मावेसु चेव तिहप्पमाणं यूया । वत्य चउरंगुलिग्गहणे पादतलपाणितले उम्मजिते उलोकिते उहिते पट्टे गीते वादिते 25 दंडजमलोदीरणे चतुक्कसद्दपडिरूवे आकारपादुन्मावेसु चेव चातूहिकप्पमाणं वूया। तत्य पंचंगुलिग्गहणे मुहिग्गहणे थणग्गहणे फिजागहणे सयणा-ऽऽसणे सपुरिसे सवपंचकपरामासे पंचकसद्दपडिरूया-ऽऽगारपादुम्भावेहिं चेय पंचाहप्पमाणं धूया । तत्थ गुप्फग्गहणे मणिबंधग्गहणे छसु वा एककेसु विसु वा विकेसु बिसु या तिकेमु एकके पंचकसहिते विके चतुक्कसहिते छकसहपडिरूव-आकारपादुन्मावेहिं चेव छाहिकप्पमाणं वूया ! तत्य सत्तकपरामासे चतुके तिगसहिते पंचगे दुगसहिते छक्के एक्ककसहिते विसु या तिकेसु एक्कगसाधारणेसु तिसु वा विकमु एकसाधारणेमु 30 सत्तकसद्दपडिरूत्र-आकारपादुभावेसु चेव सत्ताहिकप्पमाणं यूया। तत्य विचउक्ोदीरणे चउण्हं था दुगाणं सणे अहसु १५ एतचिहान्तर्गतः पाठः ई. तक नास्ति ॥२ हसचिहान्तर्गतः परः १. तु. एव वर्तते ॥३°परिचारे' ह. त•निना। ४- एतचिहान्तर्गतः पाठः हं. त• नास्ति ॥ ५ अपचयं अखंतरे है. त• विना ॥ ६ मुष्टिकरणे थणंतरे गणे फिजा . त• विना ॥ .
- अंगविज्ञापइपणयं वा एककेमु अहरुसद्दपढिरूप-आकारपादुन्मावेसु चेय अट्टाहिकं यूया। तत्य चउकपंचकोदीरणे अट्ठके एक्कासहिते तिकाणं या तिण्हं दसगे सत्तके विकसहिते णवण्हं या एककाणं उदीरणे परामासे या णवफसद्दपडिरूवा-ऽऽकार- पादुमाये चेरणयाहिकप्पमाणं घूया । तत्य पंचकदंडोदीरणे पंचकजुगलग्गहणे पंचण्हं या विकाण दसणे दसकपरामासे या दसकयग्गोदीरणे या दसकपडिरूव-आकारपादुन्माचे चेव दसाहिकप्पमाणं घूया। एवं तन्वं या योगेगं दिवसप्पमाणं 5 जाय एकूमतीसतिरत्तातो । विपक्रो वाऽऽधारिते उप्पण्णे या जोगेणं पण्णरसरत्तातो उद्धं जाव भिण्णमासमासप्पमाणातो तिणेतर दिवसप्पमाणं भवति । इति दिवसप्पमाणं वा योगते आमास-सह-पडिरूबपादुभावेहिं य उपलद्धव्यं भवति । तत्य मासप्पमाणे पुख्याधारिते एतेणेय एकरग्गादिणा दुग-तिग-च उक-पंचक-उका-सत्तक-अट्ठक-गवक-दसक- वगरमेणं यथा दिवसप्पमाणं अदिलु आमास-सह-पडिरूया-ऽऽगारपादुदभावविधीहिं तहा पक्सप्पमाण कमवि तयं भवति । जघा या जोगप्पमाणं दिवसप्पमाणे :- उद्दिदं तथा मांसप्पमाणं पि वा जोगए दिट्ठव्यं भवति । 10 इति - मासप्पमाणं यक्सातं भवतीति । तत्य संयच्छरप्पमाणे पुख्याधारित संबन्छरप्पमाणे उप्पण्णे जघा मासप्पमाणेग एकागादिणा बिग-तिग- चउपा-पंचक-छपा सत्तक-अट्ठक-गरक-दसकयग्गकमेण जघा मासप्पमाणमुयदिढे आमास-सह-पडिरूया-ऽऽकारपादु- समावेहिं वघा संवच्छरप्पमाणं व तव्यं भवति । जाय कोडियग्गाओ अपरिमितवग्गातो वा यधा या जोग्गा अक्स- द्वागं आमासा य उपदिहा णिधीसुत्ते तथा तव्यं भवति संवच्छरप्पमाणं परिमितं अपरिमितं चेति । मुहुत्त-दिवस- 16 परसप्पमाण-मास-संयच्छरप्पमाणाणि पेय पुणरवि अण्गोण्णसमाजोगेणं भिण्णाणि एतेहिं चेव यग्गेहिं वा जोगहाणेहि य आधारयित्ता संजोयणाविसेसेहिं सम्मं समणुगव्याणि भांति ॥ ॥ इति सलु भो! महापुरिसदिण्णाय अंगविजाय कालज्झायो णाम एगोनपष्टि(गसहि)मो सम्मत्तो ॥ छ । [सहिमो पुब्वभववियागज्झाओ-पुव्यद्धं ] १० अधापुज्यं मलु भो ! महापुरिसदिण्णाय अंगविनाय पुच्चभवविवागंणामझायं । तं सलु भो ! तमणुचरस- रसामि । सं जपा-तत्य अंगरता अव्यग्गेगं महात्येणं तणुरागदोसेणं भवितूगं अप्पयो अझत्यभावेणं परेण या पुरियतेगं को मे भंते ! पुरिमो अणंतरपच्छाफहो भयो ? ति एयमुत्तेणं सम्ममव्यग्गसतीकेणं अंतरंगे पाहिरंगे या उदुमये या भयो पउव्यिहो आधारयितव्यो भवति । तं जधा-देवभयो मणुरसभयो तिरिक्सजोगिकमयो गेरइफमयो वि। सत्य उदगीयाय सिरोमुहामासे उम्मनिते उसोपिते पदस्सिते उरिसते उहिते एकमाकरणे उत्त-भिंगार-पहागा- 13 लोमदत्य याममपटक पामरा-वीजणीदंसणे सेसाजोग-जणा-यलिपादुम्माये पहेणगते अधिगते पंदिते पूपिते सफ्ते संपुते पनोगर जलिफरणे देयनपूयापादुम्माये सव्यदेवगने सचदेवणामोदरणे मयदेवणामधेसी थी-पुरिमगते देवपम्मपरि- किसामु मध्यदेवोपचारते एयंपिये पेस्रितामासे सह-पढिरूयपादुम्माये चेय देयमगतो भागते सि देया असंतर- पायो गिप्पा । सत्य फारातो देवगिरायातो पागतो ? नि पुमरवि आधारयितव्यं भवति । संजधा-देवग्झाते हंउ विधी पनिकाया आमाग-गर-पटिरूपपादुम्मापोपलद्धीदि राधा आपारयितव्यं मयति, आधारयिता आपला भनि । गत्य पुनरपि देशेरलदीरं देवगालो मागतो भाधारविनयं भयतीति इति देयेभयो पुरिमो रियो भी। १पाजोगtt..॥२- पहा VEt. स. मागि। विहान. पा.. Tri ५गमात..॥ ६ उपदिर पक ..." परमेरापरणाई... पागर पषिद... पायो..
सट्टिमो पुत्वभवविभागऽझाओ-पुष्वद्ध २६३ तत्थ समगत्तामासे उज्जुकपेक्खिते उजुकवकोपचारे उज्जुभावगते उज्जुववहारगते णिकूडे णिरुवहते सव्यउज्जुक- कम्मोपचारगते अंविसंवादणाय सव्यमाणुसगते सव्वमाणुसोपचारगते सव्वमाणुसोपकरणगए सव्यमाणुस- कम्मचेट्ठागते चेव एवंविधे पेक्खितामासे पडिरूव-सद्दपादुभावे चेव माणुसर्भवातो आगतो सि माणुसभवातो अणंतर- पच्छाकडो त्ति घूया । तत्थ कतमेहि माणुसेहिं आगतो त्ति जधुत्तं आधारयितव्वं । तरस जातीविचये आरिय-मेलक्खु- अन्न-पेस्सोपलद्धीयं दीव-समुद्द-पव्वतवाँसीतो वा आमास-पडिरूव-सद्दपादुभावोपलद्धीहिं आधारयित्ता आधारयित्ता र उवलद्धव्वं भवतीति । तत्थ पुणरवि थीभावातो वा पुरिसभावातो वा कत्तो आगतो ति आधारितसि जधुत्ताहिं थी-पुरिसणपुंसकोपलद्धोहिं उवलद्धव्वं भवतीति । इति मणुस्सभवो पुरिमो विण्णेयो । तत्य तिरियामासे सव्वउवधि-णिकडि-सौतिकजोगकरणे सव्वअणज्जवभावगते सव्यतिरिक्खजोणीगते सव्वतिरिक्ख- जोणीकणामगते सव्यतिरिक्खजोणिकउवचारगते सव्यतिरिक्खजोणीमये उवकरणे सव्यतिरिक्खजोणीकउवकरणे सव्व- तिरिक्खजोणीकणामधेजे थी-पुरिसउवकरणगते एवंविधे पेक्खितामासे पडिरूव-सहपादुब्भावे चेव तिरिक्खजोणिगभवातो 10- सि आगतो ति बूया । पुव्वमाधारितंसि जधुत्ताहि एकेंदिय-वेइंदिय-तेइंदिय चरिंदिय-पंचिंदियोपलद्धीको जीवणि- कायाणं तसाणं थावराणं च तिरिक्खजोणीकाणं व विधिभेदोपलद्धीयं चिंतिते अज्झाये आमास-सद्द-रूवपादुभावेहि तधा सव्यं समणुगंतव्यं भवतीति । तत्थ पुणरवि आधारितंसि कत्तो आगतो ? इति (इत्थि) भांवातो पुरिसीवातो णपुंसकौवातो ? ति । इमे कायणपुंसका विष्णेया भयंति, तं जधा-पुढविकाइया आयुकायिका तेउकायिका वाउका- यिका वर्णफतिकायिका, एते एकेंदिया एकैदियोपलद्धीयं णपुंसकवेदा वेति विण्णेयं । "वेइंदिया तेइंदिया परिदिया 16 एते वि सकाहिं उपलद्धीहिं उपलब्भ णपुंसकवेदो जेव विण्णेयो भवति । पंचेदियतिरिक्खजोणिकेसु सकायं उक्लद्धीयं उपलद्धेसु तिविधमाधारयितव्वं भवति-थियो पुरिसा णपुंसका चेति । एते अधुत्ताहि थी-पुरिस-णपुंसकोपलद्धीहिं आधार- 'यित्ता आधारयित्ता थियो पुरिसा णपुंसका चेति थीणामागंतरा विण्णेया भवंतीति । इति तिरिक्खजोणीगता पुरिमभाया अणंतरपच्छाकडा उवलद्धव्या भवंतीति । तत्थ अधोगत्तामासे णिण्णामासे कण्हामासे उबहुतामासे संकिलिट्ठामासे दुग्गंधामासे दारुणामासे अमणुण्ण- 30 सद्द-पडिरूव-गंध-फासगते सव्वदारुणकम्मोपचारगते सव्वणेरइयणामपादुभावे सव्वणिरयपुरक्खडोपचारगते सव्वणेर- यिकणामधेजे थी-पुरिसगते एवंविधसह-रूवपादुभावे येव णेरइकभवातो सि आगतो रइकभयो ते अणंतरपच्छाकहो त्ति बूया । तत्थ कतमेहिं णेरयिकेहिं आगतो ? त्ति पुणरवि आधारितसि जधुत्ताय चिंतायं णेरइकोपलद्धीओ लेस्साहिं वेदणाहिं ठितिविसेसेहिं आमास-सह-पडिरूवपादुभावोपलद्धीहिं तधा सव्यं समणुगंतव्वं भवतीति । तत्थ पुणरवि गेरइए पुन्याधारिते णेरइया णपुंसका चेव सव्वे उवलद्धव्या भवंतीति । एवं लेसाहिं वेदणाहिं ठितीविसेसेहिं पुढवीए विचयेण 25- पढमाय वितियाय ततियाय चउत्थीयं पंचमीयं छट्ठीयं सत्तमीयं ति आगमणाणि आधारयित्ता आधारयित्ता आमास- सद्द-पडिरूवसण्णाभिणिवेसेहि य उपलब्भ रयिकभवो पुरिमो विष्णेयो भवतीति ॥ ॥ पुरिमभवविभागो णामा पष्टिमोऽध्यायः समाप्तः ॥छ । १ जुवकोप है• त•॥२ अतिसं हं. ० ॥ ३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः ह• त• एवं वर्तते ॥ ४°भावतो है. त• पिना ।। ५°सी चेव आहे. त.॥ ६माणुसमवे पुरिसमो हं. त• विना ॥ ७°माति है. त• विना ॥ ८°जोणीगए म है। ९ दिय-तेंदिय" है. ॥ १०-११-१२ भावओ है. त•॥ १३°णस्सइका है. त• ॥ १४ येदिया तेदिया है. त.॥
अंगविजापइण्णयं [सहिमो उववत्तिविजयज्झाओ-उत्तरद्धं ] - अघापुत्रं सलु भो! महापुरिसदिष्णाय अंगविजाय उववत्तिविजयो णामझायो, तमणुवक्सरसामि । तत्य अंगविदा सम्म अप्पाणं पडिदेक्सियाणं सव्यंगेण सव्यंगसकेणं अयह९ राग-दोसे मझत्येणं सम्मं आधारणे जोगं समंताहारपणिधितेणं एकागमतिदियसमंताहारेणं वप्परेणं अप्पणो अज्झत्ये सण्णायं आधारयमाणेगं 'कत्य इमं 5 जंतुमुपपन्निरसति ?' त्ति 'काऽस गती पुरेक्खडे ?' ति एय पुव्याधारितेण या आधारयमाणेणं उपपत्ती जीवाणं उपल- दया भवति । तं जधा-णिरयभवोपपत्ति तिरिक्खभवोपपत्ति मणुस्सभवोपपत्ति देवभवोपपत्ति सिद्धिअभवउपपत्ति मिव्वाणमिति । तत्य रविकोपपत्ति तिरिक्खजो कोपपत्ति मणुस्सगतोपपत्ति देवोपपचि चेति चतुविधा संसारोपपत्ती विण्णेया भवति । सिद्धउपपत्ती मोक्खो अपुणन्मयो संसारविष्पमोक्खो असंसारोपपत्ती विण्णेया भवति । तत्य अंतरंगे का बाहिरंगे वा तदुभये या आधारयित्ता संसारोपपत्ती पुणन्मयो चतुविधो सिद्धीउपपत्ती चेय अपुणन्भवो इमेहिं 10 आमास-सह-पहिरूपविसेसेहिं उपलद्धव्यं भवतीति । तत्य अधोगत्तामासे गिण्णामासे कण्हामासे किलिट्ठामासे दुगंधामासे - उवद्दुत्तामासे - सच्चदारुणगते सम्वगिरयपुरक्खटोपचारगते रयिकणामपादुन्भावे रयिकपहिरूबगते गेरयिकणामधी-पुरिसउवचारगते गिरयणामो- दीरणे गिरयाणुभागपरिफित्तणासु गिरयोपपातकधासु अमणुण्णसद्द-पडिरूव-गंध-रस-फासोदीरणेसु चेव उव्वेदणीयासु एवंविषे पेक्सितामासे सद्द-पडिरूवपादुद्भावे चेव गिरयमुपपजिस्सतीति णिरयभावो ते अर्णतरपुरक्खडो त्ति बूया 16 वत्य कतमं गिरयमुपपजिरसतीति पुव्यमाधारिते सीतवेदीयं उसिणवेदीयं व ति। तत्थ अग्गेयेसु सव्वअग्गिपादुब्भावे सव्वरसुणफासपादुभाचे सव्यपयणपादुम्भावे सन्यतापणपादुभावेसु उसुगीजोणीकेसु सत्तेसु अग्गिउवकरणेसु अग्गिसरीरेसु वा उपकरणेसु एवंविये सद्द-रूपपादुभावे या उसुणवेदणीयं गिरयं उपपजिस्सतित्ति घूया । तत्थ सव्यपुणे- येसु संवत्ततेसु सब्बसीतफासेसु सव्यसीतआपुजोणीयं सन्यापुमये उपकरणे हेमंतोपकरणेसु हेमंतसीतफास-सीत- वासपरिकिवणासु सीतजोणिकेसु सत्तेसु सीतहुयपरिकित्तणासु चेय एवंविधै सह-पडिरुवपादुभावे सीतवेदणीयं गिरयं 20 उपपजिरसति त्ति बूया । किंलेसे निरये उपपजिस्सति त्ति लेसायं आधारितायं कण्हयण्णपडिरूवगते कण्हलेरसजीव- परिकित्तणे चे कण्हलेसं गिरयं उपपन्निस्सति त्ति बूया । तत्य पीलवण्णे पहिभोगपरामासे णीलवण्णपडिरूवगते य णीललेस्सजीवपरिकित्तणेसु चेव एवंविवे सह-पहिरूवपादुव्भाचे णीललेस्सं गिरयं उपपजिस्सति ति बूया । सत्य' काबुमण्यपडिभोगपरामासे कावुरण्यापहिल्यगते कावुलेक्सजीवपरिकितणेमु चेव एवंविघे सहपडिरूयपादुमावे कायुलेस्सं गिरयं उपपजिस्सति ति यूया । तत्य 'कतमसि पुढवीयं उपपजिस्सति ? ति पुबमाधारयितव्यं 25 मयति । गगणापरिसंसायं एका-विक-तिक चउफ पंचक-छक सत्तकेहिं ठियामासठाणेहिं उपलब्म पढम-विविय-ततिय- घउत्थी-पंचमी-ही-सत्तमीयो पुढवीयो अमुकिरिस पुढवीयं उपपजिस्सति ति यूया । 'किंटितीयं उपपजिस्सति पिरयं' ति पुरुषमाधारितसि सत्यपादुमावेसु सव्यंगिकिं ठितिं घूया । जघण्णपलितोरमेसु वा आधारितेमु पलियपहिरूवेमु पलियपहिरूवेहिं सहेहिं य पलितोमं विष्णेयं, सागरपडिरूवेण य सागरसदोदीरणेहि य सागरोपमं विष्णेयं । गगगापरिसंसराय तव्याणि पलितोत्रमाणि सागरोपमाणि य आधारयित्ता आधारयित्ता विण्णेयाणि भवंति 30 सागरोपमार्ग परिसंसा । सिद्धं सीरिणि ! खीरिणि ! उदुपरि ! स्वाहा, सव्यकामदये! स्वाहा, सचणाणसिद्धिकरि ! खाहा १ । विणि पहागि, मासं दुखोदणेगं उद्द्यररम हेहा दिया विनामधीये, अपच्छिमे छहे ततो विनाओ य पवर्तते रूपेण य दिसते, . मषिरण है.त.। २१ - एलचितानात पाठः है. ह. नास्ति। ४सप्यम्मि किं...॥ ५सागरसमुहो. • विना ॥ ३ उपपयिस्सति है. त• विना ॥
, सट्ठिमो उववत्तिविजय झाओ-उत्तरद्धं २६५ भणति-कतो ते पविसामि?, तं जहा ते पविसामि तं ते अणंगं काहामीति । पविसित्ता य भणति-सोलस वाकरणाणि वा णाहिसि एक चुक्तिहिसि । एवं भणित्तु पविसति सिद्धा भवति । णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो सम्वसाधूणं, णमो भगवतीय महापुरिसदिण्णाय अंगविज्ञाय, आकरणी याकरणी लोकवेयाकरणी धरणितले सुप्पतिहिते आदिच्च-चंद-णखत्त-राहगण-तारारुवाणं सिद्धकतेणं अंत्यकतेणं धम्म- कतेणं सव्वलोकसुबुहेणं जे अढे सव्वे भूते भविस्से से अहे इथ दिस्सतु पसिणम्मि स्वाहा २। एसा आभोयणीविजा । आधारणी छट्ठग्गहणी, आधारपविसंतेग अप्पा अभिमंतइतब्यो, आकरणि काकरणि पविसित्तु मंते जैवति पुस्सयोगे, चउत्थभत्तेणमेव दिसति । णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो भगवतो यसवतो महापुरिसस्स, णमो भगवतीय सहस्सपरिवाराय अंगविज्ञाए, इमं विजं पयोयेस्सामि, सा मे विजा पसिज्झतु, खीरिणि खीरिणि ! उढेवरि ! स्वाहा, सर्वकामदये! स्वाहा, सर्वज्ञानसिद्धिरिति स्वाहा ३ । उपचारो-मासं दुद्धोदणेग उदुंबरस्स हेट्ठा दिवसं विजाभधीये, अपच्छिमे छढे कातव्वे 10 ततो विजा ओवयति त्ति रुवेण दिरसति, भणति य-कतो ते पविसामि ?, जतो य ते पविस्सिस्सं तीय अणंगं काहामि । पविसित्ता य भणती-सोलस वाकरणाणि वाकरेहिसि, ततो पुण एकं चुकिहिसि, वाकरणाणि पण्णरस अच्छिड्डागि भासिहिसि, ततो अजिणो जिणसंकासो भविस्ससि, अंगविज्ञासिद्धी स्वाहा । परिसंखा तव्या, तच्छीसोपरि पुढवीयं ठिती विण्णेया। एसा उकहो पलितोवमाणं गणणा । परं दस १ कोडौकोडीओ आधारयित्ता दसकोडा कोडीओ सागरोयमं 15 पलितोक्माणं विण्णेयाणि भवंति । उक्कसं सागरोवमं विण्णेयं भवति । उक्कस्सा गिरयेसु ठिती तेत्तीसं सागरोयमाणि विष्णेयाणि भयंति । तल्थ कतमायं पुढवीयं ति एवं ठितीयो निरयो निरयोपपाते आधारयित्ता उकरस-जहण्णायं पुढवी- उबलद्धीयं चेत्र उपलब्भ अमुकठितीकं गिरयमुपपजिस्सतीति वूया । इति गिरयोपपाता विण्णेया । भवंति या वि [एत्यं गाहाओ-] अधोगत्ताणि आमसति किलिहाणि य सेवति । दीणे दीणपरामासे अधोदिट्ठीय माणवो ॥१॥ उपदुताणि सेवंतो उव्विग्गो जो तु पुच्छति । अमगुण्णे सद्द-रूपम्मि णिरयाणं कधासु य ॥२॥ णिरयोपपातफरणे पत्ते या वि दसणे । एतारिसे समुप्पाते जाणेजा गिरयोपकं ॥ ३ ॥ इति । तत्य तिरियामासे तिरियविलोकिते तिरियगमगे तिरिच्छागमणे तिरिच्छाकरणे सयकुडिलागते समअणज्जवगते सन्चअणजयभावगते सव्वउयधि-णिकडि-सातिजोगकरणे सव्वअतिसंधणागते सव्वअणजयववहारगए च्छादणा-गृहणासु चेव सव्यतिरिक्सजोणीगते सव्यतिरिक्खजोणिकपडिरुयगते सव्यतिरिक्सजोणिकणामपादुभावे सब्यतिरिक्सजोणिकसदगते 25 सव्यतिरिक्सजोणिकउपकरणगते सब्बतिरिक्खजोणिकसरीरमये उपकरणे सव्यतिरिक्खजोणिकणामधेने थी-पुरिसे एवंविवे पेक्खितामासे सद-पडिरूवपादुन्भावे तिरिक्सनोणी उपपजिस्सति त्ति तिरिक्सजोणीमाको ते अणंतरपुरक्खडो त्ति बूया । तत्य तिरिक्सजोणिकभावे पुयाधारित तिरिक्सजोणी पुणरवि पंचविधामाधारये । तं जधा-एदिए धेईदिए तेइंदिए चउरिदिए पंचेंदिए चेति । तत्थ एफेमु गत्तेसु एकाभरणके एक्कोपकरणे एकवेणीकरणे एकचरेसु सत्तेसु एकसाधारगते एकपादुन्भावे सब्वे- 20 कैदियपादुन्भावे एकैदियणामपादुघ्भावे एकैदियमये उपकरणे एकैदियणामवेजथी-पुरिसपकरणे चेय एवंविधे सद-पडि. रुयपादुभावे चेर एकैदियकायम वूया । तत्य एकैदिये पुव्याधारित एकैदियं पंचविधमाधारये, तं जधा-पुढविका- इके आवुकायिक तेयुकायिके वायुकायिके वणप्फतिकायिके चेति । १ अत्थकत्यकपणं है. त.॥ २°वहेणं ह० त० ॥ ३ आलोयणीहै. त• ॥ युवति ६० त० दिना ।। ५- एनश्चिान्तर्गत. पाठः ६० त० नाति ॥ ६ माति' त• विना॥ ७- एनचिहान्तर्गतः पाठः त. नास्ति ॥ ८ 'पुराकडी त• सि. ॥ ९एकामाहार त०॥ अंग०३४ - 20 । २६६ अंगविजापइण्णयं तत्थ दढामासे सव्यधातुजोणीगते पुढवीकायपादुन्भावे पुढविणामवेजोदीरणे पुढवीउयकरणगते पुढवीधातुमये उपकरणे पुढवीणामधेजे थी-पुरिसउपकरणपादुम्माये एवंविघे पेक्सितामासे सद्द-पडिरूयपादुव्भावे पुढचीकायएकैदिय- काये उपपजिरसति त्ति पुढविकाइओ ते अणंतरपुरक्सडो त्ति बूया । तत्य पुढविकाइये पुव्याधारिते पुणरवि सुद्धपुढवी पत्थरपुढवी मणिपुढवी धातुपुढवी कायवंतपुटवीकायं च अधापडिरूयतो आधारयित्ता आधारयित्ता सजोणीहिं । आमास-सद-पडिरूवपादुन्मावेहिं चेव चूया इति पुढविकायोपपत्ती विण्णेया भवति । तत्य आपुणेयेसु पागजोणीगते सम्पउदकपादुम्भावे उदकसहगते य उदकणामधेनोदीरणे आपुजोणिकदव्योग- करणपादुब्भावे पाणजोणीमये उयकरणे आपुजोणीणामधेने थी-पुरिसरयकरणगते र आपुकायिको ते एकैदियकायिको अगंतरपुरक्खडो त्ति धूया। तत्थ आपुकायिक पुव्याधारिते आपुकार्य सत्तविधमाधारये, तं जधा-सायोदकं लवणोदकं मधु- रोदकं वारुणोदकं खीरोदकं घत्तोदकं सोतोदकं ति । एताणि उदकाणि अधोवदिट्टेहिं रम-पटिरूवोपलद्धीहिं आमासोपलद्धीहिं 10 चैत्र उपलव्याणि भवंति । तं समासेण पुणरवि दुविधमाधारयितव्यं भपति-अंतलिरवं भोम्मं चेति । एताणि उदकाणि अंतलिक्सोपलद्धीहिं भोम्मोपलद्धीहिं चेव उवलद्धव्याणि भांति । तत्य उद्धंभागेसु गत्तेसु सह-पडिरुवेसु चेव अंतलि- खेसु य अंतलिक्सोदकं वूया । अधोभागेसु गत्तेमु भोम्मेसु येव सद-पडिरुवेसु य भोम्ममुदकं वूया । सत्य भोम्मे उदके पुसमाधारिते वं अट्ठविधमाधारये, तं जधा-सामुदं णादेयं तालुकं रोड कोप्पं पल्ललजलं परसत्रण उद्भिजामिति । एताहिं जधुत्ताहिं उवलद्धीहिं समुद्द-णदी-तलाक-कूपादिकाणि उपलद्धीहिं आमास-सद्दपाउन्भावेहिं सुध उपल- 15 द्धन्याणि भवंति इति आपुक्कायो विष्णेयो भवतीति । तत्य अग्गेयेसु सव्यअग्गिपादुम्भावे सयअग्गिगते सधअग्गिणामगते अग्गिउवकरणेसु अग्गेयेसु उपकरणेसु अग्गिजीवणेसु अग्गेयकम्मं उपचारपादुव्भावसु ते अग्गिनामधेजे थी-पुरिसउयकरणपादुव्भावसु च्या चेव तेयुकार्य उपवजिस्सति ति बूया, तेचुकायो ते एकैदियकायो अणंतरपुरक्सडो त्ति यूया । तत्थ तेवुझाये पुष्याधारिते अणुसरीर वादरसरीरं वा कतमं उपपचिरसति ? त्ति पुणरवि आधारयितव्यं भवति । तत्थ अणूसु आमास-सद-पडिख्यपादुमावेसु 20 अणुसरीरं तेवुकायं उपपजिस्सतीति यूया । तत्थ कायतेसु घायरसद्द-1 पंडिरुव घ्य पादुद्भावेसु चेर बादरस- रीरमुपपजिस्सति ति चूया ! सत्य तेवुक्कायरस सुभत्तमसुभत्तं चेति आधारयित्ता आधारयित्ता आमास-सदपडिरूव- पादुब्भावेसु चेर णेतव्यं भवतीति इति तेवुक्कायोपपातो विष्णेयो भवति । तत्य घायब्वेसु वाडकायपादुभावेसु वायुकायसद्दगते वायुकायणामोदीरणे यायुक्कायोपकरणेसु विजेणय-ताल- निंदादीसु संस-पन्चत-योगशालकादिसु आतोजेसु वायुकायणामवेजे थी-पुरिसउयकरणगते चैव एवंविचे पेक्खितामासे 25 सद्द-पडिरूवगते पादुद्भावे यायुक्कायमुपपजिस्सति ति वूया, वायुकायो ते एकैदियभवो अणंतरपुरक्सडो त्ति बूया । तत्थ वायुकाये पुजाधारिते वायुकायस्स अणुसरीरंता बादरसरीरता य सुभता असुभता य आमास-सह-पडिरूव- पादुन्मावेहिं अघुत्ताहिं उरलद्वीहिं उबलद्धव्यं भवतीति इति वायुकातोपरातो उपलद्धयो भवतीति । तत्य मूलजोणिगते सव्यतण-बणस्तति-हरितपादुम्भावेहिं मूलजोणीसगते मूलजोगीणामपादुघ्भावे मूलजोणी- उयकरणगते मूलजोणीमये उवकरणे मूलजोगीणामधेने थी पुरिसउवकरणगते अहोगत्तामासे सनसंधगते सव्वमूलगते 30 सबनीजगते चेप एवंविधे पेक्सितामासे सह-पडिरुवपादुम्भावे यणप्फतिकायं उपपजिस्सति त्ति बूया, वणप्फतिकायो ते एकेंदियभयो अणंतरपुरक्सडो त्ति बूया । तत्थ वणप्फतिकाये पुन्याधारिते तं णवविधमाधारये, तं जधा-रक्सगतं लतागतं गुम्मगतं गुच्छगतं वलयगतं उदाणगतं तणगतं थलज-हरितगतं चेति । तत्य उद्धंमागेसु सचखंधगते चेच रसं वूया । उसु उद्धंभागेसु य उम्महेसु य लतायो धूया । गहणेसु गुम्मे यूया। दीहेसु कुडिलेसु य सव्पगुच्छगते १ तालुकं वो स ३ पु• सि.॥ २-३-४ हस्तचिहान्तर्गत पाठः त० एवं वर्तते ॥ ५ वीजण त.॥ ६'रस्स मायादसरीराता यत.॥
- - - 10 सट्टिमो उवयत्तिविजयज्झाओ-उत्तरद्धं २६७ चेव गुच्छे बूया । काययंतेसु रुक्खे धूया । मज्झिमकायेसु गुम्मे चूया । मज्झिमाणतरकायेसु वलये चूया । पञ्चवर- कायेसु तगाणि हरिताणि या बूया । आपुणेयेसु मूलजोणीसाधारणेसु थलजोणिहरिताणि चूया । सद्द-पडिरूवपादुन्भावसु चेव सव्वाणि सरिसेहिं वूया । तत्थ वणफति सव्यं पुणरवि चउव्यिधमाधारये-कंदगतं मूलगतं खंधगतं अग्गगतं चेति । तत्थ कंदगते कंदगता विण्णेया, मूलगते मूलगता विण्णेया, खंधगते खंधगता विण्णेया, अग्गगते अग्गगता विण्णेया भवतीति । तत्थ अग्गगता चतुविधामाधारयितव्या भवंति, तं जधा-पत्तगता पुष्फगता फलगता वीजगता । चेति । तत्य अणूसु पुधूसु सयपत्तगते चेव पत्तगता विन्नेया । मुंदितेसु सव्यपुप्फगते चेव पुप्फगता विण्णेया । पुण्णेसु सव्वफलगते चेत्र फलगता विष्णेया । तणूसु सव्यवीयगते चेय वीयगता विण्णेया । तत्थ एसा वणप्फती दुविधा समासेण-जलजा थलजा चेव । णवविधा रुक्खादिकेण वित्थारेणं । पुणरवि चउविधा समासेणं-कंदगता मूलगता खंधगता अग्गगता चेव । अधुत्ताहिं उबलद्धीहिं आमास-सद-पडिरुवसमुत्थिताहिं विण्णेया आधारयित्ता आधारयित्ता उबलद्धव्या भवंति । इति वणप्फतिउपपातो विण्णेयो भवतीति । तत्थ दंडोदीरणे दंडेसु गत्तेसु जमलाभरणके यमलोपकरणे यमलपीतिकरणे मेधुणचरेसु सत्तेसु सव्ववियपादु- भावे । वेइंदियसत्तपादुव्भावे हा सव्वविईदियसद्दगते विइंदियणामोदीरणे वेइंदियोपकरणे विइंदियसरीरमये उपकरणे विइंदियणामधेजे थी-पुरिसउवकरणगते एवंविथे पेक्खितामासे सद्द-पडिरूवगते विइंदियकाये उपपजिस्सति त्ति यूया, चिइंदियकायो ते अणंतरपुरक्खडो त्ति बूया इति यिइंदियोपपातो विष्णेयो भवति । तत्थ तिरुपादुब्भावेसु भुमकंतरे णासग्गे सिंघाडगे सव्यतिकपादुद्भावेसु तिइंदियसत्तपादुब्भावे तिइंदियणामधेजोदीरणे तिइंदियोपकरणे 15 तिइंदियसरीरमये उवकरणे तिइंदियणामधेजे थी-पुरिसउयकरणगते पादुन्भावे एवंविधे पेक्खितामासे सद्द-पडिरूव- पादुव्भावेहिं तिइंदियोपपजिस्सतीति तिइंदियभवो ते अणंतरपुरक्खडो भविस्सतीति वूया इति तेइंदियोपपातो भवतीति विण्णेयो । तत्थ चउकेसु सव्यचउकयग्गपादुव्भावे सम्वचउरिदियसत्तपादुन्मावे सव्यचउरिदियसदगते चउरिदियणा- मधेजोदीरणे चउरिंदियउपकरणे चउरिदियमते उचकरणे चरिंदियणामधेजे थी-पुरिसउवकरणपादुब्भावे चउर दिय- सद्दपडिरूयपादुभावे चेव चतुरिदियभयो ते अणंतरपुरक्खडो त्ति इति चतुरिंदियोपपातो भवतीति । तत्थ वेइंदिये संख-संखणग-सिप्पिका-जलाउ-दककिमी-णीपुर-सुमंगल-संयुकादयो एवंविधा फासिदिय-जिन्भि- दियोपपेता विष्णेया भवंतीति । तिइंदिया "जुगलिका-उप्पाडक-उप्पातक-तणहारक-पत्तहारक-कुंथु पिपीलिका-उपचिक- रोहणिक-तेवरुक-तपुस-मिंजिक-पातिक-साहिक-सतप्पाय-गोम्मि-हत्यसोंडक-कडमच्छादयो एवंविधा [फासिंदिय- जिभिदिय-पाणिदियोपपेता विष्णेया भवंति । तत्थ चउरिदिया.. ...दयो] फासिदिय-जिभिदिय-पाणिंदिय-चक्खिदियउपपेता विष्णेया भवंति । एते णं जीया तसकायिका सम्मुच्छणसंभवा, ण 25 एतेसिं गम्भोपपत्ती विण्णेया, एते णं पञ्चवरकायेसु खुड्जोणी विण्णेया । एतेसिं णपुंसकजोगीयो सीत-उसुण-सीतोसुण- साधारणातो सरीरसट्ठाणाणि वण्गोपलद्धीतो अपद-बहुपदग्गं खेचोपपातविसेसा उद्धमधो तिरियं च दिसापविभागा उग्गविसता मंदसिया णिव्यिसयों तोप्पभोगतो अगोपभोग्गतो सुमचं असुभत्तं च यधुत्ताहि मास-सद्द-पडि- रूवोपलद्धीहिं छा आधारयित्ता आधारयित्ता उवलद्धव्यं भवतीति । एते व णं तसा वेईदिय-तेइंदिय-चरि दिया वायरा य काया एकेंदिया सव्वे णपुंसका विण्णेया भयंतीति । तत्य पंचकामासे पंचकपादुन्भावे सयपंचेंदियगते सव्यपंचेदियोपकरणे सव्यपंचेदियतिरिक्सजोणिकसरीरमये 30 उपकरणे सव्यपंचेंदियतिरिक्खजोणिकणामधेने थी पुरिसउयकरणगते एवंविवे पेक्सितामासे सद्द-पडिरूवपादुम्माये चेप पंचेंदियतिरिक्सजोणीयं उपजिस्ससि ति घूया, पंचेंदियतिरिक्सजोणीमभयो ते अगंवरपुरकसडो ति यूया । तत्य १ मिदितेसु त• विना ॥ २रणेसु गचेसु त• विना ॥ ३ हस्तचिहान्तर्गतः पाठः त. एव वर्तते ॥ ४जंग त.॥ ५°या ओपभोग्गया अणोपमोग्गया सुत॥ ६ हस्तविहान्तर्गतः पाठः त. एव वर्तते ॥ 20 । 13 २६८ अंगविजापइण्णयं पंचेंदियतिरिक्सजोणीयं पुयाधारितायं पंचेदियतिरिक्रराजोणी पंचविधा आधारयितव्वा भवति, तं जधा-पक्खिगता चतुष्पदगता सरीसियगता परिसप्पगता जलचरगता चेति । एस पंचविधा वि पंचेंदियतिरिक्सजोणीयं जधा पुष्यचिंति- तायं उपदिट्ठा समास-वित्थरेहिं आमास-सद-रूवपादुभावोपलद्धीहिं तथा सव्या समणुगंतव्वा भवतीति । एवं पंचेंदि- यतिरिक्सजोणीउपपातो उपलद्धव्यो भवतीति । भवंति चावि एत्थं गाहाओ, तं जधा- तिरिय गत्ताणि आमसति तिरिय वा वि विपेक्सति । तिरिच्छागमणे चेव तिरिच्छागमणेसु य ॥१॥ उबधी-णियडिजोगेसु सातिजोगमणजवे ! तिरिक्खजोणीसमुप्पाते तेरिच्छसद्दरूविते ॥२॥ तिजजोणिसणामके थी-पुमंसे उवक्सरे । एरिसे सह-रूपम्मि तिजजोणिकमादिसे ॥ ३ ॥ तत्य उजुकामासे उजुकपेक्सिते उजुकोपगमणे उजुकवापगते सव्वणिरुवहितगते सव्वअणुकूलगते सव्वमाणुस. गते सम्ममाणुसपडिरुवगते माणुससद्दगते माणुस्सणामपादुव्भावे मणुस्सोवकरणगते मणुस्सकम्मोवयारगते माणुसकम्मो- १८ ययारपरिकित्तणामु चेन एवंविधे पेक्सितामासे सद्द-स्वपादुव्भावेसु चेव मणुस्सभनं उपपजिस्ससि त्ति मणुस्सभवो ते अणंतरपुरक्राडो त्ति बूया । तत्य मणुरसभवे पुव्याधारिते मणुस्सा आरिया मिलक्खू अजा पेरसा थी-पुरिस-णपुंसक- सिप्प-कम्म-विजा-खेचोरवातबिसेसेहिं चेर एवमादीकेहिं उकस्स-मझिम-जहण्यकेहिं उवलद्धीहिं जधा जातीविचये उपदिलु आमास-सद्द-पडिरुवपादुभावोपलद्धीहिं तधा सव्यमाधारयित्ता आधारयित्ता सम्म समणुगंतव्यं भवतीति । भांति या वि एत्थ गाहाओ- उजुगत्तसमामासे उजुकोवकरणम्मि य । उजुकं पेक्खिते चेय उजुभावगतेसु य ॥१॥ सपनवोपयोगेसु यवहारम्मि य उजुके । उजुकम्मोपचारे य स मांगुसाणं च दंसणे ॥२॥ समे सदोपकरणे उवचारे य» माणुसे । माणुसे पडिरुवे य माणुसं भवमादिसे ॥३॥ एवं मणुस्सभोपपातो विण्णेयो भरतीति । तत्थ उद्धंगीयाय सिरोमुहामासे उल्लोकिते उम्मढे उपहसिते उस्सिते उहिते एकंसाकरणे छत्त-भिंगार-आदस- 20 पताका-लोमहत्य-धीजणि-जासण-कडकपादुन्भावे वंदिते पूजिते सकते संथुते अचिते पणमिते अभिवादिते सेसाजोग- जण्ण-बलिहरणगते सव्यपहेण-गंध-मल्ल-धूप-लापण्णकपयोगगते चे सव्वदेवागारंगते देवणामोदीरणे देवतोपचारे देवकम्म- परिकित्तणामु सव्यदेवणामवेजे थी-पुरिसउचरणगते एवंविधे पेक्सितामासे सद-रूप-रस-गंध-फासदिव्यियपादुभावे देवभयं उपजिम्सतीति देवभयो ते अणंतरपुरक्सडो ति बूया । तत्थ देवभवे पुयाधारिते देवाणं णिकायविसेसा - आधिपचविसेसा - सामाणिव विसेसा परिसाविसेसा । लेसविसेसा - खेत्तविसेसा आभिजोगिकविसेसा 25 धी-पुरिसविसेसा भावणाविसेसा जहा देवज्झाए उवइहो तहा नेयव्यं भरइ । उनलद्धीयं पि आमास-सह-पटिरूव- णामपादुन्भावहिं णेतयं भवतीति । भांति चापि एत्थं गाहाओ- उद्धं गीगाय गत्ताणि आमसंतो तु पुच्छति । उल्लोकंतो जो तु गत्तमुम्मजए तु जो ।। १ ।। एगमायरसरणे छत्त-भिंगारदंसणे । पताका-वेजयंतीणं पहेणागं च दंसणे ॥२॥ देयकम्मोग्यारेसु देवरम्मरधामु य । देयोरपातं जाणीया पादुन्भावे य तारिसे ।। ३ ।। एवं देयोपपातो विण्णेयो भरतीति । नत्य दिपज्ञोणीयं अत्तागं उम्मनगाय उत्तमहेनु उत्तमेमु समोरसेमु सव्यअसंसतेसु सविसंजोगेमु मत्यमोम्योपापस्थामु सयमोसिसत्योदीरामु मरसिद्धिगते सम्पणियगते सम्पतिगगते स सव्यअम्जगते । मव्यापम्मगते मारमुपगने व मननयोगगने - मध्यपरिसुद्धगते चेर एविधे परिसलामासे मद-रूपपादुम्भावसु 30 १ मायरिया त• ॥ २-३-४- एतविक्षन्तर्गन. पाटः . नातिल ॥ ५उलंकनो जो जं नु गत्त सम्म त• ॥ १-०एभिमानांपा... नाभि सहिमो उववत्तिविजयज्झाओ-उत्तरद्धं चेव सिद्धिं उपपजिस्ससि त्ति वूया, सिद्धिभावो ते अणंतरपुरक्खडो त्ति यूया । भवंति चावि एत्थं गाहाओ- गत्ताणि देवजोणीयं उम्मजतो तु पुच्छति । मोक्खेसु वा वि सव्वेसु उम्मढे उत्तमम्मि य ॥१॥ सिद्धो मुत्तो त्ति तिण्णो ति णीरयो णिव्वुतो ति य । असंगो केवली बुद्धो अंसरीरकधासु य ॥२॥ अकम्मो णिप्पयोगो त्ति सद्देसेवंविवेसु य । [............ .] सिद्धिभावं पवेदयेदिति ॥ ३ ॥ इति सिद्धोपपत्ती अपुणव्भवा विण्णेया इति । ॥ इति खलु भो! महापुरिसदिन्नाय अंगविजाय उपपत्तीविजयो णामझायो सहितिमो सम्मत्तो ॥६॥ b 10 णमो भगवतो अरहतो यसवतो महापुरिसस्स महावीरवद्धमाणस्स । णमो भगवतीय महापुरिसदिन्नाय अंगवि- जाय सहस्सपरिवाराय भगवतीय अरहंतेहिं अर्णतणाणीहिं उपदिट्ठाय अणंतगमसंगहसंजुत्ताय पण्णसमणसुतणाणि- वीजमतिअणुगताय अणंतगमपजायाय ।। णमो अरहताणं । णमो सिद्धाणं । णमो आयरियाणं । णमो उबझायाणं । णमो लोए सव्वसाहूणं ॥ णमो भगवतीए सुतदेवताए ॥ छ ॥ ग्रंथानम् ९००० ॥ छ ॥ ॥ अंगविज्जा[पइण्णयं] संपुण्णं ॥ १सिद्धमु त० दिना ॥ २यसंसारकया त• पिना ॥ ३ ग्रंथाप्रम् ८८०० ॥ अंगविद्यापुस्तक ममाप्तम् ॥ त.॥
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परिशिष्टानि प्रथमं परिशिष्टम् ।। जयन्तु वीतरागाः॥ सटीकं अङ्गविद्याशास्त्रम् । ...तानां कालोऽन्तरात्मा सर्वदा सर्वदर्शी शुभाशुभैः फलसूचकैः सविशेषेण प्राणिनामपराङ्गेपु स्पर्श-व्याहारे- गितचेष्टादिमिनिमित्तैः फलमभिदर्शयति । तत्प्रयतो दैवज्ञोऽप्रहतमतिरवधार्य स्वशास्त्रार्थमनुसृत्य यशोवर्मानुग्रहार्थ- मर्थिनां शुभा-शुभानां भावा-भावमभिनिर्दिशेत् । तत्र दिशं दिशः कालं व्या[हा] द्रव्यदर्शनम् । अगप्रत्यगस्पर्शनं समीक्ष्य फलमादिशेत् ।। १ ।। इति ।। १॥ स्थानं पुप्पसुहासिभूरिफलभृत्सुलिग्धकृत्तिच्छदा- सत्पक्षिच्युतशस्तसंज्ञिततरुच्छायोपगूढ़ समम् । देवर्षि-द्विज-साधु-सिद्धनिलयं सत्पुप्प-सस्योक्षितं, सत् स्वादूदकनिर्मलत्वजनिताहादं च सच्छादलम् ॥ २॥ एवंविधं स्थानं 'सत्' पृच्छायां शुभदमित्यर्थः । कीदृशम् ? एवंविधानां तरूणां-वृक्षाणां या छाया तयोपगूढं-- छन्नम् । कीदृशानाम् ? 'पुप्पसुहासि' पुष्पाणि-युमुमानि शोभनो हासो येषां ते पुष्पसुहासिनः । तथा भूरीणि-प्रभूतानि फलानि [विभ्रति-] धारयन्ति ये ते भूरिफलभृतः । सुस्निग्धा कृत्तिः–त्यक् छदानि-पर्णानि येषां ते सुस्निग्धकृत्ति- च्छदाः । तथा असत्पक्षिभिः-अनिष्टविहगैः काकोलूकादिभिश्युताः-रहिताः। तथा शस्तसंज्ञिताः-प्रशस्तनामानो ये पलाशपिप्पल-न्यग्रोध-विल्यप्रभृतयः । तथा 'सम' निम्नोन्नतावनिरहितम् । 'देवीति' देवाः-सुरा ऋपयः-मुनयो द्विजाः विप्राः साधवः-सन्तः सिद्धाः-देवयोनय एतेषां यन्निलयं-स्थानम् । तथा सत्पुप्पः-सुगन्धैः कुसुमैः सस्यैश्च धान्यादि- भिर्युतं उक्षितं-सेवितं शुभम् । तथा 'स्वादूदकनिर्मलबजनिताहादं च स्वादु-मृष्टं यदुदकं-जलं निर्मलं-प्रसन्नं च ० तद्भावेन जनित-उत्पादितं आहाद-चित्तहर्पम् , यत् तथाभूतेनोदकेन युक्तम् । 'सच्छावलं' शोभनदुर्यायुक्तं तत् सदिति । तथा च परासरः-"अथ पुप्पितफलितहरितस्निग्धत्वपत्रनामाङ्कितसौम्यद्विजवरनिषेविततरुच्छायोपगूढे सस्यकुसुम- रहितमृदुशावलासिक्तमृष्टद्यप्रसन्नसतिलाशयेऽवकाशे देवर्षिसिद्धसाधू .. ..पूर्वाभिमुसो वा यः पृच्छेत् तस्य प्रार्थितार्थोपपत्तिमेभिनिर्दिशेत् ॥ २ ॥ अथ [अ]शुभस्थानादर्शनार्थमाह- छिन्न-भिन्न-कृमिखात-कण्टकि प्लुष्ट-रुक्ष-कुटिलैन सत्कुजैः । क्रूरपक्षियुतनिन्द्यनामभिः शुष्कशीर्णवहुपर्णचर्मभिः ॥३॥ एवंविधैः कुजैः-युयुतं अमत् । कीदृशैः ? छिन्न:-कल्पितैः, भिन्नैः-बुटिले:, कृमिसातैः-कीटक्षितैः, कण्ट- किभिः-सकण्टकैः, प्लुष्टेः-दुष्टेः रू:-अभिग्वैः, कुटिलै:-अस्पष्टैर्न शोभनैः । को-भूमौ जायन्त इति कुजाः । तथा रे:-अनिष्टेः परिभिः-विहगैः काक-गृध्र-यकार्ययुक्तः निन्द्यनामभिः-फुत्सितसंज्ञः विमीतका.. । शुकैः- नीरमः । तथा शीर्णानि-च्युतानि बहूनि पर्गानि-प्रभूतानि पत्राणि चर्माणि-त्यचो येषां ते ॥ ३॥ [अन्यद] प्याह- दमशान-शून्यायतनं चतुप्पथं तथाऽमनोज्ञं विपमं सदोपरम् । अवस्करा-ऽङ्गार-कपाल-भस्मभिश्चितं तुपैः शुष्कतृणैर्न शोभनम् ॥ एवंविधं स्थानं पृच्छायां न शोभनम् । कीदृशम् ? श्मशानं-शवशयनप्रदेशः। शून्यायतनं-उद्वासितदेवगृहम् । 'तुम' पत्चारः पन्यानो यत्र । तथा 'अमनोई' न चित्ताहादकम् । विपमं-निग्नोन्नतम् । सदा-सर्वकालमूपरं- १प्रन्योऽयमापन परहितः मन्दित एवं प्राप्तोऽम्ति, अतो नामाप्यम्येदं मत्परिकल्पितमेव शेयमिति ।। 25 । 30 10 . अङ्गविद्याशास्त्र सटीकम् । રક कतासंयुक्तम् । अवस्करैः-गृहमुक्तैरशुचिभिरनुपयोग्य ण्डैश्वितं-व्याप्तम् । तथाऽङ्गारकैः-दग्धकाठैः कपालैः अस्थि- कालैः भस्मना च चितं-युक्तम् । तथा तुपैः-धान्यचर्मभिः शुष्कैः-नीरसैस्तृणैश्चितं न शोभनमिति ॥ ४ ॥ 'अन्यदप्याह- प्रवजित-नग्न-नापित-रिपु-बन्धन-सौनिकैस्तथा श्वपचैः। कितव-यति-पीडितैर्युतमायुध-माक्षीकविक्रयादशुभम् ॥५॥ एवंविधं स्थानं पृच्छायामशुभम् । प्रव्रजितः-तापसो लिङ्गी। नग्नः-विवस्त्रः । नापित:-दिवाकीर्तिः शिल्पी जधारप्रभृति । रिपुः--शत्रुः । वन्धनं-बन्धशाला । सौनिक:-पशुघातकः । एतैर्युक्तं स्थानम् । तथा श्वपचैः-चाण्डालैः । तयः-द्यूतकारकः । यतिः-त्रिदण्डी । पीडितो रोगादिना। एतैर्युक्तं स्थानम्। तथाऽऽयुधं आयुधशाला यत्र, माक्षीकं मधु द्विक्रयशाला कल्पपालगृहसमीपाद्धेतोरशुभमिति ॥ ५॥ अथ दिकाललक्षणमाह- प्रागुत्तरेशाश्च दिशः प्रशस्ताः प्रष्टुन वाय्चम्बु-यमा-ऽग्नि-रक्षः। पूर्वाह्नकालेऽस्ति शुभं न रात्रौ सन्ध्याद्वये प्रश्नकृतोऽपराहे ॥६॥ दिशः-आशाः प्राक्-पूर्वी उत्तरा ऐशानी च पृच्छायां 'प्रशस्ताः' शुभाः 'प्रष्टुः पृच्छकस्य, तदभिमुखः शुभ त्यर्थः । 'घाय्यम्युयमाग्निरक्षः' वायवी वारुणी दक्षिणाऽऽमेयी नैर्ऋती च न शस्ताः, न शुभाः एता दिशः नटुः । 'पूर्वाह्नकाले' दिनप्राग्भागसमये 'प्रश्नकृतः' पृच्छकस्य 'शुभं' शोभनफलमस्ति विद्यते, 'रात्रौं' निशि 'सन्ध्यादये'] सायं प्रातः अपराहे च न शुभमिति । तथा च परासरः-"छिन्नभिन्नशुष्करूक्षवक्र......दग्धकण्टकक 15 ......द्विज...पिधिनाः प्रशस्तनामाङ्कितपादपच्छायश्मशानयन्यायतनवन्धरोपितरिपुनापितायुधमद्यविक्रय.. मु नम्रतामेययाम्यवारुणवायव्याशाभिमुखः प्रचोदयेत् , स्पष्टमर्थमनर्थाय विन्द्यात्” । अपि च- वेलाः सर्वाः प्रशस्यन्ते पूर्वाह्ने परिपृच्छताम् । सन्ध्ययोरपराहे तु क्षिपायां च विगर्हिता ॥ १ ॥ इति ॥ ६ ॥ अन्यदप्याह- यात्राविधाने च शुभाशुभं यत् प्रोक्तं निमित्तं तदिहापि वाच्यम् । दृष्ट्वा पुरो वा जनताहृतं वा प्रष्टुः स्थितं पाणितलेऽथ वस्त्रे ॥ ७ ॥ यात्राविधाने यत् शुभाशुभं 'प्रोक्तं' कथितम्, "सिद्धार्थका-ऽऽदर्श-पयो-ऽञ्जनानि" इति शुभदम्, “कर्पासौपध- कृप्णधान्यम्" इत्यशुभम् । तथा तत्र शाकुनं यन्निमित्तं 'प्रोक्तं' कथितं तद् 'इहापि' प्रश्नसमये याच्यं वक्तव्यम्। 'पुरों' असतो या दृष्ट्वा य...नो परजनता-जनसमूहः तया आहृतं-आनीतं 'प्रष्टुः' पृच्छकस्य 'पाणितले' हस्ते 'वस्त्रे अम्बरे या स्थितं दृष्ट्वा शुभमादिशेदिति । तथा च परासरः- यात्राविधाने निर्दिष्टं निमित्तं यच्छुभाशुभम् । तदेव दृष्ट्वा देवज्ञो वाञ्छासिद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ १ ॥ ७ ॥ अधुना अगानि पुंसंज्ञकान्याह- अथाङ्गान्यूर्वोष्ठ-स्तन-वृषण-पादं च दशना, भुजी हस्ती गण्डौ कच-गल-नखा-ऽङ्गुष्ठमपि यत् । सशङ्ख कक्षांसं श्रवण-गुद-सन्धीति पुरुपे, स्त्रियां भू-नासा-स्फिग्-वलि-कटि-सुलेखा-ऽङ्गुलिचयम् ॥ ८॥ अधैतानि पुसंक्षकान्यङ्गानि भवन्ति-ऊरू ओष्टी स्तनी वृपगो-मुष्की पादौ-घरणी 'दगनाः' दन्ताः 'मुजी' याहू 'हस्तो' करो 'गण्डो' मुसकपोलो कचा:-केशाः गल:-फण्ठः नसा:-कररहाः अद्गुष्ठी-हस्तपादाद्गुष्ठो, एतत् सरं यत्तदपि 'पुरुपे' पुंसि । फनी प्रसिद्धी, अमा-स्कन्धो, अयणी-कार्गों, गुदं-पायुस्थानं सन्धिप्रहणे सर्वाङ्गसन्धय उच्यन्ते, 'इति' एवं प्रकाराः सर्व एव पुरुपे पुंसि ज्ञेयाः । तथा च परासर:--"तयाङ्गानि मुफ- 20 25 30 " . भंग०३५ २७४ - । 10 प्रथमं परिशिष्टम् । स्वन-पादा-ऽङ्गुष्ठोरु-गुस-भुज-हस-मस्तक-कर्णा-ऽक्षि-कक्ष-राम-दन्ता-ऽङ्गुष्टौष्ठं नस-गल स्कन्ध-गण्डं केश-समयः पुरुषाख्यानीति" । अप स्त्रीसंझानाह-स्त्रियां' इति एतान्यनानि त्रियां भवन्ति । ध्रुवौ प्रसिद्ध । नासा-प्राणम् । स्फिजौ-प्रसिद्धी । वली-लेसा, यथा त्रिवली । कटि:-प्रसिद्धा । सुलेसा-शोभनलेखा करमध्यसा । अलि- चयं-अङ्गुलिसमूहः ॥ ८ ॥ अन्यानपि स्त्रीसंज्ञानाह- जिह्वा ग्रीवा पिण्डिके पार्णियुग्मं जड़े नाभिः कर्णपाली कृकाटी। वक्रं पृष्ठं जन जान्वस्थि पाच हृत्ताल्पक्षि स्यान्मेहनोरनिकं च ॥९॥ 'जिह्वा' रसना । 'प्रीवा' फुकाटिका । 'पिण्डिके' जल्योः पश्चिमभागौ । 'पाणी' चरणयोः पश्चिमभागी 'लडे' प्रसिद्ध । 'नाभिः' तुन्दः । कर्णपाली' प्रसिद्धा । 'छकाटी' प्रीयापश्चिममागः। [............] ॥९॥ नपुंसकाख्यं च शिरो ललाटमाश्चाद्यसंज्ञैरपश्चिरेण । सिद्धिर्भवेत्रातु नपुंसकों रूक्ष-क्षतर्भग्न-कृशैश्च पूर्वैः ॥१०॥ 'शिरः' मस्तकम् । ललाटं' मुखपृष्ठम् । एतत् सर्व नपुंसकाख्यम् । तथा च परासर:-"शिरो-ललाट-मु... धु...पृष्ठ-जठर-जत्तु-जान्यस्थि-पार्श्व-हृदय-कर्णपीठा-ऽक्ष-मेहनोरनिक-वास्विति नपुंसकाख्यानि" । अथ 'आद्यसंह:' प्रथमत उक्तैः पुनामभिः स्पृष्टैः 'आशु' क्षिप्रमेय सिद्धिः 'स्याद्' भवेत् । 'अपरैः' तदनन्तरोक्तेः स्वीनामभिचिरगा सिद्धिर्भवेदिति । नपुंसकैः स्पृष्टः 'न जातु' न कदाचित् सिद्धिः स्यात् । 'रूक्ष-क्षतैर्भम-कशैश्च पूर्वैः' इति, नेत्यनुवर्तते, 18 पूर्वेः पुनामभिः स्त्रीनामभिर्वा रूः अस्निग्धैः क्षतैः-सप्रहारः भग्नैः-स्फुटितैः कृशैश्च-अल्पमांसैन जातु सिद्धिः । तथा च परासरः-"तत्र पुन्नामभिरस्निग्धमनुपह्तमरोगमनं स्पृष्टं दिग्देश-काल-व्याहारेटदर्शन-निरुपहतप्रष्टुः पृच्छार्थे सकलम- यत्तियति, स्त्रीसत्कमपि पूर्वोक्तलक्षणमुक्तं तत् कालान्तरेणासफलम् । नपुंसकाख्यमकार्यसिद्धिमनर्थानां च गमनं कुर्यात् । अपि च भवति यात्र- पुंसंज्ञेप्याशु सिद्धिः स्यात् स्त्रीसंज्ञेषु चिराद् भवेत् । अशुभं त्वेव निर्दिष्टं नपुंसकसनामसु ॥ १ ॥ पुरुषाख्येऽपि संस्पर्शे वाह्ये रूक्षे च लक्षिते । नार्थसिद्धिमथो ब्रूयादगविद्याविशारदः ॥ २॥” इति ॥ १० ॥ अथ पृथक पृथक् फलनिर्देशार्थमाह- स्पृष्टे वा चालिते वाऽपि पादाङ्गुष्ठेऽक्षिरुग् भवेत् । अगुल्यां दुहितुः शोकं शिरोघाते नृपादु भयम् ।। ११ ।। वत्र पृच्छायां पादाङ्गुष्ठे चालिते स्पृष्टे वा प्रष्टुः 'अक्षिरुग् नेत्रपीडा 'स्याद्' भवेत् । अहुल्यां स्पृष्टायां दुहितुः ७ शोकं वदेत् । 'शिरोधाते' शिरोऽभिहत्य पृच्छेत् तदा 'नृपाद्' राजतो भयं ब्रूयात् । अथ पृथक् पृथक् फलनिर्देश:- तर पादाङ्गुष्ठं प्रचालयन् स्पृक्षा या पृच्छेत् तत्प्रधुश्चक्षुरोगं विनिर्दिशेत् , अगुली स्पृष्ट्वा दुहितशोकम् , शिरसि हन्यमाने राजमयम् ॥ ११॥ अन्यदप्याह- विप्रयोगमुरसि स्वगोत्रतः कर्पटाहृतिरनर्थदा भवेत् । स्थात् प्रियाप्तिरभिगृह्य कर्पटं पृच्छतश्चरण-पादयोजितुः ॥१२॥ ......सह विप्रयोगं प्रयदेत् 'स्वग्नतः' आत्मीययर्गात् । 'फटाहृतिः' यस्नत्यागः 'अनर्यदा'.. 'कर्पट' यनं 'अभिगृल' प्राप्य परणं-पादं पादे-द्वितीये चरणे योजयति तस्य 'पृच्छतः' प्रष्टुः प्रेयलामः स्यात् । तथा घ परासर:-"उरः स्पृष्ट्वा विप्रयोगं गोत्रात्, यसमुत्स्जदोऽनगमम्, पादं पादेन संस्पृशेत् पटान्तमभिगृह्य वा पृच्छन् प्रियममागर्म विद्यान्" ।। १२ । अन्यदप्याह--- पादाङ्गुष्ठेन विलिखेद् भूमि क्षेग्रोन्यचिन्तया । हस्तेन पादौ कण्डूयेत् तस्य दासीमया च सा ॥ १३ ॥ प्रष्टा क्षेत्रोत्यचिन्तया पादाहुटेन 'भूमि' मुयं विलिसेन् , 'हस्तेन' करेण पादं कण्डूयेत् सदाऽस्य 'सा' चिन्ता 20 :- 30 35 10 अङ्गविद्याशास्त्रं सटीकम्। 'दासीमया' दासीकृता । तथा च परासरः-"अङ्गुष्ठेन भूमेिं विलिखेत् क्षेत्रचिन्तां विजानीयात्, हस्तेन पादौ कण्डूयेद् दासीकृता च सा" ॥१३ ।। अन्यदप्याह- ताल-भूर्जपटदर्शनेऽशुकं चिन्तयेत् कच-तुपा-ऽस्थि-भस्मगम् । व्याधिराश्रयति रज्जु-जालकं वल्कलं च समवेक्ष्य बन्धनम् ॥ १४ ॥ तालवृक्षपनदर्शने भूर्जपटदर्शने या प्रष्टा 'अंशुकं' वस्त्रं चिन्तयेत् । 'कचतुपा-ऽस्थि-भस्मगं व्याधिराश्रयति' । कचा:-केशाः तुपं-धान्यवर्म अस्थि-प्रसिद्धम् , भस्म, एपामन्यतमस्योपरिगवं प्रष्टारं 'व्याधिः' पीडा आश्रयति । रजुः-प्रसिद्धा, जालक-पत्र मत्स्य-पक्षिणो घध्यन्ते तदेव तत्सदृशं वा, 'बल्कलं' त्वक्, एपामन्यतमस्थं वा 'समवेक्ष्य' अवलोक्य गृहीत्वा वा पृच्छेत् तदा वन्धनं वदेत् । तथा च परासरः-"वाल-भूर्जपत्रदर्शने बनायें, केशा-ऽस्थि- भस्मनाऽऽक्रम्य व्याधिभयं श्रूयात् , निग(मृग )जालमजु-सिक्थ-वल्कलान्यधिष्ठाय दर्शने या बन्धनं मतम्" ॥ १४ ॥ अन्यदप्याह- पिप्पली-मरिच-सुण्ठि-वारिदै रोध्र कुष्ट-वसना-ऽम्बु-जीरकैः । गन्धमासि-शतपुष्पया वदेत् पृच्छतस्तगरकेन चिन्तनम् ॥ १५॥ स्त्री-पुरुषदोप-पीडित-सर्वा-ऽध्व-सुता-ऽर्थ-धान्य तनयानाम् । द्वि-चतुःशफ-क्षितीनां विनाशतः कीर्तितईष्टेः ॥ १६ ॥ पिप्पलीति । पिप्पल्यादिदर्शने रुयादिचिन्तां क्रमशो व्यपदिशेत् । तत्र पिप्पलीदर्शने या स्त्री दोपदुष्टा । सदोपा तत्कृतां चिन्तां वदेत् । मरिचदर्शने दोपयुतस्य सपापस्य पुरुपस्य चिन्तां प्रवदेत् । सुण्ठिदर्शने पीडितस्य- व्याधितस्य मृतस्य चिन्तां वदेत् । वारिदा-मुस्ता तेषां दर्शने सर्वनाशकृताम् । रोध्रदर्शने अध्वनाशकृताम् । कुष्ठदर्शने मुवनाशरुतां-पुत्रनाशजाम् । वसन-वस्त्रं तद्दर्शने अर्थनाशकृताम् । अम्युदर्शने धान्य[नाश] कृताम् । जीरकदर्शने वनयस्य-पुत्रस्य नाशकृताम् । गन्धमास्या द्विशफानों-द्विपदनाशकृताम् । शतपुष्पया चतुःशफानां-चतुप्पदविनाश. कृताम् । तगरेण क्षिते:-भूमेः नाशकृताम् । एतैः 'कीर्तितैः' उच्चरितैर्यो दृष्टेः' अवलोकितैर्वा विनाशहेतोः पृच्छा 20 भवति । तथा च परासरः- "पिप्पलीनां दर्शने प्रदुष्टस्नीकृतां चिन्ताम् , मरीचकस्य पापपुरुषवाम् , शृङ्गवेरस्य मृतचिन्ताम् , अजाज्याः सुवनाशकृताम् , रोधस्याध्वनाशकृताम् , मुस्खस्स सर्वनाशकृताम् , कुष्ठस्य सर्वनाशकृताम् वसनस्यार्थनाशकृताम् , तगरस्य भूमिनाशकृताम्, शतपुष्पायाश्चतुष्पान्नाशकृताम, मांस्या द्विपदनाशार्थाम्" ॥ १५ ॥ १६॥ अन्यदप्याह- न्यग्रोध-मधुक-तिन्दुक जम्बू-प्लक्षा-अन-बदरजातफलैः । धन कनक पुरुप-लोहांशुक-रूप्योदुम्बराप्सिरपि करगैः ॥ १७ ॥ 'न्यमोपादिजावफल:' वत्सम्भः फलेः 'करगैः' हस्तस्यैः धनाद्याप्तिर्भयति । वत्र न्यग्रोधजावफलः प्रष्टुईवस्पै. र्धनाप्ति:-वित्तलाभो भवति। मधुकफ्ले: कनकस्य-स्वर्णस्याप्तिः । तिन्दुकफलेः द्विपदस्य-पुरुषस्याप्तिः। जम्बूफटेर्लोहस्य । प्लक्षफलैः अंशुकस्य-वस्त्रस्य । आम्रफलैः रूप्यस्य । बदरफलेख्दुम्बरस्प-ताम्रस्येति । तथा च परासरः-"अय न्यमोधफलेईस्वस्थैः पृच्छेद् धनागममादिशेत् , मधुकोदुम्बरफलेः काञ्चनागमम्, द्विपदागर्म तिन्दुके, पनागमं प्लमः, 30 रूप्यस्य आपः, वानस यदरः, लोहस्य जाम्बवैः" इति ॥ १७॥ अन्यदप्याह- धान्यपरिपूर्णपात्रं, कुम्भः पूर्णः कुटुम्यवृद्धिकरः। गज-गो-शुनां पुरीपं, धन-युवति-सुहृद्विनाशकरम् ॥ १८ ॥ धान्यपरिपूर्ण पात्र मुम्मः पूर्णः कुटुम्बवृद्धिकरः । 'गड-गो-शुनां पुरीपं धन-युयति-मुद्विनाशकां' गगनां-इथिनां 'पुरी' रिष्त गर्दा पुरीपंप शुना-सारमेयानां पुरीपं धनम्म-ऐश्वर्यस्य युवतीनां-लीगणं घ्यभिचार मुहदां च विनाशं 15 फोति ॥ १८॥ अन्यदप्याह- 25 " २७६ 10 प्रथमं परिशिष्टम्। पशु-हस्ति-महिप-पङ्कज-रजत-व्याप्रैर्लभेत सन्दृष्टैः। आविक-धन-निवसन-मलयज-कौशेया-ऽऽभरणसङ्घातम् ॥ १९॥ पश्वादिभिः पृच्छासमये 'सन्दृष्टैः' अवलोकितैः अव्याद्याभरणसङ्घातं-समूहं प्रष्टा लभेत । तत्र पशुदर्शने आविकस्य-और्णिकस्य कम्वलादेर्लाभः । हस्तिन:-करिणो दर्शने धनागमः । महिपदर्शने निवसनस्य-क्षौमवस्त्रस्य, 5 पङ्कजस्य-पद्मस्य दर्शने मलयजस्य, रजतस्य-रुप्यस्य दर्शने कौशेयस्य वलस्य, व्याघ्रदर्शने आभरणस्यागमः । तथा च परासरः-"महिपस्य क्षोमवस्त्रागमम् , मणिभाण्डस्य गवाजिनम् , और्णिकानां पशुदर्शने, व्याघ्रस्याभरणागमं वदेत्, पङ्कजस्य दर्शने रक्तवत्रचन्दनलाभम् , रूप्यस्य दर्शने कौशेयवस्राणाम्" ॥ १९॥ अन्यदप्याह-- पृच्छा वृद्धश्रावक-सुपरिव्राड्दर्शने नृभिर्विहिता। मित्र-छूतार्थभवा गणिका-नृप-सूतिकार्था वा ॥ २० ॥ वृद्धश्रावक:-कापालिकः तद्दर्शने-तदालोक्ने 'नृभिः' पुरुषैः मित्र-छूतार्थभवा 'पृच्छा विहिता' कृता पृच्छा । गणिका–वेश्या नृपः-राजा सूतिका-प्रसूता स्त्री तत्कृता ॥ २० ॥ अन्यदप्याह- शाक्योपाध्याया-ऽहन्निर्ग्रन्थ-निमित्त-निगम कैवतैः । चौर-चम्पति-वाणिज-दांसी-योधा-ऽऽपणस्य-वध्यानाम् ॥ २१ ॥ शाक्यादीनां दर्शने चौरादीनां पृच्छा । शाक्यदर्शने चौरकृताम् । उपाध्यायदर्शने चमूपतिकृतां-सेनापतिकृताम्। 15 मईतो दर्शने वाणिजकृताम् , निम्रन्यदर्शने दासीकृताम् । नैमित्तिकस्य दैवविदो दर्शने योधकृताम् । नैगमस्य दर्शने आपणस्थस्य-श्रेष्ठिनः कृताम् । कैवर्तस्य धीवरस्य दर्शने वध्यकृतां चिन्तामिति ॥ २१ ॥ अन्यदप्यहि- तापसे शौण्डिके दृष्टे प्रोपितः पशुपालनम् । हृद्तं पृच्छकस्य स्यादुन्छवृत्तौ विपन्नता ॥ २२॥ तापसे दृष्टे पृच्छकस्य 'हृतं' चित्तस्थं 'प्रोपितः' प्रवासे यः कश्चित् स्थितः तस्य प्रवासिनश्चिन्तनम् । 'शौण्डिके' 20 मद्यासक्ते दृष्टे पशुपालनं चित्तस्थम् । 'उच्छवृत्तौ' शैलोञ्छवृत्तौ दृष्टे विपन्नार्थचिन्ताम् । तथा च परासरः-"निम्रन्थ- दर्शने दासीपृच्छाम् , वृद्धश्रावकदर्शने मित्रद्युतकृताम् , शाक्यस्य चौरकृताम् , परिव्राजकस्य नृप-सूतिका-गणिकाओं वा, उपाध्यायस्य चम्पतिकृताम् , नैगमस्य श्रेष्ठिकृताम् , नैमित्तिकस्य योधार्थाम् , उञ्छवृत्तीनां विपन्नाम् , अर्हतो वाणिजम्ताम्, तापसस्य प्रोपितार्थाम्, शौण्डिकस्य पशुपालनार्थाम् , कैवर्तस्य यध्यघातकृताम्" इति ।। २२ ।। इच्छामि द्रष्टुं भण पश्यत्यार्यः समादिशेत्युक्ते । संयोग-कुटुम्योत्था लाभैश्वर्योद्ता चिन्ता ॥ २३ ॥ इच्छामीलायुक्ते यथासयं संयोगादिकृताम् । तत्रेच्छामि द्रष्टुमिति 'उक्ते' भापिते संयोगकृतां चिन्तां वदेत् । मणेत्युक्ते फुटुम्यताम् । पश्यतु आर्य इत्युक्ते लाभाद्कृतां लाभार्यकृताम् । समादिशेत्युक्ते ऐश्वर्योद्गतां चिन्तामिति ॥२३॥ अन्यदप्याह- निर्दिशेति गदिते जया-ऽध्वजा प्रत्यवेक्ष्य मम चिन्तितं यद । आशु सर्वजनमध्यगं त्वया दृश्यतामिति च धन्धु-चौरजा ॥ २४ ॥ निर्दिशेति 'गदिते' उक्त पृच्छा 'जयाध्यज्ञा' जयायं कृता जाता अध्यजा या 1 'प्रत्यवेक्ष्य' विचार्य मम 'चिन्तितं' हदनं यदेत्युक्ते यन्धुकृता । सजनमभ्यगं द्रष्टारमे यक्ति 'आशु' क्षिप्रमेय त्वया दृश्यतामिति 'चौर- जाता' तसरफ्ना चिन्ता । तथा च परासरः -"आदिशेत्युक्ते ऐश्वर्यचिन्ताम् , भणेत्युक्ते कुटुम्बचिन्ताम्, इच्छामि मिति संयोगचिन्ताम्, पदयत्यार्य इनि लामस्ताम् , निर्दिशेत्यध्यकृतां जयपृच्छां वा, पृच्छामि तावदार्येति या मम्यक सम्प्रत्यपेशवेति पन्धुश्ताम् , अथ फाले निष्पन्नात्तः सहसा बहुजनमध्यगतं दृश्यतामिति पृच्छेचौरकृतां जानी- यादिति ॥ २४ ॥ अय घोरतानमाह- अन्यदप्या- 25 30 २७७ 10 अङ्गविद्याशास्त्रं सटीकम् । अन्तःस्थेऽङ्गे स्वजन उदितो वाह्यगे याह्य एव, पादाङ्गुष्टा-ऽङ्गुलिकलनया दास-दासीजनः सात् । जो प्रेप्यो भवति भगिनी नाभितो हृच्च भार्या, पाण्यङ्गुष्ठा-ऽङ्गुलिचयकृतस्पर्शने पुत्र-कन्ये ।। २५॥ 'अन्तःस्थेऽहें अभ्यन्तरस्थे 'अङ्गे अययवे स्पृष्टे पृच्छायां चौरः 'स्वजनः' आत्मीय एव 'उदितः' उक्तः ।। याह्यगेऽङ्गे स्पृष्टे वाह्यत एयोदितश्चौरः । 'पादाङ्गुष्टाङ्गलिकलनया' पादाङ्गुष्ठे स्पृष्टे दासश्चौरः, अङ्गुलीपु-पादाङ्गुलीब- प्येवं दासीजनः 'स्याद्' भवेत् । अवासर्शने 'प्रेष्यः' कर्मकरो भवति । नामितो भगिनी । हृदि भार्या आत्मीया जाया । पाणिः-हस्तः, हस्ताङ्गुष्टस्पर्शने पुत्रः । अङ्गुलिचयस्पर्शने कन्या-आत्मीया तनया चौरी । एवं कृतस्पर्शने चौर- ज्ञानम् ॥ २५ ॥ अन्यदप्याह- मातरं जठरे मूर्ध्नि गुरुं दक्षिण-वामको । याहू भ्राताऽथ तत्पनी स्पृष्ट्वैवं चौरमादिशेत् ॥ २६ ॥ 'जठरे' उदरे स्पृष्टे 'मातरं' जननी चौरी यदेत् । 'भूमि' शिरसि गुरुम् । दक्षिण-धामको वाहू स्पर्शने यथासङ्ख्यं भ्राताऽथ तत्पन्नी, दक्षिणबाहुस्पर्शे भ्राता, वामे तत्पन्नी । 'एवं' अगस्पर्शने दृष्टे 'चौरं' तस्करं 'आदिशेन' यदेत् । तथा च परासरः---"वाह्याइस्पर्शने वाह्यं चौरम् , अन्तः स्वकृतम् , तत्र पादाङ्गुष्ठे दासम्, अगुलिपु दासीम् , जङ्घयोः प्रेष्यम् , जठरे मातरम्, हस्ताङ्गुलिपु दुहितरम् , अङ्गुष्ठे सुतम् , नाभ्यां भगिनीम् , गुरुं शिरसि, 15 हृदि भार्याम् , दक्षिणवाही भ्रातरम्, पामयाही भ्रातृभार्याम्" ॥ २६ ॥ अथापहृतस्य लाभाऽलाभज्ञानमाह- अन्तरङ्गमवमुच्य पाह्यगं स्पर्शनं यदि करोति पृच्छकः । श्लेष्म-मूत्र-शकृतस्त्यजन्नथ पातयेत् करतलस्यवस्तु चेत् ॥ २७ ॥ भृशमवनामितानपरिमोटनतोऽप्यथवा, जनधृतरिक्तभाण्डमवलोक्य च चौरजनम् । हृत-पतित-क्षताऽस्मृत-विनष्ट-विभग्न-गतो- न्मुपित-मृताद्यनिष्टरवतो लभते न धनम् ॥ २८ ॥ अन्तरङ्गमिति । एवंविधैर्निमित्तः प्रष्टा हृतं धनं न लभेत । कैः ? इत्याह–'अन्तरङ्ग अभ्यन्तरस्थमवययं प्राप्त 'अयमुच्य' परित्यज्य बाह्यमवयवस्य स्पर्शनं यदि पृच्छकः करोति । अथवा श्लेप्म-मूत्र-शतः 'यजन्' परित्यजति तत्कालम् । अथवा करतलस्यं-पाणितलस्थं किश्चिद् यस्तु पातयेत् ॥ २७ ॥ भृशमवनामितानमिति । अथवा 'भृशं' अत्ययं अवनामिताद्गावययो अद्गानामेव परिमोटनं-चटचटाशब्द- मुत्पादयति । तथा तत्कालं जनधृतं-लोकस्यादेवितरिक्तभाण्डं (1) 'अवलोक्य' दृष्ट्वा । तया 'चौरजन' तस्करमवलोक्य । अथवा हत-पतिता-ऽशता-ऽस्मृत-विनष्ट-विमान-गतोन्मुपित-मृतादि, एपामनिष्टरवतः-शब्दश्रयणात् , आदिग्रहणान्नष्ट-कष्ट- दष्टा-ऽनिष्ट-जीर्णशब्दश्रवणात् प्रष्टा हतं न लमत इति । तथा च परासर:---"अन्यत्र रोग स्पृष्ट्वा निर्हरणं या शेप्म- मूत्र-पुरीपाण पुर्यात्, हस्ताद्वा किश्चित् पातयेत् , गात्राणि या स्फोटयेत्, कृत-इत-पतित-मुपित-विस्मृत-नष्ट-कष्टा-30 ऽनिष्ट-माम-गत-जीर्णशब्दप्रादुर्भायो या स्यात्, रिक्तमाण्ड-तस्कराणां दर्शने नष्टस्यालाभं विन्धात्" ॥२८॥ अय पीटार्याना मरणा-ज्ञानमाह- निगदितमिदं यत् तत् सर्व तुपा-स्थि-विपादकैः, सह मृतिकरं पीडार्तानां समं रुदित-क्षुतैः। "अन्तरगमयमुच्य" इत्यत आरभ्य यदिदं नष्टचिन्तायां 'निगदित उक्तं तत् मयं तुपा-ऽस्थि-विवादः 'सद' 5 साफं सया रुदित-सुनेः 'समं' सह 'पीडानानां' रोगिगां 'मृति' मरणं करोति । आदिग्रहणात् छिन्न-भिन्न-मृत-दुग्ध- 20 25 - २७८ 5 10 प्रथमं परिशिष्टम् । दग्ध-पाटिवशब्देरिति । तथा च परासरः-अयो रोगाभिचावत्यर्दि()मूत्र-पुरीपोत्सर्ग-केशा-ऽस्थि-भस्म-तुप-विषादानां अशुमानां दर्शने, तथा छिन्न-भिन्न-व्यापन्न-हृत-गत-क्षुत-जग्ध-बद्धन्दग्ध-पाटित-रुदिवशब्दप्रवणे या रोगिणां मरण- मादिशेत्" ॥ अथ भोजनज्ञानमाह- अवयवमपि स्पृष्ट्वान्तास्यं दृढं मरुदाहरे- दतिपहु तदा भुत्त्वाऽन्नं सुस्थितः सुहितो वदेत् ॥ २९ ॥ 'अन्तःस्थ अभ्यन्तरस्थितं 'दृढं' स्थिरमवययं स्पृष्ट्वा 'मरुद्' वायुं 'संहरेत्' उनिरन् पृच्छेत् तदा स पृच्छको 'अतिबहु' अतिप्रमूतमन्नं भुक्त्या 'मुहितः तृप्तः सुस्थित इति वदेत् ॥ २९ ॥ अन्यदप्याह- ललाटदर्शनाच्छूकदर्शनाच्छालिजोदनम् । उरःस्पर्शात् पष्टिकाख्यं ग्रीवास्पर्शे च यावकम् ।। ३० ॥ ललाटदर्शनाच्छूकधान्यानां या दर्शनाच्छालिजोदनं पृच्छकेन मुक्तमिति वदेत् । उर:-पक्षःस्पर्शत् पष्टिकान्नम् । प्रीवास्पर्शे ‘यावयावान्नम् ॥ ३० ॥ अन्यदण्याह- कुक्षि-कुच-जठर-जानुस्पर्श मापाः पयस्तिल-यवागूः । आस्वादयतश्चोष्ठी लिहतो मधुरं रसं ज्ञेयम् ॥ ३१ ।। फुक्षिस्पर्शे मापा मुक्ताः । कुचौ-स्तनी तयोः स्पर्शे पय:-क्षीरोदनम् । जठर-उदरं तत्पर्शने तिलौदनम् । 15 जानुपर्शे यवागू-पायकम् । ओष्ठौ आस्वादयतो लिहतो वा प्रष्टुर्मधुरं रसं भुक्तमिति क्षेयम् ॥ ३१ ॥ अन्यदप्याह- विस्फे स्फोटयेजिह्वामम्ले वक्त्रं विकोपयेत् । कटुकेऽसौ कपाये च हिप्केत् ठीयेच सैन्धवे ॥ ३२ ॥ 'जिहां रसनां विस्के स्फोटयेद्वा प्रष्टाऽम्ले मुक्ते । मुखं विकोपयेत् कटुके 'असो' पृच्छकः । कपाये मुक्ते हिफेत् । 'सैन्धवे' लयणे मुक्ते टीवेत् ॥ ३२ ॥ अन्यदप्याह-- लेप्मत्यागे शुष्क तिक्तं तदल्पं श्रुत्वा ऋव्यादं प्रेक्ष्य था मांसमिश्रम् । भ्रू-गण्डोष्ठस्पर्शने शाकुनं तद् मुक्तं तेनेत्युक्तमेतन्निमित्तम् ॥ ३३ ॥ श्लेष्मणः परित्यागे शुष्कं रूक्षं तिक्तं तदल्पं च मुक्तम् । 'कन्याद' मांसाशिनं प्राणिनं [ श्रुत्वा ] 'प्रेक्ष्य' दृष्ट्वा या तन्मांसमिमं मुक्तम् । भ्रूगण्डोष्ठस्पर्शने शाकुनं मांसं 'तेन' प्रष्ट्रा तद् मुक्तमिति । 'उकं' कथितमेतद् 'निमितं' चिह्नम् ।। ३३ ।। अन्यदप्याह--- मूर्द्ध-गल-केश-हनु-शप-कर्ण-जङ्घ च पस्ति च स्पृष्ट्वा । गज-महिप-मेप-शूकर-गो-शश-मृग-महिपमांसयुतम् ॥ ३४ ॥ मूद्धांदिसने ययाक्रमं गजादिमांसं वक्तव्यम् । मूा-शिरसस्पर्शने गजमांसं मुकं वदेत् । गटस्पर्शने माहि- पम् । फेगस्पर्शने मेपमांसम् । हनुस्पर्शने शैकरं मांसम् । सशसशेने गोमांसम् । कर्णसर्शने शसमांसम् । जहास्पर्शने मृगमांमम् । परिवरपर्शने च माहिपमांसयुतमेव मुक्तमिति ॥ ३४ ॥ अन्यदप्याह- दृष्टे झुतेऽप्यशकुने गोघा-मत्स्यामिपं घदे मुक्तम् । गर्मिण्या गर्भस्य विनिपतनमेयं प्रकल्पयेत् प्रमे ॥ ३५ ॥ अगाकुने दृष्टे श्रुते अवलोकिते या........ ....गोधामिपं मत्स्यमांसं या मुकं पदेत् । एवमेय गर्मस्य पृच्छायां अशाकुने' दुनिमित्ते रहे श्रुते या गर्भिण्याः प्रियो गर्मपतनं वदेत् । वपा प परासर:-"क्या सिग्य-दृढमभ्य- न्तराचं स्पृष्ट्वोदिरन पृच्छेद् मुक्कमग्नं विन्यात् । पत्र स्टाटसरों शूकानां च दर्शने शल्योदनम्, उरसि संस्पृष्टे पष्टि- SE कामम्, प्रीयायां पापचन्नम् , जठरे तिलौदनम् , कुली माणेदनम्, सनयोः सीरोदनम्, आन्दोर्यायकमा- सादयेत्, मोटी मा परिलेहि मधुरम् , लिम्फ जिहां वा स्फोटये, अग्ले मुखं विष्णयेत्, कडके हित्, फारे । 20 25 30 ૨૭૨ 5 - 10 अङ्गविद्याशास्त्रं सटीकम् । निष्ठीवेत् , तिक्ते शुप्के श्लेप्माणमुत्सजेदिति, लयणम् । कन्यादानां दर्शने मांसप्रायम् । तत्र भ्रू-गण्ड-जिह्वीष्टसंस्पर्शने शाकुनम् , इन्योर्वाराहम् , कर्णयोश्छागम् , जल्योमार्गम् , केशानामौरभ्रम् , शनयोगव्यम्, पस्तिनालयोाहिपम् , मूर्ध्नि कौआरम्, पाटित-छिन्न-मिन्नानां दर्शने श्रवणे गोधा-मत्स्ययोमांसमिति ॥ ३५ ॥ अथ गर्भिण्या गर्भज्ञानमाह- पुं-स्त्री-नपुंसकाख्ये दृष्टेऽनुमिते पुरःस्थिते स्पृष्टे । तजन्म भवति पाना-अन्न-पुष्प-फलदर्शने च शुभम् ॥ ३६॥ गर्भपृच्छायां पुरुपे 'दृष्टे' अवलोकिते 'अनुमिते विकृते 'पुरःस्थिते' अग्रतः स्थिते स्पृष्टे या तस्मिन् तस्मिन् 'तज्जन्म भवति' पुंजन्म भयति । एवं स्त्रियां दृष्टायां च पुरःस्थितायां वा स्पृष्टायां स्त्रीजन्म । नपुंसकाख्ये दृष्टे स्पृष्टे पुरःस्थितेऽनुमिते नपुंसकजन्म भवति । 'पाना-ऽन्न-पुष्प-फलदर्शने च शुभं' इति पानस्य-आसवस्य अन्नस्य- भोजनाः पुप्पाणां-फुसुमानां फलानां च दर्शने 'शुभं जन्म' सुखप्रसयो भवति ॥ ३६ अन्यदप्याह-- अङ्गुष्ठेन भ्रदरं चागुली; स्पृष्ट्वा पृच्छेद् गर्भचिन्ता तदा स्यात् । मध्वाज्याचेहम-रत्न-प्रवालैरग्रस्यैर्वा मातृ-धान्यात्मजैश्च ॥ ३७॥ स्त्री स्वाङ्गुष्ठेन भ्रूयुगमुदरं वाऽगुलीर्वा स्पृष्ठा पृच्छेत् तदा गर्भचिन्ता 'स्याद्' भवेत् । अथया 'अप्रस्थितः' पुरोऽवस्थितैः 'मध्वाज्यावैः' मधु-माक्षिकं आज्यं-धृतम् , आदिग्रहणात् पुनामभिः शोभनफलेश्च, तथा हेमरत्न- प्रवाल: हेम-स्वर्ण रत्नानि-मणयः प्रयालं-विद्रुमम् , तथा 'मातृ-धात्र्यात्मजैश्च' माता-जननी धात्री-स्तनदायिनी आत्मजः-पुत्रः, एतैरप्यप्रस्थैर्गर्भपृच्छां जानीयात् । तथा च परासरः-"अथ स्त्री भ्रुनो जठरमद्गुष्ठेनाद्गुलिं स्पृष्ट्वा 15 पृच्छेद् गर्भचिन्तां जानीयात्, तथा फलन्च्छायावृक्ष-प्रयाला-ऽङ्कुर-मधु-घृत-हेम-गर्भ-प्राजापत्यं या मात्-धात्री- पुत्रनिदर्शनशब्दप्रादुर्भावे गर्भपृच्छामेव" ॥ ३७ ॥ अन्यदप्याह- गर्भयुता जठरे करगे स्याद् दुष्टनिमित्तवशात् तदुदासः। कर्षति तजठरं यदि पीडोत्पीडनतः करगे च करेऽपि ॥ ३८॥ 'जठरे' उदरे 'करगे' हस्तगते हस्तेन स्पृष्टे स्त्री गर्भयुता 'स्याद्' भवेत् । तस्मिन्नेव पृच्छासमये 'दुष्टनिमित्त- 20 यशाद' दुष्टनिमित्तदर्शनात् क्षुत्-पतित-भान-विनष्ट-दग्ध-क्षीणादिदर्शन-श्रवणात् 'तदुदासः' गर्भपतनं भवति । अथया तजठरं 'पीडोत्पीडनतः' पीडमईनं कृत्या कर्पति कद्रूयत्, 'करगे च करेऽपि' हस्तं हसेन याऽवलम्ब्य पृच्छति तथापि वदुदास इति ॥ ३८ ॥ अथ गर्भग्रहणे फालज्ञानमाह-- घाणाया दक्षिणे द्वारे स्पृष्टे मासोऽन्तरं वदेत् । यामेऽन्दी कर्ण एवं मा द्वि-चतुर्वं श्रुति-स्तने । ३९ ।। अगुप्टेनेत्यनुवर्तते । 'प्राणायाः' नासिकाया दक्षिणे 'द्वारे' श्रोतसि अद्भुप्टेन स्पृष्टे गर्भपणे मासोऽन्तरं 'यदे' भूयात् , मासेन गर्भग्रहणं भविष्यतीति । यामे श्रोतसि स्पृष्टे 'अब्दो' यपंद्वयमन्तरम्, वर्पद्वयेन गर्भग्रहणं भवतीति । एवं पामे फर्गे यर्पदयेनेय । माः शन्देन मास उच्यते, श्रुतिः-कर्णः दक्षिणे कर्णच्छिद्रे स्पृष्टे मासे द्विनं-द्विगुणम् , भासद्वयन गर्भप्रहणं भवतीति । पामे वर्षद्वयेन सनस्पर्शने। माश्चतुन-चतुर्मासैः सनद्वयस्पर्शनेनेति ॥३९॥ अन्यदप्याद- वेणीमूले प्रीन् सुतान कन्यके द्वे कर्णे पुत्रान् पञ्च हस्ते प्रयं च । अगष्टान्ताः पश्चकं चाऽनुपूा पादाङ्गुष्ठे पार्णियुग्मेऽपि फन्याम् ॥ ४०॥ वेणी-पेशफलापः तन्मूले पृच्छायां स्पृष्टे त्रीन् 'मुनान्' पुत्रान् है फन्यके जनयिष्यसीति यक्तव्यम् । 'कार्ग' कर्णयुग्मे स्पृष्टे पुत्रान् पश । हसयोः सर्शने पुत्रत्रयं च । फनिष्टिकालेरारभ्यागुतागुलिं यापदानुपूर्व्या क्रमेण पुरपत्रक सूते । तर कनिष्ठिकासने एकं पुत्रम्, अनामिग्रस्पर्शने दो, मध्यमायां प्रयः, सन्यां पत्यारः, अद्गुष्टे पला । पादाङ्गुष्ठे रसृष्टे पाणियुग्मेऽपि सृष्टे फत्यामेछां सूते ॥ ४० ॥ अन्यदृप्यार--- 25 - - 30 २८० , 15 प्रथम परिशिष्टम्। सव्या-सव्योरुसंस्पर्श सूते कन्या-सुतद्वयम् । स्पृष्टे ललाटमध्या-ऽन्ते चतु-स्त्रितनया भवेत् ॥ ४१॥ सव्यं-दक्षिणमूरु तत्संस्पर्शे कन्याद्वयं सुतद्वयं च सूते। असव्ये-वामेऽप्येवमेव । ललाटमध्या-ऽन्ते स्पृष्ट यथासायं चतुखितनया भवेत् , ललाटमध्ये स्पृष्टे चतुस्तनया:-चतुःपुत्राः, ललाटान्ते नितनया भवेत् । तथा च परासरः- 5 "तत्र जठरस्पर्शने गर्भिणीमेव ब्रूयात्, अङ्गुष्ठेन नासाश्रोतसि दक्षिणे कुर्यान्मासान्तेन गर्भग्रहणम् , वामे द्विवर्षा- न्तरेण, कर्णच्छिद्रे मासद्वयेन, वामे वर्षद्वयेन, स्तनयोरङ्गुष्टेनैव स्पृशेचतुर्भिर्मासैः । पीठमर्द-कचान्तरे कृत्वोपरं कण्डूयेत् , अग्र-हस्तं हस्तेनायगृह्य वा पृच्छेद्, भन्नलोहिका-बधिरउद्दालक-कुठार-सुतयलित-भग्नदर्शन-शब्दप्रादु- र्भावे या स्याद् गर्भपतनं या विन्द्यात् । तथाऽन्न-पान-पुष्प-फलं प्रेक्ष्य द्वि-चतुष्पदामन्यद्रव्याणां पुंसंज्ञकानां दर्शन-श्रवणे पुंजन्म विन्द्यात्, स्त्रीपुंसंज्ञानां स्त्रीपुंजन्म, नपुंसकाख्ये नपुंसकानाम् । अथ विशेषः-वेणीमूलमतिगृह्य पृच्छेत् सस्य 10 द्विवान पुत्रान् जनयिष्यसीति ब्रूयात् , ललाटमध्यं स्पृशन्तीति चत्वार्यपत्यानि, ललाटान्तं त्रीणि, कर्णयोः संस्पर्शे पश्चा- पत्यानि विन्द्यात् , हस्ततलसंस्पर्श त्रीणि, कनिष्ठा-ऽनामिका-मध्यमा-प्रदेशिनी-सर्जन्यङ्गुष्टानामेक-द्वि-त्रि-चतुः-पञ्चापत्यानि, दक्षिणोरुस्पर्शे द्वौ पुत्रौ द्वे कन्यके जनयिष्यसीति, वामस्य तिस्रः कन्यका द्वौ पुत्री, पादाङ्गुष्ठस्य कन्यकैका, पार्यो- कन्यकैव” इति ।। ४१ ॥ अथ गर्भिण्याः कस्मिन् नक्षत्रे जन्म भविष्यतीति तज्ज्ञानार्थमाह- शिरो-ललाट-भ्रू-कर्ण-गण्डं हनु-रदा गलम् । सव्योऽपसव्यः स्कन्धश्च हस्तौ चिवुक-नालकम् ॥ ४२ ॥ उरः कुचं दक्षिणमप्यसव्यं हृत्पार्श्वमेवं जठरं कटिश्च । स्फिक्पायुसन्ध्यूरुयुगं च जानू जद्देऽथ पादाविति कृत्तिकादौ ॥४३॥ सूते इत्यनुवर्तते । पृच्छासमये गर्भिण्याः शिरःप्रभृतिसंस्पर्शने कृत्तिकादौ नक्षत्रे जन्म विन्द्यात् । 'शिरः' मूर्द्धानं संस्पृशेत् कृत्तिकानक्षत्रे जन्म भवति, गर्भिणी सूते । ललाटे रोहिण्याम, ध्रुवोमंगशिरे, कर्णयोराः 20 ज़्याम् , गण्डयोः पुनर्वसौ, हन्योः पुष्ये, रदाः-दन्तास्तेष्वश्लेषायाम् , गले-प्रीवायां मघासु, सव्ये-दक्षिणस्कन्धस्पर्शने पूर्वफल्गुन्याम्, अपसव्ये वामस्कन्धस्पर्शने उत्तराफल्गुन्याम् , हस्तयोः स्पर्शने हस्ते, चिचुके-आस्थाधोभागे चित्रायाम् , नालके वक्षःसन्धौ स्वातौ, उरसि-वक्षसि विशाखायाम् , दक्षिणकुचस्पर्शेऽनुराधायाम् , असव्ये-वामे ज्येष्ठासु, हृदि मूले, पार्श्वद्वयं एवं' प्राग्यत्, दक्षिणपाधै पूर्वापाढासु, वामपार्श्वे उत्तरापाढासु, जठरे श्रवणे, कट्यां धनिष्ठायाम् , स्फिग-गुदसन्धिस्पर्शने शतभिपजि, दक्षिगोरुस्पर्शने प्राग्भद्रपदायाम्, वामे उत्तरभद्रपदायाम् , जान्वो 2 रेवत्याम , जदयोरश्विन्याम् , पादयोर्भरण्यामिति । तथा च परासरः-"शिरसि स्पृष्टे कृत्तिकासु जन्म विन्द्यात्, ललाटे रोहिण्याम् , ध्रुवोः मृगशिरसि, कर्णयोराायाम् , गण्डयोः पुनर्वसौ, हन्योस्तिष्ये, दन्तेष्वश्लेपायाम् , ग्रीवायां मघासु, दक्षिणांसे प्राक्फल्गुन्याम् , उत्तरायां वामे, हस्ते हस्तयोः, चिबुके चित्रायाम् , स्वातौ नालके, उरसि विशाखायाम् , दक्षिणे स्तनेऽनुराधायाम्, वामे ज्येष्ठासु, हृदि मूले, दक्षिणपार्श्वे प्रागापाढासु, उत्तरापाढास्वपरपार्थे, जठरे श्रवणे, अविष्ठामु पोण्याम् , स्फिग्गुदयोरिणे, दक्षिणे प्राक्प्रोष्ठपदायाम्, वामेनोत्तरायाम् , जानुभ्यां पौष्णे, जदयोराश्विने, 30 भरण्यां पादयोः" इति ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ अथोपसंहारा [र्थमाह-] इति विरचितमेतद् गात्रसंस्पर्शलक्ष्म, प्रकटमभिमताप्य वीक्ष्य शास्त्राणि सम्यक । विपुलमतिरुदारो वेत्ति यः सर्वमेत- नरपति-जनताभिः.... ........ ॥४४॥ [॥ अमे सण्डितोऽयं प्रन्थः॥] . . - द्वितीयं परिशिष्टम् अंगविजाए सद्दकोसो। १२८ अजव ७ गोत्र १५० क्रिया. ७१ १४८ मचवले ६६ अञ्चल्लीण पत्र शब्द पत्र शब्द पत्र अगिवेस्स गोत्र १५० भजजोणि देवता ६९-२०५:२२३ अग्गिहोत्त अइराणी भाण्ट १०१-२२२ बजणी १९३ भइरिका देवता ६९ अम्गेय १२३ अजय पितामह २१९ मार्य १३४-१८७ ११६ अग्गेयया अजा अर्कत देवता २२३ अप्रिय ५२० अग्धणमाणं [पढलं] २५३ मजाधिउत्थं भकिट्ठामास आजिघ्रति देवता २२४ २०२ अग्धायते यजिया मार्यिका अकोडित भकुचित ? १४८ अग्धाहिति मानास्थति ८४ मजण वृक्ष सकोसीघण्ण १७८ अघोसा १५३ अज्झप्पवित्त अध्यात्मवृत्त अक्खक आमू. ६०-६५ अचपला अज्झायी अक्खपूप भोज्य १४२ अचला देवता अज्झेणणासित? ११८ अखमालिका भाभू. अचलाय अचलायाम् १८ अझोमाताणि ९२ अक्खाम अक्षाम ४३ अचवलाई १२८ अद्यालय १३७-२१४ अक्खारित? क्रिया. १२५ भट्टियगत अहिकागत २१६ अखिकूड अक्षिकूट ७२-१२३ मचिरुट्टित मचिरोस्थित २४९ अट्टालिका सुरा २२१ अस्विगुटिका पक्षिगुलिका-कनी निका ६६ अञ्चत्यकार अत्यर्यकार २३९ अक्खाणंसि अर्यायाने १० मक्खिगूधक अक्षिगूथ १०८-२०३ मञ्चत्यहसित अत्यर्थहसित ३५ भट्टखुत्तो अष्टकृस्वः १८४ अविववत्तिणी अक्षिपत्रिका अत्यालीन ८७ अट्ठपद अर्थपद अक्खीणमहाणस अक्षीणमहानसलब्धि ८ अञ्चा अचर्चा १४७ अट्ठमय आभू. १६२ भक्खुजंत? २०० भञ्चाइक अत्यायिक ३७ अट्टममाधणी मष्टमसाधनी ८ अक्खोडित भास्फोटित २५१ अचाइत अत्यायित ४१ अट्ठमंगलक कण्ठआभू. ६५-१६३ मक्खोडिय भास्फोटित १०१ अच्छणक भासनक १३६ अट्टमंडल अक्खोल फल ६४-७१ अच्छदंत पर्वत ७८ अट्ठविधि अर्थविधि अखई भक्षयिका चतुष्पद ६२ अट्ठाहिक अष्टाहिक १२७ अनुयाचार अच्छाइत अस्थिक (?) अक्षुदाचार भाच्छादित १३०-१७० महिक १५ अगणिकाइयाणि वस्त्र २२१ अट्टिकमय भाण्ड २१५-२२१ अगतिसंपन्न १७३ मच्छादण आच्छादन अस्थिमजा १९. मट्टिमिजा अच्छायित भाच्छादित १६८ अट्ठिसेणा अगल थाल्य १४३ अगोलिक अज्ञ सर्पजाति गुडवर्जित भोज्य १८२ ६३ महिल चतुष्पद ६९ भगोलीय धर्मवस्त्र २३० भट्टोदित अजिणगकंचुक गुडवर्जित भोज्य १८२ भोदित ११७ मजिगपट्ट मग्गि भनन्यमनस्तया चर्मवस्त्र २२१-२३० अणण्यमणवाय अत्रिणप्पवेणी २२१ भणप्पमूय अनामभून अग्गिइंदगि मग्गिठपजीवि पशु २२७ अणभियित अनभिचि(जि) अजिन २३० अणभिवुत्त अनमिवृच १६२ अग्गिगिह अग्निगृह १३६ अजीणकंबल २३० अणसूयक मनुरमुक मग्गिघर अग्निगृह ४. अत्रीणप्पवेणिका २३० अणह अक्षत भग्गिमारुय देवता २०४ मनोगवहा भयोगवाहाः १५३ अणंगण गुरुमजाति अग्गिरस अब मार्य १३-१४९ अणंद्र माम् अंग०३६ १८ मच्टमल्ल ५८ अच्छाद गोन १५० प्राणिज वख देवता २०५ अजिणविलाल कर्माजीविन् १६० अजीण प्राणिज वस्त्र गोत्र १५० २८२ अंगविजाए सहकोसो सन्द १३९ अदाकाल भग्झायो ९५ मघामय ४ ५ शब्द शब्द पत्र भणंतरपच्छाकट भनन्तरपवात्कृत २६२ अण्हेने मुनक्ति.... अद्धकोमिनिक मगंवरपुरक्सट भनन्तरपुरस्कृत २६४ मतप्परं मतः परम् ६२ भदरोगाणि भणतोहिविण अनन्तावधिजिन 1 भवसी धान्य १६३ अपहरिया अपयस्तिका १८ अणाउत्त अनायुक्त १. अनिकण्हाणि १८१ ५७-१२-१२८ असंविट्टरत भणागतजोणि १३९ मतिक्रिमण अतिकृपण २४॥ असंयुवाय अर्थमंतया १८५ भगागताणि ५७-८३-१२८ भनिएक मोग्य ६१-२२० पदहार कण्ठमामू. ६५-१६२ मणादिता देवता ६९ मतिकतजोणि १९३ अगाधारयमाण क्रिया. ११ अनिवणात ११८ अधभूतस्य यथाभूतार्य ५९ अणापस्मय अनपश्रय ३० प्रतिच्छंद मतिकाम्यत् अधमजाणि १४० अणायकाणि ५९-१२६ मनिपञ्चवर मनिष्ठ अचहत्तरम्मिरे! अगावलोइयते भनवलोकितक १५ प्रतिफुट अनिस्फुटित १०६ अधापुग्व यथापूर्व १-५-९-१९५ पणावलोक १४ ययामत ९० मतिमंगुल अतिमनुभम् मणावुद्विसुबुद्धि अनावृष्टि-मुवृष्टि अधिकतण? ५ अनिमुत्तकतेल २३२ श्रणिकुज मनिकुछ १५ अधिकमक टरसव ९८-१२१ मनिमुत्ता वृक्ष मणिस्मरा ५८-१९-१२९ अनिमुछेय अधिन अध्येत 10 अणुक १११ भतिवत्ताणि अधिवमिस्मति भधिवस्यति १९२ ५०-८१-१२८ अणुजल अनुज्वल प्रतिविरूद भविवास दोहद १०२ १८ मणुनुरित अनुत्वरित २३५ अतिरंति किया. अघीयता तृवीयैकवचनम् १०७ अणुदत्त २१५ भधीयाण ५६ भचमावपरिक्खा अणुगतामास १४५ अत्तमावपरीणाम अघोगागार? ११ अणुपुब्बमो भनुपूर्वशः अधोमागामास अणुयोगजोणि अत्तमाण आममान १६ अस्थजोणी अनुनासिका अणुयोगविधि १५३ १८ अनुस्वार १५३ अणुलित्त अनुलिप्त १३०-१६८-१७० अत्यत्यिकत्यताय अार्थिकार्यतया अग्नोसहित अन्यावयकित १४८ भणुलेवण दोहदप्रकार १७२ अत्यदार १४४ अपक अपकृष्ट मणुल्हायित किया. १६६ अत्यपीला अर्थपीडा २२ अपम्द्वंत अपकर्षत् १४४ अणुवक्खइस्मामि अमुच्याझ्यास्यामि ७-१३५ अत्यरक आम्नरक १७-६५-१६३ अपकडिव अपकर्पित १६९ अणुवस्वयिस्मामि मस्यवापद अर्थव्यापत् अपकरती १६९ अनुव्याख्यास्यामि ५-१६४ अत्यसच्च मर्थसन्य अपकर्षयेत् १४५ अणुवस्वाइस्मामि मनुव्याख्यास्यामि ५. अत्याय मर्याय चतुर्थी एकव. अपक्षिप्त अणुवसायिस्मामि अनुय्याख्यास्यामि २:१ अत्यायं अर्थ आयम्-अर्थलामम् २० अपछुद्ध अपक्षिप्त १६९-100 अणुसूयक अनुरसुक १. अत्यिला शुजन्तु २५३ अपविहत भोज्य १८२ मणुस्सित अनुमित भास्तृव ११६-१९० अपणत किया. १६९-101 मणि ५८-11. अत्योपणायक अर्थोपनायक भणे क्रिया. मामन्त्रणम् ६८ अदसंसायी अणेवाणि अपमासित अनिर्वाणी १३५ मदसी क्रिया. १६९ घान्य भणोकंत अपथद्ध धपस्तम्घ ३६-१३५ मनपक्रान्त ४२ असणिया क्रिया. १८३ अशोज गुल्मजाति ६३ भदसणीला १२३-१२९ अपमनितापम? अप्रमार्जिवापसृष्ट २५ भणोद्ग अनृतुक २५. अदिनि देवता २०८ अपमह १६९.१०१-१०६ मण्णमणाशि ०९-१२९ अदागमंडल आदर्शमण्डल ११५-२४१ अपमत अवमक मण्णजोणी ६४ अहारिक बनस्पति १०३ अपमतर अवमवर अण्णेयाणि १२६ अदकविटग भाण्ड ६५ अपमयापमय मवमकानमक ९५ १. अपकट्टिनी ९ अपकद्वेजा १० अपत्रिखत्त ३ मत्थुत ८० भपणामित ५८ अपपानित
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२८४ अंगविजाए सद्दकोसो पत्र शब्द १२८ अहम्वेद ३८ अस रोग २०३ १८. अखिणो शब्द पा शब्द ४५ अव्यत्तच्छित अध्यक्कर २६ अस्सायेति भास्वादते १०७ अलक्तककारक १६. अन्चंग अव्य ११३ अस्सारोध भश्वारोह कर्माजीविन् १५९ भाण्ड ६५ अव्वापण्णामास २०२ अस्तावित आधावित १३३-१८६ भालीनालीन ८७ अव्यावाधा देवता २०४ अस्सियो देवता २०४ १४२ अयोआताणि ५७ भस्सोत्थ २३१ अपकर्षति १०८ अन्वोकड ८६ अहरई अहरहा अपकर्षत् ३७ भयोयताणि गोन १५० अव्याक्षिप्त अस्य १७-५०-५३-२६५ अहिआण अपीयान १ क्रिया. १९८ असण वृक्ष ६३ अहिणी सर्पिणी ६९ कृकाटिका ११३ असत्थिण्णा? ५२ अहिणूका सर्पिणी ६९-२२७ क्रिया. २१० असरसंपण्ण १७३ अहिधापति अभिधावति ८० अपनयत् क्षसलेसा अश्लेपा २०६ अहिनिप अधिनृप १६० थपस्तम्भ असलीण असलीन ४६ अहिमार २३२ असलीणुद्वित असलीनोस्थित ४५ अहिरपणक १५३ ६३ असन्यओ यशस्वतः १ अहिल्का परिसपंजीव २३७ अपमृष्ट २१५ असहस्सदि असहस्मृति १० अंकोल वृक्ष अपराह्न १६४-१७८ असंघातसंपस १७३ अंकोलपुप्फ पुप्प अपराह १६५ असामर्ण भुत्तं अक्षिणी १२२ २६ असालिका आसालिका-जलचर ६९ अंगजक आभू. ६५ क्रिया. वर्ण ९०-१०५ अंगणगिह अनगृह १३८ भवलोकित २१५ असितरणपडिभागा ५८ अंगत्थवो अज्झायो अगस्तवोऽध्यायः अवप्वष्कत् १३५ असिलट्ठी असियष्टि ११५ अंगदुवारघर अगद्वारधर ८ अवप्वप्कित अक्षिणाम् १७९ अंगदेवी ११२ अवष्वविकते अशीति १२७ गमणीअज्झाय ५७ अवस्वप्कित २१७ असीमालिका कण्ठआभू. १६२ अंगयाणि याहुआभू. १६३ अपस्त १३० असुयामाससह? ४५ अंगरक्खा अङ्गरक्षा अपसव्य असोकवणिकापाल कर्माजीविन् १६० अंगविजा अङ्गविद्या अपसिद्ध वृक्ष ६३ अंगविनाविसारत अङ्गविद्याविवारद ९९ अशोकवनिका २२२ अंगवी अङ्गवित् ७-१४ अपधित १९८ अस्सअधिगत कांजीविन् १५९ अंगहिय अद्भहित अङ्ग ६६ अरसकण्ण वृक्ष ६३ अंगहियय अङ्गहृदय ६-१२९ २१६ अस्सपूतण पशु २२० अंगुप्पत्तीअज्झाय ६. अस्ससंस? कांजीविन् १६० अंगुलिपोहिया आभू. २५ अस्सबंध १५९ अंगुलिमुद्दिका भाभू. अपाचीना १८-१९ अस्सभंड भाण्ड २३० अंगुलीमंडल अमावास्या २०६-२०९ अस्समच्छ मत्स्यजाति २२८ अंगुलेयक अलिआभू. १६३ अवासनत् १८ अस्समंडल अंगे (अग्गे) याण अग्नेयानि १२८ माणिजवस्त्र २२१ अस्समोहणक १३७ अंगोदधि १ फर्माजीविन् १५९ अरणिका रजुविशेष १५ ५८ अस्सात? १७३ अंजणमूलक धातु भविस्वर ३६ भस्मातियाख कमांजीविन् १६० अंजणी भाण्ड अगित ४ अस्सादेहिति भास्वादमिष्यति ८४ अंजणेकसक वृक्षजाति अलि मलित्तककारक अलिंद अलीणमलीण अवक? अवकढति भवकरिसेंत भवक्खित्त भवजेयमाण? अवह भावणामित भवणेत भवत्थंभ भवत्थिया छवदातक भवमट्ट अवयि भवरण भवरह अवरसजमगत्त। अवलोणित अवलोयित अवसक्त भवसक्किम भवसक्किमम्दि अवसक्कित अवसरित अचसन्च अवसिद्ध अवस्सय भवस्सित अवह अवहस्थ अवहस्थग भवंग अवाइमा भवामस्सा अवाहणत भविक्रपतुण्णा भविधेप अविवरा भविस्मर भयेगिम १७६ असित ५ १६ असिंगीण १७ असीति ७ ६७ असोग १८६ असोयवणिया ७ " ७३ अस्सवारिक क्रिया.
द्वितीयं परिशिष्टम् २८५ " ७ ८५ आगम्मगिह ७ आधार्य १८५ २३८ आगामिभह ६८ आगारेति ६३ आचमणिका आक रयति क्रिया. ८० पत्र शब्द पत्र पन शब्द अंतणिजमाण अन्तीयमान १९६ भागच्छते क्रिया. ८ आदंसगिह आदर्शगृह १३६-१३० अंतस्था ३५३ आगण्णेति आकर्णयति १०७ आदाणणक्खत्त अंतपाल ८९ आगतविभासा णाम पडलं ४२ आदित्तमंडल ११५ अंतर १२६ आगताणि सोलस ४१ आदिपंडक नपुंसकविशेप २२४ अंतरंस १८७ आगमगिह आगमगृह १३६ आदेयाणि १२८ अंतरिज अन्तरीय वस्त्र ६४-१६४ आगमण अज्झाय १३०-१३५ आधात्मचिंताय अध्यात्मचिन्तया अंतरिय २२२ आगमणजोणि १३९ आधायित किया. २१५ अंतलिस्साय अन्तरिक्षक १ भागमणविधिविसेस ९.१०.५९ आधार आहार अंता ५८-१२१-१२९ आगमेसभद्द आगमिष्यद्भद्र १०८ आधारइता आधारयित्वा ६७-८१ अंतोघर अन्तर्ग्रह ३२ आगमेहिति आगमिष्यति ८४ आधारए आधारयेत् अंतोणाद अन्तर्नाद आगत्य १९२ आधारणाय आधारणायाः अंतोवारीय अन्तर्वार्याम् १३८ आधारणो अज्झाओ अंदोलति क्रिया. ८० आगर आकर २०१ आधारतित्ता आधार्य ८१ अंधक १०८ आधारयितू अंधी आन्ध्रदेशजा १०७ आधारयित्ता आधार्य अंब आम्रवृक्ष भाण्ड २५५ भाधावितक क्रिया. अंबकवि भोज्य आचरिय गोत्र १५० भाधिपच आधिपत्य ११२ अंथढिक भोज्य १८२-२४६ आचिक्खति आचष्टे ८३-१०७ आधुत अंबपिंडी भोज्य किया. १६५ माधोधिक माधोऽवधिक अंथ (त) राई आच्छन्न १७ भापडित मापतित अंबाडक वृक्ष ६३ आजीवक गोशालकमत २४५ भापंचमंडल अंबाडकधूरी भोज्य ७१ आजीवणिक ९१ मापुणेय १२४-१४९ अंबामण पर्वतः ७८ आजोग आयोग २० भापुरायण गोत्र १५० अंबिल अम्ल २२० आज्ञयणीय अध्ययनीय १४७ लापूपिक कर्माजीविन् १६० अबिलक भापीड २५९ अविलजवागू भोज्य ११ आडविक अबेलि भोज्य ७१-१७९-२४६ आडा मापीडचिह्न १४९ पक्षी ६९-२२५ माफकी सकूड घृक्षजाति अङ्ग ७२ आणावचरणिग स्थल-जलचर २२७ अंसकोवकरण माबद्धक १३४ आणु(णूक कर्णाभू. १६२ लक्षण १७३-७४ अंसपीढाणि भाबंधण क्रिया. १९८ ११८ आणुतासवेला! अंसवीफाणिए भावाधिक ६१ ९९ आणेयाणि १२८ आतवगिद भाभरणगत दोहदप्रकार १७२ आतपगृह १३६-१३८ भाभरणजोणी आइल आदिल वस्त्र भाउर आतुर १२ आतिअति] आददाति १०७ भाभरणजोणी भज्झाय १४०-१६२.१६३ आउंटित माकुचित १९८ आतिगंछिति आचिकित्सति भामरणाधिगत कर्माजीविन् १६० आएसण भावेशन १३८ भातिमूलिकाणि आभिजण ७४-७६-१०४ आओग आयोग २० आतिमूलीया १२१-१२८ भाभिजोगिक भाभियोगिक २६८ भाकारण्णपवत्तणा? ४४ आतुरगिह आतुरगृह १३८ भाभिणिबोधिक माभिनियोधिक भाकासरियड ११९ आतुरजोणि १३९ आभिप्पायिक १५७ आकासाणि ५८-११८-१२८ आतुरता १३५ भामियोगिक भाकुंडित आकुचित ११५ आतोजसद्द आतोद्यशब्द 1८८ आमह मामृष्ट २१-२४.११-१२८ भाकोडित आकृत्रित 01 भादंसग भादर्श-दर्पण १९३ मामतमत मामयमय १९४ ७१ आचित ५९ आच्छपण ९ . भोज्य १७९ आडवक पक्षी २३८ मापेलग १५९ आपलचिंध ४ आतवितक ९ देवता २०५ अंगविजाए सहकोसो शब्द पत्र शब्द शब्द पत्र आमधिन भामयित भोज्य २२. आलिंगित क्रिया. ५.-१८४ भासंदी आसन मामला पल ६४ आलिंगितरत आस्वादित १०७ १८३ भासाइत भामली वृक्षजाति ७. आलिंगियविधि ९-१० भासाति(लि)का कृमि २२९ भामसती आमाति १७० आलिंगियाणि चउद्दम ११-१३८ आसार? आमसमाग भामाद १४६ आलिंगेतस्स आलिदेवस्य थासालक भासनविशेष भामर्म मामृतान् ७६ आलीपणग आदीपनक १६२-१६८ मासासण माधासन ११८ भाममंत मामशत् १४५-१६९ आलीवणक आदीपना १९२-२५४ आसित क्रिया. २३ माममित्ता सारश्य १०३-१७० आलुक भोज्य १८ भासिलेखा अश्लेषा नक्षत्र १५६ [ম]ষ। ६-२०३ आलेक्स आलेख्य ११६ भासेक नपुंसकविशेष २२४ भामामहमय ७.११.२१-१३० भालोलीवेलिका २४७ माहाडक उद्भिज २२९ भामासपहिरूब ५६ आवगित आवल्गित १४३ आहार ५८-१०७-१२८ भामाम-मर-स्व १३ आवरित आवृत २४१ आहारगत दोहदप्रकार १७२ भामेलक पुष्पीटक ६४ भापलिका कण्ठआभू. १६२ आहारजोणि १४० भामोमग गोन १५० आरसंपयुत्त । २०९ माहारणीहार ५८.१०८-१२८ भामोसहिपत्त मामशीपधिप्राप्त ८ भागतेते आपातयति ३६ आहारणीहारजोणि १४. मायवाणि ५९-१२५-१२९ भावाद उत्सव २२३ माहारतरकाणि १२८ भायमणी माधमनी ५५.७२-२१४ आधिक घर १६३ आहारमाहार माययमुदिता ५९ भाविधिहिति भाग्यस्यति ८४ आहारसम्मत्ति १०७ आयरगट्टयाय मादरणार्यतया १३० आवुजोणिय १२४ भादाराहारा ५८ मायाग १५२-१६८ भाउणेया ५८ हारिपेरिखत माहारिप्रेक्षित मायिक प्राणिजात २२१ आनुपधगत अप्पथगत २२२ आहितरिंग कर्माधीविन् 1.1-10 मायुशायिकाणि ५८ भाया आस्य क्रिया. भायुनोगीय मयोनिक १५. भासनित्ता आसय २५, भाग्छिति क्रिया. ८४ मायुधागरिक भायुधागारिक १५९ वासणगत दोहदप्रकार १७२ मागुणमागिर १.३ मामणगिद भासनगृह १३६-१३८ । मायुपमागे यस्ममतप्पमागाणि ५. भामगजराम भासनाध्याय भोज्य .. भायोग २. मामणम्ति भामने रस १३४-२१२ भारएमप पितामाभू. १२ मासणविधी निरिहा १५ एप इत्येय मारामयोग ११. भापणस्म दिमा भट्ट आसन कमांगीचिन् ८५-१५९ मामगहारक ८. कारागार इटकानाकार कमांत्रीविन १. मामगागि कमांजीगिन् । मारामाणित कर्मात्रीगिन् ११. मामयाणि बालीस १३ इतिक्तिी मोज्य मारिद ९२ मामगाभिगदरिदी १५ इतिहास गोत्र मारका देता २. भामगावपास भागनापमापरत हस्येच मारोह मायन मुरा (१-१२१ इपिभा पियार मामि २२. मुरा मिपा: 10 Time 1.५ भागाप पत्रिनाम WITTER m-भामय समाजारिन् ५९ हरियार पुरमा ११. मार्गदर मामन १५-२१. इरिग १५-१९. २. प्रार्मरण १५-१६ ती २१. मारमा २॥ रामा ४० भाचिति पादपुतौ भव्ययम् ४ १२८ कार १८. हो ७८ २२॥ एपीप १२ मागि इमानि २८७ द्वितीय परिशिष्टम् १४० ९२ उज औणिक १६३ ७० २०६ उक्स्सुली पत्र शब्द पत्र शब्द भत्र फ्रिया. १७६-२९५ उद्वित्त क्रिया. १३३ इस्सराणि १२८ उक्कासित ऐश्वर्य इस्सज उस्कुल ६१ उकुन १८४ उडुजोणि उत्कृष्ट वृक्ष ५८-११९ उकुट ९३ उडुंवर इस्सरभूत उत्कृष्ट उणमामक सिक्का ६६ ५८-११९ उकुट इस्सरा २०१ उछुट पनि १७३ उण्णत इस्सरियामास उद्धत ३३-१२४ इस्सरोपक्खर ११९ उकुटुक १४० ३७ उण्णतजोणि इस्सापंडक नपुंसकविशेप ७३-२२४ उक्कुलिणी उण्णता इंगालकारक कर्माजीविन् उत्कूज १५५ उण्णमंत उन्नमत् ३३-१३५ इंगालकोटक अङ्गारकोष्ठक २५४ उकूणित उत्कूणित १२३-१४८ उण्णरूव १४२ इंगालद्यारिगा मजारभूति १०६ उवोस ध्यान १७३ उण्णवाणिय कर्माजीविन् १६० इंगालवाणिय कर्माजीविन् ९२ उक्कोस पक्षी २२५ उण्णामित किया. १६८-१७० इंगुणि(दि)तेल २३२ उक्कोसस देवता ६९ उष्णिक इंचका मत्स्यजाति २२८ उत्खणंत उत्खनत् ३८ उहणामि उर्णनाम इंदकाझ्या क्षुदजन्तु २३८ उक्खलिका उदूखटिका १९१ उपहा ५८ इंदकेउ इन्द्रध्वज १०१ उखली उदूखली ०२-१४२ उण्हाली चतुप्पदा इंदगोपक क्षुद्रग्रजन्तु ५७३-२२९ उक्खंभमाण उत्तम्भयत् ४२ उण्हिम भोज्य १८१ इंदगोविका स्थलचर बहुपदा २२७ उक्वित्त उत्क्षिप्त १७१ उण्हिपुण्णामतेल्ल २३२ इंदणाम १०१ उक्खित्ततुंबिक ८१ उण्होलक इंदघणु भाण्ड १९३ उतदुंबरमूलीय? ९ इंदधय इन्द्रध्वज २११ उखलिका उदूखलिका २२१ उतु ऋतु १९१ इंदमद इन्द्रमह उद्गृहीत १४८-१७१ उत्तमजोणि १३९ इंदवह इन्द्रवर्धकिन् १०१ उग्याडित उद्घाटित १४८ उत्तममज्झिमसाधारणाणि इंदिआली इंदिआलि ८ उच्चपातरास २४९ उत्तमाणतराणि १२८ इंदीवर पुष्प ६३-१७३ उच्चंपति क्रिया. १०७ उत्तमाणि वीसति ५७-९३ उच्चारित क्रिया. १३२-१७० उत्तमामास १४५-२०१ इंसाभिमहित ईपदभिमर्दित क्रिया. १९३ उत्तरजोणि ईसिसंपीलित ईपरसम्पीडित २२ उच्छाडित अउच्छादित १०६ उत्तरदारिक ईसुम्मट्ट ईपदुन्पृष्ट उत्क्षिप्त ३७१ उत्तरपञ्चत्थिम उच्छुरस १८१ उत्तरपच्छिम उउपाण उदपान १६७ उज्जवणिका उद्यानिका २४९ उत्तरपुरथिम ५८ उकरालीसं एकचत्वारिंशत् ११७ उजाणगिह उद्यानगृह १३८ उत्तराणि ५८-११० उक्ट्ठा उत्कृष्टा २४-३३ उजाणभोज उद्यानमोज्य २५६ उत्तरिज उत्तरिय ६४-१६४ उक्कट्टिव ९१ उत्ता उक्ता ३८-२३६ उक्कडुओकट्ठ उत्कृष्टापकृष्ट ८६ उजुउल्लोइत ऋजूल्लोकित ३. उत्तागपस्सिक उत्तानपार्श्विक २४९ उक्छति उत्कर्षति ५९-१२८ उत्ताणरत १८५ उक्करिसाऽपरिसा उस्कपकपात् १३०~१६९ उत्ताणसेज उत्तानशय्या २४९ उत्कर्ष १५ उज्झंत उज्झत् १४८ उत्ताणाणि १२८ उकटका उत्कण्ठा १३६ उज्झीयति उत्क्षीयते २५० उत्ताणुम्मत्थकाणि ५९-१२५ उहंदित ११८ उद्दपाल उष्ट्रपाल कर्माजीविन् १६० उत्तिममझिमसाधारणाणि उक्कापात उल्कापात २०६ उट्टिका भाण्ड ७२-२१४ उत्यत क्रिया. १४८ उकारिका मोज्य १८२ उहितपट्ट २.१ उस्थित क्रिया. १६८-१७० १०१ उग्गहित ई २५ उच्छंदण २२ उच्छुद्ध शोकात १२१ उजालक ८० उजुकाणि १० उजुकामास २८८ अंगविजाए सद्दकोसो पत्र २९ उपरिगह २०१ उपलोलित १८५ उपयति गोत्र १५० शब्द शब्द पत्र शब्द पत्र उदकचर १३३ उपपुलणस्सत्त २०९ उम्मजिताभिमट्ट उदकचार २२२ उपगृहित क्रिया. १६८ उम्ममिण उन्मन्य २३९ उदकसत्ता उदकयात्रा ८-९ उपग्गहण उपग्रहण ११८ उम्मट्ट उन्मृष्ट उदकवकि कर्माजीविन् १६० उपचिम श्रीन्द्रियजन्तु २६७ उम्मट्ठाणि ९०-१२८ उदकाय मत्स्यजाति २२८ उपणत क्रिया. १६८-१७० उम्मस्थित उन्मथित ११८ उदकुण्हिका उदकोणिका भोज्य ७१ उपणद उपनद्ध १६८-१७० उम्मर दे. देहली उदकेचर उपणय १४३ उम्महित उन्मथित १४८ उदगगिह उदकगृह १३६ उपणयण उत्सव ९७ उम्माण लक्षण १०३ उद्गचर १८७ उपणामित क्रिया. १६८-१७. उम्माणसंपण्ण १७३ उदगपरणालि उदकप्रणाली २४३ उपदासित आलिगित ? १६८-१७० उम्माणहीण १७३ उदपवल्ली वृक्षजाति ७. उपध्मानीय १५३ उम्मुक्क उन्मुक्त १४८ उदग्ग उदन ९८ उपपत्ती विजयोऽसायो २६९ उरच्छक वर्म २५९ उदत्त १२१-१४० उपमाणक ९८ उरणा पुष्प ६४ उदत्तदेसे उपरिगृह ३२ उरालक धान्य उदपाग १५१ उपरिट्ठिमजोणि उपरिमयोनि १४. उरणी कच्छ १४२ उदलादल क्रिया. देवता २०५ उपलगिह उहंधित ११८ उपलगृह उदाहित उदाहृत ४८ उपलद्ध उलंहित उपलब्ध उल्लवित १४८ १६८ उदुकाल हास ऋतुकालभास उहायक क्रिया. १६८-१७० ९० कर्माजीविन् उल्लालित किया. १४८ उदुणीय ऋतुमत्या उदुपाण १५५-२२२-२३४ उपवत्त उपवृत्त १६८-१७० उत्त उदुसोभा १ भोज्य उपवप्पित? ऋतुशोभा २५७ क्रिया. उल्लूरधूविता उदिच उल्लोइत उपविट्ठ औदीच्य १०५ उपविष्ट १७० उल्लोक्ति १६८ उल्होएत उल्लोकयत् उपविट्ठरत ४२ उदारणा १८१ ११ उल्लोकित उपविट्ठविधिविसेस क्यिा. उद्दवित १७० ५९ उपसत्थिय उपसव्यस्त उल्लोकेति उहत उल्लोकयति १४९ उपसरित क्रिया. १७. उल्लोगित रिया. ४३.१३०-१७६-२०६- उदुयामास उपसारित क्रिया. १६८-१७० २१५ उदूढ २५० टपसेक उलोपिक भोज्य १७९-२२० १८२ उद्धभागा उपाणद क्रिया. उल्लोयित १९७ उपानत् १४२-१८३ उद्धमुलोगित ऊवाहोक्ति ३४ उप्पल उत्पल १५ फिया. १०६ उलोहित उप्पलगिह उपकृष्टे उद्धवित उत्पलगृह १३६ उचकट्ठम्हि १७ त्रिया. ११७ उप्पाडक त्रीन्द्रियजन्तु २६७ उवकसित उपकृष्ट उर्दूभागामास २०१ उप्पात अन्झाय २१० उवक्वलित. उपस्सलित २५१ उद्विततर उप्पातक जीन्द्रियजन्तु. २२९-२६७ उवगूढ क्रिया. उदीरमाण उद्रियमाण १९८ उप्यातिमा मत्स्यजाति २२८ उबग्गहणाणि ५८ उदुजमाण उदयमान उप्पुत ३७ उपजिब्बा क्रिया. परिपूर्ण ११४ उम्मुभंद भाण्ड १९३ उवट्ठाणजालगिह उपस्थानजालगृह १३६ पक्षिनाम ६२ उमयमया उपस्थूल २०८ उपकडत उपकर्षत् १४४ उभयोसंविट्ठरत १८४ उवणामत उपनामयद टपकती उपकपंन्नी १६९ उभित्रणफणसपमाणगकुच्चटुं। १९३ उवणिग्गमण उपकवि उपकृष्ट १५८ उमुक? ३४ उवत्त ૧૨૨ उपकडिया उपप्य १४५ उम्मनित उन्मनित २५-११८-२०६ उवत्थग उपस्थ १५ उलप्त १४ उद्दुत १४८ उदला? ८ उवटूल द्वितीयं परिशिष्टम् २८९ २०१ उस्साहिया ओझीण ११२ ओतारिश गोत्र १५० ओदपिंडी शब्द पत्र शब्द पत्र पत्र उवथूलागि ५८-११४-१२८ उस्सयभोयग उत्सवभोजन १८० ओकुंभ ! २४३ उवदासिताणि आलिह्नितानि १३८ उस्सव उत्सव २२३ ओऋणत भवकूणत् उहित? क्रिया. १४८ उस्सात ऊप्मान्त १५१ ओगूढ अवगूढ उत्सारित १६५ ओघट्ट १४७ अवघट्ट उबहुत उपद्रुत ५८-१२२ उस्सारित उच्छाखिका २२२ ओघहित उबहुतामास अवघहित १४८ उस्सित उवहुतो अज्झायो उच्छ्रित १३२-१७० ओचक्सति ? २०२-२०४ किया. उस्सिघण आघ्राण १९३ उपधाइणि ? ६८ ओचूलक शीर्पआभू. १६२ उस्सिपित भानात १४८-१८६ उवधारए उपधारयेत् १०७ ओछुद्ध अवक्षिप्त १६९ उस्सीस उच्छीर्ष उपधि-माया २६५ अपक्षीण ११४ उंगुणी वृक्षजाति उवफरिसते उपस्पृशति १०७ उंडणाही ओड कर्माजीविन् १६१ क्षुद्रजन्तु २२९ उपलक्खये उपलक्षयेत् १९७ ओणत भवनत ३३-४२-१६९-१७१ उवलगिह उपलगृह १३७ ऊरुजालक ओणमंत आभू. अवनमत् ४२-१३५ उवलद्ध उपलब्ध १७. ऊहस्सित क्रिया. ओणामित अवनामित १६९-१७१-१८४ १०६ उवलेवमंडल ११६ ओणिपीलित अवनिपीडित १४८ क उववत्तिविजयो अज्झायो २६४ ऋरिकसुत्त अवतारित उववसित उपोपित १९३ ओतारित उवविट्ठविहि उपविष्टविधि ९-१०-११-१३ ओतिण्ण एकणासा देवता २०५ अवतीर्ण ३३-१७७ उववित्त १५ ओतिषणोतारित क्रिया. १११ एकभस्स एकभाप्य-एकवचन उववृत्त उपवृत्त एकद भोज्य ७१ उवसक्त उपप्वष्कमाण ३७-१३५ देवता २२३ एकाणसा ओदनिक उवसक्किम कर्माजीविन् १६० उपप्याप्कित ओदीवसिंह एकावलिका ७१ ९१ उवसक्किअम्दि उपप्वप्किते बाभू. १७ एककाणि भोधावति अवधावति उवसक्ति उपष्वप्कित १८४-१९३ एक्वगमणता एकाग्रमनस्कता उपधिगृह १३६ उवहित उपहित २०२ एक्कभस्स एकवचन १५७ मोधिजिण अवधिजिन उवाताणुत्तमाणि १२८ एक्कसिरीय एकमरिक १४१ ओधुत अवधुत ८०-९१८ उवादिष्ण उपादत्त २१७ एक्कापविट्टरत १८४ ओपणिव्वय क्रिया. १९५ उपविष्ट १८४ एक्कक एकैक १२६ ओपविका उसंत २२९ क्षुद्रजन्तु उपविशत् १३५ उद्वर्तन १९३ एगपादटिभ एकपादस्थित उचहण ३३ ओपुष्फ एण एतं ५६-१४ ओपेसेजिक कर्माजिपिन् १६० उब्बरक अपवरक१९५-२२० उच्वरित उद्वरित १११ एतया २३६ ओबाधित भववाधित १४३ उच्चलित उदलित १०६ एतेसं एतेषाम् १५५ मोम उन्चलेंत उद्बलत् एतेसां एतेपाम् ७३-१४१ भोमजित अपमार्जित १२०-२१९ उन्चात उद्वात १२२ एलुरु देहली २३३ मोमत्यकाणि उब्वेलित उद्वेलित १०८ एलुय २२२ भोमस्थित भयोमुपीत 101-२१५ उम्बेहासित उद्वैहासिक १४८ एल्ग ५-३३ भोमथित भयमथित उसणीतेल एयरकल्याण ८३ मोमहित अरमर्दित १६३ उसघतेल ओ मोमुक अवमुक्त उसमक मामू. ६४ ओकट्ट भवकृष्ट १६ ओमुक भवमुक्त १६९-10. उसिण १२४ ओकटित १७१-१९५ मोमुंचमाग भवमुचन् उस्सभो उत्सवः ९८ मोकहित १६९ मोयकार कमांजीविन् " उरसणिकामत्त कर्माजीविन् १६० मोझासक कंगमामू. १९२ मोयमा गोत्र १५० १३५ ओधिगिह १ उचेह एताय " " २३२ एमकहाण " अंग०३७ २९० अंगविजाए सद्दकोसो पत्र ८१ कडित ३९ मोहीण १ भाण्ड " ७० शब्द शब्द शब्द पत्र ओयवति साधयति २४२ ओहसित उपहसित ८१-२१५ कहिकतोरण कटिकातोरण १३६ ओरम्भिक कर्माजीविन् १६, ओहास उपहास ७ कडिगेज्झम कटिनायक २४९ ओराणी आभू. ७१ ओहिजंत अपजिट्रियत् कटित-कटयुक्त ओरिक अवरिक्त १४८ ओहित अपहृत अवहित ३४ कडीगहितरत ओरुज्झ अपरा अपहीन ४६ कदुकालमच्छ २३७ ओरुभंते अवरोहति सप्तमी एक. क कडुमाय ६२ चनुप्पद ओरुढ अवरूढ १४८ ककाडिका वृक्षजाति कृकाटिका ६६.१२.१२१ कड्कीका अपरेचित कृष्ट ओरेचित गोत्र कवित ११८ १४८ कवितजाण कढ गोन १५० ओलकित अवलगित? ११८ ककी पक्षी २३९ कढिणधातुगत ओलमित? किया. २३५ कलुंडि २१४ कगलीत? ओलंबित अवलम्बित १४८ क्वडी मत्स्य विशेष १८३ कणवीर गुल्मजाति ओलोएत मालोकयत् ४२ गुडविशेष १८२ कणवीरका कनीनिके ९३-१२५ ओलोकित अवलोकित १३०-१७१ ककरपिंडग भोज्य २४६ कणिकार कर्णिकार ९० ओलोलित किया. ८१-१६९ कक्कुस कुकुस १०६ कणिलिका कनीनिका १२५ ओवहित अपवर्तित १६९-१७१ कक्खड कर्कशः १८९ कणेटिका अझ १३४ ओवत्त अपवृत्त १६९-१७१ कम्खडाल कण्ण गोत्र १२५-१५० ओवयित भवपतित २५८ कक्खारक-ग फल ६४-२३८ कण्णकोवग कर्णाभू. ६४ ओवात अवपात १४९-२४९ कावारणी वृक्षजाति कण्णखील ओवातसामाणि गोत्र १५० कचरखी कर्णाभू. कचि ओवाताणि कण्णगूधक कर्णगूथक-कर्णमलः १५५-१७८ क्वचित् १५४ ५७-९० कच्छमक स्थल-जलचर २२७ ओवातिक परिसर्पजाति ६९ कच्ठभमगर ओवातिका कर्णचूलिका ६६ अपपातिका मत्स्यजाति २२८ कण्णचूलिगा कच्छा कण्णतिल २०१ कक्षा धान्य ओवादकर अवपातकर ४ कजूरी खरीवृक्ष कण्णपालिक कर्णाभू. ११६ ओवारि कञोपक कार्योपग २५४ कण्णपाली कर्णपाली ६६-१२४-१४१ ओवारित अपवारित १४८ कटुतरी कृष्णपीलक कर्णाभू. १५-१८३ वख ओबालित क्रिया. १४८ काष्ठ अङ्ग ९३ ओवास भाभू कर्णामू. ६५-१८३ ओवुलीक चतुष्पद ६९ कटु जलवाहन धान्य १६४ ओवेढग आभू ६५ वटखोड दे० काष्टखोड कर्णाभू. ओरेढिय अपवेष्टित २१६ कट्ठमय सामू. १६२ कण्णवलयक कर्णाभू. ११६ ओसघगिह औषधगृह १३७ कट्ठमय पीट काष्ठमय पीठम् २६ कण्णवल्लीका कर्णाभू. ओमघजवागू भोज्य वादन १९३ कण्णवीही भोसघीप डिपोग्गल १४३ कढहारक काष्टहारक ८९ कण्णसकुछ १५५ ओसर १३६ कटुंसालुक (कंठमालक) रोग २०३ कण्णाणिवहण उत्सव ११३-१४४ ओसरक अपसरक १३७ कदाधिकत कांजीविन् १६० कण्णातिमास ओसरित क्षपस्त १६९ कट्ठवहक कण्ठमाभू. १६३ कण्णातिलग तिलकप्रकार २४६ ओसारित किया. १३०-१४८.१७१ कडक-ग स्तहाभू.६४-६५.१६३ कण्णापवाहण कन्याप्रवाहन भोसीसजमिय भवशीर्षनृम्भित ४. कदण्डकी कडुच्छिका ७२ कपणायावहण उरसव ओमुद किया ११८-१९७ करमच्छ श्रीन्द्रियजन्तु २६७ कण्णावासणो अज्झायो १७५-१७६ ओस्तक मवमुप्तक २४९ कसकरा वर्णमृत्तिका १०४-२३३ कणिका कर्णाभू. उपहत १४८ भाण्ड २१४ कण्णिकार वृक्ष ओहायइसिय अपहतहासित ३५ कडिपाणि कटीमाभू. १६३ कपिणवल्लीबंध? ५ ७० कर्णाभू. १८३ कह १५ कण्णपुत्तक ६५ कण्णपूरक १६६ कण्णराटक १५ कण्णलोहक १८१ कट्ठमुह द्वितीय परिशिष्टम् २९१ २०९ कसकी ७० कर्माजीविन् १६० कसित कस्स? रोग २०३ ९२ कर शब्द कण्णुप्परिका कण्णुप्पलक कण्णुप्पीलक कपणेपूरक कण्णेयाणि कण्ड कण्हकराल? कण्हफीडिका कण्हगुलिका कण्हणीलपडीमागा कण्हतिल कण्हतुलसी कण्हपडीमागे कण्हपिपीलिका कण्हमोयक ? कण्हलुक्स कण्हवण्णपडिमागा कण्हविच्छिका कण्हाणि कपदामास कण्हाल? कण्हेरी कतमस्सि कतलिछारिका? कतंब कतिमि कतरिका कत्यलायण कद्दमग कधा कधामझक कपिट्ट फपिस्थतेल्ल कपिलक ७० पत्र शब्द पन्न স্থা पन्न १२३ कम्मजोणी अन्झाय १५९-१६१ कसक उद्भिज २२९ कर्णाभू. ११६ कम्मणक्खत्त वृक्षजाति कर्णाभू. १६२ कम्मण्ण ? कसरि भोज्य ७१-१७९ कर्गाभू. १६२ कम्मदार १४६ कसिगोरक्ख कांजीविन् १५९-१८५ ५९-१२८ कम्मासवाणिज गोत्र १४९ वर्ण १०४ कम्मिक कर्मिक कसेरक भोज्य १८१ ९२ कम्मियि कमिश्चित ८५ कसेरुक फलजाति क्षुद्र जन्तु २२९ कम्हियि ११४ उद्भिज २२९ कयहिक कृताहिक २४७ कस्सव गोत्र १५० १२८ कयर पक्षिनाम ६२ कस्सामो कक्ष्यामः २३६ रोग २५३ कयार कचवर कंक वनस्पति वृक्ष कंकण करआभू. करकी १०४ माण्ड कंकसालाय करणमंडल कशालायाम् १३६-१३८ ५८-११६ क्षुदजन्तु २२९ कंगुका करणसालाय ७० पुष्प करणशालायाम् १३८ ९२ करणोवसंहिता कंगू धान्य १२८ १२८ करमंद फल ६४-२३१ कंगूफ वृक्षजाति करल रोग २०३ कंचणिका भाण्ड ७२ क्षुद्रजन्तु २२९ करंजतेल कंची २३२ कटीमाभू. ५७-९२.१२८ करंदग करण्डक कंचीकलापक २२१ कटीआभू. ६५-१६३ करिण्डका उद्भिज २२९ कंचुक वर ९२ करिलेग कंटकमालिका २३८ आमू. ७१ चतुप्पदा ६९ करीप १०६-१४२ कंटकालक कण्टकमय कतमस्याम् २६४ करेणूयक वस्त्र कंटकीरुक्ख १६४ कण्टकिवृक्ष २५५ करोडक भाण्ड कंटासक कदम्बवृक्ष करोडी ७३ कटिका कतमाम् मामू. कतरिका कलम १९१ बाल गोत्र कलवा गोत्र १५० कंटेगुण १५० कण्ठसूत्रः ६४-२५८ स्थल जलचर २२७ कलस भाण्ड भग ६६-११९ कथा वृक्ष? २३८ कंडूसी गोत्र १५० पक्षिनाम ६२ कलाय धान्य जलवाहन १६६ कलायभजिय मोज्य १८२ कंतिकवाहक पुष्प पशिनाम कलिमाजक वृक्ष २४३ गोत्र १५० कलाडक मत्स्यजाति २२८ कंदित ऋन्दित ४६-१६२ वन २२१-२३२ कवचिका भापद्ध ७२ कंदियविधि ९-१० कांसी आभू. ६५ कल्पोपग ६२ करली भाग्ड कंबल कृमिजाति ७० कविट्ठ वृक्ष भाजन १.१ करिंजल पक्षी ६२ कंपकारक कांजीविन् १६०-१६१ कर्मकृत २५६ कवी पक्षी १९५ कंसगिह कर्मगृह १३६-१३० कच्वुड । ८. कंसपत्ति माण्ड છે करीस " ९७ कंटेण ६५ कंडरा ४० कलहिमी १६४ कंडे २३२ कलायस २३१ कंदल ६४ कंदलि ६२ कंद्ग वर कप्पासिक कप्पासी कप्पोपक कमेइका कमंडल कम्मत कम्मगिद ६३ कंबटिक २२० कांस्यगृह १३६ २९२ अंगविजाए सद्दकोसो पत्र कृमिजाति २७ कुतिपि रोग २०३ कुदु(द)क " शब्द पत्र शब्द शब्द कंमलोह धातु २३३ कावकर काग्यकर ९१ कुट्टित क्रिया कंसिक कास्थिक कास १७७ कुबुद्धी कोरबुद्धी 4 काकमजुक पक्षी २२५ कासक कर्षक २४९ कुठारिका भाण्ड ७२ काकवाल? १४२ कासमाण १३५ कुडज वृक्ष कार्कडकवण्ण १०५ कासित क्रिया १३०.१४८-१६८-१८५ कुडिला ५९-१२४-१२९ काकाक पक्षी १४५ वासंत काममान ३७ कुहुकालक मत्स्यजाति २२८ काकुरही गोत्र १५० काहापण सिक्क ६६ कुटुंबक २५३ कायिका उद्भिन २२९ काहावण " १३४-१८९ कुडापस्मय कुड्यापश्रय ३० काटिहि ७० किजर भाण्ड २२१ कुढारक भाण्ड काणवि वृक्षजाति ७. किहित कीर्तित १४२ कुणिणस रोग २०३ वार्तव कादंवपक्षी ६२-1४५.२२५ किडिका दे० सडकिया उद्भिज २२९ कापुर करसमान ९९६ किडिग कुटुक १३५ काप्पायण गोन १५० किडिभक कामजोणी कुहिम क्रिया. १५७ ५३-५५.१३९ किणिहि कृमिजाति कुघुटुक पक्षी कामदार ११४ क्तिबुद्धि कृतयुद्धि १२२ कामल कीर्तयिष्यामि रोग २०३ कित्तयिरसं कुद्धता १३५ अन्दता कामसघ कामसत्य ९ किपिलक कृमि कुमंड ६१ कायतेगिच्छक कर्माजीविन् १६ किपिल्लिका कृमिजाति कुमिधी पुष्प कायर्वतो ११७-१२८ फिमिका कुमारीला मत्स्यजाति २२८ २२९ ५८ फिमिमलिकारिका कुम्मासपिदि कुल्मापपिण्डी ७१ कारयिस्सनि कारयिन्यति १७५ क्लिकिलायिम प्रिया १८६ कुरयक भाभू. कारिमलिका वृक्षजाति ७. पिरास रोग कुरयक वृक्ष कारकम्म कांजीविन् १५५ फिलिट्ठपरामास कुरिल? १८८ २३० कारकाजोणि ३९ किलिट्ठा ५९.१२६-१२९ कुरुड्का कारगगिह कास्कगृह २५८ किलिङ्कामाम २०१ कुलणखत २०५ कारगिणी कोजीदिनी ६८ फिलिपण कुलस्य धान्य १६५ कारंदमय पक्षी १२-२२५ फिलिम क्लीव भोग्य कुलत्यपूर ७३ ६४ कारक पक्षी ६८-२३८ किलेसित लेशित १४८ कुखद पशिनाम ६२ कालकमालिका शलाका १३५-१९० कुलिंगम शुजन्तु २३८ कारवारमणी भाभू. १६२ फिविल्लका कृमि ७२-२२९ वुलीबंधक भाभू. १८३ कालमाप २६०-२६२ किए मत्स्यजाति कालप्परिमाग २६. फिमा सर्पिणी कारोह धातु २३३ किस २.५ काटकोहमप धानुपम २२१ बीतक फ्रीतक मामू. १२ वीएणम कीटना १४५ सगगत काठश्याम १८ सिंग वृक्ष ६३ कुसीएक कुशीण्य-कांगीविन् .. कार्मनी माण्ड ०२ युसरल मुरा २२१ कागग ५ पुष्यणार? १३. कुमुमारिका ११२ मद्र १४ पुसुम धाम्य बाटिका नामानि .. गुडिगा ., कुर्मुमनेत २१२ २१९ सिधारक निपारक बालिगी दृप्तमाति .. पोलि। सपना गुरुममानि भाष १ २०३ १९. कुलीर ५८-१२८ कुलीरा 11 लोपकुल १५६ कुविक १२३ कुमुदी गिमता द्वितीयं परिशिष्टम् कुंडमालिका कुंड कुंडिका कुंथ कुंभ कुंभकार कुंभकारिक कुंभकंडका सवा १७-२६ १६१ कोडिवग्गे २३२ कोडी क्षत्रपक सिकक १८३ कोत्यलग ६९ कोरेंटक कुंभिकारीमा कुंभीकपंडक कुचफगलीखावण! कूचिय कूडणाणक कूडपुरी वूडमासक कूटलेख कूमंड भंडग कूभंडी कूरवेला वित पत्र शब्द पत्र शब्द पत्र ७१ कोवि जलवाहन १६६ खचित धातुवन कर्ण " ६४-१६२ कोट्टक कोष्ठक १३६-१३७ खनकारक कांजीविन् १६० गोत्र ११९ कोट्ठाकार कोष्टागार १३८ खजगगुल गुलविशेष १८१ १९१ कोटाकारिक कोटागारिक १५९ खजगत दोहदप्रकार १७२ क्षुद्रजन्तु २२९ कोट्ठागार कोष्ठागार २२२ खजापज खाद्यपेय जलवाहन १६६ कोडित क्रिया. २१५ राजूर फल ६४-२३८ कांजीविन् १६० कोडिलक्षणक मासन २३. खट्टा ५९ खडुग मौक्तिक्कटक ६४-११६ १२७ खहुभायणगत २२२ गोत्र १५० कोटिक कुष्ठरोग २०३ सणता क्षणदा २३५ क्षुद्रजंतु २३८ कोतवक वस्त्र १६३ सणंत खनत् ७३ कोत्यकापल भाजन २७ खत्तपक ८५ सत्तबंभ १०२ भोज्य २२० कोद्दव धान्य १६४ खत्तवेस्साणि १०२-१२८ १३० कोमारभिच्चा कर्माजीविन् १६१ खत्तसुद्द १०२-१०३ पक्षिणी वर्ण १०५-१४१ खत्तिक १०२ १३० कोरेंटवण्णपडिभागा ५८ सत्तिकोसपण १६१ २३. सत्तिय पादमाभू. १८३ धान्य २२० खत्तियजोणि २३८ खत्तियज्झोसिय कुष्माण्डी कांजीविन् १६१ सत्तियधम्मक पादशाभू.६५-१६३ ६३ सत्तेजवेस्सेजाणि ५७-१०२ किया. १५५-२१४ क्षुद्रजन्तु २३० सत्तजाणि रजुविशेष ११५ कोविडाल वृक्ष 101 भाभू. ६५ कोविराल वृक्ष ६१ कोसक चतुष्पद सपटापाडण वृक्षजाति ७० कोशगिह कोशगृह १३८ २३८ कोसजाया कर्माजीविन् १६१ फेचिश २३६ कोसरक्स १६० स्वराई ५९-१२४-१२९ माण्ड ३०-०२ कोसंय वृक्ष पर्यत १४९ सलिणगिह कियाकृष्यः १४६ कोमिवलगत सालित १४८ प्राणिजार १६३-२२१ फेशनिमांजन १४८ गुल्पमणियन्ध . कोसेमिका पख संजग सअन ९२ पेशवाणिग् १० कोसीधण्ण संहसीम १५३ १६४-१०० गोन खंडित रिया १४८ १०६ गोत्र संद-विमाद देवता २०० मौकाविशेष ११ संधार २५८ पक्ष? २३० संमारस्मय सम्मापश्रय कमांजीविन् १९० महत सादित किया १९१-२.३.२३१ गईमा क्षयिका गानि 1.0 शयन १५ पागप गोत्र १५. सारम चतुष्पदा १३० कोलक २३, कोलथ २३९ कोलफल ७० कोटिक २४० कोलिक " ६३ सत्तयाणि ६३ सदिर ? केणिका देखमी केयवसक मिथ खफुह। खरड ६३ सलक ७८ कोसिक फेलास फेवनिमुत्तो गोन २१८ रालित ३१ कोसेनक पेशमौटि १४६ कोसेयपारस मणिम्मजण केममोटि फेमशाणिय कोछ ११९ कोटक ६५ कोटा छोरिव बोहराम G कोहित हिम ८१ संमा १८ गति २९४ अंगविजाए सद्दकोसो २४६ ७८ " ४ भाभूः ३. गहतोय " " ८७ शब्द पत्र शब्द पत्र पत्र पारमगी रव १९४-२१५ ग गहेतूर्ण गृहीत्वा ३९ गारोह धातु १३३ गजाधिपति कर्माजीविन् १६. गंगावत्तग भोज्य? स्वारवाहिका भोज्य १८२ गनित क्रिया १६८ गंडक कर्माजीविन् १६॥ सालक पशु २२७ गहिक ? ६२ मंडसेल गण्डशैल गाहिनि खादयिष्यति ८४ गणक कर्माजीविन् १६० गंडीपाद रोग २०३ पिढागत गोग्र १५० गणिकाखंसक १६. गंडीवेला २१७ पिप्पकार क्षिप्रकार गणितापढपणक? ९७ गंडूपक निसिणिक पादामू. ७१.१६३ गणेस्सरिक गणेश्वरिक १२३ गंडूपक कृमि २२९ निसिणिमहुरघोस ध्वनि १७३ गततालुगवण्णपडिमागा गजतालु. ५८ गंडूपयक जहाभू. १६३ पिंमित किया. १४८ गतपय ववयः १०. गंदित क्रिया १४८ खीणवंस क्षीणवंश १०० गति लक्षण १७३ गंधगत पीरपक मृत्तिका २३३ गद्द पक्षी २३९ गंधजोणी ११० पीरपादप क्षीरपाइप देवता २०४ गंधविसारद अन्यविशारद धीरसम क्षीरवृक्ष २७ गहम गोत्र १५० गंधिक कर्माजीविन् १६० पीरनिवर ५ गहमकप्पमाण मत्स्यजाति २२८ गंधिकगायक पीरस्पद क्षीराधवलाधि ८ गद्दभग पुष्प ६३ गंधेय ५८-१२३-१२८ वीरिणिविरणउद्यरिणिया ८ गम्भगिह गर्भगृह १३६ गंभीरा ५८-१२४-१२९ मुझंग कुवार ११७ गम्म प्राम्य १७९ गागरक मत्स्यजाति मुखित खण्डित ११५ गम्मारण्णा माम्यारण्या: १८८ गाढलीण सहक वाल ६ गाढोपगूढ ८७ ग हखमाभू. गजगृह १३६ गाणक गान समिरीमित्र शुउपरीसर १६० गयगोकण पशु २२७ गाधमक मत्स्यजानि सहाध्पत्त शुहकमरव १६८ गयतालुकवण्ण १०५ गामणरास्त २०९ सुक्षकामु रप्ठामु २११ गयवारी गजरारी १३६.१३७ गालित त्रिया. ११८ शुचित शुधित १३.-१४८.२१५ गयमालाय गजशालायाम् १३८ गिनिहिते गास्यति ८४ गुण भग ११९ गयाधियास गजाध्यक्ष १५९ गितकार गीतकार R1 कर्माजीगिन् १६० गल्लक मामू ६५ गिरिकुमारी देवता २२४ परिमर्पजाति रोग २.३ गिरिजण गिरिजन्य २५४ शुद्धिका निज २२९ गलुक २०३ गिरिमेस्वर पर्वत পি किया. १५५-१७६ गडिका यान २६ गिल मत्स्यजानि ६२ गमित १४८ गवली ९२ गिलि वाहन ७२.१६६-१९५ তুলে शुग्ध ११२ गलभंड! २१५ गिधी गृदि २०१ गयममय। मामू. १२ गीयरोग गोपाल २०. गडक शुदजम्नु २३८ गीवा पशी २२५ गेला १. गहगत दोहदप्रसार १२ गुग्गुणविगत रस २५२ मोटा भोम्प १८२ गीरि गुप १२६ मानि किया. 11८.३१५ गहगाणि ५८.116 गुटिकाय! गूहिकायाम् १० नाम पप १५.२३२ गारोपमा १२१.१२९ गुणोपत्रप गोमागण १४ गहानि गोत्र १९ गुरुतु (गहू) पया पृमि २२९ (५ गहर पक्षी १२ गुण्यागीत गुदम्पानीय 1. नाममानित गुप रोग ३.३ १६९ गम्मी? ६५ गयगिद ६५ गत " " रोग २०३ दर गोत्र १५. गुरु द्वितीयं परिशिष्टम् २९५ ध्वनि १७३ १४८ घही ६५ घतउण्ड " ६४ घयजवागू ३९ घरकोइला ६९ चतु १४७ चतुचछीया पत्र पत्र शब्द शब्द भोज्य ६४.१७९ गोसम्ग प्रभात २४७ चकवा गुलकूरक पक्षी २२५ गुलखित? क्रिया. १४८ गोसांगण्हाणक प्रभातस्नान ९८-२५५ चकवाकयीय पक्षी २२५ गुलदधि भोज्य २२० गोसंखी कमांजीविन् १६० चक्काक चरिक १६. चर्दिक १४० ९८ गोहातक गुलमरखण ६५ घ चक्सणिका गुलमग भाण्ड आस्वादनिका २५८ गुलिक ? १०६ घडक भाण्ड ६५ चक्खुमाकंत चक्षुरकान्तः १२० घडभायण २२२ चश्वुसा चक्षुपा गुलुकपुप्फ गृहित किया. भाण्ड ७२ चम्बुमाणि चाक्षुष्काणि १९६ गेजकन्च गेयकाव्य १४७ घणकडत? ११८ चक्षुस्सं चक्षुष्मान् १९५ गेज्य ग्राह्य-गृहीत्वा घणपिच्छिलिका? भाभू. चच्चर चन्दर १३६-१४५ भोज्य गेवेज २३६ चणक धान्य कण्ठआभू. १६४ गोकंटक ६४-१७९ चण मृत्तिका २३३ घतकूरक १६४ गोरछक १८१ चणविका पुष्प २२० दे०? चतुप्पदा १२६ गोझकपती गुह्यकपति घरपोपलिका परिसपंजीव २३० चतुगिह चतुष्कगृह १३६-१३८ गोज्झरति घरिफल २३८ चतुक्काणि गोज्झाणि घसेंत घर्पयत् ३८ चतुक्खुत्तो ५९-१२५-१२८ चतुःकृस्वः १८४ गोहाण गोस्थान घंटिक चतुश्चक्रिका २४२ गोणस सर्पजाति ६३-२३९ घंसित घर्पित १४८ चतुपवयण गोतमा गोत्र १५० घायति जिघ्रति १०७ चतुप्पदरत १८४ गोत्तज्झाय प्रिंघिणोपित? किया. १४८ १४९ -१५० चतुरस्मा १२८-१६१ गोत्तम! ग्रीष्म १४७ - १९९ चतुरंसायत चतुरस्रायत गोधसालक घुकभरघ क्षुद्रजन्तु २२९ चतुर्वेद चतुर्वेद १०. गोधूम धान्य पूर्णित १४८ चत्तालीमतिवग्गा १६४ युणित ५९ गोधूमममिय भोज्य घुमति १८२ ५९ गोपच्छेलक घोटेति घोटयति २५८ प्राणी ९२ चमुतेमु! किया. गोपाल कर्माजीविन् १५९ घोडदादिकर? १४० चम्मकार कांजीविन् १७ गोप्फा गुरको १२.१६५ घोडित घोटित चर्मका २१६-२२२ गोम्पर घोलि छगण यान ૨૬ चम्मक्वील चमकील-मर्शोरोगः १४. गोमच्छ मत्स्यजाति २२८ घोसक कर्माजीविन् १६० १५५-२०३ गोमयकोग परिसर्पजाति घोसर्वत १५३.१६० धम्मगडोला २३१ गोमेदम घोसाडकी वनस्पति रस २१५ २२१ गोमेपकमय घोहणुमत मत्स्यवाति २२८ रखमा चम्ममाडी धर्मग्र २२१-२२० गोम्मि प्रीन्द्रियजन्तु २२०.२३८-२९० धम्मिरा माम्पनाति २२० कांजीविन् १६ पदमपुब्धि चतुर्दशर्मिन् ८ चम्मिराज ૨૨૮ गोन ११९ घरंसा ५८.10 चयगी चपनी गोटिक ९६ घउम्पीम चतुर्वित गरिका माहारसम्पदा गोहिंग १९ परममिदुगग मामू. १४ चकगत भाण्ड गोयमामतिकारक समांजीचिन्.. पापण्डविर १४९ पमानि ५०-०९-१२८ गोरपक्ष्य गोमजाल्य १५९ घरमंडल गोचित गापित १४८ परउग २५२ बडिम १४५ पिंसुम त्रिया. ८० ४६ चम्मकोस ७. गोल " पर अंगविजाए सद्दकोसो घलोढ ७३ छइच्छेद २२३ छकुत्तो भासन ८ रोग २०३ चिता २३४ छड्त भोज्य २४६ छण ९२ छत्तकारक " वृक्षजाति ७० शब्द पत्र शब्द शब्द चटिन किया. १४८ चिल्ला वृक्ष चोलपट्ट १४२ चिल्लिक नपुंसक छविच्छेद १४४ ६. चिंचिणिक वृक्ष १२६ चवला १८४ १२५ चिंतितं अज्झातो पदकृत्वः घमणिका छगणपीढग छगणपीठक २६ स्थल-बहुपदा २२७ चिंतितो अज्झायो २३४ चसित्त? छगली मग-चोटिका? १५३ चिफलक १५ चंडक गोग्र १४९ चीणपट्ट उदग्गहणी पष्टप्रहणी वस्त्र ६४.१६३-२३२ छट्टसाधणी पष्टसाधनी चंदाणता ८ ५९-१२४-१२९ चीणंसुग वर हड्डि चंद पुष्प ७० चीती छर्दयत् चंदण वृक्ष ६३ चुक्तिक क्षण १२१ चदणरस २३२ चुडिलीय चुदुल्या कर्माजीविन् १६० चंदणिकातेल २३२ चुण्णक गृहधवलनद्रव्यम् १०४ छत्तधारक १६० चंदलेदा देवता ६९ चुण्णछारिका २५५ उत्तंसासणहारण? ७९ चंपकतेल २३२ चुण्णिकार कर्माजीविन् १६० छत्तोष वृक्ष चंपकाली कृमि २२९ छहेमाण छर्दयत् १३५.१३७ चंपगपुप्फ पुष्प ६३ चुछमाता सपनीमाता ६८.२१९ उप्पि पदपि चाउछ चापल्य ३ चुली भाण्ड ७२ छमिणी धातुच्यण्णविधाण १०३ चुंयणा सोलस चुम्बनानि पोडश १ छलंगनी गोन १५० चाहिक चातुरहिक २६१ चुंवित किया. ५८-१३८-१६८-१८३ छलंस पहन २४२ चापल्ल चापल्य ३ धुंबिय किया. ९-१० एलिक (छंदक)? चाय मोज्य १८१ चुंबियविभासापडलं ४९ देति छन्दयति १३ वृक्ष ६३ चुंभल पुष्प ६४ छंदोक गोत्र १५० चारपाल कर्माजीविन् १५९ चुंभलक अवतंस-दोखर २४२ छंदोग गोय चारायण गोत्र स्तनाग्र ६६ डागलिक कर्माजीविन् १५९ चालित पिया. १४८ चेहितक? जाति १४९ छात दे० बुभुक्षित ३८.१२१ चांटिक गोग्र १४९ चेति चैत्य १४८.२३३ छावक क्षुधितक १४२. १४३ चिति चिता १०१.१४८ घेतिक चैत्य ३१ छातता क्षुधालुता १३५ चितका २५४ चेतित २६ छायत्त दे० बुभुक्षितस्व चित्तकारक कर्माजीविन् १६०.१६१ घेतितपादव चैत्यपादप ३० छाया लक्षण चित्तर पर्यत ७८ चेतिवागत ४१ छायासंभ छायास्तम्भ २७.३० चित्तगिह चित्रगृह १३०-२२२ चेतिय चैरा १४७ छायासंपन्न चित्तजीवी कर्माजीविन् १६० चेलिकसुत्तीजा चेलिकसूत्रता १८ छायछायाहीण चिसपरिमा चित्रप्रतिमा १८३ चेलिम क्षारिका-रक्षा घर्ण १०५ चोरघाता कर्माजीविन् १६१ टिक गुरुमजाति चित्तवण्णाडिभागा ५८ चोरलोपहारा दिख १-१३ चिसविना चित्रविद्या १३. घोरासो गर प्राणी २३९ चिबुक भार ११५ घोरला ७९ रिपर्ण चिया २३५ चौरालि भोज्य १ विगाली क्लटा १८३ चिराइच चिरानिवृत्त १६ चोलक सस्कारोस्सब ९०.१५३ हिर प्राणी २३० रिराय ९५ चोलाडिगा सुदजन्तु २१८ डिरा शिरा बिहानी चिलावदेशजा १८ घोलोपयश उस्मद २२३ डिवित स्कृष्ट १८३-१८९ १२० १५० चूचुका " " चैत्यागत २७ छारिस " १६. डिण्ण १ टिण्णमाला २४० हित स्पष्ट द्वितीयं परिशिष्टम् २९७ १७७ जधावुत्त सेष्टित १४८-१७३ यक्षोपयाचन १८३ ७० शब्द पत्र शब्द पत्र छिदंत छिन्दत् ३८ जधण्णाणि १२८ जाणगिह यानगृह १३६-१३८ छिंदंती छिन्दती १६९ जधण्णामास २०१ जाणजोणी अज्झाय १६५ छीत क्षुत १६८ जधाजात यथाजात ४४ जाणसाला यानशाला छीयमाण स्यमाण १३५ जधाणात यथाज्ञात ५६ जाणिनो जानीयात् १५.१७ जधामाणसिक वस्त्र? १६४ जाणि छुधा क्षुधा १६८ ज्यानिम् ५३ जधाविधि क्षुण्ण यथाविधि ४६ जाणेजो जानीयात् ३६-४४.५४ वनस्पतिप्रकार यथोक्त छुपगत ४४ जातकम्म जातकर्म १४७ जधासत्ति ययासत्ति छुभगत १८१ ६३ जातिणसत्त २०९ छुवफल जघोट्टि यथोद्दिष्ट १७७ ४३ जातीतेल्ल २३२ छुहा सुधा १०४ जमलभूसण १५६ जातीपट्टणुग्गत वन मुछिका चतुप्पदा ६९ जम्मणा ५८ जातीपडिरूपक वख छेत्तमंडल क्षेत्रमण्डल जयकालिका सुरा २२१ जातीविजयो अज्झायो खेलंत सेण्टिका कुर्वत् १३५ जयतणं? ५४ जामवेला २४७ छेलित जयविजय? १४६ जामातुकीक जामात्रिक छेलित सेण्टिका कुर्वत् जयसमण पुष्प जामिलिक वस्त्र ७१ जयो अज्झायो १९९ जारिका जारी ६० जलगिह जलगृह १३७ जारीय जार्याः १६ जइणक कर्माजीविन् १६० जक्खोपयाण जलपरसंदण जलप्रयंदन १९७ जाला कृमिजाति जलाउ किया. जगतिजगभूय द्वीन्द्रियजन्तु २६७ जालिंकर १४८ जगतीजगद्भुत ६ जगल जलामास १४६.१८६ जावक गोत्र सुरा २२१ जग्गंतक अग्निज्वालनकर्कटिका २५४ जवमजिय भोज्य १८२ जावतिक यावत्क २३८ जग्गिक वस्त्र जवातू यवागू १८१ जिणसंथवो अज्झाओ जघण्ण जसवो जघन्य यशस्वतः ९ जिणोत्त जिनोत जजरित क्रिया. १२८ जिस्से यस्यां २४९ जणक स्थानविशेप १३८ जहण्णाणि ५७-९४ जिह्वामूलीय १५३ जणक कर्णाभू. १६२ जंगम ५८-१२१ जीवंजीवक पक्षिन् जण्ण जंगमाला यज्ञ १२१ पुप्प ७० जीवंतायणा गोत्र १५० जण्णकारि यज्ञकारिन् १०१ जंघावाणियक कर्माजीविन् ७९ जीवितहार १४४-१४५ जपणजण जन्यजन ९८ जंतुतर ८३ जुगमत्थ युगमस्तक जण्णमुंड यज्ञमुण्ड १०१ जंपितविभासापडलं ४८ जुग्ग वाहन १६६-१९३ जण्णुकाणि अझ १२४ जैपिताणि सत्तेव ४७ जुण्णवय जीर्थग्यः १०० जण्णुगसंधी ११३ जंबुफल ६४ जुत्तग्य १६३ जण्गेया ५८.१२३ जंबुफलक भाण्ड युक्तार्ये जण्णोपइतक यज्ञोपरीतक १०१ जंबूका मामू. १ जुत्तप्पमाणदीहाणि ११५-१२८ जतुकार कर्माजीविन् १६० अंभाइत जुम्मायित ४७ जुत्तसंपीटिव युक्तसम्पीडित २२ जतुमक्ष भन ७७ जंभाइयाणि सत्त जुत्तामासाय जणि ६. मायमाण १३५ जुत्तोपचया ५८-११४ जत्ताज्झायो १९९ जंभित किया. ११८.१६८-१८४ जुत्तोवचयाणि ५८.११४.१२८ उत्तणि मा ९५-१०१-११५-१२१ भितविभामा पटलं ४७ जुवतीयो १२५ जघजुत्त ययायुक्त ४४ जागी पुष्प ७. सुरतेयाणि ५९-१२८ जपण्णकाया १७ जागू यरागू.१.२४७ जंगटिका श्रीन्द्रियजन्तु २६० जधण्यावरका १२८ जाचितक याचितक १६५ जूनगिह अधण्णतरका काया जागा यानक २६ जूतमालाय अंग०३८ पूतासालापाम् ३८ १४८ जहण्णकाया मन ६५ जुत्तग्यम्हि अह २९८ अंगविजाए सद्दकोसो पत्र १० मचि ९ पत्यक १८ जत्यण वृक्ष नस दे. नस्तक २०२ दे० नस्तन २४ नास्ति १९ पक्षी २२५ २२५-२२८ २२५ " ६८ दरक १४२ ढहरचल १३८-१४० ढहराक १२९-२०४ गपुंसकणखत्त गोत्र १५० डिप्फर २०९ ५७-७२ १६८-२०१ निस्फटिव २१० नमस्कृत नमस्कृत्य ११२ १८६ १५५ १३९ होमा " मत्स्यजाति २२८ पक्षी २३९ परमच्छ पशु २२७ शब्द पत्र शब्द पत्र शब्द जूधिका पुष्प ७०.१०४ ठियपडल ३३ णनमाल जूब यूप १०१-१४८ टियपस्थिय जूम ६४ ठियविहि जेर एव १४६ ठियंतिय जोइसमंडल ज्योतिर्मण्डल ११५ टियामट्ठा १२० त्यि-रथी जोगवखेम योगक्षेम १३४ टियामासा ५९.१०४.१०५-१२८ णदीकुकुडीक जोगवहा योगदाहाः १५३ नदीमृत्तक ड जोजयितवं योजयितव्यम् १८५ उमालुम नौविशेप १४६ णदीमुत्तक जोणिका यौनदेशजा लघु ९८.१२०-१५३ णपुंसकजोणि जोणिवालिक मोणी अन्याय लघु १९ णपुंसकाणि जोणीलक्सण वागरण १४०.१४४ टहंत पुंसकामास दहत् ३८ जोतिसिक भासनविदशेप १७-२६-६५ णप्फडित जोयिजमाण योज्यमान १९८ णमोक्कत नौविशेष जोवणन्थजोणि हुपकहारक गोत्र णमोकारयित्ता जोवणथमझिमवयसाधारणाणि णयणातिमास ढोहला १५० जोवणत्याणि ५७.९७-१२८ णयणामास द जोसिता युवती ६८ ढंकराली झ टेटिका नितम्वी ११४ णरसीद ध्वनित १४७ णरेतर टेलिय मृत्खण्ड २१५ क्षपित ११३ णल १४२ नयम ध्वजस्तम्म णइकुकुडिका शहरीमंडल स्थानविशेप १३६ णवम्वुत्तो झंकक णखत्तमंडल माभू. पवण संझणित क्रिया. १४७ णखत्तबिजयो अज्झायो २०६-२०९ गवणीत झामित ध्यामित १४८ णक्खपद नखपद झामितापस्सम २७-३० णखंतराविमास १८६ णवमिगा झीण क्रिया. ८१-१४८ णगत्ति गोत्र १५. गंतकविकला मुझुरायित क्रिया. कर्माजीविन् १६० गंतुका इपित १४८ णगरणवत्त २०९ दिविणद्धक छसिर शुपिर १०. णगरदेवता देवता २०६ गवुतिवग्गा झोसित क्रिया. ११८ णगररक्ख कर्माजीविन् १६० णवूहक णगरविजयज्झाम १६. णहसिहा टकारी घृशजाति ७. गराधियत्व नगराध्यक्ष १५९ महसेटि टेहिवालक पक्षी २२५ णगोध ६३ णाग ट गच्छक स्थगित २४१ णहोसक नाम्याचार्य! ६७ भागमालक येतूर्ण स्थापयिचा १९० गट्ठ नष्ट १४८ णागक्ख टागमाय १५९ गट्टकोसयो मझातो २२२ गागवेल दियविधिविसेम ५९ गट्ठजोणि १३९ गाणी हितमाधारण १२९ गटागट्टो अन्यायो २१. पाटिकिमा टितामाम २१ दिनुहडिका पक्षिणी ६९ गापुण्णमंडल टिदामाम २५ णविमया ८ णामिगिदिसे झणित झापित ण " पक्षी २३८ णलियमालिका वृक्ष मत्स्यजाति २२० आमू नवकृरवः १८४ उत्सव ९८ मोज्य २२० पुष्प देवता २०५ नंतकविकला १९६ पक्षिणी शीर्षमाभू. १६२-१८३ १८५ णवमछिका ७. १४८ जगरगुत्तिय ट रोग २०३ णागतण्णु पक्षी २२५ मन्न १२४ नखश्रेणि १२५ परिसर्पजाति ६२ अनागतज्ञ १२९ गुल्मजाति वृक्ष ६३ २५७ ५८-११४ न अभिनिर्दिशेत् १०८ णिण्णेत? २१७ णितणिका ७० ७ २९ पिगमजोणि निगमाज्ञाम् २५८ णित्यणित १३९ मिथुद्ध ? ९-१० णिहीण १५१ णिणिद्धतराणि ७९ णिग्छुद्ध ८९ णिच्छेव ५८ ७६ णिनामक ५८ द्वितीय परिशिष्टम् २९९ पत्र शब्द पत्र पत्र शब्द क्रिया. णामझाय क्रिया. १९८ १५८ णिस्खुस्सति ? पुप्प णायकाणि ५९. १२६-१२८ णिक्खेवउपावण णाराय णितरिंगि आभू. नाराच ११५ णिगमणी निर्गमनी निस्तनित १७१ णारास? २१४ णिगमाणं क्रिया. १७१ णारिए नार्याः णिहिजति नर्दीयते-लूयते २४३ पालक भाण्ड ६५ णिमामा एकारस निर्दीण! १७१ णालिक फल २३९ णिग्गयविधि णिधाणो अज्झायो २१४ पालिकेर वृक्ष-फल ६३-६४ णिग्गयविमासापडल ४६ णिधीसुत्त २६२ णालिमज्झाणि मङ्ग ७७ णिग्गिण्ण निर्गीण १०७.१३३-१७६ णावा नौ १६६ गिधुंटक? १२८ णावाखम नौस्तम्भ २७-३० णिचकित निश्चकित २५३ पिद्धणिदा निर्धम ३२-३३ णावाधिगत कर्माजीविन् १६० णिचसो णिद्धम नित्यशः १५८ गिद्धमण निर्द्वमन १३६ णावाधियक्ख नावाध्यक्ष १५९ णिच्छालित क्रिया. १६८ णिद्धलुक्ख वर्ण ५८-१०५-१२८-१८६ णाविक कर्माजीविन् निक्षिप्त १६८-१७१ णिद्धलुक्खवण्णपडिमागा णाविकम्म निक्षेप-पर्यन्त २५ णिलड़ाणि १०७ णासपुडा अङ्ग ९३ णिच्छोडण निभ्छोटन १०६ णिद्धवण्णपडिमागा णासाविमास १८६ णिच्छोलित निस्वक्षित १६८.१७१ णिद्धा णासाय पुत्तक निर्यामक णिद्धाडित निर्घाटित १६८.१७१ णिकहि निकृति २६५ णिजायंतो निर्यान् १९८ णिद्वाणि उम्मट्ठाणि १३ णिकति निकर्षति ८०-१०८ णिजासगत निर्यासगत १७७ णिद्धामास १३०.१३३ णिकाणित क्रिया. १८५ णिज्झाय निर्व्यात ३४ णिद्धावति निर्घावति णिकुज णिहिता २२१ णिद्धोत निर्धात १०६ णिकुज्जक निकुखक णिट्ठिअमासम निष्टितभापक ४ णिप्पतित निष्पतित १६९ णिजित निकुन्त्रित १६९-१७१ निध्यूत १४०-१७१ णिप्फाहित निस्फाटित १६९ णिकुंचिमहि? निम्पाव धान्य नियत १४६ णिप्फाव णिकुंजण निकुञ्जन १३० णिटुद्ध १६४ णिप्फावित निष्टीवत् क्रिया. णिकूद्ध निष्फूट १३६ णिटुममाण णिप्फीलित? णिकूजित क्रिया. णिप्फेहित निस्फेटित णिकहित निष्कृष्ट १९८ णिटुभित निष्ट्यूत १८३ णिब्भामित निर्धामित १०६ णिकहित निष्कृष्ट १६८-१७१ णिटुंधति निष्टीवति ८० णिमित्तसंग्रह निमित्तसङ्ग्रह णिछाणित निष्ठुर २०८ णिमित्तहियय निमित्तहृदय १२९ गिफुटरच्छासु २१४ णिहालपस्साणि ललाटपाथै ११. णिमिलाइसित निमीलहसित निष्ट स्थान १३० पिडालमामक माभू. निमीटत् ३० णिम निष्क निर्मार्जित १३०.१५७- मिस्वर्णत निप्खनत् ३८.१४४ मिणादित निनादित १६८-01-1८४-२१५ णिस्वगती निसनती १६९ णिपणगंभीर १२. गिम्मट्ट निर्मष्ट मिक्खण्ण निखात 101 णिपणजोणि निम्नयोनि ११० णिय ! मिक्खिण्ण निसिख ८०-१0८ पिण्णयण निर्णयन १९८ जियश्रोति पश्यति १०० णिस्तित निक्षिप्त ११८ णिण्णाणि ५८-१२३-१२९ णिस्यकाई ५९ मिक्सित्त १६८ णिण्णामित निर्गमित ११८ जिरस्थाणतराणि १२९ मिश्तिप्पमाण निक्षिप्यमाण १९८ गिणिजमाण निर्गीयमान १९९ गिरत्ये णिस्युट निकूट ११९ मिनीत निर्माता पिरास्त निराहत १६९ ८. सुरा १५७ शिटुभंत निकाणित १८३ शिटल १५२ गिडोल ६४ णिमिहंत १६९ मिम्मजित ३०० अंगविजाए सद्दकोसो ? १७१ णिस्सावित? १०८ णिस्सित ७८ " शब्द पत्र शब्द पत्र पत्र पाब्द णिरागति गोन १५० णिमढ पर्वत ७८ गीहाराहारजोणि १४० हिराणत निरानत १६९ णिसण्ण निषण्ण णीहाराहारा ५८-१०८-१२८ णिरातार? ८२ णिसित्त निपिक्त १६८ पीहारि ३४ निरुक्खगं निक्षक १५१ णिसीदत ३४ निपीदत् णीहारिपेक्षमाण णिरत्त निरुक्त २ किया. णिसुद्ध णीहारेति १०८ पातित १९७ णिरोपजिया निरुपजीव्या १६९ वृक्षजाति णीह णिस्सट्टा निःसृष्ट, अत्यन्त निर्लिपति १०७ ४४ णिलिक्खति वनस्पति ११ णिस्सरित निःसृत १६९-१७१ गुत्तमारक णिलुलित निया. णिस्ससत णुमजु गिलुंचित किया. निःश्वसत् १३५ १६८ १४८ हिस्ससित निःश्वसित १६८-१७१ गिलचित निया. णेयातुझासदा। णिल्लिखित निर्लिखित १३०.१६८.२१५ गिस्संघति निदिशति १०८ णेरहकाणि ५९-१२५ णिलिक्खण निर्टिखन १०६ णिस्संचित निःशिद्धित १४६ रिता गोत्र १५० णिल्लिहित निर्लिसित १५७ हिस्सारित क्रिया. १६८-१७१ णेलकता वर्णमृत्तिका २३३ गिल्लूवित क्रिया. १७१ णेलकटक ९२ णिट्रहित नीरूक्षित १७६ णिरिसत निधित १७१ पोलकित? १०४ णिलेले निर्लाल्य? नि.शिकत् ३७ लवंत पर्वत जिल्लोलित निलोलित १६८ णिरिसषित निःशिद्धित १८६ रोहित निग्ध १०६ णिवपणविभासापडल ५३ णिस्सिपेमाण नि शिद्धत् १३५ णोद्धति क्षिपति-नोदति णिवण्णाणि १३८ णिस्सेणि निःश्रेणि ३३ पहाणगिह खानगृह १३८ णिवसिहिति निवत्स्यति ८४ निव वृक्ष ६३ पहाणघर २२२ णिवासेंत निवासयत् ३८ णीया निर्घात ५ ण्हाणधरिय कर्माजीविन् १६० णिबुर द्वीन्द्रियजन्तु २६७ पहाधिति खास्यति णि? सान् आभू. ६५-११६-१६३ ण्डायमाणो णिवेसण निवेशन १६५ णीयमाण नीयमान पहाविय नापित कर्माजीविन् १६१ १९८ णिवोद्धए निमजयति। णीया "हुसाय सुपायाः ५९-१२६-१२९ णिदोलित निमजित? १७१ णीरक्कए निराकृते १७१ णिव्वगत २१४ तक-भोज्य २२० णीलक वर्ण १०४ णिव्वहिजमाण निर्यमान १९८ भोज्य ७१-१७९ तक्कुलि विहित निरर्तित णीलकधातुक २३३ णीलकंठक तकुली पुप्प णिबदारी १५४ गुल्मजाति तकोदण भोज्य २२० णिवर? णीलखारमणी ७९-१५५ याभू. १६२ तच्माण णिन्चलक तक्षत् णीलपडीभागा १०४ तजगत वग्गत १७७ णिव्वदण निर्वहन ९८ णीलमिग नीलमृग २२७ तजातपडिपोग्गल १४२ णिवाहित निष्पातित १६८ णीलवण्णपडीभागा तज्ञायपडिरूव णिवाधिक निाधिक नीलवाणिजक ९२ तहक भाण्ड ६५ णिचामण निर्वापन २६० पीलदारककम्म तट्टकार कर्माजीविन् १६० णिवामित निर्वामित १६९ णीलीकारक कर्माजीविन् तट णिव्वासित निर्वासित १७१ णीदरति निःसरति १०८ वणच्छत! ५२ णिवाहित निर्वाहित १५५ णीदार ५८-१०७-१२८ तणपीढक तृणपीठक शिविट्ठ निर्विष्ट १७१ पीहारगत १६१ तणसाला तृणशाला २५८ णिग्विसुत्तो अज्झायो २१५-२१६ णीहारजोणि १४० तणसोलिका मल्लिकाविशेष १०४ णिचुति निति ३. णीहारणीहारा ५८.१०८-१२८ तणसोल्लिय पुष्प गिसक भाण्ड ७२ णीदारपडल १०८ तणदारक श्रीन्द्रियजन्तु २६५ वृक्ष ६३ जीपुर निविष्ट १४३ निर्षलक १०६ १९. भीलवाणियक ९२ तड द्वितीयं परिशिष्टम् ३०१ " ५८ तिरीड " ६६ तिलफ्टिी " पत्र शब्द पत्र शब्द तणाधिगत कर्माजीविन् १६० तस्मायत भ्यस्त्रायत ११६ तिमिरक गुल्मजाति तणित तत १४७ तंडित किया. १४८ तिमिगिल मत्स्यजाति ६२ तणुणह तनुनस ११७ तंत? १५ तिमी ६२ तणुत्तय तनुत्वक ११७ तंतुवित तन्तुव्यूतं १९० तिय त्रिक २१६ तणुमझ वनुमध्य ११७ तदेसि तद्देदो २३८ निरिक्सजोणिका वणुलोम तनुलोमन् ११७ वनिप्फाव धान्य २२० तिरिक्सजोणीकाणूक १७४ तणू ५८-१२८ तंयभूमी मृत्तिका २३३ तिरिच्छजोणिया तण्णक तर्णक ९७-१४२ तंबमय मामू. १६२ तिरिच्छाण तिरथीन ५२ सपिणका तर्णिका ६८ वाणि ५९-१२५-१२८ तिरिच्छीण तण्दाइत तृपित २५३ तंवाधावक कर्माजीविन् ७९ तिरिण? क्रिया. तताणि ५९-१२५ सेद्य-भोज्य १८२ तिरियामास तंवाराग १३१-१६९ ततियलोकहितय १२९ तंसा शीआभू. ६४ तध तथा २९ ताइक पशु २२७ तिलक ललाटमाभू. ६४.१८३ ससिभोवनिमा तामरस पुप्प वृक्ष तपनीयतिलक तिलकप्रकार २४६ तालसंड च्यजनकविशेष! २०५ तिलकालक रोग १५५-२०३ तपुमय आमू. १६२ तालट तालवृन्त १४६ निलम्सली तिलसली १८२ तपुम श्रीन्द्रियजन्तु २६७ तालबोंट १९८ निलतेल २३२ सपुसेडालुक ६४ तालुका अद भोज्य तप्पक तप्रक-जलवाहन १६६ तासित ग्रामित १४८ तिलमजिय १८२ तप्पण तर्पण १०६ तिउण त्रिगुण १४४ तिलवेल्लववाका ? १९५ तप्पणपिंडी तर्पणपिंडी तिकाणि ५९.१२३ तिल धान्य १६४ तप्पणा भाण्ट उपकरण १५५ तिलेमाण? क्रिया. भोज्य गोन गोत्र १५० तयागत स्वग्गत धातु २५९ तिह सयो ततः ३४ ग्यद २६१ तिक्ता तरच्छ तरक्ष मामू. ६५ तिसामाम १८८-२०२ तरपमह कर्माजीविन् १६० सिंदुक ६४ तिरिक्षण दीक्ष्ण १९० तररथ तरवारी तियुरुकी वृक्षजाति तरकग्गिा तिगिरसमरिस वर्ण ९० मामू. तीनवय अतीतवयाः तलको तिगिच्छा पुष्प गुल्मजाति तीता-ऽणागय-संपदा तलगिह निमनोणिगताणि ६२.१.९ तलगृह १३६.१३८ मतीता-नागत-साग्मताद सलतालपोम ध्वनि तिमंमाग १७३ २३८ तरपक निजाणत उद्रिा २२९ पलपत्तक कर्णभामू. ६१.१६- निष्णयाम १२० १६२.१८३ निणि १२६ सीमनियग्गा ५९ कर्गमाभू. १५.16 निदा १२९ मासारिका कमांजीविनी निसिल परिमर्पजानि ५८.१२-१२९ कृमिजानि नियाल मीपंपाट कर्माजीगिन् १० मुण्डामाग सपन १५ नित्यपापत मायायात- ११. मुष्टिा मिया. 1१८ सतुगी .. तिद। ११३ दुरियानि माण्ड देवना १९ कुत्तागा उपाना मागी प्रापी रित लिपिमापक काटमा. १९१ मुरित पिप १२९ निमिनिमगिट माम्पमानि १३८ कुण्ड १९. तिकुज १८२ निश्पक १७७ विक्सलोह १५. निवेद ५८-१२२ तिमिच्छिग ७० ७. निर्यग्भाग २१ सौतिणि नियंगानत १५५ तीलक होर्णयाम २४९ सीस पुष .. ६५ मुस्तानि ..
३०२ अंगविजाए सदकोसो दाब्द पाद त्यापन तुङग्य तुल्लजोणी तुवरि तुंबुरु दूका सूण रोग १५५ गोन १५० ददुम्मण तूरित्य ७० थुडा २३२ थूणा ११३ दलायते ८० पत्र शब्द पत्र तुल्याय १६ थावरा ५६-१२८ दठामाम १३९-१३३.१८८ १९१ विग्गटगत स्थिरगलगत १८५ दणि १९० घान्य १७८ यितामास २४-१९८ दण्णपाणी १५१ फल २३८ बिया स्त्रिया. २५-३४.३६.४७.२५ दति इनि-जलवाहन १६६ यूका ७. बिल्ली यान ७२ ददरक घाय २५० रोग २०३ थीगायत्त २०९ दडुपिलक उन २०७ थीगव किया. त्वरिष्यसि २६० थीणामजोणि १३९ दधिर मोज्य उदा ५६ थीणामाणि ५७.६६०१ दधिताव भोग्य ६१.१०९-२२०२४६ मोनित ११८ धीणा[मा]माम १८० दधिवण्ण वृक्ष एतेन २३६ थीपरामास १३. दधिसर दधिमकपदार्य 1.0 गोग्र १५. थीमागा ५९-१२८ दपकार कांजीबिन् १६० २५८ थीय स्त्रियाः २४ दरकराय वृक्षजाति इंपस्कृतायाम् १३० विकमति ८३ स्कन्ध दलिय दलिक भोज्य ६४ धूणिकाखल २२० प्रागी २३९ १८१ यूणिकारम २२१ श्रीन्द्रियजन्तु २६७ थूभाग दछमी? १७८ तेगम् दविउलंक भाण्ट १९३ ९५ धूरका मन दविय द्रव्य ५८-1१७-१२८ फल २३८ थेव्विद्ध दवी दी-माण्ड २ क्रिया क्षुद्रजन्तु २३७ दव्यीकर सर्पविदोष २१८-२२७-२३९ ? २२७ दुससुनो पशु दशरवः १८४ उपभोगतः २६. दकिमि द्वीन्द्रियजन्तु २६७ दसमीण्हाणक दशमीनानक टरसव? दक्खाणक मामू. ९८ दशाह १२० दक्षिणगत्तामास २०१ दसीरिका भोज्य १८२ ११५ दक्सिणजोणि १३९ दस्सामो ६४ मक्ष्यामः २३६ इत्येवम् दक्षिणदारिक २०६ दहफलिहा दहपरिखा २२२ दक्षिणपञ्चस्थिमा ५८ ददरचलणा ५८ नकुटिका प्रकार दक्षिणपच्छिमजोणि १३९ दहरचला ११९ श्राम्यत् ५८ दहरस्थावरा १९ स्वनपाली ६६-२०४ दक्विणाचार ७४ दहरयावरेजा ५८ दक्मिणाणि सनत् ५७-१०९.१२८ दंढमाणव पक्षी ६२ स्नुनित दक्सिणामाम ११५-१६८ दंतस्त्रय दन्तक्षत १८५ तेणित तेनेण तेत्तिरिक तेमग्गिह? तेरणि तेलवणिकरस तेखकर तेलजवागू तेवरक तेसं तमं तेसं तोडण तोड़ तोहक टोपमोगतो सोप्पारुमणा तोमर तोरण " तेषां तेषाम् १४० थूलाणि ६४ साह २२१ ३८ दक्षिणपुरत्यिमा थहमा थत थणपाली थर्णव थणित १८० दक्खिगोदाग णारं ५८-१२३-१२८ दग ३० दगकोटम ११५ देगलट्ठी दकयष्टि थलचर थला पटिका यविका थमायणा यमित थाल पालक याटिका थाली स्थलिका मन योग्र १५. दगवदगि स्तब्ध १६१ दंतरिक्ष दक १२१ दंतगूधक दककोष्ठक १३८ देवचुण्ण ३० दंतपन दका किन् २५५ दंतपवण ९८ दंतमय गोत्र १५० १८६ दंतवेदी १५५ दवसिहा ५७-10-१२८ दंतसेदिका दक्षः दन्तगूयन्दन्तमल दन्तचूर्ण १०४ १५५ दन्तरवन ५ मामू. माण्ड २.५-२२१ दन्तवेष्टि ६६ भद १२५ दन्त नेणि १२४ माण्ट " " ७२ ददाहुद? ०२ ददाणि " द्वितीयं परिशिष्टम् ३०३ पत्र " ९१ दोणी १२४ दीहकील सर्प २३९ श्वापद २२७ धणित ध्वनित २३९ " ८० शब्द दंवंतरातिमास २०९ १८६ दीणामास १६८ देवणसत्त दसणट्टयाय दर्शनार्थतया १३० दीगारमासक सिक्क ६६ देवताययणमत्तिका मृत्तिका २३३ दंसणियाणि ५८.१२३ १२८ दीणारी ७२ देवताविजयो अज्झायो २०४-२०६ दायते क्रिया. ८३ दीगोदत्त ४२-४९-१४० देवदूता देवता २०४ दारकण्णय द्वारकर्णक १९५ दीपिक २२० देवयागे मुत्तं देवयागमोजन १८० दारपाल कर्माजीबिन् १६० दीवस्तख दीपवृक्ष-कल्पवृक्ष २०-३० देवहच्चा गोत्र १५० दारपिट द्वारपिण्ड ३. दीववेलिका २४७ देवागार २२२ दाराधिगत कमांजीविन् १६० दीवालिकाणि भोज्य १८२ देवाणूक १७१ दारुकाधिकारिक १६० दीविक चतुष्पद ६२-७२ देमंसि देदो दाणा ५९-१२९ दीविकाधारक कर्माजीविन् भाण्ड ७२ दारगामास १८८ दीविकाहारिक कर्माजीविन् ९. दोहलो मज्झायो १००-१०२ दारुगे घ दालित दारित १४८ दीहजुत्ताणि १२८ घटि वृक्षजाति .. दालिम दाडिम फल ६३-६४-२३१-२३८ दीहपदा (हा) मत्स्यजाति २२८ धणजाय गोत्र १५० दालिमपूसिक भाण्ड ६५ दहबग्ध दालिय दारित दीहमक्कुलिका भोज्य १८२ दे० अत्यन्त ४०२३-२४ दासिघर दासीगृह २२२ दीहाणि घणिता ११४-१२५ प्रिया ६८ दाहिणाचार घण्णक दीहाणुम्मनिताणि १२८ चतुष्पद ६२ दाहिणामास घण्णजोणि दुकूल व १६३ ३२-१४० दिअंटकंबलवायक कर्माजीविन् १६१ घण्णजोणी मज्झाय १२२ १६५ दिग्धग्गीव घण्णरस दुकूल वख २३२ दिग्धपाद धण्णवा १२५-१२९ घान्यवान् १०५ ५८-११५ घण्णवाणिय कर्माजीविन् १६० दुग्गयाणा दिजाती गोत्र १०१-११९ धमित दुगंधपरामास ध्मात ११८ दिजिस्सति धम्मक ५८-१२२-१२९ पादिआभू. दिट्ठिवाय दृष्टिवाद घम्मजोणी २०१ ५३-१३८ दितिका तिका २३० दुद्धर मोज्य धम्म? कांजीविन् १६० दिमिलि विदेशजा धम्मण ६४ २३८ दुवेलिका २४० धम्मणग दिवद्खेत्ताणि यक्षेत्राणि २०७ दुदुहिका दुग्धौगिका भोज्य ०१-२४६ धम्मपण वृक्ष दिम्या ५९-१२५-१२८ धम्मसञ्च धर्मसत्य द्विमान्य-द्विवचनम् १५१ दुभस्स दिसा घम्मिक्क धार्मिक दुर्मनस्कः दिसादाह दिग्दाइ २०६ धम्मी दुम्मृष्ट २२ दिसावाणिया कांजीविन् दुवारसालाय द्वारशालायाम् १३६-१३० वृक्ष दिसाहुत्त दिगभिमुख १४ दुवेद गोन धवलपट दिस्स दृष्ट्वा २४९ दुस्सिक कर्माजीविन् १६. घबासी पृशजाति एति ६ दूभग दुर्मग ७९ धविका नकुलिका विशेष १६५-१७८ दीणउछोगिठ दीनोलोकित मात दीया १२. दूरातिमरित फिया. धमित ध्वंमित ११८-१९० दीगता १३५ दूरोगाट दूरावगाद घानक ध्रातक मुभिक्ष १३५-११२ दीगपरिपोग्गल १५ देवजोणि ६२ धानीकुमार। दीया ५८.२९-११० देवर कमांजीविन् १९. धानुकोणी ३२.४९-१३२-११० २३९ दुग्गट्ठाणाणि दिग्घा १८८ दास्यति १०५ दुग्गंधा १ दुगंधामास ६८ दुजागू " स २३८ ३२ दुम्मणेनो ४ ७. धव ७० ८.
३०४ अंगविजाए सद्दकोसो " ५. परस्ट घोतक १०४ पत्र सान्द धातुनोगीममुत्याग २७ पउण्ण वस्त्र ७१ पच्छिमदारिक घानुमय माभू. १६२ पउमसरवण्ण ९० पच्छिमाणि १०९-१२८ धारित धौत १४८ पउली प्रतोली १३७ पच्छिमुत्तरजोणि १३९ धिरराग! ॥ पएणि घन ७१ पच्छिमुत्तरा घीतर दुहित २१९ पकंटा २२२ परडेलित प्रसेण्टित १४६-100-100 घीतरी २१९ पकिष्ण प्रकीर्ण १६९-१७१ पच्छोलित प्रच्छोटित १६८ पीता प्रकुष्ट २१५ पजाणवं प्रज्ञानवान् ४८ पीया २१९ पकासय पकाशय २०३ पजातिरसति प्रजानन्यते किया. १४८ परखच्च्यक पक्षग्छदक ८१ पजायिस्सति १६९ दुहित पक्षपिण्ड १७ पजोजयिस्सं प्रयोजयिष्यामि २ पुतविक ૦૨ परसटकत पक्षपिण्डकृत १३५ पजजतु १५५ पुरगत दोहदप्रकार १२ पक्रयेदाय पक्षवेष्टया पजणी वर्णमृत्तिका २३३ धूमगत माण्ड २३० परसात प्रख्यात १८५ पजायवायग पर्यायवाचक २५ परसापक्ति धूमगाठी धूम्रनलिका २५४ नपुंसकविशेष ७३-२२४ पजिया प्रार्यिका ६८ पश्सिजोणिय সালি देयानि ૬૨ ३२ पजुगासंतो पर्युपामयन् १९७ पोनकर पपरगत प्रक्षरगत २३० पमोरस धोवमा पगति पर्यपवर्त २७ प्रकृति १७३ धावयत् पगलत पह थन प्रगलतू ३८ पहार कमांजीविन १० पग्गाहक प्रमादक मतिका नर्मिका ६८ पस दोहदप्रकार पट्टिक वर १७२ मत मासरे प्रघर्षत पट्टकर पाठ्यकाग्य १४. मरिगी बनस्पनि पट्टिस पृष्ठिांश २.५ पघातण प्रघातन १४८ नहटिया प्रवचन घन ६४ १४० मानिका मातुर्माना १८ परगपाणि सत्त पडमट्ठ मोग्य मामागह मामग्रप्रह पहल पटल प्रथलायनात् मामिम्परा पहाका पताका १५२ मयुदनीय ११८ मारीप नायो . पालिका माण पथरथरण वख मानित मांगीरिन् १९. पथरिथमा परिउममाण प्रतियुज्यमान १५॥ ५८ मिछाने नि शोम! १८ परिमोधुत पयवाण प्रत्यवदान प्रत्ययधून १९ १४७ ६. श्रेष्ठ 1.1९.९५ पटिकम्मगिह प्रतिरमगृह 18-10 मिमितिय निमीलित २.१ पयानोणि पदिकम्मघर मम्मा पराल प्रस्थमपास ८-१५९ परिकलित प्रतिशित १५४ भिरागत २.२ पनपनि प्रत्यम्तवसति पडिग्रि ८९ प्रतीमित १६८-10. मानित प्रत्पम्तिम ११२ परिहर प्रतिक्षित १९५-100 Sriram Sfintia 1" पापा परिगामित प्रतिनामित 01 मीन ५ पचाघिसमाग प्रगमयमान १९८ परिणायित प्रतिनायित ११ मिनराधार ५ पाठवित प्रत्यासित १९८ परिनिगा प्रतिनिशार .. पचारमा पनि पति-19 पापा प्रतिnिाम् १. पयोहार परिवदिमामा भाप ४५ प्रभात प्रनित १९९-101 नाग १ एगीत प्रधान ११८ परिणिपा मनियत rre- ९ मिमी १९ परिणिय प्रतिप्रेत " पादि.1. पच्छिमापिसना १८ परिपोगाट प्रतियRE .-11 १५३ पसंत ७. १५ पचवण १५. पचलायमा मामिम्बरा: १५३ पपउदग्गीय १-२ पचर 1.1 पतिम ॥ पनिण द्वितीय परिशिष्टम् ३०५ पडियाणि भट्ट ९८ पण्ड भोज्य १८२ १६३ पप्फोहित प्रस्फोटित १६९ योग २०९ २५९ पत्तमय शब्द पत्र शब्द पडिबुद्ध प्रतिबुद्ध १७१ पण्णाधिग प्रज्ञाधिक ५७ पद्मतिलक तिलकप्रकार २४६ पहिमविधि ९-१० पण्णायिक गोन १५० पद्रव प्रदेशविशेष १६७ पडिमुंडित प्रतिमुण्डित १७१ पण्णासपण्णत्तरिवस्ससाधारणाणि ५७ पधकलीतेल २३२ ११ पणिक कांजीविन् १६० पधवावत पथन्यात १५९ पडिलोलित प्रतिलोलित १६९-१७१ पण्णेलिका प्रणालिका? ११६ पधावति प्रधापति ८० पढिवज्झक उरसव पाण्डु २१८ पधिकणिलय पथिनिलय २५० पडिविस्सिन प्रतिप्रेक्षेत १३ पतजगह? ४५ पधित प्रहित १९१ पडियेसघर प्रतिवेदमगृह २२० पतिभारक्ख प्रत्यारक्ष १५९ पोवंत प्रधापयत् ३९ पहिसराखारमणी कण्ठमाभू. १६३ पतिगिण्हती तिगृण्हती १६९ पपुट प्रपुष्ट प्रपृष्ट प्रस्पृष्ट १३० पडिसरित प्रतिसूत १६९-१७, पतिग्गह पतिग्रह १६८ पपुत प्रमुत पहिसामिजमाण? पतिजेट्ट प्रतिज्येष्ठ २१९ पप्पट १९८ पडिसायण प्रतिशावन पतिट्ठाण प्रतिष्ठान ३. पप्परूव प्राप्यरूप ११ १५३ पडिसिद्ध प्रतिपिद्ध १६९-१७१ पतिहारक कर्माजीविन् १६० पप्फडित प्रस्फटित १७१ पडिसेजक वस्त्र ६५ पडिसेधित प्रतिपेधित १५८ पते पतेत् १५ पदमट्ट प्रष्ट १६९-१७१ पटिहारक भोज्य प्रतिहारक पत्तकर ६४ पमजितापम? प्रमार्जितापमृष्ट २३ पत्तगत पढिहारित प्रतिहारित १६९-१७१ दोहदप्रकार १७२ पमदायं ममदायाम् २९ पत्तमनित पदिहारी प्रतिहारी भोज्य १८२ पमह पढमकप्पिगो पमिलात प्रथमकल्पिक पत्तभंट प्रम्लान ८२ भाण्ड २०३ पढमिलक प्रथमक प्रमुक्त १६९ मामू. १६२ पमुछ पणतालीस पञ्चचस्वारिंशत् १२० पत्तरस प्रमूञ्छित १६९-१७१ पणतालीसतिवग्गा ग्रीन्द्रियजन्तु २६७ पमुह प्रसृष्ट पणतीस क्रिया. वर्णमृत्तिका २३३ १३० पणवीसतिवग्गा भोज्य पवेलि ५९ प्रमुखक ७१ क्रिया. पत्ति पणचिणी २१५ प्रनतृका भाण्ट ६८ पणवमन्स प्रस्मृत १३०.१३९-१६९ पणवमध्य वस्त्र १४२-१६३ पणस वृक्ष ६३ भाण्ड २३० पम्हुत पत्तेकसो प्रत्येकशः २१५ पयणु पासक माण्ड ६५ पत्तेगपुष्फ १०७ पयलाइतविमासा पलं ४० ४६-१२५ पयलाइताणि नकुलिका प्रकार २२. पायरिय प्रस्तृत पणाली प्रणाली ३२.२३.२२२ पत्यारइत्त प्रसार्य पयलायमाण प्रचलायमान १५-१३५ पणितामह पपलायंत पणितगृह १३९-१३८ पश्चित प्रस्थित १९५ १० पणिवते १४४-१४५ पयादार प्रणिपतेद ५६ पश्धिवपडिमा पार्थिवप्रतिमा १८३ मणुगीसक पयाविमुदी मन्साय १६८ १२. पत्यीणाई ५९-१२१.१२९ पणुवीमतिदग्गा पयुका मामू. १ ५९ परथुत प्रस्तुत पशुवीमपण्यासरस्ममाघारणागि पयुमक ५७ उत्सर पशुशीमबस्सपमाणागि ५० पदरगाह पदमाह पयुमरत्तक ११४ १११ पागसरिदस्पप्पमाणागि ५. पदपुदी परपुद्धि पपोजयिस्मामि प्रपोजयिध्यामि पपगत्तरियस्ससवसाधारणाणि पन ३९-१५ परा ५८.१२.१२९ पण्गरम १२० परम्प ११..18.12.11 पगरसया ५९ पदुमक वर्ग १.५ परग्यतरक पराम्पंवार पण्गोल १. पगंगटरिष पतेन् ४५ परग्यहि पराय पा ९ पोजि प्रबोटी २.. परगोन पानोदना १ भंग०३१ १८१ पमुच्छित ५९ पत्तहारक १२० पतंग पमुत्त? ७३ पम्मुभी २५७ पनुषण " . " उनिम २२९ ८ ८ ३०६ अंगविजाए सइकोसो परमृत पक्षी .. ९० परिवेदित ५८-१२८ परिसन १८८ परिसहित २६ परिसरण ४ ३. पग्मिाहतो १०८ परिमुक परिहा 11 परिमोरित! किया. १६९ सन्द शब्द परतिका .. परिटीट किया. १३३.१०६.१८६ पटलदेवया पल्वलदेवता २०५ २३८ परिवट्ट परिविष्ट १८९ पहंक शयन १५.२६-६५-२३० परमुयमा परमृवसन्द २४४ परिवत्तने परिवर्तने ८. पछंसिका पल्यशिविका ॥ पर(रिमपित परिमपित २१५ परिवद्विव परिवर्धित १६९ पडालु फल २३८ परमागू १० परिवदिता १०० पछारका वृक्ष परमाणू ५८.110-1२८ परिबिट्ट परिविष्ट १८. पन्दथिकायो वारीम परमामा मामू. ६५ परिविट्टिय परिवेष्टित १८. पन्हरिथगाविहि परमोपिजिग परमारधिजिन परिविहल परिविफल २०० लवन २५० परगहमारपिता। गोग्र १५. परिद १९४ परिवून पपर १४ प्रवरोत्तम पांगेगी परियेष्टित २६ पवरुत्तम परंपरीकमाई परिमानो परिष्वामतः ५८.11.11८.१२८ पलिंत ३६ प्रवलयत् पवस्मिस्म प्रोषितस्य २९ परियार ७७-१३५ परंपरा पवा परिशटित १६९ परापातमा प्रपा १३८-१९१ पवाणगत प्रपानगत २२० पराक पातीय २११ परिमप्पर वाल पादित किया. १९८ परामट्ट परागृष्ट घन पवायित परारण परिमाहित प्रवादित .. परावृप १५९-101 परिशाटिव 101 पवालक परात परायण पर्वदूषकः २१५ पराभूत परिशुष्क 101 पवासम्स भदाका महायं १९२ परिम पामो भन्सायो १९१-१९२-१९ परिम परिकेत परिमोववण देव २.५ परिभात प्ररिजात २०१ परिषगेत परीय परिहायिस्मनि परिहायति ११९ पनिटक मोग्य १८२ परिग परिवेश १६२ परिहित परिभजनु परिमन्यताम् ४१ गर किया.. परिहरक-ग जहाभाभू.१५.11-1५५ पविभागमो प्रविभागशः १५ पग्गिा गत परोक्ष प्रविजात ९० पटक परिपुमति परिपूर्णपति प्रोपित परासीका पशिगी परिगति परियन प्रोपितपोनि पठान परम्मत पलायित १-९८ पर्यापति प्रप्रेक्षते १९१-१९ पभीरा पलानमंगम पटामितमाम • पश्ययि प्रपेक्षते १९ ५८ पहाय परिपना मरण संयमोम्प १८२ पर्वगी परिपत् परिवामपनक कर्णमामू. १६२ पदये प्रवेदपेन् पत्र श्रेठांत ३.1 पोइयेदिति रिया. 10 प्रपतपेदिनि २१ परिनोरम पम्पोरम बारातिर २१५ पदेदिमा प्रदपेन् Freभागा पास पनि प्रनिमित " २४.1..11-४५.141 पा पिा पार गंगनिरा 1-1 परेमगी माझापी पधारा २.. पति 41.1.2.1.1 पनिषमाग प्रमिपमान 14 more វា ममुनि.-1 पदमोबगामी 1९५ THE मापे . पर्गमा पम्पपश गोत्र १५. रिया. 1.4 पापा पश्यप पपमाणमा Trमा १९. महामी 11. परमार in पापा पगता ११५ atri...111111पिwife १ पगार गुरा ११८-२११ .. पटना पंनिगा 11५ पास किया. १६८ १८ प्ररोह २.१ पवियान प्राणी २३० पविमित " पपजोगि ८. ८. प्रवेगी व १५ द्वितीय परिशिष्टम् ३०७ पन्न १४८ पाकटित " १९३ पाणगत .. ७२ पालोयणी? शब्द शब्द पत्र शब्द पत्र पसती गवयी ६९ पासूचिका पादआभू. ७१ पापहिक सर्पजाति पसत्थं णामाग्झायं १४६ पाउत प्रावृत ४१ पामुद्दिका पादक्षाभू. पसत्यो मज्झायो प्रकटित २४९ पामेच्छ वनस्पति? ९२ पसबतरका ११२ पागुत प्रावृत १३०.१३४-१६८-१७० पायस भोज्य पसवाणि ५८-१२८-१८१ पाघट्टिका पादघट्टिका शिराभू. पायुका पादुका १८३ पसचे अप्पसल्ने ११२ पाहालिका पुष्प पारम्मुह पराशुख पसरादि वस्त्र ७१ पाठीण मत्स्यजाति ६३ पारावणा गोत्र १५० पसलचित्ता क्षुद्रजन्तु २२९ पाडल पुष्प ६३ पारावत वृक्ष पसल्लिम पाश्चिक १८४ पाण वृक्ष पसंचित्त प्रसहित १७१ पाणक सुरा ६४ पारिप्पव पारिप्लव प्राणी २३९ पसाणग उपकरण? दोहदप्रकार १७२ पारियत्त पारियात्र पर्यंत ७८ पसाधक कर्माजीविन् १६० पाणगिह पानगृह १३८ पारिहत्थी पुष्प पसाधणकवट्ट प्रसाधनकपट्ट ११६ पाणजोणि ३२.४९-१३२-१४० पारेवत फल २३१ पसारितामास १९८ पाणजोणिगत ४२-१८ पालिका भाण्ड पसिव्विका नकुलिकाविशेष १०८ पाणजोणिसमुत्याण २७ पालिभग वृक्ष ६३ पसुवेलिका २४७ पाणवगिह? पालीक मोज्य १०९ पसेवक नकुलिकाप्रकार २२१ पाणहरा वामा १२८ पालु पण १२४-१२५-२१४ पस्स पार्श्व ४२ पाणि भाण्डोपकरण १५७ पस्सवण निर्धारण १४६ पाणियरिय पानीयगृहिक पाव? १५५ पस्संतरिया पार्थान्तरिका २२२ कर्माजीविन् १५९-१६० पावरणक वस्त्र १७५ पस्से पश्येत् १९५ पाणुप्पविद्वं १६१ पावार वस्त्रप्रकार ६४-१६३ पहिजते प्रहीयते ८१ पातरासवेला २४७-२४९ पावासिक प्रवासिन् १३४-१३९ पंचकाणि ५९-१२६ पातवगिह पादपगृह १३६ पावासिय प्रवासिक १९० पंचखुचो पंचकृत्वः १८४ पातिक त्रीन्द्रियजन्तु २६७ पावासि प्रवासिनम् पंचणवुतिवग्गा ५९-१२७ पातिज उत्सव ९८ पावीर स्थानविशेष १३६ पंचते पञ्चारमनि ११ पातुर्णत प्रावृण्वत् प्रासादगत २११ पंचपंचासति वग्गा ५९ पाथमक प्रथमक ३६ पासिकुत्ताणक पाश्वकोत्तानक ४५ पंचमंडलिक ११६ पाटकलापक पादआभू. ६५-१८३ पासुचाणाणि पंचमिका ९७ पादकिणिका पास्यति ८४ पंचमेजण उत्सव ९८ पादखहुयग प्रावरिष्यति पंचवण १२० पादगोरा! प्रियग्राझण पंचसद्विवग्गा ५९-१२७ पादजालक पादामू. ६५ पिगाणादियवंतरा? ०१ पंचसत्तरिवग्गा ५९-१२० पादपट्टिओ पादपूष्टिके पिचक मरस्वजाति २२८ पंचासतिग्गा ५९ पादपुरण पादप्रोम्छन १४२ पिटरग माण्ड १९३ पंचामवस्सप्पमाणाणि ५. पादपेसणफ उत्सव ९० पिढरक पंचासीतिवमा ५९-१२. पादफल आसन ६५ पिगंधण मपिनहन ४० पंढक ७३ पादध काव्यविशेष १४७ पिगिंधग पंधराग सर्पविशेष २३८ पादमुद्दिका पादआम. १६३ पिणेघण पंदु वर्ण १०४ पादसंही १८ पितरो देवता २०४ पंडुपडीमागे १०४ पादीविक ९. पितुकमकिश्य पितृकार्यकृस्य २०८ पंदुवपणपरिमागा ५८ पादोपक मामू. १६३ पितुदेवता पंया पन्या: पायेय १९२ पिनुस्सहा! पंपोटग शुमजन्तु २३८ पापढक मामू. ६५ पिनुस्मिया पिनुःवमा ६०-२१ ३८ पासातगत " १८३ पाहिति ६५ पांगुहिति १५३ पिममण ७७ " " " देवता २२५ २३३ पाधेन ३०८ अंगविजाए सद्दकोसो ३८ पुरोहित १३९ पुम्बामास २४ पुसुय। गोत्र १५० पुष्पगृह २२२ १४२ पुस्समाणव ६२ पूक पुत्तंगय पूर्व १७७ गोत्र १५० पुत्चेयाणि पुन्यवा? पुत्री ११४ पूता पूजा २५६ पत्र शब्द पत्र पितुस्सियाघीतर पितुःप्वसहित २१९ पुच्छिवपहल कमांजीविन् १६० पितुस्मिपाधीतरी २१९ पुच्छितविधिविसेस ५९ पुलम रख २१५ पित्तप्पगति पित्तप्रकृति १७४ पुच्छिताणि चउम्धीसं ११.३६.३८ पुलिंदि पुलिन्ददेशजा पितियधीतर २१९ पुच्छियविहि ९-१० पुग्वण्ण पूर्वाह १६४-१७८ पिधयित्ता विधाय ४२ पुडिका पुटिका २५९ पुन्वदक्षिणकाणि १२८ पिधुलाणि ११६-१४२ पुढविकाइया ५८ पुम्वदक्खिणजोणि पिपीलिका श्रीन्द्रियजन्तु २६७ पुढविधातुगत १३३ पुवक्सिणभागाणि पिप्परी वृक्ष ७. पुणोइ पुनः ११ पुस्वदारिक २०६ पिप्पलफल २३८ पुण्णा ५८-१२४ पुग्वभवविवाग २६२ पिप्पलमालिका मामू. ७१ पुण्णामजोणि पियंगुका पुष्प ७० पुग्णामधेजामास १३०-१४५ पुष्वुत्तरजोणि १३९ पियाणि ५८-१२८ पुण्णामम्दि 'नानि १८५ पियाल प्रियालफल २३१ पुण्णामाणि-णि ५७-१२६ पुस्सकोकिलक मामू. ६५ पियोमागा पुण्णामा पण्णतार ५९ पुस्सघर पिरिली पक्षिणी ६९ पुण्यामास ३०-१६१ पुस्सतेष्ठ २३२ पिलम पक्षी बाल कांजीविन् १९६-१६० पिलक रोग २०३ पक्षी पिलक्खक ५९-१२५-१२८ पूतणा २७ पक्षिणी पिला पिल्लक पृथिवी १२, पूतिक! १५५ बालक ९०-११२-१५३-१६९ पिलिका लम्बीवाला पुधुला ५८-१२-१४२ प्रतिकरंज २३२ पिविपिण ११७ पूतिकरंजतेल २३२ मत्स्यजाति विच्छोला पुष्पगत दोहदप्रकार १७२ प्रतिय पूजित २१. भाण्ड ७२ पुप्फगिह पिंडालुकी ५९ पुष्पगृह ११६-१३८ प्रतियं वृक्ष पुप्फलोणी ६४ पूतिल २३२ पिंटिक जलवाहन पुप्फमय भाभू. १६२ पूर्तिगाल परिसर्पजाति पीणक भाण्ड ६५ पीतक पुफ्फरस वर्ण १२५-१२९ १८१-२२१ पूतीणि १०४ पुष्पाधियक्त पीतवणपडिमागा पुष्पाध्यक्ष १५९ पूप भोज्य १८२ दीतिउलोगित पुप्फितिक आमू. ७. पृयिव पूजित ३४ पुष्फुचाग पितिक पुष्पोचायक ८९ पूयिय पुरच्छिमा ५८ पूरिमंसा गोत्र १५० पीटोलकस्म खंभी ३° पुरथिमजोणी क्रिया. पीटक १५.१७-११२ पुरस्थिमाणि पीडपिटी १.८-१२० पेक्खमाण प्रेक्षमाण १६९ सिक्क पेक्खितदिमासा ३५ पीवफलक बासन पुरिममवविभाग २६३ पेक्खितामास ७२-०३-८० पीदिका पीटिका १५ पुरिमंगाणि कण्ठमाभू. १६३ पीमियतता ३५ पुरिमा प्रेक्षते १०७ पीलुतेछ २३२ परिमुचराणि ११-१२८ पेम पेय १३ पुरम्बरणी पुष्करणी २३३ पुरिसणवत्त पीटिका ३१-७२-१३६ माण १५ पुरिसपरामास देवता २०१ कष्टमा, १९२ पुरिसावस्मय पुरुषापधय २. पेनकि प्रेवकृत्य २०८ पुग्छिामाग पृष्ठयमान १९५ पुरेखा पुरस्कृत १६-११८ पेता देवता २०४ पुतिमझाय १५-१३८ पुरोहर भप्रहार १३८ पेनिन पैतृकम् २१९ पुधूणि ७. " १३९ पूसित? मोग्य १०३ पेचुछ १५ पेटते २.९ पेदिका १३. पेतक द्वितीयं परिशिष्टम् ३०९ पत्र पत्र शब्द पत्र व १५३ वकुल ८४ वझवझाणि पेयाल पेयालित पेलग पेलिका पेलिठागत पेला पेल्लिका पेसणकारक पेसणिय पेस्सजोणि पेस्सणिक पेस्सभूया पेस्सा पेस्सामास पेस्सेजाणि पेस्सेयाणि पंडिका " १४५ बंधणगिह रहस्य ६४-२३७ किया. २१ फणिका बक ६४ आभू. उपकरण ७२-२३० भापीड २४२ फरिसा वृक्ष. १२८ पेटा २२१ फरिसायते स्पर्शायते वझवझंतराणि ८३ पेटागत २२२ फरिसाहिति स्प्रक्ष्यति ९२-१२६ पेटा १०८-२२१ फलक आसन १५ बझमंडलचारि गोत्र १५० ७२ भाण्ड बझसा कांजीविन् १६३ फलकारक कर्माजीविन् १६० फलकी बज्झामास आसन १५-१७.२६७२ भोज्य १८२ ७९ फलकीय बदरचुण पलक्या: ५२ बद्ध ५८-१२२ १३९ फलगत दोहदप्रकार १७२ ययरी वर्वरदेशजा १२. फलजोणी बरिहिण बर्हिप्वनि १७३ ५८-११९-१२९ फल-पुष्फपोहल फल-पुप्पगठरिका बलगणक कर्माजीविन् १५९-१६० ५८-१२९-१३० फलमय भाभू. १६२ यहिरम्भतराणि १२८ २०० फलरस १८१-२२१ बहुअंतराग १९४ ११९ फलवाणिय क्रर्माजीविन् १६० बहुक्खत पहुक्षय २०२ १२० फलद्दारक माभू. ६५ बहुमस्स यहुमाग्य यहुवचन १५१-१५७ अन्न ११९-१२५ फलाधियरस फलाध्यक्ष १५९ वहुवाधीव यहुप्याधिक १६१ भोज्य १८२ फलापस्सव पल्लपध्रय २७ बहुस्मय कांजीविन् १६० यन्धनगृह १३६ पिण्डित यंधणजोणि ५२ पोचट? परिसायाम् १३६ बंधनागारिय कमांजीविन् १६० परिसा १३०-२३३ बंध-मोक्खा १२९ पक्षिणी फलोशायक वृक्ष दे.गठरिका यधुने भुत्तं घुमोजन १८० १४८ प्रन्थिका २१६ यमसत्त फाणित १०२ गुडविशेप १८२ ६२ फालित त्रिया. १४८ यंमसत्तेज्ञाणि भचारिका स्फालय जलवाहन १६६ फालेत यमचारिगजोणि स्फाटयत् १५४ बाल ९७-११२ मया गोन १५० फासगत पुस्तकर्म मग माझग १०२ फासेया ५८.१२३.१२८ यमगजोणि १५६ फिजा 1३९ स्किम् ६६-१२१ किया. भगझोमिय १५२ मणोसन चमण्णू प्रमा पुरम्पत्य पुल्पित १४८ यंमार कृमिनानि मरिमि भोग्य मुंगलिका १०२-२५६ मित भ्रान्त पुरिल १९८ मयाप 1.1 १८ मति दुपाभारा पृष्टि २५. मचिम्म माय १.३ मोग्य १८२ मम्म १५. पोषित पति 01 ममुर मन्म 1.2-1.1 अहवारम प्रेरित १४८ मेगगनमागि २३३ पलामास ११५ फलिक ९८ फलिखाय १४८ फलिहा ६९ फलुबाग ३० फंदरेदे? ८९ संधुजीवक प्रोटपद २०० फालित पेंटपाली? पंडित पोम पोकत्त पोटाकी पोद्दल पोहलिका पोहह। पोट्टयद पोत पोटक पोरयकम्म पोरिस पोरुपविदा पोरस पोरेपप पोष्ठ पोपटक पोवरिता पोरही पोरम मोदाहरिप्यामि गोत्र १५० रफुटित। ६०-१११ फुलित १२ फुलिय गुपिर .. पुमी १८२ प्रमगाठी मर ७२ बमरण सपी युवती भाडादन अंगविजाए सद्दकोसो १३ बुरी ६९ मिउही ७० १६ मिसकंटक " " २४७ भिंगपत्त शब्द शब्द पत्र बंमेनाणि ५७-१२८ बुद्धि-मेहाओ देवता २०५ मारहाई पक्षिणी बंमेयाणि १०१ वुद्धीरमण ५८-१२२ भारधिक भारतिक २४८ बाढकार ९८ बुवति प्रवीति १९५ भारंट पक्षी ६२ बाधिरंग बाबाज अग्रवीत् १७ भावस्मिओ भावाश्रितः १२० बारगय द्वारगत २१४ भेलक ६४ भासण पक्षी २३९ बालक बाल १७० बोटमच्छक मरस्य जाति ६३ भासमाण भाषमाण १६९ वालजोगि १३९-१९४ बोंडज दे. कार्यसफल भासा बालजोव्वणत्यसाधारणाणि भासासद बालजोवणमामण्ण १०० भक्ख-भोजकधा भक्ष्य-भोज्यकथा ४० भाष्य ५७ बालतिलक तिलकप्रकार २४६ भगवती देवता कृमिजाति बालमुंडिका भाण्ड २३० भगवा गोत्र १५० मिक्खोदण मिक्षोदन १८० बालवीरा प्राणिजवन २२१ भगिणिधीवर भगिनीदुहित २१९ मिण मिन्न १५-१६८ वालम्बयणी बालव्यजनी २३० भाग मन १६८ मिण सहरस १२७ बालसाडि भाण्ड २३० भग्गगिह भानगृह १३७ मिन्नमणोघोस ५३ वाला ९७ भच्छा भरा २३० मिस भोज्य १८१ बालामरक! मनाय भार्यायाः १८२ वालामास २६ भतिकम्म मृतिकर्म कांजीविन् १५९ भिसमुणाल १८१ वालेपतुंद कर्माजीविन् १६१ भत्तघर भक्तगृह २२२ भिसी मासन १५-१६-७२-१०१ वालेयागि ५७-९७ भत्तबेला २४७ मिंगणाग स्थल-जलचर २२० बालोपणयण १२१-१८० भत्तवेलिका भृगपत्र ९२ याहिरमो बहिस्थः भासन २६-६५ भिंगराय पक्षिन् ६२ याहिरतुंबिय ८१-९० भदासण भद्रासन १५-१६६ भिंगार भाण्ड २०५ याहिरवादिराणि भयमाभया भिंगारिका ७२ बाहिरमंतरा ५७-८६-८७.९१ भरेहते भरिष्यति ८४ भिगारी कृमिजाति ६९ बाहिराणि ८९-९२-१२८ भंडगिह भाण्डगृह १३० याहिरिकार्य याहिरिकायाम् १९० मंजंत भअत् ३८ मिजिक श्रीन्द्रियजन्तु २६७ वाहुजालक आमू. ६५ भंजुलिका वृक्षजाति मीराहि सर्पजाति बाहुणाली अङ्ग ६६-८१-१२६ भंडण भण्डन ४० भीह १२६ बाहुपहत्यिका बाहुपर्यस्तिका २० भदभायण ६५ भीर वृक्ष ६३ वाहुपगुरण बाहुप्रावरण ४२ भैरवापत कर्माजीविन् १६० भीरूणि ५९ बाहुमंदलक ११६ भंडाकारिकिणी भाण्डागारिणी क्षुधायाम् बाहुविक कमांजीविन् १६० भंत भग्गाणि भ्रान्तभन्नानि मुक्खित क्षुधित १४८ विक मागवता भुमंतरामास विकागि ५९ मागवाती १५० मुंभलक मद्यपात्र २५९ बिग द्विक २१६ भागसो भागशः १५१ भूतकर भोज्य विशालक २३८ मागहारक ८. भूतविजिक कमांजीविन् १६॥ बिभस्म द्विमान्य द्विवचन १५७ भागिणेज भागिनेय ६८-२१९ भूमकंतरवंत बिछ ६४ भातुमाया भ्रातृजाया ६८ भूमिगिह भूमिगृह १३६ विडतेस विस्वतैल २३१ मानुषीतर मातृदुहित २१९ भूमिजाग भूमियाग २४४ यह २६॥ मातूर्ण प्राणाम् १०९ भूमिविलासय २२७ मीनपाल धीजपाल कमांजीवी मामिव नामित १४८ भूमीकम्म मञ्झाम बीपकागि भोज्य १८२ मायणजोगी भाजनयोनि ३२ भूमीकम्मविही पुग्ने मोरम्यामि मायणापस्मत २० भूमीकम्मसत्तसमुद्देसो पडलं ९ भद्दपीढ ८ सर्प २३९ " ६८ भुक्खायं ४. गोत्र " ९-५६ द्वितीयं परिशिष्टम् ३११ शब्द " " १६६ मडहिया बलाइ हसित ३५ मधित सुरा " पत्र शब्द पत्र शब्द भूमीकम्मस्स विजा मज्झिमजोणि १३९ मत मृत १८७ भेदति भिनत्ति ८३ मज्झिममज्झिमसाधारणाणि ५७-९६ मतकपडिमा मृतकप्रतिमा १८३ भेदित क्रिया. १४८ मज्झिममज्झिमाणंतरसाधारणाणि ५७ मतकमोयण मृतकभोजन १८० भोगमित्ती भोगमैत्री ६८ मज्झिमम्हि मध्यमे १७ मताणि ५९-१२५-१२९ भोति आमन्त्रणम् मझिमवयसमहन्वय साधारणाणि ५७ मतामास १३०-२०१ मोम्म भौम १ मज्झिमवयाणि ५७-९९ मतिंग? ९२ भोयणगत दोहदप्रकार १७२ मज्झिमविगाढ १७२ मत्तिकामय धातुवख भोयणगिह भोजनगृह १३६-१३८ मज्झिमाणतरजहण्णसाधारणाणि ५७-१६ मत्थक मङ्ग भोयणी मोगिनी ६८ मज्झिमाणतरमझिमसाधारणाणि पुष्पापीड भोयणो अज्झायो १७६-१८२ मज्झिमाणतरा ११७-१२८ मत्थककंटक मस्तककंटक भाभू. भोयणोपक्खर भोजनोपस्कर ३२ मज्झिमाणतराणि-णि ५७-९४.१२७-१२८ मत्थग आभू. म मज्झिमाणि ५७-९४-७६-१२८ मत्थतक भोज्य १८२ मउक मृदुक १८९ मझे विगाढा १२१ मदणसलाका पक्षी ६९-१९५ ५९ महियापीढ्य मृत्तिकापीठक २६ मदुक १२४-१२८ मुकुट मडहक मडमक ११५ मक्खर मक मृग मडभिका मधमग्गि महामग्नि २५४ मकपणी आभू. ७१ मडहारक कर्माजीविन् १६१ मधापध महापथ ११५ मकतण्हा मृगतृष्णा २४६ मट्ठाहसित मथित मकरिका मामू. मणवित्तम मनोविद् मधु मकसक? १६२ मणस्सिला मनःशिला १४१ मधुरक २२१ मक्सित म्रक्षित मणाम प्रिय १२० मुसमामू. मग मृग ६२-१६६-२३८ मणिओ मणितः १० मधुरसेरक सुरा मगमच्छ मत्स्यजाति २२८ मणिक ८० मधुसित्य मधुसिक्य १०४ म[ग]यंतिका पुष्प मणिकार कर्माजीविन् १६० मधुस्सव मधुस्रवलब्धि मगरक भाभू. ६४ मणित्यवो अज्झाम ६ मधूग वृक्ष मगलुद्धग मृगलुब्धक १६० मणिधाउकय १३३ मयंसल कृमिजाति मगवच्छक वनस्पति २३८ मणिधातुगत १३३ मयु मृदु ३५-३६ मगसक क्षुद्रजन्तु २३७ मणिबंघहत्या ६० मयूरग्गीव वस्त्र १६४ मच्छबंध कर्माजीविन् १६० मणिमय १६२ मच्छडिक शर्कराविशेप १८१ मणिरूवालिका १४१ मरणजोणि मजपरिय १५९ मणिवर ६ मरिम २३८ मजणमालिका पुष्प ७० मणिवियारभूमिकम्म १. मरुभूतिक मन्झकल्लाणसोमणा मणिसंशित मलय पर्वत मग्मगाढा ५९ मलित मर्दित ११४-१४८ मन्झरयाणि १२० मणिसोमाणक कण्ठ मामू. भाण्ड मग्झरसा गोत्र १२९ मडगत दोहदमकार २ मन्झविगाढाणि मणुब मनोज्ञ ५ मलगभंट माण्ड गझनिक ५८-१२३ मलमाग यन मन्झतिय गुल्मविशेष ११ मलिका पुष्प मन्दीणा गोय मनोरथ सर्पिणी मझायं मणोसिलक घर १६४ मपारम ममारक मसिमकाणि १२८ मगोमिटवण्णपरिभागा ५८ मसारसारमणी भामू. मन्झिमकाया 10-1२८ मणोसिलागि वर्ण १०५ मसारगठ २१५ ८ ७० भाभू. मरकली ७८ ७८ ९९ मणिसण्णिम १२८ मगिसुत् १६३ मलकमूलक १५० मणीसमुशप ५८ २२-७३.१७२ मणेय २१९ मणोज १५. मगोरथ ७. २४. मलुरी ३१२ अंगविजाए सद्दकोसो ७२ मारदि ११६ मालायोणि ५७-९९ मंडव गोत्र १५० १२५ मंडी ८ ७८ मितु क्रिया. १२ मिशि ६० मयणी पत्र दशब्द पत्र मसूर घान्य १६४ मंजरीपुष्फ १७७ मातुस्सियाधीतरी २१९ ममूरक उपकरण १५.१७-६५-२३० मंजिट्टा १४. मातुस्सियापुत्त मातुःप्वसूपुत्र २९ महग्याम्दि महाध्ये १६ मंजूमा मञ्जूषा २७-१६५ मायाकारक कमांजीविन् १६५ महारका महत्तरकाशाम् २५८ मंजूमिका मापिका मारुति ८ महनिमहापुरिस ८ मंड वृहत् ११४ मालाकार कमांजीदिन् १६० महनिमहावीर ८ मंडलक ३२ महनिमहारीरवद्वमाणाय ५९ मंडलास मद्दपिनुयपीवर मालुका सर्प २:८-२२० पक्षिणी महापितृदुहित २१९ मंडलि मास मापधान्य महमानुया पिनुमाता ६८ मंडलिकारिका कृमिजानि महग्यवाणि मासकमावणी मण्डप १३८ महावय ९७ महापयः १८७ मंडवा मासपूरणक महावयागि मासालग 100-1२८ मंदि वृक्ष वायन ५२-६५ महंतकाई ५९ मंदिल्लका मोज्य माहकी गोत्र १५० १८२ मतागि भाण्ड ७२ माहिसिक वरु महाजानि पुर .. मंडूकलिपा मङ्किका २३७ माहिंद महाग महाजन १२३ मंत पर्यंत महागपेपक महाजनोन्यक १३ मंनिक कर्माजीविन् १६० मिनुमागा ५९ महाणपगिद महानसगृह १३० मंतुलित ! १२८ মামনি महानमिक मन्थनी १७ मित्तजोणि महाणि १२८ मंधु १२५ महानिमित पर्वत मिथः महापरिग्गद ५८-१२२ मंम कमांजीविन् १६० महापरिग्गहानि मिघोसंलाबजुत्ता १२८ माउस्महा। हस्त्रिमहामात्र १५९ माउस्मिया मिरवदेवता महामत्त देवता २०१ मानुसा ६८ मिलाम महामन! १. माकणीकृषिक! महालोक मिलिंदक सर्पजाति ६२ मागधयेग २४० महावीर पदमाग मिडेति मुधति १.९-1३० माद मिस्मका महाग १२८ २३९ माग लक्षण १०३ महादिमत पर्वत्र मिस्समि देवता माग भाण्ड महिपरम्परा महिलापनय मिस्सगामस १८८ २. मागर्मपत्र मादाय महिगया: २. मागिका मीण मम्स्यजाति २२० मरिमपारक कमांजीविन् १. मागिताम्य भीमसका गोत्र १५० ८२ मामाहा मापन .२ माशुस्समागि मदिनीराय पारीदिन् १९. माणूमाणूक भोज्य १८२ पी माव! मलिकारिदोष १० म मुरा १८१ मातंग ९२ घाम्य ११४ 1. मानुषीतर मातुम् हित २९ मुभायग मंगल गुम ५५ मानुगि कमांजीगिन् १० अंगण पण २१. मानलिंगी इन .. गुगाटिक मृगाटिका आपन १५२११५ माटुंग 10 माटुंगाम २१२ मुनिगम गृहामध्य Afn सावन २५-11. मनुरिमा माजमा ३१.मुनामय मामू. में ! १८ मानुस्मिपापीवर मानुजगदि 1. मुणवर .1 मोग्य २२० मिदुमागे ७८ मियो गोत्र ११९ १२५-१२८ मुगंदवग ११ मुगाजिय मुम्गा . गोत्र ११ मुहिक २॥ गुन्दन " .
द्वितीयं परिशिष्टम् ३१३ पत्र " १३० मेलम्खु ११८ शब्द पत्र शब्द शब्द मुत्तिक मौक्तिक २१५ मेचक वर्ण १०४-१६४ युत्तग्यहि युक्तायें १६ भाण्ड २२१ मेजुक पक्षी १४५-२३८ युंजद युनक्ति १३ मुत्तिका पहिमा मृत्यतिमा १८३ मेदित पुष्ट ११४ यूविकातेल २३२ मुत्तोली प्राणिविशेष २५३ मेधुण ! योगवाहा मुदितजोणि योग्गायरिय १३९ मेयकवण्णपहिभाग ५८ १५९ मुदितसाधारथूम २२२ मेरक र मुरा मुदिताणि ५८-१२१-१२८ मेरा मर्यादा २४१ रकिंगत भाण्ड २१४ मुदितामास म्लेच्छ २६३ रच्छागिह रथ्यागृह १३६ मुद्दिका आभू. ११६ मो पादपूरणे २५६ रच्छामि(भ)त्ति मोज्य भाण्ड मोक्स ५८-१२२ रजूक मुद्दियाणि-णि १२५-१२९ मोक्खजोणि रण्ण आरण्य मुट्ठीगा द्राक्षाफल २३० मोगरग रणजोणि अरण्ययोनि १४० पुष्प मुद्देयक मङ्गुलिमाभू. १६३ मोगल गोत्र १५० रोहक रनुविशेष मुधुटूक पक्षी ६२ मोघविखद्धित रतीसंपयुत्त क्रिया. मुम्मुलक कृमिमाति रत्त मोदक भोज्य वर्ण १०४ ૧૮૨ मुयंग मोरकंट रत्तकंठक गुल्मजाति ६३ ९२ मुरव वाद्य मोरेंढक रत्तसारमणि भोज्य १८२ आमू. १६२ मुख मृत्तिका २३३ रत्तणिप्फाव धान्य मोलि १६५-२३२ सर्प २३९ मुरुंब रत्ततिल मोहणक मुसल १४२ रत्तनामाध्याय १५० मोहणगिह मोहनगृह १३६ मुहफलक मुसआभू. ६४ रत्तरजक कर्माजीविन् १६० मुहवासक रत्तवण्णपडीमाग ५७-१०५ मुहातिमास यगिक याज्ञिक (1) रत्तचीही घान्य १६४ मुंगसी यजुवेद गोत्र चतुष्पदा ६९ १५० रत्तसालि १६४ यणाणा १५० मुंचंत मुञ्चत् ३८ रध वाहन १५६-१६६ मुंडक भाण्ड यपिणक ६५ १५० रघकार कांजीविन् १६० मुंदलोह घातु यण्णेजामास यज्ञेयामर्प १४८ रघगिह स्थगृह मुंदिका मृदीका फल यत्तप्परहण यात्राप्रवहण रघजावरत रथजातरत १८४ मूलकतेल यत्ताणुयत्त २३२ १४८ यतानुयन्न रगेमियोम यदाणा कर्माजीविन् १६० यदाज्ञक ४ रथप्पयातकरत १८४ यधलाभ यथालाम २५६ मूलक्खाणक १६०-१६१ रथसालाय रथशालायाम् १३० मूलगोत यथोक्ताभिः १८८-२१० गोत्र यधुत्ताहिं रभस्म रहस्यम् यमगामास २१९ मूलजोगि ३२-४८-१३२-१४० रमणिनाणि यमा मूलजोणिसमुस्थित २७ १५३-१५५ रमणीयाणि ५८-१२४-१२८ यव १६४-१८१ मूलजोमय १६२ श्यक कमांजीयी-रजक यसपतो यशम्वतः मूलवाणिय कर्माजीविन् १६० रयणलावग यस्म यस्थ माभू. मूरामास २५ रयणगिह रखगृह 10 मलिक कमांजीविन् १६० यागहरण रनवगृह १३९ मेखल मामू. 01 याचिठक क्रिया. मेखटिका कटीआमू. १६३ याण यान ८२ मेयध्यकाय? किया. १८६ याणुस्सप यानोरम ४. रम मेघवीय! पारत् २४९ रमजोगि अंग०४० " ध्वनि १०३ यस्मा? १४० रयतगिह १६६ रययमायम २६ रयितपुर अंगविजाए सइकोसो पत्र पत्र पत्र १३० लतागिह ९२ लतादेवता १६३ लतालाह ७० २३२ लभित्ताणं १२९ लयित ३४ लसिया रसणा आभू. .१ रिद्विपत्त रसदधी माण्ड १९३ रिसिमंडल रसधातुगत १३३ रिंगमाण रसायते क्रिया. १०७ रस्सजोणि रसाल भोज्य रूस्खफल रसालादहि २२० वसामास रसेजा ५८ रगण? रसेया १२३-१२८ रचक रसोतीगिह रसवतीगृह १३६ रचिका १९१ रचिकातेल गोत्र १५० स्वाणि रहस्सपढलो अज्झाओ १८६ रुण्ण रंगावचर नाटकपात्र १६०-१९१ रणारत * रन्धनक २४९ रदित रंधित फिया. ११८ रदितविधि राइपण सर्प २१८ रदिताणि वीसं राजपोरस राजपुरप १९१ रुद्दा राजमहोरक स्थल-जलचर २२७ रधिचीक ? रावण राजादन-फल २३८ रप्पमय राते राति १०७ रुप्पियमास रातोवरोधम्मि राजोपरोधे २५८ रप्पी रामायण प्रन्थ २१८ रुरु रायजोणि १३९ रुवपक्सर यण्ण राजन्य रायवाणी राजधानी १६१-२०१ रूविअग राजपथ १३७ रूवेया रायपुरिसजोणि रायपोरिस कर्माजीविन् १५९ रोगमणाणि रायप्पमात राजप्रसाद रायम्भंतर राजाभ्यन्तर ८५ रोहणिक रायमरगसमासु रच्छासु २१४ रोहिणिक रायविजा १४३ रोहिणिक रायसस्सर धान्य १६४ रोहित रायसासव रायाण राजाज्ञाम् २५८ रोहिती रायाणुगायजोणि रायिणं रानाम् २१३ लड्त रायिमंत सर्पविशेष २२० लउच रायो पजायपत्ति राज्ञ. पर्यायपत्री धान्य १६४-२२० रिकिसिक पक्षी १२-२३८ लकड रिक्षक वृक्ष ऋद्धिप्राप्त ८ एकुचि वृक्ष २३९ रित् २५९ लक्षण लक्षण लक्सगो माझायो १७३ लक्सय लक्षयेत् १९० १७७ टतागृह १३८ देवता २०६ हम्तमामू. वृक्षजाति घृक्षजाति ७० लद्धामास १९९ लवध्या लगित २०० रदिन १३-१५५ लवंगपुप्फ पुष्प रदितारदित पूय १७७ किया. १६८ लंका मन ९-१० रुंसक कर्माजीविन् १६५ ११-४२ रंवा(चा)पलि वृक्षजाति ५९ लाउल्लोपिक लगितोलोपिक १८३ १५५ राउलोयिक लायितोल्लोचित १८३-२१० आभू. १६२ लाजिका? ६८ २३९ लाही लाटदेशजा पर्यत १०५ चतुष्पद लामदारं असायं पक्षिणी किया. १६८ लासक कर्माजीविन् १६१ धातु २३३ लासित क्रिया. ८१ कृमि २३० वृक्षजाति ५९-१२५-१२९ लुक्खणिद्ध वर्ण १०५ ५८-१०६.१२८ त्रीन्द्रियजन्तु २६७ लुक्खलुक्वाणि ५८-१०६.१२८ क्षुदजन्तु २२९ लुक्खवण्णपडिभाग ५८.१०६.१२५-१२८ १६८ किया. १३०-१४८ चतुष्पद कृमिजाति ल लुलितप्पसादित क्रिया. लगित १९८ लेखक कांजीबिन् १६० २३१ लेखा वस्त्र २३८ टेक्ष लेह १३ ११६ लेझगत दोहदप्रकार १७२ ७१ लेज्झनुण्ण लेझचूर्ण १८२ ६३ लेवणगिह लेपनगृह १३८ ७८ लाणी पुष्प? १४४ कमांजीविन् १६१ लाविका रायपद्य ५८ लिच्छा १४८ लिंगिच्छी १३९ रेचित क्रिया. लोह १०६ लुक्खणिवाणि ५८ पक्षी २२५ लुक्खाणि रोझ गवय ६२ लुक्खामास मत्स्यजाति २२८ लुचित " " ६९ लुता ६८ एउम् " लक आभू.
द्वितीयं परिशिष्टम् ३१५ ६२ ववकि १४२ वणझम्मिक २२१ वणति ६५ वणपेलिका " ७० ३ धक्कय ६३ वक्सस्सामि पशु २२७ वक्खाइस्सामो " ? ४३ वपणजोणि १८४ वण्णपडीमागा ८४ शब्द शब्द पत्र देहणिक्खिवण लेखनिक्षेपण ९७ वइंदबुद्धि पुष्प वडम लेहपट्टिकमंडल ११६ वउत्थ प्रोपित १९६ वड्ड गृहत् लेहिचक? २४९ वक वृक कर्माजीविन् १६० लोकक्खिणो गोत्र १५० वक्कभंड वल्कमाण्ड लोकमाता ९ वन पुष्प लोकम्हि लोके घल्फज भारछादन भाण्ड १९३ लोकहित्य लोकहृदय यकल वल्कल १४२ यणप्फइकाइकाणि ५८ लोणवाणिज कर्माजीदिन् १६० यतिकतेल वलिककतैर २३२ वणप्फती वनस्पति लोक? वक्सण वसण ६०-९६-०१-१२३ वणसंड वृक्ष ६३ लोद्ध वृक्ष व्याख्यास्यामि १८६ पणियप्पधजोणि वणिक्पथयोनि लोपक व्याप्यास्यामः १३५ वण्ण लोपा लक्षण १७३ वक्सामि वक्ष्यामि लोममंडलक ११० चक्खायिस्सामि च्यास्वास्यामि १९२ लोमवासी अङ्ग ६६-७६-१२१ वषणधातुगत १३३ वक्खावत्यरत वृक्षापस्तब्धरत लोमसिका कर्कटिका १०४ घग्घपद व्याघ्रपद गोत्र १५० वण्णमत्तिका लोमसिग फल २३८ वर्णमृत्तिका २३३ बचाई कृमिजाति लोमहत्य लोमहस्त २१० ६९ वणयिस्पामि वर्णयिष्यामि २३० वञ्चगिह वोंगृह १३६-१३० लोयक चतुप्पद वर्णोदेवता ७६-२२५ वण्णसुत्तक वचदेवता भाभू. १६२ दे० शटितधान्य वण्णा पचभूमीय वर्षोभूम्याम् २२२ लोलित क्रिया. वण्णेय वञ्चारक १२३ लोवहरयपाणिय वर्षोंवत् ? २२२ भाण्ड १९३ वतंसक कर्णाभू. १८३ वचाडगत लोहकार कांजीविन् १६० वर्षोभूमी २१४ वतिमेदग गोग्न वच्छ शुदजन्तु २३८ १४९ लोहजालिका धातुवन १६३-२२१-२३४ वत्तणासी सर्पिणी लोहमाण बाल वच्छक भाण्ड २५९ वत्तणीपालक वर्तनीपालक ८९ लोहमय यादयिप्पति भाण्ड यत्तगीपालमग्गिय वर्चनीपालमार्गिक ९० पक्षी १९० आभू. वत्तपुरव सपूर्ण सोहमंधात १५ चत्तमाणजोणि गोन १५० वखुर वृत्तसुर ११६ वृत्तक्रीडनक १६ पत्तमाणाणि आभू. ५७-८२.१२८ सर्पजाति ६३ वहझाय वृत्ताध्याय मोहितास वृत्तोरसव ८1.1.0 भाभू. आसन लोहितिभा लोहितिका दोहदप्रकार २ १८ वहमस्थ वृत्तमस्तक लोहियरस २१५ वहमाणग भाण्ड वगृह यत्यजोणि मोदीगत भापड २१४ यमुद वृत्तमुग लोदीवारगत भाण्ड धानु २३३ पस्यतोणी मनाम दाहिनि लामयिष्यति पहलोहमप यायपाइक धानुयर कमांजीपिन् . पहसीम पृत्ती र यापारका माण्ड ०३ प पहा ५८-१२८ परयाधिगा यमाधित मांगीदिन् १६. वृत्तार २५९ परिप १९९ वही पति भवन पारण ग्यामरण वन ११५ ययिसीम मम्पमानि २२० यह १३ पदेना पागमा २०-२२५ पएममोति पटक इदिन २२ पापारिमर ८४ २२. पजिहिते १६२ वहक " लोहिय रोहितक १६२ वट्टरोलणक 1 यासी १६२ पहपीदक १६ यत्ता ६५ वतुस्सय 1१६ ययगत ६५ परथगिह २११ यहोह ८४ पाप ९ घटापेल बस पन्धित पश्यतोपिर १७ पाग्नुगर ५९ ३६६ अंगविजाए सद्दकोसो पत्र १६. वसायं " १६ वंजण ९७ वंजणऽज्झायो १५० वापन १७ वामणक २१६ वंतं? १०७ वंदहे १ वाइजो घरह पत्र शब्द शब्द पत्र वाधुवापतिक कांजीविन् १६० वसवा देवता २०४ वाधुन उत्सव ४०-१२१-१४३-१९० वन्योपजीविक वसायाम् ५ वाधुजभंड विवाहमाण्ड ७५ पदंसक अवतंसक १४० वसुमंतो वसुमान् १०५ वाधेज विवाह १३४ वधुन विवाह १४१ वस्सघर पर्वत वापण्णा धूमनण वधूमजन २५५ वस्सारतं वर्षाराम ६७ वापण्णोपटुता १२९ बदक याभू. व्यञ्जन १ वापद व्यापत् यणक उत्सर १७४-१७५ वापदि व्यापदं ८९ वद्धमाग वर्धमान १ वंजणात व्यञ्जनान्त १२२ यप्प वन १३७ वंजुल वृक्ष ६३ वामगत्तामास वंत वप्पक बाल १६९ घान्त १५३ चप्पडी भोज्य १० वामदेस पप्पा यता वन्दे ६ वामद्धणाहारा १२८ वफान भुनक्ति १०७ वंदिताणि ११.३८-१३८ वामपक्ख यमारक स्थल-जलचा २२७ बंदियविहि ९-१०-५९ वामपार गोन १५० पम्मिका धामू. वाचयेत् १० घामभाग ७६ वय ग्रज १३७-२२२ वाउकाणी वस्त्र ७१ वामसील ७६ वयसाधारणा वाउजोणीक वायुयोनिक १४० यामाई ११३-१२८ परिसर्पजाति वाउब्वातिक वातौत्पातिक १९२ चामाणि ५७-७५-११० वाफपहिका चरक धान्य १६४-२२० वल्कपहिका यामा धणहरा ५८-११२-१२८ गोय याकल वल्कल १५० वामा पाणहरा ५८-११२ वागपह घरद वर वृहत् १४ २३२ वामामास वागरणजोणि यरत रनुविशेष १५ ७६ वागरणपागड व्याकरणप्रक्ट परममण उत्सर २५५ घामार घागरणोदधि पराणि ५९-१२६-१२८ ५८-११२ वागरणोपदेसो भग्झाओ वामा सोवद्दवा घरादा गोन घाचि वाचिक? वामिस्स ध्यामिश्र ९५-१२ १५ धरिपगरिया मरहस्स १८२ वामोद्दाग णगर। १६१ पशु २२७ परिसघर वपंधर करिन् १५९-१६० यायुक्छाहकाणि पाणाधिगत कर्माजीविन् १६० पांगक वृक्ष ६३ घाणियस्कम्म वायुणेय १२१ १५९ वएगाइप देवता २०५ वाणीर घायुमुत्ता गुरुमजाति कण्टाभू. १९३ १३ बलामी ११७ वायेजो पाचयेत् १२९ 1१६-२.. वायेहिति देवता २२४ वावकपण ८४ यादयिष्यति पनुयग मा. पातारील उद्भिज २२९ धारक भाण ६५ दम्यागिय १०४ रोग यारमहिम पानगुम्म फल २३८ पक्षिा कर्णाभू. १८५ २०३ बारवाण वानचाकमंडल कशुस्यकार पलिरिकी २१. यारंग वातपाय २२२ वृक्ष पहिरन ५८.१२.१२९ धारिणीला गोत्र १५० पातीतार २३२ वार पारिस वर्षाकालिक ... पर भोग्य २. वाताभरिम यारेन विवाह १८-१३ पात्र সাপল 1.५ पादगि मागी! २२. पाएका १४२-100 वापर परगाना १२५ पानमु उमिग २२५ पार कलि मोरय " प(ब)गिरा २४. पानिए ०३ वाममप भाभू. ११२-२१५ पापा चपना ५ वाकिंग माय २२१ ६-१० वामायार ७ वाणर ५८ 100 बातमगा रोग २.३ " द्वितीयं परिशिष्टम् ८०.१६८-१७१ विणियत्त ४५ विणीयविण ४ ६५ विक्सिरे " ८४ ७० १५० विगयसंठाण विण्ही वस्त्र ४८ पिच्छिक १८३ गिरिछत्त २२२ विच्छिन्न १५० विच्छे? ८० ७० शब्द पन शब्द शब्द वालवा गोत्र १५० विक्खित्तमणता विक्षिप्तमनस्कता १३५ विणिकोलंत विनिजत् । वालिका विनिष्ठीवनि १०० कर्णाभू. ७१ विक्खित्तविकधा विक्षिप्तविकथा ४१ विणिटुते वालीणा किया. विनिवृत्त मत्स्यजाति २२८ विक्खिन्न विकीरेत् विनीतविनय वालुक विणेच्छिति पिनत्स्यति वालुंक विखिवंत विक्षिपत् १३५ विषणातूण विज्ञाय १२७ वालुंकी विगतस्सर वृक्षजाति विकृतस्वर ३५ वावदारी विण्णासगट्ठयाय विन्यासनार्यतया १३० गोत्र विकृतसंस्थान वावसजोणीमामास १८८ विगलप्पमाण वितडीक वितर्दिक ६ विगिलते क्रिया. १०७ वावारक? १६७ वितत क्रिया. वाविद्ध व्याविद्ध १०८-१३० विघोलते विताणक ६४-१६४.२०६ चाम व्यास-विस्तार वृश्चिक २१० वित्तीतोस वृत्तितोप विक्षिप्त १६८ वासकडक यासकटक वित्यत विस्तृत 11७.१३४-१९० विस्तीर्ण १२२-१७१ वासघर वासगृह विदू विद्वान् वासण वमन १४२ विच्छुद्ध विक्षिप्त १६८-१७१ विधत्तेसु क्रिया. १५५ वासंती पुष्प ७०-१०४ विद्युद्धगत्त विधार विहार २२० वासि गोत्र विधावति क्रिया. वासुरल स्थानविशेष २२२ विजयद्दार १४४-१४६ विधित्तिक पटजाति वासुल गोग्र १४९ विजयिका विजयवती विधीचार वीथीचार २०६ पुप्प ७०-१०४ विजाणीया विजानीयात् १४ विधीयनि विधीयते १२९ पाहणगत दोहदप्रकार १०२ विज्ञता देवता ६९ विपनय विपर्यय ४५ वाहिन वाहन विपतत् १२२ विअहमवुढे १२४ विद्यात् १८-४६ विपचीसंपदा विभाकरे ग्याकुर्यात् ५७ विनादेवता देवता २२४ विपादित विपातित पिादित रिदत्त विचिन ६ विनाधारक कण्ठआमू. विपाटित १६८-101 विकति विकर्पनि ८. विज्ञासस्थाहियुत्या देवता २२४ विपिस्सियविदि ९-१० विकरण १४६ विजिस्मति क्रिया. १७५ विपकिसतविधिरिसेस ५९ विकलका २३० विजिहिए प्रिया. ८८ विप्पवित सिप्रकर्षित १९५ विकपण दिया. १३. विनिहिति क्रिया. ९. विप्परिण किया. विकालिका भामू. " विनिहिते विक्ष्यति ८१-८५ विप्पोटनि किया. शिकात विगत् ४२ रिनु विद्युत् २०६ रिपजोयित प्रियोजित क्रिया. १८४ विमुता रिपुत् २५४ विप्पयोगनोगि विगित १२३-१३०.१५५ विजुपाय वियुनि ५ शिप्परिटते किया. विद्याणित विरणित १८३ पिहिते ११. रिप्परियत्तते भोग्य १८२ शिवित विज्ञपित रिध्यापित १९८.101 रिपरिमि विनि विदित रिझन्दित १५५ विमीयनि क्षिीयते २५. विप्पलोहित झ्यिा. विदिपपल ४४ विद्वण पेष्टन १९. रिपोषण सिंदिपाणि मद्देष ४४ विरिएम टिपर रिप्यमारित विनष्ट 1१८-101 रिपेश्यिपागो दम नपुंमा पिनमत् ३५.३७.५५ रिपोगहिरन freehruare efry रिक्षाति ४५ विगयोनि १९ मिति सिमटदिन किती १.८ विगामित 1४८-11मिमी विमलया शिक्षिप्त १३-१४ गिगामित हिनामा १८ धिमारी रिमानन् १९३ विजा " ६९ विपत विणिम . ८. . .३ रियमंत ८ रिसाद शिमल ३१८ अंगविजाए सद्दकोसो पत्र पन्न ८॥ वेदपुट " ४२ विरसाय १९८ विस्ममुद्द वितानक ११७ स्मुिम २४ विस्मोदण ३३ विदक १९६ विहि विष्णु २२३ वैवालिक ११. घेदिका १५२ वेदी १३६ वेदोपकरण २३९ वेदाध्यायिन् १०१ गोत्र १५० यख वैधव्य १९७ वैमनस्यात् गोत्र १५० वस्त्र कांजीविन् १६१ किया. विदम्बपति ८३ मोज्य १८२ जलवाहन २२१ वृक्षजाति १४२ वेश्यागृह स्थानविशेष २२२ देवता २०० पेशिक १६० येश्यागत २०० ५७-१०३ " " " ०० ११८ वीजणी ९ वीणा ९ वीयणी विभाषेतूण विमाथ्य ८६ विसतित्यिका कमांजीविन् १६१ वेण्ड विमट्ट विमृष्ट २१ विसमाणि ५८-१२४-१२९ वेवालिक विमरिस विमर्ष ५७ पिपलाइत विशलाकिती ८० बेतिया विमिटीसेलणालिका ५ निमंधित निया. १६८ वेती विमिमित दे. प्रकाशित ६ विसाणमत्तिका वर्णमृत्तिका २३३ वेतोपकरण विमुक्कायं विमुक्तायाम् २. विसाह विशाखा २२३ दज्झाइ वियप्पाप विकटप्रकाश १३० विसिण्ण रिशीण वियदसंवुना ५९-१२८ विसेसक तिलकविशेष वेधण ६४ वियागरिज व्याकुर्यात् . विसेमक्यिा ओकुंतक येधव्य १८३ वियागरे विश्वस्त १४३ चेमणसा बियाजिजमाण? त्रिया. वैश्यशूद्र १०३ चेयाकरण बियाणक वेलविक विश्रुत १९२ वियाणिजो विजानीयात् भोज्य १७९ लंबक बियाणीया वेलेंबित विहग ११७ पियानो लंबेति १२१ बियाणेय वेलातिक पर्वत विस्मति विरुणद्धि १९७ थी वेलु अपि विरूदतरक उपकरण विरोध विरह वाध विरोह उपकरण चिराईते विरोइति (स०ए०) ३३ यीयगीया व्यजनिका पिटका विटया-घनिता १८-२०२ धीरल पक्षिनाम ६२-२३९ येसमणकादय लिंपित किया. ११८ धीद १४५ बेसिक विष्ठात धध १६३ वीम १२० चेसियागत विटाक पा २३८ घीसतिवग्गा ५९ घेसेनसुदेनाणि शिलाल २२. वीहि घान्य १६४ पेमेजाणि पीडित ४५ क्वाधिउत्या विठियंघ वृक्ष वृक्ष पिजरा पुर ७. बुद्विदार टिपिका मोश्य १४-१७९-२४६ पुद्विदार पेस्पजोणि पिरोस विलोच्यत् १२ युद्धजोणि १३९ येस्मप्पा निभो हिरी যদি १९ पुष्पमुत कण्टाभू. येस्मर्दम विषम माण हित १४८ घेस्मरण येड्या ५८-१२-१२९ घेरसेयाणि विवाति इसरिफका विकलपिका १०४ पेस्मोमण्य मामू. शिवाल विदयन् ४ पेजमोह बेहायस पातु २५८ रिवानी शिरारती १९ देनी दृशतानि ००-१४५ बटक रिचारगोन दोकगित पुस पेष्टन ११४-२४२ किया. १५ मी पोमी मामू. १५-1 वोमदमाग ३० वेलुमय २३० चेल्लरि २३० वेलिका २०५ सगिह १९सण " ५० देवता २२४ घेस्स वैश्य १०२ देय १२०-२५३ वेश्यक्षा १०२ १५६ पेस्मतत्त १९. हित देवता २.५ १०३ १९२ महिमामू. १५ भ्यराट भोग्य १४८ २५ वेग रिम्मत् ११८ द्वितीयं परिशिष्टम् शब्द स सअंग १० " सकडचक्क सकडपट्टक सकही सकडीक सकपरका सकलदसद सकविगतगोत्त सकस्स सकाणि-णि सकित (कसित) सकुचिका सकुणि सकत सक्कुलिका सगड सगडी सगलिकारस सगुण सगोत्ता सद्यपडिहार पत्र शब्द सण्णिरोध साश्रुक ३५ सहमच्छ स्वक १२३ सण्हाणि वाहन १६६ सत शकटचक्र २४२ सतधोत ११६ सतपत्त वाहन ७२ "७२-१६६ सतपदि ५८ सतप्पाय वस्त्र १६३ सतवग्गे गोत्र १५० सतविसय स्वकस्य २४ सतसहस्स ५८-१२८ सतसहस्पवग्गे गोन ११९ सता मत्स्यजाति २२८ सनीमता पक्षिणी सतेरक ६९ सत्कृत भोज्य १८२ सत्तक सत्तबुत्तो शकट शकटी सत्तमिक सत्तर २२१ सत्तरिवग्गा शकुन सत्तिवण्ण गोत्र १५० सत्तपिडि ९ सत्यधिदुस्था वृक्ष सत्याण २३२ सत्यावरण शय्या सथिआयमणी सज्यमान १९८ सत्यिक पर्यत सधिक १२७ सत्त २६ पत्र शब्द पत्रं सविरोध ३८ सबरी शावरदेशजा मत्स्यजाति ६३ सबल १५३ ५९-१२४-१२८ सवुद्धिरमणाणि १२८ १२७ सभंडणमुलक सभण्ढनोल्लाप? १०४ समखेत्ताणि २०७ पक्षिनाम ६२ समगिरेस? २३५ पुष्पजाति ६३ समगुण्डिक भोज्य बहुपदा २२७ समजुंज समयुआन (1) १५ ग्रीन्द्रियजन्तु २६७ समणिम्म? समनिर्पष्ट २३ ५९ समणुवत्तति समनुवर्तते १९५ समतिकान्त २५८ शतभिपग् २०८ समतिच्छिम समतुंव परिपूर्ण ११४ १२७ समयमंडल ५९ समलिकति सदा स्मृतिमता समंछणी समन्यनी ७२ सिक्क ६६ समागमदार ११४-११५ समापयेत् समाणए ५ लक्षण १७३ समाणक्सराणि १२६ १५३ समाणयंतो सप्तकृत्वः १८४ सम्मानयन् समाणि ५८-१२४-१२८ ९७ समाणित क्रिया १६८-१७० १२७ समाधिमण ५९ समामट्ठा १२१ वृक्ष समाय उत्सव १३४-१५३-२२३ सक्तपिण्डी समारोधण समारोहण देवता २२४ समालमणक क्रिया संस्थान २१८ समास उत्सव ९८-१२१ शनावरण २०१ समामन्च समासाद्य माण्ड २१४ समासेयणक समासेचनक मापन ६५ समिग्मतु समिध्यताम् १२ स्वस्तिक १४७ समिद्धजोक समृद्धयोग २४० ६५ समिद्धविहि समृद्धविधि ९-१० निपसप्रकार समुन समुद्यत (1) १५-३६ ११३ क्रिया २०० समुनग समजंक ५८-१२३ समुहकाक पक्षी गोय १५० समुहकुमार देवता २२४ उदिन २२९ समुहकुमारी ५८-१२३.१२८ समुइवही वृक्षजानि মিসির १५ समुदायक! २०५ २०. समुपलक्सिम समुपलक्ष्य याल १४५-१०. ममुम्मद समुन्मृष्ट २२ पुष्प ६३ समुस्मयग ममुसवन " PE सनलस भामू. सना सजिजमाण सन्झ सद्धि सहिवग्गा सडिका सद्गुकमोयण सदिक सण मणिग्यर ११६ समुजत ६३ सहया सत्यिण्णा? पक्षिणी ६९ सस्थिसंघातमंडल श्राद्धभोजन १८० सदिवारित शादिक सहमणा गुल्मजाति शनैश्चर २१. सहा "१०१-२१. सध्या समस्कन्धावार १३९ सरिकासिय ६४ सनिवेम क्रिया १५२ सप्पक ११५ सम्फ सगिंधर सण्णासंघावार सण्णाहपहक सगिटिव सग्णिद ३२० अंगविजाए सद्दकोसो पत्र १११ सम्वट्ठक नलुलिकाप्रकार २२१ द्वीन्द्रियजन्तु २६७ संस्कृत १७६ कर्माजीविन् १६० २४ सम्वत्त ३९ सव्वपादोवक १६२ द्वीन्द्रियजन्तु २६७ उदिन २२९ १०४ संस्कृता २२० २१५ भाभू. १०४ १०४ शङ्कवाणिजक १०४ भङ्ग ७७-१२४ भाण्ड २२१ गोत्र १३८ सम्ववेद १५८ संखा ८ १२८ शब्द शब्द शब्द समोखिण्ण समुक्षिप्त १९५ सम्वचलामास १३. संकोसक समोवयितगत्त कृमि २२९ संख सन्मति-वीरजिन १० सव्वणीहारगत १६८ संखभ सम्मजित सम्मार्जित २९ सम्वतोभद आसन ३१-६५ संखकार सम्मट्ट सम्मृष्ट सर्वत्र १५८ संखचुण्ण सम्मिका कर्णआभू. १८३ सम्वत्थीक ? ३०-४८-५५ संखणग सम्मोई सम्मुद् १२-४०.१११ सम्वत्थीभापप्पदेसदंसक ५७ संखणा सम्मोदी सम्मुत् १९८ सव्वपल्हत्यिका सर्वपर्यस्तिका १८ संखणाभि सम्मोयिमा सम्मुद् सर्यपादोपक १४२ संखता सयओ सयतः ६ सव्ववाहिरबाहिर ८९ संसभंड सयणगत दोहदप्रकार १७२ सवरंगावचरगत १३. संखमय सयणगिह शयनगृह गोत्र १५० संखमल सयणपाली कर्माजीविनी ६८ सव्वसजीवपरामास १३. संखवलय सयणावस्थद्वरत सयनापस्तब्धरत १८४ सव्वसप्पसु १५५ संखवाणियक सम्पाणित? सयसाह शतशाख ९ सब्बोधिजिण सर्वावधिजिन १ सयसाहस्समुख शतसहस्रमुख २ संखागवलमय सब्बोसहिपत्त सौंपधिप्राप्त सयसाहस्ससाधि शतसहस्रशाखिन् २ संखागोत्त सस सयाहिजुत्त सदाऽभियुक्त पशु २३८ संखावम्माणि सयितवमोणि ससपतिकाय सस्वपतिकया १८५ संखावामा सर लक्षण ६४ संखिक ससबिंदुकिणी स्वर वृक्षजाति संखेणा सर ससित भाण्ड श्वसित ६५ १४८ सरक-ग संगमजोणि सरगपतिभोयण ससिस्स १९३ सच्छिध्य ५ संगमत्तिका सरसकचुण्णक सरजालक भाभू. २३३ संगमित सस्सप सरंट धान्य शरट २२७ सस्सयित संशयित १९९ संगलिकावत्थ सरसंपण्ण १७३ सस्सावित किया सरस्पती देवता १३३ संघतण सहकाररस २३२ संघमालिका भाण्ड सहत्यकारी स्वहस्तकारी ९८ संघाट सलाकंजणी शलाकानी ७२ सहवरपुष्क पुष्प ६३ संघायमंडल सरिलयता सलिलयात्रा ११८ सहस्स १२७ संचित सलईहिं सलुकीभिः १७७ सहस्सदेत मरस्यजाति ६३ संजुकारक सप्तकसा कर्माजीविन् १६१ सहस्सदारजुस सहस्रद्वारयुक्त श्यालिका २ संझडित सलिका ६८ सहस्सपत्त पुष्पजाति ६३ संझादसण सली सहरसवम्गे ५९ संठाण सरणमिद सवनगृह १३८ सहस्सागरणा सहयग्याकरणा ८ संडिला सवाहिक स्थल जलचर ६८ संद सवाहत प्रिया २०२ सहितमहका। १५५ संवस्थ सप्यममीवपरामास सस्था संताणका सम्ममारित किया 1. मंगम २६ संतिहिस्सति मध्यममारपत्र १३. मंकर ७३ संयडिय समगोगिपण ११. संकुशुट्टित सोचनायित संबित १७३ ससबिंदुक ५८-११२ १०४ गोत्र १५० १६५ संगलिका वर्णमृत्तिका २३३ सङ्गमित सागरिका १ सिङ्गिका १६६-१७९ संहनन लक्षण १७३ भाभू. ७१ जलवाहन सरिक क्रिया १५८ कमांजीविन् १६० संशीर्णः लक्षण गोन १५० २२० सहिगिणी! १५. संख्या संग्रस्त २५४ शुजन्तु २२९ संस्थास्यति ११ संस्कृत ९ द्वितीयं परिशिष्टम् ३२१ गोत्र १५० ११५ सालासी " २२० सालिका १६१ सालिमजिय १९० सागरोयम १८ साम १६९ सासक? " ३९ सातिक शब्द पत्र शब्द पन्न साब्द संदण वाहन १९३ संसरणगिद १३८ सालयगय स्वालयगत १८१ संदमाणिका यान ७२-१६६ संसरित क्रिया १४८ सालंकायण संघागिदसण सन्भ्यानिदर्शन १५५ संसावित १८६ सालाका पक्षिणी ६९ संघावति क्रिया ८. संसिजमाण संशीयमान १९८ सालाकालिक मोज्य १८२ संधिपाल कर्माजीविन् १५१ संहित क्रिया कर्माजीविन् १६१ संधिवाल ८८ सालि सा स्यात् ११-२२-३६-४० धान्य १६४-२१९ संघी साकरस जलवाहन संपडिका आभू. ७१ साकिजा गोत्र १५० साटिम पशु २२० संपढिपेक्सित्ता सम्प्रतिप्रेक्ष्य ४१ भोज्य १८२ सारसानगर संपदा साम्प्रता: १८७ सागरस २२१ सालिमाटिणी देवता संपदाकालिय कालविशेष २६५ सालिया पक्षिणी ६९ संपमिण सम्प्रभिन्न १५४ साहक शाटक कर्ण भामू. १८३ संपवेदये सम्प्रवेदयेत् १४-१२६ साडक वाल १४० संपवेदेजो ५० यस ६४-१७. सासवर भोग्य ६४ संपसस्मते सम्प्रशस्यते मायाप्रकार २६३ सासवतेल २३२ संपादेंत सम्पादयत् ३८ सातिजित स्वादित १७० साहवो सायवः ५ संपारित सम्प्राप्त १७६ साधारणजोणि १३९ साहाभवस्सितरत १८४ संयाधतरातिमास १८६ साधुजुत्त साधूधुक्त ४ साहारामे १०२ संवक द्वीन्द्रियजन्तु २६७ साधूणिन साधुयोग्य श्रीन्द्रियजन्तु २६० संभिक शेप्मरोग २०३ सापस्सत सापध्रय साधुसम्पन्न संमिससोय सम्मिश्रोतस्-लब्धि ८ सिएणि? सामझण्डाणि ५०-९२ संमुथविजय संभूपरिजय २०० मिकुस्थी सर्पिणी सामकाल संट श्यालक २१९ सिवलिका सामली १५३ संसापजोणी भन्साप १६७ सर्पिणी सामवेद मिस्याटी संटारजोणीमो संलापयोनयः सामंत सामन्त-समीप सिगिला संटाययंदित संलापन्दित धान्य सामाग मिगिलि १०८ प्राणी २३० संसापरिधिपाल ४१-१८ सामाणि संलावितरिधिविसेस देवता २०५ मिचन सामाणिय पण संटारिवागि मिति २४७ सामामरेटिका संटाविपरिहि सीदति मिक संगपत्र मांजीगिन् ११. सामिदि सिता स्था ૨૮ संवसम्योरप संघमनोरय सामेलार कमांत्रीचिन् १९. सितीय ६. निम्म्याम् 11-8 नकुटिकाविशेष 1. सामाई सम्मा ४०-11 मिपमा मम्माति २२८ मंपिजागिया संविजानीयात् सामोरातानि १८-११-१२८ गिर पुप्प देवा २.. मंपिरिपी গায়ি गिरपात्र 10 संरिमापर मारिसरमन Forypr 1-1. १ गप्पा मागिन् । पगिन् २५८ गिभिरा सोधिपान . १५ साम २११ दिया पान.१.11.14.1॥ ५ साहिक ३१ साहुसंपन्न ४ प्राणी २३० गोत्र १५० ५७-१५५ सिग्गुकनेछ संरटिका १५ मिपिर ११ सार . भोग्प १८१ १५ [मारा ] गरो मनायो २१ पिन रिमार ९ मणगि २२-१२-१२९ मार २५. माता मंग०५६ ३२२ अंगविजाए सद्दकोसो ७३ सुणहि ५८ सुणिक ? ४ ६९ सुतवितेहिं २६ सुतीसोपक २६ सीवण्णी १३२ सीसमय " २३४ सीसारक्ख ६३ सीसावक शब्द पत्र शब्द शब्द पत्र सिम श्लेष्म २०३ सीकाहारक कर्माजीविन् १६१ सुग्गमवण्णपहिमागा ५८ सिरिकंट पक्षिनाम ६२ सीकुंडी मत्स्यजाति २२८ सुनोदम सूर्योदय २४५ सिरिकसग माण्ड ६५ सीडा फल २३८ सुझिय गुद्धित ६ सिरिकुण्ड ६५ सीत १२४ सुट्टियम्हि सुस्थिते सिरिघर २२२ सीतपेटक कर्माजीविन् १६० सुट्टियायं सुस्थितायाम् १८ सिरियक गुल्मविशेष १४१ सीतमोयण १८० सुणवारक रोग २०३ सिरिवग्छ आभू. ६५ सीतल ६९ सिरिबिटकमद १७७ सीतला ९८ सिरिवेट्टक रस २३२ सीता ६६ सुण्डा खुपा २८ उद्भिज २२९ सीपिंजुला पक्षिणी सुतपद्रिः सिरी देवता २०५ सीमंतक अङ्ग सिरीस श्रुतविद् ७६ सुतवी वृक्ष ६३ सीमंतिका सीमा २१४-२४१ सुनीसील सिरीसमालिका शुचीशील १९४ आमू. सीया शिविका २३९ सिरीसिव सरीसृप १९१ सीवण्ण फल ६४-२३८ मुत्तक भाभू. सिरोमुहपरामास श्रीपर्णीवृक्ष ७. सुत्तकिय सूत्रकृत १ सिरोमहामास भाभू. १६२ सुत्तगुणविभासा पलं सिलावल शयन ६५ सीसवत्तिया वृक्षजाति ७० सुत्तवत्त कर्माजीबिन् १६० सिलापपासाणा कर्माजीविन् १५९-१६० सुत्तवाणिय ५६० सिलिंध वृक्ष शीर्षआभू. २४२ सुत्तिका शुक्तिका १७३ सिलोचय पर्वत ७८ सीसेकरण वस्त्र सिवाणि ५८-११३-१२८ सीसोपक स्वस्तिकागत शीर्षमाभू. १६२ सुत्थियागत ४१ सिविण १८८ सीहक बाल? कोमल? शुद्ध १०३ सिब्वणी भर ६६ सीहविजंभित सिंहविजृम्भित शुदक्षत्र १०२-१०३ सिस्सजोणि १३९ सीहस्समंडक सुद्दजोणि आभू. ६४ १३९ सिस्सोपस्खावण ५ सुउत्तम श्रुतोत्तम सुइझोसिय १ सिहा शिस्त्रा १०२-१०३ ६६ सुकुमालाणि ५९-१२४ मिंगक ९३-१४२-१६९ मुक्क वाल शूदवैश्य १०३ मुद्दवेस सिंगमय सुहेबाणि माण्ड सिंगारवाणिया कर्माजीविन् १६० सुपण्टुपडीमागा १६१ १२८ मिंगालका २३८ सुकल सुखरजक कर्माजीबिन् १६० ११४ सिंगि नकुलिकाविशेष १७८ मुक्वणपडिमागा सुद्धवसिईन शुद्धवसितिक ५७-१.४ सिंगिका ६८ मुकामास सुदंसुवसाम ૨૦૨ सिंगी शम्बा १६६ मुकिल मुद्राकारी शुरु १०४ मिघाटक सुदामास शुष्क शारक-मार्ग 10-10 मुक्स-मळाणमु गुष्क-म्लानयोः मुपतिटक माण्ड १४ सिंदीवासी मुप्प शूर्प १४२ वृक्षजाति मुक्खामास मिथुवार १६० मुष्पतिमाणवं गुरुमहानि १३-१०१ मुगंधाणि सुप्रतिमानवान् ५६ ५८.१२२-१२८ सुमिक्सदुन्भिक्त मिविवाटिका मिझदुर्भिक्ष २०२ मुभिक्खयोगखेम १६२ गोत्र सीउहानि १५. सुमंगल दीन्द्रियजन्तु २६० १२८ मुचिम शुचिमत् ९. मुवेद गोत्र १५० सीकपाकी नजाति वर्ण १.५ मुरगोपक शुभजन्तु २१८ १६. सुचेरक ? १४५ सुद ४० मुद्दखत्त सुद्दम २२. मुपडीमाग शुकृप्रतिभाग १०३ मुद्दोसण्ण शुष्क . प्वी वाला ९० मोज्य १८. मुश्य " ७. ७ सीटक 101 मुगंधामास १५ मुवरा .. मुजरंगम द्वितीय परिशिष्टम् १५३ सेंदकंटक शोणित १७ २०९ सेडकणवीर " पक्षी २२५ सोतसा गोत्र १५० सोपान ३१-३३-१३६ १ शब्द पत्र शब्द पत्र सुराधरित कर्माजीविन् १६० सेड श्वेत गुल्मजाति ६३ सुरादेवी देवता २०५ सेडककंद १०४ सोकत्त शोकात १२१ सुरालायुल्लोधिकमच्छक ? श्वेतकर्णिकार १०४ सोणिय सेडकफलिका श्वतफलिका १०४ सोणियओघायण प्रोणिउपघातन १८५ सुवष्णक सिकक १८९ सेडगद्दभक श्वेतगर्दभक चन्द्रविकाशिकमल सोणिसुत्त मामू. सुवण्णकाकणी ६५ ૭૨ १०४ सोणीमा प्रोणिका ८५ सुवणकार कर्माजीविन् १६० सुदण्णखयित सेडि सेटिका १०४ सोतगुल गुडप्रकार धातुवस्त्र २२१ सेडिका सुवण्णखसित प्रोतसा सेडिल १५३ सुवपणगुंजा सोत्तिया ૭૨ सेडीका पक्षी २३८ सुवण्णजूधिगा पुष्प सोदरिय सेणा पक्षिणी सोदरिक १६८ सोपरत्त सुवष्णपह धातुवस्त्र १६३-२२१-२३४ २२१ सेणायपतिणी सेनास्वामिनी सुवण्यपडिपोग्गल १४२ सोमकाइय गोत्र १५० देवता २०४ सेणिका मुबण्णमासक सिक्कक ६६-२३९ सोमणाम सेही पक्षिणी ६९ सुवण्याधियक्ष सुवर्णाधिपाल्य १५९ सोमपा १." सेत वर्ण १०४ मुवपिणक कांजीविन् १६० सोमपाह सेतगुलिका उद्गिज २२९ सोमपायिन् १०० मुवरी चतुप्पदा ६९ सोमाण सुविण धान्य १६५-२३२ सेतणिप्फाव स्वम सोमाणि सुविणो अल्झायो सेततिला ५९-१२५-१२८ धान्य १६४-२२०-२३२ १८६-१९१ सोमित्तिकी मुमाणदेवता १६४ देवता २०६-२२४ सेतीही २२० सोवण्णमय माभू. सेवसासय मुस्सवमाण १६२ सुधूपमाण सुहस्सहा बासनविशेष मुरा १८. सोवण्णमुत्तग भाभू. मुही १५० स्वरपिता मुंम्माला शुल्कशाला १३८ सेतुकम्म १३८ स्वरविना मुंकमालिय शुल्कशालिक १५९ सेद त २१८ स्वरान्त स्वरान्त १५१ मुंमुमारा मत्स्यज्ञाति ६२-२२८ सेदणिम्मनग पिया १४८ स्वाहाटपडीहार मुंमुमारी परिसर्पजाति ६९ सेदपरामास स्थान २५ सूकमिदा कृमि २३० सेदमा तशाटक द सूकमिटा २२९ सेधक पगु २२० इटिका कारबन्धन १५ सूकरिका वृक्ष! २३८ सेरयिलासया सूचिकानि १२६ सेलमय पानुवय २२० शुकार्य हनुरे १२० सूचीका हवमाभू. १६३ सेलुफ्ल २३८ हायकरणात सूगावावत सूनाम्यात १५९ सेटूरक पहावग मूत्रमागध कमांजीगिन् ११० सेवगारत १८१ पृशज्ञानि सूपति सेशला २८ हपमार ५९-१२६ सेनिनिधिषिसेम मुगमिक पर्ग इसमम्म सूपोइन प्रीग्निपत्र २. मेगा २९ मेरिपरिहि सेपितविधि १-१. पापिपारा बाप्पा मांजीरिन् रा- पार १ " १७ सेतमुरा १९ सेतस्सतरा गोत्र ९ ९ ८ १४६ सा " " सूप? .. इत्याग १९ सेवाति ५९-१२८ सेवादप १०५ सेपितविमासार ५९ हापडसर ५६ थर्मन्द्रमा 1-1-116 गोरख मुमोदन " ३२४ अंगविजाए सद्दकोसो २३३ हिमगिह १५९ हारावलि हारित " ६२ हारीहह ७० शब्द सन्द पत्र शब्द इस्थिमधिगत इस्त्यधिकृत १५९ हंदोलक हिंदोलक ८० हिस्थिय स्थल-जलचर २२७ हत्यिक बाभू. ६४ हातु धातु ६ हिदयत्ताणक आभू. ६५ हस्थिक्षस कर्माजीविन् १६० हार कण्टआभू. ६५-१६२ हिदयाणि हरियमच्या मरस्यजाति २२८ हारङग धातु हत्यिमहामत्त कर्माजीबिन् १६० हारमूडमय धातुपन २२१ हिमवंत पर्वत हरियमंठ थामू. ७१ हिरणपडिपोग्गल १४१ हनु (न) मूलजिह्वामूलीय किया १४८ हिसेत? क्रिया १४८ हपगिह हयगृह १३६-१३८ गोत्र १४९-१५० हिंगुलकप्पम वर्ण १०५ हरित चतुप्पद पक्षिनाम ६२ हिंगुलमरणपडिमागा हरित वर्ण १०५ हारीडणिप्फाव धान्य १६५ हिंडाघोडा वृक्षजाति हरितवपणपविभाग गोत्र हुतासिणा सिहा हुवाशनीशिखा ११९ हरितापरसत हरितापप्रय हुंदित किया. ११८ परिमर्पजाति हरिवाल १४१ हासहासित हेट्टामुह अधोमुस १४३ हरितालवण्णपरिभागा हेटिम अघस्तन १११ ५८ हिजो हाः २३८ हरितालसमप्पम हेलिमजोणि १४० वर्ण १०५ हिट्ट हृष्ट १२-१४७ हरितावरसम क्रिया हेडित १४८ हरितापय २७ हिता हृष्टता हमितविधि हेतिबद्ध २१६ ९.१०-५९ हितयात हृदयाकृत ११८ कमांजीविन् १६० हमितविभागा ३६ हितयागून 12-३५ हिवयाणि हृदयाणि ११८ हेरणत्याय हेलनार्थाय પર इसीयमाण हममान ३५ हितयाणुम्मजिवाणि भविष्यति ८१-९०-९१ हमुहोलक भाभू. ६५ हितयामास १३. हरमाणि ११५-१२८ हस्मा किंचि दिग्या ५८ हिव्यत प्रस्त, रजित ११ इस्सा य किंचि दिग्पा ११५ हेरणिक २४१ हेरणहाय " १८ हमियाणि चठदस १२८ होम्पति तृतीयं परिशिष्टम् अंगविजान्तर्गतानां प्राकृतधातुप्रयोगाणां सङ्ग्रहः घातुरूपम् पत्रम् अ ६ १६८ ३०-१३० ८३ पत्रम् धातुरूपम् अपकट्टित्ता १४८ अपकट्टिती १६९ अपपिसत्त १४८ सपछुद्ध २५१ अपणत ८३-१०७ अपणामंत ८४ सपणामित ८७ अपणासण ५३० अपणासित १९३ अपत्थर १६८ अपमजित अपमह ३ अपलिखित १४८ अपलोलित ३० अपवहित १३५ अपवत्त १३०-१६८ पत्रम् धातुरूपम् १६९ अभिवंदहे १६९ मभिवंदिऊण अभिसंगत १६ १६९-१७१ अभिसंधुत १६९-१७१ अभिहट्ट मलंकरमाण अलंकारेति १७१ अलंकारेहिते १४८ अलंकित १६९ मल्लीण अवकट्ठति १११-१७६ अवकट्टित १७१.१७६ अवझरिसेंत भवकिण्ण अवक्खित्त अवञ्चत भवजेयमाण १७१-२०० भवणामित सवणेत १६९-१०१ ८० १०८ १७१ १६-३८ १९८ अकोडित अक्रमंती अक्खारित अक्खोहित अग्यायते मग्याहिति अचल्लीण मच्छाइत अच्छादण अच्छायित अजिहिते सम्झावए मझेणणासिव मणमियित अणवत्यद्ध अणुगंण अणुनुरित अणुपविट्ठ अणुलित्त भणुलेवण अगुवासहस्सामि अणुवक्साइस्सामि भणुवसामि पोहंत भण्हेते मतिकंत भतिगत भतिवस भतिसरित पतिहरंति मधिसमाण मधिवसिस्सति मघीयता मधीपाश भयोमरित भारत मपनि ८० अपविट्ठ २३५ अपसारित क्षपहित ८७ १९८ भवमट्ट १०८ ७ ४२ १३० ७ १ १९३ १३०-१६८ अपंगुत १९३ भपायुर्णत अप्फालित अप्फोडित थभंगण ४१ भन्मुक्कदित १०. अब्भुत्तिट्ठति ८. अन्भुस्थित १०० भन्मुप्पवति ८. अभिजाणइ ८६ अमिनिय १०० ममिणदिव १४७ अमिणिदिसे १९२ ममिपिस्सित ५ ममिणीयमाण ५६ ममिनिहिसे २१५ १३५ १९८-२१० अवमाणित ३८ अवयश्रांत १४५ अवलोकित १६९-२९५ भवलोणित अवलोयित १११ भवसवंत ११५-१९८ अवसक्ति भवसकिय १४१ ४ अवसरित १९२ अवसारित १६८ अवस्सित १४ अवंगुत १५२ प्रवाहमंत १९८ मयोह ८९ अस्साएति १५० मस्मात २. भस्मादेहिति २. भस्सायेति १३. १९८ १९८ २१५ ३८ १०१ ११८ ममिमट्ट १४. ममिमिहंत १६९ भमिवाहित ८१ ३२६ अंगविजान्तर्गतानां प्राकृतधातुप्रयोगाणां संग्रहः पत्रम् धातुरूपम् पत्रम् धातुरूपम् अस्मावित अहिजुत्त अहिधारनि अहियाग अंदोलंति १४८ ઉપર २५० आ पत्रम् धातुरूपम् १३३-१८६ भाग्धति १३ धामसंत ८. मामसित्ता १ मारमंत ८० आलद्ध आणिगित १९८ आलोकित १५५ भागात ११५ माविट्ट १७१ आमिचिहिनि ८४ मारेद्रिय ३६ भासबित्ता १०७ भासते ८३ उज्झंत १६९ उग्झित १७००२५७ उज्झीयति १३५ उद्वित ७९ रहित ११८-१९३ उहिंत १३० उड्डग्झिहिमि ३६ उष्णत १५५ उण्णमंत ८४ उपणामित २ २५, उत्तरंत ८३ उत्थत १९२ १६८ १४८ माउंहित माकुंचित माडित आमोहित आगच्ने भागलो भागणेति आगत मागमिस्मति भागमिस्स भागमेहिनि क्षारम्म भागहिति भागारैति भाचिश्मनि माझयनीय १०० उत्थित १०७ मामाइत ६०.८३ थासासण १.८ आमिव ८४ माहारित १९२ आहारेनि १५८ १५८ उदाहरिस्सामि २४३-२५५ उदीरण १७६ उदीरंत ८३-१०७ उदीरंति १४४ उत्रित 0. १४८ १४७ १९८ ८५ माहारेमाण १०० माहित ५३.१०. माहिवनि ११७ माहु २३५ १५७ रह १.७ कति १०० टक्कटिय १६८ टकं (उक्त) मागंदिन माणित मागीय भागेनि भानिमन] भानिगडित भादिमे मायापित १०० रईदित १४८ रवामिव ८४ १६८-100 ८३ उद्धवित ३६ उदीरमाण उदुजमाण ८६ उपकढुंती ८० उपादित १०८ उपसहिता 1 उपग्रहित १४८ उपचानित १०१-२१५ उपगत १४८ उपपद्ध २. उपगामित २५४ उपदामित १२ उपलद 12.101 उपगेटिन ११८-101 उपवत्त ११८ परपित १८ उपविष्ट १.. टपरेमग ११२-1. उपप? ६६.८३ उणित २१५ उस्मर्गत ११० १६८ ८१ रस्सरित उस्ममाण रश्मि मापारपु मापारनिता भापारपर मापारपे बापारिसमा १९८-10. १९८-100 " रेग्गदित रम्पादित ८. १५ उपनि मापारे ११८ 1१८ १२. रचारित ८. 101 राति बार १.१ उपमारित .-11 समेत एतीयं परिशिष्टम् पत्रम् रममत ." पप्रम् १८१ भोगिन २. भोधात १८१ भोल 1१५ मनधित १९५ भोमणि ८.-1४४ متنزه لنا पत्रम् धानुरूप २४१ उपगरिन ८५ उगादिया ८५ उदेश ३० रंगा २४५ उपाग -1१८ उरित रमदित उमंग the 1९२-1.1 २८ सम्मपिण रमल 9 भोमधिप .. मोमुर १८ भोभमान १२३ भारित 1. भारत १५८ भोरना 1. भारत १४८ ११८ उम्मेलित उमंदागिन ११ १४८ 71-7AL PAL गार 16 उगमा उस्मा। ग्गिा अगित ११-१९८ १४५-1४८ A 10-11 AR ملوانا ܐܘܕܬ݁ १४-१.१ त armire عذرانيد ग A r 1.. 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३२८ भंगविमासान पारसपारामगंगा पत्रम् पत्र पानुरूप १५५ मा 11.-11 माग पषम पर १८-१५५ मा कापमान कामित 12 ១ខែ។ . 16 गरम 1 दिन froमामि सिविल तिथिमामि जिशिप २१-२ ति " गायों ६५ पदमाग 140 १.८ ती 144 गाद १.८ मिलिदिन 1 16 ११५ मिनिसापिस मिमित मुहिन कुरले मुपत १४५ गुप १.. मीप १५ गुप्ततित १५५ दिन 1४८ 1१५ १ eft दिन १५५ गोविन रविन किमणिम्ममग कोहित कोग्वि ८९ ११ मरित २८ वादिन १४८ र ve 1. जयग्मति दिना 11८ जन ८. प्रगित पान पापनि पिपिगोपित पुग्गिा पुमन पेतून १८ ३५. ४८ १२.-10 1.. ४३ ८५ गंत स्त्रमने प्रतिव संदित प्राति साहिति सिरे सिमित मुरित सुधित सुवित मुविय सुरवति 126 १५५-१८१ ५५ ध १५ ८. ममाग १९ जमात २५८ मापमाग ४५ भित्र जाणिमा १५५ मागिता ८०-१४८ जाणे १४८ जागेमा ভ্রান্ত ८१ जापति १४८ १५ चटिश १२०-२१५ चारित १७६ पियेपूर्ण १५५ बितेति २७५ चितेहिति १४८ शुक्रिहिमि १६२ गुंदित ११८-२.५ पेट्टित ५१-९८ १.८ २५५ मुसित १९७ सुहित सोहित १४८ ग छ जीवति १७-१८१ १५५ शारिद्यत असे ८.-१५२ गुण्ण ३. जोइजमाण २५० गच्छंत गच्छे १३५ सहित १९८ ३२९ तृतीयं परिशिष्टम् पत्रम् घानुरूपम् १५७-१८४ १०७ १६९ EEEEEEEEEEEEE झाणित झरण सवित झंझाणित झामित झीण मुझुरायित झुपित घोसित परम् धातुरूपम् णिग्गलित १४७ णिगिग २५५ गिच्छालित २५५ णिच्छुद्ध १४७ जिच्छोडण ३०-१४८ णिच्छोलित ८१-१४७ णिजायंत णिज्झाय १४८ मिझायति १४८ गिट्टित णिगुत १९८ णिहुममाण जिटुभंत २५४ णिटुंधति ३८ णिड्डील णियादित ८३ जिपणयण ८१ गिगामित २१७ णिपणीत पत्रम् धातुरूपम् १०६ णिम्मजित १०७-१७६ पियक्खेति १६८ गिराकत १०८-१६८ गिराणत १०६ णिरिक्खति १६८-१७१ णिलिक्सति १९९ णिलुलित ३४ गिलुचित मिलूचित १०७ मिल्लक्खित ८१ णिल्लिक्षण १४८-१९७ गिलिखित ३७-१३५ गिल्लिहित गिलुवित १६९ जिल्लहित गिल्लेलेउ णिलोकित १९८ जिल्लोलित १६८ १७१ णिवर्जत १६८ १६८ १०१ ट १६२-१९८ १७१ ८० उल्झति डहंत १७६ १९८ णञ्चति गचित १६८-१९८ ३६-१३५ १९८ णिवण्ण १७१ णिवसिहिति १७१ २४६ णिवुड्ड णिवासेंत पापफहित शमंसित णमोका सिजति णाहिति पाहिसि णिकदृति णिकायित गिकुज गिजित णिकुंजण ११७ १०८ १७१ १९८ १७१-१९८ णिजित णिकटित गिकि णिश्वगंत २५८ णिपणेत १५५ णित्यणित ५६ णित्थुद्ध ८४ णिद्दहति २६५ जिद्दिजति ८०-१०८ गिदिसे १९८ जिद्दीण १८४ णिद्धावति १६९-१७१ गिद्धाडित १३० णिद्वोत १५७ णिपतित १९८ णिप्पीलित १९८ णिप्फजते ३८-१४४ जिप्फाहित १६९ णिपफावित जिप्फीलित १०८ णिप्फेहित ११८-१६८ शिवोधत णिमग णिमामित १०८ २६० १६९ णिवेसंत २४३ १४-३६ णिवेसित णिवोल्लए णिवोडित १६८-१08 णिवहिनमाण १०६ णिग्वहित १६९ णिवत्तते मिन्वाहित २५५ जिब्वामण २५७ णिग्वामित णिव्वासित णिवाहित १६८ गिविट्ठ ११ णिच्युत २ गिसण्ण १६२ णिमरति १०६ मिमामेति ३. णिमारेति १ गिमित 11८ मिसीदंत १६९ १५५ 1." १२.१९२ णिक्वती शिक्षण पिरिसण्ण गिक्षित मिक्खिय गिरिखपमाण निमुस्सति ८० १.८ १६८ जिम्मत शिमगमिस्मति २५५ णिमिदंत १.८ गिमीटित ०६ जिम्मनग मंग०४२ ३३० अंगविज्ञान्तर्गतानां मारतधातुप्रयोगाणां समाः पत्रम् पयम् धानुरूपम् प २५५ पत्रम् धायुरूपम् पगलिय २५५ पपईत २८ पधमण १२३-१९७ थकित १०८-१६९ थन १०८-२४६ थर्णत १७.1३५ मित १५५-१६८ धेग्विद १९१ १५ ११८ ५५ १९८ धातुरूपम् मिसुद गिसेवति णिस्सरित हिस्ससति जिस्ससंत हिस्ससित हिस्संघति णिस्सारित हिस्सावित शिस्मित णिस्सिचित पिस्सिधेमाण जिरसुंधित निहित जीणित जीणीयमाण जीरकम पीहरति णीहरेंत णीदारेति णीहित १४८ ११८ पपावण १४८ पपठायण पति १४. पचार विममा ८३ पचालदित ८० परमादित २३६ परऐटित ८३ परछोगित ८.-1५८ पजायनि ८१-२३६ पजायते पनायिस्मति १०८-१६८ पामग 101 दलायते १६२-101 दलिय 101.1८६ दरसामो १२५ दायते २५५ दाटित ११५-१८४ ११.१४८ दाहिति १९८ दिनिस्सति १९८ दिनिहिति २३६ पजाहिति १०८ १९० २४७ दिस्सी दिस्मते दिस्सहिति दीसति दुसिस्सति १०८ ८ पशुवामंत ८३-१०८ पळोवत्त ८४ परिभोधुत ८. पडिगमिस्ससि १७५ पहिउद ८३ पडिग्छित पडिहुन्छ ३९ १४८ १९२ २३६ १६८-१७० १९९-११ घ १८ धणित ४४ घमित ८० धंत १२१-१६९ गुण जेय णोल्लण गोलति पहाण पहात पहाधिति पहायमाण पहाहिते १९३ धंसित 61 धावति २३९ परिणामित १४८ पडिणायित १६८ परित १४८-१९७ पडिदिण्ण ८० पडिदिष्ट १५८ पडिपिक्खिया ८४ पडिबुग्यते ८०-१४८ पडिबुद्ध २५४ पडिमुंद्रित १६९ ८४ ३८ ८४ १५ ८३ ११ धावित धाहिति धुत धूमायत धेत सं.हेय धोवमाण ३८ १७१ १६९ तच्छेमाण तणित तण्हाइत परे १२१-२४६ १० न १४८ निवेसए १५८ निवेसेति ३२ पडिलोलित ३८ पडिविक्खिज पडिसरित ११ पडिसामिजमाण ८३ पडिसामित परिसिद्ध ८०-१६९ पडिसेधित २१५ पडिहरित २५४ पडिहारित ८० पढति १६९-१७१ १९८ २४५ १७१-१९८ १४७ तासित तिरिण तिलेमाण सुच्छित दूरिस्य तेणित प १६९ पकिपण ११८ पट्ट २६० पखलित ११८ पगलिस १७१ ८३ तृतीयं परिशिष्टम् पन्नम् पत्रम् धातुरूपम् ८० पविट्ठ ३६ पवियात १५५-१६ ८० घातुरूपम् पदित पटिहिति पणामयंती पणीवते पतंत पतिगिण्इंती पतित पतिसिजति पते पत्यारेय पथारइत्तु १९४ १६९ २६५ १९३ १९४ पविसित पविसित्तु पवेक्षति पवेक्खयि पवेखति पवेदये ७६-७९ १९४ १ २४५ पवेदिय २१५ पवेदेज १६२ पवेदेनो ५३३-१७६ पवेसित ७ २४-१७ १०७-१९८ ८० १६९ पत्रम् धातुरूपम् ८१ परिचेति ८४ परिदेवंत १६९ परिदेवित ५६ परिधावति ३६ परिपुच्छेज १६९ परिपुच्छेजा १५५ परिब्भमे १२६ परिभीत ४५ परिमजित ११७ परिमत्थित परिमद्दित ४५ परिलीढ ८० परिवत्तते १९३ परिवर्तित ३९ परिसक्तो १४८ परिसवंत १५५ परिसडित १७१ परिसाडिय १६९ परिसुक्क १४८-१७१ परिसोडित १६९-१७६ परिस्संत १०८ परिहायति १६९-१७१ परिहायिस्सति १७१ परिहित १३. पलित २१५ पलिहित १३०-१७६ पलोहित १७१ पलोयंत १५५ पलोलित पलोलिय १७ ११ २४ १३५-३७ १६९ पधावति पघोषण पपोवंत पपतण पपुव परफडित पफोहित पम्मट्ठ पमुक्क पमुञ्चति पमुच्छित ६७-८७ पवेसियमाण पसस्सई पसस्सए पसस्सति पसस्सते पसंखित्त पसादित पसाधेहिति पसायति पसारित पसारेति ८० १४८ ८० १७१ १६९ १२१ २५० १३०-१९३ पस्से पसुत्त पमुत पम्मुय १९५ २०० ८१ १-१९३ २४५ १३०-१६८ पन्हुत पयलाइत पयसायमाण पयलायंत परहिऊण पयाहिति पराजित परामसति ३० पवक्वामि ७ पबजे ११८ पहत १०६ पहिजते ८१-१९७ पाठणेति ४२ पाउत १६९-२१७ पागडिय पागुत ५९-८१ पाढेति ९ पातित २५५ पातुर्णत १३५ पावह ८ पावनि १५ पाविस्मति ९ पाविस्ससि १९३ पाहिति १५८ पांगुहिति १४८ पिणिदंत पिणेधण १९१ पित ५ परावचिय १९२ १९२ ७६-९८ पवहित १०८ पवडत २५७ पवत्ता पवयण सं० प्रपतन २०. पवविस्सामि १०८ पवसित ६२ पवादित १४७ पवायण १७. पवायित " पदासण ८. पविद्यागिया परिविचित परिक्षीण परिसर परिस्सेद परिघुमति ८" १२ ५६ स्थियिचा अंगयिवान्तर्गताना प्रारतपातुप्रयोगाणां सादः पत्रम् धानुरूपम् पत्रम् ८३ १२१ १९० मानते ८. माग धातुरूपम् पियति पियासित विहित पीणित पीत पीलित पुरिजमाण पुरिछत पुग्छे पुरोना १८१ भगिनते पत्रम् पायुरूपम् मादित १९५ मिटी 1.0 मुनि १०-११८ मुरिहिनि २५४ मुराद १४८ मुगेन ५ गुदिन १४५ २१५ मुंगद मह १९५ भगति १६-८७ मणित य । र ८. पुफिय १४८ ८३ निरि ८४ रमेदिनि १६.९८ गायत ८४ रंति ०९ गणि भमने . भरेनि ११-१५५ भरहते मचिस्मति १४८ भविस्सते मेरोत १०० भमंति १५९ मामित १२ भासमाग १४५ मिष्ण ८५ मिन 1.0 मुरिसत भुत्त १५२ भुजति ८७-२५५ २५५ रिंगमा ११८-१५५ पण पूयित पूयिय पूरण पूसित पेरखति पेसचे पेक्खमाण पेश्चत पेरिखप पेच्छति पेग्छते पंडित पोरुपविद्ध पोसित २५९ १५५-१६२ दगार सदापित २५४ १२१.११८ २०.१४८ १४८ १८४ ६१-८३ रोजयिस्सति रोक्त फ ३१-१३ ३० २५५ रोहण भुजते ८३-100 अॅजिस्सति ८५ भूसित ३० मेदति ल ८३ एपसये १८ भेदित ११८ मा ८.-२.. म ७ फरिसायते फरिसाहिति फलिय फालित फालित फालेत फालेती फासित फुलिस फुल्लित मित फोडित ८० १९८-२०. २४५ एमति ८३ समित्तार्ण ८. लमिरसति ८. रयित २०. एंछित ८० लासित १६९.७५ लीण ८१.१४८ लुचित १४७ लुलित १२१ सहित हासेहिति ११४ मनति १६९ मजिय १५५ मत मधित १४८ भय १६८ मरिस्सति १४८ मलित मंटित ८७ मंतुलित मंतेति १९५ १५-६९ मंतेहिति १७ माणेहिति १७ मारमरीति ८" व ८ १५०-११८ १४८ पुज्झते युवति व्या बूवी ८४ HEEL घ बोधिजमाण ८४ २५५ वखस्सामि तृतीयं परिशिष्टम् पत्रम् ११७ १८ घानुरूपम् घरवामि धक्यायिस्मामि वनिहिते पति वहिहिनि १४८ ८० ६३-१०७ १२२ १६८-१७१ वडीयत वचने वरियत वदे वधिस्सति दयिस्सामि वफनि १९५ ८०-१०८ ८० २०० वयंत सं० पतत् ८० पग्रम् धातुरूपम् १०८ विक्सरइ १९२ विक्सिण्ण ८४ विक्सित ६६ मिक्खित्त ८४ विक्खिन ९ मिक्खिरे २३६ विक्खिवमाण ८३ विस्सिये ११७ निसद्धित ६६ विसिवंत ७९ निगलिय २३६ विगिलते १०७ विघोलने ४५ विचलित ११५ पिच्छिपण १७१ विच्छित ६ विच्छिन्न ६ विच्छुद्ध ६ विच्छोभण १५५ विज्ञाणेजो ८१ विजागति १४५ विजा १२२ विजिस्मति विजिहिति २५४ विनिहिते १२९ विजेहिति ८४ १०८-१३० विजेहिते विज्झवित २५७ ८३ विज्झीयति १९५ यवस्मति वंत वंदहे वदामि ८० पत्रम् धातुरूपम् ४५ विस्थिण्ण १०८ विदू १९९ विद्ध ३८ विधत्त ८०-१६८ विधावति ४५ विधीयति १३६ विधीयते १०८ विपइंत १४८ विपाडित १३५ विपक्रहित विप्पकिण्ण १०७ विप्पघोलति विप्पजोयित विप्पमुक्क १२२ विप्परिचेट्टते विप्परिवत्तते विप्पलोहित १६८-१७१ विप्पसारित १४८ निभाएजो २३५ विभावेतूण चिमाणित १८-२१ विमिसंत ८३-७६ वियंभंत ९० वियाकरे ८१-९८ वियागरंति ११० वियागरिज १६८-१७१ पियागरे २५० वियागरेज १६८ वियाजिजमाण १५५ बियाण ३७-१३५ वियाणिजो ८० १५५ १०८ १४ वैदिऊण दैदिन वाइय वादित वारपण वायए १०८ ६ ३७ ६१ वारंत वायेतो १० ७ वायेहिनि वाविद्ध वासति दासित वादरनि वाहित ३६-६० १४९ १९८ १०७ विणट्ट १९ विमाकरे विनागरे विनि विकडित १६९ वियाणिया २४ १४-८१ २२ २४६ विपण विपिय विगत gra विपिन मिति विणत १५२ चिणमंत विणस्सिस्सति १२-६१ ८०-१०८ विणासण १०८ विणासिजमाण १५५ विणासित १३० विणिटुंत १७ विणिकोलंत १२ विणेच्छिति १५५ विष्णातूण १८१ विण्ड १३. वितत १४ वियत १४८ बियाणीया १९८ वियाणेनो १०८-१६८ बियाणेय विलमति विरोइंत ८४ रिलंधित १२७ विलित ११७ बिलिंपनि 10 विपिंव ११८ ४४ अगणिधानगंगानां प्रारमधागुम्योगा; भार पत्रम् पाया पाणुस्पा fifififelt 16 पिणे शिगित निये रिपे बिगी ४५fin ४ मत u mile!! ५ mmsin ११. मगर 11 १.८ गणमान " fanteria min m 4. 1-1.५ मिना शिगज पिोप " १६८ मागिर २.-८ मानस १.८ सम्मान १२९ गरी ५८ गगन ८ IHAR FArg Murly गुरा .. मूहिट বাস पंप पवित्र परंत गागा ririt विद्या मंपिद्विारा २५४ १.५ गुशि 11८ गुण १५४ पोमत पोप पोप्यामि पोसहमाग ३ गुप्त २५ गरी . ३५. २४. गोभी 100 गोनि " मा. ८. १२५ गत सगरमाग सग्गिानिय समिाहित गणिगाव सनिबमाग सण्यद सदिशारित १५५ जा५ 10 जापने २१ संगम २४९ मंत्र 11८ पने तिहिरी 1. मपात १४४ मथुन 14 गाय १५२ परिशिया १५ सपना १९८ मंगधारए ११५ संपाधिप २.. मंपये २१९ मतो १९५ संगत २१५ संपापित २५८ मंपिरित ४ संपीडित ५५ संमति ८५ संभव ३. मंरिट ५ मंदिभाग्य ११८-100 मलिन २१५ ८५ "गने ३५-1१५ २५ ११ " हगित ५५ हमीपमा २८ दापनि-से 100 दारित ११५ हिग्यत २२-114 दिसत ८३ हुंदित ममगुरत्तनि समनिकन ममनिरिमय समभिजामह समठिकति समाचरे गमापर्यन समाये समाणित ११८ ११ १४८ १५८ १९८ होरपनि १ होति १५ होहिनि 41-९. १०० ८-२१५ चतुर्थ परिशिष्टम् (१) अंगविजानवमाध्यायमध्यगतानामहानाम्नां कोशः बेगनाम सपी शोकांकः अंगनाम सोमांकः अंगनाम सोर ४ २ संसार ३०९ २ फगवीर २.९१०.१२८७.१७५९ २ म1ि41.१२४६१२८५-१२९८. १९५-१६०८.१०२९ १५२९.१६४१-१०२१.१०३७. १ असीमागिय १२८ २ सय २.९१०.11८1.१२९८-९९ १०३८-१०६२ १०३१ १५२९.१५03.18.२.१९२४. २ मरिगमरमंतर ७३६-१२४६ उदर ५.१८३-१९७.१०९९.१२०० १९५१-१९०३.100.101.. २मगिरण १४७० १२८१-१९६-१९९८-१००४ १०२१-१०२८.१०११ २ मरियर ३०६-१७२६ १०३.१०१० २ पगलिगा २ मरिगुटिका १९५ १ उदरपुरिम ६.८ २करमरम्म २ मरियर १५९९ , उदरभंगर ०३८ २ करमराठी ११-१०४५ २ मरिमतिनी १९४ उर १-१८१-५२२.१११४-१५... २कगीत २ पग्गग्ग १०४५ १५६३.११.1.10111५. सारेग १५३८ १८.1010-1०२०.१०२५ १०१० २ जाती २मरिउमा तर १२८१ १ रिंग ५१५-1५१२ २मटी २.१४९९१०२०-100४ , उम्मंतर २मानित उपपग १५१२ गुरिग २ मघर १५.९.१५१९.१६२.१९९८ २ उपपगरप्तिममाग ५९.-१.१५ मधिद्वार १०५८ १२.. १५११-१.१५ मंगु ५.१५...१५१1-180- ५५४ ९१०-१२८१ 1.10.100-100 १५११ २ सामानर .. परम २ का १ २ टिममाग " . 1..1 ...11..14111५१९.. 141.1१64.100.101.. ५ ९.11.11.11. ......... 1..४९.101. . ....111.1.16. . Item .
३३६ " २ गह २ गंडपम्प " १ २ गोष्फ " २ गोष्फग 1 जामि अंगविज्ञानयमाध्यायमध्यगतानामङ्गनाम्नां कोशः कंगनाम लोकांमः अंगनाम श्लोकांक: अंगनाम शोक २ बलुक ६५१९-१६३२-१७२९ २ जंतुनरपुरिम १६६८ १-५२१-११९११२१६ २ जागु १२८१.१५:९-१६०८. २ ११६९-१०२० २-१९३.५२४.९६७-११४९. १६३१-१६६० २वारक १९४ ११८१-१५००-१५३९.१५६३. २ जाणुरच्छिम १६०८ १९४-१९८५.१२८०- १६२४-१६४१-१०२५-१७३३. २ जाणुमीम १७१० १९५-१२८५-१२८७- ३३३९-१३४९-१५२९- ४-१९२९-१०००-११९४. २ गहन्मंतर ७३८ १५६३-१५७७-१६२१- १२१६-१२९८-१५००-१५३८. १गीवन्मंतर ०३८-१२८६ १६०१-१००९-१०२०- १६४१-१७३३१०१० गीरा १९५-११४९-१२१६-१२८१ १०३८-१७४०-१७५६ २ यशपाटी १ गीगापच्चिममाग ६.० २ देटिक १५१९ यतर १८२-९९०-१६४१-१६५७ २ गीगाहे १०२६ २ जयण २००९-१०५९ २यमिका १५२९ १ गुमंतर ०३० पह १२८५ यूणा १९४ गुदा १९५-१०१०-१०३० १००५-१७५०-१७६० यूरक १९६ ६-१०१५-१०६०-१०७३ २०ण-प १२१३-१033-१६०१ १२८५ १२०६-११७०.१५१२- १ २०णहमिदा ९६७-१९८१-१२१६-१६२४. १६३२ गहसद्धि १७५० 100 १२८१ १ गाणी (णामि?) १८२ ५२४-१११२-१६०१-१६५ १ घाग १३३१-१३१९ १९६-१०९६-१४६९. १ दंतमय ३-१२८७ १३३१-१३४९-१०२४ १५३८-१०२० दंवरही १९५ २ पद्ध ५ जाभित्रमंतर दंवबेटा ३ १ चिमुक १५१० दंतमिहा १ जामग्ग १०१७ १७५० १९६ दंतसंडिका-दी १०१५-१७५० २ १ उगली १९३ १जामा १८१-९६०-१११९- १९५ दाढा ११८-१५१०-१६०२- , देहफरिस १३२१-१३४९ २जण्णुक-ग १०२९-१७१३ धमनी १६२४-१००१-१७२९ २ जण्गुगमंघि २ पोह २ १९६ १५०९-१७२८ १-५२२-११०९ १ पट्टि १९५-११९४-१५००-१५१२- १ णामापुट २ अनुमन्न ५२४ २५२१-१५६३.१६.८- २ ९६७-११४९-१२९८- १६६८ १०१८-१७६० १६९७.१००९-१७४६ १०३८-११२९-११९४- २ पट्टीपच्छिममाग ६० पायापुत्तक १८१ १५२९ २ पट्टीपस्म १०९६ णापास १ ननुभंवर १०३० २ पण्डिका बत्तुचर , णामिकामंवर १८१ ७३० २ पण्डी १६३२-१६०३ २जंघमंदर ७३६ , णामिका १९४.१६११-१६५४. २ पण्डीतल १५६९ ३जंघा १९६-१.१५.१०.३.१३०६- १७२१ २ पण्डीपटिममाग ६१८ १५०९-१५२१-१६३२- १णिदाल ५२२.९६६-११५०-११८- २ पदेमिमी १७५४ १६६०-१०१०-१७६३ १३९८.१५१०-१५६९.१६०.. २ वापच्छिममाग ६१८ १६०८.१६२१-१६११-१७२१. ३० पध्वंतरंगुळ २ अंगारस्म ६५८ १०२५.१०४५ २ पस्म १-५२२-१७९-१४६९- २ जंघापुरिम ६९८ २ गिहालयस्म १६९८-10६० २घामम .निवार पुरिम ६९० २ पाणितल १२८०-१५६१.१५१९. अंधोकमंतरभाग शिटाइम्भंवर १५३०-१६०१-१६०८-10५६ २ अनुभम्वर तया 1010-1०६० ३ पाणितटरमवर " १५१२ " २ पवाह चतुथै परिशिष्टम् २ पाद 'यंस १. पादणह २ पादतल मिर्यट २ पादपट्टि ६५८ २ पादपस्म २ पादहितय २ पादंगुह अंगनाम श्लोकांक अंगनाम श्लोकांक संगनाम शेर २ पापितलहितय २ मुम ११८१.१५२९.१५९९ 1 [पग्यि] सीमधुरिम ६ पाणिदेहा १५२९ १६९८-१०४५ यठी ६.१३३१-१३३९-१४७०० १ भुमक १९४ २ पसग १०२९-101 १६६७-१६९०-१००४ १ भुमरंतर ११४९ २ यमगंतर १७३७-१७५९ १ भुमकंतरसंस १९५० २ मुमगमतर ७३८ २ संग २-५२४.९६६-1101-10१९. ६.१०७३-१२०६-१२८७ १ मुमंतर ३०६.१६२४.१६५७ ११००.१५१२.१५३९.१६४१- १५६३.१५६९-१५७७ २ भुमाधि १७१८-१०१५ १६.१.१६०८.१६३२. मझ १५५९ १७५६ २ मन्झिमिया १०५३ २ पादवलहितय १५८६ २ मणिबंध १५१२-१०२९ 1मिर ५२२-11५..11८1१५... ५२३ २ मणिबंधहायसवल १५०९-१५२५-२५३९.१६२३. २ पादपण्डि १.१५ मायकमा १.४८०.९६६-१५३८. १९६८-100 १६२४.१६४१-१६५७ मियी १०२१.१०२५.१०३० १०१५ , मिहा १ मस्यकामंतर ०३८ १०१५-१०७३.१२०६. सीता १६६० १५८३ १ मंस (मंमु) मीमंत २ पादंगुलि १०७३.१२.६ १ मंमु ३७७-१५९१.१७०५.१७५० सीम १.९९५-12-1३४९. १६३२-१७४४ २.१२९८.१६५३-१६९८. १६२१-१९४-१९६८.१०२१ १. पार्दगुलिपप्प १९९८-1७०४-1010.१०२. १५५८-१६१३ १ सीसर १०२१-१७२८-१०२३.१७३५. 1.2. १. पाईगुलिपोहिया १०६२ सीमारिखममाग १०१५-१०३८-१०६१ मुहपुरिम २ सीमरम्म २ पंडिका १६३२-१०६३ १ मेड १२००.१२९८.१०३५-10३० ११.२.१.२४ पोरस ५-१.१० , मेहग ४८२.१.९४.११.२.1010 , मोनिममंतर 2. १०९०-१२०० १०५८-१०५८.10" १२२१-१५४९ २ रिजा १९५ , मेहगम्मतर ग (पा) २ फिजापटिममाग १८ १५२९ २रिया १५...१५५८-१९३३. रोम १५१९ 1111-1३१ १०३.१०२९.१०४७.१०६३ २.४८1-1५२९.१५९५. १२८ 10. १९५१-१२४९ १.११ २.९९८-11-1-11९. रहा १५.९.१५२१-११- सोम १७१५२९.१०.५.1.५.. १७२८.१.५० १९९-1१२८ १ गानाटीस्टिममाग .पंगार ११३८ होमती १९९.४८३.१.११. पानीपरम •rig १५८ frie 4.1.५९.1104.१२... 1. न १५५-11 " पालु मन मोप मेंट २ साली होमग २ माटीम १ माटीमा १५८ १mily Brgin 1414 नि Parin.1.1.113... १५.1.1.16 (२) अंगविजानवमाध्यायप्रारम्भे निर्दिष्टानां २७० अविभाजकद्वाराणां सङ्ग्रहः द्वारनाम द्वारांक: द्वारनाम द्वारांकः द्वारांक १८२ २२३ १३४ द्वारनाम ९ गंभीरा ४ गोझा च ४१ चटरसा ८ चतुक्काणि २ पत्तालीसनिवा ६ चपला २८ चलाणि ३६ चंदाता १२० २४२ २०२ २५१ १८. २९ २ अणू ८ २०३ ९२ ८९ २२१ ९४ १२९ १५४ २३९ म इ १० अगणिकाइकाणि १४४ १४ इस्सरमूता १. अम्गेया १० इस्परा ० भचपला २२२ १६ भणायवाणि ११ १. उजुका ०५ भापकाई २३२ १४ उष्णता १. अणिस्सरा १३५ १० उपहा १२५ २ उत्तममग्झिमसाधारणाणि ५. अपणजणाई २३५ २० उत्तमाणि ५. मनिकाहाणि २४ १० उत्तरपञ्चत्यिमा १६ मतिवचाणि ९ १० उत्तरपुरस्यिमा २ अदंसणिया १० उत्तरा १३ अघोमागा ९५ ५ उत्तागुम्मयका १ अपरिमिते १२ उद्धमागा ५. अपसण्णअपमण्णा ९८ ५ उवग्रहणागि ४ अप्पपरिग्गहा १६१ ९ उवयूला ५. अप्पसण्णा ५. उवद्दुता २६ अप्पिया ११० प २० अप्पोपचया १०८ ५. एक्काणि ४ अबुद्धीरमगा १५९ ओ अभंवरमभंवराणि १३ ५० ओवातसामाणि ५. मर्मतरवाहिराणि १५ ५. ओवातागि ५. मन्म॑तराणि १२ क २६ अथिया २ कृष्णेया १९ दिवरा १९३ १० कण्हवण्गपढिमागा ५. अब्दोभावाणि २३ ५० कण्हाणि २ असीतिवम्मा २६२ ११ करणमंडला ३३ बता १५० ५काया १६ अंबराई १० किलिट्ठा आ १२ भाकामा १३० १. कुरिला २३ भातिमूठिकाणि ११८ , कोडिवग्गे ६ भापता २०१ . माययमुदिता २ सत्तेमवेसेजागि १. माधुशायिकाणि १३ ११ सवाणि २० मायुप्पमागे वस्समतपमागाणि १७ २४ खरा 1. मागेया १८९ ग .माहारणीहारा ८३ २ गततालुगणपदिमाग्य ५ गहाण .माहाराहारा ८२ ७ " " १८ १० जपणेया १० जम्मणा १७५ १० जहण्यणि २८ २० जंगमाणि २५ जुत्तोपचया १०७ २ जुवतेया २ जोवणत्यमझिमवयसाधारणाणि ३० १४ जोवणल्याणि ३१ 3 ६ ठिामासे २५४ २४५ २४६ ९ २१७ २१८ ठिामाले भसितवण्णपढिमागा ६८ ठिआमासे कोरेंटवण्णपहिमागा ठिामासे चित्तवपणपडिमागा ठिामासे गिद्धलुक्खवण्णपडिमागा ०३ ठिामासे णिवपणपडिमागा ठिामासे पंदुवण्णपहिभागा ठिआमासे मणोसिलवणपहिभागा ६५ टिआमासे लुक्सवण्णपडिमागा ठिामासे सुब्रुगगमवण्णपहिमागा ६. टिआमासे हरितालवण्णरहिमागा ६५ हिमामासे हिंगुलकवण्णाटिमागा ६६ " २१४ २२ १२२ २२९ १० किसा २६९ ख ४५ ३ २६४ १.माहारा ५८ पुंसकागि २ वुतिवग्गा २० णानिकिसा ०५ पयकाई ८. १२८ ३ गंधेया २३१
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३४० अंगविज्ञानवमाध्याये विभागशो निर्दिष्टानामगनाम्नां यथाविभाग सग्रहः द्वारनाम द्वारांकः द्वारनाम द्वारांक: १०३ २१ १९ विवरा १५ विसमा २ घीसतियग्गा २ वेसेजसुदेवाणि १४ वेसेजाणि १८८ १९५ ११८ स ५४ १५७ १. लुस्खणिद्धा १० लुक्सटुरखा "लुक्सा व २० वटा १० वणफइकाइकाणि १६ वचमाणाणि ७५ पराई ४ बातमणा ५. वारणा १७ वामाणि १६ वामा घणहरा १६ वामा पाणहरा ५८ वामा सोवद्दवा १२ वायुकाइकाणि २८ नियदसंबुढा ५० सकपरका ५० सका २ सहिवरगा द्वारांकः द्वारनाम १९२ ३० संसावामा १८४ ५. सामकहाणि २५० ५० सामाणि १६ ११ सिवा ४२ १. सीवला ७ सुकुमाला ७२ सुक्वग्णपढिमागा १६६ २ सुगधा १६४ १० सुद्देजाणि २५८ २८ सूची १९९ ११ सूराई २६६ २६८ २६० ह १७४ १८ हरितवण्णपढिमागा १६७ १६ इस्मा किंचिदिग्या ५ हिदयाणि २६७ १६ इस्सा २३० १०५ ५६ सहा २२८ २३० २११ १५५ २ सोम्मा १०१ १०० सववम्गे 1 सवसहस्सवग्गे २ सत्तरिवग्गा २ सद्दमणा २ सध्या १२समा सहस्सवग्गे ५८ १०२ १११ १४५ १२७ १९४ ११५ (३) अंगविजानवमाध्याये विभागशो निर्दिष्टानामङ्गनाम्नां यथाविभागं सत्रहः सिहा मनमंख्या भानाम सर्वसंख्या भङ्गसंख्या ७५ पुंजातीय अंग पृष्ठ ५९ २ मितंट १ २ १ मस्थक २ R १ सीस ३ १ सीमंतक २ २ संख ६ ४ १ ललाट ७ २ भण्ठी ९ २ २ मवंग २ २ करवीरक २ २ का १५ २ गंट १७ २ २ कबोल १९ २ कण्णासक २१ २ २ ओट्ट १ 1 दंतला २ १ देवमम २५ १ ३ प २ यंस २८ २ मननाम सर्पसंख्या भनसंरया अङ्गनाम सर्यसंरया बाहु २ ऊरु ६९ ३२ २ गोष्फ ७१ कोप्पर ३४ २ पाद अवहत्यग ૨ पादतल ७५ मणिबंधहत्यसल ७५ स्त्रीजातीय भंग पृ. ६६ अंगुर ४२ १ छगली संघ ४४ १ ૨ गंह ४८ २ कपणचूलिका मक्खक ३ मुमक ५१ २ भक्खिगुलिका यण ५३ २ तारका हितय ५८ २ अक्खिवत्तिणी कुक्ति १ णामिका ६१ २ कृष्णाली घाखण ६३ थूणा पोरस ६४ सीता यत्यिसीस तालुक चन -
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अंगविजानवमाध्याये विभागशो निर्दिष्टानामानानां यथाविमागं सङ्ग्रहः १ १ १ प ५ ५ . १ १ १ ९ - १ ७ १ ११ २ ९ १ १० १ ४ . १ १ ७ - ९ १ १ १० मङ्गसंख्या भजनाम सर्यसंख्या असंख्या अङ्गनाम सर्यसंख्या भनसंख्या भङ्गनाम सर्वसंख्या २ याहुपस्स २० उत्तम अंग पृ.९३ १४ यौवनस्थ अंग पृ. ९७ २ जंघापस्स मत्थक १ उदर . २ ऊरपस्स १४ सीस २ कति २ २ पादपस्स १६ ૨ संस ४ १ जामि १६ अनागत अंग पृ.८३ १ णिहाल २ कटिपरस मुहपुरिम २ १ कण्णपुत्तक २ पटिपरस कण्ण पिडालपुरिम ९ ८ २ २ गंड ११ टोमवासी १ कंठपुरिम ३ २ ओढ १३ हिदयपुरिम मेहण १ १ दंत २ जंतुतरपुरिम धरिथ ६ १ णासा १५ उरपुरिम १ [वरिय]सीस णासपुर याहुणालीपुरिम R फल कणवीरक १८ वस्थिपुरिम १४ मध्यमवयः अंग पृ.९९ २ अपंग २० सीसपुरिम २ बाहा २ उदरपुरिम १४ मध्यम अंग पृ. ९४ २ याहुणाली २ जंघापुरिम जत्तुअंतर १४ १ इत्यंगुलीउदर थणवर २ २ २ अरुपुरिम १६ हत्यं गुट्ट हियय ३ २ हाथ ५. अभ्यंतर अंग पृ.८४ असवीफाणिय २ पादतलमंतर २ २ शंस १२ २ पापिवलमंतर २ थाहु १४ २ जंघमंतर २ कस्मन्मंतर २ हत्य १२ २० महावयः अंग पृ. ९९ २ काखमंतर हत्थतल ११ गीवा . २ अक्खिअभंतर १२ १० जघन्य अंग पृ.९४ १ २ २ वक्त्रणभंतर १४ २ अंगुह २ देत १ णाभिमभंवर १५ २ पादपण्डि १ २ भोट ६ १ मेहणमंतर ૨ जंघा ६ १ णासा हितयसमूह तर २१ २ गुप्फ २ णासापुर ९ कापामठर २३ २ पादहित्य गड णासिकमंतर २ उत्तममध्यमसाधारणअंग पृ.९५ २ कवोल १३ ૨ पाहुणालीमम्मतर २ ૨ भुमकंतर हत्यनंतर २८ २मध्यमानंतरमध्यसा- पिंडाल १५ १ सोणिमन्मंतर २९ धारण अंग पृ. ९६ सिर गुदभवर २ वक्खण २ मत्थक वर २मध्यमानंतरजघन्यसा- २ वालयौवनस्थसाधारणअंगपृ.१०० गिडाल तर धारण अंग पृ. ९६ २ गीवभंतर वक्खण २ गोरफ २ २ गंढभंवर १० वालेय अंग पृ.९७ २ यौवनस्थमध्यमवयःसा- मुमगन्मंतर पादंगुट्ट धारण अंग पृ. १०० जंतुमनंतर ३९ पार्दगुलि ૨ थण २ उरम्भंवर गोप्फ ६ २मध्यमवयोमहावयासा- उदरम्मतर जंघा धारण अंग पृ. १०० पादवल २ जत २ ८ थण २ १. ८ २ ४ ८ १. २ १ १ २ १ १ J २ २ २ ४ १० 1 १ २ २
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अंगविजानवमाध्याये विमागशो निर्दिष्टानामङ्गनानां यथाविभाग सङ्ग्रहः १ ४ ५ २ ७ ७ ८ १ १ ९ १ १ १ १ १ १ ९ १ १ २ ४ १ १ १ ७ १ हत्य ९ १ १ १ १ भङ्गसंख्या मनाम सर्पसंख्या भनसंख्या मङ्गनाम सर्वसंख्या भनसंरया सर्वसंख्या २ बाहुपस्स १० २० उत्तम अंग पृ. ९३ १४ यौवनस्थ अंग पृ.९७ जंघापस्स १२ १ मत्यक १ १ उदर . २ करुपरस १४ १ सीस ૨ कहि २ २ पादपस्स १६ २ संस १ णाभि १६ अनागत अंग पृ.८३ पिडाल ऋद्विपस्स १ मुहपुरिम २ कण्गपुत्तक २ पट्ठिपस्स णिडालपुरिम २ कण्ण ९ २ १ पट्ठिमझ २ गंट लोमवासी १ कंठपुरिम ३ ३ ओट्ठ १३ हिदयपुरिम मेहण १ ११ २ जंतुतरपुरिम धस्थि ६ णासा १ उरपुरिम [वस्थि] सीस १२ णासपुट १६ २ वाहुणालीपुरिम २ फल ११ २ कणवीरक वत्थिपुरिम १० १४ मध्यमवयः अंग २ अपंग २० १ सीसपुरिम २ बाहा २ उदरपुरिम १४ मध्यम अंग पृ. ९४ १२ याहुणाली जंघापुरिम जतुअंतर हत्यंगुलीउदर यर्णवर R २ २ करुपुरिम १६ हत्यंगुह हियय ३ २ ५०अभ्यंतर अंग पृ.८४ उदर अंसवीफाणिय १. २ पादतलमंतर २ २ शंस ६ २ जत्तु १२ २ पाणिवलकमंतर २ बाहु थण १४ २ जंघन्भंतर ६ २ पबाहु १० २ ऊरुममंतर ८ २ हस्थ १२ २० महावयः अंग पृ. ९९ २ कक्खल्भंवर दृश्यवल गीवा भक्खिमम्भंतर १२ १० जघन्य अंग पृ. ९४ २ २ वरखणभंतर १४ २ अंगुह २ देत १ णामिममंतर २ पादपण्डि २ भोट ६ १ मेहणभंवर २ जंवा ६ णासा हितयसमूहमंतर २१ २ गुप्फ २ णासापुट ९ २ कपणमंतर २३ २ पादहितय १० २ गंड १ णासिक-मंतर २४ २ उत्तममध्यमसाधारणअंग पृ.९५ २ कवोल २ पाहुणालीअम्मंतर २ २ भुमकंतर २ इत्यम्भंतर २८ २मध्यमानंतरमध्यसा- णिडाल १५ सोणिमन्मंतर २९ धारण भंग पृ. ९६ सिर १६ गुदन्नंतर ३ वक्त्रण २ १ मत्थक तर २मध्यमानंतरजघन्यसा- गिटालस्तर २ वालयौवनस्थसाधारणअंग पृ.१०० ३२ धारण अंग गीव तर . २ वश्रण २ ३३ २ गोप्फ २ २ गंदम्भतर ३५ १० बालेय अंग पृ. ९७ २ यौवनस्थमध्यमवयःसा- मुमगरमंतर २ पार्दगुटु धारण अंगपू. १०० ३ जंतुमन्मंतर २ पादंगुलि यण २ उरम्मतर गोप्फ २मध्यमवयोमहावयासा- उदरम्मतर २ जया धारण अंग पृ. १०० पादतल . २ जतु २ ८ २ १४ १ १ २ १ ४ ४ ७ ८ १ १ २ ४ ४० २ १ ८ २
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- ४ ५ ५ or ९ ८ १ १ - १० ४ १ १ १ १ ९ १ - २ १ १ ७ v ९ ४ १ ३४२ अंगविज्ञानवमाध्याये विभागशो निर्दिष्टानामङ्गनाम्नां यथाविभाग सङ्ग्रहः अगसंख्या सर्वसंख्या भनसंख्या सर्वसंरया भङ्गसंख्या मङ्गनाम सर्वसंरया २ याहुपस्स २० उत्तम अंग पृ. ९३ १४ यौवनस्थ अंग पृ. ९७ ૨ जंघापस्स १२ १ मत्यक १ उदर १ २ करपरस १ सीस २ कडि २ २ पादपस्स २ संख १ णाभि १६ भनागत अंग पृ.८३ १ गिडाल २ कढिपस्स मुहपुरिम ३ कण्णपुत्तक पट्टिपरस णिहालपुरिम २ २ पट्ठिमझ २ गंड ११ कंठपुरिम लोमवासी ९ १ ३ ओट्ट मेहण १ हिदयपुरिम १४ वस्थि ११ जंतुतरपुरिम २ णासा १५ उरपुरिम [वस्थिसीस णासपुड २ पाहुणालीपुरिम ११ फल २ वत्यिपुरिम कणवीरक १८ १४ मध्यमवयः अंग २ अपंग २० १ सीसपुरिम ૨ बाहा २ उदरपुरिम १४ मध्यम अंग पृ. ९४ १२ २ वाहुणाली जतुअंतर १ जंघापुरिम ११ हत्थंगुलीउदर थर्णतर २ २ रुपुरिम २ ૧૬ हत्थंगुट्ट हियय २ ५०अभ्यंतर अंग पृ.८४ हत्थ अंसवीफाणिय २ पादवलमंतर २ ईस १२ २ पाणितलमंतर २ बाहु १४ २ जंघन्भंतर २ पबाहु ૨ उस्मभंवर २ हत्य १२ २० महावयः अंग पृ. ९९ २ काखम्भंवर हस्थतल १४ गीदा १ २ परिखमभंतर १० जघन्य अंग पृ. ९४ २ वखणभंतर १४ २ अंगुह २ ૨ देव णाभिमभंवर १५ २ पादपण्हि २ ओट्ट ६ मेहणम्भवर २ जंघा १ णासा हिठयसमूहभंवर गुप्फ णासापुर २ कण्णमंतर २ पादहितय १० णासिकम्भंवर २४ २ उत्तममध्यमसाधारणभंग पृ.९५ कयोल बाहुणालीममंतर २६ २ उत्तु २ भुमकंतर १४ हरयन्भतर २मध्यमानंतरमध्यसा- पिडाल सोणिभन्भंवर २९ धारण अंग पृ.९६ सिर गुदमतर २ वक्सग २ मस्थकर तर ३१ २मध्यमानंतरजघन्यसा- मिशालमठर २ यालयौवनस्वसाधारणभंग पृ.१०० धारण अंग पृ.९६ गीयम्भहर २ घरखण ૨ ३१ २ २ गंडम्मर १० यालेय अंग पृ. ९७ २ यौवनस्थमध्यमवयःसा- ३ भुमगरमंतर पाण्ड धारण अंग पृ. १०० ३ अनुभम्र्मवर २ पण २ पार्दगुलि उरमंदर गोफ १ २मध्यमवयोमहावयःसा- उमरम्मतर धारण अंग पृ. १०० पाइतल २ २ २ थण १० ८ १ रे - १ . २ २ ८ २ ९ २ गंट २ २ -- २ 1 .......... , . २ २ है १ 1 ३ ८ , चतुथै परिशिष्टम् ३० २ १० १२ ३२ ३ २ २ जाणु अंस बाहु पबाहु बाहुसंधि २ ४ ૨ २० ४४ २ १ ४६ ४८ १ ५० १ ५ पादंगुलिपोटिया [पाद] तल पण्दि खुल गोप्फ कंडरा जंघा पेंडिका जाणु फिया २६ प्रिय अंगपृ. १२० गिडास मत्थक सीस संख कपण अक्सि णासिका दंत मोह जिभा गंड ७ १ २ अंगुलपोह १० नद २ णासा २ णासपुड ५२ ૨ सोणि २ कण्ण ५५ मेहण ५६ १२ आकाश अंग पृ. ११८ २ पिडाल २ अंसपीढ ३ २ जाणु जाणुपच्छिम पादतल पाणितल पट्टि १२ ५६ दहरचल अंग पृ. ११९ ८ हत्यंगुलिपब २८ पादंगुलिपव १ ५३ दहरस्थावरेय अंग पृ. ११९ हरथंगुलिपध्यंतर २८ पादंगुलिपवंतर दहरस्थावरेय अंग १३ मतान्तरे २ जंघामज्झ २ ऊरुमज्झ २ बाहुमग्झ ६ १ पट्टि २ पस्स ९ २ १ २ २ १ ९ २ ८ १२ ૨ २ १ १५ १ १ २ २ १८ २ १ २० २ २१ १ कडि २ कडिपस्स २४ १ लोमवासी उर २६ १ सिर २७ अधर जन्तु १ ३१ सीस ३२ तल ३३ अंत अंग पृ. १२१ २० अंगुलिअग्ग २० केसग्ग २१ लोमग्ग २२ कण्णग्ग २४ णासग्ग २ कोप्पर २८ २ पण्हिक २ फिया ककाडिका २० तीक्ष्ण अंग पृ. १२२ २० अग्गर्दत २० २ दुर्गंध अंग पृ. १२२ पिहित णासापुड २ सुगंध अंग पृ. १२२ अवगुत णासापुड २ ९ बुद्धिरमण अंग पृ. १२२ हत्थ २ पाद भुम ६ अक्खि मुह ४ अबुद्धिरमण अंग पृ. १२२ पस्स २ उदर ३ पट्टि २ M ७ २५ १ २ २ १ थण थणंतर हत्थंगुट्ट हत्थ णाभि २६ मध्यस्थ अंग पृ. १२० भुमंतर वंस मत्थक मासिका २ कम १३ १ १ १ २ २ १ १ ३ १ २ ४ २ १ ३ ४ १ ६ १ २ १० ईश्वर अंग पृ० ११९ पिंडाल मत्थक सीस कण्ण गंड भुमंतर दंत ओट्ट णासा जिब्भा ५० प्रेष्येय अंग पृ.११९ पादंगुलि पादणह उर थणंतर हितय २ ६ ७ २ ८ ८ १ ९ २ २ ३३ आतिमूलिक अंग पृ. १२१ पादंगुह पाद गोप्फ जंघा २ २ १ 10 १० २ १ ८ ४ २ अंगविजानवमाध्याये निभागशो निर्दिष्टानामङ्गनानां यथाविभागं सङ्ग्रहः 3 o- ९ . १ ४ १ १ १ १ ५ १ १ २ ५ ४ १ ८ ६ २ १ ७ २० ९ १ १ २ 1 १ १ १ १ . मनमग्न्या अङ्गनाम सरसंख्या मनमत्या अनाम सर्वसंख्या अङ्गसंख्या घननाम सर्यमंख्या अधर ९ २ च्यन्त्र अग पृ० ११७ २ बाहु २ थविका រ។ वत्यि २ हयपाद १ मिर १२ [वत्यि] सीम २ २ धर १४ २५ युक्तोपचय अंग पृ. २१, ५काय अंग पृ०१९७ जिम्मा ३ थंगुट्ठ १ कायवंत १ अंगुह अंगुलि २० मन्झिमकाय २ लोम २० १ गिहाल २१ मज्झिमागंतरकाय ३ ६ पाणिलेहा १ चिबुक २२ जघण्णकाय ४ १० परिमंडल अंग पृ० ११५ २ घोट्ट २४ जधण्गतरकाय मत्यग णामा २५ वाहुसीस २७ तनु अंग पृ० ११७ ३ २७ कृश अंग पृ. ११४ २ जाणुमीम २ पादवल २ २ गोष्फ ૨ २ थग पाणितल ४ २ जाणुगमंधि णामि २ कण्ण ६ मणियंध फिया जिम्मा १० १ वत्यग १४ करणमंडल अंग पृ०११६ णह २७ २ [कण्ण] संधि दक्विणवाहुमंडल २१ परमतनु अंग पृ० ११७ २ भुममंधि वामयाहुमंडल २० मग्गणह २ संस १३ बाहुसंघावमंदल ३ घग्गम पट्टि १४ सस्थिसंघातमंडल २ अणु अंग पृ० ११७ वृकुटा १५ अंगुलिमंडल १२ १ अवदु कैसलोमण १ अंगुटुंगुलिमंडल १३ ११ परंपरा अंग पृ. ११४ संघायमंडल मंसु २ २० वृत्त अंग पृ०११६ ५हृदय अंग पृ० ११८ जाणुक २ हत्यंगुलिपश्च पादतलहितय २ २ देटिक पादंगुटिपच पाणितलहितय कोप्पर हितय १२ पृथु अंग पृ० ११६ कम उर ५ग्रहण अंग पृ० ११८ रोम कम हग (गः) पट्टि ३ मंसु २६ टीर्घ अंग पृ० ११४ २ पादतल अधोममु ३ पागितल कत्सा पयाहु २ कष्णपीट ९ ५उपग्रहण अंग पृ० ११८ २ ६ २ गंह १ जिम्मा भरिख रम्द याठि २१ ४१ चतुरस अगपृ० ११७ सोमवासी १ गिहाल १ ५६ रमणीय अंग पृ०२१८ . पहि २६ २ ३ मोह २ २६ युनप्रमाण दीर्य भंग पृ० ११५ पाहतल २ दंत ३ ३ पागितल बिहार २ मति पणिहाल पाहत १ २ पागितल परंगुल १० ८ 13 , १ २ . २ ३ १ १० ४ २ ८ ५ १ ९ - 1 २ १ १ १ ५ २ २ . २ १ २ मुम २ २ ८ २ १ ५ २ ३ १ ५ 1 . २ २ ८ चतुर्थे परिशिष्टम् ३४५ अंगुलपोह १० १० २० ५० २ पादंगुलिपोहिया [पाद] तल पण्दि ३२ १ २ १४ अरु जाणु शंस याहु पवाहु वाहुसंधि १ १ २ ३६ ૨ २ २ ४२ ३ २० १ २ ४४ १ ૨ १ २२ १ २ ४८ २ २४ २ ५० कहि फडिपस्म लोमवासी ठर सिर मधर जनु १ १ १ २० २९ २ गोप्फ कंडरा जंघा पंडिका जाणु फिया २६ प्रिय अंग पृ. १२० गिडाह मत्यक सीस संस कण्ण अक्सि णासिका दंत ओट जिम्मा गंड १ ૨ १ १ णासा ५१ णासपुड ५२ सोणि २ कण्ण मेहण १२ आकाश अंग पृ. ११८ पिंडाल १ ૨ अंसपीढ ३ २ जाणु ૨ जाणुपच्छिम २ पादतल ९ २ पाणितल ११ १ पट्टि १२ ५६ दहरचल अंग पृ. ११९ २८ हत्यंगुलिपब्ध २८ २८ पादंगुलिपब्व ५३ दहरस्थावरेय अंग पृ. ११९ हरथंगुलिपन्वंतर २८ २८ पादंगुलिपस्वंतर दहरस्थावरेय अंग १३ मतान्तरे २ जंघामक्ष २ २ ऊरुमझ याहुमक्ष ६ पट्टि २ पस्स १ ३० २ श सीम २ १ २ ९ १ २ १२ २० २० २ २१ १ २२ २५ २ २ १८ २ ३३ अंत अंग पृ. १२१ अंगुलिमाग फेमग्ग लोमग कण्णग णासम्म कोप्पर पण्डिक पिया कमाटिका २० तीक्ष्ण अंग पृ. १२२ २ ૨૮ ४ २० २१ २ २ यण थर्णतर इरथंगुह हत्य णाभि २३ २ ७ - २ २५ ९ १ २६ २० १. २ १३ १ 1 २६ मध्यस्थ अंग पृ. १२० मुर्मतर यंम मायक जामिका २ २ . - २ ३ २ कम १० ईश्वर अंग पृ० ११९ गिहाल मायक सीस कण्ग गंट मुमतर . २दुर्गंध अंग पृ. १२२ रिहित जापा २ सुगंध अंग . १२२ भवगुन नामापुर युद्धिरमण भंग पृ. १२२ ४ २ २ ३ ४ ५ ५ पर्णवर ६ ३ . 1 भोट ८ १ 1 णारा ३३ आतिमूलिकमंग पृ. १२१ पारंगुर १ ४ अहिरमण गर. १२२ २ १ २ ५० प्येय अंग प. १९ पाईगुति पाना अंग०४५ अंपा पति १. २ २ २ . - २ ४ २ ५ २ २ ८ १ ८ १ १० २ १ १ ७ १ १ ८ - २ णासा १ १० २ ४ १ ६ १ १ S २ १ ५ २ ५ २ ७ ८ ९ अंगविजानवमाध्याये विमागशो निर्दिष्टानामङ्गनाम्नां यथाविभाग सङ्ग्रहः ११ महापरिग्रह अंग पृ. १२२ २ शब्दवत् अंग पृ.१२३ १२ निम्न अंग पृ. १२३ वक्खण गुदा २ ३ मेहण २ पाद मक्सिकूड १० वर्णेय अंग पृ. १२३ २ कण्ण कण्णसोत केसमंसु २ गीवाट २ असि ठर कुकुंदल १ पट्टि णाभि १२ ४ अल्पपरिग्रह अंगपृ. १२२ २ जंघा ९गंभीर अंग(१) पृ. १२४ २ करवा १ लोम वत्यिसीस ૨ पह ३ संत कण्ण . मंसु १० अग्नेय अंग पृ. १२३ २ बाहु १९ यद्ध अंग पृ. १२२ १ १५ विपम अंग पृ. १२४ २ अच्छि ३ णासा पाद ४ अंसपीढ सिहा हितय यसण कण्ण २ फिया २७ मोक्ष अंग पृ. १२२ जिम्मा २ कोप्पर हत्य २ तिक " पाद प्रकारान्तरेण सिहा खलुक अविख कपण मणिबंध णामिका ३ २शानदेय अंग पृ. १२३ ८४ पुण्ण अंग पृ. १२४ कपण कण्णसोत गंट २ णिढाल २ २रूपेय अंग पृ. १२३ मत्यग भास ६ २गंधेय अंग पृ. १२३ कण्णुप्परिका अंजलि सिस्स जामापुट १रसेय अंग पृ. १२३ २ दर्शनीय अंग पृ. १२३ पुण्णाम सासु १९ वियर अंग पृ. १२४ २ स्पर्गीय पृ. १२३ ' सोणि २ १० स्थल अंग पृ. १२३ पाल ३ पोरिम अंगुटितर १९ मायक १ १मननीय भंग पृ. १२३ णिदास २ ८ विवृतसंकृत अंग पृ. १२४ हिनय गह भविस ४पातयत् भंग पृ. १२३ हिवय २ पाद गुदा हमनट मेड २ जनुग २ ૨ २ २ ५ २ २ २ ६ घण ४ १ ७ १ ५ २ जपण २ , १ १ ९ २ ८ १० २ २ मुह ७५ ८४ . , २ 1 १ 1 . २ . . २ ? २ २ ५ २ 1 जापाग ३ ८ . २
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३५० उपाल मगलुद्धग भोरगिभग पहिनिप हरियमहामत्तो गोसंखी गजाधिपति कोसरक्ख लेखक गणक पुरोहित संवच्छर दाराधिगत दारपाल बलगणक सेणापति गणिकाखमक वरिसघर पत्याधिगत जगरगुत्तिय दूत जहणक पेसणकारक पतिहारक तरपमह णावाधिगत तित्यपाल पृ.१६१ अंगविजामध्यगतानां विशिष्टयस्तुनाम्नां विभागशः सङ्ग्रहः पाणियपरिय लोहकार छत्तधारक दारुकआधिकारिक फलकारक पहाणधरिय सीतपेट्टक पसाधक सामेलक्स सीकाहारक सुरापरिय कुंभकार हत्यिखंप हत्यारोह महारक कट्ठाधिकत मणिकार भस्पर्खस अस्सारोह कोसेजवायक तणाधिगत संखकार अग्गिउपजीवी पेस्स दियंडकंबलवायक चीतपाल कंसकार माहितग्गि बंधनागारिय कोलिक ओपेसेजिक पहकार कुसीलक (?) चोरलोपहार वेज मारामाधिगत दुस्सिक रंगवचर मूलक्खाणक कायतेगिच्छक णगररक्ख रयक गंधिक मूलिक सलकत्ता असोकवणिकापाल कोसेज मालाकार सालासी बाणाधिगत घाग चुण्णकार सत्यक आभरणाधिपत साम भूतविजिक सूतमागध हेरणिक कोमारभिच उदकवडकि महिसवातक पुस्ममाणव सुवणिक मच्रबंध उस्सणिकामत्त विसतित्यिक पुरोहित चंदण. नाविक सिप्पपारगत छत्तकारक धम्म? दुस्सिक बाहुविक वत्योपजीविक महामंत संजुकारक चम्मकार सुवण्णकार फलवाणिय दपकार गोवन्झमतिकारक पहाविय मलत्तकारक मूलवाणिय गोहातक बहुस्मय रत्तरनक घण्णवाणिय मणिकार ओयकार चोरघात देव ओदणिक कोहाक ओह मायाकारक उण्णवाणिय कम्मासमंसवाणिज वत्थुपाढक कुंभकारिक गोरीपाढक सुचवाणिय तप्पणवाणिज वस्थुवापतिक लंखक इडकार जतुकार लोणवाणिज मंतिक वालेपतुंद मुहिक चित्तकार आपूपिक मंडवापत सुत्तवत्तय लासक चित्ताजीची खजकारक तित्थवापत कंसकारक चेलंबक तहकार पणिक श्रारामवावत चित्तकारक गंडक सुदरजक सिंगारवाणिय रधकार रूवपक्खर घोसक (७) स्थानाध्यक्षविभाग गयाधियरस गणिकरखस पतियारस्ख पुरोहित ताराबति मजयरिय यलगणक सुंकसालिय मायुधशकारिक गहवति पाणियपरिय गायक रजक सेनापति जोतिपति णावाघियक्ख वरिसघर पघवाबत कोटाकारिक जोतिसपति सुवण्णाधियक्स आदविक वत्थुपारिसद पृष्ठ २३९ जगपति दयिमधिगत णगराधियवस आरामपाल सुरवति गणपति अस्सअधिगत पञ्चंतपाल सुसाणवापत ঘানি कुलपति योग्गायरिय सूणावावत जलवति जूहपति चारकपाल पोतवनि मिगपति गोवयक्त संधिपाल फलाधियक्स्त्र परवति गोपनि पडिहार सीसारक्स पुष्फाधियक्ष णइवनि पयापति (८) यानविमाग गिल्ली जलचरयान पहुंकामिका मिविका णावा स्थलचरयान गोलिंग संदमाणिका कोटिव सिविका संदमाणिका सकर भालुय महामण गिलि सकही राया रायकम्मिक अमञ्च ममचम्मिक णायक भासणत्य भांडागारिक भरभागारिक महाणमिक पृष्ठ १६६ पृष्ठ ७१ सकडी सकडिका बिही पञ्चमं परिशिष्टम् ३५१ विक्कीत जाण भणोसपणणगर बत्तियझोसियणगर बहुवुढीकनगर पृष्ठ १६२ बस्सोसण्णणगर बुरशोसियणगर मुद्दोसण्णणगर साखानगर शायित लव कट्ठ मक सं. मृग सक जाण सिबिका गल्लायित पिंडिका सजीवयान सिंगी णव जाण कचरयान अस्स असिंगी जुण्ण जाण जाण वा घेलु हत्थि बलिवद्द दुट्टित जाण जुग्ग अय सुट्टित जाण कट्ठमुह तुंब गो एलग कीतक जाण हिब गिल्लि कुंभ महिस याचितक जाण संदण लिका दति खर आधावितक जाण पडिरूव जाण सकड पक संघाड अयेलक अपहरितक जाण सकडी (९) नगर- र-विभाग चिरनिविट्ठनगर परिमंडलणगर उद्धनिविटणगर बहुपरिक्खेस बहुवुट्टिकणगर भणझोसियणगर अचिरनिविठ्ठनगर कारामणणगर चतुरखणगर पब्वतणगर बहूदकवाहणगर पुरस्थिमदिसणगर बहुमकसकणगर बहुउदकनगर कट्टपागारपरिगतणगर निव्विगंदिणगर पच्छिमदिसणगर सत्थप्पवातबहुलणगर इगपागारपरिगत- पाणुप्पविट्ठणगर दक्खिणदिसणगर आसपणणगर बत्तियोसण्णणगर अप्पोदगनगर गर बहुवाधीतणगर उत्तरदिसणगर जुत्तोपकट्ठणगर -इस्सझोसितणनगर अप्पवुट्ठीकणगर दक्खिणोद्दागणगर अव्वाधितणगर बहुअण्णपाणणगर पचंतिमणगर चोरवासणगर यामोहागणगर बहुवातकणगर सुभिक्खयोगक्खेम- अजवासणगर पविटणगर भप्पुजोगणगर बहुवातोवद्दवणगर गतणगर अप्पणगर वित्थिण्णणगर अतिक्खदंडणगर बहुउण्हणगर अणभिवुत्तणगर यहाणी परणगर गहणणिविट्ठणगर अप्पपरिक्खेसणगर आलीपणगबहुलणगर विस्सुतकित्तियणगर दीहणगर रमणीयणगर आरामबहुलणगर बहुविग्गहणगर बहूदकणगर (१०) गृह-शाला घर-निलय विभाग उपलगिह रसोतीगिह भंडगिह चित्तगिह सवणगिह हिमगिद ओसधगिह हयगिह उजाणगिह सिरिघर भादंसगिह जाणसाला चित्तगिह रधगिह पहाणघर तलगिह गयगिह वेसगिह पुरसघर आगमगिह लतागिह दासीघर पुष्फगिह पहाणगिह अंगणगिह दगको?गगिह देवागार चतुकगिह जूतगिह रच्छागिह पातवगिह कोसगिह भातुरगिह दंतगिह खलिणगिह संसरणगिह पाणगिह भग्गिघर कंसगिह बंधणगिह सयणगिह सुंकसाला जागघर पडिकम्मगिह जाणगिह करणसाला गयसाला कंकसाला रधसाला भत्तघर तणसाला सातवगिह भग्गगिह जूतसाला वासघर तेमग्गिह पणियगिह पाणगिह जलगिह पडिकम्मघर कारगगिह पत्थगिह भासणगिह महाणसगिह असोयवणिया पधिकणिलय भोयणगिह रयणगिह लेवणगिह (११) स्थान प्रदेश गृह-प्राकारादिअवयव प्रादेशिकसंकेत विभाग णिफूड सोमाण विमाण पागार भर्भतरपरिपरण फलिखा गगण बलभी चरिका पावीर गिद्यारवाहा संधि वेति (दि) पेदिका मच्छणक समर गयवारि पंसु ओसर कडिकतोरण गिद्धमण संकम पृष्ठ १३८ पृष्ठ १३६ गम्भगिह अभंवरगिह भत्तगिह वञ्चगिह उदगगिह अग्गिगिह भूमिगिह मोहणगिह दुवारसाला उवट्ठाणजालगिह पृष्ठ २२३ पृष्ठ २५८ पृष्ठ २२२ पृष्ठ १३७ सिप्पगिह कामगिह रयतगिह ओधिगिद सयण भरजरमूल कोटक म समूल रासि पृष्ठ १३७ पश्चर्म परिशिष्टम् अंगविजामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनाम्नां विभागशः सङ्ग्रहः मनुप्यविभागः (१) चतुर्वर्णविभाग पृष्ठ १०२-३ यमरेस्म सुद्दम वेस्सखत्त वेस्ससुद वेस्मयंभ खत्तिक सत्तसुद सुद्दवेम बमसुद खत्तयेस्स मुद्दखत्त चमण सुद्दयम यभम्वत्त सत्तम अज मजदेमंतर अणजदेमिन मिलक्नु बमण सत्तिय स्म मुद्द-मिलकस्नु (२) जातिविभाग पृष्ठ १४९ ववहारोपजीवी दीववासि सत्योपजीवी जणपदवासि रोत्तोपजीवी घेहितक मिक्खुदवासि आपलचिंध गिढदेसिन कण्द पवतवामि कंचुकचिंध मुद्दण्ण साम काटक महाकाय मज्झिमकाय पचवरकाय मोवात पुरस्थिमदेसीय दक्खिणदेसीय पच्छिमदेसीय उत्तरदेसीय अनदेसणिस्सित (३) गोत्रविमाग पृष्ठ १४९-५० संडिछ इतिहास गहपनिक दिनाति भाट गोल हारित माइकि कस्मत गोतम माग्गिरम बराद डोइल कंसी শালার্ন काकुरडी कपण मादीण परक मूलगोत्त मंमागोत मेदाणुबोग मुजायण करयलायण गहिक णेरित घंमद्य काप्पायण भगव मागत सफित(कमित) घामुक यड कोष्ट कोमिक भोपम होशिय कचरित्र अप्पमप्यमा मालकायण यणाण मामोसल माफिन टपरति सोम धमायण जीवाय लोहिय पियोभाग पम्वयन संहिष्ठ आपुरायण वारदारी वग्यपद पिल देवच पारिणील मुघर थीगद व्याकरण मीमसक दोक पण्णायिक करितवाण यगिक निमक जानिमिक सुयवेद सामवेद यजुवेद महम्मेद एम्वेद दुवेद निवेद सय्यद छलगवि सणिक णिरागनि घेदपुर मोतिय मझायी भाचरिय जायक माति वामगार मगोत मागितगोल पंपचारिक पारावग मनियम मोग्गत वार्मय सत्रम्मतर तसिरिक मारम परमप पागि इंदरोग पगमाय मंग ३४९ धम्मजोणि मस्यजोणि कामजोणि मंगमजोणि विप्पयोगजोणि मित्तजोणि विवादजोणि पावासिकजोणि पवुयजोणि भागमणजोणि जिग्गमजोणि रायजोणि रायाशुपायजोणि रायपुरिसजोणि वणियप्पधनोणि कारुकजोणि भणुयोगजोणि भजजोणि सिस्सजोणि पेस्सजोणि গলালি मोक्खजोणि मुदितजोणि भातुरजोणि पृ०२१९ पृष्ठ ६८ पजिया मनिया नानिका महमातुया घुलमाता माउस्सिया पिनुस्मिया ममा सही पत्ती पणत्तिणी सुण्दा सावत्ती सलिका मेधुणा भातुजाया भगिणी भागिणेजा पितुस्सदा मातुस्सहा पञ्चमं परिशिष्टम् (४) योनिविभाग-अटक पृष्ठ १३८-४० मरणजोणि मझिमजोणि उत्सरजोणि मूलजोणि सयितव्वजोणि उत्तमजोणि परिटमजोणि भाभरणजोगि लिण्णजोणि पञ्चवरजोणि दरिपणजोणि धण्णमोणि णट्ठजोणि मम्भतरजोणि दक्मिणपच्छिमजोणि वत्यजोणि विणयजोणि बाहिरजोणि पच्छिमउत्तरजोणि रण्गजोणि साधारणजोणि वंभचारिगजोणि पुव्युत्तरजोणि भारामजोणि णपुंसकजोणि बमणजोणि पुष्वदरिसणजोणि भधमजोणि पुण्णामजोणि खत्तियजोणि उण्णतजोणि उपरिहिमजोणि थीणामजोणि हेहिमजोणि णिण्णजोणि येस्सनोणि अणागतजोणि माहारणीहारजोणि रसजोणि सुद्दजोणि अनिकंतजोणि णीहाराहारजोणि घण्गजोणि बालजोणि वत्तमाणजोणि पाणजोणि गंधजोणि जोचणजोणि पुरिस्थिमजोणि धातुजोणि उदुजोणि (५) सगप्पण (सगपण) संल मानुस्मियाधीतर जोणिभगिणी अजय संली पितुस्सियापीतर सोदरियमगिणी पितर मेधुण पित्तियपीतर मागिणेश पेतिज देवर जातर जोणिपुर मातुल पनिजेट्ट णणंदर भत्तिम मातुस्सिया भानुवयस्म सही भानुपुत पितुस्मिया भगिणिपति मातुना भगिणित पुलमानुया मातुलपुरा सही पीया अजिया मातुस्मियापुत्त महपितुरूपीतर मानुपीतर भाता मना मातुलपीनर भगिनिधीतर भगिणी साठी सोदरी (६) कर्मविभाग-व्यापारविभाग उजागपालक गीतकारि मंगवायग मीमारस्य यणपालक नहरु परिहार पुप्पुवाग मग्गिक रायपोरिस फनुपाग यवहार महागरिक पत्तगोपालग माजीयगिर यमिगोरग्य मापारिय अंतराल पागपरिय पपंतपाल पीटीकारक मनिहार हपारिताप दंगारवार पादिपमम्म महामा यतापर जोहार इपिट मि पानपानिया रायमय अम्माधिपान मुरागरि इंगारवानिपर भामारोप बामशशि बागपत दिविहारिक Pr मारिष ज पाईवित उमा जमार मा पृष्ठ ८१ पृ० १५९ गूल (गर) परिधारक जंघायानियक মিমি पतहारग मारगहारग उरिसत्तधिक बाहिरतुंपिय परराज्छपक कम्युट भागहारक साधिगाएर पृ०९२ पृष्ठ ८८ पृष्ठ ९० भानुभूमिप মান अधिगधारक परिहार मंधिवाल अमागारिक पृष्ठ८९ पृ०९१ ०१४७ पाग पनामिक पा mare बरामरा ३५० उपाल मगलुन्ग ओरगिभग अहिनिए हन्थिमहामत्तो गोसंखी गजाधिपति कोसरक्त गणक पुरोहित संवच्छर दाराधिगत दारपाल यलगणक सेणापनि गणिकाखमक वरिसघर पत्याधिगत णगरगुचिय अंगविजामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनाम्नां विभागशः सङ्ग्रहः पाणियवरिय लोहकार छत्तधारक दारुकआधिकारिक फलकारक पहाणधारय सीतपेट्टक पसाधक सामेलक्स सीकाहारक मुराधरिय कुंभकार हत्थिखम हत्यारोह महारक कट्ठाधिस्त मणिकार अस्सखस अस्मारोह कोसेजवायक तणाधिगत संखकार अग्गिउपजीपी पेस्स दियंढकंबलवायक धीतपाल कंसकार माहितम्गि बंधनागारिय फोलिक ओपेसेजिक पहकार कुसीलक (व?) चोरलोपहार वेज मारामाधिगत दुस्सिक रंगवचर मूलक्खाणक कायतेगिच्छक गररक्ख गंधिक मूलिक असोकवणिकापाल सहकत्ता कोसेज मालाकार मूलकम्म सालाकी वाणाधिगत वाग चुपणकार सत्यक माभरणाधिगत साम भूतविजिक सूतमागध हेरगिणक कोमारमिच उदकवट्टकि महिसघातक पुस्समाणव सुवपिणक मच्छबंध उस्सणिकामत्त विसतिथिक पुरोहित चंदण. नाविक सिप्पपारगत छत्तकारक घम्म? दुस्सिक बाहुविक वस्थोपजीविक चम्मकार महामंत संजुधारक सुवष्णकार फलबाणिय दपकार गोवज्झमतिकारक पहाविय मलत्तकारक मूलवाणिय गोहातक बहुस्सय रत्तरजक घण्णवाणिय मणिकार ओयकार चोरघात देवर ओशिक कोहाक मोह मायाकारक उण्णशणिय कम्मासमवाणिज वत्थुपांढक कुंमकारिक गोरीपादक सुत्तवाणिय तप्पणवाणित वस्थुवापतिक लंखक इहकार जतुकार लोणवाणिज मंतिक बालेपतुंद मुहिक चिचकार आपूपिक मंडवापत लासक सुत्तवत्तय चित्ताजीची खनकारक तित्यवापत कंसकारक चेलंबक सहकार पषिणक मारामवावत चित्तकारक गंडक मुद्धरजक सिंगारवाणिय रघकार रुवपरखर घोसक (७) स्थानाध्यक्षविभाग गयाधियश्स्त्र गणिकर्सस पतिमारक्स पुरोहित तारावनि मजवरिय वरगणक मुंकसालिय आयुधाकारिक गवति पाणियपरिय रनक गायक सेनापति जोतिपति जावाधियक्त परिसघर पघवावत कोटाकारिक जोनिसपति माविक मुष्णाधियाम्प याधुपारिसद जगपति हरियमधिगत णगराधियत्व धारामपाल मुस्वति गणपति भस्ममधिगत पतपाल मुमागवावत घगानि कुलपनि योग्गायरिय सूणादावत जलवति जूहपनि दूत चारक्याल पोतवति मिगपति गोवयस्य संधिपाल फराधियश्य णरवनि गोपति पटिहार सीमारवस पुष्फाधियक्त णवनि पयापति (८) यानविभाग मिठी जलचस्यान पृष्ठ १६६ पठकमिका गियिका जावा स्थलचरयान गोलिंग मंदमागिता मिविका संदमाणिका पृष्ठ ४६ महामा मिलि सकसी जहणक पेमगकारक पतिहारक तरपमह णावाधिगत तिग्यपाल राया रायकस्मिक पृष्ठ २३२ भमचम्मिम जायक मामगाय मांडागारिक भामागारिक महाशनिक पृष्ठ ७१ मसी जग्ग पञ्चमं परिशिष्टम् ३५१ एलग संदण पृष्ठ १६२ उल्लायित मक सं. मृग सक जाण सिविका मणुलायित पिंडिका सजीवयान णव जाण सिंगी कंड अस्स असिंगी जलचरयान जुण्ण जाण जाण हत्थि बलिवद्द दुट्टित जाण वेलु जुग्ग णावा उद्द अय सुट्टित जाण पोत कट्ठमुह गो कीतक जाण कोटिंब महिस याचितक जाण विक्कीत जाण सालिका दति खर आधावितक जाण पडिरूव जाण सकड तप्पक संघाड अयेलक अपहरितक जाण पृष्ठ १९३ सकडी (९) नगर-विभाग चिरनिविटनगर परिमंडलणगर उद्धनिविट्ठणगर बहुपरिक्खेस बहुधुटिकणगर बंभणझोसियणगर अचिरनिविट्ठनगर चतुरस्रणगर पव्वतणगर कारामणणगर बहूदकवाहणगर पुरस्थिमदिसणगर घमणोसण्णणगर बहुउदकनगर बहुमकसकणगर कट्टपागारपरिगतणगर निव्विगंदिणगर पच्छिमदिसणगर खत्तियझोसियणगर बहुवुट्ठीकनगर इगपागारपरिगत- पाणुप्पविट्ठणगर सत्थप्पवातबहुलणगर दक्खिणदिसणगर भासण्णणगर खत्तियोसण्णणगर अप्पोदगनगर णगर बहुवाधीतणगर उत्तरदिसणगर जुत्तोपकट्ठणगर वहस्सझोसितणनगर अप्पवुट्ठीकणगर दक्षिणोद्दागणगर अव्वाधितणगर बहुअण्णपाणणगर पचंतिमणगर वेस्सोसण्णणगर चोरवासणगर वामोद्दागणगर बहुवातकणगर सुभिक्खयोगक्रोम- सुइझोसियणगर अज्जयासणगर पविट्ठणगर अप्पुजोगणगर बहुवातोवद्दवणगर गतणगर सुहोसण्णणगर अप्पणगर वित्थिपणणगर अतिक्खदंडणगर बहुउण्हणगर अणभिवुत्तणगर रायहाणी परणगर गहणणिविट्ठणगर अप्पपरिक्खेसणगर आलीपणगबहुलणगर विस्सुतकित्तियणगर साखानगर दीहणगर मारामबहुलणगर बहुविग्रहणगर बहूदकणगर रमणीयणगर (१०) गृह-शाला घर-निलय विभाग पृष्ठ १३६ उपलगिह रसोतीगिह भंडगिह सवणगिह चित्तगिह गब्भगिद हिमगिह हयगिह ओसधगिह उजाणगिह सिरिघर अभंतरगिह आदसगिह रधगिह जाणसाला चित्तगिह पहाणघर भत्तगिह तलगिद्द गयगिह सगिह पुरसघर आगमगिह पुप्फगिह लतागिह पहाणगिह दासीघर चतुक्कगिह जूतगिह दगकोटुगगिह अंगणगिह देवागार अग्गिगिह रच्छागिह पातवगिह कोसगिह भातुरगिह भूमिगिह दंतगिह सलिणगिह पाणगिह संसरणगिह अग्गिघर मोहणगिह कंसगिह बंधणगिह सयणगिह सुंकसाला जागघर दुवारसाला पडिकम्मगिह जाणगिह करणसाला गयसाला उवट्ठाणजालगिह रघसाला कंकसाला सिप्पगिह भग्गगिद्द भत्तघर आतवगिह जूतसाला सणसाला कम्मगिह वासघर पाणगिह जलगिह पणियगिह तेमग्गिह महाणसगिह पडिकम्मघर भासणगिह वत्यगिह कारगगिह असोयवाणिया पधिकणिलय भोयणगिह लेवणगिह रयणगिह (११) स्थान-प्रदेश गृह-प्राकारादिअवयव प्रादेशिकसंकेत विभाग सोमाण विमाण पागार फलिखा मरंजरमूल वलभी मम्भंठरपरिपरण गगण चरिका पाशीर संधि रासि घेति (दि) गिदुपारयादा पेदिका पष्ट भण्डगम पंमु समर गयवारि मिमण भोसर रखमूल संकम पृष्ठ १३७ कहिकतोरण पृष्ठ १३८ वञ्चगिह उदगगिह पृष्ठ २२३ पृष्ठ २५८ पृष्ठ १३७ पृष्ठ २२२ स्यतगिह ओधिगिह सयण ३५२ अंगविनामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनाम्नां विभागशः सङ्ग्रहः चचर थंगण वियहप्पकाम रायपध मिवाढग खेत्त तलाक विसरण परमवण सित भाराम तलाग सेतु अंगण पष्ट २२१ मरंजर उहिया पछ पृष्ठ १४८ पृष्ट २१४ पासाय जूब चिनि सेनुबंध भायतण रायपव महारच्छा उस्माहिया पामाद गोपुर अलग पकंट तोरण यार पन्यत वासुल यूम उदुपाण उहियाग जग्गवाट देवायतण संगामभूमी पृष्ठ २३३ रोत्त वायु गाम नगर सनिवेम भावास पट्टीम माइग्ग मिनर उस्खलिका पृष्ठ २२२ माल वातपाण पृष्ठ १५२ उदकपध चय वप्प पउली अस्समोहक खम भागमगसंरोध पृष्ठ १३८ आएसण मंत्व पागार गोपुर अहारग पथ्यत पवत सागर मेदिणी दी चेतिय आयाग पृष्ठ २०० देस निगम नदी लाग पुरसरणी पवान बप्प तलाक दहफलिका दी सर फलिद फलिहा सेतुकम्म पुरोहट पृष्ठ १४५ णगर पट्टण देवतायतण गिह कृविया आकाम जणपद मरण सीमंतिका खेत्त रच्छा णिधेसण रायमग बिल णाली थंभ अंतरिया पस्मंतरिया कोट्टागार भरस्म भावुपध पणाली उदकचार वञ्चाटक मरिगदण वेसण अंतेपुर निय सिंघाग चक्क पाकार वय परिखा सेड पागार पंदपाली एलुग घेति पवा महापध नित्य बुख पाली मागर गाम सपिणवेस पृष्ट २०१ रायवाणी पायाद गिह जलस्थान णदी समुह गिब्ध पणाली बच्चाह मुसाण वचभूमि मंडलभूमी पब्बत पृष्ठ २३४ उदुपाण चीती पत्रा (१२) सिका विभाग पृष्ठ ६६ सुवणमासक त्ययमासक दाणारमामा ऊणमामक कादापण सुवण्णगुंजा दीगारी पृष्ठ ६५ सत्तरक पृष्ठ ७२ पुराण सुवण्णकाकणी सतेरक मासकारणी (१३) भाण्डोपकरणविमाग सिप्पमय कालंची सेलमय करकी कुटारिका धीजातीय मंडो- याली गरण मंही अरदिका घडी पत्ती उक्तली केला थालिका उहिका वारक पुंजातीय भंडो- कलस गरण गुलमग अरंजर पिढरक पलिंद लिगमंड पसमंद माणक रोदमय मणिमय संखमय पृष्ट ७२ माणिका णिसका मायमणी चुल्ली फूमणाली समंटणी मंजूमिका मुद्दिका सलाकंजणी पेल्लिका धूतुलिका पिच्छोला फणिका दोणी उकुलिणी पाणी मामिला पालिका दवी पञ्चमं परिशिष्टम् ३५३ करक कुंडिका पृष्ठ २६२ ववी वरथरिका कुदाली वासी धुरिका कवल्ली दीविका कढच्छकी दविउलंक रसदग्वी छत्त उपाणह पाउगा उम्भुभंड उभिखण फण सपसाणग वणपेलिका विवणग भजणी पसाणग मादसग धूमणाली अगिकारिका अग्गिकुंड जग्गंतक संदीपण दीप चुडली मधमग्गि चुल्ली चितका फुफुका महिमकारका अग्गिपखंडक उवाण छत्तक सप्पण कतरिका कुंडिका उक्खलिका पादुका उपाणह पृष्ठ १९३ उक्सुली पिटरग भिंगार पढागा लोमहत्य वासणकहक चामर घीजणी पृ० २२१ स्थगिका संपुड पेला पेलिका करंग संकोसक पणसक थइया पसेच्चक पृष्ठ १९८ पृष्ठ २५५ भिंगार वीयणिया तालवोंट पृष्ठ २३० घडग भरंजर उहिक आचमणिक पृष्ठ २०१ सयण वीजणी थासण दंडा जाण धूमणत्त वाहण वीजणिया वस्थ चामर माभरण अस्सभंड परिच्छद भच्छा सत्यावरण दितिका पृष्ठ २२१ अजीण मुत्तिक पृष्ठ २५४ संखागवलमय इंगालकोट दंतमय इंगालसकहिका सिंगमय कदुच्छ भट्टिकमय धूपघडिका वाल्मय धूमकरणाक लोहमय धूमण चम्ममय पिसायक धूमणेत्त अंजणी खारापक फणिका वीजणक (१४) भाजनविभाग मुंढक पाणजोणिमय पीणा धातुजोणिमय मूलजोणिमय थीभायण पाणजोणिमय करोडी सिप्पिपुड कसपत्ती संखमय पालिका मूलजोणिमय सरिका कट्ठमय भिंगारिका फलमय कंचणिका पत्तमय कवचिका धातुजोणिमय सुवण्णमय (१५) भोजनविमाग पत्तरक पृष्ठ ७१ कुलरयरक दुदुहिका मुग्गरक उदकुहिका मासपूरक समगुण्दिका मोदणकरक जागू मतिकरक कसरी तितक भवेली पतबेली मूतपूरक थीआहार याएकी घुमायण पृष्ठ ७२ रुपमय तंवमय कसमय काललोहमय सेलमय मत्तिकामय लोहीवार उहिक मायमणी सत्थीमायमणी चरक कालुंडी सरक थाल सिरिकुंड पणसक मद्धकविटा सुपतिटक पुक्खरपत्तग सिरिकंसग थालक दालिमपूसिक पालक मल्लकमूलक करोडक घहमाणग अलंदक जंवुफलक भंडभायण खोरक बहक पृष्ठ २१४ पृष्ठ २२१ लोही कदाह भरंजर उक्वटी कट्ठमय पुप्पामय फलमय पत्तमय सरग मुंडग पृष्ठ १८० पायस पृष्ठ ६४ पुंमोयण मोदण भर मसग मोयग जेमण माहार परमन दधिताव विलेपिक दधिरक दुदकूरक घरक सासवतक गुलरक सकुली कुम्मामपिंडी सनुपिंडी तप्पणपिटरी इतिपिंडी मोदपिटी निलपिडी पीरिती रण्डामती रसारा पडिमट्ठा चोराठी अंबपिटी अंपकवी उतरविता अंगारंगी भोजन पृष्ट १७६ अंग०४५ पाणजोणिगत मूलजोणिगत धातुजोणिगत पाणजोणिगत पलाल संयाराग लेझचुण्ण भोजन पृष्ठ २२० . पृष्ठ १७९ दधि णवणीत घत मंस वसा मधु संखयाहार असंखयाहार सोतगुल सकरा अग्गेयाहार अणग्गेयआहार सालि M पृष्ठ १७७ अंगविजामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनान्नां विभागशः सहः कसाय पाणजोणिमयभायण- सोवचिका धण्णरस अविल भोयण पिप्पली अग्गगत कटुक धातुजोणिमयमायण- खारवण पत्तगत लवण भोयण वहभोयण पुप्फगत मूलजोणिमयभायण- मोदक पलगत विस्सोदण भोयण पंडिक अतिकूरक जवागू पुप्फगत पप्पट पत्तेगपुष्फ गुलरक दुजवागू मोरिंडक घतपूरक घयजवागू गुलुकपुष्फ सालाकालिक विटेपि मंजरीपुष्फ तेलजवागू अंवटिक पायस अविलजवागू फलगत वित्थडमोयण कसरि उण्दियजवागू रूपरागत पोवलिक दधिताव ओसधजागू गुम्मगत वोक्तिक घल्लोगत तकुलि भालुक पोक्लक अंग्रेलि क्सेस्क पप्पड छुपगत अंबिलक सिंघारक पृष्ठ १७८ सकुलिका पालीक भिस पक्खिमंस कोदव भिसमुणाल फेणक परिसप्पमंस चाय यीहि भक्खपूप कंग चतुप्पदमंस मच्छंडिका अपडिहत सिंगिचतुप्पदमंस पवितलक रालक असिंगिचतुप्पदमंस राजगगुल घेलातिक घरक इक्कास पत्तभजित सामाग महमंस उलोपिक सुक्क्मंस तप्पणा सिद्धस्थिका मास उस्सयभोयण बदरचुण्ण बीयक मतकभोयण विक्कस उकारिका चणक सट्ठभोयण कलायभजिया मंडिल्लका कलाव दासीभोयण मुग्गमजिया दीहभोयण णिप्फाब बालोपणयणभोयण जरभजिया दीहसकुलिका मसुर देवताभोयण गोधुममजिया खारवट्टिक कुलस्य मंतगणभोयण सालिभजिया खोडक तुवरि मंतसमावगमोयण तिलभजिया दीवालिक यव विजागहणभोयण अणग्गेयलवण दसिरिका गोधूम विजासमत्तिभोयण सामुद्द भिसकंटक अमिणवभोयण सेंधव मस्थतक सासव सीतमोयण सोवञ्चल लेज्सभोयण अतसी भिक्खोदण पंसुक्खार फाणित मधुर असामण्णमोयण अग्गेयलयण ककब तित्त सहमोयण जवखार तिलक्वली (१६) पेयविभाग मरिट गोधसालक दधि भासद पाणक पाणीय पय मेरक खीर गुल मधु जूम णवणीत पृष्ठ १८० मूलजोणिगत मूलगत खंघगत अग्गगत कंदगत तजगत णिज्जासगत णिज्जासगत सिरिविट्ठकसद्द . पृष्ठ १८२ तक गवणीत कुचिया भामधित गुलदधि रसालादहि मथु परमण्ण दधिताव तकोदण अतिकूरक मंस रधिर वसा कुसण कोलरय बलिक साकरस थूणिकाखल अंबिल उपसेक पृष्ठ २४६ दुण्डिका दधिताव अंबेल्लि विलेपिका ककरपिंढग गंगावत्तग चुक्तिक वप्पडी अंबढिग घतउह पोवलिका सल्लकि कास सोणिय लसिया जवागू उच्छुरस गोलोय पत्तरस पुप्फरस पृष्ठ ६४ पुंपेय अपरस पकारस दधि धित तेल फाणित पञ्चमं परिशिष्टम् ३५५ -सेतसुरा . पृष्ठ २२१ पृष्ठ २५८ पृष्ठ २३२ पृष्ठ १८१ पसपणा अयसा मरितु पसण्णा गिट्टिता मधुरक भासद चंदणरस तेलवणिकरस कालेयकरम सहकाररस मातुलुंगरस करमंदरस सालफलरस . पृष्ठ १६३ वत्थ कोसेज पतुज आविक वालमुंडिका बालन्वयणी मनिणगकंचुका चम्मसाडी पृ० २३२ पतुण्ण सुवण्णपट्ट सुवण्णखसित काललोहज्ञालिक सकलदस वहियदस छिण्णदस विवाडित सिवित पाचारक कोतवक उष्णिक पृ०१६४ खोम पृ० २३० चीणप कप्पासिक पह लोहजालिका सोमक दुगुल्ल जग्गिक चीणपह बागपह कप्पासिक पृ० २२१ अत्यरक जगल जयकालिका मधुरसेरक अरिट्ठ भट्टकालिका बहुपिट्टिया गुग्गुलविगत पक्सा सजलस आसवासव सुरा जातिकसण्णा इक्कास कुसुकुंडी भरिट्ठा सिरिवेट्टक (१७) वनविभाग वधुवत्थ मेचक भाविक मतकवत्थ जातिपणुग्गत भविपत्तुष्ण विलात पहिक अजीणपट्ट भातवितक बट्टण अजीणपवेणी ओमद्दित सीसेकरण चम्मसाही उत्तरिज वालवीर सेवालक अंतरिज मयूरग्गीव पञ्चत्थरण सजीवक करेणूयक विताणक पत्तुण्ण कप्पासिकपुप्फक परिसरणक मजीणप्पवेणी पउमरत्तक अजीणकंबल मणोसिलक कोसेजक बालसाही (१८) आच्छादनविभाग कप्पास थीअच्छादण लेखा कंचुक पउण्णा वाउकाणी पएणी चेलविका चारवाण वण्णा परत्तिका विताणक सोमित्तिकी माहिसिका पच्छत अद्धकोसिनिका इली सण्णाहपदक पसरादी जामिलिका मलसाडग पिगाणा थीअच्छादणए- दियवंतरा कार्थक (१९) भूपण-आमरण-अलंकारविभाग कुरवक इत्थखड्डग सुत्तक कण्णकोवग अर्णत सोवण्यमुत्तग कपणपील निगिन्छिग कण्णपूरक हत्यमंढक हिदयत्ताणक कण्णखीलक कंकण सग्यिक कण्यलोडक चेदक मिरिवष्ठ केर भट्टमंगरक तलम मद्दार सोणिमुत्त कंग रायगलादग परिहेरग येकरलग गंदूपक भावेढग ससिपधम्मक वलयग पीपुरग हायलारग अंग पृष्ठ६४ पुंअच्छादण पडसाडग खोमदुगलुग सण्हा थूला सुवुता दुम्वुत्ता अप्पग्घा महग्या महता घोनिका साडक सेदसाड कोसेयपारय कंबलक उत्तरिज अंतरिक्ष उस्सीस वेषण चीर्णसुग चीणपह पावार पह . पृष्ठ ७१ झंकक कडग खडुग पापटक पादखदुयग परमासक पादकालावग सरजालक पृष्ठ ६४-६५ पुंजातीयभूसण तिरीड मउट सीहमंडक मटकपरिक्रोव मत्यककंटक गलक मगरक उसमक सीटक हरिपक पहामिहुग गिडालमासक तिलक मुद्दफलक विसेसक मवंग उस्मारक पाद्जालक भरसक पुस्पोरिटक कंचीरलायक हमुहोलक यक मत्थग तलपत्तक दस्तागक पृ.७१ प पृष्ठ १६२ हारकूड तपु सीसक काललोह पहलोह सेल मत्तिका कट्ठमय पुष्फमय फलमय पत्तमय पृष्ठ २४२ चुंभळक पेलक जणक अंगविजामध्यगतानां विशिष्टयस्तुनाम्नां विभागशः सग्रहः धीजातीयभूसण वणवलयक सिरआमरण इत्थामरण अंजण सिरीममालिका खहुक मोचूलक हत्यकढग चुण्णक णलियमालिका मुद्दिका गंदिविणद्धक कडग भलत्तक मकरिका घेढक अपलोकणिका रचन गंधवण्णक भोराणी कण्णपालिक सीसोपक सूचीक कण्णसोधणक पुफितिका णीपुर कर्णाभरण हत्थोपक अंजणी मकण्णी कण्णुप्पलक तलपत्तक अंगुलिआमरण सलाका आवद्धक गुलेयक कुश्चठावण पालिका प्राणयोनिगत पलिकामदुधनक मुद्देयक कपणवल्लीका धातुयोनिगत कुंडल वेंटक सूची कपिणका मूलयोनिगत कटिआमरण धूपण दुम्माटिका प्राणयोनिगत ओकासक कंचिकलापक गंधविधी सिदस्थिका संखमय कण्णेपूरक मेसलिका सासा अंगुलिमुदिका मुत्तामय कण्णुप्पीलणक कडिउपक सम्मिका भाखमालिका दंतमय अक्षिआभरण जंघाआमरण पतंसक संघमालिका गवलमय अंजण गंड्पपक मोवास पयुका यालमय भृकुटिआभरण णीपर कण्णपीलक णितरिगी भट्ठमय मपी परिहेरक करणपूरक केटकमालिका मूलयोनिगत गण्डाभरण पादाभरण गंदीविणदक घणपिरिडलिका हरिताल तिसिणिक कूलीयंधक विकालिका पुप्फमय हिंगुलुय खत्तियधम्मक तिलक एकावलिया फलमय मणस्सिला पादमुदिका पिपलमालिका पत्समय ओष्ठाभरण पादोपक वलिका हारायली धातुयोनिगत मलत्तक तिलक तलपत्सक मुपावली सोवण्णमय कण्ठाभरण पृष्ठ २४६ पृष्ठ १९३ प्पमय घण्णसुतक बालतिलक अंजण रसगा वमय तिपिसाचक कण्णातिलग व्हाण जयूज़ सीसमय विमाधारक तवणिमनिलग पोषण मेखला लोहमय मसीमालिका पदुमतिलग पम्वासण टिका तपुमप हार पृष्ठ १८३ अणुलेवण संपरिका काललोहमय मवहार पादकलाप रिसेसकाप पारिता भारसमय पुरसक पादकिंकिणीका धूमाधिवास वम्मिका गोमेयक मायलिम स्वसियधम्मक परिधाण पाममूषिका रोहिता पायुका उत्तरासंग पापहिया मणिमोमाणक पवासक उपागह सोणिमुक्त निसिगिका रत्तापारमणि भट्टमंगलक मह शोहित पेगु मुकुर मुरभिजोग मारणीरिया मुकारिक पायुमुत्ता कृषपाणलीसावण हत्योपक विमल पहाण संविषाण परिसरागारमणि ধীন भिंगार पग्गिा मपारकत रिसेमरिया कालागारमा पामामरण मोगा पतागा मगर मंगप हरिना कोषहत्य रगारमति बुद्धिय पृष्ठ २२१ सामी मराहो मगगिर बेटण मालिका बा सीसावक पृष्ठ २५९ 8 (घ) मलक मापेलग मालिका पहापेल पृष्ठ १६३ तेल पृष्ठ २३२ कुमुभतेल मतसीतेल रुचीकाल करंजतेड उण्डीपुषणामतेज विसल्ल उसणीत पत्तीतेच सासवड पनिकजनेल निग्गुकोड हरियत दुपटनेत मूलनेत ३५७ मतिमुत्तकतेल तिलतेल्ल इंगुदीतेल पघकलीतेल यूधिकातेल्ल ओसधतेल वकिकतेल्ल पुस्सतेल पञ्चमं परिशिष्टम् चंपकतेल्ल जातीतेल्ल चंदणिकापुस्सतेल पीलुतेल्ल (२०) आसनविभाग कट्टखोड भूमीमय महटिका तणमय उप्पल छगणपीढग लोहसंघात पुप्फ दंत भट्टिक घीय पृष्ठ १५ तण साहा मही फलक फलकी भिसी चिफलक मंचक मदासण पीढग अत्थरक पवेणी कंबल सुहस्सहा कट्ठपीढ खेहुखंड सर्मथणी पृष्ठ १७ डिप्फर पीढिका मासंदक खा (२१) शयनासनविभाग पृष्ठ५२ सयणासण पलंक मसारय मंचक खट्टा फलिक मंचिक कणक तलिय सेलसेजा सम्वतोभद्द भूमि तुससेजा सयणासण सिलातल लोहसेना भासंदग फलपुप्फहरितसेजा अंगारछारिकासेजा भद्दपीढ तिणसेजा पादफल झामसेजा सुक्ककट्ठसेजा वद्दपीढक जाणसेजा मासालग डिप्फर बीयसेज्जा पीढफलक धणधण्णसेना पुंजातीयसयणासण सत्यिक पहरणावरणसेजा भासण तलिय मसूरक भत्थरक कोहिम सिलातल मासाल मंचक पलंक पहिसेजक थीजातीय सय- णासण सेना खा भिसी भासंदी पेढिका महिसाब सिला फलकी पृष्ठ ६५ पृष्ठ ७२ पृष्ठ २६ आसणापस्सय भासंदय भएपीठ डिप्फर फलकी सेना जाणापस्सय सीया भासंदण जाणक घोलि गल्लिका सगड सगडी याण (२२) अपश्रयविभाग-टेका-तकिया दारप्पिधणापस्सय णावाखम अधोगागार- कीडिका छायाम मितुपडिमा दारकवाड दीवरुक्खखंभ दारुपडिमा रस्सावरण दगलटिखम हरितापस्सय कुडापस्सय सेलखम तणभारय लित्त कट्ठसंभ पचमारय अलित्तकुड्ड भट्टिकखंभ पदमारय लित्तचेलिम रुपखापस्सय पुप्फभारय मलित्तचेलिम कंटकीरक्त मायणापस्सय लित्तफलकमय खीरलस कुंभकारका अलित्तफलकमय लितफलकपासित पडिमापस्सय पटल मलित्तफलकपासित सेलपतिमा कोरथकापल खंमापस्सय लोहपटिमा मंगमा खंभ मद्विपटिमा कमायण पाहाण कट्टपतिमा घरणितम पोरयकम्मपरिमा नपार्मम पिलवसम चित्तकम्मरडिमा पीडोरम भिसी कटपीट तणपीद महियापीढ एगणपीढ सयणापरसय सयण भासण पहंक मंच मासाटक मंचिका चेतितपादव पण्णयोहल पलपोहल मूलपोद्दल पुप्फपोहल घतला तेलकेला मुराकुंभ अरंजर पृष्ठ ३१ सोमाण मिती सम्यवोभाभामण दारपिंड चेतितापस्सय- लोहमय पृष्ठ २७ पुरिसापस्सय मणुस्स गय बाजी पृष्ठ ३० भरंजरपेटिका वेड्या गिस्मगि वसम करम ३५८ पृष्ठ १८३ दिव्वरत माणुस्परत निरिक्खजोणियरत पुरिसरत थीरत णपुंसकरत चुबितरत मालि गितरत सेवणारत ममारिकपुरिसरत समारिकपुरिसरत भपतिकथीरत सपनिकथीरत अणरत्तपुरसरत वंझायीरत दिव्यरत अग्धरारत देवरत मागकण्णारत पागरत पियरिरत फिचररत पिसाईरत पिसायरत रवसरत रक्खमीरव गंधापरत अंगविजामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनाम्नां विभागशः सङ्ग्रहः (२३) रतविभाग गंधवीरत नपुंसकरत वक्खावत्थद्ध उदुणीरत मुदितारत भसुरकछारत विगतरत पृष्ठ १८५ अणुदुणीरत विस्सुयकित्तिरत असुररत भविगतरत गुदेरत बिसदारत पक्खातारत मतक्पडिमारत पृष्ठ १८४ णाभिरत दुस्सीलारत दंसणीयस्वसंपणारत पन्थिरपडिमारत उट्टितरत थर्णतररत भद्धसंवुतारत सुगंधारत मुत्तिकापडिमारत उवविट्ठरत पाणिरत समजारत इट्टथीरत चित्तपडिमारत संविटरत उपातारत परमजारव भिउडीरत तिरिक्खजोणि भवत्थदरत सामारत मित्तमजारत णिकाणितरत यरत दक्षिणपस्सरत कालिकारत रायपुरिसभारियारत खयरत सगुगिरत वामपस्सरत दीहारत परिचारिकारत णवखपदरव ककडिरत उत्ताणरत रस्सारव परूढणखकक्खरोमारत देतखयरत टिहिमीरत णिकुजरत थूलारत अचिरपरूढणहरोमात गीतरत पारेवतीरत ओणतरत फिसारव सुपरिमजितणहकक्स- हसितरत हितगालिरत उभरत वालारत वस्थिसीसारत गोरत माहारितरत एक्भग्गरत वयत्यारत पुधुउपधारत महिसरत पुसुयरत पसल्लियवेलुफालियरत मज्झिमारत संसित्तभगारत अयेलकरत सोणियओघायणरत उत्ताणरत महवयारत परिमंडलभगारत भस्मतरिरत उमयोसंविट्ठ बंभणीरत सुदारत चतुरस्सभगारत सुणिकारत पडियारत अद्धसंविट्ठ खत्तिकारत समगारत वराहीरत एकापविट्ठ(द) विवादरत वेस्सीरत अमेखलारत चलवारत रत्तिरत पणतरत सुदीरत समेखलारत उहीरत कडिगहित फसिगोरक्खमनारत कुमारिरत दिवारत गहमीरत संझाकालरत चतुप्पद कारकमजारत जुवतीरत गाचीरत पदोसरत रघप्पयात यवहारिभजारत -उत्तानमगारत महिसीरन उपविट्ठरत पउत्थपतिकारत णिपणमगारत भवरणरत माणुस्सरत मन्झतियरत सयणावत्यद्ध अविधवारत पसण्गारत थीरत भासणारयद्ध अद्धरत्तरत अवहिवारत कुदारत पुरिसरत साहावत्थर घरचित्तारत चित्तारत पचूसरत (२४) दोहद विभाग अरण्णगत सहगतदोहद धूपगत पाहणगत परस्त्रसंधीसु पत्त भूमिगत मणुस्पसहगत मल्लगत गगन अभंतरपंचमीवत गरपन पक्विसदगत पुष्पगत वत्यगत परमपंचमीवत्त सघागरगत चनुप्पदसगत फरगत भाभरणगत अम्भतर पृष्ठ १७२ पत्तगत जाणगत दसमीवत्त मिशागत परिसप्पसहगत माहारगत समयदोहद परमदसमीवत पुष्कगन दियघोसगत रमगतदोहद सरदे दत्त 'पायरासे पत्त यादितघोसगन पायगत विम्हे वत्त पदोसे वक्त मदायरगत मामरणयोसगत भोयगत पाउने वस मम्झनिके यत्त पुरविगत गंधगत दोहद समगद पासारते यत्त मगुरते यत्त पचवागत लेगझगत भपरदे बत्त भारामगन मणुलेवगगत फासगतदोहद यानी बच्च मनिवसमासत मरिवामगन मामणगा मुमागे वत्त मणागतमापस मंगामगन गर्घमगन मयंगगा कालपागे दत यत्तमागमहारा. पृष्ठ १७१ रुवगतदोहद मणुस्पगत पनुपदगा परिवगत परिपप्पगत कीरिरिगत पुष्पग विदिगत नदीगा हेमते वत्त पारिगत गुरमीत पृष्ठ २०२ छेज छट्टि फिक्का अवयि गलगंड कटुंसालुक तिलकालक पत्थक पृष्ठ २०३ कीडिमक कुणिणख गहि बहिर कण्गच्छेज णासारोग णासाछेज जिब्भारोग जिब्भाछेज तयादोस फासोवघात कुंट गंडीपाद खंज कुणीक सामदंत गीवारोग सीसवाधि अक्सिवाधि वातिक पेतिक सेंभिक पट्ठीरोग खंडोह पृष्ठ २०४ सपिणवातित वण पञ्चमं परिशिष्टम् (२५) रोगविभाग पलित पीलक खरड गलुक चम्मकील गंड कीडिग किलास कोढिक कट्ठ कोट्टित सिन्भ वातंड खत अंहरि सुणवारक वातंडअरिस कामल भगंदल णील कुच्छिरोग कण्हतिल वातगुम्म (२६) उत्सव विभाग णिबहण भधिक्कमणक अधिक्कमणक पृष्ठ १४७ तोप्पारमणा बलि पातिज मंगल णवण यागहरण पंचमेजण सेसा वारेज अण्णोष्ण जामातुकीय पितुकज पेतकिच दसमीण्हाणक काण अंध करल खंडदंत पृष्ठ ९७ पञ्चाहरणक चोलक उपणयण लेहणिक्खिवण गणितापढपणक बालक जाणक ठियपडिया पंचमिका सत्तमिका उहाणा मासपूरणक पिंडवणक उपणिग्गमण पादपेसणक परंगणक पदकमणक पृष्ठ ९८ गोसग्गण्हाणक घरपंचमजण तिरिक्सजोणिमजण पृष्ठ २५६ वाधुज चोल उवणयण उजाणभोज पृष्ठ २६२ सेसा जोग पृष्ठ २०८ आवाह वीवाह चोलोपणयण तिधि उस्सव समाय जण्ण पृष्ठ २४९ उजवणिका पृष्ठ २५५ वरमजण वधूमजण गुलभक्खण बाढकार समासेयणक सुण्णिका उपमाणक गोसग्गण्हाणक पडिवज्झक पृष्ठ २२३ पृष्ठ १२१ जण्ण यलि पृ०२३० वीणा मसूरका पखर पृष्ठ ७८ हिमवंत महाहिमवंत रुप्पि मेरु मंदर णेलवंत बालोपणवण जायणविवद्धी वाधुज पडिभोगकम्म (२७) वादिनविभाग दहरक मुरव आलिंगा (२८) पर्वतविभाग केलास सज्झ बस्सधर विझ वेयड मंत अच्छदंत (२९) खनिजविभाग सारमणी काललोह धातु वहलोह कंसलोह सुवण्ण हारकूडग सवुक रूवियग तंवक सीसक मलय पारियत्त महिंद चित्तकूड अंबासण मेस्वर जिसढ रत्न पृ०२३३ पेरुलिय फालिय मसारकल लोहिवक्स अंजणमू(ोलक गोमेदक अंकामलक सासक सिलप्पवाल पृ०२३३ सीसक लोह तंय हारबूडक सुवष्ण काललोह निक्सलरोह मुंबलोह वर्णमृत्तिका पृ०२३३ मुधा सेडिका पलपक पलकता पवालक पृ०२५८ गेरग मरगत ३६० भगोसिट पचंग हिंगुलक पजणी अंगविजामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनाम्नां विभागशः सहः घण्गमतिका पंहुमत्तिका देवताययणमत्तिका मुवण्ण नीलकधानुक गदिमत्तिका संवभूमी जातरूव सस्मकचुण्णा संगमत्तिका मुरंय मणस्सिला कण्डमतिका विसाणमसिका कासकरा गोकंटक (३०) वर्ण-रङ्गविमाग कण्ह मेचक कारंदवण्ण मणोसिलाजिम सुरुगमिक हरितालवण पीतक गयतालुकवण्ण पदुमक हिंगुलक खीरपक भन्भवालुका लवण सुद्धभूमी पृ० १०४ पृष्ठ १०५ चितवण मिस्सवपण कोरेंटकणिम पील पृष्ठ ११५ भाागमंडल गायत्तमंडल जोड्स मादित णापुण्णमंडल भट्ठमंडल मंडलास डेसमंडल उवलेवमंडल किमिटिक पंचमंडलिक अपंचमंडल माकणीकणिक एक (३१) मण्डलविभाग कण्णपालिक वलकणिक जीपुर वक कण्णुप्पलक तलपत्तक पण्णेलिक परिहेरक सकटपटक तलभ पालत्यिकापह करणपलयक भकरपहक सडक भस्ममहल मुदिका पावधमंडल देक महरिमंडल लेहपहिकमंडल सत्थिसंघातमंदल अंगुलिमंडल संघायमंडल करणमंडल पृष्ठ २३९ जोतिसमंडल पुदयीमंडल पृष्ठ २४१ महामंडळ मन्तिमगमंडल सुदुलगमंडल णखत्तमंडल भदागमल धंदमहल सूरमंडल पृष्ठ २४२ पलकपालग घाडीच सफाचक समपर्मल रिसिमडल संसर्मस (३२) नक्षत्र विभाग पृष्ठ २०६ पुष्पहारिक दरिसदारिक परिमारिक उत्तादारिक समोच दियाखेत अदरोत्त जातिणस्वस भादाणगवत मिलामत पुरिसगावत थीगक्खत 'मरणासत्त गरणवायत्त देवासस गामणखत्त रोडणवत्त कुलणसत्त उपकुटणवत्त कुलोपकुमणक्सर पमहणणासस (३३) कालविमाग पृष्ठ २३५ उस्माम जामषेला चोरवेला गोसमावेका शिम एवं जागुरेला वामपेत्रिका पागवेला पमुवेटिका दीवरेलिया सामामषेठीया पृष्ठ २५७ पृष्ठ२५६ हायक मरमद बगत ममिवर पुष्प मागपयेला भवरद दुदयलिका मागधम माहोलीवेलिका पानराम भाणुतामरेला मणुमजसाह परदेला पृष्ठ २४७ पानरामपेठा मत्तवनिता गवेग (३४) व्याकरणरिमाग ध्याण पिनीय अनुमागिर समानी समागाना निगडी सधिमापर १५३ प मामिसर पृष्ठ १५. अपांग प्रभाग पोमन रिमार अनुमरिहामूर्भप गभस्म ३६१ कवल पृष्ठ ६२ चतुष्पद हस्थी कोसक मस्स पृष्ठ २३९ पृष्ठ ६२ गहम घोडग उसम बलिवद्द वच्छक तण्णक सीह वग्ध खग रोहित दीविक थालक अच्छमल तरच्छ महिस गय लोयक सस कंटेण घण्णक कदुमाय कुरंग सियाल चतुष्पदी कणेरु हस्थिणी गावी महिसी वडवा किसोरी घोडिका अजा भविला कण्हेरी रोहिती एणिका पसती कुरंगी मिगी मल्लुकी सुण्ही सीही बग्धी विकी अच्छभल्ली मज्जारी मुंगसी उपहाली अडिला मूसिका मुछिका ओवुलीका उंदुरी वाराही सुवरी को दीपिका स्वारका घरकोइला चतुष्पद पञ्चमं परिशिष्टम् (३५) तिर्यग्जातिविभाग सूमर मंगुस मनुप्यतिर्यक्सा- सुंसुमारी मग णउल धारण असालिका पसत उंदुर वाणर जलचर विलाल कालक गरसीह पृष्ठ २२७ वाणर पयल अस्सपूतण कद्दमग सस कातोदूक णीलमिग हिस्थिय लोपा सरंत गायगोकपण कच्छभक घरघूला आगावचरणिग हय थलचर पुंजातीयमत्स्य- पदुम गय दुक्खचर जाति भिंगणाग खर बिलसाइ मच्छ वमारक सेलबिलासय कच्छम राजमहोरक गो भूमिबिलासय णाग सवलाहिक माहिस मगर वृक्षचर वग्ध मुंसुमार देवपुत्तक विराल अच्छमल्ल तिमी समाणाहिय दीपिक उंदुर तिमिगिल पृष्ठ २२८ वरच्छ गिल दुपदमच्छ घरपल खग्ग मंदुक हथिमच्छ अहिणूक वग कुलीर मगमच्छ रोहित तोडक बोडमच्छक गोमच्छ पचलाक पसत पाठीण अस्समच्छ घराह शैलविलाश्रय गागरक णरमच्छ दीहवग्ध सहमच्छ णदीपुत्तक गो अच्छमल्ल महामच्छ चतुप्पदमत्स्य महिस तरच्छ कालाहग कच्छम अय सालिम गाधमक मुंसुमार एलक सेधक पिविपिण मंदुक्क दिपिक स्त्रीजातीयमत्स्य- उदकाय विलालु जाति बहुपदमत्स्य मजीणविलाल मटुंडी कुमारिल सीह सलम अहिणूका सचिक वग्ध गोधा दीर्घपदमत्स्य वरच्छ अहिणी चम्मिर अच्छदम योमीका घोहणुमट दीविक मिवाली वहरमच्छ गज कुटीरा निमि चमरी भूमिपिलाश्रय कच्छमी तिमिगिल लोपक सम्ग वत्तगामी पालीग उल मिगिला मुंमुमार गोधा मिपी कच्छममगर अहिणूका घरई वराह गामापमाग वग तोड़क ओदानिका रोहित सियाल ताडक मंहुली पृष्ठ २२६ सुणय विराल णकुल सुणक मूसंग सरम भयकर पृष्ठ २२७ वाणर गजपुंगव मेस उरणक मैंग छगल हरित मग हत्थी अस्म पृष्ठ २३८ अय ममिल सुणग अंग०४६ उलूकी कारंडव वंजुल फुसी उक्कोस रिकिसिक काक कपोत कपिंजल वच्छ कोट्टकवास सतपत्त वंजुल कलहिभी सूकरिका मंचुलक भाडवक काक मेजुक सेडीका टेट्टि कालक णाइकुकुलिका कार्तब पृष्ठ २२६ पृष्ठ २३९ ३६२ अंगविजामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनाम्नां विभागशः सङ्ग्रहः भिंगारी गहर गंतुका टेट्टीवालक मीण अरका कुलल णवूहक चम्मिराज वचाई सेण मालुका णदीसुत्तक कल्लाडक इंदगोविगी बास (ज) सेणा सिकुंडी तुका (यूका) सुय सिपिंजुला काकमजुक उप्पातिक लिक्खा कीरी कातंब इंचक सतपत्त मदणसलाका णदीकुकुडी कुडुकालक मुम्मुलका कपिलक सालाका सित्थमच्छक जाला पारेवय कोकिला कोंच परिसर्प लुता कपोत पिरिली गीवा भिउडी हारीड कुडपूरी रोहिणिक अजगर किणिही भारहाई समुहकाक असालिका तला तित्तिर लाविका गोधा कभेइका लावक वहिका चकवाक तोहका उण्हणामी कयर सेण्ही भासीविस सरंत काणटिट्टी कविंजल कुक्कुडी तिण्हविस पयलाक मयंसला कातंव पलाडीका पृष्ठ २२६ अहिणुक किपिल्लिका दंडमाणव पोटाकी मयूर घडोपल सर्पजाति आसवाय सउणिया कंक णाकुल पृष्ठ २२७ कोंच छिण्णालिंगा दग्वीकर कधामझक टिट्टिभिका गद्ध मंडलि सरभ णडिकुक्कुडिका वीरल पुंजातीय सर्प रायिमंत उपक सडिका सेण कीटजाति मासीविस मयूर उल्क मिराही तिण्डविस कारंडय चकवायी सालक गोणस वातंदविस पिलय पृष्ठ १४५ कपोत भज णिव्विस सिरिकंठ पक्षी घायस अजगर पृष्ठ २३९ पुसंगय सुक मिलिंदक दीदकील भिंगराय कोकिल लोहितक दम्पीकर जीपंजीवक तित्तिर पापहिक मोलि मुथुलक चक्वाक पूर्तिगाल भिंगारी कारंडक तेलपातिक तिसिल गोणस कार्तव सगुणिक गोमयकीग पक्षिणी काकाक परसउणिक पक्षी विल्लरी मेजुक चम्मडिल पतंग गरुल रायसी पृष्ठ १९५ चित्तकपोतक संस रायइंस कलहंसी मदणसलाका कोकी कयी वसक घास सालिया मोर पृष्ठ २३८ रिकिसिक पूतणा पृष्ठ २२५ तितिर स्त्रीजातीय सर्प- वीरत सकुणी वहक कीटजाति सारस गिदी सेटिक हादक गोपा चहवाग सेणी परमुत काकी चश्वाकयी भारं माता सालक पृष्ठ ६३ कोंच किण्णर बलाका मयूर कलहंस भासकुण महासकुण दिग्धगीव दिग्धपाद पारिप्पन दंकराली गह वातिक पृष्ठ ६९ पृष्ठ ६२ दलुक भास धीरल समघाती छिपणंगाला ककी जंतु दाटक छ ६९ पृष्ठ २२७ गोभी मेलारिका यहुपद गोम्मी पञ्चमं परिशिष्टम् सिप्पिका जलाउ दक किमि णीपुर सुमंगल संयुक्त तेइंदिय जुंगटिका उप्पादक उप्पातक तणदारक पत्तहारक पृष्ठ २३० लिग्छ सतपदी इंदगोपिका चसणिका पृष्ठ २२९ भमर मधुकरी मसग मक्खिका किविल्लका मोपविका कुंथु इंदगोपक पसलचित्त कण्डकीठिका यूका मंकुण उम्पावका रोहिणिका जुगलिका कण्हपिपीलिका कण्हविच्छिका মূল संताणक टेडणाही घुखभरप अग्गिकीट पतंग उद्भिज संखण काकुंथिक वटक सिरिवेट्टक करिण्हुक पयुमक सह बिलासय कण्हगुलिक सेवगुलिक खुलिक आदाडक कसक वातपुरील वातंसु कुतिपि यहुपद ईलिका सीकूणिक गंदी उन्मणाभि संतुवायक गदीमच्छक फलकीड जलायुमच्छक घण्णफीद भासालिक सुत्तजगलिका कीमिक कुंथु उरणी गंडूपय सुयम्मुत्ता सम्वट्ठक सूकमिड कोलिक घरपोपलिका अहिलका संधुटिक भिंगारी सूकमिद मालका भमर पृष्ठ २३७ मधुकर सुलक तोडू धराड संखणग पतंग मच्छिमा सिप्पि गंडूपद मगसक जलका छिर भासालिका कुरिल यारवत्त सिगिलि पाण्णयिक मंकलिमा धिकुण लिक्खा गोम्मी घुण कीग चम्मकीट विठिय (३६) वनस्पतिविभाग पालिमग सन्न पंजीवक भमुण दपिवय कतंय सत्तिवण्ण निय कोसंव भीय उदुंबर भयकृष्ण भकोय भस्मकृष्ण गोध धम्मण्य घय सिन्हक दाठिन मिलिंप पारि बिटियध गिर सुरगोपक इंदकाइय उंदुर सरद खालग सुहलग पंथोलग वतिभेदग गहकंदुग कुंभकारीम घोलाडिग कुर्लिंग धम्मणग पंढराग पृष्ठ २६५ एगिदिय पुढविधाइक भावुदायिक तेनुसायिक यायुकायिक वणप्फतिकायिक पृष्ठ २६६ बेइंदिय संख संखणग पिपीलिका उपचिक रोहिणिक तेरस्क तपुस मिजिक पातिक साहिक सतप्पाय गोम्मि हत्यसोटा कटमष्ट पृष्ठ २३८ चिठक पृष्ठ २०२ पुष्प असोग तिलक एकुची सिरीस एत्तोष पर मधुग पृष्ठ ६३ पुंजातीय गुल्म कोरेंट कगवीर मिथुवार मर्णगण भगोन रूस गुप्छ पंजुल पुण्णाग जागवत मोद उपदोसक पारंग गदिर पष्ठी पत्त मयमार मेटक mer पवाद परोह पुंगसएकार्यफ वागीर श्रकोष्ठ कोलिक गोध मतिमुत्तक महिरपणा ऋगिकार पृष्ठ ६३ पुंजातीय पक्ष अंब समोर पगम पाग पोधिराप्त बना पारिराम गिरी रिग ३६४ पृष्ठ ६३ पुंजातीय पुष्प पदुम पुंडरीक पंकय सहस्सपत्त सतपत्त सप्फ कुमुद उप्पल कुचलय गद्दभग तणसोल्लिक तामरस इंदीवर कोजक पृष्ट १०४ पृष्ठ २३२ अंगविजामध्यगतानां विशिष्टवस्तुनानां विभागशः सङ्ग्रहः दालिम टक्कारी थीपुप्फ कसेरका अस्सोत्थ णालिकेर वेजयंती चंपयजाति मुणालिका बिल्ल कंगूका महाजाति विधित्तिका पील आमरक सीसवत्तिया सुवण्णजूधिका लोमसिका पियाल तिंदुक अप्फोतिका जूधिका अक्खोला फरस बदर धवासी तकुली कुकुडिका चम्मणडोला सेलूडक सिंदीवासी तलुसी सिंगलिका कोलक तलपक्क समुद्दवल्ली वासंती थीफलएकार्थक करमंद सीत्रण कप्पासी वासुला फलपिंडी कलायस धम्मण रुचिका वइंदबुद्धी फलगोच्छ पारेवत तोरण उंगुणी जयसमणा करमंद मातुलिंगी णवमल्लिका फलिका मातुलंग बेमेलक णिहू मल्लिका फलमाला कंटासक भाफकी णितणिका जंबु फलमिजा जंबुफल अरंजरवल्ली तिगिंठी दालिम फलपेसिका पारावत उदकवल्ली पीतिका अक्खोल कुभंडी मगयंतिका अयकण्ण मातुलिंग तवुसी पियंगुका सुकिलपुप्फ पूतिकरंज खजूर पल्लालुका कंगुका सेडकणवीर महिमार कलिमाजक तुंबी वासंती पुतिला पृष्ठ ७० कालिंगी वणती वासुला कुंभकंडक वालुंकी अवमंजरी वेइलपुप्फिका कक्खारुणी गुल्मादि थीपुप्फएकार्थक जाती मामलग णलिणी लाणी पिप्परी पउमिणी पुप्फमंजरी जंबु जूधिका कमलिणी पुप्फपिडिया णवमालिका जंबू पुप्फगोच्छी अंबाडग उप्पलिणी अंबिलिका मल्लिका करमंद पिंडालुकी थीपुप्फसंजोग चंपकाली चिंचिणिका सीवपण घोसाडकी चंदा मंडी तणसोलिक उंबर ससबिंदुकिणी तीसालिका सीवणी सेडकफलिका रातण भंजुलिका पारिहत्थी कजरी पुंडरिक तोडण कसकी कुभिंधी केतभी सेडगमक सीडा कारियल्लिका धम्मी सेडककंद ककीका जागी लउसु मिली सिंधुवार तिवुस्की कालिका विलिंजर तुदुरु धर्कटी रुपख पिप्पल अंजणेकसका पोहालिका घेलरी जयंती पृष्ठ२३१ सेलुफल तेरणी स्त्रीवृक्षादि पणस कोलफल मनणमालिका भरलसा एकार्थक जंगमाला तुंब वारमटिम भामली खोलकमाला कूभेड घरिफल सेवती लट्ठी अंय करिलेग लचापली छमिणी पृष्ठ ७०-७१ श्रयाक लोमसिक सीकरलोकी काणवी थीफल णीप बिदालक लिंगिष्टी दुमगुम्मलता मुंदिका तिदुक पासिंगण हिंछापोहा चलिका उर्दूवर यालुक स्त्रीजातीय वृक्ष पृष्ठ२३८ पाडल कंदल चंपगपुप्फ इरिकाक लवंगपुप्फ मोगरग अंकोल्लपुष्फ सहवरपुष्फ पुंपुप्पएकार्थक कंटेगुण संविताणक उरणा चुंभल आमेरक मत्थक गोरछक पुष्फरासी पुष्पाणिगर पुप्फपोद्दल वेडसी पृष्ठ ६४ पुंजातीय फल कारिंग समर्विक तगुमेलामुक पृष्ठ ७० पञ्चमं परिशिष्टम् मूल खंध पूगफल कक्कोलग लवंग जातीफल मुद्दीगा मरकल मगवच्छक सिंगालक अंधक दालिम तीतिणी बिल्ली पलालु व्यवसक पुप्फ मरिय वासिका वीज जलज . दिल्ल थटज गोधूम मास पृष्ठ ६६ पुंधण्ण सालि वीहि तिल कोद्दव चरक उरालक चीण पृष्ठ १६४ सालि वीहि कोव कंगु रालक तिल मास मुग्ग चणक कलाय णिप्फाव कुलव्य जव गोधूम कुसुम मतसी मसूर मुग्ग णिप्फाव कक्खारक कूभंड रक्ख तयुसक पृष्ठ २४३ पृष्ठ २३९ मजुण गुच्छ वलपक्क कुडय वलय णालिक कतंब उदाण कपिट्ठ सिलिंध तण कंदलि थलज कालिंग कुटुंबक थलजहरित तुंव पृष्ठ २६६ कंद (३७) धान्यविभाग रायसस्सव भाजनगत धान्य कोसीघण्ण वरक मंजूसागत धान्य तिल चणव पलगत धान्य मास सेतबीहि जाणगत धान्य मुग्ग सेततिल णिवेसणगत धान्य चणक ओवारिगत धान्य रत्तसालि कलाव भरण्णगत धान्य रत्तवीहि णिप्फाव कीत धान्य रत्ततिल विक्कीत धान्य कुलत्थ कण्हवीही मसूर सक धान्य कण्हरालक मित्त धान्य सुवरि कण्हतिल जाचितक धान्य पृष्ठ २२० पृष्ठ १६५ णिक्खेवपरिगतधान्य सालि सेतणिप्फाव पोराण धान्य वीहि रत्तसासव नव धान्य कोहव रत्तणिप्फाव पन्न १७८ हारीडणिप्फाव कोसीधण्ण रालक सस्सप अकोसीधण मरक (३८) देवविभाग कप्पोपक जक्खी इला वेमाणिक किश्मरका सिता गोजाग वणप्फती विजा गोज्झगपति दिसा विनता तारका चंदलेहा देवी हिरी उकोससा असुरी सिरी भब्मराया असुरमजा लच्छी देवकण्णा असुरकण्णा कित्ती मसुरकण्णा णागी मेघा ईदग्गमहिसी णागकण्णा सती अमुरग्गमहिसी भवणालया चिती अइरिका गंधब्धी घी भगवती रक्तसी बुद्धी अलंबुमा अलसंदक चणक णिप्फाव कुलत्य चणचिका मसूर तिल अतसी कुसुम सामात सेततिल सेतसासव तंवणिप्फाव रायसासव गोधुम मास मूढत्य चणक सण पिसाय जक्ख रक्खस चंद सूर बुध पृष्ठ ६९ पृष्ठ ६२ देव मसुरलोक असुरेंद णाग सुवण्ण पपागलोक भवणवासी महालोक किंपुरस गंधव किवर मस्त भूत मिस्सकेसी भीणका मियदसणा अचला अणादिवा अइराणी मिस्सकेसी तिघिणी सालिमालिणी तिलोत्तमा चित्तरघा चिचलेहा वहस्सति धूमकेत लोहियंक सणिरकर विमाणिद कप्पपती देव पृष्ठ २०४ ३६६ जक्स गंधव पितर पेत वंमा दाण धादिच अस्मि भञ्चाबाघ देवदूत मच्छरसा मज्जाधिउत्य धुक्साधिडत्य गिरिकुमारी समुद्दकुमार दीवकुमार भारत वातकण्णा वरण सोम इंद पुधवी सत्यंधिवुत्था विजासत्याधिवुस्था कुलदेवता वरथुदेवता बच्चदेवता सुमाणदेवता पितुदेवता बिजादेववा थरिह सारस्पत गदतोय यदि भन्ठा वरणकाइय पेममयकाइय सोमकायिय पुढवी पृष्ठ २२४ अंगविजामध्यगतानां विशिष्टयस्तुनाम्नां विभागशः सङ्ग्रहः मगि पवमिगा पछलदेवया बलदेव मादप सुरादेवी घुद्धी घासुदेव पृष्ठ २०५ जागी मेहा पजुण्ण इंदग्गि सुवण्णा पृष्ट २०६ णाग मसुर अलणा लतादेवता णाग मन्ना वत्युदेवता उर्वेद सुवष्ण अइराणी बलदेव दीवकुमार णगरदेवता माठया मुमाणदेवता वासुदेव समुह सउणी दिसा पञ्चदेवता एकाणंसा काम मग्गि उडिकदेवता सिरी उदलादला मारियदेवता गिरी वाठकुमार वुद्धी सिव यणितकुमार मिलक्खदेवता मेधा विजुकुमार सुवण्ण जम कित्ती वेस्सरण सामाणिय पृष्ठ २२३ सररसनी वरण मामिमोगिक वेस्ममण रक्सस सोम परिसोववण्ण घेण्ड गंधव मिरी समुददेवता सिव किंपुरिस पहराणी णदीदेवता जवख कूवदेवया विसाद एकणासा तलागदेवया ईमा वेमाणित (३९) एकार्थकविभाग वीर कुमारी सामिणी भगिणी विसारद धिना वल्लमी मागिणेजा दिवसात पत्ती पजिया कोर्दुविणी लन्दमाग वधू अजिया पितुस्पहा महायल उपवधू नानिका माठस्सद्दा महापरकम इरिथया महमानुया णेयानुकासका स्खीएकार्थक पमदा चुछमावा इत्थीरयण अंगणा माउस्सिया महादेवी महोमहिला महिला पिनुस्मिया रायपत्ती मदिरा णारी मना रायगमहिसी मुमहिला पोट्टी जारी रायोपजायपत्ती महोहाथी जुबनी सद्दी सेणापनिणी जोमिता भोयणी धणिता पत्ति बलवरी दारिया पिला पणसिगी रहिणी वालिया रिम्हामिगी रमा गामिणी सिंगिका ममची सावती दलमी परिश पिपा सहिमा परिहारी नपिनका मगामा मेगा इस्मरिंगिणी पोनित दिवाष्टिना भानुमाया मोइणिगी इमरी मगोचा परिणी विसाह पुंएकार्थक सत्यवाही इत्मी महोपुरिम महापुरम पुरमसीह पधागपुरम मोगमित्ती भही पाही कारुगिणी सहिगिणी लाही जोणिगा चिराती पव्यरी पुलिंदी पृष्ठ ६८ रायपुग्य पुरिमिस्पर विजापुरिस मुदत्यी अधी जोयगाय पार पुरिम गरिक पोहर माग मुमग पिका सिमुप गर दमिली छाजिका उवधाहणी दासी कम्मरी मतिका पपावती भणे ३६७ पञ्चमं परिशिष्टम् उत्सवएकार्थक पृष्ठ ९८ उस्मय समास जण्ण छण अन्भुदय भोज मज्जण पृष्ठ ९२ पृष्ठ ७८ पृष्ठ १२१ उस्सय मोति बंभ माणिणी सयंभु मातुस्सा पयावति ओयातिका भण सामोवाता बभरिसि कालस्सामा बंभवत्य कालका यंभष्णु दिग्यमदहिया पियमण खुजमदहिया दिजाति मायतमडहिया दिजातिवसभ चतुरस्सा दिजातिपुंगव अंतेपुरिका दिजाइपवर ममोगकारिणी विप्प सयणपाली विप्परिसि मंडाकारिकिणी विप्पवर तणुकी जपण मज्झिमिका जण्णोकत काणा जण्णकारि नपुंसकएकार्थक जण्णमुंट पृष्ठ ७३ सोम णपुंसक सोमपा अपुल्स चिल्लिक सोमपाइ सीतल सोमणाम अग्निहोत्त वातिक माहितगि किलिम भगिहोसहुत संकर वेद कुंभीपंडक वेदज्झाइ इस्सापंडक वेदपारक पक्खापक्खि चतुवेद विक्ख वारिस संढ पुग्वमास परेतर चतुम्मास पृष्ठ १०१ ब्राह्मणएकार्थक चिति पितामह अग्गिचयणी समास विहि जपण उपल मणि सिलापट्ट गंडसेल गिरिक वइर मेरुक मरुभूतिक धुवक अचलित थावरक सिवणाम गुत्तणाम भव अभव थित सुत्थित ठाणस्थित भकंप णिप्पकंप गिब्बर सुहत वामएकार्थक कमंडलु णीलुप्पल दभ पामेच्छा सजा लकंठक मिसी मसी आरिट्रक जपणोपइतक कण्हाल कृष्णवर्णएकार्थक कण्हमोयक दृढएकार्थक कण्ह नील हिमवंत कालक महाहिमवत मसित णिसढ भसितकिसिण रुप्पि हरित मंदर अंजण लवंत कजल केलास गण वस्सघर भंग वेयड खंजण अच्छदंत भिंगपस सज्झ विंझ सूगर मंत कोकिला मलय गोपच्छेलक पारियत्त भमर मोरकंठ महेंद चित्तकूड वायस मातंग अंपासण मतिंग मेस्वर णग गय महिस पब्वत बलाहक मेघ सिलोच्चय जलहर सिहरि कण्हकराल पासाण कण्हतुलसी पत्थर छण लक्षण पृष्ठ १७३ वण्ण सर गति संठाण संघतण माण उम्माण पृष्ठ ७६ वाम बामावह वामसील चामायार वामपरख वामदेस वामभाग वामतो अपवाम अपसव्य अवसब्द अप्पग्ध आणुक पगति छाया सार अष्टानिमित्त पृ.१ अंग सर लक्खण चंजण सुविण छिण्ण (दिव्य) भोम्म अंतटिक्स
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