Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Vanaspati Jagat Ki Ashcharya Janak Baaten
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वनस्पति जगत की
आश्चर्यजनक बातें
10000000
Manand
ललितनारायण उपाध्याय
:
प्रकाशक विद्या विहार,
1685 कूचा दखनीराय, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
सर्वाधिकार सुरक्षित । संस्करण
प्रथम,
1991 . मूल्य : चालीस रुपए
VANASPATI-JAGAT KI ASHCHARYAJANAK BAATEN by Lalit Narayan Upadhyaya
Pinter. Graphic World New Delhi-2
Rs.400
मनुष्य अपना भोजन नहीं बनाते इस पृथ्वी पर ईश्वर या प्रकृति के बाद कोई श्रेष्ठ रचना है तो वह है मनुष्य। उसने अपना बहुत बड़ा भौतिक संसार बनाया है। वह फसलें पैदा करता है और अपने खाने योग्य पदार्थ आदि बड़ी मात्रा में उत्पन्न करता है। फिर भी कहा जाता है कि मनुष्य अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते। यह सच भी है। मनुष्य का भोजन वनस्पति-जगत तैयार करता है। वह उसे 'पकाकर' खाता है। मनुष्य तो क्या यदि हम कहें कि प्राणियों में पशु-पक्षी आदि भी अपना भोजन खयं नहीं बनाते तो यह अत्युक्ति नहीं होगी। सभी जीव-जंतु तथा प्राणी अपना भोजन वनस्पति-जगत से प्राप्त करते हैं और जीवित रहने के लिए किसी न किसी प्रकार से वनस्पति-जगत पर ही आश्रित रहते हैं कुछ प्राणी ऐसे हैं जो जब भी खाते हैं, मांस ही खाते हैं। इन्हें शुद्ध मांसाहारी प्राणी कहा जाता है। इनमें सिंह और अन्य हिंसक जीव-बाघ, तेंदुआ, सफेद शेर आदि प्राणी शामिल हैं। अनेक कीट-भक्षी प्राणी भी मांस पर ही जीवित रहते हैं। ये जिन प्राणियों को खाते हैं, वे प्राणी शाकाहारी होते हैं। शाकाहार से उनके शरीर में मांस बनता है और मांसाहारी उसे खाते हैं। इस प्रकार मांसाहारियों के शरीर में भी 'मांस' अंततः 'शाकाहार' से ही बनता है। 7 . इसीलिए यह माना जाता है कि चाहे कोई शाकाहारी हो या मांसाहारी वह अंततः 'शाकाहार' पर ही आश्रित होता है। इस प्रकार सभी जीवधारी अंततः वनस्पति-जगत पर ही आश्रित रहते हैं। वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें 13 हर प्राणी के मांस का विश्लेषण करने पर आपको यही परिणाम मिलेगा कि प्रारंभ में वह घास-पात ही था। इस संसार में जीव ही जीव का भोजन है। छोटे-छोटे कीट पौधों का रस पीते हैं और जीवित रहते हैं; मेढक आदि उनको खा जाते हैं; मेढकों को साँप खा जाते हैं; साँपों को गरुड़ आदि पक्षी खा जाते हैं; और यह क्रम चलता ही रहता है। जीव, जीव का भोजन बनते रहते हैं। अंततः हर जीव अपने शरीर में मांस बनाता है और यह मांस किसी न किसी प्रकार से घास-पात वनस्पति-जगत का अंग या अंश ही होता है। जिस दिन पृथ्वी पर से वनस्पति, पेड़-पौधे आदि समाप्त हो जाएँगे उस दिन 'जीव-जगत' भी समाप्त हो जाएगा। इस वनस्पति-जगत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये न केवल स्वयं अपने लिए भोजन बनाते हैं और जीवित रहते हैं, वरन् दूसरों के लिए भी भोजन बनाते हैं; एक तरह से उनका पालन-पोषण करते हैं और उन्हें भी जीवित रखते हैं। सारी सृष्टि वनस्पति-जगत की किसी न किसी प्रकार से ऋणी अवश्य होती है। इस अर्थ में वनस्पति-जगत संसार की सबसे श्रेष्ठ रचना कही जा सकती हैं। शाकाहारी घास-पात खाते हैं - आपको यह जानकर बिलकुल आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि शाकाहारी घास-पात ही खाते हैं। शाकाहारी गेहूँ, जौ, जई तथा मक्का आदि का उपयोग अधिक करते हैं। ये भोजन के अनिवार्य खाद्य पदार्थ हैं। ये सब घास-पात की श्रेणी के पौधे है। खेतों में हम जो अनाज बोते हैं उसे नुकसान पहुँचानेवाले हलके किस्म के पादपों को हम साधारण भाषा में घास-पात कहते हैं। ये हमारे द्वारा बोए जानेवाले अन्न का अधिकांश खाद, वीज, पानी आदि अपने काम में ले लेते हैं तथा हमारे द्वारा खाद्य पदार्थ देनेवाली फसलों को तरह-तरह से नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए हम इन्हें - और वह है घास-पात की संज्ञा देते हैं। किसान इन्हें 'खरपतवार' कहते हैं। इसे खेतों से निकालने की क्रिया को 'निंदाई-गुड़ाई' कहते हैं। इस घास-पात में कुछ घास-पात जहरीले किस्म के भी होते हैं। परंतु सभी प्रकार के घास-पात हमें एक लाभ पहुंचाते हैं ये ढालू जमीन में मिट्टी को कटने से रोकते हैं। अतः ये भूमि-कटाव को रोकने में हमारी सहायता करते हैं। इस प्रकार अनुपयोगी कहे जानेवाले घास-पात भी हमें कुछ न कुछ लाभ अवश्य पहुँचाते हैं। इस घास-पात से पूरा संसार भरा हुआ है। हमें चारों तरफ जमीन से लगी हुई जो हरियाली दिखाई देती है वह इसी घास-पात के कारण होती है। गन्ना और बाँस भी एक प्रकार की घास ही हैं। परंतु ये डंठलधारी या गाँठधारी घास होती हैं। खस भी एक प्रकार की घास ही है जो गरमी के दिनों में हमें ठंडक देती है। इन सबमें गेहूँ, मक्का, जौ और जई से अधिक उपयोगी और कोई घास नहीं होती। ये सब हमारे भोजन के अंग हैं। आज भी हम कंद-मूल-फल खाते हैं,. पौधे चीनी से स्टार्च या माँड बनाते हैं। यह अतिरिक्त स्टार्च उनकी जड़ों में इकट्ठा होता रहता है। इसी से चिकनाई तथा पेड़-पौधों के अन्य खाद्य पदार्थ भी बनते हैं। पेड़-पौधे अपना खाद्य पदार्थ जिस तेजी से बनाते हैं उसका वे उस तेजी से उपयोग नहीं कर पाते । वह उनकी जड़ों, डंठलों, बीजों और पत्तियों में जमा होता रहता है। हम लोग बहुत बड़ी मात्रा में पौधों द्वारा इस प्रकार से जड़ों में जमा किया गया खाद्य पदार्थ या खाद्य भंडार खाते हैं। वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बने।
आइए, यह भी जान लें कि उन वस्तुओं या पदार्थों के नाम क्या हैं? ये हैं गाजर, मूली, कंद, अरबी, आलू, अदरक, शकरकंद, हलदी आदि । पार प्रापगारो पौधों से हरा-भरा है यह संसार कहते हैं, सावन के अंधे को चारों ओर हरा-भरा ही दिखाई देता है, परंतु वास्तविकता तो यह है कि आदमी किसी भी ऋतु में अंधा हो, उसे चारों और हरा-भरा ही दिखाई देगा। . , यह संसार हरीतिमा या हरे रंग से भरा हुआ है। जिस प्रकार आकाश नीले रंग से भरा हुआ है और उसका यह रंग समुद्रों तक में प्रतिबिंबित होता है, उसी प्रकार यह पृथ्वी हरे रंग से भरी हुई है और इसमें सर्वत्र हरे रंग की ही प्रधानता है। पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं और यह रासायनिक कारखाना उनके अंगों में छिपा होता है। ये पौधे धरती में से पानी और हवा में से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं। फिर ये सूर्य से शक्ति प्राप्त कर अपने अनोखे कारखाने में 'ग्लूकोज' नामक चीनी बनाते हैं। यह चीनी के समान मीठा नहीं होता। ग्लूकोज बनाने के बाद पौधे उसे माँड अर्थात स्टार्च में परिवर्तित करते हैं। यह स्टार्च पानी में घुल जाता है और पौधे द्वारा, अपने तने की नन्ही-नन्ही नलियों में से होकर, जड़ में पहुंचा दिया जाता है। यह वहाँ जमा होता रहता है। इस माँड-निर्माण के साथ हरा पौधा सेल्यूलोज भी बनाता है। इस प्रकार पौधे ग्लूकोज, माँड या स्टार्च तथा सेल्यूलोज बनाते हैं। उनकी यह क्रिया प्रकाश-संश्लेषण कहलाती है। संसार के सभी हरे पौधे अपना भोजन प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया द्वारा ही बनाते हैं। इस प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में एक और रासायनिक क्रिया होकर पौधे में हरीतिमा या क्लोरोफिल का निर्माण होता है जिसके कारण ही पौधे हरे दिखाई देते हैं। इन्हीं हरे पौधों के कारण यह संसार हरा-भरा दिखाई देता है। इस सिलसिले में यह भी जान लें कि 1. प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया पौधे सूर्य के प्रकाश में करते हैं। सूर्य का प्रकाश इस कार्य में उन्हें 'शक्ति' देता है। - वाति-जगन को आश्चर्यजनक याते ।।
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इस क्रिया के दौरान पौधे हवा में से कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं।
इस क्रिया में उनके शरीर में से ऑक्सीजन निकलती है।
यह क्रिया करते समय जड़ों द्वारा चूसा हुआ पानी तने में से होकर ऊपर आता
..
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प्रकाश-संश्लेषण क्रिया
प्रकृति का अनूठा चक्र
प्राणियों के लिए प्राणवायु या ऑक्सीजन नितांत आवश्यक होती है। हम
ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और नोषजन या कार्बन डाइऑक्साइड त्यागते हैं। हम यह
क्रिया चौबीसों घंटे करते हैं। पेड़-पौधे दिन में नोपजन या कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण
। सम्मानको कापमा यो
करते हैं और ओषजन या ऑक्सीजन त्यागते हैं। आपने देखा होगा कि दिन में इसीलिए वृक्षों के नीचे ताजगी व चैन महसूस होता है। रात में यही पेड़-पौधे ओषजन या प्राणवायु ग्रहण करते हैं और नीषजत-छोड़ते हैं। इसी कारण रात में वृक्षों के नीचे उमस-सी महसूस होती है और हमें वह ताजगी नहीं मिलती जो दिन में वृक्षों के नीचे मिलती हैं। रात में चूंकि पेड़-पौधे नोषजन छोड़ते हैं और वह मनुष्यों के लिए हानिकारक होती है, इसीलिए प्रायः रात में वृक्षों के नीचे सोने की मनाही की जाती है। करोड़ों वर्षों से ऑक्सीजन उपयोग में है करोड़ों वर्षों से पृथ्वी पर जीवन चल रहा है और ऑक्सीजन उपयोग में आ रही है। फिर भी क्या कारण है कि ऑक्सीजन आज तक समाप्त नहीं हुई। जबकि इतनी अधिक संख्या में प्राणियों द्वारा इसे उपयोग में लाने और खराब करने पर तो यह न जाने कब की समाप्त हो गई होती ? जी हाँ, ऑक्सीजन समाप्त हो गई होती यदि प्रकृति ने पेड़-पौधों की सहायता से ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के निर्माण का 'अनूठा जीवन-रक्षक चक्र' नहीं बनाया होता। इसमें प्राणी एक ओर ऑक्सीजन काम में लाते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं, तो दूसरी ओर पौधे कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करते हैं और अन्य प्राणियों के उपयोग के लिए ऑक्सीजन छोड़ते हैं। यदि हम वनस्पति, पेड़ और पौधों को किसी भी प्रकार से नष्ट करते हैं तो हम इस क्रम को तोड़ने का प्रकृति-विरोधी बहुत बड़ा अपराध करते हैं जो हमारे ही नाश का कारण बन सकता है। यह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। धनम्पनि-जगत को आश्चर्यजनक बने।
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CO2
जीवन-रक्षक चक्र
आज हजारों कल-कारखाने बराबर धुआँ उगल रहे हैं, जिससे हमारे आसपास
का वातावरण दूषित होता जा रहा है। इसे वायु-प्रदूषण कहा जाता है। यदि ये
कल-कारखाने चलते ही जाते और उतनी ही अधिक संख्या में वृक्षों को भी रोपा जाता
तो वायु-प्रदूषण नहीं होता । कारण वृक्ष उक्त क्रम का निर्वाह करते हुए वायु
करते रहते । मनुष्य ने वृक्षों को काटकर कारखाने लगाए, परंतु उन वृक्षों के बदले पुनः
दूसरे वृक्ष नहीं रोपे, जिससे अनेक समस्याओं का जन्म हुआ है। इन समस्याओं में
वायु-प्रदूषण सबसे प्रमुख है।
को शुद्ध
10/वनस्पति-जगत को अरचर्यजनक मते
MI- -- . पौधे और प्राणी एक-दूसरे पर आश्रित हैं या पौधे और प्राणी दोनों ही सजीव वर्ग में आते हैं। इस प्रकार के एक संजीत्र और सक्रिय संसार या सृष्टि को बनानेवाले हैं। वे एक-दूसरे पर निर्भर हैं। तितलियाँ पौधे का रस पी जाती हैं परंतु अपने पैरों में 'परागकण' ले जाकर उसे दूसरी जगह फैलाती हैं जिससे ये पादप वहाँ भी बढ़ते हैं, उगते हैं और फैलकर नया जीवन पाते हैं। मक्खी को हम सामान्यतः नुकसानदायक ही मानते हैं परंतु परागकणों को फैलाने में वह बड़ी सहायक होती है। फलों के अंदर बीज होते हैं। अनेक प्राणी फलों और बीजों को खाते हैं। अपने मल त्यागने के माध्यम से वे उन बीजों को अन्यत्र फैलाते हैं जिससे वे बीज वहाँ उपजते हैं। इस प्रकार वे एक नया जीवन पाते हैं। पक्षी भी अपने पंजों में बीजों को इधर से उधर ले जाते हैं। क्या-क्या नहीं मिला है हमें वनस्पति-जगत से भोजन साधारण भाषा में हम कह देते हैं कि पृथ्वी ही हमारी माता है और यही हमारा पोषण करती है। इससे ही हमें सब कुछ प्राप्त होता है। विशिष्ट अर्थ में हम देखें तो पाएँगे कि यह प्रकृति, यह वनस्पति-जगत ही हमारी 'माता' है तथा हमें सब कुछ इस वनस्पति-जगत के माध्यम से प्राप्त हुआ देखिए क्या-क्या कीमती वस्तुएँ इस वनस्पति-जगत ने हमें दी हैं -- है। - संसार के सभी प्राणी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर हैं। वनस्पति-जगत से हमें गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा, जौ, ज्वार, जई आदि अनाज के रूप में मिलते हैं। घनस्पति-जगा की आश्वयंसक बने । 11 दालों के रूप में हमें अरहर, मूंग , मसूर, चना, उर्द तथा मटर आदि मिलते हैं। जड़ों के रूप में हम आज भी गाजर, कंद, मूली, शलजम, अदरक, लहसुन आदि का उपयोग करते हैं। साग-सब्जियों के रूप में हम पत्तागोभी, टमाटर, पालक आदि का उपयोग करते हैं। फूल रूपी साग-सब्जियों में हम गोभी का फूल, कचनार, अगस्त के फूल आदि का उपयोग करते हैं। सरस फलों में हम संतरा, मौसमी, आम, अमरूद, जामुन, सेब, अनार, नीबू, पपीता, केला, शहतूत, लीची, अंगूर, अंजीर, आलूचा, आडू आदि का उपयोग करते हैं। शुष्क फलों में हम काजू, बादाम, अखरोट, किशमिश, पिस्ता, सूखे मेवों आदि का उपयोग करते हैं। वनस्पति के फलों के रूप में हम लौकी, कद्दू, करेला, तोरई, बैंगन, भिंडी, कटहल, सहजन या सुर्जना, कुंदरू या कंदूरी आदि का उपयोग करते हैं। केवल मसालों के रूप में हम फल, इलायची, मिर्च, धनिया, सौंफ तथा काली मिर्च, फलों की कलियों के रूप में लौंग फल की कली, पादपों के रस के रूप में पपीते का रस, हींग जो एक पादप का रस होता है, काम में लाते हैं। पत्तों के रूप में तेजपात आदि के पत्ते सुखाकर मसाले में डाले जाते हैं । भूमिगत तनों के रूप में हलदी, अदरक मसालों के रूप में काम में आती है। छाल के रूप में दालचीनी आदि की छाल का उपयोग किया जाता है। अनेक प्रकार के सुगंधित पदार्थ जैसे केवड़ा, गुलाब जल, पिपरमेंट आदि सुगंधित द्रव जो मिठाइयों आदि में काम में लाए जाते हैं, हमें फूलों से मिलते हैं। चारा पशुओं को विविध प्रकार का चारा वनस्पति-जगत से ही मिलता है। 12/वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें
पत्तियों का उपयोग
चाय, कॉफी में पत्तियों का उपयोग होता है।
रंग व चमड़ा बनाने के लिए भी वृक्षों की छालों का ही उपयोग होता है।
ओषधियों का स्रोत वनस्पति-जगत ही है। जैसे - आँवला, अमलतास, नीम,
पीपल, तुलसी आदि। अनेक एलोपथिक दवाइयाँ भी वनस्पति-जगत से प्राप्त
जड़ी-बूटियों से ही बनाई जाती हैं।
वृक्ष भूमि का संरक्षण और कटाव रोकते हैं। वायु का शुद्धीकरण वृक्षों व
वनस्पति-जगत की सहायता से ही संभव है। सूक्ष्म जीव, जैसे बैक्टीरिया च
रबर
रबर का स्रोत रबर देनेवाला वृक्ष है।
ईंधन
लकड़ी का उपयोग मकान बनाने के अलावा ईंधन तथा कोयले के रूप में भी
होता है।
पैट्रोल
पैट्रोल शब्द सुनकर शायद आप चौंक जाएँ परंतु पृथ्वी के अंदर से
निकलने-वाला कच्चा तेल पैट्रोल जीवाश्म पेड़-पौधों की ही देन है। इस प्रकार पैट्रोल
के प्राप्त होने का आधार करोड़ों साल पूर्व नष्ट हुए पेड़-पौधे ही हैं।
रेशे
वनस्पति से हमें कपड़ा, रस्सी, धागे तथा पटसन कागज और रेयान बनाने के
लिए रेशे भी प्राप्त होते हैं।
तेल व वसाएँ
चिकनाई भी अंततः हमें वनस्पति-जगत से प्राप्त होती है। जैसे मूंगफली का
तेल, सरसों का तेल, विनौले का तेल, जैतून और सोयाबिन का तेल, अरंडी का तेल
आदि।
वनस्पति जगत की आश्चर्यजनक या
मृतजीवी कवक आदि अंततः पृथ्वी की शरण में जाकर नष्ट होते हैं। वनस्पति इन्हें रासायनिक क्रिया करके खाद में बदल देती है। आज भी पेड़-पौधे सजावट के कार्य में आते हैं। इनके बिना हमारे उद्यान और वाटिकाएँ सूनी हो जाएँगी। मनुष्यों, प्राणियों और स्वयं वनस्पति-जगत को जीवित रहने के लिए जिन तत्त्वों की जरूरत होती है उन सबकी पूर्ति अंततः वनस्पति-जगत ही करता है। वायुमंडल का संतुलन वनस्पति-जगत से ही बना हुआ है। खेती तथा हमारी प्रगति वर्षा पर ही आधारित है तथा वर्षा वृक्षों पर आधारित होती है। इसी प्रकार छुई-मुई, कीट-भक्षी पौधे, रेफ्लीशिया आदि हमारी उत्सुकता बढ़ाने- वाले पौधे हैं। फूलों के गुलदस्तों से हमारा मन खिल उठता है। पेड़-पौधे और अंतरिक्ष जब यात्री अंतरिक्ष में जाता है तो वहाँ साँस के लिए ऑक्सीजन प्राप्त करना कठिन होता है। दूसरी ओर श्वसन से पैदा हुई कार्बन डाइऑक्साइड को प्रतिस्थापित कर काम में लाने लायक बनाना भी कठिन होता है। नवीन खोजों से ज्ञात हुआ है कि क्लोरेला (Chorella) नामक हरे शैवाल से वायु का प्रतिस्थापन संभव है; और अंतरिक्ष यात्रा के समय यह बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। वायु-प्रदूषण की समस्या से केवल वृक्ष और वनस्पति ही हमें उबार सकती हैं। इसलिए आज संसार के हर क्षेत्र में वृक्षारोपण तथा वनस्पति के हरे-भरे सौंदर्य को बढ़ाने के प्रयास जारी है। HI-माको मायाको पादप और उनके प्रकार पादप या पौधे मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं भूमि पर उगनेवाले; जल में उगनेवाले तथा रेगिस्तान जैसे क्षेत्र में उगनेवाले। चूँकि यह सुनकर ही आश्चर्यजनक लगता है कि रेत या रेगिस्तान में भी पौधे उग सकते हैं या पौधे होते हैं, अतः इन्हें एक विशिष्ट भाग में बाँटा जाता है। जबकि ये पादप भी भूमि पर ही उगनेवालों की श्रेणी में आते हैं। वनस्पति-वैज्ञानिक दूसरे वृक्षों पर उगनेवाले पौधों को चौथी श्रेणी अधिपादप में गिनते हैं। इन्हें 'परजीवी' पौधे भी कहा जाता है। आर्किड, शताबरी वेंडा तथा डेंड्रेमवियम ऐसे पादप हैं जो परजीवी श्रेणी के पादपों में अग्रगण्य हैं। परजीवी पौधे भूमध्य रेखा के आसपास के जंगलों में अधिक मिलते हैं। यों तो इन्हें कहीं भी, किसी भी पौधे पर शहर या जंगल में उगते हुए देखा जा सकता है। आर्किड वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें/15
जलीय पौधे
जल में पौधे होते हैं। इनकी जड़ें उस तालाब, नदी-नाले अथवा झील में होती
हैं जहाँ ये उगते हैं।
कमल और सिंघाड़ा प्रसिद्ध जलीय पौधे हैं जिनकी उपयोगिता हम जानते हैं।
इसके अलावा जल हायासिथ, हाइडिला वेलिसवेरिया अदि अनेक पादप हैं, जो जल
में पौधे के रूप में जन्मते हैं।
161 वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें
आइए, वृक्षों के बारे में भी जान लें वनस्पति-विज्ञान के विशेषज्ञों ने वृक्षों को भी वैज्ञानिक भाषा में परिभाषित कर दिया है। उनके अनुसार ऐसा कोई भी पौधा, जो अपने तने के सहारे खड़ा होता है और साधारणतः तीन मीटर ऊँचाईवाला होता है 'वृक्ष' कहलाता है। इसका वह भाग जो ऊपर होता है 'मुकुट' कहलाता है। नीचे का भाग जड़ या मूल कहलाता है। यह जमीन में होता है। जड़ें ही वृक्षों का पोषण करती हैं। ये भूमि से पानी, खनिज पदार्थ, लवण, खाद्य पदार्थ आदि प्राप्तकर वृक्ष का पालन-पोषण करती हैं। पेड़ की पत्तियाँ भोजन बनाने की क्रिया में सहायता करनेवाली होती हैं। इसकी पीड़ हमारे अनेक कामों में आती है। इनसे दरवाजे, चौखट और पल्ले आदि बनाए जाते हैं। लकड़ी का फर्नीचर वृक्ष की पीठ में से प्राप्त लकड़ी से ही बनता है। . वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बाते/17 वृक्ष में फल, फूल और बीज भी लगते हैं। वृक्षों से ही ओषधियाँ, तारपीन का तेल, कागज बनाने के लिए लुगदी आदि प्राप्त होते हैं। वृक्ष हमें छाया और शुद्ध वायु भी देते हैं। संसार में लाखों प्रकार के वृक्ष पाए जाते हैं। रबर नामक पदार्थ रबर के वृक्ष से मिलता है। यह एक प्रकार का लसदार पदार्थ है। रबर की खोज के बाद विज्ञान में बहुत प्रगति हुई है। यदि रबर नहीं होती तो हवाई जहाज और मोटरों के चक्कों के ऊपर क्या चढ़ाया जाता? रबर ने यातायात को गति प्रदान की है। वृक्षों से प्राप्त लकड़ी से रेलवे स्लीपर भी बनाए जाते हैं जिन पर रेलें दौड़ती हैं। संसार में वृक्ष ही ऐसे हैं जो जन्म से मृत्यु तक बढ़ते ही रहते हैं। अफ्रीका और आस्ट्रेलिया के जंगलों में 100 मीटर से भी अधिक ऊँचे वृक्ष पाए जाते हैं। अमेरिका में पाए जानेवाले अनेक वृक्षों के तनों की मोटाई आठ से दस मीटर तक की होती है। यह अपनेआपमें आश्चर्य तथा कुतूहल का विषय है। देवदार और चिनार के वृक्ष लकड़ी के अच्छे स्रोत होते हैं। नारियल, केला, संतरा, अखरोट, सेब और कोको के वृक्ष हमें फल देते हैं। कार्क और रबर के वृक्ष व्यापार में लाभ पहुंचाते हैं। शहतूत के वृक्ष से हमें शहतूत प्राप्त होता है। यह रेशम के कीड़ों को पालने के काम में आता है। भोज वृक्ष से 'भोजपत्र' प्राप्त होते हैं; किसी समय इनसे कागज का कार्य लिया जाता था; इन पर लिखा जाता था। चीड़, बिलो, सनोवर, वरगद, रेडवुड, मैपल, सरो, कॉटन वुड, मैगनोलिया, एल्प, शाहबलूल, लोकस्ट आदि वृक्ष भी हमारे लिए बड़े ही उपयोगी हैं। वृक्ष पतझड़, वसंत और शरद ऋतुओं की मार सहकर भी सदा हमारी सेवा में खड़े रहनेवाले सेवक और हमारे स्वामी भी हैं। 181 बा-कोअरचर्पजमाबले लकड़ी, जिसका हमारे जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है लकड़ी का निर्माण वृक्ष में बहुत समय में तथा अनेक रासायनिक परिवर्तन होकर होता है। लकड़ी एक विशेष प्रकार के कोशों से वृक्ष में बनती है। लकड़ी के नए कोशों के भीतर एक तरल पदार्थ होता है, जो कालातंर में सूखकर लकड़ी का रूप धारण कर लेता है। यह ठोस तथा पोला होता जाता है। अंत में सब भाग रासायनिक परिवर्तनों द्वारा भर जाते हैं जिससे लकड़ी मजबूत और ठोस हो जाती है। कैसे जानते हैं वृक्षों की आयु जब लकड़ी को काटा जाता है, तब उस पर पड़ी हुई गोल धारियों से यह पता चलता है कि वह पेड़ कितना पुराना है। जिस पेड़ की मोटाई में जितने अधिक वलय (गोल घेरे) मिलते हैं वह पेड़ उतना ही पुराना होता है। इससे आयु का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। वृक्ष की आयु बतानेवाले वलय वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें/19 . कम आयु के पेड़ों के वलयों की संख्या कम होती है। दूसरे इनका रंग, हलका तथा सफेद होता है। जबकि अधिक आयुवाले पेड़ों के वलयों का घेरा बड़ा होता है तथा इनका रंग हलका भूरा होता है। आदि से अंत तक का साथ कहा गया है कि जीवन शुरू होता है पौधे से, बीतता है पौधे के सहारे और समाप्त होता है पौधे के साथ! जब बच्चे का जन्म होता है वह पालने में लिटाया जाता है जो लकड़ी का बना होता है। वह सारा जीवन पौधों के सहारे बिताता है। वनस्पति-जगत से ही उसे भोजन मिलता है। वह घर बनाता है। उसमें लकड़ी का बड़ा हिस्सा होता है। सारा जीवन बिताकर जब वह मृत्यु को प्राप्त होता है तब उसे टटिया पर लिटाया जाता है। अनेक देशों में उसे 'कफन बॉक्स' (Coffin box) में रखा जाता है जो लकड़ी का होता है। हिंदुओं को 'चिता' पर जलाया जाता है जो लकड़ी की होती है। कभी न मरनेवाला वृक्ष बरगद के वृक्ष की विशेषता होती है इसकी शाखाओं से निकलनेवाली शाखाएँ जो बहुधा जड़ों के समान दिखाई देती हैं, धीरे-धीरे बढ़ती रहती हैं और जमीन में प्रवेश कर जाती हैं। जमीन में प्रवेश करने के बाद यह 'शाखा' एक जड़ का रूप ले लेती है। फिर यह पृथ्वी से पानी, वातावरण से हवा तथा अन्य पदार्थ संचित कर अपनेआप को उस विशाल वृक्ष का भाग बना लेती है परंतु स्वयं एक जंड़ का कार्य करती रहती है। जिन पेड़ों में शाखा जड़ के रूप में बदल जाती है उनमें 'बरगद' सबसे पहले गिना जाता है। इस प्रकार इस पेड़ का जीवन सदा बढ़ता ही रहता है और इसीलिए यह कभी न बूढ़ा होनेवाले पेड़ की संज्ञा पाता है। इस प्रकार वनस्पति-जगत में बरगद अपनेआपमें आश्चर्यजनक वृक्ष माना जाता है। 20/ परस्पति-जगत को आश्चर्यजनक याने इस वृक्ष की एक और विशेषता यह है कि ज्यों-ज्यों इसकी आयु बढ़ती आती है त्यों-त्यों तने की मोटाई भी बढ़ती जाती है। यह नियम आयु बढ़ते रहने पर एक दिन शक्तिहीन होना, निर्बल होना संसार के सब प्राणियों पर लागू होता है। परंतु बरगद उनमें अपवाद है। ज्यों-ज्यों इसकी उम्र बढ़ती है त्यों-त्यों वह और अधिक फैलता है और शक्तिशाली तथा विशाल होता जाता है। संसार-भर में सबसे अधिक आयुवाले पेड़ों में यदि किसी पेड़ का नाम आता है तो वह बरगद का ही है। कलकत्ता के बोटेनिकल गार्डन में एक विश्व-प्रसिद्ध बरगद का वृक्ष है। अनुमान है कि इसकी आयु 2,000 सालों से भी अधिक है। इस वृक्ष के नीचे 7,000 से भी अधिक मनुष्य खड़े हो सकते हैं। इसका सबसे मोटा तना 5 मीटर मोटा है। इसकी 3,000 से भी अधिक जड़ रूपी तने या शाखाएँ हैं, जो इसे विशाल बनाए हुए हैं। इससे उसकी विशालता का अनुमान लगाता जा सकता है। भारतवर्ष में पीपल के बाद बरगद भी पवित्र वृक्ष माना जाता है। इसलिए इसे कहीं भी काटा नहीं जाता और समय-समय पर उनकी पूजा भी की जाती है
कैसे होते थे प्राचीन काल के जंगल
अनुमान है कि हमारे देश में आजादी के समय जितने जंगल थे आज उनका
70 प्रतिशत हिस्सा काटे जाने के कारण समाप्त हो गया है। केवल 30 प्रतिशत हिस्सा
ही शेष रहा है। इससे अनेक समस्याओं का जन्म हुआ है जिनमें देश-भर में वर्षा की
कमी, फसलों का न पैदा होना आदि प्रमुख हैं।
किसी भी देश में आज भी जंगल देश की प्राकृतिक संपदा माने जाते हैं। इनके
नष्ट हो जाने से देश का सौंदर्य नष्ट होता है।
2 / बसस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते
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आइए, कुछ व्यवस्थित व वैज्ञानिक जानकारी भी प्राप्त कर लें वनस्पति-विज्ञान जीव-विज्ञान की एक शाखा मानी जाती है। आज वह एक बहुत ही सशक्त शाखा के रूप में विकसित हो चुकी है। वनस्पति-वैज्ञानिक नित्य नवीन खोजों में लगे हैं तथा नित्य नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं जो आश्चर्यजनक और चौंकानेवाले हैं। यों तो पादपों को नई-नई खोजों के आधार पर नई-नई श्रेणियों में रखा जाता है परंतु फिर भी पादपों के निम्नलिखित समूह या श्रेणियाँ सर्वमान्य हैं तथा संसार-भर में पादपों का विभाजन इसी आधार पर किया जाता है। यहाँ हम हर श्रेणी के कुछ पादपों का नाम, उनका स्थान तथा उनकी आश्चर्य- जनक बातों से भी अपने पाठकों को अवगत करा रहे हैं। stain on Twit (Algae) ये पादप सरल किस्म के होते हैं। इनमें तना और पत्तियाँ नहीं होतीं। ये हरे, भूरे, लाल या नीले रंग के होते हैं। इनमें कुछ तो अत्यंत ही सूक्ष्म प्रकार के पौधे या पादप होते हैं। क्लोरोफिल या पर्णहरित के समान ये हरा वर्णक या हरा पदार्थ रखनेवाले पादप होते हैं जिसकी सहायता से ये अपना भोजन बनाते हैं। अधिकांश शैवाल पानी में होते अनेक प्रकार के शैवाल इतने छोटे होते है कि उन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी यंत्रों की सहायता से ही देखा जा सकता है। . वनस्पति-जगत को
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ये बीजाणुओं से जन्म लेनेवाले ऐसे पादप हैं जो जल में ही पैदा होते हैं।
वैज्ञानिकों ने आज तक इनकी 20 हजार से भी अधिक जातियाँ खोज निकाली हैं।
साथ ही आज भी इन पर खोज और शोध जारी है।
फंगी Fungi)
ये भी सरल प्रकार के पौधे होते हैं। इनके भी जड़, तने और पत्तियाँ नहीं होती।
इनकी एक और विशेषता यह होती है कि इनमें से अधिकांश का रंग सफेद या हलका
भूरा होता है।
24/वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक यते
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इनमें पर्णहरित या क्लोरोफिल नहीं पाया जाता। जो पादप पर्णहरित या
क्लोरोफिल नहीं बनाते वे अपने भोजन के लिए दूसरों पर आश्रित रहते हैं। फंगी भी
दूसरों पर आश्रित रहते हैं। इनमें से कुछ पानी में तो कुछ भूमि पर तथा कुछ दूसरे
पौधों या पादपों या वृक्षों पर आश्रित रहते हैं।
चूँकि कवक अपना भोजन दूसरों की सहायता से प्राप्त करते हैं। और अपना
भोजन स्वयं नहीं बनाते, इसलिए इन्हें इतरपुष्टि (Heterotrophic), परोपजीवी
(Parasites), मृतोपजीवी (Saprophyte) तथा सहजीवी (Symbiotic) जैसे नाम
भी दिए जाते हैं। इनके कुछ पादप एककोशीय होते हैं तो कुछ बहुकोशीय ।
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वनस्पति जगत की आश्चर्यजनक बाते/25
ब्रायोफाइटा (Bryophyta) ये पौधे छोटे-छोटे तथा हरे होते हैं। साथ ही अनिश्चित प्रकार या अनियमित . रूप या आकारवाले होते हैं। ये गीली भूमि, दीवारों तथा वृक्षों की छालों पर भी उगं आते हैं। इसी प्रकार के अनेक पौधे हरे-हरे और मखमल के समान दिखाई देते हैं। अधिकांश ब्रायोफाइटा (Bryophyta) आत्मपोषी पादप भी कहे जाते हैं। वैज्ञानिकों ने इनकी 23,500 जातियाँ खोज निकाली हैं।
फर्न (Fern) जड़, तना और पत्तियाँ इन पादपों की विशेषताएँ होती हैं। इनकी पत्तियाँ बड़ी होती हैं तथा इनकी शाखाएँ भी होती हैं। आज फर्न के पौधों की भी हजारों शाखाएँ खोज ली गई हैं। HER अनुमान है कि फूलों और पौधों की अपेक्षा पांग या फर्न कई लाख साल पुराने हैं। प्राचीन काल में पर्णांग वृक्षों के समान बड़े हो जाते थे। कालांतर में ये नष्ट हो गए। ये बीच से उत्पन्न न होकर जीवाणुवों से उत्तन्न होते हैं। बीजाणुओं से उत्पन्न होनेवाले पौधे पान की शक्ल के होते हैं। इनका तना प्रायः जमीन में रहता है। जिम्नोस्पर्म (Gymnosperm) अनावृत बीजी, जिनके बीच किसी आवृत या आवरण से ढके नहीं होते। इसलिए इन्हें 'नग्न बीजी' भी कहा जाता है। इसके उदाहरण हैं चीड़, फर तथा साइकेस । अनुमान है कि 700 से भी अधिक प्रकार के अनावृत बीजी पौधे या वृक्ष पाए जाते हैं। वनस्पति-अगत की आश्चर्यजनक बातें/27 एंजिओस्पर्म (Angiosperm) आवृत बीजी कहलाते हैं। इनके दो लाख से भी अधिक प्रकार के पौधे होते हैं। इनके फल होते हैं तथा इनके बीज हमेशा इनके अंदर छिपे होते हैं। इनमें एकबीजीय में मक्का, ज्वार, चावल तथा द्विबीजीय में मटर, संतरा, सूरजमुखी सोयाबीन आदि आते हैं। इनमें से अधिकांश को हम दालों के रूप में उपयोग में लाते हैं। अनावृत बीजी (Gymnosperm) इस समूह के पादप बड़े-बड़े पेड़ होते हैं। इनकी प्रमुख विशेषता यह होती है कि इनमें फल नहीं लगते, केवल बीज होते हैं। इनका बीज किसी आवरण से ढका नहीं होता, बल्कि खुला रहता है। इसलिए इन्हें अनावृत अर्थात बिना किसी आवरण के बीजवाले पादप कहा जाता है। -AM 28 1 वरमान जगन यो आरनजरा याने आवृत बीजी (Angiosperm) आवृत बीजी में हमारे आसपास दिखनेवाले अधिकांश पौधे व उनके समूह आते हैं। ये पुष्पी पादप कहलाते हैं। इनके बीज हमेशा फल के अंदर होते हैं तथा किसी आवरण से ढके होते हैं। इनमें नारियल, आर्किड, केला, अदरक, घास, गेहूँ, धान तथा ज्वार एकबीजीय होते हैं। दूसरी ओर दालें, कपास, आम, इमली, चना, अरहर दो बीजवाले या द्विबीजीय कहलाते हैं। वनस्पनि-जगत की आरचर्यजनक बातें 129 बीजों का अद्भुत व आश्चर्यजनक संसार वनस्पति-जगत में बीज ही हैं जो किसी वनस्पति को जन्म देते हैं। संसार का सबसे बड़ा बीज नारियल है। नारियल का वृक्ष ही ऐसा है जो बारहों माह फल देता है। हम कच्चे और पक्के नारियल किसी भी समय प्राप्त कर सकते हैं। आर्किड का बीज संसार का सबसे छोटा बीज है। यह इतना छोटा होता है कि सूक्ष्मदर्शी से ही देखा जा सकता है। इतना छोटा होने के कारण ही इसे फिर से व आसानी से नहीं उगाया जा सकता। इसलिए आज भी आर्किड को लगाना एक कठिन काम है। जितने भी द्विबीजीय पादप हैं उनमें से अधिकांश को हम खाने के काम में लाते हैं। जैसे मूंगफली, चना, अरहर आदि बीज खाने का भी काम देते हैं। अंकुरण के पश्चात बीज से नया पौधा जन्म लेता है। आक और ट्राइडेक्स के बीजों की चोटी पर बालों का गुच्छा-सा होता है। ये बालों के गुच्छे पैराशूट के समान काम आते हैं। ये उड़ते रहते हैं तथा आसानी से अपनेआपको कहीं भी उगा सकते हैं। । 30/मन-जगत को आश्चर्यजनक यते बीजों का अंकुरण कैसे होता है . बीज पृथ्वी में जाने के बाद अंकुरित होते हैं। इनके अंकुरित होने का समय अलग-अलग होता है। हर पादप के बीज का अंकुरित होने का समय उनके विशेष अध्ययन से ही निर्धारित किया जा सकता है। सामान्यतः कपास, ज्वार तथा मूंगफली आदि के बीज 4 से 8 दिनों के अंदर अंकुरित होने लगते हैं। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि पानी, भूमि व प्रकाश आदि उनके अंकुरित होने के अनुकुल हों। पादपों के बीज अपना समय-चक्र आते ही अंकुरित होने लगते हैं। जैसे घास-पात के बीज वर्षा होते ही अपनेआप अंकुरित होकर पादप का रूप धारण कर लेते हैं। अंकुरित होते समय बीजों की जड़ नीचे की ओर बढ़ती है तथा अंकुर जमीन के ऊपर की ओर बढ़ते हैं। यह उनका प्राकृतिक नियम है। अनेक प्रकार के पौधों के बीज का निर्माण उनके जनन अंगों में होता है। वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बाते | 31 बीज तथा अन्य जीव-जंतु किस प्रकार अपना आवास बदलते हैं आज सभी प्राणी अपना मूल निवास, जहाँ कभी उनके पूर्वज रहा करते थे, छोड़ चुके हैं। वास्तव में सभी प्राणी अच्छे और अनुकूल निवास या आवास के स्थान में रहना चाहते हैं। जब जंतु, पादप या पौधे अपना आवास बदलकर अन्यत्र जाते हैं तब इस क्रिया को 'प्रकीर्णन' कहा जाता है। पादपों और जीव-जंतुओं की यह क्रिया भी बड़ी ही मजेदार, रोचक और आश्चर्यजनक है। बीजों का प्रकीर्णन अनेक प्रकार से होता है, जैसे-वायु के द्वारा प्रकीर्णन। सूखे तथा हलके किस्म के बीज वायु में उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाते हैं तथा ऐसी जगहों पर भी उग आते हैं, जहाँ ये पहले कभी नहीं उगा करते थे। आक, संभल, रुई तथा क्लीमेटिस आदि के बीजे इसी प्रकार उड़कर फैलते हैं। 32/ वरम्पति जगत की अरपर्यवसायने पैराशूट विधिवाले बीज जिस प्रकार पैराशूट की सहायता से कहीं भी उतरा जा सकता है, लगभग उसी प्रकार से बीज कहीं भी उतर या पहुँच सकते हैं। इनमें से अनेक बीजों के पंख-से होते हैं। बहुत-से एक वर्षीय और बहुवर्षीय पौधों के बीज पककर जमीन पर गिर जाते हैं और वायु उन्हें इधर-उधर फैला देती है। इससे ये पौधे अपनेआप बढ़ते हैं। जंतुओं द्वारा प्रकीर्णन जंतुओं द्वारा प्रकीर्णन भी बड़े ही रोचक ढंग से होता है। अनेक बीज ऐसे होते हैं जो जंतुओं, पक्षियों, जानवरों आदि के शरीर में अपने छोटे-छोटे नुकीले काँटों के कारण चिपक जाते हैं और भिन्न-भिन्न स्थलों पर पहुँचा दिए जाते हैं। चिड़ियाँ और गिलहरियाँ भी बीजों के प्रकीर्णन का काम बहुत अच्छी तरह से करती हैं। ये एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाकर इस काम में बड़ी मदद पहुँचाती हैं। अनेक बीजों को प्राणी खा जाते हैं। फिर ये उनके शरीर से मल के साथ यहाँ-वहाँ निकलते हैं, और बीजों का प्रकीर्णन करते हैं। मनुष्य भी अनेक प्रकार के बीजों को खाते हैं तथा उनके द्वारा भी बीजों का प्रकीर्णन उपर्युक्त प्रकार से होता है। जल द्वारा प्रकीर्णन लगभग सभी पौधों और पादपों का प्रकीर्णन जल द्वारा होता है। जल के पास उगने, जल के द्वारा बहा ले जाने या जल में फैलने आदि अनेक कारणों से जल द्वारा प्रकीर्णन आसान होता है। ये बीज नदियों और समुद्रों के साथ बहाव में कई-कई किलोमीटर की यात्रा भी कर लेते हैं। वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें 133
कमल जल में बीजों का बड़ी आसानी से प्रकीर्णन करता
है
जड़ों के कार्य और प्रकार
।
जड़ को पौधों का मूलतंत्र नाम दिया गया है। यह दो प्रकार की होती हैं
एक मूसला जड़, दूसरी रेशेदार जड़ । जड़ पौधे को स्थिरता देती है। वह खाद्य पदार्थ
का संचय व पोषण करती है। वह भूमि से हवा, पानी तथा खनिज पदार्थ शोषित कर
पादप या वृक्ष का समुचित विकास करती है।
341 वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें
जड़ सदैव प्रकाश से दूर भूमि में विकसित होती रहती है। भूमि में रहने के कारण जड़ का रंग मटमैला या सफेद होता है। जड़ें पत्तियाँ, पुष्प या फल धारण नहीं करती। कुछ जड़ों में मूल टोप होता है। यह मूल टोप जड़ों को मिट्टी में बढ़ते समय रगड़ से बचाती है। यह प्रकृति की अपनी अद्भुत विशेषता है। अवस्थानिक जड़ों का रोचक संसार घास एक सर्वविज्ञ पादप है। हम इसे आसानी से अपने आसपास फैलते देख सकते हैं। दूब घास आज हमारे लॉनों की शोभा बढ़ाती है तथा इसे विशेष प्रयास करके लगाया जाता है। दूब घास का तना, भूमि पर रेंगता हुआ-सा चलता है। इसका मुख्य तना भूमि पर आगे बढ़ता रहता है तथा साथ ही यह जगह-जगह तने पर रेशेदार जड़ें निकालकर अपना भोजन प्राप्त करता है। मक्का तथा गन्ना जैसे पादपों में भी ऐसी ही जड़ें होती हैं। जो जड़ें तने अथवा पत्तियों से निकलती हैं वे अवस्थानिक जड़ें कहलाती हैं। . वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें | 35 तना तने का वृक्ष में वही महत्त्व है, जो मानव शरीर में रीढ़ की हड्डी का है। वृक्ष तने के सहारे ही खड़े रहते हैं और बढ़ते हैं। तने की अनेक विशेषताएँ होती हैं; तना भूमि से विपरीत दिशा में बढ़ता है। तना प्रकाश की ओर झुकता है। इस पर शाखाएँ, पत्तियाँ, फल, फूल, बीज आदि विकसित होते है। वृक्षों के बड़े तने हमारे लिए लकड़ी के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं । झाड़ियों आदि के तने कोमल होते हैं। इसलिए ये अधिक उपयोगी नहीं होते। शाक पौधों के तने मुलायम और काष्ठ रहित होते हैं। कुछ तने बल्लरी होते हैं तो कुछ आरोही तथा कुछ प्रतान आरोही। इस प्रकार ये तने अन्य वृक्षों आदि पर आसानी से चढ़ जाते हैं; जैसे सेम, कद्रू आदि के पादप क्रमशः बल्लरी, आरोही, प्रतान, आरोही किस्म के होते लौकी, पत्तियाँ जिनका पेड़ के जीवन से गहरा संबंध होता है यह तो आप जानते ही होंगे कि पेड़ वसंत ऋतु में पत्तियों रूपी पोशाक धारण करते हैं। इस पोशाक को वे पतझड़ ऋतु में त्याग देते हैं। वसंतु ऋतु में वृक्ष का हर भाग पत्तों से ढका होता है तो पतझड़ ऋतु में आपने बिना पत्तों के वृक्ष भी देखे होंगे। किंतु आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यदि उन पत्तों को पतझड़ ऋतु के अलावा वृक्षों से दूर कर दिया जाए तो वृक्ष सूखकर दूंठ हो जाता है। वे नया जीवन पाने के लिए पत्तियों को त्यागते हैं, परंतु यदि किसी साधारण कारण से पत्तियाँ उनसे दूर हो जाएँ, तो वे प्राण त्याग देते हैं। संसार में लाखों प्रकार के वृक्ष होते हैं। जिस प्रकार से हम पक्षी को उसके पंखों के आधार पर पहचानते हैं, उसी प्रकार से वृक्षों को भी उनकी पत्तियों के आधार 36/ स्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते बहुत बड़ी। पर ही पहचाना जाता है। सभी पादपों की पत्तियाँ होती हैं; कुछ की बहुत छोटी तो कुछ की हमारे आसपास पाए जानेवाले केले के वृक्ष की पत्तियाँ और जंगल में पैदा होने- वाले देवदार वृक्ष की पत्तियाँ काफी बड़ी और चौड़ी होती हैं। पेड़ों के जीवन में पत्तियों का महत्त्व इसलिए भी अधिक है कि इनके भोजन बनाने का एक पूरा कारखाना इन पत्तियों के सहारे ही चलता है। वृक्षों की पाकशाला इन पत्तियों के सहारे ही अपना भोजन बनाती है। ये पत्तियाँ पानी और कार्बन डाइऑक्साइड से अपना भोजन तैयार करती हैं। प्रकाश-संश्लेषण की एक सशक्त वैज्ञानिक व रासायनिक क्रिया करके ये वायु-चक्र को भी नियमित करती हैं। पानी व कार्बन डाइऑक्साइड पत्तियों का यह स्वभाव होता है कि वे सूर्य की ओर आकर्षित होती हैं । वास्तव में हर पौधा अपनी पत्ती को इस प्रकार पैदाकर फैलाता है कि वह स्वयं ही सूर्य की रोशनी प्राप्त करने लगती है। वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें 137 अपना भोजन तैयार करने के लिए पत्ते जिस हरे रंग या क्लोरोफिल को तैयार करते हैं वह क्रिया प्रकाश संश्लेषण की क्रिया कहलाती है और वह सूर्य के प्रकाश की सहायता से ही संभव होती है। पत्तियों की नसें पत्तियों का ढाँचा तैयार करती हैं। संसार में लाखों प्रकार के वृक्ष मिलते हैं, निश्चित ही उनकी पत्तियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। पत्तियों का शिरा-विन्यास पत्तियों का शिरा-विन्यास बहुत ही कठिन व जटिल होता है। इसका अध्ययन करने के लिए हम पीपल के एक पत्ते को कई दिनों तक पानी में रखकर उसे गला सकते हैं। कुछ दिनों के बाद हम देखते हैं कि उसका क्लोरोफिल युक्त भाग गल चुका है। अब पत्ते में मुख्य शिराओं और छोटी-छोटी शिराओं को आसानी से देखा जा सकता है। ये शिराएँ पत्ते की हर अंतिम कोर तक फैली होती हैं। देखिए चित्र में बताया गया है कि जिस प्रकार से मानव शरीर में शिराएँ हर भाग में फैली होती हैं तथा वे रक्त का संचार करती हैं, उसी प्रकार पत्ती के भी हर भाग में शिराएँ फैली होती हैं। दोनों में समानता देखने लायक है; साथ ही आश्चर्यजनक भी है। 38/ वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें पतझड़ में पत्तियों का रंग बदलना भी आश्चर्यजनक है पतझड़ दो प्रकार से होता है। पहले वर्ग में वे पौधे आते हैं जिनके पत्ते हर वर्ष किसी विशेष मौसम में झड़कर गिर जाते हैं। दूसरे वर्ग में ऐसे सदाबहार वृक्ष आते हैं जिनमें पत्ते धीरे-धीरे झड़ते रहते हैं। पतझड़ का समय वृक्ष के विश्राम का समय होता है। इस समय इसकी पत्तियाँ पीली पड़ती जाती हैं और धीरे-धीरे टूटकर गिरती जाती हैं। इस समय कुछ वृक्ष तो बिलकुल ही पत्तों रहित हो जाते हैं। कुछ समय पश्चात वे फिर हरे-भरे हो जाते हैं। पेड़ और पत्तियाँ जब एक ऐसी प्रक्रिया द्वारा अपने विशिष्ट अपशिष्ट पदार्थों को त्यागते हैं तब यह क्रिया पतझड़ कहलाती है। अपशिष्ट पदार्थ को त्यागते समय पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है। दूंठ से दिखाई देनेवाले वृक्ष कुछ ही समय में पुनः नया रूप धारण कर लेते हैं। यह प्रकृति का बड़ा ही रोचक नियम है। फलों का संसार भी कितने फल देता है! जिस प्रकार लाखों प्रकार के पादप होते हैं उसी प्रकार लाखों प्रकार के फल भी होते हैं। कई प्रकार के फल बीज का भी काम देते हैं तथा कई प्रकार के फलों के अंदर बीज होते हैं, जैसे-नारियल, फल का भी काम देता है तथा बीज का भी। दूसरी ओर आम, अनार, जामुन या अमरूद के अंदर बीज होते हैं। अनेक फलों को हम बीज सहित खा सकते हैं जैसे अमरूद । अनेक फलों को बीज सहित नहीं खाया जाता जैसे आम आदि। अनेक फलों के बीज खाए नहीं जाते हैं जैसे इमली आदि। कुछ फलों के छिलके होते हैं। उन्हें फेंककर फल खाया जाता है, जैसे केले, अखरोट आदि । कुछ फलों के बीजों को खाया जाता है, तो कुछ के छिलके दूसरे कामों वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें / 39 में आते हैं। अखरोट के छिलके अनेक कामों में आते हैं। इसके बीज खाने के काम में भी आते हैं और पूरा फल वृक्ष उगाने के। फल वास्तव में एक परिपक्व अंडाशय है, जिसमें बीज बनते हैं। अनेक प्रकार के फल ऐसे भी हैं जो पुष्पक्रम से उत्पन्न होते हैं, जैसे बरगद, शहतूत, कटहल, पीपल आदि, जबकि इनके वृक्ष बड़े विशाल होते हैं। अनेक प्रकार के बीजों को खाना खतरे से खाली नहीं होता। जैसे नारियल आदि के बीज को खाना संभव नहीं होता । नारियल फल की दीवारों का कोई भी भाग खाने योग्य नहीं होता। इसी प्रकार आम आदि के बीज या गुठली को नहीं खाया जा सकता। शुष्क फलों की विशेषता होती है कि वे सरस नहीं होते। दूसरी ओर सरस फल शुष्क रूप में नहीं पाए जाते । अनेक फल, फल भी हैं और वीज भी । 40/बई-जगत को अपना यते एक फल जिसका नाम ही 'रोटी फल' है रामफल और सीताफल का नाम आपने सुना होगा और इन्हें खाया भी होगा। किंतु एक फल ऐसा भी है जो खाया तो नहीं जाता मगर उसका स्वाद मीठा होता है वह है मेहनत का फल । परंतु हम आपको बताने जा रहे हैं, एक ऐसे फल के बारे में, जिसका नाम ही रोटी फल है, जिसे अंग्रेजी में ब्रैड फ्रूट (Bread fruit) कहा जाता है। देखने में तो यह ब्रैड फ्रूट कच्चे नारियल-सा होता है परंतु इसका वृक्ष शहतूत के पेड़ की जाति का होता है। स्वाद में यह फल आलू के समान स्वादवाला होता है। इसके टुकड़ों को काटकर और सुखाकर उनसे रोटी बनाई जाती है जो बहुत स्वादिष्ट होती है। इसके वृक्ष दक्षिणी प्रशांत महासागर के आसपास मिलते हैं। इस वृक्ष की लकड़ी से फर्नीचर, भीतरी छाल से कपड़ा और वृक्ष की खोल से वाद्य-यंत्र तथा नावें आदि भी बनाई जाती हैं। प्रशांत महासागर क्षेत्र के निवासी इस वृक्ष को बहुत चाहते हैं और इसकी तन-मन-धन से सेवा करते हैं। क्यों न करें? यह वृक्ष उनके लिए कितना लाभदायक होता है। फूलों से सजी दुनिया जी हाँ, फूल ही हैं जिनके कारण यह संसार इतना सुंदर बन पड़ा है। कठोर से कठोर हृदयवाला व्यक्ति भी यदि कहीं झुकता है, यदि कहीं आकर्षित होता है तो वह फूलों की ओर ही। वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें / 41 एक भी इसलिए कहा जाता है कि यदि फूल न होते तो, यह दुनिया इतनी आर्कषक नहीं होती। परंतु आपको जानकार आश्चर्य होगा कि आज से करोड़ों वर्ष पूर्व संसार में फूल नहीं था। यह अनुमान नहीं, सत्य है। फिर जब फूल पैदा हुआ तो वह संसार-भर में फैल गया और एक दिन ऐसा भी आया जब संसार-भर में फूल ही फूल नजर आते थे। मनुष्य ने अपनी जरूरतों के लिए फिर इन फूलों के बागों को नष्ट करना शुरू कर दिया और यह क्रम आज भी जारी है। फूलों के बीज फूलों से ही प्राप्त होते हैं। इनकी यह भी विशेषता होती है कि हर पंखुड़ी बीज का काम करती है, इसीलिए ये बड़ी मात्रा में पैदा होने की शक्ति रखते -- प्रायः सभी प्रकार के फूलों के चार अंग होते हैं बाह्य दल, पंखुड़ी, पराग केसर और गर्भ केसर। गर्भ केसर में छोटी-छोटी कोशिकाएँ होती हैं, जो बीजांड कहलाती हैं। ये भी बीज के मूल रूप या स्रोत होते हैं। फूलों की संख्या या प्रकार गिनना बहुत कठिन है जी हाँ, आज भी फूलों की संख्या या प्रकार गिनना बहुत कठिन है। आज भी वनस्पति-वैज्ञानिक इनकी नित्य नई किस्में तैयार कर रहे हैं। अतः इनकी संख्या गिन पाना कठिन है। फूलों को उनके पादप या वृक्ष के आधार पर एक वर्षीय, द्वि वर्षीय तथा बहुवर्षीय या सदाबहार श्रेणी में रखा जाता है। कुछ फूलों में केवल सुंदरता होती है, सुगंध नहीं। कुछ में सुंगध होती है, सौंदर्य नहीं। इनमें से अनेक फूलों की कलम जड़, कंद या पौधों के रूप में भी लगाई 42 / वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें जा सकती है। ट्यूलिप नाम का फूल देनेवाला पादप केवल कंद से ही लगाया जा सकता है। जबकि अच्छी से अच्छी सुगंध देनेवाले अनेक पौधे किसी भी जमीन में उग सकते हैं। परंतु इनमें से हरेक को चाहिए सूर्य का प्रकाश, पानी और भूमि या मिट्टी आदि । एकबीजीय और द्विबीजीय पौधे ऐसे हैं जो फूल परिवारों में आते हैं। गुलाब-जिसके ठाट सबसे निराले हैं यह रूप, गुण और सौंदर्य का सर्वत्र मिलनेवाला तथा आसानी से लग सकनेवाला पादप है। इससे आज भी इत्र और सुगंधित वस्तुएँ बनाई जाती हैं। विदेशों में तो गुलाब की बाकायदा फसलें पैदा की जाती हैं। वहाँ इसका व्यापार किया जाता है जबकि भारत जैसे देशों में यह शौकिया लगाया जाता है। यह बीज और कलम दोनों से लगाया जा सकता है। इससे गुलकंद, गुल रोगन, गुलाब अर्क और अन्य अनेक औषधियाँ भी बनाई जाती हैं। आजकल ऐसे भी गुलाब विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें काँटे नहीं होते। गुलाब अलूचा, सेबफल, नाशपाती, खूबानी, चेरी, ब्लैकबेरी, स्ट्राबेरी आदि परिवार का सदस्य है। जलीय पौधे जलीय पौधों की संख्या भी हजारों में है। यह आश्चर्यजनक है कि ये जल में पैदा होते हैं परंतु सड़ते नहीं, जबकि जल में अनेक वस्तुएँ सड़ जाती हैं। सेवार, जल-कुंभी, डकबीड आदि अनेक जलीय पौधे हैं। जलीय पौधों में कमल और सिंघाड़ा मानव के लिए बहुत उपयोगी होता है। केले का पेड़ केला यद्यपि वृक्ष या पेड़ कहलाता है, परंतु हमारा कहना है कि इसके पेड़ को वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें / 43 पेड़ मत कहिए क्योंकि उसके तने में लकड़ी बिलकुल भी नहीं होती। इसमें फूल उगते हैं जो धीरे-धीरे फलों में बदल जाते हैं। अपनी सारी उम्र में केले का एक पौधा केवल एक बार ही फल देता है जबकि वृक्ष सदाबहार होते हैं। परंतु यह परंपरा ही है कि केले का वृक्ष भी 'वृक्ष' की संज्ञा पाता है। केरल में जहाँ केला अधिक मात्रा में होता है वहाँ इसे सुखाकर कई तरह की चीजें बनाई जाती हैं। केला पूर्ण आहार का काम भी देता है फूलों की दुनिया में निराला फूल फूलों की दुनिया में सबसे निराला फूल रेफ्लेशिया का है। यह संसार का सबसे बड़ा फूल माना जाता है। इसका फूल एक-एक मीटर तक फैला और चौड़ा होता है। इस प्रकार एक मीटर व्यासवाला यह फूल 8 किलोग्राम तक के वजनवाला होता है। इसमें से अच्छी सुगंध नहीं आती, वरन् सड़े हुए मांस-सी गंध आती है जो मांस पोषित मक्खियों (Carrion flies) को बहुत प्रिय होती है। इसी फूल का मक्खियों के द्वारा भी परागण होता है। यह भी प्रसिद्ध है कि हाथी द्वारा भी इसका परागण होता है। 44/वनम्पनि-जगत को आश्चर्यजनक यातें सदाबहार कौन है ? यदि दुनिया में कोई सदाबहार है तो घास-पात ही है। सदा हरी-भरी, सदा जवान और खिली रहनेवाली होती है घास-पात । जिसमें पतझर का नाम भी नहीं होता। फूलों और पत्तों की अद्भुत बातें फूल छोटी-मोटी पंखुड़ियों से बना करते हैं किंतु वनस्पति-जगत में एक फूल ऐसा भी है, जो पत्तों से बनता है। यह फूल होता है पत्ता गोभी का । इसके पत्ते जितने बड़े होते हैं उतने और किसी फूल के नहीं होते। क्लोरोफिल के कारण ये हरे भी होते हैं। मानव इनकी सहायता से क्लोरोफिल का उपयोग करता है। प्याज के छिलकों के समान पत्ता गोभी को छीलते रहने पर केवल पत्ते ही मिलते हैं। यह फूल अपनेआपमें अजूबों से भरा हुआ है। मानव पालक और पत्ता गोभी आदि के पत्तों को भोजन के उपयोग में लाता है। पत्तियों का सर्वाधिक उपयोग हम चाय में भी करते हैं। चाय की पत्तियों को सुखाकर चाय नामक पेय बनाया जाता है जो भारतवर्ष में बहुत ही लोकप्रिय है। गिरीदार फल जो मांस के बदले खाए जा सकते हैं गिरीदार फलों की यह विशेषता होती है कि इनमें भारी मात्रा में वसा यानी चिकनाई और प्रोटीन होता है। ये मांस का निर्माण करनेवाले होते हैं। इनको खाने से 'मांस' के खाने की पूर्ति हो सकती है। वनस्पति जगत की आश्चर्यजनक बाते/45 और श्रृंगार गिरीदार फलों को पेरकर तेल भी निकाला जाता है। इनसे साबुन के प्रसाधन भी बनाए जाते हैं। इन सब फलों की एक विशेषता यह होती है कि प्रायः इन फलों का छिलका ऊपर से कड़ा होता है। काजू, मूंगफली, नारियल और अखरोट आदि ऐसे ही भारतीय गिरीदार फल हैं जबकि बादाम और पिस्ता अफगानिस्तान में अधिक पैदा होते हैं। ये भी शक्तिदायक गिरीदार फल हैं। गिरीदार फल बहुत लंबे समय तक काम में आते हैं तथा ये जल्दी खराब नहीं होते। छुई-मुई का पौधा जो अनेक आश्चर्यों से भरा होता है छुई-मुई के पादप को हाथ लगाते ही छूने की संवेदनशीलता होती है और इसकी पत्तियाँ सिकुड़-सी जाती हैं। हाथ लगाते ही इसकी पत्तियों का तनाव कम हो जाता है, इस कारण छुई-मुई अपनेआप में आश्चर्यजनक पादप माना जाता है। इसका पौधा 'मनोरंजन' के काम में भी आता है। 46/ वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें वनस्पति-जगत में इसके पादप को 'मिसोमा पुडिका' कहा जाता है। इसकी पत्तियों की बनावट संयुक्त पत्तियोंवाली होती है। जिस स्थान पर ये पत्तियाँ डालियों से जुड़ी रहती हैं, वहाँ कुछ मोटे-मोटे उभार होते हैं। जब इन कोशिकाओं द्वारा पानी सोख लिया जाता है तब ये फूल जाती हैं और पानी के निकलते ही सिकुड़ जाती हैं। · इनकी पत्तियों को हाथ लगाते ही पानी तले में चला जाता है जिससे ये सिकुड़ जाती हैं। कीड़ों आदि के स्पर्श से भी इसकी पत्तियाँ मुरझा जाती हैं। इसकी पत्तियों को मूल अवस्था में आने में लगभग आधे घंटे का समय लगता है। यह पादप अपनेआपमें आश्चर्यों से भरा हुआ है। इसे घरों में आसानी से लगाया जा सकता है। फलियों का संसार ऐसा कौन होगा जिसने कभी फलियों का उपयोग नहीं किया होगा। फलियाँ खाने में जो स्वाद मिलता है वह किसी अन्य खाद्य पदार्थ को खाने में नहीं मिलता। फलियाँ तोड़िए, छीलिए और उसके दानों का आनंद लीजिए। कहते हैं यदि हम एक दाना खाएँ और एक दाना ही पास रखे बरतन में डालें तो बरतन भर जाता है परंतु हमारा पेट नहीं भरता । N ad वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें 147 संसार में 12,000 प्रकार के ऐसे पौधे हैं, जो फलियाँ देते हैं। हम में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने इन सब फलियों को चखा हो। इन पादपों या पौधों के बीज के स्रोत भी इन फलियों में होते हैं। किसी भी फली को छीलिए, तत्काल उसका छिलका दो भागों में बँट जाएगा । सूखी फलियों का छिलका तो अपनेआप दो भागों में बँट जाता है। मटर, चना, मसूर, अरहर, सेम आदि अनेक प्रकार की ऐसी फलियाँ हैं जिनसे हम भली-भाँति परिचित हैं। ये फलियाँ अपने फल में एक लड़ी के रूप में रहती हैं। इनकी पत्तियाँ छोटी होती हैं, और एक साथ तीन-तीन पत्तियों के रूप में होती हैं। प्रायः सभी प्रकार की फलियाँ व उनमें से प्राप्त फलियाँ खाने योग्य होती हैं परंतु कुछ प्रकार के पौधों की फलियाँ, जो जहरीले पौधे माने जाते हैं, जहरीली होती इनके छिलके बढ़िया खाद का काम देते हैं। साथ ही ये पशुओं के खाने के काम में भी आती हैं। आर्किड आर्किड बहुत सुंदर पौधे या पादप होते हैं। ये आजकल हमारे घर-आँगन व ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाने के काम में आते हैं। इनका बीज इतना छोटा होता है कि उसे देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी यंत्र की आवश्यकता होती है। वायु-भक्षी पौधे वायु-भक्षी पौधों की संख्या भी बहुत अधिक है। ये परजीवी प्रकार के पौधे हैं। ये वर्षा और ओस से पानी प्राप्त कर लेते हैं। भूमध्य रेखा पर, दूसरे पौधों पर उगनेवाले इन पौधों की संख्या इतनी अधिक है कि ये अन्य पौधों को पानी और प्रकाश ७/ पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते -- लेने से वंचित कर देते हैं। इसलिए इन्हें 'पर-वायु-भक्षी' पौधे भी कहा जाता है। ये पौधे अपने वृक्षों पर ठीक किसी गमले के समान टॅगे रहते हैं और बढ़ते रहते हैं। यह भी आश्चर्यजनक है कि एक नहीं अनेक ऐसी विषैली जड़ी-बूटियाँ और पादप हैं, जिनकी सहायता से तरह-तरह की गुणकारी दवाइयाँ बनती हैं। इनकी सूची बहुत लंबी है। जहर से ही जहर को मारा जाता है, यह सिद्धांत इन ओषधियों पर लागू होता है। इसी प्रकार नीम, पुदीना और तुलसी आदि का स्वाद मीठा नहीं होता परंतु दवाइयों में इनका उपयोग होता है। आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक तथा एलोपैथिक पद्धति की अधिकांश दवाइयों का निर्माण पौधों से ही होता है। इनमें अनेक जहरीले पौधों का उपयोग भी होता है। सस्पति-जगत की आरवर्षजनक बा149 रेगिस्तान के पौधे रेगिस्तान और पौधे शब्द स्वाभाविक रूप से विरोधाभासी लगते हैं परंतु रेगिस्तान में पाए जानेवाले पौधों की संख्या कम नहीं है। नागफनी और इसी प्रकार के पौधे रेगिस्तान में बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। इनमें से कुछ पौधे तो ऐसे होते हैं जिनकी जड़ें जमीन में काफी नीचे तक जाकर पानी प्राप्त करके जीवित रहती हैं। इनकी पत्तियाँ ऐसी वनी होती हैं कि इनमें से पानी भाप बनकर नहीं उड़ पाता। 50/ मम्मी-जगत की आराधनापने आजकल नागफनी की ऐसी पचासों किस्में मिलती हैं जिन्हें घर-आँगन में शोभा के लिए लगाया जाता है। नागफनी लगाना आज एक फैशन का रूप ले चुका है। रंग-बिरंगे फूल देनेवाले नागफनी के पादप भी विकसित हो चुके हैं। विषैले पौधे बिच्छू बूटी के पौधे रोएँवाले होते हैं। छूते ही इनके रोएँ शरीर में घुस जाते हैं और हमें पीड़ा पहुंचाते हैं। हमारे द्वारा विकसित किए जानेवाले गुलाब के पौधे में भी काँटे होते हैं। होली नामक अनेक प्रकार के पौधों के छूने मात्र से खुजली और जलन होने लगती है। गाजर घास के संपर्क में भी आने से त्वचा के रोग होने का डर रहता है। अमेरिका में पाया जानेवाला ईबी नाम का जहरीला पौधा छूते ही अपने जहर का असर दिखाने लगता है। । कुछ को खाने से जहर चढ़ता है इन जहरीले पादपों में कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें छूने से नहीं, खाने से जहर चढ़ता है। धतूरा, उकाब आदि ऐसे ही पौधे हैं। इनको खा लेने से जहर चढ़ने लगता कुकुरमुत्ते की कुछ किस्में जहरीली होती हैं। है वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते/51 मांस-भक्षी पौधे या पादप कुछ पौधे ऐसे हैं जो जीवों को खा जाते हैं। इन्हें मांस-भक्षी पादप या पौधों के रूप में जाना जाता है। ये कीट-पतंगों को अपना भोजन बना लेते हैं। सनड्यू, बेनस फ्लाईट्रेप पिचर प्लांट, बटर वाटर आदि पौधे ऐसे हैं जिनकी बनावट इस प्रकार की होती है कि छोटे-बड़े कीट उनमें घुसने के बाद वापस नहीं आ पाते। इन मांस-भक्षी पौधों की बनावट कुछ इस प्रकार की होती है कि ये कीट उनमें फँस-से जाते हैं और निकल नहीं पाते। इनमें से कुछ में चिपचिपा पदार्थ होता है, जो कीटों को पकड़ लेता है। 52 / पनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते पिचर प्लांट की पत्तियाँ ऐसी होती हैं मानो वे सुराही हों। इनमें बरसाती पानी होता है। कीट इनमें समा जाते हैं और धीरे-धीरे सड़कर इनका भोजन बन जाते हैं। परजीवियों की कमी नहीं है इस संसार में परजीवियों की कमी नहीं है। मनुष्य स्वयं वनस्पति पर आधारित जीवन जीता है। वह सबसे बड़ा परजीवी कहा जा सकता है। वनस्पति-जगत पहले अपने लिए और बाद में मनुष्यों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भोजन बनाता है। हरे पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इसलिए ये स्वपोषित कहे जाते हैं। इन्हें उत्पादक और प्रोड्यूसर भी कहा जाता है। परंतु अनेक पौधे अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते। ये अपनी भोजन संबंधी सभी बातों के लिए दूसरों पर आश्रित रहते हैं, अतः ये परजीवी या परपोषी कहलाते हैं। ऐसे परपोषी उपभोक्ताओं की कमी नहीं है। पादप- जगत में सैकड़ों की संख्या में परजीवी मिलते हैं। अनुमान है कि लगभग 450 पुष्पीपादप इस प्रकार के पौधे हैं जो कीट-भक्षी हैं। इनमें से 30 से भी अधिक प्रकार की जातियाँ भारत में पाई जाती हैं। M वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते / 53 है निपेंथिस खासियाना नामक कीट-भक्षी पौधा भारत में बड़ा प्रसिद्ध है। यह असम के खासिया पहाड़ों में मिलता है। इसकी पत्तियाँ अपना रूप बदलकर घड़े के समान रूप या आकार धारण करती हैं। अतः इसे घटपर्णी कहा जाता कई बार इसका रूप एक सुराही के समान भी होता है। यह लाल रंग का पौधा बड़ा आकर्षक होता है। फिर बेचारे कीट तो कीट ठहरे, इस घट के अंदर बसे छोटे-छोटे रोम या रोएँ,जो ग्रंथियों का रूप होते हैं, कीटों को मार डालने में बड़े सहायक होते हैं। यहाँ जो द्रव रूपी पानी होता है उसमें फंसकर कीट मारे जाते हैं। अन्य कीटों में मच्छर, मक्खी, घु, खटमल आदि ऐसे प्राणी हैं जो परजीवी होते हैं। ये दूसरों का खून चूसकर अपना जीवन बिताते हैं। चना, मटर, अरहर, मूंग आदि की दालों पर एक विशेष प्रकार का कीटाणु रहता है। यह जहाँ रहता है वहाँ का भाग फूल-सा जाता है। यह सहजीवी के रूप में रहकर अपना जीवन बिताता है। सहजीवी भी परजीवियों के समान ही अपना जीवन अन्य पादपों पर बिताते हैं। - इस प्रकार के पादप जो कीट-भक्षी हैं, परपोषी या उपभोक्ता पादप कहलाते हैं। बहुधा पादप उपभोक्ता नहीं, उत्पादक होते हैं। परंतु परपोषी उपभोक्ता किस्म के पादप होते हैं। इसलिए ये अपनेआपमें अनोखे और आश्चर्यजनक होते हैं। मिसलटो यानी 'चोर पौधा' कहते हैं, जो पड़ जाता है सो नाम, और जो निकल जाए सो काम । पशुओं में हिक्टोपस को 'दरियाई घोड़ा' का नाम मिला है जबकि इसका न तो दरिया से कोई वास्ता है, और न यह प्राणी घोड़े-सा दिखाई देता है। इसी प्रकार पादपों की दुनिया में मिसलटो 'चोर पौधे कहे जाते हैं। यद्यपि इनके समान चोरी करनेवाले बहुत-से प्रबिनम्न-जगत को आरपर्पजनक बने 'परोपजीवी पौधे हैं पर ये बेचारे 'चोर पौधों के नाम से जाने जाते हैं। मिसलटो जिन --पौधों पर उगते हैं वे उसका हवा, पानी, नमक आदि सब चुरा लेते हैं और अपने काम में ले लेते हैं। ये अपनी चोरी की आदत के कारण दूसरे पौधों पर ही उगते हैं, जमीन में नहीं। यदि ये किसी छोटे पौधे पर उग जाते हैं तो उसका जीवन ही नष्ट कर देते हैं। क्रिसमस के अवसर पर मिसलटो के फूलों और पत्तों से घर सजाए जाते हैं। कुकुरमुत्ता नाम, धाम, काम उपयोग और कर्मों से आश्चर्य पैदा करता है अन्य बीजाणुओं से पैदा होनेवाले पादपों के समान कुकुरमुत्ते के भी फूल, फल, बीज, पत्ते और जड़ आदि नहीं होते। इसका नाम कुकुरमुत्ता क्यों पड़ा, यह भी अपनेआपमें आश्चर्यजनक बात है। इसके पैदा होने का कुत्तों से दूर तक, कोई संबंध नहीं है। इसे सुंबी भी कहा जाता है। इसके पादपों को किसी भी गंदी जगह में आसानी से देखा जा सकता है। ये फफूंद या फंगी श्रेणी के पादप होते हैं। इनमें क्लोरोफिल या हरीतिमा नहीं होती; न ये इसका निर्माण करते हैं। ये भी अपना भोजन परजीवियों के समान हड़पते हैं। इसकी अनेक प्रकार की जातियाँ खाने के काम में भी लाई जाती हैं। लिपटनेवाली बेलों व पादपों का अद्भुत संसार साधारणतः बेल का अर्थ ही लिया जाता है लिपटनेवाली । संस्कृत भाषा में इसे 'लता' कहा जाता है जिसका अर्थ होता है आश्रित रहनेवाली या लिपटनेवाली। वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें/55 बेलें चाहे लाभकारी हों या हानिप्रद, सुंदर लगती हैं। हानिप्रद बेलें जिस पेड़ पर चढ़ जाती हैं उसका भोजन ग्रहण करती रहती हैं। इन्हें परोपजीवी की संज्ञा भी दी जाती है। इन बेलों के कारण उन वृक्षों का विकास रुक जाता है जिस पर वे मेहमान बनती हैं। अमर बेल का नाम आपने सुना होगा। यह इसी प्रकार की हानिप्रद तथा परोपजीवी बेल है। इसके तने लंबे और पतले होते हैं। इन बेलों में स्प्रिंग के समान घुमावदार तने होते हैं जो किसी रस्सी या डोरी के समान कार्य करते हैं और उस आश्रित वृक्ष से इस प्रकार लिपट जाते हैं कि वे उसे निकालना कठिन होता है। चाहे कितनी भी हवा, आँधी आए ये अपने आश्रयदाता वृक्ष से दूर नहीं होते । अंगूर, कद्दू, खीरे, ककड़ी आदि की बेलें बड़ी उपयोगी होती हैं। अनेक प्रकार की बेलें हमारे घरों में सजावट के काम में भी आती हैं। 56/वी-जगत की आरपजायते बूटियाँ जिनके तने नहीं होते प्रायः 'जड़ी' और 'बूटी' शब्द एक साथ प्रयोग में आते हैं। परंतु बूटियाँ ऐसे पौधे हैं, जिनके तने नहीं होते। पेड़ों का तना होता है, झाड़ियों और छोटे-छोटे पौधों के भी तने होते हैं परंतु बूटियों के तने नहीं होते। बूटी पादपों की विशेषता है कि इनके डंठलों में पानी की मात्रा अधिक होती है। ये सीधी भी खड़ी रहती हैं। यद्यपि इनका डंठल निर्जीव हो जाता है, पर इनकी बूटियाँ वर्षों ताजी रहती हैं। प्रायः अनेक प्रकार की बूटियाँ ओषधियों में काम में लाई जाती हैं, इसलिए अनेक प्रकार की बूटियों को ओषधि-निर्माता अपने बागीचों में उपजाते हैं तथा इनकी विशेष देख-रेख करते हैं। आइए, कुछ महत्त्वपूर्ण बूटियों के नाम भी जान लें जैसे—पुदीना की चटनियाँ और अचार बनाए जाते हैं। अजवाइन का उपयोग हमारे घरों तथा आयुर्वेदिक ओषधियों में बहुत अधिक होता है। सेज, कुठरा, टैरागोन आदि ऐसी बूटियाँ हैं जो सुगंधित होती हैं। अनुपयोगी बूटियों की कोई कमी नहीं है। ये बड़ी संख्या में यहाँ-वहाँ देखी जा सकती हैं। वनस्पति-जगत की आश्चर्यजाक बाते 157 काई जिसके न तने होते हैं, न पत्ते और न जड़ न फूल और न बीज ये नन्हे पौधे 'मादा अंडे' और 'नर अंडे' देते हैं, जिनसे इनका जन्म होता है। काई के पौधे पादप श्रेणी के न होकर, बीजाणु-वृत के होते हैं। ये बीज से पैदा न होकर बीजाणुओं से पैदा होते हैं जो अपनेआपमें एक आश्चर्यजनक उत्पत्ति है। कंदों की अपनी विशेषता प्याज, लहसुन, अदरक आदि के कंदों की अपनी एक विशेषता होती है। इन्हें यदि पानी और भूमि मिल जाती है तो ये पुनः फलने-फूलने लगते हैं। इस प्रकार पूर्ण विकास प्राप्त कर लेने पर भी ये पुनः विकसित होने की क्षमता रखते हैं। यह अपनेआपमें आश्चर्यजनक है। 58/वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक माते आज भी गाँवों में लोग 'अदरक' की गाँठ को बाजार से लाकर गमलों और घर-आँगन में गाड़ देते हैं। वह फलता-फूलता रहता है और आवश्यकता पड़ने पर निकाल लिया जाता है। अरबी को भी इसी प्रकार सुरक्षित रखा जाता है, पादप और संवेदनशीलता डॉक्टर जगदीशचंद्र बसु और अन्य वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि पौधों में भी जीवन या प्राण होते हैं, ठीक मनुष्यों के समान। मानव चल सकते हैं पर पादप अचल हैं यानी चल नहीं सकते । परंतु वे शेष सब मामलों में मानव के समान हैं। जैसे पौधों पर भी विष का असर होता है। ठीक मानव के समान विष के प्रभाव से वे भी मर जाते हैं। क्लोरोफार्म से जिस प्रकार मानव बेहोश हो जाते हैं पौधे भी बेहोश हो जाते हैं। कुछ समय बाद उन्हें भी मानव के समान होश आता है। क्रेस्कोग्राफ नामक यंत्र से पौधों की प्रति सेकंड बढ़त तक को नापा जा सकता है। इस यंत्र की सहायता से उनके दुख और संवेदना तथा कष्ट को भी नापा जा सकता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक बैक्सटर ने 1966 में एक प्रयोग करके पौधे के मन की बात जाननेवाला पोलीग्राफ नामक यंत्र बनाकर यह साबित कर दिया कि पौधे वातावरण में किसी सजीव कोशिका की मृत्यु पर शोक भी प्रकट करते हैं। किसी लकड़हारे को देखकर वृक्ष काँप उठते हैं ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार जानलेवा शत्रु को देखकर मानव काँप उठते हैं। पौधे भी संगीत का अनुभव करते हैं। जब भैंस संगीत सुनकर अधिक दूध दे सकती है तो पौधे भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते । तेज और कानों के लिए असहनीय आवाजें मानव के समान पौधों को भी पंसद नहीं हैं। 1 वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बात / 59 उपर्युक्त सब बातों से स्पष्ट है कि मानव और पौधों की संवदेनशीलता में कोई खास अंतर नहीं है। पौधे भी मानव के समान जीवित हैं। ये बेजबान भी कितनी भाषाएँ बोलते हैं जी हाँ, ये पौधे बेजबान होकर भी न जाने कितनी भाषाएँ बोलते हैं। हम उनकी भाषाओं को समझ सकते हैं बशर्ते हमारे पास उसको समझने-बूझने की क्षमता हो। जब ये पेड़-पौधे सताए जाते हैं, बिना किसी कारण के झंझोड़ दिए जाते हैं तब उन स्थानों से जहाँ से इनके पत्ते तोड़े गए हों, रस रूपी आँसू निकल पड़ते हैं। ये रोने लगते हैं। ये दुखी हैं, यह हम आसानी से समझ सकते हैं। हमें भोजन चाहिए यह सूचना भी पेड़-पौधे हर समय आपको देते हैं। उनका मुरझाना देखकर आप उन्हें खाद, पानी आदि देते हैं। कुछ समय बाद ही ये पुनः हँसते हुए-से प्रतीत होते हैं। खाद, पानी मिलते ही इनकी एक-एक पत्ती आभार से मुसकरा उठती है। इन्हें आवश्यकता से अधिक खाद, पानी भी नहीं चाहिए। अधिक पानी से भी इनकी पत्तियाँ आदि सड़ने लगती हैं, जिसकी सूचना ये हमें देते हैं। इनका कहना है कि हम तो सदैव देनेवाले हैं; आवश्यकता से अधिक न तो हम रखते हैं और न ही इकट्ठा करते हैं। जो सुख त्याग में है वह भोग में नहीं, यह पाठ भी पादप हमें सदा पढ़ाते रहते हैं। कितने महत्त्व के हैं ये पौधे सूर्यमुखी, अमरूद, नीम, जिंगोबाइलोजा आदि पौधे वातावरण में होनेवाले प्रदूषण को रोकने में सहायता करते हैं। इसलिए इन्हें घरों के आसपास लगाया जाता 0/बनम्पनि-जगत को आश्चर्यजनक बातें है। यूकोलिप्टस तथा तुलसी मलेरिया और मच्छरों को भगाने में सहायक होते हैं। इसलिए इन्हें घरों के आसपास लगाने की सलाह दी जाती है। नागफनी की सहायता से मरुभूमि में होनेवाली वर्षा का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। यह वहाँ वर्षा के नाप का ज्ञान देनेवाला पौधा है। अनेक पौधे हमें आनेवाले संकटों का संकेत देते हैं। ऐसे भी अनेक पौधे हैं जो हमें वर्षा के आगमन या चले जाने की सूचना देते हैं। पौधे हमें अंतरिक्ष-विज्ञान तक में सहायता देते हैं। सूर्य देवता के अनन्य भक्त पादप वृक्ष और पादप सूर्य देवता के अनन्य भक्त हैं । सूर्य से उन्हें ऊर्जा प्राप्त होती है। सूर्य के प्रकाश की ओर पादप बड़े ही स्वाभाविक रूप से आकर्षित हो जाते हैं। सूर्यमुखी का पौधा जिस ओर सूर्य होता है उस ओर मुड़ता जाता है। प्रातःकाल उसका मुँह सूर्य की दिशा में होता है, दोपहर को उसका मुँह ऊपर आकाश की ओर होता वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते 161 है और शाम को उसका मुँह सूर्य डूबने की दिशा अर्थात पश्चिम में होता है। इस प्रकार सूर्यमुखी सूर्य या सूरज की ओर उन्मुखी होने के कारण ही सूर्यमुखी कहलाता यह पौधा अनादि काल से कुतूहल का विषय रहा है। यह पौधा आजकल तिलहन की फसल के रूप में भी परिचित होने लगा है। पहले यह केवल एक शौक का पौधा अधिक था। इसकी एक विशेषता यह भी है कि इसे किसी भी मौसम में बोया जा सकता है। मूंगफली आदि के समान प्रोटीन और तेलयुक्त इस पौधे की सहायता से शहद का उत्पादन भी किया जा सकता है। मक्खियाँ और अन्य कीट इसके बीज के निर्माण में सहायक होते हैं तथा परागण की क्रिया करके इसे अन्यत्र उगाने में सहायता करते हैं। अतः मधुमक्खियों को इसके खेतों की मेड़ों के पास ही डब्बे बनाकर पाला जा सकता है और शहद प्राप्त किया जा सकता है। सूर्यमुखी वास्तव में हजारों फूलों का एक गुच्छा है। इसकी प्रत्येक पंखुड़ी के साथ अपनेआपमें एक पूर्ण फूल जुड़ा हुआ होता है। कमल का फूल भी सूर्य के उगते ही खिलता है और शाम ढलते ही मुरझा जाता है। जैसे यह सूर्य का सबसे बड़ा 'प्रेमी' हो । प्रातःकाल प्रकृति सूर्य का स्वागत करते हुए दिखाई देती है। सूर्यास्त के समय यही प्रकृति दुःखी हो उठती है। जो फूल सुबह-सुबह खिले थे, शाम तक वे मुरझा जाते हैं। अपने देवता के आकाश की ओट में जाते ही, मानो वे दुखों से कराह उठते हैं। किनके आश्रय स्थल नहीं हैं ये चीटियाँ, भृग, तितलियाँ, टिड्डे, जुगनू, काष्ठयूका, झींगुर आदि कीटों के घर वृक्षों पर बने होते हैं। सजावटी और छायादार वृक्षों की हम सदा तलाश में रहते हैं। 621 वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें मनुष्यों का घर किसी समय वृक्ष ही थे। आज भी मनुष्यों के पूर्वजों, वानरों का घर वृक्ष ही हैं। वृक्षों के कारण वानर इतने निश्चित हैं कि मनुष्य के समान हाथ-पाँव और थोड़ी-बहुत बुद्धि होने पर भी वे अपना घर नहीं बनाते। पेड़-पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं और उसके अतिरिक्त भाग को संचित करके दूसरे का पेट पालते हैं। इसलिए वे उत्पादक या निर्माता कहे जाते हैं। मानव उपभोक्ता है। मानव को उत्पादक की संज्ञा इस अर्थ में प्राप्त नहीं है जिस अर्थ में वृक्षों का है। सभी जंतुओं का धर वृक्ष, पेड़-पौधे ही हैं, जबकि मानव तो उनके नाम से ही घबराता है। वृक्षों के कोटरों में हजारों प्रकार के पक्षियों का घर होता है। कुछ पक्षी व प्राणी वृक्ष के ऊपरी भाग में रहते हैं तो कुछ मध्य भाग में और कुछ वृक्ष के निचले भाग में पाए जाते हैं। अनेक प्रकार के कीट वृक्षों की जड़ों तक में अपना निवास बनाते हैं। वृक्ष के मध्य भाग में अनेक पक्षी पत्तों, लकड़ी, रुई आदि से अपना घर बनाकर उसे सजाते हैं। मकड़ियाँ और कीड़े वृक्षों के पत्तों पर ही अपना घर बना लेते हैं। दरजी पक्षी वृक्ष के पत्तों को सीकर अपना घर बना लेता है । बंदर और वनमानुष आदि काल से वृक्षों पर आश्रित रहे हैं। ये वृक्ष आज भी उनका आसरा हैं। ऐसे सुखदायी वृक्षों को काटकर मनुष्य अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम करता है। कहते हैं मनुष्य ठोकर खाकर ही संभलता है। आज उसे अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का बोध हो गया है और वह वृक्षों की देख-रेख और उन्हें लगाने के मामले में पुनः सजग हो उठा है। वृक्ष उसकी जागरूकता का फल शीघ्र ही पुनः देने लगेंगे। आइए कलमें लगाना और रोपण करना भी सीखें अनेक प्रकार के आम जो आज हम खाते हैं, वे किसी समय इतने मीठे और अच्छे नहीं थे। अतः उन वृक्षों के साथ दूसरे अच्छे किस्म के पौधों की कलम लगाई वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते/63 . गईं, उनका रोपण किया गया और एक नए तथा अच्छे संकर किसम के आम का जन्म हुआ। चीकू की कलम चीकू तथा खिरनी नामक पौधे से लगाई जाए तो और अधिक मात्रा में तथा अच्छा चीकू प्राप्त होता है। नीबू की भी संकर किस्में बनाई जाती हैं तथा मौसमी की भी। इस प्रकार अच्छा नीबू और अच्छे किस्म की मौसमी तथा संतरा भी कलम लगाकर प्राप्त किया जा सकता है। गुलाब की तरह-तरह की किस्में बनाई जा सकती हैं। एक ही वृक्ष की डाली में अनेक तरह के रंगवाले फूल प्राप्त किए जा सकते हैं। यह कलम लगाकर रोपण से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। जब जड़ सहित किसी पौधे को अन्यत्र लगा दिया जाता है तब इसे रोपण कहते हैं परंतु जब इसकी कलम बनाई जाती है तब इसे कलम लगाकर रोपण, बोना या शंकर पौधा पैदा करना कहते हैं। जब हम परिपक्व तने को तना देते हैं तो उसे 'घड़कलम' लगाना कहा जाता है। इसी प्रकार जब एक पौधे की शाखा को दबाकर लगा दिया जाता है तब उसे दाब कलम कहते हैं। 64/वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते कितनी विचित्रताएँ समाई हैं पादपों के संसार में कुछ पौधे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भी जा सकते हैं। इनके नाम हैं क्लोमाइडोमोनास व यासवाकस। कुछ पौधे या पादप हरे रंगवाले नहीं होते। ये क्लोरोफिल का निर्माण नहीं करते। कवक श्रेणी के पौधे ऐसे ही हैं। इनका रंग भूरा सफेद होता है। पुष्पी पादपों के जड़, तना, पत्तियाँ और फूल होते हैं, जैसे गुलाब, मोगरा आदि। कुछ पादप पुष्प विहीन होते हैं। इनमें फूल नहीं लगते। ये हैं शैवाल, कवक, छत्रक, गौरा, फर्न आदि। तुलसी मलेरिया जैसे रोगों का नाश करनेवाली होती है। यह मच्छरों को घरों से दूर करती है। आधा पौधा आधा प्राणी बनाम हाफ प्लांट हाफ एनीमल नामक पौधा-यूग्लीना भी अपनेआपमें आश्चर्यजनक है। बीज भी श्वसन करते हैं, यह बात भी अपनेआपमें बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक है। बीज जब श्वसन करते हैं तो प्राणियों के समान कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं और ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। टमाटर और धतूरा भाई-भाई हैं जी हाँ, चकराइए मत और न आश्चर्य कीजिए और न टमाटरों को खाना छोड़िए। परंतु यह जान लीजिए कि टमाटर और एक प्रकार का धतूरा पादप आपस में भाई-भाई का रिश्ता रखते हैं। किसी समय टमाटर का पौधा जहरीला हुआ करता था। ईस्टर लीली और प्याज में भी भाई-भाई का रिश्ता है। हमारे द्वारा उपयोग में आने- वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बाते/65 । वाला गेहूँ का पौधा तथा बाँस, दोनों के बीच भी भाई-भाई का रिश्ता है। यह बात अलग है कि इनमें से एक भाई 'बाँस' जरा ऊपर उठ गया है। बाँस का पौधा 35 से 40 मीटर तक की ऊँचाई प्राप्त कर सकता है, जबकि गेहूँ का पौधा साधारणतः 5 से 6 फुट ऊँचाई प्राप्त करता है। घास-परिवार में भी फूल होते हैं घास-परिवार में भी फूल होते हैं पर हम उन्हें फूल मानते ही नहीं हैं। हमारे अधिकांश खाद्य पदार्थ घास-परिवार के ही हैं। गेहूँ, जौ, चावल और मक्का घास-परिवार की ही देन हैं; और तो और जो घास हम लान में उगाते हैं, वह भी गेहूँ जैसे खाद्य परिवारवाले पादपों से आई है। परंतु उसका ‘स्थान' लॉन तक ही सीमित है। पादपों में विचित्रताएँ और भी हैं काई के समान अमरबेल में भी न तो पत्ते होते हैं और न ही फल-फूल। संसार की सब बेलें क्लोरोफिल से युक्त होती हैं। कुछ परजीवी पादप तो दूसरे से भोजन पाकर 'हरे-भरे' रहते हैं परंतु पीले रंगवाली अमरबेल पत्तियों से विहीन बेल होती है। 'पत्तों से विहीन बेल' यह तथ्य अपनेआपमें आश्चर्यजनक है। यह कभी न मरनेवाली बेल है। यह हर परिस्थिति में जिंदा रहनेवाली बेल है। इसीलिए तो इसका नाम अमरबेल है। जहाँ पेटदर्द, अफरा, बवासीर और उन्माद की बीमारियों में यह बेल ओषधि का काम करती है, वहाँ दूसरी ओर यह बेल भूत और प्रेत का निवास स्थान मानी जाती है। अंधकार और अज्ञान में डूबे लोग इसे छूते तक नहीं है। 86/बनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते बाँस, जो संसार की सबसे बड़ी घास है जी हाँ, बाँस संसार की सबसे बड़ी घास है। अन्य घासों के समान बाँस का तना भी पोला होता है। बाँस की ऊँचाई 10 मीटर से लेकर 30-40 मीटर तक होती है। बाँस के नरम कुल्लों या गुल्लों से सुस्वादु भोजन तैयार होते हैं। तरह-तरह के अचार और मुरब्बे इसके कुल्लों से बनाए जाते हैं। इससे टोकरियाँ, चटाइयाँ, दरवाजों की चिक, फर्नीचर तथा अन्य सुंदर और आकर्षक चीजें भी बनाई जाती हैं। बाँस 500 से भी अधिक किस्मों या प्रकार का होता है। यह मकान आदि बनाने के अलावा बड़ी मात्रा में कागज बनाने के काम में भी आता है। वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें/67 बलूत का पेड़ बलूत (Oak) या माजू का पेड़ 150 फुट से अधिक ऊँचा होता है। इसकी सख्त लकड़ी बहुत टिकाऊ होती है। पानी के छोटे-छोटे जहाजों और बड़ी नावों में इसका उपयोग होता है। मजबूत फर्नीचर बनाने के लिए तो यह बहुत उपयोगी होता है। इसकी छाल से चमड़ा कमाया या पकाया जाता है। साथ ही कार्क वृक्ष के समान इसकी छाल से भी डाटें या 'कार्क' बनाई जाती हैं। जैतून, जो पवित्रता का प्रतीक है; शांति का सूचक है हमारे देश में बड़ या वट वृक्ष तथा पीपल पवित्र माने जाते हैं। इनमें देवताओं का निवास है, यह मान्यता भी है। इसी प्रकार यूनान में आदि काल से जैतून को शांति या सद्भावना का प्रतीक माना जाता है। किसी समय ओलंपिक खेलों में जीतनेवाले खिलाड़ियों को जैतून का ताज पहनाया जाता था। इसके फलों का अचार तथा मुरब्बे, तेल, दवाइयों, साबुन, सलाद तथा तेलों के रूप में उपयोग किया जाता है। कार्क की खोज से खोजी गई नई दिशाएँ बलूत या माजू वृक्ष तथा कार्क वृक्ष की छाल से कार्क बनाए जाते हैं। शीशियों के डाट या कार्क हलके, लचकदार और पानी में न भीगनेवाले होते हैं। ये वायुरोधी होते हैं। ये बाहर की वायु को बोतल आदि के अंदर नहीं जाने देते तथा अंदर की वायु या सुगंध आदि को बाहर नहीं निकलने देते। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में कार्क की खोज होने से पदार्थों के संरक्षण को नई दिशा मिली है। 68/ वनस्पति-जगत को आश्चर्यगक बातें
कैक्टस की भी महिमा न्यारी है
नाग के फन-सा दिखाई देने के कारण कैक्टस 'नागफनी' ही कहलाता है।
इसके फूल सुंदर होते हैं और आकर्षक भी। इसकी 1,000 से अधिक किस्में होती
हैं। कैक्टस के अनेक वृक्ष इमारतों से भी ऊँचे होते हैं। सेरियस नाम का कैक्टस रात
में
फूलता है।
है। ये धूप और गरमी सहन करनेवाले पादप होते हैं।
पादप भी करते हों मानो परिहास
आपने देखा होगा कि अनेक बकरियों और बकरों की दाढ़ी होती है। आपने
यह भी देखा होगा अनेक बकरियों और बंदरों के गलों में दो थन से लटकते रहते
हैं। ये सब भले ही उनके लिए उपयोगी न हों, परंतु हमारे हास-परिहास के कारण
अवश्य बनते हैं।
।
आपने देखा होगा कि मक्का के भुट्टों के बाल होते हैं। भुट्टों में ये बाल
लगभग उनकी दाढ़ी के समान दिखाई देते हैं। कभी-कभी ये सफेद बाल किसी वृद्ध
अनुभवी के बालों के समान लगते हैं।
कहा है न हमने प्रकृति भी मानो तरह-तरह से परिहास करती हुई लगती है।
वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें 169
खजूर का पेड़ खजूर का पेड़ यद्यपि पश्चिमी एशिया और भूमध्य सागरीय देशों में अधिक होता है, फिर भी इसे संसार-भर में जाना-पहचाना जाता है। खजूर के पेड़ से संबंधित बहुत-सी कहावतें हिंदी जगत में प्रसिद्ध हैं जबकि भारत में यह पेड़ बहुतायत से नहीं होता। खजूर के पेड़ों की आश्चर्यजनक विशेषता यह होती है कि इसके सभी पेड़ों पर फल नहीं लगते। इनमें नर जाति के पेड़ केवल पराग उत्पन्न करते हैं। फल केवल मादा पेड़ों पर ही लगा करते हैं। खजूर का पेड़ तीस मीटर तक ऊँचा हो जाता है। यह एक साल में एक ही फसल देता है। 70 / वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बाते वनस्पति-जगत से मिला एक बहुत बड़ा सिद्धांत सदियों तक लोग यह मानकर चलते थे कि जब फल पक जाता है तब टूटकर वह जमीन पर ही गिरता है। होता भी ऐसा ही था। परंतु वह जमीन पर ही क्यों गिरता है ? इसका कारण कोई नहीं जानता था। इसका कारण खोज निकाला सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने। एक दिन वह एक पेड़ के नीचे लेटे थे। ऊपर से सेब का एक फल टपका, जो सौभाग्य से उनके सिर पर नहीं लगा। - उनके मन में अनेक प्रश्न उठे। यह सेब का फल नीचे ही क्यों आया; ऊपर क्यों नहीं गया? क्यों और कैसे पर विचार करते-करते एक दिन न्यूटन ने जो सिद्धांत खोज निकाला वह था—पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज का । वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें/71 उन्होंने बताया कि पृथ्वी के केंद्र में जो गुरुत्वबल या गुरुत्वाकर्षण शक्ति छिपी हुई है उसी के कारण सभी वस्तुएँ पृथ्वी की ओर आकर्षित होती हैं और पृथ्वी पर ही आकर टिकती हैं। यदि पृथ्वी में यह शक्ति न रह जाए तो उस पर स्थित सब वस्तुएँ अन्यत्र आकर्षित होकर चली जाएंगी। गुरुत्वाकर्षण का यह नियम सदा तथा सब वस्तुओं पर काम करता है। सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल परिक्रमा लगाती हुई पृथ्वी को खींचे रहता है और उसे दूर, बाहर आकाश में उड़ जाने या चले जाने से रोकता है। समुद्रों पर आनेवाले ज्वार-भाटों का कारण सूर्य और चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही है। न्यूटन को इस सिद्धांत की खोज से बड़ा सम्मान मिला। दूसरी ओर वनस्पति- जगत के कारण ही संसार को यह एक बहुत बड़ा सिद्धांत मिला है। क्या होगा उस दिन वनस्पति नहीं रहेगी जिस दिन ? जरा कल्पना कीजिए कि क्या होगा उस दिन, ...वनस्पति नहीं रहेगी जिस दिन? जी हाँ, वनस्पति ही इस संसार का प्राण है और हम हर पल, हर क्षण, हर दिन इसे समाप्त करने पर तुले हुए हैं। हम सड़कें बनाते हैं तो हजारों किलोमीटर तक फैली हुई हरियाली और वनस्पति समाप्त हो जाती है। हम बाँध बनाते हैं, और उसके पानी के लिए एक विशाल अप्राकृतिक तालाब बनाते हैं, सैकड़ों हैक्टेयर भूमि का क्षेत्र पानी में डूब जाता है। वहाँ का वनस्पति-क्षेत्र सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाता है। आजादी को बसाने के लिए हम जंगलों को काटते हैं, वहाँ के वृक्षों को समाप्त कर देते हैं, घास-पात को जला डालते हैं, और सैकड़ों हैक्टेयर क्षेत्र की वनस्पति काट n/ बनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बाते देते हैं। हम कॉलोनी बनाते हैं, वहाँ के कीमती वृक्षों को काट देते हैं, वह क्षेत्र हमेशा-हमेशा के लिए हरियाली से दूर हो जाता है। हम खेती करने के लिए जंगलों को साफ करते हैं, और वहाँ के घास-पात में आग लगाकर उसे बहुत लंबे समय के लिए समाप्त कर देते हैं। इस प्रकार संसार-भर में मानव हरियाली का दुश्मन बना हुआ है। जो वस्तु उसके जीवित रहने के लिए सबसे अधिक जरूरी है वह उसे ही समाप्त करने पर तुला हुआ है। आइए,करके देखें आइए, देखें कि अंकुर ऊपर की ओर बढ़ते हैं और जड़ें नीचे की ओर। एक मर्तबान में रुई के अंदर विविध प्रकार के बीज बो दें। उन्हें पानी से तर रखें। कुछ दिनों बाद आप देखेंगे कि उनमें बीज अंकुरित हुए हैं। अंकुर ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं तथा जड़ें नीचे की ओर। यह पौधे का अपना स्वभाव होता है कि जड़ें नीचे की ओर बढ़ती है तथा अंकुर ऊपर की ओर । अब मर्तबान को उलटा कर दें। रुई को तर रखें। कुछ दिनों बाद आप देखेंगे कि जार को उलटा करने पर भी अंकुर ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं और जड़ें नीचे की ओर। यह भी अपनेआपमें आश्चर्यजनक है। वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक यातें /73
पौधों को पानी चाहिए
यह बात हम अच्छी तरह से जानते हैं कि जिन पौधों को पानी नहीं मिलता
वे सूख जाते है। जिन्हें अच्छी खाद, पानी और सूर्य का पर्याप्त प्रकाश मिलता है वे
खिल उठते हैं।
दो पौधोंवाले एक-से गमले लें। एक पर लिखें पानीवाला। दूसरे पर लिखें
बिना पानीवाला पौधा।
पानीवाला
बिना पानीवाला
जिसे पानी नहीं दिया जाता वह मुरझा जाता है क्योंकि पौधे अपने कच्चे भोज्य
पदार्थो को पानी की सहायता से ही भोजन में बदलते हैं। पानी के अभाव में वे मुरझा
जाते हैं।
74/ बनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें
आइए, करके भी देखें
जड़ द्वारा पानी सोखा जाता है। इस बात को हम एक सरल-से प्रयोग के द्वारा
करके भी देख सकते हैं।
जिस प्रकार चित्र में बताया गया है, वैसा करने के कुछ समय बाद हम देखते
हैं कि गिलास में रखा पानी कुछ कम हो गया है तथा कुछ पानी काँच की नली में
चढ़ गया है।
यदि हम सादे गिलास के बदले नपना गिलास रख दें तो हम आसानी से नाप
सकते हैं कि जड़ ने कितने मिलीलीटर पानी को सोखा है। है न रोचक और ज्ञानवर्धक
प्रयोग।
(GHHHHH
वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें 175
पौधों को विकसित होने के लिए धूप चाहिए आइए, इसे एक प्रयोग से सिद्ध करके देखें। दो गमले लें, जिनमें एक जैसे दौ पौधे लगे हों। अब एक गमला ऐसे किसी ढक्कन से ढक दें जिसमें हवा जाने के लिए कुछ छेद हों। दूसरे गमले को ऐसे ढक्कन से ढकें जिसमें हवा जाने का छेद न हो। कुछ दिनों में आप देखेंगे कि जिस पौधे में हवा जाने की जगह थी वह ताजा-सा लग रहा है तथा जिसमें हवा जाने की जगह नहीं थी वह मुरझा गया है। अब इन पौधों को खुला कर दें तथा धूप में रखें। कुछ दिनों में दोनों पौधे ताजे से लगने लगेंगे। इस एक छोटे-से प्रयोग से सिद्ध होता है कि पौधों को प्रकाश और वायु दोनों की जरूरत होती है। 76 / वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें पौधे सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा प्राप्त करते हैं पौधों को हवा से कार्बन डाइऑक्साइड मिलती है, जिसे मनुष्य अशुद्ध वायु के रूप में छोड़ते हैं। पौधे ऑक्सीजन छोड़ते हैं। उनकी जड़ें पानी खींचनेवाली होती हैं। अनेक पौधे अपना 'अतिरिक्त पदार्थ' जड़ों में संचित करते हैं। तने के माध्यम से पानी वृक्ष में ऊपर उठता है। इन सब कार्यो में रासायनिक क्रिया होती है। । पादपों का विकास भी मनुष्यों आदि के समान होता है। वे भी दुख और सुख, खिलना और मुरझाना जानते हैं। वे भी हँसते-से लगते हैं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पौधे सूर्य के प्रकाश की सहायता से करते हैं। आइए, इसे एक छोटे से प्रयोग की सहायता से करके देखें। ॥ वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें/77 एक पौधा लें और उसे सूर्य के प्रकाश में रख दें। उसके एक पत्ते पर मोटे कार्ड की एक पत्ती लगा दें। उसे कुछ दिनों तक रहने दें। कुछ समय बाद निकाल लेने पर तुम देखोगे कि जिस जगह वह कार्ड लगा था पौधे की पत्ती का वह हिस्सा सफेद हो गया है। पौधे की पत्ती के इस हिस्से को सूर्य का प्रकाश नहीं मिल रहा था। क्योंकि उस स्थान पर प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया नहीं हुई। इस प्रयोग से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए सूर्य का प्रकाश आवश्यक है। जो पौधे हरीतिमा या क्लोरोफिल बनाते हैं, यदि वे भी प्रकाश से दूर रख दिए जाते हैं तो उनके पत्ते हरे नहीं होते, वरन उनका रंग सफेद-सा हो जाता है। इससे भी जाना जा सकता है कि उन्हें सूर्य का प्रकाश नहीं मिल रहा है। पौधे सूर्य के प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं आइए, इस तथ्य का पता एक छोटे से प्रयोग से करके देखें। एक पौधे को एक पेटी से ढक दें। उस पेटी का एक हिस्सा कटा हुआ हो, जैसाकि चित्र में दिखाया गया है, जहाँ से सूर्य का प्रकाश उस पौधे पर पड़ता हो। पहले पौधा खड़ा हुआ था। कुछ समय बाद हमने देखा कि वह तिरछा हो गया है। M/मन की भरपाले इस प्रयोग से यह सिद्ध होता है कि पौधे सूर्य का प्रकाश प्राप्त करने के लिए सूर्य की ओर झुक जाते हैं। आप चाहें तो पौधे का मुँह दूसरी दिशा में कर दें, जहाँ सूर्य का प्रकाश बहुत देर बाद पहुँचता हो। आप कुछ दिनों बाद देखेंगे कि उस पौधे का मुँह उस दिशा में पलट गया है जहाँ से सूर्य का प्रकाश आ रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि पौधे सूर्य के प्रकाश की ओर झुकते हैं या आकर्षित होते हैं क्योंकि उन्हें जीवित रहने के लिए ताप रूपी ऊर्जा सूर्य से ही मिलती है। पौधे भी साँस लेते हैं आइए, इस बात की पुष्टि एक छोटे-से प्रयोग से करें। एक-से दो पौधेवाले गमले लें। एक पौधे को खुला रख दें। दूसरे पौधे को काँच के एक जार से ढक दें, जैसाकि चित्र में दिखाया गया है। तुम देखोगे कि जिस पौधे को हवा मिल रही है वह खिला हुआ है। जिसे हवा नहीं मिल रही है वह पौधा मुरझा गया है। सूर्य के प्रकाश और हवा के बिना भी पौधे मुरझा जाते हैं, वह हम प्रयोग से जान सकते हैं। कि वनस्पति-जगत की आश्चर्यजनक बातें 179 बीज भी श्वसन करते हैं एक छोटे-से प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि बीज श्वसन करते हैं। एक खाली साफ-सुथरी बोतल लें। उसमें मटर के अंकुरित दाने डाल दें। कार्क से उसका मुँह अच्छी तरह से बंद कर दें। उसे किसी अँधेरे स्थान में रख दें। उस बोतल में जो दो दिन के बाद दोनों को खोलें। पहलीवाली बोतल में जलती हुई मोमबत्ती डालते ही आप देखेंगे कि वह बुझ जाती है। कारण स्पष्ट है हवा थी उसे बीज ने साँस के द्वारा ग्रहण किया तथा कार्बन डॉइआक्साइड छोड़ी जिसके कारण बोतल में मोमबत्ती जल नहीं सकी। पदार्थ को जलने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। दूसरी बोतल में जलती हुई मोमबत्ती डालें। वह जलती रहती है क्योंकि उसमें बीज नहीं था। अतः उसकी वायु का उपयोग नहीं हुआ। उसमें जो ऑक्सीजन थी वह वैसी ही बनी रही। है न मजेदार और रोचक बात । 80/-जगत को आश्चर्यजनक बाते -
पौधे ऑक्सीजन छोड़ते हैं, आइए एक और प्रयोग से देखें
नीचे बने चित्र को ध्यान से देखिए।
एक पादप एक जार से ढक दिया गया है। वहाँ ताजी हवा के न होने से पौधा
कुछ समय बाद मुरझा जाता है।
दूसरे चित्र में बताया गया है कि जार से ढक देने और वायु के न होने से चूहा
मर जाता है।
तीसरे चित्र में बताया गया है कि बेलजार में पौधे और चूहे को एक साथ रखने
पर चूहा अधिक समय जिंदा रहता है।
ऐसा क्यों हुआ। आइए, यह भी जान लें।
पादप के जार से ढके रहने पर वायु का जीवन-रक्षक चक्र नहीं बना । अतः
पौधा
मुरझा गया।
वनस्पति जगत को आश्चर्यजनक बातें 181
चूहे की साँसों से जार के भीतर की वायु दूपित हो गई और कार्वन डाइऑक्साइड की अधिकता के कारण चूहा मर गया। तीसरे जार में चूहा कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता था। पौधा उसे ग्रहण करके ऑक्सीजन त्यागता था। यह क्रम जब तक जारी रहा चूहा जिंदा रहा। स्वच्छ वायु के न मिलने से यह क्रम जव बंद हुआ तव चूहा मर गया। इस प्रयोग से जीवन-रक्षक वायु के चक्र को हम आसानी से समझ सकते हैं। 82 / वनस्पति-जगत को आश्चर्यजनक बातें वनस्पति-जगत के आश्चर्य संसार का सबसे छोटा पुष्प या फूल सबसे बड़ा फूल सबसे छोटा परजीवी पौधा सबसे छोटा बीज सबसे भारी काष्ठ या लकड़ी सबसे हलकी लकड़ी सबसे ऊँचा पुष्पी पादप सबसे छोटा पुष्पी पादप सबसे छोटा जिम्नोस्पर्म नामक पौधा संसार का सबसे ऊँचा वृक्ष संसार का सबसे बड़ा बीज सबसे बड़ा बीजाणु बोल्फिया रेफ्लीशिया अरसेथोवियम आर्किड हार्ड वीकिया बाइनेटा आक्रोमा लागोपस यूकीलिप्टस लेम्ना जामिया पिगमिया सेकोया जाइनेंटिस नारियल सायकस राष्ट्रीय फूल . कीट-भक्षी पौधे सबसे बड़ी पत्ती सबसे बड़ा फल प्रदूषण की सूचना देनेवाले पौधे सबसे छोटा गुण सूत्री पौधा सबसे बड़ा गुणसूत्रवाला पादप हाफ प्लांट हाफ एनिमल अर्थात आधा पादप आधा जंतु मक्खी को भोजन बनानेवाला पौधा कमल ड्रासेरा, निथीस, युट्रीकुलेरिया, डायोनिया विक्टोविया, रेजिया लोडीइसिया जिंगो, बाइलोबा, सूर्यमुखी, अमरूद। 'शैवाल ट्रोलियम युग्लीना सोरोमेटस् गटटेम् वनस्पति जगत की आश्चर्यजनक बाते/83 बीमारी पैदा करनेवाले पौधे पैनीसीलियम, एसपरजिलस जूते, कपड़े, कागज अचार, भोजन को नष्ट करनेवाले कवक जिनमें क्लोरोफिल नहीं होता (हरीतिमा रहित पौधे) कवक आदि मलेरिया, मच्छरों व रोगों को भगाने- वाले पौधे तुलसी, यूकीलिप्टस खाने पर जहरीले पौधे धतूरा आदि जहर चढ़ानेवाले पौधे बिच्छू बूटी, ईबी काँटेवाले पौधे गुलाव, बबूल आदि संसार का सबसे मोटे तनेवाला वृक्ष सिकोया संसार में सबसे अधिक आयुवाला वृक्ष सिकोया-4,000 वर्ष तक जीवित बरगद एक कोशीय पौधे एल्गी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने- वाले पौधे क्लामाइडोमोनास व यासवाक्स जो पुष्प विहीन है शैवाल, कवक, छत्रक, गौरा, फर्न . सबसे विशाल वृक्ष 8/यनमाको अश्वनना यो
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