Sanmati Library, Jaipur
Bharatari Shatak
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श्रीगणेशायनमः
साधारतरीसलक भाषा
लिख्यते
जाकी मेरे चाहै छै मासाविरक्तसना और पहषसों की
तपुर वह चहत और धन ॥ मेरे मन कनपरीकर
ही कोउ इक औरहि ॥ यह विचित्रगान दोषचिवज्यों
जज धन ढोरहिं एव भांति राज पति भी सुध काजर पुर)
प को परमधिकाधिमकामयाहि धिक मोहि धिका
बरन निधिकोसन इक ॥१॥दोहा॥ पुरुष करिमूड
रिझाइये प्रति सुजन पंडित लोग भग्वदग्धज्माजील
को विधिहुनारम्विनजोग॥२॥ निकसनबार
दिल जतन कर काढ़त कोज । गन्तवाको नाम
याला सो को लहत सुभा कोनगाहमरस में।
मणिकाढ़ता होनजलधि के शट लहरियालीजनवाद
नारिस मरेप को पहपज्यो भने शिर पर शासक
व॥ ३॥ कुंडलिया की है शशिदिवसका-
मिनजोवन हीन सुन्दरमख अक्षरबिना सर पर
कजलीन ।। सरबर पेकजलीन होत प्रभुलामीचनको
सज्जन कपटी होतन्टपतिडिगदासखलनको रस
तोहीसरल्प मर्म छेदन वाजीको बजनिपिनको
देखि होग मेरेमनीको ३५ ।। रुटीई का कोलगैमणि
वर साणचड़ोसुग बीर अंग कठि शस्त्र संसोमासरस
बढ़ीसुअंगगज मदकरौनहि । बैजकला शशिसो
भि सरद सरताज महीनहि ।सुरत दलमलीनारल
हजसुंदरिता मोटी मार्थिन को धनादेत सौंधीनाहि
न छोटी ॥३॥दोहा॥ जाको जब मुष्टी नहीं होतांवहन्ट
पति राज ॥ छोटे मोटे होत सब सोचगर्भनहि को
ज।पे। सबथन का ज्ञानमधुर वानी जिनके
मख ॥ नित प्रति विद्यादेत मजसको पूररह्यौ सुख।
ऐसे कविजयस्तरहत निरधनताको प्रतिवरजाना
हिंप्रचीनभईयाही तेंयहाति। यह विवेकसंपति
सहत सबपुरुषन में प्रति हावर ॥परकियारतन
को मोल जिनवजोहोरी करनर॥७॥दोहा॥ विपता
धीर संपति क्षमा सभा माहिं सुन बैन । जुध विक्रमन
नति कथा देनर वर गुनएन) छप्पै। नीत निपुन नए
धीर् वीर कछु सुजस करौ किन अथवा निंदा कीर काही
दूर बचन छिन छिन। संपति ह चलिजाउरदौथवा
गिनत धन ॥ भबहीम्रत्यु किन होउ होउभथा
निश्चलतन। परन्याय पंथकातजत नहिं बुधि बिबेक
गुन ज्ञाननिधि यह संग साहकरहतनित देतलोकप
रलोक सिधि॥ ॥ कुंडलिया। पंडित पर प्रांधीन
को नहिं करिये अपमान।न्टरण समसंपति कोगिनेबस
नहिं होत सुजान। बसनहिं होत सुजान नपदाझर
गज हैजैसे। कमलनाल के तंतु बधै रुकिरहि है कैसे।
सेड्नको जान सबहिसखसाचामंडितानादरसोंब
सहातमस्तहाथीजों येडित॥॥छप्पाचर सकतनहि
चोरभारेनिस पुस्ट करत प्राधिन हूं कोदेवछिनछिन
में अगनित कबहू बिन सत नाहिलसत विद्यासुगुप्तधन
जिनके यहसबसाजसदा तिन को प्रसन्न मन पराधाधि
राजछित छत्र पति यह यैतौनधिकारलहि॥उनकोनि
हार गफेरबोयह तुमकोउचितनदि २९॥ कुंडलिया।
मांगे नाहिन दुष्टते लेत मित्र को नाहिपीत निवाहन
इश्क मेंन्यावरत्तिमनमाहि॥ न्याय रतिमनमाहिज
चपद, प्यारो निनकों।मानन हूकेजात भकत भावनाही
निनको परखडगधार तधारीरहकमाई नहि त्यांगे। संत
न की यह मंत्र दिये कोने बिनमारे॥१२॥ नाहरभूखों
उदर र बसतनबीन। सिथलसंन्नतिकरसा चाल
बहू में लीन । चलिये हमेंलोनाज साहस नहिं छोड़े।
मद गजकुम्म विदारमासमक्षनमनमाडे। स्टगपतिभा
दोघास पुरानीखात नजाहर। अभिमानन में मनुष्य
शिरोमन साहत नाहर ॥१३॥दोहा॥ अटतभरेतनस
नबंचन निस दिन परतुगुनमानत पेरुसमाविरलेसंता
समार५१४४ ईश्वर प्ररू राक्षसरहत परवतबड़वांतु
त्य सिंधुगभीर सुप्रति बड़ो राखत सुखसे कुल्य ।
भूमि सयन कह पलक पेसाक हार कहमिष्टा कहहुका
था सिर पावकह अर्था सुख दुख इस ॥ १६॥ कय्याबड़ी
भूमि विस्तार सिंधु सीमा कर गस्ती सिंचारसौ कोसना
वधि येतो कल मारपी। बहुत बड़ौआकाश तादि रबि
अति दिन नापत रविहू कोरघण्य प्रापअपने बलहा
कत । सबकीस्टजाददेखीसुनीजपिबहाई इसहतः ।
सर्व एकबुद्धिविस्तार विधिसाधनसामाररहित।१७
दोहा । बदनसबही सुरनको बिधिहू को दडौत।क
मन को फले देत है इन को कहाउदीत ॥ लाभ संतोष
दरि के ऐसेकंचन मेरु ॥याकी महिमायाहि में विधि
रचियो कहारे हेर ॥ ९६ छपे। कछित मंत्री भूप
संत बिना संतकसंगते।लाड़लड़ाये पूत पोतकन्याकु
दंगते। बिन बिध्या ते विप्र साल खलसंगकियेते।
हा
तभीति को नाश वासपरदेश करेंते॥बनिता बिनाम
द हास से खेती बिनदेखी दगन ।। सुखनातअनुपान
रागतें प्रति मंशादशेजात धना॥ २०॥ लज्जाजतजो
होय ताहि मूरख ठरावत ॥धर्म रनिमन माहिताहिहं
भी ठरावत । अति पवित्र जो होय ताहिकपटीकाहि
बोलत ॥ राखत सुरता अंग ताहि पापी कहि बोलत।
बिक्रमीत मत प्रिय वचनरंकतेजवानलंपट कहत।
पंडित लदार कह दुष्टजन गुनकोतनै गुनगहत।
जात रसातलजाहजाहगुनताह के तर ॥ परोसिलापर
सीलभगिन मेंजरो सुपरिकर ॥ सूरातनके सीसबन
बैरिन के बरमह। एक व्यबहीतिरैनदिन धनज्यो)
सरज़हुजाबिनसबगणतिरहसमकछ कारिजनहि
करि सकहिं । कंचन-प्राधान सुवसाज सब बिलकंच
जगप्रकलकहि ॥ २२॥जैसे काहू सापकोछबरे पकरि
धखौनु । बनमाही मेल्यो सुबहदैसिर फट पस्तोसुदै
सिर फूति पस्योसुभ पंडितप्रति कैदी॥ इन्द्री विहवल
भूख पिटारी महसे छेदीगरेतूमन पिराखिकर प्रभु
ऐसा जैसे ॥२३॥ दोहा। करकी मारी गेंदज्यों लागि
भूमि जरिभात । सत परूषन की विपतिज्योहिनही
में सिटिजात ॥ २६ जैले किन गिर ज्यो नरमशिन दुन्य । पापीड खो उठते नहीं तांबडयो मम॥ २५॥ पुनः चरित्र निय हित करत सुख दुस मित्रममा मनरंजन तीनों सिलें पूरब पन्नाहि जान॥ २६॥ सोरठा।।स नपरुषल लीरीति पनि कोलहिसना दुखही में यहीलि बंज समान होय मन ।। २७॥ विद्याजुना ह होय तरू हाट नजिदीजिये। सर्पजमणिधर होय नयकारीवहा कीजिये ॥ कुंडलियां ।। पानी भर लोमिलत हो जान्यौ अपनो सिंच भाग सयौ फासीवजललियो सुचित जल कोकियो सुदिन नपत जब एकको ज्ञानी । लब अपनी तन वार मोहजनन में पानी फालेचल्योमधि अखिल खातमाल रिसात पानी ॥ सत पुरुषनशी प्रोतिनीतियों वय और पानी । २६॥ छ ।। कहत साधुसू दुष्पद पंडित रहावत॥ करते मित्र को शानु अछताको विष कारगावत ॥ न्ट पति सभा कोलाम चक्रका देवी कहिये। ताकी सेवा किये सकल सेना लहिये। यह जो प्रस है है. वहीं होगा सबफल ॥ तुजबात चतुरनर तू यह वासीयाँ है है सकल् ॥ ३० ॥ कोडिलियो । कर लिए कीरापरे गिरतवेदन ते लार में श्री वास दिकालतन बुग हाल बेमार ॥ बुरोहालबोबाद हाइजसके कोचावता सुरपतिकी संक नैक हू नाहिन सावत निडर महामन नाहि देख घुर रावत हझर नेस्ही नर नीच निलजयों डोलत कर ॥ ३९॥ कूकर सूके हाईसों मानत है नन- मोद् ॥ सिंह चलावत हाथ नहिं गोदर आये गोद ।। गीदरमाये गोद भोखिडू नाहि उपारे । महानेत गजदेखि दौरिके कुम्लनिक्षरे। लेलेही नर बड़े बड़ी खुद करत दह कर कर नीचतानीच करज्यों के चित कूकर ॥ ३२५. नेहा ॥ पापानरावत हितकरत गुनगान मागिन होकि ॥ दुरस में एखत देव शर्छसतमि बनबहाक ।। ३३ ॥ माहिजल म्टगके सुल्टरण सज्जन हित करीब ॥ लधुत धीवर दुधजन बिन कारनदु खीव ॥ २४॥ सोरता ॥ सबद पीन रूमलपन जैसी रहै सत्तासीयह सीन शाम मान अपमान।। ३५॥ कामन हालै ख्यकोषकीये विधि हसऐप य पानी सब होय जुदाकरे नहिं । ২৮- নিকাং লিলিহক জিজ। रानभाया नत कर्म दर करख पानाम जुठीक ३० पहु गुशहर पर रहै सू के बन माहि॥ मनोरस तपुरुष रहे फष दुशवर माहि ॥ ३॥ गुपशुपगो ला बरबचन बिपरहार जड़दार । क्षमादान परिहार ल सवा सपदि दूर ॥ इणै। नीचे हैदलतहोस बतेअंचे प्रति परगुन कीरत करत भागगुननाफालय हमति भातमभी विचार करतनिशदिन परमा रमा दुष्ट दूरवचन कहताभाकर साधत स्वार॥ निलरहत) कसमबनसों बचनकोपकर कहत रेले जस सेन याजगत में ना वह सब के सुलह ॥ भयोलान - मन माहि कहनये औगुन चाहिये॥निंदासबकी कर तनहाँ सब पानिकल हीयेसत्य वचन कहातप्यसु ची मनातीरथजानहु । हाथ सजनता जहाँतहागुन प्रघट बरखानहु ॥जस जहां कहाभूषन चहतसबबि द्याजहाँपन कहाँ ॥अपजसहि छयोयाजगत में ति न्ह म्रत्यया है महां॥४९॥ गंटि उघारे मंद वाहू सिर पर नाही तप्पोजेठकोधाम बील की पकरी छोही तहांबीलफल एकसी सपेंपलौ सुवाके । मानों बज महार इन्द्रनें कियो सुनाके । सरव और जान बिरम्यो सुवह हायड्तते दुखको सहत॥निर भाग परपजिलजायतित बैरबिपताअगनितलहत। कुंडलिया। मंडन है अस्वको सजन तासनमान। बानी मंडन सूरला मंडनधन को दान॥मंडनधनको दान ज्ञान इन्द्री मंडनदम।तपमंडनप्रकाधिविनय मंडन साहत सम॥ प्रभुता मंडममाफधममनंडनछ ल छंडन । सबहिन में सिरदार शालयहसबकोमंडन ॥४४॥ उत्तम नर पर अर्थ करत स्वारथ कोत्यागत ॥ मध्यम नर पर कानकरल स्वारथानुरागत दुष्ठ- जान निजकाज करत बरकान बिगारत ।।वहनहिजा निजओनरूपचौपीजे धारन । निज कौन हौन निजका जकल मारके चारयहरन ॥ जिन कौन होतानिदरते किन देह मभ कस्सनहा बिनडरत ॥दोहा॥ जाने पर के गुन बसेंबे महत पुरुष को संगवि धाअपनी भार्या तिन मनकारंग। तिनमें मनको रंगभक्ति शिब की दृढ़ गरे। परमबती को त्यागवचन भरथरी झूठे नहिं भाषै। गुरु आज्ञा में नम्बरहै दुष्टन हंगा हम ज्ञान मन माहि दमन इन्द्रीसुख मानें ।लाकबा द की संग पुरुसतेन्द्रपतनजाने । ४७॥ छप्पै । जो दरपन प्रतिलिंब हाथमेंमावत नाही।त्यों नारीन के हृदय कसिन समर और माहीं ॥ दुर्गम गिरसमाचपल हितंचितगति सोक। सबनारि नालनकों कहत बिस कर की बेलीयह ॥ निषधीस दोषमष एकहोकही अति कीनगह ॥ ४॥ टएमा को तनिदेहु एम को भज न करौ नित ।। या हिया में राखि पापको दुरि राखि नित॥ सत्य बचन सुखबोल सा पदवी जियधोरह। सत रुषन की सेब नम्रता श्रुति बिस्तासुद्धा सब गन अपने गम करि करति परिपालन करहकरद या दुखी नरदेविस के संतरीतियह-जनसर ४६॥ भयो सकचित गाव दंतह उखरि परे महि॥ आयेदीखत नाहि बदनतेलार परत ढह ॥ भई चाल बेचलहाल हाल भयो अति बननमानत बंधनारिहतजी भी निगति ॥ यह कामही दियेध पनकबुखसोन हिं कह सकता निज पुननादर कहवयह बूढीयों होकहत ॥५०॥ हाडदेखि तजत तियज्यों कोली को कप। कोही भोरेशरिलबिबुरोलगत नर रूप ॥ ५॥ कोरज भाछौ अरुबुरी कीजैबहुत बिचार।कीयेजल दनाहीं बने रहत हिये में हार ॥५२॥ छप्पै॥चरिलस नपा.माहि तिसनकी खलकोरापताप्राक रुईके हेतु खेतकेचनहलसाधता कोई निजपनकाजखातधेनसार हिडारतासेंहीनरदेह पाप विषया बिषतारत यह भरतरी ॥ कर्म भूमि को पायकेंजे नहिं जपतपरत करहिं तब मूंड महानर जगत में गाय पोर सिरपर परहि ॥ ५३॥ दोहा ॥ बन रणज भोर अगिन में गिरिसमद्रम- ध्य ॥ निंदा पटौरहिं कदिन प्रव पुन्याहिं सिद्ध । (५४॥ शिब विश्लए जोगेश्वर मफामायी लेवनंदन पद इन्हें प्रष्ट धर्म भागको सेव॥ ५५॥बूडि समुद्र अरु मेरु चे िशनुजीत व्यौहार॥ विद्या खेती चाकरी पग लिख भावी सार॥५६॥ कुंडलिया हिमगिर सिर धन के कहत कहा क्यों मनाक ॥सहिवाहों निज सीस पर बूंद बंज परवाक|दन पर वाक - गिनवाला में जरिवो ॥ नीको होयसबभांतिवहांसन्मा रख है मरिची ॥डसिंघ के माहि कहाली में है घिर निलजलजायो मोहि पितामहान्यो हिमगिरण ५७॥ छप्पे सुरगरसेनाधीस सुरनकी सैनाजाके। सस्त्र हाथालि बिज्ररहतास।ऐरापति असवार प्रभूको परमानना नह। ऐसी संपतिसोजुसदा सेहत सुईन्द्रय॥ सोजुद्ध मॉम्हि दानबन मोहोत पराजय ॥ खोयं पतिसमाज समान सबही रथासब सो अद्भत दैवगति ॥ ५॥ दोहा ॥ दान भोगऔर नासतीधन अनधन मेंजातहै। करत दोय की त्रासबासनास को तीसरौ।। छप्पे भहा अमोलिकरत्ननाहिं सुरंरीमत लिनकों जिनकी निर्मल बुद्धिएक प्रतिही अस्टतसों ।
तैसेंही नर धीर काज निकरिमतिही। सबदोष हित और गन कहन एसो कारज मनधरत॥ ताकोजुप्रीम म्टत लहूत कोऊ दुष्ट को नाहि करत ॥ ६३॥ कुंडलीया राज बिसे और दिवस को रविसमतेन निधान गया मह इन समनहीं नाते तजे निदान।। तातेंतजेनिदा न आन इनहीं सोभरकत । भयो सीस कोसह चाह कर जपतपपकरत॥ ऐसही नर धीर मरतहू करत सु जाका ॥ गिरत परत रनमाहिं सुंभर पहुंचतजहांरा जा.॥६४॥ कुंडलिया. कंकन तेसोहत न कर कंडल तें नहिं कान॥चन्दना ने सोहत नसिर जानलेह परजान । जानलेउ.यह जान दान नै पानलसत है। कथाश्रवन लें कानसरम शोभा सरसत है। परमारथ सोदेहु दिपतचंदनसों उकन॥ यह सकतसबरे खिपहरिये कंडिल की कंकन ॥६५॥ दोहा सोही पंडित सोई दक्षत सोगरगजकल बान । जाके धनसाई सुघर सुन्दर सूरसुजान ॥६६॥ माल लख्यौ बिधना सुबह घंटे बंधैकलूनांहि "सुर घर कंचन मेरुजस मंदकूपघट माहि॥ धेनुपराको चहत पय प्रजा बच्छ करिमान।याको परिपालनकी ये केल्प यक्ष समजान॥७॥ छप्पे सांची है सबभानि सदा सबबातनझूठी । कब हो। स में भरी कबहू प्रिय बचनअनूठी॥ हिंसाकाडरना हि दयाह प्रगट दिखावत ॥धनलेबै की बात है। - है धन को भामत ॥ एरसन जमीर बहु नरनाकीसदांसंवा रत॥ रहतग्नह भात रुपनानारखत ॥ ७॥ दोहा जो अति कोधीभूपति काहू सोन रुपाल। होमकरन ह दजन्यो हनी गिनीज्वाल॥७२॥ द्याहीन बिन काज रिसत्तर करता पर पुष्टासहिन संकतम खबंध को यह स्वभाम सो दुष्ट ॥७३॥ विधि बिपति दरन बरन करते धीरजहिं दूर दूरहोल धीरजतनी प्रलय सिंधु गिर पूर॥७४ ॥ नियकाढा छिसरकतत छिरत ढहत कोपही अंग॥ लाभ पासरेवंचितन मनव बिरले है जागि॥७॥ पै दयांजनावत माहि घरंगये करत सुशाद हित कर। साधन मात कहल उपगार बचनवर । कास्कूदुख होत कथावह कबहन भारलता सदा दानसों प्रीतिना तजूं संपतिराखन । यह रडगाधारितधारि केजेनहि धरत बिकार मन ॥ नकोस वहाँलोक इह में छाय रहोजसही रचना॥७६॥ दोहा। परीन पल्लवत छीन छंद बढ़िचार ॥ सन परपनको बिपति छिन संपत सदांअपार ।। ७७॥ धीरजगणा डाक्यो चहै ताहि ढकज्या न काहू ढाल॥जैसा नीचौशारिख रख रवी निकसत ज्वाल।निस्टहोय फलभारतकजलमरन घरासु॥ त्यासंपति कर सतपुरुषनबै स्वभाव फरास ॥७॥ प्रमपिनदन हिगता मीतबचन धन पूर। निजात परख निदार हन वह सलमेसूर। शशि कमुटु A ९३ नि भफलित करत कमला विकसनभानविनमानमा न॥देत जल त्यों ही सत सुनान॥४१॥ बड़े साद सी होयसो काज करतझुकि झूमि। सूर बीर और सूर यह लेवजातरनभूमि॥३॥ गिरतें गिरपरका मलौ पकरिवी नारियो नाग॥ अगिन होतजलरूप सिंघ डावर पद पावत पहोत सुमेरह सेर सिंह हू स्यारे कहावत ॥पहीपमालसमव्यालहोत बिषहूसमन- म्टता वह नगर समान होत सबभांतिश्ननोपम॥ सब शत्रु आप पायन परत मिबहूकरतप्रसन्नचित्त। जिनके सुपन्यप्राचीनसुमतिनकमंगलमोदनित। ॥४॥दोहा। पवन बान सबनमनसुनिसहत कोन रिकत्याग ॥५॥ छप्पे चाकर इदसबीस नाहिंजोनाहाराखत गजातमोती के लोग कबहूंभाजनाहिंजो-चारवत अपनी निजपा रिवार नाहि बेद प्रसन्नमन ।बिपन हौदानदैनकोमि लत नाहियन। कचुकरन सकत हित मित्रकोरंगराग अरु नित्यगत॥२६बालन सौंबाधिव्यालसकरन उभात ॥सरस होप के तार बज्र को भेद्यौचाहत॥डारि सहत कीनूद समुद्र को पार मिसवत ॥नैसे हो हिलन खलन के मनाहि रिमावत॥ वह नीच अपने पीतजत नहिं ज्यों भुजवात्यों दुष्ट । जनपाय पाय सुनावतरा गहू डसंही में रहतबन॥ छप्प विद्यानर को रूप प्रगट विद्यासुगुमधना विद्यासु ख दिस देन संगविद्या सुबुधजम् ॥ विद्यासदांसहाय) देवता हू विद्या यह ॥ राखन विद्यामानलसन विद्याही सांग्टह ॥ सब भांति सबनसोंप्रति बड़ी विद्यासों ब- झा कहाषत । शिब विस्म हूंबिधा बस करनन्रपतन्या य निधा चहत॥२०॥ साजन सों हितरीतिदया परि जन सो राखहु ।। दुर्जन सोसदि भाव प्रीति संतन मधि माखहु ॥ कपट खेलन सो राखि विनयरारव्यो अधिजनसों ॥ छिपागुरुन सो राखि सुरताबैरागिन सो॥धूना राखिजब तीनसोजोत जगबसिबीचही। प्रति ही केराल कलि कालनाइनबालेनसों सुखसरें। ॥६॥ करत करलतें दान सीसगरुचरननराखत । मुख सों बोलतमांच शुजन सोंजय अभिलाषत चित्त की निर्मल रत्तिएक नम्टतोंशतिही। सेंहीनर धीर काजनित्रै कर मतही। सब दोष रहत औरगनसह ल रेसो कारज मनधरत।नाकोजमर्थ प्रस्टतलहत कोज दुखकोनहिं करत॥२॥ धोरधएको सीसम्म नि करिबोप्रारुम। सेल कमठ और भूमि कमउधार, रयो बिनाश्नम ॥ कम शेशअरुभूमिदारा हिरह्यौदा रि॥ इन सबहिन को मार एकजलै आश्रित कर एक सौ रक बिक्रम अतिक करत बड़ प्रथमुत सकेत। ति निकै चरन समारहित प्रतिबिचित्र राखत सुरत॥ सहा. करत नाहि उपदेश कछु तोऊ करो सतसंग ।। सत पुरुषनकीवात ही देते चितको रंग ॥ ४॥ पुन्य पराक्रम करिलिली रहतमजन के माहि॥मौदा १५ --- बनिताज्यों विनय लांडौचाहननाहि ॥ छप्पै ॥ | मैया लज्जागान की निज माया समजानि तेजबंत दिन कोतजन पाकों तजतमजाल ॥ याकांतज तमना न सत्यबत बारहे नर॥ करत मान कात्याग तजत नहि नेक बचनबर "टेक मापनी राखिरही बद दशरथरा रखा ॥ बल हरचंद टैक यहजसकीभाषा॥ ६॥महामू मि को भार कही कछु साहिबनलागत ॥ निसदिनभ स्कत भानु कही दुख में नहि यागत ॥ हरे रहत नहि सूर कमरहू मारनडारत॥तीनर कैसे धीरबीरप नाया बिसारत ॥ वह लेतभार निज भुजन पर नाहिनि वाहत हित सहित ॥ सतपुरुषन को कलधरमसंचिता करि राख्यो सुचित ॥६॥ दोहा सन्मुख आये शजकोजीत लेहु धनधाम। परि बहूंमस्वर्गसुख होतश्यामको काम। कुंडलिया कामी कबिदोज मिले ओगुन गनहिं समान।भोगड रित मनधरन कबिगुन अर्थबखान ॥ कविगन अर्थब खान बचन कामी हितबोलत ॥ सब बयाक्रमहीन तीने कबि कबिहूं नतोलल ।। ब्रिषईघर पदि सदसैंक बिहमद पद्गामी। दोषरहतकबि लोग भजन भरि पकरतगामी॥६॥ दोहा जल धूजल बरसतअगथपपिहाजालेत जे होगाभागसाहिन तोही देत।। ९०० ॥ . ५
गराउनरंनोभंगन्हायके अतरलगावत ॥ चन्दनचर
वित अंग बसनबहभातिवनाबत। पहररतन की
मोल रतन के भूषन गाजत।यहनहिं शोभादेत नेकबो
लतजोसाजत ॥संबहीसिंगार कासार यह बानीबर
मग प्रस्टतझर। तिनहु सुनते संबनको मन हरत
र रइत नित न्टपति बर।। १०१॥
लेका नीति मेजरी बढ़तही प्रगट होतिहै नीति रजनि
या पर सात करीमतीत ॥ १०२॥ इति श्रीमन्महाराज
पिरान रानराजे भोसचाईमातापसिंहजीदेवबिराचित
बोनमंजरी सम्पूर्णम
REDEEM
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भरतरी, श्रीगणेशायनमः अथसिंगारमंजरीलिख्यते छप्पै चन्द्रकला पयकान्ति याति वहुभांतिनसावत जास्वों काम पतंग विनु भयो जुपरसत ॥ महा मोह भज्ञान हृदय को तिमिर नसाक्त ॥ अपनो आतमरूपमा गट करि ताहि दिखावत ॥ दुनि दिपतअखंडित एकर सभडत अतुलित एक वर । जगमगतसंतचितसा दन में ज्ञानं दीपजय जयत हर॥९॥ दोहा शुभ कर्मन के उहद मेंग्नहत पचित सब ठौर। अस्त भये तीनों नहीं ज्यों मुकता बिनुडोर। दीपक गविर विवेकज्योंतोलोयाघटमाहि तोलों नारिकटाक्षपटजबलों लागतनाहि पीन लंक प्रतिपातकुचलिय तियकेहगतीर जेशधार नहिं करतमतिधनि र बहुधीर ॥४॥ छप्पे करतजोग अभ्यासाप मन बसकरि राख्यो। प्रेमन म सों प्रीति प्रघट जिनयेसुखचाख्यो । तिनकोति न के संग कहा मुख बामनबहै । कहाअधर मध्यान कहालोचन बिहै। मुखकमलस्वाससोगंध कहा कठिन को परसि। परमन चाहजहाजोगीमनएकरल १८ कंडलिया पंडितजन तंपतष कहत तिय तिवहको वात ।। केकर नब्रथा बकबाद वह तजीनेकनहिंजांत ॥ तजीनेक नहिं जात गात कवि फरक बरन ॥ कमल पत्र समनै न बचन बोलत अटतहर। साहस मुखम्सदुहासअंग आभूषनमुदित ॥ऐसी नियकों कोतजैकेयों ऐसीपेंडि दोहा. मदगजकुंभहिसिंह सिरकरतशसपरिहार मदनराजजीतेजिन्हैइसी पुरुषनहीं संसार रसत्याही रेशराजतेबाएअनूप ॥ बालनिचलनचिनौल में बनिधनरूप॥ नपरकिंकना किंकलाबोलत अटतबैन। कागामनवसकरजनहीं म्ठगनेनीकेनन तीनलोकतिकालमें महामनोहरनार ॥ दुखहू की दाता यहै देखासोच विचार ॥ १०॥ शामिन कसकतसहन में मूरख मानवप्यार। सहजप्रफुल्लित कमुदनीभेवराजधगवार॥ १९॥ अस्तु कामको कामिनी जो नहिं होतो हाथ। नो काह सिरन नबावतो तपकर होतसनाथ ॥१२॥ बनाम्टगोन के देनको हरेन्टरणलेह॥ अथवा पीर पान को बाराबंधन लेह ॥ जद्यपि नारि सनीतिजबतीजनकोसंग ।। नमपन्यते यापये महा मनोहर अंग ॥१४॥ नीत बचन सुबचनपतिजकाजलखि भद। कोसेवागिरवरनके कामिन मुच सेव।। memornp
।
छप्पे
करि कारेवाकेनैनकहानहमहि निहारनि । करदस्था
हीबंदबांधिधनबसनसंवारत । हम बनवासी लोग
बालापनखोयोबनमें॥तजीजगत कीनासकामनारही।
न मनमें ॥ टरण समान जानतजगत मोहजालतोसे
तमकि । भानन्द भारइत पापहमरहे ज्ञान की छाका
छति ॥ १८॥ दमा सिंधुअंगाध को कोऊन पावतपा
र ॥ कामिन जोवन हीन पर प्यारनछोड़त जार ॥२६
घटाचदी सिरमोरगिरहरी भई भूमिसब। बिरही हग
डोरे कहादेखिरसो जियधूम ॥२९॥ (छपै)
प्रलप सार संसार कहाबै बात शिरोमन ॥ ज्ञान भटके
सिंधु मगन के रहे बुद्धि वन । नित्या नित्य बिचार
सहत सब साधनसाधे.॥ कै यह नौदाढार धारिउरमें
आराधे । चेतन मदन अंकुस परमिसक तक कसका
न करत रिसा रस मस्तक कविलसत हसत इन्द्रागि
धिवत बहु दिवस नित॥२९॥ पीनलेक कुचपीननैन
कज सेराजत॥ भौहें बनीकमानचन्द्रसोमखाधित
छाजता मद गयंद सीचालचलतचितचोरत गएकी
नारि निहारि हातपंडित जनजोरत । अविही मलीन
सबौरमति चितगति भरी अनेक छलताको सुमान
प्यारी कहतमहोमोहमहिमा प्रबल २२॥ कबहुं भो
हको भंग कबहेलीलारसबरसत॥ कबहुं ससकन
संक कबहुंजीला रस बरसत में कबहुं किया।
स कबहुं हितबचनउचारत॥ कबहुं हिलोरन
र चपलबह वारनिहारन । छिन चरिचसबिचित्रक
.
रि कमल निमद मदन अंकुश छवि छाजत ॥ ऐसी निपति रूप लख हरषतरहिये दिवसानिश॥ २३ ॥ (छप्प करत चन्द्र बि मंदन संदन अंकशबि छाजता कम लन बिहसतरैननैन दिन प्रफलित राजत । करांट कनकतिहीन अंगमामांगति उमगति ॥ अलकनी जीते मोर कंचन कर कुम्भ किराहत ॥ददुता शरी रमारे सुमन मुखसुरखा सम्ठगमद कदन रेसी भूपतिरूप लखि धूपछाह नहिं गिनत मन ॥२४॥ करत चतुरता मोहन पन हौन चत चितौयो । प्रगट सचित को चाबचोपसे म्हदुससकेखो ॥ दुरनमुरत सकुचात गात परसातजपलागत। उहकत इतन दखिचलत बैटन बिछाजत ॥ यह सामूषन नियन के अंगअंग शोभाधरन ।अरु रोही सस्वसमान है जब जनमनाम्टगबध करन॥ २५ ॥ सोरठा नहीं विष नाही अम्टनहूँ एक तियजोजाना मिलने स्त नदी बिछुरे विषकी खान॥२६॥ विहसत बरसता ल से दरसत पोष अलीक । परसतही मतगतहरतः नी अतिरमनीक ॥ २७॥ सुधि पारा सुप बुधरहरदर संत करत अचेत । परसत मनमोहन करत यहप्यो रीके हेत ॥ २९॥ (छप्प) परम भरम को भोर सबढ़ गढ़ अनु बिमत्त को सिन्ध कोसहै. दोसभरखको । अगर कपट को कोट खेत मप्र नीत करन को । सुर पर को बदमारनपुरद्वारनरका को महा ॥ अम्रत बिस सोमरयौं घिरचर किनरसरण सुर सबकेग्नबंधन करें।२६॥ इन्द्री रमले जाय बिनय जोलों सुमसुत कर्म बलों नारीनयनसरभो दत नाहीमर्म५.३०॥ अधर गधर मधु सहित मुख हतो सबनसिरमोर॥ अब बिगरे फलनज्यों भया भोरसों भोर ॥३१॥ (छप्पै) तो प्रसार संसार जान संतोषनतजते ॥ भरि भारकम रे भूप कोभूलिन भजते॥ बुधि बिबेक निदान माना अपनो नहिं देने॥ हकम बिरानोलाखि लारा संपति महि लेते ॥जो यह नहिं होती शशिमुखीम्टगनेनी कहरी कटि ॥ बिछटीछुटाकैसीटारसछपटींक रीलदी॥ ३२॥ म्टगनैनी के हाथ अर्गजाचन्दन लावत ॥ छुटत फहारेदेख पहुप सिंज्या बिरमावत । चौहचांदनी मंद मंदमारत कौवी। बतधोनस गगायन को गैवो। चांदनीउजरेमहल की निरखना. चितगत हितटरत । पुरुषन कोग्नीषम विवभ भैराम दूनहि बिसनरत॥३३॥ सब गंधन के ज्ञान अरुनी, तबान नर॥ तिनमेंकोज कहीमुक्ति मारग मेंतत्पर ॥ सबको देत बहाय कनपनी नारी जाकीवाकी मो. हत चहत अतिहीभानपरी। यह कूचीनरकरार के खोलनको उहकत फिरत में जिनके नलगत हगन में निनब सागरको निरत ॥३४॥ रबली तरल तरंगलसत कुचचक वाकस्ता प्रा लिन पान कजारि यहनदी मनोरम ।। महाभयानक चाल चलत नब सागर सन्मुख। हा न धरत प्रासनात जिनको अपनी रुख ॥ संसारसिं घुचारत निस्यो नौल्यासों दूरिरहः॥ जाको प्रभाव अति ही प्रवल लेक म्हातही जात वह ॥ २५॥ कान निरंत गान तानसनबाही चाहते ।लोचन चाहत रूपरेन दिन रहतसराहत । नासा प्रतरच हत सुगंध फ्लनली माला ॥तुलासहत सुखसेज संगकामातन बाला ॥ रसनाह चाहतरहनानितषा हे मोठे चरपरे ॥ इनन्दिन मिलियो प्रपंच सामूपन कॉमिक्षुक करै । ३६५ रसोरठा जोनहिं होती नारि तो तिरबोजगमैं सुगम ।। यह लंबी तरवारि सारिलेत-प्रधनीची कुंडलिया. गरे मन मेरे पधिक ननजाह दुहबार पतरुनीत न बनसचन में कच परबत नरजोर । कुन्त परबतबर जोर चोर एक तहाँ बसत है। जे कीजवा मगजाहि वाहि को वह नसत है. ॥ लूटि लेल सब माल पकार कर राखतचरे । दिलयन ओरकान चस्यातू कित कूपरे॥३॥ यहजोबन धन पाय सदासोचत सिंगा. रतर ॥कीड़ा रसको सोतचनुरता देतरतलकर नारी नयन चोर चोपको चंदा विराजत । करमायुध के धाम सिंह शोभा को भाजतः। ऐसा यह जोबनण यु के जे नाहिंधन विहार मन बहु धरम पर धीर मनसूर सिरोमणिसंत जन॥ ३६॥ कहां देखिवजोग प्रिया कोन्नति प्रसंग सुख ॥क हा सुधि ऐसोधि स्वाससौगदहरता दुख। कहा दी जियेकान प्राणप्यारी की बातन । कहालीजियो स्वाद अधर के अम्टतं मयातन । परस एकहित प को सुनत ध्यान कहाजी बनसुबि । सबभांतिस तोगुनको सदन नातसुजस गावात सुकवि ॥ ४९॥ जात हीन कुल हीन अधकुडत करूपनर ॥जरा नग्नस्तकसगांत गलात कष्टी और पावर॥ ऐसधन वान होयजो सादरवाको ॥ अपनो गात बिछाय देत रस कसजो जाडो॥ गानका निबेक कीबेल को कदन करन वारी निरख । बधिरहे बड़ेकल बंत नरपंचतरचत मूरख ॥ ४२॥ दोहा रानको केम्टदुवाठिको कुलीन चवनकरे नद बर बिर ठगोठ पीक है पावसबनको गनिका के तनिका भगिनरूपसमुंद्रमजबूत होम करत कासी पुरुषतनमनधन आहूत दोहा रितु बसंत कोकिल कहाकिन्यौही पवन अनूप बिरह विपति के भरत अम्टत विषरूप॥ ४५ ॥ कुंडलिया कामिनि सुप्रा कामका सकल अर्थ को देत। मूरख वाकोजित हैंठे फल के देत ठेफल २४ ॥ कि देत ननत निनकी को दाडे ॥ गदि मूड़े मूढवसन बिनु करि कार छोड़े। भगवां करिके भेरवजटिलके जागतजामिन । भीख मागिके बात कहतहमछोड़ी कामिन ॥४॥ .... (दोहा) काम केरि भव सिंधु में फांसी डारी नारि ॥मनी नरन की गह पचन प्रेमनगिनको वार ॥ ४ गम्टग नैनी हंसिरहसहित बचन सुखदेत॥ करत को उदित अतिकछु अद्भुतहरलेत ॥५०॥ केसरि सों अगियों सनी नयन कीनांक मिली प्रान प्यारी मनौ घर आयो सुरलोक ॥ ५॥ कुंडलिया केसरि चरिचित पानकुटर काठमुक्ताहार ॥नूपर हुनकत मचत हगलचकत कटिसफमार॥लचक त कटि सुकमार छुटीभलकें बिछलकें उड़कतई तउत देखजुरतउचरत सीपलकें लसत हंसतसी भोह फसतचित निरखत बेसर।अद्भुततुलित अंग रंगसी नाहिन कैसर॥ ५॥ सरुन अधर कुच कठिन हगभौह चपलदुखदेत। बुधिर रूपएमावली तापकरत किह हेत॥५३॥मनमें कछु बातन कछु नैनन में कबुऔर ॥ चितकींगति और ही यह प्यारीकेहि हेतु ॥५४ बिनदेखेमनहोत याहिनी के करि देखे ॥देखते मन होत अंग प्रालिंगन पेखे॥ आलिंगिनते होत याहितनमय दोहा चहत कहा ना भरतरी कर राखे । जैसेजल और दूध एक रसत्या अभिल मिलि रहें. तोऊ मिलियौ या विरह को । बरनो नजात शुद्धत चरिख प्रेम पाट की गिरह को॥ ५८ ॥ खुले केमा चहं और फैल फूलन कोबरसत ॥मद काके नैनजरतउधर न से दरसत ॥ सुरगद के खेलकलिनसुन्दरक पालगह ॥ करत अधर रसपान परमप्रातसमा न लहि ॥ वह धन धन सुकती परुषजा ऐसे उद्वैत रहतः ।। हितभरे रूपज़बना भरे द्वैपात सुरम संगत जैहै नहिं जो पर्थिक तूभादों में निज भान तालिया जियत न पाइये करि जैहै निजगोन । करिहैनि जगौन पारपरबाई आयें। मोरनको सुनिसोर पोर घनके घहराये॥देखतं फलफूल फूल फूलहलहर हो । चपला चमकत चाह माह करकारमाने ॥ दोहा । गेहर कहाँ होती है जो वह जीवन नाहि जीवत है तोजकह घराचंदी ना माहि ॥६॥ जो न होत सुख परस पर बिहरततुरंत समाजाती वह दोऊ करत हैं काम निवाहन काजः ॥ ६२॥छम नाना कहिगन प्रगट करत शमिलाखत जतास थल होय घरधीर प्रेमकी इच्छा करि उजानिय रसकोलेत सेंजरनरोतहिं नाही. जीडामाहि प्रवीन नारि सुखिया मन माहीं ।। मह सुरत माई अति ही सुग रिति करतहरत चितगात हेरे । कलब, कामनी केलिके कल काम की सबटरें। -24 २६ दोहा ।जौलो नारी नयन लिंगतोलोम्टतवेल॥ दरभयेनेजर समलगत विरह की सेल॥ ६॥को मिन हुकमी कामयह चैन सैन अंगठान पतीन्यौलोक जोत्यो मदन ताहि करत निजहान ५६५॥ मंत्र दवाओ बधीन ते बैदनामिटेनबेदः ॥कामकानसम्टदमन किसे मिटि है खेद । ६६॥ दीप भगिन मन्य चंप्रमान गमगज्योति सुदार ॥ म्टगनैनी कामिन बिना लगत सबै अंधियार ॥ चन्द्र कान्तिसममुखलसत नीलम के सहिपास पुण्प राग संभ करल सो नारीरत्वमा काश॥ ६॥ भो है काली कुटिलति है नागिनी समान॥ कसतलसत ऐसी मनो फन करदरित पान (छ) केश राह समजानचंदसोसाहत भानन ॥ दश में है. और नैन के तेहि मल कानन ॥ मैद हांस हैशक बुद्धि वानी करजानो।सुरगुर जानोराज करनमंगलाहिं बयानो। अतिमंद चाल सोहमंदगति महामनोहर जुबति यह ॥ सबही फलदायक देखियतजाको सेवतनी गिरह॥७॥ प्रति प्रगत कमनेत तिय करमें बानन लेत देखो यह विपरीत गति गनते बेदत चेत॥७९॥ छौ । अनुरागी जगमाहिएक संकरसरसाने। पावतीअरु पूरी हुन नस दिनलपटाने बीत गगहा भये एक कोरिषेब देव बर ॥ तजोतियन को संगसदांतपसी में ततपर जड़जीब और या जगत के मदन महा सग के उगे॥ नहिं बिषम मोग नाहिं जोगहू गाहीजे दोह्म maya - लत डगमगे।७२५ मंत्र वा प्रोमधीनतंतजत सर्व विषलाग॥ यह क्यों हूं उजरत नहीं नारनयन को नाग ५.७३॥ बिछरनही में मिलनहोजो मन माहिस निह । विना नेह के मिलन में उपजत बिरह अलेह ।। नारी नागिन नैनतेडसत दुरते मित्र ॥जनन करतज्यों ज्यों बढ़त बहु बिष प्रतिही विचित्र ॥७६ ॥ क्यों रेगि तचर पंदी शभा संपति पाय ॥ पुन्य पात्रकोपरसिके करै यौन मन लाय ॥७॥ बिरही जनमन तप करें वन-वला सोरे । धिगहू पंचमटेरिये बरिये कियबारे भौरहे मन नाय उदेपाडल के महकतः ॥ फूलन लगेप लास दसो दिशं दोषहु देहक ॥ मलियागिर सी पवन हु कामभगन प्रफलत करन। बिनकंतबसंत प्रसतज्या चोरिरहो कहि नहिंटरत्॥७॥ दोहा दमकति दामिन मेघइतकेतक पहप प्रकाश । मोर सोर सादिनन में बिरही जनमनास ॥७॥ नवतर नी रति चतुर बिजयकामको देनय प्रत करत बि लास पहा कछुआत हरलेत ॥४०॥ कोकिल फल को सीलता चैत चाँदनों रैन । प्रियासहत निजमहल में सुकतींकरत सुचैन ॥४९॥ शशि बदनी शरुकामणि चन्दन पहप सुगंध ए रसिकनके मन रतनकेचि त बन्द ॥२॥ महानथम नम जल दामिनटमकतड गत प.हर्ष-शोक दोज करत तियाकोप विंगत। संजत राख केशन पनहूंकामन-चारी ।। मुखडूमाहिय HTTA चित्ररहत दान सवारी॥ऊपर मक्ताहार रहत निसदि न छब कागः॥ आनन-चन्द उदासरूपउज्जल सर पायो । तेरे तन तरुनी टदुल अति चलत पाल धीर नासहित ॥ सब भानि सती गण को सदन नऊ करत अनुराग रित ॥ ४॥ (दोहा) तनहीलोमन मानियेनबहीनों सनमानियतनहीलों भूमंग ॥ बोलो चन्दन सो मिलो पवन परसत अंग। भान पयोधर को चलतअंगठ करत है बाम ।। पादसा तय्यारी निरखि होत तमामः॥ नव नादर मरुजीवहर इंतज कदंषसुगंदा पार और रमनीक बनावको सु गिद ॥ ८॥ महामाह में सीत इन पेजल भर बरसत में हलन बाहर पाव परब नहीं प्रतिही यरसव कमहोत जनगातिलबहीप्यारीतबही प्यारी संग सोवत।। उता अनंगरंग अंगमें अंगसमोवतः॥ रिबिवेदिः के छेदन करत जालरिन्धमावत पवन ॥ इहि भांति दि नाव दूर दिसा बनजसुकीत सुख के भदनः ॥ ८॥ (छप्पे) लाके मदन के के छाक मदराके छाके ॥ करतसुरत रिनारंगजंग करि क एक प्याकें । पोडरहेलिपटा य अंग अंगन में उर है। बहुत लगी जब प्यार तब ही चित चाहत सुर है। उड़ पियत रात आधीगयेसी निलजल यासरदको । नर सन्य बत फललेत निजात किती फरदको॥८६॥ दोहा। जिनके पासत मेंति यान तनालिपराय तिनकाल मनके सदनकी लागत Mw.04. सोरा दहीपष्टत पान बसन मजीठहिरंगके । आलिंगन रति दान केसर चीरच हिमत में॥ १९॥ बिलकुलक र सुकेसन पनहीं छिनमुदितः। असन नाचेलेत दोहरोमांचनरूंचतः।। करत हृदयको कपकरतु मुखहू सोसीसी पीड़ा करत है बीस वापराह नारिनारिसरासी) यह सीतकालिजानिये अद्भुत गत भारत पवन पनि नदोसरे दरही निजारा संगनिजभवन॥३२॥ चक्न करत कपोलमुखसहिकार करावत ॥ हृदय माहि पनि जात नारोगबदावत ॥जयन को यहत क्सन हादरी करत सिमलनीरत है संगद्वार को कहा कर घड़िका ॥ यह सिसर पवन बारूप धरि गलिना गलिन भटकत फिरता मिलिरहेनारिनरपरन में याकी मद मेरन भरता॥ दोहा. मोजाके मन भावतोताको मासों काम ॥ कमलनाचा हत चांदनी जिगसत परसतमान॥२४॥ बासकीजि ये गंगतर पाय निकारतडारकै कागिनकुचजुगल को सेवन करत बिचार ॥ कंडलिया जैसे सुख दुखरहत हैं गर अत्या में ध्यान त्यागकि ये संसार को ब्रजनिधिभक्ति अनान॥ वृज निधि भक्ति अन्यनगफाहेमाचलसबै। कुचकठोर नारवहे जीव लनावितवे ॥ नपकार जीवन छीन किये सुखही मेंह वह ॥ दोहा॥ पहा मारपणावपवन चंदन चंद सुहारिंग ३० म्टगनैनी कामिन बिना लगत सबै धियारा॥ धरन में अम्टत बसै कचकठोरताबास ॥ नाते इन को नेलरसउनको मरदन कास॥ ६॥जैसेरोगी पे त्य को पापोजानत नाहि ॥ तैसी ही तिय मखनिरखि रुचि मानत मनमाहि॥ ९९०॥ महामात इहि प्रेम को तबंतिय करत उदोत॥ तब बाके छलबल निरखि विधि ह का घर होत ॥१०९॥ काकाह के बैरागरुचि काहू कू रुचि नीति ॥ काहू कोसिंगार जुदीश्यहरीति॥१०॥ इनिश्श्रीमहाभारतधिराज राज राजेन्द्र श्रीसवाई मतापसि ही देव बिरचित सिंगादे मंजरी सम्पूरण ५ शुभम् । ANIMa Kalee : JHAR
श्रीगणेशायनमः
अथ बैराज्ञमंजरीलि
ख्यते
सोरता
सर्व दिशा सबकाल पूरिरको चेतन्यधन सदाएक
रसचाल वैदनवापार ब्रह्मक ॥९॥ छपै। पंडित में
हरिताभरे सूर्खभरे अभिमान॥और जीवयोजगत
के मूरख महाअजान ।मूरख महा अजानदेखिके संकर
सहिये। छन्दं प्रावध कविता काव्य साका सोकहिये
सद्धि भई मन माहि मधुर बानी गुन मंडित अपने
मनको मारि मौनगहि बैठे पंडित ॥ २॥ या जगरोज
त्पन्न भजेजे चरन मनोहर नेसबही दिन भंग प्रगम
यह पूरिसोडरिजिज्ञादिकतं स्वर्ग गयतकमयमा
जन ॥ इन्द्र शादिसबबश्नबधि अपनी कोजानत
फलभोगकरतजे पुन्य को निमको रोग वियोग मम॥
दुखसकल सुखदेखि कोमय संततिजनजानभयं ।।
सहिगार और रखीज़ हात हारतधरि भायौ । हर
स्वानज्यों पारिधरखायो।इहभनिनवारे मोहितवर
कायो।देलोभाभल ॥ अजनताहि साप कहत्ता
तु पाथन प्रवल ॥ ॥४॥ खोदतडोल्यो भूमि गंदी कहाँ
पावंति संपति चोकतरो पखान कनक लोभ
लगीमति। गयो सिंधु के पास तहाँ मुक्ता नहिं पापी। कोड़ी कर नहीं लगीन्टपतकोसीस नवायो।साथैत्र योगसमसान में बेतालभजि । अजहन नोहि शंतोष कह अबतो रसमा मोहताज ॥५॥ रहे खलनके बैनाइते पैमनहिं रिझायो निननको जलरोकि सुमन मुखमुस्क्यायो। तनहीं कल चित तज करजोरि दिखाये। कार चाबले पर भोरही दो न आयो। मन आस पासोरी प्रवल तू भगतमाति गहत । इहिभानि नचायो मोहि अब और कहाकियो वहतः ॥ ६॥ उदै अस्तरविहान भागको छानकरतान न ॥ मह अंधे के माहिसमय बीतन अजान चित। सो देखन जन्मजरा रुमरण विपत्तिहालाऊडरत नहिं नैक नहू नायक करगहू ॥ जगजीव मोहमद ए पिये छाके फिरत प्रशाद में। सब गिरत फिर गिरत विषयवासनास्वाद में ॥ ७॥ फाटपौ पुराना वीर ताहि खेचत और भारत शेटे मोटे बाल भूख ही भूख पुकारतः। घरमाही नहिं आनाना हिं यदिदा यान ।। मई महाजरूप कळू मरकड़त न बातें ॥ यहादशादेखि भारवरत चित जीचे लरथररु कत मुरत। आप नजर पान दहित देह कहतक पुरुषन ॥ भागी भोग की दाह गयो गौरव गमानस ब। मिव गयेसरलोक अकेले आपरहेनापरहेनब। उदनलाकरीटेकालमिरभावन में छायोंगखबरसुनतनाहि राज चकित होतमाखीसुनतः। देखो विचित्रगति जगत की दुखह को सुखसोलनत॥६॥ - Papaper . ३३ भरतरी विन उद्यम बिन पाय पवन सर्पन को दीनौ । नेसे ही सब औरया सपसक्नकोकीनों ।। जिनकी निर्मल बुद्धि निरम भषसागर समय ॥ निनके दूवर रातिहरन गुन जान अंघ मत ।। बिधि बिधि करतभधिका निगालें नर पर पर फिरत निसबीस पचतनन मन तचनलचतरचत रहित गिरत॥१०॥ विधिसो पूजनाहि पाय प्रभुके सुखकारी। प्रभु को धरौनध्यान सकलमब दुखको हारी। खोलेस्वर्ग कपाट धमाहू कियोनऐसो । कामिनकचके संगरंग। भररसो नसौ॥ हरिहायकीत्यौ कहापाप पदारण नर जनन ॥ जननीजोचन दहन कोअगित रूपमा र सुहम ॥ १९॥ भोग रहे भरि प्रायपहभुगतगई संब। नप्योना हि तब मुंद अवस्था बीतगई सब कालनकितही जात बैस यहचलीजात निता रद्धि भईनही भास बुद्धि व्यय मई छांह हित ॥ अजहों अचेतचितचना करि देह गैह सों नेहतजि । सहरन मंगलकर न श्रीहरि के चरन भजि॥ १२ ॥ छिमा बिन कीनाछिमा बिन संतोष नजे सुखासहे। सीतधुत बिना धर्मतपेपायमहा दुखाचो बिष यका ध्यान चन्द्रसेबरना धायौ। नज्योसकलसं सार प्पार जब उन बिसरायो। मनकरतकाजसोहीका रेल दीखत विपरीतिश्रुति।अबताकहाचिन्ता किया जहोंकरि रिचरनरति॥१३॥खेदवार विनदसन बित बदनसज्योज्यो रूप ॥गांत सबै मिथलत भयो वोतमा
बोढ़तच
३४
हरण सवरूप ॥१४॥ इक अंबर के ट्रकको बिस में
सूप्यै
जिले वारे भोग कहा जो बह विधि लिलाना सदासर्वस
सिंगारहन नहियों ह मिलसे। तीनो तजिही नाहि आप
कि यह उठा है। तब होइहै संताप अधिकचिन्ताह
है ॥ जातजे पाप यहविषय सुख तासुख होत अनंत
अति दुस्तर अपार भवसिंधु के पार होत यह हिमाल
सति ॥ १६॥ दुवरो कारण हीन श्रवणाविन पूछनवायो
बहोषिकल बिकल शरीरबार बिन कार लगातो फल
सासतें राधि रुधिरकममारतडारन । सुरीछीन प्रति
दीन गर्गना कंठ किलोलता यह देसस्वान पाई ईनऊ
कतिया सों उरस्त गिरत ॥ देखभनीत यामदन की
म्टतकन को मारनफिरत ॥२७॥ भीष अंत कवारलों
नाबिन खायरहत हो । फाटी गूदार ब्रह्मकी छोड्गह
नहो गधासपात करडार सूमि नित प्रति सोवताए
ख्यौतन परिबार ताकोयहडोवता॥ इह भौति रहतचा
हतन का तऊ विषय बाधा करत ॥ हरि हाय हाय
तेरी सरन प्राय परोइनों डरतः ॥ १८॥ कुच अमिय
की गाडि कनकके कलस कहत कति । मुखर कष्ट
कोधाम कहन शशि के समानवि भरत सूची
रधान अरी दुर्गध और सब ॥नाको चंपक बेलिक
हत रस रल डेलदेव ॥ यह नार निहार मिदिन सबै
उह के विषईबाबरे। बाके बदायको विरदयो
ले बहनतावरे।
३५ जानत नाहि पनंग भवन को तजभई । गिरतरूप को देख जरत अपने अबिबेकन ॥ जैसे ही यह मा. न मास को लोभ लुभायो । कटक जानन नाहिन्या यवहह छिदायो । हमजानि चूहि संकट सहत छोड़ि सकत नहिं जगत सुख॥ यह महा मोहमह मा अंचल देत दुहन को दोष हुरवः ॥२०॥ दोहा धूमि समन बल कल बसुन फल भोजन पाठ पान । बमेरे इन न्टयति सरलौ नाहि कलु काम ॥ २९॥ छप्पे भये जगत में धनिधार जिनजगतरच्यौ है । कोज माणे माहि सुतौ नहिं नैंकलच्यो है ॥काह दीन्यो दान जीत काहबमकीन्याभवन चतुर्दश भोगक कस्बौ कहा जसलीनो । एक अधिक भरोतुम ही तिन में तुछाबितः। दसबीसमगरके न्टपतिन्दै यहाँ मद पीज्वर तोहि कित॥ २२॥ तुम प्रथ्वी पतिभूप भरे अभिमान बिराजतहमश य गुरुन के गेह बुद्धि ताके बल गाजत । नमधनों विख्यात सुकवि गावतकेंपावत। दमजससों दि ख्यात रहत निस यौसषदावत । महमबीच अंत र बडो देखो सोच विन्दारचित॥ ऐते पर जो मुखफे रिहो तौ हमको एकात हित ॥ २३॥ छिनहींछाडी नाहि भोग भुगती वह भूपनाकलदासी यह भूमिलाभमानत सहीपमना साहूकई के अंगा हि पावत। गारखत है कष्ट रैन दिन रेहत बन
वत॥ अपनी और कीहाथ वहयाते नर पचिपचिरहे।
दृढज्ञानगोपीचन्दसेबुराजान के बाचिरहे॥२४॥
इक स्टनिका को पिड रहत जल मांहि निरंतर साज
सबही नाहिन तकलीला में हड़करत हजारनभूपजण
नब करत मोगपित ॥ मिटतन अपनी प्यासानको
होत कहाचिन ॥ ऐसे हिडसरपके भरे तिनहूसों
जो चहलधन ॥धन जन्म मन्स अधम को सदासर्वदा
मलनसन ॥ २५॥ दोहा॥ नटभर बिट गायकतही
नहीं वादिन के पार ॥ कौन भनिन्रए हम मिलता
भी हो हम नाहि॥ २६॥ सेसेजयमभये मुडभाल
शिबकीन। धीन लीनीनर नुवनलगि तुमकोमज्वर
लीनः ॥ २७॥ भीरबन्धसन और गवसन फलभोजन
तरुधाम।। अब मेरे इनन्दपन रहयौनाको काम।
तुमभबनीके ईसईसहमहोबानी के तुमहारनमें
रनमें धीर बीरगाहे भतिजीके । न्याही विचाबाद
करत हमहें नहिं हारे । प्रलपछिको मन मारापः
मा बिस्तारे । धन लोभी नर सबै तुम्हें हमकोसिखा
सोता। भलै लमको नहमारी चाहता हमहूयहासे
उठिचलें ॥२६॥ जनहीं समझौनेक नबही सर्वज्ञ
भयौ है ।जैसे गज मदमत्त अवता छाडगयो है।
तबसते संगत पायकबुकासमन लाग्योति
दही भयो है मूडयार्म गुनकोसब भाग्यो।ज्वरचा
दिनाभनिता पूजो उत्तरत मीनल होततन । त्याही
मनकोम उत्तरलियो शील संतोषमन॥ ३०॥
नूहोरीकनयों नहींकहा रिमापा और ममेरेही या नन्दनें बिता बन सब और॥ १२॥ जैसे चंचल चंचला याही चंचल भोगलेसही मा हपाप है ज्योधन पवन प्रयोग ज्योधन भवन प्रयोगनरलसोहीजवान तन विससतलगतधार गति ह जात भोसकन देख्यो दसह दुक्ल दैहन धारन के ऐले। साधत संत समाधव्याधि से छूटने जैसे॥ ३३ ॥ पंकज पत्र पर मंचल दुरिज्यत न्याही नंचल मानहू तजिहै निजगात निजे दलिजगात बात यह मोकोजानताजनांडिवि बिकन्टपन की सेबाडानल निजगुन करलकमा न निर्जलता उभरी ऐसे॥ भूलिगयौनिजज्ञान न्या संसारी तसे ॥ ३४ ॥ न्टपनि सैन संपति सचिब सनललिव परिबार। करत सवन को स्वप्न समनभी काल करतार ॥ ओजनमें हमसंग सुतौ सबस्वर्ग सिधारे ॥ खेले हमसार काल दिनहरुमारे। हमहूंजर २.. देह निकर ही दीसत मारो । जैसेसरता तार- स को तुरत उखरिदो। अजई नछाडन मन उमा गि उरमो रहात ॥ ऐसेनचे के संग में माया जगत को दुख सहत॥ ३६॥ सर्प सुमनको हार ग्नबैरी उग्गबैरी औरसाजन ॥ कंचन मणि और लोह कसमज्यों अह पाहन ॥ ऐसीवरुणीनारि- -- दोहा ब्रम्ह ध्यानधार गंगा तर दिगो गौतमजिसंग॥कब हु वह दिन होयगो हिरन खजावत अंग॥ ३८॥ जग के सुखसो दुखित है सरह ढरहे नैन।कबर दिहों तटगंगके शिब शिब भारत बैन ॥ ३६॥ ईशं शीश ताजे स्वर्ग तजि गिरवर तज उतंग। वनी तजिजलदहि मिली परदसौं पर मुखगंग पर चप्पे नदीरूपयह भास मनोरम पूरिरह्योजल परमान रल तरंग रोग हैम्बाहमहावल नानातिनषि इंग संगतरुतोरत । भूमरम्यान मोहसबन को गहि गहि घोरत ॥ नित बहुत रहताचित भूचि ना तर अतिही विकट । कालि गये शरनोगीपुर ष जिन पाणसुख तर निकरं। ४१५ ऐसौ पायंसारमें सुन्यौनदेख्यो धीर। विषीया हथनी संगलग्यो मन गजवाप धीर। कुंडलिया। छोटे दिन लागत निनै जिनके वहवि पभोग तजात बिलसत रहत करत सुरत संजोग करतसुन्न सेजोगतनक से जिनकी लागत है। सबगदानातिन्हे दीरराझेदागताह मएम्टम नंगमाहीत मोटे सदा एकरसुद्यौस लगत हैं बड़े नछोटे। विद्यारहतकलंकताहिचित में नहिंधारोग धन उपायोनाहि सदांसंगीसुखकारी ।। मात पिता की सेब मुश्रुतपानेक नफीनी गटगनैनी नब नारि अंकमरि कंबहुनलीनी । यही बितीत कीनासमय वाकत डोल्मो काकनों । ले भज्योटेक पर हाततें चचचोर चालाक ज्यो॥४४॥ बीतगयो। सर बरखत तरुणाकरुणा छाई हिय॥ बिनासार संसार अंत परिणाम जान जिय ॥ प्राति पवित्र और राध सरई के चन्द सहत लिसा करि हातहाविती न प्रीतिसा. हर्षिरसौं दिस ॥ सब विष त्याग बैरग धार गंगाधर हरर कहत ॥ ४॥ छपणे तम धन से संतुष्ट तहमरक्ष बकलते। दोभा येसैभान नैन मुख अंगसकलतें । जान्यौं जातदोरेन्द्र बहलटरमा है जिनके। जिनके रक्ष्या नादि बहुत संपति है जिनके ॥ तुमहीं विचारदेखो दृगन को निरधन धनबंन जुन पापको कोस त अरुसंतको॥ ४६॥ दोहा॥ सत संगत सुधरना बिनाक्रपणता भन्छु । कहा जानों किहतपकियों यह फल होत प्रतिच्छ । M छ भोजन कोकरि पबदसों दिसाबसनवनाये॥ भये भीख को सेन पलंग एपी परछाये।ांडिसबन को सा अकेले रइतरैन दिसा निजमात्मा सोलीनपीन संतोष छिनालिन। सन्यास धन कियकर्म निर्मूलनि न ॥ ५॥ दोहा । टपसेवा में तुच्छ फलडरीकाल की व्याधि अपनी हितचाहतंकियों मूतोतपमाराथ istोरगा विमन के घरजायभावमागियो है ४० " भलो। बंधुनके सिरताज भोजनइ करिवीबुरो ॥५॥ रूप्ये अगर करत दुखदोष विषमरे विभय भोगसुखाइन सों परसों परसुरले ही सबहीसनमुख ॥ ऐरे चित्तच लाक चालतेरे तू तजिरे। दैडिज्ञानकी गौरख सुम निपटरानी सजिरे । छिनसंगजातकीचोर तूजिन एका मोहिमच ॥ संतोष सत्य अभ्यासहित सगरम साधनसव ॥५५॥ दोहा॥बकल वसन फल मसन कार ही बनविश्राम ॥ जित अविवेकी नरब को सुनियत नाही नाम ॥५६॥ इये मोह मोहिमनमीतभीतिसों चन्द्रचूड़भजि सरसा रिता के तीर धीर धारे तुभासन सजि । समदम जोग बिरोगत्यागन कोअनुसारे॥ रथावकै धक बाद स्वाद सबही त् परिहार। शिर नहीं तरंगबूंदा बूंद सहा जाता है। सुखकही कहा इननरन कं जासों फूलतगात है। ५७ ॥ हो रागनीराग सुनी गावति है निस दिन। कबिजनपढ़त्त कवि त छन्द छप्पै छिनहीछिन । लिये दुहुधावार करता रारी सब नारी॥ दहन कमन कधनि होत लगत् काननको प्यारी॥जो मिले तोहियहसाजतात्कार संसाररति ॥ नहिं मिले इतहताहि सोसाधत क्यों जसमाधिगति ॥ ५॥ महलमहारमनीके कहावसबेनहि लायकाना
भरनरी
हितसुनने जोगकही।गावत गायकनाहिनसुन
वेजोगकहाजो गावतगायक। नवतरुनीको संग
कहा सुख उनहि नलागत को काहे को छांडि छाडि
यह बनको भाजत ॥ इन जान लियो जगतकों जैसे
दीपक पवन में गलगिबात जगत बुझजात है थिरर
हत नहीं निजभवन में।६०॥ दोहा ॥
भय नाहिं सबही प्रलय कंदमूल फलफल ॥करणंमद
मातेन्टषन की सेवा करतकबूल ॥ ६१॥ गंगातट
गिर बरराहा वहां कहा नहि दौर । करणगते अपमान
सों रपात पराये कौर ।। ६२॥
एका की इच्छा रहत पाणी गात्रादिगवख ।शिवर
कहिवी होउगकर्मशाहकोशस्त्र॥ ६४॥ इन्द्रभये
धनपित्त भये भयेशबकेताल । कल्प जिये तोऊगये
अंतकाल के गाल ॥ मन बिरक्त हरभक्त जति
सं गौवनटगडामा यहितें कछु औरहै परमन
र्थ को लाभ ॥६६॥ ब्रह्म प्रसंडा बदषसमरत कौन
निसंक जाके छिन संसगते लगतलोकपतिरंग।
कुंडलिया
फांद्यौ ते शाकाश पै कोसौतपातालग दलों दिसा तू
फिसौ ऐसी चंचल चाल। ऐसी चंचलचाल इतै कब
हूँनहिं भायौ । बद्धि सदनको पाय ज्ञान छिनई न
किवायो । देख्या नहीं निजरूपपअम्टत कोला
पौ॥ ऐरे मन मत मूंद कौंन भवसागर फायो ।
६॥चेही निसबही दिवसबही तिथिवह वार । वही
उसम वही किया वहही विषय बिकार वेही विषय
बिकार सुनत देखत और संघत॥ वही भोजन भोग जागसोवत साऊंघतः॥ महानिलज यह जीबमोह में भयो निदेही।आजह आटत नाहिं कटत गुनबेके विही॥६६॥ प्रथ्वी परम पुनीत पलगना को मनमा ग्यो । लकिया अपना हाथ गगनकोतम्बूनानों। सहित चन्दचिएक बिजुवा करनदसों दिस अनिता अपनीवृतिसंग हार हित दिवसनिस॥ अतुलितनपा र संपतिसहत सोहत हैंसरवमें मगन। मुनिराजमहा न्टपराजज्यों पौढ़े हमदेखेगन॥७॥ सोरठा कहा. विषय को भोग पर भोग इक और है।ताके हो नसंजोगनीरस लागतः॥७९॥ छपे साधे सबशुभकर्म स्वर्गको बासलहौतिन करत तहाहूं चाल काल कोव्यालभयंकर । ब्रह्मा और स रेश सबनकोजन्म मरणडर। यह बनक पतिदेवी सफलअति नहीं कछु कामकी॥ ३ ॥ जलकी तरल नरंगजात त्याही जातुभायुयह ॥ जोबन हों दिनचार चटक की चोपकांच यहा। ज्यौदामिन पर संगभोग सब जानतेसे तैसेहीयहदेह मंदिर है है कैसे। सुनिरे मेरे चित्तत होप ब्रझमेलीन अब मनोप मत्य श्रद्धासहित समदमसाधन साथ सब।।७४ ॥ ज्या सफरी को फिरत लखि सागर करतन छोभ अंडस बह मंडको त्योतनके लोभ ।७५॥ मनुसम्दति शोर पुराण पढ़ी बिस्तार सहित जिन ॥ कहा अपज बही भयो तबतियदेखी सबठौर। श्रबिबेकी अंजन कियो लख्यो अलख सिर भार॥७६॥ हुये चंद चादनीरम्परम्यवन मति पहुपजुतान्याही में नि रमनीक मित्रको मिलिगी अगुन । वनिता के हंदु नोलमहारमनीक बिराजत। माननीसुखमनीकहग न अंसुक्न कर सावित ॥ इक यह परमरमनीक प्रति सब कोऊ चितसेचहत । इनको बिनास जबदेखिय त नब इन में कोऊन रहत॥७॥ दोहा उछ तिगतिमान समदृष्टीईच्छारहि ॥ करमतपस्वी ध्यानकाकोनासन कीये॥७॥री मेदनी मातता त मारुत सुनपरे ॥ तेजसरवाजलभाता व्योमबधज सनि मेरे। तमको करत नाम हात तुम आगेजोरता तुम हमरेही मित्र शत्रुन को सिंधु कामरत ॥त्रज्ञान जान तव माह ह मिटियो तिहारे संगते । आनन्दम- खंडानंदका डायरमौरसरंगते॥७॥ जोलों देह निरोगजोलो निजराठन। अरुनोलोबल वान भाप उरई मिनके गन ॥नोलो निजकलान करस कोजनन बिचारत। वह पंडित बहुधीर बीरज्यो मन श्रम समारथ ॥ फिर होत कहाजरजर भये जपतपसजा मनहिं बनत ॥ भाभ काप उठायोनिजभवन मेंतबमों कर कूपहिः पिनतः॥३०॥ दोहा विद्यापही नरपदलोलयोननारि समीद। यह नोवा नयोंही गयो ज्यो सून्यारह को दीय ॥
१ छप्पे मनके मनही माय मनोरथराभये सब॥निजअंगन में पासभयो जबजाबन होमव। विद्याकी गई व्याज बूमबारे नहिं दीसत ॥ दोरे आवत काल कोपकरदस नन पीस्त ॥ कबून पूजै नीति सोचक पानि प्रभुकेचर रण॥भवबंधन काटे कौन-मजहों गहरे हरि सरन॥२ नर सेवातजि ब्रह्मभजगुरु चरनन चितलायकब गंगा नरध्यानधारे पूजों गोशिबा पाय ॥२॥पंकज नयनी शशि मुखी सब कवि कहत पकारिताको ह म ऐसे कहत हाड़ मांसभयनारं ॥४॥ छाप मेरे कामबेकाम धनुषटंकार करत जत तूहकोकिल बर्थ क्या काहे को गुरजत ॥सेही तनादि रथाही करत काँछे । सोहिनउपजत मोह छोह सबरहिगी याछ ।चिचमचूदके ध्यान को ज्ञान भटत बरसताई। त॥ मानन्द अखंडानंदसोनाहि जगत सोक्यकहत ६६॥ कथा और कोपीन महाजरजरहै जिवके॥बेरी मिबसमान संकहू नाहिन तिनके । बनसमानबैमास भीख मांगे तब खाबैग सदां ब्रह्म में लीन पीन संतोष हि पावै॥ यह भांति रहतधुन ध्यान में ज्ञानभानउ नके उदिन । नित रहत अकेले एक रस बहजोगीजग में मुदित ॥७॥ अति चंचल यह भोगजगत हू चंचल नेसा तपोभरकतजीब मंदसंसारी नेसा मास फातीकार चित्ततू निर्मला है। साधनसाध समाधम रन निज पद को छरे। । काररे मीनि मेरे बचनद्वारे रेत् इद बोरे को। छिन इहै यहै दिन ही भलो जिन राज्यों कछरौ भौर को ॥६जोगी जग बिलण्य लाय गिर गहावसन हे ।। करत ज्यानि कोध्यान प्रेम भासा बरसत है। बग कल बैठत अंक पियत निरसकन पन जल्॥धनि धनि वह धीर धणे जिन यह समाधिवल॥ हमसेषत दाशेवागसरि सरिता वापी क्षेत॥खोवत है यही भापको भय निपटही निधर पट॥६॥मस्या जन्म कोमित्र मराजीवन कौग्नास्पोग्नासिबकास- तोष लाभ यह अपर मकास्यो । तैसे ही सम दृष्टिमः सति वनिता शिलासवर। मच्छर गणग्नासलेतग्रस तबन को भुजंगवर । टप म्हसत किये इनदुरजनन की सोचपला धनग्नासति ॥कछु हुनदेल्या बिनाण्ट सतयाही चितभनन्दसत ॥६॥ दोहा रोग बियोग बिपति बह देहापभाधीन ॥ निडरबि धाताजगरयौ महाअधिरता लीन॥३१॥ सयौ गर्भ दुखजन्म दुखजोवन नियाबियोगारद्ध भये सबहन सतज्यो जगतकियों यह रोगः॥ १२॥ (छ) सो वर्षन की आयुरेन में बीतत भाभी ताके गाधी भाधरवाला पनसाधी॥ रहै यह दिनचादिव्या घि दह कोजसमोये। जल की तरंगबूंद बूंद सह सदेह है जात है ॥-सुखकहो कहा इजनरन, कू जालों फूलत गात है । ६३॥ दोहा ४६ बड़े बिबेकी तजत हैं संपतिपितु अरुमात केयाऔरकोपीनहं हमनजीनजात ४६ कुपति सिंधनीज्योंजराकुपतिशवज्यों रोग ॥ फूटे घर मलज्यों जगत तऊनहित जतलोग॥ १५॥ पति विद्या छड़होत जबसबही भांति सुछुन्द । सबहीनर कोतनहरतबदौ विधाता मंद ॥६६ छले है हूँ कछुक धनिधरी जिनधरत पीठ पर। जोधूवह धनसरिस सिराखतपरिकर। राजगत में जन्मजीवा निजस्थारथसाचे॥ परमारथके काज होत ऊंचेनहि मीचे ॥धह जानत नांहि हित करमचमार हिमरता गूलर फलसे ब्रह्मभंड में मदरसे उपजत मरन।। ६७॥ छिन में बालक होत होत छिनहीनें निरपन ॥ होता छिनक में वृद्धि देहजरजरता पावतः।। नटज्यों पलटत अंग स्वर्ग नितनयो दिरखावतः॥यहजीबनी चमाना मचत निचलोरहतमएकदमकरिके कनात संसारकी कौतुक निरखत रहतजमा ६५ बहुत बहुतभोगकोसंगतहांत्यो इनरोगन कोडर ॥ यह कोडर भूप नगिन अरु त्यों होत सकर। सेवा में भयस्वामि समर में सदनको भय ॥ कुलहमें भय नारि देह को काल करत छय। अभिमान डरत अपा मान सो मुगन डरपत सुन रखल सवद ॥सने गिरत परतभय सों भरे अभयएक बैंराज्ञ पद ।।१००। (दोहा) करी भरतरी शतक भाषा भली मनापं नीत महल रस गोख में वीत राज्ञ प्रभु आप॥ १०॥ दोहा श्रीराधा गोबिन्द के चरन शरन विश्राम ॥ चन्दमह. ल चित चहल में उदयपुर नगर मुकाम॥ १०२॥ दोहा सम्बत प्रशदस सतक शुभ वावना वर्ष भाज एमा पंचमीएरव्यो ग्नेय करि हर्ष। १०३॥ इतिश्नी मन्महाराजाधिराजराजराजेन्द्र भी श्री सवाई प्रताप सिंहजीदेव विरचंतभरतरीसबक भाषा नीति सिंगारराज्ञ मंजरी सम्पूरणम् (दोहा) तुलसीबिलम्बन कीजियेभजिलीजैरघुवीर तनतरसकससोजात है स्वाससारखेतीर इनि हस्ताक्षर श्रीराम शर्मा गोपालपुर निवासी PRIYE 'इश्तिहार प्रगट हो कि हमारे यहां हर किस्म की हिन्दीउई की किताबें मौजूद हैं और व्यापारियों को बहुत किफायत से दीजाती है जिनसाहबों कोज़रूरतहोएकवार में गाकर देख लेवें॥ विजेमुक्तावली - व्यंजन मकाश गगचमन चारभाग प्रेमसागर ज्योतिषशार इम्टतसागर रामायण महूर्त्तचिन्तामन बनविलास भालखंड पिनबोध बागबहार उई आफ़तकी पुड़िया जगफतकीपुड़िया दिलबहलावनी, चारों भागनागरी दोहिस्सा नागरी लेताल पच्चीसी सिंहासन बत्तीसी चीलीभटियारी सूमावहत्तरी विद्यारथी महाजनीशर बालापदेशागणित प्रकाश बस्ता नारक चौ सस्ती पन्नूके बीरबलनामा चिद रतन लागी ४ भाग दिललगनः नाही प्रकाश निघंट बुलबुलहजारया चका फेवली तोता मैनाभा स्नो भाग गोपीचन्द भरतरी द्रसभा सभाबिलासे सत्यनारायण विराह पनि अनदोलारानी नौटंकी गुलबकावली पता: लाला बंसीधर कन्हैयालालमहेश्री बुकसेलर कसेरठबाजार आगरा वैद्यकसार
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