Sanmati Library, Jaipur

Ratnkarndshravkachar

Bakaliwal, Pannalal · 2009/11

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Front matter

Published by Shri Nothoram Promi, Propmotor Shr: Jain
Grantha Ratankar Karyolsyn, Hirabng, Noor
GP Innk-Bombay
Printed by G N Kulkarnı at the Karnatak Press,
434, Thakurdwar, Bombay

श्रीवीतरागाय नमः श्रीसमन्तभद्रस्वामिरचित रत्नकरण्डश्रावकाचार अन्वय आर अर्थसहित। मङ्गलाचरणम् । अनुष्टुपश्लोक । नमः श्रीवर्द्धमानाय निर्धूतकलिलात्मने । सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ॥१॥ अन्वयार्थी-( यद्विद्या ) जिनका ज्ञान, ( सालोकानां) अलोकसहित (त्रिलोकानां ) तीनों लोकोंको (दर्पणायते) दर्पणकी समान आचरण करता है अर्थात् जिनकी ज्ञानरूपी आरसीमें तीनों लोक झलकते हैं ( ' तस्मै' ) तिन ( निधूतकलि- लात्मने ) पापरूपी मैलको आत्मासे धो डालनेवाले, ( श्रीवर्द्धमा- नाय ) श्रीवर्द्धमान भगवान्को ( नमः ) नमस्कार ('अस्तु') होओ॥१॥ भावार्थ-लोकालोकके जाननेवाले और चार घातियारूपी कर्ममलको नष्ट करनेवाले महावीर स्वामीको मैं नमस्कार करता हूँ॥१॥ ( र.क.२

[२]
)
,
धर्मोपदेश करनेकी प्रतिज्ञा ।
देशयामि समीचीनं धर्म कर्मनिवर्हणम् ।
संसारदुःखतः सत्त्वान्यो धरत्युत्तमे सुखे ॥१॥
अन्वयार्थी-( यः ) जो ( सत्त्वान् ) जीवोंको (ससारदु-
खतः ) ससारके दुःखोसे छुटाकर ( उत्तमे सुखे ) उत्तम सुखमें
(धरति ) धारण करता है ('तम्' ) उस ( कर्मनिवर्हण )
कर्मों के नाश करनेवाले ( समीचीन ) अति उत्कृष्ट (धर्म)
धर्मको ('अह' ) मै ( समन्तभद्राचार्य ) ( देशयामि ) उपदेश
करता हूँ ॥२॥
धर्मका लक्षण ।
सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्म धर्मेश्वरा विदुः ।
यदीयपत्नीकानि भवन्ति भवपद्धतिः ॥ ३॥
अन्वयार्थों-(धर्मेश्वराः) धर्मके ईश्वर गणधरादि आचार्य
( सदृष्टिज्ञानवृत्तानि ) सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकूचा-
रित्रको (धर्म) धर्म (विदुः ) कहते है (यदीयमत्यनाकानि)
जिनके कि उल्टे मिथ्यादर्शन मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र
( भवपद्धतिः ) ससारकी परिपाटीरूप (भवन्ति) होते है ॥ ३ ॥
भावार्थ-सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्ररूप रत्नत्रयको धर्म
कहते हैं, और मिथ्यात्वको ससारकी परिपाटी अर्थात् अधर्म
कहते हैं ॥३॥
सम्यग्दर्शनका लक्षण।
श्रद्धानं परमार्थानामाप्तागमतपोभृताम् ।
त्रिमूढापोढमष्टाङ्ग सम्यग्दर्शनमस्मयम् ॥ ४ ॥

[३] अन्वयार्थों-(परमार्थानां ) सत्यार्थ अथवा मोक्षके कारण- भूत ( आप्तागमतपोभृताम् ) देव शास्त्र और गुरुका ( अष्टाङ्गं ) अष्टअंगसहित, (त्रिमृदापोडं ) तीन मूढ़तारहित तथा (अस्मयं) आटमदरहित ( श्रद्धानं ) श्रद्धान करना ( सम्यग्दर्शन ) सम्य- ग्दर्शन ( अस्ति ) है ॥ ४॥ भावार्थ-सच्चे टेव, सन्चे शास्त्र और सच्चे गुरुको ही मोनके कारण मान कर उनकी उपासना ( सेवा पूजा ) करना, अन्य किसी भी देव गुरु शास्त्रकी सेवा पूजा नहीं करना, सम्यग्दर्शन है ॥ ४ ॥ सत्यार्थ आप्तका ( सच्चे देवका ) लक्षण ! आप्तेनोच्छिन्नदोपेण सर्वजेनागमेगिना । भवितव्य नियोगेन नान्यथा ह्याप्तता भवेत् ॥५॥ अन्वयार्थों-(नियोगेन) नियमसे ( उन्छिन्नदोपेण ) रागद्वेपादि दोपरहित वीतराग ( सर्वजेन ) सर्वज्ञ और (आगमे- शिना) आगमका ईश ही (आप्तेन) आप्तै अर्थात् सच्चादेव (भवि- तव्य ) होता है । (हि) निश्चय करके (अन्यथा ) और किसी प्रकार ( आप्तता ) आतपना (न भवेत् ) नहीं हो सकता ॥ ५॥ वीतरागका लक्षण। क्षुत्पिपासाजरातङ्कजन्मान्तकभयस्मयाः। न रागद्वेपमोहाश्च यस्याप्त स प्रकीर्त्यते ॥६॥ अन्वयार्थी-( यस्य ) जिस देवके (क्षुत्पिपासाजरातक- जन्मान्तकमयस्मयाः) क्षुधा, तृषा, बुढापा, रोग, जन्म, मरण, भय, गर्व ( रागद्वेपमोहाः ) राग, द्वेप, मोह (च) और चिन्ता, १ भूतभविष्यवर्तमानका ज्ञाता । २ सबको हितका उपदेश करनेवाला। ३ सत्यार्थवका । ४ देवपना । , , [४] मद, अरति, खेद, स्वेट, निद्रा, आश्चर्य (न 'सन्ति') नहीं है, (स.) वही ( आप्तः ) आप्त वीतराग देव ( प्रकीयते) कहा जाता है ॥ ६ ॥ हितोपदेगीका लक्षण । परमेष्ठी परज्योतिर्विरागो विमल कृती । सर्वज्ञोऽनादिमध्यान्तः सार्वः शास्तोपलाल्यते ॥ ७॥ अन्वयार्थी-'यः' ) जो (परमेष्ठी) परमपदमें रहनेवाला हो, ( परज्योतिः ) उत्कृष्ट ज्योतिवाला हो, (विरागः ) रागर- हित वीतराग हो, (विमलः ) कर्ममलरहित हो, (कृती) कृतकृत्य हो, ( सर्वज्ञः ) सर्वज्ञ हो अर्थात् भूतभविष्यत्वर्तमानकालकी समस्त पर्यायोसहित समस्त पदार्थोका जाननेवाला हो, ( अनादि- मध्यान्तः ) आदि मध्य अन्तसे रहित हो, आर ( सार्वः ) समस्त जीवोंका हितकारक हो ('सः') वही (शास्ता) हितोपदेशी (उपलाल्यते) कहा जाता है ॥ ७ ॥ प्रश्न—जो विराग और कृतकृत्य है, वह हितोपदेशी अर्थात् सव जीवोका हित करनेवाला उपदेश कैसे दे सकता है ? इसका उत्तर- अनात्मार्थ विना रागैः शास्ता शास्ति सतो हितम् । ध्वनन् शिल्पिकरस्पर्शान्मुरजः किमपेक्षते ।। ८ ।। अन्वयार्थी-(शास्ता ) हितोपदेशी जो होता है, वह ( अनात्मार्थ ) विना प्रयोजन और ( रागैः विना ) रागादि भावोके बिना ही ( सतः हित) सत्पुरुपोके हितको ( शास्ति) " १ केवलज्ञानरूपी ज्योतिवाला । २ चार घातियारूपी कर्ममलरहित । ३ जिसको कोई काम करना बाकी न रहा हो। ४ अवस्थाओंर सहित ।

[५] 2 उपदेश करता है, क्योंकि ( शिल्पिकरस्पर्शात् ) बजानेवाले के हायके स्पर्श होनेसे ( ध्वनन् ) गव्द करता हुआ (मुरजः) मृदग (कि अपेक्षते ) क्या इन्छा करता है। कुछ भी नहीं ॥ ८ ॥ सत्यार्थ ( सच्चे ) गानका लक्षण । आप्तोपज्ञमनुल्लध्यमदृष्टेटविरोधकम् तत्वोपदेशकृत्सा शास्त्रं कापयघट्टनम् ॥ ९॥ अन्वयार्थी-('यत्' ) जो (आसोपजं ) आप्तका कहा हुआ हो, ( अनुल्लचचं ) वादी प्रतिवादीद्वारा खडन करनेमे न आवे, ( अदृष्टेष्टविरोधकं ) प्रत्यक्ष अनुमानादि प्रमाणोंसे विरोवरहित हो, (तत्त्वोपदेशकृत् ) वस्तुस्वरूपका उपदेश करनेवाला हो, (सार्व) सब जीवोंका हितकारक हो और ( कापथघट्टनं ) मिथ्यामार्गका खंडन करनेवाला हो, ('तत् ) वह ( शास्त्रं ) सयार्य शास्त्र ('अस्ति' ) है ॥ ९ ॥ सत्यार्थ ( सच्चे ) गुरुका लक्षण । विषयाशावशातीतो निरारम्भोऽपरिग्रह । ज्ञानध्यानतपोरक्तस्तपस्वी स प्रशस्यते ॥१०॥ अन्वयार्थी- ('यः) जो (विषयाशावशातीतः) विषयोंकी आशाके वगसे रहित हो, (निरारम्भ ) आरभरहित हो, ( अप- रिग्रहः ) चौवीस प्रकारके परिग्रहोंसे रहित हो, और (ज्ञानध्या- नतपोरक्तः) ज्ञान ध्यान और तपमें लवलीन हो, ( सः) वह (तपस्वी ) तपस्त्री अर्थात् गुरु (प्रशस्यते ) प्रशसा करने योग्य है ॥१०॥ १ 'ज्ञानध्यानतपोरलः' ऐसा भी पाठ है जिसका अर्थ यह है, कि ज्ञान ध्यान और तप ही हैं रत्न जिसके ऐसा ।

[६] सम्यक्त्वके आठ अंग। १. नि.शक्षित अगका लक्षण । इदमेवेशमेव तत्त्व नान्यन्न चान्यथा । इत्यकम्पायसाम्भोवत्सन्मार्गेऽसशया रुचिः ॥ ११ ॥ अन्वयार्थों-(तत्त्वं ) वस्तुका स्वरूप ( इद एव ) यही है, ( ईदृश एव ) इसी प्रकार ही है, ( अन्यत् न ) और नहीं है, ( अन्यथा च न ) और अन्यप्रकार भी नहीं है, ( इति) इस प्रकार ( सन्मार्गे ) जैनमार्गमें (आयसाम्भोवत् ) खड्गके पानीके समान ( अकम्पा ) निश्चल ( रुचिः ) श्रद्धान ( असंशया) निःशङ्कित अग कहा जाता है ॥ ११ ॥ २. नि काक्षित अगका लक्षण । कर्मपरवशे सान्ते दुःखैरन्तरितोदये । पापवीजे सुखेऽनास्था श्रद्धानाकाङ्क्षणा स्मृता ॥ १२ ॥ अन्वयार्थी-( कर्मपरवशे ) जो कर्मके परवश है, (सान्ते) अन्तकरसहित है, ( दुःखैः अन्तरितोदये ) जिसका उदय दुःखों- करके मिला हुआ है, और ( पापवीजे) जो पापका बीजभूत है (सुखे) उस सासारिक सुखमें (अनास्था ) अनित्यरूप (श्रद्धा) श्रद्धा रखना अर्थात् सासारिक सुखकी बाछा नहीं करना, सो (अनाकाङ्कणा) नि:काक्षितनामा अग (स्मृता) कहा गया है॥१२॥ ३ निर्विचिकित्सित अगका लक्षण । स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रिते । निर्जुगुप्सागुणप्रीतिर्मता निर्विचिकित्सता ॥ १३ ॥ (१) जिस तरह तलवारकी धारका पानी (आव ) हिलता चलता नहीं है, उस प्रकारका पक्का विश्वास ।

[७] अन्वयाचा-(स्वभावतः) स्वभावसे (अशुचौं) अपवित्र, परन्तु ( रत्नत्रयपवित्रिते ) रत्नत्रयसे पवित्र ( 'एतादृशि' ) ऐसे धर्मात्माओंके ( काये ) शरीरमें ( निर्जुगुप्सागुणप्रीतिः ) ग्लानि- रहित गुणोंमें प्रीति करना (निर्विचिकित्सिता) निर्विचिकित्सित अंग (मता ) माना गया है ॥ १३ ॥ ४. अमूहदृष्टि अगका लक्षण। कापथे पथि दुःखानां कापथस्थेऽप्यसम्मतिः । असंपृक्तिरनुत्कीर्तिरमूढा दृष्टिरुच्यते ॥ १४ ॥ अन्वयार्थी-(दुःखानां पथि) दुःखोंके मार्गरूप (कापथे) कुमार्गमें ( अपि) और ( कापथस्थे ) कुमार्गमें स्थित मिध्याति- योंमें (असम्मतिः) मनसे सम्मत न होना, ( असंक्तिः) कायसे सराहना नहीं करना, ( अनुत्कीर्तिः ) वचनसे प्रशंसा नहीं करना, सो ( अमूढा दृष्टिः ) अमूढदृष्टि नामा अंग (उच्यते) कहा जाता है ॥ १४ ॥ ५ उपगृहन अंगका लक्षण । स्वयं शुद्धस्य मार्गस्य वालाशक्तजनाश्रयाम् । वांच्यतां यत्समार्जन्ति तद्वन्त्युपगृहनम् ॥ १५ ॥ अन्वयार्थी-( स्वय शुद्धस्य ) जो अपने आप ही पवित्र ऐसे (मार्गस्य ) जैनमार्गकी (वालाशक्तजनाश्रयां) अज्ञानी तथा असमर्थ जनोंके आश्रयसे उत्पन्न हुई (वाच्यतां ) निंदाको ( यत् ममार्जन्ति ) जो दूर करते है (तत् ) टसको (उपगृहनं ) उपगृहन अग ( वदन्ति ) कहते हैं ॥ १५॥ १मिथ्यामतमें।

ii ६ स्थितिकरण अगका लक्षण । दर्शनाचरणाद्वापि चलतां धर्मवत्सलैः । प्रत्यवस्थापन प्राज्ञैः स्थितिकरणमुच्यते ॥ १६ ॥ अन्वयार्थी-( दर्शनात् ) सम्यग्दर्शनसे (वा) अथवा (चरणात् अपि ) सम्यकचारित्रसे भी ( चलता ) डिगते हुए पुरुषोंको ( धर्मवत्सलैः ) धर्मसे प्रेम करनेवाले पुरुषोंके द्वारा ('यत्' ) जो ( प्रत्यवस्थापन ) फिर उसीमे स्थिर किया जाना है ('तत्' ) सो (प्राज्ञः ) विद्वानोके द्वारा (स्थितिकरण ) स्थिति- करण अंग ( उच्यते) कहा जाता है ॥१६॥ ७ वात्सल्यअगका लक्षण । स्वयूथ्यान्मति सद्भावसनाथापेतकैतवा । प्रतिपत्तिर्यथायोग्यं वात्सल्यमभिलप्यते ॥ १७ ॥ अन्वयार्थी-( स्वयूथ्यान् प्रति ) अपने सहधर्मी भाइयोंके प्रति ( सद्भावसनाथा) समीचीन भावोंसहित और ( अपेतक- तवा ) छलकपटरहित ( यथायोग्य ) यथायोग्य (प्रतिपतिः) आदरसत्कार करना (वात्सल्य ) वात्सल्यनामा अग (अभिलप्यते) कहा जाता है ॥ १७॥ ८ प्रभावना अगका स्वरूप । अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम् । जिनशासनमाहात्म्यप्रकाशः स्यात्मभावना ।। १८॥ अन्वयार्थों-( अज्ञानतिमिरव्याप्ति ) अज्ञानरूपी अधकारके विस्तारको ( यथायथ ) जिसप्रकार बने उस प्रकार (अपाकृत्य) दूर करके (जिनशासनमाहात्म्यप्रकाशः ) जिनमार्गका माहात्म्य [९] वा प्रभाव समस्त मतावलम्बियोंमें प्रगट कर देना (प्रभावना) प्रभावना नामा आठवा अग (स्यात्) है ॥ १८ ॥ भावार्थ-ससारमें चारों ओर अज्ञानरूपी अन्धकार फैला हुआ है । लोग नहीं जानते हैं कि सुमार्ग कौन है और कुमार्ग कौन है। वस्तुके यथार्थ स्वरूपसे चे सर्वथा अपरिचित है । विद्याका प्रचार करके, वास्तविक तत्वोंके स्वरूपको प्रकट करके उक्त अन्धकारको मिटाटेना, तनमनधन लगाकर जैसे बने तैसे दूसरों- को ज्ञानी बना देना सच्ची धर्मप्रभावना है। प्रत्येक अगमें प्रसिद्ध होनेवालोंके नाम । तावदञ्जनचौरोऽङ्गे ततोऽनन्तमती स्मृता । उद्दायनस्तृतीयेऽपि तुरीये रेवती मता ॥ १९ ॥ ततो जिनेन्द्रभक्तोऽन्यो वारिपेणस्ततः पर । विष्णुश्च वज्रनामा च शेषयोर्लक्षयतां गत ॥ २० ॥ अन्वयार्थों-( तावत् अने) पहले निःशकित अंगमे (अञ्जन चौरः ) अञ्जन चोर, ( ततः अनन्तमती) दूसरे निःकालित अगमें शेठकी पुत्री अनन्तमती, (स्मृता ) स्मरण की जाती है । (तृतीये ) तीसरे निर्विचिकित्सित अगमें ( उद्दायनः ) उद्यायन नामा राजा, ( अपि) और (तुरीये ) चौये अमूढदृष्टी अगमें ( रेवती ) रेवती नामा रानी, ( मता ) मानी गई है ॥ १९ ॥ ( ततः ) फिर पांचवें उपगृहन अगमें (जिनेन्द्रभक्त ) जिनेन्द्रभक्त नामका शेठ (ततः परः अन्यः ) तत्पथात् छठे स्थिति- करण अगमें ( वारिपेणः ) वारिपेण ( श्रेणिक राजाका पुत्र ) (च) और ( शेपयोः) शेपके दोनों अगोंम अर्थात् वात्सल्य और प्रभावना अगमें (विष्णुः ) विष्णुकुमार मुनि (च) आर - [१०] ( वज्रनामा) वज्रकुमार मुनि ( लक्ष्यतां गतौ) लक्ष्यपनेको प्राप्त हुए हैं, अर्थात् प्रसिद्ध हुए हैं ॥ २० ॥ भावार्थ-सम्यग्दर्शनके अग आठ हैं । यों तो इन एक एक अगोंका पालन करनेवाले सैकडों मनुष्य हो गये है, परन्तु उन सबमें सबसे अधिक ऊपर कहे हुए अजन चोर आदि प्रसिद्ध हैं । इन सबकी जुदा जुदा कथायें दूसरे ग्रन्थोंमेंसे पढ लेना चाहिये । नांगहीनमलं छेत्तुं दर्शन जन्मसन्ततिम् । न हि मत्रोऽक्षरन्यूनो निहन्ति विपवेदना ॥२१॥ अन्वयार्थी-('यथा' ) जैसे (अक्षरन्यूनः मन्त्र ) अक्षर- रहित मन्त्र (विषवेदना ) विपकी वेदनाको (हि ) निश्चयकरके (न निहन्ति ) नष्ट नहीं करता है, ('तथा') तैसे ही (अगहीन अङ्गरहित ( दर्शन-सम्यग्दर्शन भी (जन्मसन्तति) ससारकी सन्तति ( छेत्तुं ) छेदनेको ( अलं) समर्थ (न) नहीं है ॥ २१ ॥ भावार्थ-मत्रोंके अक्षरोंमें शक्ति होती है । वही मत्र सिद्ध हो सकता है जो शुद्ध हो अर्थात् जिसमें पूरे अक्षर हों । यदि एक भी अक्षर कम होगा तो उससे सिद्धि नहीं होगी । इसी तरह अष्टाङ्गयुक्त सम्यग्दर्शन ही ससारसे मुक्त कर सकता है। यदि अगरहित हो तो नहीं। लोकमूडताका स्वरूप आपगासागरस्नानमुच्चयः सिकताश्मनाम् । गिरिपातोऽग्निपातश्च लोकमूढं निगद्यते ॥ २२ ॥ अन्वयार्थी-धर्म समझकर ( आपगासागरस्त्रानं ) गंगा यमुनादि नदियोंमें तथा समुद्रमें स्नान करना, (सिकताश्मनां) (१) अशुद्ध मन्त्र । १ [११] ) वालुका और पत्थरीका ( उच्चय ) टेर करना, (गिरिपातः ) पर्व- तसे गिरना ( च ) और ( अग्निपात.) अग्निमें जैटना (लोकमूढं) लोकमूढता (निगद्यते ) कही जाती है ॥ २२ ॥ देवमुटतारा स्वरूप । वरोपलिप्सयाशावान् रागद्वेपमलीमसाः। देवता यदुपासीत देवतामृढमुच्यते ॥ २३ ॥ अन्वयार्थी-(आशावान् ) आशावान् होता हुआ (वरोप- लिप्सया) वरकी इच्छा करके ( रागद्वेषमलीमसा.) रागद्वेपरूपी मैलसे मलीन (देवता. ) देवताओंकी ( यत् ) जो ( उपासीत ) उपासना की जाती है ('तत् ' ) सो (देवतामूह ) देवमूढता (उच्यते ) कही जाती है ॥ २३ ॥ भावार्थ-जो सम्यग्दृष्टि है-जिसे पदार्थका यथार्थस्वरूप भास गया है, उसकी दृष्टिमें वीतराग सर्वज्ञ ही पूज्य हो सकते है। उन्हें छोड़कर किसीसे राग और किसीसे ट्रेप करनेवाले जो अनेक देव प्रसिद्ध हैं वे पूज्य नहीं हो सकते । वह यह भी जानता है कि कर्मोदयके विरुद्ध ये न तो किसीकी भलाई कर सकते है और न किसीकी बुराई । इस कारण वह किसी तरहकी आज्ञासे या वरकी इच्छासे उनकी सेवा पूजा नहीं करता । पाखडिमूढता (गुरुमूटताका ) स्वरूप । सग्रन्धारम्भहिंसानां संसारावर्त्तवर्तिनाम् । पाखण्डिनां पुरस्कारो ज्ञेयं पाखण्डिमोहनम् ॥ २४ ॥ अन्वयाथों-( सग्रन्थारम्भहिंसानां ) परिग्रह आरभ और (१) जैसे मारवाडमें छाँछरिया विंदायक माना जाता है। (२) जैसे पतिके पीछे मती होना।

[१२] , हिंसासहित (संसारावर्त्तवर्तिनाम् ) नसारके चक्रमें भ्रमण करनेवाले (पाखण्डिनां) पाखडी माधु तपस्त्रियोंका (पुरस्कार.) आदरसन्मान भक्तिपूजाटिक करना सो ( पाखण्डिमांदनं ) गुरुमूढता (जेयं) जानना ॥ २४ ॥ अष्टमदो नाम । ज्ञानं पूजां कुलं जातिं वलमृद्धिं तपो वपुः । अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुर्गतस्मयाः ॥ २५ ॥ अन्वयार्थी--(ज्ञानं ) विद्या, ( पूजां) प्रतिष्ठा, ( कुलं ) कुल, (जाति) जाति, (वलं) शक्ति, (ऋद्धि ) सम्पत्ति. (तप.) व्रताचरण, ( वपु ) और गर्गर ( 'एतान् । अष्टौ आश्रित्य ) इन आठौंको आश्रय करके (' यत्' ) जो (मानित्व) गर्व करना है, ('तत्' ) उमको (गतस्मया ) मदरहित गणधरादिक आचार्य (स्मयं ) मद (आहुः ) कहते हैं ॥ २५ ॥ गर्व करनेका फल । स्मयेन योन्यानत्येति धर्मस्थान् गर्वितागयः । सोऽत्येति धर्ममात्मीय न धर्मों धामिर्केविना ॥ १६ ॥ अन्वयाय -( यः) जो (गर्विताशयः ) गर्वयुक्त आगय- वाला (स्मयेन ) अपने घमडसे ( अन्यान् धर्मस्थाम् ) अन्य धर्मात्मा पुरुपोंको ( अत्येति ) उल्लघन करता है, अर्थात् उनका अपमान करता है ( सः ) वह पुरुष ( आत्मीय धर्मम् ) अपने धर्मको ( अत्येति ) उल्लघन करता है ('यत") क्योंकि (धार्मिकः विना) धर्मात्माओंके विना (धर्मः न ) धर्म नहीं है। भावार्थ धर्मको चलानेवाले धर्मात्मा पुरुष ही होते हैं । इसलिये जिसने धर्मात्मा पुरुषोंका तिरस्कार किया, उसने अपने [१३] 2 रत्नत्रयरूप वर्मका ही तिरस्कार किया । क्योंकि वर्मामा पुरुषोंका तिरस्कार होनेसे वे तथा उनकी देखादेखी अन्य धर्मात्मा भी धर्ममें शिथिल हो जाते हैं और उनका अपमान देखकर अन्यान्य पुरुष भी धर्मको ग्रहण करनेमें अग्रसर नहीं होते हैं ॥ २६ ॥ यदि पापनिरोधोऽन्यसम्पदा किं प्रयोजनम् । अथ पापासवोऽस्त्यन्यसम्पदा किं प्रयोजनम् ।। २७ ॥ अन्वायार्थी--(यदि) यदि (पापनिरोधः) पापका निरोध है ('तर्हि' ) तो ( अन्यसम्पदा ) अन्य सम्पदासे (किं प्रयो- जन) क्या प्रयोजन है। ( अथ ) और यदि ( पापासवः ) पापका आश्रत्र ( अस्ति ) है, ('तर्हि' ) तो ( अन्यसम्पदा) अन्य सम्पदासे (किं प्रयोजन ) क्या प्रयोजन है।॥ २७ ॥ भावार्थ-यदि पापका आना रुक गया, तो यही वडी भारी सम्पदा मिल गई, और सम्पदाकी क्या जरूरत रही ? और यदि पापों- का आस्रव होता रहा, तो दूसरी सम्पत्ति मिलनेसे भी क्या? पापका दुःखरूप फल तो भोगना ही पडेगा । सम्यग्दर्शनकी महिमा । सम्यग्दर्शनसम्पन्नमपि मातङ्गदेहजम् । देवा देव विदुर्भस्मगूढांगारान्तरौजसम् ॥ २७ ॥ अन्वयार्थी-(देवाः ) गणधरादिक देव ( सम्यग्दर्शनस- म्पन्न) सम्यग्दर्शनसहित (मानंगदेहज अपि) चाडलको भी ( भस्मगूढांगारान्तरौजस 'इव' ) भस्मसे ढके हुए गुप्त अगारके भीतरी प्रकाशके समान ( देव ) देव (विदुः) कहते है ॥ २८ ॥ भावार्थ-जैसे ऊपरकी राखसे अगार राख ही सरीखा मालूम 2 - [१४] होता है, परन्तु उसके भीतर अग्नि जरूर छुपी रहती है, इसी प्रका- रसे यद्यपि सम्यक्ती चाडाल जपरसे चाटालसा दिखता है, परन्तु उस- के अन्तरगमें सम्यग्दर्शनकी जागती हुई जोत छुपी रहती है । इससे वह देवतुल्य है। श्वापि देवोऽपि देवः श्वा जायते धर्मकिल्विपात् । कापि नाम भवेदन्या सम्पद्धर्माच्छरीरिणाम् ॥ २९ ।। अन्वयार्थी--(धकिल्विपात्) धर्म और पापसे (श्वा अपि देव.) कुत्ता भी देव और (देवः अपि श्वा) देव भी कुत्ता (जायते) हो जाता है। (धर्मात् ) धर्मसे ( शरीरिणां ) जीवोंके ( अन्या) अन्य ( कापि नाम सम्पत् ) कोई भी अनिर्वचनीय सम्पदा ( भवेत् ) हो, अर्थात वर्मसे हर कोई सम्पति प्राप्त हो सक- ती है ।। २९ ॥ सम्यग्दृष्टिके लिये त्यागने योग्य मार्य। भयागास्नेहलोभाच्च कुदेवागमलिंगिनाम् । प्रणाम विनय चैव न कर्यु शुद्धदृष्टयः ॥ ३९ ॥ अन्वायाौँ-(शुद्धदृष्टयः) शुद्ध सम्यग्दृष्टि जीव ( भया- शास्नेहलोभात् ) भय, आशा, प्रीति और लोभसे ( कुटेवागमलिं- गिनाम् ) कुदेव कुशास्त्र और कुलिंगियोंको (प्रणाम) प्रणाम (च) और (विनयं एव) विनय भी न (न कर्युः) न करे ॥ ३० ॥ सम्यग्दर्शनकी प्रधानता। दर्शन झानचारित्रात्साधिमानमुपाग्नुते । दर्शन कर्णधर तन्मोक्षमार्गे प्रचक्ष्यते ॥३१॥ अन्वयार्थी-( ज्ञानचारित्रात् ) ज्ञान और चारित्रकी अपेक्षा [१५] (दर्शन) सम्यग्दर्शन ( साधिमान ) मुख्यतया ( उपाग्नुत) उपासना किया जाता है, ('यतः ) क्योंकि (तदर्शन ) वह सम्यग्दर्शन (माक्षमार्गे) मोक्षमार्गमें (कर्णधार ) खेवटियाके सा (प्रचक्ष्यते ) कहा जाता है ॥ ३१ ॥ विद्यावृत्तस्य संभूतिस्थितिवृद्धिफलोढयाः । न सन्त्यसति सम्यक्त्वे वीजाभावे तरोरिख ।। ३२ ।। अन्वयार्थी-(सम्यक्त्वे ) सम्यक्त्वके ( असति ) न होते (वीजाभावे ) वीजके बिना (तरो इवः ) वृक्षके समान (वि. द्यात्तस्य ) ज्ञान और चारित्रके (सभूतिस्थितिवृद्धिफलोदया) उत्पत्ति स्थिति वृद्धि और फलका लगना (न सन्ति ) नहीं है। भावार्थ-सम्यग्दर्शनके हुए विना सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र होता नहीं । सम्यग्दर्शनके बिना ज्ञान मिथ्याज्ञान कहलाता है और व्रतादिक कुचारित्र कहलाते है ॥ ३२ ॥ मोही और निमोहीका अन्तर । गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोहो नैव मोहवान | अनगारो गृही न निर्मोहो मोहिनो मुने ॥ ३३ ॥ अन्वयार्थी-(निर्मोहः ) मोहरहित (गृहस्थः ) गृहस्थ भी (मोक्षमार्गस्थ. ) मोक्षमार्गमे स्थित है, किन्तु ( मोहवान् ) मोह- वोन् (अनगारः एव ) मुनि भी (न) मोक्षमार्गमें स्थित नहीं है, ('अत एव' ) इस कारण ( मोहिनः मुने ) मोही मुनिसे (निर्मोह गृही) निर्मोही सम्यग्दृष्टी गृहस्थ (श्रेयान् ) श्रेष्ठ है ॥३३॥ सम्यक्त्व और मिथ्यान्व । न सम्यक्त्वसमं किञ्चित्रकाल्ये त्रिजगत्यपि। (१) दर्शनमोहसे रहित । ( २ ) मिथ्यात्त्री । (३) द्रव्यलिंगी मुनिगे ।

[१६] श्रेयाऽश्रयश्च मिथ्यात्वसम नान्यत्तनूभृताम् ॥ ३४ ॥ अन्वयार्थी-(त्रैकाल्ये) तीन लोक और (त्रिजगति) तीन जगतमें ( तनुभृतां ) जीवोंका ( सम्यक्त्वसम ) सम्यक्त्वके समान (किञ्चित् अपि ) कुछ भी (श्रेयः ) कल्याण (न) नहीं है (च) और ( मिथ्यात्वसम ) मिध्यात्वके समान (अश्रेयन) अकल्याण नहीं है ॥ ३४ ॥ सम्यग्दर्शनका महत्त्व । आयी। सम्यग्दर्शनशुद्धा नारकतिर्यड्नपुंसकत्रीत्वानि । दुष्कुलविकृताल्पायुर्दरिद्रतां च ब्रजन्ति नाप्यतिका ॥३५॥ अन्वयार्थों-( सम्यग्दर्शनशुद्धाः ) जो सम्यग्दर्शनसे शुद्ध हैं वे ( अवतिका अपि ) व्रतरहित होनेपर भी (नारकतिर्यङ्- नपुंसकत्रीत्वानि ) नरक तिर्यञ्च नपुसक और स्त्रीपनेको (च) तथा ( दुष्कलविकृताल्पायु. ) नीचकुल विकलअग अल्पआयु और (दरिद्रतां) दरिद्रपनेको (न) नहीं (ब्रजन्ति) प्राप्त होते हैं ॥३५॥ ओजस्तेजोविद्यावीर्ययशोदृद्धिविजयविभवसनाथाः। महाकुला महार्था मानवतिलका भवन्ति दर्शनपूताः ॥३६॥ अन्वयार्थी-( दर्शनपूताः ) शुद्ध सम्यग्दृष्टी जीव (ओज- स्तेजोविद्यावीय॑यशोद्धिविजयविभवसनाथाः) कान्ति, प्रताप- विद्या, वीर्य, कीर्ति, कुलवृद्धि, विजय विभवके स्वामी (महाकु- लाः) उच्चकुली ( महाथोः ) धर्म अर्थ काम मोक्षके साधक और (मानवतिलकाः ) मनुष्योमें शिरोमणि (भवन्ति) होते हैं । ३६ [१७] अष्टगुणपुष्टितुष्टा दृष्टिविशिष्टाः प्रकृष्टशोभाजुष्टाः । अमराप्सरसां परिपदि चिरं रमन्ते जिनेन्द्रभक्ताः स्वर्गे ॥ ३७॥ अन्वयार्थी-( दृष्टिविशिष्टाः ) सम्यग्दृष्टि जीव (स्वर्गे ) स्वर्गोमे (जिनेन्द्रभक्ताः ) जिनेन्द्रभगवानके भक्त, ( अष्टगुणपु- टितुष्टाः) अष्टऋद्धियोंसे तुष्टायमान, और (प्रकृष्टशोभाजुष्टाः) अतिशय शोभायुक्त होकर (अमराप्सरसां) देवदेवागनाओंकी (परि- पदि) सभामें (चिरं) बहुत कालपर्यंत (रमन्ते) आनन्द करते हैं ३७ नवनिधिसप्तद्वयरत्नाधीशाः सर्वभूमिपतयश्चक्रम् । वर्चयितुं प्रभवन्ति स्पष्टदृशः अत्रमौलिशेखरचरणाः॥ अन्वयाथों-(स्पष्टदृशः ) निर्मल सम्यक्त्वके वारक पुरुप ( क्षत्रमौलिशेखरचरणाः) जिनके चरणोंपर राजाओंके मुकुटोंके शिखर झुकते है ऐसे, तथा (नवनिधिसप्तद्वयरलाधीशाः) नवनिधि और चौदह रत्नोंके अधीश, (सर्वभूमिपतयः) समस्त भूमिके पति और (चक्र) चक्र (वर्तयितुं) प्रवर्तानेको (प्रभवन्ति) समर्थ होते हैं ३८ भावार्थ-सम्यग्दृष्टी पुरुष सम्यक्त्वके प्रभावसे चक्रवर्ती राजा होते हैं जिनके कि चरणों पर सव राजा मस्तक झुकाते हैं और जो नवनिधियों, चौदह रत्नों और छह खंडोंके स्वामी होते है । अमरासुरनरपतिभिर्यमधरपतिभिश्च जाः । दृष्टया सुनिश्चितार्था सुपचक्रधरा भवन्ति लोकशरण्याः ॥ ३९ ॥ नूतपादाम्भो- १ आज्ञा या चक्ररूपी रत्न । २.क प्रा.२ [१८] अन्वयार्थी-(दृष्टया) सम्यग्दर्शनके प्रभावसे ( सुनिश्चि तार्थाः) भले प्रकार निश्चय कर लिये हैं जीवादिक पदार्थ जिन्होंने ऐसे 'तथा' (अमरासुरनरपतिभिः) इन्द्र धरणांन्द्र नरेन्द्रोंकर (च) और ( यमधरपतिभिः ) गणधरोकर ( नूतपादाम्भोजाः ) नम- स्कार किये गये है चरणकमल जिनके ऐसे (वृपचक्रधराः) धर्म- चक्रके धारक तीर्थकर (लोकशरण्याः) तीनों लोकोंके जीवोंको शरणभूत (भवन्ति ) होते हैं ॥ ३९ ॥ शिवमजरमरुजमक्षयमव्यावाघं विशोकभयशङ्कम् । काष्ठागतसुखविद्याविभवं विमलं भजन्ति दर्शन- शरणाः॥४०॥ अन्वयार्थी—(दर्शनशरणाः) सम्यग्दर्शन ही है गरण जिनको ऐसे जीव (अजरं) जरारहित, (अरुज) रोगरहित, (अक्षयं) भयर- हित, ( अव्यावाचं ) वाधारहित, (विशोकभयगई) शोकभय- शकारहित, (काष्ठागतसुखविद्याविभवं) परम प्रकर्पताको प्राप्त हुआ है सुख और ज्ञानका विभव जिसमें ऐसे और (विमलं ) कर्ममल- रहित (शिवं ) मोक्षपदको ( भजन्ति ) प्राप्त होते है ॥ ४ ॥ , वसन्ततिलका। देवेन्द्रचक्रमहिमानममेयमानम् राजेन्द्रचक्रमवनीन्द्रशिरोर्चनीयम् । धर्मेन्द्रचक्रमधरीकृतसर्वलोकम् लब्ध्वा शिवं च जिनभक्तिरुपैति भव्यः॥४१॥ अन्वयार्थी—(जिनभक्तिः भव्यः) जिनेन्द्रकी है भक्ति [१९] जिसके ऐसा भन्यजीव ( अमेयमानं) अपरिमित ( देवेन्द्रचक्र- महिमानं ) देवेन्द्रसमूहकी महिमाको और (अवनीन्द्राशिरोऽ र्चनीयं ) राजाओंके मस्तकसे पूजनीय ( राजेन्द्रचक्रं ) चक्रवर्तिके चक्रको तथा ( अधरीकृतसर्वलोकं ) नीचे किया है समस्त लोक जिसने ऐसे (धर्मेन्द्रचक्र) तीर्थकर पटको (लभ्वा) प्राप्त होकर (शिवं ) मोक्षको ( उपैति ) पाना है ॥ ११ ॥ इति श्रीसमन्तभद्राचार्यविरचिते रत्नकरण्डकनानि उपासका. ध्ययने सम्यग्दर्शनवर्णनं नाम प्रथमः परिच्छेदः॥१॥ अर्थ-इसप्रकार श्रीममन्तभद्रस्वामीके रचे हुए रत्नकरण्डनामक श्रावका- चारमें सम्यदर्शनके वर्णनवाला प्रथम परिच्छेद पूर्ण हुआ ॥१॥ आर्या । सम्यगशानका लक्षण । अन्यूनमनतिरिक्तं याथातथ्यं विना च विपरीतात् । निःसन्देहं वेट यदाहुस्तज्ज्ञानमागमिनः ।। ४२ ।। अन्वयाथों-(यत्) जो ('वस्तुस्वरूपं') वस्तुके स्वरूपको (अन्यूनं ) न्यूनतारहित, (अनतिरिक्त) अधिकतारहित, (च) और (विपरीतात् विना) विपरीततारहित, (याथातथ्यं ) जैसाका तैसा, (निःसन्देह) सन्देहरहित (वेद) जानता है (तत्) उसको (आगमिनः ) आगमके ज्ञौतापुरुष (ज्ञानं ) सम्यग्ज्ञान (आहुः) कहते हैं ॥ ४२ ॥ प्रयमानुयोगका स्वरूप । प्रथानुयोगमाख्यानं चरितं पुराणमपि पुण्यम् । बोधिसमाधिनिधानं वोधति बोधः समीचीनः॥४३ ।। अन्वयायौँ-(समीचीनः वोघः ) सम्यग्ज्ञान जो है सो १ सम्यग्दृष्टी। २ गणधरादिक ।

[२०] (अर्थाख्यानं) परमार्थ विषयका अथवा धर्मअर्थकाममोक्षका है कथन जिसमें, (चरितं) एक पुरुपके आश्रय है कथा जिसमें, (पुराणं) सठ शलाकापुरुपोंका है चरित जिसमें, (अपि) और (पुण्यं) पुण्यका है आश्रय जिसमें तथा (बोधिसमाधिनिधानं ) रत्नत्रय और ध्यानका है कोष वा खजाना जिसमें ऐसे ( प्रथमानुयोगं) प्रथमानुयोगरूप शास्त्रको जानता है ॥१३॥ भावार्थ-जिसमें किसी एक उत्तम पुरुपका अथवा त्रेसठश- लाका पुरुषोंका पुण्यचरित होता है, उसे प्रथमानुयोग कहते हैं। इस प्रथमानुयोगके शास्त्रोंको उक्त प्रकारका सम्यग्ज्ञान भले प्रकार जानता है। करणानुयोगका स्वरूप । लोकालोकविभक्तेर्युगपरिवृत्तेश्चतुर्गतीनां च । आदर्शमिव तथामतिरवैति करणानुयोगं च ॥४४॥ अन्वयार्थी-( च ) और ( तथामतिः) उक्त प्रकारका सम्यग्ज्ञान ही ( लोकालोकविभक्तेः) लोक अलोकके विभागको, (युगपरिहत्तेः) युगोके परिवर्तनको (च) तथा (चतुर्गतीनां) चारों गतियोंको (आदर्श इव) दर्पणके समान प्रगट करनेवाले ( करणा- नुयागे) करणानुयोगको ( अवैति ) जानता है । चरणानुयोगका स्वरूप । गृहमेध्यनगाराणां चारित्रोत्पत्तिवृद्धिरक्षांगम् । चरणानुयोगसमयं सम्यग्ज्ञानं विजानाति ॥ ४५ ॥ १ युगोंकी अर्थात् कालकी पलटनको [२१] अन्वयाय-तथा (सम्यग्ज्ञानं) सम्यग्ज्ञान ही (गृहमेध्यन- गाराणां) गृहस्थ और मुनियोंके (चारित्रोत्पत्तिरद्धिरणांग) चारि- की उत्पत्ति, वृद्धि और रक्षाके अगभूत (चरणानुयोगसमय)चर- णानुयोग शास्त्रको (विजानाति) विशेष प्रकारसे जानता है ॥४५॥ ट्रव्यानुयोगका स्वाप । जीवाजीवसुतत्त्वे पुण्यापुण्ये च वन्धमोक्षौ च । द्रव्यानुयोगदीपः श्रुतविद्यालोकमातनुते ।। ४६ ॥ अन्वयार्थों-(द्रव्यानुयोगटीपः) द्रव्यानुयोगम्पी दीपक (जीवाजीवसुतत्त्वे) जीव अजीवरूप सुतत्त्वोंको, (पुण्यापुण्ये) पुण्य, पाप (च) और (वन्धमोक्षौ) वध, मोक्षको (च) तथा (श्रतविद्या- लोकं) भावश्रुतरूपी प्रकाशको (आतनुते) विस्तारता है ॥ ४६॥ इति श्रीसमन्तभद्रस्वामिविरचिते रत्नकरण्डकनाम्नि उपास- काध्ययने सम्यग्ज्ञानवर्णनं नाम द्वितीयः परिच्छेदः ॥२॥ अर्थ-इसप्रकार समन्तभद्रस्वामीके रचे हुए रनकरण्डनामक श्रावका चारमें सम्यग्ज्ञानके वर्णनवाला दूसरा परिन्छेद पूर्ण हुआ ॥२॥ चारित्र धारण करनेकी आवश्यक्ता । मोहतिमिरापहरणे दर्शनलाभाढवाप्तसंज्ञानः । रागद्वेपनिवृत्त्यै चरणं प्रतिपद्यते साधुः ॥४७ ।। अन्वयार्थी-(मोहतिमिरापहरणे) दर्शनमोहरूपी अधकारके नाश होने पर (दर्शनलाभात् ) सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिसे (अवाप्तसं- ज्ञानः) प्राप्त हो गया है सम्यग्ज्ञान जिसको, ऐसा जो ( साधुः) सम्यग्दृष्टि जीव है सो (रागद्वेपनिवृत्त्यै) रागद्वेषकी निवृत्ति के लिये (चरणं) सम्यक्चारित्रको (प्रतिपद्यते) धारण करता है ।। ४७॥

[२२]
भावार्थ-सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानकी प्राप्तिके पश्चात् पर-
पदार्थोंसे रागद्वेष घटानेकी इच्छासे सम्यग्दृष्टि जीवको हिंसादि
पाच पापोंका सर्वथा त्यागरूप वा एकोदेशत्यागरूप बाह्यचारित्र
( व्यवहारचारित्र ) धारण करना चाहिये ।
रागद्वेषनिवृत्तेहिंसादिनिवर्त्तना कृता भवति ।
अनपेक्षितार्थवृत्तिः कः पुरुपः सेवते नृपतीन् ॥४८॥
अन्वयार्थों-(रागद्वेपनिवृत्तेः) रागद्वेपकी निवृत्तिसे (हिंसा-
दिनिवर्तना) हिंसादि पाच पापोंसे निवृत्त हो जाना (कृता भवति)
संपादित होता है । क्योंकि (अनपेक्षितार्थवत्तिः) नहीं है आजीवि-
काकी इच्छा जिसको ऐसा (कः पुरुषः) कौन पुरुप है जो (नृप-
तीन् ) राजाओंकी (सेवते) सेवा करे ? ॥ ४८॥
भावार्थ-जैसे जिसको आजीविकाकी इच्छा नहीं होती है वह
किसी राजाकी सेवा नहीं करता है, उसी प्रकारसे जिसके रागद्वेष
नष्ट हो जाते हैं वह हिंसादि पापोंमें प्रवृत्त नहीं होता है।
चारित्रका स्वरूप ।
हिंसानृतचौर्येभ्यो मैथुनसेवापरिग्रहाभ्यां च ।
पापप्रणालिकाभ्यो विरतिः संज्ञस्य चारित्रम् ॥ ४९ ॥
अन्वयार्थी-(हिंसानृतचौर्येभ्यः) हिंसा, असत्य, चोरी (च)
तथा (मैथुनसेवापरिग्रहाभ्यां) मैथुनसेवा और परिग्रह (एतेभ्यः)
इन पाचों (पापप्रणालिकाभ्यः) पापकी प्रणालियोंसे (विरातिः)
विरक्त होना (संज्ञस्य ) सम्यग्ज्ञानीका (चारित्रं) चारित्र है ॥१९॥

[२३] चारित्रके भेट। सकलं विकलं चरणं तत्सकलं सर्वसंगविरतानाम् । अनगाराणां विकलं सागाराणां ससंगानाम् ॥ ५० ॥ अन्वयार्थों-(तत् चरणं) वह चारित्र (सकलं विकलं ) सकल और विकल ('द्विभेदरूपं' ) दो प्रकारका है (तस्मिन्मध्ये) तिनमेंसे (सर्वसंगविरतानां) समस्त प्रकारके परिग्रहोंसे विरक्त (अन- गाराणां) मुनियोंका तो (सकलं) सकल चारित्र है और (ससंगानां) गृहादि परिग्रहसहित (सागाराणां) गृहस्थोंका (विकल ) विकल चारित्र ('भवति' ) है ॥ ५० ॥ श्रावकाचारके भेट! गृहिणां त्रेधा तिष्ठत्यणगुणशिक्षात्रतात्मकं चरणम् पञ्चत्रिचतुर्भेदं त्रयं यथासवथमाख्यातम् ॥ ५१ ॥ अन्वयार्थों-(गृहिणां) गृहस्थोंका (चरणं) चारित्र (अणु- गुणशिक्षावतात्मकं ) अणुव्रत, गुणव्रत और शिक्षाव्रतरूप (धा) तीन प्रकारका (तिष्ठति ) है और ('तत् त्रयं' ) वह तीन प्रकारका चारित्र ( यथासंख्यं )कमसे (पञ्चत्रिचतुर्भेदं) पाच, तीन और चार इसप्रकार बारह भेदरूप ( आख्यात ) कहा गया है ।। ५१ ॥ अणुमतका स्वरूप। प्राणातिपातवितथव्याहारस्तेयकाममूछेभ्यः । स्थूलेभ्यः पापेभ्यो व्युपरमणमणुव्रतं भवति ।। ५२ ।। (१) चोवीसप्रकारके । (२) पाच पापोंका मवंथा त्यागरूप चारित्र । (३) पाच पापोंका एकोदगत्यागरूप । ( ४ ) यह प्रथ गृहस्योंके आचारका है, इसकारण मुनिक चारित्रका व्याख्यान न करके एकोदेशत्यागरूप गृहस्थके चारित्रका ही वर्णन किया जाता है।

[२४]
अन्वयार्थों-(प्राणातिपातवितथव्याहारस्तेयकाममूर्छ-
भ्यः ) हिंसा, असत्य, चोरी, काम ( कुशील ) और मूर्छा अर्थात्
परिग्रह ( 'एभ्यः ) इन ( स्थूलेभ्यः पापेभ्यः ) स्थूल पापोंसे
( व्युपरमणं ) विरक्त होना ( अणुव्रतं ) अणुव्रत (भवति)
है।। २ ॥
अहिंसा अणुव्रतका स्वरूप ।
सङ्कल्पात्कृतकारितमननाद्योगत्रयस्य चरसत्त्वान् ।
न हिनस्ति यत्तदाहुः स्थूलवधाद्विरमणं निपुणाः ।। ५३ ।।
अन्वयार्थी-(योगत्रयस्य संकल्पात् ) मनवचनकायके सक-
ल्पसे और (कृतकारितमननात् ) कृत कारित अनुमोदनासे (चर-
सत्त्वान् ) त्रस अर्थात् दोइन्द्रिय, तेन्द्रिय चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय
जीवोंको (यत्) जो (न हिनस्ति) नहीं हनता है (तत्) उस क्रियाको
(निपुणः) गणधरादि निपुण पुरुप (स्थूलवधाद्विरमणं) स्थूल हिं-
सासे विरक्त होना अर्थात् अहिंसाणुव्रत (आहुः ) कहते है ॥ ५३ ।।
अहिंसाणुव्रतके पाच अतीचार ।
छेदनवन्धनपीडनमतिमारारोपणं व्यतीचाराः।
आहारवारणापि च स्थूलवधादव्युपरतेः पञ्च ॥ ५४ ।।
अन्वयार्थी-(छेदनवन्धनपीडन) १ छेदना, २ बाधना, ३
पीड़ा देना, (च) तथा (अतिभारारोपण) ४ बहुत भार लादना,
(अपि) और (आहारवारणा) ५ आहार देनेमें त्रुटि करना ('एते'
पश्च ) ये पाच ( स्थूलवधाव्युपरतेः ) स्थूलहिंसात्यागके अर्थात्
अहिंसाणुव्रतके ( व्यतीचारः ) अतिचार ('सन्ति' ) है ॥५४॥

[२५] सत्यापुवतन्नास्वरूपा स्थलमलीकं न वदति न परान् वाटयति सत्यमपि विपदे । यत्तद्वदन्ति सन्तः स्थूलमृपावादवैरमणम् ।। ५५ ।। अन्वयायौं-( यत् ) जो (स्थूलं अलोकं ) स्थूल झूठ(न वदति)न तो आप बोले और (न परान्) न दृमरोंसे (वादयति) वुलवावे तया (विपढे) विपत्तिके लिये अर्थात् जिस वचनमे किसीको आपदा आ जावे उसके अर्थ (सत्यं अपि) यथार्थ मी ('न वढात न परान् वादयति' ) न आप बोले और न दूसरोंसे बुलवावे, (तत्) उसको (सन्तः) सत्पुरुष (स्थूलमृपावादरमण) स्थूल झूठ वचनसे विरक्त होना अर्थात् सत्याणुव्रत(वटन्ति ) कहते हैं ॥५२॥ मत्याणुव्रतके पाच अतीचार । परिवादहोभ्याख्या पैशून्यं कूटलेखकरणं च । न्यासापहारितापि च व्यतिक्रमाः पञ्च सत्यस्य ।। ५६ ।। अन्वयाथों-(परिवादरहोभ्याख्या ) मिथ्या उपदेश देना, किसीके गुप्त रहस्यको प्रगट करना, ( पैशून्यं ) चुगली वा निंदा करना, (च) तथा ( कूटलेखकरणं) झूठी वात लिखना ( अपि च ) और ( न्यासापहारिता ) किसीकी धरोहरको हेरना ('एते' पश्च ) ये पाच ( सत्यस्य ) सत्याणुव्रतके ( व्यतिक्रमा ) अती- चार ) ('सन्ति' ) हैं ॥ ५६ ।। (१)गणधरादिक । (२) अगविकारभ्रूक्षेपादिसे किमीका गुम अभिप्राय जानकर निंदापूर्वक प्रगट करना, इसको माकारमत्रभेद भी कहते हैं । (३) क्सिाने गहने वा रुपये वगैरह अनामत रक्खे हो और लेते समय गिनती में उसने भूलने कुछ स्म मागे हों, तो अपने याद रहते हुए भी 'हा इतने हीयेमोले जाओ' इत्यादि कहना।

[२६] अचौाणुव्रतका स्वरूप । निहितं वा पतितं वा सुविस्मृतं वा परस्वमविसृष्टं । न हरति यन्न च दत्ते तदकुशचौर्य्यादुपारमणम् ॥ ५७ ॥ अन्वयार्थी-(यत् ) जो (निहित) रक्खे हुए (वा) तथा ( पतितं ) गिरे हुए (वा) अथवा (सुविस्मृतं) भूले हुए (वा) अथवा (अविस्मृष्टं) धरोहर रक्खे हुए (परस्वं) परद्रव्यको (न) नहीं ( हरति ) हरता है (च) और ( न ) न ('अन्यस्मै) दूस- रोको (दत्ते) देता है (तत्) सो (अकृशचौर्यात् ) स्थूलचोरीसे ( उपारमणं) विरक्त होना अर्थात् अचार्याणुव्रत( 'भवति') है।५८॥ अचौय्यांणुव्रतके पाच अतीचार । चौरपयोगचौरार्थादानविलोपसदृशसन्मिश्राः। हीनाधिकविनिमानं पञ्चास्तेये व्यतीपाताः ॥ ५८ ॥ अन्वयाौँ–(चौरपयोगचौरार्थादानविलोपसदृशसन्मि- श्राः ) चोरीका उपाय बताना, चोरीका द्रव्य लेना, राजाकी आज्ञाका उल्लघन करना, अधिक मूल्यकी वस्तुमें हीन मूल्यकी वस्तु मिलाकर चला देना और ( हीनाधिकविनिमानं ) नापने तोलनेके गज, बॉट, तराजू आदिक हीनाधिक रखना, ('एते' ) ये (पञ्च ) पाँच ( अस्तेये व्यतीपाताः) स्थूलचोरीके त्यागमें अर्थात् अचौर्याणु- व्रतमें अतीचार ('सन्ति' ) हैं ।। ५९ ॥ परदारनिवृत्तिअणुव्रतका स्वरुप । न तु परदारान् गच्छति न परान् गमयति च पापभीतेर्यत् । सा परदारनिवृत्तिः स्वदारस- न्तोषनामापि ॥ ५९॥ . ,

[२७]
अन्वयाथों-(यत) जी (पापभीतेः) पापके भयने (न तु)
न तो (परदारान् ) परस्त्रीके प्रति ( गच्छति ) गमन कर (च)
और ( न परान्) न दूसरांको ( गमयति ) गमन करावे (सा)
वह (परदारनिवृत्तिः) परस्त्रीत्याग ( अपि) तथा ( स्वदार-
सन्तापनाम ) स्वदारसंतोष नामक अणुव्रत ( 'भवति' )
है ॥ ५९ ॥
भावार्थ-जो पुरुष न तो आप परस्त्रीके पास जाता है और
न दूसरोंको ले जाता है, उसको परस्त्रीत्यागी वा स्वदारसनोपी
कहते हैं ॥ ५९॥
परस्त्रीत्याग व्रत पाँच अतीवार ।
अन्यविवाहाकरणानङ्गक्रीडाविटत्वविपुलतृपः।
इत्वरिकागमनं चास्मरस्य पञ्च व्यतीचाराः ॥ ६० ॥
अन्वयायौँ- ( अन्यविवाहाकरणानंगक्रीडाविटत्वविपुल-
तुपः) दूसरेका विवाह कराना, कामसेवनके अगोंसे भिन्न अड्डोंके द्वारा
कामक्रीड़ा करना, भण्डवचन बोलना, स्वस्त्रीके सेवनमें भी अतिशय
इच्छा रखना, (च) और (इत्वारिकागमनं ) व्यभिचारिणी
स्त्रीके यहाँ जाना ('एते' ) ये (पञ्च) पाच (अस्मरस्य) परस्त्रीत्या-
गके ( व्यतीचाराः) अतीचार ('सन्ति' ) हैं ॥ ६० ॥
परिग्रहपरिमाणवतका स्वरूप ।
धनधान्यादिग्रन्थं परिमाय ततोऽधिक निःस्पृ-
इता । परिमितपरिग्रहः स्यादिच्छापरिमाण-
नामापि ॥ ६१॥

[२८] अन्वयार्थी-(धनधान्यादिग्रन्थं ) धनधान्यादि दश प्रकारके परिग्रहको (परिमाय ) परिमित करके अर्थात् उसका प्रमाण करके कि इतना रक्खेगे (ततः अधिकेपु) उससे अधिकमें (निःस्पृहता) इच्छा नहीं रखना ( परिमितपरिग्रहः) परिग्रहपरिमाणवत (स्यात) है तथा यह (इच्छापरिमाण नाम अपि ) इच्छापरिमाण नामका व्रत भी ( 'उच्यते ) कहा जाता है ।। ६१ ॥ भावार्थ-आवश्यकीय धनधान्यादि पदार्थोंका परिमाण करके बाकीके छोड देना, इसको परिग्रहपरिमाणव्रत कहते हैं ।। ६१ ॥ परिग्रहपरिमाणवतके पाच अतीचार । अतिवाहनातिसंग्रहविस्मयलोभातिभारवहनानि । परिमितपरिग्रहस्य च विक्षेपा पञ्च लक्ष्यन्ते ।। ६२ ॥ अन्वयार्थों-(अतिवाहनातिसंग्रहविस्मयलोभातिभारवह- नानि) प्रयोजनसे अधिक सवारी रखना, आवश्यकीय वस्तुओंका अतिशय संग्रह करना, परका विभव देख आश्चर्य करना, बहुत लोभ और बहुत भार लादना, ( 'एते' ) ये ( पञ्च ) पांच (परिमितपरिग्रहस्य ) परिग्रहपरिमाणव्रतके (विक्षेपाः) अतीचार (लक्ष्यन्ते ) कहे जाते हैं ॥ ६२ ॥ पञ्चाणुव्रत धारनेका फल। पञ्चाणुव्रतनिधयो निरतिक्रमणाः फलन्ति सुरलोकं । यत्रावधिरष्टगुणा दिव्यशरीरं च लभ्यन्ते ।। ६३ ।। अन्वयार्थों-(निरतिक्रमणाः) अतीचाररहित (पञ्चाणुव्र- रखना, १ दोपरहित ।

[२९]
तनिधयः) पाच अणुव्रतरूपी निधियां (सुरलोकं) उस स्वर्गलोकको
( फलन्ति ) फलती हैं ( यत्र) जिसमें ( अवधिः ) अवधिज्ञान,
(अष्टगुणा:) अणिमा महिमादि आठ ऋद्धिया (च) और (दिव्य-
शरीरं ) मनोहर गरीर (लभ्यते) प्राप्त होता है ।। ६३ ॥
पञ्चाणुव्रतधारियोंमें जगत्प्रसिद्ध होनेवालॉक नाम ।
मातंगो धनदेवश्च वारिपेणस्ततः परः ।
नीली जयश्च संप्राप्ता पूजातिशयमुत्तमम् ॥६॥
अन्वयार्थी-( मातंगः) अहिंसाणुव्रतमें यमपालनामा चाडाल
(च) और (धनदेवः ) मत्याणुव्रतमें धनदेव शेठ (ततः परः) तत्प-
श्चात् अचौर्याणुव्रतमें ( वारिपेण ) श्रेणिक राजाका पुत्र वारिपेण,
(नीली ) ब्रह्मचर्य्यव्रतमें नीली नामकी वणिक्पुत्री (च)
और ( जयः ) परिग्रहपरिमाणत्रतमें जयकुमार नामा राजपुत्र ( उत्तम
पूजातिगयं ) उत्तमपूजाके अतिशयको अर्थात् पूज्यपदको ( संमा-
साः) प्राप्त हुए।। ६४ ॥
हिंसादि पाच पापोंमें प्रसिद्ध होनेवालोंक नाम ।
धनश्रीसत्यघोपौ च तापसारक्षकावपि ।
उपाख्येयास्तथा श्मश्रुनवनीतो यथाक्रमम् ।। ६५ ।।
अन्वयार्थी-(धनश्रीसत्यघोपौ ) हिंसामें धनश्री नामकी
सेठानी, असत्यमें सत्यघोप अर्थात् श्रीमूति नामक पुरोहित (च) और
( तापसारक्षको) चोरीमें तापसी, कुशीलमें यमदण्ड नामक कोत-
वाल (अपि) और ( तथा ) इसीप्रकारले परिग्रहकी तृष्णामें
( श्मश्रुनवनीतः ) श्मश्रुनवनीत नामका वैश्य (यथाक्रम)
यथाक्रमसे ( उपाख्येयाः ) कहे गये हैं ॥ ६५ ॥

[३०]
श्रावककै अष्ट मूलगुण।
मद्यमांसमधुत्यागैः सहाणुव्रतपञ्चकम् ।
अष्टौ मूलगुणानाहुहिणां श्रमणोत्तमाः ॥६६॥
अन्वयार्थी-(मद्यमांसमधुत्यागैः) मद्य मास और मधुके त्याग
(सह) सहित (अणुव्रतपञ्चकम्) पाचों अणुवतोंको (श्रमणोत्तमाः)
श्रेष्ठ मुनिराज ( गृहिणां ) गृहस्थोंके (अष्टौ) आठ ( मूलगुणान् )
मूलगुण ( आहुः ) कहते हैं ।। ६६ ॥
इति श्रीसमन्तभद्रस्वामिविरचिते रत्नकरण्डकनाम्नि उपास.
काध्ययने अणुव्रतवर्णनं नाम तृतीयः परिच्छेदः ॥ ३ ॥
अर्थ-इस प्रकार श्रीसमतभद्रस्वामांके बनाये हुए रत्नकरडश्रावकाचारमें
अणुव्रतवर्णनवाला तीसरा परिच्छेद पूर्ण हुआ ॥३॥
तीन गुणव्रतोंके नाम।
दिग्वतमनर्थदण्डव्रतं च भोगोपभोगपरिमाणम् ।
अनुबृंहणागुणानामाख्यान्ति गुणवतान्यायः ॥६॥
अन्वयार्थों-(आUः) श्रेष्ठ पुरुष अर्थात आचार्य (गुणानां)
गुणोंके ( अनुबृहणात् ) बढानेसे (दिग्वतं) दिग्वत, (अनर्थदण्ड-
व्रत) अनर्थदण्डव्रत (च) और (भोगोपभोगपरिमाणं) भोगोपभो-
गपरिमाण व्रतको ( गुणव्रतानि ) गुणव्रत (आख्यांति) कहते हैं ।
दिग्व्रतकास्वरूप!
दिग्वलयं परिगणितं कृत्वातोऽहं वहिर्न यास्यामि ।
इति सङ्कल्पो दिग्व्रतमामृत्यणुपापविनिवृत्त्यै ॥ ६८ ॥

[३१] मे अन्वयार्थी-(आमृत्यणुपापविनिय) मरणपर्यन्त मून पापोंकी निवृत्ति के लिये (दिग्वलयं) दिल्लय अर्थात् दौदियाओंका (परिगणिनं कृत्वा) परिमाण करके (अतः बहिः) टसने वाहा (अहं) (न यास्यामि) नहीं जाऊंगा (इति सङ्कल्प) इन प्रकार नकल्प करना निश्चय करना सौ (दिव्रत) दिन्नत ('अस्ति) है ।। ६८ ॥ दिग्त्रत धारण करनेकी मयांदा । मकराकरसरिटटवीगिरिजनपढयोजनानि मर्यादाः । पाहुर्दिशां दशानां प्रतिसहारे प्रसिद्धानि॥६९॥ अन्वयार्थी-(दगानां) दशों (दिशा) दिगाओंके ( प्रति- संहारे ) त्याग ( प्रसिद्धान) प्रसिद्ध ( मकराकरसरिट्ट- वीगिरिजनपदयोजनानि) समुद्र नही, अटवी, पर्वत. देश, और योजन, पर्वतकी ( मर्यादाः ) मर्यादा (पाहुः) कही है ॥६९॥ दिग्वत धारण करनेका फ्ल। अवघेर्वहिरणुपापप्रतिविग्तेटिंग्वतानि धारयताम् । पञ्चमहाव्रतपरिणतिमणुव्रतानि प्रपद्यन्ते ।। ७० ॥ अन्वयार्थी-(अवधः वादिः) मर्यादासे बाहर (अणुपापप्र- तिविरतः) मूत्म पापोंकी निवृत्ति होनेते (दिव्रतानि धारयतां) दिग्वतधारियोंके (अणुव्रतानि) अणुव्रत ( पञ्चमहाव्रतपरिणति) पञ्चमहाव्रतोंकी सदृशताको (प्रपद्यन्ते ) प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७० ॥ (१) मीलोंके सदृश योजनाले यम । (२) हद्द । (३) न्याग ।

[३२] भावार्थ:-दिग्वतधारी अपनी की हुई मर्यादामें तो श्रावक हैं, परन्तु मर्यादासे बाहर न जानेसे वहापर कोई भी पाप नहीं करते, इसकारण वे मर्यादासे बाहर मुनिके समान सर्वत्यागी हैं ॥ ७० ॥ 2 मयादाके वाहर गुणवत' साक्षात् महानत क्यों नहीं होते ? इसका उत्तर । पत्याख्यानतनुत्वान्मन्दतराश्चरणमोहपरिणामाः। सत्त्वेन दुरवधारा महाव्रताय प्रकल्प्यन्ते ॥७१॥ अन्वयार्थों-( प्रत्याख्यानतनुत्वात् ) प्रत्याख्यानावरणीय- क्रोधमानमायालोभके मंद होनेसे ( मन्दतराः ) अतिशय मदरूप ( चारित्रमोहपरिमाणाः) चारित्रमोहनीयके परिणाम ( महा- व्रताय प्रकल्प्यन्ते ) महाव्रतकी कल्पना उत्पन्न करते हैं, अर्थात् महाबत सरीखे प्रतीत होते हैं । और ('ते') वे (परिणामाः) भाव ( सत्त्वेन ) सत्तासे (दुरवधाराः) वडे कष्टसे जाननेमें आने योग्य ( 'सन्ति' ) हैं, अर्थात् वे कपायपरिणाम इतने सूक्ष्म होते है कि उनका आस्तित्व भी कठिनतासे प्रतीत होता है ॥ ७१ ॥ संस्कृतटीका-चरणमोहपरिणामा. भावरूपाचारित्रमोहपरिणतय. कल्प्य. न्त उपचर्यन्ते । किमर्य महाव्रतनिमित्त । कथभूता सन्त सत्त्वेन दुरवधारा, अस्तित्वेन महता कष्टनावधार्यमाणा सन्तोऽपिते अस्तित्वेन लक्षयतु न शक्यन्त इत्यर्थ । कुतस्ते दुरवधारा ? मन्दतरा अतिशयेनानुत्कटा । मन्दतरत्वमप्येषा कुंत. ? प्रत्याख्यानतनुत्वात प्रत्याख्यानशब्देन प्रत्याख्यानावरणा द्रव्यशोध- मानमायालोमा गृह्यन्ते। “नामैकदेशे हि प्रवृत्ता शब्दा नाम्न्यपि प्रवर्तन्ते भी.

[३३] मादिवत्" प्रत्याच्याने हि माकल्येन हिमादिविरतिलक्षणःमयम. । तदायण्वन्ति ये ते प्रन्याख्यानावरणा द्रव्यकोधादयः। यदुदये यात्मा कात्न्यात्तद्विरति कत्तु न श. क्रोति ।अती द्रव्यरूपादीनाक्रोधादीना तनुत्वान्मन्दोदयत्वादावरूपाना मन्दतरत्व सिद्धम् । ननु फुत्तस्ते महावताय कल्प्यन्ते न तु साक्षान्महानतरूपा भवन्तीत्याह । महाव्रतका स्वरूप । पञ्चानां पापानां हिंसादीनां मनोवचःकायैः । कृतकारितानुमोदैत्यागस्तु महाव्रत महताम् ॥ ७२ ॥ अन्वयार्थी-(हिंसादीनां ) हिंसादिक ( पञ्चानां ) पांचों (पापानां) पापोंका (मनोवचःकायैः) मन वचन काय (तु) और ( कृतकारितानुमोदैः) कृत कारित अनुमोदनासे (त्यागः) त्याग करना सो ( महतां ) महापुरुषोंका (महाव्रतं ) महाव्रत है ॥ ७२ ॥ दिग्दतके अतीचार। उर्धाधस्तात्तिर्यग्व्यतिपाताः क्षेत्रवृद्धिरवधीनाम् । विस्मरणं दिग्विरतरत्याशाः पञ्च मन्यन्ते ॥ ७३ ॥ अन्वयार्थी-( उधिस्तात्तिर्यग्व्यतिपाताः ) अज्ञान वा प्रमादसे ऊपरकी, नीचेकी तथा विदिशाओंकी मर्यादाका उल्लं- धन करना (क्षेत्रवृद्धिः ) क्षेत्रकी मर्यादा बढ़ा लेना और (अवधीनां विस्मरण ) की हुई मर्यादाओंको भूल जाना ('एते') ये (पञ्च) पाच (दिग्विरतेः ) दिग्वतके (अत्याशाः) अतीचार (मन्यन्ते) माने गये हैं ॥ ७३ ॥ अनर्थदण्डव्रतका स्वरूप। अभ्यन्तरं दिगवधेरपार्थिकेभ्यः सपापयोगेभ्यः । विरमणमनर्थदण्डव्रतं विदुव्रतधराग्रण्यः ॥ ७४ ॥ र.क.पा. 3 [३] अन्वयाथी-(दिगवधेः) दिशाओंकी मर्यादाके ( अभ्य- न्तरं ) भीतर भीतर ( अपार्थिकेभ्यः) प्रयोजनरहित (सपापयो- गेभ्यः) पापके कारणोंसे (विरमणं) विरक्त होनेको (व्रतधरा- ग्रण्यः) व्रतधारियोंमें अंग्रगण्य पुरुष ( अनर्थदण्डव्रतं ) अनर्थ- दण्डवत (विदुः) कहते हैं ॥ ७४ ॥ अनर्थदण्डके पाच भेद । पापोपदेशहिंसादानापध्यानदुःश्रुतीः पञ्च । पाहुः प्रमादचामनर्थदण्डानदण्डघराः ।।७५ ॥ अन्वयार्थों-( अदण्डधरा) देण्डको नहीं धरनेवाले गण- धरादिक आचार्य ( पापोपदेशहिंसादानापध्यानदुःश्रुतीः ) पा- पोपदेश, हिंसादान, अपध्यान, दुःश्रुति और (प्रमादचर्याम् ) प्रमादचा ('एतान्' ) इन (पञ्च) पाच ( अनर्थदण्डान् ) अनर्थदण्डोंको (प्राहुः) कहते हैं ।। ७५ ॥ पापोपदेशनामा अनर्थदण्ड । तिर्यक्क्लेशवणिज्याहिंसारम्भमलम्भनादीनाम् । कथाप्रसङ्गप्रसवः स्मर्त्तव्यः पाप उपदेशः ।। ७६ ॥ अन्वयार्थी- (तिर्यक्क्लेशवणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादी- नां) तिर्यंचोंको क्लेश पहुंचानेवाली तथा वाणिज्य, हिंसा, आरंभ ठगाई आदिकी (कथाप्रसङ्गमसवः) कथाओंके प्रसङ्गके उठानेको (पापः उपदेशः) पापोपदेशनामा अनर्थदण्ड (स्मर्त्तव्यः) जानना चाहिये || ७६ ॥ (१) तीर्थंकर गणधरादिक । (२) अशुभमनोवचनकायरूप दड । (३) 'प्रसवकथाप्रसङ्गः' ऐसा भी पाठ है।

[३५] हिंसादाननामा अनर्यटट। परशुकृपाणखनित्रज्वलनायुधगद्गशृङ्खलादीनाम् । वघहेतूनां दानं हिंसादानं सुवन्ति बुधाः ॥ ७७ ।। अन्वायायौं-(परशुकृपाणखनित्रज्वलनायुधशृङ्गशृङ्खला- दीनां ) फरसा, तलवार, खनित्र, अग्नि, आयुध, सींगी, शाकल, आदि ( वधहेतूनां ) हिंसाके कारणोंके (दानं ) देनेको (बुधाः) पडितजन ( हिंसाठानं ) हिसादान नामा अनर्थदण्ड (ब्रुवन्ति ) कहते हैं || ७७॥ अपघ्याननामा अनर्थदड । वधवन्धच्छेदाटे पादागाच परकलत्रादेः। आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदा॥७८॥ अन्वयार्थों-(जिनशासने) जिनमतमें ( विशदाः) जो पुरुष निर्मल अर्थात् प्रत्रीण हैं वे (द्वैपात्) द्वेषसे (च) अथवा (रागान्) रागसे ( परकलत्रादेः ) अन्यकी स्त्री आदिके (वधवन्धच्छेदादेः) नाश होने, बंधे होने, कट जाने आदिके (आध्यानं ) चितवन करनेको ( अपध्यानं ) अपध्याननामा अनर्थदड (गासति) कहते हैं ।। ७८ ॥ दु:श्रुतिनामा अनर्थदद। आरम्भसगसाहसमिथ्यात्वद्वेपरागमदमदनः । चेतःकलुपयतां श्रुतिवरधीनां दुःश्रुतिर्भवति ॥ ७९ ॥ (१) जमीन सोदनेके अन्न फावड़ा सुनीता वगैरह । (२) कैद होने ।

[३६] अन्वयायौँ-( आरम्भसगसाहसमिथ्यात्वद्वेपरागमदन- दनैः ) आरभ, परिग्रह, साहस, मिथ्यात्व, द्वेष, राग, मैट और मंदन इनसे (चेतःकलुपयतां) चित्तको मैले करनेवाले (अव- धीनां ) शास्त्रोका ( श्रुतिः ) सुनना सो ( दुःश्रुतिः ) दु.श्रुति- नामा अनर्थदड ( भवति ) है ॥ ७९ ॥ प्रमाटचर्यानामा अनर्थदड । , - क्षितिसलिलदहनपवनारम्भं विफलं वनस्पतिच्छेदं । सरणं सारणमपि च प्रमाढचर्या प्रभापन्ते ॥८॥ अन्वयार्थों-(विफलं ) विना प्रयोजन (मितिसलिलदह- नपवनारम्भ ) पृथिवी, जल, अग्नि और पवनके आरंम करने, (वनस्पतिच्छेद ) वनस्पतिके छेदने, (सरणं) पर्यटन करने (च) और (सारणं अपि) दूसरेको पर्यटन करानेको भी (प्रमाद- चाँ) प्रमादचर्या नामा अनर्थदड (प्रभापन्ते ) कहते है ॥८॥ अनर्थदडव्रतके अतिचार । कन्दर्प कौत्कुच्यं मौखर्यमतिप्रसाधनं पञ्च । असमीक्षय चाधिकरणं व्यतीतयोऽनर्थदण्डकृद्विरतेः ।। अन्वयार्थों--(कन्दर्प ) रागसे हास्यमिश्रित भडवचन बोलना, (कौत्कुच्यं) कायकी कुचेष्टा करना, (मौख) वृधा वकवाद करना, ( अतिप्रसाधनं ) व्यर्थ ही भोगउपभोगकी सामग्री बढाना, (च) और ( असमीक्ष्य अधिकरणं) प्रयोजनकी जाच किये बिना ही करना अथवा प्रयोजन रहित अधिकताके साथ मनवचनकायको प्र- (१) गर्व । (२) कामदेव ।

[३७] वर्ताना ('एते') ये ( पञ्च ) पाच (अनर्थदण्डकृतिरतेः) अनर्यद- ण्डत्याग नामक गुणवतके (व्यतीतयः) अतीचार ('सन्ति') हैं ८१ भोगापभोगपरिमाणवतका स्वरूप । अक्षार्थानां परिसंख्यानं भोगोपभोगपरिमाणम् । अर्थवतामप्यवधौ रागरतीनां तनूकृतये ॥ ८२ ॥ अन्वयार्थी-(सगरतीनां ) रागादिभावोंको ( तनूकृतये) घटानेके अर्थ ( अवधौ अपि ) परिग्रहपरिमाणवतकी मर्यादामें भी (अर्थवता) प्रयोजनभूत(अक्षार्थानां)इन्द्रियोंके विपयोंका (नित्यं) प्रतिदिन (परिसंख्यानं ) परिमाण करना ( भोगोपभोगपरि- माणे) भोगोपभोगपरिमाण व्रत (उच्यते' ) कहा जाता है।।८२॥ भोग और उपभोगका निर्णय । भुक्त्वा परिहातव्यो भोगो भुक्त्वा पुनश्च भोक्तव्यः । उपभोगोऽशनवसनमभृतिः पञ्चेन्द्रियो विपयः ।।८३।। अन्वयार्थों-(अशनवसनमभृतिः) भोजन वस्त्रादिक (पञ्चे- न्दियः विपयः ) पचेंद्रियसबधी विषय जो (भुक्त्वा)भोग करके (परिहातव्यः) फिर त्याग दिये जाते हैं अर्थात् फिर नहीं भोगे जाते हैं वे तो ( भोगः ) भोग है ( च ) और ( भुक्त्वा ) भोग करके (पुनः भोक्तव्यः) फिर भी भोगने योग्य हों वे (उपभोगः) उपभोग ( 'अस्ति' ) हैं ॥ ८३ ॥ (१) 'श्रावकोंको ऐसा भी अर्थ होता है।

[३८] भोगोपभोगपरिमाणव्रतमें विगेप त्याग । त्रसहतिपरिहरणार्थ क्षौद्रं पिशितं प्रमादपरिहतये । मद्यं च वर्जनीयं जिनचरणौ शरणमुपयातैः ।।८४॥ अन्वयार्थी-( जिनचरणौ शरणं उपयातैः ) जिनेन्द्रमग- वानके चरणोंकी शरणमें आनेवाले मनुष्यों करके (सहतिपरिहर- णार्थ ) त्रस जीवोंकी हिंसाके निवारणार्थ (क्षौद्र) मधु, (पिशित) मांस (च) और (प्रमादपरिहतये) प्रमाद दूर करनेके लिये(मय) मदिरा ( वर्जनीयम् ) त्याग देने योग्य है ।। ८४ ॥ अल्पफलवहुविधातान्मूलकमाणि शृङ्गवेराणि । नवनीतनिम्बकुसुमं कैतकमित्येवमवहेयम् ।। ८५ ॥ अन्वयार्थी-(अल्पफलबहुविघातात् ) फल थोड़ा परन्तु त्रसहिंसा अधिक होनेसे ( आाणि ) गीले अर्थात् सचित्त (शृङ्गवेराणि ) अदरख, (मूलक) मूली, गाजर, (नवनीतनिम्ब- कुसुम) मक्खन, नीमके पुष्प, (कैतक) केतकीके फूल (इति एवं) इत्यादि सब वस्तुएं ( अवहेयं ) छोडने योग्य हैं ।। ८५ ॥ नतका लक्षण। यदनिष्टं तब्रतयेद्यच्चानुपसेव्यमेतदपि जह्यात् । अभिसन्धिकृता विरतिविषयायोग्राद्रद्वतं भवति ॥८६॥ अन्वयार्थी--(यत) जो ( अनिष्ट) अनिष्ट अर्थात् हानिकारक है (तत्) वह (व्रतयेत) छोडे (च) तथा ( यत् ) जो (अनुप- (१) विना पके हुए अप्रासुक । (२) उपलक्षणसे अन्य सब प्रकारके फूल भी अभक्ष्य समझना चाहिये।

[३९] सेव्यं ) उत्तमकुलके सेवन करने योग्य नहीं ( एतदपि) वह भी ( जगात् ) छोडे, क्योंकि (योग्यात् विपयात् ) योग्य विपर्योसे (अभिसन्धिकृता) अभिप्रायपूर्वक किया हुआ ( विरतिः ) त्याग (व्रतं ) व्रत (भवति ) है ॥ ८६ ॥ यमनियमरूपततका स्वरूप । नियमो यमच विहितों द्वेधा भोगोपभोगसंहार । नियमः परिमितकालो यावज्जीवं यमो ध्रियते ।। ८७।। अन्वयार्थी-(भोगोपभोगसंहारे, ) भोगोपमोगके त्यागमें (नियमः ) नियम (च) और (यमः) यम द्विषा) दो प्रकारका त्याग (विहिती ) विधान किया गया है। जिस त्यागमें (परिमि- तकालः) कालकी मर्यादा है वह तो (नियमः ) नियम है और जो (यावजी ) जीवनपर्यन्त (भियते ) धारण किया जाता है वह ( यमः ) यम है ।। ८७ ॥ नियम करने की विधि भोजनवाहनशयनम्नानपवि रागकुसुमेपु,। ताम्बूलवसनभूपणमन्मथसंगीतगीतेषु ।। ८८ ॥ अद्य दिवा रजनी वा पक्षो मामस्तयत्तुरयनं वा । इति कालपरिच्छित्त्या प्रत्याख्यानं भवेनियमः।।८९||

[४०]
-
अन्वयार्थी-(भोजनवाहनशयनम्नानपवित्रागरागकुमुमे-
पु) भोजन, सवारी, शयन, स्नान, कुंकुमादि लेपन, ( ता-
म्बूलवसनभूपणमन्मथसङ्गीतगीतेपु), ताम्बूल, वस्त्र, अलकार,
कामभोग, सगीते और गीत इन विषयोंमें ( अद्य ) बड़ी,
पहर, ( दिवा ) एक दिन ( वा ) अथवा ( रजनी )
एक रात, (पक्षः) एक पक्ष (मासः) अथवा एक मास, (तथा)
तैसे ही (ऋतुः) दो मास (वा ) अथवा ( अयनं ) यह मास
(इति ) इस प्रकार (कालपरिच्छित्या) काटके विभागसे
(प्रत्याख्यानं ) त्याग करना सो ( नियमः ) नियम ( भवेत)
है ॥ ८८-८९ ॥
भोगोपभोगपरिमाणवतके अतीचार ।
विपयविपतोऽनुपेक्षानुस्मृतिरतिलौल्यमति-
तृपाऽनुभवो। भोगोपभोगपरिमान्यतिक्रमा
पञ्च कथ्यन्ते ।। ९०॥
अन्वयार्थी-(विपयविपतः) विपयरूपी विषसे (अनुपेक्षा)
उपेक्षा नहीं करना अर्थात् विपयोंसे प्रेम रखना, (अनुस्मृतिः) पूर्वकालके
भोगे हुए विषयोंका स्मरण करना, ( अतिलौल्यम् ) वर्तमानके वि-
पयभोगनेमें अतिशय लालसा रखना, (अतितपा) भविष्यतमें विषय प्रा-
(१) नृत्यवादिन सहित गाना।

[४१] तिकी अतिशय तृष्णा रखना और (अनुभवः) विषय नहीं भोगते हुए भी विपन भोगता हूँ ऐसा अनुभव करना ('एते' पञ्च) ये पांच (भोगोपभोगपरिमाव्यतिक्रमः) भोगोपभोगपरिमाण नामक गुणवतके अतीचार (कथ्यन्ते ) कहे जाते हैं ।। ९० ॥ इति श्रीसमन्तभद्रस्वामिविरचिते रत्तकरण्डकनाम्नि उपास- काध्ययने गुणवतवर्णन नाम चतुर्थः परिच्छेदः ॥४॥ अर्थ-इसप्रकार श्रीसमन्तभद्रस्वामीकृत रत्नकरण्डनामके श्रावकाचारमें गुणव्रतवर्णन नामका चौथा परिच्छेद पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥ चार शिक्षाव्रतोंके नाम । देशावकाशिकं वा सामयिक मोषधोपचासो वा। वैयात्यं शिक्षात्रतानि चत्वारि शिष्टानि ।। ९१ ॥ अन्वयार्थों-(देशावकाशिकं ) देशावकाशिक, (वा) तथा (सामयिक) सामायिक, (पोषधोपवास:) प्रोषधोपवास (वा) और (वैयारत्यं ) वैयावृत्य ('एतानि' चत्वारि) ये चार (शिक्षाव्रतानि ) शिक्षात्रत (शिष्टानि ) कहे गये हैं ।। ९१ ॥ देशावकाशिकनाम शिक्षावत । देशावकाशिकं स्यात्कालपरिच्छेदनेन देशस्य । प्रत्यहमणुव्रतानां प्रतिसंहारो विशालस्य ॥ ९२ ॥ अन्वयार्थी-(विशालस्य देशस्य ) दिग्व्रतमें परिमाण किये हुए विशाल देशका ( कालपरिच्छेदनेन ) कालके विभागसे (प्रत्यहं ) प्रतिदिन (प्रतिसंहारः) त्याग करना है सो (अणुव्रतानां [४२] अणुव्रतधारियोंका (देशावकाशिकं) देशावकाशिक व्रत (स्यात् ) होता है ॥ ९२ ॥ देशावकाशिक व्रतके क्षेत्रकी मर्यादा। गृहहारिग्रामाणां क्षेत्रनदीदाययोजनानां च । देशावकाशिकस्य स्मरन्ति सीमा तपोरद्धाः ॥ ९३।। अन्वयार्थी-(तपोवृद्धाः ) तपसे वृद्धरूप जे गणधरादिक हैं ते ( देशावकाशिकस्य ) देशावकाशिकके क्षेत्रकी ( सीमा) मर्यादा ( गृहहारिग्रामाणां ) अमुक घर, गली अथवा कटक, छावनी, ग्राम ( च ) तथा (क्षेत्रनदीदावयोजनान ) खेत, नदी, वन और योजनतककी ( स्मरन्ति ) स्मरण करते हैं, अर्थात् कहते हैं ।। ९३ ॥ देशावकाशिक व्रतके कालकी मर्यादा। संवत्सरमृतुरयनं मासचतुर्मासपक्षमृतं च । देशावकाशिकस्य पाहुः कालावधि प्राज्ञाः ॥९४ ॥ अन्वयार्थी-(माज्ञाः ) गणधरादिक ज्ञानी पुरुष (देशाव- काशिकस्य ) देशावकाशिक व्रतकी (संवत्सरम्) एक वर्ष, (ऋतु) दो मास, ( अनय ) छह मास, (मासचतुर्मासपक्षं) एकमास चतुर्मास, पक्ष ( च ) और ( ऋक्ष ) नक्षत्रेतक ( कालावधि ) कालमर्यादा (पाहुः ) कहते है ॥९४॥ (१) पहले समयमें प्रसिद्ध मागोंमें एक योजनकी दूरीपर एक एक थंभ हुआ करता था, जैसे कि आजकल मील होते हैं। (२) चद्रभुक्ति वा मादित्यभुक्तिकालपर्यन्त ।

[४३] देशावकाशिक शिक्षाबतकी सार्थकता। सीमान्तानां परतः स्थूलेतरपञ्चपापसंत्यागात् । देशावकाशिकेन च महात्रतानि प्रसाध्यन्ते ॥ ९५ ॥ अन्वयायौं-(सीमान्तानां परतः) सीमाओं के परे (स्थूलेतर- पञ्चपापसंत्यागात् ) स्थूलसूक्ष्मरूप पाचों पापोंका भलेप्रकार त्याग होनेसे (देशावकाशिकेन च ) देशावकाशिकव्रतीके द्वारा भी (महाव्रतानि) महाव्रत (प्रसाध्यन्ते ) साधे जाते हैं ॥ ९५ ॥ देगावकाशिक शिक्षाव्रतके पांच अतीचार। प्रेषणशब्दानयनं स्पाभिव्यक्तिपुद्गलक्षेपौ । देशावकाशिकस्य व्यपदिश्यन्तेऽत्ययाः पञ्च ।।९६ ॥ अन्वयार्थों-(प्रेपणशब्दानयनं ) मर्यादाके वाहर भेजना, शब्द करना, मगाना, ( रूपाभिव्यक्तिपुद्गलक्षेपौ ) अपना रूप दिखाकर समस्या करना, और कंकर पत्थर फेंकना ('एते' पञ्च ) ये पाच (देशावकाशिकस्य ) देशावकाशिक व्रतके ( अत्ययाः) अतीचार ( व्यपदिश्यन्ते ) कहे जाते हैं ॥ ९६ ॥ सामायिक शिक्षाप्रत । आसमयमुक्ति मुक्तं पञ्चाघानामशेषभावेन । सर्वत्र च सामयिकाः सामायिकं नाम शसन्ति ॥१७॥ अन्वयार्थी-(अशेपभावेन) मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदना करके (सर्वत्र) मर्यादा और मर्यादामे बाहर भी ( आस- . (१) इशारा।

[४४] मयमुक्ति)किसी नियतसमयपर्यन्त(पञ्चाघानां)पाचों पापोंक (मुक्तं) त्याग करनेको (सामयिकाः ) शास्त्रज्ञ अर्थात् गणधरादिक(साम- यिकं नाम ) सामायिक नामसे (शंसन्ति ) कहते है ।। ९७ ॥ सामायिककी विधि। मूर्धरुहमुष्टिवासोवन्धं पयंकवन्धनं चापि । स्थानमुपवेशनं वा समयं जानन्ति समयज्ञाः॥९७॥ अन्वयार्थी-(समयज्ञाः) ज्ञानी पुरुप (मृर्धरुहमुष्टिवासो- चन्ध ) चोटीके बाल, मूठी वा वस्त्रके वांधनेको( च )तथा ( पर्यव- वन्धनं ) पलाठी मारने वा कायोत्सर्गको ( अपि) और (स्थान) स्थान, ( उपवेशनं ) उपवेशन (वा) अथवा ( समयं ) सामा- यिक करनेयोग्य समयको ( जानन्ति ) जानते हैं ॥ ९८ ॥ सामायिक करनेयोग्य स्थानका निर्देश । एकान्ते सामयिक निर्व्याक्षेपे वनेषु वास्तुषु च । चैत्यालयेषु वापि परिचेतव्यं प्रसन्नधिया ॥९९।। अन्वयार्थी-(निाक्षेपे ) उपद्रवरहित ( एकान्ते) एका- न्तमें ( च ) तथा (वनेषु) वनोमें (वा) अथवा (वास्तुषु) घर अथवा धर्मशालाओंमें (च) और (चत्यालयेषु अपि ) चैत्यालयोंमे गिरिगहरादिकोंमें भी (प्रसनधिया) प्रसन्नचित्तसे (सामयिक) सामायिक ( परिचेतव्यं ) बढ़ाना चाहिये, अर्थात् धारण करना चाहिये ॥ ९९॥ (१) आत्माके अथवा शास्त्रके जाननेवाले । (२) चित्तव्याकुलतारहित अर्थात् शीत वात दशमशकादि बाधारहित । (३) जिनमदिरोंमें ।

[४५] व्यापारवैमनस्याद्विनिवृत्त्यामन्तरात्मविनिवृत्त्या ॥ सामयिक वनीयादुपवासे चैकभुक्ते वा ॥ १०० ॥ अन्वयाथों-(व्यापारवैमनस्यात् ) कायादि चेष्टा और मनो- व्यग्रतासे (विनिवृत्त्या) निवृत्ति होनेपर (अन्तरात्मविनिवृत्त्या) मनके विकल्पोंकी विशेप निवृत्ति करके (उपवासे) उपवासके दिन (च) और ( एकभुक्ते वा) एकाशनके दिन (सामयिक) सामायिक (वघ्नीयात् ) करे ॥ १० ॥ हेतुपूर्वक प्रतिदिन सामायिक करनेका उपदेश । सामयिक प्रतिदिवसं यथावदप्यनलसेन चेतव्यं । व्रतपश्चकपरिपूरणकारणमवधानयुक्तेन ॥ १०१ ॥ अन्वयार्थों-(सामायिक) सामायिक (वतपञ्चकपरिपूरण- कारणम् ) पचमहाव्रतोंके परिपूरण करनेका कारण है ('अतएव) इसलिये उसे ( प्रतिदिवसं) प्रतिदिन ही ( अनलसेन ) आल- स्यरहित ( अपि ) और ( अवधानयुक्तेन ) एकाग्रचित्तमे ( यथा- वत् ) यथानियम (चेतव्यं ) वढाना चाहिये ।। १०१ ॥ सामायिकको शिक्षाबतपना। सामयिके सारम्भाः परिग्रहा नैव सन्ति सर्वेऽपि । चेलोपसृष्टमुनिरिव गृही तदा याति यतिभाव ।। १०२ ॥ अन्वयाथों-(सामायिके) सामायिकमें (सारम्भाः) आरम्भ सहित (सर्वे अपि ) सब ही प्रकारके (परिग्रहाः) परिग्रह (न एव) [४६] नहीं (सन्ति ) होते हैं ('अतएव' ) इस कारण (तदा) उस समय (गृही ) गृहस्थ ( चेलोपसृष्टमुनिः इव ) उपसर्गसे ओढ़े हुए कपडेसहित मुनिकी तरह ( यतिभावं) मुनिपनेको (याति) प्राप्त होता है ॥ १०२॥ सामायिक्में परीपह महनेका उपदेग। शीतोष्णदंशमशकपरीपहमुपसर्गमपि च मौनधराः । सामयिक प्रतिपन्ना अधिकुवीरनचलयोगाः ॥ अन्वयार्थी-(सामयिक) सामायिकको (प्रतिपन्नाः ) प्राप्त होनेवाले ( मौनधराः) मौनधारी ( अचलयोगाः 'सन्तः।) अचल योग होते हुए ( शीतोष्णदंशमशकपरीपहं ) शीत उष्ण डास मच्छर आदिकी परीपहको (च) और ( उपसर्ग अपि ) उपसर्गको भी ( अधिकुर्वीरन् ) सहन करते हैं ॥ १०३ ॥ सामायिक करते समय क्या विचार करना चाहिये । अशरणमशुभमनित्यं. दुःखमनात्मानमावसामि भवम् । मोक्षस्तद्विपरीतात्मेति ध्यायन्तु सामयिके ।। १०४ ।। अन्वयार्थी-('अहं') मैं ( अशरण) अशरणरूप ( अशुभं) अशुभरूप, ( अनित्यं ) अनित्य, (दुःखम् ) दुःखमय और ( अनात्मानं ) पररूप ( भवं ) ससारमें ( आवसामि ) निवास करता हू और ( मोक्षः ) मोक्ष ( तद्विपरीतात्मा ) [१७] उससे विपरीत है (इति), इसप्रकार (सामयिके ) सामायिकमें (ध्यायन्तु ) ध्यान करना चाहिये ॥ १०४ ॥ सामायिक पाच अतीचार । वाकायमानसानां दुःमणिधानान्यनादरस्मरणे । सामयिकस्यातिगमा व्यज्यन्ते पञ्च भावेन ॥१०५ ।। अन्वयार्थी- ( वाकायमानसानां ) वचन काय और मनका (दुम्मणिधानानि ) चलायमान करना, (अनादरस्मरणे) सामा- यिकमें अनादर करना और सामायिकका काल व पाठका भूलजाना ('एवं' ) इसप्रकार (भावेन) परमार्थसे (सामयिकस्य ) सामायिकके ( पञ्च ) पांच ( अतिगमाः) अतीचार (व्यज्यन्ते) प्रगट किये जाते है ॥ १०५ ॥ , प्रोषधोपवाम शिक्षात्रत। पर्वण्यष्टम्यां च ज्ञातव्यः प्रोपघोपवासस्तु । चतुरभ्यवहार्याणां प्रत्याख्यानं संदेच्छाभिः ॥१०६॥ अन्वयार्थी-(तु) और (पर्वणि ) चतुर्दशी (च ) तथा ( अष्टम्यां ) अष्टमीके दिन ( सदा) सर्वकाल (इच्छाभिः) व्रतविधानकी वांछाओंसे ( चतुरभ्यवहार्याणां) चार प्रकारके आहार्य पदार्थोंके (प्रत्याख्यान) त्याग करनेको (प्रोपधोपवासः) प्रोपधोपवास (ज्ञातव्यः) जानना चाहिये ॥ १०६ ।। (१) 'सदिच्छामि ऐसा भी पाठ है, जिसका अर्थ 'मनीचीन मावोंसे' ऐसा होता है।

[४८] प्रोपधोपवास के दिन क्या क्या त्याग करना चाहिये । पञ्चानां पापानामलंक्रियारम्भगन्धपुष्पाणाम् । स्नानाञ्जननस्यानामुपवासे परिहातिं कुर्यात् ॥१०७॥ अन्वयार्थी-(उपवासे) उपवासके दिन (पञ्चानां पापानां) हिंसादि पाचों पापोंका, ( अलंक्रियारम्भगन्धपुप्पाणां ) शृंगार, आरभ, गन्ध, पुष्प, (सानाञ्जननस्यानां) और मान, अञ्जन तथा नस्य अर्थात् नाकसे सूघनेकी वस्तुओंका (परिहति) त्याग (कुर्यात् ) करै ।। १०७ ॥ उपवासके दिनका कर्तव्य । धर्मामृतं सतृष्णः श्रवणाभ्यां पिवतु पायये- द्वान्यान् । ज्ञानध्यानपरो वा भवतूपवसन्नत. न्द्रालुः ॥१०८॥ अन्वयार्थी-( उपवसन् ) उपवास करके ( अतन्द्रालु) आलस्यरहित हो (श्रवणाभ्यां ) कानोसे ( सतृष्णः 'सन्') अतिशय उत्कठित होता हुआ ( धर्मामृतं ) धर्मरूपी अमृतको (पिवतु ) पीवै ( वा ) तथा ( अन्यान् ) दूसरोको (पाययेत) पिलावै (वा) अथवा (ज्ञानध्यानपरः) ज्ञानध्यानमें तत्पर ( भवतु ) होवै ॥ १०८॥ चतुराहारविसर्जनमुपवासः मोपधः सकृद्भुक्तिः । स प्रोषधोपवासो यदुपोण्यारम्भमाचरति ॥१०९॥ (१) और उपलक्षणसे रागके उत्पन्न करनेवाले गीत नृत्यादिकोंका भी त्याग करै।

[१९] . अन्वयार्थों-(चतुराहारविसर्जनम् ) अशन दालभात आ- दिक, पान-पीने योग्य दूध मठा आदि, खाद्य-मोदकादि और लेबर खड़ी आदि, ऐसे इन चार प्रकारके आहारोंका त्याग करना (उप- वासः ) उपवास है तथा ( सकृद्धक्तिः) एक बार भोजन करना (मोषधः) प्रोपध है और धारनेके दिन एक वार भोजनपूर्वक ( यत् ) जो ( उपोष्य ) उपवास करके ( आरम्मं ) पारनेके दिन आरम्भ अर्थात् एकाशन (आचरति ) करता है ( सः ) सो (प्रोपधोपवासः ) प्रोषधोपवास ('कथ्यते' ) कहा जात । है ॥ १०९॥ प्रोपधोपवासके पांच अतीचार । ग्रहणविसर्गास्तरणान्यदृष्टमृष्टान्यनादरास्मरणे । यत्मोपधोपवासव्यतिलचनपञ्चकं तदिदम् ॥ ११० ॥ अन्वयार्थी-( यत् ) जो ( अष्टमष्टानि ) विना देख विना शोधे (ग्रहणविसर्गास्तरणानि )पूजाके उपकरण ग्रहण करना, मल- मूत्रादिका त्याग करना, सन्यारा बिछाना, अनादर करना और योग्य क्रियाओंका भूल जाना है ( तत् ) सो (अनादरास्मरणे) उपवासमें (इदं) यह (मोपधोपवासव्यतिलद्धनपञ्चकं ) प्रोपधोपवासका अतीचार पचक ('अस्ति' ) है, अर्थात् ये प्रोपधोपवासके पांच अतीचार हैं ॥ ११० ॥ वैयावृत्त्य नामक शिक्षाप्रत । दानं वैयावृत्त्यं धर्माय तपोधनाय गुणनिधये । अनपेक्षितोपचारोपनियमगृहाय विभवेन ॥११॥ अन्वयार्थी-(गुणनिधये ) सम्यक्त्वादि गुणों के भडार (अ- [५०] गृहाय ) गृहराहत (तपोधनाय ) तपस्वियोंको (विभवेन), विधि- द्रव्यादि सपदा करके (धर्माय ) धर्मके अर्थ ( अनपेक्षितोपचा- रोपक्रियं ) प्रत्युपकारकी अपेक्षाके विना ( दानं ) दान देना (वैयावृत्त्यं ) वैयावृत्त्य ( 'उच्यते' ) कहा जाता है ॥ १११ ।। व्यापत्तिव्यपनोदः पढयोः संवाहनं च गुणरागात् । वैयावृत्त्य यावानुपग्रहोऽन्योप संयमिनाम् ॥११२ ।। अन्वयार्थी-(गुणरागात् ) गुणोंमें अनुरागपूर्वक ( संय- मिनां ) सयमी जनोंके (व्यापत्तिव्यपनोदः ) खेदका दूर करना (च) और ( पदयोः) चरणोंका (संवाहनं )ढावना अर्थात् पग- चपी करना तथा ( अन्यः अपि ) और भी ( यावान् ) जितना (उपग्रहः ) उपकार करना है सो (वैयावृत्त्यं) वैयावृत्त्य ('कथ्यते) कहा जाता है ॥११२॥ दानका स्वरूप । ) नवपुण्यैः प्रतिपत्तिः सप्तगुणसमाहितेन शुद्धन। अपसूनारम्भाणामार्याणामिण्यते दानम् ॥ ११३॥ अन्वयार्थों-(सप्तगुणसमाहितेन ) सप्तगुणसहित (शुद्धन 'श्रावकेन) शुद्धश्रावक करके (अपसूनारम्भाणां) पचसूनाके आरम्भ रहित अर्थात् जो कूटने, पीसने, चूल्हा सुलगाने, पानी भरने और बुहारी देनेका आरम्भ नहीं करते हैं, ऐसे (आर्याणाम् ) मुनि- (१) श्रद्धा तुष्टिभक्तिर्विज्ञानमलुब्धता क्षमासत्त्व । यस्यैते सप्तगुणास्त दातार प्रशसन्ति ॥ १॥ अर्थात् जिसमें श्रद्धा, सतोप, भाकि, ज्ञान, अलुब्धता, क्षमा, और शक्तिये सात गुण हो, वह दातार प्रशसा करनेके योग्य है।

[५१] योंका ( नवपुण्यैः ) नवधा भक्तिसे (प्रतिपत्तिः ) गौरव करना वा आहार आदि देना (दान) दान (इप्यते) कहा जाता है ॥ ११३ ॥ टानका फल। गृहकर्मणापि निचितं कर्म विमाष्टिं खलु गृहवि- मुक्तानाम् । अतिथीनां प्रतिपूजा रुधिरमलं धावते वारि ॥११४ ॥ अन्वयार्थी-('यथा') जैसे (वारि ) जल ( अलं) नि- श्चय करके (रुधिरं) रुधिरको (धावते) धो देता है ('तथा') तैसे ही ( गृहविमुक्तानां) गृहरहित ( अतिथीनां ) अनिधि- योंका (प्रतिपूजा अपि ) प्रतिपूजन करना अर्थात् नवधा भक्ति- पूर्वक आहार दान देना भी (खलु) निश्चय करके ( गृहकर्मणा) घरके कार्योंसे ( निचितं ) सचित किये हुए (कर्म) पाप (विमाष्टिं ) नष्ट करता ॥ ११४ ॥ उच्चैर्गोत्रं प्रणते गो दानादुपासनात्पूजा । भक्तेः सुन्दररूपं स्तवनात्कीर्तिस्तपोनधिषु ।।११५॥ अन्वयार्थी-(नपोनिधिपु)तपस्वी मुनियोंमें (को) (पणतेः) नमस्कार करनेसे ( उच्चैगोत्रं ) उच्चगोत्र, (दानात् ) दान देनेसे ( भोगः ) भोग, (उपासनात्) उपासना करनेसे (पूजा) प्रतिष्टा, (भक्तेः) भक्ति करनेसे (सुन्दररूपं) सुन्दर रूप और (स्तवनात) स्तुति करनेसे ( कोतिः ) कीर्ति ('भवति' ) होती है ॥ ११५ ॥ क्षितिगतमिववटवीजं पात्रगतं दानमल्पमपि काल । १ पडिगाहना, उच्चस्थान देना, पादोदक अर्थात चरणोटकको मस्ताने लगाना, पूजा करना, प्रणाम करना, मन वचन और कायकी शुद्धि रखना और एपणशुद्धि भयांत शुद्ध आहार देना ये नवधा भक्तिया है।

[५२]
फलतिच्छायाविभवं बहुफलमिष्टं शरीरभृतां ॥११६॥
अन्वयार्थी-(शरीरभृतां) जीवोंको ( पात्रगतं ) पात्रमें गया
हुआ अर्थात् मुनि अर्जिका आदिके लिये दिया हुआ ( अल्प अपि
दानं ) थोडासा भी दान (काले) समय पर (क्षितिगतं ) पृथ्वीमें
प्राप्त हुए ( वटवीजं ) वटके वीजके (छायाविभवं इव ) छायाके
विभवकी तरह ( इष्टं ) मनवाछित (बहुफलं ) बहुत फलको
(फलति) फलता है ॥ ११६ ॥
दानके भेद ।
आहारौषधयोरप्युपकरणावासयोश्च दानेन ।
वैयावृत्यं ब्रुवते चतुरात्मत्वेन चतुरस्राः॥ ११७ ॥
अन्वयार्थी—(चतुरस्राः) चार ज्ञानके वारक गणधर (आ-
हारौषधयोः) आहार और औपचके ( अपि) तथा ( उपकरणा-
वासयोः च ) ज्ञानके साधन शास्त्रादि उपकरणके और स्थानके
(दानेन ) देनेसे (चतुरात्मत्वेन) चार प्रकारका (वैयावृत्त्यं)
वैयावृत्त्य (ब्रुवते ) कहते हैं ॥ ११७ ।।
दानके प्रासद्ध फलभोक्ता।
श्रीषेणवृषभसेने कौण्डेशः शूकरश्च दृष्टान्ताः।
वैयावृत्त्यस्यैते चतुर्विकल्पस्य मन्तव्याः॥११८ ॥
अन्वयार्थों-(श्रीषेणपमसने) श्रीषेण राजा और सेठकी पुत्री
वृषभसेना आहार और औषधदानमें, ( कौण्डेशः ) कौण्डेश
नामक कोटपाल शास्त्रदानमें (च) और (शूकरः) शूकर
मुनिकी रक्षा करनेसे आवासदानमें (एते ) इस प्रकार ये चार
(चतुर्विकल्पस्य ) चार प्रकारके (वैयावृत्त्यस्य ) वैयावृत्त्यके (ह-
शान्ताः ) दृष्टान्त (मन्तव्याः) मानने चाहिये ॥ ११८ ॥

[५३ ] वैयावृत्त्यके भेदमें ही भगवत्पूजा करना। देवाधिदेवचरणे परिचरणं सर्वदुःखनिर्हरणम् । कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादाहतो नित्यं ॥ ११९ ।। अन्वयारों-(कामदुहि ) इच्छित फल देनेवाले और ( का- मदाहिनि ) कामबाणको भस्म करनेवाले ( देवाधिदेवचरणे) देवोंके अधिदेव अर्थात् अरहत भगवान्के चरणों में (परिचरणं) पूजा करना ( सर्वदुःखनिहरणं ) समस्त दु.खोंका नाश करनेवाला है, ('अत एव') इस कारण इसे (आदृतः) आदरपूर्वक (नित्यं) प्रतिदिन ही (परिचिनुयात् ) करना चाहिये ॥ ११९ ॥ पूजाके फलका प्रसिद्ध भोका । अर्हचरणसपर्यामहानुभावं महात्मनामवदत् । भेकः प्रमोदमत्तः कुसुमेनैकेन राजगृहे ॥ १२० ॥ अन्वयार्थी-(अहच्चरणसपर्यामहानुभावं) भगवानके चर- णोंकी पूजाके माहात्म्यको ( राजगृहे ) राजगृही नगरीमें ( एकेन कुसुमेन) एक पुष्प करके (प्रमोदमत्तःसन् ) प्रमोदमें मत्त होता हुआ (भेकः ) मेंडक ( महात्मनां ) महापुरुषोंको ( अवदत ) देवपर्याय प्राप्त होकर कहता हुआ, अर्थात् दिखाता हुआ ॥ १२० भावार्थ-मेंडकने भगवान्को फूल चढानेकी इच्छा करके और उसके प्रसादसे स्वर्ग प्राप्त करके प्रगट कर दिया कि भगवानकी पूजा करनेका कैसा माहात्म्य है। वैयावृत्त्यके अतीचार। हरितपिधाननिधाने हनादरास्मरणमत्सरत्वानि । वैयांवृत्त्यस्यैते व्यतिक्रमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥ १२१ ॥ 'वैयावृत्तस्य 'ऐसा भी पाठ हैं।

[५४] अन्वयार्थी-(हरितपिधाननिधाने ) दान देनेवाली वस्तुको हरितपत्रसे ढकना, और हरितपत्रमे रखना, (अनादरास्मरणम- सरत्वानि) अनादरसे देना, दानकी विधि वगैरह भूल जाना, और ईर्षावुद्धिसे देना (हि ) निश्चयकरके (एते पञ्च ) ये पाच (वैयावत्त्यस्य ) वैयावृत्त्यके (व्यतिक्रमाः) अतीचार (कथ्यन्ते) कहे जाते हैं ॥ १२१ ॥ इति श्रीसमन्तभद्रस्वामिविरचिते रत्नकरण्डकनाम्नि उपासका- ध्ययने शिक्षाव्रतवर्णनं नाम पञ्चमः परिच्छेदः समाप्तः॥५॥ अर्थ-इसप्रकार श्रीसमन्तभद्रस्त्रामीके रचे हुए रत्नकरण्ड नामके श्रावका. चारमें शिक्षाव्रतके वर्णनवाला पाचवा अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥ सल्लेखनाका स्वरूप । उपसर्गे दुर्भिक्षे जरसि रुजायां च निःप्रतीकारे । धर्माय तनुविमोचनमाहुः सल्लेखनामार्याः ॥१२२ ।। अन्वयार्थी—(आर्याः) गणधरादिक श्रेष्ठ पुरुष (निःमती- कारे) उपायरहित (उपसर्गे) उपसर्ग आनेपर, (दुर्भिक्षे) दुर्भिक्ष होनेपर, (जरसि ) बुढ़ापा आनेपर, (च) और (रुजायां) रोग होनेपर (धर्माय ) धर्मके अर्थ (तनुविमोचनं ) शरीरके छोड़नेको (सल्लेखनां) सल्लेखना (आहुः ) कहते हैं ॥ १२२ ।। सल्लेखनाकी आवश्यकता। अन्तक्रियाधिकरणं तपःफलं सकलदर्शिनः स्तुवते । तस्माद्यावद्विभवं समाधिमरणे प्रयतितव्यं ।।१२३ ।। अन्वयार्थी-(अन्तक्रियाधिकरणं) मृत्यु समयकी क्रियाका सुधारना अर्थात् सन्यास धारण करना ही ( तपःफलं) तपका फल है ( 'इति' ) इस प्रकार (सकलदर्शिनः ) समरत मताव- ॥

[५५] लम्बी (स्तुवते) कहते है (तस्मात्) इस कारण ( यावद् विभवं ) जहातक शक्ति है (समाधिमरणे) समाधिमरण करनेमे (प्रयति- तव्यं) प्रयत्न करना चाहिये ।। १२३ ।। समाविमरण करनेकी ( सल्लेसनाकी ) विधि । स्नेह वैरं सङ्गं परिग्रहं चापहाय शुद्धमनाः । स्वजनं परिजनमपि च क्षान्त्वा क्षमयेलियैर्वचनैः ।। अन्वयायी-समाविमरणके समय (स्नेहं राग (वैरं) द्वेप (सॉ) सबंध (च) और (परिग्रह ) बाह्याभ्यन्तर परि- प्रहको ( अपहाय ) छोडकर (शुद्धमनाः सन् ) शुद्धमन होता हुआ (पियैः वचनैः ) प्रिय वचनोंसे ( स्वजनं ) अपने कुटुंबि- योंको (च) और (परिजनं आपि) नौकर चाकरोंसे भी (क्षान्त्वा) क्षमा करावे और आप भी (क्षमयेत् ) क्षमा करे ॥ १२४ ॥ आलोच्य सर्वमेनः कृतकारितमनुमतं च निर्व्याजं । आरोपयेन्महाव्रतमामरणस्थायि निरोपं ।। २२५ ॥ अन्वयार्थों-(निर्व्याजम् ) छलकपटरहित (च) और (कृतकारितं अनुमतं)कृतकारित अनुमोदनासे किये हुए (सर्व एनः) समस्त पापोंकी ( आलोच्य ) आलोचना करके (आमरणस्थायि) मरणपर्यंत रहनेवाले (निश्शेपं) समस्त (महात्रतं) महाव्रतको ( अरोपयेत् ) धारण करे ॥ १२५ ॥ शोकं भयमवसादं क्लेदं कालुण्यमरतिमपि हित्वा । सत्त्वोत्साहमुदीर्य च मनः प्रसाद्यं श्रुतैरमृतः ॥१२६ ॥ अन्वयार्थी-(शोक ) शोक (भयं) भय( अवसाद) विषाद (क्लेदं) राग ( कालुण्यं) कलपता (अरतिं अपि) और अर- [५६] तिको (हित्वा ) त्याग करके (च) तथा अपने (सत्त्वात्साई) बल और उत्साहको ( उदीर्य) प्रगट करके ( अमृतैः) ससारके दुःखरूपी सन्तापको दूर करनेवाले अमृतके समान (श्रुतैः) शास्त्रोंसे (मनः) मनको (प्रसाद्यं) प्रसन्न करे ॥ १२६ ॥ आहारं परिहाप्य क्रमशः स्निग्धं विवर्द्धयेत्पानम् । स्निग्धं च हापयित्वा खरपानं पूरयेत्रमशः॥१२७॥ अन्वयार्थों-(क्रमशः) क्रमक्रमसे (आहारं ) आहारको (परिहाप्य ) छोडकर (स्निग्धं पानं) दुग्ध वा छाछको (विवर्द्ध- येत् ) बढावे (च) और (स्निग्धं ) दुग्धादिकको (हापयित्वा) छोडकर (खरपानं) काजी और गर्मजलको (पूरयेत्) बढावे, अर्थात् पीता रहे ॥ १२७ ॥ खरपानहापनामपि कृत्वा कृत्वोपवासमपि शक्त्या । पञ्चनमस्कारमनास्तनुं त्यजेत्सर्वयत्नेन ॥ १२८ ॥ अन्वयार्थौ तत्पश्चात् (खरपानहापनां ) उष्ण जलपानका त्याग ( आपि) भी (कृत्वा) करके (अपि) और (शक्त्या) शक्तिसे (उपवासं कृत्वा) उपवास करके ( सर्वयत्नेन) सर्व प्रकारके यत्नों- से (पञ्चनमस्कारमनाः सन् ) पच नमस्कार मत्रको मनमें धारण करता हुआ (तनुं ) शरीरको (त्यजेत् ) छोड़े ॥ १२८ ॥ सल्लेखनाके अतीचार । जीवितमरणाशंसे भयमित्रस्मृतिनिदाननामानः । सल्लेखनातिचाराः पञ्च जिनेन्द्रैः समादिष्टाः ॥१२९॥ अन्वयार्थी-(जीवितमरणाशंसे) जीने मरनेकी बाछा करना, भयभित्रस्मृतिनिदाननामान:) भय करना, मित्रादिकोंका स्मरण [५९] देदीप्यमान होते हुए (त्रैलोक्यशिखामणिश्रियं ) तीन लोककी शिरोमणिभूत शोभाको (दधति ) धारण करते हैं ॥ १३ ॥ पूजार्थाजैश्वर्यैत्रलपरिजनकामभोगभूयिष्ठैः। अतिशयितभुवनमद्भुतमभ्युदयं फलति सद्धर्मः॥१३५|| अन्वयार्थों-( सद्धर्मः ) सलखनादिसे उपार्जन किया हुआ समीचीन धर्म (पूजार्थाजैश्वर्यैः ) प्रतिष्ठा, धन, आज्ञा और ऐश्वर्य- से तथा (वलपरिजनकामभोगभूयिष्ठैः ) सेना नौकर चाकर और काम भोगोंकी बहुलतासे (अतिगयितभुवनं) लोकातिशायी अर्थात् बहुत बड़े और (अद्भुतं अभ्युद्य) अद्भुत अभ्युदयको (फलति) फलता है ।। १३५॥ इति श्रीसमन्तभद्रस्वामिविरचिते रत्नकरण्डनाम्नि उपासका- ध्ययने सल्लेखनावर्णनो नाम पष्ठः परिच्छेदः समाप्तः ॥६॥ अर्थ-इसप्रकार श्रीसमन्तभद्रस्वामीके रचे हुए रत्नकरण्डनामक श्रावका- चारमें सल्लेखनावर्णनमाला छटा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ श्रावककी ग्यारह प्रतिमा (कक्षा)। श्रावकपदानि देवैरेकादश देशितानि येषु खलु। स्वगुणाः पूर्वगुणैः सह संतिष्ठन्ते क्रमविद्धाः॥१३६ ।। अन्वयार्थों-(देवैः) सर्वज्ञकरके (श्रावकपदानि) श्रावकके पद अर्थात् दरजे ( एकादश देशतानि ) ग्यारह प्रकारके उपदेश किये गये हैं; (येषु) जिनमें (खलु) निश्चय करके ( स्वगुणाः) अपने गुण (पूर्वगुणैःसह) पहिलेके समस्त गुणोंसहित (क्रमविद्धाः 'सन्तः') क्रमसे बढते हुए (संतिष्ठन्ते ) रहते है ॥ १३६ ॥ भावार्थ-ऊपरकी प्रतिमा धारण करनेवालोंको उसके पढेकी [५८ ] अन्वयार्थी-सल्लेखनाधारण करनेवाले पुरुप (निरतिशयाः) अतिशयरहित अर्थात् ज्ञानादिगुणोके हीनाधिक भावसे रहित (निरवधयः ) कालकी मर्यादारहित (विद्यादर्शनशक्तिस्वास्थ्य- प्रह्लादप्तिशुद्धियुजः ) अनत ज्ञान, दर्शन, वीर्य, परम उदासीनता, अनन्तसुख, तृप्ति और द्रव्यकर्मभावकर्मरूपी मलरहितताकर युक्त होते हुए (निःश्रेयसं सुखं ) मोक्षके सुखमें ( आवसन्ति) चिरकालतक निवास करते है ॥ १३२ ॥ 'काल कल्पशतऽपि च गते शिवानां न विक्रिया लक्ष्या। उत्पातोऽपि यदि स्यात् त्रिलोकसंभ्रा- न्तिकरणपटुः॥१३३ ॥ अन्वयार्थों-(च) और (यदि) यदि (त्रिलोकसम्भ्रान्तिक- रणपटुः) तीनलोकको लौट पौट करनेमें समर्थ ऐसा (उत्पाताअपि) उत्पात भी (स्यात्) हो, तथापि (कल्पशते काले) सैकडो कल्पकाल (गते अपि) बीतने पर भी (शिवानां ) मोक्षप्राप्त जीवोंके ज्ञाना- दिकगुणोंमें (विक्रिया ) कोई फेरफार (लक्ष्या ) मालूम (न) नहीं होता है ॥ १३३ ॥ निःश्रेयसमधिपन्नास्त्रैलोक्यशिखामणिश्रिय दधते। निष्किट्टिकालिकाच्छविचामीकरभासुरात्मानः॥१३४॥ अन्वयाथी-(निाश्रयसं अधिपन्नाः) मोक्षको प्राप्त होनेवाले जीव (निष्किट्टिकालिकान्छविचामीकरभासुरात्मानः 'सन्ता') किट्टिक और कालिमा रहित छविको धारण करनेवाले सुवर्णके समान [५९] देदीप्यमान होते हुए (त्रैलोक्यशिखामणिश्रियं ) तीन लोककी शिरोमणिभूत शोभाको (दधति ) धारण करते हैं ।। १३४ ।। पूजार्थाज्ञैश्वर्यैवलपरिजनकामभोगभूयिष्ठैः । अतिशयितभुवनमद्भुतमभ्युदयं फलति सद्धर्मः।।१३५।। अन्वयार्थी-( सद्धर्मः ) सलंखनाटिसे उपार्जन किया हुआ समीचीन धर्म (पूजार्थाजैश्वर्यैः ) प्रतिष्ठा, धन, आज्ञा और ऐश्वर्य- से तथा (वलपरिजनकामभोगभूयिष्ठैः ) सेना नौकर चाकर और काम भोगोंकी बहुलतासे ( अतिगयितभुवनं) लोकातिशायी अर्थात् बहुत बड़े और (अद्भुतं अभ्युदयं) अद्भुत अभ्युदयको (फलति) फलता है ॥ १३५॥ इति श्रीसमन्तभद्रस्वामिविरचिते रत्नकरण्डनाम्नि उपासका- ध्ययने सल्लेखनावर्णनो नाम पष्ठः परिच्छेदः समाप्तः ॥ ६ ॥ अर्थ-इसप्रकार श्रीसमन्तभद्रस्वामीके रचे हुए रत्नकरण्डनामक श्रायका- बारमें सलेखनावर्णनमाला छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥ श्रावककी ग्यारह प्रतिमा ( कक्षा)। श्रावकपदानि देवैरेकादश देशितानि येषु खलु। स्वगुणाः पूर्वगुणैः सह संतिष्ठन्ते क्रमविवृद्धाः॥१३६ ।। अन्वयार्थी--(देवैः) सर्वज्ञकरके (श्रावकपदानि) श्रावकके पद अर्थात् दरजे ( एकादश देशतानि ) ग्यारह प्रकारके उपदेश किये गये हैं; (येषु) जिनमें (खलु) निश्चय करके (स्वगुणाः) अपने गुण (पूर्वगुणैःसह) पहिलेके समस्त गुणोसहित (क्रमविवृद्धाः 'सन्तः') क्रमसे बढते हुए (संतिष्ठन्ते ) रहते है ॥ १३६ ॥ भावार्थ-ऊपरकी प्रतिमा धारण करनेवालोंको उसके पहलेको

[६०]
सब प्रतिमायें पालना पड़ती हैं । प्रतिमाओंका धारण विना क्रमके
नहीं होता है ॥ १३६॥
१ दर्शनिक (दर्शनप्रतिमाधारी)।
सम्यग्दर्शनशुद्धः संसारशरीरभोगनिर्विण्णः ।
पञ्चगुरुचरणशरणो दर्शनिकस्तत्त्वपथगृह्यः ॥१३७ ॥
अन्वयार्थी-('या' ) जो (संसारशरीरभोगनिर्विण्णा)
संसार शरीर व भोगोंसे विरक्त हो, (सम्यग्दर्शनशुद्धः) जिसका
सम्यग्दर्शन शुद्ध अर्थात् अतीचाररहित हो, (पञ्चगुरुचरणश-
रण:) जिसे पचपरमेष्ठीके चरणोंकी शरण हो, तथा जो ( तत्त्वप-
थगृह्य ) सत्यार्थ मार्गका ग्रहण करनेवाला हो सो ( दर्शनिक)
दर्शनप्रतिमाका धारी दार्शनिक ('अस्ति') है ॥ १३७ ॥
,
२. व्रतप्रतिमाधारी ।
निरतिक्रमणमणुव्रतपञ्चकमपि शीलसप्तकं चापि ।
धारयते निःशल्यो योऽसौ वतिनां मतो व्रतिकः ॥ १३८ ।
अन्वयार्थों-(यः) जो (निःशल्यः 'सन्' ) शल्यरहित
होता हुआ (निरतिक्रमणं) अतीचाररहित ( अणुव्रतपश्चर्क)
अणुव्रत पञ्चकको अर्थात् पाचों अणुव्रतोंको (अपि) तथा ( शील-
सप्तकं च अपि) शीलसप्तक अर्थात् गुणवतों और शिक्षात्रतोंको भी
(धारयते) धारण करता है ( असौ) ऐसा पुरुष (व्रतिनां)
व्रतधारियोंमें (व्रतिकः ) व्रत प्रतिमाका धारी (मतः) माना
गया है ॥ १३८॥

[६१] सामायिकप्रतिमाधारी। चतुरावर्त्तत्रितयश्चतुःप्रणामः स्थितो यथाजातः । सामयिको द्विनिपद्यस्त्रियोगशुद्धस्त्रिसन्ध्यमभिव- न्दी ।। १३९ ।। अन्वयार्थों-जो (चतुरावर्तत्रितयः) चारो दिशाओंमें तीन तीन आवर्त करता है, (चतुःमणामः) चार चार प्रणाम करता है, (स्थित ) कायोत्सर्गमें स्थित रहता है, ( यथाजातः ) अन्तरंग और बहिरंग परिग्रहकी चिन्तासे परे रहता है, ( द्विनिपद्यः) खगासन और पद्मासन इन दो आसनों से कोई एक आसन लगाता है, (त्रिसन्ध्यं अभिवन्दी ) और त्रिकाल वन्दना करता है, वह (सामयिकः ) सामायिक करनेवाला सामायिक प्रतिमाका धारी श्रावक है ॥ १३९ ॥ ४. प्रोषधप्रतिमाधारी। पर्वदिनेषु चतुर्वपि मासे मासे स्वशक्तिमनिगुह्य । पोषधनियमविधायी प्रणधिपरः प्रोपधानशनः||१४०॥ अन्वयार्थी-('यः') जो (मासे मासे) महीने महीने ( चतुर्यु अपि) चारों ही ( पर्वदिने) पर्वोमें अर्थात दो अष्टमी और दो चतुर्द- शीके दिनोमें (स्वशक्ति) अपनी शक्तिको ( अनिगुह्य ) न छुपाकर (प्रणधिपरः सन् ) शुभध्यानमे तत्पर होता हुआ (मोपधनियम- १प्रात:काल, मध्यान्हकाल और सन्ध्याकाल।

[६२] . विधायी) आदिअन्तमे प्रोपधपूर्वक उपवास करनेवाला हो, ('सः') वह (प्रोषधानशनः) प्रोपधोपवासप्रतिमाका धारी है ५. सचित्तत्यागप्रतिमाधारी । मूलफलशाकशाखाकरीरकन्दप्रसनवीजानि । नामानि योऽत्तिसोऽयं सचित्तविरतो दयामूर्तिः ॥ १४१ ॥ अन्वयार्थी-(यः) जो ( आमानि) कच्चे (मूलफलशाक- शाखाकरीरकन्दप्रसूनवीजानि) मूल, फल, शाक, शाखा करीर ( वासकी कोंपल वा कैर ) जमीकद, पुष्प और बीज (न अत्ति) नहीं खाता है (सः ) वह (दयामूर्तिः) दयाकी मूर्ति है और ( अयं एव) यह ही ( सचित्तविरतः ) सचित्तत्याग प्रति- माका धारी श्रावक ('आस्ति' ) है । ७. रात्रिभुक्तित्यागी। अन्नं पानं खाद्यं लेां नानाति यो विभावर्याम् स च रात्रिभुक्तिविरतः सत्त्वेष्वनुकम्पमानमनाः १४२ अन्वयार्थी-(यः) जो (सत्त्वेषु)जीवोंपर (अनुकम्पमान- मनाः ) दयारूपचित्तवाला होता हुआ (विभावयाँ) रात्रिमें (अन्न) चावलमूंगादि (पान) दुग्धजलादिक (खाद्य) कलाकद मोदकादि और (लेह्य) चाटने योग्य रबड़ी आदिक पदार्थोंको (न अश्नाति) नहीं खाता है, (सः) वह (रात्रिभुक्तिविरतः) रात्रिभुक्तित्यागनामक प्रतिमाका धारी है ॥ १४२ ॥ 41 १ अपक्क अर्थात अग्निमें विना पके अथवा पेड पर विना पके।

[६३] . ब्रह्मचर्यप्रतिमा। मलवीजं मलयोनिं गलन्मलं पूतिगन्धि वीभत्सं । पश्यन्नशमनगाद्विरमति यो ब्रह्मचारी सः ॥ १४३ ॥ अन्वयार्थी-(यः) जो ( मलबीज ) मलके बीजभूत, (मलयोनि) मलको उत्पन्न करनेवाले, (गलन्मलं ) मलप्रवाही, (पूतिगन्धि ) दुर्गन्धियुक्त, (वीभत्स) और लज्जाजनक वा ग्लानि- युक्त ( अझं) अगको ( पश्यन् ) देखता हुआ (अनगात) काम- सेवनसे (विरमति ) विरक्त होता है (सः) वह ( ब्रह्मचारी) ब्रह्मचर्य नामक प्रतिमाका धारी ब्रह्मचारी हैं ॥ १४३ ।। ८ आरभत्यागप्रतिमा। सेवाकृपिवाणिज्यप्रमुखादारम्भतो व्युपारमति। प्राणातिपातहेतोर्योऽसावारम्भविनिवृत्तः ॥ १४४॥ अन्वयार्थी-(यः) जो ( प्राणातिपातहेतोः ) जीव- हिंसाके कारण ( सेवाऋपिवाणिज्यमुखात् ) नौकरी खेती व्या- पारादिकके ( आरम्भतः ) आरम्भसे (व्युपारमति) विरक्त होता है, सो ( असौ ) यह ( आरम्भविनिवृत्तः) आरभत्यागप्रतिमाका धारी है ॥ १४ ॥ ९ परिग्रहत्यागप्रतिमाधारी। वाह्येषु दशसु वस्तुपु ममत्वमुत्सृज्य निर्ममत्वरतः। स्वस्थः सन्तोपपरः परिचित्तपरिग्रहाद्विरतः ।।१४५॥ अन्वयाथों-('यः' ) जो ( वाह्येपु ) बाहरके (दशमु-च- स्तुपु) दशों परिग्रहोंमें (ममत्वं ) ममताको (उत्सृज्य) छोड़करके

[६४]
(निमर्मत्वरतः 'सन्') निर्ममत्वमे रत होता हुआ ( स्वस्थः ) मा-
यादिरहित स्थिर और ( सन्तोषपरः ) सन्तोपवृत्ति धारण करने में
तत्पर है (सः) वह ( परिचित्तपरिग्रहात् ) परिचित्तपरिग्रहसे
(विरतः) विरक्त है, अर्थात् परिग्रहत्याग प्रतिमाका धारक है ॥१४५||
१० अनुमतित्यागप्रतिमाधारी।
अनुमतिरारम्भे वा परिग्रहे वैहिकेषु कर्मसु वा ।
नास्ति खलु यस्य समधीरनुमतिविरतः स मन्तव्यः ॥
अन्वयार्थी-( यस्य ) जिसकी ( आरम्भे ) आरंभमें (वा)
तथा ( परिग्रहे ) परिग्रहमें (वा) तथा (ऐहिकेषु कर्मसु ) इस
लोकसम्बन्धी कार्योंमें ( अनुमतिः) अनुमति (न अस्ति)
नहीं है, (सः) वह (समधीः) समानबुद्धिवाला (खलु) निश्चय
करके (अनुमतिविरतः) अनुमतित्याग प्रतिमाका धारी (मन्तव्यः)
मानने योग्य है।
११. उत्कृष्ट श्रावक।
गृहतो मुनिवनमित्वा गुरूपकण्ठे व्रतानि परिगृह्य ।
भैक्ष्याशनस्तपस्यन्नुत्कृष्टश्चेलखण्डधरः ॥ १४७॥
अन्वयार्थी-('य:' ) जो (गृहतः) घरसे (मुनिवनं)
मुनिवनको ( इत्वा); प्राप्त होकर (गुरुपकण्ठे ) गुरुके निकट
(व्रतानि ) व्रत (परिगृह्य ) धारण करके ( तपस्यन् ) तप
करता हुआ (भैक्ष्याशनः ) भिक्षाभोजन करता है ( 'स! ) वह
(चेलखण्डधरः) खण्डवस्त्रका धारी ( उत्कृष्टः ) उत्कृष्ट श्रावक
है।॥ १७॥

[६५] श्रेष्टज्ञाताका म्वरूप । पापमरातिधर्मो वन्धुर्जीवस्य चेति निश्चिन्वन् । समयं यदि जानीते श्रेयो ज्ञाता ध्रुवं भवति ॥१४८॥ अन्वयाथों-(जीवस्य ) जीवका (पापं ) पाप (अरातिः) वैरी है (च) और ( धर्मः ) धर्म ( वन्धुः ) मित्र है, (इति) इस प्रकार (पूर्व) नित्य (निश्चिन्वन ) विचारता हुआ ( यदि ) जो ( समयं ) शास्त्रको ( जानीते) जानता है, ('सः एव' ) वह ही ( श्रेयः ) श्रेष्ठ (ज्ञाता) ज्ञाता (भवति) है ॥ १४८ ॥ उपसहार। येन स्वयं वीतकलङ्कविद्या दृष्टिक्रियारत्नकरण्डभावं । नीतस्तमायाति पतीच्छयेव सर्वार्थसिद्धिस्त्रिषु विष्टपेषु ॥ १४९ ।। अन्वयार्थी-(येन ) जिसने ( स्वयं ) अपनेको (वीतक- लङ्कविद्यादृष्टिक्रियारत्नकरण्डभावं ) निर्दीप ज्ञान, दर्शन और चारित्ररूपी रत्नोंका पिटारा (नीतः ) बनाया (तम् ) उसको (त्रिषु विष्टपेषु ) तीनो जगतोंमें (पतीच्छया इव ) पतिकी समान इच्छा करके ( सर्वार्थसिद्धिः ) धर्म अर्थ काम मोक्षकी सिद्धिरूप स्त्री ( आयाति ) प्राप्त होती है ॥ १४९ ॥ अन्तमगल। सुखयतु सुख भूमिः कामिनं कामिनीव सुतमिव जननी मां शुद्धशीला भुनक्तु ।

[६६] कुलमिव गुणभूपा कन्यका संपुनीता- जिनपतिपदपद्मप्रेक्षिणी दृष्टिलक्ष्मीः ॥ १५० ॥ अन्वयार्थी-( जिनपतिपटपभप्रेक्षणी ) गणधराटिकोंके पति तीर्थकर भगवान्के चरण कमलोका निरीक्षण करनेवाली अथवा भगवानके कहे हुए सुबन्त तिडन्त रूप पदोंपर श्रद्धा रखनेवाली ( दृष्टिलक्ष्मीः ) सम्यग्दर्शनरूप लक्ष्मी ( कागिनं ) कामी पुरुपको (सुखभूमिः कामिनी इव ) सुखकी भूमि स्त्रीकी तरह (मां सुखयतु) मुझको सुखी करो, तया ( सुतं ) पुत्रको (शुद्धशीला जननी) इव शुद्धशील माताकी तरह (मां भुनक्तु) मेरी रक्षा करो, तथा ( कुलं) कुलको (गुणभूपा कन्यका इव) गुणभूषित कन्याके समान ( संपुनीतात् ) पवित्र करो ॥ १५० ।। इति श्रीसमन्तभद्रस्वामिविरचिते रत्नकरंडकनाम्नि उपासका ध्ययने एकादशप्रतिमावर्णनं नाम सप्तमः परिच्छेदः॥७॥ अर्थ-इस प्रकार श्रीसमन्तभद्रस्वामीके बनाये हुए रत्नकरण्ड नामक श्राव- काचारमें एकादशप्रतिमावर्णनवाला सातवा परिच्छेद पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥ समाप्तोऽयं ग्रंथः।।

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Ratnkarndshravkachar

Author
Bakaliwal, Pannalal
Title
Ratnkarndshravkachar
File name
Ratnkarndshravkachar
Text
OCR done
Citation
1918
Published
2009/11
Publisher
Bombay, Jain Granth Ratnakar Karyalay
Language
Sanskrit
Pages
68
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344218
Barcode
99999990234096.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
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