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Rigved Bhasha Bhashaya Pancham Mandalam

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आर्यसमाज स्थापना-शताब्दी-प्रकाशन
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सादेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा
महर्षि दयानन्द भवन, रामलीला मैदान, नई दिल्ली-१
[३]
ऋग्वेद (थार्यभाषा-भाष्य)
( पंचम, षष्ठ, सप्तम मण्डल)
महर्षि दयानन्द सरस्वती कुत
प्रायंसंवत् १६७२६४६०७३
मूल्य २० रुपये
सार्वदेशिक प्रेस
पटौदी हाउस, दरियागंज, दिल्ली-६

2227 स्तुता मयां वरदा वैदमाता प्र- चोदयन्तां पावमानी द्विजानाम। आयुःप्राणं प्रजां पशुं कीर्ति द्र विणं ब्रह्मवर्चसम्। मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्॥ अथर्व०१९-७१-१ स्तुति करते हम वेद ज्ञानकी, जो माता है प्रेरक-पालक, पावन करतो मनुज मात्र को। आयु,बल,सन्तति, पशु कीर्लि धन, मेधा, विद्या का दान। सब कुछ देकर हमें दिया है, मोक्ष मार्ग का पावन ज्ञान। सकल क D the हे कृपानिधे! सर्वात्मा सच्चिदानन्दो- ऽनन्तो यो न्यायकृच्छुचिः। भूयात्तमां सहायो नो दयालुः सर्वशक्तिमान् ॥१॥ व्याख्या--जो परमात्मा, सबका आत्मा, सत् चित् आनन्दस्वरूप, अनन्त, अज, न्यायकारी, निर्मल, सदा पवित्र, दयालु, सब सामर्थ्यवाला हमारा इष्टदेव है वह हमको सहाय नित्य देवे, जिससे महाकठिन काम भी हम लोग सहज से करने को समर्थ हो । हे कृपानिधे ! यह काम हमारा आप ही सिद्ध करने वाले हो, हम आशा करते हैं कि आप अवश्य हमारी कामना सिद्ध करेंगे। ! -महर्षि दयानन्द सरस्वती editicket.in २८५८ भा * ओ३म् ऋग्वेद भाषाभाष्यम्॥ 08:3:0%80%30:-- पञ्चमं मण्डलम्॥ :053:0:43:03:0- - -- विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परां सुव । यद्भद्रं तन आ सुंद ।। अथ द्वादशर्चस्य प्रथमस्य सूक्तस्य बुधगविष्ठिरावात्रेयाषी । अग्निर्देवता १।३ । ४ । ६ ११ । १२ निचूतत्रिष्टुम् । २ । ७ । १० त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ५॥ ८ स्वराट् पङ्क्तिः । ६ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ नब बारह ऋचा वाले प्रथम सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में उपदेश देने योग्य और उपदेश देने वाले के गुणों को कहते हैं । अबाध्यग्निः समिधा जनानां पति धेनुमिवायतीमुषासम् । यहा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र मानवः सिस्रते नाकमच्छ ॥२॥ पदार्थः हे विद्वन् जैसे (समिधा) इन्धन. और घृत आदि से (अग्निः) अग्नि (प्रबोधि) जाना जाता अर्थात् प्रज्वलित किया जाता है (भानवः) कान्ति (जनानाम्) मनुष्यों की (प्रायतीम्) आती हुई (धेनुभिव) दुग्ध देने वाली गौ के तुल्य (उषासम्) प्रातर्वेला के (प्रति) प्रति (प्र,सिस्रते) प्राप्त होती और (वयाम्) शाखा को (प्र, उज्जिहानाः) अच्छे प्रकार त्यागते हुए (यह्वाइव) बड़े वृक्षों के सदृश (नाकम्) दुःख से रहित अन्तरिक्ष को (अच्छ) उत्तम प्रकार प्राप्त होती हैं वैसे आप हूजिये ॥१॥ shim 44

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पदार्थों की विद्या को ग्रहण कर कार्यों में अच्छे प्रकार
ऋग्वेदः म० ५ । सू०१।।
भावार्थ:-
:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं - जो
हैं वे दुःखरहित हुए वृक्षों के समान बढ़ते हैं ॥१॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
अर्वाधि होता यजयाय देवानू/ अग्निः सुमनाः प्रातरंस्थात् ।
समिद्धस्य रुशंददर्शि पाजों महान् देवस्तमंसो निरमोचि ॥२॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (सुमनाः) शुद्धमनवाला (होता) हवनकर्ता पुरुष
(यजथाय) यज्ञ करने के लिये (अद्धवः) ऊपर को चलने वाले (अग्निः) अग्नि के
सदृश (देवान्) विद्वानों वा श्रेष्ठगुणों को (प्रबोधि) जानता और (प्रात:) प्रातःकाल
में (अस्थात) स्थित होता है वह (समिद्धस्य) प्रदीप्त अग्नि के (शद) रूप के
समान (प्रशि) देखा जाता है और जो (महान्) बड़ा (देव:) प्रकाशमान सूर्य
(पाजः) बल को प्राप्त होकर (तमसः) अन्धकार से (निः) (अमोचि) अत्यन्त
छुटाया जाता है उसकी आप लोग सेवा करो ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो मनुष्य उत्तम आचरण से
अग्नि के सदृश ऊपर को जाने वाले होते हैं वे अविद्या से निवृत्त होकर
यशस्वी होते हैं ॥२॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
यही गणस्य रशनामजीगः शुचिरङ्क्ते शुचिभिर्गोभिरग्निः ।
आदक्षिणा युज्यते वाजयन्त्युत्तानामूवों अंधयज्जुहूभिः ॥३॥
पदार्थ:--हे मनुष्यो (यत्) जो (शुचिभिः) पवित्र (गोभिः) किरणों से
(अग्निः) अग्नि के सदृश (गणस्य) समूह की (रशनाम्) डोरी को (अजीग:) अत्यन्त
निगलता अर्थात् ग्रहण करता (प्रात्) और (शुचिः) पवित्र होता हुआ (ऊर्वः) ऊपर
को उठा (प्रङ्क्ते) प्रसिद्ध होता है वह (दक्षिणा) दक्षिणदिशा में युज्यते) युक्त
किया जाता है जो विद्यायुक्त स्त्री (वाजयन्ती) प्राप्ति कराती हुई (उत्तानाम्)
ऊपर जाने वाली सामग्री को निरन्तर ग्रहण करती है, वह (ईम्) प्राप्त हुए
(जुहूभिः) पान करने के साधनों से पीने योग्य पदार्थ को (अधयत्) पान करती
भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु०-जो समुदाय के संतोष को
उत्पन्न करते हैं वे किरणों से सूर्य जैसे वैसे सर्वत्र यश से प्रकाशित होते
हैं ॥३॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू. १॥ व्य AME AN फिर उसी विषय को कहते हैं । अग्निपच्छा देवयतां मनांसि चक्षुषीव सूर्य संचरन्ति । यदी मुवात उषसा विरूपे श्वेतो वाजी जायते अग्रे अहाम् ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्) जैसे (अह्नाम्) दिनों के (अ) अग्रभाग में (विख्ये) विरुद्धस्वरूप (उषसा) रात्रि और दिन (ईम्) प्राप्त हुई क्रिया को (सुवाते) उत्पन्न कराते हैं और उन में (श्वेतः) श्वेतवर्ण (वाजी) जनाने वाला अर्थात् कार्यों की सूचना दिलाने वाला दिवस (जायते) उत्पन्न होता है वैसे (अग्निम् ) अग्नि की (देवयताम् ) कामना करते हुए जनों के बीच (सूर्ये) सूर्य में (चक्षूषीय) नेत्रों के सदृश परमात्मा में (मनांसि) अन्तःकरण (अच्छा) उत्तम प्रकार (सम्, चरन्ति) प्राप्त होते हैं ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे दिन वैसे विद्वान् जन और जैसे रात्रि वैसे अविद्वान् हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । जनिष्ट हि जेन्यो अग्रे अह्नां हितो हितेष्वरूषो वनेषु । दमैदमे सप्त रत्ना दांनोऽग्निहोता नि पसादा यजीयान् ॥५॥ पदार्थ:--हे विद्वन् जो (अह्नाम्) दिनों के (अग्ने) अग्रभाग में (हितेषु) सुख के कारणों में (हितः) हित करने वाला (बनेषु) वनों में (अरुष:) मर्मस्थलों में न व्यापी (दमेदमे) गृह गृह में (सप्त) सात किरणों और (रत्ना) धनों को (दधानः) धारण करता हुआ (जेन्यः) जीतने वाला (अग्निः) अग्नि के सदृश (होता) संगत क्रियानों का कर्ता (जनिष्ट) उत्पन्न होता है और श्रेष्ठ कर्मों में (नि,ससाद) प्रवृत्त होवे (हि) वही (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञ करने वाला होता है ।।५।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे दिन के आरम्भ में प्रभातसमय सब का हितकारी होता है वैसे ही श्रेष्ठ कर्म का करने वाला यजमान सब का हितैषी होता है ।।५।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अग्निहोता न्यसीधीयानुपस्थ मातुः सुरभा के लोके । युवा कविः पुरुनिष्ठ ऋतावा धर्चा कृष्टीनामुत मध्य इद्धः ॥६॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जैसे (मध्ये) मध्य में (इदः) प्रदीप्त (अग्निः) बिजुली. a mype prior ala ।

४ ऋग्वेदः सं० ५ । सू०१॥ JANA - के सदृश (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञकर्ता (युवा) बलवान् (कविः) उत्तम बुद्धिवाला विद्वान् (पुरुनिःष्ठः) अनेक प्रकार की श्रद्धा वा बहुत स्थानों वाला (ऋतावा) सत्य- का विभाग (धर्ता) और धारण करनेवाला (होता) यज्ञकर्ता (सुरभी) सुगनिधत (मातुः) माता के (उपस्थे) समीप में (लोके) लोक में (नि,प्रसीदत्) निरन्तर स्थित होवे (उ) वही (कृष्टीनाम्) मनुष्यों का (उत) और पशु आदिकों का रक्षक होवे ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा०-जैसे अग्नि मातारूप वायु में विराजता हुआ बिजुलीरूप से सबको सुख देता है वैसे ही धार्मिक विद्वान् सबको आनन्द दिलाने को योग्य है ।।६।। फिर उसी विषय को कहते हैं । म णु त्यं विर्ममध्वरेषु साधुमग्निं होतारमीळते नमोभिः । आ यस्ततान रोदसी ऋतेन नित्य मृजन्ति वाजिन घृतेनं ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो अग्नि (नमोभिः) अन्न आदिकों से (ऋतेन) सत्य से (घृतेन) और जल से (वाजिनम्) गतिवाले पदार्थ को (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (प्रा, ततान) विस्तृत करता अर्थात् अन्तरिक्ष और पृथिवी पर पहुँचाता है उसकी विद्या से जो (नित्यम्) नित्य (मजन्ति) शुद्ध करते और (त्यम्) उस (अग्निम्) अग्नि के सदृश (होतारम्) यज्ञ करने वाले (साधुम् ) श्रेष्ठ (विप्रम्) बुद्धिमान् की (अध्वरेष) नहीं हिंसा करने योग्य व्यवहारों में (नु) शीघ्र (प्र, ईलते) अच्छे प्रकार स्तुति करते हैं वे सुखी होते हैं ॥७॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे विद्वान् जन अग्नि को कार्यों में संप्रयुक्त अर्थात् काम में लाकर धन और धान्य से युक्त होते हैं वैसे ही इसकी विद्या को कार्यों में संयुक्त करके प्रत्यक्ष विद्यायुक्त होते हैं॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। माजोल्यो मृज्यते स्वे दमूना: कविप्रशस्तो अतिथिः शिवो नः। सहस्रशृङ्गो वृषभस्तदोजा विश्वाँ अग्ने सहसा पास्यन्यान् ॥८॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान (दमूना:) इन्द्रियों को वश में रखने वाले (कविप्रशस्तः) विद्वानों से प्रशंसा करने योग्य अथवा विद्वानों में प्रशंसा को प्राप्त (शिवः) मङ्गलस्वरूप वा मङ्गल करनेवाले (अतिथि:) जिनको पाने की ऋग्वेदः मं० ५। सू०१॥ HERE कोई तिथि नियत विद्यमान न हो (सहस्रशङ्गः) जो हजारों शृङ्गों के तुल्य तेजों से युक्त (वृषभः) बलिष्ठ और वृष्टि करने बाले (तदोजाः) जिनका वही पराक्रम (मार्जाल्यः) जो अत्यन्त शुद्ध करनेवाले अग्नि के सदृश आप (स्वे) अपने में (प्र, मज्यते) शुद्ध किये जाते हैं वह (सहसा) बल से (विश्वान्) सम्पूर्ण (न:) हम लोगों की तथा (अन्यान्) अन्यों की रक्षा करते हुए (असि) विद्यमान हो उन की हम लोग सेवा करें ॥८॥ भावार्थः-- वे ही अतिथि होवें जो इन्द्रियों के दमन करने और मङ्ग- लाचरण करने वाले धम्मिष्ठ विद्वान् जितेन्द्रिय और सब के प्रिय साधन में प्रीति करने वाले होवें और जैसे अग्नि सबका शुद्ध करनेवाला है वैसे ही सम्पूर्ण जगत् के पवित्र करने वाले अतिथि जन हैं ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । प्र सद्यो अग्ने अत्यष्यन्यानाविर्यस्मै चारुतमो बभूथं । ईळेन्यौ वपुष्यो विभावा प्रियो विशामतिथिर्मानुषीणाम् ॥९॥ पदार्थ:--हे (अग्ने) विद्वन् (यस्मै) जिस के लिये श्राप (प्रावि:) प्रकट (बभूथ) होते हो वह (ईलेन्यः) प्रशंसा करने योग्य धर्मयुक्त कर्म करने वाला (वयुष्यः) सुन्दर रूप में प्रसिद्ध (विभावा) विशेष करके कान्तियुक्त (चारुतमः) अत्यन्त सुशील और सुन्दर और (मानुषीणाम् } मनुष्यादिरूप (विशाम्) प्रजाओं की (प्रियः) कामना वा सेवा करने योग्य (अतिथि.) सर्वत्र घूमने वाला (घ) समर्थ होता है जिस कारण प्राप (अन्यान् । प्रथम उपदेश दिये हुओं को (सः) तुल्य दिन में (प्रति, एषि) उल्लङ्घन करके प्राप्त होते हो वह आप हम लोगों से सत्कार करने योग्य हो । भावार्थ:-जो मनुष्य नित्य भ्रमण करते और प्राप्त हुए जनों को उपदेश कर और नहीं प्राप्त हुओं को उपदेश के लिये जाते तथा सब के हितैषी बड़े विद्वान् और यथार्थवादी हैं वेही अतिथि होने के योग्य हैं ।।९।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। तुभ्य भरन्ति क्षितयो यविष्ठ बलिमग्ने अन्तित ओत दूरात् । आ मन्दिष्ठस्य सुमति चिकिद्धि बृहत्ते अग्ने महि शर्म भद्रम् ॥१०॥ पदार्थ:- हे (यविष्ठ) अतिशय युवा (अग्ने) विजुली के सदृश विद्या में व्याप्त जिस से माप (अन्तितः) समीप से (उत) और (दूराद) दूर से पाकर सब ( ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १ ।। RA aad HER MDHA को सत्य का उपदेश करते हो इस से (क्षितयः) गृहस्थ मनुष्य (तुभ्यम्) आप के लिये (बलिम्) खाने और पीने योग्यादि पदार्थों के समूह को (प्रा, भरन्ति) धारण करते हैं और हे (अग्ने) पवित्र कार्य करने वाले प्राप (भन्दिष्ठस्य) अत्यन्त श्रेष्ठ पाचरण करने वाले की (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धि को (मा, चिकिद्धि) विशेष करके जानिये और यह (ते) आप का (महि) सत्कार करने योग्य (बृहत) बड़ा (भद्रम्) सेवन करने योग्य सुख का देने वाला (शर्म) गृह वा सुख हो ॥१०॥ भावार्थ:-जिस से अतिथि जन सब मनुष्यों के सत्य उपदेश से परम उपकार को करते हैं इस से वे अन्न पान स्थान प्रिय वचन और धन आदि से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आय रथं भानुमो भानुमन्तमग्ने तिष्ठं यजतेभिः समन्तम् । विद्वान्पथीनामुर्व १'न्तरिक्षमेह देवान्हविराय वक्षि ॥११॥ पदार्थ:-हे (भानुमः कान्तिवाले (अग्ने) विद्वन् पाप (इह) यहां (अद्य) इस समय (यजतेभिः) प्राप्त हुए घोड़े आदिकों से संयुक्त (समन्तम्) सब प्रकार दृढ़ अवयवों वाले (भानुमन्तम्) कान्तियुक्त (रथम्) सुन्दर वाहन पर (मा) अच्छे प्रकार (तिष्ठ) विराजिये इससे (विद्वान्) विद्यायुक्त आप (पथीनाम् ) मार्गों के (उरु) व्यापक (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष को और (हविरद्याय) खाने योग्य अन्न आदि के लिये (देवान्) विद्वान् अतिथियों को जिससे (आ, वक्षि) अच्छे प्रकार पहुंचाते हो इससे हम लोगों से सत्कार करने योग्य हो ॥११॥ भावार्थ:--गृहस्थों को चाहिये कि दूर स्थित भी उत्तम अतिथियों को उत्तम वाहनों पर बैठाकर उपदेश के लिये लावें और अन्न आदि से उनका सत्कार करें॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अवोचाम कवये मेध्याय बचौ वन्दार वृषभाय वृष्णे। गविष्ठिरो नमसा स्तोममग्नौ दिवींव रुक्ममुरुव्यञ्चमवेत् ॥१२॥ पदार्थ:-हे राजा आदि मनुष्यो अतिथि हमलोग जो (गविष्ठिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी में स्थित (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (विवीव) जैसे सूर्या में वैसे (अग्नौ) अग्नि में (रुक्मम्) प्रीतिकारक और प्रकाशयुक्त (उरुव्यञ्चम्) बहुत व्यापक और (स्तोमम्) प्रशंसा करने योग्य का (अभेद) प्राश्रय करे उस Asha ऋग्वेदः मं० ५। सू०२॥ (वृष्णे) सत्य उपदेश की वृष्टि करने वाले (वृषभाय) बलिष्ठ (मेध्याय) पवित्र (कवये) विद्वान् जन के लिये (वन्दार) प्रशंसा करने योग्य धर्मसम्बन्धी (वचः) वचन का (अबोचाम) उपदेश करें ॥१२॥ भावार्थ:-उन पुरुषों को ही विद्वान् अतिथि जन विशेष उपदेश देवें कि जो पवित्रात्मा विद्या में प्रीति करने और उत्तम क्रियाओं के जानने की इच्छा करने वाले होवें और जो इन बातों से विपरीत अर्थात् रहित हों उन को अधिकार की योग्यता अर्थात् विशेष उपदेश के समझने का सामर्थ्य साधारण उपदेश के द्वारा प्राप्त करा के अधिकारी करें।।१२।। इस सूक्त में उपदेश सुनने और उपदेश के सुनाने वाले का गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में प्रथम सूक्त समाप्त हुमा ।। प्रथ द्वावर्चस्य द्वितीयस्य सूक्तस्य १ । ३-८।१० १२ कुमार पायो वृशो वा जार उभौ वा । २।। वृशो जार ऋषिः । अग्निदेवता । १।३।७।८ त्रिष्टुप् । ४ । ५ । । १० निवृत्रिष्टप् । ११ विराट त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । २ स्वराष्ट्र पङ्क्तिः। ६ भुरिक पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । १२ निदतिजगती छन्दः । निषाद: स्वरः॥ अब बारह ऋचावाले द्वितीय सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में युवावस्था में विवाह करने के विषय को कहते हैं ।। कुमारं माता युवतिः समुंध गुहां बिभर्ति न ददाति पित्रे अनीकमस्य न मिनज्जनांसः पुरः पश्यन्ति निहितमरतौ ॥१॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (युवतिः) पूर्ण अवस्था अर्थात् विवाह करने योग्य अवस्थावाली होकर जिस स्त्री ने विवाह किया ऐसी (माता) माता (समुधम्) तुल्यता से ढपे हुए (कुमारम्) कुमार को गुहा) गर्भाशय में (विभति) धारण करती और (पित्रे) उस पुत्र के पिता के लिये (न) नहीं (बदाति) देती है (अस्य) इस पिता के (अनीकम्) समुदायबल को अर्थात् (न) जो नहीं (मिनत् ) नाश करनेवाला होता हुआ (अरतौ) रमणसमय से अन्यसमय में (निहितम्) स्थित उस को (जनासः) विद्वान् जन (पुरः) पहिले (पश्यन्ति) देखते हैं वैसाही आप लोग आचरण करी॥१॥ भावार्थ:---यदि कुमार और कुमारी ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़के और

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २ ॥
SRO
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सन्तान के उत्पन्न करने की रीति को जान के पूर्ण युवा अवस्था अर्थात्
विवाह करने के योग्य अवस्था होनेपर स्वयम्वर नामक विवाह को करके
सन्तान की उत्पत्ति करते हैं तो वे सदा आनन्दित होते हैं ॥शा
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
कमेतं त्वं युवते कुमारं पेषी बिमर्षि महिषी जजान ।
पूर्वीहि गर्भः शरदो ववर्धापश्यं जातं यदऍत माता ॥२॥
पदार्थ:-हे युवते) ब्रह्मचर्य से पढ़ी विद्या जिस ने ऐसी पूर्ण अवस्था
वाली (पेषी) पेष्याकार अर्थात् डिव्वी के आकार के गर्भाशय में वीर्य को स्थित
करने वाली (महिषी) महान् रूप बल और उत्तम स्वभाव आदि के योग से प्रादर
करने योग्य (स्वम्) तू (कम्) किस (एतम्) किया है ब्रह्मचर्य जिस ने ऐसे इस
(कुमारम्) बालक का (बिभषि) पालन करती है और (माता) माता (यत्) जिस
को (असूत) उत्पन्न करती तथा (जातम्) उत्पन्न हुए को मैं (अपश्यम्) देखता हूं
वह (गर्भः) गर्भाशय में प्राप्त (पूर्वीः) प्राचीन (शरदः) शरदऋतुओं तक निरन्तर
(हि) जिस से (ववर्ष) बढ़ता है उस से (जजान) उत्पन्न होता है ॥२॥
भावार्थः- हे कन्यानो! तुम बाल्यावस्था में सोलह वर्ष के प्रथम
और पचीस वर्ष के प्रथम कुमार जनो विवाह को न करो जो इस प्रकार से
ब्रह्मचर्य के करने के अनन्तर विवाह को करें उन के सन्तान उत्तम रूप
और गुणों से युक्त बहुत कालपर्यन्त जीवने वाले और शिष्ट जनों से उत्तम
प्रकार मान पाने वाले होते हैं ।।२।।
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
हिरण्यदन्तं शुचिवर्णमारात् क्षेत्रांदपश्यमायुंधा मिमानम् ।
ददानो अस्मा अमृत विपृकत्किं मामनिन्द्राः कृणवन्ननुक्याः ॥३॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो मैं किया ब्रह्मचर्य जिन्हों ने ऐसे स्त्री पुरुषों में से
(क्षेत्रात्) संस्कार की हुई भार्या स्त्रीसे उत्पन्न हुए (हिरण्यदन्तम्) सुवर्ण वा तेज के
तुल्य दांत वाले (शुचिवर्णम्) पवित्रस्वरूपयुक्त वा अतिसुन्दर और (प्रायुधा) शस्त्र
और अस्त्रों को (मिमानम्' धारण करने वाले को (पारात्) समीप से (प्रपश्यम्)
देखू और (प्रस्म) इसके लिए (विपृक्वद) विशेष करके सम्बद्ध (अमृतम्) मोक्षसुख
को (ददानः) देता हुआ मैं हूं उस (माम्) मुझ को (मनिन्द्राः) ऐश्वयं से रहित
(अनुक्थाः) अविद्वान् जन (किम्) क्या (कृणवन्) करें ॥३॥

. & भावार्थ:-हे मनुष्यो ! पूर्ण ब्रह्मचर्य शिक्षा विद्या युवावस्था और परस्परप्रीति के विना सन्तानों का विवाह न करें इस प्रकार करते हुए सब जन अति उत्तम सन्तानों को प्राप्त होकर अति ही आनन्द को प्राप्त होते हैं जो इस प्रकार प्रसिद्ध होते हैं उन के समीप दारिद्रय मूर्खता वा दरिद्री और अविद्वान् जन कुछ भी विघ्न नहीं कर सकते हैं ॥३॥ Marw फिर विवाहसम्बन्धी-संतान विषय को कहते हैं । क्षेत्रदिपश्यं सनुतश्चरन्तं सुमद् यूथं न पुरु शोभमानम् । न ता अगृभ्रन्नजनिष्ट हि षः पलिक्नीरियुबतयों भवन्ति ।।४।। पदार्थ:--हे मनुष्यो जो मैं जिस क्षेत्रात) संस्कार की हुई स्त्री से उत्पन्न (चरन्तम्) व्यवहार करते हुए (सुमत्) अापही (पुरु) बहुत (शोभमानम्) शोभायुक्त (न) समान वा (यूथम्) सेनासमूह के (न) समान बलिष्ठ को (सनुतः) सनातन से (अपश्यम्) देखता हूं (स:) वह सुखी (अजनिष्ट) होता है और जो ब्रह्मचारिणी कन्यायें उत्तम नियमों वाली हुई युवावस्था के प्रथम पतियों को (अगृभ्रन्) ग्रहण करती हैं (ता:) वे (हिही (युवतयः) युवती हुई पुत्रपौत्रों के अतिसुख से युक्त (इत्} और (पलिश्नो:) श्वेत केशोंवाली अर्थात् वृद्धावस्थायुक्त (भवन्ति) होती हैं ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमाले०हे. मनुष्यो ! यदि आप लोग अपने सन्तानों को अतिकालपर्यन्त ब्रह्मचर्य करावें तो वे धर्मिष्ठ बुद्धियुक्त और चिरञ्जीवी हुए आप लोगों के लिये अतीव सुख देवें ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । के में मर्यक वि यवन्त गोमिन येषां गोपा अरंगश्चिदास । य ई जगभुरव ते सृजन्ताजाति पश्व उप नश्चिकित्वान् ।।६।। पवार्थ:-हे विद्वानो (के) कौन (गोपा:) गौमों के पालन करने वाले (गोभिः) गौत्रों के (न) सदृश (मे) मेरे (मर्यकम् ) अल्प मनुष्य को (वि, यवन्त करें और येषाम्) जिनका वह (चित) निश्चित (अरण:) मिलने वाला (मास) होता है और (ये) जो (पश्व:) पशुओं को (जगभुः) ग्रहण करें (ते) वे (मा, प्रजाति) अच्छे प्रकार सन्तानों की उत्पत्ति जिस कुल में उस को (उप सृजन्तु) उत्पन्न करें और जो (ईम्) विद्या ग्रहण करें ये दुःख को (अव) दूर करें और man १० ऋग्वेदः मं० ५। सू० २ ॥ ne जो (चिकित्वान्) बुद्धिमान् उत्पन्न करता है वह (न:) हम लोगों का हितैषी है यह समझानो ॥५॥ भावार्थः इस मन्त्र में उपमालं० -मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति यह पूछे कौन हम ले गों के थोड़े ज्ञानवाले सन्तानों को उत्तम बुद्धिवाले कर सकते हैं वे विद्वान् यह उत्तर देवें कि जो यथार्थवादी हों वे ही उक्त काम को कर सकते हैं अन्य जन नहीं ॥५॥ अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। वसां राजानं वसतिं जनानामरातयो नि दधुर्मत्यैषु । ब्रह्माण्यत्रेरव तं सृजन्तु निन्दितारो निन्द्यांसो भवन्तु ॥६॥ पदार्थ:-जो (वसाम्) वसते हुए प्राणियों और (जनानाम्) सज्जन पुरुषों के (राजानम्) न्याय' करने वाले को और (वसतिम्) निवास को प्रकट करे (तम्) उस को विद्वान् जन (अव सृजन्तु) न निकाल दें और जो (निन्दितारः) गुणों में दोषों और दोषों में गुणों का स्थापन करने वाले (निन्द्यासः) अधर्म के प्राचरण से निन्दा करने योग्य और (अरातयः) अन्याय से ग्रहण करने वाले शत्रुजन (मर्येषु) मरणधर्मा मनुष्यों में (ब्रह्माणि) बड़े धनों की (नि, दधुः) स्थापना करें वे (अत्रेः) तीन प्रकार के दुःख से रहित के भी दूर स्थित (भवन्तु) हों ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो निकृष्ट कर्म करने और दूसरे के द्रव्य के हरने वाले द्वषकर्ता हों उनको दण्ड देकर निर्जन देश में बांधो और जो स्तुति करने वाले धम्मिष्ठ होवें उन को समीप में निवास देकर सदा सत्कार करो ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्रायुपदिमुञ्चो अमिष्ट हि षः। एवास्मदग्ने वि मुमुग्धि पाशान्होतश्चिकित्व इह तू निषध |७|| पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् प्राप (सहस्रात्) असंख्य (य पात्) मिले वान मिले हुए बन्धन से (निवितम्) निन्दित (शुन:शेपम्) सुख के प्राप्त कराने और इन्द्रियाराम अर्थात् इन्द्रियों में रमण रखने वाले को (चित) भी (अमुचः) त्याग करो (हि) जिस से (सः) वह (प्रशमिष्ट) शान्त होता (एव) ही है । है (होतः। हवन करने वाले (चिकित्व:) बुद्धिमान् (इह) यहाँ युक्तधर्म सम्बन्धी व्यवहार में Mini म BHritik ऋग्वेदः मं०५। सू०२॥ Ane SPA अशा (निषद्य) प्रवृत्त होकर (अस्मत्) हम लोगों से (पाशान्) संसाररूप बन्धनों को (तू) फिर (वि, ममुग्धि) काटिये ।।७।। भावार्थ:--विद्वानों का यही आवश्यक कर्म है जो सब मनुष्यों को अविद्या और अधर्माचरण से अलग कर विद्वान् धार्मिक बना उनका दुःख- बन्धन छुड़ाना निरन्तर करना चाहिये ।।७।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। हृणीयमानो अप हि मदैये प्र में देवानी व्रतपा उवाच । इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वां चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम् ॥८॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) तीन दोषों के नाश करने वाले (हणीयमानः) क्रोध करते हुए आप (हि) ही (मत) मेरे समीप से (अप, ऐये:) जाइये और जो (हि) निश्चय (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (विद्वान्) विद्वान् (त्वा) आप को (अनु, चचक्ष) अनुकूल' कहें और जो (मे) मेरे लिये (देवानाम्) विद्वानों के बीच (तपाः) सत्य की रक्षा करने वाला हुआ सत्य को (प्र, उवाच) कहे (तेन) इस से (अनुशिष्टः) शिक्षा को प्राप्त (अहम्) मैं सत्यबोध को (शा, अगाम्) प्राप्त होऊ ॥६॥ भावार्थ:---जो मनुष्य दुष्ट गुण कर्म स्वभाव वाले हों वे दूर रखने योग्य हैं और जो धर्मिष्ठ सत्य का उपदेश करें उनके संग से शिष्ट अर्थात् श्रेष्ठ होके सुख को प्राप्त होवें ॥८॥ फिर उसी विद्वद्विषय को कहते हैं । वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निराविविश्वानि कृणुते महित्वा । भादेवीमायाः संहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे ।।९।। पदार्थ:-हे विद्वानो जैसे (अग्निः) सूर्य आदि रूप से अग्नि (बृहता) बड़े (ज्योतिषा) प्रकाश से (महित्वा) बड़प्पन से (विश्वानि) सम्पूर्ण वस्तुओं को (प्रावि:) प्रकट (कृणुते) करता है (वि) विशेष करके (भाति) प्रकाशित होता है और (प्र) अत्यन्त (सहते) सहन करता है (शुगे) शृङ ग के निमित्त (रक्षसे) दुष्टों के विनाश के लिये (विनिक्षे) वा अन्य विनाश के लिये (शिशीते) प्रताप- युक्त होता है वैसे (दुरेवाः) दुष्ट प्राप्त कराने रूप कर्म वाली (प्रदेवी:) अशुद्ध (माया:) छल आदि से युक्त बुद्धियों को सब प्रकार से वारण कीजिये ।। भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु०- जैसे सूर्य अन्धकार का वारण कर और प्रकाश को उत्पन्न कर के भयका निवारण करता है वैसे ही विद्वान् M Aiw

१२
ऋग्वेदः मं० ५ । सू०२॥
-
Rane
A
-
AAR
जन घोर अज्ञान का निवारण करके विद्यारूप सूर्य को उत्पन्न करके सब के
प्रात्मानों को प्रकाशित करें ॥६॥
अब धनुर्वेद के दृष्टान्त से अविद्या निवारण को कहते हैं ।
उत स्वानासों दिवि पन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे इन्तवा उ ।
मर्दै चिदस्य प रुजन्ति भामा न बरन्ते परिबाघो अदेवीः ॥१०॥
पदार्थ:-हे विद्वानो (अग्नेः) अग्नि से' (तिग्माय धाः) तीक्ष्ण आयुध युक्त
(स्वानासः) उपदेश करने वाले (विवि) विद्या के प्रकाश में वर्तमान (रक्षसे) दुष्टों
के विनाश करने के लिये (हन्तवै) हनने को समर्थ (सन्तु) हूजिये और उत) भी
(मदे) आनन्द के लिये प्रवृत्त हूजिये (चित्, उ) और भी (अस्य) इसके (भामाः)
क्रोधों के (न) तुल्य (परिबाधः) सब ओर से बाधनों को (अदेवीः) प्रमाद रहित
क्रियायें (प्र, रुजन्ति) सब प्रकार भङग करती और (वरन्ते) स्वीकार करती हैं।
उनका निवारण करो ॥१०॥
भावार्थ:--हे विद्वानो! आप लोग जैसे धनुर्वेद को पढ़े हुए शस्त्र
और अस्त्रों के प्रक्षेप अर्थात् चलाने रूप युद्ध में चतुर जन अग्निसम्बन्धी
अस्त्रादिकों से शत्रुओं का निवारण कर के विजय को प्रकाशित करते
हैं. वैसे ही अत्यन्त विद्या के पढ़ाने और उपदेश करने से अविद्याकृत
प्रमादों का निवारण कर के विद्याकृत श्रेष्ठ गुणों का प्रकाश करो ॥१०॥
फिर विद्वानों के गुणों को कहते हैं ।
एतं ते स्तोमै तुविजात विप्रो रयं न धीरः स्वषां अतक्षम् ।
यदीदग्ने प्रति त्वं देव हर्याः स्वर्वतीरप एंना जयेम ॥११॥
पदार्थ:-- है (तुविजात) बहुत विद्वानों में प्रसिद्ध अग्ने) विद्वन् जैसे मैं
(ते) आप का (स्वपाः) उत्तम कर्म करने वाला (धीरः) क्षमा आदि गुणों से
युक्त और ध्यान करने वाला (विप्रः) बुद्धिमान् जन के (न) सदृश (एतम् इस
श्रेष्ठ गुणों के प्रकाशक (रथम्) सुन्दर वाहन को (प्रतक्षम्) बनाता हूं वैसे स्वम्)
आप आचरण कीजिये और हे (देव) सम्पूर्ण विद्या के देने वाले (यदि) जो आप
वाहन को रचिये तो (इत्) ही (स्तोमन्) प्रशंसित व्यवहार जिसमें ऐसे सुख को
प्राप्त हुजिये और जैसे हम लोग (एना) इस से (हयाः) कामना करने योग्य
अर्थात् सुन्दर (स्वर्वतीः) अच्छे सुखों से युक्त (अपः) प्राणों से युक्त (प्रति, जयेम)
प्रति जीतै वैसे आप इन को जीतिये ॥११॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३ ॥ १३ भावार्थः इस मन्त्र में उपमालङ्कार-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन धम्मंयुक्त कामनाओं को करके विजयी होते हैं वैसे ही आप लोग भी आचरण करो॥१०॥ फिर विद्वानों के गुणों को कहते हैं ।। तविग्रीवों वृषभो वाधानोऽशव१' यः समजाति वेदः। इतीम मग्निममृता अवोचबर्हिष्मते मनवे शर्म यंसद्धविष्भते मनवे शर्म यंसत् ॥१२॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जैसे (तुविनीव:) बहुत बल वा सुन्दरी ग्रीवायुक्त (वावधानः) अत्यन्त बढ़ता हुआ (वृषभः) अतीव बलवान् (अर्यः) स्वामी (अशत्रु) शत्रुओं से रहित (वेदः) धन को (सम्, प्रजाति) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे और (बहिष्मते) ज्ञान की वृद्धि से युक्त (मनवे) मनुष्य के लिये (शर्म) सुख वा गृह को (यंसत्) देवे और (हविष्मते) बहुत उत्तम पदार्थों से युक्त (मनवे) विचारशील पुरुष के लिये (शर्म) सुख को (यंसव) देवे (इति) इस प्रकार से (इमम्) इस (अग्निम्) बिजुली को (अमृताः) प्रात्मज्ञान जिन को प्राप्त वे (अवोचन्) कहें ॥१२॥ भावार्थ:-सब विद्वान् जन ही सब विद्यार्थियों के लिये उत्तम शिक्षा देकर शत्रुता को छुड़ा के सब प्रकार से सुख को प्राप्त होवें ॥१२॥ इस सूक्त में युवावस्था में विवाह और विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में द्वितीय सूक्त समाप्त हुमा ॥ अथ द्वादशर्चस्य तृतीयस्य सूक्तस्य वसुथु त प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता । १ निचत्पङ्क्तिः । ११ भुरिपङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ । ३ । ५। । । १२ निचत्रिष्टुप् । ४ । १० त्रिष्टुप् । ६ स्वराद त्रिष्टुप् । ७ । ८ विरात्रिष्टुप छन्दः । धवतः स्वरः ।। अब बारह ऋचा वाले तीसरे सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मंत्र में राजा के कर्तव्य को कहते हैं ।। त्वमग्ने वरुणो जायंसे यचं मित्रो भवसि यत्समिद्धः। त्वे विश्वं सहसस्पुत्र देवास्त्वमिन्द्रो दाशुषे माय ॥१॥ ple १४ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३ ॥ IN Ara pen पदार्थ:-है (सहसः) बल' के (पुत्र) पालन करने वाले (अग्ने) विद्या का अभ्यास किये हुए विद्वान् (यत्) जिस के (त्वम्) आप (मित्रः) सखा और (यव) जिस से (समिद्धः) प्रकाशयुक्त (भवसि) होते हो और जो (त्वम्) आप (वरुणः) दुष्टों के बन्ध करने वाले श्रेष्ठ (जायसे) होते हो और जो (त्वम्) आप (इन्द्रः) ऐश्वर्य के दाता (बाशुषे) देने योग्य (माय) मनुष्य के लिये धन देते हो उन (स्वे) आप में (वि श्वे) संपूर्ण (देवाः) विद्वान् जन प्रसन्न होते हैं ॥१॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जिस के आप मित्र वा जिस से आप विरुद्ध और उदासीन होते हैं वह आप के साथ सदैव मित्रता रक्खे और आप भी उसके साथ रक्खें ॥शा फिर उसी विषय को कहते हैं। स्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वावन् गुह्यं विर्षि । अजन्ति मित्रं मुधितं न गोभिर्यदम्पती समनसा कृणोषि ॥२॥ पदार्थः-- है (स्वधावन्) अच्छे अन्न से युक्त राजन् (यत्) जिससे (त्वम्) आप (कनीनाम) कामना करने वालों के (प्रयंमा) न्यायाधीश (भवसि) होते हो और (गुह्यम्) गुप्त (नाम) नाम को (बिर्षि) धारण करते हो और (यत्) जो (दम्पती) विवाहित स्त्री पुरुषों को (समनसा) तुल्य मन और दृढ़ प्रीतियुक्त (कृणोषि) करते हो उन आप को सम्पूर्ण विद्वान् जन (गोभिः) वारणी प्रादि पदार्थों से (सुधितम्) सुन्दर प्रसन्न (मित्रम्) मित्र के (न) सदृश (अञ्जन्ति) प्रकट करते हैं ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं -वही राजा श्रेष्ठ है जो प्रजात्रों का यथार्थ न्याय करता है और जैसे मित्र मित्र को प्रसन्न करता है वैसे ही राजा प्रजात्रों को प्रसन्न करे ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । तवं श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चार चित्रम् । पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेनं पासि गुह्यं नाम गोनाम् ॥३॥ पदार्थ:-हे (रुद्र) दुष्टों के रुलाने वाले जो (मरुतः) मनुष्य (तव) भाप की (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (मर्जयन्त) शुद्ध करें (ते) प्राप का (यत्) जो (चार) सुन्दर (चित्रम्) अद्भुत (पदम्) प्राप्त होने योग्य (अनिम) जन्म उस को शुद्ध करें और (यत्) जो पाप (विष्णोः) व्यापक ईश्वर का (उपमम्) उपमायुक्त और (गोनाम्) इन्द्रियों वा किरणों का (गृह्यम्) गुप्त (नाम) नाम (निधायि) धारण MAAL ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३ ।। करें (तेन) इसी हेतु से उन का आप (पासि) पालन करते हो इस से सत्कार करने योग्य हो ॥३॥ भावार्थ:-हे राजन् ! इसी से प्राप के जन्म का साफल्य होवे जिस से आप ईश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग कर के प्रजाओं का पालन करो॥३॥ com D om Pape Alam अथ प्रजाकृत्य को कहते हैं । तवं श्रिया सुदृशों देव देवाः पुरू दधाना अमृत सपन्त । होनारमग्निं मनुषो नि दुर्दशस्यन्त उशिजः शंसंसायोः ॥४॥ पदार्थ:-हे (देव) दानशील राजन् (तब) आपकी (श्रिया) लक्ष्मी वा शोभा से (सदशः) उत्तम प्रकार देखने और (पुरू) बहुत (अमृतम्) मृत्युरहित अर्थात् अविनाशी पदवी को (दधाना:) धारण करते और (उशिजः) कामना करते हुए (प्रायोः) जीवन के (शंसम्) कहाने और (होतारम्) ग्रहण करने वाले (अग्निम् ) अग्नि को (दशस्यन्तः) विस्तारते हुए (देवाः) विद्वान् (मनुषः) मनुष्य (सपन्त) आक्रोशि रहे अर्थात् चिल्ला चिल्ला उसका उपदेश दे रहे हैं वे मृत्युरहित पदवी को (नि, दुः) प्राप्त होवें ॥४॥ भावार्थ:-- हे मनुष्यो ! आप यथार्थवक्ता विद्वानों के सङ्ग से विद्याओं को ग्रहण कर लक्ष्मीवान् हो और इस संसार में सुख भोगकर अन्त अर्थात् मरण में मुक्ति को भी प्राप्त होओ।॥४॥ फिर राजधर्म को कहते हैं ।। न बद्धोता पूर्वो अग्ने यर्जीयान्न काव्यैः परो अस्ति स्वधाता। विशश्च यस्या अतिथिभवासि स यज्ञेनं बनवदेव मर्त्तान् ॥५॥ पदार्थः --- हे (स्वधावः) बहुत धन और धान्य से युक्त (देव) सुख के देने वाले (अग्ने) विद्वान् वा राजन् अाप (यशेन) प्रजापालनरूप व्यवहार से (मन्)ि मनुष्यों का (वनवत) सेवन करते हो (न) न (त्वत्) श्राप के समीप से (पूर्व:) प्राचीन (होता) दाता (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञ करने वाला (अस्ति) है और (न) न (काव्यः) कवियों के बनाये हुओं से (परः) श्रेष्ठ है (यस्याः) जिस (विश:) प्रजा के (च) भी (अतिथिः) प्रादर करने योग्य जो आप (भवासि) होवें (सः) वह प्राप उस प्रजा के सत्कार करने योग्य है ।।५।। भावार्थ:-जो राजा धर्मयुक्त व्यवहार से प्रजात्रों का पालन करे वही राज्य करने के योग्य होता है ॥५॥ R १६ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३॥ 400 ANAM आय UN फिर प्रजाविषय को कहते हैं । वयमग्ने वनुयाम योता वसूयवा हविषा बुध्यमानाः । वयं समर्ये विदथेष्वहां वयं राया संहसस्पुत्र मर्त्तान् ॥६॥ पदार्थ:-हे (सहसस्पुत्र) बल की पालना करने वाले (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी राजन् (त्वोलाः) आप से रक्षा किये गये (वसूयवः) अपने धनकी इच्छा करने वाले (हविषा) दान से (बुध्यमानाः) बोध को प्राप्त होते हुए (वयम्) हम लोग आप से रक्षा की (वनुयाम) याचना करें और (वयम्) हम लोग. (अह्नाम्) दिनों के (विदथेषु) विशेष ज्ञान संबन्धी व्यवहारों में (समर्पा) सग्राम के बीच प्रवृत्त होवें और (वयम्) हम लोग (राया) धन से (मान्) मनुष्यों को याचे अर्थात् मनुष्यों से मांगें ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! विद्वानों से श्रेष्ठ गुणों की आप लोग प्रार्थना करें तो स्वयं प्रजायें धनवती होवे ।।६।। फिर चोरी आदि अपराधनिवारण प्रजापालन राजधर्म को कहा है। यो न आगों अभ्येनो भरात्यधीदघमघशंसे दधात । जही चिकित्यो अभिशस्तिमेतामग्ने यो नो मर्चयति द्वयेन ॥७॥ पदार्थ:--हे (चिकित्वः) विज्ञानवान् (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी पृथिवी के पालनेवाले (यः) जो (नः) हम लोगों के (प्रागः) अपराध और (एन:) पाप को (अभि,भराति) सम्मुख धारण करता है उस (प्रशंसे) चोरीरूप कर्म में जो (अधम्) पाप (इत्) ही को (अधि, बधात) अधिस्थापन करे और (य:) जो (द्वयेन) पाप और अपराध से (न:) हम लोगों को (मर्चयति) बांधता है और (एताम् ) इस (अभिशस्तिम्) सब ओर से हिंसा को करता है उस का आप (जही) त्याग कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो प्रजा को दोष देने वाले होवें उन को सदा ही दण्ड दीजिये और जो श्रेष्ठ आचरण करने वाले होवें उनको मानो अर्थात् सत्कार करो ॥७॥ फिर राजधर्म को कहते हैं । त्वामस्या व्युषि देव पूर्व दूतं कृण्वाना अयजन्त हव्यैः । संस्थे यदंग्न ईयंसे रयीणां देवो मसुमिरिध्यमानः ॥८॥ Vra time fa INION !

ऋग्वेदः म० ५। सू०३ ॥ १७ - पदार्थ:-- है (देव) श्रेष्ठ गुणों से युक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान (देवः) विद्वान् होते हुए आप (यद) जिस से (अस्याः) इस प्रजा के मध्य में (संस्थे) उत्तम प्रकार स्थित होते हैं जिस में उस में (रयीणाम्) धनों के बीच (वसुभिः) धन मादि पदार्थों से युक्त (मत्तः) मरणधर्मवाले' मनुष्यों से' (इध्यमानः) प्रकाशित किये गये (ईयसे) प्राप्त होते वा जाते हो और पालन का (ब्युषि) सेवन करते हो उन (त्वाम्) पाप को (हव्यैः) प्रशंसा करने योग्य पदार्थों से (वृतम्) शत्रुओं के नाश करने वाले (कृण्वानाः) करते हुए (पूर्व) पालन करने वाले विद्वान् जन (प्रयजन्त) मिलें ॥९॥ - - भावार्थः हे राजन् ! जो पाप विद्या और विनय से न्यायपूर्वक प्रजाओं का निरन्तर पालन करें तो आप को यश, धन, राज्य की उन्नति और उत्तम पुरुष प्राप्त होवें ॥८॥ फिर सन्तान शिक्षा विषयक प्रजाधर्म को अगले मन्त्र में कहा है। अर्थ स्पृधि पितरं योधि विद्वान् पुत्रो यस्तै सहसः सून ऊहे । कदा चिकित्यो अमि चक्षसे नोऽग्ने कदा मुंतचिद्यातयासे ॥९॥ पदार्थ:-हे (सहसः) ब्रह्मचर्यबल से युक्त पुरुष के (सूनो) पुत्र (चिकित्व:) बुद्धियुक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्विन् (ते) तेरे लिये मैं (अहे) विशेष तर्क करता हूं (य:) जो तू (विद्वान्। विद्यावान् (पुत्रः) दुःख' से रक्षा करने वाला है सो (पितरम्) पिता अर्थात् अपने पालने वाले' की (प्रव,स्पृधि) अभिकांक्षा कर और दुःख को (योधि) दूरकर तथा (ऋतचित्) सत्य का संचय करने वाले तुम (न:) हम लोगों को (कवा) कब (अभि, चक्षसे) उपदेश दोगे और (कवा) कब अच्छे कामों में (यातयासे) प्रेरणा करोगे ॥६॥ भावार्थ:- जो कन्या और बालकों को माता पिता ब्रह्मचर्य से विद्या प्राप्त करावें और पूर्ण युवावस्था में विवाह करावें तो वे अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। भूरि नाम वन्दमानो दधाति पिता वसो यदि तज्जोषयांसे । कुविदेवस्य सहसा चकानः सुम्नमग्निवैनते वाधानः ॥१०॥ पदार्थ:-हे (वसो) निवास कराने वाले जो आप की (वन्दमान:) स्तुति करता हुआ (वेवस्थ) विद्वान् के (सहसा) बल से (सम्नम्) सुख की चकान:) कामना करता और (अग्निः) अग्नि के सदृश (वावृधानः) निरन्तर बढ़ता हुआ - ऋग्वेदः म० ५। सू. ३ ।। १९ 0 (पिता) उत्पन्न करने वाला (यदि) यदि (भूरि) बहुत (कुवित्) बड़े जिस (नाम) नाम को (बधाति) धारण करता और (बनते) सेवन करता है (तत्) उस का तो आप (जोषयासे) सेवन करें ॥१०॥ भावार्थ:-हे सन्तानो ! जो आप लोगों के माता पिता दूसरे विद्या- रूप जन्मनामक द्विज ऐसा नाम विधान करते हैं उन का सेवन निरन्तर तुम लोग करो ॥१०॥ अब चोरी आदि दोष निवारण सन्तान शिक्षाकरण प्रजाधर्म विषय को कहते है ।। स्वमङ्ग जरितारै यविष्ठ विश्वान्यग्ने दुरिताति पर्षि । स्तेना अन्त्रिपवो जनासोऽज्ञातकेता वृजिना अभूवन् ॥११।। पदार्थ:-हे (यविष्ठ) अतिशय करके युवा (अङ्ग) भित्र (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान जिस से (त्वम्) अाप (जरितारम्) विद्या और गुण' की स्तुति करने वाले पिता की (अति, पषि) अत्यन्त पालना करते हो (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरिता) दुःख के प्राप्त कराने वाले कर्म वा फलों का त्याग करते हो और जो (प्रज्ञातकेताः) नहीं जानी बुद्धि जिन्हों ने वे मूर्ख (वृजिना:) पापाचरणयुक्त वर्जने योग्य (स्तेनाः) चोर (रिपवः) शत्रु (प्रभूवन्) होते हैं और जिन को (जनासः) विद्वान् जन (अश्रन्) देखते हैं उन का आप परित्याग करो ॥११॥ भावार्थ:-हे उत्तम सन्तानो! आप लोग दुष्ट आचरणों का त्याग, माता पितादि का सत्कार और चौरी कर्म आदि का निवारण करके पुण्ययश वाले हूजिये ॥११॥ फिर प्रजा धर्म विषय को कहते हैं । इमे यामांसस्त्वद्रिगंभूबन्दसवे वा तदिदागों अवाचि । नाहायमग्निरभिशस्तये नो न रीषते वाधानः परा दात् ।।१२।। पदार्थ:-हे श्रेष्ठ सन्तान जो (अयम्) यह (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्तमान (नः) हम लोगों को (अभिशस्तये) सब प्रकार से हिसा करने के लिये (न) नहीं (मह) निश्चय (परा, वात्) दूर पहुंचावे और (वावृधान:) निरन्तर बढ़ता हुना (न) नहीं (रोषते) हिंसा करता और (स्वनिक्) आप के प्रति यत्न कराता (वसवे) धन के लिये (अयाचि) कहा गया (वा) वा (तद) वह (भागः) अपराध (इत्) ही कहा गया उसको (इमे) ये (यामासः) यम और नियमों से युक्त जन पढ़ाने और उपदेश से पवित्र करें और वे आनन्दित (अभूवन्) होते हैं ॥१२॥ 29 ऋग्वेदः म० ५ । सू. ४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन किसी को भी विना अपराध के नहीं दोष देते हैं उनको अपने समीप से मत निकालो ॥१२॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा को चोरी और अन्य अपराध आदि निवारण आदि के कहने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में तीसरा सूक्त समाप्त हुआ। i प्रथैकादशर्चस्य चतुर्थस्य सूक्तस्य वसुध त पात्रेय ऋषिः । अग्निर्देवता। १। १० । ११ भुरिक पङ्क्तिः। ४ । ७ स्वराद पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ । ६ विराट् त्रिष्टुप् । ३।६।८ निवृत्रिष्टुम् । ५ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः॥ अब ग्यारह ऋचा वाले चतुर्थ सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में राजविषय को कहते हैं । त्यामग्ने वसुपर्ति वसूनामभि प्र मन्दे अध्वरेषु राजन् । त्वया वाज वाजयन्तो जयेमाभि ष्याम पृत्सुतीमयानाम् ॥१॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) बिजुली के सदृश विद्या से व्याप्त (राजन) उत्तम गुणों से प्रकाशमान राजन् (अध्वरेषु) नहीं हिंसा करने योग्य प्रजापालन और न्याय व्यवहारों में (वसूनाम्) धनों के (वसुपतिम्) धनस्वामी (त्वाम्) आप को मैं (अभि, प्र, मन्दे) सब ओर से मानन्द देऊ वा आनन्द देता हूं और (त्वया) अधिष्ठातारूप आप के साथ (वाजम्) सङ्ग्राम को (वाजयन्तः) करते वा कराते हुए हम लोग (मानाम्) मरणवर्म वाले शत्रुओं की (पृत्सुतीः) सेनानों को (अभि, जयेम) सब पोर से जीतें इस से धन और यश से युक्त (स्याम) होवें ॥शा भावार्थ:-जिन के अधिष्ठाता मुखिया धार्मिक और विद्वान् जन होवें उनका सदा ही विजय, राज्य की वृद्धि और अतुल लक्ष्मी होती है ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।

२० ऋग्वेदः म० ५। सू०४॥ ISE distor हव्यवाग्निरजरः पिता नौ विभुर्विभावो सुदृशींको अस्मे । सुगार्हपत्याः समिषों दिदीश्वस्मधू१क्स मिमीहि श्रवासि ॥२॥ पदार्थ:-हे राजन् जैसे (हव्यवाद) द्रव्यों को एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुंचाने वा (सुदशीक:) उत्तम प्रकार देखने योग्य वा दिखाने वाला (अग्नि:) शुद्धस्वरूप अग्नि जैसे (विभुः) व्यापक परमेश्वर के सदृश सब का पालन करता और प्रकाशित होता है वैसे (विभावा) अनेक प्रकार के प्रकाश वा ज्ञान से युक्त (अजरः) वृद्धावस्था रहित (नः) हम लोगों के (पिता) पालन करने वाले होते हुए (अस्मे ) हम लोगों के लिये (सुगार्हपत्याः) सुन्दर अग्नि आदि पदार्थसमुदाय वाले (इषः) अन्नों को (सम्, दिदीहि) अच्छे प्रकार दीजिये और (अस्मथक: हम लोगों का आदर करने जानने वा जनानेवाले होते हुए (श्रवासि) पढ़ने और पढ़ाने आदि कम्र्मों का (सम्, मिमीहि) विधान करिये ॥२॥ भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजन् ! जैसे बिजुली और भूमि में प्रसिद्ध हुए रूप से अग्नि सब का उपकार करता है और जैसे परमेश्वर असंख्यात पदार्थों के उत्पन्न करने से पितरों के सदृश सबका पालन करता है वैसे ही आप हूजिये ॥२॥ अब प्रजाविषय को कहते हैं ।। विशां कविं विश्पति मानुषीणां शुचि पावकं घृतपृष्ठमग्निम् । नि होतारं विश्वविदं दधिध्वे स देवेषू वनते वार्याणि ॥३॥ i पदार्थः- हे मनुष्यो आप लोग (घृतपृष्ठम्) जल और घृत आधार में जिस के उस (पावकम्) पवित्र करने वाले (अग्निम्) अग्नि और (विश्वविदम् ) संसार को जानने वाले के सदृश (मानुषीणाम्) मनुष्य सम्बन्धिनी (विशाम्) प्रजात्रों के (विश्पतिम्) प्रजापालक (शुचिम्) पवित्र और (होतारम् ) देने वाले (कविम् ) मेधावी जिस राजा को आप लोग (नि, दधिध्वे) अच्छे स्वीकार करें (स:) वह देवेषु) विद्वानों वा श्रेष्ठ पदार्थों में (वार्याणि) स्वीकार करने योग्यों का (वनते) सेवन करता है ॥३॥ भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलु०-जो अग्नि के सदृश प्रतापी जगदीश्वर के सदृश न्यायकारी विद्वान् और उत्तम लक्षणों वाला राजा होता है वही चक्रवर्ती राजा होने योग्य है ॥३॥ 2014 -RRENTINENT ऋग्वेदः मं० ५। सू. ४॥ २१ - RBway फिर उसी विषय को कहते हैं ।। जुषस्वग्नि इळया सजोषा यतमानो रश्मिभिः सूर्यस्य । जुवस्व नः समिधे जातवेद आ चं देवान्हविराय वक्षि ॥४॥ पदार्थ:-है (जातवेदः) ज्ञान की उत्पत्ति से विशिष्ट (अग्ने) दुष्टों के नाश करने वाले (यतमानः) प्रयत्न करते हुए (सजोषाः) तुल्य प्रीति सेवने वाले आप (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मिभिः) किरणों के सदृश (इळया) प्रशंसित वाणी से (न:) हम लोगों के (समिधम्) काष्ठ के तुल्य शत्रु की (जुषस्व) सेवा करो और (हविरधाय) खाने योग्य पदार्थ के लिये (देवान्) विद्वानों को (प्रा, वक्षि) प्राप्त कराते अर्थात् पहुंचाते हो उनकी (च) और (जुषस्व) सेवा करो ॥४॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमावाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य के प्रकाश से सब जीवों के करने योग्य कर्म सिद्ध होते हैं वैसे ही यथार्थ- वक्ता पुरुषों से राजा के सर्व न्याययुक्त प्रजापालन आदि कर्म होते हैं ॥४॥ फिर राजविषय को कहते हैं ।। जुष्टो दमूना अतिथिर्दुरोण इमं नो यज्ञमुपं याहि विद्वान् । विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्या शत्रयतामा भरा भोजनानि ॥५॥ पदार्थः - हे (अग्ने) बिजुली के सदृश श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न राजन (जुष्टः) सेवित वा प्रसन्न किये गए (दमूनाः) शम, दम आदि से युक्त (अतिथिः) अकस्मात् पाये (दुरोणे) गृह से (विद्वान्) विद्वान् श्राप (न:) हम लोगों के (इमम्) इस प्रत्यक्ष (यशम्) अन्न प्रादि उत्तम पदार्थों के दान को (उप, याहि) प्राप्त हूजिये और (शत्रूयताम्) शत्रुओं के सदृश आचरण करते हुओं की (विश्वाः) सम्पूर्ण (अभियुजः) सम्मुख प्राप्त हुई शत्रु सेनाओं का विहत्या) अनेक प्रकार के वधों से नाश करके (भोजनानि) प्रजापालन वा ख ने योग्य अन्नों को (प्रा, भरा) धारण कीजिये ॥५॥ भावार्थ:-जो राजा दुष्टों का नाश करके न्याय से प्रजाओं का पालन करता है वह बहुत ही प्रजा का प्रिय होता है ।।५।। फिर उसी विषय को कहते हैं । वधेन दस्युं प्र हि चातयस्व वयः कृण्वानस्तन्वे३' स्वायै । पिपर्षि यत्सहसस्पुत्र देवान्त्सो अंग्ने पाहि नृतम वाजे अस्मान् ।।६।। म Sama SHA •TAHARA में प्राप्त हुए In Mode 'PAUH Musta ऋग्वेदः मं० ५। सू०४॥ २२ ! -- Read पदार्थ:-हे (सहसः पुत्र) बलवान् के पुत्र (नृतम) अतिशय मुख्य (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी राजन् (यव) जो आप (स्वाय) अपने (तन्वे) शरीर के लिये (बयः) जीवन को (कृण्वानः) करते हुए (वर्धन) बध से (दस्युम्) साहस कर्मकारी चोर का (प्र, चातयस्व) अत्यन्त नाश करो वा नाश करायो। तथा प्रजाओं को (हि) ही (पिपर्षि) प्रसन्न करते हो (सः) वह पाप (वाजे) सङ्ग्रामों में (अस्मान्) हम लोगों (देवान्) विद्वानों की (पाहि) रक्षा कीजिये ॥६॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप सदा चोर डाकुओं का नाश कर धाम्मिकों का पालन करें और शत्रुओं को जीतें ।।६।। अब राज प्रजा विषय को कहते हैं । वयं ते अग्न उक्थैविधेम वयं हव्यैः पावक भद्रशोचे। अस्मे यि विश्ववार समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि ॥७॥ पदार्थः-हे (पावक) पवित्र (भद्रशोचे) कल्याण के प्रकाश करने वाले (अग्ने) बिजुली के सदृश वर्तमान विद्वान् राजा जैसे (वयम्) हम लोग जिन (ते) माप के (उक्थैः) प्रशंसित वचनों से (विश्वानि) सम्पूर्ण (बविणानि) यशों को विधेम) सिद्ध करें वैसे अमे) हम लोगों के लिये इन को (सम्, धेहि) अत्यन्त धारण कीजिये और जैसे (वयम्) हम लोग (हव्यः) देने और लेने योग्यों से आपकी विश्ववारम् ) विवरपर्यन्त अर्थात् अति उत्तम पदार्थ पर्यन्त पदार्थों से युक्त (रयिम्) लक्ष्मी को प्राप्त करावे वैसे आप (अस्मे) हम लोगों के लिये इस को (इन्व) व्याप्त कीजिये ॥७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे प्रजा और मन्त्रीजन राज- लक्ष्मी को बढ़ावें वैसे ही राजा इन लोगों के लिये धन बढ़ावे इस प्रकार न्याय से पिता और पुत्र के सदृश वर्ताव करके यशस्वी होवें ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अस्माकमग्ने अध्वरं जुषस्व सहसः सूनो विषवस्थ हव्यम् । वयं देवेषु सुकृतः स्याम शर्मणा नस्त्रिवरूथेन पाहि ॥८॥ पदार्थ:- हे (सहसः, सूनो) बलवान् और प्रतिकाल पर्यन्त ब्रह्मचर्य को धारण किए हुए जन के पुत्र और (त्रिषधस्थ) तीन अर्थात् प्रजा भृत्य और अपने कुटुम्ब के जनों के साथ पक्षपात छोड़ के रहने वाले (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी वर्तमान राजन् पाप (अस्माकम्) हम लोगों के हव्यम्) देने योग्य सुख और (अध्वरम्) पालनरूप व्यवहार का (जुषस्व) सेवन करो और (त्रिवरूथेन) वर्षा Menue JAPAREnglisten ऋग्वेदः मं० ५ । सू०४ ।। २३ शीत और ग्रीष्मकालः में श्रेष्ठ (शर्मणा) गृह के साथ (न:) हम लोगों का निरन्तर (पाहि) पालन करो जिस से (वयम्) हम लोग (देवेष) विद्वानों में (सुकृतः) धर्म सम्बन्धी कर्म करने वाले (स्याम) होवें ॥८॥ भावार्थ:-सब जन राजा के प्रति यह कहें कि हे राजन् ! आप हम लोगों का पालन यथावत् करिये आप से रक्षित हम लोग निरन्तर धर्मा- चरणयुक्त होकर आप की उन्नति को जैसे करें॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। विश्वानि नो दुर्गा जातवेदः सिन्धुं न नावा दुरिताति पर्षि । अग्ने अत्रिवन्नमंसा गृणानो३' स्मार्क बोध्यविता तनूनाम् ।।९।। पदार्थः-हे (अत्रिवत्) निरन्तर चलने वालों से युक्त (जातवेदः) विद्याओं से संपन्न (अग्ने) धम्मिष्ठ राजन् जिस से आप (नावा) नौका से (सिन्धुम्) नदी वा समुद्र को (न) जैसे वैसे (नः) हम लोगों के (विश्वानि) समस्त (दुर्गहा) दुःख से पार जाने को योग्य और (बुरिता) दुःख से प्राप्त होने योग्यों के भी (मति, पषि) पार जाते हो और (नमसा) सत्कार या अन्न आदि से (गृणानः) स्तुति करते (अस्माकम्) हम लोगों के (तनूनाम्) शरीरों के (अविता) रक्षक होते हुए (बोधि) जानते हो इससे निरन्तर सेवा करने योग्य हो । भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -जो राजा अध्यापक और उप- देशक जन सब लोगों को दुःख से पार पहुंचाते वे अतुल सुख को प्राप्त होते - NOW + हैं ॥६॥ Hue फिर उसी विषय को कहते हैं । यस्त्वा हृदा कीरिणा मन्यमानोऽमत्मत्यो जोहवीमि । जातवेदो यशौ अस्मासु धेहि प्रजाभिरग्ने अमृतत्वमश्याम् ॥१०॥ पदार्थ:-हे (जातवेदः) विज्ञान से युक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान राजन् (यः) जो (मन्यमानः) जानता हुमा (मर्त्यः) मनुष्य मैं हृदा) अन्तःकारण और (कीरिणा) स्तुति करने वाले से (अमर्त्यम्) मरणधर्म से रहित (स्था) प्राप की (जोहवीमि) अत्यन्त स्पर्धा करू और जैसे (प्रजाभिः) पालन करने योग्य प्रजात्रों के साथ (अमृतत्त्वम्) मोक्षभाव को (श्याम्) प्राप्त होऊ वैसे (अस्मास) हम लोगों में (यशः) कीर्ति को (धेहि) धरिये स्थापन कीजिये ।।१०॥ भावार्थ:---जैसे प्रजायें राजा के हित को सिद्ध करती हैं वैसे ही राजा ऋग्वेदः मं० ५ । सू०५॥ प्रजा के Mara सुख की इच्छा करें। इस प्रकार परस्पर प्रीति से अतुल सुख को प्राप्त होवें ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । यस्मै त्वं सुकृते जातवेद उ लोकमग्ने कृणवः स्योनम् । अश्विनं स पुत्रिण वीरवन्तं गोमन्तं रयिं नशते स्वस्ति ।।११।। पदार्थ:--हे (जातवेदः) बुद्धि से युक्त (अग्ने) विद्वन् (स्वम्) आप (यस्म) जिस (सते) धर्मात्मा के लिये (स्योनम्) सुख का कारण लोकम्) देखने योग्य (कृणवः) करते हो (सः, उ) वही (अश्विनम्) अच्छे घोड़े आदि पदार्थों (पुत्रिणम्) अच्छे पुत्रों (वीरयन्तम्) बहुत वीरों तथा (गोमन्तम् ) बहुत गौ प्रादिकों के सहित (स्वस्ति) सुखस्वरूप (रथिम्) धन को (नशते) प्राप्त होता है ।।११!! भावार्थ:-हे राजन् ! जो आप विद्या और विनय से प्रजात्रों को पुत्र आदि ऐश्वर्यों से युक्त करें तो ये प्रजायें आपका अति सत्कार करें।॥११॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के प्रर्थ की इससे पूर्व मत के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में चौथा सूक्त समाप्त हुमा ।। ! प्रकाशशर्चस्य पञ्चमस्य सूक्तस्य बसन त भाग्नेय ऋषिः । आ देवता । १।५।६।७।६।१. गायत्री । ३ । ८ निवृद्गायत्री। ११ विरागात्री। ४ पिपीलिकामध्या। गायत्री छन्दः । षड्ज: स्वरः । २ प्राथुष्णिक छन्दः । ऋषभः अब ग्यारह ऋचा बाले पञ्चम सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं ।। सुसमिद्धाय शोचिर्षे घृतं तीव्र होतन । अग्नये जानवेदसे ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो आप लोग (जातवेदसे ) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (सुसमिद्धाय) उत्तम प्रकार प्रदीप्त और (शोचिषे) पवित्र करने वाले नये) अग्नि के लिये (तीव्रम्) उत्तम प्रकार शुद्ध अर्थात् साफ किये (धूलम्) घृत का (जुहोतन) होम करो ॥१॥ भावार्थ:-जो अध्यापक जन पवित्र अन्तःकरण वालों में विद्या का संस्कार डालते हैं वे सूर्य के सदृश प्रताप से युक्त होते हैं ।।१।।

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५॥ २५ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। नराशंसः सुध्दतीमं यज्ञमदाभ्यः । कविहि मधुहस्त्यः ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (प्रदाभ्यः) निष्कपट (मधुहस्त्यः) मधुर हस्त वालों में श्रेष्ठ (नराशंसः मनुष्यों से प्रशंसा किया गया (कविः) बुद्धिमान् जन (हि) जिस कारण (इमम्) इस (यज्ञम्) विद्या के प्रचार नामक व्यवहार को (सषूदति) अमृत के सदृश टपकाता है इस कारण वह पूर्ण सुखयुक्त होता है ।।२।। भावार्थ:- हे विद्वान् ! जैसे गौ सबके सुख के लिये दुग्ध देती है वैसे सबके सुख के लिये सत्यविद्या के उपदेशों को निरन्तर वर्षाइये ॥२॥ अब राज विषय को कहते हैं। ईळितो अग्न आ वहेन्द्र चित्रमिह प्रियम् । सुखै रथेभिरूतये ॥३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) प्रात्मप्रकाशस्वरूप (ईळितः) प्रशंसा किये गये प्राप (इह) इस संसार में (सुखैः) सुखकारक (रथेभिः) वाहनों से (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (चित्रम्) अद्भुत (प्रियम्) मनोहर (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य को (मा, वह) सब प्रकार से प्राप्त कीजिये ॥३॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त हो के प्रजा के रक्षण के लिये सर्वत्र भ्रमण कीजिये ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। उम्रदा वि प्रथस्वाभ्य१ को अनूषत । भर्वा ना शुभ्र सातये ॥४॥ पदार्थः - हे (शुभ्र) शुद्ध पाचरण करने वाले राजन् पाप (सातये) दाय- विभाग के लिये (वि, प्रथस्व) प्रसिद्ध कीजिये और हम लोगों के लिये सुखकारी (भवा) हूजिये । हे (ऊर्ण म्रदाः) रक्षकों के सहित मर्दन करने और (अर्काः) मन्त्र और अर्थ के जानने वाले आप लोगो (न:) हम लोगों को सम्पूर्ण विद्याओं से सम्पन्न (अभि, अनूषत) कीजिये ॥४॥ भावार्थः -- राजा और राजपुरुष विभाग करके अपने अपने अंश अर्थात् हिस्से को ग्रहण करें और प्रजाओं के भाग प्रजात्रों के लिये देवें ॥४॥ अब गृहाश्रम विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। देवींद्वारो वि श्रृंयध्वं सुभायणा न ऊतये। प्रमं यज्ञं पृणीतन ॥५॥ पदार्थः हे पुरुषो तुम (सुप्रायणाः) उत्तम प्रकार गृहों में प्रवेश हो जिन से ऐसी (वेचीः) श्रेष्ठ और शुद्ध (द्वारः) द्वारों के सदृश सुख की कारणभूत उत्तम Himala ऋग्वेदः मं० ५। सू०.५॥ wat MANOR Miya स्त्रियों का (वि, श्रयध्वम् ) विशेष करके सेवन करो और (नः) हम लोगों के (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (यज्ञम्) गृहाश्रमव्यवहार को (प्रप्र, पृणीतन) पुष्ट करो ॥५॥ भावार्थः - यदि तुल्य गुण कर्म स्वभाव वाले स्त्री पुरुष विवाह कर के गृहाश्रम का आरम्भ करें तो पूर्ण सुख पावें ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। सुपतीके वयोधा यह्वी ऋतस्य मातरा ! दोषामुषासमीमहे ।।६।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे हम लोग(सप्रतीके) उत्तम विश्वास करने (क्योवृधा) सुन्दर जीवन को बढ़ाने और (यह्वी) बड़े (ऋतस्य) सत्य के (मातरा) आदर देने वाले (दोषाम्) रात्रि और (उषासम्) दिन की (ईमहे) याचना करते हैं वैसे इनकी आप लोग भी याचना करो ॥६॥ भावार्थः - जैसे रात्रि और दिन एक साथ ही बर्तमान हैं वैसे ही जिन्होंने विवाह किया ऐसे स्त्री पुरुष वर्ताव करें ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वातस्य पत्मन्नीळिता दैव्या होतारा मनुषः । इमं नो यज्ञमा गतम् ॥७॥ पदार्थ:--हे (ईळिता) प्रशंसित (देव्याः) श्रेष्ठ गुणों में उत्पन्न (होतारा) दाता जनो आप दोनों (वातस्य) वायु के (पत्मन्) गिरते हैं जिस में उस मार्ग में (नः) हम लोगों के (इमम्) इस (यज्ञम्) मिलने योग्य व्यवहार को (मनुष:) और मनुष्यों को (प्रा, गतम्) प्राप्त होवें ॥७॥ भावार्थ:-हे स्त्री पुरुषो ! आप दोनों धर्मसम्बन्धी कर्म के प्राच- रण से प्रशंसित होकर इस गृहाश्रमव्यवहार को सिद्ध करो ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वनिधः ॥८॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अत्रिषः) नहीं नाश करने वाली (इळा) प्रशंसित विद्या (सरस्वती) वाणी (मही) भूमि (मयोभुवः) सुख को कराने वाली इतिख:) तीन (देवीः) श्रेष्ठ गुणवती (बहिः) उत्तम गृहाश्रम को (सीदन्तु) प्राप्त हों वैसे ही आप लोग भी प्राप्त होनो ॥८॥ भावार्थ:-हे स्त्री और पुरुषो! आप लोग विद्या, उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी और भूमि के राज्य को सुख के लिये प्राप्त हूजिये | amana MME !

ऋग्वेदः मं०५। सू० ५ ॥ २७ ल an KAPUR Mean ani anta Lama अब राजप्रजा विषय को कहते हैं । शिवस्त्वष्टरिहा गहि विभुः पोष उत त्मना । यज्ञेयज्ञे न उदव ।।९।। पदार्थ:-हे (त्वष्टः) सब दुःखों के नाश करने वाले राजन् (इह) इस स्थल में कि (पोषे) जिस में पुष्ट हों (विभुः) व्यापक परमेश्वर के सदृश (शिवः) मङ्गल- कारी होते हुए (त्मना) आत्मा से (यज्ञेयने) मेल करने मेल' करने योग्य व्यवहार में (मा, गहि) प्राप्त होत्रो (उत) और (न:) हम लोगों की (उत्, अव) उत्तम प्रकार रक्षा करो ॥६॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलु०- हे मनुष्यो ! आप लोग परमेश्वर के सदृश वर्ताव करके सब के कल्याण को करो ॥६।। अब विद्या ग्रहण विषय को कहते हैं । यत्र वेत्थ वनस्पते देवानां गुह्या नामानि । तत्र इव्यानि गामय ॥१०॥ पदार्थ:-हे (वनस्पते) वन के पालन करने वाले प्राप (यत्र) जिसमें (देवा- नाम्) विद्वानों के (गुह्या) गुप्त (नामानि) नाम (वेस्थ) जानते हैं (लत्र) वहां (हव्यानि) देने और लेने योग्य वस्तुओं को (गामय) पहुंचाइये ।।१०।। भावार्थ:-जो विद्वानों के हृदयों में स्थित और विद्या के प्रभाव से उत्पन्न हुए नामों को जानते हैं वे बहुत सुख मनुष्यों को प्राप्त कराते हैं ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। स्वाहाऽग्नये वरुणाय स्वाहेन्द्राय मरुद्धयः। स्वाहां देवेभ्यो हविः ॥११॥ पवार्थ:--- हे मनुष्यो आप लोगों को चाहिये कि (वरुणाय) श्रेष्ठ के और (अग्नये) बिजुली आदि की विद्या के लिये (स्वाहा) सत्य वाणी (इन्द्राय) ऐश्वर्य और (मरुद्भयः) मनुष्यों के लिये (स्वाहा) सत्य क्रिया तथा (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (हविः) देने योग्य वस्तु और (स्वाहा) श्रोष्ठ कर्म का प्रयोग करो ॥११॥ भावार्थ:-मनुष्य विद्या और श्रेष्ठ कर्म से अग्नि की विद्या को ग्रहण कर विद्वानों का सत्कार करके मनुष्यों के हित को निरन्तर करें॥११॥ mad KRON २८ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६ ॥ इस सूक्त में विद्वान्, राजा, गृहाश्रम, राजाविषय और विद्याग्रहण का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में पांचवां सूक्त समाप्त हुप्रो ।। s a di Hain अथ दशर्चस्य षष्ठस्य सूक्तस्य वसुथ त प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता।१।। ६ निवृत्पङ्क्तिः । २ । ५ पङ्क्तिः । ७ विराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३ । ४ स्वराबृहती। ६ । १० भुरिग्बहतीछन्दः । मध्यमः स्वरः ।। अब दश ऋचावाले छठे सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्निविषय को कहते हैं । अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः । अस्तमर्वन्त आशवोऽस्तं नित्यांसो वाजिन इषं स्तोतृभ्य आ भर ॥१॥ पदार्थः - हे विद्वन् (यः) जो (वसः) सब स्थानों में रहने वाला (यम्) जिस (अस्तम्) फेंके अर्थात् काम में लाये गए (अग्निम्) अग्नि को और (धेनवः) गोयें जिस (अस्तम्। प्रेरणा किये गए को तथा (अर्वन्तः) जाते हुए और (पाशव:) शीघ्र चलने वाले पदार्थ और (नित्यासः) नहीं नाश होने वाले (वाजिनः) वेग से युक्त पदार्थ जिस (अस्तम्) प्रेरणा किये गए को (यन्ति) प्राप्त होते हैं (तम्) उस को मैं (मन्ये) मानता हूं उस की विद्या से आप । (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिये (इषम्) अन्न को (मा, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! यदि आप बिजुली आदि रूपवान् और सब कहीं अभिव्याप्त अग्नि को युक्ति से चलायें तो यह स्वयं वेगवान् हो कर औरों को भी शीघ्र चलाता है ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। सो अग्नियों वसुणे सं यमायन्ति धेनवः । समर्वन्तो रघुद्रवः सं सुजातासः सूरयः इषं स्तोतृभ्य आ भर ।।२।। पादर्थ:-हे विद्वन् (यः) जो (वसः) धनरूप (यम्) जिस को (धेनवः) वारिणयां (सम्, पायन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं और जिस को (रघुवः) थोड़ा दौड़ने वाले (प्रर्वन्तः) वेगवान् पदार्थ (सम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं और जिस को (सुजातासः) उत्तम प्रकार प्रसिद्ध (सरयः) विद्वान् जन (सम्) अच्छे प्रकार प्राप्त ऋग्वेदः मं० ५ । सू०६॥ २४ होते हैं और जिस की मैं (गृणे) प्रशंसा करता हूं (सः) वह (अग्निः) अग्नि है उसके प्रयोग से (स्तोतृभ्यः) अध्यापकों के लिये (इषम्) अन्न को (प्रा, भर) सब प्रकार धारण कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! आप लोग अग्नि आदि पदार्थ के विज्ञान से चतुर होकर अध्यापकों के लिये ऐश्वर्य की प्राप्ति कराइये ॥२॥ फिर अग्निविषय को कहते हैं । अग्निहि वाजिनं विशे ददाति विश्वचर्षणिः । अग्नी राये खाभुकं स प्रीतो याति वायमिर्ष स्तोत्भ्य आ भर ॥३॥ पदार्थः -- हे विद्वन् ! जो (विश्वचर्षणिः) संसार का प्रकाश करने वाला (अग्नि:) अग्नि (हि) जिस से (विशे) प्रजा के लिये (वाजिनम्) बहुते वेग वाले को (ददाति) देता है और जो (अग्निः) अग्नि राय) धन के लिये (स्वाभुवम्) स्वयं उत्पन्न होने वाले को (याति) प्राप्त होता है उस विद्या से (स.) बह आप (प्रीतः) कामना किये गए (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिये (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य (इषम्) अन्न आदि का (प्रा, भर) धारण कीजिये ।।३।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! अग्नि ही उत्तम प्रकार साधित किया गया सुख देने वाला होता है जिस से आप लोग ऐश्वर्य की वृद्धि करो॥३॥ अब अग्निविद्या के जानने वाले विद्वान् के विषय को कहते हैं। आ ते अग्न इधीमहि द्युमन्तं देवाजर॑म् । यद्ध स्या ते पनीयसी समिदीदयंति धवीर्ष स्तोतृभ्य आ मर ॥४॥ पदार्थ:-हे (देव) सुख के देने वाले (अग्ने) विद्वन् आप (शु मन्तम्) प्रका. शित (अजरम् ) जरावस्था से रहित अग्नि को प्रज्वलित करते हो और (यव) जो (ते) आप की (पनीयसी) अतीव न शंसा करने योग्य (समित्) समिध् है (स्या) वह (ते) आप के (अथि) प्रकाश में (वीदयति) प्रज्वलित की जाती है और जिस से (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिये (इषम्) अन्न आदि को (ह) निश्चय से हम लोग (प्रा, दधीमहि। प्रकाशित करें उस से स्तुति करने वालों के लिये अन्न आदि को आप (पा, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! जिस अग्नि आदि की विद्या को आप जानते हैं और जिस विद्या से आप की प्रशंसा होती है उस का हम लोगों को बोध दीजिये ॥४॥ Poo ३० ऋग्वेदः म० ५। सू०६॥ 2ayan प mate फिर उसी विषय को कहते हैं ।। आ ते अग्न ऋचा हविः शुक्रस्य शोचिषस्पते । मुश्चन्द्र दस्म विश्पते हव्यवाट् तुभ्यं हूयत इर्ष स्तोतृभ्य आ भर ॥५॥ पदार्थ:--हे (शोचिषः पते) प्रकाश के स्वामिन् (सुश्चन्द्र) अच्छे सुवर्ण से से युक्त (दस्म) दुःख के नाश करने वाले (विश्पते) प्रजाओं के पालक (अग्ने) विद्वान् राजन् (शुक्रस्य) शुद्ध (ते) आप की (ऋचा) प्रशंसा से (हविः) देने योग्य पदार्थ (प्रा) सब प्रकार से (हूयते) दिया जाता है और हे (हव्यवाट्) देने योग्य वस्तु देने वाले' (तुभ्यम् ) आप के लिये सुख दिया जाता है वह पाप (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिये (इषम्) अन्न को (आ, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥५॥ भावार्थ:-जो विद्वान् लोग अग्नि आदिकों से कार्यों को सिद्ध करते हैं उनके काम सिद्ध होते हैं ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । प्रो त्ये अग्नयोऽग्निषु विश्व पुष्यन्ति वार्थम् । ते हिन्विरे त इन्विरे त इषण्यन्त्यानुषगिर्ष स्तोत्र्भ्य आ भर ।।६।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अग्नयः) अग्नि (अग्निषु) अग्नि आदि पदार्थों में वर्तमान हैं (त्ये) वे (वार्य्यम्) स्वीकार करने योग्य (विश्वम्) सब जगत् को (प्रो, पुष्यन्ति) पुष्ट करते हैं (ते) वे स्वीकार करने योग्य पदार्थ की (हिन्विरे) वृद्धि कराते हैं (ते) वे (इन्विरे) व्याप्त होते हैं और (ले) वे कायों के सिद्ध करने वाले हैं उन को जान के जो (आनुषक) अनुकूलता से (इषण्यन्ति) अन्न आदि की इच्छा करते हैं उन की विद्या से (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिये आप (इषम्) विज्ञान को (प्रा, भर) धारण कीजिये ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो पृथिवी आदि में अग्नि आदि पदार्थ हैं उन को जान के फिर ईश्वर को जानो।॥६॥ फिर अग्निविद्या के उपदेश को कहते हैं । तव त्ये अंग्ने अर्चयो महिं ब्राधन्त वाजिनः ये पत्वभिः शफानो बजा भुरन्त गोनामिर्ष स्तोत्र्भ्य आ भर ॥७॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (ये) जो (गोनाम्) गोनों के (शफानाम्) खुरों के (पत्वभिः) गमनों से (बजा) वेगों को (भुरन्त) धारण करते हैं और जो (महि) JAN M % ऋग्वेदः म० ५ । सू० ६ ॥ ३१ PF - . बड़े (अर्चयः) तेज (वाजिनः) वेग वाले (ब्राधन्त) बढ़ते हैं (त्ये) वे (तव) आप के कार्य सिद्ध करने वाले हैं उनके विज्ञान से (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिये इषम्) अन्न को (मा, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-जैसे घोड़े और गौयें पैरों से दौड़ती हैं वैसे ही अग्नि के तेज शीघ्र चलते हैं और जो अग्न्यादिकों के संप्रयोग करने को जानते हैं उन की सब प्रकार वृद्धि होती है ।।७।। अब राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। नवा नो अग्न आ भर स्तोतृभ्यः मुक्षितीरिषः । ते स्याम य आनृचुस्त्वादूतासो दमैदम इर्ष स्तोत्रम्य आ भर ॥८॥ पदार्थः-हे (अग्ने) राजन् (ये) जो (स्वादूतास:) त्वादूतास अर्थात् आप दूत जिन के ऐसे हम लोग श्राप का (भानुचः) सत्कार करते हैं उन (न:) हम (स्तो- तृभ्यः) धार्मिक विद्वानों के लिये आप (सुक्षितीः) सुन्दर पृथिवी वा मनुष्य विद्यमान जिनमें ऐसे (नवाः) नवीन (इषः) भन्न प्रादि को (मा, भर) धारण कीजिये जिससे (ते) वे हम लोग उत्साहित (स्याम) होवें और आप (स्तोतृभ्यः) सुपात्र अर्थात् सज्जन विद्वानों के लिये (बमेदमे) घर घर में (इषम् ) उत्तम इच्छा को (मा, भर) धारण कीजिये ॥६॥ भावार्थ:-वही राजा प्रशंसनीय होता है जो उत्तम भृत्य और अतुल ऐश्वर्य को सब के सुख के लिये धारण करता है और दूत और चारों अर्थात् गुप्त संदेश देने वालों से सब राज्य का सब समाचार जान के यथायोग्य प्रबन्ध करता है ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उभे मुंश्चन्द्र सर्पिषो दी श्रीणीप आसनि । उतो न उत्पुंपूर्या उक्थेषु शवसस्पत इर्ष स्तोत्भ्य आ भर ॥९॥ पदार्थ:-हे (सुश्चन्द्र) उत्तम सुवर्ण आदि ऐश्वर्य से युक्त (शवसः, पते) सेना के स्वामी जो आप (उभे) दोनों (बर्वी) पाक करने के साधनों अर्थात् चम्मचों को इकट्ठे करके (प्रासनि) मुख में अर्थात् अग्निमुख में (सर्पिष:) घृत आदि का (श्री- णीषे) पाक करते हो (उतो) और उस से (नः) हम लोगों को (उद, पुपूर्याः) उत्त- मता से शोभित करें वा पालें वह आप (उक्थेषु) प्रशंसित धर्मसम्बन्धी कर्मों में one a न GARH wan

३२
ऋग्वेदः मं० ५ । सू. ७ ॥
(स्तोतृभ्यः) पढ़ाने और पढ़ने वालों के लिये (इषम्) अन्न का (मा, भर) धारण
करें ॥६॥
-
4mar
भावार्थ:-जो राजा सेना के भोजन के उत्तम प्रबन्ध को और आरोग्य
के लिये वैद्यों को रखता है वही प्रशंसित होकर राज्य बढ़ाता है ॥६॥
फिर राजविषय को कहते हैं।
एवाँ अग्निमंजुर्यमुर्गीभिर्यज्ञेमिरानुषक् ।
दधदस्मे सुवीर्यमुत त्यदाश्वश्व्यमिर्ष स्तोत्भ्य आ भर ॥१०॥
पदार्थ:-हे (शवसस्पते ! ) सेना के स्वामिन् जो (गीभिः) वारिणयों और
(यजेभिः) संगत कर्मों से (आश्वव्यम्) घोड़ों के सदृश वेग आदि गुणों से युक्त
(सुवीर्यम् ) उत्तम पराक्रम वाले (अग्निम्) अग्नि को (भानुषक) अनुकूलता से
(अजुर्यमः) प्रेरणा दें और नियमयुक्त करें (तेषु एव) उन्हीं में (अस्मे) हम लोगों के
निमित्त आप उत्तम पराक्रमयुक्त व्यवहार को (दधत्) धारण करते हैं (उत) और भी
(त्यत्) उस (इपम्) इष्ट व्यवहार को (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिये (श्रा,
भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥१०॥
भावार्थ:-हे राजन् ! जो अग्नि आदि की विद्या को जान के अनेक
विमान आदि वाहनों को बनाते हैं उनके लिये अन्न आदि देकर निरन्तर
सत्कार कीजिये ॥१०॥
इस सूक्त में अग्नि विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के
अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह पंचम मण्डल में छठा सुक्त समाप्त हुमा ।।
प्रय दशर्चस्य सप्तमस्य सूक्तस्येष प्रात्रेय ऋषिः । अग्निर्देवता। विराड-
नुष्टुप् । २ अनुष्टुप् । ३ भुरिगनुष्टुप् । ४ । ५। ८ । ६ निचुक्नुष्टुप् छन्दः । गान्धार:
स्वरः। ६।७ स्वराष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः । १० निवृद्बहती छन्दः । मध्यमः
अब दश ऋचा वाले सातवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र
में मित्रता को कहते हैं ।
सखायः संवः सम्यञ्चमिषं स्तोम चानये ।
वर्षिष्ठीय क्षितीनामों नः सहस्वते ॥१॥

ऋग्वेदः मं० ५। ३० ७ ।। Aama aap Nove काम पदार्थ:-हे (सखायः) मित्र हुए आप लोग जो (क्षितीनाम्) मनुष्यों के बीच वः) आप लोगों के लिये (वषिष्ठाय) अत्यन्त वृष्टि करने वाले के लिये और (ऊर्जः) पराक्रम युक्त के (नप्त्रे) नाती के सदृश वर्तमान (सहस्वते) बलयुक्त (अग्नये) अग्नि के लिये (सम्यञ्चम्) श्रेष्ठ (स्तोमम्) प्रशंसा और (इषम्) अन्न आदि को (च) भी (सम्) अच्छे प्रकार धारण करते हैं उनका सदा सत्कार करो॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! इस संसार में आप लोग मित्रभाव से वर्ताव करके मनुष्य आदि प्रजा के हित के लिये अग्नि आदि की विद्या को प्राप्त होके अन्य जनों के लिये शिक्षा दीजिये ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। कुत्रा चिद्यस्य सम॒तौ रण्वा नरॊ नृपदने । अर्हन्तश्चिद्यमिन्धते संजनयन्ति जन्तवः ॥३॥ पदार्थः- हे (नरः) नायक अर्थात् कार्यों में अग्नगामी मुख्यजनो ! जो (जन्तवः) जीव (यस्य) जिस की (समूतौ) अच्छे प्रकार यथार्थ बोध से युक्त बुद्धि में (रण्याः) रमण करते और (नृपबने) मनुष्यों के स्पान में (चित्) भी (अर्हन्तः) सत्कार करते हुए (यम्) जिस को (इधते) प्रकाशित कराते और (सजनयन्ति) उत्तम प्रकार उत्पन्न करते हैं वे (चित) भी (कुन्ना) किसी में अनादर को नहीं प्राप्त होते हैं ॥२॥ भावार्थ:-जो जीव सब मनुष्यों के हित में वर्तमान हुए यथाशक्ति परोपकार करते हैं वे योग्य हैं ।।२।। अब विद्वान् के विषय को कहते हैं। सं यदिषो वनामहे सं हव्या मानुषाणाम् । उत द्युम्नस्य शर्वस ऋतस्य रश्मिमा दंदे ॥३॥ पदार्थः -- हे मनुष्यो ! (मानुषाणाम्) मनुष्यों के बीच (अम्नस्य) धन वा यश तथा (ऋतस्या) सत्य का (शवसा) सेना से (यव) जैसे (हत्या) देने और लेने योग्य (इष:) अन्न आदि सामग्रियों का हम लोग (सम्, वनामहे) अच्छे प्रकार सेवन करें (उत) वा ( रश्मिम्) प्रकाश को मैं (सम्, पा, ददे) ग्रहण करता हूं वैसे आप लोग भी करो ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा०--जो विद्वान् जन पक्षपात को छोड़ के यथायोग्य व्यवहार कर मनुष्यों के आत्माओं में विद्याप्रकाश को धारण करें तो सब योग्य होते हैं ।।३।। Awar team be

३४
ऋग्वेदः भ० ५ । सू०७ ।।
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HD
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
सः स्मां कृणोति केतुमा नक्तं चिदर आ सते ।
पायको यद्वनस्पतीन् म मा मिनात्यजः ॥४॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (यत्) जो (अजरः) नाश से रहित (पावकः) पवित्र
करने वाला (वनस्पतीन्) वनों के पालने वालों का (स्मा) ही (मा, कृणोति) अनु-
करण करता (नक्लम्) रात्रि में (चित्र) भी दूरे) दूर देश में (सते) सत्पुरुष के लिये
(केतुम्) बुद्धि देता और दूर स्थान में वर्तमान हुआ (स्मा) ही दुष्ट और दोषों का
(प्र.मा, मिनाति) अच्छे प्रकार नाश करता है (सः) वह सर्वत्र सत्कृत होता है ॥४॥
भावार्थः- हे मनुष्यो ! जो विद्वान् दूर भी वर्तमान हुए रात्रि दिन
अग्नि वा वनस्पतियों के सदृश परोपकारी होते हैं वे ही संसार के भूषण
अलंकार होते हैं ॥४॥
फिर विद्वानों के विषय को कहते हैं ।
अब स्म यस्य वेषणे स्वेदै पथिषु जुह्वति ।
अभीमह स्वजेन्यं भूमा पृष्ठेच रुरुहुः ।।५।।
पदार्थ:-हे मनुष्यो (यस्य) जिस के (वेषण) व्याप्त व्यवहार के निमित्त
(पथिषु) मार्गों में वीर (स्वेदम्) जल को स्म) ही (प्रव, जुह्वति) बहाते और
(भूमा) पृथिवी के (मह) निश्चित (स्वजेन्यम्) अपने से जीतने योग्य स्थान को
(पृष्ठेव) पृष्ठ के सदृश (अभि, रुरुहुः) अभिवर्द्धन करते अर्थात् उस पर चढ़ते हैं उस
का खोज, (ईम्) वैसे ही आप लोग भी कशे ॥५॥
भावार्थ:-जो मनुष्य मार्गों में व्याप्त व्यवहारों की जान कर कायों
को सिद्ध करते हैं वे सुखों को प्राप्त होते हैं ॥५॥
फिर विद्वानों के विषय को कहते हैं।
यं मयः पुरुस्पृह विदद्विश्वमा धायसे ।
म स्वादनं पितूनामस्ततासि चिदायवे ।।६।।
पदार्थः - (मः) मनुष्य (प्रायवे) मनुष्य के लिये और (विश्वस्य) संसार
के (धायसे) धारण के लिये (यम्) जिस (पुरुस्यहम्) बहुतों से प्रशंसा करने योग्य
(पितूनाम्) अन्नों के (स्वादनम्) स्वाद और प्रस्ततातिम्) गृहस्थ को (चित) भी
(घ, विवत्) प्राप्त होवे उसको परोपकार के लिये धारण करे ॥६॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७ ।। arte मा भावार्थ:- मनुष्य को जिस जिस उत्तम वस्तु और ज्ञान की प्राप्ति होवे उस उस को सब के सुख के लिये धारण करे ॥६॥ अब राज विषय को कहते हैं । स हि मा धन्वाक्षितं दाता न दात्या पशुः । हिरिश्मश्रुः शुचिदन्नुभुरनिसृष्टतविषिः ॥७॥ पदार्थ:--जो (हिरिश्मश्रुः) सुवर्ण के तुल्य डाढी और (सुचिदन्) पवित्र दांतों से युक्त (अनिभृष्टतविषि:) नहीं जली सेना जिस की ऐसा (ऋभुः) मेधावी (दाता) दाता (पशुः) पशु (न) जैसे (धन्य) अन्तरिक्ष जो (पाक्षितम्) सब ओर से अविनाशी उस को वैसे दुष्टों को (आ, दाति ग्रहण करता है (सः, हि, स्मा) वही निश्चित सुखपूर्वक बढ़ता है ॥७॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमावाचकलु०---जैसे नहीं देने वाला धान्य को कटवा कर भूसे को अलग कर के अन्न का ग्रहण करता है और जैसे पशु खुरों से धान्य आदि को तोड़ता है वैसे ही राजा साहस करने वाले दुष्ट मनुष्यों का निरन्तर ताड़न करे ॥७॥ अब राजशिक्षा देने के विषय को कहते हैं। शुचिः म यस्मा अत्रिवत्म स्वर्धितीव रीयते । मुघूरसूत माता काणा यदानशे भगम् ॥ पदार्थः--(यत्! जो (शुचि:) पवित्र (क्राणा) करती हुई (माता) माता (यस्म) जिस के लिये (स्वधितीव) वज्र के धारण करने वाले के सदृश और (अत्रि- वत) अविद्यमान तीन वाले के सदृश (सुषः) उत्तम प्रकार उत्पन्न करने वाली (प्रसूत) उत्पन्न करती और (प्र, रीयते) मिलती है (स्म) वही (भगम्) ऐश्वर्य को (मानशे) प्राप्त होती है ।।८।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं ----जो माता पिता ब्रह्मचर्य किये विधि पूर्वक सन्तानों को उत्पन्न करें तो सुख और ऐश्वर्य को प्राप्त होवें ॥८॥ अब अग्नि शब्दार्थ विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ यस्तै सर्पिरामुतेऽग्ने शमस्ति धार्यसे । ऐखू द्युम्नमुत श्रव आ चित्तं मर्येषु धाः ॥९॥ INOD auda ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ८ ॥ . NET JAIN पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (यः) जो (धायसे) धारण करने वाले के लिये (ते) आप का (सपिरासुते) घृतों से सब प्रकार उत्पन्न किये गये में (शम्) सुख (अस्ति) है उसको ग्रहण करता (एषु) इन (मत्र्येषु) मनुष्यों में (ध म्नम्) यश वा धन को (मा, धाः) धारण करता (श्रवः) अन्न को (मा) धारण करता (उत) और (चित्तम्) संज्ञान को (मा) धारण करता है उस के लिये आप ऐश्वर्य दीजिये || भावार्थः-जो कोई किसी के लिये विद्या, धन और विज्ञान को धारण करता है तो उस के लिये उपकार किया भी पुरुष प्रत्युपकार के लिये वैसे ही सत्कार को करे॥ अब अग्निशब्दार्थ राजविषय को कहते हैं । इति चिन्मन्युमध्रिजस्त्वादातमा पशुं ददे । आदग्ने अप्रूणतोऽत्रिः सासह्यादस्यूनिषः सांसह्यान्नून् ॥१०॥ पवार्थः -- है (अग्ने) विद्वन् ! (अध्रिजः) धारण करने वालों में उत्पन्न आप (मन्युम्) क्रोध को (सासझाद) निरन्तर सहे (अत्रिः) निरन्तर पुरुषार्थी आप (अपूणतः) नहीं पालन करते हुए (दस्यून) दुष्ट साहस करने वाले चोरों को (सासह्यात) निरन्तर सहें और (भाव) सब ओर से (इषः) इच्छाओं और (नून्) नीति से युक्त मनुष्यों को निरन्तर सहें (इति) इस प्रकार वर्तमान (चित्) भी आप से (स्वादातम्) आप से देने योग्य (पशुम्) पशु को मैं (मा, ददे) ग्रहण करता हूं ॥१०॥ भावार्थ:-जो राजजन क्रोधादि और दुष्ट के चोर डाकुओं को जीत कर श्रेष्ठ पुरुषों से किये गये अपमान को सहें वे अखण्डित राज्ययुक्त होते हैं ॥१०॥ इस सूक्त में मित्रत्व विद्वान् राजा और अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ गति जाननी चाहिये यह पंचम मण्डल में सप्तम सूक्त समाप्त हुआ। ! व्यसनों का निवारण कर अथ सप्तर्चस्याष्टमस्य सूक्तस्येष प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता। १ । ५ स्वरात्रिष्टुप् । २ भुरित्रिष्टुप् छन्दः । षैवतः स्वरः । ३ । ४ । ७ निवृज्जगती । ६ विराजगती छन्दः । निषादः स्वरः ॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८ ॥
Ra
Apuby
अब सात ऋचावाले आठवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में
अग्निशब्दार्थ गृहाश्रमी के विषय को कहते हैं ।
त्यामग्न ऋतायवः समीधिरे प्रत्नं प्रत्नास ऊतये सहस्कृत ।
पुरुश्चन्द्रं यजतं विश्वायसं दमूनसं गृहपति वरेण्यम् ॥१॥
पदार्थ:-- हे (सहस्कृत) बल किये (अग्ने) और ब्रह्मचर्य किये हुए गृहाश्रमी
(प्रत्नासः) प्राचीन विद्वान् जन (ऋतायवः) सत्य की इच्छा करने वाले (ऊतये)
रक्षण आदि के लिये जिस (प्रत्नम्) प्राचीन (पुरुश्चन्द्रम्) बहुत सुवर्ण आदि से
युक्त (यजतम्) आदर करने योग्य (विश्वधायसम्) सब व्यवहार और धन के
धारण तथा (दमूनसम्) इन्द्रिय और अन्तःकरण के दमन करने वाले (वरेण्यम्)
अतीव स्वीकार करने योग्य और श्रेष्ठ (गृहपतिम्) गृहस्थ व्यवहार के पालन करने
वाले (वाम्) आप को (सम्, ईघिरे) उत्तम प्रकार प्रकाशित करावें । वह भाप इन
का सत्कार करो ॥१॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो आप लोगों की विद्या और दान आदिकों
से वृद्धि करते हैं उन का पाप लोग निरन्तर सत्कार करो ॥१॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
स्त्यामग्ने अतिथि पूर्व्य विशः शोचिष्कशं गृहपति नि दिरे ।
बृहत्केतुं पुरुरूपं धनस्पृत सुशाणं स्ववसं जरद्विषम् ॥२॥
पवार्थ:-- है (अग्ने) गृहस्थ ! जो (विश:) प्रजायें (अतिथिम्) सदा उपदेश
देने के लिये घूमते हुए के सदृश वर्तमान (पूर्व्यम्) प्राचीनों से किये गये विद्वान्
और (शोचिषकेशम्) केशों के सदृश न्यायव्यवहार के प्रकाशों से युक्त (बृहत्केतुम् )
बड़ी बुद्धिवाले पुरुरूपम्) बहुत रूपों से युक्त सुन्दर आकृतिमान् (धनस्पृतम्। धन
की इच्छा से युक्त (सुशर्माणम्) प्रशंसित गृह वाले (स्ववसम्) श्रीष्ठ रक्षण प्रादि
जिन के (जरद्विषम्) वा निवृत्त हुआ शत्रुरूपी विष जिन का ऐसे (गृहपतिम् ) गृह-
व्यवहार के पालन करने वाले (त्वाम्) आप को (नि, षेवरे) स्थित करती हैं उन का
श्राप निरन्तर सत्कार करें ॥२॥
भावार्थ:-- गृहस्थ जन सदा ही प्रजा का पालन, अतिथि की सेवा,
उत्तम गृह तथा विद्या का प्रचार, बुद्धि की वृद्धि, सब प्रकार से रक्षा, तथा
राग और द्वेष का त्याग निरन्तर करें ॥२॥

000 भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-सब प्रकार से यह सब का स्वभाव है जो जिस भाव से ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। स्वामने मानुषीरीळने विशो होनाविदं विविचिं रत्नधातमम् । गुहा सन्त सुभग विश्वदर्शतं तुनिष्कणसं सुयजं घृतश्रियम् ।।३।। पदार्थ:-हे (सुभग) सुन्दर ऐश्वर्य से युक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान (मानुषी:) मनुष्य सम्बन्धिनी (विश:) प्रजायें जिस (होत्राविधम् ) हवनों के गुणों को जानने वाले' (विविचिम्) विवेचक विभाग करने (रत्नधातमम्) रत्नों के' प्रतीव धारण करने (विश्ववर्शतम्) संसार के प्रकाश करने और (तुविष्वणसम्) बहुतों की सेवा करने वाले (सुयशम्) उत्तम प्रकार यज्ञ करते जिस से उस (घृतश्रियम्) घृत का प्राश्रय करते वा घृत से शोभते हुए (गुहा) अन्तःकरण में (सन्तम्) अभिव्याप्त होकर स्थित (त्वाम् ) आप को (ईळते) गुणों से प्रकाशित करती हैं उनको हम लोग भी जानें ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग जिस बिजुलीरूप अग्नि से जीवन और चेतनता होती है तद्वत् राजा को जान के सुख बढ़ानो ॥३॥ अब अग्नि शब्दार्थ विद्वद्विषय को कहते हैं । स्वामग्ने धर्णसिं विश्वा वयं गीर्भिर्गुणन्तो नमसोपं सेदिम । स नों जुषस्व समिधानो अङ्गिरो देवो मर्तस्य सशसा सुदीतिभिः ॥४॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) निद्वन् ! आप जैसे हम लोग (गीभिः) वारिणयों से (गुणन्तः) स्तुति करते हुए (विश्वधा) संसार के धारण करने वा (वर्णतिम्) अन्य को धारण करने वाले (स्वाम्) आप के (नमसा) सत्कार से (उप, सेविम) समीप प्राप्त होवें और है (अगिरः) अङ्गों में रमते हुए (स.) वह (देवः) दाता (समिधानः) प्रकाशमान आप (मर्तस्य) मनुष्य के (सवीतिभिः) उतम दानों से (वासा) जल, अन्न वा धन से (नः) हम लोगों का (जुषस्व) सेवन करें वैसे (वयम्) हम लोग पाप के समीप स्थित होवें ॥४॥ भाव और सेवन उसका होता है ॥४॥ फिर उसी बिषय को कहते हैं ।। स्वमग्ने पुरुरूपों विशेविशे वयो दधासि प्रत्नयां पुरुष्टुत । पुरूण्यन्ना सहसा विराजसि विषिः सा ते तित्विषाणस्य नाधृर्षे ॥५॥ HD ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८॥ tanda ADAM पदार्थ:--हे (पुरुष्टुत) बहुतों से प्रशंसित (अग्ने) राजन् ! जिस से आप (वि, राजसि) विशेष प्रकाशमान हैं (सा) वह (तित्विषाणस्य) अग्नि ज्वाला के समान विद्या से प्रकाशमान (ते) आपकी (विषिः) दीप्ति है और वह (भाषे) सब प्रकार से धृष्ट के लिये (न) जैसे वैसे विशेविशे) प्रजाप्रजा के लिये (पुरूणि) बहुत (अन्ना) अन्नों को धारण करती है तथा जिससे (स्वम्) आप प्रजाप्रजा के लिये (पुरुरूप:) बहुत रूपवाले आप (प्रत्नथा) प्राचीन के सदृश (सहसा) बल से (वयः) जीवन को (दधासि) धारण करते हो उसको विशेषता से जानिये ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु-हे मनुष्यो ! आप लोग जैसे अग्नि सब जगत् को धारण करता है वैसे सब मनुष्यों को विद्या के प्रकाश में धारण करो।॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स्वामग्ने समिधानं यविष्ठ्य देवा दूतं चक्रिरे हव्यवाहनम् । उरुज्रयंसं घृयोनिमाहुतं त्वेषं चक्षुर्दधिरे चोदयन्मति ॥६॥ पदार्थ:-हे (यविष्ठय) अत्यन्त युवाजनों में श्रेष्ठ (अग्ने) विद्वन् जैसे (देवाः) विद्वान् जन (हव्यवाहनम् ) ग्रहण करने योग्य वाहनों को शीघ्र प्राप्त करने वाले (उरुज्रयसम्) बहुत वेगयुक्त (धृतयोनिम्) जल वा प्रदीप्त अथवा कारण है गृह जिसका (माहुतम्) जो सब ओर से शब्दायित (त्वेषम्) प्रदीप्त तथा (चोदयन्मति) बुद्धि को प्रेरणा करने और (चक्ष :) पदार्थों को दिखाने वाले (समिधानम्) प्रकाशमान अग्नि को (दधिरे) धारण करते और (दूतम्) सब ओर से व्यवहार साधक (चक्रिरे) करते हैं वैसे (त्वाम्) आप को हम लोग धारण करें ॥६॥ भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलु -मनुष्य विद्वानों के संग के विना अग्नियों के गुण और अग्नि आदि के संयोगों के गुणों को जानने योग्य नहीं होते हैं ॥६॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतैः सुम्यवः सुषांमधा समर्माधिरे स वावृधान ओषधीभिरुक्षितो ३'भि ज्रयोसि पार्थिवा वितिष्ठसे ।। पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् ! जैसे (सुम्नायवः) अपने सुख की इच्छा करने वाले जन (घृतः) प्रकाशित करने वाले साधनों और (सुषमिधा) उत्तम प्रकार प्रकाश करने वाले इन्धन के साथ (प्रदिवः) अत्यन्त प्रकाश से (माहुतम् । ग्रहण ROMANTase HWINING opan Fwap ऋग्वेदः मं० ५। सू०६॥ किये गए जिनको (सम्, ईधिरे) उत्तम प्रकार प्रकाशित करते हैं (सः) वह (वावृधानः) निरन्तर बढ़ने वाले (उक्षितः) उत्तम प्रकार सींचे गये आप (ोषधीभिः) सोमलता और यवादिकों से (पार्थिवा) पृथिवी में विदित (अभि) सब ओर से (ज्रयांसि) वेगयुक्त कर्मों को (वि, तिष्ठसे) विशेष करके स्थित करते हो वैसे त्वाम्) श्राप को निरन्तर हम लोग सुख देवें ॥७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुक -हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन सब पदार्थों से बिजुली की विद्या को उत्पन्न करते हैं वैसे विद्वान् जन सब से गुणों को ग्रहण करते हैं ॥७॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। पञ्चम मण्डल में अष्टम सूक्त समाप्त हुआ। UMP अथ चतुर्थाष्टकारम्भः॥ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुर्व यद्भद्रं तन्न आ सुंव ॥१॥ अथ सप्तत्य नवमस्य सूक्तस्य गय प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता। १ स्वराष्णिक । ३।४ भुरिगुष्णिक् छन्दः । ऋषभः स्वरः । २ निचुदनुष्टुप् । ६ विराउनुष्टुप् छन्दः । गधार: स्वरः । ५ स्वराड वृहती छन्दः । मध्यम स्वरः । ७ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब चतुर्थ अष्टक में सात ऋचा वाले नवम सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अग्न्यादि पदार्थों के गुणों को कहते हैं । वामने हविष्मन्तो देवं मास ईळते । मन्ये त्वा जातवेदसं स हव्या वक्ष्यानुषक् ।।१।। पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान जैसे (हविष्मन्तः) अच्छे दान प्रादि से युक्त (मतस:) मनुष्य (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों को जानने वाले (देवम्) प्रकाशमान अग्नि की प्रशंसा करते हैं वैसे (त्वाम्) विद्वान् पाप की ऋग्वेदः मं० ५ । सू०६ ॥ PRON स - - ईळते) स्तुति करते हैं मैं जिन (त्वा) आप को (माये) मानता हूं (सः) वह प्राप (हव्या) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को (प्रानुषक) अनुकूलता से (वक्षि) धारण करते हो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो अग्नि आदि के गुणों को ढूंढ़ते हैं वे ही विद्या के अनुकूल व्यवहारों को उत्पन्न करते हैं ॥१॥ अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं । अग्निहोता दास्वतः क्षयस्य वृक्तबर्हिषः । सं यज्ञासश्चरन्ति यं सं वाजासः श्रवस्यवः ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जैसे (होता) दाता (अग्नि:) अग्नि के सदृश पुरुष वास्वतः) देने वाले के स्वभाव से युक्त (वृक्तर्हिषः) जल' से रहित (क्षयस्य) स्थान के मध्य में वसता है वैसे (यम्) जिसको (श्रवस्यवः) अपने धन की इच्छा करने वाले (वाजासः) वेग से युक्त (यज्ञास:) मिलने योग्य जन (सम् चरन्ति) उत्तम प्रकार संचार करते हैं वह (सम्) उत्तम प्रकार जनाने वाला होता है ।।२।। भावार्थ:-मनुष्य बड़े अवकाश वाले गृहों को रच के पुरुषार्थ से पदार्थविद्या को प्राप्त हों ॥२॥ फिर अग्निविषय को कहते हैं । उत म यं शिशु यथा नई जनिष्टारणी । धर्तारं मानुषीणां विशामग्नि स्वध्वरम् ॥३॥ पदार्थः --- (यथा) जैसे' माता और पिता (नवम्) नवीन (शिशुम्) बालक को (जनिष्ट) उत्पन्न करते हैं वैसे (स्म, ही (यम) जिसको (अरणी) काष्ठविशेषों के सदृश (मानुषीणाम्) मनुष्य आदि (विशाम्) प्रजाओं के (धारम्) धारण करने वाले' (उत्त) भी (स्वध्वरम् ) उत्तम प्रकार अहिंसारूप धर्म को प्राप्त (अग्निम्) अग्नि को विद्वान् जन उत्पन्न करें ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं जैसे माता पिता श्रेष्ठ सन्तान को उत्पन्न करके सुख को प्राप्त होते हैं वैसे विद्वान् जन बिजुलीरूप अग्नि को उत्पन्न करके ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥३॥ फिर विद्वानों के गुणों को कहते हैं ।। उत स्म दुर्गभीयसे पुत्रो न हार्याणाम् । पुरू यो दग्धासि वनाग्ने पशुन यवसे ॥४॥ WAS apana BHA 4 AMERA alig Athava Tod ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ६ ॥ ! AND aitram म ANA AM पदार्थ:--हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वन् ! (ह वार्याणाम्) कुटिलों के (पुत्रः) पुत्र के (न) सदृश (पुरू) बहुत को (दुभीयसे) दुःख से ग्रहण करते (स्म) ही हो (यः) जो अग्नि (बना) वनों को (दग्धा) जलाने वाले के सदृश (उत) भी (यवसे) खाने योग्य घास के लिये (पशुः) पशु के (न) सदृश है उस से पदार्थों को जानने वाले (असि) हो॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -जो पदार्थविद्या के ग्रहण के लिये पुत्र और गौ के सदृश वर्तमान है वही अग्नि आदि की विद्या को जान सकता है ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अर्ध स्म यस्यार्चयः सम्यक्संयन्ति धूमिनः । यदीमह त्रितो दिव्युप मातेव धर्मति शिशीते ध्यातरी यथा ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (यस्य) जिस अग्नि के (अर्चयः) तेज (धूमिनः) बहुत धूम से युक्त (संयन्ति) उत्तम प्रकार प्राप्त होते हैं (अध) इसके अनन्तर (यद) जो (ईम्) सब ओर से (ग्रह) निश्चय ग्रहण करने में (त्रितः) अच्छे प्रकार ले जाने वाला हुआ (दिवि) अन्तरिक्ष में (ध्मातेव) शब्द करने वाले के सदृश (उप, धमति) शब्द करता है और (यथा) जैसे (ध्मातरी) चलने वाले में (सम्यक् ) उत्तम प्रकार (शिशीते) सूक्ष्म करता है उससे वैसे (स्म) ही कार्यों को सिद्ध करो ॥५॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! सब पदार्थविद्याओं से पहिले अग्निविद्या जाननी चाहिये ॥५॥ फिर मित्रभाव से उक्त विषय को कहते हैं। तवाहमग्न ऊतिमिमित्रस्य च प्रशस्तिभिः । देषोयुतो न दुरिता तुर्याम मानाम् ।।६।। पदार्थः-हे (अग्ने) विद्वन् ! (अहम्) मैं (मित्रस्य) मित्र (तव) पाप की (अतिभिः) रक्षा आदिकों से और (प्रशस्तिभिः) प्रशंसानों से (च) भी प्रशंसित होऊ वैसे आप हूजिये और सब हम लोग मिल कर (द्वषोयुतः) द्वेषयुक्तों के (न सदृश (मानाम्) मनुष्यों के (दुरिता) दुःख से प्राप्त हुए दोषों की (ताम) हिंसा करें ॥६॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे मित्र मित्र की प्रशंसा करता है और शत्रुजन हित का नाश करते हैं वैसेही मित्रता करके मनुष्यों के दुःखों का हम नाश करें ॥६॥ ar AAD ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १० ॥ m AR atta . फिर उसी विषय को कहते हैं । तं नो अग्ने अभी नरों रयि संहब आ भर । स क्षेपयत्स पौषयद्भुवद्वाजस्य सातयं उतैधि पृत्सु नो वृधे ॥७॥ पदार्थ:-हे (सहस्व:) बहुत सहन आदि गुणों से युक्त (अग्ने) विद्वन् ! जो आप (नः) हम लोगों के (नरः) नायक अर्थात् कार्यों में अग्रगामियों और (रयिम्) धन को (अभी) सन्मुख (श्रा, भर) सब प्रकार धारण करें (तन्) उन का हम लोग सत्कार करें (स:) वह आप हम लोगों की (क्षेपयत्) प्रेरणा करें और (पोषयत्) पोषण पालन करें (स:) वह (वाजस्य) अन्न आदि के (सातये) संविभाग के लिये (भवत्) होवें (उत) और (पृत्सु) संग्रामों में (न:) हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिये (एधि) हूजिये ॥७॥ भावार्थ:-सुकर्मों के जानने की इच्छा करने वालों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति यह प्रार्थना करें कि आप लोग हम लोगों को श्रेष्ठ गुणों में प्रेरित करो और ब्रह्मचर्य आदि से पुष्ट करो और सत्य और असत्य के विभाग करने वाले और युद्धविद्या में चतुर जन हम लोगों की निरन्तर रक्षा करें॥७॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में नवां सूक्त समाप्त हुा ।। अथ सप्तर्चस्य दशमस्य सूक्तस्य गय प्रात्रेय ऋषिः : अग्निर्देवता।१।६ निन्दनुष्टुप् । ५ अनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः २ । ३ भुरिगुष्णिक छन्दः ! ऋषमः ४. स्वर बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः। ७ निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः । अब सात ऋचा वाले दशवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्निशब्दार्थविद्वद्विषय को कहते हैं । अग्न ओर्जिष्ठमा भर द्युम्नमस्मभ्यमध्रिगो । प्रनों राया परीणसा रस्सि वाजाय पन्थाम् ॥१॥ पदार्थ:-हे (अधिगो) धारण करने वालों को प्राप्त होने वाले (अग्ने) विद्वन् ! आप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (प्रोजिष्ठम्) अत्यन्त पराक्रमयुक्त ऋग्वेदः मं० ५। सू० १०॥ NDAR । one HA (धम्नम्) यश वा धन को (भा, भर) चारों ओर से धारण कीजिये और (नः) हम लोगों को (परीणसा) बहुत (राया) धन से (बाजाय, विज्ञान के लिये (पन्याम्) मार्ग को (प्र) प्राप्त होकर (ररिस) रमते हो इस से सत्कार करने योग्य हो ॥१॥ भावार्थ:-जो मनुष्य अन्य जनों के श्रेष्ठ उपदेश से पुण्यकीत्ति को बढ़ाते वे धर्मसम्बन्धी यश वाले होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। त्वं नो अग्ने अद्भुत क्रत्वा दक्षस्य संहना । त्वे असुर्य १' मारुहत्क्राणा मित्रो न यज्ञियः ।।२। पदार्थ:--है (अद्धत) आश्चर्ययुक्त उत्तम गुण कर्म और स्वभाव वाले (अग्ने) अध्यापक और उपदेशक (त्वम्) आप (ऋत्वा) बुद्धि से (वक्षस्य) चतुर विद्या और बलसे युक्त पुरुष के (मंहना) महत्त्व से जैसे (त्ये) भाप में (असुर्व्यम्) असुरसंबन्धी कर्म (काणा) करता हुआ (मित्रः) मित्र (यज्ञियः) यज्ञ करने योग्य के (न) सदृश (प्रा, अरुहत) बढ़ता है वैसे (न:) हम लोगों को बढ़ाइये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-वही उत्तम विद्वान् होता है जो सब के सत्कार के लिये विद्या का उपदेश देता है ।।२।। फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहा वं नो अग्न एषां गये पुष्टिं च वर्धय । ये स्तोमेभिः प्र सूरयो नरों मघान्यांनशुः ॥३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (ये) जो (नर:) नायक (सूरयः) विद्वान् जन (स्तोमेमि:) वेद में वर्तमान स्तुति के प्रकरणों से (मघानि) धनों को प्र, पानशः) प्राप्त होवें उनके साथ (त्वम्) पाप (नः) हम लोगों और (एषाम् ) इन के (गयम्) सन्तान तथा गृह वा धन (च) और (पुष्टिम्) पुष्टि की (बद्ध या वृद्धि कीजिये ॥३॥ भावार्थ:-विद्वानों को चाहिये कि यथार्थवक्ताओं के सहित सब मनुष्यों के सुख और बल को बढ़ावें ॥३॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ।। ये अंग्ने चन्द्र ते गिरः शुम्भन्त्यश्वराधसः । शुष्मभिः शुष्मिणो नरो दिवश्चियेषां बृहत्हँकीर्तिोंधति त्मनां ॥४॥ पदार्थः- है (चन्द्र) आनन्द देने वाले (अग्ने) विद्वन् ! (ले) आप की । MARAN ऋग्वेदः मं० ५। सू०१० ॥ Swamar atta (अश्वराधसः) बिजुली आदि पदार्थों की सिद्धि करने वाली (गिरः) धर्मसंबधिनी वारिणयों को (ये) जो (शुष्मेभिः) बलों के साथ (शुष्मिणः) वली (दिवः) कामना करते हुए (चित्) भी (नर:) मुख्य नायक जन (शुम्भन्ति) विराजते हैं और (येषाम्) जिन की इन वारिणयों को (वृहद, सुकीत्तिः) बड़ी उत्तम प्रशंसायुक्त श्राप (त्मना) मात्मा से (बोधति) जानते हैं वे मित्र हों ॥४॥ भावार्थ:---जो विद्वान् सदृश गुणकर्म और स्वभाव वाले मित्र होकर अग्नि आदि पदार्थों की विद्याओं को परस्पर जनाते हैं वे सिद्ध मनोरथ वाले होते हैं ॥४॥ अब शिल्पविद्या विषयक विद्वानों के गुणों को कहते हैं । तव त्ये अग्ने अर्चयो भ्रान्तो यन्ति धृष्णुया । परिज्मानो न विद्युतः स्वानो रथो न वाजयुः ॥५॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् ! (तब) आपके संग से जो (अर्चयः) विद्या और विनय से प्रकाशित करते हुए (भाजन्तः) परस्पर एक दूसरे को प्रकाशित करते हुए (धष्णुया) न्यायपूर्वक बोलने में ढीठ विद्वान् जन (परिज्मानः) सब ओर से भूमि के राज्य से युक्त (विद्य तः) बिजुलियों के (न) सदृश (वाअयुः) अपने वेग की इच्छा करने वाले के सदृश और (स्वानः) शब्द करते हुए (रथः) विमान आदि वाहनसमूह के (न) सदृश शिल्पविद्या को (यन्ति) प्राप्त होते हैं (त्ये) वे शीघ्र धनवान होते हैं ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.---जो जन यथार्थ शिल्पविद्या को जानते हैं वे सर्वत्र व्याप्त बिजुली के समान विमात आदि वाहनों के सदृश शीघ्रगामी हो और सब प्रकार से धन को प्राप्त हो कर बहुत सुख को प्राप्त होते हैं ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। नू नो अग्न ऊनये सवासश्च रातये । अस्माकांसश्च सूरयो विश्वा आशास्तरीषणि ॥६॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् राजन् ! जो (सबाधसः) बाध के सहित वर्तमान (च) और (अस्माकासः) हम लोगों के सम्बन्धी (सूरयः) विद्वान् जन (नः) हम (ऊतये) रक्षा आदि के लिये और (रातये) दान के लिये (च) भी (विश्वाः) सम्पूर्ण (प्राशाः) दिशानों को (तरोषणि) तरण में हम लोगों को (न) शीघ्र पहुंचावें वे परोपकारी होते हैं ॥६॥ BAR - ४६ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ११ ॥ dhana AAINA . भावार्थ:-वे ही चतुर विद्वान् हैं जो विमान आदि वाहनों को रच के भूगोल में चारों ओर घुमाते हैं वे प्रशंसितदान वाले होते हैं ।।६।। अब विद्यार्थि विषय को कहते हैं। स्वं नो अग्ने अङ्गिरः स्तुतः स्ववान आ भर । होतविभ्वासह रयिं स्तोतभ्यः स्तवंसे च न उतैधि पत्सु नौ वृधे ॥७॥ पदार्थ:-हे (होत:) दाता और (अङ्गिरः) प्राण के सदृश प्रिय (अग्ने) विद्वन् ! (स्तुतः) प्रशंसित (स्तवानः) प्रशंसा करते हुए (त्वम्) आप (नः) हम लोगों के लिये (विश्वासहम्) व्यापकों के अच्छे प्रकार सहने वाले (रयिम्) धन को (प्रा, भर) धारण कीजिये तथा (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों और (स्तवते) स्तुति करने वाले के लिये (च) भी (नः) हम लोगों को धारण कीजिये (उत) और (पृत्सु) सङग्रामों में (नः) हम लोगों को (बुध) वृद्धि के लिये (एधि) प्राप्त हूजिये ॥७॥ भावार्थ:--विद्यार्थियों को चाहिये कि विद्वानों की इस प्रकार प्रार्थना करें कि हे भगवानो अर्थात् विद्यारूप ऐश्वर्ययुक्त महाशयो ! आप लोग हम लोगों को ब्रह्मचर्य करा और उत्तम शिक्षा तथा विद्या देके और संग्रामों को जीत कर हम लोगों की निरन्तर वृद्धि करिये ॥७॥ इस सूक्त में अग्नि शब्दार्थ विद्वान् और विद्यार्थी के गुण वर्णन करने से इस सूक्त' के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में दशवां सूक्त समाप्त हुमा ।। . अथ षडचस्यैकादशस्य सूक्तस्य सुतम्भर प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता ।।। ३। ५ निवृज्जगती । २ जगती। ४ । ६ विगजगती छन्दः । निषादः स्वरः ।। अब छः ऋचा वाले ग्यारहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के गुणों का उपदेश करते हैं ।। जनस्य गोपा अंजनिष्ट जागृविरग्नि सुदक्षः मुविताय नव्य॑से । घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा धुमद्वि भाति भरतेभ्यः शुचिः ॥१॥ पदार्थः-हे मनुष्यो ! जो (जनस्य) मनुष्य की (गोपाः) रक्षा करने और (जागविः) जागने वाला (सुदक्षः) अच्छे प्रकार बल जिससे (धृतप्रतीकः) और घृत वा जल प्रतीतिकर जिसका ऐसा (शुचिः) पवित्र (अग्निः) अग्नि (हता) बड़े या var की (अवर्धयन्) वृद्धि करें और जिन (ले) आप की अग्नि के (धूमः) धूम ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ११ ।। (दिविस्पृशा) प्रकाश में स्पर्श करने वाले से' (नव्यसे) अत्यन्त नवीन (सुविताय) ऐश्वर्य के लिये (अजनिष्ट) उत्पन्न होता तथा (भरतेभ्यः) धारण और पोषण करने वाले मनुष्यों के लिये (धमत्) प्रकाश के सदृश (वि) विशेष कर के (भाति) प्रकाशित होता है उसको यथावत् जानिये ॥१॥ भावार्थ:-विद्वानों को चाहिये कि अग्नि आदि पदार्थों के गुण अवश्य जानें ॥१॥ अब विद्वद्विषय को कहते हैं ।। यज्ञस्य केतुं प्रथम पुरोहितमग्निं नरस्त्रिषधस्थे समीधिरे । इन्द्रेण देवा सरथं स बर्हिषि सीदन्नि होता यजाय सुक्रतुः ॥२॥ पदार्थ:--हे (नरः) श्रेष्ठ कार्यों में अग्रणी विद्वान् लोगो ! जैसे आप लोग (त्रिषधस्थे) तीन पदार्थों के सहित स्थान में (यजथाय) मिलने के लिये (यज्ञस्य) उत्तम ज्ञान की (केतुम्) बुद्धि को तथा (प्रथमम्) प्रथम वर्तमान (पुरोहितम्) प्रथम इस को धारण करें ऐसे (अग्निम्) अग्नि के समान प्रकाशमान को (सम्, ईघिरे) उत्तम प्रकार प्रकाशित करें वैसे (सः) वह (सुक्रतुः) उत्तम बुद्धि वा उत्तम कर्म वाले (होता) दाता आप (इन्द्रेण) बिजुली और (देवैः) पृथिवी आदिकों के साथ (बर्हिषि) अन्तरिक्ष में (सरथम्) वाहनों के समूह के सहित (नि, सीदत्) स्थित हुजिये ॥२॥ भावार्थ:----जो विद्वान् जन विद्या, धर्म और पुरुषार्थ में स्वयं वर्ताव करके अन्यों का उस के अनुसार वर्ताव कराते हैं वे ही सब को बोध देने वाले होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते असमृष्टो जायसे मात्रोः शुचिर्मन्द्रः कविरुदतिष्ठो विवस्वतः । घृतेन त्वावर्धयन्नग्न आहुत धूमस्ते केतुर्रभवदिवि श्रितः । ३।। पदार्थ:-हे (आहुत) सत्कार से निमन्त्रित (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान विद्यार्थी जो विद्वान् जन (विवस्वतः) सूर्य से (घृतेन) विद्या के प्रकाश से (त्वा) आप के सदृश (दिवि) प्रकाशमान मनोहर और सत्कार करने योग्य परमेश्वर में (केतुः) जनाने वाले के सदृश बुद्धि (श्रितः) सेवन की हुई (अभवत्) होती है तथा (मात्रो:) माता के सदृश सादर करने वाले विद्या और प्राचार्य की शिक्षा को प्राप्त होकर (असंमुष्टः) अच्छे प्रकार अशुद्ध पाप (मन्द्रः) प्रशंसित और मानन्दित (शुचिः) पवित्र (जायसे) हैं Stra Here

ऋग्वेदः म० ५। सू० ११ ।।
ma
MARA
-
होते हो और (कविः) विद्वान् (उत्, प्रतिष्ठः) उठते हो उन आप का हम लोग
सत्कार करें ॥३॥
भावार्थ:-जो बालक वा कन्या विद्वानों वा पढ़ी हुई स्त्रियों से ब्रह्म-
चर्यपूर्वक विद्या को प्राप्त होकर पवित्र होते वे संसार को शोभित करने
वाले होते हैं ॥३॥
फिर अग्न्यादिकों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
अग्निों यज्ञमुपं वेतु साधुयाग्निं नरो वि भरन्ते गृहेगृहे ।
अग्नितो अभवद्धव्यवाहनोऽग्नि णाना Bणते कविक्रतुम् ॥४॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे (अग्निः) अग्नि (नः) हम लोगों के (यज्ञम्)
मिलने योग्य व्यवहार को (उप, वेतु) व्याप्त हो और जैसे (साधुया) श्रेष्ठ (नरः)
अग्रणी मनुष्य (गृहेगृहे) गृहगृह में (अग्निम्) अग्नि के सदृश (वि, भरन्ते) धारण
करते हैं और जैसे (हव्यवाहन:) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को एक देश से दूसरे देशों
में पहुंचाने वाला (अग्निः) अग्नि (दूतः) दूत के सदृश कार्यो का सिद्ध कर्ता
(अभवत्) होता है और जैसे (अग्निम्) अग्नि को (वृणानाः) स्वीकार करते हुए जन
(कविक्रतुम्) बुद्धिमान् की बुद्धि का (वृणते) स्वीकार करते हैं वैसे ही आप लोग
आचरण करो ॥४॥
भावार्थ: -इस मन्त्र में वाचकलु. -जो अग्नि के
सदृश
तेजस्वी,
सज्जनों के सदृश उपकार करने और प्रत्येक जन के लिये मंगल देने वाले
हैं वे सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥
फिर विद्वानों के विषय को कहते हैं ।
तुभ्येदमग्ने मधुमत्तयं वचस्तुभ्य मनीषा इयमस्तु शं हृदे।
त्वां गिरः सिन्धुमिवावमिहीरा पृणन्ति शवसा वर्धयन्ति च ॥शा
पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश पवित्र अन्तःकरण वाले विद्यार्थी (तुभ्यः)
आप के लिये (अदम्) यह (मधुमत्तमम्) अतिशय मधुर आदि गुण से युक्त (वयः)
वचन और (तुभ्यम्) आप के लिये (इयम्) यह (मनीषा) बुद्धि (हृदे) हृदय के लिये
(शम्) सुखकारक (अस्तू) हो और जो (सिन्धुमिव) समुद्र को जैसे वैसे (अवनी:)
रक्षा करने वाली (महीः) श्रेष्ठ भूमियों के सदृश भादर करने योग्य (गिरः) वारियां
(शवसा) बल' वा सेवा से (त्वाम्) आप का (श्रा, पणन्ति) अच्छे प्रकार पालन करती
वा विद्याओं को पूर्ण करती (वर्धयन्ति, च) और वृद्धि करती हैं उन का आप ग्रहण
HOMAMRA
T
ema
dindia
कीजिये ॥५॥

ऋग्वेदः म० ५। ५० १२ ॥
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भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं.-- हे विद्यार्थिजनो ! जैसे नदियां
समुद्र को शोभित करती हैं वैसे ही विद्या और नम्रता से युक्त वाणियां
आप लोगों को शोभित करें जिन के प्रताप से आप लोगों के मुखों से सत्य
और सब का हितकारक वचन सर्वदा ही निकले ॥५॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
त्यामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्चिश्रियाणं धनवने ।
स जायसे मथ्यमानः सहो महत्यामाहुः सहसम्पुत्रमैङ्गिरः ॥६॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्या की इच्छा करने वाले जैसे (अङ्गिरसः) प्राणों
के सदृश विद्याओं में व्याप्त जन (वनेवने) जंगल जंगल में अग्नि के सदृश जीव जीव
में (शिश्रियाणम्) व्याप्त (गुहा) बुद्धि में (हितम्) स्थित परमात्मा को (अनु,
अविन्दन् ) प्राप्त होते हैं और जिन (त्वाम्) आप को प्राप्त कराते हैं बैसे (सः) वह
आप (मथ्यमानः) मथे गए विद्वान् (जायसे) होते हो और जिससे (सहसः) विद्या
और शरीर के बल से युक्त के (पुत्रम्) पुत्र और (सहः) बल (महत) बड़े को प्राप्त
(स्वाम् , आप को (अङ्गिरः) प्राण के सदृश प्रिय विद्वान् जन (पाहुः) कहें ।।६।।
भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जो योगी जन
संयम अर्थात् इन्द्रियों को अन्य विषयों से रोकने से परमात्मा को प्राप्त
होकर नित्य प्रानन्दित होते हैं वैसे इस को प्राप्त होकर आप लोग आनन्दित
हूजिये ॥६॥
इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ
की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङगति जाननी चाहिये ।।
यह पंचम मण्डल में ग्यारहवां सूक्त समाप्त हुभा ॥
प्रय षड्चस्य द्वादशस्य सूक्तस्य सुतम्भर प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता।
२ स्वराष्ट्पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३।४। ५ त्रिष्टुप् । ६ निस्त्रिष्टुप.
छन्दः । धैवतः स्वरः॥
अब छः ऋचावाले बारहवें सूक्त' का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में
अग्निविषय को कहते हैं ।
मामये बृहते यज्ञियाय ऋतस्य कृष्णे असुंराय मन्म।
घृतं न यज्ञ आस्ये३' सुपूतं गिर भरे' वृषभाय प्रतीचीम् ॥१॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० १२ ।। uman hd Himan Jantan पदार्थः-हे मनुष्यो ! जैसे मैं (प्रास्ये) मुख में और (यजे) मिलने योग्य व्यवहार में (सपूतम्) उत्तम प्रकार पवित्र (घृतम्) घृत के (न) सदृश पदार्थ को तथा (बहते) बड़े (यशियाय) यज्ञ के योग्य और (ऋतस्य) जल के (वृष्णे) वर्षाने और (असुराय) प्राणों में रमने वाले (वृषभाय) बलिष्ठ (अग्नये) अग्नि के लिये (मन्म) ज्ञान के उत्पन्न कराने वाले कारण को (प्रतीचीम्) पिछली क्रिया और (गिरम्) वाणी को (प्र, भरे) अच्छे प्रकार धारण करता हूं वैसे इस के लिये इस को पाप लोग भी धारण करो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-मनुष्यों से जैसे अग्नि विद्या के ज्ञान के लिये प्रयत्न किया जाता है उन को चाहिये कि वैसे ही पृथिवी प्रादि पदार्थों की विद्या के ज्ञान के लिये प्रयत्न करें ॥१॥ अब विद्वद्विषय को कहते हैं। ऋतं चिकित्व अतमिचिकिद्धयतस्य धारा अनु तृन्धि पूर्वीः । नाहं यातुं सहसा न द्वयेनं ऋतं संपाम्यरुषस्य कृष्णः ॥२॥ पदार्थ:-हे (ऋतम्) सत्य कारण को (चिकित्वः) जानने योग्य ओप (ऋतम्) सत्य ब्रह्म को (इद) निश्चय से (चिकिद्धि) जानिये और (ऋतस्य) सत्य के जनाने वाली (पूर्वीः) प्राचीन (धारा:) वाणियों को जानिये और अविद्या का (अनु, तन्धि) नाश करिये (अहम् ) मैं (सहसा) बल से (यातुम्) जाने की (न) नहीं इच्छा करता हूं और (द्वयेन) कार्य कारणस्वरूप बल से (अरुषस्य) नहीं हिंसा करने वाले (वृष्णः) बलिष्ठ के (ऋतम्) जल के (न) सदृश पदार्थ को (सपामि) गम्भीर शब्द से क्रोशता हूं ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन असत्य का खंडन करके सत्य को धारण करते हैं और अविद्या का त्याग करके विद्या को धारण करते हैं वैसे ही आप लोग भी करो ॥२॥ फिर अग्निपदवाच्य विद्वद्विषय को कहते हैं । कयां नो अग्न ऋतयन्नृतेन भुवो नवेदा उचथस्य नव्यः । वेदा मे देव तुपा ऋतूनां नाहं पति सनितुरस्य रायः ॥३॥ पदार्थः-- है (अग्ने) विद्वन आप (कया) किस विद्या वा युक्ति से (न:) हम लोगों को जनावें (ऋतेन) सत्य से (ऋतयन् ) सत्य का आचरण करता हुआ (भुवः) पृथिवी का (नवेदाः) नहीं प्राप्त होने वाला (उचथस्य) उचित का सम्बन्धी (नव्यः) नवीनों में श्रेष्ठ (ऋतुपाः) ऋतुओं का पालन करने वाला पृथ्वी सम्बन्धी (देवः) MOHA wide ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १२ ।। ५१ मानव AND विद्वान् (अहम् ) मैं (ऋतूनाम्) वसन्त आदि ऋतुओं और (प्रस्य) इस (सनितुः) विभाग करने वाले (राय:) धन के (पतिम् ) स्वामी का (न) नहीं नाश करता हूं वैसे आप (मे) मुझ को (वेदा) जानिये और मुझ को नष्ट मत करिये ।।३।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! सत्य के आचरण से ही पृथ्वी का राज्य प्राप्त होता है और पृथ्वी के राज्य और लक्ष्मी से सब को सुख होता है ॥३॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ।। के ते अग्ने रिपवे बन्धनासः के पायवः सनिषन्त धुमन्तः । के धासिमग्ने अनृतस्य पान्ति क आसंतो वर्चसः सन्ति गोपाः ॥४॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) राजन् (ते) आप के (रिपवे) शत्रु के लिये (के) कौन (बन्धनासः) बन्धक और (के) कौन आप के राज्य के (पायवः) पालन करने वाले (के) कोन (ध मन्तः) कामना करने वाले वा प्रकाशयुक्त (सनियन्त) विभाग करते हैं और हे (अग्ने) विद्या और विनय के प्रकाशक कौन (धासिम्) अन्न की (पान्ति) रक्षा करते हैं (के) कोन (अनृतस्य) असत्य व्यवहार के (पासतः) निन्ध (यक्षस:) वचन से (गोपाः) रक्षा करने वाले (सन्ति) हैं ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वन् राजन् ! आप को चाहिये कि इस प्रकार का कर्म करें जिस से शत्रुओं का नाश प्रजा का पालन होवे यह इस का उत्तर है ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सखा यस्ते विपुणा अग्न एते शिवासः सन्तो अशिंवा अभूवन् । अधूर्षत स्वयमेते वचौभि[जूयते जिनानि अवन्तः ॥५॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् जो (एते) ये (ते) आप के (विषुणा:) विद्या को व्याप्त (सखायः) मित्र हुए (शिवास:) मङ्गल अर्थात् अच्छे आचरण करते (सन्तः) हुए (अशिवाः) अमंगल' पाचरण करने वाले (अभूवन्) होवें उनका श्राप के नौकर और आप (अधूर्षत) नाश करो और हे राजा के नौकरो जो (एते) ये (स्वयम्) अपने ही (वचोभिः) वचनों से (वृजिनानि) धनों और बलों का (अवन्तः) उपदेश देते हुए (ऋजूयते) सरल होते हैं उन का निरन्तर पालन करो ॥५॥ भावार्थः मनुष्यों की यह योग्यता है कि जो मित्रजन शत्रु होवें वे निरादर करने योग्य हैं और जो मित्र होवें वे सत्कार करने योग्य हैं ॥५॥ ARIA

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के वर्षाने वाले (तस्या) उन (ते) आप का (य:) जो (पथः) विस्तार युक्त (प्रसा
५३
ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १२ ।।
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
यस्ते अग्ने नमसा यज्ञमी ऋतं स पात्यरुषस्य वृष्णः ।
तस्य क्षयः पृथुरा साधुरेतु प्रसस्राणस्य नहुंषस्य शेषः ॥६॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) राजन् (अरुषस्य) नहीं हिंसा करने और (वृष्णः) सुख
णस्य) अत्यन्त धर्म को प्राप्त हुए (नहुषस्य) मनुष्य के (शेषः) बाकी रहे के सदृश
(साधु:) श्रेष्ठ (क्षयः) निवास (नमसा) अन्न आदि से (यज्ञम्) यज्ञ को (इंडे)
ऐश्वर्ययुक्त करता है (सः) वह (ऋतम्) सत्यन्याय की (पाति) रक्षा करता है वह
लोगों को (प्रा, एत) सब प्रकार प्राप्त हो ॥६॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विद्वानों की सेवा और धर्म की रक्षा
करता है उसके रक्षण को आप लोग करके शेष सुखको प्राप्त हूजिये ॥६॥
इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस
से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह पञ्चम मण्डल में बारहवां सूक्त समाप्त हुआ।
।
अथ षड्चस्य त्रयोदशस्य सूक्तस्य सुतम्भर प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता ।।
४। ५ निचद्गायत्री । २॥ ६ गायत्री । ३ विरागायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः ।।
अब छः ऋचा वाले तेरहवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्य
विद्वान् के गुणों को कहते हैं ।।
अन्तस्त्वा हवामहेऽचन्तः समिधीमहि । अग्ने अर्चन्त ऊतये ॥१॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वान् हम लोग ऊतये) रक्षण आदि के लिये (स्था)
आप का (अर्चन्तः) सत्कार करते हुए (हवामहे) स्वीकार करते हैं और आप का
(मर्चन्तः) सत्कार करते हुए (सम्, इधीमहि) प्रकाश करें और आप का (अर्चन्तः)
सत्कार करते हुए विद्वान् होवें ॥१॥
भावार्थ:--हे विद्वानो! हम लोग आप लोगों के सत्कार से उत्तम
शिक्षा और विद्या को प्राप्त होकर आनन्दित होवें ॥१॥
अब अग्निगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
अग्नेः स्तोमै मनामहे सिंधमय दिविस्पृशः । देवस्य द्रविणस्यवः ॥२॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू०१३।। www क पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (द्रविणस्यवः) अपने धन की इच्छा करने वाले हम लोग अध) आज (दिविस्पृश:) परमात्मा में सुख को स्पर्श करने वाले (देवस्य) प्रकाशमान (अग्नेः) अग्नि के (सिघ्रम्) साधक (स्तोमम्) गुण कर्म और स्वभाव की प्रशंसा को (मनामहे) मानते हैं वैसे इस को आप लोग भी जानो ॥२॥ भावार्थ:-जिन की धन की इच्छा होवें वे अग्नि आदि पदार्थों के विज्ञान को ग्रहण करें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अग्निर्जुषत नो गिरो होता यो मानुषेष्वा । स यक्षदैव्यं जनम् ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (य:) जो (होता) दाता (अग्निः) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वान् (नः) हम लोगों की (गिरः) वाणियों का (जुषत) सेवन करता है और जैसे (सः) वह (मानुषेषु) मनुष्यों में (देव्यम्) श्रेष्ठ गुणों में उत्पन्न (जनम्) विद्वान् जन को (मा,यक्षत) प्राप्त हो वा सत्कार करे वैसे आप करिये ॥३॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु-जो अग्नि न हो तो कोई भी जीव जिह्वा न चला सके ॥३॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । त्वमग्ने सपथा असि जुष्टो होता वरेण्यः । त्वया यज्ञं वि तन्वते ॥४॥ पदार्थः-- है (अग्ने) विद्वन् जिस से विद्वान् जन (स्वया) आप के साथ (यशम्) यज्ञ का (वि, तन्वते) विस्तार करते हैं उन के साथ (होता) दाता का ग्रहण करने वाले (वरेण्यः) अतिश्रोष्ठ और (सप्रथाः) प्रसिद्ध यश वाले (जुष्टः) सेवन किये गये (स्वम्) आप (प्रसि) हो इस से सत्कार करने योग्य हो॥४॥ भावार्थः -- मनुष्य लोग यथार्थवक्ता विद्वानों के संग से धर्म अर्थ काम और मोक्ष की सिद्धि करने वाले यज्ञ का विस्तार करें ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। खामग्ने वाजसातमं विप्रो वर्धन्ति सुष्टुतम् । स नौ राख सुवीर्यम् ॥५॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) महाविद्वन् ! (विप्राः) बुद्धिमान् जन जिन (वाजसात- मम्) विज्ञान और बेगों के विभाग करने वाले (सुष्टुतम्) उत्तम यश वाले और (सुवीर्यम्) उत्तम पराक्रम युक्त (स्वाम्) आप की (वर्धन्ति) वृद्धि करते हैं (सः बह पाप (न:) हम लोगों के लिये उत्तम पराक्रम को (रास्व) दीजिये ॥५॥ Hin ऋग्वेदः मं० ५। सू० १४ ।। SONG भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो आप लोगों को यथार्थ वक्ता विद्वान् जन सब प्रकार से वृद्धि करें तो आप लोगों का अतुल प्रताप बढ़े ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। अग्ने नेमिरराँइत्र देवांस्त्वं परिभूरसि । आ रार्धश्चित्रम॒जसे ॥६॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (त्वम्) आप जैसे (नेमिः) रथाङ्ग (अरानिव) चक्रों के अङ्गों को वैसे (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों को (परिभूः) सब प्रकार से हुवाने वाले (मसि) हो और (चित्रम्) विचित्र (राधः) धन को (पा, ऋञ्जसे) सिद्ध करते हो इससे सत्कार करने योग्य हो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०- जैसे अरादिकों से चक्र उत्तम प्रकार शोभित होता है वैसे ही विद्वानों और उत्तम गुणों से मनुष्य शोभित होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में तेरहवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ षड्यस्य चतुर्दशस्य सूक्तस्य सुतम्भर प्रात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता ।। ४।५। ६ निद्गायत्री । २ विरागायत्री । ३ गायत्रीछन्दः । षङ्जः स्वरः ।। भब छः ऋचा वाले चौदहवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्नि गुणों को कहते हैं । अग्नि स्तोमन बोधय समिधानो अमर्त्यम् । हव्या देवेषु नो दधत् ॥१॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जो (समिधान:) उत्तम प्रकार स्वयं प्रकाशमान अग्नि (देवेषु) विद्वानों वा श्रेष्ठ गुणों वाले पदार्थों में (नः) हम लोगों के लिये (हव्या देने और ग्रहण करने योग्य वस्तुओं को (दधत) धारण करता है उस (अमर्त्यम्) मरणधर्म से रहित (अग्निम्) अग्नि को (स्तोमेन) गुणों की प्रशंसा से (बोधय) प्रकाशित कीजिये ॥१२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! प्रयत्न से अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्राप्त होनो ॥१॥ Authen ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १४ ॥ to- Aayee फिर उसी विषय को कहते हैं ।। तमध्वरेष्वीने देवं मर्ता अमर्त्यम् । यजिष्ठं मानुषे जने ॥२॥ पदार्थः -- जो (मत्ताः) मनुष्य (अध्वरेषु) नहीं नाश करने योग्य धर्मयुक्त व्यवहारों में (मानुषे) विचारशील (जने) जन में (तम् , उस (अमर्त्यम्) स्वरूप से नित्य (यजिष्ठम्) अतिशय मेल' करने वाले (देवम्) श्रेष्ठ गुण वाले अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशित परमात्मा की (ईडते) स्तुति करते हैं वे ही बहुत सुख का भोग करते हैं ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु० -जो मनुष्य अग्नि प्रादि पदार्थ के सदृश पदार्थ विद्या का प्रण करते हैं वे सब प्रकार सुखी होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । तं हि शवन्त ईळते स्युचा देवं घृतश्चुता । अग्नि हव्याय वोलहवे ॥३॥ पदार्थ:--(शश्वन्तः) अनादि से वर्तमान जीव जैसे यज्ञ करने वाला और यजमान (धृतश्चुता) जो घृत वा जल चुआती जो (स्न चा) यज्ञ सिद्ध कराने वाली स्वच उस से (हथ्याय) देने और लेने के योग्य के लिये (बोलवे) धारण करने को (अग्निम्) अग्नि की (ईडते) प्रशंसा करते हैं वैसे (हि) ही योगाभ्यास से (तम्) उस परमात्मा (देवम्) देव अर्थात् निरन्तर प्रकाशमान की स्तुति करें ॥३॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकल -जैसे शिल्पीजन अग्नि आदि तत्वों की विद्या को प्राप्त होकर और अनेक कार्यों को सिद्ध करके प्रयो- जनों को सिद्ध करते हैं वैसे मनुष्य परमात्मा को यथावत् जान के अपनी इच्छानों को सिद्ध करें।।३।। फिर अग्निविषय को कहते हैं ।। अग्नि तो अरोचत हान्दस्यूकम्योतिषा तमः । अविन्दद्गा अपः स्वः ॥४॥ पदार्थः -- हे मनुष्यो ! राजा जैसे (जातः) प्रकट हुआ (अग्निः) अग्नि (ज्योतिषा) प्रकाश से (तमः) अन्धकाररूप रात्रि का (नन्) नाश करता हुआ (अरोचत) प्रकाशित होता और (गः) किरणों (अपः) अन्तरिक्ष और (स्व:) सूर्य को (प्रविन्दव) प्राप्त होता है वैसे प्राप्त हुए विद्या विनय जिस' को वह (दस्यून्) me !

. ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १४ ॥ NA- दुष्ट चोरों का नाश करते हुए और न्याय से अन्याय का निवारण करके विजय और यश को प्राप्त हों ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे अग्नि अन्धकार का निवारण कर के प्रकाशित होता है वैसे राजा दुष्ट चोरों का निवारण कर के विशेष शोभित होवे ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अग्निमीळेन्य कविं घृतपृष्ठं सपर्यत । वेतु मे शृणवद्धवम् ।।५।। पदार्थः-हे मनुष्यो जैसे विद्वान् (मे) मेरे (हवम्) देने लेने योग्य व्यवहार को (वेतु) व्याप्त हो और (शुणवत) सुने वैसे (ईलेन्यम्) प्रशंसा करने योग्य (कविम्) प्रतापयुक्त दर्शन वाले (घृतपृष्ठम्) प्रकाश दर्शन वाले (घृतपृष्ठम्) प्रकाश घृत वा जल है पृष्ठ में जिस के उस (अग्निम्) अग्नि का (सपर्यत) सेवन करो ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों की विद्या का अभ्यास करें तो वे निरन्तर सुख को सेवें ॥५॥ फिर अग्निविषय को कहते हैं ।। वाधुः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणिम् । स्वाधीभिर्वचम्युभिः ॥६॥ पक्षार्थ:-जो (स्तोमेभिः) प्रशंसित कर्मों और (धृतेन) घृत से (विश्व- वर्षणिम्) संसार के प्रकाश करने वाले (अग्निम्) अग्नि की (वावृधः) वृद्धि करावें उन (वचस्युभिः) अपने वचन की इच्छा करने वाले (स्वाधीभिः) उत्तम प्रकार ध्यान से युक्त जनों के साथ सब मनुष्य' अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्रहरण करें ॥६॥ भावार्थ:-जैसे ईधन आदि से अग्नि बढ़ता है वैसे ही सत्संग से विज्ञान बढ़ता है ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि के गुरण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में चतुर्दश सूक्त समाप्त हुआ। अग्नि घृतेन htion ऋग्वेद मं०५। सू०१५ ।। POOR अथ पञ्चर्चस्य पञ्चदशस्य सूक्तस्य धरुण प्राङ्गिरस ऋषिः । अग्निदेवता । १। ५ स्वराट्पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ । ४ त्रिष्टुप् । ३ विरात्रिष्टुप्- छन्दः । धैवतः स्वरः॥ अब पांच' ऋचावाले पन्द्रहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् और अग्निगुणविषय को कहते हैं । प्र वेधसे कवये वेद्याय गिर भरे यशसे पूर्याय । घृतप्रसत्तो अनुरः सुशेवो रायो धर्ता धरुणो वस्वों अग्निः ॥१॥ पदार्थः हे विद्वानो ! जैसे मुझ से (धृतप्रसत्तः) जल में प्रसक्त होने (असुरः) और प्राणों में सुख देने वाला तथा (सुशेव:) सुन्दर सुख जिस से ऐसे (रायः) धन का (धर्ता) धारण करने और (बस्वः) पृथिवी आदि का (वरुणः) धारण करने वाला (अग्निः) अग्नि धारण किया जाता है उसके बोध के लिये (कवये) विद्वान् और (वेद्याय) जानने योग्य' के लिये और (यशसे) प्रशंसित (पूर्ध्याय) प्राचीनों में प्राप्त विद्या वाले (वेधसे) बुद्धिमान के लिये (गिरम्) वाणी को (प्र, भरे) धारण करता हूं वैसे आप लोग भी इस को इसलिये धारण करो ॥१॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वानो ! जो अग्नि आदि पदार्थों की विद्या असाधारण अर्थात् विलक्षण है उस को उत्तम लक्षण वाले बुद्धिमान् विद्यार्थियों के लिये ग्रहण कराइये ॥१॥ अब विद्वद्विषय को कहते हैं। ऋतेन ऋतं धरुणं धारयन्त यज्ञस्य शाके परमे व्योमन् । दिवो धर्मन्धरुणे सेदुषो नृजातैरजाताँ अभि ये ननक्षुः ॥२॥ पदार्थ:--- (ये) जो (ऋतेन) सत्य वा परमात्मा से (ऋतम्) सत्य कारणा- दिक (धरुणम्) सब के धारण करने वाले को (यज्ञस्य) सम्पूर्ण व्यवहार के (शाक) सामर्थ्य के निमित्त (परमे) उत्तम (व्योमन्) व्यापक (दिवः) सूर्य आदि से (धर्मन्) धर्म (धरणे) और धारण करने वाले में (जातः) उत्पन्न हुए पदार्थों से (अजातान्) न उत्पन्न हुए (सैदुषः) ज्ञानवान् (नन्) मनुष्यों को (अभि,ननक्षुः) प्राप्त होते हैं वे सत्यविद्या को (धारयन्त) धारण करें ॥२॥ भावार्थ:-वे ही मनुष्य विद्वान् हैं जो पूर्व और आगे वर्तमान विद्वानों को मिलकर परमेश्वर प्रकृति और जीव के कार्य की विद्या को जानते हैं ॥२॥ Mu

an-
जीवन की (जरसे) स्तुति करते हो और (विषुरूप:) विद्या जिन को प्राप्त ऐसे हुए
ऋग्वेदः मं० ५। सू० १५ ।।
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
अंहोयुवस्तन्वस्तन्वते वि वयों महद्दष्टर पूप्यं ।
स संवतो नवजातस्तुर्यासिहं न ऋद्धमभितः परि ठुः ।।३।।
पदार्थ:-हे मनुष्यो जिसके संबन्ध में (अंहोयुवः) जो अपराध को दूर करते
वे (तन्यः) शरीर के मध्य में (तन्वते) विस्तार को प्राप्त होते और (महत) बड़े
(दुष्टरम्) दुःख से पार होने योग्य (वयः) जीवन को (वि) विशेष करके विस्तृत
करते और सुख के (परि) सब ओर (स्यः) स्थित होते हैं (स.) वह उन का
सङ्गी (संवतः) उत्तम प्रकार सेवन किया गया (नवजात:) नवीन अभ्यास से
उत्पन्न हुई विद्या जिस की ऐसा पुरुष (पूर्व्याय) पूर्वज के लिये (क्रुद्धम्) क्रोधयुक्त
(सिंहम्) सिंह के (न) सदृश अन्य को (अभितः) सब प्रकार से (तुतुर्यात)
नाश करे ॥३॥
भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं० जो
धर्म का आचरण करते हैं वे शरीर और आत्मा के सुख और जीवन की वृद्धि
कराते हैं। और जैसे क्रुद्ध सिंह प्राप्त हुए प्राणियों का नाश करता है वैसे
प्राप्त हुए दुर्गुणों का सब जन नाश करें ॥३॥
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ।
मातेव यद्भरसे पप्रथानो जनजनं धायसे चक्षसे च ।
वयोवयो जरसे यद्दधानः परि त्मना विघुरूपो जिगासि ॥४॥
पदार्थ:-हे विद्वन् (यव) जिस कारण (पप्रथान:) प्रसिद्ध विद्यायुक्त प्राप
(मातेव) माता के सदृश (घायसे) धारण करने और (चक्षसे) कहाने को (च)
भी (जनजनम्) मनुष्य मनुष्य का (भरसे) पोषण करते हो और (त्मना) आत्मा
से (यत्) जिस कारण (दधानः) धारण करते हुए (वयोवय.) सुन्दर जीवन
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मनुष्य पाप को
दूर कर के
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सम्पूर्ण पदार्थों की (परि) सब प्रकार से (जिगासि) प्रशंसा करते हो इस से विद्वान्
होते हो ॥४॥
भावार्थ:-जो विद्वान् जन माता के सदृश विद्यार्थियों की रक्षा करने,
सब की उन्नति करने की इच्छा करते और ब्रह्मचर्य तथा अवस्था के बढ़ने
में कारणरूप कार्यों का उपदेश करते हैं वे संसार के आदर करने योग्य
होते हैं ॥४॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू. १६ ॥
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फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
वाजो नु ते शसस्पात्वन्तमुरुं दोघं धरुण देव रायः ।
पदं न तायुगुहा दानो महो राये चितयन्नमस्पः ।।५।।
पदार्थ:-हे (देव) विद्वन् (ते) पाप का (दाज:) वेग (शवसः) बल के
(उरुम्) बहुत (अन्तम्) अन्त की (दोघम्) तथा उत्तम पूर्ण करने वाले और
(रायः) धन के (धरुणम्) धारण करने वाले की (नु) शीघ्र (पातु) रक्षा करे
और (तायु:) चोर (पदम्) पैरों के चिह्न को (न) जैसे वैसे' (महः) बड़े (राये)
धन के लिये (गुहा) बुद्धि में सत्य को (दधानः) धारण करने और (अत्रिम्।
पालन करने वाले को (चितयन्) जनाते हुए आप सब को (अस्पः) प्रसन्न
कीजिये ॥५॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो! जैसे चोर चोर के पाद के चिह्न को ढूंढ के
ग्रहण करता है वैसे ही आत्मानों में सत्य को धारण कर और कामना की
पूत्ति करके सब को प्रसन्न करें ॥५॥
इस सूक्त में विद्वान् और अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की
इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
पंचम मण्डल में पन्द्रहवां सूक्त समाप्त हुा ।
।
-
अथ पञ्चर्चस्य षोडशस्य सूक्तस्य पुरुरात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता । १।२।३
विरात्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः १४ भुरिगुष्णिक्छन्दः । ऋषभ: स्वरः । ५
बृहतीछन्दः । मध्यमः स्वरः ।।
अब पांच ऋचा वाले सोलहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में
बिजुली के विषय को कहते हैं ।
वृहद्वयो हि मानवेऽची देवायानये ।
यं मित्रं न प्रशस्तिभिर्मासो दधिरे पुरः ॥१॥
पदार्थ:--हे विद्वन् (मासः) मनुष्य (प्रशस्तिभिः) प्रशंसाओं से (यम्)
जिस को (मित्रम् ) मित्र के (न) समान (पुरः) प्रथम से (दधिरे) धारण करते हैं
उसको (भानवे) प्रकाश के लिये और (देवाय) श्रेष्ठ गुण वाले (अग्नये) बिजुली
आदि के लिये (वृहत) बड़ा (वय:) प्रदीप्त करने वाला तेज जैसे हो वैसे' (हि) ही
(अर्चा) पूजिये भादर करिये ॥१॥

६० ऋग्वेदः मं० ५। सू०१६ ।। M R an के भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-जैसे मित्र मित्रको धारण करके सुख की वृद्धि को प्राप्त होता है वैसे ही अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को प्राप्त होकर विद्वान् जन आनन्द से वृद्धि को प्राप्त होते हैं ।।१।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। स हि युभिर्जनाना होता दक्षस्य बाह्वोः । वि हरूपमग्निरांनुषग्भगो न वारंमृण्वति ॥२॥ पदार्थः---जो (जनानाम्) मनुष्यों की (बाह्वोः) भुजाओं के (दक्षस्य) बल का (होता) देने वाला (अग्नि:) अग्नि (भगः) सूर्य के (न) सदृश (मानुषक) अनुकूलता से (वारम्) स्वीकार करने और (हव्यम्) देने योग्य पदार्थ को (वि, ऋण्वति) विशेष सिद्ध करता है (सः, हि) वही (धभिः) धर्मयुक्त कामों से बलवान् होता है ॥२॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन अपने प्रात्मा सदृश सब मनुष्यों को जान और विद्या को प्राप्त करा के उन्नति करने की इच्छा करते हैं वे ही भाग्यशाली वर्तमान हैं ।।२।। अब संग्राम विजय विषय को कहते हैं। अस्य स्तोमें मघोना सख्ये वृद्धशोचिषः । विश्वा यस्मिन्तुविष्वणि समर्ये शुष्ममादधुः ॥३॥ पवार्थ:- जो मनुष्य (मस्य) इस (वृद्धशोचिषः) वृद्ध अर्थात् बढ़ी हुई कान्ति जिस की ऐसे (मघोनः) बहुत धन से युक्त पुरुष की (स्तोमे) प्रशंसा में और (सख्ये) मित्रपन वा मित्र के कार्य के लिये (यस्मिन्) जिस (तुविष्वणि) बल सेवन तथा (सम्, अय) अच्छे प्रकार स्वामी वा वैश्य में (शब्मम्) बल को (प्रादधुः) सब प्रकार धारण करें वे (विश्वा) सम्पूर्ण सुखों को प्राप्त होवें ॥३॥ भावार्थ:-जो मित्र होकर शरीर और आत्मा के बल को धारण करके प्रयत्न करते हैं वे संग्रामादिकों में विजय को प्राप्त होकर प्रशंसित लक्ष्मीवान् होते हैं ॥३॥ अब राज्य और ऐश्वर्यवृद्धि को कहते हैं । अधा ह्यग्न एषां सुवीर्यस्य मंहना । तमियाँ न रोदसी परि श्रो बभूवतुः ॥४॥ 2- ऋग्वेदः मं० ५ । सू०१८॥ 40 पदार्थः हे (अग्ने) राजन् (एषाम्) इन वीरों और (सुवीर्यस्य) उत्तम पराक्रम वाले के (मंहना) बड़प्पन से जो (तम्) उस को (इत्) ही (यह्वम्) बड़े सूर्य (अधा) इसके अनन्तर (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के (न) सदृश (श्रवः) अन्न जैसे हो वैसे (परि) सब ओर से (बभूवतुः) होते है वे (हि) ही विजय को प्राप्त होते हैं ॥४॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं.-हे मनुष्यो ! जो बड़ी उत्तम प्रकार शिक्षित सेना को प्राप्त होते हैं उनके ही राज्य का ऐश्वर्य बढ़ता है ॥४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। नू न एहि वार्यमग्नै गृणान आ भर । ये वयं ये च सूरयः स्वस्ति धामहे सचोधि पुत्सु नौ वृधे ॥५॥ पवार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (ये) जो (सूरयः) विद्वान् (ये, च) और जो (वयम्) हम लोग (स्वस्ति) सुख को (धामहे) धारण करते हैं उन से (सचा) संबद्ध आप (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य की (नू) शीघ्र और (गृणान:) विद्वानों के गुणों की स्तुति करते हुए (नः) हम लोगों को (मा, इहि) सब प्रकार से प्राप्त हूजिये (उत) और सुख की (आ, भर) सब प्रकार पुष्टि कीजिये तथा (पृत्सु) संग्रामों में (न:) हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिये (एघि) प्राप्त हूजिये ॥५॥ भावार्थ:-जो मनुष्यों के लिये निरन्तर सुख देते हैं उनके साथ मनुष्य सदा उन्नति करें ॥५॥ इस सूक्त में बिजुली का विषय संग्राम विजय और राज्यश्वयं के वर्धन का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ पंचम मण्डल में सोलहवां सूक्त समाप्त हुआ। . । अथ पञ्धर्चस्य सप्तदशस्य सूक्तस्य पुरुरात्रेय ऋषिः। अग्निर्देवता। १ भुरिगुठिणक् छन्दः । ऋषभः स्वरः । २ अनुष्टुप् । ३ निचूदनुष्टुप् । ४ विराउनुष्टप छन्दः । गान्धारः स्वरः। ५ भुरिग्बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः ॥ अब पांच ऋचावाले सत्रहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अग्न्यादि विद्या विषय को कहते हैं ।।

akeup Igles विध्वरे) शोभन अहिंसामय यज्ञ में (यज्ञ:) विद्वानों के सत्कारादिक ऋग्वेदः मं० ५ । सू०१८ ।। आ यज्ञैर्दैव मत्य इत्था तव्यांसमूतये । अग्नि कृते स्वध्वरे पूरुरीळीतावसे ॥१॥ पदार्थ:-हे (देव) विद्वन् जैसे (पूरुः) मननशील (मय :) मनुष्य (कृते) व्यवहारों से (अवसे) विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों में प्रवेश होने के लिये (लव्यांसम्) अत्यन्त वृद्ध बड़े तेजयुक्त (अग्निम् ) अग्नि की (ईळीत) प्रशंसा करता है (इस्था) इस कारण से (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (पा) प्रयोग अर्थात् विशेष उद्योग करो ॥१॥ भावार्थ:-जो विद्वानों के सङ्ग में प्रीति करने वाले मनुष्य अग्नि प्रादि पदार्थों की विद्या को प्राप्त होकर श्रेष्ठ कर्म को करते हैं वे सब प्रकार से रक्षित होते हैं ॥१॥ अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। अस्य हि स्वयंशस्तरः आसा विधर्मन्मन्यसे। तं नाक चित्रशोचिष मन्द्रं परो मनीषयां ॥२॥ पदार्थ:-हे (विधर्मन्) विशेष धर्म के अनुगामी जो (हि) निश्चय (अस्य) इसके सम्बन्ध में (स्वयशस्तरः) अत्यन्त अपना यश जिस का ऐसा पुरुष (प्रासा) मुख वा आसन से वर्तमान है और (पर:) श्रेष्ठ हुए (मनीषया) बुद्धि से (तम्) उस (मन्द्रम्) आनन्द देनेवाले और (चित्रशोचिषम्) अद्भुत प्रकाशयुक्त (नाकम्) दुःख से रहित को आप (मन्यसे) जानते हो उसका मैं आदर करता हूं ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप सदा ही धर्मयुक्त यश को बढ़ाने वाले कर्म को करें जिस से अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अस्य वासा उं अर्चिषा य आयुक्त तुजा गिरा। दिवो न यस्य रेतसा बृहच्छोचन्त्यर्चयः ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (यः) जो (प्रसौ) यह (अस्य) इसकी (वै) निश्चय से (अचिषा) विद्या की दीप्ति और (गिरा) वाणी से (मायुक्त) युक्त होता (3) और (यस्य) जिस के (रेतसा) पराक्रम से (दिवः) जैसे मनोहर प्रयोजन के (न) - ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १७ ॥ वैसे' (अर्चयः) उत्तम सत्कार (बृहत) बड़े (शोचन्ति) शोभित होते हैं वह आप दुःखों की (तुजा) हिंसा करो ॥३॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जिन विद्वानों के सूर्य के प्रकाश के सदृश विद्या यशः और कीत्ति विलास को प्राप्त होते हैं वे ही बड़े विज्ञान को उत्पन्न करते हैं ॥३॥ अब अग्निदृष्टान्त से विद्याविषय को कहते हैं ।। अस्य क्रत्वा विचेतसो दस्मस्य वसु रथ आ। अधा विश्वास हव्योऽग्निर्विक्षु प्रशस्यते ॥४॥ पदार्थः-हे विद्वन् जिस की (विश्वासु) सम्पूर्ण (विक्षु) प्रजाओं में (हव्यः) ग्रहण करने योग्य (अग्निः) अग्नि (प्र, शस्यते) प्रशंसा को प्राप्त होता है (अधा) इसके अनन्तर (अस्य) इस की (रवा) बुद्धि तथा (विचेतसः) जनाने और (दस्मस्य) दुःख के नाश करने वाले की बुद्धि से (रथे) सुन्दर वाहन में (बस) द्रव्य (माप्र, शस्यते) प्रशंसित होता है ॥४॥ भावार्थः जैसे प्रजा में अग्नि विराजता है वैसे ही विद्या और विनय से युक्त बुद्धिमान् पुरुष शोभित होते हैं ।।४।। फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ।। नु न इद्धि वार्यमासा संचन्त सूरयः । ऊर्जा नपादभिष्टये पाहि शन्धि स्वस्तय उतैधि पृत्सु नौ वृधे ।।५।। पदार्थः --- हे विद्वन् जैसे (सूरयः) विद्वान् जन' (प्रासा) उपवेशन अर्थात् स्थिति से (न:) हम लोगों को और (वार्यम्) श्रेष्ठ पदार्थों में उत्पन्न विजुलीरूप अग्नि को (सचन्त) संबद्ध करते हैं वैसे (नपाद) नहीं गिरने वाले श्राप (नः) हम लोगों के (अभिष्टये) अपेक्षित सुख के लिये (ऊर्ज:) पराक्रमों की (पाहि) रक्षा कीजिये और (पत्स) संग्रामों में हम लोगों की (वधे) वृद्धि के लिये (हि) जिस से (शग्धि) समर्थ हूजिये और (स्वस्तये) सुख के लिये (नू) शीघ्र (इत्) ही (उत) निश्वय से (एघि) प्राप्त हूजिये ॥५॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु जो मनुष्य विद्वानों के अनुकरण को करें तो उत्तम गुणों की प्राप्ति बल की वृद्धि और सुखपूर्वक विजय को करते हैं ॥५॥ -

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १८ ॥
इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने इस सूक्त के अर्थ की इस से
पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह पञ्चम मण्डल में सत्रहवां सूक्त समाप्त हुभा ॥
अथ पञ्चचस्याष्टादशस्यसूक्तस्यद्वितोमुक्तवाहापात्रेयऋषिः अग्निदेवता ।
१। ४ विराउनुष्टुप् । २ निचूदनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः। ३ भुरिगुष्णिक
छन्दः । ऋषभः स्वरः । ५ भुरिग्बहती छन्दः । मध्यमः स्वरः ।।
अब पाँच ऋचा वाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में
अग्नि के सदृश अतिथि के विषय को कहते हैं ।।
पातरग्निः पुरुप्रियो विशः स्तवेतातिथिः।
विश्वानि यो अमयों हव्या मतेषु रण्यति ॥१॥
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पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (अग्निः) अग्नि के सदृश पवित्र (पुरुप्रियः)
बहुतों से कामना किया वा सेवन किया गया (मर्तेषु) नाश होने वाले कार्यों में
(अमर्त्यः) स्वभाव से मरणधर्मरहित (रण्यति रमता है (विश्वानि) सम्पूर्ण (हव्या)
देने योग्यों की (स्तवेत) प्रशंसा करें और जो (प्रात:) प्रातःकाल के प्रारम्भ से
(विश:) प्रजात्रों को उपदेश देवें वह (अतिथिः) आदर करने योग्य यथार्थवक्ता
विद्वान् सत्कार करने योग्य होता है ॥१॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अतिथि आत्मा का जानने वालों, सत्य
का उपदेशक, विद्वान्, विद्वानों का प्रिय, परमात्मा के सदृश सब के हित को
चाहने वाला नित्य क्रीड़ा करता है वह ही सत्कार करने योग्य है ॥१॥
फिर अतिथि विषय को कहते हैं ।
द्विताय मृक्तवाहसे खस्य दक्षस्य महना ।
इन्दुं स धत्ते आनुषक् स्तोता चित्ते अमर्त्य ॥२॥
पदार्थ:-हे (अमर्त्य) अपने स्वरूप से नित्य जो (स्तोता) सत्यविद्या की
प्रशंसा करने वाला (मानुषक्) अनुकूलता से (इन्दुम्) ऐश्वर्या को (चित्) ही (ते)
तेरे लिये (धत्ते) धारण करता है (सः) वह (द्विताय) दो जन्मों से विद्या को प्राप्त
(मुक्तवाहस) शुद्ध विज्ञान को प्राप्त कराने वाले (स्वस्य) और अपने (वक्षस्य) बल
के (मंहना) बड़प्पन के साथ वर्तमान अतिथि के लिये
सुख
-
देवें ॥२॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० १८ ।। पा Mhmah भावार्थ:-जो मनुष्य यथार्थवक्ता अतिथियों का सत्कार करते हैं वे सत्य विज्ञान को प्राप्त हो कर सर्वदा आनन्दित होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते है। तं वो दीर्घायुशोचिषं गिरा हुवे मघोनाम् । अरिष्टो येषां रथो व्यश्वदावनीयते ॥शा पदार्थ:-हे मनुष्यो (येषाम्) जिन अतिथियों और (मघोनाम्) बहुत धन से युक्त (वः) आप लोगों का (परिष्टः) नहीं हिंसा करने योग्य (रथः) वाहन (कि, ईयते) विशेषता से चलता है उनका मैं (हुवे) आह्वान करता हूं और हे (अश्वदावन्) व्याप्ति करने वाले विज्ञान आदि गुणों के दाता गृहस्थ आप के कल्याण के लिये (तम्) उस (दीर्घायुशोचिषम्। दीर्घ अर्थात् अधिक अवस्था पवित्र करने वाली जिस की ऐसे अतिथि विद्वान् का मैं (गिरा) वाणी से आह्वान करता हूं ॥३॥ भावार्थ:--जो अहिंसादि धर्म से युक्त मनुष्य अतिकालपर्यन्त जीवने वाले धार्मिक अतिथियों की सेवा करते हैं वे भी दीर्घायु और लक्ष्मीवान् होकर आनन्दित होते हैं ।।३।। फिर उसी विषय को कहते हैं । चित्रा वा येषु दीधितिरासन्नुक्था पान्ति ये । स्तीर्ण बर्हिः स्वर्णरे श्रदांसि दधिरे परि ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (येष) जिन अतिथियों में (चित्रा) विचित्र (दीधितिः) प्रकाशमान विद्या है और (प्रासन्) अासन वा मुख में (उक्था) प्रशंसा करने योग्य कर्म हैं और (ये, वा) अथवा जो (स्तीर्णम्) आच्छादित अर्थात् अन्तःकरण में व्याप्त (बहिः) अन्तरिक्ष के सदृश विज्ञान की (स्वर्णरे).सुख से युक्त मनुष्य में (पान्ति) रक्षा करते हैं और (श्रवांसि) अन्नादिकों को (परि) सब ओर से' (दधिरे) धारण करें वे ही श्रेष्ठ अतिथि होते हैं ।।४।। भावार्थः--जो विद्या के उत्तम गुणों से पूर्ण, सब के हित चाहने वाले, पुरुषार्थी अर्थात् उत्साही और पक्षपात से रहित अतिथिजन उपदेश से सब की रक्षा करते हैं वे संसार के कल्याण करने वाले होते हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ये में पञ्चाशत ददुरानां सधस्तुति । झुमदग्ने महि श्रवो बृहत्कृधि मघोना नृवद॑मृत नृणाम् ॥५॥ INI MAM HAM SAR SANN ऋग्वेदः मं० ५ । सू० १६॥ पदार्थः-(ये) जो अतिथि जन (मे) मेरे लिये (प्रश्वानाम्) वेग से युक्त अग्नि आदि पदार्थों के (सधस्तुति) साथ प्रशंसित (ध मत्) यथार्थ ज्ञान के प्रकाश से युक्त (पञ्चाशतम्) पञ्चाशतसंख्यायुक्त विज्ञान को (ददुः) देने वाले हों उन के साथ हे (अग्ने) विद्वन् आप एक साथ प्रशंसित और यथार्थ ज्ञान के प्रकाश से युक्त (महि) बड़े (बृहत) बहुत (श्रवः) अन्न वा श्रवण को (कृषि) करिये और हे (अमृत) मरणधर्म से रहित उन (मधोनाम्) बहुत धनवान् (नृणाम्) मनुष्यों के (नवद) मनुष्यों के तुल्य उन्नति को विधान करो ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अतिथिजन पदार्थविद्या को देवें उनका सत्कार यथायोग्य करो ॥५॥ इस सूक्त में अग्निवत् अतिथि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में अठारहवां सूक्त समाप्त हुआ। है अथ पञ्चर्चस्यैकोनविंशतितमस्य सूफ्तस्य विरात्रेय ऋषिः । अग्निदेवता। गायत्री। २ निचूद्गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । ३ अनुष्टुप् छन्दः । गान्धार: स्वरः । ४ भुरिगुष्णिक् छन्दः । ऋषभः स्वरः ५। निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। * * अब पांच ऋचा वाले उन्नीसचे सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में विद्वानों को सिद्ध करने योग्य उपदेश विषय को कहते हैं ।। अभ्यवस्थाः प्रजायन्ते भ वबेर्वविश्चिकेत । उपस्थे मातुर्वि चष्टे ॥१॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (व:) स्वीकार करने वाले की जो (अवस्थाः) विरुद्ध वर्ताव को प्राप्त होते हैं जिन में ऐसी वर्तमान दशायें (प्र, जायन्ते) उत्पन्न होती हैं उनका (वविः) स्वीकार करने वाला (अभि) सन्मुख (प्र, चिकेत) विशेष कर के जाने और (मातुः) माता के (उपस्थे) समीप में (वि चष्टे) प्रसिद्ध होता है उन को आप भी जानिये ॥१॥ भावार्थ:-ऐसा नहीं कोई भी प्राणी है कि जिसकी उत्तम मध्यम और अधम दशायें न होवें और जो माता पिता और प्राचार्य से शिक्षित है वही अपनी दशाओं को सुधार सकता है ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः म० ५ । सू० १६॥ ६७ क जुहुरे वि चितयन्तोऽनिमिषं नृम्ण पान्ति आ दृहळा पुर विविशुः ॥२॥ पदार्थः-जो (अनिमिषम्) दिन रात्रि (चितयन्तः) बोध कराते हुए (वि) विरुद्ध (जुहुरे) कुटिलता करते और (नुक्ष्णम्) धन की (पान्ति) रक्षा करते हैं वे (इलाम) दृढ़ (पुरम् ) नगर को (मा, विविशुः) सब प्रकार प्राप्त होते हैं ॥२॥ भावार्थ:-जो सरल स्वभाव वाले और सत्य के बोधक प्रतिक्षण पुरुषार्थ करते हैं वे राज्य और ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। आश्चत्रेयस्य जन्तवों युपर्धन्त कृष्यः । निष्कग्रीवो वृहदुक्थ एना मध्वा न बाजयुः ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जिस (श्वैत्रेषस्य) अन्तरिक्ष में स्थित दिशाओं में उत्पन्न जल के मध्य में (जन्तवः) जीव और (कृष्टयः) मनुष्य (वर्धन्त) वृद्धि को प्राप्त होते हैं (एना) इस (अध्वा) मधुर जल से (बाजपुः) अन्न की कामना करते हुए के (न) सदृश (बहदुक्थः) अत्यन्त प्रशसित (निष्कग्रीवः) एक निष्क का जिस में चार सुवर्ण प्रमाण से युक्त आभूषण जिस की ग्रीवा में ऐसा पुरुष (धा मत) प्रकाश से युक्त सुख को (प्रा) प्राप्त होता है ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! इस संसार में जितने पदार्थ हैं वे सब जल ही से होते हैं अर्थात् सब का बीज जल ही है ऐसा जानकर सब सुखों को प्राप्त होनो ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। प्रियं दुग्धं न काम्यमजामि जाम्योः सर्चा । घों न वाजठरोऽन्यः शश्वतो दर्भः ॥४॥ पदार्थ:---(वाजजठरः) क्षुधा का वेग उदर में जिस से हो (अदब्धः) जो नहीं हिंसा करने योग्य (शश्वतः) निरन्तर व्याप्त (दभः) और जिस से नाश करता है उस (धर्मः) प्रताप के (न) सदृश वा (प्रियम्) प्रिय (दुग्धम्) दुग्ध के (न) सदृश (सचा) सम्बन्ध से (जाम्योः) खाने योग्य अन्न को देने वाले प्रकाश और पृथिवी के (काम्यम्) कामना करने योग्य पदार्थ को (प्रजामि) प्राप्त होता हूं इस से मेरे साथ आप लोग भी इस को करो ॥४॥ Sants ( ऋग्वेदः मं० ५। सू० २० ।। ac RA भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जो सूर्य के प्रकाश के सदृश विद्या से व्याप्त दुग्ध के सदृश प्रिय वचन वाले और धर्म की कामना करते हुए जन हैं वे पृथ्वी के सदृश सब के रक्षक होते हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । क्रीळनो रश्म आ भुवः सं भस्मना वायुना वेविदानः । ता अस्य सन्धृषजो न तिग्माः सुसंशिता वक्ष्यों वक्षणेस्थाः ॥५॥ पदार्थ:--हे (रश्मे) किरणों के सदृश वर्तमान विद्वन् जैसे विजुलीरूप अग्नि (भस्मना) भस्म और (वायुना) पवन से (वैविधान:) जनाता अर्थात् अपने को प्रकट करता हुआ (ता:) उन (प्रस्य) इस की (धषजः) धृष्टता से उत्पन्न हुओं के (न) सदृश (तिग्माः) तीव्र (सुसंशिताः) उत्तम प्रकार प्रशंसित (वक्ष्यः) ले चलने वाली और (वक्ष्णेस्थाः) वाहन में स्थिर ऐसी लपटों को धारण करता (सन्) हुमा सुख की (सम्) संभावना कराता है वैसे (क्रीड़न्) क्रीड़ा करते हुए श्राप (नः) हम लोगों के सुखकारी (प्रा, भुवः) हूजिये ।।५।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमावाचकलु०-हे विद्वानो ! जैसे सूर्य की किरणे सर्वत्र फैली हुई सब को सुख देती हैं वैसे ही सब स्थानों में भ्रमण तथा उपदेश करते हुए आप सब को आनन्द दीजिये ।।५।। इस सूक्त में विद्वानों के सिद्ध करने योग्य उपदेशविषय का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में उन्नीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ चतू ऋचस्य विशतितमस्य सुक्तस्थ प्रयस्वन्त अत्रय ऋषयः । अग्निदेवता १ । ३ विराउनुष्टुप् । २ निन्दनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । ४ पक्तिश्छन्दः ।। पञ्चमः स्वरः॥ अब चार ऋचा वाले बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्य विद्वान् के गुणों का वर्णन करते हैं। यमग्ने वाजसातम त्वं चिन्मन्यसे रयिम् । तं नौ गीमिः श्रवाय्य देवत्रा पनया युजम् ॥१॥ पदार्थ:-हे (वाजसातम) अतिशय विज्ञान आदि पदार्थों के विभाजक (ग्ने) 2009 WAR ऋग्वेदः मं० ५। सू० २० ।। 18 * Roma विद्वन् (त्वम्) पाप ,गोभिः) उत्तम प्रकार उपदेशरूप हुई वारिणयों से (यम्) जिस (देवत्रा) विद्वानों में (श्रवाय्यम्) सुनने योग्य (युजम्) योग करने वाले (रयिम्) धन का अपने लिये (मन्यसे) स्वीकार करते हो (तम्) उस को (चित्) भी (नः) हम लोगों को (पनया) व्यवहार से प्राप्त कराइये ॥१॥ भावार्थ:- यही धर्मयुक्त व्यवहार है कि जैसी इच्छा अपने लिये होती है वैसी ही दूसरे के लिये करे और जैसे प्राणी अपने लिये दुःख की नहीं इच्छा करते हैं और सुख की प्रार्थना करते हैं वैसे ही अन्य के लिये भी उनको वर्ताव करना चाहिये ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ये अंग्ने नेरयन्ति ते वृद्धा उग्रस्य शवसः। अप द्वेषो अप हरोऽन्यव्रतस्य सश्चिरे ॥२॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (ये) जो (वृद्धाः) विद्या और अवस्था से वृद्ध जन (ते) आप के (उनस्य) उत्तम (शवस:) बल के संबन्ध में (सश्चिरे) गमन करने वाले हैं और (द्वेषः) द्वेष करने वाले (अप) दूर जाते हैं (अन्यव्रतस्थ) धर्म से विरुद्ध आचरण वाले के संबन्ध में (ह्वरः) कुटिल आचरण वाले (अप) अलग जाते हैं वे दुःख की (न) नहीं (ईरयन्ति) प्रेरणा करते हैं ।।२।। भावार्थ:-वे ही वृद्धि हैं जो सत्य बोलते और सब का उपकार करके अपने सदृश सुख देते और कभी धर्म से विरुद्ध आचरण नहीं करते हैं ।।२।। फिर उसी विषय को कहते हैं । होतारं त्वा वृणीमहेाने दक्षस्य साधनम् । यज्ञेषू पूर्ण गिरा प्रयस्वन्तो हवामहे ॥३॥ पवार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् जैसे (प्रयस्वन्तः) प्रयत्न करते हुए हम लोग (गिरा) बाणी से (यज्ञेषु) यज्ञों में (दक्षस्य) बल' के (पूर्व्यम्) प्राचीन यथार्थ- वक्ता पुरुषों से किये गये (साधनम्) साधन को (हवामहे) देते और (होतारम्) दाता अग्नि का (वृणीमहे) स्वीकार करते हैं वैसे (स्वा) आप का स्वीकार करें ॥३॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलु ० -जैसे मनुष्य परोपकारी का प्रीति से बहुत आदर करते हैं वैसे ही विद्वान् जनों से सब उत्तम कर्म किये जाते हैं ॥३॥ A ७० ऋग्वेदः मं० ५। सू०२१ ॥ PRON Bins फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ।। इत्था या त ऊतये सहसावन्दियेदिवे । राय ऋतार्य सुक्रतो गोभिः स्याम सधमादो वीरैः स्याम सधमादः ॥४॥ पदार्थ:-हे (सहसावन्) बल से तुल्य (सुक्रतो) उत्तम बुद्धि से युक्त (यथा) जैसे (ते) आप के (ऊतये) रक्षण आदि के लिये (विवे-दिवे) प्रतिदिन (ऋताय) धर्मयुक्त व्यवहार से प्राप्त (राये) धन के लिये हम लोग (गोभिः) वारिणयों से (सधमादः) साथ स्थान वाले (स्याम) होवें तथा (वीरैः) शूर वीरों के साथ (सध- मादः) साथ स्थान वाले (स्याम) हो। (इत्था) इस कारण से आप हूजिये ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जो साहस से पुरुषार्थ करते वीर जनों की सेना को ग्रहण करके ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये प्रयत्न करते हैं वे ही सुखी होते हैं ॥४॥ इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में बीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ चतुऋयस्यैकाधिकविंशतितमस्य सूक्तस्य सस यात्रेय ऋषिः । अग्नि- वता । १ अनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । २ भुरिगुष्णिक् । ३ स्वराष्णिक छन्दः । ऋषमः स्वरः । ४ निबृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः ॥ अब चार ऋचा वाले इक्कीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्नि-विषय को कहते हैं । मनुष्वचा नि धीमहि भनुष्वत्सपिंधीमहि । अग्ने मनुष्यदंङ्गिरो देवान्देवयते यज ॥१॥ पदार्थ:-हे (अगिरः) प्राणों के सदृश प्रिय (अग्ने) विद्वन् जैसे हम लोग कार्य की सिद्धि के लिये अग्नि को मिनुष्यत्) मनुष्य को जैसे वैसे (दि, धीमहि) निरन्तर धारणवाले होवें और (देवयते) श्रेष्ठ गुणों की कामना करते हुए के लिये (देवान्) श्रीष्ठ विद्यायुक्त विद्वानों को (मनुष्वत् मनुष्यों के समान (सम्, इधीमहि) प्रकाशित करें वैसे (त्वा) आप को उत्तम कर्म में स्थित करें और श्राप मनुष्यत) मनुष्य के तुल्य (यज) मिलिये अर्थात् कार्यों को प्राप्त हूजिये ।।१।।

-
ऋग्वेदः मं०५ । सू० २१ ॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य विचारशील होकर
श्रेष्ठ गुणों की कामना करते हैं वे अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को
जानें ॥१॥
GABAD
adbe
Madhu
फिर उसी विषय को कहते हैं।
त्वं हि मानुषे जनेऽग्ने सुप्रीत इथ्यसे ।
स्रुचस्त्वा यन्त्यानुषकमजोल सर्पिरासुते ।।२।।
से वर्तमान जैसे अग्नि (सपिरासुते) घृत
से सन भोर से प्रकाशित हुए में प्रकाशित
किया जाता है वैसे (हि) ही (स्वम्) पाप (भानुषे, जने) प्रसिद्ध मनुष्य में (सुप्रीतः)
उत्तम प्रकार प्रसन्न हुए (इध्यसे) प्रकाशित होते हो और जैसे (त्या) आप को.
(स्न चः) यज्ञ के साधन पात्र (भानुषक) अनुकूलता से (यन्ति) प्राप्त होते हैं वैसे ही
भाप सब के प्रति अनुकूल हूजिये ।।२।।
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! आप लोग जैसे
अग्नि इन्धन और घृत आदिकों को प्राप्त होकर वृद्धि को प्राप्त होता है
वैसे ही विद्या और उत्तम गुणों को प्राप्त होकर निरन्तर वृद्धि को प्राप्त
हूजिये ॥२॥
प्रम शिल्पविद्यावेता विद्वान् के विषय को कहते हैं ।
स्वां विश्व सजोषसो देवासो दुतर्मक्रत ।
सपर्यन्तस्त्वा कवे यज्ञेषु देवीळते ॥३॥
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Musd4
पदार्थ:--- है (क) विहन् जैसे (विश्वे) सम्पूर्ण (सजोषस:) तुल्य प्रीति के
सेवन करने वाले (देवास:) विद्वान् जन (देवम्) श्रेष्ठ गुण वाले (दूतम्) दूत के
सदृश
वर्तमान अग्नि को (अऋत) करते हैं और (सपर्यन्तः) सेवा करते हुए जन
(यज्ञेष) सत्सङ्गों में श्रेष्ठ गुण वाले विद्वान् की (ईडते) स्तुति करते हैं वैसे (त्वाम्)
आप की हम लोग सेवा करें और (त्या) श्राप का सत्कार करें ॥३॥
भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलु०-जो जन अग्नि से दूतकर्म अर्थात्
नौकर के सदृश काम कराते हैं वे सब स्थानों में प्रशंसित ऐश्वर्य वाले
होते हैं ॥३॥

७२ ऋग्वेदः मं० ५। सू० २२॥ and am EMA फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । देवं वो देवयज्ययाग्निमीळीत मत्यैः । समिद्धः शुक्र दीदिह्यतस्य योनिमासंदः ससस्य योनिमासदः ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (व:) आप लोगों के (देवयज्यया) विद्वानों के मेल से (मर्त्यः) मनुष्य (देवम्) प्रकाशित (अग्निम्) अग्नि की (ईडीत) प्रशंसा करे। हे (शुक्र) सामथ्यं वाले (समिद्धः) उत्तम गुणों से प्रकाशित प्राप (वीदिहि) प्रकाश करामो और (ऋतस्य) सत्य परमाणु आदि के (योनिम्) कारण को (मा, प्रसवः) सब प्रकार जानिये और (ससस्य) कार्य के (योनिम्) कारण को (मा, प्रसवः) सब प्रकार जानिये ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य विद्वानों के संग से कार्य और कारणस्वरूप सृष्टि अर्थात् सत्त्व रज और तमोगुण को साम्यावस्थारूप प्रधान को जान के कार्य को सिद्ध करते हैं वे सृष्टि के क्रम को जान के दुःख को कभी नहीं प्राप्त होते हैं ॥४॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुरण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में इक्कीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ चतुऋचस्य द्वाविंशतितमस्य सूक्तस्य विश्वासामाश्रेय ऋषिः । अग्नि- देवता। १ विराउनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः। २। ३ स्वराष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः। ४ बहती छन्दः । मध्यमः स्वरः ॥ अब चार ऋचावाले' बाईसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्निविषय को कहते हैं । प्रविश्वसामन्नत्रिवदों पावकनोचिषे यो अध्वरेष्वीडयो होता मन्द्रतमो विशि ||१|| पदार्थ:-है (विश्वसामन्) सम्पूर्ण सामों वाले (य:) जो (अध्वरेषु) यज्ञों में (ईडयः) प्रशंसा करने योग्य (होता) दाता (विशि) प्रजा में (मन्प्रतमः) अतिशय आनन्द युक्त होवें उस (पावकशोचिषे) अग्नि के प्रकाश के सदृश प्रकाश वाले पुरुष के लिये (अत्रिवत) व्यापक विद्यावाले के सदृश (प्र, अर्चा) सत्कार कीजिये ॥१॥ ह ऋग्वेदः मं० ५। सू० २२॥ ause भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक जनों का ही सत्कार करें अन्य जनों का नहीं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । न्य१'ग्नि जातवेदसं दाता देवमृत्विजम् । प्र यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यंचस्तमः ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जो (देवव्यचस्तमः) पृथिव्यादिकों का धारण करने और प्रति तोड़ने वाला (यज्ञः) मिलने योग्य (प्रानुषक) अनुकूलता से (प्रधा) आज हम लोगों को (एतु) प्राप्त हो उस (ऋत्विजम्) ऋतुओं में यज्ञ करने वाले के सदृश (जातवेवसम्) उत्पन्न हुओं में विद्यमान् (देवम्) श्रेष्ठ गुण कर्म और स्वभाव वाले (अग्निम्) अग्नि को (प्र, नि, दधाता) उत्तमता से निरन्तर धारण करो ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे यज्ञ करने वाले यज्ञ को पूर्ण करते हैं वैसे ही अग्नि शिल्पविद्या के कृत्य की सिद्धि को पूर्ण करता है ॥२॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। चिकित्विन्मनसन्त्वा देवं मत्तीस ऊतये । वरेण्यस्य तेऽवस इयानासौं अमन्महि ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (वरेण्यस्थ) स्वीकार करने और (अवस:) कामना करने योग्य (ते) आप के सङ्ग से (इयानास:) प्राप्त होते हुए (मसिः) मनुष्य हम लोग (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (चिकित्विन्मनसम्) विज्ञानयुक्त पुरुषों के मन के सदृश मन से युक्त (देवम्) विद्वान् (त्वा) आप को अग्नि के सदृश (अमनमहि) विशेष करके जानें ॥३॥ भावार्थ:----मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही विद्वानों के संग से पदार्थ- विद्या का खोज करें ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अग्ने चिकिद्धय १'स्य ने इदं वचः सहस्य । तं त्या मुशिन दम्पते स्तोमर्धन्त्पत्रयो गीमिः शुम्भन्त्यत्रयः ॥४॥ पदार्थः-हे (सहस्य) बल' में श्रेष्ठ (सुशिप्र) सुन्दर ठुड्डी और नासिका वाले (बम्पते) स्त्री और पुरुष (अग्ने) विद्वन् आप जैसे (प्रत्रयः) तीन प्रकार के agtan AON ROIN ww anita ७४ ऋग्वेदः मं० ५ । सू०.२३ ॥ - दुःखां से रहित जन (स्तोमैः) प्रशंसित व्यवहारों से' (वर्धन्ति) वृद्धि को प्राप्त होते हैं और जैसे (अत्रय) काम, क्रोध, और लोभ इन तीन दोषों से रहित जन (गीभिः) वाणियों से (शुम्भन्ति) पवित्र करते हैं वैसे (नः) हम लोगों के (इबम्) इस (वचः) वचन को और (अस्य) इसके वचन को (चिकिद्धि) जानिये (तम्) उन (त्वा) आप का हम लोग सत्कार करें ॥४॥ भावार्थः--- जैसे पुरुषार्थी मनुष्य सब की वृद्धि करते हैं और उपदेशक जन सब जनों को पवित्र करते हैं वैसे ही सब मनुष्य आचरण करें ॥४॥ इस सुक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में बाईसवां सूक्त समाप्त हुआ। REarriagmSETTISMATHI SH traa अथ चतुऋचस्य त्रयोविंशतितमस्य सूक्तस्य घुम्नो विश्वचर्षणिऋषिः। अग्निदेवता। १।२ निवनुष्टुप्छन्दः । ३ विराडनुष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ४ निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः।। अब चार ऋचावाले तेईसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्य वीर के गुणों का उपदेश करते हैं । अग्ने सहन्तमा भर द्युम्नस्य प्रासहा रयिम् । विश्वा यश्चर्षणीरभ्याई'सा वाजेषु सासहत् ॥१॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) वीरपुरुष (यः) जो (विश्वाः) सम्पूर्ण (प्रासहा) अत्यन्त शत्रुओं के बलों को सहने वाली (चर्षणी:) पराक्रम से प्रकाशमान मनुष्यों की सेनाओं को (वाजेषु) संग्रामों में (सासहव) अत्यन्त सहे और (प्रासा) से (अभि) सब प्रकार से उपदेश देवे उस शत्रुओं के बल को (सहन्तम् ) सहते हुए (धम्नस्य) धन वा यश के सम्बन्ध में (रयिम्) धन को आप (श्रा, भर) सब प्रकार धारण करो॥१॥ भावार्थः - जिस की विजय की इच्छा होवे वह शूरवीरों की सेना उत्तम प्रकार शिक्षा की गई रक्खे और वीररस के उपदेश से उत्साह दिला कर शत्रुओं के साथ लड़ावे ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ५। सू० २३ ।। MAR IMG M 04 तमग्ने पृतनाषद रयिं सहस्व आ भर । त्वं हि सत्यो अद्भुतो दाता वाजस्य गोमतः ।।२।। पदार्थः--हे (सहस्वः) बहुत बल से युक्त (अग्ने) राजन् जो (हि) निश्चय से (सत्यः) श्रेष्ठों में श्रोष्ठ (अमृतः) आश्चर्ययुक्त गुण, कर्म और स्वभाववाला जन (गोमतः) बहुत धेनु और पृथिव्यादिकों से युक्त (वाजस्य) सुख और धन आदि का (दाता) देने वाला होवे (तम्) उस (पृतनावहम्) सेना सहने वाले को और (रयिम्) धन को (त्वम्) आप (श्रा, भर) सब ओर से धारण कीजिये ।।२।। भावार्थः जो राजा सत्यवादी विद्वानों और विचित्र विद्यायुक्त, दृढ़ और उदार अर्थात् उत्तम आशययुक्त शूरवीरों का धारण पोषण करे वही विजय और लक्ष्मी को प्राप्त होवे ॥२॥ फिर वीर गुणों को कहते हैं। विश्व हि त्वां सजोषसो जनासो वृक्तबहिषः । होतारं सद्मसु प्रियं व्यन्ति वार्यां पुरु ।।३।। पक्षार्थ:-हे राजन् जो (विश्वे) सम्पूर्ण (सजोषस:) तुल्य प्रीति के सेवने धाले (जनासः) प्रसिद्ध उत्तम आचरणों से युक्त वृक्तबहिषः) अग्निहोत्र करने धाले और यज्ञ करने वाले के सदृश सम्पूर्ण विद्याओं में कुशल जन (हि) ही (सद्मसु) राजगृहों अर्थात् राजदरबारों में (होतारम् ) दाता और (प्रियम्) सुन्दर (स्वा) श्राप का आश्रय करते हैं वे (पुरु) बहुत (वार्य्या) स्वीकार करने योग्य धन आदिकों को (भ्यन्ति) प्राप्त होते हैं ॥३॥ भावार्थ:--- इस मन्त्र में वाचकलु० - हे राजन् ! जो राज्य की उन्नति में श्रीति करने वाले और धम्मिष्ठ भत्य आप को प्राप्त होवें उन सबका सत्कार करके निरंतर रक्षा करो ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स हि मां विश्वचर्षणिरमिमांति सही दधे । अग्न एषु क्षयेष्या रेवनी शुक्र दीदिहि धमत्पादक दीदिहिं ॥४॥ पदार्थ:-हे (शुक्र) सामर्थ्ययुक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान जो विश्वचर्षणि) संपूर्ण विद्याओं का प्रकाश (एषु) इन (क्षयेषु) निवासस्थानों में (अभिमातिः) अभिमान जिस से हो उस (सहः) बल' को (दधे) धारण करता cha ७६ ऋग्वेदः मं० ५। सू०२४।। (सः, हि) वही (स्मा) निश्चय से जीतने वाला होता है इस से आप (नः) हम लोगों के लिये (रेवत्) प्रशस्त धन से युक्त पदार्थ को (दीदिहि) दीजिये और हे (पावक) पवित्र, पवित्राचरण से हम लोगों के लिये (धुमत्) प्रकाशयुक्त का (मा, दीदिहि) प्रकाश कीजिये ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को धारण करते वे सब के लिये सुख दे सकते हैं ॥४॥ इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में तेईसवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ चतुऋचस्य चतुर्विशतितमस्य सूक्तस्य बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्वि- प्रबन्धुश्च गोपायना लौपायना वा ऋषयः । अग्निदेवता । १ । २ पूर्वाद्धस्य साम्नी बृहत्युत्तराद्धस्य भुरिग्बृहती । ३। ४ पूर्वार्द्धस्योत्तरार्द्धस्य भुरिग्बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः॥ अब चार ऋचा वाले चौबीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्या राजविषय को कहते हैं ।। अग्ने त्वं नो अन्तम उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः ॥१॥ वसुरनिर्वसुश्रवा अच्छा नक्षि धुमत्तम रयिं दाः ॥३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) राजन् (स्वम्) आप (नः) हम लोगों के हम लोगों को वा हम लोगों के लिये (अन्तमः) समीप में वर्तमान (शिवः) मंगलकारी (वरूथ्यः) उत्तम गृहों में उत्पन्न (वसुः) वसाने वाले (वसुश्रवाः) धन और धान्य से युक्त (अग्नि) अग्नि के सदृश मंगलकारी (उत) और (प्राता) रक्षक (भवा) हूजिये और जिस (ध मत्तमम्) अत्यन्त प्रकाशयुक्त (रयिम्) धन को आप (अच्छा) उत्तम प्रकार (नक्षि) व्याप्त हूजिये और उसको हम लोगों के लिये (वा:) दीजिये ॥१॥२॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जैसे परमात्मा सब में अभिव्याप्त सबका रक्षक और सब के लिये मंगलदाता, सब पदार्थों का दाता और सुखकारी है वैसे ही राजा को होना चाहिये ।।१॥२॥ अब अग्निपदवाच्यविद्वान् के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २५॥ स नो बोधि श्रुधी हव॑मुरुष्या णो अघायतः समस्मात् ॥३॥ तं त्वां शोचिष्ठ दीदिवा सुम्माय नूनमीमहे सखिभ्यः ॥४॥ पदार्थः-हे (शोचिष्ट) अत्यन्त शुद्ध करने और (दीदिवः) सत्य के जनाने वाले अग्नि के सदृश तेजस्विजन (सः) वह आप (नः) हम लोगों को (बोधि) बोध दीजिये और (नः) हम लोगों के हवम् ) पढ़े हुए विषय को (अधी) सुनिये (सम- स्माव) सब (अघायत:) आत्मा से पाप के आचरण करते हुए से हम लोगों की (उरुष्या) रक्षा कीजिये (तम्) उन (त्या) आप को (सखिभ्यः) मित्रों से (सुम्नाय) सुख के लिये हम लोग (नूनम्) निश्चित (ईमहे याचना करते हैं ॥३॥४॥ भावार्थः- सब प्रजा और राजजनों को चाहिये कि राजा के प्रति यह कहें कि आप सब अपराधों से स्वयं पृथक् होके और हम लोगों की रक्षा करके विद्या का प्रचार और धार्मिक मित्रों के लिये सुख की वृद्धि करके दुष्टों को निरन्तर दण्ड दीजिये ॥३॥४॥ इस सूक्त में अग्निपदवाच्य ईश्वर अर्थात् राजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में चौबीसवां सूक्त समाप्त हुप्रा । अथ नवर्चस्य पञ्चविंशतितमस्य सूक्तस्य वसूयव प्रात्रेया ऋषय: । अग्नि- देवता। ११८ निचूदनुष्टुप् । २ ॥ ५॥ ६ ॥ ६ अनुष्टुप् । ३ । ७ विराउनुष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ४ भुरिगुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः ।। अब नव ऋचा बाले पच्चीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि विषय को कहते हैं । अच्छा दो अग्निमवसे देवं गासि स नो वसुः। रासत्पुत्र ऋषूणामृतावो पर्षति द्विषः ॥१॥ पदार्थ:--हे विद्वन् आप जिस (देवम्) प्रकाशमान (अग्निम्) अग्निकी (व:) आप लोगों के (अवसे) रक्षण आदि के लिये (अच्छा) उत्तम प्रकार (गासि) प्रशंसा करते हो (सः) वह (वसुः) द्रव्यदाता (ऋषूणाम्) वेदमन्त्रार्थ जानने वालों के (ऋतावा) सत्य का विभाग करने वाला (पुत्रः) सन्तानरूप (द्विषः) शत्रुओं के niane MAR Ram Santan ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २५ ॥ (पर्षति) पार जाता है अर्थात् उनको जीतता है वैसे ही (न:) हम लोगों के लिये (रासत्) देता है अर्थात् विजय दिलाता है ॥१॥ भावार्थ:-जैसे विद्वानों का श्रेष्ठ पुत्र विद्वान् होकर तथा लोभ आदि दोषों का त्याग करके पितृ आदिकों को सुख देता है वैसे ही अग्नि उत्तम प्रकार सिद्ध किया गया सब को सुख देता है ॥१॥ अब अग्निदृष्टान्त से राज विषय को कहते हैं । स हि सत्यो यं पूर्व चिदेवासश्चिधमीधिरे । होतारं मन्द्रजिह्वमित्सुदीतिभिर्विभावसुम् ।।२।। पदार्थः- पूर्वे) प्राचीन (देवासः) विद्वान् जन (यम्) जिस होतारम्) देने वाले (मन्द्रजिह्वम्) प्रशंसनीय जिह्वा से युक्त (सुदीतिभिः) उत्तम प्रकाशों के सहित वर्तमान को (चित्) और (विभावसम्) प्रकाशित धन से युक्त अग्नि के सदृश वर्तमान (यम्) जिस राजा को (चित) निश्चय से (इद) ही (ईघिरे) प्रका- शित करते हैं (सः, हि) बही (सत्यः) सज्जनों में श्रेष्ठ पुरुष राज्य करने को योग्य है ॥२॥ भावार्थ:-जिस राजा का यथार्थवक्ता जन सत्कार करें वही निरन्तर राज्य की रक्षा और वृद्धि करने को योग्य हो ।।२।। अब अग्निसादृश्य से विद्वद्विषय को कहते हैं। स नो धीती वरिष्ठया श्रेठया च सुमत्या । अग्ने रायो दिदीहि नः मुक्तिभिर्वरेण्य ॥३॥ पदार्थः-हे (वरेण्य) स्वीकार करने योग्य (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान (सः) वह पाप (धीती) धारणावाली (वरिष्ठया) अत्यन्त स्वीकार करने योग्य (श्रेष्ठया) अति उत्तम (सुमत्या) सुन्दर बुद्धि से (नः) हम लोगों के लिये (रायः) धनों को (दिदीहि) दीजिये (सूक्तिभिः) उत्तम वर्जनवाली क्रियाओं से (च) भी (नः) हम लोगों की निरन्तर वृद्धि कीजिये ॥३॥ भावार्थ:- जो उत्तम बुद्धि की इच्छा करते वा उत्तम बुद्धि को अन्य जनों के लिये देते हैं वे ही सब लोगों से सत्कार करने योग्य हैं ।।३।। फिर उसी विषय को कहते हैं अग्निर्देवेषु राजत्यग्निर्मत्तैष्चाविशन् । अग्नि हव्यवाहनोऽग्नि धीभिः सपर्यत ॥४॥ AN ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २५ ॥ ALS पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्तमान तेजस्वी विद्वान् (देवेषु) विद्वानों वा पृथिवी आदिकों में और जो (अग्निः) विजुलीरूप अग्नि (मर्तेषु) मरणधर्म वाले मनुष्य आदिकों में और जो (हव्यवाहनः) हवन करने योग्य पदार्थों को धारण करने वाला (अग्निः) सूर्यादिरूप अग्नि (नः) हम लोगों में (प्राविशन्) प्रविष्ट हुआ (राजति) प्रकाशित होता है उस (अग्निम्) अग्नि को (धीभिः) बुद्धियों से आप लोग (सपर्यंत) सेवो अर्थात् कार्य में लाओ ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जो अनेक प्रकार का अग्नि आप लोगों से जाना जाय अर्थात् अनेक प्रकार के अग्नि का आप लोगों को परिज्ञान हो तो क्या क्या सुख न पाया जाय ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। अग्निस्तुविश्रवस्तमं तुविब्रह्माणमुत्तमम् । अतूर्ते श्रावयत्पतिं पुत्रं ददाति दाशुषे ।।५।। पदार्थः----जो (अग्निः) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वान् (दाशुषे) दानशील जन के लिये (तुविश्रवस्तमम्) अत्यन्त बहुत अन्न और श्रवण से युक्त और (तुवि- ब्रह्माणम्। चार वेद के जानने वाले बहुत विद्वानों से युक्त (उत्तमम्) अत्यन्त श्रेष्ठ (अतूर्तम्) नहीं हिसित और (श्रावयत्पतिम्) सुनाते हुए पालन करने वाले से युक्त (पुत्रम्) सन्तान को (ददाति) देता है वही अत्यन्त आदर करने योग्य होता है ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! उन लोगों का ही आप लोग सत्कार करो जो सब को विद्वान् और धार्मिक करते हैं ।।५।। फिर उसी विषय को कहते हैं । अग्निर्ददाति सत्पति सासाह यो युवा नृभिः। अग्निरत्यै रघुष्यदं जेतारमपराजितम् ॥६॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो वह (अग्निः) परमेश्वर वा विद्वान् (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालन करने वाले को (ददाति) देता है (यः) जो (अग्निः) अग्नि (युधा) युद्ध करती हुई सेना और (नृभिः) नायक अर्थात् अग्रणी मनुष्यों से (रघुष्यदम्) सधुगमनवान् (जेतारम्) जीतने और (अपराजितम्) नहीं हारने वाले राजा को (अत्यम्) मार्ग को व्याप्त होते घोड़े को जैसे वैसे (सासाह) सहता है ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर धर्मिष्ठ जनों के लिये धर्मात्मा राजा को देता है और जैसे उत्तम सेना विद्वान् शूरवीर और धर्मात्मा hija w ऋग्वेदः मं० ५। सू० २५।। - सेनाध्यक्ष को प्राप्त हो कर शत्रुओं को जीतती है वैसे ही वह सब लोगों को आदर करने योग्य है ॥६॥ अब अग्निपदवाच्य राजदृष्टान्त से विद्वद्विषय को कहते हैं । यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो । महिषीव त्वयिस्त्वद्वाजा उदीरते ॥७॥ पदार्थः-हे (विभावसो) स्वयं प्रकाशित (यत्) जिस (वाहिष्ठम् ) अतिशय प्राप्त करने वाले का (अग्नये) राजा के लिये (बृहत) बड़ा (अर्च) सत्कार करो (तत्) उस की (महिषीव) बड़ी अर्थात् पटरानी के सदृश सेवा करो और जो (स्वत) आप से (रयिः) धन और त्वत्) आप से (वाजाः) अन्न आदि (उद, ईरते) उत्तमता से उत्पन्न होते हैं उन को हम लोग प्राप्त होवें ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे पतिव्रता रानी अपने पति का निरन्तर सत्कार करती और उससे उत्पन्न हुए अत्यन्त सुख को प्राप्त होती है वैसे ही मनुष्य विद्वानों का आदर करके उनसे उत्पन्न हुई अर्थात् उन के सम्बन्ध से प्रकट हुई बुद्धि को प्राप्त होकर निरन्तर सुखी हों ॥७॥ अब मेघ दृष्टान्त से विद्वद्विषय को कहते हैं । तव द्युमन्तो अर्चयो ग्रावेवोच्यते बृहत् । उतो ते तन्यतुर्यथा खानो अर्त त्मना दिकः ॥८॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (तव) श्राप के (छ मन्तः) बहुत प्रकाश वाली (अर्चयः) किरणें हैं उन से जो (मावेव) मेघ के सदृश (बृहत) बहुत सत्य (उच्यते) जाता (उतो) और (ते) आप का (यथा) जैसे (तन्यतः) विजुली वैसे (स्वान:) शब्द वर्तमान है इस कारण (त्मना) आत्मा से (दिवः) प्रकाशयुक्त पदार्थों को तुम सब (अर्त) प्राप्त होप्रो ।।८।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -जो मेघ के सदृश गम्भीर शब्द से गूढ़ अर्थों के उपदेश देते और विजुली के सदृश पुरुषार्थ करते हैं वे सम्पूर्ण सुखों को प्राप्त होते हैं ॥८॥ फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।। एवाँ अग्निं वसूयवः सहसानं ववन्दिम स नो विश्वा अति द्विषः पर्षनावेव सुक्रतुः ।।९।। ANA

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २६ ॥
६१
पदार्थः-हे विद्वन् (वसूयवः) अपने धन की इच्छा करते हुए हम लोग
(अग्निम्) विजुली के सदृश तेजस्वी विद्वान् और (सहसानम्) सब को सहने वाले
आप की (ववन्दिम) प्रशंसा करें (सः, एवा) वही (सुक्रतः) उत्तम बुद्धि वा उत्तम
कम्मों से युक्त पाप (नावेव) जैसे नौका से समुद्र के वैसे (म:) हम लोगों की
(विश्वा:) सम्पूर्ण (द्विषः) द्वेषयुक्त क्रियाओं के (अति, पर्षत) पार करें ।।६।।
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं :-जैसे बड़ी नौका से समुद्र आदि के
पार सुखपूर्वक जाते हैं वैसे ही विद्वानों के सङ्ग से सब दोषों से साधारणपन
से दूर को प्राप्त होते हैं ॥६॥
इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस' सूक्त के अर्थ की
पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह पञ्चम मण्डल में पच्चीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।।
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प्रय नवर्चस्य षड्विंशतितमस्य सूक्तस्य वसूयक्ष प्रात्रेया ऋषयः । अग्नि-
देवता । १।६। गायत्री । २।३ । ४ । ५. ॥ ६ ॥ ८ निवृद्गायत्री । ७ विराड्-
गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः ।।
अब नव ऋचा वाले छब्बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में
अग्निपदवाच्य विद्वान् के गुणों को कहते हैं ।।
अग्ने पावक रोचिषां मन्द्रयां देव जिह्वा ।
आ देवान् वक्षि यक्षि च ॥१॥
पदार्थः-हे (पावक) पवित्र और शुद्धि करने तथा (देव) विद्या के देने
वाले (अग्ने) विद्वन् जिस से श्राप (रोचिषा) अति प्रीति से युक्त (मन्द्रया) विज्ञान
और आनन्द देने वाली (जिह्वया) वाणी से इस संसार में (देवान्) विद्वानों और
श्रेष्ठ गुणों वा पदार्थों को (श्रा, वक्षि) सब ओर से प्राप्त होते वा प्राप्त कराते हो
तथा (यक्षि) सत्कार करते और मिलते (च) भी हो इस से सत्कार करने योग्य
हो ॥१॥
भावार्थः - जो प्रीति से सत्य उपदेशों को कर और विद्वान् तथा श्रेष्ठ
गुणों को प्राप्त होकर अन्यों को प्राप्त कराते हैं वे ही आदर करने योग्य
होते हैं ॥१॥

६२ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २६ ॥ - अब अग्निगुणों को कहते हैं । तं त्वा घृतस्नवीमहे चित्रभानो स्वदृशम् । देवाँ आ वीतये वह ॥२॥ पदार्थ:-हे (धृतस्नो) घृत को शुद्ध करने वाले (चित्रभानो) अद्भुतप्रकाश- युक्त विद्वान् जैसे घृत को स्वच्छ करने वाला और अद्भुतप्रकाश से युक्त अग्नि (वीयते) प्राप्ति के लिये स्वदृशम्) जो सूर्य से देखे गये उन (स्वा) आप को धारण करता है (तम्) उस को हम लोग (ईमहे) याचते हैं वैसे आप (देवान्) दिव्य गुण का विद्वानों को (श्रा, वह) सब ओर से प्राप्त कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जो बहुत उत्तम गुणयुक्त अग्नि को मनुष्य विशेष कर के जानें तो बहुत सुख को प्राप्त हों॥२॥ फिर अग्नि के सादृश्य से विद्वान् के गुणों को कहते हैं । वीतिहोत्रं त्वा कवे घुमन्तं समिधीमहि । अग्ने बृहन्तमध्वरे ॥३॥ पदार्थः हे (कवे) विद्वन् (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान ! हम लोग (अध्वरे) अहिंसारूप यज्ञ में (वीतिहोत्रम्) व्याप्ति का ग्रहण जिस से उस (धुम न्तम् प्रकाश वाले अग्नि के सदृश जिन (बृहन्तम्) महान् (स्वा) आप को (सम्, इधीमहि) उत्तम प्रकार प्रकाशित करें वह आप हम लोगों को शुद्ध विद्या से प्रकाशित करें ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० --मनुष्यों को चाहिये कि शिल्प- विद्या की सिद्धि के लिये अग्नि का सम्प्रयोग अवश्य करें॥३॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । आग्ने विश्वमिरा गहि देवेभिईयदाये । होतारं त्वा वृणीमहे ॥४॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् जिन (होतारम्) देने वाले (स्वा) आप का हम लोग (वृणीमहे) स्वीकार करते हैं वह आप (हव्यदातये, देने योग्य दान के लिये (विश्वोभिः) सम्पूर्ण (देवेभिः) विद्वानों के साथ (मा, गहि। प्राप्त हुजिये ॥४॥ भावार्थ:- मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों का सत्कार कर उन्हें बुलावें और विद्वान् जन भी विद्वानों के साथ प्राप्त हो कर निरन्तर सत्य का उपदेश करें॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । यजमानाय सुन्वत आग्ने सुवीर्यं वह । देवैरा सत्सि बहिर्षि ॥५॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् अाप (देवैः) विद्वानों के साथ (बहिषि) प्रति ऋग्वेदः म० ५ । सू० २६ ।। उत्तम (ससि) सभा में (सुन्वते) यज्ञ करते हुए (यजमानाय) दाता जन के लिये (सुवीर्यम्) उत्तम पराक्रम को (आ, वह) प्राप्त हूजिये और यज्ञ को (आ) अच्छे प्रकार करिये ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! पालन करने वाले जन के लिये आप लोग सुख सदा ही दीजिये और सब की सभा से सब व्यवहारों का निश्चय कीजिये ॥५॥ PAND R बी Aama फिर अग्निसादृश्य से विद्वद्विषय को कहते हैं । समिधाना सहस्रजिदग्ने धम्माणि पुष्यति । देवानां दूत उक्थ्यः ॥६॥ पदार्थ:--हे (अग्ने) अग्नि के सदृश दुष्टों के जलाने वाले जैसे (समिधानः) निरन्तर प्रकाशित हुन्मा अग्नि (देवानाम्) विद्वानों के (दूतः) समाचार को दूर व्यवहरता वा दूर पहुँचाता और ले आता है वैसे (सहस्रजित) असङख्यों के जीतने वाले (उक्थ्याः) प्रशंसा करने योग्य विद्वानों का निरन्तर प्रकाश करने, समाचार को दूर व्यवहरने वा दूर पहुंचाने और लाने वाले होते हुए जिस से (धर्माणि) धर्म- सम्बन्धी कम्मों को (पुष्यसि) पुष्ट करते हो इस से सत्कार करने योग्य हो ॥६॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु० -- मनुध्य विद्या से अग्नि के को जान के कार्य की सिद्धि के लिये जिस अग्नि का सम्प्रयोग करते हैं वह अग्नि मनुष्य के तुल्य कार्य की सिद्धि को करता है ॥६॥ अब अग्निधारणाविषय को कहते हैं। न्य' निं जातवेदसं होत्रवाई यविष्ठयम् । दाता देवमृत्विजम् ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो पाप लोग (यविष्ठयम्) अतिशयित युवा जनों में प्रसिद्ध हुए (ऋस्विजम्) यज्ञसाधक और (देवम्) दिव्यवाले के सदृश (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (होत्रवाहम्) हवन की हुई वस्तुओं को धारण करने वाले (अग्निम् ) अग्नि को (नि, दधाता) निरन्तर धारण करो ॥७॥ भावार्थ:- जैसे शिल्पविद्या के जानने वाले जन अपने कार्य को सिद्ध करते हैं वैसे ही अग्नि आदि भी कार्य की सिद्धि करते हैं ॥७॥ फिर वितद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । म यज्ञ एत्वानुषगद्या देवव्यचस्तमः । स्तृणीत बहिरासदें ॥८॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जो (देवव्यचस्तमः) उत्तम पदार्थों में अतिशय करके ! JABAR AWAR - aati Hima ऋग्वेदः मं० ५ । मू०२७ ।। Joinde CONTRO व्याप्त (यज्ञः) सत्य और संगत व्यवहार (प्रधा) आज (भासदे) सब प्रकार से ठहरने वा जाने के अर्थ (बहिः) अन्तरिक्ष को (नुषक) अनुकूलता से (एतु) प्राप्त हो उस को आप लोग (ध स्तृणीत) अच्छे प्रकार आच्छादित करो अर्थात् सुरक्षित रक्खो ॥८॥ भावार्थ:-जो मनुष्य श्रेष्ठों की सङ्गति कर के शिल्प विद्या की उन्नति करते हैं वे सब के हितैषी होते हैं ।।८।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। एदं मरुतो अश्विना मित्रः सीदन्तु वरुणः । देवासः सर्वया विशा ॥९॥ पदार्थ:---(मरुतः) मनुष्य (मित्र:) मित्र (वरुणः) सब में उत्तम अश्विना) अध्यापक और उपदेशक तथा (देवासः) विद्वान् जन (सर्वथा) सम्पूर्ण (विशा) प्रजा से (इदम्) इस प्रासन पर (मा,सीवन्तु) विराजें ॥६॥ भावार्थ:-राजा और श्रेष्ठ जन न्यायासन पर विराज के अन्याय और पक्षपात का त्याग और न्याय कर के प्रजाओं के प्रिय होवें ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुरण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ के साथ सङ गति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में छब्बीसवां सूक्त समाप्त हुआ। Roma अथ षड्चस्य सप्तविंशतितमस्थ सूक्तस्थ व्यरुणस्त्रैवष्णस्त्रसदस्युश्व पौरु- कुत्स्य अश्वमेधस्य भारतोत्रि ऋषयः । १-५ अग्नि: । ६ इन्द्राग्नी देवते । १।३ निवृत्रिष्टप् । २ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्थरः । ४ निचूदनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । ५। ६ भुरिगुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः । अब छः ऋचा वाले सत्ताईसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मात्र में अग्निसादृश्य से विद्वान् के गुणों को कहते हैं । अनखन्ता सत्पतिर्मामहे मे गावा चेतिष्ठो असुंरो मघोना । वृष्णो अग्ने दशमिः सहस्रवैश्वानर व्यरुणश्चिकेत ||१|| पदार्थः हे (वैश्वानर) सब में प्रकाशमान (प्रग्ने) अग्नि के (सत्पतिः) श्रीष्ठ जनों के पालने वाले (बशभिः) दश (सहस्र:) सहस्रों के साथ तीन गुणों वाले पुरुष के लिये प्राप (शम्म) गृह वा सुख को (यच्छ : दीजिये ।।२।। ऋग्वेदः मं० ५। सू० २७ ।। (अनस्वन्ता, उत्तम शकट आदि वाहनों से युक्त (गावा) गौ अर्थात् वाणी के साथ (चेतिष्ठः) अत्यन्तता से बोध देने वाले (असुरः) प्राणों में रमते हुए (वृष्णः) जो तीनों में वर्षते वही (व्यरुणः) तीन गुणों से युक्त हुए आप (मे) मेरे (मघोनः) अत्यन्त धनयुक्त पुरुषों को (चिकेत) जानें उन का मैं (माम है) सत्कार करू ॥१॥ भावार्थ:- जो पुरुष शकट आदि वाहनों के चलाने में चतुर और अनेक सहस्रों पुरुषों के साथ मेल करते हैं वे धन धान्य और पशुओं से युक्त होते हैं ।।१। फिर विद्वान् के गुणों को कहते हैं ।। यो में शता च विंशतिं च गोनां हरी च युक्ता सुधुरा ददाति । वैश्वानर सृष्टतो वावधानोऽग्ने यच्छ व्यरुणाय शर्म ॥२॥ पदार्थः - हे (वैश्वानर) सब में प्रकाशमान (अग्ने) विद्वन (यः) जो (सुष्टुतः) उत्तम प्रकार प्रशंसा किया गया (वावृधानः) अत्यन्त बढ़ता अर्थात् वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (मे) मेरे (गोनाम्) गौत्रों के (शता) सैकड़ों (च) और (विशतिम्) वीशों संख्या वाले समूह को (च) और (युक्ता) युक्त (सुधुरा) उत्तम धुरा जिन में उन (हरी, ले चलने वाले घोड़ों को (च) भी (ददाति) देता है उस (व्यरुणाय) मा - GAIN भावार्थः -- हे मनुष्यो ! जो गौ घोड़ा और हस्ति आदि पशुओं के पालन करने वाले होवें उन के लिये यथायोग्य मासिक दीजिये ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । एवा ते अग्ने सुमतिं चकानो नविष्ठाय नवमं त्रसदस्युः । यो मे गिरस्तुविजातस्य पूर्वीयुक्तेनाभि व्यरुणो गृणाति ॥३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वन् (य:) जो (ते) आप की (सुमतिम्) सुन्दर बुद्धि को और (तुविजातस्य) बहुतों में प्रकट हुए (मे) मेरी (गिरः) वारिणयों की (चकानः) कामना करता तथा (नविष्ठाय) अतिशय नवीन जन के लिये (नवमम् ) नव के पूर्ण करने वाले की कामना करता हुआ (सदस्युः) त्रसदस्यु अर्थात् जिस से चोर डरते ऐसा (युक्तेन, क्रिया योगाभ्यास जिस से ऐसे मन से (त्र्यरुणः) तीन मन शरीर और आत्मा के सुखों को प्राप्त होता हुआ जन (पूर्वो:) अनादि काल से सिद्ध वाणियों को (अभि, गृणाति) सब ओर से कहता है (एवा) उसी का आप और हम निरन्तर सत्कार करें ॥३॥ ।

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ऋग्वेदः मं०५। सू० २७॥
भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप और मैं जो हमारे समीप से गुणों के
ग्रहण करने की इच्छा करता है उस को हम दोनों विद्याग्रहण करावें ॥३॥
अब उपदेश विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
यो म इति प्रवोचत्यश्वमेधाय सुरयै ।
दर्ददृचा सनिं यते ददन्मेधामृतायते ॥४॥
पदार्थ:--(यः) जो (अश्वमेधाय) शीघ्र पवित्र (सूरये) विद्वान् (मे) मेरे
लिये (ऋचा) ऋग्वेदादि से (सनिम्) सेवन करने योग्य तथा सत्य और असत्य की
विभाग करने वाली बाणी को (दवत्) देवे और (ऋतायते) सत्य की कामना करते
हुए (यते) यत्न करने वाले मेरे लिये (मेधाम्) बुद्धि को (ववत्) देवे उस का
सत्कार आप करो (इति) इस प्रकार से मेरे प्रति जो (प्रवोचति) उपदेश देता है
उसका उपकार मैं मानता हूं ॥४॥
भावार्थ:--उपदेशक जन जब अन्य जनों के प्रति उपदेश देवें तब
इस प्रकार, वेद और शास्त्रों में कहे और यथार्थवक्ताओं से आचरण किये
गये इस विषय का हम आप लोगों के लिये उपदेश देखें इस प्रकार
प्रत्युपदेश कहें ॥४॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
धस्य मा परुषाः शतमदर्पयन्त्युक्षणः ।
अश्वमेघस्य दाना सोमा इव योशिरः॥५॥
पदार्थ:--(यस्य) जिस (अश्वमेधस्य) चक्रवत्ति राज्यपालन की विद्या की
(शतम्) असङ्ख्या (परुषाः) कठोर (उक्षणः) मधुर उपदेशों से सोचती और
(सोमाइव) सोमलतादिकों के सदृश (दानाः) देती हुई (व्याक्षिरः) जीव अग्नि और
पवनों से भोगी गई (मा) मुझको (उद्धर्षयन्ति) उत्साहित करती हैं वे बारिणयां
मुझ से सहने योग्य हैं ।।।
भावार्थ:-जो विद्या की इच्छा करें वे सबकी मर्म भेदने वाली
वाणियों को सहें और चन्द्रमा के सदृश शान्त होके विद्या और विनय को
ग्रहण करें॥५॥
अब उपदेश विषय में राज्योपदेश विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।।
इन्द्राग्नी शतदात्यश्वमेधे सुवीर्यम् ।
खुत्रं धारयतं बृहदिवि सूर्यमिवाजरम् ॥६॥

ऋग्वेदः मं०५ । सू० २८ ॥ ८७ पदार्थ:-हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के सदृश अध्यापक और उपदेशक जनो (शतवाग्नि) असङ्ख्य पदार्यों को देने वाले (अश्वमेधे) राज्य पालन व्यवहार और (दिवि) प्रकाशयुक्त अन्तरिक्ष में (सूर्यमिय) सूर्य के सदृश (सुवीर्यम्) उत्तम पराक्रम तथा बलयुक्त और (प्रजरम्) नाश से रहित (बृहत) बड़े (क्षत्रम्) क्षत्रियों के कुल' वा राज्यदेश को (धारयतम्) धारण करो अर्थात् यथायोग्य उपदेश दीजिये ॥६॥ भावार्थ:-हे राजा आदि जनो ! प्रयत्न से आप लोग यथार्थवक्ता बहुत अध्यापक और उपदेशकों का अपने और दूसरे के राज्य में प्रचार कराइये जिस से आप लोगों का राज्य नाशरहित होवें ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में सत्ताईसवां सूक्त समाप्त हुा ।। M Note CLICE ON अथ षडचस्याष्टविंशतितमस्य सूक्तस्य विश्ववारात्रेयी ऋषिः । अग्निर्देवता १ त्रिष्टुप् । २। ४। ५ । ६ विराट् त्रिष्टुप् । ३ निचत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः॥ अब छः ऋचा वाले अट्ठाईसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के गुणों को कहते हैं । समिद्धो अग्निदिवि शोचिरश्रेत्मत्यथैषसमुर्विया वि भाति । पति प्राची विश्ववारा नमोभिर्देवाँ ईळांना हविषा घृताची ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (समिद्धः) प्रज्वलित किया गया (अग्निः) अग्नि (दिवि) प्रकाश में (शोचिः) बिजुलीरूप प्रकाश का (अश्रत) आश्रय करता है और (अविया) अनेक रूप वाले प्रकाश से' (उषसम्) प्रभातकाल के (प्रत्यङ्) प्रति चलने वाला (वि, भाति) विशेष करके शोभित होता है और (विश्ववारा, संसार को प्रकट करने वाली (देवान्) श्रेष्ठ गुणों को (ईळाना) प्रशंसित करती हुई (घृताची) रात्रि और (प्राची) पूर्व दिशा (हविषा) दान और (नमोभिः) अन्नादि पदार्थों के साथ (एति) प्राप्त होती है उस अग्नि को और उस विश्ववारा को आप लोग विशेष करके जानो ॥शा भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो यह सूर्य देख पड़ता है वह अनेक तत्त्वों के द्वारा ईश्वर से बनाया गया और बिजुली के प्राश्रित है और जिस के उक्त (अग्ने) विद्वन् (तव) आप के ऋग्वेदः मं० ५। सू० २८ ।। प्रभाव से पूर्व प्रादि दिशायें विभक्त की जाती हैं और रात्रियां होती हैं उस अग्निरूप सूर्य को जान के संपूर्ण कृत्य सिद्ध करो ॥१॥ अब विद्वद्विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । समिध्यमानो अमृतस्य राजसि हविष्कृण्वन्त सचसे स्वस्तये । विश्व स धत्ते द्रविणं यमिन्वस्यातिथ्यममे नि च चत्त इत्पुरः ॥२॥ पदार्थः-हे (अग्ने) विद्वन् जिससे (समिध्यमानः) उत्तम प्रकार निरन्तर प्रकाशमान आप (अमृतस्य) कारण वा जल के मध्य में (राजसि) प्रकाशित होते हो और (स्वस्तये) सुख के लिये (हविः) खाने योग्य वस्तु को (कृण्वन्तम्) करते हुए का (सबसे) सम्बन्ध करते हो और आप (विश्वम्) सम्पूर्ण (प्रविणम्) धन वा यश का (धते) धारण करते हो तथा (यम्) जिन' को (आतिथ्यम्) अतिथि सत्कार (इन्वसि) व्याप्त होता है और (पुरः) पहिले (च) भी आप (नि, धत्ते) निरन्तर धारण करते हो इस से (सः, इत) वही आप सत्कार करने योग्य हो ॥२॥ भावार्थ:-है विद्वान् जनो ! आप लोग विद्या और विनय से प्रकाशमान अतिथियों की दशा को धारण किये हुए सब स्थानों में भ्रमण करकै संपूर्ण जनों के लिये सत्य का उपदेश देते हुए यश को निरन्तर फिर उसी विषय को कहते हैं । अग्ने शर्धं महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु । कृणुष्ट शत्रयतामभि तिष्ठा महाँसि ॥३॥ (महते) बड़े (सौभगाय) सुन्दर ऐश्वर्य के लिये (उत्तमानि) श्रेष्ठ (घुम्नानि, यश वा धन (सन्तु) हों और तुम (सययम्) सुन्दर सत्य आचरणों का ग्रहण जिसमें ऐसे (जास्पत्यम्) स्त्री के पतिपने को (मा, कृणुष्व) अच्छे प्रकार करिये और (शत्रूयताम) शत्रु के सदृश प्राचरण करते हुओं की (महांसि) बड़ी सेनाओं के (सम्, अभि, तिष्ठा) सन्मुख स्थित हूजिये ।।३।। भावार्थ:--हे धम्मिष्ठो! हम लोग आप के लिये बड़े ऐश्वर्य की इच्छा करें और आप दोनों स्त्री और पुरुष जितेन्द्रिय धर्मात्मा बलवान् और पुरुषार्थी होकर सम्पूर्ण दुष्टों की सेना को जीतिये ॥३॥ पसारिये ॥२॥ जास्पत्यं सुयममा

ऋग्वेदः मं० ५। सू०२८॥
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अब विद्वद्विषय में राज्य प्रकार को अगले मन्त्र में कहते हैं।
समिद्धस्य प्रमहसोऽग्ने वन्दे तव श्रियम् ।
वृषभो झुम्नवाँ असि समंध्वरेष्विध्यसे ॥४॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) राजन् जो तुम (
(वृषभः) बलिष्ठ वा उत्तम और
(ध नवान्) यशस्वी (असि) हो और (अध्वरेष) राज्य के पालन श्रादि व्यवहारों
में (सम्, इध्यसे) प्रकाशित किये जाते हो उन (समिद्धस्य) प्रकाशमान और
(प्रमहस:) प्रकृष्ट बड़े (तव) आप के (श्रियम्) धन की मैं (वन्दे) प्रशंसा वा
सत्कार करता हूँ ॥४॥
भावार्थ:-जो राजा अग्नि आदि के गुणों से युक्त हुआ अच्छे न्याय
को यथावत् करता है वह यज्ञों में अग्नि के सदृश सर्वत्र प्रकट यश वाला
होता है ॥४॥
फिर अग्नि दृष्टान्त से पूर्वोक्त विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं ।
समिद्धो अग्न आहुत देवान्यक्षि स्वध्वर । त्वं हि हव्यव नर्सि ॥५॥
पदार्थः-हे (स्वध्वर) उत्तम प्रकार अहिंसा से युक्त (आहुत) सत्कृत
(अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान जिस प्रकार से (समिद्धः) प्रज्वलित किया गया
(हि) जिस कारण (हव्यवाद) पृथिव्यादिकों की प्राप्ति करने वाला अग्नि है वैसे
(स्वम्) आप (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों का (यक्षि) सत्कार करते हो और
पालन करने वाले (असि) हो इस से श्रीष्ठ हो ॥१॥
भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे सूर्य आदि रूप से अग्नि
सब की रक्षा करता है वैसा ही राजा होता है ।।५।।
फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं
आ जुहोता दुवश्यताग्नि प्रयत्यध्वरे । गीध्वं हव्यवाहनम् ॥६॥
पदार्थः है विद्वानो आप लोग (प्रयति) प्रयत्न से साध्या (अध्वरे)
शिल्यादि व्यवहार में (हब्धवाहनम्) उत्तम पदार्थों को प्राप्त कराने वाले (अग्निम्)
अग्नि का (दुवस्थत) परिचरण करो अर्थात् युक्ति से उसको कार्य में लगानो और
(वृणीध्वम्) स्वीकार करो तथा अन्य जनों के लिये (प्रा, जुहोता) आदान करो
अर्थात् ग्रहण
करो ॥६॥
भावार्थ:-विद्यार्थिजन जैसे विद्वान् जन शिल्पविद्या का स्वीकार
करते हैं वैसे स्वयं भी स्वीकार करें ॥६॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० २६ ।। इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पञ्चम मण्डल में अट्ठाईसवां सूक्त समाप्त हुप्रा॥ । .. - A जो (मनुषः) अथ पञ्चदशर्चस्यैकोनत्रिशतमस्य सूक्तस्य १-१५ गौरिवीतिः शाक्तय ऋषिः । १-८-१५ । इन्द्रः । ६ : इन्द्र उशना वा देवता । १ भुरिक पङ्क्तिः । ८ स्वराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २।४ १७ त्रिष्टुप् । ३।५। ६ । । । १० । ११ निवृत्रिष्टुप् । १२ । १३ । १४ । १५ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धवतः स्वरः।। अब पन्द्रह ऋचा वाले उनतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मनत्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों को कहते हैं ।। व्यर्यमा मनुषो देवतांता श्री रॊचना दिव्या धारयन्त । अर्चन्ति त्वा मरुतः पूतदक्षास्त्वमेष मृषिरिन्द्रासि धीरः ।।१।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त करने वाले राजन मनुष्य (देवताता) विद्वानों से करने योग्य व्यवहार में (दिव्या) श्रेष्ठ (त्री) तीन (रोचना) प्रकाशकों को (धारयन्त) धारण करते हैं (अर्थमा) ब्यवस्थापक अर्थात् किसी कार्य को रीति से संयुक्त करने वाला (त्री) तीन सुखों को धारण करता है और जो (पूतदक्षाः) पवित्र बल वाले (मरुतः) मनुष्य (स्वा) भाप का (अञ्चन्ति) सत्कार करते हैं (एषाम्) इनके (स्थम्) आप (ऋषिः) मन्त्र और प्रों के जानने (असि) हो ॥१॥ भावार्थः -- जो तीन कर्म, उपासना और ज्ञान को धारण करके पवित्र होते हैं वे ही बलवान् होकर सत्कृत होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । স্বল্প यदी मरुतो मन्दसानमार्च निन्द्रं पपियांस सुतस्य । श्रादत्त वज्रमभि यदहिं हन्नपो यह्वीरसृजत्सर्तवा उ ॥२॥ पदार्थ:-हे राजन् (यत्) जो (मरुतः) मनुष्य (मन्दसानम्) स्तुति किये गए (सुतस्य) प्राप्त राज्य की (पपिवांसम्) रक्षा करने वाले (यत) जिन (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त आप का (प्रार्चन्) सत्कार करें उनका वह आप अनु, मा, अदत्त) अनुकूलता से ग्रहण करते हैं और जैसे सूर्य (वचम्) वरूप किरण का वाले (धीरः) धौर ( ऋग्वेदः मं० ५। सू० २६ ॥ ६१ RAM - 2ite AND .ORG (अभि) सम्मुख ताड़न करके (अहिम्) मेघ का (हन्) नाश करता है तथा (सर्त्तवे) जाने के लिये (यह्वीः) बड़ी नदियों को और (अप:) जलों को (असृजत) उत्पन्न करता है वैसे (ईम्) सब ओर से (उ) तर्कवितर्कपूर्वक तुम न्याय करो ॥२॥ भावार्थ:- जो मनुष्य राजा का सत्कार करते हैं उनका राजा भी सत्कार करे और जैसे सूर्य मेघ का नाश कर और जल का प्रवाह कर के सर्व जगत् की रक्षा करता है वैसे राजा दुष्टों का नाश करके श्रेष्ठों की रक्षा करे ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उत ब्रह्माणो मरुतो मे अस्येन्द्रः सोमस्य सुतस्य पेया। तद्धि हव्यं मनुषे गा अविन्ददहनहि पपियाँ इन्द्रो अस्य ।।३।। पदार्थ:-जिस प्रकार (इन्द्रः) सूर्य रस को पीता है वैसे हे राजन् प्रकाशमान प्राप (मे) मेरे (अस्य) और इस के भी (तव, हि) उसी सुषतस्य) अच्छे प्रकार श्रेष्ठ बनाये (सोमस्य) ऐश्वर्यकारक पदार्थ के (हव्यम्) खाने योग्य भाग को (पेयाः) पीजिये जिस से (मनुषे) मनुष्यमात्र के लिये आप (गा:) गौ वा उत्तम वाणियों को (अविन्दत) प्राप्त हों और जैसे (पपिवान्) भूमिस्थजलादि को पान करने वाला सूर्य (अहिम्) मेघ का (महन्) नाश करता है वैसे आप (मस्य) इस राज्य के पालन को करिये (उत) इसी प्रकार हे (ब्रह्माण:) चार वेदों के जानने वाले (मरुतः) मनुष्यो तुम लोग भी आचरण करो ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सब वेदों को पढ़कर नहीं खाने और नहीं पीने योग्य वस्तु का वजन करके न्यायाधीश के सदृश न्याय और सूर्य के सदश सत्य और असत्य का प्रकाश करते हैं वे महाशय होते हैं ॥३॥ फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। आद्रोदसी वितरं वि कमायत्संविव्यानश्चिद्भियसे मृगं कः । जिगतिमिन्द्रो अएजणुराणः प्रति श्वसन्तमय दानव ईन् ॥४॥ पदार्थ:--हे राजन् जैसे (इन्द्रः) सूर्य (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (वितरम्) विशेष उलांघना जैसे हो वैसे (वि, स्कभायत) विशेष करके आकर्षित करता है (आत्) और (संविच्यानः) उत्तम प्रकार व्याप्त होता हुमा (भियसे) भय के लिये (चित्) भी (मृगम्) हरिण को (क:) करता तथा (जिगत्तिम्) प्रशंसा वा निगलने को (अपज राणः) आच्छादन से अलग करता हुमा (दानवम्) दुष्टप्रकृति 200 ऋग्वेदः मं०५ । सू० २६ ।। . नी . . mp4 स MIND aina मनुष्य को (अव, हन्) हनन करे वैसे (प्रति, श्वसन्तम्) श्वास लेते हुए प्राणी का निरन्तर प्रतिपालन करो॥४॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु० -जो राजा सूर्य के सदृश राज्य का धारण करते हैं वे जो सिंह मृग को व्याकुल करता है वैसे दुष्टों को व्याकुल करते हैं वैसा ही वर्ताव करके यश को प्रकट करें॥४॥ अब विद्विषय को कहते हैं । अव त्वा मघवन्तुभ्यं देवा अनु विश्व अददुः सोमपेय॑म् । यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरः सतीरुपरा एतशे कः ॥५॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) बहुत धन से युक्त (यत्) जो (सूर्यस्थ) सूर्य के (पतन्तीः) चलती हुई (पुरः) पालने वाली वा आगे से (सती:) विद्यमान (उपराः) समीप में रमती हुई (हरितः) हरिद्वर्ण किरणों को (एतशे) घोड़े पर घोड़े के चढ़ने वाले' के सदृश (क:) करता है उस की विद्या से' (तुभ्यम्) आप के लिये जो (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (सोमपेयम् ) सोम ओषधि के पान करने योग्य रस को (अनु, अददुः) अनुकूल देते हैं वे (अध) इस के अनन्तर (त्या) बुद्धि से विशेष ज्ञानी होते हैं ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! सूर्यमण्डल में अनेक तत्त्वों के विद्यमान होने से अनेक रूप देख पड़ते हैं यह जानना चाहिये ॥५॥ फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नव यदस्य नवति च भोगान्त्साकं वज्रेण मघा विद्यश्चत् । अर्चन्तीन्द्र मरुतः सधस्थे त्रैष्टुंभेन वचसा बाधत द्याम् ॥६॥ पदार्थ:-हे राजन् (मधवा) बहुत धन से युक्त पाप जैसे सूर्य (वण) वज के (साकम्) साथ (अस्य) इस सूर्य और जगत् के मध्य में (यत्) जि नव और (नवतिम्) नव्वे (भोगान्। भोगों को उत्पन्न करता और अन्धकार आदि का (विवश्चत्) नाश करता है तथा जैसे (मरुतः) मनुष्य (सधस्थे) समान स्थान में (त्रैष्टुभेन) तीन प्रकार स्तुति किये गए (वचसा) वचन से (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य वाले का (अर्चन्ति) सत्कार करते हैं और (धाम् ) कामना की (च) भी (बाधत) बाधा करते हैं वैसे ही दुःख और दारिद्रय का नाश करो ॥६॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजन् ! आप काम की आसक्ति का त्याग करके और न्याय से सबका सत्कार करके असंख्य भोगों को प्रजात्रों के लिये धारण कीजिये ॥६॥ digita HIM KARNA 3000 जिन (नव)

ऋग्वेदः मं० ५ । पू० २६॥
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फिर सूर्यदृष्टान्त से राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
सखा सख्ये अपचत्तयमग्निरस्य क्रत्वा महिषा त्री शतानि ।
त्री साकमिन्द्रो मर्नुपः सरासि सुतं पिबद् वृत्रहत्याय सोमम् ॥७॥
पदार्थः -- जैसे (अग्निः) अग्नि और (इन्द्रः) सूर्य (तूयम्) शीघ्र (अस्य)
इस जगत् के मध्य में (त्री) तीन भुवनों को प्रकाशित करता हुआ (सरांसि) तड़ामों
का (पिबत्) पान करता है और (वृत्रहत्याय) मेघ के नाश करने के लिये (सुतम्)
वर्षाये गए (सोमम्) ऐश्वर्य को (अपचत्) पचाता है वैसे (सखा) मित्र (क्रत्वा)
बुद्धि वा कर्म से (सत्ये) मित्र के लिये (साकम्) सहित (मनुषः) मनुष्य के (महिषा)
बड़े पशुओं के (त्री) तीन (शतानि) सैकड़ों की रक्षा करें ॥७॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे सूर्य ऊपर नीचे और मध्य-
भाग में वर्तमान स्थूल पदार्थों का प्रकाश करता है वैसे उत्तम मध्यम और
अधम व्यवहारों को राजा प्रकट करे और सब के साथ मित्र के संदृश
वर्ताव करे ॥७॥
फिर राजविषय को अगले मात्र में कहते हैं ।
त्री यच्छता महिषाणामघो मास्त्री सरॉसि मघवा सोम्यापोः।
कारं न विश्व अवन्त देवा भरमिन्द्राय यदहि जघान ॥८॥
मा
पदार्थ:-हे राजन् (यत्) जो आप (अधः) नहीं मारने योग्य होते हुए
(महिषाणाम्) बड़े पदार्थों के (श्री) तीन (शता) सैकड़ों को (माः) रचिये और हे
(सोन्या) चन्द्रमा के गुणों से सम्पन्न (मघवा) बहुत धनवान् होते हुए (त्री) तीन
(सरांसि) मेघमण्डल भूमि और अन्तरिक्ष में स्थित पदार्थों को सूर्य के सदृश प्रजात्रों
का (अपाः) पालन कीजिये और सूर्य (यव) जैसे (अहिम्) मेघ का (जघान) नाश
करता है और जैसे (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (इन्द्राय) ऐश्वर्य के लिये
(कारम्) कर्ता के (न) सदृश (भरम्) पालन को (अन्त) कहते हैं वैसे ऐश्वर्य के
लिये प्रयत्न कीजिये ।।८।।
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जैसे पुरुषार्थी जन को सब
स्वीकार करते हैं वैसे ही सूर्य ईश्वरीय नियमों से नियत जलरस का ग्रहण
करता है जैसे जन बड़े पदार्थों की उत्तेजना से सैकड़ों काम सिद्ध करते हैं
वैसे ही राजा प्रजाजनों से बड़े राजकार्य को सिद्ध करे ॥८॥

६४ ऋग्वेदः मै० ५। सू० २६ ।। - - All Manasa फिर उसी विषय को कहते हैं । उशना यत्संहस्यै ३ रयांतं गृहमिन्द्र जूजुवानेभिरश्वैः । वन्वानो अत्र सरथ ययाथ कुत्सेन देवैरवनोई शुष्णम् ॥९॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् पाप और (उशना) कामना करता हुमा जन तुम दोनों (सहस्यैः) बलों में उत्पन्न हुए पदार्थों के साथ (जूजुवानेभिः) वेगवाले (अश्वः) घोड़ों वा अग्नि आदिकों से चलाये गये वाहन पर स्थित हो के (यत्) जिस (गृहम) गृह को (अयातम्) प्राप्त हूजिये और (अत्र) इस जगत् में (ह) निश्चय से (वन्वानः) याचना करते हुए आप (कुत्सेन) वन के सदृश दृढ़ कर्म से (देवः) विद्वानों से (शुष्णम्) बल की (अवनोः) रक्षा करिये और हे मनुष्यो आप लोग इन दोनों के साथ (सरथम्) रथ के साथ वर्तमान जैसे हो वैसे निश्चय से (ययाथ) प्राप्त हो । भावार्थ:-जो राजा आदि मनुष्य उत्तम प्रकार श्रेष्ठ होवें वे विमान आदि वाहनों को बना सकें और दुष्ट जनों के मारने को समर्थ होवें ॥६॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । प्रान्यच्चक्रमहः सूर्यस्य कुत्साया गरियो यातवेकका ! अनासो दस्यूरमृणो बधेन नि दुर्योण आगङ् मृध्राचः ॥१०॥ पदार्थ:-हे राजन आप (सूर्यस्य सूर्य के सदृश (अन्यत्व अन्य (चक्रम्) चक्र की (प्र, अवहः) उत्तम वृद्धि करिये और (कुत्ताय) बन के लिये (अन्यत्) अन्य (वरिवः) सेवन को (यातवे) प्राप्त होने को (अकः करिये तथा (अनासः) मुख रहित (दस्यून) दुष्ट चोरों का (वधेन) वध से (अमृणः) नाश करिये और (दुर्योणे) गृह के प्राप्त होने में (मध्वाच:) कुत्सित वारिणयों वाले जनों को (नि, आवृणक) निरन्तर वजिये ॥१०॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जैसे सूर्य अपने चक्र का आकर्षण से वर्ताव करता है वैसे ही विमान आदि वाहनों से राज्य का अनुवत्तंन करो और चोर तथा दुष्टवाणी वालों का नाश करके राज्य में नहीं चोरी करने वाले और श्रेष्ठ वचनों वाले जनों का सम्पादन कीजिये ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स्तोमासस्त्वा गौरिवीतेरवर्धन्नरन्धयो वैदथिनाय पिनम् । आ त्वामृजिश्वी सख्याय चक्रे पचंन् पक्तीरपिवः सोममस्य ॥११॥ CURM ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २६।। weae पदार्थः-- हे राजन् (गौरिवीते:) वाणी को विशेष प्राप्त अर्थात् जानने वाले पाप के संग से (स्तोमासः) प्रशंसित (अवर्धन्) वृद्धि को प्राप्त हों उन के साथ (वैदथिनाय) संग्राम करने वाले से बनाये गये के लिये शत्रुओं का (अरन्धयः) नाश करो और जो (ऋजिश्वा) सरल कुत्ते के सदृश ही मनुष्य (पिघुम्) व्यापक (स्वा) आप को (सख्याय) मित्रपने के लिये (मा चके) अच्छे प्रकार कर चुका उस के साथ (अस्य) इस जगत् के मध्य में (पक्तीः) पाकों का (पचन्) पाक करते हुए आप (सोमम्) ऐश्वर्य वा ओषधि के रस का (अपिबः) पान करिये और जो (त्वाम्) आप की रक्षा करें उन सब का आप सत्कार करिये ॥११॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु हे राजन् ! जो उत्तम गुणों से आप की वृद्धि करते और आप को मित्र जानते हैं उन को मित्र कर के आप ऐश्वर्य की वृद्धि करो ॥११॥ अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नवग्वासः सुतसोमास इन्द्रं दर्शग्वासो अभ्यर्चन्त्यकैं। गव्यं चिदूर्वमपिधानवन्तं तं चिन्नरः शशमाना अप वन् ॥१२॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (सुतसोमासः) संपादन की ऐश्वर्य और ओषधियां जिन्हों ने (नवग्वासः) जो नवीन गतिवाले (दशग्वासः) जिन्हों ने दशों इन्द्रियों को जीता ऐसे (शशमानाः) अविद्याओं का उलंघन करते हुए (नरः) नायक जन जिस (गव्यम्) गोसम्बन्धी (चित्) निश्चित (ऊर्वम्) अविद्या के नाश करने वाले (अपिधानवन्तम्) आच्छादन से युक्त गुप्त (इन्द्रम्) विद्या और ऐश्वर्यवान् का (अः) मन्त्र वा विचारों से (अभि) सब प्रकार (अर्चन्ति) सत्कार करते और उसकी अविद्या का (अप, वन्) अस्वीकार करते हैं (तम्) उस को (चित्) भी प्राप शिक्षा दीजिये ॥१२॥ भावार्थ:---जो नवीन विद्या का ग्रहण करना चाहते और ऐश्वर्य की इच्छा करने और इन्द्रियों के जीतने वाले विद्वान् जन अज्ञानी जनों को बोध देकर विद्वान् करते हैं वे ही सत्कार करने योग्य होते हैं ॥१२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । कथो तु ते परि चराणि विद्वान वीर्यां मघवन्या चकर्थ । या चो नु नव्या कृणदः शविष्ठ प्रेदु ता ते विदथेषु ब्रवाम ॥१३॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) श्रेष्ठ धन से युक्त (या) जो (ते) आप की (परि) AARA * ( Bha tane M 2 हुए हो और (या) A ९६ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० २६ ।। सब ओर से (चराणि) चलने वाली और प्राप्त होने योग्य (वीर्या) पराक्रम युक्त सेनामों को (कथो) किसी प्रकार (न) निश्चय से (चकर्थ) करते हो तथा (विद्वान्) विद्वान् श्राप (या) जिन को (चो) और (नव्या) नवीनों में उत्पन्नों को (नु) निश्चय से (कृणवः) सिद्ध करते हो । हे (शविष्ठ) अतिशय करके बलिष्ठ (ते) आप के जिन को (विदथेषु) सङ ग्रामों में हम लोग (प्र,बवाम) उपदेश करें (ता) उन को (इव) निश्चय से (उ) भी पाप ग्रहण करो ॥१३॥ भावार्थ:----मनुष्यों को चाहिये कि सदाही नवीन नवीन विद्या और नवीन २ कार्य को सिद्ध कर के ऐश्वर्य को प्राप्त होवें इसी प्रकार अन्यों के प्रति उपदेश करें।।१३।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। एता विश्वा चयाँ इन्द्र भूर्यपरीतो जनुषा वीर्येण । या चिन्न वज्रिन्कृणो दधृष्वान्न ते वर्ता तविष्या अस्ति तस्याः ॥१४॥ पदार्थ:-हे (बनिन्) उत्तम शस्त्र और अस्त्रों से और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् (अपरीतः) नहीं वर्जित' आप (जनुषा) दूसरे जन्म से और (वीर्येण) पराक्रम से (चित्) भी (एता) इन (विश्वा) सब को (चकृवान्) किये आप की निश्चित (तस्याः) उस (तविष्याः) बलयुक्त सेना का (बधृष्वान्) धृष्ट अर्थात् धषित किया हुआ (न) शीघ्र (वर्ता) स्वीकार करने वाला कोई भी (न) नहीं (अस्ति) है ॥१४॥ भावार्थ:-जो राजा आदि जन हैं वे ब्रह्मचर्य से विद्याओं को प्राप्त होकर चवालीस वर्ष की अवस्था से युक्त हुए समावर्तन करके अर्थात् गृहस्थाश्रम को विधिपूर्वक ग्रहण कर स्वयंवर विवाह कर और सेना की वृद्धि करके प्रजा की सब प्रकार से रक्षा करें ॥१४॥ अब विद्वद्विषय में पुरुषार्थ रक्षणविषय को कहते हैं । इन्द्र ब्रह्म क्रियमाणा जुषस्व या ते शविष्ठ नव्या अकर्म । वस्त्रेव भद्रा सुकृता वसूयू रथं न धीर: स्वपो अतक्षम् ॥१५॥ पदार्थ:-हे (शविष्ठ) अतिशय करके बल से और (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त जिन (ते) आप के (नव्याः) नवीन धनों को हम लोग (अकर्म) करें और (या) जिन (क्रियमाणा) वर्तमान पुरुषार्थ से सिद्ध हुए (ब्रह्म) अन्न वा * ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३० ।। धनों का श्राप (जुषस्व) सेवन करो उन (भद्रा) कल्याणकारक (सुकृता) धर्म से उत्पन्न किये हुनों को (वस्त्रेव) जैसे वस्त्र प्राप्त होते वैसे तथा (स्वपाः) सत्यभाषण आदि कर्म करने वाला (धीरः) ध्यानवान् योगी और (वसूयुः) अपने को धन की इच्छा करने वाला (रथम्) उत्तम वाहन को (न) जैसे वैसे कल्याणकारक और धर्म से उत्पन्न किये गयों को मैं (अतक्षम्) प्राप्त होऊ ॥१५॥ भावार्थ:----इस मन्त्र में उपमा लं० --हे मनुष्यो ! वंश और धन की प्राशा से आप लोग मालस्य से पुरुषार्थ का न त्याग करो किन्तु नित्य पुरुषार्थ की वृद्धि से ऐश्वर्य की वृद्धि करके वस्त्र और रथ से जैसे वैसे सुख का भोग करके नवीन यश प्रकट करो ॥१५॥ इस सूक्त में इन्द्र और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त' के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पम मण्डल में उनतीसवां सूक्त समाप्त हुना।। 0 pump HIST अथ पञ्चदशस्य त्रिशत्तमस्य सूक्तस्य व रात्रय ऋषिः । इन्द्र ऋणंचयश्च देवता । १ । २॥ ३॥ ४ ॥ ५ । । ६ निवृत्रिष्टुप् । १० विराट् त्रिष्टुप् । ७ ॥ ११ । १२ त्रिष्टुप्छन्दः । धेवतः स्वरः। ६ । १३ पङ्क्तिः । १४ स्वराट्पक्तिः । १५ भुरिक पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब पन्द्रह ऋचा वाले तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में इन्द्र के विषय को कहते हैं। वर' स्य बीरः को अपश्यदिन्द्र सुखरथमीयमानं हरिभ्याम् यो राया बनी सुतसोममिच्छन्तदोको गन्ता पुरुहूत ऊती ॥१॥ पदार्थः -हे विद्वन् (कः) कौन (वीरः) शूर (इन्द्रम्) विजुली को (अपश्यत्) देखता है (क्व) किस में (हरिभ्याम्) वेग और प्राकर्षण से (सुखरथम्) सुख के अर्थ (ईयमानम्) चलते हुए रथ को देखता है (य:) जो (वनी) शस्त्र और अस्त्रों से युक्त (मान्ता) जाने वाला (पुरुहूतः) बहुतों से स्तुति किया गया (सुतसोमम्) इकट्ठा किया ऐश्वर्य जिस में (तत्) उस (ोक:) गृह की (इच्छन्) इच्छा करता हुआ. (ऊती), रक्षण आदि के लिये (राया) धन से विजुली को देखता है (स्यः) वह सुख के लिये रथ को प्राप्त हो ॥१॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! कौन बिजुली आदि की विद्या के प्राप्त होंने को अधिकारी हैं इस प्रकार पूछता हूँ। जो विद्वानों के संग से यथार्थवक्ता : RANDU - ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३० ।। जनों की रीति से विद्या और हस्तक्रिया को ग्रहण करके नित्य प्रयत्न करें यह उत्तर है ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। चचक्षं पदमस्थ सस्वरुग्रं निधातुरन्वायमिच्छन् । अपृच्छमन्याँ उत ते मं आहुरिन्द्रं नरो बुबुधाना अशेम । २॥ पदार्थ:-शिल्पविद्या की (इच्छन्) इच्छा करता हुआ मैं जिन (अन्यान्) अन्य विद्वानों को (अपच्छम्) पूछू (ते) वे (बुबुधानाः) संबोधयुक्त (नरः) नायक जन विद्वान् (मे) मेरे लिये (इन्द्रम्) विजुली को (माहुः) कहें उस को (अस्य) इस शिल्पविद्या के (निधातुः) धारण करने वाले के (सस्वः) गुप्त (उनम् । उनगुण, कर्म और स्वभाव वाले (पदम्। प्राप्त होने योग्य विज्ञान को (अनु, आयम् ) अनुकूल प्राप्त होऊ और अन्यों के प्रति (अव, अचचक्षम्) निश्शेष कहूं इस प्रकार (उत) भी मित्र के सदृश वर्तमान हम लोग अंग और उपाङगों के सहित शिल्पविद्याओं को (अशेम) प्राप्त होवें ॥२॥ भावार्थः जब शिल्प आदि विद्या के जानने की इच्छा करने वाले जन विद्वानों के प्रति पूछे तब उन के प्रति यथार्थ उत्तर देवें। इस प्रकार परस्पर मित्र हुए विजुली प्रादि की विद्या की उन्नति करें॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। मनु वयं सुते या ते कृतानीन्द्र ब्राम यानि नो जुजोषः । वेददविद्वाञ्छृणवच्च विद्वान्वहतेऽयं मघवा सवैसेनः ॥३॥ पदार्थः-हे (इन्द्र) विद्वन् ! (या) जिन' (ते) आप के (सुते) उत्पन्न हुए संसार में (कृतानि) किये हुए कार्यों वा (न:) हम लोगों के (यानि) जिन कार्यों को (जुजोषः) प्राप सेवते हो उनको (वयम्) हम लोग (न) शीघ्र (प्र, अधाम) उपदेश देवें और जब (अयम्) यह (मघवा) बहुत धन वाला और (सर्वसेनः) सम्पूर्ण सेनामों से युक्त (विद्वान् ) विद्वान् जन विद्या को (वहते) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता है तब यह (अविद्वान्) विद्या से रहित जन (शृणवत्) श्रवण करे और (वेदत) विशेष करके जाने (च) भी ॥३॥ भावार्थः दो उपाय विद्या की प्राप्ति के लिये जानने चाहियें उन में प्रथम उपाय यह है कि विद्या का अध्यापक यथार्थववता होवे तथा सुनने और पढ़ने वाला पवित्र कपटरहित और पुरुषार्थी होवें । दूसरा उपाय यह है कि Hala ।

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३० ।। श्रेष्ठ विद्वानों का कर्म देखकर आप भी वैसा ही कर्म करे। ऐसा करने पर सब को विद्या का लाभ होवे ॥३॥ अब वीरों के कर्म को कहते हैं ।। स्थिरं मनश्चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयंसश्चित् । अश्मानं चिच्छवसा दिद्युतो वि विदो गापूर्वमुस्त्रियाणाम् ॥४॥ पदार्थ:--हे (इन्द्र) योगजन्य ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले जन जिस प्रकार (एकः) एक सूर्य (युधये) युद्ध के लिये (शवसा) बल से (अश्मानम्) मेघ को और (भूयसः) बहुत (चित्) भी मेघों को तथा (गवाम्) चलने वाले (उस्त्रियाणाम्) किरणों के (ऊर्वम्) नाश करने वाले को (चकृष) करता और दोनों (चित्) निश्चित (वि, दिद्य तः) प्रकाश करते हैं वैसे आप विजय को (विदः) जनाइये एक (जात:) प्रकट हुए आप जिस से (मनः) अन्तःकरण को (स्थिरम्) निश्चल' करते हो (इत्) इसी से राज्य को (वेषि) प्राप्त होते हो ।।४।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु - जैसे सूर्य और मेघ परस्पर युद्ध करते हैं वैसे राजा शत्रु के साथ संग्राम करे और जैसे सूर्य किरणों से सब कार्य को सिद्ध करता है वैसे राजा सेना और मन्त्रीजनों से सम्पूर्ण राज- कृत्य सिद्ध करे ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । परो यत्त्वं परम आजनिष्ठाः परावति श्रुत्यं नाम बिभ्रत् । अतंश्चिदिन्द्रादभयन्त देवा विश्वा अपो अजयदासपत्नीः ॥५॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (यव) जो (स्वम्) आप (परः) उत्तम (परमः) अत्यन्त श्रेष्ठ (श्र त्यम्) श्रवण में उत्पन्न (नाम) संज्ञा को (बिभ्रत्) धारण करते हुए (माजनिष्ठाः) सब प्रकार से प्रकट होते हो वह जैसे (परावति) दूर देश में स्थित सूर्य (विश्वाः) संपूर्ण (दासपत्नीः) जल का देने वाला मेघ जिन का पालन कर्ता ऐसे (अपः) जलों को (अजयत) जीतता है और जैसे (देवाः) विद्वान् जन (इन्द्रात) विजुली से (अभयन्त) नहीं डरते हैं वैसे वर्तमान होने पर (अतः) इससे (चित) भी सुख की वृद्धि करिये ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकल-हे मनुष्यो ! जैसे दूरस्थित भी सूर्य अपने प्रकाश से प्रसिद्ध होता है वैसे ही दूर वर्तमान भी यथार्थवक्ता जन प्रकाशित यशवाले होते हैं ॥५॥ pa M A GIN जीत कर जगत् को सुख देता है १०० ऋग्वेदः मं० ५। सू०.३० ।। अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तुभ्येदेते मरुतः सुशेवा अर्चन्त्यर्क सुन्वन्त्यन्धः । अहिमोहानमप आशयानं प्रम यामिर्मायिनै सक्षदिन्द्रः॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जैसे (इन्द्रः) विजुली (मायाभिः) बुद्धियों से (प्राशयानम्) चारों ओर शयन करते हुए (मायिनम् )निकृष्ट बुद्धि वाले और (मोहानम् त्याग करते हुए (अहिम्) मेघ को (सक्षत) प्राप्त होता है और ताड़न करके (अपः) जलों की भूमि में गिराता है और जैसे' (एते) ये (तुभ्य) आप के लिये (सुशेवाः) उत्तम सुख वाले (मरुतः) ऋत्विक मनुष्य अकम्) सत्कार करने योग्य का (अचन्ति) सत्कार करते हैं और (अन्धः) अन्न को (सुन्वन्ति) उत्पन्न करते हैं वैसे (इत्। ही आप के लिये सम्पूर्ण विद्वान् जन सुख (प्र) देवें ।।६।। भावार्थः-वे ही विद्वान् जन जगत् के सुख करने वाले होते हैं जो सूर्य और मेघ के समान जगत् के सुख करने वाले हैं तथा अपने समान दूसरों के सुख करने वाले होते हैं ॥६॥ अब वीरविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वि पू मृधो जनुषा दानमिन्वन्नहन्गवो मघवन्तसञ्चकानः । अत्री दासस्य नमुंचेः शिरो यदवर्तयो मनवे गातुमिच्छन् ॥७॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) धन और ऐश्वर्य से युक्त राजन् पाप (जनुषा) जन्म से (दानम्) दान को (इन्वन्) प्राप्त होते हुए जैसे सूर्य (गवा) किरण से मेघ का (अहन्) नाश करता है वैसे मृधः) संग्रामों को जीतिये और (सञ्चकान:) उत्तम प्रकार कामना करते हुए जैसे (अत्रा) इस व्यवहार में सूर्य (नमुचेः) अपने स्वरूप को नहीं त्यागने वाले (दासस्य) सेवक के सदृश वर्तमान मेघ के (शिरः) उत्तम अंग का (वि) विशेषकर के नाश करता है वैसे आप (मनवे, विचारशील धाकि मनुष्य के लिये यत) जिस (गातुम्) भूमि वा वाणी की (इच्छन्) इच्छा करते हुए हो उस के लिये शत्रु के शिर को (स) उत्तम प्रकार (अवर्तयः) नाश करिय ।।७। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०- हे राजजनो ! जैसे सूर्य मेघ को सुख दीजिये ॥७॥ a sube ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३० ॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। युजं हि मामकथा आदिदिन्द्र शिरो दालस्य नमुचेर्मथायन् । अश्मनि चित्स्वयं १' वर्तमान प्र चक्रियेव रोदसी मरुद्भ्यः ।।८।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् जैसे सूर्य (नमुचेः) प्रवाहरूप से नहीं नाश होने और (दासस्य) जल देने वाले मेघ के (शिरः) शिर के सदृश वत्त मान कठिन अंग का (मथायन्) मन्थन करता हुआ (चिद) भी (स्वर्यम्) शब्दों में श्रेष्ठ (वर्तमानम् । वर्तमान (अश्मानम् ) व्याप्त होते हुए मेघ को पृथिवी के साथ युक्त करता और (चक्रियेव) जैसे चक्र वैसे (मरुभ्यः) पवनों से (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को धुमाता है वैसे (पाद) अनन्तर (इद) ही (माम्) मुझ को (हि। ही (युजम्) युक्त (प्र, प्रकृथाः) अच्छे प्रकार करिये ॥८॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु० ह राज जनो! आप लोग जैसे सूर्य मेघ को वर्षाय जगत् के सुख को और पवन से भूगोलों को धुमा के दिन रात्रि करता है वैसे ही विद्या और विनय की राज्य में वृष्टि कर अपने अपने कर्म में सब को चलाय के सुख और विजय को उत्पन्न करो।।८।। फिर उसी विषय को कहते हैं । स्त्रियो हि दास आयुधानि चक्रे किं ना करनवला अस्य सेनाः । अन्तररूपंदुभे अस्थ धेने अयोग पैयुधये दस्युमिन्द्रः ।।९।। पदार्थ:--हे राजन् जैसे (दासः) सेवक के सदृश मेघ (स्त्रियः) सियों को प्रायुधानि) तलवार आदि शस्त्रों के सदृश (चक्रे करता है (अस्य) इस की (अबलाः) बल से रहित (सेनाः) सेनायें हैं (इन्द्रः) सूर्य के सदृश राजा हि: ही (मा) मुझ को किम्) क्या (करन्) करे और जो (अन्तः) अन्तःकरण में (अख्यत्) प्रकट का ता है और (यस्य) जिस (अस्य) इस मेघ की (उभे) दोनों अर्थात् मन्द और तीन (धेने) वारणी वर्तमान हैं (अथ) अनन्तर जिस को सूर्य (युधये) संग्राम के लिये (उप, प्र, ऐव) समीप प्राप्त होता है उस के सदृश वर्तमान (हि) निश्चित (दस्युम्) दुष्ट डाकू को राजा वश में करे ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु.-वे ही जन दास हैं कि जिन की स्त्रियां ही शत्रु के सदृश विजय को देने वाली वर्तमान होवें और जैसे सूर्य और मेघ का संग्राम है वैसे ही दुष्टजनों के साथ राजा का सङ्ग्राम हो ॥६॥ MOSAN -

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ऋग्वेदः मं०५। सू०३० ॥
अब विद्वानों के उपदेश विषय को कहते हैं ।
समत्रगावोऽभिवोऽनवन्ते हेह वत्सै वियुता यदासन् ।
संता इन्द्रो असृजदस्य शाकैर्यदर्दी सोमांसः सुपुता अमन्दन् ॥१०॥
पदार्थः हे मनुष्यो (यत) जो (इहेह) इस जगत् में (गावः) किरणें (वत्सः)
बछड़ों से (वियुताः) वियुक्त (अभितः) चारों ओर से (मासन्) होती हैं (ता:)
उनकी आप लोग (अनवन्त) स्तुति प्रशंसा करें और जिनको (मस्य) इस मेघ के
(शार्क:) सामों से (पत्र) इस संसार में (इन्द्रः) सूर्य (सम्) अच्छे प्रकार
(प्रसृजत्) उत्पन्न करता है वा (ईम्) सब ओर से (सुषताः) उत्तम प्रकार उत्पन्न
(सोमासः) पदार्थ वा ऐश्वर्य वाले जीव (यत्) जो (अमन्दन्) आनन्दित होते हैं
उनको सूर्य (सम्) एक साथ उत्पन्न करता है ॥१०॥
भावार्थ:-जैसे बछड़ों से वियुक्त गोयें नहीं शोभित होती हैं वैसे ही
सन्तानों के सदृश वर्तमान सघन अवयवों से रहित मेघ नहीं शोभित
होता है ॥१०॥
अब वीरराज विषय को कहते हैं।
यदी सोपा बभ्रधूता अमन्दनरोरवीषमा सादनेषु ।
पुरन्दरः पपिवाँ इन्द्रो यस्य पुनर्गमिददादुनियाणाम् ॥११॥
पदार्थ:-हे राजन् जैसे' (इन्द्रः) सूर्य (प्रस्य) इस मेघ के (सावनेषु)
स्थानों में (पपिवान्) पीवने और (पुरन्दरः) पुरों को नाश करने वाला
(उस्त्रियाणाम्) किरणों और (गवाम्) गौनों के तेज को (पुन:) फिर (अददात)
देता है (वृषभः) वृष्टि करने वाला हुआ (अरोरवीत) अत्यन्त शब्द करता है (यत्)
जिस से (बभ्र धूता:) विद्या को धारण किये हुओं से पवित्र किये गये (सोमाः
सोम प्रोषधि के सदृश वर्तमान पदार्थ (ईम्) सब ओर से उत्पन्न होते हैं जिस से
प्राणी (प्रमन्दन्) आनन्दित होते हैं वैसे आप प्रजाओं में वत्तवि कीजिये ॥११॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो राजा सूर्य मेघ के स्वभाव
के सदृश स्वभाव वाला हुआ धर्मशास्त्र में कहे हुए अष्ट मास तक
प्रजाओं से कर लेता है और चार मास यथेष्ट पदार्थों को देता
प्रकार सब प्रजाओं को प्रसन्न करता है वही सब प्रकार से ऐश्वर्यवान्
होता है ॥११॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३० ॥ HA अब अग्नि दृष्टान्त से राजविषय को कहते हैं। भद्रमिदं रुशमा अग्ने अक्रनावां चत्वारि ददतः सहस्रां । ऋणञ्चयस्य प्रयंता मघानि प्रत्यग्रभीष्म नृतमस्य नृणाम् ॥१२॥ पदार्थः--हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी राजन् जिस से (ऋणञ्चयस्य) ऋणञ्चय अर्थात् जिस से ऋण बटोरता है उसके और (गवाम् ) किरणों के (चत्वारि) चार (सहस्रा) हजार को (ददतः) देते हुए सूर्य के (इदम्) इस (भवम्) कल्याण को (रुशमाः) हिंसा करने वालों के फेंकने वाले (अक्रन्) करते हैं उनके सदृश वर्तमान उस (नृणाम्) मनुष्यों के नतमस्य) नृतम अर्थात् अत्यन्त मनुष्यपन- युक्त श्रेष्ठ आप के (मधानि) धनों को हम लोग (प्रयता) प्रयत्न से (प्रति, अग्न- भीष्म) प्रतीति से ग्रहण करें ॥१२॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-है' मनुष्यो ! जैसे सूर्य सहस्रों किरणों को देकर संपूर्ण जगत् को आनन्दित करता है वैसे ही राजा असङ्ख्य उत्तम गुणों को देकर प्रजाओं को निरन्तर प्रसन्न करे ॥१२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। मुपेशसं माव सृजन्त्यस्तं गवाँ सही रुशमासो अग्ने । तीत्रा इन्द्रे पममन्दुः सुतासोऽक्तोव्युधौ परितक्म्यायाः ॥१३॥ पदार्थ:----(अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान राजन् जो (गवान किरणों के (सहस्र :) सहनों समूहों से (रुशमासः) हिंसकों के नाश करने वाले (तीनाः) तीक्षण स्वभावयुक्त जो (सुतासः) विद्या आदि उत्तम गुणों से उत्पन हुए (परितक्म्यायाः) सब प्रकार हंसते हैं जिन कम्मों से उनमें हुई अक्तोः) रात्रि की (व्युष्टौ) प्रभात वेला में (सुपेशसम्) अत्यन्त सुन्दर रूपवाले मा मुझ को (अस्तम्) गृह के सदृश (भव, सृजन्ति) उत्प न करते हैं और (इन्द्रम्) सूर्य के सदृश तेजस्वी राजा को (अममन्दुः) आनन्दित करें उनको आप जान के यथावत् सेवा करो ॥१३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो बिजुली और सूर्यरूप अग्नि युक्तिपूर्वक आप लोगों से सेवन किया जाय तो दिन और रात्रि सुखपूर्वक व्यतीत होवे ॥१३॥ अब विद्वद्विषय को कहते हैं ।। - ११.०४ ऋग्वेदः मं०५ । सू०३० ।। MAHES BAT औच्छत्सा रात्री परितक्म्या याँ ऋणञ्चये राजनि रुशमानाम् । अत्यो न वाजी रघुरज्यमानो वभ्रश्चत्वार्यसनत्सहस्रो ॥१४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (या) जो (रुशमानाम्) हिंसा करने वाले मन्त्रियों के (ऋणक्ये). ऋण को इकट्ठा करता है जिसे से उस (राजनि) राजा में (रघुः) छोटा (प्रज्यमानः) चलाया गया (बच :) धारण वा पोषण करने वाले और (प्रत्यः) मार्ग को व्याप्त होने वाले (वाजी) वेग युक्त के (न) सदृश (चत्वारि) चार- (सहना) सहस्रों का (प्रसनत) विभाग करती है (सा) वह (परितम्या) आनन्द देने वाली (रात्री) रात्रि संपूर्णों को (ौच्छत्) निवास देती है यह जानो ॥१४॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालं. हे विद्वानो! आप लोग रात्रि और दिन के कृत्यों को जान कर और स्वयं कर के उत्तम प्रकार परीक्षा कर के राजा आदिकों के लिये उन कृत्यों का उपदेश दीजिये जिस से ये सब सुखी हों और जैसे शीघ्र चलने वाला घोड़ा दौड़ता है वैसे ही दिन और रात्रि व्यतीत होता है यह जानना चाहिये ॥१४॥ फिर उसी विषय की कहते हैं । चतुःसहस्रं गव्यस्य पश्वः प्रत्यंग्रभीष्म रुशमेष्वग्ने । धर्मचित्तप्तः प्रवजे य पासीदयमयस्तम्बादाम विप्राः ॥१५॥ पदार्थः -(अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान राजन् (यः) जो (अयस्मयः) सुवर्ण के सदृश तेजःस्वरूप (तप्तः) तापयुक्त (धर्म:) प्रताप (प्रवृजे) अच्छे प्रकार त्यांग करते हैं जिसमें उसमें और रुशमेषु) हिंसक मन्त्रियों में (मासीत्) वर्तमान है (तम्) उस (चतुः सहस्रम्) चार हजार संख्यायुक्त को (गव्यस्य) किरणों के विकार और (पश्वः) पशु के सम्बन्ध में जैसे हम लोग (प्रति, अग्रभीष्म) ग्रहण करें वैसे आप ग्रहण करो और हे (विप्राः) बुद्धिमान् जनो आप लोगों के लिये उस (उ) ही को हम लोग (प्रादाम) सब प्रकार से देखें उस को हम लोगों के लिये आप लोग (चित्) भी दीजिये ।।१।। भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-जो मनुष्य शीत और उष्ण का सेवन युक्ति से करने को जानते हैं और इस की विद्या को परस्पर देते हैं। वे सर्वदा रोगरहित होते हैं ॥१॥ 600 ऋग्वेदः मं०५ । सू० ३१ ।। के इस सूक्त में राजा, वीर, अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में तीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ त्रयोदशर्चस्यकाधिकत्रिशत्तमस्य सूक्तस्थ अवस्थुरात्रेय ऋषिः।१-६। १०-१३ इन्त्रः । ६.3 इन्द्रः कुल्सो वा । ६४ इन्द्र उशना वा । ६ इन्द्रः कुत्सश्च देवताः।१।२।५। ७ । ६ । ११ निचूस्त्रिष्टुप् । ३।४।६ । १० त्रिष्टुप् । १३ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः। ८ । १२ स्वराट्पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वर:॥ अब तेरह ऋचावाले इकतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रगुरणों का कहते हैं। इन्द्रो राय प्रवतं कृणोति यमध्यस्थांन्मघा वाजयन्तम् । यूथेवं पश्वो व्युनोति गोपा अरिष्टो याति प्रथमः सिषासन् ॥१॥ पदार्थः - हे मनुष्यो जैसे (अरिष्टः) नहीं मारा गया (प्रथमः) प्रथम (सिषा- सन्) इच्छा करता हुमा (मधवा) अत्यन्त श्रेष्ठ धनरूप कारणयुक्त (इन्द्रः) सूर्य के सदृश सेना का ईश (गोपाः) गोत्रों का पालन्द करने वाला (पश्व:) पशुओं के (यूथेव) समूहों के सदृश लोकों की (वि) विशेष करके (उनोति) प्रेरणा करता और (वाजयन्तम्) भूगोलों को चलाते हुए को (घाति) जाता है और (यम्) जिस लोक का (अध्यस्थात) अधिष्ठित होता उस से (रथाय) वाहन के लिये (प्रवतम्) नीचे स्थल को (कृणोति) करता है वैसे प्राप प्राचरण करिये ॥१॥ भावार्थ:--- इस मन्त्र में वाचकलु० - जो राजा रथ आदि के चलने के लिये मार्गों को सुडौल बनाय के उन मार्गों से रथ आदि वाहनों पर चढ़ के तथा जाय और आय के पशुओं का पालन करने वाला पशुओं को जैसे वैसे शत्रुओं को रोक के प्रजाओं का निरन्तर पालन करता है वही सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होता है ।।१॥ फिर उसी विषय' को अगले मन्त्र में कहते हैं । आम व हरियो मा विदेन पिशङ्गराते अभि नः सचख । नहि स्वदिन्द्र वस्यो अन्यदस्त्यमेनांश्चिन्जनिवतश्चकर्थ ॥२॥ पदार्थ:-हे (हरिवः) श्रेष्ठ घोड़ों से क्त (पिशङ्गराते) सुवर्ण नादि के TOP ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३१ ॥ और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले राजन् पाप (मा, वि, बेन:) कामना मत करें अर्थात् कामी न हों और (अमेनान्) नहीं विद्यमान हैं प्रक्षेप करने वाली स्त्रियां जिन की उन को (चित) उन्हीं (जनिवत:) जन्मवाले (चकर्थ) करें और (र:) हम लोगों का (अभि. सचस्व) सब ओर से संबन्ध करें और शत्रु के विजय के लिये (प्र, श्रा, प्रव) अच्छे प्रकार दौड़ें जिस से (स्वत्) आप से (वस्यः) अत्यन्त बसने वाला (अन्यत्) दूसरा (नहि) नहीं (अस्ति) है वह आप हम लोगों को सुख से सम्बन्ध कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-- जो अतिकालपर्यन्त जीवने, बलबढ़ाने, राज्य करने और वृद्धि करने के लिये यत्न करता है वही कृतकृत्य होता है ।।२।। फिर उसी विषय को कहते हैं । उद्यत्सहः सहस आजनिष्ट देदिष्ट इन्द्र इन्द्रियाणि विश्वा । पाचोदपत्सुदूर्वा वने अन्तर्वि ज्योतिपा संव-वत्तमोऽवः ॥३॥ पदार्थ:-हे राजन् जैसे (इन्द्रः) योगरूप ऐश्वर्य से युक्त सूर्य (सहसः) बल से (यत्) जिस (सहः) बल को (उत, श्रा, अजनिष्ट) उत्पन्न करता (विश्वा) सम्पूर्ण (इन्द्रियाणि) श्रोत्र आदि इन्द्रियों वा धनों को (देदिष्टे) उपदेश देता और (प्र, अधोवयत्) प्रेरणा करता और (सुदुधाः) उत्तम प्रकार कामनाओं को पूर्ण करने वाली क्रियाओं का (ब) स्वीकार करता है वैसे (अन्तः) मध्य में (ज्योतिषा) प्रकाश से (संववृत्वत्) घेरने वाली (तमः) रात्रि की (वि) विशेष करके (अव:) रक्षा करो ॥३॥ भावार्थ:-जो राजा बल से बल और धन से धन को उत्पन्न करके न्याय के प्रकाश से अन्यायरूप अन्धकार का निवारण कर पूर्ण मनोरथों से युक्त प्रजाओं को करके विद्या प्रादि उत्तम गुणों के ग्रहण के लिये प्रेरणा करता है वही अखण्ड ऐश्वर्यवाला सदा होता है ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अनवस्तै रथमश्वाय तक्षन्त्वष्टा व पुरुहूत घुमन्तम् । ब्रह्माण इन्दै महयन्तो अरवर्धयन्नईये हन्तवा ॥४॥ पदार्थ:-हे (पुरुहूत) बहुतों से स्तुति किये गये राजन् ! जो (मनवः) मनुष्य (ते) आप के (अश्वाय) शीघ्र गमन के लिये (रथम्) वाहन को (तक्षन्) रचें और (स्वष्टा) सब प्रकार से विद्या से प्रदीप्तजन (ध मन्तम) प्रकाशयुक्त (बचम्) शस्त्र और अस्त्रों के समूह को गिराता है और (महयन्तः) प्रशंसा करते हुए (बह्माण:)

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३१ ॥ १०७ * Cate pawMS Man IMA चारों वेदों के जानने वाले विद्वान् प्रः) सत्कार के अत्यन्त सिद्ध करने वाले विचारों वचनों वा कर्मों से आप (इन्द्रम्) अखण्ड ऐश्वर्ययुक्त राजा की (अवर्धयन्) वृद्धि करते हैं और (अहये) मेघ के लिये (हन्तव) नाश करने को वृद्धि करते हैं उनका (उ) तर्कपूर्वक आप निरन्तर सत्कार करिये ॥४॥ भावार्थ:-राजानों की योग्यता है कि जो अन्तःकरण से राज्य की उन्नति करने की इच्छा करें वे सदा ही सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वृष्णे यत्ते वृषणो अर्कमच निन्द्र ग्रावाणो अदितिः सजोषाः । अनश्वासो ये पवयोऽरथा इन्द्रेषिता अभ्यवन्त दस्यून ॥५॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुष्टदलों के नाश करने वाले राजन् (यव) जिन (वृष्ण) वृष्टि करने वाले (ते) आप के लिये (अम्) सत्कार करने योग्य का प्रजाजन (अचन्)ि सत्कार करें वह जैसे (वृषणः) वर्षा के निमित्त (ग्रावाणः) मेघ और (सजोषाः) समान प्रीति का सेवन करने वाला और (अदितिः) अन्तरिक्ष वर्तमान हैं वैसे हूजिये । और (ये) जो (अरथाः) वाहनों से (अनश्वासः) घोड़ों से रहित (इन्द्रेषिताः) स्वामी से प्रेरणा किये गये (पवयः) चक्र (दस्यून्) दुष्ट चोरों के (अभि) सन्मुख (अवतन्त) वर्तमान हैं उन का पाप निरन्तर सत्कार कीजिये ॥५॥ भावार्थ:-जो राजाजन मेघ के सदृश सुख वर्षाने और आकाश के सदृश नहीं हिलने वाले अग्नि आदिकों के वाहनों को रच के इधर उधर भ्रमण करके दुष्ट चोरों का नाश करके प्रजानों को प्रसन्न करें वे भाग्य- शाली होते हैं ॥५॥ अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं । प्र ते पूर्णणि करणानि वोचं प्र नूनना मघवन्या चकय । शक्तीवो यद्विारा रोदसी उभे जयनपो मनथे दानुचित्राः ॥६॥ पदार्थ:-हे (शक्तीयः) बहुत प्रकार सामर्थ्य से युक्त (मघवन्) श्रेष्ठ ऐश्वर्य वाले राजन् बुद्धिमान् जन (यव) जैसे (या) जिन (पूर्वाणि) प्राचीन (करणानि) साधनों और जिन (नूतना) नबीनों को (प्र) सिद्ध करते हैं उन साधनों का मैं (ते) आप के लिए वैसे (श, वोचम्) उपदेश करू' और जो (विभराः) विशेष कर के पोषण करने और (दानुचित्रा:) अद्भुतदान वाले विद्वान् जन (मनवे) मनुष्य के लिये (उभे) दोनों (रोबसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को जनाते हैं उन के साथ Sovie

१०८
ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३१ ।।
P
जल के
आप मनुष्य के लिये (अपः) सूर्य जैसें जलों को वैसे शत्रुओं के प्राणों को (जयन्)
जीतते हुए उन के
सुख
के लिये सत्कार को (चकर्थ) करते हो ॥६॥
भावार्थ:--हे राजा आदि जनो! जो विद्वान् जन आप लोगों के
लिये अनादि काल से सिद्ध राजनीति और विजय के उपायों की शिक्षा
करें उन का अपने प्रात्मा के सदृश आप लोग सत्कार करें ।।६।।
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
तदिन्न ते करण दस्म विभाहिं यद् घ्ननोजो अनामिमीथाः ।
शुष्णस्य चित्परि माया अभ्माः मपित्वं यन्ना दस्यूरसेधः ॥७॥
पदार्थ:-हे (दस्म) उपेक्षा करने वाले (विप्र) बुद्धिमान् पाप सूर्य (महिम्)
जैसे मेघ को वैसे दोषों का नाश करते हैं (अत्र) वा इस जगत् में (ोजः, यत)
सदृश जो बल को गिराते हैं (तत) वह (करणम्) साधन' जैसे हो वैसे शत्रु
के बल का (घ्नन्) नाश करते हुए इस जगत् में तुम (शुष्णस्य) बल की वृद्धि का
(अमिमीथाः) निर्माण करो (चित्) और (मायाः) बुद्धियों का परि, अगुणाः)
सब ओर से ग्रहण करो और (प्रपित्वम् ) प्राप्ति को (यन्) प्राप्त होते हुए (दस्यून)
दुष्टों का (अप, असेधः) निवारण करें उन (ते) आप के लिए (न) तर्क वितर्क के
साथ (इत्) ही सुख प्राप्त होवे ॥७॥
भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु० -ह विद्वन् ! जैसे ईश्वर ने सूर्य
और मेघ का संबन्ध रचा वैसे ही अन्य भी बहुत संबन्ध रचे यह जानना
चाहिये ॥७॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
त्वमपो यदवे तुर्वशायारमयः सुदुघर्धाः पार इन्द्र ।
उग्रमेयातमवहो ह कृत्सं सं ह यामुशनारन्त देवाः ॥८॥
पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्यदाता (पारः) पार लगाने वाले होते हुए
(स्वम्) पाप (तुर्वशाय) शीघ्र वश करने में समर्थ (यदवे) मनुष्य के लिए (सुबुधाः)
उत्तम प्रकार पूर्ण करने योग्य (अप:) जलों के सदृश कम्र्मों को (अरमयः) रमा
और (उप्रम्) बड़े कष्ट से जिस को जीत सके उस (अयातम्) न आये हुए (कुरसम्)
कुत्सित को (ह) निश्चय (सम्, अवहः) अच्छे प्रकार प्राप्त होवें तथा (यत्) जिस
में (उशना) कामना करते हुए (देवाः) विद्वान् जन (अरन्त) रमें उस में (ह)
निश्चय (वाम्) आप दोनों अर्थात् आप को और पूर्वोक्त मनुष्य को रमावें ॥८॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३१ ॥ १०६ am Timi C मेक ONS भावार्थ:- ऐश्वर्यवाला मनुष्य अन्य जनों के लिये धन और धान्य आदिक देवे और जहां विद्वान् रमें वहां ही सम्पूर्ण जन क्रीड़ा करें। अब यन्त्रकलाविषय शिल्पकर्म को कहते हैं । इन्द्र'कुत्सा वहमाना रथेना वामत्या अपि कणे वहन्तु । निः षीमद्भयो धर्मथो नि षस्थान्मघोनों हृदो वरथस्तमौसि ॥९॥ पदार्थ:-हे अध्यापको और उपदेशको जैसे (इन्द्राकुत्सा) बिजुली और बिजुली का प्राघात (रथेन) वाहन से (वहमाना) प्राप्त कराते हुए वर्तमान हैं वा विद्वान्जन (कर्णे) करते हैं जिस से उस में (वाम्) आप दोनों को (मा, वहन्तु) पहुंचावें वैसे (प्रत्याः) निरन्तर चलने वाले घोड़े (अपि) भी सब को प्राप्त कराने को समर्थ होते हैं और जो बिजुली और अग्नि (अद्यः) जलों से (निः, धमथ:) शब्द करते हैं तो वे दोनों (सधस्थात्) तुल्य स्थान से (सीम्) सब प्रकार प्राप्त कराते और जो (हृदः) हृदयों के सदश प्रिय (मघोनः) धनाढ्य पुरुषों का (निः) अत्यन्त (वरथः) स्वीकार करते हैं तो सुख से (तमासि) अन्धकारों को हटाने को समर्थ होश्रो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०- हे मनुष्यो ! जो अग्नि और जल का सयोग कर शब्द कर और भाफ से यन्त्र कलाओं को ताड़ित कर के वाहनादिकों को चलावें तो आप अपने को और मित्रों को धन से युक्त कर के दुःखों के पार जावें और अन्यों को भी पार करें ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। वातस्प युक्तान्त्सुयुजश्चिदश्वान्कविश्विदेषो अजगन्नवस्युः । विश्वे ते अत्रं मरुतः सखाय इन्द्र ब्रह्माणि तविषी प्रवर्धन् ।।१०।। पदार्थः हे (इन्द्र) विद्वन् जो (ते) अापके (अत्र) इस शिल्पविद्या के जानने- रूप कार्य में (सखायः) मित्र (विश्वे) सम्पूर्ण (मरुतः) ऋतु-ऋतु में यज्ञ करने वाले विद्वान् जन (ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों की और (तविधीम् ) सेना की (अवर्धन) वृद्धि करते हैं और (वातस्य) वायु के वेग से (युक्तान्) युक्त हुए (सुयुजः) उत्तम प्रकार पदार्थों के मेल करने वाले (चित) निश्चित (अश्वान्) शीव्रगामी अर्थात् तीव्र वेगयुक्त अग्नि आदि पदार्थों को (अजगन्) चलावें उनको (एषः) यह वर्तमान (अवस्युः) अपने को रक्षण की इच्छा रखने वाले (कविः, चित) निश्चित बुद्धिमान् आप निरन्तर सत्कार करें॥१०॥ auarter A SHO - युक्त मेघ के सदृश विदाना ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३१ ।। भावार्थः - हे ऐश्वर्य की इच्छा रखने वाले पुरुष ! जो जन अग्नि आदि पदार्थों की विद्या से विचित्र आश्चर्यजनक वाहन आदि कार्यों की सिद्धि कर सकते हैं उन के साथ मित्रता कर के और उनसे विद्या को प्राप्त हो अभीष्ट कार्यों की सिद्धि करते हुए आप अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होवें ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सूरश्चिद्रथं परितक्म्यायां पूर्व करदुपरं जूजुवांसम् । भरच्चक्रमेतशः सं रिणाति पुरो धत्सनिष्यति क्रतुं नः ॥११॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जो (सूरः) सूर्य के (चित्) सदृश (परितक्म्यायाम्) सर्व और से हर्ष होते हैं जिस रात्रि में उसमें (पूर्वम्) प्रथम (रथम्) सुन्दर वाहन को (उपरम्) मेघ के सदृश (करत) करे और (जूजुबांसम्) अत्यन्त वेग से युक्त (चक्रम्) कलाओं के चलाने वाले चक्र को (एतशः) जैसे घोड़ा घोड़ेवाले' को वैसे सब प्रकार (भरत) धारण करे (पुरः) पहिले चक्र को (सम्, रिणाति) प्राप्त होता वाहन को (दधत्) धारण करता और (नः) हम लोगों की (ऋतुम्) बुद्धि वा कर्मों का (सनिष्यति) सेवन करे उस का आप सब प्रकार सत्कार करें ॥११॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा वाचकलु-जो मनुष्य कलाकौशल से वाहनों के यन्त्रों को रच के जल और अग्नि के अत्यन्त योग से चक्रों को उत्तम प्रकार चलाय कार्यों को सिद्ध करें तो जैसे सूर्य और पवन मेघ को वैसे बहुत भारयुक्त वाहन को अन्तरिक्ष जल और स्थल में पहुंचाने को समर्थ होवें ॥११॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। आयं जना अभिचक्षे जगामेन्द्रः सखायं सुतसोममिच्छन् । वदन्यावाव वेदि भ्रियाते यस्य जीरमध्वर्यवश्चरन्ति ॥१२॥ पदार्थः-हे (जनाः) प्रसिद्ध विद्वान् जनो जो (अयम्) यह (इन्द्रः) ऐश्वर्य वाला (अभिवक्षे) सब ओर से प्रसिद्ध होने को (सुतसोमम्) संपन्न की पदार्थ विद्या जिसने ऐसे (सखायम्) मित्र की (इच्छन्) इच्छा करता और (प्रावा) गर्जना से (अव, पा, जगाम) प्राप्त होवे (यस्य) जिस के (जीरम्) वेग को (अध्वयंव:) विद्या रूप यज्ञ के सम्पादक अर्थात् उक्त यज्ञ को प्रसिद्ध करने वाले जन (चरन्ति) ऋग्वेदः म० ५। सू० ३२ ।। ala WORLD tos MES प्राप्त होते हैं और जो दो शिल्पविद्या को (भ्रियाते) धारण करें उन दोनों का सदा ही आप लोग सत्कार करें ॥१२॥ भावार्थ:-जो जन विद्या की प्राप्ति तथा विद्या देने के लिये सम्पूर्ण जनों के साथ मित्रता करके मिलें वे सम्पूर्ण विद्या के प्राप्त होने को समर्थ होवें ॥१२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। ये चाकनन्त चाकनन्त ते मत्ता अमृत मो ते अंह आरन् । वावन्धि यज्यूस्त ते घेद्योजो जनेषु येषु ते स्याम ॥१३॥ पदार्थ:-हे (अमृत) आत्मस्वरूप से मरण धर्म रहित विद्वान् (ये) जो विद्या विनय और सत्य आचरणों की (चाकनन्त) कामना करते हैं तथा अन्यों के लिये भी (चाकनन्त) कामना करते हैं (ते) वे (मत्ताः) मनुष्य सत्य को नू) शीघ्र कामना करते हैं और (ते) वे (अंहः) अपराध को (मो) नहीं (मा, परन्) सब प्रकार से प्राप्त हों और वे (उत) ही (यज्यून्) सत्यभाषण आदि यज्ञ के अनुष्ठान करने वाले जनों को (बावधि) बन्धन युक्न करते हैं तथा (येषु) जिन (जनेषु) सत्य आचरण करने वाले मनुष्यों में हम लोग (ते) आपके मित्र (स्याम) होवें (तेषु) उन हम लोगों में आप (ओजः) पराक्रम को (धेहि) धारण कीजिये ।।१३।। भावार्थ:-हे विद्वान् जनो ! जो जन विद्या सत्य आचरण तथा परोपकार की और अधर्म आचरण के त्याग की कामना करके सब के उपकार की इच्छा करें वे धन्यवाद युक्त होवें और हम लोग भी ऐसे होवें ऐसी इच्छा करें ॥१३॥ इस सूक्त मे इन्द्र, विद्वान्, और शिल्पविद्या के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में इकतीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ द्वादशर्चस्य द्वात्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य गातुरात्रेय ऋषिः । इन्द्रो देवता । १।७।। ११ त्रिष्टुप् । २।३। ४ । १० । १२ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ५। स्वराट् पङ्क्तिः। ६ भुरिक पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब बारह ऋचा वाले बत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपद वाच्य राजगुणों को कहते हैं ।

ऋग्वेदः में० ५। सू० ३२ ।।
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अदर्दरुत्समसंजो वि खानि त्वमर्णवान्बदधानाँ अरम्णाः ।
महान्तमिन्द्र पर्वत वि यतः सृजो वि धारा अब दानवं हन् ॥१॥
पदार्थ:-हे (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करने वाले राजन् जिस प्रकार सूर्य
(उत्सम्) कूप के समान (महान्तम्) बड़े (पर्वतम्) पर्वताकार मेघ को नाश करके
(बहुधानान्) अत्यन्त बंधे हुओं का (अदर्दः) नाश करता है और (अर्णवान्) नदियों
वा समुद्रों का (सृजः) त्याग करता है वैसे (सम्) आप (खानि) इन्द्रियों का (वि)
विशेष करके त्याग कीजिये और हम लोगों को (वि, अरमणा:) विशेष रमरण
कराइये और (यव) जो सूर्य (धारा:) जल के प्रवाहों के सदृश वाणियों का और
(दानवम् ) दुष्ट जन , का (अब, हन्) नाश करता है (व:) आप लोगों के लिये
वि) विशेष (वि, भसृजः) विशेषकर त्यागता अर्थात् जलादि का त्याग करता है
उसका सत्कार प्रशंसा उत्तम क्रिया कीजिये ॥१॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु० ---राजा जैसे सूर्य गिराये हुए
मेघ से नदी और समुद्र आदिकों को पूर्ण करता और तटों को तोड़ता है
वैसे ही अन्याय को गिरा और न्याय से प्रजा का पालन कर के दुष्टों का
नाश करे ॥१॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
स्वमुत्साँ ऋतुभिदधाना अह अधः पातस्य वनिन् ।
अहि चिदुन प्रयुतं शयानं जघन्दाँ द्र तविषीमवत्या:॥२॥
पदार्थ:-हे (वजिन्) अच्छे वज्र वाले और (उन) तेजस्वी (इन्द्र)
सूर्य के सदृश वर्तमान राजन् (स्वम्) आप जैसे खेती करने वाले जन (ऋतुभिः)
वसन्त आदि ऋतुओं से' (बधानान्) अत्यन्त बद्ध हुओं को (उत्सान्) कूपों के
सद श (अरंहः) चलाता है और जैसे सूर्य (पर्वतस्य) मेघ के (ऊबः) जलाधार
धनसमूह को (चित्) और (प्रयुतम्) बहुत प्रकार (शयानम्) शयन करते हुए
के सद श आचरण करते हुए (अहिम्) मेघ का (जघन्वान्) नाश करता है वैसे प्राप
(तविषीम्) बलयुक्त सेना का (प्रधत्था:) धारण करिये ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र
में
वाचकलु
-जैसे खेती करने वाले जन कूपों
से जल को क्षेत्रों के प्रति प्राप्त कर अन्न उत्पन्न कर के सब ऋतुओं में
सुख और ऐश्वर्य की वृद्धि करते हैं वैसे ही आप प्रजाओं की उन्नति
कीजिये ॥२॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३२ ।। ११३ wate AMMAR अब इन्द्रपदवाच्य धनुर्वेदवित् राजगुणों को कहते हैं ।। त्यस्य चिन्महतो निर्मूगस्य वर्धर्जघान तविषीमिरिन्द्रः । य एक इदंपतिर्मन्यमान आदमादन्यो अंजनिष्ट तव्यान ॥३॥ पदार्थः ---हे विद्वन् (यः) जो (एक:) एक (अप्रतिः) नहीं है विश्वास जिस के वह (मन्यमानः) आदर किये गए पाप (तविषीभिः) सेना आदि बलों से जैसे (इन्द्रः) सेना का स्वामी (त्यस्य) उस (महत:) बड़े (मृगस्य) शीघ्र चलने वाले मेघ का (वधः) नाश करते हैं जिस में तदनुकूल' (जधान) नाश करता है वैसे हम लोगों को (चित्) भी प्रकट कीजिये (आत्) अनन्तर (अस्माद) इस से जैसे (अन्य) भिन्न और जन (निः) अत्यन्त (अजनिष्ट) उत्पन्न करता है वैसे (इत्) ही आप (तव्यान्) बलों में उत्पन्न हम लोगों को ही उत्पन्न कीजिये अर्थात् प्रकट कीजिये ।।३।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे सूर्य मेघ को जीतकर अपने प्रताप को प्रकट करके सब प्राणियों का पालन करता है वैसे ही धनुर्वेद की विद्या को जानने वाला एक भी अनेकों को जीतकर प्रजात्रों का पालन करे ॥३॥ BADAV Kolk 2- फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। त्यं चिंदेषां स्वधया मदन्तं मिहो नातं सुधं तमोगाम् । वृषप्रमर्मा दानवस्य भामं वज्रेण वज्री नि जघान शुष्णम् ॥४॥ पदार्थः - हे सेना के ईश वीर पुरुष प्राप (एषाम्) इन वीरों के मध्य में (स्वधया) अन्न आदि से (मवन्तम्) प्रसन्न होता हुआ जो जीव (त्यम्) उस के (चिद) समान जैसे' (वृषप्रभर्मा) वर्षने वाले मेव को धारण करने वाला सूर्य (मिहः) वृष्टि के (नपातम्) नहीं गिरने वाले (सुवृधन्) सुन्दर बढ़ते हुए (तमोगाम्) अन्धकार को प्राप्त अर्थात् सधन धन मेघ को (जधान) नाश करे वैसे (वत्री) उत्तम शस्त्र और अस्त्रों से युक्त होते हुए (बज्रण) तीव्र शस्त्र से (दानवस्य) दुष्टजन के (शुष्णम्) सुखाने वाले बलवान् (भामम्) क्रोध को (नि) निरन्तर नाश करिये ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु० हे राजन् ! जैसे सूर्य अति- विस्तारयुक्त मेघ का नाश कर भूमि में गिरा के जगत् की रक्षा करता है वैसे ही अतिप्रबल भी शत्रुओं का नाश कर नीचे गिरा के न्याय से प्रजाओं का पालन कीजिये ॥४॥ mar ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३२ ।। म MEAN ब APNP अब शिल्पविद्या के जानने वाले विद्वान् के गुणों को कहते हैं ।। त्यं चिंदस्य क्रतुभिर्निपत्तममर्मणों विददिदस्य मम । यदी सुक्षत्र प्रभृता मदस्य युयुत्सन्तं तमसि हयें धाः ॥५॥ पदार्थ:-हे (सुक्षत्र) श्रेष्ठ क्षत्रियकुल' वा धन से युक्त राजन् पाप (अस्य) इस (अमर्मणः) मर्म की बातों से रहित शत्रु की (ऋतुभिः) बुद्धि वा कम्र्मों से (निषत्तम्) स्थित (त्यम् ) उसको (चित्) तथा (अस्य) इस मेघ के और (मवस्य) आनन्द के (प्रभूता) अत्यन्त धारण करने वा पोषण करने में (यत्) जिस' (मर्म) गुप्त अवयव' को (इव) ही (विदन्) प्राप्त होवे उसको (ईम्) सब प्रकार प्राप्त हुए (युयुत्सन्तम्) युद्ध करने की इच्छा करते हुए को (तमसि) रात्रि में (हम्य) प्रासाद' के ऊपर पाप (धाः) धारण कीजिये ॥५॥ भावार्थ:-जो पदार्थों के गुप्त स्वरूपों को जान के बुद्धि से शिल्प- विद्या की वृद्धि करते हैं वे उत्तम राज्य और ऐश्वर्ययुक्त होते हैं ॥५॥ फिर राजविषय को कहते हैं । त्यं चिंदित्था कत्पयं शयानमसूर्ये तमसि वावृधानम् । तं चिन्मन्दानो पभः सुतस्योपचैरिन्द्रों अपगूर्यां जघान ।।६।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (इन्द्र :) सेना का ईश (उच्चैः) उच्चता के साथ (अपगूर्या) उद्यम कर (सूतस्य) उत्पन्न हुए पदार्थ का (मन्दानः) आनन्द करता हुप्रा (वृषभः) श्रेष्ठ पुरुष (तम्) उसको (चित्) भी (कल्पयम्। कितने को तथा (प्रसूर्ये) जिस में सूर्य विद्यमान नहीं उस (तमसि) रात्री में (शयानम्) शयन करते और (वावृधामम्) निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होते हुए को (चित) वा मेघ को (जधान) . नाश करता है (इत्था) इस प्रकार से (त्यम्) उस शत्रु का भी नाश करे ॥६॥ भावार्थः- इस मन्त्र में उपमालं.-जैसे सूर्य मेघ का नाश करता है अन्धकार का वारण कर के, वैसे ही राजा को चाहिये कि दुष्टों का नाश और श्रेष्ठों का पालन करे ।।६।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। उद्यदिन्द्रो महते दानवाय वधर्य मिष्ट सहो अप्रतीतम् । यदीं वज्रस्य प्रभृतौ ददाम विश्वस्य जन्तोरधर्म चकार ॥७॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (यत्) जो (इन्द्रः) राजा (महते) बड़े (दानवाय) दान कार- ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३२ ।। SADA na Mitra 4500 gi करने वाले के लिये (वय:) वध को (उत् यमिष्ट) उत्तम नियम करे और (यव) जिस (अप्रतीतम्) अधर्मिजनों से नहीं प्राप्त हुए (सहः) बलको (ईम्), सब ओर से (वनस्य) शस्त्रप्रहार के (अभृतौ) उत्तम प्रकार धारण करने में (बाम) नाश करता और (विश्वस्य) सम्पूर्ण (जन्तो:) जीवमात्र के मध्य में (अधमम्) नीचा (चकार) करता अर्थात् जो सब पर अपना आक्रमण करता है उसको जान के उत्तम प्रकार प्रयोग करो अर्थात उस से प्रयोजन सिद्ध करो ॥७॥ भावार्थ:--हे राजा आदि जनो! आप लोग सूर्य के सदृश वर्ताव कर के राज्य की अधमदशा का निवारण करें॥७॥ फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्यं चिदणे मधुपं शयानमसिन्वं वत्रं मह्याददुग्रा। अपादमत्रं महता वधेन नि दुर्राण आणङ् मृध्राचम् ॥८॥ पदार्थः --हे विद्वन् जैसे (उग्नः) तेजस्वी सूर्य (महता) बड़े (वधेन) वध से (दुर्योणे) गृह में (त्यम् ) उस (चित्) निश्चित (अर्णम्) जल' का (मधुपम्) मधुर पदार्थों की रक्षा करने वाले का (शयानम्) और सोते हुए के सदृश वर्तमान (असिन्वम् ) नहीं बद्ध (बदम्) स्वीकार करने योग्य (अपादम्) पादों से रहित और (प्रत्रम् । सर्वत्र व्याप्त होने वाले (मृध्रवाचन्) हिसित वाणी से युक्त मेघ का (महि) प्रतीव (प्रादत) ग्रहण करे वा (नि) अत्यन्त (प्रावृणक्) स्वीकार करता है वैसे आप वत्व कीजिये॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो! जैसे विजुली मेघ को भूमि में गिराती है वैसे आप दुष्टों को नीच दशा को प्राप्त करिये ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। को अस्य शुष्मं तविषर्षी वरात एको धना भरते अप्रतीतः। इमे चिंदस्य जयसो नु देवी इन्द्रस्यौजसो भियसा जिहावे ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो (क:) कौन (श्रस्य) इस के (शुष्मम्) बलको और (तविधीम्) सेना को धारण करे और (इमे) ये (देवी) प्रकाशमान दो अग्नि (इन्द्रस्य) विजुली के (मोजसः) बल के (भियसा) धारण से (न) शीघ्र (जिहाते) चलते हैं इन दोनों के मध्य में (एक:) एक तो (धना) धनों को (भरते) धारण करता है और दूसरा (अप्रतीतः) नहीं प्रत्यक्ष हुमा (प्रस्थ) इस (चित्) भी (वयसः) वेगवान् का धारण करने वाला वर्तमान है वे ये दोनों सब को (वराते) स्वीकार को प्राप्त होवें क्योंकि ये सब पदार्थ उन दोनों से धारण किये गए हैं ॥६॥ Mor Home ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३२॥ m- S am भावार्थ:-हे मनुष्यो! जो दो प्रकार का अग्नि---एक तो प्रसिद्ध सूर्य पृथ्वी में प्रसिद्ध रूप और दूसरा गुप्त विजुली रूप ये ही दोनों सब जगत् को धारण करके चलाते हैं ।।६।। फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । न्यस्मै देवी स्वधितिनिहीत इन्द्राय गातुरुशतीय खेमे । सं यदोजो युक्ते विश्वमाभिग्नु स्वधाम्नै क्षितयो नमन्त ॥१०॥ पदार्थ:-हे (युवते) युवावस्था को प्राप्त हुई (स्वधितिः) वज्र के सदृश (देवी) विदुषी तुम (अस्म) इस (इन्द्राय) ऐश्वर्य के लिये यह दो स्त्रियाँ (गातुः) भूमि और (उशतीव) कामना करती हुई स्त्री के समान (यत, जैसे (प्रोजः) वीर्य को उत्तम प्रकार ग्रहण करके (सम्, नि, येमे) अच्छे प्रकार नियम में रखती और प्राभिः) इन क्रियानों से (स्वधाने) धन को धारण करने वाले के लिये (विश्वम्) समस्त व्यवहार को (अनु, जिहीते) अनुकूल चलाती हैं तथा जैसे (क्षितयः) मनुष्य (नमन्त) नम्र होते हैं वैसे आप होइये ॥१०॥ भावार्थ:- जैसे ब्रह्मचर्य को धारण की हुई ब्रह्मचारिणी कन्या पूर्ण चौबीस वर्ष की अवस्था से युक्त हुई पति की कामना करती हुई, गुण, कर्म और स्वभाव के सदृश और प्रिय स्वामी का ग्रहण करती है वैसे ही बिजुली आदि रूप अग्नि संपूर्ण संसार का धारण करता है और जैसे गुण- वान् जनों को मनुष्य नमते हैं वैसे ही उत्तम लक्षणों से युक्त स्त्रीपुरुषों को संपूर्ण जन नमते हैं ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । एकं नु वा सत्यति पाञ्चजन्यं जातं शृणोमि यशसं जर्नेछु । तं में जगृन आशसो नविष्ठं दोषा वस्तोईवमानास इन्द्रम् ।।११।। पदार्थ:-हे विद्वानो! किया है अड़तालीस वर्ष ब्रह्मचर्य जिन ने ऐसे (एकम्) द्वितीय सहाय से रहित (सम्पतिम्) श्रेष्ठों के पालन करने वाले (पाञ्च- जन्यम्) प्राण प्रादि पांच पवन बलवान् जिस के उस के पुत्र और (जनेषु) मनुष्यों में (जातम्) प्रसिद्ध और (यशसम्) यशस्वी (स्वा) आप को (शणोमि) सुनती हूं (तम्) उन (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त (नविष्ठम् । अत्यन्त नवीन में) मेरे स्वामीकी (हवमानासः) ग्रहण करने की इच्छा करते और (प्राशसः) मनोरथ की इच्छा करते हुए जन (दोषा) रात्रियों और (वस्तोः) दिन का (न) शीघ्र (जगृध्र) ग्रहण करें ॥११॥ NON REAM Ramaper a .

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३२ ।। सदृश ही जो AR L भावार्थः- ब्रह्मचर्य को वेदोक्त समयानुसार धारण किए हुई कन्या प्रसिद्ध जिस का यश ऐसे श्रेष्ठ पुरुष उत्तम स्वभाव वाले और उत्तम गुण और रूप से युक्त प्रीति करने वाले स्वामी के अर्थात् पति के ग्रहण करने की इच्छा करे वैसे ही ब्रह्मचारी भी अपने ब्रह्मचारिणी स्त्री उसका ग्रहण करे ॥११॥ फिर विद्वद्विषयको अगले मन्त्रं में कहते हैं । एवा हि त्वामृतथा यातयन्तं मघा विप्रेभ्यो ददतं शृणोमि । किन्तै ब्रह्माणो गृहते सायो ते त्वाया निदधुः काममिन्द्र ॥१२॥ पदार्थ:-- हे (इन्द्र) परमेश्वर्य युक्त विद्या और ऐश्वर्या से युक्त पति की कामना करती हुई मैं (हि) निश्चय से (विप्रेभ्यः) बुद्धिमान् जनों के लिये (मघा) धनों को (ददतम्) देते और (ऋतुथा) ऋतु ऋतु के मध्य में (यातयन्तम्) सन्तान के लिए प्रयत्न करते हुए (स्वाम्) आप को (एवा) ही (शणोमि) सुनती हूं और (ते) आप के (ये) जो (ब्रह्माणः) चार वेद के जानने वाले (सखाय:) मित्र वे (स्वाया) आप में (किम्) क्या (गृहते) ग्रहण करते और किस (कामम्) मनोरथ को (निदधुः) धारण करते हैं ॥१२॥ भावार्थ:-स्त्री ऋतुर के मध्य में जाने की कामना वाला है वीर्य जिस का ऐसे ऊर्ध्वरेत अर्थात् वीर्य को वृथा न छोड़ने वाले ब्रह्मचर्य को धारण किये हुए उत्तम स्वभाव बाले और विद्यायुक्त उत्तम यश वाले जन को पतिपने के लिये स्वीकार करे उस के साथ यथावत् वर्ताव कर के पूर्ण मनोरथ वाली और सौभाग्य से युक्त होबे ॥१२॥ इस सूक्त में इन्द्र और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह पञ्चम मण्डल में बत्तीसवां सूक्त समाप्त हुआ। इस अध्याय में अग्नि विद्वान् और इन्द्रादिकों के गुणों का वर्णन होने से इस अध्याय में कहे हुए अर्थों की पहिले अध्यायों में कहे हुए अर्थों के साथ संगति है ऐसा जानना चाहिए।

अथ द्वितीयाऽध्यायारम्भः॥ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुर्व । यद्भद्रं तन्न आ मुंव ॥१॥ अथ दशस्य त्रयस्त्रिशत्तमस्य सूक्तस्य संवरणः प्राजापत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता। १ । २ । ७ पङ्क्तिः। ३ निचत्पङ्क्तिः । ४ । १० भुरिक्पङ्क्तिः। ५। ६ स्वराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ८ त्रिष्टुप् । ६ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धंवतः .. अब दूसरे अध्याय का आरम्भ है । तथा दश ऋचा वाले तेतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में इन्द्र के गुणों को कहते हैं । महि महे तवसे दीध्ये नृनिन्द्रायेस्था तवसे अतव्यान् । यो अस्मै सुमतिं वाजसातौ स्तुतो जनै समयश्चिकेत ॥१॥ पक्षार्थ:--हे मनुष्यो (यः) जो (प्रतव्यान्) प्रयत्न करता हुआ (स्तुतः) स्तुति किया गया (जने) मनुष्यों के समूह में (समय:) संग्राम की इच्छा करता हुआ (वाजसातौ) सङ ग्राम में (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि को (महे) बड़े (तबसे ) बल के लिए (चिकेत) जाने (अस्मै) इस (तबसे) बली (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त के लिये (इस्था) इस प्रकार (महि) बड़े (नन्) मनुष्यों का मैं (दोध्ये) प्रकाश करता हूं ॥१॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य जिस मनुष्य के लिये सुख विषयक उपकार करे वह उस के लिये प्रत्युपकार निरन्तर करे ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स त्वं न इन्द्र घियसानो अईरीणां वृषन्योक्त्रमश्रेः । या इत्था मघवन्ननु जोषं वो अभि प्रायः संक्षि जनान् ॥२॥ पदार्थ:-हे (वृषन्) सुख की वृष्टि करते हुए (मघवन्) अत्युत्तम धन से (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्या वाले (स:) वह (धियसान:) ध्यान करता हुआ (अर्यः) स्वामी राजा (त्वम्) आप (अ) विचारों से (नः) हम लोगों के वा हम लोगों को (हरीणाम्) मनुष्यों के संबन्ध में (योक्त्रम्) एकत्र करने का (प्रथः) सेवन कीजिए और (याः) जो उत्तम नीतियां हैं उन की (जोषम्) प्रीति को (अनु, वक्षः) युक्त और ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३३ ।। ११६ की क ramp4 A- SHAN sue . अनुकूल प्राप्त हूजिए (इत्था) इस प्रकार से (जनान्) मनुष्यों को (अभि, प्र, सक्षि) अच्छे प्रकार संबन्धित करते हो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-वही उत्तम विद्वान् है जो मनुष्यों को बुद्धि तथा योगाभ्यास आदि से बढ़ावे और सब काल में नीति के अनुसार कर्म करके प्रजात्रों को प्रसन्न करे।।२।। फिर उसी विषय को कहते हैं । न ते न इन्द्राभ्य १ समदृष्वायुक्तासो अब्रह्मता यदसन् । तिष्ठा रथमधि तं वज्रास्ता रहिम देव यमसे स्वश्वः ॥२॥ पदार्थ:-हे (वज्रहस्त) शस्त्र और अस्त्रों को बाहुओं में धारण करने वाले (ऋष्व) महापुरुष (देव) दानशील (इन्द्र) राजन् जो (ते) आप की (अब्रह्मता) निर्धनता (अयुक्तासः) और योग से रहित पुरुष (न) नहीं (अभि) सम्मुख (प्रसन्) होते हैं (यव) जब (ते) वे (अस्मत) हम लोगों से दूर बसते हैं तब (स्वश्वः) उत्तम घोड़ों से युक्त आप (रश्मिम्) किरण के सदृश (तम्) उस (रथम्) सुन्दर वाहन को (प्रा, यमसे) विस्तृत करते हो इस से इस के (अधि) ऊपर (तिण्ठा) स्थित हूजिए ॥३॥ भावार्थः - हे ऐश्वर्य से युक्त ! जो अयोग्य व्यवहार वाले होवें वे हम लोगों के और आप के दूर बसें और आप वाहनों के चलाने की विद्या को विशेष कर के जानें तो युद्ध में भी सामर्थ्य को प्राप्त होवें ॥३॥ फिर इन्द्र के गुणों को कहते हैं । पुरु यत्त इन्द्र सन्त्युक्था गवै चकोर्वसु युध्यन् । ततक्षे सूर्याय चिदोकसि वृषो सममुं दासस्य नाम चित् ॥४॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (वृषा) बलिष्ठ होते हुए आप (ते) आप के (यत्) जो (पुरु) बहुत (उक्था) प्रशंसित कर्म (गवे) गौ आदि पशुमों के हित के लिए (सन्ति) हैं उन को (उर्वरासु) भूमियों में और (समत्सु) सङ ग्रामों में (युध्यन्) युद्ध करते हुए (चकर्थ) करें और शत्रुओं को (ततक्षे) सूक्ष्म अर्थात् निर्बल करते हो और (सूर्याय) सूर्य के सदृश वर्तमान के लिए (चित्) भी (स्वे) अपने (मोकसि) गृह में (बासस्य) दास के (चित्) निश्चित (नाम नाम को प्रकट कीजिए ॥४॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जितनी उत्तम सामग्रियां होवें उन को सेना में म BAR RANDU wa म परw ऋग्वेदः मं०.५ । सू० ३३ ।। युद्ध के लिये स्थापित कीजिये और जो गृह के लिए वस्तु होवें उनको गृह में स्थापित कीजिए॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। वयं ते त इन्द्र ये च नरः शर्थों जज्ञाना याताश्च रथाः। आस्माऽजगम्यादहिशुष्म सत्वा भगो न हव्यः प्रभृथेषु चारुः ॥५॥ पदार्थ:-हे (अहिशुष्म) मेघ को सुखाने वाले सूर्य के सदृश वर्तमान . (इन्द्र) राजन् (ये) जो (ते) आपके (शर्थः) बल' और (जज्ञानाः) उत्पन्न तथा (याताः) प्राप्त हुए (नरः) नायक (रया:, च) और वाहन' आदि हैं (ते) वे (अस्मान्) हम लोगों को प्राप्त होवें और जो (भगः) ऐश्वर्य के योग के (न) सदृश (प्रभृथेषु) अत्यन्त धारण करने योग्यों में (हव्यः) ग्रहण करने योग्य (चारः) सुन्दर (सत्वा) स्थिर होने वाले आप हम लोगों को (आ, जगम्यात्) यथावत् प्राप्त होवें उन आप को (वयम्) हमलोग (च) भी प्राप्त होवें ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.--हे राजन् ! जब हम लोग प्राप के और पाप हम लोगों के मित्र होवें तभी हम लोगों का ऐश्वर्य बढ़ और जैसे ऐश्वर्य सब का प्रिय है वैसे ही धर्म प्रिय है और सदा रक्षा करने योग्य है ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। पपक्षेण्यमिन्द्र स्वे टोजो नृभ्णानि च नृतमानो अतः । स न एनी वसवानो रयिं दाः प्रार्थ: स्तुपे तुविमघस्य दानम् ॥६॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) विद्वन् जो (नतमानः) नृत्य करता हुआ (अमर्तः) प्रात्मभाव से मरणधर्म रहित जन (हवे) पाप में (पक्षेषयम्) पूंछने योग्य प्रोजः) पराक्रम (नगानि, च) और मनुष्यों से रमने योग्य धनों को धारण करें (सः) वह (एनीम् ) प्राप्त होने योग्य को (वसवानः) वसाता हुआ (रयिम्) धन को (दा:) दीजिये (हि) जिस से (तुविमस्य) बहुत धन के (अर्यः) स्वामी होते हुए (दानम्) दान' की (प्र, स्तुषे) प्रशंसा करते हो (सः) वह पाप (न:) हम लोगों के लिये सुख दीजिये ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग विद्वानों के प्रति पूछने योग्य प्रश्नों को कर, बल को बढ़ाय और ऐश्वर्य की वृद्धिकर के उत्तम मार्ग में दान देकर प्रशंसित विद्या और आचरण युक्त होवें ॥६॥ atta me

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३३ ॥
१२१
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फिर उसी विषय को कहते हैं ।
एवा न इन्द्रोतिभिरव पाहि गृणतः शूर कारून् ।
उत त्वचं दर्दतो वाजसातौ पिप्रीहि मध्वः सुपुतस्य चारों: ॥७॥
पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् पाप (ऊतिभिः) अन्वेक्षण आदि रक्षा आदिकों
से (एवा) ही (गृणतः) उपदेशक (कारून्) शिल्पी (न:) हम लोगों की (अव) रक्षा
कीजिये और हे (शूर) भय से रहित (वाजसातौ सङग्राम में (त्वचम्) त्वचा को
आच्छादन करने और रक्षा करने वाले कवच को (बदतः) देते हुए (सुषुतस्य) उत्तम
प्रकार संस्कार किये गये (मध्वः) मधुर और (चारो:) उत्तम जन के ऐश्वर्य का
(पाहि) पालन कीजिये और (उत) भी (पिप्रीहि) प्राप्त हूजिये ॥७॥
भावार्थ:-हे राजन् ! आप शूरवीर विद्वान् शिल्पीजनों की रक्षा
कर प्रजाओं का निरन्तर पालन कर के सङ्ग्राम में शत्रुओं को जीतकर
प्राप्त हूजिये ॥७॥
अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
उत त्ये मा पौरुकुत्स्यस्य सूरेस्त्रसदस्योहिरणियो रराणाः ।
वहन्तु मा दश श्येतांसो अस्य गौरिक्षितस्य क्रतुभिर्नु संश्चे ॥४॥
पदार्थ:--(पौरुकुत्स्यस्य) बहुत वज आदि शास्त्र और अस्त्रों को जानने वाले
के सन्तान (असदस्योः) जिस से डाकू चोर आदि डरते हैं ऐसे (हिरणिनः) सुवर्ण
धन आदि से युक्त (अस्य) इस (गौरिक्षितस्य) पर्वत में रहने वाले (सूरेः) बुद्धिमान्
जन की (क्रतुभिः) बुद्धि और कर्मों के साथ (रराणाः) रमते वा देते हुए (मा)
मुझ को (वहन्तु) प्राप्त हों (उत और भी (त्ये) वे (वा) दश संख्या परिमित
(श्येतासः) श्वेत वर्ण वाले घोड़े के सदश (मा) मुझ को प्राप्त हों उनका मैं (नु)
शीघ्र सश्चे) संबध करता हूं ।।८।।
भावार्थ:---जो सत्य धारण करने वाले और सत्पुरुष जिन के मित्र
ऐसे जन बुद्धि को बढ़ाते हुए दुष्टों का निवारण करते हैं उनके साथ मैं मेल
करता हूँ॥८॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
उत त्ये मां मारुताश्वस्य शोणाः क्रत्वांमधासो विदथस्य रातौ ।
सहस्रा मे व्यवंतानो ददौन आनूकमर्यो वपुषे नाचेत् ॥९॥

१२२ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३४ ।। --- पदार्थ:-जो (ऋत्वामघाश:) बुद्धि वा कर्म ही हैं धन जिनका वे (शोणा:) रक्त गुण से विशिष्टजन और (मारुताश्वस्य) पवनों के सदृश घोड़ों के सम्बन्धी (विदथस्य) प्राप्त होने योग्य (में) मेरे वा मेरे लिये (रातो) दान में (सहला) हजारों को (च्यवतानः) प्राप्त होता हुआ जन (उत) भी सुख देने को समर्थ हों (त्ये, वे और जो (ददानः) देता हुआ (बपुषे) सुन्दर शरीर के लिये (मा) मुझको (मानूकम्) अनुकूलतापूर्वक' (मार्चत्) आदरयुक्त' करे वह (अर्यः) स्वामी भी सब प्रकार से तिरस्कृत नहीं होता है ॥६॥ भावार्थः - हे मनुष्यो ! जो हम लोगों के अभीष्ट की सिद्धि करते हैं उनके अभीष्ट की हम लोग भी सिद्धि करें इस प्रकार स्वामी और सेवक भी वर्ताव करें॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उत त्ये मां वन्यस्य जुष्टां लक्ष्मण्यस्य सुरुचो यतानाः। मला राया संवरणश्य ऋजं न गावः प्रयता अपि ग्मन् ॥१०॥ पदार्थ:-जो (ध्वन्यस्य) ध्वनियों में कुशल और (संवरणस्य) स्वीकार किये (रायः) धन के (महा) महत्त्व से (उत) और (लक्ष्मण्यस्य) श्रेष्ठ लक्षणों में उत्पन्न (ऋषेः) मन्त्रों के अर्थ जानने वाले के संबन्ध में (प्रयताः) प्रयत्न करते हुए जन हैं (त्ये) वे (गाव:). गौवें (ब्रजम्) गोष्ठ को मे (न) जैसे (अपि) निश्चित (ग्मन्) जाती हैं वैसे महत्त्व से (मा) मुझ को भी प्राप्त होते हैं और जो (यताना:) यत्न करती हुई (सुरुचः) उत्तम प्रीति वाली मुझको (जुष्टाः) प्रसन्नता पूर्वक प्राप्त हैं उनको सब प्राप्त होवें ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं -जो मनुष्य प्रयत्न से नहीं प्राप्त हुए की प्राप्ति और प्राप्त हुए की रक्षा करते हैं वे जैसे बछड़ों को गौवें धन को प्राप्त होते हैं ॥१०॥ इस सूक्त में इन्द्र और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में तेंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ। m - अथ नवर्चस्य चतुस्त्रिशत्तमस्य सूक्तस्य संवरणप्राजापत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ भुरिक त्रिष्टुप् । ६ । ६ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः। २।४। ५ निचज्जगती । ३ । ७ जगती। म विराजगती छन्दः । निषादः स्वरः ।।

ऋग्वेदः मं०५। सू० ३४ ।। १२३ 40 - अब नव' ऋचावाले चौंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्र गुणयुक्त स्त्री पुरुष का वर्णन करते हैं । अजातशत्रमजरा स्वर्वस्यन स्वधामिता दामीयते । सुनोतन पर्चत ब्रह्मवाहसे पुरुष्टुताय प्रतरं दधातन ॥१॥ पवार्थ: :-हे मनुष्यो (स्वर्वती) सुखवाली (अमिता) अतुल' उत्तम गुणों से युक्त (स्वधा) धन को धारण करने वाली (अजरा) वृद्धावस्था से रहित युवती स्त्री जिस (अजातशत्रुम्) शत्रुओं से रहित (दस्मम्) दुष्टों के नाश करने वाले जन को (अनु, ईयते) अनुकूलता से प्राप्त होती है उस (पुरुष्टुताय) बहुतों से प्रशंसा किये गए (ब्रह्मवाहसे) धन प्राप्त कराने वाले के लिये (प्रतरम्) अच्छे प्रकार पार होते हैं दुःख के जिस से उसको (सनोतन) उत्पन्न करो और उत्तम अन्न का (पचत) पाक करो और धन आदि को (दधातन) धारण करो ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो वैररहित अत्यन्त उत्तम गुणों से युक्त और सब का हितकारी पुरुष अथवा इस प्रकार की स्त्री हो उन दोनों का निरन्तर सत्कार करना योग्य है ।।१।। अब विद्वद्विषय में पाक के गुणों को कहते हैं ।। आ यः सोमेन जठरमर्पिप्रतामन्दत मघवा मध्वो अन्धसः । यदी मृगाय इन्तवे महावधः सहस्रभृष्टिमुशना वधं धमत् ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (उशना) कामना करता हुआ (मघवा) बहुत धन से युक्त जन (सोमेन) सोमलता से उत्पन्न रस से (जठरम्) उदर की अग्नि को (मा, अपिप्रत) अच्छे प्रकार पूर्ण करे और मध्यः)मधुर आदि गुणों से युक्त अन्धसः) अन्न आदि का भोगकर के (अमन्दत) मानन्द करे और (यत्) जो (महावधः) अत्यन्त नाश करने वाला (मृगाय) हरिण को (हन्तवे) मारने के लिये (सहलभृष्टिम् ) हजारों दहन जिस से उस (वधम्) वध को (ईम्) सब प्रकार से (यमत्) देवे वह सब सुख को प्राप्त होता है ।।२।। भावार्थ:-जो मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से सोमलता आदि ओषधियों के रस के साथ संस्कारयुक्त किये गए अन्नों का भोग करते हैं वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं ॥२॥ फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ARTS N १२४ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३४ ।। श्रा MRA MIRE व APA मान . क का RU यो अस्मै घूस उत वा य ऊधनि सोम सुनोति भवति धुमाँ अहं । अपाप शक्रस्ततनुष्टिमूहति तनूशुभ्रं मघवा य कवासखः ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (अस्मै) इसके लिये (घ्र से) दिन में (उत) भी (वा) अथवा (ऊधनि) प्रभात समय में (सोमम्) जल' का (सुनोति) पान करता और (अह) विशेष करके ग्रहण करने में (शु मान्) बहुत विद्या प्रकाश वाला (भवति) होता तथा (यः) जो (श:) शक्तिमान् (ततनुष्टिम्) विस्तार की (ऊहति) तर्करणा करता और (यः) जो (कवासखः) विद्वान् जन मित्र जिसके ऐसा (मघवा) प्रशंसित धनयुक्त पुरुष (तनूशुभम्) शुद्ध शरीर वाले की तकरणा करता है वह निरन्तर दुःख को (अपाप) दूर करने की तकरणा करता है ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य दिन और रात्रि पुरुषार्थ करते हैं वे निरन्तर सुखी होते हैं ॥३॥ अब प्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यस्यावधीपितरं यस्य मातरं यस्यं शक्रो भ्राखरं नात ईषते । घेतीदस्य प्रयता यतङ्कशे न किल्बिषादीपते वस्व आकरः ॥४॥ पवार्थः-(शक्रः) सामर्थ्यवान् जन (यस्य) जिसके (पितरम्) पिता का (यस्य) जिसकी (मातरम्) माता का और (यस्य) जिसके (भ्रातरम्) भ्राता का (न) नहीं (अवधीत्) नाश करे (अतः) इस से इसका (न) नहीं (ईषते) नाश करता और (अस्य) इसके (यतङ्करः) प्रयत्न करने वाले के (न) सदृश (प्रयता) अत्यन्त दिये हुत्रों की (वेति) कामना करता है (उ) और (वस्वः) धन का (पाकर:) समूह (किल्बिषाद) पाप से पृथक् (इत्) ही (ईषते) प्राप्त होता है ॥४॥ भावार्थ:-जो पिता माता और भ्रात आदि पालन करें उनके पुत्र आदि को चाहिये कि निरन्तर सत्कार करें और जो पापाचरण का त्याग करके धर्म का प्राचरण करते हैं वे सब काल में सुखी होते हैं ।।४।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। न पञ्चभिर्दशभिर्वष्टयारमं नासुन्वता सचते पुष्यंता चन । जिनाति वेदमुया हन्ति वा धुनिरा देवयुं भजति गोमति बजे ॥५॥ पदार्थ:-जो (असुन्वता) नहीं पुरुषार्थ करने वाले से (पञ्चभिः) पाँच इन्द्रियों और (दशभिः) दशप्राणों से (आरभम्) प्रारम्भ करने की (न) नहीं HINA ऋग्वेदः म०.५ । सू० ३४ ॥ मा attach भाव ahate (वष्टि) कामना करता वह (पुष्यता) पुष्टि को करने वाले से (न) नहीं (सचते) संबन्धित होता (जिनाति, चन) और अपमान को प्राप्त होता है (वा) वा (अनुया)] इस से (हन्ति) नाश करता है (वा) वा जो (धुनिः) कंपने वाला (गोमति) बहुत गौवें विद्यमान जिस में उस (बजे) गौवों के ठहरने के स्थान में (देवयुम्) विद्वानों की कामना करने वाले का (प्रा) सब प्रकार से (भजति) आदर करता और वह सब (इव) ही सुख का भोग करता है ।।५।। भावार्थ:---जो मालस्ययुक्त जन पुरुषार्थ को नहीं करते हैं वे अभीष्ट सिद्धि को नहीं प्राप्त होते हैं ॥५॥ अब इन्द्र के सादृश्य से राजगुणों को कहते हैं ।। वित्वक्षणः समृतौ चक्रमासजोऽसुन्वतो विपुणः सुन्वतो वृधः । इन्द्रो विश्वस्य दमिता विभीषणो यथावर्श नयति दासमायः॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे वृधः) बढ़ाने वाला (इन्द्रः) बिजुली के सदृश राजा (विश्वस्य) सम्पूर्ण जगत् का (दमिता) दमन करने और (विभीषणः) भय देने वाला है वैसे (वित्वक्षणः) विशेष कर के दु.ख का नाश करने वाला (समृतौ) संग्राम में (चक्रमासजः) कालरूपचक्र के महीनों से उत्पन्न हुआ जन विषुण:) विद्या में व्याप्त और (सुन्वतः) यज्ञ करने और असुन्वतः) नहीं यज्ञ करने वाले का दमन करने वाला होता हुआ (मार्य:) ब्राह्मण क्षत्रिय वा वैश्य वर्ण पायं राजा (ययावशम्) यथाशक्ति (दासम्) सेवक शुद्र को (नयति) प्राप्त करता है ॥६॥ भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य प्रार्यों तथा उत्तम गुण कर्म और स्वभाव वालों का शूद्र सेवक होता है वैसे ही उत्तम गुण कर्म से युक्त राजा की प्रजा सेवन करने वाली होती है ॥६॥ फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। समी पणेरैजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसुं । दुर्गे चन धिंयते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुकुधत् ॥७॥ पदार्थ:-हे राजन् जो (पणेः) स्तुति किये गए के (भोजनम्। पालन वा अन्न प्रादि को (अजति) प्राप्त होता और (मुषे) चोर के लिये दण्ड को और (बाशुषे) दानशील के लिये दान (चन) भी (सम्) उत्तम प्रकार (वि, भजति) बांटता है तथा (यः) जो (अस्य) इस शत्रुजन की (तविषीम्) सेना को (अचुक्रुधत्) ऋग्वेदः मं० ५ । सू. ३४ ।। अत्यन्त ऋद्धित करता है वह (ईम्) सब प्रकार से (विश्व:) सम्पूर्ण (जन:) मनुष्य (दुर्ग) दु:ख से प्राप्त होने योग्य व्यवहार वा उत्तम कोट में (पुरु) बहुत' (सूनरम्) उत्तम मनुष्य जिस में उस (वसु) धन का (प्रा) सेवन करता है और राजा से (प्रियते) धारण किया जाता है ॥७॥ भावार्थः --जो राजा चोर डाकू आदि जनों के लिये कठिन दण्ड और श्रेष्ठ जनों के लिये प्रतिष्ठा देता है उस का राज्य धन आदि से युक्त हुआ वृद्धि को प्राप्त होता है और उस का इस संसार में यश और परलोक में सुख होता है ॥७॥ फिर पूर्वोक्त विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। सं यज्जनौं सुधनौ विश्वशंर्घसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु । युजं ह्य'न्यमकृत प्रवेपन्युीं गव्यं मृजते सत्त्वभिधुनिः ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (धुनिः) कंपने वाला (मघवा) अत्यन्त' श्रेष्ठ बहुत धन से युक्त (इन्द्रः) राजा और (यत्) जो (सुधनी) धर्म से उत्पन्न श्रेष्ठ धन से तथा (विश्वशर्धसौ) संपूर्ण बल' से युक्त (जनौ) दो जनों को (सम्, अवेत्) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे और (शुभ्रषु) उत्तम गुण वाले (गोषु) धेनु और पृथिवी आदिकों में (हि) जिस से (युजम्) युक्त (अन्यम्) अन्य को (अकृत) करता है और (प्रवेपनी) चलती हुई (गव्यम्) गौनों के लिये हितकारक (ईम्) जल' को (सत्त्वभिः) पदार्थों से (उत, सृजते) उत्पन्न करता है वह सुख करने वाला होता है ॥८॥ भावार्थ:-राजा को चाहिये कि अपने राज्य में उत्तम धनी विद्वान् तथा अध्यापक और उपदेशकों की उत्तम प्रकार रक्षा कर के उन से व्यवहार धन और विद्या की उन्नति करें।।८।। फिर उसी विषय को कहते हैं । सहस्रसामामिवेधि गृणीषे शत्रिमन उपमां केतुमर्य: तस्मा आपः संयतः पीपयन्त तस्मिन्क्षत्रममवत्त्वेषमस्तु ।।९।। पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी राजन् (अर्यः) स्वामी आप (सहस्रसाम्) असंख्य पदार्थों के विभाग करने (प्राग्निवेशिम्) अग्नि को प्रवेश कराने और (शत्रिम्) दुःख के नाश करने वाले (उपमाम्) दृष्टांत और (केतुम्) बुद्धि की (गणीषे) स्तुति करते हो (तस्मै) उन आप के लिये (प्रापः) जलों के सदृश प्रजायें (संयतः) इन्द्रियों के निग्रह से युक्त हुई (पीपयन्त) तृप्ति करती हैं (तस्मिन्) उन

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३५॥
१२७
आप राजा में (अमवत) गृह के तुल्य (त्वेषम्) प्रकाश से युक्त (क्षत्रम्) धन वा
राज्य (अस्तु) होवें ॥६॥
भावार्थ:-इस' मन्त्र में वाचकलु० - जो राजा होने की इच्छा करे तो
सर्व शास्त्रों में प्रविष्ट हुई स्वच्छ और उत्तम गुणों से युक्त बुद्धि को प्राप्त
होकर जैसे पितृजन पुत्रों का पालन करते वैसे प्रजानों का पालन करे ऐसा
करने पर श्रेष्ठ राज्य बढ़े ॥६॥
इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ
की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह
पंचम मण्डल में चौंतीसवां सूक्त समाप्त हुअा।।
-
Anta
अथाष्टर्चस्य पञ्चत्रिशतमस्य सूक्तस्य प्रभूवसुराङ्गिरसो ऋषिः । इन्द्रो
देवता । १ निचुदनुष्टुप् । ३ भुरिगनुष्टुप् । ७ अनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः । २
भुरिगुष्णिक । ४ । ५। ६ स्वराडुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः। ८ भुरिग्बृहती
छन्दः । मध्यमः स्वरः॥
अब आठ ऋचा वाले पैंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम
मंत्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुरणों का वर्णन करते हैं ।
यस्ते साधिष्ठोऽवस इन्द्र क्रतुष्टमा भर ।
अस्मभ्य चर्षणीसहं सस्नि वाजेषु दुष्टरम् ॥१॥
पदार्थ:-हे (इन्द्र) सूर्य के सदृश न्याय से प्रकाशित राजन् (य:) जो ते)
आप की (अवसे) रक्षा आदि के लिये (साधिष्ठः) अत्यन्त श्रेष्ठ (क्रतुः) बुद्धि है
(तम्) उस (चर्षणीसहम्) मनुष्यों को सहने वाले (सस्निम्) ब्रह्मचर्यव्रत और विद्या
के ग्रहण से पवित्र (वाजेषु) और संग्रामों में (दुष्टरम्। दुःख से उल्लंघन करने योग्य
को (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (श्रा, भर) सब प्रकार धारण करिये ॥१॥
भावार्थ:-वही राजा उत्तम होवे जो दीर्घ ब्रह्मचर्य से यथार्थवक्ता
जनों से विद्या और विनय को ग्रहण करके न्याय से राज्य की शिक्षा
देवे॥१॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
यदिन्द्र ते चतस्रो यच्छूर सन्ति तिस्रः
यद्वा पञ्च क्षितीनामवस्तत्सु न आ भर ॥२॥

१२८ ऋग्वेदः म० ५ । सू० ३५ ॥ iroe पदार्थ:--हे (शूर) वीर (इन्द्र) राजन् (यत्) जो (ते) आप की (चतत्रः) चार साम दाम दण्ड और भेद नामक वृत्ति और (यत्) जो (तिस्त्रः) तीन उत्तम प्रकार शिक्षित सभा सेना और प्रजा और (पञ्च) पृथिवी अप् तेज वायु आकाश पांच तत्त्व (सन्ति) हैं (वा) वा (यत्) जो (क्षितीनाम्) मनुष्यों का (अवः) रक्षण आदि है (तत्) उसको (न:) हम लोगों के लिए (सु) उत्तमता से (मा, भर) सब प्रकार धारण करो वा पुष्ट करो ॥२॥ भावार्थ:-वही राज्य बढ़ाने को समर्थ होवे कि जो राज्य के अङ्ग सब पूर्ण उत्तम प्रकार ग्रहण करे ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। आ तेऽवी वरेण्यं वृषन्तमस्य हूमहे । वृषजूतिहि जंज्ञिचे आभूभिरिन्द्र तुर्वणिः ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् (हि) जिस से (वृषजूति:) बृष के वेग के सदृश वेग से युक्त (तुर्वणिः) शीघ्रकारी और श्रेष्ठ गुणों से युक्त मंत्रियों की याचना करने वाले आप (माभूभिः) जो विद्या और विनय में सब ओर से प्रकट होते हैं उन के साथ (जशिषे प्रकट होते हो उन' (वृषन्तमस्य) अत्यन्त बलिष्ठ (ते) आप के (वरेण्यम्) अतीव उत्तम (अव:) रक्षण' आदि कर्म का हम लोग (ओ, हूमहे) उत्तम प्रकार से स्वीकार करते हैं ।।३।। भावार्थ:-हे राजन् ! जिस से आप उत्तम गुण, कर्म और स्वभाव- वाले हो और पितृजन जैसे सन्तानों को वैसे हम लोगों का पालन करते हो इस से आप को राजा हम लोग मानते हैं ॥३॥ अब प्रजा विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वृषा ह्यसि राधसे जज्ञिषे णि ते शवः । स्वक्षत्र ते धृषन्मनः सत्राहमिन्द्र पौंस्यम् ॥४॥ पदार्थः -- है (इन्द्र) बलवान् पुरुष ! (हि) जिससे आप (वृषा) बलिष्ठ वा सुख के वर्षाने वाले (असि) हैं और (राधसे) धनरूप ऐश्वर्या के लिये (जशिः प्रकट होते हो जिन (ते) आप का (वृष्णि) सुख वर्षाने वाले (शवः) बल और (स्वक्षत्रम्) अपना राज्य वा अपना क्षत्रियकुल जिन (ते) आप का (धृषत्) प्रगल्भ अर्थात् धृष्ट (मनः) चित्त जिन आप का (सत्राहम्) सत्य धर्म के प्राचरण का प्रकट करने वाला दिन और (पौंस्यम्) पुरुषों के लिये हितकारक बल है उन आप को हम लोग राजा मानते हैं ॥४॥ . A8- ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३५ ।। १२४ DIDWAR भावार्थ:--प्रजाओं को चाहिये कि जो बलवान् पूर्ण विद्या विनय और बल से युक्त, शूरता आदि गुणों से धृष्ट, सदा न्याय और धर्माचरण- युक्त हो उसी को राजा मानें ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स्वं तमिन्द्र मत्यममित्रयन्तमद्रिवः । सर्वरथा शतक्रतो नि याहि शवसस्पते ॥५॥ पदार्थः- (शवसः) बल अर्थात सेना के (पते) पालक सेना के स्वामिन् (शतक्रतो) अमित बुद्धि वाले (अद्रिवः) मेघयुक्त सूर्य के सदृश राजमान (इन्द्र) ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले प्रजाजन (सर्वरथा) संपूर्ण वाहनों से युक्त. (त्वम्) आप (तम्) उस (अमित्रयन्तम्) शत्रु के सदृश आचरण करते हुए (मयम्) मनुष्य- शरीरधारी को विजय करने के लिये (नि) अत्यन्त (याहि) प्राप्त हूजिये ॥५॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो अन्याय से आप का शत्रु होवे उस के शासन के लिए बल के सहित आप नित्य प्राप्त हूजिए ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । त्वामित्रहन्तम जनांसो वृक्तबहिषः । उग्रे पूर्वीषु पूर्य हवन्ते वाजसातये ।।६।। पदार्थ:-हे (वृत्रहन्तम) अतिशय कर के धन को प्राप्त होने वाले राजन् (वृत्तबहिषः) विदीर्ण किया है हवन किये हुए पदार्थों से अन्तरिक्ष को जिन्होंने ऐसे ऋत्विक (जनासः) प्रसिद्ध पुण्यात्मा जन (वाजसातये) संग्राम वा अन्न आदि के विभाग के लिए (उपम्) दुष्टों में कठिन स्वभाव वाले और (पूर्वीषु) प्राचीन प्रजानों में (पूर्व्यम्) पूर्व राजाओं से किया गया सत्कार जिनका ऐसे (स्वाम) आप की (हवरते.) स्तुति करते वा ग्रहण करते हैं वह आप उन की सर्वदा (इव) ही उत्तम प्रकार रक्षा कीजिए ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो प्रतिष्ठित क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न हुआ विद्या और विनय आदि से युक्त और प्रजा के पालन में तत्पर इच्छा जिस की ऐसा होवे उस को राजा मानो ॥६॥ फिर प्रजाविषय को कहते हैं । अस्माकमिन्द्र दुष्टर पुरोयावानमाजिषु । सयार्वानं धधने वाजयन्तमवा रयम् ॥७॥ MS ऋग्वेदः मं० ५। सू०३६ ॥ MPAN पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् पाप (अस्माकम्) हम लोगों के (दुष्टरम्) शत्रुओं से दुःख से पार होने योग्य (पुरोयावानम्) नगर को चलते हुए (प्राजिषु) संग्रामों में (धनेधने) धन धन में (सयावानम्) सेना आदि के साथ चलते हुए (वाज- यन्तम्) किया अन्वेक्षण जिस का ऐसे (रथम्) सुन्दर वाहन की (अवा) रक्षा करो ॥७॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो आप हम लोगों के नगर और राज्य की यथावत् रक्षा करने को समर्थ होवें तो हम लोगों के राजा होवें ॥७॥ अब राजद्वारा विद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अस्माकमिन्द्रेहि नो रथमवा पुरन्ध्या । वयं शविष्ठ वार्य दिवि श्रवौ दधीमहि दिवि स्तोम मनामहे ॥८॥ पदार्थ:-हे (शविष्ठ) अत्यन्त बल से युक्त (इन्द्र) राजन् पाप (पुरन्ध्या) बहुत विद्या को धारण करने वाली बुद्धि से (अस्माकम् ) हम लोगों के (रथम्) बहुत प्रकार के वाहन को (प्रा, इहि) प्राप्त हूजिए और (नः) हम लोगों का निरन्तर (प्रवा) पालन कीजिये जिस से (वयम्) हम लोग (विवि) मनोहर राज्य में (वाय्यम्) स्वीकार करने योग्य (श्रवः) श्रवण वा अन्न को (दधीमहि) धारण करें और (दिवि) प्रशंसा करने योग्य राज्य में (स्तोमम्) सम्पूर्ण शास्त्र के पढ़ने और पढ़ाने को । मनामहे) जानें ॥८॥ भावार्थ:-वही प्रजा का प्रिय होता है जो राजा न्याय से प्रजाओं का उत्तम प्रकार पालन करके विद्या और उत्तम शिक्षा की प्रजानों में प्रवृत्ति करे।८॥ इस सूक्त में इन्द्र राजा प्रजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम भण्डल में पैंतीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ षड्चस्य षट्त्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य प्रभूवसुराङ्गिरस ऋषिः । इन्द्रो देवता १।४।५ निचवत्रिष्टुप् । २ । ६ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ जगती छन्दः । निषावः स्वरः॥ अब छः ऋचा बाले छत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजविषय को कहते हैं ।।

ऋग्वेदः म० ५ । सू० ३६ ।। १३१ के सदृश और namaA 440 anta स आ गंभदिन्द्रो यो वसूनां चिकंतदातुं दामनो रयीणाम् । धन्वचरो न वसंगस्तृवाणश्चकमानः पिबतु दुग्धमंशुम् ।।१।। पदार्थः -- हे मनुष्यो (यः) जो (इन्द्रः) दाता (वसूनाम्) द्रव्यों के (वातुम्) देने को (चिकेतत्) जानता और (रयिणाम्) धनों की (वामनः) देनेवालियों को जानता है (सः) वह (तृषाण:) पिपासा से व्याकुल और (धन्वचरः) अन्तरिक्ष में चलने वाले के (न, सदृश (वंसगः) सत्य और असत्य के विभाग करने वालों को प्राप्त होने वाला और (चकमानः) कामना करता हुआ हम लोगों को (आ) सब प्रकार से (गमत्) प्राप्त होने और (अंशुम्) प्राणों के देने वाले (दुग्धम्) दुग्ध का (पिबतु) पान करे ॥१॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं० -मनुष्यों को चाहिये कि जो धन देने, विचार करने, सत्य की कामना करने और मर्यादा को चाहने वाला होवे उसी को राजा मानें ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ ते हन हरिवः शूर शिप्रे रुहत्सोमो न पर्वतस्य पृष्ठे । अनु त्वा राजन्नवतो न हिन्वन् गीर्भिर्मदेम पुरुहूत विश्वे ॥२॥ पदार्थ:-हे (हरिवः) अच्छे मनुष्यों से युक्त (शूर) शत्रुओं के नाश करने बाले (पुरुहूत) बहुतों से सत्कार किये गये (राजन्) राजन जिन (ते) आप का (शिप्रे) उत्तम प्रकार शोभित (हनू) मुख और नासिका (गोभिः) सत्य से उज्ज्वल वारिणयों से (हिन्वन्) चलवाता हुमा (अर्वतः) घोड़ों के (न) सदृश और (पर्वतस्य) पर्वत के (पृष्ठे) ऊपर (सोमः) सोमलता के (न) सदृश व्यवहार (श्रा, रहत) प्रकट होता है उन (स्वा) आप को (विश्वे) सब हम लोग (अनु, मदेम) आनन्दित करें तथा पाप हम लोगों को आनन्दित करिये ॥२॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं० -जो राजा सत्सङ्ग करता है वह पर्वत में सोमलता के सदृश सब ओर से वृद्धि को प्राप्त होता है ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। चक्रं न वृत्तं पुरुहूत वेपते मनों मिया मे अमतेरिदद्रिवः रथादधि त्वा जरिता संदाध कुविन्नु स्तोपन्मघवन् पुरूवसुः ॥३॥ पदार्थ:-हे (अद्रिवः) मेधयुक्त सूर्य के सदृश वर्तमान (पुरुहूत) बहुतों में BE कमा ऋग्वेदः मै० ५ । सू० ३६ ॥ सत्कार पाये हुए (मघवन्) बहुत धनों से युक्त (सदावृध। सदावृद्धि करने वाले राजन् जिस कारण (श्रमतेः, मे) मुझ निर्बुद्धि का (इद) ही (मनः) चित्त (रथात) वाहन से (वृत्तम्) वर्ते हुए (चक्रम् ) चक्र के (न) सदृश (भिया) भय से (वेपते) कंपता है उस कारण का श्राप निवारण कीजिये और जो (कुवित्) महान् (पुरूवसः) असस्य धन से युक्त (जरिता) स्तुति करने वाला (त्या) आप की (नु) निश्चय (अधि, स्तोषत्) स्तुति करे उसका आप सत्कार करें ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं. -जो राजा चोर और वाले जनों का प्रयत्न से न निवारण करे और श्रेष्ठ जनों का न सत्कार करे तो भय के उद्भव से प्रजायें व्याकुल होवें ॥३॥ अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। एष ग्रावेव जरिता त इन्द्रेयचि वाचं बृहदांशुषाणः । प्रसव्येन मघवन्यसि राया प्रदक्षिणिद्धरियो मा वि वेनः ॥४॥ साहस करने पदार्थ:-हे (हरिवः) उत्तम मन्त्रियों से और (मधवन्) धन से युक्त (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करने वाले राजन् जो (ते) पाप का (एषः) यह (जरिता) सम्पूर्ण विद्याओं की प्रशंसा करने वाला (मावेव) मेघ के सदृश वाचम्) उत्तम शिक्षा युक्त वाणी को (इत्ति) प्राप्त होता है वह (बृहत्) बड़े को (प्राशुषाण:) व्याप्त होता हुआ (सोन) वाम अोर से (प्र; दक्षिणित) उत्तम प्रकार दहिने भाग से चनने वाला (रायः) धन के (प्र, यसि) उत्तम प्रकार प्राप्त होने वा नियम करने वाले हो वह माप (वि) विशेष कर के (वेनः) कामना करने वाले (मा) न हूजिये ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जो बड़े विद्वान् जन वाणी को ग्रहण कर वा ग्रहण कराय के इन्द्रियों के निग्रह करने वाले होते हैं वे निष्फल मनोरथ वाले नहीं होते हैं किन्तु सत्यकाम और असत्य के द्वषी निरन्तर वर्तमान हैं ।।४।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । कृपा त्वा वृषणं वर्षतु द्यौपा दृषभ्यां वहसे हरिभ्याम् । स नो वृषा वृषरया मुशिप वृषक्रतो दृषां वजिन्भरें धाः॥५ पदार्थ:-हे (सुशिप्र) उत्तम कमल के समान मुखवाले (वृषकतो) बल- वानों की बुद्धि और कम्मों के सदृश बुद्धि और कम्मं जिस के वह (वचिन्) शस्त्र ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३७ ।। Dom SE और अस्त्र के ज्ञान से युक्त राजन् जो (वृषा) सुख' वर्षाने वाला (वृषणम्) बलिष्ठ (स्वा) आप को (वर्धतु) बढ़ावे और जो (वृषा) वृष के समान बलवान् आप (द्यौः) सत्य कामना वाले के सदृश (वृषभ्याम् ) बल' से युक्त (हरिभ्याम्) हरणशील हस्तों से (वहसे) प्राप्त होते वा प्राप्त कराते हो (सः) वह (वृषा) दुष्टों की शक्ति रोकने वाला और पाप वृषरथः) बलिष्ठ बैल' रथ में जिनके ऐसे (वृषा) विद्या के बर्षाने वाले (नः) हम लोगों को ( (भरे) संग्राम में (धा:) धरिये धारण कीजिये || भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विद्वान् तुम लोगों को सर्वदा बढ़ाते हैं उनको आप सग्राम में विजय के लिये प्रेरणा दीजिये ॥५॥ अब शिल्पिकार्य विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। यो रोहितौ वाजिनौ वाजिनीवान्त्रिभिा शतः सर्चमानावदिष्ट । यूने समस्मै क्षितयों नमन्तां श्रुतरंथाय मरुतो दुवोया ।।६।। पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो (यः) जो (वाजिनीवान्) वेग की क्रिया का जानने वाला (त्रिभिः) तीन (शतः) सैकड़ों से (अस्मै) इस (यूने) युवा पुरुष के लिये (सचमानौ) मिले हुए (दुवोया) जो परिचरण को प्राप्त होते हैं उन (वाजिनौ) बड़े वेगवाले (रोहितो) बिजुली और प्रसिद्ध अग्नि का (अविष्ट) उपदेश देवे उस (श्रु तरथाय) सुने गए वाहन जिस के उसके लिये (क्षितयः) मनुष्य (सम्, नमन्ताम्) अच्छे प्रकार नम्र होवें ॥६॥ भावार्थ:--जो विमान आदि वाहन के कार्यों में अग्नि आदि पदार्थों का संप्रयोग करते हैं वे जितने तीन सौ घोड़ों से वाहन को शीघ्र पहुंचाते हैं उतना बल उस कला में होता है और जो इस प्रकार शिल्पविद्या के कृत्यों में प्रसिद्ध होते हैं उनका सत्कार सब करते हैं ॥६॥ इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् और शिल्ली के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में छत्तीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ पञ्चर्चस्य सप्तत्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य अत्रिऋषिः । इन्द्रो देवता। निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ विरात्रिष्टुप् । ३ । ४ । ५ निवृत्त्रिष्टुप्- छन्दः । धैवतः स्वरः॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३७ ।। - अब पांच ऋचावाले सैंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्र विषय को कहते है ।। सं भानुना यतते सूर्यस्याजुह्वांनो घृतपृष्ठः खञ्चाः । तस्मा अमृध्रा उषसो व्युच्छान्य इन्द्राय सुनवामेत्याहं ॥१॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो (यः) जो (आजह्वानः) आह्वान किया गया (घृतपृष्ठः) जल जिसके पीठ पर ऐसा (स्थञ्चाः) उत्तम प्रकार चलने वाला अग्नि (सूर्यस्य) सूर्य की (भानुना) किरण से (सम्) उत्तम प्रकार (यतते) प्रयत्न करता और जो (अमृध्राः) नहीं हिंसा करने वाली (उषसः) प्रभात वेलाओं को (वि, उच्छान्) वसावे और जो इस विद्या को जानता है (तस्मै) उस (इन्द्राय) ऐश्वर्य युक्त जन के लिये जो (माह) उपदेश देता है (इति) इस प्रकार हम लोग उसको (सुनवाम) उत्पन्न करें ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विजुली सूर्य के प्रकाश के साथ वर्तमान है उसको प्रादि से लेकर विद्या का जो उपदेश देवे वह हमलोगों की उन्नति करने वाला होता है यह हमलोग जानें ॥१॥ अब शिल्ली विद्वान् के विषय को कहते हैं । समिद्धाग्निवनवस्तीर्णबहिर्युक्तांवा सुतसोमो जराते । ग्रावाणो यस्यैषिरं वदन्त्ययंदध्वर्युईविषाव सिन्धुम् ॥२|| पदार्थ:-हे विद्वान् जो (स्तीर्णबहिः) स्तीर्णबहि अर्थात् आच्छादित किया अन्तरिक्ष जिसने ऐसा और (युक्तग्रावा) युक्त मेघ जिस से (सुतसोमः) तथा प्रकट हुआ चन्द्रमा जिस से (समिद्धाग्निः) वह प्रदीप्त हुआ अग्नि संपूर्ण पदार्थों का (वनवत्) सम्भोग करता है (यस्य) जिसके (इषिरम्) गमन को (प्रावाणः) मेघ (वदन्ति) शब्द से सूचित करते हैं जिसको (अध्वयुः शिल्पविद्या की कामना करता हुअा जन (हविषा) अग्नि में छोड़ने योग्य सामग्री से (सिन्धुम्) समुद्र को (भव, प्रयत्) प्राप्त होता और (जराते) स्तुति करता है उस अग्नि का कार्यों में संप्रयोग करो ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जो अग्नि सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त और बहुत उत्तम गुण और क्रियावान् है उसको जानकर कार्यो को सिद्ध करो ॥२॥ अब युवावस्थाविवाह विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । NOR - मार ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ३७ ।। -- वधूरियं पतिमिच्छन्त्येति य ई वहांते महषीमिषिराम् । आस्य श्रवस्याद्रय आ चं घोषात्पुरू सहस्त्रा पार वर्चयाते ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जैसे (इयम्) यह (पतिम्) पति की (इच्छन्ती) इच्छा करती हुई (वधूः) स्त्री प्रिय स्वामी को (एति) प्राप्त होती है और (य:) जो स्त्री को प्राप्त होने वाला प्रिय (इषिराम्) प्राप्त होती हुई (महिषीम्) बहुत श्रेष्ठ गुण वाली स्त्री को प्राप्त होता है और जैसे वे दोनों सम्पूर्ण गृहकृत्य को (वहाते) चलावें वैसे (ईम्) जल' वा सम्पूर्ण पदार्थों को अग्नि से चलाया गया (रथः) वाहन चलाता है वह (अस्य) इसके (मा, श्रवस्याद) प्रात्मा के श्रवण की इच्छा करने वाले से (घोषात्, च) और शब्द द्वारा (पुरू) बहुतों और (सहला) हजारों के (परि) सब ओर (पा, वर्तयाते) अच्छे प्रकार वर्तमान है ।।३।। भावार्थः ---इस मन्त्र में वाचकलु० जैसे किया ब्रह्मचर्य जिन्होंने ऐसे स्त्री और पुरुष परस्पर पति और स्त्रीभाव की इच्छा करते हैं तथा परस्पर प्रसन्न प्रिय होकर संयुक्त हुए गृहाश्रम के व्यवहार को उत्तम रीति से पूर्ण करते हैं वैसे ही जल और अग्नि संप्रयुक्त किये गए सम्पूर्ण व्यवहार को सिद्ध करते हैं और बहुत कोसों से भी मुहूर्त मात्र में वाहन आदि को शीघ्र पहुंचाते हैं यह सबको जानना चाहिये ॥३॥ अब शीघ्रयानचालनविषय को कहते हैं। न स रामा व्यथते यस्पिन्निन्द्रस्तीवं सोमं पिबति गोसखायम् । आ सत्वनैरजति हन्ति वृत्रं क्षेति क्षितीः सुभगो नाम पुष्यन् ।।४।। पदार्थ:--'यस्मिन्) जिस राजा में (इन्द्रः) विजुली गोसखायम्) भूगोल है मित्र जिसका उस तीवम्) तीन (सोमम्) जल' का (पिबति) पान करती (सत्वनैः) और रथ आदि द्रव्यों से (प्रा, अजति) आती और (वृत्रम्, मेघ का (हन्ति) नाश करती है (सः) वह (राजा) राजा (सुभगः) सुन्दर ऐश्वर्य जिस से उस (नाम) प्रसिद्ध को पुष्यन्) पुष्ट करता हुआ (क्षितीः) मनुष्यों को (क्षेति) वसाता है वा ऐश्वर्य करता और (न) न (व्यथते) भय व पीड़ा को प्राप्त होता है ॥४॥ भावार्थः जिस राजा के वश में भूमि, जल अग्नि और पवन हैं उस राजा को किसी शत्रु आदि से भय कभी नहीं होता और वह राजा यशस्वी और प्रसिद्ध इस जगत् में होता है ॥४॥ अब विद्य विद्याविषय' को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३८॥ ta waper ON पुष्यात्क्षेमे अभि योगें भवात्युभे वृतौ संयती सं जयाति । प्रियः सूय्य मियो अग्ना भवाति य इन्द्राय सुतसोमो ददाशत् ॥५॥ - पदार्थ:-(यः) जो (सूर्य) सूर्य में (प्रियः) कामना करने वाला (अग्ना) अग्नि में (प्रियः) कामना करता हुआ (भवाति) प्रसिद्ध होवे तथा (मेमे) रक्षण में और (योगे) अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति के लक्षण में (अभि) सन्मुख (पुष्यात) पुष्टि करे तथा (वृतौ) आच्छादन करने में (उभे) दोनों (संयती) मिली हुइयों को जानकर (भवाति) प्रसिद्ध होवे और (सुतसोमः) एकत्र किया ऐश्वर्य जिस ने ऐसा जन (इन्द्राय) ऐश्वर्य की वृद्धि के लिये (ददाशत्) देवे वह जन शत्रुओं को (सम्, जयाति) अच्छे प्रकार जीते ॥५॥ भावार्थ:-जो मनुष्य अग्नि आदि की विद्या की कामना करते हुए योग क्षेम के साधन में चतुर, दाता और न्याय में प्रीति करने वाले होवें वे ही दुष्टों को जीतने को समर्थ होवें ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, शिल्पी, विद्वान् और युवावस्था में विवाह का वर्णन, शीघ्र वाहन का चलाना और विजुली की विद्या का वर्णन किया। इससे इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में सैतीसवां सूक्त समाप्त हुमा॥ MOS अथ पचर्चस्याष्टात्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य अत्रिऋषिः । इन्द्रो देवता। मनुष्टुप् । २ । ३ । ४ निवृधनुष्टुप् । ५ विराउनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । अब पांच ऋचा वाले अड़तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में इन्द्र के गुणों को कहते हैं। राधसो विश्वी रातिः शतक्रतो । अर्धा नो विश्वचर्षणे द्युम्ना सुक्षत्र मंहय ॥१।। पदार्थ:-हे (विश्वचर्षणे) सम्पूर्ण देखने योग्य पदार्थों के देखने वाले (शत- ऋतो) अनन्त बुद्धि से युक्त और (सुक्षत्र) सुन्दर क्षत्र वा द्रव्य वाले (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्या से युक्त जिन (ते) पाप के (उरोः) बहुत (राधसः) धन का (विम्वी) व्याप्त होने वाला (रातिः) दान है (अघा) इस के अनन्तर न्याय से प्रजाओं का पालन हो वह पाप नः) हम लोगों को (घुम्ना) पशु वा धन से (मंहय) बड़े करिये ॥१॥ भावार्थ:-जो पूर्णविद्या से युक्त असंख्य धन देने और संपूर्ण व्यवहारों ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३८ ॥ को जानने वाला अत्यन्त ऐश्वर्य युक्त उत्तम स्वभाव और नम्रता से युक्त होवे वह राजा प्रजानों के पालन करने को समर्थ होवे ॥१॥ अब विद्वद्विविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यदीमिन्द्र श्रवाय्यमिर्ष शविष्ठ दधिषे । पप्रथे दीर्घश्रुत्तमं हिरण्यवर्ण दुष्टरम् ॥२॥ पदार्थ:-हे (शविष्ठ) अतिबलयुक्त और (हिरण्यवर्ण) सुवर्ण को स्वीकार करने वाले (इन्द्र) दुःख के नाश करने वाले (यत्) जो (श्रवाथ्यम) सुनने के योग्य और (दुष्टरम्) दुःख से तरने योग्य (इषम्) अन्न आदि को (पप्रथे) प्रकट करता है उस (ईम्) प्राप्त होने योग्य और दुःख से तरने योग्य (दीर्घश्रुत्तमम्) अतिकाल' से अधिक तम सुनने वाले को आप (दधिषे) धारण करते हो ॥२॥ भावार्थः --हे राजन् ! जो पूर्ण विद्या से युक्त धन धान्य पशु प्रजाओं का बढ़ाने और ब्रह्मचर्य से बड़ा पराक्रम वाला है उसी को राजकर्मचारी कीजिये ॥२॥ JABAD अब राजप्रजाधर्मविषय को अगले मन्त्र मैं कहते हैं ।। शुष्मासो ये ते अद्रिवो मेहना केतसापः । उभा देवावभिष्टये दिवश्च मिश्च राजयः ॥३॥ पदार्थः - हे (अद्रिवः) मेघों के सदृश पर्वत हैं जिस के राज्य में ऐसे राजन् जैसे (उभा) दोनों, सूर्य और चन्द्रमा (देवी) उत्तम गुण कर्म और स्वभाव वाले (दिवः) अन्तरिक्ष (च) और (ग्मः) पृथिवी के (च) भी मध्य में प्रकाशित हैं (ये) जो (शुष्मासः) अधिक बलयुक्त केतसाप:) बुद्धि से सम्बन्ध रखने वाले जन (ते) वे (अभिष्टये) इष्टसिद्धि के लिये (मेहना) वर्षण से प्रजाओं में हैं वह प्रजा और आप निरन्तर (राजथः) प्रकाशित होते हैं ॥३॥ भावार्थ:-जैसे सूर्य और चन्द्रमा सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करते हैं वैसे ही राजा और प्रजा मिल के सम्पूर्ण राजधर्म को प्रकाशित करें ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। उतो नो अस्य कस्य चिदक्षस्य तवं वृत्रहन् । अस्मभ्यं नृभ्णमा मंरास्मभ्यं नृमणस्यसे ॥४॥ पदार्थ:-हे (वृत्रहन्) जैसे सूर्य मेघ का नाश करता है उसके सदृश वर्तमान ayee WH N as

१३८
ऋग्वेदः मं० ५ । सू०३६ ॥
(तव) आप का और (न:) हम लोगों के (उतो) भी (अस्य) इस के (कस्य) किस
के (चित्) भी (दक्षस्य) बलसम्बन्धी (नमणस्यसे) अपने धन की इच्छा करते हो
वह अाप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये, (नम्णम्) मनुष्य रमते हैं जिसमें उस
धन का (मा, भर) धारण कीजिये और (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये अभय
दीजिये ॥४॥
भावार्थ:-वही श्रेष्ठ मनुष्यों में मुख्य हो जो राज्य के रक्षण में
तत्पर होकर वर्ताव करे ॥४॥
फिर उसी विषय को कहते हैं।
न त आमिरभिष्टिभिस्तव शर्मन्छतक्रतो ।
इन्द्र स्थान सुगोपाः शूर स्याम सुगोपाः ॥५.।
पदार्थः - हे (शतऋतो) अत्यन्त बुद्धि वाले (इन्द्र) राजन् (ते) आप
(माभिः) इन वर्तमान (अभिष्टिभिः) इष्ट पदार्थों की इच्छाओं से (तव) आप के
शर्मन्) गृह में हम लोग (सुगोपाः) उत्तम प्रकार रक्षा करने वाले (स्थाम) होवें।
और हे (शूर) भय से रहित राजन् पाप के राज्य वा संग्राम में हम लोग सुगोपा:)
यथावत् प्रजा के पालन करने वाले (न) विश्चय (स्याम) होवें ॥५॥
भावार्थ:-हे राजन् ! हम लोग सत्य प्रतिज्ञा और प्रीति से प्राप के
गृह, शरीर, राज्य, और सेना के सदा ही रक्षक होके कृतकृत्य होवें ॥५॥
इस सूक्त में इन्द्र विद्वान् राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के
अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह पंचम मण्डल में अड़तीसवां सूक्त समाप्त हुप्रा ।।
।
अथ पञ्चर्चस्यैकोनचत्वारिंशतमस्य सूक्तस्याऽत्रिऋषिः । इन्द्रो देवता।
विराउनुष्टप् । २।३ । निवृदनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । ४ स्वराष्णिक् छन्दः ।
ऋषभः स्वरः । ५ बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः ।।
अब पांच ऋचा वाले उनचालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके
प्रथम मन्त्र में इन्द्र के गुणों को कहते हैं ।
यदिन्द्र चित्र मेहनास्ति त्वादातमद्रिवः ।
राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर ॥१॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३६ ।। का पदार्थः हे (अद्रिवः) सूर्य के सदृश विद्या के प्रकाश करने वाले (विद्वद्वसो) धन को प्राप्त हुए (चित्र) अद्भुत गुण कर्म और स्वभाव वाले (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (यत्) जो (त्वादातम्) आप से शुद्ध किया (राधः) द्रव्य (मेहना) वृष्टि के सदृश (अस्ति) है (तत्, उभयाहस्ति) उस उभयाहस्ति अर्थात् दो प्रकार के हाथ प्रवृत्त होते हैं जिस में ऐसे को (न:) हम लोगों के लिये (पा, भर) सब प्रकार धारण कीजिये ॥१॥ भावार्थः वही राजा धन से युक्त वा कुशली होवे जो वृष्टि के सदृश अन्यों के मनोरथों को वर्षावे ॥१॥ अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यन्मन्यसे वरेण्यमिन्द्र धुक्षं तदा भर । विद्याम तस्य ते वयमकूपारस्य दावनै ।।२।। पदार्थ:-है (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वयं से युक्त आप (यत्) जिस (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य (ध क्षम्) धर्म और विद्या के प्रकाश से युक्त को मन्यसे) मानते हो (तत्) उस को हम लोगों के लिये (श्रा, भर) घारण कीजिये जिस से अकूपारस्य) श्रेष्ठ है पार जिनका (तस्य) उन (ते) आप के (बावने) दाता के लिये (वयम्) हम लोग प्रयत्न को (विद्याम) जानें ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप जिस २ उत्तम विषय को जानते हैं उस का हम लोगों के प्रति उपदेश कीजिये जिस से हम लोग आप के राजकार्य को पूर्णरूप से करने को समर्थ होवें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। यत् दित्सु पराध्यं मनो अस्ति श्रुतं बृहत् । तेने दृळा चिदद्रिव आ वाजं दर्षि सातये ॥३॥ पदार्थ:-हे (अद्रिवः) उत्तम प्रकार शोभित पर्वत से युक्त विद्वन् (ते) पाप का (यव) जो (दित्सु) देने की इच्छा करने वाला (प्रराध्यम्) अत्यन्त साधने योग्य (श्रुतम्) श्रवण और (बहत) बड़ा (मनः) चित्त (अस्ति) है (तेन) इस से (चित्) भी आप (दह ळा) दृढ़ वस्तुओं की रक्षा करते हो और (सातये) धर्म और अधर्म के विभाग के लिये (वाजम्) संग्राम का (मा, दर्षि) भङ्ग करते हो ॥३॥ भावार्थ:-जिस से मनुष्य ब्रह्मचर्य विद्या योगाभ्यास और सत्य भाषण आदि के नाचरण से सम्पूर्ण विद्यानों से युक्त मन को सिद्ध सार १४० ऋग्वेदः मं० ५। सू० ३६ ॥ कर धर्म से सम्पूर्ण जनों के हित के लिये दुष्टों को दण्ड देता है इस से वह अति उत्तम है ॥३॥ अब राजप्रजाविषय को कहते हैं । मंहिष्ठं वो मघोनां राजानं चर्षणीनाम् । इन्द्रमुप प्रशस्तये पूर्वीमिर्जुजुषे गिरः ॥४॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जिस (व:) आप लोगों और (मघोनाम्) बहुत ऐश्वर्यों से युक्त (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (मंहिष्ठम्) अत्यन्त बड़े और (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्या के देने वाले (राजानम्) राजा को (प्रशस्तये) प्रशंसा के लिये (पूर्वोभिः) प्राचीन प्रजाओं के साथ (गिरः) वाणियों को (उप, जुजुषे) समीप से सेवते वा प्रसन्नता से स्वीकृत करते हो वे और वह सर्वत्र सुखी होते हैं ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो राजा और जो प्रजाजन परस्पर अनु- कूलता अर्थात् प्रीति पूर्वक वर्ताव रखते हैं वे सदा आनन्दित होते हैं ॥४॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ।। अस्मा इत्काव्यं वर्च उक्थमिन्द्राय शंस्यम् । तस्मा उ ब्रह्मवाहसे गिरों वर्धन्त्यत्रयो गिरः शुम्भन्त्यत्रयः ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य के लिये (काव्यम्) कवियों विद्वानों से कामना करने योग्य (उक्थम्) प्रशंसित (शंस्यम्) स्तुति करने योग्य (बचः) वचन का प्रयोग करता है (अस्मै) इस के लिये (इद) और (तस्मै) उस (ब्रह्मवाहसे) धनों को प्राप्त होने वाले जन के लिये (अत्रयः) नहीं हैं तीन प्रकार के दुःख जिन में वे (गिरः) वाणियाँ (वर्धन्ति) बढ़ती हैं (उ) और (प्रत्रयः) नहीं हैं तीन प्रकार के गुणों के दोष जिन में वे (गिरः) वारिणयां (शुम्भन्ति) उत्तम आचरण कराती हैं ॥५॥ भावार्थः हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन वाणियों को विद्याभ्यास से करते हैं वे कवित्व और ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ।।५।। इस सूक्त में इन्द्र राजा प्रजा और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए ।। यह पंचम मण्डल में उनचालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। क

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४०॥
१४१
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अथ नवर्चस्य चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्याऽत्रिऋषिः । १-४ इन्द्रः ।
५ सूर्यः । ६ ६ अत्रिदेवता । १ निचदुष्णिक् । २। ३ उष्णिक् । ६ स्वराष्णिक
छन्दः । ऋषभः स्वरः । ४ त्रिष्टुप् । ५।६।८ । निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः
स्वरः । ७ भुरिकपङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।।
अब नव ऋचा वाले चालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र
में इन्द्र के गुणों को कहते हैं ।
आ याह्यदिभिः सुतं सोमं सोमपते पिब ।
वर्षभिन्द्र पंभिर्वृत्रहन्तम ॥१॥
पदार्थ:--हे (सोमपते) ऐश्वर्या के स्वामिन् (वृषन्) बैल के सदृश आचरण
करते हुए (वृत्रहन्तम) अत्यन्त धन को प्राप्त होने और (इन्द्र) ऐश्वर्य की इच्छा
करने वाले जन (वृषभिः) बलिष्ठों के साथ आप (अद्रिभिः) मेघों से (सुतम्) उत्पन्न
हुए (सोमम्) सोमलता आदि पोषधियों के रस को (पिब) पान करिए और सङ ग्राम
को (मा, याहि) प्राप्त हूजिए ॥१॥
भावार्थ:-जो ऐश्वर्य की इच्छा करें वे अवश्य बल और बुद्धि की
वृद्धि करें ॥१॥
अब मेघविषय को कहते हैं ।
वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः।
वृषनिन्द्र वृषभित्रहन्तम ॥२॥
पदार्थः (वृषन्)
(वृषन्) बल' की इच्छा करते हुए (वृत्रहन्तम) अतिशय करके
शत्रुओं के और (इन्द्र) दुःखों के नाश करने वाले जन जो (अयम्) यह (वृषा)
आनन्द को उत्पन्न करने और (वृषा) वृष्टि करने वाला (ग्रावा) मेघ और (मदः)
प्रानन्द तथा वृषा) सुख का वर्षाने वाला (सोमः) ओषधियों का समूह (सुतः)
उत्पन्न किया गया है उन (वृषभिः) मेघादिकों से कार्यों को सिद्ध कीजिये ॥२॥
भावार्थ:-जो मेघ आदि पदार्थ हैं उन से मनुष्य बहुत कार्यों को
सिद्ध कर सकते हैं ॥२॥
फिर इन्द्र पदवाच्य राजा के गुणों को कहते हैं ।
वृषां त्वा वृषणं हुवे वनिञ्चित्राभिरूतिभिः ।
वृषन्निन्द्र वृषभित्रहन्तम ॥३॥

१४२
ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४० ॥
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पदार्थः -हे (वृषन्) सुख करने वाले (वनिन्) बहुत शस्त्र और अस्त्रों से
युक्त (वृत्रहन्तम) अत्यन्त दुष्टों के नाश करनेवाले (इन्त्र) ऐश्वर्या की इच्छा करने
वाले (वृषा) वृष्टि करने वाला मैं (चित्राभिः) अद्भुत (ऊतिभिः) रक्षादि क्रियाओं
और (वृषभिः) दुष्टों के सामर्थ्य को बांधने वालों के साथ वर्तमान (वृषणम्) बलिष्ठ
(त्वा) आप को (हुवे) बुलाता हूं ॥३॥
भावार्थः- मनुष्यों को चाहिये कि सूर्य के सदृश वर्तमान और सब
प्रकार गुणों से सम्पन्न, बलिष्ठ, न्यायकारी राजा का स्वीकार करें जिस
से सब प्रकार से रक्षा होवे ॥३॥
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
भृजीषी वत्री द्वेषभस्तुरापाट् छुष्मी राजा वृत्रहा सोमपावा ।
युक्त्या हरिभ्यामुप॑ यासदर्वाङ् माध्यन्दिने सर्वने मत्सदिन्द्रः ॥४॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (ऋजीषी) सरल आदि से युक्त (वत्री) शस्त्र और
अस्त्रों का धारण करने वाला वृषभः) बलिष्ठ (शुधमी) बलिष्ठ सेना से युक्त
(तुरापाट्) हिंसा करने वाले शत्रुओं को सहने (सोमपावा) श्रेष्ठ ओषधियों के
रस' का पीने (वृत्रहा) दुष्ट शत्रुनों के नाश करने और (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्या का
करने वाला (राजा) विद्या और विनय से प्रकाशमान (हरिभ्याम्) घोड़ों से वाहन
को (युक्त्वा) युक्त करके (अर्वाङ्) पीछे (उप, यासत) समीप प्राप्त होवे और
(माध्यन्दिने) मध्याहन में (सबने) भोजन के समय (मत्सत्) आनन्दित होवे उसी
को अधिष्ठाता करो ॥४॥
भावार्थ:-वही राजा प्रशंसित होवे जो राज्य के अगों और
विद्यानों को ग्रहण करके प्रजापालन के लिये प्रयत्न करे ॥४॥
अब सूर्य विषय को कहते हैं ।
यत्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः ।
अक्षेत्रविद्यया मुग्धो भुवनान्यदीधयुः ॥५॥
पदार्थ:-हे (सूर्य) सूर्य के सदृश वर्तमान (यथा) जैसे (अक्षेत्रवित)
क्षेत्र अर्थात् रेखागणित को नहीं जानने वाला (मुग्धः) मूर्ख कुछ भी नहीं कर
सकता है वैसे (यत्) जो (स्वर्भानुः) सूर्य से प्रकाशित होने वाला बिजुलीरूप
(प्रासुरः) जिसका प्रकट रूप नहीं वह (तमसा) रात्रि के अन्धकार से (अविध्यत्)
युक्त होता है जिस सूर्य से (भुवनानि) लोक (अदीधयुः) देखे जाते हैं उसके जानने
वाले त्वा) आप का हमलोग आश्रयण करें ॥५॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४० ।। १४३ HINA भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालं.-हे मनुष्यो ! जैसे बिजुली गुप्त हुई अन्धकार में नहीं प्रकाशित होती है वैसे ही विद्यारहित मूर्खजन का आत्मा नहीं प्रकाशित होता है और जैसे सूर्य के प्रकाश से संपूर्ण लोक प्रकाशित होते हैं वैसे ही विद्वान् का आत्मा सपूर्ण सत्य और असत्य व्यवहारों को प्रकाशित करता है ॥५॥ फिर सूर्यविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । खर्भानोरध यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाईन् । गूळ्हं सूर्य तमसापवतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददत्रिः ॥६॥ पदार्थः- हे (इन्द्र) विद्वान् (यव) जो (स्वर्भानो:) सूर्य के प्रकाशक के संबन्ध में (दियः) प्रकाशमान (वर्तमानाः) स्थित (मायाः) बुद्धियां (अपनतेन) अन्यथा वर्तमान (तमसा) अन्धकार से और (तुरीयेण) चौथे (ब्रह्मणा) धन से (गृह ळम्) गुप्त बिजुली नामक (सूर्यम्) सूर्य के उत्पन्न करने वाले को (अवः) नीचे (अवाहन) प्राप्त करती हैं (अध) इसके अनन्तर (अत्रिः) निरंतर चलने वाला (अविन्दत) प्राप्त होता है उनको आप जानिये ॥६॥ भावार्थ:-जैसे गुप्त बिजुली के प्रकाश बड़े कार्य को सिद्ध करते हैं वैसे ही विद्वानों की बुद्धियां सम्पूर्ण विज्ञान कार्यों को सिद्ध करती - अब उक्त विषय में राजविषय को कहते हैं। मा मामिमं तव सन्तमत्र इरस्या द्रग्धो भियसा नि गारीत् । त्वं मित्रो असि सत्यराधास्तौ मेहावतं वरुणश्च राजा ॥७॥ पदार्थ:-हे (अत्रे) तीन प्रकार के दुःखों से रहित (इरस्या) अन्न की इच्छा से तथा (भियसा) भय से (दुग्धः) द्रोह को प्राप्त (इमम् , इस को और (तव) आप के आश्रित (सन्तम्) हुए (माम्) मुझ को (मा) नहीं (नि, गारीत) निगलिये और जो (त्वम्) आप (मित्रः) मित्र (सत्यराधाः) सत्य आचरण से वा सत्यधन जिनका ऐसे (असि) हो वह आप (राजा) सब के अधिष्ठाता और (वरुणः) श्रेष्ठ सेना का ईश (च) भी (तो) वे दोनों (इह। इस संसार में (मा) मेरी (अवतम्) रक्षा करो ॥७॥ भावार्थ:-हे धर्मिष्ठ राजा और सेना के स्वामी ! अन्याय से किसी के भी पदार्थ को भी न ग्रहण करें भय और न्याय के अच्छे प्रकार चलाने १४४ Mahad a One 4- ऋग्वेदः म० ५। सू० ४० ॥ से राजधर्म से पृथक् न होवें और सदा ही सत्य धर्म में प्रिय हुए मित्र के सदृश प्रजाओं का पालन करें ॥७॥ अब विद्वद्विषय को कहते हैं । ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजाना संपर्य्यन कीरिणा देवानमंसोपशिक्षन् । अत्रिः सुय्यस्य दिवि चक्षुराधास्वर्भानोर माया अंधुक्षत् ॥८॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (ब्रह्मा) चारों वेदों का जानने वाला (कोरिणा) सम्पूर्ण विद्याओं की स्तुति करने वाले से (युयुजानः) मिलता हुआ (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (देवान्) विद्वानों की (सपर्यन्) सेवा करता और विद्यार्थियों को (उपशिक्षन) समीप प्राप्त विद्या को ग्रहण कराता हुआ (अत्रिः) सम्पूर्ण विद्याओं में व्यापक (स्वर्भानोः) सूर्य की कांति के सदृश कान्ति जिसकी उसके (ग्रावणः) मेघ से (सूर्यस्य, सूर्य के (विवि, प्रकाश में (चक्षुः) नेत्र का (प्रा, अधात्) स्थापन करे वह (मायाः) बुद्धियों को प्राप्त होवे और अविद्याओं को (अप, अघुक्षत्) अपशब्दित करे ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विद्वानों की सेवा करने वाला, योगी, विद्या के प्रचार में प्रिय, विद्वान् होवे वह जैसे बिजुली सूर्य और मेघ के संबन्ध से सृष्टि की पालना और दुःख का निवारण होता है वैसे ही अध्यापक और अध्येता के संबन्ध से विद्या की रक्षा और अविद्या का निवारण करता है ।1८॥ अब सूर्य और अन्धकार के दृष्टान्त से विद्वान् और अविद्वान् के विषय को कहते हैं । यं वै सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः । अत्रयस्तमन्वबिन्दन्न'न्ये अक्नुवन् ।।९।। पदार्थ:-हे विद्वानो! (स्वर्भानु:) सूर्य से प्रकाशित (प्रासुरः) मेघ ही (तमसा) अन्धकार से (यम्) जिस' (सूर्यम्) सूर्य को (अविध्यव) ताड़ित करता है (तम्) उस को (वै) निश्चय करके (अत्रयः) विद्या में दक्ष जन (अनु, अविन्दन्) अनुकूल प्राप्त होवें (नहि) नहीं (अन्ये, अन्य इस के जानने को (अशक्नुवन्) समर्थ होवें ॥६॥ भावार्थ:-हे. मनुष्यो! जैसे मेघ सूर्य को ढांप के अन्धकार को उत्पन्न करता है वैसे ही अविद्या आत्मा का प्रावरण करके अज्ञान को ।

ऋग्वेदः मं० ५ । ५० ४१ ।।
१४५
उत्पन्न करती है और जैसे सूर्य मेघ का नाश और अन्धकार का निवारण
करके प्रकाश को प्रकट करता है वैसे ही प्राप्त हुई विद्या अविद्या का नाश
करके विज्ञान के प्रकाश को उत्पन्न करती है इस विवेचन को विद्वान् जन
जानते हैं अन्य नहीं ॥६॥
इस सूक्त में इन्द्र मेघ सूर्य विद्वान् अविद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के
अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह पंचम मण्डल में चालीसवां सूक्त समाप्त हुआ।
।
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अथ विंशत्यूचस्यैकचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्याऽत्रिऋषिः । विश्वेदेवा देवताः ।
१।२। ६ । १५ । १८ त्रिष्टुप् । ४ । १३ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।
३। १४ । १६ पङ्क्तिः । ५।६।१०। ११ । १२ भुरिपक्तिः। ७।८
पक्तिश्छन्दः । २० याजुषी पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । १६ जगती । १७
निजगती छन्दः । निषादः स्वरः ।।
अब बीस ऋचावाले इकतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र
में विश्वदेवों के गुणों को कहते हैं ।
को नु वा मित्रावरुणावृतायन्दिवो वा महः पार्थिवस्य वा दे।
ऋतस्य वा सदसि त्रासीथां नो यज्ञायते वा पशुषो न वाजान् ॥१॥
पदार्थ:-हे (मित्रावरुणो) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्तमान पढ़ने
और पढ़ाने वाले जनो (वाम) आप दोनों और (दिवः) प्रकाशों को (क:)
कौन (ऋतायन्) सत्य का आचरण करता हुआ (वा) वा (पार्थिवस्य) पृथिवी में
विदित जन के (महः) तेज को कौन (नु) शीघ्र जाने (वा) वा (दे) प्रकाशमान
विद्वान् जनों (ऋतस्य) सत्य की (सदसि) सभा में (वासीयाम्) रक्षा करो (वा)
वा (यज्ञायते) यज्ञ की कामना करते हुए के लिये (नः) हम लोगों की रक्षा करिये
(वा) वा (पशुषः) पशुओं और (वाजान्) अन्नों के (न) सदृश हम लोगों के लिये
भोगों को प्राप्त कराइए ॥शा
भावार्थ:-- हे विद्वानो! जो आप लोग पृथिवी आदि पदार्थों की
विद्या को जानते हैं तो हम लोगों को उपदेश देवें और सभा में बैठ के सत्य
(
न्याय को करें
॥१॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४१ ।। ब aloda DORS फिर उसी विषय को कहते हैं । ते नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतो जुषन्त । नमोभिर्वा ये दधते मुक्ति स्तोम रुद्राय मीळ्हु सजोषाः ॥२॥ पदार्थ:-(य) जो (मरुतः) मनुष्य (नमोभिः) सत्कार और अन्नादिकों से (मीळहषे) सुख का सेचन करते हुए (रुद्राय) दुष्ट आचरणों के करने वाले जनों के रुलाने वाले के लिये (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवन करने वाले हुए (सुवक्तिम्) उत्तम प्रकार वर्जन होता है जिससे उस (स्तोमम्) प्रशंसा का (दधते) धारण करते (बा) वा जुषन्त) सेवन करते हैं (ते) वे (मित्रः) मित्र (वरुण:) श्रेष्ठ आचरण करने वाला अर्यमा) न्याय का ईश और (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् (ऋभुक्षाः) बड़ा विद्वान् (नः) हम लोगों के लिए (प्रायुः) जीवन का सेवन करें ॥२॥ भावार्थ:-उन्ही विद्वानों को उत्तम समझना चाहिये जो अपने सदृश सब प्राणियों में वर्ताव करें।।२।। फिर उसी विषय को कहते हैं । आ वां येष्ठांश्विना हुवध्यै वातस्य पत्मन्रथ्यस्य पुष्टौ । उत वा दिवो असुराय मन्म प्रान्धांसीव यज्यवे भरध्वम् ।।३।। पदार्थः-- है (येष्ठा) अत्यन्त नियम के निर्वाहक (अश्विना, अध्यापक और उपदेशक जनो जैसे (वाम्) आप दोनों (रथ्यस्य) रथ में उत्पन्न हुए (वातस्य, पवन के पत्मन्) मार्ग में और (पुष्टौ) पोषण करने में (उत, वा) अथवा (असराय) मेघ के लिये (दिवः) कामना करते हुए के (अन्धांसीव) अन्न आदिकों के सदृश (यज्यवे) यज्ञारम्भ वा यजमान के लिये कारण होते हो वैसे (हुवध्यै) ग्रहण करने के लिये (मन्म) विज्ञान का (प्र, प्रा, भरध्वम्) प्रारम्भ करो ॥३॥ भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु- जैसे पढ़ने और पढ़ाने वाला विद्या के प्रचार के लिये प्रयत्न करता है वैसे ही सब मनुष्यों को चाहिये कि निरन्तर प्रयत्न करें॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । प्र सक्षणो दिव्यः कण्होता त्रितो दिवः सजोषा वातों अग्निः । पुषा भगः प्रभृथे विश्वभौजा आजि न जग्मुराश्वश्वतमाः ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (दिव्यः) शुद्ध व्यवहारयुक्त (कण्व होता) बुद्धिमान्, तथा देने और ग्रहण करने वाले के सदृश जो (सक्षणः) सहने वाला (त्रितः) तीन (अवसे) रक्षण आदि के लिये (एष, प्राप्त होने को (सुशेवः) सुन्दर सुख से युक्त ऋग्वेदः मं० ५ । सू०४१ ।। पृथिवी जल और अन्तरिक्ष में बढ़ता (दिवः) श्रेष्ठ कामनाओं की इच्छा करता और (सजोषाः)साथ ही सेवन करता(वातः) वायु और (अग्निः) अग्नि' (प्रभूथे) शुद्ध करने वाले व्यवहार में (पूषा) पुष्टि करने वा (भगः) ऐश्वर्य का देने वा (विश्वभोजाः) संसार का पालन करनेवाला और श्राश्वश्वतमाः) शीघ्र चलने वाले घोड़े जिनके विद्यमान वे (माजिम्) संग्राम का (जग्मुः) जैसे प्राप्त होते हैं (न) वैसे (प्र) प्रयत्न किया जाता है वहा बहुत भोग की प्राप्ति कराता है ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग अग्नि आदि पदार्थों से दारिद्रय का नाश करके धनवान् हूजिये ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । प्र वो रयिं युक्ताश्य भरध्वं राय एषेऽवसे दधीत धीः । सुशेत्र एवैरौशिजस्य होता ये व एवो मरुतस्तुराणाम् ।।५।। पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो आप लोग (धी:) बुद्धियों को (बधीत) धारण करो और (व:) आप लोगों के लिए अर्थात् आप अपने लिये युक्ताश्वम्) यक्त घोड़े जिससे उस (रयिम्) धन को (प्र, भरध्वम्) अत्यन्त धारण करो। तथा 40 जन (एवैः) गमनों से (ोशिजस्य) कामना करने वाले सन्तान का और (रायः) धनों का होता) देनेवाला होता है और (ये) जो (व:) आप लोगों के (तुराणाम्) नाश करनेवालों के नाश करने वाले (एवा:) और कामना करनेवाले हैं उन को आप लोग सत्कार करो ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! आप लोग अग्नि आदि पदार्थों की विद्या से धनवान् होकर सत्यता से सब अनाथों का पालन करो और दुष्टों का ताड़न करो ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। प्रवो वायु रथयुज कृणुध्वं प्र देवं विप्रै पनितारमकः । इषुध्य ऋतसापा पुरन्धीर्वस्वी! अत्र पत्नीरा धिये धुः ॥६॥ पदार्थः-हे मनुष्यो जो (अत्र) इस संसार में (इषुध्यकः) वाणों के द्वारा युद्ध करने वा (ऋत्तसापः) सत्य संबन्ध रखने वाले विद्वान् जन (व:) आप लोगों के लिए (रथयुजम्) वाहन से युक्त (वायुम्) वेगवाले वायु को (धः) धारण करें वा आप लोगों और (न:) हम लोगों के लिये (पत्नीः) स्त्रियों के सदृश वर्तमानों को AN Hala - man और धि। A (सजोषाः) ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४१ ।। पृथिवी को (भा) सब प्रकार धारण करें उन के संग से' वेगयुक्त वाहन से' युक्त को (प्र, कृणुध्वम्) अच्छे प्रकार सिद्ध करें (अ) प्रशंसनीय पदार्थों से' (पनितारम्) स्तुति करने और धर्म से व्यवहार करनेवाले (विप्रम्) बुद्धिमान् (देवम्) विद्वान् को (प्र., अच्छे प्रकार प्रकट करो ॥६॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे पतिव्रता पत्नी पति आदि को सुख देती हैं वैसे ही वायु के समान वेगयुक्त रथ को और धार्मिक विद्वानों को धारण कर सब को सुखयुक्त करो ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उप छ एषे वन्येभिः शूषैः प्र यही दिवश्चितद्भिरकैः । उषासानक्ता विदुषींव विश्वमा हो वहतो मांय यज्ञम् ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (दिवः) विद्याके प्रकाशों को (चितद्भिः) जनाते हुए प्रकः) सत्कार करने योग्य विद्वानों के साथ और वन्द्योभिः) स्तुति करने योग्य शूषैः) बलों के साथ (यह्वी) बड़ी (विदुषीव) पूर्ण विद्यायुक्त स्त्री के तुल्य जो (उपासा- नक्ता) रात्रि और दिन (व:) आप लोगों के उप, एषे, समीप प्राप्त होने को (माय) मनुष्य के सुख के लिए (विश्वम्) सम्पूर्ण (यशम्, विद्या के प्रचार आदि को (हा) निश्चय (प्र, पा, वहतः) सब प्रकार धारण करते हैं उन के सेवन की विद्या को आप लोग जानें ॥७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे बड़ी विद्या- युक्त स्त्री सब जगह विद्यायुक्त स्त्रियों और विद्वानों में सत्कारयुक्त हो और संपूर्ण उत्तम गुणों को धारण करके विद्यायुक्त पति आदि की वृद्धि करती है वैसे ही रात्रि और दिन सब व्यवहारों को धारण करके सब जगत् की वृद्धि करते हैं ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अभि वो अर्चे पोष्यावतो नृवास्तोष्पति त्वष्टारं रराणः । धन्या सजोषां धिषणा नमोभिर्वनम्पतीरोपंधी राय एवं । ८॥ की सेवने वाली (विषाणा) बुद्धि (नमोभिः) सत्कारों वा अन्न आदिकों से वनस्प- तीन्) अश्वत्थ आदि और (प्रोषधीः) यव सोमलतादिकों को तथा (रायः) धनों को - MPA ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४१ ॥ १४६ - R tions 430 ANA ना 40 (एषे) प्राप्त होने के लिये समर्थं होती है वैसे (वास्तो:) निवास के स्थान के (पतिम्) पालने वाले (त्वष्टारम्) तेजस्वीजन को (रराणः) दाता मैं (पोष्यावतः) बहुत पोषण करने योग्य पदार्थ जिन के विद्यमान उन (वः) आप (नन्) मनुष्यों का (अभि, अर्चे। प्रत्यक्ष सत्कार करता हूँ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे तीव्र बुद्धि और विद्या से युक्त मनुष्य वैद्यक विद्या को जान कर मनुष्य आदिकों का पालन करते हैं वैसे ही सब के हित की इच्छा करने वाले मनुष्यों का सदा ही सत्कार करिये ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। तुजे नस्तने पर्वताः सन्तु स्वैतवो ये वसवो न वीराः । पनित आप्तयो यजतः सदा नो वर्धानः शंसं नर्यो अभिष्टौ ॥९॥ पदार्थः -हे मनुष्यो ! (ये) जो ( (स्वैतवः) उत्तम गमन वाले (बसव:) पृथिवी आदि (वीराः) बुद्धि और शरीर के बल से युक्त जनों के (न) सदृश (तने) विस्तीर्ण (तुज) दान में (न:) हम लोगों के लिये (पर्वता:) जल के देने वाले मेघ और दाता जनों के सदृश (सन्तु) होवें और जो (अभिष्टौ) इष्ट की सिद्धि में (पनितः) प्रशंसित (प्राप्त्यः) यथार्थवक्ता जनों में उत्पन्न (यजतः) मिलने वा सत्कार करने योग्य जन (न:) हम लोगों की (सदा) सदा (वर्धात) वृद्धि करे और जो (नर्यः) मनुष्यों में श्रेष्ठ (नः) हम लोगों को (शंसम्) प्रशंसा को प्राप्त करावें उन सब का हम लोग सत्कार करें ॥६॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालं०--जो जन वीर जनों के सदृश शत्रुओं के निवारण करने, मेघ के सदृश देने वाले और वायु के सदश वेग- युक्त विद्वान् हम लोगों की नित्य वृद्धि करें उन की हम लोग भी वृद्धि करें।॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। वृष्णों अस्तोषि भूम्यस्य गमै त्रितो नपतिमपां मुक्ति । गृणीते अमिरेतरी न शूषैः शोचिष्केशो नि रिणाति वनां ॥१० पदार्थ:-हे विद्वन् आप (वृष्णः) सुख की वृष्टिकरने वालों की (अस्तोषि) प्रशंसा करते हो (त्रितः) तीनों में वृद्धिकरने वाला (अपाम्) मनुष्यों के सदृश प्राणियों के (नपातम्) नहीं पतन जिस का उस (भूभ्यस्य) पृथ्वी में हुए (गर्भम्) गर्भ की (सुवृक्ति) उत्तम गमन के सहित (गुणीते) स्तुति करता है इस प्रकार जो (अग्निः) dawer Anator ऋग्वेदः मं० ५। सू०४१।। पवित्र करने वाले अग्नि के सदृश (एतरी प्राप्त होती हुई के और (शोचिषकेश:) प्रका- शित विज्ञान वाले के (न)सदृश शूषः)बलों से (वना) किरणों को (नि, रिणाति, जाता वा प्राप्त होता है वही सम्पूर्ण सृष्टि में उत्पन्न हुए सुख को प्राप्त होता है ॥१०॥ भावार्थ:-वही पुरुष बहुत धन और आदर को प्राप्त होता है कि जो सृष्टिक्रम की विद्या को जान कर कार्य की सिद्धि के लिये यत्न करता है॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । कथा महे रुद्रियाय वाम कद्राये चिकितुषे भगाय । आप ओषधीरुत नोऽवन्तु द्यौर्वना गिरयों वृक्षकैशाः ॥११॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो मनुष्य (आप:) जल (ोषधीः) सोमलता आदि ओषधियां (वृक्षकेशाः) वृक्ष हैं केशों के समान जिन के वे पर्वत (गिरयः) मेघ (उत) और (योः) सूर्य्य (चना) किरणों के सदृश (न:) हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें उन के सहाय से हम लोग (महे) बड़े (चिकितुषे) जानने योग्य और (द्रियाय) रुलाने बालों से प्राप्त हुए के लिये (क्या) किस प्रकार से (अवाम) उपदेश देवें और (राये) धन और (भगाय) ऐश्वर्य को लिये कत) कब उपदेश देवें ॥११॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-सब मनुष्य अपने और अन्यों के रक्षण के लिये विद्वानों को मिल के प्रश्न और उत्तर से सत्य विद्याओं को प्राप्त हो और अन्यों के लिये उपदेश देकर ऐश्वर्य की वृद्धि हम कब करें इस प्रकार नित्य उत्साह करें ।।११।। फिर उसी विषय को कहते हैं । शृणोतुं न ऊर्जा पतिगिरः स नभस्तरीयाँ इषिरः परिज्मा । शृण्वन्त्वापः पुरो न शुभ्राः परि नुवौ बहाणस्याः ॥१२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो सः) वह (नभः) जल (तरीयान्) तैरने और 'इपिरः) प्राप्त होने योग्य (परिज्मा) सर्वत्र प्राप्त होने वाला (ऊजम्)ि बल से युक्त सेनाओं वा अन्नादिकों का (पतिः) स्वामी पालन : करने वाला (न:) हम लोगों की गिरः उत्तम शिक्षा से युक्त वाणियों को (शृणोतु) सुने तथा (शुभ्राः) श्वेतवर्णवाले पुरः) नगरों के (न) सदृश (प्राप:) और जलों के सदृश विद्याओं से व्याप्त विद्वान् जन (न:) हम लोगों की वाणियों को सुनें (बबृहाणस्य) उत्तम प्रकार बढ़े (अद्रेः) मेघ के (स्त्र चः) चलने वालों के सदृश हम लोगों की वारिणयों को विद्वान्जन (परि, शृण्वन्त) सुनें ॥१२॥ :- के सदृश हम लोगों की चन्द्रायाः) सुवरणे वा आनन्द अग्र अर्थात ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४१ ।। १५१ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-वे ही जन विद्वान् होने योग्य हैं जो विद्वानों से पढ़ी हुई विद्या की परीक्षा को प्रसन्नता से देते हैं और वे ही अध्यापक विद्यार्थियों को विद्वान् कर सकते हैं जो प्रीति से उत्तम प्रकार पढ़ा के विरोधियों के सदृश परीक्षा लेते हैं। जो इस प्रकार दोनों प्रयत्न करते हैं वे नदी की उन्नति के समान अच्छे प्रकार बढ़ते हैं ॥१२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । विदा चिन्न महान्तो ये व एवा बाम दमा वार्य दर्धानाः व्यश्चन सुभ्व१' आव यन्ति क्षुमा मर्तमनुयतं वधस्नैः ॥१३॥ पदार्थ:- है (दस्मा:) दुःख की उपेक्षा करने वाले (महान्तः) बड़े श्रेष्ठ जनो (ये) जो (वार्य्यम् ) स्वीकार करने योग्य सुख और (वयः) जीवन' को (चन) भी (वधानाः) धारण करते हुए (सुभ्वः) श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त होने वाले हम लोग जो (व:) आप लोगों को (ब्रवाम) कहें उस को (एवाः) ही (चित्) निश्चय (न) शीघ्र आप लोग विदा) जानिये जो (वधस्न:) ताड़न से स्नान करते अर्थात् पवित्र होते हैं उनके साथ (क्षुभा). उत्तम प्रकार चलने से (अनुयतम्) अनुकूलता से प्रयत्न करते हुए (मर्तम्) मनुष्य को (श्रा, अब, यन्ति) उत्तम प्रकार प्राप्त होते हैं उन की आप लोग शिक्षा करो ॥१३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन शुभ कर्म को करें और उपदेश देवें वैसे ही आप लोग आचरण करो और जो मनुष्यों को क्लेश देते हैं उन को दण्ड दीजिये ॥१३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ दैव्यानि पार्थिवानि जन्मापश्चाच्छा मुखाय वोचम् । वर्धे तां धावो गिरश्चन्द्राग्रा उदा वर्धन्तामभिषांता अर्णाः ॥१४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो मैं जिन (दैव्यानि) श्रेष्ठ गुणों में हुए (पार्थिवानि) पृथिवी में विदित । जन्म) जन्मों और (अप:) कम्र्मों को (च) भी (अच्छा) उत्तम प्रकार (प्रा, वोचम् सब ओर से उपदेश करू जिस (उदा) जल से (पर्णाः) समुद्रों जिन के उन (अभिधाताः) चारों ओर से बटी हुई (धावः) सत्य' कामनाओं की और (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वारिणयों की (वर्धन्ताम् ) वृद्धि कीजिये जिससे (सम- खाय) शोभन यज्ञों वाले के लिये प्राणियों की (वर्धन्ताम) वृद्धि हो ॥ ४॥ AMA 4 AHANA १.५२ ऋग्वेदः मं० ५। सू०.४१ ।। - भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-हे मनुष्यो ! आप लोग धर्मयुक्त कर्मों और श्रेष्ठ गुणों का ग्रहण कर के अपनी कामनाओं और वाणी को शोभित करो। जैसे जल से नदियां और समुद्र बढ़ते हैं वैसे ही धर्मयुक्त पुरुषार्थ से मनुष्य बढ़ते हैं ॥१४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । पदेपद मे जरिमा नि धायि वरूत्री वा शका या पायुभिश्च । सिषक्त माता मही रसा नः स्मरसूरिभिजुहस्त ऋजवनिः ॥१५॥ पदार्थः - हे मनुष्यो (सूरिभिः) विद्वानों और (पायुभिः) रक्षकों से (च) और (या) जो (मे) मेरे (पदेपदे) प्राप्त होने प्राप्त होने, जानने जानने वा जाने जाने योग्य पदार्थ में (वरूत्री) श्रेष्ठ सुख की देने (जरिमा) और स्तुति कराने वाली वा) वा (शका) सामर्थ्य में कारण (माता) माता (रसा) रस आदि गुणों से युक्त (मही) बड़ी वाणी वा भूमि (ऋजुहस्ता) ऋजु अर्थात् सरल हस्त जिसके वा जिस में वह (ऋजवनिः) ऋजु अर्थात नहीं जो कुटिल उन पदार्थों के विभक्त करने वाली (न:) हम लोगों को (सिषका गम्बन्धित करे वह (मत्) ही (नि) निरन्तर (धायि) स्थित की जाती है ॥१५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे माता सन्तानों की रक्षा करती है वैसे ही विद्वानों के संग से प्राप्त और उत्तम प्रकार शिक्षित विद्या विद्वानों की सब प्रकार रक्षा करती है ॥१५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । कथा दाशेम नमसा सदाननेवया मरुतो अच्छोक्तौ प्रश्रवसो मरुतो अच्छोक्तौ । मा नोऽहिर्बुध्न्यों रिषे धादस्माकं भूदुपमातिवनि ॥१६॥ पदार्थ:-हे विद्वानो प्रश्रवसः) उत्तम श्रवण वा अन्न जिनका वे (मरुतः) मनुष्य हम लोग (एवया) गमन क्रिया से (अच्छोक्तौ) सत्य कथन में (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से' (सुदानून) उत्तम दानों को (कथा) कैसे (दाशेम) देवें जैसे (मरुतः) पवन (अच्छोक्तौ) उत्तम वचन में प्रवृत्त कराते है वैसे (न:) हम लोगों को इस विषय में प्रवृत्त करिये । जैसे (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में हुआ (अहिः) मेघ अस्मा- कम्। हम लोगों का (उपमातिवनिः) उपमा का विभाग करने वाला (भूत् हो और (रिषे) अन्न के लिये हम लोगों को (मा) नहीं (धात्) धारण करे वैसे आप लोग भी हम लोगों को हिंसा में न प्रवृत्त कीजिये ॥१६॥ MIRE *- How ऋग्वेदः मं० ५। ५० ४१ ॥ १५३ - ! m RAR Ato भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो! आप लोग विद्वानों के प्रति प्रश्न करके कि हम लोग क्या देवें और किस से क्या ग्रहण करें ऐसा निश्चय करके व्यवहार करो और जैसे मेघ स्वयं छिन्न भिन्न होके अन्यों की रक्षा करता है वैसे ही विद्वान् जन स्वयं दूसरे से अपकार किये से छिन्न भिन्न होकर भी अन्यों का सदा उपकार करते हैं ॥१६॥ फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इति चिन्न प्रजायै पशुमत्यै देवासो वनते मयों व आ देवासो वनते मयों वः। अत्र भिवां तन्वा धासिमस्या जरा चिन्मे निति- जग्रसीत ॥१७॥ पदार्थ:--हे (देवासः) विद्वान् जनो जी (मय:) मनुष्य (व:) आप लोगों को (पशुमत्यै, बहुत पशु विद्यमान जिसमें उस (प्रजाय) प्रजा के लिये (धासिम्) अन्न की (वनते) सेवा करता है और जो (चित्) निश्चय से (इति) इस प्रकार से (अस्याः) इस प्रजा के (सन्यः) शारीर की (शिवाम्) मंगलस्वरूप (जराम्) वृद्धावस्था की प्रा, वनते) अच्छे प्रकार सेवा करता है और जो (मर्त्यः) मनुष्य (चित निश्चय से (मे) मेरे शरीर की मंगल' स्वरूप वृद्धावस्था का सेवन करता और (निऋतिः) भूमि के सदृश (अत्रा) इस प्रजा में (वः) आप लोगों के अन्न को (जग्रसीत) खाता है इस प्रकार है (देवासः) विद्वान् प्रापलोग हमलोगों के लिये इसको (नु शीघ्र सिद्ध कीजिये ॥१७॥ भावार्थः हे विद्वान् जनो! आप लोग ऐसा प्रयत्न करो जिस से मनुष्यों की अवस्था बढ़े। जब तक मनुष्य वृद्ध नहीं होते तब तक ये परीक्षक भी नहीं होते हैं ।।१७।। फिर उसी विषय को कहते हैं । तां वो देवाः मुमतिमूर्जयन्ती मिर्षमश्याम बसवः शसा गोः। सा ने सुहानुयन्ती देवी प्रति द्रवन्ती मृविताय गम्याः ।।१८।। पदार्थ:-- है (देवाः) धामिक विद्वान् जनो जो (सुदानुः) उत्तम दान से युक्त (मळयन्ती) सुख देती (द्रवन्ती, जानती वा चलती हुई देवी) विद्यायुक्त स्त्री (सुविताय) ऐश्वर्या के लिये (वः) आप लोगों को प्राप्त होती है (ताम्) उसको (ऊर्जयन्तीम्) तथा पराक्रम अादि के दान से वृद्धि कराती हुई (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धि को और (इषम्) अन्न को हम लोग (प्रश्याम) भोगें । हे (वसवः) उत्तम गुणों 200 म Maiya ।

ऋग्वेदः मं०५। सू० ४१ ।। SAR KRAM RPOOR में निवास किये हुए जनो ! जो (गोः) पृथिवी के मध्य में (शसा) प्रशंसा के साथ वर्तमान है (सा) वह (न:) हम लोगों को प्राप्त हो। और हे विद्यायुक्त स्त्री आप इन जनों के (प्रति) प्रति (गम्या:) प्राप्त हूजिये ॥१८॥ भावार्थ:- -मनुष्य सदा उत्तम प्रकार घृत आदि के संस्कार से युक्त बुद्धि और बल के बढ़ाने वाले अन्न का सदा भोग करें जिस से बुद्धि यश और धन बढ़े ॥१८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अभि न इळ यूथस्य माता स्मन्नदीभिरुवंशी वा गृणातु । उर्वशी वा बृहदिवा गुणानाम्यूर्वाना प्रभृथस्यायोः ॥१९॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (इळा) प्रशंसा करने योग्य वाणी वा भूमि (यूथस्य) समूह की (माता) आदर करने वाली माता के सदृश (नः) हम लोगों की (अभि, गुणातु) सब ओर से स्तुति करे (वा) वा (प्रायोः) जीवन की (उर्वशी) बहुत वश में होते हैं जिस से ऐसी वाणी (नदीभिः) श्रेष्ठों के सदृश नाड़ियों से (स्मत) ही स्तुति करे (वा) वा (बृहद्दिवा) बड़ा प्रकाश जिसका ऐसी (गुणाना) स्तुति करने वाली (उर्वशी) और बहुतों को वश में करने वाली बुद्धि अभ्यूण्र्वाना) संमुखता से अर्थों को ढांपती हुई (प्रभृथस्य) प्रकर्षता से धारण किये गए जीवन को स्तुति करे ॥१६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! आप लोग जो सत्य भाषण से युक्त वाणी को धारण करें तो आप लोगों की अवस्था बढ़े ॥१९॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सिषक्तु न ऊर्जन्यस्य पुष्टेः ॥२०॥ पदार्थ:-जो विद्वान् होवे वह (न:) हम लोगों को (ऊर्जन्यस्य) बहुत बल से प्राप्त (पुष्टेः) पुष्टि के योग का (सिषक्तु) सेवन करे ॥२०॥ भावार्थ:-जो जगत् का उपकार करने वाला होता है वही सम्पूर्ण विद्याओं के संबध करने को योग्य होता है ॥२०॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में इकतालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। Papeute NOD (हृद्यम्। हृदय के प्रिय (सूनुम्) सन्तान के (म देने वाली (माता) माता स्तुति को प्रति, जाभ्यात ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४२ ॥ अथाष्टादशर्चस्य द्विचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्याऽत्रिऋषिः । विश्वेदेवा देवताः। १।४।६। ११ । १२ । १५ । १६ । १८ निवृत्रिष्टुप् । २ विरात्रिष्टुप् । ३ । ५। ७।८। । १३ । १४ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । १७ याजुषी पङ्क्तिश्छन्दः । १. भरिपक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। अब अठारह ऋचावाले बयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में विश्वेदेवों के गुणों को कहते हैं ।। प्रशन्तमा वरुणं दीधिती गीमित्रं भगमदिति नूनमश्याः। पृषयोनिः पञ्चहोता शृणोत्वतूर्तपन्था असुरो भयोभुः ॥१॥ पदार्थः --- हे विद्वन् जो (वरुणम्) उदान वायु को (दीधिती) प्रकाशित करती हुई (शन्तमा) अत्यन्त सुख करने वाली (पृषयोनिः) वृष्टि है कारण जिसका ऐसी तथा (पञ्चहोता) पांच प्राण ग्रहण करने वाले जिस के ऐसी (गी:) वाणी वर्तमान है उसको (मित्रम्) प्राण' (भगम्) ऐश्वर्य और (अदितिम्) आकाश वा भूमि को (नूनम्) निश्चय करके (प्र, अश्याः) प्राप्त होने और जो (अतूर्तपन्थाः) नहीं हिसित है मार्ग जिसका ऐसा (मयोभुः) सुखकारक (असरः) प्रकाश का प्रावरण करने वाला मेध है उस में स्थित जो वाणी उमको आप (शृणोतु) सुनिये ॥१॥ भावार्थ:-सब चर और प्रचर पदार्थों में आकाश के संयोग से वाणी वर्तमान है उसको विद्वान् ही जान और कार्यों में व्यवहार में ला सकते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । प्रति मे स्तोममदितिर्जगृग्यात्मनुं न माता हयं सुशेवम् । ब्रह्म प्रियं देवहितं यदस्त्यहं मित्रे वरुणे यन्मयोभु ॥२॥ प्रकार सुख देनेवाले (प्रियम्) सुन्दर और प्रीतिकारक तथा (देवहितम्) देव अर्थात् विद्वानों के लिये हितकारक (ब्रह्म) सन्, चित् और प्रानन्द स्वरूप चेतन (अस्ति) है और (यव) जो (मित्रे) प्राणवायु और (वरुणे) उदान वायु में (मयोभु) सुख. कारक है उसको (महम्) मैं इष्ट मानता हूं वैसे आप लोग भी मानिये ॥२॥ min HISAR म क- - ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४२ ॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर प्रेमभाव से स्तुति किया गया और जो उसकी आज्ञा का सेवन किया हो तो वह जैसे कृपा करने वाली माता शीघ्र उत्पन्न हुए बालक पर वैसे धार्मिक उपासक जन पर दया करता है, जो जगदीश्वर सर्वत्र व्याप्त हुआ भी प्राणादिकों में पाया जाता है उस सब काल में सुख देने वाले परमात्मा की हमलोग उपासना करें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। उदीरय कवितम कवीनामुनत्तैनममि मध्वां घृतेन । स नो वसूनि प्रयता हितानि चन्द्राणि देवः सविता मुंवाति ! ३।। पदार्थ:--हे मनुष्यो ! जैसे खेत बोने वाले जन (मध्या) मधुर (घृतेन) जल से क्षेत्र आदि सींचकर अन्नादिकों को प्राप्त होते हैं वैसे ही (एनम् इस (कवीनाम्) बुद्धिमानों के मध्य में (कवितमम्) अत्यन्त बुद्धिमान् को (उत्, ईरय, उतमता से प्रेरणा देश्रो तथा (अभि, उनत) अभ्युदय के अर्थ विद्या और उत्तम शिक्षा से सींचो और हे विद्वन् जिस कवियों के मध्य में श्रेष्ठ कवि की प्रेरणा करो सः) वह (सविता) विद्या और ऐश्वर्या का करने वाला (देव:) विद्वान् (न:) हम लोगों के लिये (प्रयता) प्रयत्न से सिद्ध होने योग्य (चन्द्राणि) आनन्द के देने वाले सुवर्ण आदि (हितानि) हितकारक (वसूनि) द्रव्यों को सुवाति) देवे ।।३।। भावार्थ:-हे विद्वान् अध्यापक पुरुषो! आप लोग जो निश्चय करके सब से उत्तम, सम्पूर्ण विद्याओं से युक्त, श्रेष्ठ विद्वान् होवे उसको 'गृहाश्रम न कर' ऐसा उपदेश दीजिये । जिस से संसार में वर्तमान मनुष्यों का बड़ा सुख बढ़े क्योंकि जो निश्चय करके पूर्ण विद्यायुक्त होकर गृहाश्रम को करे वह बहुत व्यापारवान् होने से वीर्य आदि के नाश होने से थोड़ी अवस्थायुक्त होकर निरन्तर मनुष्यों के हित करने को नहीं समर्थ होवे ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः सं सूरिभिईरिवः सं स्वस्ति । सं ब्रह्मणा देवहितं यदस्ति सं देवानां मुमत्या यज्ञियांनाम् ।।४।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त जिस से आप (यत्) जो (गोमिः) इन्द्रियों वा वारिणयों के साथ (सम, स्वस्ति) उत्तम सुख (अस्ति) है वह -- ht ऋग्वेदः मं० ५ । सू०.४२ ॥ Nom Aprip Comine (नः) हमलोगों को (मनसा) विज्ञान के साथ (सम्, नेषि) अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं और हे हरिवः) श्रेष्ठ मनुष्यों से युक्त जो (सूरिभिः) विद्वानों के साथ सुख है वह हमलोगों को सम्). एक साथ प्राप्त करते हैं और जो (ब्रह्मणा) वेद धन वा अन्न के साथ (देवहितम्) विद्वानों का हितकारक सुख है वह हमलोगों को (सम्) एक साथ प्राप्त करते हैं और जो यज्ञियानाम्) यज्ञ करने वाले (देवानाम्) विद्वानों की (समत्या) श्रेष्ठ बुद्धि के साथ विद्वानों का हितकारक सुख है वह हम लोगों के लिये (सम्) एक साथ प्राप्त करते हैं इस से सत्कार करने योग्य हो ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! आपलोग सत्यवाणी, विद्वानों का सङ्ग, वेदविद्या और श्रेष्ठ बुद्धि के सहित उत्तम प्रकार शोभित हुए अभीष्ट सुख को प्राप्त हूजिये ॥४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। देवो भगः सविता रायो अंश इन्द्रो वृत्रस्य संजितो धनानाम् । ऋभुक्षा वाजं उत वा पुरन्धिरवन्तु नो अमृतासरतुरास: ॥५॥ पदार्थः हे मनुष्यो ! जैसे (देवः) दाता (भगः) ऐश्वर्य से सम्पन्न । सविता) प्रेरणा करने वाला (रायः) धनों का (अंश:) विभाग तथा (वृत्रस्य) मेध और धनानाम् धनों का (संजितः) उत्तम प्रकार जीतने वाला (इन्द्रः) सूर्य (ऋभुक्षा:) बड़ा (वाजः) ज्ञानवान् (उत) भी (वा) वा (पुरन्धिः) बहुत बुद्धिमान और (तुरासः) शीघ्र कार्य करने वाले तथा (अमृतासः) अपने रूप से नहीं नाश होने वाले (नः) हम लोगों की (प्रवन्तु) रक्षा करें वैसे ये आप लोगों की भी रक्षा करें ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० अपने भी सुख दुःख हानि लाभ प्रतिष्ठा और अप्रतिष्ठा को मानते हैं वे ही प्रशंसा के योग्य होते हैं ॥५॥ फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मरुत्वतो अमंतीतस्य जिष्णोरजूंर्यतः प्र बंधामा कृतानि । न ते पूर्व मघवनापरासो न वीर्य ? नूतनः कश्चनापं ॥६॥ पदार्थ:-है (मघवन्) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त और अत्यन्त विद्या वाले विद्वान् वा अति बलवान् राजन् (मरुत्वतः) प्रशंसित विद्वानों से युक्त (अप्रतीतस्य) प्रतीति के अविषय (अर्यतः) जिस को जीर्ण अवस्था नहीं प्राप्त हुई ऐसे जो मनुष्य सदृश अन्यों के Hd १५८ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४२ ।। , Maina (जिष्णो:) जीतने वाले (ते) पाप के जिन (कृतानि) कृत्यों का हम लोग (प्र, अवामा) उपदेश देखें उनको (न) न (पूर्व) प्राचीनजन (न) न (अपरासः) पीछे से हुए जन व्याप्त होते हैं और नूतनः) नवीन (कः, चन) कोई भी आप के (वीर्यम्) पराक्रम को (न) नहीं (आप) व्याप्त होता है ॥६॥ भावार्थः - विद्वानों को चाहिये कि उन्हीं प्रशंसित कर्म वालों के कृत्यों को अन्य जनों के लिये उपदेश देवें जिन के कर्म अप्रतिहत अर्थात् नष्ट नहीं, होते हैं ॥६॥ फिर विद्वानों के उपदेश विषय को अगले मंत्र में कहते हैं ।। उप स्तुहि प्रथमं रत्नधेयं वृहस्पति सनितारं धनानाम् । यः शंसते स्तुवते शम्भविष्ठः पुरूवसुरागमज्जोहुवानम् ॥७॥ पदार्थ:-हे विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (यः) जो (पुरूवसुः) बहुत धनों से युक्त (शम्भविष्ठः) अत्यन्त सुखकारक जन (शंसते) प्रशंसा करने वाले और (स्तुवते) स्तुति करने वाले के लिये (प्रथमम्) पहिले (रत्नधेयम् ) रत्न धरने योग्य जिस से उस (जोहुवानम्। पुकारे गये वा पुकारने वाले के लिये । बृहस्पतिम्। बड़ों के पालने करने और (धनानाम्) धनों के (सनितारम्) उत्तम प्रकार विभाग करने वाले को (प्रागमत्) प्राप्त हो उस की आप (उप, स्तुहि) समीप में स्तुति करो ॥७॥ भावार्थः-वे ही जन प्रशंसा करने योग्य होते हैं जो सब पदार्थ बाँट अर्थात् विभाग कर के खाते हैं ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । तवोतिभिः सचमाना अरिष्टा बृहस्पते मघवानः सुवीरा । ये अश्वदा उत वा सन्ति गोदा ये वस्त्रदाः सुभगारतेषु रायः ॥८॥ पदार्थः- हे (बृहस्पते) बृहत् अर्थात् विद्या आदि उत्तम पदार्थों की रक्षा करने वाले (ये) जो (तब) आपकी (अतिभिः) रक्षा प्रादिकों के साथ (अरिष्टाः) नहीं हिंसा किये गए (सचमानाः) संबन्ध करते हुए (मघवानः) अत्यन्त श्रष्ठ धन से युक्त (सुवीराः) उत्तम वीरजन (अश्वदाः) अग्नि आदि वा घोड़ों को देनेवाले (उत) भी (वा) वा (ये) जो (गोदाः) सुशिक्षित वाणी वा गौत्रों के देनेवाले (वस्त्रदाः) वस्त्रों के देनेवाले और (सुभगाः) सुन्दर ऐश्वर्या वा धन से युक्त (सन्ति) हैं (तेषु) उनमें (रायः) धन होते हैं ।।८।।

ऋग्वेदः म०५ । सू०.४२ ॥ भावार्थ:- जो धार्मिक राजा से रक्षा किये गए और प्रशसित धनों से युक्त दाताजन हैं वे ही यशस्वी होके धनाढ्य होते हैं ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । विसर्माण कृणुहि वित्तमेवां ये भुजते अप॒णन्तो न उक्थैः । अपव्रतान्प्रसवे वाधानान्ब्रह्मद्विषः सूर्यांधावयस्य ।।९।। पदार्थः- हे विद्वन् (ये) जो (अपृणन्तः) नहीं पूर्ण वा नहीं पालन करते हुए (भुञ्जते) भोगते हैं और (नः) हमारे (उपयः) उतम वाक्यों से (प्रस) उसन्न हुए जगत् में (वावधानान्) अत्यन्त बढ़ते हुए (अपनतान्) ब्रह्मचर्य सत्यभाषणादि द्रताचाररहित ब्रह्मद्विषः) वेद वा परमात्मा से द्वेष करने वालों को रोकते हैं (एषाम् ) इन लोगों के (विसम्मणिम्) उत्पन्न करने वाले (वित्तम्) धन वा भोग को (कणुहि) करो और (सूर्यात) सूर्य से उनको (यावय स्व) अमिश्रित करो ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो लोग शुद्ध आचरणों से रहितों को शुद्ध आचरणों के सहित और अविद्वानों को विद्वान् कर के नास्तिकों को रोक के अधर्म के आचरण से पृथक् होके निरन्तर सुखी करते वे निरन्तर आदर करने के योग्य होते हैं ।।६।। फिर शिक्षाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। य ओहते रक्षसों देववीतावचक्रेभिस्तं मरुतो नि यांत । यो वः शमी शशमानस्य निन्दात्तुच्छ्यान् कार्मान करते सिविदानः ॥१०॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो (यः) जो देववीतौ) देव' अर्थात् विद्वानों से व्याप्त क्रिया में रक्षसः) दुष्ट आचरणयुक्त मनुष्यों को (मोहते) प्राप्त कराता है (यः) जो (वः) आपलोगों और शिशमानस्य) प्रशंसा किये गये के (शमीम्) कर्म की (निन्दाद) निन्दा करे और सिष्विदानः) संलग्न हुआ (तुच्छयान्) क्षुद्रों में हुए (कामान्) मनोरथों को (करते) करे (तम्) उस को (अचक्रेभिः) चक्रों से रहितों के द्वारा दण्ड से नि, यात) निरन्तर प्राप्त हूजिये ।।१०।। भावार्थः - हे राजा आदि मनुष्यो ! जो बुरी शिक्षा से मनुष्यों को दूषित करते और निन्दा तथा विषयों की प्रासक्ति में प्रवृत्त कराते हैं उन को निरन्तर दण्ड दीजिये ॥१०॥ Glam १६० ऋग्वेदः म० ५। सू० ४२ ।। AM 0 CHO अब रुद्रविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तमु ष्टुहिं यः स्थिषुः सुधन्वा यो विश्वस्य क्षयति भेषजस्य । यक्ष्वा महे सौमनसाय रुद्रं नमोभिर्देवमसुरं दुवस्य ॥११॥ पदार्थः हे राजन् अथवा विद्वन् (य:) जो (स्विषुः) सुन्दर बाणों से युक्त (सुधन्वा) उत्तम धनुष् वाला शत्रुओं को जीतता है और (यः) जो (विश्वस्य) सम्पूर्ण जगत् के मध्य में (भेषजस्य) ओषधि की प्रवृत्ति का (क्षयति) निवास करता वा निवास कराता है (तम्) उसकी (महे) बड़े (सौमनसाय) श्रेष्ठ मन के भाव के लिये (स्तुहि) स्तुति कीजिये और श्रेष्ठ कर्मों को (यक्ष्वा) मिलाइये वा प्राप्त हूजिये उस (उ) ही (देवम्) श्रेष्ठ गुणों से युक्त (रुद्रम्) और दुष्टों के रुलानेवाले (असुरम्) मेघ को बड़े श्रेष्ठ मनके भाव के लिए (नमोभिः) अन्नादिकों से (दुवस्य) सेवन कीजिये ॥११॥ भावार्थः हे राजन् ! जो शस्त्र और अस्त्रों के चलाने के लिए युद्धविद्या में चतुर वैद्य विद्या में निपुण और दुष्टों के दण्ड देने वाले जन होवें उन की स्तुति कर अच्छे कर्मों में नियुक्त कर अोर अच्छे प्रकार सेवन कर समस्त राजकृत्यों को पूर्ण करो ॥११॥ अब विद्वत्कर्त्तव्यशिक्षाविषय को कहते हैं । दमूनसो अपसो ये सुहस्ता वृष्णः पत्नीनयों विस्वतष्टाः । सरस्वती बृहदिवोत राका देशस्यन्तीर्वरिवस्यन्तु शुभ्राः ॥१२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (ये) जो (अपस:) उत्तम कर्म करने (वमूनसः) संयमी (सुहस्ताः) और उत्तम कर्मों में हाथ लगानेवाले (वृष्ण:) पराक्रम से युक्त और (विम्वतष्टाः) व्यापक ईश्वर से रचे गये जन (नधः) नदियों के सदृश (उत) और (बृहद्दिवा) बड़ा विद्याका प्रकाश जिसमें ऐसी (राका) सुख को देने वाली (सरस्वती) विज्ञानयुक्त वाणी के सदृश (दशस्यन्तीः) अभीष्ट मनोरथ मनोरथ को देती हुई और (शुभ्राः) सुन्दर स्वरूप तथा उत्तम आचरण करने वाली (पत्नीः) विवाहित स्त्रियों का (वरिवस्यन्तु) सेवन करें वे अत्यन्त सुख को प्राप्त होवें ॥१२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०---कन्या और वर-जब ब्रह्मचर्य से विद्यायें पूर्ण, युवावस्था और परस्पर की परीक्षा होवे तब स्वयंवर विवाह से पति और पत्नी होकर सौभाग्यवान होते हैं ॥१२॥ N JIO ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४२ ।। KEEP फिर उसी विषय को कहते हैं । स सू महे सुशरणार्य मेषां गिर भरे नव्य॑सी जायमानाम् । य आहना दुहितुर्वक्षणांमु रूपा मिनानो अकृणोदिदं नः ॥१३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (यः) जो मनुष्य (बक्षणासु) बहती हुई नदियों के निमित्त (दुहितुः) कन्या के (रूपा) सुन्दर रूपों (प्राहनाः) और जो सब ओर से ताड़ित होती उनका (मिनानः) मान करता हुप्रा (नः) हम लोगों को (इदम्) इस' वर्तमान सुख में पाये हुए (अकृणोद) करे उसके साथ मैं (महे) बड़े (सशरणाय) उत्तम आश्रय के लिये (नव्यसीम्) अत्यन्त नवीन (जायमानाम्) प्रसिद्ध (मेधाम्) उत्तम बुद्धि और (गिरम्) वाणी को (प्र, सू, भरे) उत्तम प्रकार धारण करता हूं ॥१३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! समानरूप वाली कन्या को देख के ही उसका सदृश पति कराने के समान बुद्धि और शिक्षित वाणी को बढ़ाय के गृहाश्रम से उत्पन्न हुए सुख को सब मनुष्यों के लिये आप लोग प्राप्त करायो॥१३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। प्र सुष्टुतिः स्तनयन्तं रुवन्तमिळस्पति जरितर्नूनमश्या:। यो अब्दिमाँ उदानिमाँ इयति म विद्युता रोदसी उक्षमाणः ॥१४॥ पदार्थः- हे (जरितः) स्तुति करने वाले श्राप (यः) जो (अब्दिमान्) मेघों से युक्त और (उदनिमान्) बहुत जलवाला (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (उक्षमाणः) सींचता हुआ (विद्य ता) विजुली के साथ मेघ (इत्ति) प्राप्त होता है और जो (सष्टुतिः) उत्तम प्रशंसायुक्त है उस (स्तनयन्तम्) गर्जना करते हुए को (नूनम्) निश्चय से (प्र, अश्याः) प्राप्त होमो और आप (रुवन्तम्) शब्द करते (इळ:) पृथिवी के (पतिम्) पालन करने वाले को (प्र) उत्तम प्रकार जनाइये ॥१४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो मेघ भूमि में वर्तमान जीवों का पालन करनेवाला, विजुली के साथ वृष्टि करता और शब्द करता हुआ भूमि को प्राप्त होता है उसको जान के अन्यों को जनाइये ॥१४॥ अब रुद्रविषयक विद्वत्कर्तव्य शिक्षाविषयक को अगले मन्त्र में कहते हैं । एषःस्तोमो मारुतं शर्थो अच्छा रुद्रस्य॑ सूनँयुवन्यूँरुदश्याः । कामों राये हवते मा स्वस्त्युप स्तुहि पृषदश्वाँ अयासः ॥१५॥ MORE Artha ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४२ ॥ me PANNA पदार्थ:-हे विद्वन् जो (कामः) इच्छा (मा) मुझ को (राये) धन के लिए (स्वस्ति) सुख को (हवते) ग्रहण करती है उसकी (उप, स्तुहि) समीप में स्तुति प्रशंसा कीजिए और जो (प्रयास:) चलते हुए (पृषवश्वान्) सींचनेवाले तथा शीघ्र चलने वाले पदार्थों को प्राप्त होते हैं उन (युवन्यून्) अपने मिले और नहीं मिले हुए पदार्थों की इच्छा करते हुओं को प्राप (उत, अश्याः) अत्यन्त प्राप्त हूजिए और जो (एषः) यह (स्तोमः) प्रशंसा का विषय (भारतम्) मनुष्यों के इस (शः) बल को ग्रहण करता है उस (रुद्रस्य) प्राण आदि है रूप जिसका ऐसे' वायुके (सूनून्) उत्पत्ति के गुणों को (अच्छा) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिए ॥१५॥ भावार्थः - हे मनुष्यो ! आप लोग वह्नि और मेघविद्या को जानकर पूर्ण मनोरथवाले हूजिये ॥१५॥ फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्रेष स्तोमः पृथिवीमन्तरिक्षं वनस्पती रोषधी राये अश्याः । देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मती धात् । १६ । पदार्थ:-हे विद्वन् (देवोदेवः) विद्वान् विद्वान् (सुहवः) उत्तम प्रकार ग्रहण करने वाले और दाता आप और जो (एषः) यह (स्तोमः) प्रशंसा करने योग्य मेघ वा वह्नि (राये) धन के लिए (पृथिवीम्) भूमि (अन्तरिक्षम्) आकाश और (प्रोषधीः) यव प्रादि ओषधियों तथा (वनस्पतीन्) वट और अश्वत्थ आदि वनस्पतियों को प्राप्त होता है उसको आप (प्र, अश्याः) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिए वह (मह्यम्) मेरे लिए सुखकारक (भूतु) होवे जिस से यह पृथिवी) पृथिवी (माता) माता के सदृश पालन करने वाली (नः) हम लोगों को (दुर्मतौ) दुष्टबुद्धि में (मा) नहीं (धान) धारण करे ॥१६॥ भावार्थ:-सब स्त्री और पुरुष विद्वान् होकर विजुली और मेघ आदि की विद्या को ग्रहण करें जिससे यह विद्या आप लोगों की माता के सदृश पालना करे और जैसे माता उत्तम शिक्षा से अपने सन्तानों को उत्तम करती है वैसे ही मेघवृष्टिविद्या से युक्त भूमि उत्तम अन्न आदिकों को उत्पन्न करती है ॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उरो देवा अनिवाधे स्याम ॥१७॥ पदार्थ:-हे (देवाः) विद्वान् जनो जैसे हम लोग (अनिबाधे) विघ्नरहित ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४३ ।। होने पर (उरौ) बहुत सुख करने वाले कार्य में विद्वान् (स्याम) होवें वैसे आप लोग करिये ॥१७॥ भावार्थ:-अध्यापक विद्वान् जनों को चाहिये कि सम्पूर्ण विद्या के प्रतिबन्धकों का निवारण करके सम्पूर्ण जनों को विद्वान् करें॥१७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। समश्विनोरवसा नूतनेन भयोमुश सुप्रणीती गमेम । आ नों रयिं वहतमोत बीराना विश्वान्यमृता सौभगानि ॥१८॥ GRA AN पदार्थः हे (मयोभुवा) सुख के करने वालो (सप्रणीती) उत्तम प्रकार वर्ती गई नीति जिन से ऐसे अध्यापक और उपदेशक जनो! जो आप दोनों (न:) हम लोगों के लिये (रयिम्) लक्ष्मी को (मा; बहतम् ) प्राप्त कराइये (उत) भी (वीरान्) श्रेष्ठ शूरता आदि गुणों से युक्त शूरवीर जनों को (प्रा) प्राप्त कराइये और भी (विश्वानि) सम्पूर्ण (अमृता) नित्य (सौभगानि) सुन्दर ऐश्वर्यों के भावरूप को (प्रा) प्राप्त कराइये उन (अश्विनोः) अध्यापक और उपदेशकों के (नूतनेन) नवीन (अवसा) रक्षण से हम लोग सम्पूर्ण नित्य सुन्दर ऐश्वर्यों के भावरूपों को (सम्, गमेम) उत्तम प्रकार प्राप्त होवें ॥१८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! विद्वानों से रक्षित और बोध को प्राप्त हुए आप लोग लक्ष्मी और उत्तम मनुष्यों के सहाय से सम्पूर्ण ऐश्वर्यों को प्राप्त हूजिये ॥१८॥ इस सूक्त में विश्वेदेव रुद्र और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में बयालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। - अथ सप्तदशस्य त्रिचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्याऽत्रिऋषिः । विश्वेदेवा देवताः। १।३।६।८।। १७ निवृत्रिष्टुम् । २।४।५ । १० । ११ । १२ । १५ त्रिष्टुप् । ७ । १३ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धंवतः स्वरः । १४ भुरिक्पङ्क्तिः। १६ याजुषी पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब सत्रह ऋचा वाले तेतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में विद्वान् के विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः म० ५। सू०.४३ ।। M Aayo dustan आ धेनवः पयसा तूण्य अमर्धन्तीरूप नो यन्तु मध्या । महो राये बृहतीः सप्त विनों मयोभुवो जरिता जोहवीति ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (जरिता) सम्पूर्ण विद्यानों की स्तुति करने वाला (विप्रः) बुद्धिमान् जन (महः) बड़े (राये) धन' के लिये (सप्त) सात प्रकार की (बहतीः) बड़ी वारिणयों का (जोहवीति) बार २ उपदेश करता है और उस से प्रेरणा किये गए (मध्वा) मधुर आदि गुरखों के साथ और (पयसा) दुग्धदान के साथ (अमर्धन्तीः) नहीं हिंसा करती हुई और (तूपाः) शीघ्र चलने वाले अर्थ जिन में ऐसी (मयोभुवः) सुख की भावना कराने वाली (धेनव:) गौनों के सदृश वाणियां (नः) हम लोगों को (उप, श्रा, यन्तु) समीप में उत्तम प्रकार प्राप्त होवें ॥१॥ भावार्थ:---जो मनुष्य यथार्थ वक्ता विद्वानों के सङ्ग से शास्त्रों के विषय से युक्त वाणियों को ग्रहण करके उनका, कृपा से अन्यों के लिये उपदेश देवें वे भी श्रेष्ठ होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ सुष्टुती नमसा वर्तयध्यै द्यावा वाजाय पृथिवी अमृधे । पिमा माता मधुंबचाः सुहस्ता भरेभरे नो यशसावविष्टाम् ॥२॥ पदार्थः- हे मनुष्यो आप लोगों से (वाजाय) विज्ञान के लिये (सुष्टुती) श्रेष्ठ प्रशंसा से (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (अमृध्र) नहीं हिंसा किये गए में (सुहस्ता) सुन्दर हस्त जिन के वे (यशसो) यश और धन से युक्त (धावा) अन्तरिक्ष और (पृथिवी) पृथिवी (मधुवचाः) मधुरं वचन जिसका ऐसा वा ऐसी (पिता) पिता और (माता) माता के सदृश (भरेभरे) संग्राम संग्राम में (नः) हम लोगों को (अविष्टाम्) प्राप्त होवें वे (मा, बर्तयध्यै, उत्तम प्रकार बर्ताव करने को प्राप्त होवें ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० --हे मनुष्यो ! जैसे माता और पिता अपने सन्तानों को उत्तम प्रकार शिक्षा देकर और वृद्धि करके विजय- कारी करते हैं वैसे ही प्राप्त हुई सूर्य और पृथिवी की विद्या सर्वत्र विजय को प्राप्त कराती है ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अध्वर्यवश्चकृवांसो मधूंनि प्र वायवे भरत चारुं शुक्रम् होतेव नः प्रथमः पाह्यस्य देव मध्वो ररिमा ते मदाय ॥३॥ E SHAN ऋग्वेदः मं० ५ । सू०४३ ।। १६५ पवार्थ:-हे (देव) विद्वन् (प्रथमः) पहिले आप (होतेब) दाता जन के सदृश (अस्य) इस (मध्वः) मधुर के मध्य में (नः) हम लोगों की (पाहि) रक्षा करिये जिस से हम लोग (ते) श्राप के (मदाय) आनन्द के लिये (ररिमा) क्रीड़ा करें। हे (चक्रिवांसः) कार्य करते हुए और (अध्वर्यवः) अपनी अहिंसा की इच्छा करते हुए आप लोग वायवे) वायु विद्या के लिये (मधूनि) विज्ञानों और (चार) सुन्दर (शुक्रम्) जल को (प्र, भरत) उत्तम प्रकार धारण कीजिये ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० - हे मनुष्यो ! जैसे हवन करने वाला होम से सब के हित को सिद्ध करता है वैसे ही सब के हित लिये वायु और जल की विद्या को विस्तारिये जिस से सब हम लोग आनन्दित वर्ताव करें ॥३॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । दश क्षिपो युञ्जते बाहू भदि सोमध या शमितारा मुहस्ता । मध्वो रस सुगर्भस्तिगिरिष्ठां चनिश्चदद् दुदुहे शुक्रमशः ॥४॥ पदार्थः -- हे मनुष्यो जैसे (सुगस्तिः) सुन्दर किरणें जिस की वह सूर्य और (अंशुः) किरण (चनिश्चदत) प्रसन्न करता है और (मध्व:) मधुर आदि गुणों से युक्त (सोमस्य) ऐश्वर्या के सम्बन्धी (गिरिष्ठाम्) मेघ में वर्तमान (अनिम्) मेघ को (रसम्) रस को और (शुभम्) जल को (दुदुहे) दुहता है वैसे जो (दश) दशसंख्या वाली (क्षिप:) प्रेरणा करते हैं जिन से वे नङ गुलियां और (या) जो (शमितारा) शांति से यज्ञकर्म के करने वाले और (सुहस्ता) अच्छे हाथों बाले (बाहू) भुजानों को (युञ्जते) युक्त करते हैं उन से धर्म संबन्धी कार्यों को करो ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु० जैसे मनुष्य आदि प्राणी अगु- लियों से पदार्थों का ग्रहण करते और त्यागते हैं वैसे ही सूर्य किरणों भूमि के नीचे से जल को ग्रहण करके फैकता अर्थात् वृष्टि करता है ऐसा जानो।॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। असावि ते जुजुषाणाय सोमः कल्ये दक्षाच बृहते मदाय । हरी रथे सुधुरा योगे अर्वागिन्द्र प्रिथा कृणुहि हूयमानः ।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युका विद्वन् जिन' से (ते) आप के (बृहते) बड़े (जुजुषाणाय) प्रीति से सेवन किये गए (कत्वे) प्रज्ञान तथा (वक्षाय) चातुर्य बल और (मवाय) प्रानन्द के लिये (सोमः) बड़ी ओषधियों का रस वा ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४३ ।। Suur EMANE Film . ऐश्वर्य (असावि) उत्पन्न किया जाय और उनके (योगे) संयोग होने पर (अर्वाक्) नीचे चलने वाले (सुधुरा) सुन्दर धुरा जिन की ऐसे (हरी) हरणशील घोड़ों को (रथे) वाहन में जोड़ के (हूयमानः) स्पर्धा किये गए आप (प्रिया) सेवन करने योग्य सुन्दर वस्तुओं वा सुखों को (कृणुहि) सिद्ध करिये ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस से बुद्धि बल आनन्द और पुरुषार्थ बढ़ें और अग्नि और घोड़े आदि के चलाने की विद्या प्राप्त होवे वह कर्म सदा करना चाहिये ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ नो महीमरमति सजोषा नां देवीं नमसा रातहव्याम् । मधोर्मदीय बृहती तज्ञामाग्ने वह पथिभिर्देवयानैः ।६।। पदार्थ:--हे (अग्ने) विद्वन् (मा, सजोषाः) सब ओर से तुल्य प्रीति के सेवन करने वाले पाप (नमसा) सत्कार वा अन्न आदि से (पथिभिः, देवयानः) यथार्थ बक्ता विद्वान् चलते हैं जिन में उन' मार्गों से (मधोः) मधुर प्रादि गुण युक्त से (मदाय) आनन्द के लिये नः) हम लोगों को (अरमतिम्) विषयों में नहीं रमण करती हुई (रातहव्याम्) देने योग्य दान जिस से' (ग्नाम्) प्राप्त होते हैं ज्ञान को जिस से तथा (ऋतशाम्) सत्य को जानता है जिस से उस (बहतीम्) बड़े पदार्थों के विषय से युक्त (देवीम्) देदीप्यमान मनोहर (मा महीम् ) बड़ी वाणी को हम लोगों के लिये (मा, वह) प्राप्त कराइये ।।६।। भावार्थ:-वे ही विद्वान् होते हैं जो सब प्रकार से सब काल में विद्या की याचना करते हैं और वे ही विद्वान् हैं जो धर्मयुक्त मार्ग से विरुद्ध कुछ भी आचरण नहीं करते हैं ।।६।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अनन्ति यं प्रथयन्तो न विपी वपावन्तं नाग्निना तर्पन्तः । पितुर्न पुत्र उपसि प्रेष्ठ आ धर्मों अग्निमृतबन्नसादि ॥७॥ पवार्थ:-हे विद्यार्थिन् (यम्) जिस (वपावन्तम् ) विद्या के बीज के विस्तार के (न) सदृश प्राप को (अग्निना) अग्नि के सदृश ब्रह्मचर्य से (तपन्तः) संताप दुःख को सहते और विद्या के बीज का विस्तार करते के सदृश (प्रथयन्तः) प्रसिद्ध करते हुए (विप्राः) बुद्धिमान् जनों के (न) सदृश अग्नि के समान ब्रह्मचर्य से सन्ताप दुःख को सहते हुए (प्रजन्ति) कामना करते वा प्रकट करते हैं और जो (पितुः) पिता के (पुत्रः न) पुत्र के सदृश (उपसि) समीप में (प्रेष्ठ:) *- को करते हुए ऋग्वेदः मं० ५। सू०४३ ॥ १६७ . meyan AAINA अत्यन्त प्रिय (धर्मः) यज्ञ वा तप (अग्निम्) अग्नि को (ऋतयन्) सत्य के सदृश नाचरण करते हुए (मा, प्रसादि) उत्तम प्रकार स्थित होवे उन को और उस को आप निरन्तर सेवन करके विद्या को ग्रहण करिये ॥७॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं. हे अध्यापक विद्वानो! तुम लोग जो जितेन्द्रिय उत्तम स्वभावयुक्त शीत उष्ण सुख दुःख अानन्द शोक निन्दा स्तुति आदि द्वन्द्व को सहने वाले अभिमान और मोह से रहित सत्य आचरण- कर्ता और परोपकार प्रिय ब्रह्मचारी विद्यार्थी होवें उन को पुरुषार्थ से विद्वान् करिये ॥७॥ फिर उसी विद्वद्विषय को कहते हैं । अच्छा मही बृहती शन्तमा गीर्दूतो न गन्त्वश्विना हुवध्यै । मयोभुवा सरथा यांतमर्वागन्तं निधि धुरमाणिर्न नाभिम् ॥८॥ पदार्थः--हे मनुष्यो जो (बहती, बड़े ब्रह्म आदि वस्तु को प्रकाश करने वाली और (शन्तमा) अत्यन्त कल्याणकारिणी (मही) बड़ी (गी:) गाते हैं पदार्थों को जिस से एसी वाणी और (मयोभुवा) सुख को उत्पन्न करने वाले (सरथा) वाहन आदिकों के साथ वत्त मान (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनों को (हुवध्य) बुलाने को जैसे' (दूतः) धाम्मिक विद्वान् चतुर राजा का दूत (न) वैसे (गन्तु) प्राप्त हूजिये तथा जिस से अध्यापक और उपदेशक जन (नाभिम्) मध्य (धुरम्) वाहन के आधार काष्ठ को {पाणि:) कीले के (न) सदृश और (अर्वाक) सत्य धर्म के पीछे (गतम्) चलते हुए (निधिम्) द्रव्यपात्र को (अच्छा) उत्तम प्रकार (प्रा, यातम्) प्राप्त हूजिये उस को आप लोग प्राप्त होमो ।।८।। भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं.-वे ही मनुष्य हैं जिनको जैसे राजा को दूत वैसे सम्पूर्ण शास्त्रों में प्रवीण वाणी प्राप्त होवे और वे ही भाग्य- शाली हैं जिन को धर्मयुक्त पुरुषार्थ से अतुल ऐश्वर्या प्राप्त होवे ।।८।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। प्र तव्यसो नमउक्ति तुरस्याहं पूष्ण उत वायोरदिक्षि । या राधसा चोदितारी पतीनां या वाजस्य द्रविणोदा उत त्मन् ।।९।। पदार्थः हे विद्वान जनो जैसे (अहम्) मैं (तुरस्य) शीघ्र कार्य करने वाले (तव्यसः बलयुक्त उत और (पूष्णः) पुष्टिकारक वायोः) वायु के (नमउक्तिम् ) सत्कार वा अन्न आदि के वचन का (अदिक्षि) उपदेश करता हूँ और (उत) भी NAAM 10 १६८ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४३ ॥ (त्मन) आत्मा में (या) जो (राघसा) धन से (मतीनाम्) मनुष्यों के (प्र, चोदितारा) अत्यन्त प्रेरणा करने वाले और (या) जो (वाजस्थ) विज्ञान वा अन्न के (द्रविणोदी) बल से देने वाले वर्तमान हैं उन को उपदेश देता हूं वैसे आपलोग भी उपदेश दीजिये ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे विद्वान् जन विद्या के उपदेश और दान से मनुष्यों को उत्तम प्रकार शिक्षित करते हैं वैसे ही तुम लोग भी करो ॥६॥ Monute ! फिर उसी विषय को कहते हैं । आ नामभिर्मरुतो वक्षि विश्वाना रूपेभिर्जातवेदो हुवानः । यज्ञं गिरौं जरितुः सुष्टुतिं च विश्वं गन्त मरुतो विश्व ऊती ॥१०॥ पदार्थ:-हे (जातवेदः) बुद्धि से युक्त (हुवानः) दान करते हुए आप नामभिः) संज्ञाओं और (रूपेभिः) रूपों से (विश्वान्) सम्पूर्ण (मरुतः) मनुष्यों को (प्रा) सब प्रकार (वक्षि) प्राप्त हूजिये (जरितुः) स्तुति करने वाले की (सुष्टु- तिम्) उत्तम प्रशंसा को (गिरः) वारिणयों को (यशम्, च) और संगति करने को (विश्वे) सम्पूर्ण (गन्त) प्राप्त होवें तथा (विश्वे, समस्त (मस्तः) मनुष्यों को ऊती) रक्षरण आदि क्रिया से (प्रा) प्राप्त हो ॥१०॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप सम्पूर्ण नाम और रूप आदिकों से सम्पूर्ण पदार्थों को सम्पूर्ण मनुष्यों के लिये साक्षात् करानो जिस से सब मनुष्य प्रशंसित होकर सब के लिये प्रशंसित विद्यायुक्त संपादित करें ॥१०॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम् । हवं देवी जुजुषाणा घृताची शम्मा नो वाचमुशती शृणोतु ।।१६।। पदार्थ:-हे विद्यार्थी जनो जैसे यह (यजता) उत्तम प्रकार प्राप्त होने योग्य (सरस्वती) विज्ञानयुक्त वाणी (दिवः) कामना करते हुए (बृहतः) महदाशय- युक्त (न:) हमलोगों को (पर्वतात) मेघ से जल के सदृश (प्रा, गन्तु) सब प्रकार प्राप्त होवे (घृताची) घृत को प्राप्त होने वाली (जुजुषाणा) उत्तम प्रकार से सेवन की गई (देवी) श्रेष्ठ गुण और शास्त्र के बोध से युक्त (उशती) कामना करती हुई विद्यायुक्त स्त्री (न:) हमलोगों के (यज्ञम्) विद्याव्यवहार को (हवम्) कहने सुनने योग्य व्यवहार को वा (शामाम्) सुखमयी (वाचम्) वाणी को और हमलोगों ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४३ ।। SAN ANAM M को (मा, शृणोतु) अच्छे प्रकार सुने वैसे ही आप लोगों को भी प्राप्त हुई यह आप लोगों के कृत्य को सुने ॥११॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-उन्हीं को श्रेष्ठ वाणी प्राप्त होती है जो सत्य की कामना करने वाले महाशय परोपकारप्रिय धर्मिष्ठ और विद्यार्थियों के परीक्षक होवें ॥११॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ वेवसं नीलपृष्ठं बृहन्तं बृहस्पतिं सदने सादयध्वम् । सादयोनि दम आ दीदिवांसं हिर॑ण्यवर्णमरुषं संपेण ॥१२॥ पदार्थः-हे बुद्धिमान् जनो आप लोग (नीलपृष्ठम्) नील गुण से युक्त पृष्ठ जिस का उस (बृहन्तम् ) बड़े (बृहस्पतिन) बड़ों के स्वामी (वेधसम्) बुद्धिमान् को (सदने) सभा के स्थान में (प्रा, सादयध्वम्) उत्तम प्रकार स्थित कीजिये । और हम लोग (सादद्योनिम्) धर्मसंबन्धी कारण' में स्थित होते और (दौदिवांसम्) निरन्तर प्रकाशमान देने वाले (हिरण्यवर्णम्) तेजस्वी (अरुषम् ) मर्मविद्या में स्थित होते हुए को (दमे) गृह में अर्थात् सभास्थान में (पा, सपेम) अच्छे प्रकार शपथों से नियत करावें ॥१२॥ भावार्थ:-वे ही मनुष्य राज्य करने और बढ़ाने को समर्थ होवें जो धर्मिष्ठ और किये हुए उपकारों को जाननेवाले कुलीन विद्वानों को सभा में स्थित करें तथा वहां स्थापनसमय में शपथों से आप लोग अन्याय को कभी मत करो ऐसा प्रलम्भन करावें ॥१२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ धर्णसिहबिचो रगणो विश्वेभिर्गन्त्वोमंभिर्हवानः । ग्ना वसान ओषधीरमृध्रस्त्रिधातुशृङ्गो वृषभो वयोधाः ॥१३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जैसे धर्णसिः) धारण करनेवाला (बृदियः) बड़े प्रकाश का (रराणः) दान करता हुअा (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (श्रोमभिः) रक्षण आदि के करने वालों के साथ (हुवानः) ग्रहण करता और (ग्ना:) वाणियों को (वसानः) आच्छादित करता हुआ (ोषधीः) सोमलता आदि का (अमृध्रः) नहीं नाश करने वाला (त्रिधातुङ्गः) तीन धातु अर्थात् शुक्ल रक्त कृष्ण गुण शृङ्गों के सदृश जिस के और (वयोधाः) सुन्दर प्रायु को धारण करनेवाला (वृषभः) वृष्टि- कारक सूर्य संसार का उपकारी है वैसे ही आप संसार के उपकार के लिये (श्रा, गन्तु) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये ।।१३।। N actort MHNP %Ausp LON NWR पा 4- - १७० ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४३ ॥ भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु०-जो विद्वान् तीन गुणों से युक्त प्रकृति के जनाने, वाणी के जनाने, नहीं हिंसा करने, औषधों से रोगों के निवारने और ब्रह्मचर्य आदि के बोध से अवस्या के बढ़ानेवाले होते हैं वे ही संसार के पूज्य होते हैं ।।१३।। फिर उसी विषय को कहते हैं । मातुष्पदे परमे शुक आयोविपन्यो रास्सिरासो अग्मन् । सुशेव्यं नमसा रातहव्याः शिशु मृजन्त्यायवो न वासे ॥१४॥ पदार्थः-हे मनुष्यो जो (शुक्र) शुद्ध (परमे) उत्तम (मातः) माता के सदृश वर्तमान भूमि के (पदे) प्राप्त होने योग्य स्थान में (प्रायोः) जीवन के (विपन्यवः) विशेषतया स्तुति करने और (रास्पिरासः) दानों की प्रीति करने वाले (रातहण्या:) दिये हुओं के देने योग्य (नमसा) सत्कार वा अन्नादि से (वासे ) वसने में (प्रायवः) मनुष्य (शिशुम्) शासन करने योग्य बालक को (मृजन्ति) शुद्ध करते हैं (न) जैसे वैसे (सुशेव्यम्) उत्तम सुखों में हुए व्यवहार को (अग्मन्) प्राप्त होते हैं वे उत्तम प्रकार सुखों से युक्त होते हैं ॥१४॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं. जैसे माता शीघ्र उत्पन्न हुए बालक को उत्तम प्रकार शुद्ध कर के उत्तम स्थान में रक्षा करती है वैसे ही जो योगाभ्यास में चित्त को शुद्ध करते हैं वे ऐश्वर्य के सहित सुख को प्राप्त होते हैं ॥१४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। बृहद्वयो बृहते तुभ्यमग्ने धियाजुरौं मिथुनासः सचन्त ! देवोदेव सुहको भूतु मह्यं मा नौ माता पृथिवी दुर्मती धात् ।।१५ । पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् जो (धियाजुरः) बुद्धि वा कर्म से प्राप्त हुई वृद्धावस्था जिन को ऐसे (मिथुनासः) स्त्रियों के सहित वर्तमान जन बृहते) बद्ध (तुभ्यम्। आप के लिये (बृहत) बड़े (वयः) जीवन को (सबन्त) उत्तम प्रकार प्राप्त होते हैं और (सुहवः) उत्तम प्रकार प्रशंसा करने योग्य देवोदेवः) विद्वान् विद्वान् (मह्यम्) मेरे लिये सुखकारी (भूतु) हो और (पृथिवी) भूमि के सदृश (माता) माता (न:) हम लोगों को (दुर्मती) दुष्ट बुद्धि में (मा) नहीं (धात्। धारण करे ॥१५॥ भावार्थः-हे मनुष्यो ! जो अवस्था और विद्या में वृद्ध आप लोगों M HAR (उत) और (वीरान्) अति उत्तम पुत्र पौत्र आदिकों को (प्रा, वहतम्) अच्छे ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४४ ।। १७१ को विद्याओं से संबन्धित करते हैं और माता के सदृश कृपा से रक्षा करते हैं वे आप लोगों के पूज्य हों ॥१५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उरौ देवा अनिबाधे स्याम ॥१६॥ पदार्थ:-हे (देवाः) विद्वान् जनो! आप लोग जैसे हम लोग (उरो) बहुत (अनिबाधे) व्यवहार में (स्थाम) होवें वैसे करिये ॥१६।। भावार्थ:-विद्वानों को चाहिये कि सब मनुष्य जैसे विघ्नरहित होवें वैसा करें॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम । आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौमंगानि ॥१७॥ पदार्थ:-हे अध्यापकोपदेशको जो (मयोभुवा) सुख के उत्पन्न करने वाले (सुप्रणीती) धर्म सम्बन्धी नीति से युक्त पाप (न:) हम लोगों को रयिम्) धन MA Ja प्रकार प्राप्त करावें और जिन (अश्विनोः) अध्यापक और उपदेशकों के (नूतनेन) नवीन (अबसा) रक्षण प्रादि से हम लोग (विश्वानि) सम्पूर्ण (अमृता) नाश से रहित (सौभगानि) सुन्दर ऐश्वर्यों के भावों को हम लोग (सम्, पा, गमेम) उत्तम प्रकार प्राप्त हो। वे दोनों हम लोगों से सदा (मा) उत्तम प्रकार सेवन करने योग्य हैं ॥१७॥ भावार्थ:-जो अध्यापक और उपदेशक जन सब मनुष्यों को नवीन और प्राचीन विद्या से युक्त कर ऐश्वर्य को प्राप्त कराते हैं वे सदा ही प्रशंसित होते हैं ॥१७॥ इस सूक्त में संपूर्ण विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त' के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । पञ्चम मण्डल में तेतालीसवां सूक्त समाप्त हुना॥ अथ पञ्चदशर्चस्य चतुश्चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य अवत्सारः काश्यप श्रन्ये ऋषयो दृष्टिलिङ्गाः। विश्वेदेवा देवताः । १ । १३ विराट्जगती । २ । ३ । ४ । ५। ६ निचज्जगती। ८।६।१२ जगती छन्दः । निषादः स्वरः । ७ भुरिक्- १७२ ऋग्वेदः मं० ५। सू०४४ ।। an पान त्रिष्टुप् । १० । ११ स्वराविष्टुप् । १४ विराट् त्रिष्टुप् । १५ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब पन्द्रह ऋचावाले चवालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में सूर्यरूपता से राजगुणों को कहते हैं । तं प्रत्ना पूर्वा विश्वथेमा ज्येष्ठतांति बर्हिषदं स्वर्विदम् । प्रतीचीनं वृजनं दोहसे गिराशुं जयन्तमनु यासु वधंसे ॥१॥ पदार्थः हे राजन् जो आप (गिरा) वाणी से (प्रत्नथा) पुराने के सदृश (पूर्वथा) पूर्व के सदृश (विश्वथा) सम्पूर्ण संसार के सदृश (इमथा) इस के सदृश (ज्येष्ठतातिम्) जेठे ही को (बर्हिषदम्) उत्तम प्रासन वा अन्तरिक्ष में स्थित होने वाले (स्वविदम्) सुख को जानते जिससे उस (प्रतीचीनम्) हमलोगों के सम्मुख सम्मुख प्राप्त होते हुए (वृजनम्) बल को तथा (प्राशुम्) शीघ्रकारी संग्राम को (जयन्तम्) जीतते को (दोहसे) पूर्ण करते हो (तम्) उन आप को और (यासु जिनमें (अनु, वर्धसे) वृद्धि को प्राप्त होते हो उन सेनाओं और उन प्रजानों की हम लोग निरन्तर वृद्धि करें ॥१॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमाल• हे मनुष्यो ! जो प्राचीन रीति से प्राचीन उत्तम राजाओं के तुल्य पिता के सदृश राज्य का उत्तम प्रकार पालन करके पूर्ण बलयुक्त सेना को कर शीघ्र विजय को प्राप्त हुई प्रजाओं को सुख के अनुकूल व वें उन्हीं को उत्तम अधिकार में नियुक्त करिये जिस से राजा और प्रजा का निरन्तर सुख बढ़े ॥१॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । श्रिये सुदृशीरुपरस्य याः स्वविरोचमानः ककुभामचोदते । सुगोपा असि न दोष सुक्रतो परो मायामित अस नाम ते ॥२॥ पदार्थ:--हे (सुक्रतो) उत्तम कर्म और बुद्धि से युक्त विद्वान आप जैसे (विरोचमानः) प्रकाशमान (स्वः) सूर्य (ककुभाम् ) दिशाओं और (उपरस्य) मेघ का प्रकाशक (मास) वर्तमान है वैसे (श्रिये) धन वा शोभा के लिये (याः जिन (सदृशीः) सुन्दर दर्शनों वालियों को प्रेरणा करने वाले और (परः, उत्तम से उत्तम (सुगोपा:) और उत्तम प्रकार रक्षा करने वाले (असि) हो और (प्रचोदते) नहीं प्रेरणा करने और (दभाय) हिंसा करने वाले जन के लिये (मायाभिः) बुद्धियों के साथ (न) नहीं वर्तमान हो जिन (ते) आप के (ऋते) सत्य में (नाम वर्तमान है उसकी वे प्रजायें सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होती हैं ।।२।।

में - ab Lime A D ahme सयुजः) जो अच्छे धर्म से युक्त होते वह (एते) ऋग्वेदः म० ५। सू० ४४ ॥ १७३7 भावार्थ:-इस मन्त्र वाचकलु -जैसे सूर्य दिशाओं का प्रकाशक हुआ सब प्रजात्रों को सुख देने के लिये वृष्टि करने वाला होता है वैसे ही सब प्रजात्रों को न्याय से प्रकाशित कर के विद्या और सुख का बढ़ाने वाला राजा होता है ॥२॥ अब मेधविषय से राजगुणों को कहते हैं ।। अत्य हविः संचते सच्च धातु चारिष्टगातुः स होता सहोमरिः । प्रसस्राणो अनु बहिटगा शिशुमध्ये युवाजरौ विमुहां हितः ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (अरिष्टगातुः) ऐसा है कि जिस की नहीं हिंसित वाणी वह (सहोभरिः) बल' को धारण करने वाला (होता) दाताजन (प्रसणिः) प्रकर्षता से अत्यन्त चलता हुमा (वृषा) बलिष्ठ (युवा) यौवन अवस्था को प्राप्त (अजरः) वृद्ध अवस्था से रहित (विस्त हा) रोगों का नाश करने वाला (हितः) हितकारी (बहिः) अन्तरिक्ष को (अनु) पश्चात् (सव) वर्तमान को (च) और (धातु) धारण करने वाले (च) और (अत्यम्) व्याप्त होने वाले में उत्पन्न (हविः) हवन करने योग्य द्रव्य को (सचते) सम्बन्धित करता है (सः) वह (शिशुः) बालक माता को जैसे वैसे संसार के (मध्ये) बीच में पुण्य से युक्त होता है ॥३॥ भावार्थः हे राजन् ! जैसे हवन करनेवाला सुगन्धि आदि से युक्त, अग्नि में हवन किये वायु वृष्टि और जल की शुद्धि के द्वारा संसार में सुख का उपकार करता है वैसे न्याय और कीत्ति की वासना से युक्त दी हुई विद्या से राज्य देश को सुखी करिये ।।३।। अब सूर्यसंयोग से मेघदृष्टान्त से राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। म एते सुयुजो यामन्निष्टये नोचीरमुष्मै यम्य ऋताधः । सुयन्तुभिः सर्व शासैरभीशुभिः क्रिविर्नामानि प्रवणे मुषायति ।४॥ पदार्थ:- जैसे (क्रिधिः) प्रजा का पालन करने वाला सूर्य (अभीशुभिः) किरणों से (प्रवणे) नीचे स्थल' में (नामानि) जलों को (प्र, मुषायति) अत्यन्त राजा आदि जन (वः) आप लोगों के (इष्टये) इष्ट सुख के लिये (यामन्) मार्ग में और (अमुष्मै) परोक्ष सुख के लिये (सुयन्तुभिः) उत्तम नियन्ता जिन' में उन (सर्वशास:) सम्पूर्ण राज्य के शासन करने वालों से (यम्य:) न्यायकारी के लिये हितकारक (ऋतावृधः) सत्य को बढ़ाने वाली (नीची:) नीची हुई प्रजाओं को सम्पन्न करें॥४॥ हुए द्रव्य से - १७४ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४४ ।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु. हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य सब के सुख के लिये जल को खींचता है वैसे ही राजा न्यायमार्ग से सम्पूर्ण प्रजात्रों को चलाता हुना उत्तम विज्ञान से युक्त भृत्यों के सहित सब मनुष्यों के हित को सम्पादन करता है ॥४॥ अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं सम्न राणस्तरुभिः सुतेगुम वयाकिन चित्तर्गर्भासु सुखरुः । धारवाकेष्जुगाथ शोभसे वधस्व पत्नीरभि जीवो अध्वरे ॥५॥ पदार्थ:-हे (ऋजुगाथ) सरल व्यवहार के स्तुति करने वाले श्राप (तरुभिः) वृक्षों से (सञ्ज राणः) उत्तम प्रकार पालन और धारण करते हुए (धारवाकेष) शास्त्रवाणी के उपदेश करने वालों में और (चित्तगर्भासु) चेतनतारूप गर्भ जिनमें उन के निमित्त (सुतेगृभम्) उत्पन्न जगत् में ग्रहण किये गए (वयाकिनम्) व्यापी को प्रजात्रों में (सुस्वरु:) उत्तम प्रकार उपदेश करने वाले हुए (अध्वरे) अहिंसा- युक्त व्यवहार में (शोभसे) शोभा को प्राप्त हूजिये और (जीव:) जीवते हुए (पत्नी:) स्त्रियों को जैसे वैसे प्रजात्रों के (अभि) सन्मुख (वर्धस्व) वृद्धि को प्राप्त हूजिये ॥शा भावार्थ:-जो मनुष्य स्थावर जङ्गमरूप प्रजाओं से उपकार ग्रहण कर सकें वे सदा ही आनन्दित होवें ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। याहगेश ददृशे ताहगुच्यते सं छायया दधिरे सिध्याप्स्वा । महीमस्मभ्यमुरुषामुरु यो बृहत्सुवीरमनपच्युतं सहः ॥६॥ पदार्थ:-जो (ज्रयः) वेगवाले (सिनया) मंगल' स्वरूप (छायया छाया से (अप्स) जलों वा प्राणों में (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (उरुषाम् ) बहुतों के विभाग करने वाले को (महीम्) बड़ी वाणी और (उरु) बहुत (बृहत) बड़े (सुवीरम्) सुन्दर वीर को जिस से उस अनपच्युतम्) नाश से रहित (सहः) बल' को (सम्, पा, दधिरे) उत्तम प्रकार धारण करते हैं और जिन लोगों से (यादा) जैसे (ददृशे) देखा जाता है (तादृक्) वै वैसा (एव) ही उच्यते) कहा जाता है वे हम लोगों से निरन्तर सत्कार करने योग्य हैं ।।६।। भावार्थ:-जो अन्य जनों में विद्या के बल और धन संचय को स्थापित करते हैं और जिन से जैसा आत्मा में वर्तमान है वैसा मन में - ऋग्वेदः म० ५ । सू० ४४ ॥ १७५ MAP . ame । और जैसा मन में वैसा वाणी से कहा जाता है वे ही यथार्थ वक्ता जानने योग्य हैं। ६। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वेत्यग्रजनिवान्या अति स्पृधः समर्यता मनसा सूर्यः कविः। घेसं रक्षन्तं परि विश्वतो गयंमस्माकं शर्म वनवत्स्वावसुः ॥७॥ पदार्थ:--जो (स्वावसः) अपनों में वसता वा अपनों को जो वसाता है वह (सूर्यः) सूर्य के सदृश (कविः) उत्तम बुद्धिमान् (अनः) अग्रगन्ता (जनिधान्) विद्या में जन्मवान् विद्यायुक्त पुरुष (समयंता) संग्राम की इच्छा करते हुए (मनसा) चित्त से (स्पृधः) स्पर्धा करते हैं जिनमें उन संग्रामों को (अति, वेति) अत्यन्त व्याप्त होता है वह (वै) निश्चय से जैसे सूर्य ( (घ्र सम्) दिन को वैसे (अस्माकम्) हमलोगों की (विश्वतः) सब से (रक्षन्तम्) रक्षा करते हुए (गयम्) श्रेष्ठ अपत्य वा धन और (शर्म) गृह का (परि) सब प्रकार से (वनवत) संविभाग करे वह हम लोगों से सत्कार करने योग्य है ॥७॥ भावार्थ:--- जो मनुष्य विद्या और विनय को प्राप्त दुष्टों में उग्न और धार्मिकों में शान्त और सदा ही दुष्टों के साथ युद्ध करने से प्रजाओं की रक्षा करता हुप्रा सुख में वास करावे वह सूर्य के सदृश प्रकाशित यश- वाला हो ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । जमायाँसमस्य यतुनस्य केतुनं ऋषिस्वरं चरति यासु नाम ते । य दृश्मिन्धायि तमपस्थयां विदध उ स्वयं वहते सो अरं करत् ॥८॥ पदार्थः- (यः) जो (अस्य) इस (यतुनस्य) यत्न करने वाले विद्वान् के (केतुना) प्रज्ञान से (ज्यायांसम्) श्रेष्ठ (ऋषिस्वरम्) ऋषियों के उपदेश को (पति) प्राप्त होता है और जिन (ते) आप का (यासु) जिन प्रजानों में (नाम) नाम है और (यादृश्मिन्) जैसे व्यवहार में जो अन्य जनों से (धाथि) धारण किया जाता है (तम्) उस को (अयस्यया) अपने कर्म की इच्छा से (विदत्) प्राप्त होता और उ) भी (स्वयम्) स्वयम् (वहते) प्राप्त होता है (सः) वह हम लोगों को (अरम, समर्थ (करत) करे ।।८।। भावार्थ:-जो मनुष्य यथार्थवक्ता जन के समीप से प्राप्त हुए बोध से स्वयं उत्तम होकर अन्यों को उत्तम प्रकार भूषित करें वे सुख को प्राप्त होते हैं ॥८॥ Ande aath १७६ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४४ ।। फिर उसी विषय को कहते हैं । समुद्रमांसामय तस्थे अग्रिमा न रिष्यति सर्वनं यस्मिन्नायता । अत्रा न हादि क्रवणस्य रेजते यत्रा मतिर्विद्यते पूतबन्धनी ॥९।। पदार्थ:-हे विद्वन् (यस्मिन्) जिस में (अनिमा) अतिश्रीष्ठ (सवनम्) ऐश्वर्या का (न) नहीं (रिष्यति) नाश करता है और (प्रासाम्) इन प्रजात्रों के बीच (समुद्र म्) अन्तरिक्ष को (भव, तस्थे) स्थित होता है और (यत्रा) जहां (आयता) बहुत धनों की वृद्धि होती है और (पूतबन्धनी) पवित्र गुणों को ग्रहण करने वाली (मतिः) बुद्धि (विद्यते) विद्यमान है (न) नहीं (अत्रा) इस में (क्रवणस्य) शब्द करने वाले का (हादि) हृदयसंबन्धी कार्य (रेजते) चलता है ॥६।। भावार्थ:-जो प्रजाओं के मध्य में अन्तरिक्ष के सदृश सुखरूपी अव- काश देने वाले और नहीं हिंसा करने वाले बुद्धिमान् उपदेशक विद्यमान हैं वे ही सुखयुक्त होते हैं ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। स हि क्षत्रस्य मनसत्य चितिभिरेवावदस्य यजतस्य सधैः । अवत्सारस्य स्पृणवाम रणभिः शविष्ठं वाजै विदुषां चिदयम् ॥१०॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (वित्तिभिः) इकट्ठे करनेरूप क्रियानों से जिस (एवा- वदस्य) एवावद अर्थात् प्राप्त गुणों को कहते हैं जिससे वा (यजतस्य) मिलते हैं जिस से वा जो (अवत्सारस्य) रक्षकों को प्राप्त होते और (मनसस्य) माना जाता और उस (सधेः) तुल्य स्थान वाले (क्षत्रस्य) राजकुल वा राज्य के संबन्ध की (स्पृणवाम) इच्छा करें तथा (विदुषा) विद्वान् से (चित्) भी (अय॑म्) अर्द्ध में उत्पन्न की तथा (रण्वभिः) रमणीयों से (शविष्ठम्) अत्यन्त बलिष्ठ (वाजम् ) विज्ञानवान् की हम इच्छा करें (स, हि) वही हम लोगों की इच्छा करे ॥१०॥ भावार्थ:-जो मनुष्य दिनरात्रि राज्य की उन्नति करने की इच्छा करते हैं वे महाराज होते हैं ॥१०॥ - Sabha atp फिर उसी विषय को कहते हैं । श्येन आसामदितिः कक्ष्यो३' मदो विश्ववारस्य यजतस्य मायिनः । समरमन्यमर्थयन्त्येतवे विदुर्विषाणे परिपानमन्ति ते ॥११॥ M 40 ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४४ ।। १७७ पदार्थ:-जो मनुष्य (श्येनः) प्रशंसनीय गमन वाले घोड़े के सदृश (प्रासाम्) इन प्रजाओं की (अदितिः) नहीं नाश होने वाली प्रकृति और (कक्ष्यः) श्रेणियों में उत्पन्न (मदः) आनन्द (विश्ववारस्य) संपूर्ण स्वीकार करने योग्य (यजतस्य) मिले हुए (मायिनः) निकृष्ट बुद्धिवाले के (अन्यमन्यम्) अन्य अन्य को (अर्थयन्ति) अर्थ करते अर्थात् याचते हैं और (एतवे) प्राप्त होने को (अन्ति) समीप में (परिपानम्) सब ओर से पान और (विषाणम्) प्रवेश किये हुए को (सम्, विदुः) उत्तम प्रकार जानते हैं वे सुखी होते हैं ॥११॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-जो विद्वान् जन दुष्ट बुद्धिवालों को श्रेष्ठ बुद्धियुक्त करते हैं और श्येनपक्षी के सदृश दुष्टों का नाश करते हैं वे जन कल्याणकारक हैं ।।११।। फिर उसी विषय को कहते हैं । सदापृणो यजतो वि द्विषो वधीद्धाहुवृक्तः श्रृंतवित्तयों का सर्चा । उमा स बरा प्रत्येति भाति च यदी गणं भजते सुप्रयावभिः ॥१२॥ पदार्थः-हे मनुष्यो (यत) जो (श्रु तवित्) श्रु त को जानने वाला (तर्यः) जो तेरा जाता वा तैरने के योग्य (सथा) सम्बन्धी (बाहुवृक्तः) बाहुओं से दुष्टों का नाश करने वाला (यजतः) सत्का (सदापूणः) सदा तृप्ति करने वाला (सुप्र- यावभिः) उत्तम प्रकार चलने वालों से ( द्विषः) धर्म के द्वेष करने वालों का (वि, वधीत्। विशेष करके नाश करता है (च) और जो (व:) आप लोगों को (प्रति, एति) प्राप्त होता वा विशेष करके जानता है, सत्य (माति) प्रकाशित होता वा सत्य को प्रकाशित करता और (गणम्) समूह का (भजते) सेवन करता है (स:) वह उभा) दोनों (वरा) श्रीष्ठ सुनने और सुनाने वालों का (ईम्) ही सत्कार कर सकता है ॥१२॥ भावार्थ:-जो बहुत शास्त्रों को सुननेवाले न्याय का आचरण करने वाले जन दुष्टों का नाश करते हुए श्रेष्ठों का पालन करते हैं वे सदा प्रसन्न होते हैं ।।१२॥ फिर विद्वान् क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सुतम्भरो यजमानस्य सत्पतिविश्वासामुधः स धियामुदञ्चनः । भरद्धेन रसवच्छिश्रिये पोऽनुववाणो अध्येति न स्वपन् ॥१३॥ पदार्थः-- हे मनुष्यो जो विद्वान (यजमानस्य) सत्कार करने वाले का (सुत- म्भर:) उत्पन्न जगत् को धारण करनेवाला (विश्वासाम्) सम्पूर्ण (पियाम्) प्रज्ञान ( . MER और कम्मों का (य:) जो (जागार) अविद्यारूप निद्रा से उठ के जागनेवाला है (तम्) उसको (उ) १७८ ऋग्वेदः म०५ । सू०४४ ।। पहुंचाने और (सत्पतिः) सत्पुरुषों का पालन करनेवाला (रसवत्) बहुत रस से युक्त (पयः) दुग्ध को जैसे (धेनुः) गौ वैसे विद्या को (भरत्) धारण करता और धर्म का (शिश्रिये) आश्रयण करता और (न) न (स्वपन्) शयन करता हुआ अन्यों के प्रति (अनु, अवाण:) पढ़कर पीछे उपदेश देता हुआ सत्य का (अधि, एति) स्मरण करता है (सः) वही सत्कार करने योग्य है ।।१३।। भावार्थः-वही उत्तम पुरुष है जो कृतज्ञ और यथार्थवक्ता जनों की सेवा में प्रिय, सम्पूर्ण मनुष्यों के लिये बुद्धि देने और गौ के सदृश सत्य उपदेश का वर्षाने वाला और अविद्या आदि क्लेशों से पृथक् वर्तमान है वही सब से मेल करने योग्य है ॥१३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । यो जागार तमृचः कामयन्तै यो जागार तमु सामानि यन्ति । यो जागार तमयं सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥१४॥ पदार्थः-(यः) जो (जागार) अविद्यारूप निद्रा से उठ के जागने वाला है (तम्) उसको (ऋचः) ऋचाओं के सदृश जन (कामयन्ते) कामना करते हैं और स anga - P निश्चित स्थानवाला है भी (सामानि) सामवेद के विभाग (यन्ति) प्राप्त होते हैं और (यः) जो (जागार) अविद्यारूप निद्रा से उठ के जागनेवाला (तम्) उसको (अयम्) यह (सोम:) सोमलता आदि ओषधियों का समूह वा ऐश्वर्य के सदृश (न्योका:) (सख्ये) मित्रत्व में (तब) पाप का (महम्) मैं (अस्मि) हूं इस प्रकार (आह) कहता ॥१४॥ भावार्थः जो वेदविद्या को प्राप्त होने की इच्छा करते हैं उन को ही वेदविद्या प्राप्त होती और जो मनुष्य आदिकों के साथ मित्रता करता है वह बहुत सुख को प्राप्त होता है ।।१४।। जो सत्य की कामना करते हैं वे सत्य को प्राप्त होते हैं । अग्निीगार तमृचः कामयन्तेऽग्निर्जीगार तमु सामानि यन्ति । अग्निर्जागार तमयं सोम आह तबाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥१५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अग्निः) अग्नि के सदृश (जागार) जागृत होता है (हम्) उस की (ऋचः) प्रशंसित बुद्धि वाले विद्यार्थी जन (कामयन्ते) कामना BAR BE ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४५ ॥ १७६ करते हैं और (अग्निः) जो अग्नि के सदृश वर्तमान (जागार) जागृत होता है (तम्) उस को (उ) भी (सामानि) सामवेद में कहे हुए विज्ञान (यन्ति) प्राप्त होते हैं (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्तमान (जागार) जागृत होता है (तम्) उस को (अयम्) यह (न्योकाः) निश्चित स्थान युक्त (सोमः) विद्या और ऐश्वर्य की इच्छा करने वाला (तव) आप की (सख्ये) मित्रता में (अहम्) मैं (अस्मि) हूं ऐसा (पाह) कहता है ॥१५॥ भावार्थ:-जो मनुष्य बालस्य से रहित पुरुषार्थी धार्मिक होते और जितेन्द्रिय विद्यार्थी होते हैं उन्हीं को विद्या और उत्तम शिक्षा प्राप्त होती के इस सूक्त में सूर्य मेघ और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में चवालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अर्थकादशर्चस्य पञ्चचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य सदापूण पात्रेय ऋषिः । विश्वे देवा देवताः १।२ पङ्क्तिः। ५ ३६ । ११ भुरिक रक्षितः । ८ । १० स्वराट- पवितश्छन्दः । पञ्चनः स्वरः । ३ विराट् त्रिष्टुप् । ४।६ । ७ निवृत्रिष्टुप छन्दः । धैवतः स्वरः॥ म afe अब ग्यारह ऋचाबाले पैतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में आदित्ययविषय को कहते हैं । विदा दिवो विष्यन्नाद्रमुक्थैरायत्या उषसो अचिनो गुः । अपात वजिनीरुत्वर्गाद्वि दुरो मार्नुपीर्देव आवः ॥१।। पदार्थः - हे मनुष्यो जैसे (स्वः, देवः) श्रेष्ठ गुणों से विशिष्ट सूर्य वा मेघ (मानुषीः) मनु संबन्धी (दुरः) द्वारों को (वि, गाव) विशेषतया प्राप्त होता और (प्रायः) ढांपता है और (अग्रिम्) मेध को और (ब्रजिनीः) वर्जन क्रियाओं को (उद्, अप. प्रवृत) अत्यन्त दूर करते हैं वैसे ही (दिवः) कामना करते हुए (विदाः) विद्वान् जन (अचिनः) सत्कार करने वाले (उक्थैः) वेदविद्या से उत्पन्न हुए उपदेशों से (प्रायत्या:) पीछे से हुए (उषसः) प्रभात कालों के सदृश (विध्यन्) व्याप्त होते और (गः) चलते हैं उनकी निरन्तर सेवा करी ॥१॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-- जो प्रभातकाल और सूर्य के AN Raa oym ANELAM eDo १६० ऋग्वेदः म० ५। मू०४५।। सदृश मनुष्यरूप प्रजाओं में विद्या और धर्म के प्रकाश करनेवाले होवें वे ही अध्यापक और उपदेशक होवें ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वि सूर्यो अमति न श्रियं सादोद्गवां माता जानती गात् । धन्वर्णो नद्य १': खादोअर्णाः स्थूणेव सुमिता ईहत द्यौः ॥२॥ पदार्थ:-जो (धोः) कामना करता हुआ (सुमिता) उत्तम प्रकार किया प्रमाण जिन' का उन (स्थूणेच) स्तम्भ के समान विद्या आदि सद्गुणों को (दहत) बढ़ाता वा धारण करता तथा (खादोर्णाः) भक्षरण करने योग्य अन्न और जल जिन में और (धन्वर्णसः) स्थल में जल जिन का ऐसी (नद्यः) शब्द करनेवाली नदियों के सदृश वा (जानती) जानती हुई माता) माता के सदृश शिष्यों और उपदेश करने योग्यों को (गात्) प्राप्त होता है और (सूर्यः) सूर्य (श्रमतिम्) रूप के (न) सदृश (श्रियम्) लक्ष्मी का (वि, सात) विशेष करके विभाग करता है (गवाम्) किरणों के (ऊर्वात) बहुत रूप से ऐश्वर्य को (प्रा) अच्छे प्रकार प्राप्त होता है वही सब को सुखी करने को योग्य होवे ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकल०--जो सूर्य के सदृश विद्या माता के सदृश कृपा, नदी के सदृश उपकार और खम्भ के सदृश धारणा करते हैं वे ही श्रीमान् और सदा सुखी होते हैं ॥२॥ अब विद्वद्विषय को कहते हैं । अस्मा उक्थाय पर्वतस्थ गौं महीनों जनु पूाय । वि पर्वतो जिद्दीत साधत द्यौराविवासन्तो दसयन्त भूमं ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (महीनाम्) भूमियों और (पर्वतस्य) मेघ के (पूाय) पूर्वी में उत्पन्न (जनुषे) जन्म के लिये तथा (अस्मै} इस (उपयाय) प्रशंसित के लिये (गर्भः) कारणभूत (पर्वतः) पक्षी के समान पर्ववान् मेध बा (धौः) कामना करते हुए के सदृश (वि, जिहीत) विशेष चलता है और जिस को (प्राविवासन्तः) सब ओर घूमते हुए (साधत) सिद्ध करें जिस से दुःख का और (चसयन्त) दोषों का नाश करें उसके तुल्य हम लोग (भूम) होवें ॥३॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु-जो विद्यार्थियों में विद्या के गर्भ को धारण करते हैं वे मेघ के सदृश सब के सुखकारक होते हैं ।।३।। IMHD INS Ski Post a ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४५ ।। RA Sta Ho et फिर उसी विषय को कहते हैं । सूक्तैमियों वचोभिबजुष्टैरिन्द्रा न्व१ग्नी अवसे हुवध्य । उक्थेभिहि मां कायः सुयज्ञा आविर्वासन्तो मरुतो यजन्ति । ४। पदार्थ: हे मनुष्यो जैसे (माविवासन्तः) सत्य का सब प्रकार से सेवन करते हुए सुयज्ञा.) सुन्दर विद्या और धर्म के प्रचार करने वाली क्रिया जिन की ऐसे (कवयः) बुद्धिमान् विद्वान् (मरुतः) मनुष्य (सूक्तभिः) जो उत्तम प्रकार कहे जाय उन (देवजुष्ट:) विद्वानों से सेवित और (उक्थेभिः) प्रशंसा करने वाले (वचोभिः) उत्तम प्रकार शिक्षित वचनों से' (हि, निश्चय से (इन्द्रा) बिजुली (अग्नी और अग्नि को तथा (बः) आप लोगों को (अवसे) रक्षण' अदि के लिये (हुवध्यै) ग्रहण करने को (न) शीघ्र (यजन्ति) मिलते हैं वैसे (स्मा) ही आप लोग भी इसी प्रकार मिलो ॥४॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन सबके लिये सुख, विद्या और विज्ञान का सेवन करते हुए अग्नि आदि की विद्या को सब के लिये देते हैं वे ही उत्तम होते हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। एतो न्व१'छ सुध्यो भौम प्रदुच्छुना मिनधामा वरीयः । आरे द्वेषांसि सनुलधामायाम प्राञ्चो यजमान पच्छे ।।५।। पदार्थ: है मनुष्यो जैसे (अध) प्राज' (एतो) ये हम लोग () शीघ्र (सुध्यः) अच्छी बुद्धिवाले (भवाम) हों और जो (बुच्छनाः) दुष्ट कुत्तों के सदृश वर्तमान उनका (प्रमिनवामा) अत्यन्त नाश करें और (द्वषांसि) द्वेषयुक्त कम्मों को (पारे। समीप वा दूर में (अयाम प्राप्त करावें (प्राञ्चः) प्राचीन काल में वर्तमान अधिक अवस्था वाले हम लोग (सनतः) सदा (वरीयः) अत्यन्त श्रेष्ठ (यजमानम्) मिलने वाले को (अच्छ) उत्तम प्रकार (दधाम) धारण करें वैसे प्राप लोग भी धारण करो ।।५।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाच कलु० -जो मनुष्य विज्ञान को बढ़ाते दुष्टों का निवारण करते और द्वष प्रादि दोषों से रहित सनातन सत्य को धारण करते हैं वे अत्यन्त प्रशंसा के योग्य होते हैं ।।५।। फिर मनुष्यों को उत्तम बुद्धि कैसे प्राप्त होनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। N १८२ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४५ ॥ 1 HD OF एता धियं कृणवामा सखायोऽप या माताँ ऋणुत ब्रजं गोः । यया मनुर्विशिशिमं जिगाय यया पणिग्वङ्कुरापा पुरीषम् ॥६॥ पदार्थः - हे मनुष्यो (यया) जिस से (मनुः) मनुष्य (विशिशिप्रम्) सुन्दर ठुढ्ढी और नासिका जिसकी उसको (जिगाय) जीतता है (यया) जिस से (वठ्ठः) धन की इच्छा करने वाला (वणिक्.) व्यापारी वैश्य (पुरीषम्) पूर्ण करने वाले जल को (मापा) प्राप्त होता है उस (धियम्) बुद्धि को (सखायः) मित्र होते हुए हम लोग (कृणवामा) करें और जैसे (या) जो (माता) माता के सदृश (गोः) किरण से (ब्रजम्) मेघ को करता है और दुःख को (अप) दूर करता है वैसे इस को आप लोग (ऋणुत) सिद्ध करिये और बुद्धि को (मा) सब प्रकार (इता) प्राप्त हूजिये ॥६॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-मनुष्यों को योग्य है कि परस्पर में मित्र हो कर बुद्धि को बढ़ाय औरों के लिये विशेष ज्ञान अच्छे प्रकार देवें जैसे वैश्य धन को प्राप्त होकर बढ़ता है वैसे उत्तम बुद्धि को पाकर बढ़े ॥६॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अनूनोदत्र हस्तयतो अद्रिरार्चन्येन दर्श मासो नवग्वाः । अतं यती सरमा गा अविन्दद्विश्वानि सत्यागिराश्चकार ॥७॥ पदार्थ: (येन) जिस से (प्रत्र) इस संसार में (नवग्वाः) नवीन गमनवाले (दश) दश (मास:) चैत्र आदि महीने वर्तमान हैं और (हस्तयतः) हाथ निग्रह किये अर्थात् वशीभूत किये जिस के वह (अद्रिः) मेघ के सदृश (आर्चन) सत्कार करता हुआ (अनूनोत्) प्रेरणा करे और जो (सरमा) तुल्य रमने वाली (ऋतम्) सत्य का (यती) यत्न करती हुई (गः) इन्द्रियों को (अविन्दन) प्राप्त होती है और जो (अङ्गिराः) अङ्गों का रस रूप प्राण के सदृश (विश्वानि सम्पूर्ण (सत्या) सत्य कार्यों को (चकार) करता है वे सत्कार करने योग्य हैं ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जो मनुष्य सर्वदा सत्य आचरण से युक्त होकर सब के उपकार को सिद्ध करते हैं वे इस संसार में धर्मात्मा गिने जाते हैं ॥७॥ फिर मनुष्यों को कैसे बर्तना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। dae

बाथ
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(युवा) मिले और नहीं मिले हुए को करने वाले यौवनावस्थायुक्त (कविः/
ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४५ ।।
विश्व अस्या व्युषि माहिनाया सं यद् गोभिरङ्गिरसो नवन्त ।
उत्स आसां परमे सधस्थ ऋतस्य पथा सरमा विदद् गा ॥८॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे (विश्वे) सम्पूर्ण प्राणी (माहिनायाः) महत्त्व
से युक्त (अस्याः) प्रातर्वेला के (व्युषि) विशिष्ट निवास में (गोभिः) किरणों के
साथ (अङ्गिरसः) पवन' (सम्, नवन्त) अच्छे प्रकार स्तुति करते हैं (यत्) जिस से
(प्रासाम्) इन प्रातर्वेलाओं के (परमे) प्रकृष्ट (सधस्थे) साथ के स्थान में (ऋतस्य)
सत्य वा जल के (पथा) मार्ग से (उत्सः) कूप के सदृश (सरमा) प्राप्त हुओं का
आदर करने वाली (गा:) किरणों को (विदत्) जानती है उन उनको आप लोग
विशेष कर जानिये ॥८॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु --जैसे प्रभात वेला में प्राणी
प्रसन्न होते हैं वैसे ही सन्देह रहित होकर मनुष्य आनन्दित होते हैं ।।८।।
फिर सूर्य के समान मनुष्य क्या करें उसका उपदेश करते हैं ।
आ सूर्यों यातु सप्ताश्वः क्षेत्रं यदस्योर्विया दीर्घ शाथे ।
रघु। श्येनः पतयदन्धो अच्छा युवा कविदोदयद् गोषु गच्छन् ॥९॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (सप्ताश्वः) सात प्रकार की शीघ्र चलने वाली
किरणें जिस की ऐसा (सूर्यः) सूर्य (यत्) जिस (क्षेत्रम्) निवास के स्थान को
(अस्य) इस जगत् सम्बन्धिनी (उपिया) पृथिवी के (दीर्घयाये) चलें जिस में ऐसे
बड़े मार्ग में (रघुः) लघु (श्येनः) अन्तरिक्षस्थ वांज पक्षी के
सदृश अन्तरिक्ष में-
जाता है वैसे आप सेना के मध्य में (मा) सब प्रकार से (यात) प्राप्त हूजिये और
जैसे (गोषु) पृथिवियों में (गच्छन्) चलता हुआ (दीदयत्) प्रकाश करता है वैसे
ne
पा
मान् विद्वान् (अच्छा) उत्तम प्रकार (अन्धः) अन्न आदि का (पतयत्) स्वामी के
सदृश आचरण करता है यह जानो ॥६॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु.
-हे मनुष्यो ! जिस सूर्य में
सात तत्त्व हैं और जो अपने चक्र को छोड़ के इधर उधर नहीं जाता है और
बहुत भूगोलों के मध्य में एक ही प्रकाशित है वैसे ही सब पुरुष होवें ॥६॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
आ सूर्यो अरुइच्छुकमोऽयुक्त यद्धरितो वीतपृष्ठाः ।
उना न नावमनयन्त धीरा आशृण्वतीरापो अर्वागतिष्ठन् ॥१०॥

१८४ ऋग्वेदः मं०५ । सू० ४६ ।। : D पदार्थः-हे मनुष्यो (यत्) जो (सूर्यः) सूर्य (शुक्रम्) वीर्य का (पा, अरहत) आरोहण करता और (अर्णः) उदक का (अयुक्त) योग करता है और (वीतपृष्ठाः) व्याप्त हैं लोक लोकान्तरों के पृष्ठ जिन से वे (हरितः) जल आदि को हरने वाले (धीराः) ध्यानवान् बुद्धिमान् जन' (उद्ना) जल से (नावम्) नौका को (न) जैसे वैसे (अनयन्त) प्राप्त होते' अर्थात् व्यवहार को पहुंचते हैं (अक्)ि पीछे (प्राशृण्वतीः) जो चारों ओर से सुन पड़ते हैं वह (आपः) प्राण प्रतिष्ठन्) स्थित होते हैं उस सब को आप लोग जानें ॥१०॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सूर्य और जल आदि की विद्याओं को जान के नौका आदि को चलावें वे लक्ष्मीवान् होते हैं ॥१०॥ जो मनुष्य उत्तम बुद्धि की याचना करते हैं वे विद्वान् होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । धियं वो अप्सु दधिषे स्वर्षी ययातरन्दर्श मासो नवग्वाः । अया धिया स्याम देवगोपा अया पिया तुतुर्थामात्यहः ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो यथा, जिस से (नवग्वाः) नवीनगमन वाले (दश) दश (मासः) महीने (अतरन्) पार होते हैं (प्रया) इस (धिया) बुद्धि से हम लोग (देवगोपाः) विद्वानों के रक्षक (स्थाम) होवें और (अया) इस (धिया) बुद्धि से (अंहः) पाप वा पाप से उत्पन्न दुःख का (अति, तुतु-म) अत्यन्त विनाश करें (:) पाप की (स्वर्षाम्) सुख का विभाग करता है जिस से उस (धियम् ) बुद्धि को (अप्सु) प्राणों में मैं (दधिषे) धारण करू ॥११॥ भावार्थ:-जो बुद्धिमान् धनवान् और बल से युक्त होकर सब की रक्षा करते हैं वे दु:खों के पार होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में सूर्य और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में पैंतालीसवां सूक्त समाप्त हुअा।। KAND प्रथाष्टर्चस्य षट्चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य प्रतिक्षत्र प्रात्रेय ऋषिः । १ --६ विश्वेदेवाः । ७-८ देवपल्यो देवताः । १ भुरिग्जगती । ३।५। ६ निवृज्जगती। ४॥ ७ जगतीछन्दः । निषादः स्वरः।२।८ निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः पञ्चमः स्वरः ॥ अब पाठ ऋचा वाले छयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में शिल्पविद्या का विद्वान् रथों को रचकर सुख से मार्ग को जाता है इस विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४६ ॥ १८५ . HARE - - Gala M हयो न विद्वाँ अयुजि स्वयं धुरि तां वहामि प्रतरंणीमवस्युवम् । नास्या वश्मि विमुचं नातं पुनर्विद्वान् पथः पुरएत ऋजु नैषति ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (विद्वान्) विद्यायुक्त मैं (स्वयम्) आप (अयुजि) नहीं संयुक्त (धुरि) मार्ग में (हयः) उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त घोड़े के (न) सदृश (ताम्, प्रतरणीम्) पार होते हैं जिससे उस (अवस्युवम्) अपनी रक्षा की इच्छा करती हुई को (वहामि) प्राप्त होता हूँ वा प्राप्त कराता हूं और (अस्याः) इस के सम्बन्ध में (विमुचम्) त्यागते हैं जिस से उसी की (न) नहीं (वश्मि) कामना करता हूं और (न) नहीं (प्रावृतम्) ढपे हुए की कामना करता हूं (पुनः) फिर (पुरएता) प्रथम जाने वाला (विद्वान्) विद्यायुक्त जन (ऋजु) सरलता जैसे हो वैसे (पथः) मार्गों को (नेषति) प्राप्त करावे ॥१॥ भावार्थः -- इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे विद्वानों से उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़े कार्यों को सिद्ध करते हैं वैसे ही प्राप्त हुई विद्या और शिक्षा जिन को ऐसे मनुष्य कार्य की सिद्धि को प्राप्त होते हैं ॥१॥ मनुष्यों को विद्य दादि विद्या अवश्य स्वीकार करने योग्य है इस विषय को कहते हैं । अग्न इन्द्र वरुण मित्र देवा। शर्यः प्रयन्त मारुतोत विष्णो । उभा नासत्या रुद्रो अध ग्नाः पूषा भगः सरस्वती जुषन्त ॥२॥ पदार्थः -- हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त (अग्ने) विद्वान् (वरुण) श्रेष्ठ (मित्र) मित्र (भारत) मनुष्यों में विदित और (देवाः) विद्वानो आप (शर्धः) बल को (प्र, यन्त) प्राप्त होते हैं (उत) और हे (विष्णो) व्यापनशील (उभा) दो (नासत्या) असत्य आचरण से रहित जन (रुद्रः) दुष्टों को भयंकर (भगः) ऐश्वर्यवान् (पूषा) पुष्टिकारक वायु (अध) इस के अनन्तर (सरस्वती) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी भी (ग्नाः) वारिणयों का (जुषन्त) सेवन करे ॥२॥ भावार्थः हे मनुष्यो ! आप लोगों को चाहिये कि विद्या शरीर बल और योग की वृद्धि करके अग्नि आदि विद्या का स्वीकार करें॥२॥ इस सृष्टि में मनुष्यों को क्या क्या जानना योग्य है इस विषय को कहते हैं । इन्द्राग्नी मित्रावरुणादिति वः पृथिवीं यां मरुतः पर्वताँ अपः । हुवे विष्णुं पूषण ब्रह्मणस्पति भगं नु भैस सवितारमूतये ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे मैं (ऊतये) रक्षा आदि व्यवहार की सिद्धि के लिये i S - M S M - MA ER PA- Tara (सधः) बल' (न:) हम लोगों को (मा, गमत) प्राप्त होवे और (उत) भी बृह ऋग्वेदः मं० ५। सू०.४६ ॥ (इन्द्राग्नी, सूर्य और बिजुली (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु तथा(अदितिम्) अन्तरिक्ष को (स्वः) सूर्य और (पृथिवीम्) भूमि को (धाम्) प्रकाश को (मरुतः) पवनों वा मनुष्यों को (पर्वतान्) मेघों वा पर्वतों को (अप:) जलों को (विष्णुम्) व्यापक धन वा जय को (पूषणम्) पुष्टिकारक व्यान वायु और (ब्रह्मणः) ब्रह्माण्ड के (पतिम्) पालन करने वाले सूत्रात्मा को (भगम्) ऐश्वर्य और शिसम्) प्रशंसा करने योग्य (सवितारम्) संसार के उत्पन्न करने वाले परमात्मा को (हुवे) ग्रहण करता हूं वैसे आप लोग (नु) शीघ्र इन को ग्रहण कीजिये ॥३॥ भावार्थः - मनुष्यों को विद्युद्विद्या अवश्य स्वीकार करनी चाहिये ॥३॥ अवश्य मनुष्यों को ईश्वरादिकों का सेवन करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । उत नो विष्णुरुत वातौ अनिधो द्रविणोदा उत सोमो मयस्कम्त् । उत ऋभव उत राये नो अश्विनोत त्वष्टोत विभ्वानु मंसते ।४। पदार्थ:-हे मनुष्यो (नः) हम लोगों को (विष्णुः) व्यापक ईश्वर (उत) और (वात:) वायु (उत) और (अस्त्रिधः) नहीं हिंसा करने और (द्रविणोदाः) धन का देने वाला (उत) और (सोमः) ऐश्वर्यवान् (उत) और (ऋभव:) बुद्धिमान् जन (उत) और (राये) धन के लिये (नः) हम लोगों को (उत, और (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जन (उत) और (स्वष्टा) सूक्ष्म करने वाला (विश्वा) समर्थ से (अनु, मंसते) अनुमान करें उन से विद्वान् (मयः) सुख को करत) सिद्ध करे ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य ईश्वर आदि पदार्थों की सेवा करते हैं वे जानने योग्य पदार्थों के जानने वाले होते हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है। उत त्यन्नो मारुतं शर्थ आ गंगदिविक्षयं यजतं बर्हिरासदै । बृहस्पतिः शर्म पूषोत नौ यमद्वस्थ्यं १' वरुणो मित्रो अर्यमा । ५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (विविक्षयम्) जिसका प्रकाश में निवास यजतम्) जो मिलता हुआ (त्यत्) वह (मारुतम्) मनुष्य सम्बन्धी (बहिः) उत्तम आसन और स्पतिः) बड़ों का पालन करने और (पूषा) पु पुष्टि करनेवाला (वरुणः) उदानवायु के सदृश उत्तम (मित्र.) प्राणवायु के सदृश प्रिय (उत) भी (अर्यमा) न्यायकारी और (प्रासदे) प्रवेश होने को (वरूथ्यम्) गृहों में श्रेष्ठ (शर्म) गृह को प्रवेश होने को (न:) हम लोगों को (यमत) देता है ।।५।। HAN ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४६ ।। १८७ भावार्थ:-जो मनुष्य वायु के गुणों को विशेषकर जानें वे सब प्रकार से धन को प्राप्त होवें ॥५॥ फिर मनुष्य' क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। उत त्ये नः पर्वतासः सुशस्तयः सुदीतयो नध? स्त्रामणे भुवन् । भों विभक्ता शबसावसा गंमदुरुष्यचा अदितिः श्रोतु मे हवम् । ६॥ पदार्थः - हे मनुष्यो जो (पर्वतासः) मेघों के सदृश (सशस्तयः) उत्तम प्रशंसायुक्त (नद्यः) नदियों के सदृश (सुदीतयः) प्रशंसित प्रकाशवाले (नः) हम लोगों को वा हमारे (त्रामणे) पालन' व्यवहार के लिये (भुवन्) हों (उत) और (उरुध्यचा:) बहुतों में व्याप्त (अदितिः) खंडन से रहित (भगः) आदर करने योग्य ऐश्वर्य का योग (विभक्ता) विभाग कर देने वाला शवसा) बल' और (अवसा) रक्षण प्रादि से (श्रा, गमत) सब प्रकार प्राप्त होवे और (मे) मेरे (हवम्) शब्द को (श्रोतु) सुने (त्ये) वे और वह सत्कार करने योग्य होवें ॥६॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु -जो मेघ के सदृश संसार के पालन करनेवाले प्रशंसित न्याय का विधान कर सम्पूर्ण प्रजा की विनती सुन के न्याय करें वे विनययुक्त होते हैं ॥६ । राजा के समान राजपत्नी न्याय करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । देवानां पत्नीरुशतीरंवन्तु नः पावन्तु नस्तुजये वाजसातये याः पार्थिवासो या अपामपि व्रते ता नौ देवीः सुहवाः शर्म यच्छत ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (याः) जो (देवानाम्) विद्वानों वा राजाओं के न्याय की ( उशतीः) कामना करती हुई (पत्नीः) स्त्रियाँ (नः) हम लोगों की वा हमारे सम्बन्धी पदार्थों की (अवन्तु) रक्षा करें और (तुजये) बल और (बाजसातये) संग्राम के लिये (प्र, अवन्तु) अच्छे प्रकार रक्षा करें और (या:) जो (पार्थिवासः पृथिवी में विदित (अपाम्। जलों के (व्रते) स्वभाव में (अपि) भी (देवीः) प्रकाशमान (सुहवाः) उत्तम आह्वान वालो (न:) हम लोगों को (शर्म) सुखकारक गृह देवें और (ताः) उन को (नः) हम लोगों के लिये आप लोग (यच्छत) दीजिये ॥७॥ भावार्थ:-जैसे राजा लोग पुरुषों का न्याय करें वैसे ही स्त्रियों के न्याय को रानियाँ करें ॥७॥ राजा के समान रानी स्त्रियों का न्याय करें इस विषय को कहते हैं । Aad

१८८
ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४७ ।।
GAM
RA
सदृश तेजस्वी
उत्त ग्ना व्यन्तु देवानीरिन्द्राण्य१'ग्नायपश्विनी राट् ।
आरोदसी वरुणानी शृणोतु व्यन्तुं देवीर्य ऋतुर्जनीनाम् ॥८॥
पदार्थ:--(यः) जो (रा) प्रकाशमान (इन्द्राणी) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त
पुरुष की स्त्री और (अनायी) अग्नि के
पुरुष की स्त्री (अश्विनी)
शीघ्र चलने वाले की स्त्री और (देवपत्नी:) विद्वानों की स्त्रियां न्याय करने के लिये
स्त्रियों की (ग्ना:) वागियों को (व्यन्तु) व्याप्त हों और (रोदसी) अन्तरिक्ष तथा
पृथिवी के सदृश (वरुणानी) श्रेष्ठ जन' की स्त्री (जनीनाम्) उत्पन्न करनेवाली स्त्रियों
की बागियों को (पा, शुणोतु) सब प्रकार से सुने और (उत्त) भी (देवी:) विद्या-
युक्त स्त्रियां (ऋतुः) ऋतु के सदृश क्रम से उत्पन्न करनेवाली स्त्रियों का जो न्याय
उसकी (व्यन्तु) कामना करें ॥८॥
भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा०-जैसे राजाओं के समीप
पुरुष मन्त्री होते हैं वैसे रानियों के समीप स्त्रियां मन्त्री होवें ॥८॥
यह पंचम भण्डल में छयालीसवां सूक्त समाप्त हुआ ।
अथ सप्तर्चस्य सप्तचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य प्रतिरथ प्रात्रेय ऋषिः। विश्वेदेवा
देवताः । १।२।३ । ७ त्रिष्टुप् । ४ भुरित्रिष्टुप् । ६ विराष्टुिप् छन्दः ।
धैवतः स्वरः । ५ भुरिपक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।।
अब सात ऋचावाले सैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम
मन्त्र में स्त्री पुरुषों के गुणों को कहते हैं
प्रयुज्जती दिव एति वाणा मही माता दुहितुर्बोधयन्ती ।
आविवासन्ती युवतिर्मनीषा पितृभ्य आ सदने जोहुंदाना । १॥
पदार्थः--जो दिवः) प्रकाश से प्रातःकाल के सदृश ( वाणा) उपदेश
देती (प्रयुञ्जती) उत्तम कर्म में अच्छे प्रकार योग करती (दुहितुः) कन्या का (बोध-
यन्ती) बोध देती और (मही) आदर करने योग्य (आविवासन्ती) सब प्रकार से
सेवती हुई (सदने) गृह में (जोहुवाना) अत्यन्त प्रशंसा को प्राप्त (युवतिः) युवा
अवस्था में विद्याओं को पढ़कर विवाह जिसने किया वह (माता) आदर करने वाली
माता (मनीषा) बुद्धि से (पितृभ्यः) पालन करनेवालों से शिक्षा को प्राप्त गृहाश्रम
को (आ) सब प्रकार से (एति) जाती वा प्राप्त होती है वह मंगलकारिणी होती
है ॥१॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ४७ ॥ १८६ RS भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - जो माता पांचवें वर्ष के प्रारम्भ होने तक सन्तानों को बोध देकर पांचवें वर्ष में पिता को सौंपती है और पिता भी तीन वर्ष पर्यन्त शिक्षा देकर प्राचार्य को पुत्रों को और प्राचार्य की स्त्री को कन्याओं को ब्रह्मचर्य से विद्याग्रहण के लिये सौंपता है और वे आचार्यादि भी नियत समयपर्यन्त ब्रह्मचर्य को समाप्त करा के और विद्याओं को प्राप्त करा के तथा व्यवहार की शिक्षा देकर गृहाश्रम में प्रविष्ट कराते हैं वे प्राचार्य और प्राचार्या कुल के भूषक और शोभा- कारक होते हैं ॥१॥ अब मनुष्यों को कार्य कारण से विस्तृत अनन्त पदार्थों को जान कर कार्यसिद्धि करनी चाहिये ।। अजिरासस्तदंप ईयमाना आतस्थिवांसों अमृतस्य नार्मिम् । अनन्तास उरवों विश्वतः सी परि द्यावापृथिवी यन्ति पन्थाः ॥२॥ पदार्थः-जो (अजिरासः) वेग से युक्त (ईयमानाः) प्राप्त होते हुए (तदपः) उन के प्राणों को (अमृतस्य) नाश से रहित कारण के (नाभिम्) मध्य में (प्रातस्थिवांसः) सब ओर से स्थित (अनन्तास:) नहीं विद्यमान अन्त जिनका वे (उरवः) बहुत (विश्वतः) सब अोर (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि (सीम्) सूर्य के प्रकाश के सदृश (परि) चारों ओर (यन्ति) प्राप्त होते हैं उनका (पन्थाः) मार्ग जानना चाहिये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु. -जो आकाश आदि अनन्त पदार्थ हैं और उनमें वर्तमान असंख्य परमाणु कारण के मध्य में कारण से उत्पन्न हुए सूर्य और प्रकाश के सदृश विस्तीर्ण हैं ।।२।। फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । उक्षा समुद्रो अरुषः सुपर्णः पूर्वस्य योनि पितुरा विवेश । मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रजसस्पात्यन्तौ ॥३॥ पदार्थ. हे मनुष्यो जो (समुद्रः) सागर (अरुषः) सुख को प्राप्त कराने वाला (सुपर्णः) सुन्दर पालन जिसके ऐसा और (दिव:) प्रकाश के (मध्ये) मध्य में (निहितः) स्थापित किया गया (पृश्निः) अन्तरिक्ष और (प्रश्मा) मेघ (उक्षा) सींचने वाला पूर्वस्य) पूर्ण प्रकाश आदि और (पितुः) पालन करने वाले के (योनिम्) कारण को (मा, विवेश) सब प्रकार प्रविष्ट होता है और (रजसः) लोक - NA M weete ऋग्वेदः म० ५। सू०४७ ।। में उत्पन्न हुए का (वि, चक्रमे) विशेष कर के क्रमण करता और (अन्ती) समीप में (पाति) रक्षा करता है वह सब को जानने योग्य है ।।३।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग कार्य और कारण को जानकर उनके संयोग से उत्पन्न हुए वस्तुओं को कार्यों में उपयुक्त कर के अपने अभीष्ट की सिद्धि करें॥३॥ मनुष्यों को चाहिये कि पृथिवी आदि तत्त्व जगत् के पालक हैं ऐसा जाने इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । चत्वार ई बिभ्रति क्षेभयन्तो दश गर्भ चरस धापयन्ते । विधातवः परमा अस्य गावो दिवश्चरति परि सद्यो अन्तान् ||४|| पदार्थ:-हे मनुष्यो (अस्थ) इस संसार के मध्य में (चरसे) चलने को (क्षेमयन्तः) रक्षा करते हुए (परमाः) प्रकृष्ट (त्रिषातवः) तीन सत्व 'रज और तमोगुण धारण करने वाले जिनके वे और (चस्मार:) चार पृथिवी आदि (ईम्) सब ओर से (गर्भम् ) समस्त जगत् की उत्पत्ति के स्थान को (बिन्नति) धारण करते हैं तथा (दश) दश दिशामों को (धापयन्से) धारण कराते हैं और (सद्यः) शीघ्र (दिवः) प्रकाश के मध्य में (अन्तान्) समीपवर्ती देशों के (गाव:) किरणें (परि, चरन्ति) चारों ओर चलते हैं ऐसा जानिये ।।४।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! इस संसार के धारण करने वाले पृथिवी, जल, तेज और पवन हैं और वे कारण से उत्पन्न हो के उपयुक्त होते ||४|| फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं। इदं वपुर्निवचनं जनासश्चरन्ति यनयस्तस्थुरापः । द्वे यदी विभृतो मातुरन्ये इहेई जाते यम्पा ३' सबंधू ।।५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (इहेह) इसी संसार में (इ) दो (यम्या) रात्रि और दिन (सबन्धू) तुल्य बन्धु जिनका उनके सदृश वर्तमान और (मातुः) माता से (अन्ये) अन्य (जाते) उत्पन्न हुए (ईम्) जल' को (बिभृतः) धारण करते हैं और (यद) जो संसार का उपकार करते हैं और (यद) जो (जनास:) विद्वान् जन जैसे (नद्यः) नदियां (प्रापः) जलों को वैसे (इदम्) इस (निवचनम्) निश्चित वचन जिसका उस (वपुः) शरीर को (चरन्ति) प्राप्त होते और (तस्थुः) स्थित होते हैं वैसे इनको विशेष कर जानिये ।।५।। thor wap ' HD HAR ra सव) वह (प्रस्तु) हो योः) दुख से पृथग्भूत (इदम्) यह (शस्तम्) को प्राप्त होकर ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४७ ॥ १६१ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु -मनुष्यों को चाहिये कि जैसे रात्रि दिन क्रम से व्यवहार करते हैं वैसे क्रम से आहार विहार कर के शरीर की रक्षा करें ॥५॥ मनुष्यों का चाहिये कि युवा अवस्था ही में स्वयंवर विवाह करें इस विषय को कहते हैं। वि तन्वते धियो अस्मा अपांसि वस्त्रां पुत्राय मातरौ वयन्ति । उपमक्षे वृषणो मोदनाना दियस्पथा बवों यन्त्यच्छे ।।६।। पदार्थ:-जो दिवः) कामना और (मोदमानाः) मानन्द करती हुई विध्वः) युवावस्थायुक्त स्त्रियां (पथा) गृहाश्रम के मार्ग से वर्तमान (उपप्रक्षे) सम्बन्ध में (वृषणः) युवापुरुषों को (अच्छ) उत्तम प्रकार (यन्ति) प्राप्त होती हैं वे (मातरः) माता (अस्मै) इस व्यवहार से सिद्ध (पुत्राय) पुत्र के लिये (धियः) बुद्धियों और (अपांसि) कर्मों को (वि, तन्वते) विस्तार करती हैं और (वस्त्रा) वस्त्रों को (वयन्ति) बनाती हैं ॥६॥ भावार्थः --जो स्त्री और पुरुष ब्रह्मचर्य से विद्यानों को पढ़ कर युवा. वस्था में वर्तमान गृहाश्रम की कामना करते हुए परस्पर प्रीति से स्वयंवर विवाह कर के धर्म से सन्तानों को उत्पन्न कर और उत्तम प्रकार शिक्षा देकर शरीर और आत्मा के बल का विस्तार करते हैं और जैसे वस्त्रों से शरीर को वैसे गृहाश्रम के व्यवहार का आच्छादन कर के आनन्द करते हैं ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। तदस्तु मित्रावरुणा तद॑ग्ने शं योरस्मभ्यंमिदमस्तु शस्तम् । अशीमहि गाधमुत प्रतिष्ठां नमो दिवे बृहते सार्दनाय ॥७॥ पदार्थः -हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्तमान माता पिता तथा अध्यापक और उपदेशक जन आप दोनों के सङग से (तत्) उस (शम् सुख को हम लोग (प्रशीमहि) प्राप्त होवें और (अग्न) हे अग्ने (अस्मभ्यम्) हम प्रशंसा करने योग्य (प्रस्तु) हो और (गाधम्) गम्भीर (उत) भी (प्रतिष्ठाम्) प्रादर करते के लिये (नमः) सत्कार हो ॥७॥ HIMAN १६२ ऋग्वेदः म० ५। सू० ४८ ॥ भावार्थ:-जो मनुष्य यथार्थवक्ता विद्वानों और अध्यापकों का सत्कार करते हैं वे ही सुख को प्राप्त होते हैं ॥७॥ इस सूक्त में स्त्री पुरुषादि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में संतालीसवां सूक्त समाप्त हुमा॥ अथ पञ्चर्चस्याष्टचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य प्रतिभानुरात्रेय ऋषिः । विश्वे- देवा देवताः । १ । ३. स्वराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । २।४ । ५ निच- ज्जगती छन्दः । निषादः स्वरः ।। अब पाँच ऋचा बाले अड़तालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्यों को किस की इच्छा करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं । कहुँ प्रियाय धाम्ने मनामहे वक्षत्राय स्वयंश से महे वयम् । आमेन्यस्य रजसो यदभ्र आँ अपो णाना वितनोति मायिनी ॥२॥ CATE बाल AAS पदार्थः--(यत) जो (आमेन्यस्थ) चारों ओर से ज्ञान के विषय (रजसः) लोक के मध्य में और (अन) मेघ में (अपः) जलों का (प्रा, वृणाना) उत्तम प्रकार स्वीकार करती हुई और (मायिनी) बुद्धि जिसमें विद्यमान वह नीति (बितनोति) विस्तार युक्त करती है उसको (उभी (वयम्) हम लोग (महे) बड़े (प्रियाय) सुन्दर (धाम्ने) जन्म स्थान और नाम स्वरूप के लिये (स्वक्षत्राय) अपने राज्य वा क्षत्रिय कुल के लिये और (स्वयशसे) अपना यश जिस से उसके लिये (कत्) कब (मनामहे) जानें ॥१॥ भावार्थः-मनुष्यों को चाहिये कि निरन्तर इस प्रकार से इच्छा करें जिस से राज्य यश और धर्म बढ़े वैसे ही स्वीकार करके अनुष्ठान करें॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ता अत्नत वयुनं वीरवक्षणं समान्या वृतया विश्वमा रज। अपो अचीरपरा अजते प्र पूर्वाभिस्तिरते देवयुर्जनः ॥२॥ पदार्थ:-(देवयुः) विद्वानों की कामना करता हुआ (जनः) जन (वीरवक्षणम्) वीरों के पहुंचाने को (वयुनम्) कर्म वा प्रज्ञान को तथा (समान्या) तुल्य (वृतया) प्रावरण करने वाली क्रिया से (विश्वम्) सम्पूर्ण (रजः) लोक- -RHG ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४८ ॥ ARAN a BAR 40 * FO AHAT लोकान्तर और जिन (अपाची:) नीचे चलने वाले (अपराः) अन्य (अपः) जलों को (अप, ईजते) चलाता है वा (पूर्वाभिः) प्राचीन जलों से (प्र, तिरते) पार होता. है (ता.) उन जलों को आप लोग (प्रा) सब ओर से (अत्नत) निरन्तर प्राप्त होओ ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग विद्वानों के संग की कामना करते हुए सम्पूर्ण विद्याओं को ग्रहण कीजिये ॥२॥ फिर स्त्री पुरुष कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । आ ग्राभिरहन्येभिरक्तभिर्वरिष्ठं वज्रमा जिघर्ति माथिनि । शतं वा यस्य प्रचरन्त्स्वे दमें संवर्तयन्तो वि चं वर्चयनहीं ॥३॥ पदार्थ:-हे (मायिनि) प्रशंसित बुद्धि से युक्त ! जिस से आप (ग्राभिः मेघों (अहत्येभिः) दिनों और (अक्तुभिः) रात्रियों से (बरिष्ठम्) अति श्रेष्ठ (वचम्) शस्त्रविशेष को (मा, जित्ति) प्रदीप्त करती हो (शतम्, बा) अथवा सैंकड़ों का दल (यस्य) जिस के (स्वे) अपने (दमे) गृह में (प्रचरन्) चलता और (महा) दिनों को (प्रा, वर्तयन्) अच्छे प्रकार व्यतीत करता हुआ व्यवहार को प्रका- शित करता है (च) और जिसकी (संवर्तयन्तः) उत्तम प्रकार वर्तमान किरणें (वि) विशेष फैलते हैं उस को तू विशेष करके जान ।।३।। भावार्थ:-- जो स्त्री और पुरुष भय रहित हों तो सूर्य और बिजुली के सदृश दिनरात्रि पुरुषार्थ को करके ऐश्वर्य से प्रकाशित हों ॥३॥ राजा कैसे राज्य को करे इस विषय को कहते हैं । तामस्य रीति परशोरिव प्रत्यनीकमख्यं भुजे अस्य वर्षसः । सचा यदि पितुमन्तमिव क्षयं रत्नं दाति भरहूतये विशे ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (अस्य) इस के (भुजे) पालन के लिये (अख्यम्) कहने योग्य (अनीकम्) सेना दल के (प्रति) प्रति (परशोरिव) परशु के सम्बन्ध को जैसे वैसे (ताम्) उस (रोतिम्) रीति को (वधाति) धारण करता है (अस्य) इस (वर्षसः) रूप के (सचा) सम्बन्धि (पितुमन्तमिव) अन्नवान् के सदृश (यदि) यदि (भरहूतये) पालन धारण करने वाली वाणी आह्वान के लिये जिस की उस (विशे) प्रजा के लिये (रत्नम्) रमणीय (क्षयम्) निवास स्थान को धारण करता है तो वही राज्य करने के योग्य होता है ॥४॥ भावार्थ:-प्रजा की पालना के लिये गूढनीति से राजा व्यवहारों का अनुष्ठान करे और सब की पालना यथार्थभाव से करे ॥४॥ Npna 40 GIRN

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ऋग्वेदः म०५।०४६ ॥
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प्रशंसित सेना जिस की ऐसा ही राजा जीतने वाला होने को योग्य है ।।
स जिह्वया चतुरनीक ऋजते चारु वसांनो वरुणो यतनरिम् ।
न तस्य विद्म पुरुषत्वा वयं यतो भर्गः सविता दाति वार्यम् ॥५॥
पदार्थ:-जो (वरुणः) श्रेष्ठ (चारु) सुन्दर वस्त्र को (वसानः) धारण
करता हुआ (चतुरनीक:) चार प्रकार की सेनायें जिसकी वह (जिह्वया) वाणी से
(परिम् ) शत्रुका (यतन्) यत्न करता हुआ (पुरुषत्वता) बहुत पुरुषार्थ के साथ
(भगः) ऐश्वर्या से युक्त (सविता) सत्य में प्रेरणा करने वाला (वार्यम्) स्वीकार
करने योग्य उपदेश को (दाति) देता है (सः) वह (ऋञ्जते) उत्तम प्रकार सिद्ध
करता है (यत:) जिस से (वयम्) हम लोग (तस्य) उस के पुरुषार्थ के अन्त को
(न) नहीं (विद्य) जानें ॥५॥
भावार्थ:-जिस की उत्तम सेना है वही राजा प्रशंसित होता है ।।५।।
इस सूक्त में विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की
इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह पंचम भण्डल में अड़तालीसवां सूक्त समाप्त हुआ।
।
अथ पंचर्चस्यकोनपंचाशत्तमस्य सूक्तस्य प्रतिप्रभ पात्रेय ऋषिः। विश्वेदेवा
देवताः । १।२। ४ भुरित्रिष्टुप् । ३ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ५
स्वराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पंचमः स्वरः ।।
अब पांच ऋचा वाले उनचासवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है उसके प्रथम
मन्त्र में मनुष्यों को चाहिये कि परोपकार ही करें इस विषय को कहते हैं ।
देवं वो अध संवित रमेधे मगच रत्न विभजन्तमायोः ।
अावां नरा पुरुभुजा वस्त्यां दिवेदिवे चिदश्विना सखीयन् ।।१।।
ma
पदार्थ:-हे मनुष्यो मैं (अध) आज (व:) आप लोगों के लिये (प्रायोः) जीवन
का (विभजन्तम्) विभाग करते हुए देवम्) विद्वान् (सवितारम्) ऐश्वर्यवान्
रत्नम्) रमणीय धन (भगम्) और एश्वर्य को (च, भी (मा, ईषे) अच्छे प्रकार
चाहता हूं और हे (पुरुभुजा) बहुतों का पालन करते हुए (नरा) अग्रणी (अश्विना)
राजा और प्रजा जनो (सखीयन्) मित्र के सदृश आचरण करता हुआ मैं (चित)
निश्चित (दिवेदिवे) प्रतिदिन (वाम् ) आप दोनों को (प्रा. स्वत्याम्) अच्छे प्रकार
वर्ताऊं ॥१॥

सुख की
इच्छा करें वे
Hote
ta
S
torene
NAR
END
प्रसिद्ध अग्नि (दस्माः) और दुःख वरुण:) उदान' (मित्रः) प्रारण (अग्नि:)
ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ४६ ॥
भावार्थ:-जो
मनुष्य मित्र होकर दूसरे के लिये
सदा ही भादर करने योग्य होवें ॥१॥
मेघ का कारण क्या है इस विषय को कहते हैं ।
प्रति प्रयाणमसुरस्य विद्वान्तसूक्तैर्देवं सवितारं दुवस्य ।
उप ब्रवीत नमसा विजानञ् ज्येष्ठं च रत्न विभजन्तमायोः ॥२॥
पदार्थ:-हे जन (विद्वान्) विद्वान आप (सूक्तः) अच्छे अर्थों को कहने वाले
वेद के विभागों से (असुरस्य) मेघ की (प्रयाणम्) यात्रा का और (देवम्) प्रकाशित
होते हुए (सवितारम्) मेघ को उत्पन्न करने वाले का (प्रति) प्रत्यक्ष में (दुवस्य)
सेवन करो और (नमसा) अन्न आदि के दानरूप सत्कार से (ज्येष्ठम् ) अत्यन्त प्रशंसा
करने योग्य (रत्नम्) धन को (च) भी (बिजानन्) विशेष करके जानता हुमा (प्रायोः)
जीवन के (विभजन्तम्) विभाग करते हुए को (उप, अवीत) कहें ।।२।।
भावार्थः -- हे मनुष्यो ! सूर्य ही मेघ आदिकों का उत्पन्न करने
वाला है उस की विद्या का उपदेश दीजिये ॥२॥
फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
अत्रया दयते वार्याणि पूषा मगो अदितिर्वस्त उत्रः ।
इन्द्रो विष्णुवरुणो मित्रो अग्निहानि भद्रा जनयन्त दमाः ॥३॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो विद्वान् (अवत्रया वार्यारिण) खाने और स्वीकार करने
योग्य अन्नादिकों को (वयते) देता है और (पूषा) पुष्टिकर्ता (भगः) सेवन करने
योग्य तथा (अदितिः) माता (उत्रः) किरणों का (वस्ते) आच्छादन करती है और
(महानि) दिनों को (जनयन्त) उत्पन्न करते हैं उनको व्यर्थ मत व्यतीत करिये ॥३॥
भावार्थ:-जैसे माता अनुग्रह से अन्न पान आदि के दान से सन्तानों
का पालन करती है वैसे ही सूर्य आदि पदार्थ दिन और रात्रि से सब की
रक्षा करते हैं ॥३॥
फिर मनुष्यों को क्या वर्ताव करके क्या प्राप्त करना
चाहिये इस विषय को कहते है ।
तन्नो अन, सविता
वरूथं तत्सिन्धव इषयन्तो अनु ग्मन् ।
उप यद्वोचे अध्वरस्य होता रायः स्याम पतयो वाजरत्ना: ॥४॥

ऋग्वेदः म० ५ । सू०५० ।। . निरन्तर पुरु- up पदार्थ:--(अध्वरस्य) अहिंसारूप यज्ञ का (होता) ग्रहण करने वाला मैं सब के प्रति (यत्) जिस का (उप, बोचे) उपदेश करू (तत्) उस के और (न:) हम लोगों के (वरूथम्) गृह (अनर्वा) घोड़े जिस के नहीं वह और (सविता) सूर्य तथा (तत्) उस को (इषयन्तः) प्राप्त होते वा प्राप्त कराते हुए (सिन्धवः) नदियाँ वा समुद्र (अनु, ग्मन्) पीछे चलते हैं, जिस से (वाजरत्नाः) विज्ञान धन है जिन के ऐसे हम लोग (रायः) धन के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो तुम सूर्य आदि के सदृश षार्थी होओ तो लक्ष्मीवान् होमो ॥४॥ मनुष्यों को क्या कर के क्या प्राप्त करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । प्रये वसुभ्य ईवदा नमो दुय्य मित्रे वरुणे सूक्तवाचः । अवैत्व कृणुता वरीयो दिवस्पृथिव्योरवसा मदेम |५|| पदार्थ:--हे मनुष्यो (ये) जो (मित्रे) मित्र (वरुणे) उत्तम तिथि के निमित्त (ईचत्) गतिमान् तथा रक्षणवान् पदार्थ को (प्र, या, दुः) उत्तम प्रकार देवें वा (ये) तुम लोग (वसुभ्यः) धनों के लिये (नम:). अन्न को (कृणुता) सिद्ध करो उन से युक्त (सूक्तवाचः) उत्तम प्रशंसित वाणी वाले हम लोग (दिवः, पृथिव्योः) प्रकाश सूर्य और भूमि के मध्य में जिस से (वरीयः, अभ्वम्) अत्युत्तम धनादि तथा अत्यन्त (प्रव, एतु) प्राप्त हो उस की (अवसा) रक्षा से (मदेम) आनन्दित हों ॥५॥ भावार्थः- हे मनुष्यो ! पुरुषार्थ से लक्ष्मी को और उस से अन्न आदि को इकट्ठा कर बड़े सुख को प्राप्त होकर सब का रक्षण करो ॥५॥ इस सूक्त में सूर्य और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। पंचम मण्डल में उनवासवां सूक्त समाप्त हुमा । जो यह अथ पञ्चर्चस्य पञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य स्वस्त्यात्रेय ऋषिः । विश्वेदेवा देवताः । १ स्वराडुष्णिक् । २ निचूदुष्णिक् । ३ भुरिगुष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः । ४ । ५ निचूदतुष्ट छन्वः । धैवतः स्वरः ।। अब पांच ऋचावाले पचासवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों के साथ मित्रता से विद्या और धन को प्राप्त होकर यश बढ़ावें इस विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ५। सू०५० ॥ पा - विश्वो देवस्य नेतुर्मों पुरीत सख्यम् । विश्वो राय इषुध्यति घुम्नं णीत पुष्यसे ॥१॥ पदार्थ:-(विश्व:) सम्पूर्ण (मतः) मनुष्य (नेतः) अग्रणी । देवस्य) विद्वान् की (सख्यम्) मित्रताको (रोत) स्वीकार करे और (विश्वः) सम्पूर्ण (राये धनके लिये (इषुध्यति) वाणों को धारण करता है और जिससे श्राप ,पुष्पसे) पुष्ट होते हैं उस (द्य म्नम्) यशं को श्राप (वृणीत) स्वीकार करिये ॥१॥ भावार्थ:-सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्या धन और शरीरपुष्टि की प्राप्ति के लिये विद्वानों की शिक्षा शरीर और आत्मा से परिश्रम निरन्तर करें ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ते ते देव नेतर्ये चेमाँ अनुशसे । ते राया ते ह्या३'पृचे सचेमहि सचयः ॥२॥ पदार्थ:-हे (मेतः) अनरणी (देव) विद्वन् ।ये) जो (ते) आप के (अनुशसे) अनुशासन के लिये (इमान्) इन को सम्बन्धित करते हैं (ते, ते) वे वे सत्कार करने योग्य हों (च) और जो (राया) धन से सब की रक्षा करते हैं (ते) वे प्रीति से युक्त होते हैं और जो (हि) निश्चित (प्रापचे) सब ओर से सम्बन्ध के लिये (सचयः) पूर्ण सम्बन्धों में उत्पन्न हुनों के साथ वर्तमान हैं उन के साथ हमलोग (सचेमहि) satis Oub - मिलें ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप इन वर्तमान और समीप में स्थित जनों [ को शिक्षा दीजिये और विद्वानों के साथ मिल के विद्याओं को प्राप्त हूजिये ॥२॥ मनुष्यों को किस का सत्कार करना और क्या प्राप्त करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। अतॊ न आ नृनतिथीनतः पत्नीर्दशस्थत । आरे विश्वं पथेष्ठां द्विषो युयोतु यूयुविः ॥३॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो (अतः) इस कारण से (न:) हम लोगों और (नन्) अधर्म से अलगकर धर्म के मार्ग पर चलाने वाले (अतिथीन्) जिन के प्रागमन की तिथि नियत नहीं उनको (मतः) इस' के अनन्तर (पत्नीः) स्त्रियों को (प्रा) सब

१९८
ऋग्वेदः मं०५। सू० ५०॥
प्रकार से (दशस्यत) प्रबल करिये और (विश्वम्) सम्पूर्ण जन को लथा (पश्रेष्ठाम्)
जो धर्मयुक्त पथ में स्थित हो उसको (मारे) समीप में प्रबल' करिये और (यूयुविः)
विभाग करनेवाला (द्विषः) द्वेष्टा जनों को दूर में (युयोत) विशेष करके विभक्त
करे ॥३॥
करें ॥३॥
भावार्थ: -मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक अतिथियों की उत्तम
प्रकार सेवा कर और मिल के विवेक को प्राप्त होकर द्वष आदि दोषों
को
दूर
जो अग्नि के सदृश व्यवहार के धारण करने वाले होवें वे धीर होते हैं
इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
यत्र वहिरभिहितो दुद्रवद् द्रोण्यः पशुः ।
नृमणां वीरपस्त्योऽर्णा धीरैव सनिता ॥४॥
4000
-
MANOROUSm
पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्र) जिस में (द्रोण्यः) शीघ्र चलनेवालों में उत्पन्न
पशुः) जो देखा जाता है उस के सदृश (अभिहितः) कहा गया वा धारण किया
गया (वह्निः) प्राप्त करने वाला अग्नि (दुइवत्) अत्यन्त चलता है वहां (अर्णा) प्राप्त
कराने वाली (धीरेव) ध्यानवती के सदृश (नुमणाः) मनुष्यों में जिसका मन (वीर.
पस्त्यः) जिसके गृह में वीर वह पुत्र (सनिता) विभाग करनेवाला होवे ॥४॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु -जो अग्नि के सदृश तेजस्वी और
वेग से युक्त होवें वे सत्य और असत्य के विभाग करने वाले होवें ॥४॥
मनुष्यों को क्या मांगना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
एष ते देव नेता रथस्पतिः शं रयिः।
शं राये शं स्वस्तय इष: स्तुतौ मनामहे देवस्तुतौ मनामहे ॥५॥
पदार्थ:-हे (नेतः) प्राप्ति कराने वाले (देव) विद्वन् ! (ते) आप का (एष:)
यह (रथस्पतिः) वाहन का स्वामी (शम्) सुखरूप (रयि:) धन और (शम्। सुख
(राये) धन के लिये वा (स्वस्तये) सुख के लिये (शम्) कल्याण (इषःस्तुतः) अन्न
आदि की स्तुति करनेवाला और जो (देवस्तुत:) विद्वानों से प्रशंसित है उन की
हम लोग (मनामहे) याचना करते हैं और हम लोग (मनामहे) जानते है ॥५॥
भावार्थ:-जो विद्वानों से प्रशंसित और कल्याणकारक पदार्थ होवें
उनको हम लोग ग्रहण करें ॥५॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू०५१॥ १६६ इस सूक्त में विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में पचासदां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ पञ्चदशस्यैकपञ्चाशत्तमस्थ सूक्तस्य स्वस्त्यात्रेय ऋषिः । विश्वेदेवा देवताः। १ गायत्री। २।३ । ४ निवृद्गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । ५। ६ । & । १० निचदुष्णिक । ६ उष्णिक । ७ विराडुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः ११ निवृत्रिष्टुप् । १२ त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः । १३ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। १४ । १५ अनुष्टपछन्दः । गान्धारः स्वरः॥ अब पन्द्रह ऋचावाले इक्यावनवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मंत्र में विद्वान् जन विद्वानों के साथ क्या करें यह उपदेश किया जाता है । अग्ने सुतस्य पीतये विश्वैरूमैभिरा गहि । देवेभिडव्यदातये ॥१॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् पाप (विश्वः) सम्पूर्ण (अमेभिः) रक्षा आदि करने वाले (देवेभिः) विद्वानों के साथ (सुतस्य) निकाले हुए प्रोषधिरस के (पीतये) पान करने के लिये और (हत्यदातये) देने योग्य बस्तु के देने के लिये (मा, गहि) प्राप्त हूजिये ॥१॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन अत्यन्त विद्वान् के साथ सम्पूर्ण जनों को उत्तम प्रकार बोध देवें तो सब आनन्दित होवें ॥१॥ कैसे मनुष्यों को होना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ऋतधीतय आ गत सत्यधर्माणो अध्वरम् । अग्नेः पिबत जिह्वया ॥२॥ पदार्थ:--हे (ऋतधीतयः) सत्य के धारण करने वाले (सत्यधर्माणः) सत्य है धर्म जिनका ऐसे विद्वानो आप लोग (अध्वरम्) अहिंसारूप व्यवहार को (मा, गत) प्राप्त हूजिये और (अग्नेः) अग्नि की (जिह्वया) जिह्वा से रस को (पिबत) पीजिये ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! आप लोग सत्यधर्म के धारण से अत्यन्त सुख को प्राप्त हूजिये ॥२॥ विद्वानों के साथ विद्वान् क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। विभिर्वित्र सन्त्य पातविभिरा गहि । देवेभिः सोमपीतये ॥३॥ - ।

२०० ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५१ ।। AM पवार्थ:-हे (सन्त्य) वर्तमान में श्रेष्ठ (वित्र) बुद्धिमान् भाप (प्रातविभिः) प्रातःकाल में जाने बाले (देवेभिः) विद्वानों के और (विप्रेभिः) बुद्धिमानों के साथ (सोमपीतये) सोमलतानामक प्रोषधि के रस के पान के लिये (मा, गहि) प्राप्त हूजिये ॥३॥ भावार्थ:---जब विद्वानों के साथ विद्वानों का सङ्ग होता है तब ऐश्वर्य का प्रादुर्भाव होता है ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अयं सोमेश्चमू सुतोऽमंत्रे परि षिच्यते । प्रिय इन्द्राय वायवे ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अयम्) यह (वायवे) बलवान् (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त पुरुष के लिये (सुतः) उत्पन्न किया गया (प्रियः) सुन्दर (सोमः) ऐश्वर्य का योग (अमत्रे) पात्र में (परि) सब ओर से (सिच्यते) सींचा जाता है वह (चम्) दो प्रकार की सेनाओं को सब प्रकार से वृद्धि करता है ॥४॥ भावार्थ:-जो वैद जन औषधियों के सारभागों को निकालकर रोग- रहित मनुष्यों को करें तो सब ऐश्वर्यों से युक्त होते हैं ॥४॥ मनुष्यों को क्या भोजन करना और क्या पीना चाहिये इस विषय को कहते हैं !! वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये । पियो सुतस्यान्धसो अभि प्रयः ॥५॥ पदार्थ:-हे (बायो) अत्यन्त बल से युक्त श्राप (हव्यवातये) देने योग्य वस्तु के देने के लिये और (बीतये) विज्ञान आदि की प्राप्ति के लिये (अभि, प्रय:) सब ओर से सुन्दर जल' का (जुषाणः) सेवन करते हुए (प्रा, याहि) प्राप्त हूजिये और (सुतस्य) उत्पन्न हुए (अन्धसः) अन्न के रस का (पिबा) पान करिये ॥५॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप रोग और प्रमाद के नाश करने और बुद्धि के बढ़ानेवाले अन्न की खाइये और रस को पीजिये ॥५॥ अब राजा और अमात्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इन्द्रश्च वायवेषां सुताना पीतिमहथः । तान् जुषेथामरेपसांवभि प्रयः ॥६॥ म पदार्थ:-हे (वायो) मुख्य पुरुष (इन्द्रः, च) और राजा 'आप दोनों (एशाम्) इन वर्तमान (सुतानाम्) पालना से छूटे अर्थात् सिद्ध हुए पदार्थों के (पीतिम्) पान के ऋग्वेदः मं० ५। सू०५१ ॥ (अहथः) योग्य होते हैं (तान्) उनको और (अरेपसौ) दयालु हुए (प्रयः) सुन्दर अन्न को (अभि, जुषेथाम्) सेवन करें ।।६।। भावार्थ:-जहां राजा और मन्त्री धार्मिक होवें वहां संपूर्ण योग्यता होवे ॥६॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः ॥७॥ 440 dava tobe पदार्थ:-हे मनुष्यो (सिन्धवः) नदियां (निम्नम्) अर्थात् नीचे स्थल को (न) जैसे वैसे (दध्याशिरः) धारण करने और खाने योग्य (सुलाः) उत्पन्न हुए (सोमासः) ऐश्वर्य से युक्त पदार्थ (वायवे) वायु के सदृश बलयुक्त (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य वाले के लिये (प्रयः) अत्यन्त प्रिय को (अभि) सब ओर से (यन्ति) प्राप्त होते हैं ॥७॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमाल -जैसे नदियां समुद्र को प्राप्त होती हैं वैसे ही बड़ी ओषधियों के सेवन करने वाले सुख को प्राप्त होते हैं ॥७॥ अब अग्नि के समान विद्वान् कैसा है इस विषय को कहते हैं ।। सजूर्विश्वेभिर्देवेभिरश्विभ्यामुषसा सजूः । आ यांाग्ने अत्रिवत्सुते रंण ॥८॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वन् ! जैसे अग्नि (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (देवेभिः) पृथिवी आदिकों से (सजूः) संयुक्त तथा (अश्विभ्याम्) प्रकाशित और अप्रकाशित लोकों तथा (उपसा) प्रातःकाल' से (सजू:) संयुक्त (सते) उत्पन्न जगत् में (अत्रिवत्) व्यापक के सदृश है वैसे (प्रा, याहि) प्राप्त हूजिये और (रण) उपदेश करिये ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० हे मनुष्यो ! जो बिजुली सब पदार्थों में व्याप्त है उसको विशेष कर के जानिये ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सर्मित्रावरुणाभ्यां सजूद सोमन विष्णुना। आ यांबग्ने अत्रिवत्सुते रण ॥९॥ M * AIMON- Win PR (नः) हम लोगों को स्वस्ति) सुख (देवी) प्रकाशित २०२ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५१ ॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्धन् ! आप जो (मित्रावरुणाभ्याम्) प्रारण और उदान पवनों से (सजू :) संयुक्त (सोमेन) ऐश्वर्य वा चन्द्र से और (विष्णुना) व्यापक आकाश से (सजूः) संयुक्त और (सुते) उत्पन्न हुए जगत् में (अनिवद) व्यापक के सदृश है उसके जानने के लिये (मा, याहि) प्राप्त हूजिये और हम लोगों के लिये सत्य का (रण) उपदेश कीजिये ।।६।। भावार्थः --- इस मन्त्र में उपमालं.--जो मनुष्य प्राण और अपान आदि में स्थित बिजुली की विद्या को जानें तो बहुत सुख को प्राप्त होवें ॥६॥ फिर वह कैसा है इस विषय को कहते हैं । सजूरादित्यैर्वसुभिः सजूरिन्द्रेण वायुना ! आ याह्यग्ने अत्रिवत्सुते रण ॥१०॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान विद्वन् ! जो (मादित्यैः) महीनों और (वसुभिः) पृथिवी आदिकों के साथ (सजूः) संयुक्त और (वायुना) बलवान् (इन्द्रेण) जीव के साथ (सजूः) संयुक्त (सुते) उत्पन्न हुए जगत् में (अत्रिवत्) व्यापक के सदृश वर्तमान है उसके जानने के लिये (भा, याहि) प्राप्त हूजिये और (रण) उप- देश करिये ॥१०॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो मन सम्बन्धी बिजुली रूप अग्नि प्राकाश में स्थित हुआ. वर्तमान है उस को जान कर कार्यो में उपयोग करिये ॥१०॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । खस्ति नो मिमीतामश्विना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनवणः । स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति द्यावापृथिवी सुचेतुनां ॥११।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जन (अनर्वणः) अश्वरहित का (स्वस्ति) सुख (मिमीताम्) रचें और (भगः) ऐश्वर्य को करने वाला अखण्डविद्या (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख (सुचेतुना) उत्तम विज्ञापन से (धावापृथिवी) प्रकाश और भूमि हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख और (पूषा) पुष्टि करने वाला दुग्धादि पदार्थ और (असुरः) मेघ हम लोगों के लिये सुख को (बधातु) धारण करे वैसे आप लोगों के लिये भी वे सुख को धारण करें ॥११॥ - m HD

(स्वस्तये) सुख के लिये (नः) हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें और (स्वस्तये)
ऋग्वेदः मं०५ । सू० ५१॥
२०३
भावार्थ:- जो.
मनुष्य
पदार्थ विद्या से जिन पदार्थों को उपयुक्त
करें अर्थात् काम में लावें वे इन से उपकार ग्रहण करने को समर्थ
होवें ॥११॥
फिर मनुष्य कैसे विद्या वृद्धि करें इस विषय को कहते हैं ।।
वस्तये वायुमुप अवामहै सोम स्वस्ति भुवनस्य यस्पतिः ।
बृहस्पति सर्वंगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु नः ॥१२॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे हम लोग (स्वस्तये) सुख के लिये (वायुम्) वायु-
विद्या और (सोमम्) ऐश्वर्य का (उप, ब्रवामहै) उपदेश देवें वैसे सुनकर आप लोग
अन्यों के प्रति उपदेश दीजिये और (यः) जो (भुवनस्य) लोक का (पतिः) स्वामी है
वह (स्वस्तये) उपद्रव दूर होने के लिये (सर्वगणम्) सम्पूर्ण समूह जिस में उस
(बृहस्पतिम्) बड़ी वेदवारिणयों के स्वामी को और (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति)
सुख को धारण करे और जैसे (मादित्यासः) अड़तालीस वर्ष परिमित ब्रह्मचर्य से
किया विद्याभ्यास जिन्होंने तथा जो मासों के सदृश सम्पूर्ण विद्याओं में व्याप्त वे हम
लोगों के अर्थ (स्वस्तये) अत्यन्त सुख के लिये (भवन्तु) होवें वैसे आप लोगों के
लिये भी हों ॥१२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-मनुष्य परस्पर पदार्थ विद्या को
सुन
और अभ्यास कर के विद्वान् होवें ॥१२॥
फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।
विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये ।
देवा अन्त्वभवः स्वस्तये स्वस्ति रुद्रः पात्वंहसः ॥१३॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अद्या) आज (विश्वे, देवाः) संपूर्ण विद्वान् जन
CHES
titute
सुख के लिये (वैश्वानरः) समस्त मनुष्यों में प्रकाशमान (वसुः) सर्वत्र वसने वाला
(अग्नि:) अग्नि रक्षा करे और (ऋभवः) बुद्धिमान् (देवाः) विद्वान जन (स्वस्तये)
विद्या सुख के लिये रक्षा करें और (रु.) दुष्टों को दण्ड देने वाला (स्वस्ति)
सुख की भावना करके (न:) हम लोगों की (अंहसः) अपराध से (पातु) रक्षा
करे ॥१३॥
भावार्थ:-विद्वानों की योग्यता है कि उपदेश और अध्यापन से सब
मनुष्यों की निरन्तर रक्षा कर के वृद्धि करावें ॥१३॥

ऋग्वेदः मं०.५। सू० ५२ ।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेवति । स्वस्ति न इन्द्रश्चाग्निश्च स्वस्ति नो अदिते कृधि ॥१४॥ पदार्थ:-हे (अदिते) खण्डित विद्या से रहित (रेवति) बहुत धन से युक्त आप (पथ्ये) मार्ग युक्त कर्म में जैसे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान (नः) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख (इन्द्रः, च) और वायु (स्वस्ति) सुख को (अग्निः, च) और बिजुली (स्वस्ति) सुख (न:) हम लोगों के लिये करती है वैसे (स्वस्ति) सुख (कृषि) करिये ॥१४॥ भावार्थ:-जो सब जीवों के लिये सुख देता है वही विद्वान् प्रशंसित होता है ॥१४॥ मनुष्यों को विद्वानों के संग से जो धर्म मार्ग उस से चलना चाहिये इस विषय को कहते हैं। स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव । पुनमूदताघ्नता जानता सङ्गमेमहि ॥१५॥ पदार्थः -हम लोग (सूर्याचन्द्रमसाविव) सूर्य और चन्द्रमा के सदृश (स्वस्ति) सुख (पम्याम्) मार्गों के (अनु, चरेम) अनुगामी हों और (पुनः) फिर (ववता) दान करने (अध्नता) और नहीं नाश करने वाले (जानता) विद्वान् के साथ (सम्, गमेमहि) मिलें ॥१५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य और चन्द्रमा नियम से दिन रात्रि चलते हैं वैसे न्याय के मार्ग को प्राप्त हूजिये । और सज्जनों के साथ समागम करिये ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में इक्यावना सूक्त समाप्त हुमा॥ OIED Ap अथ सप्तदशर्चस्य द्विपञ्चाशतमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व प्रात्रेय ऋषिः। महतो देवताः।१।४। ५ । १५ विराडनुष्टप् । २।७।१० निचूदनुष्टुप् । ६ पङ्क्ति- श्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३।६ । ११ विराडुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः ।।

बृहती मा पान्ति) अच्छे प्रकार ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५२ ।। १२ । १३ अनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । १४ बृहती। १६ निचबृहती। १७ छन्दः । मध्यमः स्वरः ।। अब सत्रह ऋचा वाले' बावनवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य सत्कार करने योग्यों का सत्कार करें इस विषय को कहते हैं। म श्यायाश्व धृष्णुयार्चा मरुद्भिक्वभिः । थे अद्रोधमनुष्षधं श्रवो मदन्ति यज्ञियाः ॥१॥ पदार्थ:-हे (श्यावाश्व) काली शिखा वाले घोड़ों से युक्त ये, जो (यज्ञियाः) सत्कार करने वाले (अबोधम्) द्रोह से रहित (अनुष्धधम्, श्रवः) अन्न और श्रवण के अनुकूल वर्तमान (मदन्ति) आनन्दित होते हैं उनकी (ऋक्वभिः) सत्कार करने वाले' (मरुद्भिः) मनुष्यों के साथ (धष्णुया) दृढ़ता से (प्र, अर्चा) सत्कार करो ॥शा भावार्थ:-जो मनुष्य सत्कार करने योग्यों का सत्कार करते हैं वे सब सत्कृत होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ते हि स्थिरस्य शर्वस: सखायः सन्ति धृष्णुया। ते यामन्ना धृषदिनस्त्मना पान्ति शश्वतः ।।२।। पदार्थ:-जो (स्थिरस्य) स्थिर (शवसः) बल' के (धष्णुया) दृढ़त्वादि गुणों युक्त (सखायः) मित्र (सन्ति) हैं (ते) वे (हि) ही (त्मना) आत्मा से (यामन्) पालन करते हैं और जो (यामन्) मार्ग में प्रवृत्त हैं (ते) वे (शश्वत:) निरन्तर पथिकों की रक्षा करते हैं ।।२।। भावार्थ:-विद्वानों का ही मित्रपन और रक्षण स्थिर होता है, अन्य किसी का नहीं ॥२॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। ते स्यन्द्रासो नोक्षणोऽति कन्दन्ति शर्वरीः । मरुतामधा महाँ दिवि क्षमा च मन्महे ॥३॥ पदार्थ:- विद्वान् जो (महः) प्रकाश और (मरुताम्) मनुष्यों के समीप में (भमा) क्षमा (अधा, च) और इसके अनन्तर (स्यन्द्रासः) कुछ wwe Indian बड़े (दिवि) २०६ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५२ ॥ चेष्टा करते हुओं के (न) सदृश (उक्षण:). सेचन करने वा (शर्वरी:) रात्रियों को (अति, स्कन्दन्ति) अत्यन्त प्राप्त होते हैं उनको हम लोग (मन्महे) विशेष प्रकार से जानते हैं (ते) वे सब मनुष्यों को जानने योग्य हैं ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-जो मनुष्य दिनरात्रि पुरुषार्थ करते हैं वे दुःख का उल्लंघन करते हैं ॥३॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । मरुत्सु वो दधीमहि स्तोम यज्ञं च धृष्णुषा । विश्वे ये मानुचा युगा पान्ति मत्यै रिषः॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (ये) जो (विश्वे) सब आप लोग (घृष्णुया) दृढ़ (मानुषा) मनुष्यों के सम्बन्धी (युगा) वर्षों को (स्तोमम्) प्रशंसा करने योग्य (यज्ञम्) पुरुषार्थ को (मर्त्यम्, च) और मनुष्य को (रिषः) हिंसक से (पान्ति) रखते अर्थात् बचाते हैं उन (वः) आप लोगों को हम लोग (मरुस्स) मनुष्यों में (दधीमहि) धारण करें ॥४॥ भावार्थ:- जो देव और मनुष्य सम्बन्धी युगों और वर्षों को जानते हैं वे गणित विद्या के जानने वाले होते हैं ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अहंन्तो ये सुदानको नरो असामिशवसः । म यज्ञं यज्ञियेभ्यो दिवो अंर्चा मरुद्भ्यः ॥५॥ पदार्थः-- हे विद्वन् (ये) जो (यज्ञियेभ्यः) यज्ञ करने वालों के लिये (यज्ञम्) सत्कार नामक कर्म की (अर्हन्तः) योग्यता को प्राप्त होते हुए (सदानवः) उत्तम दान देने वाले (असामिशवसः) अखण्डित बलयुक्त (नरः) जन (दिव:) कामना करते हुए (मरुभ्यः) मनुष्यों के लिये सत्कार नामक कर्म को सिद्ध करते हैं उनका आप (प्र, अर्चा) सत्कार करिये ॥५॥ भावार्थ: -मनुष्य जितना बल बढ़ाने की इच्छा करें उतना ही बढ़ सकता है ॥५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । आ रुक्मैरा युधा नर ऋष्वा ऋष्टीरसृक्षत । अन्वनाँ अई धुतो मरुतो जझंतीरिव भानुरर्त त्मना दिवः ॥६॥ म ऋग्वेदः म० ५। ५० ५२ ।। २०७ a- 40 पदार्थ:-हे विद्वानो जैसे (ऋष्वाः) बड़े (नरः) असणी जन (युधा) युद्ध से (ऋष्टी:) प्राप्त हुए सेनाओं के जन (भा, अनु, असृक्षत) सब प्रकार अनुकूल उत्पन्न करें और (एनान्) इनको (ग्रह) ग्रहण करने में (जमझतीरिव) शब्द करने वा शीघ्र चलने वालियों के सदृश (विद्युतः) बिजुली और (मरुतः) पवन की (दिव:) कामना करते हुए जन और (भानुः) दीप्ति (स्मना) आत्मा से जानने योग्य हैं उन को आप (रुक्मः) रोवमान प्रदीप्तों से (मा) सब प्रकार (प्रत) प्राप्त हूजिये ॥६॥ भावार्थ:-विद्वान् जन मनुष्यों के लिये बिजुली आदि विद्याओं को प्राप्त करावें ॥६॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। ये वोधन्त पार्थिवा य उरावन्तरिक्ष आ । वृजने वा नदीना सधस्थे वा महो दिवः ॥७॥ पदार्थः--हे मनुष्यो (2) जो (उरौ) बहुत रूप वाले (अन्तरिक्षे) आकाश में (पार्थिवाः) पृथिवी में जाने गये पदार्थ (वावृधन्त) अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हैं (ये, वा) अथवा जो (नदीनाम्) नदियों के (सधस्थे) समान स्थान में (वृजने, वा) वा वर्जते हैं जिसमें उसमें (आ) सब प्रकार अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हैं और (महः) महान् (दिवः) कामना करने वाले वृद्धि को प्राप्त होते हैं उनको पाप लोग विशेष कर के जानिये ॥७॥ भावार्थः--जो पृथिवी आदिकों की विद्या को जानते हैं वे सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥७॥ फिर विद्वान् क्या करे इस विषय को कहते हैं । शों मारुतमुच्छेस सत्यशवसमृभ्व सम् । उत स ते शुभे नरः प्र स्यन्द्रा युजत त्मना ॥८॥ पदार्थ:-हे विद्वन् आप (मारुतम्) मनुष्यों के संबन्धी इस (शर्थः) बल और (सत्यशवसम्) सत्य' बल जिसका उस (ऋभ्वसम्) बुद्धिमान् को ग्रहण करने वाले की (उत्, शंस) अच्छे प्रकार स्तुति करो (उत) और (स्म) निश्चित (ते) वे (स्यन्द्राः) धीरता युक्त गमन वाले (नरः) नायक आप लोग (शुभे) उत्तम कार्य में (स्मना) आत्मा से परमात्मा को (प्र, युजत) प्रयुक्त करो ॥८॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम बल और परमात्मा की निरन्तर प्रशंसा करें।।८।। MOR Rap २०६ Gunpur dep ऋग्वेदः म० ५ । सू० ५२ ।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । उत स्म ते पहष्ण्यामू) वसत शुन्ध्यवः । उत पच्या रथानाम िभिन्दन्त्योजसा ॥९॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (परुण्याम) पालन करने वाली में (शुन्ध्यवः) शोधन करने वाली (स्थानाम्) वाहनों के (पच्या) रथों के चक्रों पहियों की कीलों के सदृश (ओजसा) बल से (अनिम्) मेघ को (भिन्दन्ति) तोड़ती हैं (उत) और वर्षाती हैं वे (ते) तुम्हारे लिये हों (उत) और (स्म) निश्चित (ऊर्णाः) रक्षित हुए यहां सत्कार किये गए आप लोग (बसत) वसिये ॥६॥ भावार्थ:-जैसे मेघ वर्षते हुए पृथिवी को विदीर्ण करते हैं वैसे ही श्रेष्ठ पुरुषों का सङ्ग अशुद्धि का नाश करता है ॥६॥ मनुष्यों को समस्त विद्या धर्म मार्ग ढूंढने चाहिये इस विषय को कहते हैं । आपथयो विषथयोऽन्तस्पथा अनुपथाः। एतेभियं नामभियङ्गं विष्टार आहवे ॥१०॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (प्रापथयः) सब ओर से अभिमुख मार्ग जिन का वे और (विपथयः) अनेक प्रकार के वा विरुद्ध मार्ग जिन के वे और (अन्तस्पथा) भीतर मार्ग जिनके वे और (अनुपथा:) अनुकूल मार्ग जिन का वे (एतेभिः) इन मार्गों वा मार्गों में स्थित हुओं और (नामभिः) संज्ञाओं से (मह्यम्) मेरे लिये (यज्ञम्) विद्वानों के सत्कार आदि कर्म को (विष्टारः) विस्तार (मोहते) प्राप्त होता है ॥१०॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग सम्पूर्ण विद्याओं और उन से उत्पन्न हुए क्रिया कौशल मार्गों को यथावत् प्रत्यक्ष करके अन्यों को भी उत्तम प्रकार जनायो सिखलामो ॥१०॥ मनुष्य क्रम से विद्यादि व्यवहार को प्राप्त होवें इस विषय को कहते हैं ।। अधा नरो न्यौहतेऽधां नियुत ओहते । अधा पारोवता इति चित्रा रूपाणि दश्याँ ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (अधा) इस के अनन्तर जो (नरः) विद्याओं में अनगी जन विद्यानों के कार्यों को (नि) निश्चय करके (मोहते) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता है और (अधा) इसके अनन्तर (नियुतः) निश्चित वायु आदि गमन वाला Ans m MARATHISARJARNAMENJARANICHAke tion Aria 20 (कुमन्यवः) अपने को आपन की इच्छा करते हुए ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५२ ।। (ोहते) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता है (अधा) इसके अनन्तर (पारावताः) दूर देश में होने वाले (दया) देखने के योग्य (चित्रा) अद्भुत (रूपाणि) रूपों को (इति) इस प्रकार से प्रत्यक्ष करता है वह कृतकृत्य होता है ॥११॥ भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि पहिले ब्रह्मचर्य से विद्यानों को पढ़ कर उसके अनन्तर कार्यों के रचने में प्रवीणता को प्रत्यक्ष कर के फिर अनुमान से दूर में स्थित अदृश्य पदार्थों के विज्ञान को कर के आश्चर्ययुक्त कर्म करें ॥११॥ फिर मनुष्य कैसे वर्तों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। छन्दःस्तुभः कुभन्यव उत्खमा कीरिणो नृतुः । ते मे के चिन्न तायव ऊमा आसन्दृशि विषे ॥१२॥ पदार्थ :-(ये) जो (के) कोई (चित) भी (छन्दःस्तुभः) छन्दों से स्तुति करने (ऊमाः) सब के रक्षण आदि करने वाले (शि) दर्शक में (मे) मेरे (विषे) शरीर और आत्मा के प्रकाश और बल के लिये (अासन्) होवें (ते, वे (नृतः) चाचनेवाले के सदृश (प्रा) सब ओर से (कोरिणः) विक्षेप व्याकुल करने वाले (तायवः) चोर जन (न) न होवें ॥१२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अन्यजनों के विक्षेप और चोरी न करके जैसे पिपासा से व्याकुल के लिए जल वैसे शान्ति के देने वाले होकर सब के शरीर और प्रात्माके बल को बढ़ाते हैं वे ही श्रेष्ठ यथार्थवक्ता होते हैं ॥१२॥ मनुष्यों को किस का संग करना चाहिये इस विषयं को कहते हैं । ये अष्वा ऋष्टिविद्युतः कवयः सन्ति वेधसः । तम॒षे मारुतं गणं नमस्या रमयां गिरा ॥१३॥ पदार्थ:-हे (ऋषे) वेदार्थ के जानने वाले (ये) जो (ऋष्टिविद्युत:) ऋष्टि विद्युत् प्रर्थात् विजुली में विज्ञान जिन का वे (कवयः) सम्पूर्ण शास्त्रों में निपुण (ऋष्वाः) बड़े महाशय (वेधसः) बुद्धिमान् जन (सन्ति) हैं उन का (गिरा) उत्तम प्रकार शिक्षित सत्य कोमल' वाणी से (नमस्था) सत्कार करिये और इस से (तम् ) उस (मारुतम्) विद्वान् मनुष्यों के (गणम्) समूह को (रमया) क्रीड़ा से आनन्दित करिये ॥१३॥ HAND २१० ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५२ ।। Aa- HAR दिवो वा धृष्णव ओजसा - . भावार्थ:-जो महाशय यथार्थवक्ता जनों की सेवा और सत्कार कर उत्तम शिक्षा को प्राप्त होकर सत्य और असत्य के विवेक के लिये उपदेश करके सब मनुष्यों को प्रानन्दित करते हैं वे सब लोगों से सत्कार पाने योग्य होते हैं ॥१३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते है । अच्छे ऋषे मारुतं गणं दाना मित्रं न योषणां । स्तुता धीभिारषण्यत ॥१४॥ पदार्थ:-हे (ऋषे) विद्वन् पाप (योषणा) स्त्री और (मित्रम्) मित्र के (न) सदृश (मारुतम्) मनुष्यसम्बन्धी (गणम्) समूह को (अच्छ) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिए (वा) वा जैसे (दिवः) कामना करते हुए (घष्णवः) धृष्टप्रगल्भ दृढ निश्चय वाले (स्तुताः) प्रशंसितजन (धीभिः) बुद्धियों और (प्रोजसा) बल आदि से (दाना) दानों को देकर मनुष्यसम्बन्धी समूह को (इषण्यत) प्राप्त होते हैं वैसे सब प्राप्त हों ॥१४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-सम्पूर्ण अध्यापक और पढ़ने वाले मित्र के सदृश परस्पर वर्ताव करके वायु आदि पदार्थों की विद्या का अच्छे प्रकार ग्रहण कर ॥१४॥ फिर मनुष्य विद्वानों के संग से विद्याओं को प्राप्त हों इस विषय को कहते हैं । नू मन्वान एषां देवाँ अच्छा न वक्षणां । दाना संचेत सूरिभिर्यामश्रुतेभिरञ्जिभिः ॥१५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (मन्वानः) मननशील पुरुष (याम तेभिः) याम प्रहर सुने गए जिन से उन (अञ्जिभिः) विद्या और श्रेष्ठ गुणों के प्रकट करने वाले (सूरिभिः) विद्वानों के साथ (एषाम्) इन मनुष्यों के मध्य में (देवान् श्रेष्ठ विद्वानों वा श्रेष्ठ पदार्थों को (अच्छा) उत्तम प्रकार प्राप्त होता और (वक्षणा) प्रवाह से (दाना) दानों को करता है वह (न) निश्चय दारिद्य और अज्ञान को न नहीं प्राप्त होता है उस को आपलोग (सचेत) सम्बन्धित करिए ॥१५॥ भावार्थ:- जो मनुष्य विद्वानों के सग को प्रिय मानने और विद्या के दान में रुचि करनेवाले होवें वे ही शीघ्र विद्या को प्राप्त होवें।।१।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । - ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५२ ।। MARI प्र थे में बन्ध्वेषे गां वोचन्त सूरयः पृश्नि वोचन्त मातरम् । अधा पितरमिमिण रुद्रं वौचन्त शिक्वसः ॥१६॥ पदार्थ:--- (ये) जो (सूरयः) विद्वान् जन (मे) मेरी (बन्ध्वेषे) बन्धुओं की इच्छा के लिए (गाम् ) वाणी को (प्र, वीचन्त) उत्तम प्रकार उच्चारण करते हैं पार (पृश्निम्) अन्तरिक्ष और (मातरम्) माता का (बोचन्त) उपदेश करते हैं (अधा) इस' के अनन्तर (शिक्वसः) सामर्थ्यवाले (इष्मिणम्) बहुत प्रकार का बल जिसका उस (पितरम्) पालन करने वाले पिता और (रुद्रम्) दुष्टों के भय' देने वाले का (बोचन्त) उपदेश करते हैं वे मुझ से सत्कार करने योग्य हैं ॥१६॥ भावार्थ:-मनुष्यों को इस प्रकार जानना चाहिए कि जो हमलोगों के लिए विद्या और उत्तम शिक्षा को देवें वे हम लोगों से सदा प्रादर करने योग्य होवें ॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सप्त में सप्त शाकिन एकमेका शता ददुः। यमुनायामर्षि श्रुतमुद्राधो गव्यं मृजे नि राधो अश्व्यं मृजे ॥१७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जिस (राधः) धनको (यमुनायाम्) यम और नियमों से अन्वित क्रिया के बीच मैंने (अधि, श्रु तम्) सुना और जो (गव्यम्) गोनों के हित को उद, मजे) उत्तमता से शुद्ध करता हूं और जो (अश्व्यम्) घोड़ों में श्रेष्ठ (राधः) द्रव्य को (नि) निरन्तर (मृजे) स्वच्छ करता हूं वह (मे) मेरे (सप्त) सातप्रकार के मनुष्यों के भेद और (शाकिन:) सामर्थ्य वाले (सप्त) सात (एकमेका) एक एक (शता) सैकड़ों को जो (ददुः) देवें उस को और उन को प्रापलोग प्राप्त हूजिए और विशेष करके जानिए ॥१७॥ भावार्थ:-इस संसार में मूढ, मूढतर, मूढतम, विद्वान्, विद्वत्तर विद्वत्तम और अनूचान ये सात, सात प्रकार के मनुष्य होते हैं ॥१७॥ इस सूक्त में वायु और विश्वेदेव के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में बावनवां सूक्त समाप्त हुमा ।। 84 . (सस्त्र :) प्राप्त होते हैं (Trय (ययुः) प्राप्त होते हैं और (कस्म) किसके लिए ऋग्वेदः मैं ५ । सू० ५३ ।। अथ षोडशर्चस्य त्रिपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व प्रात्रेय ऋषिः । मरुतो देवताः । १ भुरिग्गायत्री। ८ । १२ गायत्रीछन्दः । षड्जः स्वरः । २ निबृहती। ६ स्वराडबृहतीच्छन्दः। १४ बृहतीच्छन्दः । मध्यमः स्वरः । ३ अनुष्टुप् छन्दः । गान्धार: स्वरः । ४ । ५ उष्णिक् । १० । १५ विराडुष्णिक् । ११ निचूदुष्णिक्- छन्दः । ऋषभः स्वरः । ६ पवितः । ७।१३ निवृत्पङ्क्तिः । १६ पङ्क्तिश्छन्द: अब सोलह ऋचा वाले तिरेपनवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अब मनुष्य क्या जाने इस विषय को कहते हैं ।। को वेद जानमेषां को वा पुरा सुम्नेष्वास मरुताम् । ययुयुजे किलास्यः ।।१॥ पदार्थः- हे मनुष्यो वा विद्वानो (यत्) जो (युयुञ) युक्त होता है वह (एषाम्) इन (मरुताम्) मनुष्यों वा पवनों के (जानम्) प्रादुर्भाव को (किलास्यः) निश्चित मुख जिस का वह (क:) कौन (वेद) जानता है (कः, वा) अथवा कौन (सुम्नेषु) सुखों में (पुरा) प्रथम (पास) स्थित है ॥१॥ भावार्थ: मनुष्य और वायु आदि पदार्थों के लक्षण और लक्ष्यों को विद्वान् जन ही जानने को समर्थ हो सकते हैं अन्य नहीं ॥१॥ फिर मनुष्य कैसे पूछि के क्या जानें इस विषय को कहते हैं। ऐतात्येषु तस्थुषः कः शुश्राव कथा ययुः। कस्मै सस्नुः सुदासे अन्वापय इळाभिवृष्टयः सह ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (रथेषु) विमान आदि वाहनों में (एतान्) इन (तस्थुषः) स्थावर काष्ठ आदि पदार्थों को (कः) कौन (मा, शुश्राव) अच्छे प्रकार प्राप्त होने वाले पदार्थ (सह) एकसाथ (सुदासे) सुन्दर दास जिस के उस में (अनु) अनुकूल प्राप्त होते हैं ।।२।। भावार्थ:-कोई ही वह मनुष्य सम्पूर्ण शिल्पविद्या के व्यवहार करने को समर्थ होता है जो व्याप्त और बहुत उत्तम गुणवाले विजुली आदि पदार्थों को यथावत् जानता है ॥२॥ PM pe -

ऋग्वेदः मं०५। सू०५३ ।।
२१३
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
ते में आहुर्य अथियुरुप द्युभिर्विभिर्मदे ।
नरो मर्यो अरेपस इमान्पश्यन्निति ष्टुहि ॥३॥
पदार्थ:--(ये) जो (अरेपसः) दोषों के लेप से रहित (मर्याः) मरणधर्म
वाले (नरः' नायक मनुष्य (शुभिः) कामना करते हुए (विभिः) पक्षियों के
सदृश
(मदे) अानन्द के लिए (मे) मेरे सत्य' को (बाहुः) कहें और (माययुः) जाने वा
प्राप्त होवें (ते) वे (इमान्) इन मनोरथों को (पश्यन्) देखते हुए के समान कहें
(इति) इस प्रकार आप मेरी (उप, स्तुहि) समीप में स्तुति करिए ॥३॥
भावार्थ: जो विद्वान् जन दिनरात्रि परिश्रम से विद्या को प्राप्त
होकर अन्यों को उपदेश देवें उन को यथार्थवक्ता जानना चाहिये ।।३।।
मनुष्य पुरुषार्थ से किस किस को प्राप्त होवें इस विषय को कहते हैं ।
ये अजिषु ये वाशीषु स्वभानवः स्वक्षु रुक्मेषू खादिषु ।
श्राया रथेषु धन्वंसु ॥४॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (2) जो (वाशीष) वारिणयों में (स्वभानवः) अपने
प्रकाश जिनके वे (अजिष) प्रकट व्यवहारों में (स्त्रक्षु) माला के मणियों में और
(रुक्मेषु, सुवर्ण प्रादिकों में वा (ये) जो (खादिषु) भक्षण प्रादिकों में (रथेष)
वाहनों में और (धन्वसु) स्थलों में (श्रायाः) सुनते वा सुनाते हैं वे प्रसिद्ध होते
DARI
भावार्थ:--जो मनुष्य पुरषार्थी होवें वे सब प्रकार से सत्कार को
प्राप्त हुए लक्ष्मीवान् होते हैं ॥४॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।।
युष्माकं स्मा रयाँ अनु मुदे दधे मरुतो जीरदानः ।
वृष्टी द्यायो यतीरिव ॥५॥
पदार्थ:-हे (जरिवानवः) जीवते हुए (मरुतः) मनुष्यो ! मैं (युष्माकम्) आप
लोगों के मुदे, प्रानन्द के लिए (रथान्) विमान आदि यानों को (दधे) धारण करता
और (वृष्टी वर्षाओं तथा (बाव:) प्रकाशों को (यतीरिव) प्रयत्न से सिद्ध होने
वाली क्रियाओं के समान (स्मा) ही (अनु) पीछे आनन्द के लिए धारण करता
हूं ॥५॥

२१४ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५३ ।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे मैं अभ्यास से विद्या के प्रकाशों को यज्ञ से वृष्टि को धारण करता हूं वैसे प्रापं लोग भी इन को धारण कीजिये ॥५॥ - RIP फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ यं नरः सुदानवो ददाशुषे दिवः कोशमचुच्यवुः । वि पर्जन्यं सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः ॥६॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो ! (सुदानवः) उत्तम विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों के दान से युक्त (दिवः) कामना करते हुए (नरः) नायक मनुष्य (ददाशुषे) देनेवाले के लिए (यम) जिस (कोशम्) मेघ को (मा) चारों ओर से (अचुच्यवुः) वर्षावें और (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (पर्जन्यम्) मेघ को (वि, सृजन्ति) विशेषतया छोड़ते हैं उसके (मनु) अनुकूल (धन्वना) अन्तरिक्ष से (वृष्टयः) वर्षायें (यन्ति) प्राप्त होती हैं वैसे पाप लोग भी आचरण करो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु ० -वे ही मनुष्य उत्तम दाता हैं जो यज्ञ, जङ्गलों की रक्षा और जलाशयों के निर्माण से बहुत वर्षानों को कराते हैं ॥६॥ फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। स्तुदानाः सिन्धवः क्षोदसा रजा प्र ससुर्धेनवो यथा । स्थना अश्वा इवाध्वनो विमोचने वि यद्वत्तन्त एन्यः ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यथा) जिस प्रकार से (धेनवः) दुग्ध देने वाली गौए वैसे (क्षोसा) जल से (ततदाना:) भूमि को तोड़ने वाली (सिन्धवः) नदियां रज:) लोक को (प्र, सस्त्र :) प्रस्रवित करती हैं। और (अश्वाइव) जैसे घोड़े दौड़ते हैं वैसे (यत्) जो (स्यन्ना:) शीघ्र जाने वाली एन्य: नदियाँ (विमोचने) विमोचन 'अध्वनः) मार्गों की (वि, वर्तन्ते) विताती हैं उन से संपूर्ण उपकार ग्रहण करने चाहिये ॥७॥ भावार्थ:- इस मंत्र में उपमालं० -जैसे दुग्ध देनेवाली गौवें दुग्ध की वृष्टि करती हैं वैसे ही नदी तडाग समुद्र आदि और अन्य जलाशय पृथिवी पर वष्टि करते हैं ॥७॥ फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करना योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। आ थांत मरुतो दिव आन्तरिक्षादमादुत । मात्र स्थात परावतः ।।८।। HOM ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५३ ।। २१५ wor THS पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो आप लोग (अन्तरिक्षाद) अन्तरिक्ष (उत) और (अमाव) गृह से (दिवः) कामनाओं को (आ) सब प्रकार से (यात) प्राप्त हूजिये और (परावतः) दूर देश से (मा) नहीं (अव, श्रा, स्यात, अच्छे प्रकार से स्थित हूजिये ।।८।। भावार्थः वे ही मनुष्य कामना की सिद्धि को प्राप्त होते हैं जो विरोध का त्याग करके विद्वान् होते हैं ।।८।। फिर विद्वानों को क्या उपदेश देना योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मा वो रसानितभा कुमा. ऋमुर्मा वः सिन्धुनि रीरमत् । मा वः परि ष्ठात्सरयुः पुरीषिण्यस्मे इन्सुम्नमस्तु व. ॥९॥ पदार्थः - हे मनुष्यो (अनितभा) दीप्ति को न प्राप्त (कुमा) कुत्सित प्रकाश- युक्त (ऋमः) क्रमरण करनेवाली (रसा) पृथिवी (मा) मत (वः) आप लोगों को (नि) अत्यन्त (रीरमत) रमण करावे और (सिन्धुः) नदी वा समुद्र (मा) नहीं (वः) आपलोगों को निरन्तर रमण करावे तथा (सरयुः) चलनेवाला और (पुरी- षिणी) पुरों की इच्छा करने वाली (मा) मत (व:) आपलोगों को (परि, स्थाद) परिस्थित करावे अर्थात् मत प्रालसी बनावे जिस से (अस्मे हम लोगों के लिए और (बः) आपलोगों के लिए (सुम्नम्) सुख (इद) ही (प्रस्तु) हो । भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिए कि इस प्रकार का पुरुषार्थ करें कि जिस प्रकार सम्पूर्ण पदार्थ सुख देनेवाले होवें ॥६॥ फिर विद्वान्जन को मनुष्यों के अर्थ क्या इच्छा करनी चाहिए इस विषय को कहते हैं। रथानां स्वेषं गणं मारुतं नव्य॑सीदाम् । अनु म यन्ति वृष्टयः ॥१०॥ पदार्थः-है मनुष्यो जिस स्थानाम्) वाहन और नव्यसीनाम नवीन-नबी में के बीच' मारुतम्) मनुष्यों के सम्बन्धी (गणम् ) समूह का और त्वेषम् : सद्गुणों के प्रकाश का उपदेश करता हूं और जिस को (वृष्टयः) वर्षायें (अनुप्र, यन्ति) प्राप्त होती हैं (तम् उस (शम्) बल को (ब:) आप लोगों के लिए प्राप्त करता हूँ॥१०॥ भावार्थ:-जो विद्वानों की नवीन नवीन नीति को प्राप्त होते हैं वे बल को प्राप्त होते हैं ॥१०॥ तंक शर्ध -- Site प्रशंसित होते हैं ।।१२।। ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५३ ।। पर फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। श शर्व व एषां वातंत्रातं गणंगणं सुशस्तिभिः । अनु कामेम धीतिभिः ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यों जैसे हम लोग (धीतिभिः) जैसे अङ्गुलियों से कर्मों को वैसे (सुशस्तिभिः) अच्छी प्रशंसाओं से (व:) आप लोगों के और (एषाम्) इन के (शर्धशर्धम्) बल बल और (वातंबातम्) वर्तमान वर्तमान (गणंगणम्) समूह समूहको (अन, कामेम) उल्लंघन करें वैसे आप लोगों को भी करना चाहिये ।।११।। भावार्थ:-इस मत्र में वाचकलु० -जो मनुष्य पूर्ण बल को करें तो बहुत बलिष्ठों का भी उत्क्रमण करें ।।११।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । कस्मा अध सुजाताय रातहव्याय प्र ययुः । एना यामैन मरुतः ।।१२॥ पदार्थ:-जो (मरुतः) मनुष्य (प्रधा) आज (एना) इस (यामेन) विरक्त हुए से (करम) किस (सुजाताय) उत्तम विद्यानों में प्रसिद्ध (रातहव्याय) दिया दातव्य जिस ने उसके लिए (प्र, ययुः) प्राप्त होते हैं वे विद्या के देने वाले हो कर भावार्थ:-विद्या आदि उत्तम गुणों के दान के विना विद्वानों की प्रशंसा नहीं होती है ॥१२॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं। येन तोकाय तनयाय धान्यं १ बीजं वहध्वे अक्षितम् । अस्मभ्यं तद्धत्तन यद्व ईमहे राधों विश्वायु सौभगम् ।।१३।। (येन) जिस कर्म से (तोकाय) तुरन्त उत्पन्न हुए सन्तान के और (तनयाय) कुमार के लिए (अक्षितम्) नाश से रहित (धान्यम्) तण्डुल आदि को और (बीजम्) बोने के योग्य को (वहध्वे) प्राप्त हूजिए और (यत्) जिम (विश्वायु) सम्पूर्ण आयु के करने और (सौभगम्) सौभाग्य को बढ़ाने वाले नाश से रहित (राधः) धन की (व:) प्राप लोगों के लिए (ईमहे) याचना करते हैं (तत्) उसको (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिए (धत्तन) धारण करिये ॥१३॥ ;܀ पदार्थः हे मनुष्यो ! (येन) ।

PRIMAR . i । मनुष्य सन्तानों की रक्षा के लिए ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५३ ।। की उत्तम प्रकार रक्षा करते हैं वे नाशरहित सुख को प्राप्त होते हैं ।।१३।। फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । अतीयाम निदस्तिरः स्वस्तिमिहित्वाऽवद्यमराती। वृष्ट्वी शं योराप उनि भेषजं स्याम मरुतः सह ॥१४॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो जैसे हम लोग (निः) निन्दा करने वाले मिथ्यावादियों का (अति, इयाम) उल्लङघन करें अर्थात् त्याग करें और (स्वस्तिभिः) सुख आदिकों से (तिरः) तिरश्चीनकर्म और (अवधम्) निन्दित कर्म (अराती.) और शत्रुओं का (हित्वा) त्याग और (शम्) सुख की (वृष्ट्वी) वर्षा करके (भाप:) जलों को और (यो:) मिश्रित (उत्रि) गो आदि से युक्त (भेषजम्) ओषधि को सुख आदिकों के (सह) साथ प्राप्त (स्याम) हो वैसे आप लोगों को होना चाहिए ॥१४॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिए कि निन्दक, निन्दा और पापी पाप को छोड़ शत्रुओं को जीतकर पोषधि आदि के सेवन से शरीर को रोग- रहित कर विद्या और योगाभ्यास से आत्मा की उन्नति कर के निरन्तर करें ॥१४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। सुदेव समहासति सुवीरो नरो मरुतः स मत्तः । यं त्रायध्वे स्याम ते ॥१५॥ पदार्थ:-हे (समह) सत्कार से सहित ! (स:) वह (सुदेवः) सुन्दर विद्वान् (सुवीरः) सुन्दर वीर (मर्त्यः) मनुष्य (असति) है (यम्) जिस को है (मरुतः) मनुष्यो (नरः) अग्नणीजनो (ते) वे आप लोग (त्रायध्वे) रक्षा करो हम लोग उस के साथ (स्याम) होवें ॥१५॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिए कि अतिउन्नत होकर निर्बल प्राणियों की सदा ही रक्षा करें॥१५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। स्तुहि भोजान्त्स्तुवतो अस्य यामनि रणन्गावो न यवसे । यता पूर्वी इव सखीरनु ह्वय गिरा गृणीहि कामिनः ।।१६।। सुख प्राप्त . . 4000 ante anwer ऋग्वेदः मं० ५। सू०.५४ ॥ पदार्थ:--हे विद्वन् (रणन्) उपदेश देते हुए ऑप (स्तुवतः) प्रशंसा करने वाले भोजान्) पालकों की (स्तुहि) स्तुति कीजिए और (अस्य) इस रक्षण के (यामनि) मार्ग में (यतः) जिस से (पूर्वानिव) जैसे पूर्व वैसे' वर्तमान (सखीन्) मित्रों का (गिरा) वाणी से (अनु, ह्वय) निमन्त्रण करो और मित्रों को (यवसे) बुस आदि में (गावः) गौत्रों के (न) सदृश निमन्त्रण करो और (कामिनः) श्रेष्ठ मनोरथ जिन का उन की (गृणीहि) स्तुति करो ॥१६॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं०-हे विद्वन् ! जो प्रशंसा करने योग्य और सब के प्रिय और सत्य की कामना करने वाले होवें उन का सदा ही सत्कार करो ॥१६॥ इस सूक्त में प्रश्न उत्तर और विद्वान् के गुरण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थं की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह पंचम भण्डल में तिरेपनवां सूक्त समाप्त हुआ ।। अथ पञ्सवर्चस्य चतुःपञ्चाशत्तमस्य । सूक्तस्य श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः । मस्तो देवताः । १ । ३ । ७ । १२ जगती । २ विराड् जगती । ६ भुरिग जगती। ११ । १५ निचज्जगती छन्दः । निषादः स्वरः । ४ । ८ । १० भुरिक त्रिष्टुप् । ५ ।। १३ । १४ त्रिष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः ॥ अब पंद्रह ऋचा वाले चौवनवे सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मंत्र में विद्वानों को कैसे वर्तना चाहिए इस विषय को कहते हैं। प्रशाय मारताय स्वानव हमां वाचमनजा पर्वतच्युते । धर्मस्तुभे दिव मा पृष्ठ्यज्वने घुम्नश्रवसे महि नम्णमर्चत ॥१॥ पदार्थ:-हे. (विवः) कामना करते हुए विद्वानो आपलोग (स्वभानवे) अपनी कान्ति विद्यमान जिसके उस (मारताय) मनुष्यों के सम्बन्धी (शर्धाय) बल के लिए (इमाम्) इस वर्तमान (वाचम्) उत्तमप्रकार शिक्षितवाणी का (अनज) उच्चारण: कीजिए अर्थात् उपदेश दीजिये और (पर्वतच्युते) मेध से गिरे वा जो मेघ को वर्षाता (धर्मस्तु मे) यज्ञ की स्तुति करता और (पृष्ठयज्वने) पृष्ठ से यज्ञ करता (ध म्नश्रवसे) वा यश सुनागया जिसका उसके लिए (महि) बड़े (नम्णम्) मनुष्य अभ्यास करते हैं जिसका उसका (भा, प्रर्चत) सत्कार करो ।।१।। भावार्थ:-हे विद्वानो आप लोग सदा ही ज्ञानरहित पुरुषों को विद्या ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५४ ॥ २१६ 30- के दान से ज्ञानवान् करो सत्य और असत्य का विचार करके सत्य का ग्रहण कराय के असत्य का त्याग कराइए और सब के सुख के लिए ऐश्वर्य को इकट्ठा करो ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। प्र वो मरुतस्तविषा उंदन्यवो वयोवृधौ अश्वयुजः परिज्रयः । सं विद्युता दधति वाशति त्रितः स्वरन्त्यापोऽवना परिज्रयः ॥२!! पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो जो (तविषा:) बलवान् (उदन्यवः) अपने को जल' की इच्छा करने (वयोवृधः) अवस्था से बढ़ने वा अवस्था को बढ़ाने (प्रश्वयुजः) शीघ्रगामी पदार्थों को युक्त करने (परित्रयः) और सब ओर जानेवाले जन (विद्युता) विजुली के साथ (व:) पाप लोगों को (सम्, दधति) उत्तम प्रकार धारण करते और (वाशति) वाणी के सदृश आचरण करते हैं और (त्रित:) तीन से (परिज्रयः) सब ओर जाने वाले (पापः) जल (अवना) रक्षण आदि का (प्र, स्वरन्ति) अच्छे प्रकार उच्चारण करते हैं उनका आप लोग सत्कार करो ॥२॥ भावार्थ:--जो मनुष्य बिजुली आदि की विद्या को जानते हैं वे सम्पूर्ण सुख को सब के लिये धारण करते हैं ॥२॥ फिर मनुष्य कैसे हों इस विषय को कहते हैं । विद्युन्म॑हसो नरो अश्मंदिद्यवो पातत्विषो मरुतः पर्वतच्युतः । अब्दया चिन्मुहुरा हादुनीतः स्तनयदमा रमसा उदोजसः ॥३॥ पदार्थ:-हे (नर:) नायकजनो जो (विधु महसः) बिजुली की विद्या में बड़े श्रेष्ठ (अश्मविद्यवः) मेघ विद्या का प्रकाश करने वाले (वातस्विषः) वायुविद्या से कांतियां जिनकी ऐसे और (पर्वतच्युतः) मेघों को वर्षाने वा (अब्दया) जलों को देने वाले और (स्तनयदमा:) शब्द करते गृह जिनके वे (रभसाः) वेग से युक्त (उदोजसः) उत्कृष्ट पराक्रम जिन का वे (मुहुः) बार वार (आ) सब प्रकार से (ह्रादुनीवृतः) शब्द करने वाली बिजुली से युक्त (चित्) भी (मरुतः) मनुष्य हैं उनसे मिलिये ॥३॥ भावार्थ:-जो बिजुली मेघ, वायु और शब्द आदि की विद्या को जानने वाले हैं वे सब प्रकार से लक्ष्मीवान् होते हैं ।।३।। फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। MA SAD the ow

२२०
ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५४ ।।
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व्यक्तनद्रा व्यानि शिक्षसो व्य१न्तरिक्षं वि रजास्मि धूतयः ।
वि यहाँ अथ नाव ई यथा वि दुर्गाणि मरुतो नाई रिष्यथ ॥४॥
पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो (यव) जो (शिक्वसः) सामर्थ्य से युक्त
(धूतयः) कंपाने वाले (रुद्राः) पवन (अक्तन) प्रसिद्धों को प्रकट करते हैं और
(महानि) दिनों का (वि) विशेष कर के परिणाम करते अर्थात् गिनाते
हैं (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष के प्रति (रजांसि) लोकों का (वि) विधान करते
और (वि) विशेष कर के चलाते हैं तथा (ईम्) जल को जैसे (नाव:) बड़ी नौकायें
वैसे सम्पूर्ण लोकों को चलाते हैं उन (अनान्) निरन्तर चलने वालों को वि, अजथ)
प्राप्त हूजिये और (यथा) जैसे (दुर्गाणि) दुःख से प्राप्त होने योग्यों को (न) नहीं
(मह) ग्रहण करने में (वि, रिष्यथ) नाश करें वैसे विचारिये ॥४॥
भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि वायुविद्या को अवश्य जानें ॥४॥
फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
तद्वीयर्थ वो मरुतो महित्वनं दीर्घ ततान सूर्यो न योजनम् ।
एता न यामे अमीतशोचिषोऽनश्वदां यन्न्ययातना गिरिम् ॥५॥
पदार्थ:-हे (मरुतः) वायु के सदृश वर्तमान मनुष्यो (सूर्यः) सूर्य्य (योजनम्)
युक्त करते हैं जिस से उस आकर्षण नामक के (न) सदृश और (महित्वनम्)
बड़प्पन को जैसे वैसे (दीर्घम्) विशाल' (वः) आप के (तद) उस (वीर्यम् ) पराक्रम
को (ततान) विस्तृत करता है और (अगुभीतशोचिषः) नहीं ग्रहण किया तेज
जिन्होंने वे (यामे) प्रहर में (एताः) ये गमन (न) जैसे' (अनश्वदाम्) नहीं घोड़े
जिसमें उस गमन और (गिरिम् ) मेघ को देते है और (यत्) जिस को आप लोग
(नि, अयातना) प्राप्त हूजिये उस सब को लोग ग्रहण
भावार्थः---जो लोग सूर्य और मेघों के गुणों को जानकर सामर्थ्य
और धन को इकट्ठा करते हैं वे परोपकारी होते हैं ॥५॥
मनुष्यों को कैसे वर्तना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
अभ्राजि शो मरुतो यदर्णसं मोर्षया वृक्षं कंपनेव वेधसः ।
अंध स्मा नो अरमति सजोषसश्चक्षुरिव यन्तमनु नेषथा सुगम् ।।६।।
पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो आप लोगों से (यत) जो (शर्धः) बल (अभाजि)
प्रकाशित किया जाता और (अर्णसम्) जल को जो तुम लोग (मोषथ) चुराइये तो
M
करें ॥५॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५४ ॥ २२१ - 4 . M- आप लोगों को जैसे (वृक्षम्) वट आदि वृक्ष को (कपनेव) पवनों के गमन वैसे लोग दण्ड देवें (अध) इसके अनन्तर हे (वेधसः) बुद्धिमान् जनो (सजोषसः) तुल्य प्रीति के सेवन करने वाले आप लोग (चक्षुरिव) नेत्र को जैसे वैसे' (नः) हम लोगों के (परमतिम्) रमण रहित (यन्तम्) प्राप्त होने वाले (सुगम्) सुग अर्थात् उत्तमता से चलते हैं जिसमें उस को (स्म) ही (अनु, नेषथ) अनुकूल प्राप्त कीजिये ॥६॥ भावार्थ:---.इस मन्त्र में उपमालं०-जो सब के शरीर और आत्मा के बल को प्रकाशित करते हैं वे धन्य हैं और जो श्रेष्ठ विद्या और गुणों को चुराते उनको धिक्कार धिक्कार ॥६॥ अब ईश्वर कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। न स जीयते मरुतो न हन्यते न स्प्रेषति न व्यथते न रिष्यति । नास्य राय उप दस्यन्ति नोतय ऋषि वा यं राजानं वा सुबूंदथ ।।७।। पदार्थ:---हे (मरुतः) मनुष्यो (सः) वह (न) न (जीयते) जीता जाता (न) न (हन्यते) नाश किया जाता (न) न' (धति) नाश होता (न) न (व्ययते) पीड़ित होता और (न) न (रिष्यति) हिंसा करता है (अस्य) इसका (न) न (राय) धन और (न) म (ऊतयः) रक्षण आदि व्यवहार (उप, दस्यन्ति) नाश होते हैं (यम्) जिस (ऋषिम् ) वेदार्थ के जानने वाले (वा) अथवा (राजानम्) राजा को (वा) भी आप लोग (सषूदथ) रखिये ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो जो वृद्धावस्था वा मरणावस्था रहित सत् चित् और आनन्दस्वरूप नित्य गुण कर्म और स्वभाव वाला जगदीश्वर है उस की सब आप लोग उपासना करो ॥७॥ फिर मनुष्य कैसे हों इस विषय को कहते हैं ।। नियुत्वन्तो ग्रामजितो यया नरोऽर्यमणो न मरुतः कबन्धिनः । पिन्वन्त्युत्सं यदिनासो अखरन्ध्युन्दन्ति पृथिवीं मध्वो अन्धसा॥८ Gama wneta m पदार्थः-~-हे. मनुष्यो (यथा) जैसे (नियुत्वन्तः) निश्चयवान् (ग्रामजितः) ग्राम को जीतने वाले (अर्यमणः) न्यायाधीशों के (न) सदृश (कबन्धिनः) बहुत जलों युक्त (इनास:) समर्थ (नर:) नायक (मरुतः) मनुष्य' (यत्) जिस को (उत्सम्) कूप के समान (पिन्वन्ति) तृप्त करते वा (अस्वरन्) भब्द करते हैं और (अन्धसा)

करते हुओं से (मरुभ्यः) मनुष्य मादिकों के लिए हितकारक (भवति) होता है
२२२
ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५४ ।।
अन्न' के साथ (मध्वः) मधुर गुणयुक्त होते हुए (पृथिवीम्) पृथिवी को(वि, उन्दन्ति)
विशेष गीली करते हैं वे भाग्यशाली होते हैं ॥८॥
भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं० -जो जल के सदृश
शान्ति करने
वालें और सामर्थ्य को बढ़ाते हुए विजय को प्राप्त होते हैं वे लक्ष्मी को
प्राप्त होते हैं ॥८॥
मनुष्यों को कैसे उपकार लेना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
प्रवत्वतीयं पृथिवी मरुद्भ्यः प्रवत्वंती द्यौर्भवति प्रयद्भ्यः ।
प्रवत्वतीः पथ्या अन्तरिक्ष्या प्रवत्वन्तः पर्वता जीरदानवः ।।९।।
पदार्थः -- हे मनुष्यो जो (इयम्) यह (प्रवस्वती) नीचे के स्थान से युक्त
(पृथिवी) भूमि और (प्रवत्वती) फैलने वाला (धौः) प्रकाश और (प्रपद्भ्यः) प्रयत्न
S
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जिस में (प्रवस्वन्तः) गमनशील (जीरदानवः) जीवन को देने वाले (पर्वताः) मेघ
(अन्तरिक्ष्याः) अन्तरिक्ष में उत्पन्न (प्रवत्वतीः) नीचे चलने वाली (पथ्याः) मार्ग के
लिए हितकारक वृष्टियों को करते हैं वे यथावत् जानने योग्य हैं ।।६।।
भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिए कि पृथिवी के समीप से जितना
हो सकता है उतना उपकार ग्रहण करें॥६॥
फिर मनुष्यों को कैसे वर्तना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
यन्मरुतः समरस: स्वर्णरः सूर्य उदिते मर्दथा दिवो नरः ।
न वोऽश्वाः श्रथयन्ताह सिस्रतः सद्यो अस्याध्वना पारमनुथ ॥१०॥
पदार्थः- हे (सभरस:) तुल्य पालन और पोषरण करने वाले (स्वर्णरः) सुख
को प्राप्त कराते और (दिवः) कामना करते हुए (नरः) सत्य धर्म में पहुँचाने वाले
(मरुतः) जनो आपलोग (उदिते) उदय को प्राप्त हुए (सूर्य) सूर्य में (यत) जिस
को प्राप्त होकर (मदथ) आनन्दित होनो उस से (व:) आप लोगों के (सिस्रतः)
चलनेवाले (अश्वाः) घोड़े (न) नहीं (श्रथयन्त, मह) हिंसा करते सकते हैं उन से
(मस्य) इस (अध्वनः) मार्ग के (पारम्) पार को (सद्यः) शीघ्र (प्रश्नुथ) प्राप्त
हूजिये ॥१०॥
भावार्थ:-जो मनुष्य सूर्योदय से पहिले उठ के जब तक सोवें नहीं
तब तक प्रयत्न करते हैं दुःख और दारिद्रय के अन्त को प्राप्त होकर सुखी
और लक्ष्मीवान होते हैं ॥१०॥

ऋग्वेदः मं. ५ । सू० ५४ ॥ m . 2 Indian फिर मनुष्य कौन कैसे हों इस विषय को कहते हैं । असषु व ऋष्टया पत्सु खादयो वक्षस रुक्मा मरुतो रथे शुभं । अग्निभ्राजसो विद्युतो गर्भस्त्योः शिनाः शीर्षसु वितता हिर- ण्ययीं ॥११॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो जब (व:) आप लोगों के वायु के सदश वर्तमान वीरजनो जो आपलोगों के (अंसेषु) कन्धों में (ऋष्टयः) शस्त्र और अस्त्र (परसु) पैरों में (खादयः) भोक्ताजन (वक्षः सु) वक्षःस्थलों में (रुक्माः) सुवर्ण अलंकार (रथे) सुन्दर वाहन में (शुभः) शोभित पदार्थ (गभस्त्योः) हाथों के मध्य में (अग्निप्राजसः) अग्नि के सदृश प्रकाशमान (विध तः) विजुलियां (शीर्षस) शिरों में वितताः) विस्तृत (हिरण्ययीः) सुवर्ण जिन में बहुत ऐसी (शिप्रा.) पगड़ियां हो तब हस्तगत विजय होता है ॥११॥ भावार्थ:-.. जो राजपुरुष अहर्निश राजकार्यों में प्रवीण दुर्व्यसनों से विरक्त और साङ्गोपाङ्ग राज सामग्रीवाले हों वे सदैव प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं ॥११॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तं नाकमर्यो अगृभीत शोचिषं रुशत् पिप्पलं मरुतो वि धूनुय । समच्यन्त जनातित्विषन्त यत्स्वरन्ति घोषं विततमृतायः ॥१२॥ पदार्थः - हे (मरुतः) वायु के सदृश वेगयुक्त वर्तमान जनो आप लोग (अयं:) स्वामी ईश्वर के सदृश (ऋतायवः) अपने सत्य की इच्छा करते हुए (यत्) जिस (विततम्) विस्तृत (घोषम्) वाणी का (स्वरन्ति) उच्चारण करते हैं (तम्, अगृभीतशोचिषम्) उस अगृभीतशोचिषम् अर्थात् नहीं ग्रहण की स्वच्छता जिस में ऐसे (रुशव, अच्छे स्वरूप वाले (पिप्पलम्) फल भोगरूप (नाकम् दुःख रहित आनन्द को (सम्, अच्यन्त) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिए दुःख को (वि) विशेष करके (धूनुथ) कम्पाइये और (वृजना) चलते हैं जिन से उन को (अतित्विषन्त) प्रकाशित कीजिए तथा प्रकाशित हूजिये ॥१२।। भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलु०-जो मनुष्य ईश्वर के सदृश न्याय- कारी सम्पूर्ण जगत् के उपकार करने वाले और उपदेशक हैं वे संसार के भूषक है ॥१२॥ NA २२४ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५४ ।। L फिर मनुष्यों को क्या इच्छा करनी चाहिए इस विषय को कहते हैं । युष्मादत्तस्य मरुतो विचेतसो रायः स्याम रथ्यो ३' वय॑स्वतः । न यो युच्छति तिष्यो ३' या दिवो ३' स्मे रांरन्त मरुतः सह- स्रिणंम् ॥१३॥ पदार्थ:-हे (विचेतसः) अनेक प्रकार का संज्ञान जिन का वे (रथ्यः) बहुत रथ आदि से युक्त (मरुतः) प्राणों के सदृश प्रियजनो हम लोग (युष्मादत्तस्य) आप लोगों से दिये गये (वयस्वतः) प्रशंसित जीवन जिस का उस (रायः) धन के स्वामी (स्याम) होवें और (य:) जो (अस्मे) हम लोगों के लिए वा हम लोगों में (न) नहीं (युच्छति) प्रमाद करता और (यथा) जैसे' (दिवः) प्रकाश के मध्य में (तिष्यः) सूर्य्य वा पुष्य नक्षत्र है वैसे प्रकाशित होवे और है (मरुतः) जनो श्राप लोग (सहस्रिणम्) असंख्य वस्तु हैं विद्यमान जिस के उस को (रारन्त) रमण करते हैं ॥१३॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि सदा धनाढयपन का खोज करें और प्रमाद न करें।॥१३॥ राजादिकों से कौन कौन रक्षापाने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । यूयं रयिं मरूता पाईवीरं यूयमृर्षिमवथ सामविप्रम् । यूयमर्वन्तं भरताय धान यूयं धत्थ राजानं श्रुष्टिमन्तम् ॥१४॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) पुरुषार्थी मनुष्यो (यूयम्) आपलोग (स्पार्हवीरम् ) अभिकांक्षित वीर जिस में उस (रयिम्) लक्ष्मी की (प्रवथ) रक्षा कीजिये और (यूयम्) आप लोग (सामविप्रम्) सामों में बुद्धिमान् (ऋषिम्) वेदार्थ के जानने वाले की रक्षा कीजिये और (यूयम्) आप लोग (भरताय) धारण और पोषण के लिए (अर्वन्तम्) प्राप्त होते हुए (वाजम्) वेग अन्न और विज्ञान आदि को (धत्थ) धारण करो और (यूयम्) आपलोग (थुष्टिमन्तम्) अच्छा क्षिप्रकरण जिस में उस (राजानम्) न्याय और विनय से प्रकाशमान को धारण कीजिये ॥१४॥ भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम सहाय से लक्ष्मी विद्वान् सेना और राजा को धारण करें ॥१४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तो यामि द्रविणं सद्यऊतयो येना स्व१र्ण ततनाम नरभि । इदं स मैं मरुतो हर्यता वचो यस्य तरेम तरंसा शतं हिमाः ॥१५॥ SHAN - E वाले (सुयमेभिः ऋग्वेदः मं० ५ । सू०५५ ।। २२५ पदार्थ:-है (साऊतयः) शीघ्र रक्षण आदि वाले (मरुतः) मनुष्यो (वः) आपलोगों के समीप से जिस त्रिविणम्) धन वा यश को (यामि) प्राप्त होता हूं (तत्) उस को आपलोग दीजिए (येना) जिस से (स्वः) सुख के (न) सदृश (नून्) मनुष्यों को (अभि, ततनाम) सब प्रकार विस्तृत करें और आपलोग (इदम् ) इस (मे) मेरे (वच:) वचन की (सु, हयंता) अच्छे प्रकार कामना करिए और (यस्य) जिस के (तरसा) बल से हम लोग (शतम्) सौ (हिमाः) वर्ष (तरेम) पार होवें उस से आप लोग भी पार हूजिए ।।१५।। भावार्थ:--हे विद्वानो आपलोग यश धन सुख सत्य वचन और बल को बढ़ाय दुःखों के पार हूजिए ॥१५॥ इस सूक्त में सूर्य विजुली और सुख के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्ल के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में चौवनी सूक्त समाप्त हुआ। अथ दशर्चस्य पञ्चपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य श्याचाश्व आत्रेय ऋषिः । मरुतो देवताः। १।५ जगती । २ । ४ । ७।८ निचज्जगती । ६ विराजगती छन्दः । निषादः स्वरः । ३ स्वराद त्रिष्टुप् । ६ । १० निवृत्रिष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वर ।। अब दश ऋचा वाले पचपन सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य कैसे वर्ते इस विषय को कहते हैं ।। 'ज्यवो मरुतो भ्राजदृष्टयो बृहद्वयौ दधिरे रुक्मवक्षसः । ईयन्ते अश्वैः सुश्मभिराशुभिः शुभै यातामनु रथा अवृत्सत ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जिन (अश्वैः) शीघ्र करने वा (माशुभिः) शीघ्र जाने युक्त व्यवहार को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) सुन्दर वाहन आदि (ईथन्ते) प्राप्त किये जाते हैं और (प्रयज्यवः) उत्तम मिलने वाले मनुष्य (भाजदृष्टयः) शोभित होते हैं विज्ञान जिन के वे (रुक्मवक्षसः) सुवर्ण आदि से युक्त आभूषण जिन के वे (मरुतः) प्राणों के सदृश वर्तमान (बृहत) बड़े (वयः) सुन्दर जीवन को (दधिरे) करें और जो (भनु) पश्चात् (प्रवृत्सत) वर्तमान होते हैं उन के साथ आप लोग भी इस प्रकार प्रयत्न कीजिए ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो आप लोग ब्रह्मचर्य आदि से प्रति काल पर्यन्त जीवन वाले योगी और पुरुषार्थी होइये ॥१॥ कायम 400

ऋग्वेदः में० ५। सू० ५५ ।।
date
फिर
मनुष्य कैसे हों इस विषय को कहते हैं ।
स्वयं दधिध्वे तविर्षी या विद बृहन्महान्त उर्विया वि राजथ ।
उतान्तरिक्षं ममिरे व्योजसा शुभ यातामनु रथी अत्सत ॥२॥
पदार्थ:-हे राजजनो (यथा) जैसे (महान्तः) गम्भीर प्राशय वाले श्राप
लोग (तविधीम् ) बल' युक्त सेना को (स्वयम्) अपने से (दधिध्वे) धारण कीजिये
(महत) बड़े को (विद) जानिये (उविया) बहुत से (वि) विशेष करके (राजथ)
शोभित हूजिए और जैसे (शुभम् ) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः)
वाहन (अन, प्रवृत्सत) अनुकूल वत्त मान हैं (उत) और (अन्तरिक्षम्) आकाश को
(वि) विशेष करके (ममिरे) व्याप्त होते हैं वैसे आप लोग (प्रोजसा) बल से (वि)
विशेष करके (राजथ) शोभित हूजिये ।।२।।
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं -हे मनुष्यो ! ब्रह्मचर्य से शरीर
और आत्मा के बल को धारण करके और क्रियाकुशलता को जान के जैसे
ईश्वर अन्तरिक्ष में सम्पूर्ण पदार्थों को उत्पन्न करता है वैसे ही आप लोग
अनेक व्यवहारों को सिद्ध कीजिये ॥२॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
साकं जाताः सुभ्वः साकमुक्षिताः श्रिये चिदा प्रसरं वाधुर्नरः ।
विरोकिणः सूर्यस्येव रश्मयः शुभं यातामनु रथो अत्सत ॥३॥
पदार्थ:-हे (नरः) सत्य को पहुंचाने वाले मनुष्यो (सूर्यस्येव) सूर्य के जैसे
(साकम्) एक साथ (जाताः) उत्पन्न और (सुभ्वः) शोभित (साकम् ) साथ में
(उक्षितः) सींचे हुए (विरोकिणः) अनेक प्रकार की रुचि वर्तमान जिन में वे
(रश्मयः) किरण (प्रतरम्) अत्यन्त दुःख से पार करने वाले व्यवहार को (प्रा)
सब प्रकार (वावृधः) बढ़ावें वैसे (चित्) भी मित्र होते हुए (श्रिये) शोभा वा धन
के लिए प्रवृत्त हूजिए और जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के
(रथा:) सुन्दर वाहन आदि (अनु, प्रवृत्सत) पीछे वर्तमान हैं वैसे सब के उपकार
के पीछे वतिये ॥३॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -हे मनुष्यो ! आप लोग सूर्य की
किरणों के सदृश एकसाथही पुरुषार्थ के लिए उद्यत हूजिये और जैसे
कल्याण करने वालों के रथों के पीछे भृत्यजन वर्तमान होते हैं वैसे ही
धर्म के पीछे वर्तमान हूजिए ॥३॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू०५५ ।। २२७ फिर उसी विषय को कहते हैं । आभूषेयं वो मरुतो महित्वनं दिक्षेश्यं सूर्यस्येव चक्षणम् । उतो अस्माँ अमृतत्वे देवातन शुभ यातामनु रयो अवृत्सत ॥४॥ D NRN क 2009 पदार्थ:-हे (मरुतः) प्राण' के सदृश प्रिय आचरण करने वालो जिन (व:) आप लोगों का (सूर्यस्येव) सूर्य के सदृश (आभूषेण्यम्) शोभा करने और (विदु- क्षेण्यम्) देखने को योग्य (चक्षणम्) प्रकाश (महित्वनम् ) और बड़प्पन है जिस से (उतो) निश्चित (अस्मान् ) हम लोगों को (अमृतत्वे) नाशरहित पदार्थों के भाव अर्थात् नित्यपन के वर्तमान होने पर (बधातन) धारण कीजिये और जिन (शुभम्) धर्म युक्त मार्ग को (याताम् ) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवत्सत) अनुकूल वर्तमान हैं उन का हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं ---जो मनुष्य सूर्य्य के सदृश न्याय प्रकाशक अन्यायरूपी अन्धकार के रोकनेवाले धर्ममार्ग के अनुगामी होवें उन की सदा ही आप लोग प्रशंसा करो ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। उदीरयथा मरुतः समुद्रतो यूयं वृष्टिं वर्षयथा पुरीषिणः। न वो दवा उप दस्यन्ति धेनवः शुभै यातामनु रा अस्प्तत । ५।। पदार्थ:-हे (पुरीषिणः) बहुत प्रकार का पोषण विद्यमान जिनमें वे (मरुतः) मनुष्यो (यूयम्) आप लोग हम लोगों की श्रेष्ठ कर्मों में (उत्, ईरयथा) प्रेरणा कीजिये और जैसे पवन (समुद्रतः) अन्तरिक्ष से (वृष्टिम्) वर्षा करते हैं वैसे लोग (वर्षयथा) वर्षाइये जिस से (दलाः) नाश होने वाले और (धेनवः) वाणियां (वः) आप लोगों को (न) नहीं (उप, दस्यन्ति) उपक्षय करते जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथा:) वाहन (अनु, अवृत्सत) अनुकूल वर्तते हैं वैसे धर्म मार्ग का अनुकूल वर्ताव कीजिये ।।५।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाच कलु०--हे विद्वान् जन! जैसे पवन अन्तरिक्ष से वृष्टि करके सम्पूर्ण प्राणियों को तृप्त करके दुःख का नाश करते हैं वैसे ही सत्यविद्या के उपदेश की वृष्टि से अविद्यारूप अन्धकार से हुए दुःख का निवारण कीजिये ॥५॥ आप OM RBA (शुभम्) कल्याण को (याताम) " ३२८ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५५ ।। फिर उसी विषय को कहते हैं। यदश्वान्धूर्षु पृषतीरमुग्ध्वं हिरण्ययान्प्रत्यत्काँ अमुग्ध्वम् । विश्वा इत्स्पृधों मरुतो व्यस्यथ शुभ यातामनु रथा अत्सत ।।६॥ पदार्थः--हे (मरुतः) वायु के सदृश वेग और बल से युक्त जनो जैसे अनुकूल वर्तमान हैं वैसे (धूर्षु) विमान आदि यानों के अवयव कोष्ठों में (यत्) जिन (हिरण्ययान्) ज्योतिर्मय (प्रति, अत्कान्) स्पष्ट (पृषतीः) वायु और जल के गमनों और (अश्वान्) अग्नि आदिकों को आप लोग (अयुग्ध्वम्) संयुक्त कीजिये और (प्रमुग्ध्वम् ) त्यागिये उनसे (विश्वाः) सम्पूर्ण (स्पृधः) स्पर्धायें रोष (इद) ही (वि) विशेष करके (अस्यथ) चलाइये ॥६॥ भावार्थ:-जो मनुष्य अग्नि वायु और जल आदिकों को वाहनों में उत्तम प्रकार युक्त करते हैं वे विजय के लिये समर्थ होकर धर्मसम्बन्धी मार्ग के अनुगामी होते हैं ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। न पर्वता न नधों वरन्त वो यत्राचिंध्वं मरुतो गच्छथेदु तत् । उत् द्यावापृथिवी यांथना परि शुभ यातामनु रयां अत्सत ॥७॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो आप लोग (धावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (गच्छथ, इत्) प्राप्त ही हूजिये (तत्) उनको (उ) और भी (परि, याथना) सब ओर से प्राप्त हूजिये (उत) और (यत्र) जहां (अचिध्वम्) प्राप्त हूजिये और जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, प्रवृत्सत) पश्चात् वर्तमान हैं वहां वर्तमान हूजिये और जैसे सूर्य के संबन्ध को (न) (पर्वताः) न मेध (न) न (नद्यः) नदियां (वरन्त) वारण करती हैं वैसे (व:) आप लोगों को कोई भी रोक नहीं सकते हैं ॥७॥ भावार्थ:-जो मनुष्य पृथिवी आदि की विद्या से तथा सृष्टि क्रम से कायों को सिद्ध करें उनको दारिद्र य कभी प्राप्त नहीं होवे ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । यत्पूर्व्य मरुतो यच्च नूतनं यदुद्यते वसवो यच्चं शस्यते । विश्वस्य तस्य भवथा नवेदसः शुभै यातामनु रा अवृत्सत ॥८॥ Mara ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५५ ॥ २२६ - w पदार्थ:-हे (बसवः) वास करने वाले (नवेदसः) नहीं विद्यमान धन जिन के वे (मरुतः) मनुष्यो (यत्) जो (पूर्यम्) प्राचीन विद्वानों से निष्पन्न किया हुआ (यत्) जो (नूतनम् ) नवीन (यत्, च) जो (उद्यते) कहा जाता है (यद, च) और जो (शस्यते) स्तुति किया जाता है (तस्य) उस (विश्वस्य) सम्पूर्ण संसार को वैसे रक्षा करने वाले' (भवथा) हूजिये जैसे (शुभम्) कल्याण को (याताम्) प्राप्त होने हुओं के (रथाः) वाहन (अनु, अवृत्सत) वर्तमान होते हैं ॥८॥ भावार्थ:-जो शिक्षा और विद्या के दण्ड से संसार की रक्षा करते हैं वे ही प्रशंसित होकर कल्याण को प्राप्त होते हैं ।।८।। फिर उसी विषय को कहते हैं । मृळत नो मरुतो मा बंधिष्टनास्मभ्यं शर्म बहुलं वि यन्तन । अधि स्तोत्रस्य सख्यस्यं गातन शुभै यातामनु रा अवृत्सत ।।९।। पदार्थः - है (मरुतः) विद्वानो आप लोग (नः) हम लोगों को (मृळत) सुखी करिये किन्तु (मा) मत (वषिष्टन) नष्ट करिये और (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (बहुलम्) बहुत (शम्म) सुख वा गृह (वि, यन्तन) विशेष करके दीजिये और (अधि, स्तोत्रस्य) अधिक प्रशंसित (सख्यस्य) मित्रपने के (शुभम्) सुख की (गातन) प्रशंसा करिये और जो (याताम्) प्राप्त होते हुओं के (रथा:) वाहन (प्रवृत्सत) वर्तमान हैं उनके (अनु) अनुगामी हूजिये ।।६।। भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से प्रार्थना करके श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करें और सब जगह मित्रता करके सब के लिये सुख प्राप्त कराया जावे ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । यूयमस्मान्नयत वस्यो अच्छा निरंहतिभ्यो मरुतो गृणानाः । जुषवं नो हव्यदाति यजत्रा वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥१०॥ पदार्थ:-हे (गृणानाः) स्तुति करते हुए (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो (यूयम्) आप लोग (वयः) अति धन से युक्त (अस्मान् ) हम लोगों की रक्षा कीजिये और (अंहतिभ्यः) मारते हैं जिन से उन अस्त्रों से पृथक् (अच्छा) उत्तम प्रकार (निः नयत निरन्तर पहुंचाइये और (नः) हम लोगों की जुषध्वम्) सेवा करिये । और हे (यजत्राः) मिलने वाले जनो हम लोगों के लिये (हव्यदातिम्) देने योग्य दान को प्राप्त कराइये जिस से (वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनों के (पतयः) पालन करने वाले (स्थाम) होवें ॥१०॥ ।

२३० ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५६ ॥ भावार्थ:-जिज्ञासुजन विद्वानों की प्रार्थना इस प्रकार करें कि आप लोग हम लोगों को दुष्ट आचरण से अलग करके धर्मयुक्त मार्ग को प्राप्त कराइये ॥१०॥ इस सूक्त में मरुत नाम से विद्वान् आदि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पंचम मण्डल में पचपनवां सूक्त समाप्त हुमा ।। । अथ नवर्चस्य षट्पञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व प्रात्रेय ऋषिः । मरुतो देवताः।१।२।५ निचबृहती। ४ विराड्बृहती।८।६ बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः। ३ विराट्पङ्क्तिः । ६ । ७ निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥ अब नौ ऋचा वाले छप्पनवे सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों के उपदेश से मनुष्य और वायु के गुणों को जानकर फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । अग्ने शर्धन्तमा गणं पिष्टं रुक्मेभिरञ्जिमिः । विौं अद्य मरुतामवं ह्वये दिवशचंद्रोचनादधि ॥१॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् जैसे मैं (रुक्मभिः) प्रकाशमान सुवर्ण आदि वा (अञ्जिभिः) सुन्दर पदार्थों से (मरुताम्) मनुष्यों के (पिष्टम्) अवयवीभूत (शर्धन्तम्) बलवान् (गणम्) समूह को (आ) सब ओर से (ह्वये) पुकारता हूं और (अद्य) आज (दिवः) प्रकाशमान (रोचनात्) प्रीति के विषय से (चित्) भी (विशः) मनुष्यों को (अधि) ऊपर के भाव में (अव) अत्यन्त पुकारता हूं वैसे आप भी shee करिये ॥१॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु० -- जो मनुष्य वायु और मनुष्यों के गुणों को जानते हैं वे सत्कार करने वाले होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ययां चिन्मन्यसे हृदा तदिन्में जग्मुराशसः । ये ते नेदिष्ठं हवनान्यागमन्तान्वर्ध भीमसन्दृशः ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्य (ये) जो (ते) आप के लिये (नेदिष्ठम्) अत्यन्त सामीप्य को (प्राशसः) कहने वाले (जग्मुः) प्राप्त होते हैं (तान्) उनकी प्राप (वर्ध) वृद्धि sapana me - AN राहता) प्राप्त होने वाला ( ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५६ ।। करिये और यथा, चित्) जिस प्रकार से आप (हवा) हृदय से (मे) मेरे लिये (तत्) उसको (मन्यसे) मानते हो उस प्रकार से (हवनानि देने लेने योग्य वस्तुयें (प्रागमन्) प्राप्त होवें और (भीमसन्दृशः) भयंकर दर्शन जिनका वे (इत्) ही प्राप्त होते हैं ।।२।। भावार्थः इस मन्त्र में उपमालं -मनुष्य लोग परस्पर के उपकार से सुखी हों ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। मीळ्हुष्मतीव पृथिवी पराहता मदन्त्येत्यस्मदा । अक्षो न वो मरुतः शिमीवाँ अमो दुध्रो गौरिव भीमयुः ॥३॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो जैसे (व:) आप लोगों को (पृथिवी) भूमि (मीळहष्मतीव) वीर्य का देनेवाला सुन्दर स्वामी जिस का उसके समान (अस्मत) (शिमीवान्) अच्छे कर्मों वाला (ऋक्षः) पशु विशेष के (न) समान (श्रा, एति) प्राप्त होता है तथा (गौरिव) सूर्य के सदृश (भीमयुः) भयंकर युद्ध करने वाले को होता है वैसे आप लोग भी आचरण करो ॥३॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं.-जो प्रयत्न करते हुए कर्मों को करते हैं वे सदा सुखी होते हैं ।।३।। फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नि ये रिणत्योजसा वृथा गावो न दुर्धरः। अश्मानं चित्स्वयं १' पर्वत गिरि प्र च्यावयन्ति यामभिः ॥४॥ पदार्थः- (ये) जो मनुष्य (प्रोजसा) पराक्रम से (नि, रिणन्ति) प्राप्त होते हैं (चित्) और जो (यामभिः) प्रहरों से (स्वर्यम्) शब्दों में श्रेष्ठ (पर्वत) पर्वत के सदृश ऊंचे (गिरिम्) शब्द कराने वाले (अश्मानम्) मेघ को (दुधुरः) दूरगत हैं धुरा जिनकी उनके (न) समान (प्र, च्यावयन्ति) गिराते हैं और (वृथा) व्यर्थ निज अर्थ के विना (गाव:) गौत्रों के सदृश होते हैं वे सब से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य के किरणें मेघ को नीचे गिराते हैं वैसे विद्वान् लोग दोषों को दूर करते हैं ॥४॥ . . ''. Hea SRO

२३२
ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५६ ॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
उत्तिष्ठ नूनमेषां स्तोमैः समुक्षितानाम् ।
मरुतां पुरुतममपूयं गवां सर्गमिव ह्वये ॥६॥
पदार्थ:-हे विद्वन् जैसे मैं (गवाम्) गौओं के (सर्गमिव) जल' के सदृश
(पुरुतमम्) अत्यन्त बहुत (अपूर्व्यम्) अपूर्व में हुए को (ह्वये) पुकारता हूं वैसे
(एषाम्) इन (समुक्षितानाम्) उत्तम प्रकार से सींचने वाले (मरुताम्) मनुष्यों की
(स्ताम:) प्रशंसाओं से (नूनम् ) निश्चय से (उत्तिष्ठ) ऊपर पहुंचिए ॥५॥
भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिए कि सृष्टि के क्रम को जानकर
सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त हों॥५॥
अब अग्निविद्या के उपदेश को कहते हैं ।
युग्ध्वं हारुषी रथे युध्वं रथेषु रोहितः
युग्ध्वं हरी अजिरा धुरि वोहळवे वहिष्ठा धुरि वोहळेवे ॥६॥
पदार्थ:-हे विद्वान् कारीगरो पापलोग (रथे) वाहन में (अरुषोः) रक्त-
गुणों से विशिष्ट घोड़ियों के सदृश ज्वालाओं को (युध्वम्) युक्त कीजिये (रथेषु)
रथों में (रोहितः) लाल गुणवाले पदार्थों को (युग्ध्वम्) युक्त कीजिये और (धुरि)
अग्नभाग में (वोह ळवे) प्राप्त करने के लिये (अजिरा) जाने वाले (हरी) धारण और
आकर्षण को तथा (धुरि) अग्रभाग में (वोह ळवे) स्थानान्तर में प्राप्त होने के लिये
(बहिष्ठा) अत्यन्त पहुंचाने वाले (हि) निश्चय अग्नि और पवन' को (युग्ध्वम्)
युक्त कीजिये ॥६॥
भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि अग्नि आदि पदार्थों को वाहन
आदि के चलाने के लिये निरन्तर युक्त करें ।।६।।
फिर उसी विषय को कहते हैं।
उत स्य वाज्यरुषस्तुविष्वणिरिह म धायि दर्थतः ।
मा वो यामेषु मस्तश्चिरं करस्य तं रथेषु चोदत ॥७॥
पदार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो जो (बाजी) बेगवान् (इह) इस में (अरुषः)
मर्मस्थल के (तुविष्वणिः) बल का सेवी (दर्शतः) देखने योग्य (धायि) धारण किया
जाता है (स्यः) वह (यामेषु) यम आदि से युक्त उत्तम व्यवहारों वा प्रहरों में व:)
आपलोगों को (चिरम्) बहुत कालपर्यन्त (मा) मत (स्म) ही (करत) करे अर्थात्
न निषेध करे (तम्, उत) उसी को (रथेषु) रथों में (प्र, चोदत) प्रेरित करो ॥७॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५६ ॥ भावार्थ:- जो अग्निविद्या को धारण करते हैं उनका सब समय में सत्कार करो ॥७॥ OM फिर वायुगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं । रथं तु मारुतं वयं श्रवस्युमा हुवामहे । आ यस्मिन्तस्यौ सुरणानि विभ्रती सर्चा मरुत्सु रोदसी ॥८॥ पदार्थ:-(यस्मिन्) जिस में (सुरणानि) सुन्दर रमण करने योग्य पदार्थ हैं और वीर (प्रा) सब प्रकार से (तस्थौ) स्थिर है तथा जिस में (मरुत्सु) पवनों में सुन्दर पदार्थों को (बिभ्रती) धारण करते हुए (सचा) सम्बन्ध रखने वाले (रोदसी) पृथिवी और सूर्य वर्तमान हैं उस (मारतम्) मनुष्य और वायु सम्बन्धी (श्रवस्युम्) अपनी श्रवण की इच्छा करने वाले की और (रथम्) विमान आदि वाहन की (न) शीघ्र (वयम्) हम लोग (प्रा, हुवामहे) स्पर्धा करें ॥८॥ भावार्थ:-जैसे पवन भूमि आदि को धारण करते हैं वैसे ही विद्वान् जन सब मनुष्यों को धारण करें ॥८॥ फिर विद्वानों के उपदेश विषय को कहते हैं। तं वः शधै रथेशुभं त्वेषं पनस्युमा हुवे । यस्मिन्सुजाता सुभगो महीयते सचा परुन्सु मीळ्हुषी ॥९॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यस्मिन्) जिस कुल में (सुजाता) उत्तम प्रकार प्रसिद्ध (सुभगा) सौभाग्य से युक्त (सचा) सम्बद्ध (मीळ हुषी) सेचन करने वाली (मरुत्स) मनुष्यों में (महीयते) सत्कार किई जाती और जिस को सेचन करने वाली प्राप्त होती है (तम्) उस (पनस्युम्) अपनी स्तुति की इच्छा करते हुए को (मा, हुवे) बुलाता हूँ उसको (वः) आप लोगों के (रथेशुभम्) रथ के द्वारा कहते हुए (त्वेषम्) प्रकाशमान (शर्धम् ) बलयुक्त को पुकारता हूं ॥९॥ भावार्थः जिस कुल में किया ब्रह्मचर्य जिन्होंने ऐसे स्त्री और पुरुष वर्तमान हैं उसी कुल को भाग्यशाली जानना चाहिये ।।६।। इस सूक्त में विद्वान् तथा वायु के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में छप्पनवा सूक्त समाप्त हुप्रा ।। SU । . प्रादि पदार्थ जिन के वा जो (स्वश्वाः) उत्तम घोड़ों स. ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५७ ।। अथाष्टर्चस्य सप्तपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व प्रात्रेय ऋषिः । मरुतो देवताः।१।४।५ जगती ।२।६ विराजगती । ३ निचुज्जगतीछन्दः । निषादः स्वरः । ७ विराट् त्रिष्टुप् । ८ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः ॥ अब आठ ऋचावाले सत्तावनवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में रुद्रगुणों को कहते हैं.॥ श्रा रुद्रास इन्द्रवन्तः सजोषलो हिरण्यरथाः सुविताय गन्तन । इयं वो अस्मत्पति हर्यते मतिस्तृष्णजे न दिव उत्सां उदन्यवें ॥१॥ पदार्थ:- हे मनुष्यो जैसे (हिरण्यरथाः) सुवर्ण रथों में जिन के अथवा तेज के सदृश रथ जिन के वे (सजोषसः) समान प्रीति सेवने और (इन्द्रवन्तः) बहुत ऐश्वर्य रखने और (रुद्रासः) दुष्टों को रुलाने वाले (सुविताय) ऐश्वर्या के लिए (आ) सब ओर (गन्तन) प्राप्त होवें और जो (इयम्) यह (अस्मत) हम लोगों के समीप से (मति:) बुद्धि है वह (व:) आप लोगों की (प्रति, हर्यते) कामना करती है और (तृष्णजे) तृष्णायुक्त (उदन्यवे) जल' की इच्छा करने वाले के लिये (उत्सा:) कूप (न) जैसे वैसे जो (दिवः) कामनाओं की कामना करते हैं वे हम लोगों से निरन्तर सत्कार करने योग्य हैं ॥१॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे पिपासा से -जैसे पिपासा से व्याकुल के लिए जल शान्तिकारक होता है वैसे विद्वान् जन जानने की इच्छा करनेवालों के लिये शान्ति के देनेवाले होते हैं ॥१॥ अब मरुद् गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं । वाशीमन्त ऋष्टिभन्ती मनीषिणः सुधन्वान इघुमन्तो निषङ्गिणः । खश्वाः स्थ सुराः पृश्निमातरः स्वायुधा मरुतो याथना शुभंम् ।।२।। पदार्थः-हे (पृश्निमातरः) अन्तरिक्ष माता के सदृश जिन का ऐसे (मरतः) उत्तम प्रकार शिक्षित जनो आपलोग (वाशीमन्तः) उत्तम वाणी जिन की वा जो (ऋष्टिमन्तः) ज्ञानवाले मनीषिणः) वा मन की इच्छा करनेवाले (सुधन्वान:) सुन्दर धनुष् जिनका (इषुमन्तः) वा वाणोंवाले और (निषङ्गिणः) अच्छे तरवार आयुधों वाले वा (सुरथाः) सुन्दर रथ जिन के ऐसे (स्थ) होश्रो और (शुभम्) कल्याणकारक व्यवहार वा संग्राम को (याथना) प्राप्त होओ ॥२॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिए कि विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों को ग्रहण करके सदा ही विजय से युक्त हों ॥२॥ । New

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५७ ।।
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फिर उसी विषय को कहते हैं ।
धुनुथ या पर्वतान्दाशुषे वसु नि वो वना जिहते थामनो भिया ।
कोश्यथ पृथिवीं पृश्निमातरः शुभे यदुग्राः पूर्वतीरयुग्ध्वम् ।।३।।
पदार्थः हे (उग्राः) तेजस्वियो (पृश्निमातरः) जिन की माता के सदृश
अन्तरिक्ष उन पवनों के सदृश वेग से युक्त (यत) जो आप लोग (धाम्) विजुली
और (पर्वतान्) मेघों को (धूनुथ) कंपाइये वह (दाशुषे) दाताजन के लिये (वसु)
द्रव्य को कंपित कीजिये जो (व:) आप लोगों को (वना) जङ्गल (जिहते) प्राप्त
होते हैं उन को (यामनः) जानेवाले आप लोग (भिया) भय से (नि, कोपयथ)
निरन्तर कंपाइये और जैसे पवन (पृथिवीम्) पृथिवी को युक्त होते हैं वैसे (शुभे)
जल' के लिये (पृषतीः) सेचन करने वाली जल' की धाराओं को (अयुग्ध्यम्) युक्त
कीजिये ॥३॥
भावार्थः -इस मन्त्र में वाचकलु. -जैसे पवन पृथिवी, मेघ और
वन आदिकों को कंपाते हैं और जैसे शत्रुजन शत्रुओं को ऋद्ध करते हैं वैसे
ही विद्वान् जन पदार्थों को मथकर विजुली आदि को कंपाते हैं और कार्यों
में
युक्त
करते हैं ॥३॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
वातत्विषो मरुतों वर्षनिर्णिजो यहाइव मुसदृशः सुपेशंसा ।
पिशङ्गाश्वा अरुणाश्वा अरेपसः पर सो महिना द्यौरिवोरवः ॥४॥
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पदार्थः -- हे विद्वान् जनो जो (यमाइब) न्यायाधीशों के सदृश वातत्विषः)
वायु की कान्ति के समान कान्ति जिन की ऐसे (वर्षनिर्णिजः) वर्ष का निर्णय करने
वाले (सुसदृशः) उत्तम प्रकार तुल्य गुरण कर्म और स्वभाव युक्त (सुपेशसः) उत्तम
तुल्य रूप वा सुवर्ण जिनका वे (पिशङ्गाश्वाः) सब ओर से पीले वर्ण के घोड़ों वाले
(भरेपसः) अपराध से रहित (अरुणाश्चा:) रक्त वर्ण के घोड़ों वाले (प्रत्यक्षस:)
अत्यन्त सूक्ष्मकरने वाले (महिना) महिमा से (द्योरिव) सूर्य के सदृश (उरबः) बहुत
(मरुतः) मनुष्य होवें उनका सत्कार करो ॥४॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य सूर्य के सदृश आत्मा
से प्रकाशित और न्यायाधीशों के सदश व्यवहार करनेवाले विमान आदि
वाहन से युक्त हैं उनका निरन्तर सत्कार करो ॥४॥

२३६ ऋग्वेदः मं०५ । सू० ५७ ।। - फिर उसी विषय को कहते हैं ।। पुरुद्रप्सा अजिमन्तः सुदानवस्त्वेषसंन्डी अनवभ्ररांधसः । सुजातासो जनुषा रुक्मवक्षसो दिवो अर्का अमृतं नाम भेजिरे ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (पुरुद्रप्सा:) बहुत मोहवाले (अजिमन्तः) अच्छी कामना विद्यमान जिन की ऐसे वा (सुदानवः) उत्तम दानों के करने और (स्वेषसन्दृशः) प्रकाशित रूप को देखनेवाले (अनवभ्रराधसः) नहीं विद्यमान धन का नाश जिन के ऐसे और (जनुषा) जन्म से (सुजातासः) उत्तम प्रकार धर्मयुक्त व्यवहार से प्रसिद्ध (रुक्मवक्षसः) सुवर्णं आदि से जड़े हुए प्राभूषण वक्षः स्थलों में जिन के वे (दिवः) कामना करनेवाले (अर्काः) सत्कार करने योग्य जन (अमृतम्) नाश रहित (नाम) नाम का (भेजिरे) सेवन करें उन का सब प्रकार सत्कार करिये ॥४॥ भावार्थ:--जो जन उत्तम गुण कर्म और स्वभाव को सब प्रकार ग्रहण करते हैं वे सब प्रकार से सुखी होते हैं ॥५॥ फिर मरुद्विषय में यान चलाने के फल को कहते हैं । अष्टयों वो मरुतो अंसयोरधि सह ओजो बाहो? बल हितम् । नृम्णा शीर्षस्वायुधा रथेषु वो विश्वा वः श्रीरधि तनूर्षु पिपिशे ॥६॥ पदार्थ:-हे (ऋष्टयः) ज्ञानवान् (मरुतः) मनुष्यो (ध:) आप लोगों के (अंसयोः) भुजारूप दण्डों के मूलों में जो (सहः) सहन और (प्रोजः) पराक्रम तथा (वाह्वोः) बाहुसंबन्धी (वः) आप लोगों का (बलम्) बल (हितम्) स्थित (शीर्षसु) मस्तकों (अधि) पर (नम्णा) और मनुष्य रमते हैं जिन में ऐसे (मायुधा) शस्त्र और अस्त्र (रथेष) संग्रामार्थ वाहनों में वा (वः) आप लोगों के (विश्वा) सम्पूर्ण (श्री:) धन वा शोभा (अधि, पिपिशे) अधिक प्राश्रय की जाती और (वः) आप लोगों के (तनूषु) शरीरों में धन वा शोभा अधिक प्राश्रयण की जाती उन का नाप लोग संग्रहण कीजिए ॥६॥ भावार्थः-जो मनुष्य शरीर और आत्मा से बलिष्ठ और प्रायुधों की विद्या में निपुण होकर उत्तम वाहन आदि सामग्रियों से युक्त हुए पुरुषार्थ करते हैं वे धनवान् होते हैं ॥६॥ फिर मरुद्विषय को कहते हैं । गोमदश्वविद्रयंवत्मवीर चन्द्रवद्राघों महतो ददा नः । प्रशस्ति नः कृणुत रुद्रियासो भक्षीय वोऽव॑सो दैव्यस्य ॥७॥ - m ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५८ ।। पदार्थः-हे (रुद्रियास:) साधन करने वालों में हुए (मरुतः) मनुष्यो प्राप लोग (नः) हम लोगों के लिये (गोमत) बहुत गौवें विद्यमान जिसमें वा (अश्वावत) बहुत घोड़ों से युक्त (रथवत्) वा प्रशंसित वाहनों के सहित (चन्द्रवत) वा सुवर्ण आदि से युक्त वा आनन्द प्रादि के देने वाले (सुवीरम्) उत्तम वीर निमित्तक (राधः) धन को (ददा) दीजिये और (देव्यस्य) विद्वानों से किये गए (अवसः) रक्षण' आदि के संबन्ध में (न:) हम लोगों की (प्रशस्तिम्) प्रशंसा को (कृणुत) करिये जिस से (व:) आप लोगों के समीप से एक एक' मैं सुख का (भक्षीय) सेवन करू ॥७॥ भावार्थ:--जब मनुष्य सत्पुरुषों का सङ्ग करें तब इस लोक में सम्पूर्ण ऐश्वर्या और परलोक में धर्म के अनुष्ठान करने की याचना करें॥७॥ फिर मरुद् विषयक विद्वानों के गुणों को कहते हैं । हये नरो मरुतो मुळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः । सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहद् गिरयो बृहदुक्षमाणाः ॥८॥ पदार्थ: -(हये) हे (नरः) नायक (मरुतः) मरणशील जनो (तुवीमघास:) बहुतों धनों से युक्त (अमृताः) अपने स्वरूप से मृत्यु रहित (ऋतज्ञाः) यथार्थ को जानने वाले (सत्यश्रु त:) सत्य को सुने हुए वा सत्य को सुनने वाले (युवानः) युवावस्था को प्राप्त (बृहगिरयः) बहुत प्रशंसा वाले (बहत, उक्षमाणाः) बहुत सेवन किये और (कवयः) विद्वान् होते हुए आप लोग (नः) हम लोगों को (मृळता) सुखी करो ॥६॥ भावार्थ:-जो मनुष्य यथार्थ वक्ता विद्वानों का सेवन करते हैं वे सत्य विद्या को प्राप्त होकर सदा ही प्रसन्न होते हैं ।।८।। इस सूक्त में रुद्र और वायु के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में सत्तावनवां सूक्त समाप्त हुआ। पास म अथाष्टर्चस्याष्टपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व मात्रेय ऋषिः । मरुतो देवता । १।३।४।६। ८ निवृत्रिष्टुप् । २ । ५ त्रिष्टुप् छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ७ भुरिक पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥

JAMES मा - स्वरूप संसार के गुण कर्म और २३८ ऋग्वेदः में० ५। सू० ५८ ॥ अब पाठ ऋचा वाले अट्ठावनवे सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में वायु गुणों को कहते हैं । तमु नूनं तविधीमन्तमेषां स्तुपे गणं मारतं नयसीनाम् । य आश्वश्वा असंवदइन्त उतेशिरे अमृतस्य स्वराजः ॥१॥ पदार्थः--(अमृतस्य) नाश से रहित कारण (स्वराजः) जो कि आप प्रकाश- वान् उसके संबन्ध में (प्राश्वश्वा:) शीघ्र चलने वाले अग्नि आदि अश्व जिनके वे (ये) जो (अमवत्) गृहों को जैसे प्राप्त हों वैसे (वहन्ते) प्राप्त होते हैं (उत्त) और (नव्यसीमाम्) अत्यन्त नवीन प्रजानों के (मारुतम्) पवन' सम्बन्धी (गणम्) समूह की (स्तुषे) स्तुति करने के लिये (ईशिरे) ऐश्वर्या को प्राप्त होते हैं (एषाम्) इन वीरों के (उ) तर्क के साथ (तविषीमन्तम्) अच्छी सेना जिसकी (तम्,) उसी को (नूनम्) निश्चय प्राप्त होते हैं वे विजयी होते हैं ॥१॥ स्वभावों को जानते हैं वे गृह के सदृश सब को सुखी कर सकते हैं ॥१॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। त्वेषं गणं तवसं खादिहस्तं धुनिव्रतं मायिनं दातिवारम् । मयोभुवो ये अमिता महित्वा वन्द विप्र तुविराधसो पदार्थ:-हे (विप्र) बुद्धिमान् श्राप (त्वेषम्) प्रकाशित (तवसम्) बलवान् खादिहस्तम्) खाद्य हाथों में जिस के (धुनिव्रतम्) कंपन के सदृश स्वभाव जिसका वा (मायिनम्) उत्तम बुद्धि जिसकी उस (दातिवारम्) दान के स्वीकार करने बाले वीरों के (गणम्) गगन करने योग्य' की (वन्दस्व) बन्दना करिये और (ये) जो (महित्वा) महत्व को प्राप्त होकर (अमिताः) अतुल शुभ गुण वाले (मयोभुवः) सुख को कराने वाले हों उन (तुविराधसः) बहुत धन वाले (नन्) मनुष्यों की वन्दना कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-- मनुष्यों को चाहिये कि योग्य धार्मिक विद्वानों का सत्कार करें जिस से सुख बढ़े ॥२॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । आ वो यन्तूदवाहासौ अद्य वृष्टिं ये विश्वे मरुतो जुनन्ति । अयं यो अग्निमरुतः समिद्ध एतं जुषध्वं कवयो युवानः ॥३। FATim नृन् ॥२॥ ANmalene

HDabhHADAssis
ऋग्वेदः मं० ५। सू०५८ ॥
२३६
-
पदार्थ:-हे (कवयः) बुद्धिमान् (युवानः) युवावस्था को प्राप्त हुए (मरुतः)
मनुष्यो (ये) जो (विश्वे) सम्पूर्ण (उदवाहासः) जल को जो धारण करते हैं उन
के सदृश (मरुतः) पवन (वृष्टिम्) वृष्टि की (जुनन्ति) प्रेरणा करते हैं वे (अद्य)
इस समय (वः) आप लोगों को (आ, यन्तु) प्राप्त हों और (य:) जो (अयम्
यह (समिद्धः) प्रदीप्त (अग्निः) अग्नि है (एतम्) इस को आप लोग (जुषध्वम्)
सेवन करो ॥३॥
भावार्थ:- जो वृष्टि करने वाले वायु और अग्नि आदि को विशेष
करके जानते हैं वे इन को वृष्टि करने के लिये प्रेरणा करने को समर्थ
होते हैं ॥३॥
फिर मरुद् के गुणों को अगले मंत्र में कहते हैं ।
यूयं राजानमिय जाय विभ्वतष्टं जनयथा यजत्राः ।
युष्मदेति मुष्टिहा बाहुजूतो युष्मत्सदश्वो मरुतः सुवीरः ॥४॥
पदार्थः --- हे (यजत्राः) मिलने वाले (मरुतः) उत्तम प्रकार शिक्षित मनुष्यो
जो युष्मत्) आप लोगों के समीप (मुष्टिहा) मुष्टि से मारने वाला (बाहुजूतः)
बाहुओं से बलवान् वा (युष्मत्) आप लोगों के समीप (सवश्व:) अच्छे घोड़े जिस के
ऐसा (सुवारः) सुन्दर वीरजन (एति) प्राप्त होता है उस को (जनाय) मनुष्य के
लिये (इर्यम्) प्रेरणा करने वाले (विभ्वतष्टम्) बुद्धिमानों के मध्य में तीव्र बुद्धि वाले
(राजानम्) न्याय और विनय से प्रकाशमान राजा को (यूयम्) आप (जनयथा)
प्रकट कीजिये॥४॥
भावार्थ:- मनुष्य सम्पूर्ण उपायों से धर्मयुक्त गुण कर्म और स्वभाव
वाले राजा और उसी प्रकार के सहायों को उत्पन्न करें॥४॥
अब विद्वानों के उपदेश गुणों को कहते हैं ।
अरा इवेद चरमा अहेव प्रन जायन्ते अकवा महोभिः ।
प्रश्नः पुत्रा उपमासो रभिष्ठाः स्वयो मत्या मरुतः सं मिमिक्षुः ॥५॥
पदार्थः-हे विद्वानो जो (मरुतः) पवन (अराइव) चक्रों के अवयवों के
सदृश (अचरमा:) नहीं अन्त्यावयव' जिनके वे (अहेव) दिनों के सदृश (अकवाः)
नहीं शब्द करते हुए (पृश्ने:) अन्तरिक्ष के (पुत्राः) पुत्र (महोभिः इत्) बड़ों के ही
साथ (प्रप्र, जायन्ते) अत्यन्त उत्पन्न होते और (सम्, मिमिक्षुः) अच्छे प्रकार
सिञ्चन करते हैं वैसे (उपमास:) प्रत्येक के तुल्य (रभिष्ठाः) अत्यन्त प्रारम्भ करने
वाले आप लोग (स्वया) अपनी (मत्या) बुद्धि से अत्यन्त उत्पन्न होनो ॥५॥

. HLA NDA AMA SION ! २४० ऋग्वेदः म० ५। सू०५८ ।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं -जैसे वाहन के चक्रों के अंग और दिन क्रम से वर्तमान हैं और जैसे पवन जा, पाकर वर्षाते हैं वैसे ही मनुष्यों को चाहिये कि क्रम से वर्ताव करके बुद्धि से सुख की दृष्टि सब के सुख के लिये करें॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । यत् प्रायोसिष्ट पृषतीभिरश्वैर्वीलुपविभिमरुतोरथभिः । मोदन्त आपो रिणते बनान्धवोत्रियो पृषमः क्रन्दतु यौः ॥६।। पदार्थ:-हे (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो आप लोग (पृषतीभिः) वेग आदिकों और (अश्वः) शीघ्र चलने वाले (रथेभिः) विमान आदि वाहनों से (यत्) जो (वीळ पविभिः) दृढ़ चक्रों से (क्षोदन्ते) वृष्टि करते हैं और जैसे (आपः) जल (बनानि) किरणों को (रिणते) प्राप्त होते हैं वैसे ही (उलिय:) किरणों में उत्पन्न (वृषभः) वर्षाने वाला मेघ (धौः) कामना करता हुआ किरणों का (अव, क्रन्दत) अाह्वान करे और इष्ट को (प्र, अयासिष्ट) अत्यन्त प्राप्त हो ॥६।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जो आप लोग वायु के सदृश शीघ्र गमन और जल के सदृश तृप्ति करने रूप कार्य को करें तो संपूर्ण सुखों को प्राप्त हों ॥६॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । प्रथिष्ट यामन्पृथिवी चिदेषां भत्र्सव गर्ने स्वमिच्छवो धुः । वातान्यश्वान्धुयाँयुयुत्रे वर्ष स्वेदै चक्रिरे रुद्रियासः ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (एषाम्) इन के मध्य में (पृथिवी) भूमि (यामन्) प्रहर में (गर्भम्) गर्भ को (भर्तेव) स्वामी के सदृश (प्रथिष्ट) प्रकट करती है वैसे आप लोग (स्वम्) सुख और (शवः) गमन को (इत्) ही (धुरि) वाहन के मध्य में (धुः) धारण करते और (प्रश्वान्) शीघ्र चलने वाले (वातान्) पवनों को (प्रायु- युन) सब ओर से युक्त करते और (चित्) भी (रुद्रियासः) दुष्टों के रुलाने वालों में चतुर हुए (स्वेदम्) पसीने के सदृश (हि) निश्चय (वर्षम्) वृष्टि को (चक्रिरे) करते हैं ॥७॥ भावार्थ:-इस मंत्र में उपमालं०-जो मनुष्य पृथिवी के सदृश क्षमाशील और विस्तीर्ण विद्यावाले वाहनों में पवनरूप घोड़ों को संयुक्त करके और वृष्टि के कारणों का निर्माण करके कार्यों को सिद्ध करते हैं वे सम्पूर्ण सुख कर सकते हैं ॥७॥ SHAN R ऋग्वेदः मं० ५। सू० ५६ ।। SAND Nond फिर उसी विषय को कहते हैं । हये नरो मरुतो मुळता नस्तु जयासो अमृता ऋतज्ञाः । सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहगिरयो बृहदुक्षमाणाः ॥८॥ पदार्थ:---- (हये) हे (नरः) नायक (मलतः) जनो (तुवीमघास:) बहुत धनवान् (अमृताः) मोक्ष को प्राप्त हुए (सत्यश्रतः) सत्य को यथार्थ सुनने और (ऋतज्ञाः) परमात्मा वा प्रकृति को जानने वाले (शुमान:) प्राप्त हुई अपने शरीर की यौवन अवस्था जिन को बृहगिरयः) जिन के बड़े मेवों के सदृश उपकार करने वाले गुण वे (बृहत्) महत् ब्रह्म का (अक्षमाणाः) सेवन करते हुए (कवयः) पूर्ण- विद्या वाले श्राप लोग न:) हम लोगों को (मूळता) सुखी करिये ॥८॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सम्पूर्ण सत्य विद्याओं को प्राप्त होकर यथार्थ- वक्ता, परमात्मा और उस की आज्ञा का सेवन करते हुए महाशय पूर्ण शरीर और असत्मा के बल से युक्त अध्यापन और उपदेश से हम लोगों की वृद्धि करते हैं वे ही सर्वदा हम लोगों से सत्कार करने योग्य हैं ।।८।। इस सूक्त में विद्वान् तथा वायु के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये यह पञ्चम मण्डल में अट्ठावनचा सूक्त समाप्त हुआ। ANTERTAINAYAKAIRANTHEME- अथाष्टर्चस्यैकोनषष्टितमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व प्रात्रेय ऋषिः । महतो देवताः।१।४ विराजगती । २।३ । ६ निचूज्जगती छन्दः । ५ जगती छन्दः । निषादः स्वरः । ७ स्वरात्रिष्टुप् । ८ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ।। अब आठ ऋचा वाले उनसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में विद्वद्गुणों को कहते हैं । प्र वः स्पळक्रन्सुषिताय दावनेऽ! दिवे भ पृथिव्या ऋतम्भरे । उक्षन्ते अश्वान्तरुषन्त आ रजोऽनु स्वं भानु अथयन्ते अर्णवैः ॥१॥ पदार्थ:--हे विद्वानो जो (सुविताय) ऐश्वर्य से युक्त और (दावने) देनेवाले के लिए (दिवे) कामना करते हुए के लिए: (पृथिव्यै) अन्तरिक्ष वा भूमि के लिए तथा (व:) आप लोगों के लिए (भरे) धारण करते हैं जिस में उस व्यवहार में (ऋतम्) सत्य को (प्र, अन्) अच्छे प्रकार करते हैं और (अश्वान्) वेग से युक्त अग्नि आदि को (उक्षन्ते) सेवते हैं तथा (तरुषन्ते) शीघ्र प्लवित होते हैं तथा (रजः) JAND Awae २४२ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५६ ।। ANIN maa लोक के (अनु) पश्चात् (स्वम्) अपनी (भानुम्) कान्ति को (अर्णवैः) समुद्रों वा नदियों से (प्र, श्रा, श्रथयन्ते) सब प्रकार शिथिल करते हैं उन का आप लोग सत्कार करिये और हे राजन् (स्पट्) स्पर्श करनेवाले आप इनका निरन्तर (अचा) सत्कार कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो मनुष्य शिल्पविद्या से विमानादि को रच के अन्तरिक्षादि मार्गों में जा आकर सब के सुख के लिए ऐश्वर्य का प्राश्रयण करते हैं वे संसार के विभूषक होते हैं ॥१॥ अब वायुगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं । अमादेषां भियसा भूमिरेजति नौर्न पूर्णा क्षरति व्यर्थिर्यती । दूरेदृशो ये चितयन्त एमभिरन्तर्महे विदथे येतिरे नरः ।।२।। पदार्थ:-हे (नरः) नायक मनुष्यो जो (भूमिः) पृथिवी (पूर्णा) पूर्ण (नौः) बड़ी नौका के (न) सदृश (भियसा) भय से (व्यथि:) पीड़ित होने वाली (यती) जाती हुई स्त्री के तुल्य (एजति) कांपती है और (एषाम्) इन वायु और अग्नि आदि के (प्रमात) गृह से (क्षरति) वर्षाती है उसको (ये) जो (एमभिः) प्राप्त कराने वाले गुणों से इसके (अन्तः) मध्य में (दूरदृशः) जो दूर देखे जाते वा दूर देखनेवाले (महे) बड़े के लिए (चितयन्ते) उत्तमता से समझाते हैं और (विदथे) संग्राम वा विज्ञान युक्त व्यवहार में (येतिरे) प्रयत्न करते हैं वे ही सब को सुखी करने के योग्य होते हैं ॥२॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं.-जैसे शूरवीर जनों के समीप से डरने वाले जन भागते हैं वैसे ही वायु और सूर्य से भूमि कांपती और चलती है और जैसे पदार्थों से पूर्ण नौका अग्नि आदि के योग से के पार को शीघ्र जाती है वैसे विद्या के पार मनुष्य जावें और जैसे वीर संग्राम में प्रयत्न करते हैं वैसे ही अन्य मनुष्यों को प्रयत्न करना चाहिये ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । गामिव श्रिय से शृङ्गमुत्तमं सूर्यो न चल रजसो विसर्जने । अत्याइव सुभ्व१श्चारका स्थन मयाँइव श्रियसे चेतथा नरः ॥३॥ पदार्थ:-हे (सुन्वः) उत्तम प्रकार होनेवाले (चारवः) सुन्दर स्वभाव युक्त वा जानेवाले (नरः) नायक मनुष्यो (शृङ्गम्) ऊपर के (उत्तमम्) उत्तम भाग को घोड़े आप लोग (प्रषासः) रक्त प्रादि गुणों से विशिष्ट (प्रश्वाइव, इत) घोड़ों के सदृश ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ५६॥ २४३ (सूर्य:) सूर्य के (न) सदृश (गवाभिव) किरणों के सदृश (श्रियसे) सेवने को (रजसः) लोक के (विसर्जने) त्याग में (चक्षः) प्रकाश करने वाले के सदृश प्रापलोग (स्थन) हूजिये और (अत्याइव) घोड़े के सदृश (माइस) वा विद्वानों के सदृश प्राश्रयरण करने को प्रापलोग (चैतथा) उत्तम प्रकार जानिये वा जनाइये ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य किरणों, सूर्य, और मनुष्यों के सदृश प्रकाश, दान, वेग और विवेक को सेवते हैं वे ही उत्तम सुख को प्राप्त होते हैं ।।३।। फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । को वो महान्ति महतामुदश्नवत्कस्काव्यां मरुतः को ह पौंस्यां । यूयं ह भूमि किरणं न रेजथ प्र यद्भध्ये सुविताय दावन ।।४।। पदार्थ:-हे (मरुतः) विचार करने वाले जनो (महताम्) बड़े (4:) श्राप लोगों के वा आप लोगों को (महान्ति) बड़े विज्ञान आदिकों को (कः) कौन (उद, प्रश्नवत) उत्तमता से प्राप्त होता है (क:) कौन (काव्या) बुद्धिमानों के कामों को उत्तमता से प्राप्त होता है (क:) कौन (ह) निश्चय से (पौंस्या) पुरुषों के इन बलों को प्राप्त होता है जिस से (यूयम्) आप लोग (भूमिम्) पृथिवी को (किरणम्) दीप्ति के (5) समान (रेजथ) कंपावें और (यत्) जिस को (ह) निश्चय (सुविताय) ऐश्वर्य और (दावने) देने वाले के लिये (प्र, भरध्वे) धारण कीजिये उसी को सब लोग प्राप्त होवें ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में प्रश्न और उत्तर हैं-कौन यथार्थवक्ता जनों के समीप से बड़ विज्ञानों को प्राप्त होता है और कौन प्राप्तजनों के कर्मों को और कौन वीरों के बलों को प्राप्त होता है, इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि पवित्र अन्त:करणयुक्त और धर्म के सुनने की इच्छा करने वाले धर्मिष्ठ पुरुषार्थी और ब्रह्मचारी हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अश्वाइवेदरुषासः सबन्धवः शूरांइव प्रयुधः प्रोत युयुधुः । मर्याइव सुधो वाधुनरः सूर्यस्य चक्षुः म मिनन्ति दृष्टिभिः ॥५॥ पदार्थः-हे विद्वान् जनो (सबन्धवः) तुल्यबन्धु जिन के ऐसे (नरः) नायक All शीघ्र चलिए (उत) और (प्रयुधः) अत्यन्त युद्ध करने वाले (शुराइय) शूरवीरों के AND के समान (अन्तान ३४४ ऋग्वेदः मै० ५। सू० ५६ ।। सदृश (भ, युयुधः) अत्यन्त युद्ध करिये तथा (सवृधः) उत्तम प्रकार बढ़ने वाले (मर्या- इव) मनुष्यों के सदृश (वावृधः) बढ़िये और पवन (सूर्यस्य) सूर्य देव के (चक्षुः) देखता जिससे उसको (वृष्टिभिः) वर्षाओं से जैसे वैसे शत्रुओं की सेनाओं को (प्र, मिनन्ति) अत्यन्त नाश करते हैं वे सत्कार करने योग्य हैं ॥५॥ भावार्थ:-इस मत्र में उपमालं०-जो घोड़ों के सदृश बलिष्ठ, शूरवीरों के सदृश भयरहित मनुष्यों के सदृश विचारशील और सूर्य के सदृश अविद्यारूपी अन्धकार के निवारक हैं वे सब के कल्याण के लिये होते हैं ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। ते अज्येष्ठा अनिष्ठास उद्भिदोऽमध्यमासो महंसा वि वांधु।। सुजा- तासो जनुषा पृश्निमातरो दिवो मर्या आ नो अच्छो जिगातन ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जो (अज्येष्ठाः) नहीं विद्यमान ज्येष्ठ जिन के वा (अकनिष्ठास:) नहीं विद्यमान छोटा जिन के वा (उद्भिदः) पृथिवी को फोड़कर उगनेवाले तथा (अमध्यमास:) नहीं विद्यमान' मध्यम जिन के वे (जनुषा) जन्म से (सुजाताम:) उत्तम व्यवहारों में प्रसिद्ध वा (पृश्निमातरः) अन्तरिक्ष माता जिनका वे और (दिवः) कामना करते हुए (मर्धाः) मनुष्य (महसा) बड़े बल आदि से (वि, वावृधः) विशेष बढ़ते हैं (ते) वे (नः) हमलोगों की (अच्छा) उतम प्रकार (श्रा, जिगातन) सब ओर से प्रशंसा करते हैं ॥६॥ भावार्थ:-जो मनुष्यों में यथायोग्य उत्तम शिक्षा हो तो कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम जन विचारशील होकर यथायोग्य जगत् की उन्नति कर सकें।॥६॥ फिर शिक्षाविषय को कहते हैं ।। वयो न ये श्रेणीः पातुरोजसान्तान्दिवो बृहतः सानुनस्परि। अश्वास एषामुभये या विदुः प्र पर्वतस्य नभनेरचुच्यवुः ॥७॥ पदार्थ:-(ये) जो (ोजता) पराक्रम से (वयः) पक्षियों के (न) सदृश (श्रेणीः) पङक्तियों को (पप्तः) प्राप्त होते और (वृहतः) बड़े (सानुनः) शिखर ओर से प्राप्त होते हैं (एषाम्) इनके जो (उभये) दो प्रकारके (अश्वासः) शीघ्र चलनेवाले पदार्थ हैं उनको (यथा) जिस प्रकार से (विदुः) जानते हैं और (पर्वतस्य) ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६०॥ M मेघ के (नभनून्) समूहों को (प्र, अचुच्यवः) अत्यन्त वर्षावें वे संसार के आधार होते हैं ॥७॥ भावार्थ:--- इस मन्त्र में उपमालं० - जैसे पक्षी पंक्तिवद्ध हुए शीघ्र जाते हैं वैसे ही उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त नौकर और घोड़े आदि वाहन तीनों मार्गों में शीघ्र जाते हैं ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । मिातुधौरदिति तय नः सं दानुचित्रा उपसो यतन्ताम् । आचुच्यवुर्दिव्यं कोचमेत ऋर्षे रुद्रस्य मरुतो गृणानाः ||८|| पदार्थ:-है (ऋषे) विद्या के देनेवाले' जैसे (अदितिः) माता वा (धौः) प्रकाश के सदृश (वीतये) विज्ञान प्रादि की प्राप्ति के लिये (न:) हम लोगों का (मिमातु) पादर करे वैसे आप आदर करिये जैसे (दानुचित्राः) अद्भुत दान जिन में ऐसी (उपसः) प्रातर्वेलायें व्यवहारों को सिद्ध कराती हैं वा जैसे (एते) ये (रुद्रस्य) अन्यायकारियों को रुलाने वाले (विष्यम्) कामना में श्रेष्ठ (कोशम् ) धन के स्थान को (मा, प्रचुच्यवुः) प्राप्त होवें वैसे' (गणानाः) स्तुति करते हुए (मरुतः) मनुष्य (सम् ) उत्तम प्रकार (यतन्ताम् ) प्रयत्न करें ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० --जो जन विजुली, प्रात:काल और ऋषि के सदृश धन के कोश को इकट्ठा करते हैं वे प्रतिष्ठित होते हैं ।।८।। इस सूक्त में पवन और विजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पञ्चम मण्डल में उनसठवां सूक्त समाप्त हुआ। Are Ratore अथाष्टर्चस्या षष्टितमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व प्रात्रेय ऋषिः । मरुतो वाग्निश्च देवता । १ ।३।४। ५ निस्श्रिष्टुप् । २ भुरिक् त्रिष्टुप् । ६ विराट त्रिष्टुप् छन्दः । धैवत: स्वरः । ७।८ जगती छन्दः । निषादः स्वरः ।। अब मनुष्यों को क्या साधना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। इल अग्नि स्ववसं नमोभिरिह प्रसत्तो वि चयत्कृतं नः । रथैरिव म भरे वाजयद्भिः प्रदक्षिणिन्मरुतां स्तोममृध्याम् ॥१॥ पवार्थ:- जैसे (प्रसत्त:) प्रसन्न (इह) इस संसार में मैं (नमोभिः) सत्कारों - wale BIRM ma कार ॥ २४६ ऋग्वेदः मं० ५। सू०६०।। से हूं वैसे सत्कारों से (स्ववसम्) उत्तम रक्षण जिससे उस' (अग्निम्) विजुली की (ईळ) अधिक इच्छा करता और (कृतम्) किये काम को (वि, चयत) विवेक करता हूं और जो (मरुताम्) मनुष्यों के समूह (वाजद्भिः) वेगवाले (रथरिव) वाहनों के सदृश पदार्थों से (नः) हम लोगों को पहुंचाते हैं उन को मैं (प्र, भरे) धारण करता हूं और (प्रदक्षिणित) प्रदक्षिणा को प्राप्त कराने वाला मैं मनुष्यों की (स्तोमम्) प्रशंसा को (ऋध्याम्) बढ़ाऊं ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.-विद्वान् जन को चाहिये कि विद्वानों के संग से अग्नि आदि की विद्या को प्रकट करा के प्रसन्नता संपादित करे ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । आ ये तस्थुः पृषतीषु श्रतासु सुखेषु रुद्रा मरुतो रथेषु । वना चिदुग्रा जिइते नि वॉ भिया पृथिवी चिंद्रेजते पर्वतश्चित ॥२॥ पदार्थ:-(ये) जो (स्याः) प्राण आदि और (मरुतः) मनुष्य (श्रुतासु) विद्याओं में (पृषतीषु) सेवन करने वालियों में (सुखेषु) सुखों में और (रथेषु) विमानादि वाहनों में (मा, तस्थुः) स्थित होवें (चित) पार (वना) किरण (उपा:) तीव्र स्वभाव वालों के सदृश (नि, जिहते) निरन्तर जाते हैं और (वः) आप लोगों के (भिया) भय से (पृथिवी) भूमि (चित्) भी (रेजते) कम्पित होती है (पर्वतः) मेघ के (चित) समान पदार्थ कम्पित होता है उनका हम लोग निरन्तर सत्कार भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो! उत्तम विद्याओं और उत्तम वाहनों पर स्थित होकर शीघ्र जाने के लिये समर्थ हूजिये ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । पर्वतश्चिन्महि वृद्धो बिभाय दिवश्चित्सार्नु रेजत स्वने वः । यत्क्रीळंथ मरुत ऋष्टिमन्त आपइव सध्यूञ्चो धवध्वे ॥३॥ पदार्थ:-हे (ऋष्टिमन्तः) अच्छे विज्ञान वाले (मरुतः) मनुष्यो (यद) जहां तुम (क्रोळथ) क्रीड़ा करते हो (प्रापइव) जलों के सदृश (सध्यञ्चः) एक साथ गमन करते हुए (धवचे) कंपायो और (वः) आप लोगों के (स्वने) शब्द में (पर्वतः) मेघ के (चित्र) सदृश (महि) बड़ा (वृद्धः) वृद्ध (बिभाय) डरता है (दिवः) प्रकाश aan ऋग्वेदः मं० ५। सू०६०॥ २४७ ote अ- से (चित) भी जैसे वैसे (सानु) शिखर के तुल्य (रेजत) कम्पित होता है वहाँ अन्वेषण करो ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-जो जो मनुष्य विद्या के व्यवहार की सिद्धि के लिये क्रीड़ा करते हैं तथा मित्र होकर कार्य की सिद्धि करते हैं वे सब प्रकार से आनन्दित होते हैं ॥३॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । वराइवेट्रेवतासो हिरण्यरभि स्वधाभिस्तवः पिपिश्रे। श्रिये श्रेयांसस्तवसो रथेषु सत्रा महाँसि चक्रिरे तनूषु ॥४॥ पदार्थ:--जो (श्रेयांसः) अत्यन्त कल्याण की इच्छा करते हुए (तवस:) बलवान् गतिवाले' (रैवतासः) पशुओं में हुए मनुष्य (वराइव) श्रेष्ठों के तुल्य' (इत्) ही (हिरण्यैः) सुवर्ण तेज आदिकों से और (स्वधाभिः) अन्न आदिकों से (तन्धः) शरीरों को (पिपि) स्थूल' अवयव वाले करते हैं और (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (रथेषु) वाहनों और (तनूषु) शरीरों में (सत्रा) सत्य (महांसि) बड़े काम (अभि, चक्रिरे) करते हैं वे भाग्यशाली होते हैं ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य के शरीर का आश्रय करके लक्ष्मी की इच्छा करते हैं वे दारिद्रय का नाश करते हैं ।।४।। फिर मनुष्यों को कैसे होना चाहिये इस विषय को कहते हैं। अज्येष्ठासो अनिष्ठास एते सं भ्रातरो वाधुः सौभगाय । युवा पिता स्वपा रुद्र एषां सुदुघा पृश्निः सुदिनो मरुभ्यः ॥५॥ पदार्थः-- हे मनुष्यो जैसे (स्वपाः) श्रेष्ठ कर्म का अनुष्ठान करने वाला (युवा) युवावस्था युक्त और (.) अन्यों का रुलाने वाला (पिता) पालक जन और (एषाम्) इन की (सुदुधा) उत्तम प्रकार मनोरथ की पूर्ण करने वाली (सुधिना) सुन्दर दिन जिस से वह (पृश्नि:) अन्तरिक्ष के सदृश बुद्धि (मरुद्भ्यः) मनुष्यों के लिये विद्यादि दान देती है वैसे (अज्येष्ठास:) जेठेपन से रहित (अनिष्ठास:) कनिष्ठपन से रहित (एते) ये (भ्रातरः) बन्धु जन (सौभगाय) श्रेष्ठ ऐश्वर्य होने के लिये (सम्, वावृधः) बढ़ते हैं ।।५।। भावार्थः - जो मनुष्य पूर्ण युवावस्था में विद्याओं को समाप्त कर और सुशीलता को स्वीकर कर बहुत ही उत्तम हुए उत्तम स्वभाव युक्त स्त्रियों का विवाह द्वारा स्वीकार कर के प्रयत्न करते हैं वे ऐश्वर्य को प्राप्त होकर आनन्दित होते हैं ॥५॥ tipur MOM CHER २४८ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६७ ॥ फिर मनुष्यों को परस्पर कैसे वर्तना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यदुत्तमे मरुतो मध्यमे वा यावी मुंभगासो दिवि छ । अर्को नो रुद्रा उत वा न्यथा वित्ताद्धविषो यद्यजाम ॥६॥ - Mana matam सब- Aya पदार्थः (सुभगासः) उत्तम ऐश्वर्य वाले और (रुवाः) मध्यस्थ विद्वान् (मरुतः) मनुष्यो आपलोग (यव) जिस (उत्तमे) उत्तम व्यवहार में (मध्यमे) मध्यस्थ व्यवहार में (वा) वा (अवमे) निकृष्ट व्यवहार में (यत्) जहां (वा) अथवा अन्यत्र निकृष्ट व्यवहार में (दिवि) शुद्ध व्यवहार में (स्थ) हूजिये वहां (अतः) इस कारण से (न:) हम लोगों को उत्तम व्यवहार में स्थापित कीजिये (उत, वा) और अथवा हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशित आत्मावाले (अस्य) इस के (वित्तात) धन से और (हविष:) भोग करने योग्य से (यव) जिस को (नु) निश्चय हम लोग (यजाम) प्रेरणा करें वहां आप भी प्रेरणा करिये ॥६॥ भावार्थ:-जो मनुष्य उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ व्यवहारों में यथा- योग्य वर्ताव कर के उत्तम ऐश्वर्य वाले होते हैं उन का सब लोग सत्कार करें॥६॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । अग्निश्च यन्मरुतो विश्ववेदसो दिवो वहध्व उत्तरादधिष्णुभिः। ते मन्दसाना धुनयो रिशादसो वा धत्त यजमानाय सुन्वते ॥७॥ मा 4taa kanca Hasia पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत) जो (अग्निः) अग्नि के सदृश (विश्ववेदसः) सम्पूर्ण ऐश्वर्य से युक्त (विवः) कामना करते हुए (रिशादस:) हिंसकों के नाश करने वाले (मन्दसाना:) आनन्द करते हुए (धुनयः) दुष्टों के कम्पाने वाले (मरुतः) विचारशील' मनुष्य आप लोग (सुन्वते) यज्ञ करने और (यजमानाय) पदार्थों के मेल करने वाले जन के लिये (वाम) प्रशंसा करने योग्य व्यवहार को (घस) धारण करो और (उत्तरात्) पीछे से (अधि) ऊपर के होने में (स्तुभिः) इच्छा वालों से प्रशंसा करने योग्य को (वहध्वे) प्राप्त हूजिये (ते, च) वे भी आप लोग सदा सब का उपकार करिये ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-वे ही महात्मा हैं जो सब के लिये सत्य का धारण करते हैं ॥७॥ अब विद्वानों की सेवा करना अगले मन्त्र में कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६१॥
२४६
a-
-
अग्ने मरुद्भिः शुभयद्भिज्रकभिः सोम पिब मन्दसानो गंण श्रिभिः ।
पावकेमिविश्वमिन्वेभिरायुभिर्वैश्वानर दिवा केतुना सजूः ॥८॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (गणश्रिभिः) समुदाय की लक्ष्मियों से
मन्दसानः) आनन्द करता हुआ (प्रदिवा) अत्यन्त प्रकाश वाली (केतुना) बुद्धि के
साथ (सजू:) तुल्य प्रीति को सेवने वाले (वैश्वानर) सब में मुख्य आप (शुभद्भिः)
उत्तम आचरण करने वाले (ऋक्वभिः) सत्कार करने योग्य (पावके भिः) पवित्र
(विश्वमिन्वेभिः) सम्पूर्ण संसार के व्यवहार को प्राप्त कराते हुए (प्रायुभिः) जीवनों
से (मरुद्भिः) मनुष्यों के साथ (सोमम्) बड़ी ओषधियों के रस का (पिब) पान
करिये ॥८॥
भावार्थ:----मनुष्यों की योग्यता है कि सदा यथार्थ वक्ता, विद्वानों
साथ मिलकर विद्या, अवस्था और बुद्धि को बढ़ाकर औषध के सदृश
आहार और विहार को करके उत्तम माचरण सर्वदा करें॥८॥
इस सूक्त
में
वायु, अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ
की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह पंचम भण्डल में साठवां सूक्त समाप्त हुधा ।
अर्थकोनविंशत्यूचस्यै कषष्टितमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व प्रात्रेय ऋषिः । १-४ ।
११-१६ मरुतः । ५-६ शशीयसी तरन्तमहिषी । ६ पुरुमीळहो वैदवश्विः । १०
तरन्तो वैददश्विः । १७-१६ रथवीतिल्भ्यो देवताः । १।२।३।४।६।७।
८।१०।११।१२।१३ । १४ । १५ १६ १७ १८ । १६ गायत्री छन्दः ।
षड्जः स्वरः । ५ अनुष्टुप् छन्दः । गारधारः स्वरः। सतोहली छन्दः । मध्यमः
True
अब उन्नीस ऋचावाले इकसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में प्रश्नोत्तरों
से मदादिकों के गुणों को कहते हैं ।
के ष्ठां नरः श्रेष्ठतमा य एकएक आयय । परमस्या परावसः ॥१॥
पदार्थ:-हे (श्रेष्ठतमाः) अत्यन्त कल्याण करने वाले (नरः) नायक जनो
(परमस्याः) अत्यन्त श्रेष्ठ के पार जानेवाले (के) कौन (स्था) ठहरें (ये) जो
(परावतः) दूर से आकर उपदेश करते हैं और जिनके मध्य में (एकएक:) एकएक
प्राप दूर देश से एक को (प्रायय) प्राप्त होवें ॥१॥

२५० ऋग्वेदः मं० ५। सू०६१ ।। kaalta - Kita NA भावार्थ:-कौन अत्यन्त श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं जो सर्वदा अत्यन्त श्रेष्ठ कर्मों को करें॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । कार'वोऽश्वा: क्वा३'भीशवः कथं शेक कथा यय । पृथ्टे सदो नसोर्यमः ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (वः) आप लोगों के (क्य) कहाँ (प्रश्वा:) शीघ्र चलने वाले घोड़े और (क्व) कहां (अभीशवः) अङ गुलियां हैं उन को आप लोग (कथम्) किस प्रकार (शेक) शीघ्र पहुंचने वाले हूजिये और (कथा) किस प्रकार से (यय) जाइये और जैसे (नसोः) नासिकानों के (पृष्ठ) पीछे के भाग में (सदः) छेदन करने योग्य वस्तु का (यमः) नियन्ता है वैसे आप लोग हूजिए ||२|| भावार्थ: इस मन्त्र में वाचकलु० जब कोई विद्वानों को पूछे तब वे उत्तर दें और पक्षपात को छोड़कर न्यायाधीशों के सदृश होवें तब सम्पूर्ण बोध को प्राप्त होवें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। जवने चोदं एषां वि सक्थानि नरों यमुः । पुत्रकृथे न जनयः ॥३॥ पदार्थ:--हे (नरः) नायक जनो (पुत्रकथे) पुत्र करने में (जनयः) माता पिता (न) जैसे वैसे (एषाम्) इन के (जधने) कटि के नीचे के भाग के अवयवों को जो (चोदः) प्रेरणा करने वाला है और जो (सक्थानि) घुटनों को (वि, यमः) नियम में रक्खें उन का आप लोग सत्कार करो ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं0-जैसे उत्पन्न करने वाले माता पिता सुन्दर नियम से सन्तानोत्पत्ति करके इन को उत्तम प्रकार नियमयुक्त करके उत्तम प्रकार शिक्षित करें वैसे सब करें ॥३॥ अब विद्वानों के उपदेशविषय को कहते हैं। परा वीरास एतन मयाँसो भद्रजानयः अग्नितपो यथासंथ ।।४।। पदार्थ:--हे मनुष्यो पाप लोग (यथा) जैसे (अग्नितपः) अग्नि से तपाने वाले (वीरास:) विद्या और बल से व्याप्त (मर्यासः) मनुष्य (परा) दूर के लिये (एतन) प्राप्त हों और (भद्रजानयः) कल्याण के जानने वाले (असथ) होवें वैसे वे सत्कार करने योग्य होवें ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जो बन्धन के साधन और पाप ripa ऋग्वेदः मं० ५। सू०६१ ॥ २५१ AR we के आचरण का त्याग कर और त्याग कराके और मुक्ति के साधन को ग्रहण कर और ग्रहण करा के सबको आनन्दित करते हैं उनको सब प्रानन्दित करें ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सनत्साश्च्य पशुमुत गव्यं शतावयम् । श्यावाश्वस्तुताय या दो:रायोपबबृहत् ॥५॥ पदार्थः- (या) जो (श्यावाश्वस्तुताय) कालेघोड़ों से प्रशंसित (वीराय) वीर जन के लिए (दोः) भुजा का बल (उप, बर्बहत) अत्यन्त समीप में देती है (सा) यह विद्यायुक्त स्त्री (सनत) सनातन (अश्व्यम्) घोड़ों में श्रेष्ठ (गव्यम्) गौओं में श्रेष्ठ (उत) और (शतावयम्) सौ अवयव जिस में उस (पशुम्) देखते हुए को बढ़ा सकती है ॥५॥ भावार्थ:-वही स्त्री प्रशंसित होती है जो अपने पति को काम में आसक्त करके बल का नाश नहीं करती है और गृहस्थित घोड़े आदि का पालन करके बढ़ाती है ॥५॥ फिर स्त्री के पुरुषार्थ उपदेश को कहते हैं । उत त्वा स्त्री शशीयसी पुंसो भवति वस्यसी । अदैवत्रादराधसः ॥६॥ पदार्थः -- हे पुरुष जो (स्त्री) स्त्री (प्रदेवत्रात्) विद्वानों की रक्षा करती है जिस से उससे विरुद्ध (अराधसः) धनविरुद्ध पदार्थ से पृथक् हो कर (पुंस:) पुरुष की (वस्यसी) अत्यन्त धनवाली (उत) और (शशीयसी) अत्यन्त दुःख को (भवति) होती और (त्या) आप को सुखी करती है उस को आप सुखयुक्त करो ॥६॥ भावार्थः-वही स्त्री पति से आदर करने योग्य होती है जो अन्याया- चरण और नहीं आदर करने योग्य के आदर करने से रहित हुई पति को सुखी करती है वही पति से निरन्तर आदर करने योग्य होती है ।।६। फिर उसी विषय को कहते हैं । वि या जानाति जसुरिं वि तृष्यन्तं वि कामिनम् । देवत्रा कृणुते मनः ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (या) जो (जसुरिम्) प्रयत्न करते हुए को (वि) विशेष करके (जानाति) जानती है (तृष्यन्तम्) पिपासा से व्याकुल हुए के तुल्य' को (वि) दूर करनेवाली HERI स । AND MAP २५२ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ६१ ॥ amana विशेष करके जानती है और (कामिनम्) कामातुर पुरुष को (वि) विशेष करके जानती है वह (देवत्रा) विद्वानों में (मनः) चित्त (कृणुते) करती है ।।७।। भावार्थः - जो स्त्री पुरुषार्थी, धार्मिक, लोभी और कामातुर पति को जानकर दोषों के निवारण और गुणों के ग्रहण करने के लिये प्रेरणा करती है वही पति आदि की कल्याण करनेवाली होती है ॥७॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । उत घा नेमो अस्तुतः पुमाँ इति ब्र पणिः । स वैरदेश इत्समः ॥८॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (प्रस्तुतः) नहीं प्रशंसा कियागया (उत) और (नेमः) प्राधे का अधिकारी (घा) ही (वरदेये) बैर देने योग्य जिस से उस में (पुमान्) पुरुष और जो (पणिः) प्रशंसित वर्तमान है (सः, इत) वही (समः) तुल्य है (इति) इस प्रकार से मैं (a) कहता हूं ॥८॥ भावार्थ:-जो नालस्ययुक्त जन श्रेष्ठ कर्मों में नहीं प्रवृत्त होता है और दूसरा विद्वान पुरुष सत्य और असत्य को जानकर सत्य का आचरण नहीं करता है वे दोनों तुल्य अधर्मात्मा हैं यह जानना चाहिये ।।८।। फिर स्त्रीपुरुष के विषय को कहते हैं । उत मेंऽरपद्युबतिममन्दुषी, प्रति श्यावायं वर्तनिम्। वि रोहिता पुरुमीळायं येमतुर्दिाय दीर्घयशसे ॥९॥ पदार्थ:--जो (प्रति, श्यावाय) धूमिल वर्ण से' युक्त अश्व और (पुरु मीह ळाय) बहुत वीर्य के सींचने वाले (दीर्घयशसे) बड़े यशस्वी (वित्राय) बुद्धिमान् (मे) मेरे लिये (ममन्दुषी) प्रशंसा करने योग्य और प्रानन्द करने वाली (वर्तनिम्) मार्ग को (वि, रोहिता) जानेवाली (युवतिः) यौवनावस्था को प्राप्त स्त्री (अरपत) स्पष्ट उपदेश देती है (उत्त) और मैं स्पष्ट उपदेश करू वे हम दोनों जैसे श्रेष्ठ गुणों से युक्त स्त्री और पुरुष (येमतः) नियम करते हैं वैसे वर्ताव करें ॥६॥ भावार्थ:-जो स्त्री पुरुष परस्पर तुल्य गुणकर्म और स्वभाव वाले हों तो श्रेष्ठ मार्ग, अत्यन्त कीति और प्रानन्द को प्राप्त हों ।।६।। फिर उसी विषय को कहते हैं । यो मैं धेनूनां शतं वैर्ददश्विर्यथा ददत् । तरन्त इव मंहना ॥१०॥ - thias ऋग्वेदः म० ०५। सू०६१॥ २५३ AT.IN मा पदार्थः-(य:) जो (वैदवश्विः) घोड़ों के ज्ञाता का पुत्र (मे) मेरी (धेनूनाम्) गौत्रों के (शतम्) सैकड़े को (बदत) देता है (यथा) जैसे (मंहना) बड़ी नौका से (तरन्तइव) तैरतेहुओं के समान दुःख के पार पहुंचाता है वही स्वामी होने के योग्य होता है ॥१०॥ भावार्थ:---जो मनुष्य सैकड़ों वा हजारों का देनेवाला होता है और दुग्ध देनेवाली गौत्रों की रक्षा करता है वह नौका से नदी वा समुद्र को तरता है वैसे ही बुद्धिमान् स्त्री और पुरुष दुःखरूपी सागर को धर्म के आचरण से तरते हैं ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । य ई वहन्त आशुभिः पिबन्तो मदिरं मधु । अत्र श्रवासि दधिरे ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (ये) जो (आशुभिः) शीघ्रकारी गुणों से (मदिरम्) अानन्द कारक (ईम्) जल को (वहन्ते) प्राप्त होते हैं और (मधु) माधुर्य आदि गुणों से युक्त को (पिबन्तः) पीते हुए (अत्र) यहां (श्रवासि) अन्न आदिकों को (दधिरे) धारण करते हैं वे ही लक्ष्मीवान होते हैं ॥११॥ भावार्थ:--- जो शीघ्र सुखकारक और बुद्धिवर्धक वस्तुओं का सेवन करते हैं वे यहां लक्ष्मीवान होते हैं ॥११॥ फिर उपदेशविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। थेषां श्रियाधि रोदसी विभ्राजन्ते रथेष्वा । दिवि रुक्मइवोपरि ॥१२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (येषाम् ) जिन विद्वानों का (श्रिया) शोभा वा लक्ष्मी से धर्मयुक्त व्यवहार (दिवि) कामना में (रुक्मइव) प्रीतिकारक सुवर्ण आदि पदार्थ जैसे वैसे (विनाजन्ते) शोभित होते हैं और जो (रथेषु) विमान प्रादि वाहनों में (श्रा, अधि) विराजित होवें वे (उपरि) ऊपर (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश प्रकाशित होते हैं ॥१२॥ भावार्थ:-इस मंत्र में उपमालं०-जो धर्मयुक्त पुरुषार्थ से धन आदि को इकट्ठे करते हैं वे सूर्य के किरणों के सदृश प्रकाशित यश वाले होते हैं ॥१२॥ फिर स्त्रीपुरुष के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । युवा स मारतो गणस्त्वेषरथो अधः । शुभयावा प्रतिष्कृतः ॥१३॥ 44 - २५४ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ६१ ॥ MORA Ima M । .. पदार्थः हे मनुष्यो जो (अनेछः) नहीं निन्दा करने योग्य (त्वेषरथ:) प्रकाशवान् वाहन जिसका वह शुभंयावा) जल' को प्राप्त होने वाला (अप्रतिष्कुतः) नहीं कम्पित दृढ़ (युवा) यौवनावस्था को प्राप्त (मारुतः) पवनों के समूह के सदृश मनुष्यों का (गणः) समूह है (स:) वह बहुत कार्यों को सिद्ध कर सकता है ॥१३॥ भावार्थः--जो मनुष्य संपूर्ण स्त्रीपुरुषों को यौवनावस्थायुक्त और विद्वान करते हैं वे प्रशंसा करने योग्य, कल्याणकारी और दृढ़ होते हैं ॥१३॥ फिर उपदेशार्थ विषय को कहते हैं । को वैद नूनमैषां यत्रा मदन्ति धृतयः । ऋतजाता अरेपसः ॥१४॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (यत्रा) जहां (ऋतजाताः) सत्य में उत्पन्न होनेवाले (अरेपसः) अपराध से रहित (धूतयः) पाप को कम्पाने वाले' (मदन्ति) प्रसन्न होते हैं वहां (एषाम्) इन वायु आदि के स्वरूप को (नूनम् ) निश्चित (क:) कौन (वेद) जानता है ॥१४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! अपराध, अनपराध तथा सत्य और असत्य को कौन जानता है यह हम पूंछते हैं जो प्रमाद से रहित और परमेश्वर के भक्त होते हैं ॥१४॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । यूयं मत विपन्यवा मणेतार इत्था धिया । श्रोतारो यामहूतिषु ॥१५॥ पवार्थ:-हे (वियन्यवः) बुद्धिमानो (यूयम्) आप लोग (प्रणेतारः) प्रेरणा करने और (श्रोतारः) सुनने वाले जन (धिया) बुद्धि वा कर्म से (यामहूतिष) उपरम अर्थात् निवृत्ति और आह्वानरूप कर्मों में (इत्था) इस प्रकार से (मतम्) मनुष्य को प्रेरणा करो ॥१॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन धर्मयुक्त व्यवहारों में मनुष्यों को प्रेरणा करके बुद्धिमान् करते हैं वे धन्य होते हैं ॥१५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ते नो वसूनि काम्या पुरुश्चन्द्रा रिशादसा आ यज्ञियासो ववृत्तन ॥१६॥ पदार्थः-जो (यज्ञियास:) यज्ञ के करने (रिशादसः) और हिंसकों के मारने वाले (न:) हम लोगों के (पुरुश्चन्द्राः) बहुत सुवर्ण और (काम्या) सुन्दर (वसूनि) Ima- ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६१॥ M धनों को (मा, ववृत्तन) प्राप्त होते हैं (ते) वे विद्वान् हम लोगों के कल्याणकारी होते हैं ॥१६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! वे ही इस संसार में परोपकार के लिए वर्तमान हैं जो न्याय से द्रव्य का सङ्ग्रह करते हैं ॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । एतं मे स्तोममूर्ये दााय परा वह । गिरों देवि रथीरिव ॥१७॥ पदार्थ:-हे (देवि) प्रकाशमान विद्यायुक्त स्त्री (ऊर्ये) रात्रि के सदृश वर्तमान आप (मे) मेरी (एतम्) इस (स्तोमा) प्रशंसा को सुनिये और (वाम्याय) विदारण करने वालों में हुए के लिये वर्तमान को (परा, वह) दूर कीजिये तथा (रयोरिव) प्रशंसित रथ वाला जैसे वैसे (गिरः) वारिणयों को धारण कीजिये ॥१७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं. -जैसे प्राणियों के सुख के लिये रात्रि है वैसे ही पति आदिकों के सुख के लिये श्रेष्ठ स्त्री होती है ॥१७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। उत में वोचतादिति सुतसोमे रथवीतौ । न कामो अप वेति मे ॥१८॥ पदार्थः-हे विद्वन् श्राप (मे) मेरे लिये (रथवीती) वाहनों के गमन में (उत) और (सुतसोमे) उत्पन्न किये हुए ऐश्वर्य आदि में सत्य का उपदेश देने योग्य है (इति) इस प्रकार (बोचतात) उपदेश देवें जिस से (मे) मेरी (कामः) कामना (न) नहीं (अप, वेति) नष्ट होती है ॥१८॥ भावार्थ:-सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वान् जनों के प्रति यह प्रार्थना करें कि आप लोग हम लोगों को ऐसे उपदेश करो जिस से हम लोगों की इच्छायें सिद्ध होवें ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। एष क्षेति रथवीतिर्मघवा गोमतीरनु । पर्वतवपश्रितः ।।१९।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (पर्वतेषु) मेघों में (अपश्रितः) आश्रित सूर्य (गोमती:) किरणें विद्यमान जिनमें ऐसे गमनों को (अनु) अनुकूल' वर्ताता है वैसे (एषः) यह (रमवीतिः) र रथ से मार्ग को व्याप्त होने वाला (मघवा) अत्यन्त धनवान् जन (क्षेति) निवास करता है ॥१६॥ anta vie 20 २५६ ऋग्वेदः म० ५ । सू० ६२ ।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जैसे सूर्य मेघ का कारण होकर पृथक् स्वरूप है वैसे ही विद्वान् सर्वत्र वास करता हुआ भी मोहरहित होता है ॥१६॥ इस सूक्त में प्रश्न, उत्तर और वायु आदि के गुण का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह पंचम मण्डल में इकसठवां सूक्त समाप्त हुभा॥ अथ नवर्चस्म द्विषष्टितमस्य सूक्तस्य श्रुतिविदात्रेय ऋषिः । मित्रावरुणी देवते । १।२ त्रिष्टुप् । ३ १४ १५।६ निवृत्मिष्टुप् । ७।८। विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवत: स्वरः।। अब नव ऋचा वाले बासठवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में सूर्य गुणों को कहते हैं । अखेनं अवमपिहितं ध्रुवं वां सुथ्या यत्रं निमुचन्त्यवान् । दर्श शता शह तस्थुस्तदेक देवानां श्रेष्ठ वपुषामपश्यम् ॥१॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदोशक जनो (पत्र) जहां विद्वान् जन(सूर्यास्य) सुर्य के (दश) दश (शता) सैकड़ों (अश्वान्) किरणों को (विमुचन्ति) छोड़ते और (सह) साथ (तस्थुः) स्थित होते हैं (वाम्) तुम दोनों के (ऋतेन) सत्य कारण से (ध्रुवम्) निश्चल (ऋतम्) सत्य स्वरूप (अपिहितम्) आच्छादित है (तत्) उस (एकम्) अद्वितीय (देवानाम्) विद्वानों के और (वयुधाम् ) रूप वाले शरीरों के (श्रेष्ठम् ) श्रेष्ठभाव को मैं (अपश्यम्) देखता हूं उस को आप लोग भी देखिये ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो यह सूर्यलोक है वह परमेश्वर से अनेक तत्वों द्वारा रचा गया है इस कारण अनेक गुणों से युक्त है उसको तुम लोग यथावत् जानो ॥१॥ अब मित्रावरुण के गुणों को कहते हैं ।। तत्सु वा मित्रावरुणा महित्वमीर्मा तस्थुषीरहभिर्दुदुहे । विश्वाः पिन्वयः स्वसंरस्य धेना अर्नु वामेकः पविरा ववर्त्त ।।२।। पदार्थः--हे (मित्रावरुणा) प्रारण और उदान वायु के सदृश अध्यापक और उपदेशक जनो (वाम् ) आप दोनों के जिस (महित्वम्) महत्व की (ईर्मा) निरन्तर an 14 o PARD - मित्रराजाना) ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ६२ ।। २५७ चलने वाला रक्षा करता है (तत) उस की आप दोनों (पिन्वयः) तृप्ति कीजिये और जैसे (अहभिः) दिनों से' किरणें (तस्थुषीः) स्थिर बेलाओं को (सु) उत्तम प्रकार (दुदुहे) पूर्ण करते हैं और (स्वसरस्य) दिन के मथ्य में (वाम्) आप दोनों (विश्वा:) सम्पूर्ण (धेनाः) वारिणयों को तृप्त कीजिये वैसे (एकः) सहाय- रहित केवल' एक (पवि:) पवित्र व्यवहार (प्रम) अनुकूल' (मा) (ववर्त) वर्तमान हो ॥२॥ भावार्थः हे अध्यापक और उपदेशक जनो ! आप दोनों मनुष्यों को रात्रि दिन प्राण उदान और बिजुली की विद्याओं को ग्रहण कराइये जिस से सम्पूर्ण प्रजायें आनन्दित होवें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अधारयतं पृथिवीमुत द्यां मित्रराजाना वरुणा महाभिः । वर्धयतमोषधीः पिन्वतं गा अई दृष्टिं संजतं जीरदानू ॥३॥ प्राण और बिजुली जैसे वायु और बिजुली (पृथिवीम) भूमि को (उत) और (द्याम्) सूर्य को धारण करते हैं वैसे (अधारयतम्) धारण कीजिये और जैसे ये दोनों (महोभिः) बड़े गुणों से (मोषधीः) यव आदि ओषधियों को (वर्धयतम्) बढ़ावें (गाः) पृथिवियों को तृप्त करते हैं वैसे आप दोनों (पिन्वतम्) तृप्त कीजिये और जैसे वे दोनों (वृष्टिम्) वृष्टि को उत्पन्न करते हैं वैसे (अव, सृजतम्) उत्पन्न कीजिये ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजा और मंत्रीजनो! आप दोनों प्राण और सूर्य के सदृश वर्ताव कर पृथिवी के राज्य का पालन कर वैद्य और ओषधियों की वृद्धि कर और वृष्टि की उन्नति करके सब के सुख के लिये वर्ताव कीजिये ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ वामश्वासः सुयुजो वहन्तु यतरेश्मय उप यन्त्वक् । घृतस्य निर्णिगर्नु वर्त्तते वामुप सिन्धवः प्रदिवि क्षरन्ति ॥४॥ पदार्थ:-हे वाहन के बनाने और चलाने वाले जनो जो जैसे (थाम्) आप दोनों के (सुयुजः) उत्तम प्रकार मिलने वाले (यतरश्मयः) ग्रहण की गई किरणें वा रस्सियां जिन की ऐसे (प्रश्वासः) अग्नि आदि पदार्थ वा घोड़े (धृतस्य) जल' के - Nuon ON पृथिवी की (रक्षमाणा) रक्षा करते हुए (नमस्वन्ता) बहुत अन्न वाले (इळास) २५८ ऋग्वेदः म० ५ । सू० ६२ ।। (अ) नीचे से (मा, वहन्तु) पहुंचावें और यानों को (उप, यन्तु) चलावें और (निणिक) निर्णय करने वाला सारथी (अनु, वर्तते) प्रवृत्त होता है और (प्रदिवि) प्रकाश स्वरूप अग्नि में (सिन्धवः) नदियां (वाम्) आप दोनों को (उप, क्षरन्ति) जल किछती हैं वैसा प्रयत्न कीजिये ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य वाहनों में यन्त्र कलाओं को रच के नीचे अग्नि और ऊपर जल स्थापित करके और फिर उस अग्नि को प्रदीप्त करके मार्गों में चलावे तो बहुत लक्ष्मियाँ इन को प्राप्त हों ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अनु श्रुताममति वदुर्वी बहिरिव यजुषा रक्षमाणा । नमस्वन्ता धृतदक्षाधि गर्ने मित्रासाथे वरुणेळास्वन्तः ॥५॥ पदार्थ:-हे (मित्र) प्रारण' के सदृश (वरुण) श्रेष्ठ (धृतदक्षा) धारण किया बल जिन्होंने वे (बहिरिव) जल' के सदृश (यजुषा) सत्संग वा क्रिया से (उर्वीम् ) वाणियों में और (अन्तः) मध्य (गर्ते) गृह में आप दोनों (प्रासाथे) वत्तंमान हैं और वह (अनु, श्रुताम्) पीछे श्रवण किये गए (अमतिम्) रूप को (अधि) ऊपर को (वर्धत) बढ़ावे उनकी हम लोग परिचर्या करें ॥५॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे प्राण और उदान आदि पवन सब जगत् की रक्षा करते हैं वैसे आप लोग रक्षा करें॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अक्रविहस्ता सुकृते परस्पा यं त्रासाथे वरुणेळांस्वन्तः । राजाना क्षत्रमहणीयमाना सहस्रस्थूणं विभृथा सह द्वौ ।।६।। पदार्थ:-हे (वरुणा) अति श्रेष्ठ सभा और सेना के स्वामी राजा और मंत्री जनो वायु और सूर्य के सदृश (प्रक्रविहस्ता) नहीं हिंसा करने वाले हस्त जिनके वा दानशील' हस्त जिन के वे (परस्पा) दूसरों की रक्षा करने वाले (राजाना) प्रकाश- मान और (क्षत्रम्) राज्य वा धन को (अहणीयमाना) क्रोध से रहित आचरण करते हुए (द्वौ) दोनों आप (इळासु) पृथिवियों के (अन्तः) मध्य में (सुकृते धर्म- युक्त काम' में वर्तमान (सह) साथ । (यम्। जिस को (नासाथे) भय देखें उस (सहस्रस्थूणम्) सहस्र वा असंख्य थूनी वाले जगत् राज्य वा वाहन को (विभृथः) धारण करो ॥६॥ - May - सूर्य के (उदिता " ऋग्वेदः मं० ५ । पू० ६२ ।। २५६ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - हे राजा और मन्त्री जन ! आप स्वयं धर्मात्मा होकर सहस्र शाखा जिस की ऐसे राज्य के रक्षण के लिये दुष्टों को दण्ड देकर और श्रेष्ठों का सत्कार करके यशस्वी होवें ॥६॥ फिर प्रसंग से विद्य विद्या विषय को कहते हैं । हिर॑ण्यनिर्णिगर्यो अस्य स्थूणा वि भ्राजते दिव्य' श्वार्जनीव । भद्रे क्षेत्रे निमिता तिल्बिले वा सनेम मध्वो अधिगय॑स्य ॥७॥ पदार्थ:-- इस संसार में जो (हिरण्यनिर्णिक) पृथिवी के सुवर्ण और अग्नि के तेज को अत्यन्त निश्चय करने और (प्रयः) जाने वाला (अस्य) इस राज्य और जगत् मध्य में (दिवि) प्रकाश में (भद्र) कल्याण' कारक (तिल्विले) स्नेह स्थान में (क्षेत्रे) निवास करते हैं जिस पुण्य कर्म में उसमें (वि, भ्राजते) विशेष प्रकाशित होता है और (अश्दाजनीव) बिजुली के सदृश (निमिता) अत्यन्त मापी अर्थात् जांची गई (वा) अथवा (स्थूणा) खंभे के सदृश दृढ़नीति विशेष प्रकाशित होती है उस और उसको (अधिगय॑स्य) अधिक सुन्दर गृह में हुए (मध्वः) मधुरादि पदार्थ के मध्य में हम लोग (सनेम) विभाग करें ॥७॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमा वाचकलु० -जो मनुष्य श्रेष्ठ व्यवहार में विराजमान, बिजुली आदि की विद्या को ग्रहण करते हुए गृह के कृत्य में यथावत् न्याय को करते हैं विभाग कर और विभाग देकर कृतकृत्य होते हैं वे नीति वाले होते हैं ॥७॥ फिर मित्रावरुण के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं । हिरण्यरूपमुषसो व्युष्टावयः स्थूणमुदिता सूर्यस्य । आ रोइथो वरुण मित्र गर्तमतश्चक्षाथे अदिति दिति च ॥८॥ पदार्थ:-हे (मित्र) (वरुण) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्तमान (उषस:) प्रातःकाल के (ध्युष्टौ) विशेष दाह वा निवास में (हिरण्यरूपम्) (अयःस्थूणम्) सुवर्ण के खम्भे के सदृश तेजःस्वरूप को (आ, रोहयः) आरोहण करते हैं (अत:) इस कारण से (गर्तम्) गृह को अधिष्ठित हो के (अदितिम्) नहीं नष्ट होने वाले कारण (दितिम्, च) और नाश होने वाले कार्य का (चक्षा) उपदेश करते हैं उन दोनों को हम लोग मिलें ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु.-जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार निवत्त होता और प्रकाश प्रवत्त होता है वैसे ही कार्य और २६० ऋग्वेदः म० ५। सू० ६३ ॥ HARBA कारणरूप विद्या के जानने वाले राजा और मन्त्रीजन मित्र के सदृश वर्ताव कर के दृढ़ न्याय का प्रचार करावें ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। यद्वहिष्ठं नातिविधै सुहानू अच्छिद्रं शर्मं भुवनस्य गोपा । तेन नो मित्रावरुणाविष्टं सिषासन्तो जिगीवांसः स्याम ॥९॥ पदार्थः -हे (सुदानू) उत्तम दान करने वाले (भुवनस्य) सम्पूर्ण संसार के (गोपा) रक्षक (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान के सदृश वर्तमान राजा और मन्त्री जनो श्राप दोनों जैसे (न, अतिविधे) अधिवेधन करने के अयोग्य (यव) जिस (बंहिष्ठम् ) अत्यन्त वृद्ध' (प्रच्छिद्रम) छिद्ररहित (शर्म) गृह को प्राप्त हूजिये (तेन) इस से (नः) हम लोगों को (अविष्टम्) व्याप्त हूजिये जिससे हम लोग (सिषासन्तः) विभाग करते हुए (जिगीवांसः) शत्रुनों के धनों की जीतने की इच्छा करने वाले (स्याम) होवें ॥ भावार्थ:- विद्वान् जन अति उत्तम गृहों को रचकर और वहां विचार करके विजय, विद्या और क्रिया को प्राप्त होते हैं ।।६।। इस सूक्त में सूर्य, प्राण, उदान और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में बासठवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ चतुर्थाऽध्यायारम्भः॥ विश्वानि देव सवितरितानि परासुर्व । यद्भद्रं तन्न आ मुंव ॥१॥ प्रथ सप्तर्चस्य त्रिषष्टितमस्य सूक्तस्यार्चनाना प्रात्रेय ऋषिः। मित्रावरुणो देवते । १।२।४।७ निचज्जगती । ३ । ५। ६ जगतीछन्दः । निषादः स्वरः ।। अब' चतुर्थाध्याय का प्रारम्भ है और पञ्चम मण्डल में सात ऋचा वाले वेसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मित्रावरुण विद्वद्विषय को कहते हैं ।।

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६३ ॥ २६१ 430 मृतस्य गोपावधि तिष्ठथो रथ सत्यधर्माणा परमे व्योमनि । यमत्रं मित्रावरुणावथो युवं तस्मै दृष्टिमधुमत्पिन्वते दिवः ।।१। पदार्थ:--हे (ऋतस्य) ऋत अर्थात् सत्य की (गोपौ) रक्षा करने वाले और (सत्यधर्माणा) सत्य है धर्म जिनका ऐसे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्तमान राजा और अमात्य जनो (युवम्) श्राप दोनों (परमे) अति उत्तम (ध्योमनि) आकाश के सदृश प्रकाशित व्यापक परमात्मा में स्थित होकर (रथम्) वाहन पर (अधि, तिष्ठथः) वर्तमान हूजिये और (अन) इस राज्य में (यम् ) जिसकी (अवथः) रक्षा करते हैं (तस्मै) उस के लिये (दिवः) अन्तरिक्ष से (वृष्टिः) वर्षा (मधुमत्) मधुर आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त (पिन्वते) सिञ्चन करती है ।।१।। भावार्थ:-जहां धाम्मिक विद्वान् पुत्र की जैसे वैसे प्रजा की पालना करने वाले राजा आदि होते हैं वहां उचित काल में वृष्टि और उचित काल में मृत्यु होता है ॥१॥ फिर मित्रावरुण वाच्य राजा अमात्य विषय को अगले मंत्र में कहते हैं ।। सम्राजविस्य भुवनस्य राजथो मित्रावरुणा विदथें स्वशा । वृष्टिं वां राधो अमृतत्वमीमहे द्यावापृथिवी वि चरन्ति तन्यवः ।।२।। पदार्थः हे (मित्रावरुणा) वायु और सूर्य के सदृश बर्तमान (स्वशा) सुख को दिखाने और (सम्राजौ) उत्तम प्रकार शोभित होने वाले राजा और मन्त्री. जनो आप जैसे (तन्यवः) बिजुलियां (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (वि, चरन्ति) विचरती और (बृष्टिम् । वृष्टि को उत्पन्न करती हैं वैसे (प्रस्य) इस (भुवनस्य) संसार के मध्य (विदथे) संग्राम में (राजथः) प्रकाशित होते हैं हम लोग (वाम् ) आप दोनों से (राधः) धन और (अमृतत्वम्) जल होने की (ईसहे) याचना करते हैं ॥२॥ भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे वायु और बिजुली बर्षा करके सब मनुष्यों को धन और धान्य से युक्त क ते हैं वैसे धार्मिक राजा और मन्त्री प्रजाओं को ऐश्वर्ययुक्त करें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सम्राजा उग्रा वृषभा दिवस्पती पृथिव्या मित्रावरुणा विचर्षणी । चित्रेभिरभैरुप तिष्ठथो वं यां वर्षयथो असुरस्य मायया ॥३॥ N पदार्थ:-हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के सदृश वर्तमान राजा और मन्त्री जनो (वारा ऋग्वेदः मं०५ । सू० ६३ ॥ पदार्थ:-हे राजा और मन्त्रीजनो जैसे (वृषभा) बलिष्ठ वृष्टि के कारण (पृथिव्याः) भूमि के और (दिवः) प्रकाश के (पती) पालन करने वाले (विचर्षणी) प्रकाशक (मित्रावरुणा) वायु और सूर्य (चित्रेभिः) अद्भुत (अभं:) मेघों के साथ (उप, तिष्ठथः) समीप में स्थित होते हैं और (असुरस्य) मेघ के (मायया) आच्छादन आदि से वा बुद्धि से (रवम्) शब्द को और (धाम्) प्रकाश को करते हैं वैसे (उग्रा) तेजस्वी (सम्राजो) उत्तम प्रकार शोभित होने वाले श्राप दोनों प्रजाओं के समीप स्थित होते हैं और कामनाओं से प्रजात्रों को (वर्षयथः) वृष्टियुक्त करते हैं ॥३॥ भावार्थ:-हे प्रजाजनो! जो राजा और मन्त्री आदि जन न्याय और विनय से प्रकाशमान, दुष्टों में तेजस्वी और कठोर दण्ड के देने वाले, सूर्य और वायु के सदृश मनोरथों की वृष्टि करने वाले हैं वे यशस्वी और प्रजामों के प्रिय होते हैं ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । माया वा मित्रावरुणा दिवि श्रिता सूर्यो ज्योतिश्चरति चित्रमायुधम् । तमभ्रेण वृष्टया गृहथो दिवि पर्जन्य द्रप्सा मधुमन्त ईरते ॥४॥ बुद्धि (सूर्यः) सूर्य के सदृश जिस (ज्योतिः) प्रकाशरूप (चित्रम्) अद्भुत (मायुधम्) युद्ध करते हैं जिस से उस शास्त्र को (चरति) प्राप्त होती है (तम्) उस को (अभ्रण) मेध से और (वृष्ट्या) वृष्टि से (गृहथः) घेरते हो, है (पर्जन्य) मेघ के समान वर्तमान जन (दिवि) सूर्य के प्रकाश में (मधुमन्तः) बहुत मधुर कर्म विद्यमान जिनके वे (द्र-सा:) विमोह के करने वाले (ईरते) चलते वा कंपते हैं वैसे प्राप जानिये ॥४॥ भावार्थ:-जो राजा और मन्त्री जन सूर्य और चन्द्रमा के सदश तीब्र और शान्त स्वभाव वाले बुद्धिमान् वृष्टि के सदृश प्रजात्रों का पालन करते हैं वे सब काल में सख की वृद्धि करते हैं ।।४।। अब मित्रावरुण वाच्य शिल्प विषय को कहते हैं । रथ युञ्जते मरुतः शुभे सुखं शुरो न मित्रावरुणा गविष्टिषु । रजासि चित्रा वि चरन्ति तन्यो दिवः संम्राजा पय॑सा न उक्षतम् ।।५।। पदार्थ:-हे (दिवः) कामना करने वालों के प्रति (सम्राजा) शोभित होने वाले (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश यज्ञ और शिल्प के पya उत्तम प्रकार Home (उक्षतम्) सींचिये ऋग्वेदः मं०५ । सू० ६३ ।। करनेवालो जो (मरुतः) कारीगर मनुष्य (शूरः) भयरहित वीरशत्रु को मारने वाले के (न) सदृश (शुभे) कल्याण के लिए (सुखम्) सुखकारक (रथम्) विमान आदि वाहन को (युञ्जते) युक्त करते हैं और (गविष्टिषु) किरणों की सङ्गतियों में (चित्रा) अद्भुत (रजांसि) लोक और (तन्यवः) विजुलियां (वि) विशेष करके (चरन्ति) चलती हैं उन के साथ (पयसा) जल' से (न:) हम लोगों को श्राप दोनों भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जो शूरवीरजनों के सदृश सुखकारक रथ पर चढ़कर यथेष्टस्थान में घूमते हैं वे अभीष्ट पदार्थ को प्राप्त होते हैं ॥५॥ फिर मित्रावरुणवाच्य विद्वद्विषय को कहते हैं । वाचं सु मित्रावरुणाविरोवर्सी पर्जन्यश्चित्रां वदति विधींमतीम् । अभ्रा वसत मरुतः सु मायया यां वर्षयतमरुणामरेपसम् ॥६॥ पदार्थ:-हे (मित्रावरुणौ) पढ़ाने और पढ़नेवालेजनो आप दोनों जैसे (पर्जन्य:) मेध (वदति) शब्द करता है वैसे' (इरावतीम्) जल विद्यमान जिस में उस (त्विषीमतीम्) अच्छी विद्याओं के प्रकाश से युक्त (चित्राम्। अद्भुत (वाधम्) वाणी को कहो जैसे (अभ्रा) मेघ आकाश में हैं वैसे ही (मरुतः) मनुष्य (सु,मायया) उत्तमबुद्धि से (सु) उत्तम प्रकार (वसत) बसें और हे मित्रावरुण (अरुणाम) प्राप्त होने योग्य (अरेपसम्) अपराधरहित (द्याम्) कामना की आप लोग (वर्षयतम्) वृष्टि करिये ॥६॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुक -जो मनुष्य विद्या से को प्राप्त होकर मेघ के सदृश मनोरथों की वृष्टि करते हैं वे बुद्धि से विद्वान् करके अपराध रहित करते हैं ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेथे असुरस्य माययो । ऋतेन विश्व भुवनं वि राजथा सूर्यमा धन्थो दिवि चित्र्यं रयम् ॥७॥ पदार्थ:-हे (विपश्चिता) विद्वान् (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश वमिानो जिससे आप दोनों (असुरस्य) मेघ के (मायया) आडम्बर से और (धर्मणा) धर्म से व्रता) सत्य भाषण प्रादि व्रतों की (रक्षेथे) रक्षा करते हैं तथा (ऋतेन) यथार्थ से (विश्वम्) प्रविष्ट होते हैं (भुवनम्) वा होते हैं जिस में उस संपूर्ण जगत् को (वि, राजथः) विशेष कर के प्रकाशित करते हैं और (दिवि.) प्रकाश युक्त वाणी Aut Map २६४ ऋग्वेदः मं० ५। सू०६४ ॥ में (सूर्यम्) सूर्य के सदृश (चित्र्यम्) अदभुत में हुए (रथम्) वाहन को (श्रा, धत्थः) धारण करते हैं इस से सत्कार करने के योग्य होते हैं ।।७।। भावार्थ:---जो मनुष्य धर्मसम्बन्धी सत्य भाषण आदि व्रत वा कर्मों को करते हैं वे सूर्य के सदृश सत्य से प्रकाशित होते हैं ।।७।। इस सूक्त में मित्रावरुण और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पिछिले सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में त्रेसठवां सूक्त समाप्त हुआ ।। अथ सप्तर्चस्य चतुःषष्टितमस्य सूक्तस्य अर्चनाना ऋषिः । मित्रावरुणो देवते । १।२ विराउनुष्टुप् । ६ निचुदनुष्टुप् छन्दः। गान्धारः स्वरः। ३॥ ५ भुरि- गुष्णिक । ४ उष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः। ७ निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः Power AAP अब सात ऋचावाले चौसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मित्रावरुण- पदवाच्य विद्वानों के गुणों को कहते हैं । वरुणं वो रिशादसमृचा मित्रं हवामहे । परि बजे बाइबोजगन्यांसा स्वर्णरम् ॥१॥ पदार्थ:-जैसे' (जगन्यांसा) जाते हुए प्राण' और उदान वायु के सदृश वर्तमान जन (स्वर्णरम्) सुख को प्राप्त करानेवाले को (बाह्वोः) भुजाओं की (बजेब) चलते हैं जिससे उस गति से जैसे वैसे (मः) आप लोगों को स्वीकार करते हैं वैसे हम लोग (रिशादसम्) शत्रुओं के रोकनेवाले (वरुणम्) उत्तम विद्वान् और (मित्रम्) मित्र का (ऋचा) स्तुति' से (परि) सब ओर से (हवामहे) स्वीकार करते हैं ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन प्रीति से आप लोगों का ग्रहण करते हैं वैसे इन का आप लोग भी स्वीकार करिये ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ता बाहवा सुचेतुना प्र यन्तममा अचंते । शेवं हि जायें वां विश्वासु क्षासु जोगुवे ।।२।। AND ऋग्वेदः मं०.५। सू०६४।। २६५ Howww जन पदार्थ:-हे प्राण और उदानवायु के सदृश वर्तमानो (ता) वे दोनों प्राप (बाहवा) बाहु और (सुचेतुना) उत्तम विज्ञान से (अस्म) इस (अर्चते) सत्कार करने वाले जन के लिए (शेवम्) सुख को (हि) ही (प्र, यन्तम्) प्रयत्न करते हुए (धाम्) आप दोनों का (मार्यम्) जरा वृद्धावस्था में उत्पन्न विषय' का मैं (विश्वास) सम्पूर्ण (क्षासु) भूमियों में (जोगुवे) उपदेश करता हूं वैसे उस की आप लोग प्रशंसा करो ।।२।। भावार्थ:-जो मनुष्य सब पृथिवी पर विद्या और बाहुबल से उत्तम पुरुषों के लिए सुख देते हैं उनके लिये हम लोग भी सुख देवें ॥२॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं । यन्नूनमश्यां गति मित्रस्य॑ यायां पथा। अस्य प्रियस्य शम्मण्यहिंसानस्य सश्चिरे पदार्थ:-हे मनुष्यो (अस्य) इस स (प्रियस्य) सुन्दर (अहिंसानस्य) हिंसा से रहित (मित्रस्य) मित्र के (शमणि) गृह में (यत्) जिस (गतिम्) गमन को विद्वान् (सश्चिरे) प्राप्त होते हैं उस गमन को मैं (नूनम्) निश्चित (प्रश्याम्) प्राप्त होऊ और (पथा) मार्ग से (यायाम्) जाऊ ॥३॥ भावार्थ:--सब मनुष्य विद्वानों का अनुकरण कर और धर्ममार्ग से चल कर उत्तम गति को प्राप्त होवें ॥३॥ फिर मित्रावरुणपदवाच्य विद्वानों के गुणों को कहते हैं । युवाभ्यां मित्रावरुणोपर्म धैयामृचा । यद्ध क्षयें मघोनों स्तोतृणां च स्पूधसे ॥४॥ पदार्थ:-हे (मित्रावरुणा) अध्यापक और उपदेशक जनो (युवाभ्याम्) आप दोनों से (ऋचा) स्तुति से (स्पूर्धसे) स्पर्धा के लिये (यत्) जिस (मघोनाम्) बहुत धन वालों के (स्तोतृणाम्, 'य) और विद्वानों के (क्षये) गृह में (उपमम्) उपमा को जैसे मैं (धेयाम्) धारण करू वैसे उस को (ह) निश्चय पाप धारण करो ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु -सब मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों की उपमा को ग्रहण करें ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ नो मित्र सुदीतिभिर्वरुणश्च सधस्थ आ । स्वे क्षये मघोनां सखीनां च वृधसे ॥५॥ MPION

२६६
ऋग्वेदः मं० ५ । सू०६४ ॥
Maina
पदार्थ:-हे (मित्र) मित्र आप और (वरुणः) श्रेष्ठ जन आप दोनों (सुदी-
तिभिः) अच्छे प्रकाशों से (मघोनाम्) प्रशंसित धन जिन के ऐसे (सखीनाम्) मित्रों
और (न:) हम लोगों की (वृधसे) वृद्धि के लिए (स्वे) अपने (क्षये) निवासस्थान
में (आ) सब ओर बसिये (सधस्थे, च) और तुल्यस्थान में (आ) सब ओर से
बसिये तथा हम लोग भी आप दोनों के निवास स्थान (च) और तुल्य' स्थान में
बसें ॥५॥
भावार्थः-वे ही मित्र श्रेष्ठ हैं जो परस्पर की उन्नति के लिए सुख
दुःख
और
सङ्ग
में प्रयत्न करते हैं ॥५॥
फिर विरोध छोड़ धनप्राप्ति विषय को कहते हैं ।
युवं नो येषु वरुण क्षत्रं बृहच्च विभृथः ।
उरु णो वाजसातये कृतं राये स्वस्तये ।।६।।
पदार्थ:-हे (वरुण) उत्तमो (च) और हे मित्र (युवम्) आप दोनों (येष)
जिन में (न:) हम लोगों के लिये (बृहत) बड़े और (उरु) बहुत (क्षत्रम्) धन को
(विभृथः) धारण करते हैं और (नः) हम लोगों को (वाजसातये) सङ ग्राम के लिए
(राये) धन के और (स्वस्तये) सुख के लिए (कृतम्) किया उन में वैसे ही
हूजिये ॥६॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु. मनुष्यों को चाहिये कि विरोध
का त्याग कर और उत्तम प्रकार मिलने से उद्यम करके विजय और धन
आदि को प्राप्त करें ॥६॥
फिर उसी विषय को कहते हैं।
उच्छन्त्यां मे यजता देदक्षत्रे रुशद्गवि । सुतं सोमं
न हस्तिमिरा पड्भिर्धावतं नरा विभ्रंतावर्चनानंसम् ।।७।।
पवार्थ:-हे प्राण और उदान वायु के
सदृश वर्तमान (यजता) मिलने वाले
(नरा) नायक राजा और मन्त्रीजन श्राप दोनों (उच्छन्त्याम्) विवास करती हुई में
तथा (रुशद्गवि) प्रकाशमान किरणों से युक्त । (देवक्षत्रे) विद्वानों के धन वा राज्य में
(सुतम्) उत्पन्न किये गये (सोमम) ऐश्वर्य को (हस्तिभिः) हाथियों से (न) जैसे वैसे
(पभिः) पैरों से (धावतम् ) प्राप्त होप्रो और (अर्चनानसम्) श्रेष्ठ नासिका जिस की
उस' को (बिभ्रतो) धारण करते हुए (मे) मेरे उत्पन्न किये गये ऐश्वर्य को
अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥७॥

है (सः) वह (चिकेत) जाने और जो (देवत्रा) विद्वानों में विद्वान् है (सः). (नः) हम लोगों को (अधोतु) कहे (बा) वा (यस्य) जिस का (दर्शतः) देखने के ऋग्वेदः मं० ५। सू०६५ ।। २६७ भावार्थ:-हे पुरुषार्थी राजजनो! प्रजात्रों का न्याय से पालन करके विद्वानों के धन को प्राप्त होनो॥७॥ इस सूक्त में मित्रावरुण के सदृश वर्तमान तथा विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस के पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में चौसठयां सूक्त समाप्त हुप्रा । अथ षडर्चस्य पञ्चषष्टितमस्या सूक्तस्य रातहव्यात्रेय ऋषिः । मित्रावरुणो देवते । १। ४ अनुष्टुप् । २ निचूदनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । ३ स्वराडुष्णिक् । ५ भुरिगुष्णिकछन्दः । ऋषभः स्वरः । ६ विराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब छः ऋचावाले पैंसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मित्रावरुण पदवाच्य पढ़ने पढ़ाने वाले वा उपदेश योग्य वा उपदेश देनेवालों के विषय को कहते हैं। यश्चिकेत स सुक्रतुर्देवत्रा स ब्रवीतु नः । वरुणो यस्य दर्थतो मित्रो वा वनते गिरः॥१॥ पदार्थ:-(यः) जो (सुऋतुः) उत्तम प्रकार बुद्धिमान् और (वरुणः) श्रेष्ठ वह D hanu MORE योग्य (मित्रः) मित्र है वह हम लोगों की गिरः) वारिणयों का (वनते) पालन करता है ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जो हम लोगों के मध्य में अधिक विद्वान् होवे वही उपदेश करे और जो अधिक ज्ञानवान् होवे वह सत्य और असत्य को अलग करे ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। ता हि श्रेष्ठवर्चसा राजाना दीघश्रुतया । ता सत्पती ऋताध ऋतावांना जनेजने ।।२।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (दीर्घशु त्तमा) दीर्घकाल' पर्यन्त अत्यन्त शास्त्र को सुनने वाले (श्रेष्ठवर्चसा) श्रेष्ठ अध्ययन जिन का ऐसे (राजाना) प्रकाशमान जन वर्तमान हैं (ता) वे दोनों और जो (जनेजने) मनुष्य मनुष्य में (सत्पती) श्रेष्ठों के BOAR २६८ ऋग्वेदः मं०५ । सू०६५।। hog पालन करने और (ऋतावृधा) सत्य को बढ़ाने वाले (ऋतावाना) तथा सत्य विद्यमान जिन में (ता, हि) उन्हीं दोनों का हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥२॥ भावार्थ:-जो मनुष्य बहुश्रुत, पूर्ण विद्यावाले, सत्य धर्म में निष्ठा करनेवाले और जो विद्या की प्रवृत्ति में प्रीति करनेवाले हों वे ही उपदेशक और अध्यापक होवें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ता वामियानोऽवसे पूर्वा उप अवे सचा । स्वश्वासः सु चेतुना बाजाँ अभि म दावनें ॥३॥ पदार्थ:-हे प्राण और उदान के समान वर्तमानो (स्वश्वास:) अच्छे घोड़े जिन के वे (सु, चेतुना) उत्तम ज्ञानवान् के साथ (दावने) देनेवाले के लिए (बाजान्) संग्रामों के (अभि, प्र) सम्मुख अच्छे प्रकार कहें उन को मैं (उप, बवे) समीप में कहूं । हे अध्यापक और उपदेशक जनो जिन (पूर्वौं ) प्रथम विद्या पढ़े हुए (वाम्) आप दोनों को (इयानः) प्राप्त होता हुआ (अवसे) रक्षा आदि के लिए वर्तमान (ता) उन (सचा) मिले हुओं के मैं समीप में कहता हूं ॥३॥ भावार्थ:-जैसे उपदेशक जन उपदेश देखें वैसे ही जिन को उपदेश दिया जाय वे औरों को भी उपदेश करें॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। मित्रो अंहोश्चिदादुरु क्षाय गातुं वनते । मित्रस्य हि प्रतूर्वतः सुमतिरस्ति विधतः ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (मित्रः) मित्र (अंहोः) दुष्ट आचरण से (चित्) भी वियुक्त करके (पाद) अनन्तर (उरु) बहुत (क्षयाय) निवास के लिये (गातुम्) पृथिवी को (बनते) सेवन करता है वह' (हि) निश्चय से (प्रतूवर्तः) शीघ्र करने वाले (विधतः) परिचरण करते हुए (मित्रस्य) मित्र की जो (सुमतिः) श्रेष्ठ बुद्धि (अस्ति) है उस को ग्रहण करे ॥४॥ भावार्थ:-वे ही मित्र हैं जो निष्कपटता से और शुद्धभाव से परस्पर के जनों के साथ वर्तमान हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वयं मित्रस्यावसि स्याम समयस्तमे। अनेहसस्त्वोतया सत्रा वरुणशेषसः ॥५॥ 80 oue SHNA ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ६६ ॥ २६६ OMIND A पदार्थः - हे मनुष्यो जैसे (अनेहसः) नहीं हिंसक होते हुए (त्योतयः) आप से रक्षित और (वरुणशेषसः) उत्तम जन शेष जिन के वे (वयम्) हम लोग (सत्रा) सत्य से युक्त (मित्रस्य) मित्र के (सप्रथस्तमे) अतिविस्तार युक्त (अवसि) रक्षरण आदि कर्म में (स्याम) प्रवृत्त होवें ॥५॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि सदा कृतज्ञता करें और कृतघ्नता का दूर से त्याग करें॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । युवं मित्रमं जनं यतथः सं च नयथा । मा मघोना परि ख्यतं मो अस्माकमृषीणां गोपीथे न उरुष्यतम् ॥६॥ पदार्थ:--हे (मित्रा) प्राण और उदान के समान वर्तमान अध्यापक और उपदेशक जनो (युवम्) आप दोनों (इमम्) इस (जनम्) उपदेश देने योग्य जन को (यतयः) प्रेरणा करते और (सम्, नयथः, च) प्राप्त कराते हैं तथा (मघोनः) बहुत धनों से युक्त (नः) हम लोगों का मत (परि, ख्यतम्) निरादर कीजिये और (ऋषीणाम्) वेदार्थ के जानने वाले (अस्माकम्) हम लोगों का गोपीथे) गौरों के पीने योग्य दुग्ध आदि में (मो) नहीं निरादर करिये और शुभ कर्म में हम लोगों को (उरुष्यतम्) प्रेरणा करिये ॥६॥ भावार्थः - हे विद्वानो ! आप लोग सब लोगों को प्रयत्न से युक्त करके सुख को प्राप्त कराइये और हे विद्यार्थीजनो वा श्रोतृजनो ! आप लोग हम अध्यापक और उपदेशकों का अपमान मत करो इस प्रकार वर्ताव कर सत्य धर्म का सेवन हम लोग करें ॥६॥ इस सूक्त में मित्रावरुण पदवाच्य अध्यापक और अध्ययन करने तथा उपदेश करने और उपदेश देने योग्यों के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में पैंसठवां सूक्त समाप्त हुभा ॥ ! अथ षडजस्य षट्षष्टितमस्थ सूक्तस्य रातहव्य मात्रेय ऋषिः । मित्रावरुणो देवते । १।५।६ विराउनुष्टुप् । २ निचूदनुष्टुप् । ३ । ४ स्वराडनुष्टुप्छन्दः । गान्धार:स्वर:: अब छः ऋचावाले छियासठवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करे इस विषय को कहते हैं ।

२७०
ऋग्वेदः म० ५। सू० ६६ ॥
Peace
RAAT
44
आ चिकितान सुक्रतू देवौ मर्त रिशादसा ।
वरुणाय भृतपेशसे दधीत प्रयंसे महे ॥१॥
पदार्थः-- हे (चिकितान, मर्त) ज्ञान और मरण धर्मयुक्त आप (ऋतपेशसे)
सत्यस्वरूप और (प्रयसे) प्रयत्न करते हुए (महे। बड़े (वरुणाय) उत्तम व्यवहारयुक्त
के लिए (रिशादसा) दुष्टों के मारनेवाले (सुक्रतू) उत्तम बुद्धिमान् (देवी) दो
विद्वानों को (आ) सब प्रकार से (दधीत) धारण करिये ॥१॥
भावार्थ:-वही विद्वान् होता है जो विद्वानों का सङ्ग कर के बुद्धि
को बढ़ाता है॥१॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
ताहि क्षत्रमविहतं सम्यगसुर्य १'माशाते ।
अध व्रतेच मानुषं स्व१ धायि दर्शतम् ॥२॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (ता) वे (हि) ही (अविह तम्) नहीं कुटिल (असुर्यम्)
विद्वानों के लिए हितकारक (सम्यक) उत्तम प्रकार चलनेवाले (क्षत्रम्) धन वा राज्य
को (आशाते) व्याप्त होते हैं (अध) इस के अनन्तर जिन्हों ने हित (मानुषम्)
मनुष्य संबन्धी (दर्शतम्) देखने योग्य (अतेव) कर्मों के सदृश और (स्वः) सुख के
(न) सदृश (धायि) धारण किया ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमाल.
-सब मनुष्य धर्मपथ से
सुख
और
कर्म को धारण करें ॥२॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
ता बामेषे स्थानामुर्वी गव्यूंतिमेषाम् ।
रातहव्यस्थ सुष्टुतिं दधृक् स्तोमर्मनामहे ॥३॥
OGRA
पदार्थः हे अध्यापक और उपदेशकजन आप दोनों (एषाम्) इन (रथानाम्)
विमान आदि वाहनों का (रातहव्यस्य) दिया है देने योग्य पदार्थ जिसने उस की
(सुष्टुतिम्) उत्तम प्रशंसा को और (गव्यूतिम्) मार्ग को (एषे) प्राप्त होने को
प्रवृत्त होते हैं और जैसे विद्वान् जन (स्तोमैः) प्रशंसाओं से इन की (उर्वीम्) पृथिवी
को धारण करता है वैसे (ता) उन (बंधक) प्रगल्भता को प्राप्त (वाम्) आप दोनों
का और उस विद्वान् को हम लोग (मनामहे) अच्छे प्रकार जानते हैं ॥३॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ६६ ।। २७१ के लिए उपकृत करें भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो जगत् के कल्याण सृष्टिक्रम से पदार्थविद्या को प्रकाशित करते हैं वे धन्य होते हैं ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अधा हि काव्या युवं दक्षस्य पुर्भिरद्भुता । नि केतुना जनानां चिकेथे पूतदक्षसा ॥४॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशक जनो (पूतदक्षसा) पवित्र बल जिन का ऐसे (यवम्) आप दोनों (केतुना) बुद्धि से (अद्भुता) आश्चर्यरूप (काव्या) कवियों के कर्मों को चिकेथे) जानते हैं (अधा) इस के अनन्तर (हि) जिस से (जनानाम्) मनुष्यों के (दक्षस्य) बलसबन्धी (पूभिः) नगरों से (नि) निरन्तर करके जानते हैं उन का हम लोग सदा सत्कार करें ॥४॥ भावार्थ:-विद्वानों को यह योग्य है कि जो स्वयं पूर्ण विद्वान् होके अज्ञजनों को अध्यायन और उपदेश से स्त्री भी विद्वानों के समान होकर उत्तमाचरण करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। तहतं पृथिवि बृहच्छूव एष ऋषीणाम् । जयसानावर पृथ्वति क्षरन्ति यामभिः ॥५॥ पदार्थ:--हे (पृथिवि) पृथिवी के सदृश वर्तमान विद्या से युक्त स्त्री जैसे मेघ वा योगी जन (यामभि:) प्रहरों वा प्रहर में उत्पन्न कम्मों से (पथ) विस्तीर्ण जल को (अरम्) पूरा (प्रति, क्षरन्ति) वर्षाते हैं और जैसे (जयसानौ) जाते हुए वा विशेष करके जानते हुए वर्तमान है वैसे (ऋषीणाम्) मंत्रार्थ जानने बालों के (तत्) उस (बृहत) बड़े (ऋतम्) सत्य को वा जल को (श्रवः) और अन्न वा श्रवण को (एषे) प्राप्त होने को प्रवृत्त होमो ॥५॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलु०-जो स्त्रियां विद्यायुक्त हो कर धर्म और उत्तम स्वभाव का स्वीकार कर के मेघ के सदृश सुखों की वृष्टि करती हैं तो वे बड़े सुख को प्राप्त होती हैं ।।। मनुष्यों को न्याय से राज्य की रक्षा करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। आ यद्वामीयचक्षसा मित्रं वयं च सूरयः । व्यचिष्ठे बहुपाय्ये यतेमहि स्वराज्य ।।६।। Hasir . मित्र (वरुण) और २७२ ऋग्वेदः म० ५ । सू० ६७ ।। पदार्थः-हे (ईयचक्षसा) प्राप्त होने वा जानने योग्य दर्शन वा कथन जिन का वे (मित्रा) मित्र (वाम्) आप दोनों के (यत्) जिस (व्यविष्ठे) अत्यन्त व्याप्त और (बहुपायये) बहुतों से रक्षा करने योग्य राज्य (स्वराज्ये, च) और अपने राज्य में (सूरयः) विद्वान्जन (वयम्) हम लोग (प्रा) सब प्रकार से (यतेमहि) यत्न करें उसमें यत्ल करो ॥६॥ भावार्थः-मनुष्यों को चाहिये कि मित्रता करके अपने और दूसरे के राज्य की न्याय से रक्षा करके धर्म की उन्नति करें॥६॥ इस सूक्त में मित्र और श्रेष्ठ विद्वान् के और विद्यायुक्त स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। यह पञ्चम मण्डल में छियासठवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ पञ्चर्चस्य सप्तषष्टितमस्य सूक्तस्य यज प्रात्रेय ऋषिः । मित्रावरुणी देवते । १।२। ४ निचूदनुष्टुप् । ३ । ५ बिराडनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ॥ अब पांच ऋचा वाले सड़सठवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किस' के तुल्य क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । वळित्था देवा निष्कृतमादित्या यजतं बृहत् । ववुण मित्राय॑मन्वर्षिष्ठं क्षत्रांशाथे ॥१॥ पदार्थः- है (देवा) श्रेष्ठ स्वभाव वाले (प्रावित्या) अविनाशी (मित्र) उत्तम प्रकार मिलो । हे (अर्य्यमन्) न्यायकारी (इस्था) इस प्रकार से प्राप भी मिलिये और हे मित्र श्रेष्ठ जनो तुम जैसे (ब) सत्य (वर्षिष्ठम्) अत्यन्त बढ़े हुए (क्षत्रम्) राज्य वा धन को (माशाथे) प्राप्त होते हो वैसे इस को न्यायकारी भी प्राप्त हो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे विद्वान् जन इस संसार में धर्मयुक्त कर्मों को करें वैसे राज्य का राजा आदि पालन करें ॥१॥ फिर मनुष्यों को किस' के तुल्य क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। आ यद्योनि हिरण्ययं वरुण मित्र सदया। धारी चर्षणीनां यन्तं सुम्नं रिशादसा ॥२॥ .

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६७ ॥
२७३
M
म
.
पदार्थ:-हे (रिशादसा) दुष्टों को दण्ड देने वाले (मित्र) मित्र (वरुण)
श्रेष्ठ (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के (धारा) धारण करने वाले तुम (यव) जिस
(सुम्नम्) सुख को (यन्तम् ) प्राप्त होते हुए और (हिरण्ययम्) तेजःस्वरूप (योनिम्)
कारण को (प्रा) सब प्रकार से (सदथः) प्राप्त होते हो उसको हम लोग भी प्राप्त
होवें ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे विद्वान् जन तेजःस्वरूप
बिजुली रूप सूर्य आदि कारण को जान के उपकार करते हैं वैसे ही इसको
करके मनुष्य सुख को प्राप्त हों ॥२॥
फिर मनुष्यों को कैसे वर्तना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
विश्वे हि विश्ववेदसो बरुणो मित्रो अर्थमा ।
व्रता पदेव सश्चिरे पान्ति मत्यै रिषः ॥३॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (विश्वे) सब (विश्ववेदसः) संपूर्ण विद्या और
ऐश्वर्य पाये हुए (वरुणः) श्रेष्ठ (मित्रः) और सब का मित्र (अर्यमा) और न्याय-
कारी जन (पदेव) चलते हैं जिन से उन चरणों के सदृश (व्रता) सत्याचरण रूप
कम्मों को (सश्चिरे) प्राप्त होते वा जाते हैं और (रिष:) मारने वाले से वा हिंसा
से (मर्त्यम्) मनुष्य' की (पान्ति) रक्षा करते हैं वे (हि) ही आप लोगों से आदर
करने योग्य हैं ॥३॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंo-हे मनुष्यो ! जैसे प्राणी पैरों से
अभीष्ट-एक स्थान से दूसरे स्थान को जाके अपने प्रयोजन को सिद्ध
करते हैं वैसे ही सत्यभाषण आदि कम्मों को धर्ममार्ग के लिये प्राप्त होकर
अभीष्ट आनन्द को सिद्ध करो॥३॥
फिर विद्वान् कैसे होकर क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
ते हि सत्या अंतस्पृशं ऋतावांनो जर्नेजने ।
सुनीथासः सुदानवोऽहोश्चिदुरुचक्रयः ॥४॥
पदार्थ:-हे मनष्यो (हि) जिससे (जनेजने) मनुष्य मनुष्य में जो (सत्याः)
श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (ऋतस्पृशः) यथार्थ को स्वीकार करने वाले (ऋतावानः) सत्य मत
वा कर्म विद्यमान जिनमें वे (सुदानवः) सुन्दर श्रेष्ठ विद्या आदि का दान जिनका
और (सुनीथासः) उत्तम नीति के देने और (उरुचक्रयः) बहुत करने वाले बड़े
पुरुषार्थी हुए (अंहोः) अपराध से (चित) भी पृथक् हुए होवें (ते) वे सर्वदा सब
प्रकार से सत्कार करने योग्य हों ॥४॥

२७४ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६८ ॥ - NHAIN भावार्थ:-जो स्वयं धर्मयुक्त गुण कर्म और स्वभाव वाले हुए दुष्ट आचरण से पृथक् वर्ताव करके अन्य मनुष्यों को तादृश अर्थात् अपने समान करते हैं वे धन्यवाद के योग्य हैं ।।४।। मनुष्य विद्वानों से किस प्रकार विद्या ग्रहण करें इस विषय को कहते हैं । को नु वा मित्रास्तुतो वरुणो वा तनूनाम् । तत्सु वामेषते मतिरत्रिभ्य एषते मतिः ॥५॥ पदार्थ:-हे (मित्र) मित्र (वाम्) आप दोनों के (तनूनाम्) शरीरों को (क:) कौन (श्रा, ईषते) सब प्रकार से प्राप्त होता है आप (वा) वा (वरुणः) उत्तम स्वभावयुक्त कौन (नु) शीघ्र (अस्तुतः) नहीं प्रशंसित है और जो (वाम्) आप दोनों की (मतिः) बुद्धि हम लोगों को (मा, ईषते) सब प्रकार प्राप्त होती है और (प्रत्रिभ्यः) व्याप्त विद्या जिन में उन के लिये (मतिः) मननशील' अन्तःकरण की वृत्ति (सु) उत्तम प्रकार प्राप्त होती है (तत्) उस को हम लोग स्वीकार करें ॥५॥ भावार्थ:-जो मनुष्य अध्यापक और उपदेशकों को प्राप्त होकर उनके उपदेश और विद्या को ग्रहण करके उनसे बुद्धि और उत्तम क्रिया का स्वीकार करते हैं वे प्रसिद्ध स्तुति वाले होते हैं ॥५॥ इस सूक्त में मित्रावरुण और विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में सड़सठवां सूक्त समाप्त हुना। अथ पपर्चस्याष्टषष्टितमस्य सूक्तस्य यजत पात्रेय ऋषिः। मित्रावरुणी क्षेवते। १।२ गायत्री। ३। ४ निचद्गायत्री।५ विराड गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः ।। अब मनुष्यों को परस्पर क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं। म वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा । महिक्षत्रावृतं बृहद ॥१॥ पदार्थः -हे मनुष्यो (व:) तुम लोगों के जो (विपा) अनेक प्रकार से रक्षा करने वाले (महिक्षत्री) बड़े क्षत्र जिनके वे (बृहत्) बड़े (ऋतम्) सत्य से युक्त प्रहण करें उन दोनों से (मित्राय) मित्र के और (वरुणाय) उत्तम पाचरण वाले के लिये तुम (गिरा) वाणी से (प्र, गायत) प्रशंसा करो ॥१॥ ।

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६८ ॥
२७२
भावार्थ:----जो अध्यापक और उपदेशक जन सब मनुष्यों को विद्यादि
से पवित्र करते हैं वे मनुष्यों से सर्वदा सत्कार करने योग्य हैं ॥१॥
मनुष्यों को यहां कैसे होना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।।
सम्राजा या घृतयोनी मित्रश्चोभा वरुणश्च ।
देवा देवेषु प्रशस्ता ॥२॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (या) जो (घृतयोनी) घृतयोनी अर्थात् जल' कारण
जिन का वे (देवेषु) विद्वानों में (प्रशस्ता) श्रेष्ठ (सम्राजा) उत्तम प्रकार शोभित
होने माले (देवा) दो विद्वान् अर्थात् (मित्रः) मित्र (च) और (वरुणः) स्वीकार
करने योग्य' (च) भी (उभा) दोनों प्रवृत्त होते हैं उन दोनों का आप लोग बहुत
आदर करिये ॥२॥
भावार्थ:-जो विद्वानों में विद्वान् राजपुरुष चक्रवत्ति राज्य को सिद्ध
कर सकते हैं वे ही यशस्वी होते हैं ।।२।।
फिर राज्य कैसे उन्नति को प्राप्त करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
ता न शक्तं पार्थिवस्य महो रायो दिव्यस्य ।
महि वां क्षत्रं देवेषु ॥३
पदार्थः .. हे मनुष्यो जो (न:) हम लोगों के सम्बन्ध में (पार्थिवस्य) पृथिवी
में विदित (महः) बड़े (रायः) धन के (दिव्यस्य) शुद्ध व्यवहार में हुए का
(शक्तम् ) समर्थ, जिन (वाम्) आप दोनों का (देवेषु) सत्य विद्या को प्राप्त हुओं
में (महि) बड़ा (क्षत्रम्) राज्य वा धन वर्तमान है (ला) उन आप दोनों का हम
लोग सत्कार करें ॥३॥
भावार्थ:-हे राजपुरुषो आप लोग जो अपने राज्य की विद्वानों से
रक्षा करें तो वह पृथिवी में विदित हुआ समर्थ होवे ॥३॥
विद्वानों के सदृश इतरजनों को वर्ताव करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
ऋतमृतेन सर्पन्तेषिरं दक्षमाशाते । अद्रुहां देवौ वर्धते ॥४॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (ऋतेन) सत्य से (ऋतम्) सत्य का (सपन्ता)
प्राक्रोश करते हुए (इषिरम्) प्राप्त होने योग्य (दक्षम्) बल को (पाशाते) व्याप्त
होते हैं और (अनुहा) द्वेष से रहित (देवी) दो विद्वान् जन (वर्धते) वृद्धि को प्राप्तः
होते हैं वैसे आप लोग भी प्रयत्न करो ॥४॥

DOOR
और (त्रीणि) प्रकाशित होने योग्य (रजांसि) लोकों को (वावृधानी) बढ़ाते हुए
२७६
ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ६६ ।।
भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलु.-मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों
के सदृश क्रिया करके सदा ही वृद्धि करें ॥४॥
फिर मनुष्यों को क्या जानकर क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
वृष्टिद्यावा रीत्यापेषस्पती दानुमत्याः । बृहन्तं गतमाशाते ।।५।।
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (वृष्टिद्यावा) वृष्टि और अन्तरिक्ष के कारण
(रोस्यापा) रीति और जल जिन के सम्बन्ध में वह (इषः) अन्न आदि के (पती)
पालक वायु और विद्यु दग्नि (दानुमत्याः) बहुत दान विद्यमान जिस में उस पृथिवी
के मध्य में (बृहन्तम्) बड़े (गतम्) गृह को (प्राशाते) व्याप्त होते हैं उन दोनों को
आप लोग जान के उपकार करो ॥५॥
भावार्थ:-जो मनुष्य वृष्टि आदि में कारण सूर्य वायु और विजुली
आदि को जानें तो उस उस कार्य को कर सकें ।।५।।
इस सुक्त में मित्र श्रेष्ठ और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के
अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह पंचम मण्डल में अड़सठवां सूक्त समाप्त हुआ।
त्री रोचनेति चतुऋचस्यैकोनसप्ततितमस्य सूक्तस्य उरुचक्रिरात्रेय ऋषिः ।
मित्रावरुणो देवते । १।२ निवृत्रिष्टुप् । ३ । ४ विरात्रिष्टुप्छन्दः । गान्धारः
अब चार ऋचा वाले उनहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में इस
संसार में मनुष्यों को क्या जान कर क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
त्री रोचना वरुण त्रीरुत द्यून्त्रीणि मित्र धारययो रजांसि ।
वावधानावमति क्षत्रियस्यानु बतं रक्षमाणावजुर्यम् ।।१।।
पदार्थ:-हे (मित्र) प्राणवायु के और (वरुण) उदानवायु के
जैसे प्राण और उदानवायु वा (बी) तीन अर्थात् भूमि विजुली और सूर्य रूप अग्नि
जो (रोचना) प्रकाश होने योग्य उन को और (त्रीन्) तीन (धन्) प्रकाशों (उत)
awase
mednema
सदृश वर्तमान
.
(क्षत्रियस्य) राजपूत राजा के (अमतिम्) रूप को और (अजुर्य्यम्) नहीं जीर्ण
(अनु, व्रतम्) कर्म वा स्वभाव को (रममाणो). रक्षाकरते हुए धारण करते हैं वैसे
इन दोनों को आप दोनों (धारयथः) धारण करते हैं ॥१॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६६ ॥ २७७ ROO भावार्थ:-इस संसार में तीन प्रकार का प्रकाश है एक सूर्य का दूसरा विजुली का तीसरा पृथिवी में वर्तमान अग्नि का उन तीनों को जो क्षत्रिय आदि जानें वे अक्षयराज्य करने को समर्थ होवें ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । इरावतीवरुण धेनवौं वा मधुमा सिन्धवो मित्र दुहे । त्रयस्तस्थुर्वृषभासस्तिसृणां धिषणानां रेतोधा वि धुमन्तः ॥२॥ पदार्थ:-हे (वरुण) उत्तम कर्म के करने वाले और(मित्र) मित्र (वाम् आप दोनों को जो (इरावतीः) बहुत अन्न आदि सामग्रियां (धेनवः) और वाणियाँ गौओं के सदृश (मधुमत) मधुमान् जैसे हो वैसे' (दुह) अच्छे प्रकार पूरित करती हैं और जो (सिन्धवः) नदियां वे (वाम्) आप दोनों को उत्तम प्रकार पूरित करती हैं (तिस- णाम् ) तीन प्रकार के (धिषणानाम्) कर्म उपासना और ज्ञान के जाननेवालों के (त्रयः) तीन (ध मन्तः) उत्तम कामनाओं से युक्त (वृषभासः) वर्षानेवाले (रेतोधाः) और जो वीर्य को धारण करता है वह (वि) विशेष कर के (तस्थुः) स्थित होते हैं उनको आप दोनों संप्रयुक्त करिये ॥२॥ भावार्थ:-हे सब के मित्र जनो आप लोग गौ के सदृश सुख के देने वाले नदी के सदृश मल के दूर करने बुद्धि के देने और कामनाओं की सिद्धि के देने वाले हूजिये ॥२॥ मनुष्यों को निरन्तर प्रयत्न करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । प्रातर्देवीमदिति जोहवीमि मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य । राये मित्रावरुणा सर्वतातेले तोकाय तनयाय शं योः ॥३॥ पदार्थ:-हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के सदृश माता और पिता जैसे मैं (सर्वताता) सब के सुख देनेवाले यज्ञ में (राये) धन आदि के लिये (तोकाय) छोटे (तनयाय) कुमार के अर्थ (प्रातः) प्रातःकाल (देवीम्) श्रीष्ठ बुद्धि को (अदितिम्) अखण्डित बोध से युक्त को और (सूर्यस्य) सूर्य के (मध्यन्दिने) मध्याह्न (उदिता) उदित में (योः) संयुक्त (शम्) सुख को (जोहवीमि) अत्यन्त ग्रहण करता हूं और मैं (ईळे) प्रशंसा करता हूं वैसे आप दोनों आचरण कीजिये ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०- जो मनुष्य कुटुम्ब के पालन के लिये श्रेष्ठ पुरुषों की शिक्षा और वृद्धि के लिये सर्वदा प्रयत्न करते हैं वे विद्वानों के कल को करते हैं ॥३॥ 10 OdA AT..

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७० ॥ SONG dem मनुष्यों को क्या क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । या धारा रजसो रोचनस्योतादित्या दिव्या पार्थिवस्य । न वाँ देवा अमृता आ मिनन्ति व्रतानि मित्रावरुणा ध्रवाणि ॥४॥ पदार्थः-हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान वायु के समान वर्तमान अध्यापक और उपदेशक जनो जो (अमृताः) प्राप्त हुआ जीवनमुक्ति सुख जिन को वे (देवाः) विद्वान् जन (वाम्) आप दोनों के (ध्रुवाणि) निश्चित (व्रतानि) कर्मों का (न) नहीं (प्रा) सब प्रकार से (मिनन्ति) नाश करते हैं और या) जो (रोचनस्य) प्रकाश वाले (रजसः) लोक के (प्रादित्या) सूर्यों के (दिव्या) प्रकाशमानों के (उत) और (पार्थिवस्य) पृथिवी में विदित लोक के (धारा) धारण करने वाले वर्तमान हैं उन को जानिये ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो जो वायु विजुली और सूर्य सम्पूर्ण लोक के धारण करने वाले हैं वे परमेश्वर से धारण किये गये हैं ऐसा जान कर सम्पूर्ण ईश्वर ने ही धारण किया ऐसा जानना चाहिये ॥४॥ इस सूक्त में प्राण उदान और विजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में उनहत्तरवां सूक्त समाप्त हुमा । पुरुरुणेति चतुऋच सप्ततितमस्य सूक्तस्य । उरुचकिरात्रेय ऋषिः । मित्रा- वरुणो देवते । १-४ गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः॥ प्रब चार ऋचावाले सत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं। पुरूरुणां चिद्धयस्त्यवो नूनं वाँ वरुण । वंसिं वां सुमतिम् ॥१॥ पदार्थः-है (मित्र) मित्र और (वरुण) श्रीष्ठ(हि) जिस से (वाम्) श्राप दोनों का जो (पुरूरुणा) अत्यन्त बहुत (नूनम्) निश्चित (अवः) रक्षण प्रादि (अस्ति) है और जिसको (चित) निश्चित माप (वंसि सेवन करते हैं और जो (वाम्) आप दोनों की (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि को ग्रहण करता है उन आप दोनों और उस की हम लोग सेवा करें ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो जो रक्षक राजपुरुष प्रजात्रों की अत्यन्त रक्षा करते हैं वे ही प्रजापुरुषों से सेवा करने योग्य हैं ।।१।।

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ७०।। २७४ MIC Anoota Moun फिर उसी विषय को कहते हैं । ता वा सम्यगद्रहाणेषमश्याम धायसे । वयं ते रुद्रा स्याम ॥२॥ पदार्थ:-हे (अनुहाणा) द्वेष से रहित (रुद्रा) रोदन से हृदय द्रवित करने वाले (वयम्) हम लोग (वाम् ) आप दोनों के (धायसे) धारण करने को (इषम् ) अन्न वा विज्ञान को (सम्यक्) उत्तम प्रकार (अश्याम) प्राप्त होवें (ते) वे हम लोग (ता; उन दोनों का सेवन करते हुए सब के धारण करने को (स्याम) होवें ॥२॥ भावार्थः-वे ही अध्यापक और उपदेशक कृतक्रिय होवें जो क्रोध और लोभ आदि दोषों से रहित होवें और जो उन से पढ़ते हैं वे विद्या के धारण में प्रयत्न करते हुए होवें ॥२॥ फिर मनुष्य कैसे' वत्र्ते इस विषय को कहते हैं पातं नौ रुद्रा पायुभिरुत आयेथां सुत्रात्रा । तुर्याम दस्यूंन्तनूभिः ॥३॥ पदार्थ:--हे (रुबा) दुष्टों के रुलाने वाले सभा और सेना के स्वामी आप दोनों (सुत्रात्रा) उत्तम प्रकार पालन करने वाले के साथ (पायुभिः) रक्षणों वा रक्षकों से (नः) हम लोगों का (पातम्) पालन करिये और (उत) भी (आयेथाम्) रक्षा कीजिये जिस से हम लोग (तनूभिः) शरीरों से (दस्यून्) दुष्ट चोरों का (तु-म) नाश करें ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो जो सभा और सेना के स्वामी निरन्तर प्रजाओं की रक्षा करें उन का रक्षण प्रजा करें॥३॥ उत्तमों को किसी पुरुष से भी दान कभी न ग्रहण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । मा कस्पा सकतु यक्षं भुजेमा तनूभिः । मा शेष सा मा तनसा ॥४॥ पदार्थ:-हे (अद्भुतऋतू) अद्भुत बुद्धि वा कर्म वालो ! हमलोग (तनूभिः) शरीरों से (कस्य) किसी के (यक्षम्) दान का (मा) नहीं (भुजेम) सेवन करें और (शेषसा) अन्यों के साथ वर्तमान हुए (मा) नहीं पालन करें और (तनसा) पौत्र आदि के सहित (मा) नहीं पालन करें ॥४॥ भावार्थः विद्वान् जन ऐसा उपदेश करें जिस से कि किसी से दान कोई भी नहीं ग्रहण करे वैसे ही माता और पिता से पुत्र पौत्र प्रादि भी दान की रुचि न करें॥४॥ AMM २८० ऋग्वेदः मं० ५। सू०७१ ।। इस सूक्त में प्राण उदान और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह पञ्चम मण्डल में सत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ। मा नो गन्तमिति घ्यूचस्यैकसप्ततितमस्य सूक्तस्य बाहुवृक्त पात्रेय ऋषिः मित्रावरुणो देवते । १।२।३ गायत्रीछन्दः । षड्जः स्वरः।। अब तीन ऋचावाले इकहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर अध्यापक और उपदेशक क्या करें इस विषय को कहते हैं। आ नो गन्तं रिशादसा वरुण मित्रं बर्हणा उपेमं चारुमध्वरम् ॥१॥ पदार्थ:-है (रिशादसा) दुष्टों के मारनेवाले' (वरुण) श्रेष्ठ और (मित्र) मित्र (बर्हणा) बढ़ानेवाले आप दोनों (इमम्) इस (न:) हमलोगों के (चारुम्) सुन्दर (अध्वरम्) यज्ञ के (उप) समीप (आ) सब प्रकार से (गन्तम्) प्राप्त होमो ॥१॥ भावार्थः - जो विद्वान् जन व्यवहारनामक यज्ञ को करें तो हम लोगों की उन्नति के लिये समर्थ हों॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। विश्वस्य हि प्रचेतसा वरुण मित्र राजयः । ईश्वाना पिंप्यसं वियः ॥२॥ पदार्थ:-हे (प्रचेतसा) उत्तम ज्ञानवाले (ईशाना) समर्थ (वरुण) वर के देने और (मित्र) सब के सुख करने वालो (विश्वस्य) संसार के मध्य में आप दोनों (राजथः) प्रकाशित होते हैं और (धियः) बुद्धियों का (हि) ही (पिप्यतम्) बढाइये ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो जैसे अन्तरिक्ष में सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं वैसे मनुष्यों की बुद्धियों को बढ़ाइये ॥२॥ अब विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। उप नः सुतमा गतं वरुण मित्र दाशुषः । अस्य सोमस्य पीतये ॥३॥ पदार्थ:--हे (मित्र) मित्र और (वरुण) श्रेष्ठ आप दोनों (अस्य) इस (दाशुषः) देने वाले के (सोमस्य) बड़ी औषधियों के रस को (पीतये) पीने के लि: aa H ऋग्वेदः मं० ५। सू०७२ ॥ २८१ (न:) हम लोगों के (सुतम्) उत्पन्न किये हुए पदार्थ के (उप) समीप में (आगतम्) आइये ॥३॥ भावार्थ:--मनुष्य धार्मिक विद्वानों को बुला कर सदा उनका सत्कार करें॥३॥ इस सूक्त में मित्र श्रेष्ठ और विद्वानों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पञ्चम मण्डल में इकहत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ। प्रामित्र इति त्र्यचस्य द्विसप्ततितमस्य सूक्तस्य वाहूवृक्त पात्रेय ऋषिः । मित्रावरुणो देवते । १।२ । ३ उष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः ॥ अब तीन ऋचा वाले बहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मनुष्यों के प्रति कैसे कैसे वर्तना चाहिए इस विषय को कहते हैं । आ मित्रे वरुणे वयं गीमिर्जुहुमो अत्रिवत् । नि बहिर्षि सदतं सोमपीतये ॥१॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशक जनो जैसे (वयम्) हम लोग (गीभिः) वाणियों से (अभिवत) नहीं विद्यमान तीन प्रकार का दुःख जिस को उस के तुल्य (मित्रे) मिन और (वरुणे) उत्तम पुरुष के निमित्त (प्रा, अहम:) अच्छे प्रकार होम करते हैं और आप (सोमपीतये) सोम रस के पान करने के लिए (बहिषि) उत्तम गृह वा प्रासन में (नि, सदतम्) बैठिये ॥१॥ भावार्थः -- जो मित्र के सदृश बर्ताव करके संपूर्ण जगत् का सत्कार करते हैं उन के अनुसार सब को वर्तना चाहिये ॥१॥ फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये इस विषय को कहते हैं । व्रतेनं स्थो वक्षमा धर्मणा यासयजना । नि बर्हिषि सदतं सोमपीतये ॥२॥ पदार्थः -- हे (ध्रुवक्षेमा) निश्चित रक्षण और (यातयऽज्जना) यत्न कराते हुए जनों वाले मनुष्यो जो तुम (धर्माणा) धर्म के और (प्रतेन) धर्म युक्त कर्म के साथ वर्तमान (स्थः) हो वे आप (सोमपीतये) सोम पीने के लिये (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार में (निसदतम्) उपस्थित हूजिए ।।२।। appam २८२ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७३ ॥ भावार्थ:-जो मनुष्य निश्चित धर्म व्रत और शील को धारण करते हैं वे दृढ़ सुख से युक्त होते हैं ॥२॥ मनुष्यों को यहां कैसे वर्तना चाहिये इस विषय को कहते हैं । मित्रश्चं नो वरुणश्च जुषेतौ यज्ञमिष्टये । नि बहिर्षि सदता सोमपीतये ॥३॥ पदार्थ:-हे स्त्री पुरुषो जैसे (मित्रः) मित्र (च) और (वरुणः) स्वीकार करने योग्य जन (च) भी (इष्टये) इष्ट सुख के लिये और (सोमपीतये) सोमरस के पान के लिये (न:) हम लोगों के (यज्ञम्) यज्ञ का (जुषेताम्) सेवन करिये और (बर्हिषि) उत्तम व्यवहार में प्रवृत्त होते हैं वैसे' प्राप दोनो (नि, सदताम्) स्थिर हूजिये ॥३॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलु-जो मित्र के सदृश वर्ताव कर के वांछित सुख के सिद्ध करने की इच्छा करते हैं वे गणना करने योग्य होते हैं ॥३॥ इस सूक्त में मित्र और श्रेष्ठ विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पंचम मण्डल में बहत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ। यदद्य स्थइति दशर्चस्य त्रिसप्ततितमस्य सूक्तस्य। पौर आयेय ऋषिः । अश्विनी देवते । १।२ । ४ । ५। ७ निचूदनुष्टुप् । ३।६। ८।६ अनुष्टुप्- छन्दः । १० विराडनुष्टप्छन्दः । गान्धारः स्वरः ।। अब दश ऋचा वाले तिहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में फिर स्त्री पुरुष कैसे वत्त इस विषय को कहते हैं ।। यदद्य स्थः परावति यदावत्यश्विना । या पुरू पुरुभुजा यदन्तरिक्ष आ गंतम् ।।१।। पदार्थ:-हे स्त्री पुरुषो (यत्) जो (अश्विना) वायु बिजुली (परावति) दूर देश में और (यत्) जो (अर्वावति) निकट देश में (यत्) जो (पुरुभुजा) बहुतों के पालन करने वाले (वा) वा (यत्) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (पुरु) बहुत (स्थः) स्थित होते हैं उन के विज्ञान के लिये (अद्य) आज (मा, गतम्) आइये ॥१॥ on ऋग्वेदः मं० ५ । सू०७३ ।। २८३ गृहारम्भ करें वे स्त्री कर भावार्थ:-जो ब्रह्मचर्य से विद्या को पढ़कर परस्पर प्रीति पुरुष शिल्प विद्या को भी सिद्ध सकें ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । इह त्या पुरुभूतमा पुरुदंसांसि विभ्रता । वरस्या याम्यधिंगू हुवे तुविष्टमा भुजे ॥२॥ पदार्थ:-हे स्त्रि जिन (पुरुभूतमा) अत्यन्त वहुत व्यापक (पुरू) बहुत (दंसांसि) कर्मों को (बिभ्रता) धारण करते हुए (वरस्या) अत्यन्त श्रेष्ठ और (तुविष्टमा) अत्यन्त बलिष्ठ (अध्रिगू) अधिक चलने वालों को (इह) इस संसार में (भुजे) भोग के लिये (हुवे) स्वीकार करता हूं जिन दोनों से इष्ट सिद्धि को (यामि) प्राप्त होता हूं (त्या) उन दोनों को तू भी संप्रयुक्त कर ॥२॥ भावार्थ:-जहां स्त्री और पुरुष तुल्य गुण कर्म स्वभाव और सुरूप- वान् हैं वहां सम्पूर्ण पदार्थ विद्या होती है ॥२॥ मनुष्यों को इस के आगे क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । ईन्यिद्वपुषे वपुंश्चक्रं रथस्य येमथुः । युगा महना रजाँसि दीयथः ॥३॥ पदार्थ:-हे स्त्री और पुरुषो! वायु और सूर्य के सदृश जो आप दोनों (रथस्य) वाहन के (धकम् ) चलता है जिस से उस पहिये के सदृश (वपुषे) सुरूप के लिये (अन्यत्) अन्य (ई) प्राप्त होने वा जानने योग्य (वपुः) सुरूप को मनुष्यों के सम्बन्धी (युगा) वर्ष वा वर्षों के समूहों को (परि) सब ओर से प्राप्त करामो और (मह्ना) महत्त्व से (रजांसि) लोकों का दीयथः) नाश करते हो वे श्राप कालविद्या जानने योग्य हों ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो जैसे रथ के पहिये घूमते हैं वैसे दिन रात्रि काल सम्बन्धी चक्र घूमता है जिससे क्षण आदि तथा युग कल्प और महा- कल्प आदि संबन्धी गणित विद्या सिद्ध होती है ऐसा जानो ॥३॥ फिर मनुष्य क्या विशेष जानें इस विषय को कहते हैं ।। विश्वा हवे। नाना जातावरेपसा समस्मे बन्धुमेयथुः ॥४॥ पदार्थ:--हे अध्यापक और उपदेशक जनो! (यव) जो आप दोनों ने पर्यन्या नाहुवा SD ! तदूषु वामेना कृतं यद्वामनु -

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२८४
ऋग्वेदः मं० ५। सू०७३ ॥
(कृतम्) सिद्ध किया (तत्) उन (एना) इन (विश्वा) संपूर्णों की मैं (अनुस्तवे)
स्तुति करता हूँ और जो (अरेपसा) अपराध रहित (नाना) अनेक प्रकार (जातो)
प्रकट (वाम्) आर दोनों प्राप्त होते हैं वह (अस्मे) हम लोगों के (बन्धम् ) बन्धु
को (सम्, आ, ईयथः) प्राप्त हूजिये ।
(उ) और उस को मैं (वाम्) आप दोनों की
(स) उत्तम प्रकार प्रेरणा करू ॥४॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो! जैसे मैं
वायु और बिजुली की विद्या को जानूं
वैसे ही आप लोग भी जानिये ॥४॥
फिर स्त्री कैसी हों इस विषय को कहते हैं ।।
आ यद्वा सूर्या रथं तिष्ठद्रघुष्यदं सदा
परि वामरुषा क्यों घृणा वरन्त आतपः॥५॥
पवार्थ:-है मनुष्यो (यत्) जो (घृणा) प्रकाशित (अरुषा) लाल चमकते
हुए गुणों वाली (सूर्या) सूर्य संबन्धिनी प्रातर्वेला के सदृश स्त्री (वाम्) तुम्हारे
(रघुस्यदम्) थोड़े चलने वाले (रथम्) विमान आदि वाहन पर (आ) सब प्रकार से
(तिष्ठत्) स्थित होती है जिसको (वाम्) आप दोनों के (वयः) पक्षी (परि, वरन्ते)
सब ओर से स्वीकार करते हैं वह (पातपः) चारों ओर से उष्ण करने वाले धर्म
के सदृश (सवा) सब काल में उपकार करने वाली होती है ॥५॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में
वाचकलु
-जैसे प्रातःकाल सब प्रकार से
प्रिय और सुखकारक है वैसे परस्पर प्रीतियुक्त स्त्री पुरुष प्रसन्न हैं ॥५॥
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
युवोरत्रिश्चिकेतति नरी सुम्नेन चेतसा।
धर्म यामरेपसं नासत्यास्ना भुरण्यति ॥६॥
पदार्थ:-हे (नासत्या) असत्य से रहित (नरा) धर्म मार्ग में ले चलने
वाले दो नायक जनो (यत्) जो (पत्रिः) आध्यात्मिक आधिभौतिक आधिदैविक आदि
आप दोनों अध्यापक और उपदेशकों के (धर्मम्) यज्ञ को (चिकेतति) जानता और
(प्रास्ना) मुख से (वाम्) आप दोनों के (मरेपसम्) अपराधरहित यज्ञ को
(भुरण्यति) धारण करता है उसको आप जानिये ॥६।।
भावार्थः--जो पुरुष विद्वानों के संग से अध्ययन और अध्यापन रूप
यज्ञ का विस्तार करते हैं वे संसार के उपकारक हैं॥६॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू०७३॥ २८५ papa - OF GA फिर उसी विषय को कहते हैं । उग्रो वाँ कहो ययिः शृण्वे यामेषु संतनिः । यद्वां दंसौभिरश्विनात्रिनराववसति ॥७॥ पदार्थ:-हे (नरा) नायक (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो (यत्) जो (ययि:) चलने वाला (ककुहः) बड़ा (उग्रः) तेजस्वी (सन्तनिः) उत्तम प्रकार विस्तार कर्ता मैं (यामेष) प्रहरों में (वाम्) आप दोनों को (शृण्वे) सुनू और जो (वाम्) आप दोनों के (वंसोभिः) कर्मों से (अत्रिः) न तीन वार (प्राववर्तति) अत्यन्त वर्तमान हैं उन हम दोनों को आप दोनों बोध कराइये ॥७॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सूर्य और चन्द्रमा के के सदृश नियम से वर्ताव करके कार्यों को सिद्ध करते हैं वे सर्वदा उन्नत होते हैं ।।७।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । मध्वं ऊ षु मधूयुवा रुद्रा सिषक्ति पिप्युषी । यत्समुद्राति पर्षथः पक्वाः पृक्षों भरन्त वाम् ॥८॥ पदार्थ:-हे (मधूयुवा) सोम आदि रस' को मिलाने और (रुद्रा) दुष्टों के रुलाने वाले जनो (यव) जो (पिप्युषी) पान कराती हुई (मध्वः) सोमलता के रस को (ऊ) तर्क वितर्क से (सुसिषक्ति) अच्छे प्रकार सींचती है उससे आप दोनों (समुबा) उत्तम प्रकार द्रवित होने वालों को (अति, पर्षथः) सींचते हैं जिस से (पक्वाः) पके (पृक्षः) संबन्ध हुए फल' (वाम् ) आप दोनों (भरन्त) पोषण करते हैं ॥८॥ भावार्थः --हे मनुष्यो जैसे सूर्य और वायु वृष्टि से सब को सींचते और पके हुए फलों को उत्पन्न करते हैं वैसे आप लोग भी आचरण करो ॥८॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । सत्यमिद्वा उ अश्विना युवामाहुर्मयोभुवा । ता यामन्यामहूतमा यामन्ना मूळयत्तमा ।।९।। पदार्थ:-हे (मयोभुवा) सुख कारक (अश्विना) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश अध्यापक और उपदेशक जनो जो (युवाम्) आप दोनों (यामहूतमा) tane 44 AP का

२८६
ऋग्वेदः मं०५ । सू०७४ ।।
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प्रहरों को बुलाने वाले अत्यन्त (यामन्) प्रहर में (आ, मृळयत्तमा) सब ओर से
अतीव सुखकारकों को (माहुः) कहते हैं (ता) वे दोनों (यामन्) प्रहर में (बैं)
निश्चय (सत्यम्) यथार्थ व्यवहार वा जल को (उ) तर्क के साथ (इद) भी
प्रचरित कीजिये |
भावार्थ:-जैसे भूमि और मेघ सब प्राणियों के सुख कारक हैं वैसे ही
अध्यापक और उपदेशक जन अत्यन्त सुखकारक हों ॥६॥
फिर विद्वान् क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
इमा ब्रह्माणि वर्धनाश्विभ्यां सन्तु शन्तमा ।
या तक्षाम रथों इवाशेचाम बृहन्नमः ॥१०॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (अश्विभ्याम्) अन्तरिक्ष और पृथिवी से (या) जो
(इमा) ये (वर्धना) वृद्धि को प्राप्त होते जिन से उन (शन्तमा) अत्यन्त सुखकारक
(ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों का (रथानिव) रथों के समान (तक्षाम) आच्छादन करें
वा स्वीकार कर वे आप लोगों के लिये सुखकारक (सन्तु) हों उनसे (बृहत) बड़े
(नमः) सत्कार का हम (अबोचाम) उपदेश करें ॥१०॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-हे मनुष्यो आप जैसे वस्त्र प्रादि
से वाहनों को उढ़ा कर शृङ्गार युक्त करते हैं वैसे ही धन और धान्यों को
उत्तम प्रकार ग्रहण कर के उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त करें और शुद्ध अन्न
के भोग से बड़े विज्ञान को प्राप्त होकर अन्य जनों को भी इस का उपदेश
करें ॥१०॥
इस सूक्त में अन्तरिक्ष पृथिवी और विद्वान् के गुण वर्णन करने से' इस सूक्त के
अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह पंचम मण्डल में तिहत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ।
कूष्ठ इति दशर्चस्य चतुः सप्ततितमस्य सूक्तस्य पात्रेय ऋषिः । अश्विनी
देवते ।१।२।१० विरानुष्टुप् । ३ अनुष्टुप् ४ । ५।६।६ निवनुष्टुप
छन्दः । गान्धारः स्वरः । ७ विराडुष्णिक् । ८ निचूदुष्णिक छन्दः ऋषभः स्वरः॥
अब मनुष्यों को क्या अनुष्ठान करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
कूष्ठौ देवावश्विनाद्या दिवो मनावसू ।
तन् यथो वृषण्वसू अत्रिर्वामा विवासति ॥१॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू०७४ ॥ २८७ य CONDS AIN पदार्थ:--हे (मनावसू) मन को वसाने वाले (वृषण्वसू) उत्तमों को वसाने वाले (अश्विना) विद्या से व्याप्त (देवी) विद्वानो जो (कूष्ठः) पृथिवी में स्थित होने वाला (अत्रिः) विद्या व्याप्त जन (अद्य) इस समय (दिवः) प्रकाश के संबन्ध में (वाम्) आप दोनों का (प्राविवाति) सब प्रकार से सेवन करता है (तत्) उस को आप दोनों (श्रवथः) सुनते हैं ॥१॥ भावार्थ:-हे विद्वानो जो आप लोगों का सेवन करते हैं ये बहुश्रु त विचारशील विद्वान् जन सम्पूर्ण श्रेष्ठ कर्मों का सेवन करते हैं और वे दुःख से रहित होते हैं ॥१॥ फिर मनुष्यों को विद्वानों के प्रति कैसे पूछना चाहिये इस विषय को कहते हैं । कुह त्या कुह नु श्रुता दिवि देवा नासत्या। कस्मिन्ना यतथो जने को वो नदीनां सा ॥२॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशक जनो (त्या) वे (नासत्या) सत्यस्वरूप (कह) कहां वर्तमान हैं और (कुह) कहां (शुता) सुने हुए (देवा) श्रेष्ठ वाले होते हैं और तुम (कस्मिन्) किस (जने) जन में (मा, यतथ) सब ओर से यत्न करते हो उन आप दोनों की (नदीनाम्) नदियों के (सचा) संबन्ध से (क:) कौन (नु) शीघ्र है जो (दिवि) श्रेष्ठ व्यवहार वा प्रकाश में प्रयत्न करते हैं ॥२॥ भावार्थ:-जिज्ञासु जनों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर बिजुली आदि की विद्याओं को पूछे ॥२॥ अब मनुष्यों को क्या पूछना चाहिये इस विषय को कहते हैं । कं याथः कं है गच्छथः कमच्छा युञ्जाथे रयम् । कस्य ब्रह्माणि रण्यथो वयं वांमुश्मसीष्टये ॥३॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशक जनो आप दोनो (कम्) किस को (याथः) प्राप्त होते हो और (कम्) किसको (गच्छथः) जाते हो (कम्) किस (रथम्) रमण करने योग्य वाहन को (अच्छा) उत्तम प्रकार (युजाथे) युक्त होते हो और (कस्य) किस के (ह) निश्चय से (ब्रह्माणि) धन और धान्यों को (रण्यथः) रमाते हो (वयम्) हम लोग (इष्टये) इच्छा के लिये (वाम्) आप दोनों की (उश्मसि) कामना करें ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! विद्वान् जन जिस को प्राप्त होवें और युक्त होते तथा इच्छा करते हैं उसी की आप लोग इच्छा करो ॥३॥ WAM SAL २८८ ऋग्वेदः मं० ५ । सू०७४ | फिर उसी विषय को कहते हैं ।। पोरं चिद्धयंदप्रतं पौर पौराय जिन्वयः । यदी गृभीतातये सिंहमिव द्रुहस्पदे ॥४॥ पदार्थ:-हे (पौर) पुर में हुए आप (हि) ही (उदघृतम्) जल से युक्त (पौरम्) मनुष्य के सन्तान को (चित्) निश्चय से प्राप्त हूजिये और (पौराय) पुर में हुए मनुष्य के लिए अध्यापक और श्राप (जिन्यथः) प्राप्त होते हो (गृभीततातये) ग्रहण किया श्रेष्ठ कर्मों का विस्तार जिस ने उसके लिए (द्रुहः) शत्रु के ( के (पदे) प्राप्त होने योग्य स्थान में (सिहमिव) सिंह के सदृश (यत्) जिस को (ईम्) सब ओर से प्राप्त होते हो उस को श्राप सन्तुष्ट कीजिये ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे एक नगर के वासी जन परस्पर सुख की उन्नति करते हैं वैसे ही अन्य देशवासी भी करें॥४॥ फिर मनुष्य' कैसे हों इस विषय को कहते हैं ।। म च्यवानाज्जुजुरुषों वत्रिमत्कं न मुञ्चथः । युवा यी कथः पुनरा काममृण्वे बयः ॥५॥ पदार्थ:-हे स्त्री पुरुषो (जुजुरुषः) वृद्धावस्था को प्राप्त जन (च्यवानात) गमन से (अत्कम् ) व्याप्त (वत्रिम्) रूप और व्यभिचार का (प्रमुञ्चथः) त्याग करते हो और (यदि) जो (युवा) युवावस्था को प्राप्त पुरुष के (न) समान कार्य को (कृथः) करते हो (पुनः) फिर (वध्यः) स्त्री के (कामम्) मनोरथ को युवावस्था को प्राप्त हुआ मैं (ऋण्वे) सिद्ध करता हूं वैसे आप दोनों (प्रा) सब ओर से करिये ॥५॥ भावार्थ:-इस मंत्र में उपमावाचकलु०- जैसे वृद्धावस्थाओं में रूप का त्याग कर के वृद्धावस्था को प्राप्त होते हैं वैसे ही दोषों के जानने वाले गुणों का त्याग करके दोषों का ग्रहण करते हैं ॥५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अस्ति हि वामिह स्तोता स्मसि वां सन्दशि श्रिये । न श्रुतं म आ गंतमबोभिर्वाजिनीवसू ॥६॥ पदार्थ:-हे (वाजिनीवसू) बहुत अन्नादि क्रिया को वसाने वाले अध्यापक और उपदेशक जनो (इह) इस संसार में जो (वाम्) भाप दोनों को (स्तोता) प्रशंसा Mira ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७४ ॥ २८ ANSAR वन्ने) करने वाला (अस्ति) है उस को (हि) जिस से हम लोग प्राप्त (स्मसि) होवें और (वाम्) आप दोनों के (संवृशि) सादृश्य में (श्रिये) धन के लिए (नु) शीघ्र (शु तम्) सुनिये और (प्रबोभिः) रक्षणादिकों से मुझ को प्राप्त हूजिए (मे) मेरे कथन को सुनने को (मा, गतम्) माइए ।।६।। भावार्थ:-जो विद्वानों के गुणों की स्तुति करते हैं वे गुणों से युक्त हो और विद्वानों की समता को प्राप्त हो कर श्रीमान् होते हैं ॥६॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। को वामद्य पुरूणामा बन्ने मत्यानाम् । को विनों विप्रवाहसा को यज्ञैवाजिनीवसू ।।७।। पदार्थः-हे (विप्रवाहसा) विद्वानों से प्राप्त होने योग्य (वाजिनीवसू) धन धान्य प्राप्त कराने वालो (पुरूणाम् ) बहुत (मानाम्) मनुष्यों के मध्य में (क:) कौन (विप्रः) बुद्धिमान् (प्रध) आज (वाम्) आप दोनों का (मा, अच्छे प्रकार आदर करता है (क:) कौन (यः) यज्ञों से विद्या को और (क:) कौन बुद्धि का आदर करता है ॥७॥ भावार्थ:-जो विद्या की याचना करते हैं वे विद्वान् के समीप प्राप्त हो कर प्रश्न और उत्तरों से प्रानन्द कर के लाभ को प्राप्त होवें वे अन्यों को भी प्राप्त करा सकें।॥७॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। आ वां रथो रथानां येष्ठों यात्वश्विना । पुरू चिदस्मयुस्तिर आझूषो मत्यष्वा ॥८॥ पदार्थ:-हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो जो (बाम्) तुम्हारा (रथानाम्) वाहनों के मध्य में (येष्ठः) अतिशय चलने वाला (रथः) वाहन (यातु) चले (अस्मयुः) हम लोगों को प्राप्त होने वाली (चित्) भी (मत्र्येषु) मनुष्यों में (पागूषः) अङ्गों में हुई प्रशंसा (पुरू) बहुतों को (आ) सब प्रकार से प्राप्त हो और दुःखों का (तिरः) तिरस्कार कर के सुख प्राप्त होता है उस को आप दोनों प्राप्त (प्रा) हूजिए ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे अध्यापक और उपदेशक शिल्पीजन उत्तम वाहनों को रचते हैं वैसे सुख के साधनों को आप लोग उत्पन्न कीजिये ॥८॥ Cap ama ऋग्वेदः में० ५ । ।०७५ ॥ MO DHAN was फिर विद्वानों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। शमू षु वा मधूयुवास्माकमस्तु चर्कतिः । अर्वाचीना विचेतसा विभिः श्येनेवं दीयतम् ॥९।। पदार्थ:-हे (मधूयुवा) माधुर्य गुण से युक्त (विचेतसा) अनेक प्रकार के विज्ञानवाले (अर्वाचीना) सन्मुख चलते हुए दो जनो (वाम्) आप दोनों की जो (चतिः) अत्यन्त क्रिया है वह (अस्माकम्) हम लोगों की (अस्तु) हो जिस' से प्राप दोनों (उ) ही (विभिः) पक्षियों के साथ (श्येनेव) वाज पक्षी के सदृश (शम्) सुख वा कल्याण को (सु, दीयतम्) उत्तम प्रकार देवें ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं. -वे ही विद्वान् हैं जो अपने ऐश्वर्य को अन्य जनों के सुख के लिए नियुक्त करते हैं जैसे पक्षियों के साथ श्येन पक्षी शीघ्र चलता है वैसे इनके साथ विद्यार्थी जन पूर्ण रीति से चलें ॥६॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं। अश्विना यद्ध कहि चिच्छुश्रूयात मयं हवम् । वस्वीरू षु वां भुजा पञ्चन्ति सु वां पृचः ।।१०॥ पदार्थः-हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो (यत्) जो (कहि, चित) कभी हम लोगों की (इमम्) इस वर्तमान (हवम्) प्रशंसा को (शुश्रू यातम्) प्राप्त होनो और जो (पृचः) कामना और (वस्वीः) धनसंबन्धिनी (भुजः) भोग की क्रियानों को (वाम्) आप दोनों के संबन्ध में (सु) उत्तम प्रकार (पञ्चन्ति) संबन्धित करते हैं उन की (ह) निश्चय से (उ) और (वाम्) आप दोनों की हम लोग (स) उत्तम प्रकार कामना करें ।।१०॥ भावार्थ:---जो विद्वान् जन विद्यार्थियों की परीक्षा करते हैं उन को विद्यार्थीजन विद्वान् हो कर प्रसन्न करते हैं ॥१०॥ इस सूक्त में अध्यापक उपदेशक और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पञ्चम मण्डल में चौहत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ। । अथ नवर्चस्य पञ्चसप्ततितमस्य सूक्तस्य अवस्युरात्रेय ऋषिः । अश्विनी देवते. । १ । ३ पड्पितः । २ । ४ । ६ । ७ । ८ निवृत्पङ्क्तिः । ५ स्वराट्पङ्क्तिः । ६ विराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।।

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आ नो रत्नानि बिभ्रतावश्विना गच्छतं युवम् ।
ऋग्वेदः मं० ५ । सू०७५ ॥
२६१
अब नव ऋचावाले पिचहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में
विद्वानों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
प्रति प्रियतमं रथं वृषणं वसुवाहनम् । स्तोता वामश्विना
वृषिः स्तोमेन प्रति भूषति माध्वी मम श्रुतं हव॑म् ॥१॥
पदार्थ:-हे (माध्वी) मधुर आदि गुणों को प्राप्त कराने वाले (अश्विनी)
अध्यापक परीक्षकजनो जो (स्तोता) स्तुति करने और (ऋषिः) मन्त्र और अर्थ का
जानने वाला (स्तोमेन) स्तवन से (वाम्) आप दोनों के (प्रियतमम्) अत्यन्त प्रिय
(वृषणम्) सुख के वर्षाने और (वसुवाहनम् ) द्रव्यों के पहुंचाने वाले (रथम्) रमते हैं
जिस से उस विमान आदि वाहन' को (प्रतिभूषति) शोभित करता है उस के और
(मम) मेरे (हवम्) बुलाने को (प्रति, श्रु तम्) सुनिये ॥१॥
भावार्थ:--- जो अध्यापन और उपदेश करते हैं वे योग्य समय में
परीक्षा भी करें ॥१॥
फिर मनुष्यों को किस विषय की इच्छा करनी चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
अत्यायातमश्विना तिरो विश्वा अहं सना । दस्रा हिरण्य-
वर्त्तनी सुघुम्ना सिन्धुवाइसा माध्वी मम श्रुतं हव॑म् ॥२॥
पदार्थ:-हे (दस्रा) दुःख के दूर करने और (हिरण्यवर्तनी) ज्योतिः वा
सुवर्ण को वर्ताने वालो (सुषुम्ना) उत्तम सुख से युक्त तथा (सिन्धुवाहसा) नदियों
को प्राप्त कराने वालो (माध्वी) मधुर गति से युक्त और (अश्विना) शिल्प कार्य
के जानने वालो जैसे (अहम्) मैं (सना) सदा (विश्वाः) सम्पूर्ण विद्यानों को ग्रहण
करता हूँ वैसे आप दोनों (अत्यायातम्) देशों का अतिक्रमण करके आइए और (मम)
मेरा (तिरः) तिरस्कारपूर्वक- (हवम्) पठित (श्रु तम्) सुनिए ॥२॥
भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जिन विद्वानों से
विद्याओं को आप लोग पढ़ो और वे जब जब परीक्षा करें तब तब तिरस्कार
के साथ वर्तमान को धारण करें जिस से सब को अच्छे प्रकार विद्या प्राप्त
होवे ॥२॥
फिर मनुष्यों को कैसे वर्तना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।।
ab
रुद्रा हिरण्यवर्त्तनी जुषाणा वाजिनीवसू माध्वी मम श्रुतं हव॑म् ॥३॥

२६२ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७५ ।। पदार्थ:-हे (वाजिनीवसू) अन्न आदि से युक्त सामग्री को वसाने और (हिरण्यवर्तनी) सुवर्ण वा ज्योति को वर्त्ताने वाले (रत्नानि) रमणीय धनों को (जुषाणा) सेवा और (बिभ्रतो) धारण करते हुए (रुद्रा) दुष्टों को भय देने वाले (अश्विना) विद्या से युक्त (माध्वी) मधुर स्वभाव वालो (युवम्) पाप दोनों (नः) हम लोगों को (प्रा) सब प्रकार से (गच्छतम्) प्राप्त होइये और (मम) मेरे (हवम्) आह्वान को (श्रुतम्) सुनिये ॥३॥ भावार्थ:-वे ही भाग्यशाली होवें जो यथार्थवक्ता विद्वानों के समीप जाकर वा उन को बुलाकर प्रयत्न से विद्या का अभ्यास कर के परीक्षा देते हैं ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । सुष्टुभों वां वृषण्वसू रथे वाणीच्याहिता । उत वा ककुहो मुगः पृक्षः कृणोति वापुषो माध्वी मम श्रुतं हवंम् ॥४॥ पदार्थ:-हे (वृषण्वसू) बलिष्ठों को वसाने वाले (माध्वी) मधुर स्वभाव वाले विद्यायुक्त जनो जो (सुष्टुभः) उत्तम स्तुति करने वाला (वाम्) आप दोनों के (रथे) रथ में रमता है जिस से (वाणीची) वाणी (प्राहिता) स्थापित की गई (उत) और जो (वाम्) आप दोनों का (ककुहः) बड़ा (मृगः) शुद्ध करने वाला और (वापुष:) शरीर में हुआ (पृक्षः) अन्न को (कृणोति) करता है उसके और (मम) मेरे (हवम्) प्राह वान को (श्रुतम्) सुनिये ॥४॥ भावार्थ:-वही बड़ा होता है जो विद्वानों के समीप से विद्या और ग्रहण करता है ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । बोधिन्मनसा रथ्येषिरा हवनश्रतो । विभिश्च्यवान- मश्विना नि याथो अयाविनं माध्वी मम श्रुतं हवम् ।।५।। पदार्थ:-हे (रथ्या) रथों में श्रेष्ठ (इषिरा) चलने वाले (हवनश्रु ता) आहवान सुना गया जिन का और (बोधिन्मनसा) बोधित मन जिन का ऐसे (माध्वी) मधुर स्वभाव वाले (अश्विना) विद्या के अध्यापक और उपदेशक आप दोनों (अद्वयाविनम्) द्वन्द्वभाव से रहित (विभिः) पक्षियों के साथ (च्यवानम्) पूछते हुए को (नि) अत्यन्त (याथः) प्राप्त होते हो और (मम) मेरे (हवम्) प्राह वान को भी (अ तम) सुनिये ॥५॥ सुशीलता को HOM महन्तु) पहुँचावें ऋग्वेदः मं० ५। सू०७५ ॥ भावार्थ:- जो मनुष्य शुद्ध अन्तःकरण वाले, प्राप्त हुई शिल्पविद्या जिन को ऐसे और कपटरहित होकर विद्यार्थियों के परीक्षक हैं वे जगत् के मङ्गलकारक होते हैं ॥५॥ मनुष्यों को शिल्प विद्या से कार्य सिद्ध करने चाहिये इस विषय को कहते हैं । आ वो नरा मनोयुजोऽश्वासः प्रषितप्सवः । वयों वहन्तु पीतये सह सुम्नेभिरश्विना माध्वी मम श्रुतं हव॑म् ।।६।। पदार्थ:-हे (माध्वी) मधुर स्वभाव युक्त (नरा) नायक (अश्विना) शिल्प- विद्या के जानने वालो आप दोनों (सुम्नेभिः) सुखों के (सह) साथ (पीतये, पान के लिये जो (वाम् ! आप दोनों के (मनोयुजः) मन के सदृश युक्त होने वाले अत्यन्त वेगवान् (पुषितप्सवः) जलाया ईधन आदि जिन्होंने ऐसे (वयः) व्याप्ति शील उन के लिये (मम) मेरे (हवम्) आह वान को (श्रु तम्) सुनिये ॥६॥ भावार्थः जो मनुष्य पदार्थ विद्या से शिल्प सिद्ध कार्यों को सिद्ध करें तो अधिक धनी होवें ॥६॥ फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अश्विनावहे गच्छतं नासत्या मा वि वैनतम् । तिरश्चिदर्यथा परि वर्तियाँतमदाभ्या माध्वी मम श्रतं हवम् ॥७॥ पदार्थ:-हे (नासत्या) नहीं विद्यमान असत्य व्यवहार जिन के ऐसे (अवास्या) नहीं हिंसा करने योग्य माध्वी) मधुर स्वभाव वाले (अश्विनौ) विद्या में व्याप्त आप दोनों (इह) इस संसार में (प्रा, गच्छतम्) आइये तथा (अर्यया) वैश्य वा स्वामी की स्त्री से (वेनतम्) कामना करो (तिरः) तिरस्कार को (चित) भी (मा) मत करो (वत्तिः) मार्ग को (परि, यातम्) सब ओर से प्राप्त होतो और (मम) मेरे (हवम् ) आह,वान को वि) विशेष कर के (श्रुतम् । सुनो ।।७।। भावार्थ:-- हे स्त्री पुरुषो ! आप दोनों गृहस्थ मार्ग में वर्ताव कर के धर्म से सन्तान और ऐश्वर्य की इच्छा करो तथा अध्यापन और परीक्षा सदा ही करो ॥७॥ फिर स्त्री पुरुष क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। अस्मिन्यज्ञे अंदाभ्या जरितारं शुभस्पती । अवस्यु- मश्विना युवं गृणन्तमुपं भूषथो माध्वी मम श्रत हव॑म् ।।८।। SES . - Pawy H २६४ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ७५ ।। - पदार्थ:-हे (प्रदाभ्या) नहीं हिंसा करने योग्य (माध्वी) मधुर स्वभाव वाले (शुभः, पती) कल्याण कारक व्यवहार के पालन करने वाले (अश्विना) ब्रह्मचर्य से प्राप्त हुई विद्या जिन को ऐसे स्त्री पुरुषो (युवम्) आप दोनों (अस्मिन्) इस गृहा- श्रम नामक (यज्ञे) उत्तम प्रकार प्राप्त होने योग्य यज्ञ में (जरितारम्) स्तुति करने और (अवस्युम्) अपने कल्याण की इच्छा वा कामना करने वाले (गणन्तम्) स्तुति करते हुए जन को (उप, भूषय:) शोभित करते हो (मम) मेरे (हवम् ) आह वान को भी (श्रु तम्) सुनिये ॥८॥ भावार्थ:-जो स्त्री पुरुष गृहाश्रम में वर्तमान उत्तम आचरण वाले स्तुतियों से स्तुति करने वाले गृह के कृत्यों को शोभित करते हैं तथा अध्यापन और परीक्षा से विद्या की उन्नति करते हैं वे ही इस जगत् में प्रशंसित होते हैं। फिर स्त्री पुरुष कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ।। अ दुषा रुशल्पशुरागिरधात्वियः । अयोजि वां वृषण्वसू रथा दस्रावमयों माध्वी मम श्रुतं हवंम् ॥९॥ पदार्थ:-- है (वृषण्वसू) बलिष्ठ दो देहों को बसाने और (दस्त्री) दुःख के नाश करने वाले (माध्वी) मधुर स्वभाव वाले स्त्री पुरुषो जिन (वाम्) श्राप दोनों को (रुशल्पशुः) पाला पशु जिसने वह (ऋत्वियः) ऋतु ऋतु में यज्ञ कराने वाला (अग्निः) अग्नि (श्रा, अधायि) स्थापन किया जाता है और (उषा:) प्रातःकाल के सदृश (प्रभूत्) होवे और (अमर्त्यः) नहीं विद्यमान मनुष्य जिसमें ऐसा (रथः) वाहन (अयोजि) युक्त किया जाता वे आप दोनों (मम) मेरे (हवम्) आह वान को (श्रुतम्) सुनिये और हे स्त्री के पति जो पत्नी प्रातःकाल के सदृश होवे उस को निरन्तर प्रसन्न करो ।।६।। भावार्थ:-सदा स्त्री पुरुष ऋतुगामी होवें, सदा शरीर के आरोग्य और पुष्टि को करें तथा विद्या की उन्नति कर के प्रानन्द की उन्नति करें। इस सूक्त में अश्विपद व्याप्त विद्वान् स्त्री पुरुष के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में पिचहत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ।

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७६ ॥
२६५
AROP
Ram
अथ पञ्चर्चस्य षट्सप्ततितमस्य सूक्तस्य अत्रिऋषिः । अश्दिनौ देवते । १
२ स्वरादपवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३॥ ४ । ५ निवृत्रिष्टुप्छन्दः ।
धवतः स्वरः॥
अब पांच' ऋचावाले छिहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में
फिर स्त्री पुरुष कैसे वत्तें इस विषय को कहते हैं ।
आ भात्यग्निरुषसामनीकमुद्विमाणां देवया वाचो अस्थुः ।
अर्वाञ्चो नूनं रथ्येह यात पोपियांसमश्विना धर्ममच्छ ॥१॥
पदार्थः हे (रथ्या) वाहनों में प्रवीण (अर्वाञ्चा) नीचे चलने वाले
(अश्विना) स्त्री पुरुषो जो (विप्राणाम्) बुद्धिमानों की (देवयाः) विद्वानों को प्राप्त
होने वाली (वाच:) वारिणयां (प्रस्थः) हैं और जो (उषसाम्) प्रभात वेलाओं की
(अनीकम् ) सेनारूप (अग्निः) सूर्यरूप से परिणत हुआ अग्नि (उच) ऊपर को
(भाति) प्रकाशित होता है उनसे (इह) इस संसार में (पीपिवांसम्) उत्तम प्रकार
बढ़ते हुए (धर्मम्) गृहाश्रम के कृत्य नामक यज्ञ को (नूनम्) निश्चित (अच्छ) अच्छे
प्रकार (आ) सब प्रकार से (यातम्) प्राप्त होमो ॥१॥
भावार्थ:-हे बुद्धिमान् जनो! जैसे बिजुली आदि अग्नि बहुत
कार्यों को सिद्ध करता है वैसे ही स्त्री पुरुष मिल कर गृह कृत्यों को सिद्ध
करें ॥१॥
wepal
MEAN
M
my
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
न संस्कृतं प्र मिमीतो गमिष्ठान्ति नूनमश्विनोपस्तुतेह ।
दिवाभिपित्वेऽवसागमिष्ठा प्रत्यवति दाशुषे शम्भविष्टा ॥२॥
पदार्थ: ...हे (गमिष्ठा) अतिशय चलने वाले (शम्भविष्ठा) अतिशय सुख
कारक और (नूनम् निश्चित (उपस्ता प्राप्त हुई प्रशंसा से कीति की पाये
(अश्विना) स्त्री पुरुषो पाप (इह) इस संसार में (संस्कृतम्) किया संस्कार जिसका
उस को (न) नहीं (प्र, मिनीतः) उत्पन्न करते हो और (अभिपित्वे, सब ओर से
प्राप्त होने पर (अवसा) रक्षण आदि से (अतिम्) अमार्ग के (प्रति) प्रतिकूल
उत्पन्न करते हो और (वाशुषे) दान करने वाले के लिये (दिवा) दिवस से (अन्ति)
समीप में (प्रागमिष्ठा) चारों ओर अतिशय चलने वाले होभो ॥२॥
भावार्थ:--जो गृहस्थ जन-किया है संस्कार जिन का ऐसे पदार्थों
का वृथा नहीं नाश करते हैं वे लक्ष्मीवान् होते हैं ॥२॥

२६६ ऋग्वेदः मं० ५। सू०७६ ॥ - a फिर उसी विषय को कहते हैं ।। उता यांतं सङ्गवे मातरों मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य । दिवा नक्तमसा शन्तमेन नेदानों पीतिरश्विना ततान ॥३॥ पदार्थ:-हे (अश्विना) व्याप्तसुख स्त्री पुरुषो तुम (अह्नः) दिवस के (मध्यन्दिने) मध्याहन भाग में और (प्रातः) प्रभात समय में (सूर्यस्य) सूर्यमण्डल के (उविता) उदय होने में और दिन के (सङ्गवे) सायं समय में जिसमें गौवें संगत होती अर्थात् चर के आती (दिवा) दिन (नक्तम्) रात्रि (शन्तमेन) अत्यन्त सुख से (अवसा) रक्षा आदि के साथ (मा, यातम्) आप्रो (उत) और तुम दोनों की जो (पीतिः) पिप्रावट (प्रा, ततान) विस्तृत होती है उसको (इवानीम्) अब (न) नहीं नाश करो ॥३॥ भावार्थ:-किया विवाह जिन्होंने वे स्त्री पुरुष प्रातः, मध्याह्न सायं समयों में दिन रात्रि को कल्याण करने वाले कर्मों को सुखों से प्राप्त हों कभी आलस्य मत करें ॥३॥ फिर गृहस्थों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । इदं हि वॉ पदिवि स्थानमोक इमे गृहा अश्विनेदं दुरोणम् । आ नो दिवो बृहता पर्वतादाद्भ्यो यातमिषमूर्ज वहन्ता ॥४॥ पदार्थ:-हे (दिवः) प्रकाश से (बृहतः) बड़े (पर्वतात) मेघ और (प्रयः) जलों से (इषम्) अन्न और (ऊर्जम्) पराक्रम को (प्रा) सब प्रकार से (वहन्ता) प्राप्त करने वाले (अश्विना) स्त्री पुरुषो (नः) हम लोगों को वा हम लोगों के (इदम्) इस (दुरोणम्) गृह को (प्रा) सब प्रकार से (यातम्) प्राप्त होश्रो (हि) जिससे (इदम्) यह (वाम्) आप दोनों के (प्रदिवि) उत्तम प्रकाश में (स्थानम्) स्थित होते है जिस में उस (प्रोक:) गृह को (इमे) ये (गहाः) ग्रहण करने वाले गृहस्थ जन प्राप्त होते हैं उनको सब प्रकार से प्राप्त होतो ॥४॥ भावार्थ:-जो गृहस्थ जन गृहाश्रम के कर्मों को पूर्ण रीति से करते हैं वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं ।।४।। मनुष्यों को चाहिये कि पुरुषार्थ और विद्वानों के संग से ऐश्वर्य को प्राप्त करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । समश्विनोरवसा नूतनेन भयोभुवो सुप्रणीती गमेम । आ नो रयिं वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि ॥५॥ ANDA पनि ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७७ ।। २६७ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अश्विनोः) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश राजा और उपदेशक के (नूतनेन) नवीन (अवसा) अन्न' आदि और (मयोभुवा) सुखकारक से और (सुप्रणीती) उत्तम नीति से (न:) हम लोगों के लिये (रयिम्) धन को (प्रा) सब प्रकार (वहतम्) प्राप्त कराते हुए को (वीरान्) वीरों को (उत) और (विश्वानि) संपूर्ण (अमृता) स्वादु जलों और (सौभगानि) उत्तम धनादि ऐश्वर्यों के भाव रूपों को (प्रा) सब प्रकार प्राप्त कराते हुए को हम लोग (सम्, प्रा, गमेम) उत्तम प्रकार से प्राप्त होवें वैसे आप लोग भी प्राप्त होमो ॥५॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वांचकलु०---जो लोग यथार्थ वक्ताओं के उपदेश से राजा की न्याय व्यवस्था के साथ वर्ताव करके न्याय से उत्तम पुरुषों को और संपूर्ण ऐश्वर्यों को प्राप्त होते हैं वे अभीष्ट पदार्थों की सिद्धि को प्राप्त होते हैं ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि, अश्वि, राजा और उपदेशक के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये यह पंचम मण्डल में छिहत्तरवां सूक्त समाप्त हुना ॥ WR 40 अथ पञ्चर्चस्य सप्तसप्ततितमस्य सूक्तस्य अत्रिऋषिः । अश्विनौ देवते । १। २।३ । ४ । ५ त्रिष्टुप छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब पांच ऋचा वाले सतहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। प्रातर्यावाणा प्रथमा यजध्वं पुरा गृधादररुषः पिबातः । प्रातर्हि यज्ञमश्विना दधाते प्र शंसन्ति कवयंः पूर्वमाजः ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो तुम जैसे (पुरा) पहिले (प्रातर्यावाणा) जो सूर्य और उषा प्रातवेला में चलते हैं उन (प्रथमा) प्रथम और विस्तीर्ण स्वरूप वालों को और (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनों को (यजध्वम्) मिलाओ और (अररुषः) नहीं देने वाले की (गृध्रात्) अभिकांक्षा से रस को (पिबातः) पीते और (प्रातः, हि) प्रातःकाल ही (यज्ञम्) राज्य पालन' को (वधाते) धारण करते हैं उनकी (पूर्वभाजः) पूर्वजनों के पादर करने वाले (कवयः) बुद्धिमान् जन (प्र, शंसन्ति) प्रशंसा करते हैं वैसे उनको आप लोग जानो ॥१॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जो राजा और २६८ ऋग्वेदः मं० ५। सू०७७ ॥ - - A उपदेशक जन दिन में शयनरहित और जिनकी विद्वान् जन स्तुति करते हैं उनके सत्संग से आप लोग कांक्षा सिद्धि करो ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अर्जुष्टम् । उतान्यो अस्मद्यजते वि चावः पूर्वःपूर्वो यजमानो वनीयान् ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो आप लोग (प्रात:) प्रभात काल में (अश्विना) सूर्य और उषा को (यजध्वम्) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये और (हिनोत) वृद्धि कीजिये जहां (न) नहीं (सायम्) सन्ध्याकाल (अस्ति) है वहां जो (देवयाः) श्रेष्ठ गुण और विद्वानों को प्राप्त होने वाले हैं उनका (अजुष्टम्) सेवन करिये और जो (अन्यः) अन्य (अस्मद) हम लोगों से (यजते) मिलता है (च) और जो (वि, आव:) विशेष रक्षा करता है वह (उत) भी (पूर्वः पूर्वः) पहिला पहिला (यजमानः) यज्ञ करने वाला (बनीयान्) अतिशय विभाग करने वाला होता है उसका भी सत्कार करो ॥२॥ भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन रात्रि के चौथे शेष प्रहर में उठकर जैसे नियम से अन्तरिक्ष और पृथिवी वर्तमान हैं वैसे वर्ताव करके सब की रक्षा करें ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। हिरण्यत्वङ् मधुवर्णो घृतस्नुः पृक्षो वहन्ना रथों वर्तते बाम् । मनौजवा अश्विना वातरंहा येनातियाथो दुरितानि विश्वा ॥३॥ पदार्थः-हे (अश्विना) शिल्प' विद्या के जानने वालो (वाम्) आप दोनों का (हिरण्यस्वक्) तेज और सुवर्ण के सदृश त्वचा पर का वर्ण और (मधुवर्णः) देखने योग्य वर्ण जिस का वह (घृतस्नुः) जल' को शुद्ध करने वाला (पृमः) अन्न आदि को (वहन) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता हुआ (रथः) विमान आदि वाहन को (मा, वर्तते) सब प्रकार वर्तमान है और जिस को (मनोजवाः) मन के सदृश वेग वाले (वातरंहाः) वायु के सदृश वेग युक्त अग्नि आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं और (येन) जिस रथ से (विश्वा) सम्पूर्ण (दुरितानि) दुःख से प्राप्त होने योग्य स्थानान्तरों को (प्रतियाथः) अत्यन्त प्राप्त होते हैं उस' को आप दोनों रचिये ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य विमानादिकों को अग्नि और जलादिकों से 2010 ऋग्वेदः मं० ५। सू०७७ ॥ २६६ चलावें तो वे विमान आदि मन और वायु के सदृश शीघ्र जा कर लौट पावें ॥३॥ Aurna Pare P फिर उसी विषय को कहते हैं । यो भूयिष्ठं नासत्याभ्यां विवेष चनिष्ठं पित्वो ररते विभागे । स तोकर्मस्य पीपरच्छमीभिरनलभासः सदमित्ततुर्यात् ।।४।। पवार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (नासत्याभ्याम्) नहीं विद्यमान असत्य जिनके उनसे (शमीभिः) कर्मों के द्वारा (भूयिष्ठम्) अतीव बहुत (चनिष्ठम्) अतिशय अन्न को (विवेष) व्याप्त होता है और (पित्वः) अन्न के (विभागे) विभाग में (ररते) देता है (सः) वह (अनूर्वभासः) नहीं ऊपर कान्तियां जिसकी (अस्य) इसके (तोकम्) सन्तान का (पीपरत) पालन करे वह (इत) ही (सदम्) प्राप्त दुःख का (तुतर्यात्) नाश करे ॥४॥ भावार्थ:-जो अग्नि और जल से बहुत कार्यों को सिद्ध करते हैं वे जगत् का रक्षण करके सम्पूर्ण दु:ख के नाश करने योग्य हैं ॥४॥ फिर मनुष्यों को कैसा वर्ताव करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । समश्विनोरवसा नूतनेन मयोभुवा सुप्रणीती गमेम । आ नौ रयि वहतमोत वीराना विश्वान्यमृता सौभगानि ||६|| पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे हम लोग (अश्विनो:) अग्नि और जल के समीप से (नूतनेन) नवीन (मयोभुवा) सुख के साधक (अवसा) रक्षण प्रादि और (सुप्रणीति) श्रेष्ठ नीति से (नः) हम अपने लिये (रयिम्) धन को (आ, वहतम्) प्राप्त कराते हुए को और हमारे लिये (वीरान्) शूरता आदि गुणों से युक्त पुरुषों को (उल) और (विश्वानि) संपूर्ण (अमृता) जलों के सदृश सुख कारक (सौभगानि) सुन्दर ऐश्वर्यों को प्राप्त कराते हुए को (सम्, पा, गमेम) मिलें वैसे उनको आप लोग भी (आ) उत्तम प्रकार मिलिये ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - जैसे यथार्थवक्ता जन सब के साथ वर्ताव करें वैसे इन सब लोगों को वर्ताव करना चाहिये ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि, जल, विद्वान् और राजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में सतहत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ । M mer .

३००
ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७८ ।।
अथ नवर्चस्याष्टसप्ततितमस्य सूक्तस्य सप्तवध्रिरात्रेय ऋषिः। अश्विनौ
देवते।१।२।३ उष्णिक् छन्दः । ऋषभः स्वरः। ४ निस्त्रिष्टुप् छन्दः ।
धंवतः स्वरः । ५। ६ अनुष्टुप् । ७।८ । ६ निचूदनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ॥
अब नव ऋचावाले अठहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ किया है उसके प्रथम मंत्र
में फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
अविनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वैनतम् ।
इंसाविव पततमा सुताँ उप ॥१॥
पदार्थ:-हे (नासत्या) सत्य व्यवहार से युक्त तथा (अश्विनौ) वायु और
जल के सदृश उपदेश देने वा ग्रहण करने वाले प्राप दोनों (इह) इस संसार में
(हंसाविव) दो हंसों के सदृश (श्रा, गच्छतम्) आइये और (सुतान्) उत्पन्न हुए
पदार्थों के (उप) समीप (आ) सब प्रकार (पततम्) प्राप्त हूजिये तथा (मा, वि,
वेनतम्) विरुद्ध कामना मत कीजिये ॥१॥
भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु -जो विमान से हस के सदृश
अन्तरिक्ष में जा आकर विरुद्ध आचरण का त्याग करके सत्य की कामना
करते हैं वे बहुत सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
अश्विना हरिणाविव गौराविवानु यर्वसम् ।
इंसाविव पततमा सुतौं उप ॥२॥
पदार्थ:-हे (अश्विना) यजमान और यज्ञ कराने वाले आप दोनों
(हंसाविय) वो हंसों के सदृश (सुतान्) उत्पन्न हुए ऐश्वर्य आदिकों के (उप)
समीप (मा, पततम्) आइये तथा (यवसम्) सोमलता के (अनु) पश्चात्
(हरिणाविव) जैसे हरिण दौड़ते हैं वैसे और (गौराविव) जैसे दो मृग दौड़ते हैं
वैसे आइये ॥२॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य जल और बिजुली को
सिद्ध करते हैं वे हरिण के सदृश शीघ्र जाने के योग्य हैं ।।२।।
फिर उसी विषय को कहते हैं।
अविना वाजिनीवसू जुषेयाँ यज्ञमिष्टये ।
इंसाविव पततमा सुताँ उपं ॥३॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू०७८ ।। पदार्थः- है (वाजिनीवसू) विज्ञान क्रिया को वसाने वाले (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक जनो आप लोग (इष्टये) इष्ट सुख की प्राप्ति के लिये (यज्ञम् ) विज्ञान की संगतिमय यज्ञ का (श्रा) सब प्रकार से (जुषेथाम् ) सेवन करिये तथा (हंसाविव) दो हंसों के समान (सुतान्) पुत्र के सदृश वर्तमान शिक्षा करने योग्य शिष्यों के (उप) समीप (पततम्) प्राप्त हूजिये ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-उपदेशक जन सम्पूर्ण शिक्षा करने योग्य मनुष्यों को पुत्र के सदृश मान कर और सब जगह भ्रमण कर के सत्य उपदेश से कृतकृत्य करें।॥३॥ फिर स्त्री पुरुष क्या करें इस विषय को कहते हैं । अत्रिर्यामवरोहन्नबीसमजोहवीन्नाधमानेव योषा । श्येनस्य चिज्जवसा नूतनेनागच्छतमश्विना शन्तमेन ॥४॥ पदार्थ:-हे (अश्विना) सूर्य और चन्द्रमा के सदृश वर्तमान अध्यापक और उपदेशक जनो (यत्) जो (अत्रिः) त्रिविध दुःखरहित (वाम्) आप दोनों को (अवरोहन प्राप्त होता हुआ (योषा) स्त्री (नाधमानेव) जो याचना करती उस के समान (ऋबीसम्) सरल को (अजोहवीत्) अत्यन्त आह्वान करता है उस के साथ (श्येनस्य) वाज पक्षी के (नूतनेन) नवीन (शन्तमेन) अतिशय सुख- : कारक (जवसा) वेग के (चित्) सदृश मान से (मा, अगच्छतम्) आइये ॥४॥ भावार्थः- इस मन्त्र में उपमालं. -जो विद्वानों के अनुकरण से सरल स्वभाव को स्वीकार कर के प्रयत्न करते हैं वे सर्वदा सुखी होते हैं॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वि जिहीष्व वनस्पते योनिः सूष्यन्त्या इव । श्रुतं में अश्विना हवे सप्तवधिं च मुञ्चतम् ॥५॥ पदार्थ:-हे (अश्विना) विद्या से व्याप्त अध्यापक और परीक्षक जनो (मे) मेरे (हवम्) शब्द को (व तम्) श्रवण को (च) और (सप्तवध्रिम्) नष्ट हुए सात इन्द्रिय जिस के उसका (मुञ्चतम्) त्याग करो और (वनस्पते) हे वनस्पति (सूष्यन्त्याइव) गर्भवती स्त्री के सदृश (योनिः) कारण आप (वि) विशेष करके (जिहीष्व) त्याग करो ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-आप लोग यथार्थवक्ता अध्यापक ( S ऋग्वेदः मं० ५। सू०७६ ॥ tion और उपदेशकों की इच्छा करिये और जैसे गर्भवती स्त्री बालक का त्याग करती है वैसे ही अन्तःकरण से अविद्या को दूर करिये ॥५॥ इस के अनन्तर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं। भीताय नाधमानाय ऋषये सप्तर्वध्रये । मायाभिरश्विना युवं वृक्षं सं च वि चाचथः ॥६॥ पदार्थ:-हे (अश्विना) अध्यापक और उपदेशकजनो (युवम्) आप दोनों (मायाभिः) बुद्धियों से' (भीताय) भय' को प्राप्त (नाधमानाय) उपतप्यमान और (सप्तवध्ये) पांच ज्ञानेन्द्रियां मन और बुद्धि ये सात नष्ट हुई जिसकी अर्थात् इन की प्रबलता से रहित उसके लिए और (ऋषये) वेदार्थ के जानने वाले के लिए (च) भी (सम्, अचथः) उत्तम प्रकार जाइये (वृक्षम्, च) और जो काटा जाता उस वृक्ष को (वि) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये ॥६॥ भावार्थ:-विद्वानों की योग्यता है कि बुद्धि के देने से विद्यादि भय के कारण डरे हुओं को भयरहित करके तथा संसार में मोह और अधर्म के योग से वियुक्त करके सुखी करें ॥६॥ कैसा गर्भ और जन्म इस विषय को कहते हैं । यथा वात: पुष्करिणी समिङ्गयति सर्वतः। एवा ते गर्भ एजतु निरैतु दमास्यः ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यथा) जिस प्रकार से (वातः) पवन (पुष्करिणीम्) छोटे तलाबों को (सर्वतः) सब ओर से (समिङ्गति) उत्तम प्रकार हिलाता है वैसे (एवा) ही (ते) आपका (गर्भः) जो धारण किया जाता वह गर्भ (एजतु) कंपित होवे और (दशमास्यः) दश महीनों में हुआ (निरैतु) निकले ऐसा जानो ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -जो स्त्रीपुरुष ब्रह्मचर्य से विद्या को पढ़ के विवाह करें तो दशवें मास में प्रसव हो ऐसा जानना चाहिए।॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। यथा वातो यथा वनं या समुद्र एजति । एवा त्वं देशमास्य सहावेहि जरायणा ॥८॥ पदार्थ:-हे (दशमास्य) दश महीनों में उत्पन्न हुए (यथा) जिस प्रकार से - sh The Enlan ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७६ ।। D. DARA (वातः) वायु (यथा) जिस प्रकार से (वनम्) जङ्गल' (यथा) जिस प्रकार से (समुद्रः) समुद्र (एजति) कम्पित होता वा चलता है वैसे (एवा) ही (त्वम्) आप (जरायुणा) देह के ढांपने वाले के (सह) सहित (अय, इहि) आइये ।।८।। भावार्थः- इस मन्त्र में उपमालं०-वही गर्भ और उसमें स्थित बालक उत्तम होता है जो दशवें महीने में होता है ।।८।। फिर उसी विषय को कहते हैं । दश मासाञ्छशयाना कुमारो अधि मातरि । निरैतुं जीवो अक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि ॥९॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (जीव:) प्राण आदि का धारण करने वाला (अधि) ऊपर (मातरि) माता में (दश) दश (मासान्) महीनों तक (शशयानः) शयन करता हुआ (अक्षतः) घाव से रहित (कुमारः) बालक (निरंतु) निकले' वह (जीव:) जीव (जीवन्त्याः) जीवती हुई के (अधि) ऊपर जीवता है ।।६।। भावार्थ:-वे ही सन्तान उत्तम होते हैं कि जो दश महीने पूर्ण हों जबतक तबतक गर्भ में स्थित होकर प्रकट होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में अश्विपद वाच्य स्त्रीपुरुष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पञ्चम मण्डल में अठहत्तरवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ दशस्यैकोनाशीतितमस्य सूक्तस्थ सत्यधवा आत्रेय ऋषिः । उषा देवता । १ स्वराड्ब्राह्मी गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । २ । ३ । ७ भुरिग्बृहती। १० स्वराड् बृहतीछन्दः । मध्यमः स्वरः।४।५।६ पङ्क्तिः । ६ । ६ निवृत्- पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः।। अब दश ऋचावाले उन्नासिवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में स्त्री कैसी हो इस विषय को कहते हैं । महे नो अद्य बोधयोषो राये दिविमती यथा चिन्नो अबोधयः सत्यवसि वाय्ये सुजाते अश्वसुन्ते ॥१॥ पदार्थ:-हे (उषः) श्रेष्ठ गुणों से प्रातः काल के सदृश वर्तमान (वाय्ये) डोरे के सदृश फैलाने योग्य सन्ततिरूप (सुनाते) उत्तम रीति से उत्पन्न (अश्वसनते)

३०४
ऋग्वेदः मं० ५। सू० ७६ ।।
बड़ी प्रिया वाणी जिस की ऐसी हे स्त्रि (यथा) जैसे (दिविस्मती) प्रकाश से युक्त
प्रातला (महे) बड़े (राये) धन के लिए प्रबोध देती है वैसे (अद्य) आज (नः) हम
लोगों को (बोधय) जनाइये और (चित्) भी (सत्यवसि) सत्यों के श्रवण सत्य वा
अन्न में (नः) हम लोगों को (अबोधयः) जनाइये ॥१॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० - जैसे प्रातर्वेला दिन को उत्पन्न
कर के सब को जगाती है वैसे ही विद्यायुक्त स्त्री अपने सन्तानों को
अविद्या के सदृश वर्तमान निद्रा से उठा कर विद्या को जनाती है ॥१॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
या सुंनीथे शौचद्रथे व्यौच्छो दुहितर्दिवः ।
सा व्युच्छ सहीयसि सत्यवसि वाय्य मुजाते अश्वसूनृते ॥२॥
पदार्थ:-- है (अश्वसूनृते) बड़े अन्न से युक्त (सुजाते) उत्तम संस्कारों से
उत्पन्न (वाय्ये) जनाने योग्य (सहीयसि) अतिशय सहने वाली (दिवः) सूर्य की
(दुहितः) पुत्री के समान वत्तंमान स्त्री (या) जो तू (शौचद्रथे) पवित्र रथ में
(सुनीथे) श्रीष्ठ न्याय में (सत्यवसि) सत्य का श्रवण जिसमें उसमें (वि, औच्छः)
विशेष वसाती है (सा) वह तू हम लोगों को सुख' में (वि, उच्छ) विशेष
व
lavan
-
वसावे ।।२।।
भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलु० जैसे प्रातर्वेला सब को सुख में
वसाती है वैसे ही श्रेष्ठ स्त्री आनन्दयुक्त गृहाश्रम में सब को वसाती
है ॥२॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
सा नौ अधाभरसुव्युच्छा दुहितर्दिवः ।
यो व्यच्छसहीयसि सत्यवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते ।।३॥
पदार्थ:-हे (सत्यवसि) सत्य' व्यवहार से प्राप्त अन्न आदि ऐश्वर्य वाली
(सुजाते, अच्छी विद्या से प्रकट हुई (वाय्ये) प्राप्त होने योग्य (अश्वसूनृते) बड़े ज्ञान
से युक्त (सहीयसि) अतिशय सहनशील' और (दिव:) कामना करते हुए की (दुहितः)
कन्या के सदृश विदुषी स्त्री (यो) जो तू (श्राभरद्वसः) सब प्रकार से धनों को
धारण करने वाली हुई (न:) हम लोगों को (वि) विशेष करके (मोच्छः) निवास
कराने वाली है (सा) वह आप (अध) आज उत्तम सुख में (वि) विशेष करके
(उच्छ) निवास कराओ ॥३॥

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७६ ।। स 42 भावार्थ:-जो स्त्रियां प्रातर्वेला के सदृश श्रेष्ठ गुणवाली हों तो सब को आनन्द में वसाने के योग्य होती हैं ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अभि ये त्वा विभावरि स्तोमैगुणन्ति वह्नयः । मधेघोनि सुश्रियो दामन्वन्तः सुरातयः सुजाते अश्वसूनृते ॥४॥ पदार्थः --- हे (मघोनि) बहुत धन से युक्त (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (अश्वसनते) बड़े ज्ञान से युक्त और (विभावरि) प्रकाशवती प्रातला के सदृश वर्तमान विद्यायुक्त' स्त्री (ये) जो विद्वान् जन (सुश्रियः) सुन्दर लक्ष्मी जिन को ऐसे (दामन्वन्तः) बहुत दान क्रिया से युक्त (सुरातमः) सुन्दर दान की इच्छा जिन की थे (वह्नयः) पहुंचाने वाले अग्नियों के समान वर्तमान विद्वान् जन (मः) धनों से और (स्तोमैः) स्तोत्रों से (त्वा) पाप को (अभि) सन्मुख (गणन्ति) स्तुति करते हैं वे पाप से सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु०-जैसे अग्नि प्रातर्वेलामों के कर्ता हैं वैसे ही शिक्षक जन विद्या की प्राप्ति करने वाले हों ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। यचिद्धि ते गणा इमे छदयन्ति मघाये । परिचितुष्टयो दधुर्ददतो राधो अहथं सुजाते अश्वन्ते ॥५॥ पदार्थ:-हे (अश्वसूनृते) बड़े ज्ञान से युक्त (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई विदुषि स्त्रि ! (यद) जो (इमे) ये (यष्टयः) कामना करते हुए (ते) आप के (गणाः) समूह (मघत्तये) धनदान के लिए (सहयम् ) लज्जा आदि दोष से रहित को (चित्) और (राधः) धन को (ददतः) दोनेवालों को (चित) निश्चय (छवयन्ति) प्रबल करते हैं वे निश्चय (हि) ही सुखों को (परि, दधुः) धारण करें ।।।। भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलुव -जैसे प्रातःकाल के किरणसमूह अपने तेज से सब को ढांपते हैं वैसे ही शुभगुण वाली स्त्रियां अपने शुभ- गुणों से सब को आच्छादित करती हैं ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। ऐषु धा वीरवद्यश उपों मघोनि सूरि । ये नो राधांस्यहया मघवांनो असित सुजाते अश्व॑सूनृते ।।६।। TRA Hities ma Date min ऋग्वेदः ० ५ । सू० ७६ ।। पदार्थः- हे (अश्वसूनते) बड़े ज्ञानवाली - (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (मधोनि) प्रशंसित धन से युक्त और (उषः) प्रातःकाल के सदृश वर्तमान उत्तम स्त्री तू (एषु) इन स्त्री पुरुषों और (सूरिषु) विद्वानों में (वीरवत्) वीरजन विद्यमान जिसमें उस (यशः) यश को (आ) सब प्रकार से (धाः) धारण कर और ये) जो (मघवानः) बहुत धनों से युक्त जन (नः) हम लोगों को (अहया) विना लज्जा से कहे गये (राधांसि) अन्नों को (अरासत) देखें उनका तु सत्कार कर ।।६।। भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु' -- वही प्रशंसित स्त्री है जो पिता और पति के कुल में श्रेष्ठ आचरण से पिता और पति के कुल को प्रकाशित करे ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । तेभ्यो द्युम्नं वृहद्यश उवा मघोन्या वह । ये नो राधांस्यश्च्या गया भजन्त सूरयः सुजाते अश्वसूनृते ॥७॥ पदार्थ:-हे (अश्वसुनते) बड़े ज्ञान से युक्त और (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (मघोनि) बहुत धनवती (उष:) प्रातःकाल के सदृश वर्तमान विदुषि स्त्रि ! (ये) जो (नः) हम लोगों में (सूरयः) विद्वान् जन (अश्व्या) घोड़ों के लिए और (गव्या) गौत्रों के लिए हितकारक (राधांसि) धनों का (भजन्त) सेवन करते हैं (तेभ्यः) उन विद्वानों के लिए (बहत) बड़े (धम्नम्) धन और (यशः) यश को (श्रा, वह) सब प्रकार से प्राप्त कराम्रो ॥७॥ भावार्थ:-- जो विद्वान् जन सब के सुख के लिए पदार्थों की वृद्धि करते हैं वे प्रातःकाल के सदृश प्रकाशित यशवाले होकर सुखी होते हैं ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उत नो गोमतोरिष आ वहा दुहितर्दिवः । सार्क सूर्यस्थ रश्मिभिः शुक्र शोचद्भिरर्चिभिः सुजाते अश्वसूनृते ॥८॥ पदार्थ:-हे (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (अश्वसुनते) बड़े ज्ञान से युक्त और (दिव:) प्रकाशमान की (दुहितः) कन्या के सदृश वर्तमान स्त्रि (सूर्यस्य) सूर्य के (रश्मिभिः) किरणों के (साकम्) साथ (उत) और (शुक्रः) शुद्ध (शोचद्भिः) पवित्र क ने वाले (अचिभिः) श्रेष्ठ गुण' कर्म और स्वभावों के साथ (नः) हम लोगों को (गोमतीः) गोवै विद्यमान जिनमें उन (इषः) अन्न आदिकों को (मा, वहा) सब प्रकार से प्राप्त कराइये ।।८।।

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ७६ ।। ३०७ AND atthayer hta Barsa Har भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है--- जैसे सूर्य की किरणों से उत्पन्न उषा उपकार करने वाली होती है वैसे ही शुभगुण कर्म और स्वभावों के सहित स्त्री आनन्द और उपकार करने वाली होती है ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । व्युच्छा दुहितर्दिवो मा चिरं तनुथा अपः। नेत्या स्तेनं यथा रिपुं तांति सूरों अर्चिषा सुजाते अश्वसूनृते ॥९॥ पदार्थ:-हे (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (अश्वसूनृते) बड़े ज्ञान से युक्त (दिव:) प्रकाश की (दुहितः) कन्या के सदृश वर्तमान उत्तम आचरण वाली स्त्रि तू (अपः) कर्मको (चिरम् ) बहुत काल पर्यन्त (मा) नहीं (तनुथाः) विस्तार कर (यथा) जैसे (रिपुम्) शत्रुको (तपाति) संतापित करती है वैसे (स्तेनम्) चोर को सन्तापित कर और (त्वा) तुझको कोई भी (न) नहीं सन्ताप युक्त करे और जैसे (अचिधा) तेज से (सूरः) सूर्य सब को तपाता है वैसे (इत्) ही तू दुष्टजनों को सन्तापित करके हम लोगों को (वि, उच्छा) अच्छे प्रकार वसानो ॥६॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में बाचकलु०-जो स्त्री और पुरुष माद, आलसी और चोर नहीं होते हैं वे सूर्य के सदृश प्रकाशित होते हैं ।।६।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। एतावद्धेदुषस्त्वं भूयो वा दातुमर्हसि । या स्तोत्भ्यो विभावयुच्छन्ती न प्रमीयंसे सुजाते अश्वसूत्रते ॥१०॥ पदार्थः -- हे (अश्वसूनृते) बड़े ज्ञान से युक्त (सुजाते) उत्तम विद्या से प्रकट हुई (विभावरि) प्रकाशमान और (उषः) प्रातर्वेला के सदृश वर्तमान स्त्री (त्वम्) तू (एतावत्) इतने को (वा) वा (भूयः) अधिक को (वा) भी (दातुम्) देने को (अर्हसि) योग्य है और (या) जो तू (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वालों के लिए (उच्छन्ती) निवास करती हुई वर्तमान है वह तू अपने स्वरूप से (इद) ही (न) नहीं (प्रमीयसे) मरती है ॥१०॥ भावार्थः - इस मन्त्र में वाचकलु'० -हे स्त्रीजनो! जैसे उषर्वेला थोड़ी भी बड़े आनन्दों को देती है वैसे तुम होमो॥१०॥ इस सूक्त में प्रातः, और स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह पंचम मण्डल में उन्नासीवां सूक्त समाप्त हुआ। DAN atany OM s - MAN पदार्थ:--ह उत्तम ३०८ ऋग्वेदः मं०५ । सू० ८० ॥ अथ षडर्चस्याऽशीतितमस्य सूक्तस्य सत्यश्रवा पात्रेय ऋषिः । उषा देवता । १ निचत्रिष्टुप् । २ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ । ४ । ५ भुरिक् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥ अब छः ऋचा वाले अस्सीवें सूक्त का प्रारम्भ है उस' के प्रथम मन्त्र में स्त्रियों के गुणों को कहते हैं । धुतामान बृहतीमृतेन ऋतावरीमरुणसु विभातीम् । देवीमुषसं खरावहन्ती प्रति विपासो मतिभिर्जरन्ते ॥१॥ पदार्थ:-हे स्त्रि जैसे (विप्रासः) बुद्धिमान् जन (मतिभिः) बुद्धियों से और (ऋतेन) जल के सदृश सत्य से (ध तद्यामानम्) प्रहरों को प्रकाश करती और (बृहतीम्) बढ़ती हुई (ऋतावरीम्) बहुत सत्य आचरण से युक्त (अरुणसुम्) लालरूप वाली (विभातीम्) प्रकाश करती हुई (देवीम्) प्रकाशमान और (स्वः) सूर्य के सदृश विद्या के प्रकाश को (मा, वहन्तीम्) धारण करती हुई (उषसम्) उषला की (प्रति) उत्तम प्रकार (अरन्ते) स्तुति करते हैं उनकी तू प्रशंसा कर ॥१॥ भावार्थ: इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे बुद्धिमान् पति उषःकाल आदि पदार्थों की विद्या को जानकर क्षणभर भी काल व्यर्थ नहीं व्यतीत करते हैं वैसे ही स्त्रियां भी व्यर्थ समय न व्यतीत करें॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । एषा जनै दर्शता बोधयन्ती सुगान्पयाः कृण्वती यात्यने । बृहद्रथा बृहती विश्वमिन्वोषा ज्योतिर्यच्छत्यग्रे अहाम् ।२।। जिसके ऐसी (बृहती) बड़ी (विश्वमिन्या) संपूर्ण जगत् को प्रक्षेप करती अलग करती और (जनम्) मनुष्य को और (दर्शता) देखने योग्य भूमियों को (बोधयन्ती) जनाती हुई (सुगान्) सुखपूर्वक जिनमें चलें उन (पथः) मार्गों को (कृण्वती) प्रकाशित करती हुई (उषा:) प्रातर्वेला (अमे) दिन से प्रागे (याति) चलती है और (अह्नाम्) दिनों के (अग्ने) पहिले से (ज्योतिः) प्रकाश को गच्छति) देती है वैसे तुम होनो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो स्त्रियां प्रभातवेला के सदृश अपने पति आदि को सूर्योदय से पहिले जगाती, गृह और बाहर के मार्गों को साफ करती, आते हुए पतियों के हाथ जोड़ के आगे खड़ी होती और ma Man RAM - Crane ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८० ॥ सब काल में विज्ञान को देती हैं वे ही देश और कुल को शोभन करने वाली हैं ॥२॥ M Nouam Moto फिर उसी विषय को कहते हैं । एषा गोमिररुणेभिर्युजानाधन्ती रयिमायु चक्रे । पयो रदन्ती सुविताय देवी पुरष्टुना विश्ववारा विभाति ।।३।। पदार्थ:-हे विद्यायुक्त स्त्रि जैसे (एषा) यह प्रातर्वेला (अरुणेभिः) चारो ओर रक्त वर्ण वाले' (गोभिः) किरणों के साथ (यजाना) युक्त और (रयिम्) धन को (अस्ले धन्ती) सिद्ध करती हुई (अप्राय) नहीं नष्ट होने वाले को (चके) करती है और (पथः) मार्गों को (रदन्ती) खोदती हुई (पुरुष्टुता) बहुतों से प्रशंसा की गई (विश्ववारा) संपूर्ण मनुष्यों से स्वीकार करने योग्य (देवी) प्रकाशित होती हुई (सुविताय) ऐश्वर्या के लिए (वि, भाति) विशेष करके प्रकाशित होती है वैसे आप होत्रो ॥३॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे पतिव्रता, विद्यायुक्त और चतुर स्त्री गृह को प्रकाशित करने वाली होती है वैसे ही प्रातर्वेला ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करने वाली है ।।३।। फिर उसी विषय को कहते हैं । एषा व्येनी भवति द्विवहाँ आविष्कृण्वाना तन्वं पुरस्तात् । ऋतस्य पन्थामन्वेति साधु मंजानतीव न दिशौ मिनाति ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्यायुक्त स्त्रि जैसे (एषा) यह प्रातर्वेला (पुरस्तात्) प्रथम (तन्वम्) शरीर को (आविष्कृण्वाना) और संपूर्ण रूपवाले द्रव्यों की प्रकटता करती हुई (द्विबह::) दिन और रात्रि से बढ़ाने वाली (व्येनी) विशेष हरणी के सदृश वेगयुक्त (भवति) होती है और (ऋतस्य) सत्यके (पन्थाम्) मार्ग की (अनु, एति) अनुगामिनी होती है और (साध) उत्तम विज्ञान को (प्रजानतीव) विशेष करके जानती हुई सी (दिशः) दिशाओं का (न) नहीं (मिनाति) नाश करती है वैसा तू वर्ताव कर ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु.-जैसे सती स्त्री गृहाश्रम के मार्ग को प्रकाशित करके सम्पूर्ण सुखों को प्रकट करती है वैसे ही प्रातला वर्तमान है ॥४॥ D - पदार्थ:-हे श्रेष्ठ लक्षणों वाली स्त्रि जैसे (एषा) यह (७५ प्रातला के लिये (वाणि वालीं और युवावस्था को प्राप्त हुई अपने ऋग्वेदः मं० ५। सू०८० ॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । एषा शुभ्रा न तन्वो विदानोवें स्नाती दृशयें नो अस्थात् । अप द्वेषो बाधमाना तमास्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात् ।।५।। (शुभ्रा) श्वेतवर्ण वोली बिजुली के (न) सदृश (तन्या) शरीरों को (विदाना) जनाती हुई (ऊब) ऊपर सी स्थित (स्नाती) शुद्ध और (न:) हम लोगों के (दृशये) दर्शन के लिये (अस्थात्) स्थित होती है और (प.) द्वेष करने वाले जनों और (तमांसि) रात्रियों को (अप, बाधमाना) निवारण करती हुई (विवः) सूर्य की (बुहिता) कन्या के सदृश वर्तमान (ज्योतिषा) प्रकाश से (प्रा, अगात) प्राप्त होती है वैसे तू हो ॥५॥ भावार्थ:-- इस मंत्र में वाचकलु० - जैसे कुलीन स्त्री जलादिकों और इन्द्रियों के निग्रहों से बाहर और भीतर से शुद्ध, गृहस्थान्धकार को निवृत्त करती हुई सब के शरीर की रक्षा करती है और गृह के कृत्यों में चतुर है वैसे ही प्रातला होती है ।।५।। फिर उसी विषय को कहते हैं । एषा प्रतीची दुहिता दिवो नृन्योव भद्रा नि रिणीवे अप्सः । व्यूर्वती दाशुषे वार्याणि पुनज्योतिर्युवतिः पूर्वथाकः ।।६।। पक्षार्थ:-हे शुभ लक्षणों वाली स्त्री जैसे (एषा) यह प्रातर्वेला (दिवः सूर्य की (दुहिता) कन्या के सदृश (नन्) अग्रणी श्रेष्ठ पुरुषों को (योषेव) स्त्री के सदृश (भद्रा) कल्याण करने वाली (प्रतीची) पश्चिम दिशा को प्राप्त (अप्सः) सुन्दर रूप को (नि, रिणीते) अत्यन्त प्राप्त होती है और (दाशुषे) देने वाले आच्छादित करती हुई (पूर्वथा) पहिली के सदृश (पुनः) फिर (ज्योतिः) ज्योतिः रूप को (युवतिः) प्राप्त यौवनावस्था वाली के सदृश (अकः) करती है बैसी तुम होमो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमावाचकलु०- -जो स्त्रियां शुभ आचरण सम्पूर्ण गृह कृत्यों को व्यवस्थापित करती हैं वे प्रातर्वेला के सदृश अत्यन्त शोभित होती हैं ॥६॥ PATH ka ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८१ ।। इस सूक्त में प्रातःला और स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये यह पंचम मण्डल में अस्सीवां सूक्त समाप्त हुआ। - । SH मा dire अथ पञ्चर्चस्य काऽशीतितमस्य सूतस्य श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः । सविता देवता । १ । ५ जगती। २ विराड् जगती। ४ निचुज्जगतीछन्दः । निषादः स्वरः । ३ स्वराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।। अब पांच ऋचा वाले इक्यासीवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में योगीजन क्या करते हैं इस विषय को कहते हैं ।। युञ्जते मन उत युजते धियो विधा विस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रो दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥१॥ पदार्थः-हे मनुष्यो जैसे (होत्राः) लेने वा देने वाले (विप्राः) बुद्धिमान् जोगीजन (विप्रस्य) विशेष कर के व्याप्त होने वाले (बहतः) बड़े विपश्चित:) अनन्त विद्यावान् (सवितः) सम्पूर्ण जगत् के उत्पन्न करने वाले (देवस्य) सम्पूर्ण जगत् के प्रकाशक परमात्मा के मध्य में (मनः) मननस्वरूप मन को (युञ्जते) युक्त करते (उत) और (धियः) बुद्धियों को (युञ्जते) युक्त करते हैं और हो (धयुनावित) प्रज्ञानों को जानने वाला (एकः) सहायरहित अकेला (इत्। ही संपूर्ण जगत् को (वि, वर्ष) रचता और जिस की (मही) बड़ी पादर करने योग्य (परिष्टुतिः) सब और व्याप्त स्तुति है वैसे उस में आप लोग भी चित्त को धारण करो ॥१॥ भावार्थः .. अनेक विद्यावाहित, बुद्धि आदि पदार्थों के अधिष्ठान, जगदीश्वर के बीच जो मन और बुद्धि को निरन्तर स्थापन करते हैं बे समस्त ऐहिक और पारलौकिक सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । विश्वा रूपाणि प्रति मुञ्चते कविः प्रासावीन्द्र द्विपदे चतुष्पदे । वि नाकमख्यत्सविता वरेण्योऽनु प्रयाणमुषसो वि राजति ।।२। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (कविः) सर्व पदार्थों का जाननेवाला सर्वज्ञ (वरेण्यः) स्वीकार करने योग्य और (सविता) सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का देने वाला ईश्वर awa ३१२ ऋग्वेदः मं०५ । सू०८१॥ Ste मा (द्विपदे) मनुष्य आदि और (चतुष्पदे) गौ आदि के लिये (भद्रम्) कल्याण को (प्र, असावीत्) उत्पन्न करता और (विश्वा) सम्पूर्ण (रूपाणि) सूर्य आदिकों का (प्रति, मुञ्चते) त्याग करता है तथा (नाकम्) नहीं विद्यमान दुःख जिसमें उसका (बि, अख्यत्) प्रकाश करता है वह जंसे (उषसः) प्रातःकाल' के (अनु, प्रयाणम्) पीछे गमन को सूर्य (वि, राजति) विशेष करके शोभित करता है वैसे सूर्य आदि को प्रकाशित करता है उसकी तुम सब उपासना करो ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जिस जगदीश्वर ने विचित्र और अनेक प्रकार के जगत् को संपूर्ण प्राणियों के सुख के लिये रचा उसी जगदीश्वर की आप लोग उपासना करो॥२॥ फिर ईश्वर कैसा है इस विषय को कहते हैं। यस्य प्रयाणमन्वन्य इद्ययुर्देवा देवस्य महिमानमोजसा । या पार्थिवानि विममे स एतशो रजॉसि देवः सविता महित्वना ॥३॥ पदार्थः-हे विद्वानों (यस्य) जिस जगदीश्वर (देवस्य) सब के प्रकाशक के (प्रयाणम्) अच्छी तरह चलते हैं जिस से उस मार्ग और (महिमानम्) महिमा को (अन) पश्चात् (अन्ये,इत) और ही वसु आदि (देवाः) प्रकाश करने वाले सूर्य धादि (ययुः) चलते अर्थात् प्राप्त होते हैं और (यः) जो (एतश:) सर्वत्र व्याप्त (सविता) संपूर्ण ऐश्वर्यों का करने और (देवः) सम्पूर्ण सुखों का देने वाला (महित्वना) महिमा से (प्रोजसा) पराकम से और बल से (पार्थिवानि) अन्तरिक्ष में विदित कार्यों और (रजांसि) लोकों को (विममे) विशेष करके रचता है (स.) वही सब से ध्यान करने योग्य है ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सूर्य आदिकों के धारण करने वालों का धारण करने वाला और देने वालों का देने वाला, बड़ों का बड़ा और प्रकृतिरूप कारण से सम्पूर्ण जगत् को रचता है और जिस के पीछे अर्थात् प्राश्रय से सब जीवते और स्थित हैं वही सम्पूर्ण जगत् का रचने वाला ईश्वर ध्यान करने योग्य है ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । उत यासि सवितस्त्रीणि रोचनोत सूर्यस्य रश्मिभिः समुच्यसि । उत रात्रीमुभयतः परीयस उत मित्रो भवसि देव धर्मभिः ॥४॥ पदार्थ:-हे (सवितः) सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाले (देव) विद्वन् Bivara opan प्रकाशित करते हो (उत) और (पूषा) पुष्टि करने वाले (भवसि) होते हो (उत) ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८१॥ जो आप (उत) निश्चय से (त्रीणि) सूर्य चन्द्रमा और बिजुली नामक (रोचना) प्रकाशकों को (यासि) प्राप्त होते (उत) और (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मिभिः) किरणों से (सम्, उच्यसि) उत्तम प्रकार कहते हो (उत) और (उभयतः) दोनों ओर से (रात्रीम्) अन्धकार को (परि, ईयसे) दूर करते हो (उत) और (धर्मभिः) धर्माचरणों से (मित्रः) मित्र (भवसि) होते हो वह आप हम लोगों से सत्कार करने योग्य हो ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सब का स्वामी, ईश्वर तीन -बिजुली, सूर्य और चन्द्रमा रूप बड़े दीपों को रचके सर्वत्र व्याप्त और सब का मित्र हुमा और सूर्य आदि को अभिव्याप्त हो और धारण करके प्रकाशित करता है वही सब प्रकार पूज्य है अर्थात् उपासना करने योग्य है ॥४॥ फिर ईश्वर विषय को कहते हैं। उतैशिषे प्रसवस्य त्वमेक इदुत पूषा भवसि देव यामभिः । उत्तेदं विश्वं भुवनं वि राजसि श्यावाश्वस्ते सवितः स्तोम॑मानशे ॥५॥ पदार्थ:-हे (सवितः) सत्य व्यवहार में प्रेरणा करने और (देव) संपूर्ण सुखों के देने वाले (ते) आपका जो (श्यावाश्वः) सूर्यलोक (याममि:) प्रहरों से (स्तोमम्) प्रशंसा को (प्रानशे) व्याप्त होता है उसके दृष्टान्त से (उत) भी (इदम्) इस (विश्वम्) समस्त (भुवनम्) भुवन को (त्वम्) प्राप (वि, राजसि) और (एक:) द्वितीय रहित (इत) ही (प्रसवस्य) उत्पन्न हुए जगत् के (ईशिर्षे) ऐश्वर्य का विधान करते हो ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस के महत्त्व के जनाने के लिये सूर्य आदि लोक दृष्टान्त हैं उसी सम्पूर्ण परमैश्वर्या के देने वाले का तुम ध्यान करो॥५॥ इस सूक्त में सत्य व्यवहार में प्रेरणा करने वाले ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए। यह पंचम मण्डल में इक्यासीवां सूक्त समाप्त हुआ। RORIES Boad - Fu ऋग्वेदः मं० ५। सू० १२ ॥ antan A- प्रथ नवर्चस्य यशीतितमस्य सूक्तस्य श्यावाश्व आत्रेय ऋषिः । सविता देवता । १ निवनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । २।४ । ६ निचूद्गायत्री। ३ । ५।६।७ गायत्री। विराङ्गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः॥ अब नव ऋचा वाले बयासीवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किस की उपासना करनी चाहिए इस विषय को कहते हैं । तत्सवितुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भर्गस्य धीमहि ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (वयम्) हम लोग (भगस्य) सम्पूर्ण ऐश्वर्या से युक्त (सवितुः) अन्तर्यामी (देवस्य) सम्पूर्ण के प्रकाशक जगदीश्वर का जो (श्रेष्ठम्) अतिशय उत्तम और (भोजनम्) पालन वा भोजन करने योग्य (सर्वधातमम्) सब को अत्यन्त धारण करने वाले (तुरम्) अविद्या प्रादि दोषों के नाश करनेवाले सामर्थ्य को (वृणीमहे) स्वीकार करते और (धीमहि) धारण करते हैं (तत्) उसका तुम लोग स्वीकार करो ॥१॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सब से उत्तम जगदीश्वर की उपासना करके अन्य की उपासना का त्याग करते हैं वे सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अस्य हि स्वयंशस्तरं सवितुः कच्चन प्रियम् । न मिनन्ति स्वराज्यम् ॥२॥ पदार्थ:--जो (हि) निश्चय से ( (अस्य) इस परमात्मा ( सवितुः) जगदीश्वर का (स्वयशस्तरम्) अपना यश जिस का वह अतिशयित (प्रियम् । अत्यन्त प्रिय (स्वराज्यम्) अपने राज्य को (कद, चन) कभी (न) नहीं (मिनन्ति) नष्ट करते हैं वे धाम्मिक होते हैं ॥२॥ भावार्थ:--जो परमात्मा के सम्मुख प्रज्ञान का नाश करते हैं वे यशस्वी होकर राज्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स हि रत्नानि दाशुषे सुवाति सविता भगः । तं मागं चित्रमीमहे ॥३॥ pes ..

ऋग्वेदः मं० ५। सू०८२॥ पदार्थ:-जो (सविता) उत्पन्न करने वाला (भगः) ऐश्वर्यवान् परमात्मा (दाशुषे) दाताजन के लिए (रत्नानि) धनों को (सुवाति) उत्पन्न करता है (तम्) उस (भागम्) ऐश्वर्य सम्बन्धी (चित्रम्) अद्भुत को (ईमहे) प्राप्त होवें वा जाने और (सः, हि) वही उदार दाता है ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सम्पूर्ण रत्नों के देनेवाले परमात्मा की सेवा करते हैं वे अद्भुत ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अधा नौ देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभंगम् । परां दुष्वप्न्य मुव ॥४॥ पदार्थः-हे (सवितः) सम्पूर्ण ऐश्वर्या के देने वाले स्वामिन् (देव) शोभित आप कृपा से' (नः) हम लोगों के लिए वा हम लोगों के (अधा) आज (प्रजावत्) बहुत प्रजायें विद्यमान जिसके उस (सौभगम्) सुन्दर ऐश्वर्या के भाग को (सावीः) उत्पन्न कीजिए और (दु:ष्वप्न्यम्) दुष्ट स्वप्नों में उत्पन्न दुःख को (परा, सुव) दूर कीजिये ॥४॥ भावार्थ:-जो परमेश्वर की प्रार्थना करके धर्मयुक्त पुरुषार्थ करते हैं वे बहुत ऐश्वर्य वाले होकर दुःख और दारिङ्ग से रहित होते हैं ॥४॥ मनुष्य किस लिए ईश्वर की प्रार्थना करें इस विषय को कहते हैं। विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आ सुव ।।५।। पदार्थ:-हे (सवितः) संपूर्ण संसार के उत्पन्न करने वाले (देव) और संपूर्ण संसार को प्रकाशित करने वाले जगदीश्वर (विश्वानि) संपूर्ण (दुरितानि) दुष्ट आचरणों को प्राप (परा, सुव) दूर कीजिये और (यत्) जो (भद्रम्) कल्याण- कारक है (तद) उसको (न:) हम लोगों के लिए (श्रा, सुब) सब प्रकार से प्राप्त कीजिये ॥५॥ भावार्थ:-हे परमेश्वर ! श्राप कृपा से जितने हम लोगों में दुष्ट आचरण हैं उनको अलग करके धर्मयुक्त गुण कर्म और स्वभावों को स्थापित कीजिये ॥५॥ इस जगत् में मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । अनागतो अदितये देवस्य सवितुः सवे विश्वो वामानि धीमहि ॥६॥ karne NEAM ( AND main ऋग्वेदः मं० ५। सू०८२।। mins पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अनागस:) अपराध से रहित हम लोग (अदितये) माता आदि के लिए (देवस्य) सर्व सुख देने वाले (सवितः) संपूर्ण ऐश्वर्य से यक्त' परमात्मा के (सवे) जगतरूप ऐश्वर्य में (विश्वा) सम्पूर्ण (वामानि) ऐश्वर्य प्राप्त करने योग्य धनों को (धीमहि) धारण करें वैसे आप लोग भी धारण करो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जैसे विद्वान् जन इस ईश्वर से रचे संसार में सृष्टिक्रम से विद्या के द्वारा कार्यों को सिद्ध करते हैं वैसे ही अन्य जनों को भी चाहिये कि सिद्ध करें॥६॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। आ विश्वदेवं सत्पति सूक्तैरद्या वृणीमहे । सत्यसवं सवितारम् ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे हम लोग (अद्या) प्राज (सूक्तः) उत्तम प्रकार कहे गये सत्य वचनों वा वेदोक्त वचनों से (विश्वदेवम्) संसार के प्रकाश करने और (सत्पतिम्) प्रकृति प्रादि पदार्थ और सत्पुरुषों के पालन करने वाले (सत्यसबम्) नहीं नाश होने वाला सामर्थ्ययोग जिसका उस (सवितारम्) सम्पूर्ण पदार्थों के बनाने वाले परमात्मा का (मा, वृणीमहे) स्वीकार करते हैं वैसे आप लोग भी स्वीकार कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-मनुष्यों को चाहिए कि परमेश्वर को छोड़ कर किसी अन्य का प्राश्रय नहीं करें॥७॥ फिर मनुष्य कैसा वत्तवि करें इस विषय को कहते हैं । य इमे उभे अहंनी पुर एत्यमयुच्छन् । स्वाधीर्देवः सविता ।।८।। पदार्थ:---(य:) जो (अप्रयुच्छन्) प्रमाद को नहीं करता हुआ मनुष्य जैसे (स्वाधीः) उत्तम प्रकार स्थापन किया जाता है जिससे वह (देव:) प्रकाशमान (सविता) श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरणा करने वाला सत्य में वर्तमान है वैसे (इमे) इन (उभे) दोनों (महनी) रात्रि और दिनों को सत्य से (पुरः) आगे (एति) प्राप्त होता है वही भाग्यशाली होता है ।।८।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे परमेश्वर अपने नियमों की यथायोग्य रक्षा करता है वैसे ही मनुष्य भी श्रेष्ठ नियमों की यथावत् रक्षा करे॥८ मनुष्यों से कौन परम गुरु मानाजाता है इस विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ८३ ॥ ३१७ ANA य इमा विश्वा जातान्यांश्रावयति श्लोकैन । प्रच सुवाति सविता ॥९॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (श्लोकेन) वाणी से (इमा) इन (विश्वा) सम्पूर्ण प्रज्ञानों और (जातानि) उत्पन्न हुओं को (पाश्रावयति) सब प्रकार से सुनाता है वह (च) और (सविता) प्रेरणा करने वाला हम लोगों को (प्र, सुवाति) प्रेरणा करे ॥६॥ भावार्थः -- हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर वेद के द्वारा मनुष्यों के लिए सम्पूर्ण विद्याओं का उपदेश करता है वही परमगुरु मानने योग्य है ॥६॥ इस सूक्त में ईश्वर और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पञ्चम मण्डल में बियासीवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ दशर्चस्य त्र्यशीतितमस्य सूक्तस्थ प्रत्रिऋषिः । पृथिवी देवता। १ निचत्विष्टप् । २ स्वराट् त्रिष्टुप् ३ भुरित्रिष्टुप् । ४ निचज्जगती छन्दः । निषाद: स्वरः। ५ । ६ त्रिष्टुप् । ७ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ८ । १० भुरिक् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। निचूदनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ।। अब दश ऋचा वाले तिरासीवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मेघ कैसा है इस विषय को कहते हैं । अच्छा वद सबस गीर्भिराभिः स्तुहि पर्जन्यं नमसा विवास । कनिक्रदषभो जीरदान रेतो दधात्योषधीषु गर्मम् ॥१।। पदार्थ:-हे विद्वन् जो (वृषभः) थूहेवाले बैल के सदृश (जीरदानः) जीवाने वाला (कनिकवत) शब्द करता हुअा (नमसा) अन्ननादि के साथ (मा, विवास) सब ओर से वसता और (ोषधीषु) प्रोषधियों में (रेत:) जलरूप (गर्भम्) गर्भ को (दधाति) धारण करता है उस (पर्जन्यम्) मेघ को (आभिः) इन वर्तमान (गोभिः) वारिणयों से (अच्छा) उत्तम प्रकार (वद) कहिये और (तबसम्) बल' की (स्तुहि) प्रशंसा करिये ॥१॥ भावार्थः-मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों से मेघविद्या का यथावत् विज्ञान प्राप्त करें ॥१॥ HD otade ऋग्वेदः म० ५ । सू० ८३ ।। MANO . Hasana फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । वि वृक्षान् हन्त्युत हन्ति रक्षसो विश्वं विभाय भुवनं महावधात् । उतानागा ईषते वृष्ण्यांवतो यत्पर्जन्यः स्तनयन् हन्ति दुष्कृतः ॥२।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे बढ़ई (वृक्षान्) काटने योग्य वृक्षों को (वि, हन्ति) विशेष कर के काटता है (उत) और न्यायकारी राजा जिन से (विश्वम्) संपूर्ण संसार (विभाय) भय करता है उन (रक्षसः) दुष्ट आचरणवालों का (हन्ति) नाश करता है और (यत्) जो (पर्जन्य:) मेघ (स्तनयन्) शब्द करता हुआ (महावधात्) बड़े हनन से (भुवनम्) जल को वर्षाता है और जैसे (अनागाः) नहीं अपराध जिस में वह (वृष्ण्यावतः) वर्षने योग्य मेघ जिन में उन का (ईषते) नाश करता है (उत) और (दुष्कृतः) दुष्ट कर्मों के करने वालों का (हन्ति) नाश करता है वैसा ही मनुष्य वर्ताव करें ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जो मनुष्य पालन करने योग्यों का पालन करते हैं और नाश करने योग्यों का नाश करते हैं वे राजसत्ता से युक्त होते हैं ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । रथीव कशयाश्वा अभिक्षिपनाविर्दूतान्कृणुते वयाँ३' अहे । दूरात्सिंहस्य स्तनथा उदीरते यत्पर्जन्यः कृणुते वयं नमः ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् ! (यत्) जो (पर्जन्यः) मेघ (कशया) मारने के लिए रस्सी अर्थात् कोड़े से (अश्यान्) घोड़ों को (अभिक्षिपन्) सन्मुख लाता हुआ (रथीव) बहुत रथवाले के सदृश (वान्) वर्षानों में श्रेष्ठ (दूतान्) दूतों को (प्राविः कृणुते) प्रकट करता है (अह) परतंत्र करने में वे (दूरात) दूर से (सिंहस्य) सिंह के सदृश (उद, ईरते) कम्पाते' वा चलते हैं और पर्जन्य (वर्ण्यम्) वर्षानों में हुए (नमः) अन्तरिक्ष को (कृणुते) करता अर्थात् प्रकट करता है उसको आप (स्तनथाः) पुकारिये ॥३॥ भावार्थः -- इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे सारथी घोड़ों को यथेष्ट स्थान में ले जाने को समर्थ होता है वैसे ही मेघ जलों को इधर उधर ले जाता है ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या जानना योग्य है इस विषय को कहते हैं ।।

३१६ (विश्वस्भ) संपूर्ण (भुवनाय) भुवन के लिए (इरा) अन्न आदिक (जायते) उत्पन्न' ऋग्वेदः म० ५ । सू० ८३ ॥ प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युत उदोषधीजिहते पिन्वते खः । इरा विश्वस्मै भुवनाय जायते यत्पर्जन्यः पृथिवीं रेतसावति ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्) जो (पर्जन्यः) पालनों को उत्पन्न करने वाला मेघ (रेतसा) जल से' (पृथिवीम् ) भूमि की (प्रवति) रक्षा करता है जिस से HES AN का ...... होता है और बद्दल (स्वः) अन्तरिक्ष का (पिन्वते) सेवन करते हैं और जिससे (प्रोषधी:) प्रोषधियों को (उव, जिहते) उत्तमता से प्राप्त होते हैं जिस से (विद्यु तः) बिजुलियां (पतयन्ति) पतन होती हैं जहां (वाताः) पवन (प्र) अत्यन्त (वान्ति) चलते हैं उस मेघ को यथावत् तुम विशेष जानो ॥४॥ भावार्थ:----मनुष्य लोगों को चाहिये कि जिस मेघ से सबका पालन होता है उस की वृद्धि वृक्षों के लगाने, वनों की रक्षा करने और होम करने से सिद्ध करें जिस से सबका पालन सुख से होवे ॥४॥ फिर वह मेघ कैसा है इस विषय को कहते हैं । यस्य व्रते पृथिवी ननमीति यस्य॑ व्रते शफवज्ज रीति । यस्य व्रत ओषधीविश्वरूपाः सनी पर्जन्य महि शम्म यच्छ ॥५॥ पदार्थ:-हे (पर्जन्य) मेघ के सदृश वर्तमान विद्वन् (यस्य) जिस मेघ के (ते) कर्म में (पृथिवी) भूमि (नंनमीति) अत्यन्त नम्र होती और (यस्य) जिस मेघ के (व्रते) कर्म में (शफवत्) खुर के तुल्य (जर्भुरीति) निरन्तर धारण करती है और (यस्य) जिस मेघ के (बते) कर्म में (विश्वरूपाः) अनेक प्रकार की (प्रोषधीः) सोमलता आदि ओषधियां उत्पन्न होती हैं उस मेघ की विद्या से युक्त (सः) वह आप (नः) हम लोगों के लिए (महि) बड़े (शर्म) गृह को (यच्छ) दीजिये ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु-जो वृष्टियां न होवें तो किसी का भी जीवन न होवे ॥५॥ फिर वह मेघ कैसा है इस विषय को कहते हैं । दिवो नौ वृष्टिं मरुतो ररीध्वं प्र पिन्वत वृष्णो अवस्य धाराः। अर्वाडेन्तेन स्तनयित्नुनेछपो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः ॥६॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) वायुवद्वर्तमान मनुष्यो आप, लोग (न:) हम लोगों के AND - (न्यञ्चम् ) निश्चित सेवा करते हुए को पदार्थ:-हे मनुष्यो जो सूर्य्य (महान्तम् ) ३२० ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ८३ ॥ लिये (दियः) सूर्य से (वृष्टिम् ) वृष्टि' को (ररोध्वम्) दीजिये तथा (वृष्णः) वर्षने वाले' (अश्वस्य) बड़े मेघ के (धाराः) प्रवाहों को (प्र, पिन्वत) सींचिये और जो (अर्वाङ्) नीचे वर्तमान और (एतेन) इस (स्तनयित्नुना) बिजुली रूप से (अपः) जलों का (निषिञ्चन्) अत्यन्त सेचन करता हुआ (असुरः) मेघ (न:) हम लोगों के (पिता) उत्पन्न करने वाले पिता के सदृश पालन करने वाला (मा, इहि) प्राप्त होता है उसका आप लोग विशेष कर के जानिये ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जिन कम्मों से वृष्टि अधिक होवे उन कर्मों का सेवन कीजिये ॥६॥ फिर वह मेघ क्या करता है इस विषय को कहते हैं । अभि क्रन्द स्तनय गर्भमा छौ उदन्नता परि दीया रथेन । दृति सु कर्ष विषितं न्यऽचं समा भवन्तद्वतो निपादाः ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो मेघ (गर्भम्) गर्भ को (प्रा, धाः) चारों ओर से धारण करता और (उदन्वता) बहुत जल के सहित (रथेन) सुन्दर स्वरूप से (अभि) सम्मुख (क्रन्द) शब्द करता और (स्तनय) गर्जता है (तिम्) फाड़ने वाले के सदृश जल से पूर्ण को (स, कर्ष) विशेष करके खोदता और दुःखों का (परि) सब प्रकार विशेष कर के लिखता अर्थात् चेष्टा में लाता है तथा जिससे हम लोगों के (उद्वतः अर्व स्थान में वर्तमान (निपादा:) निश्चित वा नीचे हैं अंश जिनके ऐसे (समा:) वर्ष (भवन्तु) होवें उस को जानिये ॥७॥ भावार्थ:-जो निश्चय जल से संसार को पुष्ट करता है और दुःख का नाश करता तथा फलों को उत्पन्न करता है वह मेघ विश्वंभर है ऐसा जानना चाहिये ॥७॥ अब मेघ निमित्त कौन हैं इस विषय को कहते हैं। महान्तं कोशमुदचा नि पिञ्च स्यन्दन्तां कुल्या विषिताः पुरस्तात् । घृतेन द्यावापृथिवी व्युन्धि सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्यः ॥८॥ धनादिकों के कोश के समान जल से परिपूर्ण मेघ को (उत्) (अचा) ऊपर प्राप्त होता है और जिससे पृथिवी को (नि, सिञ्च) निरन्तर सींचता है और (पुरस्तात्) प्रथम (विषिताः) व्याप्त (कुल्याः) रचे गये जल' के निकलने के मार्ग (स्यन्दन्ताम्) बहें और जो (घतेन) जल से (धावापृथिवी) पृथिवी और अन्तरिक्ष को (वि, उन्धि) HAMA anwar

BIANP
(अजीजन:) उत्पन्न कीजिये (उत) और भी (प्रजाभ्यः) प्रजाओं के लिये (कम्) किस
ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ८३ ॥
अच्छे प्रकार गीला करता है वह (अध्न्याभ्यः) गौओं के लिये (सुप्रपाणम्) उत्तम
प्रकार प्रकर्षता से पीते हैं जिसमें ऐसा जलाशय (भवतु) हो यह जानो ॥१॥
भावार्थः---हे मनुष्यो ! जो बिजुली, सूर्य और वायु मेघ के कारण
हैं उनको यथायोग्य प्रयुक्त कीजिये जिससे वृष्टि द्वारा गौ आदि पशुओं का
यथावत् पालन होवे ॥८॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
यत्पर्जन्य कनिक्रदत्स्तनयन इंसि दुष्कृतः ।
प्रतीदं विश्व मोदते थलिक च पृथिव्यामधि ।।९।।
पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्! जो (पर्जन्य) मेध (कनिऋवल) अत्यन्त शब्द
करता तथा (स्तनयन्) गर्जन करता हुआ (दुष्कृतः) दुःख से करने वालों को (हंसि)
नाश करता है (यत्) जो (किम्) कुछ (2) भी (इदम् ) यह वर्तमान (पृथिव्याम्)
पृथिवी (अधि) पर (विश्वम् ) सम्पूर्ण जगत् वर्तमान है वह सब जिस मेघ से
(प्रति, मोदते) आनन्दित होता है वह बड़ा उपकारी है ।।
भावार्थ:---मेध से ही सम्पूर्ण प्राणी मानन्दित होते हैं इससे यह
मेघ को बनाना रूप कर्म परमेश्वर का धन्यवाद के योग्य है यह सब लोग
जानो।।६।।
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
अवर्षीवर्षमुटु पू गृभाषाकर्षन्वान्थत्यैतवा ।
अजीजन ओषधी जनाय कमुत प्रजाभ्योऽविदो मनीषाम् ॥१०॥
पदार्थ:-हे विद्वन् वैद्य ! जैसे सूर्य (वर्षम्) वृष्टि को (अवर्षीः) वर्षाता है
वैसे आप (उत्, गृभाय) उत्कृष्टता से ग्रहण कीजिथे तथा (धन्वानि) जल आदि से
रहित देशों को (अत्येतवै) प्राप्त होने के लिये (सु) उत्तम प्रकार (अकः) करिये
(उ) और (ोषधीः) सोमलता आदि ओषधियों को (भोजनाय) भोजन के लिये
PAN
को (अविदः) जानते हो (उ) क्या (मनीषाम्) बुद्धि को ॥१०॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु-जैसे जगदीश्वर वर्षानों से प्रजा
के हित को सिद्ध करता है वैसे ही धार्मिक राजा प्रजानों के लिये सुख और
अध्यापक बुद्धि को उत्पन्न करे ॥१०॥

३२२ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ८४ ।। इस सूक्त में मेघ और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पंचम मण्डल में तिरासीवां सूक्त समाप्त हुभा ॥ Aape अथ व्यूचस्य चतुरशीतितमस्य सूक्तस्याऽत्रिऋषिः । पृथिवी देवता । १।२ निचूदनुष्टुप् छन्दः । ३ विराउनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ।। अब तीन ऋचावाले चौरासी सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । बळिस्था पर्वतानां खिद्रं बिभर्षि पृथिवी । प्र या भूमि प्रवत्वति महा जिनोर्षि महिनि ॥२॥ पदार्थ:-हे (प्रवत्वति) अत्यन्त नीचे स्थान से युक्त (महिनि) आदर करने योग्य (पृथिवी) भूमि के सदृश वर्तमान (या) जो तुम (पर्वतानाम्) मेघों के (मह ना) महत्त्व से (भूमिम्) भूमि को धारण करती (इत्था) इस प्रकार से (ब) सत्य को जिस कारण (बिर्षि) धारण करती हो तथा (खितम्) दीनता को (प्र, जिनोषि) विशेष करके नष्ट करती हो इस से सत्कार करने योग्य हो ॥१॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे भूमि पर पर्वत स्थिर होकर वर्तमान हैं वैसे जिन के हृदय में धर्म आदि श्रेष्ठ व्यवहार हैं वे पादर करने योग्य होते हैं ॥१॥ फिर स्त्री कैसी हो इस विषय को कहते हैं । स्तोमांसस्त्वा विचारिणि प्रति टोभन्त्यक्तभिः । प्र या वाजं न हेषन्तं पेरुमस्य॑स्यर्जुनि ॥२॥ पदार्थ:-हे (अर्जुनि) उषा के समान वर्तमान (विचारिणि) विचार करने वाली स्त्री (या) जो तू (वाजम्) वेग के (न) समान (हेषन्तम्) शब्द करते हुए। (पेसम्) पूर्ण करने वाले को (ध, अस्यसि) फेंकती है उस (त्वा) तेरी (स्तोमासः) स्तुति करने वाले जन (अक्तुभिः) रात्रियों से (प्रति, स्तोमन्ति) सब प्रकार स्तुति करते हैं ।।२।। भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमावाचकलु०-जैसे विद्वान् जन स्तुति करने योग्य जनों की स्तुति करते हैं वैसे ही विद्यायुक्त स्त्री प्रशंसा करने योग्य की प्रशंसा करती है ।।२।।

भावार्थ:--जो मनुष्य यजमान के सदृश राजा को: ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८५॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । हळा चिया वनस्पतीक्ष्पया दर्धर्योजसा । यत्तै अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टयः ॥३॥ पदार्थ:-हे स्त्री ! (या) जो (दृह ळा) दृढ़ तुम (क्ष्मया) पृथिवी से (वनस्पतीन्) वृक्षादिकों को (दषि) अत्यन्त धारण करती हो और (यत्) जो (चित) निश्चित (ते) आप के (अनस्य) धन की (दिव:) अन्तरिक्ष में हुई (विद्युतः) बिजुली और (वृष्टयः) वर्षायें (वर्षन्सि) वर्षती हैं उनको तुम (प्रोजसा) बल से धारण करो ॥३॥ भावार्थ:--जो स्त्री पृथिवी के सदृश क्षमा से युक्त और पुत्र पौत्रादि से युक्त होती है वह वृष्टि के सदृश सुखों को वर्षाने वाली होती है ॥३॥ इस सूक्त में मेघ विद्वान् और स्त्री के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ गति जाननी चाहिये । यह पंचम मण्डल में चौरासीवां सूक्त समाप्त हुआ। अथाष्टर्चस्य पञ्चाशीतितमस्य सूक्तस्य अत्रिऋषिः । वरुणो देवता।१।२ विरात्रिष्टुप् । ३ । ४।६। ८ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ५ स्वराट पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ७ ब्राह्मय ठिणक् छन्दः । ऋषभः स्वरः । अब आठ ऋचा वाले पिच्यासीवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। प्र सम्राजै बृहदर्चा गभीरं ब्रह्म प्रियं वरुणाय श्रुताय । वियो जघान शमितेव चौपस्तिः पृथिवीं सूर्याय ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्य (य:) जो रचने वाले के सदृश दुष्टों का (वि, जघान) नाश करता और (सूर्याय) रचने वाले के लिये (उपस्तिरे) बिछौने पर (चर्म) चमड़े और (पृथिवीम्) पृथिवी को (शमितेव) जैसे यज्ञमय व्यवहार प्राप्त होता है वैसे प्राप (वरुणाय) श्रेष्ठ (श्रु ताय) विशेष कर के सिद्ध यश वाले तथा (सम्राजे) उत्तम प्रकार शोभित के लिये (बृहत) बड़े (गभीरम्) थाह रहित (प्रियम् ) जो प्रसन्न करता उस (ब्रह्म) धन वा अन्न का (प्र, अर्चा) सत्कार करो ॥१॥ सुखी करते हैं वे बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥१॥ ARHIROINSTAGS । Mea - ३२४ ऋग्वेदः म० ५ । सू० ८५॥ APRINI म फिर उस परमेश्वर ने क्या किया इस विषय को कहते हैं। वनेषु व्य१न्तरिक्षं ततान वाजमव॑त्सु पय उस्रियांसु । हृत्सु ऋतुं वरुणो अप्स्वग्नि दिवि सूर्यमदधात्सोममद्रौं ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो जगदीश्वर (वनेषु) किरणों वा जंगलों में (अन्तरिक्षम्) जल' को (अर्वत्सु) धोड़ों में (वाजम्) वेग को और (उलियासु) पृथिवियों में (पयः) जल वा रस को (हृत्सु) हृदयों में (ऋतुम् विशेष ज्ञान को (अप्स) आकाश प्रदेशों में (अग्निम्) अग्नि को (दिवि) प्रकाश में (सूर्यम्) सूर्य को (अद्रौ) मेघ में (सोमम्) रस को (प्रदधात) धारण करता है वह (वरुणः) श्रेष्ठ परमात्मा संपूर्ण जगत् को (वि, सतान) विस्तृत करता है ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! जिस जगदीश्वर ने संपूर्ण जगत् को विस्तृत किया उसी का निरन्तर ध्यान करो॥२॥ फिर ईश्वर क्या करता है इस विषय को कहते हैं । नीचीनवारं वरुणः कबन्ध प्र संस रोदसी अन्तरिक्षम् । तेन विश्वस्य भुवनस्य राजा य न दृष्टिव्युनत्ति भूम ॥३ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अरुणः) श्रेष्ठ परमेश्वर (नीलीनवारम्) नीचे के स्थानों में वृष्टि करने वाले (कबन्धम्) मेघ को और (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी तथा (अन्तरिक्षम्) जल को (प्र, ससर्ज) उत्तमता से उत्पन्न करता है और (विश्वस्य) सम्पूर्ण (भुवनस्य) ब्रह्माण्ड का (राजा) प्रकाशक परमात्मा (वृष्टिः) वृष्टि (यवम्) यव आदि धान्य को (न) जैसे वैसे (वि, उनत्ति) विशेष करके गीला करता है (तेन) उससे हम लोग सुखी (भूम) होवें ॥३॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालंक -हे मनुष्यो ! आप लोग जगत् के रचनेवाले जगदीश्वर की उपासना करके और राजा होकर जैसे धान्य आदि का मेघ वैसे प्रजाओं का पालन कीजिये ॥३॥ अब राजाजन कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । उनत्ति भुमि पृथिवीमुद द्यां यदा दुग्धं वरुणो वष्टयादित् । समभ्रेणं वसत पर्वतासस्तविषीयन्तः श्रथयन्त वीराः ||४|| पदार्थ:-है राजन् (यदा) जब (वरुणः) वायु के सदृश राजा (अभ्रण) मेघ से (पृथिवीम्) विस्तीर्ण (भूमिम्) भूमि को और (उत) भी (धाम्) प्रकाश को 4- Ast INER DAMOHAN ऋग्वेदः मं०५। सू० ८५ ॥ . Ka (सम्, उनत्ति) गीला करता है (पाप) उस के अनन्तर (इद) ही वायु सदृश राजा (दुग्धम्) दुग्ध की (वष्टि) कामना करता है और हे (तविषीयन्तः) सेना की कामना करते हुए (वीरा:) शूरवीरो आप लोग (पर्वतास:) मेघों के सदृश यहां (वसत) वास करिये और (श्रथयन्त) अर्थात् शत्रुओं का नाश करिये ॥४॥ भावार्थ:-वे ही राजा लोग श्रेष्ठ हैं जो प्रजा के हित की कामना करते हैं और जैसे मेघ सब के सुखों की वृष्टि करते हैं वैसे ही राजा लोग प्रजात्रों की कामनाओं को पूर्ण करें।॥४॥ अब विद्वान् और ईश्वर क्या करते हैं इस विषय को कहते हैं । इमामू ष्वासुरस्य श्रुतस्य महीं मायां वरुणस्य प्रबोचम् । मानेनेव तस्थिवाँ अन्तरिक्ष वि यो ममे पृथिवीं सुयैण पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे मैं (इमाम्) इस (श्रु तस्य) सुने गये (प्रासुरस्य) मेघ में उत्पन्न हुए और (वरुणस्य) श्रेष्ठ की (महीम्) आदर करने योग्य वाणी का और (मायाम्) बुद्धि का आप लोगों के लिए (सु, प्र, वोचम् ) उत्तम प्रकार उपदेश करू (उ) और (य:) जो (तस्थिवान्) ठहरने वाला (मानेनेव) सत्कार से जैसे वैसे (अन्तरिक्षे) आकाश में (सूर्येण) सूर्य के साथ (पृथिवीम्) पृथिवी को (वि, ममे) विस्तारता है उसको ईश्वर जानो ॥५॥ भावार्थ:-~-इस मन्त्र में वाचकलु -हे मनुष्यो ! जो मेघ की विद्या के जानने वाले की वाणी और बुद्धि की प्रशंसा करता है और जो परमेश्वर संपूर्ण जगत् को रचता है उन दोनों का सदा सत्कार करो॥५॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । इमामू नु कवितमस्य मायां महीं देवस्य नकिरा दधर्ष । एक यदुद्ना न पृणन्त्येनीरासिञ्चन्तीरदनयः समुद्रम् ॥६॥ पदार्थ:-- हे मनुष्यो जो (इमाम्) इस (कवितमस्य) अतिशय कविजन (देवस्य) विद्वान् की (मायाम्) बुद्धि को (उ) और (महीम) वाणी को कोई भी (नु शीघ्र निकि:) नहीं (आ, दधर्ष) दबाता है और (यत्) जो (उद्ना) जल से (न) जैसे वैसे (एनीः) हरिणियों के सदृश दौड़ती और (मासिञ्चन्ती:) चारो ओर सींचती हुई (अवनयः) रक्षा करने वाली नदियां (एकम् ) एक (समुद्रम् ) समुद्र को (पृणन्ति) पूर्ण करती हैं उन को आप लोग यथावत् जानिये ॥६॥ भावार्थ:--जो मनुष्य बड़े विद्वानों के समीप से बड़ी बुद्धि और वाणी ३२६ ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ८५ ।। को प्राप्त हो कर अन्यों के लिए प्राप्त कराते हैं वे ही संसार में धन्य होते ii MA RAM vne- जल को मनुष्यों को चाहिये कि प्रमाद से किसी के भी प्रमाद को करके शीघ्र निवृत्त करावें ॥ अर्यम् वरुण मित्र्य वा सखायं वा सदमिभ्रातरं वा । वेशं वा नित्य हरुणारणं वा यत्सीमार्गश्चक्रमा शिश्रयस्तत् ।।७।। पदार्थ:-हे (वरुण) श्रेष्ठ विद्वान् (अर्यम्यम्) न्यायाधीशों में और (मित्र्यम्) मित्रों में हुए (बा) अथवा (सखायम्) मित्र और (सवम् ) स्थित होते हैं जिसमें उस गृह (इत) ही (वा) वा (भ्रातरम्) भ्राता (वा) अथवा (वैशम्) प्रविष्ट होने वाले को (वा.) अथवा हे (वरुण) (वरुण) श्रेष्ठ विद्वान् (नित्यम्) नित्य (मरणम्) (वा) वा (सीम्) सब ओर से से (यत्) जिस (आगः) अपराध को हम लोग (चकमा) करें (तत) उस सबका बाप (शिश्रथः) प्रयल करिये वा नाश करिये ॥७॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! अज्ञान वा प्रमाद से श्रेष्ठ पुरुषों में हम लोग जो प्रमाद करें उस संपूर्ण को आप निवृत्त कीजिये ॥७॥ कौन से मनुष्य सत्कार और कोन तिरस्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । कितवासो यदिरिपुर्न दीवि यद्वा घा सत्यमुत थन्न विद्म । सर्वा ता विशिथिरे देवाधा ते स्याम वरुण मियासी ॥८॥ पदार्थ:-हे (वरुण श्रेष्ठ (देव) बिद्वन् (घत) जो (कितवास:) जुमा करने वाले (वीवि) जुआरूप कम्म में (न) नहीं (रिरिपुः) आरोपित करते हैं (वा) अथवा (यत्) जिस (सत्यम्) श्रीष्ठों में श्रीष्ठ को (उत) तर्क वितर्क से (न) न (विन) जानें और (यव) जिसे (घा) ही नहीं जाने (ता) उन (सर्वा) सम्पूणों को (शिथिरेव) जैसे शिथिल' वैसे आप वि, स्थ) अन्त करिये जिससे (अधा) इसके अनन्तर हम लोग (ते) श्राप के (प्रियासः) प्रसन्न प्यारे (स्थाम) होवें ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो छली मनुष्य जुआ आदि कर्म करें वे ताड़ना करने योग्य और जो सत्य आचरण करें वे सत्कार करने योग्य JION M antra tara इस सूक्त में राजा, ईश्वर, मेघ और विद्वान् के गुण कर्म वर्णन' करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पंचम मण्डल में पिच्यासीवां सूक्त समाप्त हुभा ॥

ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८६ ॥ OEM अथ षडचस्य षडशीतितमस्य सुक्तस्य अत्रिऋषिः इन्द्राग्नी देवते । १। ४ । ५ स्वराडुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः । २ । ३ विराउनुष्टुप् छन्दः। ६ विराट पूर्वानुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ।। अब छः ऋचावाले छियासीवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन क्या करते हैं इस विषय को कहते हैं ।। इन्द्रांनी यमर्वय उभा वाजेषु मत्य॑म् । दृळा चित्स प मैदति घुम्ना बाणीरिव त्रितः ॥११॥ पदार्थः-- है (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के सदृश अध्यापक और उपदेशको तुम (उभा) दोनों (वाजेषु) संग्रामों में (यम्) जिस (मर्त्यम्) मनुष्य की (अवथः) रक्षा करते हो (स:) वह (चिद) भी (त्रितः) तीन अर्थात् अध्यापन उपदेशन और रक्षण से (वाणीरिव) जैसे वाणियों का वैसे (वृह,ळा) स्थिर (ध म्ना) धनों वा यशों का (प्र, भेदति) अत्यन्त भेद करता है ।।१।। भावार्थ:-जहां धार्मिक, विद्वान्, शूरवीर, बलिष्ठ और शिक्षक वहां पर कोई भी दुःख को नहीं प्राप्त होता है ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । या पृतनासु दुष्टरा या वाजेषु वायो । या पञ्च चर्षणीरभीन्द्राग्नी ता हवामहे ॥२॥ पवार्थ:-हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान वर्तमान सेनापति और अध्यक्ष (या) जो सेना के शिक्षक और लड़ाने वाले (पृतनासु) सेनाओं में (दुष्टरा) दुःख से उल्लंघन करने योग्य (या) जो (वाजेष) अन्नादिकों वा संग्रामों में (श्रवाय्या) प्रशंसा करने योग्य (या) जो (पञ्च) पांच' (चर्षणी:) प्राणों वा मनुष्यों को (अभि) सम्मुख रक्षा करते हैं (ता) उन दोनों को हम लोग (हवामहे) स्वीकार करें वा प्रशंसा करें ॥२॥ भावार्थ:-राजा और सेनापति को चाहिए कि उत्तम प्रकार परीक्षा करके सेना में अध्यक्ष भृत्यों को रक्खें जिस से सर्वदा विजय होवे ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । तयोरिदमवच्छवस्तिग्मा दिद्युन्मघोनोः । प्रति द्रणा गर्भस्त्योर्नवा वृत्रघ्न एषते ।३ नम --

R
Jhapa
MAM-
ऋग्वेदः मं० ५। सू०८६ ॥
maane
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे सूर्य (वृत्रघ्ने) मेघ के नाश करने वाले के लिए
(गवाम्) किरणों का (मा, ईषते) सब प्रकार नाश करता है और जो दोनों (दृणा)
चलने वाले वर्तमान हैं (तयोः, इत) उन्हीं सेनापति और सेनाध्यक्ष और (मधोनोः)
बहुत धन से युक्त (गभस्त्योः) भुजाओं के (अमवद) गृह के सदृश (शवः) बलयुक्त
(तिग्मा) तीव्र (दिद्य त) बिजुली है वैसे उसको आप लोग (प्रति) ग्रहण करें ॥३॥
भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजपुरुषो ! जैसे सूर्य मेघ
का नाश करके प्रजाओं का पालन करता है वैसे ही आप लोग दुष्टों का
नाश करके प्रजाओं की निरन्तर रक्षा कीजिये ॥३॥
फिर उसी विषय को कहते हैं
ता वामेषे रथानामिन्द्राग्नी हवामहे ।
पती तुरस्य राधसो विद्वांसा गिर्वणस्तमा ॥४॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (रथानाम्) वाहनों और (तुरस्य) शीघ्र सुखकारक
(राधसः) धन के (पती) पालन करने वाले (गिर्वणस्तमा) अतिशय उत्तम प्रकार
शिक्षित वाणी का सेवन करते हुए (विद्वांसा) विद्या से युक्त (इन्द्राग्नी) वायु और
बिजुली (वाम् ) और आप दोनों को (एषे) प्राप्त होने के लिए हम लोग (हवामहे)
प्राप्त होने की इच्छा करें (ता) उन दोनों को आप लोग भी प्राप्त होओ ॥४॥
भावार्थः - मनुष्यों को चाहिए कि वायु और बिजुली के सदृश श्रेष्ठ
गुणों से व्याप्त विद्वानों के सङ्ग से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होकर
प्रजाओं में मित्र के सदृश वर्ताव करें ॥४॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
ता वृधन्तावन
घून्माय देवावदा ।
अर्हन्ता चित्पुरो दधेऽशेव देवावर्वते ।।५।।
पदार्थः -- हे मनुष्यो जो (अंशेय) भाग के सदृश सत्कार करने योग्य
(माय) मनुष्य के लिए (अनु, धू न्) प्रतिदिन (वृधन्तौ) बढ़ते वा बढ़ाते हुए
(अदभा) नहीं हिंसा करने वाले (अर्हन्ता) आदर करने योग्य' (देवी) देने वालों को
मैं (पुरः) आगे (वधे) धारण करता हूं और जो (देवी) प्रकाशमान दोनों (चित्)
भी (अर्वते) विज्ञान के लिए वर्तमान हैं (ता) उन दोनों का आप लोग सत्कार
करो ॥५॥
भावार्थ:-जो मनुष्य दिनरात्रि मनुष्यों के हित के लिये प्रयत्न करते
हैं वे ही सबसे आदर करने योग्य हैं ॥५॥

मनुष्य (शर्धाय) बल के और (प्रयज्यवे) ऋग्वेदः मं० ५। सू०८७ ॥ ३२६ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। एवेन्द्राग्निशामहा वि हव्यं शुष्य घृतं न पूतमद्रिभिः । ता सूरिषु श्रवो बृहद्रयिं गृणत्सु दिधृतमिपं गृण दिधृतम् ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जिन (इन्द्राग्निभ्याम् ) सूर्य और अग्नि से (महा) दिनों को और (अदिभिः) मेघों से (धृतम्) घृत जैसे' (न) वैसे (पूतम् ) पवित्र (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य (शूष्यम) बल में उत्पन्न (श्रवः) अन्न होता है तथा (गृणत्सु) प्रशंसा करते हुए (सूरिष) विद्वानों में (बृहत) बड़े (रयिम्) धन को जो दोनों (दिधृतम्) धारण करें तथा (गृणत्सु) स्तुति करते हुए विद्वानों में (इषम्) विज्ञान को (वि, विधृतम्) विशेष धारण करें (ता) वे दोनों (एव) ही यथावत् जानने के योग्य हैं ॥६॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं-हे मनुष्यो ! जो विद्वानों में आप लोग निवास करें तो बिजुली और मेघ आदि की विद्या को जानें ॥६॥ इस सूक्त में इन्द्र, अग्नि और बिजुली के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह पचम्म मण्डल में छियासीवां सूक्त समाप्त हुआ। श्रथ नवर्चस्य सप्ताऽशीतितमस्य सूक्तस्य एक्यामरुदात्रेय ऋषिः । मरुतो देवताः। १ प्रतिजगती । २। ८ स्वराड्जगती। ३ ॥ ६ । ७ भुरिग्जगती । ४ निचज्जगती। ५। ६ विराजगती छन्दः । निषादः स्वरः।। अब नव ऋचा वाले सत्तासीवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को कैसे क्या प्राप्त होता है इस विषय को कहते हैं । प्र वो महे मतों यन्तु विष्णवे मरुत्वते गिरिजा एवथायरुत् । प्र शोय प्रयज्दवे सुखादये तबसे भन्ददिष्टये धुनिव्रताच शर्वसे ॥१॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जैसे (मरुत्वते) प्रशंसित मनुष्य जिस में उस (महे) बड़े (विष्णवे) व्यापक बिजुली रूप अग्नि के लिये (गिरिजाः) मेघ में उत्पन्न हुए प्राप्त होते हैं वैसे' (वः) आप लोगों को (मतयः) मनुष्य वा बुद्धियां (प्र, यन्तु) प्राप्त होवें और जैसे (एक्यामरुत्) प्राप्त कराने वालों को प्राप्त होने वालों का (सुखादये) उत्तम प्रकार खाने वाले (तवसे) बलिष्ठ के लिए तथा (भन्ददिष्टये) नागप AMITA । ३३० ऋग्वेदः मं० ५ । सू० ८७ ॥ हिक CHOICE भी मम् कल्याण और सुख की संगति के लिये (धुनिबताय) और कंपित व्रत जिस का उस (शवसे) बल' के लिए (प्र) समर्थ होता है वैसे आप लोग भी इस के लिये समर्थ हूजिये ॥१॥ भावार्थ:: जैसे बिजुली रूप अग्नि को मेघोत्पन्न गर्जनादि प्रभाव प्राप्त होते हैं क्योंकि वे गर्जनादि प्रभाव अग्नि और वायु से सिद्ध होने योग्य हैं, वैसे बुद्धिमान् पुरुषों को अन्य पुरुष प्राप्त होते हैं। और गुण प्राप्त कराने वाला पुरुष गुणी पुरुष को ढूंढ़ता है और अति उत्तम बल को भी प्राप्त होता है ॥१॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। म ये जाता महिना ये च नु स्वयं प्र विद्मनो ब्रदत एवयामरुत् । क्रत्वा सो मरुतो नावृषे शवों दाना मना तदेषामधृष्टासो नाद्रयः ॥२॥ पदार्थः-हे (मरुतः) मनुष्यो (ये) जो (महिना) महत्त्व से (जाताः) उत्पन्न हुए तथा (ये) जो (विद्मना) विज्ञान से (प्र, अवते) उपदेश देते हैं (च) और जो (स्वयम्) अपने से (नु) शीघ्र (प्र) विशेष करके . उपदेश देते हैं और (एक्यामरुद) विज्ञान वाला मनुष्य मैं (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म से उन (वः) आप लोगों के (तत्) उस' (शवः) बल को (दाना) देने से वा (मह्ना) महत्त्व से (न) नहीं (प्राधृषे) दबाने को समर्थ हाता हूं तथा (अन्यः) मेघों के (न) समान (प्रधृष्टास:) नहीं धर्षण किये गए जो (एषाम्) इनका बल है उसको नहीं दबाने को समर्थ होता हूं ॥२॥ भावार्थ:-इस मंत्र में उपमालंकार है-जो मनुष्य सब के उपकार को करके प्राणवत् प्रिय होते हैं वे ही जगत् के उपकार करने वाले होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । प्रये दिवो बृहसः शृंविरे गिरा सुशुक्वानः सुभ्वं एक्यामरुत् । न येषामिरी संघस्थ ईष्ट आँ अग्नयो न स्वविद्युतः प्र स्यन्द्रासो धुनीनाम् ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (ये) जो (सुशुक्वानः) उत्तम प्रकार शुद्ध (सभ्यः) और सुन्दर धर्मयुक्त व्यवहार में होने वाले (दिवः) कामना करते हुओं वा बिजुली आदिकों ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८७ ॥ Hema को जैसे (स्ववियुतः) अपने स्वरूप से व्याप्त और (धुनीनाम्) कम्पन क्रिया से युक्त भूमि आदिकों के (स्यन्द्रासः) पिघलते हुए वा पिघलाते हुए (अग्नयः) अग्नियां (न) वैसे (गिरा) वाणी से (बृहतः) बड़े (प्र, शुण्विरे) सुनते हैं और (येषाम् जिनका (एक्यामरुत्) विज्ञान वाला मनुष्य (इरी) प्रेरणा करने वाला (सधस्थे समान स्थान में (न) जैसे वैसे (प्र, ईष्टे) स्वामी होता है उनको आप लोग (मा) अच्छे प्रकार जानिये ॥३॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं० --मनुष्यो ! जो विद्या की कामना करने वाले जन बड़ी विद्याओं को प्राप्त हो कर बिजुली आदि पदार्थों को स्वाधीन करते हैं वे ही सिद्ध इच्छा वाले होते हैं ।।३।। अब ईश्वर की उपासना विषय को कहते हैं। स चक्रमे महतो निरुरुक्रमः समानस्मात्सदस एवयामरुत् । यदायुक्त त्मना स्वादधि ष्णुभिविष्पर्धसो विमहसो जिगाति शेटधो नृभिः॥४॥ पदार्थ:-हे . मनुष्यो जो (एक्यामरत) विज्ञान वाला मनुष्य (उरुक्रमः) जो बहुत क्रम वाला (समानस्मात्) तुल्य' (महतः) बड़े (सदसः) गृह से (नि:) निरन्तर (चक्रमे) क्रमण करता है उस को जो (त्मना) आत्मा से (यदा) जब (अयुक्त) युक्त होता है (स्नुभिः) तथा पवित्र गुणों और (नृभिः) नायकों के साथ वर्तमान (स्वाद.) अपने से (विष्पर्धसः) विशेष कर के स्पर्धा करने वालों (विमहसः) विशेष कर के बड़े गुणों से विशिष्ट और (शेवृधः) सुख के बढ़ाने वालों को (अधि, जिगाति) प्राप्त होता है (स.) वह परमेश्वर उपासना करने योग्य और योगीजन सेवन करने योग्य है ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य विद्वान् पुरुष के द्वारा परमेश्वर के योग का अभ्यास करते हैं वे सुख के धारण करने वाले होते हैं ॥४॥ फिर विद्वान् राजाजन कैसे होते हैं इस विषय को कहते हैं ।। स्वनो न वोऽर्मवानेजया वेपो ययिस्तविष एवयामरुत् । येना सहन्त ऋञ्जत स्वरोचिषः स्थारहमानो हिरण्ययाः स्वायुधास इष्मिणः || पदार्थ:-हे मनुष्यो वह (वः) आप लोगों के मध्य में (स्वनः) शब्द के (न) समान' (अमवान्) गृहवाला (वृषा) बलिष्ठ और (त्वेष:) प्रकाशवान् (तविष:) बल से (ययिः) प्राप्त होने वाला (एक्यामरत) बुद्धिमान् मनुष्य व्यवहारों को (रेजयव) MM ३३२ ऋग्वेदः मं० ५। सू० ८७ ॥ । कंपित कराता है (येना) जिस पुरुष से (सहन्तः) सहन करने वाले (स्वरोचिषः) अपने से प्रकाश जिनका ऐसे और (स्थारश्मानः) स्थिर किरणों के सदृश व्यवहार जिनके तथा (हिरण्यया:) तेजः स्वरूप (स्वायुधासः) अपने प्रायुधों वाले और (इषिमणः) बहुत प्रकार की इच्छा वाले जन आप लोग अपने प्रयोजनों को (ऋञ्जत) सिद्ध करें ॥५॥ भावार्थ:----इस मन्त्र में उपमालं ० --जो प्रकाशित धर्मयुक्त व्यवहार वाले तथा शम दम आदि से युक्त, तेजस्वी बल वाले और युद्ध विद्या में कुशल होवें वे ही विजयी होते हैं ॥५॥ अब विद्वानों को किनका निवारण कर किनका सत्कार करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अपारो दो महिमा वृद्धशवसस्त्वेषं शवोऽवत्वयामरुत् । स्थातारो हि प्रसितौ सन्दृषि स्थन ते न उरुष्यता निदा शुक्दासो नाम:॥६॥ पदार्थ:-हे (वृद्धशवसः) बढ़े हुए बल बालो (स्थातारः) स्थित होने वाले अग्नयः) अग्नियां (न) जैसे वेसे (व:) आप लोगों का जो अपार:) अपार (महिमा) बड़प्पन और (एक्यामरुत) बुद्धिमान् मनुष्य (त्वेषम्) प्रकाशित (शथः) बल की (अवत) रक्षा करे (हि) जिससे कि (प्रसितौ) प्रकृष्ट बन्धन के रहते पर (निदः) निन्दा करने वाले (शुशुक्वांसः) शोक' से युक्त होवें (ते) वे आप लोग (संदृशि) तुल्य दर्शन में (स्थन) स्थित हूजिये और (न:) हम लोगों का (उरुष्यता) सेवन करिये ॥६॥ भावार्थः-इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जो निन्दक अर्थात् मिथ्यावादी होवें उनको सदा बन्धन में प्रविष्ट करिये और जो महाशय, परोपकारी, स्तुति करने और सत्य बोलने वाले होवें उन का सदा सत्कार Runu m ANSAR WINA करिये ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ते रुद्रासः मुमखा अग्नयों यथा तुविद्युम्ना अवन्त्वेक्यामरुत् । दीर्घ पृथु पंप्रथे सग पार्थिवं येषामज्मेष्वा महा शर्धास्यद्भुतैनसाम् ।।७।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (ते) वे (सुमखा:) सुन्दर न्यायाचरण और यज्ञ के करने वाले (रुद्रासः) मध्यम विद्वान् जन (यथा) जैसे (अग्नयः) अग्नि के सदृश वर्तमान (तुविच म्नाः) बहुत धन और यश से युक्त हुए हम लोगों की (अवन्त)] ऋग्वेदः मं० ५। सू० ६७ ।। सदृश पाप M RAJ EPALI maa रक्षा करें जिन (अद्भुतैनसाम्) अद्भुत बड़े पाप वालों के (मज्मेषु) संग्रामों में (शर्धासि) बलों और (महः) बड़े (दीर्घम्) लम्बे (पृथु) विस्तृत वा प्रसिद्ध (पार्थिवम् ) पृथिवी में विदित (सम) ठहरते हैं जिसमें उस स्थान को (एक्यामरुत्) बुद्धिमान् पुरुष (मा, प्रपथे) अच्छे प्रकार प्रसिद्ध करता है ॥७॥ भावार्थ:----इस मन्त्र में उपमाल-जो मनुष्य अग्नि के के नाश करने, सत्य के प्रकाश करने और दुष्टों के रुलाने वाले, श्रेष्ठों के पालक हैं के ही अधिक कीत्ति वाले होते हैं ।।७।। फिर उसी विषय को कहते हैं । अद्वेषो नो मरुतो प्रातुमेतन श्रोता इवें जरितुरेवयामरुत । विष्णोर्महा समन्यवो युयोतन स्मद्रथ्यो ३' न देखनाप द्वेषांसि सनुतः पदार्थ:-है (समन्यवः) समान क्रोध बाले' (मरुतः) मनुष्यो. श्राप लोग (एक्यामरुत्) बुद्धिमान् मनुष्य के सदृश (न:) हम लोगों को (अद्वेषः) द्वेष से रहित करिये। और (गातुम्) पृथिवी को (श्रा, इतन) प्राप्त हूजिये तथा हम लोगों के (हवम् । श्रेष्ठ व्यवहार को (श्रोता) सुनिए (जरितः) स्तुति करने योग्य (विष्णोः) व्यापक के (महः) महत्त्व को (स्मत) ही (युयोतन) संयुक्त कीजिये और (रथ्यः) वाहनों के चलाने में कुशलों के (न) सदृश (सनुतः) सनातन (दंसना) कर्मों को और (अप) दूरीकरण के निमित्त (द्वेषांसि) द्वेषयुक्त कर्मों को संयुक्त कीजिये॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जो विद्वान् और उपदेशक जन मनुष्यों को द्वष आदि दोषों से रहित करते हैं वे व्यापक ईश्वर के पद को प्राप्त होते हैं ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । गन्ता नो यज्ञं यज्ञियाः सुशमि श्रोता हर्यभरक्ष एवयामरुत् । ज्येष्ठांसो न पर्वतासो व्योमनि यूयं तस्य मचेतसः स्यात दुत्तियो निदः ।।९।। पदार्थः-हे (यशिया:) यज्ञ करने योग्य (यूयम्) आप लोग (एक्यामरुत) बुद्धिमान् मनुष्य' के सदृश (न:) हम लोगों को वा हम लोगों के (यज्ञम्) सत्य को प्रकट करने बाले व्यवहार को (गन्ता) प्राप्त हूजिये और (सुशमि) श्रेष्ठ कर्म और (हदम्) पठन की परीक्षा नामक कर्म को (श्रोता) सुनिये तथा प्ररक्षः) नहीं रक्षा करने योग्य का निवारण करिये और (व्योमनि) आकाश ऋग्वेदः मं० ५। सू०८७॥ के सदृश व्यापक परमेश्वर में (पर्वतासः) मेघ (न) जैसे वैसे (ज्येष्ठासः) विद्या और अवस्था से वृद्ध और प्रशंसा युक्त वाणी वाले हूजिये, और जो आकाश के सदृश व्यापक ईश्वर है (तस्य) उस के (प्रचेतस:) जनाने वाले (स्यात) हूजिये और जो (दुर्धर्तवः) दुःख से धारण करने वाले (निदः) निन्दक' जन हैं उनके निवारण करने वाले हूजिये ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है -हे विद्वान् जनो! आप लोग विद्या के प्रचार नामक व्यवहार के प्रचार से धर्म सम्बन्धी कार्यों को करके अन्यों से भी करामो और निन्दा आदि दोषों से मनुष्यों को पृथक् कर के परमेश्वर की ओर प्रवृत्त करो और स्वयं भी ऐसे होभो ॥६।। इस सूक्त में वायु, विद्वान् और परमेश्वर की उपासना का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पंचम मण्डल में सत्तासीवां सूक्त समाप्त हुआ।

* ओ३म् * ऋग्वेद-भाषाभाष्यम् ॥ -:08:8:०%०६०:- अथ षष्ठं मण्डलम्॥ -:03:0:30 विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आ सुव ।। PORNO अथ त्रयोदशस्य प्रथमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निदेवता। १७॥ १३ भुरिपक्तिः । २ स्वराष्ट्रपङ्क्तिः । ५पंक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३।४।६।११ । १२ निवृत्रिष्टुप् । ८ । १० त्रिष्टुप् । ६ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धेवतः स्वरः।। अब छठे मण्डल में तेरह ऋचावाले प्रथम सूक्त का आरम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन अग्नि के सदृश क्या क्या करें इस विषय को कहते हैं । त्वं ह्यग्ने प्रथमो मनोतास्या धियो अभवो दस्म होता । स्वं सी पन्नकृणोर्दुष्टस्तु सहो विश्वस्मै सहसे सहध्यै ।।१।। पवार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (दस्म) दुःख के नाश करने वाले विद्वान् जन जैसे (प्रथमः) आदिमः (मनोता) मन के समान जाने वाले और (होता) दान करने वाले हुए (त्वम्) आप (हि) निश्चय से (अस्याः) इस (धियः) बुद्धि की वृद्धि करते हुये सुखयुक्त (अभवः) होते हो । और हे (वृषन्) वीर्य के सींचने वाले (त्वम्) आप (सीम्) सब ओर से (विश्वस्मै) सम्पूर्ण प्राणियों के लिए ऋग्वेदः मं०६ । सू०१॥ Wias H RENA - (सहः) सहनशील (सहसे) बल के लिए (सहध्ये) सहने को (दुष्टरोतु) दुःख' से उल्लंघन करने योग्य प्रकृणोः) करते हो वैसे बिजुलीरूप अग्नि करता है ॥१॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन मूर्ख लोगों से किये हुए अपराधों को सहकर सम्पूर्ण जनों के सुख के लिए प्रयत्न करते हैं वही सब के हितकारी होते हैं ॥१॥ मनुष्य किस रीति से विद्या को प्राप्त होने इस विषय को कहते हैं ।। अधा होता न्यसीदो बीयानिळस्पद इषयनीड्या सन् । तं त्वा नः प्रथमं देवयन्तो महो राये चितयन्तो अनु ग्मन् ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जिस प्रकार से (होता) ग्रहण करने और (यजीयान्) अत्यन्त यज्ञ करने वाला पुरुष (इषयन्) प्राप्त कराता और (ईडयः) स्तुति करने योग्य (सन्) होता हुआ भग्नि (इळ:) पृथिवी वा वाणी के (पदे) स्थान में वर्तमान है वैसे होकर प्राप (नि, असोदः) निरन्तर स्थिर हूजिए और जैसे (देवयन्तः) कामना करते और (चितयन्तः) जनाते हुए (नर:) मनुष्य (प्रथमम् ) आदिम अग्नि को (अनु, मन्) पश्चात् चलते हैं वैसे (आधा) अनन्तर (महः) बड़े (राये) धन के लिए (तम्) उस (वा) आप को ये सब पश्चात् प्राप्त होवें ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु -जो मनुष्य विद्वानों की कामना कर के अग्नि आदि की विद्या को ग्रहण करने की इच्छा करते हैं वे विज्ञान युक्त होते हैं ॥२॥ फिर विद्वान् जन क्या जानें इस विषय को कहते हैं । वृतेव यन्तं बहुभिर्वसन्यै ३ स्त्वे रयिं जागृवांसो अनु ग्मन् । रुन्तिमग्नि दर्शतं बृहन्त वपावन्तं विश्वहा दीदिवांसम् ॥३॥ पदार्थ:--हे विद्वन् (जागृवांसः) विद्या से जागृत विद्वान् जन जिसको (बहुभिः) बहुत (बसव्यः) पुथिवी आदिकों में हुए पदार्थों के साथ (वृतेव) वर्तमान होते हैं जिसमें उस मार्ग से (यन्तम्) जाते (रुशन्तम्) हिंसा करते. (वर्शतम्) देखने वाले वा देखने योग्य (बृहन्तम्) बड़े (वपावन्तम्) बहुत कार्यों के संस्कार जमाने के अधिकरण विद्यमान जिसमें उस (विश्वहा) सब दिनों वा सब दिनों को (दीदि- वांसम्) प्रकाशमान वा प्रकाश करते हुए ( (अग्निम्) अग्नि के सदृश विद्यादिरूप के (अनु, ग्मन्) पीछे चलते हैं और जो (स्वे) आप में (रयिम्) धन को धारण करे उसको आप पश्चात् जानिये ॥३॥ Om M P mta AN AAR पिताके सदृश पालनकर्ता और (माता) माता के सदृश आदर करने वाले ऋग्वेदः मं०६ । सू०१॥ भावार्थ:-जो निरन्तर सर्वत्र चलते हुए सब के प्रकाशक और सम्पूर्ण पदार्थों में व्यापक और पदार्थों के जलाने वाले बिजुली आदि स्वरूप अग्नि को जान कर कार्यों में उपयुक्त करते हैं वे अत्यन्त लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । पदं देवस्य नमसा व्यन्तः अवस्थामा श्रई आपनक्तम् । नामानि चिदधिरे यज्ञियानि अदायाँ रणयन्ता सन्दृष्टौ ॥४॥ पदार्थ:----हे विद्वान् जनो (वयन्तः) व्याप्त हैं विद्या और क्रियायें जिन में ऐसे और (श्रवस्यवः) अपने अन्न की इच्छा करने वाले आप लोग (नमसा) अन्न आदि वा वजवच्छेदकत्वगुरए के साथ वर्तमान (देवस्य) सब में प्रकाशमान अग्नि के (पदम्) प्राप्त होने योग्य (अमुक्तम्) शुद्धि से रहित (श्रवः) पृथिवी के अन्न आदि को (आपन्) प्राप्त होते हैं तथा इस सव में प्रकाशक के (यज्ञियानि) यज्ञ की सिद्धि के लिए योग्य (नामानि) जलों वा संज्ञाओं को (चित) निश्चय से (दधिरे) धारण करें और (ते) वे (भवायाम्कल्याणकारक (सन्दृष्टौ) उत्तम दर्शन में (रणयन्त) रमें बारमण करावें ॥४॥ भावार्थ:----जो मनुष्य अग्नि आदि पदार्थों के गुण कर्म और स्वभावों को जान कर कार्यों को सिद्ध करते हैं वे अतुल मानन्द को प्राप्त कर सुख के विषय में रमते हैं ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या प्रयोग करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। त्वां वन्ति क्षितयः पृथिव्यां त्वां राय उभयांसो जनानाम् । त्वं त्राता तरणे चेत्यो पिता माता सदभिन्मानुषाणाम् ।।५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (जनानाम्) मनुष्यों के (उभयासः) दोनों प्रकार के अर्थात् विद्वान् और अविद्वान् जन और (क्षितयः) निवास वाले मनुष्य (पृथिव्याम्) भूमि में (रायः) धनों की और (स्वाम) आप की (वर्धन्ति) वृद्धि करते हैं और (स्वाम्) उन आप को उत्तम प्रकार प्रयुक्त करते हैं वह आप (तरणे) दुःखों से उद्धार के निमित्त बाता) रक्षा करने वाले (चेत्यः) चयन समूहों में हुए (पिता) (मानुषाणाम्) मनुष्यों के पालक (भूः) होमो और (सदम्) स्थिर होते हैं जिस में उस गृह को व्याप्त हुए उन आप को (इच) ही सब लोग विशेष करके जानें ॥शा ऋग्वेदः मं०६ । ० १॥ SEN - HOM को प्राप्त भावार्थः जो पृथिवी आदिकों में वर्तमान बिजुलीरूप अग्नि का उत्तम प्रकार प्रयोग करते हैं वे सब के सुख देने वाले होते हैं ॥५॥ फिर मनुष्यों को किसकी सेवा करनी चाहिए इस विषय को कहते हैं । सपर्येण्यः स प्रियो विश्व १ ग्निहोतो मन्द्रो निषसादा थीयान् । तं त्वा वयं दम आ दीदिवांसमुप॑जुबाधो नमसा सदेम ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वन् ! जो (विक्षु) प्रजात्रों में (सपर्येण्यः) सेवा करने योग्य और (प्रियः) कामना करने योग्य अर्थात् सुन्दर (होता) ग्रहण करने पार (मन्द्रः) आनन्द देने वाला (यजीयान्) अतिशय यज्ञकर्ता (अग्निः) अग्नि (नि) अत्यन्त (ससादा) स्थित होता है जिन आप से (स:) वह प्रयोग किया जाता है (तम्) उस (दमे) गृह में (दीदिवांसम्) प्रकाशमान (त्या) आप को (ज्ञ बाधः) जंघाओं को बाधते हुए (वयम्) हम लोग (नमसा) सस्कार वा अन्न आदि से (उपमा, सदेम) समीप होवें ॥६॥ भावार्थ:- जो अग्नि आदि की विद्या को जानते हैं वे सुख होते हैं ॥६॥ फिर मनुष्यों को कैसे होकर क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । तं त्वा वयं मुध्यो३' नव्यमग्ने झुम्नायव ईमहे देवयन्तः । त्वं विशों अनयो दीद्यानो दिवो अग्ने बृहता रोचनेनं ॥७॥ पदार्थः- हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान विद्वन् जैसे (सुध्यः) उत्तम बुद्धियुक्त (सुम्नायवः) अपने सुख की इच्छा करने वाले (देवयन्तः) कामना करते हुए (वयम्) हम लोग (तम् ) उस (नव्यम्) नवीन पदार्थों में हुए अग्नि को (ईमहे) व्याप्त होवें वैसे (त्वा) आप को प्राप्त होवें और हे (अग्ने) अग्नि के सदृश विद्या से प्रकाशित जैसे सूर्य (बृहता) बड़े (रोचनेन) प्रक प्रकाश से (दोद्यान:) प्रकाशित होता हुअा (दिवः) कामना करने के योग्य पदार्थों को (विश:) प्रजात्रों को (अनयः) पहुंचाता है वैसे (त्वम्) आप इनको प्राप्त कराइये ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो विद्वान् जनों के सदृश अग्नि का अनुचरण करते हैं वे कृतकार्य होते हैं ॥७॥ फिर मनुष्य किस को प्राप्त होवें इस विषय का कहते हैं । विशां कविं विश्पति शश्वतीनां नितोशनं वृषभं चर्षणीनाम् । प्रेतीषणिमिषयन्तं पावकं राजन्तमग्नि यजतं रयीणाम् ॥८॥ - पक vasa IMA ARDHA DAR :- ऋग्वेदः मं०६ । सू०१॥ BORN पदार्थः ---हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (शश्वतीनाम्) अनादिभूत (विशाम्) प्रजाओं के मध्य में (कविम्) तेजयुक्त दर्शन जिसका ऐसे (विश्पतिम्) प्रजा के पालने वाले (नितोशनम्) पदार्थों के नाश करने वाले (वृषभम् ) बलिष्ठ और (वर्षणीनाम्) मनुष्यों और रयीणाम् ) धनों और (प्रेतीषणिम्) अच्छे प्रकार से प्राप्त हुओं को प्राप्त होने वाले को (इषयन्तम्) प्राप्त कराते हुए और (यजतम्) प्राप्त होने योग्य (राजन्तम्) प्रकाशित होते हुए (पावकम् ) पवित्र करने वाले (अग्निम्) अग्नि को उत्तम प्रकार कार्यों में युक्त' करें वैसे' प्राप लोग भी संप्रयुक्त करो ।।६।। भावार्थ:--जो मनुष्य अग्नि का शरीर के सदृश सेवन करते हैं वे प्रजा के स्वामी होते हैं ।।८।। फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को कहते हैं । सो अंग्न ईजे शशी च सौ यस्ता मानद समिधा हव्यदानिम् । साहुति परि वेदा नामिविश्वास वामा दधौ त्योत: ॥९॥ पदार्थ:--हे (अग्ने) अग्नि के सदश वर्तमान विद्वन् (ते) आप का (यः) जो (भर्तः) मनुष्य (समिधा) समिधू से (हव्यदालिम्) हवन करने योग्य बस्तुओं के देने वाले को (पान) व्याप्त होता है उस को जानने वाला (स:) वह मैं उसको (ईजे) उत्तम प्रकार प्राप्त होता और (शशमे प्रशंसा करता हूं (च) और (यः). जो (माहुतिम्) आहुति को अर्थात् जो चारों ओर से होमी जाती उस सामग्री को (परि) सब प्रकार से (वेदा) जानता है (स:) वह (त्योत:) श्राप से रक्षित हुआ (नमोभिः) अन्न आदिकों वा सत्कारों से (विश्वा) सम्पूर्ण (बामा) प्रशंसा करने योग्य कर्मों को (इत) ही (दधते) धारण करता है ॥६॥ भावार्थ:--हे मनुष्यो ! जो प्रशंसित कार्यों का करने वाला अग्नि है उसको विशेष कर जानिये ॥६॥ जो जन पदार्थविद्याप्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं वे भाग्यशाली होते हैं । इस विषय को कहते हैं । अस्मा उ ते महि महे विधेम नमोभिरग्ने समिधोत हव्यः । वेदी सुनो सहसो गीभिरुक्थैरा ते भद्रायां सुमतौ यतेम ॥१०॥ पदार्थ:-हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र (अग्ने) विद्वज्जन जैसे (समिधा) ईन्धन आदि के सदृश विद्या और (नमोभिः) अन्न आदिकों से संपूर्ण स्त्रियों को जो धारण करते हैं और जो आहुति को देख कर जानता है और जो (देवी) जानते हैं सुखों को जिस में वह होती है उस का (गोभिः) वारिणयों और (उक्थैः) कीर्तन BHAR सम

SARAN
(तरुचः।
ऋग्वेदः मैं०६ । सू० १॥
करने योग्य वचनों से और (हव्यः) भोजन करने योग्य पदार्थों से (अस्मै) इस (महे)
बड़े (ते) आप के लिए (महि) बहुत (प्रा) सब प्रकार से (विधेम) सत्कार करें
उन वारिणयों के सहित आप लोग (उ) भी (उत) और हम भी (ते) आप की
भद्रायाम्) कल्याणकारिणी (सुमतौ) उत्तम बुद्धि में (यतेम) प्रयत्न करें ॥१०॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग इस प्राणियों के समुदाय के लिये
सामग्री से यज्ञ करें॥१०॥
फिर मनुष्य किस को प्राप्त होवें इस विषय को कहते हैं ।।
आ यस्ततन्थ रोदसी वि भासा श्रोभिश्च श्रवडार स्तरुत्रः।
बृहद्भिर्वाजैः स्थविरेभिरस्मे रेवद्भिरग्ने वितरं वि माहि ॥११॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्धन् (यः) जो अग्नि (भासा) प्रकाश से और
श्रवोभिः) श्रवण प्रादि वा अन्न आदि से (च) भी (श्रवस्य:) सुनने के योग्य' और
भारी (बाजैः) संग्रामों के सहित वर्तमान (रेवद्भिः) बहुत धनों से युक्त जनों के
साथ (रोबसी) द्यावापृथिवी को (वि, श्रा, ततन्य) विशेष कर सब प्रकार विस्तार
करता है तथा (अस्मे) हम लोगों के लिए उस (वितरम्) वितर अर्थात् विविध प्रकार
से तरते हैं जिससे उसको (वि, भाहि) उत्तम प्रकार प्रकाशित कीजिये ॥११॥
भावार्थ:----जो विद्वान् जन उत्तम विद्या से अग्नि के प्रभाव को जानें
तो विस्मय को प्राप्त होकर चकित होवें ॥११॥
फिर विद्वज्जन' क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।
नृवसो सदमियस्मे भूरि तोकाय तनयाय पश्वः ।
पूर्वीरिषो बृहतीसरे अंघा अस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु ।।१२।।
पदार्थ:-हे (वसो) बसने वाले विद्वज्जन आप (अस्मे) हम लोगों में
(तोकाय) कन्या और (तनयाय) पुत्र के लिये (पश्वः) पशु गौ आदि को तथा
(सदम्) वर्तमान होते हैं जिसमें उस गृह और (बृहतीः) बड़ी (पूर्वीः) प्राचीन
(मारे प्रधाः) दूर पाप जिनके उन (इषः) अन्न आदि सामग्रियों को (भूरि) बहुत
(धेहि) धारण करिये जिससे (अस्मे) हम लोगों के लिये (इत्) ही (नवत्) मनुष्यों
के सदृश (भद्रा) कल्याणकारक (सौश्रवसानि) उत्तम प्रकार संस्कार से युक्त अन्न
में हुए पदार्थ (सन्तु) हों ॥१२।।
भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं० -वे ही विद्वान् हैं जो माता पितामों
के समान सांसारिक जनों के लिए हितकारक वस्तुओं को देते हैं ॥१२॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू० १॥ ३४१ WEIO NA अब ईश्वर के तुल्य प्रजापालन विषय को कहते हैं ।। पुरूण्यग्ने पुरुश त्वाया वसूनि राजन्यसुता ते अश्याम् । पुरूणि हि त्वे पुरुवार सन्त्यग्ने वसुं विधते राजनि त्यो ॥१३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (राजन) विद्या और विनय' से प्रकाशमान (ते) आप के समीप जो (वसुता) द्रव्यों का होना उस में वर्तमान (पुरूणि) बहुत और (पुरुधा) बहुत प्रकारों से धारण किये हुए वसूनि) द्रव्यों को (त्वाया) आप के साथ मैं (अश्याम्) प्राप्त होऊ और हे (पुरुवार) बहुतों से स्वीकार करने योग्य (अग्ने) विद्या और विनय से प्रकाशमान (हि) निश्चय से (स्वे) आप में (पुरूणि) बहुत द्रव्य (सन्ति) हैं (राजनि) राजा (त्वे) आप के होने पर (वसु) द्रव्य का (विधते) विधान करने वाले के लिए कल्याण होता है वह आप हमारे राजा हूजिये ॥१३॥ भावार्थ:-वे ही राजा उत्तम हैं जो परमेश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके पुत्र के सदृश प्रजाओं का पालन करते हैं और वे ही प्रजाजन श्रेष्ठ होते हैं जो राजा और ईश्वर के भक्त हैं ।।१३।। इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और ईश्वर के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। इस अध्याय में मित्रावरुण, अश्वि, सूर्य, वायु और अग्नि आदि के गुण वर्णन करने से इस अध्याय में कहे हुए अर्थ की इस से पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में प्रथम सूक्त समाप्त हुना।।

करते हो और हे (वो वसाने वाले (त्वमा * ओ३म् * अथ पञ्चमोऽध्यायः॥ --:02:03002- विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुवं । यद्भद्रं तन्न आ मुंव ॥१॥ अर्थकादशस्य द्वितीयस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्नि- देवताः।१।६ भुरिगुष्णिक । २ स्वराष्णिक । ७ निवृष्णिक । ८ उष्णिक छन्दः। ऋषभः स्वरः । ३ । ४ अनुष्टुप् । ५।६। १० निन्दनष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः। ११ भुरिगतिजगती छन्दः । निषादः स्वरः ।। अब पञ्चमाध्याय का प्रारम्भ है और छठे मण्डल में ग्यारह ऋचा वाले दूसरे सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है उस के प्रथम मन्त्र में अग्नि कैसा होता है इस विषय को कहते हैं त्वं हि तंवद्यशोऽग्ने मित्रो ब् पत्यसे । विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टि न पुष्यसि ॥१॥ पक्षार्थ:--हे (विनर्षणे) प्रकाश करने वाले (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान हि) जिस कारण (त्वम्) आप (क्षतवत) पृथिवी में हुए के समान (यश:) धन अन्न वा कौत्ति को (मित्रः) मित्र (न) जैसे वैसे (पत्यसे) पति के सदृश पाचरण आदि के योग को (न) जैसे वैसे (श्रवः) अन्न वा श्रवरण का (पुष्यसि) पालन करते हो इससे सुखी होते हो॥१॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं.-- उपमालं.-जैसे पृथिवी में उत्पन्न हुए शुष्क बस्तु रस से रहित होते हैं वैसे विद्यारहित और धम्मरहित जन दयारहित और कोमलता रहित होते हैं ||१|| विद्वानों को इस संसार में कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। ANP Ahea

ऋग्वेदः मं०६ । सू०२ ।।
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स्वां हि मां चर्षणयो यजेभिर्गीमिरीळते ।
स्या वाजी यात्मवृको रंजस्तूविश्वचर्षणिः ॥२॥
पदार्थ:---हे विद्वन् जो(चर्षणय:) मनुष्य (यज्ञेभिः) अध्ययन अध्यापन प्रादिकों
और (गोभिः) वारिणयों से (त्वाम् ) आपकी (हि) निश्चित (ईळते) स्तुति करते
(स्मा) हा हैं (रजस्तूः) लोकों का बढ़ाने वाला (विश्वचर्षणिः) सम्पूर्ण विचारशील
मनुष्य जिसके वह (अवृक:) चोर आदिकों के संग से रहित (बाजी) वेग से युक्त
हुआ (त्वाम्) प्राप' को (याति) प्राप्त होता है ॥२॥
भावार्थ:-जो मनुष्य जिस विद्वान् का सेवन करते हैं वह उनके लिये
विद्या देवे ॥२॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
सजोषस्त्वा दिवो नरो यज्ञस्य केतुमिन्धते ।
यद्ध स्थ मानुषो जनः सुम्नायुर्जुढे अध्वरे ॥३॥
पदार्थ:--हे विद्वन् (सजोषः) तुल्य' प्रीति के सेवन करने वाले (दिवः) सत्य
की कामना करते हुए (नरः) नायक जन (यशस्य) न्यायव्यवहार की (केतुम्) बुद्धि
को और (त्या) आपको (इन्धते) प्रकाशित करते हैं और (यत) जिससे (ह) निश्चय
करके (स्यः) वह (मानुषः) विचारशील और (सुम्नायुः) सुख की कामना करने
वाले (जनः) प्रसिद्ध मनुष्य अाप (अध्वरे) अहिंसा रूप में वर्तमान होते हो उसकी
मैं (जुह) स्पर्धा करता है ॥३॥
भावार्थः ---उसी का संग मनुष्यों को करना चाहिये जिस की धार्मिक
विद्वान् जन प्रशंसा करें ।।३।।
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
ऋवधस्तै सुदान धिया मतः शमते ।
अती ष बृहतो दिवो द्विषो अंहो न तरति ॥४॥
पदार्थ:-हे विद्वन् ! (य:) जो (मतः) मनुष्य (धिया) बुद्धि से । सदानवे
उत्तम दान करने वाले (ते) आप के लिये (ऋधत्) उत्तम प्रकार ऋद्धि करे तथा
शामते) शान्त हो (सः) वह (ऊती) रक्षण आदि कर्म से (बृहतः) बड़े (दिवः)
कामना करते हुओं को (द्विषः) शत्रु का (अंहः) अपराध (न.) जैसे वैसे (तरति.)
पार होता है ॥४॥

wom ठी s (माहुतिम्) आहुति को (नशत) आपके लिये (निशितिम्) तीक्ष्ण अतितीन पदार्थों से युक्त पर प्रकाश और (कृपा) कृपा से (पावक) अग्नि के सदृश' वर्तमान हुए (रोचसे) ३४४ ऋग्वेदः मं०६ । सू०२॥ भावार्थ:--जो मनुष्य धर्मात्मा जनों के लिए सुख देने वाले होवें वे जैसे धार्मिक जन पाप का नाश करते हैं वैसे ही शत्रुओं का उल्लंघन करते हैं ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । समिधा यस्त आहुति निशिति मर्यो नयंत् । बावन्तं स पुष्यति क्षयमग्ने शतायुषम् ।।५।। पदार्थ:--हे (अग्ने) विद्वन् जन (यः) जो (मयः) मनुष्य (समिधा) अग्नि होकर (पृष्यति) पुष्ट होता है ॥५॥ भावार्थ:-जो मनुष्य विद्वानों की सेवा से उत्तम गुण कर्म और स्वभाव वालों को प्राप्त होने हैं वे सुख की वृद्धि और अतिकाल पर्य्यन्त जीवन से युक्त और अच्छे गृहों वाले होकर शरीर और आत्मा से पुष्ट होते हैं ॥५॥ फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को कहते हैं। त्वेषस्ते धूम अण्वति आतंतः धुता त्वं कृपा रोचसे ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जसे (ते) उसका (सूरः) सूर्य (न) जैसे वैसे' (त्वेषः) प्रदीप्त (धूम) धूम (शुक्रः) शुद्धि का करने वाला (प्राततः) व्याप्त (सन्) होता हुआ (दिवि) प्रकाश में (ऋण्वति) चलता हैं वैसे (हि) ही (त्वम्) प्राप ( ता) दिवि पच्छुक पांवक Asaree सूरोन प्रकाशित होते हो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमावाचकलु०-हे विद्वान् जनो ! जिस अग्नि के धूम से वायु आदि पदार्थ शुद्ध होते हैं और जो सूर्य आदि का कारण है उस की विद्या को प्राप्त होकर उत्तम गुणों में आप लोग प्रकाशित हूजिये ॥६॥ फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं०६ । सू०२॥ SA 4000 AROO अधा हि विक्ष्वीडयोऽसि प्रियो नो अतिथिः ! रण्या पुरीब जूयः सूनुर्न त्रययायः ॥७॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (हि) जिस कारण से आप (विक्षु) प्रजाओं में (ईड्यः) स्तुति करने के योग्य और (नः) हम लोगों के (प्रियः) कामना करने योग्य (पुरीव) रमणीय' पुरी के समान (रण्वः) रमण करता हुआ (जूर्य:) जीर्ण (श्ययाय्यः) रक्षक को प्राप्त होने वाला (सूनुः) सन्तान (न) जैसे वैसे (अतिथिः) नहीं नियत तिथि जिसकी ऐसे (असि) हो तिससे (आधा) इसके अनन्तर सत्कार करने योग्य हो ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है - जैसे अतिथिजन प्रजाजनों से सत्कार करने योग्य होते और जैसे यहां माता और पिता से सन्तान पालन करने योग्य होते हैं वैसे ही धाम्मिक विद्वान् जन सत्कार करने योग्य होते हैं ॥७॥ फिर विद्वान् को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। क्रत्वा हि द्रोणे अज्यसेऽग्ने बाजी न कृत्व्यः। परिजमेव स्वधा गयोऽत्यो न हार्य: शिशुः ॥८॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान प्रतापी जन आप (हि) जिस कारण (ऋत्वा) बुद्धि वा कर्म से (बाजी) वेग से युक्त (न) जैसे वैसे (कृत्व्यः) करने योग्य कर्म को (परिज्मेव) सब ओर जाने वाला वह वायु (स्वधा) अन्न (गयः) और (अत्य:) मार्ग को व्याप्त होने वाला (न) जैसे वैसे (हार्यः) कुटिल मार्ग में जाने योग्य (शिशः) बालक (ोणे) जाने योग्य मार्ग में (अज्यसे) प्राप्त किये जाते हो इस कारण से कृतकृत्य हो । भावार्थ:----इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो विद्वान् जन सम्पूर्ण अज्ञ जनों के लिये बुद्धि देकर श्रेष्ठ मार्ग में प्राप्त कराते हैं और माता पिता बालक को जैसे वैसे शिक्षा करते हैं वे अन्न आदि से सत्कार करने योग्य होते हैं। फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । त्वं त्या चिदच्युताग्ने पशुन यवसे । धामा यत्तै अजर वनां वृश्चन्ति शिकसः ॥९॥ SAND . PUNA M ह ऋग्वेदः मं०६ । सू०२॥ विन पदार्थ:-हे (अजर) जरारूप रोग से' रहित (अग्ने) विद्वन् ! (यत) जिन (शिक्वसः) प्रकाशमान (ते) आप के गुण (बना) जङ्गलों को जैसे किरण वैसे दोषों को (वश्चन्ति) काटते हैं और हत्या, चित्) उन्हीं (अच्युता) नाश से रहित (धामा) स्थानों को (यबसे) भूसे आदि के लिए (पशुः) गी प्रादि पशु (न) जैसे वैसे (त्वम्) आप (ह) निश्चय प्राप्त होते हो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जिन अध्यापकों को गौत्रों को जैसे बछड़े प्राप्त होकर दुग्ध के सदृश विद्या को ग्रहण करते है और जो विद्वान् जन अग्नि के सदृश दोषों का नाश करते हैं वे संसार के कल्याण करने वाले होते हैं ॥६॥ फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। वेषि ह्यध्वरीयतामग्ने होता दमें विशाम् । समृधौ विश्पते कृणु जुषस्व हव्यमङ्गिरः ॥१०॥ पदार्थ:-हे (अङ्गिरः) अंगों के मध्य में रसरूप (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (विश्पते) प्रजा के स्वामिन् विद्वन् जो (हि) जिस कारण से (होता) दाता आप (अध्वरीयताम्) अपने अध्वर की इच्छा करते हुए (विशाम्) प्रजाजनों के (दमे) गृह में (वेषि) व्याप्त होते हो वह आप (समृधः) उत्तम प्रकार से ऋद्धि वाले (कृणु) करिये और (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य का (जुषस्व) सेवन कारिये ॥१०॥ भावार्थ:--हे मनुष्यो! जैसे अग्नि - यज्ञ करने वालों और प्रजाओं के कार्यों को सिद्ध करता है वैसे ही विद्वान् जन सब के प्रयोजनों को सिद्ध करते हैं ॥१०॥ अब विद्वानों के विषय को कहते हैं । अच्छा नो मित्रमहो देव देवानग्ने वाचः मुमति रोदस्योः। वीहि खस्ति सुतिति दिनो नृन्द्विषो अहाँसि दुरिता संरेम ता तरेम तवा- वसा तरेम ॥१॥ पदार्थ:--हे (मित्रमहः) मित्र आदर करने योग्य जिसका ऐसे (देव) दान करने वाले (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान' जन आप (न:) हम लोगों के (देवान्) विद्वान् दाता जनों को (रोदस्योः) अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में (सुमतिम्) श्रेष्ठ बुद्धि का (अच्छा) उत्तम प्रकार (बोचः) उपदेश करें जिस कारण से ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३ ।। ३४७ (स्वस्तिम्) सुख वा शान्ति तथा (सुक्षितिम्) उत्तम पृथिवी वा उत्तम निवास को (दिवः) कामना करते हुए और (नन्) नायक जनों को (वीहि) व्याप्त हूजिये और (द्विषः) द्वेष करने वालों का त्याग करो तथा (दुरिता) दुःख के प्राप्त कराने वाले (अहासि) पापों के हम लोग (तरेम) पार होवें (ता) उनको (तरेम) फिर भी पार हों और (तच) आप के (अवसा) रक्षण आदि से (तरेम) पार होवें ॥११॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों को मिल कर और बल को प्राप्त होकर शत्रुओं को जीत कर दुःखरूप सागर से पार हों॥११॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठ मण्डल में द्वितीय सूक्त समाप्त हुआ। Dipe ANOFM ARU अथाष्टर्यस्य तृतीयस्य सूक्तस्य भारद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निर्देवता। १।३ । ४ त्रिष्टुप् । २।५। ६ । ७ निचरित्रष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । भुरिक्- पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब आठ ऋचावाले तीसरे सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मंत्र में फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अग्ने स क्षेषतपा इंतेजा उरु ज्योतिर्नशते देवयुष्टें। यं स्वं मित्रेण वरुणः सजोषा देव पासि त्यजेसा मर्त्तमंहः ॥१॥ पदार्थ:--हे (देव) सुख के देने वाले (अग्ने) बिजुली के सदृश तेजस्वी विद्वान जैसे (ऋतपाः) सत्य का पालन करने और (ऋतेजाः) सत्य में प्रकट होने वाला सूर्य (उरु) बड़े (ज्योतिः) प्रकाश को (नाते) प्राप्त होता है वैसे (देवयुः) विद्वानों की कामना करता हुश्रा (ते) श्राप के (मित्रेण) मित्र के सहित (वरुणः) धेष्ठ (सजोषाः) तुल्य' प्रीति का सेवन करने वाला बर्तमान है और (यम्) जिस (अंहः) अपराधी (मतम्) मनुष्य की (त्वम्) आप (त्यजसा) त्याग से (पासि) रक्षा करते हो (सः) वह पुण्यात्मा होता हुआ (क्षेषत) निवास करता है ॥१॥ भावार्थ:---- इस मन्त्र में वाचकलु०- -जैसे ईश्वर से रचा गया सूर्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है वैसे ही विद्वानों के संग से हुए विद्वान् सब के आत्मानों को प्रकाशित करते हैं और जैसे सूर्य अन्धकार का नाश on Hindi Mon MOD xx ३४८ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३ ॥ aree करके दिन को प्रकट करता है वैसे ही विद्या को प्राप्त हुश्रा धार्मिक विद्वान् अविद्या का नाश करके विद्या को प्रकट करता है ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ईजे यज्ञेभिः शशमे शमीभिधारायाग्नये ददामा । एवा चन तं यशलामजुष्टिनीहो मत नशते न प्रप्तिः ॥२॥ पदार्थ:-जो विद्वान् (यज्ञेभिः) विद्वानों की सेवा और सत्य भाषण आदिकों के साथ (ईजे) उत्तम प्रकार मिलता है और (शमीभिः) शुभकर्मों से (शशमे) शान्त होता है (ऋधद्वाराय) उत्तम प्रकार बढ़ाने वाला सत्य स्वीकार करने योग्य व्यवहार जिसका उस (अग्नये) अग्नि के सदृश वर्तमान सुपात्र के लिए (ददाश) देता है (तम्) उसको (एवा) ही (धन) निश्चय से (मतम् । मनुष्य को और (यशसाम्) धनों वा अन्नों का (अजुष्टि:) असेवन (न) जैसे वैसे (अंहः) अपराध (न) नहीं (नशते) प्राप्त होता है और (प्रदृप्तिः) अत्यन्त मोह प्राप्त होता है ॥२॥ भावार्थ:----इस मन्त्र में उपमालं --जो सत्यभाषण आदि धर्म के अनुष्ठान करने वाले, योगी अभय देने वाले है वे पाप और मोह का त्याग करके विज्ञान को प्राप्त होकर सुखी होते हैं ॥२॥ फिर विद्वानों की बुद्धि कैसी होती है इस विषय को कहते हैं । सुरो न यस्य दृशतिररेषा भीमा यदेति शुचतस्त आ धीः । हेषस्वता शुरुषो नाथमक्तोः कुत्रा चिद्रण्वो बसतिनेजा ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (यस्य) जिन (हेषस्वतः) प्रसिद्ध शब्द विद्यमान जिसके उन (शुक्षतः) शोक से व्याकुल (ते) श्रापका (यत्) जो (दृशतिः) दर्शन और (अरेपा:) पाप से रहित और (भीमा) भयकारक (धीः) बुद्धि (सूरः) सूर्य के (न) जैसे वैसे (मा, एति) प्राप्त होती है उसका (अयम्) यह (शुरुधः) अन्धकार को नाश करने वाले तेज' का धारण करने वाला सूर्य (अक्तोः) रात्रि का दूर करने वाला (न) जैसे वैसे (कुत्रा) (चित्) कहीं भी (रण्यः) सुन्दर (वनेजा:) किरणों के समुदाय में उत्पन्न होने और (वसतिः) निवास करने वाला वर्तमान है उसकी हम लोग सेवा करें ॥३॥ भावार्थ: -इस मन्त्र में उपमालं -जिस विद्वान् की सूर्य की ज्योति वा बिजुली के सदृश बुद्धि है वही सम्पूर्ण जितना योग्य उतने विज्ञान को प्राप्त होता है ॥३॥ सक HAN mon

ऋग्वेदः मं०६ । सू०३।।
३४६
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फिर विद्वानों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं।
तिग्मं चिदेम महि वर्षों अस्य भसदश्वो न यमसान आसा ।
विजेईमानः परशुर्न जिह्वां द्रविन द्रवियति दारु धक्षत् ॥४॥
पदार्थः--- हे मनुष्यो जिस (प्रस्य) इस विद्वान् के (तिग्मम्) तीव्र (महि) बड़े
(वर्षः) रूपका (यमसानः) नियमन करता और (विजेहमान:) शब्द करता हुआ
(अश्व:) शीघ्र चलने वाला घोड़ा (न) जैसे वैसे (नासा) मुख से (भसत्) प्रकाशित
करता है । और (परशुः) कुठार (न) जैसे वैसे (जिह्वाम्) वाणी को (द्रविः) द्रवी
होकर उच्चारण की क्रिया (न) जैसे वैसे (द्रावयति) गीला करता है और ( दारु)
काष्ठ को (धक्षत्) जलावे उसको (चित्) निश्चय से हम लोग (एम) प्राप्त
होवें ॥४॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-हे विद्वन् ! जैसे उत्तम प्रकार
से शिक्षित घोड़ा मनुष्य को मार्ग में पहुंचाता है वैसे धर्ममार्ग को हम लोगों
को पहुंचाइये और जैसे
तालु
से उत्पन्न प्रार्द्र रस जिह्वा को प्राप्त होता है
वैसे विद्या के रस को प्राप्त कराइये तथा जैसे अग्नि काष्ठों को जलाता है
वैसे ही हमारे दुर्व्यसनों को जलाइये ।।४।।
फिर मनुष्य कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं।
स इदस्तैव प्रति पादसिध्यञ्छिशीत तेजोऽयसो न धाराम् ।
चित्र,जतिररतियों अक्तोर्वेनं द्रषा रघुपत्मजंहा ॥५॥
*
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पदार्थ:----हे मनुष्यो (य:) जो (चित्रध्रजतिः) विचित्रगमनवाला (अरतिः
नहीं रमण करता हुआ (अक्तोः) रात्रि से और (ये:) पक्षी से (न) जैसे वैसे
(द्रुषद्वा) द्रवीभूत आदि पदार्थों में स्थित होने और (रघुपत्मजंहाः) लघुपतनका
त्याग करने वाला ही प्रकट होता है (स:) वह अग्नि (अस्तेव) फूकने बाले के सदृश
(असिष्यन्) बन्धन को नहीं प्राप्त होता हुआ (अयंसः) सुवर्ण के (न) जैसे (तेजः)
तेज को वैसे (धाराम्) वाणी को (प्रति, धात) धारण करता है वह (इत) ही तेज
को (शिशीत) तीक्ष्ण करता है ॥५॥
भावार्थ:-- इस मंत्र में उपमालं०-जो मनुष्य अग्नि को बांध और
तीक्ष्ण कर के युद्ध आदि कार्यों में प्रयुक्त करते हैं तो पक्षि के सदृश
आकाश में जाने को समर्थ होवें ॥५॥

ऋग्वेदः मं० ६ । सू०३ ।। surna फिर उसी विषय को कहते हैं । सई रेभो न भर्ति वस्त उनाः शोचिषा रारपीति मित्रबहाः । नक्तं य इमरूषो यो दिवा नूनबत्यो अरुषो यो दिवा नृन् ॥६॥ पदार्थः --- (यः) जो (अरुषः) रक्तगुण के सहित वर्तमान (नक्तम्) रात्रि को (ईम्) सब ओर से (यः) जो (अमर्त्यः) अपने रूप से मृत्यु रहित (दिवा) कामना से (नन) नायक मनुष्यों को (यः) जो (अरुषः) मर्मस्थलों में वर्तमान हुआ (दिवा) कामना वा प्रीति के साथ (नन) नायक जनों के साथ मिलता है (सः) वह (ईम्) जल' और (रेभः) भादर करने योग्य विद्वान् वा विद्वानों का सत्कार करनेवाला (न) जैसे वैसे' (शोचिषा) (दीप्ति) के सहित वर्तमान (उनाः) किरणों को (प्रति, वस्ते) आच्छादित करता है और (मित्रमहाः) मित्रों का आदर करने वाला (रार. पीति) अत्यन्त शब्द करता है ।।६।। भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालंक मनुष्यो ! जैसे सूर्य जल का आकर्षण कर और उस जल को वर्षाय के प्राणियों के लिए सुख देता वैसे विद्वान् पुरुष गुणों का आकर्षण कर और गुणों को दे करके सब जिज्ञासु जनों को सुख फिर वह कैसा है इस विषय को कहते हैं। दिवो न यस्य वित्तो नवीनोद्वषां रुक्ष ओषधीषु नुनोत् । घृणा न थो धजसा पत्मना यन्ना रोदसी वसुंना दं सुपत्नी ॥७॥ पवार्थ:--(यस्य) जिस वैद्य के (दिव:) प्रकाश का (न) जैसे वैसे (विधतः) विधान करते हुए का (वृषा) बलिष्ठ (रुक्षः) तेजस्वी जन (नवीनोत्) अत्यन्त स्तुति युक्त होता है तथा (ओषधीषु) प्रोषधियों के निमित्त (नूनोत्) अत्यन्त स्तुति करता है और (यः) जो (घृणा) दीप्ति (न) जैसे वैसे (ध्रजसा) गमन' और (परमना) उद्गमन से (वसुना) और धन से (सुपत्नी) सुन्दर स्वामी वाली (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (यन्) प्राप्त होने वाला वह (दम) इन्द्रियों के निग्रह करने वाले की (भा) सब ओर से अत्यन्त स्तुति करता है वह अग्नि सब से जानने के योग्य है ॥७॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं०-जो अग्नि पृथिवी आदिकों में पूर्ण हुआ घिसने आदि से प्रकाशित होवे' वह मनुष्यों के अनेक प्रकार के कार्यों को करने वाला होता है ॥७॥ देता है ॥६॥ PUR ऋग्वेदः म० ६ । सू० ४ ॥ - 4 AMAN अब कैसा मनुष्य राजा होने के योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। धायोभिर्वा यो युज्यभिरविद्युन्न दंविद्योत्स्वेभिः शुष्मैः । शौँ वा यो मरुतां तत अभुन त्वेषो रंभसानो अद्यौत् ॥८॥ पदार्थः-- हे (विद्वन्) (यः) जो (धायोभिः) धारण करने वाले गुणों से और (युज्येभिः) युक्त करने योग्य (स्वेभिः) अपने (शुष्मः) बलों और गुणों से (वा) वा (विधत) बिजुली (न) जैसे वैसे अपने (अक:) सत्कारों योग्य कारणों से (दविद्योत्) प्रकाशित होता है (य:) जो (वा) वा (मरुताम् ) मनुष्यों के (शर्धः) बल को (ऋभुः) बुद्धिमान् जन (न) जैसे वैसे (ततक्ष) तीक्षण करता है तथा (त्वेषः) प्रकाशयुक्त और (रमसान:) वेगयुक्त जैसे (अद्यौत) प्रकाशित होता है वही राजा संस्थापित करने योग्य है ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं. हे मनुष्यो ! जो बिजुली के सदृश प्रतापी, बलवान्, पदार्थों के संयोग और वियोग की विद्या में चतुर, बुद्धिमान्, विद्वान्, धर्मात्मा, इन्द्रियों को जीतने वाला और प्रजापालनप्रिय क्षत्रिय होवे वही राजा होने के योग्य होवे ।।८।। इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में तीसरा सूक्त समाप्त हुन्मा है। अथाष्टर्चस्य चतुर्थस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निदेवता । १ त्रिष्टुप् छन्दः । धवतः स्वरः । २। ५। ६ । ७ भुरिकपवितश्छन्दः । ३ । ४ निवृत्पड्वितः । ८ पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब पाठ ऋचा वाले चौथे सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। यथा होतर्मनुषो देवतांता यज्ञेभिः सूनो सहसो यासि । एवा नो अद्य संमना संमानानुशनग्न उशतो यक्षि देवान् ।।१।। पदार्थ:-हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) सन्तान और (होतः) दान करने वाले (उशन्। कामना करते हुए (अग्ने) या अग्नि के समान विद्वन् (यथा) जैसे (मनुषः) मनुष्य श्राप (यज्ञेभिः) मिले हुए साधनों और उपसाधनों से (देवताता) श्रेष्ठ यज्ञ गाना Hub au NP विद्यमान वा उत्पन्न हुए पदार्थों को जानने वाला (वन्दा ३५२ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४॥ में (यजासि) यजन करें वैसे आप (प्रा) इस समय' (समानान्) सदृशों और (उशत:) कामना करते हुए (न:) हम (देवान्) विद्वानों को (समना) संग्राम में (एषा) ही (यक्षि) उत्तम प्रकार मिलिये ॥१॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं ०-जैसे विद्वान् यज्ञ के करने वाले जन अंग और उपांगों के सहित साधनों से यज्ञ को शोभित करते हैं वैसे ही शूरवीर बलवान् योद्धा और विद्वान् जनों से राजा संग्राम को जीतें ॥१॥ फिर जगदीश्वर कैसा है इस विषय को कहते हैं । स नो विभावा चक्षणिर्न वस्तौरग्निन्दारु वेद्यश्चनो धात् । विश्वायुयों अमृतो मत्यै घूर तिमिर्जातवेदाः ॥२॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो (य:) जो (यस्तोः) दिन और (चक्षणिः) प्रकाशक सूर्य और (अग्निः) अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशयुक्त (न) जैसे वैसे (नः) हम लोगों के बीच (विभावा) अत्यन्त प्रकाश वाला और (वेद्यः) जानने योग्य (विश्वायुः) पूर्णावस्था वाला (मत्येषु) मरण धर्मयुक्त मनुष्यों में (अमृतः) नाशरहित और (उष द) प्रातःकाल में जाना जाता है ऐसा और (अतिथि:) जिसके प्राप्त होने की कोई तिथि विद्यमान नहीं उसके समान वर्तमान और (जातवेदा:) उत्पन्न हुओं में अन्न आदि को (धार) धारण करता है (सः) वह परमेश्वर हम लोगों का मङ्गल करने वाला (भूत) हो ॥२॥ भावार्थः- इस मन्त्र में उपमालं. हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सूर्य के सदृश अपने से प्रकाशित, जाननेयोग्य, अजर, अमर, अतिथि के सदश सत्कार करने योग्य और सर्वत्र व्याप्त है उसकी सब उपासना करें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। द्यावो न यस्य पनयन्त्यभ्वं भासांसि वस्ते सूर्यो न शुक्रः । वि य इनोत्यजरः पारकोऽश्नस्य चिच्छिश्नयत्पूर्व्याणि ॥३॥ पदार्थः ---हे मनुष्यो (धाव:) कामना करते हुए विद्वान् जन (न) जैसे वैसे जन (यस्य) जिस परमेश्वर की (अचम्) बड़ी महिमा की (पनयन्ति) स्तुति कराते हैं और (सूर्यः) सूर्य (न) जैसे' वैसे (शुक्रः) शुद्ध पवित्र वा बलिष्ठ जन (भासांसि) तेजों को (वस्ते) आच्छादित करता है और (यः) जो (अजरः) जरादोष से रहित (पावकः) पवित्र और सब को पवित्र करने वाला (वि, इनोति) विशेष व्याप्त होता w ऋग्वेदः मं० ६ । सू०४ ।। NA है और (प्रश्नस्य) व्यापक के मध्य में (पूाणि) पहिले निर्मित वस्तुओं का (चित्) भी (शिश्नथत) प्रलय करता है वही जगदीश्वर जानने योग्य है ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो परमेश्वर प्रकाशकों का प्रकाशक नित्यों का नित्य और चेतनों का चेतन है उसी का भजन करो ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। वा हि सूनो अस्यमसद्वा चक्रे अग्निर्जनुषाज्मानम् । स त्वं न ऊर्जसन ऊजै धा राजैव जेरवृके क्षेष्यन्त ॥४॥ पदार्थः - है (सूनो) संपूर्ण जगत् के रचने वाले (वद्मा) कहने और (अनसद्वा) भोग्य पदार्थों में प्राप्त रहने वाले (अग्निः) पवित्र (जनुषा) जन्म से (अज्म) प्राप्त होने और (अन्नम्) खाने योग्य पदार्थ को प्राप्त हुए (असि) हो और शुद्ध (चक्रे) करते हो (सः) वह (हि) निश्चय से (त्वम्) आप (नः) हम लोगों के लिये (ऊर्जसने) पराक्रम के प्रक्षेपण में (राजेब) जैसे प्रकाशमान राजा वैसे (ऊर्जम्) पराक्रम को (धाः) धारण करिये (प्रवृके) चोर से रहित के (अन्तः) मध्य में (जे:) जीतिये और (क्षेषि) निवास करिये ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन हैं वे ईश्वर के सदृश पक्षपात से रहित और धर्म मार्ग में निवास करते हुए परमेश्वर का भजन करें ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । नितिक्ति यो वारणमन्नमत्ति वायुर्न राष्ट्रवत्यैत्यक्तून । तुर्याम यस्त आदिशामरातीरत्यो न हतः पर्ततः परिहत् ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो(यः) जो विद्वान् (नितिक्ति) अत्यन्त तीक्ष्ण किये (वारणम्) स्वीकार करने और (अन्नम्) खाने योग्य पदार्थ को (अत्ति) भक्षण करता और (वायुः) पवन (न) जैसे वैसे' (अक्तून्) प्रसिद्ध पदार्थों को (अति, एति) व्याप्त होता है और (यः) जो (पततः) पतनशील (ते) आप का (ह.तः) कुटिलता को प्राप्त हुआ (प्रत्यः) मार्ग को व्याप्त हुए घोड़े के (न) समान (परिहत) सब ओर से कुटिल' गमन करने वाला है और जिसके हम लोग (आदिशाम) सब प्रकार से दिये हुओं के (पराती:) शत्रुओं का (तुर्याम) नाश करें और (राष्ट्री) ईश्वर जैसे वैसे न्याय' में वर्ताव करें उस का हम लोग सेवन करें ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो शुद्ध खाने और पीने योग्य पदार्थ का ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४ ॥ dolena Hos Aka ARMA . सेवन करता है वायु के सदृश बलिष्ठ और ईश्वर के सदृश पक्षपात से रहित होकर न्याय की अपेक्षा से विपरीत दशा को प्राप्त हुओं का मारने वाला हो उसी को राजा मानो ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ सूर्यो न भानुमद्भिरकैरग्ने ततन्थ रोदसी वि भासा । चित्रो नयत्परि तमास्यक्तः शोचिषा पत्मन्नौशिजो न दीयन् ॥६॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान प्राप (भानुमद्भिः) बहुत प्रकाश वाले (अः) वन के सदृश छेदक किरणों से (सूर्यः) सूर्य के (न) जैसे वैसे (भासा) प्रकाश से (वि, ततन्थ) अत्यन्त विस्तार युक्त करते हो और जैसे (चित्रः) अनेक प्रकार के वर्षों से अद्भुत सूर्य (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को प्रकाशित करता और (शोचिषा) प्रकाश से (अक्तः) प्रसिद्ध हुआ (तमांसि) अन्धकारों को (परि) सब ओर से (नयद) दूर करता है वैसे (पत्पन्) चलते हैं जन जिस में उस मार्ग में (वीयन्) चलते हुए (ोशिजः) कामना करते हुए के पुत्र के (न) समान सत्य मार्ग में चलते हुए आप धर्म कर्म का (प्रा) सब प्रकार से विस्तार करें ॥६॥ भावार्थ:-इस मात्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य अपने प्रकाश से समीप में वर्तमान पदार्थों को प्रकाशित करके रात्रि का निवारण करता है वैसे ही उत्तम गुणों को प्रकाशित कर के अज्ञानान्धकार का निवारण करिये ॥६॥ अन्नादि देने वाले प्रशंसनीय होते हैं इस विषय को कहते हैं। त्वां हि मन्द्रतममर्कशौकैर्वमहे महि नः श्रोष्यग्ने । इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायु प्र॒णन्ति राधसा नृतमाः ॥७॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान जो आप (नः) हम लोगों के (महि) बड़े वचन को (घोषि) सुनते हैं उन (अशोकः) अन्न आदिकों के शोधनों से (मन्नतमम्) अत्यन्त आनन्द देने वाले (त्वाम् ) आप का हम लोग (वमहे) स्वीकार करते हैं और हे (नृतमाः) अत्यन्त अग्रणी जनो आप लोग (हि) जिस कारण से जैसे (देवता) जगदीश्वर सम्पूर्ण जगत् को प्रसन्न करता है वैसे (शवसा) बल और (राघसा) धन से (वायुम्) प्राण आदि को (पृणन्ति) सुखी करते हैं उन (स्वा) आप को (इनम्) बिजुली को (न) जैसे वैसे हम लोग स्वीकार करते हैं ॥७॥ 200 FragreAHMIRATE ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं0---जो अन्नादिकों से अत्यन्त आनन्द देने वाले मनुष्यों में उत्तम मनुष्य सम्पूर्ण संसार को उत्तम बुद्धि- युक्त करते हैं वे सत्कार करने के योग्य होते हैं ।।७।। अब विद्वानों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं । नु नौ अग्नेऽवृकेभिः स्वस्ति धेर्षि रायः पथिभिः पयः । ता सुरिभ्यो गृणते रासि मुम्नं मम शताहिमा सुवीरा ॥८॥ पदार्थ:--हे (अग्ने) विद्वन् जो आप (अवृकेभिः) चोरों से भिन्न जनों के साथ (न:) हम लोगों को (स्वस्ति) सुख (वेषि) व्याप्त करते हो तथा (पथिभिः) उत्तम मार्गों से (रायः) धनों का (न) शीघ्र (पर्षि) पालन करते हो और (सूरिभ्यः) विद्वानों के लिये और (गृणते) स्तुति करते हुए के लिये (सुन्नम्) सुख को (रासि) देते हो तथा (अंहः) अपराध को दूर करते हो उन श्राप के साथ (ता) उक्त पदार्थों को प्राप्त होकर (शतहिमाः) सौ वर्ष पर्यन्त (सुवीराः) श्रेष्ठ वीर हम लोग (मदेम) पानन्द करें ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! चोरी और चोर के संग और अन्याय से पाप के आचरण का त्याग करके और सुख को प्राप्त होकर सौ वर्ष युक्त होमो॥ इस सूक्त में अग्नि, ईश्वर और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में चौथा सूक्त समाप्त हुआ। अथ सप्तर्चस्य पञ्चमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निदेवताः। १॥ ४ त्रिष्टुप् । २।५।६।७ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ भुरिक पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः।। अब सात ऋचा वाले पांचवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या ग्रहण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। हुवे वः सूनुं सईसो युयानमद्रौघवाचं मतिभिर्यविष्ठम् । य इन्वति द्रविणानि प्रचेता विश्ववाराणि पुरुषारौं अधक् ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (प्रचेताः) उत्तम बुद्धियुक्त (पुरुवारः) बहुतों ऋग्वेदः मं० ६ । सू०५॥ से स्वीकार किया गया (अध्रुक्) नहीं द्रोह करने वाला जन (विश्ववाराणि) संपूर्ण जनों से स्वीकार करने योग्य (अविणानि) द्रव्यों को (इन्वति) व्याप्त होता है उस (मतिभिः) मनुष्यों वा बुद्धियों के सहित वर्तमान (सहसः) बल के (सूनुम) सन्तान (युवानम्) युवावस्था को प्राप्त (अद्रोधवाचम्) द्रोहरहित वाणी जिस की ऐसे (यविष्ठम्) अतिशय युवावस्था को प्राप्त हुए को (व:) आप लोगों के लिए मैं (हुवे) ग्रहण करता हूं ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! आप लोगों को चाहिये कि जो पक्षपात से रहित वाद युक्त, द्रोह से रहित और बुद्धिमानों के संग का सेवन करने वाले और बहुत विद्वानों से प्रादर किये गए और ब्रह्मचर्य से पूर्ण युवा- वस्था वाले विद्वान् हों उन्हीं का उपदेश ग्रहण करें ॥१॥ मनुष्यों को किसके होने पर क्या प्राप्त होना चाहिए इस विषय को कहते हैं । त्वे वसूनि पुर्वणीक होत>षा बस्तोरेरिरे यज्ञियांसः । क्षामेव विश्वा भुवनानि यस्मिन्स सौभगानि दधिरे पावके ॥२॥ पदार्थ:-हे (पूर्वणीक) अनेक सेनाओं से युक्त (होतः) दान करने वाले राजन् (यस्मिन्) जिन (पावके) अग्नि के सदृश पवित्र (ल्वे) आप के रक्षक रहने पर (यशियास:) यज्ञ के अनुष्ठान करने के योग्य प्रजाजन (दोषा) रात्रि में और (वस्तोः) दिन में (क्षामेव) जैसे पृथिवी वैसे (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकों में प्रकट और पञ्चभूत अधिकरण जिनके उन प्राणियों की और (वसूनि) धनों की (मा, ईरिरे) प्रेरणा करते और (सौभगानि) श्रेष्ठ ऐश्वर्यों के भावों को (सम्, दधिरे) सम्यक् धारण करते हैं उनका हम लोग सत्कार करें ॥२॥ भावार्थ:--राजा के रक्षक रहने पर ही प्रजाजन प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त होते और ऐश्वर्य को प्राप्त होकर सुख युक्त होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । त्वं विक्षु प्रदिवः सीद आसु क्रत्वा रथीरभवो वार्याणाम् । अत इनोषि विधते चिकित्वो व्यानुषगजातवेदो वसूनि ॥३॥ पदार्थः--हे (चिकित्व:) शुद्ध बहुत बुद्धि से युक्त और (जातवेदः) उत्पन्न हुआ विज्ञान जिन को ऐसे हे राजन् जिस कारण (स्वम्) आप (मानुषक) संग करने वाले होते हुए (वसूनि) धनों की (विधते) सत्कार करने वाले के लिए (वि, इनोषि) प्रेरणा करते हो और (मास) इन (विक्षु) प्रजात्रों में (करवा) बुद्धि से (वार्याणाम्) Ramaye ava Ima देता है (सः) वह (मत्येष ऋग्वेदः मं०६ । सू०५ ।। स्वीकार करने योग्यों के (रथीः) बहुत रथों वाले (अभवः) होते हो (प्रतः) इस कारण से (प्रदिवः) उत्तम प्रकाश के मध्य में (सीद) स्थित होइये ॥३॥ भावार्थ:--वही राजा होने के योग्य होवे जो राजविद्या को अच्छे प्रकार जाने ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यो नः सनुत्यो अभिदासदग्ने यो अन्तरो मित्रमहो वनुष्यात् । तमजरेभिवृषभिस्तव स्वैस्तपां तपिष्ठ तपसा तपखान् ॥४॥ पदार्थ:-हे (तपिष्ठ) अत्यन्त तप करने वाले और (मित्रमहः) बड़े मित्रों से युक्त (अग्ने) विद्वन् (यः) जो (सनुत्यः) निश्चित अन्तहित अर्थात् मध्य के सिद्धान्तों में प्रकट हुआ अथवा श्रेष्ठ (नः) हम लोगों का (अभिवासत) चारों ओर से नाश करता है और (य:) जो (अन्तरः) भिन्न हम लोगों से (वनुष्याव) याचना करे (तम्) उस को (अजरेभिः) वृद्धावस्था से रहित (वृषभिः) बलिष्ठ युवा (तव) आप के (स्वैः) अपने जनों के साथ (तपा) तप युक्त करो वा तपस्वी होयो। और (तपसा) ब्रह्मचर्य और प्राणायामादि कर्म से (तपस्वान्) बहुत तप युक्त हूजिये ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो आप लोगों से याचना करे उस सुपात्र के लिये यथाशक्ति दान करिये। और जो पीड़ा देवे उसको पीड़ित करो और तपस्वी होकर धर्म का ही आचरण करो ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । यस्तै यज्ञेर्न समिधा य उक्थैरभिः सूनो सहसो ददाशत् । स मत्येवमृत प्रचेता राया झुम्नेन श्रवसा वि भौति ॥५॥ पदार्थ:-है (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र और (अमृत) मरणधर्म से रहित (यः) जो (यशेन) विद्वानों के सत्कार नामक यज्ञ और (समिधा) सत्य के प्रकाशक वा ईंधन से तथा (यः) जो (अभिः) आदर करने योग्य और (उक्थैः) मनुष्यों में (प्रचेताः) उत्तम ज्ञानवान् (राया) धन (छ मनेन) यश और (श्रवसा) अन्न वा श्रवण से (बि, भाति) प्रकाशित होता है इस प्रकार विशेष कर के 'जानो ॥५॥ भावार्थ:-जो प्रशसित कर्म और गुणों के सहित जन इस संसार में सम मान मा

Farpa
HARE
विद्या से युक्त राजन् (लब) आपके (ऊती) रक्षण आदि कर्म से
ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ५ ।।
प्रयत्न करते हैं वे विद्या, यश और धन से युक्त होकर संसार में प्रसिद्ध
होते हैं ॥१॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
स तत्कृधीषितस्पूर्यमग्ने स्मृधौ बाधस्व सहसा सहस्वान् ।
यच्छत्यसे द्युभिरक्तो वचाभिस्तज्जुषस्व जरितु!षि मन्म ॥६॥
पदार्थः हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापयुक्त (यत्) जो आप (शुभिः)
प्रकाशमान दिनों से (अक्तः) रात्रि जैसे वैसे (शस्यसे) स्तुति किये जाते हो वह
प्राप (वचोभिः) वचनों से (जरितुः) स्तुति करने वाले का (घोषि) वाणा जिस में
ऐसा (मन्म) विज्ञान है (तत) उसका (जुषस्व) सेवन करो (सः) वह (सहस्वान्)
सहन करने वाले श्राप (सहसा) बल' से (स्पृधः) स्पर्धा करते हैं जिनमें उन सग्राम
सेनाओं की (बाधस्व) बाधा करते हो तथा (तूयम्) शीघ्र (इषितः) प्रेरित हुए
(तत्) उसको (कृधि) करो ॥६॥
भावार्थ:-जो विद्वान् और ईश्वर से प्रेरित हुए शीघ्र पालस्य का
त्याग कर के दिन रात्रि धर्म अर्थ और मोक्ष की सिद्धि के लिये प्रयत्न
करते हैं वे योग्य होकर दुःखों को बाधित करते हैं ॥६॥
मनुष्यों को किसके संग से क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
अश्याम तं काममग्ने तवोती
अश्याम रयिं रयिवः सुवीरम् ।
अश्याम वाजमभि वाजयन्तोऽश्याम धुम्नमंजराजरं ते ॥७॥
पदार्थ:-हे (अजर) वृद्धावस्थारहित (रविवः) बहुत धन और (अग्ने)
उस (कामम्) मनोरथ को (प्रश्याम) प्राप्त होवें और (सुवीरम् ) उत्तम वीरों की
प्राप्ति कराने वाले (रयिम्) धन को (अश्याम) प्राप्त होवें तथा (वाजयन्तः) जनाते
हुए हम लोग (बालम्) अन्न आदि को (अभि) सन्मुख (अश्याम) प्राप्त होवें और
(ते) आप के (अजरम्) जीर्ण होने से रहित (ध म्नम्) यश वा धन को (अश्याम)
प्राप्त होवें ॥७॥
भावार्थ:-मनुष्यों को ऐसी इच्छा करनी चाहिये कि हम लोग
यथार्थ वक्ता जन के उपदेश से इच्छा की सिद्धि, बहुत धन, वीर पुरुषों
और नहीं नष्ट होने वाले यश को प्राप्त होवें ॥७॥

ऋग्वेदः मं०.६ । सू०६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह छठे मण्डल में पांचवां सूक्त समाप्त हुना। -- अथ सप्तर्चस्य षष्ठस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निर्देवता १। २ । ३ । ४ । ५ निवृत्रिष्टुप् । ६ । ७ त्रिष्टुप्छन्दः । धेवतः स्वरः ।। अब सात ऋचा वाले छठे सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्यों को. सन्तान किस प्रकार उत्पन्न करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । प्र नव्य॑सा सहसः सूनुमच्छा यज्ञेन गातुमय इच्छमानः । वृश्चद्वनं कृष्णयाम रुन्तिं बीती होतारं दिव्यं जिंग ति ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यज्ञेन) संगतिरूप यज्ञ से (गातुम्) पृथिवी और (प्रथः) रक्षण की (इच्छमान:) इच्छा करता हुआ (नव्यसा) अत्यन्त नवीन व्यवहार से (सहसः) बलवान् के (सूनम्) सन्तान को और (कृष्णयामम्) आकर्षित किया मार्ग जिसने ऐसे (रुशन्तम्) हिंसा करते हुए (वृश्चद्वनम्) काटता है वन जिसमें उसके समान (बीती) व्याप्ति से (होतारम्) देने वाले (दिव्यम्) शुद्ध व्यवहारों में प्रकट हुए को (अच्छ) अच्छे प्रकार (प्र, जिगाति) प्राप्त होता है ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! आप लोग ब्रह्म- चर्य से बलिष्ठ होकर सन्तानों को उत्पन्न करो जिससे रोग रहित, बल. युक्त और उत्तम स्वभावयुक्त सन्तान होकर आप लोगों को निरन्तर सुख- युक्त करें॥१॥ फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को कहते हैं । सवितानस्तन्यतू रोचनस्था अजरैभिर्नानदद्भिर्यविष्ठा । यः पावकः पुस्तमः पुरूणि पृथून्यग्निरेनुयाति भवैन् ॥२॥ पदार्थः हे मनुष्यो (यः) जो (यविष्ठः) अत्यन्त युवावस्था से युक्त जैसे वैसे अत्यन्त बली (पावकः) पवित्र और पवित्र करने वाला (पुरुतमः) अतीव बहुरूप (शिवतानः) शुभ्रवर्ण (अजरेभिः) जीर्णपन आदि रोगरहित (नानदद्भिः) निरन्तर गर्जनात्रों से (तन्यतः) बिजुलीरूप (रोचनस्था:) दीपन में स्थिर (अग्निः) अग्नि दहन करता हुआ (पुरूणि) बहुत (पृथूनि) विस्तीर्णो के (अनुयाति) पश्चात् जाता है (सः) वह आप लोगों को उत्तम प्रकार प्रयोग करने योग्य है ।।२।। line PMMAR * tipm ऋग्वेदः मं० ६ । सू०६ ।। म क HA ICE भावार्थ:-हे विद्वन् ! जो आप अंग और उपांग के सहित बिजुली की विद्या को जानें तो बहुत सुख को प्राप्त होवें ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वि ते विष्वग्वातजूतासो अग्ने भामांसः शुचे शुचयश्चरन्ति । तुविम्रक्षासौं दिव्या नवग्या वना वनन्ति धृषता रुजन्तः ॥३॥ पदार्थ:-हे (शुचे) पवित्र विद्वन् (ते). आपके जो (विष्वक्) सबका आदर करने वाला और (वातजूतासः) वायु के सदृश वेगयुक्त (भामासः) क्रोध (शुचयः) पवित्र (वि, चरन्ति) विशेष करके चलते हैं (तुविम्रक्षासः) बहुतों के साथ मिले हुए (दिव्याः) अन्तरिक्ष में हुए (नवग्वाः) नवीन गमन वाले (धृषता) प्रगल्भता से (रुजन्तः) शत्रुओं को भग्न करते हुए (वना) आदर करने योग्य पदार्थों का (वनन्ति) उत्तम प्रकार सेवन करते हैं वे पवित्र होते हैं ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो बिजुली के सदृश पवित्र, दुष्टों में क्रोध करने वाले, श्रेष्ठों के साथ मेल करने और नवीन नवीन विद्या को प्राप्त होने वाले होवें वे सब स्थानों में विचरते हुए अन्यों को जनावें ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । ये ते शुक्रासः शुचयः शुचिष्मः क्षां वर्षन्ति विषितासो अश्वाः । अध भ्रमस्त उर्विया वि भांति यातयमानो अधि सानु पृश्नः ॥४॥ पदार्थ:-हे (शुविष्मः) प्रकाशयुक्त विद्वन् (यै) जो (ते). आपके (शुक्रासः) पराक्रमयुक्त (शुचयः) पवित्र (विषितासः) ध्याप्त (अश्वाः) शीघ्र चलने वाले (क्षाम्) भूमि को (वपन्ति) बोते हैं (अध) इसके अनन्तर (ते) आप का (यातयमानः) दण्ड देता हुआ (भ्रमः) भ्रमण' (उविया) बहुत प्रकार के प्रकाश से (पृश्ने:) अन्तरिक्ष के मध्य में (अधि) ऊपर के (सानु) विभाग में (वि, भाति) विशेष शोभित होता है उन सबको माप उत्तम प्रकार शिक्षा दीजिये ॥४॥ भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि अपने समीप में पवित्र और यथा- वद्वक्ता पुरुषों की सदा रक्षा करें अथवा आप भी उनका संग करें॥४॥ फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अध जिह्वा पापतीति म वृ णो गोधुयुधो नाशनि: सृजाना । शूरस्येव प्रसितिः शातिरग्नेटुंतुीमो दयते वनानि ॥५॥ BAD ) ऋग्वेदः मं०६ । सू०६ ।।। ३६१ -- Asha m MADAM पवार्थ:-हे विद्वन् (गोषयुधः) वारिणयों में युद्ध करने वाले (कृष्ण:) बलिष्ठों को (जिह्वा) वाणी (न) नहीं (पापतीति) अत्यन्त वारवार प्राप्त होती है (अध) इसके अनन्तर (प्रशनिः) बिजुली जैसे वैसे (सृजाना) उत्पन्न किया गया (रस्येव) शूरवीर के सदृश (अग्नेः) अग्नि के समान प्रकाशमान (दुर्वर्तुः) दुःख के साथ वर्तः मान से युक्त का (प्रसितिः) प्रकृष्ट बन्धन (क्षातिः) और नाश (भीमः) भयंकर हुना (वनानि) वनां को (प्र, दयते) नष्ट करता है ॥५॥ भावार्थ:---इस मंत्र में उपमावाचकलु० -- जो मनुष्य धर्म से पतित न होकर धाम्मिकों में शान्त और दुष्टों में अग्नि के सदृश भयंकर होते हैं वे ही बलवान् गिने जाते हैं ॥५॥ मनुष्यों को किसके सदृश क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। आ भानुना पार्थिवानि ज्रयांसि महस्तोदस्य धृषता ततन्थ । स बांधस्वार्ष भया सहोभिः स्पृधौ वनुष्यन्वनुषो नि जुर्व ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वन् राजन् जैसे आप (भानुना) किरण से (तोवस्य) प्रेरण के (धृषता) ढीठ से (महः) बड़े (पार्थिवानि) पृथिवी में विदित कार्य बा पृथिवी आदि से कृत (जयोसि) जानने योग्यों का (भा) चारों ओर से (ततन्य) विस्तार करते हैं वैसे (सः) वह आप (सहोभिः) बलों से (भया) भयों की (अप, बाधस्व) अतीव बाधा करो और (बनुषः) सेवन करने योग्यों का (वनुष्यन्) सेवन कराते हुए (स्पृधः) संग्रामों का (नि, जूर्व) नाश करिये ॥६॥ भावार्थ:---इस मंत्र में वाचकलु.---जो प्रम से मित्र होकर जैसे सूर्य अन्धकार को वैसे भयों को दूर करके संग्रामों को जीतते हैं वे प्रतिष्ठित होते हैं ॥६॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । स चित्र चित्रं चितयन्तमस्मे चित्रक्षत्र चित्रतम वयोधाम् चन्द्रं रयिं पुरुवीर बृहन्तं चन्द्र चन्द्राभिर्गुणते युवस्व ॥७॥ पदार्थ:-है (चित्र) अद्भुत गुण कर्म और स्वभाव वाले (चित्रक्षत्र) अद्भुत राज्य वा धन से युक्त (चन्द्र) प्राह्लादकारक जैसे (सः) वह विद्वान् (चन्द्राभिः) आनन्द और धन करने वाली प्रजाओं से (अस्मे) हम लोगों के लिये (चित्रम्) आश्चर्यभूत (चन्द्रम्) मानन्द देने वाले सुवर्ण प्रादि को (चितयन्तम्)जनाते हुए तथा (चित्रतमम्) अत्यन्त आश्चर्ययक्त रूप और (वयोधाम) जीवन के धारया ON ऋग्वेदः मं०६ । सू० ७ ॥ करने वाले और (बृहन्तम्। बड़े (पुरुवीरम्) बहुत वीरों के देने वाले (रयिम्) धन की (गृणते) स्तुति करता है उसको आप (युवस्व) उत्तम प्रकार युक्त करिये ॥७॥ भावार्थ:---जो मनुष्य अद्भुत गुण कर्म और स्वभावों का स्वीकार करके तथा अन्य जनों को ग्रहण कराय के धनाढय कराते हैं वे अद्भुत स्तुति वाले होते हैं ॥७॥ इस सूक्त में अग्नि तथा विद्वान् के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में छठा सूक्त समाप्त हुश्रा ॥ । Anto AN 44 अथ सप्तचस्य सप्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । वैश्वानरो देवता। १ त्रिष्टुप् । २ निवृत्त्रिष्टुप् । ७ स्वराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धवतः स्वरः। ३ निवृत्पङ्क्तिः । ४ स्वराट् पङ्क्तिः । ५ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ६ जगती छन्दः। निषादः स्वरः ॥ अब सात ऋचावाले सातवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को कैसा अग्नि जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । मूर्धान दिवो अरति पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम् । कवि सम्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्र जनयन्त देवाः ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (देवाः) विद्वान् जन (दिव:) प्रकाश वा सूर्य के (मूनिम्) सर्वोपरि विराजमान (पृथिव्याः) पृथिवी को (मरतिम्) प्राप्ति को (ऋते) सत्य में (जातम्) प्रसिद्ध (कविम्) स्वच्छबुद्धियुक्त वा विद्वान् (सनामम्) भूगोल' के राजा (जनानाम्) मनुष्यों के (अतिथिम्) आदर करने योग्य (पात्रम्) पालन करने वाले (वैश्वानरम्) सम्पूर्ण मनुष्यों में अग्रणी (अग्निम्) अग्नि के सदृश बर्तमान को प्रा, जनयन्त) प्रकट करते हैं वे सुखी (प्रा, प्रासन्) अच्छे प्रकार हैं ॥१॥ भावार्थ:-जो मनुष्य परमात्मा के सदृश न्यायकारी होकर तथा अग्नि के सदृश विद्या और विनय से प्रकाशित हुए चक्रवत्तित्व को प्राप्त होते हैं वे सब को सुख देने को योग्य होते हैं ॥१॥ फिर उसी अग्नि के विषय को कहते हैं। नामि यज्ञानां सदन रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त । वैश्वानरं रथ्यमध्वराणां यज्ञस्य केतुं जनयन्त देवाः ॥२॥ - p KATHMA-30AMWARVASNALITY ऋग्वेदः मं०६ । सू० ७ ।। - Sam पदार्थ:-हे मनुष्यो (देवाः) विद्वान् जन जिस (यज्ञानाम्) सत्य क्रियामय यज्ञों के (नाभिम्) बीच के भाग को और (महाम) महान् (रयीणाम्) धनों के (सदनम्) स्थान और (माहावम्) चारों ओर से स्पर्धा करने योग्य (वैश्वानरम्) सर्वत्र प्रकाशमान (रथ्यम्) रथ को बहाने [ले जाने] के योग्यः (अध्वराणाम्) नहीं नष्ट करने योग्यों के (यशस्य) प्राप्त होने योग्य व्यवहार के (केतुम्) जनाने वाले को (सम्, जनयन्त) अच्छे प्रकार प्रकट करते हैं और (नवन्त) स्तुति करते हैं उस की आप लोग (अभि) सम्मुख प्रशंसा करिये ॥२॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सर्वत्र व्याप्त और सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि के करने वाले अग्नि को अच्छे प्रकार जान कर वाहनों को प्रकट करते हैं वे कार्यसिद्धि को प्राप्त होते हैं ।।२।। फिर बह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं । त्वद्विषो जायते वाज्यग्ने त्वद्वीरासो अभिमातिषाई। वैश्वानर स्वमस्मासु धेहि वसूनि राजन्स्पृहयाय्याणि ॥३॥ पदार्थः - हे (वैश्वानर) संपूर्ण जनों में अग्रणी (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी विद्वान् (राजन) राजन् [यस्मात् जिस कारण से (स्वत) आपके समीप से (विप्रः) बुद्धिमान् (वाजी) बेगयुक्त (जायते) होता है और (स्वत) आप के समीप से (अभि- मातिशाहः) अभिमान युक्त शत्रुओं के सहने वाले (बीरासा) शूरवीर जन [जायन्ते] प्रकट होते हैं इस से' (स्वम्) आप (अस्मासु) हम लोगों में (स्पृहयाच्याणि) इच्छा के विषय होने योग्य (वसूनि) धनों को (धेहि) धारण करिये ॥३॥ भावार्थः -- वही राजा होने को योग्य है जिस के संग से दुष्ट जन भी श्रेष्ठ, कायर भी शूरवीर और कृपण भी दाता होते हैं ॥३॥ अब द्वितीय जन्म के विषय को कहते हैं। त्वां विश्व अमृत जायमान शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते । तब क्रतुभिरमृतत्वमारवैश्वानर यत्पित्रोरीदे ॥४॥ पदार्थ:-हे (वैश्वानर) संपूर्ण जनों को धर्म के कार्यों में ले चलनेवाले (अमृत) मरण धर्म से रहित यथार्थवक्ता विद्वन् जन जिन (वाम्) आप को (शिशुम्) बालक को (न) जैसे वैसे (जायमानम्) उत्पन्न हुए को (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (अभि) सब ओर से (सम्) उत्तम प्रकार (नवन्ते) स्तुति करते हैं और जिन (तव) आप के (क्रतुभिः) बुद्धि के कम्मों से बुद्धि के कर्मों से मनुष्य लोग. A Lama ऋग्वेदः मं०६ । सू०७।। - oe AMAN (अमृतत्वम्) मोक्षपन को (प्रायन्) प्राप्त होते हैं और (यत्) जो आप (पित्रोः) माता और पिता के सदृश विद्या और प्राचार्य के (अदीदे:) प्रकाशक हो वह श्राप धन्य हो ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य माता और पिता से जन्म को प्राप्त होकर आठवें वर्ष से प्रारम्भ करके आचार्य से विद्या के ग्रहण से द्वितीय जन्म को प्राप्त होते हैं वे स्तुति करने योग्य हुए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करने को समर्थ होते हैं ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त कराना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। वैश्वानर तव तानि व्रतानि महान्यग्ने नकिरा दंधर्ष । यज्जायमानः पित्रोरुपस्थेऽविन्दः केतुं बयुनेष्व हाम् ॥५॥ पदार्थ:-हे (वैश्वानर) सम्पूर्ण संसार में विद्या और धर्म के प्रकाश से अग्रणी (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशस्वरूप (यद) जो श्राप (पित्रोः) माता पिता के सदृश विद्या और प्राचार्य के (उपस्थे) सभीप में (जायमानः) प्रकट हुआ (अह्नाम्) दिनों के मध्य में (वयुनेषु) पृथिवी से लेकर परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों के विज्ञानों में (केतुम्) बुद्धि को (अविन्दः) प्राप्त होते हो उन (तव) आप के (तानि) उक्त ब्रह्मचर्य विद्याग्रहण सत्यभाषण आदि (महानि) बड़े (तानि) कम्मों को कोई भी (नकि:) नहीं (प्रा, बधर्ष) तिरस्कार करे ।।५।। भावार्थ:-जो मनुष्य दूसरे विद्यारूप जन्म को प्राप्त होवें तो उन के सफल कर्म होते हैं ऐसा जानना चाहिये ॥५॥ फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । वैश्वानरस्य विमितानि चक्षसा सानि दिवो अमृतस्य केतुना । तस्थेदु विश्वा भुवनाधि मूर्द्धनि क्या इव रुरुहुः सप्त विस्रुहः ॥६॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जिस (वैश्वानरस्य) संपूर्ण नरों में विद्या और विनय से प्रकाशमान के (चक्षसा) प्रज्ञान से (विमितानि) विशेष करके परिमित (सानूनि) प्रान्त स्थानों को (दिवः) प्रकाशमान (अमृतस्य) नाश से रहित को (केतना) बुद्धि से (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवना) लोक (सप्त) सात प्रकार के (विस्त्र हः) विशेष कर के सरकते जाते और (मूर्वनि) शिर पर अर्थात् ऊपर (वयाइव) पक्षियों के सदृश (अधि) अधिकतर (रुरहुः) प्रकट होते हैं (तस्य) उसका (इद) ही (उ) तर्क वितर्क से संग करो ॥६॥ te ANA maa ऋग्वेदः मं०६ । सू० ८ ॥ - भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं-जो विद्वान् जन परमेश्वर से रचे गए, पक्षियों के सदृश अन्तरिक्ष में चलते हुए लोकों और उन की गति को बुद्धि से विशेष करके जाने वह विद्वानों के मस्तक के सदृश प्रशंसा करने योग्य होता है ॥६॥ फिर जगदीश्वर कैसा है इस विषय को कहते हैं ।। वि यो रजांस्यमिमीत सुक्रतुर्वैश्वानरो वि दिवो रोचना कविः । परि यो विश्वा भुवनानि पप्रथेऽदब्धो गोपा अमृतस्य रक्षिता ॥७॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो (यः) जो जगदीश्वर (वैश्वानरः) सम्पूर्ण मनुष्यों का हित करने वाला (सुक्रतुः) उत्तम कर्म जिस के वह (कविः) उत्तम बुद्धि वाला ईश्वर (विव:) प्रकाशमान सूर्य के (रोचना) प्रकाशरूप (रजांसि) लोकों को (वि) विशेष कर के (अभिमीत) निर्मित करता तथा (यः) जो (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) भुवनों को (परि) सब ओर से (पप्रथे) विस्तारयुक्त करता है वह (अमृतस्य) मोक्ष का (गोपाः) पालन करने वाला (अदब्धः) अहिंसनीय और (रक्षिता) रक्षा करने वाला (वि) विशेष करके निर्माण करता है ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर ने सम्पूर्ण लोक निर्मित किये हैं तथा जो सबका रक्षक है उस की सब उपासना करें॥७॥ इस सूक्त में सब के हित करने वाले, विद्वान् और ईश्वर के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में सातवां सूक्त समाप्त हुभा ॥ अथ सप्तर्चस्याष्टमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । वैश्वानरो- देवता। १ । ४ जगती। ६ विराड्जगती छन्दः । निष्पादः स्वरः । २ । ३।५ भुरिक त्रिष्टुप् । ७ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।। अब सात ऋचावाले' आठवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मंत्र में अब मनुष्यों को क्या जान कर क्या उपदेश करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । पृक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू सह भनु वीचं विदया जातवेदसः वैश्वानराय मतिर्नव्यसी शुचिः सोमंइव पवते चारग्नये ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस (पृक्षस्य) सर्वत्र संबद्ध अर्थात् संयुक्त (अरु- षस्य) नहीं हिंसा करने और (वृष्णः) सेचन करनेवाले (जातवेदसः) उत्पन्न हुओं en E Mean ऋग्वेदः म०६।०८॥ RAKE Insta में विद्यमान के (सहः) बलका (नु) शीघ्र (प्र, वोचम्) उपदेश देऊ और (विदथा) विज्ञानों का (नू) शीघ्र उपदेश देऊ और जिसकी (सोमइब) सोमलता जैसे वैसे (नध्यसी) अत्यन्त नवीन (शुचिः) पवित्र (चारु:) सुन्दर (मतिः) बुद्धि (पवते) पवित्र होती है उस (वैश्वानराय) संपूर्ण विश्व के प्रकाशका (अग्नये) विद्वान् जन के लिये बुद्धि को धारण करू ॥१॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं.--जिन मनुष्यों की सोमलतारूप प्रोषधि के सदृश पवित्र करने वाली बुद्धि, अतुल बल और अग्नि विद्या होती है वे ही आनन्दित होते हैं ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । स जायमानः परमे व्योमनि व्रतान्यग्नितमा अरंक्षत । व्य१न्तरिक्षममिमीत सुक्रतुःश्वानरो महिना नामस्पृशत् ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो आप लोगों को जो (व्रतपाः) कम्मों की रक्षा करने वाला (अग्निः) अग्नि (परमे) श्रेष्ठ और व्योमनि, आकाश के सदृश व्यापक परमेश्वर में (जायमानः) उत्सन्न होता हुआ (प्रतानि) सत्यभाषण आदि कर्मों की (अरक्षत) रक्षा करता तया (अन्तरिक्षम्) जल की (वि) विशेष कर के (अमिमीत) रक्षा करता और (सुक्रतुः) अच्छे कम्मोवाला (वैश्वानरः) सम्पूर्ण मनुष्यों में प्रकाशमान होता हुआ (महिना) महत्त्व से (नाकम्) दुःख रहित का (अस्पृशत्) स्पर्श करता है (सः) वह जानने योग्य है ।।२।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस परमेश्वर ने अपने में सूर्य आदि लोकों के निर्माण से सब का उपकार किया उस के सत्य कर्मों का अनुष्ठान करके उपासना करो अर्थात् उसी का भजन करो॥२॥ फिर सूर्य कैसा है इस विषय को कहते हैं । व्यस्तभ्नाद्रोदसी मित्रो अद्भुतोऽन्तर्वावदकृणोज्ज्योतिषा तमः । वि चम्म॑णीव धिषणे अवयवैश्वानरो विश्वमवत्त वृष्ण्यम् ।।३।। पदार्थः - हे मनुष्यो ! जो (प्रभुतः) आश्चर्यजनक गुण कर्म और स्वभाव वाला (मित्रः) सब के मित्र के समान वर्तमान (वैश्वानरः) संपूर्ण मनुष्यों में विराज- मान सूर्य (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (वि, प्रस्तभ्नात) धारण करता तथा (ज्योतिषा) प्रकाश से (तमः) रात्रि को (अकृणोत) करता (अन्तर्वावत्) अन्तः अर्थात् ब्रह्माण्ड के भीतर अत्यन्त चलता (चर्मणीय) जैसे चर्म में रोम धारण किये MoDN

है वैसे उत्तम राजा दूर स्थित भी प्रजात्रों का पोषण करे ॥४॥
ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ८॥
गये वैसे (धिषणे) सब के धारण करने वालियों को (वि, अवर्तयत्) विशेष कर के
वर्ताता (वृष्ण्यम्) वृषों में उत्पन्न वा श्रेष्ठ (विश्वम्) सम्पूर्ण जगत् को (अधत्त)
धारण करता है उस का तुम लोग प्रयोग करो ॥३॥
भावार्थ:-इस मंत्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर
से बनाया गया यह सूर्य जैसे चर्म रोमों को वैसे आकर्षण से लोकों को
धारण करता है तथा नियम से चलाता और चलता है वही जगत् के
उपकार के लिए समर्थ होता है ॥३॥
फिर वह वायु कैसा है और क्या करता है इस विषय को कहते हैं ।।
अपामुपस्थे महिषा अंगृभ्णत विशो राजानमुप तस्थुमे॒ग्मियम् ।
आ दूतो अग्निमभर द्विवस्वतो वैश्वानरं मातरिश्वो परावतः ।।४।।
पदार्थः-हे विद्वान् जनो जो (दूतः) संतापित कराने वाला (मातरिश्वा)
अन्तरिक्ष में शयन करने वाला वायु (परावतः) दूर स्थित (विवस्वतः) सूर्य के
(वैश्वानरम्) सर्वत्र प्रकाशमान (अग्निम्) अग्नि को (अभरत) धारण करता और
जिस (ऋग्मियम्) ऋचाओं द्वारा प्रमाण किया जाता उस (राजानम्) जैसे राजा
को वैसे सूर्य को (विश:) प्रजायें (उप) समीप में (मा) चारों ओर से (तस्थः)
प्राप्त होती हैं वैसे सूर्य उपस्थित होता है और जिस (अपाम्) प्राणों वा जलों के
(उपस्थे, समीर में वर्तमान का (महिषाः) बड़े जन (भगृभ्णत) ग्रहण करते हैं उस
वायु को आप लोग जानिये ॥४॥
भावार्थ:-जैसे वायु दूर वर्तमान भी सूर्य के तेज को धारण करता
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फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं
युगेयुगे विदथ्य गृगद्भ्योऽग्ने रयिं यश धेहि नव्यसीम् ।
पव्येवं राजन्नघर्श समजर नीचा निश्च वनिनं न तेजसा ।।५।।
पदार्थ:-हे (अजर) वृद्धावस्था रूप दोष से रहित (राजन्) प्रकाशमान
(अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान प्राप (तेजसा) तेज़ से (बनिनम् ) किरण विद्यमान
जिस में उसको (न) जैसे वैसे वा शूरवीर जन (पत्येव) वज्र से जैसे (नीचा) नीच
को वैसे (अघशंसम्) चोर को (नि) अत्यन्त (वृश्च) काटो और (गृणद्भ्यः) स्तुति
करने वालों के लिये (युगेयुगे। वर्ष वर्ष वा वर्ष समुदाय वर्ष समुदाय में विदथ्यम्)संग्राम
और विज्ञानादिकों में (रयिम्) धन (यशसम्) कीर्ति वा अन्न को और (नभ्यसीम्)
अतिशय नवीन विद्या वा क्रिया को (धेहि) धारण करो
॥५॥

ऋग्वेदः म०६ । सू० ८ ॥
.
भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे सूर्य किरणों से संयुक्त मेघ
का नाश करता है और जैसे वज्र विदारण करने योग्य पदार्थ को विदारण
करता वैसे राजा चोर आदि दुष्ट जनों का छेदन भेदन करके धार्मिक जनों
के लिये धन आदि ऐश्वर्य का धारण करे ॥५॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
अस्माकमग्ने मघवत्सु धारयानामि क्षत्रमजर सुवीर्यम् ।
वयं जयेम शतिनै सहस्रिणं वैश्वानर वाजमन्ने तयोतिभिः ॥६॥
पवार्थ:-हे (वैश्वानर) संसार के अग्रणी (अग्ने) अग्नि के सदृश विद्वन्
राजन् (वयम्) हम लोग (तब) पाप की (अतिभिः) रक्षा आदि के साथ (शतिनम्)
सैकड़ों प्रकार के योद्धाओं से और (सहनिणम्) सहस्रों योद्धाओं से संयुक्त (वाजम्)
संग्राम को (जयेम) जीतें । तथा हे (अग्ने) तेजस्विन् जैसे (अस्माकम्) हम लोगों के
(मघवत्सु) बहुत धनों से युक्त प्रजाजनों में (सुवीर्य्यम्) उत्तम बल (अजरम्) नाश-
रहित (क्षत्रम्) राज्य वा धन (अनामि) नम्र होवे वैसा (धारय) धारण करो ॥६॥
भावार्थ:-जो राजा और सेना के अध्यक्ष धार्मिक विद्वान् न्यायकारी
और जितेन्द्रिय हों तो उनका सर्वत्र विजय होता है ।।६।।
फिर राजा आदि जनों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं।
अदब्धेभिस्तव गोपाभिरिष्टेऽस्माकं पाहि विषवस्थ सूरीन् ।
रक्षा च नो ददुषां शौँ अग्ने वैश्वानर म च तारीः स्तवानः ॥७॥
पदार्थ:-हे (त्रिषधस्थ) तीन तुल्य स्थानों में वर्तमान (इष्टे) मेल करने
योग्य (वैश्वानर) विद्या और विनय से प्रकाशमान (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान
(स्तवानः) प्रशंसा करते हुए आप (अवधेभिः) अहिंसक जनों से (गोपाभिः)
रक्षाओं के द्वारा (नः) हम लोगों (सूरीन) विद्वानों का (पाहि) पालन करिये और
(अस्माकम्) हम लोगों के सम्बन्धियों की (च) भी (रक्षा) रक्षा करिये तथा आपका
और (वदुषाम्) दोने वालों का (च) और हमारा (शधः) बल बढ़े और हम लोगों
के साथ आप शत्रुओं का (प्र, तारीः) उल्लंघन करो ।।७।।
भावार्थ:-हे राजजन ! जैसे सूर्य ऊपर नीचे और मध्यस्थ लोकों
को प्रकाशित करता है वैसे ही प्रजाजनों की आप सब प्रकार से रक्षा
कीजिये और जैसे इस राज्य में विद्वान् बढ़े वैसे कार्य करिये ॥७॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०६॥ इस सूक्त में विद्या और विनय से प्रकाशमान, विद्वान्, सूर्य और राजा आदि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के प्रार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में पाठवां सूक्त समाप्त हुआ। Mata Maoie प्रथ सप्तर्चस्य नवमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः। वैश्वानरी देवता । १ विराट् त्रिष्टुप् । ५ निवृत्त्रिष्टुप् । ६ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । २ भुरिक पङ्क्तिः । ३ । ४ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ७ भुरिग्जगतीछन्दः । निषादः स्वरः॥ अब सात ऋचावाले नवम सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा प्रजा परस्पर कैसे वर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ।। अइंश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः। वैश्वानरो जायमानो न राजावातिरञ्ज्योतिषाग्निस्तमौसि ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (अहः) दिन (कृष्णम्) रात्रि (च) और (महः) व्याप्ति- शील' (अर्जुनम् ) सरल' गमन आदि गुणों को (च) भी (रजसी) रात्रिदिन (वेद्याभिः) जानने योग्यों के साथ (वि, वर्तेते) विविध प्रकार वर्तते हैं और (राजा) राजा के (न) समान (जायमान:) उत्पन्न हुआ (वैश्वानरः) सम्पूर्ण करने योग्य कामों में प्रकाशमान (अग्निः) अग्नि (ज्योतिषा) प्रकाश से (तमांसि) रात्रियों का (प्रय, अतिरत्) उल्लंघन करता है ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे रात्रि दिन संयुक्त हैं वैसे ही राजा और प्रजा अनुकूल हों और जैसे सूर्य प्रकाश से अन्धकार को निवृत्त करता है वैसे ही राजा विद्या और विनय के प्रकाश से अविद्यारूप अन्धकार को निवृत्त करे ॥१॥ अब अपत्य किस का होता है इस विषय को कहते हैं । नाहं तन्तुं न वि जानाम्योतुं न यं वयंन्ति समरेऽतमानाः । कस्य स्वित्पुत्र इह वक्त्वांनि परो वदात्यवरेण पित्रा ॥२॥ पवार्थ:-हे विद्वान् जनो (यम्) जिसको (समरे) संग्राम में (अतमानाः) घूमते हुए जन (न) जैसे वैसे (वयन्ति) व्याप्त होते हैं यह (इह) यहाँ (कस्य) किस का (स्थित) भी (पुत्रः) पवित्र और सुख देने वाला है (परः) अन्य (अवरेण) ३७० ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ६ ॥ vie wate dan द्वितीय (पित्रा) पालक वा प्राचार्य के साथ (वक्त्वानि) कहने के योग्यों को (वदाति) कहै और जिस को धूमते हुए जन संग्राम में (न) नहीं व्याप्त होते हैं उस (तन्तुम्) विस्तार को (श्रोतुम्) रचने को (अहम्) मैं (न) नहीं (वि) विशेष कर के (जानामि) जानता हूं ॥२॥ भावार्थ:-विद्वानों का यह सिद्धान्त है कि जो दो से उत्पन्न होता है जिस के दो माता और दो पिता हैं वह किस का पुत्र है यह हम लोग नहीं जानते हैं ऐसा प्रश्न है । इस में सिद्धान्त यह है कि जैसे उत्पन्न करने वाले माता पिता का पुत्र है वैसे ही प्राचार्य और विद्या का भी वह द्विज पुत्र है ऐसा सब लोग जानो ।।२।। फिर अपत्य विषय को कहते हैं । स इत्तन्तुं स वि जानात्योतुं स वक्त्वान्युतुथा बंदाति । ई चिकैतदमृतस्य गोपा अवश्चरन्परो अन्येन पश्यन् ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (अमृतस्य) नित्य पदार्थ का (गोपाः) रक्षक (अन्येन) अन्य से (पश्यन्) देखता हुमा (अवः) नीचे (परः) ऊपर स्थित दूसरा (चरन्) चलता हुआ (ईम्) जल के सदृश शुक्र को (चिकेतत्) जानता है (सः, इत) वही (तन्तुम् ) कारण' को (सः) वह (प्रोतुम्) रक्षक को (वि, जानाति विशेष कर के जानता है (स:) वह (ऋतुथा) जैसे काल काल में वैसे (वक्त्वानि) कथन करने योग्यों को (ववाति) कहे ॥३॥ भावार्थ:-जो ब्रह्मचर्य के द्वारा यथार्थवक्ताओं से विद्या और शिक्षा को प्राप्त होते हैं वे ही इस जगत् के पूर्ण कारण को जानने को समर्थ होते हैं ॥३॥ अब इस देह में दो जीवात्मा और परमात्मा वर्तमान हैं इस विषय को कहते हैं ।। अयं होता प्रथमः पश्यतेममिदं ज्योतिरमृतं मत्यषु । अयं स जज्ञे ध्रद ा निषत्तोऽमय॑स्तन्या३' वर्धमानः ॥४ । पदार्थ:-हे विद्वान् जनी जो (ध्रुवः) निश्चल' दृढ़ (निषत्तः) स्थित (प्रथमः) पहिला (होता) देने वा ग्रहण करनेवाला (अयम्) यह और (मत्येष) मरणधर्मयुक्त शरीरों में (इदम्) इस प्रत्यक्ष (अमृतम्) नाश से रहित (ज्योतिः) सूर्य के सदृश अपने से प्रकाशित चेतन परमात्मा है उस (इमम्) इस को (पश्यत) देखिये और जो (अयम्) यह (अमर्त्यः) मरणधर्म से रहित (तन्वा) शरीर से (वर्धमानः) बढ़ता हुआ (मा) चारों ओर से (जज्ञे) प्रकट होता है (सः) वह जीव है ऐसा देखो ॥४॥ . am ! COM इन्द्रियां (एकम्) सहायरहित (ऋतुमान ऋग्वेदः मं०६। सू०६॥ भावार्थ:--हे मनुष्यो ! इस शरीर में दो चेतन नित्य हुए जीवात्मा और परमात्मा वर्तमान हैं उन दोनों में एक अल्प, अल्पज्ञ और अल्पदेशस्थ जीव है वह शरीर को धारण करके प्रकट होता, वृद्धि को प्राप्त होता और परिणाम को प्राप्त होता तथा हीन दशा को प्राप्त होता, पाप और पुण्य के फल का भोग करता है। द्वितीय परमेश्वर ध्रुव निश्चल, सर्वज्ञ, कर्मफल के सम्बन्ध से रहित है ऐसा तुम लोग निश्चय करो ॥४॥ इस शरीर में क्या क्या जानने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। ध्र ज्योतिर्निहितं दृशये के मनो नविष्ठं पतयत्स्वन्तः । विश्वे देवाः समनसः सकेता एक क्रतुभभि कि यन्ति साधु ।।५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (दृशये) दर्शन के लिये (ध्र वम्) निश्चल (निहितम्) स्थित (कम्) सुखस्वरूप (ज्योतिः) अपने से प्रकाशित और सब का प्रकाशक ब्रह्म है उसके आधार में जो (जविष्ठम्) अतिवेगयुक्त (पतयत्सु) पति के सदृश आचरण करते हुओं में (अन्तः) मध्य में वर्तमान (मनः) अन्तःकरण' का व्यापार है उस के आश्रय से (समनसः) सहकारि साधन मन जिन का और (सकेताः) तुल्य बुद्धि जिन की वे (विश्वे) संपूर्ण (देवाः) अपने २ विषयों को प्रकाशित करने वाली श्रोत्र आदि (अभि) सन्मुख (वि) विशेष करके (यन्ति) प्राप्त होते हैं यह आप लोग जानो ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! इस शरीर में सच्चिदानन्दस्वरूप अपने से प्रकाशित ब्रह्म, द्वितीय जीव, तृतीय मन, चौथी इन्द्रियां, पांचवें प्राण, छठा शरीर वर्तमान हैं ऐसा होने पर सम्पूर्ण व्यवहार सिद्ध होते हैं जिन के मध्य से सब का आधार ईश्वर, देह, अन्तः करण, प्राण और इन्द्रियों का धारण करने वाला और जीवादिकों का अधिष्ठान शरीर है यह PER पता- A जानो ॥५॥ अब मनुष्य के शरीर में क्या क्या जानने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। वि मे कर्णां पतयतो वि चक्षु:३'दं ज्योतिर्हृदय आहितं यत् । वि मे मनश्चरति दूरआंधीः किं खिद्वक्ष्यामि किमु नू मनिष्ये ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो (यत्) जो (मे) मेरे (कर्णा) श्रोत्र (वि) विशेष करके (पतयतः) स्वामी के सदृश आचरण करते हुए और जो मेरा (चक्षु) देखने की चेष्टा करता है जिससे वह चक्षु (वि) विशेष करके (चरति) चलता है और जो ३७२ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १० ।। (मे) मेरे (हृदये) हृदय में (इवम्) यह (माहितम्) स्थित (ज्योतिः) प्रकाशक (वि) विशेष कर के चलता है और जो मेरा (दूर-साधी) दूरस्थ पदार्थों का सब प्रकार से चिन्तक (मनः) अन्तःकरण (वि) विशेष कर के चलता है जिससे उसको मैं (किम्) क्या (स्वित) भी (वक्ष्यामि) कहूंगा और (किम्) क्या (उ) और (नू) शीघ्र (मनिष्ये) विचार करूगा यह विचारता हूँ उस सब को आप लोग जनाइये ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वान् जनो ! जो मैं और जो मेरे साधन हैं, उस सब व्यवहार को मेरे लिये जनाइये ॥६॥ मनुष्यों को किससे डर कर पापाचरण का आचरण न करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। विश्च देवा अनमस्यन्भियानास्त्यामग्ने तमंसि तस्थिवांसम् । वैश्वानरोऽवतूतये नोऽमोऽवतूतये नः ॥७॥ पवार्थ:-हे (भग्ने) प्रकाशक परमात्मन् (तमसि) अन्धकार में (तस्थिवांसम्) स्थित (स्वाम्) परमात्मा के सदृश बिजुली से युक्त को वा प्राण के सदृश परमात्मा को जैसे पृथिवी श्रादि वैसे (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (भियानाः) भय को प्राप्त हुए (अनमस्यन्) नम्र होते हैं वह (वैश्वानरः) सम्पूर्ण संसार के प्रकाशक (अमर्त्यः) मृत्यु धर्म से रहित आप (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (न:) हम लोगों की (अवत) रक्षा कीजिये और (ऊतये) रक्षा आदि के लिए (न:) हम लोगों की (अवतु) रक्षा कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे प्राण और बिजुली को प्राप्त होकर सम्पूर्ण पृथिवी आदिकों की स्थिति है और जैसे अग्नि से सम्पूर्ण प्राणी डरते हैं वैसे ही सर्वत्रव्यापी और सब के अन्तर्यामी परमात्मा को मान के पाप के आचरण से विद्वान् जन डरते हैं इस निमित्त से सब जन इस से -- डरें॥७॥ इस सूक्त में दिन रात्रि, अपत्य, जीव, परमात्मादिकों की स्थिति का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में नवम सूक्त समाप्त हुआ। अथ सप्तर्चस्य दशमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निर्देवता । १ त्रिष्टुप् । ४ प्रार्षी पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ । ३। ६ निवृत्त्रिष्टुप् । ५ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ७ प्राजापत्या बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः ॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू० १० ॥ ३७३ अब मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। पुरो वो मन्द्रं दिव्यं संवृक्ति प्रयति यज्ञे अग्निमंबरे दधिध्वम् । पुर उक्थेभिः स हि नो विभावो स्वध्वरा करति जातवेदाः ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो आप लोग (व:) आप लोगों के (प्रयति) प्रयत्न से साध्य (अध्वरे) अहिंसनीय (यज्ञे) संगतिस्वरूप यज्ञ में (उपथेभिः) कहने के योग्यों से (पुरः) प्रथम (मन्द्रम्) आनन्द देनेवाले वा प्रशंसनीय (दिव्यम्) शुद्ध (सुवक्तिम्) उत्तम प्रकार चलते हैं जिससे उस (अग्निम्) विद्य दादिस्वरूप अग्नि को (वधिध्वम्) धारण करिये और जो (हि) निश्चय करके (विभावा) विशेष करके प्रकाशक (जातवेदाः) प्रकट हुओं को जाननेवाला (नः) हम लोगों को (पुरः) प्रथम (स्वध्वरा) उत्तम प्रकार अहिंसा आदि धर्मो से युक्त (करति) करे (स.) वहीं हम लोगों से सत्कार करने योग्य है ।।१।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे यज्ञ करने वाले यज्ञ में अग्नि को प्रथम उत्तम प्रकार स्थापित कर के उस अग्नि में आहुति देकर संसार का उपकार करते हैं वैसे ही आत्मा के आगे परमात्मा को संस्थापित करके वहां मन आदि का हवन करके और प्रत्यक्ष करके उस के उपदेश से जगत् का उपकार करो॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । तमु घुमः पुर्वणीक होतरग्ने अग्निभिर्मनुष इधानः । स्तोमं यमस्मैं ममतेंव शूषं घृतं न शुचि मतयः परन्ते ॥२॥ पदार्थ:--है (पुर्वणीक) बहुतों को संविभाग करने और (ध म:) प्रकाशवान् (होतः) धारण करने वाले (अग्ने) अग्नि के सदृश विद्वन् (मनुषः) मनुष्यों को (इधान:) प्रकाशित करते हुए आप और (मतयः) मननशील अन्य मनुष्य (ममतेच) ममता के समान (अग्निभिः) अग्नियों से (अस्मै) इसके लिए (शुधि) पवित्र (घृतम्) घृत वा (शूषम्) बल के (न) समान (यम्) जिस को (पयन्ते) पवित्र करते हैं (तम्, उ) उसी अग्नि की (स्तोमम्) प्रशंसा को सुनिये ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं -मनुष्य जिस से पदार्थों को सिद्ध करते हैं वह अग्नि सबको कार्यसाधक जानने योग्य है ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । %2. 429 ऋग्वेदः मं०६ । सू० १०॥ the AD क H 4- mota ... AADIM पीपाय सः श्रवसा मत्र्येषु यो अग्नये ददाश विप्र उक्थैः । चित्रामिस्तभूतिभिश्चित्रशोचिजस्य साता गोमतो दधाति ॥३॥ पदार्थ:--हे विद्वान् जनो (य:) जो (गोमतः) अतिशय स्तुति करनेवाला और (चित्रशोचिः) अनेक प्रकार का प्रकाश जिसका ऐसा (विप्रः) बुद्धिमान् (उक्थैः) प्रशंसित कर्मा और (चित्राभिः) अद्भुत (ऊतिभिः) रक्षादिकों से (मर्येषु) मनुष्य आदिकों में (अग्नये) अग्नि के लिए (श्रवसा) अन्नादि से (पीपाय) बढ़ाता और (ददाश) देता है (स:) वह (वजस्य) चलते हैं सघन जल जिस में उस मेध के (साता) संग्राम से (दधाति) धारण करता है (तम्) उस को आप लोग जानिये ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस अग्नि में अद्भुत गुण कर्म स्वभाव हैं उसको अच्छे प्रकार जानकर संप्रयोग करो अर्थात् काम में लामो ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । श्रा यः पनौ जायमान उर्वी दूरेदृशां भासा कृष्णाध्वा । अध बहु चित्ता ऊम्यायास्तिरः शोचिर्षा ददृशे पावकः ।।४।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (य:) जो (जायमान:) प्रकट हुआ (कृष्णाध्या) कर्षित किया अर्थात् जैसे हल से जोते वैसे पहियों से सतीरा मार्ग जिस ने वह (दूरेदशा) जिस से दूर देखते हैं उस (भासा) प्रकाश से (उ:) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ) चारों ओर से (पप्रौ) व्याप्त होता है और (अध) इस के अनन्तर (ऊर्यायाः) रात्रि का (बहु) बहुत (चित्) भी (तमः) अन्धकार (शोचिषा) प्रकाश से (तिरः) तिरस्कार करता है और (पावकः) पवित्रकर्ता हुआ (वदशे) देखा जाता है उस को आप लोग जानिये ॥४॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि अवश्य बिजुलीरूप अग्नि को जानें ॥४॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहत हैं। नू नश्चित्रं पुरुषाजाभिरूती अग्ने रयिं मघवद्भ्यश्च धेहि । ये राधसा श्रवसा चात्य यान्तमुवीयभिश्चाभि सन्ति जनान् ॥५॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) यथार्थवक्ता विद्वन् अाप (पुरुवाजाभिः) बहुत ज्ञान और पुरुषार्थ से युक्त (ऊती) रक्षा प्रादि क्रियाओं से (न:) हम लोगों और (मधवद्भ्यः) युक्त जनों के लिये (च) भी (चित्रम्) अद्भुत (रयिम्) धन को (नू) शीघ्र - bar धन से THAPAGAPOHREET H ऋग्वेदः मं०६। सू० १०॥ - MIND (धेहि) धारण कीजिये (ये) जो (सुवीर्येभिः) श्रेष्ठ बल वा पराक्रम जिन के उन और (राधसा) धन और (श्रवसा) अन्न आदि से (च) भी (अन्यान्) अन्य (जनान्) मनुष्यों को धारण करते हुए (अभि) सन्मुख (सन्ति) हैं वे (अति) अत्यन्त प्रतिष्ठा को (च) भी प्राप्त होते हैं ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो आप लोगों के लिये विद्या और लक्ष्मी को धारण करते हैं उन की आप लोग अत्यन्त प्रतिष्ठा करो।॥५॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । इमं यज्ञं चनौ घा अग्न उशन्यं तं आसानो जुहुते इविष्मान् । मराजेषु दधिषे सुवृक्तिमवीर्वाजस्य गध्य॑स्य सातौ ॥६॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) पुरुषार्थी विद्वन् पाप (यम्) जिस (यशम्) परोपकार नामक यज्ञ की (उशन्) कामना करते हुए (चनः) अन्न आदि को (धाः) धारण करें और (आसान:) बैठे हुए (हविष्मान्) बहुत देने और भोग करने योग्य पदार्थ जिन में वह आप (जहते) हवन करते हैं (इमम्) इस की (गव्यस्थ) अभिकांक्षा करने योग्य (वाजस्य) विज्ञान नादि के (सातौ) संग्राम में (अवी:) रक्षा कीजिये और (भरद्वाजेषु) अन्न आदि को धारण करने वालों में (सुवृक्तिम्) उत्तम प्रकार चलते हैं जिस में उस मार्ग को (दधिषे) धारण कीजिये उन (ते) आपका सम्पूर्ण सुख सुगम होजाय ॥६॥ भावार्थ:---जो परोपकार करते हैं उनको ही अभिष्ट स्वार्थसिद्धि होती है ॥६॥ फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ।। विद्वेषाँसीनुहि वर्धयेळां मम शतहिमाः सुवीराः ॥७॥ पदार्थ:-हे अग्नि के समान परोपकार साधक विद्वन् ! आप (द्वेषांसि) द्वेष से युक्त कर्मों का त्याग करिये कराइये और (इळाम्) वाणी वा अन्न को (वि) विशेष करके (इनुहि) व्याप्त होमो और हम लोगों की (वर्धय) वृद्धि कीजिये जिस से हम लोग (शतहिमाः) सौ वर्ष पर्यन्त (सुवीराः) अच्छे वीर पुरुषों से युक्त होकर (मदेम) आननद करें ॥७॥ भावार्थ:--विद्वानों को चाहिये कि वह कर्म करें और करावें जिस से मनुष्यों के दोषों की निवृत्ति और बुद्धि, बल तथा अवस्था की वृद्धि होवे ॥७॥ anto ऋग्वेदः मं०६ । सू० ११ ॥ aama इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे भण्डल में दसवां सूक्त समाप्त हुआ ।। । - 10 -- MONDA अथ षड़चस्यैकादशस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः। अग्निदेवता । १। ३ । ५ निवृत्रिष्टुप् । ४।६ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । २ निवृत्- पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब छः ऋचावाले ग्यारहवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। यजस्व होतरिषितो यजीयानने बाधो मरुतां न प्रयुक्ति । आ नो मित्रावरुणा नासत्या द्यावा होत्रार्य पृथिवी ववृत्याः ॥१॥ पदार्थ:-है (होतः) दाता और (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी विद्वज्जन (यजीयान) अतिशय यज्ञ करने वाले (इषितः) प्रेरणा किये गये जैसे (नासत्या) असत्य आचरण से रहित मित्र वरुणा) प्राण और उदान वायु के समान अध्यापक और उपदेशक जन (होत्राय) ग्रहण करने और देनेवाले के लिये (धावा) अन्तरिक्ष और (पृथिवी) पृथिवी मिलाते है वैसे (न:) हम लोगों को (प्रयुक्ति) प्रयोग करते हैं पदार्थों का जिस में वह कर्म (प्रा) सब प्रकार से (ववृत्याः) प्रवृत्त कराइये और (मरुताम्) वायु के सदृश मनुष्यों की (बाधः) रुकावट (न) जैसे वैसे वर्तमान दिन को निवृत्त कर (यजस्व) उत्तम प्रकार मिलाइये ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो विद्वान् जन प्राण और उदान वायु के सदृश प्रिय और पुरुषार्थी होते हैं वे सब के लिये सुख प्राप्त कराने योग्य होते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वं होता मन्द्रतमो ना अध्रगन्तर्देवो विदथा मत्यैषु । पावकयां जुह्वाइ' वहिरासाग्ने यजस्व तन्वं तव खाम् ।।२।। पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान परोपकार के सहित वर्तमान विद्वन् जन जैसे (मन्द्रतमः) अतिशय आनन्द कराने वाले होता) दाताजन (विवथा) यज्ञ के (अन्तः) मध्या में (देवः) प्रकाशमान (वह्निः) धारण करने वाला अग्नि (प्रासा) मुख के सदृश (पावकया) पवित्र करने वाली ज्वाला से (जुह्वा) ग्रहण करता वा SOAD

SOMURTONTATREZARKARISANREN
ऋग्वेदः मं०६ । सू० ११ ॥
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देता जिस से उससे (न:) हम
लोगों को और (तव आप के सम्बन्ध में (स्वाम्)
अपने (तन्वम्) शरीर को मिलाता है वैसे' (त्वम् ) प्राप' (मत्र्येषु) मनुष्यों में
(अध्रुक) किसी से न द्रोह करने वाले होते हुए हम लोगों वा हम लोगों के शरीरों को
(यजस्व) उत्तम प्रकार मिलाइये ॥२॥
भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु जैसे बिजुली, सूर्य और भूमि में
हुए तेजस्वी पदार्थों के रूप से अग्नि सम्पूर्ण जगत् का उपकार करता है वैसे
ही विद्वान् जन जगत् को आनन्दित करते हैं ॥२॥
फिर वे कैसा होकर क्या करें इस विषय को कहते हैं।
धन्यां चिद्धि त्वे धिषणा वष्टि प्र देवाञ्जन्म गृणते यजध्यै
वेपिष्ठो अङ्गिरसां यद्ध विप्रो मधुच्छन्दो भनति रेभ इष्टौ ॥३॥
पदार्थ:-हे विद्वन् जो (हि) निश्चित (स्वे) आप के रहते (धन्या) धन को
प्राप्त हुई (धिषणा) बुद्धि, अन्तरिक्ष वा पृथिवी
। (देवान्) विद्वानों की
(प्र, वष्टि)
कामना करती है उन (अङ्गिरसाम्) प्राणों के सदृश विद्वानों के (जन्म) जन्म को
(यजध्ये) उत्तम प्रकार प्राप्त होने को जो (गणते) स्तुति करते हैं और (यव) जो
(ह) निश्चित (वेषिष्ठः) अतिशय कम्पानेवाला (विप्रः) बुद्धिमान् (रेभः) स्तुतिकर्ता
(इण्टौ) विज्ञान के बढ़ाने वाले यज्ञ में (मधु) माधुर्य गुण से युक्त विज्ञान और
(छन्दः) स्वतन्त्रता को (भनति) कहता है (चित) उन्हीं सब को हम लोग ग्रहण
-
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.
करें ॥३॥
.
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भावार्थ:---जो बुद्धि और विद्वानों के से विद्या की कामना करते
और अन्यों को उपदेश देते हैं वे धन्य हैं ॥३॥
फिर विद्वान् जन कैसे हों इस विषय को कहते हैं ।
अदिद्युतत्स्वपाको विभावाग्ने यजस्व रोद॑सी उरूची।
आयुं न यं नमसा रातहव्या अञ्जन्ति सुप्रयसं पञ्च जनाः ॥४॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान विद्वज्जन (रातहव्याः) दिये
गये देने योग्य (पञ्च) पांच (जना:) प्रारणों के सदृश वर्तमान जन (नमसा) अन्न
आदि से (यम्) जिस (सुप्रयसम्) उत्तम प्रकार प्रयत्न वाले को (अञ्जन्ति) अच्छे
प्रकार प्रकट करते हैं वह (सु) उत्तम प्रकार (अपाक:) नहीं परिपक्व (विभावा)
अत्यन्त दीप्तिमान् जन (प्रायुम्) जीवन को (न) जैसे वैसे (अदिध तद) प्रकाशित
होता है इस प्रकार आप (उरूची) बहुतों को प्राप्त होने वाले (रोदसी) अन्तरिक्ष
और पृथिवी को (यजस्व) उत्तम प्रकार प्राप्त हों ॥४॥

३७८ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ११ ॥ WALE से युक्त भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-जिस प्रकार से पांच प्राण शरीर को धारण करते हैं वैसे ही नियमित आहार और विहार करने वाले जन शरीर की अति कालपर्यन्त रक्षा करते हैं वैसे ही विद्वानों के उपदेश विद्या को प्रतिकाल पर्यन्त स्थिर होने वाली करते हैं ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । वृजे ह यन्नमसा बहिरनावयामि सुग्घृतवती सुवृक्तिः अभ्यक्षि सझ सदने पृथिव्या अश्रोयि यज्ञः सूर्ये न चक्षुः ॥५॥ पदार्थः हे विद्वानो मैं (नमसा) अन्न आदि से (अग्नी) अग्नि में (यत) जिस (बहिः) घृत का (ह) निश्चय करके (वृजे) त्याग करता हूं और जो (सवृत्तिः) सुवृक्ति अर्थात् उत्तम प्रकार चलते हैं जिस में वह (घृतवती) बहुत जल नदी (स्त्र क्) बहने वाली (अभ्यक्षि) चलती है उस को (अयामि) प्राप्त होता और जो (यशः) प्राप्त होने योग्य यज्ञ (सूय) सूर्य में (चक्षुः) नेत्र (न) जैसे वैसे (पृथिव्याः) पृथिवी के (सदने) स्थान में (सी) रहने का स्थान अर्थात् गृह का (प्रश्रायि) प्राश्रयण करता है उस का सब लोग अनुष्ठान करो ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं ० --जैसे हवन करने वाले जन अग्नि में स्त्र वा से घृत छोड़ते हैं वैसे विद्वान् जन अन्य की बुद्धि में विद्या को छोड़े और जैसे सूर्य के प्रकाश में नेत्र व्याप्त होता है वैसे ही हवन किया गया द्रव्य अन्तरिक्ष में व्याप्त होता है ॥५॥ फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । दशस्या नः पुर्वणीक होतदेवेभिरग्ने अग्निभिरिधानः । रायः सूनो सहसो वावसाना अति स्रसेम बृजनं नाहः ॥६॥ पदार्थ:-है (पूर्वणीक) अनेक सेनाओं से युक्त (होत:) दान करनेवाले (सहसः) बलवान् के (सूनो) सन्तान (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान राजन् (देवेभिः) निरन्तर प्रकाशमान (अग्निभिः) अग्नि के समान वर्तमान वीरजनों से (इथान:) प्रकाशमान अग्नि जैसे वैसे प्राप (नः) हम लोगों के लिये (रायः) धनों को (वशस्या) देते हैं जिस से वह दशस् है उसकी अपने लिये इच्छा करिये, जिससे (वावसानाः) ढांपे गये लोग (बृजनम् ) वर्जने योग्य बलको (न) जैसे वैसे (अंहः) अपराध को (अति) (सेम) अतिक्रमण करें ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे अग्नि इन्धनों से बढ़ता है वैसे आप लोग ऋग्वेदः मं०६। सू० १२॥ ३७६ पुरुषार्थ से बढ़िये और जैसे मनुष्य शत्रु का शीघ्र त्याग करते हैं वैसे अन्यायाचरणरूप पाप का शीघ्र त्याग करो ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में ग्यारहवां सूक्त समाप्त हुआ। 40 अथ षड्चस्य द्वादशस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निर्देवता। १ त्रिष्टुप् । २ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ भुरिकपंक्तिः । ४ । ६ निवृत्- पङ्क्तिः । ५. स्वराट् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब छः ऋचावाले बारहवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । मध्ये होता दुरोणे बर्हिषो राळग्निस्तोदस्य रोदसी यजध्यै । अयं स सूनुः सहस ऋतावा दूरात्सूर्यो न शोचिषां ततान ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (दुरोणे) गृह में (बर्हिषः) अवकाश के (मध्ये) मध्य में (होता) आदान वा ग्रहण करनेवाला (तोदस्थ) व्यथा के सम्बन्ध में प्रकाशमान (अग्निः) अग्नि (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (यजध्ये) मिलने को (ततान) विस्तृत करता है वैसे (स:) सो (अयम्) यह (सहसः) सहनशील का (सूनुः) अपत्य (ऋतावा) सत्य की याचना करनेवाला (दूरात) दूर से (शोचिषा) प्रकाश से (सूर्य:) सूर्य (न) जैसे वैसे विद्या के प्रकाश को विस्तृत करता है ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु -जो वेदविहित यज्ञ आदि कर्मों के करने वाले जन सूर्य के सदृश उत्तम कर्मों के प्रकाशक होवें वे सब के सुख बढ़ाने को समर्थ हो सकते हैं ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । आ यस्मिन्त्वे वपाके यजत्र यक्षद्राजन्त्सर्वोतव नु द्यौः त्रिषधस्थरततरुषो न जहाँ हव्या मघानि मानुषा यजध्ये ॥२॥ पदार्थ:--हे (यजत्र) मेल करने योग्य (राजन) राजा (यस्मिन्) जिन (अपाके) बुद्धि के परिपाक अर्थात् पूर्णता से रहित (त्वे) आप में (सर्वतातेव) सब की वृद्धि करने वाला यज्ञ जैसे वैसे (यौः) विजुली प्रादि का प्रकाश (स) उत्तम -MAHILA Saama P ३८० ऋग्वेदः मं०६ । सू० १२ ।। RE Masala प्रकार (मा, यक्षत) सब ओर से मेल करे वह आप (न) शीघ्र (त्रिषधस्थः) तीन पृथिवी अन्तरिक्ष और सूर्यलोक में तीन प्रकार के तुल्य' स्थानों में वर्तमान (ततरुषः) तारने और (जंहः) शीघ्र चलने वाला (न) जैसे वैसे (हव्या) देने और ग्रहण करने योग्य (मानुषा) मनुष्य सम्बन्धी (मधानि) धनों को (यजध्य) प्राप्त होने को यजन कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -जहां सूर्य के सदृश प्रतापी राजा होता है वहां सम्पूर्ण सुख होते हैं ॥२॥ फिर राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं । तेजिष्ठा यस्यारतिवनेराट् तोदो अध्वन्न धसानो अद्यौत् । अद्रोपो न द्रविता चैतति त्मन्नमयोऽवत्रं ओषधीषु ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यस्य) जिस अग्नि के सदृश राजा की (तेजिष्ठा) अतिशय तेजस्विनी (भरतिः) प्राप्ति (बनेरा) सेवन करने योग्य वा किरण में शोभित होने वाली (अध्वन्) मार्ग में (वृधसानः) बढ़ती हुई (तोदः) पीड़ा (न) जैसे वैसे (अधौत) प्रकाशित होती है वह (भद्रोधः) द्रोह से रहित (न) जैसे वैसे (अविता) चलने वाला (त्मन्) आत्मा में (अमर्त्यः) मरणधर्म से रहित (अवत्रः) नहीं निवारण करने योग्य (प्रोषधीषु) सोमलता आदि ओषधियों में (चेतति) जनाता है ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जिस राजा की तेजस्विनी प्रकृति और प्रेरणा होवे वह द्रोहरहित हुआ जैसे ओषधियां दुःख को वैसे सब के दुःख का निवारण करता है वही कृतकृत्य होता है ॥३॥ फिर विद्वानों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । सामाभिरेतरी न शूरैरग्निाष्टवे दम आ जातवेदाः द्रवन्नो वन्वन् क्रत्वा नार्वोस्रः पितेव जारयायिं यज्ञैः ॥४॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अस्माकेभिः) हम लोगों के साथ (वन्नः) द्रवीभूत अन्न जिस से वह (जारयायि) वृद्धावस्था को प्राप्त होने का स्वभाव जिस का उस शरीर का (वन्वन्) सेवन करता हुआ (पितेब) जैसे पिता वैसे (अर्वा) घोड़ा (न) जैसे वैसे (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म से (उत्रः) गौओं का सेवन करता है वैसे (यज्ञः) विद्वानों की सेवा प्रादि (शूषः) बल' आदिकों के साथ (अग्निः) अग्नि के समान जातवेवा:) प्रकट हुओं को जानने वाला (स्तवे) प्रशंसा करने योग्य (दमे) गृह में ऋग्वेदः मं०६ । सू० १२ ।। ३८१ AR - . और (एतरी) प्राप्त होने योग्य में (न) जैसे वैसे (आ) प्राप्त होता है (सः) वह राजा हम लोगों से सेवन करने योग्य है ॥४॥ भावार्थ:- इस मंत्र में उपमालं.-जैसे प्रशंसा करने योग्य गृह में सुख से निवास होता है वैसे ही पिता के सदृश पालन करने वाले राजा के होने पर प्रजा सुखपूर्वक निवास करती है और जैसे बुद्धि से जितेन्द्रिय होकर और पृथिवी के राज्य को प्राप्त होकर अनाथों की रक्षा करता है वैसे ही विद्वानों को चाहिये कि सत्य उपदेश से सब जगत् की रक्षा करें ॥४॥ अब कैसी बिजुली है इस विषय को कहते हैं । अर्ध स्मास्य पनयन्ति भासो वृथा यत्तसंदतुयाति पृथ्वीम् । सयो या स्यन्द्रो विषितो धीयानुणो न तायुरति धन्या राट् ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो (यः) जो (स्पन्द्रः) बहानेवाला (विषित:) व्याप्त (धवीयान्) अतिशय कम्पाने और (वृथा) व्यर्थ (ऋणः) प्राप्त कराने वाला (तायुः) चोर (न) जैसे वैसे वर्तमान अग्नि (यत्) जिन (भास:) प्रकाशों को (तक्षय) सुक्ष्म करता है (पृथ्वीम्) पृथिवी के (सद्यः) शीघ्र (अनुयाति) पीछे चलता है (अध) इस के अनन्तर (स्म) ही (अस्थ) इस राजा के गुरणों की विद्वान् जन (पनयन्ति) स्तुति करते हैं उस को जान कर और उसकी विद्या को प्राप्त होकर (रा) राजा (अति, धन्या) धनुर्वेद का अत्यन्त जाननेवाला होता है ॥५॥ भावार्थ:--इस मंत्र में उपमालं.-हे विद्वान् जनो! जो आप लोग विजुली की विद्या को जानकर यन्त्रों से घर्षित कर इस को उत्पन्न करके इस बिजुली के साथ मनुष्य अादिकों को युक्त करें तो यह अति कम्पाने वाली और वेगवती होवे और स्वच्छ काच के स्वभ्र पट्टे के अन्तर्गत मनुष्य को अलग करावें तो यह बिजुली शीघ्र भूमि में प्राप्त होती है सो यह सर्वत्र व्याप्त और प्रशंसा करने योग्य गुणवाली है जिस से राजा लोग शत्रुओं को सहज से जीतकर धनवान होते हैं ॥५॥ फिर मनुष्य कैसे होवें इस विषय को कहते हैं स त्वं नो अर्वनिदाया विश्वेभिरग्ने अग्निमिरिधानः । वेषि रायो वि यासि दुच्छुना मदेम शतहिमा सुवीराः ॥६॥ पदार्थ:-हे (अर्वन्) घोड़े के सदृश शीघ्र चलाते हुए (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी जिस कारण से (त्वम्) आप (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (अग्निभिः) बिजुली MA ३८२ ऋग्वेदः मै० ६ । सू० १३ ॥ आदिकों से (इधानः) निरन्तर प्रकाशमान (नः) हम लोगों की (निदायाः) निन्दा करते हुए प्रजाजन के (रायः) धनों को (वेषि) व्याप्त होते हो और (कुच्छनाः) दुष्ट श्वा के सदृश वर्तमान सेनाओं को (वि, यासि) विशेष प्राप्त होते हो (स:) वह पाप और हम लोग (शतहिमा:) सौ हिम वर्ष जिनके वे (सुवीराः) सुन्दर वीर जन (मदेम) हर्षित होवें ॥६॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि सम्पूर्ण अग्नि आदि पदार्थों से कार्यों को सिद्ध कर के जो न्याय की आज्ञा से विरुद्ध प्रजाजन हैं उन को ताड़न कर के शान्त सम्पादित करें क्योंकि इस प्रकार न्याय के आचरण से सम्पूर्ण जन सौ वर्षयुक्त होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में विद्वान्, राजा और प्रजा के गुरण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में बारहवां सूक्त समाप्त हुन्मा ।। अथ षड्चस्य त्रयोदशस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निदेवता। १ पङ्क्तिः । २ स्वरादपङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३।४ विरात्रिष्टुप् । ५। ६ निचरित्रष्टुप् छन्दः । धंवतः स्वरः।। फिर राजा से क्या प्राप्त होता है इस विषय को कहते हैं । त्वद्विश्वा सुभग सौभगान्यग्ने वि यन्ति वनिनो न क्याः । श्रृष्टी रयिर्वानी वृत्रतूर्ये दिवो वृष्टिरीडयो रीतिरपाम् ।।१।। पदार्थ:-हे (सुभग) सुन्दर ऐश्वर्य वाले (अग्ने) अग्नि के सदृश विद्वज्जन वा राजन् (वनिनः) वनसम्बन्धी (वयाः) पक्षी (न) जैसे वैसे जन (स्वत) आपसे ऐश्वयों के भावों को (वि, यन्ति) विशेष कर प्राप्त होते हैं (वृत्रतूर्ये) मेघ का हनन जिसमें उसके सदृश वर्तमान संग्राम में (दिवः) अन्तरिक्ष से (अपाम) जलों की (वृष्टिः) वृष्टि के सदृश (रीतिः) श्लिष्ट' जानने वा प्रकाश कराने वाला (ईडयः) स्तुति करने योग्य (रयिः) धन और (वाजः) अन्न (श्रुष्टी) शीघ्र प्राप्त होते हैं इससे आप सत्कार करने योग्य' हैं ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे सूर्य अन्तरिक्ष से वृष्टि कर के सम्पूर्ण जगत् को तृप्त करता है वैसे ही राजा न्याय से यक्त पुरुषार्थ से ऐश्वर्यों को बढ़ा कर प्रजानों को निरन्तर तृप्त करे ॥१॥ (विश्वा) सम्पूर्ण (सौभगानि) ऐ amerampaaruary S ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १३ ।। wom का - फिर विद्वानों को इस संसार में कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। त्वं भगो न आ हि रत्नमिषे परिज्मेव क्षयसि दसवर्चाः । अग्ने मित्रो न बृहत ऋतस्यासि क्षत्ता वामस्य देव भूरैः ॥२॥ पवार्थ:-हे (देव) देने वाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान विद्वन् जिस कारण से (त्वम्) श्राप (मित्रः) मित्र (न) जैसे वैसे (बृहतः) बड़े (वामस्प) श्रेष्ठ (भूरेः) बहुत (ऋतस्य) सत्य' वा जल के (क्षत्ता) छेदक (प्रसि) हैं इस कारण से (वस्मवर्चाः) उपक्षयित अर्थात् निवास कराई वा निवास की कान्ति जिन्होंने तथा (परिज्मेव) जो सब ओर से चलने वाले वायु के सदृश (भगः) सेवन करने योग्य ऐश्वर्य जिन का ऐसे हुए (न:) हम लोगों को (हि) जिस कारण से (रत्नम्) धन को (इथे) प्राप्त होने को (प्रा) सब पार से (क्षयसि) निवास करते वा निवास कराते हो इस कारण आदर करने योग्य हो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं० -जो विद्वान् जन प्राणों के सदृश धन और ऐश्वर्य की शोभा को धारण करते हैं वे मित्र के सदृश वर्ताव कर के सब को सुखी करें॥२॥ फिर विद्वान् जन कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ।। स सत्पतिः शवसा हन्ति वृत्रमग्ने विप्रो वि पणेभति वाजम् । यं त्वं प्रचेत ऋतजात राया सजोषा नत्रापां हिनोर्षि ।।३।। पदार्थ:-हे (ऋतजात) सत्य में प्रकट होने वाले (प्रचेतः) अच्छे ज्ञान से युक्त (अग्ने) प्रकाश स्वरूप (विप्रः) बुद्धिमान् जन (त्वम्) आप जैसे (सत्पतिः) जल का पालक सूर्य (शवसा) बल से (वृत्रम्) मेघ का (हन्ति) नाश करता है और (पणेः) व्यवहार कर्ता के (वाजम्) अन्न वा विज्ञान को (वि, भत्ति) विशेष कर धारण करता है वैसे (यम्) जिस को (सजोषाः) तुल्य प्रीति से सेवन करने वाले आप (राया) धन से (अपाम्) जलों के (नप्पा) नहीं गिरने वाले के साथ (हिनोषि) वृद्धि करते हो (सः) सो यह सब प्रकार से वृद्धि को प्राप्त होता है ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो बुद्धिमान् जन सूर्य के सदृश विद्या को प्रकाशित करके अविद्या का नाश करते हैं वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ter KANP ३८४ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १३ ॥ INOR- यस्तै सूनो सहसो गीभिरुक्थैर्यज्ञैर्मत्तॊ निशितिं वेद्यानट् । विश्वं स देव प्रति वारमग्ने धत्ते धान्यं१' पत्यते वसव्यैः ॥४॥ पदार्थ:-हे (सहसः) बलिष्ठ के (सूनो) पुत्र (देव) दीप्तिमान् (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान विद्वन् (ते) आप का (य:) जो (मतः) मनुष्य' (गीभिः) वाणियों और (उक्थैः) कहने और जानने योग्य वेद के वचनों से और (वैधा) सुख को प्राप्त कराने वाली वेदी से (निशितिम्) निरन्तर तीक्ष्णता के साथ (आन) व्याप्त होता है (वसव्यैः) धनों में प्रकट हुए पदार्थों से तथा' (यज्ञैः) विद्वानों के सत्कारादिकों से (विश्वम्) समग्न पदार्थ को (धान्यम्) धान्य को (वा) वा (परम्) पूर्ण (प्रति, धत्ते) धारण करता और (पत्यते) स्वामी के सदृश आचरण करता है (स:) वह आप से मेल' करने योग्य है ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! पूर्ण ब्रह्मचर्य से शरीर और आत्मा के बल को पूर्ण करके सन्तानों की उत्पत्ति करो ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। ता नृभ्य आ सौश्रवसा सुवीराग्ने सूनो सहसः पुष्यसें धाः । कुमोषि यच्छवसा भूरि एश्वो क्यो हकायार जसुंरथे ।।६।। पदार्थ:-हे (सहसः) बल के सम्बन्ध में (सनो) बलवान् सन्तान' (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान प्राप (यत्) जिस (शवसा) बल से (पुष्यसे) पुष्टि के लिये (नृभ्यः) नायक जनों से (सुबोरा) सुन्दर वीर जिनके लिये (ता) उन (सौश्रवसा) विद्वान् से सिद्ध किये गए कम्र्मों को (प्रा, धाः) धारण करते (पश्व:) पशु के (भूरि) बड़े (वयः) जीवन को (कृणोषि) करते हो और (जसुरये) हिंसा करने वाले (बकाय) वृक के सदृश वर्तमान (मरये) शत्रु के लिये दण्ड देते हो इस कारण से आप न्यायकारी हो ॥५॥ भावार्थ:-जो राजा दुष्ट चोरादिकों का निवारण कर के प्रजाओं को पुष्ट करता है वह सब का हितैषी होता है ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वा सूनो सहसो नो विहाया अग्नै तोकं तनयं वाजि नौ दाः। विश्वामिर्गीमिरमि पूर्तिमश्यां मम शतहिमाः सुवीराः ॥६॥ पदार्थ:-हे (सहसः) बलिष्ठ के (सूनो) सन्तान (अग्ने) अग्नि के विद्वन् (विहायाः) बड़े (वा) सत्य हित के उपदेष्टा श्राप (न:) हम को Plem RERA MO - AND maa

ऋग्वेदः मं०६ । सू० १४ ॥
(विश्वाभिः) संपूर्ण (गीभिः) वाणियों से' (वाजिनः) अन्न आदि युक्त के (तोकम्)
वृद्धि करने और (तनयम्) सुख के बढ़ाने वाले के अपत्य को (दाः) दीजिये जिससे
मैं (पूर्ति) पूर्णता को (अश्या) प्राप्त होऊ और जिससे हम लोग (शताहिमा:)
सौ वर्ष की अवस्था युक्त (सुधीराः) उत्तम बीरों वाले (अभि, मदेन) सब ओर से
प्रानन्द करें ॥६॥
भावार्थ:-हे विद्वान् जनो! आप अध्यापन और उपदेश से सम्पूर्ण
गृहस्थों के पुत्र और पुत्रियों को उत्तम प्रकार शिक्षित करके विद्या से सुख-
युक्त करो जिससे दीघ अवस्था वाले होकर ये सन्तान भी ऐसा ही आचरण
करें॥६॥
इस सूक्त में अग्नि, विद्वान और राजा के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त
के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह छठे मण्डल में तेरहवां सूक्त समाप्त हुआ।
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.
प्रथ षडयस्य चतुर्दशाय सूक्तस्य भरद्वाजो बहस्पत्य निर्देवता ।
१ । ३ भुरिगुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः । २ निवृत्रिष्टुप छन्दः । धेवत: स्वरः ।
४ अनुष्टुप् । ५ विराडनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । ६ भुरिगतिजगती छन्दः ।
निषादः स्वरः॥
अब छः ऋचावाले चौदहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अब
मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
अग्ना यो मत्यों दुो घिर्ष जुजोषं धीतिभिः ।
भसन्नु प प पूर्य इषं बुरीताईसे ॥१॥
पदार्थ:--विद्वान् . जनो (यः) जो (मय:) मनुष्य (धोतिभिः) अंगुली
आदि अवयवों से' (अग्ना) अग्नि' में (दुब:) सेवन और (धियम्) बुद्धि वा कर्म का
(जुजोष) सेवन करता है और (अबसे) रमण आदि के लिये (पूच्यः) पूर्वजनों से
प्रकाशित किया गया (प्र, भसत! प्रकाशित होवे और (इधम ) अन्न वा विज्ञान को
(नु) शीघ्र (वरीत) स्वीकार करे (स:) वह भाग्यशाली होता है ॥१॥
भावार्थ:-जो मनुष्य आलस्य आदि दोषों का त्याग कर धर्म से
पुरुषार्थ करते हैं वे सम्पूर्ण इष्ट सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥

ऋग्वेदः म०६ । सू० १४ ।। ANI ANG ADIAN AND अब मनुष्य क्या करते हैं इस विषय को कहते हैं । अग्निरिद्धि प्रचेता अग्निधस्तम ऋषिः । अनि होतारमीळते यज्ञेषु मनुषो विड ।।२।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जिस (होतारम्) सब को धारण करने वा देने वाले (अग्निम्) परमात्मा को (प्रचेताः) जनाने वाला (अग्निः) बिजुली जैसे वैसे (वेधस्तमः) अतीव विद्वान् (अग्निः) पवित्र (ऋषिः) मन्त्र और बर्थों को जानने वाला और (मनुषः) विचार करने वाले (विशः) मनुष्य यज्ञेषु) सन्ध्योपासन आदि श्रेष्ठ कर्मों में (ईळते) स्तुति करते हैं उस (इव) ही की (हि) निश्चित आप लोग प्रशंसा करो ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! सब आप लोगों का परमेश्वर ही स्तुति करने, मानने, हृदय में धारण करने और उपासना करने योग्य है ऐसा सब लोग निश्चय करो।।२।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। नाना ह्य १ ग्नेऽवसे स्पर्धन्ते रायों अर्थः । तूर्वन्तो दस्युमायको व्रतैः सीक्षन्तो अवतम् ॥३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् जो (हि) निश्चय (नाना) अनेक (प्रव्रतम्) धर्मयुक्त कर्म से रहित (दस्युम्) दुष्ट जन की (तुर्वन्तः) हिंसा करते और (व्रतैः) कम्मों से (सीक्षन्तः) सहने की इच्छा करते हुए (प्रायवः) मनुष्य (अवसे) रक्षण आदि के लिये (स्पर्धन्ते) दूसरे की बड़ाई को नहीं सहते हैं उनका सत्कार (रायः) धन का अर्यः) स्वामी करे ॥३॥ भावार्थ:-जो दुष्टों के निवारण में प्रयत्न करते हैं वे मनुष्य धनवान् होते हैं ॥३॥ फिर उत्तम' मनुष्य क्या करता है इस विषय को कहते हैं। अग्निरप्सामृतीपर वीरं ददाति सत्पतिम् । यस्य त्रसन्ति शवः सञ्चाक्ष शत्रनो भिया ॥४॥ पदार्थः- हे मनुष्यो (यस्य) जिस के (शवसः) बल से (सञ्चक्षि) सम्मुख (भिया) भय से (शत्रवः) शत्रुजन (वसन्ति) व्याकुल होते हैं वह (अग्निः) बड़ा बलिष्ठ वीर पुरुष (अप्साम्) श्रेष्ठ कर्मों के विभाग करने और (ऋतीषहम्) दूसरे म name H 'TER ऋग्वेदः मं०६ । सू० १४ ।। ३८७ AINM MPU के पदार्थों के प्राप्त कराने वाले शत्रुनों को सहन कर्ता (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालक (वीरम् ) वीर पुरुष को (ददाति) देता है ।।४।। भावार्थ:-- जो ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय और विद्वान् होकर शरीर और मात्मा के सामर्थ्य को नहीं दूर करते हैं उन से शत्रुजन डर के भागते अथवा वश को प्राप्त होते हैं ॥४॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं। अग्निहि विद्यना निदो देशे मतमुरूष्यति । सहाबा यस्याहतो रथि जेवतः ।।५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अवतः) नहीं स्वीकार किया गया (सहावा) सहने वाला (देवः) निरन्तर प्रकाशमान (अग्निः) अग्नि के सदृश पवित्रों से बढ़ा हुआ मुनि (मत्तम्। मनुष्य को (उरुष्यति) सेवता है उसका (हि) जिस से (विद्मना) ज्ञान से विशेष कर के जाने और (यस्थ) जिस के (वाजेषु) संग्रामों में (प्रवृतः) नहीं आच्छादित किया गया (रथिः) धन होता है उस से (निदः) निन्दा करने वालों का निवारण कीजिये ॥५॥ भावार्थ:-सब पदार्थों को उत्पन्न करती हुई बिजुली को मनुष्य जानें जिस विज्ञान से प्राग्नेयादि नामक अस्त्र सिद्ध होते हैं उसका सब काल में खोज करो ॥५॥ फिर विद्वानों को प्रतिदिन क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अच्छा नो मित्रमहो देव देवानग्ने बोच सुमति रोदस्योः। बीहि खस्ति संक्षितिं दिवो नृन्द्विषो अहाँसि दुरिता तरेम ता तरेम तवा- बसा तरेन । ६॥ पदार्थः हे (मित्रमहः) मियों से आदर करने योग्य (देव) सुख के देनेवाले 'अग्ने) अग्नि के सदृश विद्या के प्रकाश से युक्त विद्वन् श्राप (न:) हम लोगों ( देवान्) विद्वानों को तथा रोदस्योः) अग्नि और पृथिवी सम्बन्धिनी (सुमतिम् ) उत्तम बुद्धि को (अच्छा) उत्तम प्रकार (बोरः) कहिये (सुक्षितिम्) उत्तम भूमि जिसमें उस (स्वस्तिम्। सुख को (वीहि) प्राप्त हूजिये और (दिवः) कामना करते हुए (नन्) मनुष्यों से पदार्थ विद्या को कहिये जिस से (तव) श्राप के (अवसा) रक्षण प्रादि से द्विषः) द्वेष से युक्त जनों (अंहांसि) पापों और (दुरिता) दुष्ट प्राचरणों दुर्व्यसनों ऋग्वेदः मं०६ । सू०१५।। का (तरेम) उल्लंघन करें तथा (ता) उन निन्दादिकों का (तरेम) उल्लंघन करें और कुसंग से हुए दोषों का (तरेम) उल्लंघन करें ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वान् जनो ! जितनी विद्या को आप लोग प्राप्त होमो उतनी का अन्य जनों के लिए यथावत् उपदेश करो और सत्य उप- देश से मनुष्यों के दुष्ट व्यसनों को दूर करो और आप अधर्म के आचरण से पृथक् वर्ताव करो और सत्संग तथा पुरुषार्थ से शुद्ध होकर दुःखों से पार होकर सुख को प्राप्त होप्रो॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में चौदहवां सूक्त समाप्त हुआ। a अर्थकोनविंशत्यूचस्य पञ्चदशस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्यो बीतहव्यो वा ऋषिः। अग्निर्देवता।१।२।५ निचज्जगती । ३ निचुदतिजगती । ७ जगती। ८ विराड्जगती छन्दः । निषादः स्वरः । ४ । १४ भुरिक त्रिष्टुम् । ६ । १०१११ । १६ निवृत त्रिष्टुप् । १३ विराट् त्रिष्टुप् । १६ त्रिष्टुप् । ६ नितिशक्वरी छन्दः । धैवतः स्वरः । १२ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । १५ ब्राह्मी बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः । १७ विराडनुष्टुप् । १८ स्वराडनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः। अब उन्नीस ऋचावाले पन्द्रहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अब मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । इममूषु वो अतिथिमुषबुधं विश्वासां विशां पतिजसे गिरा । बेतीदियो अनुपा कच्चिदा शुचियों क्विंदत्ति गर्भो यदच्युतम् । १॥ पदार्थः-हे विद्वन् जिस कारण से आप (इमम्) इस (विश्वासाम्) सम्पूर्ण (विशाम्) मनुष्य प्रादि प्रजाओं के (पतिम् ) पालक (अतिथिम् ) अतिथि के समान वर्तमान (उषबुधम्) प्रातःकाल में जगाने वाले को (ऋजसे) सिद्ध करते हैं (गर्भः) अन्तःस्थ के समान जो (उ) तर्कनासहित (दिवः) पदार्थबोध की (जनुषा) उत्पत्ति से (सु, वेति) अच्छे प्रकार व्याप्त होता (इत्) ही है तथा (कत ! कभी (चित) भी (यव) जो (शुचिः) पवित्र (अच्युतन्) नाश से रहित वस्तु को (ज्योक्) निरन्तर (अत्ति) भोगता है और (वः आप लोगों की (गिरा) वाणी से (चित् निश्चित (मा) आज्ञा करता है वह विद्वान् होता है ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे अतिथि सत्कार करने योग्य है वैसे ही ऋग्वेदः मं० ६ । सू०१५ ।। ३८६ - M पदार्थ विद्या का जानने वाला सत्कार करने योग्य है , जो सब के अन्त:स्थ नित्य बिजुली की ज्याति को जानते हैं वे अभीप्सित सुख को प्राप्त होते हैं ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। मित्रं न यं सुधितं भृगयो दधुर्वनस्पतावीडयमूर्ध्वशोचिषन् । स त्वं सुमीतो बीलईव्ये अद्भुत प्रशस्तिमिर्मध्यसे दिवेदिवे ।।२।। पदार्थ:--हे (अद्भुत) महाशय (यम्) जिस मित्रम्) मित्र को (न) जैसे वैसे (सुधितम् ) उत्तम प्रकार स्थित का (वनस्पती) किरणों के पालक सूर्य में (ईड्चम) उत्तम गुणों से प्रशंसा करने योग्य (अशोचिषम्) ऊपर को ज्वाला जिस की उसको (भृगत्रः) विद्वान् मनुष्य' (दधुः) धारण करते हैं (सः) वह (त्यम्) आप (प्रशस्तिभिः) प्रशंसा करने योग्य धर्म युक्त क्रियानों से (दिवेदिवे) प्रतिदिन (सुप्रीतः) उत्तम प्रकार प्रसन्न हुए (बीसह) व्याप्त हुमा ग्रहण करने योग्य वस्तु जिससे उसमें (महयसे) सत्कार किये जाते हा इससे सेवन करने योग्य हो ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमाल०-हे मनुष्यो ! जैसे मित्र कार्यों को सिद्ध करता है वैसे ही अग्नि उत्तम प्रकार प्रयोग किया गया कार्यों को सिद्ध करता है ।।२।। फिर मनुष्य कैसे होवें इस विषय को कहते हैं । स त्वं दक्षस्थाको धो भूरर्य: परस्यान्तरस्य तरुषः । रायः सूनो सहलो मना छर्दियच्छ बीतहव्याय सप्रथी भरद्वाजाय सपथः ॥३॥ पदार्थः -- हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) सन्तान जो (स्वम्) अाप (दक्षस्य) बल के (अवृक:) नहीं चोर (वृधः) बढ़ाने वाले (परस्य) अत्यन्त (अन्तरस्य) भिन्न (तरुषः) तारने वाले (रायः) धन के (अयंः) स्वामी (मर्येषु) मनुष्यों में (सप्रथः) तुल्य प्रसिद्धि वाले (बीतहव्याय) प्राप्त हुअा प्राप्त होने योग्य जिसको उस (भरद्वाजाय) धारण किया विज्ञान जिस ने उसके लिये दाता (भः) होमो (सः) वह (सप्रथः) विस्तृत विज्ञान के सहित श्राप (छदिः) गृह को (श्रा, यच्छ) आदान कीजिये अर्थात् लीजिये ।।३।। भावार्थ:-जो मनुष्य सब प्रकार से बल की वृद्धि करें तो लक्ष्मीयुक्त कैसे न हों ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं।

३६० ऋग्वेदः मं०६ । सू० १५ ।। FHHH M द्युतानं वो अतिथिस्वर्णरभग्नि होतारं मनुषः स्वध्वरम् । विभं न धुक्षवचसं सुंवृक्तिभिहव्यवाहमरति देव,असे ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जो नाप (ब) आप लोगों के अतिथिम्) अतिथि के समान (घतानम्) सत्यार्थ के प्रकाशक (स्वर्णरम् सुख को प्राप्त कराने और (मनुषः) मनुष्य के होलारम्) ग्रहण करने वाले (स्वञ्चरम् ) उत्तम प्रकाश यज्ञ जिस से उस (अग्निम् ) अग्नि को (सुवृक्तिभिः) अच्छे प्रकार चलते हैं जिन क्रियाओं से उन के सहित जैसे वैसे (शुक्षवचसम्) द्योतक वचन के प्रकाशक (हव्यवाहम्) धारण करने योग्य को वहन करने और (मरतिम् । प्राप्ति कराने वाले (देव) प्रकाशमान (विप्रम्) बुद्धिमान् को (न) जैसे वैसे (ऋजसे) सिद्ध करते हो उसका हम लोग सत्कार करें ॥४॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे बुद्धिमान् जन यथा योग्य कर्मों को करने को समर्थ होता है वैसे ही युक्ति से अच्छे प्रकार प्रयोग किया अग्नि सम्पूर्ण व्यापार सिद्ध करने को समर्थ होता है ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या प्रकाशित करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । पावस्या पश्चितयन्स्या कृपा क्षामन् रुरुच उषसो न भानुना । तूर्वन्न यामन्त शस्य न रण आ यो घृणे न तृषाणो अजः ॥५॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो (यः) जो (भानुना) किरण से (उषसः) प्रभातवेला (न) जैसे वैसे (पावकया) अग्नि की क्रिया से' और (चितयन्त्या) जनाती हुई (कृपा) कृपा से (क्षामन्) पृथिवी में (रुचे) प्रकाशित किया जाता है (घणे) प्रदीप्त में (न) जैसे वैसे (रणे) संग्राम में (लाधारण:) पिपासा से व्याकुल (अजरः) जरा से रहित (यः) जो (यामन्) चलते हैं जिस में उस मार्ग में (एसशस्य) घोड़े का चलाने वाला (तूर्वन्) हिंसन करता हुआ (न) जैसे वैसे (न) शीघ्र (आ) प्रकाशित होता है वह सेवा करने योग्य है ।।५।। भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य के किरण प्रातःकाल को प्रकाशित करते हैं वैसे ही विद्वान् जन सब के अन्त:- करणों को प्रकाशित करें॥५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अग्निमनि वः समिधा दुवस्यत प्रिय प्रियं यो अतिथि गृणीपणि । उप Richa GAON wa RAMES ARRIMARSISTE ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १५ ॥ वो गीर्भिरमृतं विवासत देवो देवेषु बनते हि पार्थं देवी देवेषु वनते हि नो दुः॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (गृणीषणि) स्तुति करने योग्य व्यवहार में (समिधा) इन्धनों से (वः) आप लोगों के (अग्निमग्निम् ) अग्नि अग्नि का और (व:) प्राप लोगों के (प्रियस्प्रियम्) कामना करने योग्य कामना करने योग्य (अतिथिम्) अतिथि का (उप, बनते) समीप में सेवन करता (हि) ही है और जो (देवेषु) श्रेष्ठ गुण- युक्तों में (देवः) प्रकाशमान (गीभिः) वाणियों से (वः) आप लोगों को (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य व्यवहार (अमृतम्) कारणरूप से नाश रहित का सेवन करता है और जो (हि) निश्चित (देवेषु) पितृरूप विद्वानों में (देवः) दाता जन (नः) हम लोगों के लिये (दुवः) सेवन को (बनते) स्वीकार करता है उसका (दुवस्यत) सेवन करो उसका (विवासत) सेवन करो ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग जैसे विद्वान् का वैसे अग्नि का भी मेल करावें जिससे अभीष्ट कार्य सिद्ध होवे ।।६।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। समिद्धअग्निं समिधा गिरा गृणे शुचि पावकं पुरो अध्वरे ध्रुवम् । विमं होतारं पुरुचारमन् कर्षि सुम्लरीमहे जातवेदसम्म् ।।७।। पहा:----हे मनुष्यो (समिधा) इन्धन के समान पदार्थ से (समिम्) प्रकाशित हुए (अग्निम्) अग्नि को जैसे वैसे वर्तमान को (अध्वरे) अहिंसारूपयज्ञ में (ध्र वम् ) निश्चल' (शुचिम्) पवित्र और (पावकम् ) पवित्र करने वाले (होतारम्) दाता (पुरुवारम् । बहुत विद्वानों से सत्कार किये गए (अहम् ) द्रोह से रहित (जातवेदसम्) प्रकट हुई विद्या जिस की ऐसे (वित्रम्) विद्या और विनय से बुद्धिमान् को (गिरा) वाणी से (पुरः) भागे (गणे) स्तुति करता हूं (कविम्) पूर्ण विद्या से युक्त को जैसे वैसे (सुम्नः) सुखों से हम लोग ईमहे) याचना करें वैसे आप लोग भी याचना करो ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! आप लोग सत्य के प्रकाशक विद्वानों से विद्या की याचना करो तथा इस विद्या को प्राप्त होकर अन्यों को देप्रो ॥७॥ मनुष्यों से किसकी उपासना करने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। त्वां दूतमग्ने अमृत युगेयुगे हव्यथा दधिरे पायुभीडर्थम् । देवासश्च मासश्च ज गृदि विभु विश्पति नर्मला नि दिरे ।।८!! RAL aus tra " 1" , वाले श्राप (न:) हम लोगों के ऋग्वेदः मं०६। सू०८४ ।। पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशमान भगवन् (युगेयुगे) वर्ष वर्ष वा सत्ययुग आदि में जिस (हव्यवाहम्) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को धारण करने वाले (ईडयम्) स्तुति करने योग्य पायुम्) पालन करने वाले (विश्पलिम्) मनुष्य आदि प्रजात्रों के पालक (जानिम) सदा जागने वाले (अमृतम्) नाश से रहित (दूतम्) दुःखों के दूर करने वाले (शिभुम्) व्यापक परमात्मा (त्वाम् । आप को (देवास:) विद्वान् (च) और योगी (मासः) मरण धर्म वाले (च) भी नमसा) सत्कार से (दधिरे) धारण करें (नि, सेदिरे स्थित हाते हैं उसको हम लोग धारण करें तथा उसमें स्थित होवें ।।८।। भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो! आप लोग प्रतिदिन सर्वव्यापी, न्यायेश, दयालु, सब धन्यवादों के योग्य, परमात्मा ही की उपासना करो। फिर वह उपासित ईश्वर क्या करता है इस विषय को कहते हैं ।। विभूषन्नग्न उभयाँ अनु वा दूतो देवानां रजसी समीयसे। सचे धीति सुमतिमायणीमहेऽध मा ननिदरूपः शिवो भव । ९।। पदार्थः - हे (अग्ने) सम्पूर्ण दुःखों को जलाने अर्थात् दूर करने वाले परमेश्वर जो आप (रजसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (देवानाम्) विद्वानों के (वृतः) दोषों के दूर करने अथवा धर्म अर्थ और मोक्ष को प्राप्त कराने वाले होते हुए (अता) कम्मों को (विभूषन्) शोभित करते और (उभयान्) विद्वान् और अविद्वान् मनुष्यों को (अनु) पीछे शोभित करते हुए अन्तरिक्ष और पृथिवी को सम्, ईबसे) व्याप्त होते हैं भार (यद) जिस (ते) आप की (धीतिम्) धारणा वा बुद्धि को (सुमतिम्) श्रीष्ठ बुद्धि को हम लोग (प्रावृणीमहे । स्वीकार करें वह (अध) इस के अनन्तर (विधरूथः) तीन उत्तम मध्यम निकृष्ट गृहों के सदृश निवासस्थान हूजिये ॥६ भावार्थ:-- जो मनुष्य जगत् के रचने वाले ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्ताव करते हैं तथा उसके गुण कर्म और स्वभावों के सदृश अपने गुण कर्म और स्वभावों को करते हैं उनको वह जैसे दूत वैसे सब विद्या के समाचार को जनाता हुआ सहज से मुक्ति के पद को प्राप्त कराता है इस से सब काल में ही इस की उपासना करनी चाहिये ।।६।। फिर उस का ज्ञान और उपासना आवश्यक है इस विषय का कहते हैं NRS ... पदार्थ:-- है (शूर) भयरहित दुष्ट दोषों के विनाश करने और 1 ऋग्वेदः मं०६ । सू०१५।। ३६३ तं सुबतीक सुदृशं पञ्चमविद्वांसो विदुष्टरं सपेम । स यक्षद्विश्वा वयुनानि विद्वान् भ हव्यमग्निरमृतेषु वोचत् ॥१०॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अविद्वांसः) विद्या से रहित जन (तम्) उस (सुप्रतीकम् । सुन्दर कर्म किये जिसने तथा (सुद्रशम् ) योगाभ्यास से देखने योग्य वा उत्तम प्रकार दिखाने और (स्वचम्) अच्छे प्रकार जानने वा प्राप्त कराने वाले (विदुष्टरम् । अत्यन्त विद्वान् ईश्वर को नहीं विशेष कर के जानते और न उपासना करते हैं उनको हम लोग (सपेम) शाप देते हैं और जो (विद्वान्) प्रकट विद्याओं से युक्त (अग्नि:) अग्नि के समान स्वयं प्रकाशित हुआ (विश्वा) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञानों और (अमृतेषु) नाशरहित कारण जीवों में (हव्यम्) देने योग्य विज्ञान को (प्र, वोचत्) अत्यन्त कहता है (स:) वह हम लोगों को (यक्षत्) प्राप्त करावे ॥१०॥ भावार्थ:-जो परमात्मा को नहीं जानते और उसकी आज्ञा के अनु- कूल आचरण नहीं करते उनको धिक् है धिक् है और जो उसकी उपासना करते हैं वे धन्य हैं । और जो हम लोगों के लिये वेद द्वारा सम्पूर्ण विज्ञानों का उपदेश देता है उसी की हम सब लोग उपासना करें ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। तमग्ने पास्युत तं पिपर्षि यात आनंट कवये शूर धीतिम् । यज्ञस्य वा निशिति बोदितिं वा तमिणक्षि शवसोत राया ॥११॥ अविद्यारूप अन्धकार के नाश करने वाले (यः) जो (ते) आप की आज्ञा को (मान) व्याप्त होता है उस (कवये) विद्वान् के लिए धीतिम्) धारणा को देते हो (तम्) उस की {पासि) रक्षा करते हो (उत) और (तम्) उसकी (पिपषि) पालना करते वा श्रेष्ठ गुणों से पूरित करते हो (वा) वा (यज्ञस्य) यज्ञ की (निशितिम्) अत्यन्त तीक्ष्णता का वा (उदितिम्) उदय का (बा) वा (पृणक्षि) सम्बन्ध करते हो (तम्) उस का (वा) वा (शवसा) बल से (उत) और (राया) धन से भी सम्बन्ध करते हो वह (इत) ही आप उपासना करने योग्य हैं ।।११।। भावार्थ:-जो सत्यभाव से जगदीश्वर की उपासना करते हैं उन की ईश्वर सब प्रकार से रक्षा कर धर्मयुक्त गुण कर्म और स्वभावों में प्रेरणा कर तथा शरीर और आत्मा का बल अच्छे प्रकार देकर मोक्ष को प्राप्त कराता है ॥११॥ HA AN qawan na ३६४ ऋग्वेदः मं०६। सू० १५ ॥ फिर ईश्वर किस निमित्त उपासना करने योग्य है इस विषय को कहते हैं । स्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमु नः सहसावनपद्यात् । सं त्या भस्म वस्तु पाथः सं रयिः स्पृहयायः सहस्त्री ॥१२॥ पदार्थ:--है (सहसाबन्) अत्यन्त बलयुक्त (अग्ने) श्रेष्ठ गुणों के देनेवाले (त्वम्) अाप (बनुष्यतः) याचना करते हुए (नः) हम लोगों की (अवधात्) निन्ध आचरण से (त्वम् ) आप (नि, पाहि) नित्य रक्षा करिये और जो (स्पृहयाय्यः) स्पृहा कराने योग्य (सहली) सम्पूर्ण सुख जिस में वह (रथिः) धन और जो (ध्वस्मन्वत) नाशवाला (पाथः) अन्न आदि हम लोगों को (सम्, अभि, एतु) उत्तम प्रकार प्राप्त हो उससे युक्त हम लोग (3) भी (त्या) आप की (सम्) अच्छे प्रकार उपासना करें ॥१२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो धर्म से याचना किया गया जगदीश्वर अधर्म के आचरण से अलग कर के धर्म को प्राप्त कराता है और जो अनित्य सुखको भी देता है उसी को रक्षक, सब ऐश्वर्य देनेवाला तथा इष्ट देव जानो ॥१२॥ na inda फिर उसी विषय को कहते हैं । अग्निहोतो गृहपतिः स र विश्व वेद जनिमा जालदाः । देवानामुन यो भयौनां यजिष्ठः स भ यजताभृताया ॥१३॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (य:) जो (गृहपतिः) गृह का पालक जैसे वैसे ब्रह्माण्ड का प्रबन्ध करने होता) धारण करने तथा (जातवेवा:) प्रकट हुए पदार्थों को जानने वाला और सब का (राजा) न्याय करने तथा (ऋतावा) सत्य और असत्य का विभाग करने (यजिष्ठः) अतिशय यज्ञ करने वा पदार्थों का मेल' करानेवाला (अग्निः सब का प्रकाशक (देवानाम्) दिव्य पदार्थों वा विद्वानों के मध्य में (उत) और (मानाम्) मनुष्यों के (विश्वा) सम्पूर्ण (जनिमा). जन्मों को (वेद) जानता है सः) वह हम लोगों को (ध यजताम्) अत्यन्त प्राप्त करावे (सः) वह हम लोगों का राजा होवे ऐसा हम लोग निश्चय करते हैं वैसे आप लोग भी जानी ॥१३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सम्पूर्ण जगत् और जीवों के कर्मों को जानकर फलों को देता है वही सत्य राजा है ऐसा जानना चाहिये ॥१३॥ फिर वह जगदीश्वर कैसा है इस विषय को कहते हैं ।।

उल्लंघन करें ( ऋग्वेदः सं०६ । सू० १५ ॥ अग्ने यदद्य विशो अध्वरस्य होतः पार्यकशोचे वेष्ट्वं हि यज्वा । ऋता यजाति महिना वि यद्भूईव्या वह यविष्ठ या ते अद्य ॥१४॥ पदार्थ:-हे (पावकशोचे) पवित्र प्रकाश और (होतः) दान करने तथा (यदिष्ठ) अतिशय मिलाने वा विभाग कराने और (अग्ने) सम्पूर्ण प्रजा की पीड़ानों के करनेवाले (यत) जो (यज्वा) मेल करने वाले (त्वम्) श्राप (हि) निश्चय से (प्रा) इस समय (विज्ञः) मनुष्य आदि प्रजा के वेः) आकाशगन्ता पक्षी के समान (अध्वरस्य) अहिंसामय के ऋता) सत्य सुख के प्राप्त कराने वाले यज्ञ में (यजासि) यजन करते हो (यत्) जो प्राय (महिना) महत्त्व से {वि विशेष करके (भूः) होवें और (या) जो वस्तुए ते) आप के वर्तमान में (अध) इस समय हैं उन (हव्या देने योग्यों को हम लोगों के लिए (यह) प्राप्त करिये ।।१४।। भावार्थ:- हे मनुष्यो ! जो सम्पूर्ण सृष्टि को एकत्रित करता है और जो व्यापक अहिंसा आदि धर्म के अनुष्ठान के लिये आज्ञा देता है वह ही सबसे उपासना करने योग्य है ॥१४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अभि प्रशसि सुधितानि हि ख्यो नि त्यो दधीत रोदसी यजध्यै । अवा नो मघवन्वाजलातावग्ने विश्वानि दुरिता तरेम ता तरेम तवा- वसा तरेम ॥१५॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त (अग्ने) अतितेजस्वी जो आप (सुधितानि) उत्तम प्रकार तृप्ति करानेवाले (प्रयांसि) कामना कराने योग्य अन्न आदि वस्तुओं को (हि) निश्चित (नि, दधीत) प्रकार धारण करें और माप विज्ञानों को (अभि, ख्यः) सन्मुख कहते हो और आप (यजध्य) मेल' करने को (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को धारण करिये तथा (वाजसाली) संग्राम में (नः) हम लोगों की श्रवा) रक्षा करिये जिन' (त्वा) श्राप का प्राश्रय करके हम लोग (ता) उन (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरिता) दुःख के प्राप्त कराने वाले पापों का (तरेम) जावें और निरन्तर (तरेर) सम्पूर्ण दोषों का त्याग करें ॥१५॥ भावार्थ:--- हे मनुष्यो ! जो अन्न और पानादिक जीवन के हितकारक पदार्थों को धारण करता, अन्तर्यामी होने से सत्य का उपदेश करता उस के आश्रय से ही सम्पूर्ण दुःखों के पार प्राप्त होओ ॥१५॥ P

ऋग्वेदः मं०६ । सू० १५ ।।
PRIM
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
अग्ने विश्वभिः स्वनीक देवैरूणान्तं प्रथमः सीद योनिम् ।
कुलायिनै घृतवन्तं सवित्रे यज्ञं नय यजमानाय साधु ।।१६।।
पदार्थ:-हे (स्वनीक) सुन्दर सेना वाले {अग्ने) विद्वन् राजन् (प्रथमः)
प्रसिद्ध श्राप (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (देवैः) विद्वानों वा वीर पुरुषों के साथ
(अवन्तम् ) बहुत ऊण के वस्त्रों से युक्त (योनिन् । गृह में (सीद) वर्तमान हो
(सवित्रे) संसार को उत्पन्न करने और (यजमानाय पदार्थों के मिलानेरूप विद्या
को जालने वाले के लिये (कुलाधिनम् ) गृह प्रादि सामग्री से और घृतवन्तम् ) बहुत
घृत प्रादि पदार्थों से युक्त (यज्ञम् ) संगति स्वरूप व्यवहार को (साधु) उत्तम प्रकार
(नय) प्राप्त कराइये ।।१६।।
भावार्थ:-हे विद्यायुक्त राजजनो! आप लोग विद्वानों के सहाय से
न्याय के गृहों में ठहर के न्याय करिये और सब मनुष्यों को न्यायमार्ग पर
चलाइये जिससे सब श्रेष्ठ मार्ग में स्थित होकर परोपकारी होवें ।।१६।।
फिर बिजुली को किससे निकालें इस विषय को कहते हैं ।
इममु त्यथर्ववाग्निन्ति वेधसः ।
मङ्कन्तिमा यन्नद्रं श्याव्याभ्यः ।।१७।।
पदार्थ:-हे मनुष्यो (वेधसः) बुद्धिमान् विद्वान् जन (श्याव्याभ्यः) रात्रियों
में हुई क्रियानों से (यम् ) जिस (अङ्कयन्तम्) प्रसिद्ध चिह्न प्राप्त होते जिस में
(इमम् ] इस (उ) और त्वम्। जो नहीं प्रत्यक्ष हुआ उस अग्निम् ) बिजुलीरूप
अग्नि का (अथर्ववत) जैसा अथर्ववेद में मन्थन कहा है वैसे (अब एम् ) मूढ़ से भिन्न
का (मन्यन्ति मन्थन करते और कार्य की सिद्धि को (आ, अनयन्) अच्छे प्रकार
प्राप्त करते हैं उसका आप लोग भी मन्थन करके कार्यों को सिद्ध का ये ॥१७॥
भावार्थ:--जो विद्वान् जन भूमि. अन्तरिक्ष, वायु, आकाश और
सूर्य आदि से मन्थन करके बिजुली को नकालते हैं वे अनेक कार्यों के
सिद्ध करने क समर्थ होते हैं ॥१७॥
मनुष्यों को सृष्टि से कौन कौन उपकार ग्रहण करना चाहिये
इस विषय को कहते हैं।
जनिष्या देववीतये सर्वताला स्वस्तये ।
अवान् वक्ष्यमृताँ ऋत वृधा यज्ञ देवेषु पिस्पृशः ॥१८॥

कम से विद्या का ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ॥ ३६७ पदार्थ:- हे वितुन आप (देववीतये) श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिये और (स्वस्तये) सुख की प्राप्ति के लिये (सर्वताता) सम्पूर्ण सुख के करने वाले शिल्प- कारीगरीरूप यज्ञ में (अमृतान्) नाशरहित (ऋतावृधः) सत्यव्यवहार के बढ़ाने वाले (देवान्) श्रीष्ठ गुणों वा भोगों को (र, बक्षि) प्राप्त कराइये और (देवेषु) विद्वानों में (यज्ञम् सुख के देनेवाले यज्ञ का(मिस्पृशः) स्पर्श कराइये इससे सुखों को (जनिष्वा) प्रकट कीजिये ॥१८॥ भावार्थ:-विद्वानों को चाहिये कि सृष्टि में वर्तमान पदार्थों से विद्या के द्वारा श्रेष्ठ भोगों को प्राप्त होकर अपने लिये अनेक प्रकार के सुख को उत्पन्न करें ॥१८॥ फिर गृहस्यों को कैसा प्रयत्न करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । बयम त्वा गृहपतै जनानाम अकमी समिधा बृहन्तम् । अस्थूरि नो गार्हपत्यानि सन्तु तिग्मेनं नस्तेजसा सं शिंशाधि ।।१९।। पदार्थ:-है (गृहपते) गृहस्थों के पालन करने वाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान (वयम्। हम लोग (जनानाम्) मनुष्यों के मध्य में (त्या) आपका आश्रय करके (समिधा) प्रदीपक साधन से अग्नि को ग्रहन्तम् ) बड़ा (अकर्मा) करें (उ) और (नः) हम लोगों का (अस्थूरि) चलनेवालो बाहन और (गाहपत्यानि) गृहपति से संयुक्त कर्म जिस प्रकार से सिद्ध (सन्तु) हों उस प्रकार से (तिमेन) तीन (तेजसा) तेज से प्राप (न:) हम लोगों को (सम, शिशाधि) उत्तम प्रकार शिक्षा दीजिये ॥१६॥ भावार्थ:-हे गृहस्थजनो ! आप लोग मालस्य का त्याग करके सृष्टि- जिससे सब सुख बढ़े ॥१६॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् , ईश्वर और गृहस्थ के कार्यों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में पन्द्रहवां सूक्त समाप्त हुआ। Page Siny अथास्ट मास्वारिंशत: बोडशस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अग्निदेवता । १।६।७ प्रार्थी उष्णिकछन्दः । ऋषभः स्वरः।२।३।४। ५। ८।१।११।१३। १४ । १५ । १७।१८।२१।२४।२५। २८ । ३२ । ४० निचद्गायत्री । १० । १६ । २० । २२ । २३ । २६ । ३१ ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ३६ ।

Stories ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १६ ॥ . ३७ । ३८ । ३६ । ४१ गायत्री। २६ । ३० बिराङ्गायत्रीछन्दः । षड्जः स्वरः । १२ । १६ । ३३ । ४२ । ४४ लाग्नीत्रिष्टुप् । ४३ । ४५. निचरित्रष्टुप् छन्दः । पञ्चमः स्वरः २७ मा पवितः । ४६ भुरिक्पद्धितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ४७ । ४८ निचुदनुष्टुप् छ दः । गान्धारः स्वरः ।। अब अड़तालीस ऋचावाले सोलहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अब विद्वान् क्या करे इस विषय को कहते हैं । स्वमग्ने यज्ञानां होता विधेषां हितः । देवेभिर्मानुषे जर्ने ।।१।। पदार्थ:-हे (अग्ने) जगदीश्वर ! जिस कारण से (त्वम्) श्राप (यज्ञानाम्) प्राप्त होने योग्य व्यवहारों के (होला) देने वाले और (विश्वेषाम्) सब के (हितः) हितकारी हो इस से (देवेभिः) विद्वानों के साथ (मानुष) मनुष्यसम्बन्धी (जने) मनुष्य में प्रेरणा करने वाले होमो ॥१॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर सबका हितकारी और सम्पूर्ण सुखों का देनेवाला तथा विद्वानों के संग से जानने योग्य है वैसे आप लोग भी अनुष्ठान करो ॥१॥ फिर विद्वान् क्या करें इस विषय को कहते हैं । स नो मन्द्राभिरधारे जिह्वाभियजा महः । आ देवान् वक्षि यक्षि च ॥२॥ wan पवार्थ:-- हे विद्वन् अग्नि के सदृश तेजस्वी (सः) वह पाप (अध्वरे) सब प्रकार अनुष्ठान करने योग्य धर्मयुक्त व्यवहार में (मन्द्राभिः) आनन्द करने वाली (जिह्वाभिः) विद्या और विनय से युक्त मारिणयों से (नः) हम लोगों को (यजा) प्राप्त कराइये और (महः) बड़े अथवा सत्कार करने योग्यों को और (देवान्) श्रेष्ठ गुणों वा विद्वानों को (मा, बक्षि) प्राप्त कराइये और सब को यक्षि, च) भी प्राप्त कराइये ॥२॥ भावार्थ:--विद्वान् जन विद्या की प्राप्ति के लिए सबको सदा उपदेश देवें जिससे श्रेष्ठ गुणों वाले मनुष्य होवें ॥२॥ कौन उपदेश करने योग्य होवें इस विषय को कहते हैं। वेत्था हि वैधो अध्वना पथश्च देवाजसा । अग्ने यज्ञेषु सुक्रतो ।।३।। पदार्थ:-हे (सुक्रतो) उत्तम ज्ञान वा उत्तम कर्मयुक्त (देव) विज्ञान के ऋग्वेदः मं०६ । सू०१६ ।। वाजिभिः शुनस् । था OMG वाले (वेधः) मेधावी (अग्ने) प्रकाशात्मा (हि) जिससे आप (यज्ञेषु) विद्या और धर्म के प्रचारनामक व्यवहारों में (अञ्जसा) स्वतन्त्रतायुक्त वेगवालेपन से (अध्वनः) मार्गों को और (पथः) मार्गों को (च) भी (वेस्था) जानते हो इससे हम लोगों को जनाइये ॥३॥ भावार्थ:-- इस संसार में जो मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्गों को जानें वे ही अन्यों को भी उपदेश दे न कि इतर अज्ञ जन ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । त्वामीळे अर्ध द्विता भरतो ईजे यज्ञेषु यज्ञियम् ॥४॥ पदार्थ:--हे विद्वन् जैसे मैं (यज्ञेषु) समागमरूप यज्ञों में । (यज्ञियम्) यज्ञ करने योग्य (त्वान्) श्राप विद्वान् की (इळे) प्रशंसा करता हूं (अध) इस के अनन्तर (द्विता) दो पढ़ाने और पढ़ने वाले वा उपदेश करने वा उपदेश पाने योग्यों का (भरतः) धारण और पोषण करने वाला मैं (वाजिभिः) विज्ञानादिकों से (शुनम्) सुख की (ईजे) संगति करता हूं वैसे पाप संगति कीजिये ॥४॥ भावार्थ:-विद्वानों को चाहिये कि परस्पर विद्या की उन्नति करके अन्यों को ग्रहण करावें ॥४॥ मनुष्य किस का सत्कार करें इस विषय को कहते हैं । त्वमिमा वायाँ पुरू दिवोदासाय सुन्वते । भरद्वाजाय दाशुषे ।।५।। पदार्थ:-हे विद्वन् जिस कारण से (त्वम्) आप (दिवोदासाय) कामना करने योग्य पदार्थ के देने और सुन्वते) सोमलतारूप प्रोषधि आदि की सिद्धि करने वाले और (भरद्वाजाय) धारण किया विज्ञान जिसने उसके और (दाशुषे) विज्ञान के देने वाले के लिए (इमा) इन (पुरु) बहुत (वार्या) स्वीकार करने योग्यों को देते हो इससे प्रशंसा करने योग्य हो ॥५॥ भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि सत्य के उपदेशकों और विद्या के प्रचारकों का सदा ही सत्कार करें अन्य जनों का नहीं ॥५॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। त्वं दूतो अमल था वहा दैव्यं जनम् । शृण्वन् विमस्य सुष्टुतिम् ।।६।। * ४०० ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ॥ - द KARO 40 comsa पदार्थ:-हे विद्वन् (अमर्त्यः) साधारण मनुष्यों के स्वभाव से विरद्ध (दूतः) सम्पूर्ण पदार्थविद्याओं के समाचार के जनाने वाले (स्वम्) माप (चिप्रस्य) बुद्धिमान की (सुष्टुतिम्) सुन्दर प्रशंसा को (शृण्वन्) सुनते हुए (वैव्यम्) विद्वानों से सिद्ध किये गये विद्वान् (जनम्) जन को या, बहा) सब प्रकार से प्राप्त कराइये ॥६॥ भावार्थ:-हे परीक्षा करने वालो ! श्राप लोग पक्षपात का त्याग करके विद्यार्थियों की यथावत् परीक्षा करके विद्यायुक्त कीजिये ॥६॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। त्यामग्ने स्वाध्यो३' मत्तीसो देववीतये । यज्ञेषु देवीळते ॥७॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्या और विनय से प्रकाशात्मा विद्वन् जैसे (स्वाध्य:) उत्तम प्रकार चारों ओर से ध्यान करने वाले (मत्तीस:) मनुष्य (देववीतये विद्या आदि श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिये (यज्ञेषु) पढ़ाने, पढ़ने और उपदेश नामक व्यवहारों में (त्वाम्) पूर्ण विद्यायुक्त यथार्थवक्ता प्राप (देवम्) विज्ञान के देने वाले की (ईळते) स्तुति करते हैं उस प्रकार से हम लोग प्रशंसा करें ॥७॥ भावार्थः -- इस मन्त्र में वाचकलु-विद्यार्थियों को चाहिये कि विद्या की प्राप्ति के लिये विद्वानों का सेवन करें और जैसे सृष्टि के पदार्थों में अग्नि प्रशंसित है वैसे ही मनुष्यों में धार्मिक विद्वान् हैं यह जानना चाहिये ॥७॥ फिर अध्यापक और पढ़नेवाले परस्पर कैसा वत्तवि' करें इस विषय को कहते हैं ।। तव म यक्षि सन्देशमुत क्रतुं सुदानवः । विश्व जुषन्त कामिनः ॥८॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जो (सुदानवः) श्रेष्ठ दान के दाता (विश्वे) सब (कामिनः) कामना करनेवाले जन (तव) विद्वान् अापके (सन्दृशम्) अच्छे दर्शन (उत) और (क्रतुम्) बुद्धि वा कर्म का (जुषन्त) सेवन करते हैं उन का आप उसके दान से (प्र, यक्षि) मेल कराइये ।।८।। भावार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे विद्या की कामना करने वाले पाप लोगों की कामना करते हैं वैसे ही आप लोग विद्यार्थियों की कामना करो फिर राजा प्रजामों में कैसे वर्ताव करे इस विषय को कहते हैं । त्वं होता मनुहितो वह्निरासा विदुष्टर: अग्ने यक्षि दिवो विशः ॥९॥ मा. AN

NRNA
ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ।।
४०१
PRIOR
AP
मनका
पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन राजन् (वह्निः) प्राप्त करने वाले अग्नि जैसे वैसे
(होता) दाता (मनुहितः) मनुष्यों के हितकारी (विदुष्टर:) अत्यन्त विज्ञानवाले
(त्वम्) आप (प्रासा) मुख से (दिवः) कामना करती हुई (विशः) प्रजाओं को
(यक्षि) सुखयुक्त करिये ॥६॥
लोगों की कामना करता और सुख देने की इच्छा करता है वैसे आप लोग
भी उस राजा की कामना करके उसके लिये निरन्तर सुख दीजिये ।।६।।
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
अग्न आ याहि वीतयें गृणानो हव्य दातये ।
नि होता सरिस
बहिर्षि ॥१०॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन जिस कारण से आप (गृणानः) स्तुति करते हुए
(होता) दाता (बहिषि) उतम सभा में (वीतये) विद्या प्रादि श्रेष्ठ गणों की व्याप्ति
के लिए और (हव्यदातये) देने योग्य के दान के लिए (नि, सहित) उत्तम प्रकार
जानते हो इस से हम लोगों की उत्तम दीप्ति को (पा, याहि) सर्व प्रकार प्राप्त
होमो ॥१०॥
भावार्थ:-जहां विद्वान् जन विद्या की वृद्धि करने की इच्छा करते हैं
वहां सब सुखी होते हैं ।।१०।।
फिर मनुष्य परस्पर क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।
तं त्वा समिद्भिरङ्गगे घृतेन वर्ष यामसि । बृहन्छौंचा यदिष्ठय ॥११॥
पदार्थ:-हे यविष्ठय) अत्यन्त युवा जनों में साधु (अङ्गिरः) बिजुली के
समान वर्तमान जैसे यज्ञ करने वाले जन (समिद्भिः) उत्तम प्रकार प्रकाशक समिध्-
रूप काष्ठों और (घृतेन) घृत से अग्नि की वृद्धि करते हैं वैसे ज्ञान के कारण उपदेश
से (तम्) उन (त्वा) अापकी हम लोग (वर्धयामसि वृद्धि करते हैं और आप (बृहत)
बहुत (शोचा) विचारिये ॥११॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु. जो राजा आदि जन जैसे घृत
से अग्नि की वैसे शिक्षा और सत्कार से शूर जनों की वृद्धि करते हैं वे सदा
विजय को प्राप्त होते हैं ।।११।।
फिर मनुष्यों को परस्पर कैसा वर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
स नः पृथु बाययमच्छो देव विवाससि बृहदग्ने सुवीर्यम् ॥१२॥

४०२ ऋग्वेदः म०६। सू० १६ ।। om Rad BIHAR पदार्थ:-हे (देव) विद्या के देने वाले (अग्ने) अग्नि के समान कार्य के साधक जैसे अग्नि वैसे जिस कारण से श्राप (नः) हम लोगों के लिए (पृथ) विस्तार- युक्त (शवाय्यम्) सुनने योग्य (बृहत) बड़े (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ बलयुक्त (अच्छा) अच्छे प्रकार (विवाससि) सेवा करते हो इससे (सः) वह पाप सत्कार करने योग्य हो ॥१२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु -जो जिसका उपकार करते हैं वे उसके सत्कार करने योग्य होते हैं ।।१२।। मनुष्य किस' किससे बिजुली का ग्रहण करें इस विषय को कहते हैं । वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत ! मूनों विश्वस्य वाघतः ॥१३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान विद्वन् जैसे (वाघत:) बुद्धिमान् जन (विश्वस्य) सम्पूर्ण जगत् के (मूलः) ऊपर वर्तमान के (पुष्करात) अन्तरिक्ष से (अधि) ऊपर अग्नि को (निः, अमन्थत) मथते हैं वैसे (अथर्वा) अहिंसक मैं (त्वाम्) आप को प्रकाशित करता हूं ॥१३।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वान् जनो ! जैसे पदार्थ- विद्या के जाननेवाले जन सूर्य आदि के समीप से बिजुली को ग्रहण करके कार्यों को सिद्ध करते हैं वैसे ही आप लोग भी सिद्ध करो ॥१३॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । तमु वा दध्यङ् ऋर्षिः पुत्र ईंधे अथर्वणः । वृत्रहण पुरन्दरम् ।।१४॥ पदार्थ:-हे विद्वन् राजन् (तम्, उ) उन्हीं (वृत्रहणम्) मेघों के नाश करने बाले (पुरन्दरम्) मेवों के पुरों को नाश करनेवाले सूर्य को जैसे वैसें (स्वा) आप को (अथर्वणः) नहीं हिंसा करनेवाले का (पुत्रः) पुत्र (दध्यन् । धारण करनेवाले विद्वानों को प्राप्त होने और (ऋषिः) मंत्र और अर्थ का जाननेवाला (ईघ) प्रदीप्त करता है वैसे आप मुझको करिये ॥१४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वान् जनो ! जैसे ईश्वर ने प्रकाशस्वरूप और सम्पूर्ण जगत् का उपकारक सूयं रचा है वैसे विद्या से प्रकाशित जनों को विद्वान् करो ॥१४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। तमु स्थापाथ्यो वृषा सीधे दस्युहन्तमम् । धनञ्जय रणरणे ॥१५॥ पदार्थ:---हे मनुष्यो ! जैसे (पाथ्यः) मार्गों में हुए (वृषा) वर्षाने वाले सूर्य के समान वीर्य का सींचने वाला (दस्युहन्तमम्) डाकुओं को अतिशय मारने वाले ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ।। ४०३ ! (रणेरणे) प्रत्येक संग्राम में (धनञ्जयम्) धन को जीते (तम्) उन (स्था) आप को (सम्, ईधे) प्राप्त कराता है वैसे आप मुझ को (3) भी प्राप्त कराइये ॥१५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! यदि आप लोग बिजुली की विद्या को प्राप्त होकर युद्ध करो तो आप लोगों का बहुत धन और ऐश्वर्यों का देने वाला मैं बिजुली आदि से विजय कराऊं ॥१५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। एछ छु ब्राणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः । एभिवर्धाप्त इन्दुभिः ॥१६॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् जन (एभिः) इन (इन्दुभिः) सोमलताओं वा चन्द्रकिरणां से आप (वर्धासे) वृद्धि को प्राप्त होते हो ज से (मा, इहि) प्राप्त हूजिये (इत्था) इस प्रकार से (इतराः) पीछे का (ते) आप की (गिरः) वाणियों को (सु, अवाणि) उत्तम प्रकार उपदेश करू' और आप (उ) तर्क वितर्क से सुनें ॥१६॥ भावार्थ:-जो मनुष्य - हम लोग विद्याओं को पढ़कर सब को उपदेश देवें-इस प्रकार इच्छा करते हैं वे हम लोगों को प्राप्त होवें ॥१६॥ मनुष्यों को कहाँ मन स्थित करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यत्र के च ते मनो दक्ष दधस्स उत्तरम् । तत्रा सदः कृणवसे ।।१७।। पदार्थ:-हे विद्वन् (पत्र) जहां (ते) आप का (मनः) विचारात्मक चित्त है और (उत्तरम्) पार होते हैं जिस से उस (दक्षम्) बल को (च) भी प्राप (दधसे) धारण करते हो (तत्र) वहाँ (सदः) स्थित होते हैं जिस में उस को (कृणवसे) करते हो तथा (क्य) कहां निवास करते हो इन का उत्तर कहिये ॥१७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जहां जगदीश्वर वा योगाभ्यास लोगों का अन्त:करण पवित्र होकर कार्य की सिद्धि को करता है वहाँ ही आप लोग भ प्रवृत्ति करिये ॥१७॥ मनुष्यों की किस प्रकार से इच्छा सिद्ध होती है इस विषय को कहते हैं । नहि तें पूर्तमंक्षिपद्भुबन्नेमानां वलो । अथा दुवों वनवसे ॥१८॥ पदार्थ:--हे (बसो) वसाने वाले (ते) आप के (नेमानाम्) अन्नों के (पूर्तम्) पूर्ण करने वाले को कोई भी (महि) नहीं (अक्षिपत्) फेंकता है और नहीं (भवत्) होवे इस से (यथा) इसके धनम्नर (दुवः) सेवा का (वनवसे) स्वीकार करिये। १८॥ ma में आप ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ।। भावार्थ:-जो मनुष्य सत्य आचरण को करते हैं उनकी कामना की पूत्ति कभी भी नहीं नष्ट की जाती है ॥१८॥ अब अग्नि कैसा है इस विषय को कहते हैं ।। आग्निरंगामि भारतो वृत्रहा पुरुचेतनः । दिवोदासस्य सत्पतिः ॥१९॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जो (विवोदासस्य) प्रकाश के देने वाले का (भारतः) धारण करने वा पोषण करने और (वृत्रहा) मेघ को नाश करने वाला (पुरुचेतनः) बहुत चेतन जिस में वह (सत्पतिः) श्रेष्ठ स्वामी (अग्निः) अग्नि के सदृश तेजस्वी सूर्य (मा, अगामि) प्राप्त किया जाता है उसका हम लोग सेवन करें ॥१६॥ भावार्थ:-जैसे इस -जैसे इस देह में साधन और उपसाधनों के सहित जीव बहुत कम्मों को करता है वैसे ही विद्वान् सम्पूर्ण कम्र्मों को सिद्ध करता है ॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स हि विश्वाति पार्थिवा रयिं दाशन्महित्वना । वन्वनवांतो अस्तृतः ॥२०॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जो (अस्तृतः) नहीं हिंसित (प्रवातः) पवन से वजित (महित्वना) महत्त्व से (वन्वन्) सेवन करता हुआ अग्नि (विश्वा) सम्पूर्ण (पार्थिवा) पृथिवी में विदित वस्तुओं और (रयिम् ) धन को (अति, वाशत) अत्यन्त देता (सः, हि) वही सब लोगों से जानने योग्य है ॥२०॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अग्नि बहुत सुख को देता है उसका क्यों नहीं सेवन किया जावे ॥२०॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । स प्रत्नवनवीयसाग्ने घुम्नेन संयता । बृहर्त्ततन्थ भानुना ॥२१॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी विद्वन् जैसे सूर्य (भानुना) किरण से (प्रत्नवत्) प्राचीन के सदृश (बृहत्) बड़े को (ततन्थ) विस्तृत करता है वैसे (स:) वह आप (नवीयसा) अत्यन्त नवीन (संयता) उत्तम प्रकार देते हैं। जिससे उस (ध म्नेन) धन वा यश से हम लोगों को विस्तृत करो ॥२१॥ मा * ऋग्वेदः मं०६। सू० १६ ।। ४०५ सं. AN - भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो सूर्य के सदृश यशस्वी होते हैं वे नवीन नवीन प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं ।।२१॥ मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं प्रवः सखायो अग्नये स्तोम यज्ञं च ঘূয়া अर्च गाय च वेघसे ॥२२॥ पदार्थः -- हे (सखायः) मित्रो जो (वः) आप लोगों की (स्तोमम्) स्तुति और (यजम् ) सत्य व्यवहार को (च) भी उत्पन्न करता है उस का आप लोग सत्कार करो और हे विद्वन् जो पाप में जैसे मित्र वैसे वर्त्तता है उस (वेधसे) बुद्धि- मान् (अग्नये) अग्नि के समान वर्तमान के लिये आप (धष्णुया) दृढ़ता के साथ (प्र, अर्च) अच्छे प्रकार सत्कार करिये (गाय, च) और प्रशंसा करिये ॥२२॥ भावार्थ:-सूर्य ही यज्ञफलों की प्राप्ति का साधक है वैसे यथार्थ कहने और करने वाले, धर्मात्मा जन परोपकार में कुशल होते हैं ऐसा जानकर संसार में वर्ताव करे ॥२२॥ फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को कहते हैं । स हि यो मानुषा युगा सीदोतां कविक्रतुः । दूतश्च हव्यवाहनः ॥२३॥ पदार्थ:-(य:) जो (हव्यवाहनः) हवन किये गए द्रव्यों को प्राप्त कराने पहुंचाने वाला और (दूतः) दूतवत् वर्तमान (च) भी अग्नि (मानुषा) मनुष्य- सम्बन्धी (युगा) वर्ष वा वर्षसमुदायों को (सीदत्) प्राप्त होता है (सः) (हि) वही (होता) दाता (कविक्रतः) बड़ा विद्वान् जैसे वैसे कार्य का साधक होता है ॥२३॥ भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलु०-जो अग्नि धार्मिक और विद्वानों के कार्यों का करने वाला होता है उस को विद्वान् जन कार्यों की सिद्धि के लिये सम्प्रयुक्त करें ॥२३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ता राजांना शुचित्रतादित्यान् मारुतं गणम् । वसो यक्षीह रोदसी ॥२४॥ पदार्थ:-हे (वसो) श्रेष्ठ गुणों के वसाने वाले प्राप (इह) इस संसार में H alties HAMAKASIA-%babu ४०६ ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ॥ wom (ता) उन दोनों मित्र के सदृश वर्तमान (शचिवता) पवित्र कर्म वाले (राजाना) प्रकाशमान हुए तथा (प्रादिस्यान्) बारह महीनों और (मारतम्) मनुष्य सम्बन्धी इस (गणम्) समूह को (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (यक्षि) उत्तम प्रकार प्राप्त कराइये ॥२४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य पढ़ाने और पढ़ने वाले आदिकों की सेवा करके पदार्थ विद्या का ग्रहण करते हैं वे सुखी होते हैं ॥२४॥ उत्तम जन का व्यवहार वा संग निष्फल नहीं होता इस विषय को कहते हैं ।। वस्वी ते अग्ने सन्दृष्टिरिषयते माय । ऊर्जा नपादमृतस्य ॥२५॥ पदार्थ:-है (मन्ने) अग्नि के समान वर्तमान (ते) आप की (वस्वी) पृथिवी आदि वसु सम्बन्धिनी (सन्डष्टिः) उत्तम प्रकार देखते जिससे वह दृष्टि (इषयते) अन्न वा विज्ञान की कामना करते हुए (माय) मनुष्य के लिये (अमृतस्य) नाशरहित और (अर्जः) बल आदि से युक्त को (नपात्) नहीं गिरने वाली होती है ॥२५॥ भावार्थ:-जिस विद्वान् का विद्यादर्शन-विद्या पढ़ना निष्फल नहीं होता और जिससे पढ़कर विद्यार्थी जन विद्वान् होते हैं उसका सदा सत्कार करो॥२५॥ फिर विद्वान् को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। क्रत्वा दा अंतु श्रेष्ठोऽद्य त्वा वन्वन्सुरेक्णाः । मत आनाश सुवृक्तिम् ।।२६॥ पदार्थ:-(श्रेष्ठः) धर्मयुक्त गुण कर्म और स्वभाव से अतिशय युक्त (सुरेषणाः) सुन्दर धन वाला (मतः) मनुष्य (अद्या) आज (ऋत्वा) बुद्धि वा कर्म से (सवृक्तिम् ) उत्तम प्रकार जाते हैं दुःख जिस के द्वारा उसको (भानाश) व्याप्त हो और (त्या) आप का (वन्धन) सेवन करता हुआ सुखी (प्रस्तु) हो और आप विद्या के (दा:) देने वाले हाम्रो ॥२६॥ भावार्थ:-वे ही उत्तम जन गणनीय हैं जो विज्ञान को देते हैं ॥२६॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ते ते अग्ने त्वोता इषयन्तो विश्वमायुः । तरन्तो अर्यों अरांतीवन्वन्तो अर्यो अरातीः ॥२७॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान विद्या से प्रकाशमान जो (ते) आपका ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ।। (अर्यः) स्वामी आज्ञा देवे उसको आप करिये और जो (त्वोताः) आप से रक्षित इषयन्तः) अन्न की कामना करते और (विश्वम्) सम्पूर्ण (मायुः) जीवन के (तरन्तः) पार होते हुए (अराती:) नहीं विद्यमान दान जिन में उन कृपरण विरोधियों का (वन्वन्त:) विभाग करते हुए तथा (मरातोः) जिन में दान नहीं उन शत्रुओं को विशेष करके जीतते हैं वे (ते) आप के सम्बन्धी होवें आप इन के (अर्यः) स्वामी होमो ॥२७॥ भावार्थ:-जो ब्रह्मचर्य आदि से रोगों को दूर करके चिरंजीवी होवें वे धार्मिक सम्पूर्ण कार्यों में अध्यक्ष हों ॥२७॥ फिर राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अग्निस्तिग्मेन शोचिषा यासद्विश्वं न्य१त्रिणम् । अग्निनों बनते रयिम् ॥२८॥ पदार्थ:-हे राजन् जैसे (अग्निः) अग्नि (तिग्मेन) तीब्र (शोचिषा) प्रकाश से प्राप्त हुए वस्तु को जलाता है वैसे जो (विश्वम्) सम्पूर्ण (अत्रिणम्) शत्रु के प्रति (नि, यासत्) प्रयत्न करे और वैसे जो (अग्नि:) अग्नि के सदृश (न:) हम लोगों के लिये (रथिम्) द्रव्य का (धनते) सेवन करता है उस को अध्यक्ष करिये ॥२८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - राजा को चाहिये कि अधि- कारियों के नियत करने में प्रजा की सम्मति भी ग्रहण करे ऐसा होने पर कभी भी उपद्रव नहीं होता है ॥२८॥ फिर राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। सुवीर रसिमा मर जातवेदो विचर्षणे । जहि रक्षासि सुक्रतो ॥२९॥ पदार्थ:-हे (जातवेदः) उत्पन्न हुआ प्रज्ञानबल जिनके उन (विचर्षणे) तेजस्वी तथा (सुक्रतो) उत्तम बुद्धि और कर्म से युक्त राजन् अाप (सुवीरम्) सुन्दर बीर जिससे होते हैं उस (रथिम्) धन को (प्रा, भर) सब ओर से धारण करिये और (रक्षांसि) दुष्टाचारियों को (जहि) नष्ट करिये ॥२६॥ भावार्थ:-राजा को चाहिये कि सदा ही धन आदि से धार्मिक विद्वान् और क्षत्रिय कुल में हुए वीरों की उत्तम प्रकार रक्षा करे और दुष्टों का सदा तिरस्कार करे ॥२६॥ फिर राजा और विद्वान् क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। स्वं न पाईसो जातवेदो अघायतः । रक्षा णो ब्रह्मणस्कवे ॥३०॥ - 4mya JaukamartARANE ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १६ ।। को पदार्थ:-हे (जातवेदः) विद्या से युक्त (ब्रह्मणः) वेद के (कवे) कहने वाले (त्वम्) प्राप (न:) हम लोगों की अंहसः) अधर्माचरण से (पाहि) रक्षा कीजिये और (न:) हम लोगों की (अघायतः) अपने पाप करते हुए से (रक्षा) रक्षा कीजिये ॥३०॥ भावार्थ:- हे राजन् वा विद्वन् ! आप दोनों हम लोगों को अधर्मा- चरण और अधर्म का आचरण करते हुए से अलग करके सुख को बढ़ाइये ॥३०॥ फिर न्यायाधीश क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। यो नौ रने दुरेव ा पतॊ वधाय दार्शति । तस्मान्नः पाहाइसः ||३|| पदार्थ:-हे (अग्ने) न्यायाधीश (य:) जो (मतः) मनुष्य (न:) हम लोगों (वधाय) मारने के लिये (दुरेवः) दुष्ट प्राचरण को (दाशति) देता है (तस्मात्) उस (अंहसः) अधर्माचरण से (न:) हम लोगों की (पाहि) रक्षा कीजिये ॥३१॥ भावार्थ:-हे न्यायाधीश ! जो करने के विना अपराध को स्थापित करते हैं उनके लिये आप तीव दण्ड को दीजिये ॥३॥ फिर राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। त्वं तं देव जिह्वया परि बाधस्व दुष्कृतम् । मत्तौ यो नो जिघांसति ॥३२॥ पदार्थ:-हे (देव) विद्यायुक्त न्यायाधीश (त्वम्) आप (यः) जो (मतः) मनुष्य (न:) हम लोगों की (जिघांसति) मारने की इच्छा करता है (तम्) उस (स्कृतम्) दुष्ट कर्म करने वाले को (जिह्वया) वाणी से (परि) सब ओर से बाघस्य) पीड़ित करिये ॥३२॥ भावार्थ:-हे राजन् वा विद्वन् ! जो न्यायधर्म का त्याग करके पक्षपात से अधर्म करता है उसको शीघ्र निरन्तर दण्ड दीजिये ॥३२॥ फिर राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। भरद्वाजाय सप्रथः शर्म यच्छ सहन्त्य । अग्ने वरेण्यं वसु ॥३३॥ पवार्थ: (सहन्त्य) शान्त' जनों में हुए (अग्ने) दाता (भरद्वाजाय) विज्ञान और अन्न को धारण किये हुए जन के लिये (सप्रथ:) प्रसिद्धि जन प्राप ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ॥ ४०६ के सहित वर्तमान (शर्म) गृह को और (वरेण्यम्) स्वीकार करने योग्य (वसु) द्रव्य को (यच्छ) दीजिये ॥३३॥ भावार्थः - हे श्रेष्ठ गृहस्थ ! आप सदा ही सुपात्र धार्मिकजन के लिये दान दीजिये ॥३३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अग्निवत्राणि जडनद् द्रविणम्युविपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥३४॥ पदार्थ:-हे विद्वन् उद्योग वाले जैसे (शुक्रः) शीघ्रकारिणी (समिद्धः) प्रदीप्त (अग्निः) बिजुली (वृत्राणि) धनों को (जङ्घनत) अत्यन्त प्राप्त होती है वैसे (द्रविणस्युः) अपने धन की इच्छा करने वाले (माहुत:) सब प्रकार सत्कार को प्राप्त आप (विपन्यया) विशिष्ट उद्यम से धनों को प्राप्त होओ ॥३४॥ भावार्थ:-जो निरन्तर उद्यम करते वे दारिद्रय का नाश करते हैं ॥३४॥ फिर ईश्वर कैसा है इस विषय को कहते हैं । गर्भे मातुः पितुष्पिता विदिद्युतानो अक्षरे । सीदन्नृतस्य योनिमा ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जो (अक्षरे) नहीं नाश होने वाले अपने रूप, कारण वा जीव में (ऋतस्य) सत्य के (योनिम्) गृह को (प्रा) सब ओर से (सीदन्) प्राप्त होता हुआ (मातुः) माता का जैसे वैसे भूमि का और (पितुः) पिता का जैसे वैसे सूर्य का (पिता) पालक और (गर्भ) गर्भ में (विविधुतान:) विशेष करके प्रकाश- मान है उसका सम्पूर्ण संसार का जनक जानो ॥३५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो उत्पन्न करने वालों का उत्पादक, प्रकाशकों का प्रकाशक है उस की सब लोग उपासना करें ।।३७।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे । अग्ने यहीदयदिवि । ३६।। पदार्थ:-हे (जातवेदः) धन से युक्त (विचर्षणे) बुद्धिमान् (अग्ने) अग्नि के समान गृहस्थ (यत्) जो ज्योति (दिवि) प्रकाश में (दीदयत्) प्रकाशित करती है उससे (प्रजावत्) प्रजा में विद्यमान जिस में उस (ब्रह्म) धन वा अन्न को (मा, भर) सब प्रकार से धारण वा पोषण' करिये ॥३६॥ MA ORA 40

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ऋग्वेदः मं०६। सू०१६ ।।
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भावार्थ:-हे मनुष्यो! जो अग्नि में, जो सूर्य में और जो बिजुली
में तेज है उस के विज्ञान से धन और धान्य की उन्नति करिये ॥३६॥
मनुष्य कैसी वाणी का प्रयुक्त करें इस विषय को कहते हैं ।।
उप त्वा रण्वसन्दृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत । अमै ससृज्महे गिरः ॥३७॥
पदार्थ:-हे (सहस्कृत) सहसा कार्यकर्ता (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी
विद्वन् (प्रयस्वन्तः) प्रयत्न करते हुए हम लोग जिन (गिरः) वाणियों को (ससृज्महे)
अत्यन्त प्रकट करें उन से (रण्वसन्दृशम्) रमणीय के तुल्य (स्वा) आप को (उप)
समीप में अत्यन्त प्रकट करें ॥३७॥
भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि जैसे अपने प्रयोजन की प्रिय वाणी
हृदय को प्रिय होती है वैसे अन्य जनों के प्रयोजन को भी समझें ॥३७॥
फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।
उप च्छायामिव घृणेरगन्म शम्म ते वयम् ।
अग्ने हिरण्यऽसन्दृशः ॥३८॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् ! (ते) आपके (घृणे:) प्रदीप्त सूर्य से (छाया-
मिव) छाया को जैसे वैसे (शमं) गृह को (हिरण्यसन्दृशः) तेज के सदृश समानदर्शन
जिनका ऐसे (वयम्) हम लोग (उप) समीप (अगन्म) प्राप्त होवें ॥३८॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-हे विद्वन् ! हम लोग सब ऋतुओं
में हुए सूर्य को जैसे से प्रकाशमान पाप के गृह को प्राप्त होकर छाया के
सदृश सेवन करें ॥३॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न वंसंगः । अग्ने पुरो रुरोजिथ । ३९।।
पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी (य:) जो आप (वंसगः) सेवन
करने योग्य व्यवहार को प्राप्त होने और (शयंहा) मारने योग्य को मारने वाले
(तिग्मशृङ्गः) तीव्र शृगों के सदृश किरणों वाले सूर्य के (न) समान शत्रुओं के
(पुरः) आगे (उन इव) तेजस्वी जन जैसे वैसे (रुरोजिथ) भग्न करते हो उन आप
का हम लोग सत्कार करें ॥३६॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०--जो राजा आदि अधिकारी जन
र्थन से वैसे तेजस्वी होवें वे शत्रुओं के जीतने को समर्थ होवें ॥३६॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०१६ ॥
४११
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HAAN
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
आ यं हस्ते न खादिनं शिशुं जातं न बिभ्रति ।
विशामग्नि स्वध्वरम् ॥४०॥
पदार्थ:-जो (यम्) जिस को (हस्ते) हाथ में (खादिनम्) भक्षण करने
वाले के (न) समान और (जातम्) उत्पन्न हुए (शिशम्) बालक के (न) समान
(विशाम्) मनुष्यादि प्रजात्रों के (स्वध्वरम् ) सुन्दर यज्ञ जिससे हों उस (अग्निम्)
प्रकाशमान अग्नि को (मा, बिभ्रति) सब ओर से धारण करते हैं वे उस से कृतकृत्य
होते हैं ॥४०॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जो हाथ में प्रांवले
को जैसे वैसे गोदी में लड़के को जैसे वैसे अग्निविद्या को जानते हैं वे प्रजा
के स्वामी होते हैं ॥४०॥
फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।
प्र देवं देववीतये भरता वसुवित्तमम् ।
आ के योनौ नि पीदतु । ४१ ।
पदार्थः-हे विद्वान् जनो श्राप लोग (देववीतये) श्रेष्ठ गुणों को प्राप्ति के
लिए (वसुवित्तमम्) अतिशय धन को जानने और (देवम् ) देने वाले को (स्वे)
अपने (योनी) गृह में (प्र, श्रा, भरता) उत्तमता से अच्छे प्रकार धारण करिये वा
हरिये जिससे मनुष्य सुख से (नि, षीदत) निरन्तर स्थिर होने ॥४१॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप श्रेष्ठ गुणों की प्राप्ति के लिये अग्नि
आदि पदार्थों को जानिये ॥४१ ।
विद्वानों को चाहिए कि श्रेष्ठ गृहस्थों का सत्कार करें इस विषय को कहते हैं ।
आ जातं जातवेदसि प्रियं शिशीतातिथिम् ।
स्योन आ गृहपतिम् ।।४२।।
पदार्थः हे विद्वान् जनो (जातवेदसि) प्राप्त हुई विद्या जिसमें उस में
(श्रा, जातम् ) अच्छे प्रकार प्रसिद्ध (प्रियम्) प्रिय (अतिथिम्) अतिथि के समान
वर्तमान को (स्योने) सुख' में (गृहपतिम्) गृह के स्वामी को (मा, शिशीत) अच्छे
प्रकार तीक्ष्ण करिये ॥४२॥
भावार्थ:-जो व्याप्त बिजुली को प्रज्वलित कराते हैं वे सब स्थानों
में विजय प्रादि को प्राप्त होते हैं ॥४२॥

NASNAHINI
४:१२
ऋग्वेदः मं०६ । सू० १६ ॥
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फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
अग्ने युवा हि ये तवाश्वासो देव साधवः ।
अरं वहन्ति
मन्यवै ।।४३ ।
पदार्थः हे (देव) श्रेष्ठ सुख के देने और (अग्ने) शिल्प क्रिया की
कुशलता को जानने वाले विद्वन् (ये) जो (साधव:) श्रेष्ठ गमन वाले (तव)
आप के (प्रश्वासः) वेग आदि गुण (मन्यवे) क्रोध के लिए (परम्) समर्थ
को (वहन्ति) प्राप्त होते हैं उन को हि) ही आप वाहनों में (युक्ष्वा ) संयुक्त
करिये ॥४३॥
भावार्थ:- जो विद्वान् जन अग्नि आदि का योजन वाहनों में करत
हैं वे पूर्ण मनोरथ वाले होते हैं ।।४३।।
मनुष्यों को किस का सत्कार करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
अच्छा नो याह्यावहाभि प्रयासि वीतये ।
आ देवान्सोमपीतये ॥४४
पदार्थ:-हे विद्वन् अाप (न:) हम लागों को (अच्छा) उत्तम प्रकार
(सोमपीतये) सामलता रूप अोषधि के रस के पान के लिए (मा, याहि) सब
ओर से प्राप्त होमो और (प्रयांसि) अत्यन्त प्रिय वस्तुओं को (अभि) चारों ओर
से (प्रा) सब प्रकार (वह) प्राप्त होप्रो और (वीतये) ज्ञान के लिये (देवान्) विद्वानों
को सब ओर से प्राप्त होनो ॥४४॥
भावाय:- मनुष्यों को चाहिये कि सत्कार के लिये विद्वानों का
आह्वान करें।॥४४॥
फिर मनुष्यों का क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
उदग्ने भारत धुमदर्जस्रेण दविंद्युतत् । शोचा वि भाह्यजर ॥४५॥
पदार्थ:-हे (भारत) धारण करने वाले (अजर) जरा दोष से रहित (अग्ने)
विद्वन् पाप (अजस्रण) निरन्तर से (धु मत्) प्रकाश वाले को (दविध तत्)
प्रकाशित करते हो उस के लिए आप (उत, शोचा) अत्यन्त प्रकाशित हूजिये और
(वि. भाहि) विशेष कर के प्रकाशित करिये ॥४५॥
भावार्थ:-जैसे
ब्रह्माण्ड में सूर्य निरन्तर प्रकाशित होता है वैसे ही
विद्वान् जन सत्य व्यवहार में प्रकाशित हों ॥४५॥

ऋग्वेदः म० ६ । सू० १६ ॥ DUN म मनुष्यों को किस की उपासना करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। वीती यो देवं मत्तॊ दुवस्येदग्निमीळीताध्वरे हविष्मान् । होतारं सत्ययजं रोदस्योरुत्तानईस्तो नमसाऽऽविवासेत ॥४६।। पदार्थ:-हे विद्वान् जनो (यः) जो (हविष्मान्) बहुत दान करने वाला (उतानहस्तः) ऊपर स्थित हस्त जिसके ऐसा (मतः) मनुष्य (बीती) कामना से (अध्वरे) अहिंसा आदि लक्षणयुक्त योग में जिस (होतारम्) दान करने वाले (सत्ययजम्) सत्य प्राप्त कराने वाले (देवम्) मनोहर (अग्निम्) अग्नि के सदृश स्वयं प्रकाशित परमात्मा का (दुवस्येव) सेवन करे और (रोदस्योः) अन्तरिक्ष और पृथिवी के (नमसा) सत्कार से (श्रा, विवासेत) अच्छे प्रकार सेवन करे उस परमात्मा की आप लोग (ईळीत) प्रशंसा करो ॥४६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर की योगी जन उपासना करते हैं उस की आप लोग भी उपासना करो॥४६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ ते अग्न ऋचा हविदा तष्टं भरामसि । ते ते भवतूक्षणं ऋषभासो वशा उस ॥४७॥ पवार्थ:-हे (अग्ने) जगदीश्वर ! जिन (ते) आप के (हविः) अन्तःकरण और (तष्टम्) अत्यन्त शुद्ध किये गए स्वरूप को हम लोग (ऋचा) प्रशंसारूप ऋग्वेद आदि से और । हृदा) हृदय से (मा, भरामसि) अच्छे प्रकार पोषण करते हैं उन (ते) आपकी कृपा से हमारे और (ते) आपके सम्बन्धी (उक्षणः) सेचन करने वाले (ऋषभासः) उत्तम (उत) भी (बशाः) कामना करते हुए (भवन्त) होवें ॥४७॥ भावार्थ:-जो सत्यभाव से और अन्तःकरण से जगदीश्वर की आज्ञा का सेवन करते हैं वे सब प्रकार से उत्कृष्ट होते हैं ॥४७॥ अब ईश्वरविषय को कहते हैं । अनि देवासी अनियमिन्धत वृत्रहन्तमम् । येना वमन्याभूना तृळा रक्षासि वाजिनां ॥४८॥ पदार्थ: - हे मनुष्यो जैसे (देवास:) विद्वान् जन (वृत्रहन्तमम्) मेघ के अत्यन्त नाश करने वाले और (अग्रियम्) प्रागे प्रकट हुए (अग्निम्) अग्नि को बाकी ४१४ ऋग्वेदः मं०६ । सू० १७ ।। . (इन्घते) प्रकाशित करते हैं पार (येना) जिन' (वाजिना) वेग वा विज्ञान से (प्राभूता) चारों ओर से धारण किये गए (वसूनि) घनों को प्रकाशित करते हैं और (रक्षांसि) दुष्ट जनों को ((तुळ हा) हिसित करते हैं वैसे ही दोषों का नाश कर के परमात्मा को प्रकाशित करते हैं इस प्रकार आप लोग भी करो ॥४८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - जैसे यज्ञ करने वाले जन यज्ञ में वेदी पर अग्नि को प्रज्वलित कर के हवन की सामग्री छोड़ के संसार का उपकार करते हैं वैसे ही योग से युक्त संन्यासी जन परमात्मा को सब के हृदय में अच्छे प्रकार प्रकाशित कर के दोषों का नाश करते हैं ॥४८॥ इस सूक्त' में अग्नि, विद्वान् और ईश्वर के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। इस अध्याय में अग्नि, विश्वेदेव, सूर्य, इन्द्र, वैश्वानर, वायु, यज्ञ, राजधर्म, विद्वान् और ईश्वर के गुण वर्णन करने से इस अध्याय के अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे भण्डल में सोलहवां सूक्त समाप्त हुआ। * ओ३म् * अथ षष्ठाऽध्यायारम्भः ।। -: ००:०६०%8:- विश्वानि देव सवितदुरितानि परासुव । यद्भद्रं तन्न आ मुंव ॥१॥ अथ पञ्चदशर्चस्य सप्तदशस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता। १।२।३ । ४ । ११ त्रिष्टुप् । ५। ६ । ८ विरात्रिष्टुप् । ७।६।१०। १२ । १४ निचरित्रष्टुप् छन्दः । धैवत: स्वरः। १३ स्वराट् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। १५ प्राच्युष्णिक छन्दः। ऋषभः स्थरः।।

ऋग्वेदः मं०६। सू० १७ ।। ४१५ अब चतुर्थ अष्टक में छठे अध्याय और छठे मंडल में पन्द्रह ऋचा वाले सत्रहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। पिया सोमममि यमुग्र तर्दै ऊर्व गव्यं महिं गृणान इन्द्र । वि यो धृष्णो वर्धिषो वज्रहस्त विश्वो वृत्रमित्रिया शोभिः ॥१॥ पदार्थ:--- है (वज्रहस्त) शस्त्र है हस्त में जिन के ऐसे (धिष्णो) अत्यन्त दृढ़ (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले (यः) जो (शवोभिः) बलों से (वृत्रम्) भधों को सूर्य जैसे वैसे (विश्वा) सम्पूर्ण (अमित्रिया) शत्रुओं को आप (वि) विशेष करके (वधिषः) नाश करिये और है (उन) तेजस्विन् (महि) बड़े (गव्यम्) गौओं के घृत की (गुणानः) स्तुति करते हुए (यम) जिस (ऊर्वम्) हिंसा करने योग्य की (अभि) (तर्दः) हिंसा करिये उस के सम्बन्ध में वह पाप (सोमम्) महौषधि के रस को (पिबा) पीजिये ॥१॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो मनुष्य ब्रह्मचर्य, विद्या और सत्कर्म से दुष्टों को दूर करके श्रेष्ठों का स्वीकार करते हैं वे शत्रुओं का नाश करते हैं ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । सई पाहि य अजीपी तरुत्रो यः शिवान् वृषभो यो मतीनाम् । यो गोत्रभिद्वन्नभृयो हरिष्ठाः स इन्द्र चित्रों अभि तन्धि वाजान् ॥२॥ PRO Pawan RAM पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुष्टों के विदीर्ण करने वाले (य:) जो (ऋजीवी) सरलस्वभाव (तरुत्रः) सम्पूर्ण दुःख से उत्तीर्ण हुए अाप हैं (सः) वह पाप (ईम्) प्राप्त वस्तु का (पाहि) पालन करिये और (य:) जो (शिप्रवान्) सुन्दर ठुड्डी और नासिका वाले (वृषभः) बलिष्ठ और (य:) जो (मतीनाम्) मनुष्यों के मध्य में बलिष्ठ (यः) जो (वनभृत) वज को धारण करने वाले (गोत्रभित) गोत्र के नाश करने वाले हैं (यः) जो (हरिष्ठाः) अतिशय हरने वाले हैं (सः) वह आप (चित्रान्) अद्भुत (वाणान्) हिंसकों का (अभि, तन्धि) सब ओर से नाश करिये ॥२॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो प्रजा के रक्षक, दुष्टों के हिंसक जन होवें उनका आप सत्कार करिये ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।

मा- ॥ हों (ते) वे (त्वा ४१६ ऋग्वेदः मं०६ । सू० १७॥ एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीमिः। आविः सूर्यं कृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रैरभि गा इन्द्र तृन्धि ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करने वाले (प्रत्नथा) प्राचीन जन जैसे वैसे आप (ब्रह्म) वेद की (पाहि) रक्षा कीजिए और जो वेद (त्वा) श्राप की (मन्दतु) प्रशंसा करे उस को प्राप (श्रधि) सुनिये उससे (वावृधस्व) बढ़िये और (उत) भी (गोभिः) वाणियों से (सूर्यम्) परमेश्वर का (मावि:) प्राकटय (कणुहि) करिये तथा (इषः) अन्न का (पीपिहि) पान करिये और (शत्रून्) शत्रुओं का (अभि, तृन्धि) सब प्रकार से नाश करिये और दोषों का (जहि) त्याग करिये और (गाः) पृथिवियों को (एवा) ही प्राप्त हूजिये ॥३॥ भावार्थ:-जो श्रद्धा से परमेश्वर की उपासना करके विद्याथियों की परीक्षा करते हैं वे जगत् के प्रिय होते हैं ॥३॥ फिर राजा और प्रजा जान परस्पर कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ते त्वा मदो बृहदिन्द्र स्वधाव इमे पीता उक्षयन्त द्युमन्तम् । महामनूनं तवसं विभूति मत्सरासो जहषन्त प्रसाईम् ॥४॥ पदार्थ:-हे (स्वधावः) बहुत अन्न से युक्त और (इन्द्र) ऐश्वर्ययुक्त जो (इमे) ये (पीताः) पान किये गये (मवा:) प्रानन्द और (मत्सरासः) आनन्द करते हुए जन (ध मन्तम्) बहुत मनोरथों से युक्त (महाम) बड़े (गनूनम्) न्यूनता से रहित (तवसम्) बलिष्ठ (विभूतिम्) बड़े ऐश्वर्य से युक्त (प्रसाहम् ) अत्यन्त सहने- वाले को (बृहत) बहुत (उक्षयन्त) सेचन करते हैं और (जह षन्त) अत्यन्त प्रसन्न भावार्थ:-जिन सज्जनों का राजा सत्कार करें वे राजानों को भी प्रसन्न करें॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। येभिः सूर्यमुषस मन्दसानोऽवासयोऽयं हळहानि दैत् । महामद्रिं परि गा इन्द्र सन्त नुत्था अच्युतं सदसस्परि स्वाद ॥५॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्थ से युक्त राजन् (मन्दसानः) कामना करते हुए आप (येभिः) जिन से (सूर्यम्) सूर्य और (उषसम्) प्रातला को जैसे वैसे (गा:) पृथिवियों को (परि, प्रवासयः) सब प्रकार वसाइये तथा (दृळ हानि) दृढ़ Hnde 50 M

ऋग्वेदः मं०६ । सू० १७ ।।
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पदार्थों को (अप, वर्बत) पुष्ट करिये उन से (महाम्) बड़े (अनिम्। मेघ के समान
सन्तम्) वर्तमान (अच्युतम्) नाश से रहित को (स्वात) अपने से (सदसः) सभा
से (परि) चारों ओर (नुस्था:) प्रेरित करिये ॥५॥
भावार्थ:---वही राजा श्रेष्ठ होता है जो दुष्टों को विदीर्ण करके
श्रेष्ठों की सभा से सम्पूर्ण प्रजाओं का शासन करता है ॥५॥
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
तव क्रत्वा तव तई लनाभिरामासु पक्वं शच्या नि दीधः ।
औोर्दुर उनियाभ्यो त्रिदृळ्होदूद्गिा अस्जो अङ्गिर खान ॥६॥
पदार्थ:---- हे विद्वन् (तक) आप की (अत्वा) बुद्धि से और (तव) आप के
(बंसनाभिः) कम्मों से हम लोग (आमासु) नहीं पाकदशा को प्राप्त हुओं में (तत्)
उस (पक्वम्) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त विज्ञान को प्राप्त होवें और आप इस को
(शच्या) बुद्धि वा प्रजा से (नि, दीधः) धारण कराते हो और जो (उस्त्रियाभ्यः)
किरणों से (दुरः) गृहद्वारों को (ोर्चाः) आच्छादित करे तथा (ऊर्वात) हिसन से
(गाः) भूमियों को (उत्, प्रसृजः) अच्छे प्रकार रचे और (अङ्गिरस्वान्) बहुत प्रकार
के प्राण विद्यमान जिसमें वह (दळ हा) दृढ़ों को (वि) विशेष करके रचे उस का
हम लोग सत्कार करें ॥६॥
भावार्थ:-जो मनुष्य विद्वानों से शिक्षा को प्राप्त हो कर सब का
सत्कार करते हैं वे राज्य को प्राप्त होकर सूर्य के सदृश प्रकाशित होते
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फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
पनाथ क्षां महि दंसो व्यु१ वीमुष द्यामृण्वो बृहर्दिन्द्र स्तभायः ।
अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरी यही ऋतस्य ॥७॥
पदार्थ:-हे (इन्द्र) सूर्य के सदृश ऐश्वर्या करने वाले जैसे सूर्य्य (महि)
बड़े (दंसः) कर्म को (उर्वीम्) विस्तृत (क्षाम् ) भूमि को और (द्याम्) प्रकाश को
(वि, उप, पप्राथ) विशेष कर समीप में पूरित करता है और (ऋष्वः) बड़ा महात्मा
जन (बृहत) बड़े को (स्तभाय) स्तम्भित करता है वैसे पाप पूरित कीजिये और
जैसे यह सूर्य (ऋतस्य) सत्य कारण के समीप से प्रकट हुए (देवपुत्रे) विद्वानों के
पुत्र के समान वर्तमान (प्रत्ने) प्राचीन (मातरा) माता के सदृश पादर करने वाले
(यह्वी) बड़े (रोदसी) भूमि और सूर्य लोक को धारण करता है वैसे आप
(अधारयः) धारण करते हो ॥७॥

MANSINE-RANAMALAYINNER Ban ae रहित (देवान्) विद्वानों के (अभि) सन्मुख (प्रोहिष्ट) विशेष करके प्रकाश से ४१८ ऋग्वेदः मं०६ । सू० १७ ।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०--हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य भूगोलों को धारण करके पिता के सदृश संपूर्ण प्रजात्रों का पालन करता है वैसे ही आप लोग यहां वर्ताव करो ॥७॥ फिर मनुष्यों को कौन उपासना करने योग्य है इस विषय को कहते हैं । अध त्वा विश्व पुर इन्द्र देवा एक तवसं दधिरे भरीय । अदेवो यदभ्यौहिष्ट देवान्तवर्षाता वृणत इन्द्रमत्रं ॥८॥ पदार्थः-है (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्या के देने वाले स्वामिन् जगदीश्वर जो (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (भराय) पालन के लिए (त्वा) पाप (एकम्) जिन के समान दूसरा नहीं उन (तवसम्) बल आदि के बढ़ाने वाले को (पुरः) आगे. (बधिरे) धारण करते हैं उनको श्राप विज्ञान से धारण करते हो और (यत्) जो विद्वान् जन और जो (स्वर्षात:) सुखों का विभाग करनेवाला (प्रदेवः) प्रकाश से और संज्ञान को नहीं प्राप्त होता है और जो (अत्र) इस संसार में (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त का (बगते) स्वीकार करते हैं वे (अध) इस के अनन्तर सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥८॥ भावार्थ:--जो मनुष्य परमात्मा ही की उपासना करते हैं वे अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं और जो विद्या से हीन होकर विद्वानों के साथ कुतर्क करता है वह कुछ भी यहां नहीं पाता है ॥८॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । अध द्यौश्चित्ते अप सा नु वाद्वित्तानमद्भियसा स्वस्य मन्योः । अहिं यदिन्द्रो अभ्योहसानं नि चिद्विश्वायुः शयथे जघान ।।९।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्) जो (इन्द्रः) सूर्य (मोहसानम्) तर्क से जानने योग्य (अहिम्) मेघ का (अभि) सब ओर से (जधान) नाश करता है वैसे जो (चित्) कोई (विश्वायुः) सम्पूर्ण अवस्था से युक्त (नि) निरन्तर (शयथे) शयन करता है (अध) इसके अनन्तर जो (द्यौः) कामना करती हुई (चित्) भी (वज्रात्) विजुली के प्रहार से (भियसा) भय से (द्विता) दो प्रकार (अनमत्) नमती है वैसे हे विद्वन् (स्वस्य) अपने (मन्योः) क्रोध से (सा) वह (नु) निश्चय से (ते) आप का दुःख (अप) दूर करे ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग सूर्य और मेघ के सदृश वर्ताव करके परस्पर पालन करो ।।६।। a whayar ऋग्वेदः म० ६ । सू० १७ ॥ ४१६ MRA aur स- अब राजपुरुष कैसा बर्ताव करें इस विषय को अगले मन्त्र' में कहते हैं ।। अध त्वष्टा ते मह उग्र वज्रं सहस्रभृष्टिं वतच्छताश्रिम् । निकाममरमणसं येन नवन्तमहि सं पिंणगृजीषिन् ॥१०॥ पदार्थ:-- हे (ऋजीषिन्) सरल स्वभाव वाले (उग्न) तेजस्विन् (ते) आप के हस्त में (महः) बड़े (सहस्रभृष्टिम् ) हजारों का छेदन करने और (शताश्रिम्) सैकड़ों का आश्रयण करने वाले और (निकामम्) नित्य कामना किये जाते (अरमण- सम्) जिसमें नहीं रमते हैं शत्रु उस (वज्रम्) शस्त्रविशेष को धारण करता हूं (अध) इसके अनन्तर (येन) जिससे (स्वष्टा) छेदन करने वाले आप (नवन्तम्) स्तुति करते हुए नम्र के सदृश को (अहिम्) मेघ को जैसे सूर्य वैसे (सम्, पिणक) अच्छे प्रकार पीसते हैं तथा (ववृतत्) वर्ताव करते हैं उन प्रापको हम लोग भी धारण करें ॥१९॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु वीरपुरुषो ! जैसे धनुर्वेद के जाननेवाले वीरपुरुष शस्त्रों को धारण करें वैसे आप लोग भी धारण करो ॥१०॥ CREAD - HPU 4280 MyIw alaa Fre फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अर्धान्यं विश्वें मरुतः सजोषाः पचंच्छतं महिषाँ ईन्द्र तुभ्यम् । पूषा विष्णुस्त्रीणि सरॉसि धावन्त्रहण मदिरमंशुमस्मै ।।११।। पवार्थ:--हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्तमान राजन (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवने वाले (विश्वे) सम्पूर्ण (मरुतः) मनुष्य (यम्) जिन प्राप की (वर्धान्) वृद्धि करें और जो (पूषा) पुष्टि करने वाला (धावन्) दौड़ता हुआ (विष्णुः) ध्यापक बिजुली रूप (श्रीणि) तीन (सरांसि) चलते हैं जिन' में उन अन्तरिक्ष आदिकों को व्याप्त होता है वैसे दौड़ते हुए (अस्म) इस के लिए (मदिरम्) अानन्द करने बाले (अंशम्) विभक्त (वृत्रहणम्) मेघ को जैसे सूर्य वैसे शत्रुओं को मारता है और जो (तुभ्यम्) आप के लिये (शतम्) सौ महिषान्) बड़े पदार्थों को देता है और जो परोपकार के लिये (पचत्) पाक करे उसको आप लोग जानिये ॥११॥ भावार्थ:-जैसे प्रजाजन राजा और राज्य को बढ़ावें वैसे राजा इनकी निरन्तर वृद्धि करे॥११॥ अब राजा आदि क्या करें इस विषय को कहते हैं । श्रा क्षोदो महिं वृतं नदीनां परिष्ठितमसृज ऊर्मिमपाम् । तासामर्नु प्रवत इन्द्र पन्थां प्रादयो नीचौरपसः समुद्रम् ॥१२॥ Area . जनीति और ४२० ऋग्वेदः मैं० ६ । सू० १७ ।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्तमान राजन् जैसे सूर्य (नदीनाम्) नदियों के (महि) बड़े (वृतम्) स्वीकार किये गए (परिष्ठितम्) सब अोर से वर्तः मान (क्षोदः) जल को और (अपाम्) जलों की (अमिम्) तरंग को (असृजः) उत्पन्न करता है (तासाम्) उन के (प्रवतः) नीचे स्थान से (अनु) पश्चात् (पन्थाम्) मार्ग को (अपसः) कर्म की (नीचीः) नीचली भूमियों को और (समुद्रम्) अन्तरिक्ष वा बड़े समुद्र को (प्र, मा, आर्दयः) प्राप्त कराता है वैसे आप सेना और प्रजा को सुख प्राप्त करा के शत्रुओं को नीची दशा को प्राप्त कराइये ॥१२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु -जो राजा आदि जन सूर्य के सदृश वर्तमान हैं वे प्रजापालन और शत्रु के निवारण करने को समर्थ होते हैं ॥१२॥ फिर राजा और प्रजाजन कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । एका वा विश्वा चकुवांसमिन्द्रं महामुग्रमंजुयं सहोदाम् । सुवीर त्वा स्वायुधं सुवज्रमा ब्रह्म नव्यमवसे वकृत्यात् ॥१३॥ पदार्थ:-हे राजन् जो (ला) उन (विश्वा) सम्पूर्णों को और (चकृशांसम्) करते हुए (महाम्) बड़े (उनम्) तेजस्वी (अजुर्य्यम्) नहीं जीर्ण हुए (सहोदाम्) बल के देनेवाले (स्वायुधम्) उत्तम शस्त्र के चलाने में चतुर (सुवज्रम्) प्रशस्त वज्ररूप अस्त्र के चलाने में समर्थ (सीरम्) उत्तम वीरों से युक्त (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य वाले शत्रु के नाशक (त्या) आप को (एवा) ही (अवसे) रक्षण आदि के लिये और न्याय करने के लिये (मा, ववृत्याद) सब ओर से वर्ताव करे वह (नव्यम्) नवीनों में हुए (ब्रह्म) बड़े धन वा अन्न को बढ़ाने को समर्थ होवे ॥१३॥ युद्धविद्या में कुशल राजा की सब लोग वृद्धि करें और इन लोगों की यह राजा निरन्तर वृद्धि करे ॥१३॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । स नो वाजाय श्रवस इषे च राये धेहि धुमत इन्द्र विप्रान् । भरद्वाजे नृवत इन्द्र सूरीन्दिवि च स्मैधि पायें न इन्द्र ॥१४॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के प्राप्त कराने वाले (सः) वह राजा आप (ध मतः) विज्ञान के प्रकाश से युक्त (नः) हम लोगों (विनान्) बुद्धिमान् OLD Ca 20 ऋग्वेदः मं०६। सू० १८ ।। ४२१ विद्वानों को (वाजाय) वेग वा विज्ञान के लिए (श्रवसे) श्रवण के लिये (इषे) अन्न के लिये और (राये) धन के लिये (च) भी (धेहि) धारण करिये और हे (इन्द्र) दुःख और दारिद्र्य के विनाशक आप (नवतः) अच्छे मनुष्यों से युक्त हम (सूरीन्) विद्वानों को (भरद्वाजे) 'राज्य के पुष्ट करने वा पालन करने वाले व्यवहार में और (दिवि) सुन्दर न्याय के प्रकाश में (च) भी धारण करिये और है (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्या के बढ़ाने वाले आप (पाये) पार करने योग्य में भी (न:) हम लोगों के बढ़ाने वाले (स्म) ही (एधि) होमो ॥१४॥ भावार्थ:--राजाओं को योग्य है कि सम्पूर्ण अधिकारों में सम्पूर्ण विद्याओं में चतुर, धाम्मिक, कुलीन और राजभक्तों को संस्थापित कर के सब प्रकार से राज्य की उन्नति करें॥१४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। अया वाजे देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीरा ॥१५॥ पदार्थ:--- हे राजन् (अया) इस नीति से (शतहिमाः) सौ वर्ष पर्यन्त जीवन वाले (सुवीराः) उत्तम वीर जनों से युक्त हुए हम लोग (देवहितन्) विद्वानों के लिये हितकारी (वाजम्) विज्ञान का (सनेम) विभाग करें और (मदेम) मानन्द करें ॥१५॥ भावार्थ:--राजा को चाहिये कि विद्वानों का संग और विनय से राज्य पालन के लिये उत्तम वीर जनों को अधिकृत करें ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा, मन्त्री और प्रजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। imaa Ana यह छठे मण्डल में सत्रहवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ पञ्चवर्चस्याष्टादशस्य सूरजस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता। १।४।६।१४ निवृत्रिष्टुप् । २।८।११। १३ त्रिष्टुप् । ७ । १० विरात्रिष्टुप् । १२ भुरित्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ । १५ भुरिक्पंक्तिः । ५ स्वराट् पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ६ ब्राह म्युष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः ॥ अब पन्द्रह ऋचा बाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मंत्र में फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।।

Sonu
४२२
ऋग्वेदः मं०६ । सू०१८॥
-
तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजा वन्वन्नवांतः पुरुहूत इन्द्रः ।
अपाळ्हमुग्रं सहमानमाभिर्गीर्भिर्वध वृषभम् चर्षणीनाम् ॥१॥
पदार्थ:-हे राजन् (यः) जो (अभिभूत्योजाः) अभिभव अर्थात् शत्रुओं के
पराजय करने के लिए पराक्रम से युक्त (अवातः) नहीं हिंसित (पुरुहूतः) बहुतों से
प्रशंसित (वन्वन्) विभाग करता हुआ (इन्द्रः) दुःख को विदीर्ण करने वाला है (तम्)
उस (अषाळ हम्) नहीं सहने योग्य (उग्रम्) तीव्र स्वभाव वाले और (चर्षणीनाम्)
मनुष्यों में (वृषभम् ) अतिश्रेष्ठ और (सहमानम्) शत्रुओं के वेग को सहने वाले की
(प्राभिः) इन (गोभिः) वाणियों से (स्तुहि) स्तुति करिये (उ) और उससे (वर्ध)
वृद्धि को प्राप्त हूजिये ॥१॥
भावार्थ:-हे राजन् ! आप सदा स्तुति करने योग्य की स्तुति करिये,
निन्दा करने योग्य की निन्दा करिये, तथा सत्कार करने योग्य का सत्कार
करिये और दण्ड देने योग्य को दण्ड दीजिये ॥शा
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
स युध्मः सत्वा खजकृत्समद्वा तुविम्रक्षो नंदनुमाँ जीषी
बृहद्रेणुश्च्यवनो मानुषीणामेका कृष्टीनामभवत्सहावा ॥२॥
पदार्थ:-हे राजन् जो (युध्मः) युद्ध करने वाला (सस्था) बलवान् (समद्वा)
अच्छे प्रकार स्वादु भोजन करने वाला (तुषिम्रः) बहुत स्नेहयुक्त (नदनुमान्)
बहुत शब्द विद्यमान जिस में ऐसा और (ऋजीषी) सरल चलने वाला (बृहद्रेणुः)
बड़ी धूलि जिस में वह (च्यवनः) जाने वाला (मानुषीणाम्) मनुष्यसम्बन्धिनी
सेनाओं और (कृष्टीनाम्) मनुष्यों के मध्य में (एकः) सहाय रहित (सहावा) सहन-
शील (खजकृत) संग्राम करने वाला वीर (अभवत्) होवे (स:) वही पाप से राज्य
की रक्षा के निमित्त नियुक्त करने योग्य है ।।२॥
भावार्थ:-राजा को चाहिये कि राजकर्मचारी को उत्तम प्रकार
परीक्षा कर के राज्य-व्यवहार में नियुक्त करे जिससे प्रजा के सुख की वृद्धि
हो ॥२॥
फिर राजा को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
त्वं ह नु त्यदंदमयो दस्यूरेको कृष्टीरवनोराय्यीय ।
अस्ति स्विन्नु वीर्य १ तत्त इन्द्र न स्विदस्ति तदंतुथा वि वाचः ॥३॥

ऋग्वेदः मं०६। सू० १८ ॥ ४२३ --- पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् जो (ते) पाप का (वीर्यम्) बल (अस्ति) है (स्विद) क्या ? (नु) शीघ्र जो (न) नहीं (अस्ति) हैं और (स्विद) भी (ऋतुथा) ऋतु जैसे वैसे जो (वि, वोचः) कहते हो (तत्) उसका (स्वम्) पाप (अवनोः) सेवन करिये (तत्) बह मेरा हो और (दस्यून) दुष्ट चोरों को (एक.) सहायरहित हुए पाए (अदमयः) दमन करिये वह अाप (ह) निश्चय (कृष्टीः) मनुष्यों को (प्राय) द्विज के लिये (न) शीघ्र उत्तम प्रकार सेवन करिये (स्थत् , उसको हम लोग भी ऐसे करें ॥३॥ भावार्थ:-राजाओं का यह मुख्य कर्म है कि सम्पूर्ण दुष्ट चोरों का निवारण करके प्रजाओं का पालन करें ॥३॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सदिद्धि ते तुविजातस्य मन्ये सहः सहिष्ठ तुरतस्तुरस्य । उग्रमुग्रस्य तवसस्तवीयोऽरध्रस्य रघतुरौं बभूव ।।४॥ पदार्थ:-हे (सहिष्ठ) अतिशय सहने वाले (तुविजातस्य) बहुतों में प्रसिद्ध जिन (ते) माप का जो (हि) निश्चित (सहा) बल है उस को (सत्) नित्य होने वाला पदार्थ मैं (मन्ये) मानता हूं तथा (तुरतः) शीघ्र करने वाले (तुरस्य) शीघ्र प्रारम्भ करने वाले (उग्नस्य) तीव्र और (अरघ्रस्य) नहीं हिंसा करने वाले के (तवस:) बल से (उनम्) तीन (तवीयः) अतिशय बल को मैं मानता हूं वह आप (रध्रतुरः) हिंसकों के हिंसक (इत) ही (बभूव) होवें ॥४॥ भावार्थ:-सब मनुष्यों को चाहिये कि जिसमें जैसे गण कर्म और स्वभाव होवें वैसे मानें॥४॥ फिर मनुष्यों को परस्पर कैसा वत्व करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। तत्र प्रत्नं सख्यमस्तु युध्मे इस्था वद्भिवलमगिरोभिः । हवेच्युतच्युइस्मेषयन्तमृणोः पुरो वि दुरौ अस्य विश्वाः ॥५॥ पदार्थ:-हे न्यायकारी राजा प्रादि जनो श्राप लोगों के साथ लोगों की जैसे (तत्) वह (प्रत्नम्) प्राचीन (सख्यम्) मित्रता (अस्तु) हो (त्या) इस से जैसे वैसे (युष्मे) आप लोगों के (वद्भिः) कहते हुओं के साथ हम लोगों की मित्रता हो और जैसे (अङ्गिरोभिः) पवनों के साथ (अच्युतच्युत) नहीं चञ्चल अर्थात् स्थिर को चञ्चल करने वाला सूर्य (वलम्) मेघ का (हन्) नाश करता है वैसे हे (वस्म) दुःख के नाश करने वाले (इषयन्तम्) प्राप्त हुए वा जाते हुए को हो नः) हम HTRATE.MAMASHIANESHONNARIES ४२४ ऋग्वेदः मं०६। सू० १८ ।। -मनुष्यों को - आप (ऋणोः) सिद्ध करिये और जैसे (अस्य) इस जगत् के (दुरः) द्वारों को सूर्य प्रकाशित करता है वैसे आप (विश्वाः) सम्पूर्ण (पुरः) नागरिकों को (वि) विशेष करके सिद्ध करिये ॥५॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु चाहिये कि यथा- शक्ति उत्तमों के साथ मित्रता ही करें, वह कभी नष्ट न होवे ऐसा प्रयत्न करें और जैसे सूर्य सब को प्रकाशित करता है वैसे राजा न्याय से सम्पूर्ण राज्य को प्रकाशित करे ।।५।। फिर राजा को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । स हि धीभिर्हव्यो अस्त्युग्र ईशानकृन्महति वत्रतूर्ये । स तोकसाता तनये स वज्री वितन्तसाय्यो अमवत्सम ॥६॥ पदार्थ:--हे राजन् जैसे (सः) वह (धोभिः) ज्ञान वा बुद्धियों से (हव्यः) ग्रहण करने योग्य' (महति) बड़े (वृत्रतूर्ये ) संग्राम में (ईशानकृत्) ईश्वरता करने वालों को पुरुषार्थी करने वाला (अस्ति) है और (स:) वह (तोकसाता) सन्तानों के विभाग' होने में (तनये) पुत्र के लिए (उमः) तेजस्वी और (सः) वह (हि) ही (वितन्तसाथ्यः) अत्यन्त विस्तार करने योग्य (बजी) शस्त्र हैं बाहुओं में जिसके ऐसा (समत्सु) संग्रामों में (अभवत) होता है वैसे आप करिये ॥६॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु. -राजा को चाहिये कि सब कर्म- चारियों को योग्य सिद्ध करे जिससे सर्वदा विजय होवे ॥६॥ फिर राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। स मज्मना जनिम मानुषाणाममत्येन नाम्नाति प्रसवें स्स द्युम्नेन्द स शवसोत राया सबीर्येण नृत्तमाः मोकाः ॥७॥ पदार्थ:-हे राजन जैसे यह सेवक (मज्मना) बल से (सः) वह (धुम्नेन) धन बा यश से (स:) वह (शवसा.) विशेष बल से (स.) वह (राया धन से और (उत) भी (स.) वह (वीर्येण) पराक्रम से (मानुषाणाम् ) मनुष्यों के (अमत्येन) मरणधर्म से रहित कारण से और (नाम्ना) संज्ञा से (जनिम) जन्म अर्थात् प्रकट होने को (अति, प्र, सों) अत्यन्त प्राप्त होता है वह (समोकाः) एक स्थानवाला (नृतमः) मनुष्यों के मध्य में अतिशय उत्तम होवें वैसे आप करिये ॥७॥ भावार्थ:-राजा को चाहिये कि जैसे प्रजा और राजा के जन प्रसिद्धि, बल, धन, यश और पराक्रम को प्राप्त होवें वैसे प्रयत्न करे॥७॥ Maa avan RANI कराने वाले मेघ को (पुराम ऊर्ध्वगमनार ऋग्वेदः मं०६ । सू० १८ ।। ४२५ फिर मनुष्य कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ।। स यो न मुहे न मिथू जनो भृत्सुभन्तुनामा चुरि धुनि च । वृणक् पित्रं शम्बरं शुष्णमिन्द्रः पुरां च्योत्नाय शयाय न चित् ॥८॥ पदार्थ: हे विद्वन् जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य (चमुरिम्) भोजन करने (प्रिणम्) व्याप्त होने (धुनिम्) शब्द करने (शुष्णम्) सुखाने और (शम्बरम्) सुख को स्वीकार के लिये (नू) शीघ्र (वृणक्) काटता है वैसे (च) और (यः) जो (सुमन्तुनामा) उत्तम प्रकार जानने योग्य नाम जिस का बह (जनः) मनुष्य (न) नहीं (महे) मोह को प्राप्त होता और (न) न (मिथू) परस्पर (भूत) होता है (स:) वह (चित) भी सत्कार करने योग्य है ।।८।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जैसे सूर्य मेघ का निर्माण करके और वर्षाय के बद्ध नहीं होता है वैसे ही मनुष्य धर्मयुक्त कार्यों को करके सज्जनों के साथ बर्ताव करके मोहित नहीं होते किन्तु सुखी होते हैं ॥८॥ फिर राजजन क्या करें इस विषय को कहते हैं । उदावता त्वक्षसा पन्यसा च दृत्रहत्यांब रथमिन्द्र तिष्ठः । धिष्व अनं हस्त आ दक्षिणवाभि प्र मन्द पुरुदत्र मायाः ॥९॥ पदार्थ:-हे (पुरदत्र) बहुत दान करने वाले (इन्द्र) राजन् पाप (उदावता) संग्राम के लिए (रथम्) रथ पर (प्रा) सब प्रकार से (तिष्ठ) स्थित हो और (दक्षिणमा) दहिले (हस्ते) हाथ में (वनस्) शस्त्र और अस्त्र को (धिष्य) धारण करिये (माया:) बुद्धियों को (क) और प्राप्त होकर (अभि, प्र, मन्द) सब प्रकार से प्रशंसा करिये ॥ भावार्थ:---जो उत्कृष्टता से सम्पूर्ण विषयों को जानने वाली बुद्धियों को प्राप्त होकर शस्त्र और अस्त्रों को धारण करके युद्ध के लिये जाते वे विजय को प्राप्त होते हैं ।।६।। फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । अग्निर्न शुष्क वनमिन्द्र हेती रक्षो नि चक्ष्यशनिर्न भीमा। गम्भीरय ऋष्वया यो रुरोजाध्यानय दरिता दम्भयच्च ॥१०॥ at 00 मि dow top ane भी (प्रदेव ४२६ ऋग्वेदः मं०६ । सू० १८ ।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुष्टता के नाशक राजन् (यः) जो (अग्निः) अग्नि जैसे (शुष्कम्) सूखे (वनम्) बनको (न) वैसे (रक्ष:) दुष्ट जन को (धक्षि) जलाते हो और जिन आप का (हेति:) बजे प्रशनिः) बिजुली (न) जैसे वैसे' (भीमा) जिस से जन भय करते वह सेना है उस (ऋष्वया) बड़ी (गम्भीरया) अथाह बलयुक्त सेना से आप शत्रुओं को (रोज) रोगयुक्त करते हो उस को (अध्यानयत्) कंपाते हो और (दुरिता) दुष्ट आचरणों को (च) भी (दम्भयत्) नष्ट करते हो उस से जिस कारण दुष्टजन को (नि) अत्यन्त जलाते हो इससे अपराजित हो ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे राजा आदि जनो ! जैसे अग्नि ज्वाला से सूखे और गीले भी वन को जलाता है वैसे उत्तम प्रकार शिक्षित तथा बड़ी सेना से शत्रुओं को भय करिये और शत्रुओं को जलाइये ॥१०॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं। आ सहस्रं पथिभिरिन्द्र राया तुविद्युम्न तुविवाजेभिरर्वाक् । याहि सूनो सहसो यस्य न चिददेव योतोः॥११॥ पदार्थ:-है (तुविध म्न) बहुत प्रशंसा से युक्त (पुरुहूत) बहुतों से आह्वान किये गये (सहसः) बलवान् के (सनो) पुत्र (इन्द्र) दुष्टता के नाशक राजन् पाप (पथिभिः) मागों (राया) धन और (तुविवाजेभिः) बहुत वेग वा बहुत संग्रामों के साथ (अर्वाक्) पीछे से (सहस्रम्) अनेकों को (आ) सब ओर से (याहि) प्राप्त हूजिये और (यस्य) जिस (योतो:) मिश्रित और अमिश्रित करने वाले का (चित्) होमो ॥११॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप विद्या और विनय के मार्ग से प्रजात्रों का पिता के सदृश पालन करके यशस्वी होकर सत्य और असत्य का यथावत् निर्णय करिये ॥११॥ फिर कौन शत्रुवाला होता है इस विषय को कहते हैं । प तुविद्यम्नस्य स्थविरस्य घृष्वेदिवो ररप्शे महिमा पृथिव्याः । नास्य शत्रन प्रतिमानमस्ति न प्रतिष्ठिः पुरुमायस्य सह्यो। ॥१२॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जिस (तुविद्य म्नस्य) बहुत प्रशंसारूप धन से युक्त (स्थविरस्य) विद्या और अवस्था से वृद्ध (घृण्वः) दुष्टों के घिसने वाले (दिवः) ईशे पुरुहूत - Rom BAR 4ARNA (गुणानः) स्तुति का जन के और (तन्वे) शरीर के लिए (वरिवः) सेवन की ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १८ ॥ ४२७ सुन्दर (पुरुमायस्य) बहुत श्रेष्ठ कर्मों में बुद्धि जिसकी उस (सह्योः) सहनशील का (महिमा) महत्त्व (पृथिव्याः) भूमि से (प्र, ररप्शे) अलग फैलता है (अस्य) इसका (न) न (शः) वैरी (न) (प्रतिमानम्) मान वा सादृश्य और (न) न (प्रतिष्ठिः) प्रतिष्ठित (अस्ति) है ॥१२॥ भावार्थ:-जो विद्या में वृद्ध, अमित प्रशंसा और महिमा वाले, सत्य की कामना करते हुए, बहुत बुद्धिमान् और शम दम आदि गुणों से युक्त होवें उनका कोई भी शत्रु न बराबर और न उनसे अधिक प्रतिष्ठित होता है ॥१२॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । म तत्ते अद्या करणं कृतं भूत्कुत्सं यदायुमतिथिग्वमस्मै । पुरू सहस्रा नि शिशा अमि क्षामुत्तयाणं धृषता निनेथ ॥१३॥ पदार्थ:-हे राजन! (यव) जिस (कुत्सम्) वज्र के सदृश दृढ़ (अतिथिग्वम्) अतिथियों को प्राप्त होने वाले (प्रायम्) जीवन को (प्रस्म) इस के लिए श्राप (उत्) (निनेथ) उन्नति प्राप्त करिये जिस (धृषता) दृढ़त्व से (तूर्वयाणम्) शीघ्रगामी वाहन जिसका उस (क्षाम्) पृथिवी को (पुरू) बहुत (सहला) हजारों की (अभि) चारों ओर से (नि, शिशा:) शिक्षा दीजिये (तत्) वह (ते) आप का (अद्या) आज (करणम्) साधन (कृतम्) किया गया (प्र, भूत्) होवे ॥१३॥ भावार्थ:-जहां राजा आदि जन अधिक अवस्था वाले, अतिथि जनों के सेवक, पक्षपात का त्याग करके प्रजा के पालक हैं वहां सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं ॥१३॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। अनु त्वाहिघ्ने अध देव देवा मदन्विश्वे कवितमं कवीनाम् । करो यत्र वरिवो बाधिताय दिवे जनाय तन्वें गृणानः ||१४॥ पदार्थ:-हे (देव) विद्वन् (यत्र) जहाँ (बाधिताय) विलोडित हुए (विवे) (गणानः) स्तुति करता हुआ जन (करः) कार्यों को करने वाला है वहां (अहिघ्ने) मेघ को नष्ट करने वाले सूर्य के लिए जैसे वैसे जिस (कवीनाम्) विद्वानों के मध्य में (कवितमम्) अत्यन्त विद्वान् (त्वा) आप को (विश्वे) सब (देवा:) विद्वान् जन (अनु, मदन्) भानन्दित करते हैं उन आप का प्राश्रयण करके (अध) इसके अनन्तर हम लोग सुखी होवें ॥१४॥ KARAN PMORE CHANA ४२८ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १६ ॥ ma PERS भावार्थः---इस मंत्र में वाचकलु०-जो मनुष्य उत्तम, यथार्थवक्ता, विद्वानों का उत्तम प्रकार सेवन कर विद्याओं को प्राप्त होकर अन्यों को जनाते हैं वे प्रसन्न होते हैं ॥१४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अनु द्यावापृथिवी तत्त ओजोऽमा जिहत इन्द्र देवाः। कृष्णा कृत्नो अकृतं यचे अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यः ॥१५॥ पदार्थ:-हे (कृलो, करने वाले (इन्द्र) राजन् (ते) आप के समीप से जो (अमयाः) साधारण मनुष्यों के स्वभाव से बिलक्षण स्वभाव वाले (देवाः) विद्वान् जन (यत्) जो (प्रकृतम्) नहीं किया गया कर्म और (नवीयः) अतिशय नवीन वचन (उक्यम्) कहने योग्य (अस्ति) है (तत्) उस (ते) आप के वचन को (जिहते) प्राप्त होते और (द्यावापृथिवी) भूमि और सूर्य को (अन) पश्चात् प्राप्त होते हैं उनको आप (यजः) मेल करनेरूप व्यवहारों से (जनयस्व) प्रकट कीजिये और (प्रोजः) पराक्रम को (कृष्वा) करिये ॥१५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग भूमि और बिजुली आदि की विद्या से नवीन नवीन कार्य को सिद्ध करिये ॥१५॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में अठारहवां सूक्त समाप्त हुभा ॥ अथ प्रयोदशस्यकोनविंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता।१।३। १३ भुरिक्पङ्क्तिः। ६ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। २।४।६। ७ निचत्रिष्टुप् । ५ । १० । ११ । १२ विरात्रिष्टुप् छन्दः । त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब तेरह ऋचावाले उन्नीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में अब सूर्य कैसा है इस विषय को कहते हैं । महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विवहीं अमिनः सहोभिः । अस्मद्यग्वावृधे बीयाँयोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत् ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (महान्) बड़ा (इन्द्रः) सूर्य (चर्षणिप्रा:) मनुष्यों Me और ( Sota HAIN bile 40 (बृहन्तम्) पृथिवी के समीप से अतिविस्तीर्ण (ऋष्वमा । जाने वाले (अजरम/ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १६ ॥ ४२६ में बिजुलीरूप से व्याप्त होने (उत) और (द्विबह::) अन्तरिक्ष और वायु से बढ़ने (अमिनः) नहीं हिंसा करने वाला (अस्मा क) हम लोगों के सम्मुख हुमा (उरु:) बहुत (पृथः) विस्तीर्ण (सुकृतः) उत्तम प्रकार उत्पन्न किया गया (भूत) हो तथा (सहोभिः) बलों और (कर्तृभिः) कर्म करनेवालों के साथ (वीर्याय) पराक्रम के लिए (नषद) मनुष्य जैसे वैसे (मा, वावृध) सब ओर से बढ़ता है उस को जान कर इष्टसिद्धि करिये ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है- जैसे मित्र मित्र के साथ कार्य की सिद्धि के निमित्त प्रयत्न करता है वैसे ही ईश्वर से निर्मित बिजुली वा सूर्य सम्पूर्ण कर्मकारियों का सहयोगी होता है ॥१॥ मनुष्यों को किस प्रकार से उन्नति करनी चाहिए इस विषय को कहते हैं । इन्द्रमेव धिषणा सातये धाबृहन्तमृष्वमजरं युवा॑नम् । अपाळ्हेन शवसा शूशुवांस सघश्चियो वावृधे असामि ॥२॥ पदार्थः---(यः) जो (धिषणा) बुद्धि वा कर्म से (सातये) संविभाग के लिए वस्था से रहित (युवानम्) युदाजन को जैसे वैसे (अपाळ हेन) शत्रुओं से नहीं सहने योग्य (शवसा) बल से (शूशवांसम्) व्याप्तिमान् (हन्नम्। सूर्य के सदृश अत्यन्त ऐश्वर्य वाले को (धात्) धारण करता है वह (एव) ही (सधः) शीघ्र (श्रलामिअत्यन्त (चित्) निश्चित (वावृधे) वृद्धि को प्राप्त होता है ।।२।। भावार्थ:---जैसे बड़े मित्र को प्राप्त होकर मनुष्य वृद्धि को प्राप्त होते हैं वैसे ही बिजुली की विद्या को प्राप्त होकर अतुल वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥२॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं। पृथू करना बहुला गर्भस्ती अस्मद्रय१ क्सं मिमीहि श्रवासि । यूथे पश्वः पशुपा दमूना अस्माँ इन्द्राभ्या वृत्स्वाजौ ।।३।। पदार्थः - हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले न्याय के ईश ! जो आप के (पृथ) विस्तीर्ण (करना) जो करने वालों को शुद्ध करने वाले (बहुला) जिन से बहुतों को ग्रहण करते वे (गभस्ती) दोनों हाथ वर्तमान हैं उन दोनों से (पशुपाः) पशुनों के रखने वाले (पश्व:) पशु के (यूथेव) समूह जैसे वैसे (अस्मा क) हम लोगों की सेवा करने वाले होते हुए (श्रवांसि) अन्नों वा श्रवणों का (सम्, मिमोहि) उत्तम प्रकार ग्रहण करिये और (दमूनाः) इन्द्रियों का निग्रह करने वाले हुए (प्राजौ) पदक ON abindaashakRIDHARRIANATAND ऋग्वेदः म०६ । सू० १६।। क MAN More छाया सङग्राम में (अस्मान्) हम लोगों के (अभि) चारों ओर से (मा, ववृत्स्थ) अच्छे प्रकार वर्ताव करिये ॥३॥ भावार्थ:-इस मंत्र में उपमालं०-वे ही लक्ष्मीवान् होते हैं जो आलस्य का त्याग करके सदा सत्कर्म के लिये प्रयत्न करते हैं और जैसे पशुओं के पालने वाले पशुओं का पालन करके समृद्ध अर्थात् धनवान् होते हैं वैसे ही पुरुषार्थी जन दारिद्रय का विनाश करके धन के स्वामी होते हैं ॥३॥ फिर मनुष्य कैसे होवें इस विषय को कहते हैं । तं व इन्द्र चतिनमस्य शाकैरिह नूनं वाजयन्तो हुषेम । या चित्पूर्वं जरितारं आसुरनैया अनवद्या अरिष्टाः ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यथा) जैसे' (इह) इस संसार में (पूर्व) प्राचीन (अनेद्याः) नहीं निन्दा करने योग्य (अनवद्याः) प्रशंसनीय (अरिष्टाः) नहीं हिसित (जरितारः) स्तुति करने वाले (प्रासुः) होते हैं वैसे (चित्) भी (अस्य) इस के (शाकैः) सामर्थ्य विशेषों से (तम्) उस ( (चतिनम्) अानन्द और (इम्) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले को तथा (व:) तुम लोगों को (नूनम्) निश्चित (वाजयन्तः) जनाते हुए हम लोग (हुवेम) ग्रहण करें ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं० हे मनुष्यो ! जैसे प्रशसा करने योग्य यथार्थवक्ता पुरुष धर्मयुक्त कर्मों में वर्ताव करके कृतकृत्य होते हैं वैसे ही वर्ताव करके सब मनुष्य कृतकार्य होवें ॥४॥ फिर मनुष्यों को कैसा होना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। धृतव्रतो धनदाः सोम॑द्धः स हि वामस्य वसुंना पुरुक्षुः । संजग्मिरे पथ्या३' रायो अस्मिन्त्समुढे न सिन्धवो यादमानाः ॥५॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जिस को (अस्मिन्) इस व्यवहार में (यादमाना:) चारों ओर से जाती हुई (सिन्धवः) नदियों (समुद्र) समुद्र में (न) जैसे वैसे (पथ्याः) मार्ग में श्रेष्ठ (रायः) धन (सम्, जग्मिरे) प्राप्त होते हैं (सः, हि) वही (धृतवतः) धारण किये कर्म जिसने वह (सोमवृद्धः) ऐश्वर्य वा ओषधि से बढ़ा हुआ (धनदाः) धन का देने वाला (पुरुक्षुः) बहुत अन्न से युक्त (वामस्य) प्रशंसा करने योग्य (वसुनः) धन का स्वामी होता है ।।५।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.-जैसे नदियां वेग से समुद्र को - m (जिगीवांस:) जीतने वाले (त्वोताः) आप मदः) आनन्द है (येन) जिस से ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १६ ॥ ४३१ प्राप्त होकर स्थिर होती हैं वैसे ही धार्मिक तथा उद्योगी पुरुष की लक्ष्मी सेवा करती हैं ॥५॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । शविष्ठं न आ भर शूर शव अोजिष्ठमोजो अभिभूत उग्रम् । विश्वा द्युम्ना वृष्ण्या मानुषाणामस्मभ्यं दा हरिवो मादयध्यै ॥६॥ पदार्थ:-हे (हरिवः) प्रशंसनीय मनुष्यों वाले (भूर) भयरहित (अभिभूते) दुष्टों के अभिभव करने वाले आप (नः) हम लोगों को और (शविष्ठम्) अतिशय बलिष्ठ (उनम्) तीन (प्रोज:) प्राणधारण को और (श्रोजिष्ठम्) अत्यन्त पराक्रम- युक्त (शवः) बल' को (मा, भर) सब प्रकार से धारण करो और इससे (मानुषाणाम्) मनुष्य जाति में वर्तमानों के सम्बन्ध में (विश्वा) सम्पूर्ण (वृष्ण्या) उत्तम जनों के लिये हितकारक (धम्ना) प्रकाशित यशों वा धनों को (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिए (मादयध्ये) आनन्द देने को (दाः) दीजिये ॥६॥ भावार्थः । हे राजन् ! आप राज्य के पालने योग्य गुणों को धारण कर के न्याय से राज्य का पालन करिये ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। यस्ते मदः पृतनापाळमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवासम् । येन तोकस्य तनयस्य सातौ मसीमहि जिगीवांसस्स्वोताः ॥७॥ पदार्थः हे (इन्द्र) राजन् (ते) पाप का (य:) जो (अमृधः) नहीं हिंसा (तनयस्य) सुकुमार के (सातौ) संविभाग में रक्षा और विद्यादान को (मंसीमहि) जानें और आप (तम्) उस (शूशुवांसम्) श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त को (नः) हम लोगों के लिए (श्रा, भर) सब प्रकार से धारण करिये ॥७॥ भावार्थ:-हे प्रजाजनो! आप लोग राजा के प्रति यह कहो कि हम लोगों के सन्तान जिस प्रकार उत्तम शिक्षित हों वैसे नियमों को करिये जिससे विजय और आनन्द बढ़े ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। आ नो भर वृषणं शुष्ममिन्द्र धनस्कृतं शूशुवांस सुदक्षम् । येन बंसोम पृतनासु शत्रन्तवोतिर्मिरुत जामीरजामीन ॥८॥ *uote to REA weta May

४३२
ऋग्वेदः म० ६ । सू० १६ ॥
ENA
CARSA
पदार्थ:--हे (इन्द्र) दुष्टों के बलनाशक आप (न:) हम लोगों के लिए
(वृषणम्) शत्रुओं के सामर्थ्य को रोकने वाली (शुष्मम्) सेना और (धनस्पृतम्) धन
को पूरण करते जिससे उस (शशुवांसम्) शुभ गुण व्यापिनी (सुदक्षम्) उत्तम बल
की चतुराई को (प्रा) सब अोर से' (भर) धारण करिये येन) जिस' से हम लोग
(तव) आपके (अतिभिः) रक्षण प्रादिकों से (जामीन्) सम्बन्धी बन्धु आदिकों का
(उत) और (अजामीन्) असम्बन्धी दुष्ट (शत्रून्) शत्रुओं का (पृतनासु) मनुष्यों की
सेनामों में (वंसाम) विभाग करें ॥८॥
भावार्थ:--राजाओं को चाहिये कि ऐसा प्रयत्न करें जिससे मित्र और
शत्रु पृथक्-पृथक् प्रतीत होवें और वैसी ही सेना रखनी चाहिये जिससे
शत्रु नष्ट होवें ॥८॥
फिर सम्पूर्ण जनों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
आ ते शुष्मा वृषभ एंतु पश्चादोत्तरादधरादा पुरस्तात् ।
आ विश्वतो अभि समत्वर्वाङिन्द्र द्युम्नं स्वर्वद्धेह्यस्मे ।।९।।
पदार्थः -- हे (इन्द) अत्यन्त ऐश्वर्य के करने वाले जैसे (अस्मे हम लोगों के लिए
(पश्चात् । पीछे से (स्वत) बहुत प्रकार सुख विद्यमान जिस में उस (युम्नम् ) प्रकाश-
स्वरूप यश वा धन को (एतु प्राप्त हूजिये और (उत्तरात्) बाई ओर से बहुत प्रकार
सुख जिस' में उस प्रकाशस्वरूप यश वा धन को (आ) सब ओर से प्राप्त हूजिये
और (अधरात) नीचे से बहुविध सुखं वाले प्रकाशस्वरूप यश वा धन को (आ) सब
ओर से प्राप्त हूजिये तथा (विश्वतः) सब ओर से प्रकाशस्वरूप यश वा धन के
(प्रा) सब प्रकार से (अभि, एतु) से
सम्मुख' हूजिये और (अर्वाङ्) नीचे से बहुत सुख-
वाले सम्पूर्ण प्रकाशस्वरूप यश वा धन को (सम्) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये तथा
(पुरस्तात) आगे से बहुत प्रकार सुख जिस में उस प्रकाशस्वरूप यश वा धन को
अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये वैसे (ते) आप का (शुष्मः) उत्तम बलयुक्त (वृषभः)
बलिष्ठ (भा) सब ओर से प्राप्त होवे और आप हम लोगों के लिए इसको (धेहि)
धारण करिये ॥
भावार्थ:-हे राजा और प्रजाजनो ! जैसे सब दिशानों से सम्पूर्ण
जनों को सुख और यश प्राप्त होवें वैसे यत्न का अनुष्ठान करिये ॥६॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
नृवत्त इन्द्र नृतमाभिरूती वसीमहि वामं श्रीमतेभिः ।
ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्धा रत्नं महि स्थूरं बृहन्तम् ॥१०॥

ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १६॥ वृद्धि करें पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले (राजन) विद्या प्रौर विनय से प्रकाशमान जैसे हम लोग (ते) आप के नृतमाभिः) अति उत्तम मनुष्य विद्यमान जिन में उन (ऊती) रक्षण आदिकों से (नृवत्) मनुष्यों के तुल्य (बामम्) प्रशंसा करने योग्य कर्म का (वंसीमहि) विभाग करें और (श्रीमतेभिः) सुनाने योग्य वचनों से (उभयस्य) दोनों राजा और प्रजा में वर्तमान (वस्वः) धन का (ईक्षे) मैं दर्शन करता हूं वैसे आप (बृहन्तम्) बड़े (महि) आदर करने योग्य (स्थूरम्) स्थिर (रत्नम्) सुन्दर धन को (हि) ही (धाः) धारण करिये ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-राजजनों तथा प्रजाजनों और राजा को चाहिये कि प्रयत्नों से प्रशंसित विद्या और बहुत धन की निरन्तर ॥१०॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । मरुत्वन्तं वृषभं वांधानमकवारिं दिव्यं शालमिन्द्रम् । विश्वासाइमवसे नूतनायोग्रं सहोदामिह त हुदैम ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो हम लोग (इह) इस राज्यकर्म में जिस को (नूतनाय) नवीन (अवसे) रक्षण प्रादि के लिए (मरुत्यन्तम्) श्रेष्ठ मनुष्य विद्यमान जिस के उस (वृषभम्) अतिश्रेष्ठ पूर्णबल वाले (वावृधानम्) अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त होते हुए (अकवारिम्) नहीं विद्यमान हैं शब्द करते हुए शत्रु जिस के उस (दिव्यम्) सुन्दर (शासम्) पक्षपात का त्याग करके शासन करने बाले (विश्वासाहम् ) सम्पूर्ण कष्ट को सहने वाले (उग्रम्) ते तेजस्वी (सहोदाम्) बल देने वाले (इन्द्रम् ) शरीर आत्मा और राजशोभा से अत्यन्त शोभित का (हुवेम) हम स्वीकार करें (तम्) उसका आप लोग भी आह्वान कर स्वीकार कीजिये ॥११॥ भावार्थ:-- राजजनों और प्रजाजनों को चाहिये कि सब के रक्षण के लिये सब से उत्तम गुण कर्म और स्वभाव वाले राजा का स्वीकार करें और वह राजा सब की सम्मति से सत्य न्याय का निरन्तर आचरण R मय asia करे ॥११॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। जनै वज्रिन्महि चिन्मन्यमानमेभ्यो नृभ्यो रन्धया येष्वस्मि । अधा हि त्वां पृथिव्यां शूरसातौ इवामहे तनये गोष्वप्सु ॥१२।। पवार्थ:-हे (वचिन्) अच्छे शस्त्र और प्रस्त्र के धारण करने वाले राजन् Mada * KHANISEDMINISARHASNA ऋग्वेदः मं०६ । सू०१६ ॥ आप (एभ्य.) इन (नृभ्यः) उत्तम प्रकार शिक्षित अग्रणी मनुष्यों के लिए उस (महि) महान् (मन्यमानम्) अभिमान करने वाले (जनम्) मनुष्य का (रन्धया) नाश करिये और (श्रधा) इस के अनन्तर (येषु) जिन के निमित्त (शूरसातौ) शूर वीर विभक्त होते हैं जिस संग्राम में उस' में (अस्मि) हूं उसकी रक्षा कीजिये (हि) जिससे (पृथिव्याम्) विस्तीर्ण भूमि में (गोष) पृथिवियों वा धनों में और (अप्सु) जलों वा प्राणों में (तनये) सन्तान के लिये जिन (त्वा) आपको (हवामहे। स्वीकार करते हैं वह आप (चित्र) भी हम लोगों का सत्कार कीजिये ॥१२॥ भावार्थ:-हे राजसम्बन्धी जनो ! जो मिथ्या अभिमान करने वाला जन श्रेष्ठ पुरुषों को पीड़ा देवे उसको दण्ड दीजिये और युद्धविद्या से सम्पूर्ण जनों का रक्षण करिये जिससे भूमि में आप लोगों की प्रशंसा प्रसिद्ध होवे ॥१२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वयं ते एभिः पुरुहूत सख्यैः शोशनोरुत्तर इत्स्याम । घ्नन्तों वृत्राण्युभयोनि शुर राया मदेम बृहता त्वोताः ॥१३॥ पदार्थ:-हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसित (शूर) वीर राजन् (वयम्) हम लोग (ते) आपके (एभिः) इन वर्तमान पहिले कहे गये और उत्तरों से प्रतिपादित (सख्यः) मित्र के कर्मों से (शत्रोःशत्रोः) शत्रु शत्रु की सेनाओं का (घ्नन्तः) नाश करते हुए (उत्तरे) विजय के अनन्तर समय में (स्याम) प्रकट होवें और (उभयानि) राजा और प्रजाजन में वर्तमान (वृत्राणि) धनों को प्राप्त होकर आपकी (पृहता) बड़ी (राया) राज्यलक्ष्मी से तथा (त्वोताः) आप से पालना किये हुए (इत्) ही (मदेम) आनन्द को प्राप्त होवें ॥१३।। भावार्थ:-जो राजा और राजप्रजाजन मित्र के सदृश होवें तो सम्पूर्ण शत्रुओं को जीत कर बड़ी राज्यलक्ष्मी से प्रकाशित होवें ॥१३॥ इस सूक्त इन्द्र, राजा और प्रजाजनों के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में उन्नीसवां सूक्त समाप्त हुआ। में RAO Khapa 24 BHA N जलों के (बविवासना विभाग करते हुए (वत्रमा ऋग्वेदः मं०६ । सू० २० ।। awari अथ त्रयोदशर्चस्य विशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्त्रो देवता । १ श्राय॑नुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः। २।३ । ७। १२ पङ्क्तिः । ४! ६ भुरिकपक्तिः । १३ स्वराट्पङ्क्तिः । १० निवृत्पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ५।८।९।११ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब तेरह ऋचा वाले बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मंत्र में अब मनुष्यों को किस की इच्छा करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं । द्यौर्न य इन्द्राभि भूमार्यस्तस्थौ रयिः शवसा पुत्सु जनान् । तं नः सहस्रभरमुर्वरासां दद्धि सूनो सहसो वृत्रतुरम् ॥१॥ पदार्थ:-हे (सहसः) बल' से (सुनो) श्रष्ठ पुत्र (इन्द्र) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त (यः) जो (धौः) बिजुली या सूर्य के (न) समान प्रकाशित (रयि:) धन है इसका (अर्य:) स्वामी (शवसा) बल से (पृत्स) संग्रामों में (जनान्) मनुष्यों के प्रति (अभि) सन्मुख (तस्थौ) वर्तमान होवे (तम्) उस (सहस्रारम्) असंख्य को धारण करने वाले (तुरम्) जैसे' मेघों को वैसे शत्रुओं का नाश करता है जिससे उस तथा (उर्वरासाम्) बहुत श्रेष्ठ भूमियों में श्रेष्ठ विजय को (नः) हम लोगों के लिये (दद्धि) दीजिये जिससे हम लोग लक्ष्मीवान् (भूम) होवें ॥१॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य बिजुली के सदृश पराक्रमी और सूर्य के सदृश प्रतापयुक्त हुए संग्रामों में साहसिक होवें वे विजयवान् होवें ॥१॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । दिवो न तुभ्यमन्दिन्द्र सत्रासुर्य देवेमिर्धायि विश्वम् । अहिं यत्रमपो वंद्रियांसं हन्नृजीषिन् विष्णुना सचानः ॥२॥ पदार्थ:---हे (ऋजीषिन्) सरल धर्म से युक्त (इन्द्र)राजन् जैसे सूर्य (विष्णुना) व्यापक जगदीश्वर वा बिजुली से (सचानः) मिलने वाला (यत्) जिसको (अपः) मेघ को (हन्) नाश करता है वैसे (देवेभिः) विद्वानों से (तुभ्यम्) आप के लिये (सत्रा) सत्य से (दिवः) कामना करते हुए (न) जैसे वैस (विश्वम्) सम्पूर्ण (असूर्यम्) मूर्ख पापी जनों का ऐश्वर्य (अनु, धायि) पीछे धारण किया जाता है ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य पाठ मा ऋग्वेदः मं०६ । सू० २० ।। महीने में जल के रसों को आकर्षण के द्वारा हरण करके चातुर्मास्य में वर्षाता है वैसे ही राजा आठ महीने करों को ग्रहण कर अभय की वृष्टि करके प्रजा का पालन करे ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । तन्नोजीयान् तबसस्तीयान् कृतब्रह्मेन्द्रो वृद्धमहाः । राजाभवन् मधुनः सोम्यस्य विश्वासां यत्पुरां दुर्लुमावत् ॥३॥ पदार्थः-हे मनुष्यो (यव) जो शत्रुओं का (तूर्वन्) नाश करता हुमा (ोजी- यान्) अतिशय पराक्रमयुक्त जन (तधसः) बल का (तबीयान) अत्यन्त प्रशंसित (कृतब्रह्मा) किया धन वा अन्न जिसने वह (वृद्धमहाः) बड़े सहायक जिसके ऐसा (इन्द्रः) ऐश्वर्य का बढ़ाने वाला (राजा) प्रकाशमान राजा (अभवत्) होवे और (सोम्यस्य) रस आदिकों में हुए (मधुनः) मधुर आदि गुणों से युक्त और (विश्वासाम्) सम्पूर्ण (पुराम्) नगरियों के (दम्) नाश करने वाले की (प्रावत) रक्षा करे उसी को राजा करिये ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो पराक्रमी, बली जनों में बली, विद्वानों में विद्वान्, वृद्ध जनों में वृद्ध और जीतते हुए भृत्यों का सत्कार करने वाला होवे उसी को राज्य मे अभिषिक्त करके सुखी हूजिये ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । शतैरपद्रन्पणय इन्द्रात्र दशोणये कवयेऽर्कसातौ । वधैः शुष्णस्याशुषस्य मायाः पित्यो नारिरेचीतिक चन म ॥४॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अन्न देने वाले राजन् आप जो (पणयः) व्यवहारों के जानने वाले (शतः) सौ संख्या से परिमित वा असंख्य (वधैः) वधों से (अत्र) इस राजव्यवहार में (अपद्रन) नहीं द्रवित होते हैं और (अकसातौ) अन्न आदि के विभाग में (शोणये) दश न्यून जिससे उस (कवये) विद्वान् के लिये (अशुषस्य) शोषण से रहित (शुष्णस्य) बलिष्ठ की (मायाः) बुद्धियों को (पित्वः) अन्न आदि (किम्, चन) कुछ भी (न) नहीं (प्र, अरिरेचीद) अच्छे प्रकार अलग करता है उनका सत्कार करिये अर्थात् प्रशंसा करिये ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो धर्ममार्ग का त्याग करके उन्मार्ग में चलते हैं उनको राजा नित्य दण्ड देवे और जो दश इन्द्रियों से अधर्म का त्याग करके धर्म का आचरण करते हैं उनका निरन्तर सत्कार करे ॥४॥ ( ऋग्वेदः मं०६ । सू० २० ॥ ४३७ Statu Paw -- HD on फिर उसी विषय को कहते हैं । महो द्रहो अपं विश्वायु धायि वर्जस्य यत्पतने पादि शुष्णः । उरु ष सरथं सारथये करिन्द्रः कुत्लाय सूर्यस्य सातौ ॥५॥ पदार्थः-हे राजन् पाप से (वनस्य) शस्त्र और अस्त्रविशेष के पतने) गिरने में जो (द्रुहः) द्रोह करने वालों को (अप, पादि) दूर करे जिससे (महः) अत्यन्त (विश्वायु) सम्पूर्ण जीवन (धायि) धारण किया जाय और (यत्) जो (इन्द्रः) शत्रुओं का नाशक सेना का स्वामी (सारथये) वाहन चलाने वाले के लिये (सरथम्) वाहन के सहित वर्तमान को (सूर्यस्य) सूर्य के (सातौ) उत्तम प्रकार विभाग में (कुत्साय) बन के प्रहार के लिये (उरु) बहुत (कः) करे (सः) बहा (शुष्णः) बलिष्ठ का सम्बन्धी सत्कार करने योग्य है ।।५।। भावार्थ:--राजा को चाहिये कि द्रोह आदि दोषों का त्याग करके ब्रह्मचर्य आदि से सम्पूर्ण जनों को अधिक अवस्था वाले करके रथ आदि सेना के अंगों को सूर्य के तुल्य प्रकाशित करके सत्य और असत्य के विभाग से प्रजाजों का पालन करे ॥५॥ फिर राजा को किसका निषेध करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। प्र श्येनो न मंदिरमंशुमस्मै शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन् । पावन्नमी साययं ससन्त पृणग्राया समिषा सं स्वस्ति ।।६।। पदार्थ:-जो राजा (मदिरम्) मादक द्रव्य और (अंशुम्न्) वैद्यकविद्या की रीति से विभाग किये गये का सेवन करते हुए और (नमुचे:) नहीं करने वाले (दासस्य) सेवक के (शिरः) मस्तक को (श्येनः) वाज पक्षी (न) जैसे वैसे (प्र, मथायन्) अत्यन्त मथन करता हुआ (अस्म) इसके लिये कठिन शिष्य को (नमीम नम्र (साययम्) कर्म के अन्त करने वाले को (ससन्तम्) सोते हुए को करके (र, पावत) रक्षा करे और (राया) धन से (स्वस्ति) सुख को (सम्, पृणक् ) उत्तम प्रकार पूर्ण करता है तथा (इषा) अन्न प्रादि से सुख को (सम्) अच्छे प्रकार पूर्ण करता है वह सम्राट होने के योग्य होवै ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.- राजाओं का यह उचित कर्म है कि जो मादक द्रव्य का सेवन करें उनको अत्यन्त दण्ड देके, यथायोग्य सत्कार से अप्रमादियों का सत्कार करें, चे साम्राज्य करने को योग्य होवें॥६॥ an- .- AR 0 ४३८ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० २० ॥ JAB फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । वि पिप्रोरहिमायस्य हळ्हाः पुरो वज्रिन्छवसा न दर्दः । सुदामन्तद्रेणो अप्रमृष्यमृजिवने दात्रं दाशुषे दाः ॥७॥ पदार्थः - है (वज़िन्) शस्त्र और अस्त्रों को धारण करने वाले (सुदामन्) उत्तम प्रकार से दाता राजन् आप (महिमायस्थ) मेघ का ढांप लेना जैसे वैसे कपटता जिसकी उस (पिप्रोः) व्यापक की (हळ हाः) दृढ़ (पुरः) नगरियों को (शवसा) बल से (न) नहीं (वि, दर्दः) विशेष नष्ट कीजिये और जो (अप्रमृष्यम्) नहीं सहने योग्य (दात्रम्) दान को (ऋजिश्वने) सरलता आदि गुणों के बढ़ानेवाले (दाशुषे) दान देने योग्य पुरुष के लिए (दाः) दीजिये (तत्) उस (रेक्णः) धनदान को हम लोगों के लिये भी दीजिये॥७॥ भावार्थ:-राजा को चाहिये कि छल आदि का त्याग कर और अपने नगरों को करके कभी छेदन न करे और सुपात्र के लिये दान दे और कुपात्र का तिरस्कार करे ॥७॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं। स वेतसुं दर्शमायं दशोणिं तूतु जिमिन्द्रः स्वभिष्टिसुम्नः । आ तुग्रं शश्वदिभं द्योतनाय मातुन सीमुप॑ सृजा इयध्यै ॥८॥ पदार्थ:-हे राजन् जो (स्वभिष्टिसुम्नः) उत्तम प्रकार अभीष्ट सुखबाले (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त राजा (सः) वह आप (योतनाय) प्रकाश के लिये (वेतसम्) व्यापनशील' (दशमायम्) दश अंगुलियों के तुल्य प्रमाण जिस का उस (दशोणिम्) दश प्रकार से परित्याग जिसका और (तूतुजिम्) बल' से युक्त (तुग्रम्) ग्रहण करने वाले (इभम्) हाथी को (इयध्यै) प्राप्त होने के लिये (मातुः) माता से (न) जैसे वैसे (सीम्) सब ओर से (शश्वत) निरन्तर (मा, उप, सृजा) समीप प्रकट कीजिये ॥८॥ भावार्थ:-वही राजा धनवान् होवे कि जो दश इन्द्रियों से उत्तम कर्म और विज्ञान को बढ़ा के अभीष्ट सुख की निरन्तर उन्नति करे और माता के सदृश प्रजात्रों का पालन करे ॥८॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। सई स्पृधों बनते अप्रतीतो बिभ्रद्वन्ने वृत्रहणं गर्भस्तौ । तिष्ठद्धरी अध्यस्तैव गर्ने वचोयुजो वहत इन्द्रमृष्वम् ॥९॥ Help wa - में हुए आप उनसे स्तुति करिये पारस ऋग्वेदः मं.६ । सू० २० ॥ पदार्थ:--- (सः) वह प्रताप से युक्त राजा (वृत्रहणम्) जिस से मेघ का नाश करता है उस (वज्रम्) वज्र को (गभस्तो) किरण में सूर्य जैसे वैसे (बिभ्रत) धारण करता हुआ (अप्रतीतः) शत्रुओं से नहीं जाना गया (स्पृधः) स्पर्धा करते हैं जिनमें उनका और (ईम्) जल का (वनते) सेवन करता है और (हरी) घोड़े जैसे धारण और आकर्षण को वैसे वा (अस्तेय) प्रेरणा करने वाला सारथि जैसे वैसे (ग) गृह में (अधि, तिष्ठत्) स्थित होता है वैसे आप जो (वचोयुजा) वचन से युक्त करते वे दोनों (ऋष्यम्) बड़े (इन्द्रम्) बिजुली के सदृश राजा को (वहतः) पहुंचाते हैं उन को वाहनों में युक्त करिये ॥६॥ भावार्थ:-राजा सदा ही अपने विचार को छिपावे जब कार्य सिद्ध होवे तभी लोग प्रकट जानें और शस्त्रों को धारण कर सेनाओं को उत्तम प्रकार शिक्षा देकर बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होवे ॥६॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । सनेम तेऽवसा नव्य इन्द्र भ पूरवः स्तवन्त एना यज्ञैः । सप्त यत्पुरः शर्म शारदीर्दईन्दासी पुरुकुत्साय शिक्षन् ॥१०॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य और सुख के देने वाले (ते) पाप के (अवसा) रक्षण प्रादि से हम लोग (सप्त) सात (पुरः) नगरियों का (सनेम) विभाग करें और जैसे (पूरवः) मनुष्य (एना) इस (अवसा) रक्षण' आदि से और (यज्ञः) श्रेष्ठ व्यवहाररूप यज्ञों से (स्तवन्ते) स्तुति करते हैं इससे (नव्यः) नवीनों शरत्काल में हुई (बासीः) सेविकाओं को प्राप्त होके (पुरुकुस्साय) बहुत शस्त्रवाले के लिए (शिक्षन्) शिक्षा देता हुआ दुःखों को (प्र, दत) नष्ट करता है और शत्रुओं को (हन्) मारता है वह सब से सत्कार करने योग्य है ॥१०॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे राजा विनय से वर्तमान है वैसे ही सब वर्तमान होवें और पुरुषार्थ से सुन्दर पुरों का निर्माण करके उन सब ऋतुओं में सुख देने वालों में निवास करते हुए दुःखों को दूर फेकें ॥१०॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । त्वं वृध इन्द्र पूर्यों भूर्वरिवस्यन्नुशने काच्यार्य । परा नववास्त्वमनुदेय महे पित्रे दंदाथ स्वं नपतिम् ॥११॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (पूर्य:) प्राचीनों से किये गए विद्वान् (त्वम्) श्राप (वृधः) वृद्धि करनेवालों की (वरिवस्यन्) सेवा करते CENS 480 काव्याय) विद्वानों से उत्तम प्रकार शिक्षित के हैं और जो (सस्त:) शयन करता हुआ विश्वम्) सम्पूरण का पालन करते. ऋग्वेदः मं०६ । सू० २०॥ लिए दाता (भूः) हूजिये (स्वम्) अपने (नपातम्) पतन से रहित (अनुदेयम्) पश्चात् देने योग्य (नववास्त्वम्) नवीन निवास को (महे) बड़े (पित्रे) पालन करने वाले' के लिये (बदाथ) दीजिये और नहीं (परा) पीछे लीजिये अर्थात् न लौटाइये ॥११॥ भावार्थ:-जो राजा सब का यथायोग्य सत्कार करता है वह पिता के तुल्य होता है ॥११॥ फिर वह क्या करे इस विषय को कहते हैं । त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीर्मणोरपः सीरा न स्रवन्तीः । प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारयो तुर्वशं यदुं स्वस्ति ॥१२॥ पदार्थः--हे (इन्द्र) सब के पालन करने वाले' (धुनिः) शत्रुओं के कम्पाने वाले (त्वम्) आप (धुनिमतीः) शब्द करती हुई प्रजायें (सीरा:) नाडियें तथा (अप:) जल और (अवन्तीः) नदियां (समुद्रम् ) समुद्र वा अन्तरिक्ष को (न) जैसे वैसे (स्वस्ति) सुख को (ऋणोः) प्रसिद्ध कीजिये और हे (शूर) वीर (यत्) जो आप (तुर्वशम्) शीघ्र वश को प्राप्त होने वाले (यम्) यत्नशील मनुष्य का (प्र, अति, पपि) प्रसिद्ध अत्यन्त पालन करते हो वह आप हम लोगों को (पारया) दुःख से पार कीजिये ॥१२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंक राजन् ! आप मंगल और सुख के देने वाले शब्दों से युक्त और आनन्दित प्रजाओं को करें और जैसे नदियां समुद्र को प्राप्त होकर स्थिर होती हैं वैसे प्रजायें आपको प्राप्त होकर निश्चल होवें ऐसा करिये ॥१२॥ फिर वह क्या करे इस विषय को कहते हैं । तवं ह त्यदिन्द्र विश्वमाजौ सस्तो धुनीचुमुरी था इ सिध्वम् । दीदयदित्तभ्यं सोमेभिः सुन्वन्दभीतिरिम तिः पक्थ्य? ॥१३॥ पदार्थः-हे (इन्द्र) सुख के धारण करने वाले (तव) आपके (या) जो (दीदयत) प्रकाश करता है और जो (वभीतिः) हिंसा करने और (इध्मभृतिः) काष्ठ का धारण करने वाला (पक्थी) पाचक (अ) अन्नों से और (सोमेभिः) ऐश्वर्य और ओषधि आदिकों से (सुन्वन्) उत्पन्न करता हुआ (तुभ्यम्) आपके लिए , RSHADI AUDA 4ARNA . .

ऋग्वेदः मं०६ । सू० २१॥ ४४१ इत्) ही सुख को देवे (त्यत) उसको (ह) निश्चय से और उन सबों का सदा सत्कार करिये ॥१३॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप बहुत बोलने वाले, भोक्ता, वीर जनों का सत्कार करके सेनाओं को प्रबल करिये ॥१३॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में बीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ द्वादशर्चस्य कविंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता। १।२।६।१०। १२ विराट् त्रिष्टुप् । ४।५।६। ११ त्रिष्टुप् । ३।७ निवृत्त्रिष्टुप् छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ८ स्वराइ बृहतीच्छन्दः । मध्यमः । उ 40 म. AN AND Ou अब बारह ऋचावाले इक्कीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में फिर उस राजा का किस अर्थ आश्रय करें इस विषय को कहते हैं। त्वा पुरुतमस्य कारोईव्य वीर हव्या हवन्ते । धियो रथेष्ठामजरं नवीयो रयिविभूतिरीयते वचस्या ॥१॥ पदार्थ:-हे (वीर) भय से रहित जो (पुरुतमस्य) अतिशय बहुत गुणों से विशिष्ट (कारोः) कारीगर के (हव्यम्) देने योग्य को (हवन्ते) ग्रहण करते हैं और जो (इमाः) ये वर्तमान प्रजायें (हव्याः) देने योग्य (भियः) बुद्धियों को और जो (रथेष्ठाम्) रथ में स्थित होने वाले (नवीयः) अतिशय नवीन (अजरम्) वृद्धावस्था से रहित शरीर को (रयि:) धन और (वचस्या) वचन में हुआ (विभूति:) ऐश्वर्य (ईयते) प्राप्त होता है उनसे युक्त (स्वा) आपका (उ) तर्क वितर्क से हम लोग सत्कार करें ॥१॥ भावार्थ:-जो पुरुष प्रशंसा करने योग्य बुद्धि का स्वीकार करके उससे वृद्धावस्था और रोग से रहित अत्यन्त लक्ष्मी और ऐश्वर्य को प्राप्त होता है उस शिल्पीजनप्रिय राजा का सत्कार करना चाहिये ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । तमु स्तुष इन्द्रं यो विदानो गिर्वाहसं गीर्भिर्यज्ञद्धम् । यस्य दिवमति मह्ना पृथिव्याः पुरुमायस्य रिरिचे महित्वम् ।।२।।

रिरिचे) बढ़ाता है और जिसकी ? ४४२ ऋग्वेदः मं०६। सू० २१॥ पदार्थ:-हे राजन् (यः) जो (विदानः) जानता हुआ (गीभिः) वारिणयों से (गिर्वाहसम्) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी के प्राप्त कराने वाले (यज्ञवृद्धम्) यज्ञ में आदर करने योग्य विद्वान् और (विवम् ) कामना करते हुए (इन्द्रम्) परमैश्वयंप्रद जन को प्राप्त होकर (पृथिव्याः) पृथिवी और (यस्य) जिस (पुरुमायस्थ) बहुत कपट से युक्त दुष्ट जन की (महना) महिमा से (महित्वम्) महिमा को (प्रति, (तम्) उस जन का हम लोग स्वीकार करें ॥२॥ भावार्थः जो मनुष्य अत्यन्त ऐश्वर्य के बढ़ाने वाले सूर्य के सदृश प्रकाशमान राजा को सत्य का उपदेश करें वे महिमा को प्राप्त होकर दुःख से अतिरिक्त होते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स इत्तमोवयुनं तंतन्वत्सूर्येण वयुनवच्चकार । कदा ते मर्त्ता अमृतस्य धामेयंक्षन्तो न मिनन्ति स्वधावः ॥३॥ पदार्थ:-हे जगदीश्वर जो आप (सूर्येण) सूर्य से (तमः) रात्रि जैसे वैसे ज्ञानप्रकाश से (प्रययुनम्) अज्ञानान्धकार को नष्ट (चकार) करते हैं और (क्युनवत्) बुद्धि के सदृश और बुद्धि का (ततन्वत) विस्तार करते हुए हैं (स:) (इत) वही सेवा करने योग्य हैं । हे (स्वधावः) बहुत अन्न से युक्त (मर्ताः) मनुष्य (अमृतस्य) मरणरहित जगदीश्वर के (ते) आप के सम्बन्ध में (धाम) धारण करते जिससे उसको मिलाने की इच्छा करते हुए (कहा) कब (न) नहीं (मिनन्ति) नष्ट करते हैं अर्थात् दोष के कारण को दूर करते हैं ।।३।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य अहिंसा धर्म का स्वी- कार कर और विज्ञान बढ़ाय के परमेश्वर की प्राप्ति की चिकीर्षा करते वे विस्तीर्ण सुख को प्राप्त होते हैं ॥३॥ फिर मनुष्यों को विद्वानों के प्रति क्या क्या पूछना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यस्ता चकार स कुह स्विदिन्द्रः कमा जनै चरति कासु विक्षु । कस्त यज्ञो मनसे शं वरीय को अर्क इन्द्र कतमः स होता ।।४।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुःखविदारक विद्वन् (यः) जो (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्या का करने वाला (कुह) (स्वित्) कहीं (ता) उन को (चकार) करता है और (कास किन (विक्षु) प्रजाओं में (सः) वह (कम्) सुख को और (जनम्) मनुष्य को (मा, चरति) प्राचरण करता अर्थात् प्राप्त होता है और (ते) आपके (वराय) SRO को (अनु, येमः) अनुकूल नियम में लाते हैं उनका हम लोग (अर्धामसि। ऋग्वेदः मं० ६ । सू० २१ ।। ४४३ श्रीष्ठ (मनसे) विचारशील' चित्त के लिए (क:) कौन (यज्ञः) मेल' करना रूप यज्ञ (शम्) सुख को करता है और (कः) कौन (अर्कः) आदर करने योग्य और (कतमः) कौन सा (सः) वह (होता) दाता होता है इन' के उत्तरों को कहिये ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! उन बुद्धि की वृद्धियों को कौन कर सके, उपकार के लिये बुद्धियों में कौन चलता है, कौन आदर करने योग्य और कौन दाता होता है इन प्रश्नों के समाधानों को कहिये ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। इदा हि ते वेविषतः पुराजा: प्रत्नास आसुः पुरुकृत्सखायः । ये मध्यमास उत नूतनास उतावमस्य पुरुहूत बोधि ॥५॥ पदार्थ:-है (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा किये गए (पुरुकृत) बहुतों को करने वाले प्रतापयुक्त 'राजन् (ये) जो (हि) निश्चित (राजाः) पूर्व प्रकट हुए (प्रत्नासः) प्राचीन (मध्यमास:) मध्य अवस्था में हुए और (उत) भी (नूतनासः) नवीन (ते) आपके (सखायः) मित्र (प्रास:) हैं उनको (इदा) इस समय तथा (वेविषतः) ज्याप्त हुए और (उत) भी (अवमस्य) आधुनिक के सम्बन्धियों को आप (बोधि) चेतन करिये ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो आप लोगों के साथ मैत्री का आचरण करते हैं वे वृद्ध, वृद्धतर तथा मध्यम और भी तुल्य अवस्थाबाले होवें उनमें मित्रता की निश्चय रक्षा करिये ऐसा होने पर निश्चित राज्य की वृद्धि होती है, यह ही पूर्वमन्त्र में कहे हुए प्रश्नों का उत्तर है ॥५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। सं पृच्छन्तोऽवरासः परीणि प्रत्ना त इन्द्र श्रुत्यानुं थेमुः। अचमिसि वीर ब्रह्मवाहो यादेव विद्म तात्त्वो महान्तम् ॥६॥ पदार्थ:--हे (वीर) शूरता आदि गुणों से युक्त (इन्द्र) विद्वन् जो (प्रवरास:) आधुनिक जिज्ञासु अर्थात् ब्रह्म को जानने की इच्छा करने वाले जन (तम्) उन (महान्तम्) महाशय (स्वा) आपको (पृच्छन्तः) पूंछते हुए हैं (ते) वे (पराणि) उत्तर काल में वर्तमान और (प्रत्ना) पूर्वकाल में स्थित (धु त्या) वेद में प्रतिपादित विषयों सत्कार करते हैं और हे (ब्रह्मवाहः) धन और धान्य को प्राप्त कराने वाले विद्वान् हम लोग R- WARNIKALNORALERONISALI सुखजनक (पाज:) बल (रक्षसः) दुष्ट मनुष्यों के (अभि, वि, तस्थे) सन्मुख विशेष- ऋग्वेदः मं०६ । सू०२१ ।। (यात्) जितनों को (विद्य) जानें (तात) उतनों (एक) ही को आप लोग जानिये ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोगों को मित्रतापूर्वक मेल कर तथा पूर्व और पर विज्ञानों को प्राप्त होकर अत्यन्त सुख को प्राप्त होना चाहिये ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। अभि त्वा पाजो रक्षसो वि तस्थे महि जज्ञानमभि तत्सु तिष्ठ । तव प्रत्नेन युज्येन सख्या वज्रेण धृष्णो अप ता नुदस्व ।।७॥ पदार्थ:-हे (धृष्णो) दृढ़ राजन् (तव) श्रापका जो (महि) बड़ा (जज्ञानम्) fontm aastha Mera 4 कर स्थित होता है (तत्) वह (त्वा) आपको प्राप्त होवे और आप उसके (अभि, सु, तिष्ठ) सन्मुख स्थित हूजिये उस (प्रत्नेन) प्राचीन (युज्येन) युक्त करने के योग्य (सख्या) मित्र और (वज्रण) शस्त्र और अस्त्रों के समूह से आप (ता) उन शत्रु- सेनाओं को (अप, नुदस्व) दूर करिये ॥७॥ भावार्थ:-हे राजजन ! जो राजपुरुष दुष्टों के लिये दण्ड देते और श्रेष्ठों का पालन करते हैं उनका आप सत्कार करिये ॥७॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । स तु ध्रुधीन्द्र नूतनस्य ब्रह्मण्यतो वीर कारुधायः । त्वं ह्या३'पिः प्रदिवि पितृणां शपथ सुहव एष्टौ ।।४।। पदार्थ:-हे वीर) दुष्टों के नाश करने और (कारधाय:) शिल्पी विद्वानों के धारण करने वाले (इन्द्र न्याय के स्वामी विद्वन् (त्वम्) आप (नूतनस्य) नवीन की (एष्टौ) सब प्रकार से यज्ञक्रिया में (सुहवः) उत्तम प्रकार ज्ञान और विज्ञान वाले (शश्वद) निरंतर (बभूथ) हूजिये (सः) वह आप (तु) तो (हि) निश्चय से (पितृ- णाम् ) अर्थात् पालकों की (प्रदिवि) प्रकृष्ट कामना में (प्रापिः) व्याप्त होनेवाले हुए ब्रह्मण्यतः) धनप्राप्ति की इच्छा करते हुओं का सत्कार करिये और उनके वचनों को (श्रधि) सुनिये ॥६॥ भावार्थ:-- वही उत्तम विद्वान् है जो ज्ञानवृद्ध जनों से विद्यासम्बन्धी वचनों को सुन के उत्तम शिल्पिजनों की रक्षा करके सदा अपेक्षित पदार्थ की प्राप्ति से सुखी होता है ।।८।।

ऋग्वेदः मं०६ । सू० २१ ॥ । - फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्रोतये वरुणं मित्रमिन्द्र मरुतः कृष्वावसे नो अद्य । प्र पूषणं विष्णुमग्नि पुरन्धि सवितारमोषधीः पर्वतांश्च ॥९॥ पदार्थ:-हे विद्वन् आप (अद्य) इस समय (नः) हम लोगों को (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (वरुणम्) उदान और (मित्रम्) प्राण वायु (इन्द्रम्) बिजुली को (मरतः) पवनों को (प्र, कृष्व) अच्छे प्रकार करिये और (अवसे) ज्ञान प्रादि के लिये (पूषणम् ) पुष्टि करनेवाले समान वायु (विष्णुम्) व्यापक व्यान और धनञ्जय वायु को वा हिरण्यगर्भ परमात्मा को और (अग्निम् ) प्रसिद्ध अग्नि (पुरन्धिम्) सब को धारण करनेवाले' सूत्रात्मा (सवितारम्) सूर्यमण्डल' (ोषधीः) सोमलता आदि ओषधियों और (पर्वतान्, च) मेघों वा पर्वतों को (प्र) अच्छे प्रकार करिये ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वान् जनो! हम लोगों के लिये जसे पृथिवी आदि पदार्थ सुखकारक होवें वैसे करिये ॥६॥ फिर मनुष्यों को किसकी उपासना करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं। इम उ त्वा पुरुशाक प्रयजयो जरितारों अभ्यर्चन्त्यकैं। श्रुधी हवमा हुक्तो हुदानो न स्वावाँ अन्यो अमृत त्वदस्ति ॥१०॥ पदार्थ:-हे (प्रयज्यो) यत्न' से मेल करने को योग्य (पुरुशाक) बहुत सामर्थ्य से युक्त परमेश्वर जो (इमे) ये (जरितारः) विद्या के लाभ की स्तुति करनेवाले जन (अकः) सत्कारों से (स्वा) आपका (अभि, अर्चन्ति) सब ओर से सत्कार करते हैं। हे (अमृत) नाश रहित जिन (त्वत्) आप से (त्वावान्) आपके सदृश (अन्यः) अन्य दूसरा (न) नहीं (अस्ति) है वह (हुवानः) प्रशंसा करते हुए आप उन (हुवतः) स्तुति करते हुओं को और (हवम् ) उच्चारित शब्द को (प्रा) सब प्रकार (श्रुधि) सुनिये (उ) और उनका स्वीकार करिये ॥१०॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन परमात्मा की स्तुति और प्रार्थना करके उपासना करते हैं वैसे आप लोग भी उपासना करो और उसके सदृश वा उससे अधिक कोई भी नहीं है ऐसा जानो॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। नु म मा वाचमुप॑ याहि विद्वान् विश्वेभिः सुनो सहसो यजत्रैः । ये अग्निजिह्वा तसाप आसुर्ये मर्नु चक्रपर दसाय ॥११॥ KHAN SAMBANAKARMERELARASHTRA ४४६ ऋग्वेदः मं०६ । सू० २२ ।। पदार्थ:-हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) सन्तान (विद्वान्) विद्यायुक्त जन आप (मे) मेरी (वाचम्) वाणी को (उप, पा, याहि) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये और (ये) जो (अग्निजिह्वाः) अग्नि के समान तीव्र प्रज्वलित जिह्वा जिनकी (ऋत- सापः) सत्य से युक्त होने वाले (मासुः) होते हैं उन (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (यजत्रैः) मिलने योग्यों के साथ (नु) शीघ्र मेरे उपदेश को प्राप्त हूजिये और (ये) जो (उपरम्) मेघ को जैसे वैसे (दसाय) शत्रुओं के नाश होने के लिये (मनुम्) विचारशील मनुष्य को (चक्रुः) करते हैं उनका सदा सत्कार करिये ॥११॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-मनुष्य सदा ही सत्यवादी विद्वानों को उत्तम प्रकार मिलें और प्रतिज्ञा से सत्य का आचरण करें॥११॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स नो बोधि पुर एता सुगेधूत दुर्गेषु पथिकृद्विदाना ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिन इन्द्राभि वक्षि वाजम् ॥१२॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सुख और ऐश्वर्य के प्राप्त करानेवाले (स:) वह आप (पुरएता) अग्रगामी (सुगेष) सुगम व्यवहारों में (उत) और (दुर्गेष) दुःख से प्राप्त होने योग्यों में (पथिकव) मार्ग को करने वाले (विदानः) जानते हुए (नः) हम लोगों को (बोधि) जानें और () जो (प्रश्रमासः) थकावट से रहित (उरवः) बहुत (वहिष्ठा:) अतिशय पहुंचानेवाले हैं (तेभिः) उनके साथ (न:) हम लोगों के वा हम लोगों के लिये (वाणम्) विज्ञान को (अभि, वक्षि) प्राप्त कराइये ॥१२॥ भावार्थ:-वही विद्वान् है जो सबका मङ्गलकारी, स्वयं धर्ममार्ग को प्राप्त होकर औरों को धर्ममार्ग में चलनेवाले करे, जो सदा सत्संग करता है वही सब से उत्तम होकर विज्ञान देने को योग्य होता है ॥१२॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, ईश्वर और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में इक्कीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथैकादशस्य द्वाविंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ । ७ भुरिक्पङ्क्तिः । ३ स्वराट् पङ्क्तिः । १० पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २।४। ५ त्रिष्टुप् । ६। ८ विरात्रिष्टुप् । ६ । ३१ निचूरित्रष्टुप्छन्दः धैवतः स्वरः॥

४४७ dawa पा- देते हुए उपदेश देते हैं (उ) और (तम्) उसकी आप लोग उपासना ऋग्वेदः मं०६ । सू० २२ ।। अब ग्यारह ऋचावाले बाईसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मंत्र में अब मनुष्यों को किसकी उपासना करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिन्द्रं तं गीर्भिरभ्यर्च आभिः । यः पत्य॑ते वृषभो वृष्ण्यावान्त्सत्यः सत्वा पुरुमाया सहस्वान् ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (य:) जो (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के मध्य में (एक:) अकेला (इव) ही (हव्यः) स्तुति करने और ग्रहण करने योग्य है (तम्) उस (इन्द्रम्) ऐश्वर्य को देनेवाले का (आभिः) इन (गोभिः) वाणियों से मैं (अभि, अर्चे) सब प्रकार से सत्कार करता हूं और (य:) जो (वृषभः) श्रेष्ठ (वृठण्यावान्) बल' आदि बहुत प्रियगुणों से युक्त (सत्यः तीनों कालों में अबाध्य (सत्वा) सर्वत्र स्थित (पुरु- मायः) बहुतों को रचने वाला (सहस्वान्) अत्यन्त बल से युक्त हुआ (पत्यते) स्वामी सदृश आचरण करता है उसका सत्कार करता हूं उस परमेश्वर का आप लोग सत्कार करिये ॥१॥ भावार्थ:--हे मनुष्यो ! जो अद्वितीय, सबसे उत्तम, सच्चिदानन्द- स्वरूप, न्यायकारी और सब का स्वामी है उसका त्याग करके अन्य की उपासना कभी न करो॥१॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तमु नः पूर्वं पितरो नवग्वाः सप्त विप्रासो अभि वाजयन्तः । नक्षदामं तरि पर्वतेष्ठामद्राघवाचं मतिभिः शविष्ठम् ।।२।। पदार्थः-हे. मनुष्यो जिस (नक्षद्दाभम्) प्राप्त दोषों के नाश करने और (ततुरिम्) दुःख से पार करने वाले (पर्वतेष्ठाम्) मेष में वर्तमान बिजुली के समान शुद्धस्वरूप और (अद्रोधवाचम्) द्रोहरहित वारणी वाले (शविष्ठम्) अत्यन्त बल से युक्त परमात्मा का (न:) हम लोगों के (पूर्वे) पहिले (नववाः) नवीन गमन वाले (विप्रासः) बुद्धिमान् और (सप्त) सात संख्या से युक्त अर्थात् पांच प्राण और मन बुद्धि इनके सदृश वर्तमान (पितरः) पितृजन ( (अभि) सन्मुख (वाजयन्तः) बुद्धि को करो और (मतिभिः) मननशील मनुष्यों से यही सेवा करने योग्य है । भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम योगीजन जिसकी योग से उपासना करते हैं उसी का योगाभ्यास से ध्यान करो ॥२॥ Parsh REMEMORRHEUMARSA ४४८ ऋग्वेदः मं०६ । सू० २२ ॥ MO PAL फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तमीमह इन्द्रमस्य रायः पुरुषीरस्य नवतः पुरुक्षो। यो अस्कृधोयुरजर खर्वान्तमा भर हरिवो मादयध्यै ॥३ पदार्थ:-हे (हरिवः) अच्छे मनुष्यों के सहित वर्तमान विद्वान् (यः) जो (अस्कृधोयुः) व्यापक (अजरः) जरा आदि रोग से रहित (स्वर्वान्) बहुत सुख विद्य- मान जिसमें वह वर्तमान है (तम्) उसको (मादयध्यै) आनन्दित करने के लिये (मा, भर) सब प्रकार से धारण करिये और (तम्) उसको (अस्य) इस (पुरुवीरस्य) बहुत वीरों को प्राप्त कराने वाले (नृवतः) अच्छे मनुष्य विद्यमान जिसमें उस (पुरुक्षोः) बहुत ध्यान से युक्त (रायः) धन के (इन्द्रम्। अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले की हम लोग (ईमहे) याचना करते हैं ।।३।। भावार्थ:--सब मनुष्य विज्ञान आदि की प्राप्ति के लिये परमात्मा से ही याचना करें ॥३॥ फिर विद्वान् क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तन्नो वि वाचो यदि वे पुरा चिजरितारं आनः सुम्नापिन्द्र । कस्ते भागः किं वयो दुध खिद्धः पुरुहूत पुरूवसोऽसुरघ्नः ॥४॥ पदार्थ:-हे (दुध्र) दुःख से धारण करने योग्य और (पुरुहूत) बहुतों से सत्कार किये गये (पुरूवसो) बहुत धनों से युक्त (इन्द्र) विद्या और उपदेश के करने वाले (यदि) जो आप (न:) हम लोगों के लिये (तत्) उसको (वि, बोनः) विशेष कहिये जिसको (चित्र) निश्चित (ते) आपके (पुरा) पहिले भी (जरितार:) विद्या और गुणों की स्तुति करने वाले (सुम्नम्) सुख का मानशुः) भोग करते हैं (ते) आपका (कः) कौन (असुरघ्नः) दुष्ट कर्मकारियों का नाश करने वालो (भागः) अंश (खितः) दीन और (किम्) कौन (वयः) जीवन है इसको श्राप कहिये ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आपको वह विज्ञान हम लोगों के लिये देने योग्य है जिससे विद्वान् जन मानन्द करते हैं ॥४॥ फिर स्त्री कैसे पति का ग्रहण करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तं पृच्छन्ती वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्र वेपी वकरी यस्य न गीः । तुविनाभं तुविकूमि रभोदा गातुमिषे नक्षते तुम्रमन्छ ।।५।। पदार्थः-हे मनुष्यो (यस्य) जिसके (इषे) अन्न आदि के लिये (गी:) वाणी AN iy • ऋग्वेदः मं०६ । सू० २२ ।। ४४४ AR TH Aawa (तुविधामम्) बहुतों को ग्रहण करने (तुविकूलिम्) बहुत कामों के करने और (रभो. दाम्) वेग से युक्त बल' के देनेवाले (तुम्रम् ) ग्लानि से युक्त जन को और (गातुम् भूमि को (अच्छ) अच्छे प्रकार (नक्षते) प्राप्त होती है (तम्) उस (वज्रहस्तम्) शस्त्र और अस्त्रों से युक्त हाथों वाले (रथेष्ठाम्) रथ में स्थित होते हुए (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्यवान् पुरुष को (पृच्छन्ती) पूंछती हुई (वेपी) बुद्धिवाली और (वक्वरी) वचन शक्तिवाली स्त्री (न) निश्चय होवे उसका हम लोग भी पाश्रयण करें।॥५॥ भावार्थ:- कन्या को चाहिये कि सब बातों को पूंछकर हृदयप्रिय पति का स्वीकार करे ॥५॥ फिर स्त्री और पुरुष परस्पर कैसे वर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ।। अया ह त्यं मायया वाघाने मोजुवा खखकः पर्वतेन । अच्युता चिद्वीलिमा स्वोजो जो वि हळहा धृपता विरप्शिन् ।६। पदार्थ:-हे (स्वतवः) अपना बल जिसके ऐसे (विरप्शिन्) महागरणों से युक्त (स्बोजः) उत्तम पराक्रमयुक्त प्रतापी अाप (नया) इस (भायया बुद्धि से जैसे वैसे स्त्री से रमण करिये वह स्त्री (बाबधानम्) बढ़े हुए (त्यम् ) उस पति को प्राप्त होकर (मनोजुया) मन के सदृश वेगयुक्त (पर्वतेन) मेब से बिजुली जैसे वैसे रमण करे और ये दोनों (धृषता) ढीठपन से (रुजः) शेगों का नाश करके हा निश्चय से युक्त (अच्युता) अविनाशी से (बोळिता) स्तुतिरूप (वि) विशेष करके (बुळ हा) दृढ़ (चित) भी कम्मों को करें ॥६॥ भावार्थ:-हे स्त्री पुरुषो ! आस दोनों प्रेम से मिल के कृत्यों में हर्ष से, रोग निवृत्ति तथा प्रीति से मेल करके सन्तानों को उत्पन्न E गृहाश्रम के करो॥६॥ फिर मनुष्यों को किसका नित्य ध्यान करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। संयौ धिया नव्यस्था शाविष्ठं प्रत्नं मनवत् परितसयध्यै । स नो वक्षदनिमानः सुवीन्द्रो विश्वान्यति दुर्गहाणि । ७।। पदार्थः-- हे मनुष्यो जो (अनिमान:) परिमाण से रहित (सवमा) उत्तम प्रकार चलाने वाला (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जगदीश्वर (नध्यस्या) अतिशय नवीन (धिया) बुद्धि वा कर्म से (व:) आप लोगों और (न:) हम लोगों के लिये (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुर्गहाणि) दुःख से प्राप्त होने योग्यों को नाश करने वाले धर्मयुक्त कर्मों को (परितंसयध्ये) चारों ओर से सुशोभा करने के लिए (अति, वक्षत) ARRBA ४५० ऋग्वेदः मं० ६ । सू० २२ ॥ *OR SARAN अत्यन्त प्राप्त करावे (तम्) उस (शविष्ठम्) अत्यन्त बलवान (प्रत्नम्) पुरातन को (प्रत्नवत्) प्राचीन के सदृश मान कर हम लोग सेवा करें और (स:) वह भी हम लोगों का गुरु हो ॥७॥ भावार्थ-ह मनुष्यो ! जो परमात्मा हम सब लोगों के सम्पूर्ण दुःखों को बुद्धिदान से दूर करके अधर्माचरण से संकोचित करता है उस परमात्मा का आत्मा से निरन्तर ध्यान करो ॥७॥ फिर विद्वान् जनों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं। आ जनाय द्रहणे पार्थिवानि दिव्यानि दीपयोन्तरिक्षा। तपा वृषन्विश्वतः शोचिषा तान् ब्रह्मद्विषे शोचय क्षामपश्च । ८॥ पदार्थ:-है (वृषन्) बलिष्ठ विद्वन् आप (शोचिषा) प्रकाश से (विश्वतः) सब ओर से (दिव्यानि) श्रेष्ठ गुण कर्म और स्वभाव वाले वस्तुओं (अन्तरिक्षा) अन्तरिक्ष के सहचारी (पार्थिवानि) पृथिवी में हुए पदार्थों को (मा, दीपयः) सब प्रकार से प्रकाशित कीजिए और (ब्रह्मविषे) ईश्वर वा वेद से द्वष करने वाले और (द्रुह्वणे) द्रोह करने वाले' (जनाय) जन के लिये सब प्रकार से (तपा) सन्ताप करिये और जो सज्जनों को सन्तापयुक्त करते हैं (ताल) उनको (शोचय) शोक कराइये तथा (क्षाम्) पृथिवी को (अपः, च) और जलों को प्रकाशित करिये ॥८॥ भावार्थ:-हे विद्वान् जनो ! आप लोग पृथिवी आदि पदार्थों को जानकर अन्यों को जनाइये और दुष्ट जनों को उपदेश से पवित्र करिये ॥८॥ फिर वह राजा' क्या करे इस विषय को कहते हैं। सुवो जनस्य दिव्यत्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्येषलहक् । विष्ज वजं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजुर्थ से निभायाः ॥९॥ पदार्थ:-हे (अजुर्य जीर्ण अवस्था से रहित (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले (राजा) प्रकाशमान आप (भुवः) पृथिवी और (पार्थिवस्य) पृथिवी में हुए जगतः) संसार और (दित्यस्य) शुद्ध कामना करने योग्य सुन्दर (अनस्य) मनुष्य के (त्वेषसन्दृक्) न्यायप्रकाश को देखने वा दिखानेवाले होते हुए (दक्षिणे) दाहिने (हस्ते) हाथ में (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्र को (धिष्व) धारण करिये और (विश्वाः) सम्पूर्ण (मायाः) बुद्धियों को (वि, दयसे) विशेष करके दीजिये ॥६॥ भावार्थ:-वही राजा उत्तम है कि जो न्यायशील, धार्मिक, जितेन्द्रिय Filmy FACSar NET . ...

ऋग्वेदः मं०६ । सू० २२ ॥
मक
होकर सम्पूर्ण जगत् का पिता के समान पालन करके सम्पूर्ण विद्याओं को
अच्छे प्रकार देता है ॥६॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
आ संयतमिन्द्र णः स्वस्ति शंत्रतूर्याय बृहतीममधाम् ।
यया दासान्यायाणि वृत्रा करो वञिन्त्सुतुका नाहुषाणि ॥१०॥
पदार्थः- है (वचिन्) शस्त्र और अस्त्र के धारण करने वाले (इन्द्र) अत्यन्त
ऐश्वर्य के करने वाले प्राप (यया) जिससे (दासानि) शूद्र के कुलों को (प्रार्याणि)
द्विजकुल' और (सुतुका) उत्तम प्रकार बढ़ने वाले (नाहुषाणि) मनुष्यसम्बन्धी (वृत्रा)
धनों को (आ) सब प्रकार (करः) करती है उस (अमृध्राम्) नहीं हिंसा करने वाली
(बृहतीम्) बड़ी सेना को (शत्रुतूर्याय) शत्रुओं के नाश के लिए करिए और उससे
(नः) हम लोगों के लिए (संयतम्) किया है संयम जिसके निमित्त उस (स्वस्तिम्)
सुख को करिये ॥१०॥
भावार्थ:-हे राजन् ! आप सत्यविद्या के दान और उपदेश से शूद्र
के कुल में उत्पन्न हुओं को भी द्विज करिये और सब प्रकार से ऐश्वर्य
को प्राप्त कराय तथा शत्रुओं का निवारण करके सुख की वृद्धि
कीजिये ॥१०॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।।
स नो नियुद्धिं पुरुहूत्व धो विश्ववाराभिरा गहि प्रयज्यो।
न या अवो ते न देव प्राभिर्वाहि तूपमा मद्रयट्रिक् ।।११।।
पदार्थ:-- हे (प्रयज्यो) अत्यन्त यज्ञ करने वाले (पुरुहूत) बहुतों से आदर
किए गए (वेधः) बुद्धियुक्त (सः) वह भाप (देवः) विद्वान् के (न) समान (विश्व-
धाराभिः) सब से स्वीकार करने योग्य गमनों से और (प्राभिः) इन (नियुद्भिः)
निश्चित गमन वाले घोड़ों से जैसे वैसे (न:) हम लोगों को (मा, गहि) प्राप्त हूजिए
और (याः) जिन रीतियों को (प्रदेवः) विद्वान् जन से भिन्न (न) नहीं (मा, बरते
अच्छे प्रकार स्वीकार करता है (मधुतिक) मेरे सन्मुख हुए आप (तूयम्) शीघ्र (मा,
याहि) प्राप्त हूजिए ॥११॥
भावार्थ:-जो रीति विद्वानों की है उस को अविद्वान् जन नहीं
स्वीकार करते हैं इससे विद्वानों और अविद्वानों का पृथक् प्रस्थान है यह
जानना चाहिए ॥१॥

HAMARINASSETTE ४५२ ऋग्वेदः मं०६ । सू०२३ ।। इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, ईश्वर, राजा और प्रजा के धर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त' के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में बाईसवां सूक्त समाप्त हुमा॥ । स MPA AIM R FEARN AN अथ दशस्य त्रयोविंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ ।३।८।६ निचरित्रष्टुप् ५। ६ । १० त्रिष्टुप । ७ विरात्रिष्टुपु- छन्दः । धैवतः स्वरः । २ । ४ स्वराट् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब दश ऋचावाले तेईसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मंत्र में इन्द्रविषय को कहते हैं। सुत इत्त्वं निमिश्ल इन्द्र सोमे स्तोमे ब्रह्मणि शस्यमान उक्थे । या युक्ताभ्यां मघवन्हरिभ्यां बिभ्रद बाहोरिन्द्र शासि ॥१॥ पदार्थ:-है (इन्द्र) शत्रुओं के नाशक जो (त्वम्) आप (स्तोमे) प्रशंसा के निमित्त (ब्रह्मणि) धन में (निमिश्लः) अत्यन्त मिले हुए (सोने) ऐश्वर्य के (सुते) उत्पन्न होने पर (शस्यमाने) प्रशंसा करने योग्य और (उक्थे) सुनने वा कहने योग्य में (युक्ताभ्याम्) जुड़े हुए (हरिभ्याम्) हरणशील मनुष्यों से (बाह्वोः) भुजाओं में (वचम्) वज्र को (बिनत) धारण करते हुए (यासि) जाते हो और (यत) जो (वा) वा हे (मघवन्) बहुत धनों से युक्त' (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद श्राप प्राप्त होते हैं वह पाप (हत्) ही सत्कार करने योग्य हैं ॥१॥ भावार्थ:-जो राजा नहीं प्रमाद करते, पिता के सदृश प्रजानों का पालन करते और शस्त्रों का धारण करते हुए तथा दुष्टों का निवारण करते हुए हैं उनका राज्य स्थिर होता है ॥१॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । या दिवि पायें सुधिमिन्द्र वृत्रहत्येऽवसि शुरेसातौ । यद्वा दक्षस्य विभ्युषो अबिभ्यदरन्धयः शर्षत इन्द्र दस्यून् ॥२॥ पदार्थः... हे (इन्द्र) दुष्ट जनों के नाश करने वाले (यत्) जो आप (पायें) पार में हुए (दिवि) कामना करने योग्य के निमित्त (वृत्रहत्ये) मेघ के हनन (वा) वा (शूरसातौ) शूर जनों से विभाग करने योग्य संग्राम में (सुध्विम्) उत्तम प्रकार उत्पन्न करने वाले की (अवसि) रक्षा करते हो और (यत्) जो (वा) वा आप (वक्षस्य) बली (बिभ्युषः) भय करने वाले' का (अबिभ्यत्) भय करते हैं वह पाप RPIR *anta ऋग्वेदः मं० ६ । सू० २३ ॥ ४५३ rane . हे (इन्द्र) प्रतापी जन (शर्धतः) बलयुक्त से (दस्यून्) हठ से दूसरे के पदार्थ ग्रहण करने वालों का (अरन्धयः) नाश करिये ।।२।। भावार्थ:-वही राजा होने को योग्य होवे कि जो युद्ध में अपनी सेना को रक्षा करे और शत्रु तथा चोरों का नाश करे ॥२॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोम मणेनोरुनो जरितारमूती । कर्ती वीराय सुन्वय उ लोकं दाता वसुं स्तुवते कीरयै चित् ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (ऊती) रक्षण प्रादि क्रिया से (प्रणेनी:) अत्यन्त न्याय करने और (पाता) रक्षा करने वाला (उग्रः) तेजस्वी (इन्द्रः) ऐश्वर्यकारी राजा (सुतम्) उत्पन्न किए गए (सोमम्) सोमलता आदि प्रोषधियों के रस को और (अरितारम्) स्तुति करने वाले को करता है वह हम लोगों का राजा हो और जो (उ) तर्क वितर्क से (धीराय) पराक्रमयुक्त (सुप्वये) उत्तम प्रकार अच्छे पदार्थों के उत्पन्न करने वाले (स्तुवते) स्तुति करते हुए (कीरये) स्तुति करनेवाले के लिए (दाता) दाता और (कर्ता) कार्य करने वाला (लोकम्) लोक को (बस) और धन को (चित) भी करता है वह हम लोगों का अग्रणी (प्रस्तु) हो ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! उसी को राजा मानो जो सम्पूर्ण शास्त्रों का जानने वाला, पुरुषार्थी, धार्मिक और इन्द्रियों को वश में रखने वाला होवे ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। गन्तेयान्ति सर्वना हरिभ्यां बर्धिवज्र पपिः सोम ददिर्गाः। कर्ती वीरं नय सर्ववीरं श्रोता हवं गृणवः स्तोमवाहाः ॥४॥ पदार्थ:-हे (स्तोमवाहाः) समूहों को धारण करने वाले मनुष्यो जो (हरिभ्याम्) अध्यापक और उपदेशक मनुष्यों के साथ (इयन्ति) इतने (सवना) ऐश्वर्यकारक कर्मों को (गन्ता) प्राप्त होने वाला (धनम्) अस्त्रविशेष को (बभिः) पुष्ट करने वा धारण करने तथा (सोमम्) सोमलता के रस का (पपिः) पान करने और (गाः) गौओं को (ददिः) देने वाला (गुणतः) स्तुति करते हु। को और (हवम्) प्रशंसा करने योग्य को (श्रोता) सुनने वाला (सर्ववीरम्) सम्पूर्ण वीर जिससे उस (नर्यम्) मनुष्यों में श्रेष्ठ (वीरम्) वीरजन को (कत्त) कर के वाला हावे' उसका राजा मानो ॥४॥ .

-- ४५४ ऋग्वेदः मं०६ । सू०२३ ॥ ma भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सम्पूर्ण राजकर्मों में निपुण हो उसको राजा करके न्याय से राज्य का पालन करो॥४॥ फिर मनुष्यों को परस्पर कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषयको कहते हैं । अस्मै वयं यद्वावान तद्विविष्म इन्द्राय यो नः प्रदिवो अपस्कः । सुते सोमें स्तुमसि शंसंदुक्थेन्द्रीय ब्रह्म वर्धेनं यथासत् ।।५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (प्रविवः) अत्यन्तपन से कामना करते हुओं (नः) हम लोगों पार (अपः) कर्म को (क:) करता हैं और (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त जन के लिये (उक्था) प्रशंसा करने योग्य कर्मों को (शंसत) कहै और (यथा) जैसे (ब्रह्म) धन (वर्धनम्) बढ़ता है जिस से वह (असत) होवे और (अस्म) पूर्व मन्त्र में कहे हुए (इन्द्राय) ऐश्वर्य के लिये (वयम्) हम लोग (यत्) जिसको (विविध:) व्याप्त होते हैं (तत्) उसका जो (वावान) उत्तम प्रकार सेवन करता है वैसे उसकी (सते) उत्पन्न किये गए (सोम) ऐश्वर्य में हम लोग (स्तुमसि) स्तुति करते हैं ॥५॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं.-जो धन के सदृश सब के बढ़ाने- वाले हैं वे अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होकर प्रयत्न करते हैं ।।५।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ब्रह्माणि हि चकृष वर्धनानि तावत्त इद्रमतिभिर्विविष्मः । सुते सोमै सुतपाः शन्तमानि रान्द्रयां क्रियात्म वक्षणानि यज्ञैः॥६॥ पदार्थ:-है (इन्द्र) प्रतापयुक्त ! जितने (वर्धनानि) वृद्धि करनेवाले (ब्रह्माणि) धनों को आप (चकृष) करते हो (ताबद) उतने ( आपके लिये (मतिभिः) उत्तम मनुष्यों के साथ हम लोग (विविष्मः) व्याप्त होवें तथा (सुतपाः) पदार्थों की रक्षा करने वाला तथा (हि) निश्चय कर हम लोग (सुते) उत्पन्न हुए (सोमे) ऐश्वर्य में (य:) धनप्रापक व्यवहारों से निश्चय कर (शन्तमानि) अत्यन्त सुखकारक (रान्द्रया) रमण करने योग्यों को (वक्षणानि) प्राप्त कराने वाले (क्रियास्म) करें ॥६॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि उत्तम आचरण को देख के वैसा ही आचरण करें और सब मिल के ऐश्वर्य को प्राप्त होकर न्याय से प्रजा की रक्षा करें॥६॥ Poe ऋग्वेदः मं०६ । सू०२३ ॥ ४५५ MAM AMAP - aara Com फिर उसी विषय को कहते हैं । स नो बोधि पुरोळाशं रराणः पिबा तु सोमं गोजीकमिन्द्र । एदं बर्हिर्यजमानस्य सीदोरुं कृधि त्वायत उं लोकम् ॥७॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) ऐश्वर्य के धारण करने वाले (सः) वह पाप (पुरोळाशम्) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न को (रराणः) देते हुए (गोऋजीकम्) इन्द्रिय सरल जिससे उस (सोमम्) बड़ी अोषधियों के रस को (पिबा) पीजिये और (न:) हम लोगों को (बोधि) जानिये और (यजमानस्य) यजमान के (इदम् ) इस (बहिः) उत्तम आसन पर (प्रा, सीद) सब प्रकार से विराजिये तथा (उरुम्) बहुत (लोकम्) देखने योग्य को (उ) और (त्वायत:) आपकी कामना करते हुओं को (त) तो (कृषि) करिये ॥७॥ भावार्थ:-जो लोग रोग के हरनेवाले भोजनों और जलपानादि को देते हैं और परोपकार करते हैं वे यहां प्रशंसा करने योग्य हैं ॥७॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । स मन्दस्वा ह्यनु जोषमुग्र प्र त्वा यज्ञास इमे अनुबन्तु । प्रेमे हवासः पुरुहूतमस्मे आ त्वेयं धीरवस्त्र इन्द्र याः । ८|| पदार्थः - हे (उप्र) तेजस्विन् (इन्द्र) विद्या और क्रिया में कुशल जिस बुद्धि से (इमे) ये (यज्ञास:) सम्पूर्ण धर्मयुक्त व्यवहार (वा) आप को (अश्नुवन्तु) प्राप्त हों पर जो इमे) ये (हवासः) दान, पादान और अदन' नामक अर्थात् देना लेना खाना (पुरुहूलम्) बहुतों से प्रशंसित (त्या) प्रापको (प्र) प्राप्त हो सो (इयम्) यह (धीः) बुद्धि (अस्मे हम लोगों की वा हम लोगों में (श्रवसे) रक्षा के लिए हो आप उसको (मा, यम्याः) अच्छे प्रकार विस्तारिये तथा हम लोगों में (प्र) अच्छे प्रकार दीजिए उनके साथ (हि) जिससे (जोषम्) प्रीति को (अनु) अनुकूल (स.) वह पाप (मन्दस्वा) आनन्द' करिये ।।८।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिन कर्मों और जिस बुद्धि से विज्ञान और प्रानन्द बढ़ते हैं उनकी भाप लोग वृद्धि करिये ।।८।। फिर मनुष्यों को कैसा वर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । वः सखायः सं यथा सुतेषु सोमेश्वरी पृशता भोजमिन्द्रंम् । कुवित्तस्मा असंति नो भय न सुध्विमिन्द्रोऽबसे वृधात । ९॥ पदार्थ:-हे (सखायः) भित्र जनो (प्रथा) जैसे (सोमेभिः) ऐश्वर्य की प्रेरणा ४५६ ऋग्वेदः मं०६ । सू० २४ ।। ARAN MAN आदि क्रियाओं से (सुतेषु, उत्पन हुओं में (व:) आप लोग और (नः) हम लोगों के (भराय) पालन के लिए (अबसे) रक्षण आदि के लिए जो (इन्द्रः) राजा (न) नहीं (मधाति) हिंसा करे (तम्) उस (भोजन) पालन करने वाले (सुष्विम्) उत्पन्न करने वा ऐश्वर्य करने वाले (इन्द्रम् ) शत्रु के विनाश करने वाले राजा को आप लोग (सन्, पृणता) उत्तम प्रकार सुखी करिये (तस्म) उसके लिए (ईम्) जल से (कुवित्) बड़ा (असति) होवे ।।६।। भावार्थः-- जो मनुष्य राग और द्वेष का त्याग करके परस्पर रक्षण करते हैं वे सुख को प्राप्त होते हैं ।।६।। फिर उसी विषय को कहते हैं ।। एवेदिन्द्र सुते अस्तावि सोमें भरद्वाजेषु क्षयदिन्मघोनः । असयां जरित्र उत सूरिन्द्र रायो विश्ववारस्य दाता ।।१०॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यथा) जैसे (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य वाला जन (सुते) उत्पन्न हुए इस संसार में (सोमे) ऐश्वर्य में (इ) निश्चय (भरद्वाजेषु) विज्ञान को धारण किए हुओं में (अस्तावि) स्तुति' किया जाता है और जैसे (सुरिः) विद्वान् और (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जन (जरित्रे) स्तुति करने वाले जन के लिए (विश्वचारस्य) सम्पूर्ण स्वीकार जिसमें उस (रायः) धन का (दाता) देने वाला (उत) निश्चय से (क्षयत) निवास करे और (इत्) निश्चय कर (नघोनः) धन से युक्त जनों की रक्षा करता हुआ हो वह (एव) ही उस प्रकार का सुखी (प्रसत्) होवे ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं -जो मनुष्य इस संसार में धर्म- युक्त कर्म करते हैं वे सर्वदा स्तुति किये जाते हैं, जैसा देना प्रियकारक होता है वैसा लेना नहीं प्रियकारक होता है ॥१०॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में तेईसवां सूक्त समाप्त हुआ। JAPARAN AAHARAMBI अथ दशरय चतुविंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ । २ भुरिक पङ्क्तिः । ३ । ५। ६. पश्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। ४। ७ । नितिनाटुप् । ८ त्रिष्टुप् । १० विराट् बिष्टुप् छन्दः । धवतः स्वरः । ६ ब्राह्मी बृहतीछन्दः । मध्यमः स्वरः ।।

ऋग्वेदः मं० ६ । सू० २४ ।। ४५७ re AM अब दस ऋचा बाले चौबीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है उसके प्रथम मन्त्र में अब राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । वृषा मद इन्द्रे श्लोक उक्था सचा सोमेषु सृत्या मुंजीपी । अर्चयों मघवा नृभ्यं उक्थैद्यक्षो राजा गिरामक्षितोतिः ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (इन्द्रे) ऐश्वर्यवान् पदार्थ में (श्लोकः) वारणी (वृषा) बलिष्ठ (मदः) आनन्दित (सजा) मेल किये हुए (सुतपाः) अच्छा तपस्वी (ऋजीषी) सरल' गुण कर्म स्वभाव वाला (मघवा) न्याय से इकट्ठे किये हुए धन से युक्त (अक्षितोतिः) नित्य रक्षित (थक्षः) दीप्तिमान् (राजा) प्रकाश करता हुआ ( उक्थैः) प्रशंसनीय कर्मों से (सोमेषु) ऐश्वर्यों में (उत्था) प्रशंसित कर्मों को (गिराम्) न्याय और विद्यायुक्त वाणियों के संबन्ध में (नभ्यः) मनुष्यों के लिए जो (अर्चयः) सत्कार करती हुई प्रजा हैं उनका सुनने वाला हो वही राज्य' करने योग्य हो यह जानो ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो उत्तम कामों को करके सत्यवादी, इन्द्रियों को जीतने वाला, पिता के समान प्रजापालक वर्तमान हो वही सर्वत्र प्रकाशित कीर्तिवाला हो ॥१॥ फिर राजा और प्रजाजनों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं। सतुरि/रो नयाँ विचेताः श्रोता ह, गृणत न्यूँतिः शंसा भरां कारुबाया दाजी स्तुतो विदथे दाति वाजम् ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (ततुरिः) शत्रुओं का मारने वाला (वीरः) वीरता आदि गुणों से युक्त (नर्यः) मनुष्यों में श्रेष्ठ (विचेताः) अनेक प्रकार की बुद्धिवाला और (हवम् ) प्रशंसा करने योग्य व्यवहार की (गुणतः) प्रशंसा करते हुओं के (श्रोता) विवाद विषयक वचनों का सुनने वाला (उन्यू तिः) पृथिवी की रक्षा जिससे (नराम्) मनुष्यों का अग्रणी (वसुः) वास कराने और (शंसः) प्रशसा करने वाला (कारुधायाः) कारीगर धारण किये जाने जिससे यह (बाजी) विज्ञानवाला (स्तुतः) प्रशंसित हुआ (विदथे) संग्राम में (वाजन्) विज्ञान को (दाति) देता है उसकी आप लोग सेवा करो ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम लोग जो मनुष्यों में उत्तम, अधिक बल और बुद्धियुक्त, यथार्थ का सुनने वाला तथा संग्राम में युद्ध विद्या को देने वाला है उस ही का सदा सत्कार करो ॥२॥ atta aad वसुः Aama ४५८ ऋग्वेदः म०६ । सू० २४॥ फिर सूर्य और पृथिवी का कैसा वर्ताव है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अक्षो न चकयोः शुर बृहन्ध नै महा रिरिचे रोदस्योः । वृक्षस्य नु ते पुरुहूत क्या ब्यू३' तयो रुरुहुरिन्द्र पूर्वीः । ३॥ पदार्थ:-हे (शूर) वीर पुरुष (पुरुहूत) बहुतों से प्रादर किये गये (इन्द्र) राजन् जैसे (ते) आपके (मह्ना) महत्त्व से (रोदस्योः) अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में (पूर्वीः) प्राचीन (वि, ऊतयः) विविध रक्षण प्रादि क्रियायें (चक्रयोः) पहियों की (प्रक्षः) धुरी के (न) समान (प्र, रुरुहुः) अच्छे प्रकार प्रकट होवें और हे (बृहन्) महान् (वृक्षस्य) वृक्ष की बढ़वार (न) जैसे वैसे (ते) आपकी (क्याः) अवस्था (रिरिचे) प्रकट होती है उसको सब लोग जानें ॥३॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे पहियों की धारण करने वाली धुरी वृक्ष की शाखाओं के समान बढ़ती हैं और अन्तरिक्ष में स्थित होती हैं वैसे सूर्य के चारों ओर सम्पूर्ण भूगोल घूमते हैं और वैसे ही न्याय के मार्ग से प्रजायें चलती हैं ॥३॥ फिर राजा और प्रजा को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । शचींवतस्तै पुरुशाक शाका गर्वामिव नुतयः संचरणीः । वत्सानां न तन्तर्यस्त इन्द्र दामन्वन्तो अदामानः सुदामन् ।।४। पदार्थ:-हे (पुरुशाक) बहुत सामर्थ्यवान् (इन्द्र) दुःख के नाश करने वाले (शचीवतः) बुद्धि और प्रजा से युक्त (ते) आपकी (गवाभिव, स तयः) गौओं की गतियों के सदृश (सञ्चरणी:) अच्छे प्रकार चलने वाली भूमियां (शाकाः) और सामर्थ्यवाली (वत्सानाम्) बछड़ों की (तन्तयः) विस्तृत पंक्तियों के (न) सदृश (ते) आप की प्रजा हैं, हे (सुदामन, अच्छे नियमों में बंधे हुए जो (नामन्वन्तः) बहुत बन्धनों वाले होवें वे श्राप से (अहामान:) बन्धनरहित करने योग्य हैं ॥४॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं -वे ही राजाजन प्रशसित प्रताप- वाले होते हैं जो अन्याय और पीड़ा आदि के बन्धन से प्रजात्रों को कर धर्ममार्ग में चलाते हैं और जैसे बछड़ों की बढ़ानेवाली गौ होती हैं वैसे ही प्रजा के बढ़ानेवाले राजपुरुष हों॥४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अन्यदद्य कवरमन्यदु श्योऽसच्च सन्मुहुराचक्रिरिन्द्रः। मित्रो नो अत्र वरुणश्च पूर्णर्यो वशंस्य पर्येतास्ति ।।५।। Read - Rani ऋग्वेदः मं० ६ । सू०२४॥ thaar - पदार्थ:-- जा (इन्द्रः) राजा (अद्य) माज (अन्यत्) अन्य (उ) और (श्वः) आने वाले दिन में (अन्यत्) अन्य (कर्वरम्) करने योग्य कर्म को (आचनि:) सब प्रकार से करने वाला (सत्) हुआ (मुहुः) वारं वार (असत) होवे वह (च) और (अत्र) इस संसार में (नः) हम लोगों का (मित्र:) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ (पूषा) पुष्टि करने वाला (अर्यः) स्वामी (च) और (बशस्य) वशवर्ती का (पर्येता) सब ओर से प्राप्त जन (अस्ति) है वह पूर्ण सुख वाला होता है ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो राजा प्रतिदिन वार वार सत्य कर्म का आचरण करता है वह सब के न्याय करने में पक्षपात का त्याग करके मित्र के सदृश होता है और सब इसके वश में होते हैं ॥५॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेमिरिन्द्रानयन्त यज्ञैः । तं त्वाभिः सुष्टुतिभिर्वाजयन्त आजि न जग्मुगिर्वाहो अश्वाः ॥६॥ पदार्थः-हे (इन्द्र) राजन् जो (स्वत) पाप से रक्षित हुए (पर्वतस्य) पर्वत के (पृष्ठात्) पीठ से (श्रापः) जल' (न) जैसे वैसे (उक्थेभिः) प्रशंसा करने योग्य कर्मों के अनुष्ठानों से और (यज्ञैः) अच्छे कर्मों के अनुष्ठानों से जिन (त्वा) आपको (गिर्वाहः) वारिणयों को प्राप्त कराने वाले (अश्वाः) बड़े विद्वान्जन (वि) विशेष करके (अनयन्त) पहुंचाते हैं (तम्) उन आपको (श्राभिः) इन प्रत्यक्ष (सष्टुतिभिः) उत्तम स्तुतियों से (वाजयन्तः) प्रसन्न कराते हुए शूरवीर जन (माजिम्) सङ् ग्राम को (न) जैसे वैसे (जग्मुः) प्राप्त होवें ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे राजन् ! जैसे पर्वत के ऊपर वर्तमान जल शीघ्र जाकर जलाशय को प्राप्त होता है वैसे जो आपकी प्रजात्रों के हित के चाहने वाले जन आपको प्राप्त होते हैं उनके सहित ही आप सदा उन्नत हूजिए ॥६॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। न यं जरन्ति शरदो न मासा न धाव इन्द्रमक कर्शयन्ति । वृद्धस्य चिद्वर्धतामस्य तनः स्तोमेभिरुक्थैश्च शस्यमांना ॥७॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जिस (नस्य) इस जीव (वृद्धस्य) वृद्ध विद्वान् का (तनूः) शरीर (स्तोमेभिः) स्तुति करने के योग्यों और इन (उक्थैः) कहने के योग्य पदार्थों से (च) भी (शस्यमाना) प्रशंसा करने योग्य (चित्र) भी (वर्धताम्) बढ़े LAICHHANNEL ४६० ऋग्वेदः मं० ६ । सू० २४ ।। M और (यम्) जिस (इन्द्रम्) परमात्मा को. (शरदः) शरद् आदि ऋतुयें (न) नहीं (जरन्ति) जीर्ण करती हैं और (मासा:) चैत्र आदि महीने (न) नहीं जीर्ण करते हैं तथा (धाव:) सूर्य आदि (न) नहीं (अबकर्शयन्ति) दुर्बल कर सकते हैं उस विद्वान् श्रीर परमात्मा का आप लोग सेवन करिये ॥७॥ भावार्थ:-वही विद्वान् वृद्ध होकर वृद्धि को प्राप्त होता है जो सब को अच्छे बुद्धिमान्, सुशील तथा धर्माचरण करने वाले करता है और जो निविकार और जन्म मरण बुढ़ापा आदि दोषों से रहित परमात्मा की उपासना करते हैं वे प्रशंसा करने योग्य होते हैं ।।७।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न वीळो नमते न स्थिराय न सधैते दस्युजूनाय स्तवान् । अन्ना इन्द्रस्य गिरयश्चिष्मा गभीरे चिद्भवति गाधर्मस्मै ।।८।। पदार्थ:-हे विद्वानी जो दस्युजूताय) दुष्टों के संग के लिये (वीळवे) प्रशंसा करने योग्य बल के लिए (न) नहीं (नमते) नम्र होता (स्थिराय) स्थिर गंभीर पुरुष के लिए (न) नहीं नम्र होता तथा (शद्धते) बल के लिए (न) न (स्तवान्) स्तुति करे जिस (इन्द्रस्य) बिजुली के (ऋष्वाः) बड़े (अनाः) फेंकने वाले गुण (गिरयः) मेघों के (चित् । सदृश हैं (अस्मै) इस के लिए (गाधम्) ग्रहण किया परिमाण (गम्भीरे) गुरुपन में (चित्) भी (भवति) होता है उसकी प्रशंसा करिये ॥८॥ ope HOW mcam भावार्थः -- जैसे बिजुलियां अथाह गुणवाली हैं वैसे ही परमात्मा के असंख्य गुण हैं और जो परमात्मा और यथार्थवक्ता जनों का त्याग करके दुष्टों का संग करते हैं वे सब काल में सुखी होते हैं ।।८।। फिर उस ही विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । गम्भीरेण न उरुणांमत्रिन्मेषो यन्धि सुतपावन्वाजान् । स्था ऊ षु ऊर्ध्व ऊती अरिषण्यन्नस्तोव्युष्टौ परितक्म्यायाम् ।।९।। पदार्थ:-है (अमत्रिन्) बहुत बल से युक्त और (सुतपावन्) उत्पन्न पदार्थों के पवित्र करने वाले आप (गम्भीरेण) गम्भीर और (उरुणा) बहुत से (न:) हम लोगों को (इषः) अन्न आदिक (यन्धि) दीजिए (उ) और (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (ऊर्ध्व:) ऊपर वर्तमान (अरिषण्यन्) नहीं हिंसा करते हुए (अक्तोः) रात्रि से (व्युष्टी) प्रभातकाल में और (परितम्यायाम्) रात्रि में (वाजान्) विज्ञान आदिकों को (सु, प्र) अति उत्तम प्रकार (स्थाः) स्थित हूजिए ॥६ Prata N ऋग्वेदः मं०६ । सू०२५ ॥ Ma भावार्थ:-जो यम और नियमों से युक्त हुए कार्य की सिद्धि के लिए दिन-रात्रि प्रयत्न करें ये उत्तम होते हैं ।।६।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सर्चस्व नायमबसे अभीक इतो वा तमिन्द्र पाहि रिषः । अमा चैनमरण्ये पाहि रिपो मदेम शतहिमाः सुवीरा ॥१०॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् वा विद्वन् श्राप (अवसे) रक्षण आदि के लिए (अभीके) समीप में (नायम्) न्याय को (सचस्व) प्राप्त हूजिए (इतः) यहाँ से (वा) वा (रिषः) हिंसा करने वाले से (पाहि) रक्षा कीजिए और (एनम्) इसकी (प्रमा) गृह में और (अरण्ये) वन में (पाहि) रक्षा कीजिए (रिषः, 'च) और दुष्ट आचरण से भी, जिससे (सुवीराः) सुन्दर वीर जिन के ऐसे हम लोग (शत हिमाः) सौ वर्ष पर्यन्त (मदेम) आनन्द करें ॥१०॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन हैं वे दूर वा समीप में वर्तमान हुए न्यायाचरण और योगाभ्यास से बुद्धि को बढ़ाए हुए वस्ती और जङ्गलों में पुरुषार्थ से प्रजाजनों की रक्षा करें ॥१०॥ इस सूक्त राजा, विद्वान् और ईश्वर के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में चौबीसवां सूक्त समाप्त हुना॥ अथ नवर्चस्य पञ्चविंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः। इन्त्री देवता । १।५ पड्वितः । भुरिक पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २।७1८18 निवृत्रिष्टुप् । ४।६ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब नव ऋचा वाले पच्चीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अब राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं। या त ऊतिरक्षमा या परमा या मध्यमेन्द्र शुष्मिन्नस्ति । तामिरू षु वृत्रहत्येऽवीन एभिश्च वाजैर्महान्न उग्र ॥१॥ पदार्थ:-हे : (शुस्मिन्) प्रशंसित बल से युक्त (उन) तेजस्विन् (इन्द्र) न्यायाधीश राजन् (वे) आपकी (या) जो (अदमा) निकृष्ट-खराब और (या) जो पध्यमा) मध्यम और (या) जो (परमा) उत्तम (ऊतिः) रक्षा (अस्ति) है patan - ४६२ ऋग्वेदः मं०६ । सू०२५॥ (ताभिः) उनसे (वृत्रहत्ये) मेघ के नाश के समान नाश जिसमें उस संग्राम में (न:) हम लोगों की (सु) उत्तम प्रकार (प्रवीः) रक्षा कीजिये (ऊ) और (एभिः) इन (वाजः) वेग आदि उत्तम गुणों से (च) भी (महान्) बड़े हुए (न:) हम लोगों की रक्षा कीजिए ॥१॥ की सब प्रकार से रक्षा करें तो प्रजा भी आपकी सब प्रकार से रक्षा करेगी ॥१॥ . फिर सेना का स्वामी क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। आभिः स्पृधों मिथतीररिषण्यन्नमित्रस्य व्यथया मन्युमिन्द्र । आमिविश्वा अभियुजो विधूचीरायर्याय विशोऽर्थ तारीर्दासी ॥२॥ पदार्थ:-है (इन्द्र) सेना के स्वामी श्राप (माभिः) इन' रक्षाओं वा सेनानों से (मिथती:) शत्रुओं की सेनाओं का नाश करते हुए (स्पृधः) संग्रामों की (अरि- षण्यन्) नहीं हिंसा करते हुए (अमित्रस्या) शत्रु की सेनाओं को (मन्युम्) क्रोध करके (व्यथया) पीड़ा दीजिये और (भाभिः) इन रक्षा और सेनाओं से (प्राय) उत्तम जन के लिये (विश्वाः) सम्पुर्ण (अभियुजः) अभियुक्त होने और (विषूची:) व्याप्त होने वाली (दासी:) सेविकाओं को और (विश:) प्रजानों को (अब, तारी:) दुःख से पार करिए ॥२॥ भावार्थः-वे ही सेना के स्वामी सत्कार करने योग्य हैं जो अपनी सेनाको उत्तम प्रकार शिक्षा दे तथा उत्तम प्रकार रक्षा कर और सत्कार करके युद्ध विद्या में चतुर करके डाकुओं और अन्यायकारी शत्रुओं को निवारण करके नाच्छी प्रजात्रों की निरन्तर रक्षा करें ॥२॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। इन्द्र जामर्थ उत येजाजयोऽर्वाचीनाखो वनुषो युयुन्न । त्वमेषां विथुरा शांति जहि वृष्ण्यांनि कृणुही परांचा ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सेना के स्वामी (स्वम्) आप (ये) जो (अर्वाचीनासः) इस काल में हुए (जामयः) पतिव्रता स्त्रियों के सदृश और (उत) भी (प्रजामयः) सौतियां जैसे वैसे शत्रु जन (वनुषः) संविभाग करने वालों को (युयुन) युक्त होते अर्थात् मिलते हैं (एषाम् ) इन शत्रुओं की (विथुरा) पीड़ा देने वाली (शवांसि) सेनाओं को (त्वम्) आप (जहि) नष्ट कीजिए और अपनी सेनाओं को (वृष्ण्यानि) JOB ऋग्वेदः मं०६। सू० २५॥ AURA Knt ma बलिष्ठ (कृणुहि) करिये और शत्रुओं को (पराचः) पराङ मुख कीजिये अर्थात् हटाइये ॥३॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु०-वे ही मंत्री उत्तम हैं जो धार्मिक प्रजाओं की पुत्र के सदृश रक्षा करते हैं और दुष्टों को दण्ड देते हैं और अपनी सेनाओं को बढ़ाय के शत्रुओं की सेना को पराजित करते हैं ॥३॥ फिर राजा और मन्त्रीजन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शुरो वा शूर वनते शरीरैस्तनूरुचा तरुषि यत्कृण्वैते । तोके दा गोषु तनये यदमु धि क्रन्दसी उर्वरासु बैते ।।४।। पदार्थ:-हे राजजनो जैसे (शूरः) शूरवीर पुरुष (तनूरुचा) शरीरों में हुई प्रीति से और (शरीरैः) शरीरों से (तरुषि) दुःख से पार करने वाले सङ ग्राम में (शूरम्) शूरवीर जन का (वनते) आदर करता है (वा) वा दोनों (यव) जिसको (कृण्वते) करें और (ऋन्दसी) कोशते हुए (यत्) जो (तोके) शीघ्र उत्पन्न हुए (तनये) सुकुमार बालक के होने पर (उर्वरासु) पृथिवी आदि कारणों में (गोषु) वाणियों में (वा) अथवा (अप्सु) जलों में (वि, अवैते) कहें वैसे आप लोग भी हूजिये ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे सङ्ग्राम में शूरजन शूरवीरों का विभाग करके युद्ध करते हैं वैसे ही राजा और अमात्य श्रेष्ठ और अधमों का विभाग करके अधिकारों में युक्त करके प्राज्ञा देवे और जैसे खेती की विद्या से खेतीहारों को जनावे वैसे ही अपने सन्तानों को उत्तम शिक्षा से विद्या ग्रहण के लिये ब्रह्मचर्य में प्रवृत्त करावे ॥४॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । गहि त्वा शुरो न तुरो न धृष्णुन त्वां योधो मन्यमानो युयोध। इन्द्र नकिंष्ट्वा प्रत्यंस्त्येषां विश्वा जाहनस्यसि तानि ||५|| पदार्थ:-हे (इन्द्र) सेना के स्वामिन् ! जैसे (स्वा) आपको (मन्यमानः) मानता हुअा (शूरः शूरवीर जन (वा) आपसे (नहि) नहीं युयोध) युद्ध करता और (न) न (तुरः) हिंसा वा शीघ्र करने वाला (न) न (धृष्णुः) ढीठ (न) और न (योधः) प्रतियोधा (स्वा) प्राप से (अभि) सब प्रकार से युद्ध करता है, किन्तु आप के (प्रति) प्रति कोई भी (नकिः) नहीं (अस्ति) है और (एषाम्) इन की जो (विश्वा) सम्पूर्ण (जातानि) प्रसिद्ध सेना हैं जिस कारण (तानि) उनको आप जीत कर जीतते हुए (असि) हैं इससे प्रशंसा को प्राप्त होते हैं ॥५॥ BACARE its ४६४ ऋग्वेदः मं०६ । सू० २५ ।। IRC awre Nadan भावार्थ:-राजा और राजपुरुषों को चाहिये कि विशेष करके सेनाजनों से ऐसा पराक्रम और विज्ञान बढ़ावें जिससे कोई भी युद्ध करने की इच्छा न करे ॥५॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स पत्यत उभयौनम्णमयोर्यदी वेधसः समिथे हवन्ते । वृत्रे वा महो नृपति क्षथै वा व्यचस्वन्ता यदि वितन्तसत ॥६।। पदार्थः- हे राजन् जो आप (उभयोः) दोनों अर्थात प्रजा और सेना के मध्य में (पत्यते) स्वामी के सदृश आचरण करते हो (स:) वह पाप (यबी) यदि (नम्णाम्) मनुष्य रमते हैं जिसमें उस धन' को (अयोः) मिलावे वा अलग करें और (वृत्रे) धन (वा) वा (महः) बड़े (नृदति) प्रशंसायुक्त नर विद्यमान जिसमें उस (क्षये) गृह में (व्यवस्थन्ता) व्याप्त होने वाले (वितन्तसते) अत्यन्त युद्ध करें तो दोनों अर्थात् प्रजा और सेना के मध्य में एक विजय को प्राप्त होवे और (यदि, वा) अथवा जो (बेधसः) बुद्धिमान् के (समिथे) सङ ग्राम में (हवन्ते) स्पर्धा करते हैं वे अवश्य विजय को प्राप्त होते हैं ॥६॥ भावार्थ:---जो राजा पक्षपात का त्याग करके शत्रु और मित्र का सत्य न्याय करता है और सब अधिकारियों में धार्मिक, बुद्धिमान जनों को रखता है और सब प्रकार से सेना में कुलीन, दृढ़, राजभक्तों को नियुक्त करता है वही सर्वदा विजयी होता है ॥६॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अध समाते चर्षणयो यदेजानिन्द्र नातोल भावा बरुता । अस्माकांसो ये नृतमासो अर्थ इन्द्र सूरगो दधिरे पुरो नः ॥७॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले राजन् (ये) जो (ते) आप के (अस्माकासः) हमारे (नृतमासः) अतिशय मुखिया और (सूरयः) विद्वान् जन (चर्षणयः) सम्पूर्ण व्यवहारों में चतुर मनुष्य (मः) हम लोगों के (पुरः) नगरों को (दधिरे) धारण करें और उनके (अर्य:) स्वामी होते हुए (अध) अनन्तर (नाता) रक्षा करने वाले (भव) हूजिये और हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करने वाले' (यद) जिससे श्राप (एजान्) भयभीतों को कम्पाने वाले करिये और (उत) भी (वरूता) श्रेष्ठ (स्मा) ही हूजिए ॥७॥ भावार्थ:-हे राजन् ! विश्वासयुक्त, कुलीन, मुख्य राज्य में हुए pet N में (क्षत्रम्) मध्य में (नूनम्) निश्चय से (गणन्तः) स्तुति करते हुए (उत्त) भी (भारद्वाजाः) शुद्ध विज्ञान को धारण किस ऋग्वेदः म ६ । सू० २५ ।। ४६५ जनों को इस राज्य और सेना के मध्य में रक्षा के निमित्त नियुक्त करिये और उनकी रक्षा निरन्तर करिये ॥७॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अनु ते दायि मह इन्द्रियाय सत्रा विश्वमर्नु वृत्रहत्यें। अनु क्षत्रमनु सहो यजत्रेन्द्र देवेभिरर्नु ते नृपये ।।८।। पदार्थ:--- हे (यजन) अत्यन्त श्रेष्ठ (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करने वाले राजन् आपको चाहिए कि (नुषा) मनुष्यों से सहने योग्य संग्राम में (देवेभिः) विद्वानों के साथ (महे) बृहत् को (मनु, दायि) देखें और (ते) आपके (इन्द्रियाय) धन के लिए (से) आपके (सत्रा) सत्य से विश्वम्) सम्पूर्ण जगत् को (अनु) पश्चात् देवें और (वृत्रहल्ये) मेघ के नाश करने के समान संङग्राम राज्य वा धन को (अन) पश्चात् देखें और (सहः) बल को (अनु) पश्चात् देखें और (ले) अापके मनुष्यों से सहने योग्य सङग्राम में सुख को (इन) पश्चात् देवें ।।८।। भावार्थ:-- हे क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए जन ! आप उत्तम कर्मों को करिये और उनके साथ अनुकूल हुए उनका धन प्रादि से निरन्तर सत्कार करिए और सदा ही सत्य के उपदेशक विद्वानों के संग से सम्पूर्ण राजविद्या को जानकर निरन्तर प्रचार करिए ॥८॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एका नासधा समंजा समात्स्विन्द्र रारन्धि मिथतीरदेवी। विद्याम वस्तोरसा गृणन्तो भरद्वाजा उत त इन्द्र नूनम् ॥९॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सम्पूर्ण सुखों के देने वाले आप (स्पृधः) ईर्षा करते हुए (न:) हम लोगों को (समत्सु) संग्रामों में (एबा) ही (सम्, अजा) विशेष करके जनाइये और (प्रदेवीः) श्रेष्ठ गुणों से नहीं विशिष्ट (मिथतीः) नाश करती हुई शत्रओं की सेनाओं को संग्रामों में (रारधि) नष्ट करिये और है (इन्द्र) शत्रुओं के बल को दूर करने वाले (ते) अापकी (अवसा) रक्षा प्रादि से (वस्तोः) दिन के भावाथ:-जो राजा अच्छे योद्धा वीरों को प्रथम ही उत्तम प्रकार शिक्षा देकर युद्धों में प्रेरणा करता है उस सब प्रकार से रक्षा करने वाले राजा का सब शूरवीर जन आश्रय करते हैं ।। FORI Apan ऋग्वेदः मं० ६ । सू०२६ ।। इस सूक्त में इन्द्र, शूरवीर, सेनापति और राजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी जाहिए । यह छठे मण्डल में पच्चीसवां सूक्त समाप्त हुमा । dias पाग अथाष्टर्चस्य षड्विंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ पङ्क्तिः । २। ४ भुरिक्पङ्क्तिः । ३ निवृत्पङ्क्तिः। ५ स्वराद- पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ६ विरात्रिष्टुप् । ७ त्रिष्टुप् । ८ निवृत्रिष्टुप्- छन्दः । धैवतः स्वरः।। अब पाठ ऋचावाले छब्बीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा वर्ताव करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । श्रुधी न इन्द्र यामसि त्वा महो वाजस्थ सातौ वाषाणाः । सं यदिशोऽयन्त शूरसाता उग्रं नोऽवः पार्थे अहन्दाः ॥१॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् (वावृषाणा:) बल' को करते हुए (विश:) मनुष्य आदि प्रजा हम लोग (महः) बड़े (वाजस्य) वेग प्रादि गुणों से युक्त के (सातो) शूरों का विभाग जिसमें उस सङग्राम में (यत्) जिससे (त्वा) आपको (ह्वयामसि) जनावें तिस से आप (नः) हम लोगों के लिए वचनों को (श्र धी) सुनिये और जो (शूरसातौ) शूरों का विभाग जिसमें उस सङ ग्राम में (नः) हम लोगों को (सम, अयन्त) प्राप्त होते हैं उस (पार्ये) पालन करने योग्य (अहन्) दिन में (उग्रम्) तेजस्वी को (भव:) रक्षण (दा:) दीजिये ॥१॥ भावार्थ:-राजाओं को यह अति योग्य है कि प्रजा कहै उसको ध्यान से सुनें जिससे राजा और प्रजाजनों का विरोध न होवे और प्रतिदिन सुख बढ़े ॥१॥ on D- फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। त्वां वाजी हवते वाजिनेयो महो वाजस्य गध्यस्य सातौ । त्वां वृत्रेष्विन्द्र सरपति तस्त्रं त्यां चष्टे मुष्टिहा गोषु युध्यन् ॥२॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करने वाले जैसे (वाजिनेयः) ज्ञानवती का सन्तान और (वाजी) वेगयुक्त ज्ञानी जन (गध्यस्य) सबसे प्राप्त होने योग्य (वाजस्य) विज्ञान के (सातो) उत्तम प्रकार विभाग में (स्वास्) आपको (हवते) सुनावे वैसे (वत्रेषु) धनों में (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालन करने वाले (त्वाम् ) आपको ऋग्वेदः म०६। सू०२६ ।। ४६७ raa onld मैं (महः) बड़ा (चष्टे) कहता हूँ और (गोषु) प्राप्त होने योग्य भूमियों में (युध्यन्) युद्ध करता हुआ (मुष्टिहा) मुष्टि से मारने वाला मारता हुआ धनों में (स्वाम्) प्रापको मैं (तस्त्रम्) पार करने वाला कहता हूं ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजन् ! जहां-जहां प्रजाजन आपको प्राप्त होने की इच्छा करते हैं वहां-वहां भाप उपस्थित हूजिये ॥२॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वं कवि चौदयोऽर्कसातौ त्वं कुत्सीय शुष्ण दाशुषे वर्क । त्वं शिरो अधर्मणः पराहन्नतिथिग्वाय शस्य करिष्यन् ॥३॥ पदार्थ:--हे तेजस्विराजन् (त्वम्) अाप (अर्कसातौ) अन्न आदि के विभाग में (कविम्) विद्वान् की (चोदयः) प्रेरणा करिये और (त्वम्) आप (कुत्साय) वज के लिए और (धाशुषे) दान करने वाले के लिए (शुष्णम्) बल को (वक) काटते हो और (त्वम्) श्राप (अमर्मणः) नहीं विद्यमान मर्म जिसमें उसके (शिर:) शिर को (परा, अहन्) - दूर करिये और (अतिथिग्वाय) अतिथियों को प्राप्त होने वाले के लिए (शंस्यम्) प्रशंसा करने योग्य कर्म को (करिष्यन्) करते हुए वर्तमान हो इससे आप सत्कार करने योग्य हो ॥३॥ भावार्थ:---राजा विद्या और विनय आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त जनों को राजकार्यों से युक्त करे और उन्नति को करता हुआ विद्या आदि का दाता होकर प्रशंसा को प्राप्त होवे ॥३॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। त्वं रथं प्र भरो योधमृष्यमावो युध्यन्तं वृषभं दधुम् । त्वं तु वेतसवे साहन्त्वं तुजि गृणन्तमिन्द्र तूतोः ॥४॥ पवार्थ:-हे (इन्द्र) सेना के स्वामिन् (स्वम्) आप (रथम्) सुन्दर वाहन को (प्र, भरः) धारण करिये तथा (वृषभम्) बलिष्ठ (दशा म्) दश अंगुलियों से प्रकाश देने वाले और (योधम्) युद्ध करने वाले से (युध्यन्तम्) युद्ध करते हुए (ऋष्यम्) बड़े की (माव:) रक्षा करिये और (त्वम्) आप (वेतसवे) व्याप्त ऐश्वर्य वाले में (सचा) सम्बन्ध से (तग्रम्) तेजस्वी को (महन्) दूर करिये और (स्वम्) आप (गृणन्तम्) स्तुति करते हुए (तुजिम्) बलिष्ठ को (तूतोः) बढ़ाइये ॥४॥ भावार्थ:-जो राजा रथ और युद्धकुशल वीरों को बढ़ाता है वह अत्यन्त सुख को प्राप्त होता है ॥४॥ INDI N ऋग्वेदः मैं०६ । सू०२६ * फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। त्वं तदुक्यमिन्द्र बर्हणा का प्रयच्छता सहस्रा शुर दर्षि । अब गिरेसं शम्बरं इन्प्रावो दिवोदासं चित्राभिरूती ॥५॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सुख के देने वाले राजन् जिससे (त्यन्) आप (चित्राभिः) अद्भुत (ऊती) रक्षात्रों से (तत्) उस (उक्थम्) प्रशंसनीय वचन को (बर्हणा) बढ़ने से (कः) करें और हे (शूर) शत्रुओं के नाश करने वाले (शता) सैकड़ों और (सहस्त्रा) हजारों का (प्र, वर्षि) नाश करते हो और (गिरेः) मेध के (बासम्) सेदक और (शम्मरम्) कल्याण करने वाले का (प्रव, हन्) नाश करते हो और सूर्य जैसे वैसे नाश करते हो वह आप (दिवोदासम्) प्रकाश के समान उत्पन्न दानशील अर्थात् दान देने वाले की (प्र, पावः) रक्षा करो ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजन् ! आप सर्वदा प्रजा की वृद्धि, दुष्टों का नाश और विद्वानों की सेवा करो जिससे असंख्य सुख होवे ।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्व श्रद्धाभिर्मन्दसाना सोमर्दभीतये चुमुरिमिन्द्र सिष्वप । के रजि. पिठीनसे दशस्यन्पष्टिं सहस्रा शच्या साहन् ।।६।। पदार्थ:-है (इन्द्र) राजन् (त्वम्) आप (श्रद्धाभिः) सत्य की धारणाओं से और (सोमः) ऐश्वर्यों से (मन्दसान:) आनन्द करते हुए (दभीतये) दुःख के नाश के लिए (चुमुरिम्) भोजन करने वाले को (सिष्वप) सुलाइये और (स्वम्) प्राप (शच्या) बुद्धि वा कर्म के (सचा) साथ पिठीनसे) पिठी के सदृश नासिका जिसकी उसके लिए (रजिम्) पङक्ति (पष्टिम्) साठ (सहला) हजार (दशस्यन्) देता हुआ जैसे सूर्य मेघ का (अहन्) नाश करता है वैसे शत्रुओं का हनन कीजिए ।।६।। भावार्थ:-हे राजन् ! सदा ही पूर्ण प्रीति और न्याय से प्रजापालन करो और हजारों धार्मिक विद्वानों को अधिकारों में स्थापित करके यश बढ़ाओ ।।६।। फिर उसी विषय को कहते हैं। अई चन तत्सूरिभिरानश्या तव ज्याय इन्द्र सुम्नमोजः । त्वया यत्स्तवन्ते सधवीर वीरास्त्रिवरूथे। नहुषा शविष्ठ ॥७॥ an B- HD om 4- पदार्थ:-हे (शविष्ठ) बलिष्ठ और (सधनीर) ऋग्वेदः मं०६ । सू०२७ ।। जन (इन्द्र) सुख के देने वाले (वीराः) वीर (नहुषा) मनुष्य विद्वान् (यत्) जिसकी (स्तवन्ते) प्रशंसा करते हैं (तत्) उसको (त्रिवरूथेन) तीन प्रकार के शीत उष्ण और वर्षा में सुखकारक गृह जिनके उन (त्वया) आपके और (सूरिभिः) विद्वानों के साथ (अहम्) मैं (मानश्याम्) प्राप्त होऊ और (चन) भी तव) आपका जो (ज्यायः) प्रशंसा करने योग्य (सुम्नम् ) सुख और (प्रोज:) पराक्रम है उसको प्राप्त होऊ ॥७॥ भावार्थ:-जो विद्वानों के संग से पुरुषार्थी होकर प्रशंसा करने योग्य, धर्मयुक्त कर्म को करते हैं वे बली होकर उत्तम सुख को प्राप्त होते हैं ॥७॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। वयं ते अस्यामिन्द्र द्युम्नहूतौ सखायः स्याम महिन प्रेष्ठाः ! प्रातर्द निः क्षत्रश्रीरस्तु श्रेष्ठो घने वृत्राणां सनये धनानाम् ॥८॥ पदार्थ:-है (महिन) बड़े श्रेष्ठ (इन्द्र) सब के सुख देने वाले (वयम्) हम लोग (ते) आपकी (स्याम्) इस (ध मनहूतौ) धन वा यश से आह्वान जिसमें उसमें (प्रेष्ठाः) अतिशय प्रिय (सखायः) मित्र (स्याम) होवें और आप (प्रातर्दनिः) प्रातःकाल में देना जिनका वह (वृत्राणाम् ) धर्म के आवरण करने वालों के (धने) नाश करने में (धनानाम्) धनों के (सनये) विभाग के लिये (श्रेष्ठः) अत्यन्त प्रशंसनीय (क्षत्रधीः) राज्य लक्ष्मीवान् (प्रस्तु) होवें ॥८॥ भावार्थ:----जो राजा गुणग्राही, पुरुषार्थी, श्रष्ठ जनों का पालन करने और दुष्ट जनों का निवारण करने वाला तथा सबका मित्र होवे उसके साथ सज्जनों को चाहिये कि मित्रता करें॥८॥ इस सूक्त में इन्द्र, परीक्षक, श्रेष्ठ, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में छब्बीसवां सूक्त समाप्त हुआ। , अथाष्टर्चस्य सप्तविंशतितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः। १-७ इन्द्रः । ८ अभ्यावसिनश्वायमानस्यदानस्तुतिर्देवता । १।२ स्वराः पतिः। ३ । ४ निचरित्रष्टुप् । ५। ७।८ त्रिष्ट छन्दः । धैवतः स्वरः । ६ ब्राह्मी उष्णिक छन्दः। ऋषभः स्वरः॥

४७० ऋग्वेदः मं०६। सू० २७॥ Mana अब पाठ ऋचावाले सत्ताईसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में प्रश्नों को कहते हैं । किमस्य मदे किम्वस्य पीताविन्द्रः किमस्य सख्ये चकार । रणां वा ये निषदि किं ते अस्य पुरा विविद्रे किमु नृतनासः॥१॥ पवार्थ:-हे वैद्यराज (इन्द्रः) दुःख के नाश करने वाले ने (प्रस्य) इसके (मदे) मानन्द में (किम्) क्या (चकार) किया (अस्य) इसके (पीती) पान करने में (किम्) क्या (उ) ही किया (अस्य) इसके (सख्ये) मित्रपने में क्या किया और (ये) जो (वा) वा (निषदि) बैठते हैं जिसमें उस गृह में (रणा:) रमते हुए (मस्य) इसके (पुरा) सन्मुख (किम्) क्या (विविक्रे) जानते हैं और (किम्) क्या (उ) और (नूतनासः) नवीन जन जानते हैं वे (किम्) क्या अनुष्ठान करते हैं ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में सोमलता आदि के रस के पानविषयक प्रश्न हैं उनके उत्तर अगले मन्त्र में जानने चाहियें ॥११॥ अब किस-किस द्रव्य' का सेवन करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सदस्य मदे सदस्य पीताविन्द्रः सदस्य संख्ये चकार । रणा वा ये निषदि सत्ते अस्य पुरा विविद्रे सदु नुतनासः ॥२॥ पवार्थ:-हे जिज्ञासु जनो (इन्द्रः) पूर्ण विद्यावाला वैद्य (प्रस्थ) इस सोमलता मादि बड़ी ओषधिसमूह के (मदे) मानन्द में (सत) प्रमाद से रहित सत्य ज्ञान (चकार) करे और (मस्य) इसके (पोतो) पान करने में (सत्) प्रमाद से रहित सत्य ज्ञान को (उ) भी करे और (अस्य) इस के (सख्ये) मित्रपन में (सत्) प्रमादरहित सत्य ज्ञान को करे (ये, वा) अथवा जो (निषदि) बैठते हैं जिसमें उस गृह अर्थात् बैठक में (रणाः) रमते हुए (प्रस्य) इसके (सत्) प्रमादरहित सत्य ज्ञान को (विवि) प्राप्त होते हैं (ते) वे (पुरा) पहिले (नूतनासः) नवीन जन (सत) प्रमादरहित सत्यज्ञान को (७) ही प्राप्त होते हैं ॥२॥ भावार्थ:-मनुष्य लोग मादक द्रव्य के सेवन का त्याग करके सर्वदा बुद्धि, बल, आयु और पराक्रम के बढ़ाने वालों का सेवन करें जिससे सदा ही सुख बढ़े ॥२॥ STAR APAN बिजुली के समीप से (निहतस्य) गिराये एतत्) इसको (ते) आपकी (वज्रस्य) ऋग्वेदः मं०६ । सू०२७ ।। ४७१ फिर मनुष्यों को किसका ध्यान करना चाहिए इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। नहि नु ते महिमनः समस्य न मघवन्मघवत्वस्य विद्म न रासो राधसो नृतनस्येन्द्र नकिर्ददृश इन्द्रियं ते ॥३॥ पदार्थ:----हे (मघवन्) न्याय से इकट्ठे किये हुए धन से युक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले जिन (ते) आपकी (महिमनः) महिमा का और (समस्य) तुल्यता का कोई (नु) भी (नहि) नहीं (ददृशे) देखा जाता है तथा हम लोग (मघवत्त्वस्य) बहुत धन से युक्तपने के तुल्य कुछ भी (न) नहीं (विद्य) जानें और (नूतनस्य) नवीन (राघसोराधसः) धन धन के तुल्य (नकिः) नहीं देखा जाता है और (ते) आपका (इन्द्रियम्) इन्द्रिय (न) नहीं देखा जाता है उनकी उपासना को हम लोग करें ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिसकी महिमा के समान महिमा, ऐश्वर्य- सामर्थ्य के समान सामर्थ्य और स्वरूप नहीं विद्यमान है उसी सर्वव्यापक, सन्तिर्यामी, जगदीश्वर का निरन्तर ध्यान करो।।३।। फिर राजा और प्रजा को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एतत्यत्त इन्द्रियमंचेति येनावधीवरशिखस्य शेषः । वज्रस्य यत्ते निहतस्य शुष्मात्स्वनाच्चिदिन्द्र परमो ददार ॥४॥ पदार्थ:-है (इन्द्र) सूर्य के समान राजन् (परमः) श्रेष्ठ माप (यत) जनाता है (येन) जिससे (घरशिखस्य) श्रेष्ठ शिखा वाले (ते) आपका (शेषः) शेष है और भाप (अवधीः) नाश करें और बिजुली (चित्) जैसे (शुष्मात्) बल और शोषण से (स्वनात्) शब्द से भय देती है वैसे ही आप दुष्टों को भयभीत करिये ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं.--जो राजा बिजुली के समान पराक्रमी, विज्ञान को बढ़ाने वाला, न्याय के व्यवहार में सूर्य के सदृश प्रकाशित होता है वही राजाओं में शिरोमणि समझना चाहिये ॥४॥ फिर वह कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। - ALL MOD sky प्राप्त होते हैं उनका आप सत्कार कारये ॥६॥ ४७२ ऋग्वेदः मं०६ । सू० २७ ॥ वधीदिन्ो वरशिवस्य शेषोऽभ्यावर्तिन चायमानाय शिक्षन् । वृचीवतो यदरियूपीयर्यायां हन् पूर्व अर्धे भियसापरो दत् ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्) जो (शेषः) अवशिष्ट (इन्द्रः) सूर्य (बचीवतः) अविद्या का छेदन प्रशंसित जिसके उस (वरशिसस्थ) श्रेष्ठ शिखा वाले के समान मेघ के (अभ्यातिने) चारों ओर घूमने वाले के लिए जैसे वैसे (चायमानाय) सत्कार करने वाले के लिए (शिक्षन्) बिद्या देता हुआ (भियसा) भय से (हरियूपीयायाम्) विचारशील' मनुष्यों की इच्छा करते हुओं की पानक्रिया में (पूर्वे) सन्मुख (अद्ध) अर्द्धभाग में (हन्) नाश करता वा (वधीत्) नाश करे (अपरः) अन्य बिजुलीरूप अग्नि उसको (द) विदीर्ण करता है वैसे वर्तमान उपदेशक का हम लोग सत्कार करें ॥५॥ भावार्थ:-जो मनुष्य पूर्व अवस्था में विद्वानों से विद्या ग्रहण करके बुरे व्यसनों का त्याग करके उत्तमस्वभावयुक्त होते हैं वे अधर्माचरण से डरते हैं ॥५॥ फिर राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्रिंशच्छतं वम्भिक इन्द्र साक यव्यावत्यां पुरुहूत श्रवस्या । वृचीवन्तः शरवे पत्यमानाः पा भिन्दाना न्यान्यायन् ॥६॥ पदार्थ:--(पुरुहूत) बहुतों से स्तुति किये गए (इन्द्र) सेना के स्वामिन् (निशच्यसम्) तीस सैकड़े (वमिणः) कवच को धारण किये हुए (वृचीवन्तः) रोग से आच्छादित करते हुए (शरवे) हिंसन के लिए (पात्रा) शत्रुओं के वाहनों को (मिन्दानाः) विदीर्ण करते और (पत्यमानाः) पति के सदृश आचरण करते हुए (साकम्) साथ (ययावत्याम्) यवों से बने पदार्थों के पाक जिसमें उस सेना में सब लोग (श्रवस्था) अन्त में होने वाले (न्यानि) निश्चित अर्थ जिनमें उन भावार्थ:-हे राजन् ! जो वीर पुरुष, राजविद्या में निपुण, कार्यों के प्रारम्भ में दृढ़ प्रयोजन, सिद्ध वस्त्रों वाले होवें वे आप से सेना में सत्कार- पूर्वक रखने योग्य हैं ॥६॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यस्य गावावरुषा सूंघवस्यू अन्तरूपु चरतो रेरिहाणा । स सृञ्जयाय तुर्वशं परांदाचीतो देवयाताय शिक्षन् ॥७॥ SHA me :2une ऋग्वेदः म०६। सू०२८ ।। ४७३ पदार्थ:--हे राजन् (यस्य) जिसके (अरुषा) चारों ओर से रक्त (सूयवस्यू) अपने उत्तम यवों की इच्छा करतीं और (रेरिहाणा) अास्वादन करती हुई (गायों) किरणों के सदृश सेना और राजनीति प्रजा के (अन्तः) मध्य में (सु, चरतः) उत्तम प्रकार चलती हैं (सः) वह (देववाताय) श्रेष्ठ वायु के विज्ञान और (सृञ्जयाय) उत्पादन के लिए (वृधीवतः) छेदन वाले के (तुर्वशम्] मनुष्य को (शिक्षन्) शिक्षा देता (उ) और दुर्गण को (परा, अदात्) दूर करे और अखण्डित राज्य को प्राप्त होवे ॥७॥ भावार्थ:-जो राजा नीति और सेना की वृद्धि करता है वह अखण्डित राज्य को प्राप्त होता है ॥७॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। द्वयाँ अंग्ने रथिनों विशति गा बधुमन्तो मघवा महयं सम्राट् । अभ्यावर्ती चायमानो दंदाति दूणाशेयं दक्षिणा पार्थवानाम् ॥८॥ पदार्थ:--- है (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान जो (वधूमन्तः) अच्छी श्रेष्ठ वधुयें और (रथिनः) श्रेष्ठ रथों वाले होवें जिन (यान्) प्रजा और सेना के जनों को (मधवा) प्रशंसित धन वाले (सम्राट) उत्तम प्रकार से शोभित और (अभ्यावर्ती) जीतने को चारों ओर से वर्तमान (चापमानः) आदर किये गये प्राप (विशतिम्) बीस (गा:) गोत्रों को जैसे वैसे (दवाति) देोते वह भाप (मह्यम्) मेरे लिये जो (पार्थवानाम्) राजाओं की (इयम्) यह (दणाशा) दुर्लभ नाश जिसका ऐसी (दक्षिणा) आप से दी गई है उससे उनको प्रसन्न करिये ॥८॥ भावार्थ:-जो राजा कुलीन, विद्या और व्यवहार में निपुण, धार्मिक राजा और प्रजाजनों को भयरहित करता है वह अतुल प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है ॥८॥ इस सूक्त में इन्द्र, ईश्वर, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सुक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए। यह छठे मण्डल में सत्ताईसया सुक्त समाप्त हुया ।। - अथाष्टर्चस्याष्टविंशतितमस्या सूक्तस्य भरद्वाजो बाहत्पत्य ऋषिः । १। ३- ७३ गाव: । २ । ८ गाथ इन्द्रो वा देवता । १.७ निवृत्रिष्टुप् २ स्वरात्रिष्टुप् । ५।६ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ३। जगती छन्दः । निषादः स्वरः। निवृक्नुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ।।

४७४ aaya AND AR Cour doweimg अग्मन) ऋग्वेदः मं०६ । सू०२८ ॥ अब मनुष्य किरणों के गुणों को जानें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ गावों अग्मन्नुत भद्रमंक्रन्त्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे । प्रजावतीः पुरुरूपा इह स्युरिन्द्रीय पूर्वीरुषसो दुहानाः ॥१॥ पदार्थ:-है (मनुष्यो) जैसे (इह) यहां (अस्मे) हम लोगों के लिए (गाव:) कल्याण को (अक्रन्) करती हैं वे (गोष्ठे) गौत्रों के बैठने के स्थान में (सीदन्त) प्राप्त हों और जैसे (पुरुरूपाः) बहुत रूपवाली (पूर्वोः) प्राचीन (दुहानाः) मनोरथ को पूर्ण करती हुई (उषसः) प्रभात वेलाए (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त के लिए (प्रजावती:) बहुत प्रजाओं वाली (स्युः) होवें वैसे आप लोगों के लिए भी हों ॥१॥ भावार्थ:-जो वृक्षों के लगाने और सुगन्ध आदि से युक्त धूम से पवन के किरणों को शुद्ध करें तो ये सब को सुखयुक्त करते हैं ॥१॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इन्द्रो यज्वने पृणते शिक्षत्युपेद्ददाति न स्वं मुषायति । भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने खिल्ये नि दधाति देवयुम् ॥२॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जो (इन्द्रः) राजा (अस्य) इस संसार के मध्य में (रयिम्) विद्यारूप धन को (इत) (वर्षयन्) बढ़ाता हुआ (अभिन्ने) इकट्ठे हुए व्यवहार में और (खिल्ये) टुकड़ों में हुए के बीच (च) भी (देवयुम्) विद्वानों की हुए विद्वान् को (भूयोभूयः) वारं वार (नि, दा दधाति) निरन्तर धारण करता है भौर (स्वम्) अपने ज्ञान को (न) नहीं (मुषायति) चुराता है और (यज्वने) यज्ञ के करने वाले के लिए (उप, शिक्षति) विद्या देता है और (पणते) सुखयुक्त करता है (च) और (ददाति) देता है वह (इद) ही सबको बढ़ा सकता है ॥२॥ भावार्थ:-वे ही विद्वान् यथार्थवक्ता हैं जो निष्कपटता से वार वार प्रतिदिन विद्याकोश को योग्य के लिए देते हैं ।।२।। अन कौन उत्तम दान है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न ता नेशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति । देवांश्च याभिर्यजते ददाति च ज्योगित्ताभिः सचते गोपतिस्प्लह ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (याभिः) जिन विद्यानों से यजमान (देवान्) विद्वानों on कामना करते ऋग्वेदः मं०६ । सू०२८ ॥ करिये ॥३॥ Laban को (यजते) मिलता और (ददाति) देता (च) भी है तथा (ज्योक) निरन्तर (इव) ही (ताभिः) उन विद्याओं के (सह) साथ (गोपतिः) गौत्रों का स्वामी (सचते) मिलता है (न) न (मासाम्) इनका (प्रामित्रः) शत्रु और (व्यथिः) पीड़ा (च) भी (मा, वधर्षति) तिरस्कार करती है (ताः) वे विद्याएं (न) नहीं (नशान्ति) नष्ट होती हैं तथा (तस्करः) चोर उनका (न) नहीं (दभाति) नाश करता है उन विद्याओं को आप लोग ब्रह्मचर्यादि से ग्रहण भावार्थ:-हे मनुष्यो! सब के लिए अधिक सुख करने, नहीं नष्ट होने और निरन्तर बढ़ने वाले और चोर आदिकों से हरने के अयोग्य विद्या- दान ही है यह जानो ॥३॥ वह विद्या किस को प्राप्त होती और किस को नहीं प्राप्त होती है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न ता अवौं रेणुककाटो अश्नुते न संस्कृतत्रमुपं यन्ति ता अभि । उरुगायमभयं तस्य ता अन गायो मतस्य वि चरन्ति यज्वनः ॥४॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो (ताः) उन विद्याओं को (रेणुककाटः) रेणकाओं के कूप के समान अन्धकार हृदय वाला (भा) घोड़े के समान बुद्धिहीन विषयासक्त जन (न) नहीं (अश्नुते) प्राप्त होता है और मूढजन (संस्कृतत्रम्) संस्कारयुक्त की रक्षा करने वाले को प्राप्त होकर (ता.) उनके (न) नहीं (अभि) सन्मुख (उप, यन्ति) समीप प्राप्त होते हैं किन्तु वे । (उरुगाय) बहुतों से प्रशंसनीय (अभयम्) निर्भय जन के सन्मुख समीप प्राप्त होती हैं और (ता.) वे विधायें (याब:) किरणों के समान (तस्य) उस (यज्वनः) विद्वानों के सेवक और प्राप्त होते हुए (मतस्य) विचारशील मनुष्य के (अनु, वि, चरन्ति) पश्चात् चलती हैं तथा विशेष करके प्राप्त होती हैं ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अशुद्ध आहार और विहार करने वाले, लम्पट, चुगुल और कुसंगी हैं उनको विद्या कभी नहीं प्राप्त होती है। और जो पवित्र आहार और विहार करने वाले, जितेन्द्रिय, यथार्थवक्ता, सत्संगी, पुरुषार्थी हैं उन को विद्या प्राप्त होती है ऐसा जानिये ॥४॥ मनुष्यों को चाहिए कि अवश्य विद्या की प्राप्ति की इच्छा करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। गावो भगो गाव इन्द्रों में अच्छान् गावः सोमस्य प्रथमस्य भक्षा इमा या गावः स जनास इन्द्र इच्छामीङ्ख्दा मनसा चिदिन्द्रम् ।।५।। ।

देवे और मैं (हृदा) आत्मा तथा (मनसा) विज्ञान से (चित्) भी (इन्द्रम्) ऐश्वर्य- उत्तम प्रतीति कराने वाले द्वार प्रादि जिसमें उस (भद्रम्) कल्याण करने शुद्ध वायु ऋग्वेदः मं०६।०२८ ।। पदार्थ:-है (जनास:) विद्वान् मनुष्यो जैसे (प्रथमस्य) पहिले (सोमस्य) ऐश्वर्य की सेवने वाली (गाव:) गौए बछड़ों को दुग्ध देती हैं वैसे (गाव:) किरणों के समान जन और (भगः) ऐश्वर्य की इच्छा करने वाला (गाव:) उत्तम प्रकार शिक्षित वारिणयों को और (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त (भक्षः) सेवा करने योग्य जन (मे) मेरे लिए (अच्छान्) देवें और (याः) जो (इमाः) ये (गावः) वारिणयाँ जिसकी हैं (सः) वह (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त मुझ को शिक्षा युक्त जन की (इद) ही (इच्छामि) इच्छा करता हूं ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जो मनुष्य आत्मा और अन्त:- करण से विद्या की प्राप्ति की इच्छा करते हैं वे सब सुख का भोग करते हैं ॥५॥ फिर मनुष्यों का क्या अवश्य कर्तव्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। यूयं गांवो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम् । भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद्वो वयं उच्यते सभासु १६॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (यूयम्) आप लोग जो गावः) बारिणयां हैं उन को (मेदयथा) मधुर करिये (चित) और (अधीरम्) अमङ गलस्वरूप और अधर्माचरण करने वाले को (कशम्) क्षीण (कृणुथा) करिये और (चित्) भी (सुप्रतीकम्) pa में जल और वृक्ष वाले (गृहम) गृह को (कृणुष) करिये और (सभास) प्राप्त विद्वानों से प्रकाशमान सभाओं में (भद्रवाचः) जो कल्यारण करने वाली सत्यभाषण से युक्त वाणियां उनको स्वीकार करिए और जो (वः) आप लोगों का (बृहत) बड़ा (वयः जीवन (उच्यते) कहा जाता है उसको करिये ॥६॥ भावार्थ:--जो मनुष्य कोमल, सत्य , धर्मयुक्त वाणी तथा सर्व ऋतुओं सुख करने वाले घर को, सभा को और अधिक अवस्था को करते हैं वे संसार में कल्याण करने वाले होते हैं ॥६॥ अब प्रजाघों का कैसे पालन करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। प्रजावतीः सूयबसं रिशन्ती शुद्धा अपः सुंभपाणे पिबन्ती । मा ईशत माघसा परिवो हेती रुद्रस्य ज्याः ||७|| पदार्थ:--हे राजन् जैसे गौओं का पालन करने वाला (सूयवसम्) सुन्दर घास आदि को (रिशन्तीः) भक्षण करती हुई (सुप्रपाणे) सुन्दर जल पान के स्थान में 'Padaar Aam Mauli ऋग्वेदः भ०६। सू० २८॥ ४७७ : Res (शुद्धाः) निर्मल (अपः) जलों को (पिबन्तीः) पीती हुई (प्रजावती:) श्रेष्ठ सन्तान वाली गौवों का पालन करता है वैसे आप प्रजानों का पालन करिए और जैसे (व:) आप लोगों की प्रजाओं को (स्तेनः) चोर और (अघशंसः) पाप करने वाला डाकू (मा) नहीं (ईशत) मारने में समर्थ होवे वैसे (व:) आप लोगों के सम्बन्ध में (रुन स्य) रौद्र कर्म के करने वाले का (हेतिः) वज्र इनको (मा) मत (परि, वृज्याः) परिवर्जन करे ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुo-जो पिता के सदृश प्रजाओं का पालन करते और शुद्ध भोजन और विहार वाली करके पुरुषार्थ करते और चोर आदि दुष्टों का छेदन करते हैं वे राजा, अमात्य और भृत्य प्रशंसा करने योग्य होते हैं ॥७॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उपेदमुपपचैनमासु गोधूपं पृच्यताम् । उपं ऋषभस्य रेतस्युपेन्द्र तवं वीर्य ॥८॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के करने वाले (ऋषभस्य) श्रेष्ठ (तब) आपके (वीर्य) पराक्रम में प्रजाओं के साय (उप, पृच्यताम्) संबन्ध करिए तथा (रेतसि) पराक्रम में आपको (उप) संबन्ध करना चाहिए और (आसु) इन (गोषु) पृथिवियों वा वाणियों में (उपपर्चनम्) समीप संबंध (उप) सम्बन्ध करना चाहिए और (इदम्) इस राजनीति का (उप) संबंध करना चाहिए ।।८।। भावार्थ:--जो राजा आदि मनुष्य विद्वान् होकर सभा में परस्पर की एक सम्मति करके विरोध के नाश करने से एकता में प्रयत्न करते हैं वे अखण्डित सामर्थ्यवाले होते हैं ॥८॥ इस सूक्त में गो, इन्द्र, विद्या, प्रजा और राजा के धर्म का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । इस अध्याय में इन्द्र, सोम, सूर्य, प्रातःकाल, राज्य, विश्वेदेव, योधा, मित्रत्व, जगदीश्वर, अग्नि, अन्तरिक्ष, पृथिवी, राजा, प्रजा, पवन, कारीगर, न्यायेश, उपदेशक, वाणी और विद्या के गुण वर्णन करने से इस अध्याय के अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में अट्ठाईसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥ - -

ऋग्वेदः म०६। सू०२६ ।।
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अथ षडचंस्यैकोनत्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो
देवता। १।३।५ निवृत्रिष्टुप् । ४ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । २ भुरिक्त
पंक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ६ ब्राह्मी उष्णिक् छन्दः । ऋषभः स्वरः।।
अब छः ऋचा वाले उनतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों
को कैसा वर्ताव करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
इन्द्र वो नरः सख्याय सेपुर्महो यन्तः सुमतये चकानाः ।
महो हि दावा वज्रहस्तो अस्ति महामु रण्वमवसे यजध्वम् ।।१।।
पदार्थ:-हे (नरः) नायक जनो जो (महः) बड़े विज्ञान को (यन्तः) प्राप्त
होते और (सुमतये) उत्तम बुद्धि के लिए (चकानाः) कामना करते हुए (व:) प्राप
लोगों के (सख्याय) मित्रपने के लिए (इन्द्रम्) ऐश्वर्य के करने वाले को (सेपुः)
शपथ करते हैं तथा (हि) जिस कारण जो (महः) बड़े विज्ञान का (दाता) देनेवाला
और (वज्रहस्तः) शस्त्र और प्रस्त्रों से युक्त हाथों वाला (अस्ति) है उस' (रण्वम्)
रमणीय उपदेशक (महाम्) महान् महाशय सर्वाध्यक्ष का (ऊ) ही (अवसे) रक्षण
आदि के लिए (यजध्वम्) मिलिये वा सत्कार करिये ॥१॥
भावार्थः-- हे मनुष्यो ! जो आप लोगों के साथ मित्रत्व के लिये
शपथ करके तन, मन और धनों से उपकार के लिये प्रयत्न करते हैं उनका
आप लोग सर्वदा सत्कार करिये तथा इनके साथ मित्रपन में वर्ताव
..
करिये ॥१॥
WHAIN
M-
फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
आ यस्मिन्हस्ते नयाँ मिमिक्षुरा रथे हिरण्यये रथेष्ठाः ।
आ रश्मयो गर्मस्त्योः स्थूरयोराध्यन्नश्वासो वृषणो युजानाः ।।२।।
पदार्थ:-हे मनुष्यो ! ऐश्वर्य करने वाले के (यस्मिन्) जिस (हस्ते) हस्त में
(रश्मयः) किरणों के समान (प्रा) सब भोर से (मिमिक्षुः) सिञ्चन करते सम्बन्ध
करते हैं तथा (ना:) मनुष्यों के लिये हितकारक शस्त्र और अस्त्र जिस के
(हिरण्यये) तेज के विकार से बने हुए (रथे) रथ में और (रथेष्ठाः) रथ पर स्थित
होने वाले जन' और (स्थूरयोः) स्थूल' (गभस्त्योः) बाहुओं के मध्य में शस्त्र और
अस्त्र हैं तथा जिसके वाहनों में (वृषणः) बलिष्ठ (प्रश्वासः) घोड़ों के समान बड़े
बिजुली प्रादि पदार्थ (मा) सब ओर से (युजाना:) युक्त (अध्वन्) मार्ग में यानों को
(प्रा) लाते हैं वे सुखों से जनों का (प्रा) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करते हैं ॥२॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०२६ ।। ४७३ Rahu pan MED भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-- जो राजा शस्त्र और अस्त्र के जानने वाले, श्रेष्ठ, धार्मिक, शूर तथा विमान प्रादि वाहनों के बनाने वाले शिल्पियों और बिजुली आदि की विद्याओं और विद्वानों का सत्कार करके रक्षा करता है उसी के सूर्य के किरणों के समान यश बढ़ते हैं ॥२॥ फिर वह राजा कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । श्रिये ते पादा दुव आ मिमिक्र्धष्णुर्वजी शवला दक्षिणावान् । वसानो अत्कं सुरभि दृशे कं स्वर्ण नृतविषिरो बभूथ ॥३॥ पदार्थ:-हे (नृतो) नायक अग्नणी जन जिन (ते) आपके (पादा) पाद (दुवः) कार्य सेवन को (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (मा, मिमिक्षः) चारों ओर सींचते हैं और (शवसा) बल से (धष्णुः) ढीठ (बन्नी) शस्त्र और अस्त्रों को धारण करने वाले (वक्षिणावान्) उत्तम दक्षिणावान् (वृशे) देखने के लिये (कम) सुख करने वाले सुन्दर (सुरभिम्) सुगन्ध को और अत्कम् ) व्याप्तिशील' वस्त्र को (वसानः) धारण करते हुए (स्व:) सुख को (न) जैसे (इषिर:) ज्ञानवान् वैसे जो आप (बभूथ) प्रसिद्ध हो उन आपकी हम लोग सेवा करें ॥३॥ भावार्थ:--हे राजन् ! जिन आपके पाश्रय से अत्यन्त लक्ष्मी, घास, ओढ़ना, वाहन, सुख और प्रतिष्ठा प्राप्त हाती है वह आप हम लोगों से कैसे नहीं सेवन करने योग्य हैं ॥३॥ फिर वह कैसा होवे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स सोम आमिश्लतमः सुतो भूयस्मिन्पक्तिः पच्यते सन्ति धानाः । इन्द्र नरः स्तुबन्तों ब्रह्मकारा उक्था शंसन्तो देववांततमा ॥४॥ पदार्थ:--हे (नरः) विद्वानों में अग्रणी जनो (यस्मिन्) जिस राजा के होने पर (पवित:) पाक (पच्यते) पकाया जाता है (धानाः) भूजे हुए अन्न हैं (मामि- श्लतमः) चारों ओर से अत्यन्त मिला हुआ (सुतः) उत्पन्न (सोमः) ऐश्वर्य का योग वा ओषधि का रस (भूत) होता है और जिस (इन्द्रम्) ऐश्वर्यकारक की (स्तुवन्तः) प्रशंसा करते हुए (ब्रह्मकाराः) धन वा अन्न को करने वाले (देववाततमाः) अतिशय विद्वानों वा पदार्थों को प्राप्त होने वाले' (उक्था) कहने योग्य वचनों का (शंसन्तः) उपदेश देते हुए (सन्ति) हैं (सः) वह पाप हम लोगों के राजा हूजिये ॥४॥ भावार्थ:-जो वह धार्मिक राजा न होवे तो सब व्यवहार लोप होवें ४८० ऋग्वेदः म०६ । सू०२६ ॥ बाम कि जिसके होने पर धन धान्य और ऐश्वर्य को धारण करती हैं वे धर्म- युक्त प्रजायें होती हैं ॥४॥ अब ईश्वर कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न ते अन्तः शव॑सो धाय्यस्य वि तु बांबधे रोदसी महित्वा । आ ता सूरिः पृणति तूर्तुजानो यूथेवाप्सु समीजमान ऊती ॥५॥ पदार्थ:-हे जगदीश्वर जिस (अस्य) इस (ते) आप ईश्वर के (शवस:) बल' की (अन्तः) सीमा किसी से भी (न) नहीं (धायि) धारण की जाती है (तु) और जो (महित्वा) बड़प्पन से (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (वि, बाबधे) बांधता है और जिन आपके (ता) उन कर्मों को (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (समीजमानः) उतम प्रकार मिलता हुआ (तूतुजानः) शीघ्र कार्य करने वाला (सूरिः) विद्वान् (अप्सु) प्राणों वा जलों में (यूथेव) समूह के सदृश - सब को (श्रा, पुणति) सुखी करता है वह आप लोगों से स्तुति करने योग्य हैं ।।५।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अनन्त गुण कर्म और स्वभावयुक्त और सब का प्रबन्ध करने वाला, उपासना किया हुआ सुख का देने वाला ईश्वर है वही सब से उपासना करने योग्य है ॥५॥ अब ईश्वरत्व में राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। एवेदिन्द्रः सुरवः ऋष्यो अस्तूती अनूती हिरिधिमः सस्वा । एवा हि जातो असमात्योजाः पुरू चं वृत्रा इनति नि दस्यून् ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (सुहवः) सुन्दर पुकारना जिसका ऐसा (ऋष्यः) बड़ा (हिरिशिप्रः) हरे रंग की ठुड्ढी और नासिका युक्त (सत्वा) परिश्रम से पुरु- पार्थ करने और (इन्द्रः) ईश्वर की उपासना करने वाला राजा (ऊती) रक्षा वा (अनूती) अरक्षा से सुख करने वाला (जातः, च) और प्रसिद्ध (अस्तु) हो वह (एव) ही (इत) निश्चय से प्रानन्द देने वाला होने और जो (हि) निश्चय से (अस- मात्योजाः) नहीं तुल्य पराक्रम' जिसका वह (पुरु) बहुत (वृत्रा) धनों की वृद्धि करता है और (दस्यून्) दुष्ट चोरों का (नि, हनति) नित्य नाश करता है वह (एवा) ही चक्रवर्ती राजा होने के योग्य है ॥६॥ भावार्थ:--वही बड़ा राजा है जो नीति के जानने वालों की रक्षा करके धमिष्ठ प्रजाओं का पालन करके चोर आदि पापियों को नहीं ग्रहण करता है वही सज्जनों से सेवन करने योग्य है ॥६॥ an ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३०॥ इस सूक्त में इन्द्र, मित्रपन, देने वाले और युद्ध करने वाले तथा ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये यह छठे मण्डल में उनतीसवां सूक्त समाप्त हुना ॥ Reston अथ पञ्चर्चस्य त्रिंशत्तमस्य सूतस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १।२ । ३ निचरित्रष्टुप् छन्दः । धेवतः स्वरः । ४ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ५ शाही उष्णिक् छन्दः । ऋषभः स्वरः ।। अब पांच ऋचावाले तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं ।। भूय इद्वादृधे वीयर्याय एको अजुर्यो दयते वसूनि । प्ररिरिचे दिव इन्द्रः पृथिव्या अमिदस्य प्रति रोदसी उभे ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (इन्द्रः) सूर्य के समान वर्तमान जन (दिव:) प्रकाशमान पदार्था तर और (पुथिव्याः) : भूमि से (अर्द्धम्) भूगोल का अर्द्ध भाग (उभे) दोनों (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवीभूगोल के (प्रति) प्रति अर्द्धभाग प्रकाशित होता है और सब से (प्र, रिरिचे) समर्थ होता है तथा (अस्थ) इसके (इत) ही आकर्षण से सम्पूर्ण लोक वर्तमान हैं उस (इत्) ही प्रकार से जो राजा (वीर्याय) पराक्रम के लिए (भूयः) फिर (वावृधे) बढ़ता और (एकः) सहायरहित (अजुर्य:) युवा हुआ (वसूनि) धनों को ( दयंते) देता है वही श्रेष्ठ होता है ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु ----- -जो राजा सूर्य के समान श्रेष्ठ गुणों श्रेष्ठ सहायों और उत्तम सामग्री से प्रकाशमान यशस्वी होता है और जैसे सूर्य सम्पूर्ण भूगोलों के सन्मुख स्थित भूगोलों के अर्द्धभागों का प्रकाश करता है वैसे ही न्याय और अन्याय के बीच में से न्याय का प्रकाश करे और सब के लिए दोनों को देवे॥शा फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं अघो मन्ये बृहदसुर्यमस्य यानि दाधार नकिरा मिनाति । दिवेदिवे सूर्यों दर्शको भूद्वि सान्युर्विया सुक्रतुर्थात् ॥२॥ पदार्थ:-हे राजन् जैसे (दर्शतः) देखने वा पूछने योग्य (सक्रतुः) शुभ कर्म करने वाला (सूर्यः) सूर्य (दिवेदिवे) प्रतिदिन जो (प्रस्य) इसके (बृहत) बड़े HTANEYarauथा RANADHE ४८२ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३० ।। HD URN RMEAath (असुर्यम्) मेघ के सम्बन्धी का और (यानि) जिन वायुदलों का (वाधार) धारण करता है और इसको (नकि:) नहीं (मा, मिनाति) नष्ट करता है और (विया) पृथिवी के साथ (सदानि) स्थानों को (धात् धारण करता है वैसे प्राप (वि, भूत) होते हैं (अधा) इसके अनन्तर ऐसे हुए आपको राजा मैं (मन्ये) मानता हूं ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु..... जैसे सूर्य प्रतिदिन मेघ को धारण करके वर्षा के पृथिवी और पृथिवीस्थ पदार्थों का नाश नहीं करके धारण करता है वैसे ही राज्य को धारण करके सुख को वर्षा के प्रजा के साथ न्यायकों को राजा धारण करे ।।२।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अद्या चिन्नू चित्तपो नदीनां सदाभ्यो सारंदो गातुमिन्द्र । नि पर्वता अनसदो न संदुस्त्वा हळहानि सुक्रतो रजाति ॥३॥ पवार्थ:-हे सुकलो श्रेष्ठ कर्मों को उत्तम प्रकार जानने वाले (इन्द्र) सूर्य के समान वर्तमान पिच) जैसे सूर्य (धातुम् भूमि फा (परतः) आकर्षण करता है तथा (नदीनान ) नदियों के समीप से (अप:) जलों का प्रकर्षण करता है और (यत्) जो (शायः) इन नदियों से बचता (तव) वह (चिद) भी वर्षता है वैसे (ar) अाज अाप (नू) शीघ्र करिये और जैसे सूर्य से जांसि) लोकविशेष (वृळ हानि) धारण किये गये वैसे आज (प्रासदः) उत्तम प्रकार खाने योग्यों में स्थित होने वाले पर्वताः) मेघ (न) जैसे वैसे (स्थया) रक्षक वा स्वामी मापसे प्रजा और राजजन (नि, सेयुः) स्थित होते हैं ॥३॥ भावार्थः- इस मन्त्र में उपगावाचकलु० - हे राजन् ! जैसे सूर्य सम्पूर्ण पदार्थों से आठ महीने रस धारण करके मेघमण्डल में स्थापित करके वर्षाओं में वर्षाके प्रजात्रों को सुखी करता है वैसे आप पाठ मासों में प्रजामों से कर लेकर वर्षाकाल में देवें ॥३॥ . Maan फिर ईश्वर कैसा है इस विषय को अगले भनत्र में कहते हैं । सत्यमित्तन्न त्वायाँ अन्यो अस्तीन्द्र देवो न भत्यों ज्यायर्यान् । अहन्नहिं परिक्षयानमोऽवासृजो अपो अच्छा समुद्रम् ॥४॥ पदार्थः- है (इन्द्र) सूर्य के सदृश अपने से प्रकाशमान जगदीश्वर जिससे पाप से बनाया गया सूर्य (परिशयानम्) चारों ओर से सोते हुए से (अहिम्) व्याप्त होने वाले मेघ का (महन्) नाश करता है और (अर्णः) भ्रमर पड़ते जल वा अन्य M ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३० ॥ ४५३ PATI (अपः) जलों और (समुद्रम्) सागर वा अन्तरिक्ष को (अच्छा) उत्तम प्रकार (प्रव, असृजः) उत्पन्न करता है इससे (अन्यः) और (त्वावान्) आपके सदृश' कोई भी दुसरा (ज्यायान्) बड़ा नहीं है (न) न (देवः) विद्वान् वा प्रकाशमान और (न) न (मर्त्यः) साधारण मनुष्य (अस्ति) है (तत्) वह (सत्यम्) श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (इत) ही है ।।४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस जगदीश्वर ने जगत् के पालन के लिये आकर्षण करने और बृष्टि तथा प्रकाश करने वाला सूर्य और मेघ बनाया इस कारण से जगदीश्वर के तुल्य कोई भी नहीं है फिर अधिक कहां से हो यह सत्य जानिए ॥४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। स्वायो विदुरो विषूदौरिन्द्र हळहरूज पर्वतस्य । राजांभयो जर्गतश्चर्षणीनां सार्क सूर्य जनचन्द्यामुपासम् ॥५॥ पदार्थ:--हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले जगदीश्वर जैसे सूर्य (पर्वतस्य) मेघ के (छळ हम्) दृढ़ भाग को भंग करता पीर (विधूची:) व्याप्त (दुरः) द्वारों को प्रकाशित करता हुमा (अप:) जलों दा प्राणों को (बि) विशेष कर वर्षाता है तथा (बात:) संसार के (सर्षणीनाम्) मनुष्यों का (राजा) राजा होता है वैसे (स्थम्) आप (सूर्य) सूर्य और (घास) प्रकाश को और (उपासम्) दिन के मुख प्रभात को (जनयन्) उत्पन्न करते हुए सब के (साकम्) साथ व्याप्त हुए दुःख. को (शरजः) नष्ट कीजिये और संसार के मनुष्यों के राजा (अभवः) हूजिए ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जो सूर्य आदि का उत्पन्न करने वाला, प्रकाशक और धारण करने वाला तथा सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त जगदीश्वर है उसकी प्रात्मा के साथ निरन्तर उपासना 23 करो॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा, सूर्य और ईश्वर के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे भण्डल में तीसरा सूक्त समाप्त हुना ॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३१ ॥ अथ पञ्चर्चस्यैकत्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य सुहोत्र ऋषिः । इन्द्रो देवता । ५ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । १ निवृत्रिष्टुम् । २ स्वराट् पंक्तिः । ३ पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। ४ निचदतिशयरी छन्दः । निषादः स्वरः।। अब पांच' ऋचावाले इकतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में ईश्वर कैसा है इस विषय को कहते हैं। अभूरेको रयिपते रयीणामा हस्तयोरधिथा इन्द्र कृष्टीः । वि तोके अप्पु तनये च सूरेऽदोचन्त चर्षणयो विर्वाचः ॥१॥ tanki पदार्थ:-हे (रयीणाम्) द्रव्यों के बीच (रयिपते) धन के स्वामिन् (इन्द्र) ऐश्वर्या के देने वाले राजन् पाप जो (विवाचः) अनेक प्रकार की विद्या और शिक्षा युक्त बारिणयों वाले (चर्षणयः) मनुष्य (अप्सु) प्रार्थों वा अन्तरिक्ष तथा (तोके) शीघ्र उत्पन्न हुए सन्तान (तनये, च) और ब्रह्मचारी कुमार और (सरे) सूर्य में विद्याओं को (वि, श्रवोचन्त) विशेष कहते हैं उन (कृष्टी:) मनुष्य आदि प्रजात्रों को (हस्तयोः) हाथों में प्रांवले के सदृश (मा, अधिथाः) अच्छे प्रकार धारण करिये और (एकः) सहायरहित हुए प्रजा के पालन करने वाले (अभूः) हूजिये ॥१॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलुo परमेश्वर का स्वभाव है कि जो सत्य का उपदेश देते हैं उनको सदा उत्साहित करता और रक्षा में धारण करता और ऐश्वर्य को प्राप्त कराता है और जैसे विनय से युक्त एक भी राजा राज्यपालन करने को समर्थ होता है वैसे ही सर्वशक्तिमान् परमात्मा सम्पूर्ण सृष्टि की सदा रक्षा करता है॥१॥ फिर मनुष्य क्या जानें इस विषय को कहते हैं ।। त्वद्भियेन्द्र पार्थिवानि विश्वाच्युता चिच्च्यावयन्ते रजासि । द्यावाक्षामा पर्वतासो वनानि विश्व हळ्हें मयते अज्मना ते ॥२॥ पवार्थ:-हे (इन्द्र) बिजुली के सदृश वर्तमान (ते) आपके (भिया) भय से (विश्वा) सम्पूर्ण (अच्युता) नाश से रहित (पार्थिवानि) पृथिवी में विदित जन्तु- विशेष (रजांसि) लोकों को (चित्) निश्चित (च्यावयन्ति) चलाते हैं तथा जैसे सूर्य से (धावाक्षामा) अन्तरिक्ष और पृथिवी तथा (पर्वतासः) पर्वत और (बनानि) जंगल (विश्वम्) सम्पूर्ण जगत् को चलाते हैं वैसे (स्वत) पाप से (बळ हम्) दृढ़ विश्व (प्रज्मन्) मार्ग में (प्रा, भयते) अच्छे प्रकार भय करता है ॥२॥ 42 RAM SOM Ma भ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३१ ।। ४८५ munow AHIT area Mahat का भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे न्यायकारी वीर पुरुष से कायर जन डरते हैं वैसे ही बिजुली से सब प्राणी डरते हैं ॥२॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । त्वं कुसैनाभि शुकमिन्द्राशु युध्य कुर्यवं गहिष्टौ । दश प्रपित्वे अध सूचस्य मुपायश्चक्रमाविवे पोसि ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्या के देने वाले राजन् (स्वम्) श्राप (शुष्णम्) बल और (अशु अम् । शुष्करहित को (कुत्सेन) वज्र से (गविष्टौ) किरणों के समागम में (कुशवम्) कुत्सित यव जिसमें उसको (अभि, युध्य) अभियोधन करो (अध) इसके अनन्तर (प्रपित्वे) प्राप्ति में (वंश) दश (रपांसि) हिंसनों को (मुषायः) चुरानो और (सूय्यंस्य) सूर्य के (चक्रम्) चक्र को (अविवेः) व्याप्त होमो ॥३॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप अधर्मी शत्रु के साथ ही युद्ध करिये धर्मात्मा के साथ न करिये ऐसा करने पर जिस प्रकार सूर्य के चारों ओर भूगोल चक्र के समान घूमते हैं वैसे ही प्रजाजन आपको देखकर पुरुषार्थ से चलेंगे ॥३॥ mile फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । त्वं शतान्यव शम्बरस्य पुरों जघन्थामतीनि दस्यौ। अशिक्षो यत्र शच्या शचीवो दिवोदासाय सुन्वते मुंतके भरद्वाजाय गृणते वसूनि ॥॥ पदार्थ:-हे (शचीवः) उत्तम बुद्धि वाले (सुतके) उत्तम प्रकार प्रसन्न अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले राजन (त्वम्) आप जैसे सूर्य (शम्बरस्य) मेघ के समान शत्रु के (शतानि) सैकड़ों (पुरः) नगरों का (अव, जघन्थ) नाश करते हो वैसे (दस्योः) दूसरे के द्रव्य चुराने वाले दुष्टजन के (अप्रतीनि) नहीं जाने गये भी सैकड़ों नगरों का नाश करिये और (शच्या) उत्तम शिक्षायुक्त वाणी वा उत्तम कर्म से इनको (अशिक्षः) शिक्षा दीजिये और (यत्र) जहां (दिवोदासाय) विज्ञान के देने तथा (सुन्वते) सार के निकालने वाले (गुगते) स्तुति करते हुए (भरद्वाजाय) विज्ञान के धारण करने वाले के लिये (बसूनि) द्रव्यों को दीजिए वहाँ इससे विद्या का प्रचार कराइये ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो राजा सूर्य के सदृश न्याय ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३२ ।। का प्रकाश करने वाला और मेघ के सदृश विद्या प्रादि के प्रचार के लिये बहुत धन का देने वाला होता है वही सर्वत्र विजय को प्राप्त होता है ॥४॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। स सत्यसत्वन्महते रणाय रथमा तिष्ट तुविनम्ण भीमम् । याहि प्रपयिन्नवसोपं मद्रिक् प्र च श्रुत श्रावय चर्षणिभ्यः ॥५॥ पदार्थ:-हे (सत्यसत्वन्) शुद्ध अन्तःकरण आदि इन्द्रियों युक्त (प्रपथिन्) उत्तम मार्ग वाले और (तुविनम्ण) बहुत धन से युक्त (स:) वह पाप (महते) बड़े (रणाय) संग्राम के लिए (रथम्) सुन्दर वाहन पर (मा, तिष्ठ) स्थित हूजिए और (अवसा) रक्षण आदि से (भीमम्) भयंकर संग्राम को (उप, याहि) प्राप्त हूजिए तथा (मद्रिक) मेरे सन्मुख हुए विद्वानों से (श्रुत) सुनिये (चर्षणिभ्यः, च) और मनुष्यों के लिए (प्र, श्रावय) सुनाइये ॥५॥ भावार्थ:-जो राजा सत्यवादियों से राजनीति के कृत्य को सुनकर अन्यों को सुना कर शुद्धचित्त वाला सब के रक्षण के लिये दुष्टों का परा- जय करता है वही बहुत लक्ष्मीवाला होता है ।।५।। इस सूक्त में इन्द्र और राजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में इकतीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ पञ्चर्चस्य द्वात्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य सुहोत्र ऋषिः । इन्द्रो देवता है १ भुरिपङ्क्तिः । २ स्वराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३। ५ त्रिष्टुप् । ४ निचत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।। अब पाँच ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं । अपृा पुरुतमान्यस्मै महे वीराय तवसे तुराय । विरप्शिने वज्रिणे शन्तमानि वचाँस्थासा स्थविराय तक्षम् ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे मैं (प्रासा) मुख' से (अस्मै) इस (महे) बड़े (वीराय) बल पराक्रम तथा विद्यायुक्त के लिए और (तवसे) बल' के लिए (तुराय) appeap ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३२ ।। शीघ्र कार्य करने वाले तथा (विरप्शिने) प्रशंसित (बज्रिणे) प्रशंसित शस्त्र और अस्त्रों से युक्त (स्थचिराय) वृद्धजन के लिये (अपूर्णा नहीं विद्यमान है पूर्व जिससे उस में हुए (पुरुषमानि) अतिशय बहुत शन्तमानि) अतीव कल्याण करने वाले (वास) बचनों का (तक्षन्) उपदेश करू वैसे आप लोग भी अन्यों को उपदेश दीजिये ॥१॥ Patra ime May भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलु०-विद्वानों को चाहिये कि सदा ही सब के लिये सत्य उपदेश करें जिससे अतुल सुख होवे ॥१॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स मातरा सूर्येणा कवीनामासयद्रुज िगृणानः । स्वाधीभिक्वंभिर्वावशान उदुनियांणामसृजनिदानम् ॥२।। पदार्थ:--हे मनुष्यो जैसे (सूथ्यण) सूर्य के सहित बिजुली रूप' अग्नि (अद्रिम्) मेघ को (रजत) स्थिर करता और (कवीनाम्) विद्वानों के (मातरा) माता पिता को (प्रवासयत्) वसाता है वैसे ही जो राजा (स्वाधीभिः) सुन्दर स्थान जिनके उन नीतियों और (ऋक्वभिः) प्रशंसा के योग्य व्यवहारों के साथ (गृणानः) स्तुति करता और (वावशानः) कामना करता हुआ' जैसे सूर्य (उस्त्रियाणाम् ) किरणों के (निदानम्) निश्चय को वैसे निश्चय को (उद्, असृजत्) उत्पन्न करता है (स.) वह राजा सबसे सत्कार करने योग्य है ।।२।। भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजन् ! जैसे सूर्य किरणों से सबको प्रकाशित करता है वैसे ही विनय आदिकों से सम्पूर्ण राज्य को प्रकाशित करिये और जैसे श्रेष्ठ पुत्र माता पिता की सेवा करते हैं वैसे ही राजधर्म का सेवन करिये ॥२॥ राजा कैसे जनों के साथ मित्रता करे इस विषय कहते हैं। स वनिमिवभिगोषु शश्वन्मितर्जुभिः पुरुकृत्वा भिगाय । पुरः पुरोहा सखिभिः सखीयन्ळ्हा रुरोज कविभिः कविः सन् ॥३॥ पदार्थ:-हे सज्जनो ! जो (मितभिः) संकुचित जांघ वाले' बैठे हुए विद्वानों और (ऋक्वभिः) प्रशंसित (वह्निभिः) धारण करने वाले (कविमि:) विद्वानों से (कवि:) विद्वान् (सन्) हुआ और (सखिभिः) मित्रों से (सखोयन्) मित्र के सदृश आचरण करता हुआ (पुरोहा) नगरों का नाश करने वाला (हळ हाः) कम्पन क्रिया से रहित (पुरः) शत्रुनों के नगरों का (रोज) भंग करता है और (गोषु) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों में (शश्वत्) निरन्तर (पुरुकृत्या) PIT - ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३२ ।। Pos 0 बहुत करके शत्रुओं को (जिगाय) जीतता है (सः) वहीं आप लोगों से मानने योग्य है ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य प्रशसित, बलिष्ठ, थोड़े बोलने वाले, विद्वान् मित्रों के साथ मित्रता कर राज्य को प्राप्त होकर दुष्टों का नाश करके धार्मिकों की रक्षा करते हैं वे कृतकृत्य होते हैं ॥३!! फिर उसी विषय को कहते हैं ।। सनीच्याभिर्जरितारमच्छो महो वाजेभिर्महद्भिश्च शौः पुरुवीरांभिर्टषम क्षितीनामा गिर्वणः मुविताय म बाहि ।।४।। पदार्थ:-हे (वृषभ) बलयुक्त (गिर्वणः) उत्तम वारिणयों से सेवा किये गए अत्यन्त ऐश्वर्य के करने वाले राजन् (सः) वह आप (नीव्याभि.) प्राप्त कराने योग्य पदार्थों में होने वाली तथा (बाजेभिः) वेग और विज्ञान आदि गुण वालों तथा (महद्धिः) महाशयों और (शुष्मः) प्रशंसित बलवालों से युक्त (पुरुषीराभिः) बहुत वीर जिनमें उन सेनाओं के साथ ( क्षितीनाम्) मनुष्यों की (सुविताय) प्रेरणा के लिए (प्र, मा, याहि) अच्छे प्रकार यात्रा करिये और (महः) बड़े (जरितारम्, च) और स्तुति करने वाले को अच्छा) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य धार्मिक, बलिष्ठ और उत्तम प्रकार से शिक्षित पुरुषों की सेनाओं से विजय के लिये प्रयत्न करे वह निश्चय कर विजय को प्राप्त होवे ॥४॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। स सर्गेण शवसा सक्तो अत्यैरप इन्द्रो दक्षिणतरतुराबाट । स्था सृजाना अपावृक्ष्य दिवेदिवे विविषुरस्मृष्यम् ॥५॥ पदार्थ:-हे (राजन) (सः) वह पाप जैसे सूर्य (आपः) जलों को प्रकट करता है वैसे (तक्तः) प्रसन्न (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले (अत्यैः) घोड़ों के समान वेग वाले पदार्थों से और (दक्षिणतः) दहिने पसवाड़े से (सर्गण) उत्तम प्रकार प्रकट करने योग्य (शसा) बल से (तुराबाट) हिंसकों को सहने वाले तथा (अनपावृत) असत्य को नहीं स्वीकार करने वाले हुए अाप (दिवेदिवे) प्रतिदिन (मप्रमृष्यम्) नहीं विचारने योग्य (प्रथम) द्रव्य का सब ओर से स्वीकार करिये और जैसे (सृजानाः) उत्तम प्रकार शिक्षितजन कृत्य को (विविषः) व्याप्त होते हैं (इत्था) इस हेतु से कर्तव्य कम्मों में प्रविष्ट हूजिये ॥५॥ - A ऋग्वेदः मं०६। सू० ३३ ।। ४८ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु -जो मनुष्य अधर्म से करने योग्य को अनर्थ नहीं करता है वह सूर्य के सदृश प्रकाशित यश वाला होता है और जैसे सूर्य वृष्टि करके सब को हर्षित करता वैसे ही राजा शुभ गुणों की वर्षा करके सब को आनन्दित करे ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में बत्तीसवां सूक्त समाप्त हुमा । अथ पञ्चर्चस्थ त्रयस्त्रिशत्तमस्य मूलस्य शुनहोत्र ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ । २ । ३ निवृत्पङ्क्तिः । ४ भुरिपङ्क्तिः । ५ स्वराः पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥ ga HAVE अब पांच ऋचावाले तेंतीसवें सुक्त का प्रारम्भ किया जाता है उसके प्रथम मन्त्र में राजा क्या करके क्या करावै इस विषय को कहते हैं। य ओजिष्ठ इन्द्र तं शु नौ दा मदो पन्तस्वभिष्टिास्वान् । सौवश्व्यं यो वनवत्स्ववी वृत्रा समत्सु सासहदमित्रान् ।।१।। पदार्थ:--हे (वृषन्) तेजस्वी (इन्द्र) ऐश्वर्य के देने वाले (धः). जो (ोजिष्ठः) अतिशय बली (मदः) हषित हुए (स्वभिष्टिः) अच्छी संगति वाले (दास्वान्) दाता वह अाप (न:) हम लोगों के लिये (सीवश्यम्) सुन्दर घोड़ों और बड़े पदार्थों में हुए को (सु) उत्तम प्रकार दाः) दीजिये और (यः) जो (स्वश्या) अच्छे घोड़ोंबाला हुमा (वृत्रा) धनों की (धनवत्) याचना करता है तथा (समत्सु) संग्रामों में (अमित्रान्) शत्रुओं को (सासहत) अत्यन्त सहता है (तम्) उसका हम लोग सत्कार करें ॥१॥ भावार्थ:-जो अभय देने वाला और संग्रामों में जीतने वाला तथा दिन रात अपने बल को बढ़ाता है वही सब को सुखी करने को योग्य है ॥१॥ y- अचा फिर उसी विषय को अगले मंत्र में कहते हैं । स्वां ही३'न्द्रावसे विवाचो हवन्ते चणवः शूरसाचौ । त्वं विभिदि पीर शायम्त्वोत इत्सनिता वाजमीं ॥२॥ पदार्थ:--हे (इन्द्र) दुःख के नाश करने वाले राजन् जो (हि) जिससे Ana MinI Jaya ४९० ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३३ ।। Pawan (अर्वा) घोड़े के समान श्रेष्ठ गुणों के ग्रहण करने वाले वेग वाले (सनिता) विभाग करने वाले (त्वोतः) आप से रक्षित जन (बाजम्) विज्ञान को प्राप्त होता है उसके सहित (त्वम्) आप (विप्रेमि:) मेघावी जनों के साथ (पणीन्) प्रशंसितों को (दि, प्रशायः) सुलाइये उस' (इत्) ही (वाम्) आपकी (श्रवसे) रक्षा आदि के लिये (रसातो) शूर वीर जनों के विभागरूप संग्राम में (विवाचः) अनेक प्रकार की विद्या से युक्त वाणियों बाले (चर्षणयः) विद्वान् जन (हवन्ते) स्तुति करते हैं ॥२॥ भावार्थ:-जो राजा धार्मिक विद्वानों के साथ राज्य का पालन करे तो उस की कौन नहीं प्रशंसा करे ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । त्वं ताँ इन्द्रोभयाँ अमित्रान्दासा वृत्राण्यार्या च शूर । वीर्वनैव मुर्धितेभिरस्कैरा पृत्सु दर्षि नृणां नृतम ॥३॥ पदार्थ:-हे (नृणाम्) मुखियाजनों में (नृतम) अत्यन्त मुखिया (शूर) दुष्टों के नाशक (इन्द्र) राजन् (त्वम्) आप (तान्) उम (अमित्रान्) दुष्ट सब को पीड़ा देने वाले और (प्राा) धर्मिष्ठ उद्यम जनों को (च) और (उभयान्) दो प्रकार के विभाग करके दुष्ट और पीड़ा देने वालों का (पृत्सु) संग्रामों में (वनेव) अग्नि जैसे वनों का वैसे (वधीः) नाश करिये और (सुधितेभिः) उत्तम प्रकार से तृप्त किये गये (अत्कः) घोड़ों से (मा, दार्षि) विदीर्ण करते हो और धम्मिष्ठ उत्तम जनों की रक्षा करते हो तथा (वासा) देने योग्य (वत्राणि) धनों को प्राप्त होते हो इससे विवेकी हो ॥३॥ भावार्थ:-जो राजा उत्तम, अनुत्तम, धार्मिक और अधार्मिकों का परीक्षा से विभाग करके उत्तमों की रक्षा करता और दुष्टों को दण्ड देता वही सम्पूर्ण ऐश्वर्य को प्राप्त होता है ॥३॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को कहते हैं ।। स त्वं न इन्द्राकवाभिरूती सखा विश्वायुरविता वृधे भूः। वर्षाता यद्ध्वयोमसि त्वा युध्यन्तो नेमधिता पृत्सु शूर ॥४॥ पदार्थ:-हे (शूर) शूरवीर शत्रुजनों के नाश करने और (इन्द्र) सुख के देने बाले (यत्) जो (त्वम्) आप (अकवाभिः) नहीं निन्दा करने वालों और (ऊती) रक्षाओं से (नः) हमारे (सखा) मित्र (विश्वायुः) सम्पूर्ण अवस्था से युक्त (अविता) रक्षक (वृध) वृद्धि के लिये (भूः) होवे (सः) वह पाप (स्वर्षाता) सुख के देने वाले ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३४॥ ४६१ हुए जीतने वाले हूजिये उन' (त्वा) आपको (नेमधिता) धार्मिक और अधार्मिक के मध्य में धार्मिकों के ग्रहण करने वाले (पत्सु) संग्रामों वा सेनानों में (युध्यन्तः) युद्ध करते. हुए हम लोग (हृयामसि) पुकारें ॥४॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जैसे मित्र, मित्र के लिये प्रिय आचरण करता है वैसे ही प्रजा के लिये हित आचरण करिये और जहां जहां प्रजायें आपको पुकारें वहां वहां उपस्थित हूजिये और शत्रुओं के जीतने में प्रयत्न करिये ॥४॥ फिर वह राजा कैसा वर्ताव करे इस विषय को कहते हैं । नूनं न इन्द्रापरायं च स्या भवा मृळीक उत नो अभिष्टौं । इत्था गृणन्तों महिनस्य शमन्दिवि व्याम पायें गोषतमा: ॥६॥ Ram A MARA AND पदार्थ:-हे (इन्द्र) दु:खों के नाश करने वाले प्राप (न:) हम लोगों के (मुळीकः) सुखकारक (भवा) हूजिये और (उत) भी (अपराय) अन्य के लिये (नूनम्) निश्चय कर सुखकारक (स्याः) हूजिए और (न:) हम लोगों के (अभिष्टौ) अपेक्षित सुख में (च) भी प्रवृत्त हूजिए (इत्या) इस कारण से (गुणन्तः) स्तुति करते हुए (गोषतमाः) वाणियों को अत्यन्त सेवने वाले हम लोग (महिनस्य) बड़े आपके (पायें) पूर्ण करने और (दिवि) कामना करने योग्य (शर्मन्) गृह में (स्याम) होवें ॥५॥ भावार्थ:-जो राजा अपने और दूसरे का पक्षपाती न होकर प्रजा के रक्षण में यत्न करने वाला होवे तो सम्पूर्ण प्रजा प्रेम के स्थान में बंधी हुई होकर राजा की दिनरात स्तुति करें ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में तेंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ। . अथ पचर्चस्य चतुस्त्रिशत्तमस्य सक्तस्थ शुनहोत्र ऋषिः । इन्द्रो देवता । त्रिष्टुप् छन्द । धैवतः स्वरः ।। अब पांच ऋचावाले चौतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा क्या करें इस विषय को कहते हैं ।

४६२
ऋग्वेदः मं०६ । सू०३४ ।।
Mara
HERE
M
सं च त्वे जग्मुगिर इन्द्र पूर्वीयि च स्वयंन्ति विम्वों मनीषाः ।
पुरा नूनं चं स्तुतय ऋषीणां पस्पध्र इन्द्रे अध्युक्थार्का ॥१॥
पदार्थ:--हे (इन्द्र) विद्या के देने वाले जो (त्वे) कोई (स्वत) आपके समीप
से (पूर्वी:) प्राचीन (गिर:) उत्तम प्रकार शिक्षित वारिणयों को (ब) भो (यन्ति)
प्राप्त होते हैं (च) और श्रेष्ठ गुणों से (सम्) उत्तम प्रकार (जग्मुः) मिलते हैं तथा
(विम्वः) श्रेष्ठ गुणों से व्याप्त (मनीषाः) गमन करने वाले हुए परस्पर (वि) विशेष
करके प्राप्त होते हैं और (ऋषीणाम् ) वेद के मन्त्रों के अर्थ जानने वालों और यथार्थ
उपदेश करने वालों के (पुरा) आगे (स्तुतयः, च) प्रशंसानों की भी 'नूनम्। निश्चय
से (पस्पृध्र) स्पर्धा करते हैं और (इन्द्रे) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले के लिए
(उक्थाका) प्रशंसित और आदर करने योग्य वचनों की (अधि) अधिक स्पर्धा करते
हैं वे सुख को प्राप्त होते हैं ।।१।।
भावार्थ:-हे राजन् ! इस संसार में कोई योग्य, कोई अयोग्य जन
होते हैं उनमें प्रशंसा करने योग्य सज्जनों के साथ मेल करके उत्तम सहाय
वाले हुए धर्म से राज्यपालन निरन्तर करिये ॥१॥
फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं।
पुरुहूतो यः पुरुपूर्त ऋम्या एका पुष्प्रशस्तो अस्ति यज्ञैः ।
रथो न महे शवसे युनानो३' माभिरिन्द्रा अनुमायो भूत् ॥२॥
maya
*
MP
CH-
पदार्थः हे विद्वज्जनो (यः) जो (पुरुहूतः) बहुतों से सत्कार किया गया
(पुरुगूतः) बहुतों से उद्यम कराया गया (पुरुप्रशस्तः) बहुतों में उत्तम (एकः)
सहायरहित (रथः) विमान प्रादि वाहन (न) जैसे वैसे (महे) बड़े (शवसे) बल के
लिए (यः) विद्वानों के सत्कार और सङ्ग तथा दानों से और (ऋभ्या) बड़े
बुद्धिमान् से (युजानः) युक्त हुआ (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य का देनेवाला (अस्माभिः)
हम लोगों के साथ (अनुमाधः) पीछे से प्रसन्न होने योग्य (भूत) होवे वह हम लोगों
का आनन्दकारक (अस्ति) है उस राजा को आप लोग भी मानिये ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे घोड़ों और
अग्नि आदिकों से युक्त रथ अभीष्ट कार्यों को करता है वैसे ही उत्तम
सहायों के सहित राजा राज्य के कार्यों को पूर्ण करने को समर्थ होता
है ॥२॥

ऋग्वेदः मं०६। सू० ३४ ।। ४६३ : NA FRIEN . फिर वह राजा कैसा होता है इस विषय को कहते हैं । न यं हिंसन्ति धीतयो न वाणीरिन्द्रं नक्षन्तीदभि वर्धयन्तीः । यदि स्तोतारः शतं यत्सहस्रं गृणन्ति गिर्वणसं शं तदस्मै ।।३।। पवार्थ:-हे विद्वानो (यम्) जिस (इन्द्रम्) पूर्ण विद्या वाले और अत्यन्त ऐश्वर्या वाले राजा को (इत्) ही (धीतयः) अङ गुलियां (न) नहीं (हिंसन्ति) नष्ट करती हैं और जिस पूर्णविद्या और अत्यन्त ऐश्वर्य वाले राजा को (वाणी:) वाणियो (न) नहीं नष्ट करती हैं और जिस पूर्णविद्या वाले और अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त राजा को (वर्धयन्तीः) बढ़ाती हुई अङ गुलियां और वाणियां (अभि, नक्षन्ति) प्राप्त होती हैं और (यदि) जो उस (गिर्वणसम्) वारिणयों से सेवा करने और मांगने वाले पूर्ण विद्या और अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त राजा की (स्तोतारः) स्तुति करने वाले जन (गृणन्ति) स्तुति करते हैं तो (यव) जो (अस्मै) इस स्तुति करने वाले के लिए (शतम्) सैकड़ों और (सहलम्) असंख्य प्रकार का (शम्) सुख प्राप्त होता है (तत्) वह लोगों को भी प्राप्त हो ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जिस को शत्रु से की हुई विरुद्ध क्रियायें और निन्दित वाणियां नहीं पीड़ित करती हैं उस हर्ष और शोक से रहित राजा को अतुल सुख प्राप्त होता है ॥३॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। अस्मा एतद्दिव्य१'र्चेव मासा मिमिक्ष इन्द्रे न्यथामि सोमः। जनं न धन्वन्नभि सं यदापः सत्रा वावृधुवनानि यज्ञैः ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जिस (दिवि) सुन्दर शुद्ध व्यवहार में (इन्द्रे) दुष्टों के नाश करने वाले राजा के होने पर (मासा) चैत्र आदि महीने (वावृधः) बढ़ते हैं और (यज्ञैः) विद्वानों के सत्कारों से (अर्चेब) सस्त्रिया के समान (सत्रा) सत्य कारण से (यती जो (हवनानि) दान आदि कर्म बढ़ते हैं तथा (धन्वन्) बालुका से युक्त स्थान में (थापा) जल (जनम्) मनुष्य को (न) जैसे वैसे (सम्, अभि) उत्तम प्रकार चारों ओर से बढ़ते हैं (एतत्) यह (अस्म) इस के लिए (सोमः) उत्पन्न करने वाला मैं जैसे (नि, अयामि) निरन्तर प्राप्त होता हूं वैसे आप इसको (मिमिक्षः) सीचिये ॥४॥ भायार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे सत्कार करने योग्य का सत्कार और निर्जल स्थान में हुए को जल का मिलना सुखकारक - - म ASON Com ४६४ ऋग्वेदः मं०६। सू० ३५ ।। 4Rta कस्ताक Eneta SEX होता है वैसे ही यज्ञ का अनुष्ठान और श्रेष्ठ ऐश्वर्य सब के आनन्दकारक होते हैं ॥४॥ फिर विद्वानों का कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं।। अस्मां एतन्मह्याङ्गुषमस्मा इन्द्राय स्तोत्रं मतिभिरुवाचि । असा महति ठूनतर्थे इन्द्रो विश्वायुरमिता वृधश्च ॥५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (यथा) जैसे (मतिभिः) विचारशील मनुष्यों से (अस्म) इस उपदेशक के लिए (एतद) यह (महि) बड़ा (आंगूषन) प्राप्त होने योग्य (स्तोत्रम् ) स्तोत्र (अवाचि) कहा जाता है और जैसे (अस्मै) इस (इन्द्राय) ऐश्वर्या के करने वाले राजा के लिए यह बड़ा प्राप्त होने योग्य स्तोत्र कहा जाता है और 'जैसे (इन्द्रः) शत्रुओं का नाश करने वाला योद्धा (महति) बड़े (वृत्रतूर्ये) सङ ग्राम में (बधः) बढ़ाने और (अविता) रक्षा करने वाला (विश्वायुः, च) और पूर्ण अवस्था युक्त (असत) होवे वैसे आप लोगों को भी करना चाहिये ॥५॥ भावार्थः -जो अविद्वान् हों वे विद्वानों के अनुकरण से अपना वर्ताव उत्तम करें॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे भण्डल में चौतीसदा खुजत समाप्त हुभा ॥ अथ पञ्चचस्य पञ्चत्रिशत्तमस्य सूक्ता नर ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ विराख्रिष्टम् । ३ निवृत्रिष्टुप् । ४, ५ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः। २ पङक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब पांच ऋचावाले पैंतीसर्वे सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा के प्रति कैसा उपदेश करें इस विषय को कहते हैं । कदा भुवनयक्षपाणि ब्रह्म कदा स्तोत्रे संहनगोष्य दाः । कदा स्तोम वासयोऽस्य राया कदा धियः करसि बाजरत्नाः ॥१॥ पदार्थ:-हे राजन् ! आपके (कदा) कब (रथक्षयाणि) वाहन के रहने के स्थान (भुवन्) होते हैं और (कदा) कब (स्तोत्रे) प्रशंसा के साधन में (सहन- पोष्यम्) असंख्य जनों के पुष्ट करने योग्य (ब्रह्म) धन को (दा:) दीजिये और (कदा) ४६५ B0- a Kina . ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३५ ॥ कब (अस्य) इसके (राया) धन से (स्लोभम्) प्रशंसा को (वासयः) बसाइए और आप (कदा! कब (बाजरत्नाः) धन और धान्य की बढ़ाने वाली (धिमः) उत्तम बुद्धियों वा उत्तम कर्मों को (करसि) करें ॥१॥ भावार्थ:--सब सभा में बैठने वाले, विद्वान् जन और उपदेशक जन राजा से यह कहें कि आप कब सेना के अंगों और पुष्टि करने वाले ऐश्वर्य और उत्तम बुद्धियों को करें ।।१।। फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। कई स्वित्तदिन्द्र बन्नृभिवृन्वीरैरानीळयांसे जयाजीन् । विधातु मा भर्थि पयासि गोपिन्द्र घुम्नं स्वर्ववेद्यस्मे ॥२॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सेना के धारण करने वाले आप (कर्हि) किस समय में (स्वित्) कहिए (सीरैः) शूरता और बल' प्रादि से युका नृभिः) उत्तम मनुष्यों से (बीरान्) धृष्टता आदि गुणों से युक्त (नन्) श्रेष्ठ मनुष्यों की (नोळयासे) प्रशंसा कीजिए और (गः) पृधिवियों को कब (अधि) (जयासि जीतिए और है । इन्द्र) प्रतापी और सेना के धारण करने वाले पाप गोषु) पृथिवियों में और (अस्मे) हम लोगों में (य) जो (सर्वस्) बहुत सुख से युक्त विधात) सोना चांदी और तांबा ये तीन धातु जिसमें ऐसा (श म) धन वा यश है (तत्) उसको हम लोगों में (हि) धारण करिए सो ऐसा करके (जीन्) संग्रामों को (जय, जीतिए ॥२॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप विद्वानों के साथ विद्वानों का तथा शूर- वीर जनों के साथ शूरवीरों का अच्छे प्रकार ग्रहण करके तथा संग्रामों को जीतकर और पृथिवी के राज्य को प्राप्त कर न्यायाचरण से प्रजाओं का पालन करके बड़े यश वा धन को बढ़ाइये ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। कहि स्वित्तदिन्द्र यज्जरित्रे विश्वप्सु बम कृणवः शविष्ठ । कदा विषो न नियुत्तों युवासे कदा गोमंघा इतनानि गच्छा ॥३॥ पदार्थ:-हे (शविष्ठ) अतिशय बली (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त राजन् श्राप (कहि) कब (स्वित्) कहिए ! (जरित्र स्तुति करने वाले के लिए (यत्) जो (विश्वप्सु) अनेक रूप (ब्रह्म) धन (कृणवः) करेंगे (तत्) उसको इसके लिए हम लोग भी करें तथा (नियुतः) अत्यन्त श्रेष्ठ गुणों से युक्त (न) जैसे वैसे (धियः) बुद्धियों को (कदा) कब (युवासे) मिलाइएगा और (गोमधा) पृथिवी के WAT TARA ARATARA ४६६ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३५ ।। to 2OL राज्य से सत्कृत धनों तथा (हबनानि) ग्रहण करने योग्यों को (कदा) कब (गच्छाः) प्राप्त हूजिएगा ॥३॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप सम्पूर्ण धन, पूर्ण बुद्धियां और उत्तम क्रियाओं को कब करियेगा ? अर्थात् शीघ्र इनको करिये ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स गोमघा जरित्रे अश्वश्चन्द्राः दाजश्रवसो अधि धेहि पृक्षः। पीपिहीषः सुदुर्घागिन्द्र धेनुं भरद्वाजेषु सुरुचौ रुरुच्याः ॥४॥ पदार्थः-- हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्या के देनेवाले राजन् (स:) वह आप (जरित्रे) विद्या और गुण के प्रकाश करने वाले के लिए जो (गोमधाः) पृथिवी के राज्यरूप धन वाले (अश्वश्चन्द्राः) घोड़े हैं सुवर्ण जिनके वे (वाजधवसः) अन्न और विद्या श्रवण युक्त (पृक्षः) सम्बन्ध करने योग्य हैं उनको हम लोगों में (अधि, धेहि) धारण करिए और (इषः) प्राप्त होने योग्य रसों को (पीपिहि) पीजिए और (भरद्वाजेषु) धारण किया विज्ञान जिन्होंने उन विद्वानों में (सुदुधाम् ) उत्तम प्रकार कामना पूर्ण करने वाली (धेनुम् ) विद्या और शिक्षा से युक्त वाणी को (सुरुचः) तथा उत्तम प्रीति वालों को (रुरुच्याः) प्रीतियुक्त करिए ॥४॥ भावार्थ:-हे राजन् ! अपनी प्रजाओं में पूर्ण विद्या और सम्पूर्ण धन को धारण कर और शरीर के आरोग्यपन को बढ़ा के धर्म में रुचि करिये ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तमा नूनं वृजनभन्या चिच्छूरो यच्छेक्र वि दुर्गे गृणीषे । मा निररं शुक्रदुर्घस्य धेनोराङ्गिरसान् ब्रह्मणा विप्र जिन्व ।।६॥ पदार्थ:---हे (विप्र) बुद्धिमान् जन (शक) सामर्थ्य और अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् (यत) जो (वृजनम्) चलते हैं जिससे वा जिसमें उसकी (नूनम् निश्चित (प्रा, गणीषे) प्रशंसा करते हो (तम्) उसकी (चित्) भी (निः) निरन्तर प्रशंसा करते हो और (शूरः) भयरहित और शत्रुओं के मारने वाले आप (दुरः) द्वारों को (जिन्य) पुष्ट करिए तथा (शुक्रदुधस्य) शीघ्र पूर्ण करने वाली (धेनोः) वाणी के (मागिरसान्) प्राणों में श्रेष्ठों को (ब्रह्मणा) बड़े धन वा अन्न से (अरम्) अच्छे प्रकार से (वि) प्रसन्न कीजिए और कभी (अन्यथा) अन्यथा (मा) न करिए ॥५॥ !

- जिन में वे (सन सत्य (विभक्ता) विभागों को प्राप्त हुए हैं उनके पाप धारण करने वाले (अभवः) ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३६ ।। ४६७ भावार्थ:-जो राजा आदि जन प्रजाओं को सुख से शोभित कर अन्याय से अन्यथा आचरण नहीं करते वे सम्पूर्ण ऐश्वयं से युक्त होते हैं ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, राजा और प्रजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए। यह छठे मण्डल में पैंतीसवां सूक्त समाप्त हुन्मा ॥ अथ पञ्चर्चस्य पत्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य नर ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ निवृत्रिष्टुप् । २ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः। ४ । ५ भुरिक पक्तिः । ३ स्वराट् पक्तिश्छन्दः । पंचम: स्वरः ॥ अब पांच ऋचावाले छत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा कैसा होकर क्या धारण करे इस विषय को कहते हैं ।। सत्रा मदासस्तव विश्वजन्याः सत्रा रायोऽध ये पार्थिवासः । सत्रा वाजानामभवो विभक्ता यद्देवेषु धारयथा असुर्यम् ॥१॥ पदार्थ-हे राजन् (तव) आपके (ये) जो (विश्वजन्या:) सम्पूर्ण जन्य' सुख (सत्रा) सत्य (पार्थिवासः) पृथिवी में विदित और (वाजानाम्) अन्न आदिकों के . Mahura AuA PAIN M हूजिए (अध) इसके अनन्तर (यत्) जो (देवेषु) विद्वानों में (असुर्यम्) अविद्वानों में हुआ है उसको (धारयथा:) धारण कराइए ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो इस संसार में बुद्धि और प्रानन्द के बढ़ानेवाले, विद्या और धनादि से युक्त और विद्वानो के साथ सत्सग करने वाले हैं उनको धारण करके सत्य और असत्य के विभाग करने वाले हूजिये ॥१॥ फिर मनुष्य कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । अर्नु प्र येजे जन ओज अस्य सत्रा दधिरे अनु वीयर्याय । स्यूमभे दुधयेऽवते च ऋतुं वृञ्जन्त्यपि त्रहत्यै ।।२।। पदार्थ:-हे राजन् जो (जनः) मनुष्य' जैसे शूरवीर जन (अस्य) इस संसार के मध्य में (सत्रा) सत्य (प्रोजः) बल' को (दधिरे) धारण करते हैं और नाममा गुरणों में व्यापक ४९८ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ३६ ॥ (वृत्रहत्ये) संग्राम में (स्यूमगभे) एक दूसरे को मिले हुए के ग्रहण करने वाले (वीर्याय) पराक्रम के लिए (ऋतुम्) बुद्धि को (अनु) पीछे धारण करते हैं (च) और (दुधये) मारने वाले (पर्वते) प्राप्त हुए के लिए बुद्धि का (अपि) भी (वृञ्जन्ति) त्याग करते हैं वैसे (अनु, प्र, येजे) यज्ञ करता है उसको और उनको आप ग्रहण करिये और हिंसकों को वजिये ॥२॥ भावार्थ:-जो मनुष्य न्याय और दया से युक्त बुद्धि को धारण कर, धर्मयुक्त कर्मों को कर, दुष्टता को दूर कर और युद्ध में विजय प्राप्त करके श्रेष्ठों की संगति करते हैं वे दिन रात्रि बुद्धि को बढ़ा सकते हैं ॥२॥ फिर उस उत्तम मनुष्य को क्या प्राप्त होता है इस विषय को कहते हैं । तं सधीचीरूतयो वृष्ण्यानि पौंस्यानि नियुतः सश्चुरिन्द्रम् । समुद्रं न सिन्धव उक्थशुष्मा उरुव्यचंसं गिर आ विशन्ति ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जिस (उहत्यचसम्) बहुत श्रेष्ठ (इन्द्रम्। सत्य धर्म और न्याय के धारण करने वाले को (उक्थशुष्माः) कहे बल जिनसे वे गिरः) वाणियां (समुद्रम) समुद्र को (सिन्धवः) नदियां (न) जैसे वैसे (मा, विशन्ति) सब प्रकार से प्राप्त होती हैं (तम्) उसको (सध्रीचीः) एक साथ गमन करने वाली (नियुतः) वायु की निश्चित गतियों के समान क्रिया और (ऊतयः) रक्षण आदि क्रियायें (वृष्ण्यानि) दुष्टों के सामर्थ्य को रोकने वाले (पौंस्यानि) वचन भी (सश्च:) प्राप्त होवें ॥३॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं -जैसे नीचे चलने वाली नदियां समुद्र को सब ओर से प्राप्त होती हैं वैसे ही धार्मिक राजा को सम्पूर्ण बल, सब रक्षायें और उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियां भी प्राप्त होती हैं ॥३॥ फिर राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं। स रायस्खामुपं सृजा गृणानः पुरुश्चन्द्रस्य त्वमिन्द्र वर्खः । पतिर्बभूथासंमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्य राजा ॥४॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) धन के स्वामिन् राजन् जैसे (विश्वस्य) सम्पूर्ण (भुवनस्य) संसार का स्वामी (असमः) जिसके समान और नहीं (स:) वह (एक:) सहायरहित (राजा) प्रकाशमान राजा है वैसे आप (जनानाम् ) धामिक मनुष्यों और (पुरुश्चन्द्रस्य) बहुत सुवर्ण जिसमें उसके (रायः) लक्ष्मी के (वस्वः) धन के ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३७ ।। ४६8 पापा (पतिः) स्वामी (बभूथ) हूजिये और (गृणानः) स्तुति करते हुए (स्वम्) आप (खाम्) नदी के समान धन के कोश को (उप, सृजा) बनाइये ।।४।। भावार्थ:-- इस मंत्र में वाचकलु०-हे राजा लोगो ! जैसे ईश्वर पक्षपात का त्याग करके सब का न्याय से पालन करने वाला है वैसे ही होकर पाप लोग धन के स्वामी हूजिये ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । स तु श्रुधि श्रुत्या यो दुवोयुधौई भूमामि रायो अर्थः । असो या नः शवसा चकानो युगेयुगे वयंसा चेकितानः ॥५॥ पदार्थ:-हे ऐश्वर्य से युक्त (य:) जो (धौ:) प्रकाश (न) जैसे वसे (दुवोयुः) सेवा की कामना करता हुआ (अर्यः) स्वामी (शवसा) बल से' (चकानः) कामना करता हुआ (युगेयुगे) प्रतिवर्ष (बयसा) अवस्था से (चेकितानः) जानता हुआ (श्र त्या) श्रवण से (यथा) जैसे (न:) हम लोगों के समाचार को सुनता है और जैसे सः) वह (असः) हो तथा (रायः) धनों को प्राप्त हुए हम लोग प्रकाश जैसे वैसे (भूम) होवें वैसे (तु) तो आप सब की बात को (अभि, श्रुधि) सुनें ॥५॥ भावार्थ -इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे परीक्षक विद्यार्थियों के अध्ययन की परीक्षा करके विद्वान् करता है वैसे ही राजा यथार्थ न्याय को करके प्रजाओं को प्रसन्न करे ।।५।। इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में छत्तीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ पञ्चर्चस्य सप्तत्रिशत्तमस्य सूतस्य भरताजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता।१।४। ५ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । २ निवृत्पङ्क्तिः । ३ निचुत्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥ अब पांच ऋचावाले सैतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। अर्वाग्रथं विश्ववार त उग्रेन्द्र युक्तासो हरयो वहन्तु । कीरिश्चिद्धि त्वा हवते खर्वान्धीमहि सधमादस्ते अद्य ॥१॥ NO- GRA Cour m mah मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं। ५०० ऋग्वेदः म० ६ । सू० ३७ ।। पदार्थ:-हे (उग्र) तेजस्विन् (इन्द्र') प्रजा के स्वामिन् जो (युक्तासः) नियुक्त किये गए (हरयः) घोड़ों के तुल्य शिल्पी मनुष्य (ते) आपके (विश्ववारम्) सम्पूर्ण सुख स्वीकार करने वाले (रथम्) सुन्दर वाहन को (वहन्तु) प्राप्त करावें और जो (स्वर्वान्) बहुत सुख विद्यमान जिसमें वह (कोरिः) स्तुति करने वाला विद्वान् (हि) ही (स्वा) प्रापको (हवते) पुकारता है उनके (सधमावः) तुल्य स्थान वाले हम लोग (ऋधीमहि) समृद्ध होवें। और जिन (ते) आपके (प्रक्)ि पीछे (अध) इस समय जो सुख को प्राप्त होते हैं वे (चित्) भी इस समय सुखों से भूषित होते हैं ॥१॥ भावार्थ:-जो राजा धार्मिक और अनुकूल मनुष्यों का सत्कार करता है उस की सब मिष्ठ विद्वान् सदा सेवा करते हैं ॥१॥ फिर मनुष्य परस्पर कैसा वर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ।। प्रो द्रोणे हरयः कर्माग्मन्पुनानास ऋज्यन्तो अभूवन् । इन्द्रों नो अस्य पूर्व्यः पीया धुक्षो मदस्य सोम्यस्य राजा ॥२॥ पदार्थ:-जो (इन्द्र :) अत्यन्त ऐश्वर्यवाला (अस्य) इस (सोम्यस्य) ऐश्वर्य में हुए (मवस्य) आनन्द का (क्षः) अन्तरिक्ष के सदृश भूमि जिस की वह (पपीयात) बढ़े और (पूर्व:) पूर्वजनों से उत्पन्न किया गया (न:) हम लोगों का (राजा) प्रकाशमान राजा होवे और जो (पुनानास:) पवित्र (ऋज्यन्तः) सरल के सदृश आचरण करते हुए. (हरयः) मनुष्य (द्रोणे) परिमाण में (कर्म) कर्म को (प्रो) अच्छे प्रकार (अग्मन्) प्राप्त होते हैं और (प्रभूवन्) प्रसिद्ध होते हैं वे अन्यों को भी पवित्र करते हैं ।।२।। भावार्थ:-जो राजा आदि श्रेष्ठ जन स्वयं पवित्र और श्रेष्ठ स्वभाव वाले और सरल होकर श्रोष्ठ कर्मों को करके न्याय से हम लोगों की रक्षा करते हैं वे हम लोगों से सत्कार करने योग्य हैं ॥२॥ फिर आसवाणासः शवसानमच्छेन्द्र सुचक्रे रथ्यालो अश्वाः । अभि श्रव अज्यन्तो वहेयुनू चिन्न वायोरमृतं वि दस्येत् ॥३॥ पदार्थ:-जो (पासत्राणास:) चारों ओर से गमन करने वाले (रथ्यासः) वाहनों में श्रेष्ठ (प्रश्वाः) घोड़े जैसे वैसे (अभि, श्रवः) चारों ओर से सुनने वाले (ऋज्यन्तः) सरल के समान आचरण करते हुए विद्वान् जन (शवसानम्) बलयुक्त * MAP ऋग्वेद मं०६। सू० ३७ ।। (इन्द्रम्) राजा को (नू) शीघ्र (बहेयु:) प्राप्त होवें और जो (चिन) भी इन को (अच्छ) अच्छे प्रकार (सुचके) सुन्दर करता है वह (बायोः) पवन के (अमृतम्) नाशरहित स्वरूप को प्राप्त होकर दुःखों की (न) शीघ्र ही (वि, दस्येत) उपेक्षा करे ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे प्रजाजनो ! जैसे राजा आप लोगों की वृद्धि करे वैसे आप लोग भी इस की वृद्धि करिये और सब योगाभ्यास करके प्राणों में वर्तमान परमात्मा को जान कर दु:खों का नाश करो ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । वरिष्ठो अस्य दक्षिणाभियर्तीन्द्रो मघोनों तुविकूर्मितमः । थयो पतिवः परियास्यंहों मघा च धृष्णो दयसे वि सूरीन् ॥४॥ पदार्थ:-हे (वचिव:) प्रशंसित शस्त्र और अस्त्र से तथा (धृष्णो) दृढ़ उत्साह से युक्त (यया) जिस दक्षिणा से पाप (हः) अपराध का (परियासि) सब प्रकार से परित्याग करते हो (सूरीन्) विद्वानों (भधा, च) और धनों को वि) विशेष करके (दयसे) देते हो उस (अस्थ) इस राज्य के (मघोनाम्) बहुत धनों से युक्तों की (दक्षिणाम्) बढ़ाने वाली दक्षिणा को (तुविम्मितमः) अत्यन्त बहुत करने और (बरिष्ठः) अत्यन्त स्वीकार करने वाले (इन्द्रः) राजा हुए आप (इत्ति) प्राप्त होते हैं इससे सत्कार करने योग्य हैं ॥४॥ भावार्थ:- वही राजा स्थिर राज्य करने योग्य है जो विद्वानों और धार्मिक जनों पर दया करता और दुष्ट व्यसनों का त्याग करता है तथा पुरुषार्थी होकर दूतरूप च वाला हुआ प्रजा के पालन में यत्नवाला होता है ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । इन्द्रो वाजस्य स्थविरस्य दातेन्द्रो गीर्भिर्वर्धतां वृद्धमहाः । इन्द्रो वृत्रं हनिष्ठो अस्तु सत्वा ता सूरि पृणति तूतुजानः ॥६॥ पदार्थ:-हे. मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्या से युक्त और (स्थविरस्य) स्थूल (वाजस्य) अन्न आदि का (दाता) देने वाला और जो इन्द्रः) विद्या और ऐश्वर्य से युक्त राजा (गोभिः) वारिणयों से (वर्धताम्) बढ़े और (वृद्धमहाः) वृद्धों से सत्कार किया (इन्द्रः) सूय्यं (वृत्रम्) मेघ का जैसे वैसे शत्रुओं का RUN ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३८ ।। (हनिष्ठः) अत्यन्त' मारने वाला प्रस्तु) हो और जो (तूतुजान:) शीघ्र करने वाला (सत्वा) सतोगुण से युक्त (सूरिः) विद्वान् (ता) उन धनों को (श्रा, पृणति) अच्छे प्रकार सुखयुत करता है उसका तुम सब लोग सत्कार करो॥५॥ . भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अभय का देने वाला, विद्या में वृद्धों और प्राप्तों का सेवक, दुष्टों का मारने वाला, शीघ्रकर्ता, विद्वान् मनुष्य हो उसी को तुम लोग राजा मानो ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा और प्रजा के कर्मों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में संतीसवां सूक्त. समाप्त हुमा ।। Aam FOR अथ पञ्चर्चस्याटशिल मस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रों देवता।१।२। ३ ५ ५ निवृत्रिष्टुप् । ४ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ।। अब पाँच ऋचावाले अड़तीसवें सूक्त का प्रारम्भ हे उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को कैसे विद्वान् की सेवा करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं । अपादित उर्दु नश्चित्रतमो वहीं भर्षद् घुमतीमिन्द्रहुतिम् । पन्यसी धीति दैव्यस्य यामन् जनस्य राति वनते सुदानुः ॥१॥ पक्षा:-जो (भपात) पैरों से रहित (इत:) प्राप्त हुआ (चित्रतमः) अत्यन्त अद्भुत गुण कम और स्वभाव वाला (सुदानः) उत्तम दान वाला (न:) हम लोगों के लिये (ध मतीम् ) विद्या के प्रकाशवाली (इन्द्राहूतिम्) अत्यन्त ऐश्वर्य की प्रकाशिका (पन्यसीस) प्रशंसा करने योग्य (देव्यस्य) श्रीष्ठ गुण अथवा विद्वानों में हुए (जनस्य, मनुष्य की (धोतिम्) धारणा से युक्त बुद्धि को और (महीम्) महती वाणी को तथा (यामन्) चलते हैं जिसमें उस मार्ग में (रातिम्) दान को (उत्, भर्षत) धारण करता (उ) और (वनसे) सेवन करता है वह विद्वान् मंगल' करने वाला होता है ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जिस यथार्थवक्ता विद्वान् की सब के ऊपर दया, विद्यादान, निष्कपटता और उत्तम दृष्टि वर्तमान है वही सब से सत्कार करने योग्य होता है ॥१॥ फिर मनुष्य' क्या ग्रहण करके सेवा करें इस विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं०६ । सू०३८ ॥ NAM 400 FIRHA Sew दूराचिदा वसतो अस्य कर्णा घोषादिन्द्रस्य तन्यति ब्रवाणः । एयमेनं देवहूतियान्मद्रय १ गिन्द्रमियमुच्यमाना ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जिस (अस्य) इस (इन्द्रस्य) राजा के (दूरात्) दूर से (चित्) भी (वसतः) निवास करते हुए के (कर्णा) दोनों कान (घोषात्) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी से जो (मा, तन्यति) अच्छे प्रकार शब्दित करता है और जो (देवहूतिः) विद्वानों से प्रशंसा की गई (इयम्) यह वाणी (एनम् ) इस (इन्द्र म्) ऐश्वर्य से युक्त विद्वान् को (भा) चारों ओर से (बवृत्यात्.) बत्तित करे और (इयम्) यह (ऋच्यमाना) स्तुति की गई और जो (मा) मुझ सरीका (अ वाण:) उपदेश करता हुआ है उसको वतै उसकी और उसकी आप लोग सेवा करी ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस का आत्मा श्रोत्रों के द्वारा विद्या से तृप्त होवे और जिसको सम्पूर्ण विद्या से युक्त वाणी प्राप्त होवे उसी का उत्तम प्रकार सेवन करके पूर्ण विद्या को प्राप्त हूजिये ॥२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। तं वॉ धिया परमया पुराजामजरमिन्द्रमभ्यनूष्यकैः । ब्रह्मा च गिरों दधिरे समस्मिन्महांश्च स्तोमो अधि वर्षदिन्द्रे ॥३॥ ee पदार्थः हे विद्वानो जैसे तुम (ब्रह्मा) वेद की और (व:) आप लोगों की (परमया) अत्यन्त उत्तम (षिया) बुद्धि वा कर्म से (तम्) उस (पुराज्ञाम्) पहिले प्रकट हुए (अजरम्) जीर्ण होने से रहित' (इन्न म्) बिजुली की भी प्रशंसा करो वैसे (अ) सूर्यों से मैं इसकी (अभि, अनूषि) स्तुति करता हूं और जैसे (च) भी अस्मिन्) इस (इन्द्रे) अत्यन्त ऐश्वर्य में (च) भी (महान्) बड़ा (स्तोमः) प्रशंसा करने योग्य गुण कर्म और स्वभाव वाला (अधि, वर्धत्) बढ़ता है और जैसे श्राप विद्वानों को (गिरः) वेदवारिणयों को (सम्) (दधिरे) उत्तम प्रकार धारण करते हैं वैसे हम लोग अनुष्ठान करें ॥३॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है- जो मनुष्य विद्वानों के उपदेश और पुरुषार्थ से बिजुली आदि की विद्यायुक्त बुद्धि को स्वीकार करते हैं वे यहां स्तुति करने योग्य होते हैं ।।३।। अब मनुष्य क्या बढ़ा। इस विषय को कहते हैं ।

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ऋग्वेदः मं०६। सू०३८ ।।
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वर्धाचं यज्ञ उत सोम इन्द्र वर्षाद् ब्रह्म गिर उक्था च मन्म ।
वर्धानमुषसो यामन्नतोर्वर्धान्मासाः शरदो घाव इन्द्रम् ॥४॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (यम्) जिस (इन्द्रम्) बिजुली आदि की विद्या को (यशः)
श्रेष्ठों की संगति आदि स्वरूप और (उत्त) भी (सोमः) प्रेरणा करने वाला विद्वान्
(वर्धात) बढ़ावे और (ब्रह्म) धन को (वर्धात) बढ़ावे तथा (उक्था) प्रशंसा करने
योग्य वचनों और (मन्म) विज्ञानों और (गिरः) वारिणयों को (च) भी (वध)
बढ़ावे और (अह) इसके अनन्तर (एनम्) इस (उषसः) प्रभात से और (अक्तोः)
रात्रि से (यामन्) चलते हैं जिस में उस मार्ग में (मासा:) महीने (शरदः) ऋतुयें
और (द्यावः) प्रकाशयुक्त दिन वा प्रकाश (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य को (वर्धान्)
बढ़ावें वे हम लोगों को बढ़ावें ॥४॥
भावार्थ:--हे मनुष्यो ! जैसे विद्वानों का सत्कार और संगतिस्वरूप
व्यवहार, बिजुली आदि की विद्या को तथा अत्यन्त ऐश्वर्या और पूर्ण प्राय
को बढ़ाता है वैसे ही आप लोग सम्पूर्ण श्रेष्ठ व्यवहारों को दिनरात्रि
बढ़ाइये ॥४॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
एवा जंज्ञानं सहसे असामि वासुधानं राधसे च श्रुताय ।
महामुग्रमवसे विष नूनमा विवासेन्स वृत्रतूर्येषु ॥५॥
पदार्थ :--हे (विप्र) बुद्धियुक्त (असामि) उपमारहित को (सहसे) बल के
लिए (जज्ञानम्) विद्या और विनयों में प्रकट हुए को (राधसे) असंख्य धनयुक्त के
लिए (श्रुताय) सम्पूर्ण विद्याओं का किया श्रवण जिसने उसके लिए इच) भी
(वावृधानम्) बढ़ते हुए को (वृत्रतूर्येषु) शत्रुओं से हिंसा करने योग्य संग्रामों में
(भवसे) रक्षण प्रादि के लिए (महाम) बड़े (उग्रम्) तेजस्वी की हम लोग (नूलम्)
निश्चित (मा) सब प्रकार से' (विवासम) नित्य सेवा करें उस (एबा) ही की आप
भी सवा करो ॥शा
भावार्थ:-जब मनुष्य सम्पूर्ण श्रेष्ठ गुण कर्म और स्वभावों
में वर्तमान शूरवीर विद्वान् की सेवा कर और विद्या को ग्रहण
करके बल आदि को बढ़ावें तो वे कौनसा उत्तम कार्य न सिद्ध कर
wala
PERM
सकें॥५॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०३६ ॥ ५०५ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, उत्तम बुद्धि और वाणी के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में अड़तीसवां सूक्त समाप्त हुमा । अथ पञ्चर्चस्यैकोनचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता ।१।३ विराट् त्रिष्टुप् । २ त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः । ४ । ५ भुरिक्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥ अब पांच ऋचा वाले उनतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। मन्द्रस्य कवेर्दिव्यस्य वह्नविप्रमन्मनो वचनस्य मध्यः । अपां नस्तस्य सचनस्य देवेषों युवस्व गृणते गोअग्राः ॥१॥ पदार्थः - हे (देव) अत्यन्त विद्वन् श्राप (वह्न) सम्पूर्ण विद्याओं के धारण करने वाले अग्नि के सदृश (कवे:) विद्वान् और (दिव्यस्य) सुन्दर इच्छात्रों में श्रेष्ठ (मन्द्रस्य) आनन्दित होते और आनन्दित करते हुए (विप्रमन्मनः) विद्वान् का विज्ञान जिस में उस (मध्वः) माधुर्य आदि गुण से युक्त (वचनस्य) वचन के व्यवहार का (अपाः) पालन करिये और (तस्य) उस (सचनस्य) सम्बद्ध हुए की (गृणते) स्तुति करते हुए के लिए (मोना) वाणी उत्तम जिनमें उन (इषः). अन्न आदि वा इच्छाओं को (न:) हम लोगों के लिए (युवस्व) संयुक्त कीजिये ॥१॥ भावार्थ:- हे विद्वन् ! श्राप ऐसा प्रयत्न करिये जिससे हम लोगों को दिव्य सुख, दिव्य विद्या और दिव्य ऐश्वर्य प्राप्त होवे ॥१॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अयमुशानः पर्यद्रिमुखा ऋतधीतिभितयुग्युजानः । रुजदरुग्णं वि बलस्य सार्नु पणींवचौभिरभि योधदिन्द्रः ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जैसे (अयम्) यह (ऋतधीतिभिः) जल के धारण करने वाले गुणों से (उन्ना:) किरणों को (युजानः) धारण करता हुआ (इन्द्रः) सूर्य (अद्रिम्) मेघ को (परि, रुजत) विभाग करता है और (बलस्य) मेघ के (सानुम्) शिखर के आकार मेध को नाश करने को (अभि, वि, योधत्) सब ओर से विशेष कर युद्ध करता है वैसे (ऋतयुक्) सत्य से युक्त होनेवाला (उशानः) कामना करता akasa वार I Skesta ऋग्वेदः मं०६ । सू० ३६ ।। AMAN - हुप्रा (वचोभिः) वचतों से उत्तम जन को (अरुग्णम्) रोगरहित और (पणीन्) प्रशंसा करने योग्य व्यवहारों को सिद्ध कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वान् जनो ! जैसे सूर्य अपनी किरणों से भूमि से जलका आकर्षण कर धारण कर और मेघ के आकार का नाश करके पृथिवी के ऊपर गिराय सम्पूर्ण व्यवहारों को सिद्ध करता है वैसे ही विद्वानों से श्रेष्ठ विद्यामों का आकर्षण कर धारण करके उत्तम विद्यार्थियों में वर्षाय और अविद्या का नाश करके विज्ञान से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के व्यवहारों को सिद्ध करो॥२॥ फिर विद्वान् जन कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं। अयं द्योतयदद्युतो व्यक्तून् दोषा वस्तौः शरद इन्दुरिन्द्र । इमं केतुमदधुनू चिदनां शुचिजन्मन उपसंश्चकार ॥३॥ पदार्थः- है (इन्द्र) सूर्य के सदृश वर्तमान विद्वन् जैसे (अयम्) यह (इन्दुः) गीला करनेवाला सूर्य (प्रातः) नहीं प्रकाश करने वाले भूमि प्रादिकों को और (अक्तून्) रात्रियों को (दोषा) प्रभातकालों को (वस्तोः) दिन को (शरदः) शरद् आदि ऋतुओं को (वि, द्योतयत्) प्रकाशित करता है और (मह्नाम्) दिनों के (चित्) भी (शुचिजन्मनः) सूर्य से जन्म जिसका उस (उषसः) प्रभात वेला की प्रकटता को (चकार) करता है वैसे (इमम्) इस (केतुम्) बुद्धि को प्रकाशित कीजिये और जैसे इस प्रकाशस्वरूप सूर्य को प्रभात वेलायें (अदधुः) धारण करें वैसे (न) शीघ्र विद्या के प्रकाश को धारण करिये ॥३॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वान् जनो! आप लोग जैसे सूर्य अप्रकाशक भूमि आदि का प्रकाश करने और प्रानन्द करने वाला पवित्रक्षण प्रादि समयों का निर्माण करता है वैसे मनुष्यों के आत्माओं के प्रकाशक हुए विद्या की वृद्धि करने वाले कर्मों को निष्पन्न कीजिये और कर्मों का प्रचार कराइये ॥३॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं । अयं रोचयदरुचौ रुचानो३'यं वासययुर'तेन पूर्वीः । अयमीयत ऋतयुग्भिरश्वैः स्वर्विदा नाभिना चर्षणिमाः ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जैसे (अयम्) यह (अरुचः) प्रकाश से रहित चन्द्र आदिकों को (रुचानः) प्रकाशित करता हुआ सूर्य सम्पूर्ण जगत् को (रोचयत्) प्रकाशित करता है वैसे विद्या से सब मनुष्यों को प्रकाशित करिये जैसे (अयन्) यह JAMIA Star D ऋग्वेदः मं०६ । सू०३६ ।। ५०७ सूर्य (ऋतेन) जल' के सदृश सत्य से (पूर्वीः) पहिले उत्पन्न हुई प्रजात्रों को (वि, वासयत्) विशेष बसाता है वैसे सम्पूर्ण प्रजाओं को सत्य विज्ञान से संयुक्त करिये और जैसे (अयम्) यह सूर्य (ऋतयुग्भिः) जल के युक्त करने वालों से (प्रश्वः) महान् शीघ्रगामी किरणों और (स्वविवा) सुख को जानते हैं जिससे उस (नाभिना) मध्य के आकर्षण आदि बन्धन से (चर्षणिप्राः) विद्या प्रादि गुणों से मनुष्यों के प्रति व्याप्त होने वाला हुआ (ईयते) जाता है वैसे सत्य के युक्त कराने वाले बड़े गुणों से सुख देने वाले प्रात्मा के आकर्षण से और वक्तृत्व से श्रोताओं को व्याप्त होते हुए जहां तहां जाइये ॥४॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन सूर्य के सदृश प्रकाशात्मा होकर अविद्या का विनाशकर और मनुष्यों को विद्या से प्रकाशित करते हैं और सत्य आचरण के प्रति आकर्षित करते हैं वे धन्य हैं ॥४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। नू गुणानो गृणते प्रत्न राजनिषः पिन्व वसुदेयाय पूर्वीः । अप ओषधोरविषा वनानि गा अवतो ननृचसे रिरीहि ॥५॥ पदार्थ:--है (राजन) विद्या और विनय' से प्रकाशमान (प्रत्न) प्राचीन तथा दीर्घ अ युयुक्त प्राप (गणते) स्तुति करते हुए के लिए (गुणानः) स्तुति करते हुए (वसुयाय) द्रव्य देने योग्य जिससे उसके लिए (पूर्वी:) पूर्ण सुखवाले (इषः) अन्न आदिकों को (अपः) जलों को (ओषधीः) यव आदिकों को (अविषा) नहीं विद्यमान विष जिनमें उन (बनानि) जंगलों को (गा:) धेनु आदिकों को (अर्वतः) अश्व आदिकों को और (नन्) मनुष्य प्रादिकों को (ऋचसे) प्रशंसित कर्म के लिए (पिन्य) सेवन करिए और नू) शोघ्र (रिरीहि) याचना करिये ॥५॥ भावार्थ:-जो राजा सत्यवादी है और सत्य बोलने वालों को प्रसन्न करता है और विद्वानों से विद्या और विनय को प्राप्त होकर सदा ही प्रजा के सुख को चाहता है तथा यज्ञ और उत्तम सुगन्धित फल पुष्प से युक्त वृक्षों से और लता आदिकों से सब को सुखयुक्त करता हुआ, जल प्रोषधि वृक्ष गौ घोड़ा और मनुष्यों के सुख की वृद्धि के लिए परमेश्वर वा विद्वानों से याचना करता है वही इस लोक और परलोक के अनन्त आनन्द को प्राप्त होता है ॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान्, सूर्य और राजा के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये यह छठे मण्डल में उनतालीसवां सूक्त समाप्त हुप्रा ।।

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४० ॥ । R अथ पञ्चर्चस्य चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १।३ विराट् त्रिष्टुप् । २ त्रिष्टुप् छन्दः । धवतः स्वरः । ४ भुरिक पङ्क्तिः । ५ स्वराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब पांच ऋचावाले चालीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है उसके प्रथम मन्त्र में राजा को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायावं स्य हरी वि मुचा सखाया। उत प्र गाय गण मा निषद्यार्थी यज्ञाय गृणते वो धा॥२॥ पदार्थ:-- है (इन्द्र) राजन् जो (तुभ्यम्) आपके लिए (मदाय) हर्ष के अर्थ (सुतः) उत्पन्न किया गया सोमलता का रस है उसको (पिब) पीजिए उस से (प्रव, स्य) विनाश को अन्त करिये अर्थात् निश्चित रहिए और (उल) भी (हरी) संयुक्त घोड़ों के सदृश वर्तमान राजा और प्रजाजन (वि, मुचा) जो कि दुःख का त्याग करने वाले (सखाया) मित्र होते हुए हैं उनकी (प्र, गाय) स्तुति करिये और (गणे) गणना करने योग्य विद्वानों के समूह में (निषा) स्थित होकर (प्रथा) इस के अनन्तर (गृणते) सत्यविद्या को धारण करने वाले की नहीं प्रशंसा करने वाले के लिए तथा (यशाय) सत्य से संयुक्त होने वाले के लिए (वयः) कामना करने योग्य अवस्था को (प्रा) सब प्रकार से (धाः) धारण करिये ॥१॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप सोमलता आदि बड़ी ओषधियों के रस का पान कर, रोगरहित होकर, सत्य और असत्य का निर्णय कर, सब मित्रों की स्तुति करके, विद्वानों की सभा में स्थित होकर और सत्य न्याय का प्रचार करके, दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से विद्याग्रहण के लिए सम्पूर्ण बालिका और बालकों को प्रवृत्त कराके सम्पूर्ण प्रजाओं को अधिक अवस्थावाली करिये ॥१॥ Area an अब मनुष्यों को क्या खाना और क्या पीना चाहिए इस विषय को कहते हैं । अस्य पिब यस्य जज्ञान ईन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन् । तमु ते गावो नर पापो अदिरिन्दु समान्पीतये समस्मै ॥२॥ पदार्थ:-हे (विरप्शिन्) बड़े गुण से विशिष्ट (इन्द्र) राजन् (यस्य) जिस (अस्य) इसके (मदाय) आनन्द देने वाले (कत्वे) प्रज्ञान के लिए रस को (अपिबः) पान किया उस रस को श्राप फिर (जज्ञान:) प्रसिद्ध होते हुए (पिब) पान करिये और जिन (ते) आप के (गावः) किरणों के सदृश (नरः) मनुष्य और (प्रापः) जल - वाले जिन (स्वायता ऋग्वेदः मैं०६ । सू० ४० ।। और (अतिः) मेघ (इन्दुम्) जल' को जैसे वैसे (तम्, उ) उसको ही प्राप्त होते हैं और (अस्मै) इस (पीतये) पान के लिए (सम्, अह्मन्) अच्छे प्रकार व्याप्त होते हुए आप (सम्) उत्तम प्रकार पान करिए ।।२।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजन् ! जिस भोजन और पान से बुद्धि और बल बढ़े उसका भोजन और उसका पान करिये और उसका भोजन कराइये और पान कराइये तथा उसका भोजन और पान न करिये और न कराइए जिससे बुद्धिभ्रश होवे ॥२॥ फिर राजा और राजा के जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। समिद्धे अग्नौ सुख इन्द्र सोमे आ वो वहन्तु हरयो वहिष्ठाः । स्वायता मनसा जोहवीमीन्द्रा याहि सुविताय महे नः ।।३।। पदार्थः- है (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देनेवाले (बहिष्ठाः) अतिशय प्राप्त कराने वाले (हरयः) घोड़ों के सदृश मनुष्य (समिद्धे) उत्तम प्रकार प्रदीप्त (अग्नौ) अग्नि में और (सुते) उत्पन्न हुए (सोमे) बड़ी ओषधि के रस में (स्वा) आपको (प्रा, बहरतु) सब प्रकार से प्राप्त करावें और हे (इन्द्र) दुःख दारिद्रय के विदारने अत्यन्त पुकारता हूं वह भाप (महे) बड़ी (सबिताय) प्रेरणा के लिए (नः) हम लोगों को (अध, याहि) सब प्रकार से प्राप्त हूजिए ।।३।। भावार्थ:-हे राजन् ! आप उत्तम मनुष्यों के साथ वैद्यों की उत्तम प्रकार परीक्षा कर, उत्तम रसों और अन्नों को सम्पन्न कर, उनका भोजन कर, एकमत कर और प्रजाजनों की रक्षा करके अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होकर हम लोगों को भी धनयुक्त करिये ॥३॥ फिर राजा आदिकों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । आ याहि शवदुशता यथाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम् । उप ब्रह्माणि शृणव इमा नोऽया ते यज्ञस्तन्वे३' वयों धात् ।।४।। पदार्थ:-- हे (इन्द्र) अत्यन्त धन के देने वाले जो (यज्ञः) सद्विद्या और व्यवहार को बढ़ाने वाला व्यवहार (नः) हम लोगों के और (ते) आप के (तन्वे) शरीर के लिए (ययः) जीवन को (धात) धारण करता है उससे (अथा) इसके अनन्तर (इमा) इन (ब्रह्माणि) धनों को वा वेदों को आप (महा) बड़े (मनसा) विज्ञानयुक्त चित्त से (उशता) कामना करते हुए विद्वान् के साथ (शृणवः) सुनिए और NEGHD ऋग्वेदः मं०६। सू० ४१ ।। INDI - (शश्वत्) निरन्तर (ययाथ) प्राप्त हूजिए तथा (सोमपेयम्) पीने योग्य सोमलता के रस को पीने के लिए (उप, प्रो, याहि) समीप प्राप्त हूजिए ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वान् राजा आदि जनो! आप लोग विद्वानों के साथ मेल कर, बुद्धि और बल के बढ़ाने वाले आहार और विहार को कर, परस्पर विचार करके ब्रह्मचर्य आदि से अवस्था को बढ़ायें जिससे सब महाशय प्राप्त होवें ॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। यदिन्द्र दिवि पायें यदृधग्यद्वा स्वे सदने यत्र वासि । अतो नो यज्ञमवसे नियुत्वान्त्सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः॥५॥ पदार्थ:-हे (गिर्वणः) उत्तम शिक्षित वाणी से स्तुति किये गए (इन्द्र) विद्वन् (यत्) जो (पायें) पालन करने योग्य राज्य में (दिवि) कामना करने योग्य में (यत्) जो (ऋधक) यथार्थ और (यत्) जो (वा) वा (स्वे) अपने (सदने) स्थान में (यत्र) जहां (वा) वा आप (मसि) हो (अतः) इस कारण से (नः) हम लोगों के प्रवसे) रक्षण आदि के लिये (नियुत्वान्) नियत करने वाले ईश्वर के सदृश (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवन करने वाले हुए (मरुद्भिः) उत्तम मनुष्यों के साथ (यज्ञम्) सत्कार करने योग्य न्याय व्यवहार की (पाहि) रक्षा कीजिये ॥शा भावार्थ:-हे राजन् ! आपको चाहिये कि सदा ही राज्य का उत्तम प्रकार रक्षण, सत्य का प्रचार और अपने सदृश सब का ज्ञान और ईश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके महाशय धाम्भिक श्रेष्ठ जनों के साथ प्रजा का पालन निरन्तर करें॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, सोम ओषधि, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में चालीसवां सूक्त समाप्त हुश्रा ।। ! अथ पञ्चर्चस्य कचत्वारिंश तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ विराट् त्रिष्टुप् । २।३।४ त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः। ५ भुरिक् पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब पांच' ऋचावाले इकतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४१ ॥
Name
का
a
m
.
.
अहेळ मान उप याहि यज्ञं तुभ्यं पवन्त इन्दवः सुतासः ।
गावो न वजिन्तवमोको अच्छेन्द्रा गहि प्रथमो यजियानाम् ॥१॥
पदार्थ:-हे (बनिन्) शस्त्र और अस्त्र को धारण करने और (इन्द्र
अत्यन्त ऐश्वर्या के देने वाले (यजियानाम्) यज्ञ का पालन करने के योग्यों में (प्रथमः)
पहिला (अहेळमानः) सत्कार किया गया जिस (यज्ञम्) आहार विहार नामक यज्ञ
को (तुभ्यम्) आपके लिये और (सुतासः) उत्पन्न किये गए (इन्दवः) सोमलता
आदि के जल' (पवन्ते) पवित्र करते हैं उसके (उप, याहि) समीप आइये और
(गावः) गौवें (न) जैसे (स्वम्) अपने (प्रोकः) निवास स्थान को वैसे (अच्छ, पा,
गहि) अच्छे प्रकार सब ओर से प्राप्त हूजिये ॥१॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजन् ! प्रजाजनों से उत्तम
गुणों के योग के कारण सब से सत्कार किये गए राज्य के पालन नामक
व्यवहार को यथावत् प्राप्त हूजिये और जैसे गौवें अपने बछड़े और स्थानों
को प्राप्त होती हैं वैसे प्रजा के पालन के लिये विनय को प्राप्त
हूजिये ॥१॥
फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
या ते काकुत्सुकता या वरिष्ठा यया शश्वपिबसि मध्वं अमिम् ।
तयां पाहि प्र ते अध्वर्युरस्थात्सं ते वज्रों वर्त्ततामिन्द्र गव्युः ।।२।।
पदार्थ:-हे (इन्द्र) धर्म के धारण करने वाले मनुष्यों के स्वामिन् (ते)
आपकी (या) जो (सुकृता) सत्य भाषण' आदि उत्तम क्रिया से युक्त और (या)
जो (वरिष्ठा) अतिशय उत्तम (काकुत्) उत्तम प्रकार शिक्षा की गई वाणी (यया)
जिससे आप (मिम्) तरंग को जैसे वैसे (मध्वः) मधुर आदि गुणों से
युक्त
के
रस को (शश्वत्) निरन्तर (पिबसि) पान करते हो और जिससे (ते) आपका
(अध्वयु :) अपने अहिंसारूप व्यवहार की कामना करते हुए अच्छे प्रकार से
(प्र, अस्थात्) स्थित होते हो और जिससे (ते) आपका (बज्रः) शस्त्र और अस्त्रों
का समूह (सम्, वर्तताम्) उत्तम प्रकार वर्तमान होवे (तया) उससे (गन्युः) पृथिवी-
राज्य की इच्छा करने वाले हुए सम्पूर्ण प्रजाओं का (पाहि) पालन करिये ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु-राजा और राजा के सभासद्
उत्तम प्रकार संस्कार की विद्या से युक्त सत्यभाषण से उज्ज्वलित वाणियों
को प्राप्त होकर उन से प्रजापालन आदि व्यवहारों को निरन्तर सिद्ध
29
करें ॥२॥

wa MARA kama ऐश्वर्यों का योग (सतः। ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४१ ।। फिर वे किसके लिये क्या करें इस विषय को कहते हैं । एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूप इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः। एतं पिब हरिवः स्थातरुन यस्येशिंषे प्रदिवि यस्ते अन्नम् ॥३॥ पदार्थ:--हे (हरिवः) अच्छे मनुष्यों से युक्त (स्थात:) स्थित होने वाले (उग्र) तेजस्विन् राजन् (यस्य) जिस (ते) आपका (एषः) यह (अप्सः) दुष्टों का विमोह करना (वृषभः) सुख का वर्षाने वाला (विश्वरूपः) अनेक प्रकार के स्वरूप वाला (सोमः) बड़ी-बड़ी ओषधियों से उत्पन्न हुआ रस (वृष्णे) बल आदि गुण के करने और (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाले के लिये (सम्, अकारि) किया जाता है (यः) जो (प्रदिवि) अच्छे प्रकार सुन्दर व्यवहार में (अन्नम्) भोजन करने योग्य पदार्थ को प्राप्त कराता (एतम्) इस का श्राप (पिब) पान करिये और इसके (ईशिषे) स्वामी हूजिये ॥३॥ भावार्थ:--जिस राजा के अनेक प्रकार के उत्तम प्रबन्ध, उत्तम ओषधियाँ, उत्तम सेना और धार्मिक विद्वान् अधिकारी हैं वही सम्पूर्ण प्रतिष्ठा को प्राप्त होता है ॥३॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । सृतः सोमो अतादिन्द्र वल्यानयं श्रेयोचिकितुषे रणाय । एतं तितिर्व उप याहि यज्ञं तेन विश्वास्तविषीरा पृणव ॥४॥ पसार्थ:--हे (तितिर्व:) शत्रुओं के बल को उल्लङघन करने वाले' (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वयं से युक्त जो (अयम्) यह (चिकितुष) विचार करने को इष्ट (रणाय) संग्राम के लिये (श्रेयान् ) अतिशय कल्याण को प्राप्त (वस्यान्) अतिशय वास करनेवाला (असतात) नहीं उत्पन्न किये गए पदार्थों से (सोमः) बड़े प्रकार प्राप्त होने योग्य के आप (उप, वाहि) समीप प्राप्त हूजिये (तेन) उससे (विश्वाः) सम्पूर्ण (तविषीः) बलयुक्त सेनाओं को (मा, पृणस्व) सब प्रकार से सुखी करिये ॥४॥ भावार्थ:-जो राजा छोटे भी संग्राम के लिये बड़ी सामग्री को इकट्ठी करते हैं वे शत्रुओं को जोतते हुए सम्पूर्ण प्रजात्रों को निरन्तर सुखी करने के योग्य हैं ॥४॥ LA MONDA made JAB ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४२ ॥ tw MEAN 240 Sride फिर वह कैसा हुमा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। हृयामसि त्वेन्द्र याह्याङ ते सोमस्तन्वं भवाति । शतक्रतो मादयस्खा सुतेषु प्रास्माँ अब पृतनासु प्र विक्षु ॥५॥ पदार्थ:-हे (शतक्रतो) असंख्य बुद्धियुक्त तथा उत्तम कर्म करने और इन्द्र) सब प्रकार से रक्षा करने वाले (ते) आपके (लन्वे) शरीर के लिये जो (सोमः) बड़ी ओषधि आदि का रस (अर्वाङ्) नीचे चलने वाला (प्र, भवाति) प्रभाव को प्राप्त होता है उसको पाप (याहि) प्राप्त हूजिये और जिन स्वा) आपको हम लोग (मा, हृयामसि) पुकारते हैं वह भाप (सुतेषु) उत्पन्न हुए ऐश्वर्यों में (अस्मान्) हम लोगों की (प्र अब) उत्तम प्रकार रक्षा करो और (पृतनास) मनुष्यों वा सेनाओं में और (विक्षु) प्रजाओं में (परम्) अच्छे प्रकार (मादयस्वा) आनन्द करो वा प्रानन्द करात्रो॥॥ भावार्थ:--- जो राजा अपने ऐश्वर्य से सम्पूर्ण प्रजानों की न्याय से रक्षा करता है वह प्रशंसित, अधिक अवस्था वाला और आनन्दयुक्त वा आनन्द कराने वाला भी होता है ।।५।। इस सूक्त में इन्द्र, राजा और सोम के रस का गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठ मण्डल में इकतालीसवां सूक्त समाप्त हुआ । awar अथ चतुचस्य द्विचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ स्वराष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः । २ निवृदनुष्टुप् । ३ अनुष्टुप् । ४ भुरिगनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ॥ अब चार ऋचा वाले बयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । प्रत्यौ पिपींपते विश्वानि विदुषै भर । अरंगमाय जग्मयेऽपश्चाद्दध्वने नरें ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वन् राजन् पाप (जग्मये) विज्ञान की अधिकता के लिये (अपश्चादध्वने) उत्तम व्यवहारों में आगे चलने तथा (प्ररङ्गमाय) विद्या के पार जाने और (पिपोषते) पान करने की इच्छा करने वाले (विदुषे) यथार्थवक्ता विद्वान् के लिये और (अस्मै) इस (नरे) अग्रणी मनुष्य के लिए (विश्वानि) सम्पूर्ण उत्तम New RAND

माना
ऋग्वेदः म०.६ । सू० ४२ ॥
वस्तुओं को (भर) धारण करिये और यह भी आपके लिए इनको (प्रति)
धारण करे ॥१॥
भावार्थ:-जो राजा विद्वानों के लिये सम्पूर्ण धन वा सामर्थ्य को
धारण करता है और जो विद्वान् राजा आदि के हित के लिए प्रयत्न करते
वे सर्वदा उन्नत होते हैं ॥१॥
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
एमैनं प्रत्यैतन सोभिः सोमपातमम् ।
अमंत्रेभिर्घजीषिणमिन्द्र मुतेभिरिन्दुभिः ॥२॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो आप लोग (सुतेभिः) उत्पन्न किये गए (सोमेभिः)
ऐश्वर्यो वा मोषधियों के
समूहों से (इन्दुभिः) आनन्दकारक जलों से तथा
(अमभिः) उत्तम पात्रों से (सोमपातमम्) अतिशय सोमरस के पीनेवाले
(ऋजीषिणम्) सरल' धार्मिक जनों की इच्छा करने के स्वभाव वाले (एनम्) इस
(इन्द्रम) ऐश्वथ्य के देनेवाले राजा की (ईम) सब ओर से (भा) सब प्रकार से
(प्रत्येतन) प्रतीनि करिये ॥२॥
भावार्थ:-हे राजा और प्रजाजनो! आप लोग यथार्थवक्ता तथा
राजा आदि विद्वानों में विश्वास करिये और वे आप लोगों में विश्वास करें
इस प्रकार दोनों ओर पानन्द बढ़े ॥२॥
फिर वे परस्पर क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
यी सुतेभिरिन्दुभिः सोमेभिः प्रतिभूषय ।
वेदा विश्वस्य मेधिरो धृषत्तन्तमिदेषते ॥३॥
पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जो जो (विश्वस्य) सम्पूर्ण राज्य का (मेधिरः)
मेल करने और (पाद) दुष्टों का दबाने वाला (आ, ईषते) प्राप्त होता और राजा
के व्यवहार को (वेदा) जानता है (तन्तम्, इत्) उसी उसको (यदी) जो (सुतेभिः)
(प्रतिभूषथ) सुशोभित कीजिये तो यह भी आप लोगों को उत्तम प्रकार शोभित
करे ॥३॥
भावार्थ:-जो उत्तम-उत्तम मनुष्यों का सत्कार करते हैं वे सबको
श्रेष्ठ गुणों से शोभित करते हैं ॥३॥

ऋग्वेदः मं०.६ । सू. ४३ ।। प्रभरा सुतम् । aur फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अस्माअस्मा इदन्धसोऽध्वयों कुवित्समस्य जेन्यस्य शतोऽभिस्तेरवस्परत् ॥४॥ पवार्थ:-हे (अध्वर्यो)नहीं हिंसा करने वाले प्राप (अस्मानस्म) इस इसके लिए (अन्धसः) अन्न आदि के (समस्य) तुल्य' (जेन्यस्य) जीतने योग्य (शर्धतः) बल के और (अभिशस्तेः) चारों ओर से प्रशंसित (कुधित) महान् (सतम्) उत्पन्न किये गए को (प्र, भरा) धारण करिये इससे (इव) ही हम लोगों का प्राप अवस्परत) पालन करते हैं ॥४॥ भावार्थ:- जो विद्वान् सब के लिये सम्पूर्ण उत्तम पदार्थों को समर्पित करते हैं और जितने सामर्थ्य का धारण करते हैं उतना सब औरों के रक्षण के लिए करते हैं उस सब को भाग्यशाली गिनना चाहिये ॥४॥ इस सूक्त में इन्द्र , राजा, विद्वान् और प्रजा के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह छठे मण्डल में बयालीसवां सूरत समाप्त हुआ। । अथ चतुऋचस्य त्रिचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता ।१।२।३।४ उष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः ।। अब चार ऋचा वाले तेंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। यस्य त्यच्छम्बरं मई दिवोदासाय रन्धयः। अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिवं ॥१॥ पदार्थ:- है (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्या के प्राप्त कराने वाले (सः) वह (अयम्) यह (सोमः) बुद्धि और बल' का बढ़ाने वाला रस (ते) आपके लिए (सुतः) उत्पन्न किया गया है उसका आप (पिब) पान करिये और (शम्बरम्) मेघ को सूर्य जैसे वैसे (मदे) आनन्दकारक (दिवोदासाय) विज्ञान के देनेवाले के लिये दुःख के देने वाले दुष्ट का (रन्धयः) नाश करिये और यस्य) जिसकी कुकर्म के अनुष्ठान में इच्छा होवे (त्यत्) उसका नाश करिये ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे राजा आदि जनो! आप धाम्मिक जनों को पीड़ा देने वाले मनुष्यों को यथावत् दण्ड दीजिये और - MEIN . NMENT मेघ के (अन्तः) मध्य में (हळ हाः) दृढ़ (गा:) किरणों को मिले। ऋग्वेदः मं०६। सू०४३ ।। वैद्यकशास्त्र में कही हुई रीति से बड़ी ओषधियों के रस को निकाल कर उसका सेवन कर रोगरहित होकर सम्पूर्ण प्रजामों को रोगरहित करिये ॥१॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । यस्य तीव्रसुतं मदं मध्यमन्त च रक्षसे । अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिबं ॥२॥ पदार्थः --- हे (इन्द्र) बल के देने वाले (यस्य) जिसके (तीनसतम्) तेजस्वियों से कर्मोद्वारा उत्पन्न किये (मदम्) आनन्द के देने वाले (मध्यम्) मध्य में हुए (अन्तम् ) और अन्त में वर्तमान की (च) भी (रक से) रक्षा करते हो (स:) वह (प्रयम्) यह (सोमः) उत्तम पोषधियों का रस (ते) आपके लिए (सुतः) उत्पन्न किया उसका आप (पिब) पान करिये ।।२।। भावार्थ:- हे विद्यायुक्त राजन् ! आप वैसी ही ओषधियों को प्रकट करिये जिन से सब का सुख बड़े ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यस्थ गा अन्तरश्मनो मर्दै हळ्हा अवाजः । अयं स सोमं इन्द्र ते सुतः पिबं ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सम्पूर्ण रोगों के नाश करने वाले (यस्य) जिस (अश्मनः) (प्रवासृजः) उत्पन्न करता है उसके सम्बन्ध से (सः) वह (अयम्) यह (सोमः) रोगों को नाश करने वाला प्रोषधियों का रस (ते) आपके लिये (सुतः) निर्माण किया गया उसको श्राप (पिब) पीजिये ।।३।। भावार्थ:-हे विद्वानो ! जिसके परमाणु मेघमंडल में भी वर्तमान हैं ओषधियों से उसका निर्माण वैद्यक रीति से कर और उसका सेवन करके रोगरहित हूजिये ॥३॥ फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं । यस्य॑ मन्दानो अन्धसो माघनं दधिषे शवः । अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिबं ॥४॥ पदार्थः-हे (इन्द्र) वैद्यराज ! (यस्य) जिस (अन्धसः) अन्न प्रादि की IN ऋग्वेदः मं०६। सू० ४४ ।। ५१७ (मन्दान:) स्तुति करते हुए पाप (माधोनम्) बहुधनयुक्त को और (शवः) बल का हेतु उसको (दधिषे) धारण करते हो (सः) वह (अयम् ) यह (सोमः) ऐश्वर्या करनेवाला रस (ते) आपके लिये (सत:) उत्पन्न किया गया उसको आप (पिब) पीजिये ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिससे बल, बुद्धि और सुख बढ़ें उसी रस और अन्न का निरन्तर सेवन करो॥४॥ इस सूक्त में इन्द्र, सोम और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में तेंतालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। . r अथ चतुर्विशत्यूचस्य चतुश्चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य शंयुर्हिस्पत्य ऋषिः । इन्द्रो देवता । १।३। ४ निचूदनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः । २।५ स्वराड- ष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः । ६ प्रासुरी पङ्क्तिः । ७ भरिपङ्क्तिः । ८ निवृत्पंक्तिः । ६ । १२ । १६ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः।१०। ११ । १३ । २२ विराट- त्रिष्टुप् । १४ । १५ । १७ । १६ । २० । २४ निचत्रिष्टुप् । १६ । २१ । २३ त्रिष्टुप छन्दः । धैवतः स्वरः॥ अब चौबीस ऋचा वाले चवालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा आदि को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यो रयिवो रयिन्तमो यो घुम्नैर्युम्नवतमः । सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः ॥१॥ पदार्थ:-हे (स्वधापते) अन्न के स्वामिन् (रयियः) अच्छे धनों वाले (इन्द्र) धन के धारण करने वाले (यः) जो (रयिन्तमः) अत्यन्त धनाढय और (यः) जो (घुम्न:) धनों वा यशों से (ध म्नवत्तमः) अत्यन्त यशोधन युक्त (सुतः) निर्माण किया गया (सोमः) ऐश्वर्य (मदः) प्रानन्द देने वाला (ते) आपका (अस्ति) है (स:) वह पापसे सत्कार करके स्वीकार करने योग्य है ॥१॥ भावार्थ:-हे राजा आदि जनो ! आप लोगों को चाहिए कि अपने राज्य में बहुत धनाढ्य विद्वानों का सत्कार करके रक्षा करें जिससे निरन्तर लक्ष्मी बढ़े ॥१॥ a ऋग्वेदः मं०६। सू० ४४ ॥ SAND PAL फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । यः शम्मस्तुविशम्म ते रायो दामा मतीनाम् । सोमः मृतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापत मदः ॥२॥ पदार्थ:-हे (तुविशग्म) अनेक प्रकार के सुखों वाले (स्वधापते) अन्न प्रादिकों के स्वामिन् (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्या से युक्त (यः) जो (ते) आपका (शग्मः) सुखयुक्त (रायः) धनों को (मतीनाम्) विचारशीलों को (दामा) देने योग्य (सुतः) उत्पन्न किया गया (मदः) आनन्दकारक (सोमः) ऐश्वर्यों का समूह (अस्ति) है (सः) वह (ते) प्रापके धर्म की कीर्ति करने वाला हो ॥२॥ भावार्थ:-जो मनुष्य धन आदि ऐश्वर्य से धर्म और विद्या की उन्नति करते हैं वे ही बहुत सुख और धन वाले होते हैं ।।२।। फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । येनं वृद्धो न शवसा तुरो न खाभिरूतिभिः । सोमः सुतः स ईन्द्र तेऽस्ति स्वधापतै मदः ॥३॥ पदार्थः-- हे (स्वधापते) अपने पदार्थों के धारण करने वाले (इन्द्र) राजन् आप (येन) जिस ऐश्वर्य से और (शबसा) बल से (वृद्धः) वृद्ध (न) जैसे वैसे वा (तरः) हिंसक (न) जैसे वैसे (स्वाभिः) अपनी (ऊतिभिः) रक्षाओं से (मदः) भानन्द दोनेवाला (सः) वह (सोमः)- ओषधियों का रस (सुतः) उत्पन्न किया गया ले) पापका (अस्ति) है उसको आप वृद्धि कीजिये ॥३॥ भावार्थः -- हे मनुष्यो ! जिस पुरुषार्थ से विद्वान् होकर युवा भी वृद्ध होते हैं उसको निरन्तर संचित कीजिए अर्थात् संग्रह कीजिए॥३॥ फिर मनुष्यों को किसकी स्तुति करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। त्यमुवी अमहण गृणीचे शवसस्पतिम् । इन्द्र विश्वासाई नरं मंहिष्ठं विश्वचर्षणिम् ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो मैं (य:) आप लोगों और (त्यम्) उसको (3) वितर्क- पूर्वक (अप्रहणम् ) अन्याय से नहीं किसी को मारने वाले (शवसः) सेना के (पतिम्) स्वामी (विश्वासाहम् : संपूर्ण शत्रुओं की सेनाओं को सहने वाले (मंहिष्ठम्) अत्यन्त महान् और (विश्वचर्षणिम्) धार्मिक मनुष्य काम देखने वाले जिसके उस (नरम्) अग्रणी (इन्द्रम) दुष्टाचार शत्रुओं के विनाशक मनुष्य की (गणी) प्रशंसा करता हूं जिसकी आप स्तुति करते हो ॥४॥ AAVAT ENA ऋग्वेदः मं०६। सू०४४ ॥ ५१६ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोगों को उसकी प्रशंसा करनी चाहिए जो नित्य न्यायकारी, सबका सहने वाला, महाशय, युद्ध आदि राजकम्मों में निपुण, दुष्टों का विदारक, दृढ़ उत्साही, मनुष्य होवे ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।। यं वर्धयन्तीगिरः पर्तिन्तुरस्य राधसः । तमिन्न्यस्य रोदसी देवी शुष्मं सपर्यतः ।।५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (यम्) जिस (तुरस्य) दुःख के नाश करने वाले (राधसः) धन के (पतिम्) स्वामी ऐश्वर्या से युक्त को (इत) ही (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियां (वर्धयन्ति) बढ़ाती हैं और (अस्य) इसके (देवी) सुन्दर प्रकाशमान (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी (शुष्मम्) बल का (नु) शीघ्र (सपर्यतः) सेवन करते हैं (तम् इत्) उसी की आप लोग वृद्धि करके सेवा करो।शा भावार्थ:-जो मनुष्य श्रेष्ठ गुण कर्म और स्वभावों में वृद्धि को प्राप्त जन की वृद्धि करते हैं वे पञ्चतत्त्वमय राज्य का भोग करते हैं ॥५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। तद्वं उक्थस्य बहणेन्द्रायोपस्तृणीपणि । विपो न यस्योतयो वि यद्रोहन्ति सक्षितः ॥६॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो (यस्य) जिसके (सक्षित:) तुल्यनिवास और (ऊतयः) रक्षण आदि कर्म (विपः) बुद्धिमान् जन (न) जैसे वैसे (यत) जिसको (वि) विशेष करके (रोहन्ति) जमाते हैं (तत्) उसको (व:) आप लोगों के (उक्थस्य) प्रशंसित कर्म के (बहणा) बढ़ाने से (इन्द्राय) अत्यन्त एश्वयं के लिए (उपस्तृणीषणि) ढाँपने योग्य को हम लोग बढ़ावें ॥६॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जो विद्वानों के सदृश प्रजा के रक्षण से ऐश्वर्या को बढ़ाते हैं वे सब प्रकार से बढ़ते हैं ॥६॥ फिर राजा क्या करके क्या करे इस विषय को कहते हैं। अविदद्दा मित्रो नदीयान्पपानो देवेभ्यो वस्यों अचैत् । ससवान्त्स्तौलाभिधोतरीभिरुरुष्या पायुरभवत्सखिभ्यः ॥७॥ पदार्थः- हे राजन् जो (नवीयान्) अतिशय थोड़ी अवस्था वाला ((पपानः) पालन करता हुआ (मित्रः) सब का मित्र (ससवान्) अच्छे अन्न वाला (पायुः) रक्षक - A- HER - , tela MAN ५२० ऋषवैदः म०६। सू० ४४ ।। हुश्रा (स्तोलाभिः) स्थूल में हुई (धोतरीभिः) शत्रुओं को कम्पाने वाली सेनाओं से (देवेभ्यः) विद्वानों के और (सखिभ्यः) मित्रों के लिए (वस्यः) अत्यन्त वास का कारण (अचैत) बटोरे और (उरुष्या) रक्षा करे और सब का मित्र (अभवत्) हो वह अतुल (दक्षम्) बल' को (अविदत) पाता है ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सब का मित्र, युवा, धन धान्य आदि से युक्त, सब का रक्षक, बड़ी सेनावाला, विद्वान् राजा होवे वही धाम्मिकों के रक्षण के लिए सत्य बल को प्राप्त होवे ॥७॥ अब मनुष्यों को कैसा बर्ताव करके क्या प्राप्त करके क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं। ऋतस्य पथि धा अपायि श्रिये मनांसि देवासों अक्रन् । दर्धानो नाम महो वचौमिर्वपुर्दशय वेन्यो व्यावः ॥८॥ पदार्थः- हे मनुष्यो जैसे (बेधा:) बुद्धिमान् (ऋतस्य) सत्य के (पथि) मार्ग में (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (अपायि) रक्षा करता है और (देवास:) विद्वान् जन (मनांसि) मनों को (अक्रन्) करते हैं और (बचोभिः) वचनों से (महः) कीति के योग से बड़ी (नाम) प्रसिद्धि को (दृशये) दिखाने के लिए (वपुः) अच्छे रूपवाले शरीर को (दधानः) धारण करता (वेन्यः) सुन्दर होता और (वि, प्राय:) रक्षा करता है वैसे आप लोग भी यत्ल करो। भावार्थः----इस मन्त्र में वाचकलु०- मनुष्यों को चाहिए कि सर्वदा धर्ममार्ग में चलकर धन की उन्नति के लिए मनों को निश्चित करें और धन से प्राप्त हुए धन से अनाथों का पालन, विद्या और धन की वृद्धि तथा औषधदान और मार्गशुद्धि करके सब दिशाओं में प्रशंसा विस्तारें॥८॥ अब राजा और प्रजाजन परस्पर का हित कैसे करें इस विषय को कहते हैं । धुमत्तमं दस धेह्यस्मे सेवा जनानां पूर्वीररांतीः । वर्षों की दयः कृणुहि शचीमिर्धनस्य स तावस्माँ अविड्ढि ॥९॥ पदार्थ:- हे राजन् पाप (शचीभिः) बुद्धियों का कर्मों का प्रजाओं के साथ (अस्मे) हम लोगों में (द्य मत्तमम्) प्रशंसित अत्यन्त विद्या के प्रकाश से युक्त (वक्षम्) बल को (धेहि) धारण करिये और कार्य को (सेधा) सिद्ध कीजिये और (जनानाम्) मनुष्यों की (पूर्वी:) प्राचीन (अरातीः) नहीं दान करने की क्रियाओं को दूर कीजिए तथा (वर्षीयः) अतिशय श्रेष्ठ (वयः) सुन्दर अवस्था को (कृणुहि) करिये और amang - ऋग्वेदः मं०६ । सू०४४ ।। ५२१ लोगों का : (धनस्य) धन के (सातो) संविभाग में (अस्मान्) हम (अविदि) प्रवेश कराइए ॥६ भावार्थ:--- प्रजाजनों को राजा की ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए कि हे राजन् ! पाप जो हम लोगों को बलयुक्त, कृपणता से रहित और ब्रह्मचर्य आदि से दीर्घ अवस्था वाले पुरुषार्थी और सब प्रकार से रक्षा करके भयरहित करके धर्म अर्थ काम और मोक्ष के साधन में प्रवेश कराइए तो आपकी हम लोग सर्वदा वृद्धि करें ।।६।। अब राजा और प्रजाजन परस्पर कहां प्रेरणा करें इस विषय को कहते हैं । इन्द्र तुभ्ममिन्मघवन्नभूम वयं दात्रे हरिवो मा वि वेनः । नकिरापिदैशे मयंत्रा किमंग रंध्रचोदनं त्याहुः ॥१०॥ पदार्थ:-- हे (अंग) अंग के तुल्य वर्तमान (हरिवः) प्रशंसित मनुष्यों से और (मघवन्) बहुत धनों से युक्त (इन्द्र) पूर्णविद्या वाले राजन् (दा) दान करने के स्वभाव वाले (तुभ्यम्) आपके लिए (इद) ही देने वाले (वयम्) हम लोग (प्रभूम) होवें आप हम लोगों की (मा) मत (वि, वैन वेनः) कामना करिये और (प्रापिः) व्याप्त होने वाला हुआ मैं आपको विरुद्ध दृष्टि से (नकिः) नहीं (ददृशे) देखता हूं तथा (मस्यंत्रा) मनुष्यों में प्राप (किम् ) किस की इच्छा करते हो जिससे (रध्रचोदनम्) धन की प्राप्ति के लिए प्रेरणा करने वाले प्रापको विद्वान् जन (आहुः) कहते हैं इससे हम लोग आपका प्राश्रयण करें ॥१०॥ भावार्थ:-हे राजा और प्रजा जनो! जैसे आप लोग आपस के लिए धन प्रादि से और सुख दान से सबको श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरणा करें वैसे मिल के सत्य न्यायपालन का अनुष्ठान करें ॥१०॥ मनुष्यों को क्या नहीं करके क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । मा जखने वृषभ नो रीथा मा ते रेवतः सख्ये रिपाम । पूर्वीष्टं इन्द्र निषिधो जनेषु जासुष्वीन्त्र वृहापूणतः ॥११॥ पवार्थ:-है (वृषभ) बलयुक्त (इन्द्र) दुःखों के नाश करने वाले राजन् प्राप (जस्वने) अन्याय' से दूसरे के धन को अन्यत्र प्राप्त कराने वाले दुष्ट राजा के लिए (नः) हम लोगों को (मा) मत (ररीथाः) दीजिये और हम लोग (ते) आप रेशतः) बहुत धन वाले के (सख्ये) भित्रपने के लिए (मा) नहीं (रिषाम) क्रुद्ध होवें और जो (ते) आपके (जनेषु) मनुष्यों में (पूर्वीः) प्राचीन (निःषिधः) सुखकारक क्रियायें हैं ५२२ ऋग्वेदः मं०६ । सू०४४॥ + walysia Wate 7 उनको दीजिये (असम्वीन्) उत्पत्ति के नहीं करने वालों का (जहि) त्याग करिए और (अपूणतः) दुःख के देने वाले दुर्जन से हम लोगों को (प्र, बृह) पृथक् करिये ॥११॥ भावार्थ: राजन् ! जो हम लोगों को पीड़ा देवें उनके प्राधीन मत करिए और कल्याण में क्रियाओं को प्राप्त कराइए वैसे हम लोग भी इस सब को आपके लिए करें इस प्रकार मित्र होकर अभीष्ट मनोरथों को हम सब लोग प्राप्त होवें ॥११॥ फिर वह राजा किसके सदृश क्या करे इस विषय को कहते हैं। उदभ्राणीव स्तनयन्त्रिपतींन्द्रोराधास्पश्व्यानि गव्यां । त्वमसि प्रदिवः कारुधाया मा त्वादामान आ दभन्मघोनः ॥१२॥ पदार्थ:-है राजन् जिससे (स्तनयम्) शब्द करता हुआ (कारुधायाः) विद्वान् शिली जनों का धारण करने वाला (इन्द्रः) बिजुली के सदृश वा (अभ्राणीद) वायु के दलों के सदृश (अश्व्यानि) घोड़ों में हितकारक (गव्या) गौनों में हितकारका (राधांसि) सम्पूर्ण सुखों के करने वाले धनों को (उद) भी (हत्ति) प्राप्त होता है और (प्रविवः) अत्यन्त सुन्दर (मघोनः) धन से युक्त जनों को वह ग्रहण करने वाला है और (प्रदामान:) प्रदाता जन (त्वा) आपकी (मा) मेरी (मा, दभन्) हिंसा करें और धन से युक्त जनों की मत हिसा करें वैसे (त्वम्। आप जो कर चुके (मसि) हैं तो आप में कौन नम्र होता है ॥१२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.-जिस की मेघों की घटाओं के समान बलवती सेना, बिजुली के समान पराक्रमयुक्त वर्तमान है और जिससे सब गुणी संग्रह किये जाते हैं वही धन धान्य राज्य और पशु आदि पदार्थों को प्राप्त होता है ॥१२॥ कौन इस पृथिवी पर राजा होने के योग्य है इस विषय को कहते हैं । अध्वयों वीर प्र महे सुतानामिन्द्रीय भर स ह्यस्य राजा । या पामिरुत नूतनाभिःभिवावधे गूणतामृषीणाम् ॥१३॥ पदार्थ:-हे (अध्वयों) नहीं हिंसा करने वाले' (वीर) दुष्टों की हिंसा करने वाले (यः) जो (राजा) राजा (गृणताम) प्रशंसा करने वाले (ऋषीणाम्) मन्त्रों के अर्थ जानने वालों की(पूाभिः) पूर्व जनों से सेवित (उत) भी (नूतनाभिः) नवीन वर्तमान (गीभिः) वाणियों से (वावधे) वृद्धि को प्राप्त होता है (सः, हि) वही (अस्य) इस राज्य' का राजा होने को योग्य हो वैसे आप (सतानाम्) उत्पन्न une शत्रुओं को (हन्ता) मारने (यज्ञम्) श्रेष्ठ क्रियास्वरूप व्यवहार ऋग्वेदः मं०६। सू०४४ ।। हुए पदार्थों के (महे) बड़ें (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य के लिए इनको (प्र, भर) धारण करिये ॥१३॥ भावार्थ:---वही राज्यपालन करने और बढ़ाने को समर्थ होता है जो यथार्थ वक्ताओं के सहित, उत्तम प्रकार शिक्षित और न्यायेश होवे और वही विद्वान् होता है जो शिष्ट जनों से नित्य उपदेश सुनता है ।।१३।। फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। अस्य मदें पुरु वीसि विद्वानिन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघान । तमु प हॉषि मधुमन्तमसमै सोम वीरायं शिपिणे पिबध्यै ।।१४।। पदार्थ:-जो (विद्वान्) विद्यायुक्त जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य (वृत्राणि) मेयों (अधान) नाश करता है वैसे (अस्य) इस ओषधियों के समूह के (मदे) आनन्द- कारक रस में (अप्रती) नहीं विश्वास किये गए (पुरु) बहुत (वासि) सुन्दर रूपों का निर्माण करके स्वीकार करे (तम्) उसके प्रति (उ) भी (मधुमन्तम्) मधुर आदि गुणों से युक्त द्रव्य के साथ (सोमम्) बड़ी प्रोषधियों के रस को (अस्म) इस (शिप्रिणे) उत्तम ठुड्ढी और नासिका वाले (बीराय) भयरहित जन के लिये (पिबध्य) पीने को आप (प्र, होषि) देते हो इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - जो सूर्य के सदृश न्याय और विजय के प्रकाशक, युक्त आहार और विहार वाले और महौषधियों के रस को पीने वाले हैं वे अनेक प्रकार के पदार्थों को प्राप्त होकर इस जगत् आनन्द करते हैं ॥१४॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं हन्ता वृत्र वण मन्दसानः । गन्ता यज्ञं घरावतश्चिदच्छा वसु(नामवितो कारुधायाः ॥१५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्या का देने वाला (सुतम्) उत्पन्न हुए (सोम) मोषधिरस को (पाता) पान करनेवाला (बजे ण) शस्त्र और अस्त्रों के समूह से (मन्दसान:) कामना करता हुआ (वृत्रम्) मेघ को सूर्य जैसे से होने (पराषतः) दूर देश से (चित्र) भी (कारुषायाः) शिल्पी जनों का धारण करने वाला और (वसः) वसाने वाला होता हुआ (पीनाम्) उत्तम कर्मों की (अच्छा) अच्छे प्रकार (अविता) रक्षा करने वाला है वह अत्यन्त ऐश्वयं से युक्त (मस्तु) हो उसका आप लोग निरन्तर सत्कार करो ॥१॥ - में ५२४ ऋग्वेदः मं०६ । सू०४४ ।। Media 4 AND M भावार्थ:-जो राजा आदि मनुष्य वैद्यक शास्त्र की रीति से उत्पन्न किये ओषधियों के रस को पीते हैं तथा शस्त्र और अस्त्र की विद्या से दुष्टों का निवारण करके न्यायप्रचार नामक कर्म का प्रचार करके सत्. कर्म के करने और शिल्पविद्या के जानने वालों को सङ्ग्रह करके आलस्य का त्याग करके श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त होते वे ही यहां प्रशंसनीय होते हैं ॥१५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । इदं त्यत्वात्रमिन्द्रपानमिन्द्रस्य प्रियममृतमपापि । मत्सधा सौमनसायं देवं व्य१ स्मद् द्वेषो युयवद्वयंहः ॥१६॥ पदार्थ:-हे विद्वन् आप (सौमनसाय) अच्छे मन के होने के लिये (यथा) जैसे (इदम्) इस (स्वत) उस (इन्द्रपानम्) ओषधियों के रस वा ऐश्वर्य के पान वा रक्षरण को (इन्द्रस्य) इन्द्रियों के स्वामी जीव के (प्रियम् ) प्रीतिकारक (अमृतम्) अच्छे प्रकार स्वादिष्ट (पात्रम्) जिससे पान करता वा रक्षा करता है उसको (अपायि) पीता है । और जिससे (मत्सत) आनन्दित होता है तथा (देवम् ) श्रेष्ठगुण- कर्मयुक्त वस्तु का पान करता है और (अस्मत) हम लोगों से द्वषः) द्वष आदि से युक्त कर्म वा शत्रु को (वि, युपवत) वियुक्त करता है और हम लोगों से (अंहः) पापाचरण को (वि) पृथक् करता है वैसा आचरण करो ॥१६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं-हे मनुष्यो! जिससे मन में प्रमाद और द्वष न होवे उसी का पान करना चाहिये और जैसे अपने आत्मा की सब रक्षा करते हैं वैसे अन्य सभी की रक्षा करें॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। एना मन्दानो जहि शुर शत्रजामिमजामि मघवन्नमित्रान् । अभिषेणा अभ्या३ देदिशानान्परांच इन्द्र प्र मृणा जही च ॥१७॥ पदार्थ:-हे (धुर) दुष्टों को मारने वाले (मघवन्) बहुत धनों से युक्त (इन्द्र) दुष्टों के विदारक आप (एना) इससे (मन्दानः) प्रशंसित हुए (जामिम्) जवांई आदि को (अजामिम्) दूसरी सम्बन्ध रहित को (शत्रून) धर्म के विरोधियों (अमित्रान्) मित्रभाव रहित वैरियों का (जहि) त्याग करो (अभिषेणान्) सन्मुख सेना जिनकी उन (मादेविशालान्) अत्यन्त आज्ञा करने वाले (पराच:) पश्चिम की ओर अर्थात् पीछे मुख किये हुओं की (अभि, प्र, मृणा) बाधा करो (च) और अविद्या आदि दोषों का (जहि) त्याग करो ॥१७॥ बन् Pawa Pare ! BY- 05 के ) किरणों के सदृश विजय सुख के बर्षाने वाले तेजस्वी (प्रत्याः) बलकारक (मदाय) आनन्द के लिए ऋग्वेदः म०६ । सू० ४४॥ ५२५ भावार्थ:-हे राजन् सेना के स्वामिन् ! आप ब्रह्मचर्य और सोमलता के रस के पान आदि के स्वयं आनन्दित हुए वीरों को प्रानन्द देकर सम्पूर्ण शत्रुओं को जीतो ॥१७॥ फिर राजा और प्रजाजनों को निरन्तर क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । आसुष्मा णो मघवनिन्द्र पृत्व ? स्मभ्यं महि वरिवः सुगं को। अपां तोकस्य तनयस्य जेष इन्द्र सूरीन् कृणुहि स्मा नो अर्द्धम् ॥१८॥ पदार्थ:-हे (मघवन् ) बहुत धन से युक्त (इन्द्र) दुष्टों के मारने वाले आप (पास) इन (पृत्सु) वीर मनुष्यों की सेनाओं में (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (महि) बड़े (सुगम् ) उत्तम प्रकार चलते हैं जिसमें उस (वरिवः) सेवन को (क:) करें (नः) हम लोगों को (स्मा) ही विजयी करें और है (इन्द्र) सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के देने वाले पाप (अपाम्) प्राणों के (तोकस्य) शीघ्र उत्पन्न हुए अपत्य के और (तनयस्य) सुकुमार के बोध के लिये और शत्रुओं को (जेषे) जीतने के लिए (नः) हम लोगों को (सूरीन्) युद्ध विद्या में कुशल विद्वान् और (अर्द्धम्) अच्छे प्रकार समृद्धि को (स्मा) ही (कृणुहि) करिये ॥१८॥ भावार्थ:---राजा वैसा यत्न करे जैसे अपनी सेनायें उत्तम प्रकार शिक्षित जीतने वाली और बलयुक्त होवें और सम्पूर्ण बालक और कन्यायें ब्रह्मचर्य से विद्यायुक्त होकर समृद्धि को प्राप्त हुए सत्य न्याय और धर्म का निरन्तर सेवन करें ॥१८॥ फिर राजा और मन्त्रीजन कैसे होवें इस विषय को कहते हैं । आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः । अस्मत्राञ्चो वृषणो वजवाहो वृष्णे मदाय सुयुजो वहन्तु ।।१९।। पदार्थ:--हे. अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् जैसे (वृषणः) बलयुक्त (युजानाः) जिनके सावधान प्रात्मा और (वृषरथासः) बलयुक्त सेना के अंग जिन सम्पूर्ण श्रेष्ठगुण और कम्मों में व्यापी (अस्मत्राञ्च:) शत्रुओं से हम लोगों की रक्षा करने वालों को प्राप्त होने और (वृषणः) शत्रुशक्ति के रोकनेवाले (वजवाहः) शस्त्र और अस्त्रों की विद्या को धारण करने तथा (सयुजः) उत्तम प्रकार युक्त होने वा युक्त कराने वाले (हरयः) उत्तम प्रकार शिक्षित घोड़ों के सदृश मनुष्य (वृष्णे) करावें वैसे इनको आप प्रीति से (आ) प्राप्त हूजिये ॥१६॥ appa o 0 ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४४ ।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु -राजा को चाहिये कि उत्तम प्रकार परीक्षा करके उत्तम गुण कर्मा और स्वभाव वाले मनुष्यों को राज्य कर्मा के अधिकारों में नियुक्त करे तथा आप भी श्रेष्ठ गुण कर्म और स्वभाव वाला हावे ॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । आ ते नृपन् वृषणो द्रोणमस्र्घतपषो नोर्मयो मदन्तः । इन्द्र प्र तुभ्यं वृषभिः सुतानां वृष्णे भरन्ति वृषभाय सोमम् ॥२०॥ पदार्थ:-हे (वृषन्) बल से युक्त (इन्द्रः) सम्पूर्ण ऐश्वर्यों से सम्पन्न जो (ते) आपके (वृषणः) बलिष्ठ (घृतप्रुषः) जल' को पूर्ण करने वाले (ऊम्मयः) समुद्र आदि के जल के तरंग (न) जैसे वैसे आपको (मदन्तः) आनन्द देते हुए (वृषभिः) बलिष्ठ वैद्यों से (सुतानाम्) उत्पन्न किये हुए (सोमन्) बड़ी ओषधियों के रस को (घृष्णे) बल के और (वृषभाय) बल की इच्छा करने वाले (तुभ्यम्) आपके लिए (प्र, भरन्ति) अच्छे प्रकार धारण करते हैं तया (कोणम्) जाते हैं जिस विमान आदि वाहन से उस पर (प्रा) सब प्रकार से (अस्थुः) स्थित होते हैं उनको प्राप प्रसन्न करिये ॥२०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं.--हे राजन् ! जो सत्यभाव से आपके राज्य के हित करने की इच्छा करते हैं उनको आप सुखी रखिये और जैसे वायु से जल के तरंग उठते हैं वैसे ही सत्संग से बुद्धियाँ बढ़ती हैं ऐसा जानो ॥२०॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं। वृषासि दिवो Bषभः पृथिव्या वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम् । वृष्णे त इन्दुषभ पीपाय स्वादू रसे मधुपेयो वरीय ॥२१॥ पदार्थ:- हे (वृषभ) शत्रुओं के सामर्थ्य के प्रतिबंधक एश्वर्य से युक्त जिससे आप (दिवः) सूर्य के (वृषभः) बलिष्ठ और श्रेष्ठ (पृथिव्याः) भूमि से (वृषा) बर्षाने वाले और (सिन्धूनाम्) नदियों वा समुद्रों के (वृषा) वर्षान वाले और (स्तियानाम् ) मिले हुए नहीं चलने और चलने वाले प्राणी और अप्राणियों के (वृषभः) अत्यन्त करने वाले (असि) हैं (ते) पाप (वराय) उत्तम (वृष्णे) सुख के वर्षाने वाले के लिए (पीपाय) पान को (स्थादुः) स्वादु से युक्त , इन्दुः, रसः) सोमलता का रस (मधुपेयः] सहत के साथ पीने योग्य हो ॥२१॥ Na ऋग्वेदः मं०६ । सू०४४ ॥ ५२७ ! भावार्थ:-हे राजन् ! जो आप बिजुली, भूमि, नदी, समुद्र, अन्त- रिक्ष, स्थावर और जंगम पदार्थों की विद्या और उपयोग को जानिये तो आपको बड़ा आनन्द प्राप्त होवे ॥२१॥ फिर वह राजा किसका सत्कार करे इस विषय को कहते हैं । अयं देवः सहसा जायमान इन्द्रेण युजा पणिमस्तमायत् । अयं स्वस्य पितुरायुधानीन्दुरमुष्णादर्शिवस्थ मायाः ॥२२॥ पदार्थः - हे राजन् जो (अयम्) यह (इन्द्रेण) अत्यन्त ऐश्वर्य से (युजा) युक्त होने वाले राजा से (सहसा) बल से (जायमानः) उत्पन्न हुप्रा देवः) श्रेष्ठ गुणवाला विद्वान् (पणिम्). स्तुति करनेयोग्य व्यवहार को (अस्तभायत्) स्थिर करता है और जो (अयम्) यह (इन्दुः) आनन्दकारक (स्वस्य) अपने (पिसुः) पिता के (प्रायुधानि) शस्त्र और अस्त्रों को स्थिर करता है और (अशिवस्य) अमंगल की (मायाः) बुद्धियों को (अमुष्णात) चुराता है उसका आप गुरु के सदृश सत्कार करिये ॥२२॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो धर्मयुक्त व्यवहार को स्वयं करके सर्वत्र प्रचार करते हैं और युद्धविद्या में और उपदेश में कुशल हुए अमंगल का सब प्रकार नाश करके कल्याण को उत्पन्न करते हैं वे आपसे सत्कार को प्राप्त हों।॥२२॥ फिर विद्वान् कैसे होवें इस विषय को कहते हैं । अयमंकणोदुपसः सुपत्नीरव सूर्य अदधाज्ज्योतिरन्तः । अयं त्रिधातुं दिवि रोचनेषू त्रितेषु विन्ददमृतं निगूल्हम् ॥२३॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जैसे (अयम्) यह सूर्य (उषसः) प्रातःकाल- बेलामों को (सपत्नीः) सुन्दर भार्यानों के सदृश (अकृणोद) करता है वैसे एक स्त्री के ग्रहणरूप व्रतधारी आप लोग हों और जैसे (अयम्) यह परमात्मा (सूर्य) सूर्य के (अन्तः) मध्य में (ज्योतिः) प्रकाश को (अदधात्) धारण करता हैं वैसे आत्माओं में विद्या के प्रकाश को धारण करिये और जैसे (अयम्) यह ईश्वर (दिवि) प्रकाश में (त्रितेष) प्रसिद्ध बिजुली और सूर्य में (रोचमानेषु) प्रकाशमानों में (अमृतम्) नाश से रहित (निगळ हम्) अत्यन्त लुप्त अतीन्द्रिय (विधात) सत्व रज और तमःस्वरूप जगत् को (विन्दत) प्राप्त होता है वैसे प्रकृति आदि जगत को जानिये ॥२३॥ - ऋग्वेदः मं०६ । सू०४५ ॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जो इस जगत् में विवाहित एक स्त्री के ग्रहणरूप व्रतधारी, विद्या और अविद्या के प्रकाशक, कार्य कारण स्वरूप गुप्त पदार्थों की विद्या के जानने वाले होवें वे सूर्य, ईश्वर और यथार्थवक्ता जन के सदृश मन्तव्य होवें ॥२३॥ विद्वान् जन ईश्वर के सदृश वर्तमान करें इस विषय को कहते हैं। अयं द्यावापृथिवी वि ष्कभायदयं रथमयुनक् सप्तरश्मिम् । अयं गोषु शच्या पक्वमन्तः सोमो दाधार दर्शयन्त्रमुत्सम् ॥२४॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जैसे (अयम्) यह ईश्वर (द्यावापृथिवी) प्रकाश और भूमि को (वि) विशेष करके (स्कभायत्) धारण करता है और (अयम्) यह मब को धारण करने वाला ईश्वर (सप्तरश्मिम् ) सात प्रकार की विद्यारूप किरणें जिसमें उस (रथम्) सुन्दर सूर्य्यलोक को (अयुनक) युक्त करता है और (अयम्) यह धारण और नहीं धारण करने वाला परमात्मा (सोमः) सब जगत् करने वाला (शच्या) सत्य कर्म से (गोषु) पृथिवियों वा धेनु आदि के (अन्तः) मध्य में (उत्सम्) कूप के सदृश जल से खेदित को जैसे वैसे (दशयन्त्रम्) सूक्ष्म और स्थूल दश प्रकार के भूत प्राणी यन्त्रित जिस में उस (पक्वम्) पके हुए को (दाधार) धारण करता है वैसे आप लोग भी धारण कीजिये ॥२४॥ भावार्थ:-हे विद्वान् जनो ! जो सूर्य के सदृश न्याय को, पृथिवी के सदृश क्षमा को, सब के धारण और दुग्ध आदि रसों को और सब जगत् को यथावत् निर्माण करके धारण करता है वैसे आप लोग भी इस सब को धारण करिये ॥२४॥ इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और ईश्वर के गुण कर्मों के वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में चवालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। को उत्पन्न अथ त्रयस्त्रिशदृचस्य पञ्चचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य शंयुबर्हिस्पत्य ऋषिः । १-३० इन्द्रः । ३१-३३ बृबुस्तक्षा।१।२।३।८।१४ ॥ २० ॥ २१॥ २२ २३ । २४ । २८ । ३० । ३२ । गायत्री।४।७।६।१०।११ । १२ । १३ । १५ । १६ । १७ । १८ । १६ । २५। २६ । २६ निवृद्गायत्री।५।६।२७ विराङ्गायत्रीछन्दः । षड्जः स्वरः । ३१ प्राच्र्युष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः । ३३ अनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः।

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४५ ॥ ५२६ ANP अब तेंतीस ऋचा वाले पैतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। य पानयत्परावतः मुनीती तुर्वशं यदुम् । इन्द्रः स नो युवा सखा ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (युधा) शरीर और आत्मा के बल से युक्त (इन्द्रः) सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का देने वाला राजा (सनीती) सुन्दर न्याय से (परावतः) दूर देश से भी (तुर्वशम्) हिंसकों को वश में करने वाले' (यदुम्) यत्न करते हुए मनुष्य को (प्रा) सब प्रकार से (अनयत) प्राप्त करावे (स:) वह (न:) हम लोगों का (सखा) मित्र हो ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! तुम उस राजा के साथ मैत्री करो जो सत्य न्याय से दूर देश में स्थित भी विद्या, विनय और परोपकार में कुशल, श्रेष्ठ मनुष्य को सुनकर अपने समीप लाता है उस राजा के साथ मित्र हुए बर्ताव करो ॥१॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । अक्नेि चिद्वगो दर्धदनाशुना चिदर्वता । इन्द्रो जेता हितं धनम् ॥२॥ पदार्थ:-है मनुष्यो जो (इन्द्रः) शत्रुओं का नाश करने वाला (अवि) बुद्धिरहित में (चित) भी (वयः) सुन्दर जीवन वा विज्ञान को (दधत्) धारण करता है तथा (अनाशुना) घोड़े से रहित शीघ्र जानेवाले वाहन से (अर्वता) घोड़े से (चित्) भी (हितम्) सुखकारक (धनम्) द्रव्य को (जेता) जीतने वाला धारण करता है वह यशस्वी होता है यह जानना चाहिये ।।२।। भावाथ:-जो विद्वान् राजा बालकों और अज्ञों में अध्यापन और उपदेश के प्रचार से विद्या को धारण करता है वह यशस्वी होकर विना सेना के भी राज्य को प्राप्त होता है ।।२।। फिर उस ही विषय को कहते हैं । महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः । नास्य क्षीयन्त ऊतयः॥३॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो (अस्य) इस राजा की (मही:) बड़ी (उत) और (पूर्वीः) प्राचीन वेदों में कही हई (प्रणीतयः) उत्तम नीति और (ऊतयः) रक्षण आदि क्रियायें हैं (अस्य) इस की (प्रशस्तयः) श्रेष्ठ कीर्तियां (न) नहीं (क्षीयन्ते) क्षीण होती हैं ॥३॥ OM Hary मारने वाले राजन् (यथा) जैसे (वयम्) हमला ऋग्वेदः म०६ । सू० ४५ ।। भावार्थ:- जो राजाजन नित्य बड़ी राजधर्मनीति को धारण करके पुत्र के सदृश प्रजात्रों का पालन करते हैं उनका नाशरहित यश होता है ॥३॥ फिर मनुष्यों को किसका सत्कार करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । सखायो ब्रह्मवाहसेऽर्चत प्र च गायत । स हि नः प्रमतिर्मही ॥४॥ पदार्थ:-हे (सखायः) मित्रो ! आप लोग (ब्रह्मवाहसे) वेद और ईश्वर के विज्ञान प्राप्त कराने के लिए जिसका (प्र, अर्चत) अत्यन्त सत्कार करो (गायत, च) और प्रशंसा करो जिससे (नः) हम लोगों के लिए (प्रमतिः) अच्छी बुद्धि (मही) और बड़ी वारणी दी जाती है (सः, हि) वही जगदीश्वर और विद्वान् हम लोगों से उपासना और सेवा करने योग्य है ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप लोग परस्पर मित्र होकर परमेश्वर और सब के कल्याण के लिए प्रवृत्त यथार्थवक्ता तथा उपदेशक का सदा ही सत्कार करो जिससे हम लोगों को उत्तम बुद्धि और वाणी प्राप्त होवे ॥४॥ फिर राजा और मन्त्रियों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि । उतेदृशे या वयम् ॥५॥ पदार्थः - है (वृत्रहन्) मेघ को नाश करने वाले सूर्य के समान शत्रुओं के सहायरहित के (उत) और (वयोः) राजा और प्रजाजनों के रक्षक होते हैं वैसे जिससे (स्वम) श्राप (अविता) रक्षक (असि) हो इससे सत्कार करनेयोग्य हो ॥शा भावार्थ:-हे राजन् जैसे हम लोग पक्षपात का त्याग करके अपने और अन्य जन का यथावत् न्याय करें वैसे ही आप करिये ऐसे धर्मयुक्त व्यवहार में वर्तमान हम लोगों की सदा ही वृद्धि और मोक्ष होते हैं ॥५॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। नयसीद्वति द्विषः कृणोष्युक्थशंसिनः । नृभिः सुवीर उच्यसे ।।६।। पदार्थ:-हे जिससे आप (द्विषः) द्वेष करने वालों को (उक्थशंसिनः) वेद की प्रशंसा करने वाले (कृणोषि) करते हो और उपाय का उल्लङघन करके धर्म को (अति, नयसि) अत्यन्त प्राप्त होते वा प्राप्त करते हो (उ) और (नृभिः) नायक अग्रणी मनुष्यों से (सुवीरः) श्रेष्ठ वीरों से युक्त हुए सब के प्रति (उच्यसे) उपदेश किये जाते हो इससे (इद) ही आदर करनेयोग्य हो ॥६॥ WHON 20 -हे राजन् ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४५ ॥ NON भावार्थ:-हे राजन् ! जो आप नम्रतायुक्त, विद्वान् होवें तो वेद में कहे हुए धर्म से द्वष करनेवालों को भी वेदोक्त धर्म में प्रीति करनेवाले उपदेश वा विनय से कर सकते हो ॥६॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं। ब्रह्माणं ब्रह्मवाहस गोभिः सखायमुग्मियम् । गां न दोहसे हुवे ॥७॥ पदार्थ:-हे राजन् जैसे मैं (गीभिः) सुशिक्षायुक्त, मधुर सत्यवाणियों से (धोहसे) दोहने पूरण करने को (गाम्) गो के (न) समान (सखायम्) सब के मित्र (ऋग्मियम्) स्तुतियों से स्तुति करने योग्य (ब्रह्मवाहसम्) वेदों के शब्दार्थ संबन्ध और स्वरों के प्राप्त कराने वाले (ब्रह्माणम्) चतुर्वेदवेत्ता विद्वान् को (हुवे) बुलाता और उसकी प्रशंसा करता हूं वैसे इसको आप बुला और उसकी प्रशंसा करो ॥७॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलु० -हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन वेदपारगन्ता, प्राप्त, विद्वान् का प्राश्रय लेकर सभ्य विपश्चित् होते हैं वैसे इन के सग से तुम भी विद्वान् वा चतुर होमो ॥७॥ फिर क्या करके राजा ऐश्वर्य को प्राप्त होवे इस विषय को कहते हैं । यस्य विश्वानि हस्तयोरू चुर्वसूनि निद्विता । वीरस्य पृतनापहः ॥८॥ पदार्थ:----हे विद्वान् जनो! (यस्य) जिस राजादि विद्वान् (वीरस्य) शत्रु के बल को दबाने वाले' के (हस्तयोः) हाथों में (विश्वानि) सम्पूर्ण (वसुनि) द्रव्यों को (पृतनावह:) शत्रुओं की सेना को सहनेवाले (नि) निश्चित (ऊचुः) कहते हैं उसके साथ (द्विता) दोनों-राजा और प्रजा तथा उपदेश देने वाले और उपदेश देने योग्य- पने की रक्षा करो ॥८॥ भावार्थ:-जो राजा विद्या और विनय से पुत्र के सदृश प्रजात्रों की पालना करे तो सम्पूर्ण ऐश्वर्य और सम्पूर्ण सुख उसके प्राधीन ही होवे जिससे उत्तम मन्त्री और प्रशंसित सेना को प्राप्त होकर राजा प्रजाजनों के कल्याण को कर सकता है ।।८।। फिर मनुष्य किसका निवारण करके किसको प्राप्त होवे इस विषय को कहते हैं । वि हळहानि चिदद्रिवो जनानां शचीपते । वृह माया अनानस ॥९॥ पदार्थ:-हे (अद्रिवः) मेघों के करने वाले सूर्य के सदृश वर्तमान (अनानत) शत्रुओं के समीप में नम्रता से रहित (शचीपते) प्रजा के स्वामिन् श्राप (माया:) कपटों को (वह) काटो और (वित्) भी (जनानाम्) मनुष्यों की (दृळ हानि) निश्चित सेनामों को करके शत्रुओं का (वि) विशेष करके नाश करिये ॥६॥ MMS AIM Ham . ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४५ ।। भावार्थ:-- वह राजा प्राचार्य वा अध्यापक उत्तम होवे जो छल आदि दोषों का निवारण करके मनुष्यों को धर्म के आचरण से युक्त निरन्तर करे ॥४॥ पि.र राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । तमु त्वा सत्य सोमपा इन्द वाजानां पते । अहूमहि श्रवस्यवः ॥१०॥ पदार्थ:--हे (सत्य) श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (सोमपाः) ऐश्वर्य की रक्षा करने तथा बाजानाम्) विज्ञान और अन्न आदिकों के (पते) पालने और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले (श्रवस्यवः) अपने अन्न आदि की इच्छा करने वाले हम लोग (त्या) आपकी (महूमहि) प्रशंसा करें वैसे (तम्, उ) उन्हीं को सब लोग पुकारें ॥१०॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु -हे राजन् वा विद्वन् ! आप श्रेष्ठ गुण कर्म और स्वभाव से युक्त होकर प्रजा के पालन में तत्पर सुशील और इन्द्रियों के जीतनेवाले जब तक होंगे तबतक हमलोग आपको मानेगे ॥१०॥ फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । तमु त्वा या पुरासिथ यो वो नूनं हिते धनें । हव्यः स श्रुधी हवम् ॥११॥ पदार्य:-हे राजन् (यः) जो आप (हिते) सुखकारक (धने) धन में (पुरा) प्रथम से (आतिथ) थे और (य:) जो (वा) वा (नूनम् ) निश्चित सुखकारक धन में (हत्यः) पुकारने के योग्य हो (तम्, उ) उन्हीं (त्वा) आपको हम लोग सुनावें (सः) वह पाप हम लोगों की (हवस्) बात को (शुधी) सुनिये ॥११॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो राजा सब के हित की इच्छा करे और सब को धन और ऐश्वर्या से युक्त करता है वह बलिष्ठ और निर्बलों की बातों को प्रीति से सुन कर यथार्थ न्याय करता है उसी का सब लोग निरन्तर सत्कार करें॥११॥ फिर राजा आदि को क्या प्राप्त करके क्या प्राप्त करता चाहिये इस विषय को कहते हैं । Bha Biter Mom PM are - dire ऋग्वेदः मं०.६ । सू०४५ ॥ aane धीभिरवैद्भिरर्वतो दाजा इन्द्र श्रवाया॑न् । त्वया जेष्म हितं धनम् ॥१२॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करने वाले जैसे हम लोग (धीभिः) बुद्धियों वा कम्मों से (अद्भिः) शब्द करते हुए घोड़ों से (बाजान्) वेगयुक्त (श्रवा- य्यान्) सुनने को इष्ट (अवंतः) घोड़ों के सदृश प्राप्त होकर (स्वया} आप के साथ (हितम् ) सुखकारक (धनम्) धनको (बेडम) जीतें वैसे पाप हम लोगों के साथ सुख से वर्ताव करो ॥१२॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०- जब राजा आदि जन एक सम्मति कर उत्तम सेना के अंगों को सम्पादन कर और अन्यायकारी दुष्टों को जीत कर न्याय से प्राप्त हुए धन से सब का हित कयें तभी अपने हित की सिद्धि से युक्त होवें ॥१२॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं। अभृरु वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते। भरै वितन्तसायः ॥१३॥ पदार्थ:-हे (गिर्वणः) वाणियों से याचना किये गये (वीर) शूरता आदि गुणों से युक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य के देने वाले श्राप (महान्) महाशय (वितन्त- साय्यः) अत्यन्त विजय में होने वाले हुए (हिते) सुखकारक (धने) धन में (उ) और (भरे) संग्राम में जीतने वाले (अभूः) हूजिये ॥१३॥ भावार्थ:-जो राजा सब के हित के प्राप्त होने की इच्छा करता हुआ पुरुषों में ज्ञानी, किये हुए को जानने वाला और योद्धाओं का प्रिय होवे उसके सदा ही विजय से प्रतिष्ठा और ऐश्वर्य बढ़ें।।१३।। फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । या त अतिरमित्रह शूजवस्तमासति । तयां नो हिनुही स्थम् ॥१४॥ पदार्थः-- हे (अमित्रहन्) शत्रुओं के मारने वाले (या) जो (ते) आपकी (मर्जवस्तमा) शीघ्र अतिशय वेग से युक्त (ऊतिः) रक्षा आदि क्रिया (असति) होवे (तया) उससे (नः) हम लोगों की (रथम्) विमान प्रादि वाहन को प्राप्त कराके (हिनुहि) वृद्धि कीजिये ॥१४॥ भावार्थ:-जो राजा वेग आदि गुणों से युक्त रक्षा से प्रजात्रों को प्रसन्न करके उन्नति करे वही निरन्तर वृद्धि को प्राप्त होवे ॥१४॥ .

Home पक्रतुः) बलयुक्त ऋग्वेदः मं०६। सू० ४५ ॥ फिर वह राजा किससे किस को जीते इस विषय को कहते हैं। स रथेन रथीतमोस्माकेनाभियुग्वना। जेर्षि जिष्णो हितं धनम् ॥१५॥ पदार्थ:-हे (जिष्णो) जीतने वाले (स:) वह (रथीतमः) अतिशय करके बहुत रथों वाले श्राप (अभियुग्वना) विभक्त होने वाले (अस्माकेन) हमारे (रथेन) वाहन से (हितम्) प्रवृद्ध (धनम्) धन को (जेषि) जीतते हो इससे प्रशंसा करने योग्य होते हो ॥१२॥ भावार्थ:-जो राजा प्रशंसनीय वाहन आदि से बहुत धन को जीतता है वह प्रशंसनीय होता है ॥१५॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं । य एक इत्तमु ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः । पतिज्ञे वृषऋतुः ॥१६॥ पदार्थ:-हे मनुष्य (यः) जो (एक:) सहायरहित (इत) ही (कृष्टीनाम्) (जज्ञे) होता है (तम्) उस वार पुरुष को (उ) ही (स्तुहि) प्रशंसा करिये ॥१६॥ भावार्थ:--हे प्रजाजनो ! जो सम्पूर्ण विद्या और श्रेष्ठ गुण कर्म स्वभाववाला निरन्तर न्याय से प्रजाओं के पालन में तत्पर होवे उसको राजा मानो दूसरे क्षुद्राशय को नहीं ॥१६॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं । यो गृणतामिदासिंथापिरूती शिवः सखा । स त्वं न इन्द्र मुळ्य ॥१७॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुःखों के नाश करने वाले राजन् (यः) जो (गृणताम्) प्रशंसा करने वाले (न:) हम लोगों के (प्रापिः) श्रेष्ठ गुणों से व्यापक (शिवः) मंगलकारी (सखा) मित्र (मास्थि) होते हो (सः, इत्) वही (त्वम्) आप (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से हम लोगों को (मूळय) सुखी करो ॥१७॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो आप शत्रुरहित और संसार के मित्र, सब के मंगल करने वाले प्रजाओं में हूजिये तो शीघ्न धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करिये ॥१७॥ !

ऋग्वेदः मं०६ । सू०४५ ॥
R
फिर राजा आदि क्या ध्यान करके क्या करें इस विषय को कहते हैं।
धिष्व वज्रं गर्भस्त्यो रक्षोहत्याय वजिवा।
सासहीष्ठा अभि स्पृधः॥१८॥
पदार्थ:-हे (निवः) प्रशंसित शस्त्र और अस्त्रों के चलाने में चतुर और
अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् पाप (रक्षोहत्याय) दुष्टों के मारने के लिए
(गभस्त्योः) हाथों के मध्य में (वनम्) शस्त्र और अस्त्रों के समूह को (घिष्य)
धारण करिये तथा (स्पृधः) स्पृहा करने योग्य सङ ग्रामों के (अभि) सन्मुख (सास-
होष्ठाः) अत्यन्त सहिये ॥१८॥
भावार्थ:-हे राजन् वा सेना के जनो! आप लोग शस्त्र और
अस्त्रों के चलाने में चतुर होकर डाकू आदि शत्रुनों का नाश करके सहन-
शील हूजिये ॥१८॥
मनुष्य कैसे जन की प्रशंसा करें इस विषय को कहते हैं।
प्रत्नं रयीणां युजं सखायं कीरिचोद॑नम् । ब्रह्मवाहस्तमं हुवे ॥१९॥
पदार्थ:- है मनुष्यो जैसे मैं (रयीणाम्) धनों के (युजम्) युक्त करानेवाले
(कीरिचोदनम्) विद्यार्थियों के प्रेरक (ब्रह्मवाहस्तमम् ) अतिशय वेद और ईश्वर की
जो विद्या उसके प्राप्त करानेवाले (प्रत्नम्) प्राचीन (सखायम्) सब के मित्र की
(हुवे) स्तुति करता हूं वैसे इस की भाप लोग भी प्रशंसा करो ॥१॥
भावार्थः-जो सम्पूर्ण जनों के हितकारक, अत्यन्त विद्वान्, सत्य के
ग्रहण और असत्य के त्याग के लिये अध्यापन और उपदेश से प्रेरणा करने
वाले, स्थिर मित्र का सत्कार करके प्रशंसा करते हैं वे ही गुणग्राहक
होते हैं ॥१९॥
फिर मनुष्यों को कैसा राजा करना चाहिए इस विषय को कहते हैं ।
स हि विश्वानि पार्थिवाँ एको वसूनि पत्यते ।
गिर्वणस्तमो अध्रिगुः ॥२०॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (स:) वह (हि) जिससे (एकः) सहायरहित (गिर्व-
णस्तमः) अतिशयित वारिणयों से प्रशंसा करने योग्य
(अनिगुः) सत्यगमनवाला
राजा (विश्वानि) समस्त (पार्थिवा) पृथिवी में जाने हुए (वसूनि) द्रव्यों को (पत्यते)
स्वामी के सदृश प्राचरण करता है इससे हम लोगों से सत्कार करने योग्य है ॥२०॥

S (वाजेभिः) विज्ञान और अन्न आदि के करने वाले ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४५ ।। भावार्थ:-- हे मनुष्यो ! जो विलक्षण बुद्धि और विद्या से युक्त, पृथिवी आदि पदार्थों की विद्या का जानने वाला, प्रशंसा करने योग्य गुण कर्म और स्वभावयुक्त और सत्य आचरण करने वाला जन होवे उसी को राजा करो ॥२०॥ फिर राजा और प्रजाजन परस्पर किसकी शोभा करें इस विषय को कहते हैं । स नो नियुद्भिरा पृण कामं वाजेभिरश्विभिः। गोमद्भिगोपते धृषत् ॥२१॥ पदार्थ:-हे (गोपते) इन्द्रियों के स्वामिन् (सः) वह (धूषत) ढीठधर्षण निश्चित कारण तथा : गोमद्भिः) प्रशंसित भूमि, गो और वाणी से युक्त (अश्विभिः) सूर्य और चन्द्रमा आदिकों से (न:) हम लोगों के (कासम्) मनोरथ की (प्रा) सब प्रकार से (पुण) पूर्ति करिये ॥२१॥ भावार्थ:-हे राजन् जो आप हम लोगों के मनोरथ की पूत्ति करें तो हम लोग भी आपकी इच्छा की पूत्ति करें ॥२१॥ फिर मनुष्य किसके लिए क्या करें इस विषय को कहते हैं । तो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्त्वने । शं यद् गये न शाकिने ॥२२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्) जो (व:) आप लोगों के लिये प्रशंसा करते हैं (तत्) वे (शाकिने) सामर्थ्ययुक्त (गवे) स्तुति करने वाले के लिए (न) जैसे वैसे (सुते) उत्पन्न हुए इस संसार में (सचा) संयुक्त सत्य से (पुरुहूताय) बहुतों से प्रशंसित (सत्वने) शुद्ध अन्तःकरण वाले' के लिए हों उनकी हे (इन्द्र) ऐश्वर्य से युक्त प्राप (शम्। सुखपूर्वक (गाय) स्तुति कीजिये ।।२२।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है - जैसे सम्पूर्ण विद्यानों के पार जाने वाले के अध्यापन और उपदेशरूप कर्म से सब का मंगल बढ़ता है वैसे ही उत्तम राजा से प्रजा का सुख उन्नत होता है ।।२२।। फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । न घा वसुनि यमते दानं वाजस्य गोमतः । यत्सीमुप श्रवगिरः ॥२३॥ पदार्थः--यत्) जो जन (गोमतः) प्रशंसित वाणी से युक्त (वाजस्य) विज्ञान का (वसः) वास दिलाने वाला (दानम्) दान को (नि) अत्यन्त (यमते) đi lên NILION ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४५ ।। Aau देता है (गिरः) वारिणयों को (सीम् । सब प्रकारसे (उप, श्रवत्) सुने वह (न, था) नहीं मारा जाता है ॥२३॥ भावार्थ:- जो मनुष्य विद्या और अभयदान देता और सम्पूर्ण विद्वानों से सत्य सुनता है वह इस संसार में विघ्नों से नहीं मारा जाता है॥२३॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं । कुवित्संस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत् । शचीभिरपं नो वरत् ॥२४॥ पक्षार्थ:-जो (दस्यहा) दुष्ट चोरों को मारने वाला राजा (शचीभिः) बुद्धि वाले कर्मों से (कुवित्सस्य) अत्यन्त विभाग करने वाले के (गोमन्तम्) प्रशंसित गौवें विद्यमान और (बजम्) चलते हैं जिसमें उसको (अप, गमत्) प्राप्त होता है वह (हि) ही (नः) हम लोगों को (प्र, वरत) स्वीकार करे ॥२४॥ भावार्थ:--- जो राजा दुष्टजनों को दूर करके न्यायव्यवहार के प्रचार के लिए उत्तम जनों का स्वीकार करता है वह बड़े सत्य और असत्य का विचार करनेवाला होता है ।।२४॥ फिर धर्मात्मा राजा की सब प्रशंसा करें इस विषय को कहते हैं। इमा उं त्वा शतकतोऽभि प्र णोनुवुगिरः । इन्द्र वत्सं न मातरः ॥२५॥ पदार्थः हे (शतकतो) अथाह बुद्धि वाले (इन्द्र) आदर देने वाले (वरसम्) बछड़े की माता (न) जैसे वैसे जो (इमाः) ये प्रजायें और (गिरः) वाणियां (त्वा) आप की (प्र, नोनुवः) अत्यन्त प्रशंसा करें उनकी (उ) वितर्क के साथ आप (अभि) सब प्रकार से स्तुति करिये ॥२॥ भावार्थः- इस मंत्र में उपमालं.-हे राजन् ! जैसे गौवें प्रेम से अपने बछड़ों को प्रसन्न करती हैं वैसे ही उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियां सब को आनन्द देती हैं ऐसा जानो ॥२५॥ किन की मित्रता नहीं जीर्ण होती है इस विषय को कहते हैं । गव्यते । अश्वो अश्वायते भव ॥२६॥ पदार्थ:-हे (वीर) धीरता प्रादि गुणों से युक्त राजन् वा विद्वान् जो आप (गव्यते) गौ के सदृश आचरण करते हुए के लिए (गौः) गाय जैसे वैसे (अश्वायते) । kone दूणाशै सख्यं तव गौरसि वीर pak nिe - धनव:) दुग्ध की देने वाली (गाव:) गौयें (न) जैसे वैसे (स्वा) आपको ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४५ ।। घोड़ों के सदृश आचरण करते हुए के लिए (अश्वः) घोड़ा जैसे वैसे (असि) हैं और जिन (तब) आपका प्रेम के प्रास्पद में बन्धा हुमा (दूणाशम्) दुर्लभ नाश जिसका वह (सख्यम्) मित्रपन है वह पाप हम लोगों के मित्र (भव) हूजिये ॥२६॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु जैसे गौमों में बैल और घोड़ियों में घोड़ा प्रसन्न सदा ही होता है वैसे ही संज्जनों की मित्रता अविनाशिनी होती है ऐसा सब लोग जानें ॥२६॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं । स मन्दस्वा हन्धसो राधसे तन्वा महे । न स्तोतारै निदे करः ॥२७॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (हि) जिससे आप (तन्वा) शरीर से (महे) बड़े (राषसे) धन के लिए (अन्धसः) अन्न आदि से (मन्दस्वा) आनन्दित हूजिये वा आनन्दित करिये और (निदे) निन्दा करने वाले के लिए (स्तोतारम्) स्तुति करने वाले को (न) नहीं (करः) करिये इससे (सः) वह पाप जनों को प्रिय हैं ॥२७॥ भावार्थ:-हे राजा और प्रजाजनो! आप लोग अन्न आदि से सब को आनन्दित करिये । और निन्दा न करने योग्यों की मत निन्दा करिये तथा ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए निरन्तर प्रयत्न करिये ॥२७॥ अब किसके लिए कहाँ क्या प्राप्त होवे इस विषय को कहते हैं । इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरी। वत्सं गावो न धेनवः ॥२८॥ पदार्थ:-हैं (गिर्वणः) पाणियों के प्रशंसा करने योग्य (सुतेसुते) उत्पन्न उत्पन्न हुए इस संसार में (इमाः) ये (गिरः) उत्तम प्रकार शिक्षित वारिणयां (वत्सम्) बछड़े को (नक्षन्ते) व्याप्त हों वे (उ) और हम लोगों को भी प्राप्त हो ॥२८॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालं०-जो श्रेष्ठ आचरण करने वाले हैं उनको गौ जैसे बछड़े को वैसे सम्पर्ण विद्या और वाणियां प्राप्त होती हैं ॥२८॥ फिर कौन उत्तम है इस विषय को कहते हैं ।। पुरूतम पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि । वाजेभिर्वाजयताम् ॥२९॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो वारिणयां (वाजेभिः) अन्न आदिकों से (वाजयताम्) प्राप्त कराने वाले (पुरूणाम्) बहुत (स्तोतृणाम्) विद्वानों के (विवाचि) अनेक । - HAR ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४५ ।। dea tate प्रकार की सत्य' अर्थ को प्रकाश करने वाली वारिगया जिसमें उस व्यवहार में (पुरूतमम्) अतिशय बहुत विद्यायुक्त व्यवहार को प्राप्त होती हैं वे हम लोगों को निश्चित प्राप्त हो ॥२६॥ भावार्थ:-वे ही बहुतों में उत्तम हैं जो विद्या, विनय और अधर्मा- चरण को प्राप्त हुए हैं ॥२६॥ राजा और प्रजाजन एकमति करें इस विषय को कहते हैं। अस्माकमिन्द्र भृतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः । अमान् राये महे हिंतु ॥३०॥ पदार्थ:-- है (इन्द्र) धन के देने वाले (अस्माकम्) हम लोगों का (वाहिष्ठः) । अतिशय धारण करने वाला (अन्तमः) समीप में वर्तमान (स्तोमः) प्रसंसास्वरूप व्यवहार (ते) आपका बढ़ाने वाला (भूतु) होवे और जो आपके समीप में वर्तमान अतिशय धारण करने वाला प्रशंसारूप व्यवहार हो वह (अस्मान्) हम लोगों को महे) बड़े (राये) धन के लिये (हिनु) बढ़ावे ॥३०॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो ऐश्वर्या आपका वह प्रजा का, और जो प्रजा का वह प्रापका हो ऐसा करने के विना राजा और प्रजा की उन्नति का नहीं सम्भव है ॥३०॥ अब व्यापार-विषय को कहते हैं। अघि पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धनस्थात् । उता कक्षो न गांग्यः ॥३१॥ पवार्थ:-- है मनुष्यो जो (उः) बहुत (कक्षः) जलका उल्लंघन करने बाला टापू वा तट आदि (गाङ्ग्यः) पृथिवी को प्राप्त होने वाले के समीप में वर्तमान (न) जैसे वैसे (पणीनाम्) प्रशंसा करने योग्य व्यवहार करने वालों के (वर्षिष्ठे) अतिशय वृद्ध (मूर्द्धन्) मस्तक में (बूबः) काटने लाला (अधि) ऊपर (अस्थाद) स्थित होता है वह आप लोगों से कार्य में उत्तम प्रकार संयुक्त करने योग्य है ॥३१॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं०-जैसे पृथिवियों में जाती हुई नदी के मध्यस्थ टापू और तट समीप में वर्तमान हैं वैसे ही व्यापारियों के समीप में शिल्पीजन वर्तमान होवें ॥३१॥ श्रेष्ठविद्या आदि के दान से क्या होता है इस विषय को कहते हैं । यस्य वायोरिव द्रवद्भद्रा रातिः संहत्रिणीं । सद्यो दानाय महते ॥३२॥ ब गा HAM MIN के सदृश (द्रवत) प्राप्त होती वा शीघ्र जाती है वह (सधः शीघ्र (बानाय) दान के पूर्ण अभीष्ट सुख को प्राप्त होते हैं और जो ऋग्वेदः मं०६ । सू०४६ ॥ पदार्थः हे मनुष्यो (यस्य) जिसकी (अहस्त्रिणी) असंख्य पदार्थ दिये जाते हैं जिसमें वह (भा) मङ्गल' करने वाली (राति:) दान-क्रिया (वायोरिव) वायु लिए मंहते) बढ़ता है ऐसा जानना चाहिये ॥३२॥ भावार्थ:-- इस ग्रन्त्र में उपमालं०-जो विद्या प्रादि के दान में प्रिय शिल्पविद्या की वृद्धि करते हैं वे असंख्य धन को प्राप्त होते हैं ॥३२॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । तत्सु नो विश्व अर्थ आ सो गृणन्ति कारदः। बुबुं सहस्रदातमं सूरि सहस्रसातमम् ।।३३।। पदार्थ:-जो (न:) हम लोगों के (विश्वे) सब (कारवः) कारीगरजन (सहस्रदातमम्) अतिशय असंख्य देने वाले (बुबुम्) मुख्य शिल्पी (सहस्त्रसातमम्) अतिशय असंख्य पदार्थ बाँटने वाले (सूरिम्) विद्वान् को (सु) उत्तमता से (श्रा) सब प्रकार (गृणन्ति) स्वीकार करते हैं वे (तव) उस अतुल ऐश्वर्य को (सदा) सर्व- काल में प्राप्त होते हैं और जो इन में (अर्यः) स्वामी वा वैश्य होवे वह इन का उत्तम प्रकार सत्कार कर रक्षा करे ॥३३॥ भावार्थ:-जो जन क्रिया में निपुण विद्वानों और कारीगरों की प्रशंसा करते हैं वे असंख्य धन को प्राप्त होकर असंख्य धन देने योग्य होते हैं ॥३३॥ इस सूक्त में राजनीति, धन के जीतने वाले, मित्रपन, वेद के जानने वाले, ऐश्वर्य से युक्त, दाता, कारीगर और स्वामी के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में पैंतालीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।। - अथ चतुर्दशर्चस्य षट्चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य शंयुर्हिस्पत्य ऋषिः । इन्द्रः प्रगाथं वा देवता । १ निचुदनुष्टुप् । ५। ७ स्वराडनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः । २ स्वराड्बृहती । ३ । ४. भुरिग्बृहती। ८ । ६ विराबृहती। ११ निबृहती। १७ बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः। ६ ब्राह्मी गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः। १० पंक्तिः । १२ । १४ विराट्पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। - ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४६ ॥ ५४१ अब चौदह ऋचावाले छयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर शिल्पविद्या को कहते हैं ।। स्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवा त्वां वृत्रेष्चिन्द्र सत्पति नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः ॥१|| पदार्थ:-हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जन (कारवः) कारीगर (नरः) जन हम लोग (स्वाम्) आपको (हि) ही (वाजस्य) विज्ञान के (साता) विभाग में (हवामहे) ग्रहण करें और (वृत्रेषु) धनों में (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालने वाले (स्वाम्) आपको पुकारें तथा (प्रर्वतः) घोड़ों को जैसे सारथी वैसे (स्वाम्) आपको (काष्ठासु) दिशाओं में (इत्) ही पुकारें ॥१॥ भावार्थ:-हे धन से युक्त ! जो आप हम लोगों के सहायक होवें तो आपके धन से हम लोग शिल्पविद्या से अनेक पदार्थों को रचकर आपको बड़ा धनी करें ॥१॥ फिर मनुष्य शिल्पविद्या से क्या पाते हैं इस विषय को कहते हैं ।। स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः । गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किंर सत्रा वाजं न जिन्युषे ॥२॥ पदार्थ:-हे (अद्रिवः) मेघ से युक्त सूर्य के समान वर्तमान (चित्र) अद्भुत विद्या वाले (बज्रहस्त) हाथ में शस्त्र और अस्त्र को धारण किये हुए (इन्द्र) ऐश्वर्य से युक्त (सः) वह (स्वम्) आप (धष्णुया, निश्चयपने वा ढिठाई से (महः) बड़े की (स्तवान:) प्रशंसा करते हुए (सत्रा) सत्य विज्ञान से (वाजम्) सङग्राम को (न) जैसे वैसे (जिग्युषे) जीतने वाले (न:) हम लोगों के लिये (गाम् ) गौ को (स्थ्यम्) और वाहन के लिये हितकारक (अश्वम्) घोड़ों को (सम्, किर) संकीर्ण करो-इकट्ठा करो ॥२॥ भावार्थ:---- इस मन्त्र में उपमालं. राजा आदि मनुष्यो ! जैसे जीतने वाले योद्धा जन सङ्ग्राम में विजय को प्राप्त होकर धन और प्रतिष्ठा को प्राप्त होते हैं वैसे ही शिल्पविद्या में चतुर जन बड़े ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥ फिर मनुष्य सङ ग्राम में कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं। यः संत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे दयम् । सहस्रमुष्क तुर्विम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे ।।३।। A Akela PHRAM to - ५४२ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४६ ।। awad पदार्थः -- हे (सहस्रमुष्क) असंख्य पराक्रम वाले (तुविनुम्ण) बहुत धनों से युक्त (सत्पते) विद्वानों के पालनेवाले अत्यन्त ऐश्वर्या से युक्त (यः) जो (विचर्षणिः) विद्वान् मनुष्य' (सत्राहा) सत्य दिनों में (इन्द्रन) अत्यन्त ऐश्वयं से युक्त को पुकारता है वैसे (तम्) उसकी (वयम्) हम लोग (हूमहे) प्रशंसा करते हैं और आप (समत्सु) संग्रामों में (न:) हम लोगों की (धे) वृद्धि के लिए (भवा) हूजिये ॥३॥ भावार्थ:---उसी की हम लोग प्रशंसा करते हैं जो प्रतिदिन हम लोगों की रक्षा करता है और उसी की हम संग्राम में रक्षा करें ॥३॥ फिर राजा और प्रजाजन किसकी प्रतिज्ञा करें इस विषय को कहते हैं ।। बाधसे जान्षमेव मन्युना घृषौ मीळ्ह अंचीपम । अस्माकं बोध्यविता महाधने तनूष्वप्सु सूर्य ॥४॥ पवार्थ:--हे (ऋचीषम) ऋचा के सदृश प्रशंसा करने योग्य अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त राजन् जो (मन्युना) क्रोध से (वृषभेव) बलयुक्त बैल जैसे वैसे (घृषौ) दुष्टों के घर्षण में (मीळ ह) सङ्ग्राम में (जनान्) मनुष्यों की बाधा करते हैं जिससे श्राप उनकी (बाधसे , बाधा करते हो और (अस्माकम्) हम लोगों के (तनूषु) शरीरों में और (अप्स) प्राणों में (महामने) सङग्राम में (अबिता) रक्षा करने वाले हुए (सूर्ये) सूर्य में प्रकाश जैसे वैसे हम लोगों को (बोधि) जनाइये इससे आप प्रादर करने योग्य हैं ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं.-हे राजन् ! हम लोग दुष्टों के बाधने के लिये और सङ्ग्राम में अपने लोगों की रक्षा के लिये आपका स्वीकार करें तथा आप हमलोगों को सत्य न्यायकृत्य सदा ही जनाइये ॥४॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। इन्द्र ज्येष्टं न आ और ओजिष्ठं पपुरि श्रवः । येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओमे मुंशिम माः ॥६॥ पदार्थः-हे (सशिप्र) सुन्दर ठुड्ढी और नासिकायुक्त (चित्र) अद्भुत गुण कर्म और स्वभाव वाले (बज्रहस्त) शस्त्र और अस्त्र हाथ में जिसके ऐसे और इन्द्र) श्रेष्ठ गुणों के धारण करनेवाले आप (ज्येष्ठम्) अतिशय प्रशंसित (मोजिष्ठम्) अतिशय बल के देने (पपुरि) पालन करने और पुष्टि करने वाले (श्रवः) अन्न वा श्रवण' को (न:) हम लोगों के लिये (प्रा, भर) धारण करो (येन) जिससे !! PREM oin MP ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४६ ।। SUMAR मा (उमे) दोनों (इमे) इन (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (प्रा) सब प्रकार से (प्रा.) व्याप्त होमो ॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप ऐसे गुण कर्म और स्वभाव का स्वी- कार करें जिससे न्याय, भूमि, राज्य, सेना और विजय को धारण करने को समर्थ होवें ॥५॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं। त्वामुग्रमवसे चर्षणीसहं राजन्देवेषु हूमहे । विश्वा सु नौ विथुरा बिन्दना वसोऽमित्रोन्मुषहान्कृधि ।।६।। पदार्थ:--हे (वसो) सुख में वसाने वाले (राजन) विद्या और विनय से प्रकाशमान हम लोग (विश्वा) सम्पूर्ण कार्यों के प्रति और (देवेष) विद्वानों में (अवसे) रक्षण आदि के लिए (उग्रम्) तेजस्वी और (चर्षणीलहम्) शत्रुओं की सेना के सहने वाले (त्वाम्) आपको (सु, हूमहे) पुकारें और आप (नः) हम लोगों के (अमित्रान्) शत्रुओं को (सुसहान्) सुख के सहने योग्य (कृषि) करिये और (पिन्दना) पीसने योग्य शत्रु सैन्यों को (विथुरा) व्यथायुक्त करिये ॥६॥ भावार्थ:----जो राजा मन्त्री और प्रजाजनों के अपने सदृश जान कर जैसे शत्रुत्रों का पराभव होवे वैसा उपाय करने वाला होवे उसी को सब लोग पिता के सदृश मानें ॥६॥ फिर राजा को कहां क्या धारण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । वदिन्द्र नाहुषीष्वाँ ओजो नृम्णं च कृष्टिषु । यद्वा पञ्च क्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौंस्था ॥७॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) प्रजा के प्रिय को धारण करने वाले श्राप (कृष्टिषु) मनुष्यों में और (नाहुषीषु) मनुष्य सम्बन्धी प्रजात्रों में (यत) जो (भोजः) बलकारक अन्न आदि नुम्णम्) धन (च) और होवे उसको (श्रा, भर) धारण करिये (वा) वा (पञ्च) पांच तत्वों और ( क्षितीनाम्) राज सम्बन्धिनी भूमियों के मध्य में (यत्) जो (घुम्नम्) शुद्ध यश है अथवा (सत्रा) सत्य (विश्वानि) सम्पूर्ण (पोस्या) पुरुषार्थ से उत्पन्न हुए बल वर्तमान हैं उनको (प्रा) धारण करिये ॥७॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो आप सम्पूर्ण प्रजाओं को धन धान्य और विद्या से युक्त करिये तो पञ्चतत्त्व नामक राज्य को प्राप्त होकर धवलित यश को प्राप्त हूजिये ॥७॥ सुख और दुःख को ARAN ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४६ ॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । या तृक्षौ मघवन्द्रुह्यावा जने यत्पृरौ कच्च वृष्ण्यम् । अस्मभ्यं तद्रिरीहि सं नृषाहयेऽमित्रान्पृत्सु तुर्वणे ॥८॥ पदार्थः-हे (मधवन्) न्याय से धन इकट्ठा करने वाले पाप (वृक्षौ) विद्या और श्रेष्ठ गुण से प्राप्त (ब्रह्मो) द्रोह करने योग्य (जने) मनुष्य में (यत्) जो (रिरीहि) प्राप्त कराइये और (पूरौ) पूर्ण बलवाले मनुष्य में (यत्) जो (वृष्ण्यम्) उत्तमों में हितकारक जो बल उसको प्राप्त कराइये (तत्) वह (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (च) और (कव) कब प्राप्त कराइये और कब (वा) वा हम लोगों के (अमित्रान्) शत्रुओं को (नृषाह्य) मनुष्यों से सहने योग्य सङ्ग्राम में (पृत्स) सेनाओं में (तुर्वणे) हिंसन के लिए (सम्) अच्छे प्रकार (आ) सब ओर से प्राप्त कराइये ॥८॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जब आप उत्तम मनुष्यों में प्रतिष्ठा और दुष्टों में तिरस्कार धारण करें तभी शत्रुओं के विजय के लिये योग्य होवें॥८॥ मनुष्य को बनावें इस विषय को कहते हैं । इन्द्र त्रिधातुं शरणं त्रिवरूयं स्वस्तिमत् । छर्दिय पछ मघवड्यश्च मयं च यावयाँ दिद्युमभ्यः ॥९॥ पदार्थः-हे (इन्द्र) ऐश्वर्यों से युक्त आप (त्रिधातु) तीन सुवर्ण चांदी और तांबा ये धातु जिसमें उस (प्रिवरूथम्) शीत उष्ण और वर्षा ऋतु में उत्तम (शरणम्) आश्रय करने योग्य (स्वस्तिमद) बहुत सुख से युक्त (छदिः) गृह को (यच्छ) ग्रहण' करिये वा दीजिये और जिन (मघवद्भ्यः) बहुत धनवालों के और (मह्यम्) मुझ धनयुक्त के लिए (च) भी ग्रहण करिये वा दीजिये (एभ्यः) इन वर्तमानों के लिए (विध म्) सुप्रकाश को (च) भी (यावया) संयुक्त कराइये ॥६॥ भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि जो सब ऋतुओं में सुखकारक, धन धान्य से युक्त, वृक्ष, पुष्प, फल, शुद्ध वायु, जल तथा धार्मिक और धनाढ्यों से युक्त गृह उसको बना कर वहां निवास करें जिससे सर्वदा आरोग्य से सुख बढ़े ॥६॥ Ans Ima ऋग्वेदः म०६ । सू० ४६ ॥ ५४५ News inde SEARNaram फिर वह राजा किन का क्या करे इस विषय को कहते हैं। ये गव्यता भनसा शत्रमादभुरंभिप्रघ्नन्ति भृष्णुया । अर्थ स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव ॥१०॥ पदार्थः (गिर्वण:) उत्तम प्रकार शिक्षित वारिणयों से सेवा किये गए (मघवन्) बहुत धन से युक्त (इन्द्र) शत्रुओं को नाश करने वाले (ये) जो (धृष्णुया) ढीठपन आदि से (गव्यता) वाणी के सदृश आचरण करते हुए (मनसा) मन से (शत्रुम्) शत्रु का (प्रादभुः) सब प्रकार से नाश करते हैं (अध) इसके अनन्तर इसकी सेना का (अभिप्रध्नन्ति) सन्मुख अत्यन्त नाश करते हैं उनके साथ (स्मा) ही (नः) हम लोगों के (तनूपाः) अपने और अन्यों के शरीरों के रक्षक (अन्तमः) समीप में स्थित (भव) हूजिये ॥१०॥ भावार्थ:--हे राजन् ! जो ठग आदि दुष्टों और शत्रुओं के बांधने वाले तथा प्रजात्रों के पालन में तत्पर धार्मिक जन हों उनके विश्वास से राज्य के कृत्यों को शोभित करिये ॥१०॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते है ।। अध मा नो वृधे भवेन्द्र नायमंवा युधि । यदन्तरिक्षे पतयन्ति पणिनों दिधर्वस्तिम्ममुर्दानः ॥११॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) ऐश्वर्या के बढ़ाने वाले सेना के स्वामी (यत्) जो (अन्त- रिक्षे) अन्तरिक्ष में (पणिनः) पक्षियों के समान (विधव:) प्रकाशमान (तिग्ममूनिः) ऊपर वर्तमान योद्धा जन (युधि) सङग्राम में (पतयन्ति) जाते हैं (अध) इसके अनन्तर विजय को (नायम्) प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं उनके साथ (न:) हम लोगों की (वृधे) वृद्धि के लिए (भव) प्रसिद्ध हूजिये और सङ ग्राम में हम लोगों की (स्मा) ही निरन्तर (वा) रक्षा कीजिये ॥१०॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु-हे राजन् ! आप विमान आदि वाहनों को स्थापित कर पक्षियों के सदृश अन्तरिक्ष मार्ग से गमन और आगमन करके तथा उत्तम पुरुषों के साथ विजय को प्राप्त होकर सब से श्रेष्ठ हूजिये ॥११॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। यत्र शूरांसस्तन्यो वितन्वते प्रिया शर्म पितृणाम् । अध मा यच्छ तन्वे३'तने च छर्दिरचित्तं यावय द्वेषः॥१२॥ Mm १२॥ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४६ ।। पदार्थ:-हे ऐश्वर्या के बढ़ाने वाले (यत्र) जहां (शूरासः) युद्ध में चतुर जन (पितृणाम्) अपने पिता और स्वामियों के (तन्वः) शरीरों को (वितन्वते) बढ़ाते हैं और (प्रिया) प्रिय (शर्म) गृहों को बढ़ाते हैं (अध) इस के अनन्तर (तन्वे) शरीर के लिए (तने) बढ़े हुए व्यवहार में (च) भी (अचित्तम्) चेतनता से रहित (छदिः) गृह को आप (यच्छ) ग्रहण करिये वहाँ (वष:) शत्रुओं को (स्म) भावार्थ:- हे राजन् शूर धार्मिक जनों की सत्कारपूर्वक उत्तम प्रकार रक्षाकर शत्रुओं का निवारण कर उत्तम गृहों में पितरों और स्वामी जनों के लिये सुन्दर भोगों को देकर अपने यश का विस्तार करो ॥१२॥ फिर मनुष्यों को कैसे गमनादिक करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यदिन्द्र सर्गे अर्वतश्चोदयांसे महाधने । असमने अध्वनि वृजिने पथि श्येना इव श्रवस्यतः ॥१२॥ पदार्थः - हे (इन्द्र) वीर शत्रुओं के नाश करने वाले (यत्) जहां (सर्गे) मिलने योग्य (महाधने) बड़े धन जिससे उस और (असमने) नहीं विद्यमान सङग्राम जिसमें ऐसे (वृजिने) बलकारक (अध्वनि) मार्ग में और (पथि) आकाशमार्ग में (श्येनानिव) बाजों को जैसे वैसे (श्रवस्यतः) सुख की इच्छा करते हुए (अवंतः) घोड़े प्रादि को (चोदयासे, प्रेरणा करिये वहां आपका दूर भी स्थित स्थान निकट-सा होवे ॥१३॥ भावार्थ:-हे राजन् युद्ध के विना भी जब-जब कार्य के लिए गमन आप करें तब-तब शीघ्र ही जाना चाहिये और शिथिलता पैरों से वा वाहन से जाने में नहीं करनी चाहिये ॥१३॥ फिर वे राजा आदि क्या करें इस विषय को कहते हैं । सिन्धुरिव प्रवण आंशुया यतो यदि क्लोशमनु ष्वर्णि । आ ये वयो न वस्तत्यामिषि गृभीता बाह्वोर्गवि ॥१४॥ ama M auta PM RAM - .AAN पदार्थ:-हे राजन् पाप (यदि) जो (प्रवणे) नीचे स्थान में (सिन्धूनिव) नदियों को जैसे वैसे (प्राशुया) शीघ्र चलने वाले घोड़ों से वा (स्वनि) शब्द के होने और (आमिषि) मांस के देखने पर (वयः) पक्षी (न) जैसे वैसे (गवि) पृथिवी में (क्लोशम्) कोश को (अनु, ववृतति) अत्यन्त वा वारम्वार प्राप्त होते हैं वा (बाह्वोः) बाहुओं में (शुभीताः) ग्रहण की गई किरणे वा कलायें यथावत् जाती हैं ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४७ ।। तो दूसरे स्थान में प्राप्त होना दुर्लभ नहीं है (ये) जो (यत:) जहां से जाते (मा) पाते हैं वे भी ऐसा करें ।।१४।। भावार्थ: इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो तुम जैसे जल ऊंचे स्थान से नीचे के स्थान को शीघ्र जाता है और जैसे बाज आदि पक्षी मांस के लिये शीघ्र जाते हैं वैसे भूमि अन्तरिक्ष वा जल में वाहनों से शीघ्र जानो ॥१४॥ इस सूक्त में राजा वीर संग्राम गृह शूरवीर और यान कृत्य के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह छठे मण्डल में छयालीसवां सूक्त समाप्त हुमा । -- । अर्थकत्रिशवचस्य सप्तचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य १---३१ गर्ग ऋषिः । १- ५ सोमः । ६-१६-२०१.२१-३११, इन्द्रः। २०.लिङ्गोक्ता देवताः । २२-२५ प्रस्तोकस्य सार्जयस्य दानस्तुतिः। २६-२८ रथः । १६-३१ . बुन्दुभिदेवता ।। १।३ । ५ । २१॥ २२ ॥ २८ निस्त्रिष्टुप । ४ । ८ । ११ विराट् त्रिष्टुप् । ६ । ७ । १० । १५ । १६ । १८ । २०।२६ । ३० त्रिष्टुप् । २७ स्वराट् त्रिष्टुप्छन्दः । धवतः स्वरः। २।९।१२ । १३ ॥ २६ ॥ ३१ भुरिपङ्क्तिः । १४ । १७ स्वराद पङ्क्तिः । २३ पासुरीपतितश्छन्दः । पचमः स्वरः । १६ बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः । २४ । २५ विराट् गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः ।। अब एकतीस ऋचा वाले सैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में क्या करके राजा शत्रुनों से नहीं सहने योग्य होवे इस विषय को कहते हैं ।। स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतार्य तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम् । उतो न्व१' स्य पपिवांसमिन्द्र न कश्चन संहत आहवेषु ॥१॥ पदार्थ:-हे शूरवीर जनो जो (अयम्) यह (स्थादुः) सुन्दर स्वाद से युक्त (किल) निश्चय करके (उत) और (अयम्) यह (मधुमान्) मधुरादि गुणों से युक्त (किल) निश्चय करके (अयम्) यह (तीव:) तेजस्वी और वेगयुक्त' (उत) और (अयम्) यह (रसवान्) बड़ी ओषधि का प्रशंसित रसयुक्त सार है (प्रत्य) इसके (उतो) भी (पपिवांसम्) पीने वाले (इन्द्रम्) राजा आदि शूरवीर को (आहवेष) संग्रामों में (न) शीघ्र (क:) (चन) कोई भी (न) नहीं (सहते) सहता है ॥१॥ भावार्थ:-जो ब्रह्मचर्य, जितेन्द्रियत्व और युक्त आहार-विहारों से sa ऋग्वेदः म०६ । सू० ४७ ।। युक्त होते हैं उनको सङ्ग्रामों में सहने को - शरीर और आत्मा के बल से शत्रु समर्थ नहीं हो सकते हैं ॥१॥ फिर मनुष्य किसका सेवन करके क्या करें इस विषय को कहते हैं । अयं स्वादुरिह मर्दिष्ट आस यस्येन्द्रो त्रहत्ये ममाद । पुरूणि यश्च्यात्ना शम्बरस्य वि नवति नवं च देयो हन् ।।२।। पदार्थः--(य:) जो (इन्द्रः) सूर्य के सदृश प्रतापी राजा और जो (अयम्) यह (इह) इस संसार में (स्वादुः) अच्छे स्वाद से युक्त (मदिष्ठः) अतिशय आनन्द देने वाला (पास) होता और (यस्य) जिसके पान करने से (ममाद) प्रसन्न होता है उसका पान करके जैसे (इन्द्र :) सूर्य के समान प्रतापयुक्त (शम्बरस्य) मेघ के (नव, च) नव (नवतिम्) नब्बे प्रकार की मेधातियों का (वि, हन्) नाश करता है उस प्रकार से (वेह्यः) वृद्धि करने के योग्य हुमा (चत्रहत्ये) सङग्राम में शत्रुओं की (पुरूणि) बहुत (च्यौना) सेनाओं का नाश करे वही विजयी होवे ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० मनुष्यो ! जिसका उत्तम स्वाद और जिससे बल बुद्धि तथा पराक्रम बढ़ते हैं उसके सेवन से शत्रुओं को जीत कर निष्कण्टक राज्य का सेवन करो ॥२॥ फिर सोम प्रोषधि क्या करती है इस विषय को कहते हैं ।। अय में पीत उदियत्ति वाचमयं मनीषामुंशतीमजीगः । अयं षीरमिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे ॥३॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अयम्) यह (पीतः) पान किया गया सोमलता का रस (मे) मेरी (बाचम्) वाणी को (जशतीम् ) कामना करती हुई (मनीषाम्) बुद्धि को (उत्, इत्ति) बढ़ाता है जिससे' (अयम्) यह जन कामना को (अजीग:) प्राप्त होता है जिससे (श्रयम्) यह (षट्) छः प्रकार की (उर्योः) भूमियों को (धीरः) ध्यान करने वाला बुद्धि मान् जन (न) जैसे (अमिमीत) निर्माण करता है और (याभ्यः) जिनसे (आरे) दूर वा समीप में (कत्) कभी (चन) भी (भुवनम्) संसार को रचता है यह वैधकशास्त्र की रीति से बनाने योग्य है ॥३॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जिस पिये हुए से वाणी, बुद्धि, शरीर बढ़ें और जिससे शास्त्र उत्तम प्रकार ग्रहण किये जायं इसका ही सेवन करना चाहिये न कि बुद्धि आदिकों के नाश करने वाले का ॥३॥ M AEU anta PM ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४७ ॥ POIN asach फिर वह सोम क्या करता है इस विषय को कहते हैं। अयं स यो वरिमाणं पृथिव्या वर्माणं दिवो अकृणोदयं सः । अयं पीयूचे तिमधु प्रवत्सु सोमो दाधारोई रिक्षम् ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (य:) जो (अयम्) यह (सोन:) सोमलता का रस (तिसृष} तीन भूमि आदिकों (प्रवत्सु) नीचे के स्थलों में (पीयूषभ) अमृत को (दाधार) धारण करता है और जो (प्रयम्) यह (पृथिव्याः) पृथिवी से (वरिमाणम्) श्रष्ठपने को और (दिवः) सूर्य के प्रकाश से (बर्माणम्) वृष्टि करने वाले को (अकृणोत) करता है (स:) वह सब मनुष्यों से उत्तम प्रकार ग्रहण करने योग्य और जो (अयम्) यह (उरु) बहुत (अन्तरिक्षम्) मध्य में नहीं नष्ट होने वाले को धारण करता है (स:) वह इस सब का सुख करने वाला है ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सोमलतारूप ओषधि का रस वायु के साथ भूमि को, किरणों के साथ सूर्य को धारण करता है उसको ग्रहण और सेवन करके सब रोगरहित होप्रो॥४॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । अयं विदच्चित्रीकमणः शुक्रसमनामुषलापनोंके । अयं महान्महता स्कम्भनेनोयामस्तभ्नाद् वृषमो मरुत्वान् ॥५॥ पदार्थ:--- हे मनुष्यो जैसे (अयम्) यह (वृषभः) वृष्टि करनेवाला (मत्त्वान्) बहुत वायु विद्यमान जिसमें ऐसा सूर्य (शुक्रसभानाम्) शुद्धस्थानों और (उपशाम्) प्रभातवेलामों की (मनोके ) सेना में (चित्रवृशीकम्) आश्चर्ययुक्त दर्शन' जिसका ऐसें (अर्णः) जल को (विदत्) प्राप्त होता है और जो (अयम्) यह महान् ) बड़ा (महता) बड़े (स्कम्भनेन) धारण से (धाम्) प्रकाश को (उत्, अस्तम्नात) ऊपर को उठाता है उसको कार्य का उपयोगी करो ॥१॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वान् जनो! आप लोग सूर्य के सदृश प्रातःकाल से लेकर प्रयत्न से विद्यानों को प्रकाशित करके सुख को प्राप्त होमो ॥२॥ फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते है। धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम् माध्यन्दिने सर्वन आ षस्व रयिस्थानो रयिम स्मासु धेहि ॥६॥ RAND बार

ऋग्वेदः मं०६ । सू०४७ ॥
Muke
पदार्थ:-हे (शूर) भय से रहित (इन्द्र) सूर्य के सदृश वर्तमान सेना के
स्वामिन् जैसे (वत्रहा) मेघ का नाश करने वाला (माध्यन्दिने) मध्य दिन में की
गई (सबने) प्रेरणा में (वसूनाम्) पृथिवी प्रादिकों के मध्य से जल को अत्यन्त
पीता है वैसे (समरे) सङ ग्राम में (धृषत) ढीठ हुए (कलशे) पात्र में (सोमम्)
बड़ी ओषधियों के रस को (पिब) पीजिये और (रयिस्थानः) धनों से युक्त हुए (प्रा,
वृषस्व) बलिष्ठ हूजिये और (अस्मासु) हम लोगों में (रयिम्) धन को (धेहि)
धारण करिये ॥६॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु-हे राजन् ! जैसे मध्याह्न में
वर्तमान सूर्य सम्पूर्ण समीप में वर्तमान जगत् को प्रकाशित करता है वैसे
न्याय में वर्तमान हुए आप वादी और प्रतिवादी जनों की व्यवस्था करके
राजनीति से न्याय को प्रकाशित कीजिये ॥६॥
फिर वह राजा कैसा होवे इस विषय को कहते हैं।
इन्द्र प्रणा पुरएतेवं पश्य प नो नय प्रतरं वस्यो अच्छे
भवा सुपारो अतिपारयो नो भवा सुनौतिरुत वामनीतिः ॥७॥
पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करने वाले राजन् अाप (पुरएतेव) आगे
चलने वाले के सदृश (न:) हम लोगों को (प्र, पश्य) अच्छे प्रकार देखिये और (नः)
हम लोगों के (प्रतरम्) शत्रुओं के बल उल्लंघन को (अच्छ) अच्छे प्रकार (प्र, नय)
प्राप्त करिये और (न:) हम लोगों के शत्रुओं के बल का उल्लंघन और (वस्यः)
अतिशय धन को अच्छे प्रकार प्राप्त कराइये और हम लोगों का (सुपारः) सुन्दर
पार जिनसे ऐसे (अतिपारयः) अत्यन्त पार करने वाले (भवा) हूजिये तथा (सुनीतिः)
अच्छे न्यायवाले और (उत) भी (वामनीतिः) प्रशंसित नोतिवाले (भव)
हूजिये ॥७॥
भावार्थ:---जो राजा मनुष्यों की परीक्षा लेने वाला और सब को
न्याय मार्ग से ऐश्वर्य को प्राप्त कराने और दुःख से और सङ्ग्राम से पार
पहुंचाने वाला और सदा धर्मपूर्वक नीतियुक्त होवे वही इस संसार में प्रशंसा
कोपावे ॥७॥
राजा अपने आश्रितों के प्रति कैसा बर्ताव करे इस विषय को कहते हैं ।।
उरुं नौ लोकमनु नेषि विद्वान्त्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति ।
ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप स्थेयाम शरणा बृहन्ता ॥८॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०:४७ ।। . Bhim Sap khane पदार्थ:-है (इन्द्र) न्याय को प्राप्त कराने वाले राजन् जिस (स्थविरस्थ) विद्या और विनय से वृद्ध (ते) अापके (शरणा) शत्रुओं के नाश करने वाले (बृहन्ता) बड़े (ऋष्वो) श्रेष्ठ (बाहू) बल और वीर्य से युक्त भुजाओं को हम लोग (उप, स्थेयाम) प्राप्त होवें वह (विद्वान्) विद्वान् श्राप जिससे (न:) हम लोगों को (उरुम् ) बहुल (स्वर्वत्) अत्यन्त सुख से युक्त (ज्योतिः) ज्ञान का प्रकाश और (अभयम् ) भय से रहित (स्वस्ति) सुख (लोकम्) दर्शन वा वृद्धि को (अनु, नेषि) प्राप्त कराते हो इससे हम लोगों से आदर करने योग्य हो ॥८॥ भावार्थ:-- राजा बड़े प्रयत्न से अपने आधीन प्रजात्रों को विद्या और अभय सुख से युक्त करे जिससे सब प्रजा अनुकूल होवें ॥८॥ फिर वह राजा किन के प्रति कैसा बर्ताव करे इस विषय को कहते हैं। वरिष्ठे न इन्द्र बन्धुरे घा वहिष्ठयोः शतावनश्चयोरा। इषमा वैक्षीषां वर्षिष्ठां मा नस्तरीन्मघववार्यो अर्थः ॥९॥ पवार्थ:-हे (शतावन्) सेनाओं से युक्त (मघवन्) बहुत धन वाले (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् राजन् (रायः) धन के (अर्यः) स्वामी पाप (वहिष्ठयोः) अतिशय ले चलने वाले (अश्वयोः) शीघ्र पहुंचाने वालों के (वरिष्ठे) अतिशय श्रीष्ठ (बन्धुरे) प्रेम बन्धन में वाहन से (नः) हम लोगों को (आ, धाः) सब प्रकार से धारण करिये तथा (इषम्) अन्न को (मा, वक्षि) प्राप्त हूजिये और (नः) हम लोगों को (वषिष्ठाम्) अतिशय वृद्ध (इषाम्) अन्न आदिकों को (मा) नहीं (तारोत) करिये ॥६॥ भावार्थ:--प्रजा और सेना के जनों को चाहिये कि राजा से ऐसी प्रेरणा करें कि आप हम लोगों को उत्तम वाहनों में उत्तम प्रकार बैठाकर अधिक धन प्राप्त कराइये जिससे हम लोगों के वञ्चन को कभी मनुष्य न करें अर्थात् हम लोगों को कभी न ठगे ॥६॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। इन्द्र मुळ माँ जीवातुमिच्छ चोदय धिरमयसो न धाराम् । यत्किञ्चाई स्वायुरिदं वदामि तज्जुषस्व कृधि मा देवदन्तम् ॥१०॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सबके लिये सुख धारण करने वाले श्राप (मा) मुझको (मूळ) सुखी करिये और (मह्यम्) मेरे लिये (जीवातुम्) जीवन की (इच्छ) इच्छा करिये और (अयसः) सुवर्ण के (न) समान धियम्) बुद्धि वा धर्मयुक्त HER RAI ४७ ॥ कर्म को और (धारामा प्रादि धन की इच्छा कर ज्ञाना सुन्दर पुकारना वा संग्राम जिसका उस (शरम्) निर्भयत्व' आदि गुणों से युक्त ५५२ आपकी कामना करता हुआ (अहम्) मैं (यत्) जो (किम्) कुछ (च) भी (वदामि) कहता हूं (तद) उस (इदम्) इसको (जुषस्व) सेवन करिये और (देववन्तम्) विद्वान् जिसके सम्बन्ध में एसा मुझको (कृषि) करिये ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं. राजन् ! जैसे सब जन सुवर्ण करिये और सम्पूर्ण प्रजायें जैसे उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी, यथार्थ ज्ञान, अवस्था और विद्वानों के संग को प्राप्त होवें वैसे करिये ॥१०॥ फिर वह राजा क्या करे और प्रजायें उसका किस लिए आश्रयण करें इस विषय को कहते हैं ।। त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम् । हामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्र स्वस्ति नौ भधवा धाविन्द्रः॥११॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जो (मघवा) अत्यन्त श्रेष्ठ धन से युक्त (इन्द्रः) अत्यन्त एश्वर्य वाला (न:) हम लोगों के लिये (स्वस्ति) सुख को (धातु) धारण करे उसको (हवेहवे) संग्राम संग्राम में (प्रातारम्) पालन करने वाले (अबितारम्) AN SEN and SMCN (इन्द्रम्) श्रेष्ठ गुणों के धारण करने वाले (शक्रम्) समर्थ (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे गए (इन्द्रम्) सेना के धारण करने वाले को (हयामि) पुकारता हूं वैसे इसको पाप लोग भी पुकारो ॥११॥ भावार्थः ---जो मनुष्य जैसे सर्वत्र सहायक परमेश्वर को पुकारते हैं वे वैसे ही राजा का भी सर्वत्र पाश्रयण करें ॥११॥ फिर वह कैसा हो और उसकी रक्षा कौन करें इस विषय को कहते हैं । इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अाभिः मुमूलीको भवतु विश्ववेदाः । बाधतां देषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम ।।१२।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (सुत्रामा) उत्तम प्रकार रक्षा करने वाला (स्थवान्) बहुत अपने जन विद्यमान जिसके ऐसा (विश्ववेदाः) सम्पूर्ण विज्ञान को जानने वाला (इन्द्रः) दुष्टता का नाश करने वाला (प्रयोभिः) रक्षण आदि से हम लोगों का (सुमळीक:) उत्तम प्रकार सुख करने वाला (भवत) हो तथा (द्वषः) द्वेष आदि andy ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४७ ॥ Annu R AD SIN er दोषों से युक्त जनों का (बाधताम्) निवारण करे और (अभयम्) निर्भयपन (कृणोतु) करे उस (सुवीर्यस्य) सुन्दर पराक्रम वा ब्रह्मचर्य वाले के (पतयः) पालन करने वाले स्वामी (स्याम) होवें उसके रक्षक आप लोग भी हूजिये ॥१२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो जो राजा सम्पूर्ण विद्या और किये हुए पूर्ण ब्रह्मचर्य से युक्त बहुत मित्रों वाला और अपने सदृश श्रेष्ठ का रक्षक, दुष्टों को दण्ड देने वाला, सब प्रकार से निर्भयता करता है उसकी रक्षा सब को चाहिये कि सब प्रकार से करें॥१२॥ फिर राजा और प्रजाजन कैसा वर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । तस्य वयं मुमतौ यज्ञियस्थापि भद्रे सौमनसे स्याम । स सुत्रामा स्ववाँ इन्दौ अस्मे आराच्चिद्वेषः सनुतयुयोतु ।।१३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (वयम्) हम लोग (तस्य) उस पहिले प्रातिपादन किये विद्या भौर विनय से युक्त राजा के और (यज्ञियस्य) विद्वानों की सेवा संग और विद्या के दान करने के योग्य' को (सुमतौ) सुन्दर बुद्धि में (सौमनो) उत्तम धर्म से युक्त मानस व्यवहार में (भद्रे) कल्याण करने वाले' में (अपि) भी निश्चय से वर्तमान (स्थाम) होवें और जो (स्ववान्) अपने सामर्थ्य से युक्त (इन्द्रः) विद्या देने वाला (अस्मे) हम लोगों की (सुत्रामा) उत्तम प्रकार पालना करने वाला होता हुआ हम लोगों के (पाराय) समीप वा दूर से (चित्) भी (द्वेषः) धर्म से द्वेष करने वालों को (सनुतः) सदा ही (युयोत) पृथक् करे (सः) वह हम लोगों से सदा सत्कार करने योग्य है ॥१३॥ भावार्थ:-हे राजा और प्रजाजनो ! जिस शुद्ध न्याय और श्रेष्ठ गुणों में राजा बर्ताव करे वैसे इस विषय में हम लोग भी वर्ताव करें और सब मिलकर मनुष्यों से दोषों को दूर करके गुणों को संयुक्त करके सब काल में न्याय और धर्म के पालन करने वाले होवें ॥१३॥ फिर उस राजा का सेवन कौन गुरण करते हैं इस विषय को कहते हैं ।। अव त्वे इन्द्र अवतो नोमिगिरो ब्रह्माणि नियुतो धदन्ते । उरू न राधः सईना पुरूण्यपो गा थनिन्युक्से समिन्दून ॥१४॥ पदार्थ:-है (बजिन) शस्त्र और अस्त्रों से युक्त (इन्द्र) राजन् जो (स्वे) श्राप में (नियुतः) निश्चित सत्यवाद जिन में ऐसी (गिरः) श्रेष्ठ वारिणयां (ब्रह्माणि) धनों वा अन्नों को और (प्रवतः) ननों को (अभिः) लहर (न) जैसे वैसे ५ arta ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४७ ॥ D ANI AIN HIHA (अव, धवन्ते) चलाती हैं और (उरू) बहुत (राधः) धनों को (न) जैसे वैसे (पुरूणि) बहुत (सवना) प्रेरणायें प्राप्त होती हैं और जिस कारण (अपः) जलों (गाः) भूमि वा वाणियों को और (इन्दून्) आनन्दों को (सम्) (युवसे) संयुक्त करते हो इससे आप श्रेष्ठ हो ॥१४॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-जो ब्रह्मचर्य आदि श्रेष्ठ कम्र्मों को करते हैं उनको नीचे के स्थान को जल जैसे और पुरुषार्थी को लक्ष्मी जैसे वैसे सम्पूर्ण विद्या, सम्पूर्ण ऐश्वर्य और सम्पूर्ण आनन्द प्राप्त होते हैं ॥१४॥ फिर कौन किनसे पूछे और समाधान करें इस विषय को कहते हैं । क ई स्तवत्का पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहादेत् । पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः ॥१५॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो इस संसार में {कः) कौन (ईम्) प्राप्त होने योग्य परमात्मा को (स्तवत) स्तुति करे और (क:) कौन सबका (पृणात्) पालन करे (क:) कौन सत्य का (यजाते) यजन करे कि (यद) जो (मघवा) बहुत धन वाला (शचीभिः) कम्मों से (विश्वाहा) सब दिन (उनम्) तेजस्वी (इद) ही की (अवेत्) रक्षा करे तथा (पादाविव) चरणों को जैसे वैसे (अन्यमन्यम्) दूसरे दूसरे को (प्रहरन्) मारता हुप्रा (पूर्वम्) पहिले वाले को (अपरम्) पीछे (कुणोति) करता है ॥१५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-हे विद्वान् जनो ! हम लोग आप लोगों से पूंछते हैं कि इस संसार में कौन ईश्वर की प्रशंसा करता, कौन सब का न्याय से पालन करता और कौन विद्वानों का सत्कार करता इन प्रश्नों का क्रम से उत्तर-जो विद्या के योग से धन से युक्त है वह सर्वदा परमेश्वर ही की स्तुति करता है और जो न्यायकारी राजा पक्षपात का त्याग कर अपराधी को दण्ड देता और धार्मिक का सत्कार करता है वह सर्वरक्षक है और जो स्वयं विद्वान् गुण और दोषों का जानने वाला है वही विद्वानों का सत्कार करने योग्य है ये उत्तर हैं ॥१५॥ फिर वह राजा कैसा होने इस विषय को कहते हैं ।। शण्वे चीर उग्रम दमायनन्धमन्यमतिनेनीयमानः । एधमानद्विळुभयस्य राजा चोकूयते विश इन्द्रों मनुष्यान् ॥१६॥ Amate - W प्रकाशमान राजा (इन्द्रः) विद्या और विनय को धारण करने वाला (विश:, ऋग्वेदः मं०६ । सू०४७ ॥ पदार्थ:-हे मन्त्रीजनो जो (वीर:) शूरता आदि गुणों से युक्त जन (उपमुग्रम्) तेजस्वी तेजस्वी जन को (बमायन्) इन्द्रियों का निग्रह कराता हुआ और (अन्यमन्यम्) दूसरे दूसरे को (अतिनेनीयमानः) अत्यन्त न्याय की व्यवस्था को प्राप्त कराता हुभा (एधमानद्विद्) वृद्धि को प्राप्त होते हुओं से द्वेष करने वाला और (उभयस्य) राजा तथा प्रजाजन समुदाय का (राजा) न्याय और विनय से मनुष्यान्) प्रजाजनों को (चोकूयते) निरन्तर पुकारता है उसको मैं न्यायेश (शृण्वे) सुनता हूँ ॥१६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो मनुष्य दुष्टों दुष्टों को ताड़न करता, श्रेष्ठों श्रेष्ठों का सत्कार करता, अन्य की वृद्धि देख कर द्वेष करने वालों को दण्ड देता और प्रसन्नों का सत्कार करता हुमा सम्पूर्ण वादी और प्रति- बादी के वचनों को यथावत् सुन के सत्य न्याय को करता है वही राजा होने के योग्य है ॥१६॥ फिर वह राजा क्या नहीं करके क्या करे इस विषय को कहते हैं। परा पूर्वेषां सख्या णक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति । अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्णरिन्द्रः शरदस्तरीति ॥१७॥ पदार्थ:--जो सूर्य के सदृश (इन्द्रः) राजा (पूर्वेषाम्) पूर्वजनों के (सख्या) मित्र से (वितत्तुं राणः) विशेष करके अत्यन्त हिंसा करता और (अनानुभूती:) अनुभव से रहित जनों को (अवधूवान:) नीचे को कम्पाता हुआ (परा, वृक्ति) त्यागता है और (अपरेभिः) अन्यों के साथ (एति) जाता है वह जैसे सूर्य (पूर्वोः) प्राचीन (शरदः) शरद् प्रादि ऋतुओं को वैसे वर्षों के (सतरीति) अत्यन्त पार होता है ॥१७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-जो राजा वृद्ध जनों के मित्रपन का त्याग करके नीच मित्रों को प्राप्त होता है वह कल्याण से च्युत होता है और जो अनभिज्ञ मित्रों का त्याग करके अभिज्ञों को मित्र करता है वही पूर्ण प्राय भर सुख से पार होता है ॥१७॥ फिर यह जीवात्मा कैसा होता है विषय को कहते हैं। रूपरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हर्रयः शता दर्श ॥१८॥ R- A ऋग्वेदः म०६ । सू० ४७ ॥ .. wa पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (इन्द्रः) जीव (मायाभिः) बुद्धियों से (प्रतिचक्षणाय) प्रत्यक्ष कथन के लिये (रूपंरूपम्) रूप रूप के (प्रतिरूपः) प्रतिरूप अर्थात् उसके स्वरूप से वर्तमान (बभूव) होता है और (पुरुरूपः) बहुत शरीर धारण करने से अनेक प्रकार का (ईयते) पाया जाता है (तद) वह (श्रस्य) इस शरीर का (रूपम् ) रूप है और जिस (अस्य) इस जीवात्मा के (हि) निश्चय करके (दश) दश संख्या के विशिष्ट और (शता) सौ संख्या से विशिष्ट (हरयः) घोड़ों के समान इन्द्रिय अन्तः- करण और प्रारण (युस्ताः) युक्त हुए शरीर को धारण करते हैं वह इसका सामर्थ्य है ॥१८॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुक. मनुष्यो ! जैसे बिजुली पदाथ पदार्थ के प्रति तद्रूप होती है वैसे ही जीव शरीर शरीर के प्रति तत्स्वभाव वाला होता है और जब बाह्य विषय के देखने की इच्छा करता है तब उसको देख के तत्स्वरूपज्ञान इस जीव को होता है और जो जीव के शरीर में बिजुली के सहित असंख्य नाड़ी हैं उन नाड़ियों से यह सब शरीर के समा- चार को जानता है ॥१८॥ फिर वह जीव इस देह में कैसा वर्ताव करे इस विषय को कहते हैं । युजानो हरिता रथे भूरि त्वष्टेह राजति । को विश्वाहां द्विषतः पक्ष आसत उत.सीनेषु सूरिषु ।।१९॥ पदार्थ:--जैसे (क:) कोई भी सारथी (रथे) सुन्दर वाहन के सदृश शरीर में (हरिता) ले चलने वाले घोड़ों को (युजानः) जोड़ता हुआ (भूरि) बहुत (राजति) प्रकाशित होता है वैसे (त्वष्टा) सूक्ष्म करने वाला जीव' (इह) इस शरीर में (राजति) प्रकाशित होता है और (क:) कौन (इह) इस शरीर में (विश्वाहा) सब दिन (द्विषतः) द्वेष से युक्त का (पक्षः) ग्रहण करता (पासते) है और (उत) भी (प्रासीनेष) स्थित (सुरिषु) विद्वानों में मूर्ख का प्राश्रय कौन करता है ॥१६॥ भावार्थः--इस मन्त्र में वाचकलु-हे मनुष्यो ! सदा ही मूखों का पक्ष त्याग के विद्वानों के पक्ष में वर्ताव करिये और जैसे अच्छा सारथी घोड़ों को अच्छे प्रकार जोड़ कर रथ में, सुख से गमन आदि कार्यों को सिद्ध करता है वैसे जितेन्द्रिय जीव सम्पूर्ण अपने प्रयोजनों को सिद्ध कर सकता है और जैसे कोई दुष्ट सारथी घोड़ों से युक्त रथ में स्थित होकर दुःखी | होता है वैसे ही अजित. इन्द्रियाँ जिसमें ऐसे शरीर में स्थित होकर जीव दुःखी होता है ॥१६॥ aurepp M AWN - RAM समें उस गृह ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४७ ।। फिर मनुष्य कैसे आरोग्य को प्राप्त होवें इस विषय को कहते हैं । अगम्यूति क्षेत्रमागन्म देवा उर्वी सती भूमिरहूरणाभूत् । बृहस्पते प्र चिकित्सा गविष्टावित्था सत्ते जरित्र इन्द्र पन्थाम् ।।२०॥ पदार्थ:--हे (बृहस्पते) बड़ों के पालन करने (चिकित्सा) रोगों की परीक्षा करने और (इन्द्र) रोग और दोषों के दूर करने वाले वैद्यराज आपके सहाय से (उर्वी) बहुत फल आदि से युक्त (सती) वर्तमान (अंहूरणा) चलने वालों का संग्राम जिसमें वह (भूमिः) पृथिवी (अभूत) होती है और जहां (अगव्यूति) दो कोस के परिमाण से रहित (क्षेत्रम्) निवास करते हैं जिस स्थान में ऐसा स्थान होता उसको (देवाः) विद्वान् हम लोग (मा, अगन्म) सब प्रकार से प्राप्त होवें (इस्था) इस प्रकार से वा इस हेतु से (गविष्टौ) उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी की संगति में (सते) वर्तमान (जरित्रे) स्तुति करने वाले के लिये (पन्यास) मार्ग को (प्र) अच्छे प्रकार प्राप्त होवें ॥२०॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो श्रेष्ठ वैद्य होवें उनके साथ मित्रता से रोग रहित, अधिक अवस्था वाले, बलिष्ठ, विद्वान् हो और भूमि के राज्य को प्राप्त होकर जहां कहीं विमान आदि वाहनों से जा, पा, कर विद्वानों के मार्ग का आश्रयण करो॥२०॥ फिर ने राजा और प्रजाजन कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । दिवेदिवे सदृशीरन्यमबै कृष्णा असेघदप सझनो जाः। अहन्दासा द्वेषभो वस्नयन्तोदव्रजे वर्चिनं शंबरं च ॥२१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (जाः) प्रकट हुआ सूर्य (दिवेदिवे) प्रतिदिन (सदृशीः) तुल्य स्वरूपयुक्त (कृष्णा:) खराब वर्ण वाली वा खोदी गई पृथिवियों और (अन्य ) अन्य' (अर्द्धम् ) आधे को । (च) भी (असेधत) अलग करता है और तथा (वृषभः) वृष्टि करने वाला (उदबजे) जल जाते हैं जिसमें उसमें (वचिनम्) प्रकाशमान (शम्बरम्) मेघ का (अहन्) नाश करता है वैसे (वस्नयन्ता) निवास के समान आचरण करते हुए राजा और प्रजाजन (दासा) उपेक्षा करने वाले वर्ताव करें ॥२१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य और मेघ समस्त पृथिवी का आकर्षण कर प्रकाश और जलयुक्त करते हैं। वा जैसे सूर्य इस पृथिवी के अद्धभाग को प्रकाशित करता और वर्षा को करता है तथा अन्धकार का - 30 करते हुए करें ॥२१॥ मापसे (दश) दश संख्या से युक्त (अश्वान्) घोड़ों और (दश) ऋग्वेदः मं०६ । सू०४७ ।। निवारण कर सबको सुखी करता है वैसे ही राजा और प्रजाजन सत्य को खंच असत्य को त्याग कर अन्याय का निवारण कर न्याय का प्रचार कर और उत्तम विद्या के उपदेशों की वृष्टि कर सब मनुष्यों को सुखी फिर वे राजा और प्रजाजन परस्पर कैसा बर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । प्रस्तोक इन्न राधसस्त इन्द्र दश कोशयीर्दर्श वाजिनोऽदात् । दिवोदासाइतिथिग्वस्य राध: शाम्बरं वसु प्रत्यग्रभीष्म ॥२२॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सूर्य के सदृश अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त जो (ते) अापके (वाजिनः) बहुत अन्नों से युक्त (राधसः) धन की (दश) दश (कोशयोः) कोशों खजानों को प्राप्त होने वाली भूमियों की (प्रस्तोकः) स्तुति करने वाला (प्रदात) देता है और (दश) दशगुनी सम्पादित करता और जिस (अतिथिग्वस्य) अतिथियों को प्राप्त होने वाले के (दिवोदासात्) प्रकाश देने वाले से प्राप्त हुए (राधः) धन को (शाम्बरम्) और मेघ में हुए विस) जल' नामक द्रव्य को हम लोग (प्रति, अग्रभीष्म) ग्रहण करें उसको (इद) ही (नु) शीघ्र आप हम लोगों के लिये दीजिये उसको ही शीघ्र हम लोग आपके लिये देवें ॥२२॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो आपके राज्य में असंख्य धनों को देने, वृष्टि करने तथा अतिथियों के संग का सेवन करने वाला जन होवे उसकी रक्षा को प्राप करिये और जो हम लोगों को धन प्राप्त होवे उसको आपके लिये हम लोग देवें और जो आपको प्राप्त होवे उसको हम लोगों के लिये दीजिये ॥२२॥ फिर मन्त्रीजन राजा से क्या प्राप्त करें इस विषय को कहते हैं ।। दशाश्वान्दश कोशान्दश वस्त्राधिभोजना। दशी हिरण्यपिण्डान्दिवोदासादसानिषम् ।।२३।। पदार्थ:-हे ऐश्वयं से युक्त राजन् (विवोदासात) सुन्दर धन के दोने वाले दश संख्या से युक्त (कोशान्) दशगुने धन से पूर्ण खजानों और (दश) दश प्रकार के (वस्त्रा) वस्त्रों को और दश प्रकार के (अधिभोजना) अधिक भोजनों को और (दशो) दश प्रकार के (हिरण्यपिण्डान्) सुवर्ण आदि समूहों को मैं (असानिषम्) संविभाग कारके प्राप्त होऊ ॥२३॥ ANP AARA ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४७ ॥ ५५६ woma :- भावार्थः--जो धार्मिक, शूरवीर और शत्रुओं के जीतने वाले, राज- भक्त और प्रजा के पालन में तत्पर विद्वान् मन्त्रीजन होवें वे घोड़े आदि सम्पूर्ण पदार्थों को दशगुने राजा के समीप से प्राप्त करें ॥२३॥ फिर वह राजा अधिकार किसके लिये देवे इस विषय को कहते हैं ।। दश स्थान्प्रष्टिंमतः शतं गा अथर्वभ्यः । अश्वयः पायवेऽदात् ।।२४॥ पदार्थः- हे राजन् वा गृहस्थ लोगो ! जैसे (अश्वथः) भोजन करने वाला बुद्धिमान् जन (पायवे) पालन के लिये' (अथवभ्यः) नहीं हिंसा करने वालों को (प्रष्टिमतः) नहीं इच्छा विद्यमान जिनमें उन (बश) दश संख्या से विशिष्ट (रथान्) वाहनों को और (शतम्) सौ (गा:) गौओं को (नदात) देवे वैसे आप भी दीजिये ॥२४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० - जो राजा आदि जन पालन करने योग्य के लिये पशु रथ आदि के रक्षण के अधिकार को देते हैं वे अच्छी सामग्री से युक्त होते हैं ।।२४।। फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । महि राधौ विश्वर्जन्यं दधानान्भरद्वाजान्लार्जयो अभ्ययष्ट ॥२५॥ पदार्थ:-जो (साञ्जयः) अनेक प्रकार के न्याययुक्त व्यवहारों को बनानेवाले का सन्तान (महि) बड़े (विश्वजन्यम्) संसार से वा सम्पूर्ण से उत्पन्न होने योग्य वा सम्पूर्ण सुख को उत्पन्न करने वाले (राधः) धन को (वधानान्) धारण करने वाले (भरद्वाजान्) अन्न आदि के धारणकर्तामों के (अभि, अयष्ट) सन्मुख जावे वह राजा चक्रवर्ती होवे ॥२५॥ भावार्थ:--जो ब्रह्मचर्य से शरीर और आत्मा को बलिष्ठ कर और सम्पूर्ण ऐश्वर्य को बढ़ाय के उत्तम पुरुषों को ग्रहण करता है वही राजा राज्य के बढ़ाने के योग्य होवे ॥२५।। फिर वह राजा कैसे मित्रों की इच्छा करे इस विषय को कहते हैं । वनस्पते वीड्दङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवी।। गोभिः संनद्धो असि वीळय स्वास्थाता लें जयतु जेवानि ॥२६॥ पदार्थ:-हे (वनस्पते) किरणों के पालन करने वाले सूर्य के समान वर्तमान (हि। जिससे (बीड्वङ्गः) बलिष्ठ अङ्ग जिनके वह (प्रतरणः) पार करने वाले (सुवीरः) अच्छे प्रकार वीरों से युक्त (गोभिः) उत्तम प्रकार शिक्षित वारिणयों m m ऋग्वेदः म०६। सू०४७ ।। miu Hote AHARY के साथ (सन्नद्धः) अच्छे प्रकार तैयार हुए अाप (प्रसि) हो इससे' (अस्मत्सखा) हम लोगों के मित्र (भूयाः) हूजिये और (प्रास्थाता) स्थिति से युक्त हुए हम लोगों को (वीळयस्व) दृढ़ कराइये (ते) आपकी सेना (जेत्वानि) जीतने योग्य' शत्रुओं की सेनाओं को (जयतु) जीते ॥२६।। भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक बलवान् के साथ मित्रता करें जिससे सर्वदा विजय हो ॥२६॥ फिर मनुष्यों को किन से' उपकार ग्रहण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । दिवसृथिव्याः पर्योज उद्भूतं वनस्पतिभ्यः पर्षाभृतं सहः। अपामोन्मानं परि गोभिराष्ट्रतमिन्द्रस्य वज्र हविषा रथ यज ॥२७॥ पदार्थ:-हे विद्वन् पाप (दिवः) बिजुली से वा सूर्य से (पृथिव्याः) भूमि वा अन्तरिक्ष से (वनस्पतिभ्यः) बट आदि बनस्पतियों से (प्रोजः) बल (उद्धृतम्) उत्तम रीति से धारण किया गया वा (सहः) बल (परि) सब प्रकार से (प्राभूतम्) सन्मुख धारण किया गया और (गोभिः) किरणों से (अपाम्) जलों के (ोज्मानम्) बलकारी (परि) सब ओर से (प्रावृतम्) ढांपे गये (इन्द्रस्य) बिजुली के (वत्रम्) प्रहार को और (स्थम्) विमान आदि वाहन विशेष को (हविषा) सामग्री के दान से (परि, यज) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये ॥२७॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सब ओर से बल को ग्रहण करके जलों के बलकारी मेघ को जैसे वैसे सुख को वर्षाते हैं वे सब प्रकार से सत्कृत होते हैं ॥२७॥ फिर राजा को बिजुली से क्या सिद्ध करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । इन्द्रस्य वो मरुवामनीक मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः। सेमां नो हव्यदाति जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गूभाय ॥२८॥ पदार्थ:-हे (देव, रथ) सुन्दर विद्वन् राजन् अपि जो (मराताम्) मनुष्यों की (अनीकम्) सेना के सदृश (इन्द्रस्य) बिजुली की (वनः) धमक वा शब्द (मित्रस्य) प्राण के (गर्भः) मध्य में स्थित और (वरुणस्य) श्रेष्ठ वायु का (नाभिः) बन्धन है (सः) वह (नः) हम लोगों की (इमाम्) इस (हव्यदातिम्) देने योग्य दान की क्रिया को (जुषाणः) सेवन करता हुआ (हव्या) ग्रहण करने योग्यों को देता है उसको आप (प्रति, गृभाय) प्रतीति से ग्रहण करिये ॥२८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र मे वाचकलु•-हे विद्वान् जनो ! बिजुली आदि ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४७ ।। . New - पदार्थों और सम्पूर्ण मूर्त द्रव्यों के मध्य में वर्तमान कर्मों से युक्त सेना को करके विजय से शोभित हूजिये ॥२८॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। उप श्वासय पृथिवीमुत यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत् । स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूरादवीयो अप सेध शत्रन् ॥२९॥ पदार्थ:---हे (दुन्दुभे) दुन्दुभि के सदृश गर्जने वाले' जैसे (सः) वह जगदीश्वर (पृथिवीम्) भूमि वा अन्तरिक्ष को और (उत) भी (द्याम्) सूर्य वा बिजुली को (विष्ठितम्) विशेष करके स्थित (जगत) व्यतीत होने वाले संसार को (मनुताम्) जाने उस ज्ञान से (पुरुत्रा) सम्पूर्ण पदार्थों में हुए (इन्द्रेण) बिजुलीरूप अस्त्र से और (देवः) विद्वान् वीरों से (लजूः) संयुक्त प्राप (शत्रून) शत्रुओं को (दूरात) दूर से (दवीयः) अति दूर (अय, सेव) हटाइये और जो (ते) आपके कल्याण को जाने उसकी उपासना करके सब को (उप, श्वासय) समझाइये ॥२६।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर ने पृथिवी और सूर्यादि सम्पूर्ण संसार को अपनी सत्ता से स्थापित किया वैसे ही बिजुली सम्पूर्ण द्रव्यों में अभिव्याप्त होकर मध्य में प्रविष्ट है, ईश्वर की उपासना और बिजुली आदि के प्रयोगों से दूर पर स्थित भी शत्रुओं को जीत कर सब को जिलामो ॥२६॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । आ क्रन्दय बलमोजे न आ धा निः टंनिहि दुरिता बाधमानः । अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि बीळयस्व ॥३०॥ पदार्थ:- हे (दुन्दुभे) दुन्दुभी के समान वर्तमान श्राप (न:) हम लोगों के लिए (बलम्) सामर्थ्य को और (प्रोजः) पराक्रम को (श्रा, धाः) धारण करिये और शत्रुओं को (प्रा) सब ओर से (कन्दय) रुलाइये और बुलाइये तथा हम लोगों को (निः) अत्यन्त (स्तनिहि) शब्द कराइये और (दुरिता) दुष्ट व्यसनों को (बाधमानः) नष्ट करते हुए (दुच्छुनाः) दुष्ट कुत्तों के समान वर्तमान शत्रुओं के (अप, प्रोथ) जीतने को पर्याप्त हूजिये अर्थात् शत्रुओं को असमर्थ करिये जिससे आप (इन्द्रस्य) बिजुली की (मुष्टिः) मुष्टि के समान दुष्टों के मारने वाले (असि) हो इससे हम लोगों को (वीळयस्व) बलयुक्त करिये ॥३०॥ भावार्थः --हे राजन् ! आप ऐसे बल को धारण करिये जिससे दुष्ट . !

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४७ ॥ व्यसन, और दुष्ट शत्रु नष्ट होवें और आप प्रजाओं के पोषण करने को समर्थ होवें ॥३०॥ फिर राजा आदि जन क्या करें इस विषय को कहते हैं । आमूरज प्रत्यावर्तमाः कतुमईन्दुभिवावदीति । समवपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनौ जयन्तु ॥३१॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) शत्रुओं के विदीर्ण करने वाले राजन् श्राप जैसे (बुन्दुभिः) नगाड़ा (केतुमत्) प्रशंसायोग्य बुद्धियुक्त (वावदीति) निरन्तर बजता है वैसे (इमाः) यह (अश्वपर्णाः) महान् पक्षों वाली अपनी सेनाए (प्रत्यावर्त्तय) लौटाइये और उन से (अमूः) यह शत्रुसेनाए दूर (मा, अज) फेंकिये जो (अस्माकम्) हमारे (रथिनः) प्रशंसित रथ वाले (नरः) नायक नीर हमारे शत्रुओं को (जयन्तु) जीतें और जो विजय के लिए (सम्, परन्ति) सम्यक् विचरते हैं वे (न:) हम लोगों को सुशोभित करें ॥३१॥ भावार्थ:-हे राजा आदि जनो ! तुम लोग दुन्दुभि आदि वाजनों से भूषित, हर्ष वा पुष्टि से युक्त सेनाओं को अच्छे प्रकार रख कर इनसे दूरस्थ भी शत्रुओं को अच्छे प्रकार जीतकर प्रजाओं को धर्मयुक्त व्यवहार से पालन करो ॥३१॥ इस सूक्त में सोम, प्रश्नोत्तर, बिजुली, राजा, प्रजा, सेना और वाजनों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । इस अध्याय में इन्द्र, सोम, ईश्वर, राजा, प्रजा, मेघ, सूर्य, वीर, सेना, यान, यज्ञ, मित्र, ऐश्वर्य, प्रज्ञा, बिजुली, बुद्धिमान, वाणी, सत्य, बल, पराक्रम, राजनीति, संग्राम और शत्रुविजय प्रादि गुणों का वर्णन होने से इस अध्याय की पूर्वाध्याय के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में सैंतालीसवां सूक्त समाप्त हुना ॥ - .

* ओ३म् * अथ चतुर्थाष्टकऽष्टमाध्यायारम्भः॥ - । विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परसुव । यद्भद्रं तन्न मा सुंव ॥१॥ अथ द्वाविंशत्यूचस्याष्टचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य शंयुर्हिस्पत्य ऋषिः । तृण- पाणिकं पृश्निसूक्तम् ॥ १-१० अग्निः । ११ । १३ । २० । २१ मरुतः । १३- १५ मरुतो लिंगोक्ता देवता था। १६-१६ पूषा । २२ पृश्निावाभूमी वा। १ । ४ १५ । १४ बृहती। ३ ! १६ विराबृहती। १० । १२ । १७ भुरिग्बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः । २ मार्ची जगती छन्दः । १५ निवृदतिजगती छन्दः । निषाद: स्वरः । ६ । २१ त्रिष्टुप् । ७ निवृत्रिष्टुप् । ८ भुरित्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ६ भुरिगनुष्टुप् । २० स्वराउनुष्टुप् । ३२ अनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः । ११ । १६ उष्णिक । १३ । १८ निचूदुष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः ।। अब चतुर्थाष्टक के अष्टमाध्याय का प्रारम्भ है इसमें बाईस ऋचावाले अड़तालीसवें सूक्त के प्रथम मन्त्र में विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय का वर्णन करते हैं। यज्ञाय॑ज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे । प्रम वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न बसिषम् ।।१।। पदार्थः-हे विद्वान् जनो (व:) आप के (यज्ञायज्ञा) यज्ञयज्ञ में (गिरा-गिरा, च) और वाणी वाणी से (अग्नये) अग्नि (दक्षसे) जो कि विचक्षण है उसके लिये (वयम्) हम लोग प्रयत्न करें । और (अमृतम्) नाश से रहित (जातवेदसम्) जात- वेदस् अर्थात् जिससे विद्या उत्पन्न हुई ऐसे अग्नि (प्रियम्) मनोहर (मित्रम्) मित्र के (न) समान तुम लोगों की मैं जैसे (प्रप्र, शंसिषम्) वार वार प्रशंसा करू वैसे प्राप भी हम लोगों की प्रशंसा कीजिये ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन आप लोगों की प्रीति उत्पन्न करें वैसे आप भी हमारे कार्य साधने के लिये प्रीति उत्पन्न कीजिये ॥१॥ 49 ER

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ऋग्वेदः मं०६ । सू०४८ ॥
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फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वर्ते इस विषय को कहते हैं ।
ऊर्जा नपतिं स हिनायमस्मयुर्दाशेम हव्यदातये ।
भुवद्वाजेष्वपिता भुव॑द् वृध उत त्राता तनूनाम् ॥२॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अयम्) यह (अस्मयुः) हम लोगों की कामना करने
वाला तथा (हव्यदातये) देने योग्य दान के लिए (अविता) रक्षा करने वाला (भवत)
होवे और (वाजेषु) संग्रामों में रक्षा करने वाला (भुवत) हो तथा वृधः) वृद्धि करने
वा रक्षा करने वाला हो (उत्त) और (तनूनाम्) शरीरों का (त्राता) पालन करनेवाला
उसको (ऊर्ज:) पराक्रम के (नपातम्) नपातन कराने अर्थात् न विनाश कराने
बाले की अच्छे प्रकार रक्षा कर हम सुख (दाशेम) देवें (सः, हिन) वही हमारे लिए
सुख देवे ॥२॥
भावार्थ:-हे प्रजासेनाजनो! जो राजा संग्राम वा असंग्राम में सबकी
रक्षा करने वाला निरन्तर हो तदनुकूल वर्ताव कर हम लोग उसके लिये
पुष्कल सुख देवें ॥२॥
फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
वृषा ह्यग्ने अजरो महान्विभास्यर्चिषां ।
अजस्त्रेण शोचिषा शोशुंचच्छुचे सुदीतिभिः सु दीदिहि ॥३॥
पदार्थ:--हे (शुचे) विद्या और विनय से प्रकाशित (अग्ने) पावक के समान
वर्तमान (हि) जिससे (वृषा) अत्यन्त बलवान् (अजारः) जरा अवस्था से रहित
(महान्) बड़े प्राप (अजस्रण) निरन्तर (अचिषा) सत्कार वा दीप्ति से (शोचिषा)
वा प्रकाश से (शोशुचत) निरन्तर पवित्र करते हुए (सुदीतिभिः) उत्तम दीप्तियों से
सबको (विभासि) विशेषता से प्रकाशित करते हैं इससे हम लोगों को (स, दीदिहि)
प्रकाशित कीजिये ॥३॥
भावार्थ:-हे राजन् ! आपको चाहिये कि निरन्तर विद्या और
विनय के प्रकाश से और दुष्ट व्यसनों के नाश से प्रजा की निरन्तर पालना
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3210
करो ॥३॥
फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं।
महो देवान्यजसि यक्ष्यानुषक्तव क्रत्वोत दंसना ।
अर्वाचः सी कृणुाग्नेऽवसे रास्व वाजोत वस्व ॥४॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४८ ।। ) पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान राजन् अाप (अर्वाचः) जो प्राप्त होते उन (महः) महान् अत्युत्तम महात्मा (देवान्) विद्वान्जनों से (यजसि) संगत होते हैं और (प्रानुषक) अनुकूलता में (वंसना) कर्मों को (यक्षि) संगत करते हैं उन (तव) आपकी (क्रत्वा) प्रज्ञा से हम लोग उनको संगत करें (उत) और (अवसे) रक्षा के अर्थ हम लोगों के लिए (रास्व) दीजिये और (सीम् ) सब ओर से सुख (कृणुहि) कीजिये (उत) और (बाजा) अन्नों का (वस्व) सेवन कीजिए ॥४॥ भावार्थ:-जो मूों को विद्वान् करते हैं वे महत् अनुकूल सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। यमापो अद्रयो वना गर्भमृतस्य पिप्रति । सहसा यो मथितो जायते नृभिः पृथिव्या अधि सानावे ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यम्) जिस (ऋतस्य) जल के (गर्भम्) गर्भरूप संसार को (आपः) जल (अद्रयः) मेघ और (बना) किरण (पिप्रति) पूरण करते हैं और (यः) जो (नृभिः) नायक मनुष्यों से (सहसा) बल से (मथितः) मथा हुना (पृथिव्याः) पृथिवी के (अधि) कार (सानवि) पर्वत के शिखर पर (जायते) प्रसिद्ध होता है उस अग्नि को तुम अच्छे प्रकार युक्त करो ॥५॥ भावार्थः --हे मनुष्यो ! जो सब में व्याप्त होकर रहने वाले अग्नि को विद्वान् जन प्राप्त होते और मथ के प्रदीप्त करते हैं वे भूमि के राज्य करने में अधिष्ठाता होते हैं ॥५॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। आ यः पौ भानुना रोदंपी उभे धूमेन धावते दिवि । तिरस्तमो दहश जाखा श्यावास्वरुषो वृषा श्यावा अंरुषो वृषा ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो तुम (य:) जो (भानुना) किरण से (उभे) दोनों (रोवसी) द्यावापृथिवी को (श्रा, पौ) व्याप्त होता और (धूमेन) धूमसे (दिवि) अन्तरिक्ष में (धावते) दौड़ता है तथा (श्यावासु) काली (ऊर्यास) रात्रियों में जो (तमः) अन्धकार उसको (तिरः) तिरस्कार कर (अरुषः) लाल रंगवाला (वृषा) वर्षा का निमित्त है और जिसकी (श्यावाः) वेगवती किरणें विद्यमान हैं जो (अरुषः) कुछ लाली लिये हुए है वह (वृषा) वर्षा करने वाला सूर्य (आ, ददृशे) अच्छे प्रकार देखा जाता है उसे (मा) अच्छे प्रकार जानो ॥६॥ म - - ऋग्वेदः मं०६ । सू०.४५॥ MER 40 भावार्थ:-जिस बिजुलीरूप आग से भूमि और सूर्य दिखाते हैं, जिससे अधिक वेगवान् कोई नहीं तथा जो अन्धकार की निवृत्ति करने वाला है उसका अच्छे प्रकार प्रयोग करो ॥६॥ फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये इस विषयको कहते हैं ।। बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा । भरद्वांजे समिधानो यविष्ठ्य रेवनः शुक्र दीदिहि धुमत्पादक दीदिहि ॥७॥ पदार्थः हे (शुक्र) शीघ्र कर्म करने (पावक) वा पवित्र करने (यविष्ठय) वा अतीव युवा अवस्था रखने वा (देव) देने वाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान विद्वन् जैसे अग्नि (बृहद्भिः) महान् (अचिभिः) तेजों से' (भरद्वाज) विज्ञानादि के धारण करने वाले व्यवहार में (समिधान:) अच्छे प्रकार देदीप्यमान (न:) हमारे लिये (धुमव) प्रशस्त प्रकाश वा (रेवद) प्रशस्त ऐश्वर्य से युक्त धन को देता है वैसे (शुक्रण) शुद्ध (शोचिषा) न्याय के प्रकाश से उसे' (दोदिहि) प्रकाशित कीजिए, तथा विद्या और नम्रता (दीदिहि) दीजिये ॥७॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु:--- -जो विद्वान् जन सूर्य के समान शुभ गुणों में बल बा सुशीलता से लक्ष्मी को प्राप्त होकर प्रकाशित होते हैं वे सत्कार करने योग्य हैं ॥७॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । विश्वासां गृहपतिर्षिशामसि त्वमग्ने मानुषीणाम् । शत पूभिर्यविष्ठ । पाचंहसः समेद्धार शतं हिमाः स्तोतभ्यो से च ददति ॥८॥ पदार्थ:-हे (यविष्ठ) शरीर और प्रात्मा के बल से युक्त (अग्ने) दुष्टों के दाह करने वाले (2) जो (स्तोतृभ्यः) स्तुति करने वाले विद्वानों से (शतम् ) सौ (हिमाः) वृद्धि वा हेमन्त आदि ऋतुओं तक (समेद्वारम्) अच्छे प्रकार प्रकाश करने वाले को (ददति) देते (च) और शुभ गुणों को ग्रहण कर दूसरों को देते हैं उनके साथ युक्त (विश्वासाम्) समस्त (मानुषीणाम्) मनुष्यसम्बन्धी (विशाम् । प्रजाजनों के बीच जिससे (त्वम्) पाप (गृहपतिः) घर के स्वामी (असि) हैं वा पूभिः) नगरों के साथ इनके लिये (शतम्) सौ पदार्थ देते हैं इस कारण हम लोगों की (अंहसः) दुष्ट आचरण से (पाहि) रक्षा करो ॥८॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो इस प्रजा में विद्या और धर्म आदि शुभ ग्रहण कराते हैं उनका तुम निरन्तर सत्कार करो और वे आपका भी सत्कार का ॥८॥ A Upada ''. गुणों को ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४८ ॥ - maa and- . फिर विद्वान् जन सन्तानों को कैसे शिक्षा दें इस विषय को कहते हैं। त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधांसि चोदय । अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः ॥९॥ पदार्थः- हे (वसो) वास कराने वाले (अग्ने) बिजुली के समान पुरुषार्थी जन (चित्रः) अद्भुत पुरुषार्थ करने वाले (त्वम्) श्राप (ऊत्या) रक्षा से (नः) हम लोगों के (राधांसि) समृद्ध धनों की रक्षा करो तथा (अस्य) इसके रायः) धन की (चोदय) प्रेरणा करो जिस कारण प्राप (विदाः) विज्ञानवान् और (रथीः) बहुत प्रशंसायुक्त रथवाले (असि) हैं इस कारण से (तु) फिर (नः) हम लोगों के (तचे) सन्तान के लिए (गाधम्) बुद्धि विलोड़ने की प्रेरणा करो ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप जैसे इन हमारे संतानों की बुद्धि के बिलोड़ने से विद्या प्राप्ति हो वैसे अनुविधान कीजिये तथा जैसे पुरुषार्थी जन धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये प्रेरणा करता है वैसे ही आप शिक्षा दीजिये॥६॥ फिर मनुष्यों को कौन सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं ।। पर्षि तोकं तनयं पतभिष्ट्वमदब्बैरप्रयुत्वभिः । अग्ने हेळासि दैव्या युयोधि नोऽदैवानि हरांसि च ॥१०॥ पदार्थ:-हे (बग्ने) पढ़ाने वाले जिस कारण (त्वम्) अाप (अप्रथस्वभिः) न मिले हुए अर्थात् अलग अलग विधमान (अदब्धः) हिंसारहित (पतभिः) पालना करने वाले व्यवहारों से (न:) हमारे (तोकम्) शीघ्र उत्पन्न हुए. सन्तान वा (तनयम्) सुन्दर कुमार की (पषि) पालना करते हो और (प्रदेवानि) अशुद्ध (देव्या) विद्वानों में कहे गये (हेळांसि) अनादरों और (हरसि) कुटिल कर्मों को (च) भी (पयोधि) अलग करते हो इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१०॥ भावार्थ:-जो अध्यापक वा उपदेशक पढ़ाने तथा उपदेश करने से शुभ गुणों को ग्रहण करा कर सब के दोषों का निवारण कराते हैं वे ही सदा सत्कार करने योग्य होते हैं ॥१०॥ कौन इस संसार में मित्र हैं इस विषय को कहते हैं ।। आ संखाया सबघाँ धेनुमजध्वमुप नभ्यसा वचः । सृजध्वमनपस्फुराम् ॥११॥ R 20- ३ ... EARN

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४८॥
श
पदार्थः है (सखायः) मित्रवर्मो तुम (नव्यसा) अतीव नवीन पढ़ाने वा
उपदेश करने से (सबर्दुधाम् ) समस्त कामनाओं की पूर्ण करने वाली (अनपस्फुराम्)
निश्चल दृढ धेनुम् ) वाणी को (प्रजध्वम्) प्राप्त करिये तथा (बच:) अर्थात् वचन
को (उप, मा, सृजध्वम्) विविध प्रकार की विद्या से युक्त करो ॥११॥
भावार्थ:-जो सुहृद् होकर सत्य, सुन्दर शिक्षायुक्त, वाणी और विद्या
को विद्यार्थियों को
ग्रहण कराते हैं वे संसार के शुद्ध करने वाले होते
हैं ॥११॥
अब माता जन सन्तानों को सदा शिक्षा देवे इस विषय को कहते हैं ।
या शर्धाय मारताय स्वभानवे श्रवोऽमृत्यु धुसंत ।
या मूळोके मरुतो तुराणां ग सुम्नैरेक्यावरी ॥१२॥
पक्षार्थ:-हे विद्वान् जनो (या) जो विद्या और सुन्दर शिक्षायुक्त विद्या
पढ़ाने वा उपदेश करने वाली (मारुताय) मनुष्यों के इस (स्वभानवे) अपनी विशेष
बुद्धि के प्रकाश वा (शर्धाय) बल के लिये (प्रमृत्यु) जिसमें मुत्य भय विद्यमान नहीं
उस (श्रयः) श्रवण को (धुक्षत) परिपूर्ण करे वा (या) जो विदुषी स्त्री (मळीके)
सुख करने वाले व्यवहार में (तुराणाम् ) शीघ्रकारी (मरुताम्) मनुष्यों के बीच
मृत्युभय जिसमें नहीं उस श्रवण को परिपूर्ण करे तथा (सम्नः) सुखों से (या) जो
शिक्षा करने वा (एक्यावरी) दुःख निवारने वाली सन्तानों की शिक्षा करती है वही
यहां मानने योग्य होती है ॥१२॥
भावार्थ:-वे ही स्त्रियां धन्य हैं जो अपने संतानों को विद्या और
सुन्दर शिक्षायुक्त करने व कराने को निरन्तर प्रयत्न करती हैं ॥१२॥
फिर उसी विषय को कहते हैं ।
भरद्वाजाया धुक्षत द्विता ।
धेनुं च विश्वदोहसमिषं च विश्वमोजसम् ॥१३॥
पदार्थः-जो विदुषी माता (भरद्वाजाय) जिसने विज्ञान धारण किया उसके
लिये (विश्ववोहसम्) जिससे समस्त विज्ञान को पूर्ण करती उस' (धेनुम्) विद्या युक्त
वाणी को (अव, धुक्षत) परिपूर्ण करती है और (विश्वभोजसम्) समस्त मनुष्यमात्र
के पालक (इषम्) अन्न वा विज्ञान को (च) भी परिपूर्ण करती है वह (द्विता)
दोनों विज्ञान वा अन्न की चेष्टा वाली (1) भी इस प्रचारिणी क्रिया से
होती हैं ॥१३॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४८ ॥
Mum
भावार्थ:-जो स्त्रीजन सत्यभाषणयुक्त वाणी और सर्वोत्तम सत्य
विद्या को सन्तानों के लिये देती हैं वे ही देवी विदुषी स्त्रियां बहुत मान
करने के योग्य होती हैं ॥१३॥
फिर मनुष्य किसकी प्रशंसा करें इस विषय को कहते हैं ।।
तं व इन्द्रं न सुक्रतुं वरुणमिव मायिनम् ।
अर्यमणं न मन्द्रं सृपभोजसं विष्णुं न स्तुष आदिशे ॥१४॥
पदार्थ:-हे विद्वन् पाप जिस इस (इन्द्रम्) बिजुली के समान तीव्रबुद्धि के
(न) समान (सुऋतुम्) उत्तम बुद्धि वाले (वरुणमिव) वरुण के समान (मायिनम्)
कुत्सित बुद्धि वाले वा (अर्यमणम्) न्यायाधिपति के (न) समान (मन्द्रम्) अानन्द
देने वाले (विष्णुम्) व्यापक जगदीश्वर के (न) समान (सृप्रभोजसम्) प्राप्त हुए
पदार्थों के पालने की (स्तुषे) प्रशंसा करते हैं (तम्) उसको (ध:) तुम लोगों के
लिये (प्राविशे) आज्ञा पालने के अर्थ मैं उसकी प्रशंसा करता हूं ॥१४॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है---जो मनुष्य सूर्य के समान
विद्याप्रकाशक, व्याध के समान दुष्टों के मारने वाले, प्राप्त विद्वान् के
समान न्याय के करने वाले, ईश्वर के समान सर्व के पालने वाले, सत्य के
उपदेश करने वाले तथा धर्म करने वाले मनुष्य की प्रशंसा करते हैं वे ही
इस ससार में परीक्षा करने वाले होते हैं ।।१४।।
फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
त्वेषं शों न मारुतं तुविष्वण्यनर्धाण पूषणं सं या शता। सं
आविगंव्हा वसू करत्सुवेदो नो वसू
me
JHAR
HIAN
LAIMES
tube
सहस्रा कारिपच्चर्षणिभ्य आँ
करत् ॥१५॥
पदार्थ:-हे विद्वानो (यथा) जैसे (सुवेदा) सुशोभित विज्ञान जिसका वह
(नः) हम लोगों के लिये (त्वेषम्) दीप्तिमत् (तविष्वणि) बहुत शब्दों वाले {मारुतम्)
मनुष्य सम्बन्धी (शद्धः) बल के (न) समान (अनर्वाणम्) अविद्यामान हैं अश्व
जिसमें उस पदार्थ को (पूषणम्) पुष्टि करने वाला (करत) करे वा जैसे (चर्षणिभ्यः)
मनुष्यों के लिये (शता) सैकड़ों वा (सहला) सहस्रों (गूळ हा) गुप्त (वसू) धनों को
(मा, सम्, कारिषद) सब ओर अच्छे प्रकार सिद्ध करे और गुप्त (वसू) विज्ञान वा
धनों को (सम्, प्राविष्करत) प्रकट करे वैसे इनको पाप करें ॥१५॥

५७०
ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४८ ॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालंकार है - हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान्
जन विज्ञानदान से गुप्त विद्याओं को तुम्हारे लिये प्रकट करते हैं और
आपके शारीरिक और आत्मिक बल को बढ़ाते हैं वैसे इनको तुम
बढ़ानो ॥१५॥
फिर मनुष्य परस्पर कैसे वर्ते इस विषय को कहते हैं।
आ मां पृषन्नुपं द्रव शंसिर्फ नु ते अपिकर्ण आंधुणे।
अघा अर्यों अरातयः॥१६॥
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SHAHR
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पदार्थ:-हे (पूषन्) पुष्ट करने वाले (माणे) सब ओर से प्रकाशमान
जिन (ते) आपके (अपिकणे) ढंपे हुए कर्ण में मैं (नु) शीघ्र सत्य को (शंसिषम्)
प्रशंसा करू सो (प्रयः) स्वामी हुए माप (पा) सब ओर से (मा) मेरे (उप, द्रव)
समीप पात्रो और जो (अरातयः) न देने वाले जन हों उन्हें शीघ्र (घा.) हनिये
अर्थात् मारिये ॥१६॥
भावार्थ:-हे पालनीय जन ! आप रक्षा के लिये मेरे समीप आयो,
मैं सत्योपदेश से तुम्हें विचक्षण करूं तथा हम सब लोग मिलके दुष्टों का
विनाश करें॥१६॥
मनुष्यों को क्या न करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
मा कोकम्बीरसुद्हो वनस्पतियणास्तीवि हि नीनशः।
मोत सूरो अहं एवा चन ग्रीवा आदधते थे॥१७॥
पदार्थ:-हे विद्वन् पाप (काकंबीरम्) कौओं की पुष्टि करनेवाले
(वनस्पतिम्) बट आदि वृक्ष को (मा, उत्, वृहः) मत उच्छिन्न करो तथा
(प्रशस्तीः) और अप्रशंसित (हि) ही कर्मों का (वि, नीनश:) विशेषता से निरन्तर
नाश करो और (सूरः) सूर्य (अहः, एवा) दिन में ही जैसे (वेः) पक्षी के (ग्रीवाः)
कण्ठों को (चन) निश्चय से (मादयते) अच्छे प्रकार धारण करते हैं वैसे (उत) तो
हम लोगों को (मा) मत पीड़ा देो ॥१७॥
भावार्थ:---किसी मनुष्य को श्रीष्ठ वृक्ष वा वनस्पति न नष्ट करने
चाहियें किन्तु इनमें जो दोष हों उनको निवारण करके इन्हें उत्तम सिद्ध
करने चाहिये, हे मनुष्य ! जैसे श्येन वाज पक्षी और पखेरुओं की गर्दनें
पकड़ घोटता है वैसे किसी को
दुःख न
देवो ॥१७॥

तुम में (वामस्य) प्रशंसा करने योग्य का सम्बन्धी (वाम) बहुत प्रशंसित कर्मका
ऋग्वेदः मं०६। सू०४८ ।।
किन की मित्रता नहीं नष्ट होती है इस विषय को कहते हैं।
दृतेरिव तेऽवृकर्मस्तु सरूपम् । अच्छिद्रस्य दधन्वतः
मुपूर्णस्य दधन्वतः ॥१८॥
पदार्थ:-हे विद्वन् (अच्छिद्रस्य) अखंडित और दधन्वतः) दृढ़ता से धारण
करने वाले' (दृतेरिय) मेघ के समान (सुपूर्णस्य) अच्छे प्रकार परिपूर्ण प्रसिद्ध
(बधन्यतः) विद्या और शुभगुणों के धारण करने वालों को धारण करने वाले (ते)
तुम्हारी (प्रवृकम्) चोरी से रहित (सख्यम्) मित्रता (अस्तु) हो ॥१८॥
भावार्थ:--- इस मन्त्र में उपमालंकार है-जैसे मेघ और भूमि का
मित्रवत् व्यवहार है वैसे ही धार्मिक विद्वानों की मित्रता अजर अमर
वर्तमान है ॥१८॥
मनुष्यों को कैसा होना चाहिये इस विषय को कहते हैं।
परो हि अत्यैरसि समो वैरुत श्रिया।
अभि ख्यः पूषन्पृतनासु नस्त्वमा नूनं या पुरा । १९॥
पदार्थ:-~है (पूषन्) पुष्टि करने वाले (यथा) जैसे (हि) जिस कारण (पुरा)
पहिले (हा) आप (नः) हमारी (पृतनासु) मनुष्य सेनानों में (अभि, ख्यः) सब
ओर से अच्छे प्रकार कथन करते हैं वैसे (नूनम् ) निश्चित (मत्यः) साधारण मनुष्य
वा (देवैः) विद्वान् (उत्त) और (श्रिया) लक्ष्मी के साथ (परः) उत्कृष्ट अत्युत्तम वा
(सम: समान (असि) हैं इससे (वा) रक्षा कीजिये ॥१९॥
भावार्थ:-जो विद्वानों के तुल्य है वह विद्वान्, जो मनुष्यों के तुल्य है
वह मध्यम, और जो पशुओं के तुल्य है वह अधम मनुष्य है इसको सब
जानें ॥१६॥
फिर मनुष्यों को कैसी नीति धारण करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
धामी वामस्य धूतया प्रीतिरस्तु सूनृता ।
देवस्य वा मरुतो मयस्य वेजालस्य प्रयज्यवः ॥२०॥
पदार्थ:-हे (धूतयः) कंपन कराने वाले (प्रयज्यवः) उत्तमता से यज्ञसंपादको
ORN
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और (देवस्य) विद्वान् की (वा) वा (मरुतः) मरणधर्मा तथा (ईजालस्य) यज्ञकर्ता
(वा) वा (मर्त्यस्य) साधारण मनुष्य की (सूनृता) सत्यभाषणदि युक्त (प्रणीतिः)
उत्तम नीति (प्रस्तु) हो ॥२०॥

५७२ ऋग्वेदः मं०६ । सू०४८ ।। Ramap - A भावार्थ:--प्राप्त राजा मन्त्रियों को उपदेश देवे कि आप लोग न्यायकारी तथा धर्मात्मा होकर पुत्र के समान प्रजाजनों को पालें ॥२०॥ किस राजा की पुण्यरूप कीत्ति होती है इस विषय को कहते हैं । सद्यश्चिद्यस्य चर्केतिः परि धां देवो नैति सूर्यः त्वेषं शवों दधिरे नाम यज्ञिय मरुतो वृत्रहं शवो ज्येष्ठं वृत्रह शवः ॥२१॥ पदार्थ:--(यस्य) जिस राजा की (चतिः) निरंतर उत्तम क्रिया देदीप्यमान (सूर्यः) सविता और (धाम्) प्रकाश के (न) समान (सखः) शीघ्र विनय को (परि,एति) सब ओर से प्राप्त होती वा जिसके (मरुतः) प्रजाजन (श्वेषम्) देदीप्यमान (नाम) संज्ञा (यज्ञियम्) यज्ञ संपादक और (शवः) बलको (बधिरे) धारण करते हैं वा (वृत्रहम्) शत्रुओं के नाश करने वाले (शवः) बल वा (ज्येष्ठम्) प्रशंसित (वृनहम्) धन प्राप्त कराने वाले (शवः, चित्) बलको भी धारण करते हैं उसका सर्वत्र विजय होता है ।।२१।। भावार्थ:-जो राजा विद्या और विनय से युक्त, पुरुषार्थी, दृढप्रतिज्ञा करनेवाला, जितेन्द्रिय, धार्मिक, सत्यवादी होकर धार्मिक विद्वानों को अधि कार में संस्थापन कर पुत्र के समान प्रजाजनों को पालता है उसकी इस जगत् में सूर्य के समान कीति फैलती है ॥२॥ अब प्रजा के कृत्य को कहते हैं। सकृद्ध यौरजायत सकृमिरजायत । पृश्न्या दुग्धं सकृपयस्वदन्यो नानु जायते ॥२२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (ह) निश्चय के साथ (छौः) सूर्य (सकृत) एक वार (प्रजायत) उत्पन्न होता है तथा (भूमिः) भूमि (सफूच) एक वार (अजायत) उत्पन्न होती है और (पृश्न्याः) अन्तरिक्ष में उत्पन्न होने वाली सृष्टियां (सकृत एकवार उत्पन्न होती हैं तथा (दुग्धम्) दूध और पियः) जल एकवार उत्पन्न होता है (तत्) उससे (अन्यः) और (न) नहीं (अनु, जायते अनुकरण करता वैसे तुम जानो ॥२२॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! जिस ईश्वर ने र्यादि जगत् एक वार उत्पन्न किया वह इस सृष्टि के साथ नहीं उत्पन्न होता किन्तु इस सृष्टि से भिन्न अर्थात् भेद को प्राप्त होकर सबको शीघ्र उत्पन्न करता है उसी का लोग करो ॥२२॥ Kama ARDA ध्यान तुम ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४६ ।। , , इस सूक्त में अग्नि, मरुत्, पूषा, पृश्नि, सूर्य, भूमि, विद्वान्, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में पड़तालीसवां सूक्त समाप्त हुभा ॥ प्रथ पञ्चदशर्चस्यकोनपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य ऋजिध्वा ऋषिः । विश्वेदेवा देवताः। १।३। ४ । १०३ ११ त्रिष्टुप् । ५। ६ । । १३ निवृत्रिष्टुप् । ८ । १२ विरात्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । २१ १४ स्वराट पस्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ७ ब्राह्मय ष्णिकछन्दः । ऋषभः स्थरः । १५ प्रतिजगती छन्दः । निषादः . aub अब पन्द्रह ऋचावाले उनचासवे सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । स्तुषे जनै मुव्रतं नव्यसीमिर्गीमिमित्रावरुणा मुम्नयन्ती। त आ गंपन्तु त इह ध्रुवन्तु सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अग्निः ॥१॥ पवार्थ:-हे विद्वानो ! (नव्यसीभिः) अतीव नवीन (गीभिः) शीघ्र सुशिक्षित वाणियों से (सुव्रतम्) जिसके शुभ व्रत अर्थात् कर्म हैं उस (जनम्) मनुष्य की ओर (सम्नयन्ता) सुखप्राप्ति करानेवाले (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान पढ़ाने और उपदेश करने वाले की मैं (स्तषे) स्तुति करता हूं तथा जो (मित्रः) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ (अग्निः) अग्नि के समान तेजस्वी और (सुक्षत्रासः) जिनका सुन्दर राज्य वा धन है ऐसे वर्तमान हैं (ते) वे (इह) यहाँ (पा, गमन्त) पावें और (ते) वे (धु वन्तु) श्रवण करें ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो तुमको नवीन-नवीन विद्या का उपदेश करते हैं उनको बुलाकर वा उनसे मेलकर उनसे सुनकर विद्याओं को प्राप्त होओ ॥१॥ फिर मनुष्य किसकी स्तुति करें इस विषय को कहते हैं । विशोविश ईडयमध्वरेष्ठ दृप्तकतुमरसिं युक्त्योः । दिवा शिशुं सहसः सूनुमग्नि यज्ञस्य केतुमरुषं यजध्यै ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (अध्वरेषु) अहिंसनीय व्यवहारों में (विशोविशः) प्रजा- प्रजा के बीच (अरतिम्) विषयों में विना रमते हुए (अदृप्तऋतुम्) जिसकी बुद्धि M SAS Bala ५७४ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४६ ॥ more 300 orylus मोहित नहीं हुई उस (ईडयम्) स्तुति करने योग्य (युक्त्योः) युवावस्था को प्राप्त हुए स्त्री पुरुष के (दियः) मनोहर व्यवहारसंबंधी (शिशुम्) बालक की (सहसः) वा बलवान् के (सूनुम्) उस पुत्र की जो (अग्निम्) अग्नि के समान वर्तमान तथा (भरुषम्) कुछ लाल रंग युक्त और (यजस्य) यज्ञादि कर्म का (केतुम्) अच्छे प्रकार समझानेवाला है (यजध्यै) संग करने के लिए स्तुति करो ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो ब्रह्मचर्य से युवा अवस्था को प्राप्त स्त्री- पुरुषों के उत्तम बल से उत्पन्न, अग्नि के समान तेजस्वी हो उसको राजा वा अधिकारी करो ॥२॥ अब स्त्री पुरुष कैसे होकर कैसे वर्ताव करें इस विषय को कहते हैं । अरुषस्य दुहितरा विरूपे स्तुमिरन्या पिपिशे सूरौं अन्या । मिथस्तुरा विचरन्ती पार के मन्मं श्रुतं नक्षत ऋच्यमाने ॥३॥ पवार्थ:-हे स्त्रीपुरुषो वा राजा और प्रजाजनो ! जैसे (अरुषस्य) कुछ लालरंग वाले अग्नि के (विरूपे) विविधरूप वा विरुद्धस्वरूपयुक्त दिन और रात्रि (मिथस्तुरा) परस्पर हिंसा करने वाले (विचरन्ती) विविध गति से प्राप्त होते हुए (ऋच्यमाने) स्तूयमान (पावके) पवित्र (दुहितरा) कन्याओं के समान वर्तमान हैं उनमें (अन्या) और अर्थात दोनों से अलग रात्रिरूप कन्या (स्तृभिः) नक्षत्रादिकों के साथ (पिपिशे) पोसती हुई अंग के समान वर्तमान है (अन्या) और दिनरूप कन्या अर्थात् (सूरः) सूर्य किरणों से पीसती हुई वर्तमान है वे दोनों समस्त जगत को (नक्षतः) ब्याप्त होते हैं वैसे मिलकर प्रीति से (शु तम्) श्रवण वा (मन्म) विज्ञान को तुम दोनों प्राप्त होओ ॥३॥ भावार्थ:--- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालं०-जैसे सूर्यरूप अग्नि के रात्रि दिन पुत्री के समान वर्तमान हैं तथा दोनों विलक्षण सदा संबन्ध करने वाले होते हैं, वैसे ही विचित्र वस्त्र और आभूषण वाले, विविध विद्यायुक्त और प्रशंसित होते हुए विद्या विज्ञान और धर्मोन्नति में संबन्ध और प्रीति करने वाले स्त्री-पुरुष हों॥३॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं। प्र वायुमच्छो बृहती मनीषा बृहद्रयिं विश्ववारं रथमाम् । द्युतधामा नियुतः पत्यमानः कविः कविमियक्षसि प्रयज्यो ॥४॥ पवार्थ:-हे (प्रयज्यो) उत्तमता से यज्ञ करने वाले (पत्यमानः) ऐश्वर्य की इच्छा करते हुए (कविः) विद्वान् आप जो (ध तद्यामा) जिससे विशेषकर पदार्थ ..

- म app m पर ऋग्वेदः म०६ । सू० ४६ ॥ ५७५ winsored प्रकाशित होते हैं ऐसी (बहती) बड़ी (मनीषा) बुद्धि है उससे जो (बृहब्रयिम् ) जिससे बहुत धन सिद्ध होता उस (विश्ववारम्) और जो समस्त उत्तम व्यवहार को स्वीकार करता वा (रथप्राम्) रथ को परिपूर्ण करता वा (कविम्) विद्वान् के समान क्रम- पूर्वक बुद्धि प्राप्त होती उस (वायुम्) वायु और इसके (नियुतः) निश्चित गति वाले • वेगरूप घोड़ों को (अच्छा) (प्र, इयक्षसि) मिलते हैं तो कौन-कौन चाहे हुए पदार्थ को नहीं प्राप्त होते हैं ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य शुद्ध बुद्धि और योगाभ्यास से सर्व सुख देने तथा सर्व जगत् के धारण करनेवाले पवन को प्राणायाम में वश करते हैं वे सर्वसुख को प्राप्त होते हैं ।।४।। फिर मनुष्य किससे किसको प्राप्त होवें इस विषय को कहते हैं । स मे वपुश्छदयविनोर्यों रथे विरुक्मान् असा युजानः । येन नरा नासत्येषयध्यै वर्तिथिस्तनयाय त्मने च ॥५॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (यः) जो (अश्विनो:) प्राण और अपान के (विरुक्मान्) विविधदीप्तियुक्त (मनसा अन्तःकरण से (युजानः) युक्त होता हुआ (रथः) रमणीय व्यवहार (मे) मेरे (वपुः) शरीर वा रूप को (छदयत) बली करता है तथा (येन) जिससे (तनयाय) सन्तान के लिए (मने, च) और अपने लिए (नरा नायक अग्रगामी (नासत्या) जिन के असत्य विद्यमान नहीं दे अध्यापक और उपदेशक योगीजन (इषयध्यै) चलने के लिए जो (वत्ति:) मार्ग है उसको (याथः) प्राप्त होते हैं (सः) वह तुम लोगों को चाहिये कि जानकर अन्तःकरण से आत्मा में निरन्तर युक्त करने योग्य हो ॥५॥ भावार्थ-हे मनुष्यो ! जिस वायु से योगीजन विविध प्रकार के विज्ञान को प्राप्त होते हैं तथा जिससे सब जगत् वा सब प्राणी जीते उसके अभ्यास से परमात्मा को जान कर मुक्तिपथ से आनन्द को प्राप्त होमो ॥५॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। पर्जन्यवाता वृषमा पृथिव्याः पुरींपाणि जिन्वतमप्यानि । सत्यंश्रुतः कवो यस्य गीमिर्जगतः स्थातर्जगदा कृणुध्वम् ।।६।। पदार्थ:-हे (वृषभा) बृष्टि कराने वाले यजमान और पुरोहितो | जैसे (पर्जन्यवाता) मेघस्थ पवन (पृथिव्याः) अन्तरिक्ष से (अप्यानि) जलों में प्रसिद्ध हुए ASHAN ५७६ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४६ ।। (परीषाणि) जलों को पहुंचाते हैं वैसे तुम (जिन्वतम्) पहुंचो वा पदार्थ को पहुंचाओ और (सत्यश्रुतः) जो सत्य को सुनने वाले जन हैं वे (कवयः) विद्वान् होते हुए जलों को (मा, कृणुध्वम्) अच्छे प्रकार सिद्ध करें । हे (स्थातः) स्थिर होने वाले विद्वान् जन (यस्य) जिसकी (गोभिः) वाणियों से (जगतः) संसार के बीच (जगद) जगत् को विशेषता से जानते हो उसका आप सत्कार करें ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो मनुष्य पवन के समान जगत् के हित करने वाले तथा सत्य के सुनने वाले हैं वे ही जगत् को जान कर औरों को इस जगत् का ज्ञान दे सकते हैं ॥६॥ फिर कैसी स्त्री सुख देवे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। पावीरवी कन्या चित्रायुः सरस्वती वीरपत्नी धियं धात् । नाभिरच्छिद्रं शरणं सजोषा दुराधर्ष गृणते शर्म यंसत् ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (पावीरवी) शुद्ध करने वाली (चित्रायुः) चित्र विचित्र जिसकी आयु वह (सरस्वती) विज्ञानयुक्त (बीरपत्नी) वीर पतिवाली कन्या) मनोहर (ग्नाभि.) सुन्दर शिक्षित वाणियों से (घियम्) शस्त्रोत्थ प्रज्ञा उत्तम बुद्धि वा कर्म को (धात्) धारण करती है वा जो (गृणते) स्तुति करने वाले मेरे लिये (अच्छिन्द्रम् ) छेदरहित व्यवहार को तथा जो (सजोषाः) समान प्रीति की सेवने वाली होती हुई स्तुति करने वाले मेरे लिए (शरणम्) आश्रय' को वा जो (दुराधर्षम्) दुःख से धृष्टता के योग्य (शर्म) घर वा सुखको (यंसत्) देती है वही मुझसे सदैव सत्कार करने योग्य है ॥७॥ भावार्थ:-जो विदुषी शुभगुण कर्म स्वभाव वाली कन्या हो उसी को वीर पुरुष विवाहे, जिसका संग वा प्रीति कभी नष्ट न हों तथा जो सर्वदा सुख दे वह पत्नी पति से सर्वदा सत्कार करने योग्य है ।।७।। फिर मनुष्यों को किसका सेवन करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । पथस्पथः परिपति वचस्या कामैन कृती अभ्यानळर्कस् । स नो रासच्छुरुधश्चन्द्रामा वियंधियं सीषधाति म पूषा ॥४॥ पदार्थः-जो (पूषा) पुष्टि करने वाला (कामेन) कामना से (पथस्पथः) मार्गों मार्गों को (परिपतिम्) स्वामी को छोड़ के वा सब ओर से स्वामी को और (वचस्या) वचन में उत्तम व्यवहारों को (कृतः) किये हुए (अर्कम्) सत्कार करने योग्य क्रियामय व्यवहार को (अभि, प्रान) सब पोर से व्याप्त होता है तथा (नः) CAM *RNO सान स्या 300 इषितासः) प्रेरणा किये हुए ऋग्वेदः मंसू ४६ ।। ५७७ हम लोगों के लिये (शुरुधः) शीघ्र रोकनेवाली (प्रा.) जिनके तीर सुवर्ण उत्तम विद्यमान उनको (रासद देवे तथा (धियंधियम्) प्रज्ञा प्रज्ञा वा कर्म कर्म को (प्र, सोषधाति) अच्छे प्रकार सिद्ध करता है (:) वह उपदेशकर्ता तथा न्याय करने वाला हम लोगों का हो ॥८॥ भावार्थ:-- हे मनुष्यो ! जो तुमको सन्मार्ग दिखाकर दुष्ट मार्गों का निवारण कर सत्याचरण करने वाले स्वामी का सेवन करा और दुष्टपति का निवारण कराके बुद्धि को बढ़ाता है वही तुम लोगों को सत्कार करने योग्य होता है ॥८॥ फिर मनुष्य किसका सेवन करें इस विषय को कहते हैं ।। प्रथममाज पक्षस वोका झुपाणि देव भूगर्भस्तिमन्त्रम् । होश क्षयजतं पस्त्यानामनिसार हाय विभाह १९ । पदार्थ:--हे मनुष्यो जो (शग्निः पावक के समान वर्तमान (बिमावा) विशेषता से प्रकाशमान होता) दानशील जन (लटारम्) छेदन भेदन करने वाले सुहषा) बुलाने योग्य वा पस्त्यानाम्) घों के बीच (बजतम्) संग करने योग्य वा (ऋभवाम् । बुद्धिमान् सुगस्लिम्) सुन्दर प्रकाशक (प्रथमभाजन्) अगलों को सेवते हुए यशसम्) कीतिमान् तथा बयोधा । जीवन धारण करने वाले तथा (सपाणिम्) सुन्दर व्यवहार वाले ना शोभन धर्म कर्मकारी हस्त जिसके उस (देवम्) दान करने वाले विद्वान्जन का (अक्षत्) संग करे बद्दी तुमको संग करने योग्य है ॥६॥ भावार्थ:-... इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है--जो मनुष्य विद्या- वृद्ध, अग्नि के समान अविद्याजन्य दुःख के जलाने वाले विद्वानों की सेवा करते हैं वे घर में दीपक के समान उपदेश देने योग्यों के प्रात्माओं के प्रकाश करने को योग्य हैं ॥६॥ फिर मनुष्यों को कौन प्रशंसा करने योग्य है इस विषय को कहते हैं । भुवनस्य पितरं गीर्भिरामी रुदै दिवा पर्षया रुद्रमक्तो। बृहन्तमृध्वमजर सुषुम्नमृधग्घुबैग कबिनषितासः ॥१०॥ हमलोग (आभिः) इन वर्तमान (गोभिः) वाणियों से (भुवनस्य) संसार के (पितरम्) पालने वाले (अक्तौ) रात्रि में : रुखम्) दुष्टों को रुलाने और (बृहन्तम् ) बढ़ाने वाले (ऋष्वम्) बड़े (अजरम्) जरावस्थारहित (सुषुम्नम्) सुन्दर सुखयुक्त (रुद्रम्) रोग .

५७८ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ४६॥ ao भगाने वाले जन की (ऋधक्) सत्य' (हुवेम) स्तुति करें वैसे इस रुद्र को आप (दिवा) कामना वा विद्यादीप्ति से (वर्धया) बढ़ानो ॥१०॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालं०-सब मनुष्य विद्वान् से प्रेरणा को पाये हुए विद्या और नम्रता के व्यवहार में वृद्ध होकर सब जगत् के पालने वाले परमात्मा की सत्य व्यवहार से प्रशंसा करें जिससे अविनाशी सुख को सब प्राप्त हों ॥१०॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं। आ युवानः कवयो यज्ञियासो मरुतो गन्त गुणतो वरस्याम् । अचित्रं चिद्धि जिन्वथा वृधन्त इत्या नक्षन्तो नरो अङ्गिरखत् ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (युतान:) युवा पुरुष (यज्ञियास:) सत्य प्रिय व्यवहार को करने योग्य हैं तथा (कवयः) सर्व शास्त्रवेत्ता (मरुतः) मनुष्य (अङ्गि- रस्वर) प्रशंसित वायुओं के समान (वरस्याम्) स्वीकार करने योग्य प्रशंसा को तथा (गृणतः) सत्य की प्रशंसा करने वाले विद्वानों को (मा, गन्त) प्राप्त हों तथा प्रचित्रम्) साधारण वृधन्तः) बढ़ाते और (इत्था) इस प्रकार से (नक्षन्तः) व्याप्त होते हुए (नरः) नायक मनुष्य (चित) ही (जिन्दथा) प्राप्त हों वे (हि) ही जगहितैषी होते हैं ॥११॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालं०-जो मनुष्य विद्वान् तथा युवा- बस्थावाले होकर और अच्छी क्रिया कर सबको बढ़ाते हैं वे वृद्धियुक्त होते हैं ॥११॥ फिर तुल्य किसको प्राप्त हों इस विषय को कहते हैं । प्र वीराय प्र तसे तुरापाजो यूथे पशुरक्षिरस्तम् । स पिस्पृशति तन्धि श्रुतस्य स्वभिर्न नाक वचनस्य विषः ।।१२।। पदार्थः --हे मनुष्यो जो (विषः) मेधावीजन (स्तृभिः) नक्षत्रों से (नाकम्। जिसमें दुःख नहीं विद्यमान उस अन्तरिक्ष को (न) जैसे (तन्धि) शरीर में (श्रुतस्य) सुने हुए (वचनस्य) वचन का वा (अजा) छाग (यूथेव) समूहों को जैसे वैसे वा (पशुरक्षिः) पशुओं की रक्षा करने बाला (अस्तम्) घर को जैसे वैसे (वीराय) शूरता आदि गुणों से युक्त (तवसे) बढ़ने वाले (तुराय) दुःखनाशक के लिये घर का (प्र, पिस्पृशति) अत्यन्त स्पर्श करता (सः) वह सुखों का (अ) अच्छे प्रकार अत्यन्त स्पर्श करता है ।।१२।। मनुष्य किसके AHAN M Pram AR

ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ४६ ।।
५७६
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भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार
-मनुष्य जैसे भेड़ बकरी
दौड़ के अपने झुंड को वा जैसे सायंकाल में गोपाल घर को वैसे समस्त
विद्या के श्रवण को प्राप्त होता है ।।१२।।
फिर मनुष्यों को क्या जानने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।
यो रजाति विममे पार्थिवानि त्रिश्चिद्विष्णुर्मनवे बाधिताय ।
तस्य ते शमन्नुपदद्यमाने राया मंदेन तन्वा३'तना च ॥१३॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (विष्णुः) चराचर में प्रवेश होता वह
जगदीश्वर (बाधिताय) पीड़ित (मनवे) मनुष्य के लिये (पार्थिवानि) पृथिवी में सिद्ध
हुए (रजांसि) लोकों को (त्रिः) तीन वार (चित) ही (विमने ) रचता हैं (तस्य)
उसके संबन्ध में (ते) आपके (उपदद्यमाने) समीप ग्रहण किये (शर्मन्) घर में
(तना) विस्तृत (राया) धन (तन्या, च) और शरीर के साथ हम लोग (मदेम)
आनन्दित हों ॥१३॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर सब जगत् का निर्माण करके
मनुष्यादिकों का उपकार करता है उसके आश्रय से ही हम लोग धनवान्
और
बहुत आयु
वाले हों ॥१३॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
तन्नोऽहिर्बुध्न्यो अद्भिरस्सस्पतस्तत्सविता चनो धात् ।
तदोषधीभिरभि रातिषाचो भगः पुन्धिजिन्वतु प्र राये ॥१४॥
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सार
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पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (अकः) सत्कार साधनों वाले (अद्भिः) जलादिकों
के और (प्रोषधीभिः) सोमलतादि प्रोषधियों के साथ (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध
हुआ (अहिः) मेघ (नः) हम लोगों के लिये (राये) धन के लिये (चनः) अन्नादिक
को वा (तत्) उस गृह को (धात) धारण करता वा (तत्) उसको (पर्वत:) पर्वता-
कार मेघ धारण करता वा (तत्) उसको (सविता) सूर्य धारण करता वा (तत्)
उसको (रातिषाच:) दान करने वाले धारण करते उसको (पुरन्धिः) जगत् का
धारणकर्ता (भगः) ऐश्वर्यवान् (प्र, जिन्वतु) अच्छे प्रकार प्राप्त करावे उसको
(अभि) सब ओर से प्राप्त करावे ॥१४॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे परमेश्वर ने प्राणियों के उपकार के
लिये जगत् बनाया वैसे इससे तुम
लोग पुष्कल उपकार ग्रहण
करो ॥१४॥

५८० ऋग्वेदः म०६। सू०५० ॥ नूनों Antatun - MATHA ANS ve M HAND Anta . फिर दाताओं को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। रयिं रथ्य चर्षणियां पुरुवीर मह ऋतस्य गोपाम् । क्षय दाताजरं येन जनान्त्स्पृधो अदेवीरभि च क्रमाम विश आदेवीरभ्य१' नाम ||१५|| पदार्थ:--हे विद्वानो (येन) जिससे (स्पृधः) स्पर्धा करते हुए (जनान्) मनुष्यों को तथा (प्रदेवोः) विद्यारहित (विश:) प्रजाओं को हम लोग (अभि, क्रमाम) अनुक्रम से प्राप्त हों बा (मादेवीः) सब ओर से निरन्तर प्रकाशमान विदुषी (च) और प्रजात्रों को हम लोग (अभि, अश्नवाम) सब ओर से प्राप्त हों । तथा (रथ्या) विमान प्रादि रथों में हितरूप (चर्षणिप्राम्) मनुष्यों को व्याप्त होने तथा (पुरुबीरम्) बहुत वीरों के कारण (क्षयम् ) निवास कराने को (अजरम्) हानि- रहित अर्थात् पुष्ट (महः) और बड़े (ऋतस्य) सत्य की (गोपाम् ) रक्षा करने वाले (रयिम्) धन को (नः) हम लोगों के लिये (न) शीघ्र (दात) दीजिये ॥१!! भावार्थ:--वे ही देने वाले उत्तम हैं जो धर्म से धनादिकों को संचित कर विद्यादिसद्गुणरूप परोपकार के लिये देते हैं और वही धन है जिससे विदुषी वा अविदुषी प्रजाए अत्यन्त सुख पाय हर्षित हों ।।१५।। इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे मण्डल में उनच सवा सूक्त समाप्त हुया ॥ RAA .. अथ पञ्चदशर्षस्य पञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य ऋजिष्या ऋषिः। विश्वेदेवा देवताः।१।७ शिष्टम् । ३ । ५। ६ । १० । ११ । १२ निवृत्रिष्टुप् । ४।८। १३ विरात्रिष्टुप्छन्दः। धैवतः स्वरः। २ स्वराट्पतिः । ६ पषितः । १४ रिपक्तिः । १५ निवृत्पतिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब पन्द्रह ऋचा वाले पचासवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन किसलिये क्या करें इस विषय को कहते हैं । हुवे वो देवीमदिति नोभिर्मुळीकाय रुण मित्रमग्निम् । अभिक्षदामयमणं सुशेवं बातृन् वान्त्सवितारं मर्ग च ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो. जैसे मैं (नमोभिः) सत्कार और अन्नादिकों के साथ MIN ED पदार्थः हे अध्यापक और उपदेशको ! तुम (स्था) जैसे (रोदसी) बहुत ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५०॥ ५८१ (वः) तुम लोगों के (अभिक्षदान्) जो भिक्षा नहीं देते उनके (मुळीकाय) सुख के लिये (अदितिम्) जो माता नहीं उस (देवीम् ) देदीप्यमान विदुषी वा (वरुणम्) उदान के समान सर्वोत्कृष्ट वा (मिन्नम् ) प्राण के समान प्यारे वा (अग्निम् ) अग्नि तथा (अर्यमणम् ) न्यायकारी और (सुशेवम्) सुन्दर सुख वाले जन को वा (प्रातृन्) रक्षा करने वाले वा (देवान्) विद्वानों वा (सवितारम् ) सत्कर्मों में प्रेरणा देने वाले राजा (भगम्, च) और ऐश्वर्य को (हुवे) बुलाता वा देता हूं वैसे इनको हमारे लिये तुम बुलाओ वा देनो ॥१॥ भावार्थः जो विद्वान् जन सुपात्रों के लिये भिक्षा देते और सब को पुरुषार्थी कर उनके लिए विदुषी माता वा वरुण आदि को लेते हैं वे जगत् के हितैषी हैं ॥१॥ अब मनुष्य निरन्तर क्या करें इस विषय को कहते हैं । सुज्योतिषः सूर्य दक्षपितृननागास्त्वै सुमहो वोहि देवान् ! ६ द्विजन्मानो य ऋतसापः सत्याः स्वर्वन्तो यजता अग्निजिह्वाः ॥२॥ पदार्थः - है (सूर्य) सूर्य के समान वर्तमान (ये) जो (अनागास्त्वे अन- पराधिपन में (द्विजन्मान:) उत्पत्ति और विद्याप्राप्ति रूप जन्म वाले' (ऋतसापः) सत्य से संबन्ध करते वा (सत्याः) प्रतिज्ञा करते (स्वर्वन्तः) वा बहु सुखयुक्त (यजताः) समस्त विद्यानों का संग करते (अग्निजिताः) वा अग्नि के समान सत्य विद्या से सुन्दर प्रकाशित जिह्वाए जिनकी वा (सुज्योतिषः सुन्दर विनय के प्रकाश करने वाले विद्वान् हों उन (सुमहः) श्रेष्ठ महान् गहाशय (क्षपितृन्) चतुर पिता और विद्या पढ़ाने वाले (देवान्) विद्वानों को श्राप निरन्तर (बीहि) प्राप्त होमो वा उनकी कामना करो ऐसा होने पर सर्वदा कल्याण प्राप्त होवे ॥२॥ भावार्थः . इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है---जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या और धर्म के प्रकाश करने वाले अध्यापक, उपदेशक वा विद्वानों की सेवा करते हैं वे भी वैसे ही होते हैं ॥२॥ फिर विद्वान् जन किसके तुल्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। उस द्यावापृथिवी सत्रमुख बृद्रोदसी शरणं सुषुम्ने । महस्करयो रिवो बयानोऽस्से क्षयाय धिषणे अनेहः ॥३॥ M on कार UP कार्य और (सुषुम्ने) सुन्दर सुख करने वाली (धिषणे) व्यवहारों को धारण करने वाली (द्यावापृथिवी) बिजुली और भूमि (नः) हमारे (उस) बहुत (बृहत् महान् RI Rom PAP H सिषक्ति सींचता है आप इससे (नु ५८२ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५० ।। (शरणम्) आश्रय और (क्षत्रम्) धन राज्य वा क्षत्रियकुल को सिद्ध करते हैं वैसे (महः) बड़े (वरिवः) सेवन (उत) और (अनेहः) न नष्ट करने योग्य व्यवहार (अस्मे) हम लोगों में (क्षयाय) निवास करने के लिये (करथः) सिद्ध करो ॥३॥ भावार्थः- इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो अध्यापन और उपदेश करने वाले जन सूर्य और भूमि के तुल्य सब को विद्यादान, धारण और शरण देते हैं तथा जो सत्य, यथार्थवक्ता और विद्वानों की सेवा करते हैं वे सर्वथा माननीय होते हैं ।।३।। फिर विद्वान् कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ नो रुद्रस्य सूनों नमन्तामया हुतासो वसवोऽधृष्टाः । यदीमर्ने महति वा हितासो बाधे मरुतो अाम देवान् ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत) जो (हूतासः) बुलाये हुए (अधृष्टाः) अप्रगल्भ (वसवः) आदि कोटिवाले विद्वान् जन (बाधे) विलोड़न के निमित्त (अर्भ) थोड़ी अवस्था वाले (महति, वा) वा बहुत अवस्था वाले जन में (हितासः) हित करने वाले वा (रुद्रस्य) दुष्टों के रुलाने वाले के (सूनवः) संतान (मरुतः) मनुष्य (नः) हम लोगों को (अद्या) आज (मा, नमन्ताम् ) अच्छे प्रकार नमें उन (देवान्) विद्वानों को हम लोग (ईम) सब ओर से (अह्वाम) चाहें ॥४॥ भावार्थ:-जो विद्वान्जन, चक्रवर्ती राजा वा क्षुद्र जन में पक्षपात छोड़ कर हित के लिये वर्तमान, नम्र, विद्वानों के प्रिय मनुष्य हैं वे भाग्य- शाली होते हैं ॥४॥ फिर विद्वान् जनों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। मिम्यक्ष येषु रोदसी नु देवी सिषक्ति पूषा अभ्यर्धयज्वा । श्रुत्वा हवं मरुतो यद्धं याथ भूमा रेजन्ते अध्वनि पविक्ते ॥६॥ पदार्थ:-है (मरुतः)मनुष्यो (येषु) जिन वायु आदि पदार्थों में (रोदसी) प्रकाश और भूमि (देवी) जो कि दिव्यगुणवाली हैं उनको (अभ्यद्धयज्या) मुख्य के प्राधे में (मिम्यक्ष) शीघ्र जाइये (यत्) जो (ह) निश्चय कर (भूमा) भूमि में वा (प्रविक्ते) प्रकर्षकर चलने योग्य (अध्वनि) मार्ग में (रेजन्ते) कांपते वा जाते हैं उनके (हवम्) शब्द को (श्र त्या) सुनकर उनको तुम (याथ) प्राप्त होप्रो ॥५॥ भावार्थः -हे विद्वानो ! तुम सूर्य और पृथिवी के तुल्य प्रकाश और KAN का an

ऋग्वेदः मं० ६ । सू०५० ।।
५८३
क्षमाशील होकर सबके प्रश्नों को सुनकर समाधान देशो, जैसे भूमि आदि
लोक अपने-अपने मार्ग में नियम से जाते हैं वैसे नियम से धर्ममार्ग में
जामो॥॥
Pre
फिर विद्वानों को क्या उपदेश कर क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।
अभि त्यं वीर गिर्वणसमन्द्रं ब्रह्मणा अरितनन ।
श्रवदिद्धवमुपं च स्तवानो रासद्वाजाँ उप महो गृणानः ॥६॥
पदार्थः-- हे (जरितः) स्तुति करने वाले जन आप (महः) बहुत (वाजान्)
अन्नादिकों की (गृणानः) प्रशंसा करते हुए (उप, रासत्) समीप में दें और (स्तवानः)
स्तुति करते हुए (हवम्) सत्य की प्रशंसा को (उप, श्रवत्) सुर्ने (इत्) ही तथा
(नवेन) नवीन (ब्रह्मणा) धन वा अन्नादि से (प) उस (गिर्वणसम) वारिणयों से
सेव्यमान (वीरम् ) वीरवान् तथा (इन्द्रम् परमैश्वर्यवान् का (च) भी (भि,अर्च)
सब ओर से सत्कार करो ॥६॥
भावार्थ: -हे विद्वन् ! आप सब के प्रश्नों को
सुनकर समाधान देते
हुए और अन्नादि पदार्थों की प्राप्ति कराते हुए धार्मिक वीरों को और
धनाढयों को सर्वदा शिक्षा देवै जिससे इनका ऐश्वर्य अन्याय मार्ग में नष्ट न
हो ॥६॥
-FREEM
स
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फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
ओमानमापो मानुषीरमृक्तं धात तोकाय तनयाय शं यो।
यूयं हि ष्ठा भिषो मातृतमा विश्वस्य स्थातुर्जगतो जनित्रीः ॥७॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (मातसमाः) माता के समान अतीव कृपालु
(जनित्रीः) उत्पन्न करने वाली (तोकाय) थोड़ी आयु वाले सन्तान वा (तनयाय)
सुन्दर कुमार संतान के लिए (शम्) सुख करती हैं वैसे (यूयम्) तुम (पापः) जलों
के समान (अभपतम्) अशुद्ध जन को वा (प्रोमानम्, रक्षा आदि करने वाले को
और (मानुषीः) मनुष्य संबंधी प्रजानों को (धात) धारण करो तथा स्थातुः) स्थावर
वा (जगतः) जंगम (विश्वस्य) संसार के हि) जिस कारण तुम भिषज:) वैद्य
(स्था) हो, वा जैसे यायाधीश सबको सुख्ख (योः) पहुंचाता है वैसे यहां वर्तो ७॥
भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे अध्यापक
और उपदेशको ! तुम अपवित्र जन को सत्य ग्रहण कराकर शुद्ध करो तथा
सब जगत् की रक्षा करने के निमित्त अविद्यारूपी रोग के निवारण करने
वाले होते हुए सब को माता के तुल्य पालो ॥७॥

५८४ ऋग्वेदः मं०६। सू०५० ॥ मा फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं। आ नो देवः सविता नामागो हिरण्यपाणिर्यजतो जंगम्यात् । यो दवाँ उषसो न प्रतीक ब्यूर्णने दाशुषे वायाँणि ||८|| पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (दत्रवान्) दान देने वाला (हिरण्यपाणि:) हाथ में सुवर्णादि लिये हुए और (यजतः) संग करने वाला (देवः) दिव्यगुण कर्म स्वभावयुक्त (सविता) सूर्य के तुल्य (नायमाणः) रक्षक जन (उषस:) प्रभातवेला के (न) समान समय से (दाशुषे) देने वाले के लिए (प्रतीकम्) प्रतीति करने वाले पदार्थ और (वार्याणि) स्वीकार करने योग्य पदार्थों को (व्यूणुते) आच्छादित करता है तथा (न:) हम लोगों को (मा, जगम्यात्) सब ओर से निरन्तर प्राप्त हो उसको हम लोग सदा सुखी करें ।।८।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो दानशील प्रभातवेला के समान सुन्दर प्रकाश करने वाले जन सब के लिए विद्या और अभयदान देते हैं वे संसार में श्रेष्ठ गिने जाते हैं ॥८॥ फिर मनुष्यों को किससे क्या प्रार्थना करनी योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। उत्त त्वं सूनो सहसो नो अद्या देयाँ अस्मिन्नध्वरे वृत्याः । स्यामहं ते सदमिद्रातौ तब स्यामग्नेऽवसा सुधीरः ॥९॥ पवार्थ:-हे (सहसः) शरीर और आत्मा के बल से युक्त विद्वान् के (सूनो) विद्यासम्बन्धी पुत्र (अग्ने) अग्नि के तुल्य प्रकाशित पारमा बाले' (स्वम्) आप (अद्या) अाज (अस्मिन्) इस (अध्वरे) न नष्ट करने योग्य विद्या प्राप्ति के व्यवहार में (न:) हम (देवान्) विद्वानों को वा दिव्या भोगों को (मा, यवृत्याः) अच्छे प्रकार प्रवृत्त कीजिये जिससे (अहम् ) मैं (सदम्) प्राप्त होने योग्य पदार्थ को पाकर (ते) आपके (रातो) दान कर्म में स्थिर (स्था) होऊ (जत) और (तव) आपके (अवसा) रक्षा आदि कर्म से (सुधीरः) सुन्दर योद्धाओं वाला मैं (इत्) ही होऊ ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! यदि आप अब हमको सुख पहुंचाइये तो हम विद्या देने वाले महावीर होकर आपकी सेवा को निरन्तर करें॥६॥ फिर मनुष्यों को किनके संग से कैसे होना योग्य है इस विषय को कहते हैं । उत त्या मे हवमा जग्म्यातं नास या श्री भिर्युवमङ्ग विभा। अत्रिं न महस्तमंसोऽमुमुक्त तूर्वतं नरा दुरितादभीके ॥१०॥ स 23120 मा EN AN ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५० ॥ MOHSIA पदार्थ:-हे (अङ्ग) मित्र (नासत्या) सत्य' आचरण करनेवाले (वित्रा) मेधावी अध्यापक और उपदेशक (नरा) नायक सब में श्रष्ठजन (त्या) वे (युथम्) तुम दोनों (धीभिः) उत्तम बुद्धि वा कर्मों से (मे) मेरे (प्रभीके) समीप में (हवम्) लेने योग्य पदार्थ को हा, जगम्यातम्) सब ओर से प्राप्त होमो (उत) और जैसे (महः) महान् (तमसः) अन्धकार से (अनिम्) सूर्य को (न) वैसे (दुरितात्) अधर्मा- चरण से (अमुक्तम् ) छुड़ानो और दुर्गुणों को (तूर्वतम्) नष्ट करो ॥१०॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालं०--जैसे सूर्योदय को प्राप्त होकर सब पदार्थ अन्धकार से छूट जाते हैं वैसे धार्मिक विद्वान् को प्राप्त होकर अविद्या से मनुष्य मुक्त होते हैं ॥१०॥ फिर मनुष्य कैसे हों इस विषय को कहते हैं । से नौ रायो घुमतो दाबतो दावारों भूत नृवतः पुरुक्षोः । दशस्यन्तो दिव्या पार्थिवालो गोमाता अप्यां सूळता च देवाः ॥११॥ पदार्थ :--, (देवाः) विद्वानो! जो तुम (न:) हमारे (धमतः) जिस की प्रशंसायुक्त कामना विद्यमान उस (बाजवसः) बहुत अनादि पदार्थयुक्त (नवतः) बहुत उत्तम मनुष्ययुक्त (पुरुक्षोः) बहुत अन्न वाले पदार्थ के (दशस्यन्तः) देनेवाले और (रायः) धन के (नातार) देनेवाले (भूत) होमो (ते) वे (च) और जो (दिव्याः) उत्सम (पार्थिवासः) पृथिवी के बीच हुए (गोजाताः) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध (अन्याः) और जलों में प्रसिद्ध हैं वे भी आप हम लोगों को (मुळता) सुखी करो ॥११॥ भावार्थः हे विद्वानो! तुम निरन्तर प्राप्त होने योग्य विद्या और धनों को प्राप्त होकर सब मनुष्यों को सुखी करो॥११॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ते नौ रुद्रः सरखती सजोषा मीळ्हुष्मन्तो विष्णुर्मुळन्तु वायुः । अभुक्षा वाजो दैव्यों विधाता पर्जन्यावाता पिप्यतामिर्ष ना ॥१२॥ पदार्थ:--हे अध्यापक और उपदेशको (सरस्वती) बहुत विज्ञानयुक्त (सजोषाः) समान प्रीति सेवने वाले (पर्जन्यावाता) मेघ और वात के समान आप दोनों जैसे (ते) वे अर्थात् (वः) दुष्टों को रुलाने वाला (विष्णुः) व्यापक अग्नि (वायुः) पवन (ऋभुक्षाः) मेधावी जन. (वाज:) अन्न (देव्यः) विद्वानों से किया हुआ व्यवहार और (विधाता) विधान करने वाला ये सब (मीळ हुमन्तः) बहुत वीर्य- AN How RANGA ५८६ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५०॥ odisha M सेचक आदि गुणों वाले होते हुए (नः) हम लोगों को (मळन्तु) सुखी करें वैसे (नः) हम लोगों के लिये (इषम्) अन्नादि पदार्थों को (विष्यताम्) बढ़ानो ॥१२॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है--हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर से निर्मित किये हुए पृथिवी आदि पदार्थ प्राणियों को सुखी करते हैं वैसे ही तुम विद्यादान से सब को सुखी करो ॥१२।। फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। उत स्य देवः सविता भगों नोऽपां नपादवतु दानु पनि। त्वष्टा देवेभिर्जनिभिः सजोषा द्यौदेवेभिः पृथिवी समुद्रः ॥१३॥ पदार्थ:-हे विद्वन् आप जैसे (स्यः) वह (देवः) देदीप्यमान (सविता) उत्पत्ति करने वाला सूर्य (भगः) सेवने योग्य प्राण (उत) और (अपाम्) जलों के बीच (नपात्) न गिरने वाला विद्य त् रूप अग्नि तथा (देवेभिः) दिव्य गुणों के और (जनिभिः) जन्म दा जन्म देने वालों के साथ (मष्टा) छिन्न भिन्नकर्ता (सजोषाः) समान प्रीति का सेवने वाला (देवेभिः) सूर्यादि वा दिव्य पदार्थों के साथ (धौः) सूर्य (समुद्रः) समुद्रों के साथ (पृथिली) भूमि (वानु) दान को (पतिः) पूर्ण करते हुए (न:) हम लोगों की (अवतु) रक्षा करें ॥१३॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालकार है-हे मनुष्यो ! जैसे ईश्वर से रचे हुए सूर्यादि पदार्थ सब मनुष्य आदि प्राणियों के कार्य- सिद्धि के निमित्त हैं वैसे आप लोग भी सब की कार्यसिद्धि करने वाले हों॥१३॥ फिर मनुष्यों को क्या आकांक्षा करने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। उत्त नोऽहिर्बुध्न्यः शृणोत्वज एकपात्पृथिवी समुद्रः । विश्वे देवा श्रृंताधो हुवानाः स्तुता मन्त्राः कविशस्ता अवन्तु ॥१४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (एकपात्) जिसका जगत् में एक पाद है (अजः) जो कभी नहीं उत्पन्न होता वह परमात्मा (नः) हमारी उस प्रार्थना को (शृणोतु) सुने जिससे (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में होने वाला (अहिः) मेघ (पृथिवी) भूमि (समुद्रः) अन्तरिक्ष (उत) और (ऋतावृधः) सत्य के बढ़ाने वाले (हुवानाः) और श्राह्वान करने वाले तथा (विश्वे, देवाः) समस्त विद्वान् (कविशस्ता:) कवि मेधावी जनों से प्रशंसित वा पढ़ाये हुए और (स्तुताः) प्रशंसित (मन्त्रा:) वेद की श्रुति वा वेदविचार लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें।।१४।। alive ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५१॥ ANI AN m भावार्थ:- हे मनुष्यो ! तुम- -जो जन्म मरणादि व्यवहार से रहित जगदीश्वर है उसकी कृपा और पुरुषार्थ से तथा सम्पूर्ण पृथिवी आदि पदार्थों के विज्ञान से अपनी अपनी उन्नति निरन्तर करो॥१४॥ फिर जिज्ञासु जन कैसे हों इस विषय को कहते हैं । एवा नपांतो मम तस्य धीभिर्भरद्वाजा अभ्यर्चन्त्यकैः । ग्ना हुतासो वसवोऽधृष्टा विश्व स्तुतासो भृता यजत्राः ॥१५॥ पदार्थः -- हे (यजत्रा) संग करने वालो जैसे (मम) मेरी और (तस्य) उसकी (धोभिः) बुद्धि वा कर्मों से (भरद्वाजाः) धारण किया है विज्ञान जिन्होंने वे सज्जन और (नपातः) पातरहित (हुतासः) सत्कार से ग्रहण किये हुए (स्तुतासः) प्रशंसा को प्राप्त (विश्वे) सब विद्वान् मेरी और उनकी बुद्धि वा कर्मों से (:) विचारों से (ग्नाः) वाणियों को (अभि, अर्चन्ति) सब ओर से सत्कृत करते हैं वैसे (एवा) ही (अधृष्टाः) धृष्टतारहित (वसवः) विद्यादिकों में बसनेवाले तुम (भूत) होमो ॥१५॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु०-जो विद्यार्थी विद्या और प्रगल्भता की इच्छा करते हैं वे यथार्थवक्ता तथा ईश्वर के गुण कर्म और स्वभावों को धारण कर इष्ट मति और विद्या को प्राप्त होते हैं ॥१५॥ इस सूक्त में विश्वे देवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में पचासवी सूक्त समाप्त हुआ ! aaANEMAMA अथ षोडशस्यकपञ्चाशत्तमस्य सुस्तस्य ऋजिया ऋषिः। विश्वेदेवा देवताः। १।२।३।५।७।१०। ११ । १२ निवृत्त्रिष्टुप् । ८ विष्टप्छन्दः । धवतः स्वरः । ४।६।६ स्वराट् पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । १३ । १४ । १५ निष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः । १६ निचुदनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः ॥ अब सोलह ऋचा वाले इक्यावनथें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मं में फिर मनुष्यों को क्या चाहने योग्य है इस विषय को कहते हैं । उदु त्यच्चक्षुर्महि मित्रयोराँ एति प्रियं वरुणयोरदब्धम् । ऋतस्य शुचि दर्शतमनीकं रुकभी न दिव उदिता व्यद्यौत् ॥१॥ aan श Dura - ५८८ ऋग्वेदः मं०६। सू० ५१।। । Mai- पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको ! जो तुम लोगों को (त्यत्) वह उत्तम (महि) बड़ा वस्तु वा (वरुणयोः) उदान के समान वर्तमान दो सज्जनों का (प्रियम् ) प्रिय पदार्थ वा (मित्रयोः) दो मित्रों का वा अध्यापक और अध्येताओं का वा शरीर के बाहर और भीतर रहने वाले प्राण वायुओं का (अदब्धम्) अविनष्ट व्यवहार वा (ऋतस्य, सत्य का (शुचि पवित्र (वर्शतम्) देखने योग्य (दिवः) बिजुली की उत्तेजना से (उदिता) सूर्योदयकाल में (रुवमः) प्रकाशमान सूर्य के (न) समान (अनीकम्) सेना समूह के समान कार्यसिद्धि का पहुंचाने वाला (चक्षुः) जिससे देखते हैं वह (वि, अशोत) विशेषता से प्रकाशित होता हैं (मा, उत्, एति) उत्कृष्टता से प्राप्त होता है तो आप लोग (उ) तर्क वितर्क से विद्वान् होश्रो ॥१॥ भावार्थ:--- जो मनुष्य धर्म से यान पाने की इच्छा करते हैं वे सूर्य के प्रकाश के तुल्य विज्ञान को प्राप्त होते हैं जो सत्य पदार्थ की विद्या की उन्नति करते हैं वे सर्वत्र सत्कृत होते हैं ॥१॥ फिर मेधावी जन क्या जानें इस विषय को कहते हैं । वेद यस्त्रीणि विदान्येषां देवानां जन्म सनुतरा च विद्यः । ऋजु मतेषु वृजिना च पश्य॑नधि चष्टे खुरों अर्थ एकान् । २।। पदार्थ : -... य:) जो (अर्थः) स्वामी (विप्रः) बुद्धिमान् (सूरः) सूर्य के समान (एवान्) प्राप्त होने योग्य पदार्थों के तुल्य (एषाम् ) इन (देवानाम् ) विद्वानों के (सनुतः) सर्वदा (जन्म) उत्पन्न होने वा (त्रीणि) तीन (विवथानि) जानने के योग्य कर्म उपासना और ज्ञानों को (मत्तेषु) मनुष्यों में (जिना) बलों और (ऋजु, च) सरल व्यवहार को (पश्यन्) देखता हुआ (प्रभि, श्रा, चष्टे) सब ओर से प्रकाशित करता है वह (च) भी इन उक्त पदार्थों को वेद जानता है ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो मनुष्य मनुष्यों के विद्याजन्म को जानते हैं वे मनुष्यों में पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को पाय सब पदार्थों के जानने योग्य होते हैं, जो कर्म उपासना और ज्ञानों को प्राप्त होते हैं वे स्वामी होते हैं ।।२।। फिर मनुष्य किन की प्रशंसा कर इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। उ यो मह ऋतस्य गोपानदिति भित्रं वरुणं सुजातान् । अर्यमणं भगमदेवधीतीनच्छां वोचे सचन्द्र पावकान् ।३।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (सधन्यः) धन्य प्रशंसितों के साथ वर्तमान मैं (व:) C. WAP a 600 MAR ऋग्वेदः मं०६ । सू०५१ ।। ५८६ -- तुम्हारे (महः) बड़े (ऋतस्य) सत्य के (गोपान्) पालनेवालों वा (अवितिम्) अखण्डित विद्या वा प्रकृति वा (मित्रम्) मित्र वा (वरुणम्) इच्छा करने योग्य वा (अर्यमणम्) न्यायाधीश वा (भगम्) ऐश्वर्य वा (अदब्धधीतीन्) अविनष्ट अध्ययन व्यवहारवालों वा (सुजातान्) सुन्दर प्रसिद्ध वा (पायकान्) पवित्र करने वाले पदार्थों की (स्तुषे) प्रशंसा करता हूं (उ) और तुम्हारे प्रति (अच्छा) अच्छे प्रकार (वोचे) कहूं उस मुझे तुम अच्छे प्रकार प्राप्त होगी ।।३।। भावार्थ:-जो मनुष्य विद्वानों की प्रशंसा कर वा विद्वानों का संग कर सकल प्रकृति आदि पदार्थविद्या आदि पदार्थों को जान कर औरों को पढ़ाते हैं वे सबके पवित्र करने वाले हैं ।।३।। फिर मनुष्य कैसे राजाजनों को मानें इस विषय को कहते हैं । रिशादसः सल्पतीरदबान्महो राजः सुवसनस्य दातॄन् । यूनः सुक्षत्रान्क्षयंतो दिवो नृनादित्यान्याम्यदिति दुवायु ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे मैं (रिशासः) हिंसक वा नाश करने वाले वा सत्यतीन्) सत्य के पालने वाले बा (अदब्धान्) विनाश को न प्राप्त हुए उनको वा न हिंसने वाले वा (सुवसनस्य) सुन्दर वास के (दातन्/ देने वाले वा सुक्षत्रान्) उत्तम धन और राज्यों को वा (अदितिम्) अखण्डित नीति को (क्षयतः) स्थिर होते हुए (दिवः) कामना करने योग्य और काम करने वा (नन्) मनुष्यों वा (आदित्यान्) किया है. अड़तालीस वर्ष ब्रह्मचर्य जिन्होंने उन वा (यूनः)जवान मनुष्यों वा (दुबोयु) सेवन की कामना करने वालों को तथा महः) महान् (राज्ञः) राजाओं को मैं (यामि) प्राप्त होता हूं वैसे ऐसों को तुम भी प्राप्त होनो ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो चोर आदि के निकासने और धर्मात्माओं के पालने वाले, हिसादि दोषों से रहित, सब के लिये सुख से निवास देने वाल, पूर्ण विद्यायुक्त, जितेन्द्रिय, न्याय से पिता के समान प्रजा के पालने वाले, पूर्ण यौवनयुक्त, दुष्ट व्यसनों से रहित, गुणग्राही जन हों उन्हीं को तुम स्वामी मानो और क्षुद्र हृदय वालों को न मानो ॥४॥ पित्रादिकों को संतानों के लिये क्या करना योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । द्यौ३'पितः पृथिवि मातरध्रगग्ने भ्रातर्वसवो मुळता नः । विश्व आदित्या अदिते सजोषा अस्मभ्यं शर्भ बहलं वि यन्त ॥५॥ AN

(रथ्यः) रथों में साधु उत्तम जो व्यवहार उसके समान (यूयम् ) तुम (स्था) होइहि)
ऋग्वेदः म० ६ । सू० ५१ ।।
पवार्थ:--हे (पितः) पालनेवाले (धौ:) सूर्य के समान तुम हे (मातः)
माता (पृथिवी) भूमि के समान तुम हे (अग्ने) अग्नि के समान प्रकाशात्मा (भ्रातः)
भ्राता तुम (अध्र क) द्रोहरहित होते हुए (वसवः) सुख वास के देने वाले तुम सब
(न:) हमको (मळता) सुखी करो हे (अदिते) अखण्डित ज्ञान और ऐश्वर्यवती
पंडिता स्त्री जैसे (विश्वे) सब (प्रादित्याः) पूर्ण की है ब्रह्मचर्य से विद्या जिन्होंने वे
सज्जन (अस्मभ्यम् ) हम लोगों के लिये (बहुलम्) बहुत पदार्थयुक्त (शर्म) सुख करने
वाले घर को (वि, यन्त) देते हैं वैसे (सजोषाः) समान एकसी प्रीति की सेवने वाली
तु बहुत सुख और विद्या को दे ॥५॥
भावार्थ:- इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जिनका सूर्य के
समान सुन्दर शिक्षा से पालने वाला पिता पृथिवी के समान सहनशीलता
आदि गुण और विद्यायुक्त माता, अग्नि के समान प्रकाशमान भ्राता वर्तमान
है वही सुखी होता है तथा जैसे पूर्ण विद्यावान् जन सन्मार्ग को पूंछते हैं वैसे
विद्या पढ़ने वाले पढ़ाने वालों का निरन्तर सत्कार करते हैं ॥५॥
फिर मनुष्यों को किसकी इच्छा नहीं करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
मा नो दृषि वृद्धी समस्मा अघायत रीरधता यजत्राः ।
यूयं हि ष्ठा रथ्यो नस्तनूनी यूवं दक्षस्य वर्चलो बभूव ।।६।।
पदार्थ:-हे (यजत्राः) संग करने वालो (यूयम् तुम (वृकाय) चोर के लिये
वा (वृक्ये) चोरों में उत्पन्न हुए व्यवहार के निमित्त (सपस्म, अघायते) अघ की
इच्छा करने वाले सर्वजन के लिये (नः) हम लोगों को (मा, रीरधता) मत नष्ट करो
तथा (नः) हमारे (तनूनाम्) शरीरों के (दक्षस्य) बलयुक्त (बचस:) वचन का
A
-
जिससे सुख करने वाले (बभूव) होमो ॥६॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-सब मनुष्यों को
चोर आदि दुष्टों का व्यवहार कभी नहीं कर्तव्य है और जो धर्मात्मा,
अजातशत्रु अर्थात् जिन के शत्रु नहीं हुआ तथा सबकी रक्षा करने वाले हों
उनकी
तुम
निरन्तर सेवा करो ॥६॥
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
मा व एनो अन्यकृतं भुजेम मा तत्कर्म वसो यच्चय ।
विश्वस्य हि क्षयय विश्वदेवाः स्वयं रिपुस्तन्वं रीरिषीष्ट ॥७॥

ऋग्वेदः मं०६। सू० ५१॥ - दुष्ट का atra पदार्थ:-हे (बसनः) वास के हेतु (विश्वदेवाः) सब विद्वानो ! तुम (विश्वस्य) संसार के बीच (यद) जो (चयध्वे) इकट्ठा करो और (हि) जिससे जिसको (क्षयथ) निवास करो जैसे (रिपुः) शत्रु (तन्वम्) अपने शरीर को (स्वयम्) आप (रीरिषीष्ट) निरन्तर मारे वैसे उस (व:) तुम्हारे (अन्यकृतम्) और से किये हुए (एनः) अपराध को हम लोग (मा, भुजेम) मत भोगें (तत्) उस दुष्ट कर्म को (मा) मत (कर्म) करें ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० हे विद्वानो तुम किसी अनुकरण मत करो, अपने शरीर को नष्ट मत करो तथा और के किये अपराध के संगी मत होमो ॥७॥ मनुष्य सदैव नम्र हों इस विषय को कहते हैं ।। नम इदुग्रं नम आ विवासे नमो दाधार पृथिवीमुख द्याम् । नयाँ देवेभ्यो नम ईम एषां कृतं चिदेनो नमसा विवासे ||८|| पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (नमः) नमस्कार करने योग्य ब्रह्म (पृथिवीम्) भूमि (उल) और (द्याम्) सूर्य को (दाधार) धारण करते उस (उग्रम) तीव्र (नमः) नमस्कार करने योग्य ब्रह्म का मैं (प्रा, वियासे) सेवन करू (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (नमः) अन्न की सेवा करू (नमः) सत्कार बा (नमः) अन्न की (ईशे) इच्छा करूं उस (नमसा) सत्कार से (एषाम्। इन के (कृतम्) किये उत्तम कर्म (चित) और (एनः) अनुतम कर्म का (इत) ही (मा, विवासे योग्य सेवन करू 11८॥ -हे मनुष्यो ! सब से नमस्कार करने योग्य परमेश्वर के सह य प से हम लोग उत्तम क्रिया को धारण कर और दुष्टता को निवार विद्वानों के लिये हित सिद्ध कर सबका उपकार सदैव करे ।।८।। फिर सबको कौन नमस्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । ऋतस्य वो रथ्यः पूतदक्षान्तस्य पस्त्यसदो अदब्धान । ताँ आ नोभिरुष्चक्षसो नृन् विश्वन्वि आ नमे महो यजत्राः ॥९॥ पदार्थः (यजत्राः) अच्छे व्यवहार का संग करते हुए सज्जनो (रथ्यः) रथों में उत्तम व्यवहार वतने वाला मैं (ऋतस्य) सत्य के (पूतदक्षान्) पवित्र बलों वा (ऋतस्य) यथार्थ धर्मयुक्त व्यवहार के (पस्त्यसदः) जो घरों में स्थिर होते उन (अदब्धान्) अविनष्ट कार्यो वा नष्ट न करने वाले पदार्थों वा (उरुचक्षसः) बहुत दर्शनों वा (विश्वान्) समग्र (महः) महाशय (नन्) उत्तम विद्वान् (वः) आप लोगों को PM है

ऋग्वेदः मं०६। सू० ५१ ।।
(श्रा, नमे) अच्छे प्रकार नमस्कार करता हूं जो हम लोगों को सत्य बोध कराते हैं
तान्) उन (व:) आप लोगों का (नमोभिः) बहुत सत्कारों से हम लोग निरन्तर
(आ) अच्छे प्रकार सत्कार करें।
भावार्थ:-हे मनुष्यो! तुम सब से उत्कृष्ट विद्या वाले, धर्मिष्ठ,
परोपकारी जनों ही को सदा नमो, तथा इन से विनय (नम्रता) को प्राप्त
होओ ॥६॥
फिर कौन सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं ।
ते हि श्रेष्ठंवर्चसस्त उ नस्तिरो विश्वानि दुरिता नयन्ति ।
सुक्षत्रासो वरुणो मित्रो अन्नि वधीतयो वक्मराजसत्याः ॥१०॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (हि) जिससे (ते) वे (श्रेष्ठवर्चसः) श्रेष्ठ पढ़ने वाले
(सुक्षत्रासः) उत्तम राज्य वा धनयुक्त (वरुणः) श्रष्ठजन (मित्रः) मित्र (अग्नि:)
अग्नि के समान शुद्धान्तःकरण पुरुष, इनके समान वर्तमान (ऋतधीतयः) सत्य के
धारण करने वाले (बचमराजसत्याः) कहने वाले राजाओं में सत्य के प्रतिपादन करने
दाले सज्जन (नः) हम लोगों के (विश्वानि) समस्त (दुरिता, दुष्टाचरणों को
(तिरः) तिरस्कार को (नयन्ति) पहुंचाते हैं उस कारण से (उ) ही (ले) वे मान
करने योग्य हैं ॥१०॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जिससे विद्वान्
धर्मात्मा जन निष्कपटता से औरों के हित साधने वाले, विद्यादान और
उपदेश द्वारा सब दुष्ट आचरणों को निवार के सत्य आचरण में प्रवृत्त करने
वाले हैं इसी से सत्कार करने योग्य हैं ॥१०॥
फिर किसके तुल्य कौन मानने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं ।।
ते न इन्द्रः पृथिवी शाम वर्धन पूषा भगो अदितिः पञ्चजन:
सुशर्माणः स्ववस: सुनीथा भवन्तु नः सुत्रावासः सुगोपाः ॥११॥
पदार्था:- हे मनुष्यो जिससे' (ते) वे (इन्द्रः) बिजुली (पृथिवी) अन्तरिक्ष
(क्षाम) भूमि (पूषा) वायु (भगः) ऐश्वर्यवान् जन और (अदितिः) जन्म देने वाली
माता के समान (सुशर्माण:) प्रशंसित घरों वाले (स्ववस:) जिन की सुन्दर रक्षा
और (सुनीथाः) न्याय विद्यमान वे (पञ्च, जनाः) पांच प्राणों के समान उत्तम
मनुष्य हैं इससे (न:) हमको (वर्धन्) बढ़ावें और (न:) हमारे (सुगोपाः) सुन्दर
गौ वा पृथिव्यादिकों के रक्षा करने वाले तथा (सुत्रात्रास:) उत्तमता से पालना करने
वाले (भवन्तु) हों ॥११॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०५१ ॥ नू समान attune Aama भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालकार है-जिससे विद्वान् जन बिजुली, भूमि, अन्तरिक्ष, प्राण, ऐश्वर्य और माता के तुल्य सब के बढ़ाने वा पालनेवाले हैं इसीसे पूज्य होते हैं ॥११॥ फिर कौन धन्यवाद के योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । दिव्यं नंशि देवा भारद्वाजः सुमतिं यांति होता । आसानेभिर्यजमानो मियेधैर्देवानां जन्म वसुयुबवन्द ।।१२।। पवार्थ:--हे (देवाः) विद्वानो जो (भारद्वाज:) विज्ञान को धारण किये (होता) देनेवाला (सुमतिम्) शोभन बुद्धि को (याति) प्राप्त होता है वह (नू) शीघ्र (दिव्यम्) मनोहर (समानम्) जिसमें स्थिर होता उस घर को (नंशि) व्याप्त होता है । जो (बसूयुः) द्रव्यों की कामना करने और (यजमानः) यज्ञ करनेवाला (मियेधैः) प्रेरणा देनेवाले (प्रासानेभिः) बैठे हुए ऋत्विजों के साथ (देवानाम् विद्वानों के (जन्म) उत्पन्न होने की (वबन्द) प्रशंसा करता है उसका तुम सत्कार करो ।।१२।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो राजा के विद्या और जन्म की प्रशंसा करते हैं वे शुद्ध सुख को प्राप्त होते हैं जैसे बहुत विद्वानों के साथ यज्ञ करने वाला यज्ञ को सुभूषित कर समस्त जगत् का उपकार करता है वैसे ही विद्वान् जन पढ़ाने और उपदेशों से सब को प्राज्ञ (उत्तम ज्ञाता) कर प्रशंसा को प्राप्त होते हैं ॥१२॥ फिर कौन दूर करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । अप त्वं जिनं रिपुं स्तेनमग्ने दुराध्यम् । दविष्टमस्य सत्पते कृधी सुगम् ॥१३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (त्यम्) उस (वयिष्ठम्) अतीव दूर (वृजिनम्) त्यागने योग्य (दुराध्यम्) वा दुःख से वश करने योग्य (रिपुम्) विद्याशत्रु (स्तेनम्) चोर को (सुगस्) सुगम (कृषी) करो, हे (सत्पते) सत्य के पालने वाले आप (अस्य) इसका (अप) दूरीकरण करो ॥१३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम विद्या का अभ्यास कर शरीर और आत्मा के बल से युक्त होते हुए दुःसाध्य भी शत्रुओं को सुसाध्य अर्थात् उत्तमता से सूधे करो जिससे वे दूर स्थित ही भय से सद्धर्म के अनुष्ठान करने वाले हों ॥१३॥ य ऋग्वेदः म०६ । सू० ५१ ।। BHEN , AU फिर किससे मित्रता कर कौन दूर करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । प्रावाणः सोम नो हि के सखित्वनाय वावशुः । जही न्य१'त्रिण पणि को हि षः॥१४॥ पदार्थ:-हे (सोम) प्रेरणा देने वाले जो (मावाण:) मेघों के समान (सखित्वनाय) मित्रपन के लिये (नः) हम लोगों को (हि) ही (वावशुः) चाहते हैं वे (कम्) सुख को प्राप्त हों जो (अत्रिणम्) दूसरे का सर्वस्व हरनेवाला (पणिम्) व्यवहारकर्ता का संबन्ध करता है (सः, हि) वही (वृक:) चोर है इस हेतु से इसे आप (नि, जही) निरन्तर मारो ॥१४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-यदि धर्मात्मा विद्वान् जन धर्मिष्ठ विद्वानों के साथ मित्रता रखते हैं तो वे निरन्तर सुख को प्राप्त होकर मेघ के समान सबको बढ़ाके दुष्ट आचरण करने वाले छलियों को शीघ्र मारते हैं ॥१४॥ कौन इस संसार में प्रानन्द के देने वाले हैं इस विषय को कहते हैं ।। यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिधवः । का नो अध्यन्ना सुगं गोपा अमा ॥१५॥ पदार्थ:-हे (सुदानवः) उत्तम गुणों के देने वाले विद्वानो (इन्द्रज्येष्ठr:) सूर्यलोक महान् ज्येष्ठ जिन लोकों का उनके समान वर्तमान (अभिद्यः) पदार्थज्ञान के भीतर प्रकाशमान (गोपाः) रक्षा करने वाले (अध्वन्) मार्ग में (न:) हम लोगों को तथा (सुगम्) सुन्दरता से जिसमें जाते (प्रमा) ऐसे घर को (मा, कर्ना) प्रकट करो उस (हि) ही घर में (यूयम्) तुम (स्था) स्थित होतो ॥१५॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो मनुष्य दुर्गम मार्गों को सुगम करते हैं और उत्तम घरों को बनाकर आप तथा औरों को निवास करते कराते हैं वे ही जगत् में सुख करने वाले होते हैं ॥१५॥ फिर कैसे मार्ग सिद्ध करने चाहियें इस विषय को कहते हैं । अपि पन्यामगन्महि स्वस्तिगामनेहसम् । येन विश्वाः परि द्विषो वृणक्ति विन्दते वसु ॥१६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (येन) जिससे वीर जन (विश्वाः) सब (द्विषः) शत्रुओं को (परि, वृक्ति) सब ओर से दूर करता और (बस) धन को (विन्दते) प्राप्त MARAN Rame MER ऋग्वेदः मं०६ । सू०५२ ।। होता है उस (अनेहसम्) न नष्ट करने योग्य और (स्वस्तिगाम्) जिसमें सुख को प्राप्त होते उस (पन्थाम्) मार्ग को हम लोग (अपि) भी (अगन्महि) प्राप्त हों ।।१६।। भावार्थ:--.-राजादि मनुष्य ऐसे मार्गों को बनावें जिन में जाते हुओं को चोरों का भय न हो और द्रव्य का लाभ भी हो ॥१६॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के प्रथं के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में इक्यावनवां सूक्त समाप्त हुमा ।। .. cume SHA बाम- समान अथ सप्तशचस्य द्विषञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य ऋजिष्वा ऋषिः। विश्वेदेवाः देवताः । १४ ॥१५॥ १६ निवृत्रिष्टुप् । २।३ । ६ । १३ । १७ त्रिष्ट्रप छन्दः । धैवतः स्वरः ।५ भुरिपङ्क्तिश्छन्दः । पंचमः स्वरः । ७ । ८।११ गायत्री ।। १० । १२ निचद्गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । १४ विराड जगती छन्दः । निषादः स्वरः ।। अब सत्रह ऋचावाले' बावनवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में किस से अधिक सुख होता है इस विषय को कहते हैं । न तदिशा न पृथिव्यानुं मन्ये न यज्ञेन नोत शर्मीभिराभिः। उब्जन्तु तं सुभ्व१': पर्वतासो नि हीयतामतियाजस्य यष्टा ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (सभ्वः) जो अच्छे होते हैं वे (पर्वतास:) मेघ (तम्) उसको (उब्जन्तु) कुटिल' करें वैसे (अतियाअस्य) जो अतीव यज्ञ करने के योग्य है उसका (यष्टा) संग' करने वाला वर्तमान है वह (तत्) उस कारण से (दिवा) दिन में (न) न' (नि, हीयताम् ) छोड़ने योग्य है (न) न (पृथिव्या) भूमि से (न) न (यज्ञेन) होम आदि कर्म से (न) न (उत) और (आभिः) क्रियानों से वा (शमीभिः) कर्मों से छोड़ने योग्य है उसे मैं (अनु, मन्ये) अनुकूलता से मानता हूं ॥१॥ भावार्थः--जो सुख मेघों से उत्पन्न होता है वह सुख न दिवस में, न पृथिवी, न सगति, न कर्म से होता है इससे यज्ञ करने वाला ही सुखभागी होता है ॥१॥ फिर कौन मनुष्य निन्दा करने और वर्जने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । अति वा यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यः क्रियमाणं निनित्सात् । तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्मद्विषमभि तं शोचतु द्यौः ॥२॥ , ५९६ ऋग्वेदः मं०६। सू० ५२॥ पवार्थ:-हे (मरुतः) मनुष्यो (यः) जो (नः) हम लोगों को (अति, मन्यते) अत्यन्त मानता है (वा) वा (यः) जो (क्रियमाणम्) क्रियमाण (ब्रह्म) धन को अत्यन्त मानता है (वा) वा (निनित्साव) निन्दा' करने को चाहे (तम्) उस- (ब्रह्मद्विषम्) धनके द्वषीजन को (ोः) कामना करता हुआ विद्वान् (अभि, शोचत) सब ओर से शोचे (तस्मै) इसके लिए (तपूंषि) तेजोमय व्यवहार (वृजिनानि) बाधक (सन्त) हों ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! जो मनुष्य अतिमान, धनादिकों से द्वेष और अच्छे सज्जनों की निन्दा करते है वे दण्ड देने, निन्दा करने और शोच करने योग्य होते हैं ॥२॥ फिर मनुष्य कैसे परीक्षक हों इस विषय को कहते हैं । किमङ्ग त्वा ब्रह्मणः सोम गोपां किमङ्ग वाहुरभिशस्तिपां ना किमङ्गनः पश्यसि निधानान् ब्रह्मद्विषे तयुषि हेतिमस्य ॥३॥ पदार्थ:--हे (अङ्ग) मित्र (सोम) ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले जन (किम्) क्या स्वा) तुझे (ब्रह्मणः धनका (गोपाम् ) रक्षा करनेवाला (माहुः) कहें, हे (अङ्ग) मित्र (किम् क्या (त्वा) तुझे (अभिशस्तिपाम्) सामने प्रशंसा रखने वाला कहते हैं । हे {श्रङ्ग) मित्र तू (न:) हमलोगों को (किम्). क्या (पश्यसि) देखता है । हे मित्र तू (नियमानान्) निन्दा प्राप्त (नः) लोगों को क्या देखता है (ब्रह्मविषे) वेद- विद्याद्वीपी जनके लिए (तपुषिम् ) अति तपे हुए (हेतिम्) बच को क्या नहीं देखता (प्रस्य) इस पर वज्र प्रहार कर ॥३॥ भावार्थ:---हे मनुष्यो ! तुम इस धन के रक्षक क्यों नहीं होते हो, स्तुति (प्रशंसा) करने वाले हम लोगों को निन्दा करने वाले भ्रम से मत देखो, जो निश्चय धनपति तथा वेदविद्या से द्वेष करते हैं उनका संग युद्ध विना मत करो ॥३॥ फिर मनुष्यों को कैसा आचरण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अवन्तु मामुपसो जायमाना अवन्तु मा सिन्धवः पिन्वमानाः । अवन्तु मा पर्वतासो प्रयासोऽवन्तु मा पितरो देवहूतौ ॥४॥ पदार्थ:-हे उपदेश करने वालो तुम (देवहूतौ) दिव्यगुण वा विद्वानों के संग्रहण में जैसे (जायमानाः) उत्पद्यमान (उषसः) प्रभात' वेलाए (माम्) मेरी (अवन्त) रक्षा करें तथा (पिन्वमानाः) सेचन करती हुई (सिन्धवः) नदियां (मा) DUIND शुभ गुणों को CAM कथ AM स:) ऋग्वेदः मं०६ । सू०५२ ।। मेरी (अवन्तु) रक्षा करें और (ध्र वास:) निश्चल' (पर्वतासः) शैल' पहाड़ (मा) मेरी (अवन्त) रक्षा करें और (पितरः) पिता वा पढ़ाने वाले वा ऋतु वसंत आदि (मा) मेरी (अवन्तु) रक्षा करें वैसी शिक्षा करो ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! तुम इस प्रकार युक्त आहार विहार करो जिससे सब सृष्टिस्थ पदार्थ दुःख देने वाले न हों और तुम लोग प्राप्त होनो ॥४॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । विश्वऽदानों सुमनसः स्याम पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम् । तथा करदसूपतिर्वसूनां देवा ओहानोऽवसागमिष्ठः ॥५॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (अवसा) रक्षा आदि के साथ (प्रागमिष्ठः) अतीव आने और (बसूनाम्) वसुओं के बीच (बसुपतिः), पदार्थों की पालना करने वाले और (मोहानः) रक्षक आप जैसे हम लोगों को (देवान्) विद्वान् (करत) करें वैसे हम लोग (विश्वदानीम्) सर्वदा (सूर्यम्) सूर्यमण्डल' जो (उच्चरन्तम्) ऊपर को चढ़ता है उसे (पश्येम) देखें और (न) शीघ्र (सुमनसः) प्रसन्नचित्त (स्याम) होवें ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जैसे प्रीति से अध्यापक और उपदेशक विद्यार्थियों को और उपदेश सुनने वालों को विद्वान् करके सुखी करते हैं वैसे ही पढ़ने वालों और उपदेश सुनने वालों को चाहिये कि विद्वान् होकर भी इनका सदा सत्कार करें॥५॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इन्द्रो नेदिष्ठमवसागमिष्ठः सरस्वती सिन्धुभिः पिन्व॑माना । पर्जन्यों न ओषधीभिर्मयोभुरणिः सुशंसः मुहवः पितेव ।।६।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अवसा) रक्षा प्रादि से (नेदिष्ठम्) अतीव समीप को (प्रागमिष्ठः) अतीव पाने वाला वा (सिन्धुभिः) नदियों से (पिन्वमाना) शोभन प्रशंसा तथा (सुहबः) शोभन सत्कार वाले (अग्निः) अग्नि के समान (प्रोषधोभिः) ओषधियों से युक्त (पर्जन्यः) मेघ (मयोभुः) सुख हुवाने तथा (पितेव) जन्म देने वाले पिता के समान (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (नः) हम लोगों की पालना करता है वह राजा हम लोगों से निरन्तर सत्कार करने योग्य है ।।६।। ARR ऋग्वेदः मं०६। सू० ५२ ।। 4 REP भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो राजा न्याय और पुरुषार्थ से प्रजा की निरन्तर रक्षा करता है उसकी पिता के समान प्रजाजन पालना करते हैं ॥६॥ फिर पढ़ने वालों को क्या करना चाहिए इस विषय को कहते हैं । विश्वे देवास आ गत शृणुता में इमं हवंम् । एदं बहिनि षीदत ॥७॥ पदार्थ:-हे (विश्वे देवासः) सब विद्वानो! तुम हमारे अति समीप (मा, गत) पामो तथा (इदम् } इस (बहिः) उत्तम आसन पर (नि, सीदत) निरन्तर स्थिर होमो तथा (मे) मुझ विद्यार्थी के (इमम्) इस (हवम्) सुने पढ़े विषय को (मा, शृणुता) अच्छे प्रकार सुनो ॥७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में "नेदिष्ठम्" यह पद पिछले मंत्र से अनुवृत्ति में पाता है। विद्यार्थियों को चाहिये कि परीक्षा करने वाले विद्वानों की प्रार्थना कर परीक्षा में सुनाने योग्य समस्त सुना और पढ़ा विषय उसके समीप में निवेदन कर तथा वे परीक्षक भी अच्छे प्रकार परीक्षा कर गुण और दोषों का उपदेश दें ऐसा करने पर पढ़ना निर्दोष हो ॥७॥ फिर अध्यापक और अध्ययन करने वाले परस्पर कैसे वर्ताव करें इस विषय को कहते हैं ।। यो हो देवा धृतस्नुना हव्येन प्रतिभूषति । तं विश्व उप गच्छथ ॥४॥ पवार्थ:-हे (देवाः) पढ़ाने और उपदेश करने वाले विद्वानो (4:) जो (घृतस्नुना) घृत के समान शुद्ध (हव्येन्) लेने देने योग्य वा प्रशंसित पढ़ने और सुनने से (4:) तुम लोगों को (प्रतिभूषति) प्रत्यक्षता से सुभूषित करता है (तम्) उसके (विश्वे) सब तुम लोग (उप, गच्छथ) समीप प्राप्त होश्रो ॥६॥ भावार्थ:--हे मनुष्यो ! जो सत्य विद्यादान से तुम सब लोगों को सुभूषित करता है उसे तम सब प्रतिभषित करो अर्थात् बदले में सुशोभित करो ॥८॥ फिर मनष्यों को कैसा नियम करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्यमृतस्य ये । सुमूळीका भवन्तु नः ॥९॥ पदार्थ:-हे राजन् वा विद्वानो (2) जो (नः) हमारे (सूनवः) सन्तान हों वे (अमृतस्य) नाशरहित विज्ञान की (गिरः) विद्यायुक्त वाणियों को (उप, शृण्वन्तु) समीप में सुनें तथा (सुमुळीकाः) सुन्दर सुख वाले होकर (नः) हमारी सेवा करने वाले भवन्त) हों।।९।। a , ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५२ ॥ ५४४ भावार्थ:-पितृजनों को राजनीति व CLA NRO aar भावार्थ:-पितृजनों को राजनीति वा अपने कुल में यह दृढ़ नियम करना चाहिए कि जितने हमारे सन्तान हैं वे ब्रह्मचर्य से समस्त विद्याओं के ग्रहण के लिए ब्रह्मचर्य प्राश्रम को कर, जो इसका विनाश करे उसे राजा वा कुलीन निरन्तर दण्ड देखें ।।६।। फिर मनुष्य क्या कामना कर विद्यानों को प्राप्त होवें इस विषय को कहते हैं । विश्वे देवा ऋताधं ऋतुभिईवनश्रुतः । जुषन्तां युज्यं पयः ॥१०॥ पदार्थ:-हे (ऋतावृधः) सत्यविद्या के बढ़ाने वालो (हवनथ तः) जो अध्ययन को सुनते हैं वे (विश्वे, देवाः) सब विद्वान् आप लोग (ऋतुभिः) वसन्तादिकों के साथ (युज्यम्) समाधान करने योग्य (पयः) दूध, जल वा अन्न को (जुषन्ताम्) सेवें ॥१०॥ भावार्थ:-जो अध्ययन करने और परीक्षा कराने को चाहें वे मद करने, कुत्सित बुद्धि वा नाश करने वाले पदार्थों को छोड़ के दुग्ध आदि बुद्धि के बढ़ाने वाले उत्तम पदार्थों को सेवें ॥१०॥ फिर मनुष्य किसके साथ क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। स्तोत्रमिन्द्रों मरुद्गणस्त्वष्टमान्मित्रो अर्थमा । इमा हव्या जुषन्त नः ॥११॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो श्राप जो (मरुद्गणः) जिसके उत्तम मनुष्यों का समूह और (त्वष्टमान्) उत्तम शिल्पीजन विद्यमान हैं तथा (मित्रः) जो कि सबका मित्र (अयमा) न्याय करने वाला और (इन्:) परमैश्वर्यवान् राजा हो उसके साथ (नः) हमारे (स्तोत्रम्) उस स्तोत्र को जिससे स्तुति करते हो और (इमा) इन (हव्या) लेने खेने योग्य अन्नादि पदार्थों को (जुषन्त) सेवो ॥११॥ भावार्थ:--वेही मनुष्य चाहे हुए पदार्थों को पा सकते हैं जो सब से श्रेष्ठ पुरुष को अधिष्ठाता करते हैं ॥११॥ फिर मनुष्य कैसे राजा को करें इस विषय को कहते हैं । इमं नो अग्ने अध्वरं होतर्वयुनशो यज । चिकित्वान्दैव्यं जनम् ॥१२॥ पदार्थ:-हे (होतः) देने वाले (अग्ने) अग्नि के समान वर्तमान राजन् माप (क्युनशः) उत्तम ज्ञान से (न:) हमारे (इमम्) इस (अध्वरम्) न नष्ट करने योग्य न्याय व्यवहार को (चिकित्वान्) जानने वाले आप (देव्यम् ) विद्वानों से Musa MOM D D apan per सत्कार को प्राप्त हुए (जनमा ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५२ ।। प्राप्त हों ॥१२॥ भावार्थ:--हे राजा प्रजाजन ! आप जो हमारे बीच शुभ गुणकर्म स्वभाव युक्त हो उसी को राज्य करने में अच्छे प्रकार युक्त करो ॥१२॥ फिर मनुष्यों को कौन बुला कर सत्कार करनेयोग्य हैं इस विषय को कहते हैं । विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उप धवि छ । ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बहिर्षि मादयध्वम् ॥१३॥ पवार्थ:-हे (विश्वे, देवाः) सब विद्वानो (ये) जो (अन्तरिक्षे) भीतर अवि- नाशी आकाश में (ये) जो (धवि) प्रकाश में (ये) जो (अग्निजिह्वाः) सत्य प्रकाशमान जिह्वा जिन की (उत्त, वा) अथवा (यजत्राः) संग करने योग्य हों उन सब के साथ (मे) मेरे (इमम् ) इस (हवम्) सुने पढ़े और जाने हुए विषय को (उप, शृणुत) समीप में सुनो और समीप में (स्थ) स्थिर होश्रो तथा (अस्मिन्) इस (बहिषि) उत्तम प्रासन वा स्थान में (प्रासखा) बैठ के हम लोगों को (मादयध्वम्) मानन्दित करो ॥१३॥ भावार्थ:-मनुष्यों को सदैव जो विमानस्थ अन्तरिक्ष में, वा जो बिजुली की विद्या में कुशल हैं और जो पढ़ाने वा परीक्षा करने में निपुण, धर्मिष्ठ, प्राप्त, विद्वान् हों उनके निकट जाकर और उनको अपने समीप बुलाकर सत्कार कर उनसे सुनना चाहिये और सुना हुआ सुनाना चाहिये जिससे सुनने में वा विज्ञान में श्रम न हो ॥१३॥ फिर कौन संग करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । विश्वे देवा मर्म शृण्वन्तु यज्ञियां उभे रोदसी अपां अपां नपाच्च मन्म मा वो बचांसि परिचक्ष्याणि वोचं मुम्नेष्विद्वो अन्तमा मदेम ॥१४॥ पदार्श:-हे (विश्वे, देवाः) सब विद्वानो पाप (उभे) दोनों (रोदसी) प्राकाश और पृथिवी के तुल्य सब की रक्षा करने वाले (यशिया:) सज्जनों का संग करने वाले होते हुए (मम) मेरे (वचांसि) वचनों को (शृण्वन्तु) सुनिये तथा (व:) आपके (अपाम्) प्राणों के (नपात) न विनाश करने वाले' (मन्म) विज्ञान के विरुद्ध मैं (मा, वोचम्) मत कहूं (परिचक्ष्याणि, च) और सब ओर से कहने के योग्यों की प्रशंसा करू', इस प्रकार वर्तमान हम लोग (व:) प्रापके (अन्तमाः) समीप स्थिर होते हुए (सुम्नेषु) सुखों में (इव) सर्वदैव (मदेम) आनन्दित हों ॥१४॥ BAP tive - पर्जन्यो) बिजुलीरूप अग्नि और मेघ के तुल्य' (अस्मिन्) इस (हवे। ऋग्वेदः मं०६ । सू०५२ ।। ६०१ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है - हे मनुष्यो ! जिन विद्वानों का वचन असत्य नहीं होता तथा जिनका संग सर्वदा सुख और विज्ञान का बढ़ाने वाला है और जो भूमि और सूर्य के तुल्य सब के पालने वाले और विवाद सुनकर पक्षपात को छोड़ न्याय करने वाले हों उनके निकट स्थिर होकर सदैव आनन्द को प्राप्त होओ॥१४॥ फिर मनुष्यों से कौन नित्य सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । ये के च मा महिनो अहिमाया दिवो जज्ञिरे अपां सधस्थे । ते अस्मभ्य मिषये विश्वमायुः क्षप उस्रा वरिवस्यन्तु देवाः॥१५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (ये) जो (के, च) कोई भी (महिनः) महान् जैसे (ज्मा) पृथिवी के बीच (अहिमायाः) मेघ की कुटिल' गतियां (दिवः) सूर्य के प्रकाश से (अपाम्) जलों के (सधस्थे) समानस्थान वाले मेघमंडल' में (जज्ञिरे) उत्पन्न होती हैं वैसे वर्तमान (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (इषये) अन्न वा विज्ञान के अर्थ (क्षपः) रात्रि (उस्मा:) दिन और (विश्वम्) पूर्ण (प्रायुः) जीवन को (वरिवस्यन्तु) सेवें (ते) वे (देवाः) दिव्यगुण वा विद्वान्जन हम लोगों से निरन्तर सेवने योग्य हैं ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो इस वर्तमान समय में दिन रात्रि मनुष्यों के प्रारोग्य, प्रायु और विज्ञान के बढ़ाने और मेघ के समान पुष्टि करने वाले हों वे ही सब से सत्कार करने योग्य हैं ॥१५॥ फिर वे विद्वान् कैसे क्या करें इस विषय को कहते हैं । अग्नीपर्जन्याववतं धियं मेऽस्मिन्ह मुहथा मुष्टुतिं नः । इळामन्यो जनयद्गममन्यः प्रजावंतीरिष आ धत्तमस्मे ॥१६॥ पक्षार्थ:-हे (सुहवा) सुन्दर प्रशंसित अध्यापक और उपदेशको तुम (अग्नी- युक्त व्यवहार में तुम दोनों (मे) मेरी (घियम्) बुद्धि की (अवतम्) रक्षा करो तथा (न:) हमारी (सृष्टुतिम्) शोभन प्रशंसा की रक्षा करो जैसे अग्नि और मेघ के बीच (अन्यः) और बिजुलीमय अग्नि (इळाम्) महान् वाणी को (अन्यः) और मेघ (गर्भम्) गर्भरूप (जनयद) उत्पन्न करता है वैसे (अस्मे) हमारी (प्रजावतीः) बहु प्रशंसित प्रजायुक्त (इषः) अन्नादि पदार्थों की इच्छाओं को (मा, धत्तम्) सब ओर से धारण करो ॥१६॥ RUAR HAN AN NA मन्) इस (विदथे) विज्ञानमय यज्ञ में जैसे मैं ऋग्वेदः म०६ । सू० ५३ ।। भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो वह्नि और मेघ के समान सब की बुद्धि के बढ़ाने वाले वा रक्षा करने वाले, सब प्रजाजनों को सुख में धारण करते हैं वे जैसे मेघ पृथिवी पर गर्भ को धारण कर प्रोषधियों को उत्पन्न करता और जैसे अग्नि वाणी को विधान करता अर्थात् बिजुलीरूप होकर तड़कता है वैसे वे सुखों का विधान करने वाले होते हैं यह आप जानो ॥१६॥ फिर कौन इस संसार में प्रानन्द देने वाले होते हैं इस विषय को कहते हैं । स्तीर्णे बहिर्षि समिधाने अग्नौ सूक्तेनं महा नमसा बिवासे अमिनो अद्य विदर्थ यजत्रा विश्वे देवा इविषि मादयध्वम् ।।१७।। पदार्थ:-- हे (यजत्राः) संग कराने वालो (विश्वे, देवा:) सब विद्वानो तुम वेदमन्त्र समूह से (महा, नमसा) अन्नादि समूह से (स्तीर्ण) इन्धनादि से आच्छादित (बहिषि) यज्ञकुण्ड में (समिधाने) प्रदीप्त (अग्नौ) अग्नि के बीच (मा, विवासे) सब ओर से सेवन करू वैसे (नः) हम लोगों को (हविषि) देने या भोजन करने योग्य अन्नादि पदार्थों में (मादयध्वम्) सुखी करो ॥१७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो! जैसे इन्धनों से प्रदीप्त अग्नि में वेदमन्त्रों से सुगन्ध्यादियुक्त होम किया पदार्थ सब जगत् को सुखी करता है वैसे सुपात्रों में विद्वानों की बोई हुई विद्या सब जगत् को आनन्दित करती है ॥१७॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त' के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में बाथनयां सूक्स समाप्त हुमा ।। अथ दशस्य त्रिपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । पूषा देवता । १।३ । ४।६।७।१० गायत्री। २ । ५ निवृगायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । ८ निचलनुष्टप् छन्दः । गान्धारः स्वरः ।। अब दश ऋचा वाले पनवें सूक्त का प्रारम्भ है इसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य किसके लिए किनका सेवन करें इस विषय को कहते हैं ।। वयमं त्वा पयस्पते स्थं न वाजसातये । धिये पूषन्नयुज्महि ॥शा त्विा) आपको (रथम् ) विमान आदि यान के (न) समान (प्रयुज्माहि) ऋग्वेदः मं०६ । सू०५३ ।। ६०३ पदार्थः --- हे (पूषन्) पुष्टि करने वाले (पथः) मार्ग के (पते) स्वामिन् (वयम्) हम लोग (उ) ही (वाजसातये) संग्राम का विभाग करने वाली (धिये) प्रयुक्त करते हैं ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-जो मनुष्य उत्तम बुद्धि पाने के लिये विद्वानों की सेवा करते हैं वे वेगवान् रथ से एक स्थान से दूसरे स्थान के समान एक विद्या से दूसरी विद्या को शीघ्र प्राप्त होते हैं ॥१॥ अब स्त्रीपुरुषों को क्या चाहने योग्य है इस विषय को कहते हैं । अभि नो नयं वसु वीरं प्रयतदक्षिणम् । वाम गृहपति नय ॥२|| पदार्थ:-हे पुष्टि करने वाले आप (न:) हम लोगों को (प्रयतदक्षिणम्) जिससे प्रयत्नपूर्वक दक्षिणा दी गई उस (नथ्यम्) मनुष्यों में उत्तम (वसु) धन और (वामम् ) प्रशंसित (वीरम् ) शुभलक्षणयुक्त पुरुष को (गृहपतिम्) गृहस्वामी को भी अभि, नय) सब भोर से पहुंचाओ ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वन् वा विदुषी ! आप हम लोगों के लिए उत्तम पति, उत्तम भार्या, प्रशंसित धन की प्राप्ति करा के उत्तम शिक्षा से धर्म- पाचरण की प्राप्ति कराइये ॥२॥ फिर विद्वान् जन किसके लिए क्या प्रेरणा करें इस विषय को कहते हैं । अदित्सन्तं चिदाणे पृषन्दानाय चोदय । पणेश्चिद्वि नंदा मनः ॥शा पदार्थ:-है (अधुणे) सब मोर से प्रकाशात्मन् (पूषन) पुष्टि करने वाले विद्वन् साप (अविस्सन्तम्) देने की अनिच्छा करते हुए (चित) भी देने वाले को (दानाय) देने के लिये (चोक्य) प्रेरणा देयो (चित) फिर भी देने वाले को और अपने (मनः) मन को भी प्रेरणा देनो और (पणेः) जुआ खेलने वाले के भी अन्त:- करण को (वि, दा) विशेषता से मर्दो अर्थात् दण्ड क्षेत्रो॥३॥ भावार्थ: अध्यापक, उपदेशक वा राजन् ! विद्यादि शुभगुणों की प्रवृत्ति के लिये न देनेवालों को भी दान करने के लिए प्रेरणा देनो और जुआ खेलने वाले पाखण्डियों को मारो अर्थात् ताड़ना देनो ॥३॥ . - amum JABA Kanakaman ६०४ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५३ ।। HD KARO फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । वि पथो वाजसातये चिनुहि वि मृधों जहि । साधन्तामुन नो धियः ॥४॥ पदार्थ:-हे (उप्र) तेजस्वी सेनापति प्राप (वाजसातये) विज्ञान वा धन की प्राप्ति वा संग्राम के लिये (पथः) मार्ग से (वि, चिनुहि) संचय करो तथा (भूधः) संग्रामों में प्रवृत्त दुष्टों को (वि, अहि) विशेषता से मारो जिससे (नः) हमारी (षियः) बुद्धियां कार्यों को (साधन्ताम् ) सिद्ध करें ॥४॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप उत्तम निर्भय मार्गों को बनायो उनमें विपथगामियों को मारो जिससे सब की बुद्धि उत्तम कर्मों की उन्नति करने के लिये प्रवृत्त हों ॥४॥ फिर राजा से कौन पीड़ा देने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । परि तृन्धि पणीनामारया हृदया कवे । अर्थमस्मभ्य रन्धय ॥५॥ पदार्थ:-हे (कये) विद्वन् राजन् पाप (प्रारया) उत्तम कोड़ा से' (पणीनाम्) धू त प्रादि व्यवहार करने वाले पुरुषों के (हृदया) हृदयों को (परि, तृन्धि) सब ओर से मारो (अथ) इसके अनन्तर (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (ईम्) सब ओर से दुष्टों को (रन्धय) पीड़ित करो और हमारे लिये सुख देप्रो ॥५॥ भावार्थ:--जो अपवित्र शिक्षा देने वाले और छली पुरुष अपने राज्य में हों उनको अच्छे प्रकार दण्डो जिससे न्यायमागं के बीच वर्तमान हम लोग सुखी हों ॥५॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । वि पूषन्नारया तुद परिच्छ हृदि प्रियम् । अयमस्मभ्य रन्धय ।।६।। पदार्थ:-हे. (पूषन्) पुष्टि करने वाले श्राप दुष्टों को (ईम्) सब ओर से (रन्धय) अति पीड़ित करो तथा (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (हृदि) हृदय में (प्रियम्) प्यारे पदार्थ की (इच्छ) इच्छा करो (अथ) इसके अनन्तर (पारया) कोड़ा से बैलों के समान (पणेः) प्रशंसित व्यवहार करने वाले के असंबन्धी जनों को (वि. तुद) विशेषता से पीड़ा देवो ॥६॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप दुष्टों को दण्ड देकर श्रेष्ठों का सत्कार कर सब को श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरणा देवो ॥६॥ MAN m- Coatee क BUM dao ! भावार्थ:-हे मनुष्यो! जिस क्रिया से पश बढ़ें उस क्रिया को ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५३ ।। ६०५ फिर राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। आ रिख किकिरा कृणु पणीनां हृदया कवे । अयमस्मभ्य रन्धय ॥७॥ पदार्थ:-हे. (कवे) विद्वन् श्राप (पणीनाम्) व्यवहार करने वालों के (किकिरा) व्यवस्थापनों को (मा, रिख) सब ओर से लिखो तथा दुष्टों के (हृदया) हृदयों को (रन्धय) अति पीड़ा देनो (प्रथ) इसके अनन्तर (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (ईम्) सुख (कृणु) करो ॥७॥ भावार्थ:--राजा वादी और प्रतिवादी अर्थात् झगड़ालू प्रति- झगड़ालुभों का लिखापढ़ीपूर्वक न्याय करे ॥७॥ फिर विद्वान् को कैसे किसके लिये प्रेरणा करनी योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। यां पूषन्त्रमचोदनीमारां विभाघृणे । तयाँ समस्य हृदयमा रिख किकिरा कृणु ॥८॥ पदार्थ:-हे (पूषन्) पुष्टि करने वाले (आपूर्ण) सब ओर से न्याय के प्रकाश करने वाले भाप (याम् ) जिस (ब्रह्मचोदनीम्) विद्या और धन की प्राप्ति के लिये प्रेरणा करने तथा (प्राराम् ) काष्ठ के विभाग करने वाली पारी को (बिर्षि) धारण करते हो (तया) उससे (समस्य) तुल्य के समान अर्थात् जो सब में बुद्धि वाला है उसके (हृदयम्) हृदय को (मा, रिख) अच्छे प्रकार लिखो और (किकिरा) उत्तम गुणों को विकीर्ण (कृण) करो, फैलानो ॥८॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप विद्या और धन की प्राप्ति की प्रेरणा के समान राजनीति को धारण करो जिससे सब की न्यायव्यवस्था हो ॥८॥ मनुष्यों को क्या बढ़ा कर किसकी प्रार्थना करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। या ते अष्ट्रा गोऑपशाणे पशुसाधनी । तस्यास्ते सुम्नीमहे ।।९।। पदार्थ-हे (माधुणे) सब ओर से पशुविद्या के प्रकाश करने वाले (या) जो (ते) आपकी (अष्ट्रा) व्याप्त होने वाली (गोनोपशा) जिसमें गौए परस्पर सोती हैं और (पशुसाधनी) जिससे पशुओं को सिद्ध करते हैं वह क्रिया वर्तमान है (तस्याः) उससे (ते) आपके (सस्नम्) सुख को हम लोग (ईमहे) याचते अर्थात् मांगते हैं ॥६॥ बढ़ा- कर सुख को मांगो॥६॥ . - O ऋग्वेदः ०६ । सू०५४ ।। +HAR HOM फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । उत नौ गोपणि धियंभश्वसां योजसामुत । नृवत्कृणुहि वीतये ॥१०॥ पदार्थ:-हे पशु पालने वाले विद्वन् श्राप (न:) हम लोगों के लिये (वीतये) प्राप्ति के अर्थ (गोषणिम्) गौत्रों को अलग-अलग करने वाली (उत) और (अश्वत साम्) घोड़ों का विभाग करने वाली (उत) और (वाजसाम्) अन्नादि पदार्थों का विभाग करने वाली (घियम्) उत्तम बुद्धि को (नवत्) मनुष्यों के तुल्य (कृणुहि) करो ॥१०॥ भावार्थ:-मनुष्यों को गौ, अश्व और धन धान्य की वृद्धि के लिए पुरुषार्थी जनों के समान महान् पुरुषार्थ करना योग्य है ।।१०।। इस सूक्त में राजमार्ग, डाकुओं का निवारण, उत्तम दक्षिणा देने वालों को प्रेरणा, दुष्टों को मारना, श्रेष्ठों की पालना और पशुओं का बढ़ाना कहा है इस कारण इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी योग्य है ।। यह छठे मण्डल में त्रेपनवां सूषत समाप्त हुभा ॥ , MAHORAMANENERMERam अथ वर्चस्य चतुःपञ्चाशतमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । पूषा देवता । १।२।४।६।७।८।६ गायत्री।३। १० निचद्गायत्री । ५ विराङ्- गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः।। अब दश ऋचावाले चौवनवें सूक्त का प्रारम्भ है उस के प्रथम मंत्र में मनुष्यों को किसका संग चाहने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। सं पूषन्विदुषो नय यो अङसानुशासति । य एवेदमिति बवत् ।।१।। पदार्थ:-हे (पूषन्) पुष्टि करने वाले विद्वन् (यः) जो (इदम्) यह (एव) इसी प्रकार है (इति) ऐसा (अवत) उपदेश करे (य:) जो सत्य के (अनुशासति) अनुकूल शिक्षा दे उस (विदुषा) विद्वान् के साथ हम लोगों को (अञ्जसा) साक्षात् (सम्, नय) अच्छे प्रकार उन्नति को पहुंचानो ॥१॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! हम लोगों को जो सत्य विद्या का उपदेश करें उनका सत्कार कर उनके संग से हम लोग विद्वान् होकर उपदेशकर्ता हों ॥१॥ मनुष्यों को किसका संग निरन्तर करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।।

Com MAND ON व्यवहारों की पद्यते। ऋग्वेदः मं०६। सू० ५४ ।। ६०७ समु पृष्णा गंमेमहि यो गृहाँ अभिशासति । इम एवेति च ब्रह्मत् ॥२॥ पदार्थ:--(यः) जो विद्वान् (इमे) ये पदार्थ (एव) इसी प्रकार हैं (इति) ऐसा (अवत्) कहे (उ) और (च) भी (गृहान्) गृहस्थों को (अभिशासति) सन्मुख होकर शिक्षा दे उस (पूष्णा) पुष्टि करने वाले वैद्य विद्वान्जन के साथ हम लोग (सम्, गमेमहि) संग करें ॥२॥ भावार्थ:- जो विद्वान्जन निश्चय से पृथिव्यादि पदार्थों की विद्या के अध्यापन और उपदेश से तथा हस्तक्रिया से साक्षात् कर सके तथा राज- नीति आदि अनुकूलता से शिक्षा दे उसी विद्वान् का संग हम लोग सदा करें ॥२॥ किसका कर्तव्य नष्ट नहीं होता इस विषय को कहते हैं। पूष्णश्चक्र न रिष्यति न कोशोऽव पद्यते । नो अस्य व्यथते पविः ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जिस (अस्य) इस (पूष्ण:) पुष्टि करने वाले शिल्पी विद्वान् का (चक्रम्) कलायंत्रादि (न, रिष्यति) हिंसन नहीं करता तथा (कोश:) धन- शस्त्रास्त्रविद्या (नो) नहीं (व्यथते) व्यथित होती अर्थात् शत्रुजन जिस को नहीं मथते उसी का संग हम लोग करें ॥३॥ भावार्थ:-जिस विद्वान् का पूर्ण बल है, जिसका एकच्छत्र राज्य है, जिसका कोश सब अोर से पूरा होता और शत्रुओं में जिसका शस्त्र नहीं नष्ट होता है उसके राज्य में सब जन निर्भय होकर वसें ॥३॥ कौन महान् श्रीमान होता है इस विषय को कहते हैं । यो अस्मै हविषाविधन्न तं पूषापि मृष्यते । प्रथमो विन्दते वसु ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (य:) जो (हविषा) देने वा लेने से (अस्मै) इस के लिए (वसु) बहुत धन का (अविधत्) विधान करता है वा (प्रथमः) पहिला कारुका धन (विन्दते) पाता है (तम्) उसको (पूषा) पुष्टि करनेवाला (अपि) भी (न) नहीं (मृष्यते) सहता है ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो पहिले से शिल्प विद्या को पाकर क्रिया से -- , AMNI

६०८
ऋग्वेदः म०६ । सू० ५४ ।।
ARH
पदार्थों का निर्माण करता है वह बहुत धन को प्राप्त होता है उसके सदृश
पुष्ट कोई नहीं होता है ॥४॥
कौन राज्य को पाता है इस विषय को कहते हैं।
पूषा गा अन्वैतु नः पूषा रक्षत्वर्वतः । पूषा वाजें सनोतु नः ॥६॥
पक्षार्थ:--जो (पूषा) पुष्टि करने वाला विद्वान् (नः) हमारे लिए (वाजम्)
धन को (सनोतु) देवे जो (पूषा) पुष्टि करने वाला (अर्वतः) घोड़ों के समान
अग्न्यादि पदार्थों की (रक्षतु) रक्षा करे वह (पूषा) शिल्पिजनों की पुष्टि करने वाला
(न:) हम लोगों को तथा (अन, गाः) अनुकूल पृथिवी और वाणियों को (एत)
प्राप्त हो ॥५॥
भावार्थ:-जो पहिले औरों का उपकार करता वा पदार्थों को इकट्ठा
करता है वह सब के सहाय से भूमि के राज्य आदि को प्राप्त होता है ॥५॥
किन के संग से विद्या और राज्य को प्राप्त होवे इस विषय को कहते हैं ।
पूषन्मनु भ गा इंदि यजमानस्य सुन्वतः । अस्माकं स्तुवतामुत ॥६॥
पदार्थ:-हे (पूषन्) पुष्टि करने वाले प्राप (सुन्धतः) यज्ञ के संपादन करने
वाले (यजमानस्य) यज्ञकर्ता के (उस) और (स्तुवताम् ) विद्या की प्रशंसा करने वाले
(अस्माका) हम लोगों की (गाः) सुन्दर शिक्षित वाणी वा भूमियों को (अनु, प्र,
इहि) अनुकूलता से प्राप्त होनो ॥६॥
भावार्थ:-हे शिल्पी विद्वान् जन ! आप राजधनादि के सहाय से
हम से वा शिक्षा देने वालों से विद्याओं को पाकर भूमिराज्य को प्राप्त
किसी को हिंसा नहीं करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
भाकिर्नेशन्माकी रिपन्माकी संशोरि केवटे ।
अथारिष्टामिरा गहि ॥७॥
पार्थ:-हे विद्वन् जो कभी (माकिः) न (नेक्षत) नष्ट हो तथा किसी को
(माकोस्) न (रिषद) नष्ट करें (अथ) इसके अनन्तर (केवटे) कुए में (माकीम्)
न (सम्, शारि) नष्ट करे वा कुए के निमित्त किसी को न नष्ट करे उसको पाकर
(अरिष्टाभिः) अहिंसित क्रियानों से आप हम लोगों को (मा, गहि) प्राप्त
हूजिये ॥७॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५४ ।।
६०६
कस
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Shera
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो नष्ट कर्म नहीं करता न किसी को नष्ट
करता है तथा कुए के जल से भी किसी को नहीं पीड़ा देता वहीं सब से
संग करने योग्य और न हिंसा करनेवाला होता है ॥७॥
मनुष्यों को किससे धन पाना योग्य है इस विषय को कहते हैं।
शृण्वन् पूषण वादियमनटवेद शाम् । ईशान राय ईमहे ॥८॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (वयम्) हम लोग (इयम्) प्रेरणा देने योग्य (अनिष्ट-
वेदसम्) अक्षतविज्ञानधन तथा (ईशान म्) ईश्वरता का शील रखने और (शृण्वन्तम्)
सुनने और (पूषणम्) पुष्टि करनेवाले राज्जन विद्वान् को प्राप्त होकर (रायः) धनों
को (ईमहे) मांगते हैं वैसे इसको प्राप्त होकर तुम सब धन को मांगो का
भावार्थ:- जो सुपात्र और कुपात्र, विद्वान् और अविद्वान् तथा धार्मिक
और अधार्मिक की परीक्षा करने वाला हो उसी के सकाश से पुरुषार्थ से
धन पाना चाहिये ॥८॥
कौन किसमें अहिंसक हों इस विषय को कहते हैं ।।
पूषनाथ व्रते व्यं न रिब्धेम का चन ! स्तोमारस्त इह मसि ||९||
पदार्थ:-हे (पूषन्) पालन करने वाले धर्मात्मन् जिस (ते) आपके (इह
इस संसार में (स्तोतारः) विद्या की स्तुति करने वाले (क्यान) हम लोग (मसि)
हैं उस (तब) आपके (बते) कर्म में (कदा, चन्द) कभी भी हम लोग (न, रिथ्येन)
नष्टकत न होवें ॥६॥
भावार्थ:-- जो सत्यविद्याओं की प्रशंसा करने वाले मनुष्य हों वे
विद्वानों के काम में हिंसा करने वाले न हों ।।६।।
किन गुणों से कैसे मनुष्य होते हैं इस विषय को कहते हैं ।।
परि पूषा परस्ताद्धस्तं दधातु दक्षिणम् । पुनर्नो नष्टमाजंतु ॥१०॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो {पूषा) पुष्टि करने वाला दानशील (दक्षिणम्)
दहिने (हस्तम्) हाथ को धारण करे वह (पुन:) फिर (नष्टम्) नष्ट हुई भी वस्तु
को (परस्ताद) पीछे से (परि, दधातु) सब ओर से धारण करे (नः) हम लोगों को
फिर (मा, अजत) अच्छे प्रकार दे वा प्राप्त हो ॥१०॥
भावार्थ:-इस लोक में जो देने वाला है वही उत्तम है, जो लेने वाला
है वह अधम है और जो चोरी से प्राप्त करने वाला है वह निकृष्ट है यह
जानना चाहिये ॥१०॥

६१० ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५५ ।। इस सूक्त में विद्वानों का संग, शिल्पियों की प्रशंसा, उत्तम गुणों की याचना, हिंसा छोड़ना और दान की प्रशंसा कही है इससे इस सूक्त के अर्थ की इस पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में शौचना मुक्त समाप्त हुआ। Dirria अथ षडर्चस्य पञ्चपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्थ भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । पूषा देवता ।।२।५।६ गायत्री । ३ । ४ विरागायत्री छन्दः । षड्ज: स्वरः।। अब छः ऋचावाले पचपनवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में किसका संग करना योग्य है इस विषय को कहते हैं। एहि वां विमुचो नपादाधुणे सं संचाप है । स्थीर्घतस्य नो भव ॥१॥ पदार्थ:--हे (अाघृणे) स सब ओर से देदीप्यमान (नपात) जो नहीं गिरते वह आप (नः) हमारे लिए (ऋतस्य) सत्य के संबन्धी (रथी:) बहुत रथोंवाले (भव) हो तथा पाप हम लोगों को (आ, इहि) प्राप्त होगो । हे अध्यापक और उपदेशको (चाम्) तुम दोनों को हे उक्त विद्वन् आप (विमुचः) छोड़ो तथा पाप और मैं (सम्, सचाव है) संबन्ध करें ॥शा भावार्थ:---जो विद्वान् सत्य की पालना करने वाला, सत्य का उपदेशक हो वह और सुनने वाला, मित्र होकर तथा सत्य विद्या को प्राप्त होकर औरों को भी विद्या को प्राप्त करावें ॥१॥ फिर कैसे पुरुष से धन प्राप्त करना चाहिये इस विषय को कहते हैं रथीतम कपर्दिनमीशान राधसो महा। रायः सखायभीमहे ।२।। पदार्थ:-हे मनुष्यो। हम लोग जिस (महः) महान् (राधसः) धन के वा (रायः) साधारण धनके (ईशानम्) ऐश्वर्या से युक्त (रथीतमम्) जिसके बहुत रथ विद्यमान (कपर्दिनम्) जो जटाजूट' ब्रह्मचारी (सखायम्) मित्र विद्वान् उसकी (ईमहे) याचना करते हैं उसकी तुम भी याचना करो ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जो ब्रह्मचारी होकर विद्या पढ़ा हुआ पुरु- षार्थी तथा बहुत धन का स्वामी है उसी से विद्या पढ़कर धन को प्राप्त होमो ॥२॥ अब कौन सब को सुख देने वाला होता है इस विषय को कहते हैं ।। रायो धारास्याघृणे वसौ राशिरजाश्व । धीवतोधीवतः सखा ॥३॥ AND HD R - ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५५ ।। ६११ htam Cate ON fuse MA पदार्थ-हे (अजाय) अविनाशी बिजुलीरूप घोड़े वाले (अाघृणे) विद्या से प्रकाशमान विद्वान् जिससे आप (सोः) वास कराने वाले (रायः) धन की (राशिः) ढेरी के समान वा (धारा) प्राप्ति कराने वाली वाणी के समान (धीबलोधीलत:) प्राज्ञ प्राश के (सखा) मित्र (प्रसि) हो इससे सत्कार करने योग्य हो ॥३॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में बाचकलुप्तोपमालंकार है---जो मनुष्य प्राज्ञ पुरुषों के मित्र, पदार्थविद्याओं के जानने वाले तथा धनाढ्य हों वे सबके [सुख देनेवाले होते हैं ॥३॥ फिर किन गुणों से उत्कृष्ट होता है इस विषय को कहते हैं । पूषणं न्व१ जाश्वमुप स्तोपाम बाजिनम् । स्वसुर्यो जार उच्यते ॥४॥ पदार्थ:-(य:) जो (स्वसः) बहिन के समान वर्तमान उषा का (जार:) जीर्ण कराने वाला (उच्यते) कहा जाता है उस (वाजिनम्) ज्ञान और बल' का देने वाला (अजाश्वम्) जिसमें बकरी और घोड़े विद्यमान (पघणम्) जो पुष्टि करने वाला है उस आदित्य की हम (नु) शीघ्र (उप, स्तोषाम) प्रशंसा करें ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे राजा आदि मनुष्यो ! जैसे सूर्य रात्रि का निवारण करने वाला है वैसे ही प्रजाजनों में जारकर्म में वर्तमान मनुष्यों का निवारण करो ॥४॥ फिर मनुष्य क्या जानें इस विषय को कहते हैं । मातुर्दिधिषुमंत्र खसुर्जारः शृणोतु नः । भ्रातेन्द्रस्य सखा ममं ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (इन्द्रस्य) बिजुली के (भ्राता) भ्राता के समान (मम) मेरा (सखा) मित्र (नः) हम लोगों के (दिधिषुम्) धारण करने वाले को (शृणोतु) सुने और जो (स्वसः) भगिनी के समान उषा का (जारः) निवारण करने वाला (मातुः) माता का धारण करने वाला है उसको मैं (अब्रवम् ) कहूं और उसको सब जानें ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे अग्नि का मित्र वायु है, और रात्रि का निवारण करने वाला सूर्य भी है वैसे ही धार्मिक मेरे मित्र और मैं भी उनका मित्र होकर रात्रि के समान वर्तमान अविद्या का हम सब निवारण करें ॥५॥ फिर मनुष्य क्या जानके किसको प्राप्त होते हैं इस विषय को कहते हैं । आजासः पूषणं रथे निम्मास्ते जनश्रियम् । देवं वहन्तु विभ्रतः ॥६॥ M सा MUR ESSA ६१२ ऋग्वेदः मं०६। सू० ५६ ॥ पवार्थ:--हे मनुष्यो जो (निशम्भा:) नित्यसंबन्ध करने वाले (प्रजासः) पुष्टिकर्ता सूर्य के किरणरूप अशक (धणम्) पुष्टि करनेवाले सूर्य्य वा (जनश्रियम्) जिसके मनुष्यों की शोभा विद्यामान उस' (देवम्) दिव्यगुरणवाले विद्वान् के (बिभ्रतः) धारक अर्थात् पुष्टि करने वालों और धारण करनेवालों को (रथे) रमणीय जगत् में (मा, वहन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त करें (ते) वे सर्व चाही हुई वस्तु को प्राप्त होते हैं ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! तुम शरीर और आत्मा की पुष्टि करने वाले पदार्थों को जानकर और उनसे उपयोग लेकर ऐश्वर्य को प्राप्त होमो ॥६॥ इस मन्त्र में पूषा और प्रादित्य के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठ मण्डल में पनपनवां सूक्त समाप्त हुमा ।। mano m अथ परस्य षट्पञ्चाशसमस्थ सूत्तस्य भरद्वाजो बाहर पत्य ऋषिः । पूषा देवता। १।४।५ गायत्री ।। ३ निचवायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । ६ स्वराडक्षिणक्छन्दः । ऋषभः स्वरः॥ अब छः ऋचा वाले छप्पनवें सूक्त का प्रारम्भ है इसके प्रथम मन्त्र में किसको किसके लिये क्या उपदेश करना योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। य एनमादिदेशात करम्भादिति पूषणम् । न तेन देव आदिौ ॥१॥ पदार्थ:---(यः) जो (करम्भाद) करम्भ करमन्हां नामक अन्न को खाने वाला (देवः) विद्वान् (एनम्) बिजुली प्रादि रूप वाले (पूषणम्) पुष्टि करने वाले को (प्राविदेशति) सब ओर से अच्छे प्रकार उपदेश करता है (इति) इस प्रकार (तेन) उसके साथ मैं अन्यथा (न, प्राविशे) नहीं सब ओर से प्रशंसा करता हूं ॥१॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सत्य का उपदेश करते हैं वे सब आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥१॥ फिर वह कैसा होता है इस विषय को कहते हैं । उत घा स रथीतमः सख्या सत्पतियुजा । इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (युजा) युक्त (संख्या) मित्र के साथ (सत्पतिः) ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५६ ।। ब aree au सज्जनों की पालना करनेवाला (उत) और (रथीतमः) अतीव रथयुक्त (इन्द्रः) सूर्य के समान राजा जैसे सूर्य (वृनाणि) मेघों को मारता है वैसे (जिघ्नते) शत्रुओं को मारता है (स:) वह (घा) ही कृतकृत्य होता है ।।२।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सत्य तथा सत्पुरुषों से साथ मित्रता तथा दुष्टों के साथ उदासीनता करते हैं वे दुष्टों को निवारकर श्रेष्ठों का स्वीकार कर सकते हैं ॥२॥ फिर मनुष्यों को कैसा भाषण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । उतादः परुषे गवि सूरश्चकं हिरण्ययम् । न्यस्यद्रथीतमः ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (रथीतनः) अतीय रथादि पदार्थों से युक्त (सूरः) वीर पुरुष (अदः) उस (हिरण्ययम्) सुवर्णादि युक्त वा तेजोमय (चक्रम्) चक्र को (नि, ऐरयत्) निरन्तर प्रेरित करे वह (उत) निश्चय से (परुष) कठोर व्यवहार में और (गवि) वाणी में नहीं प्रवृत्त हो ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य कठोर भाषण को छोड़ कोमल भाषण करता है वह सदा आनन्दी होता है ॥३॥ फिर विद्वान् क्या करे इस विषय को कहते हैं । यदद्य त्या पुरुष्टुत बाम दल मन्तुमः । तत्सु नो मन् साधय ॥४॥ पदार्थ:-हे (पुरुष्टुत) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त बस्त्र) दुःख को नष्ट करने वाले (मन्तुमः) प्रशस्त विज्ञानयुक्त (अध) आज हम (यत) जिस ज्ञान को (त्वा) तुझ को (अवाम) कहें यह तू (नः) हमारे लिये (तत्) उस' (मन्म) विज्ञान को (सु, सानप अच्छे प्रकार सिद्ध कर ॥४॥ भावार्थः - मनुष्यों को सर्वदा सन्मुख या अन्यत्र सत्य ही कहना चाहिये जिससे सत्य ज्ञान सर्वत्र बढ़े ॥४॥ फिर विद्वान् क्या करे इस विषय को कहते हैं ।। इमं च नो गवेषणं सातये सीधो गणम् । बारात्पूषन्नसि श्रुतः ॥५॥ पदार्थ:-हे (पूषन्) पुष्टि करने वाले जिससे आप (पारात) समीप वा दूर से (श्रुतः) सुने हुए (असि) हो इससे (सातये) संविभाग करने के लिए (नः) हमारे (इमम्) इस (गवेषणम्) वाणी प्रादि पदाथों की प्रेरणा करने वाले को तथा (गणम्) अन्य पदार्थों के समूह को (च) भी (सीषधः) साधो ॥५॥ 40 ऋग्वेदः मं० ६ । सू०५७।। plaa भावार्थ:-हे विद्वन् ! जिससे आप प्राप्त विद्वानों के गुणों से युक्त हैं इससे हम मनुष्यों के संघों को विद्वान् करो ॥५॥ फिर सब को विद्वानों के लिये क्या इच्छा करनी चाहिये इस विषय को कहते श्रा ते स्वस्तिमीबह आरे अंधामुपावसम् । अधा च सर्वत तये श्वश्च सर्वतातये ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वन् (सर्वतातये) सम्पूर्ण सुख सिद्ध करने वाले यज्ञ के लिये (ते) तेरे लिये (अद्या) प्राज (च) और (श्य:) आगामी दिन (च) भी (सर्वतातये) सर्वसुख करने वाले और पदार्थ के लिये (पारेप्रधाम्) जिस में पाप दूर पहुंचे तथा (उषावसम्) वा समीप धन आदि पदार्थ विद्यमान उस (स्वस्तिम्) सुख को हम (मा, ईमहे) अच्छे प्रकार मांगते हैं ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! जिससे आप पापाचरण से अलग तथा सब के कल्याण करने वाले हैं इससे आपके लिए सदैव सुख की इच्छा हम लोग करें ॥६॥ इस सूक्त में उपदेशक, श्रोता और पूषा शब्द के अर्थ का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में छप्पनवां सूक्त समाप्त हुभा। अथ षड़चस्य सप्तपञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रापूषणो देवते । १ । ६ विराङ्गायत्री । २ । ३ निवृद्गायत्री । ४ । ५ गायत्री छन्दः। षड्जः स्वरः॥ अब छः ऋचा वाले सत्तावनवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किसके साथ मित्रता करनी चाहिये इस विषय का वर्णन करते हैं । इन्द्रा नु पूषणां वयं सख्याय स्वस्तये । हुवेम वाजसातये ॥१॥ पदार्थः-(इन्द्रा, पूषणा) परम ऐश्वर्ययुक्त को तथा सबको पुष्टि करने वाले को (वयम्) हम लोग (सख्याय) मित्रता तथा (स्वस्तये) सुख वा (वाजसातये) अन्नादिकों का जिसमें विभाग है उसके लिये (नु) शीघ्र (हुवेम) स्वीकार AR 4- करें ||१|| की भावार्थ:-जो सबमें मित्रता विधान कर सबके सुख हैं उन्हीं को हम लोग स्वीकार करें ॥१॥ चाहना करते ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५७ ।। ६१५ MARIM duria వానా PRON (ipur फिर बिहान् जन किसके तुल्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । सोममन्य उपांसदपालवे चम्बा सुतम् ! कर मास इच्छति ।।२।। पदार्थ:-हे परमैश्वर्य युक्त और सब की पुष्टि करने वाले तुम दोनों में से (अन्य:) एक जन (अन्धोः) आकाश और पृथिवी के बीच' (सुतम् ) उत्पन्न हुए (सोमम्) ऐश्वर्य के (पातवे) पीने को (उप, असदद) दूसरे के समीप बैठता है (अन्यः) और दूसरा (करम्भम्) भोगने योग्य पदार्थ को (इच्छति) चाहता है उन दोनों को हम लोग मित्रता आदि के लिये स्वीकार करते हैं ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वान् जनो ! जैसे सूर्य और चन्द्रमा द्यावा और पृथिवी के बीच वर्तमान होते हुए हैं, इन दोनों में से सूर्य रस को लेता है और चन्द्रमा रस को देता है वैसे ही तुम सब वर्तों ॥२॥ फिर इन दोनों से मनुष्यों को क्या प्राप्त होना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। अजा अन्यस्य वह्नयो हरौं अन्यस्य सम्भृता । ताभ्यां वृत्राणि जिघ्नते ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! उन दोनों के बीच जिस (अन्यस्य) भूमि के सम्बन्धी (वह्नयः) पदार्थ को एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुंचाने वाले (प्रजाः) नित्य अर्थात् जो नष्ट नहीं होते वा जिस (अन्यस्य) और दूसरे बिजुलीरूप अग्नि के (हरी) हरणशील (सम्भृता) अच्छे प्रकार धारण किये हुए धारण और आकर्षण गुण वर्तमान हैं (तान्याम) उनसे जो (वृत्राणि) धनों को (जिधनते) प्राप्त होता है उसका तुम सत्कार करो ॥३॥ भावार्थः हे मनुष्यो ! मिले हुए भूमि और बिजुली की उत्तेजना से तुम धनों को प्राप्त होत्रो ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या जानना चाहिये इस विषय को कहते हैं । यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः । तत्र पूषाभंवत्सां ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यत्) जो (वृषन्तमः) अतीव वर्षा करने वाला (इन्द्रः) बिजुली रूप अग्नि (रितः) अपनी कक्षाओं में घूमने वाली (मही:) भूमि और (अप:) जलों को (अनयत्) पहुंचाता है (तत्र) वहां (पूषा) भूमि (सचा) संयुक्त (अभवत्) होती है उसको तुम लोग जानो ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्य ! जो बिजुली पृथिवी और जल के बीच स्थिर ई सबको समय-समय पर प्रतिस्थान पहुंचाती है जिसके साथ पृथिवी A ऋग्वेदः म०६ । सू० ५८ ।। वर्तमान है उसको जान कलायन्त्रों से उसे उठा कर सब कामों को सिद्ध करो ॥४॥ Ans SED फिर मनुष्यों को क्या जान कर क्या प्रारम्भ करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । खां पूष्णः सुमति वयं वृक्षस्य प्रवामिज । इन्द्रस्य चा संभावहे ॥५॥ पदार्थः --- हे मनुष्यो (वयम्) हम लोग जिस (पूष्णः) पृथिवी संबन्धिनी (सुम- तिम्) उत्तम बुद्धि को (वृक्षस्य) काटने योग्य पदार्थ को (क्यामिव) वृक्ष की दृढ़ विस्तीर्ण शाखा के समान वा (इन्द्रल्य, बिजुलीरूप अग्नि सम्बन्धिनी उत्तम मति का (च) भी (प्र, मा, रभामहे) प्रारम्भ करें (ताम्) उसको तुम भी प्रारम्भ करो ॥५॥ भावार्थः-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है हे मनुष्यो ! तुम भूगर्भविद्या और विद्युद्विद्या को प्राप्त होकर कार्यसिद्धि के लिये क्रिया का प्रारम्भ करो ॥॥ फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त होने योग्य है इस विषय को कहते हैं । उत्पूषण युवामहेभीशूरिव सारथिः । मह्या इन्द्र स्वस्तये ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे हम लोग (महा) पृथिवी और (स्वस्तये) सुख के लिए (सारथिः) नियन्ता अर्थात् एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुंचाने वाला (अभी- शूनिव) रश्मियों के समान (पूक्षण) भूमि को और (इन्द्रम् । विद्युतरूप अग्नि को (उत्, पुवामहे) उत्तमता से अलग करते हैं वैसे ही तुम भी करो ॥६॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमा०-यदि मनुष्य भूमि और बिजुली का विभाग करें तो बहुत सुख पावें ॥६॥ इस सूक्त में भूमि और बिजुली के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इसके पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह छठे मण्डल में सत्तावनां सूरत समाप्त हुया ।। month hi अत्र चतुऋचस्याण्टपञ्चाशतमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । पूषा देवता । १ त्रिष्टुप् । ३ । ४ विराट त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । २ विराड जगती छन्दः । निषादः स्वरः ॥ अब चार ऋचाबाले अट्ठावन सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य क्या करके क्या पाते हैं इस विषय को कहते हैं।

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५८ ॥ ६१७ KAA hinpar us शुक्रं ते अन्य_जतं ते अन्यद्विप॒रूपे अईनी द्यौरिवासि । विश्श हि माथा अबासि स्वधावो भद्रा ते पूषनिह रातिरस्तु ।।१। पदार्थ:-हे (स्वधावः) बहुत अन्नवाले और (पूषन्) पुष्टिकर्ता जन (ते) आपका (अन्यत्) और (शुक्रम्) शुद्ध रूप तथा (ते) आपका (अन्यत्) रूप है सो तुम दोनों (विषरूपे) व्याप्तरूप (अहनी) रात्रि दिन में (यजतम्) मिलो और (द्यौरिव) सूर्य प्रकाश के समान (विश्वा:) संपूर्ण (मायाः) बुद्धियों को तुम (अवसि) रक्खो जिन ते! आपकी (भद्रा) कल्याण करने वाली शतिः) दान क्रिया (ह) यहां (प्रस्तु) हो रह (हि) ही आप सत्कार करने योग्य (असि) हैं ॥१॥ भावार्थः- हे मनुष्यो ! जो पुरुष दिन-रात्रि के समान क्रम से कामों को सिद्ध करते हैं वे सब सामग्री को पाकर सूर्य के प्रकाश के समान उत्तम कीत्ति वाले होते हैं ॥१॥ फिर विद्वान् जन क्या करे इस विषय को कहते हैं। अनावः । शुषा वाजपस्त्यो धियजिन्वो भुबने विश्वे अर्पितः । अष्ट्रा पूष शिथिरामुद्ररीजमाञ्चक्षाणो भुना देव ईयते ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (अजानः) भेड़ बकरी और घोड़ों को रखने वाला (पशुशाः) ज: पशुओं की रक्षा करने वाला तथा (वाजपस्त्यः) घर में अन्नों को रखने वाला (घियंजिन्व:) बुद्धि को तृप्त करता है वह ह (विश्वे) समग्र (भुवने) संसार में (अर्पितः) स्थापन किया हुआ (पूषा) पुष्टि करने वाला (शिथिरा) शिथिल और (प्रष्ट्राम्) पदार्थों में व्याप्त बुद्धि और (भवना) गृहों की (सञ्चक्षाणः) अच्छे प्रकार कामना वा उनका उपदेश करता हुआ (बेनः) विद्वान् (ईयते) प्राप्त होता वा जाता है तथा (उहरीवृजव) उत्तमता से बजता है उसका तुम लोग सेवन करो ॥२॥ भावार्थः - जो मनुष्य भुबनस्थ सब पदार्थों को मिले वा न मिले जान कर कार्यों को करते हैं वे बुद्धिमान् होते हैं ।।२।। फिर विद्वान् किसको बना कहां जाकर क्यो पावे इस विषय को कहते हैं। यास्ते पूषनायौं अन्तः समुद्रे हिरण्ययीरन्तरिक्षे चरन्ति । ताभिर्यालि दून्या सुर्यस्य कामैन कृत श्रव इच्छमानः ॥२॥ पदार्थ:-हे (कृत) किये हुए विद्वन् (पूषन्) भूमि के समान पुष्टियुक्त (याः) जो (ते) आपकी (हिरण्ययोः) तेजोमयी सुवर्णादिकों से सुभूषित (नावः) प्रशंसनीय dowwe am -- मा se ६१८ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५८ ।। KI PRIMAR Calor नौकायें (समुद्रे) समुद्र वा (अन्तरिक्ष) अन्तरिक्ष में (अन्तः) भीतर (चरन्ति) जाती हैं (ताभिः) उनसे (कामेन) कामना करके (श्रवः) अन्नादिक की (इच्छमान:) इच्छा करते हुए (सूर्यस्य) सूर्य के (दूस्याम्) दूत की क्रिया के समान कामना को (यासि) प्राप्त होते हो इससे धन्य हो ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सुदृढ़ नावें और भूविमानों को भूमि पर और अन्तरिक्ष में चलने वाले यानों को अन्तरिक्ष में चलने को रचते और उन से देश-देशान्तरों को जाय पाकर अपनी इच्छा को पूरी करते हैं वे ही सूर्य के समान प्रकाशित कीर्ति वाले होते हैं ॥३॥ फिर कौन विद्या को प्राप्त होने के योग्य होते हैं इस विषय को कहते हैं । पूषा सुबन्धुदिच श्रा पृथिव्या इळस्पतिर्मघवा दस्मवर्चाः । यं देवासो अददः सूर्याथै कामेन कृतं तबसं स्वञ्चम् ॥४॥ पदार्थ:-~-हे मनुष्यो (यम्) जिसको (देवास:) विद्वान् जन (कामेन) कामना से (कृतम् } किये हुए तिवस) बलिष्ठ (स्वचम्) सुन्दरता से जाते हुए अर्थात् शरीर और आत्मा के बल से युक्त युवा मनुष्य को (सूर्याय) सूर्य के समान शुभ गुरण और स्वभावों से प्रकाशित कन्या के लिए (अददुः) देते हैं वह (सुबन्धुः) सुन्दर भ्राता वा मित्रों वाला (मघवा) बहुत ऐश्वर्ययुक्त (दस्मवर्चाः) नष्ट होते हुए पदार्थों में प्रकाश रखने वाला (पूषा) भूमि के समान पुष्ट वा पुष्टि करने वाला (दिवः) बिजुली और (पृथिव्याः) भूमि तथा (इळ:) वाणी का (पतिः) स्वामी होता हुआ सुख को (प्रा) ग्रहण करता है ॥४॥ भावार्थ:-जो ब्रह्मचर्य से पूर्ण युवावस्था का प्राप्त हुए अपने सदृश बहुओं को प्राप्त होकर ऋतुगामी अर्थात् ऋतुकाल में स्त्रीभोग करने वाले होकर सुन्दर पुष्ट अंग और बुद्धि बल विद्या और शिक्षा को प्राप्त हों वे ही भूगर्भ वा विद्युदादि विद्या को प्राप्त हो सकते हैं और क्षुद्राशय नहीं ॥४॥ इस सूक्त में विद्वानों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में अट्ठावनवां सूक्त समाप्त हुआ।

(जीवथः) जीवते हो यह काम्) तुम दोनों को मैं (न) शीघ्र (प्र, बोचा) उपदेश ऋग्वेदः ०५९ ॥ अथ वर्चस्यैकोनषष्टितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्राग्नी देवते । १।३ । ४।५ निचद बृहती। २ विराबृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः। ६ । ७ । ६ भुरिगनुष्टुप् । १० अनुष्टुप छन्दः। गान्धारः स्वरः। उष्णिक छन्दः । अब दश ऋचा बाले उनसठवें सूक्त का प्रारम्भ है इसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करके बलिष्ठ हों इस विषय को कहते हैं प्र.नु यांचा सुते वां वीर्वा३' यानि चक्रथुः । हत सो वां पिरो देवत्रय इन्द्राग्नी जीवथो युवम् ॥१॥ पदार्थ:-हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान अध्यापक और उप- देशको (युद्धम्) तुम दोनों (यानि) जिन (सुतेषु) उत्पन्न हुए पदार्थों में (वीर्या) पराक्रमों को (चक्रथुः) किया करते हो उनसे (वाम्) तुम दोनों के जो (देवशत्रवः) विद्वानों से द्वेष करने वाले शत्रु (हतासः) नष्ट हों और तुम दोनों बहुत समय तक DON trHD DIAN देता हूं जिससे तुम दोनों के पितरः) पालने वाले भी ऐसा (बाम) तुम दोनों को उपदेश दें ॥१॥ भावार्थ:-जो मनुष्य उत्पन्न हुए मनुष्यों में पराक्रम की उन्नति करते हैं उन के शत्रु विलय (नाश) को प्राप्त होते हैं ।।१।। फिर अध्यापक और उपदेशक कैसे हों इस विषय को कहते हैं । बळिस्था महिमा वाभिन्द्राको पनिष्ठ आ। समानो वा जनिता भ्रातरा युवं यमाव्हेिईमातरा ॥२॥ पदार्थ:--है (इन्द्राग्नी) पवन और अग्नि के तुल्य' राजप्रजाजनो जो (वाम्) तुम दोनों का (पनिष्ठः) अतीव प्रशंसित (ब) सत्य (महिमा) प्रताप वा (वाम्) तुम दोनों का (समानः) तुल्य (जनिता) उत्पादन करने वाला पिता (इहेहमातरा) यहाँ यहां जिनकी माता के यमौ) नियन्ता अर्थात् गृहस्थी के चलाने वाले (भ्रातरा) भाई बर्तमान हैं उनको (इत्था) इस प्रकार से (युवम्) तुम (मा, जीवथ:) जिलाते हो ॥२॥ भावार्थ:-जो अध्यापक और उपदेशक बिजुली और सूर्य के तुल्य विद्याओं में व्याप्त तथा परोपकारी हैं वे सत्य महिमा वाले होते हैं ॥२॥ AURANG NEW आदि से (इह) इस संसार में (सते): ६२० ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५६ ।। फिर विद्वान् जन क्या जानकर कैसे हों इस विषय को कहते हैं । ओकिवांसो सुते सचा अश्वा सप्ती इबादने । इन्द्रान्वयी असेह वज्रिणा वयं देवा हवामहे ॥३॥ पवार्थ:--हे मनुष्यो जैसे (देवाः) विद्वान् (वयम्) हम लोग (अवसा) रक्षा युक्त (अश्वाः) और व्याप्त हुए (त्रिणा) प्रशंसित शस्त्र अस्त्र वाले (प्रोकिवांसा) संग और सम्बन्ध को प्राप्त हुए (सप्तीइय) जैसे दो घोड़े (पादने) भक्षण करने योग्य धास अदन के निमित वर्तमान वैसे (इन्द्राग्नी) पवन और बिजुली की (नु) शीघ्र (हवामहे) प्रशंसा करते हैं वैसे इनकी तुम भी प्रशंसा करो ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालंकार है-जो विद्वान् जन सदा मिले हुए वायु और बिजुली इन दोनों पदार्थों को जानते हैं वे इस संसार में अद्भुत क्रियानों को कर सकते हैं ॥३॥ फिर विद्वान् जन कैसे हों इस विषय को कहते हैं ।। य इन्द्राग्नी सुतेषू व स्त्वत्तेष्टसाधा। जोषवाकं वदता पहोषिणा न देवा भसर्थश्चन ।।४॥ पवार्थ:-है (पत्रहोषिणा) प्राप्त हुई वाणी वा घोषयुक्त (ऋतावृधा) सत्य बढ़ाने वाले (इन्द्रामी) वायु और बिजुली के समान अध्यापक और उपदेशको (यः) जो (लघु) उन (सुतेषु) उत्पन्न हुए पदार्थों में (वा) तुम दोनों की (स्तवत्) प्रशंसा करे वा जो (देवा) विधान जा (चन) भी (न) नहीं (भसथ:) व्यर्थ बाद करते हैं उस सर्वजन के प्रति तुम दोनों (जोषवाकम्, प्रीति करने वाले वचन (वदतः) कहते हो वह सर्वजन भी तुम्हारे प्रति कहे ॥४॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है --हे मनुष्यो ! सर्व पदार्थों में प्रविष्ट वायु और बिजुली को जानकर ऐश्वर्य को प्राप्त होकर रूखी असत्य क्रिया और लोकविद्वेषी जनों को जान सबके उपकार के लिए सत्य प्रिय वाक्य सर्वदा कहो ॥४॥ कौन मनुष्य पदार्थ विद्या को जानने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं। इन्द्राग्नी को अस्य वां देवौ यतश्चिकेतति । विपूंचो अश्वान् युयुजान ईयत एक समान आ रथें ॥५॥ S ऋग्वेदः मं०६ । सू० ५६ ॥ Sande पदार्थ:-हे प्रध्यापक और उपदेशको (कः) कोन (अस्य) इस जगत् के बीच वर्तमान (मत्तः) मनुष्य (विषूचः) व्याप्त (अश्वान्) शीघ्रगामी बिजुली आदि पदार्थों को (समाने) समान (रथे) विमान आदि यान में (युयुजान्दः) युक्त करता हुआ (एक:) एक विद्वान् (देवी) दिव्यगुण कर्म स्वभावयुक्त (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली को (चिकेतति) जानता है वह (बाम) तुम दोनों को (आ, ईयते) प्राप्त होता है | भावार्थ:-हे विद्वानो! कौन यहां पदार्थ विद्या का जानने वाला, विमान आदि यानों का निर्माण करने वाला शीघ्रगामी हो, इसका उत्तर पीछे दिया यह तुम सुनो ॥५॥ बिजुली का जानने वाला क्या कर सकता है इस विषय को कहते हैं। इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात्पद्वतीभ्यः । हित्वी शिरों जिह्वया वावदच्चरत्रिशत्पदा न्यक्रमीत् ॥६॥ पदार्थः -- जो (जिह्वया) वाणी से' (वावदत) निरन्तर कहता है और जो (इयम्) यह (अपात) पैररहित (पूर्वा) पूर्ण वा अग्नस्थ (पद्वतीभ्यः) पैरों से की हुई गतियों से (शिरः) शिर से तुल्य' मुख्य' वचन को (हित्वी) त्याग कर बिजुली (मा, श्रगाव) प्राप्त होती है तथा (त्रिंशद) आकाश और प्रकाश को छोड़ कर सब भूमि आदि पदार्थ रूपी (पवा) स्थानों को (नि, अक्रमीत) क्रम क्रम से पहुँचती और शीघ्र (चरत्) चलती है इससे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली को जानता है वही मनुष्य बिजुली की विद्या को जानने वाला होता है ॥६॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! आप यदि बिजुली की विद्या को अच्छे प्रकार ग्रहण करो तो सब यानों से शीघ्र जाने को तथा और काम सिद्ध कर सकते हो ॥६॥ कौन विजयी होते हैं इस विषय को कहते हैं ।। इन्द्राग्नी आ हि तन्वते नरो धन्वांनि बाह्यो । मा नो अस्मिन्महाधने पर वक्तं गविष्टिषु ॥७॥ पदार्थः है मनुष्यो जो (नरः) नायक मनुष्य (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली को (प्रा, तन्यते) विस्तारते हैं और (बाह्वोः) भुजाओं में (हि) ही (धन्वानि) धनुषों को धारण कर (अस्मिन्) इस (महाधने) संग्राम में हम सब को विस्तारते हैं और (गविष्टिष) किरणों की जिनमें मिलावटें हैं उन क्रियाओं में प्रवीण होते हुए * ६२२ ऋग्वेदः मं०६। सू०.५६ ।। जैसे वायु और बिजुली (नः) हम लोगों को (मा, परा, वर्तम्) मत छोड़ें वैसा करते हैं उनको हम लोग मिलें ॥७॥ भावार्थ:-जो राजा प्रजाजन बिजुली आदि से आग्नेयादि अस्त्रों को बनाय सग्राम के जीतने वाले होते हैं वे इस संसार में राज्यैश्वर्य से सुख बढ़ा सकते हैं ।।७।। फिर विद्वान् जन किस-किस से बिजुली का संग्रह करें इस विषय को कहते हैं । इन्द्राग्नी तपन्ति माघा अर्यो अरांतयः। अप द्वेषांस्था कृतं युयुतं सूर्थादधि ॥८॥ पदार्थ:-हे सभा सेनाधीशो जो (अरातयः) शत्रुजन' (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली को (तपन्ति) तपाते हैं उनके (षांसि) द्वेषयुक्त कामों को (अप, कृतम्) नष्ट करो और (सूर्यात्) सवितृमण्डल से (अधि) ऊपर जाने वाली बिजुली को (आ, युयुतम्) अलग करो। हे राजन् (अर्थः) स्वामी आप इन शिल्पीजनों को (मा, धाः) मत करो || भावार्थ:-हे राजसहित राजप्रजा जनो ! जो आप लोग सूर्यादिकों से बिजुली ग्रहण करना जानो तो शत्रुजनों को जीतकर द्वषीजनों के करने को समर्थ होयो ।।८।। कौन उत्तम धनको प्राप्त होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।। इन्द्राग्नी युरोरपि वसु दिव्यानि पार्थिना । आ ने इह प्र यच्छतं रयिं विश्वायुपोषाम् ।।९।। पदार्थ:--हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान सभासेनाधीशो तुम यदि (इह) यहां (नः) हमारी (विश्वायुपोषसम्) समस्त प्रायु के पुष्ट करने वाले (रयिम्) धन को (प्र, श्रा, यच्छतम्) अच्छे प्रकार देनो तो (युवोः) तुम्हारे (अपि) भी (विव्यानि) अतीव उत्तम (पार्थिवा) पृथिवी में उत्पन्न हुए (वसु) धन आधीन हों ॥९॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सभा सेनापति बिजुली की विद्या को जान कर तुम्हारे लिये देते हैं वे पूर्ण आयु करने वाले धर्म से प्राप्त समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ।।६।। मनुष्य क्या करके बिजुली की विद्या जानें इस विषय को कहते हैं । -

मार
पदार्थ:--हे (इन्कार
ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६० ।।
इन्द्राग्नी उक्थवाहला स्तोमेभिईवनश्रुता ।
विश्वांभिर्गीभिरा गंतमस्य संवरन पीतये ॥१०॥
(उक्थवाहला) प्रशंसित विद्या की प्राप्ति कराने और (हनता हबनों को सुनने
वालो ! तुम (स्तोमेभिः) प्रशंसानों से और (विश्वाभिः) समस्त (गोभिः) विद्या
और उत्तम शिक्षायुक्त वाणियों के साथ (प्रत्य) इस (सोमस्य) महौषधियों के
रस के (पीतये) पीने को (मा, गसम्) प्रायो॥१०॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-बे ही बिजुली को
विद्या को जानने योग्य होते हैं जो विद्वानों से विद्या पाने को प्रयत्न करते
हैं ॥१०॥
इस सूक्त में इन्द्र और अग्नि के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की
इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह छठे मण्डल में उनसठमां सूक्त समाप्त हुमा ।।
.
अथ पञ्चदशर्चस्य षष्टितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः ।
इन्द्राग्नी देवते । १ । ३ निचुत्त्रिष्टुप् । २ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः।
४। ६ । ७ विराङ्गायत्री।५।१।११ निवृद्गायत्री।। १० । १२ गायत्री
छन्दः । षड्जः स्वरः । १३ स्वराट् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । १४ निवनुष्टुप् ।
१५ विराडनुष्टुप छन्दः । गान्धारः स्वरः ।।
अब पन्द्रह ऋचावाले साठवें सूक्त का प्रारम्भ है इसके प्रथम मन्त्र में
कौन ऐश्वर्य को पाता है इस विषय को कहते हैं।
श्रयंत्रमुत सनोति वाजमिन्द्रा यो अग्नी सहुरी सपर्यात् ।
इरज्यन्तो वसव्या भूरेः सहस्तमा सहसा वाजयन्ता ॥१॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (य:) जो विद्वान् (सहुरी) सहनशील' (इरज्यन्ता)
ऐश्वर्य को सिद्ध करते हुए वा (सहस्तमा) अतीव सहन करने वाले (सहसा) बल से
(वाजयन्ता) अन्नादिकों की इच्छा करते हुए (इन्द्रा, अग्नी) पवन और विजुली को
(श्नथत) ताड़ता है (उत) और (सनोति) प्राप्त होता है तथा (बसव्यस्य) धनादि
पदार्थों में हुए (भूरेः) बहुत सुख से (वृत्रम्) धन को प्राप्त होता है और (वाजम् )
अन्न को (सपर्यात) सेवे वही ऐश्वर्य को पावे ॥१॥

६२४ ऋग्वेदः म ६ । सू०६०॥ . DD T210 प्रक भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो माप वायु और बिजुली की विद्या को जानो तो महान् ऐश्वर्य वाले होकर महान् राज्य के स्वामी होनो॥१॥ मनुष्य क्या करके सुख पाते हैं इस विषय को कहते हैं । ता रोधिष्टाभि मा इन्द्र नूनमाप: स्वपलो अन कळदा । दिशा खरुषस इन्द्र चित्रा अपो गा अग्ने युवसे नियुत्वान् ॥२॥ पदार्थ -हे (इन्द्र) परमैश्वर्य युक्त (अग्ने) विद्वान् वा प्राव (स्व:) आदित्य (उषसः) प्रभात वेलाओं को जैसे वैसे' (गा:) पृथिवी और (नूनम् ) निश्चय से (अप:) कर्म को (युवसे) संयुक्त करते हो और जिनसे (विशः) दिशायें (ऊळ हा:) प्राप्त हुई (ता) उनको जानकर तुम दोनों (अभि, योधिष्टम्) सब ओर से युद्ध करो। हे (इन्द्र) दुःखविदारक [दुःख के नाश करने वाले] वा (अग्ने) विद्वान् जन (नियुत्वान्) ईश्वर के समान न्यायाधीश आप (स्व:) आदित्य (उषसः) प्रभात वेलाओं के समान (चित्राः) चित्र विचित्र (अपः) उदक (गा:) और वाणियों को संयुक्त करते हो इससे ईश्वर के समान न्यायकर्ता हो ॥१ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जो मनुष्य वायु और बिजुली के तुल्य पाक्रमी होकर युद्ध का आचरण करें वे उषाकाल को जैसे सूर्य उसी के स्मान प्रजाओं को न्याय से प्रकाश को प्राप्त कराय कर और सर्व दिशात्रों में कीर्ति वाले हो अद्भुत वाणी, बलों और भूमि के राज्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥ फिर राजा जन कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। आ हृत्रहणा वृत्रहभिः शुष्मैरिन्द्र यातं नमाभिरग्ने अर्वाक् । युवं राधोभिरकवेभिरिन्द्राग्ने अस्मे भक्तमुत्तमेमिः ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) बिजुली के समान राजजन वा (अग्ने) अग्नि के समान सभ्यजन वायु और बिजली के समान वर्तमान दोनों पुरुषो ! जैसे (वत्रणा) मेघ को हनने वाले बिजुली के दो भाग (वृत्रहभिः) उन कम्मों से जिन से मेघ को मारते वा (शुष्मैः) बलों से वा (नमोभिः) अन्नादि पदार्थों से (अर्वाक्) पीछे जाते हैं वैसे (युवम्) तुम दोनों (अकवेभिः) असंख्य (राधोभिः) धनों से हम लोगों को (श्रा, यातम्) प्राप्त होप्रो । हे (इन्द्र) दुष्टविदारक वा (अग्ने) पापियों को संतप्त करने वाले (उत्तमेभिः) श्रेष्ठ कर्मों से (अस्मे) हम लोगों के लिए सुख करने वाले (भवतम्) होत्रो ।।३।। taka KANE ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६० ॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा और उसके राजमन्त्री वायु और बिजुली के समान उपकारी हों वे असंख्य धन को प्राप्त हों ॥३॥ मनुष्यों को चाहिये कि वायु और बिजुली को यथावत् जानें इस विषय को कहते हैं । ता हुवे ययोरिदं पप्ने विश्वं पुरा कृतम् । इन्द्राग्नी न मर्धतः ।।४।। पदार्थ:-(ययोः) जिनका (इदम्) यह (विश्वम्) समस्त जगत् वा (पप्ने) जिन से प्रवृत्त हुए व्यवहार में जो(इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली (पुरा) पहिले (कृतम्) किये हुए इस विश्व को (न) नहीं (मर्धतः) नष्ट करते हैं (ता) उनको मैं (हुवे) ग्रहण करता हूं ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिन वायु और बिजुली से सब जगत् व्यव- हार करता है तथा जो ससार में स्थिर हो किसी को नष्ट नहीं करते और विकार को प्राप्त हुए वे नष्ट करते हैं, मनुष्यों को चाहिये कि उनको जान कर यथावत् उपकार करें॥४॥ फिर वायु और बिजुली कैसे हैं इस विषय को कहते हैं । उग्रा विघनिना मृधं इन्द्राग्नी हवामहे । ता नो मृळात ईदृशे ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो हम लोग (उन्ना) तेजस्वी (विघनिना) विशेष हनने वाले (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली को (हवामहे) ग्रहण करते हैं उनसे (मृधः) सग्रामों को जीतते हैं जो (ईशे) ऐसे' युद्धप्रकारक व्यवहार में (न:) हम लोगों को (मुळातः) सुखी करते हैं (ता) उन दोनों को तुम भी जानो ।।५।। भावार्थ:--मनुष्यों को वायु और बिजुली यथावत् जान और उनका संप्रयोग कर संग्रामों को जीत सुख पाना चाहिये ॥५॥ फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं। हतो वृत्राण्यार्यां इतो दासानि सरपती । हतो विश्वा अप द्विषः ।।६।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (मार्या) उत्तम गुण कर्म स्वभावयुक्त (सत्पती) सज्जन पुरुषों के व्यवहारों के पालने वाले सूर्य और बिजुली (वृत्राणि) मेघ के अवयवों को जैसे वैसे (विश्वा) समस्त (द्विषः) शत्रुजनों को (अप, हतः) मारते हैं वा (दासानि) दानों को (हतः) नष्ट करते हैं वा दुःखों को (हतः) दूर करते हैं वे सत्कार करने योग्य हैं ।।६।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो श्रेष्ठ गुणकर्मस्वभाव वाले मनुष्य, सत्य का anta 2.70 AMD

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६० ॥
ma
MANG
धर्मनिष्ठ, प्राप्त सज्जनों के पालने और दुष्टों को हरने वाले हों, उनका
सदा सत्कार करो ॥६॥
फिर वे दोनों कैसे हैं इस विषय को कहते हैं ।
इन्द्रग्निी युवामिमे३'भि स्तोमा अनूषत । पिबतं शम्भुवा सुतम् ॥७॥
पवार्थ:-हे (शम्भुवा) सुख की भावना कराने वाले (इन्द्राग्नी) सूर्य और
बिजुली के समान सभासेनाधीशो (युवाम्) आप दोनों जो (इमें) ये (स्तोमाः)
प्रशंसायें (अभि, अनूषत) प्रशंसा करती हैं उनसे (सुतम्) सब ओर से उत्पन्न किये
हुए दूध आदि रस को (पिबतम्) पियो ॥७॥
भावार्थ:--हे सभासेनाधीशो! आप लोग पथ्य आचार से सदा
ओषधियों के रस को पीके अरोगी होकर प्रशंसित कर्मों को करो ॥७॥
फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं ।
या वां सन्ति पुरुस्पृहों नियुतो दाशुषे नरा ।
इन्द्राग्नी ताभिरा गंतम् ॥८॥
पदार्थः हे (नरा) नायक (इन्द्राग्नी) विद्या और ऐश्वर्ययुक्त अध्यापक
और उपदेशको ! (वाम्) तुम दोनों की (या) जो (पुरुस्पृहः) बहुतों की चाहना
करते जिनसे वे (नियुतः) निश्चित (सन्ति) हैं (लाभिः) उन इच्छात्रों के (दाशुषे)
दान देने वाले के लिये (मा, गतम्) प्रामो ॥८॥
भावार्थ:- जो मनुष्य परोपकार करने की इच्छा करते हैं वे ही
सत्पुरुष होते हैं ॥८॥
फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।
ताभिरा गच्छतं नरोपेदं सर्वनं सुतम् । इन्द्राग्नी सोमपीतये ॥९॥
पदार्थ:--हे (नरा) नायक (इन्द्राग्नी) बिजुली और वायु के समान. सज्जनो
तुम दोनों (ताभिः) उन इच्छाओं से (सोमपीतये) सोमपान के लिये (इदम्) इस
(सुतम्) अच्छे प्रकार संस्कार किये हुए (सवनम्) जिससे उत्पन्न करते हैं उसके
(उप, पा, गच्छतम्) समीप प्राप्त होतो ॥६॥
भावार्थ:- यजमान जन विद्वानों को बुलाकर सदैव सत्कार करें और
सत्कार पाये हुए वे लोग भी यजमानों को धर्मपथ को प्राप्त करावें ॥६॥

m atta Shar . (ख) प्रदीप्त व्यवहार में (इन्द्रस्य) ऋग्वेदः मं०६। सू० ६० ।। ६२७ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को कहते हैं ।। तमीलिष्ट यो अर्चिषा धना विश्वां परियजत् । कृष्णा कृणोति जिह्वया ॥१०॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जन जैसे सूर्य (अधिषा) सत्कार से (विश्या) समस्त (वना) किरणों का (परिष्वज) सब ओर से संबन्ध करता है तथा (कृष्णा) पदार्थों की खीचों को (कृणोति) करता है वैसे (यः) जो (जिह्वया) जिह्वा से सत्य आचरण का सम्बन्ध करे (तम्) उसकी पाप (ईळि) प्रशंसा वा याचना करो ॥१०॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमाल कार है-जैसे सूर्य के प्रकाश से सब पदार्थ यथावत् दीखते हैं वैसे ही विद्या से सब पदार्थ प्रका- शित होते हैं ॥१०॥ फिर मनुष्यों को किसके लिये क्या सेवन करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । ध इद्ध आविषासति सुम्नमिन्द्रस्य मत्यः । शुम्नाय सुसरा अपः ॥११॥ ऐश्वर्य के (शम्नाय) यश वा धन के लिये (सुतराः) सुन्दरता से जिन में तैरें उन (अपः) जलों को और (सुम्नम्) सुख को (प्राविवासति) सब ओर से सेवता है वह भाग्यवान होता है ॥११॥ भावार्थ:--मनुष्य जैसे प्रदीप्त अग्नि में सुगन्ध्यादि पदार्थों का हवि होमकर सिद्धकाम होते हैं वैसे जो यश से धर्मकीत्ति के वा स्वर्ग के लिये प्रयत्न करते हैं वे निरन्तर श्रीमान् होते हैं ॥११॥ फिर मनुष्यों को किससे क्या करने योग्य है इस विषय को कहते हैं। ता नो वाजवतीरिष श्रान्पित्तमर्वतः । इन्द्रमनि च वोल्हवे ॥१२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम जो (नः) हमारे लिये (वाजवती:) प्रशस्त विज्ञान- युक्त (इष:) अन्नादि पदार्थों और (प्राशून्) शीघ्रगामी (अर्वतः) घोड़ों को (पिपृतम्) पूर्ण करते हैं (ता) उन (इन्द्रम्) बिजुली रूप अग्नि (अग्निम्, च) और प्रसिद्ध अग्नि को (बोळ हवे) विमान आदि यानों को वहाने के लिये संग्रह करो ॥१२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम बिजुली आदि पदार्थों से विमान प्रादि यानों को चलाकर इच्छाओं को पूर्ण करो।।१२।। - !

ऋग्वेदः मं०६ । सू०६० ॥ CHES AMERA फिर शिल्पीजन उनसे क्या करें इस विषय को कहते हैं । उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या उभा राधसा सह मादयध्यै । उमा दाताराविषां रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम् ॥१३॥ पदार्थ:-हे शिल्पविद्या के अध्यापक और उपदेश करने वालो जैसे (वाम्) तुम्हारे समीप स्थिर होकर (आहुवध्यै) आह्वान करने को (उभा) दोनों (इन्द्राग्नी) सूर्य और बिजुली को (राषसः) धन संबन्धी (मादयध्य) आनन्द देने को (उभा) दोनों को (सह) एक साथ (उभा) और दोनों को (इषाम्) अनादि पदार्थों के वा (रयीणाम्) धनादि पदार्थों के (वातारो) देने वाले' तथा (उभा) दोनों को (वाजस्य) विज्ञान वा संग्राम के (सातये) संविभाग के लिए मैं (हुवे) स्वीकार करता हूं वैसे ही (वाम्) तुम दोनों को इस विद्या का बोध कराऊ ॥१३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य वायु और बिजुली को यथावत् जान में उनका अच्छे प्रकार प्रयोग करते हैं वे श्रीपति होते हैं ॥१३॥ फिर मनुष्यों को किन के साथ मित्रता करनी चाहिए इस विषय को कहते हैं । आ नो गव्येभिरश्व्यैर्वसन्यै ३ रुपं गच्छतम् । सखायौ देवौ सख्याय शंभुयेन्द्राग्नी ता हवामहे ॥१४॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको इन्द्राग्नी) सूर्य और बिजुली के समान वर्तमान बा (शम्भुवा) सुख की भावना करने वाले (देवी) विद्वान् (सखायौ) मित्र (नः) हम लोगों को (सख्याय) मित्रता के लिए (गव्येभिः) गो घृत आदि पदार्थ (प्रश्श्यः) अश्वादिकों में हुए गुणों और (वसव्यैः) धनादिकों में हुए सुखों के साथ वर्तमान तुम दोनों को हम लोग (हवामहे) बुलाते हैं (ता) वे तुम दोनों लोगों के (उप, पा, गच्छतम्) समीप आओ ॥१४॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो मनुष्य विद्वानों के मित्र होकर पदार्थविद्या सिद्ध करने की इच्छा करते हैं वे अवश्य विज्ञान को प्राप्त होते हैं ॥१४॥ फिर वे दोनों क्या करें इस विषय को कहते हैं। इन्द्राग्नी शृणुतं हवं यजमानस्य मुन्वतः वीतं हव्यान्या गतं पिबतं सोम्यं मधु ॥१५॥ AM KAM IN 4- पदार्थ:-हे (इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली के समान वर्तमान अध्यापक और

ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६१ ॥
६२६
.
उपदेशको
तुम दोनों (सन्वतः) पदार्थ विद्या से बहुत पदार्थों को उत्पन्न करते हुए
(यजमानस्य) शुभ गुण देने वाले मेरे (हवम्) पढ़े विषय को (शृणुतम्) सुनो और
(हव्यानि) उत्तम पदार्थों को (बीतम्) प्राप्त होपो वा व्याप्त होमो उनके समीप
(मा, गतम्) प्राओ और (सोभ्यम्) शान्ति शीतलता के जो योग्य है उस (मध)
मधुरादि युक्त रसको (पिबतम्) पिनो ॥१५॥
भावार्थः- सब मनुष्यों को चाहिये कि आमन्त्रण से विद्वानों को
बुलाकर इनका सत्कार कर इनसे अपनी विद्या की परीक्षा कराय अधिक
विद्या ग्रहण करें ॥१५॥
इस सूक्त में इन्द्र और अग्नि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ
को इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह छठे भण्डल में साठी सूक्त समाप्त हुमा ।
.
।
।
AL
SAR
अथ चतुर्दशर्चस्यकषष्टितमस्य सूक्तस्य बार्हस्पत्य ऋषिः । सरस्वती देवता ।
१ । १३ निचज्जगती । २ जगती । ३ विराजगती छन्दः । निषावः स्वरः । ४ ।
६ । ११ । १२ निचद्गायत्री।५।६।१० विराङ गायत्री । ७।८ गायत्रीछन्दः ।
षड्जः स्वरः । १४ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वारः॥
अब चौदह ऋचावाले इकसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मंत्र में यह
वारणी क्या देती है इस विषय को कहते हैं ।
इयमंददाद्रमसमृणच्युतं दिवोदासं वध्यूश्वाय दाशुषे ।
या शश्वन्तमाचखादावसं पणि ता ते दात्राणि तविषा सरस्वति ॥२॥
पदार्थ:-- हे (सरस्वति) विदुषी (या) जो (इयम्) यह (बध्यश्वाय) बढ़ाने
वाले घोड़ों से युक्त (दाशुषे) दानशील के लिए (रमसम्) वेग (ऋणच्युतम् । ऋण
से छूटे (दिवोदासम्) विद्या प्रकाश के देने वाले को (श्रददाद) देती है तथा (शश्त्र
न्तम्) अनादि वेदविद्याविषय जो कि (अवसम्) रक्षक तथा (पणिम्) प्रशंसनीय है
उसको (पाचखाद) स्थिर करती है वह (ते) आपके (तविषा) बल' से (ता) उन
(दात्राणि) दानों को देती है यह जानो ॥१॥
भावार्थ:-- जो स्त्री विद्या शिक्षायुक्त वाणी को ग्रहण कराती है वह
अनादिभूत वेदविद्या को जानने योग्य होती है वह जिसके साथ विवाह करे
उसका अहोभाग्य होता है यह जानने योग्य है ॥१॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०.६१ ॥ Hy MM -- कमल फिर वह क्या करती है इस विषय को कहते हैं। इयं शुष्म॑भिर्बिसखा ईवारुजत्सानु गिरीणां संविभिरूमिभिः। पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरखतीमा विवासेम धीतिभिः ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वानो ! जो (इयम्) यह (शुष्मेभिः) बलों से (बिसखाइव) के. तन्तु को खोदने वाले के समान (तविभिः) बलों और (मिभिः) तरङ्गों से (गिरीणाम्) मेघों के (सानु) शिखर को (अरुजव) भङ्ग करती है उस (पाराव- तघ्नीम्) आरपार को नष्ट करने वाली (सरस्वतीम्) वेगवती नदी को (धीतिभिः) धारण और (सवृक्तिभिः) छिन्नभिन्न करने वाली क्रियाओं से (श्रवसे) रक्षा के लिए जैसे हम लोग (श्रा, विवासेम) सेवें वैसे तुमभी इसको सदा सेवो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जैसे कमलनाल तन्तुओं को खोदने वाला कमलनाल तन्तुओं को प्र प्राप्त करता है वैसे ही पुरुषार्थी मनुष्य उत्तम विद्या को प्राप्त होते हैं और जैसे बिजली मेघ के अंगों को छिन्न भिन्न करती है वैसे ही सुन्दर शिक्षित वाणी अविद्या के अंगों और सशयों को नाश करती है ॥२॥ फिर वह क्या करती है इस विषय को कहते हैं। सरस्वति देवनिदो नि बर्हय मजा विश्वस्य बृसंयस्य मायिनः । उत क्षितिभ्योऽवनीरबिन्दो विषमेश्यो अस्त्रवो वाजिनीवति ॥३॥ पदार्थ:-हे (बाजिनीति) विज्ञान, क्रिया और (सरस्थति) विद्यायुक्त स्त्री तू (देवनियः) जो विद्वानों को निन्दा करते हैं उनको (नि, बर्हय) निकाल (उत्) और (विश्वस्य) समन (वृसयस्य) अविद्या छेदन करने वाले मायिनः) प्रशंसित बुद्धियुक्त विद्वान् की (प्रजाम् ) प्रजा को (अविन्दः) प्राप्त हो तथा (भितिभ्यः) पृथिवियों से (अवनीः) रक्षा करने वाली भूमियों को प्राप्त हो और एभ्यः, इन भूमि के भीतरी देशों से (विषम्) जल को (प्रस्रवः) चुनामो-निकालो ।।३।। भावार्थ:-वही पंडिता स्त्री श्रेष्ठ है जो विद्वानों और विद्या के निन्दकों को निकाल विद्या के प्रशंसकों (बड़ाई करनेवालों) का सत्कार करती और जो भूगर्भादि विद्या जानने वाली समस्त प्रजा को विद्याऽभि- मुख करती है ॥३॥ फिर वह कैसी रक्षा करने वाली है इस विषय को कहते हैं । प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । धीनामवित्र्यवतु ॥४॥ Indan 445 ऋग्वेदः मं०६ । सू०६१।। पदार्थ:-हे सन्तानो जो (देवी) विदुषी (वाजेभिः) अन्नादिकों के साथ (वाजिनीवती) प्रशस्त विज्ञान वा क्रिया से युक्त वा (सरस्वती) विज्ञानयुक्त वाणी से युक्त (न:) हमारी (धीनाम्) बुद्धियों की (अवित्री) रक्षा करने वाली (प्र अवतु) अच्छे प्रकार रक्षा करे उसको तुम स्वीकार करो ॥४॥ भावार्थ:--माताजनों को चाहिये कि अपने सन्तानों को बाल्यावस्था में अच्छी शिक्षा देकर विद्या से विद्वान् कर उनके साथ अतुल सुख भोगें॥४॥ Fay- Natonia फिर वह किसके तुल्य क्या करती है इस विषय को कहते हैं । यस्त्वां देवि सरस्वत्युपनते धने हित । इन्द्र न त्रतूर्ये ।।५।। पदार्थः - हे (देवि) विदुषी (सरस्वति) विज्ञानयुक्ता भार्या (यः) जो (त्वा) तुझे (वृत्रतूर्ये) मेघ के हिंसन में (इन्द्रम्) बिजुली के (न) समान (हिते) सुख करने वाले (धने) द्रव्य के निमित्त (उपब ते) कहता है उस विद्वान् पति की तू सेवा कर ।।५।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे पुरुषो ! जैसे पतिव्रता विदुषी स्त्रियां तुम लोगों को सत्य ग्रहण कराकर प्रिय वचन कहती हैं वैसे इनके साथ तुमभी हित कहो॥५॥ फिर वह क्या करती है इस विषय को कहते हैं । त्वं देवि सरखत्यवा वाजेषु वाजिनि । रदो पूर्व नः सनिम् ॥६॥ पदार्थ:-- है (देवि) कामना करने वाली (वाजिनि) प्रशस्तविज्ञानयुक्त (सरस्वति) विदुषी स्त्री (स्वम्) तू (न:) हमारी (सनिम्) सत्य' और असत्य के विभाग करने वाली बुद्धि को (वाजेषु) प्राप्तव्य पदार्थों में (पूषेव) भूमि के समान (अधा) पालो और (रवा) विशेषता से लिखो ॥६॥ भावार्थ:-हे वरानने सुन्दर मुखवाली! तू पृथिवी के समान सबका ॥६॥ फिर वह कैसी है इस विषय को कहते हैं ।। उत क्या ना सरखती घोरा हिरण्यवर्जनिः । वृत्रघ्नी वष्टि सुष्टुतिम् ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (हिरण्यवर्तनि:) जिसमें विद्याव्यवहार का वर्ताव है वह (घोरा) दुष्टों को दुःख देने वाली (वृत्रघ्नी) मेघ को हनने वाली बिजुली के धारण कर और प्रज्ञा दे MER baca Aries

ऋग्वेद: मं०६। सू० ६१ ॥
समान (सरस्वती) विज्ञान भरी हुई वारणी (नः) हम लोगों को सुखी करती है (स्या)
वह (उत) भी हमारी (सुष्टुतिम्) सुन्दर प्रशंसा की (वष्टि) कामना करती है ॥७॥
भावार्थ:-जो बिजुली की चमक दमक के समान सुन्दर शोभा वाली
विदुषी स्त्री घर के कार्यों को प्रकाश करनेवाली तथा सन्तानों की विद्या
की कामना करती है वही यहाँ सौभाग्यवती होती है ।।७।।
फिर वह वाणी कैसी है इस विषय को कहते हैं ।।
यस्या अनन्तो अहतस्त्वेषश्चरिष्णुरेणुवः । अमश्चरति रोरुवत् ।।८।।
पदार्थ:- हे मनुष्यो (यस्याः) जिस वाणी का (ग्रहतः) अकुटिल सरल
(त्वेषः) प्रकाश वा (चरिष्णुः) जाने वाले (अनन्तः) निःसीम (अर्णवः) समुद्र के
तुल्य आकाश (रोस्वत) निरन्तर शब्द करता वा (अमः) फैलनेवाला (चरति) प्राप्त
होता है उसको तुम जानो ।।८।।
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जितना आकाश है उतना ही शब्द अनन्त है
जैसे समुद्र में जल पूरा है वैसे आकाश में शब्द है यह जानो ॥८॥
फिर वह कैसी है इस विषय को कहते हैं ।
सा नो विश्वा अति द्विषः
स्वसृरन्या ऋतावरी।
अतन्नहब सूर्यः ॥९॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (सा) वह (ऋतावरी) उषा [प्रभातवेला] (न:) हमारे
(विश्वा:) समस्त (द्विषः) द्वेषी जनों को (अति) अतिक्रमण [उल्लंघन] कराती है
और (सूर्यः) सूर्य (अहेब) दिनों को जैसे (प्रतन) व्याप्त होता वैसे' (अन्याः) और
(स्वसः) भगिनियों के समान वर्तमान' गत विगत प्रभातवेलानों का संयोग करती
-
ANSAR
Pull
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे. मनुष्यो ! जो वाणी
अच्छे प्रकार प्रयोग की हुई सुख और अन्यथा कही हुई दुःख प्रदान करती
है। जो सत्यवादी हैं वे ही मिथ्या कहना नहीं चाहते जैसे सूर्य समस्त
मूर्तिमान् द्रव्यों को प्रकाशित करता है वैसे ही यह वाणी सब व्यवहारों को
प्रकाशित करती है ॥६॥
फिर वह कैसी है इस विषय को कहते हैं ।
उत नः प्रिया प्रियासु सप्तखंला सुजुष्टा ।
सरस्वती स्तोम्यो भूत् ॥१०॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०६१॥ ६३३ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (न:) हमारी (सरस्वती) वह सरस्वती जिसको बहुत अन्तरिक्ष का संबन्ध है तथा (प्रियासु) सुख देनेवाली क्रियाओं वा स्त्रियों में (प्रिया) मनोहर (सप्तस्वसा) जिसके सात अर्थात् पांच' प्राण मन और बुद्धि बहिन के समान वर्तमान तथा (सजुष्टा) अच्छे प्रकार सेवित की हुई (उत) और (स्तोम्या) स्तुति करने योग्य (भूत) हो वैसे तुम्हारी भी हो ॥१०॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सब ओर से शुद्धि करनेवाली सत्य वाणी को जानते हैं वे ही प्रशंसा करने योग्य होते हैं ॥१०॥ फिर वह कैसी और क्या करती है इस विषय को कहते हैं । आपभषी पार्थिवान्युरु रजो अन्तरिक्षम् । सरस्वती निदस्पातु ॥११।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (पार्थिवानि) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध हुए वा विदित हुए (उरु) बहुत (रजः) परमाणु आदि पदार्थों को तथा (अन्तरिक्षम्) आकाश को (आपघुषी) सब ओर से व्याप्त (सरस्वती) विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त वाणी हम लोगों को (निवः) निन्दकों से (पातु) बचावे ॥११॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो वाणी सर्वत्र आकाश में व्याप्त है उसको जान के इससे किसी की भी निन्दा अर्थात् गुणों में दोषारोपण और दोषों में गुणारोपण कभी न करो ॥११॥ फिर वह क्या करती है इस विषय को कहते हैं । विषवस्था सप्तधातुः पञ्च जाता वर्धयन्ती। वाजेवाजे हव्या भूव ॥१२॥ पदार्थ:-हे विद्वानो ! (त्रिषधस्था) तीन समान स्थानों में स्थित (सप्त- धातुः) सात प्राण आदि जिसकी धारणा करने वाले (पञ्च) पांच प्राणों से (जाता) प्रसिद्ध (वाजेबाजे) प्रत्येक व्यवहार वा प्रत्येक संग्राम में (हत्या) उच्चारण करने योग्य (वर्धयन्ती) वृद्धि को प्राप्त कराती (भूत) हो उसका युक्ति के साथ अच्छे प्रकार प्रयोग करो ॥१२॥ भावार्थ:---जो विद्वान् जन वाणी के योग को जानते हैं तो क्या क्या बढ़ा नहीं सकते हैं ॥१२॥ फिर वह कैसी है इस विषय को कहते हैं । प्र या महिम्ना महिनासु चेकिते द्युम्नेभिरन्या अपसामपस्तमा । रथइव बृहती विश्वनं कृतोपस्तुत्यां चिकितुषा सरस्वती ॥१३॥ withd Monda RAN ved ऋग्वेदः मं०६ । सू०६१ ॥ sion State MARHI पदार्थ:--हे मनुष्यो (या) जो (महिम्ना) बड़प्पन से (महिना) बड़ी (अप- साम्) कर्म करने वालों में (अपस्तमा) अतीव कर्म करने वाली और (रथइय) रम- रणीय आकाश के समान (बृहती) बढ़ती हुई (विम्बने) विभुत्व के लिये (चिकितुषा) समझाने वाली (उपस्तुत्या) जिससे कि समीप स्तुति करता उससे (कृता) जगदीश्वर ने उत्पन्न किई (सरस्वती) जिसमें विज्ञान वर्तमान वह वाणी (धुम्नेभिः) प्रकाश जो यशरूप हैं उनसे (अन्याः) प्रत्येक प्राणी के प्रति भिन्न भिन्न है अर्थात् नाना प्रकार वाणी हैं (प्रास) उनमें जो (प्र, चेकिते) विज्ञान कराती उसको यथावत् जानके सत्य वाणी का अच्छे प्रकार प्रयोग करो ॥१३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! विद्या, सुशिक्षा, सत्संग, सत्यभाषण और योगाभ्यासादिकों से निष्पन्न हुई यह वाणी व्याप्त वा समर्थ है उसको तुम जानो ॥१३॥ फिर वह कैसी है इस विषय को कहते हैं ।। सरस्वत्यमि नो नेषि वस्यो मापं स्फरीः पयसा मा न आ धक् । जुषस्व नः सख्या वेश्या च मा त्वत्क्षेत्राण्यरणानि गन्म ॥१४॥ पदार्थ:-हे (सरस्वति) बहुत विद्या से युक्त विदुषी स्त्री जो तू (नः) हमारे (वस्यः) अतीव प्रोढ़ने योग्य वस्त्र आदि को (अभि, नेषि) सन्मुख लाती है सो तू सुशिक्षित वाणी से हीन हम लोगों को (मा) मत' (अप, स्फरी) अवृद्ध करे किन्तु वृद्धियुक्त करे और (पयसा) विशेष रस से अलग कर (न:) हम लोगों को (मा, मा, धक) मत दाह दे और (वेश्या) समीप प्रवेश करने योग्य (सख्या) मित्रपन से (च) भी (नः) हम लोगों को (जुषस्व) सेवे तथा (त्वत्) तेरे (अरणानि) अरमणीय (क्षेत्राणि) निवासस्थानों को हम लोग (मा, गन्म) मत प्राप्त हों इससे' तू सत्कार करने योग्य है ॥१४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विदुषी स्त्रियां-जैसे विद्या और उत्तम शिक्षा से युक्त वाणी सर्वत्र अच्छे प्रकार रक्षाकर सर्वथा वृद्धि देती है वा जो सत्यभाषण आदि से दुःख को नहीं प्राप्त कराती उसके तुल्य वर्तमान हैं वे लोगों को शोकादिकों से अलग कर मित्रता से अच्छे प्रकार सेवन करतीं और सर्वदैव आनन्दित करती हैं ॥१४॥ इस सूक्त में वाणी के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में इकसठना सूक्त समाप्त हुआ। हम

* ओ३म् *
अथर्वेदे पञ्चमाऽष्टकारम्भः॥
--08:02:००:--
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अब ऋग्वेद में पञ्चमाष्टक का प्रारम्भ है ।।
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद्भद्रं तन्न आ सुंव ॥१॥
प्रथैकादशर्चस्य द्विषष्टितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बाहत्पत्य ऋषिः । अश्विनी
देवते ।१।२ भुरिपवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३ विराट् त्रिष्टुप् । ४ । ६ ।
७।८।१० निचरित्रष्टुप् । ५ । । । ११ त्रिष्टुप्छन्दः । घेवतः स्वरः ।।
अब बिजुली और अन्तरिक्ष कैसे हैं इस विषय को कहते हैं ।।
स्तुषे नरा दियो अस्य प्रसन्ताश्विना हुवे जरंमाणो अः ।
या सघ उस्रा व्युषि ज्मो अन्तान्युयूषनः पर्युम बरासि ॥१॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (जरमाणः) स्तुति करता हुआ मैं (अः) मन्त्रों से (या)
जो (म्युषि) विशेष दाह के निमित्त (उसा) जिनकी किरणें विद्यमान वे (प्रसन्ता)
विभाग करने वाले (नरा) नायक (अश्विना) व्यापनशील' विजुली और अन्तरिक्ष
(अस्य) इस (विवः) प्रकाश के तथा (जन:) पृथिवी के (अन्तान्) समीपस्थ पदार्थों को
(उच) बहुत (वरांसि) उत्तम वस्तुओं को (सद्यः) शीघ्र (परि, युयूषतः) अच्छे प्रकार
अलग-अलग करते उनकी (स्तुषे) स्तुति करता हूं तथा (हुवे) ग्रहण करता हूं वैसे
इनकी स्तुति कर तुम भी ग्रहण करो ॥१॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अन्तरिक्ष और विद्युत् सर्वाधिकरण और
सब पदार्थों के बीच ठहरे हुए वर्त्तमान हैं उनके बीच बिजुली विभाग करने
वाली और अन्तरिक्ष आधार वर्तमान है उनके गुणों को सब जानो ॥१॥
फिर वे दोनों कैसे हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
ता यज्ञमा शुचिभिश्चक्रमाणा रथस्य भानु रुरुचू रजोभिः ।
पुरू वरांस्यमिता मिमानापो धन्यान्यति याथो अन्नान् ॥२॥

Intrican परमाणु वा लोकों के साथ (पुर) बहुत (अमिता) (वरांसि) स्वीकार ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६२ ।। पवार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको ! तुम जो (शुचिभिः) पवित्र गुणों से (यशम्) सर्वसंगत व्यवहार को (श्रा, चक्रमाणा) आक्रमण करते हुए (रथस्य) रमणीय जगत् के (भानुम् ) प्रकाश करने वाले को प्रकाश करने वाले वा (रजोभिः) करने योग्य पदार्थों को (मिमाना) निर्माण करने वाले वा (अपः) जल जो (धवानि) अन्तरिक्षस्थ हैं उनको और (अजान्) प्रक्षिप्त पदार्थों को (याथः) प्राप्त होते और जिनसे सब (रुरुचुः) रुचते हैं (ताः) उनको (प्रति) अत्यन्त प्राप्त होते हो ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! यदि तुम वायु और बिजुली को यथावत् जानो तो अमित आनन्द को प्राप्त होमो ॥२॥ फिर वे कैसे हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ता ह त्यद्वतिर्यदरंध्रमुनेत्था धियं ऊहथुः शश्वदश्वैः । मनॉनवेभिरिषिरैः शयध्यै परि व्यथिर्दाशुषो मत्य॑स्य ।।३।। पदार्थ:-हे विद्वानो! (यत) जो (उप्रा) तेजस्वी वायु और बिजुली (अश्व:) महान् वेगादि गुणों से वा (इषिरः) प्राप्त (मनोजवेभिः) मनोवद्वेगवानों से (दाशुषः) दानशील' (मर्त्यस्य) मनुष्य के (त्यत्) उस (वत्तिः) मार्ग को तथा (अरश्रम्) असमृद्ध व्यवहार और (षियः) बुद्धि वा कर्मों को (शश्वत) निरन्तर (ऊहथुः) चलाते हैं वा (शयध्ये) सोनेको (व्यथिः) व्यथा को (ह) निश्चय से (परि) पहुंचाते हैं (सा) उनको (इत्था) इस प्रकार के वर्तमान जानकर तुम अच्छे प्रकार प्रयुक्त करो अर्थात् कलायंत्रों में जोड़ो ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जब तम वायु और बिजुली के गुणों को जानोगे तभी पूर्ण ऐश्वर्य को पाओगे ॥३॥ फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं। ता नव्यसो जरंमाणस्य मन्मोपं भूषतों युयुजानसप्ती । शुभं पृक्षमिषमूर्ज वहन्ता होता यक्षत्प्रत्नो अध्रग्युवांना ॥४॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जो (युयुजानसप्ती) वेग वा आकर्षणयुक्त होनेवाले हैं के (युवाना) संयुक्त होने वाले वायु बिजुली (नव्यसः) अतीव नवीन (जरमाणस्य प्रशंसा करनेवाले के (मन्म) विज्ञान को (उप भूषत:) पूर्ण करते हैं वा जो (शुभम्) उदक (पृक्षम्) अन्न (इषम्) इच्छा और (ऊर्जम्) पराक्रम को (वहन्ता) पहुंचाने वालों को (अध्रुक्) किसी से न गोह करनेवाला (प्रत्नः) जिसने पहिले विद्या पढ़ी Epap 12

वतुः) होते हैं (ता) उनकी (मा, विवासे) सेवा करता हूं वैसे उनकी तुमभी सेवा
ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६२ ।।
वह (होता) ग्रहण करनेवाला पुरुष (यक्षत) प्राप्त हो (ता) उनको तुम भी प्राप्त
होमो ॥४॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो वायु और बिजुली विज्ञान के विषय,
घोड़ के समान शीघ्र जाने वाले और सब उत्तम उत्तम पदार्थों की प्राप्ति
कराने वाले हैं उनसे चाहे हुए कार्यों को सिद्ध करो ॥४॥
फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं।
ता वल्गू दस्रा पुरुशाकतमा प्ररना नव्यसा वचसा विवासे ।
या शंसते स्तुवते शम्भविष्ठा बभूवर्तुगुणते चित्ररांती ॥५॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे मैं (या) जो (बल्गू) अत्युत्तम (दना) दुःख को
नष्ट करने वाले (प्रत्ला) प्राचीन (नन्यसा) अत्यन्त नवीन (वचसा) परिभाषा
करने योग्य (पुरुशाफतमा) अतीव सामर्थ्यवाले (चित्रराती) जिनसे अद्भुत दान
होता वे (शंसते) प्रशंसा करने वाले (स्तुवते) वा प्रशंसा पाये हुए वा (गणते) सत्य
उपदेश करने वाले के लिये (शम्भविष्ठा) अतीव सुख की भावना कराने वाले (बभू-
Patay
करो ॥५॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो
वायु और बिजुली कारणरूप से सनातन और कार्यरूप से नूतन,
नूतन, बहुत
शक्तिमान्, वेगादि गुणयुक्त, कल्याणकारी वर्तमान हैं उनको यथावत्
जानो ॥५॥
फिर उनसे क्या सिद्ध होता है. इस विषय को कहते हैं ।
ता भुज्यु विमिरयः समुद्रात्तग्रस्य सूनु हथू रजोभिः ।
अरेणुभिर्योजनभिभुजन्तो पतत्रिभिरगसो निरुपस्थात् ॥६॥
पदार्थः --हे. विद्वानो जो बिजुली और वायु (विभिः) पक्षियों के समान
(अद्भ्यः) जलों वा (समुदात) सागर वा अन्तरिक्ष वा (अर्णस:) जल के (उपस्थात्)
समीप स्थित होनेवाले से (पतनिभिः) गमनशीलों के समान (प्ररेणुभिः) रज जिनमें
नहीं उन (योजनेभिः) अनेक योजनों से युक्त (रजोभिः) ऐश्वयंप्रद मार्गों से (तुनस्य)
बलिष्ठ की(सूनुम) संगान के समान वर्तमान को (नि,ऊ हथः) निरन्तर पहुंचाते और
(भुजम्ता पालन करने वाले (भुज्युम्) भोगने योग्य प्रानन्द को पालना करते हैं (ता)
उनको तुम जानो ॥६॥

ऋग्वेदः म०६ । सू० ६२ ।। HAR भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो बिजुली और वायु विमान आदि यानों को अन्तरिक्ष में पक्षियों के समान चलाने वाले वेग से पहुंचाते हैं उनको समीपस्थ कर अभीष्ट सुखों को प्राप्त होमो ॥६॥ फिर उनसे क्या होता है इस विषय को कहते हैं । वि जयुषो रथ्या यातमा श्रुतं हवं वृषणा वधिमत्याः । दशस्यन्तां शय पिप्यथुर्गामिति च्यबाना मुमति मुरण्यू ॥७॥ पवार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशक सज्जनो ! (वधिमत्याः) जिसमें वर्धन विद्यमान उस भूमि वा अन्तरिक्ष के बीच (जयुषा) जयशील (रथ्या) रथ के लिये हितकारी (वृक्षणा) वर्षा तथा (दशस्यन्ता) बल कराने वाले (अद्रिम्) मेघ को वि, यातम्) विशेषता से प्राप्त होते हैं और (सुमतिम्) सुन्दर मति को (च्यवाना) शीघ्र जाने वाले (भुरण्यू) पालना वा धारण कर्ता (गाम्) वाणी को (इति) इस प्रकार से (शयवे) सोने के लिये (पिप्यथः) बढ़ाते हैं उनके (शवम्) विद्या विषयक शब्द को तुम (शुतम्) सुनो ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विमान आदि को चलाने वा संग्राम में जय कराने वा प्रज्ञा और बल के देने, वर्षा करने वाले तथा सोने जागने और वाणी के हेतु हैं उनको जान कार्य सिद्धि के लिये अच्छे प्रकार प्रयोग करो ॥७॥ फिर मनुष्य क्या धारण करें इस विषय को कहते हैं। यद्रोदसी प्रदिवो अस्ति भूमा हेो देवानामुत मर्त्यत्रा । तदादित्या वसवो रुद्रियासो रक्षोयुजे तपुरषं दधात ॥८॥ पदार्थ:-हे (वसवः) पृथिवी आदि (रुद्रियासः) प्राण वा जीव वा (श्रादित्याः) काल के अवयवों के समान प्रथम मध्यम और उत्तम विद्वानो ! तुम (यव) जो (प्रदियः) उत्तम प्रकाश के वा (देवानाम) विद्वानों के सम्बन्ध में (उत) और (मयंत्रा) मनुष्यों में (भूमा) व्यापक (हेळ:) अनादर (रोदसी) द्यावापृथिवी को प्राप्त (अस्ति) है और जैसे उक्त प्रकार के विद्वान् जन (तत्) उसको (दधात) धारण करते हैं वैसे (रक्षोयुजे) दुष्टों के युक्त करने वाले के लिये (तपुः) सन्ताप और (अधम्) अपराध को धारण करो ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त, सब को धारण करने वा DAAD Page ( ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ६२ ।। ARMA Lama China ab HAR सब का नियम करने वाला है उसको धारण कर और अच्छे प्रकार ध्यान कर सुखी होमो और जो ऐसा नहीं करता है उस पर कठोर दण्ड धरो॥८॥ फिर वह क्या करे इस विषय को कहते हैं। यई राजांनाहतुथा विदधद्रजसो मित्रो वरुणश्चिकैतत् । गम्भीराय रक्षसे हेतिमस्य दोघीय चिद्वचस आनेवाय ॥९॥ पदार्थ:-हे विद्वानो ! (य:) जो (मित्रः) मित्र वा (वरुणः) शमादिगुण युक्त जन (गम्भीराय) गम्भीर (मानवाय) सब ओर से नवीन (वचसे) वचन के लिये (चित) और (बोधाय) द्रोह तथा (रक्षसे) दुष्ट आचरण वाले के लिये (अस्य) इसके ऊपर (हेतिम्) वज्र को (रजसः) और लोकजात के (ऋतुथा) ऋतुओं से (राजानी) प्रकाशमामान सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य सभासेनापति को (विदधत) विधान करता हुआ (ईम्) सब ओर से (चिकेतत्) जानता है उसको तुम उत्साह देनो ॥६॥ भावार्थ:-जैसे सूर्य चन्द्रमा ऋतुनों को बांट और अन्धकार निवारण कर जगत् को सुखी करते हैं वैसे ही विद्यादि शुभगुणों का प्रचार संसार में अच्छे प्रकार समर्थन, सत्य और असत्य का विभाग और अविद्यान्धकार का निवारण कर विद्वान् जन सबको आनन्दित करते हैं ।।६।। फिर सभासेनापति जगत् के उपकार के लिये क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। अन्तरैश्चक्रैस्तनयाय वर्तिघुमता यातं नृक्ता रथेन । स त्येन त्यजसा मत्य॑स्य वनुष्यतामपि शीर्षा वृक्तम् ॥१०॥ पदार्थः - जो राजा लोग (अन्तरैः) भिन्न भिन्न (चक्र :) लोकों के घूमने के लिये परिधियों से वर्तमान (धुमता) प्रकाशमान् (नवता) जिसमें उत्तम नर विद्यमान उस (रथेन) रमणीय विमानादि यान वा (सनुत्येन) प्रेरणा करने योग्य के साथ वर्तमान (त्यजसा) त्याग के साथ (मर्त्यस्य) मनुष्य के (तनयाय) पुत्र के लिये (वत्तिः) मार्ग को (प्रा, यातम्) प्राप्त होवें और मार्ग का विधान कर (वनुष्यताम्) क्रोध करने वा बाधा वालों के (शीर्षा) शिरों को (अपि) भी (ववृक्तम्) छिन्न भिन्न करें उनका सबको सत्कार करना चाहिये ॥१०॥ भावार्थ:-यदि सभासेनापति मनुष्य सन्तानों का ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास प्रादि का प्रबन्ध करें तो सब विद्वान् होकर अनेक उत्तम कार्य करने और दुष्टों तथा शत्रुओं के निवारने को समर्थ हों ॥१०॥ 400 JO -- सत्या) सत्यस्वभावयुक्त सभासेनाधीशो (यः) जो (अर्वाक) ६४० ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६३ ।। फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं। आ परमाभिरुत मध्यमाभिनियुद्भिर्यातमवशामिराक् । दृहस्य॑ चिद् गोमतो वि ब्रजस्य दुरों व गृणते चित्रराती ॥११॥ पदार्थः- हे (चित्रराती) अद्भुत दान' वाले सभासेनाधीशो ! तुम (अथ- माभिः) निकृष्ट (मध्यमाभिः) मध्यम (उत) और (परमाभिः) उत्तम (नियुद्भिः) वायु की गतियों से (मा, यातम्) आओ तथा (अफ्)ि पीछे (दळ हस्य) अति पृष्ट के (चिव) भी (गोमतः) बहुत गौयें वा किरणें जिसमें विद्यमान उस (व्रजस्य) मेघ के (दुरः) द्वारों को (गणते) स्तुति करने वाले के लिये (वि, वर्तम्) विशेषता से वर्तामो ॥११॥ भावार्थ:-हे राज प्रजाजनो ! जैसे सब भूगोल वायु की गतियों के साथ जाते पाते हैं और जैसे शिल्पीजन विमान से मेघमण्डल पर जाते वैसे ही तुम भी अनुष्ठान करो इस सूक्त में अश्वियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में बासठवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अर्थकादशर्चस्य त्रिषष्टितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । अश्विनी देवते । १ स्वराडबहती छन्दः । मध्यमः स्वरः । २ । ४ । ६ । ७ पङ्क्तिः । ३।१० भुरिपङ्क्तिः । ८ स्वराट् पवितः । ११ पासुरीपङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ५। ६ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ।। अब एकादश ऋचावाले तिरसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में सभासेनापति किसको प्राप्त होते हैं इस विषय को कहते हैं। की त्या वल्गू पुरुहूताद्य दूतो न स्तोमोऽविदन्नमस्वान् । श्रा यो अर्वाङ् नासत्या ववर्त प्रेष्ठा घसंथो अस्य मन्मन् ॥१॥ पदार्थ:-हे (वल्गू) शोभन वाणी वाले (पुरुहूता) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त नीचे जाने वाला (अद्य) आज (नमस्वान्) बहुत अन्नयुक्त वा सत्कृत (स्तोमः) स्तुति करने योग्य (दूतः) समाचार पहुँचाने वाले के (न) समान जन (अविदत्) प्राप्त होता ॥११॥ R

ऋग्वेदः मं०६। सू०.६३ ॥
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वा (क्य) कहां (अस्य) इसके (मन्मन्) विज्ञान में जो (सा, बथत) अच्छे प्रकार
वर्तमान है (त्या, हि। वे ही तुम दोनों (अतथः) होते हो ॥१॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है---जो इस जगत् के विज्ञान के
निमित्त प्रयत्न करते हैं वे कहीं भी दुःखित नहीं होते हैं ।।१।।
फिर वे क्या करें इस विषय को बाहते हैं।
अरं मे गन्त हलाया गुणाना यथा पिबायो अन्धा !
पार ह त्यतिथिो रिपो न सत्परो नान्तरस्तुर्यात् ।।२।।
पदार्थः --हे सभासेनाधीशो तुम (त्यत) उस (वतिः) मार्ग को (परि, याथः)
सब ओर से जाते हो (यत्, ह) जिसमें (परः) शत्रुजन (अन्तरः) भिन्न (रिषः)
हिंसकों के (न) समान किसी को (न) न (तुतुर्यात्) मारे (यथा) जैसे (मे) मेरे
अस्म) इस (हवनाय) ग्रहण के लिये (परम्) पूर्णतया (गतम्) जामो वैसे
(गृणाना) स्तुति करने वाले होते हुए (अन्धः) रस को (पिबाथः) पिनो ॥२॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालंकार है-राजजनों से पैसा प्रबन्ध
किया जाय जैसे मार्गों में कोई भी चोर और शत्रु किसी को पीड़ा न
दे ॥२॥
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फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।
अकारि वामन्धसो वरीमन्नस्तारि बर्हिः मुंपायचतमम् ।
तानहस्तो युवयुर्ववन्दा वां नक्षन्तो अद्रय प्राजन् ।।३।।
पदार्थ:-हे सभासेनाधीशो जो (युस्युः) तुम दोनों की इच्छा करनेवाला
(उत्तानहस्तः) ऊपर को हाथ उठाये हुए (वरीमन्) अतीव उत्तम व्यवहार में (धाम् )
तुम दोनों से अन्धप्स:) अन्न आदि के सम्बन्ध में (सुप्रायणतमम् ) उत्तमता से जाते
हैं जिसमें वह बहिः) अन्तरिक्ष प्रकारि) प्रसिद्ध किया जाता वा दुःख से (अस्तारि
तारा जाता उसको जानके (बबन्द) वन्दना करता है, जो विद्यादि शुभगुरणों में
नक्षन्तः) प्राप्त होते हुए अदयः) मेघों के समान (वाम् ) तुम दोनों की (प्रा,
आजन्) अच्छे प्रकार कामना करते हैं उनकी तुम दोनों कामना करो ॥३॥
भावार्थ:-जो होम से वायु प्रादि पदार्थों को शुद्ध कर विमान आदि
थानों से अन्तरिक्ष में जाते तथा सुख और उत्तम गुणों को व्याप्त होते हुए
मेघ के समान सबके सुख और उन्नतियों को चाहते हैं वे उत्तम सुख पाते
हैं ॥३॥

६४२ ऋग्वेदः मं०६। सू० ६३ ।। फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं। ऊों दोमग्निरध्वरेण्वस्थात्म रातिरसि जूर्णिमा घृताची । प्र होता गूर्णमा खोऽयुक्त यो माया हयामन् ||४|| पया.....हे (नासत्या) सत्य व्यवहारयुक्त सभासेनाधीशो (बाम) तुम दोनों का यदि (य:) जो (गर्तमनाः) उद्यम करने को मन जिसका वह (उरण बहुत पदार्थ सिद्ध करनेवाला (होता) दानशीलजन (अध्वरेष) अहिंसादि धर्मयुक्त व्यवहारों में (ऊर्ध्वः) ऊपर जाने वाला (अग्निः) अग्नि के समान (अस्थाय) स्थिर होता है और (घुताची) रात्रि के समान (जूणिनी) वेगवती (राति:) दानक्रिया (प्र, एति) प्राप्त होती है वा (हवीमन्) होम कम में (प्र, अयुक्त) अच्छे प्रकार प्रयुक्त होता उसका सदा सत्कार करो॥४॥ भावार्थ:-हे सभासेनाधीशो! जो मनुष्य राजव्यवहार में सत्य और उत्साह से प्रवृत्त होते हैं उनका सत्कार प्राप लोग करें॥४॥ फिर वे किसके समान कैसे हों इस विषय को कहते हैं। अधि श्रिये दुविधा सूर्यस्य रथ तस्थौ पुरुभुजा शतोति । प्र मायाभिर्मायिना भूतन्त्र हरां ऋतू अन्तिम अनिमज्ञिानाम् ॥५॥ पहा:--हे (माणिना) प्राज्ञ (युशनुमा) बहुतों की पालना करनेवाले नबू, अग्रगन्ता (नरा) नायक राजसभा सेनाधीशो तुम (मायाभिः) वुद्धियों से (अभी इस (यज्ञियाना) सत्संगति' के योग्य मनुष्यों के (अनिम्मन्) जन्म में जैसे (सूर्यस्थ) सूर्य की (दुहिता पुत्री के समान उषा शितोतिम्) जिससे सैकड़ों रक्षा होती उस रथम्) रमणीय किरण के (अधि, तस्थौ ऊपर स्थित होती वैसे (श्रिये) शोभा वा लक्ष्मी के लिये (प्र, भूतम्) समर्थ होगी ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है जो उषा के समान यानादि साधनों से राज्यश्री की प्राप्ति के लिये विद्वानों के विद्याजन्म को कराते हैं वे असंख्य रक्षा को प्राप्त होके इस जगत् में अधिष्ठाता होते हैं ॥५॥ फिर राजादि किसके लिये किसको प्राप्त होके कैसे हों इस विषय को कहते हैं ।। युवं श्रीभिर्देर्शताभिराभिः शुमे पुष्टि हथुः सूयाः । प्रवां क्यो वपुषेऽनु पप्तन्नक्षद्वाणी सुष्टुता धिष्ण्या वाम् । ६॥ म * - (दर्शलादभिःष्ट (माभिः) इन धीभिः राजनीति योग्य ऋग्वेद: मं०६। सू०६३ ।। पदार्थ:---- है (धिगया दृढ़ प्रगल्भो जो (चाम् । तुम दोनों जैसे (वयः) पक्षी (पप्तन् गिरते है वैसे (शुभे) कल्याणरूपी वपुषे सुख्प के लिए सुष्टुता) उत्तम प्रशंसा को प्राप्त वाणी, वेदवाणी नु, नक्षत् अनुकूलता से साप्त वा प्राप्त हो की शोभानों पर्यायाः) उषासम्बन्धिनी प्रजा से वाणी की हिम्) पुष्टि को (ज, कहाः) प्राप्त कराते हो थे (बाल, तुम दोनों निरन्तर पुरो ॥६॥ भावार्थ:----इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! यदि तुम लोग राज्य करने की और राज्यलक्ष्मी को प्राप्त करने की इच्छा करते हो तो प्रयत्न से और समस्त धन प्रादि से विद्यायुक्त वाणी को प्राप्त होनो और जैसे पक्षी अपने प्राश्रय को प्राप्त होत इसी प्रकार तुम धर्मयुक्त नीति को प्राप्त होकर जैसे उषाकाल दिन को वैसे यश को प्रकाशित करो॥६॥ फिर मनुष्य' किससे क्या करें इस विषय को कहते हैं । आ वां बमोऽश्यांसो बहिष्टा अभिप्रयो नासल्या बदन्तु । रथो मनोजचा अमर्जीप पूक्ष इषिधो अनु पूर्वी ॥७॥ पदार्थ:--- है (मासस्या, सत्या माचरण करने वालो जो (धान्) तुम दोनों के (वहि:) अतीव यानों के लेजाने वाले मनोजबाः) मन के समान जिनकी गति के (प्रश्वास:) शीघ्रगामी अमित आदि थिय:) पक्षियों के समाल (नया) शान्तयादि पदार्थ को (मा, अभि, बन्सु) सन्मुख पहुंचावें जिससे (पक्षा) अच्छे प्रकार पर होने में से प्रत्येचा अनुअसजि) रची जाती वह (रथः) रथ (शास्) तुम दोनों को (प्र) पहुंचावे ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है ---हे मनुष्यो ! जो आप लोग अग्न्यादि पदार्थों के प्रयोगों को जानो तो विमानादि यानों से पक्षियों के समान अन्तरिक्ष में जा सको, जिससे चाहे हुए पदार्थों को प्राप्त होकर सर्वदा आनन्दित होमो ॥७॥ फिर राजा प्रजाजन कैसे वत्तवि' कर क्या पावें इस विषय को कहते हैं । पुरु हि वा पुरुभुना देणं धेनुं न इष पिन्वतमसंक्राम् । स्तुतश्च वां माध्त्री सुष्टुतिश्च रसाश्च ये वापनु रातिसम्मन् ||८|| पदार्थ:-हे (पुरुभुजा) बहुतों की पालना करने वालो (वाम्) तुम दोनों ६४४ ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ६३ ।। --- (नः) हमारे लिए (पुरु, देष्णम्) बहुत देने योग्य पदार्थ (धेनुम्) वाणी और (अस- काम्) सहन को उल्लघन करने वाले (इम्, च) अन्न वा विज्ञान को भी (पिन्व. सम् । सुखयुक्त को अर्थात् पुष्ट करो । जो (हि) निश्चित (स्तुतः) प्रशंसा को प्राप्त है (च) वह भी (वाम) तुम दोनों को पुष्टि दे थे। जो धा) तुम दोनों के माध्वी) माधुर्यादिगुणयुक्त (सुष्टुतिः) श्रेष्ठ प्रशंसा (रहा, 'च) और रस हैं उनसे (रातिम्) दान को (अनु, सामान प्राप्त होते हैं उनसे हमको युक्त कराइये ॥८॥ भावार्थ:-जो राजा प्रजाजन परस्पर के उपकार के लिये प्रयत्न करें तो इनको सर्व प्रशंसा और सकल ऐश्वर्य भी प्राप्त होवे ॥८॥ किर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । उत्त थे जे पुर्रयस्थ रक्षी सुमीळ्हे शतं रुके च पक्था । शाण्डो दाद्धिणिना सद्दिष्टीन्दर्श वशाली अभिषाचं ऋष्मान् ॥९॥ पदार्थ:----जो मनुष्य (अभिषाय:) सन्मुख संबन्ध करते वा (वशास:) वश को प्राप्त होते हैं तथा पुरयस्य) जो पहिले प्राप्त होता उस (से) मेरे (ऋत्र) बोमलता से प्रिय सुमीळ हे सुन्दर सेचने योग्य (उत) और (पेरुके) पालन करने काले व्यवहार में (रध्वी) छोटी क्रिया (पक्का, च) और पके फलों को (शाण्डः) सूक्ष्मता करने वाला (बात देता है उन' (हिरणिनः) हिरण वाले (स्मदिष्टीन) प्रशंसित दर्शन वाले (ऋजान्) बड़े बड़े (दश) दश घोड़े वा रथों को वा (शतम्) और सैकड़ों को मैं प्राप्त होऊं ॥६॥ भावार्था:-हे मनुष्यो ! जो मेरे वशीभूत, प्रीतियुक्त, महान् (बड़े- बड़े) सहायक होत हैं उनके आधीन मैं भी होऊ इस प्रकार परस्पर का वश- भाव हुए पीछे उत्तम असख्य कार्य कर सकू ।।६।। फिर राजा और सेनापति क्या करें इस विषय को कहते हैं । संवा शता नासत्या सहस्त्रावानां पुरुषन्धा गिरे दात् । भरद्वाजाय वीर न गिरे हौद्धना रक्षांसि युरुदंससा भ्युः ॥१०॥ पदार्थ:-हे (पुरुवंससा) बहुत उत्तम कर्मों वाले (नासत्या) अधर्माचरण रहित जो (बाम) तुम दोनों का । पुरुषन्थाः) बहुत प्रकार का मार्ग (अश्वानाम्) घोड़े वा अग्नि आदि पदार्थों की (गिरे, वाणी के लिये शता) सैकड़ों वा (सहस्त्रा) हजारों प्रकारों को सम्, दादा अच्छे प्रकार देता है जो (भरद्वाजाय) धारण किया विज्ञान जिसने उसके लिये वा गिरे) राजनीतियुक्त वाणी के लिये सैकड़ों और ।

ऋग्वेद: मं० ६ । सू०६४ ॥ हजारों प्रकारों को (दाद देता जिससे ( रक्षासि) राक्षस (हता) नष्ट (स्युः) हों, हे (वीर) वीर उससे' आप दुष्टों को (नू) शीघ्र मागे ॥१०॥ भावार्थ:-- हे राजा और सेनापतियो ! जो धार्मिक न्याय से राज्य की पालना करने और शत्रुओं से अपनी सेना की रक्षा करने के लिये यत्न करे उसके लिए असंख्य धन और प्रतिष्ठा निरन्तर करो।।१०।। फिर उसी विषय को कहते हैं । अावा सुभ्ने परिहन्तरिभिः १११॥ पदार्थ: - हे राजा और सेनापतियो ! जिस प्रकार मैं (सूरिभिः) अत्यन्त बुद्धिमान् विद्वानों के साथ (वरिमन् । अतीव श्रेष्ठ (सुभ्ने) सुख में (श्रा, स्याम् ) सब ओर से होऊ अर्थात् प्रसिद्ध होऊ वैसा (वान्) आप विधान करो ॥११॥ भावार्थ:-... राजा और सेनापतियों को सर्वदा धार्मिक विद्वानों का सत्कार करना चाहिये जिससे यह सब के सुख की उन्नति दिलावें ॥११॥ इस सूक्त' में अश्वियों का गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह छठे भण्डल लेंसठवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ षडवस्य चतुःषष्टितमस्य सूस्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । उषा देवता । १।२। ६ विरात्रिष्टुप् । ३ बिष्टुप् । ४ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवत: स्वरः । ५ पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब स्त्रियां कैसी श्रेष्ठ होती हैं इस विषय को कहते हैं ।। उदु श्रिय उपसो रोचमाना अस्थुरपां नोर्मयो रुन्तः । कृणोति विश्वा सुपथा सुगान्य दु वस्वी दक्षिणा मघोनी ॥१॥ पदार्थ:--हे पुरुषो जो स्त्रियां (रोचमाना:) दीप्तिमती (उषसः) प्रभात वेलामों के समान वा (अपाम्) जलों की । शन्त.) हिंसती अर्थात् फूलों ॥ विदारती हुई (ऊर्मयः) तरङगों के (न) समान (श्रिये शोभा के लिए (उत, प्रति उठती हैं वे (उ) ही सुख देने वाली हैं जो (वस्वी) वसुओं की यह । दक्षिणा) दक्षिणा के समान (मधोनी) परमधनयुक्त (अभूत) होती है वह उषा के समान (उ) ही (विश्वा) समस्त (सुपथा) शुभ मार्ग वाले (सुगानि) जिनमें सुन्दरता से चलें उन कामों को (कृणोति) करती है ।।१।।

६४६ ऋग्वेदः मं०.६ । सू०६४ ।। दुःखों SAR a AND Cast har , भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-हे पुरुषो ! जैसे प्रभातवेलायें रुचि करने वाली होती हैं वैसी हुई स्त्रियां श्रेष्ठ हैं वा जैसे जलतरंगे तटों को छिन्नभिन्न करती हैं वैसे ही जो स्त्रियां को छिन्नभिन्न करती हैं और जो दिन के तुल्य समस्त गृहकृत्यों को प्रका- शित करती हैं वे ही सर्वदा मंगलकारिणी होती हैं ॥१॥ फिर यह कैसी हो इस विषय को अगले मंत्र में कहते हैं । भद्रा दंडक्ष उर्दिया कि भारयु शोचिनियो धावपतन्न् । प्राविक्षः कृणुषे गुम्भमनोधौ देशि रोका मजः ॥२॥ पहा:--हे (उ) प्रभातवेला के समान वर्तमान (देवि) विदुषी जिसले तू भद्रा) कल्याणकारिणी (क्षे) देखी जाती है तथा (उपिया बहुरूप हुई घर के कामों का उत, वि, भासि) विशेषकर उत्तम प्रकाश करती है जिस तेरी (शोचिः उत्तम नीति का प्रकाश (भाननः किरण जैसे) अन्तरिक्ष को (अपप्तन् । जाती-प्राप्त होती को वक्षः) छाती का प्राषिः, कृणुषे) प्रकाश करती है वा (महोभिः) महान् शुभ गुणकर्म स्वभावों से ६ शुभ माना सुन्दर शोभायुक्त और (रोचमाना) विद्या और विनय से प्रकाशित होती हुई सुख देती है इससे अच्छे प्रकार सरकार करने योग्य है ।।२।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है--हे स्त्रियो! तुम चतुरता से सब पति आदि को संतोष देकर, घर के कामों को यथावत् अनुष्ठान कर, अतिविषयासक्ति को छोड़ और सुन्दर शोभायुक्त होकर सदैव पुरुषार्थ से धर्मयुक्त कामों को सूर्य के समान प्रकाशित करो ॥२॥ फिर वे कैसी हो इस विषय को कहते हैं ।। वहन्ति सीमरुणासो शन्तो गावः सुभगोमुर्विया प्रथानाम् । अपेजते शूरो अस्तेव धात्रन्बाधते तमो अजिरो वोळ्हा ॥३॥ पदार्थ:-हे स्त्री तू (अजिरः) जो शीघ्र नहीं जाता उस पुरुष के (न) समान और (बोळ हा) विवाहित स्त्री (शत्रून् ) शत्रुओं को (शूरः) बल' वा पराक्रम आदि के योग से निर्भय (अस्तेव) शस्त्र और अस्त्रों को अच्छे प्रकार फेंकने वाले के समान (अप ईजते) दूर करती तथा प्रभातवेला जैसे (तमः) अन्धकार वा रात्रि को (बाधते) नष्ट भ्रष्ट करे वा जैसे (अरुणास:) लाल काली पीली धौली आदि (रशन्तः) पदार्थों को छिन्न भिन्न करती हुई (गावः) किरणें सब पदार्थों को (सीम्) ऋग्वेदः ०६। सू०६४ उषा को जैसे सूर्य से इस (प्रथानामा अत्यन्त सुन्दरता से प्रख्यात भार्या को (सुभ- लक्ष्मी को था वह प्राप्त कराइये मारन: हम लोगों को रक्षा करियर ६४७ सब ओर से (बहन्ति) पहुंचाती हैं वैसे (सपिया) बहुत पुरुषार्थयुक्त हो । हे पुरुष ! गाम) सौभाग्ययुक्त करो ॥३॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उमपा और बाचकलुप्तोपमालंकार हैं-है मनुष्यो ! जो अभातवेला के समान सुप्रकाश, सुरूपवती, सूर्य किरणों के तुल्प घर के कामों की अवस्था का निर्वाह करनेवाली, शूरवीर के समान व्यथा अर्थात् परिश्रम की थकावट न मानने वाली स्त्रियां हों उनका निरन्तर सत्कार कर सौभाग्ययुक्त करो ॥३॥ फिर वह स्त्री कैसी हो इस विषय को कहते हैं। सुगोत से सुपथ पतनवाते अस्तरसि मानो । सा न आ वह पृथु यशान मि देवो दुहितरिक्षणयों ।।४।। पदा... है (स्वभानो) अपनी दीप्तियुक्त (पृथुयानन्) बहुत पदार्थों की प्राप्ति करानेवाले (ऋध्ये महान् गुणयुक्त विद्वान् भाप इस स्त्री के साथ (रयिम्) Hinutsta সঙ্গ से (इनपः) जलों के समान दुःखों को (तरति तरले अर्थात उनसे अलग होते हो । नौर (भावातेनिति होने से (पर्वसेषु पर्वतों में जैसे सुपथ में जाते हो तथा जो (ते) तुम्हारी (सुगा) सुन्दरता से जाने योग्य स्त्री वा है (विना प्रकाश की (दुहितः) कन्या के समान वर्तमान स्त्रीतू पति को (इपमध्ये प्राप्त होने को योग्य हो (उत) और तेरा पति मेरे मन का प्रिय हो (सा) सो तू हम लोगों को (सुपथा) मच्छे मार्ग सुख प्राप्त करा ॥४॥ भावार्थ:--इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे अच्छी नीति वाले राजजन पर्वतों में भी अच्छे मार्गों को बनाय सब मार्ग चलने वालों को सुखी करते हैं वा जैसे उषा (प्रभातवेला) मार्गों को प्रकाशित करती वैसे ही उत्तम परस्पर प्रसन्न स्त्री पुरुष धर्ममार्ग का संशोधन कर परोप- कार का प्रकाश करते हैं ॥४॥ फिर वे स्त्री पुरुष कैसे वर्ताव वत्त इस विषय को कहते हैं ।। सा वह योक्षभिरवातोपो वरं वहसि जोपर्नु । त्वं दिवो दुहितर्या है देवी पूर्वहूतौ महना दर्शता भू ॥५॥ पदार्थ:-हे (वियः) सुर्य की (दुहितः) कन्या के तुल्य तथा (उषः) उषा . FINE HER ६४८ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६४ ॥ प्रभातवेला के समान वर्तमान श्रेष्ठ मुख वाली (या) जो (भवाता) वायुरहित (उक्षभिः) वीर्य सेवकों से युक्त (बरम्) श्रेष्ठ (जोषम्) प्रीति से चाहे हुए पति को ई अनु) अनुकूलता से (स्थम् । तू (वहसि ) प्राप्त होती (सा) वह मुझ पति को (श्रा, वह) सब ओर से प्राप्त हो (या) जो (ह) ही (पूर्वहूतौ पूर्व सत्कार करने योग्यों के आह्वान के निमित्त (मंहला) सत्कार करने और (वर्शता) देखने योग्य (देवी) विदुषी तू (भूः) हो सो मेरी प्रिया स्त्री हो ॥१॥ R मा ANGBAR भावार्थ:-जैसे उषा रात्रि के अनुकूल वर्तमान नियम से अपने काम को करती है वैसे ही नियमयुक्त स्त्री अपने घर के कामों को करे तथा ब्रह्मचर्य के अनन्तर अपने मन के प्यारे पति को विवाह कर प्रसन्न होतो हुई पति को निरन्तर प्रसन्न करे ऐसे ही पति भी उस अनुकूल आचरण करने वाली को सदैव आनन्दित करे ॥५॥ फिर वे स्त्री पुरुष परस्पर कैसे वर्ते इस विषय को कहते हैं ।। उत्ते वयंश्चिद्वसतेरपप्तमरश्च पितुभाजो ध्युष्टौ । अमा सते वहसि भूरि वाममुषों देवि दाशुषे मयाय ।।६।। पदार्थ:-हे (उष:) उषो के समान वर्तमान (बेवि) मनोहररूपवती जो तू (ध्युष्टौ) विविध गुणों से सेवा करने योग्य प्रभातवेला में (सते) वर्तमान (दाशुषे) सुख देने वाले (अत्याय) मनुष्य पति के लिए (अमा) घरों को (भूरि) बहुत (वामम्) प्रशंसित कर्म जैसे हों वैसे (बहलि) प्राप्त होती उस (ते) तेरे (ये) जो (पितुभाज:) उत्तम अन्न के सेदनेवाले नरः) मनुष्य के (च) भी (वसते:) निवास के संबन्ध में (अयः) पक्षियों के (चित्) समान तेरे सुरूष को देख (उत, अपप्तन्) उड़ते हैं उनमें से स्वयंवर विधि से सर्वथा प्रसन्न पति को तू प्राप्त हो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालं०-जो वधू और वर स्वयंवर विवाह से परस्पर प्रसन्न होकर विवाह करते हैं वे सूर्य और उषा के समान गृहाश्रम को उत्तम प्राचार से अच्छे प्रकार प्रकाशित कर सर्वदा आनन्दित होते हैं ॥६॥ इस सूक्त में उषा और सूर्य के तुल्य स्त्रियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में चौसठया सुक्त समाप्त हुमा ॥

ऋग्वेदः मं०६। सू० ६५ ॥ ६४६ 43 अथ षडचस्य पञ्चषष्टितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः। उषा देवता । १ भुरिपङ्क्तिः । ५ विराट्पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ । ३ विरात्रिष्टुप् । ४ । ६ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धवसः स्वरः ॥ अब छः ऋचावाले पैंसठवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर वह स्त्री कैसी हो इस विषय को कहते हैं । एषा स्या को दुहिता दिवोजाः क्षिती रुन्छन् ती भानुषीरजीगः । था भानुना रुसा राम्यास्त्रज्ञाथि शिरस्ताश्चिदक्तून् ॥१॥ पदार्थ:-हे स्वीकार करने योग्य या) जो (रुशता) रूप से (भानुना) किरण के साथ वीमान (राधासु ) रात्रियों में (ज्ञायि) जानी जाय (तमस:) अन्धकार से (चित) भी (अक्तून् । रात्रियों को (तिरः) तिरस्कार करती तथा (मानुषीः) मनुष्यसंबन्धी प्रकाओं को (क्षिती:) और पृथिवियों को (उच्छन्ती) विशेष निवास कराती हुई (दिवोजाः) सूर्य से उत्पन्न हुई उषा के समान (अजीगः) जगाती है (न:) हमारी (एषा) सो (स्था) यह (इंहिता) कन्या है तम ग्रहण करो ॥१॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में बाचकलुप्तोपमालंकार है-जो कन्या उषा के तुल्य वा बिजुली के तुल्य अच्छे प्रकाश को प्राप्त, विद्या विनय और हाव भाव कटाक्षों से पति आदि को आनन्दित करती है वा जैसे सूर्य रात्रि को दूर कर सब प्रजा को प्रकाशित करता है वैसे घर से अविद्या और अन्धकार को निवार विद्या से सब को प्रकाशित करती है वही उत्तम स्त्री होती हैं ॥१॥ Nana फिर वे स्त्री कैसी हों इस विषय को कहते हैं ।। वि तद्ययुररुणयुरिभरश्वैश्चित्र भान्स्युषसंश्चन्द्ररथाः । अग्रं यज्ञस्य बृहतो नयंतीकि ता बांधन्ते तम अम्यायाः ॥२|| पदार्थ:-हे पुरुषो ! जो कन्यायें जैसे (चन्द्ररथा:) जिनका सुवर्ण के समान रमणीयरूप है वे (उषस:) प्रभातवेलायें (अरुणयुग्भिः) जो अरुण किरणों की योजना करती हैं उन (अश्वः) बड़ी बड़ी किरणों से (ययुः) प्राप्त होती है (तद, चित्रम्) उस प्राश्चर्य को (वि, भान्ति) विशेषता से प्रकाशित करती हैं तथा (बृहतः) महान् (यज्ञस्य) सग करने योग्य गृहस्थों के व्यवहार के (अनम्) अगले भाग को (नयन्तीः) प्राप्त कराती हुई (कायाः) रात्रि के (तम:) अन्धकार को (वि, बाधन्ते) . Hal होती उनको ६५० ऋग्वेदः मं०६। सू०६५।। नष्ट करती हैं (ता:) उनके समान दुःखान्धकार को दूर करने वाली वधुओं को तुम प्राप्त होमो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! तुम अपने सदृश गुणकर्मस्वभावयुक्त प्रभातवेलानों के समान मानन्द देने वाली, विद्या और नम्रता प्रादि गुणों से सुशील, ब्रह्मचारिणी कन्याओं को प्राप्त होकर उनको निरन्तर भानन्द देकर पाप मानन्द को प्राप्त होनी ॥२॥ फिर वे कैसी हों इस विषय को अगले सत्र में कहते हैं । श्रयो नामाभिषमूर्जे वहन्तीनि दाशुषं उपती मवार मघोनीवरिखत्यस्माना अदी धात विधले रत्नपध ॥३॥ पदार्थ:-हे पुरुषो जो (उपसः) प्रभातवेलाओं के समान धारा विद्यादि शुभगुण देने वाले (विधते) सेवा करते हुए (माय) मनुष्य के लिये (चना) श्रवण (बाजम्) विज्ञान (इषम् ) अन्न और (कर्जम् पराक्रम को (महन्ती:) प्राप्त कराती तथा (भधोनी: बहुत उत्तम धन वाली (बोरथद) वीर के समान (पश्यमानाः) प्राप्त होती हुई स्त्रियां (अध) इस समय (रस्नम) रमणीय (अव) रक्षा को प्राप्त भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो उषा के समान वर्तमान, सत्यशास्त्र श्रवणादियुक्त, बलिष्ठ, विचक्षण (चित्रविचित्र वुद्धियुक्त) धन और ऐश्वर्य की बढ़ाने वाली, रक्षा में तत्पर, विदुषी स्त्रियां हों उनके बीच से अपनी अपनी प्रिया भार्या को सब ग्रहण करें ॥३॥ फिर वे कैसी हों इस विषय को कहते हैं। इदा हि वो विधते रत्नमस्तीदा वीराय दाशुष उपासः । इदा विप्राय जरते यदुक्था नि म भावते यहथा पुरा चित् ।।४।। पदार्थ:-- हे वीर पुरुषो! जैसे (उपास:) उषाकाल, उन्हीं के समान वर्तमान भार्यात्रों को जो प्राप्त होनो तो (इदा) अब हि) ही (व:) तुमको (विधते) सेवन करते हुए के लिये (रस्नम्) रमणीय धन (अस्ति) विद्यमान है या (इदा) अब (दाशुषे) देते हुए (वीराय) बलिष्ठ जन के लिये और (इदा) अब (जरते) स्तुति करने वाले (विनाय) मेधावी पुरुष के लिये (मावते) जो मेरे सदृश है उसके लिये (पुरा) पहिले (चित्) भी (यत्) जो (उत्था) कहने के योग्य वचन हैं (स्म) उन्हीं को (नि, वहथा) निवाहो ॥४॥ hodias

ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ६५ ।।
भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो
उषा के समान वर्तमान भार्यायें तुम लोगों को प्राप्त हों तो इसी जन्म में
सब सुख तुम लोगों को प्राप्त हों क्योंकि अविरोध से वर्तमान स्त्रीपुरुषों
को सदैव यश प्राप्त होते हैं ।।४।।
फिर वह कैसी है इस विषय को कहते हैं ।
इदा हि से अपो अद्रि सानो गोत्रा गावामरखो गुणान्छ ।
अ१ का विभिदुर्बहाणा च सल्या नृमायाजदेवहूति १५ ।
पदार्थ:---- (अद्रिशानों, मेघ के बीच शिखर [चोटी] रखने वाली (उषः)
प्रभातवेला के समान वर्त्तमान उत्तम स्त्री जैसे ते तेरे संबन्धी (अङ्गिरसः) पवलों
के तुल्य (अकण) सूर्य (बह्मणा) परमेश्वर वा वेद से (छ) भी सूर्य को गोत्रा)
पृथिवी के समान वा (गजाम्। किरणों के संबन्ध को (वि, गृणन्ति प्रस्तुत करते
हैं और (विभिः) विदीर्ण करते हैं वैसे (इया) व (हि) ही (देवहूतिः) विद्वान् जन
जिससे बुलाते हैं वैसी तू प्रसिद्ध होती है सो तू (नणाम्) मनुष्यों के बीच (सत्या)
विद्यमान पदार्थों में उलम अलबत्) होती है ।।५।।
भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे
किरणे प्रभातवेला से सूर्यप्रकाश की निमित्त है वैसे ही सत्य व्यवहारों को
सिद्ध करने और दुष्ट व्यवहारों का निरोध करने वाली उषा है वैसी श्रेष्ठ
स्त्री होती है।॥५॥
फिर वह किसके समान क्या करतो किसको प्राप्त होती है इस विषय को कहते हैं ।।
उच्छा दियो दुहित प्रत्नवना भरद्वाजवितै संघानि ।
सुवीरं रवि गृणते रिशहामायमधि धेहि श्रवो नः ॥६॥
पदार्थ:--- हे (विव:) विजुली की (दुहित:) कन्या के समान वर्तमान मधोनि)
परमपूजित धनयुका पत्नी तु (ना) हम लोगों का (विधते) विधान करने वाले के
लिये (प्रत्नवत) प्राचीन कारण जिसमें विद्यमान उसके वा (भरद्वाजवत) कर्ण के
तुल्य (उच्छा) विवास क राम्रो अर्थात् एक देश से दूसरे देश में वास कराओ (गृणते)
और प्रशंसा करने वाले तेरे पति के लिए वा नः हम लोग जो संबन्धी हैं उनके
लिये (उरुगायम् ) बहुत अपत्य धन वा गृह जिससे प्राप्त होते हैं उसे और (श्रवः)
अन्न वा श्रवण तथा (सुव. रम्) शोभन वीर जिससे उस ( रयिम्) धन को अधि,
बेहि) अधिकता से धारण कर और तू मुझ से इस उक्त विषय को (रिरीहि)
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Asm
मांग ॥६॥

६५२
ऋग्वेद: मं० ६ । सू०६६ ।।
भावार्थ:-हे बीरपुरुष ! बिजुली का प्रकाश और संप्रयोग किया
हुमा सत्य, ऐश्वर्य को उत्पन्न करता है वैसे ही शुभ माचरण करने वाली
पत्नी घर का सौभाग्य बढ़ाती है और जैसे प्राचार्य प्रति समय सुन्दर शिक्षा
और विद्या को विद्याथियों को ग्रहण कराते हैं वैसे ही विद्वान् स्त्री पुरुष
अपने सन्तानों को विद्या और सुन्दर शिक्षा ग्रहण करावें ।।६।।
इस सूक्त में उषा के तुल्य स्त्री जनों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त
के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह छठे मण्डल में पैंसठवां सूक्त समाप्त हुआ।
अर्थकादार्चस्य षष्टितमल्य सूक्तस्व भरद्वाजो बाहय ऋषिः । नरुतो
देवताः । १ । । । ११ निवृत्तिदुप् । २ । ५ विरानिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्मरः ।
३ । ४ निचुत्पषितः । ६। ७ । १० भरिपक्तिः । स्वरापतितश्छन्दः ।
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अब ग्यारह ऋचावाले छियासठ सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर
वह किसके तुल्य क्या करती है इस विषय को कहते हैं ।।
वपुर्नु तच्चि कतुर्षे चिदस्तु समानं नाम धेनु पत्यमानम् ।
माधव न्यद्दोहसे शेषाय सकुच्छुक दुदुहे पनि १६॥
पदार्थ:--हे पनि जैसे (अधः) रात्रि और पृश्निः) अन्तरिक्ष (सकृत) एक
वार (शुक्रम् । शीघ्र वीर्य करने वाले को (दुदुहे) परिपूर्ण करता है वैसे (धेनु) बाणी
के समान तू मर्तेष) मनुष्यों में (पत्यमानम्) जाते हुए पति को (अन्यत्) और को
जैसे वैसे (दोहसे) पूर्ण करने को पीपाय) बढ़ानो [वृद्धि देप्रो] ऐसी हुई जो
उसका जो (चित) निश्चित समानम्। समान [एकसाj (वपुः) सुन्दर रूप और
(नाम) नाम है (तत्) वह (चिकित) विज्ञानवान पति के लिये (नु, अस्तु) शीघ्र
हो ॥१॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे पुरुष! जैसे
रात्रि और समीप में मायारूपी अन्तरिक्ष वर्षा से होता अर्थात् मेघ से ढपा
हुआ अन्तरिक्ष अन्धकारयुक्त होता है वैसे ही समान गुणकर्मस्वभावयुक्त
स्त्री पति के सुख के लिए समर्थ होती है जैसे गौ बछड़ों को पालती है वैसे
विदुषी [विद्या पढ़ी हुई] माता सन्तानों की यथावत् रक्षा कर सकती
है ॥१॥

ऋग्वेदः मं०६। सू० ६६ ।। MERED at - बयान - फिर विद्वान् जन कैसे हों इस विषय को कहते हैं। ये अग्नयो न शोशुचनिधाना द्वित्रिमरुती वावृधन्तः । अरेणवों हिरण्ययास एषां साकं नृष्ण पौंस्यभिश्च भूपन् । २।। पदार्थ:-- हे मनुष्यो थे जो यत्न करते हुए हिरण्ययासः) बिजुली के तेज से बढ़े हुए १ अरेणयः) धूलि जिनमें नहीं थे (मरतः) पवनों के समान भणः धनों और (पौंस्येभिः) पुरुषार्थ बलों के (साकम् ) साथ (भुधन) हों (एषाम् ) इन के संबन्ध में (यव) जो दिः) दो चार वा (त्रिः) तीन बार (बावृधन्त) निरन्तर बढ़ते हैं (थ) और (इधाना:) प्रकाशमान (अग्नयः) अग्नियों के इन समान (शोशवन्) निरन्तर शुद्ध करते वे भाग्यशाली होते हैं ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है- जो अग्नि के समान पवित्र हुए पवित्र करने वाले, वृद्धि को प्राप्त हुए बढ़ाने वाले, पवन के समान बलिष्ठ और चक्रवर्ती राजा के समान लक्ष्मी के साथ वर्तमान विद्वान् हों उन्हीं को तुम सेवो ॥२॥ किन स्त्री पुरुषों के पुत्र उत्तम नहीं होते हैं इस विषय को कहते हैं ।। रुद्रस्य ये मीळ्हुषः सन्ति पुत्रा यांश्चो नु दाधिभरध्यै । विदे हि माता महो मही पा सेत्पृश्निं सुभ्वे३ गर्भमाधात् ।।३।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (ये) जो (मीळ हुधः) वीर्य सींचने वाले (सदस्य) वायु के समान' बलिष्ठ के (पुत्राः) पुत्र (सन्ति) (यान, चो) और जिनको (भरध्ये) पोषण वा धारण करने के लिए (दाविः) धारण करने वाली । मही) जो महान् सत्कार करने योग्य है (सा) बह (माता) मान करने वाली (मा, अधात) अच्छे प्रकार धारण करती है और सा, इरा) वही । पृश्निः) अन्तरिक्ष के समान विस्तार- वाली (सुन्ने। जो सुन्दर प्रसिद्ध होता है उस विदे, जानने वाले के लिए (हि) ही (महः) महान् । गर्भन्। गर्भ को (उ शीघ्र अच्छे प्रकार धारण करती है उन सबको और उस माता रूप स्त्री को तुम सब भ ग्ययुक्त जानो ॥३॥ भावार्थः वे ही मनुष्य कल्याणरूप होते हैं जिनके माता पिता ऐसे हैं कि जिन्होंने पूरा ब्रह्मचर्य किया हो ॥३॥ कौन श्रेष्ठ होत है इस विषय को कहते हैं। न य ईबन्ते जनुषाऽया २१ त सन्तोऽवद्यानि पुनानाः । निर्यदह शुचयोऽनु जोषमतुं श्रिग तन्वमुक्षमाणाः ।४ । -- ६५४ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६६ ॥ - पक्षार्थ:--हे मनुष्यो (2) जो (जनुषः) जन्मों को (न) नहीं (ईपन्त) नष्ट करते किन्तु (नया) इस नीति से (अन्तः) बीच में (सन्ः सत्पुरुष हुए विद्यानि) निम्धकर्मों को इन शीघ छोड़ के पुनानाः) शरीर को पवित्र करते हुए होते हैं और यत) जो (शूजया) पवित्र जन (अनु, जोधम् सेवा के अनुकूल' ( श्रिया लक्ष्मी से (तन्ध) शारीर को उमाणा:) सेवन करते हुए अन्न, निर्, बुह) अनुक्रम ले जन्म पूरा करते हैं ले धन्य होते हैं ।।४।। भावार्थ:-जो मनुष्य ब्रह्मचर्यादि व्रतों को छोड़ मूढ़ होकर, शीघ्र विवाह कर, नपुंसक के अर्थात् हीजड़ा के समान होकर, निर्बल'; रोगी और लम्पट मनुष्यों के बीच जिनकी कहावत हो रही हो तथा दृष्टव्यसन जिनको होता है ऐसे पुरुष सौ वर्ष से पहिले ही शरीर को नष्ट भ्रष्ट कर मनुष्य शरीर के फल को न पाकर दुर्भाग्यवश निष्फल होते हैं ॥४॥ यहां के प्रकार के पुरुष होते हैं इस विषय को कहते मसू न येई दोहसे चिदशा का नाम धृष्णु मा दानाः । नये स्तौना अथातो गदा नू चिनुदानरक्ष यातदुग्रान् ।।५।। पदार्थ:--येषु) जिन मनुष्यों में चिद) निश्चय से (दोहसे) कामों के पूरे करने को शक्ति नहीं है या जो शया:) प्राप्त होते हुए (धृष्णु) दृढ़ प्रगल्भ (मार- तम्) मनुष्यों के इस (नाम प्रसिद्ध व्यवहार को का, बंधानाः) धारण करते हुए हैं वा (ये जो (यासः) चलते हुए (स्तौनाः) चोर (न नहीं हैं और लो (सुहानुः) उत्तम दान देने वाला उन । उग्नाल) कठिन स्वभाव वालों को (म) शीनन (अव, यासद। प्राप्त करे उनका चित्) शीघ्र (महा) महारद से नू) शीघ्र सत्कार करे उनको यथावत् रब जानें ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! इस जगत् में दो प्रकार के मनुष्य हैं एक शक्ति और विद्या से हीन, दुष्ट कर्म करने वाले हैं दूसरे शक्तिमान्, श्रेष्ठ कर्म धारण करने वाले हैं। उनमें जो दुष्कर्म करने वालों का सत्कार नहीं करते और श्रीष्ठों का सत्कार करते हैं वे शीघ्र महान् चाहे हुए सुख को पाते हैं ॥५॥ फिर मनुष्य क्या करके कैसे हों इस विषय को कहते हैं । व इदुग्राः शर्थसा धृष्णुरेणा उभे युजन्त रोदसी सुमेके । अर्ध स्मैषु रोदसी वशोचिरामवत्सु तस्थौ न रोकः ।।६।।

(दली) आकाश और पृथिवी के बीच निरन्तर साधनताकताह वा ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६६ ॥ पदार्थ:- जो (धष्णुषेणा:) दृढ सेना वाले' (शवला) बल से (उग्राः) तेजस्ती (उमे) दोनों (सुमेके) सुन्दर रूपवाले (रोदसी) आकाश और पृथिवी को (युअन्त) युक्त होते हैं (मध) तदनन्तर (म) ही (एषु) इन (समवस्सु प्रशंसित गृह वालों में (रोदसी) नाकाश और पृथिनी के बीच (स्वशोबि:) अपनी दीप्ति वाला विद्युत् भनिन (मा, स्थीअच्छे प्रकार स्थित है और (ब) नहीं (रोमः) शब्दायमान है (ते) वे सब (इस) ही सुखी होते हैं ॥६॥ भावार्थ:--जो मनुष्य बिजुली और पृथिवी की विद्या को लेकर दृढ़ सेनावाले होते हैं उनको शत्रुजन रोक नहीं सकते हैं तथा जो उत्तम घरों में निवास करते हैं वे प्रकाशित बुद्धिवाले होते हैं ।।६।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अनेनो धो महतो यामो अस्त्वनश्चिचमजत्यरंथी। अनबसो अनभीशु रंजस्तूर्वि रोदसी पथ्यां याति साधन् । ७॥ पदार्थः --है (मतः) मनुष्यो (व.) तुम्हारा चलन भनेनः निष्पाप प्रस्तु। हो और (यामः जिसमें जाते हैं उस प्रहर के समान जो (अनश्व:) ऐसा है कि जिसके घोड़े नहीं है (वरथीः) रथ नहीं हैं (मानवा: अन्न जिसके नहीं है और (अनमीशुः) बलयुक्त बाहु नहीं हैं तथा जो (रजस्तः जल को बढ़ाता है वह (चित) निश्चय के साथ (यम्) जिसको प्रजाति) प्रक्षिप्त करता [फेंकता] है वा मार्गों में उत्तम गतियों को (वि, याति) विशेषता से जाता है उसको करो ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-मनुष्यो ! तुम पक्षपात रूपी पाप को छोड़ के निर्बलों की निरन्तर रक्षा कर भूगर्भविद्या और विद्युत् विद्या को अच्छे प्रकार सिद्ध कर भूमि और उदक तथा अन्त- रिक्ष के मार्गों को उत्तम यानों से जाकर पानी॥७॥ किन से रक्षा किये जाने पर भय नहीं है इस विषय को कहते हैं । नास्य वन तरुता न्दस्ति सरुतो यमदथ वाजसातौ। तोके ना गोषु तनये यमप्सु स व्रज दर्ता पायें अब घो: ।।८।। पदार्थ:-है (मरतः) विद्वानो! तुम (वाजसातो) अन्नादि पदार्थों के विभाग में (यम्) जिसको (गोषु) गो आदि पशु वा पृथिवी विभागों वा (अप्स) तुम स्वीकार aane की निरन्तर ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६६ ।। जलों बा (तोके) संतान (बा) वा (तनये सुकुमार इन सब में यम्) जिसकी (अवथ) रक्षा करते हो मस्य) इस व्यवहार का कोई व बर्ताव कराने और कोई (न) नहीं है और कोई तस्ता) उक्त व्यवहार का उल्लंघन कराने वाला (ल, अस्ति) नहीं है (स:) वह (आधा). इसके अनन्तर पायें पार करने योग्य व्यवहार में (योः) प्रकाश के (जम्) मेघ के समान शत्रुसेना को (दा, नु) शीव्र विदीर्ण करने वाला है | :----हे मनुष्यो ! जिन के विद्वान् जन रक्षा करने वाले हों उनको कहीं से भय नहीं प्राप्त होता, जैसे सूर्य से वर्षा होकर जगत् निर्भय होता है वैसे ही धार्मिक विद्वानों के संघ से समस्त राज्य निर्भय होता है ।।८।। फिर मनुष्य किसके लिये क्या धारण करके क्या करें इस विषय को कहते हैं । प्रचित्रमर्के गुणते तुराय मारुताय स्वतंबसे भरध्वम् । ये सहासि सहसा सहन्ते रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः ॥९॥ पदार्थः- हे विद्वानो ।ये) जो (लहसा) बल वा उत्साह से (सहासि) बलों को (सहन्ते) सहते हैं उनके लिये तुम (चित्रम्) अद्भुत (अम्) अन्न वा वन को (प्र, भरध्वम् अच्छे प्रकार धारण करो है (अग्ने विद्वान् जैसे (मखेभ्यः) संग्राम आदि जो संग करने योग्य हैं उनके लिए पृथिवी भूमि परेजते) कम्पित होती है तथा स्वतबसे) अपने बल से युक्त (तुराय शीघ्रता करने और (मारताय) मनुष्यों के सहयोगी (गृणते) स्तुति करने वाले विद्वान् के लिए अद्भुत अन्न वा वन को धारण करो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे चलती हुई भूमि यज्ञ सामग्री को उत्पन्न करती है वैसे ही बड़े-बड़े शूरवीर विद्वानों के लिये अन्नादि पदार्थ और अस्त्र-शस्त्रसमूह तथा उनकी विद्या और पराजय करने को सामथ्यं उत्पन्न होता है यह जानो।।६।। फिर किसके तुल्य कैसे शूरवीर सिद्ध करने चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। विर्षीमन्तो अध्वरस्थैव दिद्युत्तषुच्यवंसो जुह्वो३'नाग्नेः । अर्चनंगे धुनयो न वीरा भ्राजज्जन्मानो मरुतो अधृष्टाः ॥१०॥ पदार्थ:-जो अध्वरस्येव। अहिंसामय यज्ञ के समान वा (जुह्वः) जिनसे हवन करते उनके (न) समान (तृषच्यवसः) जो शीघ्र जाने वाले (अग्नेः) अग्नि के NEIN m ऋग्वेदः म०६ । सू०६६ ।। ६५७ at aste स ona (अर्चनयः) सत्कारकर्ता (धुनयः) कंपते हुए पदार्थों के (न) समान (त्विषीमन्तः) विद्या विनयादि के प्रकाश से युक्त (भाजज्जन्मानः) देदीप्यमान जन्म है जिनका तथा (अधृष्टाः) जो शत्रुओं से धृष्टता को नहीं प्राप्त होते (मरुतः) वे पवन के समान बली (बीरा:) वीर (दिद्य त) प्रकाश के समान वर्तमान हों उन्हीं से विजय को प्राप्त होमो ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे राजा आदि जनो ! जैसे यज्ञ के बीच वर्तमान लपट शीघ्र ही अन्तरिक्ष को जाती है वैसे शिक्षा के बीच वर्तमान जन शीघ्र विजय के लिये जा सकते हैं जैसे जुहूमों से अग्नि प्रदीप्त की जाती है वैसे शिक्षा और सत्कार से वीरों की सेना को प्रदीप्त करना चाहिये जैसे अग्नि की लपटें और शब्द होते हैं वैसे ही तुम्हारी सेना के प्रकाश और शब्द बहुत हों ॥१०॥ फिर मनुष्यों को किनके साथ कैसा जन राज्य का अधिकारी करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। तं वृधन्तं मारुतं भाजदृष्टिं रुद्रस्य सूनुं हवसा विवासे । दिवः शाय शुचयो मनीषा गिरयो नापं उग्रा अस्पधन् ॥११॥ पदार्थ:-जो (शुचयः) पवित्र (मनीषाः) मनस्वी अर्थात् उत्साही मन वाले (उग्नाः) तेजस्वी (गिरयः) मेघ और (प्रापः) जलों के (न) समान (विव:) मनोहर पदार्थ के (शयि) बल के लिए (अस्पृनन्) स्पर्धा करें उनके साथ (वृधन्तम्) श्राप बढ़ते वा दूसरों को बढ़ाते हुए (मारुतम्) पवनों की विद्या जानने वाले (भ्राजदृष्टिम्) प्रकाशमान दृष्टियुक्त (रुद्रस्य) किया है चवालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य जिसने उसके (तम्) उस (सूनम्) पुत्र को (हवसा) लेने के व्यवहार से मैं (मा, विवासे) सेवता हूं ॥११॥ भावार्थः--इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं--जो मनुष्य मेघ के समान उन्नति करने, प्रजा के पालने, जल के समान पुष्टि करने वाले, पवित्र प्राशययुक्त, तेजस्वी और मनोहर बल के बढ़ाने वाले हों उनके साथ यदि राजा राज्य शिक्षा करे तो कहीं भी पराजय और अप- कीर्ति न हो॥११॥ इस सूक्त' में पवनों के गुणों के समान विद्वानों और वीरों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे भण्डल में छियासठवां सूक्त समाप्त हुना। Antar M समा बर ऋग्वेद: मं०६ । सू० ६७ ।। अथैकावर्चस्य सप्तष्टितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । मित्रा- वरुणो देवते। १।६ स्वराट् पषितः । २ । १० भुरिपवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। ३ । ७।८।११ निवृत्तिनुस् । ४ । ५ त्रिष्टुप् । ६ विरात्रिष्टुप छन्दः । धवतः स्वरः॥ अब ग्यारह ऋचावाले' सड़सठ सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किनका सत्कार करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। विश्वेषां वः सतां ज्येष्ठतमा गीमिमित्रावरुणा वावृधध्यै । सं या रश्मेवं यमतुर्यमिष्ठा द्वा जना असमा बाहुभिः स्वैः ||१|| पदार्थ:-हे मनुष्यो (विश्वेषाम् ) सब (सताम् ) सज्जन जो (व:) आप लोग उनमें (या) जो (ज्येष्ठतमा) अतीव ज्येष्ठ (यमिष्ठा) अतीव नियम को वर्त्तने वाले (प्रसमा) अतुल्य अर्थात् सब से अधिक (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशक (बावृषध्य) अत्यन्त बढ़ने के लिए (जनान्) अनुष्यों को (रश्मेव) किरण वा रज्जु के समान (गोभिः) बाणियों से (सम्, यमतुः) नियमयुक्त करते हैं और (ar) दोनों सज्जन (स्वः) अपनी (बाहुभिः) भुजाओं से मनुष्यों को किरण वा रस्सी के समान नियम में लाते हैं उन अध्यापक और उपदेशकों का सदैव सत्कार करो॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो! जो विद्या और उत्तम शील आदि गुणों से श्रेष्ठ, अधर्म से निवृत्त कर धर्म के बीच प्रवृत्त कराने वाले, अध्यापन और उपदेश से सूर्य के समान उत्तम बुद्धि के प्रकाश करने वाले हों उन्हीं का सदा सत्कार करो ॥१॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इयं मद्रां प्रस्तृणीते मनीषोप प्रिया नमसा बर्हिरच्छे । यन्तं नो मित्रावरुणावधृष्टं छर्दिर्यद्वा वरूथ्य मुदान ।।२।। पदार्थ:-हे (सुदानू) सुन्दर दान देने वालो (प्रिया) मनोहर (मित्रावरुणो) अध्यापक और उपदेशको (वाम) तुम दोनों की (नमसा) सत्कार वा अन्नादिकों के साथ (इयम्) यह (मनीषा) विद्या और उत्तम शिक्षायुक्त बुद्धि (मनु) मुझ से (प्र, स्तृणीते) अच्छे प्रकार सर्व विषयों को पाच्छादित वा प्राप्त करती है तथा (यत्) जो (वाम) तुम दोनों के (वरूश्यम्) घर के बीच उत्पन्न हुए (बर्हिः) अतीव विशाल तथा (श्रच्छ) अच्छे प्रकार (यन्तम्) प्राप्त होते हुए और (न:) हमारे (अधृष्टम्) शत्रुत्रों AMAN KR aharar roo ऋग्वेदः मं०६ । सू०६७ ॥ ६५६ P Ana SION की न धृष्टता को प्राप्त हुए (छदिः) घर को (उप) समीप से ढापती है वह सब को अच्छे प्रकार ग्रहण करने योग्य है ।।२।। भावार्थ:--हे मनुष्यो ! जिनके संग से हमको उत्तम बुद्धि और घर प्राप्त होते हैं उनको सदैव तुम मानो ॥२॥ फिर कौन निरन्तर सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहत हैं। आ यातं मित्रावरुणा मुशस्त्युपं प्रिया नमसा हूयमाना । सं यावप्ना स्थो अपसेच जनाधीयवश्चियखयो महित्वा ॥३॥ पवार्थ:-हे (प्रिया) सब को तृप्त करने वाले (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान प्रिय पुरुषो (नमसा) सत्कार से (हूयमाना) बुलाये हुए तुम दोनों (जनान्) मनुष्य के (उप, श्रा, यातम्) समीप प्रानो तथा (सुशस्ति) सुन्दर प्रशंसा को प्राप्त होमो (यो, चित) जो निश्चय से (महित्वा) बड़प्पन' से (यतथः) यत्न करते हैं वा (श्रु धीयतः) अपने अन्न की इच्छा करते हैं वे दोनों (अप्नः स्थः) सन्तानों में ठहरने वाला (अपसेव) कर्म से जैसे वैसे हम लोगों को (सम्) प्राप्त होवें ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम अध्यापक और उपदेशकों को सदा सत्कार से बुलाकर उनका सत्कार कर विद्या और सत्योपदेश को संसार के बीच विस्तारो। हे अध्यापक और उपदेशको! तुम प्रयत्न से माता और पिता के समान मनुष्यों को उत्तम शिक्षा देकर विद्यावान् सर्वोपकार करने वालों को सिद्ध करो ॥३॥ फिर सब मनुष्यों को कौन सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । अश्वा न या वाजिनो पूतबन्धू ऋता यद्गर्भमदितिर्भरध्यै । प्र या मईि महान्ता जाय॑माना घोरा मीय रिपवे निदधः ॥४॥ पदार्थः-हे मनुष्यो (या) जो (अश्वा) घोड़े वा महाशय' जनों के (न) समान (बाजिना) बहुत वेग वा विज्ञानयुक्त (पूतबन्धू) पवित्र बन्धु वाले (ऋता) सत्य आचार के रखने वाले (अदितिः) माता के तुल्य (महि) महान् जन (पद) जिस (गर्भम्) गर्भ को (भरध्यै) धारण करने को प्रवर्त्तमान वा (या) जो (महान्ता) महात्मा (जायमाना) उत्पन्न हुए (रिपवे, मत्तीय) शत्रुजन के लिए (घोरा) भयङ्कर (प्र, णि, दोधः) और कारागार में निरन्तर शत्रुजनों को डाल देते हैं उनको अपने मात्मा के तुल्य सत्कार करो॥४॥ Day man - ऋग्वेद: मं०६ । सू० ६७ ।। . लक भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो कुलीन, जिनका महान् पक्ष, विद्वान् माता पिता से उत्पन्न हुए, उत्तम शिक्षायुक्त, महाशय, माता के तुल्य मनुष्यों पर कृपा करते, वा पढ़ाने और उपदेश करने से सब पर उपकार करते, तथा दुष्टों को रोकते हुए विद्वान् होते हैं। उन्हीं की सेवा, संग, उन्हीं से उपदेश और विद्या पढ़ना निरन्तर करो॥४॥ फिर मनुष्यों को कौन सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । विश्वे यद्वा महना मन्दमानाः क्षत्रं देवासो अदधुः सजोषाः । परि यद्भूयो रोदसी चिदुर्वी सन्ति स्पशो अदब्धासो अमुराः १.५॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको (यत्) जो तुम दोनों (उर्वी) बहुतः पदार्थों से युक्त (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी के समान विद्या और क्षमा से युक्त (भूथः) होते हो उन (वाम) तुम्हारे संग से (यत्) जो (मंहना) सत्कार करने वाले (मन्दमानाः) आनन्द' वा सत्कार को प्राप्त वा स्तुति करते (सजोषाः) एकसी प्रीति को सेवने वाले (स्पशः) अविद्यान्धकार का विनाश करने और विद्याप्रकाश का स्पर्श करने वाले (अदब्धासः) हिंसा को न प्राप्त और हिंसा न करने वाले (प्रभूराः) मूढ़तादि दोषरहित (विश्वे, देवासः) समस्त कामना करते हुए विद्वान् जन (सन्ति) हैं वे ही (चित) निश्चित (क्षत्रम्) धन वा राज्य को (परि, अदधुः) सब ओर से धारण करते हैं उनका वा उन तुम लोगों का सब हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥५॥ भावार्थ:-वे ही प्राप्त विद्वान् जन हैं जिनका पढ़ाना उपदेश और संग शीघ्र सफल होता है जिन के संग से हिंसा आदि दोषरहित विद्वान् होकर पक्षपात को छोड़ सब प्राणियों को अपने प्रात्मा के तुल्य सुख देते हैं ॥५॥ फिर कौन यहां संग करने योग्य और सुख के बढ़ाने वाले हैं इस विषय को कहते हैं ।। ता हि क्षत्रं धारयेथे अनु द्यून टेहेथे सानुमुपमादिव द्योः। हल्हो नक्षत्र उत्त विश्वदेवो भूमिमातान्यां धासिनायोः ॥६॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको जो (हि) जिस कारण से हैं (ता) तुम दोनों (अनु, धू न्) प्रतिदिन (क्षत्रम्) राज्य वा धन को (धारयेथे) धारण करते हो तथा (योः) सूर्य की (उपमादिव) उपमा से जैसे वैसे (सानुम्) शिखर को (हेथे) बढ़ाते हो जिनके संग से (विश्वदेवः) सब का प्रकाश करने वाला (हळ हः) दृढ़ (उत) और (नक्षत्रः) जो नहीं नष्ट होता ऐसा होता हुआ (भूमिम्) भूमि और Res- HANE ऋग्वेद: मं०६ । सू० ६७ ।। - Antane RAM (धाम्) मनोहर विद्या को प्राप्त होकर (धासिना) अन्न से (प्रायोः) जीवन को बढ़ाता है उन पूर्वोक्त दोनों तथा उसको जो (मा, अतान्) सब ओर से प्रकाशित करें वे निरन्तर सुखी होते हैं ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अध्यापक और उपदेशक प्रतिदिन सूर्य के समान विद्याव्यवहार को सम्यक् प्रकाशित कर राज्यधन और आयु को बढ़ाते, सब को सुख को धारणा कराते, जिनको प्राप्त होकर सब जन विद्वान् होते हैं उनका संग निरन्तर करो ॥६॥ फिर कौन किसके समान मेधावी विद्यार्थियों को धारण करते हैं इस विषय को कहते हैं । ता विग्रं धैथे जठरै पृणध्या आ यत्सम सभृतयः पृणन्ति । न पृष्यन्ते युक्तयोऽवाता वि यत्पयो विश्वजिन्या भरन्ते ।।७।। पदार्थ:--हे अध्यापक और उपदेशको जैसे (अवाता:) पतियों को न प्राप्त हुई (सभूतयः) समान पतियों वाली (युवतयः) युवती स्त्रियां समान पतियों को (भरन्ते) धारण करती अर्थात् प्राप्त होती वे (न) नहीं (मा, पृणन्ति) पूरे सुख को प्राप्त होती क्योंकि और सौतें नहीं (मध्यन्ते) सहती हैं (यत) जो (सम) घर को सुखयुक्त करती हैं और (यत्) जो (पयः) जल के समान (वि) विविध प्रकार से सुख देती हैं तथा जो तुम दोनों (जठरम्) उदर में ठहरे हुए अग्नि' को (पृणध्ये) सुखी करने के लिये (विनम्) बुद्धिमान् पुरुष को (धैथे) धारण करते हो। हे (विश्वजिन्वा) संसार की पुष्टि करने वाले श्राप उन स्त्रियों तथा (ता) उन दोनों को निरन्तर सेवो ॥७॥ भावार्थ:-- इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे समान गुण कर्म स्वभाव रूप स्त्री पुरुष अत्यन्त प्रीति से विवाह कर कभी विरोध नहीं करते हैं वैसे ही विद्वान् जन और विद्यार्थीजन विद्वेष नहीं करते हैं ऐसे प्रेम के साथ वर्तमान सब सदैव आनन्दित होते हैं ॥७॥ फिर किनके संग से जन विद्वान हों इस विषय को कहते हैं । ला जिह्वया सदमेदं सुमेधा आ या सत्यो अरतिते भूत् । तद्वा महित्वं घृतान्नावस्तु युवं दाशुषे वि चयिष्टमंहः ॥८॥ पदार्थ:-हे (घृतान्नौ) बहुत घृत और अन्न वाले अध्यापक और उपदेशक: जनो (वाम्) तुम दोनों के उपदेश से (सुमेधाः) उत्तम जिसकी बुद्धि वह (मरतिः) प्रक ६६२ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६७ ॥ MERO maa - सत्य उपदेश को प्राप्त होता हुआ (सत्यः) सज्जनों में उत्तम जन (जिह्वया) वाणी से (मा, इदम्, सदम्) सब ओर से जिसमें विद्वान्जन स्थिर होते हैं उस सत्य वचन को पाकर (ऋते) सत्य' धर्म में (श्रा, भूत) प्रसिद्ध होवे (यव) जो (युवम्) प्राप दोनों (वाशुषे) दानशील पुरुष के लिए (अंहः) पाप को (वि, चयिष्टम्) विगत चयन करते हैं (तत्) वह (वाम्) तुम दोनों की (महित्वम्) महिमा (प्रस्तु) हो (ता) उन तुम दोनों का हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिनकी उत्तेजना से तुम लोग विद्या को प्राप्त होमो वा उपदेश ग्रहण करो उनका धन्यवाद आदि से निरन्तर सत्कार करो, जिनके सग से मनुष्य सत्य आचरण वाले उत्तम ज्ञाता होते हैं के ही महाशय हैं ॥८॥ कौन विद्वानों के प्रिय वा अप्रिय होते हैं इस विषय को कहते हैं । प्र यद्वा मित्रावरुणा स्पूर्धन् प्रिया धाम युवर्धिता मिनन्ति । न ये देवास ओहंसा न मर्त्ता अयज्ञसाचो अप्यो न पुत्राः ॥९॥ पदाथ:-है (मित्रावरुणा) प्रारण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशको (यव) जो (स्पूद्धन्) स्पर्धा करते हुए जन (वाम् ) तुम दोनों के (प्रिया) प्रिय (धाम) धाम जिनमें स्थापन करते हैं उन (युवधिता) तुम दोनों का हित करने वालों को (न) न (प्र, मिनन्ति) नष्ट करते हैं वा (ये) जो (देवासः) विद्वान् जन (प्रोहसा) प्राप्त बल वा वेग से और (अयज्ञसाचः) जो यज्ञ से संबन्ध नहीं करते वे (मत्ताः) मनुष्य (न) नहीं नष्ट करते हैं वे (अप्यः) कर्मों में प्रसिद्ध के (न) समान और (पुत्राः) पुत्रों के समान होते हैं ।।६।। भावार्थ:-जो मनुष्य अध्यापक और उपदेशकों का अप्रिय आचरण नहीं करते हैं वे सत्पुत्रों के समान होते हैं और जो अप्रिय का आचरण करते हैं वे शत्रुओं के तुल्य होते हैं ॥६॥ फिर कौन तिरस्कार करने योग्य और सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । वि यद्वा कीस्तासो भरन्ते शंसन्ति के चिनिविदो मनानाः । आद्वा ब्रवाम सत्यान्युक्था नकिर्देवेभिर्यतयो महित्वा ॥१०॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको यदि तुम दोनों (महित्वा) महिमा से (देवेभिः) विद्वानों के साथ विद्यावृद्धि के लिये (नकिः) न (यतयः) यत्न करते हो तो (वाम्) तुम दोनों के प्रति हम लोग (सत्यानि) उत्तम पदार्थों में भी उत्तम (उपथा) am ऋग्वेद: मं०६ । सू० ६७ ।। कहने वा सुनने के योग्य विषयों को (भात, ब्रबास) पीछे कहें (यत्) जो (कोस्तासः) मेधावीजन (वाचम् ) वाणी को (बि, भरन्ते) विशेषता से धारण करते हैं और (के, चित्) कोई (मनाना:) विचार करते हुए (निविदः) उत्तम वारिणयों की (शंसन्ति) प्रशंसा करते हैं उनको सर्वदा तुम पढ़ाभो ॥१०॥ भावार्थ:-राजा और राजजनों को और प्रजास्थ विद्वानों को भी कौन विद्वान् अच्छी शिक्षा देने योग्य हैं जो निष्कपटता से अपनी शक्ति के अनुकूल पढ़ाने से विद्या प्रचार न करें और जो प्रीति के साथ विद्याओं को पाकर सर्वत्र प्रचार करते हैं वे ही सदा सत्कार करने योग्य हैं ॥१०॥ फिर कौन विद्वान होते हैं इस विषय को कहते हैं ।। अबोरित्या हो छर्दिषों अभिष्टौ युवोमित्रावरुणावस्कृधोयु । अनु यद्गार्यः स्फुरानृभिप्यं धृष्णुं छद्रणे वृषणं युनर्जन् ॥११॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको (यत्) जो (गावः) किरणें वा धेनु हैं उनको (स्फुरान्) स्फूर्ति वाले पदार्थों वा (ऋजिप्यम्) कोमल वा सरल पदार्थों के पालने वालों में हुए (धृष्णुम्) दृढ़ प्रगल्भ (वृषणम्) बलिष्ठ को (रणे) संग्राम में कोई (युनजन्) जोड़ता हुआ विजय को प्राप्त होता है है (मित्रावरुणो) वायु और सूर्य के समान वर्तमान (अवोः) रक्षा करने वाले (वाम) तुम दोनों के (चर्दिषः) घर के (अभिष्टौ) सन्मुख यज्ञ क्रिया में (यत्) जो प्रयत्न करता है तथा (युदोः) तुम दोनों के संबन्ध में (अस्कृषोयु) जो अपने की लघुता नहीं चाहता (इत्था) इस हेतु से (अनु) अनुकूलता से यत्न करता है उसका सदैव सत्कार करो ॥११॥ भावार्थः हे अध्यापक और उपदेशको! जो विद्यार्थी जन तुम्हारे काम को अपने काम के समान जानते हैं वे ही दीर्घ आयु वाले, प्रशंसित विद्यायुक्त, धार्मिक परोपकारी होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशकों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में सड़सठवां सूक्त समाप्त हुमा ।।

६६४
ऋग्वेद: मं०६। सू० ६८ ॥
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अर्थकादशर्चस्याष्टषष्टितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रा-
वरुणो देवते । १ । ४ । ११ त्रिष्टुप् । ६ निवृत्रिष्टुप्छन्दः। धैवतः स्वरः । २
भुरिक पंक्तिः । ३ । ७।८ स्वराट् पङ्क्तिः । ५ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।
। १० निचज्जगतीछन्दः । निषादः स्वरः॥
अब ग्यारह ऋचाबाले अड़सठवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में
विद्वानों को अच्छे प्रकार कौन पढ़ाने चाहियें इस विषय को कहते हैं ।
श्रुष्टी वा यज्ञ उद्यतः सजोषां मनुष्ववृक्तवहिपो यजध्यै ।
आ य इन्द्रावरुणाविषे अद्य महे सुम्नाय मह आंववत्तत् ।।१।।
पदार्थ:-है (इन्द्रावरुणौ) बायु और बिजुली के समान अध्यापक और
उपदेशको (यः) जो (उद्यतः) उद्योगी (सजोषाः) अपने आत्मा के तुल्य औरों का
प्रीति से सेवन करता (मनुष्यत्) मनुष्य के तुल्य (वृक्तबहिषः) संक्षोभित किया जल
जिसने उसका और (वाम) तुम्हारा (यज्ञः) संग करने योग्य शिष्य (मा, यजध्ये)
अच्छे प्रकार संग करने को (अध) आज (महे) महान् (सुम्नाय) सुख वा (महे)
बहुत (इ) विज्ञान वा अन्न के लिये (श्रुष्टी) शीघ्र (भाववर्तत्) अच्छे प्रकार
वर्तमान है उसको तुम दोनों पढ़ाओ ।।१।।
भावार्थ:-हे पढ़ाने और उपदेश करने वालो ! जो आप लोगों के
सुख के लिए प्रयत्न करते हुए पुरुषार्थी, प्रीतिमान्, शीघ्रकारी वर्तमान हैं
उन पवित्र, जितेन्द्रिय धामिक विद्यार्थियों को निरन्तर सत्य का उपदेश
करो॥१॥
फिर कौन यहां राजजन उत्तम और सत्कार करने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं ।
ता हि श्रेष्ठौ देवतांता तुजा शुराणां शविष्ठा ता हि भूतम् ।
मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेनं वृत्रतुरा सर्वसेना ।।२।।
पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (हि) ही (देवताता) सत्य व्यवहार यज्ञ में (श्रेष्ठा)
उत्तम (तुजा) दुष्टों की हिंसा करने वाले (भूराणाम्) निर्भय जनों में (शविष्ठा)
अतीव बलवान् (भूतम्) होते हैं और जो (हि) निश्चय के साथ (मघोनाम्) धनाढ्यों
के बीच (मंहिष्ठा) अतीव सत्कार करने योग्य (ऋतेन) सत्य आचरण से
(तविशुष्मा) बहुत बल और सेना से युक्त (वृत्रतुरा) जो मेघ के समान बढ़े हुए
शत्रुओं का विनाश करने वाले (सर्वसेना) समग्र सेनाओं से युक्त सभा और सेनाधीश
वर्तमान हैं (ता) वे सत्कार करने योग्य हैं और (ता) वे ही उत्तम अधिकार में
स्थापन करने योग्य हैं ॥२॥

ऋग्वेदः मं०६ । सू०६८ ।। . भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो सत्य न्याय से प्रजा की पालना करने में प्रयत्न करते हुए, सब प्रकार की विद्या और सर्वोत्तम सेनामों से युक्त, दुष्टों की हिंसा से श्रेष्ठ, धनाढ्य और वीर पुरुषों की रक्षा करने वाले होवें वे धन्यवाद के योग्य हैं ॥२॥ फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं । ता गृणीहि नमस्पैभिः शुभैः सुम्नेभिरिन्द्रावरुणा चकाना । वज्रेणान्यः शवसा हन्ति वृत्रं सिषक्तयन्यो वृजनेषु विप्रः ॥३॥ पदार्थ:--हे विद्वान् जन (विप्रः) मेधावी बुद्धिमान् पाप जिनमें से (अन्य:) सूर्य वा बिजुली (वरण) किरण समूह के समान शस्त्रास्त्र और (शवसा) बल' से (वत्रम्) मेघ के समान शत्रु को हन्ति) मारती है और जो (अन्यः) वायु के समान (वृजनेषु) मार्ग वा बलों में (सिषक्ति) सींचता है (ता) उन दोनों (इन्द्रावरुणा) वायु और बिजुली के समान (सुम्नेभिः) सुखों से (चकाना) कामना करते हए (शूषः) बलों और (नमस्येभिः) अन्नों के बीच सिद्ध हुए पदार्थों से सत्कार को प्राप्त हुओं की (गणीहि) प्रशंसा करो ॥३॥ भावार्थ:-जो सभा सेनापति सूर्य और वायु के समान प्रजा के पालने वाले, उत्तम सेनाजनों से दुष्टों को निवारने वाले, मेघों के समान प्रजा- जनों को कामनाओं से पूरित करते हैं वे सब से सत्कार करने योग्य हैं ॥३॥ फिर वे किन के साथ क्या करें इस विषय को कहते हैं । नाश्च यन्नरंश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वार्ताः। प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा यौश्च पृथिवि भूतमुर्वी ॥४॥ पदार्थः- (यत) जो (विश्वे, देवासः) समस्त विद्वान् जन (नरः, च) और विद्वानों के बीच अग्रगामी (स्वगूर्ताः) अपने पराक्रम से उद्यमी जन (नराम्) मनुष्यों की (ग्ना:) वाणी तथा अपनी (च) भी वाणियों को प्राप्त होकर (वावृधन्त) सब ओर से बढ़ते हैं (प्र, एभ्य:) उत्कर्षण से इनसे (इन्द्रावरुणा) बिजुली और सूर्य के समान वा (उर्वी) विस्तृत (पृथिवि) पृथिवी (धौः, च) और प्रकाश के समान वर्तमान (महित्वा) महिमा से (भूतम्) प्रसिद्ध होवें । वे सब जन मनुष्यों से सरकार करने योग्य हैं ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे राजन् ! जो - ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६८ ॥ Ca MORE P and विद्या, धर्म और विनय से बढ़ते हैं उन उद्यमियों के साथ इन प्रजाजनों की पालना करो॥४॥ फिर राज सेनाजन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। स इत्युदानुः स्ववाँ ऋतावेन्द्रा स्ववाँ ऋतावेन्द्रा यो वाँ वरुण दाशति त्मन् । इषा स द्विपस्तरेदास्वान्दंसद्रयिं रयिवतश्च जनान् ।।५।। पदार्थः-- हे (इन्द्रा, वरुण) सूर्य और वायु के समान वर्तमान सभासेना- धीशो (बाम्) तुम दोनों का (यः) जो (सुदानः) उत्तम देने वाला (स्ववान्) जिसके अपने लोग बहुत विद्यमान हैं (ऋताबा) जो सत्य को भजता है वह (स्मन्) आत्मा में अभयपन (दाशति) देता है जो (दास्वान्) देने वाला होता हुआ (द्विषः) शत्रुजनों को (तरेत) तरे और (रणिवतः) बहुधनवान् (जनान्, च) जनों को भी (रविम्) धन का (बंसत) विभाग करे (सः, इत) वही सर्वोत्तम और (सः) वह राजा होने योग्य है ॥५॥ भावार्थ:--इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य वर्षा करा कर और वायु प्राण धारण करा कर यह दोनों सब प्राणियों को निर्भय करते हैं वैसे जो संग्राम के बीच अच्छे प्रकार सन्मुख हैं उनसे पाये हुए धन का यथावत् विभाग कर सोलहवां भाग भृत्यों के लिये देते हैं तथा वहां संग्राम में जो योद्धा जीतें उनके लिये उससे भी सोलहवां भाग देते हैं वेही विजयी होकर आपस में प्रसन्न होते हैं ॥५॥ फिर राजजन क्या करें इस विषय को कहते हैं यं युवं दाश्वध्वराय देवा रयिं धत्थो व सुमंतं पुरुक्षुम् । अस्मे स इन्द्रावरुणावपि ध्यात्म यो भनक्ति वनुषामर्शस्तीः ॥६॥ पदार्थ:-हे (इन्द्रावरुणो) बिजुली और वायु के समान वर्तमान सभा सेना- धीशो (देवा) देने वालो (युवम् ) तुम दोनों (दाश्वध्वराय) जिससे अहिंसामय यज्ञ देने योग्य होता है उसके लिए (अस्मे) हम लोगों में (यम्) जिस प्रशस्त (रयिम्) धन (वसुमन्तम्) बहुत ऐश्वर्ययुक्त और पुरुक्षुम्) बहुत अन्न वाले जन को (धत्थः) धारण करो (य:) जो (धनुषाम्) राज्य को मांगने वाले शत्रुओं की (प्रशस्तीः) अप्रशं- सानों को (अ, मनक्ति) अच्छे प्रकार मदित करता है (स:) सो (अपि) ही अतीव स्थिर (स्यात) हो ॥६॥ भावार्थ:-हे सभासेनाधीशो ! जो तुम लोग उत्तम बुद्धि और अतुल m ऋग्वेदः मं०६ । सू०६८।। xbeen PER म लक्ष्मी को हम लोगों में धरो तो हम लोग सदैव विजयी होकर विजय, राज्य और ऐश्वर्य को बढ़ावें ॥६॥ फिर कौन राजा योग्य है इस विषय को कहते हैं । उह ने सुत्राबो देवगोपाः रिभ्य इन्द्रावरुणा रयिः व्यति । येषां शुष्मः पृतनासु साह्वान्न भयो द्युम्ना सिरते तरिः ॥७॥ पदार्थ:-हे (इन्द्रावरुणा) वायु और बिजुली के समान वर्तमान प्रशंसित राजा (येषाम्, पृतनासु) जिन शूरवीरों की सेनाओं में (शुष्मः) बलवान् (साह्वान्) सहनशील (ततुरि:) उत्तीर्ण होने वाला सेनापति वर्तमान है। तथा जो (सद्यः) शीघ्र (चना) धन और यशों को (प्र, तिरते) उत्तमता से प्राप्त होता है वा जिसके पराक्रम से (रथिः)लक्ष्मी (स्यात्) हो (उत) और (न:) हम लोग (सरिभ्यः) जो विद्वान् हैं उनके लिये (सुत्रानः) जो अच्छों की रक्षा करने वालों की रक्षा करने वाला (देवगोपाः) विद्वानों का रक्षक हो वही राजा होने योग्य है ॥७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो सूर्य के समान प्रतापी, पवन के समान बलवान्, विद्यावान् के समान नम्रता और शूरवीरों की रक्षा करने वाले हों वे सर्वत्र शोघ्र शत्रुओं को जीत के यशस्वी होकर धनवान् होते हैं ॥७॥ फिर वे राजप्रजाजन कैसे वत्” इस विषय को कहते हैं। नु न इन्द्रावरुणा गृणाना पृक्त रयिं सौश्रवसाय देवा । इत्था गृणन्तौ महिनस्य शर्धोऽपो न नावा दुरिता तरेम ||८॥ पदार्थ:-हे (इन्द्रावरुणा) सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य वर्तमान (नः) हम लोगों की (गृणाना) प्रशंसा करने और (देवा) देने वाले राजप्रजाजनो जैसे तुम दोनों (सौश्रवसाय) उत्तम यश होने के लिये (रयिम्) धन का (पृङ्क्तम्) संबन्ध करो (इत्था) ऐसे' (महिनस्य) बड़े के (शर्धः) बल की (गृणन्तः) प्रशंसा करते हुए हम लोग (नावा) नाव से (अपः) जलों को (न) जैसे वैसे (दुरिता) दुःख से उल्लंघन करने योग्य कष्टों को (नू) शीघ्र (तरेम) तरें ॥८॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो राजप्रजाजन आपस में प्रीति वाले होकर अन्नादि पदार्थों के लिए धन इकट्ठा करते हैं वे सूर्य और चन्द्रमा के तुल्य प्रतापी होकर जैसे बड़ी नौका से दुःख से तरने योग्य समुद्रों के जन पार होते हैं वैसे ही बड़े-बड़े दुःख और दारिद्रयों को शीघ्र तरते हैं ।।८।। AAN ऋग्वेदः मं०६। सू०६८ ॥ He na AN Jam - ran M He फिर वह राजा कैसा है और उसके लिये क्या उपदेश देना चाहिये इस विषय को कहते हैं। म सम्राजे बृहते मन्म नु प्रियमर्च देवाय वरुणाय समर्थः । अयं य उर्वी महिना महिव्रतः क्रत्वा विमात्यजरो न शोचिां ॥९॥ पदार्थ:--हे विद्वन् (थः) जो (अयम्) यह (सप्रथः) सत्कीति से विख्यात और (महिवतः) बड़े-बड़े धर्मयुक्त कर्म जिसके विद्यमान वह (क्रत्वा) प्रज्ञा वा कर्म से (महिना) और महिमा वा (शोचिषा) अपने प्रकाश से (अजरः) वृद्धावस्थारूपी रोग से रहित सूर्य जीवात्मा वा परमात्मा के (न) समान (उर्वी) सूर्यमण्डल और पृथिवी को (विभाति) प्रकाशित करता है उस (वरुणाय) सब से उत्तम (देवाय) अभय देने वाले (बृहते) बड़े (सम्राजे) अच्छे सूर्य के समान विद्या और नम्रता से प्रकाशमान के लिये (प्रियम्) प्रीति करने वाले (मन्म) विज्ञान को आप (न) शीघ्र (प्र, अर्च) सत्कार देवें॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे विद्वान्जनो ! जो सूर्य के तुल्य, जीव के तुल्य, वा परमात्मा के तुल्य शुभ गुण कर्म स्वभावों से देदीप्य- मान, विद्या और विनय से युक्त, उत्तम यत्न के साथ वाणी, मन और शरीर से पिता के समान प्रजाजनों की पालना करने को प्रयत्न करता है उस चक्रवर्ती, सर्वोत्कृष्ट, विद्वान् और सत्कार करने योग्य राजा के लिये राज्य में सत्य नीति को आप लोग समझावें जिससे यह सर्वत्र धर्मयुक्त यश वाला हो ॥६॥ फिर वे राज प्रजाजन क्या कर कैसे हों इस विषय को कहते हैं । इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोम पिबतं मयं धृतव्रता । युवो रथो अध्वरं देववीतये प्रति स्वसरमुब याति पीतये ॥१०॥ पदार्थ:-हे (इन्द्रावरुणा) बिजुली के समान वर्तमान (सुतपो) सुन्दर ब्रह्मचर्य आदि अनुष्ठान तप जिनका और (धृतवता) जिन्होंने उत्तम कर्म धारण किये हैं वे सभा और सेनाधीशो जिन (युवोः) तुम लोगों का (रथः) विमान आदि यान (देववीतये) दिव्यगुणों की प्राप्ति और (पीतये) उत्तमोत्तम रस पीने के लिये (प्रति, स्वसरम्) प्रतिदिन (अध्वरम्) अहिंसामय यज्ञ को (उप, याति) प्राप्त होता है वे (इमम्) इस (सुतम्) उत्पन्न किये हुए (मधम्) जिससे जीव आनन्द को प्राप्त होता है उस (सोमम्) बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को (पिबतम् ) पिभो ॥१०॥ KHION ऋग्वेद: मं०६ । सू० ६६ ।। THES EMA maan भावार्थ:-हे राजप्रजाजनो ! तुम प्रतिदिन सोमलता आदि से उत्पन्न किये हुए सर्व रोगों के हरने, बल, बुद्धि, पराक्रम बढ़ाने वाले, हिंसारहित, महौषधियों के रस को पीकर धर्मात्मा होओ ॥१०॥ फिर वे क्या करके क्या करावें इस विषय को कहते हैं । इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा दृषेथाम् । इदं वामन्धः परिषिक्तमस्मे आसद्यास्मिन्बहिषि मादयेथाम् ॥११॥ पदार्थ:-हे (इन्द्रावरुणा) बिजुली और वायु के समान वर्तमान (वृषणा) बलवान् राजा प्रजाजनो ! तुम (मधुमत्तमस्य) अतीव मधुरादिगुणयुक्त (वृष्णः) बल करने वाले (सोमस्य) बड़ी बड़ी ओषधियों के रसों के सेवने से (मा, वृषेथाम्) बलिष्ठ होनो जिन (वाम्) तुम दोनों का (इदम्) यह (परिषिक्तम्) सब ओर से सींचा हुआ (अन्धः) अन्न है वे तुम (प्रस्मे) हम लोगों में वा हम को (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) अवकाश में (मासघ) बैठ के (मादयेथाम्) आनन्दित करो ॥११॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो सोमलतादि रसयुक्त अन्न वा पान से आप आनन्दित होकर हमको आनन्दित करते हैं के ही सबसे सत्कार करने योग्य होते हैं ॥११॥ इस सूक्त में इन्द्र वरुण के समान राजप्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में अड़सठवां सूक्त समाप्त हुआ। अथाष्टर्चस्यैकोनसप्ततितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रा- विष्णू देवते। १।३।३ । ७ निचत्रिष्टुप् । २।४१८ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ५ ब्राह्मय ष्णिकछन्दः । ऋषभः स्वरः ॥ अब पाठ ऋचावाले उनहत्तर- सुक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा और शिल्पी जन क्या करके क्या करें इस विषय को कहते हैं । सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्रीविष्णू अपंसस्पारे अस्य । जुषेयां यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैनः पथिमि पारयन्ता ॥१॥ पदार्थ:-हे (इन्द्राविष्णू) सूर्य और बिजुली के समान वर्तमान महाराज मौर शिल्पीजनो जिन (वाम) तुम दोनों को मैं (कर्मणा) अतीव चाहे हुए काम से ba ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६६ ।। andu (सम्, हिनोमि) अच्छे प्रकार बढ़ाता हूं (मस्य) इस (अपसः) काम के (पारे) पार में (हषा) अन्नादि पदार्थों से (सम्) अच्छे प्रकार बढ़ाता हूं. वे (अरिष्ट:) हिंसक- रहित (पथिभिः) मार्गों से (नः) हम लोगों को (पारयन्ता) पार कराते हुए तुम (यज्ञम्) संगतिकरण कार्य (द्रविणम्, च) और धन वा यश को (जुषेथाम्) सेवो और हम लोगों के लिये (धतम्) धारण कीजिये ॥१॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे अध्यापक और उपदेशको ! जैसे वायु और बिजुली विमानादिकों में अच्छे प्रकार जोड़े हुए गतिरूप कर्म के विषय को स्थान से पार पहुंचाते हैं वैसे उनकी विद्या में तुमको प्रेरणा देकर जिस प्रकार हम लोग बढ़ावे उस प्रकार बढ़कर निर्विघ्न मार्गों से हम लोगों को लेजा के धन और यश की प्राप्ति निरन्तर कराइये उन आप लोगों की सेवा हम लोग निरन्तर करें ॥१॥ फिर वे दोनों कैसे हैं और क्या करें इस विषय को कहते हैं । या विश्वास जनितारां मतीनामिन्द्राविष्णू कलशा सोमधानां । म वां गिरः शस्यमांना अवन्तु ष स्तोमासो गीयमानासो अझै ॥२॥ पदार्थ:-हे राजा और शिल्पीजनो (या) जो (विश्वासाम्) समस्त (मती- नाम्) बुद्धियों के (जनितारा) उत्पन्न करने वाले (सोमधाना) जिन के बीच सोम धरते हैं वे (कलशा) घट के समान वर्तमान (इन्द्राविष्णू) सूर्य और बिजुली जिन (वाम्) तुम दोनों में (अः) मन्त्रों वा सत्कारों से (शस्यमानाः) प्रशंसा को प्राप्त होती हुई (गिरः) वाणी (गीयमानासः) सुन्दरता से गाई हुई तथा (स्तोमासः) जो स्तुति किये जाते हैं वे सब को (प्र, अवन्तु) अच्छे प्रकार पालें उन सबों की तुम लोग (प्र) अच्छे प्रकार रक्षा करो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे विद्वानो! जो वायु और बिजुली बुद्धि बढ़ाने और सब विद्याओं के धारण करने वाले वर्तमान हैं उनके अच्छे प्रकार प्रयोग से अर्थात् कार्यों में लाने से विद्या, शिक्षा तथा वाणियों की अच्छे प्रकार रक्षा करो ॥२॥ फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं। इन्द्रविष्णू मदपती मदानामा सोम यातं द्रविणो दधाना । सं वामजन्त्वक्तभिर्मतीनां संस्तोमांसः शस्यमानास उक्यः ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्राविष्णू) वायु और बिजुली के समान सभासेनापतियो ( ANPNE ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ६६ ।। ६७१ . taman Date (मदानाम्) प्रानन्दों के बीच (मस्पती) अानन्द के पालने और (द्रविणो) धन वा यश के (दधाना) धारण करने वालो! तुम दोनों (सोमम्) ऐश्वर्य को (मा, यातम्) प्राप्त होप्रो (दाम्) तुम दोनों को (मतीनाम्) मनुष्यों के बीच (अक्तुभिः) रात्रियों से और (उक्थैः) वेदस्थ स्तोत्रों से (शस्यमानास:) प्रशंसायुक्त किई जाती (स्तोमास:) स्तुतियां (सम्, प्रजन्तु) अच्छे प्रकार प्रकट करें जिससे प्रीति के साथ तुम दोनों लोगों को (सम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होनो ॥३॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो वायु और बिजुली के समान सब के आनन्द के बढ़ाने वाले, मनुष्यों से प्रशस्त किये जाते और विद्या वा धन को अच्छे प्रकार देते हुए प्रयत्न करते हैं वे ही राजकर्म के योग्य होते हैं ॥३॥ फिर उस राजा को कौन प्राप्त होकर क्या करते हैं इस विषय को कहते हैं। आ वामश्वासो अभिमातिषाह इन्द्राविष्णू सधमादौ वहन्तु । जुषेयां विज्ञा हवना मतीनामुप ब्रह्माणि शृणुतं गिरी मे ॥४॥ पदार्थः - हे (इन्द्राविष्णू) वायु और सूर्य के तुल्य वर्तमान सभासेनाधीशो (वाम्) तुम दोनों जो (अश्वासः) महात्माजन (अभिमातिषाहः) अभिमानयुक्त शत्रुओं को सह सकते हैं वे (सधमादः) समान स्थान को (श्रा, वहन्तु) प्राप्त करें उन (मतीनाम्) मनुष्यों के (विश्वा) सब (हवना) देने लेने योग्य (ब्रह्माणि) धनों को (जुषेथाम् ) सेवो और (मे) मेरी (गिरः) वाणियों को भी (उप, शृणुतम्) समीप में सुनो ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे राजन् । यदि बुद्धिमान्, अतीव बलवान् और शत्रुओं के बल के सहने वाले मनुष्य आपको प्राप्त होवें तो वे सब ऐश्वर्य और विद्या को संसार में विस्तारें ॥४॥ फिर ने क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। इन्द्रीविष्णू तत्पनयाय्य वां सोमस्थ मद उरु चक्रमाथे । अकृणुतमन्तरिक्षं वरीयोऽप्रथतं जीवसें नो रजौसि ॥६॥ पदार्थ:-हे राजा और प्रजाजनो जो (इन्द्राविष्णू) वायु और सूर्य (सोमस्य) ऐश्वर्य का (मदे) आनन्द प्राप्त होने पर (तत्) उस (अन्तरिक्षम्) भूमि और सूर्य के बीच की पोल को (पनयाय्यम्) प्रशंसा के योग्य करते हैं उनकी (वाम्) 4 HEASON aan CASH RATE re ६७२ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ६६ ।। या Hootu तुम (उरु, चक्रमाथे) बहुत कामना करो और (वरीयः) अत्यन्त श्रेष्ठ को (अप्रथतम्) विख्यात करो उससे (नः) हम लोगों के (जीवसे) जीवन को तथा (रजांसि) ऐश्वर्यों को (अकृणुतम्) सिद्ध करो ॥५॥ भावार्थ:-हे राजप्रजाजनो! जैसे यज्ञ से शोध हुए वायु और बिजुली समस्त चराचर जगत् को प्रशंसा के योग्य और नीरोग करते हैं वैसे विधान कर उससे हमारे ऐश्वर्य और जीवन को अधिक करो ॥५॥ फिर उन्हें कैसे सिद्ध कर क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । इन्द्रोविष्णू हविषा वावृधानान'द्वाना नमसा रातहव्या। घृतासुती द्रविणं धत्तमस्मे समुद्रः स्थः कलशः सोमधानः ॥६॥ पदार्थ:-हे ऋत्विज् और यजमानो जैसे (हविषा) होमे हुए पदार्थ से (वा- धाना) निरन्तर शुद्धि से बढ़े वा बढ़ाने (अनाद्वाना) अग्रभाग के भोगने को विभाग करने वाले और (नमसा) अन्नादि पदार्थ से (रातहव्या) देने योग्य देने वाले (घृता- सुती) सब ओर से जिन' की घी से प्रेरणा होती वे (इन्द्राविष्णू) वायु और सूर्य (अस्मे) हम लोगों में (द्रविणम्) धन और यश को धरते हैं वैसे तुम (धत्तम्) धरो तथा (सोमधानः) और सोमादि ओषधि जिसमें स्थापन की जाती हैं और (समुद्रः) अच्छे प्रकार जल तरंगें लेते हैं जिसमें वह अन्तरिक्ष वा मेघ (कलशः) घट के समान वर्तमान है उसके समान (स्थः) होते हो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है । हे ऋत्विग् और यजमान आदि जनो ! सुगन्धि और घृतादि पदार्थों के होम से वायु और सूर्य को शुद्ध कर सबके भाग्य की सिद्धि कर सब के सुख के बढ़ाने वाले होमो ॥६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं । इन् विष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्राजठर पृणेथाम् मा वामन्धाँसि मदिराण्यग्मन्नप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे ॥७॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको (दमा) दुःख के विनाश करने वालो (वाम्) तुम दोनों को जो (मध्यः) मधुरगुणयुक्त (मस्य, सोमस्य) सोम आदि प्रोषधियों से उत्पन्न हुए इस रस के (मदिराणि) प्रानन्द करने वाले (अन्धांसि) अन्न (अग्मन्) प्राप्त होवें उनको (इन्द्राविष्णू) वायु और बिजुली के समान (पिबतम्) पिनो और उनसे (जठरम्) उदर को (मा, पुणेथाम्) अच्छे प्रकार भरो । An MAMA KUNYMaintinkanalod एक (चन) भी (न) नहीं (परा, जिग्ये) पराजित होता है ।।८।। ऋग्वेदः मं० ६ । सू०७०।। फिर (मे) मेरे (ब्रह्माणि) पढ़े हुए वेदस्तोत्रों को और (हवम्) नित्य के वेदपाठ को (उप, शृणुतम्) समीप में सुनो ॥७॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो मनुष्य औषधों से शरीर के रोगों को तथा विद्या, सत्संग और धर्म के अनुष्ठान से प्रात्मा के रोगों को निवार के वायु और बिजुली के समान बलिष्ठ हो विद्याभ्यास करके विद्यार्थियों की परीक्षा करते हैं वे सब के दुःखों को निवृत्त कर प्रानन्द दे सकते हैं ॥७॥ फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं । उभा जिग्यथुन पर जयेथे न परां जिग्ये कतरश्चनैनोंः इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेयां त्रेधा सहस्त्रं वि तदैरयेथाम् ॥८॥ पदार्थ:-हे (विष्णो) बिजुली के समान व्याप्त होने वाले (हन्द्रः, छ) और परमैश्वर्यवान् वायु के समान वर्तमान तुम दोनों (यत्) जो (सहस्रम्) असंख्य सेना समूह है (तत्) उसे (धा) तीन प्रकार (अपस्पृधेथाम् ) स्पर्धा अर्थात् तर्क वितर्क से स्थापित करो और उसे (वि, ऐरयेथाम्) विविध प्रकार से यथास्थान स्थित कराम्रो ऐसा करो तो तुम (उभा) दोनों (जिग्यथः) विजय को प्राप्त होते हो (न) नहीं (परा, जयेथे) पराजय को प्राप्त होते हो तथा (एनोः) इनके बीच (कतरः) कोई न kanta भावार्थ:-हे सेनाबल के अधीशो! यदि आप लोग सर्वदा सेना की उन्नति के लिये और युद्धविद्या की वृद्धि के लिये प्रयत्न कीजिये तो सर्वत्र जीतिये, कहीं भी न पराजित हूजिये ।।८।। इस सूक्त में इन्द्र और विष्णु के समान सभा और सेनेश आदि के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में उनहत्तरवां सूक्त समाप्त हुप्रा ।। अथ षडवस्य सप्ततितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । धावा- पयिन्यो देवते । १ । ५ निचज्जगती।२। ३।४। ६ जगलीच्छन्दः । निषादः अब छः ऋचा वाले सत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में भूमि और सूर्य कैसे वर्तमान हैं इस विषय को कहते हैं।

६७४
ऋग्वेदः म० ६ । सू० ७० ।।
10
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घृतवती भुवनानाममिश्रियोर्वी पृथ्वी मंधुदुर्घ सुपेला ।
द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा ॥१॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो तुम (भुवनानाम्) समस्त लोकों सम्बन्धी (अभिश्रिया)
सब ओर से कान्तियुक्त (उर्वी) बहुत पदार्थों से युक्त और (पृथ्वी) विस्तार से युक्त
(घृतवती) जिन में बहुत उदक वा दीप्ति विद्यमान वे तथा (मधुदुधे) जो मधुरादि
रसों से परिपूर्ण करने वाले (सुपेशसा) जिनका शोभायुक्त रूप वा जिन से दीप्तिमान
सुवर्ण उत्पन्न होता (भूरिरेतसा) जिन से बहुत वीर्य वा जल उत्पन्न होता और
(अजरे) जो अजीर्ण अर्थात् छिन्न भिन्न नहीं वे (वरुणस्था) सूर्य वा वायु के (धर्मणा)
आकर्षण [खींचने] वा धारण करने आदि गुण से (विष्कभिते) विशेषता से धारण
किये हुए (द्यावापृथिवी) भूमि और सूर्य हैं उन्हें यथावत् जानो ॥१॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप भूगर्भ और बिजुली की विद्या को जानो
और जो दो पदार्थ सूर्य तथा वायु से धारण किये हुए हैं उनसे बल की
वृद्धि और कामना की पूर्णता करो ॥१॥
फिर वे कैसे हैं इस विषय को कहते हैं ।।
असंश्चन्ती भूरिधारे पय॑स्वती घृतं दुहाते सुकने शुचित्रते।
राजन्ती अस्य भुवनस्य रोदसी अस्मे रेत: सिञ्चतं यन्मनुहितम् ।।२॥
पदार्थ:--हे मनुष्यो जो (असश्चन्ती) अलग अलग वर्तमान (भूरिधारे)
जिनकी बहुत धारायें विद्यमान (पयस्वती) जो बहुत जलसे युक्त (सुकृते) जो ईश्वर
ने सुन्दर बनाये वा अच्छे कर्म कराने वाले' और (शुचिव्रते) पवित्र कर्मयुक्त हैं
तथा (अस्य) इस (भुवनस्य) ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध में (राजन्ती) प्रकाशमान हैं वे
(रोक्सी, आकाश और पृथिवी (अस्मे) हम लोगों में (यत्) जो (मनुहितम्)
मनुष्यों का हित करने वाला है. उस (धृतम्) जल को दुहाते) पूर्ण करते हैं उस
(रेत:) जल वा वीर्य को (सिञ्चतम्) सींचते हैं उन्हें यथावत् उपकार के लिये
प्राप्त होमो ॥२॥
भावार्थः- हे मनुष्यो ! सूर्य और भूमि ही सब जगत् की रक्षा के
निमित्त बहुत उदक प्रादि पदार्थयुक्त और सब के काम को पूर्ण करते हैं
उनको यथावत् जानकर कार्य की सिद्धि के लिये अच्छे प्रकार उनका
प्रयोग करो ॥२॥

ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ७० ।। M AB फिर इन को जान कौन कैसा होता है इस विषय को कहते हैं ।। यो वामृजवे क्रमणाय रोदसी मतो ददा धिषणे स साधति । प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि युवो सिक्ता विघुरूपाणि सर्वता ॥३॥ पदार्थ:-हे राज प्रजाजनो! जो (धिषणे) प्रज्ञा और प्रगल्भता के कारण (रोदसी) आकाश और पृथिवी (वाम्) तुम लोगों के (ऋजवे) सरलपन के लिये और (क्रमणाय) गमन वा आगमन के लिए होते हैं उनको (यः) जो (मतः मनुष्य (ददाश) देता है (सः) वह कार्यों को (प्र, साधति) प्रसिद्ध करता है और (प्रजाभिः) उत्पन्न हुए पदार्थों के साथ (जायते) प्रसिद्ध होता है और (युवोः) तुम्हारे (धर्मणः) धर्म से (विषुरूपाणि व्याप्त रूप (सवता) समान कर्मों को तथा (सिपला) वीर्य वा' उदकों को सींचे हुए करते हैं वे (परि) सब ओर से सिद्ध करने योग्य हैं ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! .जो भूगर्भविद्या और द्यावापृथिवी के कर्मों को जानते हैं वे प्रजा, पशु, विद्या और राज्य से युक्त होते हैं ॥३॥ फिर वे कैसे हैं और क्या प्राप्त कराते हैं इस विषय को कहते हैं । प्रतेन द्यावापृथिवी अभीटते घृतथिषा घृतपृचा धूतावृषो । उस पृथ्वी होतृव्ये पुरोहित ते इद्विप्रा ईळते मुम्नमिष्टये ॥४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (विप्राः) मेधावी बुद्धिमान् पुरुष (वृतेन) जल से तथा (उर्वी) बहुत गुण और पदार्थों से युक्त (अभीवृते) सब ओर से वर्तमान (घृतश्रिया) अत्यन्त प्रकाश वा अवकाश धन जिन का (घृतपृचा) जो प्रकाश वा जल से अच्छे प्रकार संबन्ध किये हुए और (घृतधा) तेज से बढ़ते हैं तथा (होतृवर्षे) होताजन जिन से स्वीकार होते और युरोहिते) आगे से हित को धारण करते हुए (इष्टये) संग के लिये पृथ्वी) बहुत विस्तारयुक्त जो (सावापृथिवी) बिजुली और अन्तरिक्ष हैं उनकी (ईळते) प्रशंसा करते हैं (ते, इत्) वे ही सब से सुम्नम्) सुख पाते हैं ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे उत्तम बुद्धिमान् जन बिजुली और अन्त- रिक्ष की विद्या को जान के कार्यों में लगाते हैं वैसे तुम भी उनका प्रयोग करो ॥४॥ फिर उनसे क्या करने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।। 4u 42 G 2 ऋग्वेदः मं० ६ । सू०७०॥ RRIAN AMER मधु नो द्यावापृथिवी मिमिक्षतां मधुश्चुता मधुदुधे मधुबते । दाने यज्ञं द्रविणं च देवता महि श्रवो वाजेमस्मे सुवीर्यम् ।।६।। पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको जो (अधुश्चुता) मधुर जल के वर्षाने और (मधुदुधे) मधुर जल से काम पूरे करने (मधुव्रते) जिनके मधुर काम (देवता) जो दिव्यरूप (अस्मे) हम लोगों में (यज्ञम्) संगतिमय व्यवहार (क्षिणम्) धन (महि) महान् (श्रवः) अन्न (वाजम्) विज्ञान (सुवीर्यम्, च) और उत्तम पराक्रम को भी (वधाने) स्थापन करते हुए (धावापृथिवी) सूर्य और भूमि यह दोनों पदार्थ वर्तमान हैं उनसे तुम (न:) हमारे लिये (मयु) मधुर जल के (मिमिक्षताम) सींचने की इच्छा करो ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे भूमि भोर सूर्य सत्य कर्मयुक्त, इच्छा पूरी करने और मधुरादि रस देने, धन, अन्न, बल और विज्ञान के बढ़ाने वाले हों बैसा अनष्ठान करो ॥५॥ फिर वे कैसे किसके तुल्य और क्या करते हैं इस विषय को कहते हैं। अर्ज नो द्योश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा। संरराणे रोदेसी विश्वशंभुवा सनि वाजें रयिमस्मे समिन्वताम् ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (विश्वविदा) जिन से सर्व सुख को प्राप्त होते हैं (सुदंससा) जिनसे सुन्दर काम सिद्ध होते हैं (संरराणे) जो अच्छे प्रकार सुख देते हैं और (विश्वशंभुवा) जो सब के लिये सुख की भावना कराते वे (रोदसी) बहु- पदार्थयुक्त द्यावापृथिवी (अस्मे) हम लोगों में (सनिम्) अच्छे प्रकार विभाग को और (बाजम्) विज्ञान वा अन्न तथा (रयिम्) धन को (सम्, इन्वताम्) उत्तमता से व्याप्त हों तथा (पिता) पिता के समान (धौः) सूर्य वा विद्युत् अग्नि (च) और (माता) माता के समान (पृथिवी) भूमि (च) भी (नः) हमारे लिये (कर्जम) अन्न वा पराक्रम को (पिन्वताम्) सुखपूर्वक परिपूर्ण करें उनको यथावत् जानो ॥६॥ भावार्थ: - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! आप जो सूर्य पिता के समान, जो पृथिवी माता के समान ये दोनों सर्व सुख देने वा धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वा मंगल कराने वाले उत्तम क्रिया- युक्त और बल वा पराक्रम देने वाले वर्तमान हैं उनको उत्तम यत्न के साथ कसे न जानो ॥६॥ fashan Aata -- .

और (यः) जो (चतुष्पदः) गौ प्रादि चार पग वाले पशु आदि जीवों के (भूमनः) ऋग्वेदः मं०६ । सू०७१ ॥ ६७७ इस सूक्त में द्यावापृथिवी और उनके समान अध्यापक और उपदेशक वा ऋत्विक और यजमानों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए। यह छठे मण्डल में सत्तरवां सूक्त समाप्त हुश्रा ।। अथ षड्जस्य कसप्ततितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । सविता देवता। १ जगती। २ । ३ निचजगतीच्छन्दः । निषादः स्वरः । ४ त्रिष्टुम् । ५। ६ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब छः ऋचा वाले इकहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में फिर राजा कैसा हो इस विषय को कहते हैं। उदु ष्य देवः सविता हिरण्यर्थ बाहू अयंस्त सर्वनाय सुक्रतुः । घृतेनं पाणी अभि प्रष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो पदार्थः -- जो (मखः) यज्ञ के समान सुख करने वाला (विधर्मणि) विशेष धर्म में (दक्षः) सुन्दर बल जिसका वह (युवा) जवान (सुक्रतुः) उत्तम बुद्धियुक्त, (सविता) ऐश्वर्यवान् (देव:) विद्वान् (सवनाय) ऐश्वर्य के लिये (घतेन) जल वा धी से युक्त (पाणी) प्रशंसा करने योग्य (हिरण्यया) सुर्वण आदि प्राभूषण युक्त (बाहू) भुजायों को (उद, अयंस्त) उठाता है (स्य:, ) वही (रजसः) लोक के विरोधियों को (अभि, पृष्णते) सब ओर से भस्म करता है ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो विद्वान् प्रति बल से युक्त भुजाओं वाला, अत्यन्त बुद्धिमान्, विशेषता से धर्मात्मा होकर ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये निरन्तर उद्यम करता है वह ऐश्वर्य को प्राप्त होकर फिर सब प्रजा के धर्म में प्रवेश कर जैसे यज्ञ सुख देता है वैसे सुखी करता है ॥१॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। देवस्य वयं संवितुः सर्वामनि श्रेष्ठ स्याम वसुनश्च दाबनें। यो विश्वस्य द्विपदो यश्चतुष्पदो निवेशने प्रसवे चासि भूमनः ॥२॥ पदार्थ:-है विद्वान् राजा (यः) जो (द्विपदः) मनुष्यादि दो पग वाले जीव विधर्मणि ॥१॥ Ane MOM बहुरूपी (विश्वस्य) समग्र संसार के (प्रसवे) उस उत्पन्न हुए स्थान में (निवेशने) Raml ६७८ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ७१ ।। क th pe m tant ! जिसमें सब निवेश करते हैं अभिव्याप्त होकर विराजमान है उस (सवितः) सकल जगत् के उ.पन्न करने वाले (देवस्य) अपने आप प्रकाशमान परमेश्वर के (श्रेष्ठ) प्रशंसित व्यवहार में (सवीमनि) उत्पन्न हुए जगत् में (वसुनः, च) धन के भी (दावने) देने में जैसे (वयम्) हम लोग उद्यत (स्याम) हों वैसे तुम (च) भी जिस कारण (असि) हो इससे यहां राजा होनो ॥२॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे विद्वानो ! जैसे इस जगत् में जगदीश्वर अभिव्याप्त होकर सब की रक्षा करता है वैसे हो इस जगत् में व्याप्त होकर विद्या और विनय से समस्त राज्य को पुत्र के समान पालो ॥२॥ फिर वह राजा कैसा और किस से क्या करे इस विषय को कहते हैं । अदब्धेभिः सथितः पायुभिष्ट्वं शिवेभिरद्य परि पाहि नो गय॑म् । हिरण्यजिह्वा सुविताय नव्य से रक्षा माकिर्नो अघशेस ईशत ॥३॥ आप अद्य) अब (महब्धेभिः) न नष्ट करने वा नष्ट होने और (शिवेभिः) सुख करने वा मंगल विधान करने वाले (पायुभिः) रक्षा के निमित्तों से (नः) हमारे (गयम्) संतान धन और घर की (परि, पाहि) सब ओर से रक्षा करो तथा (हिरण्यजिह्वः) सुवर्ण के समान सत्य से जिसकी वाणी प्रकाशित है ऐसे होते हुए (नव्य से) अतीव नवीन (सुविताय) ऐश्वर्य के लिए हमारे पुत्रादिकों की (रक्ष) रक्षा करो जैसे (अघशंसः) चोर (नः) हम लोगों के प्रति (माकिः) न (ईशत) विघ्नों के करने को समर्थ हो वैसा करो ॥३॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा प्रयत्न के साथ प्रजाओं की अच्छे प्रकार रक्षा कर डाकुओं को मारे वही नवीन नवीन ऐश्वर्य को उत्पन्न कर निरन्तर प्रजाजनों का प्यारा और धार्मिक हो ॥३॥ फिर उसी विषय को कहते हैं ।। उदु ष्य देवः सविता दमूना हिरण्यपाणिः प्रतिदोषमस्थात् । अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाशुषे सुवति भूरि वामम् ॥४॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो जो (दमूना:) दमनशील (हिरण्ययाणिः) सुवर्ण आदि हाथ में लिये हुए (प्रयोहनुः) लोहे के समान दृढ़ ठोढ़ी रखने और (यजतः) संग

ऋग्वेदः मं०.६ । सू०७१ ॥
६७६
.
न
Nawara
am.
miere-
करने वाला (मन्द्र लिह्वः) जिसकी प्रानन्द देने वाली वाणी विद्यमान वह (सविता)
ऐश्वर्यदाता और (देव:) सुख देनेहारा विद्वान् (प्रतिवोवम्) जैसे रात्रि रात्रि के प्रति
सूर्य उदय होता है वैसे प्रजा पालन करने के लिये (उद, अस्थात्) उठता है तथा
(दाशुषे) दान करने वाले के लिए (भूरि) बहुत (धामम्) प्रशंसा योग्य कर्म के प्रति
(मा, सुमति) उद्योग करने में प्रेरणा देता है (स्यः, उ) वही राजा होने को योग्य
होता है।॥४॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे
ईश्वर से नियुक्त किया सूर्यलोक प्रतिक्षण अपनी क्रिया को नहीं छोड़ता
वैसे ही जो राजा न्याय से राज्य पालने के लिये प्रतिक्षण उद्योग करता है,
एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोता तथा सब मनुष्यों को उत्तम कर्मों के बीच,
प्राप वर्ताव कर, उन्हें प्रेरणा देता है वही शम दम आदि शुभ गुणों से
युक्त राजा होने योग्य है यह सब जानें ॥४॥
फिर वह राजा किसके तुल्य कैसा हो इस विषय को कहते हैं ।।
उर्दू अयाँ उपवक्ते बाहू हिरण्ययर्या सविता सुप्रतीका ।
दिवो रोहास्यरुहत्पृथिव्या अरीरमत्पतयत्कञ्चिदभ्वम् ॥६॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (सविता) सूर्यमण्डल (दिवः) अाकाश की (रोहासि)
चढ़ाइयों को (महत्) चढ़ता है और (पृथिव्याः) अन्तरिक्ष के मध्य में भूमि के
समस्त (अभ्वम्) महान् न्याय को (अरोरमव) वत्तांचे' (चिद) और (पतयत) पति
के समान आचरण करे वैसे जिसकी (सुप्रतीका) सुन्दर प्रतीति करने वाले काम
जिनसे होते ऐसे (हिरण्यया) हिरण्य के समान सुदृढ़ सुशोभित (बाहू) भुजा वर्तमान
हैं वह (3) ही (उपवक्तेब) समीप कहने वाले के समान (कव) कब (उत, प्रयान्)
उदय हो ॥५॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-हे
राजन् ! आप कब सूर्य के समान न्याय और विनय से प्रकाशित,
सुन्दर
दृढ़ अङ्गयुक्त,
श्रेष्ठ धर्मज्ञ विद्वानों के समान वक्ता होो। जैसे इस जगत्
में सर्वोपकार के लिये ईश्वर ने सूर्य बनाया है वैसे ही सब के सुख के लिये
राजा बनाया है ॥५॥
फिर वह प्रजात्रों के लिये क्या करे इस विषय को कहते हैं ।
वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिदिवे वाममस्मभ्य सावीः ।
वामस्य हि क्षयस्य देव भूरैरया धिया वामभाज: स्याम ॥६॥

६८० ऋग्वेदः मं०६। सू०७२ ।। पदार्थ:-हे (सवितः) ऐश्वर्या के देने वाले (देव) दिव्यगुणयुक्त राजन् ! जैसे (हि) जिस कारण से प्राप (अध) अब (वामम्) प्रशंसा करने योग्य सुख (उ) और (श्व:) अगले दिन (वामम्) प्रशंसा करने योग्य सुख तथा (विवेदिवे) प्रतिदिन (वामम्) अति उत्तम सुख (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (सावी:) उत्पन्न करो उससे उस (प्रया) इस (धिया) प्रज्ञा वा कर्म से (भूरेः) बहुत प्रकार के (वामस्य) प्रशंसित (क्षयस्य) घर के (वामभाजः) वामभाज' अर्थात् प्रशंसित सुख भोगने वाले हम लोग (स्थाम) हो ॥६॥ भावार्थ:- हे राजन् ! जिससे आप हम प्रजाजनों के लिये प्रशंसनीय सुख को उत्पन्न करते और रक्षा का विधान करते हो वैसे हम लोग सुख से धन, घर और प्रशंसित कामों के सेवने वाले होकर आपकी आज्ञा में नित्य वत्तें ॥६॥ इस सूक्त में सविता, राजा और प्रजा के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में इकहत्तरवां सूक्त समाप्त हुमा । अथ पञ्चर्चस्य द्विसप्ततितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । इन्द्रा- सोमो देवते । १ निवृत्त्रिष्टुप् । २।४ । ५ विरात्रिष्टुप् । ३ निस्त्रिष्टुप्छन्दः । घेवतः स्वरः॥ अब बहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अध्यापक और उपदेशक किसके तुल्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । इन्द्रासोमा महि तद्वौ महित्वं युवं महानि प्रथमानि चक्रथुः । युवं सुर्य विविदथुयुवं स्व१'विश्वा तमांस्यहतं निदश्च ॥१॥ पवार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको जैसे (इन्द्रासोमा) बिजुली और चन्द्रमा (सूर्यम्) सूर्य को (विविदथः) प्राप्त होते हैं वैसे (युवम्) तुम न्यायरूपी सूर्य को प्राप्त होमो जैसे यह बड़े कामों को करते हैं वैसे (वाम) तुम्हारा (तत्) वह (महि) महान् (महित्वम्) बड़प्पन है और वैसे (युवम्) तुम (महानि) प्रशंसा योग्य (प्रथ- मानि) ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण और दान भादि कामों को (चक्रथः) करो (युवम्) तुम जैसे यह दोनों (विश्वा) समस्त (तमासि) रात्रि के समान अविद्या प्रादि अन्धकारों को नष्ट करते हैं वैसे अविद्या और अन्याय से उत्पन्न हुए पापों को m प pE प्रकाश के समान (अमन्यता ऋग्वेदः मं० ६ । सू०७२॥ (अहतम्) नष्ट करो और (स्वः) सुख की प्राप्ति करो वा करामो (निदः, च) और निन्दक तथा पाखण्डियों को निरन्तर नष्ट करो॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है । हे प्रजाजनो ! जैसे सूर्य को प्राप्त होकर चन्द्र प्रादि लोक प्रकाशित होते हैं वैसे ही अध्यापक और उपदेशकों का संग कर सब प्रकाशित प्रात्मा वाले हों॥१॥ फिर वे किसके तुल्य क्या करते हैं इस विषय को कहते हैं । इन्द्रासोमा वासयंथ उपासमुत्सूर्य जयथो ज्योतिषा सह । उप यां स्कम्मथुः स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि ॥२॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको जैसे (इन्द्रासोमा) वायु और बिजुली (उषासम्) प्रभातकाल को (उत्) और (सूर्यम्) सूर्यमण्डल को वसाते हैं वैसे विद्या और न्याय से प्रजाजनों को तुम (वासयथः) वसानो जैसे दोनों (ज्योतिषा) ज्योति के (सह) साथ (धाम्) प्रकाश को रोके वैसे अच्छे व्यवहार को (उप, स्कम्भः) व्यवहार करने वाले के समीप रोको जैसे यह दोनों (स्कम्भनेन) रोकने से (मातरम्) माता के समान वर्तमान (पृथिवीम्) पृथिवी को विस्तारते हैं वैसे ही राज्य को (वि, अप्रथतम्) विशेषता से विस्तारो सौर सुख को (नयथ:) प्राप्त करो ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे अध्यापक और उपदेशको ! जैसे बिजुली और पवन सूर्य आदि लोकों का निवास कराते हैं वैसे ही प्रजाजनों को अच्छे उपदेश से सुख में बसानो॥२॥ फिर वे किसके तुल्य' कैसे वर्ताव करावें इस विषय को कहते हैं । इन्द्रासोमावहिमपा परिष्ठां हथो वृत्रमर्नु वां चौरमन्यत । पाणीस्यैरयतं नदीनामा समुद्राणि पप्रथुः पुरूणि ॥३॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको तुम दोनों जैसे (इन्द्रासोमो) बिजुली और पवन (परिष्ठाम् ) सब ओर से स्थित होने वाले (त्रम्) सूर्यावरक (महिम) मेघ को (हथः) छिन्नभिन्न करते और (अपः) जलों को (मा, पप्रथः) व्याप्त होते हैं । वैसे अविद्या को नष्ट भ्रष्ट कर विद्या को विस्तारो। जैसे यह दोनों (नदीनाम्) नदियों के (पुरूणि) बहुत (समुद्राणि) उन स्थानों को जिनमें अच्छे प्रकार जल तरने लेते हैं तथा (अर्णासि) जलों को प्रेरणा देते हैं वैसे शास्त्रों के बीच मनुष्यों के अन्तः। करणों को (प्र, ऐरयतम्) प्रेरित करो ऐसे (वाम्) तुम दोनों के बीच एक (चौ:)

६८२ ऋग्वेदः मं०६ । सू० ७२॥ 4AR - भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे अध्यापक और उपदेशको ! जैसे वायु और बिजुली मेघ को नष्ट भ्रष्ट कर जल को वर्षात हैं वैसे कुत्सित शिक्षा को विनष्ट कर अच्छी शिक्षा की वर्षा करो ॥३॥ फिर वे किसके तुल्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । इन्द्रासोमा पक्वमामास्वन्तर्नि गवामिबंधथुर्पक्षणामुं। जगुमथुरनपिनद्धमासु रुच्चित्रासु जगतीध्वन्तः ॥४॥ पदार्थः- है अध्यापक और उपदेशको ! तुम दोनों जैसे (इन्द्रासोमा) पवन और बिजुली (आमासु) न पकी हुई सामग्रियों के (अन्तः) बीच (पक्वम् ) पोक को (नि, वधयः) स्थापन करते हैं और (गवाम्) किरणों के बीच (इव) निश्चित तथा (मासु) इन (वक्षणासु) नदियों में (अनपिनवम्) खुला हुआ (जगृभयः) ग्रहण करते हैं तथा इन (चित्रास) अद्भुत (जगतीषु) सृष्टियों के (अन्तः) बीच' (रुशत) सुरूप को धारण करते हैं वैसे तुम वर्तो॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो बिजुली और सोम के समान सब में दृढ़ ज्ञान स्थापन कर नदी के प्रवाह के तुल्य आगे चलाते हैं वे संसार में कल्याण करने वाले होते हैं ॥४॥ फिर वे किसके तुल्य क्या करें इस विषय को कहते हैं । इन्द्रासोमा युवमङ्ग तसूत्रमपत्यसाचं श्रुत्य रराथे। युवं शुष्मं नर्य चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनापाईमुग्रा ॥५॥ पदार्थ:-(प्रङ्ग) हे मित्र अध्यापक और उपदेशक (युवम) तुम दोनों (इन्द्रासोमा) वायु और बिजुली के समान वर्तमान (तस्त्रम्) दुःख से तारने और (अपत्यसाचम्) सन्तान के बीच व्याप्त होने वाले (श्रु त्यम्) श्रवरणों में उत्तम ज्ञान को (रराथे) देनो और (यवम्) तुम दोनों (चर्षणिभ्यः) मनुष्यों के लिए (उग्रा) तेजस्वी होते हुए (पतनाषाहम्) सेनाओं को सहने वाले (नर्यम्) मनुष्यों में उत्तम (शुष्मम्) बल को (सम्, विव्यथः) अच्छे प्रकार युक्त करो ॥५॥ भावार्थ:-हे अध्यापक वा उपदेशको! आप लोग पवन और बिजुली के समान सर्वत्र अनुकूलता से संग वाले होते हुए उत्तम सन्तानों को उत्पन्न कर मनुष्यों के हित करने वाले शरीर और आत्मा के बल को उत्पन्न करें जिससे शत्रुओं की सेना को सह सकें ॥५॥ PARAN FRHA क- ऋग्वेदः मं०६। सू० ७३ ।। इस सूक्त में इन्द्र, सोम, अध्यापक और उपदेशकों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह छठे मण्डल में बहत्तरवां सूक्त समाप्त हुभा ॥ mma rah काम अथ त्र्यचस्य त्रिसप्ततितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्य ऋषिः । बृहस्प- तिर्देवता । १ । २ त्रिष्टुप् । ३ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।। अब तीन ऋचावाले तिहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा किसके तुल्य कैसा हो इस विषय को कहते हैं ।। यो अदिमित्प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान् । द्विबहज्मा प्राधर्मसत्पिता न आ रोदसी वृषभो रोरवीति ||१|| पदार्थ:-हे राजन् (य:) जो (प्रथमजाः) प्रथम उत्पन्न हुभा (अद्रिभित्) मेघों का विदीर्ण करने और (ऋतावा) जल को अच्छे प्रकार सेवने वाला (बृहस्पतिः) पृथिवी आदि का रक्षक और (प्राङ्गिरसः) वायु और बिजुलियों में उत्पन्न हुमा (हविष्मान्) जिसमें हवि होमे हुए विद्यमान जो (विबर्हज्मा) दो से बढ़ता है उससे युक्त भूमि जिसकी वह (प्राधर्मसद) प्रताप का सेवने वाला (नः) हमारा (पिता) पालने वाले के समान (वषम:) वर्षा कराने वाला मेघों को छिन्न भिन्न करने वाला (रोदसी) आकाश और पृथिवी को प्राप्त हो (श्रा, रोरवीति) बिजुली आदि के योग से सब ओर से शब्द' करता है उसके तुल्य तुम होप्रो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा मेघ का सूर्य जैसे वैसे शत्रुओं का विदीर्ण करने वाला, ज्येष्ठ, महात्मा, धर्मात्मा जनों की पालना करने वाला, प्रजावान्, पृथिवी पर सुख वर्षानेहारा होकर प्रजाओं में न्याय का निरन्तर उपदेश करे वही पृथिवी के तुल्य क्षमाशील और प्रतापवान् तथा प्रजाजनों में पिता के समान वर्ते ॥१॥ फिर उस राजा को कैसे सेना के अधिकारी करने चाहिये इस विषय को कहते जाय चिद्य ई त उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार । घ्नन्वृत्राणि वि पुरो दर्दरीति जयञ्छरमित्रान्पृत्सु साहन् ॥२॥ पदार्थः - हे मनुष्यो (य:) जो (देवहूतौ) विद्वानों के बुलाने में (बृहस्पतिः) बड़ों की पालना करने वाले सूर्यलोक के समान (ईवते) समीप आने वाले (जनाय) मनुष्य के लिये (लोकम्) देखने योग्य सुख वा स्थान को प्रकाशित (चकार) करता Amst ६८४ ऋग्वेदः मं०६ । सू०७३ ॥ . तथा (पृत्सु) संग्रामों में (साहन्) सहन करता हुआ (अमित्रान्) विरोधी उदासीन जनों को (जयन्) जीतता और (शत्रून्) शत्रुओं को (नन्) मारता हुआ तथा (वृत्राणि) धरों को प्राप्त होता हुआ (पुरः) शत्रुओं के नगरों को (वि, दर्दरीति) निरन्तर विदीर्ण करता है वह (उ, चित्) ही सेनापति होने योग्य है ॥२॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो न्याय से प्रजा पालने के लिये प्रसन्न, पूर्णशरीरात्मबलयुक्त, वीर विद्वान् होवें वे सेनापति हों जिससे शत्रुओं के जीतने और उनकी सेना के सहने और उसे छिन्न भिन्न करने तथा विजय और धन को पाने को समर्थ हों।।२।। फिर वह कैसा हो इस विषय को कहते हैं । बृहस्पतिः समंजय नि मही बजान् गोमतो देव एषः। अपः सिषासन्तस्वर'प्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमः ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (महः) महान् (देवः) देदीप्यमान (एषः) यह (बृहस्पतिः) सूर्य के समान वेदवाणी को पालने वाला (गोमतः) बहुत किरणों से युक्त (अजान्) मेघों को छिन्न भिन्न कर (अपः) जलों को वर्षाय जगत् की पालना करता है वैसे शत्रुओं से (अप्रतीतः) न प्रतीति को प्राप्त होता हुआ (बृहस्पतिः) बड़े राज्य की यथावत् रक्षा करने वाला राजा (अकः) वज्र आदि के साथ प्रजा- जनों के (सिषासन्) काम पूरे करने की इच्छा कर (अमित्रम्) शत्रु को (हन्ति) मारता है तथा शत्रुओं को (सम्, अजयत्) अच्छे प्रकार जीतता है तथा (वसूनि) धनों को प्राप्त होता और (स्व:) अन्तरिक्ष के समान अक्षय सुख को उत्पन्न करता है ॥३॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा सूर्य के समान विद्या, विनय और अच्छे सहाय से प्रकाशमान, प्रजाजनों की पालना करता और सब के लिये अभयदान देता हुआ दुष्टकर्म करने वालों की निवृत्ति करता है वही यहां राजाओं में महान् राजा होता है ॥३॥ इस सूक्त में बृहस्पति के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह छठे मण्डल में तिहत्तरवां सूक्त समाप्त हुआ।

ऋग्वेदः मं०६ । सू०७४ ।। map - अथ चतुऋचस्य चतुःसप्ततितमस्य सूक्तस्य भरद्वाजो बार्हस्पत्व ऋषिः । सोमारुद्रो देवते । १।२। ४ त्रिष्टुप् । ३ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब चार ऋचा वाले चौहत्तर सुक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में राजा और वैद्य कैसे श्रेष्ठ हों इस विषय को कहते हैं । सोरुिद्रा धारयथामसुर्य प्रवामिष्टयोऽरमश्नुवन्तु । दमैदमे सप्त रत्ना दधाना शं नो भृतं द्विपदे शं चतुष्पदे ॥१॥ पदार्थ:-हे (सोमारुखा) चन्द्रमा और प्राण के तुल्य राजा और वैद्यजनो तुम दोनों (असुर्यम्) मेघ के इस कर्म को (धारयेथाम्) धारण करो जिससे' (वाम्) तुम को (इष्टयः) इच्छाओं की प्राप्तियां (परम्) पूरी (प्र, अश्नुवन्त) मिलें तथा (दमेदमे) घर घर में (सप्त) सात (रत्ना) रमणीय हीरा प्रादि को (दधाना) धारण किये हुए (न:) हमारे (द्विपदे) दो पग वाले मनुष्य आदि के लिये (शम्) सुख करने वाले (भूतम्) होमो और (चतुष्पदे) गौ आदि चौपाये जीवों के लिये (शम्) सुख करने वाले होमो ॥१॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-हे मनुष्यो ! जो राजा चन्द्रमा के तुल्य और जो वैद्य प्राण के तुल्य सब को निर्भय और नीरोग करें वे सब सुखों को प्राप्त होते हैं जो प्रजा के घर-घर में धन और आरोग्य को बढ़ावें वे द्विपग वाले और चार पग वालों से बहुत सुखों को प्राप्त होते हैं ॥१॥ फिर वे किसको निवारि के क्या करें इस विषय को कहते हैं । सोमांरुद्रा वि इतं विधूचीममीवा या नो गयमाविवेश । आरे बांधेयां निति पराचैरस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु ॥२॥ पदार्थ:-हे (सोमारुद्रा) मोषधी और प्राणों के समान सुख उत्पन्न करने वाले राजा और वैद्य जनो ! तुम (या) जो (अमीवा) रोग (न:) हमारे (गयम्) घर वा संतान को (प्राविवेश) प्रवेश करता है उस (विषूचीम्) विषूच्यादि को (छि, वहतम्) छिन्न भिन्न करो तथा (पराचैः) पराजित हुए दुष्टों की (निऋतिम्) दुःख देने वाली कुनीति को (प्रारे) दूर (बाधेथाम्) हटाओ, जिस कारण (अस्मे) हम लोगों में (भद्रा) सेवन करने योग्य (सौश्रवसानि) उत्तम अन्नादि पदार्थों में सिद्ध अन्न (सन्तु) हों ॥२॥ भावार्थ:- :-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा और Home A- ६८६ ऋग्वेदः मं० ६ । सू०७४ ।। वैद्यवर रोगों को शरीर के प्रवेश से पहिले ही दूर करते हैं तथा कुनीति और कुपथ्य को भी पहिले दूर करते हैं उनके पुरुषार्थ से सब मनुष्य बहुत धनधान्य और आरोग्यपनों को प्राप्त होते हैं ॥२॥ फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं । सोमारुद्रा युवमेतान्यमे विश्वा तनूर्षु भेषजानि धत्तम् । अव स्थतं मुञ्चतं यनो अस्ति तनूर्षु बद्धं कृतमेनो अस्मत् ।।३।। पदार्थ:-हे (सोमारधा) यज्ञ से शुद्ध किये हुए सोमलता और वायु के समान राजा और वैद्यो (युवम्) तुम (यत्) जो (नः) हमारे (तनूषु) शरीरों में (कृतम्) किया हुआ और (बद्धम्) लगा हुआ (एनः) कुपथ्यादि वा अपराध (अस्ति) है उसे (अस्मत) हम से (मुञ्चतम्) छुड़ानो और हमारे रोगों को (प्रव, स्थतम्) नष्ट करो तथा (अस्मे) हमारे (तनूषु) शरीरों में (विश्वा) समस्त (एतानि) यह (भेषजानि) औषधे (धत्तम्) स्थापन करो ॥३॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु -हे राजन् ! आप वैद्य विद्या का प्रचार कर हमारे शरीरों को नीरोग कर और पुरुषार्थ में प्रवेश करा के दुःखों को अलग कर अच्छे वैद्यों का सत्कार करो ॥३॥ फिर वे क्या करें इस विषय को कहते हैं । तिम्मायुधौ तिग्महती सशेवी सोमारुद्राविह मु मुळतं नः। प्र नौ मुञ्चतं वरुणस्य पाशाद् गोपायात ना सुमनस्यमांना ॥४॥ पदार्थ:-हे (सोमास्त्रौ) शुद्ध प्रोषधी और प्राणों के समान वर्तमान (तिग्मायुधौ) तेज आयुधों तथा (तिग्महेती) पैने वज़ वालो (सुशेवो) अच्छे सुख युक्त वैद्य और राजा जनो तुम (इह) इस संसार में (न:) हम लोगों को (सु, मृळतम्) अच्छे प्रकार सुखी करो तथा (न:) हम लोगों को (वरुणस्य) उदान के समान बलवान् रोग के (पाशात) बन्धन से (प्र, मुञ्चतम्) छुड़ानो और (सुमनस्यमाना) सुन्दर विचारवान् होते हुए (न:) हम लोगों की निरन्तर (गोपायतम्) रक्षा करो ॥४॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-हे मनुष्यो ! जैसे महौषधि और बहिःप्राण वायु सबकी सदा पालना करते हैं वैसे उत्तम राजा और वैद्यजन समस्त उपद्रव और रोगों से निरन्तर रक्षा करते हैं ॥४॥ 03390 R

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ऋग्वेद: म० ६ । सू० ७५॥
६८७
इस सूक्त में प्रोषधि और प्राण के समान वैद्य और राजा के कामों का वर्णन
होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ
संगति जाननी चाहिये ।।
यह छठे मण्डल में चौहत्तरवां सूक्त समाप्त हुभा ॥
अर्थकोनविंशत्यूचस्य पञ्चसप्ततितम्भस्य सूक्तस्य पायुभारद्वाज ऋषिः।१
वर्म । २ धनुः । ३ ज्या। ४ मानौ । ५ इषुधिः । ६.' सारथिः । ६.१ रश्मयः । ७
प्रश्वाः । ८ रथः । ६ रथगोपाः । १० लिङ्गोक्ता देवताः । ११ । १२ । १५॥ १६
इषवः । १३ प्रतोदः । १४ हस्तघ्नः । १७-१६ लियोक्ता देवताः सङ्ग्रामाशिषः
(१७ युद्धभूमिब्रह्मणस्पतिरनितिश्च । १८ कवचसोमवरुणाः । १६ देवा ब्रह्म च) १।
३ निवृत्रिष्टुप् । २ । ४।५। ७।८।६ । ११ । १४ । १८ त्रिष्टुप्छन्दः ।
वतः स्वरः । ६ जगती । १० विराड जगती छन्दः । निषाद: स्वरः । १२ । १९
विराडनुष्टुप् । १५ निचूदनुष्टुप् । १६ अनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः । १३ स्वराड-
ष्णिक्छन्दः । ऋषभः स्वरः । १७ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।।
अब उन्नीस ऋचावाले पिचहत्तरवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में
शूरवीर किसे धारण कर क्या क्या करें इस विषय को कहते हैं।
जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वी याति समदामुपस्थे ।
अनाविद्धया तन्वा जय त्वं स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्त ॥शा
पदार्थ:-हे वीर (यत्) जो (जीमूतस्येव) मेघ के समान (प्रतीकम्) प्रतीति
कराने वाला वर्म (भवति) होता है उससे (वर्मों) कव वधारी होकर (समदाम्)
अहकारों के साथ वर्तमान संग्रामों के (उपस्थे) समीप (याति) जाता है तथा
(अनाविद्धया) शस्त्रास्त्ररहित अर्थात् अनविधे (तन्वा) शरीर से (स्वम्) तुम शत्रुओं
को (अय) जीतो (स.) सो (बर्मणः) कवच' का (महिमा) महत्त्व' (त्या) तुम्हें
(पिपत) पाले ॥१॥
भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-जो मेघ के समान सुन्दर
कवचों को धारण कर युद्ध करते हैं वे घाव से रहित शरीर वाले
वैरियों को जीत सकते हैं, जिस जिस प्रकार से शरीर में घाव करने वाले
नोकदार शस्त्र न प्राप्त हों उन-उन उपायों का वीरजन सदैव आश्रय
-
RAN
AMAN
-
to
करें ॥१॥

ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ७५ ॥
फिर वीर किससे क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।
धन्वना गा धन्वनाजि जयेम धन्वना तीवाः समदों जयेम ।
धनु: शत्रौरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम ॥२॥
पवार्थ:-हे वीर पुरुषो जो (धनुः) धनुष् (शत्रोः) शत्रु के (अपकामम्)
काम का विनाश (कृणोति) करता है जिस (धन्वना) धनुष् से जैसे हम (गाः)
भूमियों को (धन्वना) धनुष् से (प्राजिम्) संग्राम को (जयेम) जीतें (धन्धना) धनुष्
से (तीवाः) कठिन तेज (समदः) संग्रामों को (जयेम) जीतें और (धन्वना) धनुष् से
(सर्वाः) सब (प्रदिशः) दिशा प्रदिशाओं में स्थित जो शत्रुजन उनको (जयेम) जीतें
वैसे उससे तुम भी उनको जीतो ॥२॥
भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है - जो मनुष्य धनुर्वेद
को पढ़ के पूरा शस्त्र और अस्त्र बनाने का अभ्यास कर प्रयोग करने को
जानते हैं वे ही सर्वत्र विजयी होते हैं ॥२॥
फिर ये किससे कौन क्रिया करते हैं इस विषय को कहते हैं ।।
वक्ष्यन्तीवेदा मनीगन्ति कर्ण प्रियं सखायं परिषस्वजाना ।
योव शिङ्क्ते वितताधि धन्वन् ज्या इयं समने पारयन्ती ॥३॥
पदार्थ:-हे शूरवीर जो (इयम्) यह (ज्या) प्रत्यञ्चा अर्थात् धनुष् की तांति
(वक्ष्यन्तीव) जैसे विदुषी कहने वाली होती वैसे (प्रियम्) अपने प्यारे (सखायम्)
मित्र के समान वर्तमान पति को (परिषस्वजाना) सब ओर से संग किये
(योषेव) पत्नी के समान (कर्णम्) कान को (मा, गनीगन्ति) निरन्तर प्राप्त होती है
वैसे (अधि) (धन्वन्) धनुष के ऊपर (वितता) विस्तारी हुई तांति (समने) संग्राम
में (पारयन्ती) पार को पहुंचाती हुई (शिङ्कते) गूंजती है उस (इत्) ही को
तुम
यथावत् जानकर उसका प्रयोग करो ॥३॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे वीर पुरुषो! जैसे प्रिय
मित्र पति के साथ स्त्री प्यारी संबद्ध अर्थात् प्रेम की डोरी से बंधी हुई है
और जैसे विद्यार्थिनी कन्याओं के साथ पढ़ाने वाली विदुषी स्त्री बंधी हुई
दुःख से और अविद्या से पार पहुंचाती है वैसे ही यह धनुष् की प्रत्यञ्चा
यद्ध से पार पहुंचा कर सदैव सुखी करती है ॥३॥

ऋग्वेद: मं०६ । सू० ७५ ।।
६८६
estha
Che.
arta
baba
Camu
monts
फिर वे वीर किनसे क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।
ते आचरन्ती समनेव योषां मातेवं पुत्रं विभृतामुपस्थे
अप शत्रन् विध्यतां संविदाने आत्नी इमे विष्फुरन्ती अमित्रान् ॥४॥
पदार्थः-हे वीर पुरुषो (ते) वे दोनों (इमे) ये (संविदाने) प्रतिज्ञा पालने
वालियों के समान वा (अमित्रान्) शत्रुजनों को (विस्फुरन्ती) कंपाती (मारी) वेग
से जातीं और (प्राचरन्ती) सब ओर से प्रिय आचरण करती हुई (योषा) पत्नी स्त्री
जैसे (समनेव) समान मन वाली वैसे वा (पुत्रम्) पुत्र को जैसे (मातेव) माता वैसे
(उपस्थे) समीप में विजय को (बिभृताम्) धारण करें और (शत्रून्) शत्रुजनों को
(अप, विध्यताम्) पीटें ॥४॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे वीरजनो! जैसे समान
प्रीति की सेवने वाली पत्नी पति को तथा माता पुत्र को निरन्तर सुखी
करती है वैसे शस्त्र और अस्त्रों से शत्रुओं को निवारो॥४॥
फिर वीरों को क्या धारण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
बहीनां पिता बहुरंस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्यं ।
इषुधिः संकाः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनदो जयति प्रसूतः ॥५॥
पदार्थःहे मनुष्यो (बह्वीनाम्) बहुत वाणों की (पिता) पालना करने वाले
के समान (अस्य) इसके (बहुः) बहुत (पुत्रः) पुत्र के समान वाण' (समना) संग्रामों
को (अवगत्य) प्राप्त होकर (इषुषिः) तूणीर (चिश्चा) चींची शब्द (कृणोति) करता
है तथा (पृष्ठे) पीठ पर (निनद्ध :) नित्य' बंधा और (प्रसूतः) उत्पन्न होता हुआ
सर्वाः) समस्त (संकाः) संग्रामस्थ वैरियों की टोली (पृतनाः, च) और सेनामों
को (जयति) जीतता है वह तुम लोगों को यथावत् बना कर धारण करना
चाहिये ॥५॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे वीरपुरुषो !
यदि तूणीर को तुम धारण करो तो शत्रुओं को विदीर्ण करके पुत्रों के
प्रति पिता जैसे वैसे प्रजा-पालन करके समस्त शत्रुसेनानों को जीत
सको ॥५॥
फिर वीरजन किसके तुल्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्रंयत्र कामयते सुपारथिः ।
अभीशूनां महिमानं पनायत मना पश्चादनु यच्छन्ति रश्मयः ॥६॥

६६० ऋग्वेदः मं० ६ । सू० ७५ ॥ AAR Me पदार्थ:-हे विद्वान् वीरपुरुषो जैसे (सुषारथिः) अच्छा सारथि (रथे) रथ पर (तिष्ठन्) स्थित होता हुआ (यत्रयत्र) जहां जहां (पुरः) पहिले (कामयते) कामना करता है वहां वहां (वाजिनः) वेग वाले अश्वों की (नयति) प्राप्ति कराता है जैसे (रश्मयः) किरणें सूर्य के (पश्चात्) पीछे (अनु, यच्छन्ति) अनुकूल नियम से जाती हैं वैसे वहां वहां (मभीशूनाम्) बाहुओं की (महिमानम्) महिमा को (मनः) और चित्त को तुम (पनायत) व्यवहार में लामो वा उसकी स्तुति करो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है - हे राजा आदि वीरपुरुषो ! तुम जितेन्द्रिय होकर अपने कार्य के पार रथ से अच्छे सारथी के समान जामो तथा प्रधान के अनुकूल जाने वाले बड़े व्यवहार को करके सुन्दर शिक्षा को भृत्यों को पहुंचा कर काम सिद्धि करो ॥६॥ फिर मनुष्य किन से किन्हें जीतें इस विषय को कहते हैं । तीवान घोषान्कृयते वृषपाणयोऽश्वा रथेभिः सह वाजयन्तः । अवक्रामन्तः प्रपदैरमित्रान् क्षिणन्ति शरनपव्ययन्तः ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (प्रपदैः) प्रति उत्तम गमनों से (प्रवक्रामन्तः) इधर उधर जाते और (अनपव्ययन्तः) व्यर्थ खर्च को न प्राप्त होते हुए तथा (रथेभिः) रमणीय यानों के (सह) साथ (वाजयन्तः) श्राप जाते वा दूसरों को ले जाते हुए (वृषपाणय:) वष के समान व्यवहार जिनका वे (अश्याः) घोड़े वा अग्नि आदि पदार्थ (तीवान्) तीक्षण (घोषान्) शब्दों को (कृण्वते) करते हैं और (अमित्रान्) वैर करते हुए (शत्रून्) शत्रुजनों को (क्षिणन्ति) क्षीण करते हैं उनको तुम क्षीण करो ॥७॥ भावार्थ:-हे राजपुरुषो! तुम घोड़ों को अच्छे प्रकार शिक्षा देकर तथा अग्नि आदि का संप्रयोग और शत्रुओं को आक्रमण कर जीतो ॥७॥ फिर मनुष्य कहां ठहर कर क्या करें इस विषय को कहते हैं । रथवाहनं हविरस्य नाम यत्रायुधं निहितमस्य वर्म । तत्रा रथमुप शग्मं संदेम विश्वाहा वयं सुमनस्यमानाः ॥८॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जैसे (सुमनस्यमानाः) सुन्दर विचार करते हुए (वयम्) हम लोग (यत्र) जहाँ (मायुधम्) शस्त्र (निहितम्) स्थापित किया वा जहां (प्रस्य) इसका (धर्म) कवच और जिस (अस्य) इसका (हविः) लेने योग्य (नाम) नाम है (तत्रा) वहां इस (रथवाहनम्) जिससे रथ चलाया जाता है उसको वा (शम्मम्) सुख को और (रथम्) रमणीय यान को (विश्वाहा) सब दिनों (उप,सवेम) प्राप्त होवें ॥६॥ -- - ally - பவக AR - ऋग्वेदः मं०६ । सू०७५ ॥ RA THAN ANDU HD वन Eng 4000 भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! तुम लोग अच्छे विचार के साथ अग्नि आदि के सम्प्रयोग से बनाये आयुधों से युक्त उत्तम यान द्वारा सर्वदैव शत्रुओं को ताड़ना देप्रो ।।८।। फिर राजपुरुष कैसे हों इस विषय को कहते हैं । स्थादुपंसदः पितरों वयोधाः कृच्छ्रेश्रितः शक्तीवन्तो गभीराः । चित्रसेना इटुंबला अमृध्राः सतोवीरा उरवो वातसाहाः ॥९॥ पदार्थ:- हे राजन् ! जो (स्वादुषंसदः) स्वादिष्ट अन्नों के भोगने को स्थिर होते वा न्याय करने को सभा में स्थिर होते हैं वा (वयोधाः) जो अवस्थाओं को धारण करते हैं वा (कृच्छश्रितः) जो अति दुःख में भी धर्म का प्राश्रय करते हैं वा (शक्तीवन्तः) प्रशंसित बहुत शक्ति विद्यमान जिनके वा (गभीराः) जो गंभीर माशय वाले हैं वा (चित्रसेनाः) जिनकी चित्रविचित्र सेना है तथा (इषुबलाः) शस्त्र और अस्त्रों से युक्त जिनकी सेना और (अमृध्राः) जो अहिंसा न करने वाले (सतोवीराः) सत्व बल' से युक्त (बालसाहाः) जो शत्रुसमूहों को सहते हैं वे (उरवः) बहुत पुत्रों की (पितरः) पिता जैसे मिष्ठ वैसे विज्ञान और अवस्था से बढ़े हुए पालने वाले जन प्रजा की पालना करते हुए मिष्ठ मनुष्य हों उनसे तुम प्रजाओं की पालना निरन्तर करो। भावार्थ:-हे विद्वान् मनुष्यो! तुम सभ्य, पिता के समान प्रजाजनों की पालना करने वाले, बहुत अवस्था से युक्त और दुःख को पाकर न कंपने वाले, सामर्थ्यवान्, गम्भीर आशय, अद्भुत सेना तथा शस्त्र और अस्त्रों की विद्या में कुशल, बल से युक्त, शत्रुसमूह का संहने वाला और बहुत गुण कर्मों से युक्त जो पुरुष उसी का राज्याभिषिचन काम में अभिषेक ! करो ॥६॥ mes फिर मनुष्य परस्पर कैसे वर्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। ब्राह्मणास पितर सोम्यासः शिवे नो द्यावापृथिवी अनेहसां । पूषा न पातु दुरितादृताधो रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत ॥१०॥ पदार्थ:-है (पितरः) पिता के समान प्रजाजनों पर कृपा करने वाले (सोम्यास:) शान्तियुक्त गुणों के योग्य (ब्राह्मणासः) वेद और ईश्वर के जानने वाले विद्वानो! तुम (नः) हम लोगों को अधर्म के आचरण से अलग रक्खो जैसे (अनेहसा) न हिंसा करने वाली (शिवे) मंगलकारिणी (धावापृथिवी) सूर्य और पृथिवी (न:) हमारे लिये हों वैसे उपदेश करो जैसे (पूषा) विद्या और विनय से ६६२ ऋग्वेदः म०.६ । सू० ७५ ॥ M 4 पुष्टिकारक (ऋतावृधः) सत्य का बढ़ाने वाला (नः) हम लोगों की (दुरितात्) दुष्ट आचरण से (पातु) पालना करे जिससे' (अघशंसः) चोर हम लोगों को (माकिः) न (ईशत) मारने के लिये समर्थ हों, हे राजन् तुम इन की निरन्तर (रक्ष) रक्षा करो ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन तुम लोगों को विद्या और विनय देवें तथा बिजुली और भूगर्भ- विद्या से सुख से सम्पन्न करें और अधर्माचरण से अलग रक्खें तथा जो राजा चोर आदि दुष्टों से निरन्तर रक्षा करे उन सब की तुम निरन्तर सेवा करो ॥१०॥ फिर भूमि कैसी वेग वाली है और युद्ध करने वाले युद्ध क्यों करते हैं इस विषय को कहते हैं। सुपर्ण वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः सन्नद्धा पतति प्रसूता । यत्रा नरः सं च विच द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिर्षवः शर्म यंसन् ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (गोभिः) किरण वा धेनुओं से (सन्नद्धा) अच्छे प्रकार से बंधी और (प्रसूता) उत्पन्न हुई भूमि (मगः) मृग के समान (पतति) जाती है (अस्याः) इस के बीच (दन्तः) जिससे डराते हैं वह दांत वर्तमान है जो (सुपर्णम्) सुन्दर पालना करने वाले को (वस्ते) उढ़ाता है और (यत्रा) जिस संग्राम में (नर:) योद्धा नर (च) भी (सम्, अवन्ति) अच्छे प्रकार दौड़ते हैं (वि) विशेष धावन करते हैं (तत्र) वहां (इषवः) बाण (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (शर्म) सुख जैसे (यंसन्) देवें वैसा अनुष्ठान करो ॥११॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो भूमि परमेश्वर ने पालना के लिये बनाई है और मृग के समान शीघ्र जाती है तथा जिसके लिये बहुत संग्राम होता है उसकी प्राप्ति के निमित्त वीरता का संग्रह करो॥११॥ फिर मनुष्यों को किस से कैसे शरीर करने चाहिये इस विषय को कहते हैं। जीते परि वृधि नोऽश्मा भवतु नस्तनः । सोमो अधि ब्रवीतु नोऽदितिः शर्म यच्छतु ॥१२॥ पदार्थ:-हे विद्वान् राजा जो श्राप (ऋजीते) सीधे चलते हो वह (न:) हम लोगों को (परि, वृद्धि) सर्व प्रकार वृद्धि देप्रो और (सोमः) जो ओषधियों का रस निकालने वाला विद्वान् जैसे (नः) हम लोगों का (तन:) शरीर (अश्मा) - - HAR से रोकता और (विद्वान्) जानने योग्य को होता है वा (विश्वत:) सब ओर से (पुमांसमोर, एति) सब ओर से प्राप्त ऋग्वेदः सं०६। सू०७५ ॥ पत्थर के समान दृढ़ (भवतु) हो वैसा (अधि, ब्रवीतु) ऊपर ऊपर उपदेश करे और (अदितिः) माता के समान भूमि (न:) हम लोगों के लिये (शर्म) सुख वा घर (यच्छतु) देवे ॥१२॥ भावार्थ:-राजा ऐसा प्रयत्न करे जैसे दीर्घ ब्रह्मचर्य से विषया- सक्ति के त्याग से और व्यायाम से क्षत्रियों के शरीर पाषाण के तुल्य कठिन हों और उपदेशक भी सबको ऐसा ही उपदेश करें जिससे सब दृढ़ शरीर आत्मा वाले हों ।।१२।। फिर रानी संग्राम में क्या करे इस विषय को कहते हैं । श्रा जवन्ति सान्वेषां जघनाँ उप जिघ्नते । अश्वांजनि प्रचेतसोऽश्वान्त्समत्सु चोदय ॥१३॥ पदार्थ:--है (अश्वाजनि) घोड़ों को पटकी देने वाली रानी तू जो वीरजन (एषाम्) इन शत्रुओं के (सानु) अङ्गों को (श्रा, जङ्घन्ति) सब ओर से निरन्तर काटते हैं तथा (जधनान्) नीचकर्म करने वालों को (उप, जिघ्नते) उपस्थित होकर मारते हैं उन (प्रचेतसः) उत्तम विज्ञान वाले (प्रश्वान्) बड़े बड़े बलवान् शूरवीर पुरुषों को (समत्सु) संग्रामों में (चोदय) प्रेरो॥१३॥ भावार्थ:-संग्राम में राजा के अभाव में रानी सेनापति हो और जैसे राजा युद्ध कराने को वीरों को प्ररणा दे वैसे ही वह भी आचरण करे ॥१३॥ फिर राजा और भृत्य परस्पर कैसे वत्तै इस विषय को कहते हैं । अहिरिव भौगैः पति बाहुं ज्यायो हेति परिवाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान्पुमाँस परि पातु विश्वतः ॥१४॥ पदार्थ:-हे राजन् ! जो (हस्तघ्नः) हाथों से मारने वाला (ज्यायाः) प्रत्यञ्चा के संबंधी (हेतिम्) बज्र के समान बाण को (परिबाधमानः) सब ओर (अहिरिव) मेघ के समान (भोगः) भोगों के साथ (बाहुम्) अपने स्वामी की भुजा प्रकार पालना करे उसका सर्वदा सत्कार करो ॥१४॥ भावार्थ:-हे वीरो! जो राजा समस्त मेघ के समान भोगवृष्टि 2tta BRAHB ऋग्वेदः मं०६ । सू० ७१ ॥ HAND M - करता है तथा समग्न विद्यायुक्त होता हुआ सब की सब ओर से तृप्ति करता है उसकी सब जन सब ओर से निरन्तर रक्षा करें॥१४॥ फिर रानी कैसी हो इस विषय को कहते हैं । आलोक्ता या रुरुंशीग्रंथो यस्या अयो मुखम् । इदं पर्जन्यरेतस इदै देव्यै बृहनमः ॥१५।। पदार्थः-(या) जो (पालाक्ता) विष से युक्त (रुरुशोष्र्णी) रुरु जाति के मृग के शिर के समान जिसका शिर और (प्रथो) इसके अनन्तर (यस्याः) जिसका (इदम्) (अयः) लोहे युक्त (मुखम्) मुख है उस धारण करने वाली (पर्जन्यरेतसे) मेघ के जल के समान वीर्यवती (देव्य) दिव्य और (इध्व) गमन करती हुई शूरवीर स्त्री के लिये (बृहत) बहुत (नमः) अन्न हो ।।१।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो रानी धनुर्वेद जानती हुई शस्त्र अस्त्र फेंकने वाली है उसका वीरों को निरन्तर सत्कार करना चाहिये ॥१५॥ फिर सेनापति सेना को क्या प्राज्ञा दे इस विषय को कहते हैं । अवसृष्टा परां पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते । गच्छामित्रान्त पंधरव मामीषां के चनोच्छिषः ॥१६॥ - eHear MORE पदार्थ:-हे (शरव्ये) वारणों को व्याप्त होने वालों में उत्तम (ब्रह्मशंसिते) वेद जानने वाले सेनापति से प्रशंसा पाई हुई सेना तू (अवसृष्टा) शत्रुओं के ऊपर पड़ी हुई (परा) हम लोगों से पराङ मुख (पत) जामो तथा (अमित्रान्) शत्रुओं के समीप (गच्छ) पहुँचो (अ, पद्यस्य) प्राप्त होओ अर्थात् शत्रुजनों पर चढ़ाई करो और (अमीषाम्) परोक्षस्थ शत्रुओं के बीच (कम्, चन) किसी को भी (मा) मत (उत, शिष:) शेष छोड़ो ॥१६॥ भावार्थ-सेनापति पहिले सेना को अच्छी शिक्षा देकर जब संग्राम में उपस्थित हो तब अपनी सेना को प्राज्ञा दे कि शत्रुओं के बीच से एक को भी न छोड़ना ॥१६॥ फिर उसी विषय को कहते हैं। यत्र बाणा: सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव । तत्री नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु ॥१७॥ पदार्थः हे राजन् (यत्र) जिस संग्राम में (कुमाराः) कुमार अर्थात् जिनका ऋग्वेदः मं०६। सू० ७५॥ PAR मुण्डन हो गया है उन (विशिखाइव) विना चोटी वालों के समान (बाणा:) बाण (सम्पतन्ति) अच्छे प्रकार गिरते हैं (तत्रा) वहां (न:) हमारे लिये जैसे (ब्रह्मणः) धन के (पतिः) पालक धनकोश का ईश (विश्वाहा) सब दिनों (शर्म) सुख (यच्छतु) देवे और (अदितिः) भूमि (शर्म) सुख (यच्छतु) देवे वैसे विधान करो ॥१७॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जब संग्राम के लिए सेना जावे तब किसी पदार्थ के विना किसी भृत्य को क्लेश न हो वैसा अनुष्ठान कीजिये ऐसे किये पीछे आपका ध्रुव विजय हो ॥१७॥ फिर योद्धाओं के प्रति अध्यक्ष कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मौणि ते वर्मणा छादयामि सोमंस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम् । उरोर्वरीयो वरुणस्तै कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मंदन्तु ॥१८॥ पदार्थ:--हे योद्धा वीर मैं (ते) तेरे (मर्माणि) शरीरस्थ जीवन हेतु अंगों को (वर्मणा) कवच से (छादयामि) ढांपता हूँ (सोमः) ऐश्वर्य संपन्न (राजा) राजा (अमतेन) जल आदि से (त्वा) तुझे (अन) अनुकूलता से (वस्ताम्) ढांपे तथा (वरुणः) सेना की पालना करने वाला उत्तम विद्वान् (उरोः) बहुत (वरीय:) अत्यन्त श्रेष्ठ अन्न आदि (ते) तेरा (कृणोतु) करे तथा (जयन्तम्) शत्रुओं को जीतते हुए (त्या) तुझे (देवाः) उपदेशक विद्वान् वा अधिष्ठाता जन (अनु, मदन्तु) अनुकूलता से हर्षित करें वा करावें ॥१८॥ भावार्थ:-सेनाध्यक्षों को चाहिये कि सब वीरों के शरीरों की रक्षा करने वाले कवचों को यथावत् करें और सर्वाधीश राजा अमृतात्मक अर्थात् अमृत के समान भोग सब के लिये देवे तथा वस्त्र और शस्त्र आदि पदार्थ भी देवे । और युद्ध करते हुए सब को सब अध्यक्ष हर्ष देवें और उत्साहित करें तथा आप भी हर्ष पावें और उत्साह करें ऐसा करने पर क्योंकर हार हो ॥१८॥ फिर सेनाध्यक्ष संग्राम में क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यो नः स्वो अरणे यश्च निष्टयो जिघांसति । देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम् ॥१९॥ पदार्थ:-हे सेनापति (यः) जो (नः) हमारे (स्वः) अपना (मरणः) संग्राम रहित यथावत् संग्राम नहीं करता (यः, च) और जो (निष्टयः) शब्द से ढिठाई 44 hd ऋग्वेदः मं०६ । सू० ७५ ।। कराने योग्य दूरस्थ होते हुए तथा अपनी सेना को (जिघांसति) मारने की इच्छा करता है (तम्) उसको (सर्वे) सन (देवाः) विद्वान् जन (धूर्वन्तु) मारें तथा (मम) मेरा (अन्तरम्) समीप में रमता हुमा (ब्रह्म) सर्वव्यापक चेतन' (वर्म) कवच के समान रक्षा करने वाला हो ॥१६॥ भावार्थ:--सेनापति के जो अपने भृत्य उत्साह से युद्ध न करें और जो अपने नौकरों के मारने की इच्छा करें उन सब को विद्वान् और अधीश शीघ्र मारें तथा युद्ध के समय सब वीर परमेश्वर ही को अपना रक्षा करने वाला जानें ॥१६॥ इस सूक्त में वर्म अर्थात् कवच बस्तर आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह छठे मण्डल में पचहत्तरवा सूक्त समाप्त हुआ। षष्ठं मण्डलं समाप्तम् ।। RamananayoungerpuraTV * ओ३म् * ऋग्वेद-भाषाभाष्यम् ॥ mpoun -:03:5303300:--- अथ सप्तमं मण्डलम् ।। - विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद्भद्रं तन आ मुंव ॥१॥ eN Bap - अथ पञ्चविंशत्यूचस्थ प्रथमस्य सूक्तस्य बसिष्ठ ऋषिः । अग्निदेवता । १-१८ एकादशाक्षरपादस्त्रिपया विरागायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । १६-२५ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवत्तः स्वरः ।। अब सातवें मण्डल के प्रथम सूक्त का प्रारम्भ है, इसके पहिले मन्त्र में मनुष्यों को विद्य त् अग्नि कैसे उत्पन्न करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं । अग्निं नरो दीधितिमिररण्योहस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम् । दुरेश गृहपतिमर्युम् ॥१॥ पदार्थ:-हे (नरः) विद्वान् मनुष्यो ! जैसे प्राप (बोधितिभिः) उत्तेजक क्रियामों से (हस्तच्युती) हाथों से प्रकट होने वाली घुमानारूप क्रिया से (अरण्योः) अरणी नामक ऊपर नीचे के दो काष्ठों में (दूरदृशम्) दूर में देखने योग्य (अग्निम्) अग्नि को (जनयन्त) प्रकट करें वैसे (अथर्युम) अहिंसाधर्म को चाहते हुए (गृहपतिम्) घर के स्वामी को (प्रशस्तम्) प्रशंसायुक्त करो ॥१॥ भावार्थ:-हे विद्वान् जनो! जैसे घिसी हुई अरणियों से अग्नि उत्पन्न होता है वैसे सब पार्थिव द्रव्य वा वायुसम्बन्धी द्रव्यों के घिसने से जो सर्वत्र व्याप्त हुई विद्युत् उत्पन्न होती है वह दूर देशों में समाचारादि पहुंचने ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १॥ - रूप व्यवहारों को सिद्ध कर सकती है। इस विद्युत् विद्या से गृहस्थों का बड़ा उपकार होता है ॥१॥ फिर उस बिजुली को कैसे प्रकट करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तमग्निमस्ते वसवो न्य॒ण्वन्त्सुप्रतिचक्षमव॑से कुर्तश्चित् । दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः ॥२॥ पवार्थ:-हे विद्वानो ! (यः) जो (वक्षाय्यः) चतुर विद्वान् के तुल्य (दमे) घर वा इन्द्रियादि के दमन में (नित्यः) सनातन उपयोगी (पास) है जिस (सुप्रति- चकम्) मनुष्य जिसके द्वारा अनेक विद्याओं को अच्छे प्रकार देखता है (कृतश्चित) किसी के (अवसे) रक्षा वा अधिक अन्न के लिए (वसवः) प्रथम कक्षा के विद्वान् (नि, ऋष्यन्) निरन्तर प्रसिद्ध करें (तम्) उस (अग्निम् ) विद्युत् को (अस्ते) घर में वा फेंकने में आप लोग उत्पन्न करो ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जो यह नित्यस्वरूप विद्युत् अग्नि स्थल द्रव्यों को घर बना के नित्य स्वरूप से स्थित है उस अग्नि को विद्या और क्रियाओं से प्रकट कर तथा कलायंत्रों में संयुक्त कर के बहुत अन्न, धन और रक्षा को प्राप्त होप्रो ॥२॥ फिर उसको कैसे प्रकट करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्रया सूम्या यविष्ठ । स्वां शश्वन्त उप यन्ति वाजः ॥३॥ पदार्थ:-है (यविष्ठ) अत्यन्त जवान (अग्ने) अग्नि के तुल्य प्रकाशित बुद्धि- वाले विद्वान् ! जो (प्रेद्धः) अच्छे प्रकार जलता हुआ अग्नि (अजस्त्रया) निरन्तर प्रवृत्त क्रिया [से] (सा) अच्छे छिद्र सहित शरीरादि मूत्ति वा कला से (न:) हम को और (स्वाम्) तुम' को प्राप्त है जिसको (शश्वन्तः) प्रवाह से नित्य अनादि पृथिव्यादि (वाजाः) प्राप्त होने योग्य पदार्थ (उप, यन्ति) समीप प्राप्त होते हैं उसको (पुरः) पहिले वा सामने विद्या और क्रिया से (वीदिहि) प्रदीप्त कर ॥३॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जो अग्नि अनादिस्वरूप प्रकृति के अवयवों में विद्य त् रूप से व्याप्त है, जिसकी विद्या से बहुत से व्यवहार सिद्ध होते उसको निरन्तर प्रकाशित कर धनधान्यादि ऐश्वर्य को प्राप्त होप्रो॥३॥ फिर अग्नि किससे प्रकट करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं०७ । सू० १॥ AUD A प्र ते अग्नयोऽग्निभ्यो वरं निः सुवीरांसः शोशुचन्त धुमन्तः । यत्रा नरः समासते सुजाता ॥४॥ पदार्थः-जो (सुधीरासः) सुन्दर वीर (नरः) पुरुषार्थ से प्राप्तव्य को प्राप्त कराने हारे विद्वान् हैं (ते) वे (यत्र) जिस व्यवहार में (अग्निभ्यः) अग्नि के परमा- रणुओं से (सुजाताः) अच्छे प्रकार प्रकट हुए (ध मन्तः) बहुत दीप्ति वाले (अग्नयः) विद्युत् आदि अग्नि उत्पन्न होते हैं उसमें (नि:, शोशुचन्त) निरन्तर शुद्धि करते और उनसे (वरम्) उत्तम व्यवहार को (प्र, समासते) सम्यक् प्राप्त होते हैं वैसे इसको प्रकट करके तुम लोग भी उत्तम सुख को प्राप्त होप्रो ॥४॥ भावार्थ:- जो मनुष्य अग्नि से अग्नि को उत्पन्न कर सिद्ध कामना वाले होके सर्वोत्तम सुख पाते हैं वे जगत् में अच्छे प्रसिद्ध होते हैं ॥४॥ फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। दा नो अग्ने धिया रयिं सुवीर स्वपत्यं सहस्य प्रशस्तम् । न यं यावा तरति यातुमावान् ॥५॥ पदार्थ:-- हे (सहस्य) बल में श्रेष्ठ (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् (षिया) बुद्धि वा कर्म से जैसे अग्नि क्रिया से (सुवीरम्) सुन्दर वीर जन (स्वपत्यम्) सुन्दर सन्तान जिससे हों उस (प्रशस्तम्) उत्तम (रयिम्) धन को (नः) हमारे लिये देता है (यम्) जिसको (यातुमावान्) मेरे तुल्य चलता हुआ (यावा) गमनशील (न) नहीं (तरति) उल्लङघन करता उस प्रकार की विद्या हमारे लिये बुद्धि से माप (वा.) दीजिये ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-ह विद्वानो ! जिसे अग्नि-विद्या से सुन्दर सन्तान, उत्तम शूरवीर जन, श्रेष्ठ धन और यानों का बड़ा वेग उत्पन्न हो उस विद्या को उत्तम विचार और अनेक प्रकार की क्रियाओं से प्रकट करो ॥५॥ फिर अग्नि-विद्या किसके तुल्य क्या उत्पन्न करती है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते है। उप यमेत युवतिः सुदः दोषावस्वाईविष्मंती घृताची । उपस्वैनमरमतिर्वसूयुः ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे (युवतिः) युवावस्था को प्राप्त कन्या (बोषा, वस्तोः) रात्रि दिन (सुदक्षम्) अच्छे बलयुक्त (यम्) जिस पति को (उप, एति) समीप H ७०० ऋग्वेदः मं०७ । सू०:१॥ Saa से प्राप्त होती है जैसे (हविष्मती) ग्रहण करने योग्य बहुत वस्तुओं वाली (घृताची) रात्री चन्द्रमा को (उप) प्राप्त होती है तथा जैसे (अरमतिः) जिसके गृहस्थ के तुल्य रमणक्रिया नहीं वह (वसूयुः) द्रव्यों की कामना करने वाली (स्वा) अपनी स्त्री (एनम्) इस विवाहित प्रिय पति को प्राप्त होके सुख पाती है वैसे अग्निविद्या को प्राप्त होके तुम लोग निरन्तर आनन्दित होनो ॥६॥ भावार्थ:- इस मंत्र में वाचकलु: -जो दिन रात उद्यम और विद्या के द्वारा अग्निविद्या को प्रकट करते हैं वे परस्पर प्रीति रखने वाले स्त्री पुरुषों के तुल्य बड़े आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥६॥ फिर अग्नि से उपकार लेना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । विश्वा अनेऽप दहारातीर्येभिस्तपोभिरदहो जरूयम् । पनिस्वरं चातयस्वामीवान् ।।७।। पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् ! (येभिः) जिन (तपोभिः) हाथों को तपाने वाले अग्नि के गुणों से अग्नि (जरूथम्) जीर्ण अवस्था को प्राप्त हुए पुराने काष्ठ को (प्रबहः) जलाता है उन गुणों से (विश्वाः) सब (अरातीः) शत्रुओं की सेनाओं को (अप, दह) जलाइये तथा (अमीवाम्) रोग को (निःस्थरम्) निर्मूल जैसे हो वैसे (प्र, छातयस्व) नष्ट कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जो आप अग्नि के प्रभाव को जान के प्राग्ने- यास्त्र आदिकों को बना के संग्राम में प्रवृत्त हों तो अनेक शत्रुओं की सेनाएँ शीघ्र भस्म होवें जैसे उत्तम वैद्य अपने शरीर को रोग रहित करके अन्यों को रोगरहित करता है वैसे ही आप लोग अग्निविद्या के प्रभाव से रोगरूप शत्रुओं का निवारण करो ॥७॥ फिर विद्वानों को किससे सेना तेजस्विनी करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ यस्तै अग्न इवते अनीकं वसिष्ठ शुक्र दीदिवः पावक । उतो न एभिः स्तवयैरिह स्याः॥८॥ SION PREM पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य वर्तमान (बसिष्ठ) अतिशय कर वसने और (शुक्र) शीघ्रता करने वाले पराक्रमी (वीदिवः) विजय की कामना करते हुए (पावक) पवित्र (ते) आपकी (अनीकम्) सेना को (यः) जो अग्नि (मा, इधते) प्रदीप्त प्रकाशित करता है उस अग्नि की (एभिः) इन (स्तवर्थः) स्तुतियों से (इह) ऋग्वेदः म० ७ । सू० १॥ - इस राज्य में (नः) हमारे रक्षक (स्याः) हूजिये (उतो) और भी हम लोग उस अग्नि के बल से ही आपके रक्षक होवें ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु जो राजपुरुष अग्निविद्या से आग्नेयास्त्रादि को बना के अपनी सेना को अच्छे प्रकार प्रकाशित करके न्याय से प्रजा के पालक हों, वे दीर्घ समय तक राज्य को पाके महान् ऐश्वर्य वाले होते हैं ॥८॥ फिर कैसे भृत्यों के साथ राजा प्रजा का पालन करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वि ये ते अग्ने भेजिरे अनीकं मर्ता नरः पिन्यासः पुरुत्रा । उतो न एभिः सुमना इह स्थाः ॥९॥ पदार्थ:-है (अग्ने) विद्य त के तुल्य प्रकाशमान ! (ये) जो विद्वान् (पित्र्यास:) पितरों के लिये हितकारी (मत्ताः) मनुष्य (नर:) नायक हैं (ते) वे (पुरुत्रा) बहुत राजाओं में (अनीकम्) सेना को (वि, भेजिरे) सेवन करते हैं (उत्तो) और (एभिः) इन प्रत्यक्ष विद्वानों के साथ आप (इह) इस राज्य में (नः) हम पर (समनाः) शुद्ध चित्त वाले प्रसन्न (स्या:) हुजिये ॥६॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो अग्निविद्या में कुशल, आपकी सेना के प्रकाशक, वीर पुरुष, धार्मिक, विद्वान् अधिकारी हों उनके साथ आप न्याय से हमारे पालक हूजिये ॥६॥ राजा को कैसे मन्त्री करने चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इमे नरो वृत्रहत्येषु शुरा विश्वा अदेवीरभि सन्तु मायाः । ये मे धियं पनयन्त प्रशस्ताम् ॥१०॥ पदार्थ:-हे राजन् ! (ये) जो (इमे) वर्तमान (शूराः) शूरवीर (नरः) न्याययुक्त पुरुष (वृत्रहत्येषु) संग्रामों में (विश्वा:) समस्त (प्रदेवी:) अशुद्ध (मायाः) कपट छलयुक्त बुद्धियों को निवृत्त करके (मे) मेरी (प्रशस्ताम् ) प्रशंसित (धियम्) उत्तम बुद्धि का (अभि, पनयन्त) सन्मुख स्तुति वा व्यवहार करते हैं वे आपके कार्य करने वाले (सन्तु) हों ॥१०॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो शत्रुओं के छलों से ठगे हुए न हों, संग्रामों में उत्साह को प्राप्त, शूरतायुक्त युद्ध करें, सब ओर से गुणों को ग्रहण कर दोषों को त्यागें वे ही आपके मंत्री हों ॥१०॥ aa PUR Mara ७०२ ऋग्वेदः मं० ७ । सू०१॥ - . ! फिर ये राजादि क्या न करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। मा शूनै अग्ने नि षदाम नृणां माशेषसोऽवीरता परि त्वा । प्रजावतीषु दुर्योमु दुर्य ॥११॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् ! जो (प्रवीरता) वीरों का प्रभाव है उससे (नृणाम्) नायकों में (मा, निषदाम) निरन्तर स्थित न हों (शूने) शीघ्रकारिणी सेना में (अशेषसः) संपूर्ण हम (वा) तेरे (मा) न (परि) सब ओर से निरन्तर स्थित हों । हे (दुर्य) घरों में वर्तमान जिस कारण (प्रजावतीषु) प्रशस्त सन्तानों से युक्त (दास) घरों में हुई रीतियों में सुखपूर्वक निरन्तर स्थित हों वैसा कीजिये ॥१॥ भावार्थ:-हे क्षत्रिय-कुल में हुए राजपुरुषो ! तुम कातर मत होओ। विरोध से परस्पर युद्ध करके निःशेष मत होनो। सनातन राजनीति से प्रजाओं का पालन कर कीत्ति वाले होमो ॥११॥ फिर वह अग्नि क्या सिद्ध करता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। यमश्वी नित्यमुपयाति यज्ञं प्रजावन्तं स्वपत्यं क्षयं नः । स्वजन्मना शेषसा वावृधानम् ॥१२॥ पवार्थ:-हे विद्वानो ! जो (अश्वी) बहुत वेगादि गुणों वाला अग्नि (नः) हमारे (यम्) जिस (प्रजावन्तम्) बहुत प्रजावाले (स्वपत्यम्) सुन्दर बालकों से युक्त (यज्ञम्) संग करने ठहरने योग्य (क्षयम्) घर को वा (स्वजन्मना) अपने जन्म के (शेषसा) शेष रहे भाग से (पावृधानम्) बढ़ते या बढ़ाते हुए के (नित्यम्) नित्य (उपयाति) निकट प्राप्त होता है उसको तुम लोग जानो ॥१२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अग्नि प्रकट हुए द्वितीय जन्म से प्रजा, सुन्दर सन्तानों और घर को प्राप्त कराता है उसको प्रसिद्ध करो ॥१२॥ किस करके किससे किसकी रक्षा करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । पाहि नो अग्ने रक्षसो अर्जुष्टात्पाहि धूर्तरर्ररुषो अघायोः । त्वा युजा पृतनापूरभि ष्याम् ॥१३॥ पदार्थ:-हे (प्रग्ने) विद्युत् अग्नि के तुल्य वर्तमान राजन् वा उपदेशक प्राप (न:) हमको (रक्षसः) दुष्टाचारी मनुष्यों से (पाहि) बचाइये । हमारी (प्रज- JAN- - Maritain तुल्य वर्तमान राजन् वा उपदेशका ऋग्वेदः मं०७ । सू०१॥ ७०३ - MIND एटात) धर्म का सेवन न करते हुए अधर्मी (धूतः) धूर्त (पररुषः) शीघ्र मारने वाले (अघायोः) आत्मा को पाप की इच्छा करते हुए से (पाहि) रक्षा कीजिये (त्वा, युजा) युक्त हुए तुम्हारे साथ वर्तमान मैं (पृतनायून) सेनाओं को चाहते हुओं के (अभि, ज्याम्) सन्मुख होऊ ॥१३॥ भावार्थ:-वही राजा अध्यापक उपदेशक वा कर्म करनेहारा श्रेष्ठ होता है जो आप धर्मात्मा होकर अन्यों को भी धार्मिक करे फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। सेदग्निरनीरँत्यस्त्वन्यान्यन वाजी तनयो वीलुपाणिः । सहस्रपाथा अक्षरा समेति ॥१४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (बाजी) वेगबलादियुक्त (वीळ पाणिः) बलरूप जिस के हाथ हैं (तनयः) पुत्र के तुल्य (अग्निः) अग्नि (यत्र) जहाँ (अन्यान्) अन्य (अग्नीन) अग्नियों को प्राप्त (प्रत्यस्तु) अत्यन्त हो (सः, इत्) वही (सहनपाथा:) अतोल' अन्नादिः पदार्थों वाला (अक्षरा) जलों को (समेति) सम्यक् प्राप्त होता है वहां उसको तुम लोग सिद्ध करो ॥१४॥ भावार्थ:- इस मंत्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे सुपुत्र पितरों को प्राप्त होता है वैसे अग्नि अग्नियों को प्राप्त होता है तथा प्रसिद्ध होकर अपने स्वरूप कारण को प्राप्त होकर स्थिर होता है, जो लोग अभिव्याप्त बिजुली के प्रकट करने को जानते हैं वे असंख्य ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥१४॥ फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। सेदग्नियों वनुष्यतो निपाति समेद्धारमहंस उरुष्यात् । सुजातासा परि चरन्ति वीराः ॥१५॥ पदार्थ:-हे मनुष्य ! (यः) जो (अग्निः) अग्नि (वनुष्यतः) याचना करते हुओं की (निपाति) निरन्तर रक्षा करता है तथा (समेद्वारम् ) सम्यक् प्रकाशित कराने वाले को (अंहसः) दुःख वा दरिद्रता से (उरुष्याद) रक्षा करे जिसको (सुजा- तासः) विद्यानों में अच्छे प्रकार प्रसिद्ध और (वीराः) विज्ञान को प्राप्त हुए वीर पुरुष (परि, चरन्ति) सब ओर से जानते वा प्राप्त होते हैं (सः, इत) वही अग्नि तुम लोगों को अच्छे प्रकार उपयोग में लाना चाहिये ।।१५।। भावार्थ:---जो मनुष्य अच्छी विद्या से अग्नि का सेवन कर कार्यसिद्धि

७०४
ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १॥
के लिये सप्रयुक्त करते हैं वे दु:ख और दरिद्रता से रहित, कीत्ति वाले हुए
विजय के सुख को निरन्तर प्राप्त होते हैं ॥१५॥
फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं ।
अयं सो अग्निराहुतः पुरुत्रा यमीशानः समिदिन्धे हविष्मान् ।
परि यमेत्यध्वरेषु होता ॥१६॥
Inter
पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (यम्) जिसको (ईशानः) जगदीश्वर (सम्, इन्धे)
सम्यक् प्रकाशित करता है और (यम्) जिसको (हविष्मान्) देने योग्य बहुत वस्तुओं
सहित (होला) होम करने वाला (अध्वरेषु) हिंसारहित संग्रामादि व्यवहारों में
(परि, एति) सब ओर से प्राप्त होता है (सः, अयम् इद) सो वही (अग्निः) विद्युत्
अग्नि (प्रातः) सम्यक् स्वीकार किया हुआ (पुरुत्रा) बहुत कार्यों को सिद्ध करता
है ॥१६॥
भावार्थ:-हे विद्वानो ! ईश्वर ने जिसलिये बनाया है जिस लिये
ऋत्विज और यजमान सेवन करते हैं तदर्थ वह अग्नि तुम लोगों से बहुत
व्यवहारों में
प्रयुक्त
किया
हुना
अनेक कार्यों का सिद्ध करने वाला होता
है ॥१६॥
फिर मनुष्य लोग किसके तुल्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं
त्वे अंग्न आहवनानि भूरीशानास आ जुहुयाम नित्यां ।
उभा कृण्वन्तों वहतू मियेधैं ॥१७॥
S
MAL
प्र.60
AAI
पदार्थ:-हे (अग्ने) सत्यवादी प्राप्त विद्वन् जैसे (उमा) दोनों (वहतू)
प्राप्ति कराने वाले यजमान और पुरोहित (मियेधे) परिमारणयुक्त यज्ञ में (नित्या)
नित्य (भूरि) बहुत (आहवनानि) अच्छे दानों को देते हैं वैसे (ईशानासः) समर्थ
हम लोग उन दोनों यजमान पुरोहितों को समर्थ (कृण्वन्तः) करते हुए (स्वे) अग्नि
के तुल्य तेजस्वि प्राप स्वामी के होते हुए उन दोनों को (मा, जयाम) अच्छे
प्रकार देवें ॥१७॥
भावार्थ:-- इस मंत्र में वाचकलु० -जो यजमान और ऋत्विजों के
तुल्य सब मनुष्यों का अच्छी शिक्षा से उपकार करते हैं उनकी शिक्षा का
सब लोग अनुष्ठान करें॥१७॥

ऋग्वेदः मं०७ । सू० १ ।। ७०५ Pra फिर मनुष्य किससे क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इमो अग्ने छीलतमानि हव्याऽजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ । प्रति न ई सुरभीणि व्यन्तु ।।१८।। पदार्थ:-हे (अग्ने) तेजस्विन् विद्वन् ! जिससे (अजस्त्रः) निरन्तर (देवता- तिम्) उत्तम सुख देने वाले यज्ञ को (अच्छ, वलि) अच्छे प्रकार प्राप्त करते हैं इससे (इमो) इन (सुरभीणि) सुगन्धि आदि गुणों के सहित (बीततभानि) अतिशयकर ज्याप्त होने को समर्थ (हत्या) देने योग्य वस्तुओं को (न:) हमारे (प्रति) प्रति (ईन, ज्यन्तु) सब ओर से प्राप्त करें ॥१८॥ भावार्थ:--मनुष्य जैसे अग्नि में उत्तम हविष्यों का होम कर जल आदि को शुद्ध करके सब के उपकार को सिद्ध करते हैं वैसे वर्ताव करना चाहिये ।।१८॥ फिर विद्वान् लोग क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मा नो अग्नेऽवारले परां दा दुर्वालसेऽयतये मा नो अस्यै । मानः क्षुध मा रक्षस ताको मानो हमे सावन आ जुहूर्थाः॥१९॥ पदार्थ:-- है (अन्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी ! आप (अधीरते) बीरतारहित सेना में (नः) हमको (मा, परा, का) पराङ मुख मत कीजिये (टुरिसे) बुरे वस्त्र धारण के लिए तथा (श्रमतये) मूर्खपन के लिये (नः) हमको (भा) मत नियुक्त कीजिये । (:) हमको (अस्य ) इस प्यास के लिये (मा) मत वा (क्षुधे) भूख के लिये (मा) मत नियुक्त कीजिये । हे (ऋतावः) सत्य के प्रकाशक ! (रक्षसे) दुष्ट जन के लिये (दमे) घर में (लः) हमको (मा) मत पीड़ा दीजिये (धने) वन में हम को (मा) मत (प्रा जुहूर्थाः) पीड़ा दीजिये ॥१९॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! तुम लोग हमारी कातरता, दरिद्रता, मूढ़ता, क्षुधा, तृषा, दुष्टों के सङ्ग और घर वा जङ्गल में पीड़ा का निवारण कर सुखी करो ॥१६॥ फिर विद्वान् क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न मे ब्रह्माण्यग्न उच्छंशाधि त्वं देव मघवद्भय सुध्दः । रातौ स्यांमोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदो नः ॥२०॥ Sama .. - संयुक्त करें कीजिये ॥२१॥ ७०६ ऋग्वेदः मं०७ । सू० १ ।। पदार्थ:-हे (देव) विद्वन् (अग्ने) दाताजन ! (स्वम्) आप इसे) मेरे (मघव- दुभ्यः) बहुत धनयुक्त धनाढयों से (ब्रह्माणि) बड़े बड़े धनों की (उत, शशाधि) शिक्षा कीजिये तथा दुःखों को (सुषूदः) नष्ट कीजिये जिससे (अभयासः) दोनों विद्वान् अविद्वान् हम लोग (रातो) दान देने में प्रकट (स्याम) हों जैसे (ते) अापकी रक्षा हम करें वैसे (यूयम्) तुम लोग (नः) हमारी (स्वस्तिभिः) सुखों से (सदा) सब काल में (नु) शीघ्र (मा, पात) अच्छे प्रकार रक्षा करो ॥२०॥ भावार्थ:---राजादि पुरुषों को चाहिये कि धनाढयों से दरिद्रों को भी अच्छी शिक्षा देके धनाढय करें तथा विद्वान् और अविद्वानों का मेल करा के परस्पर उन्नति करावें और परस्पर दुःख का निवारण कर सुखों से ॥२०॥ फिर विद्वान् इस जगत् में कैसे वर्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वमने सुहवा रणसंहक्मुदीती सूनो सहसो दिदीदि । मा त्वे सचा तनथे नित्य आघमा बीरो अस्मन्नर्थो वि दासीत् ।।२१।। पदार्थ:-हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र (अग्ने) अग्नि के (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्या से प्रकाशमान विद्वन् ! (सहधः) सुन्दर स्तुति युक्त (रण्वसन्दृक्) रमणीय सम्यक् देखने वाला जैसे (नर्यः) मनुष्यों में उत्तम (बीरः) वीर (अस्मत्) हम से (मा) मत (वि, दासीद) दान से रहित हो वा (नित्ये) सब काल में करने योग्य कर्म में (त्वे) श्राप (तनये) सन्तान में (सचा) सम्बन्ध से (मा, पा, धक) अच्छे प्रकार मत जलाइये वैसें (स्वम्) पाप (सवीती) उत्तम दीप्ति से हमको (दिदीहि) प्रकाशित भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलु-हे विद्वानो! जैसे हमारे बन्धु लोग हमारे विरोधी नहीं होते हैं, जैसे माता में पुत्र, पुत्र के विषय में माता, प्रेम के साथ वर्तती है वैसे ही आप भी हमारे साथ वतिये ॥२१॥ फिर मनुष्य' सब से किसको ग्रहण करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मा नो अग्ने दुर्भुतये सचेषु देवेढेवग्निपु प्र वोचः । मा ते अस्मान्दुर्मतयो भूमारिच देवस्वं सूनो सहसो नशन्त ॥२२॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (सचा) सम्बन्ध से (एषु) इन (देवेद्धेषु) वायु आदि में प्रज्वलित किये हुए (अग्नि) अग्नियों में (दुभृतये) दुष्ट दुःखयुक्त कठिन धारण वा पोषण जिसका उसके लिए (नः) हमको (मा, प्र, वोचः) * ध sain MAIN ऋग्वेदः मं० ७ । सू०१॥ marn BUM मत कठोर कहो । है (सहसः) बलवान् (देवस्य) विद्वान् के (सूनो) पुत्र ! (भृमात् भ्रान्ति से (चित) भी (ते) आपके (दुर्मतयः) दुष्टबुद्धि लोग (अस्मान्) हमको (मा) मत (नशन्त) प्राप्त होवें ॥२२॥ भावार्थ:-सब मनुष्यों को योग्य है कि सब से शुभ गुण सुन्दर बुद्धि और उत्तम विद्या का ग्रहण करें। दोषों का कदापि ग्रहण न करें।।२२।। फिर मनुष्यों को किसका सेवन करना चाहिए इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। स मतों अग्ने स्मलीक रेषानमा ए पाजुहोति हव्यम् । स देवतां वसुनि दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति ॥२३॥ पदार्थ:-हे (स्वनीक) सुन्दर सेना वाले (अग्ने) विद्या और विनयादि से प्रकाशमान जन ! (4:) जो (रेवान्) बहुत धनवाला होता हुआ (प्रमाणे) भरण- धर्मरहित अग्नि वा परमात्मा में (हव्यम्) देने योग्य घृतादि द्रव्य वा चित्त को (आजहोति) अच्छे प्रकार छोड़ता वा स्थिर करता है (सः, देवता) दिव्य गुणयुक्त वह (बसवनिम्) धनों के सेवन को (दधाति) धारण करता है (य) जिसको (अर्थी) प्रशस्त प्रयोजन वाला (पृच्छमानः) पूछता हुआ (सूरिः) विद्वान् (एति) प्राप्त होता है (स.) वह (मतः) मनुष्य सुखी करता है ।।२३।। भावार्थ:--- जो मनुष्य अग्निविद्या को जान के इस अग्नि में सुगन्ध्यादि का होम करते और इससे कार्यों को सिद्ध करते हैं और जो पूछ अच्छे प्रकार विचार और ध्यान कर के परमात्मा को जानते हैं उनको अग्नि, धनाढ्य और परमात्मा विज्ञानवान् करता है ॥२३॥ फिर मनुष्य विद्वानों से क्या ग्रहण करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । महो नो अग्ने सुवितस्य वद्वानयि सूरिभ्य आ चहा बृहन्तम् । येन वयं सहसावन्मदेमाविक्षितास आयुषा सुधीराः ।।२४।। पदार्थ:-हे (सहसाबन्) बल से युक्त (बग्ने) दानशील पुरुष (विद्वान्) विद्वान् ! आप (महः) महान् (सुनिलस्य, प्रेरणा किये कर्म के कर्ता ह ते हुए (सूरिम्यः) विद्वानों से (बृहन्तम्) बड़े (रथिम्) धन को (न:) हमारे लिये (गा, वह) अच्छे प्रकार प्राप्त कीजिये (येन) जिस से (अविक्षितास:) क्षीणता रहित (सुवीराः) सुन्दर वीरों से युक्त हुए (वयम् ) हम लोग (मायुषा) जीवन के साथ (महेम आनन्दित रहें ॥२४॥ !

ऋग्वेद: मं० ७ । सू० १ ।। 44 मा m P0 ! भावार्थ:---जो मनुष्य विद्वानों से बड़ी विद्या को ग्रहण करते हैं वे सब काल में वृद्धि को प्राप्त होते हुए पूर्ण लक्ष्मी और दीर्घ भवस्था को पाते हैं ॥२४॥ फिर विद्वान् कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि देव अचंदड़यः सुहः । शतौ श्यामओभयास आ से यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥२६॥ पदा:-हे (देव) धन की कामना करने वाले (अग्ने) विद्वन् ! (त्वम्) आप (मघवद्भ्यः) बहुत धनयुक्त पुरुषों से (प्रमाणि) भन्नों की (मे) मेरे लिये (उत, शशाधि) उत्कृष्टतापूर्वक शिक्षा कीजिये और (सषदः) दीजिये हम लोग (ते) तुम्हारे लिए ही देखें जिससे (उभयासः) देने लेने वाले दोनों हम लोग (रातो) सुपात्रों को दान देने के लिये प्रवृत्त (स्याम) हों यूयम्) हुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हमारी (न) शीघ्र (सदा) सब काल में, (मा, पात) अच्छे प्रकार रक्षा करो ॥२५॥ भावार्थ:-हे राजपुरुष ! आप न्यायपूर्वक हम सब लोगों को शिक्षा कीजिये, हम से यथायोग्य कर लिया कीजिये, पक्षपात छोड़ के सब के साथ वतिये, जिसमे राजपुरुष और हम प्रजाजन सदा सुखी हों ॥२५॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, श्रोता, उपदेशक, ईश्वर और राजश्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में प्रथम सूक्स समाप्त हुमा ।। " manus ra के योग्य वा शुद्ध (सानु) सेवनयोग्य धन को (ल्य (दिवस) * बोम् * अथ पञ्चमाष्टके द्वितीयोऽध्यायः॥ 43:0:53:0930 विश्वानि देव सहित रितानि पर छुरा । यद्भद्रं तन्न आ सुव ।। अथकान शर्चस्व द्वितीयस्वा सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । पात्रं देवता । १--- विरान्निष्टुप् २ । ४ त्रिष्टुप् । ३ । ६ ८।१०। ११ निचनिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः। ५ पङ्क्तिश्छन्दः । ५ स्वरः ।। अब पञ्चमाष्टक के द्वितीयोऽध्याय का और सातवें मण्डल के द्वितीय सूक्त का प्रारम्भ है । इसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् लोग किसके तुल्य वत्र्ते इस विषय का उपदेश करते हैं। जुषस्व नः समिधमग्ने अद्य शोचा बृहद्यजत धूममृण्वन् । उप स्पृश दिव्यं सानु स्तूपैः संरक्षिमभिस्ततन. सूर्यस्य ॥१॥ पदार्थ:--- है (अग्ने) अग्नि के तुल्य' तेजस्वि विद्वन् ! आप जैसे अग्नि (सनिधम्) समिधा को वैसे (न:) हमारी प्रजा का (जुषस्थ) सेवन कीजिये तथा अग्नि के तुल्य (अद्य) आज (बृहत्) बड़े (यजतम्) सङ्ग करने योग्य व्यवहार को (शोचा) पवित्र कीजिये और (धमम् ) धूम को (ऋण्वन्) प्रसिद्ध करते हुए अग्नि के तुल्य सत्य कामों का (उप, स्पृश) समीप से स्पर्श कीजिये तथा (सूर्यस्य) सूर्य के (स्तूपैः) सम्यक् तपे हुए (रश्मिभिः) किरणों से वायु के तुल्यः (दिव्यम्) कामना कीजिये ॥१॥ भाषार्थः- इस मन्त्र में वाचकलु-हे विद्वानो ! जैसे अग्नि समिधाओं से प्रदीप्त होता वैसे हमको विद्या से प्रदीप्त कीजिये । जैसे सूर्य की किरणें सब का स्पर्श करती हैं वैसे आप लोगों के उपदेश हम को प्राप्त होवें ॥१॥ HEL

७१०
ऋग्वेदः मं० ७ । सू०२ ॥
फिर मनुष्यों को किस का सेवन करना चाहिये इस विषय को अगले
मन्त्र में कहते हैं ।
नराशसंस्था महिमानमेषामुपं स्तोपाभ राजतस्य यज्ञैः ।
ये सुकाचः शुचयो धियं था: स्वंदन्ति देवा उभयानि हव्या । २।।
SAR
cha
melan
Azive
AAP
पदार्थ:----हे मनुष्यो ! (ये) जो (सुस्ता) उत्तम प्रज्ञा वाले' (शुचय:) पवित्र
(धिन्धाः) उत्तम कर्मों के बारण करने बाले (देवाः) विद्वान् लोग (उभयानि)
शरीर और आत्मा के पुष्टिकारक (हव्या) भोजन के योग्य पदार्थों को (स्वदन्ति)
अच्छे स्वादपूर्वक खाते और (यः) सङ्गति के योग्य साधनों से (यजतस्य) सङ्ग
करने योग्य (नराशसस्थ) मनुष्यों से प्रशंसा किये हुए तथा अन्न का भोग करने वाले
के (एषाम् ) इनकी (महिमानम्) महिमा की हम लोग (उप, स्लोषाम) समीप
प्रशंसा करें ॥२॥
भावार्थ:-हे अनुष्यो ! तुम को चाहिये कि सदैव विद्वानों के अनु-
करण से शरीर और मात्मा केबल को बड़ाने वाले खान-पानों का सेवन
किया करो जिससे तुम्हारी महिमा बढ़े ॥२॥
फिर मनुष्य किसका सत्कार करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
ईळे को अपरं सुरभन्दतं रोइसी सत्यवाचन् ।
मनुध्वनि अनुमा समिद्धं सभध्वराध समियम ।।३।
पदार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे हम लोग (व:) प्रापक (अन्तः) बीच में सुरम्)
मेघ के तुल्य वर्तमान (सुदाम) सुन्दर बल और चतुराई से युक्त (रोली) सूर्य
भूमि और (वृतम्) उपतार देने वाले अग्निम् ) कार्य को सिद्ध करने वाले अग्नि को
जैसे वैसे (लयद्याच) सत्य बोलने वाले (ई न्य) प्रशंसा योग्य' (मनुनादी मनुष्य
के तुल्य (मनुना) मननशील विद्वान् के साथ (अध्वराय) हिसारहित बहार के
लिए (समि) प्रदीप्त किये (सक्षम) जिसके निकट बैठे उ, अग्नि के तुल्य विद्वान्
को (लम्, इत, सहेम) सम्यक् ही सत्कार करें वैसे तुम लोग भी इ का सत्कार
MA
रोशा
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो मेघ के तुल्य उपकारक, अग्नि के तुल्य
प्रकाशित विद्यावाले, धर्मात्मा, विद्वानों का सत्कार करते हैं वे सर्वत्र
सत्कार पाते हैं ॥३॥

ब do प समनेसंग्रामों में (अगुवः) माता पित ऋग्वेदः मं०७। सू० २ ॥ फिर मनुष्य' कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सपनो भरमाणा अभिज प्रजते नमसा बहिरग्नौ । आजुह्वाना घृत्तपृष्ठं पृषददर्यवो हविषा मर्जयध्वम् ।।४।। पदार्थ:--हे मनुष्यो ! जैसे (अभिज्ञ) विद्वानों के समीप पग पीछे करके सन्मुख घोट् जिनके हों वे विद्यार्थी विद्वान् होकर (सपर्यवः) सत्य का सेवन करते और (भरमाणा:) विद्या को धारण करते हुए (नमसा) अन्न के साथ (बहि:) उत्तम घृत आदि को (अग्नी) अग्नि में (प्र, वृजते) छोड़ते हैं वैसे (घृतपृष्ठम्) घृत' जिसके पीठ के तुल्य है उस अग्नि को (आजह्वानाः) अच्छे प्रकार होमयुक्त करते हुए (पृष- द्वत्) सेवनकर्ता के तुल्य (अध्वर्यवः) अहिंसाधर्म चाहते हुए (हविषा) होम सामग्री से मनुष्यों के अन्तःकरणों को तुम लोग (मर्जयध्वम्) शुद्ध करा ॥४॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में [उपमा] वाचकलु ---जो विद्वान् लोग यजः मानों के तुल्य मनुष्यों के अन्तःकरण और आत्मानों को अध्यापन और उपदेश से शुद्ध करते हैं वे आप शुद्ध होकर सब के उपकारक होते हैं ॥४॥ फिर विद्वान् लोग कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स्वाध्यो३ वि दुरों देवयन्तोऽशिश्रयू रायुदेवतांता । पूर्वी शिशुं जमातरी रिहाणे समग्रवो न समनेष्टञ्जन् ।।५।। पदार्थ:-जो (स्वाध्यः) सुन्दर विचार करते (देवयन्तः) विद्वानों को चाहते हुए जन (देवताता) विद्वानों के अनुष्ठान या सङ्ग करने योग्य व्यवहार में (स्थयु:) रथ को चाहने वाले के तुल्य (रिहाणे) स्वाद लेते हुए (पूर्वी) अपने से पूर्व हुए मागे चलती हुई [सेनाए ] () जैसे वैसे (दुरः) द्वारों का (वि, अशिश्नयुः) विशेष आश्रय करते हैं और समाजन्) चलते हैं वे सुख करने वाले होवें ॥५॥ भाक्षा:- इस मन्त्र में उपमानाचकलु०- जो मनुष्य सम्बक विचार करते हुए, विद्वानों के सङ्ग में प्रीति रखने वाले, यज्ञ के तुल्य परोपकारी, न्याय से प्रजामों का पालन करते हैं वे सदा सुखी होते हैं || फिर विदुषी स्त्रियां कैसी हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उत योषणे दिव्ये मही न उषासानक्ता सुदुधैव धेनुः । बहिषदा पुरुहूने मघोनी श्राज्ञ सुविताय श्रयेताम् ॥६॥ TRA ka EN BAR ७१२ ऋग्वेदः भं० ७ । सू० २॥ पदार्थ:-हे विद्वानो ! जो (न:) हमारे लिये (यशिये) यज्ञ सम्बन्धी कर्म में (मघोनी) बहुत धन मिलने के निमित्त (योधणे) उत्तम स्त्रियों के तुल्य (दिध्ये) शुद्ध- स्वरूप (मही बड़ी (धेनः) विद्यायुक्त वाणी वा गो (सुधेय) सुन्दर प्रकार काम- नामों को पूर्ण करने वाली के तुल्य (उस) और (बहिषया) अन्तरिक्ष में रहने वाली (पुरुहूते) बहुतों से व्याख्यान की गई (उपासानक्ता) दिन रात रूप देला हम को (प्रा, श्रयेताम् ) प्राश्रय करें वे दिन रात (सुविताय) ऐश्वर्य के लिये यथावत सेवने योग्य हैं ॥६॥ भावार्थ:---- इस मन्त्र में वाचकलु०--हे मनुष्यो ! जो स्त्रियां उत्तम विद्या और गुणों से युक्त, रात्रि दिन के तुल्य सुख देने वाली सत्य वाणी के तुल्य प्रिय बोलने वाली हों उन्हीं का तुम लोग पाश्रय करो।।६।। फिर वे स्त्री पुरुष कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । विप्रा यज्ञेषु मानुषेषु कारू मन्ये वां जातवेदसा यजध्यै । जर्व नों अध्वरं कुन हवेषु ता देथेषू वनयो कार्याणि । ७|| पदार्थ:-हे स्त्री पुरुषो ! जो (मानुषेषु) मनुष्यसम्बन्धी (यज्ञेषु) सत्कमों में (कारू) वा शिल्लविद्या में कुशल वा पुरुषार्थी (जातवेदसा) विद्या को प्रसिद्ध प्राप्त हुए (विप्रा) बुद्धिमान तुम दोनों (न:) हमारे (हवेष) जिन में ग्रहण करते उन घरों में (अध्वरम् ) रक्षा करने योग्य गृहाश्रमादि के व्यवहार को (ऊर्ध्वम्) उन्नत (कृतम्) करो (देवेष) दिव्य गुणों वा विद्वानों में (वार्याणि) ग्रहण करने योग्य पदार्थों को (वनथः) सम्यक् सेवन करो (ता) वे (वाम्) तुम दोनों (यजध्ये) सङ्ग करने के अर्थ मैं (मन्ये) मानता वैसे दोनों मुझ को मानो ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु -हे मनुष्यो ! जैसे ब्रह्मचर्यसेवन से विद्या को प्राप्त हुए क्रिया में कुशल विद्वान् स्त्रीपुरुष सब घर के कामों को शोभित करने को समर्थ होते हैं और वे संग करने योग्य होते हैं वैसे तुम लोग भी होमो ॥७॥ फिर स्त्री पुरुष कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। आ भारती भारतीभिः सजोषा इळा देवैमनुष्येभिरग्निः । सरस्वती सारस्वतेभिरर्वाक् तिस्रो देवीबहिरेदं संदन्तु ॥८॥ पदार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे (भारतीभिः) अपने तुल्य विदुषी स्त्रियों के साथ (भारती) शीघ्र शास्त्रों को धारण कर, वाणी के तुल्य सब की रक्षक विदुषी तुम * AHM ऋग्वेदः मं० ७ । सू०२।। ७१३ (सजोषाः) तुल्य प्रौति को सेबने वाली (देवः सत्यवादी विद्वानों (मनुष्येषिः) और मिथ्यावादी मनुष्यों से (इळा, स्तुति के योग्य (शारदभिः) वाणी विद्या में कुशलों से (सरस्वती) विज्ञानयुक्त बाणी (मर्यादा पुनः (अग्निः) अग्नि के तुल्य शुद्ध (तिनः) तीन प्रकार की (देवी) उत्तम स्त्रियां । इसम्) इस (बहि:) उत्तम घर वा शरीर को (T, सवन्तु सच्छे कार याप्त हों वैसे ही तुम लोग विद्धानों के साथ (A) आनो ॥८॥ भावी :---इस मन्त्र में नाचकल - हे मनुष्यो ! यदि तुम लोग प्रशंसित वाणी और बुद्धि को प्राप्त हो तो सूर्य के तुल्य प्रकाशित हो कर इस जगत् में कल्याण करने वाले होमो॥८॥ फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तन्नत्तुरीपमध पोषयित्नु देव त्वष्टविराणा इयख । थतो वीरः कर्मण्यः सुदा युक्तावा जायते देवकांमः ॥९॥ पदार्थ:-हे (त्वष्टः) विद्या को प्राप्त कराने वाले (देव) विद्वन् ! (वि,रराणः) विशेष विद्या देते हुए (नः) हमारे (तत्) पढ़ाने के आसन को (पोषयित्नु) पुष्ट करने वाले (तुरीपम् ) शीघ्र (स्यस्व विद्या को पार कीजिये (अध) अब (यतः) जिससे (कर्मण्यः) कर्मों में कुशल (सुदक्षः) सुन्दर बल से युक्त (युक्त ग्राबा) मेघ को युक्त करने ार (देवकामः) विद्वानों को कामना करने वाला (वीरः) वीर पुरुष (जायते) प्रकट होता है ।।६।। भावार्थ:-सब मनुष्यों को उचित है कि सब लाभों से विद्या लाभ को उत्तम मान के उसको प्राप्त हों, सदैव जो विद्वानों का सङ्ग करके सदा कर्मों का अनुष्ठान करने वाला होता है वह श्रीठ प्रात्मा के बल वाला होता है ॥६॥ फिर विद्वान् लोग क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वनस्पतेऽव सृजोपं देवानग्निईविः चमिता सुंदयाति । सेदु होता सत्यतरो यजाति या देवानां जनिमानि वेद ॥१०॥ पदार्थ:-हे (वनस्पते) किरणों के पालक सूर्य के तुल्य तेजस्वि दिद्वन् ! (शमिता) शान्तियुक्त श्राप (यथा) जैसे (अग्निः) अग्नि (हविः) हवन किये द्रव्य को (सूदयाति) भिन्न भिन्न करे वैसे (देवान्) दिव्यगुणों को (उप, अव, सुज) फैलाइये जैसे (होता) दाता (यजाति) यज्ञ करे वैसे (इव) ही (उ) तो (सत्यतरः) सत्य से ७१४ ऋग्वेदः मं०७ । सू०२॥ । द aatana दुःख के पार होने वाले हूजिये । जो ( देवानाम् ) पृथिव्यादि दिव्य पदार्थों वा विद्वानों के (जनिमानि) जन्मों को (वेद) जानता है (सः) वह पदार्थविद्या को प्राप्त होने योग्य है ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलु० -हे विद्वानो ! यदि आप लोग, सूर्य जैसे वर्षा को, होता जैसे यज्ञ को, और विद्वान् जैसे विद्या को, वैसे पढ़ाने और उपदेश से सर्वोपकार को सिद्ध करें तो आप के तुल्य कोई लोग नहीं हों यह हम जानते हैं ॥१०॥ फिर विद्वान् लोग क्या करें इस विषय को अगले सत्र में कहते हैं । श्रा याह्याने समिधानो अर्वाङि ट्रैण हेवैः सरथ तुरेभिः । बहिर्न आस्तामदितिः सुपुत्रा स्वाहा देवा अमृता मादयन्ताम् । ११॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान विद्वन् ! जैसे (लनिधानः) शुभ गुणों से देदीप्यमान अग्नि अर्थात् सूर्य का प्रकाश (इन्द्रेण) बिजुली वा सूर्य के साथ (अर्वाङ्) नीचे जाने वाला प्राप्त होता है वैसे होकर आप भी (तरेभिः) शीघ्र करने वाले (देवैः) विद्वानों वा दिव्य गुणों के साथ (नः) हमारे लिये (सरथम्) रथ के साथ वर्तमान (बहिः) अन्तरिक्ष को (मा, याहि) आइये और जैसे (दाहा) सत्य क्रिया से (सुपुत्रा) सुन्दर पुत्रों से युक्त (अदितिः) माता है वैसे आप भी (प्रास्ता) स्थित होवें और जैसे (अमृताः) मोक्ष को प्राप्त हुए (देवाः) विद्वान् जन सब को आनन्दित करते हैं वैसे श्राप भी सब को (मादयन्ताम) आनन्दित कीजिये ॥११॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वानो ! जैसे सूर्य का प्रकाश दिव्य गुणों के साथ नीचे भी स्थित हम सबों को प्राप्त होता है और जैसे सत्य विद्या से युक्त और उत्तम सन्तान बाली माता सुखपूर्वक स्थित होती है वैसे ही अविद्वान् हम सबों को श्राप प्राप्त होकर अच्छी शिक्षा दीजिये तथा सुखी कीजिये ॥११॥ इस सूक्त में [अग्नि], मनुष्य, बिजुली, विद्वान्, अध्यापक, उपदेशक, उत्तम वाणी, पुरुषार्थ, विद्वानों का उपदेश तथा स्त्री आदि के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये। यह सप्तम मण्डल में दूसरा सूक्त समाप्त हुमा ।।

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३ ।। ७१५ a प RIA MIND अथ दशर्चस्य तृतीयस्थ सुक्तस्या यसिष्ठ ऋषिः । श्रग्निर्देवता ।। ६ । १० विरानिष्टुप् । ४ ५ ६ । ७ । ६ निवृत्रिष्टुप् । ५ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्मरः । २ स्वराट् पङ्क्तिः । ३ भुरिक पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब ७वें मण्डल के तृतीय सूक्त का प्रारम्भ है। इसके प्रथम मन्त्र में विद्युत् कैसी है इस विषय को कहते हैं । अग्नि को देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम् । यो नि,वितावा तपुर्दा घृताभ पावकः ॥१॥ पहा : ... हे मनुष्यो ! (य:) जो (वः) तुम्हारा (सजोषाः) एक सी प्रीति को सेबने वाला मर्येषु) मरणधर्म सहित मनुष्यादिकों में (निध्रुवि:) निरन्तर स्थित (ऋताया) सत्य वा जल का विभाग करने वाला (सयुमूर्खा) शिर के तुल्य उत्कृष्ट चा उत्तम जिसका ताप है (घतानः) अन्न के तुल्य प्रकाशित जिसका घृत है (पावकः) जो पवित्र करने वाला है उस (अध्झरे) सूर्य आदि के साथ (यजिष्ठस्) अत्यन्त संगति करने वाले (दूतम्) दूत के तुल्य तार द्वारा शीघ्र समाचार पहुंचाने बाले शनिम, देवह उत्तम गुभा, कर्म और स्वभाव युक्त अग्नि को तुम (कृणुध्वम् । प्रस्ट' करो ॥१॥ भा~~ हे विद्वानो ! जो विद्युत् सर्वत्र स्थित, विभाग करने वाली, प्रकाशित गुणों से युक्त साधनों से प्रकट हुई वर्तमान है उसी को तुम लोग दूत के तुल्य बनाकर युद्धादि कार्यों को सिद्ध करो॥१॥ फिर वह विद्युत कैसी है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं. मोपदक्षोभ शवोऽविपक्षमादा महः संबाद्वयस्थाद । आदस्य दातो अनुवाति शोचिरय समाते ब्रजनं कृष्णमस्ति । २।। पदार्थ:--- हे विद्वन् ! जो (ते) आपका (कृष्णम्) आकर्षण करने योग्य (सजनम्) गमन (अस्ति) है उसके सम्बन्ध में महः) महान् (संवरणात) सम्यक् स्वीकार से शोवि:) प्रदीपन (अध, स्म) और इसके अनन्तर ही (प्रत्य) इसके सम्बन्ध में (बातः) वायु (यदा) जब (अनु, वाति) अनुकूल' चलता है (प्रात्) अनन्तर तब (यबसे) भक्षण के अर्थ अविष्यन्) रक्षा करता (प्रीयत्) और शब्द करता हुमा (अश्व: न) घोड़े के समान शीघ्र यह अग्निमार्ग को (ध्यस्थाव) व्याप्त होता है ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जब मनुष्य लोग अग्नियान । LIP

जिस (नवजातस्य) नवीन प्रकट हुए (वृष्ण:) विद्या से बलवान् (ते) आप विद्वान् के
ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३ ।।
से गमन और विद्युत् से समाचारों को ग्रहण करें तब ये शीघ्र कार्यों को
सिद्ध कर सकते हैं ॥२॥
फिर विद्वान् बिजुली से क्या सिद्ध करें इस विषय को अगले मन्त्र में रहते हैं।
उद्यम ते नवजातस्थ्य वृष्णोऽग्ने चरन्त्यजरी इवानाः ।
अच्छा द्यामंपो धूम एखि सन्दूतो अंग्न ईय से हि देवान् ।।३।।
पदार्थ:-है (अग्ने विद्युत अग्नि के तुल्य गुप्त प्रताप वाले ! (यस्य)
वापस
JAN
ए
,
निकटवर्ती जैसे (अन्ने) प्रसिद्ध अग्नि के तुल्य कार्यसाधक (इन्धानाः) प्रकाशमान
जलते हुए (अजराः) खर्चरहित अग्नि (उत, चरन्ति ) ऊपर को उठते वा चलते हैं
(परुषः) गर्भस्थ पुरुष (सात) प्रकाश को प्राप्त होकर जिसका (धूमः) धुआं
(अच्छा, एति) अच्छा जाता है जो (दूतः) दूत के तुल्य (देवान्) विद्वानों को प्राप्त
होता जब उसको (हि) ही भाप (समीयसे) प्राप्त होते हो तब कार्य करने को समर्थ
होते हो ॥३॥
भावार्थ:-हे विद्वन् ! यदि आप विद्युत् की विद्या को जानें तो आप
किस-किस कार्य को सिद्ध न कर सकें ॥३॥
फिर वह विद्युत् कैसी है और कैसे प्रकट करनी चाहिये इस विषय को
अगले मन्त्र में कहते हैं।
वि यस्य ते पृथिव्यां पाजो अ|त्तषु यदन्ना समक्त जम्भैः ।
सेनेव सृष्टा प्रसिलिष्ठ एति थ न दस्म जुह्वा विवेक्षि ॥४॥
पदार्थ:-हे (दस्म) दुःखों के नाश करने हारे विद्वन् ! जिस (जुह्वा) होम
साधन से (यवम्) यवों को (न) जैसे वैसे विशु द्विद्या को (विवेक्षि) व्याप्त होते हो
वह (ते) तुम्हारी (सृष्टा) प्रयुक्त क्रिया प्रतितिः) प्रबल बन्धन होती हुई (सेनेव)
सेना के तुल्प (एति) प्राप्त होती है और (यत्) जो (जम्भः) गात्रविक्षेपों से (मन्ना)
अन्नों को (समयुक्त) अच्छे प्रकार वजित करता अर्थात् शरीर से छुड़ाता है (बस्य)
जिस (ते) लस विद्य त् के (पाजः) बल' को (पृथिव्यां) पृथिवी में (ए) शीघ्र
(व्यशेती आश्रय करता है उसको तुम जानो ॥४॥
भावार्थ:-जो विद्वान् लोग विद्युत्विद्या को जानते हैं वे उत्तम सेना
के तुल्य शत्रुओं को शीघ्र जीत सकते हैं, जैसे घी आदि से अग्नि प्रज्वलित
होता वैसे घर्षण आदि से विद्युत् अग्नि प्रकट करना चाहिये ॥४॥

ऋग्वेद: मं० ७ । सू० ३ ।। ७१७ मा. AND 9 AN aid M Ace M MER फिर वह विद्यत् कैसे उत्पन्न करनी चाहिये और वह क्या करती है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। लगिदोश तमुषसि पविष्ठमग्निमत्यं न मर्जयन्त नरः । नशिशामा अतिथिस्य योनौ दीदाय शोचिराहुतस्य वृष्णः ॥५॥ पदार्थ:-है (नरः) नायक मनुष्यो ! जो (निशिशानाः) निरन्तर तीक्ष्णता पूर्वक कार्य करते हुए श्राप (तम्) उस विद्य त् अग्नि को (बोषा) रात्रि में (तम्) उसको (उपसि) दिन में (अत्याम) घोड़े को (न) जैसे वैसे (यविष्ठम्) अत्यन्त जवान तुल्य (अग्निम् ) विद्युत अग्नि को मजयन्त) घर्षण प्रादि से शुद्ध करो (अस्य) इस (पाहतस्य) अभीष्ट सिद्धि के लिए संग्रह किये (वृष्णः) वर्षा के हेतु अग्नि के (योनी) कारण में (अतिथिम्) अतिथि के तुल्य सेवने योग्य (शोचिः) दीप्तियुक्त विद्युत् को (दीदाय) प्रकाशित (इत्) ही कीजिये । ५।। भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-जो तीव्र घर्षणादिकों से दिन रात विद्युत् अग्नि को प्रकट करते हैं वे जैसे घोड़े से, वैसे शीघ्र स्थानान्तर के जाने को समर्थ होते हैं ॥५॥ फिर वह विद्युत् अग्नि कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सुसन्हक्त कनीक प्रतीक विपद्रवमो न रोचस उमाके । दियो न ले सन्यतुरेति शरश्चित्रो न सूरः भतिवक्षि भानुम् ।।६।। पदार्थ:-हे (स्वनीक) सुन्दर सेना वाले सेनापते ! जिस (ते) आपका (यत्) जो (प्रतीकम्) विजय का निश्चय कराने वाले (म:) प्रकाशमान सूर्य के न) तुल्य है जो (उपाके) समीप में (वि, रोचसे) विशेष कर रुचिकारक होते हो। जिस (ते) तुम्हारा (दिवः, न) सूर्य के तुल्य (सुसन्दृक्) अच्छे प्रकार देखने का साधन (तन्यतुः) विद्युत् विजय प्रतीतिकारक नियम को (एति) प्राप्त होता है उसका (शुष्मः) बलयुक्त (चित्रः) आश्चर्यस्वरूप (सूरः) सूर्य (न) जैसे वैसे मैं (भानुम्) प्रकाशयुक्त (प्रति) आपके प्रति (चक्षि) कहूं ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-हे राजन् ! यदि आप विद्युत् को जानें तो सूर्य के तुल्य सुन्दर सेनादिकों से प्रकाशित विजय, कीति और राजाओं में सुशोभित होवें ॥६॥ फिर मनुष्य परस्सर कैसे वर्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। Haren हुए सर्वत्र ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३ ॥ या वः स्वाहाऽनये दाम परीलोभित विश्व हल्यैः । तेमिनों अग्ने अगितमहोभिः शतं पृभिरायसीमिनि पाहि ॥७॥ Kuma पदार्थ:-हे विद्वान् लोगो ! (स्था) जैसे हम लोग (व:) तुम्हारे अर्थ (स्वाहा) सत्यक्रिया से (घृतद्भिः) घृतादि से युक्त (हव्यः) होम के योग्य पदार्थों (अ) और (इळाभिः) अन्नों के साथ (अग्नये) अग्नि के लिये (जल) सैकड़ों प्रकार के हविष्यों को (परि, बाशेम) सब और से देखें वैसे (अमितः) असंख्य (महोभिः) बड़े बड़े कर्मों वा पुरुषों और (तेभिः) उन (आयसीभिः) लोहे से बनी (भि:) नगरियों के साथ वर्तमान (नः) हम लोगों को (अग्ने हे अग्नि के तुल्य तेजस्वी प्रकाशमान राजन् (नि, पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु-हे मनुष्यो ! जैसे ऋत्विक् और यजमान लोग घृतादि से अग्नि को बढ़ाते हैं वैसे ही राजा प्रजाओं को और प्रजाएँ राजा को न्याय विनयादि से बढ़ा के अपरिमित सुखों को प्राप्त होते हैं ॥७॥ फिर किन किन से किनकी रक्षा करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। या वा ते सन्ति दाशुषे अधृष्टा गिरो वा यामिनूवतीहरूप्याः । ताभिः सूनो सहसो नि पाहि मत्सूरीञ्ज रतृञ्जातवेदः ॥८॥ पदार्थ:-हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र ! (जातवेदः) प्रकट बुद्धिमानी को प्राप्त हुए (माः) जो (ते) आपकी (अधृष्टाः) न धमकाने योग्य (गिरः) सुशि- क्षित वाणी (सन्ति) हैं (था) अथवा (दाशुषे) दाता पुरुष के लिये हितकारिणी हैं (वा) अथवा (याभिः) जिन वाणियों से पाप (नवतीः) उत्तम मनुष्यों वाली प्रजाओं की (उरुष्याः) रक्षा कीजिये (ताभिः) उनसे (नः) हम (जरितन्) समस्त विधाओं की स्तुति प्रशंसा करने वाले (सूरोत्) विद्वानों की (स्मत) ही (नि, पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये ॥८॥ भावार्थ:-मनुष्य लोग जब तक विद्या, शिक्षा, विनयों को ग्रहण कर अन्यों को नहीं ग्रहण कराते तब तक प्रजात्रों का पालन करने को नहीं समर्थ होते हैं, जब तक धर्मात्मा विद्वानों के, राज्य में अधिकार न हों, तब तक यथावत् पालन होना दुर्घट है ॥८॥ !

HAKARMA ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३ ।। फिर मनुष्यों को कैसा राजा मानना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। निर्यत्पूतैव स्वर्धितिः शुचिर्गात्स्वा कृषा तत्वा३' रोचमानः ! आ यो मानोरुशेन्यो अनिष्ट देवयज्याय सुक्रतुः पारकः ।।९ । पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (यत्) जो (पूतेव) पवित्रता के तुल्य (स्वधितिः) वज्र (शुचिः) पवित्र पुरुष (निः, गात् ) निरन्तर प्राप्त होता है (यः) जो (स्वया) अपनी (कृपा) कृपा से (तन्या) शरीर करके (रोचमानः) प्रकाशमान (मात्रो:) जननी और धात्री में (उशेन्यः) कामना के योग्य (पावकः) अग्नि के तुल्य प्रकाशित यश वाला (सुऋतु:) उत्तम प्रज्ञा वाला (देवयज्याय) बुद्धिमानों के समागम के लिये (पा, अनिष्ट) प्रकट होता है वही इस जगत् में प्रशंसा के योग्य होवे ॥६॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमावाचकलु० -हे मनुष्यो ! जिसको वज्र के समान दृढ़, अग्नि के समान पवित्र, कृपालु, दर्शनीय शरीर, विद्वान्, धर्मात्मा जानो उसी को इनमें राजा मानो ॥९ राजा भी कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम । विश्वा स्तोतभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥१०॥ पदार्थ:-हे (ग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् राजन् ! आप (नः) हमारे (एता) इन (सौभगा) उत्तम ऐश्वथ्यों के भावों को (दिदीहि) प्रकाशित कीजिये जिससे (अपि) भी हम लोग (सुचेतसम्) प्रबल विद्यायुक्त (ऋतुम्) बुद्धि का (क्तेम) सेवन करें (स्तोतृभ्यः) ऋत्विजों और (विश्वा) सब की (गृणते) स्तुति करने वाले के लिए ये (ब) भी सब प्राप्त (सन्तु) हों (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) स्वस्थता करने वाले सुखों वा कर्मों से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥१०॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप सब मनुष्यों के सौभाग्यों को बढ़ा के बुद्धि को प्राप्त करो। हे प्रजा पुरुषो! आप लोग राजा और राज्य की सदैव रक्षा करो ॥१०॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा और प्रजा के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में तृतीय सूक्त समाप्त हुश्रा॥ Paud SON alod ७२० ऋग्वेदः मं० ७ । सू०४ ।। अध वशस्य चतुर्थस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निवता । १।३।४ । ७ भुरिक पङ्क्तिः । ६ स्वराष्ट्र पङ्क्तिः । ८।६ पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। २। ५ निवृत्रिष्टुप् । १० विरात्रिष्टुपछन्दः । धैवतः स्वरः । अब दश ऋचा वाले चतुर्थ सूक्त का प्रारम्भ है। इसके प्रथम मंत्र में मनुष्यों को कैसा होना चाहिये इस विषय को कहते हैं । म का शुक्राय भानवे भरध्वं हव्यं मति चाग्नये सुप॒तम् । यो दैव्यानि भानुशा जतर्विशान विमना जिगाति ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (य) जो (4:) तुम्हारे (शुक्राय) शुद्ध' (भानये) विद्याप्रकाश के लिए तथा (अग्नये) अग्नि में होम करने के लिए सुपूतम्) सुन्दर पवित्र (हव्यम्) होमने योग्य पदार्थ के तुल्य (मतिम्) विचारशील बुद्धि को वा (दमानि) विद्वानों के लिये (माजुधा) मनुष्यों से सम्पादित (जनूंषि) जन्मों वा कर्मों को (च) और (विश्वानि) सब अन्तः) अन्तर्गत (विझना) जानने योग्य वस्तुओं को (जिगाति) प्रशंसा करता है उसके लिये तुम लोग उत्तम सुखों का (प्र भरध्वम्) पालन वा धारण करो ॥१॥ भावार्थ:--हे विद्वानो ! जो तुम्हारे लिये उत्तम द्रव्यों तथा सब के हितकारी जन्मों और विज्ञानों का उपदेश करने को प्रवृत्त होता है उसकी तुम लोग निरन्तर रक्षा करो ||१|| मनुष्यों को युवावस्था में ही विवाह करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। स गृत्सो अग्निस्तरुणश्चिदस्त यतो गठिो अनिष्ट मातुः । सं यो वनो युगते शुचिदन्यूरि चिदन्ना समिदत्ति सद्यः ॥२॥ पशर्य:--हे मनुष्यो ! (य:) जो (मातुः) अपनी माता से (अजनिष्ट) उत्पन्न होता (सः) वह (अग्निः) पावक के तुल्य तेज बुद्धि वाला बालक (तरुणः) जवान (चित) ही (अस्तु) हो (यतः) जिससे वह (गृत्सः) बुद्धिमान् (यविष्ठः) अत्यन्त जवान हो (सद्यश्चिद) शीघ्र ही (अन्ना) अन्नों का (इव) ही (समत्ति) सम्यक भोजन करता है (शुचिदन्) पवित्र दांतों वाला (भूरि) बहुत (वना) जैसे सूर्य किरणों को संयुक्त करता वैसे वनों -तेजों] को (सम्, युबते) संयुक्त करे ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुoहे मनुष्यो ! जैसे अपने पुत्र पूर्ण युवावस्था वाले, ब्रह्मचर्य में सम्यक् स्थापन कर विद्यायुक्त, अति बलवान्, HOM Altoas

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४ ।।
७२१
RS
MCN
।
सुरूपवान् सुख भोगने वाले, धार्मिक, दीर्घ अवस्था वाले, बुद्धिमान् होवें
वैसा
अनुष्ठान
करो
॥२॥
फिर कैसे विद्वान् को सभासद् और अध्यक्ष करें इस विषय को
अगले मन्त्र में कहते हैं।
अस्य देवस्य संसद्यनींके यं मास: श्येतं जंगृभ्रे ।
नि यो गृभं पौरुषेयीमुवीच दुरोकमग्निरायवे शुशोच ॥३॥
पवार्थ:-हे मनुष्यो ! (य:) जो (पौरुषेयीम्) पुरुषसम्बन्धी कार्यों की रीति
का (नि गुभम्) निरन्तर ग्रहण करने को (उबोच) कहता है (अग्निः) अग्नि के
तुल्य तेजस्वी (प्रायवे) जीवन के लिए (शुशोच) शोच' करता है (यम्) जिस
(श्येतम्) श्वेत (दुरोकम्) शत्रुओं से दुःख के साथ सेवने योग्य को (अस्य) इस
(देवस्य) विद्वान् की (संसदि) सभा वा (अनीके) सेना में (मासः) मनुष्य (जगृभ्र)
ग्रहण करते हैं उसी को सभापति सेनापति करो ॥३॥
भावार्थ:--विद्वानों को चाहिये कि अच्छे प्रकार परीक्षा कर सभासदों
और अध्यक्षों को नियत करें
जो
बलवान् और अधिक अवस्था वाले हों
वे ही राज्य को अच्छे प्रकार भूषित कर सकते हैं ॥३॥
कौन विद्वान् अधिक कर विश्वास के योग्य हो इस विषय को
अगले मन्त्र में कहते हैं।
अयं कविरक विषु प्रचंता मतेष्वग्निरमृतो नि धायि ।
स मा नो अत्र जुहुर। सहस्वः सदा त्वे सुमनसा स्याम ॥४॥
पदार्थ:-हे (सहस्व:) प्रशस्त बलवाले ! जो (अयम्) प्रत्यक्ष श्राप
(अकविषु) न्यून बुद्धि वाले अविद्वानों में (कविः) तीब्र बुद्धियुक्त विद्वान् (मर्तेषु)
मनुष्यों में (प्रचेता) चेत कराने वाले (अग्निः) विद्युत् अग्नि के तुल्य (अमृतः)
अपने स्वरूप से नाशरहित पुरुष को (नि, धाथि) धारण करते हैं (स:) सो आप
(अत्र) इस व्यवहार में (नः) हमको (मा, जुहुरः) मत मारिये जिससे हम लोग
(त्वे) आप में (सुमनसः) सुन्दर प्रसन्न चित्त वाले (सदा) संदा (स्थाम) होवें ॥४॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जो यह दीर्घ
ब्रह्मचर्य के साथ विद्वानों से विद्या को ग्रहण करता है वही विद्वान् प्रशंसित
बुद्धि वाला, मनुष्यों में महान् कल्याणकारी हो उसके प्रति सब मनुष्य यदि
मित्रता से वत्तें तो अविद्वान् भी बुद्धिमान् होवें ॥४॥

७२२
ऋग्वेदः म०७ । सू० ४ ॥
anim
स
कौन विद्वान् किसके तुल्य करता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
आ यो योनि देवकृतं ससाद क्रत्वा ा १ मिरमृता अतारीत् ।
तमोषधीश्च वनिनश्च गर्भ भूमिश्च विश्वायस बिभर्ति ॥५॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (य:) जो (अग्नि:) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (देवकृतम्)
विद्वानों ने विद्या पढ़ने के अर्थ बनाये (योनिम्) घर में (श्रा, ससाद) अच्छे प्रकार
निवास करे वह (हि) ही (क्रत्वा) बुद्धि से (अमृतान्) नाश रहित जीवों वा पदार्थों
को (अतारीत्) तारता है (ब) और जो (भूमिः) पृथिवी के तुल्य सहनशील पुरुष
(तम्) उस (विश्वधायसम्) समस्त विद्याओं के धारण करने वाले (गर्भम्) उप-
देशक (च) और (ओषधिः) सोमादि अओषधियों (च) और (वनिनः) बहुत किरणों
वाले अग्नियों को (च) भी (बिति) धारण करता है वही अतिपूज्य होता
17409
मा
भावार्थः -- इस मन्त्र में वाचकलु-जैसे अग्नि समिधा और होमने
योग्य पदार्थों से बढ़ता है वैसे ही जो पाठशाला में जा आचार्य को प्रसन्न
कर ब्रह्मचर्य से विद्या का अभ्यास करते हैं वे ओषधियों के तुल्य अविद्या-
रूप रोग के निवारक, सूर्य के तुल्य धर्म के प्रकाशक 'और पृथिवी के समान
सब के धारण वा पोषणकर्ता होते हैं ॥५॥
मनुष्यों को कभी कृतघ्न नहीं होना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
ईशेयर मिरमृतस्य भूरेरीने रायः सुवीर्यस्य दातोः ।
मा त्वा वयं संहसाबनवीरा मासवः परि षदाम मादुदः ॥६॥
पदार्थ:-हे (सहसायन्) बहुत बलयुक्त विद्वन् पुरुष ! जो (अग्निः) अग्नि
के समान तेजस्वी आप (श्रमतस्य) नाश रहित नित्य परमात्मा को जानने को (ईशे)
समर्थ वा इच्छा करते हो (भूरेः) बहुत प्रकार के (सुवीर्यस्य) सुन्दर पराक्रम के
निमित्त (रायः) धन के (धातोः) देने को (ईशे) समर्थ हो (२) उन (हि! ही (त्या)
आपको (प्रवीरा:) वीरता रहित हुए (वयम्) हम लोग [(मा)] (परि, सदाम)
सब ओर से प्राप्त [न] हों (अप्सवः) कुरूप होकर आपको (मा) मत प्राप्त
(अबुवः) न सेवक होकर (मा) नहीं प्राप्त हों ।।६।।
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अमृत रूप ईश्वर का विज्ञान, विविध
सुखों से तृप्त करने वाली परिपूर्ण लक्ष्मी को तुम्हारे लिये देता है उसके
समीप वीरता, सुन्दरपन और सेवा को छोड़ के निठुर, कृतघ्नी मत
होमो॥६॥

ऋग्वेदः म० ७ । सू०४ ।। GA P Haman - कौन धन अपना और कौन धन पराया है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। परिषधं शरणस्थ रेक्णो नित्यस्थ राया पतयः स्याम । न शेषो अन्यजातमस्त्यचैतानस्य मा पथो वि दुक्षः ॥७॥ पदार्थ:-है (अग्ने) विद्वन् ! आप (प्रचेतानस्य) चेतनता रहित मूर्ख के (पथः) मार्गों को (मा) मत (विवृक्षः) दुषित कर (परिषधम् ) सभा में होने वाले (अन्यजातम्) अन्य से उत्पन्न (हि) ही (रेषण:) धन को इस प्रकार जानो कि इस की (शेषः) विशेषता वा अपने आत्मा की ओर से शुद्ध विचार कुछ (न, अस्ति) नहीं है आपके सङ्ग वा सहाय से हम लोग (मरणस्य) संग्राम रहित (नित्यस्य) स्थिर (रायः) धन के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! धर्मयुक्त पुरुषार्थ से जिस धन को प्राप्त हो उसी को अपना धन मानो, किन्तु अन्याय से उपाजित धन को अपना मत मानो । ज्ञानियों के मार्ग को पाखण्ड के उपदेश से मत दूषित करो, जैसे धर्मयुक्त पुरुषार्थ से धन प्रात हो वैसे ही प्रयत्न करो ॥७॥ कौन पुत्र मानने के योग्य है इस विषय को पागले मन्त्र में कहते हैं । नहि प्रभावारणा सुशेवोऽन्योदयों मनसा मन्तथा । अधा चिदोका पुनरित्सा एत्या नौ वायभीषाळेतु नव्यः ।।८।। पदार्थ:-हे मनुष्य ! जो (अरणः) रमण न करता हुआ (सुशेवः) सुन्दर सुख से युक्त (अन्योदयं:) दूसरे के उदर से उत्पन्न हुआ हो (स:) वह (मनसा) अन्तःकरण से (अभाय) ग्रहण के लिये नहि) नहीं (मन्तवै) मानने योग्य है (चित, उ, पुन:, इत्) और फिर भी वह (ोकः) घर को नहीं (एति) प्राप्त होता (अध) इसके अनन्तर जो (नध्यः नवीन (अभीषाड्) अच्छा सहनशील' (बाजी) विज्ञान- वाला (न:) हमको (मा, एतु प्राप्त हो ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! अन्य गोत्र में अन्य पुरुष से उत्पन्न हुए बालक को पुत्र करने के लिये नहीं ग्रहण करना चाहिये क्योंकि वह घर आदि का दायभागी नहीं हो सकता किन्तु जो अपने शरीर से उत्पन्न वा अपने गोत्र से लिया हुआ हो वही पुत्र वा पुत्र का प्रतिनिधि होवे ॥६॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वमग्ने वनुष्यतो नि पाहि त्वमुं नः सहसावन्नवद्यात् । सन्त्वाध्वमन्वयेतु पाथः सं रयिः स्पृहयाय्यः सहस्री ॥९॥ म रक पदार्थ:-हे (सहसावन्) बहुत बल से युक्तः । ७२४ ऋग्वेदः म०७ । सू० ५॥ विद्वन् ! (त्वम्) आप (बनुष्यतः) मांगने वालों की (नि, पाहि) निरन्तर रक्षा कीजिये (उ) और (त्वम्) आप (प्रवद्याव) निन्दित अधर्माचरण से (न:) हमारी निरन्तर रक्षा कीजिये जिससे (त्वा) आपको (ध्वस्मन्वत) दोष और विकार जिसके नष्ट हो गये उस (पाथः) अन्न को (समभ्येतु) सब ओर से प्राप्त हूजिये (सहस्री) असंख्य (स्पृहयाय्यः) चाहने योन्य (रयिः) धन भी (सम्) सम्यक् प्राप्त होवे ॥६॥ भावार्थ:-हे राजन् ! यदि पाप आप से रक्षा चाहते हुए प्रजाजनों की निरन्तर रक्षा करें और आप स्वयं अधर्माचरण से पृथक् वत्तें तो आप को अतुल धन धान्य प्राप्त होवें ।।६।। फिर राजा को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतु सुचेतसं वतेम । विश्व स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥१०॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि राजन् ! श्राप (एता) इन (सौभगा) उत्त न ऐश्वर्य वाले पदार्थों को (नः) हमारे लिये (दिदीहि) प्रकाशित कीजिये (अपि) और तो (सचेतसम्) सुन्दर ज्ञानयुक्त (ऋतुम्) बुद्धि को प्रकाशित कीजिये (स्तोतृभ्यः) ऋत्विजों के लिये (च) तथा (गृणते) यजमान के लिये उत्तम ऐश्वर्य वाले (सन्तु) हों जिससे (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) स्वस्थता करने वाली क्रियानों से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो इसलिये हम लोग पूर्वोक्त बुद्धि और (विश्वा) धनों का (वतेम) सेवन करें॥१०॥ भावार्थ:-हे राजन् ! यदि आप सब मनुष्यों को ब्रह्मचर्य के साथ विद्यादान दिलावें, ऋत्विजों और यजमानों की सर्वदा रक्षा करें तो स्वस्थता से पूर्ण राज्य के ऐश्वर्य को प्राप्त हों॥१०॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा, वीर और प्रजा की रक्षा आदि कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह साम मण्डल में चौथा सूक्त समाप्त हुमा। E अथ नवर्चस्य पञ्चमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । वैश्वानरो देवता।१।४ विरात्रिष्टुप् । २ । ३ । ८ । ६ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ५। ७ स्वराट पद्धितः । ६ पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।।

ब पाय) धारण किया. ऋग्वेदः म०७। सू० ५।। ७२५ अब नौ ऋचा वाले पांचवें सूक्त का प्रारम्भ है इसके प्रथम मन्त्र में किसकी प्रशंसा और उपासना करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं ।। प्राग्नये तवसे भरध्वं गिरं दिवो अरतये पृथिव्याः। यो विश्वपाममृतान मुपस्थे वैवानरो योवृधे आगवद्भिः ॥१॥ पदार्थः - हे मनुष्यो (यः) जो (वैश्वानरः) सम्पूर्ण मनुष्यों में प्रकाशमान जगदीश्वर (दिवः) सूर्य वा (पृथिव्याः) पृथिवी के बीच (विश्वेषास्) सब (अमृतानाम्) नाशरहित जीवात्माओं वा प्रकृति आदि के (उपस्थे) समीप में (बावृधे) बढ़ाता है (जागृद्धिः) अविद्या निद्रा से उठने वाले हो उसको प्राप्त होते उस (तवसे) बलिष्ठ (अरतये) व्याप्त (अग्नये) परमात्मा के लिये (गिरम्) योग- संस्कार से युक्त वाणी को (प्र, भरध्वम्) धारण करो अर्थात् स्तुति प्रार्थना करो ॥१॥ भावार्थ:-यदि सब मनुष्य सब के धर्ती योगियों को प्राप्त होने योग्य परमेश्वर की उपासना करें तो वे सब ओर से वृद्धि को प्राप्त हों ॥१॥ फिर वह कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। पृष्टो दिवि धाय्यग्निः पृथिव्यां नेता सिन्धूनां वृषमः स्तियानाम् । स मानुषीरभि विशो वि भांति वैश्वानरो वावधानो वरेण ॥२॥ पदार्थ:-- हे विद्वानो ! योगियों से जो (मग्निः) अग्नि के तुल्य स्वयं प्रकाश- जाता (सिन्धूनाम् ) नदी बा समुद्रों और (स्तियानाम्) जलों के बीच (वृषभः) अनन्त- बलयुक्त हुना (नेता) मर्यादा का स्थापक (वरेण) उत्तम स्वभाव के साथ (वावृधानः) सदा बढ़ाने वाला (वैश्वानरः) सब को अपने-अपने कामों में नियोजक विश:) प्रजानों को (अभि, वि, भाति) प्रकाशित करता (सः) वह (पृष्ट:) पूछने योग्य है ॥२॥ भावार्थ:-- हे मनुष्यो ! जो सब प्रजा को नियम व्यवस्था में स्थापक, सूर्यादि प्रजा का प्रकाशक, सब का उपास्य देव, वह पूछने, सुनने, जानने, विचारने और मानने योग्य है ॥२॥ फिर वह परमेश्वर कैसा है इस विषय का अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वद्भिया विश आयनसिक्नीरसमना जईतीर्भोजनानि । वैश्वानर पूरव शोशुचानः पुरो यदग्ने दरयन्नदीदेः ॥३॥ मा RAJP क Solu (मानुषीः) मनुष्य सम्बन्धी me ७२६ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५ ॥ पदार्थ:-हे (वैश्वानर) सर्वत्र विराजमान (अग्ने) सूर्य के तुल्य प्रकाशस्वरूप (यत) जो श्राप दुःखों को (दश्यन् ) विदीर्ण करते हुए (पूरने) मनुष्य के लिये (शोशुचानः) पवित्र विज्ञान को (पुरः) पहिले (अदीदे:) प्रकाशित करें इससे' (त्वत) आपके (भिया) भय असिक्नीः) रात्रियों के प्रति (असमनाः) पृथक पृथक वर्तमान (भोजनानि) भोगने योग्य वा पालन और (जहती:) अपनी पूर्वावस्था को त्यागती हुई (विशः) प्रजा (प्रायन्) मर्यादा को प्राप्त हों ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस परमेश्वर के भय से वायु आदि पदार्थ अपने-अपने काम में नियुक्त होते हैं उसके सत्य न्याय के भय से सब जीव अधर्म से भय कर धर्म में रुचि करते हैं। जिसके प्रभाव से पृथिवी सूर्य आदि लोक अपनी अपनी परिधि में नियम से भ्रमते हैं, अपने स्वरूप का धारण कर जगत् का उपकार करते हैं वही परमात्मा सब को ध्यान करने योग्य है ॥३॥ फिर वह जगदीश्वर कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तव त्रिधातु पृथिवी उत द्यौदैश्वानर व्रतमग्ने सचन्त । त्वं भासा रोदसी आतंतन्थाऽजस्रेण शोचिषा शोशुचानः ॥४॥ पदार्थ:--हे (वैश्वानर) सब के नायक (अग्ने) सब के प्रकाशक ईश्वर (तव) अापके (व्रतम्) कर्म और (त्रिधातु) धारण करने वाले तीन सत्वादि गुणों वाले प्रकृत्यादिरूप अव्यक्त जगत् के कारण को (पृथिवी) भूमि (उत) और (धौः) सूर्य (सचन्त) सम्बद्ध करते हैं जो (स्वम्) पाप (अजस्रण) निरन्तर अन्नादि (शोचिषा) अपने प्रकाश से (शोशुचानः) प्रकाशमान हुए (भासा) अपने प्रकाश से (रोदसी) सूर्य्यादि प्रकाशवाले और पृथिव्यादि प्रकाशरहित दो प्रकार के जगत् को (प्राततन्थ) सब ओर से विस्तृत करते हैं उन्हीं आपका हम लोग निरन्तर ध्यान करें ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस के माधार में पृथिवी सूर्य स्थित होके अपना कार्य करते हैं, कठोपनिषत् में लिखा है कि उस परमात्मा को जानने के लिए सूर्य, चन्द्रमा, बिजुली बा अग्नि आदि कुछ प्रकाश नहीं कर सकते किन्तु उसी प्रकाशित परमेश्वर के प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं ॥४॥ कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्यामग्ने हरितो वावशाना गिरः सचन्ते धुनयो घृताचीः । पति कृष्टीनां रथ्य रयीणां वैश्वानरमुषसां केतुमाम् ॥५॥ फिर वह Me M Aama ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५॥ ७२७ . GP पदार्थ:-हे (अग्ने) ज्ञानस्वरूप जगदीश्वर जिस (त्वाम्) आपको (हरितः) दिशा (वावशाना:) कामना के योग्य (गिरः) वाणी (धुनयः) वायु और (घृताचीः) रात्री (सचन्ते) सम्बन्ध करती हैं उस (रयीणाम्) धनों के (रथ्यम्) पहुंचाने वाले घोड़े के तुल्य रथों के हितकारी (उषसाम्) प्रभात वेलाओं के बीच (वैश्वानरम्) अग्नि के तुल्य प्रकाशित (अह्नाम) दिनों के बीच (केतुम्) सूर्य के तुल्य (कृष्टीनाम्) मनुष्यों के (पतिम्) रक्षक स्वामी आपका हम लोग निरन्तर सेवन करें ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस में सब दिशा, वेदवाणी, पवन और रात्रि आदि काल के अवयव सम्बद्ध हैं उसी समग्र ऐश्वर्य के देने वाले सूर्य के तुल्य स्वयं प्रकाशित परमात्मा का नित्य ध्यान करो ।।५।। फिर वह कैसा है इस विषय को अगले मंत्र में कहते हैं । त्वे असुर्य१' बसवो न्य॒ण्वन्क्रतुं हि ते मित्रमहो जुषन्त । त्वं दस्यूरोकसो अग्न आज उरु ज्योतिर्जनयनायि ॥६॥ पदार्थ:-हे (मित्रमहः) मित्रों में बड़े (अग्ने) अग्नि के तुल्य' सब दोषों के नाशक जिस (स्वे) आप परमात्मा में (बसवः) पृथिवी आदि आठ वसु (असुर्यम्) मेघ के सम्बन्धी (ऋतुम) कर्म को (नि, ऋण्वन्) निरन्तर प्रसिद्ध करते हैं तथा (जुषन्त) सेवते हैं जो (त्यम्) आप (पार्याय) सज्जन मनुष्य के लिए (उर) अधिक (ज्योतिः) प्रकाश को (जनयन) प्रकट करते हुए (ोकस:) घर से (दस्यून) दुष्ट कर्म करने वालों को (मास:) प्राप्त करते हैं उन (से) श्रापका (हि) ही निरन्तर हम लोग ध्यान करें ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! योगीजन जिस परमेश्वर में स्थिर होकर इष्ट काम को सिद्ध करते हैं उसी परमात्मा के ध्यान से सब कामनानों को तुम लोग भी प्राप्त होमो ॥६॥ फिर वह जगदीश्वर क्या करता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स जायमानः परमे व्योमन्वायुर्न पाथा परि पासि सद्यः । त्वं भुवना जनयन्नभिन्नपत्याय जातवेदो दशस्यन् ।।७।। पदार्थ:-हे परमेश्वर जो (परमे) उत्तम (व्योमन्) प्राकाश तुल्य व्यापक पाप में (जायमानः) उत्पन्न होता हुआ योगीजन (वायुः, न) वायु के तुल्य (पाथ:) पृथिव्यादि को (सद्यः) शीघ्र (एति) प्राप्त होता है (स:) वह आप से उन्नति को प्राप्त होता है । हे (जातवेदः) उत्पन्न हुए सब को जानने वाले जो (त्वम्) श्राप .

म (वाजन्) विज्ञान को (नि, युवस्वत्यम्) सुनने योग्य (रयिम्) धन को और ७२८ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५ ॥ (भुवना) सब लोकों को (जनयन्) उत्पन्न करते हुए (अपत्याय) माता जैसे सन्तान के लिए वैसे कामनात्रों को (बशस्यन्) पूर्ण करते हुए सब को (अभि, कन्) पूर्ण करते हुए (परि, पासि) सब ओर से रक्षा करते हो इससे उपासना के योग्य हैं ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जो अपत्य के लिये माता के तुल्य कृपालु, रक्षक, योगी के तुल्य सब काम देने वाला, सब विश्व का कर्ता, सब का रक्षक ईश्वर है उसी की नित्य उपासना करो॥७॥ फिर वह ईश्वर किसको क्या देता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तामग्ने अस्मे इषमेरेयस्त्र वैश्वानर घुमती जातवेदः । थथा राधा पिन्न सि विश्ववार पृथु श्रवो दाशुषे मत्याय ॥८॥ पदार्थः -- हे (वैश्वानर) सब में प्रकाशमान (आतवेयः) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (विश्ववार) सब से स्वीकार करने योग्य (अग्ने) विज्ञानस्वरूप ईश्वर आप (दाशुषे) विद्या देने वाले (माय) मनुष्य के लिए (यया) जिससे (पृथु) विस्तारयुक्त (राष:) धन और (श्रयः) श्रवण को (पिन्वसि) देते हो (ताम्) उस (ध मतीम) प्रशस्त कामना वाले (इषम्) अन्नादि को (अस्मे) हमारे लिये (एरयस्व) प्राप्त कीजिये ॥८॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जिसकी उपासना से विद्वान् लोग पूर्ण ऐश्वर्य और पूर्ण विद्या को प्राप्त होते हैं। जो उपासना किया हुआ समस्त ऐश्वर्य को देता है उसी की नित्य सेवा करो॥८॥ फिर वह ईश्वर क्या क्या देता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते तं नो अग्ने मघवद्भयः पुरुहूं रयिं नि वाजं श्रुत्यै युवस्व । वैश्वानर महि नः शर्म यच्छ रुद्रेभिरग्ने वसुभिः सजोषाः ॥९॥ पदार्थ है (वैश्वानर) सब को अपने अपने कार्य में लगाने वाले (अग्ने) अग्नि के तुल्य प्रकाशित जगदीश्वर श्राप (मघवद्यः) बहुत धनयुक्त हमारे लिए (वसुभिः) पृथिवी आदि तथा (रुभिः) प्राणों के साथ (सजोषाः) व्याप्त और प्रसन्न हुए आप (नः) हमारे लिये (महि) बड़े (शर्म) सुख वा घर को (यच्छ) दीजिये ॥६॥ भावार्थ:- हे मनुष्यो ! जो परमात्मा धन ऐश्वर्या और प्रशंसा के । Hin Ka Wan ऋग्वेदः मं० ७ । सू०६॥ ७२९ योग्य विज्ञान और राज्य को पुरुषार्थियों के लिये देता है उसी की प्रीति- पूर्वक निरन्तर उपासना किया करो।।। इस सूक्त में ईश्वर के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में पांचवां सूक्त समाप्त हुप्रा ।। । - 4nA अथ सप्तर्चस्य षष्ठस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । वैश्वानरो देवता । १।४। ५ निवृत्रिष्टुप् । ६ विराट् त्रिष्टुम्छन्दः । धेवतः स्वरः । २ निस्पदितः । ३ । ७ भुरिक पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब सात ऋचा वाले छठे सूक्त का प्रारम्भ है इसके पहिले मन्त्र में कौन राजा श्रेष्ठ हो इस विषय को कहते हैं । प्र सम्राजो अमुरस्य प्रशस्ति पुंसः कृष्टीनामनुमायस्थ । इन्द्रस्येव प सक्संस्कृतानि बन्दै दारुं वन्दमानो विवक्मि ||१|| पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे (दारुम्) दुःख के दूर करने वाले ईश्वर की (वन्दमानः) स्तुति करता हुआ मैं (कृष्टीनाम् । मनुष्यों के बीच' (असुरस्य) मेघ के तुल्य वर्तमान (इन्द्रस्य) सूर्य के समान (अनुशास्य) अनुकूल हर्ष करने योग्य (सन्नाजः) चक्रवर्ती (स:) पुरुष को प्रशस्तिम्) प्रशंसा (अ, विधक्मि) विशेष कहता हूं (तबस:) बल से (कृतानि) किये हुओं को (प्र, महे) नमस्कार करता हूं वैसे इस की प्रशंसा कर के इसकी सदा वन्दना करो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और बाचकलु-हे मनुष्यो ! जो शुभ गुण, कर्म और स्वभावों से युक्त वन्दनीय और प्रशंसा के योग्य हो उस चक्रवर्ती राजा की शुभकर्मों से हुई प्रशंसा करो ॥१॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । कवि केतुं धासि भानुमहिन्वन्ति शं राज्यं रोदेश्योः । पुरन्दरस्य गीर्भिरा विवासेऽग्नेब्रतानि पूर्व्या महानि ॥२॥ पवार्थ:-हे राजन् (अग्ने:) अग्नि के समान जिन आपकी (गोभिः) वाणियों से (अद्रेः) मेघ के तुल्य वर्तमान (पुरन्दरस्य) शत्रुओं के नगरों को विदीर्ण करने वाले राजा के (महानि) बड़े (पा) पूर्वज राजाओं ने किये (ब्रतानि) कर्मों को RAN अन्न के शचीभिः) ७३० ऋग्वेदः मं०७ । सू० ६॥ तथा (कयिम्) तीव्र बुद्धि वाले (केतन) अतीव बुद्धिमान् विद्वान् को (धासिम्) तुल्य पोषक (भानुम्) विद्या विनय और दीप्ति से युक्त (रोदस्यो:) प्रकाश और पृथिवी के सम्बन्धी (शम्) सुखस्वरूप (राज्यम्) राज्य को (हिन्वन्ति) प्राप्त करवाते बढ़ाते हैं उनका मैं (मा, विवासे) अच्छे प्रकार सेवन करता हूं ।।२।। भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलु०- हे मनुष्यो ! जिसके उत्तम कर्म राज्य और विद्वानों को बढ़ाते हैं और राज्य को सुखयुक्त करते हैं उसी का सत्कार सबको करना चाहिये ॥२॥ फिर विद्वानों को कौन रोकने योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न्यक्रतून्ग्रथिनो मृध्रवाचः पणारश्रद्धाँ अवधाँ अथज्ञान् । प्रमतान्दस्यूरग्निर्विवाय पूर्वश्चकारापराँ अर्यज्यून् ॥३॥ पदार्थ:-हे राजन् (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजोमय आप (अऋतून) निबुद्धि (ग्रथिनः) अज्ञान से बंधे (मध्वाचः) हिंसक वारणी वाले (अयज्ञान्) सङ्गादि वा अग्निहोत्रादि के अनुष्ठान से रहित (अश्रद्धान्) श्रद्धारहित (अवृधान्} हानि करने हारे (तान्) उन (दस्यून्) दुष्ट साहसी चोरों को (प्रप्र, विवाय) अच्छे प्रकार दूर पहुंचाइये (पूर्वः) प्रथम से प्रवृत्त हुए पाप (अपरान्) अन्य (अयज्यून) विद्वानों के सत्कार के विरोधियों को (पणीन्) व्यवहार वाले (निश्चकार) निरन्तर करते हैं ।।३।। भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०--हे विद्वानो! तुम लोग सत्य के उपदेश और शिक्षा से सब अविद्वानों को बोधित करो जिससे ये अन्यों को भी विद्वान् करें ॥३॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यो अंपाचीने तमसि मदन्तीः प्राचीश्चकार नृतमा चीभिः । तमीशानं वस्वो अग्नि गृणीषेऽनानतं दमयन्तं पृतन्यून् ।।४।। उत्तम वारिणयों से (प्रपाचीने) बुरा चलना जिसमें हो उस (तमस) अन्धकार में (सदन्तीः) भानन्द करती हुई (प्राचीः) पूर्व को चलने वाली सेनाओं को (चकार) करता है । हे विद्वान् ! जिस (वस्वः) धन के (ईशानम्) स्वामी (अनानतम्) नम्रस्वरूप (पृतन्यून्) अपने को सेना की इच्छा करने वालों को (वमयन्तम्) निवृत्त करते हुए (अग्निम्) अग्नि के तुल्य प्रकाशस्वरूप ईश्वर की (गृणीषे) स्तुति करता है (तम्) उसका हम लोग सत्कार करें ॥४॥ AAP Fo HOM -- ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ६ ॥ . HAHI Aae ORIA M न मा 133 भावार्थ:-जो मनुष्यों में उत्तम राजा प्रजाओं के साथ पिता के तुल्य वर्त्तता है, जैसे निद्रा में सुखी होता है वैसे सब प्रजाओं को आनन्द देता हुमा शत्रुओं को निवृत्त करता है। जो युद्ध में भय से शत्रुनों के साथ नम्र नहीं होता और धन का बढ़ाने वाला है, उसी राजा का हम लोग सदा सत्कार करें॥४॥ फिर कैसा राजा अत्यन्त उत्तम होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यो देयो३ अनमय बस्नयों अर्थपत्नीषसंश्चकार । स निरुध्या नहुषो यहो अग्निविशश्चक्रे बलिहता सोभिः ॥५॥ पदार्थ:-- हे मनुष्यो (य:) जो (देह्यः) बढ़ाने योग्य (वधस्नः) मारने से शुद्ध करने वाले न्यायाधीशों से दुष्टों को (अनमयत्) नम्र करावे (य:) जो सूर्य जैसे (उषस:) प्रातःकाल की वेलाओं को सुशोभित करता है वैसे (मर्यपत्नीः) स्वामी की स्त्रियों को शोभित (चकार) करता है और जो (नहुषः) सत्य में बद्ध (यह्वः) महान् (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (सहोभिः) सहनशील बलिष्ठों के साथ शत्रुओं को (निरुध्या) रोक के (विशः) प्रजात्रों को (बलिहतः) कर पहुंच.ने वाला चक्र) करे (स:) वह सब को पिता के तुल्य पूज्य है ॥शा भावार्थ:--.--इस मन्त्र में वाचकलु हे प्रजाजनो! जो अत्यन्त विद्वान् दुष्टाचारियों और अन्याय के वर्ताव को रोक जितेन्द्रिय हो के न्यायपूर्वक प्रजा से कर लेता है वह सब को बढ़ाने योग्य होता है ॥५॥ फिर कौन राजा नित्य बढ़ता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते है। यस्य शर्मन्नुप विश्व जनास एवैस्तस्थुः सुमति भिक्षमाणाः । वैश्वानरो वरमा रोदस्योराग्निः संसाद पित्रोरुपस्थम् ॥६॥ पक्षार्थ:-हे मनुष्यो (यस्य) जिसके (शर्मन्) घर में (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि की (भिक्षमाणाः) नित्य याचना करते हुए उन्नतिशील (एवैः) विज्ञानादि से प्राप्त हुए श्रेष्ठ गुणों के साथ वर्तमान (विश्वे) सब (जनासः) धर्मात्मा, उत्तम विद्वान् जन (उप, तस्थुः) उपस्थित होते हैं जो (वैश्वानरः) समस्त मनुष्यों के बीच राजमान (रोदस्योः) सूर्य और पृथिवी के बीच (अग्निः) सूर्य के तुल्य स्थित हुए के समान (पित्रो:) उत्तम शिक्षा करने वाले अध्यापक उपदेशक के (उपस्थम्) समीप (बरम्) उत्तम जन को (मा, ससाद) अच्छे प्रकार स्थित करे वही चक्रवर्ती राज्य कर सकता है ॥६॥ भावार्थ:- - इस मन्त्र में वाचकलु -वही राजा नित्य बढ़ता है जिसके AMA COP MEN OLD aastha m ७ स्वराट् पक्तिश्छन्द ऋग्वेदः मं० ७ । सू०७॥ समीप विद्यावर्धक, विद्वान् मन्त्री सदा रहें । जो सत्यवक्ता के उपदेश को नित्य स्वीकार करता है वह सूर्य के तुल्य भूगोल में प्रकाशमान होकर प्रशस्त राज्य को प्राप्त होता है ।।६।। कौन राजा प्रशंसित यश वाला होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। श्रा देवो दंदे बुध्न्या३' वसूनि वैश्वानर उदिता सूर्यस्य । आ समुद्रादवरादा परस्मादाग्निदेदे दिव आ पृथिव्याः ॥७॥ पदार्थः-- हे मनुष्यो (वैश्वानरः) सब मनुष्यों का नायक (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (देवः) पूर्ण विद्वान् सुखदाता 'राजा जैसे (सूर्यस्य) सूर्य के (उविता) उदय में (बुध्न्या) अन्तरिक्षस्थ (वसूनि) द्रव्य (प्रा) अच्छे प्रकार प्रकाशित होते हैं वैसे जो न्याय और विद्या के प्रकाश को सब से (प्राददे) लेता है वा जैसे (परस्माव) पर (अवरात्) तथा इधर हुए (प्रा, समुद्रात) अन्तरिक्ष के जल' पर्यन्त (दिव:) प्रकाश और (पृथिव्याः) पृथिवी के बीच सूर्य प्रकाश को देता है वैसे श्रेष्ठ गुणों का ग्रहण कर प्रजा के लिये हित (भाददे) ग्रहण करता है वह (मा) अच्छे सुख से बढ़ता है ॥७॥ भावार्थ:-यदि विद्वान् लोग सत्य भाव से न्याय का संग्रह कर प्रजाओं का पुत्र के तुल्य पालन करें तो वे प्रजा में सूर्य के तुल्य प्रकाशित कीर्ति वाले होकर सब के लिये सुख देने को समर्थ होते हैं ।।७।। इस सूक्त में वैश्वानर के दृष्टान्त' से राजा के कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में छठा सूक्त समाप्त हुश्रा । अथ सप्तस्य सप्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निदेवता ।। ३ त्रिष्टुप् । ४ । ५। ६ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । २ भरिक पङ्क्तिः । अब सात ऋचा वाले सातवें सूक्त का प्रारम्भ है । उसके प्रथम मन्त्र में कैसे पुरुष को राजा करें इस विषय को कहते हैं । प्र वों देवं चित्सहसानमग्निमश्च न वाजिन हिषे नोभिः । भवा नो दूतो अध्वरस्य विद्वान्त्मनो देवेषु विविदे मितः ॥१॥ ।

ऋग्वेदः मं० ७ । सू०७॥ ATHI पाय RUAR पदार्थ:--हे मनुष्यो ! जैसे मैं (बः) तुमको (सहसानम्) यज्ञ के साधक (देवम्) दानशील (अग्निम्) विद्या से प्रकाशमान (अश्वम्, न) शीघ्र चलने वाले घोड़े के तुल्य' (वाजिनम्) उत्तम वेग वाले (नमोभिः) अन्नादि करके (प्र, हिर्षे) अच्छी वृद्धि करता हूं वैसे इसको तुम लोग भी बढ़ायो । हे राजन् (त्मना) आत्मा से जो (देवेषु) विद्वानों में (मितः) शास्त्रानुकूल' पदार्थों को प्राप्त होने वाला (विद्वान्) विद्वान् (विविदे) जाना जाता है उसको प्राप्त होके (न:) हमारे (अध्वरस्य) अहिंसा और न्याययुक्त व्यवहार के (दूतः) सुशिक्षित दूत के तुल्य (भव) हूजिये ॥१॥ भावार्थ-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो प्रजा के किये आक्षेपों को सहता, घोड़े के तुल्य सब कार्यों को शीघ्र व्याप्त होता, विद्वानों में विद्वान्, दूत के तुल्य समाचार पहुंचाने वाला हो उसी को राजा करो ॥१॥ फिर कैसा राजा श्रेष्ठ होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ याह्यग्ने पथ्या३' अनु स्वा मन्द्रो देवानां सख्यं जुषाणः । आ सानु शुष्मै दयन्पृथिव्या जम्भेभिर्विश्वमुशवचनानि ||२|| पदार्थ - हे अग्ने) बिजुली के तुल्य राजविद्या में व्याप्त (देवानाम) विद्वानों के (सख्यम् ) मित्रपन को (जुषाणः) सेवते हुए (मन्त्र:) आनन्ददाता (शुष्म:) बलों के साथ (पृथिव्याः) पृथिवी के (सानु) शिखर के तुल्य विज्ञान को (मा, नदयन्) अच्छे प्रकार नाद करते हुए विद्युत् के तुल्य' (जम्भेभिः) गात्र नमाने से (विश्वम्) समस्त जगत् (वनानि) सूर्य की किरणों के तुल्य धनों की (उशषक) कामना करते हुए (पथ्याः) धर्ममार्ग को प्राप्त होने वाली (स्वाः) अपनी प्रजाओं को (अनु, श्रा, याहि) अनुकल' आइये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाच कलु० -जो बिजुली के तुल्य पराक्रमी, सूर्य के तुल्य प्रतापी अपनी अनुकूल प्रजात्रों को न्याय से आनन्दित करता है वही उत्तम राजा होता है ।।२।। इस जगत् में कौन मनुष्य उत्तम हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्राचीनो यज्ञः मुधितं हि बर्हिः प्रीणीते अग्निरीलितो न होता । आ मातरो विश्वयारे हुवानो यतों यविष्ठ जज्ञिषे सुशेवः ॥३॥ पदार्थ:-हे (यविष्ठ) अतिशय कर युवावस्था को प्राप्त यतः) जिनसे आप (सुशेवः) सुन्दर सुखयुक्त (जशिषे) होते हो उन (विश्ववारे) सब सुखों के स्वीकार करने वाले दोनों (मातरा) माता पिता की (हुवानः) स्तुति करता हुआ (ईडितः) ऋग्वेदः भ० ७ । सू० ७॥ में कृतज्ञ होते - Kapa CHAR भारत का प्रशंसित गुणोंवाला (होता) होमकर्ता (न) जैसे वैसे (अग्निः) अग्नि के तुल्य (प्राचीनः) पूर्वकाल' सम्बन्धी (यज्ञः) संग करने योग्य पुरुष (सुधितम्) सुन्दर हित- कारी (बहिः) उत्तम अधिक हविष्य को प्राप्त करने के अर्थ जो (मा, प्रोणीते) अच्छे प्रकार कामना करता है (हि) वही योग्य होता है ॥३॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे होमकर्ता वेदविहित यज्ञ और उसकी सामग्री की कामना करता है वैसे ही जो पितृ- जनों की प्रशंसा करते हुए सेवन करते हैं वे ही इस जगत् हैं ॥३॥ फिर कौन मनुष्य योग्य राजा होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सद्यो अध्वरे रथिरं जनन्त मानुषासो विचेतसो य एषाम् । विशामधाथि विश्पतिर्दुरोणे३'ग्निर्मन्द्रो मधुवचा ऋतायां ॥४॥ पदार्थ:-(विचेतसः) विविध प्रकार की बुद्धि से युक्त (मानुषासः) मनुष्य (अध्वरे) अहिंसारूप व्यवहार में जिस (रथिरम्) रथवालों में रमण करने वाले को (सधः) शीघ्र (जनन्त) प्रकट करते हैं (:) जो (एषाम्) विद्वानों के बीच (दरोणे) घर में (अग्निः) अग्नि के तुल्य (मन्त्रः) मानन्ददाता (मधुक्षमाः) कोमल वचनों (ऋतावा) और सत्य का सेवन करने वाला (विशाम्) प्रजाओं का (विपतिः) रक्षक विद्वानों से (अधाथि) धारण किया जाता है वही राजा होने को योग्य होता ॥४॥ भावार्थ:-- [इस मन्त्र में वाचकलु.] - जिसको उत्तम शिक्षा से विद्या ग्रहण कराके विद्वान् लोग पण्डित करते हैं वह योग्य होकर घर में दीप के तुल्य प्रजाओं में न्याय का प्रकाशक होता है ॥४॥ फिर अग्नि कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं असादि वृतो वह्निराजगन्वानग्निर्बला नृषदने विधर्ता। छौश्च यं पृथिवी बांबधाते आ यं होता यजति विश्वबारम् ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे (नषदने) मनुष्यों के स्थान में (ब्रह्मा) चार वेद का जानने वाला होता है वैसे जो (वृतः) स्वीकार किया (माजगन्दान्) अच्छे प्रकार प्राप्त होने वाला (वह्निः) पहुंचाने वाले (अग्निः) अग्नि के तुल्य (विधर्ता) विशेष- कर धारणकर्ता (प्रसादि) अच्छे प्रकार स्थित होता है (यम्) जिसको (धौः) सूर्य (च) और (पृथिवी) भूमि (वावृधाते) बढ़ाते हैं (यम्) जिस (विश्वयारम्) सबको HIND

-marathi-nimanisit
ऋग्वेदः मं० ७ । सू०७॥
ON
EARTS
Mara
स्वीकार करने योग्य को (होता) होमकर्ता (मा, यजति) अच्छे प्रकार सङ्ग करता
है उस को सब लोग जानें ॥२॥
भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०- जैसे अग्नि यथावत् सम्प्रयोग
किया हुआ सब कार्यों को सिद्ध करता है वैसे ही सत्कार कर स्वीकार
किये वेद के विद्वान् लोग धर्मार्थ काम मोक्ष पदार्थों को सबको प्राप्त कराते
हैं ॥५॥
फिर कौन श्रेष्ठ विद्वान् होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
एते द्युम्नेभिर्विश्वमातिरन्त मन्त्रं ये वार नर्या अतक्षन् ।
प्र ये विशस्तिरन्त श्रोषमाणा आ ये में अस्थ दीधयन्नतस्य ॥६॥
पदार्थः - हे मनुष्यो (ये) जो (एते) ये (नर्याः) मनुष्यों में श्रेष्ठ (छुम्नेभिः)
धन वो कीत्ति से (विश्यम् ) समस्त (मन्त्रम्) विचार को (प्रा, अतिरन्त) अच्छे
प्रकार पार होते (बा, परम्) अथवा पूर्ण कार्य को प्रतक्षन) तीक्ष्णता से करते
(ये) जो (श्रोषमाणाः) सुनते हुए (विश:) प्रजाजनों को (प्र, तिरन्त) अच्छे तरते
और (ये) जो (मे) मेरे (अस्य) इस (ऋतस्य) सत्य विज्ञान को (प्रा, बोधयन्)
अच्छे प्रकार प्रकाशित करते हैं वे अभीष्ट को प्राप्त होते हैं ।।६।।
भावार्थ:-जो मनुष्य सुन्दर विचार के साथ स्वीकार करने योग्य
पदार्थों को प्राप्त होते और नित्य विद्वानों के वचनों के श्रोता होकर सत्य-
झूठ का विवेक कर और असत्य छोड़ सत्य का ग्रहण कर यशस्वी धनाढ्य
होते हैं वही इस जगत् में सत्कार के योग्य होते हैं ॥६॥
फिर कौन अच्छा, चतुर, अतिबलवान् तथा प्रशंसित होता है
इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
नु त्वामन ईमहे वसिष्ठा ईशानं सूनो सहसो वसूनाम् ।
इषं स्तोतृभ्यो मघवद्भ्य भानडययं पति स्वस्तिभिः सदा नः ॥७॥
पदार्थ:-हे (सहसः) अतिबलवान् के (सूनो) सत्पुत्र (अग्ने) विज्ञानस्वरूप
(वसूनाम्) पृथिव्यादि तत्त्व साधनों के बीच (ईशानम्) समर्थ बलवान् (त्वाम् ) प्राप
को (वसिष्ठाः) अत्यन्त वसने वाले हम लोग (ईमहे) याचना करते हैं (यूयम्) तुम
लोग | स्तोतृभ्यः) सब विद्याओं की प्रशंसा करने वाले (मघवद्भ्यः) बहुत धनयुक्त
होने के लिए (न:) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो। जो तुमको और (इषम्)
अन्नादि को (न) शीघ्र (प्रानट) व्याप्त हो उसकी तुम (स्वस्तिभिः) स्वस्थता कराने
वाली क्रियाभों से सदा रक्षा करो ॥७॥

Saintination ऋग्वेदः मै० ७ । सू० ८ ॥ भावार्थ:-जो विद्वानों के लिये धन देता है और विद्या की याचना करता है, जिसकी रक्षा प्राप्त करते हैं वह सदा रक्षा को प्राप्त, बढ़ता हुआ सब ऐश्वर्य से युक्त होता है।॥७॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजादि के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम भण्डल में सातवां सूक्त समाप्त हुप्रा ।। । अथ सप्तचस्याष्टमस्या सूक्तस्थ असिष्ठ ऋषिः । अग्निदेवता । १ । ७ स्वराट पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ५ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । [२] । ३।४ । ६ त्रिष्टुप्- छन्दः । धवत: स्वरः।। अब वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इन्धे राजा सगर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन । बरो हव्येभिरीळते सबाध अग्निर उपसमिशोचि ॥१॥ पदार्थ:--जो (नर:) नायक मनुष्य (हव्येभिः) देने योग्य जनों वा (नमोभिः) अन्नादि से होने वाले सत्कारों के साथ घृतेन) प्रदीप्तिकारक जल वा घी से (यस्य) जिसकी (माहुतम्) स्पर्द्धा ईर्षा को प्राप्त (प्रतीकम्) सेना की निश्चय कराने वाली (ईडते) स्तुति करते हैं वह (समयः) युद्ध में कुशल (राजा) प्रकाशमान तेजस्वी मैं उनको (इन्धे) प्रदीप्त करता हूं जैसे (उषसाम्) प्रभात समय होने से (अग्ने) पहिले (सबाधः) बाध अर्थात् संयोग से बने सब संसार के साथ वर्तमान (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्त्री जन (मा, प्रशोचि) प्रकाशित किया जाता है वैसे मैं शत्रुनों के सन्मुख अपनी सेना का प्रकाशक और उत्साह देने वाला होऊ ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -- हे मनुष्यो ! जो जिस के भृत्य उपकार करने वाले हों, वे उपकार को प्राप्त हुए से सदा सत्कार पाने योग्य हैं ॥१॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अयमु ष्य सुमही अवेदि होता मन्द्रो मनुषो यह्वो अग्निः। वि मा अकः ससृजानः पृथिव्यां कृष्णपंचिरोषधीभिर्ववक्षे ॥२॥ पवार्थः - हे विद्वानो ! जैसे (विभाः) प्रकाश करने वाला (यह्वः) बड़ा (अग्निः) अग्नि के तुल्य तेजस्वी (मोषधीभिः) सोमलतादि ओषधियों से (ववक्षे) ऋग्वेदः मं० ७ । सू०८॥ म Kana USA GARY प्राप्त करता है वैसे (कृष्णपविः) तीक्ष्ण काट करने वाले शस्त्र अस्त्रों से युक्त (होता) दानशीलः (मन्द्रः) आनन्द' कराने वाला (सुमहान्) शुभ गुणकर्मों से सत्कार करने योग्य (मनुषः) मनुष्य विद्वानों से (अवेदि) जाना जाता है (स्थः) वह (अयम्) यह (३) हो (पृथिव्याम्) पृथिवी पर सब को सुख से (ससृजानः) संयुक्त करता हुमा सबकी उन्नति (अक:) करता है ।।२।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु -जो सूर्य के तुल्य उपकारक होते हैं वे ही अच्छे प्रकार सत्कार पाने योग्य हैं ।।२।। फिर वे राजा और प्रजा के जन कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। कयां नो अग्ने वि वसा मुक्ति कामु खधाभृगवः शस्थमानः । कदा भवेम पतयः सुदन रायो वन्तारों दुष्टरस्य साधोः ॥३॥ पदार्थ-हे (सुबत्र) सुन्दर दाता (अग्ने) विद्यत् के समान ऐश्वर्य देने वाले राजपुरुष (शस्यमालः) प्रशंसा को प्राप्त हुए पाप (कया) किस रीति से (न:) हमको (वि, वस:) प्रवास कराते हैं (काम्, उ) किसी (सुवृक्तिम्) सुग्दर प्रकार जिस में प्राप्त हों उस नीति और (स्वधाम् ) अन्न को (ऋणयः) प्रसिद्ध करो (कदा) कब (दुष्ट रस्य) दुःख से तरने योग्य (शायोः) सत्पुरुष के (वन्ताः) सेवक (रायः) घर के (पतयः) स्वामी हम लोग (भदेल होवें ॥३॥ भावार्थ: - हे राजन् ! यदि आप हमारा यथावत् पालन कर धनाढ्य करें तो हम भी आप सज्जन की निरन्तर उन्नति करें ॥३॥ फिर कैसा राजा सत्कार के योग्य होता और यह राजा कैसों का सत्कार करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । प्रप्रायमग्निर्भरतस्य शृण्ये यत्सूर्यो न रोचते बृहद्भाः। अभि या पूरूं पृतनासु तस्थौ गुंतानो दैव्यो अतिथिः शुशोच ||४|| पवार्थ:-हे राजपुरुष (यत्) जो (श्रयम्) यह (भरतस्य) धारण वा पोषण करने वाले के (अग्निः) अग्नि के समान वा (सूर्यः,न) सूर्य के समान (वि, रोचते) विशेष प्रकाशित होता है वा जिसको मैं (प्रा, शृण्वे) अच्छे प्रकार सुनता हूं (गः) जो (बृहत) बड़े जगत् वा राज्य को तथा (पूरुम्) पालक सेनापति को (अभि, भाः) सब ओर से प्रकाशित करता है तथा (अतिथि:) जाने आने की तिथि जिसकी नियत न हो उसके तुल्य (देव्यः) विद्वानों ने किया विद्वान् (ध तान:) प्रकाशमान (पृतनासु) सेनाओं में (तस्थौ) स्थित हो वह (शुशोच) प्रकाशित होता है उसका आप सदा सत्कार कीजिये ॥४॥ MAR Karta Eme AMERA ७३८ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ८ ॥ Aawa 40 CON भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलु० --जो राजा लोग सत्कर्म करने वालों का ही सत्कार करें और दुष्टाचारियों को दण्ड देवें वे ही सूर्य के तुल्य प्रकाशमान अतिथियों के समान सत्कार करने योग्य होते हुए सर्वदा विजयी होकर प्रसिद्ध कीर्तिवाले होते हैं ॥४॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । असनिचे आहवनानि भूरि भुवो विश्वेभिः सुमना अनीकैः । स्तुतश्चिंदग्ने शृण्विषे गृणानः स्वयं वर्धस्व तन्वं मुजात ।।५।। पदार्थः - हे (सुजात) सुन्दर प्रकार प्रसिद्ध (अग्ने) विद्वन् राजन् (स्वे) प्राप के निमित्त (भुवः) पृथिवी के सम्बन्ध में (भूरि) बहुत (पाहवनानि) सत्कारपूर्वक निमन्त्रण (असन्) होते हैं (विश्वेभिः) सब (अनीकैः) अच्छी शिक्षित सेनामों के साथ (सुमना:) प्रसन्न चित्त (स्तुतः) स्तुति को प्राप्त (गृणानः) स्तुति करने वालोंके वाक्यों को (चित) भी (शृविर्षे) सुनते हैं सो आप (स्वयमित) स्वयमेव (तन्वम्) शरीर को (वर्धस्व) बढ़ाइये ॥५॥ भावार्थ:-हे राजन् ! यदि आप प्रशंसित धर्मयुक्त कर्मों को करें तो सर्वत्र विजय को प्राप्त होते हुए आप वृद्धि को प्राप्त होके सब प्रजात्रों को बढ़ावें ॥५॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इदं वचः शतसाः संसहस्रमुदग्नये अनिषीष्ट द्विबहीं। शं यत्स्तोत्र्भ्य आपये भवाति घुमदमीवचातनं रक्षोहा ॥६॥ पवार्थ:-हे राजन् (शतसाः) सौ का विभाग करने (द्विबह::) विद्या और विनय से बढ़ने और (रक्षोहा) दुष्ट राक्षसों के हिंसा करने वाले आप (अग्नये) अग्नि के लिये जैसे वैसे (इदम्) इस (सं, सहस्रम्) सम्यक् सहस्र (वचः) वचन को (जनिषीण्ट) प्रकट कीजिये (यत्) जिस (ध मत्) कामना वाले (अमीवचातनम्) रोगनाशरूप (शम्) सुख को (स्तोतृभ्यः) स्तुतिकर्ता विद्वानों के लिये वा (प्रापये) प्राप्त कराने वाले प्राप्त के लिये (उद्भवाति) प्रसिद्ध करते हैं उसी को निरन्तर सिद्ध करें ॥६॥ भावार्थ:-हे प्रजाजनो! जैसे सभापति राजा सब के लिये मधुर कोमल वचन और उत्तम सुख देकर दुःख दूर करता है वैसे ही तुम लोग भी राजा के लिये असंख्य पदार्थों को देकर प्रमाद और रोग रहित करके अधिकतम धन देनो ॥६॥ N ऋग्वेदः मं० ७ । सू०६॥ AINI IMAL N पुरुष को प्रजा लोग राजा मानें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। न त्वामन ईमहे वसिष्ठा ईशानं सूनो सहसो वसूनाम् । इषं स्तोम्यो मषवद्भय आनडययं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥७॥ पक्षार्थ:--है (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र (अग्ने) सत्य मार्ग के प्रकाशक राजन् पुरुष जिससे आप (स्तोतृभ्यः) ऋत्विजों के लिये (इषम्) विज्ञान वा धन को (मघवन्यः) बहुत धन वाले के लिये घन वा विज्ञान को (मानद) व्याप्त होते हो इस कारण (वसिष्ठाः) अत्यन्त धन वाले हम लोग (वसूनाम् ) वास के हेतु पृथिव्यादि के (ईशानम्) अध्यक्ष (स्वाम्) आपको (नु, ईमहे। शीघ्र चाहते हैं और हम लोगों की रक्षा करें वे (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) कल्याणों से (नः) हमारी सदा (पात) रक्षा करो ॥७॥ भावार्थ:-हे राजन् ! आप विद्वानों के लिये श्रेष्ठ वस्तु, धनवानों के लिये प्रतिष्ठा देते हो आप और राजपुरुष हमारी निरन्तर रक्षा करें इसलिये आपके हम सेवक होवें ॥७॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजा के कर्तव्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह सप्तम मण्डल में पाठयां सूक्त समाप्त हुआ। Ansla D Saral अथ षड्चस्य नवमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निदेवता । १ त्रिष्टुप् । ४। ५ निचत्रिन्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः। २ । ३ भुरिक पङ्क्तिः । ६ स्वराट् पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब छः ऋचा वाले नवम सूक्त का प्रारम्भ है । इसके प्रथम मन्त्र में फिर कौन विद्वान् धेवने योग्य हैं इस विषय को कहते हैं । अबोधि जार उषसामुपस्थाद्धोता मन्द्र कवितमः पावकः । दधाति केतुमुभयस्य जन्तोईच्या देवेषु द्रविणं सुकृत्# ॥१॥ पदार्थ:-है मनुष्यो ! जैसे (जार:) रात्रि का नाश करने वाला (उषसाम्) प्रातःकाल' की बेलामों के (उपस्थात) समीप से (उभयस्य) इस लोक परलोक में जाने आने वाले (जन्तोः) जीवात्मा के (हव्या) होमने योग्य वस्तुओं को (केतुम्) बुद्धि को और (द्रविणम्) धन वा बल' को (देवेष) पृथिव्यादि वा विद्वानों में (वधाति) धारण करता है तथा (होता) दानशील (मन्द्रः) आनन्ददाता (कवितमः) ७४० ऋग्वेद: मं०७ । सू०६॥ अति प्रवीण (पायकः) पवित्रकर्ता विद्वान् जीव के ग्राह्य वस्तुओं को (सुकृत्स्) पुण्यात्मा विद्वानों में धन और बुद्धि का धारण करता स्वयं प्रज्ञानियों को (प्रबोधि) बोध कराता उसी अध्यापक विद्वान् की निरन्तर सेवा करो ॥१॥ भावार्थ:--- इस मन्त्र में वाचकलु. -जो विद्वान् जैसे रात्रि को सूर्य निवारण कर प्रकाश को उत्पन्न करता वैसे अविद्या का निवारण करके विद्या को प्रकट करते हैं, वे जैसे धर्मात्मा न्यायाधीश राजा पुण्यात्मानों में प्रेम धारण करता है वैसे शमदमादि युक्त श्रोताओं में प्रीति को विधान करें ॥३॥ IMAR मान Sta ! फिर राज कार्यों में कौन लोग श्रेष्ठ होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स सुक्रतुर्थो वि दुरपणीनां पुनानो अर्को पुरुभोजसं नः। होता मन्द्रो विशां दमूनास्तिरस्तमो ददृशे राम्याणाम् ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (यः) जो (पणीनाम्) प्रशस्त व्यवहार करनेहारों के (दुरः) द्वारों को (पुनानः) पवित्र करता हुआ (राम्याणाम्) रात्रियों के (तमः) अन्धकार का (तिरः) तिरस्कार करके सूर्य (दहशे) दीखता है तथा (सुऋतुः) सुन्दर बुद्धि वाला (अन्) अन्न वा सत्कार योग्य (पुरुभोजसम्) बहुतों के रक्षक मनुष्य को (यि) विशेष कर पवित्र कर्ता (न:) हमारी (विशाम्) प्रजानों में (मन्द्रः) आनन्ददाता (होता) दानशील (दभूना:) दमनशील' अविद्या का तिरस्कार करता है (सः) वह हमारा राजा हो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०--जो सभ्य राजा लोग सूर्य के तुल्य न्याय के प्रकाशक, अविद्यारूप अन्धकार के निवारक, दुष्टों का दमन और श्रेष्ठ धार्मिकों का सत्कार करने वाले होते हुए धर्मसम्बन्धी मार्ग को पवित्र करते हैं वे ही सब को सत्कार करने योग्य होते हैं ।।२।। फि: कैसा विद्वान् पूजनीय होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। अमूरः कविरदितिर्विवस्वान्मुसंसन्मित्रो अतिथिः शिवो नः । चित्रमानुरुषसां भात्यग्रेऽपां गमः प्रस्व१' आ विवेश ॥३॥ पदार्थः-हे मनुष्यो ! जो (उषसाम्) प्रभात वेलाओं के (अग्ने) पहिले (चित्रभानुः) अद्भुत प्रकाशयुक्त (विवस्वान्) सूर्य के समान (अपाम्) अन्तरिक्ष के बीच (गर्भः) गर्भ के तुल्य वर्तमान (प्रस्वः) अपने सम्बन्धी उत्तम जनों वाला हुआ PAN R- AN come ऋग्वेद: मं० ७ । सू० ६॥ - M (भाति) प्रकाशित होता है (सु, संसत्) सुन्दर सभा वाला (मित्रः) मित्र (अभूरः) मूढ़ता रहित (कविः) प्रवृत्त बुद्धि वाला पण्डित (अवितिः) पिता के तुल्य वर्तमान (अतिथिः) प्राप्त हुए विद्वान् के तुल्यः (नः) हमारा (शिवः) मङ्गलकारी हुआ (मा, विवेश) प्रवेश करता है वही विद्वान् सब को सत्कार करने योग्य होता है ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु-हे मनुष्यो ! जो विद्वानों में मुखिया, सूर्य के तुल्य सत्य न्याय का प्रकाशक, अविद्यादि दोषों से रहित, धर्मात्मा विद्वान्, पुत्र के तुल्य प्रजात्रों का पालन करता है वही अतिथि के तुल्य सत्कार करने योग्य होता है ॥३॥ फिर कौन प्रशंसा योग्य होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ईळेन्यो वो मनुषो युगेषु समनगा अशुचज्जातवेदाः । सुसंदृशा भानुना यो विभाति प्रति गावः समिधानं बुधन्त ।४।। पवार्थ:-हे मनुष्यो ! (यः) जो (ईळे न्यः) स्तुति के योग्य (समनगाः) संग्राम को प्राप्त होने वाला (जातवेदाः) विद्या को प्राप्त हुआ (युगेषु) बहुत वर्षों में (वः) तुम (मनुषः) मनुष्यों को (सुसन्दशा) अच्छे प्रकार दिखाने वाले (भानुना) किरण से सूर्य के समान (विभाति) प्रकाशित करता है और जैसे (समिधानम्। देदीप्यमान के (प्रति) प्रति (गावः) किरण (बुधन्त) बोध के हेतु होते हैं वैसे (अशुवत्) शुद्ध प्रतीति कराता है वही मनुष्यों में उत्तम होता है ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० -जो मनुष्य सूर्य के सदृश शुभ गुणों का ग्रहण कराके मनुष्यों को प्रकाशित करते हैं वे प्रशंसा करने योग्य होते हैं ॥४॥ फिर कौन विद्वान् संगति करने योग्य होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अग्ने याहि दूत्यं १ मा रिषण्यो देवा अच्छा ब्रह्मकृता गणेन । सरस्वती मरुतो अश्विनाऽपो यक्षि देवाननधेयाय विश्वान् ॥ . vira पदार्थ:-हे (अग्ने) वह्नि के तुल्य कार्य सिद्ध करनेहारे विद्वन् ! पाप (दूत्यम्) दूत के कर्म को (याहि) प्राप्त हूजिये (देवान्) विद्वानों वा शुभ गुणों को (मा) मत (रिषण्यः) नष्ट कीजिये (ब्रह्मकृता) जिससे धन वा अन्न को उत्पन्न करते (गणेन) उस सामग्री के समुदाय से (रत्नधेयाय) रत्नों का जिसमें धारण हो उसके लिए (सरस्वतीम्) विद्याशिक्षायुक्त वाणी का (मरुतः) मनुष्यों का (अश्विना) प्रध्यापक और उपदेशकों के (अपः) कर्मों का और (विश्वान्) सब (देवान्) विद्वानों

७४२
ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १०॥
w
-
का जिस कारण (अच्छा, यक्षि) अच्छे प्रकार संग करते हैं इससे सत्कार करने
योग्य हैं ॥शा
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् लोग अग्निरूप दूत से बहुत
कार्यों को सिद्ध करते हैं वैसे कार्य की सिद्धि करके किसी को मत मारो,
पदार्थविद्या, धन वा धान्य से कोश को पूर्ण कर सब को सुखी करो ॥५॥
फिर वे विद्वान् क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
त्यामग्ने समिधानो वसिष्ठो जरूयं हन्यक्षि राये पुरन्धिम् ।
पुरुणीथा जोतवेदो जरस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥
पदार्थ:-हे (जातवेदः) विज्ञान को प्राप्त (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्यादि
गुणों से प्रकाशित विद्वन् जैसे (समिधानः) सम्यक् प्रकाशमान (वसिष्ठः) अत्यन्त
धनी (जस्थम्) शिथिलावस्था से युक्त जीर्ण मेघ को (हन्) हनन करता है वैसे
सुन्दर सभा के योग्य (पुरन्धिम्) बहुतों को धारण करने वाले (स्वाम्) आप विद्वान्
का (राय) धनप्राप्ति के लिए मैं (यक्षि) सङ्ग करता हूं (यूयम्) तुम लोग
(स्वस्तिभिः) सुख साधनों से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो और
(पुरुणीथा) बहुतों को प्राप्त होने वाले धर्मयुक्त कर्मों की (जरस्व) प्रशंसा
करो॥६॥
भावार्थ:-जो राजा के सहित सभ्य लोग, सूर्य मेघ को जैसे वैसे
अविद्या और दुष्टाचारों का नाश करते हैं सब को धर्मयुक्त मार्ग को प्राप्त
कराते वे सब के यथावत् रक्षक होते हैं ।।६।।
इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सुक्त के
अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह सप्तम मण्डल में नववा सूक्त समाप्त हुप्रा ।
अथ पञ्चर्चस्य दशमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निदेवता। १।२ । ३
निस्त्रिष्टुप् । ४ । ५ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ।।
अब पाँच' ऋचा वाले दशवें सूक्त का प्रारम्भ है । उसके प्रथम मन्त्र में अब विद्वान्
किसके तुल्य क्या करे इस विषय को कहते हैं ।
उषो न जारः पृथु पाजो अश्रेदविद्युतदीयच्छोशुचानः ।
वृषा हरिः शुचिरा भांति भासा धियो हिन्वान उशतीरंजीगः ॥१॥

ऋग्वेदः मं०७ । सू० १०॥ पदार्थ:-हे विद्वन् जैसे (जारः) जीर्ण करने हारे के (न) तुल्य (शोशुचानः) शुद्ध संशोधक (वृषा) वृष्टिकर्ता (हरिः) हरणशील' (उशती:) कामना किये जाते (धियः) कर्मो वा बुद्धियों को (हिन्वानः) बढ़ाता हुआ अग्नि' (अजीगः) जगाता है (भासा) दीप्ति से सब को (मा, भाति) प्रकाशित करता है (पृथु) विस्तृत (पाजः) अन्नादि का (अश्रत) आश्रय करता है सब को (वविद्युतत्) प्रकट करता है (उषः) प्रभातवेला के तुल्य (शुचिः) पवित्र स्वयं (दीखत) प्रकाशित होता है वैसे प्राप कीजिये ॥१॥ ma भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमा और वाचकलु०-जैसे उत्तम शिक्षा को प्राप्त विद्वान् यथावत् कार्यों को सिद्ध करते वैसे ही विद्युत् आदि पदार्थ सम्प्रयोग में लाये हुए सब व्यवहारों को सिद्ध करते हैं ।।१।। फिर वह विद्वान् कैसा हो क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स्वर्ण वस्तौरुषसामरोचि यज्ञं तन्वाना उशिजो न मन्म । अग्निर्जन्मानि देव आ वि विद्वान्द्रवद्र्तो देवयावा वनिष्ठः ।।२।। पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (अग्निः) विद्युत् अग्नि (स्वः, न) आदित्य के समान (वस्तो:) दिवस और (उषसाम्) प्रभातवेलाओं के सम्बन्ध में (अरोचि) रुचि करता है वा प्रकाशित होता (यज्ञम्) संगतियोग्य व्यवहार को (तन्वानाः) विस्तृत करते और (उशिजः) कामना करते हुए के (न) तुल्य (देवः) प्रकाशयुक्त कामना करता हुआ (विद्वान्) विद्वान् (मन्म) मानने योग्य विज्ञान और (जन्मानि) जन्मों को (वि, पा, अवत) विशेष कर अच्छा शुद्ध करता हुआ (दूतः) समाचार पहुंचाने वाला (वनिष्ठः) अत्यन्त विभागकर्ता (देवयावा) दिव्य उत्तम गुणों को प्राप्त होने वाला अग्नि के तुल्य' श्रेष्ठ व्यवहारों को प्रकाशित करता उस विद्वान् पुरुष की निरन्तर सेवा करो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलु०-जो जिज्ञासु विद्वानों से शिक्षा को प्राप्त होके विधि और क्रिया से अग्नि आदि पदार्थों से समस्त व्यवहारों को सिद्ध करते हैं वे प्रसिद्ध धनवान होते हैं ॥२॥ फिर स्त्रीपुरुष किसके तुल्य होकर कैसे स्वीकार करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अच्छा गिरौ मतयो देवयन्तीरनि यन्ति द्रविणं भिक्षमाणाः । सुसन्दृशं सुप्रतीक स्वञ्च हव्यवाहमरति मानुषाणाम् ॥३।। . Ram ७४४ ऋग्वेदः मं०७। सू.१०॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो कन्या (मतयः) बुद्धि के तुल्य वर्तमान (गिरः) विद्यायुक्त वारिणयों और (अच्छा, देवयन्तीः) अच्छे प्रकार विद्वान् पतियों की कामना करती हुई (सुसन्दृशम्) अच्छे प्रकार देखने योग्य (सुप्रतीकम्) सुन्दर प्रतीति के साधन (स्वञ्चम्) सुन्दर प्रकार पूजने योग्य (मानुषाणाम्) मनुष्यों के सम्बन्ध से (हव्यवाहम) होमने योग्य पदार्थों को देशान्तर पहुंचाने वाले (अरतिम्) सर्वत्र प्राप्त होने वाले (द्रविणम्) धन वा यश को (भिक्षमाणाः) चाहती हुई (अग्निम्) विद्युत् की विद्या को (यन्ति) प्राप्त होती हैं वे ही विवाहने योग्य होती हैं ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे कन्या दीर्घ ब्रह्मचर्य के साथ विदुषी हो और अग्नि आदि की विद्या को प्राप्त हो के पुरुषों में से उत्तम उत्तम पतियों को चाहती हुई अपने अपने अभीष्ट स्वामी को प्राप्त होती हैं वैसे पुरुषों को भी अपने अनुकूल स्त्रियों को प्राप्त होना चाहिये ।।३।। कोन विद्वान् निरन्तर सेवने योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इन्द्र नो अग्ने बमुभिः सजोषा रुद्र रुद्रेभिरा वहा बृहन्तम् । आदित्येभिरदिति विश्वान्यां बृहस्पतिमृक्वमिविश्वबारम् ॥४॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन (सजोषा:) तुल्य सेवनकर्ता प्राप (न:) हमारे लिये (वसुभिः) पृथिव्यादि के साथ (इन्द्रम्) विद्य त् अग्नि को (रुवेभिः) प्राणों के साथ (बृहत्तदो बड़े (स्त्रम्) जीवात्मा को (आदित्येभिः) बारह महीनों से (विश्वजन्या) संसारोत्पत्ति की हेतु (अदितिम्) अखण्डित काल- विद्या को और (ऋक्वभिः) ऋग्वेदादि से (विश्वबारम्) सब के स्वीकार करने योग्य (बृहस्पतिम्) बड़ी ऋग्वेदादि वाणी के रक्षक परमात्मा को (मा, वहा) अच्छे प्रकार प्राप्त कराइये ॥४॥ भावार्थ:-जो ही पृथिव्यादि विद्या के साथ बिजुली की विद्या को, प्राणविद्या के साथ जीवविद्या को, कालविद्या के साथ प्रकृति के विज्ञान को भऔर वेदविद्या से परमात्मा के विज्ञान कराने को समर्थ होता है उसी का सब लोग विद्या प्राप्ति के लिये पाश्रय करें।॥४॥ मनुष्य प्रतिदिन किस का खोज करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं मन्दं होतारमुशिजो यविष्ठमग्नि विश्व ईळते अध्वरेषु । स हि क्षपावाँ अभवद्रयीणामतन्द्रो दूतो यजय देवान् ।।५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जिसको (अध्वरेषु) अग्निहोत्रादि क्रियारूप व्यवहारों में ANA Mus ऋग्वेदः मं० ७ । सू. ११ ॥ ७४५ (मन्यम्) आनन्दकारी (होतारम्) दाता (यविष्ठम्) अतिजवान के तुल्य (अग्निम्) अग्नि की (उशिजः) कामना करते हुए (विशः) प्रजाजन (ईळते) स्तुति वा खोज करते हैं (स:, हि) वही (क्षपावान्) बहुत रात्रियों वाला (प्रतन्द्रः) बालस्य रहित (दूतः) दूत के समान (रयीणाम्) द्रव्यों की (यजथाय) प्राप्ति के लिये (देवान्) दिव्यगुणों के प्राप्त कराने को समर्थ (अभवत्) होता है ।।५।। भावार्थ:-जो अग्नि, दूत के तुल्य सब विद्याओं का संग कराने वाला होता है उसका सब मनुष्य खोज करें, जिससे सब गुणों की प्राप्ति हो ॥५॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान् और विदुषी के कर्तव्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में दावा सूक्त समाप्त हुभा ॥ . -- । - 4p A अथ पञ्चर्चस्य कादशस्य सूक्लस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निर्देवता। १ स्वराद पङ्क्तिः । २।४ भूरिक पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ३ विराट् त्रिष्टुप् । ५ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ।। फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। महाँ अस्पध्वरस्य प्रकेतो न ऋते त्वदमृता मादयन्ते । आ विश्वभिः सरथ याहि देवन्यग्ने होतो प्रथम संदेह ॥१॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) स्वप्रकाशस्वरूप जगदीश्वर आप (इह) इस जगत् में (विश्वेभिः) सब (देवः) विद्वानों के साथ (प्रथमः) पहिले (होता) विद्यादि शुभगुणों कि दाता हमको (सरथम्) रथ सहित (नि, श्रा, याहि) निरन्तर प्राप्त हूजिये जिस कारण (स्वत) आप से (ऋते) भिन्न (अमृताः) नाश रहित जीव (न) नहीं (माद- यन्ते) मानन्द करते हैं इससे आप (सद) स्थिर हूजिये श्राप (अध्वरस्य) सब व्यवहार के (महान्) बड़े (प्रकेतः) उत्तमबुद्धि के प्रकाशक (असि) हैं ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिसके विना न विद्या, न सुख प्राप्त होता जो विद्वानों का सङ्ग, योगाभ्यास और धर्माचरण से प्राप्त होने योग्य है उसी जगदीश्वर की सदा उपासना करो ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। स्वामीळते अजिरे दूत्याय हविष्मन्तः सदमिन्मानुषासः । यस्य देवैरासदो बहिरग्नेऽहोन्यस्मै सुदिना भवन्ति ॥२॥ - ७४६ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ११ ॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य' स्वयंप्रकाशस्वरूप ईश्वर (यस्य) जिस आप के (देवैः) विद्वानों से (मा, प्रसव:) प्राप्त होने योग्य (बहिः) सुखवर्द्धक विज्ञान प्राप्त होता है (अस्मै) इस विद्वान् के लिये आप के (अहानि) दिन (सुदिना) सुदिन (भवन्ति) होते हैं जैसे (हविष्मन्तः) प्रशस्त सामग्री वाले (मानुषासः) मनुष्य (इत्याय) दूतकर्म के लिये (सवम्, इत) स्थिर होने वाले (अजिरम्) फेंकने हारे अग्नि की (ईळते) स्तुति करते हैं वैसे ये लोग (स्वाम्) आपकी निरन्तर स्तुति करें ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे सामग्री वाले अग्निविद्या को प्राप्त होके निरन्तर आनन्दित होते हैं वैसे ही ईश्वर को प्राप्त होके निरन्तर श्रीमान होते हैं ॥२॥ किसके होने पर मनुष्य उत्तम गुरण को प्राप्त होते हैं इस विषय को अगले ममत्र में कहते हैं । त्रिश्चिदत्तोः प्र चिकितुर्वसूनि त्वे अन्तर्दाशुषे मल्य । मनुष्वदग्न इह यक्षि देवान्भवा नो दूतो अभिशस्तिपाया ॥३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वन् (त्वे) आपके (अन्तः) बीच (दाशुषे) दानशील (माय) मनुष्य के लिये (बसूनि) द्रव्यों को (अक्तोः) रात्रि के सम्बन्ध में (चित) भी (त्रिः) तीन वार विद्वान् (प्र, चिकितुः) जानते हैं आप (इह) इस जगत् में (मनुष्वत्) मनुष्यों के तुल्य (देवान्) विद्वानों का (यक्षि) सत्कार कीजिये (न:) हमारे (दूतः) दूत के समान (अभिशस्तिपावा) प्रशंसितों के रक्षक पवित्रकारी (भव) हूजिये ॥३॥ भावार्थ:-जिसके संग से मनुष्यों को दिव्य गुण और पुष्कल धन प्राप्त होते हैं इस जगत् में उसी की स्तुति कर जो दूत के तुल्य परोपकारी होता है वह सब को सत्य जताने को समर्थ होता है ।।३।। किसकी विद्या से अभीष्ट प्राप्त करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अमिरीशे बृहतो अध्वरस्याग्निविश्वस्य हविषः कृतस्य । क्रतुं ह्यस्य वसंवो जुषन्तायो देवा दधिरे हव्यवाहम् ॥४। पदार्थ:-(अग्निः) विद्य त् अग्नि (बृहतः) बड़े (अध्वरस्य) रक्षा योग्य व्यवहार के करने को (ईशे) समर्थ है (अग्निः) अग्नि (कृतस्य) शुद्ध (विश्वस्य) ऋग्वेदः म०७ । सू०१२।। ७४७ - सब (हविष:) संग करने योग्य व्यवहार के लिये समर्थ है (अस्य) इस अग्नि के संग से जो (वसवः) चौबीस वर्ष ब्रह्मचर्य करने वाले प्रथम कक्षा के (देवा:) विद्वान् जन (तुम्) बुद्धि का (हि) ही (जुषन्त) सेवन करते हैं (प्रथा) इसके अनन्तर (हव्य- वाहम्) ग्रहण करने योग्य वस्तुओं को प्राप्त करने वाले अग्नि को (बधिरे) धारण करते हैं वे ही जगत् में पूज्य होते हैं ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विद्युत् बड़े बड़े कार्यों को सिद्ध करती जिसके सम्बन्ध से योगाभ्यास कर के मनुष्य बुद्धि को प्राप्त होता उसी अग्नि का सब लोग युक्ति से सेवन करें ॥४॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आग्ने वह हविराय देवानिन्द्रज्येष्ठास इह मादयन्ताम् । इमं यज्ञं दिवि देवेषु धेहि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥५। पवार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि विद्वन् पाप (अद्याय) भोगने योग्य वस्तु के लिये (देवान्) विद्वानों को (हषिः) भोजन योग्य अन्न को (प्रा. वह) अच्छे प्रकार प्राप्त कराइये उससे (इह) इस समय (इन्द्रज्येष्ठासः) जिन में राजा श्रेष्ठ है वे मनुष्य (मादयन्ताम्) आनन्दित करें श्राप (इमम्) इस (यज्ञम्) धर्मयुक्त व्यवहार को (दिवि) द्योतनस्वरूप परमात्मा और (देवेष) विद्वानों में (हि) धारण करो, हे विद्वानो (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥५॥ भावार्थ:-हे विद्वानो ! जैसे अग्नि सूर्यादिरूप से सब को पानन्दित करता है वैसे इस जगत् में तम सब लोगों की रक्षा कर और कर्तव्य को कराके अभीष्ट भोगों को प्राप्त करायो॥५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वानों का कृत्य बर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में ग्यारहवां सूक्त समाप्त हुआ। । अथ व्यर्चस्य द्वादशस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निदेवता । १ विराट- त्रिष्टुप् । २ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब बारहवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि कैसा इस विषय को कहते हैं।

ऋग्वेदः मं०७। सू० १२ ॥ N AND अर्गन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे। चित्रभानुं रोदसी अन्तर्वी खांहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम् ।।१।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (स्वे) अपने (दुरोणे) घर में (समितः) प्रकाशित है वह (दीवाय) सबको प्रकाशित करता है उसको (उर्वी) बड़ी (रोक्सी) सूर्य पृथिवी के (अन्तः) भीतर वर्तमान (चित्रभानुम्) अद्भुत किरणों वाले (स्वाहुतम्) सुन्दर प्रकार ग्रहण किये (विश्वतः) सब ओर से (प्रत्यञ्चम्) पीछे चलने और (यविष्ठम्) अतिशय विभाग करने वाले (महा) बड़े अग्नि को (नमसा) सत्कार वा अन्नादि से जैसे हम लोग (अगन्म) प्राप्त हों वैसे इसको तुम लोग भी प्राप्त होमो॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-विद्वानों को उचित है कि सब को ऐसा उपदेश करें कि जैसे हम लोग सब के अन्तःस्थित विद्युत् अग्नि को जानें वैसे तुम लोग भी जानो॥१॥ फिर प्रेम से उपासना किया ईश्वर क्या करता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। स मसा विश्वा दुरितानि साह्वानग्निा टवे दम आ जातवेदाः। स नौ रक्षिषदुरितादवद्यादान्गृणत उत नौ मघोनः ॥२॥ पदार्थ:-- हे मनुष्यो! जगदीश्वर (वमे) घर में (अग्निः) अग्नि के तुल्य (जातवेदाः) उत्पन्न हुए पदार्थों में व्याप्त होकर विद्यमान (स्तवे) स्तुति में (मह्ना) महत्त्व से (साह्वान्) सहनशील (विश्वा) सब (दुरितानि) दुराचरणों को दूर करता है (सः) वह (अवद्यात) निन्दनीय (दुरिताय) दुष्टाचार से (नः) हमारी (मा, रक्षिषत) रक्षा करे (गुणतः) शुद्धि करते हुए हम लोगों की रक्षा करे (उत) और (मघोनः) बहुत धन वाले (नः) हमारी (सः) वह रक्षा करे ॥२॥ भावार्थ:--- इस मन्त्र में वाचकल०-हे मनुष्यो! जैसे घर में प्रज्वलित किया अग्नि अन्धकार और शीत की निवृत्ति करता है वैसे ही उपासना किया परमेश्वर अज्ञान और अधर्माचरण को दूर कर धर्म और विद्या ग्रहण में प्रवृत्ति कराके सम्यक् रक्षा करता है ॥२॥ फिर वह उपासना किया ईश्वर क्या करता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ote L ऋग्वेदः मं०७ । सू० १३ ।। ७४६ A Emom त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः। वसुं सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥३॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य स्वयं प्रकाशस्वरूप ईश्वर जो (वसिष्ठाः) सब विद्याओं में अतिशय कर निवास करने वाले (मतिभिः) बुद्धियों से (स्वाम्) तुमको (वर्द्धन्ति) बढ़ाते हैं उन (स्वे) आप में प्रीति वालों के (सुषणनानि) सुन्दर विभाग किये (वस) द्रव्य (सन्त) हों जो (त्वम्) पाप (वरुणः) श्रेष्ठ (उत) और (मित्रः) मित्र है सो आप हमारी (सदा) सदा रक्षा करो और हे विद्वानो (यूयम्) तुम लोग ईश्वर के तुल्य (नः) हमारी (स्वस्तिभिः) स्वस्थता-सम्पादक क्रियाओं से (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥३॥ भावार्थः -- इस मन्त्र में उपमालं०-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वानों से सम्यक् बढ़ाया हुआ अग्नि दरिद्रता का विनाश करता है वैसे ही उपासना किया परमेश्वर अज्ञान को निवृत्त करता है। जैसे प्राप्त लोग सब की सदा रक्षा करते हैं वैसे परमात्मा सब संसार की रक्षा करता है ।।३।। इस सूक्त में अग्नि, ईश्वर और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में बारहवां सूक्त समाप्त हुआ। . । 10 अथ व्यर्चस्य त्रयोदशस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । वैश्वानरो देवता १। २ स्वराट्पङ्क्तिः । ३ भुरिक्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। अब तीन ऋचा वाले तेरहवें सूक्त का प्रारम्भ है । उसके प्रथम मन्त्र में संन्यासी कैसे होते हैं इस विषय को कहते हैं ।। प्राग्नये विश्वशुचे धियन्धेऽसुरघ्ने मन्म धीति भरध्वम् । भरे हविर्न बर्हिषि प्रीणानो वैश्वानराय यतये मतीनाम् ।।१।। पदार्थ:-हे मनुष्यो (मतीनाम्) मनुष्यों के बीच (वैश्वानराय) सब मनुष्यों के नायक (विश्वशुचे) सब को शुद्ध करने वाले (धियन्धे, बुद्धि को धारण करने हारे (असुरध्ने) दुष्ट कर्मकारियों को मारने वा तिरस्कार करने वाले (अग्नये) अग्नि के तुल्य विद्यादि शुभ गुणों से प्रकाशमान (यतये) यत्न करने वाले संन्यासी के लिए (बहिषि) सभा में (प्रीणानः) प्रसन्न हुमा राजा (भरे) संग्राम में (हविः) भोगने htty ERS ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १३ ।। धारणा को - वा देने योग्य अग्न' को जैसे (न) वैसे (मन्म) विज्ञान और (धीतिम्) धर्म की तुम लोग (प्र, भरध्वम्) धारण वा पोषण करो॥१॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में [उपमा] वाचकल -हे गृहस्थो ! जो अग्नि के तुल्य विद्या और सत्य धर्म के प्रकाशक, अधर्म के खण्डन और धर्म के मण्डन से सब के शुद्धिकर्ता, बुद्धिमान्, निश्चित ज्ञान देने वाले, अविद्वत्ता के विनाशक, मनुष्यों को विज्ञान और धर्म का धारण कराते हुए संन्यासी हों उनके सङ्ग से सब तुम लोग बुद्धि को धारण कर निस्सन्देह होमो। जैसे राजा युद्ध की सामग्री को शोभित करता है वैसे उत्तम संन्यासी जन सुख की सामः की सामग्री को शोभित करते हैं ॥१॥ फिर वे संन्यासी किसके तुल्य क्या करते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वमग्ने शोचिषा शोशुचान आ रोदसी अपृणा जायमानः । त्वं देवाँ अभिशस्तरमुञ्चो वैश्वानर जातवेदो महित्वा ।।२।। पदार्थ:-हे (अग्ने अग्नि के तुल्य वर्तमान तेजस्विन् संन्यासिन् श्राप जैसे अग्नि (शोशुचानः) शुद्ध करता और (जायमान:) उत्पन्न होता हुआ (शोचिषा) प्रकाश से (रोदसो) सूर्य भूमि को अच्छे प्रकार पूरित करता वैसे हम लोगों को (त्वम्) पाप (श्रा, पृणाः) अच्छे प्रकार पूर्ण कीजिये हे (वैश्वानर) सब मनुष्यों के नायक (जातवेदः) विद्या को प्राप्त विद्वत् (त्या) श्राप (महित्वा) अपनी महिमा से (देवान्) हम विद्वानों को (अभिशस्तेः) सन्मुख प्रशंसा करने वाले दम्भी से (अमञ्चः) छुड़ाइये ॥२॥ भावार्थ:-~-इस मन्त्र में वाचकल मनुष्यो ! जैसे अग्नि प्राप शुद्ध हुआ सब को शुद्ध करता है वैसे संन्यासी लोग स्वयं पवित्र हुए सबको पवित्र करते हैं ॥२॥ फिर वे संन्यासी कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। जातो यदग्ने भुवना व्यख्या पशून्न गोपा इर्यः परिज्मा । वैश्वानर ब्रह्मणे विन्द गातुं यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ।।३।। पदार्थ:-हे (वैश्वानर) सब मनुष्यों में प्रकाश करने वाले (अग्ने अग्नि के तुल्य तेजस्वि विद्वन् संन्यासिन् जैसे (जात:) उत्पन्न हुमा अग्नि (भुवना) लोक- लोकान्तरों को (वि, प्रख्यः) विशेषकर प्रकाशित करता है वैसे (यत्) जो आप विद्याओं में प्रसिद्ध मनुष्यों के प्रात्माओं को प्रकाशित कीजिये तथा (पशून्) गो tra- स ऋग्वेदः मं० ६ । सू० १४ ।। ७५१ आदि को (गोपाः) पशुरक्षकों के (न) तुल्य (इर्यः) सत्य मार्ग में प्रेरक और (परिज्मा) सब ओर से प्राप्त होने वाले हूजिये वह पाप (ब्रह्मणे) परमेश्वर, वेद वा चार वेदों के ज्ञाता के लिये (गातुम्) प्रशस्त भूमि को (विन्द) प्राप्त हूजिये (यूयम् ) तुम संन्यासी लोग सब (स्वस्तिभिः) स्वस्थता के हेतु क्रियानों और सत्य उपदेशों से (नः) हमारी (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो सूर्य के तुल्य, परोपकार, विद्या और उपदेश जिनके प्रसिद्ध हैं वे जैसे गौए बछड़ों की रक्षा करतीं वैसे विद्यादान से सब की रक्षा करने वाले सर्वदा घूमते हुए वेद, ईश्वर को जानने के लिये राज्यरक्षणार्थ राजा के तुल्य न्यायशील होकर सब मूों को बोध कराते वे सदा सब को सत्कार करने योग्य होते हैं ॥३॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से संन्यासियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में तेरहवां सूक्त समाप्त हुआ। FARMIRE A अथ व्यर्चस्य चतुर्दशस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निर्देवता । १ निचद्- बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः। २ निवृत्रिष्टुप् । ३ विराट् त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः॥ अब तीन ऋचा वाले चौदहवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में संन्यासी की सेवा कैसे करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं । समिधा जातवेदसे देवाय देवहूतिभिः । हविनिः शुक्रशोचिषे नमस्विनौ वयं दाशेमामये ।।३।। पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे ऋत्विज् पुरुष और यजमान लोग (समिधा) दीप्ति के हेतु काष्ठ और (हविभिः) होम के साधनों और (देवहूतिभिः) विद्वानों ने प्रशंसित की हुई वारिणयों के साथ (अग्नये) अग्नि के लिये प्रयत्न करते हैं वैसे (नमस्विनः) अन्न और सत्कार वाले (वयम्) हम लोग (जातवेदसे) उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान (शुकशोचिष) वीर्य और पराक्रम से दीप्तिमान् तेजस्वी (देवाय) विद्वान् संन्यासी के लिये अन्नादि पदार्थ (दाशेम) देवें ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे दीक्षित लोग अग्निहोत्रादि यज्ञ में घृत की आहुतियों से होम किये अग्नि से जगत् का हित करते हैं

ऋग्वेदः मं०७। सू० १४ ॥
वैसे हम अनियत तिथि वाले संन्यासियों की सेवा से मनुष्यों का कल्याण
करें ॥१॥
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फिर वे संन्यासी क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
वयं ते अग्ने समिधा विधेम वयं दाशेम सुष्टुती यजत्र ।
वयं घृतेनाध्वरस्य होतयं देव हविषा भद्रशोचे ।।२।।
पदार्थ:-- है (यजत्र) संग करने योग्य (होतः) होम करने वाले (भत्रशोचे)
कल्याण के प्रकाशक (देव) दिव्य गुणयुक्त (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन जैसे
(वयम्) हम लोग (समिधा) ईधन से अग्नि में होम (विधेम) करें वैसे (सुष्टुतो)
श्रेष्ठ प्रशंसा से (ते) तुम अतिथि के लिये (वयम्) हम (दाशेम) अन्नादिक देवें जैसे
ऋत्विज् और यजमान लोग (अध्वरस्य) यज्ञ के बीच (धृतेन) घी तथा (हविषा)
होमने योग्य द्रव्य से जगत् का हित करते हैं वैसे (वयम्) हम लोग आप का हित
करें। जैसे (वयम्) हम आप की सेवा करें वैसे' आप हमको सत्य उपदेश
करें ॥२॥
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भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु-जैसे गृहस्थ लोग प्रीति से
संन्यासियों की सेवा करें वैसे ही प्रीति से संन्यासी भी इनके कल्याण के
अर्थ सत्य का उपदेश करें॥२॥
फिर गृहस्थ और यति लोग परस्पर कैसे क्त्तें इस विषय को
अगले मन्त्र में कहते हैं ।
आ नो देवेभिरुप देवहूतिमाने याहि वर्षद्कृति जुषाणः ।
तुभ्यं देवाय दाशंत: स्याम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥३॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य दोषों के जलाने वाले श्राप (देवेभिः)
विद्वानों के साथ (नः) हमारे (देवहूतिम्) विद्वानों से स्वीकार की हुई (वषट्कृतिम्)
सत्य क्रिया को (जुषाणः) सेवन करते हुए हमको (उप, पा, याहि) समीप प्राप्त
हूजिये हम लोग (तुभ्यम्) तुम (देवाय) विद्वान् के लिए (दाशतः) सेवन करने वाले
(स्याम) होवें (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुख क्रियाओं से (नः) हमारी (सदा) सदा
(पात) रक्षा करो ॥३॥
भावार्थ:-गृहस्थों को चाहिये कि सदैव पूर्ण विद्या वाले संन्यासियों
की निमन्त्रण द्वारा प्रार्थना वा सत्कार करें जिससे वे समीप पाये उनकी
रक्षा और निरन्तर उपदेश करें॥३॥

ऋग्वेदः मं० ७ । सू०१५॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से यति और गृहस्थ के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में चौदहवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ पञ्चवर्चस्थ पञ्चदशतमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निदेवता । १।३।७।१०।१२ । १४ विरागायत्री ।२।४।५।६।९।१३ गायत्री। ८ निचूद्गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः । ११ । १५ आयुष्णिक छन्दः । ऋषभः MLA so अब पन्द्रह सूक्त का प्रारम्भ है । इसके प्रथम मन्त्र में अतिथि कैसा हो इस विषय को कहते हैं। उपसोय मीळ्हुष आस्यै जुहुता हविः । यो नो नेदिष्ठमाध्यम् ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (नः) हमारे (नेदिष्ठम्) अति निकट (प्राप्यन्) प्राप्त होने योग्य को प्राप्त होता है उस (उपसराय) समीप में स्थापन करने योग्य (मीळ हुर्षे) जल से जैसे वैसे सत्य उपदेशों से सींचने वाले के लिये (प्रास्ये) मुख में (हविः) देने योग्य वस्तु को (जहुत) देनो ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो यति समीप प्राप्त हो उसका तुम सब लोग सत्कार करो और अन्नादि का भोजन करानो ॥१॥ फिर वे संन्यासी और गृहस्थ परस्पर कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यः पञ्च चर्षणीरभि निषसाद दमैदमे । कविय॒हप॑तिर्युवां ॥२॥ पदार्थ:-(यः) जो (कविः) उत्तम ज्ञान को प्राप्त हुना' संन्यासी (दमेबमे) घर घर में (पञ्च) पांच (चर्षणीः) मनुष्यों वा प्राणों को (अभि, निषसाद) स्थिर करे उसका (युवा) पूर्ण ब्रह्मचर्य के साथ वर्तमान' (गृहपतिः) घर का रक्षक युवा पुरुष निरन्तर सत्कार करे ॥२॥ भावार्थ:-संन्यासीजन सदा सब जगह भ्रमण करे और गृहस्थ इस विरक्त का सत्कार करे और इससे उपदेश सुने ॥२॥ फिर वे दोनों परस्पर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु विश्वतः । उतास्मान्पात्वंहसः ॥३॥ पवार्थः-(स.) वह संन्यासी (अग्निः) अग्नि के तुल्य (न:) हम गृहस्थों की क Aarathe ७५४ ऋग्वेदः मं०७ । सू० १५॥ 444 M वा (अमात्यम्) उत्तम मंत्री की और (वेदः, धन की विश्वतः) सब ओर से रक्षतु) रक्षा करे (उत) और (अस्मान्) हमारी (अंहसः) दुष्टाचरण वा अपराध से (पात) रक्षा करे ॥३॥ भावार्थ:-- गृहस्थ लोग ऐसी इच्छा करें कि संन्यासी जन हमको ऐसा उपदेश करे कि जिससे हम लोग धन के रक्षक हुए अधर्म के आचरण से पृथक् रहें ॥३॥ फिर वे संन्यासी लोग कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नवं नु स्तोमममय दिवः श्येनाय जीजनम् । वस्वः कुविद्वनाति नः ॥४॥ पदार्थ:-जो (न:) हमारे (वस्वः) धन के (कुवित) बड़े भाग को (वनाति) सेवन करे उस (श्येनाय) श्येन के तुल्य पाखण्डियों के विनाश करने वाले (अग्नये) अग्नि के समान पवित्र के लिए (दिवः) कामना की (नवम्) नवीन (स्तोमम्) प्रशंसा को मैं (नु. जीजनम् । शीघ्र प्रकट करू ।।४।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०- -जो अतिथि लोग श्येन पक्षी के तुल्य शीघ्र 'वलने वाले, पाखण्ड के नाशक, द्रव्य और विद्या के उपदेशक सन्यासधर्मयुक्त हों उनका गृहस्थ सत्कार करें ॥४॥ किसका धन प्रशंसनीय होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। स्पार्दा यस्य श्रियों दृशे रयिर्वीरवतो यथा । अग्रे यज्ञस्य शोचतः ॥५॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यस्य) जिस (वीरवतः) वीरों वाले के (स्पाहाः) चाहना करने योग्य (श्रियः) लक्ष्मी शोभाए (दृशे) देखने को योग्य हों वह (यथा) जैसे (अग्ने) पहिले (शोचतः) पवित्र (यज्ञस्या) सङ्ग के योग्य व्यवहार का साधक (रयिः) धन है वैसे सस्क्रिया का सिद्ध करने वाला हो ॥५॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालंकार है-उसी का धन सफल है जिसने न्याय से उपार्जन किया धन धर्मयुक्त व्यवहार में व्यय किया होवे ॥५॥ फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। सेमां वैतु वर्षट्कृतिमग्निर्जुषत नो गिरः । यजिष्ठो हव्यवाईनः ॥६॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (सः) वह (यजिष्ठः) अत्यन्त यज्ञकर्ता (हव्यवाहनः) वेने योग्य पदार्थों को प्राप्त होने वाला (अग्निः) पावक अग्नि (न:) हमारी (इमाम्) Imatmavati ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १५ ॥ ७५५ इस (वषट्कृतिम्) शुद्ध क्रिया को और (गिरः) वाणियों को (वेतु) प्राप्त हो उसको तुम लोग (जुषत) सेवन करो ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अग्नि सम्यक्प्रयुक्त किया हुआ हमारी क्रियाओं का सेवन करता वह तुम लोगों को सेवने योग्य है ।।६।। फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। नि त्वा नक्ष्य विश्पते धुमन्त देव धीमहि । सुवीरमग्न आहुत ॥७॥ पदार्थ:-हे (नक्ष्य) व्याप्त वस्तुओं को उत्तम प्रकार जानने वाले (माहुत) बहुतों से सत्कार को प्राप्त (विश्पते) प्रजारक्षक (देव, भग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि' विद्वन् जिस (धुमन्तम्) प्रकाश वाले (सुवीरम् ) उत्तम वीर हों जिससे उस अग्नि के तुल्य शुद्ध (स्वा) आपको जैसे (नि, धीमहि) निरन्तर ध्यान करें वैसे आप हमको निरन्तर प्रानन्द में स्थिर कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे हम लोग आपको न्याय से राज्य पालनरूप व्यवहार में सदा स्थित करें वैसे प्राप हमको धर्मयुक्त व्यवहार में प्रतिष्ठित कीजिये ॥७॥ फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। क्षप उम्रर्थ दीदिहि स्वमयस्त्वया वयम् । सुवीरस्त्वमस्मायुः ॥८॥ पदार्थ:-हे राजन् (अस्मयुः) हमको चाहने वाले (सवीरः) सुन्दर बीर पुरुषों से युक्त (त्वम्) आप (क्षपः) रात्रियों (च) और (उस्रः) किरण युक्त दिनों में (अस्मान्) हमको (दीविहि) प्रकाशित कीजिये (त्वया) आपके साथ (स्वग्नयः) सुन्दर अग्नियों वाले (वयम्) हम लोग प्रतिदिन प्रकाशित हों॥८॥ भावार्थः - हे राजा और राजपुरुषो! जैसे प्रतिदिन सूर्य प्रकाशित होता है वैसे तुम लोग सदा प्रकाशित होओ ॥८॥ फिर विद्वान् क्या करते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उप त्वा सातये नरो विप्रासो यन्ति धीतिमिः। उपाक्षरा सहनिर्णी ॥९॥ पदार्थ:-हे विद्यार्थिनि ! जैसे (विप्रासः) बुद्धिमान् (नरः) मनुष्य (धीतिभिः) अंगुलियों से (अक्षरा) अकारादि अक्षरों को (उप, यन्ति) उपाय से प्राप्त करते वे जो कन्या (सहस्रिणी) असंख्य विद्या विषयों को जानने वाली है उसको जानें वैसे (त्वा) अापके (सातये) सम्यक् विभाग के लिये बुद्धिमान् मनुष्य (उप) समीप प्राप्त 4 MISE Mail ऋग्वेदः मै० ७ । सू० १५ ।। 3200 भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जैसे अंगूठा और अंगुलियों से अक्षरों को जानकर विद्वान् होता है वैसे ही विद्वान् लोग शोधन कर विद्या के रहस्यों को प्राप्त हों ।।६।। फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अग्नी रक्षांसि सेधति शुक्रशॉचिरमर्त्यः । शुचिः पावक ईडयः ॥१०॥ पदार्थ:-जो (शुक्रशोचि:) शुद्ध तेजस्वी (अमर्यः) साधारण मनुष्यपन से रहित (शुचिः) पवित्र (पावकः) शुद्ध पवित्र करने वाला (ईड्यः) स्तुति करने वा खोजने योग्य (अग्नि:) अग्नि के तुल्य राजा वा सेनाधीश (रक्षासि) रक्षा करने योग्य कार्यों को (सेधति) सिद्ध करे वह कीर्ति वाला होता है ॥१०॥ भावार्थ:-जैसे राजा अन्याय का निवारण कर न्याय का प्रकाश करता है वैसे विद्युत् दरिद्रता का विनाश कर लक्ष्मी को प्रकट करता है ॥१०॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। स नो राधास्या भरेशानः सहसो यहो । मगंश्च दातु वार्यम् ॥११॥ पदार्थ:--हे (सहसः) अति बलवान् के (यहो) पुत्र राजन् अग्नि के तुल्य तेजस्वी (ईशानः) समर्थ (भगः) ऐश्वर्यवान् जो आप (नः) हमारे लिए (राधांसि) सुख बढ़ाने वाले धनों को (प्रा, भर) अच्छे प्रकार धारण वा पोषण करें तथा (वार्यम्) स्वीकार करने योग्य ऐश्वर्य को (च, भी (सः)सो आप (दात) दीजिये ॥११॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० जैसे अग्नि विद्या से धनधान्य सम्बन्धी ऐश्वर्य को मनुष्य प्राप्त होते हैं वैसे ही उत्तम राज्य प्रबन्ध से मनुष्य धनाढय और सुखी होते हैं ॥११॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स्वमग्ने वीरवद्यों देवश्च सविता भगः । दितिश्च दाति वार्यम् ॥१२॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वि राजन् ! जैसे (देवः) दानशील वा प्रकाशमान (सविता) प्रेरणा करने वाला वा सूर्य और (वितिः) दुःखनाशक नीति भी (वार्यम्) स्वीकार के योग्य (वीरवत) जिससे उत्तम वीर पुरुष हों (यश:) PER Ramesh ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १५॥ ७५७ Ama to उस धन वा कीति (च) और (भगः) ऐश्वर्य को (दाति) देती है। इसको (स्वम्) श्राप दीजिये ॥१२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु० जो राजा अच्छे प्रकार सम्प्रयुक्त अग्नि आदि के तुल्य प्रजाओं में उद्योग से और अच्छी नीति से ऐश्वर्य कराके दुःख को खण्डित करता है वही यशस्वी होता है ॥१२॥ फिर वह राजा किसके समान क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आग्ने रक्षा को अंहंसः प्रति म देव रीषतः । तपिष्ठैरजरी दह ॥१३॥ पदार्थः- है (देव) उत्तम गुण कर्म स्वभावयुक्त (अग्ने) अग्निवत् तेजस्वी राजन् ! जैसे अग्नि (तपिष्ठः) अत्यन्त तपाने वाले तेजों से काष्ठादि को जलाता है वैसे (प्रजरः) वृद्धपन वा शिथिलतारहित हुए आप (रोषतः) हिंसक से (नः) हमारी (रक्ष) रक्षा कीजिये और (अंहसः) पापाचरण से (स्म) ही (प्रति) प्रतीति के साथ रक्षा कीजिये और दुष्टाचारियों को तेजों से (वह) जलाइये ॥१३॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलु-जैसे अग्नि शीत और अन्धकार से रक्षा करता है वैसे राजा आदि विद्वान् हिंसादि पापरूप आचरण से सब को पृथक रखते हैं ॥१३॥ फिर राजा और राणी प्रजा के प्रति क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अवां मही न आयस्यनाधृष्टो नृपीतये । पूर्मवा शतभुजः ॥१४॥ पदार्थ:-है राणी जैसे तुम्हारा (अनाधृष्टः) किसी से न धमकाने योग्य पति राजा न्याय से मनुष्यों का पालन करता है वैसे (अध) अब (प्रायसी) लोहे से बनी दृढ़ (पू:) नगरी के समान रक्षिका (मही) महती वाणी के तुल्य (शतभुजिः) असंख्यात जीवों का पालन करने वाली भाप (नपीतये) मनुष्यों के पालन के लिये (न:) हम स्त्री- जनों की रक्षा करने वाली (भव) हूजिये ॥१४॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-जहां शुभ गुणकर्मस्वभावयुक्त राजा पुरुषों और वैसे गुणों वाली राणी स्त्रियों का न्याय और पालन करें वहाँ सब काल में विद्या, आनन्द, अवस्था और ऐश्वर्य बढ़ें ॥१४॥ फिर राणी राजा, प्रजाजनों के प्रति कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वं न पायईसो दोषावस्तरघायतः । दिवा नक्तमदाभ्य ॥१५॥ पदार्थः-हे (प्रदाम्य) रक्षा करने योग्य राजन् ! (त्वम्) भाप (दोषावस्तः) ७५८ ऋग्वेदः मं०७ । सू० १६ ॥ , दिन रात (अघायत:) अपने को पाप चाहते हुए दुष्ट के सङ्ग से और (दिवानक्तम्) रात्रि दिन सब समय में (अंहस:) अपराध से (न:) हमको आप (पाहि) रक्षित कीजिये, बचाइये ॥१५॥ भावार्थ: जैसे राजा पुरुषों की निरन्तर रक्षा करे वैसे राणी प्रजा की स्त्रियों की नित्य रक्षा करे ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि के दृष्टान्त से राजा और रानी के कृत्यों का वर्णन करने से इस सूक्त की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह सप्तम मण्डल में पन्द्रहवां सूक्त समाप्त हुमा । Lal Dipur Hina ( अथ द्वादशर्चस्य षोडशस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निर्देवता । १ स्वराड- नुष्टप् । ५ निचूदनुष्टुप् । ७ अनुष्टुप् । ११ भुरिगनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः । २ भुरिग्बृहती। ३ निबृहती। ४ । ६ । १० । बृहतीछन्दः । मध्यमः स्वरः । ६ । ८ । १२ निवृत्पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥ अब राजा प्रजा के सुख के लिये क्या क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एना वो अग्नि नमसोजों नपातमा हुवे । प्रियं चेतिष्ठमरतिं वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम् ॥१॥ पदार्थ:--हे प्रजा जनो ! जैसे मैं राजा (यः) तुमको (एना) इस (नमसा) अन्न वा सत्कारादि से (ऊर्जः) पराक्रम के (नपातम्) विनाश को प्राप्त न होने वाले (प्रियम्) चाहने योग्य (चेतिष्ठम्) अतिथय' कर सम्यक् ज्ञापक (परतिम्) सुख प्रापक (स्वध्वरम्) सुन्दर अहिंसादि व्यवहार वाले (अमृतम्) अपने स्वरूप से नाशरहित (विश्वस्य) संसार के (दूतम्) बहुत कार्यों के साधक (अग्निम्) अग्नि के तुल्य तेजस्वी उपदेशक को (माहुवे) स्वीकार करता वैसे तुम भी उसको स्वीकार करो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु. -जैसे राजा सत्योपदेशकों का प्रचार करे वैसे उपदेशक अपने कर्तव्य को प्रीति से यथावत् पूरा करें।।१।। फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स योजते अरुषा विश्वभौजसा सदुद्रवत्स्वाहुतः । सुब्रह्मां यज्ञः सुशमी वसूनां देवं राधो जनानाम् ।।२।। पवार्थ:-हे मनुष्यो यदि (स.) वह (स्वाहुतः) सुन्दर प्रकार आह्वान किया ब (यशस्तमम्) अतिशय कीति करने वालम अग्नि को (दूतम्) दूत ऋग्वेदः मं०७ । सू० १६ ॥ ७५६ हुमा (स) वह (सुब्रह्मा) सुन्दर अन्न वा धनों से युक्त वा अच्छे प्रकार चारों वेद का ज्ञाता (यज्ञः) सत्कार के योग्य (सुशमी) सुन्दर कर्मों वाला (वसूनाम्) धनों का (राधः) धन (जनानाम्) मनुष्यों के बीच (देयम्) उत्तम (विश्वभोजसा) विश्व के रक्षक (अरुषा) घोड़ों के तुल्य जल' अग्नि को युक्त करता और (दुद्रवत) शीध्र प्राप्त होता हुआ (योजते) युक्त करता है वह इच्छा सिद्धि वाला होता है ॥२॥ भावार्थ:- जो राजा प्रजापालन के अर्थ सदा सूस्थिर है उसको जो दुःखनिवारण के लिये बुलावें उनको शीघ्र प्राप्त होकर सुखी करता है उत्तम आचरणों वाला विद्वान् होता हुआ प्रतिक्षण प्रजा के हित की इच्छा करता है वही सब को पूजनीय होता है ॥२॥ फिर वह अग्नि कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उदस्य शोचिरस्थादाजुह्वानस्य मीळ्हुषः । उधूमासौं अरुषासो दिविस्पृशः समग्निमिन्धते नरः ॥३॥ पदार्थः-जो (नरः) मनुष्य जिस (प्राजुह्वानस्य) अच्छे प्रकार होम किये द्रव्य को प्राप्त (मळ हुषः) सेचक (अस्य) इस अग्नि की (शोचिः) दीप्ति (उदस्थात) उठती है (दिविस्पृश:) प्रकाश में स्पर्श करने वाले (धूमास:) धूम और (अरुषास:) अरुणवर्ण लपटें (उत्) उठती हैं उस (अग्निम्) अग्नि को (सभिन्धते) सम्यक् प्रकाशित करते हैं वे उन्नति को प्राप्त होते हैं ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम लोग ऊर्ध्वगामी धूमध्वजा वाले तेजोमय वृष्टि आदि से प्रजा के रक्षक अग्नि को सम्यक् प्रयुक्त करो जिस से तुम्हारे कार्यों की सिद्धि होवे ॥३॥ फिर राजादि मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तं त्यो दूतं कृण्महे यशस्तमं देवाँ आ बीतये वह । विश्वा सूनो सहसो मतभोजना राख तयत्वेमहे ॥४॥ पवार्थ:- है (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र विद्वन् ! जैसे हम लोग करते वैसे (त्या) आपको मुख्य करते हैं । आप (बीतये) विज्ञानादि को प्राप्त करने के लिए (देवान्) दिव्य गुणों वा पदार्थों को (भा, वह) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये वा कीजिये (विश्वा) सब (मतभोजना) मनुष्यों के भोजनों वा पालनों को (रास्थ) दीजिये जैसे (यत्) जिस अग्नि को कार्यसिद्धि के लिये प्रयुक्त करते वैसे (तत्) उसको और (त्वा) आपको (ईमहे) याचना करते हैं ॥४॥ Party ka

७६०
ऋग्वेदः मं०७। सू० १६ ।।
*
भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०-जो सब कार्यों के साधक विद्युत्
अग्नि को दूत और राजकार्यों के साधक विद्या वा विनय से युक्त पुरुष
को राजा करते हैं वे सब ऐश्वर्य और पालन को प्राप्त होते हैं ॥४॥
फिर मनुष्य कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
त्वमग्ने गृहपतिस्त्वं
होता नो अध्वरे।
त्वं पोता विश्ववार प्रचेता यक्षि वेषि च वार्यम् ॥५॥
पदार्थ:-हे (विश्ववार) सब को स्वीकार करने योग्य (अग्ने) अग्नि के
तुल्य प्रकाशमान (गृहपतिः) घर के रक्षक ! (त्वम्) आप (नः) हमारे (अध्वरे)
अहिंसादि लक्षणयुक्त धर्म के प्राचरण में (होता) दाता (त्वम्) आप (पोता)
पवित्रकर्ता (स्वम्) आप (प्रचेताः) अच्छे प्रकार जताने वाले पाप (वार्यम्) स्वीकार
योग्य धर्मयुक्त व्यवहार को (यक्षि) सङ्गत करते (च) और (वेषि) व्याप्त होते हैं
उन आपकी हम लोग याचना करते हैं ॥५॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु-पूर्व मन्त्र से यहां
-पूर्व मन्त्र से यहां (ईमहे) पद की
अनुवृत्ति पाती है। जैसे अग्नि घर का पालक, सुखदाता, यज्ञ में पवित्र-
कर्ता, शरीर में चेतनता कराने वाला, सब विश्व का संग करता और
व्याप्त होता है वैसे ही मनुष्य होवें ॥५॥
फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
कृधि रत्नं यजमानाय सुक्रतो त्वं हि रत्नधा असि ।
आ ने ऋते शिशीहि विश्वमृत्विज सुशंसो यश्च दक्षते ॥६॥
पदार्थ:-हे (सुक्रतो) उत्तम बुद्धि वा धर्मयुक्त कर्म करने वाले पुरुष (यः)
जो (सुशंसः) सुनदर प्रशंसायुक्त जन (दक्षते) वृद्धि को प्राप्त होता उस (विश्वम्)
सब (ऋत्विजम्) ऋतुओं के योग्य काम करने वाले को (च) और (नः) हमको
(ऋते) सत्यभाषणादि रूप संगत करने योग्य व्यवहार में (त्वम्) आप (प्रा,
शिशीहि) तीव्र उद्योगी कीजिये (हि) जिस कारण आप (रत्नधाः) उत्तम धनों के
धारणकर्ता (असि) हैं इस कारण (यजमानाय) परोपकारार्थ यज्ञ करते हुए के लिये
(रस्नम्) रमणीय धन को प्रकट (कृषि) कीजिये ॥६॥
भावार्थ:-इस संसार में जो पुरुष धनाढच हो वह निर्धनों को उद्योग
कराके निरन्तर पालन करे । जो सत् श्रेष्ठ कर्मों में बढ़ते उन्नत होते हैं
उन को धन्यवाद और धनादि पदार्थों के दान से उत्सायुक्त करे ॥६॥

ऋग्वेदः मं०७। सू०.१६ ।। ७६१ IGORO R Om फिर वह राजा किन का सत्कार करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः । यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वान्दयन्त गोनाम् ।।७।। पक्षार्थ:----हे (स्वाहुत) सुन्दर प्रकार सत्कार को प्राप्त (अग्ने) विद्या विनय के प्रकाशक अग्नि के तुल्य तेजस्वि राजन् ! (ये) जो (जनानाम्) मनुष्यों के बीच (गोनाम्) गो आदि पशुओं के (ऊर्वान्) रक्षकों को (दयन्त) दया करते वा सुरक्षित रखते और (यन्तारः) शुभ कर्मों को प्राप्त होने वाले (मघवानः) बहुत प्रकार के धनों से युक्त (सूरयः) धर्मात्मा विद्वान् (त्वे) श्राप में (प्रियासः) प्रीति करने वाले (सन्तु) हों उनका आप नित्या सत्कार कीजिये ॥७॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलु -हे मनुष्यो ! जैसे राजा सब में दया का विधान कर और विद्वानों का सत्कार करके अपने राज्य में धनाढयों को वसावे वैसे प्रजाजन भी राजा के हितैषी होवें ॥७॥ राजा को किनका पालन बा किनको दण्ड देना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। येषामिळो घृतहस्ता दुरोण आँ अपि पाता निषीदति । ताँस्त्रायख सहस्य द्रुहो निदो यच्छा नः शर्म दीर्घश्रुत् ॥८॥ पदार्थ:-है (सहस्य) बल से युक्त राजन् ! (येषाम्) जिन के (दुरोणे) घर में (घृतहस्ता) हाथ में घी लेने वाली के तुल्य (प्राता) व्यापक (इळा) प्रशंसा योग्य वाणी (मा, निषीदति) अच्छे प्रकार निरन्तर स्थिर होती (तान्) उनकी पाप (प्रायस्थ) रक्षा कीजिये (बोर्षभुत) दीर्घ काल तक सुनने वाले प्राप (न:) हमारे (शर्म) घर को (पच्छ) ग्रहण कीजिये जो (ध्रुहः) द्रोही (निदः) निन्दक हैं उनको (अपि) भी अच्छे प्रकार ग्रहण कीजिये ।।।। भावार्थ:-हे राजन् ! जो सत्यवाणी वाले, वेद ज्ञाता हों उनको नित्य सुख दीजिये और जो द्रोहादि दोषयुक्त प्राप्तों के निन्दक हैं उनको शीघ्र दण्ड दीजिये।॥८॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स मन्द्रयां च जिह्वया वह्निरासा विदुष्टरः । अग्ने रयिं मघवद्भयो न आ वह हव्यदाति च सूदय ॥९॥ Amo ACH !

७६२ ऋग्वेदः मं०७ । सू० १६ ॥ Map पदार्थः-है (अग्ने) अग्नि के तुल्य न्याय से प्रकाशित राजन् ! [जो] (वह्निः) अग्नि के तुल्य वर्तमान विद्या और सुख प्राप्त कराने वाले (विदुष्टरः) अत्यन्त विद्वान् हैं (सः) सो आप (मन्द्रया) प्रशंसित आनन्द देने वाली (जिह्वया) सत्य भाषरणयुक्त वाणी से (च) और (प्रासा) मुख से (मधषद्भ्यः) प्रशंसित धन वाले (नः) हम लोगों के लिए (रयिम्) धन को (मा, वह) प्राप्त कराइये (च) और (हव्यदातिम्) होम के वा ग्रहण करने के योग्य वस्तुओं के खण्डन को (सूदय) नष्ट कीजिये ॥६॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०- जैसे अग्नि सब पृथिव्यादि तत्त्वों से हीरा आदि रत्नों को सब ओर से पका के देता है वैसे राजा, धनाढयों के सम्बन्ध से निधन को धनवान् कराके सुख प्राप्त कराये सत्य मधुर वाणी से प्रजाजनों को शिक्षा करे जिससे ये अयुक्त व्यवहार में धन- हानि न करें॥६॥ फिर वह राजा प्रजाजनों के प्रति कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ये राधांसि ददत्यश्व्या मघा कामैन श्रवसो महः । ताँ अंहंसः पिपृहि पर्तृभिष्ट्वं शतं पूर्मियविष्ठय ॥१०॥ पदार्थ:-हे (यविष्ठय) अतिशय कर जवानों में श्रेष्ठ राजन् ! (2) जो (महः) बड़े (श्रवसः) अन्न की (कामेन) कामना से (शतम्) सैकड़ों (मघा) स्वीकार करने योग्य (अश्व्या) महत् लोगों में प्रकट होने वाले (राधांसि) धनों को सब को (ददति) देते हैं (तान्) उनको (पतभिः) रक्षक (पूभिः) नगरियों के साथ (त्वम्) आप (अंहसः) दुष्टाचरण से (पिपृहि) रक्षा कीजिये ॥१०॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो धर्मात्मा उद्योगी जनों को उनसे श्रम करा के धन और अन्न देते हैं उन नगरी और पालकों के साथ वर्तमानों को अधर्माचरण से पृथक रक्खो जिससे धर्मपूर्वक उद्योग से पुष्कल धन और अन्न पाकर जगत् के हितार्थ निरन्तर दान करें ॥१०॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । देवो वो द्रविणोदाः पूर्णी विवष्ट्यासिचम् । उद्वा सिञ्चध्वमुपं वा पृणध्वमादिवो देव ओहते ॥११॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (द्रविणोदाः) धनदाता (देव:) विद्वान् (व:) तुमको (पूर्णाम्) पूरी (मासिचम्) अच्छे प्रकार सेचन की कान्ति को (विवष्टि) AIN- -- - ऋग्वेदः मं०७ । सू० १७ ।। विशेष कर कामना करता है (वा) अथवा जो (देवः) दिव्यगुणधारी विद्वान् (वः) तुमको (ोहते) वितकित करता उसको (उत्, सिञ्चध्वम्) ही सींचो (बा) अथवा (माद, इद) इसके अनन्तर ही (उप पुणध्वम्) समीप में तृप्त करो ॥११॥ भावार्थ:-जो विद्वान् लोग मनुष्यों की कामना पूर्ण करते हैं उनको सब सुखी करें ॥११॥ फिर अध्यापक और अध्येता क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वहिं देवा अंकृण्वत । दधाति रत्न विधते सुवीर्यमग्निर्जनाय दाशुषे ॥१२॥ पदार्थ:-जो (अग्निः) अग्नि के तुल्य वर्तमान विद्वान् (विधते) विधान करते हुए (दाशुषे) दाता (जनाय) जन के लिये (सुवीर्यम्) सुन्दर पराक्रम युक्त (रत्नम्) रमणीय धन को (दधाति) धारण करता जिसको (देवाः) विद्वान् लोग (अध्वरस्य) अहिंसारूप यज्ञ के कर्ता वा (होतारम्) विद्या के ग्रहीता (वह्निम्) कार्यों के चलाने और (प्रचेतसम्) अच्छे प्रकार जताने वाले जन को (अकृण्वत) करें (तम्) उसको सब सुशिक्षित करावें ॥१२॥ भावार्थ:- हे विद्वानो ! जो जितेन्द्रिय, तीव्रबुद्धि वाले, विद्या ग्रहण के अर्थ प्रवृत्त विद्यार्थी हों उनको अहिंसाशील, बुद्धिमान्, विद्या और धर्म के धारक करो॥१२॥ इस सूक्त में अग्नि, विद्वान्, राजा, यजमान, पुरोहित, उपदेशक और विद्यार्थी के कृत्य का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह सप्तम मण्डल में सोलहवां सूक्त समाप्त हुआ। , अथ सप्तर्चस्य सप्तदशस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । अग्निर्देवता।१।३। ४।६।७ प्राच्युष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः । २ साम्नी त्रिष्टुप्छन्दः । घेवतः स्वरः । ५ साम्नी पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । अब विद्यार्थी किसके तुल्य कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अग्ने भव सुषमिधा समिद्ध उत बहिरुर्विया वि स्तणीताम् ॥१॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्वी विद्वन् ! जैसे (सुषमिधा) समिधा के तुल्य शोभायुक्त धर्मानुकूल' क्रिया से (समिद्धः) प्रदीप्त अग्नि होता है वैसे ऋग्वेदः मं०७ । सू० १७ ॥ - (भव) हूजिये (उत्त) और जैसे अग्नि (उविधा) पृथिवी के साथ (बहिः) बढ़े हुए जल का विस्तार करता है वैसे प्रकार होकर प्राप (विस्तृणीताम्) विस्तार कीजिये ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु. -जैसे इन्धनों से अग्नि प्रदीप्त होता, वर्षा जल से पृथिवी को आच्छादित करता है वैसे ही ब्रह्मचर्य, सुशीलता और पुरुषार्थ से विद्यार्थी जन सुप्रकाशित होकर जिज्ञासुओं के हृदयों में विद्या का विस्तार करते हैं ॥१॥ फिर अध्यापक और विद्यार्थी परस्पर कैसे वर्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। उत द्वार उशतीवि श्रयन्तामुत देवाँ उशत आ वहेह ।।२।। पार्थः--है विद्यार्थी जैसे (arr:) द्वार (उशतीः) कामना वाली हृदय को प्यारी पत्नियों को विद्वान् (उत) और (उशतः) कामना करते हुए (देवान्) उत्तम गुण कर्म स्वभावयुक्त विद्वान् पतियों को स्त्रियां (वि, श्रयन्ताम् ) विशेष कर सेवन करें वा जैसे अग्नि (इह) इस जगत् में सब को प्राप्त होता (उत) और दिव्य गुणों को प्राप्त कराता है वैसे ही आप (मा, वह) प्राप्त करिये ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु० -जो विद्यार्थी विद्या की कामना से प्राप्त अध्यापकों का सेवन करते जिन उत्तम विद्यार्थियों को अध्यापक चाहते वे परस्पर कामना करते हुए विद्या की उन्नति कर सकते हैं ॥२॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अग्ने वीहि हविषा यक्षि देवान्त्स्वध्वारा कुंणुहि जातवेदः ॥३॥ पदार्थ:--हे (जातवेदः) विद्या को प्राप्त (अग्ने) अग्नि के तुल्य तीनबुद्धि वाले विद्यार्थिन् त विद्य त् के तुल्य (हविषा) ग्रहण किये पुरुषार्थ से विद्याओं को (वीहि) प्राप्त हो (देवान्) विद्वान् अध्यापकों का (यक्षि) संग कर और (स्वध्वरा) सुन्दर अहिंसारूप व्यवहार वाले कामों को (कृणुहि) कर ॥३॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलु०-विद्यार्थिजन जैसे विद्युत् मार्ग को शीघ्र व्याप्त होते वैसे पुरुषार्थ से शीघ्र विद्याओं को प्राप्त हों और अध्यापक पुरुष उनको शीघ्र विद्वान् करें ॥३॥ कौन अध्यापक श्रेष्ठ हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वध्वरा करति जातवेदा यसदेवाँ अमृतान्पिप्रयच्च ॥४॥ पदार्थ:---जो (जातवेदाः) विद्या में प्रसिद्ध अध्यापक विद्यार्थियों को (देवान्) mma 4

ऋग्वेदः म०७ । सू० १७ ॥
७६५
pum
AS
विद्वान् और (स्वध्वरा) अच्छे प्रकार अहिंसा स्वभाव वाले (करति) करे (अमृतान्)
अपने स्वरूप से मृत्युरहितों को (यक्षत) संगति करे (च) और इनको (पिप्रयत्)
तृप्त करे वह विद्यार्थियों को सेवने योग्य है ॥४॥
भावार्य-जिन अध्यापकों के विद्यार्थी शीघ्र विद्वान्, सुशील, धार्मिक
होते हैं वे ही अध्यापक प्रशंसनीय होते हैं ॥४॥
फिर अध्यापक से विद्यार्थी जन क्या पूछे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
पंख विश्वा वायाँणि प्रचेतः सत्या भवन्त्वाशिषों नो अद्य ॥६॥
पदार्थ:-हे (प्रचेतः) उत्तम बुद्धि से युक्त पुरुष प्राप (विश्वा) सब
(वार्याणि) ग्रहण करने योग्य विद्वानों का (बस्व) सेवन कीजिये जिससे (अध)
आज (न:) हमारी (आशिषः) इच्छा (सत्याः) सत्य (भवन्तु) होवें ॥५॥
भावार्थ:-हे अध्यापक ! श्राप विवेक से सत्य शास्त्रों को पढ़ाइये
और सुशिक्षा करिये जिससे हम लोग सत्य कामना वाले हों ॥५॥
फिर विद्यार्थी किसके तुल्य किसका सेवन करें इस विषय को
अगले मंत्र में कहते हैं।
त्वामु ते दधिरे हव्यवाह देवासो अग्न ऊर्जा नपांतम् ।।६॥
पदार्थ:-हे (अग्ने) समस्त विद्या से प्रकाशित (ते) आपके (ऊर्जः) पराक्रम-
युक्त (देवासः) उत्तम स्वभाव वाले विद्यार्थी जन (नपातम्) जिसका गिरना नहीं
विद्यमान उस (हव्यवाहम्) होमे हुए पदार्थों को पहुंचाने वाले अग्नि के समान
(स्वाम्) (उ) तुझे ही (पा, दधिरे) अच्छे प्रकार धारण करें ॥६॥
भावार्थ:-जैसे अग्निविद्या जानने वाले ऋत्विज् अग्नि की सेवा
करते हैं वैसे ही विद्यार्थी जन अध्यापक की सेवा करें ॥६॥
फिर वे परस्पर क्या क्या देवें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
ते ते देवाय दाशंत: स्याम महो नो रत्ना वि दध इयानः ॥७॥
पदार्थः-हे अध्यापक ! जो आप (नः) हमारे लिये (इयानः) प्राप्त होते
हुए (महः) बड़े-बड़े (रत्नः) रत्नों को (वि, दधः) विधान करते हो (ते) उन
(देवाय) विद्वान् अध्यापक आप के लिये (ते) वे हम लोग (दाशतः) देने वाले
(स्याम) हों ॥७॥
भावार्थ:- जैसे अध्यापक जन प्रीति के साथ विद्यायें देवें वैसे
विद्यार्थी जन वाणी, मन, शरीर और धनों से अध्यापकों को तृप्त
करें॥७॥

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १८ ।। इस सूक्त में अध्यापक और विद्यार्थियों के कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में सत्रहवां सूक्त समाप्त हुप्रा । अथ पञ्चविंशत्युचस्याऽष्टादशतमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः। १-२१ इन्द्रः । २२-२५ सुदासः पैजवनस्य दानस्तुतिर्देवता।१।१७ । २१ पङ्क्तिः । २।। १२ । २२ भुरिक पवितः । ८।१३। १४ स्वराट्पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। ३। ७ विरात्रिष्टुप् । ५। । ११ । १६ । १६ । २० निस्त्रिष्टुप् । ६।१०।१५। १८ । २३ । २४ । २५ त्रिष्टुप्छन्दः। धैवतः ity RPNG गा अब पच्चीस ऋचा वाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा कैसा श्रेष्ठ होता है इस विषय को कहते हैं । त्वे ह यत्पितरश्चिन्न इन्द्र विश्वा वामा जरितारो असन्वन् । त्वे गावः सदुधास्त्वे ह्यश्वास्त्वं वर्मु देवयवे वनिष्ठः ॥१॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् (स्वे) आपके होते (यत्) जो (न:) हमारे (पितरः) ऋतुओं के समान पालना करने वाले (चिद) और (जरितारः) स्तुति- कर्ता जन (विश्वा) समस्त (वामा) प्रशंसा करने योग्य पदार्थों की (प्रसन्वन्) याचना करते हैं (त्वे, ह) आपके होते (सुदुधाः) सुन्दर काम पूरने वाली (गाव:) गौए हैं उनको मांगते हैं (त्वे, हि) पाप ही के होते (अश्वाः) जो बड़े-बड़े घोड़े हैं उनको मांगते हैं जो आप (देवयते) कामना करने वाले के लिये (वनिष्ठः) अतीव पदार्थों को अलग करने वाले होते हुए (वसु) धन देते हैं सो (त्वम्) आप सब को सेवा करने योग्य हैं ॥१॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलु -यदि राजा सूर्य के समान विद्या और न्याय का प्रकाशक हो तो सम्पूर्ण राज्य कामना से अलङ्कृत होकर राजा को पूर्ण कामना वाला करे तथा धार्मिक जन धर्म का प्राचरण करें और अधार्मिक जन भी पापाचरण को छोड़ धर्मात्मा होवें ॥१॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। राजेव हि जनिभिः क्षेष्येवाव धुभिरभि विदुष्कविः सन् । पिशा गिरो मघवन् गोभिरसस्त्वायता शिंशीहि राये अस्मान् ॥२॥ Immuanswara N ऋग्वेदः मं०७ । सू० १८ ॥ dents म 48 पदार्थ:-हे (मघवन्) ऐश्वर्यवान् विद्वान् जो आप (जनिभिः) उत्पन्न हुई प्रजाओं से (राजेव) जैसे राजा वैसे (गोभिः) धेनु और (अश्वैः) घोड़ों से (राये) धन के लिये (स्वायत:) तुम्हारी कामना करते हुए (अस्मान्) हम लोगों को (शिशीहि) तेज बुद्धि वाले करो। जो (विदुः) विद्वान् (कविः) कविताई करने में चतुर (सन्) होते हुए (पिशा) रूप से (गिरः) वारिणयों को तीक्ष्ण करो (धभिः) दिनों से (हि) ही (अभि, प्रव, क्षेषि) सब ओर से निरन्तर निवास करते हो (एव) उन्हीं आपको हम लोग निरन्तर उत्साहित करें ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जैसे सूर्य सब पदार्थों के साथ प्रकाशित होता है वैसे जो राजा प्रकाशमान हो और जो हम लोगों को सत्य के चाहने वालों को प्रसन्न करता है वह भी सदा प्रसन्न हो ॥२॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इमा उ त्वा पस्पृधानासो अत्र मन्द्रा गिरों देवयन्तीरुप स्थुः । अर्वाची ते पथ्यो राय एंतु स्याम ते सुमताविन्द्र शर्मन् ॥३॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त राजन् जिन (त्या) आपको (पस्पृधानासः) स्पर्धा करते अर्थात् अति चाहना से चाहते हुए (इमाः) यह प्रजाजन और (देवयन्तीः) विद्वानों की कामना करती हुई (मन्द्राः) प्रानन्द देने वाली (गिरः) वाणियां (उप, स्थः) उपस्थित हों और (ते) आपकी (अर्वाची) नवीन (पथ्या) मार्ग में उत्तम नीति (रायः) धनों को (एतु) प्राप्त हो उन (ते) आपके (अ.प्र) इस सुमतौ) श्रेष्ठमति और (शमन्) घर में (उ) भी हम लोग सम्मत (स्याम) हो ॥३॥ भावार्थ:- हे राजन् ! यदि आप सर्वविद्यायुक्त, सुशिक्षित, मधुर, श्लक्ष्ण, सत्यवाणियों को धारण करो तो तुम्हारी नीति सब को पथ्य हो सब प्रजाजन अनुरागयुक्त होवें ॥३॥ राजा सर्वसम्मति से राजशासन करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। धेनु न त्वा सूयवसे दुर्युक्षन्नुप ब्रह्मांणि ससृजे वसिष्ठः । स्वामिन्मे गोपति विश्व आहा न इन्द्रः सुमतिं गन्त्वच्छं ॥४॥ पदार्थ:-हे राजन् ! जो (वसिष्ठः) अताव धन (सूयवसे) सुन्दर भक्षण करने योग्य धास के निमित्त (धेनुम्) गौ को (न) जैसे वैसे (त्या) तुम्हें (दुदृक्षन्) कामों से परिपूर्ण करता हुआ (ब्रह्माणि) बहुत अन्न वा धनों को (उप, ससृजे) सिद्ध करता है (मे) मेरी (गोपतिम्) इन्द्रियों की पालना करने वाले (स्वाम) तुम्हें - ७६८ ऋग्वेदः मं० ७ । सू०१८ ॥ - (विश्वः) सब जन जो (पाह) कहे (इव) उसी (न:) हमारी (सुमतिम्) सुन्दर मति को (इन्द्रः) परमैश्वर्य युक्त राजा आप (अच्छ, श्रा, गन्त) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-यदि आप हम लोगों को विद्वानों की संमति में वर्तकर राज्य शासन करें वा जो कोई प्रजा जन स्वकीय सुख दुःख प्रकाश करने वाले वचन को सुनावै उस सब को सुनकर यथावत् समाधान दें तो आप को सब हम लोग गो दूध से जैसे वैसे राज्यैश्वर्य से उन्नत करें॥४॥ फिर राजा किसके तुल्य क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अाँसि चित्पप्रथाना सुदास इन्द्रो गाधान्यकृणोत्सुपारा । शर्धन्तं शिम्युमुचथस्य नव्या शापं (सन्धूनामकृणोदशस्तीः ॥५॥ पदार्थ:-हे राजा (नव्यः) नवीनों में प्रसिद्ध आप (इन्द्रः) सूर्य वा बिजुली (चित्) के समान (सुदासे) सुन्दर देने योग्य व्यवहार में (पप्रथाना) विस्तीर्ण (अर्गासि) जल जो (गाधानि) परिमित हैं उनको (सपारा) सुन्दरता से पार जाने योग्य (अकृणोत्) करते हैं (सिन्धूनाम्) नदियों को (प्रशस्ती:) अप्रशंसित जलरहित (अकृणोत्) करते हैं (उचथस्य) कहने योग्य (शद्धन्तम्) बल' करते हुए (शिम्युम्) अपने को कर्म की कामना करने वाले' [के] प्रति (शापम्) शाप अर्थात् जिससे दण्ड देते हैं ऐसे काम को करें |शा. भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे राजा ! जैसे सूर्य वा बिजुली समुद्रस्थ जलों को सुख से पार जाने योग्य करता है वैसे ही व्यवहारों को भी परिमाणयुक्त और सुगम कर दुष्टों का नाश और श्रेष्ठों का सन्मान कर दुष्टों की अधर्म-क्रियाओं को निन्दित आप सदा करें ॥५॥ फिर राजा किनका सत्कार करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । पुरोळा इत्तर्वशो यक्षरासीद्राये मत्स्यासो निर्षिता अपीच । श्रुष्टिं चक्रु गवो द्रुह्यश्च सखा सखायमतरद्विषूचोः ॥६॥ पदार्थ:-हे राजा (राये) धन के लिये जो (तुर्वशः) शीघ्र वश करने और (पुरोडाः) आगे जाने (यक्षः) दूमरों से मिलने वाला (इद) ही (प्रासीत) है वा (च) और जो (मत्स्यासः) समुद्रों में स्थिर मछलियों के समान (मपीव) प्रतीव ग्वेदः मं०७ । सू० १६ ॥ । buse Sam (निशिताः) निरन्तर तीक्ष्णस्वभावयुक्त (भृगवः) परिपक्व ज्ञान वाले (ब्रह्मवः) दुष्टों की निन्दा करने वाले (च) भी (श्रुष्टिम्) शीघ्रता (चक्र:) करते हैं जो (सखा) मित्र (विषूचोः) विद्या और धर्म का सुन्दर शील जिनमें विद्यमान उनके (सखायम्) मित्र को (प्रतरत्) तरता है उन सबों का आप सदा सत्कार करो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे राजन् ! जो सब शुभ कम्मों में पागे, अच्छे प्रकार सिद्धि की उन्नति करने वाले, बड़े मगरमच्छों के समान गम्भीर प्राशय वाले, शीघ्रकारी, एक-दूसरे में मित्रता रखने वाले हों उन अतीव बुद्धिमानों का सत्कार कर राज्यकार्यों में नियुक्त करो।।६।। फिर राजजन कैसे श्रेष्ठ हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ पक्थासौ भलानसा मनन्तालिनासो विषाणिनः शिवासः । आ योऽनयत्सधमा आर्यस्य गव्या तृत्सुभ्यो अजगन्युधा नृन् ।।७।। पदार्थः-है राजा जो (पक्थास:) पाकविद्या में कुशल (भलानस:) सब ओर से कहने योग्य (अलिनासः) जिनकी सुभूषित नासिका (विषाणिनः) जिनके सींग के समान तीक्षण नख विद्यमान (शिवासः) और जो मङ्गलकारी आपको (मा, अनन्त) अच्छे प्रकार उपदेश करें (तृत्सृभ्यः) हिंसकों से युधा) युद्ध से (नन्) मनुष्यों को (मा, अजगन्) प्राप्त हों (:) जो (सधमाः) समान स्थान में मानले हुए (प्रार्यस्य) उत्तम जन के (गव्या) उत्तम वाणी में प्रसिद्ध हुओं को (मानयत्) अच्छे प्रकार पहुंचाता है उन सब की आप उत्तमता से रक्षा करो ॥७॥ भावार्थ:-हे राजा जो तपस्वी पुरुषार्थी वक्ता जन उत्तम रूप वाले मङ्गल जिनके आचरण युद्ध विद्या में कुशल आर्यजन आपको जिस जिस का उपदेश दें उस उस को अप्रमत्त होते हुए सदा ठानो अर्थात् सर्वदैव उसका भाचरण करो ॥७॥ कौन इस लोक में भाग्यहीन होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। दुराध्यो३' अदिति स्नेवयन्तोऽचेतसो वि जंगृध्र परुष्णीम् । महाविध्यवघृथिवीं पत्यमानः पशुष्कविरंशयच्चायमानाः ॥८॥ पदार्थ:-जैसे (मह्ना) बड़प्पन से (पत्यमानः) पति के समान आचरण करता (चायमानः) वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (कविः) प्रत्येक काम में आक्रमण करने वाली बुद्धि जिसको वह (पशुः) गो प्रादि पशु (प्रशयद) सोता है (परुष्णीम) पालने वाली (पृथिवीम्) भूमि को (अविस्मक) विविध प्रकार से आक्रमण करता है वैसे जो (अचेतसः) निर्बुद्धि (राध्यः) दुष्टबुद्धि पुरुष (अदितिम्) उत्पत्ति काम ORENTIN ७७० ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १८ ॥ को (नवयन्तः) सेवते हुए (वि, जगृ) विशेषता से लेते हैं वे वर्तमान हैं ऐसा जानो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! वे ही इस संसार में पशु के तुल्य पामर जन हैं जो स्त्री में आसक्त हैं ।।। फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। ईयुरथ न न्यर्थ परुष्णीमाशुश्चनेदभिपित्वं जगाम । सुदास इन्द्रः सुतुकाँ अमित्रानरन्धयन्मनुषे वधिवाचः ॥९॥ पदार्थ:-जैसे (सुदास:) सुन्दर दान जिसके विद्यमान वह (इन्द्रः) परमैश्वर्य- वान् (अर्थम्) द्रव्य के (न) समान (भ्यर्थम्) निश्चित अर्थ वाले को (प्राशुः) शीघ्र- कारी होता हुआ (परुष्णीम्) पालना करने वाली नीति को (चन) भी (अभिपित्यम्) और प्राप्त होने योग्य पदार्थ को (जगाम) प्राप्त होता है (ममित्रान्) मित्रतारहित अर्थात् शत्रुओं को (अरन्धयत्) नष्ट करे और (मानुषे) मनुष्यों के इस संग्राम में (बध्रिवाचः) जिनकी वृद्धि देने वाली वाणी वे (सुतुकान्) सुन्दर जिनके सन्तान हैं उनकी रक्षा करते हैं वैसे और भी मनुष्य (इत्) उसको (ईयुः) प्राप्त हो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है - हे राजजनो ! जैसे न्यायाधीश राजा न्याय से प्राप्त पदार्थ को लेता और अन्याय से उत्पन्न हुए पदार्थ को छोड़ता तथा श्रेष्ठों की सम्यक् रक्षा कर दुष्टों को दण्ड देता है वही उत्तम होता है ।।६।। फिर जीव अपने अपने किये हुए कर्म के फल को प्राप्त होते [ही] हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ईयुर्गावो न यवसादगीपा यथाकृतमभि मित्रं चितासः । पृश्निगावः पृश्निनिप्रेषितासः श्रुष्टिं चक्रनियुतो रन्तयश्च ॥१०॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (यवसात) भक्षण करने योग्य घास आदि से (अगोपाः) जिनकी रक्षा विद्यमान नहीं वे (गाव:) गौयें (न) जैसे वा जैसे (अभिमित्रम्) सन्मुख [=सम्मुख] मित्र वैसे (चितासः) संचय' अर्थात् संचित पदार्थों से युक्त जीव (यथाकृतम्) जैसे किया कर्म वैसे उसके फल को (ईयुः) प्राप्त हों वा पहुंचे वा जैसे (पृश्निगाव:) अन्तरिक्ष के तुल्य किरणों से युक्त (पृश्निनिप्रेषितास:) अन्तरिक्ष में निरन्तर प्रेषित किये हुए (नियुतः) निश्चित गति वाले वायु और (रन्तयः) जिनमें रमते हैं वे वायु (च) (अष्टिम्) शीघ्रता (चक्र :) करते हैं वे वैसा ही फल पाते हैं ॥१०॥ JH- 200MAA ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १८ ।। ७७१ E GMAIN , भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे चरवाहों से रहित गौयें अपने बछड़ों को और वायु अन्तरिक्षस्थ किरणों को और मित्र मित्र को प्राप्त होता है वैसे ही अपने किये हुए शुभ अशुभ कर्मों को जीव ईश्वरव्यवस्था से प्राप्त होते हैं ॥१०॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एक च यो विशतिं च श्रवस्या वैकर्णयोजनावाजा न्यस्तः । दस्मो न समन्नि शिशाति बहिः शुरः सर्गमकृणोदिन्द्र एषाम् ।।११।। पदार्थ:-हे. मनुष्यो (यः) जो (दस्मः) दुःख के विनाश करने वाले के (न) समान (वैकर्णयोः) विविध प्रकार के कानों में उत्पन्न हुए ध्यवहारों का (नि, अस्तः) निरन्तर प्रक्षेपण करने अर्थात् औरों के कानों में डालने वाला (राजा) विराजमान (जनान्) मनुष्यों को (समन्) जिसमें बैठते हैं उस घर में (निशिशाति) निरन्तर तीक्षण करता है और (विशतिम्, च, एकम्, च) बीस और एक भी अर्थात् इक्कीस (श्रवस्या) अन्न में उत्तम गुण देने वालों को (अकृणोद) सिद्ध करता है वह (एषाम्) इन वीर मनुष्यों के बीच (इन्द्रः) सूर्य (बहिः) अच्छे प्रकार बढ़े हुए (सर्गम् । जल को जैसे वैसे (शुरः) निर्भय शत्रुओं को जीतता है ॥११॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार है। जो राजा मनुष्यों को पुत्र के समान पालता, अहिंसक के समान सब को मानन्दित कराता और सूर्य के समान न्याय विद्या और बलों को प्रकाशित कर शत्रुओं को जीतता है वही सब सुखों को प्राप्त होता है ॥११॥ फिर राजा अमात्य और प्रजा पुरुष परस्पर कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अर्ध श्रुतं कवर्षे वृद्धमप्स्वर्नु द्रा नि gणग्वज्रबाहुः । वृणाना अत्र सख्याय सख्यं त्वायन्तो ये अमंदन्ननु त्वा ॥१२॥ पदार्थ:-हे राजन् ! (ये) जो (अत्र) यहाँ (सख्याय) मित्रता के लिये (सख्यम्) मित्रपन को (वणानाः) स्वीकार करते और (त्वायन्तः) तुम्हारी चाह करते हुए धार्मिक विद्वान् पुरुष (त्या) तुमको (मनु, अमदन्) आनन्दित करते हैं (प्रथ) इसके अनन्तर उनसे जिस कारण (श्रु तम्) सुना इस कारण उनमें से (कवषम्) उपदेश करने वाले (बुद्धम्) अवस्था और विद्या से अधिक को और (ब्रह्म म्) दुष्टों से द्रोह करने वाले को जो (वज्रबाहुः) शस्त्रों को हाथों में रखने Mera m R तामि) उत्पन्न किये वे (गव्यवः) अपने को भूमि चाहते ७७२ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १८ ।। वाला (निवणक) निरन्तर विवेक से स्वीकार करता और (अप्सु) जलों में (अनु) अनुकूलता से स्वीकार करता है उन सबको वा उसको सब सत्कार करें ॥१२॥ भावार्थ:-हे राजा ! जो आपके अनुकूल वर्तमान हैं और जिनके अनुकूल आप हैं वे सब मित्र मित्र होकर न्याय से प्रजाओं का पुत्र के समान पालन कर आनन्द भोगें ॥१२॥ फिर वे राजा आदि कैसा बल करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। वि सद्यो विश्वां दंहितान्येषामिन्द्रः पुरः सहसा सप्त दर्दः । व्यानवस्य तृत्सवे गये भाग्जेष्म पूरुं विदथै मृधवांचम् ।।१३।। पदार्थ:-जैसे (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (सहसा) बल से (एषाम्) इन शत्रुनों के (सप्त) सातों (पुरः) पुरों को (वि, दर्दः) विशेषता से छिन्न भिन्न करता वा (मानवस्य) सब ओर से नवीन के (गयम्) प्रजा वा घर को (वि, भाक) विशेषता से सेवता है तथा (पूरुम्) पूरण बुद्धि वाले मनुष्य को और (विदथे) संग्राम में (मध्रवाचम्) हिंसा करने वाली जिसकी वाणी और (तृत्सवे) दुसरे हिंसक के लिये सन्मुख [=सम्मुख] विद्यमान है उसको हम लोग (जेष्म) जीतें जिससे हमारी (सद्यः) शीघ्र (विश्वा, हितानि) समस्त सेना के जन वृद्धि -- उन्नति को प्राप्त हों ॥१३॥ भावार्थ:-जो धार्मिक अपने प्रधानों से सहित वा राज्य कार्यों में शूरवीर पुरुष अपने से सतगुने अधिक भी दुष्ट शत्रुओं को जीत सकते हैं वे प्रजा पालने को योग्य होते हैं ॥१३॥ राजादि मनुष्यों से कितना बल बढ़वाना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। नि गव्यवोऽनवी द्रवंश्च षष्टिः शता सुषुपुः षट् सहस्रा । पष्टिवीरासो अधि षट् दुवायु विश्वेदिन्द्रस्य वीयाँ कृतानि ।।१४॥ पदार्थ:-जिन्होंने (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य युक्त राजा के (विश्वा) समस्त (इव) (बृह्मवः) और दुष्ट अधर्मी जनों को मारने की इच्छा करते हुए (अनवः, षष्टिः, वीरासः) साठ वीर अर्थात् शरीर और प्रात्मा के बल और शूरता से युक्त मनुष्य (षट् सहस्त्रा) छः सहस्र शत्रुओं को (अधि) अधिकता से जीतते हैं वे (च) भी (षट्, षष्टिः, शता) छयासठ सैंकड़े शत्रु (दुवोयु) जो सेवन की कामना करता है उसके लिये (निसुषपुः) निरन्तर सोते हैं ॥१४॥ - ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १८ ॥ ७७३ म MAM भावार्थ:-जहां राजा और प्रजा सेनाओं में प्रजा और सेना बिजुली के समान पूर्ण बल और पराक्रमयुक्त सेना को बढ़वाते हैं वहां साठि [=साठ] योद्धा छः हजार शत्रुओं को भी जीत सकते हैं ॥१४॥ किस के साथ कौन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। इन्द्रेणैते तत्सदो वेविषाणा आपो न सृष्टा अधवन्त नीचीः । दुमित्रासः प्रकलविन्मिाना जहुविश्वानि भोजना सुदासे ॥१५॥ पदार्थ:-जो (एते) ये (इन्द्रेण) परमैश्वर्ययुक्त राजा के साथ (तृत्सवः) शत्रुओं को मारने वाले (वेविषाणाः) शत्रुओं के बलों को व्याप्त होते हुए (प्रापः) जलों के (न) समान (सृष्टाः) शत्रुओं पर नियम से रक्खे और (विश्वानि) समस्त (भोजना) भोजनों को (मिमाना:) उत्पन्न करते हुए जो (दुमित्रासः) दुष्ट मित्रों वाले हों उनकी जो सेना हैं वे (नीचीः) नीचे जाती और (अधयन्त) कम्पती हैं उन पर जो शस्त्र अस्त्रों को (जहुः) छोड़ते हैं और जो परमैश्वर्ययुक्त राजा (सुवासे) श्रेष्ठ देने वाले के निमित्त (प्रकलवित) अच्छे प्रकार संख्या का जानने वाला है वे सब विजयभागी होते हैं ॥१॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालंकार है-जिनकी समुद्र की तरङ्गों के समान, उत्साहयुक्त, बलिष्ठ सेना हों वे शत्रुषों की सेनाओं को नीचे गिरा शीघ्र उन्हें जीत सकते हैं ॥१५॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अर्द्ध वीरस्य शृतपामनिन्द्रं परा शर्धन्तं नुनुदे अभि क्षाम् । इन्द्रों मन्यु मन्युभ्यो मिमाय भेजे पथो वर्तनि पल्यमानः ॥१६॥ पदार्थ:---जो (क्षाम्) भूमि को (पत्यमानः) पति के समान माचरण करता हुआ (इन्द्रः) ऐश्वयंयुक्त शत्रुओं को विदीर्ण करने वाला (वीरस्य) शुभ गुणों में व्याप्त राजा (Vतपाम) पके हुए दूध को पीने वा (श्रद्धम्) बढ़ाने वा (शद्धन्तम्) बल करने वाले सेनापति को पाकर (अनिन्द्रम्) अनैश्वर्यं को (पराणुनुदे) दूर करता है वा जो (मन्युभ्यः) क्रोध' को नष्ट करने वाला शत्रुओं पर (मन्युम्) क्रोध को (अभि) सन्मुख [-सम्मुख] से (मिमाय) मानता (पथः) वा मार्गों को और (वर्तनिम्) जिसमें वर्तमान होते हैं उस न्याय-मार्ग को (भेजे) सेवता है वही राजजनों में श्रेष्ठ और राजराजेश्वर होता है ॥१६॥ भावाथः--जो राजा वीर जनों की बल वृद्धि करके दुष्टों पर क्रोध , ७७४ ऋग्वेदः मं०७ । सू० १० ।। - करता और धार्मिकों पर आनन्ददृष्टि हो तथा न्याययुक्त मार्ग का अनुगामी होता हुआ ऐश्वर्य को पैदा करता है वही सर्वदा वृद्धि को प्राप्त होता है ।।१६॥ कौन शत्रुओं के जीतने में योग्य होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आधेण चित्तद्वेक चकार सिंा चित्पत्वेना जघान । अब सक्तीवेश्यावृश्चदिन्द्रः प्रायच्छद्विश्वा भोजना सुदासें ॥१७॥ पदार्थः- जो (इन्द्रः) दुष्टों के समूह को विदारने वाला (लक्तीः) रची सेनाओं को (वेश्या) सूचना से (प्रवृश्चत) छिन्न भिन्न करता (अाघ्रण) सब भोर से धारण किये विषय से (चित्) ही (तत्) उस (एकम्, उ) एक को (चकार) सिद्ध करता (सिंहाम्) सिंहों में उत्पन्न हुए बल के समान (चित्) ही (पेत्वेन) पहुंचाने से (अव, जघान) शत्रुओं को मारता और (विश्वा) समस्त (भोजना) अन्नादि पदार्थों को (प्रायच्छव) देता है उस (सुदासे) अच्छे . देने वाले के होते वीरजन कैसे नहीं शत्रुओं को जीतें ॥१७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो वीर जन सिंह के समान पराक्रम कर शत्रुओं को मारते हैं और भूगोल में एक अखण्डित राज्य करने को अच्छा यत्न करते हैं, वे समग्न बल को विधान कर और वीरों का सत्कार कर बुद्धिमानों से राज्य की शिक्षा दिलाने को प्रवृत्त हों ॥१७॥ मनुष्यों को सदा शत्रुपन से युक्त निवारने योग्य हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। शवन्तो हि शत्रवो रारधुष्टं भेदस्य चिच्छर्धतो विन्द रन्धिम् । मी एनः स्तुवतो यः कृणोति तिग्मं तस्मिन्नि जहि वज्रमिन्द्र ॥१८॥ पदार्थ:-है (इन्द्र) शत्रुओं को विदीर्ण करने वाले ! जो (हि) निश्चय से (शश्वन्तः) निरन्तर (शत्रवः) शत्रु जन हैं (ते) वे (स्तुवतः) स्तुति करते हुए (मान्) मनुष्यों को (रारधः) मारते हैं जो (भेदस्य, शद्धतः) बलवान् भेद के (रन्धिम्) वश करने को (चित्) ही (विन्द) प्राप्त हों (यः) जो (एनः) पहुंचाने वाला हिंसा (कृणोति) करता है (तस्मिन्) उसके और उन पिछलों के निमित्त भी (तिग्मम्) तीव्र गुण कर्म स्वभाव वाले (वनम्) शस्त्र और अस्त्र को (नि, जहि) निरन्तर छोड़ो॥१८ भावार्थ:-हे राजा आदि धार्मिक जनो! जो सर्वदा शत्रुभावयुक्त asan , ऋग्वेद: मं०७ । सू०१८॥ Raye और धार्मिक जनों को नष्ट करते हुए विद्यमान हैं उनको शीघ्र मारो जिससे सब जगह सबके अभय और सुख बढ़ें ॥१८॥ जो मनुष्य परस्पर की रक्षा कर न्याय से राज्य को पालते हैं वे ही शिर के समान उत्तम होते हैं । आवदिन्द्र यमुना तृत्सवश्च प्रात्रं भेदं सर्वतांता मुषायत् । अजासश्च शिवो यक्षवश्च बलिं शीर्षाणि जभ्ररश्यानि ॥१९॥ पदार्थः- जो (प्रजास:) शस्त्र और अस्त्रों के छोड़ने (शिग्रवः) सांकेतिक बोली बोलने (यक्षवश्च) और संग करने वा (यमुना) नियम करने (तृत्सवश्च) और मारने वाले जन (अत्र) इस सर्वताता) राज्यपालनरूपी यज्ञ में (बलिम्) भोगने योग्य पदार्थ को और (अश्व्यानि) बड़ों के इन (शीर्षारिण) शिरों को (जन :) धारण करते हैं (च) और जो (भेदम्) विदीर्ण करने वा एक एक से तोड़ फोड़ करने को (प्र, मुषायत्) चुराता छिपाता है वा जो (इन्द्रम् ) परमैश्वर्यवान् की (आवत्) रक्षा करे वे सब श्रेष्ठ हैं ॥१९॥ भावार्थ:-जो राजा आदि जन, सब मनुष्यों को अभयरूपी दक्षिणा जिस के बीच विद्यमान है ऐसे राज्यपालनरूपी यज्ञ में भेदबुद्धि को छोड़, महान् धार्मिक उत्तम जनों के एक मति आदि उत्तम कामों को स्वीकार कर शत्रुओं के जीतने को प्रवृत्त होते हैं वे ही परमैश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥१६॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न त इन्द्र सुमतयो न राय: संचक्षे पूर्वी उषसो न नूत्नाः। देवकं चिन्मान्यमानं जघन्थाव त्मना बृहतः शम्बरं भेत् ॥२०॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सुख देने वाले (ते) आपके (पूर्वाः) पहिली और (नूत्नाः) नवीन (उषसः) उषा वेलाओं के (न) समान वा (सुमतयः) उत्तम बुद्धिमानों के (न) समान (रायः) धनों को (संवक्षे) अच्छे प्रकार कहने को कोई भी (न) नहीं (जघन्थ) मारता है वा जैसे सूर्य (बृहतः) बड़े से बड़े (शम्बरम्) मेघ दल को (मेत) विदीर्ण करता वैसे जिसे (मना) अपने से आप (अव) नष्ट करते हैं । चित) उसके समान (मान्यमानम्) मान्यों का सत्कार जिसमें है उस (देवकम्) देव समान वर्तमान का सत्कार करें तो प्रजा सब ओर से बढ़ें ॥२०॥ :-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे राजन् ! जैसे पिछली Mom Ma ७७६ ऋग्वेद: मं०७ । सू० १८ ॥ और नई होने वाली प्रभात वेला सर्वथा मंगल करने वाली हैं वैसे यदि न्याय से इकट्ठे किये हुए धन से धार्मिक और उत्तम बुद्धिवाले जनों का सत्कार कर उन उक्त मनुष्यों की रक्षा कर इनसे राज्य के कार्यों को साधिये और वहां मेघ को सूर्य के समान दुष्टों को मार श्रेष्ठों को प्रसन्न रखिये तो आपकी सब अोर से वृद्धि हो ॥२०॥ फिर राजा के सहाय से प्रजाजन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्र ये गृहादममद्दुस्त्वाया पराशर शरायोतुर्वसिष्ठः । न त भोजस्य सख्यं मृषन्ताधा सूरिभ्यः मुदिना व्युच्छान् ॥२१॥ पदार्थ:--हे राजन् (ये) जो (स्वाया) तुम्हारी नीति के साथ (गृहाव) घर से (अममदुः) आनन्दित होते हैं वा (शतयातुः) जो सैकड़ों के साथ जाता है जो (वसिष्ठः) अतीव वसने वाला और जो (पराशरः) दुष्टों का हिंसक मानन्दित होता है (ते) वे (भोजस्य) भोगने और पालन करने की (सख्यम्) मित्रता को (न) नहीं (प्र, भूषन्त) सहते हैं (अध) इसके अनन्तर जो (सूरिभ्यः) विद्वानों से (सुदिना सुखयुक्त दिनों में (युच्छान्) निरन्तर बसें वे तुमको सदा सत्कार करने योग्य हैं ॥२१॥ भावार्थ:-जिसकी विद्या, विनय और सुशीलता से सब गृहस्थ आदि मनुष्य आनन्दित हों और जो औरों का उत्कर्ष देखकर पीड़ित होते हैं और जो विद्वानों से सर्वदैव सुन्दर शिक्षा लेते हैं वे सब सुख पाते हैं ॥२१॥ फिर वह राजा किसके तुल्य क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। द्वे नप्तुर्देववतः शते गोर्दा रथा बधमता सुदासः । अहंन्नग्ने पैजवनस्थ दानं होतेच सझ पर्येमि रेमन् ।।२२।। पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वान् जैसे (महन्) सत्कार करता हुआ (सदासः) उत्तम दानशील मैं (दानम्) दान (होतेथ) देने वाले के समान (सा) धर को वा (पैजयनस्य) वेगवान् (नप्तः) पौत्र के स्थान को (पर्येमि) सब ओर से जाता हूं और (देववतः) प्रशंसित गुण वाले विद्वानों से युक्त की (गोः) धेनु वा भूमिसम्बन्धी (a) दो (शते) सौ (वधूमन्ता) प्रशंसायुक्त' वधू वाले (द्वा) दो (रथा) जल स्थल में जाने वाले रथों को सब ओर से प्राप्त होता हूं वा जैसे विद्वान् जन (रेभन्) स्तुति करते हैं उनको सब सोर से जाता हूं वैसे आप हूजिये ॥२२॥ OM HOM hi ROO Now diwan ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १८ ॥ ७७७ MAR मा Munita भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-हे मनुष्यो जैसे देने वाले उत्तम दान देते और पौत्र पर्यन्त धन धान्य और पशु आदि की समृद्धि करते हैं वैसे सब को वर्तना चाहिये ॥२२॥ फिर वे राजा आदि क्या अनुष्ठान करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । चत्वारों या पैजवनस्य दानाः स्मद्दिष्टयः कृशनिनो निरेके । ऋज्रासो मा पृथिविष्ठाः सुदासंस्तोक तोकाय श्रबसे वहन्ति ।।२३।। पदार्थ:-- हे राजा (पैजवनस्य) क्षमाशील रखने वाले के पुत्र अापके जैसे अत्यारः) चार ऋत्विज् (दाना:) देनेवाले (स्मद्दिष्टयः) जिनके निश्चित दर्शन (कृशनिनः) वा बहुत हिरण्य विद्यमान (ऋजासः) जो सरल स्वभाव (पृथिविष्ठाः) पृथिवी पर स्थित रहते हैं वे विद्वान् जन (निरेके) निःशङ्क राज्यव्यवहार में (मा) मुझे विधान करते हैं, स्थिर करते हैं (श्रयसे) विद्या सुनने के लिये और (तोकाय) सन्तान के अर्थ (तोकम्, मा) मुझ सन्तान को (वहन्ति) पहुँचाते हैं वैसे उनके प्रति आप (सुदासः) सुन्दर दानशील हूजिये ॥२३॥ भावार्थ:- इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! वेद- वेत्ता ऋत्विज्' ब्राह्मण राजसहाय से यज्ञानुष्ठान से सब का निश्चित सुख बढ़ाते हैं और जैसे ब्रह्मचारी सन्तान के लिए ब्रह्मचर्य से पहिले विद्या पढ़ने के लिये विवाह कर सन्तान उत्पन्न करते हैं वैसे राजजन और राज- पुरुष सब के हित के लिये ब्रह्मचर्य से विद्या ग्रहण कराकर सब के सुख की उन्नति करें।॥२३॥ फिर वे राजा आदि किसके तुल्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यस्य श्रवो रोदसी अन्तर्वी शीणे शीष्णे विवमाजा विभक्ता। सप्तेदिन्द्रं न स्रवतो गृणन्ति नि युध्यामधिशिशादमोके ॥२४॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! (यस्य) जिसका (श्रवः) अन्न वा श्रवण (उ!) बहु- फलादि पदार्थों से युक्त (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी को (शोधणे शोधणे) शिर के तुल्य उत्तम सुख के लिए (अन्तः) बीच में (विबभाज) विशेषता से भेजता है जिन (इन्तम्) इन्द्र के (न) समान (सप्त) सात प्रकार से (विभक्ता) विभाग को प्राप्त हुई [ = हुए] आकाश और पृथिवी, सुखों को (इत) ही (स्वतः) पहुंचाते हैं जिनकी सब विद्वान् जन (गृणन्ति) प्रशंसा करते हैं उनकी विद्या से जो राजा (अभीके) समीप में (युध्यामधिम्) युद्धरूपी रोग को धारण करते शत्रु को (नि, अशिशात्) निरन्तर छेद वही राज्य-शिक्षा देने के योग्य हो ॥२४॥ 4 JAPAN RINA ७७८ ऋग्वेदः मं०७। सू०१६ ॥ - भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-यदि राजादि पुरुष धर्मयुक्त न्याय में वर्त कर राज्य को उत्तम शिक्षा दिलावें तो सूर्य के समान प्रजाओं में उत्तम सुखों की उन्नति कर सकते हैं और शत्रुओं को निवार [-निवारण कर] सुख देने वाले सपीपस्थ जनों का सत्कार करना जानते हैं ॥२४॥ फिर मनुष्य कैसे राजा का अच्छे प्रकार आश्रय करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इमं नरो मरुतः सश्चतानु दिवोदासं न पितर सुदासः । अविष्टना पैजवनस्य के दूणा क्षत्रमजर दुबोयु ॥२५॥ पदार्थ:-हे (नरः) नायक (मरुतः) मनुष्यो ! जो (सुवासः) उत्तम दान देने वाला हो (इमम्) उस (दिवोदासम्) विद्याप्रकाश देने वाले को (पितरम्) पालने वाले पिता के (न) समान तुम लोग (सश्चत) मिलो, सम्बन्ध करो और (पंजवनस्य) क्षमा शील है जिसका उससे उत्पन्न हुए पुत्र के (दूणाशम्) दुःख से नाश करने योग्य पदार्थ वा दुर्लभ विनाश (केतम्) उत्तम बुद्धि और (अजरम्) विनाश रहित (वायु) सेवन करने के लिए मनोहर (क्षत्रम) राज्य वा धन को (अनु, प्रविष्टन) व्याप्त होमो ॥२॥ :-इस मन्त्र में उपमालंकार है-यदि मनुष्य बिद्यादि शुभ गुणों के देने वाले, पिता के समान [पालक] राजा का आश्रय करें तो पूर्ण प्रज्ञा प्रविनाशि सेवने योग्य ऐश्वर्य और राज्य को स्थिर कर सकें ॥२५॥ इस सूक्त में इन्द्र, राजा, प्रजा, मित्र, धार्मिक, अमात्य, शत्रुनिवारण तथा धार्मिक सत्कार के अर्थ का प्रतिपादन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये।। यह सप्तम मण्डल में अठारहवां सूक्त समाप्त हुआ। - " अथकादशस्यकोनविंशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देखता। ११.५ त्रिष्टुप् । ३ । ६ निचत्रिष्टप् । ७ । ६।१० विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । घेवतः स्वरः। २ निवृत्पङ्क्तिः। ४ पङ्क्तिः ।। ११ भुरिक पक्तिश्छन्दः । अब ग्यारह ऋचा वाले उन्नीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कैसा राजा उत्तम होता है इस विषय को कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ७ । सू०१६ ॥ ७७8 ARDAS NGO यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम एकः कृष्टीश्च्याचयति प्र विश्वाः । यः शश्वतो अदाशुषो गर्यस्य प्रयन्तासि मुवितराय वेदः॥१॥ पवार्थ:-हे राजन् (यः) जो कल्याण करने वाला जन (तिग्मशृङ्गः) तीक्ष्ण किरणों से युक्त (वृषः) वर्षा तथा (भीमः) भय करने वाले सूर्य के (न) समान (एक:) अकेला (विश्वाः) समग्र प्रजा (कृष्टी:) मनुष्यों को (प्र, च्यावयति) अच्छे प्रकार चलाता है और (य:) जो (शश्वत:) निरन्तर (श्रवाशुषः) न देनेवाले के (गयस्य) संतान के (सुध्विराय) सुन्दर प्रतीव ऐश्वर्य को निकालने वाले के लिये (वेबः) विज्ञान वा धन को करता है उसके जिससे तुम (प्रयन्ता) उत्तमता से नियम करने वाले (असि) हो इससे अधिक मानने योग्य हो ॥१॥ भावार्थः-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य वा बिजुली वर्षा करने से सुख देने वाली और तीव्र ताप से वा पड़जाने से भयंकर है वैसे जो राजा विद्याध्ययन के लिये सन्तानों को जो नहीं देते उनके लिये दण्ड देने वाला वा ब्रह्मचर्य से सब की विद्या बढ़ाने वाला राजा हो उसी को सब स्वीकार करें॥१॥ फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। त्वं ह त्यदिन्द्र कुत्समावः शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्थे । दासं यच्छुष्णं कुर्यवं न्यस्मा अरन्धय आर्जुनेयाय शिक्षन् ॥२॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सूर्य के समान प्रतापयुक्त राजा (स्वम्) पाप सूर्य के समान (स्यत्) उस (कुत्सम्) बिजुली के तुल्य वज को दुष्टों पर प्रहार कर कल्याण करने वाली प्रजा की (माव:) पालना कीजिये (शुश्रूषमाणः) सुनने की इच्छा करने वाले श्राप (तन्या) शरीर से (समय) संग्राम में (ह) ही उत्तम सेना की रक्षा कीजिये (यत) और जिस (शुष्णम्) शुष्क करने वा (कुयवम्) कुत्सित यव आदि अन्न रखने वाले (वासम्) दाता वा सेवक को (नि, परन्धयः) नहीं मारते (अस्मै) इस' (मार्जुने- याय) सुन्दर रूपवती विदुषी के पुत्र के निमित्त (शिक्षन्) विद्या इकट्ठी कराते अविद्या को हनो ॥२॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलु०- -जो मनुष्य विद्याप्राप्ति के लिये आप्त, श्रेष्ठ, विद्वान् अध्यापकों की शुश्रूषा करते, शरीर और आत्मा के बल को विधान कर संग्राम में दुष्टों को जीतते और विद्याध्ययन से [रहित] जनों का तिरस्कार करते, विद्याभ्यास करने वालों का सत्कार करते हैं वे स्थिर राज्यैश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥ - ७८० ऋग्वेद: मं०७ । सू० १६ ॥ page ALI me AN- हे (धृष्णो) दृढ़ पुरुष (म्) अ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त्वं धृष्णो धृषता वीतहव्यं भावो विश्वाभिरूतिमि सुदासम् । प्र पौरुकुसि सदस्युमानः क्षेसाता वृत्रहत्येषु पूलम् ॥३॥ पदार्थ:- आप (धृषता) प्रगल्भ पुरुष के साथ (विश्वाभिः) समग्र (ऊतिभिः) रक्षाओं के साथ (वीतहव्यम्) पाये हुए और पाने योग्य पदार्थ वा (सदासम्) अच्छे जिसके दास जो (पौरुकुत्सिम्) बहुत शस्त्रास्त्र- विद्याओं के योग रखने वाले का पुत्र (सदस्युम्) जिससे भयभीत दस्यु होते हैं उस जन की निरन्तर (प्रायः) कामना करो और (क्षेत्रसाता) क्षेत्रों के विभाग में (वृत्रहत्त्येषु) शत्रुनों के मारनेरूप सङ ग्रामों में (धुरुम् ) पालना वा धारणा करने वाले की (प्रायः) कामना करो ॥३॥ भावार्थ:-- जो राजजन धार्मिक, दस्युओं को मारने, शस्त्र अस्त्रों के फेंकने में कुशल और विद्यादि शुभगुणों के देने वाले सज्जनों का सत्कार करते हैं वे सदा सुखी होते हैं ॥३॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। त्वं नृभिर्नेमणो देववीतौ भूरीणि वृत्रा हर्यश्व इंसि ! त्वं नि दस्युं चुरि धुनि चास्वाययो दभीलये सुहन्तुं ।।४।। पदार्थ:---हे (हर्यश्व) मनोहर घोड़े से युक्त (नृमणः) और न्यायाधीशों में मन रखने वाले राजा (स्वम्) नाप (नृभिः) न्यायप्राप्ति कराने वाले विद्वानों के साथ (देवधीतो) विद्वानों की प्राप्ति जिस व्यवहार में होती उसमें (भूरोणि) बहुत वित्रा) शत्रुसैन्यजन वा धनों को (हसि) नाशते वा प्राप्त होते हैं (त्वम्) श्राप (धुनिम्) श्रोष्ठों को कंपाने वाले (चुमुरिम्) चोर और (दस्युम्) दुष्ट आचरण करने वाले साहसी जन को (न्य स्थापयः) मार कर सुलामो तथा (दभीतये) हिंसा के लिये (च) भी दुष्टों को श्राप (सुहन्तु) अच्छे प्रकार नाशो ॥४॥ भावार्थ:-- हे राजा! आप सदैव सत्पुरुषों का संग न्याय से राज्य को पाल के धन की इच्छा और दुष्ट डाकुओं को निवार के प्रजापालना निरन्तर करो ॥४॥ फिर राजा के सेनाजन कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। तवं च्यौत्नानि वज्रहस्त तानि नव यत्पुरॊ नवतिं च सद्यः। निवेशने शततमाऽविवेषीरहेन च वृत्रं नसुचिमुताईन् ।।५।। मा May - lease ऋग्वेद: मं० ७ । सू० १६ ॥ ७८१ . an पदार्थ:--- है (वज्रहस्त) साथ में वज्र रखनेवाले जैसे (तव) आपके (तानि) वे (च्यौनानि) बल हैं अर्थात् सूर्य (यत्) जो (नवनवतिम्) निन्यानवे (पुरः) मेघरूपी शत्रुओं की नगरी उनको (सद्यः) शीघ्र (अहन्) हनता (ख) और (निवेशने) जिसमें निवास करते हैं उस स्थान में (शततमा) अतीव सैकड़ों को (उत) और (नमु- चिम्) जो अपने रूप को नहीं छोड़ता उस (वृत्रम्) आच्छादन करने वाले मेघ को (च) भी (अहन्) मारता वैसे आप (अविवेषीः) व्याप्त हूजिये अर्थात् सेनाजनों को प्राप्त होकर शत्रुबलों को प्राप्त हूजिये ।।५।। भावार्थ:-हे राजन् ! जैसे सूर्य असंख्य मेघ की नगरियों के समान सघन घन घटाघूम बादलों को हनता है वैसे तुम्हारे सेना जन उत्तम होकर समस्त शत्रुनों को मारें ॥५॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सना ता त इन्द्र भोजनानि रातहव्याय दाशुषे सुदासे । वृष्णे ते हरी वृषणा युनज्मि व्यन्तु ब्रह्माणि पुरुशाक वाज॑म् ।।६।। पदार्थ:-हे (पुरुशाक) बहुत शक्तियुक्त (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के देने वाले राजा जो (ते) आपके (रात हव्याय) दी है देने योग्य वस्तु जिसने उस (सुदासे) सुन्दर दानशील (वृष्णे) सुखवृष्टि करने (दाशुषे) देने वाले के लिये (सना) सनातन वा विभाग करने योग्य (भोजनानि) भोजन हैं (ता) उनको मैं (युनज्मि) संयुक्त करता हूं तथा जो (ते) अापके (वृषणा) बलयुक्त अश्व (हरी) हरणशील हैं उनको संयुक्त करता हूं जिससे प्रजाजन (वाजम्) वेग और (ब्रह्माणि) धनों को (व्यन्तु) प्राप्त हों ॥६॥ भावार्थ:--हे राजजनो ! यदि आप लोग कर देने वालों की पालना न्याय से करें और शरीर से, धन से और मन से प्रजाजनों की उन्नति करें तो कुछ भी ऐश्वर्य अलभ्य न हो ॥६॥ फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मा ते अस्यां संहसावपरिष्टावधाय भूम हरिवः परादै त्रायस्व नोऽवृकेभिर्वरूथस्तव प्रियास: सूरिषु स्याम ।।७।। पदार्थ:-हे (हरिवः) प्रशंसित मनुष्य और (सहसावन्) बहुत बल से युक्त राजा (अस्याम्) इस (परिर दौ) सब ओर से संग करने योग्य वेला में (ते) आपके (परादै) त्याग करने योग्य (अधाय) पाप के लिये हम लोग (मा, भूम) मत हो ७८२ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० १६ ॥ Rile Fa (प्रवृकेभिः) और जो चोर नहीं उन (वरूथः) श्रेष्ठों के साथ (न:) हम लोगों की (बायस्थ) रक्षा कीजिये जिससे हम लोग (लव) तुम्हारे (सरिष) विद्वानों में (प्रियासः) प्रसन्न (स्याम) हो ॥७॥ भावार्थ:-हे राजा! जैसे हम लोग तुम्हारी उन्नति के निमित्त प्रयत्न करें वैसे आप भी प्रयत्न कीजिये, विद्या के प्रचार से सबको विद्वान् कराइये जिससे विरोध न हो ॥७॥ फिर मनुष्य परस्पर कैसे वत्र्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्रियास इत्ते अघवन्नमिष्टौ नरो मदेम शरणे सखायः। नि तुर्वशं नि याद शिशीह्यतिथिग्वाय शंस्य करिष्यन् ।।८।। पदार्थः- (मधवन्) बहुत धन देने वाले (सखायः) मित्र होते हुए (प्रियासः) प्रीतिमान् वा प्रसन्न हुए (नरः) नायक मनुष्य हम लोग (ते) आपके (अभिष्टौ) सब ओर से प्रिय संगति अर्थात् मेल मिलाप में (शरणे) शरणागत की पालना करने के कर्म में (मदेम) आनन्दित हों। आप (तुर्वशम्) निकटस्थ मनुष्य को (नि, शिशीहि) निरन्तर तीक्षा कीजिये और (याद्वम्) जो जाते हैं उन पर जो जाता है उसको (नि) निरन्तर तीक्ष्ण कीजिये और (अतिथिग्वाय) अतिथियों के गमन के लिये (शस्यम्) प्रशंसनीय को (इद) ही (करिष्यन्) करते हुए तीक्ष्ण कीजिये ॥८॥ भावार्थ:-हे राजा! जो शुभ गुणों के आचरण से युक्त तुम में प्रीति- मान् हों उन धार्मिक जनों को प्रशंसित कीजिये, जैसे अतिथियों का आगमन हो वैसा विधान कीजिये ॥८॥ फिर पढ़ने और पढ़ाने वाले परस्पर कैसे' बर्ताव वर्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। सद्यश्चिन्न ते मघवन्नभिष्टौ नर शंसन्त्युक्थशास उक्था । ये ते हभिर्वि पीरदाशनस्मान्वृणीष्व युज्याय तस्मै ॥९।। पदार्थ:-हे (मघवन्) प्रशंसनीय विद्या के अध्यापक जो (उक्थशासः) प्रशंसा करने योग्य मन्त्रों के प्रथों की शिक्षा देने वाले (नरः) विद्वान् जन (ते) तुम्हारी (अभिष्टौ) सब ओर से प्रिय वेला में (सधः) शीघ्र (चित्) ही (उक्या) प्रशंसित वचनों को (शंसन्ति) प्रबन्ध से कहते हैं और (ये) जो (हवेभिः) हवनों के साथ (ते) आपके (विपणीन्) व्यवहारों को (नु, अदाशन) ही देते हैं उन्हें और (अस्मान्) हम लोगों को (तस्मै) उस (युज्याय) युक्त करने योग्य व्यवहार के लिये (वणीष्व) स्वीकार कीजिये ॥६॥ mewa HOM - - ab . ऋग्वेदः मं०७ । सू० १६ ।। ७८३ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है विद्वान् अध्यापक ! तुम हम लोगों को वेदार्थ शीघ्र ग्रहण करानी जिससे हम लोग भी अध्यापन करावें ॥६॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं एते स्तोमा नरा नृतम तुभ्यमस्मद्यञ्चो ददतो मघानि । तेषामिन्द्र वृत्रहत्ये शिवो भूः सखा च शूरोऽविता च नृणाम् ॥१०॥ पवार्थ:-है (नराम्) नायक मनुष्यों के बीच (नतम) अतीव नायक (इन्द्र) परम ऐश्वर्ययुक्त राजा जो (एते) ये (अस्मध चः) हम लोगों को प्राप्त होते हुए (स्तोमाः) प्रशंसनीय विद्वान् और पढ़ने वाले (तुभ्मम् ) तुम्हारे लिये (मघानि) विद्या- धनों को (दक्षतः) देते हैं (तेषाम्) उन (नृणाम्) मनुष्यों के (वृत्रहत्ये) मेघों के हनन करने के समान संग्राम में सूर्य के समान (अविता) रक्षा करने वाले (शिवः) मंगलकारी (सखा, च) प्रोर मित्र (शूरः) शत्रुओं के मारने वाले (च) भी आप (भूः) हूजिये ॥१०॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जो आप विद्वानों की रक्षा करके उनसे उप- कार लें तो कौन कौन उन्नति न हो ॥१०॥ फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नू इन्द्र शूर स्तवमान ऊती ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधस्व । उप नो वाजान्मिमीयप स्तीन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥११॥ पदार्थ:-हे (शूर) निर्भय सेनापति (इन्द्र) शत्रुओं के विदीर्ण करने वाले आप (स्तवमानः) सब युद्ध करने वालों को वीररसयुक्त व्याख्यान से उत्साहित करते हुए और (ब्रह्मजूतः) धन वा अन्न से संयुक्त (ऊती) सम्यक् रक्षा से (तन्या) शरीर से (वावृधस्व) निरन्तर बढ़ो (स्तीन्) और मिले हुए (वाजान्) बल वेगादियुक्त (न:) हम लोगों का (उपमिमीहि) समीप में मान करो तथा (नू) शीघ्र शत्रुबल को (उप) उपमान करो, हे भृत्य जनो ! (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करो ॥११॥ भावार्थ:-हे सेनापति ! तुम जैसे अपने शरीर और बल को बढ़ानो वैसे ही समस्त योद्धाओं के शरीर-बल को बढ़ानो। जैसे भृत्यजन तुम्हारी रक्षा करें वैसे तुम भी इनकी निरन्तर रक्षा करो ॥११॥ !

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २० ॥ में इन्द्र के इस सूक्त दृष्टान्त से राजसभा, सेनापति, अध्यापक, अध्येता, राजा, प्रजा और भृत्यजनों के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व- सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। [इस अध्याय में अग्नि, वाणी, विद्वान्, राजा, प्रजा, अध्यापक, अध्येता, पृथिवी आदि, मेधावी, बिजुली, सूर्य, मेघ, यज्ञ, होता, यजमान, सेना और सेनापति के गुण कर्मों का वर्णन होने से इस अध्याय के अर्थ की इससे पूर्व अध्याय के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥] यह सप्तम मण्डल में उन्नीसवां सूक्त समाप्त हुना॥ * ओ३म् * अथ पञ्चमाष्टके तृतीयोऽध्यायः ॥ :०६:0:30 विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आ सुव ।। अथ दशस्य विशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता। १ स्वराट्पङ्क्तिः। ७ भुरिक्पंक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २। ४ । १० निचरित्रष्टुप् । ३ । ५ विरात्रिष्टुप् ६ । ८ । ६ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब पञ्चमाष्टक के तीसरे अध्याय तथा दश ऋचा वाले बीसवें सूक्त का आरम्भ हैं, जिसके पहले मन्त्र में कैसा राजा श्रेष्ठ हो इस विषय को कहते हैं ।। उग्रो जज्ञे वीर्याय स्वधावान्चक्रिरपो नर्यो यत्करिष्यन् । जग्मियुवा नपदनमवोभिस्त्राता न इन्द्र एनसो महश्चित् ॥१॥ पदार्थ: -(यत) जो (नर्यः) मनुष्यों में साधु उत्तम जन (स्वधावान्) बहुत धन धान्य से युक्त (चक्रिः) करने वाला (उग्रः) तेजस्वी (युवा) जवान मनुष्य ब 40 य damad ऋग्वेद: में ०७ । सू०२०॥ । (नुषदनम्) मनुष्यों के स्थान को (अग्मिः) जाने वाला (अवोभिः) रक्षा आदि से पालना (करिष्यन्) करता हुआ (त्राता) रक्षा करने वाला सूर्य जैसे (अपः) जलों को (चित्) वैसे (इन्द्रः) राजा (वीर्याय) पराक्रम के लिये (जज्ञे) उत्पन्न हो और (महः) महान् (एनसः) पापाचरण से (न:) हम लोगों को अलग रखता है वही राजा होने के योग्य है ॥१॥ भायार्थः- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो मनुष्यों का हितकारी पिता के समान पालने और उपदेश करने वाले के समान पापाचरण से अलग रखने वाला, सभा में स्थित होकर न्यायकर्ता तथा धन, ऐश्वर्य और पराक्रम को निरन्तर बढ़ाता है उसी को सब मनुष्य राजा माने॥१॥ -- फिर वह कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । हन्ता वृत्रमिन्द्रः शूशुबानः प्रावोन्न वीरो जरितारमूती । कर्ता सुहासे अह वा उं लोकं दाता वसु मुहुरा दाशुषे भूत् ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (इन्द्रः) सूर्य जैसे (वत्रम्) मेघ को वैसे जो शत्रुओं का (मह) निग्रह कर अर्थात् पकड़ पकड़ (न) शीघ्र (हन्ता) घात करने वाला राजा (शूशुवानः) निरन्तर बढ़ते हुए (वीरः) शुभ गुण कर्म स्वभावों में व्याप्त (कता) दृढ़ कार्य करने वाले और (बसु, दाता) धन के देने बाले (सुदासे) सुन्दर दानशील के लिये ही (ऊती) रक्षा से (जरितारम्) गुणों की प्रशंसा करने वाले (उ) अद्भुत (लोकम्) अन्य जन्म में देखने योग्य वा अन्य लोक को (मुहः) वार वार (प्रावीत) उत्तम रक्षा करे (दाशुषे) दानशील' के लिये वार वार (मा, भूत) प्रसिद्ध हो ( वही राज्य करने के लिये श्रेष्ठ हो ॥२॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है- जो शीघ्रकारी, सूर्य के समान विद्या और विनय के प्रकाश से दुष्टों का निवारण करने वाला शूरवीर होता हुआ अच्छे सुपात्रों के लिये यथायोग्य पदार्थ देता हुआ बहुते सुख को प्राप्त हो ॥२॥ फिर वह कैसा होकर क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । युध्मो अनर्वा खजकृत्समदा शूरः सत्रापाड् जनुपेमषाहः । व्यास इन्द्रः पृतनाः स्वोजा अधा विश्व शत्रयन्त जघान ॥३॥ पदार्थ:-जो राजा (इन्द्रः) बिजुली के समान (जनुषा) जन्म से (स्वोजाः) ७८६ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २० ॥ MORam PER शुभ अन्न वा पराक्रम जिसके विद्यमान (युध्मः) जो युद्ध करने वाला (अनर्वा) जिसके घोड़े विद्यमान नहीं जो (अपाळहः) शत्रुओं से न सहने योग्य (खजद) सङ ग्राम करने वाला (समद्वा) जो मत्त प्रमत्त मनुष्यों को सेवता (शूरः) शत्रुनों को मारता (सत्रापाट्) जो यज्ञों के करने को सहता और (पृतनाः) अपनी सेनाओं को पाले (अध) इसके अनन्तर (वि, मासे) विशेषता से मुख के सन्मुख विश्वम्, शत्रूयन्तम्) सब शत्रुओं की कामना करने वाले को (ईम्) सब ओर से (जधान) मारे वही शत्रुओं को जीत सके ॥३॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में बाचकलु-ह मनुष्यो! श्रेष्ठ राजगुणों सहित, दीर्घ ब्रह्मचर्य से द्वितीय जन्म अर्थात् विद्या जन्म का कर्ता, पूर्ण बल पराक्रमयुक्त, धार्मिक धार्मिक हो वह सूर्य के समान दुष्ट शत्रुओं को अन्याय- रूप अन्धकार को निवारे वही सब का आनन्द देने वाला हो ।।३।। फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उमे चिदिन्द्र रोदसी महित्वा पंप्राथ तविषीभिस्तुविष्मः। नि वज्रमिन्द्रो हरिवान्मिमिक्षन्त्समन्धसा मर्देषु वा उंचोच ॥४॥ पदार्थः - हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्तमान राजा अाप (उभे दो (रोदसी) आकाश और पृथिवी (चित्) के समान (महित्या) सत्कार पाके (तविषीभिः) बलिष्ठ सेनामों से (श्रा, पप्राथ) निरन्तर ब्याप्त होता और (तुधि.) बहुत जल- युक्त होता हुआ (हरिवान्) बहुत मनुष्यों से युक्त (अन्धसा) अन्नादि पदार्थ से (सम्, नि, मिमिक्षन्) प्रसिद्ध सुखों से निरन्तर सींचने की इच्छा करता हुआ(वत्रम्) शस्त्र अस्त्रों को धारण कर जो (इन्द्रः) वीर पुरुष राजा (मदेषु) आनन्दों के निमित्त (उवाच) कहे (व) वही राज्य करने को योग्य हो ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालकार है-जैसे भूमि और सूर्य बड़प्पन से सब को व्याप्त होकर जल और अन्न से सब को और गीले किये जगत् को सुखी करते हैं वैसे ही राजा विद्या और विनय से सत्य का उपदेश कर सब प्रजाजनों की निरन्तर उन्नति करे ॥४॥ उत्पन्न हुआ मनुष्य कैसा होकर सामर्थ्यवान होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वृषा जजान वृषणं रणांय तमु चिन्नारी नयै सुसूव । प्र यः सेनानीरध नृभ्यो अस्तीनः सत्वा गवेषणः स धृष्णुः ॥५॥ , SAND ऋग्वेदः मं०७ । सू० २० ।। Aura ब na पदार्थ:---(यः) जो (वृषा) वर्षा करने (सेनानीः) सेना को पहुंचाने वाला (सत्दा) बलवान् (गवेषणः) और उत्तम वाणी विद्या का ढूंढने वाला (नृभ्यः) सेना नायकों से (धष्णुः) धृष्ट प्रगल्भ (जमान) उत्पन्न हो (स.) वह (इनः) ईश्वर के समान (रणाय) संग्राम के लिये प्रतापी (अस्ति) है (अध) इसके अनन्तर जिस (उ) ही (नर्यम्) मनुष्यों में (वृषणम्) बलिष्ठ योद्धा पुत्र को वर्षा करने वाला पुरुष और (नारी) स्त्री (प्र, सुसूब) उत्पन्न करते हैं (तम्, चित) उसी को जन न्यायकारी मानते हैं ॥५॥ भावार्थः--इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जिसको स्त्री पुरुष दीर्घ ब्रह्मचर्य का सेवन कर उत्पन्न करते हैं वह पुरुष जगदीश्वरवत् सब को न्याय से पालने को समर्थ होकर सेनाधिप शत्रुओं के जीतने को सदा समर्थ होता है ।।५।। फिर मनुष्य क्या करके कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। नू चित्स भ्रषते जनो न रेषन्मनो यो अस्य घोरमाविवासात् । यौर्य इन्द्रे दधते दुवासि क्षयत्स राय ऋतपा ऋतेजाः ॥६॥ पदार्थ:-(यः) जो (जनः) मनुष्य (अस्य) इसके (घोरम्) घोर (मनः) अन्तःकरण को (न, प्राविवासात्) न सेवे (सः, चित्र) बही (न) शीघ्र विजय को (भ्रषते) पाता और वह नहीं (रेषद) हिंसा करता है (यः) जो (ऋतपा:) जो सत्य की पालना करने और (ऋतेजाः) सत्य में उत्पन्न अर्थात् प्रसिद्ध होने वाला (यज्ञैः) मिले हुए कर्मों से (इन्द्रे) परमैश्वर्ययुक्त परमेश्वर में (दुवांसि) सेवनों को (दधते) धारण करता (स:) वह (राये) धन के लिये निरन्तर (क्षयत) वसे ॥५॥ भावार्थ:-जो रागद्वेषरहित मन वाले, घोर कर्मरहित, परमेश्वर के सेवक, धर्मात्मा जन हों वे कभी नष्ट न हों॥६॥ फिर विद्वान् अन्यजनों के प्रति कैसे उपकारी हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यदिन्द्र पूर्वो अपराय शिक्षन्नयज्ज्यायान्कनीयसो देष्णम् । अमृत इत्पयाँसीत दूरमा चित्र चित्र्य भरा रयिं नः ॥७॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के देने वाले (यत्) जो (पूर्व:) प्रथम (अपराय) और के लिए (ज्यायान्) अतीव वृद्ध वा श्रेष्ठ जन (कनीयसः) अत्यन्त कनिष्ठ से (देष्णम्) देने योग्य को (शिक्षन्) शिक्षा अर्थात् विद्या ग्रहण कराता हुभा (प्रयद) प्राप्त होता वा (चित्र) हे अद्भुत कर्म करने वाले जो (अमृतः, इद) नाशveshan ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २० ॥ Nabar रहित ही आत्मा से नित्य योगी (दूरम्) दर (पर्यासीत) सब ओर से स्थित हो उसके साथ आप (नः) हम लोगों के लिए (वित्र्यम्) अद्भुत अद्भुत कर्मों में हुए (रथिम्) धन को (मा, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-हे राजा ! जो पहिले विद्वान् होकर विद्यार्थियों को शिक्षा देते हैं वा जो ज्येष्ठ कनिष्ठों के प्रति पिता के समान वर्ताव रखते हैं वा जो योगी जन परमात्मा को समाधि से अपने प्रात्मा में अच्छे प्रकार आरोप के औरों को उपदेश देते हैं उनके लिये तुम शरीर, मन और धन को धारण करो ॥७॥ फिर राजा, भृत्य और प्रजाजन परस्पर कैसे वर्ताव करें इस विषय को अगले मात्र में कहते हैं। यस्त इन्द्र प्रियो जनो ददाशदसन्निरेके अद्रिवः सखा ते । वयं ते अस्यां मुमतौ चनिष्ठाः स्याम वरूथे अनंतो नृपीतौ ॥८॥ पदार्थ:-हे (अद्रिवः) मेघों वाले सूर्य के समान वर्तमान (इन्द्र) विद्वान् (यः) जो (प्रियः) प्रसन्न करने वाला (जनः) मनुष्य' (सखा) मित्र (निरेके) निःशंक व्यवहार में (असत) हो और सुख (ददाशद) दे जिन (ते) आपके (मस्याम्) इस (नपोतो) मनुष्यों से जो रक्षा की जाती उसमें और (सुभतो) अच्छी सम्मति में (वयम्) हम लोग (धनिष्ठाः) अत्यन्त अन्नादि ऐश्वर्ययुक्त' (स्थाम) हों और अध्नतः) अहिंसक जो (ते) तुम उनके (धरूथे) घर में प्रसिद्ध हों उन मान करने थोग्य दो को हम सत्कारयुक्त करें ॥८॥ भावार्थ:-हे राजन् ! जिस नीतिज्ञ आपके जो नीतिमान् जन हैं वे ही प्रिय हों और आप भी उन्हीं के प्रिय हूजिये, ऐसे परस्पर सुहृद् होकर एक सम्मति कर निरन्तर आप उन्नति कीजिये ॥८॥ फिर मनुष्य क्या करके किसको प्राप्त हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एष स्तोमो अचिक्रदो त उत्त स्वामुमघवन्नक्रपिष्ट । रायस्कामों जरितार त पागन्त्वमङ्ग शक वस्त्र आ शको नः ॥९॥ पदार्थ:-हे (शक) शक्तिमान् (मङ्ग) मित्र पुरुषार्थी राजन जो (एषः) यह (ते) आपका (स्तोमः) प्रशंसा करने योग्य (उत) और (वृषा) बलिष्ठ जन (अचिक- दद) बुलावे वा है (मघवन्) बहुत धनयुक्त (स्तामुः) स्तुति करने वाला जन (प्रक- पिष्ट) समर्थ होता है वा (ते) तुम्हारे लिए जो (रायः) धन की (कामः) कामना Hea Main KAM . ARA MIR- DO पम्) तुम ऋग्वेदः मं० ७ } सू०२१॥ ७८६ करने वाला (जरितारम्) स्तुति करने वाले आपको (मा, अगन्) सब अोर से प्राप्त हो वह (स्वम्) आप (न:) हमारे (वस्वः) धनों को (प्राशकः) सब ओर से सह सको ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम जो शक्ति को बढ़ा कर धर्म कर्म से ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति की अभिलाषा बढ़ानो तो तुमको पुष्कल ऐश्वर्य प्राप्त हो ॥६॥ फिर मनुष्य कैसे प्रयत्न करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सन इन्द्र त्वयंताया इषे धास्त्मनां च ये मघवानो जुनन्ति । वस्ती घु ते जरिने अस्तु शक्तियं पति स्वस्तिभिः सदा ना ॥१०॥ पवार्थ:-हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त राजा जो पाप (स्मना) प्रात्मा से (स्वय- ताय) जिससे अपने में यत्न होता है उस (इषे) अन्न आदि सामग्री के लिये (नः) हम लोगों को (धाः) धारण कीजिये (ये, च) और जो (मघवान:)प्रशंसित धन वाले इस अन्नादि सामग्री के लिए आपको (जुनन्ति) प्राप्त होते हैं (सः) सो आप उद्योगी हूजिए जिससे (अरित्र) सत्य की प्रशंसा करने वाले (ते) तेरे लिए (वस्वी) धन- (स्वस्तिभिः) सुखों से (न: हम लोगों को (सदा सदा (स, पाल) अच्छे प्रकार रक्षा करो ॥१०॥ भावार्थ:--वे ही लक्ष्मी करने वाले जन हैं जो प्रालस्य का त्याग कराय पुरुषार्थ के साथ युक्त करते हैं वा जो ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं उनको ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाला सामर्थ्य होता है वा जो परस्पर की रक्षा करते हैं वे सदा सुखी होते हैं ॥१॥ इस सूक्त में राजा, सूर्य, बलिष्ठ, सेनापति, सेवक, अध्यापक, अध्येता, मित्र, दाता और रचने वालों के कृत्य और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त' के अर्थ को इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में बीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ दशस्यकविशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता। १।६। ६ विराद त्रिष्टुप् । २ । १० निवृत्यिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ । ७ भुरिक्- पङ्क्तिः । ४ ॥ ५ स्वराट् पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥

७६०
ऋग्वेदः मं०७ । सू० २१ ॥
अब दस ऋचा वाले इक्कीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में
विद्वान् क्या करे इस विषय को कहते हैं ।
असांवि देवं गोजीकमन्धो न्यस्मिन्निन्द्रों जनुमुवोच ।
बोर्धामसि वा हर्यश्व यज्ञों ना स्तोसमन्धसो मर्देषु ॥१॥
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पदार्थः हे (हर्यश्व) मनोहर घोड़ों वाले जो (अन्धः) अन्न (असावि) उत्पन्न
होता उसको तथा (जनुषा) जन्म से अर्थात् उत्पन्न होते समय से (ईम्) ही (गोऋजी-
कम्) भूमि के कोमलता से प्राप्त कराने और (देवम्) देने वाले को (इन्द्रः) विद्या
और ऐश्वर्ययुक्त जन (उवोच) कहे वा जिसके निमित्त (त्या) आपको (नि, बोधा-
मसि) निर तर बोधित करें (अस्मिन्) इस व्यवहार में प्राप (अन्धसः) अन्न आदि
पदार्थ के (मदेषु) अानन्दों में (यज्ञैः) विद्वानों के संग आदि से (नः) हम लोगों को
(बोध) बोध देप्रो और (स्तोमम्) प्रशंसा की प्राप्ति करामो ॥१॥
भावार्थ:-जो मनुष्य पृथिवी आदि से धान्यं आदि को प्राप्त होकर
विद्या को प्राप्त होते हैं और जो विद्वानों के संग से समस्त विद्या के रहस्यों
को ग्रहण करते हैं वे कभी दुःखी नहीं होते हैं ॥१॥
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
प यन्ति यज्ञं विपयन्ति बर्हिः सोनमादो विदथै दुधवांचा ।
न्यु भ्रियन्ते यशसो गृभादा दूरउपब्दो वृषणो नृषाचः ।।२।।
पदार्थ:--- जो (सोममायः) सोम से हर्षित होते (भ्रवाचः) वा जिनकी दुःख
से धारण करने योग्य वाणी (वषणः) वे बलिष्ठ (नुषाचः) नायक मनुष्यों से सम्बन्ध
करने वाले जन (यज्ञम्) विद्वानों के संग प्रादि को (प्रयन्ति) प्राप्त होते हैं (विक्थे)
संग्राम में (बहिः) अन्तरिक्ष में (विषयन्ति) विशेषता से जाते हैं (उ) और जो (यशसः)
कीति से वा (गृभात) घर से (T, भ्रियन्ते) अच्छे प्रकार उत्तमता को धारण करते
हैं तथा दूरउपन्दः) जिनकी दूर वारणी पहुंचती वे सज्जन (नि) निरन्तर उत्तमता
को धारण करते हैं और वे विजय को प्राप्त होते हैं ॥२॥
भावार्थ:--- जैसे यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले पानन्द को प्राप्त होते
हैं वैसे युद्ध में निपुण पुरुष विजय को प्राप्त होते हैं जैसे दूरदेशों में कीर्ति
रखने वाला विद्वान् जन होता है वैसे यश से संचय किये कर्मों को कर परो-
पकारी जन हों ॥२॥

ऋग्वेदः मं०७ । सू० २१ ॥
७६१
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JAPAN
फिर वह राजा किसके तुल्य क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
स्वमिन्द्र सवितवा अपस्कः परिष्ठिता अहिना शूर पूर्वीः ।
त्वविक्रे रथ्यो।' न घेना रेजन्ते विश्वा कृत्रिमाणि भीषा ॥३॥
पदार्थ:-हे (शूर) शूरवीर (इन्द्र) सूर्य के समान विद्वान् राजा जैसे सूर्य
(स्रवितब) वर्षा को (महिना) मेघ के साथ (पूर्वो:) पहिले स्थिर हुए (परिष्ठिताः)
वा सब ओर से स्थिर होने वाले (अपः) जलों को उत्पन्न करता है वैसे (त्वम्) प्राप
प्रजाजनों को सन्मार्ग में (क:) स्थिर करो जैसे सूर्य आदि और (रथ्यः) रथ के लिए
हितकारी घोड़ा यह सब पदार्थ (वावक्रे) टेढ़े चलते हैं और (विश्वा) समस्त (विक-
त्रिमाणि) विशेषता से कृत्रिम किए कामों को (रेजन्ते) कंपित करते हैं वैसे (स्वीषा)
तुम से उत्पन्न हुए भय से प्रजाजन (धेनाः, न) बोली हुई वाणियों के समान प्रवृत्त
हों ॥३॥
भावार्थ:----इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं---जो
राजा सूर्य के समान प्रजाजनों की पालना करता है दुष्टों को भय देता है
वही सुख से व्याप्त होता है ॥३॥
फिर
वह सेनापति क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
भीमो विवेषायुधेभिरेषामपालि विश्वा नयाँणि विद्वान् ।
इन्द्रः पुरो जहषाणो वि दूधोद्वि वज्रहस्तो महिना जघान ॥४॥
पदार्थ:-जो (भीमः) भय करने वा (वज्रहस्तः) शस्त्र और अस्त्र हाथों में
रखने वाला (जहषाणः) निरन्तर आनन्दित (विद्वान्) विद्वान् (इन्छः) परमैश्वर्यवान्
राजा (आयुधेभिः) युद्ध सिद्धि कराने वाले शस्त्रों से (महिना) बड़प्पन के साथ
(एषाम् ) इन शत्रुषों के (विश्वा) समस्त (नर्याणि) मनुष्यों के हित करने वाले
अपांसि) कर्मों को (विवेष) व्याप्त हो (पुर:) शत्रुओं की नगरियों को (वि, दूधोत)
कंपादे शत्रुओं को (वि, जधान) मारे, वही सेनापति होने योग्य होता है ॥४॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो समग्न युद्ध कार्यों को जान अपनी सेना
को
युद्ध में निपुण कर शत्रुओं को कंपा और शत्रु सेनाओं को कंपाते हैं वे
विजय से शोभित होते हैं ॥४॥
अब कौन तिरस्कार करने योग्य हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
न यातवं इन्द्र जूजुवुनों न वन्दना शविष्ठ वेद्यामिः।
स वर्षदों विपुंणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुर्भुतं नः ॥५॥

. - कदापि वन्दना करने योग्य नहीं वे हम लोगों को कभी न प्राप्त हों इसको 'लोग जानो और जो धर्मात्मा जन हैं वे वन्दना ) ऋग्वेदः मं०७। सू० २१।। पदार्थ:-हे (शविष्ठ) अत्यन्त बलयुक्त (इन्द्र) दुष्ट शत्रुजनों के विदीर्ण करने वाले जन जैसे (यातयः) संग्राम को जाने वाले (नः) हम लोगों को (न) न (जूजुवुः) प्राप्त होते हैं और जो (शिश्नदेवाः) शिश्न' अर्थात् उपस्थ इन्द्रिय से विहार करने वाले ब्रह्मचर्य रहित कामी जन हैं वे (ऋतम्) सत्यधर्म को (मा, गुः) मत पहुंचे (अपि) और (नः) हम लोगों को (न) ने प्राप्त हों वे ही (विषुणस्य) शरीर में ध्याप्त (जन्तोः) जीव को (वेद्याभिः) जानने योग्य नीतियों से (वन्दनाः) स्तुति करने योग्य कर्मों को न पहुंचे और (यः) जो (अर्थः) स्वामी जन शरीर में व्याप्त जीव को (शद्धत) उत्साहित करे (सः) वह हम को प्राप्त हो ॥५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो कामी लंपट जन हों वे तुम लोगों को योग्य हैं, कामातुरों को धर्मज्ञान और सत्य विद्या कभी नहीं होती है ॥५॥ अब कैसे जन से शत्रुजन नहीं जीत सकते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अभि क्रत्वेन्द्र भूरच समन्न त विव्यङ्महिमानं रजाति । खेना हि वृत्रं शमा जघन्य न शत्ररन्त विविदयुधा ते ॥६॥ पदार्थ:--हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त जन आप (ऋत्वा) बुद्धि के साथ (ज्मन्) पृथिवी पर शत्रुओं के (अभि, भूः) सन्मुख हूजिए (अध) इसके अनन्तर (ते) आपके (महिमानम्) बड़प्पन को और (रजांसि) ऐश्वर्यों को (शत्रुः) शत्रुजन मुझे (न) न (विध्यक्) व्याप्त हो [ = हो] (स्वेन) अपने (शबसा) बल से (हि) ही सूर्य जैसे (त्रम्) मेघ को वैसे शत्रु को प्राप (जघन्थ) भाशे इस प्रकार से (युधा) संग्राम से शत्रुजन (ते) आपके (अन्तम्) अन्त अर्थात् नाश वा सिद्धान्त को (न) न (विविदत) प्राप्त हो ॥६॥ भावार्थ:---जो मनुष्य शरीर और प्रात्मा के बल को प्रतिदिन बढ़ाते हैं उनके शत्रुजन दूर से भागते हैं किन्तु वह आप शत्रुओं को जीत सकें ॥६॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । देवाश्चित्ते असुयाय पूर्वेऽहं क्षत्रार्थ ममिरे सहाँसि । इन्द्रों मघानि दयते विषह्येन्द्र वाजस्य जोहुवन्त सातौ ॥७॥ पवार्थ:-हे विद्वान् जो (पूर्व) पहिले विद्या ग्रहण किये हुए (देवा:) विज्ञान श्राप के (असुर्याय) मेध में उत्पन्न हुए के लिये और (क्षत्राय) राज्य वा (ते) ऋग्वेदः मं०७ । सू० २१॥ ७६३ 231001 VA1- SHAN Kan धन के लिये (सहासि) बलों का (अनु, ममिरे) निरन्तर अनुमान करते जो (चित) भी (इन्द्रः) सूर्य के समान राजा (मघानि) प्रशंसा करने योग्य धनों को (दयते) ग्रहण करता वा जो (वाजस्य) प्राप्त हुए व्यवहार के (सातौ) संविभाग में (इन्द्रम) परमैश्वर्य को (विसह्य) विशेष सह करके परमैश्वर्य को (जोहुवन्त) निरन्तर ग्रहण करते हैं उनका श्राप सत्कार करो ॥७॥ भावार्थ:--- वे ही विद्वान् जन श्रेष्ठ होते हैं जो सबों में दया का विधान और सत्य शास्त्रों का उपदेश कर बलों को बढ़ाते हैं वे ही पिता के समान सत्कार करने योग्य होते हैं ॥७॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। कीरिश्चिद्धि त्वामवसे जुहावेशानमिन्द्र सौभंगस्य भूरेः । अवो बभूथ शतमूते अस्मे अभिक्षत्तस्त्यावतो वरूता ॥८॥ पदार्थ:--हे (शतमूते) सैकड़ों प्रकार की रक्षा करने वा (इन्द्र) परम ऐश्वर्या के देने वाले जो (हि) ही (कोरिः) स्तुति करने वाले (चित्) के समान (अवसे) रक्षा के लिए (ईशानम्) समर्थ (त्वाम्) आपको (जुहाव) बुलावे उसके (भूरेः) बहुत (सौभगस्य) उत्तम भाग्य के होने की (अवः) रक्षा करने वाले श्राप बभूथ) हूजिये । जो (अस्मे) हम लोगों को (त्वामतः) आपके सदृश (अभिक्षत्तुः) सब ओर से नाशकर्ता हिंसक के (वस्ता) स्वीकार करने वाला हो उसके भी रक्षक हूजिये ॥८॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-हे राजन् शूरवीर! जो पीड़ित प्रजाजन तुमको आह्वान दें उनके वचन को आप शीघ्र सुनें और सब की रक्षा करने वाले होकर दुष्टों की हिंसा करने वाले हूजिये ॥६॥ फिर किसकी मित्रता करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सोयस्त इन्द्र विश्वई स्याम नमोवृधासों महिना तरुत्र । वन्वन्तु स्या तेऽवसा समीके३' भीतियों वनुषां शवांसि ॥९॥ पदार्थः- है (तरुत्र) दुःख से तारने वाले (इन्द्र) राजा (नमोवधासः) अन्न के बढ़ाने वा अन्न से बढ़े हुए हम लोग (महिना) बड़प्पन से (विश्वह) सब दिनों (ते) आपके (सखायः) मित्र (स्याम) हों जो (ते) आपके (समीके) समीप में (अवसा) रक्षा प्रादि से (अभौतिम्) अभय और (वनुषाम्) मंगता जनों के (शवांसि) बलों को (वन्वन्त, स्म) ही मांगें (अर्यः) वैश्यजन माप इनके इस पदार्थ को धारण करो ॥६॥ MAPNA ७६४ ऋग्वेदः मं०७। सू० २२ ॥ P- भावार्थ:-जो धार्मिक राजा से नित्य मित्रता करने की इच्छा करते हैं वे बड़प्पन से सत्कार पाते हैं, जो प्रजा को अभय देते हैं वे प्रतिदिन बलिष्ठ होते हैं ॥६॥ फिर राजा-प्रजाजन परस्पर कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। स ने इन्द्र त्वयंताण इषे धारत्मनां च थे मानो जनन्ति । वस्ती षु ते जरित्रे अस्तु शक्तियूयं पात स्वस्तिभिः सदा ना ॥१०॥ पदार्थ:-है (इन्द्र) दुःख के विदीर्ण करने वाले (स:) सो आप (स्वयताय) आपने जो बड़े यत्न से सिद्ध की उस (इष) इच्छा सिद्धि वा अन्न की प्राप्ति के लिये (नः) हम लोगों को धाः) धारण कीजिये (ये, च) और जो (मघवान:) नित्य धनाढय जन (जुनन्ति) प्रेरणा देते हैं उनको भी उक्त इच्छासिद्धि वा अन्न की प्राप्ति के लिये धारण कीजिये जिससे (ते) आपकी (जरित्रे) स्तुति करने वाले के लिये (वस्वी) धन करने बाली (शक्तिः) सामर्थ्य (अस्तु) हो । हे मन्त्री जनो! (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों को (सदा) सब कभी [ = सदा] (सु, पात) अच्छे प्रकार रक्षा करो ॥१०॥ भावार्थ:-हे राजा राजा! आप प्रयत्न से सबको पुरुषार्थी कर निरन्तर धनाढय कीजिये और अच्छे कामों में प्रेरणा दीजिये जिससे आपकी और आपके भृत्यों की अलौकिक शक्ति हो और ये आपकी सर्वदा रक्षा करें ॥१०॥ , इस सूक्त में राजा, प्रजा, विद्वान्, इन्द्र, मित्र, सत्य, गुण और यात्रा आदि के गुणों का वर्णन होने से इस सुक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में इक्कीसवां सूक्त समाप्त हुआ। Sarvad WAL । अथ नवर्चस्य द्वाविंशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्नो देवता । १ भुरिगुष्णिक्छन्वः । ऋषभः स्वरः । २ । ७ निचूदनुष्टुप् । ३ भुरिगनुष्टुप् । ५ अनुष्टुप् । ६ । ८ विराडनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः स्वरः । ४ प्रार्थी पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । ६ विराट् त्रिष्टुप्छन्दः । धैवत: स्वरः ।। अब नव ऋचा वाले बाईसवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करके कैसा हो इस विषय का उपदेश करते हैं।

ऋग्वेदः मं०७। सू० २२॥ ७६५ पिबा सोममिन्द्र मन्दंतु त्वा यं ते सुषाव हर्यश्वादिः । सोतुर्बाहुभ्यां सुयतो नावा ॥१॥ पदार्थ:-हे (हर्यश्व) मनोहर घोड़े वाले (इन्द्र) रोग नष्टकर्ता वैद्यजन आप (अर्वा) घोड़े के (न) समान (सोमम्) बड़ी ओषधियों के रस को (पिब) पीयो (यम) जिसको (अद्रिः) मेघ (सुषाव) उत्पन्न करता है और जो (सोतुः) सार निकालने वा (सुयतः) सार निकालने की और सिद्धि करने वाले (ते) आपकी (बाहुभ्याम्) बाहुओं से कार्यसिद्धि करता है वह (त्या) आपको (मन्वत) श्रानन्दित करे ॥१॥ CATED भावार्थः- इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे वैद्यो! तुम, जैसे वाजी घोड़े तृण, अन्न और जलादिकों का अच्छे प्रकार सेवन कर पुष्ट होते हैं वैसे ही बड़ी-बड़ी ओषधियों के रसों को पीकर बलवान् होप्रो ॥१॥ फिर वह राजा किसके तुल्य क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हसि । स स्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्त ॥२॥ पवार्थ:-हे (प्रभूवसो) समर्थ और वसाने वाले (हर्यव) हरणशील घोड़ों से युक्त (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् राजा (यः) जो (ते) आप का (युज्यः) योग करने योग्य (चारु:) सुन्दर (मनः) आनद (अस्ति) है वा (येन) जिससे सूर्य (वृत्राणि) मेघ के अङ्गों को वैसे शत्रुओं की सेना के अङ्गों का (हंसि) विनाश करते हो (स:) वह (स्वाम) तुम्हें (ममत) आनन्दित करे ॥२॥ भावार्थ:-जिस जिस उपाय से दुष्ट बलहीन हों उस उस उपाय का राजा अनुष्ठान करे अर्थात् प्रारम्भ करे ॥२॥ फिर मनुष्यों में कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । बोधा मु में मघवन्नाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम् । इमा ब्रह्म सधमादें जुषस्व ॥३॥ पवार्थ:-हे (मघवन्) प्रशंसित धन वाले विद्वान् पाप (याम्) जिस (ते) आप के विषय की (प्रशस्तिम्) प्रशंसित वाणी को (वसिष्ठः) अतीव वसने वाला (मा, अर्चति) अच्छे प्रकार सत्कृत करता है (इमाम्) इस (मे) मेरी (वाचम्) sewa ऋग्वेदः मं०७। सू० २२॥ com वाणी को श्राप (सु, बोध) अच्छे प्रकार जानो उससे (सधमादे) एका से स्थान में (इमा) इन (ब्रह्म) धन वा अन्नों का (जुषस्व) सेवन करो ॥३॥ भावार्थः-- वही विद्वान् उत्तम है जो जिस प्रकार की उत्तम शास्त्र विषय में बुद्धि अपने लिये चाहे उसी को औरों के लिये चाहे और जो जो उत्तम अपने लिये पदार्थ हो उसे पराये के लिये भी जाने ॥३॥ फिर पढ़ने पढ़ाने वाले परस्पर कैसे वत्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। श्रुधी हवं विपिपानस्यार्बोधा विजस्याचतो मनीषाम् । कृष्वा दुवांस्यंतमा सचेमा ॥४॥ पदार्थः-हे परम विद्वान् पाप (विपिपानस्य) विविध प्रकार के पीने जिस से बनें उस (अद्रेः) मेघ के समान (अर्चतः) सत्कार करते हुए (वित्रस्य) उत्तम बुद्धि वाले जन के (हवम) शब्दसमूह को (श्रुधि) सुनो (मनीषाम् ) उत्तम बुद्धि को (बोध) जानो और (इमा) इन (अन्तमा) समीपस्थ (दुवांसि) सेवनों को (सचा) सम्बन्ध करो।॥४॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे जिज्ञासु विद्यार्थी जनो! तुम अपना पढ़ा हुआ परीक्षा लेने वाले विद्वान् को सुनायो, वहां वे जो उपदेश करें उनका निरन्तर सेवन करो ॥४॥ फिर परीक्षक जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुरस्य विद्वान् । सदा ते नाम स्वयत्रो विवक्मि ॥५॥ पदार्थः-है विद्यार्थी ! नहीं है विद्या में अभ्यास जिसको ऐसे (ते) तेरे (तुरस्य) शीघ्रता करने वाले की (गिरः) वाणियों को (विद्वान्) विद्वान् मैं (न, मध्ये) नहीं विचारता (अपि) अपितु (असूर्यस्य) मूों में प्रसिद्ध हुए जन की (सुष्ट- तिम्) उत्तम प्रशंसा को (न) नहीं विचारता (ते) तेरे (नाम) नाम और (स्वयशः) अपनी कीत्ति की (सदा) सदा (विवविम) विवेक से परीक्षा करता हूं ॥५॥ भावार्थ:----विद्वान् जन परीक्षा में जिनको आलसी, प्रमादी और निर्बुद्धि देखे उनकी न परीक्षा करे और न पढ़ावे । और जो उद्यमी अर्थात् परिश्रमी उत्तम बुद्धि विद्याभ्यास में तत्पर बोधयुक्त हों उनकी उत्तम परीक्षा कर उन्हें अच्छा उत्साह दे ॥५॥ - शक ऋग्वेदः मं०७ । सू० २२ ।। ७६७ 2009 ब dauty फिर मनुष्यों को क्या इच्छा करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । भूरि हि ते सर्वना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित् । मारे अस्मन्मघवन्ज्योक्कः ॥६॥ पदार्थ:-है (मघवन्) बहुत विद्यारूपी ऐश्वर्ययुक्त जो (मानुषेषु) मनुष्यों में (भूरि) बहुत (मनीषी) बुद्धिवाला जन (ते) आपके (सवना) यज्ञसिद्धि कराने वाले कर्मों वा प्रेरणाओं को (भूरि) बहुत (हवते ग्रहण करता तथा जो (त्वाम्) आप की (इत्) ही स्तुति प्रशंसा करता (हि) उसी को (अस्मत्) हम लोगों से (आरे) दुर (ज्योक) निरन्तर (मा, कः) मत करो किन्तु सदा हमारे समीप रक्खो ॥६॥ भावार्थ:-जो निश्चय से मनुष्यों के बीच उत्तम विद्वान् प्राप्त परीक्षा करने वाला हो उसको तथा अन्य अध्यापकों की निरन्तर प्रार्थना करो आप लोगों को हमारे निकट जो धार्मिक, विद्वान् हो वही निरन्तर रखने योग्य है जो मिथ्या प्यारी वाणी बोलने वाला न हो।।६।। फिर सेनापतियों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तुभ्येदिमा सर्वना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि । त्वं नृभिहव्यो विश्वासि ॥७॥ पदार्थ:-है (भूर) निर्भयता से शत्रुजनों की हिंसा करने वाले राजा वा सेनापति, जो (विश्वधा) विश्व को धारण करने वाले (त्वम्) आप निभिः) नायक मनुष्यों से (हस्यः) स्तुति वा ग्रहण करने योग्य (असि) हैं इससे (तुभ्यं) तुम्हारे लिये (इत) ही (इमा) यह (सधना) औषधियों के बनाने वा प्रेरणाओं को (कृणोमि) करता हूं और (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (विश्वा) समस्त (ब्रह्माणि) धन वा अन्नों और (वर्धना) उन्नति करने वाले कर्मों को करता हूं ॥७॥ भावार्थ:-सेनाधिष्ठाता जन सेनास्थ योद्धा भृत्यजनों की अच्छे प्रकार परीक्षा कर अधिकार और कार्यों में नियुक्ति करें यथावत् उनकी पालना करके उत्तम शिक्षा से बढ़ावें ॥७॥ फिर वह राजा कैसे पुरुषों को रक्खे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नु चिन्न ते मन्य॑मानस्य दस्मोद॑श्नुवन्ति महिमानमुन । न वीर्यमिन्द्र ते न राधः॥८॥ पदार्थ:-है (वस्म) दु:ख के विनाशने वाले (उन) तेजस्वी (इन्द्र) परमैश्वर्य- युक्त राजा (मन्यमानस्य) माननीय के मानने वाले (ते) आपके (महिमानम्) ७९८ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २२ ॥ 500 PRNA बड़प्पन को (नु) शीघ्र सज्जन (उदश्नुवन्ति) उन्नति पहुँचाते हैं उनके विद्यमान होते (ते) आपके (वीर्यम्) पराक्रम' को शत्रु जन नष्ट (न) न कर सकते हैं (चित्) और (न) न वहां (न) शीघ्र (राधः) धन ले सकते हैं ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे राजन् ! आप अच्छी परीक्षा कर सुपरीक्षित, धार्मिक, शूर, विद्वान् जनों को अपने निकट रक्खें तो कोई भी शत्रुजन आपको पीड़ा न दे सके, सदा वीर्य और ऐश्वर्य से बढ़ो॥८॥ राजादिकों को किनके साथ मैत्री विधान करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । च पूर्व ऋषयो ये च नृत्ला इन्द्र ब्रह्माणि जनयन्त विप्राः । अस्मे ते सन्तु सख्या शिवानि यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥९॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजन् (ये) जो (पूर्वे) विद्या पढ़े हुए (ऋषयः) वेदार्थ- वेत्ता जन (च) और धार्मिक अन्य जन (ये) जो (नूरना:) नवीन पढ़ने वाले जन (च) और बुद्धिमान् अन्य जन (विप्राः) उत्तम बुद्धि वाले' जन (ते) तुम्हारे और (अस्मे) हम लोगों के लिये (ब्रह्माणि धन वा अन्नों को (जनयन्त) उत्पन्न करते हैं उनके साथ हमारे और सापके (शिधानि) मंगल' देने वाले (संख्या) मित्र के कर्म (सन्त) हों जैसे (यूयम्) तुम हमारे मित्र हुए (स्वस्तिभिः) सुखों से (न: हम लोगों की (सदा) सदा (पात) रक्षा करो वैसे हम लोग भी तुम को सुखों से सदा पालें ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालकार है- हे राजा ! जो वेदार्थवेत्ता और अर्थ पदार्थों को जानने वाले योगी जन विद्याध्ययन में निरत बुद्धिमान् हमारे कल्याण की इच्छा करने वाले हों उनके साथ ऐसी मित्रता कर धनधान्यों को बढ़ा इनसे इनकी सदा रक्षा कर और रक्षा किये हुए वह जन आप की सदा रक्षा करेंगे ।।६।। इस सूक्त में इन्द्र, राजा, शूर, सेनापति, पढ़ाने, पढ़ने, परीक्षा करने और उपदेश देने वालों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में बाईसवां सूक्त समाप्त हुआ।

ऋग्वेदः मं०७ । सू० २३ ॥ BAD अथ षड्चस्य त्रयोविंशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता ।।।६ भुरिक् पङ्क्तिः । ४ स्व राष्ट्पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ । ३ विराट् त्रिष्टुप् । ५ निवृत्रिष्टुप्छन्दः। धवतः स्वरः ॥ अब छः ऋचावाले तेईसर्वे सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में प्रबन्धकर्ता जन उपस्थित संग्राम में क्या क्या करें इस विषय को कहते हैं । उदु ब्रह्माण्यैरत श्रवस्यैन्द्रं समये महया वसिष्ठ । आ यो विश्वानि शवसा ततानोपश्रोता म ईवतो वचौसि ॥१॥ पदार्थ:-हे (वसिष्ठ) अतीव वसने वाले विद्वान् राजा जैसे विद्वान् जन (भवस्या) अन्न वा श्रवणों के बीच उत्पन्न हुए (ब्रह्माणि) धनधान्यों को (उदैरत) प्रेरणा देते हैं वैसे (इन्द्रम्) शूरवीर जन का (उ) तर्क-वितर्क से (समय) समर में (महय) सत्कार करो (य:) जो (उपश्रोता) ऊपर से देखने वाला अच्छे सुनता है वह (शवसा) बल' से' (ईवतः) समीप जाते हुए (मे) मेरे (विश्वानि) सर्व (वासि) वचनों को (प्रा, ततान) अच्छे प्रकार विस्तारता है उस उपदेशक का भी समर में सत्कार करो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे राजा जब संग्राम उपस्थित हो तब बहुत धन अन्न शस्त्र अस्त्र सेनाओं के अंग और इनकी रक्षा करने तथा अच्छे प्रबन्ध करने वालों को श्राप प्ररणा देयो, प्राप्त और उपदेष्टा जनों को रक्खो, योद्धा जन उत्साहित और सुरक्षित हुए शीघ्र विजय करें ॥१॥ फिर वह राजा और मन्त्री जन परस्पर कैसे वर्तों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अयामि घोष इन्द्र देवजामिरिरज्यन्त यच्छुरुधो विवाचि । नहि स्वमायुश्चिकितै जनेषु तानीदेहास्यात पर्यस्मान् ॥२॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य के देने वाले (यव) जो (शुरुधः) शीघ्र रूधने वाले (विवाचि) नाना प्रकार की विद्याओं में जो प्रवृत्त वाणी उसमें (इरज्यन्त) प्राप्त होते हैं वा जिनके साथ (देवजामि:) विद्वानों के संग रहने वाली (घोषः) अच्छी वक्तृता से युक्त वाणी प्रवृत्त हो वा जो (जनेषु) मनुष्यों में (स्वम्) अपनी (प्रायुः) उमर को (चिकिते) जानता है वा (तानि) उन (अंहांसि) अधर्मयुक्त कामों को दूर (प्रति, पषि) भाप अति पार पहुंचाते वा (अस्मान्) हम लोगों की अच्छे प्रकार रक्षा ८०० ऋग्वेदः म०७। सू०२३ ॥ GANA alls करता है उसकी मैं (अयामि) रक्षा करता हूं ये समस्त हम लोग पुरुषार्थ से पराजित (इत, नहि) कभी न हों ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन धर्मयुक्त व्यवहार में वत्त वसे तुम भी वर्गों, ब्रह्मचर्य आदि से अपनी आयु को बढ़ानो ॥२॥ फिर क्या करके वीर संग्राम में जावें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। युजे रथं गवेषणं हरिभ्यामुप ब्रह्माणि जुजुषाणमस्थुः । वि बोधिष्ट स्थ रोदसी महित्येन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघन्वान् ॥३॥ एवार्थ:--हे सेनेश जैसे (इन्द्रः) सूर्य (महित्वा) अपने महान् परिमाण से (रोदसी) आकाश और पृथिवी को प्रकाशित करता है वैसे जिस (ब्रह्माणि) धन धान्य पदार्थों को (जुजुषाणम्) सेवते हुए. (रथम्) प्रशंसनीय रथ को वीरजन (उपास्थः उपस्थित होते हैं जिससे शूरवीर जन शत्रुओं को (विबाधिष्ट) विविध प्रकार से विलोवे-पीड़ा दें उसको (अप्रति) अप्रत्यक्ष अर्थात् पीछे भी (जधन्वान्) मारने वाला (स्यः) वह मैं (गवेषणम्) भूमि पर पहुँचाने वाले रथ को (हरिभ्याम्) हरणशील घोड़ों से (युजे) जोड़ता हूं जिससे (वृत्राणि) धनों को प्राप्त होऊ ॥३॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे शूरवीरो! जब आप लोग युद्ध के लिये जावें तब सब सामग्री को पूरी करके जावें जिससे शत्रुओं को शीघ्र बाधा-पीड़ा हो और विजय को भी प्राप्त हों ।।३।। फिर सेनपति का ईश बीर, कैसे युद्ध करने वालों को रक्खे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आपश्चिलिप्युः स्तयों न गावो नक्षन्नृतं जरिवारस्त इन्द्र ! याहि वायुन नियुतो नो अच्छा हि धीभिर्दयसे वि वाजान् ॥४॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सर्व सेनापति जो वीरजन (प्रायः) जलों के (चित्) समान सेनाजनों को चलाते हुए (स्तयः) ढपी हुई इई (गाव:) किरणों के (न) समान (पिप्युः) बढ़ावें और (ते) आप की (जरितारः) स्तुति करने वाले जन (ऋतम्) सत्य को (नक्षन्) व्याप्त होते हैं उनके साथ (वायुः) पवन के (न) समान (त्वम्) आप (याहि) जाइये हि) जिससे (धीभिः) उत्तम बुद्धियों से (नियुतः) निश्चित किये हुए (वाजान्) वेगवान् (न:) हम लोगों को (अच्छ) अच्छे प्रकार (विदयसे) विशेषता से दया करते हो इससे हम लोग तुम्हारी प्राज्ञा का न उल्लंघन करें ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे सेनाध्यक्ष पति यदि आप We ANN ऋग्वेदः मं०७। सू० २३ ॥ ८०१ - Aad सुपरीक्षित शूरवीर जनों की अच्छे प्रकार रक्षा कर अच्छी शिक्षा देकर और कृपा से उन्नति कर शत्रुओं के साथ युद्ध करावें तो ये सूर्य की किरणों के समान तेजस्वी होकर पवन के समान शीघ्र जा. शत्रुओं को शीघ्र विनाशें ॥४॥ फिर वे सब सेनापति और सब सेना जन परस्पर कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ते त्वा मदां इन्द्र मादयन्तु शुष्मिणं तुविराधसं जरित्रे । एको देवत्रा दयसे हि मानस्मिञ्छूर सर्वने मादयस्व ॥५॥ पदार्थ:-हे (शूर) निर्भय (इन्द्र) सर्व सेना स्वामी (हि) जिस कारण आप (एकः) अकेले (देवत्रा) विद्वानों में जिस (जरित्रे) सत्य की स्तुति करने वाले के लिये और जिन भृत्य जनों के लिये (वयसे) दया करते हो (ते) वे (मवाः) आनन्दयुक्त होते हुए भट योद्धाजन (शुष्मिणम् ) बलयुक्त (तुविराधसम्) बहुत धन धान्य वाले (स्वा) आप को (मावयन्तु) हर्षित करें आप (अस्मिन्) इस वर्तमान (सवने) युद्ध के लिये प्रेरणा में उन (मन्)ि मनुष्यों को (मादयस्व) आनन्दित करो ॥५॥ भावार्थ:--हे सर्व सेनाधिकारियों के पति ! आप सर्वदेव सबपर पक्षपात को छोड़ कृपा करो और सब को समान भाव से आनन्दित करो जिससे वे अच्छी रक्षा और सत्कार पाये हुए दुष्टों का निवारण और श्रोष्ठों की रक्षा करके निरन्तर राज्य बढ़ावें ॥५॥ फिर सर्व सेनापति को सेनाजन परस्पर कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। एवेदिन्द्रं वृषणं वज्रबाहुं वसिष्ठासो अभ्यर्चन्त्यकैः । स नः स्तुतो वीरवत्पातु गोमंयूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥ पदार्थः -- जो (वसिष्ठासः) अतीव बसाने वाले जन (अः) उत्तम विचारों से (वृषणम्) सुखों की वर्षा करने और (वज्रबाहुम्) शस्त्र अस्त्रों को हाथों में रखने वाले (इन्द्रम्) सर्व सेनाधिपति का (अभि, अर्चन्ति) सत्कार करते हैं (सः, एव) वही (स्तुतः) स्तुति को प्राप्त हुआ (नः) हम लोगों की (पातु) रक्षा करे। सब (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की तथा (गोमत्) प्रशंसित गौए जिसमें विद्यमान वा (वीरवत्) वीरजन जिसमें विद्यमान वा (इत) उस सेना- समूह की भी [सदा] (पात) रक्षा करो ॥६॥ - INM

८०२
ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २४ ।।
भावार्थ:-जिनका जो अधिष्ठाता हो उसकी आज्ञा में सब को
यथावत् वर्तना चाहिये । अधिष्ठाता भी पक्षपात को छोड़ अच्छे प्रकार
विचार कर आज्ञा दे ऐसे परस्पर की रक्षा कर राज्य, धन और यशों को
बढ़ा सदा बढ़ते हुए होमो ॥६॥
इस सूक्त में इन्द्र, सेना, योद्धा और सर्व सेनापतियों के कार्यों का वर्णन होने से इस
सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह सप्तम मण्डल में तेईसवां सूक्त समाप्त हुआ।
समा
3B
AND
EN
अथ षडधस्य चतुर्विंशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता।१।
३ निवृत्रिष्टुप् । २।५ त्रिष्टुप् । ४ विराट् त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ६ विराट
पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।।
अब छः ऋचावाले चौबीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में
मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं ।
योनिष्ट इन्द्र सदने अकारि तमानृभिः पुरुहूत प्र याहि ।
असो यथा नोऽविता वृधे च ददो वसूनि ममदश्च सोमैः ।।१।।
पदार्थ:--(पुरुहूत) बहुतों से स्तुति पाये हुए (इन्द्र) मनुष्यों के स्वामी राजा
(ते) आपके (सदने) उत्तम स्थान में जो (योनिः) घर तुम से (अकारि) किया जाता
है (तम्) उसको (नृभिः) नायक मनुष्यों के साथ (प्र, याहि) उत्तमता से जामो
(यथा) जैसे (न:) हमारी (मविता) रक्षा करने वाला (प्रसः) होमो और हमारी
(वधे) वृद्धि के लिए (च) भी (वसूनि) द्रव्य वा उत्तम पदार्थों को (प्राददः) ग्रहण
करो (सोमः, च) और ऐश्वर्य वा उत्तमोत्तम ओषधियों के रसों से (ममव:) हर्ष को
प्राप्त होनो वैसे सब के सुख के लिये होतो ॥१||
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालकार है--मनुष्यों को चाहिये कि
निवासस्थान उत्तम जल स्थल और पवन जहां हो उस देश में घर बना कर
वहां वसें, सब के सुखों के बढ़ाने के लिये धनादि पदार्थों से अच्छी रक्षा
कर सबों को आनन्दित करें ॥१॥
फिर वे स्त्री पुरुष क्या करके विवाह करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
गृभीतं ते मने इन्द्र द्विवहाँः सुतः सोमः परिषिक्ता मधूनि ।
विधेना भरते मृवृक्तिरियमिन्द्रं जोहुवती मनीषा ॥२॥

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २४ ॥ ८०३ Limal teen toviane ARA पदार्थ:-हे (इन्द्र) परमैश्वर्य के देने वाले जो (विसृष्टधेना) नाना प्रकार की विद्यायुक्त वाणी और (स्वक्तिः) सुन्दर चाल ढाल जिसकी ऐसी (इयम्) यह (मनीषा) प्रिया स्त्री (इन्द्रम्) परमैश्वर्य देने वाले पुरुष को (जोहुवती) निरन्तर बुलाती है उसको (भरते) धारण करती है जिसने (ते) तेरा (मनः) मन (गृभीतम्) ग्रहण किया तथा जो (द्विबर्हाः) दो से अर्थात् विद्या और पुरुषार्थ से बढ़ता वह (सुतः) उत्पन्न किया हुआ (सोमः) ओषधियों का रस है और जहां (परिषिक्ता) सब ओर से सींचे हुए (मधूनि) दाख वा सहत आदि पदार्थ हैं उन्हें सेवो ॥२॥ भावार्थ:-जो स्त्री सुविचार से अपने प्रिय पति को प्राप्त हो के गर्भ को धारण करती है वह पति के चित्त की खींचने और वश करने वाली होकर वीर सुत को उत्पन्न कर सर्वदा आनन्दित होती है ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या वर्त कर क्या पीना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ नो दिव आ पृथिव्या अंजीषिनिदै बहिः सोमपेयाय याहि । वहन्तु त्वा हरयो मद्र यंञ्चमाङ्गषमच्छी सबस मदाय ॥३॥ पदार्थ:-हे (ऋजीषिन्) सरल स्वभाद' वाले आप (सोमपेयाय) उत्तम ओषधियों के रस के पीने के लिये (दिव:) प्रकाश और (पृथिव्याः) भूमि से (न:) हमारे (इयम्) इस वर्तमान (बहिः) उत्तम स्थान वा अवकाश को (मा, याहि) आनो (मदाय) आनन्द के लिए (मद्रयञ्चम्) मेरा सत्कार करते (आङ्ग्लम्) और प्राप्त होते हुए (तबसम् ) बलवान् (त्वाम् ) आपको उत्तम ओषधियों के रस पीने के लिये (हरयः) हरणशील (अच्छ, श्रा, वहन्तु) अच्छे पहुंचावें ॥३॥ भावार्थ:-वे ही नीरोग, शिष्ट, धार्मिक, चिरायु और परोपकारी हों जो मद्यरूप और अच्छे प्रकार बुद्धि के नष्ट करने वाले पदार्थ को छोड़ बल, बुद्धि आदि को बढ़ाने वाले सोम आदि बड़ी ओषधियों के रस के पीने को अपने वा प्राप्त के स्थान को जावें ॥३॥ फिर कौन प्राप्त विद्वान होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। आ नो विश्वामिरूतिमिः सजोषा ब्रह्म जुषाणो हर्यश्व याहि । वरीजस्थविरेमिः मुशिमाश्मे वर्षण शुष्म॑मिन्द्र ॥४॥ पदार्थ:-हे (सुशिष) उत्तम शोभायुक्त ठोढी वाले (हर्यश्व) हरणशील मनुष्य वा घोड़े बड़े बड़े जिसके हुए वह (इन्द्र) परम ऐश्वर्य देने वाले (विश्वाभिः) ८०४ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २४ ।। hindhi समस्त (ऊतिभिः) रक्षा आदि क्रियाओं से (सजोषाः) समान प्रीति सेवने वाले (ब्रह्म) धन वा अन्न को (जुषाणः) सेवने वा (स्थविरेभिः) विद्या और अवस्था में वृद्धों के साथ (अस्मे) हम लोगों में (वृषणम्) सुख वर्षाने वाले (शुष्म) बल' को (वधत्) धारण करते हुए श्राप दुःखों को (वरीवृजत) निरन्तर छोड़ो और (न:) हम लोगों को (प्रा, याहि प्रानो, प्राप्त होओ ।।४।। भावार्थ:-वे ही मनुष्य महाशय होते हैं जो पाप और परोपघात अर्थात् दूसरों को पीड़ा देने के कामों को छोड़ के अपने आत्मा के तुल्य सब मनुष्यों में वर्तमान सब के सुख के लिये अपना शरीर, वाणी और ठोढी को वर्ताते हैं ॥४॥ फिर विद्वान् किसके तुल्य क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एष स्तोमो मह उग्राय वाहे धुरी३'वात्यो न वाजयन्नधायि । इन्द्र त्याऽयम इँट्टे वसूनां दिवाय द्यामधि ना श्रीमतं धाः ||५|| पदार्थ:-हे (इन्द्र) परम ऐश्वयं के देने वाले जिन आपने (वाहे) सब को सुख की प्राप्ति कराने वाले (महे) महान् (उग्नाय) तेजस्वी के लिये (धुरीव) धुरी में जैसे रथ आदि के अवयव लगे हुए जाते हैं वैसे (प्रत्य:) शीघ्र चलने वाले घोड़े के (न) समान (वाजयन्; वेग कराते हुए (एषः) यह (स्तोमः) श्लाघनीय स्तुति करने योग्य व्यवहार (अधायि) धारण किया जो (अयम्) यह (अकः) सत्कार करने योग्य (बसूनाम्) पृथिवी श्रादि के बीच (दिबीक) वा सूर्य ज्योति के बीच (रवा) आपको (ईट्टे) ऐश्वर्य देता है वह आप (नः) हम लोगों को (द्याम्) प्रकाश और (श्रीमतम्) सुनने योग्य को (अधि, धाः) अधिकता से धारण करो ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो विद्वान् तेजस्वियों के लिए प्रशंसा धारण करता वह धुरी के समान सुख का आधार और घोड़े के समान वेगवान् हो बहुत लक्ष्मी पाकर सूर्य के समान इस संसार में प्रकाशित होता है ॥५॥ फिर मनुष्यों को परस्पर कैसे वर्तना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। एवा इन्द्र वार्यस्य पूर्वि प्र ते महीं सुमति वैविदाम इषं पिन्व मघवंद्रयः सुवीरां यूयं पति स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) शत्रुओं के विदीर्ण करने वाले आप (वार्यस्य) ग्रहण करने योग्य (ते) आप की जिस (महीम) बड़ी (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि को हम लोग (बेविदाम) यथावत् पावें (एव) उसी को और (नः) हमको (प्र, पूद्धि) अच्छे प्रकार न HORI *

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २५ ॥
पूर्ण करो जिसको (मधवद्भयः) बहुत धनयुक्त पदार्थों से (सुवीराम्) उत्तम वीर
हैं जिससे उप (इषम्) अन्न को हम लोग यथावत् प्राप्त हों। और उसको प्राप
(पिन्व) सेवो उस सुमति और अन्न तथा (स्वस्तिभिः) सुखों से (यूयम्) तुम लोग
(न:) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करो ॥६॥
भावार्थ:-हे विद्वान् ! आप हम लोगों के लिये धर्मयुक्त उत्तम बुद्धि
को देनो जिससे हम लोग अच्छे
गुण
कर्म स्वभावों को प्राप्त होकर सब
मनुष्यों की अच्छे प्रकार रक्षा करें॥६॥
इस सूक्त में इन्द्र, राजा, स्त्री पुरुष और विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस
सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए ।
यह सप्तम मण्डल में चौबीसवां सूक्त समाप्त हुमा॥
अथ षडवस्य पञ्चविंशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः। इन्द्रो देवता ।
१ निवृत्पद्धितः । २ विराट्पङ्क्तिः । ४ पङ्तितः। ६ स्वराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः
स्वरः । ३ विरात्रिष्टुप् । ५ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।।
अब छः ऋचावाले' पच्चीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में
कैसी सेना उत्तम होती है इस विषय को कहते हैं ।
आ ते मह इन्द्रोत्युग्र समन्यवो यत्समरन्त सेनाः ।
पतांति दिथुन्नर्थस्य बाह्वोर्मा ते मनो विश्वव्य१ वि चारीत् ॥१॥
पदार्थ:-हे (उन) शत्रुओं के मारने में कठिन स्वभाव वाले (इ-7) सेनाप
(यत्) जिस (नयंस्य) मनुष्यों में साधु (महः) महान् (ते) आप के (समन्यवः)
फ्रोध के साथ वर्तमान (सेनाः) सेना (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (मा, समरन्त)
सब ओर से अच्छी जाती हैं उन (ते) भाप की (बाह्वोः) भुजाओं में (दिधत)
निरन्तर प्रकाशमान युद्धक्रिया (मा) मत (पताति) गिरे, मत नष्ट हो और
तुम्हारा (मनः) चित्त (विध्वयक) सब ओर से प्राप्त होता हुआ (वि, चारीत)
विचरता है ॥१॥
भावार्थ:-हे सेनाधिपति ! जब संग्राम समय में प्राप्नो तब जो क्रोध
प्रज्वलित क्रोधाग्नि से जलती हुई सेनाएँ शत्रुओं के ऊपर गिरें, उस समय
वे विजय को प्राप्त हों जब तक तुम्हारा बाहुबल न फैले, मन भी अन्याय
में न प्रवृत्त हो तब तक तुम्हारी उन्नति होती है यह जानो ॥१॥

म लोगों को (दुर्ग) शत्रुओं को दुःख से पहुंचने योग्य परकोटा में ८०६ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २३ ।। फिर राजा को कौन दण्ड देने योग्य और निवारने योग्य हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। नि दुर्ग इन्द्र नथियमित्रानभि थे नो मतासो अमन्ति । श्रारे तं शंसं कृणुहि निनित्सोरा नो भर सम्भरणं वसूनाम् ।।२।। पदार्थ:-हे (इन्द्र) दुष्ट शत्रुओं के निवारने वाले राजा (ये) जो (मासः) (अमन्ति) रोगों को पहुंचाते हैं उन (अमित्रान्) सब के साथ द्रोहयुक्त रहने वालों को (नि, अभि, श्नथिहि) निरन्तर सब ओर से मारो हम लोगों से (मारे) दूर उनको फेंको (निनित्सो:) और निन्दा की इच्छा करने वाले से हम लोगों को दूर कर (नः) हम लोगों के (तम्) उस (शंसम्) प्रशंसनीय विजय को (कृणुहि) कीजिये तथा (वसूनाम्) द्रव्यादि पदार्थों के (संभरणम्) अच्छे प्रकार धारण पोषण को (श्रा, भर) सब भोर से स्थापित कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-हे राजा! जो धूर्त मनुष्य ब्रह्मचर्य आदि के निवारण से मनुष्यों को रोगी करते हैं उनको काराघर में बांधो और जो अपनी प्रशंसा के लिये सब की निन्दा करते हैं उनको समझा कर उत्तम प्रजाजनों से अलग रक्खो, ऐसे करने से आपकी बड़ी प्रशंसा होगी ॥२॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। शतं ते शिप्रिनतर्य सुदासे सहस्रं शंसा उत रातिरस्तु । जहि वर्वनुषो मत्यस्यास्मे घुम्नमधि रत्नै च धेहि ।।३।। पदार्थ:-हे (शिप्रिन्) अच्छे मुख वाले राजा (ते) आपके (धनुषः) याचना करते हुए [(मर्तस्य)] पीड़ित मनुष्य की (शतम्) सैकड़ों (ऊतयः) रक्षा प्रादि क्रिया और (सहनम् ) असंख्य (शंसा) प्रशंसा हों (उत) और (सुदासे) जो उत्तमता से देता है उसके लिए (रातिः) दान (अस्तु) हो आप (वनुषः) अधर्म से मांगने वाले पाखण्डी (मय॑स्य) मनुष्य की (वधः) ताड़ना को (जहि) इनो, नष्ट करो तथा (अस्मे) हम लोगों में (ध मनम्) धर्मयुक्त यश और (रत्नं च) रमणीय धन भी (अधि, धेहि) अधिकता से धारण करो ॥३॥ भावार्थ:-हे राजा ! आप सैकड़ों वा सहस्रों प्रकार से प्रजा की पालना और सुपात्रों को देना, दुष्टों का बंधन, प्रजाजनों में कीर्ति बढ़ाना और धन को निरन्तर विधान करो जिससे सब सुखी हों ॥३॥ PUR

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ऋग्वेदः मं०७ । सू० २३ ।।
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प्रवृत्त हैं ॥४॥
फिर वे राजा और प्रजाजन परस्पर में कैसे वर्ते इस विषय को
अगले मन्त्र में कहते हैं।
वाईतो होन्द्र क्रत्वे अस्मि त्वावतोऽवितुः शूर रातौ ।
विश्वेदहानि तविषीद उ ओकः कृणुष्व हरिवो न मर्धीः ॥४॥
पदार्थः -हे (तविषीयः) प्रशंसित सेना वा (हरिवः) प्रशंसित हरणशील
मनुष्यों वाले (शूर) निर्भय (इन्द्र) सेनापति (हि) जिस कारण मैं (विश्वा, इत,
प्रहानि) सभी दिनों (त्वावतः) तुम्हारे समान के (क्रत्वे) बुद्धि वा कर्म के लिये
प्रवृत्त हूं (स्वावतः) और आपके सदृश (अवितः) रक्षा करने वाले के (रातो) दान
के निमित्त उद्यत (अस्मि) हूं उस मेरे लिये (उग्रः) तेजस्वी आप (पोकः) घर
(कृणुष्व) सिद्ध करो, बनाप्रो और अधार्मिक किसी जन को (न) न (म(ः)
चाहो ॥४॥
भावार्थ:-हे धार्मिक राजा! जिससे भाप सबकी रक्षा के लिये
सदा प्रवृत्त होते हो इससे तुम्हारी रक्षा में हम
लोग सर्वदा
फिर उस राजा को क्या अवश्य करना चाहिये इस विषय को
अगले मन्त्र में कहते हैं।
कुत्सां एते हर्यश्वाय शूपमिन्द्रे सहो देवजूत मियानाः ।
सत्रा कृधि सुहना शूर वृत्रा वयं तरुत्राः सनुयाम वाम् ॥५॥
पदार्थ:-हे (शूर) निर्भय जिन (इन्द्रे) परमैश्वर्ययुक्त श्राप में (हर्यश्वाय)
प्रशंसित जिसके मनुष्य वा घोड़े उसके लिये (एते) ये (कुस्साः) वच अस्त्र और शस्त्र
प्रादि समूह हों उनको और (वेबजूतम्) देवों से पाये हुए {शूषम्) बल तथा (सहः)
क्षमा (इयानाः) प्राप्त होते हुए (तक्षत्रा:) दुःख से सबको अच्छे प्रकार तारने वाले
(वयम्) हम लोग (योजन) विज्ञान को (सनुयाम) याचे पाप (सत्रा) सत्य से वृत्रा)
दुःखों को (सहना) नष्ट करने के लिये सुगम (कृषि) करो ॥५॥
भावार्थ:--हे राजा ! यदि राज्य पालने वा बढ़ाने को आप चाहें तो
शस्त्र प्रस्त्र और सेना जनों को निरन्तर ग्रहण करो फिर सत्य आचार को
मांगते हुए निरन्तर बढ़ो और हम लोगों को बढ़ानो ॥५॥
फिर उपदेशक और उपदेश करने योग्यों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
एवा ने इन्द्र वार्यस्य पूर्षि प्र ते महीं सुमति वेंविदाम
इषं पिन्व मघवद्भयः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥

ऋग्वेद: मं० ७ । सू० २६ ।।
पदार्थः - है (इन्द्र) परमैश्वर्य के देने वाले आप (नः) हम लोगों को विद्या
और उत्तम शिक्षा से (प्र, पूधि) अच्छे प्रकार पूरा करो जिससे हम लोग (वार्यस्य)
स्वीकार करने योग्य ते) आपकी (सुमतिम्) उत्तम मति और (महोम्) अत्यन्त
वारणी को (वेविदाम) प्राप्त हों तथा (मघवद्भ्यः) बहुत धन से युक्त सज्जनों से
(सुवीराम्) उत्तम विज्ञानवान् वीर जिसमें होते उस (इषम्) विद्या को प्राप्त होवें
यहां आप हम लोगों की (पिन्य, रक्षा करो और (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से
(न:) हम लोगों की (सदा, एव) सर्वदैव (
(पात) रक्षा करो॥६॥
भावार्थ:-वे ही पढ़ाने वाले धन्यवाद के योग्य होते हैं जो विद्यार्थियों
को शीघ्र विद्वान् और धार्मिक करते हैं और सर्वदैव रक्षा में वर्तमान होते
हुए सब की उन्नति करते हैं ॥६॥
इस सूक्त में सेनापति, राजा और शस्त्र प्रस्त्रों को ग्रहण करना इन अर्थों का
वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के
साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह सप्तम मण्डल में पच्चीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।।
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अथ पञ्चर्चस्य षड्विंशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता।
१। २।३ । ४ त्रिष्टुप् । ५ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ।।
अब पांच ऋचा वाले छब्बीस सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में जीव का
उपकार कौन नहीं कर सकता इस विषय को कहते हैं ।
न सोम इन्द्रमसुतो ममाद नाब्रह्माणो मघवानं सुतासः ।
तमा उक्चं जनये यजुओपन्नृवन्नवीयः शृणवद्या नः ॥१॥
पदार्थ:-हे विद्वानो (यथा) जैसे (प्रसुतः) न उत्पन्न हुआ (सोम:)
महौषधियों का रस जिस (इन्द्रम्) इन्द्रियों के स्वामी जीव को (न) नहीं (ममाद)
हर्षित करता वा जैसे (अब्रह्माणः) चार वेदों का वेत्ता जो नहीं वे (सुतासः) उत्पन्न
हुए (मघवानम्) परमपूजित धनवान् को (न) नहीं आनन्दित करते हैं वह इन्द्रिय-
स्वामी जीव (यव) जिस (नृवत) नृवत् अर्थात् जिसमें बहुत नायक मनुष्य विद्यमान
और (नवीयः) अत्यन्त नवीन (उक्थम्) उपदेश' को (जुजोषत्) सेवता है (न:) हम
लोगों को (शृणवत्) सुनता है (तस्मै) उसके लिये सब प्रकार के विधानों को मैं
(जनये) उत्पन्न करता हूं ॥१॥

८०8 और ऐश्वर्य में प्रकट हुए (भघवानम् धर्म कर्म बहुत धन जिसके उसको (हवन्ते) ऋग्वेदः मं०७ । सू०२६ ॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे बुद्धिमान् मनुष्यो ! जैसे उत्पन्न हुमा पदार्थ जीव को आनन्द देता है जैसे यथावत् वेदविद्या और प्राप्तजन धार्मिक धनाढ्य को विद्वान् करते हैं वैसे उत्पन्न हुई विद्या आत्मा को सुख देती है और शुभ गुण धनाढ्य को बढ़ाते हैं और सत्संग से ही मनुष्यत्व को जोव प्राप्त होता है ॥१॥ फिर किसके तुल्य कौन क्या करता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उक्थउक्थे सोम इन्द्र ममाद नीथेनीथे मघवानं सुतासः । यी समाधः पितरं न पुत्रा संमानदंक्षा अवसे हवन्ते ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (यत्) जो (ईम्) सब अोर से (सबाधः) पीड़ा के साथ वर्तमान (पितरम्) पिता को (समानदक्षाः) समान बल, विद्या और चतुरता जिनके विद्यमान वे (पुत्राः) पुत्र जन (न) जैसे (अयसे) रक्षा आदि के लिये (सुतासः) विद्या ANay 4OES MOM AARAN स्पर्धा करते वा ग्रहण करते हैं और जैसे (सोमः) बड़ी बड़ी ओषधियों का रस वा ऐश्वर्य (उक्थे उपथे) धर्मयुक्त उपदेश करने योग्य व्यवहार तथा (नीथे नीथे) पहुंचाने पहुंचाने योग्य सत्य व्यवहार में (इन्द्रम्) जीवात्मा को (ममाद) हर्षित करता हे उनके साथ वैसा ही आचरण करो ।।२।। भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-जो विद्यार्थी जन जैसे अच्छे पुत्र क्लेशयुक्त माता पिता को प्रीति से सेवते हैं वैसे गुरु की सेवा करते हैं वा जैसे विद्या विनय और पुरुषार्थों से उत्पन्न हुआ ऐश्वर्य, उत्पन्न करने वाले को आनन्दित करता है वैसे तुम लोग वर्तो ॥२॥ फिर मनुष्य किसके तुल्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । चकार ता कृषवन्ननमन्या यानि अवन्ति वेधसः सुतेषु । जनीरिव पतिरेकः समानो नि मामृजे पुर इन्द्रः मुसाः ॥३॥ पदार्यः -- हे विद्वान् ! जैसे (वेधसः) मेधावी जन (सुतेषु) उत्पन्न हुए विज्ञान और बलों में उपदेश करने योग्यों को (यानि) जिन उपदेश-वचनों को तथा (अन्या) और वचनों को (ब्र वन्ति) कहते हैं (ता) उनको आप (नूनम्) निश्चित (कृणवत्) करें वा जैसे (समान:) पक्षपात रहित (पतिः) स्वामी राजा (एकः) अकेला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् (जनीरिव) उत्पन्न हुई प्रजा के समान (स, सर्वाः) सम्यक समस्त प्रजा को (पुरः) पहिले' (नि, मामजे) निरन्तर पवित्र करता है वैसे इसको आप (चकार) करो ॥३॥ AUN ८१० ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २६ ।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! तुम विद्वानों के उपदेश के अनुकूल ही आचरण करो जैसे धार्मिक, जितेन्द्रिय, विद्वान् राजा पक्षपात छोड़के अपनी प्रजा न्याय से रखता है वैसे प्रजाजन इस राजा की निरन्तर रक्षा करें, ऐसा करने से निरन्तर सब को निश्चल सुखलाभ होता है ॥३॥ फिर कौन इस जगत् में राजा होने योग्य होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एवा तमाहुरुत शृंण्व इन्द्र एको विभक्ता तरणिर्मघानाम् । मिथस्तुर ऊतयो यस्य पूर्वीरस्मे भद्राणि सश्चत प्रियाणि ॥४॥ पदार्थ:-(यस्य) जिसकी (पूर्वीः) पुरातन (मिथस्तुरः) परस्पर शीघ्रता करती हुई (ऊतयः) रक्षायें (अस्मे) हम लोगों में (प्रियाणि) मनोहर (भद्राणि कल्याण करने वाले काम (सश्चत) सम्बन्ध करें जो (एक:) एक (मघानाम्) धनों के (विभा) सत्य असत्य का विभाग करने वा (तरणिः) तारने वाला (इन्द्रः) परमै- श्वर्य युक्त जीव धर्म की सेवा करता है (तम्, एव) उसी को प्राप्त शिष्ट धर्मशील सज्जन' धर्मात्मा (आहुः) कहते हैं (उत) निश्चय उसी का उपदेश मैं (शम्बे) सुनता हूं ॥४॥ भावार्थः हे मनुष्यो ! जिसकी प्रशंसा प्राप्त विद्वान् जन करें वा जिसके धर्मयुक्त कर्मों को समस्त प्रजा प्रीति से चाहे, जो सत्य झूठ को यथावत् अलग कर न्याय करे वही हमारा राजा हो ॥४!! फिर विद्वान् जन राजा प्रादि मनुष्यों को धर्म-मार्ग में नित्य अच्छे प्रकार रक्खे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। एवा वसिष्ठ इन्द्रमूतये नृन्कृष्टीनां वृषभं सुते गुणाति । सहस्रिण उप नो माहि वाजान्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥५॥ पदार्थ:-हे विद्वान् (वसिष्ठः) अत्यन्त विद्या में वास जिन्होंने किया ऐसे आप (कृष्टीनाम्) मनुष्यादि प्रजाजनों के बीच' (वृषभम्) प्रत्युत्तम (इन्द्रम्) परमै- श्वर्यवान् जीव और (नन्) नायक मनुष्यों की (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (एव) ही (माहि) सत्कार कीजिये (सुते) उत्पन्न हुए इस जगत् में (सहत्रिणः) सहस्रों पदार्थ जिनके विद्यमान उन (वाजान्) विज्ञान वा अन्नादियुक्त (नः) हम लोगों को जो आप (उप, गृणाति) सत्य उपदेश देते हैं सो निरन्तर मान कीजिये । हे विद्वानो । (यूयम्)

ऋग्वेदः मं०७ । सू० २७॥
तुम (स्वस्तिभिः) कल्याणों से (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा
करो ॥५॥
भावार्थ:- विद्वान् जनो! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे राजा आदि
जन धार्मिक होकर असंख्य धन वा अतल मानन्द को प्राप्त हों, जैसे प्राप
उनकी रक्षा करते हैं वैसे ये प्रापकी निरन्तर रक्षा करें।॥५॥
इस सूक्त में इन्द्र शब्द से जीव, राजा के कर्म और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त
के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह सप्तम मण्डल में छब्बीसवां सूक्त समाप्त हुआ।
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अथ पञ्चचस्य सप्तविंशतितमस्य सूक्तस्य वशिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता।
१।५ विराट् त्रिष्टुप् । २ निवृत्त्रिष्टुप् । ३ । ४ त्रिष्टुप्छन्दः । पैवतः स्वरः ॥
अब पांच ऋचा वाले सत्ताईसवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में सब को
कैसा विद्वान् राजा इच्छा करने योग्य है इस विषय को कहते हैं ।
इन्द्रं नरौँ नेमधिता जन्ते र त्पायाँ युनते धिप्रस्ता
शुरो नृपाता शवसश्चकान आ गोमंति बजे अंजा त्वं नः ।।१।।
पदार्थ:-हे राजा' जो (शूरः) शत्रुओं की हिंसा करने वाले (शवसः) बल से
(चकान:) कामना करते हुए (त्वम्) प्राप' (नुसाता) मनुष्य जिसमें बैठने वा
(गोमति) गौयें जिसमें विद्यमान ऐसे (ब्रजे) जाने के स्थान में (न:) हम लोगों को
(प्रा,भज) अच्छे प्रकार विये, हे राजन् ! जिन (इन्द्रम्) परमैश्वर्य देने वाले आपको
(यत्) जो (पार्याः) पालना करने योग्य (घिय:) उत्तम बुद्धि (युनजते) युक्त होती
हैं (ता:) उनको आप अच्छे प्रकार सेवो । जो (नरः) विद्याओं में उत्तम नीति देने वाले
(नेमपिता) संग्राम में आप को (हवन्ते) बुलाते हैं उनको आप अच्छे प्रकार सेवो ॥१॥
भावार्थ:- जो निश्चय से इस संसार में प्रशंसित बुद्धिवाला, सर्वदा
बल वृद्धि की इच्छा करता हुआ, शिष्ट जनों की सन्मति वर्तने वाला,
विद्वान्, उद्योगी, धार्मिक और प्रजापालन में तत्पर जन हो उसी की सब
कामना करो ॥१॥
फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
य इन्द्र शुष्मो मघवन्ते अस्ति शिक्षा सखिभ्यः पुरुहूत नृभ्यः ।
त्वं हि हळहा मघवन्दिता अपां वृधि परितं न राधः ॥२॥

८१२ ऋग्वेदः मं०७ । सू० २७ ॥ ब candit पदार्थ:-हे (मघवन्) परम पूजित धनवान् (इन्द्र) परमैश्वर्य देने वाले (यः) जो (ते) आपका (शुष्मः) पुष्कल बलयुक्त व्यवहार (अस्ति) है । हे (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त जो आपकी (सखिभ्यः) मित्रों के लिए वा (नुभवः) अपने राज्य में नायक मनुष्यों के लिए (शिक्षा) सिखावट है । हे (मघवन्) बहुधनयुक्त जो आपके (दृळहा) दृढ़ शत्रु सैन्यजन हैं उनसे' (विचेताः) विविध प्रकार वा विशिष्ट बुद्धि जिनकी वह (स्थम्) पाप (हि) ही (परिवृतम्) सब ओर से स्वीकर किये (राधः) धन को (न) जैसे वैसे दृढ़ शत्रुसेनाजनों को (अपा, वृषि) दूर कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-वही राजा सदा बढ़ता है जो अपराधी मित्रों को भी दण्ड देने के विना नहीं छोड़ता, जो ऐसे सदैव उत्तम यत्न करता है जिससे कि अपने मित्र उदासीन वा शत्रु अधिक न हों और जो सदैव विद्या और शिक्षा की वृद्धि के लिये प्रयत्न करता है वही सब दुष्ट और लोककण्टक डाकुओं को निवार के राज्य करने के योग्य होता है ॥२॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इन्द्रो राजा जगतश्चर्षणीनामधि क्षमि विधुरूपं यदास्त । वतो ददाति दाशुषे वसूनि चोदद्राध उपस्तुतश्चिदक् ि।।३।। पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य (जगतः) संसार के बीच (अधि, क्षमि) पृथिवी पर प्रकाशित होता है वैसे (इन्द्रः) शत्रुओं का विदीर्ण करने वाला (राजा) विद्या और नम्रता से प्रकाशमान राजा (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के बीच प्रकाशित होता (यव) जो (विषुरूपम्) व्याप्तरूप धन (अस्ति) है (ततः) उससे (दाशुषे) देने वाले के लिए (वसूनि) धनों को (ददाति) देता और (उपस्तुतः) समीप में प्रशंसा को प्राप्त हुए (चित) के समान (अर्वाक्) नीचे प्राप्त होने वाला सबको (राध:) धन के प्रति (चोवत) प्रेरणा देवे वही राज्य करने के योग्य होता है ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा आदि जन सूर्य के समान राज्य में दण्ड प्रकाश किये और सुख के देने वाले होते हैं वे ही सब सुख पाते हैं ॥३॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। न चिन्न इन्द्रो मघवा सहूती दानो वाजं नि यमते न ऊती । अन्ना यस्य दक्षिणा पीपार्य वामं नृभ्यो अभिवाता सखिभ्यः ॥४॥ - AirA SAMA Ram APP m M ऋग्वेदः मं०७। सू० २७ ।। पदार्थ:--हे मनुष्यो ! जो (मघवा)बहुत धन युक्त (दानः) देने वाला (इन्द्रः) बिजुली के समान विद्या में व्याप्त (नः) हम लोगों को (सहूती) एक सो प्रशंसा (उत्या) तथा रक्षा आदि क्रिया से (नः) हम लोगों के लिए (वाजम्) धन वा अन्न को (नियमते) निरन्तर देता है (यस्य) जिसकी (चित्) निश्चित (सखिभ्य:) मित्र (नृभ्यः) मनुष्यों के लिए (पनूना) पूरी (अभिवीता) सब ओर से व्याप्त अभय (दक्षिणा) दक्षिणा और (वामम्) प्रशंसा करने योग्य कर्म (पीपाय) बढ़ता है वह सब के लिए (नु) शीघ्र सुख देने वाला होता है ॥४॥ भावार्थ:- जो राजा आदि जन यथावत् पुरुषार्थ से सब मनुष्यों को अधर्म से धर्म में प्रवृत्त करा अभय उत्पन्न करते हैं वे प्रशंसनीय होते हैं ॥४॥ फिर राजा प्रजाजन परस्पर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। नू इन्द्र राये वरिवस्कृषी न आ ते मनो वस्याम मघायं । गोमदश्वविद्रयवद्वयन्तो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥५॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) धन की उन्नति के लिए प्रेरणा देने बाले पाप (राये)धन के लिये (न:) हमारी (वरिवः) सेवा (कृषि) करो जो (ते) आपका (मनः) चित्त है उसको (मघाय) धन के लिए हम लोग (नु) शीघ्र (मा, ववृत्याम) सब ओर से वत्त (गोमत्) बहुत' गो आदि वा (अश्वावत्) बहुत घोड़ों से युक्त वा (रथवत्) प्रशंसित रथ आदि से युक्त धन को (व्यन्तः) प्राप्त होते हुए (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) उत्तम सुखों से (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करो ।।५।। भावार्थ:-हे राजा! जैसे हम लोग आपको राज्य की उन्नति के लिये प्रवृत्त करावें वैसे हम लोगों को धनप्राप्ति के लिये प्रवृत्त करायो। सब आप लोग परमैश्वर्य को प्राप्त होकर हमारी रक्षा में निरन्तर प्रयत्न me bheen dah । करो॥५॥ इस सूक्त में इन्द्र, सेनापति, राजा, दाता, रक्षा करने वाले और प्रवृत्ति कराने वाले के गुणों का और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में सत्ताईसवां सूक्त समाप्त हुधा ॥

८१४ ऋग्वेदः मं०७ । सू०२८॥ अथ पञ्चर्चस्याष्टविंशतितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ । २ ॥ ५ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ भुरिपङ्क्तिः । ४ स्वरादपक्ति- छन्वः। पञ्चमः स्वरः॥ AMAR मा अब पांच ऋचावाले अट्ठाईसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में वह राजा क्या करे इस विषय को कहते हैं । ब्रह्मा ण इन्द्रोपं याहि विद्वानर्वाञ्चस्तै हरयः सन्तु युक्ताः । विश्य चिद्धि त्या विहयन्त मा अस्माकमिच्छृणुहि विश्वमिन्द ॥१॥ पदार्थ:-हे (विश्वमिन्द) सब को फेंकने वा (इन्द्र) परमैश्वर्य और विद्या की प्राप्ति कराने वाले (विद्वान्) विद्यावान् श्राप (न:) हम लोगों को (ब्रह्म) धन वा अन्न (उप, याहि) प्राप्त करामो जिन (ते) आपके (मर्वाचः) नीचे को जाने वाले (हरयः) मनुष्य (युक्ताः) किये योग (सन्तु) हों (चित्) और जो (हि) ही (विश्वे) सब (भाः) मनुष्य (त्या) आपको (वि, हवन्त) विशेषता से बुलाते हैं उन के साथ (अस्माकम्) हमारे वाक्य को (इव) ही (शृणुहि सुनिये ॥१॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सत्य न्यायवृत्ति से राजभक्त हों वे राज्य में सत्कार किये हुए निरन्तर बसें फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । हवं त इन्द्र महिमा व्यानड् ब्रह्म यत्पासि शवसिन्नषीणाम् । आ यद्वजं दधिषे हस्त उग्र घोरर सन्क्रत्वा जनिष्ठा अपाळहा ॥२॥ पदार्थ-हे (शय सिन्) बहुत प्रकार के बल और (उग्न) तेजस्वी स्वभाव युक्त (इन्द्र) दुष्टों के विदारने वाले राजा (यत्) जो (ते) आप का (महिमा) प्रशंसा- समूह (हवम्) प्रशंसनीय वारिणयों के व्यवहार को और (ब्रह्म) धन को (व्यान) व्याप्त होता है तथा पाप (ऋषीणाम् ) वेदार्थ वेत्ताओं के प्रशंसनीय वारणीव्यवहार की (पासि) रक्षा करते हो और (यत) जिस (वयम्) शस्त्र समूह को (हस्ते) हाथ में (मा, दधिषे) अच्छे प्रकार धारण करते हो और (घोरः) मारने वाले (सन्) हो कर (क्रत्वा) प्रज्ञा वा कर्म से (अषाळहाः) न सहने योग्य शत्रु सेनामों को जनिष्ठाः) प्रकट करो अर्थात् ढिठाई उन की दूर करो सो तुम हम लोगों से सत्कार पाने योग्य हो ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो शस्त्र और अस्त्रों के प्रयोगों का करने धनुर्वेदादिशास्त्रों का जानने और प्रशंसायुक्त सेना वाला हो और जिस की aa वे (दुमित्रास:) दुष्ट मित्र हैं और जो (हि) निश्चित (क्षितयः) मनुष्य सत्य कहते हैं। ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २८ ।। पुण्यरूपी कीत्ति वत्तंमान है वही शत्रुओं के मारने और प्रजा जनों के पालने में समर्थ होता है ॥२॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तव प्रणीतीन्द्र जोडुवानान्तसं यन्नृन्न रोदसी निनथे । महे क्षत्राय शव॑से हि जज्ञेऽजि चित्ततुंजिरशिश्नत् ।।३।। पदार्थ:-है (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त (हि) जिस कारण आप (महे) महान् (क्षत्राय) राज्य धन और (शवसे) बल के लिये (जज्ञे) उत्पन्न होते (तूतुजिः) बलवान होते हुए हिंसक लोगों को (चित्) भी आप (अशिश्नत) मारते और (यत्) जो (जोहुवानान्) निरन्तर बुलाये हुए (नन्) जन और (अत्तजिम्) निरन्तर न हिंसा करने वाले को (रोदसी) आकाश और पृथिवी के (न) समान प्राप (सं, निनेथ) अच्छे प्रकार पहुंचाते हो उन (तब) श्राप की (प्रणीती) उत्तम नीति के साथ हम लोग राज्य पालें ॥३॥ भावार्थ-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो राजपुरुष सूर्य और पृथिवी के समान समस्त प्रजाजनों को धारण कर धर्म को पहुंचावें वे नीति जानने वाले समझने चाहिये ॥३॥ फिर मनुष्यों को कैसे वर्तना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। एभिन इन्द्राईभिर्दशस्थ दुर्मित्रासो हि क्षितया पर्वन्ते । प्रति यच्चष्टे अनृतमनेना अव द्विता वरुणो मायी पदार्थ:-- है (इन्द्र) दोषों के विदीर्ण करने वाले जो (अनृतम्) झूठ कहते हैं सात् ॥४॥ ato womer ARE ये (एभिः) इन वर्तमान (अहभिः) दिवसों के साथ पबन्ते) पवित्र होते हैं इनके साथ श्राप (नः) हम लोगों को (बशस्य) बीजिये और अनेना:) निष्पाप अाप (यत्) जिसके (प्रति) प्रति (चष्टे) कहते हैं (द्विता) तथा दो का होना (वरुणः) जो स्वीकार करने योग्य वह और (मायो) उत्तम बुद्धिमान होता हुआ जन (नः) हम लोगों को सत्य का (अवसाद) निश्चय कर देवे ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो यहां झूठ कहते हैं वे अधर्मात्मा पुरुष हैं और जो सत्य कहते हैं वे धर्मात्मा हैं ऐसा निश्चय करो ॥४॥ फिर विद्वान् जन क्या उपदेश करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।

(इन्द्रम्) दुष्ट शत्रुओं के विदीर्ण करने वाले को (यत) जो (ददत) देवें (इत्) उसी ८१६ ऋग्वेदः म०७ । सू० २६॥ वीचे मेदिन्द्र मघवानमेन महो रायो राधसो यदन्नः । यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिमिः सदा ना॥५॥ पदार्थः-हे विद्वानो (यः) जो (प्रचंतः) सत्कार करते हुए (नः) हम लोगों के (महः) महान् (राधसः) समृद्ध (रायः) धन सम्बन्ध के (भविष्ठः) प्राप्त होने वाला (ब्रह्मकृतिम) जिसके धन की क्रिया हैं (एनम्) इस (मघवानम) परमैश्वर्यवान् ama को हम लोग (बोचेम) कहें (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हमारी (सबा) सर्वदेव (पात) रक्षा करो ॥५॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! जैसे हम लोग राजा आदि मनुष्यों के प्रति सत्य का सर्वदा उपदेश करें वैसे तुम भी उपदेश करो, ऐसे परस्पर की रक्षा कर उन्नति विधान करनी चाहिय ।।५।। इस सूक्त में इन्द्र , विद्वान्, राजगुणों और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तव मण्डल में अट्ठाईसवां सूबत समाप्त हुमा ।। अथ पञ्चर्चस्यकोनत्रिशत्तमस्य सूतस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ स्वरापतितः । ३ पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २ विरात्रिष्टुप् । ४ । ५ निस्त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब पांच ऋचा वाले उनतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में किसको कौन बनाना चाहिये इस विषय को कहते हैं । अयं सोम इन्द्र तुभ्य सुन्व आ तु म याहि हरिवस्तदोकाः । पिबा त्यस्य सुपुतस्य चारोदेदो मघानि मधनियानः ॥१॥ पवार्थ:-हे (मघवन्) बहुधन और (हरिश:) प्रशस्त मनुष्य युक्त (इन्द्र) दारिद्रय विनाशने वाले जो (प्रयम्) यह (सोमः) ओषधियों का रस हैं जिसको मैं (त) तो (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (प्रसन्वे) खींचता हूं उसको तुम (पिब) पीओ (तदोका:) वह श्रेष्ठ गृह जिसका है ऐसे होते हुए (भायाहि) मानो (मस्य) इस (सषुतस्य) सुन्दर निर्माण किये और (चारोः) सुन्दर जन के (मघानि) धनों को (इयान:) प्राप्त होते हुए हमारे लिये (दद:) देसी ॥१॥ AINE NA . Bा ना२॥ ArAm OF00 (विश्वाः) सब (मता ऋग्वेदः मं०७ । सू० २६ ।। ८१७ भावार्थ:- जो मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से उत्पन्न किये हुए सर्व- रोग हरने और बुद्धि बल के देने वाले, बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को पीते हैं वै सुख और ऐश्वर्य पाते हैं ॥१॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मबन में कहते हैं। ब्रह्मन्बीर ब्रह्मति जुषाणोऽर्वाचीनो इरिभिर्याहि तूर्यम् । अस्मिन्न षु सर्वने मादयस्वोप ब्रह्मांणि शृणक इमा पवार्थ:-हे (ब्रह्मन्) चार वेदों के जानने वाले (वीर) समस्त शुभगुरणों में व्याप्त (ब्रह्मकृतिम्) परमेश्वर की कृति जो संसार इसको (जुषाणः) सेवते हुए (अर्वाचीनः) वर्तमान समय में प्रसिद्ध हुए आप (हरिभिः) अच्छे गुणों के आकर्षण करने वाले मनुष्यों के साथ (तूयम्) शीघ्र (याहि) जानो (अस्मिन्) इस (सबने) सवन में अर्थात् जिस कर्म से पदार्थों को सिद्ध करते हैं उसमें हम लोगों को (माद- यस्य) आनन्दित कीजिये (न:) हमारे (इमा) इन (ब्रह्माणि) पढ़े हुए वेदवचनों को (स, उ, उप, श्रृणवः) उत्तम प्रकार तर्क वितर्क से समीप में सुनिये ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वन् ! आप सृष्टि के क्रम को जान कर हमको जत- लामो, इसमें पढ़ाना पढ़ना काम और पढ़े हुए की परीक्षा करो और विद्या- दान से शीघ्र प्रमोद देओ।।२।। कौन पढ़ाने और पढ़ने वाले प्रशंसा करने योग्य हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । का ते अस्त्यरकृतिः सुक्तः कदा नूनं ते मघवन्दाशेम । निश्वां मतीरा ततने त्वायावां मा इन्द्र शृणवो हवेमा ॥३॥ पवार्थ:-हे (मघबन्) बहुधनयुक्त (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य सम्पन्न (का) कौन (ते) आपका (अरकृतिः) अलंकार (अस्ति) है (सूक्तैः) और अच्छे प्रकार कहा है अर्थ जिनका उन वेद-वचनों से (ते) आपको (नूनम्) निश्चित प्रापकी बुद्धि से मैं (श्रा ततने) विस्तार करू (आय) इसके अनन्तर आप (मे) मेरे (इमा) इन (हवा) सुने वाक्यों को (शृणवः) सुनो ॥ ३॥ भावार्थ:-वे अध्यापक श्रेष्ठ होते हैं जो इन अपने विद्यार्थियों को कब विद्वान् करें ऐसी इच्छा करते हैं और सब के लिये सत्य उत्तम ज्ञानों को देते हैं और वे ही विद्यार्थी श्रेष्ठ हैं जो उत्साह से अपने पढ़े हुए की Magar tion 100 MAA AND - ८१८ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० २६ ॥ उत्तम परीक्षा देते हैं तथा वे ही परीक्षा करने वाले श्रेष्ठ हैं जो परीक्षा में किसी का पक्षपात नहीं करते हैं ॥३॥ कौन पढ़ाने वाले अतिश्रेष्ठ हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उतो घा ते पुरुष्या३' इदासन्येषां पूर्वेषामभृणोषीणाम् । अधाहं त्वा मघवञ्जोहवीमि त्वं न इन्द्रासि प्रमतिः पिते ॥४॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) विद्या ऐश्वर्या से सम्पन्न (इन्द्र) विद्या ऐश्वर्य देने बाले विद्वान् जो पाप (येषाम्) जिन (पूर्वेषाम्) पहिले जिन्होंने विद्या पढ़ी उन (ऋषीणाम्) ऋषिजनों से वेदों को (प्रशृणोः) सुनो (उतो) और जो (पुरुष्याः) पुरुषों में सत्पुरुष (घ) ही (आसन) होते हैं (ते) वे (नः) हमारे अध्यापक हो जिससे (स्थम्) आप हमारे (पितेव) पिता के समान (प्रमतिः) उत्तम बुद्धि वाले (असि) हैं इससे (प्रथ) इसके अनन्तर (अहम् ) मैं (त्या) प्रापकी (इत्) ही (जोह- बीमि) निरन्तर प्रशंसा करू ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-जो विद्वान् पितृजन पुत्रों के समान विद्यार्थियों की पालना करते हैं वे ही सत्कार करने और प्रशंसा करने योग्य होते हैं ॥४॥ फिर कौन यहाँ संसार में सब की रक्षा करने वाले होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वोचेमेदिन्द्र मघवानमेनं महो रायो राधसो यददन्नः। यो अर्चतो ब्रह्मकृतिमविष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो (यूयम्) विद्यावृद्ध तुम (स्वस्तिभिः) उत्तम शिक्षाओं से (न:) हम लोगों की (सदा) सदा (पात) रक्षा करो। हे परीक्षा करने वाले (य:) जो (प्रषिष्ठः) अतीव रक्षा करने वाला (ब्रह्मकृतिम् ) वेदोक्त सत्य क्रिया को (न:) हम लोगों के लिये ददत्) देवे वा (यत्) जिसको (प्रचंतः) सत्कार किये हुए जन का (महः) महान् (राधसः) शरीर और आत्मा के बल का बढ़ाने वाला (रायः) विद्यारूपी धन का उत्तम प्रकार से देने वाले (एनम्) इस (मघवानम्) प्रशस्त विद्या धनयुक्त (इन्द्रम्, इद) अविद्यान्धकार विदीर्ण करने वाले अध्यापक की हम लोग (बोचेम) प्रशंसा कहें उसकी तुम भी प्रशंसा करो ॥५॥ भावार्थ:-जो जन नाश न होने वाले सर्वत्र सत्कार के हेतु विद्याधन के देने वाले हैं वे ही सबके यथावत् पालने वाले हैं ॥५॥ an ALM नाण) शत्रु सेन्य जन आदि को (रन्धय) मारो ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३०॥ इस सूक्त में इन्द्र, सोमपान, अध्यापक, अध्येता, परीक्षक और विद्या देने वालों के गुण और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में उनतीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ पञ्धर्चस्य त्रिशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता । १ विराट् त्रिष्टप । २ निवृत्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ३ निचत्पङ्क्तिः । ४ । ५ स्वराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । अब पांच ऋचा वाले तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है उसके प्रथम मन्त्र में कौन राजा प्रशंसा करने योग्य होता है इस विषय को कहते हैं । आ नो देव शवसा याहि शुष्मिन्भवा वृध इन्द्र रायो अस्य । महे नम्णाय नृपते सुवज्र महि क्षत्राय पौंस्याय शुर ।।१।। पवार्थः - है (शूर) निर्भय (सुवन) उत्तम शस्त्र और प्रस्त्रों के चलाने में कुशल (नृपते) मनुष्यों की पालना करने वाले (शुष्मिन्) प्रशंसित बलयुक्त (देव) विद्या गुण संपन्न (इन्द्र) परम ऐश्वर्यवान् राजन् प्राप (शवसा) उतम बल से (नः) हम लोगों को (मायाहि) प्राप्त होप्रो (मस्य) इस (रायः) धन वा राज्य की (बुधः) वृद्धिसंबन्धी (भव) हूजिये और (महे) महान् (नम्णाय) धन के तथा (महि) महान् (क्षत्राय) राज्य के और (पौस्याय) पुरुष विषयक बल के लिये प्रयत्न करो ॥१॥ भावार्थ:-वही राजा श्रेष्ठ होता है जो राज्य की रक्षा में निरन्तर उत्तम यत्न करे और धनविद्या की वृद्धि से प्रजा को अच्छे प्रकार पुष्टि देकर सुखी करे ॥१॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । हवन्त उ त्वा हव्यं विवाचि तनूषु शुराः सूर्यस्य सातौ । त्वं विश्वेषु सेन्यो जनेषु त्वं वृत्राणि रन्धया सुहन्तुं ॥२॥ पदार्थ:-हे परमैश्वर्ययुक्त जो (स्वम्) प्राप(विश्वेषु) सब (जनेष) मनुष्यों में (त्वम्) भाप जैसे वीर होता हुआ जन शत्रुओं को अच्छे प्रकार हने वैसे उनको प्राप (सहन्त) मारो (सूर्यस्य) सवितृमण्डल की किरणों के समान राज्य के बीच और (तनूष) फैला है बल जिनमें उन शरीरों में प्रकाशमान (शूराः) शत्रुओं के मारने ।

८२० ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३० । JHAR mea Pr Laline वाले जन जिन (हव्यम्) बुलाने योग्य (स्वा) आपको (सातौ) संविभाग में अर्थात् बांट चूंट में वा (विवाचि, उ) विरुद्ध वाणी जिसमें होती है उस संग्राम में (हवन्ते) बुलावें उनको आप बुलावें ॥२॥ भावार्थ:-वही राजा सर्वप्रिय होता है जो न्याय से प्रजा की अच्छी पालना कर संग्राम जीतता है।॥२॥ फिर वह राजा कैसा होता हुआ क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अहा यदिन्द्र मुदिनी व्युच्छान्दधो यरकेत मुष्मं समत्से । न्य १ मिः सौंददसुरो न होता हुवानो अत्र सुभगाय देवान् ॥३॥ पवार्थ:-हे (इन्द्र) सूर्य के समान वर्तमान (अत्र) इन (समत्स) संग्रामों में (यत्) जिन (देवान्) विद्वानों को (सुभगाय) सुन्दर ऐश्वर्या के लिये (असरः) जो प्राणों में रमता है उस (होता) होम करने वाले के (न) समान शत्रुओं को युद्ध की प्राग में (हुवानः) होमते अर्थात् उनको स्पर्धा से चाहते हुए (अग्निः) अग्नि के समान माप (नि, सीदत) निरन्तर स्थिर होते हो और (यत्) जिस (उपमम् ) उपमा दिलाने वाली (कैलुम् ) बुद्धि के विषय को (महा) साधारण दिन वा (सुदिना) सुख करने वाले दिनों दिन (व्युच्छान्) विविध प्रकार से वसाये हुए द्विानों को संग्रामों में (दधः) धारण करो सो आप जीत सकते हो ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-वही राजा जीतता है जो उत्तम शूरवीर विद्वानों को अपनी सेना में सत्कार कर रक्खे जैसे होम करने वाली अग्नि में साकल्य होमता है वैसे शस्त्र और अस्त्रों की अग्नि में शत्रुओं को होमे ॥३॥ फिर किसकी उत्तम जीत और प्रशंसा होती है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। वयं ते त इन्द्र ये च देव स्वदन्त शुर ददंतो मघानि । यच्छो सूरिभ्य उपमं वरूथं स्वाभुवो जरणामश्नवन्त ॥४।। पवार्थ:-हे (शूर) शत्रुओं के मारने और (इन्द्र) परम ऐश्वर्य देने वाले (देव) विद्वान् जन (ये) जो (सूरिभ्यः) विद्वानों के लिये (मघानि) धनों को (बदतः) हुए (ते) आपके (उपमम्) जिससे' उपमा दी जाती उस कर्म की (स्तवन्त) प्रशंसा करते हैं (च) और जो (स्वाभुवः) अच्छे प्रकार सब ओर से उत्तम होते हैं वे जन (वरूयम्) घर और (जरणाम्) जरावस्था को (प्रश्नवन्त) प्राप्त होते हैं (ते) वे (वयम्) हम लोग आपकी प्रशंसा करें पाप हम लोगों के लिये धनों को (यच्छ) देनो॥४॥ CHUN

ऋग्वेदः मं०७। सू०-३१॥
R
opra
-
भावार्थः --जो राजा अच्छी परीक्षा कर विद्वानों के लिये धन आदि
दे और सत्कार कर इन विद्या अवस्था वृद्ध धार्मिक जनों को सेना आदि के
अधिकारों में नियुक्त करता है उसकी सर्वदा जीत और प्रशंसा होती
है।॥४॥
फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
वोचेमेदिन्द्र मघवानमेनं महो रायो राधसो यदन्नः।
थो अर्चतो ब्रह्मकृतिमर्विष्ठो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥५॥
पदार्थः --हे मनुष्यो यः) जो (भविष्ठः) अतीव रक्षा करने वाला (अर्चतः)
सत्कार करते हुए (न:) हम लोगों को प्राप्त होकर (ब्रह्मवतिम्) परमेश्वर ने उपदेश
की हुई प्रिय वाणी (दवत्) देता है (यव) जिस (एनन्) इस (मघवानम्) बहुत धन
और ऐश्वर्य से युक्त तथा (महः) महान् (राधसः) उत्तम समृद्धि करने वाले (रायः)
धन की वृद्धि करने और (इन्द्रम्) भय विदीर्ण करने वाले विषय को (ोचेम) सत्य
कहें (इत्) उसी को तुम भी सत्य उपदेश करो। हे राजा प्रादि जनो (यूयम्) तुम
(स्वस्तिभिः) सर्वसुखों से (न:) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा
करो ॥५॥
भावार्थ:-यदि सब मनुष्य सत्य के उपदेश करने वाले हों तो राजा
कभी ज्ञानहीन न हो, जब राजा धर्मिष्ठ हो तब सब मनुष्य धर्मात्मा हों
ऐसे परस्पर की रक्षा से सदैव सुख तुम लोग पानी ॥५॥
इस सूक्त में इन्द्र, राजा, प्रजा, भृत्य और उपदेशक के काम का वर्णन होने से इस
सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।।
यह सप्तम मण्डल में तीसयां सूक्त समाप्त हुन्या ।।
-
अथ द्वादशस्यकत्रिशत्तमस्य सुक्तस्य सिष्ठ ऋषिः । इन्द्रो देवता ।
१ विरागायत्री। २।८ गायत्री । ६ । ७ । ६ निद्गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः ।
३ । ४।५ प्राचयुष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः। १० । ११ भुरिगनुष्टुप् । १२
अनुष्टुप् छन्दः । गान्धारः स्वरः।।
अब बारह ऋचावाले इकतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मात्र में मित्रों
को मित्र के लिये क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं।
प्र व इन्द्राय मादन हर्यश्वाय गायत । सखायः सोश पाने ॥१॥

८२२ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३१ ॥ पदार्थ:-हे (सखायः) मित्रो (व:) तुम्हारे (हर्यश्वाय) मनुष्य वा हरणशील घोड़े जिसके विद्यमान हैं उस (सोमपान्ने) सोम पीने वाले (इन्द्राय) परमैश्वर्यवान् के लिये (मादनम्) प्रानन्द तुम (प्र, गायत) अच्छे प्रकार गाओ ||१|| भावार्थ:-जो मित्रजन अपने मित्रजनों को प्रानन्द उत्पन्न करते हैं वे मित्र होते हैं ॥१॥ फिर विद्वान्जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शंसेदुक्थं सुदानव उत घुझं यथा नर । चकमा सत्यराधसे ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वान् (यथा) जैसे (नरः) मनुष्य हम लोग (सदानवे) उत्तम दान के लिये वा (सत्यराधसे) सत्य जिसका धन है उसके लिये (धु क्षम्) मनोहर (उक्थम्) प्रशंसनीय काम (चकृम) करें वैसे आप (इत) ही (शंसे) प्रशंसा करें (उत) ही ॥२॥ भावार्थ:-- इस मंत्र में उपमालंकार है-हे विद्वानो ! जिसका धर्म से उत्पन्न हुआ धन है और सुपात्रों के लिये दान वर्तमान है उसी को उत्तम जानो ॥२॥ फिर वह विद्वान् कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। त्वं न वाजयुस्त्वं गज्युः शतक्रतो। त्वं हिरण्ययुर्वसो।।।। एवार्थ:--हे (शतक्रतो) असंख्य प्रज्ञावान् (वसो) वसाने वाले (इन्द्र) परम ऐश्वर्ययुक्त (वाजयुः) प्रशसित अन्न वा धन अपने को चाहने वाले (त्वम्) आप (गव्युः) पृथिवी वा उत्तम वाणी की कामना करने वाले (स्वम्) आप (हिरण्ययुः) सुवर्ण की कामना करने वाले (स्वन्) श्राप (नः) हमारी रक्षा करने और पढ़ाने वाले हूजिये ॥३॥ भावार्थ:-सब मनुष्यों को यही इच्छा करनी चाहिये जो धर्मात्मा प्राप्त विद्वान् राजा अध्यापक वा परीक्षा करने वाला है सो निरन्तर उन्नति करने हारा हो ॥३॥ फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वयमिन्द्र वायवोऽभि प्र णोनुमो वृषन् । विद्धि त्व१स्य नो वसो ॥४॥ पवार्थ:-हे (वसो) वसाने (वृषन्) बल रखने और बल' के देने वाले (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्ययुक्त राजा वा अध्यापक (त्वायवः) आपकी कामना करने वाले date प ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३१ ।। ८२३ (वयम्) हम लोग आपको (अभि, प्र णोनुमः) सब ओर से अच्छे प्रकार निरन्तर प्रणाम करें प्राप (न:) हमको (तु) तो (अस्थ) इस राज्य के रक्षा करने वाले (विद्धि) जानो ॥४॥ भावार्थ:-जैसे धार्मिक प्रजाजन धार्मिक राजा की कामना करते और उसको नमते हैं वैसे ही राजा इस धार्मिकी प्रजा की कामना करे और निरन्तर नमें ॥४॥ फिर राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। मा नो निदे च वक्तवेऽर्यो रन्धीरराव्णे । त्वे अपि ऋतुर्मम ॥५॥ पदार्थ:-हे राजा (अर्थः) स्वामी होते हुए जो (मम, त्वे) मेरी तुम्हारे बीच (ऋतः) उत्तम बुद्धि है उसको (मा) मत (रन्धीः) नष्ट करो (अपि) किन्तु (न:) हमारे (वक्तवे) कहने योग्य (अराणे) न देने वाले के लिये और (निदे) निन्दक के लिये (च) भी निरन्तर दण्ड देप्रो. ॥शा भावार्थ:- राजा सदैव विद्या, धर्म और सुशीलता बढ़वाकर निन्दक, दुष्ट मनुष्यों को निवार के प्रजा को निरन्तर प्रसन्न करे ॥५॥ फिर वह कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वं वर्मासि समयः पुरोयोधश्च वृत्रहन् । त्वया प्रति ब्रवे युजा ।।६।। युद्ध करने वाले (सप्रथः) प्रख्याति प्रशंसा के सहित (धर्म, च) और कवच के समान (असि) हैं जिस (युजा)न्याय से युक्त होने वाले (स्वया) अापके साथ मैं (प्रति, अवे) प्रत्यक्ष उपदेश करता हूं सो आप (पुरः) आगे रक्षा करने वाले हूजिये ।।६।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा सत्कीर्ति, सुशील, निरभिमान, विद्वान् हो तो उसके प्रति सब सत्य बोलें और वह सुनकर प्रसन्न हो ॥६।। फिर उसकी विद्या और विनय क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। महाँ उतासि यस्य तेऽनु स्वधावरी सईः । मम्नाते इन्द्र रोदसी ॥७॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) राजा जैसे (महान्) बड़ा सूर्य है वैसे (यस्य) जिसके सकाश से (स्वधावरी) बहुत अन्न की देने वाली (रोवसी) आकाश और पृथिवी (अनु, मन्नाते) अनुकूलता से अभ्यास करते हैं उन (ते) आपके वैसे ही सेना और राज्य हों (उत) मौर जिससे आप महान् (असि) हैं इससे (सहः) बल को ग्रहण कर निर्बलों को पालो॥७॥ 440 D NAMA ८२४ ऋग्वेदः मं०७ । सू०३१॥ - क भावार्थः -- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जिस राजा की प्रजा और सेना धार्मिक और सुरक्षित हों उसका सूर्य के समान प्रताप होता है ॥७॥ कौन प्रशंसा करने योग्य हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तं त्यो मरुत्वती परि भुवद्वाणी सयावरी । नक्षमाणा सह धुभिः ॥८॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जिन (वा) आपको (मरुत्वती) जिसमें प्रशंसायुक्त मनुष्य विद्यमान (सयावरी) जो साथ जाती (नक्षमाणा) और सब विद्यानों में व्याप्त होती हुई (वाणी) वारणी (धभिः) विज्ञानादि प्रकाशों के (सह) साथ (परिभवत्) सब ओर से प्रसिद्ध हो (ता) उन आपको हम लोग सब ओर से भूषित करें।८।। भावार्थ:-जिस विद्वान् राजा वा उपदेशक विद्वान् की सकलविद्या- युक्त वाणी उत्तम और कार्य करने वाले उपदेश के योग्य हो वही सब प्रशंसा को योग्य होता है।॥८ फिर किस मनुष्य को सब नमते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। असिस्त्वान्विन्दवो सुबन्दस्ममुष धार्वि । सन्तै नमन्त कृष्टया ॥९॥ पदार्थ:--हे विद्वान् जो (अध्वांसः) उत्कृष्ट (इन्दवः) ऐश्वर्ययुक्त आनन्दित (अनु, भुवन्) अनुकूल होते हैं (ते) वे (कृष्टयः) मनुष्य' (उपवि) समीपस्थ प्रकाशित वा अप्रकाशित विषय में (अस्थम्) शत्रुओं का उपक्षय विनाश करने वाले (स्था) प्रापको (सन्नमन्त) अच्छे प्रकार नमते हैं 111 भावार्य:-जिस राजा के समीप में भद्र, धार्मिक इन हैं उसकी नम्रता से सब प्रजा नन्न होती है ।।६।। फिर राजप्रजाजन परस्पर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। प्र वो महे महिष्टधै भरध्वं प्रचेतसे घ सुमति कृणुध्वम् । विशः पूर्वीप्र चरा चर्षणिमाः ॥१०॥ पदार्थ:-हे विद्वानो! जैसे हम लोग (व:) तुम्हारे लिये उत्तम पदार्थों को दें वैसे तुम हम लोगों के (महे) महान् व्यवहार के लिए (महिवृधे) तथा बड़ों के बढ़ने और (प्रचेतसे) उत्तम प्रज्ञा रखने वाले के लिए (सुमतिम्) सुन्दर मति को (प्र, भरध्वम्) उत्तमता से धारण करो, हम लोगों को (पूर्वोः) प्राचीन पिता पिता- महादिकों से प्राप्त (विशः) प्रजाजनों को (भ, कृणुध्यम) विद्वान् अच्छे प्रकार करो SHAND RE RAM on me ae . (अनुत्तमन्युम) जिसका प्रेरणा नहीं किया गया क्रोध उस (राजानमा ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३१ ।। ८२५ (वर्षणिप्रा.) जो मनुष्यों को व्याप्त होता वह राजा आप न्याय में (ज, चर) प्रचार करो ॥१०॥ भावार्थ:-- इस मंत्र में वाचकलप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो! जैसे विद्वान् जन तुम लोगों के लिये शुभगुण और पुष्कल ऐश्वर्य विधान करते हैं वैसे तुम इनके लिये श्रेष्ठ नीति धारण करो ॥१०॥ फिर वे विद्वान् जन क्या उत्पन्न करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। उरुव्यचसे महिने मृवृक्तिमिन्द्राय ब्रह्म जनयन्त विप्राः । तस्य व्रतानि न मिनन्ति धीराः॥११॥ पदार्थ:-हे (धीराः) ध्यानवान् (विप्राः) विद्वानो आप लोग (उरुष्यचसे) बहुत विद्याओं में व्यापक (महिने) सत्कार करने योग्य (इन्द्राय) परमेश्वर्यवान् के लिये (सुवृक्तिम्) उत्तमता से अन्याय को वर्जते हैं जिससे उसको और (ब्रह्म) धन वा अन्न को (जनयन्त) उत्पन्न करते हैं (तस्य) उनके (अतानि) सत्य भाषण आदि कर्म कोई (न) नहीं (मिनन्ति) नष्ट करते हैं ॥११॥ भावार्थ:-जो राजा के लिये बहुत धन उत्पन्न करते और असत्य आचरण को निवृत्त कर सत्य आचरण प्रसिद्ध करते हैं वे पूज्य होते हैं ॥११॥ फिर कैसे मनुष्य को सत्य वाणी सेवती है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। इन्द्रं वाणीरनुत्तमन्युभेव सत्रा राजानं दधिरे सहध्यै । हर्याय बहया समापीन् ॥१२॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जो (धाणीः) सकल विद्यायुक्त वाणी (सत्रा) सत्य से (इन्द्रम) अविद्या विदीर्ण करने वाले विद्वान् को (सहध्यौ) सहने को (दधिरे) धारण करते तथा (भापीन्) जो व्याप्त होते हैं उनको (सम्) अच्छे प्रकार धारण करते हैं। (एव) उसी (हर्यश्वाय) प्रशंसित मनुष्य और घोड़ों वाले के लिये सब विद्यानों को (बहय) बढ़ाओ ॥१२॥ भावार्थ:-जिस न उत्पन्न हुए क्रोध वाले, जितेन्द्रिय राजा को सकल शास्त्रयुक्त वाणी व्याप्त होतो है वही सत्य न्याय से प्रजा पालने योग्य होता है ॥१२॥ na Si बृहता। २१ । स्वराबृहता छन्दः । मध्यमः स्वरती।१७। २५ । भुरिग. ८२६ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३२ ।। इस सूक्त में इन्द्र, विद्वान् और राजा के काम का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम भण्डल में इकतीसवां सूक्त समाप्त हुमा। अथ सप्तविंशत्युचस्य द्वात्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य । १-२५, २६२ २७ वसिष्ठः। २६. वसिष्ठः शक्तिर्वा ऋषिः । इन्द्रो देवता। । ४ । २४ विराइ बृहती। ६ । ८। १२ । १६ । १८ । २६ निचबृहती। ११ । २७ बृहती। १७ । २५ । भुरिग- १५ । १६ । २३ निचत्पङ्क्तिः । ३ साम्नीपवितः। ७ विराट् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । १० । १४ भुरिगनुष्टुप् । २० । २२ स्वराडनुष्टुप्छन्दः । गान्धारः D Bana अब सत्ताईस ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में कौन और समीप में रक्षा करने योग्य होते हैं इस विषय को कहते हैं । मो घु वो वाघतश्चनारे अस्मनि रौरमन् । आराताञ्चित्सधमाद न आ गहीह वा सन्नपं श्रुधि ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वान् राजा (वाघतः) मेधावी जन आपके (मारे) दूर (धन) और (अस्मत) हम से दूर (मो, स, रोरमन्) मत रमें निरन्तर आपके समीप होते हुए (श्वा) आपको रमावें (प्रारातात्) दूर में (चिस्) भी आप (न:) हमारे (सध- मावम्) उस स्थान को कि जिसमें एक साथ प्रानन्द करते हैं (मा, गहि) पात्रो (इह, वा) यहां प्रसन्न (सन्) होते हुए हमारे वचनों को (नि, उपश्रुषि) समीप में सुनो ॥१॥ भावार्थ:-जिन मनुष्यों के समीप बुद्धिमान, धार्मिक, विद्वान्जन और दूर में दुष्ट जन हैं वे सदैव सुख पाते हैं ॥१॥ फिर किसके समीप कोन वर्से इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। इमे हि ते ब्रह्मकृतः सुते सचा मघौ न मक्ष आसते । इन्द्रे काम जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः ॥२॥ पदार्थ:-हे राजा (ते) आपके जो (इमे) यह (ब्रह्मकृतः) धन वा भन्न को सिद्ध करने (वसूयवः) धनों की कामना करने (जरितारः) और सत्य की स्तुति करने वाले जन (सते) उत्पन्न किये हुए (मधी) मधुरादिगुणयुक्त स्थान में (मक्षः) मक्खियों A ta

SAKALINSAANTER
ऋग्वेदः मं०७। सू० ३२॥
८२७
के (न) समान (सपा) सम्बन्ध से (पासते) उपस्थित होते हैं (इन्द्रे) परमैश्वर्यवान्
आप में (रथे) रमणीय यान में (पादम्) पैर जैसे धरें (न) वैसे (कामम्) कामना
को (मा, वधुः) सब ओर से धारण करते हैं वे (हि) ही सुखी होते हैं ॥२॥
भावार्थः -- इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो विद्वान् राजा धर्मात्मा
न्यायकारी हो तो इसके समीप में बहुत धार्मिक विद्वान् हों ॥२॥
फिर किसको कौन किसके तुल्य उपासना करने योग्य हैं
इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
रायस्कोमो वहस्तं सुदक्षिणं पुत्रो न पितर हुवे ॥२॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (रायस्काम:) धनों की कामना करने वाला मैं (पुत्रः)
पुत्र (पितरम्) पिता को जैसे (न) वैसे (बज्वहस्तम्) शस्त्र और अस्त्रों के पार जाने
और (सुवक्षिणम्) शुभ दक्षिणा रखने वाले राजा को (हुवे) बुलाता हूं वैसे तुम भी
बुलाभो ॥३॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है ---जो मनुष्य जैसे पुत्र पिता
की उपासना करते हैं वैसे राजा की सेवा करते हैं वे समस्त ऐश्वर्य
पाते हैं ॥३॥
Cast
SA
फिर राजा आदि क्या प्राचरण करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
इम इन्द्राय सुन्विरे सोमांसो दध्याशिरः ।
ताँ था मदीय बज्रहस्त पीतये हरिभ्यां याहोक आ॥४॥
पवार्थ:-है (वज्रहस्त) शस्त्र और अस्त्रों को हाथ में रखने वाले जो (इमे)
यह (अध्याशिरः) धारण करने और व्याप्त होने वाले (सोमासः) प्रेरक जन (मवाय)
प्रानन्द और (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिये तथा (पीतये) पीने को (सन्विरे) अच्छे
रसों को उत्पन्न करते हैं (तान्) उनको (हरिभ्याम्) अच्छी सीख पाये हुए घोड़ों से
युक्त रथ से (श्रा, याहि) प्रानो (ोकः) शुभ स्थान को (प्रा) प्राप्त होओ ॥४॥
भावार्थ:----जो पुरुषार्थ से विद्याओं को प्राप्त होकर उद्यम करते हैं
वे राज्यश्री को प्राप्त होते हैं ॥४॥
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
श्रवच्छुकर्ण ईयते वसूनां नू चिन्नो मषिगिरः ।
सद्यश्चियः सहस्राणि शता ददन्नकिदित्सन्तमा मिनत् ॥५॥

८२८ ऋग्वेद: मं० ७ । सू० ३२॥ MUS M Npna MEIN पदार्थ:--(यः) जो (श्रु स्कर्णः) श्रुति में कान रखने वाला (सद्यः) शीघ्र (श्रवत्) सुने (नः) हमारे (वसूनाम्) धनों के सम्बन्ध में (गिरः) अच्छी शिक्षा की भरी हुई वाणियों को (चित) भी (नु) शीघ्र (मधिषत्) चाहे (सहस्राणि) हजारों (शता) सैकड़ों पदार्थों को (ददत्) देता और (ईयते) पहुंचाता है (दिस्सन्तम्) देना चाहते हुए को (नकिः) नहीं (श्रा, मिनत) विनाशे (चित्) वही सर्वदा सुखी होता है ॥५॥ भावार्थ:-जो दीर्घ ब्रह्मचर्य से सब विद्याओं को सुनते, अच्छी शिक्षायुक्त वाणियों को चाहते और औरों को अतुल विज्ञान देते हैं वे दु:ख नहीं पाते हैं ॥५॥ फिर मनुष्य किनके साथ क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स वीरो अप्रतिष्कुत इन्द्रेण शुशुवे नृभिः। यस्ते गभीरा सर्वनानि वृत्रहन्त्सुनोत्या च धावति ॥६॥ पदार्थ:-हे (वृत्रहन शत्रुओं को मारने वाले (यः) जो (ते) आपका (अप्र- तिष्कुतः) इधर उधर से निष्कंप (वीरः) निर्भय पुरुष (इन्द्रण) परमैश्वर्य और (नृभिः) नायक मनुष्यों के साथ (शूशुवे) समीप आता है (गभीरा) गम्भीर (सव- नानि) प्रेरणाओं को (सुनोति) उत्पन्न करता है (श्रा, धावति, च) शीघ्र दौड़ता है (सः) बही शत्रुओं को जीत सकता है ॥६॥ भावार्थ:-जो उत्तम पुरुषों के साथ सब ओर से मित्रता और दुष्टों के साथ वैमनस्य रखते हैं वे अनगिनत ऐश्वर्य पाते हैं ॥६॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। भवा वरूयं मघवन्मघोनां यत्समजासि शर्धतः । वि वाहतस्य वेदनं भजेभह्या दूणाशी भरा गयम् ॥७॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) बहुधनयुक्त राजा आप इयत्) जो (मघोनाम्) धनवानों का (वरूयम्) प्रशंसित घर है उसे (समजासि) अच्छे प्रकार प्राप्त होमो (स्वाहतस्य) तुम्हारे द्वारा नष्ट किये हुए (शर्धतः) बलवान् के घर को प्राप्त (भव) होमो बलवान् के (गयम्) प्रजाजनों को (भर) धारण पोषण करो और (दूणाशः) दुर्लभ है नाश जिसका ऐसे होते हुए (वि) विशेषता से प्रसिद्ध हूजिये जिससे (वेदनम्) पदार्थों की प्राप्ति को हम लोग (मा, भजेमहि) अच्छे प्रकार सेवें ॥७॥ भावार्थ:-हे राजा! दुष्टों के मारने वाले आपकी प्रजा में जो नीति उसी के अनुकूल कर्म हम लोग करें जिससे हमारे अनुकूल आप होमो ॥७॥ ga ८२६ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो अन्याय से किसी की ऋग्वेदः मं०७। सू० ३२ ।। फिर राजा को वैद्यों से क्या कराना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सुनोता सोमपान्ने सोममिन्द्राय वजिणे । पचता पक्तीरवसे कृणुध्वमित्पृणन्निघृणते मयः ।।८॥ पदार्थः-- हे वैद्यशास्त्रवेत्ता विद्वानो तुम (सोमपान्ने) बड़ी-बड़ी ओषधियों के रस को पीने वाले के लिये (सोमम्) ऐश्वर्य को (सुनोता) उत्पन्न करो (बविणे) शस्त्र और अस्त्रों को धारण करने और (इन्द्राय) दुष्ट शत्रुओं को विदीर्ण करने वाले के लिए ऐश्वर्य को उत्पन्न करो सब की (अबसे) रक्षा के लिये (पक्तीः) पाकों को (पचत) पकाओ (कृणुध्यम्, इत) करो ही जैसे (पुणन) पालना करता हुआ विद्वान् (मयः) सुख को (पृणते) पालता है वैसे (इद) ही प्रजाजनों के लिये सुख पालो ।।८॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो वैद्य हों वे उत्तम श्रोषधि, प्रशंसायुक्त रोगनाशक रस और उत्तम अन्न पाकों की सब मनुष्यों के प्रति शिक्षा दें जिससे पूर्ण सुख हो ॥८॥ तुल्य इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। मा धत लोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे । तरणिरिजयति क्षेति पुष्यति न देवास: कवरनवे ॥९॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो! जैसे (देवासः) विद्वान् जन (कवनवे) कुत्सित कर्म में व्याप्ति के लिए (न) नहीं प्रवृत्त होते हैं वैसे (सोमिनः) ओषधि आदि युक्त वा ऐश्वर्यवान् के (मातुजे) बल करने वाले (महे) महान् (राये) धन के लिये (मा) मत (धत) विनाशो (वक्षत) बल पानो (कृणुध्वम्) सुकर्म करो जो (तरणिः) पुरुषार्थी जन (इद) ही (जयति) जीतता (क्षेति) जो निरन्तर वसता वा (पुष्यति) जो पुष्ट होता वे सब बल पावें ॥६॥ फिर मनुष्य मनुष्य किसके कम AN GIAN arte हिंसा नहीं करते और धर्मात्मानों की वृद्धि करते हैं वे विद्वान् जन सर्वदा जीतते, धर्म में निवास करते और पुष्ट होते हैं ॥४॥ फिर किसका किससे क्या हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नकि सुदासो रथं पर्याप्त न रीरमत् । इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमंति बजे ||१०॥ पदार्थ:--(यस्य) जिसका (इन्द्रः) दुष्टों को विदीर्ण करने वाला (अविता) ap ama BURN :) जो (हरिवान्) बहुत प्रशंसित मनुष्य युक्त (इन्द्रः) समर्थ उसको (रिपः) शत्रुजन (न) नहाभाग (अद्रिश्यते) अधिक होता ८३० ऋग्वेदः मं०७। सू० ३२ ।। रक्षक (गमत) जाता है वा (यस्य) जिसके (मरुतः) प्राण के समान मनुष्य रक्षा करने वाले हैं जो (गोमति) जिसमें बहुत सी गौयें विद्यमान और (बजे) जिसमें जाते हैं उस स्थान में जाता है, जिसका दुष्टों का विदीर्ण करने वाला रक्षक नहीं वह (सुदासः) श्रेष्ठ सेवक वा दानों वाला जन (रथम्) रथ को (नकिः) नहीं (पर्यास) सब ओर से अलग करता और (स:) वह (न) नहीं (रीरमत्) दूसरों को रमाता है ॥१०॥ भावार्थ:- यदि राजा प्रजा का रक्षक न हो तो किसी को सुख न हो ॥१०॥ फिर राजा और प्रजाजन परस्पर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। गमद्वाज वाजयंन्निन्द्र मयो यस्य त्वविता भुवः । अस्माकं बोध्यविता रानामस्माकं शूर नृणाम् ॥११॥ पदार्थ:-हे (शूर) निर्भय (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त राजा (यस्य) जिसके पाप (अविता) रक्षक (भुवः) हों वह (मर्त्यः) मनुष्य (वाजयन्) पाने की इच्छा करता हुश्रा (वाजम्) विज्ञान वा अन्नादि को (गमत्) प्राप्त होता है जिन (अस्माकम्) हम लोगों के (स्थानाम्) रथ आदि के तथा जिन (अस्माकम्) हम लोगों के (नृणाम्) मनुष्यों के भी (अविता) रक्षा करने वाले (त्यम्) अाप (बोधि) समझे वे विज्ञान वा अन्न आदि को प्राप्त हों॥११॥ भावार्थ:-जब राजा प्रजाओं की और बजाजन राजाघों की रक्षा करें तब सब की यथावत् रक्षा का संभव हो ॥११॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उदिन्वस्य रिज्यतेऽशो वनं न जिग्युषः । य इन्द्रो हरिवान दमन्ति तं रिपो दक्षं दधाति सोमिनि ||१२|| पवार्थ:- राजा (सोमिनि) ऐश्वर्यवान् में (दक्षम्) बल (दधाति) धारण करता है (तम्) है उसको वह भाग (धनम्) धन के (न) समान (न) शीघ्र धारण करता है ।।१२।। भावार्थः--जो राजा धनियों में जो ऐश्वर्य है उसे दरिद्रों में भी बढ़ाता है उसको कोई नष्ट नहीं कर सकता है जिसका अधिक पुरुषार्थ होता है उसी को धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होती हैं ॥१२॥ ROHI Alive tandin ऋग्वेद: मं०७। सू० ३२ ।। - mod disa ARYAN फिर प्रजा कैसे राजा के अनुकूल होती हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मन्त्रमख सुषितं सुपेशसं दांत यज्ञियेष्वा । पूर्वीश्चन प्रसितयस्तरन्ति तं य इन्द्रे कर्मणा भुवन ॥१३॥ पदार्थः-~-जो (यजियेषु) राजपालनादि कामों से संग रखते हुए व्यवहारों में (अखर्वम्) पूर्ण (सुधितम्) सुन्दरता से स्थापित (सुपेशसम्) सुरूप (मन्त्रम्) विचार को विधात) धारण करें। (यः) जो (कर्मणा) उत्तम क्रिया से (इन्द्र) राजा के निमित्त (भुवत) प्रसिद्ध हो (तम्) उसको (पूर्वीः) प्राचीन (प्रसितयः) प्रकृष्ट प्रेमबंधन (चन) भी (मा, तरन्ति) प्राप्त होते हैं ॥१३॥ भावार्थ:-जिन राजाओं का गूढ़ विचार सर्वहित करना और श्रेष्ठ यत्न होता है वे अच्छी क्रिया से सब प्रजाजनों को प्रेमास्पद से प्रसन्न कर सकते हैं ॥१३॥ Hala Homen फिर मनुष्य किससे रक्षा पाया हुअा कैसा होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । कस्तमिन्द्र स्वावसुमा मयों दधर्षति । श्रद्धा इत्ते मघवन्पायें दिवि वाजी वाजें सिषासति ॥१४॥ पवार्थ:-हे (मघवन्) बहुत ऐश्वर्य वाले (इन्द्र) धार्मिक राजा (क:) कौन (मत्यः) मनुष्य (तम्) उस (त्वावसुन्) तुम से पाये हुए धन वाले का (दधर्षति) तिरस्कार करता है (ते) आपके (पार्ये) पालना करने योग्य वा पूर्ण (विधि) प्रकाश में कौन (वाजी) विज्ञानवान् (वाजम्) विज्ञान को तथा (श्रद्धा) सत्य में प्रीति श्रद्धा (इद) ही को (मा, सिषासति) अलग करना चाहता है ॥१४॥ भावार्थ:-- जिसकी रक्षा धार्मिक राजा करता है उसका तिरस्कार कौन कर सकता है ॥१४॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसुं। तब प्रणींती हर्यश्व सुरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता ॥१५॥ पदार्थ:-हे (हर्यश्व) हरणशील महान् घोड़ों वाले मनुष्य (सूरिभिः) विद्वानों के साथ (ये) जो (तथ) प्रापकी (प्रणीती) उत्तम नीति से (प्रिया) प्रिय मनोहर (वस्) धनों को (दवति) देते हैं उनको और जो आपकी उत्तम नीति और M A FAIRS स्वा) आपको कोई भी ऋग्वेदः मै० ७ । सू० ३२॥ विद्वानों के साथ हम लोग (विश्वा) सब (दुरिता) दुःखों को (तरेम) तरें उन्हें भी पाप (वृत्रहत्येष) शत्रुओं की हिंसा जिनमें होती है उनमें (मघोनः) धनाढ्य करने (स्म) ही को (चोदय) प्रेरणा देनो ॥१॥ भावार्थ:-हे राजा! आप यदि पक्षपात को छोड़ के सबकी रक्षा क और उदार धनाढ्यों को संग्राम में प्रेरणा दें तो सब हम लोग सब दुःखों को तरें ॥१५॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तवेदिन्द्रावमं वसु पुष्यसि मध्यमम् । सत्रा विश्वस्य परमस्य राजसि नकिट्या गोषू वृण्वते ॥१६॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान जो (तव) आपका (प्रथमम्) निकृष्ट वा रक्षा करने वाला और (मध्यमम्) मध्यम (वसु) धन है जिससे (त्वम्) आप(पृष्यसि) पुष्ट होते जिस (विश्वस्य) समग्र (परमस्य) उत्तम धन के बीच (सन्ना) सत्य आप शत्रु जन (नकिः) न (इत) ही (वृण्वते) स्वीकार करते है ॥१६॥ भावार्थ:--हे राजा! आप सदैव निकृष्ट, मध्यम और उत्तम धनों का न्याय से ही संचय करो, जिसका धर्म से उत्पन्न होने से सत्य धन वर्तमान है उसको कोई दु:ख नहीं प्राप्त होता है ॥१६॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। त्वं विश्वस्य धनदा असि श्रुतो य भवन्त्याजयः। तवायं विश्वः पुरुहूत पार्थिवोऽवस्युमि भिक्षते ॥१७॥ पदार्थ:-है (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त स्वीकार किये हुए राजन् जो (श्रुतः) प्रसिद्ध कीर्तियुक्त (पार्थिवः) पृथिवी पर वदित (स्वम्) श्राप (विश्वस्य) समग्न राज्य के (धनदाः) धन देने वाले (प्रसि) हैं जिन (तव) आपका (अयम्) यह (विश्यः) सर्व (अवस्युः) अपनी रक्षा चाहने वाला जन (नाम) प्रसिद्ध तुम से रक्षा को (भिक्षते) मांगता है (ये) जो (ईम्) सब ओर से (माजयः) संग्राम (भवन्ति) होते हैं उनमें सब तुम्हारे सहाय को चाहते हैं उनको श्राप निरन्तर रक्षा करें ॥१७॥ भावार्थ:-जो राजा संग्राम में विजय करने वालों को बहुत धन देता है उसका पराजय कभी नहीं होता है जो प्रजाजन रक्षा चाहे उसकी रक्षा जो निरन्तर करता है वही पुण्यकीति होता है ।।१७॥ 8 म Mote Hoster COM M रक्षक को न जानं जो आप (पिता) पिता रक्षा करने वाले (चन) भी हैं इस ऋग्वेद: मं० ७ । सू० ३२ ।। फिर राजपुरुषों को क्या चाहना योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। यदिन्द्र यावंतस्त्वमेतावदहमीशीथ । स्तोतारमिदिधिषेय रदावसो न पापत्वार्य रासीय ॥१८॥ पदार्थ:-हे (रवावसो) करोदनों में वसने वाले (इन्द्र) परम ऐश्वयं के देने वाले (यत्) जो (त्वम्) आप (यावतः) जितने के ईश्वर हो (एतावत) इतने का मैं (ईशीय) ईश्वर होऊ समर्थ होऊ (स्तोतारम्) प्रशंसा करने वाले को (इत्) ही (दिविषय) धारण करू और (पापवाय) पाप होने के लिये पदार्थ (न) न (अहम् ) मैं (रासीय) देऊ ॥१८॥ भावार्थ:-हे राजा! यदि आप हम लोगों की निरन्तर रक्षा करें तो हम आपके राज्य की रक्षा कर पापाचरण त्याग औरों को भी अधर्माचरण से अलग रख कर निरन्तर प्रानन्द करें ॥१८॥ फिर प्रजाजनों को क्या चाहने योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शिक्षयमिन्महयते दिवेदिवे रामा कुहचिद्विदे। नहि त्वदन्यन्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥१९॥ पदार्थ:-हे (मधवन्) पूजित धनयुक्त परमैश्वर्यवान् जो मैं (दिवेदिवे) प्रकाश प्रकाश के लिये (प्रा, कुहचिनिदे) जो कहीं भी प्राप्त होता उस (महयते) महान् (राय) धन के लिये (शिक्षेयम्) अच्छी शिक्षा करू (स्वत) तुम से (अन्यत्) कारण सो पाप (इव) ही (न:) हमारे (वस्य:) अत्यन्त वश (प्राप्यम्) प्राप्त होने के योग्य हैं और (नहि) नहीं (मस्ति) है ॥१६॥ भावार्थ:-वे ही भृत्य उत्तम हैं जो राजा वा स्वामी को छोड़ के दूसरे को से] नहीं जांचते [मांगते], न विना दिये लेते, प्रतिदिन पुरुषार्थ से प्रजा की रक्षा और धनवृद्धि करना चाहते हैं ॥१९॥ फिर राजा और प्रजाजन परस्पर कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तरणिरिसिषासति वाजं पुरन्ध्या युना। आ व इन्द्रं पुरुहूतं नमे गिरा नेमि तष्टेच सुद्रवम् ॥२०॥ पदार्थ:--जो (तरणिः) तारने वाला (इत्) ही राजा (युजा) योगयुक्त R HEN POS ८३४ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३२॥ (पुरन्ध्या) बहुत अर्थों को धारण करने वाली बुद्धि से (वाजम्) धन वा विज्ञान को (सिषासति) अच्छे प्रकार बांटने की इच्छा करता है उस (वः) तुम्हारे (पुरुहूतम्) बहुतों से स्तुति को पाये हुए (इन्द्रम्) परमेश्वर्यवान् को (सृद्रवम्) अच्छे प्रकार दौड़ने वाले (नेमिम्) पहिये को (तष्टेव) बढ़ई जैसे वैसे (गिरा) वाणी से (मा नमे) अच्छे प्रकार नमता हूं ॥२०॥ भावार्थ:-जो राजा पूर्ण विद्या और विनय तथा धर्मयुक्त व्यवहार से सत्य और असत्य को अलग कर न्याय करता है उसको हम सब लोग नमते हैं जैसे बढ़ई रथादि को बनाता है वैसे हम लोग सब कामों को रचें ॥२०॥ S 300 फिर मनुष्य धन की प्राप्ति के लिये क्या क्या कर्म करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । न दुष्टुती मत्यो विन्दते वसु न धन्तं रयि शत् । सुशक्तिरिन्मघवातुभ्यं मावते देणं यत्पायें दिवि ॥२१॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) परमपूजित धनयुक्त जैसे (मर्त्यः) मनुष्य (दुष्टुतीः) दुष्ट प्रशंसा से (वसु) धन को (न) न (विन्दते) प्राप्त होता है (स्रधन्तम्) और हिसा करने वाले मनुष्य को (रथिः) लक्ष्मी और (सशक्तिः) सुन्दर शक्ति (इव) ही (न) नहीं (नशत्) प्राप्त होती है इस प्रकार (मावते) मेरे समान (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (पार्ये) पालना वा पूर्णता करने के योग्य (विधि) काम में (यत्) जो (देष्णम्) देने योग्य को न प्राप्त होता वह और को भी नहीं प्राप्त होता है ॥२१॥ भावार्थ:-जो अधर्माचरण से युक्त दुष्ट, हिंसक मनुष्य हैं उनको धन, राज्य, श्री और उत्तम सामर्थ्य नहीं प्राप्त होता है इससे सबको न्याय के आचरण से ही धन खोजना चाहिये ॥२१॥ फिर इस जगत् का स्वामी कौन है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। अमि त्यो शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्वदृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥२२॥ पदार्थ:-हे (शूर) पापाचरणों के हिंसक (इन्द्र) परमेश्वर्ययुक्त परमात्मा (अस्य) इस (जगतः) जंगम के (ईशानम्) चेष्टा कराने और (तस्थुषः) स्यावर संसार के (ईशानम्) निर्माण करने वाले (त्या) आपको (स्व शम्) सुखपूर्वक देखने को (धेनवः) गोयें (अदुग्धा इव) दूधरहित हों जैसे वैसे हम लोग (अभि, नोनमः) सब मोर से निरन्तर नमते प्रणाम करते हैं ।।२२।। s Now ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३२ ।। ६३५ W AGAR Date भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो! यदि निरन्तर सुखेच्छा हो तो परमात्मा ही की माप लोग उपासना करें ॥२२॥ परमेश्वर के तुल्य वा अधिक कोई नहीं है इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते । अश्शायन्तो मघवभिन्द्र वाजिनी गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥२३॥ पदार्थ:-हे (मघवन्) बहुधनयुक्त (इन्द्र) परम ऐश्वर्य देने वाले जगदीश्वर जिससे कोई पदार्थ (न) न (स्वावान्) आपके सदृश (अन्यः) और (दिव्यः) शुद्ध- स्वरूप पदार्थ है (न) न (पार्थिव:) पृथिवी पर जाना हुआ है (न) न (जातः) उत्पन्न हुआ है (न) न (जनिष्यते) उत्पन्न होगा इससे (त्वा) आपकी (अश्वायन्तः) महान् विद्वानों की कामना करने वाले (वाजिनः) विज्ञान और अन्न वाले और (गव्यन्तः) अपने को उत्तम वाणी वा उत्तम भूमि की इच्छा करने वाले हम लोग (हवामहे) प्रशंसा करते हैं ॥२३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जिस कारण परमेश्वर से तुल्य अधिक अन्य पदार्थ कोई नहीं न उत्पन्न हुआ न कभी भी उत्पन्न होगा इस से हो उसकी उपासना और प्रशंसा हम लोग नित्य करें॥२३॥ फिर वह परमेश्वर कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। अभी पतस्तदा मरेन्द्र ज्यायः कनीयसः । पुरुषसुईि मघवन्त्सनादसि भरैमरे च हव्यः ॥२४॥ पदार्थ:-है (मघवन्) सकलेश्वर्य और धनयुक्त (इन्द्र) साधारणतया ऐश्वर्य- युक्त (हि) जिससे आप (भरे भरे) पालना करने योग्य व्यवहार में (सनात) सनातन (हव्यः) स्तुति करने योग्य (पुरुवसः) बहुतों के वसाने वाले (असि) हैं इससे (सतः) विद्यमान (तत्) उस चेतन ब्रह्म (कनीयसः) अतीव' कनिष्ठ के (ज्याय:) अत्यन्त ज्येष्ठ प्रशंसनीय ब्रह्म को पालनीय व्यवहार में (च) भी (मा, अभि, भर) सब ओर से धारण करो ॥२४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जो परमात्मा अणु से अणु, सूक्ष्म से सूक्ष्म, बड़े से बड़ा सनातन सर्वाधार सर्वव्यापक सब को उपासना करने योग्य है उसी का आश्रय सब करें॥२४॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। ube 0 ऋग्वेदः मं० ७ । सं० ३२॥ aag ARMA परां णुदस्व मघवन्नमित्रान्त्सुवेदो नो वसू कृधि । अस्माकं बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखीनाम् ।।२५।। पदार्थ:-हे (मघवन्) बहुधनयुक्त राजा (सुवेवाः) धर्म से उत्पन्न किये हुए ऐश्वर्ययुक्त पाप (न:) हमारे (अमित्रान्) शत्रुओं को (परा, णुदस्व) प्रेरो हमारे लिये (बसु) धन' को (कृषि) सिद्ध करो (महाधने) बड़े वा बहुत धन जिसमें प्राप्त होते हैं उस संग्राम में (अस्माकम्) हमारे (सखीनाम्) सर्व मित्रों के (अविता) रक्षा करने वाले (बोधि) जानिये और (वृधः) बढ़ने वाले (भव) हूजिये ॥२५॥ भावार्थ:-हे राजा! आप धार्मिक शूर जनों का सत्कार कर उनको शिक्षा देकर युद्धविद्या में कुशल कर डाकू आदि दुष्टों को निवृत्त कर सर्वो. पकारी मनुष्यों के रक्षा करने वाले हूजिये ॥२५॥ परमेश्वर मनुष्यों को किसके तुल्य प्रार्थना करने योग्य है । इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यो । शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवाज्योतिरशीमहि ॥२६॥ पवार्थः --- है (पुरुहूत) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त इन्द्र) परमैश्वर्य के देने वाले जगदीश्वर भगवन् (यथा) जैसे (पुत्रेभ्यः) पुत्रों के लिये (पिता) पिता वैसे (मः) हम लोगों के लिये (ऋतुम्) धर्मयुक्त बुद्धि को (पा, भर) अच्छे प्रकार धारण कीजिये (अस्मिन्) इस (बामनि) वर्तमान समय में (न:) हम लोगों को (शिक्षा) सिखलानो जिससे (जीवाः) जीव हम लोग (ज्योतिः) विज्ञान को और आपको (अशीमहि प्राप्त होवें ॥२६।। भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे जगदीश्वर ! जैसे पिता हम लोगों को पुष्ट करता है वैसे प्राप पालना कीजिये जैसे प्राप्त विद्वान् जन विद्यार्थियों के लिये शिक्षा देकर सत्य बुद्धि का ग्रहण कराता है वैसे ही हमको सत्य विज्ञान ग्रहण करापो जिससे हम लोग सृष्टिविद्या और आपको पाकर सर्वदैव आनन्दित हों॥२६॥ मनुष्य समुद्रादिकों को किससे तरें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो३ माथिबासो अर्व क्रमुः। त्वयां वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि ॥२७॥ - ( AM ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३३ ॥ ८३७ तिलि मीया ofit पदार्थ:-हे (शूर) निर्भय (न:) हम लोगों को (प्रज्ञाताः) छिपे हुए (बृजगाः) जिनमें जाते हैं वा जिनसे जाते हैं वे (दुरा:) और दुःख से चिंतने योग्य (नः) हम लोगों को (भा, प्रय, क्रमः) मत उल्लंघन करें (शिधास:) दुःख देने वाले हम लोगों को (मा) मत उल्लंघन करें जिससे (स्वया तुम्हारे साथ (अयम्) हम लोग (प्रयत:) नीचे देशों को तथा (शाश्वतो.) अनादिभूत (अप:) जलों को (अति, तरामसि) अतीव उतरें ॥२७॥ भावार्थ:--राजा और राजजन, सेना और सभाध्यक्ष ऐसी नावें रचें जिनसे समुद्रों को सुख से सब तरें उन समुद्रों में नौकाओं के चलाने वालों को मार्गविज्ञान यथार्थ हो ।।२७।। इस सूक्त में इन्द्र, मेधावी, धन, विद्या की कामना करने वाले, रक्षक, राजा, ईश्वर, जीव, धनसंचय', फिर ईश्वर और नौकानों के जाने वालों के गुण और कर्म का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में बत्तीसवां सूक्त समाप्त हुा ।। ति वति। पागा SALAIMERIESMotSHAK प्रमा अथ चतुर्दशर्चस्य अर्यास्त्रशतमस्य सूक्तस्य १-१४ संस्तवो वसिष्ठस्य सपुत्रस्येन्द्रेण वा संवादः । १---६ वसिष्ठपुत्राः । १० -१४ वसिष्ठ ऋधिः स एम देवताः। १।२। ६ । १२ । १३ त्रिष्टुप् ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५॥ ७ । ६ ! १४ निवृत- विष्टुः । ८ १ ११ विराट् शिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । १० भुरिपङ्क्तिश्छन्दः । तव्यात वीत. एति। ति । लको HINI अब चौदह ऋचा वाले तेतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में पढ़ाने और पढ़ने वाले क्या करें इस विषय का वर्णन करते हैं । श्वित्यञ्चों मा दक्षिणतस्कपर्दा धिजिन्वासो अभिहि प्रमन्दु उत्तिष्ठन्त्रोचे परि बहिषो नून्न में दूरादवितके वसिंहाः ॥१॥ पदार्थ:-- जो (शिवस्यञ्चः) वृद्धि को प्राप्त होते (वक्षिणतस्कपर्वाः) दाहिनी ओर को जटाजूट रखने वाले (धियम्) बुद्धि को (जिन्मास:) प्राप्त हुए (वसिष्ठाः) अतीव विद्यानों में बसने वाले (हि? ही (मा) मुझे (प्र, मन्दुः) आनन्दित करते हैं (मे) मेरे (अवितवे) पालने को (दूरात) दूर से आवें उन (बहिषः) विद्या धर्म बढ़ाने वाले (नन्) नायक मनुष्यों को (उत्तिष्ठन्) उठता हुआ अर्थात् उद्यम के लिए प्रवृत्त हुआ (परि, वोचे) सब ओर से कहता हूं ॥१॥ । प्रक PAHARI ५३० ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३३ ॥ , य - N उत्पन्न हुए पदार्थ वा पुत्र भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो! जो विद्याओं में प्रवीण, मनुष्यों की सत्य प्राचार में बुद्धि बढ़ाने वाले, पढ़ाने पढ़ने और उपदेश करने वाले हों उनको विद्या और धर्म के प्रचार के लिए निरन्तर शिक्षा, उत्साह और सत्कारयुक्त करें ॥१॥ फिर वह राजा कैसे विद्वानों को स्वीकार करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । दूरादिन्द्रमनयन्ना सुतेन तिरो वैशन्तमति पान्तमुग्रम् । पाषद्युम्नस्य वायतस्य सोमात्सुतादिन्द्रो अवृणीता वसिष्ठान् ॥२॥ पदार्थ:-है मनुष्यो! जो (सुतेन) से (वैशन्तम्) प्रवेश होते हुए जन के संबन्धी (पान्तम्) पालना करते हुए (उनम्) तेजस्वी (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् को (दूरात्) दूर से (अनयन्) पहुंचाते और दारिद्रय को (तिरः) तिरस्कार करते हैं उनसे (पाशध नस्य) जिसने धन यश पाया है उस (वायतस्य) विज्ञानवान् के (सताद) धर्म से उत्पन्न किये (सोमात्) ऐश्वयं से (इन्द्रः) परमैश्वर्य राजा (वसिष्ठान्) अतीव विधाओं में किया निवास जिन्होंने उन को (अति, आ, प्रवृणीत) अत्यन्त स्वीकार करें ॥२॥ भावार्थ:-हे राजा आदि जनो! जो दूर से अपने देश को ऐश्वर्य पहुंचाते और दारिद्रय का विनाश कर लक्ष्मी को उत्पन्न करते हैं उन उत्तम जनों की निरन्तर रक्षा कीजिये ॥२॥ फिर मनुष्य क्या-क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एवेन के सिन्धुमेभिस्ततारेवेन के भेदमेभिर्जघान । एवेन के दाशराज्ञे सुदास भावदिन्द्रो ब्रह्मणा वो वसिष्ठाः ॥३॥ पदार्थ:-(वसिष्ठाः) अत्यन्त ब्रह्मचर्य के बीच जिन्होंने वास किया वह है विद्वानो (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् यह जन (एभिः) उत्तम विद्वानों के साथ (कम्, एव, इव) किसी (सिन्धुम् ) नदी को भी (1) शीघ्र (ततार) तरे (एभिः) इन उत्तम विद्वानों के साथ (कम्, एव, इद) किसी को भी (नु) शीघ्र (जधान) मारे (वाश- राजे) जो सुख देता है उस राजाके लिए (कम्, एव, इत्) किसी (भेदम्) विदीर्ण करने योग्य को भी (ब्रह्मणा) धन से (नु) शीघ्र (प्रावत) अच्छे प्रकार रक्खे और (सवा- सम्) अच्छे देने वाले वा सेवक को तथा (व:) तुम लोगों को भी (न) शीघ्र रक्खे ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य नौकादिकों से समुद्रादिकों को अच्छे प्रकार Pel .

मीयत याशि ति दक्ष अहि फिर कौन पढ़ाने और कौन न पहा ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३३ ।। शीघ्र तरें, वीरों से शत्रुओं को शीघ्र विनाशें, राजा और राज्य की भी रक्षा करें वे मान करने योग्य हों ॥३॥ फिर मनुष्य क्या करके क्या नहीं करते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। जुष्टी नरो ब्रह्मणा वः पितॄणामसंभव्ययं न किला रिपाय । यच्छकरीषु बृहता रवेणेन्द्रे शुष्ममदधाता बासिष्ठाः ॥४॥ पदार्थ:-हे (वसिष्ठाः) धन में अत्यन्त वास करते हुए (नरः) नायक मनुष्यो तुम (यत्) जिस (बृहता) महान् (रवेण) शब्द से (शक्वरीषु) शक्तियुक्त सेनाओं में और (इन्द्रे) परमैश्वयं में (शुष्मम् ) बल को (अदधात) धारण करते हो (जुष्टी) प्रीति वा सेवा से तथा (ब्रह्मणा) धन से (व:) आप के (पितृणाम्) जनक अर्थात् पिता आदि का जो (अध्ययम्) नाशरहित (अक्षम्) व्याप्त बल उसे (फिल) निश्चय कर तुम (न, रिषाथ) नहीं नष्ट करते हो उससे सब की रक्षा करो ॥४॥ भावार्थ:-जो मनुष्य अपनी शक्ति को बढ़ा के दुष्टों को मार धन की वृद्धि से सब के अर्थ जो नष्ट नहीं उस सुख को प्रीति से बढ़ाते थे बड़ी कीर्ति को पाते हैं ॥४॥ फिर कौन मनुष्य सूर्य के तुल्य होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उघाभिवेत्तष्णजो नाथितासोऽदीधयुर्दाशराज्ञे वृतासः । वसिष्ठस्य स्तुवत इन्द्रो अश्रोदुरुं वृत्सुभ्यो अकृणोदु लोकम् ।।५।। पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (खामिय) सूर्य के समान नाथितासः) मांगते हुए और (तृष्ण:) तृष्णा को प्राप्त (वृतासः) स्वीकार किये हुए (इव) ही (बाशराने) देने वालों के राजा के लिये (उददीधयुः) ऊपर को प्रकाशित करें जो (इन्त्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (वसिष्ठस्य) अतीव विद्वान् की (स्तुक्त ) स्तुति करने वाले के लिये वाले को] (उरम्) बहुत सुख करने वाले वाक्य को (अश्रोत्) सुने (तत्सभ्य:) और शत्रुओं के मारने वालों के लिये (उ) ही (लोकम्) लोक को (अकृणोत) प्रसिद्ध करता है उनका सब सत्कार करें ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है--जो मनुष्य सूर्य के समान विद्या और नम्रता से प्रकाशित और तृषित जल के समान ऐश्वर्य के ढूंढने वाले सकल विद्यायुक्त विद्वानों के लिये प्रानन्द को धारण करते और शूरवीरों के लिये धन भी देते हैं वे बहुत सुख पाते हैं ॥५॥ Ana AIN PHONE Mara तध्यारी वीत. एति। गति ऋग्वेदः मं०७। सू० ३३ ॥ - Com दण्डाइवेद्गोअजनास आसन्परिच्छिन्ना भरता अमकासः । अभवच पुरएता वसिष्ठ आदित्तसूनां विशो अप्रथन्त ॥६॥ Atta त्य- पदार्थ:-हे विद्वानो जो (गोमजनासः) सुशिक्षित वाणी में [अ] प्रसिद्ध हुए (परिच्छिन्ना:) छिन्न भिन्न विज्ञान वाले (भरताः) देह धारण और पुष्टि करने से युक्त (अर्भकास:) थोड़ी थोड़ी आयु के बालक (दण्डाइव) लट्ठ से सुखे हृदय में अभिमान करने वाले (इव) ही (मासन्) हैं उन (तत्सूनाम्) अनादर किये हुओं के बीच (विश:) प्रजा मनुष्यों को (अप्रथन्त) प्रख्यात करते हैं (मात, इत) और ही इनके जो (पुरएता) आगे जाने वाला (वसिष्ठः) अतीव धनाढय (अभवत्) हो (च) बही इन को अच्छी प्रकार शिक्षा के ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है---जो मनुष्य दण्ड के समान जड़बुद्धि हों वे अच्छी परीक्षा कर न पढ़ाने योग्य और जो बुद्धिमान हों वे पढ़ाने योग्य होते हैं जो विद्या व्यवहार में प्रधान हो वही विद्याविभाग की उत्तम प्रबन्ध से शिक्षा पहुंचावे ॥६॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । श्रयः कृण्वन्ति भुवनेषु रेखितः प्रजा आर्या ज्योतिरग्राः । त्रयाँ घर्मास उपस सच सबौं इत्ताँ अनुं वितुर्दसिष्ठाः ॥७॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जैसे (श्य:) तीन (भुवनेषु) लोकों में (रेतः) वीर्य (कृण्वन्ति) करते हैं जैसे (श्रयः) तीन (धर्मासः) पाप (उषसम्) प्रभातवेला और (ज्योतिः) विद्याप्रकाश आदि का (सचन्ते) सम्बन्ध करते हैं वैशे (तिस्रः) तीन अर्थात् विद्या राजा और धर्मसभास्थ (वसिष्ठाः) अतीव धन में स्थिर (मार्याः) उत्तम गुण कर्म स्वभाव वाले पुरुष (प्रा.) अग्रगण्य (प्रजाः) प्रजाजन (तान्। उन (सर्वान) सब को (इत, अनु, विचः). ही अनुकूल' जानते हैं और विद्या प्रकाश आदि को सम्बन्ध करते हैं ॥७॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में बाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे कार्य और कारण को कार्य में स्थिर बिजुलियां सूर्य आदि ज्योति को प्रकाशित करती हैं प्रभातबेला और दिन को उत्पन्न करती हैं वैसे तीन सभा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष साधन देने वाले प्रकाशों को करती हैं ॥७॥ फिर विद्वान् कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। Kamaha AD EN ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३३ ।। धति । अध याक्षिा विति। ne सूर्यस्येव वक्षथो ज्योतिरेषां समुद्रस्यैव महिमा गंभीरः । वातस्येव प्रजवो नान्येन स्तोमो वशिष्ठा अन्वेतवे वः ॥८॥ पदार्थ:-हे (वसिष्ठाः) प्रतीब विद्या में वास करने वालो जो (अन्वेतवे) विशेष जानने को, प्राप्त होने को वा गमन को प्राप्त अत्यन्त धर्मशील विद्वान है (एषाम्) इन बिजुली आदि पदार्थों के और (वः) तुम्हारे विशेष जानने को प्राप्त होने को वा गमन को (सूर्यस्येव) सूर्य के समान (वक्षयः) रोष वा (ज्योतिः) प्रकाश (समुद्रस्येव) समुद्र के समान (महिमा) महिमा (गमीरः) गम्भीर (वातस्येव) पवन के समान (प्रजवः) उत्तम वेग और (स्लोमः) प्रशंसा है वह (अन्येन) और के समान (न) नहीं है ॥८॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जिन धार्मिक विद्वानों का सूर्य के समान विद्या और धर्म का प्रकाश, दुष्टाचार पर क्रोध, समुद्र के समान गम्भीरता, पवन के समान अच्छे कर्मों में बेग हो वे ही मिलने योग्य हैं यह जानना चाहिये ॥६॥ कोन सत्य का निश्चय करने योग्य हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । त इनिण्यं हृदयस्य भकेतैः सहस्तवलशममि संचरन्ति । यमेन ततं परिधि वयंन्तोऽप्सरस उप सेदुर्षसिष्ठा ॥९॥ पदार्थ:---- (अक्षरसः) जो अन्तरिक्ष में जाते हैं वे और (यमेन) नियन्ता जगदीश्वर से (ततम्) च्याप्त (परिधिन्) सर्व लोकों के परकोटे को (वयन्तः) व्याप्त होते हुए (वसिष्ठाः) अतीव विद्यावान जन (प्रोत:) उत्तम बुद्धियों से (हृदयस्थ) मात्मा के बीच (निण्य) निति अन्तर्गत (सहसपालाम) हमा” असंख्य अंकुरों के समान शास्त्रबोध जिसमें उस विद्या व्यावहार को (उप, सेवः) उपस्थित होते अर्थात् स्थिर होते हैं (ते, इत) वे ही पूर्ण विद्याओं का (भि, सं. चरन्ति) सब ओर से संचार करते हैं । भावार्थ:-वे ही विद्वान् जन संसार के उपकारी होते हैं जो दीर्घ ब्रह्मचर्य से और प्राप्त विद्वानों की उत्तेजना से शिक्षा पाय समस्त विद्या पढ़ परमात्मा से व्याप्त सर्व सृष्टिक्रम को प्रवेश करते हैं ।।६।। फिर विद्वान् जन कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं विधुतो ज्योतिः परि संजिहांनं मित्रावरुणा यदपश्यतां त्वा । तत्ते जन्मोतर्फ वसिष्ठागस्त्यो यच्या विश आजमार ॥१०॥ १ ।। यागा धातुके অশ্র BIKA म 4 HAM तव्या वीतः । एति माति । PM ८४२ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३३ ।। ON पदार्थ:-हे (वसिष्ठ) प्रशंसायुक्त विद्वान् जो (अगस्त्यः) निर्दोष जन (ते) आपकी (विशः) प्रजाओं को (मा, जमार) सब ओर से धारण करता (उत) और (एकम्) एक (जन्म) जन्म को सब ओर से धारण करता और (त्वा) आप को सब ओर से धारण करता तथा (यत्) जिस (विध तः) बिजुली को (संजिहानम्) अधि- कार त्याग करते हुए (ज्योति:) प्रकाश को (मित्रावरुणा) अध्यापक और उपदेशका (पर्यपश्यताम्) देखते हैं (त्वा) आपको इस विद्या की प्राप्ति कराते हैं उस समस्त विषय को प्राप ग्रहण करें ॥१०॥ भावार्थ:-जिस मनुष्य का विद्या में जन्म प्रादुर्भाव होता है उसकी बुद्धि बिजुली की ज्योति के समान सकल विद्यानों को धारण करती है ॥१०॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्मनसोऽपि जातः । द्रप्स स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे त्वाऽददन्त ॥११॥ पदार्थ:-हे (ब्रह्मन्) समस्त वेदों को जानने वाले (बसिष्ठ) पूर्ण विद्वान् जो (मत्रावरुण:) प्राण और उदान के वेत्ता पाप (उर्वश्याः) विशेष विद्या से (उत) और (मनस:) मन से (अधि, जातः) अधिकतर उत्पन्न (असि) हुए हो उन (त्वा) प्रापको (विश्वे, देवाः) समस्त विद्वान् जन (ब्रह्मणा) बहुत धन से और (दैव्येन) विद्वानों ने किये हुए व्यवहार से (पुष्करे) अन्तरिक्ष में (स्कन्नम्) प्राप्त (इप्सम्) मनोहर पदार्थ को (अददन्त) दो ॥११॥ भावार्थ:---जो मनुष्य शुद्धान्तःकरण से प्राण भौर उदान के तुल्य और निरन्तर मनोहर विद्या को ग्रहण करते हैं वे विद्वानों के समान आनन्दित होते हैं ॥११॥ फिर वह विद्वान् कैसा हो इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । स प्रकेत उभयस्य प्रविद्वान्त्सहस्रदान उत वा सदाना। यमेन ततं परिधि बयिष्यन्नप्सरसा परि जज्ञे वसिष्ठः ॥१२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (उभयस्य) जन्म और विद्या-जन्म दोनों का (प्रविद्वान्) उत्तम विद्वान् (प्रकेतः) उत्तम बुद्धियुक्त (सहस्रदानः) हजारों पदार्थ देने वाला (उत, वा) अथवा (सदानः) दानयुक्त (यमेन) वायु वा बिजुली के साथ वर्तमान (ततम्) विस्तृत (परिधिम्) परिधि को (वयिष्यन्) खर्च करता हुआ dain ADS HI ki davita ऋग्वेदः मं०७। सू० ३३ ।। एR na AL do ति दश पति (वसिष्ठः) अतीव धनवान् (अप्सरसः) अन्तरिक्ष में चलने वाले वायु से (परि जज्ञे) सर्वतः प्रसिद्ध होता है (स:) वह सब को सेवा करने योग्य है ॥१२॥ भावार्थ:-जिस मनुष्य का माता पिता से प्रथम जन्म, दूसरा प्राचार्य से विद्या द्वारा होता है वही आकाश के पदार्थों का जानने वाला उत्पन्न हुमा पूर्ण विद्वान् अतुल सुख का देने वाला है ।।१२॥ फिर कैसे विद्वान होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सत्रे ह जाताविषिता नमोभिः कुम्भे रेतः सिषिचतुः समानम् । ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातमृर्षिमाहुर्वसिष्ठम् ॥१३॥ पदार्थ:----यदि (जाती) प्रसिद्ध हुए (इषिता) अध्यापक और उपदेशक (नमोभिः) अन्नादिकों से (सत्रे) दीर्घ (ह) ही पढ़ाने पढ़ने रूप यज्ञ में (कम्भे) में (रेतः) जल के (समानम्) समान विज्ञान को (सिषिचतः) सीचे छोड़ें (ततः, ह) उसी से ही जो (मान:) मानने वाला (उदियाय) उदय को प्राप्त होता है (ततः) उस (मध्याद) मध्य से (जातम्) उत्पन्न हुए (बसिष्ठम्) उत्तम (ऋषिम्) वेदार्थवेत्ता विद्वान् को (माहुः) कहते हैं ॥१३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे स्त्री और पुरुषों से सन्तान उत्पन्न होता है वैसे अध्यापक और उपदेशकों के पढ़ाने और उपदेश करने से विद्वान् होते हैं ॥१३॥ फिर पढ़ाने और पढ़ने वाले जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उक्थभृत सामभृतं बिभर्ति ग्रावाणं विनत्व वंदात्यो। उपनमाध्वं सुपनस्यमांना आ वो छाति प्रतृदो वसिष्ठः ॥१४॥ पदार्थः ---हे (सुमनस्यमानाः) सुन्दर विचार वाले मनुष्यो जो (प्रतृवः) अतीव अविद्यादि दोष के नष्ट करने वाले (प्रावाणम्) मेघ को सूर्य जैसे वैसे विद्या को (विभ्रत्) धारता हुमा (वसिष्ठः) अत्यन्त विद्या आदि धन से युक्त (अग्ने) पूर्व (उक्थमृतम्) ऋग्वेद को और (साममृतम्) सामवेद को धारण करने वाले को (विभति) धारण करता वह औरों को (प्र, वदाति) कहे जो (व:) तुम लोगों को (मा, गच्छाति) प्राप्त हो (एनम्) उस की तुम (उप, माध्वम्) उपासना करो ॥१४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो विद्यार्थी सकल वेदवेत्ता कुशिक्षा और अविद्या को नष्ट करने वाले प्राप्त विद्वान् मनप्या HANN तयारी वीत: सत्य । एति Ata খা मेह लि ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३४ ।। की पूर्व अच्छे प्रकार सेवा कर विद्या पाय फिर पढ़ाता है उसकी सब ज्ञान चाहने वाले जन विद्या पाने के लिये उपासना करते हैं ॥१४॥ इस सूक्त में पढ़ाने पढ़ने और उपदेश सुनाने और सुनने वालों के गुण और कार्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में तेतीसवां सूक्त समाप्त हुआ। AWAR rari का अथ पञ्चविंशत्यू वस्य चतुस्त्रिशमस्य सूक्तस्य वशिष्ठ ऋषिः । ----१५ । १८-२५ विश्वेदेवाः । १६ अहिः । १७ अहिबुन्यो देवता।१।२५। १२ । १३ । १४ । १६ । १६ । २० । भुरिगा गायत्री ३ । ४ । १७ मार्ची गायत्री। ६ । ७ । ८ ।। १० । ११ । १५ । १८ । २१ निवृत्रिपाद्गायत्री । २२ । २४ । निचूदार्षी त्रिष्टुप्छन्दः । षड्जः स्वरः । २३ प्रार्थी त्रिष्टुप् । २५ विराडार्षी त्रिष्टुप व छन्दः । धैवतः स्वरः।। अब कन्याजन किनसे विद्या को पावें इस विषय को कहते हैं ।। म शुक्रतुं देवी मनीषा अस्मत्सुतष्टो रथो न वाजी ॥१॥ पदार्थ:---(शुक्रा) शुद्ध अन्तःकरणयुक्त शीघ्रकारिणी (देवी) विदुषी कन्या (अस्मत्) हमारे से (सुतष्ट:) उत्तम कारू अर्थात् कारीगर के बनाए हुए (बाजी) वेगवान् (रथः) रथ के (न) समान (मनीषाः) उत्तम बुद्धियों को (प्रेतु) प्राप्त होवे ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-सब कन्या विदुषियों से ब्रह्मचर्य नियम से सब विद्या पढ़ें ॥१॥ फिर वे कन्या किस किस विद्या को जानें इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । विदुः पृथिव्या दिवो जनित्र शृण्वन्त्यापो अधः क्षतीः ।।२।। पदार्थ:-जो कन्या (अधः, क्षरन्तीः) नीचे को गिरते वर्षते हुए जलों के समान विद्या (शृण्वन्ति) सुनती हैं वे (पृथिव्याः) पृथिवी और (दिवः) सूर्य के (जनित्रम्) कारण को (विदुः) जानें ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में बाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे मेघमण्डल से जल वेग से पृथिवी को पाकर प्रजा आनन्दित होती हैं वैसे जो कन्या पढ़ाने वाली से भूगर्भादि विद्या को पाकर पति आदि को निरन्तर सुख देती हैं वे अत्यन्त श्रेष्ठ होती हैं ॥२॥ Auth " ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३४ ।। ८४५ पतार মী। त दर वति हि। हवं AND arta यागा। फिर वे कैसी हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आपश्चिदस्मै पिन्वन्त पृथ्वीवृत्रेषु शुरा मंसन्त उग्राः ॥३॥ पवार्थ:---जो कन्या (पृथ्वीः) भूमि और (आपः) जल (चित्) ही के समान (अस्म) इस विद्या व्यवहार के लिए (पिन्वन्त) सिंचन करती और (वृत्रेषु) धनों के निमित्त (उनाः) तेजस्वी (शूराः) शूरवीरों के समान (मंसन्ते) मान करती हैं वे विदुषी होती हैं ॥३॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-जो कन्या जल के समान कोमलत्वादि गुणयुक्त हैं, पृथिवी के समान सहनशील और शूरों के समान उत्साहिनी विद्याओं को ग्रहण करती हैं वे सौभाग्यवती होती हैं ॥३॥ फिर वे कन्या विद्या के लिए क्या यल करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ धूर्वस्य दधाताशानिन्द्रो न बज्री हिरण्यवाहुः ॥४॥ पदार्थ:-हे कन्याओ तुम (अस्म) इस विद्याग्रहण करने के लिए (धूष) रथों के प्राधार धुरियों में (अश्वान्) घोड़े और (हिरण्यबाहुः) जिसको भुजाओं में दान के लिए हिरण्य विद्यमान उस (बत्री) शस्त्र अस्त्रों से युक्त (इन्द्रः) सूर्यतुल्य राजा के (न) समान ब्रह्मचर्य को (श्रा, दधात अच्छे प्रकार धारण करो ॥४॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है - जैसे सारथी घोड़ों को रथ में जोड़कर नियम से चलाता है वैसे कन्या प्रात्मा अन्तःकरण और इन्द्रियों को विद्या की प्राप्ति के व्यवहार में निरन्तर जोड़कर नियम से चलावें ॥४॥ फिर कन्याजन कैसे विद्या को बढ़ावें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अभि प्र स्थाताव यज्ञं यातेब पत्मन्त्मनां हिनोत ॥५॥ पदार्थ:-हे कन्याओ तुम विद्याप्राप्ति के लिए (पहेब) दिनों के समान यज्ञन) पढ़ने पढ़ाने रूप यज्ञ के (अभिप्रस्थात) सब ओर से जाओ (मना) अपने से (पत्मन्) मार्ग में (यातेव) जाते हुए के समान (हिनोत) बढ़ाभो ॥१॥ भावार्थ:-इस मस्त्र से उपमालङ्कार है-हे कन्याओ ! जैसे दिन अनुकूल क्रम से जाते और आते हैं और जैसे बटोही जन नित्य चलते हैं वैसे ही अनुकूल क्रम से विद्याप्राप्ति मार्ग से विद्याप्राप्तिरूप यज्ञ को बढ़ामो ॥५॥ फिर कन्या विद्याप्राप्ति व्यवहार को बढ़ावें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स्मना समत्सु हिनोत यज्ञ दात केतुं जनाय वीरम् ।।६।। तव्या वीत. MERO एति लडो क॥ याप्रक P- ८४६ ऋग्वेदः म० ७ । सू० ३४ ॥ पदार्थ:-हे कन्यानो जैसे (जनाय) राजा के लिए (समत्स) संग्रामों में (वीरम्) पूरा करने वाले जन को प्रेरणा देते हैं वैसे (स्मना) अपने से (केतुम्) बुद्धि को (वधात) धारण करो और (यशम्) संग करने योग्य विद्याबोध को (हिनोत) बढ़ायो ।॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जैसे शूरवीर धीमान् बुद्धिमान् राजा पुरुष उत्तम यत्न से संग्रामों को विशेषता से जीतते हैं वैसे कन्याओं को इन्द्रियां जीत और विद्याओं को पाकर विजय की विशेष भावना करनी चाहिये ॥६॥ फिर वे कन्या विद्या कैसे पावें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उदस्य शुष्माद्भानुर्ति बिभर्ति भारं पृथिवी न भूमं ॥७॥ पदार्थः-हे कन्याजनो जैसे हम (भारम्) भार को (पृथिवी) भूमि (न) जैसे और (भानुः) किरणयुक्त सूर्य जैसे (न) वैसे (अस्य) इस विद्या व्यवहार के (शुष्मात्) बल से विदुषी (भूम) हों वा जैसे यह भानु पृथिवी आदि के भार को (उद्विभत्ति) उत्कृष्टता से' धारण करता है समस्त उस व्यवहार को (वातं) प्राप्त होता है वैसे तुम होनो ॥७॥ भावार्थ:-जैसे विद्वान् जन इस विद्याबोध के बल से सब सुख को धारण करते हैं वैसे ही कन्या विद्याबल से सब आनन्द को पाती हैं ।।७।। फिर अध्यापक, अध्येताओं को क्या उपदेश करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। हृयामि देवाँ अातुरग्ने साधन्नृतेन धियं दधामि ॥८॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) विद्वान् जैसे मैं (देवान्) विद्वानों को (ह्वयामि) बुलाता हूं (ऋतेन) सत्य व्यवहार से (साधन) सिद्ध करता हुआ (घियम्) उत्तम बुद्धि वा शुभ कर्म को (दधामि) धारण करता हूं और (अयातुः) जो नहीं जाता उस स्थिर से विद्या ग्रहण करता हूं वैसे आप कन्या पढ़ाने का निबन्ध करो ॥८॥ भावार्थ:-जो विद्वानों को बुला के और उनका सत्कार कर सत्य आचार से विद्या को धारण करते हैं वे विद्वान् होते हैं ।।८।। सब मनुष्यों को क्या इच्छा करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अभि वो देवीं धियं दधिष्वं प्र वो देवत्रा वाचं कृणुध्वम् ॥९॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जिस' (देवत्रा) विद्वानों में वर्तमान (देवीम्) दिव्य NAA .... - ऋग्वेदैः मैं० ७ । सू० ३४ ।। ८४७ तिलि HARE नीया माहिश AAD GANA १ ।। धातुके (बिषयम्) बुद्धि को तुम (अभिवधिध्वम्) सब ओर से धारण करो उस (व:) आपकी बुद्धि को हम लोग भी धारण करें विद्वानों में जिस (वाघम्) वाणी को तुम (प्र, कृणुध्वम्) प्रसिद्ध करो उस (41) आपकी वाणी को हम लोग भी (प्र) प्रसिद्ध करें ॥६ भावार्थ:-मनुष्यों को चाहिये कि विद्वानों का अनुकरण कर बुद्धि विद्या और वाणी को धारण करें ॥४॥ फिर वह विद्वान् कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ चष्ट आसां पार्थो नदीनां वरुण उग्रः सहस्रचक्षाः ॥१०॥ पवार्थ:-हे विद्वान् जैसे (वरुणः) सूर्य के समान (उमः) तेजस्वी जन (सहनचक्षाः) जिसके वा जिससे हजार दर्शन होते हैं वह सूर्य (श्रासाम्) इस (नदी- नाम्) नदियों के (पाथः) जल को खींचता और पूरा करता है वैसे हुए आप मनुष्यों के चित्तों को खींच के जिस कारण विद्या को (वाचण्टे) कहते हैं इससे सत्कार करने योग्य हैं ॥१०॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है--जो विद्वान् सूर्य के तुल्य अविद्या को निवार के विद्या के प्रकाश को उत्पन्न करता है वही यहां माननीय होता है ॥१०॥ फिर वह राजा किसके तुल्य क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। राजा राष्ट्रानां पेशो नदीनामनुत्तममै क्षत्रं विश्वायु ॥११॥ पदार्थ:-- जो (राजा) प्रकाशमान (नदीनाम्) नदियों के (पेश:) रूप के समान (राष्ट्रानाम्) राज्यों की रक्षा का विधान करता है (अस्म) इसके लिये (अनुत्तम्) शत्रुओं से अपीड़ित (विश्वायु) जिससे समस्त प्रायु होती है वह (क्षत्रम्) धन वा राज्य होता है ।।१।। भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजा न्याय- कारी विद्वान् होता है उसके प्रति समुद्र को नदी जैसे वैसे प्रजा अनुकूल होकर ऐश्वर्य को उत्पन्न कराती हैं और इस राजा की पूरी आयु भी होती है ॥११॥ फिर राजजन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अविष्टो अस्मान्विश्वासु विवधु कृणोत शंस निनित्सोः ॥१२॥ पवार्थ:-हे राजजनो तुम (विश्वास) समस्त (विक्षु) प्रजानों में (अस्मान्) उनके अनुकूल राज्याधिकारी हम जनों को (अविष्टो) दोषों में न प्रवेश किये हुए 40 Mara माहु नव्या चीता एति देह लि ६४८ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३४ ॥ MEAN निरन्तर रक्षा करो हमारी (शंसम्) प्रशंसा (कृणोत) करो हम लोगों की (निनित्सोः) निन्दा करना चाहते हुए के (अद्यम्) प्रकाशरहित व्यवहार को प्रकाश करो ॥१२॥ भावार्थ:--राजजन प्रजाओं में वर्तमान निन्दक जनों का निवारण कर प्रशंसा करने वालों की रक्षा कर और प्रजाजनों में पिता के समान वत्तं कर अविद्यान्धकार को निवारण करें ।।१२।। फिर थे राजजन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । व्येंतु दिद्युद्विवामशेवा युयोत विष्वग्रपस्तननाम् ॥१३॥ पदार्थ:-हे राजजन विद्वानो तुम (द्विषाम्) द्वेष करने वालों को (अशेवा) असुख अर्थात् दुःख को करो (तनूनाम्) शरीरों के विद्युत) निरन्तर प्रकाशमान (विष्वक) और व्याप्त (रपः) अपराध को (युयोल) अलग करो जिससे भद्र उत्तम सब मनुष्यों को सुख (दि, एतु व्याप्त हो ॥१३॥ भावार्थ:-हे राजजनो ! तुम, जो धार्मिक सज्जनों को पीड़ा देवं उनको दंड से पवित्र करो जिससे सब ओर से सब को सुख प्राप्त हो ॥१३॥ फिर वह राजा क्या करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अवीन्नो अग्निईव्यान्नमोभिः प्रेष्ठो अस्था अधायि स्तोमः ॥१४॥ पदार्थ:-जिस राजा ने (अस्म) इस राज्य के लिये (प्रेष्ठः) अतीव प्रिय (स्तोमः) प्रशंसा व्यवहार (अधायि धारण किया गया जो (हव्यात्) होम करने योग्य अन्न भोजन करने वाले (अग्निः) अग्नि के समान वर्तमान (नमोभिः) अन्नादि पदार्थों से (न:) हम लोगों की (प्रवीत) रक्षा करे वही हम लोगों को सत्कार करने योग्य है ॥१४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे सूर्य स्वप्रकाश से सब की रक्षा करता है वैसे राजा न्याय के प्रकाश से सब प्रजा की रक्षा करे ॥१४॥ फिर वे राजजन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सजूदेवेभिरपां नपति सखायं कृथ्वं शिवो नों अस्तु ॥१५॥ पदार्थ:-हे राजा जैसे (देवेभिः) विद्वानों से वा पृथिवी आदि दिव्य पदार्थों के (सजूः) साथ वर्तमान सूर्यमण्डल (अपां नपातम्) जलों के उस व्यवहार को जो नहीं नष्ट होता मेघ के समान करता है वैसे प्राप (न:) हमारे वा हमारे लिये (शिवः) मंगलकारी (प्रस्तु) हों हे विद्वानो ऐसे राजा को हमारा (सखायम्) मित्र (कृध्वम्) कीजिये ॥१५॥ HAL AMA than -- ऋग्वेदः म०७ । सू० ३४ ॥ ८४६ mins यत ABER अति हि पागा भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे. मनुष्यो! जैसे सूर्य आदि पदार्थ जगत् में मित्र के समान वर्त कर सुखकारी होते हैं वैसे ही राजजन सब के मित्र होकर मंगलकारी होते हैं ।।१५।। फिर वे राजजन किसके तुल्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अब्जामुक्थैरहि गृणीषे बुध्ने नदीनां रजासु षीदन् ॥१६॥ पदार्थ:-हे राजा जैसे सूर्य (बुध्ने) अन्तरिक्ष में वर्तमान (नदीनाम्) नदियों के संबन्धी (रजःसु) लोकों में (सीदन्) स्थिर होता हुआ (अब्जाम् ) जलों में उत्पन्न हुए (हिम्) मेघ को उत्पन्न करता है वैसे (उक्थैः) उसके गुणों के प्रशंसक वचनों से राज्य में जो ऐश्वर्य उनमें स्थिर होते हुए भाप नदियों के प्रवाह के समान जिससे विद्या को (गृणीषे) कहते हो इससे सत्कार करने योग्य हो ॥१६॥ भावार्थ:---इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालकार है-हे राजपुरुषो ! जैसे सूर्य वर्षा से नदियों को पूर्ण करता है वैसे धन धान्यों से तुम प्रजाओं को पूर्ण करो ॥१६॥ फिर वे राजजन' क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य निधतायोः ॥१७॥ पवार्थ:-हे विद्वानो जैसे (बुधन्य:) अन्तरिक्ष में उत्पन्न हुमा (अहिः) मेघ (न:) हम लोगों को (रि) हिंसा के लिये (मा) मत (धात्) धारण करे वा जैसे (मस्य) इस (ऋतायोः) सत्य न्याय धर्म की कामना करने वाले राजा का (यज्ञः प्रजापालन करने योग्य व्यवहार (मा, निधत) मत नष्ट हो वैसा अनुष्ठान करो॥१७॥ भावार्थ:-- इस मत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे राजा भादि मनुष्यो ! जैसे अवर्षण न हो, न्यायव्यवहार न नष्ट हो, वैसा तुम विधान करो॥१७॥ फिर वे राजजन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उत ने एषु नृषु श्रवो धुः प्र राये यन्त शर्धन्तो अर्थः ॥१८॥ पदार्थ:-हे राजा जो (न:) हमारे (एष) इन व्यवहारों में (राये) धन के लिये (श्रवः) अन्न वा श्रवण को (धुः) धारण करें वे हम लोगों को प्राप्त होवें (उत) और जो हम लोगों को (शर्धन्तः) बली करते हुए (नष) नायक मनुष्यों में (अर्य:) शत्रु जन हमारे राज्य प्रादि ऐश्वर्य को चाहें वे दूर (प्र, यन्तु) पहुँचें ॥१८|| एति पाति । के॥ wara म्। या प्रव वह लि ८५० ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३४ ॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि सज्जनों के निकट और दुष्टों के दूर रह कर लक्ष्मी की उन्नति करें॥१८॥ कौन शत्रुओं के निवारण में समर्थ होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । तपन्ति शत्रं स्वर्णभूमा महासैनासो अमेभिरेषाम् ॥१९॥ पदार्थ:-(महासेनास:) जिनकी बड़ी सेना है वे जन (एषाम्) इन वीरों के (अमेभिः) बलादिकों से (शत्रुम्) शत्रु को (तपन्ति) तपाते हैं उनके साथ राजा आदि हम लोग (स्वः) सुख (न) जैसे हो वैसे (भूम) प्रसिद्ध हों ॥१६॥ भावार्थ:-हे राजा यदि आपसे योद्धा शूरवीर जनों की सेना सत्कार कर रक्खी जाय तो आप के शत्रुजन बिला जायं और सुख निरन्तर बढ़े ॥१९॥ फिर राजा और अन्य भृत्य परस्पर कैसे वत्तें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ यन्नः पत्नीर्गमन्त्यच्छा त्वष्टा सुपाणिर्दधातु वीरान् ॥२०॥ पदार्थ:-हे राजा जैसे (यत्) जो (पत्नी:) भार्या (न:) हम लोगों को (अच्छा) अच्छे प्रकार (मा, गन्ति) प्राप्त होती और रक्षा करती हैं और जैसे हम लोग उनकी रक्षा करें वैसे (स्वष्टा) दुःख-विच्छेद करने वाला (सुपाणि:) सुन्दर हाथों से युक्त राजा प्राप (धीरान्) शूरता आदि गुणों से युक्त मन्त्री और भृत्यों को (दधात) धारण करो ॥२०॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे पतिव्रता स्त्री स्त्रीवत पति जन परस्पर की प्रीति से रक्षा करते हैं वेसे राजा धार्मिकों की, अमात्य और भृत्यजन धार्मिक राजा की निरन्तर रक्षा करें॥२०॥ SHA फिर वे राजा और मन्त्री प्रादि परस्पर कैसे वर्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । प्रति नः स्तोमं त्वष्टा जुषेत स्यादस्मे अरमतिर्वसूयुः ॥२१॥ पदार्थः-हे विद्वानो! जैसे हम लोग राजा की प्रीति से सेवा करें वैसे (भरमतिः) पूर्ण मति है जिस को (वसूयु।) धनों की कामना करता हुआ (त्वष्टा) दुःखविच्छेद करने वाला राजा (नः) हम लोगों को (प्रति, जुषेत) प्रीति से सेवे असे यह राजा हमारी (स्तोमम्) प्रशंसा को सेवे वैसे हम लोग इसकी कीति को सेवें य ति वा (ततश्र ऋग्वेदः म०७ । सू० ३४ ॥ ८५१ जैसे यह (अस्मे ) हम लोगों में प्रसन्न (स्थाव) हो वैसे हम लोग भी इस में प्रसन्न हों.॥२१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जहां राजा अमा- त्य भृत्य और प्रजाजन एक दूसरे की उन्नति को करना चाहते हैं वहां समस्त ऐश्वर्य सुख और वृद्धि होती है ॥२१॥ फिर वे राजादि प्रजाजनों में कैसे वर्ते इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ता नो रासनातिषाचो वसून्या रोदेसी वरुणानी शृणोतु । वरूत्रीभिः मुशरणो नो अस्तु त्वष्टा सुदनो वि दधातु रायः ॥२२॥ पदार्थ:-- है विद्वानो आप (वरूत्रीभिः) वरुणसम्बन्धी विद्याओं से (यरुणानी) जलादि पदार्थयुक्त (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी के समान (रातिषाचः) दान सम्बन्ध करते हुए (न:) हम लोगों के लिये (ता) उन (सूनि) धनों को (मारासन्) अच्छे प्रकार देवें है राजन् (सदनः) अच्छे दानयुक्त (स्वष्टा) दुःखविच्छेदक (सुश- रण:) सुन्दर प्राश्रय जिनका वह आप (नः) हमारे रक्षक (अस्त) हों हमारे लिये (रायः) धनों को (वि, दधातु) विधान कीजिये । हमारी वार्ता (शृणोतु) सुनिये ॥२२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो राजपुरुष सूर्य और भूमि के तुल्य प्रजाजनों को धनी करते, उनके न्याय करने की बातें सुनते और यथावत् पुरुषार्थ से लक्ष्मीवान् करते हैं वे ही पूण सुख वाले होते हैं ॥२२॥ फिर विद्वान् जन अन्यों को क्या क्या ज्ञान देवें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। तन्नो रायः पर्वतास्तन्न आपस्तद्रोतिषाच ओषधीरूत द्यौः वनस्पतिभिः पृथिवी सजोषा उभे रोदसी परि पासतो नः ॥२३॥ पदार्थ:--हे विद्वानो जैसे (पर्वताः) मेघ वा शैल' (नः) हमारे लिये (तत्) उन (रायः) धनों को (शातिषाचः) जो दान का सम्बन्ध करते हैं वा (आपः) जलों को (उत्त) निश्चय करके (सजोषाः) समान सेवनेवाला जन वा (औः) सूर्य (वनस्प- तिभिः) वटादिकों के साथ (पृथिवी) पृथिवी वा (उभे) दोनों (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी भी (न:) हम लोगों की (परि, पासतः) रक्षा करें वैसे हम लोगों की आप लोग रक्षा करें ॥२३॥ मासु ध्या सत्या 4 RAND SHAN ARE -

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ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३४ ॥
प्रा
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है- पढ़ने और सुनने
वाले जन पढ़ाने और उपदेश कराने वालों के प्रति ऐसी प्रार्थना करें
लोगों को आप ऐसा बोध करावें कि जिससे हम लोग सब सृष्टि के सकाश
से
सुख
की उन्नति कर सकें ॥२३॥
फिर विद्वान् जन किसके तुल्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
अनु तदुर्वी रोदसी जिहातामनु द्युक्षो वरुण इन्द्रसखा ।
अनु विश्व मरुतो ये सहासो रायः स्याम धरुण धियध्यै ॥२४॥
पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जैसे (उर्वीः) बहुपदार्थयुक्त (रोदसी) आकाश और
पृथिवी (तत्) उन पदार्थों को (अनु, जिहाताम) अनुकूल प्राप्त हों वा (इन्द्रसखा)
परमैश्वर्य राजा सखा मित्र जिस का (द्य क्षः) प्रकाशों को वसाता (वरुण:) और
श्रेष्ठजन (अनु) पीछे जावे वा (ये जो (विश्वे) सर्व (सहासः) सहनशील और
बलवान् (मरुतः) मनुष्य अनुकूलता से प्राप्त हों। वैसे हम लोग (रायः) धन
के (घरुणम्) धारण करने वाले को (धियध्य) धारण करने को समर्थ (स्याम)
हो॥२४॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे सृष्टिस्थ भूमि आदि पदार्थ सब को
धारण कर सुख देते हैं वैसे ही आप हों ॥२४॥
फिर सेव्य सेवक और अध्यापक अध्येता जन परस्पर कैसे वर्त
इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप ओषधीर्वनिनों जुषन्त ।
शर्मन्त्स्याम मरुतामुपस्थै यूयं पात खस्तिभिः सदा नः ॥२५॥
पदार्थ:-हे विद्वानो ! जो (वनिनः) किरणवान् (इन्द्रः) बिजुली के समान
राजा (वरुणः) श्रेष्ठ (मित्रः) मित्रजन (अग्निः) पावक (प्रापः) जल और
(प्रोषधीः) यवादि प्रोषधी (नः) हमारे लिये (तत्) उस सुख को (जुषन्त) सेवते हैं
जिससे (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदेव (पात)
रक्षा करो उन तुम (मरुताम्) लोगों के (उपस्थे) समीप (शर्मन्) सुख में हम लोग
स्थिर (स्यास) हों ॥२५॥
भावार्थ:--मनुष्यों को ऐसी इच्छा करनी चाहिये कि विद्वानों के
संग से जैसे बिजुली प्रादि पदार्थ अपने कामों को सेवें वैसे हम लोग
अनुष्ठान करें॥२॥

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३५ ॥ ८५३ लि इस सूक्त में अध्येता, अध्यापक, स्त्री, पुरुष, राजा, प्रजा, सेना, भृत्य और विश्वे देवों के गुण और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह खप्तम मण्डल में चौंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ। 11 y ति। -TIHAR E मप्या अथ पञ्चदशस्य पञ्चत्रिशसमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः। विश्वेदेवा देवताः।१।२।३। ४ । ५। ११ । १२ त्रिष्टुप् । ६।८।१० । १५ नित विटुप् । ७॥ ६ विरात्रिष्टुप्छन्दः। धैवतः स्वरः। १३ । १४ भुरिक पङ्क्ति- छन्दः । पञ्चमः स्वरः। अब पन्द्रह ऋचा वाले पैंतीसवे सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को सृष्टिपदार्थों से क्या क्या ग्रहण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । शन्न इन्द्रामी अवतामबोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रालईव्या । शमिन्द्रासोमा झुविताय शं योः शं न इन्द्रापूष्णा वाजसातौ ॥१॥ पवार्थ:-हे जगदीश्वर (वाजसातौ) संग्राम में (सुचिताय) ऐश्वर्य होने के लिए (न:) हम लोगों को (अयोभिः) रक्षा प्रादि के साथ (इन्द्राग्नी) बिजुली और साधारण अग्नि (शम्) सुख करने वाले (शम्) मंगल करने वाले (रातहध्या) दी है ग्रहण करने को वस्तु जिन्होंने ऐसे (इन्द्रावरुणा) बिजुली और जल (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुख करने वाले (इन्द्रासोमा) बिजुली और पोषधिगण (शम्) सुखकारक (योः) सुख के निमित्त और (इन्द्रापूषणा) बिजुली और वायु (न:) हमारे लिये (शम्) प्रानन्द देने वाले (भवताम्) हों वैसा हम लोग प्रयत्न करें ॥१॥ भावार्थः हे जगदीश्वर ! भाप की कृपा से, विद्वानों के संग से और अपने पुरुषार्थ से आप की रची हुई सृष्टि में वर्तमान बिजुली आदि पदार्थों से हम लोग उपकार करना कराना चाहते हैं सो यह हम लोगों का प्रयत्न सफल हो ॥१॥ मनुष्यों को जैसे ऐश्वर्य आदि सुख करने वाले हों वैसे विधान करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। शं नो भगः शर्मु नः शंसो अस्तु शं नः पुरंन्धिः शर्मु सन्तु रायः । शं नः सत्यस्य॑ सुयर्मस्य शंसः शं नौ अर्यमा पुरुजातो अस्तु ।२। पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे (नः) हम लोगों के लिये (भगः) ऐश्वर्य (शम्) व्या गीत: सत्य एति। गति म या प्रक Sta M ८५४ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३५॥ 489 Pune सुख करने वाला (नः) हम लोगों के लिये (शंसः) शिक्षा वा प्रशंसा (शम्) सुख करने वाली (उ) और (पुरन्धिः) बहुत पदार्थ जिसमें रक्खे जाते हैं वह आकाश (शम्) सुख करने वाला (प्रस्तु) हो (न:) हम लोगों के लिये (रायः) धन (शम्) सुख करने वाले (उ) ही (सन्तु) हों (नः) हम लोगों के लिये (सत्यस्य) यथार्थ धर्म वा परमेश्वर की (सयमस्य) सुन्दर नियम से प्राप्त करने योग्य व्यवहार की (शंसः) प्रशंसा (शम्) सुख देने वाली और (पुरुजातः) बहुत मनुष्यों में प्रसिद्ध (अर्यमा) न्यायकारी (न:) हमारे लिये (शम्) आनन्द देने वाला (प्रस्तु) होवे वैसा हम लोग प्रयत्न करें ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम जैसे ऐश्वर्य, पुण्यकीति, धन, धर्म, योग और न्यायाधीश सुख करने वाले हों वैसा अनुष्ठान करो ॥२॥ फिर मनुष्यों को सृष्टि से कैसा उपकार लेना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शं नौ धाता शर्मु धर्ता नो अस्तु शं ने उरूची भवतु स्वधाभिः । शं रोदसी बृहती शं अद्रिः शं नौ देवानां सुहवानि सन्तु ॥३॥ पदार्थ:-हे जगदीश्वर वा विद्वान् ! आपकी कृपा और संग से (नः) हम लोगों के लिये (धाता) धारण करने वाला ( (शम्) सुखरूप (उ) और (धर्ता) पुष्टि करने वाला (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (प्रस्तु) हो (स्वधाभिः) अन्ना- दिकों के साथ (उरूची) जो बहुत पदार्थों को प्राप्त होती वह पृथिवी (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुख देने वाली (भवत) हो (बृहती) महान् (रोक्सी) प्रकाश और अन्तरिक्ष (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप हो। (अद्रिः) मेघ (नः) हमारे लिये (शम्) सुखकारक हो (नः) हम लोगों के लिये (देवानाम्) विद्वानों के (सुहवानि) सुन्दर भावाहन प्रशंसा से बुलावे (शम्) सुखरूप (सन्तु) हों ॥३॥ भावार्थ:-- जो मनुष्य पुष्टि करने वालों से उपकार लेना जानते हैं वे सब सुखों को पाते हैं ॥३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मंत्र में कहते हैं ।। शं नो अमियोतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरुणावश्विना शम् । शं नः सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं ने इपिरो अभि वातु वातः ॥४॥ पदार्थ:-हे जगदीश्वर वा विद्वान् पाप की कृपा से (ज्योतिरनीकः) ज्योति ही सेना के समान जिसकी (अग्निः) वह अग्नि (नः) हम लोगों के लिये (शम्) ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३५ ।। s - आ य ideo सुखरूप (अस्तु) हो (अश्विना) व्यापक पदार्थ (शम्) सुखरूप और (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान (नः) हमारे लिये (शम्) सुखरूप होवें (नः) हम (सुकृताम्) सुन्दर धर्म करने वालों के (सुकृतानि) धर्माचरण (शम्) सुखरूप सन्तु हों और (इषिरः) शीघ्र जाने वाला (वातः) वायु (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूम (अभि, वातु) सद नोर से बहे ॥४॥ भावार्थ:- जो अग्नि और वायु आदि पदार्थों से कार्यों को सिद्ध करते वे समग्र ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥४॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु । शं न ओषधीनिनो भवन्तु शन्नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः ॥५॥ पदार्थ:-हे जगदीश्वर और शिक्षा देने वाले पाप की कृपा और उपदेश से (पूर्वहूतौ) जिसमें पिछलों की प्रशंसा विद्यमान वा जिससे पिछलों की प्रशंसा होती है उस में (द्यावापृथिवी) बिजुली और भूमि (न:) हम लोगों के लिए (शम्) सुख (शये) देखने को (अन्तरिक्षम्) भूमि और सूर्य के बीच का प्राकाश (न:) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (प्रस्तु) हो और (मोषधी:) ओषधि तथा (वनिनः) वन जिनमें विद्यमान वे वृक्ष (नः) हमारे लिए (शम्) सुखरूप (भवन्तु) होवें (रजसः) लोकों में उत्पन्न हुओं का (पतिः) स्वामी (जिष्णुः) जयशील (न:) हमारे लिए (शम्) सुखरूप (प्रस्तु) हो ॥५॥ भावार्थ:---जो सब सृष्टिस्थ पदार्थों को सुख के संयुक्त करने को योग्य होते हैं वे ही उत्तम विद्वान होते हैं ॥५॥ फिर विद्वानों को क्या जान के और संयुक्त कर क्या पाने योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शं न इन्द्रो वमुभिर्देवो अस्तु शमादित्येभिर्वरुणः सुशंसः । शं नो रुद्रो रुद्रेभिर्जलापः शं नस्त्वष्टामानिरिह भृणोतु ॥६॥ पदार्थ:-हे जगदीश्वर वा विद्वान् आपके सहाय से और परीक्षा से (इह) यहां (बसभिः) पृथिव्यादिकों के साथ (देवः) दिव्य गुणकर्मस्वभावयुक्त (इन्द्रः) बिजुली वा सूर्य (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप और (प्राविश्येभिः) सवत्सर के महीनों के साथ (सशंसः) प्रशंसित प्रशंसा करने योग्य (वरुणः) जल समुदाय (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (अस्त) हो (रभिः) जीव प्राणों के साथ माह do लडो गा HTRA ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३५॥ (जलाध:) दुःख निवारण करने वाला (श:) परमात्मा वा जीव (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप हो (ग्नाभिः) वाणियों के साथ (त्वष्टा) सर्व वस्तुविच्छेद करने वाला अग्नि के समान परीक्षक विद्वान् (नः) हम लोगों के लिए (शम्) सुख (श्रृणोतु सुने ॥६॥ भावार्थ:-जो पृथिवी, आदित्य और वायु की विद्या से ईश्वर, जीव और प्राणों को जान यहाँ इनकी विद्या को पढ़ा परीक्षा कर सब को विद्वान् और उद्योगी करते हैं वे इस संसार में किस किस ऐश्वर्य को नहीं प्राप्त होते हैं ॥६॥ फिर विद्वानों को किन उपायों से जगत् का उपकार करना योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शं ना सोमो भवतु ब्रह्म शं नः शं नो ग्रावाणः शर्मु सन्तु यज्ञाः । शं नः स्वरूणां मितयो भवन्तु शं नः प्रस्था' शम्वस्तु वेदिः ॥७॥ पदार्थ:--है जगदीश्वर वा विद्वान आपकी कृपा और पढ़ाने से (सोमः) चन्द्रमा (न:) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (भवतु) हो (ब्रह्म) धन वा अन्न (नः) हमारे लिए (शम्) सुखरूप हो (ग्रावाणः) मेघ (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (सन्तु) हों (यज्ञा:) अग्निहोत्र को प्रादि ले शिल्प यज्ञ पर्यन्त (नः) हम लोगों के लिए (सम्, उ) सुखरूप ही हों (स्वरूणाम्) यज्ञशाला के स्तम्भ शब्दों के (मितयः) प्रमाण हमारे लिये (शम् । सुखरूप (भवन्तु) हों (अस्वः) जो उत्पन्न होती है वह प्रोषधि (नः) हमारे लिये (शम्) सुखरूप हों और (वेदिः) कुण्ड आदि हमारे लिये (शम्, उ) सुख रूप ही (प्रस्तु) हो ॥७॥ भावार्थ:-जो मनुष्य विद्या, श्रोषधी, धन और यज्ञादि से जगत् का सुख के साथ उपकार करते हैं वे अतुल सुख पाते हैं ॥७॥ फिर विद्वान् जनों को क्या इच्छा करनी चाहिये इस विषय को अगले मंत्र में कहते हैं। शं ना सूर्य उरुचक्षा उदॆतु शं नश्चततः प्रदिको भवन्तु ! शं नः पर्वता ध्वयों भवन्तु शं नः सिन्धवः शर्मु सन्त्वापः ॥८॥ पदार्थ:-हे परमेश्वर वा विद्वान् आपकी शिक्षा से (उरुचक्षा:) जिससे बहुत दर्शन होते हैं वह (सूर्यः) सूर्य (न:) हम लोगों के लिए (शम्) सुख रूप (उदेत) उदय हो (चतस्त्रः) चार (प्रदिशः) पूर्वादि वा ऐशानी आदि दिशा वा rung मा भा ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३५ ॥ लि - Navar हैं apa । विदिशा (नः) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (भवन्तु) हों (ध्रुवयः) अपने अपने स्थान में स्थिर (पर्वताः) पर्वत (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (भवन्तु) होवें (सिन्धवः) नदी वा समुद्र (न:) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप और (मापः) जल वा प्राण (शम्) सुखरूप (उ) ही (सन्तु) हों ।।। भावार्थ:-जो जगदीश्वर ने बनाये हुए सूर्यादिकों से उपकार ले सकते हैं वै इस जगत् में श्री राज्य और कीति वाले होते हैं। फिर शिक्षकजनों को शिष्यजन अच्छी शिक्षा दे कैसे सिद्ध करने चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। शं नो अदितिर्मवतु व्रतेभिः शं नो भवन्तु मरुतः स्वर्णाः । शं नो विष्णुः शर्मु पूषा नौ अस्तु शं नो भवित्रं शम्बस्तु वायुः ॥९॥ पदार्थः-- हे अध्यापक और उपदेशक विद्वानो! तुम जैसे (अदितिः) विदुषी माता (व्रतेभिः) अच्छे कामों के साथ (न:) हम लोगों को (शम्) सुखरूप (भवतु) हो और (स्व:) सुन्दर मन्त्र विचार हैं जिनके वे (मरुतः) प्राणों के समान प्रिय- जन अच्छे कामों के साथ (शम्) सुखरूप (भवन्तु) हो (विष्णुः) व्यापक जगदीश्वर (नः) हम लोगों के [ = को] (शम्) सुखरूप हो (पूषा) पुष्टि करनेवाला ब्रह्मचर्यादि व्यवहार (नः) हमारे लिये (शम्) सुखरूप (उ) ही (अस्तु) हो (भवित्रम्) होनहार काम (न:) हमारे लिये (शम्) सुखरूप होवे और (बायुः) पवन (नः) हमारे लिये (शम्) सुखरूप (3) ही (अस्तु) हो वैसी शिक्षा देनो ॥६॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-माता आदि विदु- षियों को कन्या और विद्वान् पिता आदि को पुत्र अच्छे प्रकार शिक्षा देने योग्य हैं जिससे यह भूमि से ले के ईश्वरपर्यन्त पदार्थों की विद्याओं को पाके धार्मिक होकर सब मनुष्यों को निरन्तर आनन्दित करें ॥६॥ फिर विद्वानों को कैसी शिक्षा करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूपसौ विभातीः । शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥१०॥ पदार्थ:-- हे विद्वानो। तुम वैसे हम लोगों को शिक्षा देनो जैसे (प्रायमाणः) रक्षा करता हुआ (सविता) सकल जगत् की उत्पत्ति करने वाला ईश्वर (देवः) जो कि सब सुखों का देने वाला पाप ही प्रकाशमान वह (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (भवतु) हो (विभातीः) विशेषता से दीप्तिवाली (उषसः) प्रभात वेला तुके सत्य . WAVE ति। लड़ो गति न ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३५ ॥ (नः) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (भवन्तु) हों (पर्जन्यः) मेघ (प्रजाभ्यः नः) हम प्रजाजनों के लिये (शम्) सुखरूप (भवत) हो और (क्षेत्रस्य, पतिः) जिसके बीच में निवास करते हैं उस जगत् का स्वामी ईश्वर वा राजा (शम्भुः) सुख की भावना कराने वाला (नः) हमारे लिये (शम्) सुखरूप (प्रस्तु) हो ॥१०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-विद्वानों को वेदादि विद्यानों से परमेश्वर प्रादि पदार्थों के गुणकर्मस्वभाव विद्यार्थियों के प्रति यथावत् प्रकाश करने चाहिये जिससे सबों से उपकार ले सकें॥१०॥ 488- 44 . फिर मनुष्य किनको प्राप्त हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शं नो देवा विश्वदेवा भवन्तु शं सरस्वती सह धीभिरस्तु । शममि- पाचा श{ रातिषाचः शं नौ दिव्या पार्थिवा शं नो अग्योः ॥११॥ पदार्थ:-हमारे शुभ गुणों के प्राचार से (देवाः) विद्यादि शुभ गुणों के देने वाले (विश्व, देवाः) सब विद्वान् जन (न:) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (भवन्तु) हो। (सरस्वती) विद्या सुशिक्षायुक्त वाणी (धीभिः) उत्तम बुद्धियों के (सह) साथ (नः) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (प्रस्त) हो (अभिषाचः) जो अभ्यन्तर आत्मा में सम्बन्ध करते हैं वे (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप हों और (रातिषायः) विद्यादि दान का सम्बन्ध करने वाले हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (उ) ही होवें तथा (दिव्याः) शुभ गुण कर्म स्वभावयुक्त (पार्थिवाः) पृथिवी में विदित राजजन वा बहुमूल्य पदार्थ (शम्) सुखरूप और (श्रयाः) जलों में उत्पन नौकाओं से जाने वाले वा मोती आदि पदार्थ हम लोगों के लिये (शम्) सुख- रूप हों ॥११॥ भावार्थ:-- मनुष्यों को ऐसा आचरण करना चाहिये जिससे सब को सब विद्वान् जन सुन्दर बुद्धि और वाणी विद्या देने वाले योगी जन राजा और शिल्पी जन तथा दिव्य पदार्थ प्राप्त हों॥११॥ फिर मनुष्य किसकी इच्छा करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अन्तः शर्मु सन्तु गावः । शं नं ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु ।।१२।। पदार्थ:-हे जगदीश्वर वा विद्वान् जैसे (हवेषु) हवन प्रादि अच्छे कामों में (सत्यस्य) सत्य भाषण प्रादि व्यवहार के (पतयः) पति (न:) हम लोगों के लिये CHAN kaku BARN ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३५ ।। ८५६ हि (शम्) सुखरूप (भवन्तु) होवें (अर्वन्तः) उत्तम घोड़े (नः) हमारे लिये (शम्) सुख- रूप हो। (गाव:) दूध देती हुई गोयें (नः) हम लोगों को (शम्) सुखरूप (उ) ही (सन्तु) हों (सुकृतः) धर्मात्मा (सुहस्ताः) सुन्दर अच्छे कामों में हाथ डालने वाले (ऋभवः) बुद्धिमान् जन (नः) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप हों (पितरः) पितृजन (न:) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (भवन्तु) हों वैसा विधान करो ॥१२॥ भावार्थ:- मनुष्यों को ऐसे शील की धारणा करनी चाहिये जिससे प्राप्त सज्जन प्रसन्न हों जिनकी प्रीति से सब पशु और विद्वान् पितृजन प्रसन्न और सुख करने वाले होवें ॥१२॥ फिर विद्वान् जनों को क्या शिक्षा करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं शं नो अज एकपाद्देवो अस्तु शं नोऽहिर्बुध्न्यः १' शं समुद्रः । शं नो अपानात्पेरुरैस्तु शं नः पृश्निर्भवतु देवगोपाः ॥१३॥ पदार्थ:-हे विद्वानो! तुम वैसी शिक्षा देनो जैसे (न:) हम लोगों को (अजः) जो कभी नहीं उत्पन्न होता वह जगदीश्वर (एकपात) जिसके एक पैर में सब जगत् विद्यमान है (देवः) सब सुख देने वाला विद्वान् (शम्) सुखरूप (अस्तु) हो बुधन्य:) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध होने वाला (अहिः) मेघ (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप हो (समुद्रः) जिसमें अच्छे प्रकार जल उछलते हैं वह सागर (न:) हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप हो (अपाम्) जलों का (पेक्षः) पार करने वाला और (नपात) पैर जिसके नहीं हैं वह नौका (नः) हम लोगों के लिए (शम्) सुखरूप (अस्तु) हो (वेवगोपाः) और सब की रक्षा करने वाला (पृश्निः) अन्तरिक्ष अवकाश हम लोगों के लिये (शम्) सुखरूप (भवत) हो ॥१३॥ भावार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको! तुम हम लोगों को जन्म- मरणादि दोषरहित ईश्वर, मेघ, समुद्र और नौका की विद्या का ग्रहण कराइये जिससे हम लोग सब के रक्षक हों ॥१३॥ फिर मनुष्य क्या अवश्य करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। आदित्या रुद्रा वसंवो जुषन्तेदं ब्रह्म क्रियमाणं नवीयः । शृण्वन्तु नो दिव्याः पार्थिवासो गोजाता उत ये यज्ञियासः ॥१४॥ पदार्थ:-है विद्वानो जो आप लोग (प्रावित्याः) अड़तालीस वर्ष प्रमाण से ब्रह्मचर्य सेवन से विद्या पढ़े हुए हों वा (रुद्राः) चवालीस वर्ष प्रमाण ब्रह्मचर्य से HD MAHA SAR ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३५ ।। विद्या पढ़े हुए हों वा (बसपा) चालीस वर्ष प्रमाण जिसका है ऐसे ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़े हुए हों वा (विव्या) शुद्ध मनोहर गुण प्रादि में प्रसिद्ध वा (पार्थिवालः) पुथिवी में विदित वा (गोजाताः) सुशिक्षित वाणी से उत्पन्न हुए (उत) और (ये) जो (यजियाः) यश संपादन करने वाले हैं वे (न:) हम लोगों के लिए (इयम् ) इस प्रत्यक्ष (नवीयः) अत्यन्त नवीन (क्रियमाणम्) वर्तमान में सिद्ध होते हुए (ब्रह्म) बहुत धन वा अन्न को (जुषन्त) सेवें और हम लोगों का पढ़ा हुआ (शृण्वन्तु सुनें ॥१४॥ भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि धार्मिक विद्वानों को बुलाय सत्कार कर अन्नादिकों से अच्छे प्रकार तृप्त कर और अपना पढ़ा अच्छे प्रकार सुना शेष इनसे सुनें जिससे भ्रमरहित सब हो ॥१४॥ मनुष्यों को किनसे विद्याध्ययन और उपदेश सुनने योग्य हैं इस विषय को अगले मात्र में कहते हैं । ये देवानां यज्ञिया यज्ञियांना मनोर्यजत्रा अमृता ऋतज्ञाः । ते नौ रासन्तामुरुगायमध यूयं पात स्वस्तिमिः सदा नः ॥१५॥ पदार्थ:-(2) जो (देवानाम्) विद्वानों के बीच विद्वान् (यशिधानान्) यज्ञ करने के योग्यों में (यज्ञियाः) यज्ञ करने योग्य (मनोः) विचारशील के (यजत्राः) संग करने (अमृताः) अपने स्वरूप से नित्य वा जीवन्मुक्त रहने (ऋतज्ञा:) और सत्य के जानने वाले हैं (ते)वे (अधा) आज (न:) हम लोगों के लिए (उरुगायम्) बहुतों ने गाये हुए विद्याबोध को (रासन्ताम्) देखें, है विद्वानो (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) विद्यादि दानों से (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पास) रक्षा करो ॥१५॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो अत्यन्त विद्वान् अत्यन्त शिल्पी सत्य आचरण करने वाले जीवन्मुक्त ब्रह्मवेत्ता जन हम लोगों को विद्या और सुन्दर शिक्षा से निरन्तर उन्नति देते हैं उनको हम संरक्षण देकर सदा A AAR सेवें॥१५॥ इस सूक्त में सर्व सुखों की प्राप्ति के लिए सृष्टिविद्या और विद्वानों के संग का उपदेश किया इससे इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में पैंतीसवां सूरत समाप्त हुमा॥

ऋग्वेदः म०७। सू०३६ ॥ ८६१ FDM ap तुके अथ नवर्चस्य पत्रिंशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठधिः । विश्वेदेवा देवताः । २ त्रिष्टुप् । ३।४ । ६ निवृत्रिष्टुप् । ८ । विरात्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः। ५ पवितः । १।७ भुरिपक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब नव ऋचावाले छत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य क्या करे इस विषय को कहते हैं । म ब्रौतु सदनाहतस्य वि रश्मिभिः ससृजे सूर्यो गा। वि सानुना पृथिवी संस उर्वी पृथु प्रतीकमध्येधै अग्निः ॥१॥ पदार्थ:--(अग्निः) अग्नि के समान विद्वान् जन जैसे (सूर्यः) सूर्य (रश्मिभिः) किरणों से (पृथु) विस्तृत (प्रतीकम्) प्रतीत करने वाले पदार्थ (गाः) किरणों को (वि, ससृजे) विविध प्रकार रचता वा छोड़ता वा (अधि, पा, ईधे) अधिकता से प्रकाशित होता है और जैसे (ऊर्वी) बहुपदार्थयुक्त (पृथिवी) पृथिवी (सानुना) शिखर के साथ (वि, सत्र) विशेषता से चलती है वैसे आप (ऋतस्य) सत्य के (सदनाव) स्थान से (ब्रह्म) धन को (प्रेतु) अच्छे प्रकार प्राप्त हों ॥१॥ भावार्थः - जो जगदीश्वर श्राप ही प्रकाशमान और सूर्यादिकों का प्रकाश करने वा बनाने वाला जगत् के प्रकाश के लिए अग्नि और सूर्यलोक को रचता है उसकी उपासना कर सत्य पाचरण से मनुष्य ऐश्वर्य को प्राप्त होवें ॥१॥ फिर मनुष्य किसका सेवें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इमां वा मित्रावरुणा मुक्तिमिषं न कृण्वे असुरा नवीयः । इनो वामन्यः पदवीरदब्धो जनं च मित्रो यतति अवाणः ।।२।। पदार्थ: -हे (असुररा) प्राणों में रमते हुए (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशको जो (अन्यः) और जन (पदवीः) पद को प्राप्त होता और (अदब्धः) अर्हिसित (मित्रः) सखा (इन:) ईश्वर (वाणः) उपदेश करता हुभा (वाम् ) तुम दोनों को (जनं च) और जन को भी (नवीयः) अत्यन्त नवीन व्यवहार की प्राप्ति कराने का (अतति) यल कराता तथा (वाम्) तुम दोनों की (इमाम् ) इस प्रत्यक्ष (सवृतिम्) जिससे सुन्दरता से दुःखों की निवृत्ति करते हैं उस सत्य वाणी को (इषम् ) इच्छा वा अन्त के (न) समान देता है जिसको कि मैं परोप- कार के लिए (कृण्वे) सिद्ध करता हूं उसको मैं तुम नित्य सेवें ॥२॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! आप जो सब के लिये अलग सर्वव्यापी सबका ति ति !

८६२ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३६ ॥ REP more FOR - मित्र जगदीश्वर सबके हित के लिये सदैव प्रवृत्त है उसकी उपासना कर मोक्ष पद को प्राप्त होवें ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिए इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ वातस्य ध्रजतो रन्त इत्या अपीपयन्त धेनवो न सूदाः। महो दिवः सर्दने जायमानोऽचिक्रदृषमः सस्मिन्नधन् ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जो (महः) महान् (दिवः) प्रकाश के (सदने) घर में (जायमान:) उत्पन्न होता हुआ (वृषभः) बलिष्ठ (सस्मिन्) अन्तरिक्ष में और (अधन्) उषाकाल में (अचिक्रवत्) आह्वान करता जिसमें (ध्रजतः) जाते हुए (वातस्य) पवन के सम्बन्धी (सूदाः) पाप करने वालों के (न) समान (धेनवः) गौयें (इत्याः) जो कि पाने योग्य हैं उनको (रन्ते) रमता और सबको (श्रा, अपीपयन्स) सब ओर से बढ़ाता है उस सूर्य को युक्ति के साथ उत्तम प्रयोग में लामो ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-हे मनुष्यो ! जैसे प्रकाशमान पदार्थों में उत्पन्न हुना रवि अन्तरिक्ष में प्रकाशित होता है वा जिस अन्त- रिक्ष में सब प्राणी रमते हैं उसी में सब सुख को प्राप्त होते हैं ॥३॥ फिर वह राजा किसका सत्कार करके उसकी रक्षा करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । गिरा य एता युन जरी त इन्द्र प्रिया सुरयां शुर धायू । म यो मन्यु रिरिक्षतो मिनात्या सुक्रतुमर्यमणं बवृत्याम् ॥४॥ पदार्थ:-है (शूर) शत्रुओं की हिंसा करने वाले (इन्द्र) राजा (यः) जो(ते) आपके (एता) यह दोनों (सस्था) सुन्दर रथ वाले (धायू) धारणकर्ता (प्रिया) मनोहर (हरी) घोड़ों को (गिरा) वाणी से (युनजत) युक्त करता है वा (यः) जो (रिरिक्षतः) हिंसा करने की इच्छा किये हुए दुष्ट शत्रु से (मन्युम्) क्रोध को (प्रमि- णाति) नष्ट करता है उस (सुक्रतुम्) प्रशंसित बुद्धियुक्त (अर्यमणम् ) न्यायकारी सज्जन को मैं (प्रा, ववृत्याम्) अच्छे प्रकार वत्तू ॥४॥ भावार्थ:-हे राजा जो रथ आदि के चलाने में कुशल, राजप्रिय, विद्वान् हों तिनको आप न्यायकारी करो ॥४॥ कौन संग करने योग्य होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यजन्ते अस्य सख्यं वयंश्च नमखिनः स्व ऋतस्य धामन् । वि पृक्षो बाबधे नृभिः स्तवान इदं नर्मों रुद्राय प्रेष्ठम् ॥५॥ ' anS.. ऋग्वेद: ०७ । सू०३६ ॥ ८६३ Rare statu WARSH CPND - पदार्थ:---जो (स्वे) अपने (नमस्विनः) बहुत अन्नयुक्त जन (ऋतस्य) सत्य के (धामन्) धाम में वर्तमान (अस्य) इसकी (सख्यम्) मित्रता को (क्यः) जीवन को तथा (पृक्षः) अच्छे प्रकार संग करने योग्य अन्न को (यजन्ते) संग करते हैं जो निश्चय से (नभिः) नायक मनुष्यों के साथ (स्तथानः) स्तुति किया हुआ (रुद्राय) रुलाने वाले के लिये (इदम्) इस' (प्रेष्ठम्) अत्यन्त प्रिय और (नमः) अन्न आदि पदार्थ को (वि, बाबधे) विशेषता से बांधता है उस () और उन' को हम लोग संग करावें ॥५॥ भावार्थः - जो अच्छे पुरुष संग करने वाले, सब के मित्र और सब का दीर्घ जीवन अन्तादि ऐश्वर्य को करना चाहते हैं वे ही लोक में अत्यन्त प्यारे होते हैं ॥५॥ फिर कैसी स्त्रियां श्रेष्ठ होती हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। आ यस्माकं यशसौ बावशानाः सरस्वती सप्तथी सिन्धुमाता । याः सुष्त्रयन्त खुदृधाः सुधारा अभि स्वेन पयसा पीयाना ॥६॥ पदार्थ:--हे विद्वानो! जिन की (सिन्धुमाता) नदियों का परिमारण करने वाली सी (यत) जो (सप्तथी) सातवीं (सरस्वती) उत्तम वारणी वर्तमान (याः) जो (स्वेन) अपने (पयसा) जल के (साकम्) साथ (पोप्यानाः) बढ़ती हुई नदियों के समान (सबुधाः) सुन्दर रीति से इच्छाओं को पूरा करने वाली (सुधाराः) सुन्दर धारामों से युक्त (यशसः) कीत्ति को (वावशानाः) कामना करती हुई विदुषी स्त्री (सभ्यासुध्वयन्त) सब ओर से जाती हैं वे निरन्तर मान करने योग्य होती हैं ॥६॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे छः अर्थात् पांच ज्ञानेन्द्रिय और मन के बीच कर्मेन्द्रिय वाणी सुन्दर शोभा- युक्त है और जैसे जल से पूर्ण नदी शोभा पाती हैं वैसे विद्या और सत्य की कामना करती हुई पूर्ण कामना वाली स्त्री श्रेष्ठ और मान करने योग्य होती हैं ।।६।। कोन विद्वान् जन श्रेष्ठ होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। उत त्ये नो मरुतो मन्दसाना धिर्य तोके च वाजिनोऽवन्तु । मा नः परि ख्यदक्षरा चरन्त्यवीवृधायुज्यं ते रयिं नः ॥७॥ पवार्थ:-(त्ये) वे (वाजिनः) प्रशंसित विज्ञान वाले (मन्दसाना:) कामना करते हुए (मरुतः) विद्वान् जन (न:) हमारी (धियम्) बुद्धि को (उत) और (तोक) ति बाल्क ति F ८६४ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३६ ॥ RED AN AN Si सन्तान को (ख) भी (अवन्त) बढ़ावें जैसे (चरन्ती) प्राप्त होती हुई (अक्षरा) अवि- नाशिनी वाणी (न:) हम लोगों को (मा) मत (परिख्यत्) सब ओर से बजें वैसे (न:) हम लोगों के सम्बन्ध में (ते) आप के (युज्यम्) योग्य (रयिम्) धन को (प्रवी- वृषन्) बढ़ावें ॥७॥ भावार्थ:-वे ही विद्वान् जन अति उत्तम हैं जो सब के पुत्र और कन्याओं को ब्रह्मचर्य से रक्षा कर और बढ़ा कर उत्तम ज्ञाता करते हैं ॥७॥ फिर विद्वान् जन और विद्यार्थी परस्पर कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्र वो महीमरमतिं कृणुध्वं प्र पूषणं विदथ्यं न वीरम् । भग धियोऽवितारं नो अस्याः सातौ वाजै रातिषाचं पुरन्धिम् ।।८।। पवार्थ:-हे विद्वानो! जैसे तुम (नः) हमारी (पूषणम्) पुष्टि करने वाले (विवथ्यम्) संग्रामों में उत्तम (बीरम्) शूरता आदि गुणों से युक्त जन के (न) समान (व:) तुम्हारी (अरमतिम्) पूर्णमति (महीम्) बड़ी वाणी (भगम्) ऐश्वय्य (धियः) बुद्धियों और (प्रवितारम्) बढ़ाने वाले (अस्याः) इस बुद्धिमात्र के तथा (सातौ) अच्छे भाग में (पुरन्धिम्) बहुत सुख धारण करने वाले (रातिषाचम्) दानसम्बन्धि (वाजम्) विज्ञान को (प्र, कृणुध्वम्) अच्छे प्रकार सिद्ध करो वैसे इन को हम लोग भी (1) सिद्ध करें ॥८॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जैसे विद्वान् जन अध्यापक और उपदेशक सब की बुद्धि प्रायु विद्या की वृद्धि और शूरवीरों के समान सर्वदा रक्षा करते हैं वैसे उन की सेवा और सत्कार सब को सदा करने योग्य हैं ।।८।। कौन विद्वान् सेवा करने योग्य हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अच्छायं वो मरुतः श्लोक एत्वच्छा विष्णु निषिक्तपामवामिः । उत प्रजायै गृगते वयो धु!यं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥९॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (अयम्) यह (वः) तुम्हारी (श्लोकः) शिक्षायुक्त वाणी (भवोभिः) रक्षाओं के साथ (निषिक्तपाम् ) जो धर्म के बीच अभिषेक पाये हुए [हैं उन के रक्षक] विष्णुम्) व्यापक परमेश्वर को (अच्छत) अच्छे प्रकार प्राप्त हो (उत) और जो (प्रजायै गुणते) स्तुति करने वाली प्रजा के लिये (वयः) जीवन को (अच्छा) अच्छे प्रकार (धः) धारण करते हैं जैसे (यूयम्) m Haatseli ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३७ ।। वि तुम (स्वस्तिभिः) सुखों के साथ (न:) हम लोगों की (सपा) सर्वदैव (पात) रक्षा 11 करो ॥ भावार्थ:-जानने की इच्छा वालों को वेदवेत्ता ब्रह्म के जानने वाले अध्यापक और उपदेशकों को प्राप्त होकर परमेश्वर आदि की विद्याओं का संग्रह कर सर्वदैव सब प्रकार से सब की रक्षा और उन्नति बढ़ानी चाहिये ॥६॥ इस सूक्त में विश्वे देवों के काम और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की संगति इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में छत्तीसवा सक्त समाप्त हुआ। .4 । .. गा MAHARA 480 kuta ति या। अथाष्टर्चस्थ सप्तत्रिशत्तमस्थ सुक्तस्य वसिष्ठषिः । विश्वेदेवा देवताः । १ त्रिष्टुप् । २ । ३ । ७ निस्त्रिष्टुप् । ५। ८ विरात्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ४ निस्पतिः । ६ स्वराट्पक्तिश्छन्दः । पञ्चम: स्वरः॥ अब सैंतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वान् जन क्या प्राप्त करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मा यो बाहिष्ठो वहतु स्तवध्य रथो वाजा ऋक्षणो अमृतः । अभि त्रिपृष्ठैः सवनेषु सोमर्मदे मुशिमा महभिः पृणध्वम् ।।१।। पदार्थ:-हे (सुशिप्रा.) सुन्दर ठोढ़ी और नासिका वाले (बाजाः) विज्ञानवान् (ऋभुक्षणः) मेधावी बुद्धिमान् जो (वः) तुम्हारा (अमुक्तः) न नष्ट हुश्रा (वाहिष्ठः) अत्यन्त पहुंचाने वाला (रथः) रमण करने योग्य' यान (मदे) आनन्द के लिए (त्रिपृष्ठ:) तीन जानने योग्य रूप जिन के विद्यमान उन (महभिः) सत्कार और (सोमः) ऐश्वर्य वा ओषधि प्रादि पदार्थों से (सक्षनेषु) उत्तम कामों में (स्तवध्य) स्तुति करने को हम को सब ओर से पहुंचाता है वही तुम को (अभ्यावहत) सब ओर पहुंचावे उस को तुम (पृणध्वम्) पूरो, सिद्ध करो ॥१॥ भावार्थ:- हे विद्वानो! तुम हम लोगों को रथ से चाहे हुए स्थान को पहुंचाने के समान पढ़ाने से विद्या को पहुंचानो ॥३॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं ।। यूयं ह रत्नं १ मघवत्सु धत्थ स्वर्ट ऋभुक्षणो अमृक्तम् । सं यज्ञेषु स्वधावन्तः पिवध्वं वि नो राधांसि मतिमिर्दयध्वम् ॥२॥ ति गा m नि

८६६
ऋग्वेद: मं० ७ । सू० ३७ ।।
म
पवार्थ:-हे (स्वधावन्तः) बहुत अन्नादि पदार्थयुक्त (स्वशः) सुख देखते
हुए (ऋभुक्षण:) मेधावी विद्वान् जनो (यूयम्, ह) तुम्हीं (मलिभिः) बुद्धियों से
(मधवत्सु) बहुत धनयुक्त व्यवहारों में (रत्नम्) रमणीय धन को (सं, त्य) अच्छे
प्रकार धारण करो (यज्ञेषु) संग करने योग्य व्यवहार में (अमृक्तम्) विनाश को
नहीं प्राप्त ऐसे बड़ी प्रोषधियों के रस को (पिबध्वम्) पीओ और (न:) हमारे
(राधांसि) धनों को (वि, दयध्वम्) विशेष दया से चाहो ॥२॥
भावार्थ:-जो विद्वान् जन हैं वे प्रजात्रों में ब्रह्मचर्य विद्या उत्तम
क्रिया बड़ी बड़ी ओषधियों और धनों को बढ़वाकर सुखी हों ॥२॥
फिर धनाढ्य किस को दान देखें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
उवोचिथ हि मघवन्देष्ण महो अर्भस्य वसुनो विभागे ।
उमा ते पूर्णा वसुंना गर्भस्ती न सूत्रता नि यमते वसव्या ॥३॥
पदार्थ:--हे (मघवन्) बहुधनयुक्त (हि) जिससे आप (महः) बहुत वा
(अर्भस्य) थोड़े (बसुनः) धन के (विभागे) विभाग में (देष्णम्) देने योग्य को
(उवोचिथ) कहो जिन (ते) आप के (उभा) दोनों (गभस्ती) हाथ (बसना) धन से
(पूर्णा) पूर्ण वर्तमान हैं उन आपकी (वसव्या) धनों में उत्तम (सूनृता) सत्य और
प्रिय वाणी किसी से भी (न) नहीं (नियमते) नियम को प्राप्त होती अर्थात्
रुकती ॥३॥
भावार्थ:-जो धनाढ्य जन बहुत वा थोड़े धन वा सुपात्र और कुपात्र
वा धर्म और अधर्म के विभाग में सुपात्र और धर्म की वृद्धि के लिये धन
दान करते हैं उन की कीर्ति चिरकाल तक ठहरने वाली होती है ॥३॥
फिर मनुष्य कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
स्वमिन्द्र स्वयंशा ऋभुक्षा वाजो न साधुरस्तमेष्यको ।
वयं नु ते दाश्वांसः स्याम ब्रह्म कृण्वन्तो हरिवो वसिष्ठाः ॥४॥
पदार्थ:-हे (हरिवः) प्रशंसित मनुष्यो (इन्द्र) और योगैश्वर्यों से युक्त जन
जो (ऋभुक्षाः) मेधावी (स्वयशाः) अपनी कीर्ति से युक्त (ऋषमा) सत्कार करने
वाले (बाजः) ज्ञानवान् के (न) समान (साधः) सत्कर्म सेवने हारे (स्वम्) आप
(मस्तम्) घर को (एषि) प्राप्त होते हैं उन (ते) आप के (ब्रह्म) धन वा अन्न को
(नु) शीघ्र (कृण्वन्तः) सिद्ध करते हुए (वसिष्ठाः) अतीव अच्छे गुण कर्मों के बीच
निवास करने वाले (वयम्) हम लोग (दाश्यांसः) दानशील (स्याम) हों ॥४॥

How न कारका म हा -- BE Bra । अवा) घोड़े के समान (न:) हम ऋग्वेदः मं०७। सू० ३७ ।। ८६७ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है--जो अच्छे मार्ग में स्थिर, साधु जनों के समान धर्मों का पाचरण करते हैं वे ऐश्वर्य के साथ हो अर्थात् ऐश्वर्यवान् होकर दानशील होते हैं ॥४॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। सनितासि प्रवर्ती दाशुषे चिद्याभिर्विषो हर्यश्व धीभिः । ववन्मा नु ते युज्याभिरूती कदा न इन्द्र राय आ दास्यः॥५॥ पवार्थ:-हे (हर्यश्य) सद्गुण और हरणशील घोड़ों वाले (इन्द्रा) परम सुखप्रद विद्वान् जिस से आप (याभिः) जिन (युज्याभिः) युक्त करने योग्य विद्यानों (चित्) और (घोभिः) बुद्धियों से (ऊतीः) तथा रक्षा आदि क्रिया से (दाशुषे) देने वाले के लिये (सनिता) विभाग करने वाले (असि) हैं (प्रवतः) नम्रत्व आदि गुणों के देने वालों के (रायः) धनों को (विवेषः) प्राप्त होते हैं हम लोग (ते) भाप के जिन पदार्थों को (वयनम) मांगते हैं उन को (नु) आश्चर्य है पाप (नः) हम लोगों के लिये (कदा) कब (श्रादशस्यः) देप्रोगे ॥५॥ भावार्थ:--मनुष्यों को विद्वानों से सदा उत्तम विद्या लेनी चाहिये और विद्वान् भी यथावत् अच्छे प्रकार देवें ॥५॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वासयंसीव वेघसस्त्वं ना कदा न इन्द्र वर्चसो बुबोधः । अस्तै तात्या धिया रयिं सुवीरं पृक्षो नो अर्वा न्युहीत बाजी ॥६॥ पदार्थ:-हे (इन्द्र) सुख देने वाले (स्वम्) आप (तात्या) व्याप्त परमेश्वर में उत्तमता से स्थिर होने वाली (धिया) बुद्धि से (नः) हम (बेधसः) बुद्धिमान् जनों को (वासयसीव) वसाते हुए से (नः) हमारे (वचसः) वचन को (कबा) कब लोगों को (सुवीरम्) जिससे अच्छे अच्छे वीर जन होते हैं उस (रयिम्) धन को कब (नि, उहीत) प्राप्त करियेगा और हमारे (अस्तम्) घर को प्राप्त होकर (पृक्षः) संपर्क करने योग्य अन्न कब सेवोगे ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-सब मनुष्य विद्वानों के प्रति ऐसी प्रार्थना करें आप लोग हमें कब विद्वान् करके धन धान्य स्थान आदि पदार्थ और ऐश्वर्य को प्राप्त करावेंगे ॥६॥ EEFEROFEL ८६९ ऋग्वेद: मं०७। सू० ३७ ।। ai SAR S COM AUR SURI फिर मनुष्य कैसे बत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अभि यं देवी नितिश्चिदीशे नक्षन्त इन्द्र शरदः सुपूक्षः । उप त्रिबन्धुर्जरदष्टिमेत्यखवेशं यं कृणवन्त मताः ॥७॥ पदार्थः- हे मनुष्यो ! जैसे (यस्) जिस पदार्थ को (निऋतिः) भूमि (चित) वैसे (देवी) विदुषी स्त्री उसको (अभ्येति) सब ओर से प्राप्त होती वा (सुपृक्षः) जो सुन्दर अन्न वाला (निबन्धः) तीन जनों का बन्धु जिस (जरदष्टिम् ) वृद्धावस्था को (ईशे) ऐश्वर्ययुक्त करता है जिस (इन्द्र) सूर्य को (शरदः) शरद् प्रादि ऋतु (नक्षन्ते) व्याप्त होती हैं जिस (अस्सवेशम्) अपने रूप को न धारण किये हुए का (मर्ताः) मनुष्य (उप, कृणवन्त) उपकार करते हैं उन सब का हम भी उपकार करें ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! तुम जैरे शरीर वाणी और मन से उत्पन्न हुए तीन प्रकार के सुख को प्राप्त विद्वान् जन हृदय से चाही हुई भार्या को प्राप्त होता है स्त्री भी प्रिय पति को प्राप्त होकर पानन्दित होती वा जैसे ऋतु अपने अपने समय को प्राप्त होकर सब को पानन्दित करती वा जैसे स्वभाव से ही कोमार आदि अवस्था आती हैं वैसे ही परस्पर में प्रीति कर प्रयत्न करो॥७॥ मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा पालने से और पुरुषार्थ से लक्ष्मी की उन्नति करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ नो राधांति सवितः स्तवध्या आ रायो यन्तु पर्वतस्य रातो। सदो नो दिव्या पायुः सिषक्त यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥८॥ पदार्थ:----हे (सदितः) सकल जगत् के उत्पन्न करने वाले जगदीश्वर आप की (स्तवध्य) स्तुति करने को (न:) हम लोगों को (रावांसि) धन' (आ, यन्तु) मिले (पर्वतस्य) मेघ के (रातो) देने में (रायः) धन पावें (रिव्यः) शुद्ध गुण कर्म और स्वभाव में प्रसिद्ध हुए (पायुः) रक्षा करने वाले श्राप (न:) हम लोगों को सदा (मासिषक्तु सुखों से संयुक्त करें, हे विद्वानो! इस विज्ञान से सहित (यूयम्) तुम लोग (स्पस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की (सदा) सर्वदेव (पात) रक्षा करो।॥८॥ भावार्थ:-जो सत्य भाव से परमेश्वर की उपासना कर न्याययुक्त व्यवहार से धन पाने को चाहते हैं और जो सदा प्राप्त प्रति सज्जन विद्वान का संग सेवते हैं वे दारिद्रय कभी नहीं सेवते हैं ।।। Maley ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३८ ॥ हि इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम सग्ला में संतोसयां सूक्त समाप्त हुमा ।। Pawan अथाष्टवस्थाष्टत्रिशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । १-६' सविता देवता । ६. सविता भगो वा । ७ । ८ वाजिनः । १।३। ८ निचरित्रष्टुप् । ५ विराट त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । २ । ४ ५ ६ स्वराट् पक्तिः । युरिपक्तिश्छन्दः । द Jiri MARA ग त्या अब अड़तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को किसकी उपासना करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं उदु ष्य देवः सविता ययाम हिरण्ययीममलि यामशिश्रेत् । नूनं भगो हव्यो मार्नुपेभिर्वि यो रत्ना पुरूबसुर्दांति ॥१॥ पदार्थः--(यः) जो (भगः) सेवन करने योग्य सकलैश्वर्ययुक्त (पुरुवसः) बहुत धनों वाला (सविता) सकलैश्वर्य देने हारा (देवः) दाता ईश्वर (मानुषेभिः) मनुष्यों से (नूनम्) निश्चय से (हव्यः) स्तुति करने योग्य है जो हम लोगों के कामों को (विदधाति) सिद्ध करता है (स्यः) वह जगदीश्वर (उ) ही (याम्। जिस (हिर. ण्ययीम्) हिरण्यादि रत्नों बाली (अमतिम्) सुन्दर रूपवती लक्ष्मी को तथा रत्ना:) रमण करने योग्य धनों को (अशिश्न) भाश्रय करता है उसका हम लोग (उद्ययाय) उत्तम नियम पालें ॥१॥ भावार्थ:-..जो मनुष्य परमेश्वर की उपासना करते हैं वे श्रेष्ठ लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं ॥१॥ फिर वह जगदीश्वर कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उर्दु तिष्ठ सवितः श्रुध्य १ स्य हिरण्यपाणे प्रभृतावृतस्य । व्यु१'वीं पृथ्वीममति सृजान आ नृभ्यो मतभोजनं मुवानः ॥२॥ पदार्थ:---(हिरण्यपाणे) हित से रमणरूप व्यवहार जिसका (सवितः) वह अन्तर्यामी हे जगदीश्वर श्राप (अस्य) इस जीव की स्तुति (अधि) सुनिये (क) और में (उत्तिष्ठ) उठिये अर्थात् उत्कर्ष से प्राप्त हूजिये और (ऋतस्य) सत्य कारण की (प्रभृतो) अत्यन्त धारणा में (अमतिम्) अच्छे अपने रूप वाली (उर्वीम्) बहुत पदार्थयुक्त (पृथ्वीम्) पृथिवी को (वि, सृजानः) उत्पन्न करते हुए (नुभ्यः) BEAN EANSA thi इसके हृदय ऋग्वेदः मं०७। सू० ३८ ॥ - मनुष्यों के लिये (मर्सभोजनम्) मनुष्यों को जो भोजन है उसे (मा, सुवान:) प्रेरणा देते हुए कृपा कीजिये ॥२॥ भावार्थ:-जो सत्य भाव से धर्म का अनुष्ठान कर योग का अभ्यास करते हैं उनके प्रात्मा में परमात्मा प्रकाशित होता है जिस ईश्वर ने समस्त जगत् उत्पन्न कर मनुष्यादिकों का अन्नादि से हित सिद्ध किया उसको छोड़ किसी और की उपासना मनुष्य कभी न करें ॥२॥ फिर कौन सब को प्रशंसा करने योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। अपि ष्टुतः सविता देवो अस्तु यमा चिद्विश्वे वसवो गृणन्ति । स नः स्तोमान्नमस्य?'श्चनों धाद्विश्वेभिः पातु पायुभिर्नि सुरीन् ॥३॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो (यम्, चित्) जिस परमेश्वर की (विश्वे) सब (वसवः) वे विद्वान् जन जिन में विद्या वसती है (गृणन्ति) स्तुति करते हैं वह (सविता) सब को उत्पन्न करने वाला (देवः) सूर्यादिकों का भी प्रकाशक ईश्वर हम लोगों से (पास्तुतः) अच्छे प्रकार स्तुति को प्राप्त (प्रस्तु) हो और वह (अपि) भी (नमस्यः) नमस्कार करने योग्य हो (नः) हमारी (स्तोमान्) प्रशंसाओं को और (चनः) अन्नादि ऐश्वयं को भी (धात) धारण करे तथा (स:) वह (विश्वेभिः) सब के साथ (पायुभिः) रक्षामों से (सूरीन) विद्वानों की (नि, पातु) निरन्तर रक्षा करे ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस ईश्वर की सब धर्मात्मा सज्जन प्रशंसा करते हैं जो हम लोगों की निरन्तर रक्षा करता हम लोगों के लिये समस्त विश्व का विधान करता है उसी की हम लोग सदा प्रशंसा करें॥३॥ फिर मनुष्यों को किसकी प्रशंसा करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अभि यं देव्यदितिर्गुणाति सवं देवस्य सवितुर्जुषाणा । अभिसम्राजो वरुणो गृणन्त्यभि मित्रासो अर्थमा सजोषाः ॥४॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो (सवितः) प्रेरणा देने वाला अन्तर्यामी (वेवस्य) सर्व सुखदाता जगदीश्वर के (सवम्) उत्पन्न किये जगत् की (जुषाणा) सेवा करती हुई (देवी) विदुषी (अदितिः) माता जिस को (अभि, गृणाति) सन्मुख [ = सम्मुख कहती है वा (वरुणः) श्रेष्ठ विद्वान् जन (सजोषाः) समान प्रीति सेवने वाला (अर्यमा) न्यायाधीश और (मित्रासः) सब के सुहृद् (सम्राजः) अच्छे प्रकार प्रकाश- मान चक्रवर्ती राजजन (यम्) जिसकी (अभि, गुणन्ति) सब ओर से स्तुति करते हैं उसी की सब निरन्तर स्तुति करें ॥४॥ in CONN ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ३८ ॥ dan team mada tants first भावार्थ:-हे मनुष्यो! तुम उसी प्रशंसा करने योग्य परमेश्वर की स्तुति करो जिस की स्तुति करके विदुषो स्त्री राजा और विद्वान् जन चाहा हुमा फल पाते हैं ॥४॥ फिर मनुष्य परस्पर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अभि ये मिथो वनुषः सर्पन्तै गति दिवो रातिषाचः पृथिव्याः। अहिर्बुध्न्य उत नः शृणोतु वरूध्ये कंधेनुमिनि पातु ।।५।। पदार्थ:--(ये) जो (दिवः) मनोहर ( (रातिषाचः) दान देने वाले के (एक- धेनुभिः) एक वाणी ही है सहायक जिनकी उनके साथ मिय:) परस्पर (बनुषः) मांगते हुए (नः) हम लोगों को (रातिम्) देने को (अभि, सपन्ते) अच्छे प्रकार सब ओर से नियम करते हैं (उत) और (धरूत्री) स्वीकार करने योग्य माता (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध हुए (महिः) मेघ के समान हम लोगों को (पृथिव्याः) भूमि और अन्तरिक्ष के बीच (नि, पात) निरन्तर रक्षा करे वह समस्त जनमात्र हमारा पढ़ा हुआ (शृणोतु) सुने ॥५॥ भावार्थ:-जो लोगों को विद्याहीन देख निन्दा करते और विद्वान् देख प्रशंसा करते और एकता के लिये प्रेरणा देते हैं वे ही हमारे कल्याण करने वाले होते हैं ॥५॥ फिर राजा आदि मनुष्यों को क्या करके क्या प्राप्त करने योग्य है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अनु तन्नो जास्पतिर्षसीष्ट रत्नै देवस्य सवितुरियानः ! भगंमुग्रोऽवसे जोडवीति भगमनुग्रो अध याति रनम् ॥६॥ पदार्थ:-है मनुष्यो जैसे (उग्रः) तेजस्वी (जास्पतिः) प्रजा पालने वाला (सवितः) सर्वान्तर्यामी (देवस्य) सब प्रकाश करने वाले के (भगम्) ऐश्वर्या को (इयान:) प्राप्त होता हुआ जिस (रत्नम्) रमणीय धन को स्वार्थ (मंसीष्ट) मानता है (तर) उस को (न:) हम लोगों के लिये (अनु) अनुकूल माने जिस (भगम्) ऐश्वयं को प्रवसे) रक्षा आदि के लिए (अनमः) तेजरहित जन (जोहयोति) निरन्तर प्रहण करता है वह (रत्नम्) रमणीय धन (अध:) हीन दशा को (याति) प्राप्त होता है ॥६॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जो राजा परमेश्वर की सृष्टि में सब की रक्षा के लिये प्रवृत्त होता है वही सब ऐश्वर्य को पाकर सब को आनन्दित करता तु R Saa AMRO GAD ८७२ ऋग्वेदः मं०७। सू० ३६ ॥ 09 फिर कौन इस संसार में कल्याण करने वाले होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। शं नो भवन्तु वाजिनो हदेषु देवतांता मितद्रवः स्वाः। जम्भयन्तोऽहिं वकं रक्षांसि सनेभ्यस्मधुयवनीवाः ॥७॥ पदार्थ:--है विद्वानो (वाजिनः) वेगवान् घोड़ा वा ज्ञानवान् योद्धा पुरुष मितनवः) जो प्रमाण भर जाते हैं (स्वः) जिन का शुभ अन्नादि है (हवेष) वे संग्रामों में (देवताता) वा विद्वानों के अनुष्ठान करने योग्य यज्ञ में (अहिम्) सर्प के समान वर्तमान (वृकम्) चोर को और (रक्षांसि) दुष्ट प्राणियों को (जम्भयन्तः) जम्भाई दिलाते हुए (न:) हम लोगों को (शम्) सुख के लिये (भवन्तु) होवें जिस से (अस्मत) हम लोगों से (सनेमि) पुराने व्यवहार में (अमीवाः) रोग (युयवन्) अलग हों।७॥ भावार्थ:-जो दुष्ट प्राचार वाले प्राणी, रोग और शत्रुओं को निवार के सब के सुख करने वाले होते हैं वे ही जगत्पूज्य होते हैं ॥७॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वाजेबाजेऽवत वाजिनो नो धनेषु विप्रा अमृता ऋतज्ञाः । अस्प मध्यः पिबत मादयध्वं तृप्ता यांत पथिभिर्देवयानः ॥८॥ पदार्थ:--हे (अमृताः) मृत्युरहित (ऋतज्ञाः) सत्य व्यवहार वा ब्रह्म के जानने वाले (वाजिनः) बहु विज्ञान अन्न बल और वेगयुक्त (विज्ञाः) मेधावी सज्जनो तुम (धनेषु) धनों में (बाजेबाजे) और संग्नाम संग्राम में (नः) हम लोगों की (अवत) रक्षा करो (शस्य) इस (:) मधुरादि गुणयुक्त रस को (पिबत) पीरो, हम लोगों को (मादयध्यम् , आनन्दित करो और (तृप्ताः) तृप्त होते हुए (देवयानः) विद्वानों के मार्ग जिन से जाना होता उन (पथिभिः) भागों से (यात) जागो।।८ भावार्थ:-विद्वानों के प्रति ईश्वर की यह अाज्ञा है कि तुम धार्मिक विद्वान् होकर सब की रक्षा निरन्तर करो और मानन्दित तथा बड़ी ओष- धियों के रस से नीरोग हुए सब को आनन्दित और तृप्त कर धर्मात्मानों के मार्गों से आप चलते हुए औरों को निरन्तर उन्हीं मार्गों से चलावें ॥८॥ इस सूक्त में सविता, ऐश्वर्य, विद्वान् और विदुषियों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में अड़तीसवां सूक्त समाप्त हुन्मा ।। Aawataye ऋग्वेदः मं०७। सू० ३६ ॥ ८७३ । पाक RALA अथ सप्तस्यैकोनचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः। विश्वेदेवा देवताः । १।२। ५। ७ निचरित्रष्टुप् । ३ स्वराट् त्रिष्टुप् । ४ । ६ । विराट् त्रिष्टुप्छन्दः । वतः स्वरः॥ अब सात ऋचा वाले उनतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उस के प्रथम मन्त्र में विद्वान् स्त्री पुरुष क्या करें इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । ऊर्यो अग्निः सुमतिं वस्वों अश्रेत्प्रतीची जूर्णिदेवतातिमेति । भेजाते अद्री रथ्येव पन्थामृतं होता न इषितो यजाति ॥१॥ पदार्थ:-जो (जूणिः) जीर्ण (प्रतीची) वा कार्य के प्रति सत्कार करने वाली विदुषी पत्नी (ऊर्ध्वः) ऊपर जाने वाले (अग्निः) अग्नि के समान (देवतातिम्) विद्वानों के अनुष्ठान किये हुए यज्ञ को और (समतिम्) श्रेष्ठमति को (अभेद) आश्रय करे वा (रथ्येव) जैसे रथों में उत्तम घोड़े बैसे (ऋतम्) सत्य (पन्थाम्) मार्ग को (एलि) प्राप्त होती वा जैसे (अधी) निन्दारहित पत्नी और यजमान (जस्वः) धन को (मेजाते) भजते हैं वा जैसे (इषितः) इच्छा को प्राप्त (होता) देने वाला नः) हम लोगों को (यजाति) संग करे उन सब का और उस का वैसे ही सब सत्कार करें ॥१॥ भावार्थ:-इस मंत्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं-जहां स्त्री पुरुष ऐसे हैं कि जिन्होंने बुद्धि उत्पन्न की है पुरुषार्थी हैं अच्छे काम में पाचरण करते हैं वहां सब लक्ष्मी विराजमान है ॥१॥ फिर वे स्त्री-पुरुष क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । म वाजे सुप्रया बहिरैषामा विश्पतींव बीरिट इयाते । विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान् ॥२॥ पदार्थ:-जो स्त्री पुरुष (बीरिटे) अन्तरिक्ष में सूर्य और चन्द्रमा के समान (इयाते) जाते हैं (विश्पतीद) वा प्रजा पालने वाले राजा के समान (अक्तोः) रात्रि की (उषसः) और दिन की (पूर्वहूतौ) अगले विद्वानों ने की स्तुति के निमित्त जाते हैं वा (पूषा) पुष्टि करने वाले (वायुः) प्राण के समान (नियुत्वान्) नियमकर्ता ईश्वर (विशाम्) प्रजा जनों के (स्वस्तये) सुख के लिये हो (एषाम) इन में से जो कोई (सप्रयाः) सब को अच्छे प्रकार तृप्त करता है वा (बहिः) उत्तम सब का बढ़ाने वाला कर्म (मा, प्र, थावृजे) सब ओर से अच्छे प्रकार प्राप्त होता है उन सब का सब सत्कार करें ॥२॥ 3 a

८७४
ऋग्वेदः मं०७। सू० ३६ ॥
.
RAN
R-
भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं- सदैव
जो स्त्री-पुरुष न्यायकारी राजा के समान प्रजा पालना, ईश्वर के समान
न्यायाचरण, पवन के समान प्रिय पदार्थ पहुंचाना और संन्यासी के
तुल्य
पक्षपात और मोहादिदोष त्याग करने वाले होते हैं वे सर्वार्थ सिद्ध हों ॥२॥
फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
ज्मया अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षे मर्जयन्त शुभ्राः।
अवाक्पथ उरुज्रयः कृणुध्वं श्रोता दूतस्य जम्मुषों नो अस्य ॥३॥
पदार्थ:-हे (उरुनयः) बहुत जाने और (शुभ्राः) शुद्ध पाचरण करने वाले
(वसवः) विद्या में वास किये हुए (देवाः) विद्वान् जनो तुम (उरौ) बहुव्यापक
(अन्तरिक्षे) आकाश में (भत्र) इस संसार में (ज्मयाः) भूमि के बीच (रन्त) रमो
(अर्वाक्) पीछे (पथः) मार्गों को (मर्जयन्त) शुद्ध करो (अस्य) इस (दूतस्य) दूत को
(नः) हम लोगों को (जम्मुषः) जाने, प्राप्त होने वा जानने वाले (कृणुध्वम्) करो
और हमारी विद्याओं को (श्रोत) सुनो ॥३॥
भावार्थ:--हे विद्वानो ! तुम धर्म-मार्गों को शुद्ध प्रचरित कर दूत के
समान सब जगह घूम, धर्म का विस्तार कर सब मनुष्यों को विद्या सुखयुक्त
-
करो॥३॥
ASIA
MA
फिर विद्वान् कैसे हों और क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
ते हि यज्ञेषु यज्ञियांस ऊमा सधस्थं विश्व अभि सन्ति देवाः ।
ताँ अध्वर उशतो यक्ष्यग्ने श्रुष्टी भगं नासत्या पुरन्धिम् ।।४।।
पदार्थ:-(a) वे (हि) ही (यज्ञियासः) यज्ञ सिद्ध करने (ऊमाः) भोर
रक्षा करने वाले (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् (यज्ञेषु) विद्या देने व लेने के व्यवहारों
में (अभि, सन्ति) सन्मुख [ = सम्मुख] वर्तमान हैं (तान्) उन (अध्वरे) अहिंसनीय
व्यवहार में (सधस्थम्) एक से स्थान को (उशतः) चाहने वाले विद्वानों को मैं
(यक्षि) मिलूं जो (नासस्या) असत्य व्यवहार रहित अध्यापक और उपदेशक
(पुरन्धिम्) बहुत सुखों के धारण करने वाले (भगम्) ऐश्वर्य को (शुष्टी) शीघ्र देखें,
उनको जैसे मैं मिलूं वैसे ही हे (अग्ने) विद्वान् पाप भी इन को मिलो ॥४॥
भावार्थ:-हे.मनुष्यो ! जो सत्यविद्या और धर्म के प्रकाश करने वाले
वेदवेत्ता अध्यापक, उपदेशक, विद्वान् सब मनुष्य आदि की उन्नति करते
हैं वे ही सर्वदा सर्वथा सब को सत्कार करने योग्य होते हैं ॥४॥

IANOHAN ऋग्वेदः मं०७ । सू० ३६ ।। ८७५ LAB ABIN E- SARAN फिर विद्वान् जन क्या जान कर क्या दूसरों को जतलावें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। आग्ने गिरौ दिव आ पृथिव्याः मित्रं वह वरुणमिन्द्रममिम् । आर्यमणमदिति विष्णुमेषां सरस्वती मरुतो मादयन्ताम् ॥५॥ पदार्थ:--- हे (अग्ने) विद्वन् आप (दिवः) बिजुली और सूर्यादि प्रकाशवान् पदार्थों की विद्या का प्रकाश करने वाली वा (पृथिव्याः) भूमि आदि पदार्थों का प्रकाश करने वाली (गिरः) सुन्दर शिक्षित वारिणयों को (श्रा, वह) प्राप्त कीजिये (मित्रम्) मित्र (वरुणम्) अतिश्रेष्ठ (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवान् राजा (अग्निम्) अग्नि (अर्यमणम्) न्यायाधीश (अदितिम्) अन्तरिक्ष (विष्णुम) व्यापक वायु को (मा) प्राप्त कीजिये और जो (एषाम्) इनकी विद्यायुक्त (सरस्वती) वाणी उसको जानकर हमारे अर्थ (आ) प्राप्त कीजिये हे (मरतः) विद्वान् मनुष्यो उक्त विद्या को देकर हम लोगों को श्राप (मावयन्ताम्) आनन्दित कीजिये ।।५।। भावार्थः - जो मनुष्य बिजुली आदि की विद्या को प्राप्त होकर औरों को प्राप्त कराते हैं वे सबका प्रानन्द करने वाले होते हैं ॥५॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ररे हव्यं मतिभिर्यज्ञियांना नक्षत्कामं मयानामसिन्वन् । धाता रयियविदस्य संदासां सक्षीमहि युज्यभिर्नु देवैः ॥६॥ पदार्थ:--- जो (मतिभिः) प्राज्ञ मनुष्यों के साथ या (युज्येभिः) योग करने योग्य (देवः) विद्वानों के साथ (यज्ञियानाम्) यज्ञ सम्पादन करने वाले (मानाम्) मनुष्यों के (हध्यम्) ग्रहण करने योग्य (कामम्) काम को (असिन्धन) निबन्ध करते हैं जिस (अविदस्यम्) अक्षीण विनाशरहित (सदासाम्) सदैव अच्छे प्रकार सेवने योग्य (रयिम्) धन को (धात) धारण करते हैं वा जो इनके साथ उसको (नक्षत्) व्याप्त होता है उसको मैं (ररे) देऊ हम सब लोग इनके साथ उसको (नु) शीघ्र (सक्षीमहि) व्याप्त होवें ॥६॥ भावार्थ:-जो विद्वान् अन्य मनुष्यों का काम पूरा करते हैं वे पूर्ण- काम होते हैं ॥६॥ फिर विद्वान् जन औरों के लिए क्या देवें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। न रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैतावानो वरुणो मित्रो अग्निः । यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नो अर्क यूयं पात खस्तिभिः सदा नः ॥७॥ Sunt EL GS s tram sue b aayaar

८७६
ऋग्वेदः मं०७। सू० ४० ॥
पदार्थ:- जैसे (वरुणः) श्रेष्ठ (मित्रः) मित्र (अग्निः) अग्नि के समान
विद्यादि शुभ गुणों से प्रकाशित और (ऋतावान:) सत्य को याचने वा (चन्द्राः) हर्ष
करने वाले जन (बसिष्ठः) अतीव वसाने वाले के साथ (अभिष्टुते) सब ओर से
प्रशंसित (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी (उपमम्) जिससे उपमा दी जावे उस(मर्कम्)
सत्कार करने योग्य अन्न वा विचार को (नः) हम लोगों के लिए (न) शीघ्र
(यच्छन्तु) देवें वैसे हे विद्वानो (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हमारी
(सदा) सदैव (पात) रक्षा कीजिये ॥७॥
भावार्थ:-जो विद्वान् जन धर्मात्मा, विद्वानों के साथ जिसकी उपमा
नहीं उस विज्ञान को देते हैं वे हम लोगों की रक्षा कर सकते हैं ॥७॥
इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के प्रथं की
इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।
यह सप्तम मण्डल में उनतालीसवां सूक्त समाप्त हुआ।
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अथ सप्तर्चस्य चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः। विश्वेदेवा देवताः।
१ पक्तिः। ३ भरिवपक्तिः। ६ विराट्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २।
४ विरात्रिष्टुप् । ५। ७ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।।
अब सात ऋचा वाले चालीसवें सूक्त का प्रारम्भ किया जाता है, उसके
प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
ओ श्रुष्टिविदया३' समंतु प्रति स्तोग दधीमहि तुराणाम् ।
यदद्य देवः सविता सुवाति स्यामांस्य रत्निनों विभागे ॥१॥
पदार्थ:---(ओ) मो विद्वान् जैसे (श्रुष्टिः) शीघ्र करने वाला (विदथ्या)
संग्रामादि व्यवहारों में हुई (तुराणाम्) शीघ्रकारियों के (प्रति, स्तोमम्) समूह
समूह के प्रति (समेत) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे वैसे इस समूह को हम लोग
(वधीमहि) धारण करें (यत्) जो (प्रद्य) अब (देवः) विद्वान् (सविता) अच्छे कामों
में प्रेरणा देने वाला (विभागे) विशेष कर सेवने योग्य व्यवहार में (अस्य) इस विद्वान्
के (रनिनः) उन व्यवहारों को जिनमें बहुत रत्न विद्यमान और स्तुति समूह को
(सुधाति) उत्पन्न करता है वैसे हम लोग उत्पन्न करने वाले (स्याम) हों ॥१॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जैसे विदुषी माता
सन्तानों की रक्षा कर और अच्छी शिक्षा देकर बढ़ाती है वैसे विद्वान् जन
हमको बढ़ावें ॥१॥

८७७ HARELAHATE: ऋग्वेदः म०७ । सू० ४० ।। S Man m Nuta फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मित्रस्तनो वरुणो रोदसी च धुभक्तमिन्द्रो अर्थमा ददातु । दिदेण्टु देव्यदिती रेक्णो वायुश्च यन्नियुदैते भगश्च ॥२॥ पदार्थ:-जो (रोदसी) प्रकाश और पृथिवी के समान (मित्रः) मित्र (अर्यमा) न्यायकारी (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् राजा (वरुणः) जलसमूह (वायु:) और पवन (च) भी (धुभक्तम्) जो प्रकाश को सेवता है (तत्) उसको (न:) हम लोगों के लिए (बदातु) देनो और (देवी) विदुषी (प्रवितिः) स्वरूप से अखण्डित (भगः) और ऐश्वर्यवान् (च) भी (यव) जिस (रेषणः) अधिक धन को (नियुवते) निरन्तर जोड़े उसका विद्वान् जन हमें (च) भी (दिदेष्ट) उपदेश करें ॥२॥ भावार्थ:-इ7 मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है -- मनुष्य सर्वदा पुरुषार्थ से सबको ऐश्वर्ययुक्त करावें ॥२॥ कौन सुरक्षित विद्वान् होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सेडो अस्तु मरुतः स शुष्मी यं मयै पृषदखा अाथ । उतैमग्निः सर ती जुनन्ति न तस्य रायः पर्येतास्ति पदार्थ:-है (मरुतः) विद्वान् (पृषदश्वाः) सींचे हुए जल और अग्नि से जल्दी चलने वाले बड़े (यम्) जिस (मत्यंम्) मनुष्य को अवाथ) रक्खें (स, इद) वही (उग्रः) तेजस्वी (सः) वह (शुक्ष्मी) बहुत बलवान् (अस्तु) हो जिसको विद्वान् (जुनन्ति) प्रेरणा देते हैं (तस्य) उसके (रायः) धनों को (पर्येता) वर्जन करने वाला (न) नहीं होता है (उत, ईम्) और सब ओर से (अग्निः) अग्नि के समान (सरस्वती) शुद्ध वाणी उसकी उत्तम (अस्ति) है ॥३॥ भावार्थ:--जिन मनुष्यों की विद्वान् जन रक्षा करते हैं वे विद्वान् हो धन और ऐश्वर्य को पाकर औरों की भी रक्षा कर सकते हैं ।।३।। कौन राजा होने योग्य होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अयं हि नेता वरुण ऋतस्य मित्रो राजांनो अर्यमापो धुः । सुहवा देव्यादितिरन ते अति पर्षन्नरिष्टान् ॥४॥ पदार्थ:-जो (अयम्) यह (नेता) न्यायकर्ता (वरुणः) श्रेष्ठ (मित्रः) मिन्न (अर्यमा) और न्यायाधीश (सहवा) सुन्दर देने लेने वाले (राजानः) राजजन (हि) ही (ऋतस्य) सत्य के (अपः) कर्म को (धुः) धारण करें (ते) वे (अनर्वा) नहीं है क CHHA मनुष्यो! -- RAIN COM अंहो ८७८ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४० ।। घोड़े की चाल जिसकी उस (देवी) देदीप्यमान (अदितिः) अखण्डित' नीति के समान (नः) हम लोगों को (अरिष्टान, अंहः) अपराध से न विनाश किये हुए (प्रति, पर्षन्) उल्लंघे अर्थात् छोड़ें॥४॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-वे ही राजा होते हैं जो न्याय श्रेष्ठ गुण और सबों में मित्रता की भावना कराते हैं वे ही अपराध के आचरण से लोगों को दूर रखने योग्य होते हैं और राजा होने योग्य होते हैं ॥४॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। अस्य देवस्य मीळ्हुषो क्या विष्णोरेषस्य प्रभृथे हनिर्मिः । विदे हि रुद्रो रुद्रिय महित्व यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरक्ति ॥५॥ पदार्थ:-जैसे (अश्विना) सूर्य और चन्द्रमा (प्रस्य) ईस (मीळहुषः) जल के समान सुख सींचने वाला (विष्णोः) बिजुली के समान व्यापक ईश्वर (एषस्य) जो कि सर्वत्र प्राप्त होने (देवस्य) और निरन्तर प्रकाशमान सकल' सुख देने वाला उसके (हविभिः) होमने योग्य पदार्थों के समान ग्रहण किये शान्त चित्तादिकों से (प्रभूथे) उत्तमता से धारण किये हुए जगत् में (इरावत) अन्नादि ऐश्वर्य युक्त (वतिः) मार्ग को और (महित्वम्) महत्त्व को (यासिष्टम्) प्राप्त होते हैं उस ईश्वर की (रुद्रियम्) प्राणसम्बन्धी महिमा को (क्याः) प्राप्त करने (रुद्रः) दुष्टों को रुलाने वाला मैं (हि) ही (विदे) प्राप्त होता हूं ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जिस ईश्वर की महिमा को पाकर सूर्य आदि लोक प्रकाश करते हैं उसी की उपासना सर्वस्व से करनी चाहिये ॥१॥ फिर विद्वान् जन क्या करते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मात्र पूषन्न घृण इरस्यो वरूत्री यातिषाचश्च रासन् । मयोभुवो नो अवन्तो नि पान्तु वृष्टिं परिज्मा वातों ददातु ॥६॥ पवार्थ:-हे (प्राधणे) सब ओर से प्रकाशित (पूषन्) पुष्टि करने वाले जैसे (परिज्मा) सब ओर से जो जाता है वह (वातः) वायु (वृष्टिम्) वर्षा को (धातु) देवे वैसे (मयोभुवः) श्रेष्ठता हुवाने वाले (अर्वन्तः) प्राप्त होते हुए (रातिषाच:) दानकर्ता जन (न:) हम लोगों की (नि, पान्तु) निरन्तर रक्षा करें और (यत) जो (वस्त्री) स्वीकार करने योग्य विद्या है (च) उस को भी (रासन्) देते हैं वैसे mpine ऋग्वेद: मं०७ । सू. ४१॥ ८७ह (इरस्य:) प्राप्त होने योग्य आप करें (मा, पत्र) और मत इस जगत् में विद्वेषी होमो ॥६॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन श्रेष्ठ जनों के तुल्य वर्त कर सब के लिये सुख वा विद्या देते हैं वे सब के सब ओर से रक्षक हैं ॥६॥ फिर पढ़ाने और उपदेश करने वाली स्त्रियों क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। नू रोदसी अभिष्टुते वसिष्ठैऋतावानो वरुणो मित्रो अभिः । यच्छन्तु चन्द्रा उपमं नौ अर्क यूयं पांत स्वस्तिभिः सदा नः॥७॥ पदार्थ:-जो पढ़ाने और उपदेश करने वाली (रोदसी) आकाश और पृथिवी के समान (अभिष्टुते) सामने पढ़ाती वा उपदेश करतीं वे (वसिष्ठः) अतीव धनाढयों के साथ जैसे (मित्रः) मित्र के समान प्यारे आचरण करने वाला (वरुणः) जल के समान शान्ति देने वाला और (अग्निः) अग्नि के समान प्रकाशित यश जन तथा (चन्द्राः) प्रानन्द देने वाले (नः) हमारे लिये (उपमम्) उपमा जिस को दी जाती उस को अतीव सिद्ध कराने वाले (मकम् ) सत्कार करने योग्य धन धान्य को (नु शीघ्र (यच्छन्तु देखें वैसे हम लोगों को (ऋतावान:) सत्य की प्रकाश करने वाली कन्याजन निरन्तर विद्या देवें, है विदुषी स्त्रियो! (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हम लोगों की (सबा) सर्वदैव (पात) रक्षा करो ॥७॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो भूमि के तुल्य क्षमाशील, लक्ष्मी के तुल्य शोभती हुईं, जल के तुल्य शान्त, सहेली के तुल्य उपकार करने वाली विदुषी पढ़ाने वाली हों वे सब कन्याओं को पढ़ा के और सब स्त्रियों को उपदेश से आनन्दित करें ॥७॥ इस सूक्त में विश्वे देवों के गुण और कृत्य का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह सप्तम मण्डल में चालीसवां सूक्त समाप्त हुया ॥ AMMAR प्रथ सप्तर्चस्य करावारिंशत्तमस्य सूक्तस्य ? -७ वसिष्ठषिः । १ लिङ्गोक्त- देवताः ॥२-६ भगः । ७ उषाः । निचजगती छन्दः । निषादः स्वरः । २।३॥ ५.७ निवृतत्रिष्टुप् । ६ त्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ४ पश्तिश्छन्दः । पञ्चमः ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४१ ॥ AAR SHER S New ARCH अब सात ऋचा वाले इकतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में प्रात:- काल उठ के जब तक सो तब तक मनुष्यों को क्या क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। पातरनिं प्रातरिन्द्र हवामहे प्रातमित्रावरुणा प्रातरश्विना । प्रातर्भग पूषणं ब्रह्मणस्पति प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ॥२॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो! जैसे हम लोग (प्रातः) प्रभात काल' में (अग्निम्) अनि को (प्रात:) प्रभात समय में (इन्द्रम्) बिजुली वा सूर्य को (प्रातः) प्रात:- समय (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान मित्र और राजा को तथा (प्रातः) प्रभात काल में (अश्विना) सूर्य चन्द्रमा वैद्य वा पढ़ाने वालों की (हवामहे) विचार से प्रशंसा करें (प्रात:) प्रभात समय (भगम्) ऐश्वयं को (पूषणम्) पुष्टि करने वाले वायु को (ब्रह्मणस्पतिम्) वेद ब्रह्माण्ड वा सकलैश्वयं के स्वामी जगदीश्वर को (सोमन) समस्त पोषधियों को (उत) और (प्रातः) प्रभात समय (रुद्रम्) फल देने से पापियों को रुलाने वाले ईश्वर वा पाप फल भोगने से रोने वाले जीव की (हुवेम) प्रशंसा करें वैसे तुम भी प्रशंसा करो ॥१॥ भावार्थ:-मनुष्यों को रात्रि के पिछले पहर में उठ कर आवश्यक कार्य कर ध्यान से शरीरस्थ वा ब्रह्माण्डस्थ वा विजुली प्राण उदान मित्र सूर्य चन्द्रमा ऐश्वर्य पुष्टि परमेश्वर ओषधिगण और जीव, विचार से जानने योग्य हैं फिर अग्निहोत्रादि कामों से सब जगत् का उपकार कर कृतकृत्य होना चाहिये ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । प्रावर्जितं मगपुग्रं हुवेम वयं पुत्रमदितयों विधर्ता । आध्रश्चियं मन्यमानस्तुरश्चिद्राजो चिचं मग भक्षीत्या ॥२॥ पवार्थ:-हे मनुष्यो (य:) जो (अदितेः) अन्तरिक्षस्थ भूमि वा प्रकाश का (विधर्ता) बा विविध लोकों का धारण करने वाला (मानः, चित्) जो सब ओर से धारण सा किया जाता (मन्यमानः) जानता हुमा (तुरः) शीघ्रकारी (राजा) प्रकाशमान (चिद) निश्चय से परमात्मा (यम्) जिस (भगम्) ऐश्वर्य की प्राप्ति होने को (माह) उपदेश देता है जिसकी प्रेरणा पाये हुए (वयम्) हम लोग (पुत्रम्) पुत्र के समान (प्रातजितम्) प्रातःकाल ही उत्तमता से प्राप्त होने को योग्य (उग्रम्) तेजोमय तेज भरे हुए (भगम्) ऐश्वर्य को (हुवेम) कहें (इति) इस प्रकार (यम्, चित) जिस को निश्चय से मैं (भक्षि) सेवू उस की उपासना करें ॥२॥ E AAR ऋग्वेदः मं० ७ । सू०४१ ॥ ८८१ - IMG NOTES ॐ Eena भावार्थ:- इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालंकार हैं। मनुष्यों को चाहिये कि प्रातः समय उठ कर सब के आधार परमेश्वर का ध्यान कर सब करने योग्य कामों को नाना प्रकार से चितवन कर धर्म और पुरुषार्थ से पाये हुए ऐश्वर्य को भोगें वा भुगावें यह ईश्वर उपदेश देता है ॥२॥ फिर मनुष्यों को ईश्वर की प्रार्थना क्यों करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । भग प्रणेतर्भग सत्यराघो भगेमां धियमुदवाददन्नः । भग प्र णो जनय गोभिरश्वैर्भग प्र नृमिवन्तः स्याम ॥३॥ पदार्थः-- है (भग) सकलैश्वर्ययुक्त (प्रणेतः) उत्तमता से प्राप्ति कराने वाले (भग, सत्यराधः) अत्यन्त सेवा करने योग्य सत्य प्रकृतिरूप धनयुक्त (भग) सकल ऐश्वर्य देने वाले ईश्वर आप कृपा कर (न:) हम लोगों के लिये (इमाम् इस प्रशंसायुक्त (धियम्) उत्तम बुद्धि को (ददत्) देते हुए हम लोगों की (उदवा) उत्तमता से रक्षा कीजिये, हे (भग) सर्वसामग्रीयुक्त (नः) हम लोगों के लिये (गोभिः) गोनों वा पृथिवी आदि से (अश्वैः) वा शीघ्रगामी घोड़ा वा पवन वा बिजुली आदि से (, जनय) उत्तमता से उत्पत्ति दीजिये, हे (भग) सकलैश्वय्यंयुक्त आप हम लोगों को (नृभिः) नायक श्रेष्ठ मनुष्यों से (1) उत्तम उत्पत्ति दीजिये जिस से हम लोग (नूयन्तः) बहुत उत्तम मनुष्ययुक्त (स्याम) हों ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य ईश्वर की आज्ञा, प्रार्थना, ध्यान और उपासना का प्राचरण पहिले करके पुरुषार्थ करते हैं वे धर्मात्मा होकर अच्छे सहाय- वान् हुए सकल ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं ॥३॥ फिर मनुष्यों को किससे' कैसा होना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उतेदानी भगवन्तः स्यामोत प्रपित्व उत मध्ये अाम् । उतोदिता मघवन्त्सूर्यस्य वयं देवानां सुमतौ स्याम ॥४॥ पदार्थ:--हे (भषयन्) परमपूजित ऐश्वर्ययुक्त जगदीश्वर (इदानीम्) इस समय (उत) और (प्रपित्वे) उत्तमता से ऐश्वर्या की प्राप्ति-समय में (उत) और (अह्नाम्) दिनों के (मध्ये) बीच (उत) और (सूर्यस्य) सूर्य लोक के (उदिता) उदय में (उत) और सायंकाल में (भगवन्तः) बहुत उत्तम ऐश्वर्ययुक्त (वयम् ) हम लोग 49 N ore ८६२ ऋग्वेदः मं०७३ सू० ४१ ।। (स्याम) हों (देवानाम् ) तथा आप्तविद्वानों की (सुमतौ) श्रेष्ठ मति में स्थिर Mam भावार्थ:-जो मनुष्य जगदीश्वर का आश्रय और आज्ञा पालन से विद्वानों के संग से अति पुरुषार्थी होकर धर्म अर्थ काम और मोक्ष की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं वे सकलैश्वर्य युक्त होते हुए भूत भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों कालों में सुखी होते हैं ॥४॥ फिर मनुष्य क्या करके कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। भग एव भगवाँ अस्तु देवास्तेनं वयं भगवन्तः स्याम । तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति स भग पुरएता मधेह ॥५॥ पदार्थ:-है (भग) सकल' ऐश्वर्या के देने वाले जो पाप (भगः) अत्यन्त सेवा करने योग्य (भगवान्) सकलेश्वर्यसम्पन्न (प्रस्तु) होमो (तेनैव) उन्हीं भगवान् के साथ (अयम्) हम (देवाः) विद्वान् लोग (भगवन्तः) सकलैश्वर्य युक्त (स्याम) हों, हे सकलेश्वर्य देने वाले जो (सर्वः) सर्व मनुष्य (तम्) उन (त्या) प्रापको (जोहवीति) निरन्तर प्रशंसा करता है (स:) वह (इह) इस समय में (न:) हमारे (पुरएता) आगे जाने वाला हो और हे (भग) सेवा करने योग्य वस्तु देने वाले आप (उत्) ही हमारे अथं आगे जाने वाले (भव) हूजिये ॥५॥ भावार्थ:-हे जगदीश्वर जो सकलैश्वर्यवान् श्राप सब को सब ऐश्वर्या देते हैं उन के सहाय से सब मनुष्य धनाढय होवें ॥२॥ फिर मनुष्यों को कैसे होकर क्या पाकर क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। समध्वरायोषसों नमन्त दधिक्राव शुचये पदार्य । अर्वाचीनं वसुविदं भगै नो रथमिवावा वाजिन आ दहन्तु ॥६॥ पदार्थः- (रथमिव, अश्वाः) रमणीय यान को महान् वेग वाले घोड़े वा शीघ्र जाने वाले बिजुली आदि पदार्थ जैसे वैसे जो (वाजिनः) विशेष ज्ञानी जन (शुचये,पवित्र (अध्वराय)हिंसारहितधर्मयुक्त व्यवहार (पदाय) और पाने योग्य पदार्थ के लिये (उषसः) प्रभात वेला की (दधिक्रावेव) धारणा करने वालों को प्राप्त होते के समान (सन्नमन्त) अच्छे प्रकार नमते हैं वे (अर्वाचीनम्) तत्काल प्रसिद्ध हुए नवीन (वसुविचम्) धनों को प्राप्त होते हुए (भगम्) सर्व ऐश्वर्य युक्त जन को और (म.) हम लोगों को (मा, वहन्त) सब ओर से उन्नति को पहुंचावें ॥६॥ ARD mein FIR क ऋग्वेदः म०७ । सू० ४२ ॥ ARI भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-जो मनुष्य प्रातःकाल उठ के वेगयुक्त घोड़ों के समान शीघ्र जाकर प्राकर मालस्य छोड़ ऐश्वर्य को पाय नम्र होते हैं वे ही पवित्र परमात्मा को पा सकते हैं ॥६॥ फिर विदुषी स्त्री क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अश्वांवतीर्गोमतीने उपासों वीरवतीः सदमुच्छन्तु भद्रा । घृतं दुहांना विश्वतः प्रपीता यूपं पति स्वस्तिभिः सदा नः ॥७॥ पदार्थ:-हे पढ़ाने और उपदेश करने वाली पण्डिता स्त्रियो ! तुम (उषसः) प्रभात वेला सी शोभती हुई (प्रश्वायती:) जिन के समीप बड़े बड़े पदार्थ विद्यमान (गोमतीः) वा किरणें विद्यमान (वीरवती:) वा वीर विद्यमान (Aar:) जो कल्याण करने (अपीताः) उत्तमता से बढ़ाने और (विश्वतः) सब ओर से (घृतम्) जल को (दुहानाः) पूरा करती हुई आप (नः) हमारे (सबम्) स्थान को (उच्छन्तु) सेवो वह (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हम लोगों की (सदा) सर्वदैव (पात) रक्षा कीजिये ॥७॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जैसे प्रभात वेला सब निद्रा में ठहरे हुए मरे हुए जैसों को चैतन्य करा कर्मों में युक्त कराती हैं वैसे ही होती हुई विदुषी स्त्रियां सब अविद्यानिद्रास्थ स्त्रियों को पढ़ाने और उपदेश करने से अच्छे काम में प्रवृत्त करावें ॥७॥ इस सूक्त में मनुष्यों की दिनचर्या का प्रतिपादन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह सप्तम मण्डल में इकतालीसवां सूक्त समाप्त हुना। अथ षडचस्य द्विचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य १६ वसिष्ठ ऋषिः । विश्वे देवा देवताः । १।३ निवृत्त्रिष्टुप् । ४ । ५ विराट् निष्टुप् । २ त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । ६ निवृत्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब छः ऋचा वाले बयालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में पूरी विद्या वाले जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। प्र ब्रह्माणो अङ्गिरसो नक्षन्त प्र क्रन्दनु भन्यस्य वेतु । प्र धेनवं उदातो नवन्त युज्यातामद्री अध्वरस्य पेशः॥१॥ Mus i ऋग्वेद: म०७ । सू० ४२ ॥ Home AN ASAN पदार्थ:-हे (ब्रह्माण:) चारों वेदों के जानने वाले जनो (अङ्गिरसः) प्राणों के समान विद्वान् जन जैसे (क्रन्दनुः) बुलाने वाला (नभन्यस्य) अन्तरिक्ष पृथिवी वा सुख में उत्पन्न हुए (अध्वरस्य) न नष्ट करने योग्य व्यवहार के (पेश:) सुन्दर रूप को (प्र, वेतु) अच्छे प्रकार प्राप्त हो वा (उदप्रतः) उदक जल को प्राप्त हुई नदियों के समान (धेनवः) और दूध देने वाली गौओं के समान वाणी अहिंसनीय व्यवहार के रूप की (नवन्त) स्तुति करती हैं और जैसे (भद्री) मेघ और बिजुली अहिंसनीय व्यवहार के रूप को (प्रयुज्याताम्) प्रयुक्त हों आप लोग वैसी विद्याओं में (प्र, नक्षन्त) व्याप्त होमो ॥१॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो चारों वेद के जानने वाले, विद्वान् जन, अहिंसादि लक्षण हैं जिसके ऐसे धर्म के स्वरूप का बोध कराते हैं वे स्तुति करने योग्य होते हैं ॥१॥ कोन विद्वान् जन श्रेष्ठ होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सुगस्तै अग्ने सनवित्तो अध्वा युवामृते हरितो रोहितश्च । ये वा सन्नरुषा वीरवाहों हुवे देवानां जनिमानि सत्तः ॥२॥ पदार्थ:-हे (अग्ने) अग्नि के समान विद्याप्रकाशित (सुते) उत्पन्न हुए इस जगत् में (ये) जो (हरितः) दिशाओं के समान (रोहितः, च) और नदियों के समान (सअन्) स्थान में (अरुषाः) लालगुणयुक्त (वीरवाहः) वीरों को पहुंचाने वाले हैं उन (देवानाम्) विद्वानों के (जनिमानि) जन्मों को को (सत्तः) आसत्त हुआ मैं (हुवे) प्रशंसा करता हूं वैसे जो पाप का (सुगः) अच्छे जाते हैं जिसमें वह (सनवित्तः) सनातन वेग से प्राप्त (अध्वा) मार्ग है जिसकी कि मैं प्रशंसा करू उसको आप (थुक्ष्य) युक्त करो ॥२॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-वे ही विद्वान् जन श्रेष्ठ हैं जो सनातन वेदप्रतिपादित धर्म का अनुष्ठान करके अनुष्ठान कराते हैं, उन्हीं विद्वानों का जन्म सफल होता है जो पूर्ण विद्या को पाकर धर्मात्मा होकर प्रीति के साथ सब को अच्छी शिक्षा दिलाते हैं ।।२।। फिर विद्वान् क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । समु वो यज्ञं महयन्नमोभिः प्र होता मन्द्रो रिरिच उपाके । यजस्व सु पुर्वणीक देवाना यज्ञियांमरमति वकृत्याः ॥३॥ पदार्थ:-हे (पूर्वणीक) बहुत सेनाओं वाले राजा श्राप (देवान्) विद्वानों को ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४२ ।। (सुयजस्व) अच्छे प्रकार प्राप्त होनो (यज्ञियाम्) जो यज्ञ के योग्य होती उस (पर- मतिम्) पूरी मति को (मा, ववृत्याः) प्रवृत्त करानो (मन्त्रः) भानन्द आने वा (होता) दान करने वाले होते हुए (उपाके) समीप में (प्र, रिरिचे) अन्याय से अलग रहिये, हे विद्वानो जो (नमोभिः) अन्नादिकों से (व:) तुम लोगों के (यज्ञम्) विद्याप्रचारमय यज्ञ का (सम्महयन्) सम्मान [= सम्मान] करते हैं (उ) उन्हीं का तुम सत्कार करो ॥३॥ aras prakar - - COM - भावार्थ:-जो विद्वान् जन सत्कर्मानुष्ठानयज्ञ का अनुष्ठान करते हैं वे पुष्कल वीर सेना वाले होते हुए सबको आनन्द देने वाले होते हैं ॥३॥ फिर अतिथि और गृहस्थ परस्पर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यदा वीरस्य रेवतो दुरोणे स्यौनशीरतिथिराचिकैतत् । सुप्रीतो अग्निः मुधितो दम आ स विशे दाति वार्य मियत्यै ॥४॥ पदार्थ:-(या). जब (स्योनशीः) सुख से सोने वाला (अतिथि:) सत्य उपदेशक (रेवतः) बहुत धन वाले (वीरस्य) वीर के (दुरोण) घर में (प्राचिकेतत्) सब ओर से जानता है तब (सः) वह (अग्लिः) अग्नि के समान पवित्र (सुधितः) अच्छा हित करने वाला (सुप्रीतः) सुन्दर प्रसन्न गृहस्थ के (दमे ) घर में इयत्ये) सुखप्राप्ति की इच्छा के लिये (विशे) और प्रजा सन्तान के लिये (वार्यम् स्वीकार करने योग्य विज्ञान को (मा, बाति) सब ओर से देता है. ॥४॥ भावार्थ:-इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जब विद्वान् धार्मिक उपदेश करने वाला अतिथि जन तुम्हारे घरों को आवे तब अच्छे प्रकार उसका सत्कार करो, हे अतिथि जब जहां जहां आप रमण भ्रमण करें वहां वहां सब के लिये सत्य उपदेश करें॥४॥ फिर वे गृहस्थ अतिथि परस्पर के लिये क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इमं नो अग्ने अध्वरं जुषस्व मरुत्स्यिन्दै यशसं कृधी ना। आ नक्ता बहि: संदतामुषासोशन्ता मित्रावरुणा यजेह ॥५॥ पदार्थ:-हे. (अग्ने) अग्नि के समान विद्या से प्रकाशित अतिथि प्राप (मरुत्स) मनुष्यों के (इन्द्र) और राजा के निमित्त (न:) हम लोगों के (इमम्) इस (अध्वरम् ) उपदेशरूपी यज्ञ को निरन्तर (जुषस्व) सेवो (नः) हमारी (यशसम्) कीर्ति की वृद्धि (कृषि) करो (नक्तोषसा) रात्रि को दिन के साथ (बहिः) तथा PUR ८८६ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४३ ।। 1000 EM उत्तम आसन को (प्रासवता) स्वीकार करो स्थिर होमो और (इह) इस जगत् में (उशन्ता) कामना करते हुए (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान स्त्री पुरुषों को पाप (यज) मिलो ॥१॥ भावार्थ:-जब अतिथि आयें तब गृहस्थ अर्घ्य पाद्य आसन मधुपर्क प्रिय वचन और अन्नादिकों से उसका सत्कार कर और पूछ कर सत्य और असत्य का निर्णय करें और अतिथि भी प्रश्नों के समाधान देवें ॥५॥ धन की कामना करने वाले क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एवानि सहस्यं वसिष्ठो रायस्कायो विश्वपन्यस्य स्तोत् । इष रयिं पंप्रथद्वाज॑मस्मे यूयं पति स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥ पदार्थ:-जो (रायस्कामः) धन की कामना वाला (वसिष्ठः) अतीव निवास- कर्ता जन (विश्वप्न्यस्य) समग्न रूपों में और (सहस्यम्) बल में हुए (अग्निम्) अग्नि की (स्तोत्) स्तुति करता है (एव) वही (प्रस्मे) हमारी (इषम्) अन्नादि सामग्री (रयिम्) लक्ष्मी (वाजम्) विज्ञान वा अन्न को (पप्रथत्) प्रसिद्ध करता है, हे अतिथि जनो (युयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की (सदा) सदैव (पात) रक्षा करो ॥६॥ भावार्थ:--जिसको धन की कामना हो वह मनुष्य अग्न्यादि विद्या को ग्रहण करे, जो अतिथियों की सेवा करते हैं उनको अतिथि लोग अधर्म के आचरण से सदा अलग रखते हैं ॥६॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में बयालीसवां सूक्त समाप्त हुमा ।। .. अथ पञ्चर्चस्य त्रिचत्वारिंशतमस्य सुक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । विश्वेदेवा देवताः । १ निचत्रिष्टुप् । ४ त्रिष्टुप् । ३ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । २।५ भुरिक् पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। अब पांच ऋचा वाले तेतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर अतिथि और गृहस्थ एक दूसरे के लिये क्या क्या देवें इस विषय को कहते हैं।

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४३ ।। प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अर्चन्धावा नोभिः पृथिवी इषध्यै । थेषां ब्रह्माण्यसमानि विमा विष्वग्वियन्ति बनिनो न शाखाः॥१॥ AN AND- HD पदार्थ:--हे (विप्राः) बुद्धिमानो (येषाम्) जिनको (असमानि) औरों के धनों से न समान कन्तु अधिक (ब्रह्माणि) धन वा अन्न (बनिनः) वन संबन्ध रखने और (शाखा:) अन्तरिक्ष में सोनेवाली शाखामों के (न) समान (विश्वक) अनुकूल व्याप्ति जैसे हो वैसे (वि, थन्ति) व्याप्त होते हैं वा जो (नमोभिः) अन्नादिकों से (इषध्य) इच्छा करने का जानने को (खावापृथिवी) सूर्य और भूमि की (यज्ञेषु) विद्याप्रचारादि- व्यवहारों में (देवयन्तः) कामना करते हुए (व:) तुम लोगों का (प्रार्चन्) अच्छा सत्कार करते हैं उनका तुम भी सत्कार करो॥१॥ भावार्थ:-हे अतिथि विद्वानो ! जैसे गृहस्थ जन अन्नादि पदार्थों के साथ आपका सत्कार करें वैसे तुम विज्ञान-दान से गृहस्थों को निरन्तर प्रसन्न करो॥१॥ फिर मनुष्य कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्र यज्ञ एतु हेत्वो न सप्तिधच्छध्वं समनसो घृताचीः । स्तृणीत बहिरंध्वराय साधूर्धा शोचीषि देवयून्यस्थुः ॥२॥ पदार्थ:- है (समसः) समान ज्ञान वा समान मन वाले विद्वानो ! जिन आप लोगों को (4:) विज्ञानमय संग करने योग्य व्यवहार (एत) प्राप्त हो वे आप लोग( हेत्व:) अच्छे बढ़े हुए वेगवान् (सप्तिः) घोड़ा के (म) समान सब को (प्रोवच्छ- ध्यम्) अतीव उद्यमी करो जिसके (ऊर्धा) ऊपर जाने वाले (देवयूनि) दिव्य उत्तम गुणों को करते हुए (शोधाषि) तेज (अस्थः) स्थिर होते हैं उससे (अध्वराय) अहिंसामय यज्ञ के लिए पाप (घृताचीः) रात्रियों और (बहिः) अन्तरिक्ष को (साधु) समीचीनता से (स्तुणीता) माच्छादित करो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे गृहस्थो जिससे वायु, जल और प्रोषधि पवित्र होती हैं उस यज्ञ का निरन्तर अनुष्ठान करो। यज्ञ- धूम से अन्तरिक्ष को ढांपो, हे अतिथियो तुम सब मनुष्यों को सारथि, घोड़ों को जैसे वैसे धर्म कामों में उद्यमी कर इनका पालस्य दूर करो जिससे इनको समस्त लक्ष्मी प्राप्त हो ॥२॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४३ ॥ आ पुत्रासो न मातरं विभृत्राः सानौ देवासौं बर्हिषः सदन्तु । था विश्वाची विदामनक्स्यग्ने मा नौ देवाता मृधस्का ॥३॥ पदार्थ:--हे (अग्ने) विद्वान जैसे (विश्वाची) विश्व को प्राप्त होने वाली (विदयाम्) घरों में नीति को (प्रा, अनक्तु) सब ओर से चाहे उसके उपदेश से आप (नः) हमारे (देवताता) दिव्य गुणों की प्राप्ति कराने वाले यज्ञ में (मृधः) हिंसकों को (मा, कः) मत करें जो (देवासः) विद्वान् जन (सानो) ऊपरले देश स्थान में (विभृताः) विशेष कर पुष्टि करने वाले (पुत्रास:) पुत्र जैसे (मातरम्) माता को (न) वैसे (बहिषः) उत्तम वृद्ध जन (मा, सदन्त) स्थिर हों उनकी आप कामना करें॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-वही माता उत्तम है जो ब्रह्मचर्य से विदुषी होकर सन्तानों को अच्छी शिक्षा देकर विद्या से इनकी उन्नति करे, वही पिता श्रेष्ठ है जो हिंसादिदोषरहित सन्तान करे, वे ही विद्वान् प्रशसा पाये हैं जो और मनुष्यों को मा के समान पालते हैं ॥३॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। ते सीपपन्त जोषमा यजत्रा ऋतस्य धाराः सुदुघा दुहांनाः । ज्येष्ठं वो अब मह ा वसूनामा गन्तन समनसो यति ४ ॥४॥ पदार्थ:-जो (यजत्राः) संग करने वाले (जोषम्) पूरी (मा, सोषपन्त) शपथ करें (ते) वे (समनस:) एकसे विज्ञान वाले जन (ऋतस्य) सत्य की (सुबुधाः कामनाओं की पूरी करने वाली (दुहानाः) पूर्ण शिक्षा विद्यायुक्त (धारा:) वारिणयों को (मा, गन्तन) प्राप्त हों और (यति) जिनमें यत्न करते हैं उस व्यवहार में (मा, स्थ) स्थिर हों है धार्मिक सज्जनो (व:) तुम लोगों को (बसूनाम्) धनों का (महः) महान् (ज्येष्ठम् ) प्रशंसित भाग (अध) आज प्राप्त हो ॥४॥ भावार्थ:-जो सत्य कहने, सत्य करने और सत्य मानने वाले होते हैं वे पूर्णकाम होकर सब मनुष्यों को विद्वान् कर सकते हैं ॥४॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। एवा नो अग्ने विश्वा दंशस्य त्वया वयं सहसावन्नास्कर राया युजा संघमादो अरिष्टा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ।।५।। पदार्थ:-हे (सहसायन्) बहुबलयुक्त (भाने) विद्वान् पाप (विक्ष) प्रजाजनों Teena ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४४ ॥ में (नः) हम लोगों को धन (दशस्य) देनो जिससे (स्वया) तुम्हारे साथ (युजा) युक्त (वयम्) हम लोग (राया) धन से (सधमादः) तुल्य स्थान वाले (भास्काः) सब ओर से बुलाये और (अरिष्टाः) अविनष्ट हों (यूयम् ) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करो (एव) उन्हीं की हम लोग भी रक्षा करें॥शा भावार्थ:-हे विद्वानो! तुम हम को विद्या देनो जिससे हम लोग प्रजाजनों में उत्तम धन आदि पाकर तुम्हारी सदैव रक्षा करें ।।५।। इस सूक्त में विश्वे देवों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम भण्डल में तेतालीसवां सूक्ता समाप्त हुआ। - अथ पञ्चर्चस्य चतुश्चत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । लिङ्गोक्ता देवताः १ निचज्जगती छन्दः । निषाद: स्वरः । २ । ३ निवृरिश्रष्टुप्छन्दः । धैवतःस्वरः । ४ । ५ पक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।। अब चवालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को सृष्टिविद्या से सुख बढ़ाना चाहिये इस विषय को कहते हैं । दधिक्रां का प्रथममश्विनोषसमाग्नि समिद्धं भगभूतये हुवे । इन्द्रं विष्णु पूषगं ब्रह्मणस्पतिमादित्यान्यावापृथिवी अप वः ॥१॥ पदार्थ:-हे विद्वानो! जैसे (ऊतये) धनादि के लिए मैं (व:) तुम लोगों को और (प्रथमम्) पहिले (दधिक्राम्) जो धारण करने वालों को क्रम से प्राप्त होता उसे (अश्विना) सूर्य और चन्द्रमा (उषसम्) प्रभातवेला (समिद्धम्) प्रदीप्त (अग्निम्) अग्नि (भगम्) ऐश्वर्या (इन्द्रम्) बिजुली (विष्णुम्) व्यापक वायु (पूषणम्) पुष्टि करने वाले ओषधिगण (ब्रह्मणस्पतिम्) ब्रह्माण्ड के स्वामी (मादिस्यान्) सब महीने (शावापृथिवी) सूर्य और भूमि (अपः) जल और (स्व:) सुख को (हुवे) ग्रहण करता हूं वैसे ही मेरे लिये इस विद्या को आप भी ग्रहण करें ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालकार है-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन प्रथम से भूमि आदि की विद्या का संग्रह करके कार्यसिद्धि करते हैं वैसे तुम भी करो॥१॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

८६० ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४४ ।। C RE tos MER 450 दधिक्रामु नमसा बोधयन्त उदीराणा यज्ञमुप प्रयन्तः । इला देवीं बहिर्षि सादयन्तोऽश्विना विप्रा सुहमा हुवेम ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे (नमसा) अन्नादि से वा सत्कार से (वधिकाम्) पृथिवी आदि के धारण करने वालों को (बोधयन्तः) बोध दिलाते हुए (उदीराणाः) उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त (यज्ञम्) यज्ञ का (उपप्रयन्तः) प्रयत्न करते (उ) और (देवीम्) दिव्य गुण कर्म स्वभाव वाली (इळाम्) प्रशंसनीय वाणी को (बर्हिषि) वृद्धि करने वाले व्यवहार में (सादयन्तः) स्थिर कराते हुए हम लोग (सहया) शुभ बुलाने जिन के उन (अश्विना) पढ़ाने और उपदेश करने वाले (विप्रा) बुद्धिमान् पण्डितों की (हुवेम) प्रशंसा करें वैसे उनकी तुम भी प्रशंसा करो ॥२॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-वे ही विद्वान् जन जगत् के हितैषी होते हैं जो सब जगह विद्या फैलाते हैं ॥२॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । दधिक्राणिं बुबुधानो अग्निमुप ब्रव उषसं सूर्य गाम् । ब्रनं मांश्चतोर्वरुणस्य बभ्रं ते विश्वास्माईरिता यावयन्तु ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (वधिकावाणम्) धारण करने वाले यानों को चलाने वाले (अग्निम्) भाग (उषसम्) प्रभातवेला (बघ्नम्) महान् (सूर्यम्) सूर्यलोक (गाम्) भूमि को (मंश्चतोः) मानते हुए विद्वानों को मांगने वाले (वरुणस्य) श्रेष्ठ जन के (बभ्र म्) धारण वा पोषण करने वाले को तथा जिनको आपके प्रति (उप, अ.वे) उपदेश करता हूं (ते) वे पाप लोग (अस्मत) हम से (विश्वा) सब (दुरिता) दुष्ट आचरणों को (यावयन्त) दूर करें ।।३।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जैसे प्राप्त विद्वान् सब के लिए विद्या और अभयदान देकर पाप के आचरण से उन्हें अलग करते हैं वैसे सब विद्वान् करें॥३॥ फिर विद्वान् जन क्या जान कर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। दधिक्रावा प्रथमो वाज्यर्वाग्रे रथांनां भवति प्रजानन् । संविदान उपसा सूर्येणादित्येभिर्वमुभिरङ्गिरोभिः ॥४॥ पदार्थ:-जो (वधिभावा) धारण करने वालों को पहुंचाने और (प्रथमः प्रथम सिद्ध करने वाला (वाजी) वेगवान् (अर्वा) प्रेरणा को प्राप्त अग्नि (उषसा) Mong -- MON- HoiPage ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४५ ॥ ८६१ प्रात:काल की वेला (सूर्येण) सूर्य लोक (मादित्येभिः) संवत्सर के महीनों (वसुभिः) पृथिवी आदि लोकों और (अङ्गिरोभिः) पवनों के सहित होता हुआ (रथानाम्) रमणीय यानों के (अमे) आगे बहन करने वाला (भवति) होता है उसको (प्रजानन्) उत्तमता से जानता और (संविधानः) अच्छे प्रकार उसका विज्ञान करता हुआ विद्वान् जन अच्छा प्रयोग करे ॥४॥ भावार्थः --जो अग्निविद्या को जानते हैं वे रथों के शीघ्र चलाने वाले होते हैं ॥४॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । आ नो दधिकाः पथ्यामनक्त्वृतस्य पन्धामन्वैतवा उ । शृणोतु नो दैव्यं श| अग्निः शृण्वन्तु विश्वे महिषा अमराः ॥५॥ : पदार्थः-है विद्वान् श्राप (दधिका:) घोड़े के समान धारण करने वालों को चलाने वाले (पथ्याम्) मार्ग में सिद्धि करने वाली गति के समान (न:) हम लोगों के (ऋतस्य) सत्य वा जल' (पन्थानम्) मार्ग के (अन्वेत) पीछे जाने को (मा, अनक्तु) कामना करें (उ) और (अग्नि:) बिजुली के समान' शीघ्र जावें और (न:) हमारे (बव्यम्) विद्वानों ने उत्पन्न किये (शर्धः) शरीर और प्रात्मा के बल को (शृणोतु) सुने (महिषाः) महान् (विश्वे) सब (अमूरा:) अमूढ अर्थात् विज्ञानवान् जन हमारे विद्वानों के सिद्ध किये हुए वचन को (शृण्वन्तु) सुनें ॥५॥ भावार्थ:--हे मनुष्यो ! जैसे परीक्षक न्यायाधीश वा राजा सब के वचनों को सुन के सत्य और असत्य का निश्चय करता और अग्नि आदि का प्रयोग कर शीघ्र मार्ग को जाता है वैसे ही तुम लोग विद्वानों से सुन कर धर्मयुक्त मार्ग से अपना व्यवहार कर मूढ़ता छोड़ो और छुड़ानो ॥५॥ इस सूक्त में अग्निरूपी घोड़ों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में चबालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। . । अथ चतुऋचस्य पञ्चचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । सविता देवता। २ त्रिष्टुप् । ३ । ४ निवृत्त्रिष्टुप् । १ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब पैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर विद्वान् जन किसके तुल्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।।

ammar ८९२ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४५ ।। an आ देवो यांतु सविता सुरत्नोऽन्तरिक्षमा वहमानो अश्वैः । हस्ते दानो नयाँ पुरूणि निवेशयञ्च प्र सुवञ्च भूमं ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (सुरत्न:) जिसके वा जिससे सुन्दर रमणीय धन होता (सविता) जो सकलैश्वर्य देने वाला (देवः) दाता दिव्य गुणवान् (अन्तरिक्षप्राः) अन्तरिक्ष को व्याप्त होता (प्रश्वः) किरणों के समान महान् अग्नि जल आदिकों से भूगोलों को (वहमानः) पहुंचता वा पहुँचाता (पुरूणि) बहुत (नर्या) मनुष्यों के लिये हितों को (दधानः) धारण करता और (निवेशयत्) प्रवेश करता हुआ (प्रसुवम्) जिसमें नाना रूप उत्पन्न होते हैं उस ऐश्वर्य को प्राप्त होता है वैसे इससे प्राप्त कराता हुआ (ब) और ऐश्वर्य को (हस्ते) हाथ में धारण करता हुमा विद्वान् (मा, यातु) श्रावे, उसके साथ हम लोग (च) भी वैसे ही (भूम) होवें ॥१॥ भावार्थ:- इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-जो मनुष्य सूर्य के तुल्य शुभ गुण और कर्मों से प्रकाशित, मनुष्यादि प्राणियों का हित करते हैं वे बहुत ऐश्वर्य पाते हैं ॥१॥ फिर राजादि जन कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उदस्य बाहू शिथिरा बृहन्ता हिरण्ययो दिवो अन्ताँ अनष्टाम् । नूनं सो अस्य महिमा पनिष्ट सूरश्चिदरमा अनु दादपस्याम् ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (सूरः) सूर्य के (चित) समान (अस्मै) इस विद्वान् के लिए (अप, स्याम्) अपने को कर्म की इच्छा (अनुवात्) अनुकूल दे जिस (अस्य) इसकी (स:) वह (महिमा) अत्यन्त प्रशंसा हम लोगों से (नूनम्) निश्चय (पनिष्ट) स्तुति की जाती है जिस (अस्य) इस (विव:) प्रकाश के (अन्तान्) समीपस्थ पदार्थ वा हिरण्यग) हिरण्य आदि आभूषणयुक्त (बृहन्ता) महान् (शिथिरा) शिथिल दृढ़ (बाहू) भुजा (उदनष्टाम्) उत्तमता से प्रसिद्ध होती वही हम लोगों की प्रशंसा करने योग्य है ॥२॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जिसका सूर्य के समान महिमा प्रताप सर्व बलयुक्त बाहू वर्तमान हैं वही इस राज्य के बीच पूजित होता है ॥२॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सो नो देवः सविता सहावा साविषसंपतिर्वसूनि । विश्रयमाणो अमतिमुरूची मतभोजनमध रासते नः ॥३॥ NATH M ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४६ ।। पदार्थ:-जो (वसुपतिः) धनों की पालना करने वाला (उरूचीम्) बहुत वस्तुओं को प्राप्त होता और (अमतिम्) सुन्दररूप को (विश्रयमाणः) विशेष सेवन करता हुआ (न:) हम लोगों को (मतभोजनम्) मनुष्यों का हितकारक भोजन वा पालन (रासते) देता है (स, ध, अध) वही पीछे (सबिता) ऐश्वर्यवान् सूर्य के समान प्रकाशमान (सहावा) साथ सेवने वाला (देवः) मनोहर विद्वान् (नः) हमको (वसूनि) धन (मा, साविषत) प्राप्त करे ॥३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सूर्य के समान सब के धनों को बढ़ा कर सुपात्रों के लिये देते हैं वे धनपति होते हैं ॥३॥ फिर धार्मिक विद्वान् जन किनसे स्तुति किये जावें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इमा गिरः सवितार मुजिह्व पूर्णगभस्तिमीळते सुपाणिम् । चित्रं वयो बृहदस्मे दधातु यूयं पात खस्तिभिः सदा नः ॥४॥ पदार्थ:-जो (अस्मे) हम लोगों में (बृहत) बहुत (चित्रम्) अद्भुत (वयः) आयु को (दधातु) धारण करे उस (सुपाणिम्) सुन्दर हाथों वाले (पूर्णगभस्तिम्) पूर्ण रश्मि जिसकी उस सूर्यमण्डल के समान वर्तमान (सवितारम्) ऐश्वर्य युक्त (सुजिह्वम्) सुन्दर जीभ रखते हुए धार्मिक मनुष्य की (इमाः) यह (गिरः) विद्या शिक्षा और धर्मयुक्त वाणी (ईळते) प्रशंसा करती हैं हे विद्वानो (यूयम् ) तुम विद्या- युक्त वाणी के समान (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हम लोगों की (सहा) सर्वदैव (पात) रक्षा करो ॥४॥ भावार्थ:--अच्छी विद्या से धार्मिक पुरुष होते हैं, धर्मात्मा पुरुष ही को विद्या और सर्व सुख प्राप्त होते हैं ॥४॥ इस सूक्त में सविता के तुल्य विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त' के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम भण्डल में पैंतालीसवां सूक्त समाप्त हुमा । अथ चतुऋचस्य षट्चत्वारिंशतमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । रुद्रो देवता। २ निस्त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः। १ विराड् जगती । ३ निचुज्जगती छन्दः । निषावः स्वरः। ४ स्वराट् पवितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः॥ अब छियालीस सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में योद्धाजन कैसे हों इस विषय को कहते हैं ।।

.... T) तथा अपनी ही वस्तु. और अपनी धार्मिक शत्रुओं के सहने को समर्थ (तिग्मायुधाय) तीन आयुध शस्त्रयुक्त (वेधसे) मेधावी ८६४ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४६ ।। इमा रुद्राय स्थिरधन्वने गिरः क्षिप्रेषवे देवाय स्वधान्ने । अपाळहाय सईमानाय वेधसे तिग्मायुधाय भरता शृणोतु नः ॥१॥ पदार्थ:--हे विद्वानो जिस (स्थिरधन्वने) स्थिरधनुष बाले ((क्षिप्रेषवे) शीघ्र क्रिया को धारण करने वाले (मषाळहाय) शत्रुओं से न सहे जाते हुए (सहमानाय) ra Ane gita A Nasa (रुद्राय) शत्रुओं को रुलाने वाले शूरवीर (देवाय) न्याय की कामना करते हुए विद्वान् के लिये (इमाः) इन (गिर:) वारिणयों को (भरत) धारण करो वह (नः) हम लोगों की इन वाणियों को (शुणोतु) सुने ॥१॥ भावार्थ:-जो दुष्टों के शिक्षा देने वाले, शस्त्र और अस्त्रवेत्ता, सहन- शील, युद्धकुशल विद्वान् हैं उनको सर्वदैव धनुर्वेद पढ़ाने से और उसके अर्थ से भरी हुई वक्तृता से विद्वान् जन अत्यन्त उत्साह दें और जो सेनापति है वह प्रजास्थ पुरुषों की वाणी सुने ॥१॥ फिर वे राजा आदि जन कैसे हुए क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स हि क्षयेण क्षम्यस्व जन्मनः साम्राज्येन दिव्यस्य चेतति । अवनवन्तीरुप नो दुरश्चरानमीवो रुद्र जासु नो भव ॥२॥ पदार्थ:-हे (रुद्र) दुष्टों को रुलाने वाले जो पाप (नः) हमारी (अयन्तीः) रक्षा करती हुई सेना वा प्रजाओं की (प्रवन्) पालना करते हुए (दरः) द्वारों के (उप, घर) समीप जाओ और (अनमोवः) नीरोग होते हुए (हि) जिस कारण (क्षयेण) निवास से (क्षम्यस्थ) क्षमा करने योग्य (दिव्यस्थ) शुद्ध गुण कर्म स्वभाव में प्रसिद्ध हुए (जन्मनः) जन्म के (साम्राज्येन) सुन्दर प्रकाशमान के प्रकाशित राज्य से हम लोगों को (चेतति) अच्छे प्रकार चेताते हैं (सः) वह आप (न:) हम लोगों की (जासु) प्रजात्रों में रक्षा करने वाले (भव) हूजिये ॥२॥ भावार्थ:-जो विद्वान् रक्षा करने वाली सेना वा प्रजाओं की रक्षा करता हुआ प्रत्येक गृहस्थ के व्यवहार को विशेष जानता, दुःखों को नाश करता और सुखों को उत्पन्न करता हुआ अच्छे प्रकार राज्य कर सकता है वही प्रजाजनों की पालना करने वाला है यह सब निश्चय करें ।।२।। फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

H - 40 (तोकेषक) आपके (सहस्त्रम्) असंख्य हजारों (भेषजा) प्रोषधियां हैं वह आप ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४६ ।। am या ते दिवसृष्टता दिवस्परिक्ष्मया चरति परि सा ,णक्त नः । सहस्र के खपिवात भेषजा मा नस्तोकेषु तनयेषु रीरिषः ॥३॥ पदार्थ:-हे (सुअपिधात) पवन के समान वर्तमान (ते) आपको (वा) जो (दिवः) मनोहर कार्य के सम्बन्ध में (परि) सब ओर से (अवसृष्टा) शत्रुओं में प्रेरणा देने वाली (विद्युत) न्यायदीप्ति (क्ष्मया) भूमि के साथ (चरति) जाती है (सा) वह (न:) हम लोगों को अधर्माचरण से (परिवृणक्तु) सब ओर से अलग (तोकेषु) शीघ्र उत्पन्न हुए और (सनयेष) कुमार अवस्था को प्राप्त हुए बालकों में वर्तमान (न:) हम लोगों को वा हमारे सन्तानों को (मा, रोरिषः) मत नष्ट करो ॥३॥ भावार्थ:-जिस राजा का न्यायप्रकाश सर्वत्र प्रदीपता है वही सबको अधर्माचरण से रोक सकता है, जिसके राज्य में हजारों दूत गुप्तचर और वैद्यजन विचरते हैं उसकी थोड़ी भी राज्य की हानि नहीं होती है॥३॥ फिर वह राजा कैसा हो इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। मा नौ वधी रुद्र मा परी दा मा ते भूम प्रसितो हीळीतस्य । आ नो भज बहिर्षि जीवशंसे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा ना ॥४॥ पदार्थ:-हे (रुद्र) दुष्टों को रुलाने वाले श्राप (नः) हम लोगों को (मा) मत (बधी:) मारो (मा) मत (परा, दाः) दूर हो और (होळितस्य) अनादर किये हुए (ते) आपके (प्रसितौ) बन्धन में हम लोग (मा, भूम) मत हों आप / बीवशंसे) जीवों से प्रशंसा करने योग्य (बर्हिषि) अन्तरिक्ष में (नः) हम लोगों को (आभज) अच्छे प्रकार सेवो, हे विद्वानो (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (न: हम लोगों की सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥४॥ भावार्थ:-वही राजा वीर वा उत्तम हो जो धार्मिक जनों को अदण्डय कर दुष्टों को दण्ड दे ॥४॥ इस सूक्त में रुद्र राजा और पुरुषों के गुण और कामों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में छियालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। ए H- EO

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ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४७ ।।
अथ चतुऋयस्य सप्तचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । प्रापो देवताः ।
१ । ३ त्रिष्टुप् । २ विरात्रिष्टुप्छन्दः । धैवतः स्वरः । ४ स्वराष्ट्पङ्क्तिश्छन्दः ।
अब सैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य प्रथम अवस्था
में विद्या ग्रहण करें इस विषय को कहते हैं ।
आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रपानमूर्मिमकृण्वतैः ।
तं वो क्यं शुचिमरिममय घृतप्रषं मधुमन्तं वनेम ॥१॥
पदार्थ:-हे मनुष्यो (देवयन्तः) कामना करते हुए जन (व:) तुम्हारी (इळ:)
वाणी को (प्रथमम्) और प्रथम भाग जो कि (इन्द्रपानम्) जीव' को प्राप्त होने योग्य
उसको (प्रापः) तथा बहुत जलों के समान वा (ऊर्मिम्) तरंग के समान (यम्)
जिसको (अकृण्वत) सिद्ध करें (तम्) उस (शुधिम् ) पवित्र (अरिप्रम्) निष्पाप
निर्दोष (घृतघुषम्) उदक वा धी से सिंचे (मधुमन्तम्) बहुत मधुरादिगुणयुक्त पदार्थ
को (वः) तुम्हारे लिए (वयम्) हम लोग (अद्य) आज (बनेम) विशेषता से
भजे ॥१॥
AROO
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जो विद्वान् जन
पहिली अवस्था में विद्या ग्रहण करते और युक्त आहार विहार से शरीर को
नीरोग करते हैं उन्हीं की सब सेवा करें ॥१॥
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
तमूर्मिमापो मधुमत्तमं वोऽपां नपांदवत्वाशुहेमा ।
यस्मिन्निन्द्रो वसृभिर्मादांते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य ॥२॥
पदार्थ:-हे विद्वानो (यस्मिन्) जिसमें (प्राशुहेमा) शीघ्र बढ़ने वा जाने
वाला (इन्द्रः) बिजुली के समान राजा (वसुभिः) धनों के साथ (व:) तुमको (माद-
याते) हर्षित करे (तम्) उसको (मापः) जल' (मिम्) तरङ्गों को जैसे वैसे (मधु-
मत्तमम्) अतीव मधुरादिगुणयुक्त पदार्थ को (अपांनपात) जो जलों के बीच नहीं
गिरता है वह बिजुली के समान राजा जैसे (अवतु) रक्खे वैसे हम लोग (तम्)
उसको रक्खें और (व:) तुम लोगों की (देवयन्तः) कामना करते हुए हम लोग
(प्रथ) आज (अश्याम) प्राप्त होवें ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जैसे वायु जल
की तरङ्गों को उछालता है वैसे जो राजा धनादिकों से प्रजाजनों की रक्षा
करे उसी को हम लोग राजा होने की सम्मति देवें ॥२॥

ऋग्वेदः मं०७ । सू० ४७ ।। ८६७ tra शा बमा - Kai फिर स्त्री पुरुष कैसे होकर विवाह करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अतपवित्राः वषया भदन्तीदेवीर्देवानामपि यन्ति पार्थः । ता इन्द्रस्य न मिनन्ति व्रतानि सिन्धुभ्यो हव्यं घृतवज्जुहोत ॥३॥ पदार्थ:-है विद्वान् मनुष्यो जो (शतपवित्राः) सौ उपायों से शुद्ध (मवन्तीः) प्रानन्द करती हुई (देवी:) विदुषी पण्डिता ब्रह्मचारिणी कन्या (देवानाम् ) विद्वानों के (स्वधया) अन्नादि पदार्थ से (पाथः) अन्नादि ऐश्वयं को (अषि, यन्ति) प्राप्त होती हैं (सा:) वे (इन्द्रस्य) समग्न ऐश्वर्यवान् परमात्मा के (प्रतानि) ब्रतों को (न) नहीं (मिनन्ति) नष्ट करती हैं जैसे (सिन्धुभ्यः) नदियों के समान (धृतवत) बहुत धी से युक्त (हव्यम्) देने योग्य वस्तु बनाकर वे होमती हैं वैसे इनको तुम (जुहोत) ग्रहण करो॥३॥ भावार्थ:-जो युवती कन्या, नदियां समुद्रों को जैसे वैसे हृदय के प्यारे पतियों को पाकर छोड़ती नहीं हैं वैसे ही तुम सब मनुष्य एक दूसरे के संयोग से सर्वदा मानन्द करो ॥३॥ फिर स्त्री पुरुष क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । याः सूर्यों रश्मिभिराखतान याभ्य इन्द्रो अरंदगातुमूर्मिम् । ते सिन्धवो वरियो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥४॥ पदार्थ:-हे पुरुषो (सूर्यः) सूर्यमण्डल (रश्मिभिः) अपनी किरणों से (याः) जिन जलों को (मा, ततान) विस्तारता है (इन्द्र :) बिजुली (याभ्यः) जिन जलों से (गातुम्) भूमि को और (मिम्) तरङ्ग को (अरदत) छिन्न भिन्न करती है उनको अनुहारि स्त्री पुरुष व जैसे (ते) वे (सिन्धयः) नदियां समुद्र को पूरा करती हैं वैसे जो स्त्रियां सुखों से हम लोगों को (धातन धारण करें (न:) हमारी (वरिवः) सेवा करें उनकी हम भी सेवा करें, हे पतिव्रता स्त्रियो (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम पति लोगों को (सदा) सदा (पात) रक्षा करो ॥४॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे विद्वानो ! जैसे सूर्य अपने तेजों से भूमि के जलों को खींच कर विस्तार करता है वैसे अच्छे कामों से प्रजा को तुम विस्तारो॥४॥ इस सूक्त में विद्वान् स्त्री पुरुष के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह सप्तम मण्डल में संतालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। Katha RB काम ondomuta BRE

६६८
ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ४८ ॥
अथ चतुचस्याष्टचत्वारिंशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । १-३ ऋभवः ।
४ ऋभवो विश्वे देवाः । १ भुरिष्पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। २ निस्त्रिष्टुप् ।
३ त्रिष्टुप् । ४ विरात्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।।
अब चार ऋचा बाले अड़तालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में विद्वानों
को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं।
अभुक्षणो वाजा मादयध्वमस्मे नरो मघवानः सुतस्य ।
आ वोऽर्वाचः क्रतो न याला विवो रथं नये वर्तयन्तु ॥१॥
पदार्थ:-हे (ऋभुक्षणः) महात्मा (मधवान:) बहुत उतम धनयुक्त
(विश्व:) सकल विद्याओं में व्याप्त (अर्वाचः) जो पीछे जाने वाले (वाजाः) विज्ञान-
वान् (नरः) मनुष्यो ! तुम (क्रतवः) अतीव बुद्धियों के (न) समान (सुतस्य) उत्पन्न
हुए के सेवने से (अस्मे) हम लोगों को (मादयध्वम्) आनन्दित करो (पा, याताम् )
पाते हुए (व:) तुम लोगों के और हमारे (नर्यम्) मनुष्यों में उत्तम (रथम्) रमणीय
यान को और नर (वर्तयन्तु) वः ॥१॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन
तुम्हें और हमें विद्या और बुद्धि के दान से वा शिल्पविद्या से आनन्दित
करते हैं वे सर्वदा प्रशंसा करने योग्य हैं ॥१॥
मनुष्य' कैसे विद्वान होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
ऋभुमुभिरभि वः स्याम विश्वों विभुभिः शर्थसा शवासि ।
वाजो अस्माँ अवतु वाजसाताविन्द्रेण युजा तरुषेण वृत्रम् ।।२।।
पक्षार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (वाजः) विज्ञानवान् वा ऐश्वर्ययुक्त जन (ऋभुभिः)
बुद्धिमान् उत्तम विद्वानों के साथ (याजसातौ) संग्राम में (ऋभः) बुद्धिमान् (वः)
तुम्हें और (अस्मान्) हमें (अक्तु) पाले रक्खे वा (युजा) योग किये हुए (इन्द्रेण)
बिजुली आदि 'शस्त्र से (नम्) धन को प्राप्त हो वैसे (विम्यः) सकल' शुभ गुण
कर्म और स्वभावों में व्याप्त हम लोग (विभुभिः) अच्छे गुणादिकों में व्याप्त जन
और (शबसा) बल के साथ (शवासि) बलों को (अभि, तषेम) प्राप्त हों जिससे हम
लोग सुखी (स्याम) हों ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-वे ही विद्वान् जन
विद्यानों में व्याप्त शुभ गुण कर्म स्वभाव युक्त हैं जो संग्राम में भी सब की
रक्षा करके धन और बल दे सकते हैं ॥२॥

N --- सेवन (कर्तन) करो (नः) हमारी (अवसे।। ऋग्वेदः म० ७ । सू० ४६ ।। फिर कौन राजा विजयशील राज्य का बढ़ाने वाला होता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। ते चिद्धि पूर्वीरभि सन्ति शासा विश्वाँ अर्य उपरांति वन्वन् ! इन्द्रो विभ्वाँ ऋभुक्षा वाजो अर्यः शत्रोमियत्या कृणवन्धि नृम्णम् ॥३॥ पवार्थ:--हे मनुष्यो जो (बाणः) बल विज्ञान और अन्नयुक्त (पर्यः) स्वामी (ऋभुक्षाः) उत्तम बुद्धिमानों को निरन्तर वसावे वह (इन्द्रः) परमैश्वर्ययुक्त महान् राजा (शत्रोः) शत्रु को (मिथत्या) हिंसा से (नम्णम्) जो मनुष्यों में रमणीय ऐसे धन की इच्छा करता हुआ जिन (विश्वान्) समस्त (विम्बान्) विद्या में व्याप्त अमात्य जनों को अपना करता है (ते) वे विद्वान् जन (उपरताति) मेघास्त्रादिकों से संग्राम में विजय (कृणवन्) करते हैं वे (चित्र) ही (हि) निश्चय कर (शासा) शासन से (पूर्वीः) सनातन प्रजाजन (अभि, सन्ति) सब ओर से विद्यमान हैं तथा वह स्वामी (वि) विजयी होता है ॥३॥ भावार्थ:- वही राजा महान् विजयी होता है जो धार्मिक उत्तम विद्वानों का संग्रह करता है ।।३॥ फिर राजादिकों से विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं॥ न देवासो वरिवः कर्तना नो भूत नो विश्वेऽवसे सजोषाः । समस्मे इषं वसवो ददीरन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥४॥ पदार्थ:-हे (सजोषाः) समान' प्रीति के सेवने वाले (बसव:) विद्या में निवासकर्ता (विश्वे) समस्त (देवासः) विद्वान् जनो तुम (नः) हमारा (वरिवः) संनद्ध होओ (अस्मे) हमारे लिये (इषम्) अन्न' वा विज्ञान को (संदवीरन्) अच्छे प्रकार देप्रो (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हमारी (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करो ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वान् राजजनो! तुम हम लोगों की और प्रजाजनों की निरन्तर रक्षा करो, सर्वदा विज्ञान और अन्न आदि ऐश्वर्य को देनो, ऐसा करोतो तुम लोगों की हम निरन्तर रक्षा करें॥४॥ न माम tara WADA य NA Rom HD अब चार ऋचा वाले उनचासवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर वे १०० ऋग्वेदः मं०७। सू० ४६ ॥ इस मन्त्र में विद्वानों के गुण और कर्मों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पञ्चम मण्डल में पड़तालीसवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ चतुचस्यकोनपंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठर्षिः। प्रापो देवताः । १ निवृत्रिष्टुप् । २ । ३ त्रिष्टुप् । ४ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ जल' कैसे हैं इस विषय को कहते हैं । समुद्रज्येष्ठाः सलिलस्य मध्यात्पुनाना यन्त्यनिविशमानाः । इन्द्रो या वज्री द्वेषभो रराद ता आपो देवीरिह मामवन्तु ॥१॥ पवार्थ:-हे विद्वानो (याः) जो ऐसी हैं कि (समुद्रज्येष्ठाः) जिन में समुद्र ज्येष्ठ है वे (पुनाना:) पवित्र करती हुई (अनिविशमाना:) कहीं निवास न करने वाली (प्रापः) जल' तरङगें (सलिलस्य) अन्तरिक्ष के (मध्यात्) बीच से (यन्ति) जाती हैं वह (माम्) मेरी (इह) इस संसार में (प्रवन्तु) रक्षा करें और (ता.) उन (देवी:) प्रमोद कराने वाली जल' तरंगों को को (वृषभः) वर्षा करने वा (वी) वन के तुल्य छिन्न-भिन्न करने वाला बहुत किरणों से युक्त (इन्द्रः) सूर्य वा बिजुली (रराव) वर्षाता है वैसे तुम होप्रो ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है --हे मनुष्यो ! जो जल अन्तरिक्ष से बरस के सब की पालना करते हैं उन कां तुम पान आदि कामों में अच्छे प्रकार योग करो ॥१॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । या आपों दिव्या उत वा स्रवन्ति खनित्रिमा उत वा या स्वयंजाः । समुद्रार्या याः शुचयः पावकास्ता आपो देवीरिह मामवन्तु ॥२॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (या:) जो (दिव्याः) शुद्ध (प्रापः) जल (स्रवन्ति) चूते हैं (उत, वा) अथवा (खनित्रिमाः) खोदने से उत्पन्न होते हैं वा (याः) जो (स्वयंजा.) आप उत्पन्न हुए हैं (उत, वा) अथवा (समुद्रार्थाः) समुद्र के लिये हैं वा (याः) जो (शुचयः) पवित्र (पावकाः) पवित्र करने वाले हैं (ता:) वह (देवीः) देदीप्यमान (मापः) जल (इह) इस संसार में (माम्) मेरी (अवन्तु) रक्षा करें ॥२॥ HD- . . ................ वा जिन में (सोमः) प्रोष) न्याय और विनय नम्रता से प्रकाशमान (यास) ऋग्वेदः मं०७। सू० ४६ ।। भावार्थ:-हे विद्वानो! जैसे जल और प्राण हमारी अच्छे प्रकार रक्षा कर बढ़ावें वैसे तुम लोग हम को बोध कराम्रो ।।२।। फिर वह जगदीश्वर कैसा है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम् । मधुश्चुतः शुचयो याः पावकास्ता आपो देवीरिह मामदन्तु ॥३॥ पदार्थः-हे मनुष्यो (यासाम्) जिन जलों के (मध्ये) बीच (वरुणः) सब से उत्तम (राजा) प्रकाशमान ईश्वर (जनानाम्) मनुष्यों के (सत्यानते) सत्य और झूठ आचरणों को (अय, पश्यन्) यथार्थ जानता हुआ (याति) प्राप्त होता है वा (याः) जो (मधुश्चुतः) मधुरादि गुणों से उत्पन्न हुए (शुचयः) पवित्र (पावका:) और पवित्र करने वाले हैं (ताः) वह (देवी:) देदीप्यमान (आप:) जल' (इह) इस संसार में (माम्) मेरी (अवन्तु) रक्षा करें ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जो जगदीश्वर प्राणादिकों में अभिव्याप्त सब जीवों के धर्म अधर्म को देखता और फल से युक्त करता हुआ सब की रक्षा करता है वही सब को निरन्तर ध्यान करने योग्य है ॥३॥ फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। यासु राजा वरुणो यासु सोमो विश्वे देवा यासुजै मदन्ति । वैश्वानरो यास्वग्निः प्रविष्टस्ता आपों देवीरिह मामवन्तु ॥४॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (यासु) जिन अन्तरिक्ष जल' वा प्राणों में (वरुणः) वा जिन में (सोमः) प्रोषधिगण और (यासु) जिन में (विश्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् जन अथवा पृथिवी आदि लोक (ऊर्जम्) बल पराक्रम को (मदन्ति) प्राप्त होते हैं वा (यासु) जिन में (वैश्वानरः) सब में वा मनुष्यों में प्रकाशमान परमात्मा वा (अग्निः) बिजुलीरूप अग्नि (प्रविष्टः) प्रविष्ट है (ताः) वह (देवीः) मनोहर (भाप:) जल' (इह) इस संसार में (माम्) मेरी (अवन्त) रक्षा करें ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिस आकाश में प्राणों में वा जल में सब जगत् जीवन धारण करता है वा जिन प्राणों में स्थित योगी जन परमात्मा को प्राप्त होता है वा जहाँ बिजुली प्रविष्ट है उन जलों को तुम जान कर रक्षायुक्त होओ ॥४॥ taye AN ६०२ ऋग्वेदः मं०७। सू० ५० ।। इस सूक्त में जलादिकों के गुण और कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में उनचासवां सूक्त समाप्त हुआ। AMAARAMARNAMANDARMINAINA M HARI dooter aMON अथ चतुर्भस्य पञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य १-४ वसिष्ठः । १ मित्रावरुणो । २ अग्निः । ३ विश्वेदेधाः । ४ नद्यः । १ । ३ स्वराष्ट्र त्रिष्टुप् छन्दः । धेवतः स्वरः । २ निचूज्जगती । ४ भुरिगतिजगतीच्छन्दः । निषादः स्वरः ।। अब चार ऋचा वाले पचासवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्यों को इस संसार में क्या आचरण करना चाहिये इस विषय को कहते हैं । आ मां मित्रावरणेह रक्षतं कुलाययद्विश्वयन्मा न आ गन् । अजकावं दुईभीक तिरोदधे मा मां पान रपसा विदत्सरः ॥१॥ पदार्थ:--हे (मित्रावरुणा) प्राण और उदान के समान अध्यापक और उपदेशक तुम (इह) इस संसार में जो मैं (कुलाययत्) कुल की उन्नति चाहता हुआ (विश्ययव) सब काम करने वाला (दुशीकम् ) दुःख से देखने योग्य (अजकावम्) जीवों को पीड़ा देता उसको (तिरोधे) निवारण करता हूं वह (त्सरु:) कुटिल' गति रोग (पचन) प्राप्त होने योग्य (रपसा) पाप से (माम्) मुझे (मा) मत (विवत्) प्राप्त हो कोई पीड़ा (न:) हम लोगों को (मा) मत (भागन्) प्राप्त हो इससे (माम्) मेरी (मा, रक्षतम्) सब ओर से रक्षा करो।।१।। भावार्थ:-- मनुष्यों को पापाचरण वा कुपथ्य कभी न करना चाहिये जिससे कभी रोगप्राप्ति न हो जो इस संसार में अध्यापक और उपदेशक हैं वे पढ़ाने और उपदेश करने से सब को अरोगी कर सीधे और उद्योगी करें ॥१॥ फिर मनुष्यों को रोगनिवारणार्थ क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। यद्विजामन्परुषि वन्दनं सुवदाठीवन्तौ परि कुल्फौ च देईन् । अग्निष्टच्छोचन्नप बाधतामितो मां पर्थेन रपंसा विदत्सरः ॥२॥ पदार्थ:-है मनुष्यो जो इस (परुषि) कठोर व्यवहार में (वन्दनम्) वन्दना को (विजामन्) विशेषता से जानता हुआ (भवत) प्रसिद्ध होता है (यव) जिस Minute Au ऋग्वेदः मं०७ । सू०५० ।। A AR व्यवहार में (सरु:) कठिन रोग (अष्ठीवन्तो) कफादि न थूकने वाली (कुल्फो) जङ्घाओं को (च) भी (परिदेहत) सब ओर से बढ़ावे, पीड़ा दे (तत्) उसको (अग्निः) अग्नि (शोचन्) पवित्र करता हुआ (इतः) इस स्थान से (अपबाधताम्) दूर करे (पान) प्राप्त होने योग्य (रपसा) अपराध से (माम्) मुझको रोग प्राप्त होता है वह मुझ को (मा) मत (विदत्) प्राप्त हो ॥२॥ भावार्थ:-जो मनुष्य ब्रह्मचर्य को छोड़ के बालकपन में विवाह वा कुपथ्य करते हैं उनके शरीर में शोथ आदि रोग होते हैं उनका निवारण वैद्यक-रीति से करना चाहिये ॥२॥ मनुष्यों को रोगनिवृत्त करके ही पदार्थ सेवन करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यच्छल्मलौ भवति यन्नदीषु यदोषधीभ्यः परि जायते विषम् । विश्वे देवा निरितस्तत्सुंदन्तु मा मां पडुन रपसा विदरसा ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यव) जो (विषम्) प्राण हरने वाला पदार्थ विष (शल्मलो) सेमर आदि वृक्ष में और (यत) जो (नदीषु) नदियों के प्रवाहों में (भवति) होता है (यत्) जो विष (ओषधीभ्यः) यव आदि ओषधियों से (परिजायते) उत्पन्न होता है (तत्) उसको (इतः) इस शरीर से (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् जन (निस्सुबन्त) निरन्तर दूर करें जिस कारण (पोन) प्राप्त होने योग्य (रपसा) पापाचरण से उत्पन्न हुआ (त्सरः) कुटिल रोग (माम्) मुझको (मा, विदत) मत प्राप्त हो ॥३॥ भावार्थ:-हे वैद्य प्रादि मनुष्यो ! सब पदार्थों से वा पदार्थों में जितना विष उत्पन्न होता है उतना सब निवार के अन्न पानी आदि सेवन करना चाहिये जिससे तुम को कोई भी रोग न प्राप्त हो ॥३॥ फिर मनुष्यों को किसका निवारण कर क्या सेवन करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । याः भवतो निवर्त उद्वत उदन्वीरनुदकाश्च याः । ता अस्मभ्यं पय॑सा पिन्यमानाः शिवा देवीरशिपदा मवन्तु सर्वा नद्यो अशिमिदा भवन्तु ॥४॥ पदार्थ:---(या:) जो (प्रयतः) जाने योग्य' (निवतः) नीचे (उद्वतः) वा ऊपरले देशों को जाती हैं (याश्च) और जो (उदन्तीः) जल से भरी वा (अनुस्काः) KEECER AND ................................ ९०४ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५१ ।। जल रहित हैं (ता:) वे (सर्वाः) सब (नधः) नदियां (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (पयसा) जल से (पिन्वमानाः) सींचती हुई वा तृप्त करती हुई (अशिपदाः) भोजनादि व्यव- हारों के लिये प्राप्त होती हुई (देवी:) आनन्द देने और (शिवाः) सुख करने वाली (भवन्तु) हों और (अशिमिदाः) भोजन आदि स्नेह करने वाली (भवन्तु) हों ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जितना जल नदी आदि में जाता है और जितना मेघमण्डल में प्राप्त होता है उतना सब होम से शुद्ध कर सेवो जिससे सर्वदा मंगल बढ़ कर दुःख का अच्छे प्रकार नाश हो ॥४॥ इस सूक्त में जल और ओषधी विष के निवारण से शुद्ध सेवन कहा, इससे इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये।। यह सप्तम मण्डल में पचासवां सूक्त समाप्त हुना ॥ . । MY M Russa BR0 अथ व्यूचस्यैकपंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । आदित्या देवताः।१।२ त्रिष्टुप् । ३ निवृत्त्रिष्टुप् छन्दः । धैवत: स्वरः॥ अब तीन ऋचा वाले इक्यावनवें सुक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में किनके संग से क्या होता है इस विषय को कहते हैं । आदित्यानामवंसा नूतनेन सक्षीमहि शर्मणा शंतमेन । अनागास्त्वे अदितित्वे तुरास इमं यज्ञं दधतु श्रोषमाणाः ॥१॥ पदार्थ:-जो (तुरास:) शीघ्रकारी (श्रोषमाणाः) सुनते हुए (अनागास्त्ये) अनपराधनपन में (प्रवितित्वे) अखण्डित काम में (इमम् इस (यजम्) यज्ञ को (वधतु) धारण करें उन (मादित्यानाम्) पूर्ण विद्यायुक्त विद्वानों की (अवसा) रक्षा आदि से (शंतमेन) अतीव सुख करने वाले (नूतनेन) नवीन (शर्मणा) विग्रह के साथ हम लोग (सक्षीमहि) बंधे ॥१॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जैसे हम लोग विद्वानों के संग से अत्यन्त सुख पावे वैसे ही तुम भी इसको पारो ॥१॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। आदित्यासो अदितिर्मादयन्तां मित्रो अर्यमा वरुणो रजिष्ठाः । अस्माक सन्तु भुवनस्य गोपाः पिबन्तु सोममवसे नो अद्य ॥२॥ पदार्थ:-है मनुष्यो जैसे (रजिष्ठाः) अतीव प्रीति करते हुए (अदितिः) अखण्डित नीति (मित्रः) मित्र (अर्यमा) व्यवस्था देने वाला (वरुणः) श्रेष्ठ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५२ ।। ६०.५ 4304 dawa (अस्माकम्) हमारे (भुवनस्य) जल' आदि लोकसमूह की (गोपाः) रक्षा करने वाले हैं (न:) और हमारी (अवसे) रक्षा आदि के लिये (मादयन्ताम्) आनन्द देते हैं अध) आज (सोमम्) बड़ी बड़ी ओषधियों के रस को (पिबन्तु) पोवें वैसे वे (प्राविण्यास:) पूर्ण विद्वान् वा संवत्सर के महीने हमारे जलादि वा लोकसमूह की रक्षा करने वाले (सन्त) हों ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे विद्वानो ! तुम प्रादित्य के समान विद्या-प्रकाश से वैद्य के समान ओषधियों के सेवने से नीरोग होकर हमारा भी आरोग्य करो॥२॥ फिर किसकी रक्षा से सब सुख होता है इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । आदित्या विश्व मरुतश्च विश्वे देवाश्च विश्व ऋभवंश्च विश्व । इग्दो अग्निरश्विना तुष्टुवाना यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥३॥ पदार्थ:-हे (विश्वे) सब (मादित्याः) संवत्सर के महीनों के समान विद्यावृद्ध (विश्वे, मरुतः, च) और समस्त मनुष्य (विश्वे, देवाः, च) और समस्त विद्वान् (विश्वे, ऋभवः, च) और बुद्धिमान् जन (इन्द्रः) बिजुली (मग्निः) साधारण अग्नि (अश्विना) सूर्य चन्द्रमा (तुष्टुवानाः) प्रशंसा करते हुए विद्वान् जन तथा (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखों से (न:) हम लोगों की (सदा) सर्वदा (पात) रक्षा करो ॥३॥ भावार्थ:-जिस देश में सब विद्वान् जन बुद्धिमान् चतुर धार्मिक और रक्षा करने और विद्या देने वाले उपदेशक हैं वहां सब से रक्षायुक्त होकर सब सुखी होते हैं ॥३॥ इस सूक्त में सूर्य के समान विद्वानों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में इक्यावनवां सूक्त समाप्त हुना॥ , अथ व्यवस्य द्विपंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः। पावित्या देवताः।। स्वराट् पङ्क्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ।२ निवृत्रिष्टुपुछन्दः । धवतः स्वरः ।। अब बावनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर मनुष्य कैसे हों इस विषय को कहते हैं।

::....:.:....... 8०६ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५२ ॥ Mo आदित्यासो अदितयः स्याम पूर्देवत्रा वसवो मर्त्यत्रा । सनेम मित्रावरुणा सनन्तो भवेम द्यावापृथिवी भवन्तः ॥१॥ पदार्थ:--हे मनुष्यो जैसे हम लोग (देवत्रा) देवों में वर्तमान (प्रादित्यासः) महीने के समान (अवितयः) अखण्डित (स्याम) हों जैसे (मत्यंत्रा) मनुष्यों में उपदेशक (बसवः) निवास करते हुए (सनेम) विभाग करें पूः) नगरी के समान (मित्रावरुणा) प्रारण और उदान दोनों (सनन्तः) सेवन करते हुए (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि के समान (भवन्तः) आप (भवेम) हों वैसे आप भी हों ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है - हे मनुष्यो! तुम प्राप्त विद्वान् के समान वर्त कर धार्मिक विद्वानों में निरन्तर वस कर सत्य और असत्य का विभाग कर सूर्य और भूमि के समान परोपकार कर विश्व के सुख के लिए प्राण और उदान के सदृश सब की उन्नति के लिये होमो ॥१॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मित्रस्तन्नो वरुणो मामहन्त शमै तोकाय तनयाय गोपाः मा वो भुजेमान्यजातमेनो मा तत्कर्म वसवो यच्चयध्वे ॥२॥ पदार्थ:-है (वसवः) निवास करने वालो (यत्) जो (अन्यजातम्) और से- उत्पन्न (एन:) पाप कर्म है (तत्) वह (कर्म) कर्म तुम (मा, चयध्वे) मत इकट्ठा करो जैसे (गोपाः) रक्षा करने वाले (शर्म) सुख वा घरको (भामहन्त) सत्कार से वत्त वैसे (न:) हमारे (तोकाय) शीघ्र उत्पन्न हुए बालक के लिये और (तनयाय) सुनदर कुमार के लिये उसको (मित्र:) प्राण के समान भित्र (वरुण:) जल के समान पालने वाला देखें जिससे हम लोग (वः) तुम लोगों को और पाप को (मा, भुजेम) मत भोगें ॥२॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-हे मनुष्यो ! आप सदैव ब्रह्मचर्य और विद्यादान से अपने लड़कों की रक्षा और सत्कार कर बढ़ाव और आप पाप न करके और से किये हुए को भी न सेवें ॥२॥ फिर मनुष्य किसके तुल्य होकर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। तुरण्यवोऽङ्गिरसो नक्षन्त रत्न देवस्य सवितुरियानाः । पिता च तन्नों महान्यजत्रो विश्वे देवाः समनसो जुषन्त ॥३॥ प ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५३ ॥ ०७. पदार्थ:-हे मनुष्यो (तुरण्यवः) शीघ्र करने वाले (अङ्गिरसः) प्राणों के समान (समनसः) समान अन्तःकरण युक्त (इयाना:) पढ़ते हुए (सवितः) सकल जगत् उत्पन्न करने वाले (देवस्य) प्रकाशमान परमेश्वर की सृष्टि में जिस (रत्नम्) रमणीय धन को (नक्षन्त) व्याप्त हों (तत्) वह (पिता) उत्पन्न करने वाले के समान वर्तमान (महान्) सब से सत्कार (यजत्रः) संग और ध्यान करने योग्य ईश्वर (विश्वे, देवाः, च) और सब विद्वान् जन (न:) हम लोगों के लिये (जुषन्त) सेवें ॥३॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन इस ईश्वरकृत सृष्टि में विद्या पुरुषार्थ और विद्वानों की सेवा आदि से सब सुखों को पाते हैं वैसे आप प्राप्त हों सब मिल कर पिता के समान पालना करने वाले परमात्मा की निरन्तर उपासना करें ॥३॥ इस सूक्त में विश्वेदेवों के गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह सप्तम मण्डल में बावनवां सूक्त समाप्त हुमा ।। SHABA अथ चस्य त्रिपंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । द्यावापृथिव्यौ देवते १ त्रिष्टुप् । २ । ३ निचस्त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ॥ अब तीन ऋचा वाले वेपनवें सुक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में अब विद्वान जन क्या करें इस विषय को कहते हैं । प्रधावां थः पृथिवी नमोभिः सबाय ईळे बृहती यजत्रे । ते चिद्धि पूर्व कवयो गृणन्त पुरो मही दधिरे देवपुत्रे ॥१॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जैसे (सबाथः) पीड़ा के सहित वर्तमान मैं (नमोभिः) अन्नादिकों से और (यः) संगति करने वालों से जो (मही) बड़े (बृहती) बड़े- (यात्रे) संग करने योग्य (पुरः) नगरों को धारण करने वाली (देवयुग्ने) देव पुत्र अर्थात् विद्वान् जन जिनकी पुत्र के समान पालना करने वाले हैं उन (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि की (पूर्वे) अगले (कवयः) विद्वान् जन (गृणन्तः) स्तुति करते हुए (वधिरे) धारण करते हैं (ते, चित्) (हि) उन्हीं की (प्रेळे) अच्छे प्रकार गुणों से प्रशंसा करता हूँ ॥१॥ भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जैसे 1

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९०८
ऋग्वेदः मं०७। सू० ५३ ।।
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सबको धारण करने वाले भूमि और सूर्य को विद्वान् जन जान कर उपकार
करते हैं वैसे तुम भी करो॥१॥
फिर वे भूमि और बिजुली कैसी हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
प्र पूर्वजे पितरा नव्य॑सीभिर्गीभिः कृणुध्वं सदने ऋतस्य ।
आ नो द्यावापृथिवी दैव्येन जनेन यातं महि वां वरूथम् ॥२॥
पदार्थ:-है शिल्पि विद्वानो तुम (नव्यसीभिः) अतीव नवीन (गोभिः)
सुशिक्षित वारिणयों से (ऋतस्य) सत्य वा जल के सम्बन्ध में (सबने) स्थानरूप जिन
में स्थिर होते हैं वे (पूर्वजे) आगे से उत्पन्न हुए (पितरा) माता पिता के समान
वर्तमान (धावापृथिवी) भूमि और बिजुली (दैव्येन) विद्वानों से बनाये हुए विद्वान्
(जनेन) प्रसिद्ध जन से (वाम्) तुम दोनों के (महि) बड़े (वरूथम्) श्रेष्ठ घर को
(मा, यातम्) प्राप्त हों वैसे इनको (नः) हमको (कृणुध्वम्) सिद्ध करो ॥२॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-हे स्त्री पुरुषो!
तुम पदार्थविद्या से पृथिवी आदि का विज्ञान करके सुन्दर घर बना वहाँ
मनुष्यों के सुखों की उन्नति करो ॥२॥
फिर मनुष्यों को भूमि आदि के गुण जानने योग्य हैं इस विषय को
अगले मन्त्र में कहते हैं।
उतो हि वाँ रत्नधेोनि सन्ति पुरुणिं द्यावापृथिवी सुदासे ।
अस्मे धत्तं यदसदस्कृधोयु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥३॥
पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशको! जो (सुवासे) सुन्दर दानशीलों वाले
(बावापृथिवी) भूमि और बिजुली वर्तमान हैं अथवा जिनमें (वाम) तुम दोनों के
(हि) ही (पुरुणि) बहुत (रत्नधेयानि) रत्न जिनमें धरे जाते (सन्ति) हैं वे धन
धरने के पदार्थ हैं (ते) वे भूमि और बिजुली (अस्मे) हम लोगों में (अत्तम् ) धारण
करें (यत्) जो (उतो) कुछ (अस्कृषोयु) कृश (असत्) हो अर्थात् मोटा न हो उसके
साथ (यूयम्) तुम लोग (स्वस्तिभिः) सुखों से (नः) हम लोगों की (सपा) सदा
(पात) रक्षा करो ॥३॥
भावार्थ:-जो मनुष्य बिजुली और भूमि के गुणों को जान कर वहां
स्थित जो रत्न उनको पाकर सब के लिए सुख का विधान करते हैं वे सब
ओर से सदा सुरक्षित होते हैं ॥३॥

AN Manepal FAIRS - (भव) हूजिये (यत) जहां हम लोग (का ऋग्वेदः मं०७ । सू०'५४ ॥ इस सूक्त में द्यावापृथिवी के गुणों और कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में अपनवा सूक्त समाप्त हुन्मा ।। अथ व्यवस्य चतुष्पंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । वास्तोष्पतिर्देवता । १। ३ निवृत्रिष्टुप् । २ विराट् त्रिष्टुप् छन्दः । धैवत: स्वरः ।। अब तीन ऋचा वाले चौवनवे सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में मनुष्य घर बना कर उस में क्यों करते हैं इस विषय को कहते हैं । वास्तोष्यते प्रति जानीह्यस्मान्स्यवेिशो अनमीवो भवा नः । यत्त्वेमंहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥१॥ पदार्थ:-हे (वास्तोः) निवास कराने वाले घर के (पते) स्वामी गृहस्थ जन आप (अस्मान्) हम लोगों के (प्रति, जानीहि) प्रतिज्ञा से जानो पाप (नः) हमारे घर में (स्वावेशः) सुख में है सब मोर से प्रवेश जिसको ऐसे और (अनमीवः) नीरोग (नः) हमारे (प्रति, जुषस्व) प्रति सेवो पाप (न:) हम लोगों के (द्विपदे) मनुष्य आदि जीव (शम्) सुख करने वाले और (चतुष्पदे) गौ श्रादि पशु के लिए (शम्) सुख करने बाले (भव) हूजिये ॥१॥ भावार्थ:-जो मनुष्य सब ओर द्वार और बहुत अवकाश वाले घर को बना कर उस में वसते और रोगरहित होकर अपने तथा औरों के लिये सुख देते हैं वे सबको मङ्गल देने वाले होते हैं ॥१॥ फिर गृहस्थ क्या करके किनको किसके समान रक्खे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वाष्तोस्पते प्रतरणो न एवि गवस्फानो गोभिरश्वेभिरिन्दो। अजरांसस्ते सख्ये स्याम पितेव पुत्रान्पति नो जुषस्व ॥२॥ पवार्थ:-हे (इन्वो) आनन्द के देने वाले (वास्तोष्पते) घर के रक्षक आप (गोभिः) गौ आदि से (अश्वेभिः) घोड़े आदि से से (गयस्फान:) घर की वृद्धि करने (प्रतरणः) उत्तमता से दुःख से तारने और (नः) हमारे सुख करने वाले (एघि) हूजिये जिन (ते) आपके (सख्ये) मित्रपन में हम लोग (अजरास:) शरीर जीर्ण PRON . thalive How घर का स्वामी क्या करे इस विषय को कहते है । ऋग्वेदः म०७ । सू० १५ ॥ करने वाली वृद्धावस्था से रहित (स्याम) हो सो आप (नः) हम लोगों को (पुत्रान्) पुत्रों को जैसे (पितेव) पिता वैसे (प्रति, जुषस्व) प्रतीति से सेवो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-मनुष्य उत्तम घर बना कर गो आदि पशुओं से शोभित कर शुद्ध कर प्रजा के बढ़ाने वाले होकर अक्षय मित्रपन सब में अच्छे प्रकार प्रसिद्ध कराय जैसे पिता पुत्रों की रक्षा करता है वैसे ही सब की रक्षा करें ॥२॥ फिर वे घर में रहने वाले क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वास्तोष्पते शग्मयां संसदा ते सक्षीमहि रण्वयां गातुमत्यां । पाहि क्षेम उत योगे वर नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥३॥ पदार्थ:-हे. (वास्तोपते) घर की रक्षा करने वाले जिन (ते) आप के (शग्मया) सुख रूप (संसदा) जिस में अच्छे प्रकार स्थिर हों उस (रण्बया) रमणीय (गातुमत्या) प्रशंसित वाणी वा भूमि से युक्त सभा के साथ (सक्षीमहि) सम्बन्ध करें वह पाप (योगे) न ग्रहण किये हुए पदार्थ के ग्रहण लक्षण विषय में (उत) और (क्षेमे) रक्षा में (नः) हम लोगों को (वरम्) उत्तमता जैसे हो वैसे (पाहि) रक्षा करो (यूयम्) तुम (स्वस्तिभिः) सुखादिकों से (न:) हम लोगों की (सदा) सदैव (पात) रक्षा करो ॥३॥ भावार्थ:-जो गृहस्थ सज्जनों का सत्कार कर उनकी रक्षा करते हैं वे उन के योग क्षेम की उन्नति कर निरन्तर उनकी पालना करते हैं ॥३॥ इस सूक्त में वास्तोष्पति के गुण और कृत्यों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिए । यह सप्तम मण्डल में चौवनवां सूक्त समाप्त हुभा ॥ अथाष्टर्चस्य पंचपंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । [१] बास्तोष्पतिर्देवता २-८ इन्द्रः । १ निद्गायत्रीछन्दः । षड्जः स्वरः । २ । ३ । ४ बृहतीछन्दः । मध्यमः स्वरः । ५ । ७ अनुष्टुप् । ६ । ८ निचदनुष्टुप्छन्दः पवतः स्वरः ॥ अब आठ ऋचा वाले पचपनवें सूक्त का प्रारम्भ है, इसके प्रथम मन्त्र में -- अमीवहा वास्तोष्पते विश्वा रूपाण्याविशन् । सखा सुशेवं एधि नः॥१॥ MORE OPARAN UIREM HD योग्य आप (इन्द्रस्य) परम ऐश्वर्य के (रतेनम् ) चोर (वा) वा (तस्करम/ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५५ ॥ ६.११ पदार्थः- है (वास्तोष्पते) घर के स्वामी जिस घर में (विश्या) सब (रूपाणि) रूप (प्राविशन्) प्रवेश करते हैं वहां (नः) हम लोगों के लिये (अमीवहा) रोग हरने वाले (सखा) मित्र (सुशेवः) सुन्दर सुख वाले होते हुए (एघि) प्रसिद्ध हूजिये ॥१॥ भावार्थ:-हे गृहस्थो! तुम सर्व प्रकार उत्तम घरों को बना कर सुखी होमो ॥१॥ फिर गृहस्थ कहां वास करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। यदर्जुन सारमेय दतः पिशङ्ग यच्छसे । वीव भ्राजन्त ऋष्टय उप सकेंषु बसतो नि षु स्वप ॥२॥ पदार्थ:-हे (अर्जुन) अच्छे रूपयुक्त (सारमेय) सारवस्तुओं की उत्पत्ति करने वाले (पिशङ्ग) पीले पीले (यत) जो श्राप (वीव) पक्षी के समान (वतः) दांतों को (यच्छसे) नियम से रखते हो वह जो (सक्वेष) प्राप्त उत्तम घरों में (बप्सतः) भक्षण करते हुए (ऋष्टयः) पहुंचाने वाले (उप, भ्राजन्ते) समीप प्रकाशित होते हैं उन में आप (नि, षु, ज्वप) निरन्तर अच्छे प्रकार सोप्रो ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो ! जहां आरोग्य. पन से तुम्हारे दन्त आदि अवयव अच्छे प्रकार शोभते हैं वहां ही निवास और शयन आदि व्यवहार को करो॥२॥ फिर गृहस्थों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स्तेनं राय सारमेय तस्करं वा पुनःसर । स्तोतृनिन्द्रस्य रायसि किमस्मान्दुच्छुनायसे नि षु स्व॑प ।।३॥ पदार्थ:-हे (राय) धनियों में सज्जन (सारमेय) सार वस्तुओं से मान करने डाकू आदि चोर को (पुनः, सर) फिर फिर दण्ड देने के लिए प्राप्त होमो जो आप (स्तोतन्) स्तुति करने वालों को (रायसि) कहलाते हो (अस्मान्) हम लोगों को (किम्। क्या (बुच्छुनायसे) दुष्टों में जैसे वैसे आचरण से प्राप्त होंगे सो आप उत्तम स्थान में (नि, स, ज्वप) निरन्तर अच्छे प्रकार सोमो ।।३।। भावार्थ:-गृहस्थों को चाहिये कि चोरों की रुकावट और श्रेष्ठों का सत्कार कर के कभी कुत्ते के समान न आचरण करें और सदैव शुद्ध वायु जल और अवकाश में सोवें ॥३॥ aaman ९१२ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५५ ।। MAN फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । वं सुकरस्य दहि तवं दर्दतु सूकरः । स्तोतृनिन्द्रस्य रायसि किमस्मान्दुच्छुनायसे नि षु स्वप ॥४॥ पवार्थ:--हे गृहस्थ जिस (सूकरस्य) सुन्दरता से कार्य करने वाले (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवान् (तब) तुम्हारे (सूकरः) कार्य को अच्छे प्रकार करने वाला (दर्द) निरन्तर बढ़े (त्वम्) आप (रायसि) लक्ष्मी के समान आचरण करते हो और जो सब को (वह हि) निरन्तर उन्नति दें अर्थात् सब की वृद्धि करें (स्तोतृन्) स्तुति करने वाले विद्वान् (अस्मान्) हम लोगों को (किम) क्या (कुच्छुनायसे) दुष्ट कुत्तों में जैसे वैसे आचरण से प्राप्त होते हो उस घर में सुख से (नि, स, स्वप) निरन्तर सोश्रो ॥४॥ भावार्थ:-हे गृहस्थ ! आप ऐश्वर्य का संचय कर धर्म व्यवहार में अच्छे प्रकार विस्तार कर और विद्वानों का सत्कार कर श्रीमानों के समान आचरण करो, हम लोगों के प्रति किसलिये कुत्ते के समान पाचरण करते हैं, नीरोग होते हुए प्रति समय सुख से सोओ ॥४॥ फिर गृहस्थ घर में क्या क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं सस्तु माता सस्तु पिता सस्तु वा सस्तु विश्पतिः । ससन्तु सर्वं ज्ञातयः सस्त्वयमभितो जनः ॥५॥ पदार्थ:-जो मनुष्य जैसे मेरे घर में मेरी (माता) माता (अभितः) सब ओर से (सस्तु) सोवे (पिता) पिता (सस्तु) सोवे (वा) कुत्ता (सस्तु) सोवे (विश्पतिः) प्रजापति (सस्तु) सोवे (सर्वे) सब (जातयः) सम्बन्धी सब ओर से (ससन्तु) सोवें (अयम्) यह (जनः) उत्तम विद्वान् सोवे वैसे तुम्हारे घर में भी सोवें ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-मनुष्यों को ऐसे घर रचने चाहियें जिनमें सब के सर्व व्यवहारों के करने को अलग अलग शाला और घर होवें ॥५॥ फिर मनुष्यों को कैसे घर बनाने चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । य आस्ते यश्च चरति यश्च पश्यति नो जनः । तेषां सं हन्मो अचाणि ययेदं हय तथा ॥६॥ पदार्थः-हे मनुष्यो (यथा) जैसे (इदम्) यह (हय॑म्) मनोहर घर है (तथा) toes ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५५ ॥ Rahasa वैसे (यः) जो (जनः) मनुष्य (नः) हमारे घर में (प्रास्ते) बैठता है (यः, च) और जो (चरति) जाता है (यः, च) और जो हम लोगों को (पश्यति) देखता है तेषाम्) उन सबों को (अक्षाणि) इन्द्रियों को हम लोग (सं, हम्मः) संहित न देखने वाले करें वैसे तुम भी प्राचरण करो ॥६॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-मनुष्यों को ऐसे घर बनाने चाहिये जिन में सब ऋतुओं में निर्वाह हो सब सुख बढ़े और बाहर वाले जन गृहस्थों को सहसा न देखें और न घर वाले बाहर वालों को देख ॥६॥ फिर कैसे घर में सोना आदि करना चाहिये इस विषय को अगले मात्र में कहते हैं । सहस्रशृङ्गो वृषभो या समुद्रादुदाचरत् । तेनां सहस्यैना वयं नि जनान्तस्वापयामसि ॥७॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (यः) जो (सहस्रशृङ्गः) हजारों किरण वाला (वृषभः) वृष्टि कारण सूर्य (समुद्रात) अन्तरिक्ष से जैसे (उदाचरत्) ऊपर जाता है वैसे (तेन) उसके साथ (सहस्येन) बल में उत्तम घर से (वयम्) हम लोग (जनान्) मनुष्यों को (निध्यापयामसि) निरन्तर सुलावें ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो! जहां सूर्य की किरणों का स्पर्श सब मोर से और जो बल का अधिक बढ़ाने वाला घर हो उस के शुद्ध होने में सब को सुलावें और हम लोग भी सोवें ॥७॥ फिर स्त्री जनों के घर उत्तम बनावें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्रोष्ठेशया वह्येशया नारीर्यास्तल्पशीवरीः । स्त्रियो याः पुण्यगन्धास्ताः सर्वाः स्वापयामसि ॥८॥ पवार्थ:- हे गृहस्थ मनुष्यो जैसे हम लोग (या:) जो (प्रोष्ठेशया:) प्रतीव सब प्रकार उत्तम सुखों की प्राप्ति कराने वाले घर में सोती हैं (बह्य शया:) वा जो प्राप्ति कराने वाले घर में सोती वा जो (तल्पशीवरीः) पलंग पर सोने वाली उत्तम (नारी:) स्त्री (त्रियः) विवाहित तथा (पुण्यगन्धाः) जिन का शुद्धगन्ध हो (ता:) उन (सर्वाः) सबों को हम लोग उत्तम घर में (स्वापयामसि) सुलावें वैसे तुम भी उत्तम घर में सुलामो ॥८॥ भावार्थ:-हे गृहस्थो ! जिस घर में स्त्री वसें वह घर अतीव उत्तम रखना चाहिये जिससे निज सन्तान उत्तम हों ॥८॥ Hatane GAR AMA BANDA ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ॥ इस सूक्त में गृहस्थों के काम का और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सुक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में पचपना सूक्त समाप्त हुमा । Ces मक AR - अथ पञ्चविंशत्युवस्य षट्पंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । मरुतो देवताः।१ मार्ची गायत्री ।२।६।७ । ६ भुरिगा गायत्री छन्दः। षड्जः स्वरः। ३।४।५ प्राजापत्या बृहतीछन्दः । मध्यमः स्वरः।८।१० प्राच्यष्णिक् । ११ निदाच्र्युष्णिक छन्दः । ऋषभः स्वरः । १२ । १३ । १५ । १८ । १६ । २१ निवृस्त्रिष्टुप् । १७ । २० । त्रिष्टुप् । २२ । २३ । २५ विरात्रिष्टुप्छन्दः । षवतः स्वरः । २४ पङ्क्तिः। १४ । १६ स्वरापतितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः ॥ अब पच्चीस ऋचा वाले छप्पनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब कौन मनुष्य श्रेष्ठ होते हैं इस विषय को कहते हैं। कई व्यक्ता नरः सनीळा रुद्रस्य मर्या अधा स्वाः ॥शा पदार्थ:-हे विद्वान् (ब) अनन्तर इस के (के) कौन (ईम्) सब ओर से (रुद्रस्य) रोगों के निकालने वाले के (स्वश्वाः) सुन्दर घोड़े वा महान् जन जिस में विद्यमान हैं (व्यक्ताः) विशेषता से प्रसिद्ध (सनीळा:) समान घर वाले (मर्याः, नरः) मरणधर्मा नायक मनुष्य हैं इस को कहो ॥१॥ भावार्थ:-इस संसार में कौन उत्तम प्रसिद्ध प्रशंसा करने योग्य मनुष्य हैं इस का अगले मन्त्र में समाधान जानना चाहिये ॥१॥ फिर विद्वान् जन ही प्रकट कीर्ति वाले होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । नकिर्वेषां जनषि वेद ते अङ्ग विद्रे मिथो जनित्रम् ।।२।। पदार्थ:-हे (अङ्ग) मित्र जिज्ञासु जो (हि) जिस कारण (एषाम्) इन के (जनूंषि) जन्मों को (नकिः) नहीं (वेव) जानते हैं (ते) वे उसी कारण (मिथः) परस्पर (जनित्रम्) जन्म सिद्ध कराने वाले कर्म को (विक्रे) पाते हैं ।।२।। भावार्थ:-जिन विद्वानों के जन्मों को विद्याप्राप्ति कराने वाले न जानते हैं वे प्रसिद्ध नहीं होते हैं और जो विद्याजन्म पाते हैं वे ही कृतकृत्य और प्रसिद्ध होते हैं यह उत्तर है ॥२॥ M ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ॥ da Home व्य फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं । अभि स्वपूमिर्मियो वपन्त वातस्वनसः श्येना अस्पृध्रन् ॥३॥ पदार्थ:-जो गृहस्थ पुरुष (वातस्वनसः) पवन के शब्द के समान जिनका शब्द है वे (श्येनाः) बाज के समान पराक्रमी (स्वपूभिः) सोते हुए अर्थात् अप्रसिद्ध अपने पवित्र पाचरणों के साथ (मिथः) परस्पर (वपन्त) बोते (अभ्यस्पृध्रन्) और सम्मुखस्पर्धा करते हैं वे श्रेष्ठ ऐश्वर्य वाले होते हैं ॥३॥ भावार्थ:- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो गृहस्थ परस्पर सत्याचरणानुष्ठान से गम्भीर प्राशय वाले पराक्रमी होकर सब की उन्नति करना चाहते हैं वे पूजित होते हैं ॥३॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एतानि धीरॊ निण्या चिंकेत पृश्निर्यदूधों मही जमार ॥४॥ पदार्थ:-जो (धीर:) बुद्धिमान् विद्वान् (यत्) जैसे (अधः) दुग्धधारायुक्त और (पृश्नि:) अन्तरिक्ष के (मही) तथा पृथिवी (जमार) धारण करती है वैसे क्षोभ रहित निष्कम्प गम्भीर (एतानि) इन (निण्या) निश्चित पदार्थों को जो (चिकेत) जाने वह घर के भार को धर सके ॥४॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जैसे पृथिवी और सूर्य सब गृहों को धारण करते हैं वैसे जो विद्वान् जन निर्णीत सिद्धान्तों को जानते हैं वे सर्वत्र सत्कार करने योग्य होते हैं ॥४॥ कौन प्रजा उत्तम है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सा विट् सुवीरां मरुद्भिरस्तु सनात्सहन्ती पुष्यन्ती नृम्णम् ॥५॥ पदार्थ - जो (सुधीरा) सुन्दर वीरों वाली (विट्) प्रजा (मरुद्भिः) मनुष्यों के साथ (सनात) सनातन व्यवहार में (नम्णम्) धन को (पुष्यन्ती) पुष्ट करावती और पीड़ा को (सहन्ती) सहने वाली वर्तमान है (सा) वह हमारे लिए (प्रस्तु) होवे ॥५॥ भावार्थ:-वही स्त्री श्रेष्ठ है जो ब्रह्मचर्य से समग्न विद्याओं को पढ़ के शूरवीर पुत्रों को उत्पन्न करती है और वही सहनशील तथा कोश वाली होती है ॥५॥ फिर वे स्त्री कैसी हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यामं येष्ठाः शुभा शोभिष्ठाः श्रिया संमिश्ला ओजोभिरुग्राः ॥६।। aan RREN NOM Ibyen D ऋग्वेदः मं० ७ । सू०१६ ।। पदार्थ:-हे गृहस्थो जो (शुभा) शोभन (शोभिष्ठाः) अतीव शोभायुक्त (श्रिया) धन से (संमिश्ळाः) अच्छे प्रकार मित्रता के साथ मिली हुईं (येष्ठाः) अतीव प्राप्त होने और (मोजोभिः) पराक्रम आदि से (उग्राः) कठिन गुण कर्म स्वभाव वाली होती हुईं (यामम्) प्राप्त होने वाले व्यवहार को पहुंचती हैं वे गृहस्थों को मान करने योग्य हैं ॥६॥ भावार्थ:-हे गृहस्थो ! जो शालाघर धन और अन्नादि पदार्थों से युक्त शोभायमान प्राप्त होने योग्य सुख को देते हैं उनको पतिव्रता स्त्रियों के समान सुन्दर शोभायुक्त निरन्तर करो॥६॥ फिर स्त्री कैसे वत्त इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उग्रं व ओजा स्थिरा शवास्पर्धा मरुद्भिर्गणस्तुविष्मान् ॥७॥ पदार्थ:-हे स्त्रियो (वः) तुम्हारा (मरुद्भिः) उत्तम मनुष्यों के साथ (उग्रम्) तेजस्वी (मोज:) पराक्रम और (स्थिरा) स्थिर दृढ़ (शवांसि) बल (अध) इस के अनन्तर (गणः) समूह (तविष्मान्) बलवान् हो ॥७॥ भावार्थ:-जो स्त्रियां अपने पतियों के बल कोन क्षीण कराती उनका पुत्र पौत्रादि समूह बलवान होता है ॥७॥ फिर गृहस्थ कौन काम करे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शुभ्रो वः शुष्मा ऋध्मी मनासि धुनिर्मुनिरिव शस्य धृष्णोः ॥८॥ पदार्थ:-हे गृहस्थो (व:) तुम्हारा धार्मिक जनों में (शुभ्रः) प्रशंसनीय (शुष्मः) बलयुक्त देह हो, दुष्टों में (ऋध्मी) क्रोघशील (मनांसि) मन हों (मुनिरिव) मननशील विद्वान् के समान (शर्द्धस्य) बलयुक्त बली (धृष्णो:) दृढ़ के (धुनिः) चेष्टा करने के समान वारणी हो ॥८॥ भावार्थः- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-जो गृहस्थ जन श्रेष्ठों के साथ मिलाप और दुष्टों के साथ अलग होना रखते हैं वे बहुत बल पाते हैं ॥८॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। सम्बस्मयुयोत दिधु मा वो दुर्मतिरिह प्रणब्नः ॥९॥ पदार्थ:-हे विद्वानो (अस्मत) हम से (सनेमि) पुराने (विद्यम्) प्रज्वलित शस्त्र और अस्त्र समूह को (युयोत) अलग करो जिससे (इह) इस गृहाश्रम व्यवहार में (व:) तुम लोगों को और (न:) हम लोगों को (दुर्मतिः) दुष्टबुद्धि (मा) मत (प्ररणक्) नष्ट करावे ॥६॥ fhina AR (मरुतः) मरगधा मनुष्यो (शुबीनाम्) पवित्र आचरण करने वाले (व:) तुम ऋग्वेदः म०७ । सू० ५६ ॥ ९१७ भावार्थ:-हे विद्वानो! तुम सदा दुष्टाचारी मनुष्यों से अलग रह कर और शत्रु-बल को निवार के बढ़ते हुए होमो॥६॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। प्रिया वो नाम हुवे तुराणामा यत्तपन्मरुतो वावशानाः ॥१०॥ पदार्थ:--- हे (वाक्षशानाः) कामना करते हुए (मरुतः) प्राण के समान प्यारे विद्वानो (तुराणाम्) शीघ्र करने वालों (व:) आप लोगों के (प्रिया) मनोहर (नाम) नामों को मैं (हुवे) प्रशंसता हूं अर्थात् मैं उनकी प्रशंसा करता हूं (यत) जो (श्रा, तृपत्) अच्छे प्रकार तृप्त होता है उस का और मेरा सत्कार करो ॥१०॥ भावार्थः-जो सब के प्रियाचरण करने और सुख की कामना करने वाले मनुष्य वर्तमान हैं वे ही प्रिय सुखों को पाते हैं ॥१०॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । स्वायुधास इपिणः मुनिष्का उत स्वयं तन्व: शुम्भमानाः ॥११॥ पवार्थ:-है मनुष्यो जो (स्वायुधासः) अच्छे हथियारों वाले (इटिमणः) इच्छा और अन्नादि पदार्थों से युक्त (सुनिष्का:) जिन के सुन्दर सुवर्ण के गहने विद्यमान (उत) और (स्वयम्) आप (तन्वः) शरीरों की (शुम्भमाना:) शोभा करते हुए वर्तमान हैं वे ही विजय और प्रशंसा को पाते हैं ॥११॥ भावार्थ:-जो धनुर्वेद को पढ़ के आरोग्ययुक्त शरीर और युद्धन विद्या में कुशल हैं वे ही धनधान्य युक्त होते हैं ॥११॥ कौन इस संसार में पवित्र होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । शुची वो हव्या मरुतः शुचीनां शुचिं हिनोम्यध्वरं शुचिभ्या। ऋतेनं सत्यमृतसाप पायछुचिजन्मानः शुचयः पावकाः ॥१२॥ पदार्थ:-हे (पावका:) अग्नि के समान प्रताप सहित वर्तमान (शुचयः) पवित्र (शुचिजन्मानः) पवित्र जनम वाले (ऋतसापः) जो सत्य से प्रतिज्ञा करते हैं वह लोगों के जो (सूची) पवित्र (हव्या) देने लेने योग्य वस्तु वर्तमान हैं उन (शुचिभ्यः) पवित्र वस्तुओं से वा पवित्र विद्वानों से (शुचिम्) पवित्र को और (ऋतेन) यथार्थ भाव से (सत्यम्) अव्यभिचारी नित्य (अध्वरम्) न नष्ट करने योग्य व्यवहार को (मायन्) जो प्राप्त होते हैं उन्हें (हिनोमि) बढ़ाता हूं उस मुझे सब बढ़ावें ॥१२॥ भावार्थ:-जिनके पिछले काम पुण्यरूप हैं वे ही पवित्र जन्म वाले हैं T ABAR ऋग्वेदः मं०७। सू०५६ ।। s , अथवा जिनके वर्तमान में धर्मयुक्त आचरण हैं वे पवित्रजन्मा होते हैं ॥१२॥ फिर योद्धा कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अंसेवा मरुतः खादयों दो वक्षः सु रुक्मा उपशिश्रियाणाः। वि विद्युतो न वृष्टिभी रुचाना अनु स्वधामायुधैर्यछमानाः ॥१३॥ प :-हे (मरुतः) पवनों के समान बलिष्ठ मनुष्यो ! जो (उपशि- श्रियाणाः) समीप सेवने वाले (वक्षःस) हृदयों में (रुक्माः) देदीप्यमान (खादयः) भक्षण करते हैं (वृष्टिमिः) वर्षाओं से जैसे (विधुतः) बिजुली (न) वैसे (अनु, स्वधाम) अनुकूल' अन्न को (वि, रुचानाः) प्रदीप्त करते हुए (आयुधः) शस्त्र और अस्त्र युद्ध के साधनों से शत्रुओं को (यच्छमाना:) पराजय देने वाले उन (वः) आप की (अंसेषु) भुजाओं की मूलों में बल (आ) सब ओर से वर्तमान है वे आप लोग विजय प्राप्त होने वाले होते हैं ॥१३॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-हे शूरवीर पुरुषो! जैसे बिजुली वर्षाओं के साथ ही प्रकाशित होती है वैसे ही आप लोग शस्त्र और अस्त्रों से प्रकाशित होमो और अपने शरीर बल को बढ़ाके और उत्तम सेना का आश्रय लेकर शत्रुओं को पराजय देनो ॥१३॥ फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। प्र बुध्न्या व ईरते महाँसि म नामानि प्रयज्यवस्तिरध्वम् । सहस्त्रियं दम्यै भागमेतं गृहमेषीय मरुतो जुषध्वम् ॥१४॥ पदार्थ:-हे महत:) पवनों के समान (प्रयज्यवः) उत्तम संग करने वालो तुम जो (व:) तुम लोगों के (महांसि) बड़े-बड़े (नामानि) नामों को , बुध्न्याः) अन्तरिक्ष में उत्पन्न हुए मेघ (प्रेरते) प्राप्त होते हैं उससे शत्रुओं के (प्रतिरध्वम्) बल को उल्लङ्घन करो (एतम्) इस (सहस्त्रियम्) हजारों में हुए और (दम्यम् ) शान्त करने योग्य (गृहमेधीयम्) घर के शुद्ध व्यवहार में हुए (भागम्) सेवन करने योग्य विषय को (जषध्वम्) सेवो ॥१४॥ भावार्थः- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-हे गृहस्थो ! जैसे मेघ पृथिवी को सेवते हैं वैसे ही आप लोग प्रजा जनों को सेवो और शत्रुनों की निवृत्ति कर अतुल सुख पाभो ॥१४॥ फिर वे मनुष्य कैसे प्रसिद्ध हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । Pawa dha s AANAP

स्वभाव वाले, बछड़ों के समान खेल करने वाले, पवनों के समान पदार्थों
ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ।।
यदि स्तुतस्य मरुतो अधीर्थस्था विप्रस्थ वाजिनो हवीमन् ।
मथू रायः सुवीयस्य दात न चिधमन्य आदमदरावा ॥१५॥
पदार्थ:-हे (मरुतः) पवनों के समान वर्तमान मनुष्यो (यदि) यदि (स्तु-
तस्य) प्रशंसित (वाजिनः) वेगयुक्त (विप्रस्थ) मेधावी जन के (हवामन्) जिस में
देने योग्य वस्तु विद्यमान उस व्यवहार में (इस्था) इस प्रकार से (म) शीघ्र
(अधीथ) स्मरण करो (सुवीर्यस्य) और जिन के सम्बन्ध में शुभ वीर्य होता उस
(रायः) धन को (वात) देसी (चित्) और (यम्) जिसको (अन्यः) अन्य (अरावा)
न देने वाला जन (न) शीघ्र (प्रावभत्) नष्ट करे तो क्या क्या विचार न हो ॥१५॥
भावार्थ:-जो विद्वान् के समीप से पढ़ते हैं वे समर्थ अर्थात् विद्या-
सम्पन्न हो धनपति होते हैं ॥१५॥
फिर वे राजजन कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
अत्यासो न ये मरुतः स्वञ्चो यक्षशो न शुभयन्त मयाः ।
ते हम्येष्ठाः शिशयो न शुभ्रा वत्सासो न प्रक्रीनिः पयोधाः ॥१६॥
पदार्थ:-है मनुष्यो (ये) जो (मयाः) मरणधर्मा मनुष्य (प्रत्यास:) मार्ग को
व्याप्त होते हुओं के (न) समान (स्वञ्चः) सुन्दरता से जाने (पयोधाः) वा जलों को
धारण करने वाले (मरुतः) पवनों के समान निरन्तर चाल वाले बलिष्ठ (यादृशः)
जो पूजन करने योग्यों को देखते हैं. उनके (न) समान (हम्र्येष्ठाः) अटारियों पर
स्थिर होने वाले (शिशवः) बालकों के (न) समान (शुभ्राः) शुद्ध सुन्दर (बत्सास:)
शीघ्र उत्पन्न हुए बछड़ों के (न) समान (प्रकोडिन:) अच्छे प्रकार खेल वाले होते हुए
'शुभयन्तः) उत्तम के समान आचरण करते हैं (ते) वे कृतकार्य होते हैं ॥१६॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में उपमालंकार है--जो शूरवीर घोड़े के समान
वेग वाले, अच्छी दृष्टि वाले के समान देखने वाले, बालकों के समान सीध
Apna
diary
के धारण करने वाले राजा आदि वीर जन हैं वे ही विजय और प्रतिष्ठा
को निरन्तर पाते हैं ॥१६॥
फिर कौन राजजन श्रेष्ठ हैं इस विषय को अगले मात्र में कहते हैं ।
दशस्यन्तो नो मरुतो मृन्तु वरिवस्यन्तो रोदसी सुमे ।
आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु सुम्नेभिरस्मे वसवो नमध्वम् ॥१७॥

६२०
ऋग्वेद: मं०७। सू० २६ ।।
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पदार्थ:-हे वीरो (मरुतः) प्राणों के समान (दशस्यन्तः) बल करते और
(सुमेके) एक से रूप वाले (रोक्सी) आकाश और पृथिवी को (वरिवस्यन्तः) सेवते
हुए जन (नः) हम लोगों को (मुडन्तु) सुख देखें और (व:) तुम्हारे (मारे) दूर देश
में (गोहा) गो हत्यारा (नुहा) और मनुष्य हत्यारा (वधः) यह दोनों जिससे मारते
हैं वह (प्रस्तु) दूर हो जाय (वसवः) निवास दिलाने वाले तुम लोग (सुम्नेभिः)
सुखों के साथ (मस्मे) हम लोगों को (नमध्वम्) नमो ॥१७॥
भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है-वे ही राजजन
उत्तम हैं जो श्रष्ठों को सुख देकर दुष्टों को मारते हैं और प्राप्त जनों को
नम के दुष्टों में उग्र होते हैं ॥१७॥
फिर वे राजजन कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।
आ वो होता जोहवीति सत्तः सत्राची राति मरुतो गृणानः ।
य ईवतो वृषणो अस्ति गोपा सो अद्वयावी इवते व उक्थैः ॥१८॥
पदार्थ:-हे (मरुतः) पवनों के तुल्य मनुष्यो (य:) जो (गुणानः) स्तुति
करता (सत्तः) बैठा हुआ (अद्वयावी) छल कपट आदि से रहित (होता) देने वाला
(ईवत:) जाते हुए (वृषणः) वर्षा करने वाले के सम्बन्ध में (व:) तुम लोगों को
(प्रा, जोहवीति) निरन्तर बुलाता (सत्राचीम्) जो सत्य को देती है उस (रातिम्)
दान को देता और (गोपाः) रक्षा करने वाला (अस्ति) है तथा (उक्थैः) कहने योग्य
वचनों से (व:) तुम लोगों को (हवते) बुलाता है वह उत्तम है इस को जानो ॥१८॥
भावार्थ:-जो राजा आदि जन अभय देने और सब की रक्षा करने
वाला, छल कपट आदि दोष रहित, सत्यविद्या दाता और सत्य ग्राहक है
वही यहां प्रशंसित वर्तमान है उसी को मनुष्य उत्तम जानें ॥१८॥
फिर वे कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।
इमे तुरं मरुतो रामयन्तीमे सहः सहस आ नमन्ति ।
इमे शंस वनुष्यतो नि पान्ति गुरु द्वेषो अररुषे दधन्ति ॥१९।।
पवार्य:-हे राजा जो (इमे) ये (महतः) पवनों के समान (तुरम्) शीघ्र
(रमयन्ति) रमण कराते (इमे) यह (सहसः) बल से (सहः) बल' को (मा, नमन्ति)
सब ओर से नमते (इमे) यह (वनुष्यतः) क्रोध करने वाले की (शंसम्) प्रशंसा करने
वाले को (नि, पान्ति) निरन्तर रखते और (मररुष) पूरा रोष करने वाले के लिए
(द्वेषः) वैर (गुरु) बहुत (वधन्ति) धारण करते हैं उन का पाप निरन्तर सत्कार
करो॥१॥

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ।। ६२१ AUR ROU भावार्थ:-हे राजा! जो सेना को अच्छी शिक्षा देकर शीघ्र विशेष रचना कर बली शत्रुओं को भी जीत उत्तमों की रक्षा कर दुष्टों में द्वष फैलाते हैं वे तुम को सत्कार करने चाहिये ।।१६॥ फिर वे राजजन कैसे होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इमे रधं चिन्मरुतो जुनन्ति भूमि चिद्यया वसवो जुषन्त । अपं बाघध्वं वृषणस्तमांसि धत्त विश्वं तनयं तोकमस्मे ॥२०॥ पदार्थ:-हे (वृषणः) बलिष्ठो (वसवः) निवास कराने वालो तुम (यथा) जैसे (इमे) यह (मरुतः) पवनों के समान वर्तमान (रध्रम्) समृद्धिमान् (चित) ही को (जुनन्ति) प्रेरणा करते हैं और (भूमिम्) धूमने वाले को (चित्) ही (जुषन्त) सेवते हैं वैसे और जैसे सूर्य अन्धकारों को वैसे (तमांसि) रात्रि के समान वर्तमान दुष्ट शत्रुओं को (अप, बाधध्वम्) अत्यन्त बाधा देनो और (अस्मे) हम लोगों में (विश्वम्) समस्त (सनयम्) विस्तारयुक्त शुभ गुण कर्म स्वभाववाले (तोकम्) संतान को (धत्त) धारण करो ॥२०॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है-जैसे प्राणाया- मादिकों से अच्छे सिद्ध किये हुए पवन समृद्धि और कुपथ्य से सेवन किये दरिद्रता को उत्पन्न करते हैं वैसे ही सेवन किये हुए विद्वान् राज्य की ऋद्धि और अपमान किये हुए राज्य का भङ्ग उत्पन्न करते हैं, अच्छी शिक्षा दिये और सत्कार कर रक्षा किये हुए शूरवीर जैसे शत्रुओं को नष्ट करते हैं वैसे वर्तकर प्रजाजनों में उत्तम संतान राजजन उत्पन्न करा ॥२०॥ फिर मनुष्य कैसे होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।। मा वो दात्रान्मरुतो निरराम मा पश्चाइध्म रथ्यो विभागे । आ नः स्पाईं भजतना वसन्ये ३' यी सुजातं दृषणो वो अस्ति ॥२१॥ पवार्थ:-है (मरुतः) पवनों के समान मनुष्यो जैसे हम लोग (व:) तुम को (वात्रात) दान से (मा) मत (निरराम) अलग करें है (रथ्यः) बहुत रथों वाले हम लोग (पश्चात्) पीछे से (मा, वधम) मत जावें हे (वृषण:) वर्षा कराने वालो (व:) तुम्हारा (यत्) जो (सुजातम्) सुन्दर प्रसिद्ध सुख (अस्ति) है उस (वसव्ये) द्रव्यों में हुए (स्पार्हे) इच्छा करने योग्य (विभागे) विभाग जिसमें कि बांटते हैं उस में तुम (मः) हम लोगों को (ईम) सब भोर से (मा, भजतन) अच्छे प्रकार सेवो ॥२१॥ A- Harya १२२ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ।। Janga ARIA भावार्थ:- मनुष्य सदैव विद्वानों के लिए देने योग्य सत्यासत्य व्यव- हार से अलग न होवें जो कुछ भी उत्तम सुख हो उसको सब के लिये निवेदन करें।॥२१॥ फिर वे वीर कैसे हों इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । संरद्धनन्त मन्युभिर्जनांसः शूरां यह्वीपोषधीषु विक्षु । अर्ध स्मा नो मरुतो रुद्रियासस्त्रातारों भूत पृतनास्वर्यः ।।२२।। पदार्थ:-हे (मरुतः) पवनों के समान (यत्) जो (रुद्रियासः) रुद्र के समान आचरण करने वाले (जनासः) प्रसिद्ध (शूराः) निर्भय मनुष्यो (मन्युभिः) क्रोधादिकों से शत्रुओं को (संयत्) संग्राम में (हनन्त) मारिये (अध) इसके अनन्तर (यतीषु) बहुत बड़ी (मोषधीषु) ओषधियों में और (विक्षु) प्रजात्रों में (पृतनास) शूरवीरों की सेनाओं में (स्म) निश्चित (नः) हमारे (नातार:) रक्षा करने वाले (भूत) हूजिये जो (व:) तुम्हारा (अर्थः) स्वामी है उसकी भी रक्षा करने वाले हूजिये ॥२२ । भावार्थ:-जो वीर जन शत्रुओं को मारने वाले प्रजात्रों के रक्षक और बड़ी बड़ी ओषधियों में चतुर हैं उनको स्वामी राजा प्रीति से रक्खे ॥२२॥ AMA MATICS फिर वे मनुष्य क्या क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । भूरि चक्र मरुतः पिाण्युक्यानि या व शस्यन्ते पुरा चित् । मरुद्भिल्या पूर्तनासु साळहा मरुद्भिरित्सनिता वाजमा ॥२३॥ पदार्थ:-है (मरतः) पवन के सदृश वर्तमान मनुष्यो (धः) आप लोगों के (या) जो (उत्थानि) प्रशंसा करने योग्य कर्म और (पिश्याणि पितरों के सेवन प्रादि (शस्यन्ते) स्तुति किये जाते हैं (पुरा) पहिले उनको (मद्भिः) उत्तम मनुष्यों के साथ (पतनासु) सेनाओं में (उपः) तेजस्वी (साळहा) सहने वाला पुरुष और (मरुद्भिः) मनुष्यों के साथ (सनिता) विभाग करने वाला (अर्था) वेगयुक्त घोड़ा जैसे वैसे (वाजम्) विज्ञान वा वेग को प्राप्त हुआ (चित्) भी जीतता है उनको प्राप लोग (भूरि) बहुत (चक्र) करते हैं ॥२३॥ भावार्थ:-जो मनुष्य प्रशंसनीय कर्मों को करते हैं उनका सदा ही विजय होता है ॥२३॥ फिर वे मनुष्य कैसे होवें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं०७। सू० ५६ ॥ ९२३ ektam dala 41 का mom Rom पा- मा अस्मे वीरो मरुतः शुष्म्यस्तु जनानां यो असुरो विधर्ता । अपो येन मुक्षितये तरेमाघ स्वमोको अभिव: स्याम ॥२४॥ पदार्थः -- है (मरुतः) प्राणों के सदृश बल करने वाले जनो (य:) जो (वीरः) वीर अर्थात् प्राप्त हुई बल' बुद्धि और शूरता आदि जिसको (असुरः) प्राणों में रमता हुमा बिजुली अग्नि के सदृश (जनानाम्) मनुष्यों का (विधा) विशेष करके धारण करने वाला है वह (अस्मे) हमारा (शुष्मी) बहुत बल से युक्त (प्रस्तु) हो (येन) जिससे (सुक्षितये) सुन्दर पृथिवी की प्राप्ति के लिये हम लोग (अपः) जलों को (तरेम) तैरें (अध) इसके अनन्तर (स्वम्) अपने (प्रोकः) गृहके पार होवें और (वः) आप लोगों के रक्षक (स्थाम) होवें ॥२४॥ भावार्थ:---जो मनुष्य, मनुष्यों को बलयुक्त करते और नौका आदिकों से समुद्र के पार होकर दूसरे देश में जाकर धन बटोरते हैं वै प्राप लोगों और हम लोगों के रक्षक हों ॥२४॥ फिर मनुष्य किसके सदृश क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप ओषधीर्वनिनो जुषन्त । शमन्त्स्याम महतामुपस्थे यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥२५॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जैसे (इन्द्रः) बिजुली (वरुणः) जलाधिपति (मित्रः) मित्र (अग्नि:) अग्नि (मापः) जल (ओषधीः) सोमलता आदि ओषधियों को (बनिनः) बहुत किरणें जिन में पड़ती ऐसे वन में वर्तमान वृक्ष आदि (न:) हम लोगों के (तत्) पूर्वोक्त सम्पूर्ण कर्म वा वस्तु की (जुषन्त) सेवा करें और जिस (शम्भन) सुखकारक गृह में (मरुताप) पवनों वा विद्वानों के (उपस्थे) समीप में हम लोग सुखी (स्याम) होवें उसमें (यूयम्) आप लोग- (स्वस्तिभिः) कल्याणों से न:) हम लोगों की (सवा) सदा (पात) रक्षा कीजिये ।।२।। भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे बिजुली आदि पदार्थ सब की उन्नति और नाश करते हैं वैसे ही दोषों का नाश कर और गुणों की वृद्धि करके सब की रक्षा को सब सदा करें ॥२५॥ इस सूक्त में वायु, विद्वान्, राजा, शूरवीर, अध्यापक, उपदेशक और रक्षक के যা वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह सप्तम मण्डल में छप्पनवां सूक्त समाप्त हुआ। ।

HED .. 45 यजत्राः) मिलने वाले (ये) जो (उग्राः) तेजस्वी बिजुली के ऋग्वेदः मं०७। सू० ५७ ।। प्रथ सप्तस्य सप्क्षपंचाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । मरुतो देवताः२।४ त्रिष्टुप् । १ विराट् त्रिष्टुप् । ३ । ५। ६ । ७ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः ।। फिर मनुष्य किससे सदृश क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । मध्वों को नाम मारुतं यजत्राः प्र यज्ञेषु शवसा मदन्ति । ये रेजयन्ति रोद॑सी चिदुर्वी पिन्वन्त्युत्सं यदयासुरुग्रः॥१॥ सहित पवन (यत्) जो (उर्वो) बहुत पदार्थों से युक्त (रोदसी) अन्तरिक्ष पृथिवी और (उत्सम्) कूप को जैसे वैसे सम्पूर्ण संसार को (पिन्वन्ति) सींचते हैं और (चित) भी (रेजयन्ति) कम्पाते हैं (प्रयासुः) प्राप्त होवे उसको (ये) जो (व:) आप लोगों को (मध्वः) मानते हुए (नाम) प्रसिद्ध (यज्ञेषु) विद्वानों के सत्कार आदिकों में (शवसा) बल से (मारुतम्) मनुष्यों के कर्म की (प्र, मदन्ति) कामना करते हैं उनको आप लोग जानिये ॥१॥ भावार्थः इस मन्त्र में वाचकलु० -जो पवन, भूगोलों को घुमाते और धारण करते हैं और वृष्टियों से सींचते हैं उनको जानकर विद्वान् जन कार्यों को करके प्रानन्द करें ॥१॥ फिर वे विद्वान् कैसे होवें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । निचेतारो हि मरुतो गृणन्त प्रणेतारो यज॑मानस्य मन्म । अस्माकमद्य विदथेषु बहिरा वीतये सदत पिप्रियाणा ॥२॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो (निचेतारः हि) जिस कारण समूह करने वाले मरुतः) पवन सबको प्रेरित करते हैं उस कारण (प्रणेतारः) अच्छे न्याय को करते हुए जन (यजमानस्य) सब के सुख के लिए यज्ञ करने वाले के (मन्म) विज्ञान को और (अस्माकम्) हम लोगों के (विदथेषु) यज्ञों में (गृणन्तम् ) स्तुति करते हुए को (पिप्रियाणाः) प्रसन्न करते हुए (अद्य) आज (वीतये) विज्ञान वा प्राप्ति के लिए (बहिः) अन्तरिक्ष में स्थित उत्तम प्रासन पर (मा, सदत) बैठिये ॥२॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो! आप लोग सम्पूर्ण पदार्थों के रचने वाले पवनों के समूह को जानकर सबके प्रिय को सिद्ध mma was Mada a Charu ! करो ॥२॥ फिर वे विद्वान् जन कैसे होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।।

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५७ ।। नैतावदन्ये मरुतो यथेमे भ्राजन्ते रुक्मरायुधैरतनूभिः । आ रोदसी विश्वपिर्शः पिशानाः समानमयञ्जते शुभे कम् ॥३॥ पदार्थ:- हे विद्वान् जनो (यथा) जैसे (इमे) थे (मरुतः) वायु के सदृश मनुष्य (रुक्मः) प्रकाशमान (मायुधः) आयुधों और (तनूभिः) शरीरों के साथ (भ्राजन्ते) प्रकाशित होते हैं और (विश्वपिशः) संसार के अवयवभूत (पिशानाः) उत्तम प्रकार चूर्ण करते हुए (शुभे) सुन्दरता के लिए (समानम्) तुल्य (अञ्जि) गमन को और (कम्) सुख को (प्रजते) व्यतीत करते हैं तथा (रोवसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को (आ) सब ओर से प्रकाशित करते हैं (न) न (एतावत्) इतना ही (अन्ये) अन्य करने को समर्थ होते हैं ॥३॥ भावार्थ:--इस मन्त्र में उपमालङ्कार है-हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् शूरवीर जन शरीर और प्रात्मा के बल से युक्त और श्रेष्ठ आयुधों से युक्त हुए सङ्ग्रामों में प्रकाशित होते हैं वैसे भीरु मनुष्य नहीं प्रकाशित होते हैं, जैसे प्राण सब जगत् को मानन्दित करते हैं वैसे विद्वान् सबको सुखी करते फिर मनुष्यों को कैसा बर्ताव करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । अधक्सा वो मरुतो दिधुदस्तु यद आर्गः पुरुषता करांम । मा वस्तस्यामपि भूमा यजत्रा अस्मे वो अस्तु सुमतिश्चनिष्ठा ॥४॥ पदार्थ:-हे (यजत्राः) मेल करने वाले (मरुतः) मनुष्यो (यत्) जिससे (व:) आप लोगों के (भागः) अपराध को और जिस (पुरुषता) पुरुषपने से (कराम) करें (तस्याम् उसमें (अपि) भी (वः) आप लोगों के अपराध को (मा) नहीं करें और जिससे हम लोग पुरुषार्थी (भूम) होवें (सा) वह (व:) आप लोगों के (ऋधक्) सत्य में (चनिष्ठा) अतिशय अन्न आदि ऐश्वर्य से युक्त (समतिः) अच्छी बुद्धि (अस्मे) हम लोगों में (अस्तु) हो और वह (दिरात) प्रकाशमान नीति (वः) आप लोगों की (प्रस्तु) हो ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! अन्याय से [=रूप] अपराध का परित्याग कर और सत्य बुद्धि को ग्रहण करके पुरुषार्थ से सुखी होनो ॥४॥ फिर विद्वान् जन कैसे होकर क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । कृते चित्र मरुतो रणन्तानवद्यासः शुचयः पावकार प्र णोऽवत मुमतिभिर्यजत्राः प्र वाजेमिस्तिरत पुष्यसे नः ॥५॥ me १२६ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५७ ॥ पदार्थ:-है विद्वान् जनो जैसे (अनवद्यास:) नहीं निन्दा करने योग्य और धर्माचरण से युक्त (शुचयः) पवित्र और (पावकाः) पवित्र करने वाले' (मरुतः) मनुष्य (चित्र) भी (कृते) उत्तम कर्म में (मत्र) इस संसार में (रणन्त) रमें वैसे (यजत्राः) मिलने वाले हुए आप लोग (सुमतिभिः) उत्तम बुद्धि वाले मनुष्यों और (वाजेभिः) अन्न आदिकों के साथ (न:) हम लोगों की (प्र, अवत) रक्षा कीजिये और (नः) हम लोगों को (पुष्यसे) पुष्टि के लिये (प्र, तिरत) निष्पन्न कीजिये ॥५॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-जो यथार्थवक्ता, धार्मिक, पवित्र, विद्वान् होके सब सबकी रक्षा करते हैं वे सबको पुष्ट और सुखी कर सकते हैं ॥५॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उत स्तुतासो मरुतो व्यन्तु विश्वभिर्नामभिर्नरो हवींषि । ददात नो अमृतस्य प्रजाय जिगृत रायः सूनृतो मघानि ॥६॥ पवार्थ:-हे (मरुतः) पवनों के सदृश मनुष्यो (नर:) अग्रणी आप लोगों (विश्वेभिः) सम्पूर्ण (नामभिः) संज्ञामों से (न:) हम लोगों के लिए हम लोगों के देने योग्य पदार्थों को (ददात) दीजिए (उत) और (स्तुतासः) प्रशंसा को प्राप्त हुए जन देने योग्य द्रव्यों को (व्यन्त) साप्त होवें, हम लोगों और (अमृतस्य) अविनाशी की (प्रजाय) प्रजा के सुख के लिए (राय:) शोभाओं वा लक्ष्मियों को और (सनता) धर्म से इकट्ठ किये गए (मधानि) धनों को (जिगृत) उगलिये ॥६।। भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो प्रशंसा करने वाले मनुष्य सम्पूर्ण शब्द और अर्थों के सम्बन्धों से सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त कर और शोभित होकर प्रजाजनों के लिए सत्य वचन को देते हैं वे सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं ॥६॥ फिर कौन प्रशंसा करने और आदर करने योग्य होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ स्तुतासों मरुतो विश्व ऊती अच्छा सूरीन्सर्वाता जिगात । ये नस्त्मना शतिनो वर्धयन्ति यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥७॥ पदार्थ:-हे विद्वान् मनुष्यो (ये) जो (विश्वे) सम्पूर्ण (स्तुतासः) प्रशंसा को प्राप्त हुए (शतिनः) असंख्य बलवाले (मरुतः) पवनों के समान विद्या से व्याप्त मनुष्य (त्मना) आत्मा से (ऊती) रक्षण आदि क्रिया से (न:) हम लोगों को हैं M

ऋग्वेदः मं० ७ । सू०५८ ।।
६२७
(वर्धयन्ति) बढ़ाते हैं उन (सूरीन्) धार्मिक विद्वानों को (सर्वताता) सबके सुख करने
वाले यज्ञ में (यूयम्) आप लोग (अच्छ) अच्छे प्रकार प्रा (जिगात) प्रशंसा कीजिये
और (स्वस्तिभिः) कल्याणों से (नः) हम लोगों की (सवा) सब काल में (पात)
रक्षा कीजिये ॥७॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विद्वान् धर्मयुक्त कर्म करने वाले असंख्य
विद्या से युक्त, दयालु, न्यायकारी, यथार्थवक्ता जन हम सबों की निरन्तर
वृद्धि करें, वृद्धि करके सदा रक्षा करते हैं उनको ही हम लोग प्रशंसित
करके सेवा करें ॥७॥
इस सूक्त में पवन के सदृश विद्वान् के गुणों और कृत्य का वर्णन करने से इस
सूक्त के अर्थ की संगति इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये ।
यह सप्तम मण्डल में सत्तावनवां सूक्त समाप्त हुना ॥
,
अथ षड़चस्याष्टापञ्चाशत्तमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः । मरुतो देवताः।३।४
निस्त्रिष्टुप् । ५ त्रिष्टुप् । १ विराट त्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । २ । ६ भुरिक
पंक्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः।
अब छः ऋचा वाले अट्ठावनवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में
विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।
प्र सांकमुक्षे' अर्चता गणाय यो दैव्यस्य धाम्नस्तुविष्मान् ।
उत क्षदिन्ति रोदसी महित्वा नक्षन्ते नाकं नितेरवंशात् ॥१॥
पदार्थ:-(यः) जो (तुविष्मान्) बहुत बल से युक्त (दैव्यस्थ) देवताओं से
किये गए (धाम्नः) नाम स्थान और जन्म का जानने वाला है उस (साकमुक्षे) साथ
ही सुख से सम्बन्ध करने वाले (गणाय) गणनीय विद्वान् के लिए आप लोग (प्र,
अर्चत) सत्कार करिये और (अपि) भी जो पवन (महित्वा) महत्त्व से (रोदसी)
अन्तरिक्ष और पृथिवी को (नक्षन्ते) व्याप्त होते हैं अवयवों के सहितों को (उत) भी
(क्षोदन्ति) पीसते हैं (निऋते:) भूमि से (अवंशात) सन्तान भिन्न से (नाकम्) दुःख
से रहित स्थान को व्याप्त होते हैं उनको जानने वाले विद्वानों को आप लोग भी
सत्कार करिये ॥१॥
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो वायु आदि की विद्या को जानते हैं उनका
नित्य सत्कार करके इनसे
वायु
की विद्या को प्राप्त होकर आप लोग श्रेष्ठ
हूजिये ॥१॥

६२८ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ॥ हैं फिर कौन नहीं विश्वास करने योग्य हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । जनश्चिद्रो मरुतस्त्वेष्येण भीमासस्तुर्विमन्पवोऽयोसः । प्र ये महाभिरोजसोत सन्ति विश्वों वो यामन्मयते स्वदृक् ॥२॥ पदार्थ:-हे (मरुतः) पवनों के समान मनुष्यो (ये) जो (महोभिः) बड़े पराक्रमों वा गुणों के और (प्रोजसा) बल (त्वेष्येण) प्रकाश में के साथ वर्तमान (भीमासः) डरते हैं जिन से वे (तुविमन्यवः) बहुत क्रोषयुक्त (प्रयासः) जानने वा जाने वाले जन (व:) आप लोगों को (जनूः) स्वभाव (प्रसन्ति) प्रकाश करते और (उत) भी जो (विश्वः) सम्पूर्ण (स्वक) सुख को देखने वाला मनुष्य (यामन्) जाते हैं जिससे वा जिसमें उसमें (व:) आप लोगों को (भयते) भय देता है उनको और उसको (चित) भी आप लोग जानकर युक्ति से सेवा करिये ॥२॥ भावार्थः-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे विद्वान् मनुष्यो ! जो भयङ्कर मनुष्य प्रादि प्राणी हैं उनका विश्वास नहीं करके उनको बड़े बल और पराक्रम से वश में करिये ।।२।। फिर कौन जगत् से आदर पाने योग्य होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । बृहदयो मघवद्भयो दधात जुजोषनिम्मरुतः मुष्टुति नः। गतो नावा वि तिराति जन्तुं प्रणः स्पार्दाभिरूतिभिस्तिरेत ॥३॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो जो (मरुतः) मनुष्य (मघवन्यः) अन्न से युक्त (न:) हम लोगों के लिए (बृहत) बहुत (वयः) जीवन का (जुजोषन्) सेवन करते (इव) ही हैं (न:) हम लोगों की (सुष्टुतिम्) उत्तम प्रशंसा को (दधात) धारण करते हैं और जो (गतः) प्राप्त हुमा (अध्वा) मार्ग है उसमें (जन्तुम्) प्राणी को (न) नहीं (वि, तिराति) मारता है और जो (स्पार्हाभिः) स्पृहा करने योग्य' (अतिभिः) रक्षा आदि क्रियाओं से हम लोगों को (प्र, तिरेत) बढ़ावें उनका हम लोग नित्य सेवन करें ॥३॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन सबकी अवस्था को बढ़ाते हैं, प्रशंसित कर्मों को कराते हैं, वे ही सबों से सत्कार करने योग्य होते हैं ॥३॥ किससे रक्षित मनुष्य कैसे होते हैं इस विषय को कहते हैं ।। युष्मोतो विप्रो मरुतः शतस्वी युष्मोतो अर्वा सहुरि सहस्त्री युष्मोतः सम्रात हन्ति वृत्रं प्र तो अस्तु धूतयो देष्णम् ॥४॥ BC ऋग्वेदः मं०७। सू० ५८ ॥ . पदार्थ:--है (धूतयः) कम्पाने वाले (मरुतः) प्राणों के सदृश प्रिय करने बाले विद्वान जनो (युष्मोतः) आप लोगों से रक्षा किया (विप्रः) बुद्धिमान् जन (शतस्वी) असंख्य धन वाला (युष्मोत:) आप लोगों से पालन किया गया (अर्या) घोड़े के समान (सहरिः) सहनशील (सहली) असंख्यात उत्तम मनुष्य वा पदार्थ जिसके वह (उत) और (युष्मोत:) आप लोगों से उत्तम प्रकार रक्षा किया गया (सम्राद) उत्तम प्रकाशित सूर्य के समान वर्तमान चक्रवर्ती राजा (वृत्रम्) मेघ को जैसे सूयं वैसे शत्रुओं का (हन्ति) नाश करता है (तत्) बह (देष्णम्) देने योग्यः दान (:) आप लोगों के लिए (प्र, अस्तु) हो अर्थात् आप का दिया हुमा समस्त है सो पापका विख्यात हो ॥४॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे प्राण, शरीर आदि सबकी रक्षा करके सुख को प्राप्त कराते हैं वैसे ही विद्वान् जन शरीर, आत्मा, बल और अवस्था की रक्षा करके सबको आनन्द देते हैं उनकी रक्षा के विना कोई भी चक्र- वर्ती राजा होने को योग्य नहीं होता तिससे ये सब काल में सत्कार करने योग्य होते हैं ॥४॥ फिर कौन मनुष्य सत्कार करने योग्य और तिरस्कार करने योग्य होते हैं इस विषय को कहते हैं। ताँ पा रुद्रस्य मीळहुषो विवासे कुविन्नसन्तै मरुतः पुनः । यत्सस्वती जिही किरे यदाविरव तदेन ईमहे तुराणाम् ॥५॥ पदार्थः-जो मनुष्य (यत्) जिस (सस्वर्ता) तपाने वाले शब्द से (नः) हम लोगों को (जिहीळिरे) ऋद्ध करावें उन (तुराणाम्) शीन कार्य करने वालों का (यत्) जो (एनः) पाप अपराध (तत्) उसको (अव) विरोध में (ईमहे) दूर करें उनको (नस्य) प्राण के सदृशं विद्वान् (मोळहुषः) सींचने वाले विद्वान् के सम्बन्ध में (नसन्ते) नम्र होते हैं (पुनः) फिर (तान् ) उनको (रुद्रस्य) प्राण के सदृश विद्वान् के (कुवित) बड़ा करते हुए को मैं (मावि:) प्रकटता में (अर) सब प्रकार से (विवासे) वसाता हूं ॥५॥ भायर्थ:-हे मनुष्यो! जो पापी जन धार्मिक जनों के अनादर करने वाले होवें उनको दूर बसाना चाहिये और जो नम्रता प्रादि से युक्त धाम्मिक होवें उनको समीप वसावें जिससे सबका श्रेष्ठ यश प्रकट होवे ॥५॥ फिर विद्वान् जन क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। S ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ॥ - प्र सा वांचि सुष्टुतिर्मघोनामिदं सूक्तं मरुतो जुषन्त । आराच्चिद्वेषो वृषणो युयोत यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥६॥ पदार्थ:--हे (वृषणः) बलयुक्त जनो (मघोनाम्) बहुत श्रेष्ठ धन वालों की (वाचि) वाणी में (सा) वह (सुष्टुतिः) सुन्दर प्रशंसा है (इदम्) ईस (सूक्तम्) उत्तम वचन को (मरुतः) विद्वान् मनुष्य (प्र, जुषन्त) सेवन करें (सा) वह हम लोगों को सेवन करे (यूयम्) आप लोग (द्वषः) द्वेष करने वालों को (मारात) समीप से वा दूर से (चित) भी (युयोत) पृथक् करिये और (स्वस्तिभिः) कल्याणों से (नः) हम लोगों को (सदा) सब काल में (पात) रक्षा कीजिये ।।६।। भावार्थ:-जो मनुष्य सदा ही सत्य के कहने वाले हों वे ही स्तुति करने वाले होवें, उनके साथ बल को बढ़ाय के सब शत्रुओं को दूर करके श्रेष्ठों की सदा रक्षा करो इस सूक्त में वायु और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त' के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये । यह सप्तम मण्डल में अट्ठावनवां सूक्त समाप्त हुआ। अथ द्वादशस्यैकोनषष्टितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः। १--११ मरतः । १२ रुद्रो देवता । १ निबृहती। ३ बृहती । ६ स्वराड्बृहती छन्दः । मध्यमः स्वरः । २ पङ्क्तिः । ४ निवृत्पतितश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः। ५। १२ अनुष्टुप छन्दः । गान्धारः स्वरः । ७ निवृत्त्रिष्टुप् । ८ त्रिष्टप्छन्दः । धैवतः स्वरः ।। १० गायत्री। ११ निचद्गायत्री छन्दः । षड्जः स्वरः ॥ अब बारह ऋचा वाले उनसठवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को कहते हैं। यं त्रायध्व इदमिदं देवासो यं च नयथ । तस्मा अग्ने वरुण मित्रार्यमन्मनः शर्म यच्छत ॥१॥ पदार्थ:-हे (मवत:) प्राणों के सदृश अग्रणी (देवासः) विद्वान् आप लोग (इदभिवम्) इस इस वचन को सुनाय के वा कर्म कर के (यम्) जिसको (नयथ) प्राप्त कराइये (यम्, च) और जिस मनुष्य की (बायध्वे) रक्षा करें (तस्मै) उसके लिये (शम्म) सुख वा गृह (यच्छत) दीजिये और हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी 4 Maru 49

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(नहि) अन्त वाले को
ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५६ ॥
(वरुण) श्रेष्ठ (मित्र) मित्र (अर्यमन्) न्यायकारी आप इन्हीं की सदा सेवा
कारिये ॥१॥
भावार्थ:-हे विद्वान् जनो! माप लोग सत्य उपदेश, उत्तम शिक्षा
और विद्या दान से सब मनुष्यों की उत्तम प्रकार रक्षा करके वृद्धि करिये
जिससे सब सुखी होवें ॥३॥
फिर विद्वान् मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
युष्माकं देवा अबलाइनि प्रिय ईजानतरति द्विषः ।
प्रस क्षयं तिरते वि महीरिषो यो वो वराय दार्शति ।।२।।
पदार्थ:-हे (देवाः) विद्वान् जनो (यः) जो (ईजानः) यजमान (अक्षसा)
रक्षण आदि से (द्विषः) द्वेष करने वालों का (तरति) उल्लङघन करता है और
(प्रिये) प्रीति करने वाले (अहनि) दिन में (युष्माकम) आप लोगों के प्रिय को सिद्ध
करता है और जो (मही:) भूमियों वा उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियों वा (इष:)
अन्नादिकों को (4:) आप लोगों के अर्थ (वराय) श्रेष्ठत्व के लिये (प्र, दाशति)
देता है (सः) वह (क्षयम्) निवास को (प्र, वि, सिरते) बढ़ाता है ।।२।।
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो दुष्टता के दूर करने वाले, सब की रक्षा
करने वाले, विद्या प्रादि ऐश्वर्या के देने वाले, और सुख से सर्वदा वसाने
वाले विद्वान् हों उन्हीं की सेवा और मेल करके विद्याओं को प्राप्त
हूजिये ॥२॥
फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।
नहि वश्चरमं चन वसिष्ठः परिमंसते ।
अस्माकमद्य मरुतः सुते सचा विश्वं पिबत कामिनः ।।३।।
पवार्थ:-हे विद्वानो (कामिनः) कामना करने वाले (विश्वे) सम्पूर्ण (मरुतः)
मनुष्य आप लोग (सपा) सम्बन्ध से (अद्य) इस समय (अस्माकम्) हम लोगों के
(सते) उत्पन्न हुए बड़ी ओषधियों के रस में (विबत) रस' को पीवें जिससे (:)
भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जो आप लोग इच्छा की सिद्धि करने की
इच्छा करें तो योग्य आहार और विहार जिसमें उस ब्रह्मचर्य को
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करिये ॥३॥

ऋग्वेदः मं०७ । सू० ५६ ।। www फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। नहि व ऊतिः पृतनासु मति यस्मा अराध्वं नरः। अभि व आवर्मुमतिर्नवीयसी तूर्य यात पिपीषवः ॥४॥ पदार्थ:-है (पिपोषव:) पान करने की इच्छा करने वाले (नरः) अग्रणी जनो जिन (व:) आप लोगों की (ऊतिः) रक्षा आदि क्रिया (पृतनास) मनुष्यों की सेनाओं में (नहि) नहीं (मर्धति) हिंसा करती है और (यस्म) जिस के लिये आप लोग (भराध्वम्) आराधना करते हैं वह (वः) आप लोगों के (अभि, श्रा, प्रवर्त) समीप सब प्रकार से वर्तमान होता है और जिनकी (नवीयसी) अतिशय नवीन (सुमतिः) उत्तम बुद्धि है वे आप लोग विद्या को (तूयम्) शीघ्र (यात) प्राप्त हूजिये ॥४॥ भावार्थ:--हे मनुष्यो! आप लोग इस प्रकार से प्रयत्न करिये जिससे आप लोगों की न्याय से रक्षा सेना की बढ़ती और उत्तम बुद्धि कभी न न्यून हो ॥४॥ फिर स्वामी जन नौकरों के प्रति कैसा प्राचरण करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । ओ षु घृष्विराधसो यातनान्धासि पीतये । इमा वो हव्या मरुतो ररे हि कं मोष्व न्यत्रं गन्तन ॥५॥ पदार्थः-(प्रो) हे (धष्विराधसः) इकट्ठे लिये हुए धनों वाले (मस्तः) मनुष्यो जिन (इमा) इन (हत्या) देने और ग्रहण करने योग्य (अन्धांसि) अन्नपान आदिकों को (वः) आप लोगों के अर्थ (पीतये) पान करने के लिये मैं (ररे) देता हूं उनसे (हि) ही आप लोग (कम्) सुख को (सु, यातन) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये (अन्यत्र) अन्य स्थान में (मो) नहीं (सु) अच्छे प्रकार (गन्तन) जाइये ॥५॥ भावार्थ:-हे धार्मिक विद्वानो! मैं आप लोगों का पूर्ण सत्कार करता हूं आप लोग अन्यत्र की इच्छा को न करिये यहां ही करने योग्य कर्मों को यथावत् करके पूर्ण अभीष्ट सुख को यहां ही प्राप्त हूजिये ॥५॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । आ च नो बर्हिः सदताविता च नः स्पार्हाणि दातवे वसु । अधन्तो मरुतः सोम्ये मधौ स्वाहेह मादयाध्यै ॥६॥ JAPAN सन्मुख (जिघांसति) मारने की इच्छा ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ॥ पदार्थः- हे (वसु) द्रव्य का (अस्ने धन्तः) नहीं नाश करते हुए (मरुतः) मनुष्यो आप लोग (न:) हम लोगों के (स्पाहाणि) कामना करने योग्य पदार्थों को (च) निश्चित (दातवे) देने के लिये हम लोगों के (बहिः) उत्तम बड़े गृह में (था, सवत) बैठिये (नः, च) और हम लोगों की (अवित) रक्षा कीजिये (इह) इस लोक में स्वाहा) सत्य क्रिया से (सोम्ये) सोमलता के सदृश अानन्द करने वाले (मधौ) मधुर रस में (मादयाध्यै) प्रानन्द कीजिये ॥६॥ भावार्थः -हे विद्वानो ! आप लोग सब मनुष्यों के लिये विद्या देने को प्रवृत्त हूजिये, विद्या ही से इनकी रक्षा कीजिये और ऐश्वर्य सब के लिये बढ़ाइये ॥६॥ फिर मनुष्य किसके सदृश किसको जानें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सस्वश्चिद्धि तन्व: शुम्भमाना आ हंसासो नीलपृष्ठा अपप्तन् । विश्वं शर्थों अभितो मा नि पद नरो न रण्वा सर्वने मदन्तः ॥७॥ पदार्थ:-हे विद्वान् जनो जैसे (शुम्भमाना:) शोभते हुए (हि) ही (हंसासः) हंसों के समान गमन करने वाले (नीलपुष्ठाः) शुद्ध कारण जिनके वे (सक्व:) छिपे हुए (चित्) निश्चित (सन्ध:) विस्तारयुक्त प्राण देह आदि में (Ar) सब ओर से (अपप्तन्) गिरते हैं वैसे (सवने) ऐश्वर्य में (मवन्तः) भानन्द करते (रण्याः) सुन्दर (नरः) अग्रणी जनों के (न) समान (मा) मुझ को (अभित:) सब ओर से पाप लोग (नि, सेव) बैठाइये और (विश्वम्) सम्पूर्ण (शर्थः) बल को प्राप्त कराइये ॥७॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जैसे हंस पक्षी शीघ्र चलते हैं वैसे देह से प्राण निकलते हैं और जैसे उत्तम मनुष्य सब के प्रिय होते हैं वैसे ही विद्वान् जन सब के प्रिय होते हैं ॥७॥ फिर धार्मिक विद्वान् क्या करें इस विषय को कहते हैं ।। यो नो मरुतो अमि दुई गायुस्सिरश्चित्तानि वसको जिघांसति । द्रहः पाशान्प्रति स मुंचीष्ट सर्पिष्ठेन हन्मना हन्तना तम् ।।८।। पदार्थ:-हे(बसपा) वास कराने वाले (मरुतः) मनुष्यो (यः) जो (दहणायु:) दुष्ट विचार वाला (नः) हम लोगों के (चित्तानि) अन्तःकरणों को (अभि) (पाशान्) बन्धनों को प्राप्त कराता है (तम्) उसको हम लोगों के (प्रति) प्रति Nit .............................. ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ५६ ॥ Shah (मुचीष्ट) छोड़िये (तपिष्ठेन) और अत्यन्त तप्त (हन्मना) हनन से उसको (तिरः, हन्तन) तिरछा मारिये ॥८॥ भावार्थ:-हे धार्मिक विद्वानो! आप लोग दुष्ट मनुष्यों को श्रेष्ठों से करके मोह आदि बन्धनों को निवृत्त कर के उनके दोषों का नाश करके उन को शुद्ध करिये ॥८॥ फिर मनुष्य क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। सान्तपना इदं हविमरुतस्तर्जुजुष्टन । युष्माकोती रिशादसः ॥९॥ पदार्थः-- हे विद्वानो। (सान्तपनाः) उत्तम प्रकार तपन में हुए (मरुतः) मनुष्यो आप (तत्) उस (इदम्) इस (हविः) देने योग्य अन्न आदि पदार्थ की (जुजष्टन) सिवा करिये, हे (रिशादसः) हिंसा करने वालों के हिंसक (युष्माक) आप लोगों की (ऊती) जो रक्षण प्रादि क्रिया उससे आप सेवन करें अर्थात् परोपकार करें ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! आप लोग सबका रक्षण करके ग्रहण करने योग्य को ग्रहण कराइये ।।६।। फिर गृहस्थ कैसे होवे इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । गृहमेवास प्रा गंत मरुतो माप भूतन । युष्माकोती सुदानवः ॥१०॥ पवार्थ:-हे (गृहमेधासः) गृह में बुद्धि जिन की ऐसे (मरुतः) उत्तम मनुष्यो माप लोग यहां (मा, गत) आइये और (सुवानवः) अच्छे दान वाले (भूतन) हूजिये और (युष्माक) आप लोगों की (ऊती) रक्षण प्रादि क्रिया के सहितः पाप लोग (मा) नहीं (अप) विरुद्ध हूजिये ॥१०॥ भावार्यः - हे गृहस्थ जनो! आप लोग विद्या प्रादि श्रेष्ठ गुणों के देने वाले होकर धर्म और पुरुषार्थ के विरुद्ध मत होमो ॥१०॥ फिर विद्वान् क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इहेई वः स्वतवसः कर्वयः सूर्यवचः । यज्ञं मरुत आ वृणे ॥११॥ पदार्थ:--(पूर्यत्वचः) सूर्य के समान -प्रकाशमान त्वचा जिन की ऐसे (स्वतवसः) अपने बल वाले (कवयः) हे विद्वान् (मरुतः) मनुष्यो (इहेह) इसी संसार में (वः) आप लोगों के (यज्ञम्) सङ्गतिस्वरूप यज्ञ को मैं (मा, वृणे) स्वीकार करता हूं ॥११॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! भाप लोग विद्या आदि के प्रचार नामक कर्म की सदा उन्नति करिये Ame Chie HINA AN RAN NEW ऋग्वेदः म०७॥ सू० ५६ ।। HIYE C .. फिर मनुष्यों को किसकी उपासना करनी चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥१२॥ पदार्थः -हे मनुष्यो! जिस (सुगन्धिम्) अच्छे प्रकार पुण्यरूप यशयुक्त (पृष्टिवर्धनम्) पुष्टि बढ़ाने वाले (ज्यम्बकम् ) तीनों कालों में रक्षण करने वा तीन अर्थात् जीव कारण और कार्यों की रक्षा करने वाले परमेश्वर को हम लोग (यजा- महे) उत्तम प्रकार प्राप्त होवें उसकी आप लोग भी उपासना करिये और जैसे मैं (बन्धनाव) बन्धन से (उर्वारुकमिव) के ककड़ी के फल के सदृश (मृत्योः) मरण से (मुक्षीय) छुटूं वैसे आप लोग भी छूटिये जैसे मैं मुक्ति से न छुटूं वैसे आप भी (अमृतात) मुक्ति की प्राप्ति से विरक्त (मा, प्रा) मत हूजिये ।।१२।। भावार्थ-इस मन्त्र में उपमालंकार है-हे मनुष्यो! हम सब लोगों का उपास्य जगदीश्वर ही है जिसकी उपासना से पुष्टि, वृद्धि, उत्तम यश और मोक्ष प्राप्त होता है, मृत्यु सम्बन्धी भय नष्ट होता है उस का त्याग करके अन्य की उपासना हम लोग कभी न करें ॥१२॥ इस सूक्त में वायु के दृष्टान्त विद्वान् और ईश्वर के गुण और कृत्य के वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह सप्तम बल में उनसठवां सक्स समाप्तमा ॥

* ओ३म् ॐ अथ पञ्चमाष्टके पञ्चमाऽध्यायारम्भः॥ Halaya :००:23:08.0 HOM AM a विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद्भद्रं तन्न आ सुव ।। अथ द्वावर्चस्य षष्टितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठ ऋषिः । १ सूर्यः । २-१२ मित्रावरुणो देवते । १ पङ्क्तिः । ६ विराट् पतितः । १० स्वराट् पश्तिश्छन्दः । पञ्चमः स्वरः । २।३। ४ । ६ । ७ । १२ निचरित्रष्टुप् । ५।८।११ त्रिष्टप- छन्दः। धैयतः स्वरः।। अब मनुष्यों को किसकी प्रार्थना करनी चाहिये इस विषय को कहते हैं यदद्य सूर्य योऽनागा उद्यन्मित्राय वरुणाय सत्यम् । वयं देवत्रादिते स्याम तवं प्रियासो अर्थमन्गृणन्तः ॥१॥ पदार्थ:-है (सूर्य) सूर्य के समान वर्तमान (अदिते) अविनाशी और (अर्यमन्) न्यायकारी जगदीश्वर (यत) जो (अनागाः) अपराध से रहित आप हम लोगों को (उपन्) उद्यत कराते हुए सुय्यं जैसे वैसे (मित्राय) मित्र और (वरुणाय) श्रेष्ठ जन के लिये (सत्यम्) यथार्थ बात को (अबः) कहिये वैसे हम लोगों के लिये कहिये जिससे आप को (देवत्रा) विद्वानों में (गणन्तः) स्तुति करते हुए हम लोग (तब) अापके (अध) इस समय (प्रियास:) प्रिय (स्थाम) होवें ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो! आप लोग सूर्य के सदृश प्रकाशक परमात्मा ही की प्रार्थना करो, हे परब्रह्मन् पाप हम लोगों के आत्माओं में अन्तर्यामी के स्वरूप से सत्य सत्य उपदेश करिये जिससे आपकी प्राज्ञा वर्ताव हम लोग माप के प्रिय होवें ॥१॥ फिर वह कैसा जगदीश्वर किसके सदृश क्या करता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । एष स्य मित्रावरुणा नृचक्षा उभे उदेति सूर्यों अभि ज्मन् । विश्वस्य स्थातुर्जगतश्च गोपा अजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन् ॥२॥ कर के a Home ऋग्वेदः मं०७ । सू०६०॥ ९३७ RRANG पदार्थ:-हे मनुष्यो (एषः) (स्य:) सो यह (नृचक्षाः) मनुष्यों के कर्मों को देखने वाला परमात्मा (उभे) दोनों प्रकार के स्थूल और सूक्ष्म संसार में जैसे (ज्मन्) भूमि में (सूर्यः) सूर्य लोक (अभि, उत्, एति) सब ओर से उदयं करता है वैसे (विश्वस्य) सम्पूर्ण (स्थातुः) नहीं चलने वाले और (जगतः) चलने वाले संसार का भी (गोपाः) रक्षक वह (मर्तेषु) मनुष्यों में (ऋजु) सरलतापूर्वक (वृजिना) सेनाओं को (च) और (पश्यन्) विशेष कर के जानता हुआ (मित्रावरुणा) सब के प्रारण और उदान वायु को प्रकाशित करता है ।।२।। भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे उदय को प्राप्त हुमा सूर्य समीप में वर्तमान स्थूल जगत् को प्रकाशित करता है वैसे अन्तर्यामी ईश्वर स्थूल और सूक्ष्म जगत् और जीवों को सब प्रकार से प्रकाशित करता है और सब की उत्तम प्रकार रक्षा कर के सब के कर्मों को देखता हुमा यथायोग्य फल देता है ॥२॥ फिर विद्वान् क्या करें इस विषय को अगले' मन्त्र में कहते हैं ।। अयुक्त सप्त हरित सधस्थाधा ई वहन्ति सूर्य घृताचीः । धार्मानि मित्रावरुणा युवाकुः सं यो यूथेव जनिमानि चष्टें ॥३॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जैसे (सप्त) सात (हरितः) दिशा और (याः) जो (घृताचीः) रात्रियां (सधस्थाद) तुल्य स्थान से (सुर्यम्) सूर्य को और (ईम्) जल को (वहन्ति) धारण करती हैं वैसे (य:) जो (अयुक्त) युक्त होता है (धामानि) जन्म स्थान और नाम को (भिधारणा) प्राण और उदान वायु को (युबाकुः) उत्तम प्रकार संयुक्त करने वाला हुआ (यूथेव) समूहों के सदृश (जनिमानि) जन्मों को सम्, चण्डे) प्रकाशित करता है उसको आप लोग जनाइये ॥३॥ भावार्थः - इस मन्त्र में उपमालङ्कार उपमालङ्कार है-जैसे पवन सूर्य लोकों को सब ओर से धारण करते हैं वैसे विद्वान् जन सूर्य, प्राण और पृथिवी आदि की विद्या को जानें ॥३॥ फिर विद्वानों को क्या करना चाहिये इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । उद्वाँ पृक्षासो मधुमन्तो अस्थुरा सूर्यो अहहच्छुक्रमणः । यस्मा आदित्या अध्यनो रदन्ति मित्रो अर्यमा वरुणः सजोषाः ॥४॥ पदार्थ:-हे अध्यापक और उपदेशका जनो (बाम) आप दोनों के जो (पृक्षासः) सींचने वाले (मधुमन्तः) मधुर आदि गुण विद्यमान जिन में वे (उत, अस्थुः) उठे और जो (सूर्यः) सूर्य लोक (शुक्रम्) शुद्ध (अर्णः) जल को (मा, नि ६३८ ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ६० ।। MAP अरहत) सब ओर से चढ़ाता और (यस्मै) जिसके लिये (प्रावित्याः) वर्ष के महीने (अध्वनः) मार्ग के मध्य में (रवन्ति) अाक्रमण करते हैं (सजोषाः) तुल्य प्रीति से सेवा करने योग्य (मित्रः) प्राण (वरुण:) जल' आदि (अर्यमा) बिजुली और मार्ग के मध्य में आक्रमण करते हैं उन सब को पाप लोग यथावत् जानो ॥४॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! अध्यापक और उपदेशक से विद्या को प्राप्त हुए आप लोग पृथिवी आदि की विद्या को जान कर धनवान् हूजिये ॥४॥ फिर विद्वान् क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । इमे चेतारो अनृतस्य भूरैमित्रो अर्यमा वहणो हि सन्ति । इम ऋतस्य वाधुर्दुरोणे शम्मासः पुत्रा अदितेरदब्धाः ॥५॥ पदार्थ:-हे विद्वानो जैसे (इमे) ये (मित्रः) सर्व मित्र (अर्यमा) न्यायकारी और (वरुणः) जल के सदृश पालक (भूरेः) बहुत प्रकार के (अनृतस्य) मिथ्या वस्तु के (चेतारः) उत्तम प्रकार ज्ञानयुक्त वा जनाने वाले (सन्ति) हैं और (इमे) जो (हि) निश्चित (शग्मास:) बहुत सुख से युक्त (अदितेः) अखण्डित न नष्ट होने वाली के (पुत्राः) पुत्र (अदब्धाः) नहीं हिंसा करने वाले (दुरोणे) गृह में बहुत प्रकार के (ऋतस्य) सत्य वस्तु के विज्ञान को (ववृधः) बढ़ाते हैं इससे वे सत्कार करने योग्य हैं ॥५॥ भावार्थ:-जो पूर्ण विद्यायुक्त क्त होते हैं वे ही सत्य और असत्यके जानने वाले होते हैं ॥५॥ फिर विद्वान् कैसे श्रेष्ठ होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इमे मित्रो वरुणो दूळासोऽचेतसं चिच्चितयन्ति दक्षः। अपि क्रतुं सुचेतसं वतन्तस्तिरश्चिदंईः सुपथा नयन्ति ॥६॥ पवार्थ:-जो (इमे) ये (दूळभासः) दुःख से प्राप्त होने योग्य विद्वान् (मित्रः) मित्र और (वरुण:) श्रेष्ठ पुरुष (दक्षः) सेनाओं वा चतुर जनों से (अपि) भी (प्रचेतसम्) अज्ञानी को (चित) भी (चित्तयन्ति) जनाते हैं मोर (सुचेतसम्) शुद्ध अन्तःकरण और (ऋतुम्) बुद्धि का (बतन्तः) सेवन करते हुए जन (सपथा) सुन्दर धर्मयुक्त मार्ग से (अंहः) अपराध को (चिर) भी (तिरः) निवारण में (नयन्ति) पहुंचाते हैं वे ही संसार में कल्याणकारक होते हैं ॥६॥ भावार्थ:-जो अज्ञानियों को शीघ्र विद्वान् करके सत्य धर्म के मार्ग से चलाकर पाप से पृथक् करते हैं वे ही इस संसार में दुर्लभ हैं ॥६॥ फिर कौन विद्वान् श्रेष्ठ होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ।

ऋग्वेदः मं० ७ । सू० ६० ॥ ama MOVIE LA इमे दिवो अनिमिषा पृथिव्याश्चिकित्वांसो अचेतसं नयन्ति । अनाजे चिन्नयो गाधर्मस्ति पारं नो अस्य विपितस्य पर्षन् ॥७॥ पदार्थः-- है मनुष्यो जो (इमे) ये (चिकित्वांसः) विज्ञान देते हुए (अनि- मिषा) निरन्तरता से (पृथिव्याः) भूमि प्रादि पदार्थ मात्र की और (दिवः) सूर्य आदि की विद्या को (अचेतसम्) जड़ बुद्धि को (नयन्ति) प्राप्त कराते हैं और (चित्) जैसे (प्रवाजे) जिसमें चलते हैं उस देश में (नद्यः) नदियां जाती हैं जो इन नदियों का (गाधम्) अथाह जल (अस्ति) है इससे (पारम्) परभाग को पहुंचाते हैं वैसे (मस्य) इस (विपितस्य) व्याप्त कर्म के पार को (नः) हम लोगों को (पर्षम्) पहुंचाते हैं वे ही विद्वान् करने को योग्य होते हैं ॥७॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन बिजुली और भूमि आदि सम्पूर्ण सृष्टि की विद्या को जानते हैं वे सब मनुष्यों को दुःख से पार ले जाने को समर्थ होते हैं ॥७॥ फिर कौन विद्वान् उत्तम होते हैं इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । यद् गोपावददितिः शर्म भद्रं मित्रो यच्छन्ति बरुणा सुदास । तस्मिन्ना तोके तनयं दधाना मा कर्म देवहेळंनं तुरासः ॥८॥ पवार्थ:-जैसे (अदितिः) विधायुक्त माता (मित्रः) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ (गोपायद) पृथिवी के पालन करने वाले राजा के सदृश (भत्रम्) सेवन करने योग्य सुखकारक (शम्भ) गृह को देते हैं वैसे (सुवासे) सुन्दर दाता जन जिस व्यवहार में (तस्मिन्) उसमें (तनयम्) विशाल उत्तम (तोकम्) सन्तान को (रधानाः) धारण करते हुए (यव) जो जन सबके लिए सुख (यच्छन्ति) देते हैं वे आप लोग (तुरास:) शीघ्र करने वाले हुए (देवहेलनम् } विद्वानों का जिसमें अनादर हो ऐसे (कर्म) कर्म को (मा) मत करें ॥८॥ भावार्थ:-- इस मन्त्र में वाचकलु-जो माता के, मित्र के और न्यायाधीश के सदृश सब को सत्य विद्या देकर सुख देते हैं और धार्मिक विद्वानों के अनादर को कभी भी नहीं करते हैं और सब सन्तानों की ब्रह्मचर्य और विद्या में रक्षा करते हैं वे ही सम्पूर्ण जगत् के हित चाहने वाले होते हैं ।।। फिर मनुष्य क्या करें और क्या न करें इस विषय को कहते हैं । अव वेदि होत्राभिर्यजेत रिपः काश्चिद्वरुण-तः सः । परि द्वेषोभिरर्यमा Bणक्तूहं सुदासें वृषणा उ लोकम् ।।९।। MSRM ६४० ऋग्वेदः मं०७। सू०६०॥ FRAM what ANA पदार्थः-जो (होत्राभिः) हवन की क्रियाओं वा वारिणयों से (वेविम्) हवन के निमित्त कुण्ड का (यजेत) समागम करे और जो कोई (चित) भी (काः) किन्हीं (रिपः) पापस्वरूप क्रियाओं का (अव) नहीं समागम करे (सः) वह (वरुणधृतः) श्रेष्ठ से स्थिर किया गया (अर्यमा) न्यायाधीश (द्वेषोभिः) द्वेष से युक्त जनों के साथ (परि) सब ओर से (वृणक्त) पृथक् होवे तथा (उरुम्) बहुत सुखकारक और विस्तीर्ण (लोकम्) लोक को (उ) और (वृषणो) दो बलिष्ठों को (सुदासे) उत्तम प्रकार दान जिसमें दिया जाय ऐसे कर्म में प्राप्त होवे ॥६॥ भावार्थ:-जो विद्वान् जन वेद से युक्त वाणियों से सम्पूर्ण व्यवहारों को सिद्ध करके और दुष्ट क्रियाओं और दुष्टों का त्याग करते हैं वे ही उत्तम सुख को प्राप्त होते हैं ॥६॥ फिर वे विद्वान् जन क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं । सस्वश्चिद्धि समृतिस्त्वेष्येषामपीच्येन सहसा सहन्ते । युष्मद्भिया Bषणो रेज॑माना दक्षस्य चिन्महिना मुळता नः ॥१०॥ पदार्थ:-जो (हिं) निश्चित (सस्वः) मध्य में चलते हुए हैं (चित्) और (एषाम्) इनकी (त्वेषी) प्रकाशमान (समृतिः) उत्तम प्रकार सत्य क्रिया है (अपी- च्येन) जिससे चलता है उस में हुए (सहसा) बल से (सहन्ते) सहते हैं उनके लिए मौर (युष्मत) आप लोगों के समीप से (भिया) भय से (रेजमानाः) कांपते और चलते हुए (वृषणः) बलिष्ठ काँपते हुए जाने वाले होते हैं वे आप लोग (वक्षस्य) बल (महिना) महत्व से (चित) भी (न:) हम लोगों को (मळत) सुखयुक्त करें॥१०॥ भावार्थ:-हे मनुष्यो ! जिसकी सत्य बुद्धि, विद्या, नीति, सेना और प्रजा वर्तमान है वही शत्रुओं को सहता हुआ सब को सुखयुक्त करता है वह महिमा से मानन्दित होता है ॥१०॥ फिर विद्वान् क्या करें इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। यो ब्रह्मणे सुमतिमायजाते वाजस्य सातौ परमस्य रायः । सीक्षन्त मन्यु मघवानो अर्य उरू क्षयाय चक्रिरे सुधातु ॥११॥ पदार्थ:-हे मनुष्यो (य:) जो (परमस्य) श्रेष्ठ (वाजस्य) विज्ञान और (रायः) धन के (सातौ) उत्तम प्रकार बांटने में (ब्रह्मणे) धन के वा परमेश्वर के लिये (सुमतिम्) उत्तम बुद्धि को (मायजाते) स सब प्रकार से प्राप्त होवे और जो (मघ- वानः) अत्यन्त धन से युक्त (मर्यः) यथावत् जानने वाले (मन्युम्) क्रोध को (सीक्षन्त) सम्बन्धित करते हैं और (क्षयाय) निवास के लिये (उरु) बड़े (सधातु) ऋग्वेद: मं०७ । सू०६१।। १४१ सुन्दर धातु सुवर्ण आदि जिसमें उस गृह को (चक्रिरे) सिद्ध करते हैं वे ही लक्ष्मीवान् होते हैं ॥११॥ भावार्थ:-जो मनुष्य ईश्वर के विज्ञान के, उत्तम धन के लाभ के और श्रेष्ठ गृह के लिये क्रोध प्रादि दोषों का परित्याग कर के प्रयत्न करते हैं वे सम्पूर्ण सुखों से युक्त होते हैं ॥११॥ फिर विद्वानों से क्या किया जाता है इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं। इयं देव पुरोहितियुवभ्यां यज्ञेषु मित्रावरुणावकारि । विश्वानि दुर्गा पिपृतं तिरो नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥१२॥ पदार्थ:-हे (मित्रावरुणो) प्राण' और उदान वायु के सदृश वर्तमान अध्यापक और उपदेशक जनो (देवा) दाता दोनों (युवभ्याम्) आप दोनों से (यशेषु) विद्वानों के सत्काररूपी यज्ञ कर्मों में (इयम्) यह (पुरोहितिः) पहले हित की क्रिया (अकारि) की जाती है वे दोनों प्राप' (न:) हम लोगों के लिये (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुर्गा) दुःख से जाने योग्य कामों का (तिर:) तिरस्कार कर के आप दोनों (पिपु. तम्) पूर्ण करिये और हे विद्वान् जनो (यूयम्) आप लोग (स्वस्तिभिः) कल्याणों से नः) हम सब मनुष्यों की (सदा) सब काल में (पात) रक्षा कीजिये ॥१२॥ भावार्थ:-हे प्रध्यापक और उपदेशक जनो! जैसे प्राप दोनों सब के हित को करें वैसे हम लोगों के दुष्ट व्यसनों को दूर कर के सब काल में हम लोगों की वृद्धि करें ।।१२।। इस सूक्त में सूर्य आदि के दृष्टान्तों से विद्वानों के गुण और कृत्य के वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति इससे पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये ।। यह सप्तम मण्डल में साठयां सूक्त समाप्त हुमा ।। अथ सप्तस्यैकषष्टितमस्य सूक्तस्य वसिष्ठषिः। मित्रावरुणो देवते । २ । ४ त्रिष्टुम् । ३ । ५ । ६ । ७ निवृत्रिष्टुप् छन्दः । धैवतः स्वरः । १ भुरिपक्ति- अब सात ऋचा वाले इकसठवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अब अध्यापक और उपदेशक कैसे होवें इस विषय को कहते हैं । उद्वां चक्षुर्वरुण सुप्रतीकं देवयोरेति सूर्यस्ततन्वान् । अभि यो विश्वा भुवनानि चष्टे स मन्यु मत्येष्वा चिकेत ॥१॥ Mee ....... .....none1011-....... ९४२ ऋग्वेदः मं०७ । सू० ६१ ।। Hary - पदार्थ:--हे (वरुणा) श्रेष्ठो (देवयोः) विद्वान् जो (वाम्) आप उन दोनों के जिस (सुप्रतीकम्) उत्तम प्रकार रूप आदि के ज्ञान कराने वाले (चक्षुः) चक्षु इन्द्रिय को कि जिससे देखता है (ततन्यान्) विस्तृत करता हुआ (सूर्यः) सूर्यमण्डल जैसे (उद, एति) उदय को प्राप्त होता है और (यः) जो मनुष्य (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) भुवनों को (अभि, पष्टे) जानता है (सः) वह (मत्र्येषु) मनुष्यों में (मन्युम्) क्रोध को (आ) सब प्रकार से (चिकेत) जाने वैसे आप दोनों करिये ॥१॥ भावार्थ:-इस मन्त्र में वाचकलु०-हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करता है वैसे अध्यापक और उपदेशक जन सब के प्रात्माओं को प्रकाशित करते हैं ॥३॥ फिर वे दोनों कैसे हों इस विषय को कहते हैं। प्र वा स मित्रावरुणावृतावा विप्रो मन्मानि दीर्घश्रुदियति यस्य ब्रह्माणि मुक्रतू अवाय आ यत्क्रत्वा न शरदः पृणैथें ।।२।। पदार्थः-हे । मित्रावरुणौ) प्राण और उदान वायु के सदृश वर्तमान अध्या- पक और उपदेशक जनो (सः) वह (ऋतावा) सत्य का सेवन करने और (दीर्घश्रत) बहुत शास्त्रों को वा बहुत काल पर्य्यन्त शास्त्रों को सुनने वाला (विप्रः) बुद्धिमान् जन (वाम्) आप दोनों के (मन्मानि) विज्ञानों को (इत्ति) प्राप्त होता है (यस्य) जिसके (ब्रह्माणि) धनों को (सक्रतू) सुन्दर बुद्धि से युक्त होते हुए आप (प्र, अवाथ:) रक्षा करें और (यत्) जिसकी (ऋत्वा) बुद्धि से (न) जैसे पदार्थों को वैसे (शरवः) शरद् आदि ऋतुओं को (मा, पूर्णथे) अच्छे प्रकार पूरो उन प्राप दोनों का हम लोग निरन्तर सत्कार करें ॥२॥ भावार्थ:-हे विद्वानो! जो बहुत काल पर्यन्त ब्रह्मचर्य से शास्त्रों को पढ़ता है वही बुद्धिमान् होकर सब मनुष्यों की रक्षा करने को समर्थ होता है ॥२॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां श्रीपरमविदुषां विरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिना निर्मिते संस्कृतार्यभाषाभ्यां समन्विते सुप्रमाणयुक्ते ऋग्वेदभाष्ये सप्तमे मण्डले चतुर्थानुवाक एकषष्टितमे सूक्ते पञ्चमाष्टके पञ्चमाध्याये तृतीयवर्गे द्वितीयमन्त्रस्य भाष्यं समाप्तम् ।। उक्तस्वामितं भाष्यं चैतावदेवेति ॥ सं० १९५६ वि० प्राषाढ कृष्णा ५ को छपके समाप्त हुभा ॥

. - * ओ३म् * वेदभाष्य के लिए दानदाता महानुभाव जिन्होंने ५०००) रुपया प्रदान किया १. श्री मन्त्रीजी आर्यसमाज काकड़वाड़ी, गिरगांव, वी० पी० रोड बम्बई ५०००) २. श्री जयदेवजी आर्य, ३१० सत्य बिल्डिंग, शीर्ष सकिल, बम्बई-२२ ५०००) ३. श्री प्रो० पी० गोयल-मैसर्स एयर ट्रांसपोर्ट कार्पोरेशन, ३/५ आसफअली रोड, नई दिल्ली? ५०००) ४. मैसर्स रैनबक्सी लेबोरेट्रीज प्रा. लिमिटेड, अोखला, नई दिल्ली ५०००) ५. श्री सरदारीलालजी अग्रवाल, C/0 वेल्डन इलैक्ट्रिकल्स बम्बई ५०००) ६. श्री सेठ योगेन्द्र भाई मफतलालजी बम्बई ५०००) ७. श्री आदित्य प्रतापसिंह शूरजी, कच्छ कैसल, वी० पी० रोड, बम्बई ५०००) ८. श्री मैसर्स मोहन मिकिन व रीज', मोहननगर-गाजियाबाद ५०००) ६. श्री सदाजीवितलालजी, पंजाबी चन्दू हलवाई, बम्बई ५०००) १०. श्री पी० डी० सिंहजी, राजगृह, २६ रास्ता, बान्द्रा, बम्बई ५०००) ११. श्री मा० शिवचरणदास जी, ११३ दरयागंज, दिल्ली-६ ५०००) जिन्होंने ३२००) रु० प्रदान किया १. श्री सेठ धरमसी मूलराज खटाऊ, दि खटाऊ मकनजी स्पिनिंग एण्ड वीविंग कं० लि०, लक्ष्मी बिल्डिंग, वेलार्ड स्ट्रीट, बम्बई-१ ३२००) जिन्होंने २०००) रु० प्रदान किया १. श्री आर० के०. मेहरा चेरिटेबल ट्रस्ट द्वारा श्री मोहनलाल भयाना, सी० ५४ महारानी बाग, नई दिल्ली-१४ २०००) - . मा ( ६४४) जिन्होंने १००१) रु० प्रदान किया १. श्री जगदीश चड्ढा जी द्वारा पावर इंजीनीयरिंग कम्पनी, ४६५ । ४६७ कालबादेवी रोड, बम्बई-२ १००१) २. मैसर्स मोहिन्द्रनाथ एण्ड कम्पनी, डब्ल्यू ६०, ग्रेटर कैलाश, नई दिल्ली १००१) ३. श्री के० एस० दिग्विजय सिंह जी, दरबारगढ़ खरेड़ी,जामनगर १००१) ४. श्री जोशी बुढ़ा काका महिम हलवा वाला बम्बई १००१) ५. श्री मैसर्स ब्रजवासी दुग्धालय प्रा. लि. कालबादेवी रोड बम्बई १००१) जिन्होंने १०००) रु० प्रदान किया १. श्री डा० दुःखनराम जी, ब्रजकिशोर पथ, पटना (बिहार) १०००) २. श्री बा० सोमनाथ जी मरवाहा एडवोकेट, ८ मलकागंज, दिल्ली-७ १०००) ३. श्री दीवान रामशरणदास जी मण्डी केसरगंज, लुधियाना १०००) ४. श्री सेठ भगवतीप्रसाद जी गुप्त, सागर विहार होटल, बम्बई १०००) ५. श्री बाबूलालजी गुप्त, बुद्धिभवन, सूबे की गोठ, लश्कर (ग्वालियर) १०००) ६. श्री पं० मनोहर जी विद्यालंकार, ईश्वरभवन, खारीबावली, दिल्ली-६ १०००) ७. श्री ला० ज्योति प्रसादजी प्रधान आर्यसमाज' दीवानहाल, दिल्ली-६ १०००) ८. श्री गजानन्द जी आर्य, ६६ मुक्ताराम बावू स्ट्रीट, कलकत्ता-७ १०००) ६. श्री राय साहब चौधरी प्रतापसिंह जी, माडल टाऊन, करनाल १०००) १०. श्री ला० दीवानचन्द जी ३३ बी पूसा रोड, नई दिल्ली-५ १०००) ११. श्री सत्याचरण शर्मा, रिटायर्ड फोरेस्टरेंजर पाटी गली के आगे, मुहल्ला छपेटी, इटावा (उ० प्र०) १०००) १२. श्री स्वामी देवानन्द जी महाराज ग्राम कुन कुरा पो० इचौली (मेरठ) १०००) १३. श्रीमती प्रेमदेवी दर्गन, द्वारा श्री प्रासकरन दास सरदाना, ८, सरक्यूलर एवेन्यू, ईस्ट नांगल टाऊन शिप (पंजाब) १०००) १४. श्री गोविन्द भाई के० नन्दवाना, २५६ बी० पी० मार्ग बम्बई-४ १०००) १५. श्री प्रोम्प्रकाश जी मेहरा, प्रेम कुटीर, थर्ड फ्लोर, मैरिन ड्राईव, बम्बई १०००) १६. श्री रतनचन्द जी श्री रतनचन्द चैरीटेबल ट्रस्ट, १६ गाल्फलिंक रोड, नई दिल्ली-३ १०००) १७. धी गुलजारीलाल जी आर्य, ८०८२ नागदेवी स्ट्रीट, बम्बई-३ १०००) १८. श्री गण्डाराम जी मेहता, भारत टिम्बर, रे० रोड, बम्बई-१० १०००) १६. श्री जीवनदास जी चारला, मलकागंज, दिल्ली-७ १०००) , - (९४५) - . , - - २०. श्री श्रवणकुमार जी विद्यालंकार, देसरी (बिहार) १०००) २१. श्री हरिश्चन्द्र जी खन्ना, म० न० ३४७, गली परजा, अमृतसर १०००) २२. श्री डा० जगन्नाथ जी, भगवती देवी, कूचा घासीराम, दिल्ली-६ १०००) २३. श्रीमती माता जानकी देवी जी तथा पुत्र श्री किशनदास जी, २६५ कूचा घासीराम, फतेहपुरी, दिल्ली-६ १०००) २४. मै० अमर डाई स्टफ्स कम्पनी, अतुल प्रोडक्ट्स, क्लाथमार्केट दिल्ली-६ १०००) २५. श्री मन्त्री जी आर्यसमाज, आर्यसमाज रोड, जामनगर (गुजरात) १०००) २६. श्री रामजीप्रसाद जी गुप्त, पूर्णमासी भवन, मुगलसराय (वाराणसी) १०००) २७. श्री प्राचार्य जी गुरुकुल सूपा (जि० नवसारी) गुजरात १०००) २८. मैसर्स हरिनगर शुगर मिल्स बम्बई, द्वारा श्री राजा नारायण लाल, मालावार हिल, बम्बई १०००) २६. श्री डा नारायण दास जी, फिजीशियन एण्ड आई स्पेशलिस्ट, फैसी बाजार, गोहाटी (मासाम) १०००) ३०. श्री लेखराज जी गुप्त, ४७ ए जैसावाला फोर्ट, बम्बई १०००) ३१. श्री राजेश गुप्ता जी, १०३२८ मोतियाखान, नई दिल्ली-५५ १०००) ३२. श्री जगदीशचन्द्र भयाना जी, पार ४१ ग्रेटर कैलाश, नई दिल्ली-४८ १०००) ३३. मैसर्स कंवर किशन सिंह भयाना एण्ड कं०, सी० ५४ महारानी बाग, नई दिल्ली-१४ १०००) ३४. पन्नालाल जी मित्तल, सुभाष नगर, देहरादून (उ० प्र०) ३५. श्री मन्त्री जी आर्यसमाज दीवानहाल, दिल्ली-६ १०००) ३६. श्री मन्त्री जी आर्यसमाज बाजार श्रद्धानन्द, अमृतसर (पंजाब) १०००) ३७. श्री मन्त्री जी, आर्य केन्द्रीय सभा, १५ हनुमानरोड, नई दिल्ली-१ ३८. श्री मन्त्री जी आर्यसमाज, १६ विधानसरणि, कलकत्ता-६ ३६. श्री मन्त्रीजी आर्यसमाज, १४ रवीन्द्रसररिण, बड़ा बाजार, कलकत्ता १००० ४०. श्री मन्त्री जी आर्यसमाज, बोकारो स्टील सिटी (धनबाद) बिहार १०००, ४१. श्री गुरुदास राम भण्डारी, ८३ बज्यूक्रीसेण्ट एस० यू० कैल्गरी, १४ अलबेटा, कनाडा १०००) ४२. श्री एल० के० नन्दवाना जी, प्यूपिल्स बैंक बिल्डिंग, थर्ड फ्लोर, भद्र, महमदाबाद-६ १०००) ४३. श्री प्रोंकारनाथ जी, १५४ २० रोड, बम्बई-१० ४४. श्री छगनलाल जी विजयवर्गीय, बेगम बाजार, हैदराबाद १००० ४५. श्री बनवारीलाल राधेमोहन जी, श्रद्धानन्द बाजार, दिल्ली-६ १०००) "

( ६४६ )
४६. श्री मन्त्री जी आर्यसमाज करोलबाग, नई दिल्ली-५
१०००)
४७. श्री वीरेन्द्र जी एम० ए० जालन्धर
१०००)
४८. श्री नारायणदास जी जुनेजा, बान्द्रा, बम्बई
१०००)
४६. श्री ला० रामगोपाल जी शालवाले मोती बाजार चांदनी चौक दिल्ली १०००)
५०. श्री आनन्दीलाल पोद्दार चैरीटेबल ट्रस्ट, ३६ चौरंगी रोड कलकत्ता १०००)
५१. श्री राधा कृष्ण जी जालान, जालान हाऊस, झरिया
१०००)
५२. श्री बालगोविन्द जी एडवोकेट, राँची
(द्वारा श्री डा० डी० राम जी सभाप्रधान)
१०००)
५३. श्री रघुवीरप्रसाद गुप्त २२३/डी० विधानसरणि कलकत्ता-६ १०००)
५४. श्री लक्ष्मीनारायण राधाकिशन कटरा प्यारेलाल चाँदनी चौक दिल्ली १०००)
सभी दान दाताओं का हार्दिक धन्यवाद
श्रोम्प्रकाश त्यागी
मन्त्री-सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा
महर्षि दयानन्द भवन, नई दिल्ली-१

मा
आर्य समाज
बम्बई.४
आर्य समाज काकड़वाड़ी
विट्ठलभाई पटेल रोड, बम्बई.४ ने वेदभाष्य प्रकाशनार्थ
पाँच हजार रुपये प्रदान किए-धन्यवाद !

.
पाँच हजार रुपया वेदभाष्य प्रकाशनार्थ देने वाले महानुभाव
श्री प्रो० पी० गोयल जी दिल्ली
श्री जयदेव जी प्रार्थ, बम्बई
माननीय श्री सेठ प्रतापसिंह शूरजी वल्लभदास बम्बई ने
अपने चि० सुपुत्र श्री आदित्य जी के शुभ विवाह के
अवसर पर ५००० ) रुपये सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि
सभा नई दिल्ली को वेदभाष्य के प्रकाशन में
सहायतार्थ प्रदान किये।

धर्मपरायणा स्व. श्रीमती राजदेवी जी
(धर्मपत्नी श्री प्रद्युम्नसिंह जी बम्बई)
श्रापका ३१-८-७२ को बम्बई में स्वर्गवास हो गया । आपने अपने
जीवनकाल में ही वेदभाष्य की महायतार्थ सभा को
५.०००) रुपये प्रदान करने का संकल्प किया था ।

श्री स्वामी चिन्मयानन्द जी
महाराज
श्रीयुत भाई ज्ञानचन्द जी
आपके सुपुत्र श्री भाई मोहनसिंह जी,
मनजिरा . डायरेक्टर रेनवमी लेबोरेट्रीज
आखला दिल्ली ने ५०००) वेदभाध्य के लिए
मार्वदेनिक आर्य प्रतिनिधि सभा नई दिल्ली
को महायतार्थ प्रदान किये
आपक श्रद्धालु भक्त श्री सहा-
जीवित लाल जी बम्बई निवासी ने
पांच हजार रुपये बदभाष्य के लिये
मालिक
पाय
प्रतिनिधि सभा
नई दिल्ली को प्रदान किय।
श्री मास्टर शिवचरणदास जी
दरियागंज दिल्ली ने वेदभाष्य की
सहायतार्थ पाँच हजार रुपये
प्रदान किये।

Rigved Bhasha Bhashaya Pancham Mandalam

Title
Rigved Bhasha Bhashaya Pancham Mandalam
File name
Rigved Bhasha Bhashaya Pancham Mandalam
Text
OCR done
Publisher
Null
Language
Sanskrit
Pages
954
Library
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DLI number
273765
Barcode
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