Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Kavymala-9
Front matter
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समर्पण श्रीमान् माननीय प्रातःस्मरणीय पूज्य गुरुदेव श्री १००८ श्री श्री श्री शार्दूलसिंहजी म० सा की परम पवित्र सेवा में:- आपसे सीसी गुरु ! यह बाल लेखन की कला । आपके उपकार को कैसे भुलादूं मैं मला ।। यह पुस्तिका कर कमल में स्वीकार करना दाम की । करना क्षमा गुरुदेव ! जो हो त्रुटि बाल विलास की। भवदीय चरणरज- मुनि रूपचन्द्र जैन
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I जनोपदेशक पंच गलबन्न नराणा -
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भूमिका
श्री राम-गुण रसिक प्रिय पाठकगण !
का
महत्व
रामायण अखिल संसार के तत्वों का सार, आत्म कल्याण का
आधार और नर तन जीवन का निर्धार नियमतः ज्ञानी
जनों ने सत्य और सदाचार ही को फम्माया है।
सत्य सदाचार ही आत्मधर्म है, सत्य सदाचार ही
आध्यात्मिक कर्म है, विशेप तो क्या कहें पर सत्य सदाचार ही
धर्म का मर्म हैं।
संसार में सत्य और सदाचार को जिन पुरुषों ने हृदय
से धारण किया है उन्हीं महापुरुषों का आत्म-कल्याण हुआ
था, होता है, और होगा। सत्य-सदाचारी पुरुषों की ही
संसार में जय विजय हुआ करती है, ऋद्धियों सिद्धियों
लब्धियों व शक्तियों सत्य-सदाचारी मानव के चरणारविदों में
सदैव दास दासियों की तरह नतमस्तक हो हाजिर रहा करती
है और अधिक तो क्या पर सत्य-सदाचारी की देव, दानव,
सुर असुर किन्नर समी नमीभूत हो सेवा करते हैं । यथा-
देव दानव गंधवा, जक्ख रक्खस किनरा ।
बम्भयारि नमंसन्ति, दुकरं जे करन्ति ते ।।
उत०अ०६था १६
और जिस पुरुष में सत्य सदाचार की तपचर्या है, उस मानव
में सब प्रकार की तपश्चर्या है, कहा मी है फि-"तबेसु वा उत्तम
-
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आवश्यकता
का निर्माण किया था। तदन्तर स्वल्पज्ञों के हितार्थ संगीतमय
रामायण की कृति कवि 'केशराजजी' ने की है। अन्यान्य
जैन कवियों ने भी यथाशक्ति 'रामायण' पर लेखनी चलाई
परन्तु उपरोक्त कवियों की कविता जितनी प्रख्याति में प्राई
उतनी अन्य कवियों की नहीं। अस्तु,
जन पद्य रामायण पाठक महाशय ! जैन पद्य रामायण का प्रका-
के प्रकाशन की शन क्यों किया जा रहा है और इसमें क्या
अधिकता है ? इत्यादि के उत्तर में इतना कहना
ही पर्याप्त होगा कि 'केशराजजी' रचित रामयश का प्रकाशन
कितने ही वी के पहले हुआ था, मगर उसकी इस समय
उपलब्धि विशेषतः कम होती है और स्थानकवासी जैन समाज
में उसकी पूर्ण आवश्यकता भी है । बस इसी की पूर्ती करने
के निमित्त ही इस जैन पद्य रामायण का प्रकाशन किया
जा रहा है।
इसमें अधिकता मी रहेगी वह यह कि इस जैन पद्य
रामायण में कवि केशराजजी के सिवा अन्य जैन व अजैन
कवियों की प्रसंगोपात सुन्दर रचनायें भी प्रविष्ट की गई है।
संशोधन का खयाल तो पूर्ण रूप से रहा ही है पर उससे भी
अधिक कागज कम्पोज-साइज बाइंडिंग श्रादि पुस्तक का
कलेवर भी पूर्ण रूप से सजाया गया है । इसमें विशेष सुविधा
तो यह रही है कि पुस्तक बहुत बड़ी शानदार व सजिन्द होने
पर भी स्वन्प मूल्य रख कर ग्राहकों के हाथ दी गई है ।
सग्राहजी इसके संग्रहकर्ता श्रोसवाल वंश वीशा खानदान के
सुराणा जाति के जनोपदेशक वैद्य धूलचन्दजी है
परिचय
भापका जन्म मरुधर देश पीपाड़ सीटी में सं १९४५
२ व श्री गोस्वामी तुलसीदासजी और राधेश्याम आदि कवियों यम्भचेरं" "सत्यं चेत्तपसा च कि" इत्यादि आर्य वचनों से स्वयं सिद्ध ही है और सत्य सदाचार से रहित मानव कितना ही जप तप तीर्थ व्रत त्याग क्रिया कर्म करले पर प्रात्म-कल्यास होना महा दुष्कर है, क्योंकि यय धर्म कर्म का मर्म सत्य सदा- चार ही है, इसके विना न धर्म है न कर्म और न कल्याण है। अग्नि का जल चना देना, जल का थल बना देना महा भयंकर शेर का श्यार कर देना, और झंखार सर्प की फूलों की माला बना देना इत्यादि शक्तियां सत्य सदाचार प्रताप से ही उत्पन्न हुआ करती है । जैन-पद्य अब इसके उदाहरण के लिए पुरुप-पावन श्री राम और रामायण का सती शिरोमणि श्री सीताजी का जीवन चरित्र ही जैन पद्य-रामायण पाठकों की सेवा में पेश कर रहा हूं। रामायम का श्राशय यही है कि राम+अयन यानि राम का मार्ग अर्थात् रामचन्द्रजी जिस न्याय-नीति का आश्रय लेकर चले थे अथवा जिस सदाचार के मार्ग पर प्रगति की उसका जिसमें दिग्दर्शन किया गया हो उसी का नाम रामायण है। रामायण का महत्व जैन दर्शन व अजैन दर्शन में सर्वत्र अति श्रादर से माना गया है, जैनेतर दर्शन में आदि कवि वाल्मीक परिचय पर्याप्त होगा, अतएव यह ने रामायण की बड़ी रसीली रचना की है और जैन दर्शन में पहले पहल श्री हेमचंद्राचार्यजी ने संस्कृत भाषा में 'रामायण'
का निर्माण किया था। तदन्तर वल्पज्ञों के हितार्थ संगीतमय
रामायण की कृति कवि 'केशराजजी' ने की है। अन्यान्य
जैन कवियों ने भी यथाशक्ति 'रामायण' पर लेखनी चलाई
परन्तु उपरोक्त कवियों की कविता जितनी प्रख्याति में भाई
उतनी अन्य कवियों की नहीं। अस्तु,
जन पद्य रामायण पाठक महाशय ! जैन पद्य रामायण का प्रका-
के प्रकाशन को शन क्यों किया जा रहा है और इसमें क्या
आवश्यकता
अधिकता है ? इत्यादि के उत्तर में इतना कहना
ही पर्याप्त होगा कि 'केशराजजी' रचित रामयश का प्रकाशन
कितने ही वर्षों के पहले हुआ था, मगर उसकी इस समय
उपलब्धि विशेषतः कम होती है और स्थानकवासी जैन समाज
में उसकी पूर्ण आवश्यकता भी है । बस इसी की पूर्ती करने
के निमित ही इस जैन पद्य रामायण का प्रकाशन किया
जा रहा है।
इसमें अधिकता भी रहेगी वह यह कि इस जैन पद्य
रामायण में कवि केशराजजी के सिवा अन्य जैन व अजैन
कवियों की प्रसगोपात सुन्दर रचनायें भी प्रविष्ट की गई है ।
संशोधन का खयाल तो पूर्ण रूप से रहा ही है पर उससे भी
अधिक कागज कम्पोज-साइज बाइंडिंग थादि पुस्तक का
कलेवर भी पूर्ण रूप से सजाया गया है। इसमें विशेष सुविधा
तो यह रही है कि पुस्तक बहुत बड़ी शानदार व सजिन्द होने
पर भी स्वल्प मूल्य रख कर ग्राहकों के हाथ दी गई है।
गाइफजी इसके संग्रहका ओसवाल वंश वीशा खानदान के
सुराणा जाति के जनोपदेशक वैद्य धूलचन्दजी है।
परिचय
भापका जन्म मरुधर देश पीपाड़ सीटी में सं १९४५
रा
में
की साल में कार्तिक वदि चतुर्दशी (दीवाली ) के दिन हुआ
आप बचपन से ही विद्यारसिक है । किन्तु श्रापकी बालकाल
ही चेचक ( माता) की बीमारी से नजर चली गई थी, क्या
किया जाय “ कर्मणो गहना गतिः" कर्मो के आगे किसका
जोर चल सकता है । बस आप प्रज्ञाचक्षु रहने पर भी वाणिज्य
कला में पूर्ण प्रवीन बन गये और प्रत्येक कर्तव्य में आपकी
कुशलता को देख कर बहुत से महाशय दंग होजाते हैं ।
ज्योतिष शास्त्र में आपकी अच्छी गति है और वैद्यक शास्त्र
तो आपका पूरा अधिकार है, आप जैन-वैद्य हैं, इलाज भी
आपका ठीक ही हुआ करता है और औपधियों का निर्माण
भी आप अपने ही हाथों किया करते हैं आपको नाडीज्ञान में
भी काफी सफलता प्राप्त हुई हैं । जैन सूत्रों का तो आपको
बोध बचपन से ही है।
आपके दिल में यह भावना कितने ही अर्से से थी कि
'रामायण' का संग्रह करवा कर प्रकाशन करूं मगर श्राप प्रज्ञा-
चक्षु रहे अतः आप लिख नहीं सकने के कारण यह भावना
मन ही मन रही।
अच्छी भावना प्रत्येक प्राणी की समय पाकर हो ही
जाती है, फलस्वरूप लेखकजी का भी संयोग मिल गया और
पुस्तक भी तैयार होगई।
इस पुस्तक के लिखने का परिश्रम मरुस्थलीय श्रीमज्जै-
नाचार्य त्यागमूर्ति प्रसिद्ध पूज्य श्री श्री १००८ श्री चौथमल्लजी
महाराज साहब की सम्प्रदायस्थ शान्त दान्त विमल वैरागी
सकल कुवासना त्यागी यम नियम निष्ठ सकल गुण विशिष्ट
स्थविर पद विभूपित श्रद्धेय पूज्य गुरुदेव प्रवर्तक स्वामीजी श्री
श्री 'शार्दूलसिंहजी' म० सा० के प्रधान शिष्य सरल हृदय
कवि मुनि श्री 'रूपचन्द्रजी' म० सा ने हमारे अतीव आग्रह से आपने अपना अमूल्य समय देकर जो उदारता प्रकट की है एतदर्थ संग्राहक आपका पूर्ण आभारी है । अब भापको यह भी मालूम कर देता हूं कि "जैन पद्य रामायण" में किन २ कवियों की रचना संग्रह की गई है। मुस्यता में तो कवि 'केशराजजी' की मूल रायायण है, फिर पूज्य श्री जयमल्लजी म. सा. की सम्प्रदाय के पंडित मुनिश्री रामचन्द्रजी म० की कविता व श्री व्याख्यान वाचस्पति स्वामीजी श्री नथमल्लजी म. सा. की विशेष कविता ली गई है, श्राप दोनों सर्व गुण सम्पन्न व महान प्रतापी महात्मा थे, श्राप दोनों की कविताएं काफी विद्यमान है। तीसरे नम्मर में स्वामीजी श्री नथमलजी म० मा के प्रधान शिष्य कविकुल कुमुद कलाधर स्वामीजी मन्त्री श्री चौथमल्लजी म. सा० की कविता का संग्रह किया गया है । चौथे नम्बर में स्वामीजी प्रात्मार्थी मुनि श्री रावत- गलजी म. सा. की कविता का संग्रह किया गया है। पांचवें नम्बर में श्रीमज्जैनाचार्य श्री श्रमसिंहजी म० मा० के सम्प्रदानुयायी स्वामीजी श्री नेमीचन्दजी म. की कविता भी संकलित की गई है जोकि शांत मुनिश्री नारायण- दासजी म० सा० की कृपा से प्राप्त हुई है। श्री पूज्य प्रखर पण्डित वादीगज केमरी रेखराजजी म० के शिष्य श्री नध- मल्लजी म० की अनुपम कविता भी इसमें डाली गई है। छठे नम्बर में श्रीमान् दिवंगत पूज्य श्री १००८ श्री कानमलजी म. के सुशिष्य न्यायरत्न साहित्य-प्रेमी कविता कामिनीकान्त युवक हृदय पंडितरत्न श्री चैनमलजी म. की ६ यद्यपि बहुत साहित्य सुधार सरसित है तथापि पहिले खण्ड में हनुमानजी की उत्पति के प्रसंग में थोड़ा सा अंजना का भी अधिकार केशराजजी ने अपने रामयश में लिया है तदनुमार हमने भी उस 'सती अंजना' से खास खास मौके पर गायन लिखे हैं आपकी बनाई हुई कई पुस्तकें हैं । सातवें नम्बर पूज्य गुरुदेव श्री शार्दुलसिंहजी म० सा० के सुशिष्य मुनिशी रूपचन्द्रजी म. सा० की कविता का संक- लन चारों ही खण्डों में किया गया हैं इस ग्रंथ को संशोधन करने का कष्ट श्रापही ने किया है । श्रापकी बनाई हुई कई पुस्तकें हैं वे सब एक एक से बढकर हैं । पाठवें नम्बर में श्रीमान् जैनोपदेशक वैद्य धृलचन्दजी सुराणा की सरस व अतीव उपयोगी कविता का संग्रह समग्र ग्रंथ में किया गया है। अवशेष में श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजी की कविता का व राधेश्यामजी की कविता का भी प्रसंग २ पर और अमृतलालजी माथुर (जोधपुर निवासी) की कविता का भी संग्रह है जोकि ग्रंथ समाप्ति के बाद उपलब्ध होने से परिशिष्ट में लिखी गई है इत्यादि कवियों की मौलिक कविता का इस (जैन पध रामायण ) में संग्रह किया गया है । अव पाठकों के सम्मुख एक और शब्द कह कर इस भूमिका को यहीं समाप्त करता हूं तथा साथ ही शुद्धिपत्र जो इसके साथ दिया गया है उसकी सहायता लेते रहें और भी कोई गलती रह गई हो तो कृपया संग्रहाकजी को सूचित करें जिससे द्वितीयवृति शुद्ध प्रकाशित हो सके। पं. बालकृष्ण उपाध्याय आपका- - * श्रीमतेऽहते नमः * णमुत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरस्स श्री जैन पद्य रामायण का: ** प्रथम खण्ड *** दोहा वेला-बलरागे श्री "मुनिसुव्रत'' स्वामीजी, त्रिभुवन तारण देव, तीर्थकर प्रभुवीशमो, सुरनरसारे सेव ॥१॥ पुत्र "सुमित्र" नरेन्द्रनो, “पउमावई।१ तसुमाय । जन्मभूमि जिनवर तणी, राजगृह" कहिवाय ॥२॥ अवतरिया "हरिवंशमें", "हरि" साचविया चार । "कल्याणक" पांचेमला, नामसदा जयकार ॥३॥ चरण कमल तेहना नमी, "राम" सु "लिछमन" राय । "सीता" ने "रावण' तणूं, "चरित" रचूं सुखदाय ॥४॥ सुखदाई सहुलोकने. "रामकथा" अभिराम | श्रवण सुणन्त सरेसही, मनना वंछित काम ॥५॥ "रा" उच्चरतांमुखथकी, पाप पुलाई जाय । मतिफरि आवे तेहथी, "ममो" कमाड़ी थाय ॥६॥ १ पदमावती-२= फेटलीक प्रतांमें "माचयीया" पाठान्तरे सोचधीया, छ नेमन पूर्व भसिंहगिरि नामहत् तेथी हरिसिंद थी पध्या राम अर्थ ईशके || ३रा अक्षर बोलतां (मुरा खुलीजापरे तेमाटे पेटमांधी नीकलोने) पापदर थायडे, तेफरी पेश नयी कारण मम्मो कमारी चाय पटले म अक्षर धमाड़ रूप धायछे, (म बोलतां मुम्ब बध थाबछे ।
६ , यद्यपि बहुत साहित्य सुधार सरसित है तथापि पहिले खण्ड में हनुमानजी की उत्पति के प्रसंग में थोड़ा सा अंजना का अधिकार केशराजजी ने अपने रामयश में लिया है तदनुमार हमने भी उस 'सती अंजना' से खास खास मौके पर गायन लिखे हैं आपकी बनाई हुई कई पुस्तकें हैं । सातवें नम्बर पूज्य गुरुदेव श्री शार्दुलसिंहजी म. सा. के सुशिष्य मुनिश्री रूपचन्द्रजी म. सा. की कविता का संक- लन चारों ही खण्डों में किया गया हैं इस ग्रंथ को संशोधन करने का कष्ट श्रापही ने किया है । श्रापकी बनाई हुई कई पुस्तकें हैं वे सब एक एक से बढकर है । पाठवें नम्बर में श्रीमान् जैनोपदेशक वैद्य धृलचन्दजी सुराणा की सरस व अतीव उपयोगी कविता का संग्रह ममग्र ग्रंथ में किया गया है। अवशेष में श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासजी की कविता का व राधेश्यामजी की कविता का भी प्रसंग २ पर और अमृतलालजी माथुर (जोधपुर निवासी ) की कविता का भी संग्रह है जोकि ग्रंथ समाप्ति के बाद उपलब्ध होने से परिशिष्ट में लिखी गई है इत्यादि कवियों की मौलिक कविता का इस (जैन पद्य रामायण ) में संग्रह किया गया है । अब पाठकों के सम्मुख एक और शब्द कह कर इस भूमिका को यहीं समाप्त करता हूं तथा साथ ही शुद्धिपत्र जो इसके साथ दिया गया है उसकी सहायता लेते रहें और भी कोई गलती रह गई हो तो कृपया संग्रहाकजी को सूचित करें जिससे द्वितीयवृति शुद्ध प्रकाशित हो सके। पं. बालकृष्ण उपाध्याय आपका- d- * श्रीमतेऽहते नमः * णमुत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरस्स श्री जैन पद्य रामायण : का:- ** प्रथम खण्ड *** दोहा वेला-बलरागे श्री "मुनिसुव्रत'' स्वामीजी, त्रिभुवन तारण देव, तीर्थकर प्रभुवीशमो, सुरनरसारे सेव ॥१॥ पुत्र "सुमित्र' नरेन्द्रनो, “पउमावई तसुमाय । जन्मभूमि जिनवर तणी, राजगृह" कहिवाय ॥२॥ अवतरिया "हरिवंशमें", "हरि" साचविया चार | "कल्याणक" पांचेभला, नामसदा जयकार ॥३॥ चरण कमल तेहना नमी. "राम" सु "लिछमन" राय । "सीता" ने "रावण' तणूं, "चरित" रचूं सुखदाय ॥४॥ सुखदाई सहुलोकने. “रामकथा” अभिराम । श्रवण सुणन्त सरेसही, मनना पंछित काम ॥५॥ "रा" उच्चरतांमुखथकी, पाप पुलाई जाय । मतिफरि आवे तेहथी, "ममो" कमाड़ी थाय ॥ ६ ॥ १ पदमायती-२% फेटलीक प्रतांम "माधीया" पाठान्तरे चघीया, छ नेमनृ पूर्व भवेसिंहगिरि नामहत् तेथीहरिसिंह धी मा गम भर्थ थईशके ।। ३रा अक्षर बोलता (मुख खुली जाय माटे पेटमांधी नीकलोने) पापदर थायछे, तेफरी ऐशत् नयी रणके मम्मो कमादी चाय पटले म अक्षर कमाई रूप धायरे, (म लतां मुरा वध थानछे ।। -
२ )
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड।
पावनमें पावनमहा, कलिमल हरण अपार ।
मोक्षपन्थनूं सम्बलू, सज्जन जीवन सार ॥ ७ ॥
विसरामोस्थान की भल्लू, क्षेम कुशलनो ठाम ।
बीजधर्म तरुवरतणूं, “रामचन्द्र" नं नाम ॥ ८॥
"लिंछमन" "रावण'' राजीया, तीर्थंकर पदपाय ।
मुक्तिपुरी जईथायसे, सकल जगतना राय ।। ९ ॥
सत्यवती "सीता" सती, शीलतणो. अवदात ।
स्वर्ग पहुंती बारहवें, वसुधामांहि विख्यात ॥ १० ॥
तर्ज गर्व मतिकररे-ढाल प्रक्षेप!
श्रीमत् “सिद्ध' शिरनामी, गुरुका चरण महिरपामी, मेट
नेज तनमन की खामी, शारदा सन्तन सुखदाई "महिर कर वरदे
पुजमाई" सत्यत्रत पालो, मेरी जहान सत्य व्रतपालो, सत्यसे
शप विलय जावे, सत्य से "राम" शिवपावे, सत्यका सुरनर गुण-
गावे ।। सत्य० ॥१॥
ढालपहीली तर्ज झकडी, सुण २ कन्तारे सीख सुहावणी ।
"जम्बू द्वीपे क्षेत्र “भरतभलू" "लंका' नगरी स्थानक
निरमलू; ( उलालो ) निर्मलू स्थानक पूरी "लंका," द्वीपतो
"राक्षस" जुवो ॥ "अजित" जिनवरतणे वारेभूप “धनवाहन"
हुवो ॥ “महाराक्षस' सुत पाट थापी. अजित स्वामीहाथए ।
चारित्र लेई मोक्ष पहुंच्या, घणा "मुनिवर” साथए ॥ १ ॥
मूलगी-ढालप्रक्षेप तर्ज गर्वमति करे।
रूपाचल
रत्न" पूरी राजे"
भूपतिहां धनवाहन"
जे " कंचनपुरी " " अशनीवेग" गाजे ।। कन्यातसु " श्री
कांन्ता" भारी, वरयाजिणभूपनिदिलधारी ॥ सत्यव्रतपालो ॥२॥
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । द्याधर अमरससहुभरिया, " धनवाहन " नीसरीया, अजित " जिनपायशरणवरिया । 'अभय ' जिनराज उच्चरीया न्द्र तब भीम समजावे, भूपने लंका पहठावे ॥ सत्य० ॥३॥ क्षसी विद्याही दीधी माणक नवहार परसिद्धि, भूप ने सर्व कही धी, परस्त्री, साधु सन्तावेगा, उन्ही से राज्य गमावेगा सत्य व्रत पालो॥४॥ धूलचन्दजी कृत ढाल प्रक्षेप तर्ज अरणक मुनिवर चाल्या गौचरी- लवण समुन्दर तिहृदिश शोभतो, त्रिकूट गिरी इक पासोजी । क्षिस द्वीप विच रलियामणो, जोयण सातसो खासोजी ॥ रसुणो भवियण वल्लभ वारता ॥ टेर ॥१॥ स्वर्गपूरी सम लंका हमे, सुवर्ण में शोभावेजी । पंचप्रकारे मणिना कांगरा, निरखत प्ति न आवेजी ॥ निसुणो॥ २ ॥ एहवी नगरीरे आपू तुमभणी, रिनो जोर न थावेजी। -अठ जोयण की लंका दूसरी, पूहवी हि कहावेजी ।। निसुणो ।। ३॥ यतः पंचपापाण प्राकाराः प्राकाराः सप्त चेष्टका: पुनस्ताम्रपुजः पंच, दशतेममयास्ततः ॥१॥ राक्षस द्वीपको चौडापणो ७ योजन प्रमाण है | उसमें चीकूट चत की ऊचाई नययोजन और लम्बाई पांचसो योजन की है। फूट पर्वत के नीचे तीनसो जोजन की खुली जमीन है यहां पाताल. का है, जमीन में गुफाकार पाताल लंका है। पाताल लक्षा की म्पाई घ यडाई यीश योजन की है। विकूट पर्वत के विचले फूट में का नगर है, लका के कौट का प्रमाण तीश लाख फोडमण लोह, रा लाग्य कोड मण तांवो. दश लाख कोडमण सोनो, कोटकी य में है। सयो-पमरे योजन नीष भीत लंका की जाणो, ऊंची जिन साठ भीत गढ की परवाणों त्रिशत जोजन लम्प, शेरमो हली जाणो, आगे जोजन शत, लंका रोष परमाणो। चार हजार Harma aanti - (४) . श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ट। AnmAAAAA. (ढाल मूलगी) राक्षस राजा राज्य करेघणू, अवसर जाणी तपसंयम तण, (उलालो) अवसर जाणी पुण्यप्राणी "देवराक्षस" सुतभणी, राज्य आपी ग्रही संयम, लही मोक्ष सुहामणी ।। असंख्याता हुवा भूपति, समय दशमा जिनतणे “कीर्ति धवल" नरेन्द्र नीको राय आडम्बर धणे ॥२॥ इण अवसर मेरे "रूपाचल"विखे" मेघाभिधापुर नगर अछे३अखे अखे खगः "अतीन्द्र राजा नारी तेहनी "श्रीमती" "श्रीकण्ठ” पुत्र पवित्र पुत्री नामे "देवी" गुणवती "पुष्पोत्तर" नृप “रत्नपुरी" पति नन्द “पद्मोत्तर" सही। तस अर्थे "देवी कन्यका रायमांगी ऊमही ।। ३॥ खेचर सुतने परणावी नहीं, 'लंक पतिने विवाहै गहगही ।। गहगहि विवाहै अति उमाहै 'कीर्तिधवल' नरेन्द्र ने 'देवी' वर देवीसदा सुखदा शची६ जेम सुरेन्द्र ने ॥ अति इर्ष्या थी 'रत्नपुरी' पति वहै अमरस आकरो नारी हैते क्लेश अधिको ऊपजे सुणीये खरो ॥ ४ ॥ 'पुष्पोत्तर' नी 'पद्मा कुँवरी, खग 'श्रीकण्ठे' रागे अपहरी, अपहरी निसुणी जाम 'पद्मा' 'पुष्पोतर' नृप राजीयो । दलबल चिराजी पूठे हुवो, ताम खेचर८ भाजीयो॥ लंक पतिनं शरण ली, लंकपति बतका करी । समजावी राजा व्यावर कोधो पक्षतो जीते खरी ।। ५ ॥ भाखे लंका नोपति सादरो, वास तुम्हारो इहाही करो। इहाही तुम्ह वास ठाणो, निहां तुम्ह द्वेपी सहू, कोई वेला पिशुन्यवासे१० लाज तोल घटे बहू ।। १'नाट्य पर्वत. • मेघपुर, ३ छ, ४ राक्षम, ५ अथवा, ६ इन्द्राणो ७ क्रोध, ८ राक्षस ( श्रीकण्ठ ), ९ लग्न, १० चुगलखोर (शत्रु) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । Awamw Any vv द्वीप वानर त्रिशतजोजन ठाम अधिक सुहामणो, वास कीजे सुखे रहीजे, प्रेमसाचो आपणो ॥६॥ भगिनी पतिनो भापित मानीयो, पुरी किष्किंधा वास नखाणीयो, वरवाणीयो वरवास वारु, महिल मोटा मन्दिरू, सुन्दराकार उत्तंग 'पोपह शाल' दिसे सुन्दरू। उत्तमाचार अपार सहु अति, धर्म कर्म समाचरे. देव अरिहन्त सुगुरु सेवा, जन्मनें सफलोकरे ॥ ७॥ 'वानर द्वीपे' चानर देखीये, राजा रीज्यो प्रेम विसेखीये, विसेखिये तब प्रेम बहुलो, मारिया को नविलहै । अन्नपाणी दीजीये 'नृप वचन' सहुए सर्द है, चित्र३ विलेखे सुछत्र खेचर रूप वानरन् करे ।। तेहथी अथ द्वीपनामे, जाम वानर विस्तरे ॥ ८॥ थीकण्ठ' हीथी उपन्यो नन्दन, वनसुकण्ठ' नामे आनन्दन ।। आनन्द कारी राय इकदिन सभामें बैठो जिसे, द्वीप अष्ट में जात्र देते जात देख्या सुरतिसे ।। राय चलियो 'मानुष्योत्तरगिरी' यान खलाईयो । साधु संगे लेई संयम राय मोक्ष सिधाईयो ।। ९॥ वज्र सुकण्ठादिक अनेकजी, राजा हुवाछे सुविवेकजी ॥ सुविवेकी राय हुवा चीशमां जिनने समे, 'धनो दधि' वर राय हुवो अनमत्ता आधीनमे ॥ लंक नगरी 'तडित्केश' ज राय रूड़ो राजतो, राक्षसां वानरां मांहि प्रेमनो गुण गाजतो । नन्दन वन में लंकानो धणी, रमवा चाल्यो साधे त्रियाघणी, त्रियासारे रायखेले वानरो इक एटले । राय त्रियाना कुचविल्या. कोपीयो नृप तेटले ।। १तीन मो१२ बहिननी पति।छत्रादिजार पानरनों रूप चित्रने से दीपनो नाम बानर द्वीप हुवा।
(६) श्री जैन पद गमायण प्रथम बण्ड । ~~ वाणे हणीयो भाय परियो, साधु दीये नवकारए, सईयूं साचं सोई वानर हुवो उदधी कुंवारए ॥ ११ ॥ ज्ञानपर्यंजी देखे देवजी, आची ऋपिजी सारे सेवजी, सेवसारे ताम नृपना लोप वानर मारए । देखी कोप्यो देववानर सैन्य अतिविस्तारए । कोपीया कपि नरु शिलामू हणे राक्षस लाखए । सांति ने वले सुर मनाव्यो बक्षीस अब इमभाखए ॥ १२ ॥ साधु समीपे दोई आवीया, देशना निसुणी साता पाबीया ।। पावीया साता रायपूछे कहिये ऋपि करुणा करी । वानर नी ने माहरीए सुनावो पूरवर चरी ॥ पुरी 'सावत्थी' ए मंत्री-पुत्र तूंतो 'दत्त' हुतो, 'कासिए' लुब्धक 'जीव कपीनो पापजीवी २ थो छतो १३॥ मुनिवर पासे ते दीक्षावरी, 'वणारसीए' आव्यो संचरी । संचरी आव्यो ताम 'लुब्धक' मारियो ते मुनिवरु, माहेन्द्र३ कल्पे देव होई तूं हुवोरे नरेश्वरू ॥ नरकना दुःख देखी लुब्धक ऊपज्यो वानर पणे, वैरकारण भववधारण ज्ञान बले मुनिवर भणे ।। १४ ॥ पुत्र 'सुकेशीने' पद आपीयूं, संयम माथे नृपमन थापीयू । थापियू संजम माथे एमन, मोक्षमारग साधियो । 'घनोदधि ' वर ग्रही संजम, मोक्षपद आराधीयो 'किष्कन्धी' राजा किष्कन्धाए, 'सुकेशी' लङ्कावली । 'केशराज अधिकार पहिली, ढाल ए भाखी भली ।। १५ ॥ ॥दोहा भैरव रागे॥ गिरी चैताट्य विशेष थी, ' स्थनूपुर ' पुर देख । अशनीवेग ' राजाभलो, पाले राज्य विशेख ॥१॥ १ पूर्व भवनो चरित्र (परि चरित्र ।२ पारधी । ३ देवलोक दशमो। - श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (७) ~~~~ - . , 'विजयसिंह ' विजयीमहा, 'विद्युत्वेग विशेष । दोरदण्ड१ दो नन्दना, पावे सोहर नरेश |॥ २ ॥ तिण पर्वत ' आदित्य । पुरे, ‘मन्दिरमाली ' राय । तेघर पुत्री ऊपनी, 'श्रीमाला ' सुखदाय ॥३॥ स्वयम्बर मण्डप तेहने, बोलाव्या बहु भूप । मण्डपनी रचना रची, आछी भांत अनूप ॥ ४ ॥ रायसहूने अति क्रमी, परियो किष्किन्धी राय । 'विजयसिंह ' कोप्योधणे. अमरस सह्यो न जाय ।।५।। आगे ही ऊतारीया, पर्वतथी तुम आंहि । अरे छंडेलाई छलवटो,४ अबहु तजो न कांहि ।। ६ ॥ कहे आपोवर मालिका, के शूग संग्राम । राय सुणी कोप्यो घणं, वानर-राक्षस स्वाम ।। ७ ।। 'विजयसिंह५ । ने मारियो, किष्किन्धी नृपनोभ्रात। अंध कहणी बदलो लोयो, विजयसिंह ने तात ॥ ८॥ किष्किन्धा ' लङ्का ' धणी, कूटी काढ्या दोय । इहां पलेखो को नहीं, बलियो करे सो होय ॥९॥ ढाल दूजी तर्ज-प्रभुजी ने अङ्गी सुहायती है। (कड़यो रे गुड़ भेली रो) पलियां गूं कुण लागता है, फिरी पाछा ही भागता है । टेर ।। किष्किन्धा 'लङ्का' ना नायक, पायालां थिती ठावता है। लङ्कपयाल' प्रसिद्ध पृथिवी, वास कियां सुखपावता है ।।२०॥१॥ अशनीवेगे ' नृपनिर्धात ' ज. 'लका ' थाने थापता है। देशनगर पुर पाटण सहुए, यथायोग्य ने आपता है ॥वलि० ||२|| १ पुत्ररूपी घे भुजदण्ड। २ शोभा। ३ छोडेला। कपट । ५ विजय मिा ने कितिधोना नानाभाई अन्धकमार्यो तेधी विजयसिंहना पापे अन्धकूने मारी यदलो लीयो।
www. ~~~~~~~urnam WON Nw (८) श्री जैन पद रामायण प्रथम ब्रण्ट । सहश्रार ' सुतने देई पदवी, आपण संयम धारता है। समिति गुप्ति व्रतनो प्रतिपालक, निज-पर-कारज सारता है ।।२०॥३॥ राय 'सुकेशी' घरे इन्द्राणी, नारि शिरोमणि नायका है। 'माली' 'सुमाली' माल्यान ए, पुत्र तिनोंकी दायका है ||४|| किष्किंधा पतिनी वरवनिता, नामेतो वरमाला है। 'रुक्षरज 'आदित्यरज' दो सुतनो, माय सुविशाला है ।।०॥५॥ राय किष्किंधी 'मधु' पर्वतपरे१, सुखसाता अति माणता है । नाम 'किकिया' नगर निवसावी, वास विशेपे ठाणता है।व०॥६॥ राय 'सुकेशी' तणा सुत कोप्या, नृप 'निर्घात' निकासीयोर है । 'मालि' 'लंका' पुरी 'किष्किंधा' 'सूररजा'३ नृप वासीयो है।व०||७|| नृप 'सहश्रार' तणे घरनारी, 'चित्ता सुन्दरी राजे है ॥ नन्दन 'ईन्द्र' अनोपम जायो, उपमा ईन्द्रही साजे है ।० ॥८॥ 'मालि' राजा इन्द्रेनिपात्यो, पुनरपि लंका लीधी है । नृप वैश्रवण' भणीसा दीधी, खुणसनी खुणसी कीधी है ।ब० ॥९॥ 'लंकपयाल' 'सुमालि' वसन्तो, 'रत्नश्रवा' सुत तण्डियो है । कुसुमोद्याने जय विद्यानो, साधन मोटो मण्डियो है ।३० ॥१०॥ खेचरनी कुंवरी मन हरणी, पासे आवी ऊभी है । ननमन राची रहीछे साची, प्रभुजीने गुणे' खोभी है वि०॥११॥ निश्चलमन राखन्तो नरवरे, सूधो साधन साधियो है । 'मानव' सुन्दरी विद्यासाधी, - वानघणेरो वाधियो है ।ब० ॥१२॥ दृष्टि पसारी जोतो देखे, पासे पद्मनी ठाढी है। आपण कुण अछो कहै सुन्दरी, वचने कथने गाढी है ।व० ॥१२॥ 'कोतुक मंगल' पुखर महोदूं, 'व्योमविन्दु' तिहां राजा है। 'कौशिका' कैकसी वेसहोदरी, रूप कला गुणताजा है ।ब० ॥१४॥ 'कौशिका' तो 'विश्रवसा' घरे, 'चैश्रवण' सुतवंका है। १ऊपर ।२ मारीयो । ३ आदित्यरज पाते ।।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । manor 'इन्द्र' तणे अथिकारे अधिको, लंका राज्य निशंका है ।व० ॥१५॥ निमित्तिए मुज तुमपर भाख्यो, मनसा अधिक उमाही है। तेडी कुटुम्ब आडम्बरे राजा, सा कन्या तब व्याही है ॥३०॥१६॥ पुर 'कुसुमांतर' नवरे वसावी, वासवनो सुखमाणे है । धर्म सुकर्म करन्तां बहुलो, जन्म कृतार्थ जाणे है ।ब० ॥१७ एक दिवस 'कैकशी' निशाए, सिंह सलूणो देखीयो है । गजकुम्भस्थलर भेद करतो, नृपने हर्प विसेखियो है । व०॥१८॥ गर्भवती सा राणी वाणी, अति असुहाणी भाखे है । मोडे अंग कलेश करन्ती, मानघणू मनराखे है ।ब० ॥ १९ ॥ दर्पण छांडी खडगे मुस देखे, इन्द्रही आण मनावे है । अरिशिर पाव दियू इत्यादिक गर्भ प्रभाव जणावे है ।व० ॥२०॥ प्रतिश्पखियो घर त्रास पडतों, शुभवेला सुत जायो है महम४ चतुर्दश वर्ष प्रमाणे, अविचल होई आयो है। ब० ॥२१॥ 'भीमेन्द्रेण५ पूरार्पित परगट, माणिक नव निपायो है। हार उठाई उचो लीधो, पहरी गले शोभायो है |व० ॥ २२ ॥ देखी 'कैकशी' एह तमासो, अचरिज अधिक उपायो है। 'रत्नश्रवाने एह अपूरच, राणीए ख्याल दिखायो है ।१० ॥२३॥ राक्षस इन्द्रे 'धनवाहन ने' आप्योथो इम सुणियो है। पूर्वेज जे तवअर्यो पूज्यो, देव तणी परे थुणियो है ।व० ॥२४॥ नाग हजारे सेवित किणही, ऊपायो नवि दीठो है। वालक थारो लिलाएसो, कण्ठे पहरी बैठो है ।व०॥ २५ ॥ नव माणिक मानव मुख दीसे, दशमो सहज दिखाया है। 'दगमुख' नाम पिता त्वथापे, उच्छय अधिको थायो है (१० ॥२६॥ १ इन्द्र।२ हाथोन कुम्भस्थल भेदता सिंह दी।३ शटु ।३ चौद हजार वर्ष ( सहम-सास) जैनगमायणमा साटा धारे हजार वर्ष नृ प्रमाण लग है। भीमेन्द्र राजाए ये आपेल ।।
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श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (११) .vuuN wwwww ~~~~~ m Annr धरती छूटे जेहनी, मान महातम जाय, सधन थकी निर्धन हुवे, जीवित मुआ गणाय ॥७॥ अण रखवाले छेत्रने, जो जाणे सो खाय, रखवाला बैठां थकां, कोईयन खावा पाय ॥ ८ ॥ सो दिन नयणें निरख सू , लंका नगरी जाय, पितामहने आसने, तुम वैसो उसराय ॥ ९ ॥ लंकाना लूंट नारने, चन्दि खाना मांहै । देखिस तब जाणिस सही, पुत्रवती हूं प्राहै ॥ १०॥ एह मनोरथ माहरा, गगन' कुसुम समदेख, मरुदेशे 'मरालिका' दिन २ क्षीण विशेख ॥ ११ ॥ एम वचन थवणे सुणी, विभीसण बोलन्त, थाधिरी ढाढस पकड, माता मत डोलन्त ॥ १२ ॥ ॥ ढाल तीजी तर्ज-पद आसावरी ।। शकंधर राजा चढतो तेज प्रतापे, तीन भुवन को कंटक कहीये। तणन कोई उथापे, रावण राजा चढतो०।। टेर ।। णछे 'ईन्द्र धनद३' विचारा, कोणछे खेचर जाण, हगण३ रात्री न रात्री पतिरहै, जब ऊगे इक भाण दश० ॥२॥ रावण' घर बैठां सुखपाचो, 'कुम्भकरण' को जौर, अष्टापद/४ ऊठ्यां थी केहरी' भाजीजाये भौर ।। दश० ॥३॥ कुम्भकरण' भी अलगो जावो, माहरी अधिकी टेक । नयंगल' मातो 'केहरी' आगे, पाव भरे नहीं एक दश० ॥४॥ रावण' भाखे माय सुणोजी, दिओ अमने आदेश, --more-eme आकाशना फल।२धन+द-धन देनार धनेन्द्र श्रवण । देष सर्योदय से प्रांगण एटले तागनो समूह गयी यानि अन्धकार और रात्रीपति अर्थात् चन्द्रमा रहै नहीं। ४ मिह को मारने वाला गणी १५मदोन्मत्त हाथी।
(१२) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । Mu . . विद्या साधन साधी आबू वाधे वान विशेष ॥ दश० ॥५॥ शुद्धा राधन- चलि साधी, विद्या एक हजार । 'सिह' तणा ननु पाखर बैठा, हुवा अंगंज अपार ॥ दश० ॥६|| 'कुम्भकर्ण' तो पांचज पामी, चार विभीपण लाधी । क्षेम कुशल तीने बंधव, आया विद्या साधी ।। दश० ॥७॥ विद्या साधन विधि अधिकी, पद्म पुराणे वखणी । मैं संबंध संक्षेपे कीधो, ग्रन्थ वधन्तो जाणी ॥ दश० ॥८॥ 'पट उपचासे खांडो साध्यो, 'चन्द्रहास' वरदाई । चन्द्र जिम कला नित्य चढती, वाधे अधिक वडाई || दश० ।।९।। गिरि 'वैताट्य' दक्षिणश्रेणी, पुरवर 'सुरसंगीत' । 'मय' नृप 'केतुमतिनी २ जायी, 'मन्दोदरिया पवित्त दश० ॥१०॥ परणावी राजा 'रावण' ने, सन्मुख आणी कुंवारी । जिम शचि इन्द्र घरे राणी, राय घरे ए नारी ॥ दश० ॥११॥ गिरि 'मेघरथ' खेचर पुत्री, रमति दीठी राय । छए हजार वरी इकसाथे, पूरव पुण्य पसाय ॥ दश० ।। १२ ।। 'पउमावई पुत्रिनो तातज 'सुर सुन्दर' वडराजा । अवर जनक सहु मिलीसाथे, आया लस्कर ताजा ॥ दश० ॥१३॥ बहु सहु मिली वोले स्वामी, वेगे विमान चलायो । आया कटक विकट भट भारी, टले वैरी एम टलायो । दश०॥१४॥ 'रावण' भाखे 'भामनियोंशू' आरनि कोई म आणो । भूरी३ भुजगे। गरुड न वीहै, ए उखाणो जाणो ॥ दश० ॥१५॥ करी संग्राम सहुने जीती, नागज पासे बांधे । नारी वचने छोडी बंधनथी, नेहघणेरो सांधे ॥ दश० ॥१६।। 'महोदर' नृप 'कुम्भ' पुराधिप, 'सुरूपनयना ' राणी । १छ-जैन रामायणां षोडस-सोले एसा है। २ हेमवतीति जैन गमायणे । ३ बहुत । १ सर्प।
श्री जैन पदरामायण प्रथम खण्ड । -~~~~ तडित्माला" पुत्रीपरणी, 'कुम्भकरण' घर आंणी । दश-१७ ।। "ज्योतिपुर "पति'' "वीर नरेश्वर. नन्दवती नी जायी। 'पंकजश्री' पंकजवरनयणी, विभीपणसुखदाई॥ ॥ दश०१८ ॥ 'मन्दोदरिये' नन्दन जायो ईन्द्र सरीसे तेजे । 'इन्द्रजीतजी' नामप्रमाणी, वोलाव्यो घणाहेजे ॥ ॥दश०१९॥ मेघ सरीसो नयणां नन्दन, चीजो नन्दन जायो । 'मेघवाहन' चारू कुंवर, कर्मे तो कहवायो॥ कर्मे तो कहवायो॥ ॥ दश० २०॥ 'कुम्भकरण' विभीपण भाई, लंकाने उजाडे । 'धनद' सुमालिस, ओलम्भो, दूत मुखे देवाडे ॥ ॥दश०२१ ।। रावण राजा भाई ताजा, चहिया ताम संग्रामे । 'धनद' संघाने युद्ध किया थी, 'रावणजी' जशपामे ||दश०२२।। चरम 'शरीरी' धनद नरेश्वर, चारित्र सू चित्त लावे ।। शत्रुमित्रसू सम परिणामी, 'रावण' आवी समावे ॥ ॥दश० २३ 'लंका' लोधी रावण राये, 'पुष्पक' लोधू विमान । माय मनोरथ पूरा कीधा, पुरुषों एह प्रमाण ॥ ॥ दश० २४.।। 'पुष्पक विमाने सीने, गिरी वैताट्ये आवे । भुवना लंकृत हाथी साही, गजशाले बन्धावे ।। ॥ दश०२५॥ एक 'विद्याधर' आवीसुनावे किष्किंधा' नृपजाय ॥ 'लंकपयाल' तजी निजनगरी, लेवासारु आय ॥ ॥दश० २६॥ A- १पक विद्याधर रावण के पास आकर कहने लगा कि किष्किा गजा के दोनों पुत्रों को यमराजा ने युद्ध में हराफर कैद में डाल दिया है और ये आपके सेवक हैं इसलिए उन्हों को आप हुडा । ऐसा सुनकर रापण यमराज के पास जाकर यमराजा को परास्त फर दोनों पुत्रों को छुडा लाया और यमराजा ग्थनूपुर मां जाकर यहां का इन्द्र राजा ने अपनी मदद करने के लिये कहने पर यह नैयार हुया तय मंत्री ने इन्कार किया फिर यम को सरसङ्गीतक नगर देकर युद्ध फरमाके लिये युलावाये हैं।
vực Now Musww (१२) श्री जैन पद गमायण प्रथम मण्ड। विद्या साधन साधी आवं वाधे वान विशेष ॥ दश० ॥५॥ शुद्धा राधनने वलि साधी, विद्या एक हजार । 'सिंह' तणा ननु पाखर बैठा, हुवा अंगंज अपार ॥ दश० ॥६॥ 'कुम्भकर्ण' तो पांचज पामी, चार विभीपण लाधी। क्षेम कुशलमं तीने बंधव, आया विद्या साधी । दश० ॥७॥ विद्या साधन विधि अधिकी, पद्म पुराणे वखणी । मैं संबंध संक्षेपे कीधो, ग्रन्थ वधन्तो जाणी ॥ दश० ॥८॥ 'पटी उपवासे खांडो साध्यो, 'चन्द्रहास' वरदाई । . चन्द्र जिम कला नित्य चढती, वाधे अधिक वडाई ।। दश० ॥९॥ गिरि 'वैताट्य' दक्षिणश्रेणी, पुरवर 'सुरसंगीत' । 'मय' नृप 'केतुमतिनी २ जायी, 'मन्दोदरिय' पवित्त ॥दश० ॥१०॥ परणावी राजा 'रावण' ने, सन्मुख आणी कुंवारी । जिम शचि इन्द्र धरे राणी, राय घरे ए नारी ।। दश० ॥११॥ गिरि 'मेघरथ' खेचर पुत्री, रमति दीठी राय । छए हजार वरी इकसाथे, पूरब पुण्य पसाय ॥ दश० ॥ १२॥ 'पउमावई' पुत्रिनो तातज 'सुर सुन्दर' वडराजा । अवर जनक सहु मिलीसाथे, आया लस्कर ताजा ॥ दश० ॥१३॥ बहु सहु मिली बोले स्वामी, वेगे विमान चलायो । आया कटक विकट भट भारी, टले वैरी एम टलावो ॥ दश०॥१६ 'रावण' भाखे 'भामनियोंझू' आरति कोई म आणो । भूरी भुजगे। गरुड न वीहै, ए उखाणो जाणो ॥ दश० ॥१५॥ करी संग्राम सहुने जीती, नागज पासे बांधे । नारी वचने छोडी बंधनथी, नेहघणेरो सांधे । दश० ॥१६॥ 'महोदर' नृप 'कुम्भ' पुराधिप, ' सुरूपनयना ' राणी । १ छ-जैन रामायणा पोडस-सोल पमा । २ हेमवतीति जैन गमायणे । ३ वहुन । ४ मर्प । ।
- । 'शूरपनखा ने अप हरी, खर खेचर गयो संचरी ले' घर क! ए ॥१॥ 'सूररजानो नन्दन, इन, नन्दन 'सूररजा' नो मारियोए ॥ खवर वर' ऊपर दल साजीयो, साजीयो 'मन्दोदरि' ये लंक पयाला' नो धणी, कीधो भगनी पतिभणि ड़ो कर थापीयोए ॥ 'चन्द्रोदर' मारयो सुणी णी, त्राटीधणी दैव रण्डापो आपीयोए ॥ ३॥ इयो, नामे "विराध" कहाईयो, कहाइयो सकल यौवननी वयपामीयो, वैरि विशोधन कामीयो. Tऊतावलोए ॥४॥ 'वलि' सेवा वांछतो, आणमां तो, आतुर दृत चलावियोए ॥ 'वालि' ने पगला- । अनुरागीयो, रागियो 'रावण वचन सुणावीयोए ल' थी मुजताई, 'श्रीकण्ठ' थी तुजतांइ, तुजताइ, पYए ।। अब अभिमान न कीजीये. जो कीजे तो थोडामां भाखूघJए।।६। 'वालि' कहै ए सहु खरो, तरो, आंतरो पज्योछे मनमाहरे ए । देव अने गुरु स्तक वालिये. वालिये, ना घर ताहरे ए ॥७॥ डरूँ, नही तोजाणू जीम त्तिम करूं, तिमकरूँ । ए। जा तुजस्वामीने कहै, अवतू शीलो कां आवी वणी सहीए ।।८॥ 'दूत' बचन जब सांभल्यो ल्यो. परजल्यो. दलवल बहु लेई चालीयोए आवीयो, दल बल अन्तन पावीयो. पावीयो, लीयोए ॥ ९ ॥ द्वन्द युद्धनी स्थापना. टाले पापना, उपायए अलगा कीयाए ॥ दोडतो ~ wwwmnow (१४) श्री जन पद रामायण प्रथम मण्ड । युद्धे हरावी 'यम' राजा तस बन्दी खाने ठावे । 'रावणे' छोडाव्या' यम हरिस, एम उदन्त सुणावे || दश० २७॥ 'लंका' लेई' किष्किंधा लीधी, पुप्पक लीधू विमान । 'सूर सुन्दर संग्रामे हरायो, आज वडो राजान॥ ॥दश० २८|| कोप्यो 'इन्द्र' प्रधाने निपेध्यो, देखोनी सूं थाय, । 'यमने' सुरसंगीतक' समर्गी, आणूं काढे राय ॥ दश०॥ २९॥ 'सूररज' ने पुरी 'किष्किंधा' प्रीतीधरी नृपआये । 'ऋक्ष' नगरे तो 'ऋक्ष रजने', आपणड़ो करी थापे ॥ दश०३० भलेमूहुर्ते डिम्भ घणांसू, 'रावण' लंका आवे । नारी वधावे मंगलगावे । सयणमहासुखपावे ॥ ॥दश० ३१॥ अनन्द रंग विनोद विशेषे, घर २ मंगला चार । 'केशराज' एत्रीजी ढाले, मुख २ जय २ कार ।। ॥दोहा रामग्रीरागे ॥ 'सूररज' ने घरजाणीये 'इन्दुमालिनी' नारि । 'वालि सुत ऊपन्यो बली, कौन सके तस वारि ॥१॥ समुद्रान्त पृथिवी सहु, नित्य प्रदिक्षणादेय । सब विधि चातां आगलो, शूर वीर जश लेय ॥२॥ पुनरपि केते आंतरे, जायो सुत सुग्रीव । 'सुप्रभा छे कन्या भली, शोभनीक सदीव । 'ऋक्षरजा' घर कामनी, 'हरीकांता' सुविधान ॥ 'नील' अने 'नल' नामथी, जाया पुत्र प्रधान ॥ ४ ॥ 'सूररजा' 'पाली' भणी, नृप पदवी आपन्न । चारित्र पाली निर्मलू, मोक्षे पहूंच्यो सन्त ॥ ५ ॥ ढाल चोथो तर्ज छठो भावनामनधरोए । एकदिवस 'लंका पति' क्रिडानी उपनी रति१, उपनीरती पहुंच्यो ॥दस०३२॥ १इच्छा।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (१५) परवत मन्दरूए१ ॥ 'शूरपनखा ने अपहरी, खर खेचर गयो संचरी संचरी, 'लंकपयाले' घर की ए ॥१॥ 'सूररजानो नन्दन, 'चन्द्रोदर' आनन्दन, नन्दन 'सुररजा' नो मारियोए । खबर लईने राजीयो, 'खर' ऊपर दल साजीयो, साजीयो 'मन्दोदर' ये वारियो ए॥२|| 'लंक पयाला' नो धणी, कीधो भगनी पतिभणि पतिमणि, आपणडो कर थापीयोए ॥ 'चन्द्रोदर' मारयो सुणी 'अनुराधा' बाटीधणी, त्राटीघणी दैव रण्डापो आपीयोए ॥३॥ वनमां नन्दन जाईयो, नामे "विराध" कहाईयो, कहाइयो सकल कला गुण आगलोए । यौवननी वयपामीयो, वैरि विशोधन कामीयो. कामियो कामकरण ऊतावलोए ||४'बलि' सेवा वांछतो, आणमां ले इच्छतो, इच्छतो, आतुर दृत चलावियोए ॥ 'पालि' ने पगला- गियो, अन्तः करण अनुरागीयो, रागियो 'रावण वचन सुणावीयोए ॥५॥ 'कीर्ति धवल' थी मुजताई, 'श्रीकण्ठ' थी तुजतांइ, तुजताइ, चाल्यूपति सेवक पणए ।। अव अभिमान न कीजीये. जो कीजे तो खीजिये, सीजीए थोडामां भाखूधYए।।६। 'वालि' कहै ए सहु खरो, उणघर नहिं आंतरो, आंतरो पड्योछे मनमाहरे ए ॥ देव अने गुरु टालिये, न नमू मस्तक वालिये. वालिये, नाव ह घर ताहरे ए ॥७॥ जन अपवाद थकी डरूँ, नहीं तो जाणू जीम त्तिम करूं, तिमकरूँ कीधाथी टलसं नहीं ए। जा तुजस्वामीने कहै, अप्रतू शीलो कां वहै, का वहै, एतो आधी वणी सहीए ।।८॥ दूत' वचन जब सांभल्यो राजा 'रावण' परजल्यो, परजल्यो. दलबल बहु लेई चालीयोए ॥ कपिपति सामो आवीयो, दल बल अन्तन पावीयो. पाचीयो, लोक उपद्रव टालीयोए ॥९॥ द्वन्द युद्धनी स्थापना, टाले उपाय ते पापना, पापना, उपायए अलगा कीयाए । दोइतो २ मेरु।
जिनगुण गावे भक्ति सू, भक्ति मूं. तब धरणेन्द्र पधारीयो ए॥ १दही-२ वाली मुनिना घामथी दशकधर । र व अर्थात् रियो, अधिकारीयो, 'श्रीप्रभा' परणावीयोए । 'बाली' ऋपीश्वर संचरे, निश्चलधरे, जिनशासन शोभावीयो ए॥१५॥ नित्यालोक' ज पुरवरु, 'नित्या लोक' नरेश्वरू, नरेश्वरू कन्यकाछे 'रयणावलीए । 'रावण' नृपजावे जाम, 'अष्टापद' आये ताम, आये ताम. आगेतो नासके चलीए॥१६॥ दीठा तले ऋपिजी टाढो. 'रावण' रोप करे गाढो, करे गाढो, जाणं ए पर्वत पाडे ए ॥ माथा माथे ऊपाडी, तवते पर्वत खडहड्यों, खडहड्यो, मुनिदाव्यो अंगूठड़े ए ॥ १७॥ त्रासकरीनेर नामीयो, ऋषि चरणे चित वासीयो, वासीयो, रह्यो साधु पग अनुसरथ ए॥ ऋपिजी ने राग न रोपजी, सहु साथे सन्तोपजी, सन्नोपजी, लब्धीपण देखाडीयू ऐ ॥ १८ ॥ साधु जुहारी युक्ती १(१६) । जैन पध रामायण प्रधम खण्ड । श्रावक भला, होईतो मति आगला, आगला, दया धर्म चित्त में लीयाए ॥ १० ॥ अस्त्र शस्त्र जो चाल', 'वालि' तेसहु झालवे, झालवे, 'रावण' ना उमकर्म ने ए ॥ चतुर महाछे चौकसी, चोट करे अति औकसी, औकसी, हाम न मेटे धर्म ने ए ॥ ११ ॥ गिन्दुकर ने परे पिड़ियो, करकोटे इम भीडीयो. भीड़ीयो, चार समुद्रे फेरीयो ए ॥ होई खिसाणो आपजी, आणे मन संतापजी, संतापजी, हारीयो 'रावण' हेरीयो ए॥१२॥ सम्भारे अति सारजी, पूरब ना उपकारजी, उपकारजी, छोडीयो ' रावण ' राजीयो ए ।। लघुभाई स्थिर स्थापीने, राज्यतणीस्थिति आपीने, आपीने, आपण संयम साजीयो ए॥१३॥ 'सुग्रीवे' सुविचारीयो, 'रावण' तो अधिका- प्रतिमावर बहु तपकरे, तपकरे, लब्धीवन्त कहावीयो ए ॥ १४ ॥ मास २ पारणं करे, सदा सुखकारणो वरे, कारणोवरे, 'अष्टापद' गिरि आवीयो ए । 'काउसग्गने' समाचरे, योग ध्यान निश्चलंधरे, 'अमोघ विजया' नामे भली, शक्तीरूपले निर्मलो. निर्मली विद्या- चमपाडने से उसका गवण नोम पडा3 श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । N , देई सिधाचीयोए॥ १९ ॥ दश विध आराधनकरी, "वाली" ऋपी शिव गतिवरी, शिवगतिवरी, नमो २ ऋपिरायछेए । चौथी ढाले चतुराई, चतुरलोकरेमनभाई, मनभाई "केशराज" गुणगायछेए ।। २० ॥ ॥ दोहा जयत श्री रागे ॥ गिरि " वैताहय " विशेपथी. 'ज्योती' पुर वरनाम । विद्याधरछे" ज्वलन सिंह" राजागुण अभिराम ॥१॥ नारी नामे • श्रीमती" पुत्री तो परधान, । "तारा" तार विलोचना, कोईयन तेहसमान ॥२॥ नृप "चक्रांक'' तणोसही, सुत "साहसगति" जोय । ताग दर्शनमोहियो, करे याचनासोय, ॥३॥ वानस्पतिनी वांछना, तात लखिएवान । "साहसगति" स्वल्पायुपो१, “कपिपति ने दीये तात ॥४॥ "तारा" उदरे ऊपन्या, अंगज आछा दोय । "जयानन्द" "अंगद" भला, वेलीसमफलजोय ॥५॥ "साहसगनि सांसोपडयो. झूरे रातने दीह, अणसम्जे किम पामीये, ए जिन वचननी लीह, ॥६॥ कोई दाय उपायहूं, तारासंगकगऊं । तो जीवित्व लेखेगिगू, नहींतो सद्य मरीजाऊं ॥ ७॥ रूपपरावर्तनकरी, विद्यानो आरम्भ, । हिमवन्त परवत जई, मण्डे करवा दम्भ ॥ ८॥ भूचर खेचर राजवी, दलबली मवलविराज । दिग मात्राए चालीयो, " रावण " रूडे साज ॥९॥ ॥ढाल पांवी । तर्ज-धनमालाफे छोरग॥ "रावण" दिग्विजय चालियो, साथै सब परिवारोरे । तेज प्रताप वाधेषणो, ऊगन्तो दिनकारोरे ॥ २० ॥१॥ (१) अल्प उमर पाला।
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( १८) श्री जैनपद गमायण प्रथम खण्ड ।
"लंकपायाले" आवीयो, “खर', "दूपण" मानीयोरे ।
खेचर चउद हजारसं, साथे चलेवा वाणीयोरे । रा० ॥२||
सरस खरो "सुग्रीवजी," चाल्यो "रावण" लारोरे ।।
अवसर ने आराधियों, उपजे प्रेम अपारोरे ॥रा० ॥३॥
नदी “नर्वदा" आवीयो, कांटे कटक पडावोरे ।
सभा सरस भेलीकरी, बैठो "रावण" रावोरे ।। रा०॥ ४॥
अणचिन्त्यू जलवाधीयो, “रावण " साज तणाणोरे ।
खबर करी जन आवोया, पूछे रावण राणोरे । रा० ॥५॥
नगरीछे “माहिष्मती", "सहश्रांस" तिहां राजा रे ।
रायहजारे सेविये, अधिकाछे अन्दाजारे ।। रावण ॥ ६॥
सहस एक छे सुन्दरी तसु सेवक दो लाखो रे ।
पंचेन्द्री सुख भोगवे, जलस्र अति अभिलाखो रे ॥ रावण ॥७॥
पाली बांधी पाणी में केवल नारी साथी रे ।
सेवक राखी पाखती. हर्षे रमें जिम हाथी रे ॥ रावण० ॥८॥
सुभट गया तस साहिना, सामां मार मचाई रे ।
कोई न आवे आसनो, देखी तसु सुभटाई रे ।। रावण० ॥ ९ ॥
"रावण' जी आवी अड्या, सामो थयो शर सांधो रे।
लडिया विविधा-युद्ध सू, लीधो रावणे बांधी रे ॥ रावण ॥१०॥
आकाशथी ऊतरी चारण ऋपि इक आवे रे ।
"शतवाह" नामें भलो. आवी सुत छोडावे रे । रावण० ॥१॥
'ऋपिजी" नू मन राखवां, मानीयो सोकरी भाई रे ।
देश अनेरो आपतां, चरण ग्रहै सुखदाई रे ॥ रावण ॥ १२ ॥
'अन्नरण्य' नरेन्द्र सू मित्र पणे छे वाचा रे ।
चारित्र लेसा एकठा, सगपण तो ए साचा रे॥ रावण० ॥ १३ ।
'दशरथ नन्दन ने दीया, पूरी अयोध्या राजो रे ।
"अन्नरण्य' व्रत आदरी, सार्यो आतम काजो रें। रावण ॥१४॥
श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । (१४ लात धमूकां कूटीयो, नारदे आवी पुकारयो रे । राजा 'रावण' पूछतां, उत्तर दीये हूं मरायो रे ।। रावण ॥१५॥ 'राज' नगर नो राजीयो, नामे 'मरत' कहायो रे । मिथ्या दृष्टि छे घणो, कुगुरुनो भरमायो रे ॥ रावण ॥ १६ ॥ यज्ञ में हिंसाघणी, करतां में अवगणियो रे । विप्र विशेषे कोपीया, ते कारण हूं हणियो रे ।। रावणः ॥ १७ ॥ 'रावण' चाली आवीयो, 'मरुत' नं मुखभंज्यो रे । जिनमते अधिक दृढावीयो. ऋपिजी नू मन रंज्यो रे।।रावण०१८॥ 'रावण' जी सुसतोकरी, यज्ञ धणी समजायो रे । साचेते राचे सहूं, धर्म दया मन भायो रे ।। रावण ॥ १६ ॥ 'नारद' ने नृपे पूछीयो, ए मत कोण चलायो रे । 'वसु' राजाथी चालीयो, पापे पिण्ड भरायो रे ॥ रावण ॥२०॥ 'कनक प्रभा' छे कुंवरी, 'मरुन' रायनी जाई रे। 'रावण' ने परणावतां, वांधी प्रीत सवाई रे ॥ रावण० ॥ २१ ।। निहां थकी नृप आवीयो, 'मथुग' पुरी मजागे रे । 'हरिवाहन' छे भूपति, पुत्रमधु सुविचारो रे ॥ रावण० ॥ २२ ॥ राम नणे पग लागतां, 'त्रिसुल' 'मधु' कर देखी रे। किहां थकी ते पामीयो, राये बात विशेखी रे ।। रावण० ॥ २३ ॥ मधुरपणे 'मधु' स्रोलियो, 'चमरेन्द्रे"मुजदीधोरे । पूर्वभवना मित्र थी, ए उपकारज कीधो रे ॥ रावण ॥ २४ ॥ 'चमरे' को मुज आगले, धात की खण्डे जोई रे। क्षेत्र 'ऐरावते' भलो, 'शतहार' पुरी होई रे ।। रावण ।। २५ ।। राय 'सुमीत्र' सोहामणो, 'प्रभव, अछे तस मित्रो रे । कला अभ्यासे गुरुकने, होई पुण्य पवित्रो रे ॥ रावण ॥ २६ ॥ । घोड़ा ने खेच्यो थको. अटवीने अवगाहै रे । 'पल्ली पत्तिनो' कुंवरी. 'वनमाला' ने विवाह रे ।। रावण ॥२७॥ -- प 들 tra
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(२०) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । मित्र तणो मन मोहियो, मानिनीयं मनलावे रे । रहैं घणं उदासीयु. गम तदा वोलावे रे || रावण ॥ २८ ॥ मौन रह्यो बोले नहीं, राजा फरि २ भाखे रे । आरती थारा मनतणी, मत को छानी राखे रे ॥ रावण ॥२९॥ चित्तनी आरती सांभली, हँसी नरेश्वर बोले रे । ए तुच्छ वातने कारणे, मित्र किस्यूं उमडोले रे ॥ रावण० ॥३०॥} मित्र तणे घरे मोकली, आवी भाखे वातोरे । प्राण न राखे मांगतां मुज सम्सी कौण मातोरे । रावण ॥३१॥ 'प्रभव' कहै ई पापीयो. निलज धीट अत्यन्तोरे । नार न राखी मांगतां, धन्य २ म्हारो मित्तोरे ॥ रावण ॥३२॥ आवो पधारो मानजी, बोले बारम्बारोरे । हूँ अपराधी रायनो, फिट म्हारो अवतारोरे ॥ रावण ॥३३॥ गुप्त रहीने निरखियो, राजा सहु विरतन्तोरे । गणीजी घर मोकली, छेदे कण्ठ तुरन्तोरे || रावण ॥३४॥ राजाये घसी साहिया, मित्र तणावे हाथोरे । करे प्रशंसा मित्रनी, हरख धरी नरनाथोरे ।। रावण ॥३५॥ गजाजी व्रत आदरी, पाम्यो कल्प ईशानोरे । चवि 'हरिवाहन' नन्दन, 'मधु' नामे प्रधानोरे ॥ रावण० ॥३६।। मित्रभामी भवमें घणं, "विस्वावसु' उदारोरे । 'ज्योतिर्मति' उपर ऊपनो, 'श्री कुंवर' कुंवारो रे ॥रावण० ॥३७॥ तप तपी नियाणं करी, 'चमर' हुवो हूं एहोरे । पूर्व स्नेहना बन्धथी, ए तुज साशे सनेहोरे । रावण० ॥३८॥ टेई त्रिशूल सिधाचीयो, ए मुज कही अवधारोरे । काज करी फरी आवही, जोजन दोय हजारोरे । रावण० ॥३९॥ इमनिमुणी सुन्खमानीयूं. मधु झू करे सगाईरे । 'मनोरमा' कुंवरी भली, दीधी नस परणाईरे | रावण० ॥ ४०॥ - - श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । (२१) MN हाल भली ए पांचवीं, पांचों रे मन भाई रे । 'केशराज' 'रावण' तणं, चरित्र अछे सुखदाई रे ॥ ४१ ॥ ॥ दोहा सारङ्ग रागे ।। घर छोड्यों भूपाल ने, हुवा वर्ष अहार। देश मलीपरे साधीने, घरने आवणहार ।।१।। फरि आयो महिमण्डले, ' नलकुबेर ' दिग्पाल । पुर · दुर्लध्य ' तणो धणी, राज्यकरे सुविशाल ॥ २ ॥ आमालीविद्या ' करी, शत जोजन परिमाण । अनीकोट अति आकरो, अग्नी नणो मण्डाण ।। ३॥ 'कुम्भकर्ण' 'धन' साथ सू, आणी अडियो नरेश । अग्नीजालने देखवे, कोईयन करे प्रवेश ॥ ४॥ 'कुम्भकर्ण ' फरिआषियो, स्वामीतणे मनसोर । सुभटां पगपाछापड़े, कोईयन चाले जोर ।। ५ ॥ आरति अधिकीऊपनी, केम रहै अब लाज | एटले राणो रावली, पति करवाने काज ॥ ६ ॥ रावण' पासे दुतिका, भेजी करे अरदास | जो मन राखो माहरो, तो पहुँचे सब आस ॥७॥ 'आसाली ' विद्यामहा, वस्यवर्ता आज । चक्र 'सुदर्शन ' सू सही, तूंपू सगलो राज ॥ ८ ॥ तुमसाथे मुजमनवस्यं, इह भवे तूं भरतार । प्रभु तुम विच में आनरो, सो जाणे फिरतार ।।९।। उपरम्भानी वीनती. मनमांहि अवधारि। उत्तरदीयो उतावलो, आतुर अतिसा नारि ।। १० ।। । दाल छटो तर्ज-कुंबर सुभानु सुजाणजी ।। आतुर अति जाणी करी (टेर) लघु वन्धव तर बोले रे । वेगे पधारो पदमणी, तूं इन्द्राणी तोले रे ।। आतुर ।। १ ।। .
, , . ~ ( २२ ) श्री जैनपद गमायण प्रथम खण्ड । रावण ' रीसवस्ये कहै, बन्धव इमकिम भाखे रे । पुरुपपनो तो तेहिज, परत्रियथी मन ( न ) राखे रे ॥आ०॥ २ ॥ कहै ' विभीपण ' दुपण, किहां हीथी होई रे । विप व्यवहार करे सहू, मग्ण तो खायों जोई रे । आतुर ॥ ३॥ वात कहन्तो कामनी, वेग ही वेग में आई रे । विद्यादिधी विधिकही. साधी वार न लाई रे || आतुर ॥ ४ ॥ शस्त्रदीयां सुरसानीधी, कारमियां सुविशालो रे । नगर जीती ‘नलकुबेर' ने, लहुसाही तत्कालो रे ।। आतु।। ५॥ 'चक्रसुदर्शन' पामीयो, पाम्यो अतिघणी शोभा रे । नलकुबेर' करी आपणो. थापियो न कियो लोभा रे।।आतुरा॥६|| उपरम्भा ' समजाचीने, रायसं प्रेम मिलायो रे । रथनू पुर' पुर ऊपरे, ' रावण । जी चढी आयो रे |आतुराणा सहश्रार ' नृप ' इन्द्र ' ज. नन्दन ने समझावे रे । झूठ किलेस करूं किस्युं, कोई न पूगे दावे रे ॥ आतुर ॥ ८ ॥ सहश्र सं नृप सेवितो, ' सहश्रांशू ' ने जीत्यो रे । अष्टापद ' ने उपाडतां, वसुदा मांहि विदितो रे ।। आतुर ।।९।। विद्या साधन द्विपपती, गिरि वैताढये चाल्यो रे । पौमावेरे पति शक्तीजी, सफल तणो वर आल्योरे आतुरा॥१०॥ 'मरुत' नणूं मुख भंजन, भंजन काल हरायो रे । 'धनद' तणो मद मर्दन, सुग्रीव सेवकरायो रे ॥ आतुर ॥११॥ पुर 'दुर्लध्य' उलंघन, 'नल कुवेर' बल भंजीयो रे । रायां गय कहावतो, आजन जावे गंजियो रे ॥ आतुर ॥१२॥ रूपवनी अति 'रूपीणी' पुत्री ने परणावी रे । आघृ काढीयो नन्दन, चितने लियो समजावी रे || आतुर ॥१३॥ अति आकुलपणे अष्टापद, पामे छे सन्तापो रे । (१) हजार मनुष्य सेवा करते हैं । (२) पदमावतोनो पति धरणेन्ट्र शक्किनो गवण गजाने सबल घा दियो ।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड ।
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घनन काई न विणसीयं, प्राण तजेते आपो रे ॥ आतुर ॥१४
तात वचन नवि मानीजे, ताणे आप घणेरो रे।
धन्य हो धन्य थे तातजी. धन्य मतो ए तारो रे ।। आतुर ।।१५
जे हणको तस हाथेजी, सगपण केम कराय रे ।
आज किस्यूं रे वैरतो. आगे चाली-यू जाय रे ।। आतुर ॥१६
'रावण' दृत पठावीयो, आयो इन्द्र ही पासे रे ।
पुर घेराणू ताहरूं, नृप अब किस्यू विमासे रे ॥ आतुर ॥१७
भक्ती शक्ती दोई छेजी, जीव तजी रखवाली रे ।
भक्ती भजो मन्मुख जाई, के लियो शक्ती सम्भाली।।आतुरा॥१८
'दत' प्रने 'सुरपति' कहै, रे ? तुम तो भग्माणा रे ।
गंक मनावी रींजीया, पण नवि नमिया राणा रे ।। आतुर ॥१९
ढाल प्रक्षेप तर्ज-गर्घ मति कर रे।
जाय तुम स्वामी ने कहीजे, गाफिल तूं जरा मति रही
माण तूं म्यारा ही सहीजे । इन्द्र इममानसे बोले. जरा दिल मां
नहीं तोले । भूप इम बोले मेरी जान भूप इमबोले, छक्यों न
मान क्यू सूनो. याद उण दिन ने तूंतो ॥ भूप ॥ १ ॥ टेर
दृत जब आई ने भाखे. किणी की शंक नहीं रखे, मिजाज है म
मांहै जाके, सूणी इम 'रावण पर जलियो, वचन ओ किम यो
अलीयो ॥ भूप इम वोले ॥ २॥ चतुरङ्गी सेन्या सिणगारी
इन्द्र पिण आयो कर त्यारी, परस्पर युद्ध मंड्यो भारी. जोधां व
जोर बाण छूटे. अरि उर आग ही ऊटे । भृप इम बोले ॥ ३
आवीयो 'विभीषण' वलियो, मारो ही दल तो खल वलियो. इन
तत्र कोपे पर जलोयो. दोनों का जोर है जाजा, 'रावण' 3
सुधरेला काजा ॥ भूप इम बोले ।। ४ । सेन्या हटी 'रावण' :
देखी. सामने आयो विवेकी. निकालूं अब इगरी सेखी. सराम
बाण मेह यूठा. तुरत ही इन्द्र पग छूटा । भूप इम बोले ॥५
२४) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । wn~- anhnahanimoon , , ढाल प्रक्षेप तर्ज--पूर्ववत् । कजहो आयो महिपति, माची नाम लड़ाई रे। सेनानी 'रावण' तणो, भिडियो आगे आई रे ।। आतुर ॥ टेर ।। देवे काईक राक्षसां, पाछा पैर हटाया रे । 'रावण' राजा मोकल्या शूर सुभट जे आया रे ।। आतुर ।। २ ।। 'वज्रवेग' 'हस्त' 'प्रहस्त' जी, 'मारिच' उदभयवज्रो रे । 'शुक' 'घोर' 'सारण' 'गगन" जी, 'ज्वलन' 'महाजय' 'जवरोरे ॥३॥ ए 'द्वादश' ही राजवी, वानर राक्षस पूग रे । आवी 'देवन' सूं अध्या, शूर भागी गया दूरा रे ।। आतुर ॥ ४ ॥ फौज भागी लखी इन्द्रजी, भेज्या नीका राजा रे । 'मैघ' 'मालि' 'तडितांग' जी, 'ज्वलन तक्ष' अति ताजार आ०५|| 'सज्वर' 'पाचकसीद' जी, आया फौज ने आगे रे । ए 'पट्' ही धीरज धरे, पिण धीरज नहीं जागेरे ॥ आतुर ॥ ६॥ सहन सक्या सुरतेगने, वानर राक्षम भाजे रे । 'महेन्द्रसेन' हाकोकरे, भाज्यां थी न रहै लाजेरे ॥ आतुर ।। ७ ।। महेन्द्र सेन वानर वंशी, राक्षस ने बड मित्रो रे । 'प्रश्न कीर्ति' सुन तेहनो, पोखे प्रेम पवित्रो रे ॥ आतुर ।। ८॥ मार हटाया खेचरु, अन्यदेव भट आवे रे । घेर लीयो 'प्रश्नकीर्ति ने, तब माल्यवान' सुन धावेरे ।। आ ।।९।। 'श्रीमाली' नामे भलो, 'रावण' रायनो काको रे । वाणे अम्बर छाइयो, सुर उडिया जिम फाको रे || आतुर ॥१०॥ 'सुरस्थम्भन' 'सुरपति' तणो, भाणेजो चल आवे रे । 'सिखकेशी' दण्डो ग्रही, कनक प्रवर बहुदावे रे ॥ आतुर ॥११॥ मारी कीधा पाधरा, 'माल्य' भणी जश दीधो रे । 'सुरपति' सुण आतुर थयो, आप चढण दिल कीधोरे ।। आ १२।। 'इन्द्र' अनुज 'जयवन्तजी', नमी चरण इम दाखे रे । जे अंकुर नसछेदीये, फरसीवल किम राखे रे ।। आतुर ।।१३।।
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wor- ~~~ ३) श्री जनपद रामायण प्रथम खण्ड। ॥ ढाल मूलगी॥ ₹ चढी रण आवीयो, रेणु रही नभ छाहीरे । न वखाणी ग्रन्थ में, तेम हुई लढाईरे ॥ आतुर ॥ २० ॥ रयो 'इन्द्र' नरेन्द्रजी, जीत्यो 'रावण' राजारे । य २ कार हुवो बहुं, वाग्या जशना वाजारे ॥ आतुर ।। २१ ॥ रावण' 'लङ्का' आवीयो, सयण तणे मन भायोरे । इन्द्र' दीयो कठ पिंजरे, आप कीयो फल पायोरे । आ०॥२२॥ सहस्रार' नृप आवीयो, 'रावण' { अरदासोरे । पुत्रभिक्षा मुज आपीये. थापो करी निज दासो रे ।। आ० ॥२३॥ राय कई सुण खेचरा, 'इन्द्र' करे ए कामो रे । नगर वुहारे नित्य को, आछो राखे गामो रे ।। आतुर ॥ २४ ॥ सघली बात मनावीयो, छोडीयो 'इन्द्रज' राय रे । नीबूं काम करन्तजी, आरती में दिन जाय रे || आतुर ॥ २५ ॥ 'साधु' समीपे पूछीयो, पूर्वभव 'इन्द्र' ही आपो रे । नीच कर्म करवू पडयू. कोण कियो थो पापो रे ।। आतुर ॥२६॥ साधु कहै नृप मामलो, पूर्वभव भाखू एहोरे । 'अरिजय' पुरनो भूपनी, खेचर 'मणिगुण' गेहोरे ।। आतुर ॥२७॥ 'ज्वलनसिह' घरे नारीजी, 'वेगवती ' सुविचारी रे । 'अहिल्या' नाप्ने सुता अछे, मात पिता ने प्यारी रे॥आतुरा॥२८॥ 'स्वयम्बर मण्डये तेहने, राय घणा मिली आवे रे । 'आनन्दमालि' ने कन्याजी, वरमाला पहिरावे रे ॥ आतुर ॥२९ नाम 'नडित्प्रभ' तूं नवजी. खीज्यो मनही मजारो रे । 'आनन्दमालि' साथैजी, वहतो अतिधन खारो रे ।। आतुर ॥३० 'आनन्दमालि' चारित्र ग्रही, करतो उग्रविहारो रे। ध्यानारूढ मुनीश्वर, देख्योते इकवारो रे ।। आतुर ।। ३१ ।। दीघो परिपह आकरो, साधुनो चूक्यो ध्यानो रे । सिंह मारिखो ना हुवो, हुओ श्वान समानो रे ॥आतुरा॥३२।।
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। (२८) भी जैनपद रामायण प्रथम-खण्ड । सुधारया भवदीय ।। हनु० ॥ खट् दर्शन में जोय ॥ हनु । ए सम अवरन कोय ॥ हनु० सु० ॥१॥ सेवक 'हनुमन्त' सारिसोरे, 'गम' सरीखोरे राय । हुयो नहीं होसे नहीं, आजन कोई देखाय ॥ हनु० सु० ॥२॥ ए चोल छ, थारो कपि उपकार । प्राण दियां पणना वले, शेष तणो शिर भार ।। हनु० सु० ॥३॥ सेवक ना ए बोल छ, वानर माहरो नाम | शाखा थी शाखा जई, पावं सही विश्राम ॥ हनु० सु० ॥ ४ ॥ सायर जल उलंघियू. बाली १ नगरी लङ्क । 'राम' राय परसादथी, कीधा काम निशंक ।। हनु० सु०॥५॥ दिन-करनी पर दीपतो, पुर 'आदित्य' प्रधान । हनु० राय 'प्रहल्लाद' सुहामणो, पाले जिनवर आण ।। हनु० सु० ॥६॥ 'केतुमति' महिमावती, सत्यवती घरनार । हनु० प्रीतिवति लीलावती, शीलवती संसार | हनु० सु० ॥ ७ ॥ शुभसुपनो अवलोकीयो, विनवीयो जई राय । हनु० रायकहै रलियामणो, नन्दन उपज्यो आय ।। हनु० सु० ॥ ८ ॥ शुभ वेला सुत जाईयो, गुडिया गुहिर निसाण । हनु० घर २ वार वधामणां, घर २ अति मण्डाण ।। हनु० सु० ॥९॥ वारस में दिन थापीयो, पवनंजय तसु नाम । हनु० चन्द्र कला जिम वाधतो, वाधे सुत अभिराम हनु० सु० ॥१०॥ बहोत्तरी वत्रीशजी, चार चार तनु माहे । हनु० सात अठार परिहरे, पुत्र पनो-तो पाहै ॥ हनु० सु० ॥ ११ ॥ पुरवरचे 'माहेन्द्रजी', राय 'माहेन्द्र' उदार । हनु० 'रिदय सुन्दरी'-सुन्दरी, सुन्दर ने सुविचार || हनु० सु० ॥१२॥ पुत्र एक शत ऊपरे, पुत्री हुई एक । हनु० नामे 'अंजना' सुन्दरी, सकल गुणे सुविवेक ।। हनु० सु० ॥१॥ (१) पाड़ी इति पाठान्तरे । -
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( ख ) काय ।। ब्रह्मचारीजी ॥ रांक हाथे जिम रतन ही रे लाल, कहां लगे ठहराय ॥ ब्र० सी० ॥ १० ॥ पांच-काम गुण को तजे रे लाल, सदा रहे चित्त शान्त ॥ ब्रह्मचारीजी ।। वाड़ नवनो ए कोट छे रे लाल, सीधो है शिवपुर पन्थ ।। व्र० सी० ॥११॥ विष है विविध प्रकारना रे लाल, जंगम स्थावर जान ।। ब्रह्मचारीजी ।। पिण वि- पय-समो विपको नहीं रे लाल. हुवे अनन्ती हाण ।। व्र० सी० ॥ १२ ॥ जुगवाहु-मयणरेहा-कारणे रे लाल, मणिरथ घाल्यो घाय ॥ ७० ॥ सीता ने हरतां थकारे लाल, रावण-लंक-गमाय ॥ ७० सी० ॥ १३ ॥ वाड़ सहित व्रत जे धरे रे लाल, शीयल व्रत सुख दाय ॥ ७० ॥ देव-असुर-सुर-तेहने रे लाल, नित्य प्रते नमन क. राय ॥७० सीता ॥ १४ ॥ 'धूलचन्द' जे धारसी रे लाल, व्रत यह दुद्धर धार ।। ७० ॥ पाले आराधे शुद्ध भावसं रे लाल, जावे खेवो पार ॥७० सी० ॥ १५॥ हो थ्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। womhrh trav4 ww मावित्रोने वाहालीखरी, चीरानो वड़मान । हनु० भोजाई भगिनी महा, आदर मेरु समान || हनु० सु० ॥ १ पुत्रीने परणाववा, यौवनवन्त कुँवार । प्रधाने प्रगट कीया, जोई केई हजार ।। हनु० सु०॥ १ वरतो दो मन मानीया, सगला माहि देखी। 'परनंजय' 'प्रल्हाद' नो, विद्युत्प्रभ सुविशेखी हनु० सु०॥ अष्टादशवर्षान्तरे. विद्युत्प्रभ शिवजाय । प्रत्यक्षथयछे आउखो, कन्याकेम देवाय ।। हनु० सु० ॥ १७ 'पवनंजय' चिर आउखे, पवनंजय परिमाण । पुत्री 'पवनंजय' भणी, देवाकही राजान || हनु० सु० ॥ १. खेचर मिलीया एकठा, नंदीश्वरनी जात । प्रार्थना 'प्रह्लादनी', माने सगली तात ॥ हनु० सु० ॥ १९ ॥ आजथकी दिन तीसरे. मानसरोवर जाय । विवाह करीजे वेग सूं, मेलोसहु समुदाय ।। हनु० सु० ॥ २ 'पवनंजय' कह मित्र सूं, ते दीठी साचाल । रम्भाथी अधिकी सही, रूपे झाक झमाल ॥ हनु० सु० ॥ २३ जे-हवो आंखे देखिया, लहिये चैन अत्यन्त । तेहयो वाचाएकरी, कोण कहै सुण मित्त ।। हनु० सु० ॥२ 'पवनंजय' बोल्योहसी, वासरताएदुरी । हूं जाणं हमणांजाई, जोई होऊ हजूरी ॥ हनु० सु० ॥ २३ चाल्हाना मेलाविपे, घड़िते एक दिन थाय । दिनतो जई मासा मिले, कहोरे केम रहिवाय ।। हनु सुनार मित्रकहै सुण स्वामीजी, आरती दूर निवार । रात रहस्य पणेजई, देखाइँ तुजनार ।। हनु सु० ॥ २५ 'पवनंजय कुमारही, चाल्यो मित्रसमेत । आयो अति उतावलो, नारी निरखण हेत हनु० सुमार। 3 (३०) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । जिम २ निरखे नारिने, तिम २ पावे चैन । दैव वहै अति आकरो, सुखमांहि दुख दैन ।। हनु० सु० ॥२७॥ बैठी सप्तमी भूमिका, वारुवात विनोद । रङ्ग मांहि राचीथकी, करती अधिक प्रमोद ।। हनु० सु० ॥२८॥ 'वसन्ततिलका' कहै सखी, कुँवरी तुजवड़भाग । 'पवनंजय' पतिपाईयो, जेहनो जशू सोभाग ।। हनु०सु० ॥ २९ ॥ 'मिश्रकेशी' कहै सखी, केम प्रशंस्यो ऐह । 'विद्युत्प्रभ' वरतो भलो, जेहनो अन्तिम देह ॥ हनु० सु० ॥३०॥ 'वसन्ततिलका' कहेफरी, भोली जाणे न भेद । 'विद्युत्प्रभ' स्वल्यायुपी, तेथीनसरे उमेद ।। हनु० सु० ॥ ३१ ॥ अपर कहै आवात में. तूं नवि लिखे लिगार। चन्दन थोड़ो ही भलो, नहीं विपकेगे भार ।। हनु० सु० ॥ ३२॥ 'पवनंजय' परिणाम सू, तातो थयो तिवार। कुँवरी तो चरजे नहीं, जोई रही वातां प्यार ।। हनु० सु०॥ ३३ ॥ काढी खड्ग खड़ो रयो, ए दोई संहार । करूँ सही उतावलो, बोले राज कुँवार ॥ हनु० सु० ॥३४|| मित्र कहै प्रभुजी सुणो, नारी अवध्य कहाय । तिण में निर अपराधणी, कहो प्रभु केम हणाय ।।हनु० सु०॥३५।। कुँवरीए निन्दा नविकरी, ए कोई ले लवाड़ । तुमतो गित्वा चाहीयो, पृथ्वीनाप्रतिपाल | हनु० सु० ॥ ३६॥ फरिआण्यो निजथानके, ते कहै न करूँ विवाह । प्रथमज कवले मक्षिका, आयां कुण उच्छाह || हनु० सु० ॥३७॥ रांधतहीजे कुहीयो, ते अननी न मिठास । पछी कीसी परे पामिये, पिरसन्तां शावास ॥ हनु० सु० ॥ ३८॥ मोतीव्यां ना मिले. ब्रट्यां नामिले नेह । ते माटे धुरही थकी, तूटणमतिद्यो तेह ।। हनु० सु० ॥ ३० ॥ - -
श्री जैनषद रामायण प्रथम खण्ड ।
(३१)
दाल प्रक्षेप तर्ज-नवीन रसीया-मत्री श्री चौथमलजी म. कृत-
म्हांने मिली कुपातर नार, खबर म्हांने पड़गई सारी आज | टेर ।।
में तो जाणतो छ मुजप्यारी, होसी नहीं हरगिज दुजारी ।
निजरां देखी आज, खूटी पर धरदी सारी लाज ।। म्हांने० ॥१॥
एवातां सुपने नहीं जाणी, करसी आ अपने मन मानी ।
सारो इणरो आय गयो है, मन मांही लो माज ।। म्हांने ॥ २ ॥
इसी जाणतो जो मैं पैली, अधविच में आ गोतो देली ।
तो नहीं करतो प्यार, नार आ मिली अवगुण की जाज॥म्हांने।।३।।
मैं भोलो ओ काम न जान्यो, धोलो २ दूध पिछान्यो ।
पडी न माने तोल, पोल आ निकली कीयो अकाज म्हांने।।४।।
कोई किणरी हुई न नारी, चौथमल्ल कहै समज्यो सारी ।
मने चेतायों पेली गुरुजी, · नथमलजी ' महाराज || म्हांन॥५॥
। ढाल मूलगी॥
मित्र कहै इम किम हुवे, आपण बोल्या बोल ।
न पले तव सहु ये कहै, फिट २ फुट्या ढोल ॥ हनु० सु० ॥ ४० ॥
सांतक में वेतालजी, उठाइया अजाण ।
भङ्ग न पाड़े रङ्ग में सजन नूं रे सयाण ।। हनु० सु० ॥ ४१ ।।
सायरे शिवने आपीयू, विपतो विश्वावीस ।
नीलकण्ठ नामे रहै, अलगू न करे ईश ।। हनु० सु० ॥ ४२ ॥
चौरी चढियो आय के, मित्रतणी मतिमान !
विवाहतणी विधि साचवी, नाम तणे. अनुमान हनु० सु०॥४३॥
। ढाल प्रक्षेप तर्ज-मल्ली जिन याल ब्रह्मचारी-लचन्दजी कृत।
पवनजी तोरण पर आयारे २ सय सखियन रही देख अचम्भे
आनन्द अतिपाया ।।टेर।।
झीणेश्वर सूं नारीसधवा, धवल मद्गल गाया।
आनन्द रङ्ग विनोद विशेपे. हुवा चित्त चाया ॥ पवनजी ॥१॥
NAMAmhrarh (३२) श्री जनपद रामायण प्रथम खण्ड। इन्द्रतणी पर रूप अनूपम, दीसेसवाया। निरखन्तां धापे नहीं नयणां, सयणां मनभाया ।। पवनजी ।।२।। ढाल मूलगी मयङ्गाल मोटा मलपता, अति ताजा तो खार । दीधा वरने दायजे, मणि मोती वरहार ।। हनु० सु० ।। ४४ ।। लाडीने लेईकरी, घरे आयो प्रह्लाद । सप्तभूमिसुहामणो, दीधो वर प्रासाद ।। हनु० सु० ॥ ४५ ॥ हुंसे मनाची हरख सं, उवारी अखियात । भायग भोग-वियेसही, ए निश्चय विधिवात ॥ हनु० सु० ॥४६॥ ढाल भणी ए सातमी, 'पवनंजय' परणेत । 'केशराज' सुखपामिये, जो हो चित्तचेत ॥ हनु० सु०॥४७॥ दोहा खम्भायती रागे चोल कुयोलन वीसरे, सालसमां सालन्त । क्षणहि रति नविऊपजे, आरति घणी आलन्त ॥१॥ नजर न मेले नाहलो, ऊपजे अति उचाट । आवटणूं लागेषणं. विरहै वांकी वाट ॥ २ ॥ मात पितानी लाडली, सुसरानी शुभ दीठ । कंतमया चिन कामिनी, ओछे देखे नीठ ॥ ३ ॥ 'पवनंजया नी पदमनी, परममहा सुनकारी। नाह निस्नेह निपटही, मेली माथे मारि ॥ ४ ॥ ढाल आठवीं तर्ज-भटियानी मेली माथे मारि, 'पवनंजय' की नारी, आरति आकरीए, आणे सा खरीए । लांवा लीए निस्सास, वासर जाय निराश, देवकिसो कीयोए, फाटे छे हीयोए ॥ १ ॥ दिन वातां में जाय, रयणी दुभरथाय, विरह वियोगणीए, सखी र योगणोए ।
श्री जनपद रामायण प्रथम खण्ड । (दाल प्रक्षेप तर्ज-खोटो लालचीयो, स्वा. भी चौथमलजी म. सखी भणी कहे सुन्दरी, म्हारो मनमोहन भरतार सखि किम रूठो में जानूं जिम करतार, कलङ्क दीयूं झंठोए ।। टेर ।। कुन भरमायो पापीये, कोई चुगलखोर चण्डाल । सखि० म्हारे इणभव वो सही है हिवडा केरो हार ॥ सखि० ॥ १॥ विगर गुन्हैही छोडदी, म्हारी सगी नणद रो वीर । सखि० हाय हिवे हूंस्यूं करूं, म्हारे लग्यो कलेजे तीर । सखि० ॥ २ शीलवती सा सुन्दरी काई बदन कीयो दिलगीर । सखि० नीर झरे दोऊं आंख मे, काई भीनो दिखनी चीर ॥ सखि०॥३ चिन इजत सूं जीवनो. काई मरूं कटारी खाय । सखि० वसन्तमाला इम धीरपे, कहै 'चौथू' 'नाथ' सुपसाय ।। स०॥४॥ ढाल मूलगी बोली सखी 'वसन्त तिलका' निकट वसन्त, पाइयन रोइयेए काठो होइयेए ॥२॥ सघला दिन एक रूप, नविजावे एवं विरूप, फरिवाहुडसेए नेह जोडसेए ॥ माय बापते वार समझा विचार, त्रियम हठइए, पुत्र करें किसुंए ॥ ३।। उत्तर न आपे जाम, छाना रहिया ताम, ताणि न तोडियेए, तूटयूं जोडियेए ।। हिलू मूंकीयू काम आप ही आवे ठाम, तूटे खेचीयूए, अधिकू इच्छीयूए ।। ४ । क्षेपक तज्ञ अजनारी पियरथी आवी रे सूखडी, वसन्त माला कर मोकली सोयतो । लेकर स्वामी आगे धरी, गावता गन्धर्व ने आपी छे तोय तो॥ वस्त्र आभूषण-मोकल्या, जाणू म्हारा स्वामीने शोभसी अंगतो। वस्त्र फाडी ने कटका कर्या, आभरण लेईने आपीयामातङ्गन्तो।। सती में शिरोमणी अंजना ।। टेर ।। आणा घणा पाछा मोकल्या, इणरे आणे आवीयो बडवीर तो। अंजना-कहे नवि-वालीये, वस्त्र आभूपण मोकलिया चीरतो ।।
M ( ३४ ) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । स्वामी ने मन मान्या नहीं, पीयर आची हूं तूं करूं वात तो। वन्धव पाछो हो थे वलो, मात पिता दुःख धरे दिन रात तो । सती। अंजना वैठी रे गोखमें, पवनजी तुरीय खेलावण जाय तो। आवतां जावतां निरखती, तिम २ हर्ष चधे हियमांयतो ।। पवनजी कोपे रे पर जल्यां, अंजना आणे छे अति घणी प्रीत तो। जाणे रे नार नी हालसी, गोखो आडी रे चुणाई छे भीततो। स.। पांच से गांव पोते लिया, राय राणी वेहूं वर्जे के पूत तो। अंजणा सती रे सुलक्षणी, एहने सूंपीये निज घर मूत तो ॥ म्होटारे कुलतणी ऊपनी, राजा हो महेन्द्र तणी बहु लाज तो । अंजना आदर कीजीये, यूं कहे केतुमति, राय-प्रहलाद तो॥ स. ॥ ढाल मूलगी आयो हृत उदार, 'रावण' नो सुविचार, भापित कई भलोए, प्रभुजी सांभलोए ॥ 'वरुण' न माने आण, राखे अधिक गुमान, 'रावण' रावलोए, मिलीयो छे घणोए ।। ५।। 'वरुणसुत सुविशाल, बांधिलीया तत्काल, 'खर दुपण' खराए, खेचर आकराए. तेड्यो रावण राय', खेचर मिलीया आय, प्रभु तुमही चलोए काम उतावलोए ।। ६॥ मंत्री श्री चौथमल्लजी म. कृ० ढाल प्रक्षेप तर्ज-खबर नहीं है जुग दूत 'दशमुख' नृपनो आयोरे ॥२।। युद्धकरन के हेत राय प्रहलाद ने बुलवायो सहथ पुत्रां का पिता वरुण महा अभिमानी राजा । गरण सन्मुख राड करण को. गयो वजत वाजा ।। दूत ॥ १ ॥ चार प्रकार चमुले चालो, दृत इसी दाखे । सुनकर राजा सन्नद बद्ध हुय, सुभटों ने भाखे ॥ दूत ॥ २॥ हां सुमटों जल्दी से सारा, होचो हूंसीयार ॥ थे म्हारी गक्तिने जोइ जो, मैं जोस्यूं थारी ।। दृत ॥ ३ ॥ सुन कर मुभट वणा मूंसाया, वरुण कोन वपूरो। थो यों चनो बजे जगमाहै, कसविन जेम कपूरो ॥ दूत ॥ ४ ॥ में श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। इन पर करत ओ गाज सुभट सब, कूदे नवतालों। 'चौथमल्ल' नथमाल मुनि शिष्य, जोडी ए ढालो ॥ दूत ॥ ५ ॥ ढाल मूलगी तात निपेदी जाम, चाल्यो कुँवर जाम, 'पवनंजय' जयोए, आनंद अति थयोए । हयगय रह अधिकाय, मेली जनसमुदाय, कुंवर चालीयोए, हरखे हालीयोए ॥७॥ निसुणीए चिरतन्त, कटके चलन्तोकन्त, दर्शने सा चालीए, आवे उतावलीए । पञ्चाली जिम जोय, आगे ऊभी होय, पलकन पालटेए, प्रिय जोवू घटेए ।।८।। पड़वानो जेमचन्द दुर्बलदीसेमन्द, मांसन देखीयेए, चाम विसे- खीयेए । लुखी तालक देखाय, नहींरे विलेपनकाय, सादीसाटि- काए. तिमही ललाटिकाए ॥8॥ अण खाया तम्बोल, धूंसर अधर अमोल, काया वलीए, शीथलपडी वलीए । नयन जल में झूली रही छै तन मन भूली, नारी निरखतोए, चाल्यो हरखतोये ॥२०॥ धसि लागी पतिपाय, सखी कहै खगराय, दासी तुमार- डीए, चित्तहमारडोए । तिरस्कारीछे एह, मैं जाणीधुरेछेह, मानन मांगताए, लहिए लागतांए ॥ ११ ॥ मन्त्री श्री चौथमल्लजी कृत ढाल प्रक्षेष तर्ज-परस्तान से उतरी परी पवन अंजनीपर रीसकरी इणविरिया का निजरपरी ।। टेर ।। आपापन व्यभिचारण नारी आडी क्यों आई इण वारी मैं जगरनकारन राह पकरी प० १ मैं देख्यो पापण को मुंडो वणसी आगे कारज मँडो इण पर उणरी बुद्ध विगरी प० २ पियमन तिय की परवाह नांही सातिय पिय को लेवे वधाई चा तिय पतिभा सखरी प० ३ सति अंजना की मति मोटी धन्यवाद है कोटान कोटी शिप्यनाथ चोथु उचरी प०४ दाल मुलगी फरि आवी घरमांहि, धरणिये पडि पाहि, अवला नामयीए, अरु परीणामधीए ।
(३६) श्री जनपद रामायणं प्रथम खण्ड । -- ढाल प्रक्षेप तर्ज-नवीन रमीया-स्वामी श्री चौथमल्लजी म.रुत म्हारा प्राण पतीजी प्रेम केम दीयो ऊंचो मेली रे ।। टेर।। पंचां री साखी कर पियु मुज, लारे लेली रे । कांई कीयो मैं चूक करी मने, आज अकेली रे ॥ म्हारा ॥१॥ चाय नहीं म्हारे और चाहूं मैं दरसण डेहली रे । तूं जाणे जू जाण म्हारे तो तूंहिज बेली रे ॥ म्यारा ॥२॥ मन मेलारी मालूम म्हांने पडी न पेली रे । सतगुरु पासे जाकर मैं तो बनती चेली रे ।। म्हारा ॥३॥ 'नाथ नो चौथू' कहत जोधाणे, सति अलबेली रे । पियू तणी अपमानित तदपि नवल नहेली रे ।। म्हारा ॥ ४ ॥ ढाल मृलगी दलवलनो विस्तार, चाल्यो राजकुंवार, मानसरोवरुए, वासो अनु- सरुए ।। १२ ।। मंदिर रचना कीध, पलंकडे परसिध, स्तोसुंदरुए भोग पुरुन्दरूए । दीनपणे कुरलन्त, पंखिणी शब्द सुणन्त, मन जागीयोए, राय अनुरागीयोए । १३ ।। ढाल प्रक्षेप तर्ज नाथ कैसे गजको फन्द छुडायो चकवी यों क्यूं शोर मचायो, क्यों चहचाट लगायो ॥ टेर ।। गति नहीं कारण दीसत रनमें, जिससे जिय घबरायो। विन कारण ही क्यों कुरलावे, पूरो पतो नहीं पायो ।चकची ॥१॥ सुनकर सजन' यू मन सोचे, आछो अवसर आयो । जिनसे सतिको यह अपनायें, ऐसो रङ्ग लगायो । चकत्री ॥२॥ चकवी इण विद्ध शोर मचायो । टेर ॥ चकवी कहती चतुर सुनो तुम, चित्त किनको चमकायो । कलंक लगाकर कीया विछोहा, जिनको विरहफल पायो ।च०।३। सती अंजनापे रंज को कारण, सगलो भेद बतायो । ऐसो ढङ्ग रङ्ग दिखलाकर पवन केऽनङ्ग जगायो । च० ॥ ४ ॥ १ सती अञ्जना से। नोट-"सती अञ्जना कविवर पण्डित मुनि श्री चैनमलजी महाराज रचित है। १.
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। (३७ -we वासर माणे भोग, रजनिनोरे वियोग, ते कुरले घणीए, वचने दयामणीए ।। जेहने दिन ने रात, एकज सरखी जात, ते केम जीवहीए, आरती अति वहींए ।। १४ ॥ परण्या पछीरेएह, साथे कीयो नहीं नेह, सतिय शिरोमणीए, सादीधी अवगणीए ।। जो आवीथी चाल, तोहूँ गयो मुँह टाल, चोल सन्तोपनोए, न कहिवाणो घणोए ॥ १५ ॥ आज लगेहती आश, अब तो हुई निराश, आजमरे सहीए, एतो मे लहीए ।। नारी हत्या पाप, महोटो छे सन्ताप, मुजने लागसेए, अपजश जागसेए ॥ १६॥ मित्र 'प्रहसित' बोलाय, मननी बात सुणाय, पूछे सं करूँए, मित्रं कहै खरूँए । नारी हुई निराधार, मरत न लावे वार, साचो मोचणोए, मान विमोचणोए ॥ १७ ॥ १ ढाल प्रक्षेपतर्ज-हांक मतिका गर्व दियाना। हां! काम में सोटो करीयो, लोक लाज से जरा न डरियो द्वेप सती के ऊपरे नाहकही धरीयो रे ॥ टेर ।। मात पिता मुजने समजायो. पिण में नहीं रस्ते आयो।। मित्रतणी नहीं बात मान में, उलटो लड़ियो रे ।। काम में ||२|| १ सती अञ्जना से-धेनमलजी महाराज रचित है। mia-ne ----- + (३८) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । ? (ढाल मूलगी) अव ही जावू तास, सन्तोषू स उल्हास, मानी माननीए, आशा आननीए । मध्य रात्रीये सोई, स्वामी सेवक दोई, आया संचरीए, गगन गतीकरीए ॥ १८ ।। स्वामी रहीयो वार, सेवग गेहमजार, आवी जोवहीए. राणी रोवहीए। पोयणे मारी हेम, सा तवदीसे तेम, जल विण माछलीए, तलपे बस बलीए । १९।। ऊंची नीचीथाय, चैन न रंच लहाय, कंकण तोडतीए, गिरवू लोटतीए । वरजी २ राखन्त, धाई भल भाखन्त, जीवन्तां सहुए. सुख हो से वहुए ॥ ॥ २० ॥ संचर जाणी धाय, धसीतस नारी ग्रहाय, काढे जेट लेए, भाखे तेट लेए । हूं स्वामी नो मित्र, नामे "प्रहसित" पवित्र. स्वामी आधीयोए, मनने भावीयोए ॥२१॥ भुंडा ? एसी हासी. कुंवरी कहै उदासी, नाम न मुज गमेए. दर्शन किम रमेए । वर्ष हुवा मुजवार, नवि दीठो भरतार, अलगोही रहैए, खार घणूं वहैए ।। २२॥ दोहा- सनि अंजना की सखी, सुण्या अपूरब बोल । बोली उत्तर में, अहो, सुण रे फूटा ढोल ॥१॥ दाल प्रक्षेप तर्ज कायथडा हारे लम्पटी के तूं मारग भूलीयो, हारे लम्पटी के थारो आगयो काल रे पापी म्हारा पिया परदेशां में || टेर ॥ हारेक लम्पटी वालू थारी जीभडी, होरेक लम्पटी थारी चिराऊं खाल रे पापी म्हारा पिया० ॥१॥ हारे लम्पटी में ऐसी नहीं कामनी, हारे लम्पटी रा थारे फन्दरे पापी म्हारा पिया ||२|| हारे लम्पटी क्या तूं मेरे सामने, हरि लम्पटी गिण न इन्द्र नरेन्द्र २ पापी म्हाग० ॥ ३॥ दोहा- सती शील में झिल रही, लखली पवन कुंचार । प्रेम लायके पुनरपि चोल्यो वचन विचार ।।१।। १मती अंजना से . १ ।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । [ ३९) ढाल क्षेपक तर्ज मेरा नन्नासा देवरा जिनके लिये तूं झूरे झुरणा, उनको देवे किम गारी है ।। मैं हूं तुम्हारा पियू पियारा, तूं है मेरी पियारी है ।। हां म्हारी प्यारी अंजना, तो पर वारी है ॥१॥ हा- दीपक लेकर देखीयो, निश्चय पचन कुंवार ॥ जाय वसन्ती सती भणी, बोली इणी प्रकार ॥१॥ दाल मूलगी तणो एदोप, करचो राग न रोस, कीधो आपणोए, इह-पर भव तणोए नीनो करतार, दीठो भलो भरतार. फूली अङ्गमाए, राणी रङ्गमाए ॥२३॥ ढाल प्रक्षेप तर्ज-पन्नजी मृडे बोल । घर आयोए २ । सुन सती अंजना मान बढायोए । टेर ॥ १२ अब खोल मून तूं, थारो भाग्य सवायोए । २ अब आयो पियुडो, विना बुलायोए ।। पियु०॥१॥ यो वचन ओ सती अंजना, अनहद मोद बढायोए। I आने से सती हिया में हर्ष न मायोए । पियु० ॥२॥ से सती तर निज आसन से, बदन कमल विकसायोए । ल दुवार जोड कर दोनों. वचन सुनायोए ।। पियु० ॥ ३ ढाल प्रक्षेप तर्ज-गवरल ईशजी केये तो॥ आया हो प्रियतमजी जावू वारणा हो, थांपर वारी हो बलि- राज पधारणा हो । टेर।। झट ऊठी शीप नमायो, पियु दरशन से मन विकसायो, नो सब अपराध समायो, झटपट आसन लाय विछायो काज मारणा हो॥१॥ आज आंगण में सुरतरु फलियो, म्हारो रो दुखडो टलियो. पुण्य योग से प्रियतम मिलीयो. म्हारी सती अंजना से। २ सती अंजना से। ३ सतो अंजना से। 1 ( ३८ ) श्री जैन पद रामायण प्रथम गए । . (सल मूलगी) अब ही जा तास, सन्तो स उन्हास, मानी माननीए, आशा आननीए । मध्य रात्रीये सोई, स्वामी सेवक दोई, आया संचरीए, गगन गतीकरीर ॥ १८ ॥ स्वामी रहीयो पार, सेवग गेहमजार, आवी जोवहीए. गणीरोवहीए॥पोयणे मारी हेम, सा तबदीसे तेम, जल विण माछलीए, तलपे बस बलीप ॥ १९॥ ऊंची नीची थाय, चैन न रंच लहाय, कंकण तोड़तीए, गिरवू लोटतीय ॥ वरजी २ गम्पन्न, धाई भल भाग्यन्त, जीवन्तां महए. मुख हो से बहुए ॥ २० ॥ संचर जाणी धाय, धमीतम नारी ग्रहाय, काटे माग्वे तेट लेग ।। ई स्वामी नो मित्र, नामे ग्वामी आवीयोए, मनने भावीयोग ।।२१ ।। . कंबरी कहे उदासी, नाम न मुज गमेए, वर्ष हुवा मुजवार, नवि दीटो भातार, अल वहेण ॥ २२॥ दोहा-- सनि अंजना की सखी, बोली उत्तर में, अहो, ढाल प्रक्षेपत हार लम्पटी के तूं माग्ग भूलीयो, काल रे पापी म्हारा पिया हारेक लम्पटी बालू थारी पाल रे पापी म्हारा पिया० ॥१ कामनी, हारे लम्पटी गचं थारे हरि लम्पटरी क्या तूं मेरे मामने, रे पापी म्हाग० ॥ ३॥ दोहा- सती शील में झिल प्रेम लायके १. 1 १ मती अजना से।
~~~~- vvvwwwsex १ श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । [ ३९) ढाल क्षेपक तर्ज मेरा नन्नासा देवरा जिनके लिये तूं झूरे झुरणा, उनको देवे किम गारी है । ह तुम्हारा पियू पियारा, तूं है मेरी पियारी है ।। हां म्हारी प्यारी अंजना, तो पर वारी है ॥१॥ दोहा- दीपक लेकर देखीयो, निश्चय पवन कुंवार ।। जाय वसन्ती सती भणी, बोली इणी प्रकार ॥१॥ दाल मूलगी कर्म तणो एदोष, करवो राग न रोम, कीधो आपणोए, इह-पर भव तणोए कामनीनो करतार, दीठो भलो भरतार. फूली अङ्गमाए, राणी रङ्गमाए ॥२३॥ हाल प्रक्षेप तर्ज-पन्नजी मृहे बोल पियू घर आयोए २ । सुन सती अंजना मान बढायोए ॥ टेर ॥ वोल २ अब खोल मून तूं, थारो भाग्य सवायोए । देख २ अब आयो पियुडो विना बुलायोए । पियु० ॥१॥ सुण्यो वचन ओ सती अंजना, अनहद मोद वढायोए । पियु आने से सती हिया में हर्प न मायोए । पियु० ॥ २॥ ऊठी सनी तब निज आसन से, वदन कमल विकसायोए । खोल दुवार जोड कर दोनों, वचन सुनायोए । पियु० ॥ ३ ॥ ढाल प्रक्षेप तर्ज-गवरल ईशाजी फेये तो०॥ भले आया हो प्रियतमजी जावं वारणा हो, थांपर वारी हो बलि- हारी राज पधारणा हो । टेर॥ सती झट ऊठी शीप नमायो, पियु दरशन से मन विकसायो, अपनो सब अपराध समायो, झटपट आमन लाय विछायो काज सुधारणा हो ॥१॥ आज आंगण में सुरतरु फलियो, म्हारो मारो दुखडो टलियो, पुण्य योग से प्रियतम मिलीयो, म्हारी १सती अंजना से। २ सती अंजना से। ३ सती अजना ले। .
( ३८ ) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (ढाल मूलगी) अब ही जावू तास, सन्तोपुं स उल्हास, मानी माननीए, आशा आननीए । मध्य रात्रीये सोई, स्वामी सेवक दोई, आया संचरीए, गगन गतीकरीए ॥ १८ ॥ स्वामी रहीयो वार, सेवग गेहमजार, आवी जोवहीए. राणीरोवहीए॥पोयणे मारी हेम, सातवदीसे तेम, जल विण माछलीए, तलपे चल बलीए ॥ १९॥ ऊंची नीची थाय, । चैन न रंच लहाय, कंकण तोडतीए, गिरवू लोटतीए ॥ वरजी २ राखन्त, धाई भल भाखन्त, जीवन्तां सहुए. सुख हो से. बहुए । ॥ २० ॥ संचर जाणी धाय, धसीतस नारी ग्रहाय, काहे जेट लेए, भाखे तेट लेए । हूं स्वामी नो मित्र, नामे “प्रहसित" पवित्र. म्वामी आवीयोए, मनने भावीयोए ॥ २१ ।। मूंडा ? एसी हासी. कुंवरी कहै उदासी, नाम न मुज गमेए. दर्शन किम रमेए । वर्ष हुवा मुजवार, नवि दीटो भरतार, अलगोही रहैए, खार घणूं वहैए ।॥ २२॥ दोहा- सति अंजना सखी, सुण्या अपूरब बोल। चोली उत्तर में, अहो, सुण रे फूटा ढोल ॥१॥ ढाल प्रक्षेप तर्ज कायथडा हरि लम्पटी के तूं मारग भूलीयो, हारे लम्पटी के थारो आगयो काल रे पापी म्हारा पिया परदेशां में ॥ टेर ॥ हारेक लम्पटी वालू थारी जीमडी, हारेक लम्पटी थारी चिराऊं खाल रे पापी म्हारा पिया० ॥१॥ हारे लम्पटी में ऐसी नहीं कामनी, हारे लम्पटी राचूं थारे फन्द रे पापी म्हारा पिया ||२|| हारे लम्पटी क्या तूं मेरे सामने, हरि लम्पटी गिण न इन्द्र नरेन्द्र २ पापी म्दाग० ० ॥३॥ दोहा- सती शील में झिल रही, लखली पवन कुंवार । प्रेम लायके पुनरपि चोल्यो वचन विचार ||१|| १ मती अजनासे। १ श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । ~~ ~~~~ - २ ढाल क्षेपक तर्ज मेरा नन्नासा देवरा जिनके लिये तूं झूरे झुरणा, उनको देवे किम गारी है ।। मैं हूं तुम्हारा पियू पियारा, तूं है मेरी पियारी है ।। हां म्हारी प्यारी अंजना. तो पर वारी है ॥१॥ दोहा- दीपक लेकर देखीयो, निश्चय पवन कुंवार ।। जाय वसन्ती सती भणी, बोली इणी प्रकार ॥१॥ ढाल मृलगी कर्म तणो एदोप, करवो राग न रोस, कीयो आपणोए. इह-पर भव तणोए कामनीनो करतार, दीठो भलो भरतार, फूली अङ्गमाए, राणी रङ्गमांए ॥२३॥ ढाल प्रक्षेप तर्ज-पन्नजी मृहे योल पियू घर आयोए २ । सुन सती अंजना मान बढायोए ॥ टेर वोल २ अब खोल मून तूं, थारो भाग्य सवायोए । देख २ अब आयो पियुडो; विना बुलायोए ।। पियु० ॥१॥ सुण्यो वचन ओ सती अंजना, अनहद मोद बढायोए। पियु आने से सती हिया में हर्प न मायोए । पियु० ॥२॥ ऊठी सती तब निज आसन से. वदन कमल विकसायोए। खोल दुवार जोड़ कर दोनों, वचन सुनायोए ।। पियु० ॥ ३ । हाल प्रक्षेप तर्ज-गवरल ईशाजी केये तो०॥ भले आया हो प्रियतमजी जावं चारणा हो, थांपर वारी हो र हारी राज पधारणा हो । टेर ॥ सती झट ऊठी शीप नमायो, पियु दरशन से मन विक्रमः अपनो सब अपराध समायो, झटपट आमन लाय विछायो व सुधारणा हो ॥१॥ आज आंगण में सुरतरु फलियो. म्ह सारो दुखडो टलियो, पुण्य योग से नियतम मिलीयो, म्ह १ सती अंजना से। २ सती अजना से। ३ सतो अजना से (४०) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड | । धन्य घडी धन्य भाग के लाज वधारणा हो ॥२॥ दोहा-सती सरलता क्षांतिता, पतिवरता पिण और । लखकर मन मुदित हुवा, बोला कुंवर किशोर ॥१॥ ढाल मूलगी भद्रे ? खम अपराध, थारो छेह न लाध, ओछो हूं धणीए, पूरी तूं भणीए । दुःख सायर अगवाह, कांठे आवी नाह, नामा धारथीए, नावा कारथीए २४ ॥ हसी रमी सुख पाय चालण लाग्यो राय, राणी तब कहैए. गर्भ रहै सहेए । उत्तर अहिनाण, आपो स्वामी सुजाण, लोकां थी डरूंए, सुखमें दिन भरूंए ||२५|| मंत्री श्री चौथमलजो म कृत ढाल प्रक्षेप तर्ज-नवीन रमिया पाछा जाता प्रियवर ! राज मायत से मिलता जाईजोजी ॥ टेर॥ तीन गत मैं रह्यो महिलां में, यों फरमाईजोजी । कहनो हमारो मान पति थे मत शर्माईजोजी ।। पाछा ॥ १ ॥ बात कही में सोच समझ मत यों ही गमाईजोजी । भविष्य ऊजरो होय इसी पिय बात बनाईजोजी । पाछा ॥२॥ जंग वरुण को जीत सुजशवर लारे लाईजोजी ॥ नित की ऊडास्यूं काग कंत झट पाछा आईजोजी ।। पाछा ॥३॥ आनन्द मंगल वर्ते नित २ धर्म वधाईजोजी ।। "चौथ" कहै पवनं नयने नथमाल, मनाईजोजी ।। पाछा ॥ ४॥ ( ढाल मूलगी) देई मुंदडी देव, चाली गयो ततखेव, कट के जई मिल्योए, किणहिन अटकल्याए । केशराज ए ढाल, नगर संख्या सुविशाल. नारी नाहलोए, मिलण उमाहलोए ।। २६ ।। १ पर्वत (आठ)
झुमकडानी
श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड। (४१)
दोहा (धन्या श्री रागे)
"पवनंजय" तव पाधरो, "लंका" नगरी जाय ।।
भूप भली परे भेटीयो, अति रलियायत थाय ।। १ ॥
रावण " रूड़े रावले, शुभ वेला सुविचार ।
वरुणो परि तत्खिण चल्यो, दल बलने अनुसार ॥२॥
अब तो अंजना सुन्दरी, गर्भ धरे तिण वार ।
गुप्त पणा नूं कामए, कोईयन जाणे सार ।। ३ ।।
गर्भ तणे तव लक्षणे, गर्भ जणाणो जाम ।
केतुमति ” सास कहै, किस्यूं कियो ए काम ॥४॥
पवनंजय"
परदेश छे, बहु वधारयूं पेट ।
हूं जाणू के एम हुसे. सोई हुवो नेट ॥ ५ ॥
ढोल नवमी तर्ज
"केतुमति" कलह कारिणीजी, काल रूपणी होई,करमगति दोहली।
बहु किम्यू ते ए कियूंजी, लाजचिया घर दोई ॥ कर्म९ ॥ १ ॥
भोली अभागणी निठुरणीजी. थो मननो उन्माद ॥ कर्म० ॥
नाण तजवाथा भलाजी, कां लीधो अपवाद ।। कर्म० ॥२॥
मग्चा थी फरि जीवीयेजी. शील रह्यां संसार || कर्मः ।।
गील भलो महुने सहीजी, सुन्दरी नो सिणगार ॥ कर्म० ॥ ३ ॥
नन्दननी अव मानताजी. जाणतां सहु कोय ॥ कर्म० ॥
रण थारो असतिपणोजी. आजे जणाणो जोय ॥ कर्म० ॥ ॥४||
वे गणी रावलीजी, दुःख हिये न ममात ।। कर्म० ॥
दोहा- कटुक वचन सास तणा, सुण्या "अंजना" नार ।।
उत्तर में आतुर तदा. बोली वचन विचार ॥१॥
मंत्री श्री चौथमलजी म. कृत ढाल प्रक्षेप तर्ज नवीन रसीया
साची कहदं हो सासुजी मांझू झूठ न बोल्यो जाय ।
ठ न बोल्यो जाय मांसं साच न खोल्यो (छोडयो) जाय टेरा।
अठ बोल क्यों जन्म विगारूं, चौर जार समजो सुत थारूं ।
स्या तीन इतरात सासुजी कटक सं पाछा आय 11 माची ॥२॥
(४२) श्री जैनपद रामायन प्रथम खण्ड । momum सासू रीस करीने बोले. तूं कह भूली किण रे भोले । बोले क्यूं नहीं साच देवूलां मैं थारी स्यान गमाय ।। साची ।।२।। सती कयो सासू नहीं माने, झूठी सारी वातां जाणे । 'नाथ शिष्य चोथु' दी निसाणी तत्खिणसति दिखाय |सा० ३।। ढाल प्रक्षेप तर्ज-तावडा धीमोमो पडजारे लाडीनी लखण नहीं आछा हे २ खोटा करके काम अवे थे बण- रया हो साचा ॥ टेर॥ चौरी कर तूं लाई गहणा, वण रही साहूकार । जाणूं लखण मैं थारा सारा, तूं सेवे व्यभिचार ।। लाडी ॥ १ ॥ ( ढाल मूलगी) देखावी सा मंदडीजी पति आगमनी बात ।। कर्मगत दोहीली ॥५॥ वलती वाघण वेगसूंजी, संभलावे सहु लोक । कर्मगत० ॥ नाम न भावे तेहनोजी, तेहगं स्यूं संयोग ।। कर्मगत ॥ ६ ॥ गिरी गिराई मुंद्रडीजी, हाथ चही कहीं आय ॥ कर्मगत० ॥ साची होवे सुन्दरीजी, क्यू न बोलावे ए माय || कर्मगत० ।।७।। दोहा-कूडा बोली कामणी, राखू नहीं इक रात । आंख थकी अलगी करो, भाखे राणी वात ॥१॥ मंत्री स्वा० श्री चौथमल्लजी म. कृत दाल क्षेपक तर्ज-गिणगोर की- सासूजी थे म्हारा थांरा जाया ने आवण दोजी, जाया ने आवण दो जितरे ए वातां जावणदोजी ।। टेर ।। हाथ जोड ने अरज करू मैं बडा वरों की जाईजी । ऐसी बात सुणी नहीं आगे, आ काई बात सुणाईजी ।। सासु ॥२॥ एकलडी बनमाहै गाने, मतना मेलो सासूजी ।। ऐंठो पाय रहूं घर माहै, बोले न्हाखी आंमजी || सासु ।। २ ॥ माडांणी जो बन में मेलो, साप म्यार मुझ खासीजी । विगर गुन्है ही मुझ मरवासोतो, थोरे हाथे काई आसीजी ||सासु॥३॥ साम मुमरा सेथी बोलो, कांई जोर मैं करमूंजी । १ सती अञ्जना से। - श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । (४३ भूखां तिरसां मरती मैं तो, विना मौत मैं मरजी ।। सासु ॥४॥ दीन वचन हुय बोले बहुयर, सासूजी थे मानोजी । दासी की दासी हुय रहसं, चौथू कहै मत तानोजी सासु ।।५।। श्री. धैध धूल चन्दजी सुराणा कृत ढाल क्षेषक तर्ज-बधव बोल मानो सासुजी म्हारी अरज सुणीजे हो, तुम सुत आवे ज्यां लगे घर मांही राखीजे हो। टेर॥ विगर गुन्है काढो मती, मन खांत करीजे हो। कटक भणी जन मोकली खबरी कर लीजे हो । सासु ॥ १ ॥ अर्ज इती अव धारजो, माताजी मोरी हो। पछे ही पछतावसो, कहूं कर जोरी हो । सासु ॥ २ ॥ गद २ वाणी बोलती नयणां जल ढलके हो। दुःख अपूरब सांभरें, कालेजो कलके हो । सासु ॥ ३ ॥ क्रोधवसे राणी कहै, बोले किण दावे हो। झूठ बके मुझ आगले, जरा शर्म न आवे हो ।। सासु ।। ४ ।। करम कोई बांधो मति, भवि जीवां भारी हो। भुगतण विरियां जीवने, नहीं लागे कारी हो । सासु ॥ ५ ॥ दोहा-राणी चोली रोस भर, दो दासी ने मार | एह काम सब इण कीया, पकड़ो चेटी चार ॥१॥ ढाल क्षेपक तर्ज-दमीरीयानी। धूलबन्दजी सुराणा कृत- बाजेरे लोला ताजणा, रोवन्ती असराल सनेही,। डील थयो चक चोल ज्यू, छूटे रुद्रनी धार सनेही-कर्म तणी गति दोहली। टेर॥ कूटण वाली कम्पे घणी, नहीं लागे कछु जोर सनेही। हुकम धणोरे कारणे, काम करां ए भोर सनेही । कर्म० ।। २ ।। संस करी सति भासतो. न्हाखे मुख निस्सास सनेही। चौरी में कीधी नहीं, भावे देवो मुझ पास सनेही । कर्म ॥शा दोहा-केतुमती अनि क्रोध में, सुन्या न वचन लिगार।। अनुचर को बुलवाय, बोली यो ललकार ॥१॥ - +
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(४४) श्री जनपद रामायण प्रथम खण्ड ।
अन्न पाणी री आखड़ी, जोलो ए. नहीं जाय ।।
सति विचारे चित्त में, अब वोलीजे नाय ॥२॥
क्षेपक तर्ज लावणी (लेखक).
दोनों को कालो वास तुरत पहिराया,
जो आभूपण मणीमाल तुरत उतराया ।।
कालो रथ ने काला तुरङ्ग मंगाया,
दीयो कालो स्वारथी काला हीया बनाया।
सती करे अरराट सखी समझावे,
रथ चाल्यो सननाट नगर विच आवे ।
मत देना कोई आल किसी पर भाई,
भुगते हाथो हाथ हुवे दुःख दाई ।। टेर ॥१॥
धूलचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज आज शहर में हजा मार सीपडे
नर नारी हो सारी जोवती, रावती भर २ नंण, सुज्ञानी ।
हा हा देव ए काम कीयो की , भाखे इण पर वेण ।। सु०॥
जोइजो अवस्था सतियों में पड़ी । टेर ।। २ ।।
म्होटा घर में अकाज हुवा इसा, छोटांनो स्यूं थाह ॥ सु० ॥
आरत करती हो कामण अतिघणो, जोवे नगरना शाह ।।सु.जो.॥२॥
काला रथ में वैसा संचरे, धरती दुःख अपार | सु०
मुख कुमलाणों मालती फूल ज्यू लोक घणा छै लार ।।सु जो.।।३।।
नगरी उल्लंघो हो आई बन विपे, नन में तेज न काय । सु०
मन दुःख धरतो स्वारथी वोलियो, दोषण म्हारो न माय |सु.जो.४१
सनी दुःख देखी स्वारथी इम कहै, धिक् २ पापी पेट । सु० ।
जन्म योयो हो मैं इण वम पड्यो. नीच कर्म कीयो नेट ।सु.जो.५
ढाल मृलगी
निभ्रंत्री वचने खरीजी, आरक्ष पुरुषां हाथ ।। कर्म०
काही नगरे वाइरेजी. सखी चाली तस साथ ॥ कर्म० ॥ ८॥
आरक्ष पुरुपे पाधरीजी. पीहरे आणी सोय || कर्म
बाहिर मूकी बाहुड्याजी, एतो इमहिज होय || कर्म० ॥ ९ ॥
- श्री जैनपद-रामायण प्रथम खण्ट । (४५) राने बाहीरे रहीजी, करती शोचा शोच । कर्म० किणही ठामे पड़े नहींजी, आरतीमे आलोच ॥ कर्म ॥१०॥ धूलचन्दजी कृत दाल क्षेपक तर्ज पर नहीं है पलकी सती में विपत पड़ी भारी रे, स० मत कोई बांधो कर्म चतुर सब सुणजो नरनारी ॥ टेर। क्यों रह्यो छे पीहर सासरो, प्रीयतम क्यों प्यारी । अहो २ कर्म गती कुणटारे, निज कृत दुखकारी । सती० ॥१॥ आक्रन्दशब्द करे दोई वनमें, रन है भयकारी । रुदन सुनी पंखी कुरलावे. सुनत लगे खारी ।। सती में ॥ २॥ दाल क्षेपक तर्ज पपैयाका मचावे शोर । सहेली अब किम धारूँ धीर, पड़े नयन से नीर ॥ टेर ।। परणी जद तो प्रीतम मुझपर, नाहक थे नाराज । पिया प्रेम जब कीया मेरे से, सासु चिगाड़ी लाज || कलङ्क के काले तनपर चीर ॥ सहेली ॥१॥ जशजीवन अपजश है मरना, कहते नीतिकार । इसमें श्रेय मुझे हैं मरना, मर खाय कटार ॥ सुनत यों जाय कलेजा चीर ।। सहेली ।।२।। दोहा-रात पड़ी रवि आक्ष्मीयो, प्रसरथो घोर अंधार । सागारी अनशन कीयो. नामगुणे नवकार ।।१।। नर्ज-अंञ्जना री- अंजना कहै सुन सुन्दरी, दुःखमाहै दुःख मुझ ऊपन्यो आज तो। पाणीथकी कीवी पातली, सासरा विच म्हारी नीगमी लाजतो॥ माता ने मुख किम दाख. भाई भोजायों किम करसीए नीहतो । ज्यों लगे स्वामी आवे नहीं. किमकरी दुखभर्या नीगमू दीहतो- सती में शिरोमणी अंजना ॥१॥ 'वसन्तमाला' बलती कहै, जहां लगे निर्मला ऊजला आपतो। तहां लगे स्वजन सुहामणा. हर्ष चोलायसी तुम तणो नापतो ॥ १सती अंजना से।
(४६) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्डं । ~~ माता मनोरथ पूरसी, भाई भोजाईयों मिलसी उमङ्ग तो। जहांलगे स्वामी आवे नहीं, तहां लगे पीयर पोखजो अङ्गतो।सती।२। ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-मैं अङ्गारेजी पढ़ रईहूं ।। नहीं पीयरीये चालू , मुझको शर्म सताती ।। टेर ॥ कलंक लेय किम पीयर जावं, साच कहूं महियर शर्मावू । हा हा कैसे हालू ॥ मुझको० ॥१॥ जोगिन बनकर अलख जगासू, सुत होने से फिर जलजासं । पूरण पतिव्रतं पालं ॥ मुझको० ॥ २ ॥ दोहा-क्षेपक, उपसर्ग सहतां ऊगियो, सहस किरणनो सूर । पीयर जावे पद्मणी, विकट पन्थ छै भर ॥ ॥धूलचन्दनी कृत ढाल क्षेपक तर्ज लावणी॥ दोनों तो भूली वाट ऊजड में जावे, रनवन के माहै फिर फिर गोता खावे । माणस मिलीयां विन रास्ता कुण दिखलावे, मतीयन की छाती माय दुःख नहीं मावे || यों बोले अंजना सुन तूं सखी हमारी, कर्मों की रेख कोई टले न किनसे टारी ॥ टेर। में पूर्व भव में पाप कीया अति खोटा, लीया अदत्तादान आल दिया म्होटा। वलि भूख कृपा से जीव घणो धवरावे, तो पिण पोयर की आशा मन में लावे ॥ तिहां विविध परे नो वन दुःख सहता हारी ॥ कर्मों की० ॥२]] दोहा-अनुक्रमें वाटे चालतां, चरण थया चक चोल । मन संकोचित माननी, आई नगरनी पोल ॥ १ ॥ ।। क्षेपक तर्ज-अंजनानी ॥ नगरनी सेरी हो संचरी, आधो धूंघट नीचो है मुख तो। काला हो वेप शोभे नहीं, दीटां ऊपजे अति घणं दुःख तो॥ १ सती अजना से -- N श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । [ ४७) इस गमन गति चालती, राज विछोही ए दीसे छे नार तो। माछल परजाहो परवरी, इण पर पहूंचीछे राज दुवारतो सती.३। ।। ढाल मूलगी॥ दीन मुखी गाढी दुःखीजी, ऊभी राजदुवार । कर्म० अतिहारी ए आचीनेजी, कीधो राय जुहार ॥ कर्म०॥ ११ ॥ ॥ धूलचन्दनी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-पन्नजी मुंडे बोल ॥ खाट हिंडोले हींचे राजा, खुल रही केसर क्यारी रे । आनन्द रङ्ग विनोद विविध पर पालक अरज गुजारी रे ।। मत कोई बांधोरे. मत कोई बांधो कर्म शुभाशुभ लगे न सांधोरे ।।टेर।। पोल के बारे अंजना ऊभी, एक सखी नसु लारी रे । नगर सिणगारो नरपति वोले, करो नव २ त्यारी रे॥ मत० १॥ प्रच्छन्न पणे सहु सम्बन्ध सुणायो, भयो शोच अति भारी रें। लग्यो कलेजे दाह भूप मूछौं तिणबारी रे ।। मत० ।। २ ।। ॥ ढाल मूलगी ॥ सर्व विरतंत सुनावतांजी, राजा रोप धरन्त ॥ कर्म० हाथ घसे शिर धृणवेजी, पश्चाताप करन्त ।। कर्म० ॥ १२ ॥ कुलटा कर्म समाचरीजी, कुलने लीक लगाय ॥ कर्म० आवी मुख देखाइवाजी, ए कुंण भलपण थाय ॥ कर्म० ॥ १३ ॥ घनर थी ऊपजे चीजलीजी, अमृतथी विप वेली ॥ कर्म० दीयाधी जेम कालिमाजी३, मुझ थी ए इस मेली ॥ कर्म०॥१४॥ प्रसन्न कीर्तिजी वदेजी, पापणी परहि जाय ॥ कर्म० अंगुठो तो अहिरूपाजी५, दसियाथी न रखाय ॥ कर्म० ॥ १५ ॥ सघलाने काने सुणीजी, कहै 'महोत्माह' मन्त्रीश ॥ कर्म० दांते चढावी आंगुलीजी, किस्यं कहो छो ईश ॥ कर्म० ॥१६॥ रूठी बैठी पीहराजी६, मुणो अछे आवन्त ।। कर्मः ।। जलथी अग्नी न ऊपजेजी, काष्ट थकी उपजन्त ।। क्रर्म ॥१७॥ १ लांछन (लीटी)।२ परसादयो । ३ काजल. ४ अस्पस्यमई - + ६ पीयरीए।
(४८) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ट । कुंवरी छाने राखियेजी, मेटी१ सयल कहाव । कर्म० छळ्या उड्याथी ऊजलाजी, हो राया राव || कर्म० ॥ १८ ॥ । 'केतुमती' नामे सुणोजी, अप को ति छे आद२ ॥ कर्म० झूठो दोष लगाइनेजी, बहु विगोवे वाद ॥ कर्म० ॥ १६ ॥ राजा कहै मन्त्रीशसूजी, तूं नहीं जाणे मर्म ॥ कर्म० सास बहु ने अवगणेजी, एतो अछे अधर्म || कर्म० ॥ २० ॥ अण मिलत भरतारगंजी, तिण ही में परदेश ।। कर्म० पिछे हुई गर्भणीजी, एछे कोई विशेष ॥ कर्म० ॥ २१ ॥ उहांथी उत्तर करोजी, जाज अलगी अपार ॥ कर्म० मुख नवि देखू ताहरोजी, ! बहुलो विस्तार ॥ कर्म० ॥२२॥ दिन मधे मधू सहीजी, वांका थी अति चंक । कर्म० माणमन मारो नहीं जी, एजिन वचन निशंक । कर्म० ॥ २३ ॥ नृप आदेशे पोलीयेजी, दूर करी ते बाल || कर्म० दोहा-कही सही नृपती कही, आतुर अनुचर आय । कदलीदल ज्यों धरणी पे, पडी बाल मुर्छाय ॥१॥ ॥ ढाल क्षेपक तज-कोरो काजलियो। 'वसन्तमाला' वसने करी, कांई घाले शीत समीर।।पापी बाबलीयो॥ साव चेत हुई सुन्दरी, कांई नयनों वर्षे नीर ॥ पापी० ॥१॥ 'वसन्तमाला' बाला कहै, मोरा कालो देखी वेस ।। पापी० पूछ तांछ नहीं जांच की, उलटो करीयो द्वेप ॥ पापी० ॥२ ।। इट करके ग्हती नहीं, मैं कहती सुख दुःख वात ॥ पापी. पीछे प्रभो! पिछतावसो, काई जद आसी जामात ॥ पापी० ॥३॥ ॥ नर्ज-अजनारी॥ पोलिये आवी ऊठावीयो, तुम्ह पर रूठो विद्याधर रायतो । बांह माही न बैसी करी, मनमांही चिन्तवे आपणी मायतो।। ३ १ मुकी (तनी)। २ आदि (प्रथमथी)।३ सती अजना से।
श्री जैनपदरामायण प्रथम बण्ड। + ख थकीरे आंसं झरे, शरीर सूनो थयो शुद्ध न सारतो । पार पाय पाछा पडे, इणपर पहोंतीछे माय दुवारतोसती में ४॥ दोहा-माता मन्दिर मायने, करती नवा २ रङ्ग । वारी मारग देखतां, आवे पुत्री चिरङ्ग ॥२॥ || तर्ज-अनारी॥ ठ सूकारे खरपटी पड़ी, जीभ सूकी नहीं तालवे नीरतो । ग पर चालती पालिका, ढींचण पगतले फाटोछे चीरतो ।। लोरे वेश शोभे नहीं, नयन झरे जाणे मोतीना विन्दतो। ख कुमलाणोरे कामनी, जाणे के राहु ग्रह्योछे चंदतोसती में ५।। ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-मैं अगरेजी पढ गई है। शरणे अब आई हूं, सुन तूं मेरी मैया ।। टेर ।। री गोद में तुमने पाली, मेरे मोद में होती काली । वही तेरी हां जाई हूं। सुन० ॥ ॥ सू मो शिर कलंक चढाया, काला वेप मुझे पहनाया । जन से मैं शर्माई हूं।।सुन० ॥ २ ॥ पैता साहब ने हुकम लगाया, प्यासी ने नहीं नीर पिलाया। ही मैं घबराई हूं। सुन० ॥ ३ ॥ हा-हीडे हींचती मातने, सुनली ताम पुकार ।। लखि पुत्रीका अंजना, चोली निजरे निहार ॥१॥ ढाल क्षेपक तर्ज आमिर नार पगई है। नबही अन्नजल खाऊँगी, कन्या बाहर कढाऊँगी ।.टेर ॥ कलङ्क लेय क्यों आई आज, इनको जरा न ओवे लाज || मैं नहीं मुँह लगाऊँगी । कन्या० ॥ १ ॥ बांझ प्रभु हा ! क्यों नहीं कीनी, क्यों कुलटा यह कन्या दीनी।। इनका नाक कटाउंगी। कन्या॥३॥ दोहा-आई क्यों यहां अंजनो. माता का नहीं प्रेम ।। चेड़ी नेड़ी आयके, बोली वेडी एम ॥ १ ॥ २ सती अञ्जना से। २ सही असना से। -- २ (५०) श्री जनपद रामायण प्रथम खण्ड। ढाल क्षेपक तर्ज वीरा लूंबां श्रृंयां होई आईजो ॥ म्हारी पूरी लगावोला कांईजी, तूं क्यों पीपरीए आईजी ॥ टेर॥ क्यों खोटा कर्म कमाया, थे कुलने चावल चढ़ायाजी ॥ म्हां० ।। शे अब तो कुछ शर्मावो, म्हांने मूंडो मति दिखावोजी आम्हां०॥१॥ मत मन्दिर अन्दर आना, चले झटपट यहां से जानाजी म्हां०॥ है माताजी का कहना, मत खड़े मिन्ट भर रहनाजी म्हां ॥२॥ दोहा-सती आंखको लालकर, पोली यों ललकार ।। बस बस अब खामोश हो, बोलो बचन विचार ॥१॥ ढाल प्रक्षेप तर्ज-नवीन रसीया ।। पहीले कहूं विचारी वोल मखी पीछे पिछतायोगी ॥ टेर ॥ सन्मुख मुझको गाली देते, नहीं गन खाओगी ।। जितनी बनी सैतान आज, उतनी दुःख पाओगी ।। पहीले ॥२॥ भूखी प्यासी दासी को देन तुन दया न लाओगी ।। जब दिन मेरे घर आयेंगे, फिर घबराओगी ।। पहील. ॥ २॥ पति पवन जब युद्ध से आसी, फिर शर्माओगो ।। सबके मुँह में धूड पडेगी, बदन छिपाओगो । पहीले० ॥ ३ ॥ (लेखक ) ढाल क्षेपक तर्ज पणिहारी- सुण माता कहै अंजना, हूँ आई है, जानी जनम देवाल, कीध मनाई है। में नविजानी मायड़ी, छेद देसी है, निकली कीध बेहाल ॥ वैरण जैसी है ॥१॥ सुख दुःखनी जे वातडी, नहीं पूछी है, नहीं कझो पीले नीर ।। चढ गई ऊँची है। तूं निर्दय किम नीकली, मोरी जननी है, इक इचरज इकपीर, म्हारे मननी है ॥२॥ कमल नयन से नीर, नीझर छूटी है, मानो मोतीयन की माल, तट के तूटीहै ।। १सतो अन्नना से। २सतो अक्षमासे।
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भी जनपद रामायण प्रथम खण्ड | (६
मूच्छित होय धरणी पड़ी, अत ही रो रे,
तव कहै 'वसन्तमाल क्यों तन खोवे है ॥३॥
पाईसा रोबो मती, रहो गाढा है,
ए मावित नहीं आज, आया आडा है ।।
बांह पकर बैठी करी, झट चाली है,
अब भौजाई घरे जाय, भावज भाली है ॥ ४ ॥
दाल क्षेपक स-पनजी मुंडे बोल ॥ मन्त्री श्री वीथमलजी म. कृ.
वाईसारो वेप देखने, भोजाईजी भिडकीरे ॥
दास्यांने कहै वेगो जाकर, देदो खिड़की रे ।। ।
भावज मुंडे बोल, बोल २ घर आई थारी नगदल पाई है ।।
खिडकी वेगी खोल, खोल २ म्हारी सावसगी तूंबाहली भोजाईहे।टेर
नीची झुक २ जालियों में, नणद बाई ने निरखे रे।
ऊंची निजरां करी अञ्जना, प्रेम परखे रे ।। भावन० ॥१॥
निरमल जल झारी भर पात्रो, अवरन मांगू काई रे ।
पानी पीकर वन में जास्यां, डरपो नाई रे ॥ खिड़की० ।।३।।
वचन सुण्यां अणसुण्यां करने, भावज अन्दर बड़गी रे ।
गोखो मायली पारीयां, या जाती जड़गी रे ।। खिड़की० ॥ ४ ॥
देख भाव जरा भाव अंजना, गेल छोड गई आगे रे ।
नाथ मुनि शिष्य 'चौथमल' कई, सतियों सागे रे ।। भावज ||५||
॥ तर्ज अजनारी॥
अंजना घर २ हीडती, पण कुंकु वरणा कमलसम देहतो ।
खुचना कांटाने काकरा, तिग रङ्ग राती भूमि थई तेहतो ।।
दीन बचन मुख दावती, नैण झरे जाणू सावण मेहतो ।
भूखी तिरसाकरी आधुली, भाई भोगायां सर दीनो छे छेदतोमती.६
दोहा-ऐसे आचिर आगई. माणक चौक मझार ।
नागरीक नरसे सती, कर रही एम पुकार ॥१॥
(( ५२) 'धी जनपदरामायण प्रथम खण्ड। १ ॥ १ - ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-तरकारी लेलो.॥ नगरी का लोकों ? कोई तो पिलायो पानी आयके ।। टेर.॥ प्यासां मरती.मरूं ह्यय. मैं, नीर नयन में आयो.। मात पिता तो मुझ पर- रूठे, पानी भी नहीं पायो रे नगरी १॥ अयि ? नगरा के लोकों आवो, मतना तुम भय खायो।' दीन दुःखी अवला दुर्वल की, जरा दया दिल लावो रे ॥ नगरी, २|| दोहा—ऐसे कहतां अंजना, हग भर आयो नीर । हृदय विदारक आहसे, जाय कलेजे तीर ॥१॥ ॥ छन्द मालती॥ सव नगर निवासी देख लाये उदासी । अति दुखित पियासी अंजना और दासी ।। सब जन भय खावे चित्त में दुःखं पावे । पर जल न पिलावे पास कोई न आवे ॥१॥ ॥ छन्द द्रुत विलम्बित ॥ नगरि में गरि में चरचा यही- सुजनता जनता अकुला रहीं ।। जल नहीं तुं कहां अन खावनो- पुरभयो सघलो अण खावणो || १ ॥ । छन्द मालती॥ शिर पर अति चोटी हाथ सोटी लिये हैं । जलं भर कर लोटी स्नान शुद्धि किये हैं। अतिकर करुणाई विन ने पास आई । इम किम कुमलाई बोल तूं बोल बाई ॥ १ ॥ " छन्द द्रुत विलम्बित ॥ नृपति की पति की घटना सही। • नव कथा विकथा घटना कही ।। '. जनकनी रु जहां जननी म्है। -मुझ लिये तू नहीं जन ! नीर है.।। १॥ १सनी अंजना मे । २ मती अञ्जना मे। ।
श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । ( ५३ ) । छन्द मालती॥ सुनकर अकुलायो विप्र ने शीप नायो। नहिं मन ववरायो धैर्य ऐसे बँधायो ।। मुझ विनय सुनीजे देर माता न कीजे । झटपट अब लोजे नीर ठण्डा तूं पीजे ॥१॥ दोहा-नीर पिऊं नहीं नगर में, सुनहु ब्राह्मण बीर । आकर पुरने बाहरे. पायो निर्मल नीर ।। १ ।। ॥ ढाल मूलगी। कि विलाप करे घणंजी, भूल्योरे भूपाल । कर्म० ॥ २४ ॥ तरसी तलवले जी, आंसू बरसे नयन ।। कर्म भांकुर पग वींधतांजी, पामे अधिक कु चयन ॥ कर्म० ।। २५ ।। गे पगे गिर गिर पडेजी. तरु तर लीये विसराम || कर्म० सन्ततिलका' साथणीजी. चाली जाये ताम || कर्मः ॥ २६ ॥ म नगर पुर पाटणेजी, नृपनी आयश कार ॥ कर्म० हिलाहिज कही आवीयाजी, को मत यो पेसार । कर्म०॥२७॥ सो ही अण पावतीजी, धरती अति सन्ताप ।। कर्म० मी अटची मोटिकीजी, करती अति ही विलाप ।। कर्म० ॥२८॥ भाग्य हीन जे भामिनीजी, सहूंनी हूं मिरदार ।। कर्म० रह पराभव देखवाजी. कां मरजी फिरतार ॥ कर्म० ॥ २९ ॥ आत फर्यो माता फरीजी. फरीया भाई भूर ॥ कर्म० नाथ फर्यो थी जग फोजी. मरव झरी विझूर ।। कर्म० ॥ ३०॥ सरवामें ओछो नहीं जी, साच तणो विश्वास || कर्म० कडावे दाहस घणीजी. नृप जावा दीये त्रास ॥ कर्म० ॥ ३१ ॥ ॥ दाल क्षेपक तज-तही २ याद प्रभृ आये दग्द में। चालो अब वाई सम्मालो विपनने, सम्भालो विपनने निभावोला पन नं । टेर।। १ सती अञ्जना से।
(५४ ) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । ~~~~~~~~~ पीयर सासरे आसरो नाही, कसकर कमरने वसकर मनने ॥चालो। वन मृगननके गनमें रहेंगे, भूल जाय तूं सखरे सदनने ॥चालो||२|| ढाल अजनारी- अंजना सती इण पर कहै, वसन्तमाला मने वन में ले जाय तो॥ विखमीरे डूगर अति घणा, जेह वन में घणी तरुतणी छायतो। माणस मुख दीसे नहीं, सज्जन आपणां तिहां नहीं कोयतो॥ सूरज किरण नहीं संचरे, तिण बनमें सुखे रहसां दोयतो।।सती||७|| अंजना वन मांहीं संचरी, लोक पीयर ना देवे छे गालतो॥ नगरना लोक झूरे घणा, ए किस्युं रायने ऊपज्यो ख्यालतो । आंण दिवराबीजी घरो घरे, एहवो कर्म न करेरे चण्डालतो ।। पेटनी पुत्रीरे परहरी, वनमांही काही छे अंजना बालतो।सती॥८॥ माताजी दासीजी मोकली, जाए जोवो अंजणा रही किण ठामतो।। दामी कहै वाई बन गई, हा हा दैव यह स्यू कीधू काम तो।। माहरी कूल में ऊपनी, बालपणे वेटी पर अति घणों रागतो॥ ननमांहीं बाघ विलूग्स, रात दिवस बले पेटनी आगतो॥सती९॥ निन भोजन करती र वापपे, भाई भोजाइयोंने आपती भागतो॥ उच्छ रङ्ग रमती रे अमनणे, किम कर सहसी शीतन आगतो ।। अन्न पाणी किम पामस्ये, मैं तो जाणीयो कोई राखसे चीरतो ।। मातार मूछारे वशथई, शरीर सम्भालीने साचव्यो चीरतो।।सती।।१० राजा हो गणी ने पीछवे, गज सम्बंध नहीं जाणीयो भेद तो ।। कटक थी पवनजी आवस्ये, नासका कण नो करसी रे छेद तो॥ किम कर लोकने प्रीछ किम कर राखू म्हारा देशनी कारतो ।। जो घर आणूरे अंजणा, तो नगरना लोक हीडे अनाचारतोसती११ वमन्नमाला इम उञ्चरे, बाई तारो बाप के कर्म चण्डाल तो ॥ मूर्ख मातारे तुमनणी, बन्धव कीयो के कर्म विकरालनो ॥ आंगणन गखी अवघड़ी. कलंक चढावीने दीयो के आलतो ।। १ पृछयं।
श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । AAMAN AAWAN he MAAmwww वसन्तमाला बलती कहै, थारा पिहर पर पडजोरे धारतो सती१२। बाई म्हारो बाप छे निरमलो, इण किणने नहीं दीधो छे आलतो । माता छे म्हारी महासती, पतिव्रता धर्म तणी प्रति पालतो बंधव भगता छे बापना, धरिये नहीं वसन्तमाला मन रोसतो पूर्व पुण्य किया नहीं, ए सहु आपणां कर्म नो दोपतो सती १३६ ढाल मूलगी आगे जातां देखीयाजी, गुफामां एक साध ॥ कर्म० ॥ "अमितगती" नामे भलाजी, दर्शन थी सुख लाध ॥कर्म०॥३२ नवमी ढाले सगानणोजी, सगपण नो व्यवहार ॥ "केशराज " देख्यो घणोजी, धर्म एक आधार ।। कर्म ॥ ३३ ढाल क्षेपक तर्ज चाली सजनी बहेली।। चालो जल्दी वाई, देखोंनी बन के मांहीं, मोरी सजनी ज्ञानी ग उभाध्यान में ।। टेर॥ भलो भाग्य बाईजी थारो, साचा सतगुरु मिलिया ।। दर्शण करस्यां चरण भेटसां, अव तो दुखडा टलिया ॥ मोरी ? संयम रागी तृष्णा त्यागी, पूग्ण है वैरागी ।। जान ध्यान में लीन मुनीश्वर, शिव पुर में लिव लागी ।।मोरी।। सनी अंजना सुन सुख पाई, मुनिवर पासे आई ॥ नीची लुल लुल शीस नवाई, बोली कर लघुताई ॥ मोरी ॥ ३ दोहा- (आशापरी गगे) देई प्रदिक्षणा भाव सं. विधीये वन्दन करन्त । सुख पूछी चयठी सती, अधिको हर्प धरन्त ॥ १॥ पूछे चारण' ऋपी भणी. वमन्त तिलका नाम । कोण कर्मना दोष थी. माचा झूठा नाम ? ॥२॥ ऋपि भाखे भले भाव सं. कर्म कथा नहीं पार ।। थोडा में भाग्य घणं, गुणवा चोल ये चार ॥ ३॥ १ आकाश Ri उड़ने घाला।
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श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड।
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पीयर सासरे आसरो नाही, कमकर कमरने बसकर मननें ।चालो।
वन मृगननके गनमें रहेंगे. भूल जाय तूं सखरे सदनने चालो।।२॥
ढाल अंजनारी-
अंजना सती इण पर कहै, वसन्तमाला मने वन में ले जाय तो।।
विखमीरे गर अति घणा, जेह वन में घणी तरुतणी छायतो।
माणस मुख दीसे नहीं, सजन आपणां तिहां नहीं कोयतो ।
मृरज किरण नहीं संचरे. निण वनमें सुखे रहसां दोयतो॥सतीमा
अंजना वन माहीं संचरी, लोक पीयर ना देवे छे गालतो ।।
नगरना लोक झूरे घणा, ए किस्यू रायने ऊपज्यो ख्यालतो ।
आंण दिवराबीजी घरो घरे. एहवो कर्म न करे चण्डालतो॥
पंटनी पुत्रीरे परहरी. वनमांहीं काही छे अंजना वालतोसतीग८॥
माताजी दासीजी मोकली, जाए जोवो अंजणा रही किण ठामतो।
दासी कहै वाई बन गई, हा हा देव यह स्यूँ कीधू काम नो॥
माहरी कृल में ऊपनी, बालपणे बेटी पर अति घणों: रागतो।।
ननमांहीं वाघ विल्ग्से, रात दिवस बले पेटनी आगतो सती९॥
नित भोजन करतीर वापपे, भाई भोजाइयोंने आपती भागतो।।
उच्छ रङ्ग रमती रे अमतणे, किम कर सहसी शीतन आगतो ॥
अन्न पाणी किम पामस्ये, मैं तो जाणीयो कोई राखसे चीरतो ।।
मानारे मूछारे वशथई, शरीर सम्भालीने साचव्यो चीरतोसती॥१०
राजा हो गणी ने पीछवे, राज सम्बंध नहीं जाणीयो भेद तो॥
कटक यी पवनजी आवस्ये, नासका कर्ण नो करसी रे छेद तो।।
किम कर लोकने पीछबूं किम कर राखू म्हारा देशनी कारतो।।
जो घर आणूरे अंजणा, तो नगरना लोक हीडे अनाचारतोसती११
वसन्तमाला इम उश्चरे, बाई नारो बाप छे कर्म चण्डाल तो ॥
मूर्ख मातार तुमनणी, बन्धव कीयो के कर्म विकरालतो ।
आंगणन गती अधघड़ी, कलंक चढावीने दीधो के आलनो ।।
१ पृछ।
श्री जनपद रामायण प्रथम खण्ड । MAR वसन्तमाला वलती कहै, थारा पिहर पर पड़जोरे धारतो "सनी१२|| बाई म्हारो बाप छे निरमलो, इण किण ने नहीं दीधी छे आलतो ।। माता छे म्हारी महासती, पतिव्रता धर्म तणी प्रति पालतो ।। चंधव भगता छे वापना, धरिये नहीं वसन्तमाला मन रोसतो ।। पूर्व पुण्य किया नहीं, ए सहु आपणां कर्म नो दोपतो सती १३॥ ढाल मूलगी आगे जातां देखीयाजी, गुफामां एक साध ।। कर्म० ॥ " अमितगती" नामे भलाजी, दर्शन थी सुख लाध कर्म०॥३२॥ नवमी ढाल सगानणोजी, सगपण नो व्यवहार ।। "केशराज" देख्यो घणोजी, धर्म एक आधार ।। कर्म ॥ ३३ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज चालो सजनी बहेली ।। चालो जल्दी वाई, देखोनी बन के मांहीं, मोरी सजनी ज्ञानी गुरु अभाध्यान में ।। टेर ॥ भलो भाग्य बाईजी थारो, साचा मतगुरु मिलिया ।। दर्शण करस्यां चरण भेटमां. अब नो दुसडा टलिया ॥ मोरी १॥ संयम रागी तृष्णा त्यागी, पूरण है वैरागी ।। ज्ञान ध्यान में लीन मुनीश्वर शिव पुर में लिव लागी मोरीशा सती अंजना सुन सुख पाई, मुनिवर पासे आई ।। नीची लुल लुल शीम नवाई. चोली कर लघुताई ।। मोरी ॥३॥ दोहा- (आशापरी गगे) देई प्रदिक्षणा भाव सं. विधीय वन्दन करन्त । सुख पूछी चयठी सती. अधिको हर्प धान्न ॥१॥ पूछे चारण ऋपी भणी, वमन्त निलका नाम ।। कोण कर्मना दोष थी. साचा ईंटा नाम ? ॥२॥ ऋपि भासे भले भाव सं. कर्म कथा नहीं पार ॥ थोड़ा में भाग्यू धणं, मुणवा बोल रे चार ॥३॥ आकाशप्रा उरने पाल vaMMS Wh .vvv ~~~~~ anhnav (५४) श्री जनपद रामायण प्रथम खण्ड । पीयर सासरे आसरो नाही, कसकर कमरने यसकर मननें ॥चालो।। बन मृगननके गनमे रहेंगे, भूल जाय तूं सखरे सदनने ॥चालो।।२।। ढाल अजनारी- अंजना सती इण पर कहै, वसन्तमाला मने वन में ले जाय तो। विखमीरे ड्रगर अति घणा, जेह वन में घणी तरुतणी छायतो। माणस मुख दीसे नहीं, सजन आपणां तिहां नहीं कोयतो ।। सरज किरण नहीं संचरे, तिण वनमें सुखे रहसां दोयतो।सती।।७।। अंजना वन माहीं संचरी, लोक पीयर ना देवे छे गालतो॥ नगरना लोक झुरे घणा, ए किस्यूं रायने ऊपज्यो ख्यालतो ।। आंण दिवराबीजी घरो घरे, एहयो कम न कररे चण्डालतो ॥ पेटनी पुत्रीरे परहरी, वनमांहीं काढी छे अंजना बालतोसतीग८॥ माताजी दासीजी मोकली, जाए जोवो अंजणा रही किण ठामतो।। दासी कहै वाई बन गई, हा हा दैव यह स्यूं कीधू काम तो । माहरी कूख में ऊपनी, बालपणे बेटी पर अति घणों रागतो।। वनमांहीं बाघ विलूरसे, रात दिवस बले पेटनी आगतो ॥सती९।। नित भोजन करती रे वापपे, भाई भोजाइयोंने आपती भागतो।। उच्छ रङ्ग रमनी रे अमतणे, किम कर सहमी शीतन आगतो।। अन्न पाणी किम पामस्ये, मैं तो जाणीयो कोई राखसे चीरतो।। मातारे मूर्छारे वशथई, शरीर सम्भालीने साचव्यो चीरतो।।सती।।१० राजा हो गणी ने पीछवे, गज सम्बंध नहीं जाणीयो भेद तो ।। कटक थी पवनजी आवस्ये, नासका कर्ण नो करमी रे छेद तो।। किम कर लोकने पीछयूँ किम कर राखू म्हारा देशनी कारतो ।। जो घर आणूरे अंजणा, तो नगरना लोक हांडे अनाचारतोसती ११ वमन्तमाला इम उञ्चरे, बाई तारो चाप छे कर्म चण्डाल तो ।। मूर्व मातारे तुमनणी, बन्धव कीधो छे कर्म विकरालतो ।। आंगण न गखी अवघडी. कलंक चढावीने दीधो छ आलतो।। .
श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । AMR वसन्तमाला बलती कहै, थारा पिहर पर पड़जोरे धारतो सती१२।। बाई म्हारो बाप छे निरमलो, इण किणने नहीं दीधो छे आलतो॥ माना छे म्हारी महासती, पतिव्रता धर्म तणी प्रति पालतो ।। बंधव भगता छ बापना, धरिये नहीं वसन्तमाला मन रोसतो ।। पूर्व पुण्य किया नहीं, ए सहु आपणां कर्म नो दोपतो ॥सती १३॥ ढाल मूलगी आगे जातां देखीयाजी, गुफामा एक साध ॥ कर्म० ॥ "अमितगती" नामे भलाजी, दर्शनथी सुख लाध कर्म०॥३२॥ नवमी ढाले सगातणोजी, सगपण नो व्यवहार ॥ "केशराज" देख्यो घणोजी, धर्म एक आधार ॥ कर्म ॥ ३३ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज चालो सजनी पहेली।। चालो जल्दी वाई, देखोनी बन के मांहीं, मोरी सजनी ज्ञानी गुरु ऊमाध्यान में || टेर॥ भलो भाग्य बाईजी थारो, साचा मतगुरु मिलिया ।। दर्शण करस्यां चरण भेटसां, अव तो दुखडा टलिया । मोरी १॥ संयम रागी तृष्णा त्यागी, पूरण है वैरागी ॥ ज्ञान ध्यान में लीन मुनीश्वर. शिव पुर में लिव लागी मोरी||२|| सती अंजना सुन सुख पाई. मुनिवर पासे आई ।। नीची लुल लुल शीम नवाई. बोली कर लघुताई ।। मोरी ॥ ३॥ दोहा-(आशापरी ) देई प्रदिक्षणा भाव में, विधीय वन्दन करन्त । सुस पूछी चयठी सनी, अधिको हर्प धरन्त ॥ १॥ पूछे चारण' ऋपी भणी, चमन्त निलका ताम ।। कोण कर्मना दोप थी, साचा झूठा नाम ? ॥२॥ ऋपि भाखे भले भाव में, कम स्था नहीं पार ।। थोड़ा में भाग्य घण, गुणया बोल ये चार ॥३॥ १ आकाश उउने घाला। --- rnvromrnmovvvw (५६) श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । ।। ढाल दशवीं-तर्ज-गुगंजी थे मने गोडे न गयो। पूर्व भव बात सुणावे स्वामी, सा निसुणे सुखसाता पामी । जम्बू द्वीप प्रसिद्ध प्रमाण, जोजन लाख तणो मण्डाण || क्षेत्र सुक्षेत्र 'भरत' भणीजे, 'मन्दर' पुरवर नगर सुणीजे पूर्व." वणिक बसे नामे 'प्रिय नंदी', नारी 'जया' नामे आनन्दी । जायो नन्दन नीको जाम, कला तणो सागर अभिराम । पूर्व.२। एत दिवस उद्यान सिधायो, ऋपि दर्शन देखी सुख पायो । समकित पामी पाले नेम, साधु दान देवा प्रेम ।। पूर्व० ॥ ३ ॥ नप संयम सुधा आराधी, ईशाने सुरपदवी लाधी । नगर मृगांक' मनोहर कहीये, 'श्री हरिचन्द्र' नरेश्वर लहीये पूर्व.४। 'प्रीयंगु लक्ष्मी' नारी नीकी, प्यारी छे अति राजाजी की ।। सो सुर चवि राणी उयरे आयो, 'सिंहचन्द्रजी' नाम कहायो पूर्व.५॥ धर्म करी फिर देवों मांहै, 'सिंहचन्द्रजी' उपज्यो प्रा है ।। वैताट्ये 'अरुणपुर' वारु, राय 'सुकण्ठ' अछेज्यू उदारूं ।। पूर्व०६॥ 'कनकोढरी' राणी उयरेनन्द, नामे 'सिंहवाहन' आनन्द ।। गव्य करी चिरसोई नरेशर, विमलनाथने' तीथे सुरखकर ।। पूर्व०७॥ 'लक्ष्मीधर' मुनि पासे पधार्यो, संजम साधी कारज सुधार्यो ।। दुःकर नप करणी करी मोई, लांतक' सुर लोके सुर होई।।पूर्व०८॥ तुझ उदरे मो आवी वस्यो छे, पुण्यवन्त होवरे तिरयो छ । चरम गरी उत्तम प्राणी, होशेष नन्दन तुझ गणी || पूर्व० ९ ।। 'कनकपुरी' नगरीनों नायक 'कनकरथ' गजा मुखदायक ।। गगी 'कनकोढरीय' मयाणी, बीजी 'लक्ष्मीवती' ए वखाणी पूर्व. १० 'कनकोटरीए' नन्दन जायो, रूप कला की अधिक मुहायो । 'लामी वतीप' छिपायो बालो, मानाजी दुश्व हुवो असगलो।पूर्व?? पल वलती देखी नव गणी. पाडोसणी बोले तव वाणी ।। भुंडी ! ने पम्प कीयो, माता थी बालक चोरी लीयो 1पूर्व १२|| हुई बिमाणी गणी आप. माता पासे बालक थापे ।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । . देव धर्म गुरु सूधा सेवी, स्वर्ग सुधर्म होई देवी ।। तिहां थकीतूं आवी सीधी. 'अंजना' सुन्दरी नाम प्रसिद्धिापूर्व१४॥ माता पुत्री अन्तर राखी, तेह तणां फल लेवे छे चाखी ।। किधां कर्म न छूटे कोई, अन्तर नयणे लीजो जोई ।। पूर्व ।।१५।। तब तूं हूती भगनी एहनी, अनुमोदी थी करणी तेहनी । ते माटे दुःख पामे साथे, कीधू लाभे हाथो हाथे ॥ पूर्व० ॥१६॥ भोगवो पड्यो छे एसहु कर्म. आज थकी ऊपजसे शर्म । दिन २ साता वधती जासे, शील सती तूं अधिक दृढासे पूर्व.।२७ आवसे ए कुंवरीनो मामो, देख्यां थी लेसो विश्रामो । तुमने निजधर लेई जासे, पति मेला पण वेगो थासे । पूर्व ॥१८॥ ( अञ्जना चरित्र में पूर्व भव इस प्रकार है) पूर्व भव शोक लिखमावती, अहनिश करती हो जिनतणी सेवतो। 'सिंहरथा पुत्र छे तेहनो, तेह पाडोसन अपहर्यो लेवतो ।। तेरे घडी लगेटलबली, जे नहीं बीहरे न्याय करी एमतो। जिहां लगे पुत्र देखू नहीं, तिहां लगे अन्नपाणी तणो नेमतोसती १४॥ साधवी आयने प्रीछन्यो, ताहरा मन माही वसीयो वैरागतो। आपीयो पुत्र पाये नमी, माहै मांही उपन्यो धर्म नो रागतो।। संजम साधीने तप करयो, आलोयणा विन पट्यो एकतो फेरतो। कीधारे कर्म नवि छूटोये, तेरे घडीना धया चर्प तेरतोसती ।१५। तिहां थकी तुमे सुरथया. सुरथकी चवी करी राजकुंचारतो। साथ पाटोमण दुःख सहै, कूख तुम्हारे छे पुण्यवन्त पालनो ।। चर्म शरीरो ए जीवडो, आगल होवसी धर्म साधारतो। पवनजी वरण संरण भीड़ी, कुशल घर आय करसी तुम सारतो।म..६ ।। दाल मुलगी। एम सुणी सुख पायो गाहो, ऋपिन बचन सदा छे टाहो । पर उपकारी ऋपि पांगरीयो, गगनगति गगने संचगयो ।पूर्व० १९॥ तो अजनागी। चनमाहै भमतीरे बालिका, एनले गुफामांही गंज्यो सिंहतो ।
(५८) 'श्री जैनपद रामायण प्रथम खण्ड । । गासपाडी सर्व सावजां, जाणे आपाढरो गाजीयो मेहतो ।। अंजणा कहै अलगी रहो, वसन्तमाला कहै मरण दो मायतो । जाणसे पिऊ परदेशे गई, ए संदेह टालजो अम तणो जायतोस.१६॥ 'वसन्तमाला' विरखे चहो, अंजणा आसन दृढ करी ठायतो । नाम जपे जगनाथनो, जाणे के ध्यान चढीयो मुनिरायतो ।। चऊं गति जीव जीव खमावती, चार शरणा चिन्तवे मनमायतो। केसरी रुठारे सूं करे, माहरो धर्म नहीं लेवे रे कायतो । सतीमें० १७॥ 'वसन्तमाला' विरपे टलवले, धाओ २ अंजना छे निराधारतो । बूंब पाडीने बटकाकरे, धाओ २ वन नणा रक्षपाल तो ।। धाओ २ सजनजे हुवे, धाओ २ शील तणा रखवालतो । कुँवरीने वाघ वीदारसे, इम कही रुदन करे असरालतो।सती.१८ ॥ ढाल मूलगी ॥ सिंह एक आयो तब चाली, थर थर धूजण लागी बाली । आयो तब खेचर 'मणिचूड', शरभ रूप कीबूं प्रतिकूल |पूर्व २०॥ नाठो केसरी वार न लागी, सुन्दरीनी ए आरती भागी। मुनि सुवन जिन धर्म करन्ती, वर्ते छे शुभमति अनुसरती । पूर्व ॥२१|| ( अञ्जना-चरित्र में सिंह को हटाना इस मुताफिक है ) तिणवन व्यत्नर जक्ष म्है, बाहर जोयण तणो रखवालतो। यक्षणी यक्षने इम कहै, आपणे शरणे आवी छे वे बालतो।। 'गाईल' 'रूप' जक्षे कर्यो, नखकरी केसरीनी छेदी छे देहतो । शाईले मिह पराभव्यो, कूटीने काहीयो वन नणे छेहतो |मतीमें ।१९। देवता साहाय शीले हुवो, आनन्द शील नणा गुण गायतो । नारी महमें तू निर्मली, वेकर जोडी सुर लागो छ पायतो || गीले हो शिव मुख मम्पजे, शीयल हो मिलसे तिहारो कंततो। शीलेहो मामाजी आवमी, तिहां लग इनवन रहो निश्चन्तनो।स.१२० ॥ ढाल मूलगी। दिन पूरे प्रसव्यो वर पुत्र, जाणं वायूं सघलो घर सूत्र । १. अटापर नाम जानवर ।
vvvwrnnnwww me श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (५९) कल कला लक्षण गुण पूरो, होसे एकुंवर अति शूरो। पूर्व०॥ २२।। मृती कर्म करे उत्कर्पे, 'वसन्त तिलका' सखी सुहप॑ । क सखी अछे समभावी, आपदमें दुःख लेवे वटाची ।पूर्व० २३|| ॥ तर्ज-अञ्जनारी॥ तनी आठम चांदनी, पुष्प नक्षत्र ने सोमज वारतो । छलो पहर रयणी तणो, अंजना जायो छे हुनु रे कुँवारतो।। णे के सूरज उगीयो, स्वर्ग थी सुर करे जय २ कारतो । स रोवावण ऊपनो, रामनो सेवक धर्म नो धारतोलती २१।। हीयर पुत्र पखालीयो, निझरणे जाय पखालीयो चीरतो । न पोहायोरे पाखती, सीतानो वारुहओ हनुमन्त चीरतो ।। रखतां तृप्ती पामे नही. माहो मांही वेहू सखी इम करे वाततो। म महोच्छच कहो कुणकरे,कटक चालीयोछे कुंवर तणो नाततो २२ ॥ ढाल मृलगो॥ नने आरोपीरे उच्छंगे१, सुन्दरी दुःख आणे बहु भंगे। न करन्ती मूर्छा आवे, दुष्ट देव तूं इम सुम्य पावे ॥पूर्व २४॥ वा सुतनो तो अति महोच्छत्र, घरे पितातो करतोरे महोच्छव । अब रांकडीए न थाय, ! इम चिन्तयतां हेय भराय ।।पूर्व २५|| ॥त-अजनारी॥ नणी रात पूनम नणी, अंजना बैठी छ सुत कर धरन्ततो । ल चपल सुहामणो, अतिरलीयावणो बहु गुणवन्ततो ।। बोलावेरै मायड़ी, कुंवर तणी अछै लघुपरवेयतो । राने नाकेरे चालूडो, जाणे के चांदलो झपठीने लेयतो॥मती मे२३॥ । दाल मुलगी। तमूर्य' नामे खग एक, आवीगयो मन आणी विवेक । न नणूने पूछे कारण, आपण छे दुःखनं वारण ॥ पूर्व ॥२६॥ न्त तिलका पासे कहावे. आदि अन्नधी चरित्र मुणावे । भाले हैं मामो धारो. पुत्री ? आग्नी नकल निवागे।पूर्व २७|| बोला में।
(६०) थी जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । v~~ ३ लगन लेईने वेला साधे, वेला साधतां मन वाधे । ग्रह ऊंचाछे एहना जेहवा, महोटा ने जोई जेरे तेहवा ।।पूर्व०२८॥ भाणेजी सुत सखी समेत, विमाने वैसाडी सुहेत । निज नगरीए चाल्यो जाय, हर्प घणो हैडे न समाय ।।पूर्व २६|| यानर तणा कंकण नो नाद, काने सुणो ऊपज्यो अहल्लाद । साहावाने उदल्लसियो जाम, मायर गोदथी छटकीयो ताम ।।पूर्व ३०॥ पड़यो पर्वत ऊपर आई, पर्वत चोट शक्यो न सहाई । बालक ने भारे चूराणो, बन पडे जिम तिम अधिकाणो॥पूर्व ॥३१॥ अंजना सुन्दरी आणे दुःख, मुझ दुखियारी ने शुं सुख । जाण्यं ए सुत नो मुख जोवन्त, दिनभर सुहर्प होवन्त ।। पूर्व ॥३२॥ ।। ढाल क्षेपक तर्ज नवीन रसीया || म्हारो लाल गिर्यो सुकुमार लार मैं भी गिरजाऊंगी । मैभी गिरजागी हाय मैंभी मरजाऊँगी । टेर । अब नहीं हरगिज जिन्दी रहूंगी, मैं दुःख पाऊँगी ।। लकड वाल कर जालो जाल में, मैं जल जाऊंगी || म्हारो ॥ १ ॥ जब तक लाल नहीं देखूगी, अति दुःख पाउंगी। हा? कर्मों ने यह क्या कीना, किम शान्ति मनाउंगी || म्हारो॥२ । ( ढाल मूलगी) पाछलथी मामो अति धसीयो, बालक ने देखी मन हसियो। आंचन आई कोई दीसे, पूण्यवन्तए वीश्यावीशे | पूर्व० ३३ ।। माताने आणी सुत आप्यो, माताए हैडे सुत थाप्यो । हरखन कोई पुत्र मरीखो, पुत्रहीथी नाम निरीखो ॥ पूर्व० ३४ ।। 'हनुपुर' पुरवर उच्छव ठाणे, भाणेजी न मन्दिर आणे । सयल कुटुम्ब तणू मनमानी,कुलदेवी जिम तिम सन्मानी||पूर्व.३५।। मामे नाम दी हनुमान४, चन्द्रकला जिम वधतूं वान । १ विमान । २ माताना खोलामाथी । ३ मती अञ्जना से । ४ जन्म्यापछी तुरत ते बालक 'हनुपुर' मा श्राव्यो, तेथी तेना मामा तेन नाम हनु मान पाइयू।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (६१) ल चूर वे अपर विधान, प्रगट मल्यू 'श्री शैल' प्रधान पूर्व.३६। जहंस जेम क्रीड़ा करतो, वाधे अंगज आनन्द धरतो।। शमीडाल कही समभावे, 'केशराज' ने सांच सुहावे ॥पूर्व०३७।। मुनि श्री रूपचंद्रजी महाराज कृत. ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-छोटोसो वलमों मेरे प्रांगणा मे गिल्ली खेले। छोटोसो हुनुमन्त मेरे आंगणा में रिमझिम खेले ।। इत उत दौडी जाय कुंवर माताजी झेले ।। टेर ।। लक्षण अंगे विराजता, उत्तम अलबेले । चाले चाल मराल यों ठमके पगमेले । छोटोसो ॥१॥ घमके घूघरीया पगमें फूठरा कानोंमें झेले। रुदन करे तब बाल मात गोदी में लेले छोटोसो।। २।। मुक्ता झटित मस्तक टोपली मोतियन को गेरे। माता लुकजावे अन्दर महिलके जब हनुमंत हेरे। छोटोसो।।३।। पहीरणने फावे अम्बर फूटर लपियन के घेरे । इस २ रमतो चाल ख्याल कर चक्री ने फेरे ॥छोटोसो।।४।। ॥ दोहा (सोरठा गगे) सुत मुख निरखवा हरख अति. फरि अग्ती अल्टोलरे । साल सरीखा माल ही. जो शिर चट्या कुपोल ॥१॥ सो दिन कय ही आवसे, घर आवे भरतार । लोकां मांही ऊनली. कद करसे करतार ॥ २॥ || तर्ज-अजनारी॥ जना' 'हनुमंत' इहांग्है, पवनजी, कटकले पहता सनूरतो।। कर 'रावण' से मिन्या, लेई वीडोने चालियो शूरतो।। धीया 'सर' 'दुखर' छोडावजो.तिहां मनायजो हमतणी आणनो।। टकलेई कर संचायो, मेघपुरी. कीयो जाय मेलाणनोमतीक्षा शैल (पर्वत) ने पूरवाथी "पोशल एवं प्रगट सने प्रधान (न्होटू) पर विधान (पीजू नाम) मन्यू । २ अत्यन्त । पतिशय- - - (६२) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । 'वरण' राजा तिहां आवीयो, सामुहो वर्षे छ वाणांनों मेहतो ।। 'पवनजी' पांव न चातरे, माहामाही शूग जूजेछे तेहतो।। वरसदिवस झगडो रयो, माहांमांही वेहूं जणा कीधोछे मेलतो ।। चांधीया 'खर' दुखर छोडावीया, आंण रावण तणी लीधीछे झेलतो २५ दोहा 'पवनंजय' परगट पणे, वरुण जीती वड राय । 'खर' 'दुपण' छोडावीया, रावण ने सुखथाय ।। ३ ।। 'गवण' 'लंका' आवीयो, 'पवनंजय' पगे लागी । घर आवण ने ऊमह्यो, प्रभुनी अनुमति मांगी ॥ ४ ॥ मतपिता पग प्रणमीया, नारी निरखण नेह । अकुलाणो अणदेखवे, मनमें अति अन्देह ॥ ५ ॥ || ढाल ग्यारहवीं-तर्ज:-रायखेंगारना गीतनी ।। पूछy हो पूछy कोई नारी, भाखे हो भाखे भूप प्रते भलोए । सुन्दरी हो सुन्दरी केरीवात, वातज हो वातज सहु तुमे सांभलोए ।१। गर्भ हो गर्भ तणे अहिनाण२, देखी हो देखी खीजी सासुखरीए । जाणी हो जाणी वात विरोध, काही हो काही सा घर बाहीरे ए||२|| आरक्ष हो आरक्ष पुरपों साथ, पीहर हो पीयरीए सा मोकलीए । आगे हो आगे जाणे देव, चीतकहो वीतक वितसे वलीए ।।३।। दोहा-एह बात श्रवणेसुणी. कोप्यो पवन कुंवार | हा हा मायत में कीयो, कीजे कवण विचार || १ ॥ माता धड़बड़ धृजती, आई पुत्र की लार । गदगद हो वाणी पदे, सुन जाया सुकुमार ॥ २॥ ॥ ढाल क्षेपक नर्ज-हां मगीजी ने पेड़ा भावे ॥ हां लाल ? मुन अर्ज हमारी, काया कम्प कहतां सारी। क्या कहूँ हा? हकनाक मती में विपढा डारी रे ॥टेर ॥ पाणी नो शब्द छ तेनो मूल शब्द अन्देशह-अन्देशो छे. तेनो भर्य सन्देह (शक) थाय । २ प्वाण निशानी। ३ सती अंजना से । - or श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । गर्भ देख मैंने ललकारी, ऊँची टेर सखी को मारी । कहा सतीने खूब मुझे हा कर लाचारी रे ॥ लाल ॥ १ ॥ तो भी मुझे दया नहीं आई, कैसी कुमति ऊँधी छाई । करके काला भेष देश के वार निकाली रे ॥ लाल ।। २ ॥ पाछल बुद्धि नार कहावे, उणमें अकल कठासूं आवे । हां वेगम की जात रहै नहीं गम हित कारी रे ।। लाल ।। ३ ।। दोहा-पवन श्रवण कर शीघ्र ही, प्रजल्यो कोप मझार । पर माता को देख के, बोला वचन विचार ।।१।। ढाल क्षेपक तर्ज-नवीन रसिया। माता ! जबर जुलम कर डार्यो वनमें भेजी दो सतियों ।। टेर।। अगर तुझे था निर्णय करना देनीथी पत्तियों ।। जैसी हुई थी वैसी मैया लिखदेता वतियों ॥ माता ॥ १ ॥ भैया तूं है समझदार क्यों छाई कुमतियों ॥ सतियों की हा दया न लाई, गजव करी गतियों ॥ माता ॥२॥ दोहा-यों कह चाले पवनजी. आई माता दौड ।। हाथ पकर कर लाल का, चोली वेकर जोड़ ॥१॥ भूल हमारी पुत्र भूलकर, करिये भोजन चाल । पीहर होसी वीनणी, लेसां सार सम्भाल || २॥ ढाल क्षेपक तर्ज-पाणीड़ो भरवादे । मैया मत करिये लाचार. झटपट जावणदो ।। टेर ।। भोजन माता किस विध भावे, जीव मेरा तो अति घवगवे॥ आवे दुःख अपार ।। झटपट ॥१॥ नारी बिना नहीं नीर पीऊंगा, प्यारी विना अब नहीं जीऊंगा।। मर खाय कटार 11 झटपट ॥२॥ माता का झट हाथ हुडाफर, अपने मित्रों के महिलां आकर ॥ चोला यो ललकार ॥झटपट ॥३॥ १ सती प्रजना से।सती अञ्जना से। २ (६४) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । १ ढाल क्षेपक तर्ज-लगड़ी चाल । जोगी धन तन रस्मी रमाऊं, प्यारी ढूंढ कर लाऊंगा। जो न मिले नार यार में, जहर खाय मरजाऊंगा ।। टेर ।। सती विनां यह दुनियों सारी, मुझको झूठी लखाती है ।। विना सती के गती हमारी, दिन २ विगड़ी जाती है। प्यारी विना क्या महल अटारी, खाना सोना पीना क्या ।। बिना प्रिया के सांच कहूं मैं, जगत् वीच में जीना क्या ।। मरी हुई या जीती है, यह खास खबर ले आऊंगा जोगी।॥१॥ दोहा-मित्र कह सुन पवन कुंवरजी. यों मत करो खयाल | चलो शीघ्र कीजे खबर, जाकर निज सुसराल ।। १ ।। तर्ज असनारी। पवनजी कहै मित्र ! माहरा, राय राणी ने किम करूं परणामतो। माता ए अंजना परहरी, सासरा विच म्हारी निर्गमी मामतो।। परस दिवस विग्रह हुवा, राजा हो वरुण मामो थयो जुञ्जतो । यांच्या 'खर दुपण' छोड़ाचिया, तह तणी किण आगे करमेरे गुजतो२६ मित्र कहै मती निर्मली, अवगुण आपरा काढसी जोयतो ।। गुण तोरे परतणा शिरवह, एहवी नारी नवि दीठेरे कोयतो ।। पहिला माही नहीं जायसां, अलगा थका हो कहाचो जुहारतो ।। पवनजी आणेरे आवीया, अंजना पीहर पड़ी रे पुकारतो सती२७/ 'महेन्द्र' कह ई पापीयो. कर्म कसाईनो कीधी तो काज तो ।। हांजीया लोक म्हारे घणा, डायो नर कोई नहीं दीसे छे आजतो।। मीग्वनी बात कोई ना कहीं, तो मन माहरी उतरती रीसतो ।। नर्क नीयांणो में बांधीयो, इण कर्मे केम छूटुं जगदीशतोसती२८॥ पवनजी आणेरे आचीया, मांभल मासु उर पड़ी झालतो।। हीयो दणे दोउ हाथ मूं, उदर आधान तूं किहां गई बालतो।। ऊभी थकी गिर आफले, जाणे हे कर भरे लाग छ बाणतो ।। ५ १ सती भवना से।
ww श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (६५ पुत्रीनो दुःख साले घणो, अजहु न छूटा किम रह्या प्राणतो।।२९ सेना मेली कर संचग्या, सुसरा जमाई ने सामो जायतो ।। अति दुःख रायने सम्भवे, मन मांही पुत्रीनो अति घणो दाहतो घरमें न राखी रे अध घड़ो, कालो मुख थई मिलीयो नरेशतो। पवनजी यहां रे पधारीया, महेन्द्र कहै मैं किसो उत्तर देसतो।३८ नगरी मांही पधरावीया, मर्दनीया मर्दै छे तेल चम्पेलतो।। निर्मल नीर अंघोलीया, जीमण बैठा छे वेजणा छेलतो ।। भोजन विविध पर पुरसीया, सोवन थाल ने विछापीयो पाटतो। पवनजी हाथ खेंची रया, चउदिश अंजनानी जोवे छे वाटतो।३१ अंजना जाई रे बालिका, पुत्र जायांनी वधामणी थायतो ।। वसन्तमाला रे दीरो नहीं. वा पण कीहां रही रे छिपायतो ।। सामने घर पढ्यो पीटणो, मांहो मांही ऊँ मिलो इम कर वाततो। अंजना ने सासुरे दुहवी, पीयर आवीन करी अपघाततो सती।३२ साला तणी सुत नांनडो, लेई उत्संगे साडी छे चालतो॥ कह थारी पूंही रे शं करे. तिवारे रुदन करो कहै ततकालतो।। मात पिता ए बंधवा, पापीये कीधो छे कर्म चण्डालतो॥: आंगणे न राखी रे अधघडी, कलङ्क देई करी काही छे वारनी।३३ ढाल क्षेपक तर्ज-प्राविर नार पगई है। इक दिन फंफी आई थी, पिता नहीं यतलाई थी ॥ टेर ॥ माता से उणकरी पुकार, फिरी फेर सो बन्धव द्वार ।। सबने यार कहाई थी । इक दिन० ॥ १ ॥ फुफी का लख काला वेष, राजा राणी करीयो द्वेष ।। प्यासीने निकलाई थी। एक दिन० ॥२॥ कोई मति इणने बतलावो, भोजन और पाणी मन पायो । एमी आण फिराई थी। इस दिन० ॥ ३ ॥ १मती अंजना से। or (६६) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । ~~iner -~~ -JANV wwmarware तर्ज-अञ्जनारी। चालनो वयण श्रवणे सुणी, माथा पर फेरवीने फेंकीयों थालतो॥ महैन्द्र आवी पाए नम्यो, मंत्री कहै तुमे कर्म चण्डालतो॥ ऊठो स्वामी क्यों बैठी रह्या, जीवती मूईनी कीजीये सारतो । राजाना लोक वरजे घणा, तो पिण आया छे नगरने बारतो॥३४|| वनमाही कुंवरजी टलवले, किहां गई दान दया तणी वेलतो ।। किहां गई धर्मनी धूसरी, किहां गई शील सन्तोपनी वेलतो ।। आवोनी नार आगल रहो, ताहरा मुखत" जोवू छू स्वरूपतो।। कटक थी कुशले हूं आयीयो, इम कही रुदन करे बहु भूपतो।३५) ।। ढाल मूलगी॥ वन हो वन समो ए बोल, निसुणीहो निसुणी सासरड़े आव्यो सहीए ।। सुमरोहो सुसरो वोलेएम, आवीहो आवी पण राखी नहीं ए॥ ४॥ जङ्गल हो जङ्गल माहै जाई, गिरिहो गिरि गिरि तरु तरु जोईया ए ॥ शुद्धि न हो शुद्धि न पामी कोय, आपण हो आपण उदासी होईयाए ॥ ५ ॥ मित्रहो 'प्रहसित' नामे उदार, साथे हो साथै पदे वसुधा घणीए ॥ जाई हो जाई तूहिज आप, बापज हो याप अने माता भणीए ॥ ६॥ इमजहो इम कही तूं आव. लाधीहो लाधी नहीं छे सुन्दरीए ॥ घट हो ए घटकेरो होम, करवोहो वांछे प्रभु निश्चय करीए || ७ || सुणतांहो सुणतां ए विपरीत, माताहो माता मूर्खाणी घणीए । शीतलहो शीतल करी उपचार, मूर्छाहो मेटी माताजी तणीए ।। ८ ।। मित्रहो मित्र संघाने ताम, मानाहो माता ओलम्भो दीए एटलोए । वालो हो वालो थारो विशेष, काईहो काई ने वीरो मेल्यो एकलोए ।।९।। माचोहो साचो देव विचार, आपणहो आप कीयां फल भोगāए ।। विणी हो विणठी वात अपार, मुतनेहो सुनने क्यू की जोगए ॥ १० ॥ रोवेहो रोवे मा असगल, नयणाहो नयण प्रनाला निम शरीर।
श्री जैन पद् रामायण प्रथम खण्ड । (६७) हैए ॥ ए जगहो ए जग महोटो न्याय, जेहेवो हो जेछे तेहयो ल लहैए ॥ ११॥ राजाहो राजा बहुले साथ, चाल्योहो चान्यो च गवेषणेए ॥ खेचर हो खेचर लेई हजार, धायाहो धाया सुत धण भणीए ॥ १२ ॥ लाकडहो लाकड खडकी जाम, जम्या जम्या वेछे जेटलेए ॥ पूर्वहो पूर्व पुण्य प्रमाण, तातजीहो तातजी यो तेटलेए॥ १३ ॥ ॥ तर्ज-अंजनारी।। महेन्द्र राय तिहां आवीयो, नारी सहित आयो राय 'प्रहल्लादतोग। वनजीने आय यांहै धर्या, काई रे कायर तूं मूकीछे लाजतो ।। कर्म थी बलीयोरे को नहीं, पेट वीलूरती आई अंजनानी मायतो॥ राजाहो वरणसूं रणभड्या, अति दुःख करता ऊखड़े घायतो॥३६॥ ॥ ढाल-मूलगी॥ साहिहो साहि राख्यो सोई, लाकडही लाकड़ अलगा नांखीयाए । जीवतहो जीवतने कल्याण, हेतजही हेत घणो कही दाखीयाए ॥ १४ ॥ अवलाहो अबलानो ए काम, सबला हो सबलातो एम केम करेए । थारीहो थारी तो एमाय, तुझविणहो तुझविण तो निश्चय मरए ॥ १५ ॥ खेचरहो सोधन गया था जेह, हनुपुर हो हनुपुर वरे आवीयाए । सुन्दरीहो सुन्दरीने पगेलागी, वीनकहो वीतक महु सुणावीयाए ॥१६॥ विव्हल हो विव्हल अधिकोहोय, घटमे हो घटमे थो प्रभु आगमेंए । लिखियोहो लिखियो तुझ भरतार, करताहो फरतारे तुझ भागमेंए ।। १७ । एटलेहो एटले आयो तात, राख्यो हो गयो मरवाधी तुझनायकए ॥ चिन्ते हो चिन्ने मनही मझार, पापिणीहो पापिणी पति दुःखदायकूए ॥१८॥ 'मामाहो मामा निसुणी एह, ऊंटी वने होऊहीं वने वेगो जाईये।। पनि हो पति ने देई तोप, काई हो काई एवा औरण थाईयेए ।। १९॥ रचियू हो रचियू ताम विमान, जाणे हो जाणे उग्यो दिन- पतीए ॥ मामोहो मामोजीने आप, सुतसं हो सुतसं चाली मा JAPAN AVM (६८) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । सतीए ॥२०॥ सोधत हो सोधत वन उद्यान, भूपज हो भूपज वने आया चलीए ।। मित्रेहो मित्रे दीठो ताम विमान, भूपतिहो भूपति सूं भाखे भलीए ।। २१ ।। आपो हो आपो मुझने ईश, आछी हो आछी आज वधामणीए ।। नयणे हो नयणे निरखी नारी, नन्दन हो नन्दन नंद शिरोमणीए ॥ २२ ॥ अमृत हो अमृत बूट्यो मेह, चिन्तवण हो चिन्तवण चिन्ते चाहतूंए ॥ प्रणमें हो प्रणमें सुसरा पाय, नयणां हो नयणां तेह उमाहसंए ।। २३॥ नन्दन हो नन्दन लीधो गोद, रूड़ो हो रूडोने रलियामणोए । रह्यो हो रह्यो कण्ठ लगाय, सुन्दर हो सुन्दर ने सुहामणोए ।। २४ ।। चारु हो वारु वार वखाण, बहुअर हो बहुअरने मामा तणोए ॥ प्रभुजी हो प्रभु तुम परसाद, अमघर हो अमघर रंगवधामणोए ।। २५ ॥ सुन्दरीहो सुन्दरी ना मा बाप, भाई हो भाई भोजाई सहुए ।। माताहो केतुमति पण आप, साजन हो साजन आवी मिल्या बहु ए॥ २६ ।। हनुपुर हो हनुपर पुरवरे आय, ओच्छर हो ओच्छव अधिको मांडीयोए ।। भोजन हो भोजन वर तम्बोल, दानेहो दाने दाग्दि खांडीयोए ॥ २७ ॥ दिन दस हो दिन दस ताई ताम, माजनहो माजन सहु ए गहगहेए । पहुंता हो पहुंता निज २ गेह, प्रमुजी हो बहु सुतमू रे तिहां ग्हैए ॥ २८ ॥ (अंजना चरित्र में पवनंजय का अंजना से मिलना इस प्रकार है ) आगल पवनजी चालीया, पूढे थकी आयो सहु माथतो ॥ आवतां सहियर ओलख्यो, एहछे स्वामीनी आपणो नाथतो ।। अंजना आई पावे पडी. खोले वेमावीयो हनुरे कुंवारतो ।। घडीयक पुत्र मामो जुवे. घडीयक जोवेछे अंजना नारतो॥ पवननी आनंद पामी ग्या, एडवो मुग्ख नहीं दीटोरे संमारतो॥३७॥ वमन्तमालाजी पाएनमी, ओटले घाली लीधी हीया मझारतो ।। कहो बाई तुम दुःख किममया, किमका मही म्हारी मायनी मारतो।। किम की बनकल वीणीया, किमका पर्वत रह्या निराधारतो ।।
भोलेठिया जैन दायालय लोयापिर श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (६६) अंजना पुत्र किम जन्मीयो. किमकर नीगम्यो दुःखभर्यो कालतो ।स३८ जिवारे स्वामी थे कटकेगया, सासरा पीयर म्हांने दीनोंछे छेहतो। तिवारे ऊठीने अमें वनगया, वनफल वावरी राखीछे देहतो ।। वनमांही मुनिवर भेटीया, देवता कीधीछे अम्ह तणी सारतो। धर्म करतां सुत जन्मोयो, अंजनागुण तणो नहीं लहूं पारतो।सती ३९ धिन मुख दीठोछे तुम्हतणो, बेऊ सखी बोलेछे मधुरीतो वाणतो। किम करी सैन्यमें संचर्या, किम कर सह्या राजा वरुणना वाणतो। 'सर' 'दूपण' केम छोडावीया, पवनजी वोतक दीयो सुणाय तो । जुज करोने ऊवर्या, अति सुख ऊपन्यो अंगन मायतो।सती ४० अंजना सामोरे संचरी, सासु सुसरा तणे लागी छे पायतो। पीयरीया आय सहु मिल्या, हस्त वदन रह्या सहुरे खमायतो । अंजना कहै सहु सांभलो, मनमांही माहरी मत करो लाजतो। कर्म म्हारारे हूं वनगई, हर्ष वदन थई सहु मिलो आजतो सती ४१ हनुरे पाटण थकी संचर्या, अंजनाने आपीछे अति घणी आयतो। मामाजी आया पहोंचावना, रतनपुरो लग आयो सहु साथतो ।। सामीहो परजा हो परवरी, लेई पधरावीया उत्तम ठायतो । पवनजी पाट वैसाग्ने, राय राणी हूं तत्र वन जायतो सती ४२॥ -: ढाल मूलगी कुंवरहो कुंवर आचार्यजीने पास, पढियोहो पढियो पाठ अनेकनेए । बहुतेरहो बहुतेरही विज्ञान. जाणेहो जाणे विनय विवेकनेए ॥२९॥ विद्याहो विद्या माधन कीध, हुवोहो हुवो अधिक मकाजजीए । ढालजहो ढालज इग्यारवींएह, भाखेहो भासे मुनि केशराजजीए ।३०। दोहा (रामग्री रागे) वरुण प्रत्ये रावण बली. मेले कटक अपार । 'प्रति मरज' ने 'पवननृप' गोलाच्या तिणवार ॥१॥ दोई भूपति चालतां. नीपेधी हनुमान । चाल्यो आडम्बर घणे. राँझाया गजान ।। सुग्रीवादिक सेवरा, वरुण साथे संग्राम ।
(७०) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । रावण ने वरुणात्मज, वाज्या ताम दुदाम ||३|| -: तर्ज-अंजनारी:- रावण सेना देखी करी, पुत्र सो वरुण ना आवीया सोयतो। आगना उडेरे अङ्गारीया, लोह ना वाण करी आफले दोयतो ।। सामाहो सुभटज आवीया, खेचोया धनुष्यने सांधीया वाणतो । रोस चढ्या रण आफले, जोम सहित चोले इम चाणतो ॥सती४३।। माताहो वैरण तुमतगी, तातने अलखावणो नांनडो बालतो । जो मुख आवेरे वरणने, जिण दिन खूटसी ताहरो कालतो ।। वलतोहो हनुमन्त इम कई, बंधव सोमीली आवीया साथतो। बोल साचो करी मानसू, जद वावरसो ग्णमांही हाथतो ॥सती४४॥ चांदरी विद्या साधीकरी. वन्दर रूप कीयो तिणवारतो । हाक करी दल हाकवे, वारं जोजन लगे वाजे धुंकारतो।। हाके करी सेनाहो थरहरी, वृक्ष उखेडीने नांखेछे घायतो। पूछ फेरी करी एकठा, पुत्रसो वांधी नांख्या रणमांयतो सती ४५।।. दोहा-सेना दल लेईकरी, चढियो वरुण नरेश ।। हनुमन्त तेपिण सजथयो, सेना सबल विशेप ॥१॥ धूलचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज खड़का- दोनोई कटक सटक भेला हुआ, जोयण एक नो बीच राखे । राग सिंधु गाईयो पोरस चढाईयो, कायर नर तिहां खाल ताखे ।।१।। हनुमन्त वीर अति धीर ग्ण में घणो ।। टेर ।। निज २ मोरचे सुभट रग रोपीया, तीर सणणाट कर मेह वरसे ।। भलल कर वार कर खलल लोही वहै, शिर विना शूर नर लडे धरसे ।। तिमिर वाणे करी तिमिर फेलावीयो, लावीयो हनुमन्त रोस भारी ।। मृर्य बाणे कर्ग तिमिर नामीगयो, तुग्न उद्योत थयो जगत् जहारी ।। वरुण नृप आय हनुमन्त साथे अडयो, लडत है विविध आयुध धारी।। हनुमन्त योध उद्वन्त बलवन्त अति, वरुणना धनुप्यने तोडी डारी ।। अगन बाण मेलीयो जलगर ठेलीयो, फेलीयो कपिटल जोर करने । हाक दल हाकचे नंक नहीं सखवे, आखवे अब किम जाय टग्ने ।। .
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । ( ७१ तर्ज-अंजनारी रथ थकी राजा हो ऊतरयो, आविने हनुमन्त दीधी छै बाथ तो चोटी ना बाल ते कर ग्रही, मूठीना प्रहार रु वाजे छै हाथ तो। चपल चपेटारे चावरे, हनुमन्त ऊपरे बैठो छै रायतो। 'रावण' हनुमन्त ऊपर कीयो, वरुणने वांधी नोख्यो रथ मांयतो। (दोहा) नन्दन वरुण तणेधणो, खेडयो रावण जाम । हनुमन्ते ते बांधोयो, विद्याने चले ताम ॥ ४ ॥ 'हनुमन्त' ऊपर वरुणजी, आवे होई विकराल । 'रावण' रोसकरी घणो. जीत्यो ते ततकाल ॥५॥ जीत्यो वरुण विशेप थी, नृपने करे जुहार । थाप्यो थानक तेहने, अब नहीं खुनस लगार ॥ ६॥ 'वरुण' घेर छे कन्यका, सत्यवती तसु नाम । परणावी हनुमन्तने, जाणी वर अभिराम ।।७।। पुत्री शूर्पनखा तणी, अनंग कुसुमा नाम । हनुमन्तने विवाह मही, रावण जाणी सकाम ॥८॥ 'पद्मसुरागा' पुत्रिका. वानर पतिने जोई । 'नलराजा' हरिमालिनी. पग्णावी ए दोई ॥ ९ ॥ अनेरे विद्याधरे, पुत्री एक हजार । परवाणी हनुमन्तने. धर्मे मदा जयकार |॥ १० ॥ रावणना आदर लही, परणे नारी अमन्द । हनुमन्त आव्यो निज घरे, मातपिता आनन्द ॥ ११ ॥ तर्ज-अंजनारी पाछली पहर रयणी तणो, धर्म चिन्ता करे अंजना देवतो। चारित्र लेवारे चिन्न धयो. पवनजीर पार लागी ततखेवतो।। जन्म मरण दुःख दोहीला. जोग विजोग मंसार कलेमतो। पवन कहै हनुमन्त नानडो, संयम लेवजो युद्धने वेसतोस.४७ विलम्ब तो स्वामीजी जे करे, नेहने काल को हुवे विसवास तो।
(७२) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । विपयना सुख पूरा हुवा, संयम लेवातणी मन आसतो ।। इम सुणी राय वैरागीयो, हनुमन्त ने कहै मत कर तूं अन्दोहतो ।। माताना चरण झालीरया. मायतों ऊपरे है घणो मोहतो ।।स.४८|| पुत्र समझावी संयम लीयो, अंजना राय खमावती सोयतो । छेड़ो छोडी करी संचर्या, हम तुम देवो लेवो नहीं कोयतो । पवनजी मुनिव्रत आदर्या, नपकर पामसी शिवपुर ठामतो । अंजना गुरुणी पासे गई, वसन्त माला साथे थई तामतोस. ४९॥ लोचकरी संयम लीयो कर्म तणी घेऊं तोडे छे कोडतो। आभरण लेई सुत ऊदासीयो. सुग्रीव सुता समझावे कर जोड़तो।। अंजना कीरीया करे घणी, माम २ तप पारणो धारतो। मांस ने लोही सकी गयो, लीलडी चाम दीसे नसाजालतो। म.५० अनशन करीने अराधीया, वेहूं सती पोतीछे स्वर्ग मझारतो । चक्नेहो मोक्ष सिधावसी, इम कहै गीयल ग्रंथे अधिकारतो ।। एह कथारे इहांरही, आगल सांभलो सीता अधिकारतो। सत्यवतीरे सांची सती, जगत माताने रामनी नारतो ॥स. ॥५१|| दोहा अब मिथीला नगरी भली, हरिवंशी राजान ।। 'वासबकेतु' सुहामणो, 'विपुला' नारी सुजान ॥१२॥ तेज प्रतापे आगलो, जनक नामे जग जोय ।। प्रनाने पालण भणी, जनक सारीखो होय ।।१३।। ॥ ढाल बारहवीं नर्ज-चौपाई॥ पुरी 'अयोध्या' प्रगटे नाम, राज्य करे 'आदेश्वर स्वाम ।। 'मुनन्दा' 'सुमङ्गला' वली, नारी निरूपम गुण आगली ॥ १ ॥ 'सुमङ्गला' ना जाया नन्द, नवाणू आनन्द ना कन्द ।। 'मुनन्दा' ए जायो एक, 'बाहुवल' तसु अविचल टेक ।। २ ।। मो पुत्रों में मोटो मही, पाटोघर 'भग्तेमर' सही ।। मवा कोड़ी नन्दन जेहने, 'मूर्यनशा' मुखियो नेहने ॥ ३ ॥ 'मूर्यनया' थी 'मूरजवंश', पृथिवी माहै अधिक प्रशंम । . .
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (७३) पुरुष असंख्य हुवा तेटले. मुनि सुव्रत' वारे जेटले ॥४॥ 'विजय' राय मोटो राजान, 'हिमचूला' तसु नारी प्रधान ।। जाया नन्दन नीकार दोय' 'वज्रयाहु' 'पुरन्दर' जोय ॥ ५ ॥ नगर 'अहिपुर२' छै अभिराम, 'हिमवाहन३' राजानूं नाम । 'चूडामणी' नामे घर नार, 'पुत्री' 'मनोरमा' है सुविचार ॥ ६ ॥ 'वज्रयाहु सूं' सीधो विवाह, मनमां आणी अति उत्साह ।। सुन्दरी लेई चाल्यो जाम, 'उदय सुन्दर' सालो ताम ।। ७ ॥ पोंचावणने हुवो साथ, प्राती भणो लीधो नर नाथ ॥ वाटे 'गुण सागर' ऋपिराय, दीठा दौडी लाग्यो पाय ।। ८ ।। चारोवार प्रशंसा करे, भव-दुःखथी आतम उद्धरे । दर्शन दीठो ऋपिराजनो, धन्य धन्य हो वासर४ आजनो ।। ९ ।। हांसी मिसे सालो कहै एन, घणू घणं प्रशंसा केम ? जाणू लेसो संयम भार, कुँवर कहै अम एह विचार ॥ १० ॥ सालो भाखे ढोल है कांई, दिवस गयो फरी नावे प्राही५ ॥ संयम साथे विमासण कीसी, म्हारे मन पिण एहीज चसी ॥११॥ कुंवर कहै ए सघली मही, वात विसेखे लीधी वही ।' तूं मत चूक बोली वाच, सालो भाखे जाणों साच ।। १२ ।। संयम लेवा थयो होसीयार, ऋपिने कई नारी संसार ।। सालो कई कां स.चो करो, विवाह तणा गीत मनमां घरो॥१३॥ कंकण नवि छुट्यो ताहरो, एह मनोरथ झूठो खरो॥ तुजपियु पाखे एसुन्दरी, मरीजाले दुःख भारे भरी ।। १४ ।। कुंवर कहै कुलवन्ती एह. नाह७ सरिखो राखे नेह ।। तोते कां न संयम आदरे, नारी नाह करणी अनुसरे ।। १५ ।। तूं तारी भगनी समजार, तूं पण संगम मारगे आव ।। १ ए हिन्दुस्थानी शब्द छ, सरस, उत्तम । २ नागपुर (जैन रामायण) ३ इभवाइन (जैन रामायणे)१४ दिन । ५ एनो अर्थ “घरलू फरीने एवो थाय छ, पण या ठेकाणे मात्र अनुप्रास मेलयया अज पापों जपाय के (प्रायः प्राये)।६ विना । ७ चुद्धि ।
(७४)
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड ।
दुःख पूर्वक सांसारिक सुख, पाछू ही देखावे दुःख ।। १६ ॥
नारी नाह ने सालो साथ, व्रत लीधां 'गुण सागर' हाथ ।।
अवरही कुंवर पणवीश, चरण ग्रहै तब वीश्वा चीश ॥ १७ ॥
हांसी थकी ऊपजीयो धर्म, धर्म थकी लेसे शिव शर्म ॥
सोही सगो जगमांही भलो, धर्म करावे उतावलो ॥ १८ ॥
एह सुणी थी 'विजय' नरेश, वैरागे मन आणी विशेर ।
'पुरन्दर' ने देई राज. राजाए मार्या निज काज ॥ १६ ॥
'पुग्न्दर' सुत सोहामणो, जायो 'पृथिवी' गणी तणो ।
'कीर्तिधर' ने पदवी दीध, राजाए संयम व्रत लीध ॥ २० ॥
'कीर्तिधर' नृप उदासीयो, संयम साथे मन वासीयो ।
नकर राज्य तणी सम्भाल. मंत्रीश्वर भाखे सुविशाल ।। २१ ।।
जवघर उपजे नन्दन आय, तब तुम संयम लेवो राय ।।
भूप घणाए पाल्यू राज, तुम पगथी जाये छे आज ॥ २२ ॥
न्हानाही लोकोए सोच, तुन मन केम न करो आलोच?॥
जेहने पाछल नहीं सन्तान, तेहना घरतो कह्या मसाण ॥ २३ ।।
एम सुणन्तां ढीलो पट्यो, विपय सुख ऊपर मन अट्यो ।।
'महदेवी' नामे कामोनी, भाग्य वतीछे भली भामिनी ।। २४ ॥
'सुकोशल' सुत उपन्यो जिसे, गुप्तपणेसो राख्यो तिसे ॥
जा नृप थासे संयमी, गजऋद्धि रमणीने वमी ॥ २५ ॥
जाण्यो राजा भेद जेवार, सुनने सोंप्यो पृथिवी भाम् ॥
समतारस मा चित्तधरी, गयेवजी तव मंजम मीरी ।। २६ ।।
एह बारमी ढाल अनूप, संपम प्रत पाले भलो भूप ।।
'केश राज' ऋपिराज बसाण, करता थाए जन्म प्रमाण || २७ ॥
- दोहा सिन्यु रागे
भण्यो गुण्यो मति आगलो, कातो उग्र विहार ।
दिन केताने आंतर, फरतो सो अणगार ।। १ ।।
पुरि अयोध्या आवोयो. लेवा काजे आहार ।
मध्य दहाड़े तावडे, हिंडे पर घर बार ॥ २ ॥
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । प्रथा मारवाड़ी मंत्री शांतमूर्ति श्रीचौथमलजी म. सा. विनिर्मिता कीर्ति चौपाई (प्रक्षेप) ढाल पहीली (प्रक्षेप) तर्ज-गवमति कररे- असि आ उ सा युत ॐकार, अलख अज प्रखण्ड अविकार, अजया जापहिये धार, कहूंकथा 'कीर्तिधर' *मुनिकी, राणी है 'सहदेवी' उनकी ॥ १॥ जुलम मति कररे मेरी जान जुलम० जुलम से बहुत खराबी है, जुलम से शिव की ना भी है, पावे दुःख चात आयी है ।। जुलम ॥ टेर ॥ 'अयोध्या' अवनी पति आछो, कीर्ति धर जाण्यो जग काचो, प्रवा ले आयो पाछो, भूखा मुनि एक मामहूका, लेणकू आये वहां टूका ।। जुलम ॥ २ ॥ ढाल तेरहवीं तर्ज-देश सोरठ द्वारापुरी-- अई अई कर्म चिटम्बना, राणी राजा लारोरे, आप करे अविनय घणो, ए रहोटो अविचारोरे ।। अई ॥? गोखे बेठी गौरड़ो. नगर निहालण हेतो रे, फरतो ऋपि अवलोकीयो 'कडुआंणो१ तसनेतोरे ॥ अई ।। २ ॥ आप गयो सुजने तजी, लेई जासे ए पूतो रे. चरी विविधमकारनो, आयो करण कम्तो रे ।। अई ॥३॥ पतिरे गयाथी पुत्रस्, वांधी रहूंछू नेहो रे, पुत्र गयां करस्यूं कि. मुजमन एह अन्देहो रे ।। अई ॥४॥ आंत तपाणी आकरी, न रही शुद्धि लगारो रे, पुनज व्हालो पतिथकी ए जगनों पवहारो रे ॥ अई ॥ ५ ॥ अन्य सुलिंगी आकरा, आधी अडिया नामो रे ।। ढाल प्रक्षेप तर्ज-गर्व मति फररे लिनावे राणी हलकारा, मोटेका करिये मुं. कारा, आये जहां नोट-प्रक्षेप हाल को अवशेष गाथाएँ । गवाने की महारागो, रोते मुनि देखें अल फनी, पुत्र के प्रेमे घबरानी, मागे मुझ याविन्द के लेगा, पति सोपुत्र मूडेगा ।। जुनम ॥ ३॥ यान ए पुरजन सुन पाई, राणी के क्या दिल में पाई, ऐसी को पियाई, तो कमर जन धुरकारे, मुनिने क्य काया वारे ।। जुना ॥८ * फोर्ति धन पाशवरे ।। १ मोघवी ने राता थया ।।
(७६) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । चालो अनगारा, तेरे पर माजीसा डोडा, भागजा यहां से अब मोडा ।। जुलम ॥ ४ ॥ फेर इस ग्रामे नहीं आना, आये तो हर- लेंगे प्राना, बोला में चवडे नहीं छांना ॥ हुकम नहीं रात रेणेका, हुकम तुन मार देने का । जुलम ॥ ५ ॥ गई कर छोरा हो अब के, मुनिकहै परवाह नहीं हमके, मुनि तब निकरे यूं कहके ।। करे मुनि वात याद अगली, स्वारथ की दुनियों है सगली ॥ जुलम ॥६॥ राग रु द्वेष से न्यारे, मुनि वो तिरे और तारे, सदा मुनि क्षम शम दम धारे ।। मुनि चल वन माही' आये, तरुतल ध्यान ही ठाये ।। जुलम ॥ ७ ॥ ढाल मूलगी काढीयो नगरी बाहिरे, जोवा मिलीयो गामो रे ।। अई ॥ ६ ॥ फिटकारो जण जण मुखे, राणी साथै रोसो रे । जोर न चाले कोई नो, पण आणे अफसोसो रे ।। अई ।। ७ ॥ ढाल प्रक्षेप तर्ज-गर्व मति कररे धामाता सुनलो ए वातां, रानी क्यूं खोई है हाथां, संताये मुनिवर कृ जातां, एसे कुन जग में हत्यारा, मारदे मुनिळू निकारा, जुलम मति कररे ।।९॥ दोहा रूठी मन भूठी नदा, कूटी काढ्या संत । ऊठी ए झूठी नहीं. छूटी चाल्या संत ॥१॥ दाल मूलगी धाव ज्यू आवी रोवती, गजाजी ने पासेरे, कारण पूछथं रायजी माखे धाव उदासेरे ।। अई ।। ८॥ नात तुम्हारो देवजी, तपकरी दुर्वल कायेरे, भिक्षा लेवा कारणे, आयो थो उच्छायेरे ।।अई ॥९॥ ढाल दूजी प्रक्षेप तर्ज-म्हारे हाथ में नवकर वाली धामाता तब आजी कम्बा, दौड गई दरचाररे, हाथ जोड नीचो कर लटको, इनविध करी पुकाररे ॥ १॥ महागनी निन नौकर मेली, जुल्म करायो आजरे, आहार लेनर आये मुनिवर " कीरत घन" महाराजरे ।।टेर ।।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (७७) हलकारा • मेल रानीसा, मुनि कू दिया निकाररे, एक मास क मुनिवर भूखा, कीधो कर्म चण्डाररे ॥ महारानी ॥ २ ॥ धक्का । मुनिकू कडवाया, क्या लेता मुनिरायरे ॥रात रेवन की आन दिरा एसी थारी मायरे ।। महारानी ॥३॥ जरा आपकू जाल सादि की, खबर पडी न लिगारर, काम करयो खोटो महारानी, संताय अनगाररे ॥ महारानी ॥ ४॥ हाक फूटी है सब नगरी में, धुर कारा दे लोकरे, इण लखणां स शिव किम मिलसी, दोरो दिवलोकरे ॥ महारानी ॥ ५ ॥ दाल मूलगी राणी सेवा साचवी. तेतो कहियन जायरे, पूर्वना परिचय थकी ए मुज हैयू भरायरे ।। अ. १० एम सुणन्ता वेगखू, धापरीयो भूपालोरे ।। ढाल प्रक्षेप तर्ज गर्व मति कररे जुल्म यह राजाजी सुणीया, सोच कर मस्तकने धुनीया, कहो कुन एसे हत पुनीया, उन्हीं को जूत मार लावो. कारागृहर माही पधरावो ॥ जुल्म मति कररे ।। १० ॥ गनीसा विजनस मुनि टाल्यो, हाय ओ मुनिवर क्यू शाल्यो, अरे ! उन मेरो उर वाल्यो लोक सब देवे ई धुरियों, लगी मुज कारजे छुरियों ।। जुल्म मति कररे ॥ ११ ॥ मुनि कू कूटासी जालिम, उन्हीं की कर लूगो मालिम, भेजे तब पोलिस के आलिम, कारागृह जुल्मी को पकडी, डारे तब घाल गोडा लकड़ी ।। जुल्म ॥ १२ ॥ दाल मूलगी वन्दन करवा तातने, आय गयो तत्कालोरे ॥ अई.॥१२॥ ढाल प्रक्षेप तोजी तर्ज-नन्द पेण प्रति बुध्यो घोड़े चढ राजा चाल्यो, चो रहे न किण को पाल्यो, नृप छडी असबारी हाल्यो, हो लाल १ ॥ जुल्म करयो रानी खोटो, सन्तायो मुनिवर म्होटो, इन वाते घर में टोटो हो लाल ॥ टेर।। Aanemaprem
(७८)
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड ।
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रु तरे मुनिवर बैठा, हैं ज्ञान ध्यान में सेंठा, राजाजी ऊतरया
ठा हो लाल, जु० ॥३॥ मुनिवर कू करी सिलामी, मेरे शहर
पधारो स्वामी, मैं अर्ज करूं शिरनामी हो लाल ॥जु०॥ ४ ॥
मेरी अर्ज मंजूरी कीजे, दुनियों ने दर्शण दीजे, थारी दाय पडे
ज्यूं कीजे हो लाल ।। जुलम ।। ५ ।। तय बोल्या अन्तरजामी, में
आस्यां अवसर पामी, म्हारे द्वेप नहीं शिव कामी हो लाल ।।
जुल्म०॥६॥
ढाल मूलगी
पगे लागी उभो रह्यो, माग्यो संयम भारोरे ।
जग मे कोई केहनूं नहीं, स्वार्थीयोए संसारोरे ।। अई.१२॥
ढाल प्रक्षेपक मूलगी-
मधुर ध्वनी मुनिवरजी बोल्या, जीव यह चतुर्गति डोल्या, स्वास्थ
का सगपन सहु भोल्या, मेरा अब कथन मान लेनी, अथिर यह
जगत छोड देनी ॥ जुल्म० ॥ १३ ॥ देख रुज आंखे जल भरती
मेरही मरणे वा मरती, अजीजा ईश्वर ने करती, बाकी वा सहदेवी
रानी, लेने नहीं दिया आहार पानी ॥ जुल्म ॥ १४ ॥ जगत में
जोरू का झगरा, कनक हेतु होते हैं रगरा, स्वपन का ख्याल
जग मगरा, राज का भार छोर दीना, भार शिर संयम का लीना
|| जुलम ।। १५॥
ढाल चौथी प्रक्षेपक तर्ज-नवली चन्दनी हैक सजनी विन ऋतु व मेह-
गजाजी मुनिपै गया हैक सजनी, लोक मुखे या वात ।। रानी
सुन चिलखी थई हैक सजनी. आमन दुमन घातक ||१|| निगुना
नेहको होक, साजन अद्भुत कौतुक एह ॥ टेर ॥ दुःस्व पूरित
दिन आगला हैक सजनी, विन सुत काई कम ॥ मुन कहनो
मान्यो नहीं होफ गजा, काम कायो विन फेम ॥ निगुना ||२||
हागिनने छोडे नहीं हैक माजन, कां बनसी मृत ।। कोन कुमोत
मान्सी इक सजनी, जद आसी पाछो पूतक । निगुना ॥३॥
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (७६) ॥ ढाल-मूलगी ।। करजोड़ोने वीनवे, देवी चित्रजमालारे, सुत चिन स्थिती किम चालसे, भाखो राय रसालारे ॥ अई॥१३॥ गर्भ अछे ऊदर ताहरे, में तसुदीधो राजोरे, अन्तराय कोई मति करो, सारण दीजो काजो रे ॥ अई ॥ १४ ॥ तात पासे थी समाचर्यो, चारित्र चौखो चायोरे, वात सुणन्त मुई सही, तब सहदेवी मायो रे ॥ अई ॥ १५ ॥ ॥ ढाल क्षेपक मूलगी। रानीजी महिलों से परके, ध्यान मन आरत ही धरके, मिहनी वनमें हुई मरके, सिंहनी इधर उधर म्हाले, पशु और मिनस मार खाले ।। जुलम ॥ १६ ॥ ॥ ढाल मूलगी। कांईक आर्तध्यान में, काईक क्रोध परिणामोरे, चन हुई बाघणी. गिरी गुहिर तस ठामोरे || अई ॥ १६ ॥ ॥ ढाल क्षेपक मूलगी॥ मुनि कहे जुल्मी ऊपरियो, मंत्री तर हूंफारो भरियो, मात्र सहु पाछो संचरियो, बात यह सुणी राजवर्गी, जुल्न कर रानो सा मरगी ॥ जुम ॥१७॥ गनो के प्रेज कारन कीने, जुल्मी को सचिव छोड दीने, जगत में मंत्री जस लोने, पांगूरथा मुनिवर महियल में, आवे नहीं कर्महके छल में ॥ जुलम ॥ १८ ॥ !! ढाल मूलगी॥ 'कीर्तिधर' ने 'सुकोशलो', वाप पुत्र ए दोई रे. चोवू चारित्र पालतो. पिचरे मुनिवर सोई रे ।। अई ॥ १७ ॥ गिरी गुफा में अनुसरी, करता तप उपवासोरे. समता से विचरता, रया ऋपि चौमामोरे ।। आई ।।१८।। ॥ टाल पांचवीं क्षेपकर्ज-चंदा भारी चांदनी मीरात रे।। मुनिवर विचान महियल में मनिवन्तरे, कोई आगारे गह निनोडना वाग में ।। उतरया मुनिवर निबंध स्थानक तन्तरे. कोई लेलीरक - (८० ८०) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । आज्ञा मालागारनी ॥१।। इतरे महिनो श्रावण को आवन्तरे, कांई जलऋतुरेक देखी जग सुख पावीयो, दो कोश की अलगी छे चित्तोड़रे, कार्ड विचमैरेक डर बाघन को सुनावियो ।। २ ।। । ढाल मुलगी। कार्तिक पूनम कारणे, नगरभणी आवन्तारे, एटले आवी बाधणी, ऋपि सामे धावन्तारे ।। अई ॥ १९ ॥ ॥ ढाल क्षेपक पांचवीं ॥ पहिरन खातिर जावे मुनि चित्तौड़रे, कांई विचमें रेक मिलगी इक दिन बाधनी, होले होले चाले चेलो लाररे, कांई आतीरेक अलगी देखी सिंघनी ॥ ४ ॥ नीची निजरां घाली गुरुजी जायरे, काई उनकीरेक खवरां उनको कोयनी ॥ धीमें धीमें हेलो चेलो पाड़रे, काई उभारेक राज्या निज गुरु जोयनी ॥ ५ ॥ ।। ढाल क्षेपक मूलगी। देखी इत वाधन कू आती, क्रोधसे आंखेंही राती, हातल दे धरणी धूजाती, गुरु तव चेलाकू बोले. नाठजा पर्वत के ओले।जा१९ ।। ढाल मूलगी। तातकहै मुत मामलो, एह उपद्रव आयो रे, होवादो मुज आगले, सुत बोलन्त सुहायो रे ॥ अई ।। २० ॥ ।। ढाल क्षेपक मूलगी। काम काई क्या इन डरने का, कामए मुझकू करणे का, मुझे नहीं सोच मरने का, लारे नहीं खुणे वेसण वाली, लहूं शिव आतम उजवाली ॥ जुलम ॥ २० ॥ ढाल छट्टी क्षेपक तर्ज-ख्यालरी (गुरुजी थारी वाणी प्यारीजी) वाधन से मैं नहीं डरूंसरे, रविवंशी रजपूत, मुजे अगारी जानदोस में, देव मृगतरामृत ॥१।। चेलानी नहीं आगे घरवालीजी, आगे थे मतिजावो देखो आगे ऊभी पण मुखवालीजी ।। टेर ।। कोमलतन वालो लघुमरे, तूं मुज जीवन पान, सुत चेलो वाल्हो घणोस तूं, १ सिंहनी ।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (१) किम कहूं आगीवान ॥ २॥ चेलाजी हूं जावू मति वरजोजी, दाय पड़े ज्यू कीजो लारे थेतोथोरे रति मति डरजोजी ॥ टेर ॥ हरगिज ते नहीं होनरे सरे रनो गरिन निमाज, आप अन्दाता किम मरोसरे, म्हारे बैठां आज ॥३॥ महाराजा मैं लेझं शिन- पुरीजी, जाने दो अवी मने आगे मेरी करो अरज मंज़रीजी ।।टे।। ढाल क्षेपक छठी उपधी मेली कीरत मुनिके तीररे, काई आपजरे पधारथा सिंहनी सामने ॥ संलेखन कर कियो संथारो साररे, काई मनमें रेक जाप जपे जिननामले ॥६॥ ढाल मुलगी पाछा पग न पाठवू, क्षत्रीनो ए धर्मोरे, सही उपद्रच ए आजए, साधसं शिव शोरे ।। अ० २१ ।। उहांही ऊभो रह्यो, आराधन विधि साध्योरे, ममता मूकी देहनी, आनम गुण आराध्योरे (अ.२२। दाल छठी क्षेपक आती वाघन छाती में दी मचकायरे, कार्ड हाथलरीक मारे मुनि इन पापनी, सरररररर रुद्र साल चल जायरे, कोई न कयोरे क अररर मुखथी आपनी ॥७॥ ढाल मुलगी विद्युत् पाततणीपरे, चावणीतो विकरालोरे, आधी पड़ी सुत ऊपर धरणी पडयो ऋपि वालोरे ।। अ० २३ ॥ विदारे नख अंकुशे, वाल्हा ननुनीर चामोरे, तरसी३ ए बलो अति नरमा. पोवे लोही तामोरे ॥ १० २४ ॥ तोडी नोडो तन नणं, सार नव मा मांसोरे, बिलूरी नोख्योधणं, कोधो अधिक प्रयासोरे. 11 अ० २५ ॥ अमृत ने करलेट करी. पोखीधी जे देहोरे, विनाई बाधणी, नोडी क्षेपक मूलगी ढाल को अवशेष गाथा ।। पञ्च भी "जयमल" गन्मजीप, साम्प्रत मुनि सोहे "प्रयनोपै, मेरे गुरु "नयमलजी" दीपे. " गौरमल "नोजत" मन साचे, रागयुत रामचरित्र पांच ॥ जुलम मति यर।।शा १ वीजलो ने पदवं १२ शरोरनी। ३ तरस ण्टले चर लयाने टोपी रहy प्रने नरस गढले भामुरता । ४ फोलिगे।
(२) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । नोखी तेहोरे ।। अ० २६ ।। चइते परिणामे करी, पाम्यो केवल? नाणोरे, कुशलपणेरे सुकोशले, साध्योपद, निरवाणोरे२ ।।अ. २७|| -ढाल क्षेपक मूलगी- ध्यानतो शुकलही ध्याया. मुनि तो अमरापुर पाया, लारे हिव पड़ी रही काया ॥ खावे तन वाघन तसु अटकी, मुनि तच वाघन ने हटकी ।। जुलम ॥ २१ ।। पुत्र क्यूं मारयो हित्यारी, गति क्या होसी हिव थारी, दशन द्युति सुन्दर नीहारी. सुजाती स्मरनहीं धारयो, अररर मैं नन्दन क्यों मारयो । जुलम ॥ २२ ॥ आतम की निन्दा ही करती, आंखों से आंसूं ही भरती, अवे वा परभव से डरती । वाघन तव मुनिवर पे आई, 'सुकोशल' मार शर्माई ॥ जुलम ॥ २३ ॥ सिंहनी संथारो ठावे, कल्प तब आठ में जावे, 'कीर्ति ध्वज' मुनिवर शिव पावे, नमो नमो ऐसे मुनिवर कू, 'सुकोशल' 'कीरत' नरवर कू ।। जुलम ॥ २४ ॥ ढाल मूलगी 'कीर्तिधर' करणी बले, कर्म तणो क्षय कीधोरे ।। मोक्षे पहूंच्यो केवली, नरभवनो फल लीधो रे ।। अई० ॥ २८ ॥ तेरसमीए ढालमें, जेरस पोख्यो तेणे रे । 'केशराज' रस एहवो, पोपाय कहो केणेरे ॥ अई० ॥ २९ ॥ दोहा (गोडी रागे) 'चित्रसुमाला' राणीए. जायो सुन्दर नन्द । 'हिरण्यगर्भ' नामेभलो, शत्रु स्कन्द निकंद ।। १ ।। हिरण्य गर्न घरे गौरडो, 'मृगावती' अनिराम ।। 'नधूक'३ नामे सुन जाइयो, दुःखितजन विश्राम ॥ २ ॥ ढाल चवदवी तर्ज-माई धन्य दिवस ( सुखकारण भवियण) 'हिरण्यगर्भ नृप माथे धवलो केश,देखी आलोचे४ए जमदत विशेषा? तत्क्षणते गजा ' नधूक ' कुंवरने राज, आपी आपणपे सारे आतम १ केवल ज्ञान । २ मोक्ष । ३ नहप (जैन रामायण ) । ४ श्रालोचयू एटले विचार। प A श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (८३) काज ।। २ ।। राजा घरे राणी 'सिंहिका' 'अभिधान', सा सबविधी जाणे शूरपणे सुविधान ॥ ३॥ उत्तर पंथना नृप, जीतण चाल्यो गय, दक्षिण पन्थना नृप अड्या ' अयोध्या ' आय ।। ४ ।। (लेखक) ढाल क्षेपक तर्ज-हिडे हालोरे । राणी शरीरे २ आ शीलवती गुण हिम्मत पूरीरे ।। टेर ।। नृप राणी सिंहिका जाण्यो, फिर कोई दुस्मन आयारे । अब क्या करणी चात नाथतो, कटक सिधायारे । राणी ॥ १ ॥ वचन वदे राणी दास्योंको, मर्दी वेस सव करलोरे ।। वक्तर टोप पहर लो हाथ चाण, बंदूकों भरलो रे ।। राणी ॥ २॥ मुनिश्री रूपचन्द्रजी म० कृत ढाल क्षेपक तर्ज-हां सगीजीने पेड़ा भावे हां अबे सुभटां ! झट चालो. ज्यूं त्यूं कर दुस्मन दल टालो, भालो झालो हाथ अवे पाछो मत भालो रे । अवे ॥१॥ राणी निज परिकर कर भेली. जोध झंझार बनी अलवेली, ताजा तूरी मंगाय जिणीपर, झीण मण्डालोरे । अवे ॥ २ ॥ त्रिय सैन्या लड़वाने ताती, रीस लाय करआंखें राती ।। देख वीरता कायर नर कहै आपा हालोरे ।। अवे ॥३॥ हुयो युद्ध परस्पर भारी, हार्यो नृपने जीती नारी ।। शार्दूल शिष्य मुनि रूप कहे जेतारण है वरसालोरे । अवे ।। ४ ।। -डाल मूलगी- राणीए जीत्या करी सवल संग्राम, सिंहणी के आगे गज क्यं न तजे ठाम ॥ ५॥ नृप जीती आयो निसुणी एहउदन्त, गाढो दुःख पायो कामिनी ऊपर कन्त ॥ ६॥ एहछे व्यभिचारणी, नहींतर एहy काम, नकरे कोई पोजी, नारी धरावी नाम ॥ ७॥ रहियो मन संची, न चले वाल्यो केम, रुड जग करता. थाए भूह एम।। ८ ॥ राजाने डीले ऊपजीयो ज्वरदाह, - (४) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । औषध नविमाने, आणे अस्ती' अगाह२ ॥ ९॥ सा दोष उतारण राजा आगे गणी, सहुने सांभलतां, प्रगटे अवसर जाणी ॥ १० ॥ में निज पति टाली, अवरन वंछयो कोई, तो शासनदेवी, सानिद्ध करजो सोई ॥ ११ ॥ एम कहती राणी फरस्यूं राजा अङ्ग, हरिवाहन३ आयां भाजी जाय भुजंग ॥ १२ ॥ तेम वेदना नाठी दीठी देह निरोग, राणीसं राच्यो पंचेन्द्री सुख भोग ।। १३ ।। राणी उदरे ऊपनो, पुत्र भलो 'सौदास', पट थापी आपे संजम सुखवास ।। १४ ।। 'सौदास' नरेश्वर अप्टाइक उच्छाह, मंडावे गावे श्रीजिन गुण अगाह ।। १५ ।। तव जीवदयानो, पडहो राय वजावे, मन्त्रीश्वर बोले एतो मुजने सुहावे ॥ १६ ॥ तव पूर्वज पुरुगे मांस न किणही खायो, तुम ही तिम चालो जो चाहो जश पायो।। १७॥ दाक्षिण्यथी मानी. पण मन मे न सुहाणी, जे कुवशन पडियों, ततो पापी प्राणी ।। १८ ।। तच सूट संघाते, गुप्तपणे कहै राय, क्षण एकहि में तो मांस पखेन रहाय ॥ १९ ।। तूं हेतु म्हारो, तो मुन्न ने दीए मांस, सोध्यो नविपावे दीठो करिय प्रयाश ॥ २० ॥ एक बालक मूवो, नृपने आण खवावे, माणमने मांस म्वाद घणेरो आवे ।। २१ ।। गीघो५ तब राजा, नित्ये एक मरावे, १ दुख । २ अगाव घएँ । ३ गरुड़।४ रसोइयो। ५ गीधो (गृद्ध) माननो लोनूपी राजा नित्य एक बालक मरावतो।
श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड ।
वयों नविमाने लोक असाता पावे ॥ २२ ॥
मुनि श्रीरूपचंदजी म० कृत. ढाल क्षेपक तर्ज-ताबड़ो धीमोसो पड़जा
सचिव ! म्हारी अर्जी सुन लेना, रायकरे अन्याय अनूठो आखिर
सुख है ना ॥ टेर ॥
नगर निवासी भये उदासी भरकर जल नैना, भला हां भर० ।
मत कोई मारो जीव राज्य में, यह था नृप कहना ।। सचिव १ ॥
मदिग मांसतणा जे रसिया,* लुच्चा लागा कान, राजारे लुचा ।
बालक मांस साये नित्य राजा, तोड़ी सघली आन ||सचिव २॥
वल्लम बालक मारण सारू, किण विध संप्यो जाय, राजाने किण ।
आगे अनरथ हुयो न एडो, करे सो खत्ता खाय ।। सचिव ३ ॥
से समजादो भूप भणी अब,तजदे खोटी चाल ।
'रूपमुनि' कहै रैयत वदल्यां, काई करे भूपाल || सचिव ४ ॥
मंत्रीधर म्होटो, राज्य तणो रखवालो,
कही कही समजाये, राजा नविदीये टालो ॥ २३ ।।
तव वांधी काठो, काही दीधो राजा,
थापक उत्थापक, लोक सदा ही नामा ॥ २४ ॥
'सौदास ' तणांसुत, न्यायवन्त नरेश,
'सिंहरथ' स्थिर थाप्यो, सुखदाई सुविशेष ॥ २५ ॥
भूपति अति भमतो. दक्षिण दिम चलि आवे.
देखी इक मुनिवर, गाढी साता पाये ॥ २६ ॥
पूछे तर धर्मज, मुनिवर भाखे वारु.
परहरीये मांसज, अरु परिदरीये दारू ।। २७ ।।
ओ चीजी नरके. ओबीजे पहुंचाने,
एम मुणतां मन में, राजा डर अति पारे ।। २८ ।।
पञ्चक्खाण करे नृप, मांस अने मधु फेरो.
नव श्रावक हुचो जाणे धर्म भलेरो ।। २९ ॥
यतः रोल बिगाड़ राजने. मोल पिगा मालधार २ सरदारी.
पुगल विगादेपाल ॥१॥
(८) श्री जन पद रामायण प्रथम खण्ड। 'दर्भ स्थलपुर' जाणीयेरे, 'सुकोशल' निहां रायोरे । राणी नामे 'अमृतप्रभारे, राजाने सुख दायोरे । राजा ॥२॥ पुत्रीवर 'अपराजीताजी२', इन्द्राणो अवतारोरे । व्याहै३ 'दशरथ' रायनेरे, ओछत्र करिया अपारोरे ।। ३ ।। 'सुशीला' त्रियनो पतीरे, मित्रसुभू४' भूपालोरे । 'सुमित्रा' पुत्रो परणावेरे, 'दशरथ' ने सुविशालोरे ॥ राजा ४ ॥ सुप्रभा अति देहनीने, 'सुप्रभा' तस नामोरे । राजा रंगे परणावर, 'दशरथ ने अभिरामोरे || राजा ॥ ५ ॥ पंचेन्द्रिय सुग्घ भोगवेर, पूर्व पुण्य प्रसादोरे । पूरब पुरुप उजालीयारे, विनगया जश वादोरे ॥ राजा ॥ ६ ॥ एक दिवस लका धणी रे, बैठो परपदा माह रे । निमित्तियाने पूछोयरे निज आयुवल पाहै रे || राजा ॥ ७ ॥ ।। डाल क्षेपक तर्ज-गर्व मति कररे ।। एक दिन ' रावण महागना'. सोले सहश्र सामन्त ही ताजा, वाजता निशदिन ही वाहा, सभा की देख खूब त्यारी, दिल माही अहंकारी ।। मत्य व्रत पालो ।। २ ।। 'इन्द्रजीत' मेभ- वाहन' छाजे, पुत्र पौत्रादी अति गाजे, ऋद्धि व सुरपति पिण लाजे, पूण्यथी फते कीया काजा, वाजे नित मार्थ लक्ष बाजा ॥ सत्यवत पालो ॥ ३ ॥ 'विभीपण' कुम्भकर्ण भाई. मन्दोदरी राणी सुखदाई, चौपन सहत्व शास्त्र में गाई, जबरहै पूर्व पूण्याई, आंण है तीन खण्ड माही ।। सत्यत्रत पालो ॥ ४ ॥ स्वामीजी श्रीरामचन्दजी महाराज कृत. ढाल क्षेपक तर्ज-तुम चलो सखी कुछ जेज न करीये । सहा विद्यात्रीखण्ड को भुक्ता, "गवण" मन मे गम्भायो । सुर नर पाय पर सब मेरे. कुणमुजसे सांमे थायो ।। म. १॥ सरदेव तो तपे रसोई, चन्द्र आप दीपक थायो । वेमाता मुझ दले कोद्रया. यम गजा पाणी लायो || स० २॥ २ कौशल्या, ३ परपावे, ४ स्वबंधु तिलक । वण्यो - श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। (८७) कोई मोक्ष पधारया, स्वर्ग पधारया कोई, ए वंश वडेरो, चीश्व वदीतो जोई॥४३॥ 'अन्यरण्य' नरेसर, अयोध्या, राज, करतो अतिवर्ते, सारे प्रजाना काज ॥ ४४ ।। तेहना दो नन्दन, 'अनन्तरथ' अधिकाय, 'दशरथ' दिलदरियो, शोभा कहियन जाय ॥ ४५ ।। 'अन्यरण्य' नरेसर, खेचरसं मित्राई, सारे व्रत लेस्यां, आपण एह सगाई ।। ४६॥ सो 'सहश्रकिरण'१ नृप, 'रावण' साथे लड़ाई, लेईने हार्यों तब त लीधूं धाई ॥४७॥ 'अन्यरण्य' नरेशर. 'अनन्तरथ' सुतसाथ, संजमवत लीवू म्होटा मुनिवर हाथ ॥४८॥ 'विद्याधर' साथे, पाली बोली वाच, सो मुक्ती सिधाव्या, जगमें म्होटो साच ॥ ४९ ।। 'चउदशमी' भाखी, ढाल रसाल अपार, 'केशराज' रखाणे, साधु सदा सुखकार ।। ५० ॥ दोहा ( परजिया रागे) मास एकनो थापीयो, राजा दशरथ' राज || चन्द्रकला जिम दिन दिने. वाघे दलबल साज ॥१॥ शस्त्र शास्त्र आदेकरी, कला सकलनो जाण । विनय विवेक विचार में, पण्डित पणे प्रमाण ॥ २॥ यौवननी क्य पामीयो, शूरवीर झंझार । दाता भोत्ता अरु गुणी, वसुधा जश विस्तार ॥ ३॥ ।। ढाल पनरहवीं तर्ज-पांदूरी पोट लीया मा फोरे।। राजा दशरथ' दीपनोरे. दिन दिन तेज प्रतापरे । अंगधणी में एहनोरे, दीसे आपो आगे रे ॥ राजा ॥१॥ १ सहायु इति पाहातरे। mama . (८६) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । महापुर' चलि आयो, शुभ कर्म नो प्रेयों, सुभटे परधाने, आवीने नृपधेर्यो ॥ ३० ॥ तब दिव्यसूं पंचे, 'महानगर' नो राजा, सहु लोकां मान्यो, चाध्या अधिक दिवाजा ॥ ३१ ॥ तब पुरी 'अयोध्या' दूत मोकलीयो एक, सुत सेवा१ आवो. के तुम सहावो टेक ॥ ३२ ॥ सुतवात न माने, राजा दलबल साजे, सुत पण सामहियो, सन्मुख आय विराजे ॥ ३३ ॥ तब तात पूत दोय, लड़िया विविध प्रकारे, हार्यो तब नन्दन, जीत्यो तात ते वारे ॥३४ ।। विलखाणो देखी, राजा आंत तपाणी, खोले साइयो, पालक आपणो जाणी ॥ ३५ ॥ दोधू दोनों राज्य, राजा संग्न धारी, विचो महि मण्डल, पट्कायों हितकारी ॥ ३६॥ 'सिंहस्थ' राजानो, पुन श्री 'ब्रह्मरथ', 'चतुर्मुख' राना, 'हेमरथ' 'सत्यरथ' ।। ३७ ।। 'उदय' 'पृथु' राजा, 'वारीरथ' 'शरीरथ', 'आदित्यरथ राजा, 'मान्धाता' समरथ ।। ३८ ॥ नृप 'वीरसेन' जी, 'प्रत्युमन्यु' मानी तो, नृर 'पमनी', 'रविमन्यु' जाणीनो ॥ ३९ ॥ सबही मनभावे, 'वसन्त' तिलक नरेश, 'कुवरदत्तजी' नृप 'कुन्थू' 'शाम' विलेस ।। ४० ।। 'द्विरद' नृप नीको, 'सिंहदर्शन' दिलपाक, नृप 'हरिण्यकनुपुनी' जेहनी जगमे धाक ।। ४१ ।। 'पुंजस्थल' 'प्रोटो' कुकुत्स्थ' ने 'रघुराय', ए सूरजवंशी राजा सहु सुखदाय ॥ ४२ ॥ १वाबामां भावो।
~~~ श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। (८७) कोई मोक्ष पधारया, स्वर्ग पधारया कोई, ए वंश वडेरो, वीश्व वदीतो जोई ॥ ४३ ।। 'अन्यरण्य' नरेसर, अयोव्याने राज, करतो अतिवर्ते, सारे प्रजाना काज ॥४४॥ तेहना दो नन्दन, 'अनन्तरथ' अधिकाय, 'दशरथ' दिलदरियो, शोभा कहियन जाय ॥ ४५ ॥ 'अन्यरण्य' नरेसर, खेचरसू मित्राई, साथे व्रत लेस्यां, आपण एह सगाई ।। ४६ ।। सो 'सहश्रकिरण'१ नृप, 'रावण' साथे लड़ाई, लेईने हार्यो तब व्रत ली, धाई ॥ ४७ ।। 'अन्यरण्य' नरेशर, 'अनन्तरथ' सुतसाथ, संजमवत लीधू म्होटा मुनिवर हाथ ॥४८॥ 'विद्याधर' साणे, पाली बोली वाच, सो मुक्ती सिधाव्या, जगमें म्होटो साच ।। ४९ ।। 'चउदशमी' भाखी, दाल रसाल अपार, 'केशराज' यखाणे, साधु सदा सुखकार ॥ ५० ॥ दोहा (परजिया रागे) मास एकनो थापीयो, राजा दशरथ' राज ॥ चन्द्रकला जिम दिन दिने, वाघे दलबल साज ॥१॥ शस्त्र शास्त्र आदे करी, कला सकलनो जाण । विनय विवेक विचार में, पण्डित पणं प्रमाण ॥ २ ॥ यौचननी चय पामीयो, शूरवीर झंझार । दाता भोत्ता अरु गुणी, वसुधा जश विस्तार ॥ ३॥ ॥ ढाल पनरहवीं तर्ज-पांडूरी पोट लीया या मोगरे। राजा दशरथ' दीपतोरे. दिन दिन तेज प्रतारे। अंगधणी में एहनोरे, दीसे आपो आये रे ।। राजा ॥१॥ १ सापु इति पाठावरे।
- www (८) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । 'दर्भ स्थलपुर' जाणीवेरे, 'सुल्लोगल' निहां रायोरे । राणी नामे 'अमृतप्रभारे, राजाने सुख दायोरे । राजा ॥२॥ पुत्रीवर 'अपराजीताजी२', ईन्द्राणो अवतारोरे । व्याहै३ 'दशरथ' रायनेरे, ओछन करिया अपारोरे ॥ ३ ॥ 'सुशीला' त्रियनो पतीरे, मित्रसुभू४' भूपालोरे । 'सुमित्रा' पुत्रो परणावरे, 'दशरथ' ने सुविशालोरे ॥ राजा ४ ॥ सुप्रभा अति देहनीने, 'सुप्रभा' नस नामोरे । राजा रंगे परणावर, 'दशरथ' ने अभिरामोरे ॥ राजा ॥ ५ ॥ पंचेन्द्रिय सुख भोगवेरे, पूर्व पुण्य प्रसादोरे । पूग्य पुरुष उजालीयारे, विस्तरीया जश चादोरे ।। राजा ॥ ६॥ एक दिवस लङ्का धणो रे, बैठो परपदा माहै रे । निमित्तियाने पूछोयूरे. निज आयुबल प्राहै रे । राजा ।। ७ ॥ । डाल क्षेपक तर्ज-गर्व मति कररे ॥ एक दिन 'रावण महाराना'. सोले सहश्र सामन्त ही ताजा वाजता निशदिन ही बाजा, सभा की देख खूब त्यारी, चण्ये दिल माही अहंकारी ॥ मत्य व्रत पाली ॥ २ ॥ इन्द्रजीत' मेष वाहन' छाजे, पुत्र पौत्राटो अति गाजे, ऋद्धि सं सुरपति पिए लाजे, पृण्यथी फने कीया कामा, वाजे नित सार्ध लक्ष वाजा ।। सत्यवत पालो ॥ ३ ॥ विभीपण' कुम्भकर्ण भाई. मन्दोदरी गणी सुखदाई, चौपन सहत्व शाब में गाई. जबरहै पूर्व पूण्याई, आंण है तीन खण्ड मांही ।। मत्यत्रत पालो ॥ ४ ॥ न्यामीजी श्रीरामचन्दजी महाराज कृत. दाल क्षेपक तर्ज-तुम चलो सखी कुछ जेज न करीये । महश्र विद्यात्रीखण्ड को भुक्ता, "गवण" मन में गरभायो। मुर नर पाय परे मन मेरे, कुणमुजसे मांमे थायो ।। स. १॥ सग्देव नो त ग्मोई, चन्द्र आप दीपक थायो। बेमाना मुझ दले कोया, यमगजा पाणी लायो | स० २ ॥ । गन्धर, २ कौशल्या, ३ परणावे, ? स्ववधु तिलक । १ श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। (८६) नवग्रह खाट तले नित रहते, दुर्गा आरती उत्तरायो । पवनदेव नित महिल बुहारे. पार नहीं कोई पायो ।। स० ।। ३ ।। मो सरिसो तो विरलो होगो. नाम थकी जग थररायो। कुण मुज आज अड़े हुय सामो, किणरी मा अनमो खायो ।।स०४॥ अब मुज मनमें ऐसी आवे, चार सदा मुज एरेसी । केवलज्ञानी वातन छानी, पिण नैमित्तक केवे कीसी ।। स० ॥५॥ 'रावण' के मन ऐसी भासी, नैमित्तक तव बुलवायो। 'रामचन्द्र' कहै कोई गर्वन कीजो, गर्वन कोई ठहरायो ।।स०॥६॥ ॥ ढाल क्षेपक मुलगी तर्ज-गर्व मति कररे ।। हुवो नहीं होवेगा ऐसा, मुझसे झंग करे जैसा, सुरासुर सेवे हमेसां सुनकर सभा सकल पोले. नहीं जगमें प्रभुके तोले ॥सत्यव्रत पालो ॥ ५॥ तिहां इक नैमित्तिक बैठो, ज्ञान को जो रहे सेंठो, वचन यह सुनियो है धेठो । मुख से वचन नहीं भाखे, देख यह रीत भूप दाखे । सत्यव्रत॥ ६ ॥ पंडितजी ! क्यों न वचन वोलो, तुम्हारा ज्ञान ही तोलो, हीयाका भरम सभी खोलो ।। है कोई जगत बीच ऐसा. क मुझ को मार लेवे जैसा ॥ सत्यव्रत ॥ ७ ॥ विबुध कहै सुणीये महाराजा, गर्व क्या करीये दिल आजा, आज दिन पुण्य है ताजा, जिस दिन आयुखा आवे, दुनि सब यम घर • जाये ॥ सत्य व्रत पालो० ॥८॥ नं० डाल क्षेपक तर्ज-चौकरी-स्वामी श्री नथमल्लजी म. क्त्त- अहो नरवरजी, वचन विचारीने निजमुख चोलीये ।। सुनो हितधरजी, वान ज्ञान की पूछो नो हिव खोलीये ॥ टेर ।। हुवा अनन्त चलि अरिहन्त सारा, पिण आयु कर्म नहीं टारा॥ हुवा प्रभुजी शिरपुरना प्यारा ॥ अहो नम्वरजी ॥२॥ खट खण्ड में आज्ञा विस्तारे, सुरसहसगमे सेवा सारे ।। पिण आयु कर्म आगे हारे ।। अहो नरवरजी ॥२॥ सुर इन्द्रादिक दीपे भारी. नर नव विध भोगणी त्यारी ।। ,
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१०) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । - मुखमाने अमर पदवीधारी, पिण एक दिास परभव त्यारी ||३|| जे जोध जिके बलिया, पिण काल आगे सहुको कलिया ।। इण राव रंक सगला छलिया । अहो नरवरजी ॥ ४ ॥ इण कारण प्रभुने आखू डूं, अन्तर कपट न राखू छु । जिम ज्ञानमें तिमही दाखू छु || अहो नवरवरजी ॥ ५ ॥ ।। ढाल क्षेपक मूलगी॥ 'अयोध्या' नगरी है जहारी, राय तिहां 'दसरथ ' सुखकारी. 'कौशल्या, 'सुमित्रा ' नारी ।। कूखतसु उतपत धारेगा, भूपत! सो तुझ मारेगा ।। सत्य व्रत पालो ॥ ९ ॥ 'जानकी ' स्वयम्बर त्यारी, सारङ्ग वो धनुप है भारी, विद्याधर मानळू मारी ॥ युगल ही धनुप चढावेगा ॥ भूपत ! सो तुझ मारेगा ।। सत्य० ॥१०|| 'बज्रकीर्ण ' राजा सोहावे, 'सिहोदर ' पास फत्ते पावे. भर्त का संकट मिटावावे ॥ दण्डकी वन में आवेगा, क भूपत ! सो तुझ मागेगा ।। सत्य० ॥ ११ ॥ ' संवुक' विद्या ही साधे, चन्द्रहास्य खडग आगधे, लिछमन जिस दिन ही लाधे ।। उसीका स्कन्ध चिदारेगा, क नरपत ! सो तुझ मारेगा ।सत्य० ॥१२॥ 'दुःखर' खर' 'तिखर ' ही भाई, विद्याधर चउदमहश्र घाई, विजय निज मुनते उपनाई, विध 'कू राज दिगवेगा ।। क नरपत ! मो तुज मारंगा ॥ सत्य० ॥ १३ ॥ 'सुग्रीव' को न्यायही करसी, विविध विध भूपन सूं लग्मी, अड़े सो जमगृह कू वग्मी, खण्ड त्रय आण मनावेगा | क नरपत ! सो तुज मारेगा ।सत्य०॥१४॥ हमी में गङ्गा मति आणो. ' राम । अरु 'जानकी' जाणो, 'जनक' की पुत्री गुण खांणी ॥ लिछमन 'के हाथ है मरणो, नहीं है हरि . को गणो ॥ सत्य० ।। १५ ।। वात सुन सभा मवे गड़ी, विबुध की वाणी है वकी, केवली वचन निःमंकी | भूप कई काणो अब कांई, विबुध कई टले नहीं आई ।। सत्य० ॥१६॥ गय कई भावी बल टालो, ऐसा कोई उपाय नीकालो, हुवे जिम श्री जेन पद रामायण प्रथम खण्ड । (६१) जगमें उजवालो ॥ विबुध कहै टले नहीं आई, जचीसो प्रभुने दरसाई ॥ सत्य० ॥ १७ ॥ “रत्नसेन' पुत्र आनन्दा, 'रत्नदत्त पुनिम के चंदा, 'चन्द्रावती' व्याव सुखकन्दा, लगनदिन सत्तरमो जाणो, टलेतो चांछित फल प णो । सत्य० ॥ १८ ॥ राय कहै नाम ठाम दाखो, उन्हींकी उनपत सहु भाखो, बात यह दिलमां मत राखो ॥ तसल्ली सब के दिल आवे, मेरा जो मरणा टलजावे । सत्य० ॥ १९ ॥ (स्वामी श्री नथमलजी म. विरचितम्) अथ रत्नदत्त व्याख्यानक कथ्यते (क्षेपक मिदंच) || ढाल पहली तर्ज-परभव की खरची लेलो ।। विवुध कहै सुणजो समाचार. टरे नहीं कोई होवनहार ।। टेर ।। वारु विशाल नगा अति वारु. 'रत्नसेन' नृप अधिक उदार वि०॥ पीतवनी उर नन्दन ऊपज्यो. 'रत्नदत्त' कुंवर सिरदार ॥विवुधार।। विद्यापढ यौवन वय पायो. आयो इक दिन सभा मजाराविबुधा।३।। देख आकृति सब जन मोद्या. नृप कहै शादृश जोवो नार । वि०॥४ 'मतिमार' मंत्री तच चाल्यो, चित्रपटले बहु परीवार ।। विबुध ।।५।। देश प्रदेश विदेश भग्यो अति. नहीं दीठी कुंवर उनिहार विगा। गङ्गा तट इक सरवर दीठो, मीठो अम्लू वृक्ष अपार ॥ विबुध ॥७॥ डेरो दीधो भोजन कीधो, जल भरिवा अपच्छर उनिहार चि०१८॥ कन्या दीठी लागे मीठी. आडो फिरियो आय तिवार ॥ वि०॥९॥ सामाग्वे कारण मुज दासो, आमो नाम गाम नृप मागावि०॥१०॥ सा कहै 'चन्द्रस्थल' पुाजाणो. 'चन्द्रसेन्य' नृप मौम्य दीदार ११ पांचसयां पदमण अनि सोहै, 'चन्द्रलेखा' नामे पटनार वि०१२। रूपे रुड़ी सोवन चूड़ी, चन्द्रावती तस उर अवतार । विबुध १३ । ना इन्द्राणी ना अप्सरा है, तमु गुणको नचि पावे पार विध१४॥ हनी दासी, उपवानी. ए जलसा पीवे सुखकार ।विध १५॥ जो तुम आखी सोमै भाषी, सांभल मंत्री हुवो हंसीयार। विधुध१६।
(१२) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । से दोहा-कारज सरसी माहरो, इणमें मीन न मेख । चाली आयो उतावलो, नृप भेटण सुविशेष ॥१॥ अति आदर अवनीपती, घे मन्त्रोने ताम | कन्या सज श्रृंगार अति, मेली मां अभिराम ||२|| अवनीपति के अङ्क में, बैठी कन्या सोय । इण सदृश जो वर मिले, तो मुज वंछित होय ॥३॥ डाल दूजी तर्ज-प्रभुजीने गावो रङ्गसं (महाराजाजी हथणापुर मति जावजो) मन्त्री भाखेरे, किंन कारन इहां आवीया, मंत्री निवसो कुण देश, राजिन्द पूछेरे वात कहो मुज मांडने । टेर ॥ मंत्री • देश देखण ने नीसरयो, मंत्री० पुर २ भम्यो अशेस ॥ रा० ॥ ॥ इत चल आयारे, चरण भेटीया आपग मत्री० आज सफल अव- तार हुवो म्हारोरं अवनीपति तुम सांभलो ।। टेर । इलपति आखे रे, 'इचरज' वातको दाखवो. मन्त्री० इचरज नो नविपार || मंत्री ॥ २॥ भूपति पभणेरे, पुरुष रूप कोई अभिनवो. कित ही देख्यो रे, केन्या वर मुज चाय. मन्त्री० रत्नाकीर्ण वसुंधरा. मन्त्री० कहतां पार न पाय ।। मंत्री० ॥ ३ ॥ मन्त्री भाखेरे, पिण अद्- भुत उक दाखवू सुणजो सारारे, रत्नसेन सुत जान ।। मोहनगारारे सुरगुरु सम विद्याविपे, सब जन प्यारारे, शूरवीर सुविधान !| मंत्री ॥ ४॥ रत्नदत्तरे, रूपे काम कुंवर जिसो, प्रितवती नन्दनरे, दाता मोहन वेल || मन्त्री० एक जीभथी किम कहूं, मंत्री चित्रनो जोवो खेल ।। मंत्री० ॥ ५ ॥ चित्र अति नीकोरे, देख कन्या निश्चय कीयो, ओ नर तीकोरे, इण भव यो भरतार मो मन वसी योरे, नृप कह फिर में पूछ, राजा भावेरे, हिव जावो इन बार । मंत्री० ॥ ६॥ पितुपय लागीरे, कन्या गई निज महल में, प्रीती जागीरे, चित्त में कुंवर ध्यान, मं० खान पान निन्द्रा तजी, मं० विरह जग्यो असमान ॥ मं० ॥ ७॥ मखि पूछेरे, कवण ध्यान के तागे, स० तिलकावती तिणवार स० पात को सब
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श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (६३)
मांडने ॥ टेर। मखि० माकिनी ग्राहित नी परे, स० के कोई
नसामजार, स० ॥ ८॥ कन्या भाखेरे, ना कोई साकिनी मुज-
ग्रही, कन्या० ना कोई अवर प्रकार ॥ कन्या-रत्नदत्त गुण सांभली
क. निश्चय लीयो धार |म० ॥९॥क० मोहन मुजने नवि-
मिले, क० पट्मासा के माय । क. तो नन होमं आगमें, क०
अवर नहीं मुज चाय ।। क० ॥१०॥
दोहा-तिलक वती तिण अवसर, कही मायने जाय ।
गणी सुण ते रायने. शीघ्र ही दीयो जताय ॥१॥
स्वयम्बर है मांडतो. मुज मन हंनी चाय ।
कन्या मन जोए रुच्यो, तो देसू परणाय ||२||
तत् क्षिण लेडी मन्त्रीने, पूछे भूप तिहार ।
कुंवर के कितनी कामनी, भाखो सकल विचार ॥३॥
मन्त्री कहै महिपति सुनो, अबहु न परणी कोय ।
बहु नृप चाहे व्याववा, शाश मिलिया जोय ॥४॥
। हाल तीजी तर्ज-लावणी-खवर नहीं है जग मे पलकी।
मन्त्री वचन सुणी वसुधापति, मनमें हर्षायो, नेरथा गणिक भणी
तिणवार, लगननणी चायो । सुणो सहु होणहार भाईरे, ? सुणो.
छल बल कोई कोड करो तो टले नहीं आई ।। टेर ।। अगणित
द्रव्यधरी मुस आगे लगन शुद्ध कहीये, ते कई दिन सतरमो
जाणो, आगे नही लहीये । सुणो।। २॥ जो ए टलेतो वर्ष युगल
में, नहीं लगन आवे, भूप कहे भूमी है केती, शतयोजन थावे ।।
सुणो ॥३॥ भूप कहै मंत्री ! किम वणसी, सो कह तिणवारो।।
घड़ी योजन मुज सांड चले है, मति को विचारो ।। नुणो ॥ ४ ॥
लेकर चित्र मंत्री तर चाल्यो, आय कही सारी, चित्र देख हरम्या
सहु कोई. वाहा वाहा युदि धारी । सुणो॥५॥ दोन घरां उन्चार
मंज्यो अति, अदभुत निणारी. इन्द्रादि आय मिले तो भाचिरल
टले नहीं टारी ॥ सुणो ॥६॥
N (६४) श्री जन पद रामायण प्रथम खण्ड । दोहा-राणा ' रावण । जी तदा, पण्डित धरियो मांय ॥ निशाचर ने बुलायने, कहै 'चन्द्रस्थल' पुर जाय ॥ १ ॥ लावो वाला मुजकने, ढील न करणी रञ्च ।। रङ्गभुवन सखिवृन्द में, बैठी दीठी सञ्च ॥२॥ तक्षिण ग्रही तसु चालीयो, सहु करे हाहाकार ।। पिण कछु जोर चाले नहीं, न टले होवनहार ॥३॥ पृढे सहु आक्रन्द करे, मुंपी नृपने आय ।। 'तीमङ्गला' बुलायने, समुद्र तटे तूं जाय ।। ४ ।। यतन करीने राखजे. जय सतरादिन होय ।। सूंपे ज्यो मुजन सही, पिण अवर अचिन्त्यो होय ॥ ५ ॥ पेटीधर मुखमें तदा. चाली देवी ताम || गङ्गा सागर संग में. आवी बैंठी आम ॥ ६ ॥ || ढाल चौथी तर्ज-योगी रामारी॥ 'वक्षनाग ने ताम बोलावे, वार विशाल ही जायो, 'गन्नदत्त' ने डंक देईने, पहिला पाछा आयो ।। १ ।। गवण ' हुकमें अर्द्ध निशामें, रङ्ग महिल में आवे, कुंवर सेजाए मुखमां सुतो, डक देई ने सिधावे ॥२॥ आय 'गवण ने मगली दाग्बी, दगस्कंधर हरखावे, किम ए व्याव हमी ए एहनो, पिण भावी प्रबल कहावे ॥ ३ ॥ प्रान हुवा नृप खबर लही है, जहर व्याप्त तन देखे । गे नन्दन मुज कुल भूपण, एह अवस्था देखे ॥ ४ ॥ मंत्री परमुख गामही तेच्या, कीया विविध उपचार । यंत्र मंत्र ओषध नवि लाग, मह करे हाहाकार ॥ ५ ॥ पुत्र वियोगे राजा गणी, नेत्र भगजल नांग्वे । योतिष जोई नैमिनिक भाख. मण्यों नहीं इमभाखे ॥६॥ आज तो उपचार न लागे, गङ्गाजल में बुहात्रो। - -
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Ans wwwwwwwwwwwwwwww (१६) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । हो लाल ॥ ४ ॥ उभय परम सुख पाय, साजन, वंछित करी ने भोग आनन्द अति मानीयो हो लाल || पेठा पेटी मांय, साजन, आडा सूती है वाल सफल दिन जानीयो हो लाल ॥ ५ ॥ इतरे आई तेह, साजन, साद करन्तां कन्या बोली है तदा हो लाल ॥ हूं मृती निज ठौर, साजन, सुन देवो मनमांही सुख माने मुदा हो लाल ॥६॥संध्याये मूरी सार, साजन, चाली पेटी लेय पूछे दवी इणपरे हो लाल ।। वजन वध्यो किण काम, साजन, कन्या तव मृदु वेन क मुखथी ऊचरे हो लाल ॥ ७॥ खाया फलने फूल साजन, पीधोजल लागो पवन अमारे तन तणे हो लाल || आप ग्रही बहु वार, साजन. इण कारण सूं भारी लागे आपने हो लाल ॥ ८॥ दोहा-{पीसा 'रावण' भणी, आप गई निजधाम || पोहरो राख्यो रातरा, प्रात उदय रविताम ।। १ ।। सभा सबल भारी जुड़ी. मिलीया राणो राण ।। राय कहै सवही सुणो. अवमर मिलीयो आंण ॥२॥ सतरादिन पूग हुवा, नहीं हुवो ए व्याव ।। नैमित्तिकने तेडने. भाखे नृप उच्छाह || ३ ॥ जोवो ज्ञान तुम्हारडो, भावी टली के नाय || श्रोता एक चित्त मामलो, वदे नैमित्तिक वाय ॥ ४ । ॥ ढाल छठी तर्ज-हांक मतिकर गर्व दिवाना ।। हां कहै इम योनिपनाणी, सुणो प्रभु ए म्हारी वाणी. टलेन होवन हार कयो इम केवल नाणी रे । टेर || तीर्थकर चक्री महाराया. होणहार आगे घवगया, सम्भुमचक्री जल डबकाया, एसी भावी जान आन दिल भाख्यो ज्ञानीरे ॥ कहै ॥१॥ व्याव हुवो है दिन मतरमे. क्या जो दर्पण में कर में, बोलो पई निकसे भरम, देखे मगलो लोक थोक ओ मिलीयो आनी || फहै ॥ २ ॥ नैमित्तिक ए कैसे बोल, वक्षिण नृप पईने खोले, कुंवर सूतो कन्या के NAGALAN. - . श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। (६७) ओले. चिन्ने रावण राय वाय ए सुपने न जानीरे ॥ कहैं ॥ ३ ॥ विवुध कहै चवडे देखायो, सत्र ही जन को भर्म मिटायो, कन्या कुंवर वाहिर दिखलावो, देखे सगला लोक बात ए सत्य पीछानी रे ॥ कहै ॥ ४ ॥ राम कहै भावी वल भारी, टले नहीं है होवन हारी, नैमित्तिक ने रीजदी सारी, खेचर सामे देय मेल्या उभय निज २ थानी रे ॥ कहै ॥५॥ 'नथमल' कहै सुनजो सब भाई, नैमित्तिक ने कथा सुणाई, रामायण में हर्ष धर गाई, देसी गुरु मुखधार गायां रीजे बहुप्रानी रे ॥ कहै ॥ ६ ॥ || इति रत्नदत्त कथानकं समाप्तम् ।। -ढाल मुलगी- कहै हूँ मरिस आपथी रे, के कोई मारण हारो रे ? इन्द्रादिक सुर ना रहै रे, माणसनो शो भारो रे ॥राजा दशरथवा पण्डित प्रगट पणे भणे रे, सीता हैते विनाशो रे । 'दशरथ' सुत थी थायसे रे, लोक करे तव हांसो रे ॥राजा ।।९।। चिभीपण वलियो कहै रे, झूठो पांडू जाणो रे । 'दशरथ' 'जनक' विनामतारे. विबुध वचन अप्रमाणोरे राजा १० उत्पति वीज विना नहीं रे, 'रावण' कडे ए रुडू रे । भरोसो भाई तणो रे. कदी ही न कहै कूड रे ॥ राजा ॥ ११ ॥ 'नारद' बैठो थो तिहां रे, करवाने ऊपगारो रे । राजा 'दशरथ' आगले रे, भाखे एह विचारो रे ।। राजा ।। १२ । मिथुला नगरी एजई रे. 'जनक ने रे' जणावेरे. जाणी स्वामी साचलीरे, मति अशाता पावरे । राजा० ॥१३ ।। एहिज भोलामण रायजी रे, मंत्रीधरने दीजेरे. दोई पादेशे नीकल्यारे, जाणे जिमतिम जीजेरे ॥ राजा० ॥१४॥ मूर्ति दोई रायनीरे, लेपमयी तय कीओरे. 'विभीपण ' भरमायवारे, एह उपाव ठवीजेरे । राजा० ॥१५॥ रात अंधारे आवीयोरे. 'विभीषण विकरालोरे. मूर्ति मस्तक छपरे, कोप्यो जापे कालोरे । राजा० ॥ १६॥ कलफल शब्द हुचो घणोरे. सुभट सही पाईरे, monrn -AMAN (१००) श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । 'केशराज' नन्दन नीको रे. नीको नात कहायो रे ॥राजा॥३८॥ दोहा ( कान्हडा रागे) ब्रह्मलोक थकी चवी, महर्धिक सुर सार ।। मान सरोवर हंसलो, उदरे लीयो अवतार ।। १ ।। सुख में सूती सुन्दरी, सुन्दर सेज मजार ।। गणीजी 'अपराजिता' सुपन विलोक्या चार ।। २ ।। सात हाथ ऊंचो सही, लांब पणे नव हाथ ।। चौड पणे कर तीन जी, करी करणीनो नाथ ॥ ३॥ केसरी कटी क्षीणोदरो, पञ्च मुखे प्रवेश ।। करन्तो दीठो मध्ये. राणी ए हर्प विशेप ॥ ४ ॥ नायक तो ग्रह गणतणो, रोहणी नो भरतार ।। ऊतरथो आकाशथी, चन्द्रमहा सुखकार ।। ५॥ ऊगन्तो अति रातड़ो, नहीं बापड़ो लगार ।। सूर्य सहश्र किरणे करी, पावे शोभा अपार ।। ६ ।। राय जगाची वीनवे, ईश सुणो अरदास ।। एह सुपन नं फल कहो, जिम पोहोंचे मन आश ॥ ७॥ पियु परम सुख पाय के, भाखे सुपन विचार ।। पुत्रपनोतो प्रसव से सहु जगनो आधार ।। ८ ।। गर्भ दोप सह टालतां, पोस करन्तां मार ।। शुभ वेला सुत जाइयो, वां जय जय कार ।। ९ ।। || ढाल सोलहवीं तर्ज-अव त धीरो रे ।। शुभ वेला शुभ वार कुंवर जायो रे ॥ हर्ष वधायो मंगल गायो. सब जगनेरे सुहायो ।।कुंवरजायो।।१॥ नगर उंटायो, जल सिंचवायो, कुमुमाषन वरसायो रे ।। चौक पुरायो, कलश वधायो, इन्द्र तमासे आयो ।। कुंवरजायो।।२।। लोक मिलायो, टोल बजायो, गुहिर निशान गुहिरायोरे ।। आनन्द पायो सब मन भायो. ओच्छव अति मंडायो ॥ कुंवर॥३॥ १ V . श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड । (१०१) रमणी आवे. केली रचावे, कुंकुम हाथ देवरावे रे ।। रास रमावे पात्र नचावे, उचित अधिक उपावे ॥ कुंवर० ॥ ४ ॥ घर घर पारे तोरण रचना, नारी अखाणू लावे रे ॥ दुर्वा पुष्प फलादिक आणी, मंगलाचार करावे ॥ कुंवर० ॥५॥ 'चिन्तामणि' सुरतरु जिम राजा, दाने दारिद्र निवारे रे ।। याचक नाम अयाचक कीधां. सुजश हुवो जग सारे ।। कुंवर०॥६॥ पदमनोरं निवास तेहथी, 'पझ' दी, नस नामोरे ।। सहु जगने अभिराम पणाथी, वीजं नामज 'रामो' ।। कुंवर० ॥७॥ गज१,हरि२,रवि३,शशिष्ट,अग्नी५,जलकमला६,सायर,सुपनां सातोरे। देखी 'सुमित्रा' स्वामी आगे, आची कहै ए वातो ।। कुंवर० ॥८॥ देवलोक थकी चचि आव्यो, उत्तम जीव अपारोरे ।। राणी उदरं निवास कीयोरे, हयाँ सहु परिवारो ॥ कुंवर० ॥९॥ श्यामवर्ण सुत जायो सुन्दर, राजा मन उत्साहोरे ।। ओच्छव विविध प्रकार करीने. लीयो लच्छी लाहो।कुंवर०॥१०॥ दश दिवसनो ओछ्य कीधो, छोड्या वंदी वानोरे ॥ उत्तमपुरुष ऊपजीयाथी. सहुने होय कल्याणो ।। कुंवर० ॥११ ।। 'नारायण' तसु नाम दीयोरे. 'लक्ष्मण' अपर विधानोरे ।। सुरतरु कंद तणीपरे दोर्ड, वाधे पुरुप प्रधानो ।। कुंवर० ॥ १२ ॥ अनुक्रम चीर विशेप विशेगे. मोह घणेगे पोखेरे। नीलाम्पर पीताम्बर पहीरे, साननीया संनोखे ।। कुंवर० ।। १३ ॥ आचारज साखे करी सीख्या. मकल कला गुण तेहोरे ॥ जाण पणे ते सुरगुरु मारीसा. प्रत्यक्ष दीसे एहो । कुंवर०॥ १४ ॥ लीला मुष्टि प्रहार करावे, पर्वत नांव गरे । शूग्वीर माहसिक मांही. पाये कीनि पूर्णरे ॥ बर० ॥ १५॥ पीड़ा कारण धनुप्य ग्रहीने. जर जर पूंचे वाणोरे ।। सूरज शङ्कधरीने शंके. पाड़ेमनि रे विमाणोरे ॥ कुंवरः ॥१६॥ कांइक सुजपल गय विचाग्यो. कांइक उन यल जाणी रे ॥ . है (१०४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खएछ । 'पुष्पवती' अभिधानो१, सुखमाणे मेरु समाणो । सुण ३ ॥ 'सरसा' पिण संयम लेवी, बीजे सुरलोके देवी ।। होई ने माने साता, सुख मांहै वासर२ जाता || सुण ४ ॥ 'अनुभूतिज' आरती करतो, नारीनं अति दुःख धरतो ।। भवमांही भमतो होई, हंस बालक हुवो सोई । सुण ॥ ५ ॥ सिंचाणे साही नडीयो, ऋपि आगल आधी पडीयो । ऋपिजीए दीधो नवकारो लीधो किन्नरनो अवतारो सुण०॥६॥ दश सहश्र वरपनो आयो, भोगवतो पुण्य प्रभायो । मो देव चवोने आवे, बदलो लेवे सुख पावे ।। सुण० ॥ ७ ॥ विदग्ध नगर के वारु, गजा छे अधिक उदारु ।। 'प्रकाशसिंह' नरनाहो 'प्रवगा रेवतीनो नाहो । सुण० ॥ ८॥ सहु साजनने रे सुहायो. 'कुण्डल मण्डित' सुतजायो । सुत सुन्दर अधिक मलूणो. सुततेज प्रतापे दुणो ॥ सुण० ।। ९ ॥ 'कयान' भवमा भमतो, सो वादि जमारो गमतो || नारी 'चक्रपुर' राजे, 'चक्रध्वज' राज विराजे ॥ सुण० ॥ १० ॥ 'धूमसेन' पुरोहित४ तेहने, 'स्वाहा' रमणी छे जेहने । जायो तिहां 'पिंगल' नन्दो, उपज्यो मा-मन आणन्दो। सुण । ११ । 'अतिसुन्दरी' चैटी गजानी, खप करती अति विद्यानी ॥ श्री आचारिजजी पासे. 'पिंगल' पण पढे उल्लासे ॥ सुण० ॥ १२॥ तवतो बंधाणो नेहो. 'पिंगल' ने कुँवरी तेहो ॥ संगनी विणसे कामो, एमजोजो बहुलाठामो ।। सुण० ॥ १३ ॥ कुँवरी ने लेई नाठो, ओ नामणी ओ अति धाठो५ ।। 'विदग्ध' नगर चलि आयो वसवानोमन ठहरायो | सुण० ॥२४॥ कसब न कोई जाणे, तृण लाकडी मूली आणे ॥ जिमतिमतो पंट भरेवो, विण कसबन एम करेवो । सुण० ॥ १५॥ एकमब नणी अधिकाई, निजपुर में लहरे वडाई ।। ५ नाम । २ दिन । ३ श्रायुष्य । ४ फुलगोर । ५ धीठो कठण हीयाने धीट ! ६ कामी (कला) - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१०५) ए कसब कलाए दीठो, शशि१ रुद्र तणेशिर बैठो। सुण ॥१६॥ 'अति सुन्दरी' सुन्दरता ए, नृप सुतने कोन वताए । सा लीधी तेणे छिनाई, पिंगल रहियो मुख वाई ॥ सुण० ॥ १७॥ भय वाप तणो अनि आणी, पर्वत में पल्ली ठाणी ॥ 'कुण्डलाण्डित' तिहां वसीयो, सुख दुःख न देखे रसीयो । सुण.।१८१ नारीनो आणी वियोग. "पिंगल' तर लीधो योग । चित्तथी नवि छूटे नारी. घाटी ए म्होटी भारी ॥ सुण० ॥ १९ ॥ 'दशरथ' नो देश विणा से 'कुण्डलमण्डित' जन त्रासे ।। नव 'बालचन्द्र' चहि आयो, वांधी नृप पासे लायो ।। सुण० ।।२०।। नब दीनपणं नम देखी, करुणा नृप ने सुविशेपी । छोडी दीधो तिण वारो. 'कुण्डलमण्डित' सुकुमारो। सुण० ॥२१॥ ते वाप-राज्य ने काजे, कुंवरजी रहै नीति साजे ॥ 'मुनिचंद्र' ऋषीश्वर संगे, हुवो श्रावक अति उच्छरंगे।।सुण.॥२२॥ राज्य-वांछाना मांही, तस प्राणज छूट्या प्राही ॥ जनकर घरे अवतारो, निसुणोर 'सीता' मुविचारो।। सुण० ॥२३॥ 'सरसा३' पण भव में भमती, साफिरे इच्छाए रमती ॥ होई पुरोहितनी कुंवारी, सा पढवे गुणवे सुभारी ॥ सुण० ॥२४॥ वेगवतीरे कहाणी, सुन्दर रूप सयाणी ।। मुनि भाल देई दुःख पायो. ते सुणज्यो चित्त न्यायो। सुण० ॥२५॥ दोहा क्षेपक- पाप अठारे जिनकया, करो मति भवी जीव ।। कीयांथी दुःख पाहुया, नरकां खाये रीव ॥ १ ॥ हिंसा अठ चौरी अवम्भ, ममता घणी विशेष ॥ क्रोधमान माया लोभ, बले गग ने दोप ॥ २ ॥ १ जनक राजाके यहां भामरल पुन पणे पेदा हुवा। ये मीनानो वीचार सांभलो। ३ सरमा जे ईशान देवलोपमा देयो धनी ते त्यांधी चयी घणा भवकरी धेगपती नामे अपनीन्यांची दीला लई मका लोकमां लई त्यांधी चवी जनक राजानी स्त्री 'विदेहा'ने पेटे प्रयतरी। . ।
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--------- N श्री जैन पद रामायण प्रथम खण्ड। (१०६ ) देखाव्या वसुधाविखरे, राजा राज कुंवार । सारिखो संसारमेरे, कोईयन एक लगार ॥ सीता ३ ॥ अर्धववरदेशनारे, अंतरंग" तसनाम, म्लेछ महामयमंतछेरे, देश उजाड़े ताम ।। सीता ।। ४ ।। जनक नपोंचेतेहनेरे, दृतमोकलेएक, राजा दशरथ पाखतीरे, वोले आणी विवेक ।। सीता ॥ ५ ॥ सूर्य स्हामू देखीयेरे, आवे छींक जेवार । भीडाणो छे भूपतीरे, आगे देव विचार ।। सीता ॥ ६॥ ऊख्यो अति आतुर थई रे, वाज्या ढोल दुमाम । असवारी करवा भणी रे, ताम सूं बोले 'राम' || सीता ॥ ७ ॥ तुमे पधारो छो सही रे, शूरां मूं संग्राम | अमने घर वैसी रह्या रे, कीसी वध से१ माम ।। सीता ॥ ८ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-ख्याल की मन्त्री श्री चोधमल्लजी म० कृत क्यों ? आप पधारो, हुकम करो तो जावू जुद्ध में ।। टेर ।। भेडां ऊपर जायतां सरे. आछा न लागो आप । अर्ज करू इण कारणे सरे, वग्मो आजा बापजी ।। क्यों ॥१॥ नाजुक देह लघु वय थारी. जिण मं मेंही जावों। जनक केसी टाबर ने मेल्या. इण में थे गम खावोजी क्यों २॥ 'रामचन्द्र' कह सुनो पिताजी. 'लछमन' लेऊ साथ । 'जनक' गयरी मदत में सरे. जाय दिखाऊं हाथजी ।। क्यों ३ ॥ म्हारी तर्फ रो राजा ? मनमें. जग मोच मत लावो । जावां वेगा जुद्ध में मरे, झट आजा वगमावोजी ॥ क्यों ॥४॥ लेई फौजने पद्म पधारो, जुद्ध करनके नाई ।। नवा शहम्मे 'चोधमा कहै. 'नाथ' गुरु सुपमाईजीनायो।।५।। टालमूलगी अनु१ शाने आगे करीरे, चाल्या 'राम' नरेश। चतुरंगिणी सैन्या नजीरे, 'मिथीला' पुरीय प्रवेगा ।। सीता ॥ ९॥ १ होस प्रोत अथवा शम।
(११०) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ढाल क्षेपक तर्ज-खडका स्वामी श्री नथमल्लजी म० कृत. 'दशरथ' नृपनो हुकमलेईचढे, 'राम' सु 'लिछमन' चीर शूरा ॥ हयगय रथ पायक दलसंचर्यो, सुभट ताजा लीया मानीपूरा ।। चढ्या श्री 'राम' 'लिछमन', अरिजीतवा, टेर।।१॥ मारग अनड नमावता जावता, जनक मिथीलापुरी आय मिलीया। जनक सैन्या लेई साथ हुवो तदा, असुर लड्या भणी शीघ्र चलिया || च. ॥२॥ म्लेछ मदमस्त अति पुछ गर्भितरहै, राम, दल देखीने सजथावे ।। वाजो ऋणतूर नो सांमली शूरमा, केईगज अश्व स्थबैठआवे ॥ च, ॥ ३ ॥ शस्त्र वारा चले कोई पालालडे. माचीयो शोर सं ग्रामभारी || केई धरणीढले, केईपाछापड़े. लेय मुखत्रण केई जाय हारी ॥ च, ॥४॥ ढाल मूलगी- असुरशुं आवीअड्यारे, सुभट जीके झंझार । उठावरणी असुरांतणीरे, सही नसक्या इक बार ।। सीता ॥ १० ॥ धनुष्य चढावी रामजीरे, करतो उठावणीआप । असुर महुअलगाथयारे. धर्मथकीजिमपाप ।। सीता ॥ ११ ॥ 'जनक' तणा जनपद तणोरे, टल्यो सयल४ कलेश | गजाजी सुखपामीयारे, रंग विनोद विशेप || सीता ॥ १२ ॥ 'सीता' दीधी गमनेरे. मारिखो संयोग । भलु २ भाखे घणूरे हर्प मघला लोग || मीता ।। १३ ।। सीता रूप सोहाम'रे. निसुगीने सुरदेव । निग्वण हेनेआधीया. सीताघरे ततखेव ।। मीता ॥ १४ ॥ केश नेत्र पीला खगरे, तूम्बीउत्रिकाधार । दण्ड पाणी को५ पीन मरे, शिम्ही शिश्ग्वा सुविचार ।। सीता।। १५॥ टाल नेपक तर्जा ख्यालकी स्वामी श्री नथमल्लजी कृत. एक दिवम म्हेलमें नारद' देवणने आयो जानकी । टेर ॥ मीता मुन्दगतिण ममेंमरे. बैठी म्हैल मझार, दपंग आगे गोमतोसरे, प्रतिविम्ब परयो निणवारजी ॥ टेर ।। १ ।। याज्ञा-रजा । २ युद्ध ३ देश। ४ सवलो। ५लंगोटी। ६ चोटी। ।
F4 ॥ ( ११२) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ढाल मूलगी मिथिला नगरी छे भली रे, 'जनक' तिहां भूपाल । 'विदेहा' उदरे ऊपनी रे, 'सीता' रूप रसाल ।। सीता ।।२२।। अमरी? कुंवरी नागनी रे, मैं दीठी अवि लोय । वारम्बार विचारतां रे, 'सीता' सम नहीं कोय ।। सीता ॥२३॥ जेहवी छ सा सुन्दरी रे, तेहवी लखि न जाय । लखि नैसी कही को सकेरे, अचरज है खग राय ॥ सी ॥२४॥ 'भामण्डल' ने भामिनी रे, जइरे मिले इक जोड । साचू सुख संसारनंरे, म्हारे मन ए कोड ।। सीता ॥ २५ ॥ ढाल क्षेपक पूर्ववत् महाराजाजी हम जोगी जंगल फिरां महा० नहीं नारी में ध्यान. महा. तो घर आवे या कामनी महा० होवे परम कल्याण, म० नारदजी ॥ २ ॥ महा० दीधी 'दशरथ नन्दने, म० इसडी सुणी में वात. म० शक्ती हुवे जो आपरी, म० तो तुमे घालजो हाथ । म० ॥ नारदजी ॥ ३॥ ढाल मृलगी मुत वचने संतोपोयो रे, भलू करे करतार । विमर्जीयो ऋपि राजीयो रे, उघमनो अधिकार ॥ सीता ।।२६।। खगर 'चपलगति' मोकल्यो रे, करवाने अपहार । दोहा क्षेपक नभचर३ उड्यो आकाश में, ऊतरयो मिथीला माय । कीयो रूप हयको सही, कांहूं धोरज नांय ।। १ ।। लोक मिली मदु जनकपे, कीधी ए अग्दाम । अश्व मण्डयो घोकल शवद, करे मवन को नाश ॥ २ ॥ मोग्ठा-गजा गज अमवार, आयो दयने पकडवा । कपट नणो बदुपार. कसे पावे आदमी ॥ १ ॥ १ देवी । २ आकाश में उड़ने वाला। ३ नभ श्राकाश-चर-यानी फिरने -- वाला।
wwe श्री जैन पद गमायण द्वितीय खण्ड । (११३) -सवैयो- देखो भूलोक में न भूम को चलणहार | ऐसो हय ताजी वाजी नट जो करतू है ।। तातो है तुरङ्ग रङ्ग शोभित अनेक अङ्ग । वाजिन मृदङ्ग खुर मनकू, हरतू है ।। वण्यो है श्रृंगार जिम जडित जडाव जड्यो । जाकी अति शोभा दीसे ऊजलू भरतू है ।। ऐसो हय छूटो रवि रथ केण गाव सेती । असो एह चंचल महा चपल पवंग है ।।१।। -अडियल छन्द-- हय ऊपर तिणवार मुकुट शिर भूपरे, होय गयो असवार, रायते ऊपरे, हय ले चल्यो आकाश. वाम तिहां जनक को, आय मुंक्यो नेह ठाम आवाम शोभित तीको ॥१॥ ढाल मूलगी जा लेही आवीयो रे, किणही न जाणी सार ।। सीता ॥२७॥ उठी आयो साहमोरे, मिलियो पांह पसार । हुशल पान पूछी घणी रे. प्रोनी तणे रे प्रकार || सीता ॥ २८ ॥ 'जनक' ? तुम्हारी सांभली रे, पुत्री रन प्रधान । गरी निरूपम जेटली रे, तेहमां निलक समान || सीता ॥ २९ ॥ अच्छे अनूपम कन्यकारे, जिम तुम भाखी तेम। पर्व कलायुत आगली रे. पण देवाये केम ॥ मीता ॥ ३० ॥ दीधी 'दशरथ नन्दने रे, अपग्ने केम देवाय ? मणि माथे के सापने रे. कहो किम लीधी जाय ।। मोता ॥३१॥ ती भणी मांग अछे रे. नहीं तन्नो अपहार । करतां वेला छे कीसी रे. रासू व्यवहार ॥ मीना ।। ३२ ।। अमने जीती रामजी रे. परणे कन्या पह । के 'भामण्डल' परणसे रे, एमां नहीं को संदेह ॥ सीता ।। ३३ ।। हरीज।
( ११४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। ढाल मूलगी 'वज्रावर्तज' नामथी रे, अने अरणवा वर्त । धनुष्य अछे घर माहेरेरे, मण्डपे आणी धरंत ॥ सीता ॥ ३४ ॥ यक्ष हजारे सेवियां रे, अतिशय वन्त अतीव । गोत्रज देवीनी परेरे, सैवीये रे सदीव ॥ सीता ॥ ३५ ॥ धनुष्य नमायां हमनम्यारे, रुकटी१ करवा नेम । समजो सीधी वातमा रे, जेम आपणो रहै प्रेम ॥ सीता ॥ ३६॥ एह अचम्भो छे खरो रे, एतो प्रत्यक्ष आज | एकहीने२ चहोडवे रे, सारो वछित काज || सीता ॥ ३७ ।। ढाल क्षेपक मूलगी धनुष्य दोय उहां लाय धरीये, कुलकम सेवा ही करीये, साधे सो कुंवरी ने वरीये । 'जनकने' भरियो होकारो, विद्याधर सर्व हुवा लारो ।। सत्य ।। २३ ॥ -ढाल मृलगी- खेचर 'चन्द्रगति' चालीयोरे, पुत्र अने परिवार । धनुष्य दोय माथे भला रे, राजा लेई लार ।। सीता ॥ ३८ ॥ 'मिथिला' नगरी आवीयो रे, बाहिर डेग दीध । वर्णन नो विद्या धगे रे, पृथिवी मांही प्रसिद्धः ॥ सीता ॥ ३९ ॥ अष्टादशमी हाल में रे, वस्तु भलोनी चाय । 'केशगज' पूगे मही रे, जो होय पूण्य अगाह ।। सीता ॥ ४० ॥ दोहा (माम गगे) 'जनक' 'विदेहा' नारि मुं. मम्भलावी महु वाय । मालममी माले महु, कहै गणी विललाय || १ ॥ देवन तृमो तूं हुयो, लीधो पुत्र प्रधान । लेबी चाहै पुत्रीका. केम गग्य में प्राण ॥ २ ॥ म्वेच्छाए परणेननो, हर्ष घणो संसार | अप इच्छाए परणेतनो. हर्ष न होय लगार ॥३॥ +7 योग तजवीज, इन्छा (शक्षि) एक धनुष्य ने चढ़ाववाथी । - NrvN श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( ११५) दैवयोगे श्री रामजी' धनुष्य चढावा आय । अवरनेरे चढायता, अणसर्म्य दुःख थाय ।। ४ ॥ 'जनक' कहै जाणे नहीं, 'राम' महा वलवंत । मैं दीठो संग्राम में, पौरस नो नहीं अन्त ।। ५ ।। समजावीसा सुन्दरी, पूजी धनुष्य उदार । मण्डप मांही तेडीया, राजा राज कुंवार ॥ ६॥ ढाल क्षेदक मूलगी सहुको मिथिला ही आयाः स्वयम्बर मण्डप मण्डवाया, अयोध्या दृत पठवाया । सवल बल 'रामचन्द्र' धायो, भ्रात ले मिथिलापुर आयो ।। सत्य व्रत पालो ॥ २४ ॥ 'जानकी' स्वयम्बर आवे, साथ सहु सखियन सोहावे, मनमें 'रामचन्द्र' ध्यावे । देव से अर्जी ही कीजे, क मुजने 'रघुवर' वर दोजे !! सत्य व्रत ॥२५॥ धूलचन्दजी कृत क्षेपफ तर्ज-माली थारा वाग मे दोय नारङ्गीयां पाकोरेलो फावे अम्बर फूटरा पहिरण पञ्चरङ्गारे लो, अहो, पहि० ॥ अंजन-मंजन आंजीया, शिर आड सुचंगारे लो, अहो. शिरगा झलके कुण्डल जोडला, तीखा तम्बोलोरे लो. अहो. तीसा० ॥ अधर रंग्या आठीतरे, राता रङ्गरोलोरे लो. अहो. राता० ॥ २ ॥ हार-धरिया हीयापरे, नीका नवसरियारे लो. अहो, नीका० ॥ करमें कंकण-कन्यका, भली परवरीयारे लो. अहो. भलो०॥ ३॥ चम्भल नयनी भामिनी वर रूप विगोरे लो. अहो. चर।। इन्द्राणीरती अप्सरा, लक्ष्मीपिन लाजेरे लो. अहो, ल० ॥४॥ इन्द्राणी जिम ओपनी, मय वैप मनगरे लो. अहो. मय० ॥ शोल सुग्गी सुन्दरी, पतिभना पूगेरे लो. अटो पनि० ॥५॥ स्वामी श्री रावतमलजी म कुन क्षेपक नर्स-माता मीता पी गोदी में आई-जनक-गुना सन्धि माध. हाथ वर मालिकार। दीसे इन्द्राणी अवनार अनोपम रालिकार ।। टेर।। सजकर सोले तन सिणगार. धार पति गम नेरे।
( ११६ ) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । आवे स्वयम्बर मण्डप मांय, विलोके भूप-रूप-तन तांय । इणपर चोले चिम्मय पाय | आई० ॥१॥ अहो यह कन्याने करतार रूप किम आपीयोरे । पूर्व पुण्य किया जिन प्राणी. जिन्हकी होसी यह पटराणी । ऐसी मुख २ होरही वाणी ॥ आई० ॥ २ ॥ दोहा-दिव्या भूपण धारीने, सखियो ने परिवार । मण्डपे आवी जानकी, ईन्द्राणी अवतार ।। ७ ॥ धनुष्य नणी पूजा करी, मनमें समरे राम । मनसा वाचा कर्मणा. अवरां सू नहीं काम ॥ ८ ॥ स्वामी श्रीनथमलजी म. कृत-ढाल क्षेपक तर्ज-परभव की खर्ची लेलो 'गमचन्द्र' मुजवर भाये. दुजो दाय नहीं आवे ।। टेर ।। 'रघुवर' टाली ने वर दुजो, जनक भ्रात सम दिखलावे । राम । सोहिनी सूरत मोहनी मूरत, झुरत ही अहो निशी जावे । राम २। चाप चढे तो कहा न चढे तो, हम दिल अवर नहीं खावे । राम ३। -~~-सवैया- धेनु भरी निहचे मजनी पुनि, नात हितेपन मेरो महा है। मुन्दर रूप मुरूप सखी, पन मोमन में रमगम रहा है ।। मोतिन मार नो डार चूकी, उग्धार चूकी अपनो दुलहा है । चाप निगोडो अब जर जाह, चढ्यो तो कहा न पड़े तो कहा है।।१।। ढाल क्षेपक तर्ज-पूर्ववत काच पाच के अन्तर बढुलो, अमृत तज विष कुण खावे ॥राम॥४॥ मुझ मन में तो निश्चय करीयो. नाथ अयोध्या दिलचावे|गम॥५॥ दाल मूलगी क्षेपक धनुष्य की पूजाही करती, गम को नाम अनुमग्नी, दिल बिच ध्यान ही धानी, श्रोता जन मुणजो अत्र साग, पहिरे कुण सिय की वरमाला || मत्य० ॥ २६ ॥ दाल उगणीशी तर्ज-काना ग्रीत लागी हो। 'मोता' 'गमे' गचीही, जम चकोरी चंदन एप्रीतज साची हो ।।
+ My Arvinv श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( ११७ ) भूधर खेचर राजवी, भरमाणा भारी हो। भाग्य बडो ते भूपनो, जे ए पावे नारी हो ॥ सीता ।। २ ।। नारदे भाखी जेहवी, सा तेहवी जोई हो । 'भामण्डल' भई पड्यो, अति परवस्य होई हो ॥ सीता ॥ ३ ॥ 'जनक' राम तिहां आयके. ए साच कहावे हो। धनुष्य चढावे जे सही, ते ए कन्या पावे हो ॥ सीता ॥ ४ ॥ उठया केड काठीकरी, जे राय सनूरा हो । धनुष्य चढावण करणे, शूगमां शूरा हो । सीता ॥ ५ ॥ सापां साथे वीटीया, नावे गहता हो । फरमी हो कोई नासके. जे गाहा ताऊंहो । सीता ।। ६॥ ज्वाला मूके छ घणी, दाजन्ता भाजी हो । अधो मुख अलगा रह्या, मन मांही लाजी हो । सीता ॥ ७ ॥ ढाल क्षेपक मूलगी विद्याधर चाप पास आवे, अहि अरु अगनी दीखावे. भाग्य विन ऐसा ही थावे । कहो कुण चाप पास जावे, जावे सो शर्म रहित आवे ॥ सत्य० ॥ २७ । सहुको अलगा ही नाठा, धनुष्य आगे ही वाठा, पूर्वभव पाप कीया माठा । रोस कर रघुवरजी ऊठे, सुमित्रा नन्द है पठे। सत्य व्रत पालो ।। २८ । -ढाल मूलगी-- इण अवसर श्री रामजी', लीला गति कारी हो। धनुष्य समीपे आधीयो, आछो अवतारी हो । सीता ॥ ८ ॥ 'चन्द्र गत्यादिक' राजवी, करता अति हामोहो । खेचर खेचीनठहयों. एहनी शो आशोहो । मीना ॥ ९ ॥ चनः पाणी जिम वन्न ने, गघवजी' हरसे हो । शान्त करी अहि अग्नी ने. कर साथै फरसे हो ॥ मीता ॥ १० ॥ -ढाल नेपफ तर्ज-सड़का- प्रपलपली आयीयो धाबीयो रघुपति',(टेर धनुप्प महामोनिणयार आ १ नीच । २ इन्द्र।
११८ ) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ण्यके सन्मुख पाप अलगो हुवे, तेम सगला उपद्रव पुलावे । प्र०।१। जावर्त नामथी धनुष्य सूर सेवता, सहश्र गमे सानिधि देवा । मोरका शोर सुन सर्प अलगा हुवे, तेमने निकट कोईयन रहेवा ।प्र. २॥ जी अर्ची करी आप सम्भावीयो, ऐंचोयो खांच कर्णान्त ताई । ढाल मूलगी नेत्री तणी पर चालीने, प्रभु पणछ चढावे हो। आंख कर्णान्तक खेचीने, टंकारव सुणावे हो । सीता ॥ ११ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-पूर्ववत् धनुप्य टंकारथी शब्द उठ्यो इसो, जाणे के प्रलयसमो दिखाई ।प्र.३। पर्वत शृङ्ग तूटी परे धरणप, समुद्र ना जलजिहां क्षोभपावे । शेपपिण खलबल्या, देवपिण टलवल्या हयगय बंधन तोड़ जावे ।प्र.४। ढाल क्षेपक पूर्ववत् ५ यह 'चन्द्रगति' मुनिया. शोच से मस्तक ही धुनिया, अरे • ' होगये हिन पुनीया । धनुष्य निज खोय दीया दोई, आये निज स्थान मान खोई ॥ सत्य व्रत पालो ।। २९ ।। ढाल मूलगी 'गम' गले चग्मालिका. 'सीता' पहिरावे हो। काज सर्य चित्त चिन्तव्य. अधिक सुख पावे हो ॥ सीता ॥१२॥ क्षेपक ढाल मृलगी जानिकी अधिकी हरखावे, माल गल रघुवर के ठावे, स्त्रियां मिल मङ्गल ही गावे । व्याव का बाजा बजवावे, अपर नृप निज निज पुर जावे। मत्य ॥ ३० ॥ ढाल मूलगी बीजो 'लक्ष्मण' चहावीयो. एह विधी कीधी हो । अष्टा दग वर कन्य का. बग गयों दीधी हो ।। मीता ॥ १३॥ विलम्बाणो विद्याधरु, 'भामण्डल' लेई हो। निन नगर चलि आवीयो, भृमण्डले केई हो ॥ मीता ॥ १४ ॥ नेड्या दाग्थ गजवी, मह मसन माथे हो ॥ नेदरनी मोटी। अपना बर्न ।
M में शाकर श्री जैन पद रामायण द्वितीय स्वएड । ( ११६ ) -ढाल मूलगी--- रायतिहां 'दशरथ' बोलावे, हर्ष दिल मिथिला में आवे, जनक नृप सामो ही जावे | महिपति दोनों ही मिलीया, दूध ही मिलीया ॥ सत्य ॥३१ ।। वनडा की ख़ब करी त्यारी, शहर में आई असवारी, निरखवा आया नरनारी । मूर्ती देखी नहीं आगे, लोक कहै बनड़ो ओ सागे ॥ सत्य यत ।। ३२ ।। ढाल क्षेपक तर्ज-ख्याल की तूं चाल चंपली, वनड़ो आयो है माणक चौक में || टेर ।। झमकू चाली जोर से सरे, दोली आई दौड । हुलासीरो हार सहल्यां. तटके नाक्यो तोड रे ॥ तूं घाल ॥ १ ॥ हंजा हेलो पाडीयो सरे, आव ऊरी उमराव । जमनी तो झाला करे सरे, अणची वेगी आवरे ॥ तूं चाल ॥२॥ पानी रो तो पतो न लागो, चाली गमायो बोर । चांदा चाली कर-वतुराई, संजी मचायो शौर रे ॥ तूं चाल ॥३॥ लाली लागी खवा मरे, भंवरी भांगी भीड । चुतरी तो चूडो फटगीयो, चुनी फाड्यो चीर रे ।। तूं चाल ।।४॥ दाल क्षेपक तर्ज-पदरी-धूलचन्दजी कृत वनड़ो घृमरयो छेजी, राजा 'जनकजी रे द्वार । टेर ॥ विद्याधर को मान मारीयो, असुर मनाई हार. बड़े २ भूपती ए सेवित, इण सम नहीं संमार || ३० ॥१॥ सुम्पनि मरिसो एहनो. मोह ग्या नग्नार । धन्य २ जानि की कवरी, भल पायो भरतार य.२॥ टाल मुलगी विवाह भलो मीता तणो कीधो नरनामे हो । मोता ॥५॥ दाल क्षेपकतर्ज-नवरो जोर चण्योरे हिन्दगारीको स्वामी श्रीमगलमलजी म.फून (म्यामीजी श्रीरायतमलजी म.से उपलव्ध) मसरो भाग्य भलो रे सीया नारी को. जग जग छायो रे जनक कुँचारी को ॥ टेर। धन्य २ मती गीया, पूर्व पुण्य कीगा, पायो पति अवतारी को ।। नयगे ॥१॥ धनुप्य नमायो भारी. प्रपल प्रताप कारी. मान मिटायो अहंकारी को ॥ नवगे ॥२॥ जग - २ 在
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड ।
आंसू न्हांखी भारवती, सा गद गद वाणी हो ।। सीता ॥ २६ ॥
अवरोने जल मोकल्यू, हूं क्यूं चित न आणी हो ? |
एटले नाजर आवीयू, ते आयो पाणी हो ।। सीता ।। २७ ॥
पाणी मस्तक मूकीयू, राणी सुख मान्य हो ।
धन्य जमारो माहरो, मैं आजज जाण्यू हो । सीता ॥ २८ ।।
राजाए नाजर ने पूछीयू. केम चार लगाई हो ।
वृद्ध भणी प्रभु वेग में, हूं नहीं शक्यू आई हो । सीता ।। २९ ॥
शुद्धा पांव पड़े नहीं, चालन्ता पग घासू हो ।
खं २ करतो खांसतो, सुगालो दीसं हो ।। मीना ॥ ३० ॥
दांत पड्या खोखो थयो, मुख लाल पडन्ती हो ।
नारी न आवे आसनी, नविमार करन्ती हो ॥ सीता । ३१ ।।
जोर घटे तन लीलरी, काने न सुणाय हो ।
कर कम्पे शिर धृजणी, बढापाये थाय हो । मीना ।। ३२ ।
दाल क्षेहक तर्ज-धमाल-स्वामी श्री रतनचन्द जी म. कुत
मान पिता सुत बांधवा हो, मगा सनेही मित !
परणो हाथरी पदमणी हो, ते पिण न देवे चित्त ॥ १ ॥
बूढापो वैरी आवीयो हो ।। टेर ।
गोलन्ता जीभ थडथट्ट हो, कानां सुणे नहीं वेण ।
नाकन आये वासना हो. झररया दोनों नेण } चट्टापो ॥ २ ॥
काया पड गई जोजरी हो, पग पड़े नहीं टाय ।
डांग पकड ऊभो रहे हो, अटी उठी पर जाय । बुढापो॥३॥
दांत श्रेणी खोली पडी हो, टिर राया दोनों चोट ।
लाला ललकी मुस थकी हो, आय पडी जगतणो पोट ।। वृ. १॥
माथल रलखीणो पड़ो हो, मल पड़ गया शरीर ।
निकली हाउरी पासली हो. हय गयो धोलो पीर || पहापो ५ ॥
सास सास वधियो घणो हो, आवे मीट अपार ।
हेडली होगई इनरी हो. नो कोशधयोरे बाजार । वृदापो ॥६॥
(१२२) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । वात कहै जो हिततणी हो, तो नवि माने कोय । साठी बुद्ध नाठी कहै हो, सुणने सोमा रह्यो जोय ॥ बूढापो ७ ।। ढाल मूलगी बूढापाना दोपए, राजाजी, जाणे हो। विषय थकी मन वाली ने, वैरागे आणे हो| सीता ॥ ३३ ॥ 'सत्यभूती' नामे भला,मुनिवर चउनाणी हो । वनमें आवी समोसर्या, गुरु आगम जाणो हो । सीता ॥३४|| पुत्रों मू तव रायजी, बहुयरने सासू हो । वन्दन काजे आवीया, पुरलोक उल्लास हो । सीता ॥ ३५ ॥ देई प्रदिक्षणा साधुने, पद पंकज वन्दे हो । सन्मुख सेवा साचवे, भव पाप निकन्दे हो ॥ सीता ।। ३६ ॥ 'चन्द्रगति' सुत नारी मु, खेचर परिवारे हो । 'ग्थर आवर्त' जपरवते. जई क्रीडा कारे हो । सीता ।। ३७ ।। बाहुइतार निजरे पड़था, ऋपि राय विराजे हो। आवीने सेवा करे, ऋपि देशना साजे हो ।। सीता ॥ ३८ ॥ अभिलापी 'सीता' तणो, 'भामण्डल' दीठो हो । मात पिता मुत नारीनी, भव भाख्यो मीठो हो । सोता० ॥३९॥ 'भामण्डल' 'मीना' मही युगलपणे जायां हो । मात विदेहा जाणवी. कहीने समजाया हो । सीता० ॥ ४० ॥ 'पिंगल' देवे तूं हों, निज वैर विचारी हो । तूं वाध्यो बग मन्दिरे, घरे एह कुंवारी हो । सीता० ॥ ४१ ॥ जाती म्मरण पामीने. 'मामण्डल' देख हो । माधु वदे माचो मह, मनमाहे विशेष हो । मीता० ॥ ४२ ।। मूलांए धानी पट्टयो, ऊपाडी लीघो हो । पंग लाग्यो मीना तणे, मैं अविनय कीघो हो । सीता• ॥ ४३ ॥ - १ रचाव।२ पाया परना।
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१२३) क्षेपक ढाल मुलगी मुनिपे भेदही पायो, 'भामण्डल' सुनके धवरायो, हाय में अनरथ करवायो॥ बहिन से बंछना कीनी. नग्कनी नीव मैं दीनी ॥ सत्य व्रत पालो ॥३३॥ मुनि कहै कर्मगती भारी, टरे नहीं कोई से टारी. सीता तो वेन है थारी ॥ आयने शीष ही नामे, निज कृत दोष ही खामे ।। सत्य व्रत पालो ॥ ३४ ॥ ढाल मूलगी- सीता दे आशीपजी, चिरंजीवो भाई हो । करे घणी पगे लागणी, माचित्र बोलाई हो । सीता० ॥ ४४ ॥ धाय मिलिया 'रामजी' लीये कण्ठ लगाई हो । मिश्रीथी मीठी खरी, जगमें एह सगाई हो ॥ सीता० ॥४५॥ 'भामण्डल' पट थापीयो, आपणपे राजा हो ।। वैरागे व्रत आदरे, गुरु तारण जाजा हो । सीता०॥ ४६ ।। साधु नमी राजा नमी, नमी ' राघव । राया हो ।। 'भामण्डल' सीता नमी निज मन्दिरे आया हो । सीता०॥४७॥ हाल भली ऊगणीसवीं, सीता परणावी हो ॥ 'केशगज' श्री रामनी, पटनारी कहावी हो ।। सीता० ॥ ४८ ॥ दोहा (सवाव रागे) 'सत्यभूती' मुनिवर भलो, सत्यदेव सुविशाल । शाशन सोह? वधारणो, पट् कायां प्रतिपाल ॥१॥ विधिमं देई प्रदक्षिणा. करजोडी नरनाथ ॥ प्रश्न करे प्रगट पणे, निमुणे सघलो साथ ॥२॥ -ढाल वीशवीं तर्स-चीर नृपती अन्यदास में (हमीरोयारी)- हमसं भावो एहजी, पूर्व भवान्तर यात | साधुजी ॥ सुख दुःखनो अवदातजी. वांदी जमारो जात ।। माधुजी हम ॥ 'सेनापुर यो सुन्दरूं, 'भावन शाह' सुजाण ।। माधुजी ।। पत्नी थी तमु दीपिका. सुता 'उपास्ति' अजाण ॥ साइम २॥ १शोभा वधारनार । २ स्त्रीदती। PM (१२२) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । वात कहै जो हिततणी हो, तो नवि माने कोय । साठी बुद्ध नाठी कहै हो. मुणने सोमा रह्यो जोय ।। बूढापो ७ ढाल मूलगी ढापाना दोपए, राजाजी, जाणे हो। विषय थकी मन बाली ने, वैरागे आणे हो। सीता ॥ ३३ ॥ 'सत्यभूती' नामे भला,मुनिवर चउनाणी हो । बनमें आवी समोसर्या, गुरु आगम जाणो हो । सीता ॥३४|| पुत्रों मुं तव रायजी, बहुयरने सास हो । चन्दन काजे आवीया, पुरलोक उल्ला हो । सीता ।। ३५ ।। देई प्रदिक्षणा साधुने, पद पंकज वन्दे हो। सन्मुख सेवा साचवे, भव पाप निकन्दे हो । सीता ॥ ३६॥ 'चन्द्रगति' सुत नारी मुं, खेचर परिवारे हो । 'ग्थर आवर्त' जपरवते. जई क्रीड़ा कारे हो ॥ सीता ॥ ३७॥ बाहुलतार निजरे पड़धा, ऋपि राय विराजे हो। आवीन सेवा करे, ऋपि देशना साजे हो ।। सीता ॥ ३८॥ अभिलापी 'सीता' नणो, 'भामण्डल' दीठो हो । मात पिता सुत नारीनी, भव भाख्यो मीठो हो । सोना० ॥३० 'भामण्रल' 'मीता' मही युगलपणे जायां हो । मान विदेहा जाणवी. कहीने समजाया हो । सीता० ॥ ४० 'पिंगल देव तूं हों, निज र विचारी हो ।। ये. मग मन्दिरे, घरे एह कुंवारी हो । सीता० ॥ ४१ स्मरण पामीने, 'भामण्डल' देखे हो ।। मात्रु वदे माचो मह, मनमोहे विशेष हो । सीता० ॥ ४२ ॥ मृठाए धानी पट्टयो, ऊपाडी लीधो हो । पंग लाग्यो सीता नणे, में अविनय कीघो हो । सीता• ॥ ४ स्वाव! पाया फरना ।
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १२३) . ॥ क्षेपक ढाल मुलगी मुनिपे भेदही पायो, 'भामण्डल' सुनके घबरायो, हाय में अनरथ करवायो॥ वहिन से वंछना कीनी. नरकनी नीव में दीनी ॥ सत्य व्रत पालो ॥३३॥ मुनि कहै कर्मगती भारी, टरे नहीं कोई से टारी. सीता तो वेन है थारी || आयने शीप ही नामे, निज कृत दोष ही खामे ॥ सत्य व्रत पालो ॥ ३४ ॥ ढाल मूलगी- सीता दे आशीषजी, चिरंजीवो भाई हो ।। करे घणी पगे लागणी, मावित्र बोलाई हो ॥ सीता० ॥ ४४ ॥ धाय मिलिया 'रामजी' लीये कण्ठ लगाई हो । मिश्रीथी मीठी खरी, जगमें एह सगाई हो । सीता० ॥ ४५ ॥ 'भामण्डल' पट थापीयो, आपणपे राजा चैरागे बत आदरे, गुरु तारण जाजा हो । सीता०॥ ४६ ।। साधु नमी राजा नमी, नमी ' राघव । राया हो ।। 'भामण्डल' सीता नमी निज मन्दिरे आया हो । सीता०॥४७॥ हाल भली ऊगणीसवीं, सीता परणावी हो। 'केशग' श्री रामनी, पटनारी कहावी हो । सीता० ।। ४८ ।। दोहा (सवाव रागे) 'सत्यभूती' मुनिवर भलो, मत्यदेव सुविशाल ॥ शाशन सोही धारणो, पट कायां प्रतिपाल ।। १ ।। विधिमं देई प्रदक्षिणा. करजोडी नरनाथ ॥ प्रश्न करे प्रगट पणे, निमुणे सघलो साथ ॥२॥ ढाल वीशी तर्स-चौर नृपती अन्यदास मे (दमीरीयारी)- हम भाखो एहजी, पूर्व भवान्तर यात | साधुजी ।। सुख दुःखनो अवदाननी, वांदी जमारो जात ॥ माधुजी हम ॥ 'सेनापुर' यो सुन्दरूं, 'भाषन शाह' सुजाण ।। माधुजी ।। पत्तीरथी तसु दीपिका, सुता 'उपास्ति' अजाण !! मा० ॥इम २॥ १ शोभा वधारनार । २ सतीदती।
.. . ( १२४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । साधु नी निन्दा करी, भव में भमी अपार ।। साधुजी || जीव तुम्हारो ओअछे, आगे सुणो अधिकार । सा०॥ इम ३ ॥ 'चन्द्रपुरी' रे सुहामणी. 'धनगिरी' सुन्दरी नार ॥ साधुजी ।। 'वरुण' नामे सुत जाईयो, वर्ते शुभ व्यवहार ॥ सा० ।। हम ४ ॥ साधुनी सेवा करे, श्रद्धालू समभाय ।। साधुजी ॥ सुख दुःख ना अनुसारथी, मतितो उपजे आय ।। सा० ॥ हम५।। धातकी ग्वण्डे जाणीये, उत्तर कुस्वर खेत ॥ साधुगी । युगल पणे तिहां ऊपन्यो, शुभ कर्मो नो हेन । साधुजी हम ६॥ तीन पल्यनी आऊखो, भोगवी सुर सुखसार ।। साधुनी ।। 'पुरुषला' नामेछे पूरी' 'पुरुखलावती' मजार ।। सा० ॥ हम ७॥ 'नन्दीघोष' राजा भलो. पृथ्विी राणी होय ॥ साधुमी ।। 'नंदी वर्दन' नामथी, नन्दन नीको जोय ॥ सा० ॥ हम ।। ८ ॥ 'नंदी बन' ने दीयो, गये राज्य नेवार ॥ माधुनी ।। 'यशोधर' गुरु पाग्यनी१, आप हुवा अणगार || मा० ॥ हम ९॥ श्रावक नां व्रत पालीयां, पंचम कल्पे देव ॥ माधुजी ।। जप २ कार हुवो घणो. सुपर मारे सेव ॥ सा० ॥ हम ॥१०॥ पूर्व विदेह जाणीये. वैताट्ये मुवि शेप । माधुजी ॥ उनर श्रेणीपछे भलो. 'शगीपुर' नामे देश ।। सा० ।। हम ११॥ 'ग्नमाली विद्याधम, 'विद्युतलता' नार । माधुजी ॥ 'मृर्य जय' जय कारीयो, पुत्र भलो अबधार || मा० || हम १२|| 'ग्नमाली' नृप चालीयो, 'सिंहपुगे' नो ईग || माधुजी ।। 'वज नयन' ने जीतवा. मनमें आणी गम मा०॥ हम १३॥ मिहपुरी ने पालतो, बाले अबला चाल || माधुजी ।। पशु पंवीथी नाटले, होई रह्या विक्राल || मा० ॥ हम १४ ॥ पूर्व जन्म नणो भलो, पुर्गदित नो जीव ॥ मा० 'उपमन्यु नामथी, देव दयाल मदीय || मा० ।। हम १५ ॥ 'महार' मृग्लोकथी, आवी-बोले एम ।। सा० परम (पाहलया पामे)। पशु पन्थीथी नहीं डरनां विकाल थर्ड रह्योटे ~~-~ श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१२५) उत्कृष्ट पातिक एहवं, तुमने सूजे केम ? । सा० ॥ हम १६ ॥ 'भृरीसुनन्दन' तू हतो, पूर्व जन्मारे राय ॥ सा० मांस तज्यो तो थं सही, विप्र खवाडयो आय | सा०॥हम १७॥ सोही पुरोहित१ एकदा, स्कंद हण्यो गजथाय ॥ सा० 'भूरी सुनन्दन' राजीए, घरे आण्यो गहताय । सा० ॥हम १८॥ सो हाथी रण में हण्यो, 'भूरी सुनंदन' थाम || सा० गंधारी उदरे ऊपन्यों, ,अरि सुदन' तस नाम | सा० ॥हम १९।। जाति स्मरण पामीयो. लीधो संयमभार ।। सा० कल्प आठमें देवता, सोहै देव उदार ॥ मा० ॥ हम ।। २० ।। 'भूरी सुनन्दन' पामीयो, अजगरनो अवतार ॥ मा० दावानल माही बल्यो. कर्म न चूके लार ।। सा० हम ॥२१॥ नरके पहूंच्यो दूसरे. उहांही में तुज आय ॥ सा० समजाव्यो ते कारणे, एतूं हवो राय ॥ मा० ॥ हम ॥ २२ ॥ मांस तलीने वापर्यं. तेहनो ए फल लाध ।। सा० आज होईने आकरो, कांई करे अपराध ।। सा० ॥ हम ॥ २३ ॥ एम सुणीने ऊवट्यो, 'कुल नन्दन' नृप कीध ॥ सा० 'सूर्यजय' साथे करी, राजा संयम लीध ।। सा० ॥ हम ।। २४ ॥ स्वर्ग सातमें भोगवी, सुरसुखनो विस्तार ।। सा० 'मूर्यजय' चवी तूं हुयो, 'दशरथ' राय उदार ।। सा० ।। हम २५॥ 'रलमाली' आवी हुवा, 'जनक' रायजी एह ॥ सा० 'कनक' 'जनक' भाई भलो. उपमन्यु ससनेह ॥ सा० ॥ हम २६।। 'नंदोघोप' ग्रेव्येकनां, भोगवी सुरसुख भी ॥ सा० 'सत्य भूनी' ए ई हुवो, मरि शिरोमणि सूरी ।। सा०॥ हम २५|| एम सुणी वैगगीया, प्रणमी गुरुना पाय ।। मा० गजा मंदिर आधीयो, लोक लीधा बोलाय || मा० ॥ हम ॥२८॥ १ पुरोहित कहे थे , पुरोहिननाभरे स्काध राजाना मारवायी मगने हाथी थयो, त्यांयी मगैने भूरीनन्दन राजानी स्त्री गंधारी ना पेटे पुत्र पो उपन्यो। . 44 unt (१२८) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । cov----- पाछल बुद्धि नारी केरी जाणो हो, एम्हा० पाछल० रा ) केणी सुणवी प्रभुनी दिलमें नाणोहो, एम्हा० के० रा० ॥ ३ ॥ नारी कथने बहुत अकारज हुवो हो, एम्हा० नारी० रा० । शास्तर गावे केता देवू दुहा हो, एम्हा० शा० रा० ॥ ४ ॥ हरगिज राज प्रभुजी में नहीं लेवू हो, एम्हा० हर० रा० । छाने नहीं हूं चबड़े २ के हो, एम्हा० छा० रा० ॥ ५ ॥ ढाल क्षेपक मुलगी राय कहै परतिज्ञा पालो, म्हारो ए ऋण ही तुम टालो, राम कहै मुजस्हामों भालो। चाय नहीं राजा की थारे. लोक सहु बैठा झक मारे ।। मत्य बन पालो ॥ ३५ ॥ विनयए वापनो करवो, भ्रात को बचन दिल धरवो. मात को विखादही हरवो । 'भरत' जल नेत्र ही न्हांखे. वचन मुख दीन ही भाखे ॥ सत्य व्रत ॥ २६ ॥ राम का चरण ही ग्रहीया, आपके शरणे ही रहीया. वात ए मन की जे कहीया । हरगिज नहीं राज लू मैं नो, व्यर्थ ही झोड़ करो थे तो ॥ सत्य व्रत ॥ ३७ ।। --सवैया-क्षेपक भरत ? पिता की आण मानीय धर्म जाण- मानीये न आण एतो लोक मांहीं लजिये । मन कहें 'राम' मुनो नहीं मेगे काज एतो- तुमहु अनीत कगे मोही नाह रजिये ॥ गम ? तुमे कगे राज मन ही की बहो लाज, तुम बैठे अवर कर एतो वही कजिये । कीजिये विनय जाको, मानिये हुकम नाको- 'गम' को कयों करे सोर्ट दुनियां में बड़ो जश लीजिये । मोग्ट--जननी जणे अनेक, सो कायर किम काम का । पिता वचन पिर टेक. पूतवह परमाण यह ॥ १ ॥ दोहा--पिता को मुग मर्न ? अब, लेह शीघ्र तुम गज । पाटो पात्रा प्रापणी. पणी वधागे लाज ॥१॥ -- श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१२६ ) राज लाज मुज काम नहीं, मेरे परम सन्तोष । हूं त्यागी संसारनो, साधू मार्ग मोक्ष ।। २ ॥ रामोवाच-पिता वचन नहीं लोपीये, लीजे शीप चढाय । कालपाय संयमग्रहो, वधे धर्म सुखदाय ॥ ३ ॥ रामकहै भाई भरत ? तात वचन परणाम । सो सुबुद्धिविनीतनर, धर्मी परम सुजाण ॥४॥ भर्तोवाच-'भर्त' कहै सुण रामजी, एअनीत नहीं नीत । पूज्यनीक तुम जगत में, करो सपन की चित्त ॥५॥ ढाल मूलगी घणी किसीए केलवणी करो, सो वातां की एकोरे । राम छतां हूं राजा न थाऊं, म्हारी एहिज टेकोरे ।। एविधि १९॥ राजाजी { 'राम' तदाकहै, 'भरत' वचन ए साचोरे । हूं वनवासे जावू छ सही, पालो तुमए वाचोरे ।। एविधि २० ॥ आज्ञा लेईने पगे लागोयो, मूर्णोि तब पापोरें । भरत सुभाई रोवे छे घj, हाथे ग्रही शर१ चापोरे एविधि २१॥ -ढाल मूलगी क्षेपक- वज्रसम वचन उचरियो, खाय नृप मूर्छा ही परीयो, धरण को शरणो ही वरियो । थयो नृप सचेतन त्यारे, कहै किन घले पुत्र प्यारे ॥ मत्य० ॥३८॥ नमनकर वनवासे चाल्यो, राज्य यह भत ने आल्यो. किणी रो नहीं रेवे पाग्यो । 'भर्तजी' मग्ल माद रोवे कह जिन होनहार होवे ॥ सत्य० ।। ३९ ।। -ढाल मृलगी- पद पंकज प्रणमी माताना. वचन पदे समनेहोरे । । तारे नन्दन हुई जेहवो. तेहबो भरतज एहोरे ।। एविधि २२ ।। याचा पालवा तणे कारणे, राज्य भग्नने आल्योरे। मुज पैठो तो राज्य को नहीं, हूं वनवासे चाल्योरे एविधि २३|| माजी साहस आणजो खरो, कायग्नो मत होवोरं । 40 १पाए।
( १३० ) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । योग वियोग जग करतानो कीयो, जललेई मुख धोबोरे ।एविधि २४ एम सुणन्नां घरतीए गीरी पड़ी, फरि २ मूर्छा पावरे । शीतल ताए करावे चेतना, हैयुं घणं भरी आवेरे ।। एविधि २५।। हूं जीवाडी केही पापीये, मूर्छा थी मरी जातीरे । पुत्र वियोगथकी मरव भलू काती कापे छातीरे ॥ एविधि २६ ॥ प्रभुजी संयम मार्ग आदरे. सुत होवे वनवासीरे । वज्रमहीछे मही तूं कौशल्या, जीवे काई विमासीरे |एविधि २७॥ 'गम' नदारे माता को, एम करे केम शाणीरे । कायर नारीनो एकामछे, तूं वडगयां राणीरे । एविधि २८ ॥ सिंह एकाकी वनमाहे फरे, वे परवाही वीरोरे । निज जननी तो घर बैठी म्है. नाणे कोई अधीरोरे ।। एविधि २९॥ वापरणे रे गिर ऋण जो ग्है, तेतो सुतनो दोपो रे । मुज घर रहेनां ऋण नवी उतरे, आणोए मंतोपो रे ।।एविधि ३०॥ एममम नावीने पगे लागीयो, अवर माय गिर नामी रे । प्रभूजी वन वमवाने चालिया, हर्पवणेरी पामी रे ।।एविधि ३१॥ इकवीयमीरे डाले गमजी, चाल्याछे वनवासेरे । 'कशगज' 'कैकेयी' गणीने, वचने करी मद् त्रासेरे ।। एविधि ३२|| दाल क्षेपक मृलली आश्वासन दे रघुवरजी'. हर्प दिल चाल्यो हितधरजी, माता अन्य नमस्कार करजी । जानकी खबर लही जामो, चले अब • फूटे नामो । मन्य० ॥ ४० ॥ दोहा (गोही रागे) पतिव्रता व्रत माचवं, पनि प्रेम अपार । ने मुन्दरी मंमार में, दीसे छे दो चार ॥१॥ गावे पाव पहिरवे, करवं भोग विलाम । मुन्दगनो मन मादगे, जवलग पूरे आम ।। २ ।। मुख में आवे आसनी, दुःख में अलगी जाय ।
दोटिलो पाये चालवो, क्यूं ह हालन्त हो ॥राम० ॥४॥ नारी कही तनु छांहड़ी. माथे रही सुख पाय हो । राम० १०॥ वाला सुख संसारनं. जैको प्रिय विण होय हो। प्रिय साथे दुःख हो मल, एम भाव सहु कोय हो ।राम०११॥ १ससा-स्नेही।नयन---उदक पाखन पाणी १३ सुदरहा। श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१३१) स्वार्थणी सा सुन्दरी, सखरा१ में न गणाय ॥३॥ सुसराने सादरपणे, सीताजी पगे लागि । कौशल्या प्रणमी करी, चाली अनुमति मागि ।। ४ ।। -ढाल वावीशमी तर्ज-विमला चल बन्दी- खोले लोधी खांचीने, वालक नी परे तेहहो । न्हवरावी नयनोदकेर, वाणी वदे सस नेहहो ॥ १ ॥ 'राम' रसे राची घणं, माची प्रियने प्यारहो । साची शील शिरोमणि, सत्यवन्ती संसार हो । रामः ॥ २ ॥ बहुअर १ बोराने जावादे, तूं मत जावे आप हो । व्हालो नहींय विदेशडो, सहवो अति सन्ताप हो ।। राम० ३ ।। वाहन विविध प्रकारना, तूं वयठी चालन्त हो । दोहिलो तृपाअरु भूखडी, दोहिलो लेवो वास हो । दोहिलो टाहने नावडो, रहवो नित्य उदास हो ॥ राम० ॥ ५ ॥ कोमल काया ताहरी, दोहिलो धरतीए शयन३ हो । पीछे ही पछतावसो, पाम्याथी कुचैन हो । गम० ॥ ६ ॥ प्रियने पग पंधन कही, परदेशो में नार हो । नारी तो घरमें भली, बाहिर पड़ी विकार हो । राम० ॥ ७ ॥ फलने पेखी पंखीया, तूटी पड़े नतकाल हो । नारी नयने निरखता. उपजे अति जंजाल हो ।। राम० ॥ ८॥ मानी हमारी सीपडी मति जा प्रियने लार हो । सासुनी सेवा कर्या प्रिय सेव्यो सो चार हो । गम० ॥ ९ ॥ आई ? एहकां कही. मैं अलगी न रहाय हो ।
(१३२) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । पुरुषतणी अर्धाङ्गना, नारीनू तो नाम हो । ते कहो अगली किम पड़े, प्रिय नामे विश्राम हो । राम० १२।। जेह नारी प्रिय मानीयो, तेणे मान्यो जगदीश हो । नारीनं परमेश्वरु, नाथ नमूं निसदीश हो ।। राम० ॥ १३ ।। पियुडो आगे संचरे, नारी पूठे जाय हो । चरण कमल नी रेणुका१, तन लागे सुख थाय हो ।। राम० १४॥ प्रियनं मुख अवि लोकतां, नयणे अमिय भगय हो । दुःख नो सो वर्षा तणं एक क्षणमाहै पुलाय हो || राम० १५ ।। जलहरणेर पूंटे थकी. विद्युत् जेम शोभाय हो। तेम पियुजीनो पाखती, नारी म्है सो न्याय हो । राम० १६ ॥ एम कहीने नीकली, लही सासु आशीप हो । आतम गमज गमजी, मनमें एह जगीग हो ।। गम० ॥ १७ ॥ दुई छ होसे बलि. जे पति भक्ति नारी हो। तिणमे आदि उदाहरणे. मत्यवती३ अवधारी हो ।। राम० ॥१८॥ नगर तणी नारी मिली. रोवन्ती अशगल हो । पनि व्रता माहे घणू. मग है सुविशाल हो ।। गम० ॥ १९ ॥ कष्ट पड़े चननास तो, भय नवि माने जेह हो । उभय कुल उजवालणी. आज अछे त्रिये एह हो । गम० ॥ २० ॥ हप जिम्यो थयो म्बयम्बरे. तसो ही बनाम हो । कोईन दीसे आंतरो, माहमी तने गावाग हो ।। राम० ।। २१ ॥ आननतो अति उजलं. आरती नहीं लव लेस हो । भाग्यवती भामिनी. प्रिय माथे परदेश हो । गम० ॥ २२ ॥ -मूलगी टाल क्षेपक- गमजी बनवाये जावे, बान मन परजा दुःख पावे. मभी को जियो घवगवे ।। • गम' मे प्रेम हो घाता १ रज । - वरमाद । ३ अवधाग्य -ध्यानमा ले। ४ मगह-प्रशंमा कावी।५ त्रिया-स्त्री। १ माहमीक-माहम करनार । ७ फारमी गह छ नेनो अर्थ धन्य एवो थाय छे । मुग्य । परम्पर बात यूं करता ।
on ve ~ श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १३६ ) सत्य व्रत पालो ।। ४१॥ स्वामी श्रीनथमलजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-तावड़ा धीमो सो पड़जा- अकल कित गई दशरथ नृपनी २, 'राम' भणी वनवास देईने करे पूरी अपनी ॥ टेर ॥ 'राम' सरीसा पून जगत में, जननी नहीं जाया । जिनको दृर छांड वन भीतर, 'भरत' तखत ठाया ॥ अकल १ ॥ नहीं सीख निज मतनी पतनी, भूपति भग्मायो । नहीं लायक हे तखत 'भरत' शिशु, सब जग दग्सायो ।। अकल २॥ जामी गज 'अयोध्या' केरो. फेरो फिर देसी । निलजानी खटपट कर कोऊ, हरसी परदेशी ॥ अकल ।। ३ ।। ढाल क्षेपक मुलगी बवर तय 'लक्ष्मण ने पाई. अवर वर हेरयो नहीं माई भरत की दशा केम आई । किसी का जोर नहीं धारू, चिन्तिन निज काज ही सारूं ।। सत्य० ॥ ४२ ॥ ढाल मूलगी 'लक्ष्मण कोप कलकल्यो. कालो पीलो थाय हो । जाणे अब करिये किस्य. मनियन को ठहराय हो । गम० २३ ॥ वर भण्डार ए गखीन क्यं मांगे दुग दाय हो । ताततो मरल स्वभावीया, कपट कारीग माय हो । गम० २४|| अण उतारण गिर नणं. तान कियो मुविचार हो । 'भरत' भलो यो भाईयो, का झाल्यो थो भार हो । गम० २५|| 'भग्न' धी उदालीने. नृप पदवी लई आज हो। 'राम गयन आपीने, सास लिन काम हो । गम० ॥ २६ ॥ 'राम' न लेशे गड़ग ने, दुःख पाम से नात हो। ए उनपान उठावया करे विमानी पान हो । गमः ॥ ७ ॥ दुःख मन पाचो नाती. भगत करो ए गज्य हो । राम चाल्या ई घर रह. नो पार्म लाज होगमा २८ ॥ १ एयरवी भापानी शव नेनी र 'भागोगो मारो माना ~~~~- ( १९४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । सेवक रूपी होई ने, रहिम प्रभुने साथ हो । खिजमत१ तो कर सही, मुजश दीयो जगनाथ हो ॥राम. २९|| ताततणे पगे लागीने, माजीने परणाम हो ! करीने लाग्यो चालवा, माय शीख दे ताम हो । गम० ३० ॥ बत्म ? म्यम्य मतिताहरी, खरूमतू तुजमाहै हो । माथ न नजयो भाईनो, लोक वचन ए पाहै हो ॥ राम० ३१ ।। जाई मिलो उतावला. कांई कगे विलम्ब हो। गम नान करी माननो, कई सुमित्रा अम्बर हो । राम० ३२ ।। 'कौशल्या' पगे लागीने, चालण लाग्यो जाम हो । 'काँगन्या' कहै मायजी, लक्ष्मण मामे नाम हा ।। राम० ३३ ॥ 'गम' गयो तूं जाय छे, म्हाग कवण हवाल हो । 'लक्ष्मण' कहै माना सुणो, न तजं 'गम' दुमाल हो । राम. ३४|| बनवाये एकाकीयो, आप 'गम' जी जात हो। हं न कर वकण, ती लाजत मुझ मात हो दाल मृलगी क्षेपक माना कई मुख २ जावो, गमकी सेवा करवायो, जिणी से वंछिन ही पावो । नाय शिर मोमित्रा नन्दा, कौगल्या प्रणी आनन्दा ।। मन्य० ॥ ४३ ॥ मा को मुणो पुत्र वाणी, अनुज तूं भक्ती दिल आणी, अछे तू गुणां तणी वाणी । पुत्र ? तब ओलं की आयी, दुक्का यह दिवस कैम जामी ।। सत्य० ॥ ४४ ।। वीर कह मुणिय → माता, काया त्यां छाया विग्याता, गम ज्यां लक्ष्मण शामाता । जग जब हाल नहीं कोत्री, आशोस तत्र माताने दीधी || मन्यः ॥ १५ ॥ टान मूलगी त्रमाण चालियां, आणती आनन्द हो । मायग्नी पर देखत्री, ग्न गयां नहीं मंद हो । गम० || ३६ ।। गजा गणी आधीया. भावी यो पग्विार हो । पाल ने गोपालजी. मिलिया हो अगर हो ॥ गम० ||३७ ॥ राम० ॥ ३५॥ -- ?
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खएड । (१३५) • 10 -ढाल मूलगी क्षेपक- पुरुप दोय नारी इक जावे. राजादिक पहोंचावण आवे, सखी मिल ओलूं ही गावे । राम के सन्मुख ही जोवे, आम्मू सं मुखडा ही धोये ॥ सत्य० ॥ ४६॥ ढाल क्षेपक तर्ज-वन्धव बोल सहियांमांने ओलं आवे, हो ओलं-राघवजीनी ओलूं आवे ।।टेर।। रान न आसी नींदड़ी, दिन धान न भावे हो । पल २ माहै सांभरे, हीयो भरि जावे हो । सहियां ।। १ ।। प्रभुजी ज्यां त्यां संचरे, सोही हरखावे हो। नेत्र विना मुख ज्यू सही, प्रभु विन हम दरसावे हो ॥सहियां २॥ धन्य भाई लक्ष्मण' अछे. प्रभु सङ्ग सिधावे हो । पनि भक्ता 'सीता' सती. शोभा अधिकी पावे हो । महियां ३ ॥ समाचार प्रभु मुज भणी.वेगा कसावे हो। वहिला राज पधारजो, दुनि दर्शन चावे हो ॥ सहियां ४ ।। श्री समयसुन्दरवी कृत. ढाल क्षेपक तर्ज-चान्दलीया सन्देशो रे कहीजे म्हारा कन्तनेरे राजेश्वर चालेसर हो वेग पधारजोरे. थारी जोवे बहुला बाट । पल अंतरथी अलगा नवि करूंरे. हिबड़े घणरे उचाट | गजे । । सुब मातामें पामी अन घणीरे, याद कगं नित मेव । सफल दिहाडो सो मैं जाणसोरे, सो दिन कामां मेव ।। गजे २॥ सुरभी जावे वन कोड़ा भणारे, पछा कररे पुकार । तिम तुम दरगन चिन हिव माहिबार,अहो धावां के निरधार गजे ३॥ मातपिता चले भ्रानजीरे, वलि वर बहु नग्नार । दया आणीने दिलमें साहिवारं, पाला घिरो इणवार गगडे ४ ।। पयो पिऊ. २ कारे, पिण घना नहीं चाय । जिम तुम ऊमा ओलगेजी. मानो वचन न काय ॥ गजे ५ ॥ बारम्बारे कीधी चीनतारे, पिग समन माने एक । मो जिम सेवा कीजो भरतकीरे, धारी पणा विवेकः ।। गजे ६॥
~~~~. ? ? (१३६ ) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड दोहा---गद गद कण्ठी होगये जलभर आयो नैन । रोते रोते नागरीक, व राम से वैन ॥ १ ॥ मुनि श्री रूपचन्दजी कृत. ढाल क्षेपक तर्ज-अहमद भूल न जाना रघुवर ? भूल न जाना, चिनती ध्यान में लाना || टेर।। मायत वचन मानकर तुमने, निगधार इत छोडो हमने । वन को किया प्रयाना ॥ रघुवर ? भूल न जाना ।। १ ।। यद्यपि नहीं रहना था पुरमें, तो क्यों प्रेम लगाया धुर में । अधविच में छिटकाना, रघुवर ? भूल न जाना ॥ २ ॥ प्रतिपल याद आवेगी तोरी, हार्दिक विनती स्वामिन् मोरी । जल्दी दर्श दिलाना ।। रघुवर० ॥ ३॥ हेम मृग्व आप बडे गुणधारी, शशी सम सौम्य मदा सुखकारी । मधुमय मीठी बाना ॥ रघुवर ? ॥ ४ ॥ मींच २ कर प्रेम मलिल को हराभग किया इस उपवन को । आकर फिर विक्रमाना ॥ रघुवर ? ॥ ५ ॥ जनगण तब दर्शन का प्यामा, एक आपकी लग रही आशा । चित चरणां में लुभाना ।। रघुवर ? ॥ ६ । विरह तुम्हारा सहा न जामी, वार २ उर ओलं आसी । दया भाव दिखलाना 1 रघुवर ? ।। ७ ।। अवध निवासी अर्ज गुजारी, भूल हुई हो जोभी हमारी । भूल उन्हें तुम जाना, पर भूल हमें मत जाना ॥ ८ ॥ 'प' कहे जनता के मनमें. गम म्है इन जाये न वन यही आश मन लाना ॥ रघुवर ? ॥ ९ ॥ मार्दल गुस्पद कज गिर नाई, 'जयतारण में हाल बनाई । गमायण में गाना ॥ रघुवर ? ॥ १० ॥ दोहा मृनकर प्यारी प्रेम मय, परना की अरदास । मधुमय मीठे बयन से. देन लंग आश्वाम ॥ ? || दाल नेपक नर्ज-बलग दो गिरणगार भेंबर म्हान जावपढो एक दा विपनमें जावन दो इक बार, हो म्हारी अत्र में- - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १३७ ) निवासी जनता जादा मत तानों इनवार ॥ टेर ।। वचन निभास्यां बनमें जास्यां, वहां पास्यां सुख साज । फिर चल आस्यां वास वसास्यां, पिण जावणदो मोय आज ।। जा.१॥ ढाल क्षेपक तर्ज-नवीन रसिया मुनि श्री रूपचन्दजी म० कृत. रहीजो २ हो आनन्द में प्यारे सारे ही नरनार ।। टेर ।। हिलमिल प्यारे पुरजन रहीजो वहीजो कुल-आचार । परधण परधन को तज करके कीजो प्रेम प्रचार ॥ रहिजो ॥१॥ निर्मल न्याय नीति पथ नहीजो लहीजो सुजश अपार । चिन्तामणि मम धर्म जैन को, तजदो मतना यार ।। रहीजो २ ॥ मम सम भत भणी समजीने हुक्म यहो हरवार । करसी माल सम्भाल निहाली नीति न्याय विचार ॥ रहिजो ३ ॥ सप्तव्यसन मद मच्छर ईप कर दीजो परिहार । रूप मुनि कहै ग्घुवर की या शीक्षा लो उरधार ॥ रहिजो ४ ॥ दोहा-रघुवरमायत चरण मे,नमन कीयो निणवार । हम लायक शाक्षा जनक, वात कहो धर प्यार ।। मुनि श्री रूपचन्दजी म. कृत. दाल क्षेपक तर्ज-काली कमली वाले तुमको प्राण पियारे पुत्र हमारे क्रोडां म्यावास. तुमको कोडा० । टेर ।। साग प्याग परिकर तजकर. मानव गणका हृदय चुगकर । तुमतो वनकी ओर पधारे, क्रोडां म्यावाम ॥ प्राण ॥१॥ क्षत्रिय धर्म को पूर्ण निभाया. नहीं लालचमें मन ललचाया । तुमहो वीर प्रतिज्ञा धारे, कोडां स्यावाम ॥ प्राण ॥ २ ॥ दोनों भाई हिल मिल रहीजो. भ्रात पच्छल गुण हियमें गहोजो। सप्त व्यमन तज देना प्यारं, क्रोडां स्यावाम ॥ प्राण ३ ॥ जैन धर्म निज जीवन समजो. नीच तणी थे संगति नजजो। दोनों ही मत होना न्यारे. कोडों म्यायाम ॥ प्राण ॥ ४ ॥ मैंतो कार्य उचित नहीं कीना. प्यारे पुत्रों को दृश्य दीना । 'रूप' मुनि कई है गुण पारे, कोडों स्यावाम ॥ माण ॥ ५ ॥ ॥
vi-wrA" ~ दान क्षेपक तर्ज-मै अंग्रेजी पढ़ गई हूं मुनि श्री रूपचंदजी कृत. ( १३८) श्री जेन पद रामायण द्वितीय खण्ड । दोहा-राम कहे प्रभुजी सुणो, तुमचा वचन स्वीकार । सुखसं, संयम आदरो, निज आतम उजवाल ॥१॥ अन हम वनको सिधाते, सुनले मेरी मैया ।। टेर ।। लाड प्यार कर तुमने पाले, आज आपसे हो रहे न्यारे । पितु वर वचन निभाते ॥ सुनले मेरी मैया ॥१॥ दर्शन से हम परसन होते, तेरी गोद में आकर सोते । चरणां शीप झुकाते ॥ सुनले मेरी मैया ॥२॥ ऐसा हम स्वपने नहीं जाना, तुम दर्शन का विरह होजाना । भावी प्रवल कह्यो नाथे ।। सुनले मेरी मैया । अ० ॥ ३॥ खैर हुवा सो होगया माना, होनहार नहीं टले टलाता । हितकारी कहो बातें।। सुनले मेरी मैया ।। अ० ॥ ४ ॥ नीति निपुण तुम तात प्रचीना, कह नाथा सो सब कह दीना। एक बात कहूं भ्राते ? सुनले मेरो मैया || अ० ॥ ५ ॥ -सवैया- वणा घाट लंघणा, नदी परवतने नाला । वन है बेटा विषम, पंथ चलणा है पाला । जहर भूख काटणी, गुणे दिन किसा गिणीजे, कहै मात 'कौशन्या' श्रवण दो भ्रात सुणीजे ॥ दन्ती चाराह नाहर रहोजो तिण ठौर मावता, रे पुत्र ? घणी मिल राखजो इण जनक सुतारा जावता ॥१॥ ढाल क्षेपक पूर्ववत् जनक मृता की रक्षा कीजे, गम कई मम कथन करीजे, नियको मम मा मत मेजीजे, नारी मग दुःख पाने । सुनले मेरी मैया 11 अ०॥ ६॥ 'शार्दूल' शिप्य मुनि 'रूप' सुनावे, रघुपतिजी सामावे, मो आगे जतलाते । मुनले ।। ७ ॥ (गोम्बामी , कृत, गमायण में से) मय, कीन्ह मातु परितोप । का.कर माताको ने बनमें •ऋडि प्रिय m -- अर्थ- । पुनः जानी गमचन्द्र दोप के गुण लगे।
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१३६ ) लगे प्रबोधन जानकिही, प्रगट विपिन गुण दोष ॥१॥ चौपाई-आपन मोर नीक जो चहहु. वचन हमार मान पर रहहु आयसु मोरि सासु सेवकाई,सवविधि भामिनी भवन भलाई -(चोपाई )- १ में पुनि करी प्रणाम पितुवानी,वेगि फिरव सुन सुमुखी सयानी ॥ दिवस जात नहीं लागहु चारा, सुन्दरी ? सिखवन सुनहु हमारा ।।२ जो हठ करहु प्रेम चश वामा, तो तुम दुःख पावहु परिणामा ।। ३ कानन कठिन भयंकर भारी, घोर घाम हिम वारी यारी ।। ४॥ १ जो अपना और हमारा भला चाहो तो हमारा वचन मानिके घर रहो। मेरी पाना है सासु की सेवा करनी चाहिये, हे प्यारी ! सव प्रकार से घर में रहने से भलाई होगी। १ और में पिताकी श्राजा प्रमाण करके है सुमुखी १ सयानी जल्दी लोट के श्रावूगा ।। १ ।। दिन जाते देर नहीं लगती है सुन्दरी ? हमारा सिखा- ना सुनो ॥२॥ जो तुम प्रेम से इस समय हठ करोगी तो परिणाम में दुःख पायोगी ॥३॥ वन कठिन और भयंकर होता है। मार्ग मे कठिन धूप जाड़ा पानी वायु से कष्ट होता है ।।४॥ मार्ग में फुश कांटे कंकर होते हैं, सवारी पर चले तोभी वनता पर सो भी नहीं, पांव २ चलना होगा, सोभी विना जूते के ॥ ५॥ तम्हारे चरण कमल उज्वल और कौमल है, और मार्ग भी समान नहीं किन्तु अगम है, और बड़े २ पर्वत दूसरा चढाव उतार ।। ६ । कन्दर पर्वत की गुफा नदी नद नाले बड़े अगाध है। जो निहारे नहीं जाते, पर्वत प्रगम है दहां जाना कठिन है ।। ७ ॥रोध चीता भेडिया सिंहो के नाद मुनके धीरज नहीं रहता ॥८॥ भूमि मे सोना वृक्ष की त्वचा भोज पत्रादिक का पहरना, भोजन मूल फलकंद, कंद वर्तलाकार मून लम्या सोभी क्या मदा सव दिन मिलते है किन्तु जब जिसका समय होगा नव मिलेंगे ॥ १॥ राक्षस मनुष्यों का भक्षण करते हैं, कोटी प्रकार से पट वेप धरते हैं ॥१॥ पहाड़ का पानी बहुत लगना है, है प्यारी यन को विपनी वखानी नहीं जानी 1100 विकराल सर्प घोर भयानक पत्नी और गजल बहुत से नर नागयों को चुगने हारे होने हैं ।। ३ ॥ धोर पुरुप भी वन को सुधि आने से डरजाते हैं. है मृग नयनी ? तुमनो म्यानाविव हग्ने द्वारी हो॥४॥हे हममगनी ? तुम चन के योग नहीं हो, सुनने लोग मुझे अपयश देगे॥५॥ एक तो राह कठिन ? (१४०) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । कुश कंटक मग कंकर नाना, चलव पयादे विनु पद त्राना ।। ५॥ चरण कमल मृदु मंजु तुम्हारे, मारग अगम भूमिधर भारे ॥६॥ कन्दर खोह नदी नद नारे, अगम अगाध नजाहिं निहारे ॥ ७॥ भालु वाघ वृक केहरी नागा, करहि नाद सुनि धीरज भागा ॥ ८ दोहा-~भूमि शयन वल्कल वमन, अशन कन्द फल मूल ॥ तेकि सदा मब दिन मिल ही समय समय अनुकूल ॥१॥ -(चोपाई)- नर आहार रजनी चर करही, कपट वेप विधि कोटिक घरहीं ॥१॥ लागई अति पहाड़ कर पानी. विपिन विपत्ति नहीं जाय वरवानी ॥२॥ व्याल कराल विहंग वन घोरा. निश्चिर निकर नारि नर चोरा ॥३॥ डरपहु धीर गहन मुधिआये, मृग लोचनी ? तुम भीरु सुभाये ।।४। हंमगमनी तुम नहीं बन योग, मृनि अपयश मोहि देह हि लोगू ॥५॥ मानम मलिल सुधा प्रतिपाली. जियई कि लवण पयोधी मराली ॥६॥ नवरसाल वन विहग्न शीला, मोहकी कोकिल विपन करीला ।। ७॥ रहह भवन अम हृदय विचारी, चन्द्रवदनी दुःखकानन भारी ॥ ८ ॥ (जानकीरवाच) दोहा-प्राण नाथ ? कम्णा यतन सुन्दर मुखद मुजान । तुम विन रघुकुल कुमुद वियु.? सुरपुर नरक समान ॥१॥ ( चापाई) भोग रोग मम भपण भास, यमयातना सरिम मंमारू । प्राणनाथ तुम चिन जगमांही, मो कड़े मुग्यद कहत हूं कोई नांहीं ॥१॥ जिय विनु देह नदी विन वारी, नैसिय नाथ पुम्प चिन नारी । : तुम्हारे. शरद विमल वियु बदन निहारे॥२॥ नगर वन, बलकल विमल दुकृल । पर्ण . दो आऊंगी। सुख पाऊंगी ॥ ।
um/ MA श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। (१४१) थाके चरण कमल चाएंगी, श्रमभये पवन डुलाऊंगी । नयन चकोर निमुख मयंक छवि, सादर पान कराऊंगी । जो हठि नाथ साथ नहीं लेहो तो सङ्ग प्राण पठाऊंगी। तुलसीदास प्रभु विन जीवन, रहै क्यों बदन दिखाऊंगी ॥१॥ मेवाड़ी मुनि चौधमलजी कृत. डाल क्षेपक तर्ज-वीडो मत झेलो तथा तजदीये प्राण काय० मेरे सङ्ग मत आ, सीना बहु दुःख पायोगी ।। टेर ।। वनमें कार घणो है प्यारी, फिर पाछे पछताओगी । रात अंधेरी होगी वहां पे, कौनसे जतन का प्यारी दिवला-जलाओगी ॥ मेरे ।। १ ।। खट्टे कडवे बनफल मिलसी. सो कैसे तुम खाओगी। दूध दही मावा मन गमता, ये चीजो वनमें प्यारी कहो कहां से लाओगी ।। मेरे ॥ २ ॥ यहां फूलों की सेज मुहाली, वहां पर घास चिलाओगी। शेर रिच्छ क्षुद्रिक जीवो को. जो तुम देखोगी सीता अती डरपाओगी ।। मेरे ॥ ३॥ वहां नहीं म्याना और पालखी. पैदल पन्थ कटाओगी । कुश कङ्कर से पग फूटेगे, क्षिण क्षिण नासित हो प्यारी रुदन मचाओगी । मेरे ॥ ४ ॥ रतन जडित गहना विस्तर यहां. जो चाहो सो मंगवाओगी । भोजपत्र वहां धारण करके, कैसे इस दिलको प्यारी धीरज बंधाओगी ।। मेरे ॥ ५ ॥ ना कोई संगमें दासी दास है, किनपे हुकम चला- ओगी । चको चूला जल झाड़न की, ऐसी मुशीवत कैसे शिरपे उठाओगी ।। मेरे ॥ ६ ॥ यहां पर बहुत सहेलियो विचमें, बेटी मोज उडाभोगी। यहां टपरी में मदा अकेली. कैसे रह करके प्यारी दिवस विताओगी। मेरे ॥ ७ ॥ माता कौशल्या मंग नहीं प्यारी, किनको कए सुनाओगी । यो सोची घर हो मलूणी थोड़े ही दिन में पीठी मुझे मिल जाओगी ॥ मेरे ॥ ७ ॥ (जवाव भीमती सीताजी का चाल पर तर्ज-पूर्वोह ! मुझे संग लेलो. प्रभुजी पीछे मरजाऊंगो ॥२॥ जो जो आता आप करोगे, मो मर भीग चहाजंगी।
(१४०) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । कुश कंटक मग कंकर नाना, चलव पयादे विनु पद त्राना ॥५॥ चरण कमल मृदु मंजु तुम्हारे, मारग अगम भूमिधर भारे॥६॥ कन्दर खोह नदी नद नारे, अगम अगाध नजाहिं निहारे ॥ ७॥ भालु वाघ वृक केहरी नागा, करहि नाद मुनि धीरज भागा ॥ ८॥ दोहा-भूमि शयन वल्कल चमन, अशन कन्द फल मूल । तेकि सदा मब दिन मिल हीं समय समय अनुकूल ।।१।। -(चोपाई)- नर आहार रजनी चर करही. कपट वेप विधि कोटिक धम्हीं ॥१॥ लागई अति पहाड़ कर पानी. विपिन विपत्ति नहीं जाय वरवानी ।।२।। व्याल कगल विहंग वन घोरा. निश्चिर निकर नारि नर चोरा ॥ ३ ॥ डरपहु धीर गहन सुधिआये, मृग लोचनी ? तुम भीरु सुभाये ॥४॥ हंसगमनी तुम नहीं बन योग. मुनि अपयश मोहिं देह हि लोगू ॥५॥ मानस मलिल सुधा प्रतिपाली. जियई कि लवण पयोधी मराली ॥६॥ नवग्याल वन विहग्न गीला, सोहकी कोकिल विपन करीला ॥७॥ रहद् भवन अम हृदय विचारी, चन्द्रवदनी दुःखकानन भारी॥८॥ (जानकीम्वाच) दोहा-प्राण नाथ ? करुणा यतन सुन्दर सुखद सुजान । तुम विन रघुकुल कुमुद वि.? मुरपुर नरक समान ||१|| (चौपाई) भोग गेग मम भपण भारू, यमयातना सरिस मंमारू । प्राणनाथ तुम बिन जगमांही, मो को मुग्वद कहत हूं कोई नांहीं ॥१॥ जिय बिनु देह नदी विन वाग, नैमिय नाथ पुरुप विन नारी । नाथ मकल मुख माथ तुम्हारे, शरद विमल विधु वदन निहारे ।।२।। दोहा-खग मृग परिजन नगर वन, बलकल विमल दुकूल नाथ माथ मुर मदनमब, पर्ण शाल मुखमूल I ? || -नज-लावणी- कृपा निवान मुजान प्राण पति, मङ्ग विपिन हो आऊंगी। गृहने कोटी मांतो मुख मारग, चलन माथ सुन्न पाऊंगी ।। - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। (१४१ ) थाके चरण कमल चाएंगी, श्रमभये पवन डुलाऊंगी। नयन चकोर निमुख मयंक छवि, सादर पान कराऊंगी ।। जो हठि नाथ साथ नहीं लेहो तो सङ्ग प्राण पठाऊंगी। तुलसीदास प्रभु विन जीवन, रहै क्यों वदन दिखाऊंगी ॥१॥ मेवाड़ी मुनि चौथमलजी कृत. ढाल क्षेपक तर्ज-वीड़ो मत भेलो तथा तजदीये प्राण काय० मेरे सङ्ग मन आ, सीता बहु दुःख पावोगी ॥ टेर ॥ वनमें कष्ट घणो है प्यारी. फिर पाछे पछताओगी । रात अंधेरी होगी वहां पे, कौनसे जतन का प्यारी दिवला-जलाओगी । मेरे ॥१॥ खडे कडुवे वनफल मिलसी. सो कैसे तुम खाओगी । दूध दही मावा मन गमता, ये चीजां वन में प्यारी कहो कहां से लाओगी ॥ मेरे ॥२॥ यहां फूलों की सेज सुहाली, वहां पर घास चिछाओगी। शेर रिच्छ क्षुद्रिक जीवो को. जो तुम देखोगी सीता अती डरपाओगी ॥ मेरे ॥ ३॥ वहां नहीं म्याना और पालखी. पैदल पन्थ कटाओगी । कुश कार से पग फूटेगे, क्षिण क्षिण नासित हो प्यारो सदन मचाओगी ॥ मेरे ।। ४ ॥ रतन जडित गहना विस्तर यहां, जो चाहो सो मंगवाओगी। भोजपत्र वहां धारण करके, कैसे इस दिलको प्यारी धीरज बंधाओगी ।। मेरे ॥ ५॥ ना कोई संगमें दासी दाम है. किनपे हुकम चला- ओगी | चको चूला जल झाड़न की. ऐसी मुशीवत कैसे गिरपे उठाओगी ।। मेरे ॥ ६॥ यहां पर बहुत सहेलियो विचमें, घंटी मोज उडाओगी। वहां टपरी में मढा अकेली. कैसे रह करके प्यारी दिवस विताओगी ।। मेरे ॥ ७॥ माता कौगल्या मंग नहीं प्यारी, किनको कष्ठ सुनाओगी । यो सोची घर हो मणी थोड़े ही दिन में पीली मुझे मिल जाओगी । मेरे ॥ ७ ॥ (जवाब श्रीमती सीताजी पा-डाल नेपक तर्ज-पूर्वोह } मुझे संग लेलो. प्रभुजी पीछे मरजाऊंगो ॥टे॥ जो जो आज्ञा आप फरोगे, नो सर नीश चहागो ।
(१४२)
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड ।
किसी तरह का कष्ट पड़ेगा, मैं नहीं घबराऊं सब ही शिरपे उठा-
ऊंगी ॥ मुझे ॥ १ ॥ प्रभु प्रसादे वनफल भी. खादिम कर खा
जाऊंगो । किसी बात की हठ करके में, सुनीये प्राणेश्वर तुमको
कभी न सताऊंगी ॥ मुझे ॥ २ ॥ मैं सखियन में सुख नहीं
पाउं, निश्चय कर संग आऊंगी। नाथ आपका दर्शन देखी, स्वर्ग
भवनसी साता हिरदे वसाऊंगी । मुझे ॥ ३ ।। शीत ताप की
सहन फरूंगी, मैं विस्तर नहीं चाऊंगी। सदा हर्ष दिल होकर
रहूंगी, क्षण भर भी प्रभुजी तुमसे कभी न रीसाऊंगी । मु. ४॥
तीन लोक की सम्पत समझू, जो पति देव रीझाऊंगी । मैं दुर्ल-
क्षणी नारी नहीं हूं, जो के पल पल में पियु का कलेजा जला-
ऊंगी ॥ मु० ॥ ५ ॥ पल्ले लागी प्रभु ! आपके, सङ्गमें शोभा
पाऊंगी। दया दृष्टि करीये चेरी पे. मेरी व्यथा की चिन्ता कभी
न जताऊंगी।मु० ॥ ६॥ प्राणनाथ के पदपंकज में, सुख
दिवस विताऊंगी । वनही नन्दन वनमा मेरे, यस्ती क्या सुर
नगरी की परवा न लाऊंगी ।। मु० ॥ ७ ॥ उभय वंश विख्यात
करन को, पतिव्रत पूर्ण निभाऊंगी । तन छाया के तीर्थ करके
जग महिलाओं का सच्चा स्वरूप दिखाउंगी मु० ॥ ८ ॥ चरण
मरण की दाश होयके, सदैव सैव वजाऊंगी । चौथमल्ल कहै
मीना गोली, मदाही चरण में प्रभुजी शिरको झूकाऊंगो ॥ मु०९।।
ढाल मूलगी
पगे लागी वहो लाविया माताजी ने गय हो ।
टेई दिलामा लोकने, 'गवयजी' बन जाय हो । गम ३८ ॥
दाल भली वावीगमी, 'गम' हुवा बनवाम हो ।
'कागज' शुम कर्म थी, होसे लील विलाम हो || राम ॥ ३९ ॥
मुनि श्री रूपचंदनी कृत. ढाल क्षेपक तर्ज-पपैया काहे मचावत शोर.
अवध की जनता मचावत शोर, 'गम' गये हमें छोर | टे ।।
हाय विहाय गये रघुवरजी, मानी नहीं प्रभु तनिक भी अग्जी ।
करके हृदय कठोर, अवध की जनता मचावत शोर ॥ १ ॥
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ~~ भ्राता भक्त लिछमनजी भारी, राज्य वैभव तज महिल अटारी। चाले वनकी और ॥ अवध की जनता मचावत शौर ॥२॥ सुन्दर कोमल काया वाली, सापिण सीता पियु संग चाली। शीलवती शिरमोर ।। अवध की जनता मचावत शौर ॥ ३॥ मानवनय सहर्ष सिधाये, मनमें सोच जरा नहीं लाये । क्षत्रिय कुल के तौर ।। अवध की जनता मचावत शोर ॥४॥ अटवी कंकर कण्टक वारी. तीनों मानव पाय विहारी । कैसे सहेंगे दुख धौर ॥ अवध की जनता मचावत शौर ॥ ५ ॥ कहो हमें गुन्हा क्या कीना, वतन प्रेम युगपत् तज दीना । तीनों गये चित्त चौर ।। अवध की जनता मचावत शौर ॥ ६॥ निर्भय निडर 'शार्दूलसिंह' जैसा, वनकर वन गये मिलना ऐसा। होगा कर करो गौर ॥ अवध में जनता मचायत शौर ॥ ७ ॥ पाछा रघुवर जल्दी आसे, तजदो सोच 'रूप' मुनि भासे। जाप जपो निज भोर ।। अवध की जनता मचावत शौर ॥८॥ -~~-क्षेपक ढाल मूलगी- सकल मिल पाछा ही जावे. 'राम' का गुण मुख मर गाथे, नर सब 'अयोध्या आवे. चित्त नो प्रभुजी ने आल्या, 'रघुपति' बन वासे चाल्या ॥ सत्य व्रत पालो ॥४६॥ दोहा (जयतशी रागे) गांव गांव ना ग्रामपती, करे घणी अग्दाम । देव ? इहां थानक करो, एछे तुम्हारो वाम ॥१॥ 'राम' न माने चातए, नाल्या ही बन जाय । गांव नगर पुर पाटणा, किहां ही न रहाय ॥२॥ राज्यन झाले भग्तजो. आमोशी निजमार ।। 'राम' अने लक्ष्मण तणो. विरह खम्यो नविजाय ॥३॥ चारित्र ने उतावलो, राजा दशरथ ताम || 'सामन्त मंत्री मोकले पोलायण श्री गम ॥ १॥ पश्चिम दीसे जानां थको. आधी पहोंच्यो गह ।।
AA- (१४४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । करी घणी अरदास पिण. 'राम' नमाने तेह ।। ५ ।। पाछा वाले रामजी', ओ पाछा नवलन्त ।। जाणे कदीही वावडे, तेहथी साथ चलन्त ॥६॥ -ढाल-तेवीशवीं-तर्ज-झकड़ीनी- आगे जातां रे अटवी आवही, नरनवी दीसे अधिक डरावही, डरा- मणी अटवीए माहै चाले नई छेरे विहामणी, उहां उभो होई भाखे अयोध्या पुरनो धणी. 'सामन्त मन्त्री' घरे जावो कट्व छे आगे घणो, कुशल केजो माय बाप ही आजताही अमतणो॥ १ ॥ भाई भरतने' हम करी मानजो, तातसरीसोरे सही करी जाणजो।। जाणजो भाई भरतजीने. आंतरो कोई मत करो बाप जाया सहु मरिसा पाट पतीतो ए खगे। मामन्त मंत्री ऊहां रसीया आंखे आंमृ ढालवे. धिक् जमारो माहगेरे राम तजी घर चालवे ।। २ ।। तीने माणस तेही तगंगिणी. ऊतरियों रे उंडीथी घणी । घणी ऊंडी नदी ती तरीने कांठो ग्रहै । 'सामन्त मन्त्री' दृष्टि मांडी मामां देसीने रहे॥ 'गमजी' आगे पधारीया दृष्टि थी अलगाटल्या, मामन्त मंत्री घरे आव्या, गय दशरथ ने मिल्या ।। ३ ॥ 'राम' न आवे भग्त वोलावीयो गाना 'दशरथ गिर डोलावियो ।। डोला- वीयो दशग्थे मस्तक, 'भरत' { भाग्य भलू. गज्य पालो आति टालो, कहै नृप उतावलूं ।। भग्त' भाग्वे राज्य न करूं, कोड़ी वाने एक है, 'राम' आणू प्रेम ठाणूं करूं विनय विविकाए ॥ ४ ॥ गणी 'कैकेयी' आवी भाग्वेए. गज्य न चाले रे 'गधव' पाग्वेए । पावेए 'गव' गज्य न चाले, गय मुं आवी कहै. भगत ने तो गज्य देतां वाच बग्नी निग्य है ।। गज्य अर्थी भग्त नहुवे, गम तेही करी, गज्य आपी मृदृह थापी आप ग्रहो मंयम मिरी ।। || अणर विमाम्यो मैं कीयो बगे. अपया लीयो जग अनि आकगे ।। आगे में लीयो अपयश कानको मिर्गयो नहीं, नीनही त्रिय गेन मुगतां हैयु फाटे छे मही ।। भग्न म हूं आज जाई कर बीनती कोडप.'गम लक्ष्मण मती मीना आणी मुरबहोडए॥६॥ * . - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१४५) क्षेपक तर्ज-चन्द्रायण (भरतोवाच) बुद्धि तुम्हारी मात वात में कहा करूं, कर्म उदे बलगन राज्यकू में गहूं। चली आवी ततकाल राम हर लेनकू कीधो माय परमाण भरत के वैनकू।१ ढाल क्षेपक तर्ज-आसावरी-श्री विनयचन्दजी कृत तेरी मत कहांगई कैकेयीमात ? हिताहित ज्ञान नहीं तिल मात टेरा। भरत रीसाय कहै सुन मैया, निपट विगारी ते वात । कुजस होय रहो जग सारे, कानों सुणीयो नहीं जात ॥ तेरी १॥ कहा कह तोय दोप नहीं तेगे, निटर त्रियानी जात । तुं जाणे नृप करूं भर्त ने, सो हमळू न सुहात ) तेरी २ ॥ राज्य धुरन्धर श्री रघुनायक, ताविन में अकुलात । उनळू तें वनवासे पठायो, दहन हमारो गात ।। तेरी ३ ।। विनय करी ल्याव रघुपति ने, अव ही चलो हम साथ । चिनय चन्द कहै हेतु भग्त को, अजहूं लोक सरात ॥ तेरी ४ ।। दाल मूलगी अनुमत दीसे मुजने आजए. अबही चालू कन्या काजए। काज करवा अवही चालं, भरत ने मंत्री सरू, माथ लेई वेग चाली जोत गवी ग्थ वरू। दिवस छठे जाई पहोंच्या देखी हो तरुवर तले, राम लक्षमण सती सीता दरहिथी अटकले ॥ ७ ॥ क्षेपक (चद्रायण) रामचन्द्र हरि पास चले है कैकई, भरतमणी लर्ड संग खोज उनको वहीं। उडती देखी गोरद जानकी कहै नवे, भय ऊपज्यां मनमांय 'राम' 'हरि' म लवे॥१॥ दोहा-कई राम सू जानकी, सावधान होय धोर । क्यों नचि चिन्ता आपको, आई फोज गम्भीर ॥१॥ राम उठ्यो हग मण्डले, ले हाथै दृधियार | देख पता का भर्न की, उग्में उपज्यो प्यार ॥२॥ आई सवारी भरन की, तुग्न ही वेग मनार । घणी पंप मिल वातणी, आनन्द अंग न माप ।।३ (१४६) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ढाल मुलगी रथथी उतरी रे आगे आवए, वत्स वत्स करती अति सुख पावए । पावही अति मुख आवी सन्मुख, 'राम' जी पगे लागीयो, चंबी शिर छाती लगायो, प्रेम अधिको जागीयो सुमित्रा सुत सती सीता, करे तब परणामए, हैये धरिया नेह भरिया पूछियो सुख- नामए ॥ ८॥ भरत भली पर पगे लागी रह्यो. श्री राधवजी' सुख अधिको लह्यो । सुख लह्यो अधिको चांह गलेमें, घालवे आप आपणी, आंख आली वहै चाली भरतजी भाई तणी ।। कुशल वात विशेष विवरी पूछि ही परगट पणे, आज छे अति खामिजी ने सो मन निजरे निरखणे ॥९॥ अभक्तनी परे रे मुजछां डीकरी, क्यूं रे पधार्या वन में संचरी । संचरी आया वन मांहै, वेग तुम रघुपति, कपट केल वणी रे मांही हूं न समझू छू रती ।। गाय ब्राह्मण वाल अबला मारवानो पापए, अब मोही लागो झूठ कहूं तो भरत भाखे आपए ॥ १० ॥ ढाल क्षेपक मूलगी 'भतर' पिन आग्रह अति करतो, चरण विच शीप ही धरतो, विनय को भाव अनुमग्तो । पतिन की वीनती मानों, प्रभु थे पान सर्व जानो ॥ सत्य व्रत पालो ॥४७॥ स्वामी श्री नथमल्लजी म. कृत ढाल क्षेपफ तर्ज-यामावरी पद प्रभु किम जावो छिटकाई, हाथ जोडने अर्ज करूं एमी किन कहो दीनी साई । टेर ॥ तुम बिन मनी मर्व अयोध्या, बोले भग्त माई ।। अबतो मानों हमागे केणो, केम आये छो रिसाई ।। प्रभु ॥ १॥ रोवत दामी दाम मखीजन, गेवत निज माई ॥ रोक्त मगरी नगरी देखो, भाग्बू कर नग्माई ॥ प्रभु ॥ २ ॥ प्रमुजी पाछा ही चालो, क्यों गमायने वनमें पधाया मो परहे मुस घालो॥टेर॥ प्रभू दर्शन चिन बड़ी पट्मामा, तुम दर्शन मुझ व्हालो ।।
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१४७) विरह व्यथा में साच कहूं मैं, होगयो हूं कालो । प्रभु ॥ ३ ॥ राजगादी तुम चिन नवि शो मे, परतज्ञा मति झालो ।। हमको कारागृह में देकर, पादो विपको प्याको ॥ प्रभु ॥ ४ ॥ क्यूं प्रभुजी तुम हमको छोड़ो, मैं तुमचो व्हालो ।। जम्पे भरत नरेश्वर इणपर, मुजरो म्हारो झालो || प्रभु ॥५॥ -( ढाल मूलगी)- आय अपूठोरे राज्य करीजीए, लोका केरी आरती हरीजीए । हरीजीए आरती लोककेरी, राज्य वापही परिहयो, तुम छतां पुत्रे राज्य सर्ने भरत भाखे गह गह्यो || मंत्रीशर लक्ष्मण-पोलिओ छत्रधारक तोल हूं, राजाधिराज 'राम' राजा भोगयो पृथ्विी सहु ॥ ११॥ कैकेयी कहैरे राधवजी सुणो, भाई भक्तों रे भरत अछे घणो । अछे भक्तो भरतकेरो वोलतो अब मानीये, मायनी मनुहार म्होटी जाणी अधिक न ताणीए ॥ जनक दोप न दोष भरत ही दोप ए छे माहरो, त्रिया स्वभावेमें कुभाने कीधो अविनय ताहरो ।। १२ ॥ नारी सहेजे क्लेश करी कही, परधर भंजवाने रे ऊमही । ऊमही अधिकी करण भण्डु, दीयो दुःख राजा भणी. अपराजीता ने सुमित्रा ने करी अति खीजामणी ॥ कुल रीति लोपी घणं कोपी एह अवगुण मायना, होई सायर सहो सघला सुणो नन्द सुरा- यना ॥१३॥ दाल क्षेपक मूलगी राणी कई अवगुण है मेरो, विचारो विरुध अप तेगे, अयोध्या नगर है नेरो । भर्त ए राज नहीं लेवे, लोक मुज धुरकारा देवे, ॥ सत्य व्रत पालो ।। ४८॥ बाल क्षेपक तर्ज-यामावरी पद- नंदन थे मानो वात म्हारी, अरज करूं अति गरज दीन स्यो चित्त में धारी ।। टेर ॥ १ भरत कहे के के लक्ष्मण समारो प्रधान पोलीयो बारपाल) बने शनु छत्र धारण करनारो धसे । (ला शान)।
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(१४८) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड ।
कैकेयी को सुन पुत्र हमारे, काम कियो अविचारी।
तुच्छ बुद्धि कामन की दाखी, थे छो बडे अवतारी ॥ नंदन १॥
राज भार तो भरत न झेले, छे आज्ञाकारी ।
फिट फिट लोक कहै सब हमने, आप जीते हूं हारी' ।। नंदन २॥
ढाल मूलगी
एम कहैतीरे आंसू नाखेए. वली वलीरे वारु भाखेए ।
भाखेए वार वचन चारु कोन माने रामजी, तात दी— राज्य
भरत ही माखे मुज अभिरामजी, तात जीवे हूंही जीवू चोल क्यूं
लोपायजी. वाप भाई कह्यो करयो सही सूं सुण मायजी ||१४||
स्वामीजी श्री नथमलजी कृत. ढाल क्षेपक तर्ज-जातरी गूजरणी
राम कहै मुण भाई एम, तूं राज्य न लेवे केम, मैं तुझने दीपो,
राज अयोध्यानो एहटीको तो कीघो ।। टेर ॥
प्रथम तातनो यचन लोपाय, मुझने वेला थाय || में ॥ १ ॥
लक्ष्मणजी पिण इमही भाखे, आ तात मातनी साखे । में ||२||
सीता पास मंगावे नार, टीको करयो है वडवीर ॥ में ॥३॥
ढाल मूलगी
सीता आण्योरे जल सुविवेक ही, राम करेंरे भलो अभिपेकही।
अभिषेक कीधो नाम दीधो भग्त भलो भृपालए, सामन्त मंत्री
साब गखी मेटीयो जंजालए | पाय प्रमणी भरत भूपति भला-
मण परजा भणी,
ढाल क्षेपक तर्ज-कव्वाली
कई श्री 'गम' भग्त ताई, भैया बात सुन लीजे ।
वंट के अवध की गादी, अढल इन्साफ ही कीजे ॥ १ ॥
यत' शिग्यरणी छन्दम-क्षेपक
। पर मी मानेव, कचिदपिन लोभो परबने ।
न मर्यादा मङ्गः, क्षणमपिन नीचे म्वमि सचिः ।।
ग्पिो गौर्य धयं, विपदि विनयं मगति मता-
मिमां पूज्यां पृथ्वी, भरत ? नितगं पालय मदा ॥२॥
भी जैन पद रामायण द्वितीय खएर। (१४) ढाल मूलगी देई दक्षिण दीशे चाल्या, नहीं हाजत अरजनी ।। १५ ।। पूरी अयोध्यारे आयो भरतए, रामादेशेए१ राज्य करन्तए । राज्य करवे लोक सुखीया, नहीं अमुख लिगारए, धर्म कर्म चलन्त अधिका राज्य तेज अपारए । देव हरिहन्त सुगुरु सेवा दयाने प्रतिपालवे, सूर्य वंशी सुजश पायो कुल नणे अजवालये १६ राजा दशरथ बहु परिवार मू, मनमा हप्यो कारज सारस् । सारस्र कारज हवे महारूं राज्य बैटू ठामए, 'सत्यभूति' मुनिन्द आगे कहै मस्तक नामिए । लेई संयम कारज सार्या ढालए तेवी शमी. 'केशराज' कडे शुद्ध नरने सुधर्म म मनसारमी ।। १७ ॥ दोहा (धोरणी रागे) चालन्तां चित्त चावयं, आणन्ता उल्लास । चित्रकूट दिन केटला, रहिया करीय निवास ॥ १ ॥ आगे जातां आधीयो, “अयवन्ती' पर देश । नियंजन थानक जई. लिये विश्राम नरेश ॥२॥ मत्यवती२ थाकी सरी, बडतले विश्राम । लक्ष्मण माथे बोलोया. ए अवसर श्रीगम ।। ३ ।। उजड थयो देखीए, अबही क्यू ए देश । कोई मिलेनो पूछिये, शंमय छे मुविशेप ॥ ४ ॥ पंथी परगट नामथी. बातों में वाचाल । आवी आगे नीकलीयो. पूछे तव भूपाल ॥५॥ टाल चौवीसमी तर्ज-धोघोडाघोजे मेला लूगडो रे।। पन्थीडा ! वान कहो धुर चेहथी. केगए उझर देश। दीसेरे दीसे छे महामणोरे, यारु मोहि विशेप रे ।। पंथी ।। १ ।। देशारे देशा 'उजेणी नगरीभलो रे, मिहोदर निहां गर रे । संडीरे खड़ी ने लियानणों रे. कोर्डगन नामो थायरं ।। पंथी ॥२॥ बजाजरे 'बजरूर्ण' नामे भलो रे. तेहने छ सामनरें। १ रामना भादेशयो । सोनाजी । ३तीकार। Homemwants --- ( १५.) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । दशांगरे 'दशांगपुर' नो राजीयो रे, गिरवोने गुणवन्त पंथी।।३।। हिंडेरे हिंडे आहीडे घणूं रे, नगणे पाप लगार रे । प्रीतज 'प्रीतिवर्द्धन' नामथीरे, दीठो तब अणगार रे ॥ पंथी ॥४॥ ऊभोरे ऊभो कायोत्सर्ग में रे, पूछे सामन्त नाम रे । किस्!रे किस्यूं करो ऊभारद्वारे,! करूं आपणो काम रे पंथी।।५।। वन में रे वन में काम किस्यो करोरे, । करूं तप उपवासरे । जेहथीरे कर्म पड़े छे पातलारे, साधीजे शिव वासरे ॥ पंथी ॥६॥ हिंसारे हिंसा दोप वतावीयारे, समज्यो तव भूपाल रे । श्रावकरे श्रावक हुचो सुन्दरुरे, जीव दया प्रतिपाल रे पिथी॥७॥ देवजरे देव नमं अरिहन्तजीरे, गुरु तो श्री सुधा साधरे । अवगरे अवरने शिर नाम नहीं रे, धर्म रतन में लाधरे ।।पंथी. ८॥ नरवररे ऋषि वांदी घर आवीयोरे, चित्त सं चिन्ते एमरे ।। कीघोरे कीधो अभिग्रह आकरोरे. नर नमवानो नेमरे ।।पंथी. ९|| राजार सिंहोदर दुःख पामसेरे, कीजे कांई उपायरे । नियमजरे नियम पले जिम आपणोरे. दुःख नवि पामे रायरे।पं.१०॥ मणीनी रे मणिनी कीधी मूदडी रे. मांहि लिखीयो नाम रे । अरिहन्तर अरिहन्त देवनो सहीरे, ए नियम पलवानो ठाम रे पिं.११॥ माथेरे माथे चहुडी हाथने रे भलो मनावे गय रे । मनम् रे पग चांद अरिहन्तनारे, आघृ काट्यां जाय रे ॥ पं. १२ ।। राजार राजा रीमा रे. जाण्यो जवए मम रे । व्हालोरे व्हालो पहने हूँ नहीं रे, व्हालो श्री मिन धर्मरे ।पं. १३॥ कोई कोई नर उपगागयोरे, आची भाख एहरे । भूपनि पूछे ने किम ए लहीर. तो फिगे भाखेतहरे पंथी. १४॥ ढाल क्षेपक मूलगी- गय कई सुपर कम पामी. सो कहे सृणीये हो म्वामी, साधर्मी भाई मिग्नामी । वात प्रभो ? आगल में दाखं, झूट नहीं साच ही भावं सन्यवन पालो ।। ४९ ॥ । - श्री जैत पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१५१) ढाल मूलगी- नगरीरे कुन्दनपुरी रलियामणीरे, तिहां वसे छे शाह रे। यमुनारे उदरे हूं मृत ऊपन्यो रे विद्युत् अंग उच्छाहरे पं. १५॥ अनुक्र मेरे यौवननी वय पामीयो रे ,लेई किराणो सार रे । नगरीरे 'उजयणी' चली आधीयो रे, करवाने व्यापार रे ।प. १६॥ वेश्या रे वेश्या कामलता अछे रे, तिणसं राच्यो सोयरे । खाधोरे खाधो धन मघलो सहीरे, रह्यो निधन होयपंथी|१७|| ढाल क्षेपक तर्ज-जल्लो म्हारी जोड रो, उदीयापुर म्हाले रे।। स्वजन मने वज्यों धणोरे. मतना वैश्या द्वार । मूलन मांनी वातड़ी, अब भुगतूं दुःख अपार ।। कहै विद्युत वाणीयो, कुण्डनपुर वासी रे ।। टेर ॥ १ ॥ निधनने आदर कुणदहै रे. जिणमें वैश्या जात । कूड़ कपट री कोतली रे, सग कियां दुःख पात ।। कहै ॥ २ ॥ वेश्या काढ्यो घर थकी रे, हूँ कह्यो जाऊँ नांय । विण कयो म्हारो धन विनारे, काज न चाले काय ।। कहै ।। ३॥ में कयो म्हारे धन नहींरे. होसे तुझने दीध । कामान्ध हो तव वश पड्यो. मैतो जहर इलाहल पीध कहटिया दाल मूलगी राजारे राजानी पटरागीनी रे. श्रीधरा ने कानरे । कुण्डल रे फुण्डल छे तेहवांगे, दे मुझने तूं आणरे ।। पंथी ।। १८ ।। तवहीरे तब भाखे भामिनी रे, कुण्डल आवे दामरे । चोरीरे चौरी करवा चालियोरे, कुण्डल लेवा कामरे पंथो।।१९।। राणी रे राणी राजसू कहरे क्यू हो उदासी भाबरे ? दशांगरे ‘दशांगपुर' नो नायकूरे, मारण केरे काजर पंधीं।२०॥ रजनी रे रजनी वैरण हुयरही रे, कदी पाम परभातरे । भाई रे भाई सुतने सहु भलारे, करे महुनो घानरे । पंधी ॥२१॥ एहिजरे पह मतु में सोभन्योरे. कुण्डल चौरी न्यारे । आव्योरे आग्यो में कहवा भणी रे, साधर्मी निमित्त साजरे।२२ - धर्म ( १५२ ) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । निसुणीरे निसुणी ए पुर राजीयो रे, कणतृण अधिक अपाररे । वातजरे वात कहता आधीयारे, दल वलनो नहीं पार रे।।पंथी।२३। चींट्योरे वींव्यो पुर पर चिहू दिशेरे, चन्दनने जिम सापरे । आवणरे आवण जावण नकोल है रे, लोकों लाग्यो पापरे ॥२४॥ राजारे राजा दृतज मोकन्योरे, भूपति पासे तामरे । मुद्रारे मुद्रा मूकी मन्दिरेरे, आवी करो प्रणाम रे ॥ पंथी ॥२५॥ भूपतिरे भूपति भाखे एटलू रे, देवगुरु विण देख रे । मानसरे मानसने नमवो नहीं रे. नियम अछे सुधिशेषरे पंथी।२६। दाल क्षेपक मूलगी राय कहे देवगुरु टाली, नमें नहीं मम्तक मुज ज्हारी, प्रतिज्ञा ऐसी है म्हारो | अवरको बात मुझ भाखो, किसी विध शङ्का मत गग्यो । सत्यवत पालो ।। ५१ ।। धर्म की दृढता मन म्हारे, मृन वंउिन ही मार, मुगसुर मच इनके लारे । प्रतिज्ञा लीधी सो साची , फदेही होने नहीं काची ॥ सत्य० ॥ ५२ ॥ ढाल मूलगी पौरुष पोल्प तो ए कोनहीं रे. धर्म तणो दृदायरे । चाकी रे नाकी कहो तिमही करूंरे, अवग्न कोई कहावरे ।। २७ ।। धमैन रे धर्म द्वाग्दे मुन्न भणी रे, धर्म करवा जाऊंगे । मांग म्हारे धर्म सनाईयोरे, धर्म थकी सुग्यपाऊरे ।पंथी|२८|| एकहीरे एकनमाने राजवी, आणे अति अभिमान रे। गेकी रोकी रयो मह लोकने रे, आरतितो असमान रे ।। २९ ।। टूटेरे लूटे देश दयामणोरे, ग्यवालो नहीं कोई रे । तेच्योरे नेहथी देश दयालजी रे, गयो मर उजड़ होई रे ॥३०॥ परे हंपण लेई टुम्बों आपणोंगे, अलगो थयो अपाररे । सल्यान याच्या मन्दिर माली यांग, नाणं दया लगार ।। ३१ ॥ भाग म्हातानी छापगे, लोकेन्हांकी पहारी रे | जावं जाई लेबाने लाड़ी रे, घामें नार दादी रे |पंथी||३२|| श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१५३) भंडूरे इंए भलामणी रे, दीठो दर्शन आजरे । देवजरे देवतरुसम देवरे, सरिय वंछित काजरे | पंथी ॥३३ ।। तेहना रे एह वचन श्रवणे सुणीरे, आणी दया दिल मांहीरे । दीधूरे रत्न सुवर्णमय सुत्रजीरे, दारिद्र हरे नृप प्राहिरे ।।३४ ॥ लक्ष्मण रे लक्ष्मण पुरमें मोकल्यो रे, तेह भूपतीनी पासरे । उत्तमरे उत्तम नर अवलोकवेरे, पाम्यो अति उल्लासरे ॥ ३५ ॥ सेवारे सेवकरूपी साचवेरे, लक्ष्मण भाखे तामरे । वनमें रे वन में वयठो अछे रे, 'सीता' शुं श्री गमरे ॥पंथी॥३६।। भूपतिरे 'लक्ष्मण जी तिहां आधीयारे, आण्या घर बोलायरे । भोजन रे, भोजन भक्ती करी भली रे, 'राम' तदा सुखपायरे॥३७॥ लक्ष्मणरे 'लक्ष्मण' जीने मोकल्योरे, राजा पासे तेवार रे । जाणे रे, एह उपद्रव टालीये रे, जग म्होटो उपकार रे पंथी।३८॥ ढाल मूलगी क्षेपक सिंहोदर पास ही आवे, भरत का दूत ही थावे. भरत का वचन सुनवावे, सुनो तुम सिंहोदर राजा, करो तुम मेरा यह काजा ।। सत्य व्रत पालो ।। ५३॥ दाल मूलगी राजारे राना आण मनावीयारे, 'भरत' भलो भूपाल रे। एहजरे एह उपद्रव सोंभलीरे, टालसे तत काल रे॥पंथी ॥३९॥ सेवकरे सेवक { अनुशासनारे, राजाजीनी जोई रे । परण्योरे परण्या पछे लाते माररे. अण परण्या सं होई रे ॥४०॥ एहिजरे सामन्तछे धुर माहरोरे, मुझ साथै गुमानरे । चांकजरे काहीने मधू जोकरेरे, तो किस्यो राजानरं पंथी।।४।। पुनरपिर पुनरपि 'लक्ष्मण' जी कह रे, दीसे कवण अन्याय रे । पालेरे पाले निथय भर्मने रे, कहै तुम्हारो शंजाय पंधी।४।। आधूरे आधू नो नरि सीचिये रे, चित्तमा आण नयाण रे । सायररे सायर अंते जाणीयेंगे. 'भग्न' भूपनी आगरे पंथी॥४॥ १ मजनपलो। Httpreme (१५४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । खीज्योरे खीज्यो राजा अतिघणरे, निसुणी भरत वखाणरे । लेईरे न्यूं नहीं जावे एहनेरे, पुरुषो वचन प्रमाणरे पंथी।॥४४|| ढाल क्षेपक मूलगी दूत है तुझने नहीं मारू, और का जोर नहीं धारूं, इसीका कुल ने संहारू, धूगं लग चाक रहै म्हारो, विगारयो नहीं कारज थारो ॥ सत्यव्रत पालो ॥ ५४॥ ढाल मूलगी 'लक्ष्मण' रे भाखे, भूपालने रे, भोलामांही भोलरे । ऊठीरे उठी आव उनाबलोरे, जोऊ थारो जोर रे ॥ पंथी ॥४५॥ स्वामी नथमलजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-अरजी सुन नेम हमारी चोले तय 'लक्ष्मण' प्यारो, देखू अब जोर मैं थारो | टेर ।। यह धर्म धुरन्धर, हतारो अधिकारो। जिणसं कोप राजा, होस्ये तुझ मुख कारो ।। धिक २ तुझ जमवारी ॥ १ ॥ स्वधर्मी यह 'भरत' के कहीये, तिण झू मदत । तिहूं खण्डाधिप भर्त' कहीजे, सहको जानन हारो ।। भने नहीं चबड़े नीहारो ।। बोले ॥२॥ कोप्यो राय 'सिंहोदर' को, बोले दून ए खारो। ग्रहो २ ए दुर्बुद्धि ने, गल हत्यो दे मागे । लक्ष्मण कहै को हसियारो बोले।३।। ' लक्ष्मण' कहै रे होर शिगेमण, क्यों आयो अन्त थागे। एम कहन्ता सुभटज घाया, ग्रहि २ निज हथियारो || दलबल अतुल अपारो घोले।४। ढाल मूलगी क्षेपक ममममी को पाजलीयो, कोप से दल सब खलबलीयो, मिहोदर कई दन ओ अलियो, इयो नहीं देख्यो में आगे, जाणे कोई जमगजा मागे । मन्य० ॥ ५५ ॥ ममग्ना सोकी मनकाग, उठे व मृमट झंझाग. पत्राव हाथ मे न्याग, लेवे वे ढालों का ओटा, अं अत्रे कादेमी पोठा ।। मन्य० ॥५६॥ दृत हो वचन कटक मान्दे. कायदो जग नहीं गवे, बोलोरा फल यो अब चाये कोई कई वादे काही, कोई कमी गौच गाडो सत्या७॥
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१५५) ढाल मुलगी आयोरे कर आडम्बर आकरोरे, आपण अयाणरे। लक्ष्मणरे ऊपाडी लीधो सहीरे, हाथीनो आलानरे ॥ पंथी ॥४६॥ नास्यारे त्रास्या विविध त्रासमु रे. नाठा जावे दूर रे । ऊछलिरे गज ऊपरथी वांधीयोरे, आण्यो राम हजूर रे ।। ४७॥ क्षेपक चन्द्रायण मनहूं सिंहोदर चात सेवकर करणकी, मन तजीये अभिमान मेट मति मरणकी । जाणो एह विचार और कछु नावने, सुख से बीते काल पाय पड इणतने ॥१॥ वचन तुम्हारो शीश हुकम परवांन है, आज्ञा है अखण्ड रामकी आण है। मोकू अपनो जाण दया चित्त दीजीये. मन मोंने सी आप भोलावण कीजीये ॥२॥ ढाल मूलगी राजारे 'सिंहोदर' पगे लागीने रे, राजन भु भावन्तरे । जाण्योरे मैं नवि प्रभुनी तुम्ह अछोरे, कां ए फल चाखन्तरे।४८ ढाल मूलगी क्षेपक मनें नहीं आपरी खबर, हुतीतो लेलेतो सवर, जोरहै 'लिछमण' को जबर ॥ प्रभुके दया दिल आवे, जानकी बन्धन छुड़वाये ।। सत्य० ॥ ५८ ॥ डाल मूलगी महागेरे खमजो ए अपराधजीरे, आपो अब आदेशरे । मांही रे माहां माहै. मन मेलबोरे, भाखे ताम नरेशरापंथी।।४९।। वन्धन रे बन्धन खोल्या हाथरे, मेलवीया नृप दोई रे । घग्घर रे घरघर पार यधामणारे, आनन्द बयों जोई सापयी।५०॥ आधोरे राज्य दीयो सिंहोद रेरे. राघवजीनी साखरे । मिटिगोरे मिटियो नम सेवक पणूरे स्वमूस जाई भावग। ५१ ॥ कुण्डल रे मांगीलीया राणीकने रे. चिधुन अगने दीघरे । सीधोरे नगरीमो अधिकागेयोरे. पंचों में पमिद्वारे॥५२ कन्यारे 'सिहोदर राजातणी रे. तीन सपा परिमापरे। - २ (१५६ ) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। आठजरे आठ अछे भूपालने रे, विवाह तणो मण्डाणपंथी५३॥ लक्ष्मण रे 'लक्ष्मण' कहै परगूं नहीं रे, वनवासो जवतांय रे । पछी रे पछी परणी सही रे, राजा निज घर जायरे पंथी॥५४॥ ढालजरे ढाल भली चौवीशमी रे, राजा राखी टेकरे । धर्मथीरे 'केशराज प्रत्यक्षपणे, सरिया काज अनेकरे ।।पंथी।।५५॥ दोहा (आशावरी रागे) रात रही श्री रामजी, मलया चलने जाम । जातां विचे आवीयो. देश सु 'निर्जल' नाम ॥१॥ तृपा च्यापी सीता भणी, तरुतले ले विश्राम। जल लेवाने कारणे, लक्ष्मण ' धायो ताम ॥ २ ॥ आगे एक सरोवरू, दीठं अधिक अनूप । जलक्रीडा करवा भणी, आव्यो छे इक भूप ॥ ३ ॥ 'कूवेरपुर' नो राजीयो, नाम 'कल्याण' सुकुमाल । 'लक्ष्मण' ने देख्यों थकां, राच्यो रूप रसाल ॥ ४ ॥ आकारे करी ओलखी, ए छे कोई नार । आमंत्रण भोजन तणो. वड़ो ग्राहूणो विचार ।। ५ ॥ सो रे कहूं जिम नहीं. भाई छे वनमांहि । मंत्रीश्वर सामन्तजे, लापा लेई उच्छाहि ।। ६।। स्नान करी भोजन भलूं. आरोगी रघुगय । यतलावे ते भूपने, सहज पणूं न छुपाय ॥ ७॥ टाल पञ्चवीशमी तर्ज-देवी सम्वी प्रभु कण्ट विराजे। आमलो रे मीतापति करो, जिहां जिहां मंचार रे । तिहां निहां ना काज ममारे, करी करी उपकाररे।। आमलो ।।?॥ कुवेरपुर ' पनि बोलीयोग. स्वामी मृणो मृविचार रे । 'बालिविन्य' गजाभलारे, पृथिवी नी भातार रे || आभलो ।।२।। गवती गगी हुई , एटले अमुर आवरं । बांबी लीयो ने गयनीरे, छोटावायो नविनाय आमलो||३||
भी जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड।
( १५७)
राणीए जाई पुत्रीकारे, मंत्रीए भाख्यो पुत्ररे ।
पुत्र पनोताथी रह्यो रे. आगेही घर सूत्र रे ॥ आभलो॥ ४ ॥
'सिंहोदर' सुत सांभलीरे, थापी वान प्रभान रे।
चालिखिल्य' घरे न आवेरे, तिहां लगे ए राजानरे आभलो॥५॥
पुरुपवेष धारी रही रे, बालपणाथी जोई रे ।
माता मंत्री वाहिरो रे, भेदन जाणे कोई रे ।। आभलो ॥ ६ ॥
वसुधा माहै विख्यातजीरे, भूप 'कल्याण' सुकुमालरे ।
मंत्री महोटो तो कयोरे, राज्यतणो रखवालरे ।। आभलो ॥ ७ ॥
अर्थ घणों असुगं भणीरे, आछू हूं आप रे ।
अर्थ तणा अर्थी नहीं रे, असुर न छोड़े बाप रे ॥ आभलो ||८||
'सिंहोदर' थी राखीयोरे, 'वज्रकर्ण' नृप जेमरे ।
असुरांथी ऊवारीये रे, बाप अमारो तेम रे ।। आभलो ॥९॥
'राम' कहै तूं तुरत में रे, पर हो मत करिश वेपरे ।
तात छोड़ाची ताहरो रे, आवेज्यों सुविशेपरे ॥ आमलो ।। १० ॥
महाप्रासाद करी लियो रे, कन्या राजा रूपरे ।
लक्ष्मणजी ने परणावीये रे, मंत्री कहै अनूपरे ॥आमलो ॥११॥
ढाल क्षेपक मुलगी
कामए प्रभुजी मुज करणो, हमांने आपको शरणो, व्याहको
होकारो भरणो ॥ प्रभो मत नाकारो दीजे. भेट आ चरणां में
लीजे ।। सत्य० ॥ ५९॥
डाल मूलगी
'राम' कहे वनवास में रे. होई आवं जाम रे ।
तब लग घर बैठी रहो रे, पछे सरमी काम रे । आमलो ॥१२॥
तहति कही दिन तीसरे रे, प्रभुजी पाछली रातरे ।
आगाने ऊठी चल्यारे, नृपे जाण्यो परभात रे । आमलो॥१३॥
नदी नर्मदा आवीया रे, विध्या अटमी जाई रे।
लोके ते या घरे. जाये चेपरवाई रे ।। आमलो ॥१४॥
(१५८) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । दाल क्षेपक मूलगी कहन प्रभु किनकी नहीं माने, चालन की यातही ठाने, सिंह कहो किस का भय माने, निडर हो तिनोंही चाल्पा, रह्या नहीं किणराही पाल्या ।। सत्य० ॥ ६० ।। -~-: ढाल मूलगी :-- दक्षिण नी दिशे अनुसरीरे, कण्ट की तरु भूरीरे ॥ माटो को दीसे नहींरे, जाये मार्ग रज चूरीरे ।। आभलो ॥१५॥ शुकना शुकन नागणेरे, नागणे घाट विघाटरे ॥ दुर्वल ने एसोचनार, वलियों उजड वाटरे ॥ आभलो ॥ १६॥ अमरोंनी सेनाधणीरे, दल बल नो नहीं पाररे ।। देग घातने नीकल्यारे. मिल गया तेणी वारे ॥ आमलो ॥१७॥ सेनाम सेनापतिरे, तरुण पणोछे नासरे ।। मत्य यती अविलोक तारे, पायो अति उल्हासरे || आभलो ॥१८॥ अम रोने नेडी कहैरे, उदालो ए बालरे ॥ धम मस करता धाईयारे, गम प्रत्ये तत कालरे ।। आमलो ॥१९॥ लक्ष्मण भाग्वे गम मरे. तुम रहो सोना पासरे ।। धनुयनाटंकारीरे, अमुर गया सब नाशरे ॥ आमलो ॥ २० ॥ सेना पति मामन्त संरे, लागो राघव पायरे ।। चरित्र मुणावे आपणोरे, आगे ऊमो आयरे || आभलो ॥ २१ ॥ "कौशाम्बी" नगरी मलीरे, "वैश्वानर” अभिधानरे ॥ बामण 'मावित्री' घणीने, जायो मुत अज्ञानरे || आभलो ॥२२॥ 'रुद्र देव' अनि मद्रजीरे, करतो करम कररे ॥ चार अन्यायाने गारे, बाजे अपजश तृरे ॥ आभलो ॥ २३ ।। चोगे करतां माहीयोरे, शूलीनो आदगरे । नो दीयो तव श्रावक, छोडाव्यो मृविशेषरे । आमलो ||२४|| मिन्याम दीवी मज भणोरे, मतकर एडयो कामरे ।। पछी मांद आवतांगे, मैं पायो विश्राम ॥ आमलो ॥ २५ ॥ पी पति पदं वोरे, नंज प्रताप प्रचण्ड ॥ " 'श्री जैन पद रामायण द्वितीय खएर। (१५६ ) कोई यन होवे सामु होरे, वर्ते आण अखण्डरे ।। आभलो ॥२६॥ बांधू राणा राजीयारे, पाडूं सघले त्रासरे ॥ आज हुवो मुज जाणजोरे, देव ? तुम्हारो दासरे ॥ आभलो ॥२७॥ अविनय कीघो आकरोरे, खमजो मुझ अपराधरे॥ भाग्य वडूं जे माहरुंरे, प्रभु तुम दर्शण लाघरे || आभलो॥२८॥ कामतणो आदेशथी रे, यो मुझ प्रत्ये आजरे । 'बालिखिल्य ने छोड़ीदेरे, पहलो करए कामरे । आमलो।।२९।। 'नाली खिल्य' ने छोडी नेरे, असुरे कर्यो प्रणामरे । 'पालि खिल्य' करजोडीनेरे, प्रणम्यो प्रभुजी रामरे॥ आभलो॥३०॥ 'राम' तणा आदेशथीरे, दीभो पूरी प्होंचायरे ।। 'कल्याणमाला' कूवरीरे, देख्योंथी सुख थायरे ॥ आमलो ॥३॥ ढाल भली पचीसमीरे, चन्दी मोचन नाम रे ।। 'केशराज श्री रामजीरे, काम करे अभिरामरे ।। आभलो ॥३२॥ दोहा (सारंगरागे) चींध्या अटवी अतिक्रमी१, मेलंतां बहुग्राम ॥ महानदी तापी तरी, उरहा आया ताम ॥१॥ प्रान्त ग्राम ग्रामों विष. 'अरुण' एहवो ग्राम ।। निर्लज ने निधन पणा, लोक वसे निर्मामर ॥ २ ॥ 'कपिल' नामे अति क्रोधियो, ब्राह्मण महा कुपात्र ।। अग्नीहोत्र-कर्माचरे, गर्वे प्रित गात्र ॥ ३॥ 'सुशर्माः सुसंदायीनी, ब्राह्मण गुणनी जाम ॥ मीठी बोली माननी, वसुधा माह नवाण ॥ ४ ॥ 'सीता' ने तृष्णा व्यापथी, पाणी पीवा काज ।। आची गयाते गांवमां. वेश पन्थोनो माज ।। ५ ।। -डाल धावी गनी-- तर्ज-धन्य धन्य सतीजी सापयोरसे राम!! 'राम' पधारीयाजी, बामण करे गेह ।। १ पोलंगी-हद यहार जई २ पायम विनाना-निशर्मा M •ntra २६० ) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ? हर दे अति ब्राह्मणीजी, आणी धर्म सनेह ।। राम० ॥१॥ सन मांड्या जु अ आंजी, देती अति सन्मान ।। जल पाणी पाईयोजी, जाणे अमृत पान | राम० ॥ २ ॥ -ढाल क्षेपक मूलगी- शर्मा' करती है अर्जी, कीजिये मोपर शुभ मरजी, विराजो रात परजी॥रामजी भर्यो होकारो, सीता तब देवे नाकारो।सत्य..६१। यसुन्दरजी कृत-ढाल क्षेपक तर्ज अरणक मुनिवर चाल्या गौवरी- युडा ? न रहीये रे मन्दिर पारके, (टेर) रहियों होत विखादोरे॥ पांतो वन वासो आदर्यो. छोड्या रसना स्वादोरे।। पियुड़ा॥१॥ सज इच्छाए रहियो अतिभलो, इण सम सुख जग नाही रे ॥ व इच्छाए सुख दुःख देखीये, शास्त्र वदेए प्राही रे ।। पियुड़ा ॥ २॥ म कहै दिन थोड़ो अछे. ब्राह्मणी भक्ती अपारोरे । गत रहीने प्राने चालम्यों, जब उदे दिनकारोरे ॥ पियुड़ा ॥ ३ ॥ ढाल मूलगी टले ब्रामण आवीयोजी, प्रगट पणेरे पिशाच । तोप करे अति क्रोधीयोजी, ताम विखरे पाच ॥ राम ॥ ३ ॥ रकोण मेले लूगड़ेजी, घर में घान्या आज | अग्नीहोत्र अपवित्रियोजी, की, काज अकाज ॥ राम ॥ ४॥ नीकल म्हाग घर थकीजी, नहीं तर तोडूं हाड | भामिनीनो? मुम्ब मांजबाजी, आयो लेई मुगड़ || गम ॥ ५ ॥ गणे आवी मुन्दगेजी, ' मीना ' गखी पूठ तो पण नटले पापीयोनी, ' लक्ष्मण ' आयो ऊठ ॥ राम ॥ ६ ॥ टाल नेपक तर्ज-अरणक मुनिवर० 'मीता' मारे ग्घुवर में कयो, नहीं रहीये इण गेहोरे । बनमा मुन्नमुंगे हिनां आपणे, वृटता अमृत मेहोरे |पियुड़ा||४॥ ढाल मुलगी पा माहीनो फेरीयोजी, उच्छालीयो आलाय । चिल्ली।
- -- श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । न्हांसण लाग्यो तेटलेजी, ब्राह्मण पायो त्रास ॥ ७ ॥ पाड़े अधिकी पीपडीजी, मिस्या लोक अपार । भेद लहीने भाखडीजी, फिट रे फिट गिमार || राम ।। ८ ॥ कीटी पर कटक एजी, करतां शोभान कोई। करुणा आणी रामजीजी, दीधो छोडावी सोई ।। राम ॥ ९ ॥ तिहां थकी चाली गयाजी, बीजी अटची मां है । काजल वरणी शामलीजी. परम भयंकर प्राई ।। राम ॥ १० ॥ जलधर लाग्यो परसवाजी, आवी गयो चौमास । पडला तले वासो बस्योजी, आणी अति उल्लास || राम ॥ ११ ॥ अधिष्टायक देवताजी, प्रभु थी पामे त्रास । ए तेहने सारे नहीं जी, हुवो अधिक उदाम || राम ।। १२ ।। 'ईभकर्ण' नामे भलोजी, जक्ष जक्ष सिरदार । जाई पुकार्यों देवनेजी. तर ते करे सुविचार || राम !} १३ ॥ भाग्य हीन सुर पापियाजी, अवसर चुक्यो एह । एतो म्होटा पाहुणाजी२, आया छे तुम्ह गेह ॥ राम ॥ १४ ॥ वासुदेव अष्टमाजी, ए अष्टमा चलदेव । महापुरुप पृथिवी विशेजी, क्यूं न करो ते सेव ।। राम ॥१५॥ नव जोनन चहुडा पणेजी, लांबी जोजन यार । कोट ओ बर कांगुराजी, ऊंचा मन्दिर सार । राम ।। १६॥ हाट भर्या बहु वस्तु सूजी, थर्यो न धन नो पार । कृप वायि पारी सूजी, शोभा विविध प्रकार । राम ॥१७॥ पुरी 'अयोध्या' सारिसीजी, 'गम पुरी अभिराम । रात्री विषे रचना करीजी, देव गणा ए काम || राम ॥ १८ ॥ ग्वामी नथमलजी कृत-टाल क्षेपक तर्ज वेमर मोना की नगरो राम की आतो नत क्षिण कीधी तैयार ॥टेर ॥ देवतणी ऋद्धि नो विस्तार. कहतां नावे पार ।। नगरी ॥१॥ अभिनय अलकापुर अनुमान. मानूं धरी ई स्वर्ग भी आन ॥२॥ १ वर्षा। १ A ( १६२) श्री जैन पदं रामायण द्वितीय खण्ड । महिल मनोहर अभिनव गोष, कर नूतन मनरी जोप ॥ ३॥ चहूं दिश चोहटा भरथा भंडार, माल किराणा अति न्योपार॥४|| पोढ्या 'लिछमन' 'सीता' 'राम', सेज सुकोमल ठाम ||नगरी||५|| ढाल मुलगी मङ्गल शब्द मुहामणाजी, जाण्यो 'राम' नरेश । नगरी नयणे निरखतांजी, पायो सुख सुविशेष ॥ राम ॥ १९ ॥ विणा धार विशेपसूजी, ईभकर्ण' वर यक्ष । दीठो ऊभो आगलेजी, सुरतरु तो प्रत्यक्ष ॥ राम ।। २० ॥ विस्मयवंत विचारीयोजी, राजा 'राम' जेवार । यक्ष कहै यो में कियोजी, वासतणो विस्तार ॥ राम ।। २१ ॥ स्वामी श्री नपमलजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-हरखी २ रे दिन अगेने लोग लुगाई, नगरी सोवनी देखे। मन्दिर माला अधिक रसाला, हर्ष घणो सुविशेषेजी ।। नगरी खूब वनीछेजी, योंका राम धणोछेजी ।। टेर ॥ १ ॥ श्री रामचन्दजी महाराज कृत ढाल लेपक तर्ज-येसर सोनाकी नगरी 'गम' की, आतो देवता कीधी तैयार ॥ टेर ।। पग पग प्रगटे नवे निधान, मुरनर किंकर समान || नगरी ॥६॥ जहां जावे वहां हुवे आनन्द. काटे पराया फन्द ॥ नगरी ॥७॥ मोवन कोट विराजे एन, पुन्यवन्त करता चैन ॥ नगरी ॥ ८॥ धर्म जैन परम दयाल, गउ ब्राह्मण प्रतिपाल || नगरी ॥९॥ दाल क्षेपक तर्ज हरखी २ रे कृया वारी अधिक मरोबर. मन्दिर मोहन गाराजी । सक्ता द्रव्य भयो निज घग्में, वरसे कश्चन धागजी नगरी॥२॥ देवता माख मुणो महुजन, चिन्नामकरो काइजी । सांगल जाग प्रमुनीक, नगरी एह बनाईजी ॥ नगरी ॥३॥ सगगन नाटिक कर गोमे, कदितां पार न आवेजी। म्वर्ग लोक मा मुख भोगवतां, मुखन काल गमावेजी नगरी।४] श्री जैन पद रामायण द्वितीय स्खएर। (१६३) -- ढाल मूलगी देव विशेष सेवा करेजी, आछो अवसर पामि । हूंछ् सेवक ताहरोजी, तुम्हें छो महारा स्वामी ।। राम ॥ २२ ॥ यक्ष पुरुष सेवा करेजी, पोपे परिगल प्रेम । राम रहै सुखमें सहीजी, पुण्य तणा फल एम ॥ राम ।। २३ ॥ 'कपिल' विप्र इन्धन भणीजी, अटवी में आयन्त । नूतन नगरी देखतोजी, 'इजरज' अति पावन्त ।। राम ॥ २४ ॥ नारी रूपे यक्षणीजी, विने पूछ) ताम । नीपावी नूतन पुरीजी, वास बसे श्री राम || राम ॥ २५ ॥ याचक ने जलधर परेजी, चरसे कंचन धार । एम मुणन्तां खलबल्योजी. ब्राह्मण लाग्यो लार ॥ राम ॥ २६ ॥ जन्म दारीद्री हूं अछूजी, एले जमारो जाय । जेम र पाम् दक्षिणाजी, भाखो सोई उपाय ॥ राम ॥२७॥ सा भाख नगरी तणाजी, द्वार अछे वर चार । रखवाला यक्षी रहैजो, कौन लिये पहसार ॥ राम ॥२८॥ नवकार भणेजे मुख थकीजी, धारे नियमजे पार । श्रावक होई जानतांजी. कोन करे भणवार ॥ राम ।। २९ ।। साधु समीपे आवीयोजी, आपण आवक होई । घरणी कीधी श्रावोकाजी, तब चाल्या ते दोई ॥ राम ॥ ३० ॥ पूर्व कधित विधि साचनीजी, राम समिपे आय । उभा ब्राह्मण ब्राह्मणीजी, कोई य न कहीणो जाय ।। राम ॥३१॥ 6 तर्ज लंगड़ी- मंत्रों का मंत्र नवकार मंत्र तंत्रों का तंत्र दरे दुःर नन का । जो लेवे धार दुवे पल में पार, परदे उद्धार पापी जनका ।। टेर ঘুষী কা মাং ঘ ঙাথা হয় বা না নিয়ে। मगलीक पाप, जयनन्त जप, दे सुसपमाप पाल्माण करन ।। मनोरथ के पूर चिन्ता पे पूर पटे पर्म कर भय टुप भजन । यदी रमाए नागदमण जाण पारस प्रधान करदे कंचन।। भाखे जिनेश रटते इमेश, टल जाये क्लेश कमरे मनराजोग dharanwer - ( १९४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ढाल क्षेपक मूलगी- 'लिछमण' ने देखने त्राठो, ब्राह्मण तव पाछो ही नाठो, एणे मुझ कूटयो तो काठो । 'राम' कह स्वाधर्मी भाई, वोलावो अभयदान दाई ॥ सत्य ।। ६२॥ ढाल मूलगी- लक्ष्मण बोलावी लियोजी. तब ते देय आशीस । दीधी बंछिन दक्षिणाजी, सफली करीय जगीश ॥ राम ॥ ३२ ॥ घरे आवी धन खरचीयूंजी, लीधो संयम भार । कारज सार्यों आपणोंजी, ए प्रभु नो उपकार ।। राम ।। ३३ ।। अब चौमासो ऊर्योजी प्रभुजी चालण हार । यक्षे दीधो रामनेजी. 'स्वयम्प्रभ' वर हार ॥ राम ॥ ३४ ॥ लक्ष्मणने तो कुण्डलेजी, ते जडिया मणि रयण | चूड़ामणी* सीता भणीजी, आपी उपजाव्यो चयण ॥राम ॥३५॥ मनना वांछित रागनजी, सम्भलावाने हेत । वीणा दीधी वेगसूजी, सघला साज समेत ॥ राम || ३६ ॥ पहीचाडी पाछा वल्याजी, देव महा सुखदाय । प्रभुनी आगे चालियाजी, नगरी गई विलाय ॥ राम ॥ ३७॥ दाल भली छात्रीशमीजी. देवकियो अनुगग । 'केशगज' मुनि भाखीयोजी, गम तणो सोभाग || राम ॥ ३८ ॥ दोहा (सिंधुड़ा रागे) मांचातां मुग्वमें मही. सांज ममें मह कोई । 'विजय' पूर्ग चलि आवीया, चामो सोधे सोई ॥१॥ नगर्गना उद्यान में, बडलो अछे विशेप । मन्दिग्ना आकार मुं, वामो वसे नरेश ॥२॥ 'मदिवस' महिमा नीलो, गना पाले गज । 'ईन्द्राणी' गाणी नपा. कहीये कन्थ मकाज ।। ३ ॥ 'बनमाला' पुत्री मली, बालपणाथी एम | मम्नसना गदना श्रीन योर .
। भी जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १६५) टेक ग्रही ' लक्ष्मण ' वरूं, अवर वरूं तो नेम ॥ ४ ॥ वनवासी श्रवणे सुणी, राजा करे विचार । कदी घर आवी परणसे, विवाह तणी एचार ॥ ५ ॥ प्रौढी पुत्री जाणिने, माय चाप परिवार । परणावे उतावली, राखी करे विकार ।।६।। ईन्द्रनगर १ नो राजीयो, 'वृपभ' गय मल्हार । 'सुरेन्द्ररूप' राजा भणी, सादीधी ते चार ।। ७ ॥ ढाल सत्तावीशमी तर्ज-सिधीकी देशी (गुरोंजी थे मने गोडे न राख्यो) 'वनमाला' ए निसुणी जाम, मनमाहै अकुलणी ताम । गत ही में वनमाहै आवे, एकाकी मरवाने दावे । वन ॥ १ ॥ बनदेवीनी कीधी पूना. लक्ष्मण टालीने वर दूजा । जन्मान्तरे पण मुझ मति२ आपे, एम कहीने मरवृ थापे ।। २ ॥ तेहीज बडले आवी चाली, लक्ष्मणजी ए दीठी साचाली । रामसु सीता सुखमें सोवे, लक्ष्मण जागे दश दिशे जोवेवना ए कोई वनदेवी दीरेरे, ए चटवसणी३ विश्वावीशे । रड़ आरोही ऊपर आई. 'लक्ष्मण' पुटे चयो धाई ।। वन ॥४॥ बनदिग् व्योमनणी सहुदेवी, मनवच काया करीने सेवी । सांभलजो प बोल हमागे, मुझने देजो लक्ष्मण प्यारो ॥ वन ।।५।। इहभव टाल्यो परभव देओ, नूं नाहरी पलिपना लेगो । एम कही नांख्यो गल पासो, 'लक्षमण देखे एह तमासो ॥६॥ अविलम्बे सोचे ने तेंने. लक्ष्मणजी भाखे नम हो । भन्ने ! साहम मकरो काचो, मोहूं 'लक्ष्मण' जाणो मानो ॥ ७ ॥ चांह साहोठी आणी, पटले जाग्या गजा राणी । 'लक्ष्मण' मह वृत्तान्त गुणावे. सीना गम महा नुन पाये ॥ ८ ॥ लझा पामी प्रभुजी निम्सी, पण गुन्दरी मनमा दरसी। १ रन्ननगर (जैन समायरी )२नी । ३ मा वमनारी। mon (१६६) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । सीता राम तणे पगे लागी, जाणे भाग्य दशा अब जागी ॥९॥ पछी 'इन्द्राणी' नृपनी नारी. नचि देखे 'वनमाला' प्यारी । करुणास्वरे ऊठी पोकारी, राजाने दुःख हुगो भारी ।। वन ॥१०॥ 'चनमाला' देखण ने राजा, चाल्यो साथे सुभट ले ताजा । प्रभुपासे 'वनमाला' देखी, राजाने अति रीस विशेपी ।वन।।११।। इणो हणो कही मचायो शौर, एछे मुझ कुंधरीनो चौर । सामों उठ्यो लक्ष्मण देवो, राय सुभट त्रास्या ततखेवो ॥ १२ ॥ ओलखीयो लक्ष्मण लामाता, राजाजी पाम्यो सुख साता । घरही आवी चाली गङ्गा. कुंवरीनो तो कर्म सुचङ्गा ।।वन।।१३॥ लक्ष्मण को वखाने डाही, बाल पणाथकी. उत्साही । अब प्रभुजी ए पुत्री परणो, एहि वाते विलम्बन करणो वन।१४ आदर अधिक मन्दिर आणे. भोजन भक्ती करी सन्माने । चामर हुवाछे वेचाओ, वर्ते सुख नहीं असुख लगारो वन।।१५॥ परन्दर पूगणी अद्भूतो, एटले एक पार्यो दूतो। अति वीर्य मोफलीयो आयो, ऊपज्यो जाणो अनि सन्तापो।।१६॥ 'निंद्यावत' नगरथी आयो गजाजी ए सो पतलायो । भग्व मंघाने विग्रहः वारु, 'अतिवीर्य सूं आज अपारु ।। १७ ११ ~ढाल मूलगी क्षेपक- लक्ष्मण को भग्नमं झगडो, थयो किन कारण ए रघडो, दूत कई मुझ म्वामी जयगे । भग्त की सेवा ही चावे. भरत पिण मन्मुख ही आवे ।। मन्य० ॥६३ ॥ दाल मूलगी- 'मग्न' पक्षे बहु भूपनि पाया, बडियू ग्वेन झंझाऊं बजाया । 'अनिवार्य' तुमने बोलाया पक्षथी बल बधत मवाया ॥ १८ ॥ काम पन्या जे सारं काम. मोई मगो जगमें अभिगम । पान पायी ज दीये टाली, नेह मगानं मुग्व क्रगे कालो ॥१९॥ मनाये पर विन्द्र, कयूं उपजिया छरं अयुद्ध । दिन । पद । ३ ममा ! - भी जैन पद रामापण द्वितीय खएछ । (१६७ ) दृन कहै मुझ स्वामी बलीयो, ए बातां में मैं अटकलीयो ॥२०॥ 'भरत' भूपति वांछे सेवा. विग्रह कारण एह लहेवा। कोई न हार्या कोई न जीतो, दोई पक्षे छे सुजश विदीतो ।।२।। अब ही आयो मुझने जाणो, युद्ध विधि सघली ठाणो । एम कही मोकलोयो तेहो, पिण राघव आणे नेहो ॥ वन।। २२॥ मूर्ख मर्म न काई जाणे, भरत भूप का अति ताणे । मुझ सहाय अधिको पामी, जीतण चाहै अयोध्या स्वामी ।।२३।। सैन्या सघली सूं हूं जावू, मित्र न जाणे तेम करावू । एह हणीने पालो आy, भरत भूपनी आण धरावू ।। वन ॥२४॥ राम कहै ए सघलो कूडो, तूं नाहरे घर बैठो रुडा । सुन सहुने देतूं मुझ लारे, ज्यूं मुझ कह काम समारे वन।।२५।। भली कही भाखो नर नाथे. सुत सगला ए दीधा साथे । 'निंद्यावर्त नगरना पासे, आधी उनरं अति उल्लासे ।। वन ॥२६॥ देवी खेत्र तणो रखवाली, राम प्रत्ये भाखे सुविशाली । कारज कोई मुझ फरमावो. जे तुमने छे अधिक सुहायोचिना२७॥ कार्य कोई नहीं मुझ नाई देवी कहै ए साचो सांई । तो पण कांई करी देखावं, नाम भणो १ लाज रहाऊं ॥वन॥२८॥ त्रियरूपे ते सघला होई, त्रियनं गज्य होवे जेम जोई। राम अने लक्ष्मण टो भाई. खो रूपे पण सुन्दग्नाई बना।२९।। स्वामी नथमलजी वृत ढाल क्षेपक तर्ज-वड़ाना रूपे रावत ॥ रामा केरे रूपे राघव, नहीं किणी रे सारं । नहीं किणोरे मारे. राघव आरती उतारे ॥ टेर । मानं अहि जिम वेणी गूंथी, चूंदड़ी अगर थारे । भाल विदीने चक्षुफजल. दीसे अधिक उदारे ।। रामा ॥१॥ नवरंग साडो भारी पेगे, पग ध्धा घमकारे। एम अनुपम धा धरणी छवि कौन ली नमु पारं ॥ गमा ॥२॥ हा दुकजा गलि भरपाई. नौपत यात नगारे। चामा अभिनय नृत्यकले, मधुवर राग उनारे ।। गमा (१६८) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । vavvvvvm पग पग लाख पसावजदेते, पोलपे आप पधारे । प्रतिहार्योनृप आगलाकर. पग लागीने पूकारे ॥ रामा ॥ ४ ॥ ढाल मूलगी, नारी साथै लीयेरे लडाई, राजाजीनी एह लघुताई ॥ निण हीमे त्रिय आगे हारे. ते अपजश पामे जग सारे ।। वन ३०॥ महिधरे एसैन्याभेजी, संग्रामे ए शूर सतेजी ।। द्वार पालेजई वातगुणाची, अतिवीर्य नृपनेरीस अणावी ।। वन. ३१ ॥ दोहा- 'महीधर तो मानीजतो, रचिते उलटी रीत ।। तुझ ऊपर करवा तुम्न, मेली नारी अनोत ॥ १ ॥ पोल ऊपर तेपाधरी, आय ऊभीछे अत्र ।। गम लाय भूपतिकहै, ताडो जाई तत्र ।। २ ।। ढाल मुलगी- भग्त' भूपने साधम, सुजग घणो वसुधा वाधनं ।। त्रियमन्याए पाछी भेजो मन्दिर नो धूर देख्यो चेजो । वन ३२ ॥ पटले एक कहै नर फांसी, महीधरेए कीघोहासो ।। वश्वानर जेमधी मीचाणो, गेमे रोमे गयनपाणो ॥ वन. ३३ ।। गमाटिक त्रियमेन्या पूरी, आवी गई नृप द्वार सनूरी ।। गय कई काढो गठेमाही, आया शूग मुभट संवाही ॥वन ३४ ॥ टाल क्षेपक तर्ज पूर्ववत- मृनन गुमट तय मांध शर आया, बोलत विना विचारे ।। रेण्टे ? यहांक्या आहे. हट जावो थे बारे ॥ गमा ॥५॥ म्नी बेगी रघु नाम पयाचे मुगजो सवमिन्दारे ॥ तुम नृपने नाग जाणी, 'महीधर गय हमारे || गमा ।।६।। तिमी मैना का मजी, एम कही गरवा ।। हम में बो नुम गट कगेगे, नो पहुंचाऊं जमद्वारे ॥ गमा ॥७॥ द्वान्न मुलगी नाग लड़े नग्नी पानी की. 'अटल' टलीने नहीं पड़े फीकी । हामी थांमो अटावे, हलधर वर्ष मार मचाये । वन ॥ ३५॥ - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१६६) डाल क्षेपक तर्ज पूर्ववत्- राघव धनु टंकार करीने, सुभटने तामनसारे । धड २ धूजत जनधवआगे चात कहै विस्तारे ॥ रामा ॥ ८ ॥ त्रिय सैना दे मार गजवकी. इण आगे सवहारे । ज्यूं वर्ने ज्यू निकटजावे. तुम ची फौज संहारे । रामा ॥९॥ ढाल मूलखी-- भाग्या लोकन लागी वारो, राजाजी हुवो असवारो। आवे खांडोकर सम्भाली, लक्षमण' जी ए लीधो उदाली वन३६॥ केशग्रही ने चांध्यो गाढो, लक्ष्मण नो मन हुवो ठाहो । भरत भूप गंडो आडा, गवराघो ए सुजश पवाड़ा । बन ३७ ।। डाल मूलगी क्षेपक- घीस कर लावे हे वारे, रामके चरणांहीपारे, लक्ष्मणकहै भरत मारे। भरतसम राजा नहीं दूजो, उन्हींका पगल्या नित पूजो सत्य६४ ।। ढाल मूलगी सीता ए बांध्यो छोडायो, गहिले बांदी गुमान गमायो। खेत्र देवी संकोची माया, जे जिमघा नैतिमही कराया ॥वन ३८॥ राम र लक्ष्मण दो ही दीठा, राजा लोयण अमिय पटा। पगे लागीने नरवरवोले. अवरन कोई प्रभुजी तुमतोले । वन ३९ ।। अष्टापद जेम सुणीयो आगे. उदकी उदकीन पग भागे। तेम मुझ मांही एहिज बीनी. गी चतकार ए भा छीती । वन ४० लाज गई निलजि कहाणो. लोको माहै लुण्ड कहाणो । प्रगट पगभवः एह सहाणो, चौर अन्यायी जेमनहाणो बनशा जलयी अलगो कोधो माछो. पाणी माहै नावे पाहो। तड़प तड़प करतो अति तेवे. पापो कारियों ने नविजीवन आंगलिये देखायो कुहलो, आपे अप मरे मनहलो । दिन २ प्रत्ये मोजावे गललो, लेई अपमान नवा क्लो १४३|| नाले जेम गन्योपाणी, एह महिनाली मति मन आगी। १द्धती-जलीने । वाटरपाल! --- ( १७०) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । वाडी? तीनकरो पाखलो राखी, कोन शके तेहनोजलचाखी वन४४ मानगया निष्टाईआया, साधु नी सेवा न सजाया । भाई पण जेहनाछे दीणा. परियण के परदेशां खीणा । वन ४५|| यौवन गयूं झूढापो भराणूं. तेहनो तो संयम नूं सराणूं। घणू घणेरो काई भाखू, अब हूं म्हारा मननी राखू ॥ वन ॥४६|| गज्य तजीने संयम पालं, जश मेलाणूं फरी अजवा- । राम कहै तू भरत सरीखो, राज्य करो हम गोल परीखो॥ ४७ ॥ 'अतिवीर्यनी' एह अधिकाई, विजयरथे थापी ठकुराई । 'सिंहगुरु' पासे संयम लीधो, समता रूप सुधारस पीयो ॥४८॥ 'विजयरथ' भगिनी मुविशाला, लक्ष्मण ने दीधी 'रतिमाला' ।। 'विजयमुन्दरी' बोजी भगिनी, 'भरत' भणो दीधी शुभ लगिनी।४९। भरत भूपनी सेवा साधी, निज घर आयो नृप आराधी । 'राम' 'विजयपुर' चलि आया, वनमालाने अधिक सुहाया||५०॥ सत्तावीशमी ढाल सुढाली, भरत भूपनी आरति टाली । 'केशगज' कहे मारं काम, मोही महोदर जग अभिराम ।। ५१ ।। दोहा (धनाश्री गगे) महीधग्ने रे पूछके, गम चाल्या उजाम । लक्ष्मणजी मूं वीनवे, सावनमाला ताम।। १ ।। प्राणदान दातारा , अवकां नजे निराश । माखे पूर्ण विलोचना, करे वणूं अरदास ।। २ ।। विवाह करी मृविशेपथी, मुझन लीजे लार । वनवासे मग्मिं रहु, होई खिजमतदार ॥ ३॥ लक्ष्मण भाग्वे भामिनी, ए अवसर नहीं कोय । इंटो हट नवि कीजीये ये विमासी जोय ॥ ४ ॥ जब फिर्ग मन्दिर आव , सेवोने वनवास । बोल हमाग छ मही. पहोंचाविस तुझ आस ॥ ५॥ पानी - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। (१७१) मुनि श्री रूपचन्द्रजी म० कृत ढाल क्षेपक तर्ज-पानीडो भरवादे प्रिय ! मत करना इन्कार, संग में चालण दो || टेर ।। पिया विना मैं घर नहीं रह , प्राण वल्लभ सङ्ग सुख दुःख सहस्रं । मैं रहस्रं प्रियतम लार ।। सङ्ग में चालण दो।।१।। महल अटारी वैभव सारा. तुम बिन परिकर लागत खारा । सूना सब संसार । सङ्ग में चालण दो ॥२॥ बड़े कठिन से दर्शन पाया, आजही आपने उह दिखाया । वाहा पाहा आपको प्यार । मड़में चालण दो ॥३॥ निशदिन मुझको विरह सतासी. ओलूं मोहन मूर्ति की आसी । हिय उमटे अनंग अपार ।। सङ्ग में चालण दो।। ४ ।। रातको नींदन भोजन भावे. तुम बिन जियडो अति अकुलावे । आवे दुःख अपार ।। सङ्ग में चालण दो ॥ ५॥ नवली सनेही किम छिटकावो, जरान करुणा दिलमें लावो । करलो व्याव अपार ।। सङ्ग में चालण दो ॥६॥ जो मुझको पियु संगन लेसो, निराधार यहांपर तजदेसो । में मरसू खाय कटार ।। संगमें चालण दो ।। ७ ।। (लक्ष्मणोवाच) ढाल क्षेपक तर्ज-मीठो खरबूजो मुनि श्रीरूपचन्दजी म० क्त सुनो सुलक्षणी नार प्यार धर यहां ही रहीजो हो, हठ मत कीजो हो । टेर॥ चनवासे संग चालण कोये, भूल नाम मत लीजो हो कथन हमारो मान आन, जिनवरकी वहीजो हो । हठ ॥ १ ॥ पाछो वेगो आ प्यारी, सोच जगमत कीजो हो। रूप कहै शुद्ध न्याय नीतिमग, मत तज दीजो हो । छठ ॥२॥ दोहा-सम विना जावा नई, रयणी भोजन पाए ।। नायो तो तुमने अछे. मानी लीयो प्रभु आप ॥ ६ ॥ दाल पठापीमामी मर्ज-सुधारन मुरली बाजे ! रामको सुयश षणो, स्वर्ग मृत्यु पाताल, रामको सुजश धणो
( १७२) श्री जैन पद रामायण द्वितीय स्खण्ड ।
पाछली राते आगे चाल्या, ओलंध्यो वन एक ।
'खेमाजल' पामी पूरी रे, दीसे शोभा अनेक ॥राम ॥१॥
ऊतरीया उद्यानमें रे. 'लक्ष्मण' वनमें जाय ।
लेई आयो फल शागजी रे, पाणी पात्र भराय ॥ राम ॥२॥
मंस्कार सीता कियो रे आरोग्या उत्साहै ।
गम नणा आदेश थीरे, 'लक्ष्मण' गयो पुगमां है ॥ राम ॥३॥
श्रवण मुणी उद्घोपणारे, महेजे शक्ति प्रहार ।
परणे पुत्री रायनीरे, नहीं सन्देह लगार ॥ गम ४॥
पुरुष एक तप पूछीयोरे, एछे किस्यों विचार ।
गघु दमन गजा भलोरे, राजानों सिग्दार || राम ५॥
'फन्यका देवी' तेहनेरे, पुत्रीतो प्रधान |
'जित पद्मा' छे नामथीरे, प्रत्यक्ष पद्मा थान | राम ॥ ६ ॥
वरनू चल मुविचारवारे, मांड्यो एह उपाय ।
आज लगे कोई नावोयोरे, जेहथी काम सराय ॥ राम ७ ॥
एम मुणीने आवीयो रे, परखदा मांही देव ।
नृप पूछे तूं कोण छे रे, ? तब बोले ततखेच ।। राम ॥८॥
भग्त भूपयूँ दूत यूँ रे. जावू करवा काज |
पग्णूं पुत्री नाहरी रे, इहां ई आयो आज || राम ॥९॥
मुनि श्री रूपचन्दजी म. कृत. ढाल क्षेपक हां सगीजी पेड़ा भावे-
हां वाले यूं लिछमन प्यागे, अछू दृत में भरत राजागे।
जातो दुजे गांव देखन आयो पुर थारो रे ।। राम ॥ १॥
डंड गे मुन इत आयो गजा ! नारी विन दुःख पाऊ जाजा ।
करतां सिवनी धून लग्यां तन बन गयो कालो रे ॥ वोले ॥२॥
मेरे काम में हो रही दंग, अट परणा दे कन्या तरी ।
'रूप' देख ले अनुपम मेगे इमो न दृना गे रे ।। बोले ।।३।।
ढाल मूलगी
शनि, वात ए मागे रे, कहे तू महिम कम ? |
एक नहीं पग पंचनी, मट्ट मारी में एम गम ॥१०॥
More श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १७३) जितपझा अनुरागिणी रे, होई गई ततकाल । लक्ष्मण ने अविलोक तारे, राची रूप रसाल || राम || ११ ।। पुत्री वरजे बापने रे, वह्य न माने रंच । ख्याल रोप दो साचवे रे, मूके शक्ति सू पंच || राम ॥ १२ ॥ दो हाथों दो बांह मेरे, एक सुदन्तों जोय । साही लीधी शक्तिजी रे, अजव तमासो होय ॥ राम ॥ १३ ॥ जित पदमा हरखी.खरी रे, पहिरावे वरमाल । राय कहै परणो सही रे, ए कुंवरी सु विशाल || राम ।। १४ ॥ लक्ष्मण कहै उद्यान में रे. वैठा छे श्री राम । छू सेवक तेहनो रे, करूं वताव्यू काम ॥ राम ॥ १५ ।। 'राम' 'सुलक्ष्मण' जाणीयारे, धनि गयो तिहां राय । लेई आयो रामने रे, परम महा सुख थाय || राम ॥ १६ ॥ भक्ति भाव पोगे घY रे, पूज्या प्रभुना पाय । तो पण आगे चालीया रे, राजा ने समझाय || राम ।।१७।। ढाल क्षेपक मूलगी- भूपति करता है अरजी, कन्या को व्याहो हित धरजी, उत्तर में चोल्या रघुवरजी । पाछा मै अयोध्या जासां, न्याव कर कन्या ले जासां ।। सत्यतन पालो ।। ६५ ॥ ढाल मूलगी- वंशस्थल गिरि उपरे रे, 'वंशस्थल' पुरी देखी। लोक भयानक देखनेरे. पूछयू पुरुप विशेषी । राम ।। १८ ॥ सो भासे प्रभुजी सुणो रे, राने अचम्भो धाय । ध्वनी ऊठे छे आकरी रे, ते लोको न समाय ॥ गम ॥ १९ ॥ राने अनेरीजायगरे, नासो जाए लोक । प्रातः हुवां घर आवडी रे, कष्ट नणो ए जोग ।। राम ।। २० ॥ रामे लक्ष्मण मोकन्यो रे, जोई आवो एह । काउसग्गमां है मुनि रे. दीटा दो गुण गेह । गम ॥ २१ ॥ देई प्रदक्षिणा यांदिया रे, नगली ही विधि माघी। - An- ( १७४) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । चीणा वजावे रामजी रे, यक्ष थकी जे लाधी ॥ राम ॥ २२ ॥ तान मान अनुमान { रे, राग तणू आलाप । लक्ष्मण लीलाए करे रे, अवसर जणी आप ॥ राम ॥ २३ ॥ रात जगावे रंग रे, होई रह्यो विनोद । साबु तणी सेवा करे रे, पामे अधिक प्रमोद ॥ राम ॥ २४ ॥ 'अनलप्रभ' सुर आवीयो रे, विकूर्वी वैताल । सायु ने मंतापवारे. जाणे कोप्यो काल || राम ।। २५ ॥ 'सीता' ऋपि पावती रे, 'राम' सुलक्ष्मण दोई । जेटले आवे मामुहारे, नासी गयो सुरसोई ॥ राम ॥ २६ ॥ मुनिवर हुआ केवलोरे, आवे सुरवर कोडी । केवल महिमा साचवे रे, पायनमे कर जोडी || राम ॥ २७ ॥ गम भणे प्रभुजी कहो रे, उपद्रव नं ए हेत । 'कुल भूपण' कहै केवली रे, निसुणो सहु सचेत || राम ॥ २८ ॥ नगरी नामे पदमनी रे, विजय पर्वत भूप । 'अमृत म्बरं मति वन्तजीरे, एक सुद्त अनूप ॥ राम ॥ २९ ॥ 'उपयोगा' तम कमिनीरे, नन्दन दोई उदार | उदित मुदिन गुण आगलारे, कुल केग साधार । राम ।। ३० ।। दन तणो इक मंत्रजी रे. ब्राह्मण के वसुभृति । आग उपयोगातणोरे, पात लिखी ए दूत | राम ॥ ३१ ॥ माची ने व्यभिचारिणोरे, 'अमृत स्वर' ने मारि । निकण्टक होई ग्वर्ग रे, मान्यू मुख मंमारि ।। राम ।। ३२॥ नृप आदेश द्न विरं, चाल्यो माग्ग दर । ब्राह्मण पण माथे लाग्यो रे, दन हण्यो बलपूर || गम ।। ३३ ।। ब्राह्मण घर आवीने माखरे, मुझने पाछो वाली । कारज कम्बा वेगहनी, आप गयो मो चाली || गम ॥ ३४॥ 'उपयोगाने दात जणाी, मलू कयु ते मोई । पुत्र दृश्या थी गग आपणी, कीजे तो मुन्न होई ॥ राम ।। ३५ ।।
भी जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड।
( १७५)
एह मतो तो ब्राह्मण केरो, रहस्य पणा थी जाणी।
'उदित' 'मुदित' दो भाईयारे, अमरख अधिको आणि ॥राम||३६॥
'उदिते' ब्राह्मण मारियो रे. आयो उदय कुशील।
इपत 'नलपल्ली' विपेरे, सोमरी हुवो भील || राम ॥ ३७॥
चारित्र लीधो रायजीरे, उदित मुदित पण संग।
अप्रति बंध पणे तिहारे, चाल्या ऋपि उच्छ रंग ।। राम ॥ ३८ ॥
विचे मिल्यो सो भीलडोरे, मारे तब अणगार ।
छोडाव्या पल्ली पतीरे मान लीयो उपकार ॥ राम ।। ३९ ॥
पल्लीपति हु तो पंखीयो रे, ए हता करसण कार ।
पारधीए पंखी ग्रह्मो रे. हुओ मारण हार ॥ राम ॥ ४० ॥
इणे तव छोडावीयोरे, पंखी थयो पल्लीश ।
कीधो लाभे आपणडोरे, एतो वीश्वावीश ॥ राम ।। ४१ ॥
उदित मुदित दो साधुजी रे, आराधी संथार ।
महाशुक्रना देवतारे, पाम्या जय जय कार ॥ राम ।। ४२ ॥
ढाल भली अठावीशमीरे, प्रश्नतणो अधिकार ।
'केशराज' पूर्वतणोरे, साधु वदे ते सार ॥ राम ।। ४३ ॥
दोहा-(मल्हार रागे)
बामण तो वमुभूतिनो, जीव भमी भनमा है।
माणस थई तापस तणू, पामी मुओ ते पाहै ॥१॥
देव हुवो पण ज्योतिपी. 'धूमकेतु' अभिधान ।
मिथ्या मतिनो वाहिओ, आणे अति अभिमान ॥ २ ॥
'उदित' 'मुदित' ना जीवते. सुरपद नजी आपन्त ।
शेप पुण्यना प्रेरिया, मनुष्य गनि पारन्त ॥ ३ ॥
'अरिष्ठ' पुरीनो राजीयो, 'प्रियचंद' भूपाल ।
'पोमाचे राणी ऊदरे, उपन्या मुत सुविशाल ॥ ४ ॥
'रनसुरधरलियामणो, 'चित्रमुरथ' मुविशाल!
नामथकी अति पर पड़ा. सुन्दग्ने मुकुमाल ॥५॥
(१७५) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। वीणा बजावे रामजी रे, यक्ष थकी जे लाधी ॥ राम ॥ २२ ॥ तान मान अनुमान सूं रे, राग तणू आलाप । लक्ष्मण लीलाए करे रे, अवसर जणी आप ॥ राम ॥ २३ ॥ रात जगावे रंग सं रे, होई रह्यो विनोद । साधु तणी सेवा करे रे, पामे अधिक प्रमोद ॥ राम ॥ २४ ॥ 'अनलप्रभ' सुर आवीयो रे, विकूर्वी चैताल । सायु ने संतापवारे. जाणे कोप्यो काल || राम ॥ २५॥ 'सीता' ऋपि पारवती रे, 'राम' सुलक्ष्मण दोई । जेटले आवे सामुहारे, नासी गयो सुरसोई ॥ राम ॥ २६ ॥ मुनिवर हुआ केवलोरे, आवे सुरवर कोडी। केवल महिमा साचवे रे, पायनमे कर जोडी || राम ।। २७ ॥ गम भणे प्रभुजी कहो रे, उपद्रव नं ए हेत | 'कुल भूषण' कहै केवली रे, निसुणो सहु सचेत ॥ राम ॥ २८ ॥ नगरी नामे पदमनी रे, विजय पर्वत भूप । 'अमृत म्बरं मति वन्तजीरे, एक सुदृत अनूप ॥ राम ॥ २९ ॥ 'उपयोगा' तस कमिनीरे, नन्दन दोई उदार | उदित मुदित गुण आगलारे, कुल केरा साधार ।। राम ।। ३० ।। दन तणो हक मंत्रजी रे. ब्राह्मण छे वसुभूति । आराम उपयोगानणोरे, पात लिखी ए दृत ॥ राम ॥ ३१ ॥ माची ने व्यभिचारिणोरे, 'अमृत स्वर' ने मारि । निकण्टक होई खरी ने, मान्यू मुख मंमारि ।। राम ।। ३२॥ नृप आदेश दन विरं, चान्यो माग्ग दर । ब्राह्मण पण माये लान्यो रे, दन हण्यो बलपूर ॥ गम ॥ ३३ ॥ ब्राह्मण पर आवीने माखरे, मुझने पाछो वाली । कारज करवा वेगजी, आप गयो मो चाली || राम ॥ ३४ ॥ 'उपयोगाने वात जणानी, भलू कयू ने सोई । पुत्र हण्या थी गग आपणो, कीजे तो सब होई ॥ राम ।। ३५।।
+
भी जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड ।
( १७५)
एह मतो तो ब्राह्मण केरो, रहस्य पणा थी जाणी।
'उदित' 'मुदित' दो भाईयारे, अमरख अधिको आणि ॥राम।।३६।।
'उदिते' ब्राह्मण मारियोरे. आयो उदय कुशील ।
इपत 'नलपल्ली' विपेरे, सोमरी हुवो भील ॥ राम ॥ ३७॥
चारित्र लीधो रायजी रे, उदित मुदित पण संग ।
अप्रति बंध पणे तिहारे, चाल्या ऋपि उच्छ रंग ॥ राम ॥ ३८ ॥
विचे मिल्यो सो भीलडो रे, मारे तव अणगार ।
छोडाव्या पल्ली पती रे. मान लीयो उपकार || राम ॥ ३९ ॥
पल्लीपति हु तो पंखीयो रे, ए हता करसण कार ।
पारधीए पंखी ग्रहो रे. हुओ मारण हार ।। राम ॥ ४० ॥
इणे लव छोडावीयोरे, पंखी थयो पल्लीश ।
कीधो लाभे आपणडोरे, एतो वीश्वावीश ॥ राम ।। ४१ ।।
उदित मुदित दो साधुजी रे, आराधी संथार ।
महाशुक्रना देवतारे, पाम्या जय जय कार ।। राम ॥ ४२ ॥
ढाल भली अठावीशमीरे, प्रश्नतणो अधिकार ।
'केशराज पूर्वतणोरे, साधु वदे ते सार ।। राम ।। ४३ ॥
दोहा--(मल्हार रागे)
ब्राह्मण तो वमुभूतिनो, जीव भमी भनमा है।
माणस थई तापस तणू, पामी मुओते पाहे ॥१॥
देव हुवो पण ज्योतिपी. 'धूमकेतु' अभिधान ।
मिथ्या मतिनो वाहिओ, आणे अति अभिमान ॥२॥
'उदित' 'मुदित' ना जीवते. सुरपद नजी आवन्त ।
शेप पुण्पना प्रेरिया, मनुष्य गति पारन्त ॥ ३ ॥
'अरिष्ठ' पुरीनो राजीयो, 'प्रियचंद' भूपाल ।
'पोमावे' राणी ऊदरं, ऊपन्या सुत मुविमाल ॥ ४ ॥
'रलमुरधरलियामणो, 'चित्रसुग्ध' मुविशाल ।
नामकी अनि पर पड़ा, मुन्दग्ने सकुमाल ॥ ५ ॥
anAaan mu- ~~~~~~ सोती दीघो, जई तापमां पामे व्रत नियम लीधो ।। त्रिय संगते निष्फल योग कीधो, विपया विष अमृत जाणी पीधो ॥५॥ भवाहै ( १७६) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। 'धूमकेतु' ना जीवनो, उणही घरे अवतार । अपर त्रिया उदर ऊपन्यो, नामे 'अनुरद्ध' सार ॥ ६॥ ढाल गुणतीशवी तर्ज-जगन्नाथजी रापलो आशपूरे ।। उम्टन अभिक सो नन्द हुओ, वडा बंधवथीरे चालन्त जुओ । पूर्वभव वैर नयणां जणावे, महारीसनो हेतु आणी पावे ॥ १ ॥ 'रनमुरथ' नंदने राज्य दीयो, दोई अपर लघुनंद युवराज कीघो।। पट् दिवसनो अणशण साधी सारो, नृपदेव हुवो कियो अन्य जन्मागे ॥ २ ॥ एक भूपने 'श्रीप्रभा' थी कुंचरी, दीभी रायने रंग जाणी प्यारी || 'अनुद्वर' युवरायथी बेटी मांगी, गई और ने नेहन कर न लागी ॥३॥ तप रीसमं गयना गाम मारे, करी मृत्यो सोर तो देशमारे ।। चट्यो रायजी रावलो लेई रूडो, गांधी आश्यो कलिकाल क्रूडो ॥ ४ ॥ विडम्चीपने बंधवा मेलो मम्यो चिरकाल मोई, लेई नर गति तापस फेरी होई ॥ करी वाली तप ज्योतीपीने गणेवो, मोतो एह 'अनूलप्रम' नामदेवो ॥ ६ ॥ ‘ग्नमुग्थ' चित्रमुग्ध ' दोई भाई, ग्रही संजम बारमें म्वर्ग जाई ।। 'महावल' नै अनिवल नाम पाया, इलुकर्मी या भव नणे छेद आया ॥ ७॥ हिये नारी विमला तणे उदरं आत्री, नेणे मुम्ब मोहना अधिक पायी । 'कुलभूषण' ए कुल कुंबर एहो, पछ देगभूपण' शुभवान देहो ॥ ८॥ उपाध्याय 'वग्योप' पासे पटाया, अमे चम्म नो पार नमबर हाया || जब तेग्मो वर्ष आदी मुद्रावे, नृप पावती पण्डिन लेई आवे ॥ ॥ तब गौग्य बैठी थकी हक कंवर्ग. अविलोकना जाणी.एड अमरी।। तब दोर्ड भाई नो गग होवे. मुघमाहम मारही बार जोवे ॥ १० ! नत्र चाली के आवाया गय पामे, कला देसतां गय पाम्यो दृष्टासे ।।
श्री जैन पद रामापण द्वितीय खण्ड । ( १७७) तव पण्डित पूजीया शीपनामी, निजमन्दिरे आधीया हर्ष पामी।११॥ पगेलागीने माय सेवा विशेपो, ते कुंवरी मायने पास देखी ॥ तव पूछीयूं मायने कौन कुंवारी !, तब मांय भाखे तुम वहिन प्यारी ॥१२॥ गुरु मन्दिरे वास हुतो तुम्हारो, नब ऊपजी एह ए साच धारो।। चित्त चित्तवे वंछीयो बहिनभोग, एम जाणी हम आदर्यो जोग ॥१३॥ तप तीव्र करन्तां एह गिरिही आया, हमे काउसग्गे ग्या तजीयकाया ॥ नहीं आशज जीववे डर न मरणे, दिनरात रहे अरिहन्त शरणे ॥ १४ ॥ पिता हम तणो आणीयो दुःख गाढो, समजावतां किणही नविथाय ठाढो ॥ मुओ अण शण ग्रहीय सो गरुड इसो, 'महालोचन' सुरथयो, अति जगीसो।।१५।। उपसर्ग हमारो तेणे ज्ञान लखीयो, इहां आवायो सोह तो प्रेम पखीयो ॥ मुनि 'अनन्तवोर्य ने शुद्ध ज्ञानो, करण ओच्छव देन जाये प्रधानो ॥१६॥ अनलप्रम देव गुरु देव सोही, सुरसाये चाली गया ख्याल मोही ।। सुर मानव परखदा माहै भाखे, दया धर्मज केवली कहिय दाखे ॥ १७ ॥ तय 'मुनिमुवत' मुनि पुछन्त शीप्ये, तुम पाछे केवली कोण दीसे? ॥ 'कुलभूपण' 'देशभूपण' दोई भाई. होसे केवली एह दीधा बताई ॥१८॥ 'अनलप्रभ' एह निसुणीय सारी, तवही थकी पूठ लाग्यो हमारी ।। कांई एक मिथ्यात्वनो अधिक वाहीयो, काई एक पूर्व चैरै उमाहियो॥१९॥ दिन चार हुवा उपसर्ग करतां, एनो पाप भण्डार भरपूर भरतां ॥ तुम आयीया सो गयो देव नामी. हम ऊपज्यो ज्ञान सब जग प्रकाशी ।। २० ], 'महालोचन' पाम्यो अधिक नोपो, श्री 'गमा जी करे प्रेम पोषो । मुर बांही प्रन्युपकार भावे तुरत भण्डार धरणो ॥ २१॥ 'गाथल' पुर पनि सवर पामे. श्री 'राम लक्ष्मण प्रत्ये शीप नामे ॥ ध्वनि छ उपद्रव ह अलगो, किरो भय नवि आवगे फेरी यल्गो ।। २२ ॥ श्री गन आदेशे कियो प्रमादे, जज जलहले गगन करेप पारे ।। श्री राम- करणो, पशु (१७८) ॥ श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । गिरि' गिरि तणो नाम थाप्यू. कीयो उच्छव अर्थिया अर्थ आप्यू ॥ २३ ।। सुरपतिने पूछिने देव आगे, जब चलीया लोक बहु पूटे लागे ।। बोलावीया लोक सन्मानदेई, प्रभु चालिया लोक चित्त साथ लेई ॥ २४ ॥ उद्दण्ड अति 'दण्डकारण्य' भाखी, तिहां आवोया चित्त अडर राखी ॥ गिरिगुफा गेह समतोल लेखी, तिहां वाम कीधो कई दिन विशेपी ॥ २५ ॥ अनेरे दहाड़े जन जिमण वेला, दोय चारण साधुजी पुण्य मेला ॥ 'त्रिगुप्त' 'सुगुप्त' नामे विगजे, आया आंगण सजता अन्न काजे ॥२६ ।। द्वी मास उपयामीया दोई माधो, धणे पुण्यने प्रेरणे दर्श लाधो ॥ श्री गम' जी — लक्ष्मण ' सतीय सीता, भला श्रावक विश्व माहै विदिता ।।२७। भलि भक्ति सूं साधुना चरण चन्ढे, भव सन्तति सयलना दुम्ग्य निकन्दे ।। मनीए निज हाथरां हर्ष आणी, प्रति लाभीयो प्रामुक भात पाणी ।। २८ ॥ दुःखवारणो पारणो कीभ जामो, भलां पुष्प अरु वस्त्र वरसंततामो ॥ रत्न गंधाम्बुनी वृष्टि हुई, उद्घोषणा देवनी हुई जुई ॥ २९ ॥ पांच सुदिव्य हुवा वखाण्या भला दायका आज दिन सफल जाण्या ॥ एतो ढाल गुणतीशवी जगत नाची, 'केगगज' भावे सदा वात साची ॥३०॥ दोहा (रामग्री गगे) गन्नन्टी गलियामणो, ' कम्बूद्वीप ' दयाल । खेचर मुग्थ अश्वमं, आप्योते? मुविशाल ॥१॥ गन्धाम्नी वृष्टिनो, गन्धवणो विस्तार । विस्तगयो छ दश दिशे, सुरभिर महामुखकार ।। २ ।। 'गन्धामिय' दक पंबीयो गेगी एवं नाम | वन्या उतुर्ग भारीयो. गन्य वासना पाम ।।३।। दीन दीटो माधुनो, जाति म्मग्ण लाथ । माथी धनी पञ्चो ने पंसी मायाध ॥ ४ ॥ मीनाप मुमतो कीया. बन्दै ऋपिना पाय | नजदी अने दे देवो पराम ने अश्वमहिन रथ यायो।मुवास। , श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ट। (१४) ऋपिजी चरणे स्फर्शियो. ताम निरोगी थाय ।। ५॥ ढाल क्षेपक तर्ज-कन्चाली-कर्ता धूलचन्दजी सुराणा लगे जो रंज चरणों की, अगर तन चाय भी फरसे । हुवे निरोगही काया, मुनिश्वर होतो ऐसा हो।॥ १ ॥ टेर ॥ मल-मूत्र-लगेजो मेल, रोम-नख-केश ही लगते । मिटे सब जीवकी व्याधी, मुनिश्वर हो तो ऐसा हो ॥२॥ ज्ञान-का दान ही देकर, मिटायो तप्त दुनियों की । इटावे कर्म-वैरी को। मुनि० ॥ ३ ॥ काम-रु क्रोध-नहीं तनमें, राग-रु द्वेप-नहीं मन में । मगन रहै सदा ही वनमें ।। मुनि० ॥ ४ ॥ - दोहा पांख हुई सोना समी, चंचू विद्रुम भाव१ । नाना रत्न सुमय तनु, पनराग२ सम पाव ।। ६॥ रत्नांकुरनी श्रेणीसम, माथे जटा सुहाय । नाम 'जटायु पंखीयो, ते दिन थी कहीवाय ।। ७ ।। -(ढाल तोशवी)- सर्ल धन्य २ शीलवन्त नर नारी- रे भाई ? सेयो साधु सयाणा, हेत युक्ति भल भाव वतावी, तार्या जीव अयाणारे ॥ टेर ।। 'हट प्रहारी दृढ पणेरे, मेले आय प्रहारो। परमारथ पदपाम्या प्रत्यक्ष, साधु तणा उपकागेरै ।। भाई० ॥शा 'विलायत्ती' चांदीनो बेटो, नाम चिलायती पूनो। साधु संगत कारज सार्यों, कीधी दर कुसनोरे ॥ भाई ॥२॥ 'अर्जुन माली' गारी मारे. नर पट एका नारी ॥ खटमांसा लग गमकान्ना. लीघो कारज सागरे । भाई० ॥३॥ 'परदेशी' परभव नहीं माने, पाप करे पनि पापी ।। 'केगी गुरु समजावी लीधो. समति सदा स्थिर पापीरे भाई ॥४॥ १ पखालां। ए नामनो गली।
उपमग उपजता दीने, 'म्कन्दक' भाखे तामो रे ।। भाई० ॥१४॥ (१९०) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । 'राघव' पूछे साधु संघाते, ए गृद्ध पंखो देखो। शान्त होई तुम सेवा साधे, इचरज एह विशेपोरे ॥ भाई. ॥५॥ भगवन् ! भारी देह विकारी, रोगी में सिरदारो ।। कंचन वर्णी काया होई, एछै कवण विचारोरे ।। भाई ॥६॥ साधु 'सु गुप्त' कहै सुण राजा. चरित्र तणो विस्तारो॥ 'कुम्भकारकट' पुगए हुतो, 'दण्डक राय उदारोरे ॥ भाई० ||७|| 'सावत्थी' नगरीनो राजा. 'जितशत्रु' सुखकारो॥ राणी धारणी ए सुननायो, 'स्कन्दक' नाम कुंवारोरे ।भाई० ॥८॥ पुत्री 'पुग्न्दग्यशा' ते, 'दण्डक' ने परणावे ।। 'पालक' ब्रामण दुत पणेरे, सावत्थीए आवेरे ।। भाई० ।।९।। 'जितशत्रु' गजा धर्म परायण, गोष्टी धर्म की भावे । नास्तिक वादी पाल कनेरे, भर्म कथान सुहावरे || भाई० ॥१०॥ 'स्कन्दक' कुंवरे युक्ते जीत्यो जावे अपूठो नावे ।। होर्ट सीमाणो निज घर आयो, रहै कुंनग्मं दायरे । भाई० ॥११॥ 'म्कन्दक' कुंवर पांच मयांसं. 'श्री मुनि सवत' पासे।। मंजम लेई शुद्रोपाले धर्म मार्ग प्रकाशेरे ।। भाई० ॥१२॥ बहिन बन्दा पुर समझायू, एह मतो चित ठाणी ।। 'जम्भकार' 'कट' नगरे जावा, पृथ्य प्रभुने आणीरे ।। भाई ०॥१३॥ प्रभुजी भाग्य काई न गवे, मरणान्तक ए नामो ।। दम अगधक दवा के नाही, पुनरपि स्वामी भाखे । तुटा विण मबलाही आगधा, जमदेव नेम दाखे ॥ भाई० ॥१५॥ आप विगधक होतां मधला, केगे माने कामो । एद विचार्ग चाल्यो स्कन्दक, पहुंनो नेणे ठामो रे भाई.।।१६।। 'पालक पापी नुमरि पगमव, आणे ए. अविचारो माधु मनो मया छ जिहां, गाडे हथियागेरे ।। भाई ॥१७ ।। गना पानी ग्वबा जे वारे, आवी मुनिवर बन्द ।। .
ANA ~~~~~ Amnew श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। ( १८१) देशना सांभली निजघर आवे, मन में अति आनन्दे रे ।। १८ ॥ 'पालक' पाप घणेरो पोखे, राजाने सम्भलारे ॥ शालो तुझ मारेवा आयो, ते हथियार देखावेरे ।। भाई ॥ १९ ॥ राजा वात न कोई विचारी, एकान्ते रीसाणो || 'पालक' मंत्रीने मुनि प्या, करजो जेम तुम जाणोरे भाई।।२०॥ पालक शीघ्र पणाथी ते म्होटो, मांडे यंत्रे१ जेवारे ।। 'स्कन्दक' दृष्ठे साधु एके को, पीले तेह तेवारे रे ।। भाई ॥२॥ निर्यामक तब होई स्कन्दक, आचारजजी आपे ॥ आराधन विधि शुद्ध करावे, अप्पार में मन थापे रे ॥ भाई॥२२॥ श्रेणी क्षपकनी वाटे चढतां. पामी केवल नाणो ।। अष्ट महागुण केरा नायक, पहुंता अविचल ठाणोरे । भाई ॥२३॥ चार सयां नवाणू पील्या, एक सुचेलो वालो३ ।। एहनं दुःख मने मत देखाड़े, माने नहीं चाण्डालो रे ।।भाई।।२४॥ बालकने पीलन्तां देखी, नयणे नीर प्रवाहो । महुनो काज समर्या पाछे, ऊपज्यो रोप अगाहोरे ॥ भाई ॥२५॥ 'दण्डक' 'पालक' देश सहुनो, होजो हूं क्षयकारी ।। पोते के भवसन्तती तेहथी, कीबूं नियाभारीरे। भाई ॥ २६ ॥ एह नीयाणू कीधां पाछे. पीली नांख्यो सोई ।। पावईयाने ४ पानो न चढे, एह उसाणो जोई रे ॥ भाई ।। २७ ।। वन्हि कुवारो५ मांही विदितो, देव हुवो ततकालो ।। पापी पन्थे सह तिणहीमें, पाप महा अमरानो रे ॥ भाई ॥२८॥ दण्डकी राजा वात सांभली, सोचे तेह अपारो॥ फिटरे कूड़ा पालक पापी, कीधो माधु संहारोरे ॥ भाई ॥ २९ ॥ पुग्न्दग्यशा' राणी ए. मुझ सालो मुखदाई ।। साधु तणी पदची थी म्होटी. पाप कियो ने अधाई रे fभाई॥३०॥ राजा चिन्ते संयम लेऊ. मुनिनुयन पे जाई ।। पाणी | २ पारमा । ३ मोटो। नपंगफ ! प्रारीपर।
~~~~ AMA ? ( १८२) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । एटला मांही अग्नी प्रज्वली, वेला पूगी आई रे ।। भाई ।। ३१ ॥ रत्न कम्बल तं तुज पुग्न्दर, यशा ए दीधोथो ॥ पहिन तणो मन गसण सारूं, बंधवजी लीयोथो रे भाई।।३२॥ ओ तंतुज रजोहरणो रे, लोही खरड्यो देखो ॥ दाहुन? एकन्ते लेई चाली, ए आहार विशेषी रे ॥ भाई ॥ ३३ ॥ भार घणे पंजीनी अकुलाणी. चांच थकी अड़बड़ीओ ॥ देव योगे नव देवी आगे, ओषो तंतुज पड़ियो रे ॥भाई ॥ ३४ ॥ दयो भाई मार्या केरी, जाणी ए महिनाणी ॥ कन्ला ? कांई म्होटा मुनिवर, पील्या घाली घाणी रे । ३५॥ मोक करन्नां शामन देवी ए, पापी पुग्थी लीधी । श्री मुनि मुबत पामे मूकी, स्वामी दीक्षा दीधी रे || भाई ॥३६॥ 'अग्नीकुंवार' मनो विकी, वाल्या पुग्ना लोको । 'दण्डक' गजा पालक' पापी, ए कत कर्मा जोगो रे।।भाई॥३७॥ 'दण्डकारण्य' नेहिन दिनथी, पुर नवो फरि यमाणो || भूट करना हुवे, मड़े मडं जाणो || भाई ॥ ३८ ॥ फ गजा भवमा ममीयो, दुःश्व तणों संयोगी ।। 'गैयाभिव' पपंची यो नोही महानन रोगी रे ।। भाई ॥३९ ।। आती म्मग्ण मुझ दर्शन थी, ऊपन्य एहने आजो । मलापयि लब्धा यकी रे, जाण्यो प सह माचो रे ।। भाई। ४०॥ गंग गयो निगगीयो. गन्नमयी शगंगे । श्रावक दुवो माचलों ने, धर्म को या धीगेरे || माई ॥ ४ ॥ जीवनी याने फल नवि पाए, रात्री भोजन त्यागे ।। चालना पचस्याण कगया, जाण्यो जहयो गगे। भाई० ।।४।। 'गवरने रे भोलामणी दाधी, रहेजी मेवा मांहीं ।। स्वामी ने वामन्य पगे, पृश्य धणेगे ग्राहे ॥ भाई० ||४|| गनक ए माई हेरे, तुम वचन थी यार ।। " पीनपटान्दा मयनी।
move . श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१९३) सत्य वतीनी पासे रहसे, चातुर पणेथे चारुरे ।। भाई० ||४|| एम कहीने ऋषि पांगरीया. उपकारी अणगार ।। संजम तप करी शोभ तारे, ज्ञान तणा भण्डाररे ॥ भाई०॥४५॥ देवदीयो स्थ जोतरीरे. वैसे 'सीता' 'रामो' ।। लक्ष्मण होवे सारथी रे, पंखो आगे तामोरे ॥ भाई० ॥४६॥ क्रिडा करतां संचरेरे, प्रबल पुण्य प्रभावो ।। राम तिहांहीं अयोध्यारे. मिलीयो एह कहाचोरे ।। भाई०॥४७॥ ढाल त्रीसमी में कह्यो रे. पंखी प्रश्न प्रकारोरे ।। 'केशराज' ऋपि वायकमेरे, नहीं मन्देह लगागरे । भाई० ॥४८॥ दोहा वेदारा गोडी रागे- लंक पयाला राजीयो. खर नामे भूपाल । शूर्पनखा१ घर सुन्दरी, सुन्दर रूप रमाल ॥ १ ॥ शुभ वेला सुखकारीया, जाया नन्दन दोग ।। शम्बुक 'सुन्द' मोहामणा. पाम्या यौवन सोय ॥ २॥ मांय पाप ने वरजता, 'दण्डकारण्ये मांहै ।। 'सूर्यहास' असिमाधवा, 'शम्बुक' थयो उच्छा है ।। ३ ॥ हणमं वर्जन हारने. वचन वदे विकराल । अभिमानी माने चड्यो आय पहूं तो काल ॥ ४ ॥ कोचरवा तीरे अछ, गन्धर्व वंश विशेष । तिहारही साधन करे, एक मने अकलेश ।। ५ ।। एकान्त भूमि शुद्वात्मा, जीतेनद्रिय ब्रामवार ।। पग बांधी वड माप, राघो मुखो सुविचार ॥ ६ ॥ वर्ष चार दिन सात. विद्या साधन सार । प्रारंभ्यो पागटपणे, फिस्यूं करे करनार !! ७॥ बरस पार चोली गयां उपग्नो दिन चार ।। सिदि की सिदि हुवे. घरते विद्याधार ॥ ८ ॥ avanamad १ चन्द्रनमा ति पाठान्तरे।
१ (१८) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । तेजमहा सूरज तणो, गन्धर्व माहीं ताम || विस्तर्यो दीसे घणू, कुंवर हरष्यो जाम ॥ ९॥ क्रीडा कारण आधीयो, 'लक्ष्मण' मन उल्हास ॥ 'सूर्यहास' असि देखीयो, जाणे सूर्य प्रकाश ।। १० ॥ सांडो लीधो हाथ में, काही समें सोई ।। अपूर्व शस्त्र विलोकता, क्षत्री ने सुख होई ॥ ११ ॥ तास परीक्षा कारणे, आतुर हुवो ईश ॥ वंशजाल में वाहीयो,१ शम्बुक केरो शीप ॥ १२ ॥ उतरि पड़ोयो आगले, चित्त झू चिन्तवेराय ।। निष्कारण ए मारीयो, फरी फरी ने पछताय ॥ १३ ॥ क्षेपक-दोहा लक्ष्मण मन विलखोथयो, लखीयो नहीं लिगार ॥ पकियो फल पूरो पड्यो, रखियो नहीं रखवाल |॥ १४ ॥ स्वामीजी श्री रामचन्दजी कृत-ढाल क्षेपक तर्ज असी रुपैया लो कलदार कोई नर मग्यिो, गिर घर परियो, करीयो लछमन हाहाकार । मावीने कुण टालणहार टाली नहीं टले लाख प्रकार ।। टेर॥१॥ भरीर सुगन्यो तेज दिनंदो, चन्दो लजित हुवे पदन नीहार ।।२।। गनकुंबर वर. उत्तम नम्बर, दिनकर कर सम तेज अपागाभावी।३।। क्यू इहां आऊं. खड्ग उठाऊं, क्यं वाऊं मैं विना विचार ॥ ४ ॥ आयोह भटक्यो. क्यों इहां अटक्यो, झटक्यो ग्वड् लग्यो अनाचारा५। पिन अपगधन विद्या माधन. आगधन करतो लियो मागाभावी६।। इम पिटना शीश धुनाये. आवे न पाहो फल तर डार ||भावी७॥ दोहा-गुव्हर में जोवे जई, पडला के डाल । दीठो घड अविलम्बियो, नाम चल्यो ततकाल ||१४|| गम मी आवीयो. मंमलाव्यो विग्तन्त । १ वाट्यो-(गया) वंशजालने कापनां शन्बुक यूँ मन्नक कपाई गयू अने ने तन्माजी ने पागल श्रावीने पड़यू ने थी गहग्मां जड़ने जातां बड़नी गामार व लटकना जोयं ।
arrivn Manus NARY भी जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१८५) खांडो मूक्यो आगले, भाखे राम तुरन्त ॥ १५ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-पूर्ववत् सियकहै देवर चहै बीज तरुवर, फर लगेगे रहो हुंसियाराभावी।।८॥ एह सोचन काई, सुन भोजाई, लक्ष्मण कहै मुझ एक लिगार ।। ९ ।। मनि 'राम' कहै भाई, टरे नहीं राई पिछताई रहै उत्तम आचार।१०। ढाल इकत्तीशवी तर्ज-राजवीयांने राज पीयारो। हो भाई ! ते उपद उठायो, जस ए खांडो सो नर चांडो, आयो के हिव आयो । टेर ॥ रावण भगिनी शूर्प नखाजी, विद्या सिद्धि जाणी । पूजा पाणी अन्न अनूपम. आणे सा खर राणी ॥ हो भाई ॥ १ ॥ श्रावक वैद्य धूलचंदजी ढालक्षेपक तर्ज अहो २ पासजी मुझ मिलीयाहो कहो ! ए सरवी आज पियुघरआसी ए, आसी आसीने आनन्द था सी टेर ।। लारे शम्वुक नीनारीरे, कर विध २ महिलनी त्यारीरे तन सकल सज्या सिणगारी ॥ कहो १॥ करीविकटतपस्या वनमे रे, पियु दुर्वलहोगया तनमेंरे, उनकी लगन लगी मेरामनमें । क २॥ पारे परस नी आशाफलमीरे. म्हारी विरहव्यथा सहुटरसीरे म्हारा पंछित कारज सरसी ॥ कहो।। ३ ॥ नारी बन रही झाकदा मालारे, इमायो मनोरथ मालारे, इमहर्ष मनावे पाला ।। कहो । ४॥ इतने दक्षिण अङ्ग फरकेरे. तर धड़ धड़ नियों घड़करे, कामण को कलेजो कलके ।। कहो।। ५॥ पियु आयां आनन्द वग्सेरे. मिलवाने तनमन तरसेरे. पिण विधना कहो करसे ॥ कहो ॥६॥ दाल मूलगी दीठो धड़ भस्तक जब ज्यो. अयि अपि देव एकामो । कीधोधो अणमोन्यो अधिको, मूणिो मा तामो ॥ हो भाई ॥२॥ हुई सचेतन हा यन्स ! हा पन्स , शम्पृक शम्भूक लोई ।। करती पाती अति आरड़ती. मरोडे कर दोई ।। हो भाई ॥३॥ ।
माले मादड़ी गेवे, पुत्र ? क्यूं धरणी पर सोये, दशोदिश बैगने (१८६) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ढाल क्षेपक तर्ज-धन्तुरो राचणो ।। आतो आई वन्न मझार, निरख्यो नन्दनजी हांजी । आतो धरण पडी धसकाय, कुंवर तूं गयो कीहांजी ।। थारी मायडी कूके वन माय, कुँवर वेगो आवजे रे ॥ टेर ॥ १ ॥ धड मस्तक न्यारा दोय, कुण्डल झिग मिग करेजी ॥ काया कञ्चन रूप रसाल, पड्यो धरणी तलेजी ।। थारी ॥ २ ॥ हा हा होगई अचिरज बात, महा दुःख कारीणीजी । आता बाल्दा खाणी भीम के. महा डरावणोजी ॥ थारी ॥ ३ ॥ थने गर्यो में पूत ! अपार, मूल मान्यो नहींजी । मेतो आश अलुद्धि नार, आय इमहीज रहीजी ॥ थारी ॥ ४ ॥ प अरोगो पय पान. लाई तुम कारणेजी । सामो जोबो नयन उवाड, जावं तुम्ह बारणेजी ॥ थारी ॥ ५॥ थागे किहां गयो खड्ग रतन क, विश्व चीहामणोजी । कुण पापी कियो यह काम क, दुःख लागे घणोजी | थारी ॥६॥ थे तपस्या करी र अपार, जीती वाजी हारीयोजी । कोई पापी नीच कुजात. चिन्तव इम मारीयोजी । थारी ॥७॥ किहां जो ऊरे पुत्र दीदार, थारो नयने करीजी । धागे झम्सी सब परिवार के, बाल अन्ते ऊरीजी ।। थारी ।। ८॥ १. महागे काटे हियड़ो हीरक छाती पर जलजी । -क्ति २ मृच्छा गाय, क अति ही टलवलेजी ॥ थारी ।।९।। दाल मूलगी क्षेपक- जोवे ।। नन्दन की विरह व्यथा जागी, बैग की निगह करन लागी || मत्य व्रत पाली ॥६६॥ टान मूलगी लक्षणवन्ती मामण केंग. पगनी? पंकी देवे । मुझ मृत हंना पर जाणेवो. रीम धणी मुविशेपे होभाटी) ४ ॥ पृथिवार व बांज। मारने वाला।
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १८७) पगने खोजे चाली आवी, 'सीता' 'लक्ष्मण' रामो। निरखी हरखी परखे पदमनी, 'राम' रूप अभिरामो । हो ॥ ५ ॥ काम बाणसं बींधी लीधी, न रही शुद्ध लगारो। भूली नन्दन आनन्द ऊपन्यो, करवाने भरतारो॥ हो भाई ।। ६ ।। मुनि श्री प्रसन्नचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-म्होटी जगमें मोहिणी विहल थईसा भामिनी, काई हुई अपच्छर उणिहार । कनक वरण द्युती सोहनी, कार्ड मोहनी हो सवही संमार ॥ १ ॥ धिक् धिक् चिपय विकारने ॥ टेर ॥ मांग भरी गजमोतीयों, मुख चावेहो मा पीडा पान ।। नखरालो चित्त चौरती. काई राखे हो दिल अधिकी आन ||२|| नाके नकवेसर सजी, गल पहरीयो मोतियन को हार ।। चोली पहरी चूंपसं. पग बाजे हो झांझर झणकार ।। धिक् ।। ३ ।। ठमक ठमक पगल्या ठवे. काई चाली हो मानं जेम मराल ।। काणां धूंघट पट धरी, चणि पोडसहो वर्षा री बाल || धिक् ।।४।। हाव भाव करती थकी मन धरती हो वा अधिको प्रेम । वचन सुधा सम दाखती, चित्त लागो हो चकवीने जेम ।। ५ ।। ढाल मूलगी कुंवरी अमरीने अनुसरती. धरती रूप रमालो । रामचंद्रने पासे आवो, ऊभी सा नतकालो॥ हो भाई ॥ ७ ॥ पूछे प्रभुजी पद्मणि सेथी. कोण अछो तुम्ह भासो । अटचीमा एकाकी दीसो, शंका कोई मति गसो ॥ होभाई. ८॥ सा भाखे हूं रान कुंवारी. ऊपरी भौमे सोऊं।। निद्रा गत नर मुभा सरिसो. अधिक अचेतन होऊ ॥होभाई० ९॥ एक विद्याधर रूपे मोयो. इहां लेई मुहर आयो । एटले अपर सेचर चल आयो चाई मुखजीनायो । होमाई०१०।। मुझने हेठी मूकी आपण. लम्बा लागा दोई।। लउता लडता दोई मुआ, कुरूपमन थी एम होई । होमाई०१५॥ एकाकी हूँ अपला राला, पन में किक दानी ॥
(१८८) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । अवमे प्रभुजीना पग पाम्या, आरती गई सब नासी ॥होभाई ॥१२|| जैनोपदेशक वैद्य सुराणा धूलचन्नी कृत- ढाल क्षेपक तर्ज हां सगीजी ने पेडा भावे ।। हां प्रभो ? सुन अरज हमारी, शरणे आई अबला नारी ।। वेगी कीजो व्याव करोमति, ढील लिगारोरे ।। प्रभो० ॥१॥ धिन.२ दर्शन आज मे निरख्यो, म्हारोतो मन अति ही हप्यो । परख्यो पुरुप प्रधान, जोड मिल गई मझारी रे ॥ प्रभो० ॥ २॥ एह अवस्था म्हारी नीकी, आप तणीतो मुझसे अधिकी ।। बाल पणाको भोग जोग ओ, मिलीयो भारी रे ॥ प्रभो० ॥ ३ ॥ ललितांगी करती बहु लटका, कर गूवट से करती मटका ।। झटका देवे काम गम मन, प्रीत तुम्हारीरे ।। प्रभो० ॥ ४ ॥ तुम दर्शण की हो रही प्यासी, निरखत मिट गई सर्व उदासी ॥ दामी की अरदाम पाय कर, खलो प्यारीरे ॥ प्रभो ॥ ५ ॥ विरह आग थकी अकुलाणी, जिणमं बोल रही छू वाणी ॥ गणी कर महागज लान में, तजदी सारीरे ॥ प्रभो० ॥६॥ इणपर नार अग्ज बहु कग्नी, हपित हिये नेण जल भरती ॥ करती नखरा ग्यूब लाज मन, नहीं लिगागरे । प्रभो० ॥ ७ ॥ लाल पाल करती बहु नारी, म्है छु प्रभु तुमची नारी ।। बात कही में मार्ग आप, अब कग्दो जहारीरे ।। प्रभो० ॥ ८ ॥ में गणे लीधी मुग्वकारी, कंवारी छू गज दुलारी ।। मोवातां की एक व्याव की, कालो न्यारी । प्रभो० ॥ ९॥ थिक धिक् विक विक् फाम विकाग, 'धृलचन्द' कहै मुणजो माग प्याग मन का प्यार नार एह, नागण कगरे । प्रमो० ॥ १० ॥ दोहा-बोली मुझमी सुन्दरी, ओर न जग में कोय ।। नुन मामो मुन्दर युवा. कहीं न दुजा होय ॥ १ ॥ उपक दर्ज-गवेश्याम (गवेश्याम गमायण में मे) मानो हम दोनों का स्वरूप. विविने विचार कर क्या चन्द्रमा बनाने वाले ने, मूरज तयार कर रखा है ।। है . । श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । (१८६) संकोच छोड़कर चनवासी, पूरा विधिका उत्साह करो। मैं तुमको आज्ञा देती हूं, मुझसे गन्धर्व विवाह करो ॥ ढाल मूलगी अवे मुझ व्याहो वार न लाहो, वाल पणानो भोगो । भोगवतां मुखदाई पिछे, दोहीलो ए संयोगो । हो भाई ।। १३॥ प्रभुजी ए प्रपंच विचार्यो, महोटानी मति महोटी ।। कपट कुटी कलह कारी कामनी, ए सब वातां खोटी।। होभाई॥१४॥ धूता का धूताए धुरन, धूती ने पकडाई ।। तबदीये नयणां सयण वताई, मांहो मांडी भाई ।। होभाई ॥१५॥ राम कहै म्हारे एक छे नारी, वीजी केम बराये ।। वेची निद्रा उजागर लेवे, सांसा में दिन जाये । होभाई ।। १६ ॥ पेला छडो छटक दिखावे, करसे थारो विवाहो ।। जेहने नहीं तेने आतुरता, मनमें अति उमाहो ॥ होभाई ।। १७ ।। प्रार्थना लक्ष्मण झू कीनी. लक्ष्मण कहै भलेरी ।। माय हमारी प्रभु प्रार्थियो, भाभी? मकडीसो फेरी ।। होभाई ॥१८॥ जै. वै. सु. धूलचन्दजी कृत. ढाल क्षेपक तर्ज गवरल ईसरजी केवेतो हंसकर बोलणाजी ।। लक्ष्मण भाखे है भाभी, सुन वातां मायरी ए. ॥ टेर ।। अवसर चूक गई तू स्याणी, होका आई रघुवर राणी । तूंनो हाधों वात गमाणी । अवतो स्यू होवे पिछनाणी, पेला आतीतो वाता माने तो तायरीए ॥ ल० ॥१॥ -(तर्ज-राधेश्याम रामायण में से)- लक्ष्मण से बोली-मुझे देख तुम क्यों इतने मुमकाते हो। वेतो व्याहै हैं लेकिन तुम नारी विहीन दिखलाते हो। (फवित्त) निरखे प्रवर्ग नयण, वयण प्रवरा यद्यलाये, अवगनू अनुराग चित्त म्पवरां ललचाये। दे अपरा शिर दोप, रोप अगर गये। प्रवरा सूपभिलाय भार परां मुख मारे। रति नेल पेल पवर्ग करे यान भयरां मन धागणी चित्तमांही दीप समजो चतुर, चरित्र प्यभिचारीणी ॥१॥ ।
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श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १६१) ANNA नसिरी गरज लिगारी || अब तो कोईयन लागे कारी. इनपर गाढो तो पिछतावो नारी खायरहीए || लक्ष्मण ।।२।। दोहा-शिक्षा सुन वन पति की. जली जलगई और। मिली शुद्ध जलको-नहीं. चिकने घटपरटोर ।। राधेश्याम राक्षसीने सोचा-इससे तो, गल सकनी दाल नहीं अपनी । यह तो पूरा उपदेशक है, बदलेगा चाल नहीं अपनी ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-पूर्ववत् आनो भिडकी गई आकाशे, थे मुझ कीधो कुंवर विणासे. आई खररायने पासे. आंसु न्हांखे अधिक उदासे, इसका खाती करे अरदासे, मैं तो नीठ लाज राखी कर आई मायरी है लक्ष्मणा३ ढाल मूलगी याचना भङ्ग थकी रीमाणी, रीसाणी सुतमार्गा, खर खरी आय पुकारी, रीसघणो विस्तार्यो । होमाई ॥१९ ।। चउदहजार खराही खेचर, संवाह्या ते पारो। आई गया ते वात करता, ऊडे ' राम ' जे गारो होमाई॥२०॥ 'लक्ष्मण' भाखे देव दयाकरी, बैठा रहो तुम आपो ! मुझ उठ्यां ए नाठा देखो, पुण्य थकी जिम पापो होभाई।।२।। ढाल क्षेपक तर्ज-हमीरीयारी मंत्री कहै नृप खर भणो, भेजीजे एक दूत राजेश्वर । आण लगे तुम चरण, छोड़ी अपनी आकृत राजेश्वर ॥ १ ॥ काम विचारी कीजीये ॥ टेर।। मूवो मुन जीवे नहीं, गई बात न होय ।। गजेश्वर । खड्ग मेल कर धोकदे. सावन्त हुवे सोय ॥ गजेश्वर काम||२|| दत मेज्यो खर पणे. लेख देई ने हाथ ॥ राजेघर । सुनम्हारी स्वांडो लोयो, उठो हमारी गाध ।। राजेवर कामा ३|| के पगे लागो खर तणे. लेई शंडों हाथ ।। राजेधर । के संग्राम सम्भारीये. अवग्न नीजी मान ।। राजेपर काम ४ ॥ , ( १९०) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। अच्छा तुम उनकी तरह, मुझे उत्तर देना खुर खुरा नहीं । तुम बने चनों में बनी वनं, यह जोडा भी कुछ बुरा नहीं। दोहा-लक्ष्मण का तो प्रकृती से, था स्वभाव ही गर्म । गर्मा कर कहने लगे. चलु दुष्ठा वे शर्म ।। ० ॥ ॥राधेश्याम॥ एसी बाते करने में तुझे. ओ कुलटा१ लाज न आती है । मुग्यसे यह कहने के पहीले. पापीनी मर नहीं जाती है । पहली ही वार जिन्दगी में, एमी निर्लज्ज देखी हमने । आज का दिन मनहम बडा, इतनी निर्लज देखो हमने ।। ओ कुल कलकिनी पिशाचिनी, यदि हुआ विवाह नहीं नेरा । तो अपने संरक्षक से कह. वह करदे ठौर कहीं तेरा ॥ है आर्य-विवाह योग साधन, सौदान समझ बाजार का यह । आगम ऐम इमका न लक्ष्य बंधन कर्तव्य-भारका यह ।। और अगर विवाह होचुका हो, तो जा निजपति की सेवाकर । वहही आगध्य देव तेरा, की आशाकर ॥ यदि हो वैधव्य अवस्था तो, पति नामकी वैगगिनी बनजा । देश और जाति की संवाको, बस सच्ची सन्यासिनी बनना ।। वहनों का अपनो कर सुधार, यह गह है तेरी शुभ गति की । संमार में यम कायम कग्दे, यों यादगार अपने पति की ।। वग्ना यों वाही फिरने में, क्यों अपना जन्म लजाती है । कृलको-ममानको-दंशको भी. व्यभिचागणी दाग लगाती है । ढाल क्षेपक तर्ज-पूर्वोक्त में तो लाज गमाई म्हाग वातां करदी सगली जहारी, म्हारी नृपम्य चित्रं कृपणम्य वित्तं, न नायते दुष्ट मनोग्याश्च । प्रियाश्चरित्रं, पुम्पम्य भाग्य, देवो न जानाति फुनोमनुष्यः ।। दर दरक पकड कटर व प्राणे, डोरो देखी डर मापदे मृर्व निगरे । अगा या अड्बड़े, च हट्नर शि चडहड़, पूछयां पकड़े मुन हमे बन्धाः हड्ड़ ।। माग्मू प्यार मांड जुगत कन्त हुथी कलह आग चिनमांदी ‘दी ममता चतुर चरित्र ह व्यभिचारिणी ||२|| उससे ही सुख यनः श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। नसिरी गरज लिगारी || अब तो कोईयन लागे कारी, इनपर गाढो तो पिछतायो नारी खायरहीए || लक्ष्मण ।।२।। दोहा-शिक्षा सुन पन पति की. जली जलगई और। मिली शुद्ध जलको-नहीं. चिकने घटपरटोर ।। राधेश्याम राक्षसीने सोचा-इससे तो, गल सकती दाल नहीं अपनी । यह तो पूरा उपदेशक है, बदलेगा चाल नहीं अपनी ।। ढाल क्षेपक तर्ज-पूर्ववत् आतो भिडकी गई आकाशे. थे मुझ कीधो कुंवर विणासे. आई खररायने पासे. आंसू न्हाखे अधिक उदासे, इमका साती करे अरदासे, मैं तो नीठ लाज राखी कर आई मायरी है लक्ष्मणा३ ढाल मूलगी याचना भङ्ग थकी रीसाणी, रीसाणो सुतमायाँ, खरमू खरी आय पुकारी, रीमधणी विस्तार्या ॥ होभाई ॥ १९ ॥ चउदहजार खराही खेचर, संवाया ते चारो। आई गया ते बात करन्ता, ऊठे — राम ' जे नारो होमाई॥२०॥ 'लक्ष्मण' भाखे देव दयाकरी, चैठा रहो तुम आपो। मुझ ऊठयां ए नाठा देसो, पुण्य थकी जिम पापोहोभाई॥२॥ ढाल क्षेपक तर्ज-हमीरीयारी मंत्री कहै नृप वर भणी, भेजीजे एक दूत राजेश्वर । आपण लगे तुम चरणवे, छोड़ी अपनी आकृत राजेघर ।। ।। काम विचारी कीजीये ।। टेर ।। मूवो मुन जीवे नहीं, गई यात न होय ।। राजेश्वर । खड्ग मेल कर धोकदे. सायन्न हुवे सोय म गजेश्वर काम||२|| दत भेज्यो खर पणे, लेख देई ने हाथ ।। राजेश्वर । सुतम्हारी सांडो लीयो, ऊठो हमारी साथ ।। राजेश्वर कामा३॥ के पगे लागो सर तणे. लेई सांडो हाथ ।। राजेभर । के संग्राम मम्मारीये. अवरन नीजी रात ! राजेपर काम . ( १९०) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । अच्छा तुम उनकी तरह, मुझे उत्तर देना खुर खुरा नहीं । तुम बने बनों में बनी वनं, यह जोडा भी कुछ बुरा नहीं। दोहा-लक्ष्मण का तो प्रकृती से, था स्वभाव ही गर्म । गर्मा कर कहने लगे, चलु दुष्ठा वे शर्म ।। ० ॥ ॥राधेश्याम॥ एमी याने करने में तुझे. ओ कुलटा१ लाज न आती है। मुमसे यह कहने के पहीले. पापीनी मर नहीं जाती है । पहली ही यार जिन्दगी में, एमी निर्लज्ज देखी हमने । है आज का दिन मनहम बडा, इतनी निर्लज देखो हमने । ओ कुल कलकिनी पिशाचिनी, यदि हुआ विवाह नहीं तेरा । नो अपने मंरक्षक मे कह. वह करदे ठौर कहीं तेरा ।। है आर्य-विवाह योग माधन, सौदान समझ बाजार का यह । आगम ऐम इमका न लक्ष्य बंधन कर्तव्य-भाग्का यह ।। और अगर विवाह होचुका हो, तो जा निजपति की सेवाकर । वहही आगध्य देव तेग, उससे ही सुख की आशाकर ॥ यदि हो वैधव्य अवस्था तो, पति नामकी वैरागिनी बनजा । देश और जाति की सेवाको, बस सच्ची सन्यामिनी बनजा ।। बहनों का अपनो कर सुधार, यह गह है तेरी शुभ गति की । मंमार में यम कायम करदे, यों यादगार अपने पति की ।। वग्ना यों वाही फिरने में, क्यों अपना जन्म लजाती है। कृलको-ममाजको-दंगको भी, व्यभिचागणी दाग लगाती है । ढाल क्षेपक तर्ज-पूर्वोक्त में नो लान गमाई म्हाग वानां करदी सगली जहाग, म्हारी नृपन्य चित्रं कृपगम्य वित्तं, न बायते त्रियाचरित्रं, पुरुपम्य भाग्य, देवो न जानानि फुतोमनुष्यः ।। उदा म उहाके पकड हा वाण, डोरो देखी डर मापदे मुत्र मांगे गए घर श्रवड़, चढे दृट्नर शि चहड़, पृट्टयां पफई मन हर म्वन्द्वार इट्ट । नाग्म प्यार मांड जुगत कन्न हुथी कलह ग चिनगडी टी ममता चतुर चरित्र पह व्यभिचारिणी ।।२।। दुष्ट मनोरथाश्च।
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श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। (१९१)
नसिरी गरज लिगारी || अब तो कोईयन लागे कारी. इनपर
गाढो तो पिछतावो नारी वायरहीए । लक्ष्मण ।।२।।
दोहा-शिक्षा सुन वन पति की. जली जलगई और।
मिली शुद्ध जलको-नहीं. चिकने घटपरटोर ।।
राधेश्याम
राक्षसीने सोचा-इससे तो, गल सकती दाल नहीं अपनी ।
यह तो पूरा उपदेशक है, बदलेगा चाल नहीं अपनी ।।
डाल क्षेपक तर्ज-पूर्ववत्
आनो भिडकी गई आकाशे. थे मुझ कीधो कुंवर विणासे. आई
खररायने पासे. आंसू न्हांसे अधिक उदासे, इसका खाती करे
अरदासे, मैं तो नीठ लाज राखी कर आई मायरी है।लक्ष्मणा३
ढाल मूलगी
याचना भङ्ग थकी रीसाणी, रीसाणो सुतमायां,
खर खरी आय पुकारी, रीसघणो विस्तार्यो । होभाई ।। १९ ।।
चउदहजार खराही खेचर, संवाह्या ते वारो।
आई गया ते वात करता, ऊठे ' राम जे नागे होभाई॥२०॥
'लक्ष्मण' भाखे देव दयाकरी, चैठा रहो तुम आपो ।
मुझ उठयां ए नाठा देखो. पुण्य थकी जिम पापोहोभाई॥२॥
ढाल क्षेपक तर्ज-हमीरीयारो
मंत्री कह नृप खर भणी, भेजीजे एक दुत राजेश्वर ।
आण लगे तुम चरणवे, छोडी अपनी आकृत राजेश्वर ।।।।
काम विचारी कीजीये। टेर।।
मूचो सुन जीवे नहीं, गई बात न होय ॥ गजेश्वर ।
खड्ग मेल कर धोकदे. मावन्त हवे सोय ॥ गजेश्वर काम
दृत मेज्यो सर इपणे, लेख देई ने हाथ ।। राजेश्वर ।
सुनम्हारी यांडो लीयो, उठो हमारी साध ।। गजेघरकामा ३॥
के पगे लागो खर तणे, लेई गंडा हाय ।। गजेथर ।
के मंग्राम सम्भारीये. अपग्न तीनी पान ! राजेघर काम॥ ४ ॥
( १६२) - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । लक्ष्मण कहै श्री राममू, ए खर बोली गर्व ॥ राजेश्वर । हुकम करो तुम देवजी, तो ए म्हारे सर्व ॥ राजेश्वर ॥काम॥५॥ ढाल मूलगी जाओ वेगा वैरी जीतो, जो जाणो ए त्रासो । 'सिंहनाद' निज मुखती कीजो. हूं छु थारे पासो होभाई॥२२॥ धनुष वाण लई पाये लागी, 'लक्ष्मण' चाल्यो जामो । खेचर खेते खगही शूग, मांड्यो अति संग्रामो ॥ हो भाई ॥ २३ ॥ गरुड तणे आगे निम अहिवर, तेमते ग्वेचर भाजे । अरण्य मांहीं अटल एकलो. लक्ष्मण वीर विराजे हो भाई॥२४ । पूठ गवया गवण आगे, भगनी जाय पुकारी || 'गम' मु 'लक्ष्मण' दण्ड कारण्ये, आयाछे अधिकारी | होमाई ॥२५॥ विद्या माधन करती वीरो, मारी लीयो काजो ।। लक्ष्मण मू वग्दपण अडिया, जुडियाछे जई आजो॥ होमाई ॥२६|| लघुभाई ना कलम बलियो, बलियो आप अपारो ।। बेपरवाई करतो अडग्नी, नाणे मनही मझागे। होमाई ॥ २७ ॥ मीना { मुबमाणे म्यामी मीतानो अति रूपो।। नार्ग मपली ही मोपन्ना, मीता रूप अनूपो | होमाई ॥ २८ ॥ नीन लोकनी नाग जैती, नेतो जोई विमासी ।। एक एक थी ओप अनिपण, सीता आगल दामी ।। होमाई ।।२९|| पग नयी लई गिवा यणाग्बत, मुर गुरु पाग्न पावे ॥ लगी एक बयाण पणेगे, मांये फिम कहिवावे ॥ होमाई ॥३०॥ मया-त्यश्री रेखगनजी म. के गिन्य नथमलजी माकन इन्द्र की परी है यरि है विधाता आप, चन्द्रमा मीर काही मीर अर्मापान की। कंचन वा नन न न दियाना मोड़. मावा की नीजमाने वीज आममान की ।। मात केंगे पाट पनी अनूपम और एमी। करत ग्रंमा मेवा मृमन मुगन की ।।
Avomwww श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १६३) स्वर्ग लोक मृत्यु लोक पाताल मांहीं । जायदेखी नारीहून दुजी एसीजैसी नाथ जानकी। --(ढाल क्षेपक तर्ज वीरारी)- वीरा सीता २ रूप अपार हो, वीरा ईन्द्राणी ने रद करेजी । वीरा कहता २ नावे पारहो, वीरा ईन्द्रादीक आशा धरेजी ॥१॥ वीरा थारी २ राणीयो पोई सहो, वीरा सीताने आगे पाणी भरेजीं।। वीरा थाने २ भेजी जगदीशहो, चीरा इणसं केल क्यू नहीं करंजी।।२।। चीरा राम २ सु लिछमन मील हो, वीरा वांने जाय मारो सहीजी ।। वीरा सीता २ { कीजे लीलहो, वीरा मानोंनी म्हारी कहीजी॥३॥ ढाल मूलगी-- सायर अन्ते ५ पृथिवी मांहीं, रत जीके छे जाचा।। तेतो बन्धय सघला थारा, स्वामी पणाथी साचा ।। होभाई ॥३।। पुष्पक नामे बेसी विमाणे. आणो आणी आशो । बदन विलोकी ने तब मुझने, देसो मही शाबासो।। होभाई ॥३२॥ ढाल भली ए इकतीसवीं, रावण मांड्या कानो। केशराज होतारथ बलीयो. आयो तस अवमानी । हो भाई ॥३३॥ दोहा ( फल्याण रागे) चीनगग उपदेश में, चार प्रकार धर्म । दान शीयल तप भावना, साधे वा शिव शर्म ॥१॥ चित्त वित अनुमारधी, दया दान कहिवाय । तपतो काया सोमवी. भावे भावना भाय ॥२॥ शील पालयो दोहीलो, नहीं मोडिलोलिगार । संचल चित्त स्थिर गखियो, चालयो खांडा धार ।।३।। चाये भरवो कोषलो. तरया उदधि अपार । माची साप खिलायणो. पालबो शीलाचार ॥४॥ दाल यत्तीराची तज पदनी-~- जीवर तूं शील तणो कर संग, अवर रंग सहकारमोरे, एह कगरी रंग ।। टेर॥
। ( १९२) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । लक्ष्मण कहै श्री राम, ए खर बोली गर्व ॥ राजेश्वर । हुकम करो तुम देवजी, तो ए म्हारं सर्व ॥ राजेश्वर काम||५॥ ढाल मूलगी जाओ वेगा वैरी जीतो, जो जाणो ए त्रासो। 'सिंहनाद' निज मुखती कीजो. हूं छु थारे पासो ||होभाई॥२२॥ धनुप वाण लई पाये लागी, 'लक्ष्मण' चाल्यो जामो । येचर खेने ग्वगही शूग, मांड्यो अति संग्रामो ॥ हो भाई ॥ २३ ॥ गरुड तणे आगे जिम अहिवर, तेमते खेचर भाजे । अरण्य मांहीं अटल एकलो. लक्ष्मण वीर विराजे हो भाई॥२४ । पूठ गयया गवण आगे. भगनी जाय पुकारी ।। 'गम' सु 'लक्ष्मण' दण्ड कारण्ये, आयाछे अधिकारी।। होभाई ॥२५॥ विद्या साधन करतो वीगे, मारी लीयो बेकाजो।। लक्ष्मण मुं यग्दृपण अडिया, जुडियाछे जई आजो। होभाई ॥२६॥ लघुमाई ना बलम बलियो, बलियो आप अपारो ।। बेपरवाई कम्तो अडग्नी, नाणे मनही मझागे। होमाई ॥ २७ ॥ मीना मुं मुबमाणे म्वामी सीतानो अति रूपो ।। नारी मघली ही मोधन्ता, मीता रूप अनूपो । होमाई ॥ २८ ॥ नीन लोकनी नाग जेती, नेतो जोई विमामी ।। एक एक थी ओप अतिपण, मीता आगल दासी ।। होमाई ।।२९। पग नपथी लई गिया बणान्वन, मृर गुरु पाग्न पावै ।। बानी एक वायाण वर्गगे, मांप किम कहियावे ॥ होमाई ॥३०॥ मया-पूज्य श्री रेखगजनीम के शिय नथमलजी म. कृत ईन्द्र की परी परि है विधाता आप, चन्द्रमांमवीर काही मीर अमीपान की। कंचन का तन च न दिखाता खोड, मावा की नीजमाने वीज आममान की ।। गाटगेवाट नो अदाम और एमो। कग्न अंगमा मेघा भूमत मुगन की ।।
- श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । ( १६३ ) स्वर्ग लोक मृत्यु लोक पाताल मांहीं । जायदेखी नारीहून दुजी एसीजैसी नाथ जानकी। -(ढाल क्षेपक तर्ज वीरारी)- वीरा सीता २ रूप अपार हो, वीरा ईन्द्राणी ने रद करेजी। चीरा कहता २ नावे पारहो, वीरा ईन्द्रादीक आशा धरेजी ॥१॥ वीरा थारी २.राणीयो पोई सहो, वीरा सीताने आगे पाणी भरेजी ।। वीरा थाने २ भेजी जगदीशहो, चीरा इणसं केल क्यू नहीं करेजी।।२।। वीरा राम २ सु लिछमन मील हो, वीरा यांने जाय मारो सहीजी ।। वीरा सीता २ झू कीजे लीलहो, वीरा मानोंनी म्हारी कहीजी ॥३॥ ढाल मूलगीं- सायर अन्ते ५ पृथिवी मांहीं, रन जीके छे जाचा।। तेतो बन्धव सघला थारा, स्वामी पणाथी साचा ।। होभाई ॥३१॥ पुष्पक नामे बेसी विमाणे. आणो आणी आशो || वदन विलोकी ने तय मुझने, देसो सही शापासो । होभाई ॥३२॥ ढाल भली ए इकतीशवी, रावण मांड्या कानो। केशराज होतारथ पलीयो. आयो तस अवमानी ॥होभाई ॥३३॥ दोहा (कल्याण रागे) वीतराग उपदेश में, चार प्रकार धर्म । दान गोयल तप भावना, साधे वा शिव शर्म ॥१॥ चित वित अनुमाग्धी, दया दान कहिचाय । तपतो काया सोसची. भावे भावना भाय ॥ २ ॥ शील पालयो दोहीलो, नहीं मोहिलोलिगार। पंचल चित्त स्थिर राखियो, चालयो मांटा धार ॥३॥ चाये भग्यो कोथलो, नग्या उदधि अपार । माचो माप खिलावणो. पालयो शीलाचार ॥४॥ बाल यतीराची तर्ज परनी- जीवरे तूं शील तणो कर मंग, अवर रंग सरकारमोरे, मह कगगे रंग ।। टेर।।
(१६५) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । आग थकी जल ऊपजे रे, साप थकी वरमाल । वाघ फिटी होय हरणलोरे, अंधे पणूं लहै व्याल२ ॥ जीव ॥१॥ पर्वत होवे पाव हीयो रे. विप थी अमृत होय । विन थाने ओच्छच घणो रे, दुर्जन सज्जन होय | जीव ॥२॥ मायर गांव तलावड़ी रे, अटवी निजधर वार । यूग निक भलपण भजे रे, शील तणा उपकार ।। जीव ॥ ३ ॥ पहो जगे अपयश नणो रे, गुणवने देवी आग । चारित्रो नीलांजली रे, तप जप जाये भाग ॥ जीव ॥ ४ ॥ माई मर्वापद तणी , कालो करवो गोत | द्वार देगाड़े नर्कनों रे. शील विना इम होत ।। जीव ।। ५ ।। पग भरे नर जेटला रे. परनारी ने हेत। प्रामण मारे नेटलार, मास अपर मत देत ॥ जीव ।। ६ ।। नजर मेलो नजग्नो रे, होवे जनी वार । पलके पलके पन्योपमें रे, वमयो नरक मझार ।। जीव ।। ७॥ कुममे नाग निग्ग्यतारे, ब्रह्म हत्यानो दीप । लागे लम्पटने घणो रे. पाप तणो ए पोप ।। जीव ।। ८ ।। गजदण्ड अति आकरोगे, और को नुकमान । आयु चिन मग्णी महीरे, न वधे कोई मान || जीव ॥९॥ आंच ऊंडी टोनिंदक्षये रे, क्षण २ खीणो देह । चन्द्र ग्हें निन्य बाग्मोरे जेहनो पग्घर नह ॥ जीव ।। १० ।। लान गयां निलंज पणं . कुकर के नाम । पग पग माथे ढांकणार. गोल बिना ए काम || जीव ॥ ११ ॥ मालवनी माता मनी रे वमृषा मां विख्यात । गीलन लोयो मुन्दगर, निमुगी ए अवदात ॥ जीव ।। १२ ।। पृत्यक नाम विमान में रे, बेटी गवण ताम । दाडकर आवाया, बेटा दीटा श्री गम | जीव ॥ १३ ॥ १ प्रथा पाटान्दो। : माप। गाम-नलावड़ी-गामनी नलावड़ी कानन मुभी गमय। - श्री जैन पद रामायण द्वितीय खएर । (१६५) आधा पांच पड़े नहीं रे, नवि लोपाये कार । सिंह न आवे आसनो रे, देखी आग अपार ।। जीव ॥ १४ ॥ सीता तो लेवी सही रे, राम छतां न लेवाय । आगे हरी पाछे तटी रे, सोच घणो तव थाय ।। जीव ॥ १५ ॥ विद्यातो अवलोकनी रे, समरी तब आवन्त । करजोड़ी ऊभी रही रे. प्रभुजी सुख पावन्त ।। जीव ॥ १६ ॥ सहाय करो तुम मायरी रे, पाम सीता आज । फिरी गया पंचो मध्ये रे, हूं पाम अति लाज ।। जीच ॥ १७ ।। शिरधूणी विद्याकहै रे, ए तो मुंडू काम । सीता हरतां तुमतणूं रे. थासे जगमें कुनाम ।। जीव ।। १८ ॥ सतियों मांही शिरोमणी रे, 'रामचन्द्र' की नार । शोलथकी चूके नहीं रे. जो होवे कोड़ मकार ।। जीव ॥१९॥ 'रावण' तो माने नहीं रे, देवी केरी वाय । म्हारे मन सीता वसी रे, एडी करो उपाय ॥ जीव ॥ २० ॥ विद्या कहै रघुजी छतां रे, कीयां कोडी कलाप | हाथ न आवे जानकी रे, सुरपति आयां आप ।। जीव ॥ २१ ॥ 'लक्ष्मण' लडवाने गयो रे, राम कियो संकेत । सिंहनाद तुझ सांभल्यां रे, आयां देखे खेत ॥जीव।। २२ ॥ सिंहनादने १ करूं रे, गधर ऊठी जाय । सीता लेनां मोहली रे, भाख्यो एह उपाय ।। जीव ॥ २३ ॥ लड़ता था तिण दिश जई रे. विधा कियो सिंहनाद । रामचंद्रजी माभग्यो रे. आणे मन विधवाद ।। जीव ॥ २४ ॥ नाद सुणी प्रभु चिन्तवेरे, एछे को परपंच । लक्ष्मण तो हारे नहींरे, संकट नो म्यू मंच ॥ जीव ॥ २५ ॥ मायन जायो एह पोरे, जीने राम साथ । खम्तो कुरेवो सरोरे. एमरुही रघु नाथ ।। जीव ।। २६ ।। बारम्बार चदेसरीरं, सीता पाणी सनेह ।
(१६) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । आग थकी जल उपजे रे, साप थकी वरमाल । वाघ फिटी होय हरणलोरे, अंधे पणूं लहै व्याल२ ॥ जीव ॥१॥ पर्चत होवे पाव हीयो रे. विप थी अमृत होय । विन थाने ओच्छच घणो रे, दुर्जन सज्जन होय ॥ जीव ॥ २ ॥ मायर गांव तलावड़ी रे, अटवी निजधर वार । युग तिक भलपण भजे रे, शील तणा उपकार ।। जीव ॥ ३ ॥ पड़हो जगे अपया तणो रे, गुणवने देवी आग। चारित्रने नीलांजली रे, नप जप जाये भाग । जीव ॥ ४ ॥ माई मर्वापद तणी रे, कालो करवो गोत । द्वार देगाड़े नर्कनों रे. शील विना इम होत ।। जीव ।। ५ ।। पग भरे नर जेटला रे. परनारी ने हेत । मात्मण मारे नेटलारे, माग अपर मत देत ॥ जीव ।। ६ ।। नजर मेलो नजग्नो रे, होवे जेती वार । पलके पलके पन्योपमें रे, वसवो नरक मझार ।। जीव ।। ७ ॥ कुममे नारी निग्ग्वतार, ब्रह्मा हत्यानो दीप । लागे लम्पटने घणो रे. पाप नणो ए पोप ॥ जीय ।। ८ ॥ गजदण्ड अति आकरोगे, और करे नुकमान | आयु विन मरणो महीरे, न वधे कोई मान || जीव ॥९॥ आंग ऊंडी दोनिंदाये रे, क्षण २ खीणी देह । चन्द्र रहै निन्य बाग्मोरे जहनो पग्घर नेह ॥ जीव ॥ १० ॥ दान गयां निज पणू रे, कुकर के नाम । पग पग माधे हांफणांग, गोल विना ए काम || जीव ॥ ११ ॥ भीलवनी सीता मनी रे बमृधा मां विख्यात | सोलन लाग्यो मुन्दग, निमुगी ए अवदान ।। जीव ।। १२ ।। पृयक नाम विमान में रे, चटी गवण नाम । दण्डका भावी यो रे, बेटा दीटा श्री गम || जीव ॥ १३ ॥ अन पठान्ने । मार। गाम-नलावड़ी-गामनी दन्ताबड़ी मनन परवान पनकी गाय । .
श्री जैन पद रामायण द्वितीय खएड। (१६) - रामचद्र की सीता राणी, लेई किहां तूंजाई ।। तत् १ ।। देख पराक्रम अवतू मेरो, में तुझ छोई नाई । जाय आकाशे ऊपर पडता. खगसे खगकी लाई । तत्० २॥ रावण वजे पिण नहीं माने, दीनो मुकट गिराई ।। तिम २ रोप करे पंखोडो, जीवत जावा डूं नाई ।। तत्० ३॥ ढाल मूलगी- वो तो माने नहीं रे, ताम रिसाणो राय ॥ कापी नांखी पांखडोरे, पडीयो धरती आय ।। जीव० ३४ ॥ शंकन माने कोई नोरे, बैठो जाय विमान | एह मनोरथ मायरोरे, पूर्यो श्रीभगवान् ॥ जीन० ३५ ।। क्षेपक राधेश्याम- अब रावण के हृदयको, हुआ पूर्ण विश्वाम । मनही मन मनमें सीयाको, उसने किया प्रणाम ।। फिर इकके बादहु आवहही, जो होनहार दिखलाता था। रावण के विमान में सीता थी, और वह लंका को जाता था । विमान ज्यों ज्यों आगे बढता था, त्यो त्यो सीता चिल्लाती थी। हा ? राम राम ? हा ? राम राम बस, यह आवाजें आती थी॥ विरहाग्नी के मन्तापित तन को उस नाम के नापसे सेकती थी। हा! राम यह कहती जाती थीं और भूषण वस्त्र फेंकती थी। दाल मूलगी-- हा सुसग दशरथजी रे, जनक जनक हा तात । हा लक्ष्मण हा रामजी रे, हा भामण्डल भ्रान ॥ जीव ।। ३६ ।। सिंचाणो जिम चिरकली रे. चायम रलीने जेम । ए कोई मुझने ग्रहीरे, लेई गरे एम ॥ जीव ।। ३७ ।। आवी कोई उतावसोरे, शूगे जे संभार । राक्षस धी गसी लीयोरे. करती काय प्रकार ।। जीव ।। ३८ ॥ धुलनन्दनी कुन बाल पेपर नई-फाटो लागो रे देवगैया । वेगो आजेरे देवरीया गाने, गरम लीयो जाय । ग० ॥ म्हाने लम्पट लीयो जाय ॥ टेर।।
(१६६) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। - लक्ष्मण संकटमे पडयोरे, नाद करे छे एह ।। जीव ॥ २७ ॥ कन्त को मुण कामनीरे, हमने थारो सोच । अटवीमाही एक लीरे, आप गयां आलोच ।। जीव ।। २८ ।। अवही जई फरी आवजोरे, करी वन्धवनी सार । आपोटू इम मांभलीरे, झूझे अति झंझार ॥ जीव ।।२९ ।। जैनोपदेशक वैद्य मुगणा धूलचंदजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-- चेगा श्रावो जिनवरजी- वेगा जाबो बालमजी म्हारो देवरीयो दुःखपाय ।। टेर। वाम ए विद्योधातणो, भट प्रबलबली कहिनाय ।। वेगा १॥ भौम पगई भयघगो. जीतवो मुमकिल थाय ॥ वेगा २ । वेगा जावो वेगा, बंधवनी करोमहाय । वेगा ३ ॥ गज्य ऋद्धि मरठौग्ने, संग आयो लक्ष्मण भाय । वेगा ४ ।। नेह निभायो प्रभु आपही, बाग्म लाचोकाय ॥ वेगा ५ ॥ मोवगे मनमायरो. इहां कहो कुण आय । वैगा ६ ॥ काटी कींवाडो देयने. मैट्ला माय । वेगा ७ ।। प्रयल जोर भावी तणो, पुग्प कर कहो काय । वेगा ८ ॥ दाल मूलगी- कांदयक मीता प्रेग्णारे, कांइक निमुण्योनाद । धनुष्य वाण मम्बाही के रे, ऊथ्यो धरी अन्हाद । जीव ३० ॥ मर नेतो वानोंषणोरे, चान्यो जाय मगेप । नमिटेडे भवितव्यतार, देवन देवो दोष । जीव ३१ ।। पटे गवा आचीयोरे, वन्नी अपराल । मीनाने ले चन्यो, दीठं रूप ग्माल । जीव ३२ ॥ नाम जटायु पंखीयोरे, जाई मिलीयो चाय । गए भगनाव-अंकगे, नास विलु काय । जीव ३३ ॥ टालक दान पदरी जनोपदेशक बेटा सुगरणा धूलचंदजी , दमन आहो फिगयो जवाई | टे॥ मुना पाने चौर धर्मायो रे दृष्ट अन्याई ।
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RAANnAmrus WANA श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड। ( १६६) आपणपे आलोच में रे, सापर ऊपर सोई । करे घणी ममझावणी रे, समझावाने तोई ।। जीव ॥ ४५ ॥ भृचर खेचर राजवी रे, सयल नमें हम पाय । अछू त्रिखण्डनो धणी रे, ईन्द्र आप गुण गाय ॥ जीव ।। ४६ ।। करी थापूं पटरागीनी रे, महिमा अधिक वधाय। रोवे मति रहै रङ्ग में रे, सुख में दुःख न समाय ।। जीव ॥४७॥ कर्ता कोप्यो थो घणो रे, हत किस खुणसाण । भाग्यहीण इण रामने रे, दीधी गले लगाय । जीव ।। ४८ ॥ काग गले कञ्चन तणी रे. माल भली न देखाय । सरिग्नासू मरिखो मले रे, आवे सहुने दाय ।। जीव ।। ४९ ।। मानो मुझने पति पणे रे, होई रहुं तुम दास । मुझ मान्या सहु मानसे रे, आणी तुम्हारी आश | जीव।। ५० ।। निजर न ऊंची सा करे रे, दीन ए अपूठो जबाव । अक्षर१ दोना ध्यानथी रे, आणी रही अति आप || जीव ||५|| विंध्यो मन्मथ वाणसं रे, आरति अति मनमांहै। ऊठीने पग लागीयो रे. विपय विहल प्राहे ॥ जीव ॥ ५२ ।। लम्पट ललचाणो धणू रे, तूं क्यों न करे परवाण । अण इच्छन्ति नारनोरं, पहिला छे पञ्चक्खाण ।। जीव ॥५३॥ सीता पग खेची लीयोरे, छिन्यो नहीं शिर तास । परपुरुषांने आ भड्योरे, धाये शोयल विणास || जीव ॥ ५४ ।। देवलनी ध्वज सारखोरे, पनियता कहिवाय । होय अपूठी वायथीरे. आपही अलगी पुलाय || जीव ॥ ५५ ॥ सीता आक्रोशे घणूरे. रेरे निर्लज ! नरेश । मुझ आण्यांधी नाहरीर, विणठी यात विशेष ॥ जीव ॥५६॥ सारणादिक तो घणारे. मंत्रीने सामन्त । साम्हा आवी सादरारे. प्रभुने शोप नामन्त || जीव ।। ५७ ॥ राम। फामदे।
(१९८) श्री जैन पद रामायण द्वितीय खण्ड । प्राण वल्लभ मेरे दिलजानी, आप कही सो मैं नहीं मानी । जिणग ए फल पाय || म्हांने राक्षस० ॥ १ ॥ धावो घावो लक्ष्मण देवर, एम कही नांख्यो पंगनेवर । ए सेलाणी थाय || म्हांने राक्षस० ॥२॥ हा हा देव ! अत्रे स्यं कर. आप घात करने में मरनं । एम कही विललाय ।। म्हांने राक्षस० ॥ ३ ॥ हृदय विदारक सीता रोवे, गगन विहारी पंखी जोवे । ग्या माग ही कुरलाय ।। म्हांने राक्षम० ॥ ४ ॥ ढाल मूलगी अर्थ जटीनो जाईयो रे. • रन जटी ' खग एक । रोज सुणी मीता तणो रे, मन में करीय विवेक ।। जीव ॥३९ ।। भगिनी 'भामण्डल' तणो रे. 'रामचन्द्र' नी नार | 'गवण' जी छल के लवी रे, लई चाल्यो अपहार | जीव ॥ ४० ॥ 'भामण्डलना' पक्षथी रे, रत्न जटी तलवार । मम्बाही मामो यो रे, गवणनी तिणयार ॥ जीव ।। ४१ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-चन्द्रायणा भामण्डल की यहिन गम की नार है, रे लेजावे केमके मुह गीवार है। देनो इणने छोड़ केण तूं मानले, नहींतर दे मार निश्चय । जानने ॥ १ ॥ गवण भाग्वे गड ! भक्त थारी थई. जा तूं थोर पन्य मान म्हारी कही। तो पण कर कग्वाल के ले मामो थयो, पज्यों गवग बहोतक मानत नहीं कयो।॥ १॥ दाल मूलगी मुलकाणी मनमें घणं रे, किम्युं करे ए रव, । विद्या मपनी अादर्ग, लीपी गय निशङ्क, ।। जीव ।। ४२ ।। पाल विमो पंथीयो रे, होर तेमए देख । छोटा म्होटा में अंडे . पावे दुःख विशेष ।। जीव ।। ४३ ॥ इन्द्र दोष कम्इ गांगरे, गिरती गिग्तो नेह । काय अविका औरना , आयो घाती दद ।। जीव ।। ४४ ॥
शीतहिमा जैत प्रथाला दोपावर - - ॥ श्रीमच्छार्दूलसिंह जित्-गुरवे नमः॥ अथ तृतीय खण्डं प्रारभ्यते। दोहा-(सोरठी रागे) वाग देवी वरदायनी, कविजन केरी माय । मया करीने आपजो, शुद्ध मति सुखदाय ।।१।। राम चली ऊतावला, आया 'लक्ष्मण पास। रण रङ्गे रमतो खरो. दीठो सो उल्लास ॥ २ ॥ 'राम' प्रत्ये 'लक्ष्मण' कहै, तुमतो कियो अकाज । अटवी मांही एकली, 'सीता' मूकी आज ॥ ३ ॥ मुनि श्री रूपचन्दजी म० कृत क्षेपक तर्ज-सरोता कहां भूल आये। सीता को क्यों छोड आये, प्यारे मेरे भैया ।। टेर ॥ दिवी भोलामण इतनी तुम्हको, सोयका जतन करैया । विकट भयङ्कर अटवो इसमें, निशिचर खूप फरैया । सीता ॥१॥ पर्ण कूटी में सीताजी को, एकाकी छोडैया। चिना बुलाये आये यहां क्यों, वनमें तजी भोजैया ॥ सीता ॥२॥ वार २ सिंहनाद सुनीकर, चित्त में मैं चमकया । जङ्गमें जीते लक्ष्मणजी को, ऐसा कुण मा जैया ।। सीता ॥३॥ तोरी भावज जबरन मुझको, तोके पाम पठेया । रूप मुनि कहै रामायण में, गायो ख्य गया । सीताको ॥ ४ ॥ दोहा--राम कहै तेडीयो, हूं आव्यो अवधार । सो कहै मै नवि नेडीयो. ए प्रपञ्च विचार ।। ४ ॥ फरी जावी ऊतावला. मनि को विणसे काम । पाछल थी आधीश है. जीनिने संग्राम ।। ५ ।। वेग २ वाटे वही. राम पधार्या जाम । नजर न देखे जानसी. मूर्खाणा प्रभु नाम ॥ ६ ॥ उतावलापाचोयो, दारण भरतो उन्न। वर्ष एफ नहीं वीसरे, पन रापरा पग। यतः (१०२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ढाल तेतीशमी तर्ज-घड़ीदे लाल तम्बाखू श्री रामजी ए वनमें मेली, सीता शुद्ध न पाई हो । इत उत ढूंढत डोलत वन में, सा नवि दीये दिखाई हो ॥ १ ॥ श्री रामे नार गमाई हो ॥ टेर॥ संज्ञा पामी अन्तर्यामी, आगे आई धाई हो । पंख विहणो पंखी पड़ीयो, दीठो ऊपर आई हो ॥ श्री रामे ॥२॥ पंखीड़े दीठो नर कोई, नारी लीयां जाई हो । पूठ हुवां थी पापी पुरुपे, नांख्यो छे ए घाई हो। श्री रामे ॥३॥ क्षेपक राधेश्याम चलने २ उम जगह, पहुंच गये सुख धाम | जहां अधमरा गीध वह, कहता था हे गम ! || उन मुंदती आंखों के आगे, वे दया भरी आंखे पहुंची। अघ मरे गीष के कंधों पर, वे बडी २ बाहें पहुंची ।। मग्ने वाले के कानों में, पहुंची यह वाणो प्रेम-भरी । है ! परोपकारी बोल २. किमने तेरी दुर्दशा करी ।। आग्न गोली मामने, देखे, शोभा धाम | लेकर आंखों में किया, आंखों से ही प्रणाम ।। फिर आंग्य मुंद कर बोल उठा, है कौन जो मुझे मम्हालवा है ? हा गम यह जाप में पता हूं, उम जाप में विन डालता है। कोई मी हो मैं कहता हूं, हट जाओ मुझको मरने दो। हा गम ! मंत्र है माता का, आराधना उसकी करने दो ॥ गद २ हो बोले प्रभु, मैं ही हूं वह गम | मनगन ! देखो तुम्हे. करता गम प्रणाम ।। यह सुनते ही फिर ग्युले, गीधगज के नैन । टूटी कटी जुबान में, रगा चोलने बैन । हा गम मिया को एक दृष्ट. (हा गम !) लंगया दक्षिण को । हा गम!) मरता था में उममे, (हा गम!) छुटा न मका उनको।। हा गम ! न बोला जाता है, (हा गम) ममे अन मग्नं दी।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड। ( २०३ ) (हा राम !) सामने आजावो, (हा राम !) यह स्वरूप देखने दो।। ढाल क्षेपक मुलगी- अगाड़ी पंखी ही पायो, जिणीने पूछे रघुरायो. पंखी कहै नारी ले जायो, संज्ञा से वात चेतायो, धनुष्य ले तिण दिश ही जावे, लाधी नहीं फिर पाछा आवे ॥ सत्य व्रत पालो ॥ ६७ ॥ पसीने देखी दुःख पावे , सोचतव मनमांही लावे, तथापि तसु तिरणो चावे । प्रभुजी करुणा दिल लाई, वक्त फिर यह आवे नाई ।। ॥ सत्य० ॥६८॥ ढाल मूलगी- श्रावक जाणी जाणी सहाई, प्रभु उपकार कराई हो । श्री नमोकार अपार अनूपम, दीधो तसु सुखदाई हो ॥श्रीराम।।४।। मंत्र प्रभावे स्वर्ग चतुर्थे, सुरनी पदवी पार्ड हो । मंगत थी पंखीउद्धरियो, संगत थी सुख थाई हो ।। श्री रामे ।।५।। ऊंचो देखे नीचो देखे, पास न कोई मखाई हो । संचर जाणो आशा आणी. ताम रहे पस्ताई हो !! श्री रामे।।६।। सवैया- वनके कुरंग ते कहा कुरंग कोनो. अब कहूं मृग नेनी सीय ताकी सोध लायदे । कोकिल सो कण्ठ जाको, मधुर आनन्दकारी, कीकिल कं वेगजाई इतही कं आयदे ।। ताही के शरीर की सुगंध अगर रूप अरे, पवन वीर वास इतकू पठाय दे। अहो हंसराज हम गामीनी गमन कीनो. मेरी दया देख अब सीय कृमिलाय दे। अरे लम्बे २ वट, तेरे माथे मोटी झट, मेरी सोया यतादे मट ।। प्ररे मौर. दई दिश दौर, यतादे मेरी मीय को पोर ॥ परे फाग सूना क्यं है जाग, सीता गई फिरण माग ॥ प्ररे सूवा जोतां घनी वार हवा. यतादे सीता का दूहा- wn २०२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ढाल तेतीशमी तर्ज-घड़ीदे लाल तम्बाखू श्री रामजी ए वनमें मेली, सीता शुद्ध न पाई हो । इत उन ढूंढत डोलत वन में, सा नवि दीये दिखाई हो ॥ १ ॥ श्री रामे नार गमाई हो ॥टेर ।। संज्ञा पामी अन्तर्यामी, आगे आई धाई हो । पंख विहूणो पंखी पडीयो, दीठो ऊपर आई हो ॥ श्री रामे ॥२॥ पंखीड़े दीठो नर कोई, नारी लीभां जाई हो । पूठ हुवां थी पापी पुरुपे, नांख्यो छे ए घाई हो ॥ श्री रामे ॥३॥ क्षेपक राधेश्याम चलते २ उस जगह, पहुंच गये सुख धाम । जहां अधमरा गीध वह, कहता था हे गम ! ।। उन मुंदती आंखों के आगे, वे दया भरी आंखे पहुंची। अध मरे गीष के कंधों पर, वे बडी २ बाहें पहुंची ।। मरने वाले के कानों में, पहुंची यह वाणो प्रेम-भरी । है ! परोपकारी बोल २. किसने तेरी दुर्दशा करी ।। आंखें खोली सामने, देखे, शोभा धाम । लेकर आंखों में किया, आंखों से ही प्रणाम ।। फिर आंख मूंद कर बोल उठा, है कौन जो मुझे सम्हालता है हा राम यह जाप मैं अपता हूं, उस जाप में विन डालता है। कोई भी हो मैं कहता हूं, हट जाओ मुझको मरने दो। हा राम ! मंत्र है माता का, आराधना उसकी करने दो ॥ गद २ हो चोले प्रभु, में ही हूं वह गम | भक्तराज ! देखो तुम्हे. करता गम प्रणाम ।। यह मुनते ही फिर खुले, गीधगज के नैन । ही फूटी जुबान से, लगा चोलन चैन । (हा गम : मिया को एक दुष्ट, (हा गम !) लंगया दक्षिण को । {हा गम!) लहना था में उमसे, (हा गम!) हुदा न सका उनको।। (हा गम!) न बोला जाता है, (हा गम) मी अन मग्ने दो। .
- श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २०३) (हा राम !) सामने आजावो, (हा राम !) यह स्वरूप देखने दो।। ढाल क्षेपक मुलगी- अगाड़ी पंखी ही पायो, जिणीने पूछे रघुरायो. पंखी कहै नारी ले जायो, संज्ञा से वात चेतायो, धनुष्य ले तिण दिश ही जावे, लाधी नहीं फिर पाछा आवे ॥ सत्य व्रत पालो ॥ ६७ ॥ पंखीने देखी दुःख पावे , सोचतव मनमांही लावे, तथापि तसु तिरणो चावे । प्रभुजी करुणा दिल लाई, वक्त फिर यह आवे नाई ।। ॥ सत्य० ॥६८॥ ढाल मूलगी- श्रावक जाणो जाणी सहाई, प्रभु उपकार कराई हो । श्री नमोकार अपार अनूपम, दीघो तसु सुखदाई हो ॥श्रीरामे।॥४॥ मंत्र प्रभावे स्वर्ग चतुर्थे, सुरनी पदवी पाई हो । मंगत थी पंखीउद्धरियो, संगत थी सुख थाई हो ॥ श्री गमे ।।५।। ऊंचो देखे नीचो देखे, पास न कोई सखाई हो। संचर जाणी आशा आणी. ताम रहे पस्ताई हो । श्री रामे।।६।। सवैया वनके कुरंग ते कहा कुरंग कीनो. अब कहूं मृगनेनी सीय ताफी सोध लायदे । कोकिल सो कण्ठ जाको, मधुर आनन्दकारी, कीकिल कं वेग जाई इतही कं आयदे ।। ताही के शरीर की सुगंध अगर रूप अरे, पवन वीर वास इतकू पठाय दे । अहो हंसराज हम गामीनी गमन कीनो. मेरी दया देख अब सीय कृमिलायदे ।। अरे लम्चे २ वट, तेरे माथे मोटी मट. मेरी सीया वतादे मट ।। अरे मौर. दई दिश दौर, बतादे मेरी मीय को पोर ॥ परे काग मूता क्य है जाग, सीता गई रिण माग ॥ अरे सूवा जोतां पली वार हवा. - म्हाला डालता है। ने दो। करने दो। नैन। बैन । यतादे सीता फा दहा- ॥ लेगया दक्षिा हो (१०२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । दाल तेतीशमी तर्ज-घड़ीदे लाल तम्बाखू श्री गमजी ए वनमें मेली, सीता शुद्ध न पाई हो । इत उन ढूंढत डोलत वन में, सा नवि दीये दिखाई हो ॥ १ ॥ श्री गमे नार गमाई हो ॥टेर ।। मंबा पामी अन्तर्यामी, आगे आई धाई हो । पंख विहणो पंखी पडीयो, दीठो ऊपर आई हो॥श्री रामे ॥२॥ पंपीड़े दीठो नर कोई, नारी लीयां जाई हो । पूठ हुवां थी पापी पुरुपे, नांख्यो छे ए घाई हो। श्री रामे ||३|| क्षेपक राधेश्याम चलते २ उम जगह, पहुंच गये सुख धाम । जहां अधमग गीध यह, कहता था हे गम ! ॥ उन मुंदनी आंग्यों के आगे, वे दया भरी आंखे पहुंची। अघ मरे गोष के कंधों पर, वे बडी २ बाहें पहुंची ।। मग्ने वाले के कानों में, पहुंची यह वाणो प्रेम-भरी । हे ! परोपकारी योल २. किमने तेरी दुर्दशा करी ।। आंम्ब गोली मामने, देखे, शोभा धाम | लेकर आंखों में किया, आंग्यों से ही प्रणाम ।। फिर भाग्य मूंद कर बोल उठा, है कौन जो मुझे सम्हालना है? हा गम यह जाप में पता हूं, उस जाप में विन डालता है ।। कोई मी हो मैं कहता हूं, हट जाओ मुझको मरने दो। हा गम ! मंत्र है माता का, आगवना उमकी करने दो ॥ गद २ हो वाले प्रमु, मैं हूं वह गम । मतगत : देखो तुम्हे. करता गम प्रणाम ।। यह मृनते ही फिर खुले, गीधगज के नैन । टूटी फूटी जुबान में, सगा बोलने वैन । हा गर :, मिया को एक दृष्ट, (हा गम !) लंगया दक्षिण को। हा गन !) लता था मैं उसमें, (हा गम!) द्वा न मका उनको।। दा गम :) न बोला जाता है, (हा गम) म अब मग्ने टो।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। (२०३ ) (हा राम !) सामने आजावो, (हा राम !) यह स्वरूप देखने दो।। ढाल क्षेपक मुलगी- अगाड़ी पंखी ही पायो, जिणीने पूछे रघुरायो. पंखी कहै नारी ले जायो, संज्ञा से वात चेतायो, धनुष्य ले तिण दिश ही जावे, लाधी नहीं फिर पाछा आवे । सत्य व्रत पालो ॥ ६७॥ पंखीने देखी दुःख पावे , सोचतव मनमांही लावे, तथापि तसु तिरणो चावे । प्रभुजी करुणा दिल लाई, वक्त फिर यह आवे नाई ।। ।। सत्य० ॥ ६८ ॥ दाल मूलगी- श्रावक जाणी जाणी सहाई, प्रभु उपकार कराई हो । श्री नमोकार अपार अनूपम, दीयो तसु सुखदाई हो ॥श्रीरामे।।४।। मंत्र प्रभावे स्वर्ग चतुर्थे , सुरनी पदवी पाई हो । संगत थी पंखीउद्धरियो, संगत थी सुख थाई हो ॥श्री रामे ॥५॥ ऊंचो देखे नीचो देखे, पास न कोई मखाई हो। संचर जाणो आशा आणी. ताम रहे पम्ताई हो ॥ श्री रामे॥६॥ सवैया- वन के कुरंग ते कहा कुरंग कोनो. अब कहूं मृग नेनी सीय ताकी सोध लायदे । कोकिल सो कण्ठ जाको, मधुर आनन्दकारी, कीकिल के वेग जाई इनही के आयदे ।। ताही के शरीर की सुगंध अगर रूप अरे, पवन वीर चास इतकं पठाय दे। अहो हंसराज हंस गामीनी गमन कीनो, मेरी दया देस अब सीर कृमिलाय।। अरे लम्चे २ पट. तेरे माधे मोटी गट. मेरी नीया बतादे मट । परे मौर. दई दिश दौर, नतादे मेरी नीय को और ॥ रे फागनना स्य है आग, सीता गई किण माग If अरे मूवा जोठा पली बार दवा. यतादे सीता पाइहा- Vra AR- (२०४) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । स्वामी श्री नथमलजी म. कृत ढाल क्षेपक तर्ज नणदल री- अवेरो मने नहीं आवडे, सीता केरे राग हो रघुपति । अवर वान गमे नहीं, एक सीतारी लाग हो रघु०॥ अवे. ॥१॥ "ना झपा सहुदीसे, राम पावे दुःख रास हो । रघु० । सनी सेज छे रावली, प्रीतवती नहीं पास हो । रघु०॥ अत्रे ।।२।। आसन शयन विलोकतां, वेदनतो असमान हो रघुपति० । माननीया१ साले नहीं, माले आई ठाण हो । रघु० ॥ अवे।। ३ ।। दोहा-इमगहन सोच करता फिरे, मारे वन मझार । मोह गहला थया रामजी, रुदन करे अनपार ॥१॥ धूलचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-जल्लो मेरी जोड़ को सनी मेरी जानकी' कुण लेगयो पापी रे ॥ टेर ॥ पतिव्रताथी पदमणी रे, रहती मदा इक रङ्ग । बन दुःप माथे महै रे, कुण कीयो रङ्ग में भङ्ग ।। मीता ॥ १ ॥ दुःय दीनो मोय पापीयो रे. लेगयो मीता नार । 'लक्ष्मण' पिण हाजर नहीं रे, कुण करमी तमवार सती।। २ ।। क्षिण इक मूछां पामतो रे, क्षिण इक होय मचेन । अटवी मांही टलबले रे, मीता करे हेन । मीता ।। ३ ।। ढाल मूलगीं- सामण माथे, म्बर मेचर मो, मांडे नाम लड़ाई हो। 'त्रिगिग' लघु माई गर गग्वी, आप कर अधिकाई हो ॥श्री||७|| ग्य वेमी ने लक्ष्मण माथे. मुझतणी विधि टार्ट हो । 'लक्ष्मण' बीरे मार्ग नांग्ख्या पहेली पह वधाई हो ॥ सीता ||८|| टाल नेपक नर्ज-बदका। 'लाम वीर अति धीर शूगपणे, लटन चपोट अनि चोट बाहै । १ गयां माले नहीं, माले पाही टाग। गया माले नहीं, माले पहीयो पिलाग । डर्टी विटग्न बाद में, का नहीं मोच कीयो। मनाहा गुगे उट मटके, ग्युपति रोय दीयो ।।
M - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२०५) विकट रणभूमी में भट्ट झट्ट आवीया, सामी आवे जको मृत्यु चाहै ॥ ल० ॥१॥ वाण सणणण वह चोट कोई ना सहै, कहै मुख खेचरा एम वाणी । वनतणो वासीयो सहुने ए वासीयो, नासीया सहु जणा भ्रान्ति आणी ॥ ल०॥२॥ ढाल मूलगी लङ्क पयाला केरो स्वामी, "चन्द्रोदय' सुत सोई हो। 'वीरविराध' सवल बलसाजी, आवी सहाई होई हो ॥ श्री॥९॥ सेक सोई आडो आवे, काम पड़े नहीं काचो हो । 'लक्ष्मण' साथे 'विराध' चदेरे, सेवक हूं छू साचो हो|श्री॥१०॥ चाप हणीने लड़ा लीधी, रीस घणी के आगे हो । स्वामी कारज र चापको. जगमांही जश जागेहो ॥ श्री रामे१।। तुम्ह आगेए कीट पतंगा. भृत्य पणूं हूं भाखू हो । घो आदेश विशेप वतावं. रण अखयायति राखूडो॥श्री रामे १२॥ ईपत् हसि लक्ष्मणजी बोले. स्योरे सहायज शूराहो । आपोवले बलवन्त कहावे, परवल नित्य अधूराहो ॥ श्री रामे १३ ॥ जेठो वन्धव राम नरेश्वर, दुःसीजन प्रति पालहो । देसे तुझने राज्य तुम्हारो, शव कन्द कुदाल्हो ॥ श्री रामे १४ ॥ देखी विराध विरोधोखर, तो योन्यो रोप प्रकाशीहो। शम्बूक' हणतां सहायज एहने, तूं वरीयो वनवासीहो॥श्रीरामे?५।। लक्ष्मण' भाखे' खर मतभूके, नन्दन त्रिशिरा माई हो । उणही पन्थेतूंी चला तोरे मुमित्रा माईटो ।। श्री रामे १६ ।। मार्यो के मार्यो में मूरख, जीभतजी सुमटाई हो । करी प्रगट मोहा पक्षपाती, लीज नाम बुलाई हो ॥ श्री १७ ॥ एम कहन्तां नट जिम नाचे, पाणे अम्पर छाई हो। पाण' क्षुरप्रे१ सर शिरलयं अपर रमा मुग्र पाई हो ॥श्री ग१८॥ 'दसण' दल लेईने दोड्यो. तेपिण मारी लीधो हो। पासणाने भारारं माण।
ram- (१०५) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । स्वामी श्री नथमलजी म. कृत ढाल क्षेपक तर्ज नणदल री- अवे रो मने नहीं आवडे, सीता केरे राग हो रघुपति । अवर पात गमे नहीं, एक सीतारी लाग हो रघु०॥ अवे. ॥१॥ सना झुपा सहुदीसे, राम पावे दुःख रास हो । रघु० । सुनी सेज छे गवली, प्रीतवती नहीं पाम हो रघु०॥ अवे ।।२।। आमन शयन चिलोकतां, वेदनतो अममान हो रघुपति० । माजनीया माले नहीं, माले आई ठाण हो । रघु० ॥ अवे।। ३ ।। दोहा-दमगहनर सोच करता फिरे, मारे वन मझार । मोह गहला थया रामजी, रुदन करे अनपार ॥१॥ धूलचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-जल्लो मेरी जोड़ को सती मेरी 'जानकी' कुण लेगयो पापी रे ॥ टेर ।। पतिव्रताथी पदमणी रे, रहती मदा इक रङ्गः । वन दुःप माथे महै रे, कुण कीयो रङ्ग में भङ्ग ।। सीता ।। १ ।। दुःप दीनो मोय पापीयो रे. लेगयो मीता नार । 'लक्ष्मण' पिण हाजर नहीं रे, कुण करमी तमवार ||सनी।। २ ।। क्षिण इक मूला पामतो रे, क्षिण इक होय मचेत । अटी मांही टलयले रे, मीना करे हेन ॥ मीता ।। ३ ।। ढाल मूलगीं- रमण माथे, पर मंचर मो, मांडे नाम लड़ाई हो। 'त्रिशिर्ग' लघु भार्ट ग्बर गग्वी, आप कर अधिकाई हो ॥श्री||७ ग्य वेमी ने लक्ष्मण माथे. टांझतणी विधि टाई हो । 'लमा बीरे मार्ग नांग्या पहेली गड वधाई दी।। मीता ||८|| दाल पक नर्ज-पदका। 'मामा' बीर अति चीर गपणे, लटन चपोट अनि चोट पाहै । गयां माले नहीं. माले याही ठागा। संग नहीं. माले पड़ीयो पिनाग ।। दाट जगत में नहीं मोच कीयो मीटर दुगे र मटक, रानि गेय दीयो !! ।
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AA (००६ ) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । आपण की धो आपसमार्यो, अवरांसु जश नवि दीधो हो॥श्री १९ लेई साये विगध विदीतो, उमग्यो उमग्यो आवेहो । एटले वाम नेत्र फरकियू. ताम असाता पावेहो।। श्री रामे २० ॥ अलगीथी दीठो अलवेसर?, अटवी मांही भमतो हो । नारी वियोगे योगीन हुमो, आरतो मांही रमतो हो ॥श्री २१ ॥ लई विववाद विशेप विचारे, ए तो मैंधुर जाणी 'अटवीमा एकाकी विशेपे, राम गवेपे२ राणीहो ।। श्री २२ ॥ लक्ष्मण आगे आवी ऊभो, गम' नसांमो३ देखे हो । विग्ह माल सरीखो माले, नभ वात विशेष हो ।। श्री रामे २३ ।। पान पान करी बनमेंमोमो, नारी नयणे न आवीं हो । वन देवी तुमछोवन वामिनी, द्योछो क्यूंन वनावी हो ॥ श्री २४ ॥ तुम भरोसे नारी मूकी. मैतो काम मीधायो हो । कामन की धो नारगमाई, जग अपजश बोलायो हो ॥ श्री २५ ॥ भाई भरोमे थारे मूस्यो. त्रिया रखवाली कामो हो । आयोथो मो एकन हुई, ओछो दीठो गमो हो ॥ श्री रामे २६ ॥ गनमार देवा नवि दीधो, धन्य? कैकयो मान हो । नागन गली शस्यो नरनिश्च. तोकिम गज्य रखात हो ॥ श्री २७ एम कईतो गम नश्वर, धणी पड्यो मृच्छाई हो । गम दुःमे पशु पंची दुःन्धिया, ऊमा आगे आई हो ।। श्री १२८॥ 'लक्ष्मणजी करी ! गीत बनाई पोले आवी आगेहो। आर्य! कंगे छ कार्य कि ए, महूं ने भूट्ट लागेहो ॥ श्री २९ ॥ भाई नुहागे मी आयो, बग्नी कन्द निकन्दी हो । वचन सुवाग्मा मींचागी, लहै मंना आनन्दी हो ॥ श्री ३० ॥ देवे लाऊनोभाग. ऊटी मिलियो धाई हो। मरदोई मिली वियान रखाणी. हरवाणी उमाई हो।। श्री ३१॥ दन्तु मोमीनी म मा. प्रमुए भारती म आणो हो। ---- श्राकर-? वीरमगे- AAAA श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२०७) नादभेद करी ने किणईके, सीता लीधी जाणोहो ॥ श्री ३२ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज मतकरजो कई प्रीत- लिछमन मोही कहोरी, कौनहरी है सीत ॥ टेर।। लेगयो नार कवहन रहुंगो अवमें हूंगो अतीत ॥ ली ॥१॥ तुमसा वीर प्रवल बलवन्ता, लही खेचामुंजीत ली ॥ २ ॥ अब दो बंधव होके सामिल, दुष्टको करो फजीत ॥ लि ॥३॥ ढाल क्षेपक तर्ज कपिरे प्रीया साथे--- लक्ष्मण भाई' सीता को कौन हरी । टेर।। इस मंडीया पर कागऊडत है, देखो आसूनी परी ॥ लक्ष्मण १ ॥ के कोई विद्या धर लेगयो, के कोई सिंह चरी । ल ॥२॥ झाड़ झाड सब बनकूढूंढे, तोही न खवरपरी ॥ ल ।। ॥३॥ ढाल मूलगी- तेहना प्राण संघाते सीता, वेगे पाछी आणूं हो। तो तो लक्ष्मण नाम हमारूं, नहींतो झट्ट थपाणूं हो। श्री ३३ ।। वीर विराध खरोओमिलियो, आपो बोल उदारू हो। लंक पयाले प्रभू थिरथायो, वचन पले जिम चारू हो ॥ श्री ३४॥ सीता खवर करेवा कारण, भट मोकलिया भारी हो। चीर' चीराध घणोजल फलीयो, अवसर सेवाप्यारीहो ॥ श्री ३५ ॥ सुभट सहु पृथिवी फिराया, सीता खपर न पामी हो। अधोमुखा ऊभा प्रभु आगे, बतलावे तप स्वामी हो ।। श्री ३६ ॥ (शिखरिणी) सियाजी रागरणा, निासहरि नेणां जलभरे । प्रियाजी राप्यारा, सहान गुण माग हियधरे। हरे चिन्ता सारी, तदपि दुःसभारी मनको । विजोगीहै जोगी भगती ग्नभोगी सरपरे ॥१॥ (चौपा.) गम-लक्षमण! देव सियाग गेणां । भोलवलास? निम्म निना। लक्ष्मण- मैं नेणां जगदम्रन जोई । तन-भूषण जाण नहीं कोई ।
(२०६) ~~~ श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । आपण की धो आपममार्यो, अवरांसु जश नवि दीधो हो॥श्री १९ लेई माथे विगध विदीतो, उमग्यो उमग्यो आवेहो । एटले बामू नेत्र फरकिय. ताम असाता पावेहो। श्री रामे २० ॥ अलगीथी दीठो अलवेसर?, अटवी मांही भमतो हो । नारी वियोग योगी न हुयो, आरतो मांही रमतो हो ।। श्री २१ ।। लई विववाद विशेप विचारे, ए तो मैंधुर जाणी हो । 'अटवीमा एकाकी विशेष, राम गवेपेर राणीहो ॥ श्री २२ ॥ लक्ष्मण आगे आधी ऊभो, राम' नसांमो३ देखे हो । विग्ह साल मरीखो साले, नभv वात विशेपे हो । श्री रामे २३ ।। पान पान करी बनमेमोभी, नारी नयणे न आवीं हो । वन देवी तुमछोयन वामिनी, द्योछो क्यूंन वनावी हो ॥ श्री २४॥ तुम? भरोसे नारी मूकी, मतो काम मीधायो हो । कामन की घो नारगमाई, जग अपजश बोलायो हो ॥ श्री २५ ॥ भाई भरोम थारे मृस्यो. त्रिया रखवाली कामो हो । आयोयो मी एकन हुई, ओछो दीठो गमो हो ॥ श्री गमे २६ ।। गनमार देवा नवि दीयो, धन्य? कैकयो मात हो। नागन गनी शक्यो नरनिश्च. नोकिम गज्य रखात हो ।। श्री २० एम कडेनो गम नरेश्वर, धरणी पड्यो मृाई हो । गम दुःषे पशु पंची दुःखिया, ऊमा आगे आई हो ॥ श्री ।२८ 'लक्ष्मणनी' कर्ग!ीत ताई चोले आवी आगेहो। गई कंगे छ कार्य कि मुंए, महूं नेभूट्ट लागेहो ॥ श्री २९ ॥ भाई तुम्हागे नती आयो, चग्नो कन्द निकन्दी हो । वचन सुधारमा मींचागो. लई मंना आनन्दी हो।। श्री ३० ॥ देवलमण नोआग. ऊटी मिलिया घाई हो। अमदोर्ट मिली विमान खाणी, हरयाणी उंमाई हो।। श्री ३१॥ उन्नु मामीत्री दम माग्ये. प्रमुए पानी म आणो हो। --अमावस-वनंदनगर- AAAAAJAN - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२०७) नादभेद करी ने किणईके, सीता लीधी जाणोहो ॥ श्री ३२१ ढाल क्षेपफ तर्ज मतकरजो कई प्रीत- लिछमन मोही कहोरी, कौनहरी है सीत ॥ टेर ॥ लेगयो नार कबहन रहूंगो अवमे हूंगो अतीत ।। ली।॥ १ ॥ तुमसा वीर प्रवल बलवन्ता, लही खेचरसंजीत || ली ।। २ ।। अब दो बंधव होके सामिल, दुष्टको करो फजीत ।। लि ॥ ३ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज कपिरे प्रीया साथे- लक्ष्मण भाई सीता को कौन हरी ॥ टेर।। इस मंडीया पर कागऊडत है, देखो आसूनी परी । लक्ष्मण १॥ के कोई विद्या धर लेगयो, के कोई सिंह चरी ॥ल ॥२॥ झाड झाड सब बनकूहूंढे, तोही न खवरपरी ।। ल ।। ३ ।। ढाल मूलगी- तेहना प्राण संघाते सीता, वेगे पाठी आणु हो। तो तो लक्ष्मण नाम हमारूं, नहींतो झट्ट थपाणूं हो ॥ श्री ३३ ॥ वीर विराध खरोओमिलियो. आपो बोल उदारू हो। लंक पयाले प्रभू थिरथायो, वचन पले जिम वारू हो ॥ श्री ३४॥ सीता खबर करेवा कारण, भट मोकलिया भारी हो। चीर' वीराध घणोजल फलीयो, अवसर सेवाप्यारीहो ॥ श्री ३५ ॥ सुभट सहु पृथिवी फिराया, सीता खबर न पामी हो। अधोमुखा ऊभा प्रभु आगे, बतलाये तव स्वामी हो ॥ श्री ३६ ।। (शिखरिणी) सियाजी रागरणा, निसहरि नेणां जलभरे । नियाजी राप्याग, सहज गुण माग हियधरे। हरे चिन्ता मारी. तदपि दुःखभारी मनकरे । विजोगी जोगी भगती ग्मभोगी नपरे ॥१॥ । चौपा) गम-लक्षमण! देर मियाग गेषां ओलापलाली निपनियां। लक्ष्मण- मैं नेणां जगदम्पन जोई } तन-भूषण जाप नही को? । ।
(२०८) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । . ए नूपर माता राजा" । नित पग वन्दनमूं यहीचाणू | दोपन कोई सेवक जननो, उद्यमनो अधिकारी हो। ढाल मूलगी प्रभु कुदिगाए कारज न मरे, सुदिशा कार्य समारी हो ॥श्री।।३७|| वीर 'विगध' 'प्रभो' पग लागी, अरज करे अनुरागी हो। धापी पयाला दोडूं दश दिशे, कारज केड़े लागी हो।। श्री ॥३८॥ वीर विगध मवल बल साथे, राममं लक्ष्मण दोई हो । लंक पयाले चाली आया. खबर लहै महु कोई हो ।। श्री ॥३९॥ 'घर' नो नन्दन 'शम्क' भाई, 'मुन्द' नरेश्वर आप हो। मामो आवी खेत जडावे, हाथग्रही शा चाप हो ॥श्री रामे।।४०|| वीर विगध विशेष लड़वे, वार वैग्ज वाले हो । कांदय हाथी कांहय पायक, लोक वचन सम्भाले हो । श्री॥४१॥ 'गम' मु लक्ष्मण देसी रण--मुखे, शूर्पनखा सुत लेई हो । 'गण' पामे पधारी पापण, घग्नो चोड करेई हो ॥श्री।। ४२ ॥ वीर विगध' नीहांस्थिर थाप्यो. आरती सघली टाले हो। मदोटानी? मति महोटी होवे, महोटा पोल्य पाले हो ॥ श्री।४३॥ गम मुलक्ष्मण ग्यर ने महीले, बमिया आप विगजे हो । यूर गज पदवीगविगधन, मुन्द परे मुग्यमाजे हो ॥ श्री ४४॥ द्वार, मनी एनीमुगमी, वीर विगध वधायो है। बेदागन ऋषिगज कदरे,गज्य गयो बहोडायो है ॥ श्री ॥ ४५ ॥ दोहा (नहराग) प्रताग्गो विद्यामहा. हेमवंत गिरिजाय । नेट वर विगय के मुमट माता की योज में गयेमो- गाने में विदेगा लेकर वापिम गम- लनमग को दिग्पनाये ।। बधा निवजानामि- नवजानामि कम नृपरमेव जानामि नित्यं दानिवदन 1714 १ न्दंती गुन नजर, लोवी मिले लटाक। वचन बनवां बान, घृत, मुंगी होय मटाक ।। . १ An. श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। { २०६ ) साहसगति, साधीसही. तवही आयो धाय ॥१॥ तारा नो अभिलासियो, आतुर थपो अपार । रूपधरे सुग्रीवनो नकरे कार्ड विचार ॥२॥ पुरी फिष्किन्धा आवीयो, करि सरिखो सुविलास । गति मति वाणि विचारवे. चीजो रवि अकाश ॥३॥ वनक्रीडा करवाभणी, गयो नाम 'सुग्रीव । एघरमें चलि आवियो, अवसर लही अतीव ॥४॥ तामधणी घर आवियो, रोकाणो दरबार { घरमें छे सुग्रीवजी, वातपड़ी सुविचार ।। ५ ।। दो 'सुग्रीव' विचारने, पाली तणोते पूत । काकीघर ताला जड़े, राखे वा घरसूत ।। ६ ।। चन्द्ररस्मि रलियामणो, युवराजा जयवन्त । चाली वीरनो जाईयो, बल प्रबल नहींअन्त ।। ७॥ आवीने आडोरह्यो, कोईन आगेजाय । कूटी चाहर काहिया, बलियाथी इमथाय ॥ ८॥ ढाल चौतीशवी तर्ज मुरली 'तारा' प्रत्यक्ष मोहनी, ताग अधिक रसाल । 'ताग' सुग्रीव सोहनी, हो. नाग अनि सुविशाल तारा || ताग रूप अनूपम तारा, ताग ए मोखो भूप नाग । तारा मोहन वेली ताग, तारा कोमल केली ॥ देर ॥१॥ चौदह अक्षौहणी नो धणी, राजा श्री मुनोय । पार नहीं प्रभु तातणोहो, माहिन आपसदीय ॥ ताग ।।.२ ॥ एके डांगे मारीया. साचा झूठा दोई। ज्ञान विना निश्चय नहीं हो. लोकों थी शू होई ॥ नाग ।।३।। साचो मिलसे माचने, इंठो झंठे जोई। झंठ नणी झड़ ऊपलेहो. जोमुनतारे कोई ।। ताग ! १ !! इस भने रक कमला. लोकां एक प्राम।
(२१.) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड . चीर नीर ने पारखे हो. वग वग हंस ही हम ॥ तारा ॥५॥ काच अने मणि मारसी. लोकां एक ही वाच । पण पारसियों आगलेहो, मणि मणि काच ही काच ॥ ताग॥६॥ काग अने तो कोकिला, वरणे एक सुहाग । माम वमन्त विगजियां हो. पिक २ कागही काग ।। तारा ॥७॥ मंत्री ने पंचों मिली, निवेड्यो एहवो न्याय । मान मात अक्षौहणी हो. दोई पक्षे थाय || तारा ॥८ दोई लड़ो ए आप में, साचे देव सहाय । गठी नामी जाय मही हो, मह ने आची दाय ॥ तारा ॥ ९ ॥ गेल युहायों मोकलो, ऊमा दोई आय | लोक लठ्या आप आपणा हो, झगड़ो तो न मिटाय ॥ तारा ॥१०॥ लोकन चाहे नाग ने. चाहे ए दो भाई । कोई मगे को जीवनो हो, लोकां लागे काई ।। तारा ॥ ११ ॥ नर दोई मुग्रीवजी, लडिया शास्त्र ऊपड़ी। गांति न गगी वेद में हो, नोहि न मेटी गड़ी । तारा ।। १२॥ दोई तो ममतोलजी दोई विद्यावन्त । दोई तो मैचर वग हो. दोई नो मयमन्त । तारा ||१३|| हाथी मं हाथी अडे, सिंह माय सिंह । मारे माप मिटे नहीं हो, गूग शूर अबीह । ताग ।। १४ ।। मम्भागयो, हनुमन्न आयो चाली। मुग्रीय कृटियो हो. न शके झबड़ी टाली नाग।।१५।। मुग्रीव चिनां चिन्तये, मानो एतो मोच । हने त कहने मजे हो, लोको ए आलोच? |ताग।।६।। वाली ती बलवन्तनी, जग जग माचो जोर । मा नो ही मंजनी ही, भटए हियो भोर ।। ताग ॥ १७ ॥ 'चन्द्रामा बलियो यगं. मादी में मग्दान । .
भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२११) खबर न लामे एटली हो, कोण निज कोण छे आनर ॥१८॥ 'दशकंधा छे दीपतो. लम्पट मांही गणाय । वातसुण्यों हणी दोयने हो, तारा लिये बुलाय ॥ ताग || १९ ।। एतादृशर संकट पड़े, कामम मारण हार । 'खर' थो सो रामे हण्यो हो, करतो पर उपकार ॥ तारा ॥२०॥ शरण ग्रहं श्रीरामनो. लक्ष्मण झू अभिराम । जेम विराध निवाजिया हो, मारसे हम काम ।। ताग ॥२१॥ लंक पयाला छे मही. आज लगे ओ ईश । बोलाव्यो जावे मही हो, कारज विश्वा वीश ॥ ताग ॥ २२ ॥ दूतज छानों मोकल्यो, वीर विराध ही पाम । वात जणावी विम्तरी हो. पायो मो उल्हास । तारा ॥ २३ ॥ वेगा आवो वेग आवो कगे अरदास । काम तुम्हारो माग्से हो. देसे अरिने त्रास ॥ तारा ॥ २४ ॥ सन्तोपा णो स्वामीजी, निसुणो वचन अमोल । . बलते छोटो अमितणो हो. आरति माहो सुबोल ।। तारा ॥२५॥ साहण वाहण सामटे, चाली गयो सुग्रीव । आगे धरी विराधने हो. आरती वन्त अतीव ।। तारा ॥ २६ ॥ चरण कमल प्रभुना नमी, भाखी मननी बात । पर दुःख कापण ने सही हो, विरुद्ध अछे विख्यात ॥ तारा ॥ २७॥ हम तुमने छ सारिखा अबला दुःख अपार । हमागे तुम भांजसोहो, थांगे श्रीकरतार | नाग ॥ २८ ॥ एह सुणन्तां वातजी, गहवरियोरानान । पर दुःख थी दुःख आपणे हो. साले साल नमान ॥ नाग |॥२९॥ दुःख हैया में सांवरी. सुमोव ही सन्तोष । दीधो देव दया करी हो. कीधो मुख नो पोप ॥ तारा ॥३०॥ वीर विराध कहे मही. आपाने एकाज। , Mer १दसरा। जैसा पदासा ।
(२१२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । कम्वो छ ऊतावलो हो, न कियां पावों लाज || तारा ॥ ३१ ॥ कपि पति भाग्य कामजी, आपां करबू एह । मुमनो होई मोधर्म हो. जई धग्ली ने छेह ।। नारा ॥ ३२ ॥ द्वीप अने परद्वीप नी, मुधो अणावं आप । तो तो माचो जाणजो हो. 'सूरजा' छे बाप ॥ तारा ॥ ३३ ॥ प्रभुजी चाली आविया, पुगे किष्किंधा देख । जाणे अलका १ अभिनवी हो. पायो सुख विशेप ॥ तारा ॥ ३४॥ पीजोर बोलावी लियो, उभो आवी खेत३ । दोई लड्या नवि जाणिया हो, माच झंठ ही हेत | तारा ।। ३५ ॥ 'वज्ञापनज' नामथी. धनुप चढाव्यो देव । विद्यागई टकार थी हो, प्रगट थयो ततमेव ।। नारा ।। ३६ ॥ लम्पट परनाग तणो, धीठा मांहीं धीट | जग मघलो अवलोकतां हो, तुम मम अवर न दीठ |तारा॥३॥ एक बाण माग्यिो, 'माहम गति' मयतान । एक चपटे मिहने हो. हरिण लहे अवमान५ ॥ ताग ॥ ३८ ॥ वीर विगध तणी परे, थिर थाप्यो कपिनाथ । माची करी मद् टेग्यतां ही, आणी मेल्यो साथ || नाग ।। ३९ ।। प्रयोदाई कन्या भली, गम प्रत्ये आपन्त । प्रीति गनि काठी करी हो, कपिपति तो थापन्त।। ताग ।। ४० ॥ गम करे कपिगजिया, तू वाचा मम्भार । "पागवाली पाडली हो, पहीली मीता वार ।। तारा ॥ ११ ॥ दाल, मली चीनीयमी. कपिपति काम ममार्ग। गगन अपनी कई हो. अब मोधी नारी ।। ताग ॥ १२ ॥ दोहा (गुजरी गगे) 'गवर्णन व गवणी. आज पडयो अवधार्ग । ''नी मुगी मृणावणी, आणी मिली वह नारी ।। ? " व मनी नगगे र बनावटी मुग्रीव । ३ ग्यामि मंदाग्रिहम के दुर)। मृत्यु । । तेरह । ७ यादगार ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ।
( २१३)
दिवसवे चारने आंतरे, शूर्पखाने 'सुन्द' ।
लंका नगरी आविया, वरसे आंसू वुन्द ।। २ ।।
'शूर्पनखा' सुहामणी, करती अधिक विलाप |
'रावण' ने गले लागीने, दीन वदे अति आप ॥ ३॥
धूलचन्चजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज पाईरे पनौती जरासिधने।
आई रेपनोती रावण रायनेरे, पापिणी पाए रो मूलरे ।
सासरीया सघला तणोरे, कर आई उन्मूलरे । आई ।। १ ।।
रावण नाश करायवारे, आई लंकमझाररे ।
चलती जिहांजावे गाडरीरे, तिहां २ चालण हाररे ॥ आई ॥२॥
आंसुडा लूया निज हाथरे, चांपी चांपी हिरदामझाररे ।
आस्वासन देवेघणोरे, पूछ सकल समाचाररे ।। आई ।। ३॥
दोहा-कन्त हण्यो कुंवर हण्यो, हणिया देवर दोय ।
खेचर चउद हजारनो, हन्ता एकसं जोय ॥४॥
लंक पयाले आवीयारे, हणिया अवर अगाध ।
रांक जेम हम काढीया, वसियो वीर विराध ॥५॥
बंधव तुम बैठांथकां. वरते ए अन्याय ।
घरती दिन दो चारमें, जातीही देखाय ॥ ६॥
एक सुवर्णे सामलो, बीजो पीलेवान ।
वनवासी भीलडा. पण नहीं कहने मान ॥ ७॥
वसवा भाणेजा भणी, देश अनेगे हेर ।
सगो सगे आवे वही, फोई दिनों के फेर ॥ ८॥
ए सघली श्रवणेसुणी, चोले वीर विवेक ।
घटिना फेरापणा, घटनो तो एक ॥ ९ ॥
पखाली फीडीनणो मुआम दिनजान ।
मारी कर पाघरा, अपर चनायो पार ॥१०॥
पात नहीं वत्तकानहीं, नहीं राग नहीं रंग।
राज काज भावे नहीं, होई रह्यो विरंग ॥ ११ ॥
(२९) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। कम्बो छ ऊनावलो हो, न कियां पावों लाज || तारा ॥ ३१ ॥ कपि पति भाग्य कामजी, आपां कर एह । मुमनी होई मोधर्म हो, जई धरती ने छेह ।। तारा ॥ ३२ ॥ द्वीप अने पम्हीप नी, मुधो अणावं आप । नो नो माचो जाणजो हो, 'मूररजा' छ बाप || तारा ॥ ३३ ॥ प्रभुजी चाली आविया, पुगे किष्किंधा देख । जाणे अलका१ अभिनवी हो, पायो सुग्न विशेप || तारा ॥ ३४ ॥ पीजो बोलावी लियो. ऊभो आवी खेत३ । दोई लड्या नवि जाणिया हो, माच झंट ही हेत ।। तारा ।। ३५ ॥ 'यज्रायनन' नामथी. धनुप चढाव्यो देव । पिद्यागई टकार थी हो, प्रगट थयो ततवव ।। नाग ।। ३६ ॥ लम्पट पग्नारी तणो, धीठा मांहीं धीट । जग मयलो आलोकतां हो, तुम मम अवर न दीठ ||नाग॥३०॥ एक बाणम् मारियो. 'माहम गति' मयतान४ । एक चोटे मिहने हो. हरिण लहे अवमान५ ।। ताग ।। ३८ । वीर विगर नणी परे. थिर थाप्यो कपिनाथ | माची की मह, देयतां हो, आणी मेन्यो साथ || तारा ॥ ३९ ।। प्रयोदाः कन्या भली, गम प्रन्ये आपन्त | प्रीति गति काटी कग हो, कपिपति तो थापन्त।। ताग ।। ४० ।। गम को कपिगजिया, तू वाचा मम्मा । सागवानी पाठली हो, पहीली मीता वार ।। ताग ।। ११ ॥ द्वान भी चौतीदामी, कपिपनि काम ममागे । कंगगत अपिजी कडे. हो. अब मोज नारी ।। नाग || १२ ॥ दोहा (गुदरी गग) 'गवान परे गवणी. आज पडयो अवधार्ग । 'पानी मुगी मृगावी, आना मिली यह नारी ॥ १ ॥ टेर गनमा परी २ बनावटी मुग्रीव । १ रणन ५ मेटन गरम दुव्य "मृत्यु। देह यादगार ।
।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २१३)
दिवसवे चारने आंतरे, शूर्पखाने 'सुन्द' ।
लंका नगरी आविया, वरसे आंसू बुन्द ।। २॥
'शूर्पनखा' सुहामणी, करती अधिक विलाप ।
'रावण' ने गले लागीने. दीन वदे अति आप ॥३॥
धूलचन्चजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज आईरे पनोती जरासिधने ।
आई रेपनोती रावण रायनेरे, पापिणी पाए रो मूलरे ।
सासरीया सघला तणोरे, कर आई उन्मूलरे ॥ आई ॥ १ ॥
रावण नाश करायवारे, आई लंकमझाररे ।
चलती जिहांजावे गाडरीरे, तिहां २ वालण हाररे ।। आई ॥२॥
आंसुडा लूया निज हाथ रे, चांपी चांपी हिरदामझाररे ।
आस्वासन देवेषणोरे, पूछे सकल समाचाररे ।। आई ॥ ३ ॥
दोहा- कन्त हण्यो कुंवर हण्यो, हणिया देवर दोय ।
खेचर चउद हजारनो, हन्ता एकसं जोय ॥४॥
लंक पयाले आचीयारे, हणिया अवर अगाध !
रांक जेम हम काढीया, वसियो वीर विराध ॥५॥
चंधव तुम बैठांथकां, वरते ए अन्याय ।
घाती दिन दो चारमें, जातीही देखाय ॥ ६॥
एक सुवर्णे सामलो, बीजो पीलेवान ।
वनवासी छेभीलड़ा. पण नहीं कहने मान ॥ ७ ॥
वसवा भाणेजा भणी, देश अनेरो हेर ।
सगो सगे आवे वहीं, कोई दिनों के फेर ॥ ८॥
ए सघली श्रवणेमुणी, गोले वीर विवेक ।
घटिना फेराघणा, घटनो तो एक ॥ ९ ॥
पखाली कीडीतणो मुआमें दिनजात ।
मारी करमं पारा, अपर चनायो वाउ ।। १० ॥
चात नहीं यतकानहीं, नहीं राग नहीं रंग।
राज काज भावे नहीं, रोई रनो विगंग ॥ १५ ॥
(२१५) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ।
नींद नहीं लीलानहीं, फल नहीं तम्बोल ।
भोजन पाणी पण नहीं. सुण्या न भावे बोल ॥ २॥
हांसी नही गमतनहीं, नहीं भोग नहीं योग ।
माणस मुआ सागमो, होई ग्यो तस सोग ।। १३ ॥
बातो हुवो खाटले. पच्यो रहै नग्नाथ ।
गुंग मुंग बोरे नहीं, आरती को मह साथ ॥ १४ ॥
टाल क्षेपक मूलगी-
'मंदोदरी'चिन्ते तिनवा, नाह दिलवात नहींधारे, पूछयां विन
नहीं मरेम्हारे आई नर गवण' पे चाली, विनय कर पूछेहै आली
मन्य व्रत पालो ।। ६० ॥
टाल पनीशी- तर्ज मेरे मन एमी पाणवनी-
धाग चिनमे कोई वमी मंदोदरी,
मांदी पति देवी पूछेवात इमी ।। टेर ॥
पगवाई अंधारे आये, घटतो जाय शगी ।
नेनहेज प्रताप प्रक्षीणा, गौमा लाज बमी ॥ थाग ॥ १ ॥
धनवंदजी त, टाल क्षेपक तर्ज महीलांम बैठी हो गणी कमलावती-
गणी' मन्दोदरी वाणी इमकहै. मांभलजो नग्नाथ ।
नीन गण्ड हो थारे मायनी, नहीं कोई दीसे उत्पात ।।
मांमट महागता आज काई लागीहो चिन्ता आपने || टेर ।। १॥
महम अठाही थां मुन्दग. नेमाह हूं पटनार ।
अरजी कॉछ माहिब आपन, भाग्योनी वात विचारामांमल ||२||
गगगती दीनही, और नहीं दीमे विनोट ।
आमग दृमण टीमो अतियणा, कोई दीयोरे प्रयोघ मामल ||३||
दे कोटे काम कीया आकग. के कोर्ट देव कीयो दोस ।
से कोई वर्ग आयी मामृहो. के कोई निजयर ग मोच मामल ॥४॥
दाल मुलगी
मुंबई तुझ मुझ गलानी, भाग्वा जिमी तिमी ।
भावन्त बाम थान, मनन जाय चमी
धारा॥२॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२१५) रावण भाखे सुण मन्दोदरी, चित्तमैं आण चुभी। सीता सूरति भालभलीए हैया मांही खुभी । थारा ३॥ सपैया-३१ सा-रावण उवाच भ्रकुटी तो भलीकरांन नेण तो समारेवाण, त्रिया तीनलोको घडी न घडानी है। दाडिम के दर्स जैसे रसनासे जपतराम, अधग्नकी ललीसो प्रवलीतो पुरानी है ॥ कण्ठतो अनिही झीण वासकसी वनीवीन. मस्तकमें मोतिन की मांगही भरानी है। रावण' कहै मन्दोदरी' वातमें अनोखी करी. रघुनाथजी की गनीमो जानकी हर आनी है ॥१॥ ( मन्दोदरी) अरे ! कन्त कुबुद्धि कौन पे मिखायो तो दूं, एसी कुमति करी तूं करन कुलहान. की। रघुपति ईश जगदीश चोच जान्यो नहीं, ताते र करी तूं तो विगाडी है लड़कान की। जनकजी की जाया सोतो जोगमाया रूप, सतीको हरलायो निपट करी है नादान की। रावणकी रानी सेणी मण्दोदरी मुख बोले वानी, पिया जानकी न आनीए निमानी घर जानकी ।। ढाल मूलगी धृ { ; दिन रात घणेरो. न मर ममय करी । जो तूं मुझने चाहै देवी. मेलो प्रीति सरी । धाग॥ ४ ॥ हाल क्षेपफ मुलगी एडीसे रीम चडो चोटी करूं किम यान आ पोटी. महागनी बाजू में म्होटी । पवित्रत पण को नीभायो, गवण कई मीना पे जायो । सत्य व्रत पालो ।। ७ ।। ।
(२१५) श्री जैन पद रामायण तृतीय ग्वएड । नींद नहीं लीलानहीं, फल नहीं तम्बोल । भोजन पाणी पण नहीं, सुण्या न भावे चोल ।। १२॥ हांमी नही गमतनहीं, नहीं भोग नहीं योग । माणस मुआ सारीमो, होई ग्यो नस सोग ॥ १३ ।। गातो हुयो ग्वाटले. पज्यो रहै नग्नाथ । मुंग मुंग बोले नही, आरती करे मह साथ ।। १४ ।। टाल क्षेपक मूलगी- 'मंदोदरी चिन्ने निनवार, नाह दिलवात नहींधार, पूछया विन नहीं मरम्हारे आई तब गवण' पे चाली, विनय कर पूछेहे आली गन्ग वन पालो ।। ६९ ॥ टाल पतीशीं- तर्ज मेरे मन एसी पाणवनी-- थाग चिनमें काई वमी मदोदर्ग, मांटी पनि देखी पूछेवात इसी ॥ टंर ।। पगया अंधारे आये, घटतो जाय शशी । नईन प्रताप प्रक्षोणी. सामा लाज ग्यमी ।। थाग ।। १ ।। शुलचंदजी यन, टाल पक तर्ज महीलांम बैठी ही गगी कमलावती- गणी' मन्दोदरी वाणी इमकहै. मांभलजो नग्नाथ । मान खण्डही थांग मायची, नहीं कोई दीसे उत्पात ॥ मामल महागजा आज काई लागीहो चिन्ता आपने । टेर |॥ १॥ मदम अटाही थांर मुन्दग. नेमाह हूं पटनार | भाजी कछ माहिर आप. भाग्योनी वात विचागामांमल ॥ २॥ गगगनी दीमेनही, और नहीं दीमे विनोट । आमग मादीमा अतिषणा, ककोई दीयोरे प्रयोष मामल | में कोई कामण कीया आग. के कोर्ट देवे कीयो दोम | से कोर्ट की आयो मामृही. के कोई निजधर ग मोच मामल ।।2।। दाल मृलगी- मन अछे तुझ मा गलानी, भाग्यो जिमी निमी । अतीवन्त रान थईन, मनन जाय चमी . थाग॥॥
। श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २१७) + अलगी जा आंखों आगे थी, मयली जेम मसी ॥ थारा ॥ १३ ॥ एटले 'रावण' चाली आयो, 'सीता' धमण धमी। शीतल वचनां मूं समझावे. आपे उपशमी ।। थारा ।। १५ ।। मन्दोदरी राणी तुझ आगे किंकर माहै गणी । हूं तुम दास सरीसो केनो, भाखं अवर भणी ॥ थारा ॥ १५॥ नजर निहालो उत्तर वालो, टालो पात घणी। पालो दोड्यो होस नवि पूगे, ओ असवार तणी ॥ थारा ॥ १६ ॥ होई अपूठी सीता बोले, सांभल लंक धणी । काल दृष्ठि सं हूं देखू डूं, जाघर टाली अणी ॥ थारा ॥ १७ ॥ धिक् धिक् ए तुझ आशा माथे, थारो कोण वणी । जीवित 'राम' 'लक्ष्मण हूं छू, अहि माथे रे मणी ॥थारा ॥१८॥ वारम्बार वचन आक्रोशे. न त्यजे राय रली । हांक लीयोरे हगयो होवे, श्वान न जाये टलो । थारा ॥ १९ ॥ सीता की आरती तन अधि की. न शक्यो मूर्य खमी । आथमियो अलगो होवाने. व्यापी आण तमी । थारा ॥२०॥ रावण ने ऊपजीये अधिकी, कुमति तणोरे मती। उपसर्ग कग अधिका, सीदावे रे सती ।। थारा ।। २१ ।। फेहकार करतां अति फेलं, घृ घू घृक करे । वृक विचित्र पर कुदन्ना, नीमन नरे रे डरे । थार ॥ २२ ॥ पूछया स्फोट में व्याघ्र२ विशेपे. ओतू३ अन्योन्य लड़े। इंफता फणी४ करना परगट, मांहो मांही अडे ॥ थारा ॥ २३ ॥ भूत पिशाच वैनाल विदीता. इट { हास्य इसे । डाकणी शाकणी महली देवी. काती हाथ घसे ।। थाग ॥ २४ ॥ उललंना दूर ललित अति, यम जेम कायरे । 'गवण एह विकृर्वण करिने. आगे आणी मरे ।। याग ॥२५॥ परमेष्ठी पंचे मन ध्याती, मीता खेत परे । mom १यम (प)।२ पाप (सिंह)।३मिनकाम।
(२१६) भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । दाल मूलगी प्रियनी पीडाए पीडाणी, तबही ऊठी धसी । देव रमण उद्याने देवी, आवी एक ससी१ ॥ थारा ॥५॥ हूं मण्दोदरी छरे शुभोदरी, महोटे नाम चड़ी । 'रायण' रानी मांहीं बखानी, वनिता माहै बड़ी । थारा ॥ ६ ॥ भोली क्यूं भरमाणी ळे तूं. रावण साथै रमी । मानम भवनो लाहो लीजे, हूं छु दासी समी । थारा ॥ ७ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-बीहारी मीयाजी में मिलन मण्दोदरी राणी आई, सङ्ग सहेली लाई। रिम झिम करती आई पागों, नवलख तारों की ज्योतिने छिपाई।१।। किणोरे घरजाई ऊपनी, किणां घर परणाई । के थारो प्रीतम तुझने छोडो, इहांपर नारी तूं कीयूं आई ।। २ ।। जनकनीरे घर जाई ऊपनी. दशरथ घर परणाई । कपट करी तुम पियुड़ी लायो, तुझने रण्डापोगणी देवन आई ॥ ३ ॥ दाल मूलगी- मीना तूं धन्य तुं धन्य थारे. माथे अधिक ग्ती । गना गवणरे चित्त आई. मेली अवर छती || थारा |॥ ८॥ भूचर गम तपम्ची तेनो, मेयक मात्र मही। भी पनि नमी ए पनि जी पामे, कर्म वतीरे कही ।। थारा ॥९॥ मन पचाने मौन करी थी, नीनी मही न रही। तुं तो मतियों माही मयाणो, एती हीन लहीं ॥ थाग || १० ॥ किती जमुक किहां सिंह मनूगे, गम्ड किहां रे अही विहां मुझ पनि न्हिां तुझ पनि लम्पट, लाजत नहीं नहीं ॥११॥ भारी धन्य धन्य नुझ टाकर, सम्वी जोड मिली। नापट या निलंत गनी, दती मांही मली ॥ थाग ।।१२।। माडी नवि देगवं. तुझ में बात किमी ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। (२२१ ) केलीहरा१ कामी तणारे, देखावे सुविशाल ॥ विभीषण ॥ ७ ॥ मन्दिर विविध प्रकारनार, सेज तणी वर शोभ । भद्रे ! भद्रपर्णी भजोरे, आणी विपय सुख लोभ ।। विभीषण ॥ ८॥ लम्पट ललचावे घणीरे, केलवणी ने कोड । करी देखावे अति घणीरे, खेत खरे नवि खोड ॥ विभीषण ॥ ९ ॥ हंस तजी ने हंसलीरे, कदही न बंछे काग। राम तजी सीतातणोरे, नहीं अवरांसू राग ।। विभीषण || १०॥ ताम अपूठो आवीयोरे. वृक्ष अशो के हेठ । मृकी रावण मानिनीरे. ए पण काही वेठ ।। विभीपण ॥ ११ ॥ विभीषण चित्त चिन्तवेरे, होई रह्यो मयमंत । शीसन कोई मरदहे रे, आयो दीखे अन्त ॥ विभीषण ॥ १२ ॥ मंत्रीश्वर बोलाविया रे, विभीपण वार । करे मिमलत सह मिलीरे उपज्यो ए अविचार । विभीपण ||२३|| मोहनणो मद माचीयोरे, कोई न माने कार | हुओ हरायो हाथियोरे, केम करीजे मार ॥ विभीपण ॥ ४ ॥ आयो दीसे आसनो रे. रावण काल विनाश । कोई उपकर्मा करी रे, कीजे लील विलाम ।। विभीपण ॥ १५ ॥ मति ऊपावे मनथकीरे ते माटे मंत्रीश । जोरन चाले माहरोरे. कान न मांड ईश ॥ विभीषण ॥ १६ ॥ मिथ्या मतिनो माहियारे जिन मतनो उपदेश । माने नहीं प्रभु आपणूरे. कीजे काई कलेश ।। विभीषण ॥ १७ ॥ 'हनुमन्त' ने कपि राजियारे, आदि मिल्या नृप आय । धर्म पखे पखिया धयारे, मेल्यो गवण राय ॥ विभीपण ॥१८॥ राम अने लक्ष्मण धीरे, रावण नो संहार । ज्ञानी वचन के सहीरे, चूक न पड़े लिगार ॥ विभिपण ॥१९॥ १ लीगृह-नीर फरने पर।
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. श्री सैन पद रामायण तृतीय खण्ड । { २१९) धड़ मस्तक दो जूदा दीठा, माताजी अकुलाणी रे।। सीता ।। ७॥ पग अनुसारे चाली आवी. राघव सू रीझाणी रे । लम्पटनी लालच नवि पूगी, ताम घणूं खींजाणी रे। सीता ॥८॥ 'खर' 'दपण त्रिशिर लेई आधी. आग पीथी सिंचाणी रे । सिंहनाद संकेत कियोंथी, लक्ष्मण झू मण्डाणी रे ॥ सीता ।।९।। लंका जई 'लंकपति' आण्यो. बात कही अतिताणी रे । सिंह नादनो भेद लगावी एहूं ईहां आणीरे ॥ मीता ॥ १० ॥ ए दश मस्तक कापेवाने, हूं तो काती कहाणी रे । लंका नगरी वालेचाने. १ बल बलती छाणी रे ॥ सीता ॥११॥ तेज प्रताप पराक्रम पीलग हूं घर मांडी घाणो रे । पगे? आवी छू गवण केरे. एकान्ते दुःख खाणारे । सीता ॥१२॥ श्रवणे सुणे पण ग्मि न आणे, रागीनी महिनाणी रे । आगेर सतेजी छ अति अधिको, जल आंगे उल्हाणीरे॥सोता॥१३॥ एम सुणी लघु बन्धव जम्प, भाई मति भरमाणी रे । एको पलती गाडर घर में. घाले कोण अझानी रे ॥नीता ॥१४॥ परनारी छे काली रे नागिणी, के विपवेली समानी रे । जालव ताई जवतव जोवे, किहां ही नहीं ताणोरे।।सीता॥१५॥ संपद तरुनी एह कुहाड़ी, आपद नी नीसाणी रे । श्राप सतीनो छे दुःग्वदाई, मति दीये ए रीमाणी रे ।।मीता ।।१६।। लाख कह के कोडी कई तुम. ए तो वस्तु बीगणी रे। आज कल दिन चारा माही, एतो बान दिसाणी रे ॥मीतां ॥१७॥ है म्हारो ओलम्भो टालू. गखों कीर्ति पुराणोरे । लोक कशे काई न हुतो. 'गवण' यागे वाणी ३ रे ।। मीता १८॥ 'गम'सु'लक्ष्मण' दोई पलोया, अनम्याने ही नमाणी रे। सीता ने हं देई आवं. जैम रहै प्रीत धपाणी रे । मीना ॥१९॥ दाल भली एलसीसमी, गवे एक न मानोरे। पनोती। मागे-मानी एनेज पापे पर उल भागे-बडे सोलाप। ३ पापोयो, रिक।
~- Anna प्रवीण । (२१८) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । के जिन के पियू कम्ती, 'रावण' सामो पग न भरे ॥थारा ॥२६॥ गवण तो पचवाण न भांग, 'सीता' सत्य न चले। पाकॉन नहीं भूत पराभव, काचां ने रे छले ।। थारा ॥ २७ ॥ दाल भली ए पञ्चत्रीशमी, धन्य जे टेक ग्रहै । 'केशराज' ग्रहीतो माची, मीता ज्यूं नीर वहै । थारा ॥ २८ ॥ दोहा (मालवी गौड़ी रागे) विभीपण निशिनीचरी, निसुणी लोकां मांहै। सीता पामे आवियो, करण दिलामा प्राहे ॥ १ ॥ महोदर समझावग, यात सुणावे चीर । के पग्नारी पगङ्मुख, माहसवन्त मधीर ।। २ ।। पाईजी तुम कोण छ, किहांथी आव्या चाली । कोण तुमे आण्या इहां, भाग्यो शङ्का टाली ॥ ३ ॥ धुंघट सेंची अधोमुखी, जाणी पुरुप मत्यवती माची मती. वाणी वदे अदीन ।। ४ ।। ढाल छत्तीशी तर्ज-एक दिवस स्कमण हरि साथे ।। 'मीना' नाम निशंक पणे रे, भारखे वारु वाणी रे । 'विभीषण' कुलकेंगे भूपण, निमुणे अमृत जाणी रे ।। मीता ।।१।। 'जनक' पिता 'भामण्डल' भाई. गम-त्रिया हूँ वसाणी रे । 'गाय' ना कुल बह दिनी, मतियों में अधिकानी रे ।। २ ।। गम घर लक्ष्मण देवर, बीजी ना हंगणी रे । दण्डकारय माद आवी, याम नणी स्थिती टाणी रे मीता ॥शा 'मदास अमी ता-टाले, देण्या अधिको पाणी रे । 'ल: मनी चोला लोधा. ज्यांनी वणी प्रगटाणी रे ॥ ४ ॥ कत परीक्षा वेग वादी. गजाल कपाणी । सनी दर गिर ददाणी, मन में अति पम्नाणो मीना ५|| गट देनी गश्व माघ, ने न करी मति गाणोरे । विध मापन दिन अपरावं. मायों ने ए प्राणी ॥ मीना ॥ ६॥ पजा भोजन पाणी, आणीने चमकानी ।
} (२१८) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । के जिन के पियू करती, 'रावण' सामो पग न भरे ॥थारा ॥२६॥ गवण तो पञ्चखाण न भांगे, 'सीता' सत्य न चले । पाकौन नहीं भूत पराभव, काचां ने रे छले । थारा ॥ २७ ॥ ढाल भली ए पञ्चत्रीशमी, धन्य जे टेक ग्रहै। 'केशराज' ग्रहीतो साची, मीता ज्यू नीर वहै । थारा ।। २८ ।। दोहा (मालवी गौड़ी रागे) विभीपण निशिनीचरी, निसुणी लोकां मांहै । मीना पासे आपियो, करण दिलामा प्राहै ।। १ ।। महोदर समझावग, वात सुणावे वीर । के पग्नारी पगड्मुख, साहसवन्त मधीर ।। २ ।। याई जी तुम कौण छ. किहांथी आव्या चाली । कोण तुमे आण्या इहां, भाखो शङ्का टाली ॥ ३ ॥ धुंघट सेंची अधोमुखी, जाणी पुम्प प्रवीण | मत्यवती माची मती. वाणी वदे अदीन ।। ४ ।। ढाल छत्तीशी तर्ज-एक दिवस रकमण हरि साथे ।। 'सीता' नाम निगंक पणे रे, भासे वारु वाणी रे । 'विभीषण' कुलकेंगे भूपण, निमुणे अमृत जाणी रे ॥ सीता ।।१।। 'जनक' पिता 'भामण्डल भाई. गम-त्रिया हूं वसाणी रे । 'दाग्य' ना कुल बह दिनी, मनियों में अधिकानी रे ।। २ ।। गम नंबर 'लक्ष्मण देवर, त्रीजी ना हूं गणी रे । दएकाग्ग्य माद आवी, याम तणी स्थिती टाणी रे मीता ॥३॥ 'मुहास असा नम-टारे, दंग्या अधिको पाणी रे । 'यःम जी लोलाग लोया. ज्यांनी घणी प्रगटाणी रे ॥ ४ ॥ कापसा देगे बाही. कंगनाल कपाणो रे । मारुनी दर गिर देवाणी. मनमें अति पम्नाणी मीना ५॥ देसी गायव भावं. न न कर्ग मनि गाणारे । विध मावन दिन अपगये. मायों ने प्राणी ॥ मीता ॥ ६ ॥ पाई पूजा गजर पानी. आगीने चमकानी ।
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(२२०) भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । 'कंगराज' ऋपि रावण केरी, वेला आवी जणाणी रे॥ सीता ॥२०॥ दोहा (पन्या श्री रागे) गवण होई रातडो, वदे विभीपण वीर । ग्रही वस्तु किम मे लिये, जब लग रहै शरीर ॥१॥ 'राम' मु'लक्ष्मण' भीलड़ा, वन मांही है वास । माहण वाहण को नहीं, आप ही फरे उदास ॥ २ ॥ माहण वाहण माहरे, विद्यानो अति जोर । पy करसे बापडा. कोई मचावे शोर ॥३॥ आज नहीं तो काल ही. काल नहीं तो माम । माम नहीं नो चम्म में. आपही करसे आश ॥ ४ ॥ पटले मांही आमना. ओ आवे में चाली। छलबल कोर्ट केलवी. देम परहा टाली ॥ ५ ॥ टाल मनीशी तर्ज-जगत गुरु प्रशला नन्दन चीर पहीली थी में मामली रे, गम-त्रियाथी घात । होग गवणनी मही रे, आण मिलीछे वात ।। चिभीपण यात विचारे एह. मत्य वचन नानी नणां रे, कोर्ट नहीं मन्देह । विभीषण ॥ टे॥१॥ मनी कीधा धा घणों रे, आछो ही उपकर्म । दारथ जीवतो ऊगारे, धीग दे जगधर्म ॥ विभीषण ॥ २॥ पीना बल छ घणारे, न टले कोडि प्रकार । काने नजतां थको रे, पलंग लोकान्यार || विमीपण ॥ ३ ॥ मृगती ही मुग नहीं रे. विमीपण नी वाच । दमी को देन नहीं रे, कामी एती माच ॥ विमीपण || ४ || 'पृषक नान विमान में , 'मीना 'लई भाप । हा करवा निगारे, टाल्या नटो पाप || विमीपण ॥ ५ ॥ दबाद तम्यता, ग्वमयी गिरि गज । नन्दन बननी पोरमारे, बाद वन माज ॥ विमीपण ॥ ६॥ बटन दटका मोहनी मां कंग न्याल । १ .
AS
२२)
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ।
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जितो पहीलो मोचियोरे, तो कांई सुख थाय ।
मन्दिर लागे वाग्थीरे, काठ्यां कांईयन जाय ॥ विभी० ॥२०॥
भयतो ऊपजसे महीरे, मांसो नहीं है लगार ।
जेहनी आणी कामनीरे, ते तो आवण हार ॥ विभीषण ।। २१
जे ननरीयो पाहुणोरे, तेतो जोवे बाट ।
गोट्टं नाणं आएनोरं, कीया कार्ड उच्चाट । विभीषण || २२ ॥
लवा नगरी अति मजीरे, ढीलन कीधी रंच ।
अन्न पाण लेई घणारे. मेल्यो बहुलो संच ॥ विभीपण ।। २३
कोट ओटना कांगूगरे, पोल अने प्राकार ।
मधलाही समगवियारे, गोला यंत्र अपार ॥ विभीषण || २४
चलनन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज-भजो तुम मार मंत्र नवकार
करो कोई लावें चतुगई, टले नहीं होनहार भाई ।। टेर ।।
मंत्री कई महागयजी, फिर इक करो उपाय ।
दृम्मण जोर कदे नहीं लाग, लङ्का पनी न पाय ||
आग के पाछा फिर जाई || कंगे कोई ॥ १ ॥
गंत्र पड़ी आमालीका, लङ्कागढ़ के पार |
जो विकट निम्मे कगे. कबहुन होवे हार ।।
बैग कोई आय मक नाई ।। कगे कोई ॥ २ ॥
पत्र कीयो गढ पं बड़ी, निर्भय रहण काज ।
पत्र मुख चौकी ग्या, मी आपणी माज ||
स्वामी को काम करण नाई।।कंग काई ॥३॥
दृदय कोट अमालि का, हर्गगज टूटे नांय ।
होगदार जो पुमरहै, मांजेला छिन मांय ।
उधमनी चले, नहीं काई || कगे।॥2॥
दाल मुलगी
वियती आमालीकारे, नेहना प्रबर प्राकार ।
देवडी कामग, बंधनां दम्पकार ॥ विमीपण ॥ २५॥
.श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२२३) इणविध लंकाने सजी रे, ढीलीन कीधी लीगार । अथभवियण तुम्है सांभलोरे, गधवनो अधिकार ॥ विभीषण २६॥ (आगाडी के पद्य 'भूल्यो मन भंवरा' व 'कन्त तम्वाग्वूपरहरो' इस तर्ज मे भी गा सकते है) राघव विरह विजोगीयारे आरति वन्त उदाम । अन्न पान भावे नहीरे, लम्बा लीये निस्सास ।। राघव विरह ॥ २७॥ लक्ष्मण साथे बोलीयो रे. ढील पड़े छे एह । आशा दिन दश चीशनी रे, पछीत्यजसे देह ।। विभीषण ॥२८॥ दुःखियो अधिक ऊतावलोरे, सुसियो सुसतो होई। तृपियो जावे सरोवरे रे, सामो न आवे सोई ।। विभीषण ।। २९ ।। ढीलो वानर गाजियोरे, सुखमांही दिन जात । पर दुःखे दुःखियो नहीं रे, वात बडी नविधात ॥विभो॥ ३० ।। एह सुणीने उठियोरे, हाथे ग्रही शर चाप । धम धमतो अति चालियोरे, होठ डमन्तो आप।विभी॥ ३१ ॥ कम्पावे धरती घणीरे. कम्पावे गिरि शोश । वृक्ष ऊखेडी नाखतोरे, कोप्यो विश्वावीश । विभीषण ॥ ३२ ॥ आयो पाली दरगारमें रे. खल भलियो सुग्रीव । धृजन्तो पग लागीयोरे, मारे सेव अतीय ।। विभीषण ॥ ३३ ॥ ओलम्भोदिये अति आकरोरे, शुद्ध नहीं तुझ माही। तूं घरमें सुख भोगवेरे, प्रभु नरु सेवे प्राही ॥ विभीषण ॥३४॥ वासर जावे वरमसोरे. छगुणी रात्री गिणाय । तुझमें वीनक वीतियोरे, नोहीन समझे काय विभीपण।। ३५ ॥ गुंपड़ फटां चैयने रे, सम्भार नवि कोय । आरति तो अति आंधली रे, आप थकी तूं जोय विभी॥ ३६॥ मेनत नाहरी । भणीरे, म्वेचा दोई प्रकार । भूमि नणासो भौमीयारे, मपले तुम पेमार ॥ विभीषण ।। ३७ ॥ वाचा पालो आपणी रे, काम करो धमिधाय । नहीं तो 'साइमगति' परेरे. देऊ परभव पचाय विमी॥३ (२२६) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। . मरल चली झंझार सबन को पीर है ॥ रावण करडे वयण बहु मुगने को, नहीं मानी तब बात हाथमें असि ग्रह्यो । दोऊ लघ्या निणवार बहुत चल जोर मुं, वेतो अति बलवन्त प्राक्रम कोरसं ।२। ढाल मुलगी हूं हवो नव वाहरू१ रे, करतो अति आक्रोशं । विद्या सबली अपहरीरे, 'रावण' कीधो रोप ॥ विभीषण।।५७।। समाचार सुहामणारे. सीताजीना पामि । परम महामुग ऊपन्योरे, जाणे त्रिभुवन स्वामि ॥विभीपण।।५८॥ रनजटी विद्याधरूरे. कण्ट लगाई लीध । तू म्हारे चालेमरूरे, ग्यवर भली ते दीध ॥ विभीषण ॥ ५९ ॥ जिम निम पूछे वानडोरे, तिम तिम ऊपजे राग । पारम्बार विशेपिएरे. रागीन ग भाग ॥ विभीषण ।। ६० ।। समानार मगा तणारे. मांभलतां मन्तोप । मिलवाने ओदो नहींरे, प्रेमतणो अति पोप ।। विभीपण ॥ ६१ ॥ होहा-मब मन्नाटा छागया. सन गवण का नाम । मीता पाठी आणवी, करडो दीसे काम ॥ १ ॥ ही मूलगी नर्ज के अगाड़ी के पद्य "ईडर पाया प्रांबलीरे" इम तर्ज में भी गाये जा सकते हैं) पर लड़ा कितनी दर ॥ टेर ।। ( इस मुनापिक है ) पर प्रभु मुग्रीवने, लंका कितनी दूर । मालमियां अलगी घणीरे, उद्यमवन्त हजर ।। विमोपण ॥ ६२॥ नंबानं पं पूछयोग, पूछो रावण तेज । आज नग अधिको अरे, मगज नेत्र महेज । विभीषण ।। ६३ ।। दान शेष नमाको- मुषों श्री गम' नंगागर दे जिहां, वदे विद्याधगं एम वाणी । 'गमन गरी नेत्र जग छाइयो, मुर नर अमर सब बात जाणी टि. अनि मंट अम्यूट जलनिधि भयों, विकं R " -- HA-
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. (२२६) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । मक्ल पली झंझार सबन को पीर है ॥ रावण करडे चयण बहु मुमते कन्मो, नहीं मानी तब बात हाथमें असि ग्रह्यो । दोऊं लड्या निणवार बहुत चल जोर मुं, वेतो अति बलवन्त प्राक्रम कोरखं ।२। ढाल मुलगी हूं हयो तब वाहरू१ रे, करतो अति आक्रोश । विद्या मधली अपहरीरे, 'रावण' कीधो रोप ॥विभीषण।।५७।। ममाचार मुहामणारे. सीताजीना पामि । परम महामुग ऊपन्योरे, जाणं त्रिभुवन स्वामि ॥विभीषणा|५८|| ग्वजटी विद्याधररे, कण्ठ लगाई लीध । तुम्हारे बालेमररे, खबर भली ने दीध ॥ विभीषण || ५९ ॥ निम निम पूछ बानडोरे, तिम तिम उपजे गग । पारम्बार विशेपिएरे. गगीनं ए भाग ॥ विभीषण ।। ६० ॥ ममानार मगा तणारे, मांभलतां मन्तोप । मिलयामें भोन्दो नहींरे, प्रेमतणो अति पोप ।। विभीषण ॥ ६१॥ होहा-गर मन्नाटा छागया. मुन गवण का नाम । गीता पाठी आणवी, करड़ो दीसे काम ॥ १॥ (मी ही मूलगी नज के श्रगाड़ी के पद्य “ ईडर श्रांवा प्रांवलीरे” इम न में भी गाये जा मकते है) गजेश्वर लक्षा कितनी दर ।। टेर ।। ( इस मुनामिक है ) पंद्रप्रमु मुग्रीपन, लंका कितनी दूर । मालमियां अलगी घणी, उद्यमवन्त हजर ।। विभीषण ।। ६२ ।। लंकन प्लयोरे. पूछो गवण तेज । आज लंग अधिको अरे, मगज तेज सहज ॥ निमीपण ।। ६३ ।। दान क्षेपक तज गड़को- मुगो श्री गम' लंकामह है जिहां, बई विद्याधगं एम वाणी ! 'मा गयको नेत्र जग छाइयो, मुर नर अमर मय वात जाणी ' नः १ १ ॥ विकट अति 5ट अबूट जलनिधि मर्यो, नि १मदद करने वाय RRNm- श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २२७ ) दिशां राक्षसां छाय लीधो। नाम लेनां थकां प्राण सांसे पड़े, जाणे यमराण आवास कीघो। सु० ॥ २ ॥ जगत जाहर घणों तेज रावण तणो, देन दानव पिण शंक आणे । तेहना घर तणी वात दुर्लभ घणी. अभिक डरावणी सर्व जाणे ॥ सु० ॥३॥ विपम गढ नालि गोला विषम भूमिका. चलि विषम चऊं दिसे समुद्र खाई । अभङ्ग भट अतुलबली कटक अक्षौहणी, प्रथम थी कुणशके तेथी जाई । सु० ॥ ४॥वीशभुज धारणो शत्रु संहारणो, शीस दश शोभित अति ही रूड़ो । बडा बडा योध अति क्रोध- कारी जिहां, स्वामी आगे कहां नहीं एक कूड़ो ।। सु० ॥ ५॥ नाम लंका तणो अधिक डरावणो, जावणो आवणो केम थावे । स्वामी सन्तोप कगे केण मुझ उरघरो, जीव ए सुजश दो रहावे || सु०॥ ६॥ मायरे शीप इक दोय भुज देह में. सहवाहूं नृप आप हार्यो । इन्द्रने पकड दीयो कठ पिंजरे, वरुण कुबेर नो मान मार्यो । सु० ॥ ७॥ लंक की शंक मनमांही अति मायरे, तेहसं और अब वात कीजे । आप तो राम अलवेशर राजची, माहरे आश दिन दोयजीजे ।। सु० ॥ ८॥ (अन्य अन्धकार रावण की आज्ञा मे इतनी ऋद्धि का कथन करते है। सवैया सूर्य रसोई तपे पवन अंगन बुहारे, वीहड फरे दासीपणो चन्द्रमा करे प्रकारे (शे) 'विश्वानर' घोचे वस्त्र झलाझल नैजा झलके। नवग्रह बंधीया साट पाय पग अति ही खलके ॥ अंगन अहि नांखे छांटा जम भैसो नित्य पाणी भरे । विद्याधर कहै रामने रावण सेथी हुण अरे ॥१॥ असी लास गज पंध, कोड दशतुरी तुखारा । सोले सइंस सामन्त, पायदल अरव अटारा !! अत्री लाख पचास, बापनमत पनर गजा। विधाता। Arrwer Me (२६) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । मयल चली झंझार सबन को पीर है ॥ रावण करडे वयण बहु मुमने कमो, नहीं मानी तब बात हाथमें असि ग्रह्यो । दोऊ लड्या निणवार बहुत वल जोर मूं, वेतो अति बलवन्त प्राक्रम कोरसं ॥२॥ ढाल मुलगी हूंहतो तर नाहरू१२, करतो अति आक्रोश । विद्या मपली अपहरीरे, 'रावण' कीधो रोप ॥ विभीषण।।५।। ममाचार मुहामणारे. मीताजीना पामि । पग्म महामुग उपन्योरे, जाणे त्रिभुवन स्वामि ॥विभीषण||५८|| ग्न जटी विद्याधम्रे. कण्ट लगाई, लीध । त म्हार वालेगरे, खवर भली ते दीध ॥ विभीषण ।। ५९ ॥ निग निम पूछ बातडीने, तिम तिम ऊपजे गग | बारम्बार विशेषिपरं. गगीनं ए भाग ॥ विभीषण ।। ६० ।। ममाचार मगा तणारे, मांभलतां मन्तोष । मिलयामें भोलो नहीं, प्रेमतणी अति पोप ।। विभीषण ।। ६१ ॥ होहा-मर मन्नाटा छागया. मुन गवण का नाम । गीता पाडी आणवी, कण्डो दीये काम || १ ॥ (माही मूलगी न के अगारी के पद्य "ईडर यांबा श्रांवलीरे " इम न म भी गाये जा सकते हैं. गजेश्वर ला कितनी दर ॥ टेर । ( इम मुनाविक है ) छे प्रम मुग्रीवनर, लंका कितनी दूर | मालमियां अलगी वीरे, उद्यमवन्न हजर ।। विभीषण ।। ६२ ॥ कान संपलयोरे, पृली गवण तेन । आर लंग अधिको अछेरे, मरज तेज सहेज । विभीषण ।। ६३ ।। डाल देपर नई बदको- मुग श्री गम' लंकामद है जिहां, वदे विद्याधगं एम वाणी । गबन गयको नेत्र जग छाइया, मुर नर अमर मब बान जाणी ।। १ । विकट अति कंट अन्यूट जलनिधि भयो, चिकं श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २२७ ) दिशां राक्षसां छाय लीधो। नाम लेता थकां प्राण सांसे पड़े, जाणे यमराण आवास कीधो ॥ सु० ॥ २ ॥ जगत जाहर घणों तेज रावण तणो, देन दानव पिण शंक आणे । तेहना घर तणी वात दुर्लभ घणी. अधिक डरावणी सर्व जाणे ॥ सु० ॥३॥ विषम गढ़ नालि गोला विषम भूमिका. वलि विषम चऊं दिसे समुद्र खाई । अभङ्ग भट अतुलपली कटक अक्षौहणी, प्रथम थी कुणशके तेथी जाई । सु० ॥४॥वीशभुज धारणो शत्रु संहारणो, शीस दश शोभित अति ही रूड़ो। बडा बडा योध अति क्रोध- कारी जिहां, स्वामी आगे कहां नहीं एक कूड़ो। सु० ॥ ५॥ नाम लंका तणो अधिक डगवणो, जावणो आपणो केम थावे । स्वामी सन्तोप कगे केण मुझ उग्धरो. जीव ए सुजश दो रहावे ।। सु०॥ ६॥ मांयरे शीप इक दोय भुज देह में. सहवाई नृप आप हार्यो । इन्द्रने पकड़ दीयो कठ पिंजरे, वरुण कुवेर नो मान मार्यो । सु० ॥ ७ ॥ लंक की शंक मनमांही अति मायरे, तेहसं और अब बात कीजे | आप तो राम अलबेशर राजची, माहरे आश दिन दोयजीजे ।। सु० ॥ ८॥ (अन्य ग्रन्थकार रावण की प्राक्षा मे इतनी मुद्धि का कथन करते है। सवैया सूर्य रसोई तपे पवन अंगन बुहारे, चोहड करे दासीपणो चन्द्रमा करे प्रकारे (शे) 'विश्वानर' धोवे वन झलासल नेजा झलके । नवग्रह पंधीया साट पाय पग अति ही सलके ॥ अंगन अहि नांखे छांटा जम भैसो नित्य पाणी भरे । विद्याधर कहै रामने रावण सेथी कुण अरे ॥१॥ असी लाख गज बंध. कोड दशतुरी तुवाग। सोले सइंस सामन्त, पायदल अप अटाग।। क्षत्री लाख पचास, पाचनशत पनरे राजा। १ विधाता। Aavenlar-w. wanAme . Mew---- (२२६) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड सबकोऊमाने शंक सुनत अमरापुरी बाजा ॥ बडे बडे वीर पांव पडे चालती सूर्य पोते उरे । विद्याधर कहे रायजी रावण होड कहो कुण करे ॥२॥ ढाल क्षेपक मूलगी- गम कहे कपि पति ही मुणीये, लम्पटका गुण तो नहीं थुणीये, बात कहो किण विध ही वणीये जोर कर सीताने लावा, जगतमें जरा अधिकों पायां ।। सत्य ॥ ७३ ।। ढाल मूलगी- गम कदै सो जाणीयोरे, तेज पर्ण संमार । कापर कपट करी पण रे, लेई गय मुझ नार ॥ विभी० ॥ ६४ ॥ लक्ष्मण निजगं ठाहरे रे. तो गयां राजान । देग दिन दो चार मेरे ए घोडा ए मेदान || विभी० ॥ ६५ ॥ लक्ष्मण भागे पेचहरे, गवण तो छ श्वान | मना यामें पेमियोरे. फिट पहने अभिमान ॥ विभी० ॥ ६६ ॥ शनी ने छल नाकयोरे. क्षत्रीनं बल खेत । मोई मायूं मानव र, देखोजे निज नेत ॥ विभो० ॥ ६७ ।। ढाल क्षेपक मूलगी- नयमन नव मार्ग है फाल. 'गवण' यो कायर कंगाल, नादको करियों उन बाल । प्रम छनां मीता नहीं लीधी, बात या अयुक्ती कधी ।। मन्य ।। ७४ ।। माग्नमु 'जानकी' लेमां, मुभटांग उवाच ही देना. फते श्री गम की कहां । जाम्बवान करना है अग्नी, मानहाई प्रम की मी मत्य ।। ७५ ।। मुनि गमनन्दनः न क्षेपक तर्ज मिलोको- सुनती महामना वचन हमागे, मला चावां छां गज तुम्हागे। देन टपम्हीटी टक ग्राम. विनयटन व्यापारीवसे निण टाम । निजी या मुन्द नार्ग, सप अनूपम माक अमाली । यो पट्टी पनि माथे. दुगमा चोगमा वर्थ हाथाजी हाये। व मान्ने किन नहीं माने, आवे नाव ने पावजी ठाने ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड।
(२२६)
MRAANAKnor
एम करता तो वीता बहु मासे, पंजी तो खवर ही चौरांरे पासे ।।
पोले पल्लीपती सुणजी प्रकाशां, देसां मिजमानी दाम चुकासां ।
करने विभूषा आजी नारीने लीधां, तिमही पालन्तां हुवो छ वीदा।४।
आव्यो पल्लीमें चौरां विचारयो, लीधी नारीने उणनेजी मार्यो ।
एणी तो परे वादन कीजे, एडा माटे तो केम मरीजे ॥५॥
दोहा-पल्ली समाणी लंक है, पल्लीपति रावण जाण ।
नारी समाणी सीत है, राज हो वणिक समान ॥ १॥
विद्याधर कन्या बहु, अपच्छरने उणीहार ।
एक एकथी आगली, परणो केई हजार ॥२॥
रावण लोक डरावणो, लडतां नहीं रहै लाज ।
इण कारण सीता तणी, गई करो महाराज ॥३॥
लक्ष्मण सुनके कोपियो, चोले मूंछ मरोड ।
लावां वेगी सोतने, दशमस्तक ने तोड़ ॥ ४ ॥
श्री राम मुनि कृत क्षेपक तर्ज-सिलोका-
सुणतां तो लिछमन सिंहज्यूं गूज्यों. विद्याधरां को हीयोजी धज्यों।
सुणजो विद्याधर वात हमारी, सुनने तो चुपका जोवे इतकारी॥१॥
नगर कुसुमपुर धनो व्योपारी, जिणरा घर में जमनाछे नारी ।
पांच पुत्रों में नहीं एक कमाऊं. तनमां तो रोग परदेशां जाऊं।
अटवो में मिलियो पुरुष इक सिद्धो. किरपाकरीने लोह कहो दीधो ।
इणमं तो रोग मोटका जावे, लेई कड़ोंने रोग गमावे ।। ३ ॥
चलियो तो आयो निजपुर यार, मुई नृप कन्या हुवो हाहाकार ।
नागनो विप गयो कहानी करणी. नृप हुकमसं कन्या जो परणी।।
मात पिताझं मिलीयो हुल्लासे, भोगवे नुस लीला वीलारे ।
एक दिन मजन मिस गहातट आयो यह विकट तिहां पानोजी छायो
॥५॥ तिणमां तो है गोहज लांठी, कड़ो अम्बर १ में लैईने नांटी।
वडता तो दीठी आनम सेण. शूग मुभट नहीं करोजी लेग ॥ ६॥
view (२२८) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड सबकोऊमाने शंक सुनत अमरापुरी बाजा ।। बडे बडे वीर पांवे पडे चालतो सूर्य पोते डरे । विद्यायर कहे रायजी रावण होड कहो कुण करे ॥ २ ॥ ढाल क्षेपक मूलगी- सम कहै कपि पति ही सुणीये, लम्पटका गुण तो नहीं थुणीये, बात कहो किण विध ही वणीये जोर कर सीताने लावां, जगतमें जश अधिकों पायां ।। सत्य ॥ ७३ ॥ ढाल मूलगी- गम कद सो जाणीयोरे. तेज पणं संमार । कायर कपट करी घणं रे, लेई गय मुझ नार ॥ विभी० ॥ ६४ ॥ लक्ष्मण निजगं ठाहरे रे, तो गयां राजान । देखें दिन दो चार में रेप घोडा ए मेदान ।। विभी० ॥ ६५ ।। लक्ष्मण भागे खेचरूरे. गवण तो छे श्वान | गुना घरमें पसियोरे. फिट पहन अभिमान ॥ विभो० ॥ ६६ ॥ शुत्री ने छल नाकयोरे. क्षत्रीनं पल ग्वेन । सोई मायूं मानर, देखोज निज नेत ॥ विभो० ॥ ६७ ॥ ढाल क्षेपक मूलगी-- लामन तव मार्ग है फाल. 'गवण' यो कायर कंगाल, नादको अग्यिो उन जाल । प्रभु छनां मीता नहीं लीधी, वात या अयुक्ती कीवी ॥ मन्य ।। ७२ ॥ माग्तमु 'जानकी' लंमां, मुमटांक आप ही देगा, फने श्री गम की कहमां । जाम्बवान करना है मानी, मानती है प्रभु की मरजी ।। मत्य ।। ७५ ।। मुनि गमचन्दजी कृत नेपक तर्ज मिलोको- मुनही महागडा वचन हमागे, मला चायां छां गज तुम्हागे। वनान्ट पाने म्होटी इक ग्राम, विनयदन व्यापारी बम तिण ठाम ।। नियनीया में मुन्नाग नाग, स्प अनूपम झाक अमाली । मोरमांया पट्टी पनि माये. दुगणा चांगणा वयं हाथोनी हाय।। व मनन ने गिनहीं माने. आवे जावे माजी छाने ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२३१) दुजो त्रीजो मस्तक कण्ठ लगावे हो । राज० ॥ २ ॥ चौथो छाती पंचम नाभि प्रमाणे हो सुण । छठो कटि लग सातमो साथल आणे हो।। राज० ॥३॥ आठमो जानू धरती अधर ऊठावे हो । सुन । नवमो अंगुल चारज ऊंची लावे हो । राज० ॥ ४॥ वामे कर मं शीला ऊंची करता हो सुन । वाम चरण मूं पाछी धरती में धरता हो । राज० ॥ ५॥ पूजि अर्ची बहु विध भक्ति करावे हो सुन । हरि इण क्षेत्रे सोहि शीला ऊठावे हो। राज० ॥६॥ तत् क्षिण सुरवर जय जय शब्द करावे हो सुन । पुप्प नी वृष्टी गंधाम्बू वरसावे हो । राज० ॥ ७ ॥ ढाल मूलगी जेम लताए तेम ए शीलारे, देखाडी ऊपाड़ी। पुष्प वृष्टि हुई भलीरे, सुजश चढ्यो निलाही ।। विभीषण ॥७१।। भल भलू कहै देवतारे, प्रत्यय२ पामी जाम । सहु कोई आणन्दियारे, पाछा आव्या ताम | विभीषण ॥७२॥ वृद्ध पुरुष परमारथीरे, वात विचारे एक । पहिलां दूतज मोकलोरे, जाणणहार विवेक । विभीषण ।। ७३ ।। वाता में समजावीयोरे, पाछी आपे वाल । दोई घरे होय वधामणार, वाधे नहीं जंजाल । विभीषण ||७४|| दून 'महारल' आगलोरे, मोकलिये सुप्रमाण । लंका तो माजी सुणीरे, कीमो अति मण्डाण ॥ विभीषण ॥७५ ॥ दाल भली सेतीशमीरे, सीधी दतही धाप । केशराज ऋपिजी कहरे, जेहनो प्ररल प्रताप ।। विभीपण ॥ ७६ ।। दोहा (फेदारा रागे) राक्षसकुल सायर विचे. अमृत ऊपज्यो एक। विभीपण मति आगलो. जाणे विनय विवेक॥१॥ दूत धृत जाए घमी, विभीषणने पास।
ar aim .vv.. (२३.) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । आनम सेणतो कीधो ऊपायो, नांखी लकड़ने वड़लो फूफायो । गोह मागने कडोजी लीधो, आतम सेणरो कारज सीद्धो ॥ ७॥ मनमें हों जिम अमृत पीधो एह सिलोको राम मुनि कीधो।।८॥ दोहा-गोह गवण मीताकड़ो, आतम सेण सं राम । लंकाग:-वर चुग्ने, लेवां रन बहु दाम ॥१॥ नभचर अनि विस्मय भये, सुन लक्ष्मण की वात । कही अनूपम तुम कथा, महा सुभट अवदात ।। २ ।। भूचर येऊ. अति जोर है, एनी केहने हाथ । गोद शिलाकी बात कहो, ज्यं शंसय मिट जान ।। ३ ॥ ढाल मूलगी-- 'आम्वधान' भाग भल रे, उपाडे भुजपाण। फोटो शिलाने माहमे रे, गवण हन्ता जाण || विभी० ॥ ६८ ॥ मार वचन में मांगल्य रे । अनि रूदी रीत । गहने गोला उपाहता अपने अति परतीत ।। विभी० ॥ ६९ ॥ रमण भागे ए भरे वैगी विमाने देव । शिपाया विद्या परे, आगगा तन गय । विभी० ॥ ७० ॥ दासज्ञपक जलागे-- न नम्मी पहली एक कहावे हो. गणजो महाराज । योनि निण उार मोक्ष मिधार हो गजिन्द || १ || मनिमाि पर छा गये हो मुणनो । {" मीगिरामा अधिकार श्रीरभी पाया गयाहै वह निग्नी) भागीय गि देवी का भवन है। हम शिला पर हो पाट दम चोयीगी में 27, 2: या पार कर नरमोट नि । गोर पन्नाचती Part मान बोर। अनाथ, चीनीश पाट नाक की पाट गोर मुनि छ योर मनि नगेनो नमानायक या पाट गौर मानोगोर मां ने धामट पाट A * . .
RAA
श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड ।
(२३३)
किष्किंधा चालो आयो सुग्रीव आनन्द अति पायोजी |हनु॥१०॥
वेऊं मिली राम पे आवे, चरणां विच शीप नमावेजी।हनु॥११॥
दोहा-पगे लागी ऊमोरयो, प्रभुजी केरे प्रासाद ।
तुझ सम चीजो को नहीं. तारो जग जश चाद ॥६॥
दशकंधर लेई गयो, लंका नगरी माही।
सीता के तस शुद्धी तो, तुझथी आवे प्राही ।। ७ ।।
हनुमन्त भाखे रामजी, मया करी कपिराय ।
ते माटे हूं तेडीयो, वानर घणां कहाय ॥ ८ ॥
'गवगवाक्ष' 'शरभ ज, 'गवय', 'जाम्बवान' 'नल' 'नील' ।
'द्विविद' 'गन्धमादन' भला, 'अगद' 'मेद' 'सलोल' ॥९॥
इत्यादिक नो छे भला, वानर अति अभिराम ।
छेली संख्या पूरणी, माहै म्हारूं नाम ॥ १० ॥
एण हूं कारज एटला, करूं सांभलो राय ।
लड़ा राक्षस द्वीपमूं. आणू इहां ऊठाय ॥ ११ ॥
क्षेपक छप्पय छन्द
कहोतो ईन्द्र गिरि चहूं ईन्द्र इन्द्रासन ढालं,
कहोतो पेठ पाताल शेष को भार ऊतारूं ।
कहोतो वाह वल करूं देव दानव सब दर्दू,
कहोतो मार्स सग शीप दश रावण कहूँ ।।
हनुमान कहत रघुनाथ से गम प्रताप इतनो करूं,
ऊठाय लक गवण महित दच्छिन की ऊत्तर धरूं ॥१॥
दोहा-रावण लोक डरावणो. ते भाईयों सं बांध ।
आणू प्रमुने आगले, कोईक वेला मांध ॥ १२ ॥
कहो तो हणू कुटुम्ब, कुल नो करूं निकन्द ।
सत्यवती सीता सती, आणू धरी आणन्द ॥ १३ ॥
राम कहै साचो सहु. तारो वचन विचार !
जेम कहूं तूं नेम को नहीं सन्देह लगार ॥ १४ ॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय स्वएड । 4-~- भयपामी गक्षम तणो, पाछो नावे नास ।।२।। सीता छोडावण तणी, रावण { अरदास । करसे लघु भाई भलो, मानिस ही प्रभु खास ॥ ३॥ देवयोग माने नहीं, पाछी वात विशेष । सर्व जणाये आपने, लीधी मानी नरेश ॥ ४ ॥ गुग्री ये मुमतो कियो, अब लोई सहु साथ । हनुमन्त तप पोलावीयो, जाणी अति समाथ || ५॥ सामी श्री नथमलजी कृन ढाल क्षेपक तर्ज वीग लूम्यो भूम्बो होई आईजो हनुमन्न थने गमजी बुलावे. सीता की ग्वार मंगावेजी ।। टेर ।। कपि पनि भामण्डल गया रघुवर ना सेवे पायाजी ॥ हनु० ॥ १॥ पनि वीर विगध विगजे, दल बल नो पार न छाजेजी ।। हनु.॥२॥ मुग्रोवनी काम ममायी, प्रभु माहाग गतीने मार्योजी ।। हनु. ॥६॥ गर बीयर पण भारी, लक्ष्मणजी लीधा मारीजी ॥ हनु. ॥४॥ किर कोट गिलाने उठाई, है प्रबल बली दो भाईजी ।। हनु. ।।५।। मया- कपिपति लिगी पनी दनको बुलाय कहै. पीन मुन जाय पाम लेग्य वेग दीजीये। कीजीयन र कर्ग दर में विगार होत, आय टन हग्विल आप देख लीजीये ।। महा लवन अनि मुभट अनूप रूप, संपनी में लिए क्या देखत पतीजीये । अ. काज मार्ग, गमकी लेगो नाग, लंकापति ज्यांकी बबर जाय लाय दीजीये ।। टान नेपक नज-पूर्ववत के पवन दट मित्रायो, चलकर इमान पे आयोजी ।। हनु । जिवन पत्र, काम, मान न द६ अपामजी ॥ हनु ॥ ७ ॥ दन्तम दोनो मी. पदक विलवाणीजीदनु ||८|| दनुभन्दन दीलामा दीनी, हट चल्यो दीलन कानीजी इनु.।।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२३३) किष्किंधा चालो आयो सुग्रीव आनन्द अति पायोजी |हनु॥१०॥ ऊं मिली राम पे आवे, चरणां विच शीप नमावेजी।हनु॥११॥ दोहा-पगे लागी ऊभोरयो, प्रभुजी केरे प्रासाद । तुझ सम चीजो को नहीं. तारो जग जश वाद ॥ ६॥ दशकंधर लेई गयो, लंका नगरी मांही । सीता छे तस शुद्धी तो, तुझथी आवे प्राही ॥ ७ ॥ हनुमन्त भाखे रामजी, मया करी कपिराय । ते माटे हूं तेड़ीयो, वानर घणां कहाय ॥ ८ ॥ 'गवगवाक्ष' 'शरभ' ज, 'गवय', 'जाम्बवान' 'नल' 'नील'। 'द्विविद' 'गन्धमादन' भला, 'अगद' 'मेद' 'सलील' ।।९।। इत्यादिक तो छ भला, वानर अति अभिराम । छेली संख्या पूरणी, माहै म्हारूं नाम ॥ १० ॥ एण हूं कारज एटला, करूं सांभलो राय । लङ्का राक्षस द्वीपलं, आणू इहां ऊठाय ॥ ११ ॥ क्षेपक छप्पय छन्द कहोतो ईन्द्र गिरि चई ईन्द्र इन्द्रासन ढालं, कहोतो पेठ पाताल शेप को भार ऊतारूं। कहोतो यांह चल करूं देव दानव सब ठें, कहोतो मार खग शीप दश रावण कटुं ॥ हनुमान कहत रघुनाथ से राम प्रताप इतनो करूं, ऊठाय लंक रावण सहित दच्छिन की ऊत्तर धरूं ॥१॥ दोहा-रावण लोक डगवणो. ते भाईयों सं यांध । आणू प्रभुने आगले. कोईक वेला सांध ॥ १२ ॥ कहो तो हणूं कुटुम्ब, कुल नो करूं निकन्द । सत्यवती सीता सती, आणूं धरी गाणन्द ॥ १३ ॥ राम कहै साचो मा. नारो वचन विचार । जेम कहतूं तेम फरे, नहीं मन्देह लगार ।। १४ ॥
(२३२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । vah - ~- . भयपामी राक्षस तणो, पाछो नावे नास ।। २ ॥ सीना छोड़ावण तणी, रावण { अरदास । करसे लघु भाई भलो, मानिस ही प्रभु खास ॥ ३॥ देवयोगे माने नहीं, पाछी वात विशेष । सर्व जणावे आपने, लीधी मानी नरेश ।। ४ ।। मुग्री ये सुमतो कियो, अब लोई सहु साथ । हनुमन्त तब बोलावीयो, जाणी अति समाथ ।। ५॥ ग्वामी श्री नथमलजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज वीग लूम्यो भूम्यो होई आईजो हनुमन्त थने गमजी बुलावे. सीता की खबर मंगावेजी ।। टेर ।। कपि पनि भामण्डल राया रघुवर ना सेवे पायाजी ।। हनु० ॥१॥ बलि वीर विगध विगजे, दल बल नो पार न छाजेजी। इनु. ॥ २॥ मुग्रीयनो काम ममार्यो, प्रभु साहारा गतीने मार्योजी।। हनु.||६|| पर त्रीशर दपण भारी, लक्ष्मण जी लीधा मारीजी ॥ हनु. 1॥४॥ फिर कोड गिलाने उठाई, है प्रबल बली दो भाईजी ।। हनु. ॥५॥ मर्वया- करिसनि लिपी पत्ती दनको बुलाय कहै. पांन मुन जाय पाम लेय वेग दीजीये। कीजीये न वर कर्ग देर में विगार होत, आय दत हग्विल आप देख लीजीये ।। महा बलवन्न अति मभट अनूप रूप, लेगनी में निग्यूं क्या देखन पतीजीये। आज एक कान मार्ग, गमहकी लेगो नारी, लंकपति ज्योंकी गयर जाय लाय दीजीये ।। टाल नेपक ननं-पूर्ववत से, पन न मियायो, चलकर इमान पं आयोजी ॥ हनु ६॥ तिवाची पत्र वाम, मान न प अपारजी ॥ हनु ॥ ७ ॥ हनुमन्ती दोनी गगी. इक दी हक बिलपाणीजी) हनु ॥ ८ ॥ हनुमन्दने दीलामा टीनी. अट चाल्यो ढीलन कीनीजणाहनु।९।। - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२३३) किष्किंधा चालो आयो सुग्रीव आनन्द अति पायोजी॥हनु॥१०॥ वेऊं मिली राम पे आवे, चरणां विच शीप नमावेजी|हनु।।११।। दोहा-पगे लागी ऊमोरयो, प्रभुजी केरे प्रासाद । तुझ सम वीजो को नहीं. तारो जग जश वाद ॥ ६ ॥ दशकंधर लेई गयो, लंका नगरी मांही । सीता के नस शुद्धी तो, तुझथी आवे नाही ॥ ७ ॥ हनुमन्त भाखे रामजी, मया करी कपिराय । ते माटे हूं तेडीयो, वानर घणां कहाय ॥ ८ ॥ 'गवगवाक्ष' 'शरभ' ज, 'गवय', 'जाम्बवान' 'नल' 'नील'। 'द्विविद' 'गन्धमादन' भला, 'अङ्गद' 'मेद' 'सलील' ॥९॥ इत्यादिक तो छे भला, चानर अति अभिराम | छेली संख्या पूरणी, माहै म्हारूं नाम ॥ १० ॥ एण हूं कारज एटला, करूं सांभलो गय । लङ्का राक्षस द्वीपमू, आणू इहां ऊठाय ॥ ११ ॥ क्षेपक छप्पय छन्द कहोतो ईन्द्र गिरि चढू ईन्द्र इन्द्रासन ढालं, कहोतो पेठ पाताल शेप को भार ऊतारूं। कहोतो वाह वल करूं देव दानव सब दडूं. कहोतो मारूं खग शीप दश रावण कटें ॥ हनुमान कहत रघुनाथ से राम प्रताप इतनो करूं, ऊठाय लक गवण महित दच्छिन की ऊत्तर धरूं ।।१।। दोहा-रावण लोक डगवणो. ते भाईयों सूं बांध । आणू प्रभुने आगले. कोईक वेला सांध ॥ १२ ।। कहो तो हणुं कुटुम्बनं, कुल नो करूं निकन्द । सत्यवती सीता सती, आणू धरी आणन्द ॥ १३ ॥ राम कहै साचो महु. तारो वचन विचार । जेम कहूं तूं तेम करे. नहीं नन्देह लगार ।। १४ ॥
(२३२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । --- भयपामी राक्षस तणो, पाछो नावे नास ॥२॥ मीता छोड़ावण तणी, रावण { अरदास । करसे लघु भाई भलो, मानिस ही प्रभु खास ॥ ३॥ देवयोगे माने नहीं, पाछी वात विशेष । मर्व जणावे आपने, लीधी मानी नरेश ॥ ४ ॥ सुग्रीवे सुमतो कियो, अब लोई सहु साथ । हनुमन्त तब बोलावीयो, जाणी अति समाथ ॥ ५॥ स्वामी श्री नथमलजी कृत टाल क्षेपक तर्ज वीग लूम्यो झूम्बो होई आईजो हनुमन्त थने गमजी बुलावे. सीता की खबर मंगावेजी ।। टेर । कपि पनि भामण्डल गया रघुवर ना सेवे पायाजी ॥ हनु० ॥१॥ पलि वीर विगध विगजे, दल बल नो पार न छाजेजी।। हनुः ॥२॥ मुग्रीवनो काम ममाया, प्रभु माहाश गतीने मार्योजी।। हनु.||६|| मर जीगर द्पण भारी, लक्ष्मणजी लीधा मारीजी ॥ हनु.॥४॥ फिर मोड गिलाने उठाई, है प्रवल बली दो भाईजी ।। हनु. ।।५।। मवैया- कपिपनि लिवी पत्ती दतको बुलाय कहै. पान मुन जाय पाम लेग्य वेग दीजीये। कीजीये न बेर की देर में विगार होत, आय इन हग्विल आप देख लीजीय ।। महा बलरन्न अति मुभट अनूप रूप, लगनी में लिए क्या दंग्खन पतीजीये । आज एक काज मार्ग, गमहकी लेगो नाग, कति ज्योंकी मदर आय लाय टीजीये ।। डाल देपर नजं-पूर्ववत् दे चंदे दन पियायो, चलकर दृढमान पे आयोजी ।। हनु । ति यानी पत्र वाम, मान ने पं अपारनी ॥ हनु ।।७।। हनुमन्त दोनो गी. कमी इक क्लियामीजी हनु ।।८।। दनुमन्दन दीवाना दीनी, इट चाल्यो दीलन कीनीनीहनु!!!
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{२३४) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड एक बार तो जायने. आणो खबर अवार । वश्य पडी छे पारके, वरते कवण प्रकार ।। १५ ।। ढाल अड़तालीशमी तर्ज दधि सूत जात ही- कपिरे ! प्रिया साथे कहै. प्राण प्रभु नो तुम पास । देह में न्यारो रहे रे. मन में थारी आश || कपि ॥ १ ॥ अन्न तो मोय लागत फीको, स्वाद नहीं जलपान । मयतो तो नींद न आये, एक थारो ध्यान || कपि ॥ २ ॥ गम नो मन नां ग्मे, नां रमे गुण गान । हास्य व्याल विनोद नां गमे, एक थारो ध्यान | कपि ॥३ योगने माधियां योगियो रे, भजे ज्यूं भगवान । काम गगे गचीयांथी, एक थारो ध्यान || कपि ॥ ४ ॥ हाथियो र कुंन बननो, अ.णीयो गजान । जेह गुमरे तेह वन ने, एक थारो ध्यान || कपि ।। ५॥ बरणी बच्छा ए ग्मनी, बंच्छ ही नर आन । अधिक नीत्र परिणाम राखे, एक थारो ध्यान || कपि ॥६॥ परयो धग पञ्यों पाणी. माथ गवे मान | मेदना जल माथे मनमा, एक थागे ध्यान || कपि ।।७।। महटी मा हाथ कैग भाग ले रे घरे । जागीय अधिनायो कारे. लंद कुशल ग्यरे ।। कपि ।। ८ ।। आतां चुडामणी रे, आणीजरे मही। नामद माच माने, यात मपल कही । कपि ।। १ ।। मा वियोग म मति नं. आर्ट याही पंग । ममा वोलंक पनि कंग, गिरदीयो ही दंग ।। कपि ।। भरत दल, बल, माज ममगे. मपम्ही ना। निलिया छ भोली या ई. सवर काया मुविशेष ।। कपि । पर दमाद के म्हाग प्रीया (मीना) ने था अभागी।
भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २३५) जब लगे हूं फिर न आवं, तब लगे ए ठाम | छोडवू नहीं बीनती ए, मानजो श्री राम ॥ कपि ॥ १२ ॥ राम 'लक्ष्मण चरण प्रणमी, लेई निज परिवार । वीर विमाने वैसी चाल्यो, पामी हर्प अपार ।। कपि ॥ १३ ॥ वाट जातां गिरी महेन्द्र, पुर माहेन्द्र उदार । देखीयो थी रोप ऊपन्यो. आणी ए विचार ॥ कपि ॥ १४ ॥ माय माहरी वे गुन्हा थी, काढी दीधी ताम | रीस ए मुझ अछे अधिकी, आजे फेडू ठाम ॥ कपि ।। १५ ।। एम कहतां तूर रणना, लीया राय बजाय । शब्द सुणी ब्रह्माण्ड फाटे, नगर नाठो जाय | कपि ।। १६ ।। दोहा क्षेपक- दूत भेजीयो नानाजी ने माने म्हारी आन । नहीं तर तब रहसी नहीं, थोडोमी भी शान ॥१॥ । क्षेपय तर्ज राधेश्याम- सुन दूत वचन ज्यों भूत लगा,त्यों 'महेन्द्र' राय रीसाया है। काला मुख कर मार जून शर, दृत भणो निकलाया है। बस कह देना तेरे मालिक को, मैं फौरन ही आ जाता है। मुझ को आन मनाने का मैं उसको मजा चखता हूं। सौ पुत्रों को साथ वीर वे दल पल ले तैयार हुवे । कायर नर को छोड और सब वीर पुरुप हुँसीयार हुवे ।। रण भैरो जो वहां बजती थी, और घाय निशान लगाया है। महिन्द भूप निज सेना ले कर, नगरी बाहर आया है ।। नानाजी के निकट आयकर, खहा वीर हइमान हुआ । मानों आया सूर्य ऊतर कर, एमा ही अनुमान हुआ ।। महेन्द्र भूप यों चोला उन को तं नो अब तक बना है। तूं मेरे से नहीं जीतेगा, यह कदन हमाग मशा है ।। १ सती संजना से।
(२३४) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड एक बार तो जायने, आणो खबर अचार । चश्य पडी छे पारके, चरते कवण प्रकार ॥ १५॥ डाल अड़तालीशमी तर्ज दधि सूत जात हो- कपि रे ! प्रिया माथे कहै. प्राण प्रभु नो तुम पास । देह मं न्यारो रहे रे मन में थारी आश || कपि ॥१॥ अन्न तो मोय लागत फीको, स्वाद नहीं जलपान । सयतो तो नींद न आये, एफ थारो ध्यान || कपि ॥ २ ॥ गम नो मन नां ग्मे, नां ग्मे गुण गान । हाम्ग ख्याल विनोद नां गमे, एक थारो ध्यान | कपि ॥३॥ योगने माधियां योगियो रे, भजे ज्यूं भगवान । काम गगे राचीयांथी, एक थारो ध्यान || कपि ॥ ४ ॥ हाथियो रे कुंज वननो, आणीयो गजान । जेह गुमरे नेह वन ने, एक थारो ध्यान || कपि ॥ ५ ॥ बैग्णी बच्छा एग्मती, वंच्छ ही नर आन । अधिक नीत्र परिणाम गग्वे, एक थारो ध्यान || कपि ॥ ६ ॥ परयो धग पश्यों पाणी, माथ गये मान । मेहना जल माथे मनमा. एक थागे ध्यान ।। कपि ॥ ७ ॥ मुंहदी र हाथ की आगे लेई रे धरे । गनी पदिनाणी कारे, लो, कुगल बरे ॥ कपि ।। ८ ।। भावना दामी, आणीन मही। जमग मद माच मान. बात मपल कही । कपि ।। ९ ॥ मा वियोग मा मनि ट्रॅ. आर्ट याही पंग। माती पति कंगे, कि दीयो ही दंग्य || कपि ॥१०॥ मादल अन मान पपग. मयाही नांदा। मिविय मोकलीपी ई. पवा कग्या मुबिगए । कपि ।।?.?" मानदेन म्याग प्रीया (मंना) ने श्राममा दी : व्यमानी। .
मानों आगरा सूर्य ऊना कर, एमाहीतुन भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२३५) जब लगे हूं फिर न आवं, तब लगे ए ठाम । छोडवू नहीं वीनती ए, मानजो श्री राम ॥ कपि ॥ १२ ॥ राम लक्ष्मण चरण प्रणमी, लेई निज परिवार । वीर विमाने वैसी चाल्यो, पामी हर्ष अपार ॥ कपि ॥ १३ ॥ वाट जातां गिरी महेन्द्र, पुर माहेन्द्र उदार । देखीयो थी रोप ऊपन्यो. आणी ए विचार ॥ कपि ॥ १४ ॥ माय माहरी वे गुन्हा थी, काढी दीधी ताम । रीस ए मुझ अछे अधिकी, आजे फेडू ठाम ।। कपि ॥ १५ ॥ एम कहतां तूर रणना, लीया राय वजाय । शब्द सुणी ब्रह्माण्ड फाटे, नगर नाठो जाय ॥ कपि ॥ १६ ॥ दोहा क्षेपक- दूत भेजीयो नानाजी ने माने म्हारी आन । नहीं तर तय रहसी नहीं, थोड़ोसी भो शान ।। १॥ १ क्षेपय तर्ज राधेश्याम- सुन दूत वचन ज्यों भूत लगा,त्यों 'महेन्द्र' राय रीमाया है। काला मुख कर मार जत शर, दूत भणो निकलाया है। बस कह देना तेरे मालिक को, मैं फौरन हो आ जाता है। मुझ को आन मनाने का मैं उसको मजा चखता। सौ पुत्रों को साथ वीर वे दल बल ले तैयार दुरे । कायर नर को छोड़ और सब वीर पुरुष हुँनीयार दुई रण भैरो जो वहां बजती थी, और घाव निशान महिन्द भूप निज सेना ले कर, निज सेना ले कर, नगरी शहर नानाजी के निकट आयकर, सडा वीर हद महेन्द्र भूप यों रोला उस को ने नो ! तुं भेरे से नहीं जीनेगा. यह कहना है १ सती पंजना से।
(२३६) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । दोहा (क्षेपक) नानासाकी नीति को. सुनकर म्हारी फाल । वजरंगी अंगीकुंवर, बोला शीघ्र सवाल ॥१॥ क्षेपक तर्ज राधेश्याम- मत करीये मगरूरी इतनी, धूल मांय मिल जायेगी। जय तीर हमारे चालेंगे, तब मनकी मनमें रह जायेगी। में छोटा हूं या मोटा, यह भी मालूम पड जायेगी। अब जोग हमाग देख आपकी, होस हवा उडजायेगी ।। ढाल मूलगी- नृप गहेन्द्र 'मुग्न्द्र' नी परे, चढ्यो पुत्र ममेत । मांहो मांही युद्र मच्यो, बात मे विण हेत ।। कपि० ॥ १७ ॥ अंजना मुत आकगेरे, सुभट दीधा मोड । प्रचंट बाए उडी जाए, तृण तणीतो कोड ।। कपि० ॥१८॥ प्रदान कीर्ति आची लडीयो, लडे चित्त ने चाय । दोर्ट गीर विशेष बलीया, आपममें न टलाय || कपि० ॥ १९ ॥ हनुमन्ने मुविचार कीघो, आज मुझे धिकार । म्वामानातो काम विच में, पह लगावी चार|| कपि० ॥ २० ॥ माग में एक क्षण में, मायकुल-क्षयथाय । काम प्रारम्भ्यो कर, शोच उपन्यो आय ॥ कपि० ॥ २ ॥ भांजी ग्य माग्थी भुजबरे, बांधी लीधा मोय । उस मरेन्द्र नगेन्द्र मादीयो, शूग्थी एम होय ॥ कपि ॥ २२ ॥ घा लागी छोड दीया. आप प्रगटी नाम । गायने दाम दीया थी तुम्ह, नंदना ए काम || कपि० ॥ २३ ॥ मामी काका. तुम्हें प्रभुने पाम । आमा माघी याची. पाममा यह ग्राम ॥ कपि० ।। २४ ।। हामी बाट बगार नान. दोहीनी गिर चुची। मरमातामहमजन ग्या नंब ।। ऋपि० ॥ २५ ॥ सदर मुजग मायी, आव दीटी आन ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । आपणो आप थकी शकी, आप पावे लाज ॥ कपि० ॥ २६ ॥ म्वामी काम प्रयाण कीजे. पन्थ में कल्याण । होईजो कही आप प्रभुने, चल्यो करी मण्डाण || कपि० ।। २७ ॥ वाटमें पर सिद्ध 'दधिमुख', आईयो डक द्वीप । माधु दो काउसग्ग दीठा, ध्याने लीन अतिव ।। कपि० ॥ २८॥ पाखतीही तीन कन्या. राखी मन एकन्त । करे विद्या तणो साधन, दैवगति न लहन्त ॥ कपि० ॥ २९ ।। लागीयो दवझाल पसरी. आवीयो प्रभु१ धाय । उदधीन जल आणी अधिकं. लीयो तेह बुझाय । कपि० ॥ ३०॥ साधुवन्दी कहै कुंवरी, स्वामी सांभलो वात । साधु उपद्रव टालीयोए, नहीं तो बलिजान ।। कपि० ।। ६१ ।। तुम माह्यने लीये सिद्ध विद्या, एह हमारी जोय । विणही काले फले तरुवर. एह अतिशय कोय ॥ कपि० ॥३२॥ पूलही प्रभु आप कौन तुम ? नाम दीये जवाच । नगर 'दधिमुख' अछे नीको. अवर पुर में आवः ॥कपि०॥३३॥ गयतो गन्धर्च रूडा, कुसुम माला नार । ए अमे छऊ नस कुंवरी, रतितणे अवतार ।। कपि० ।। ३४ ॥ खेचरा बहुतरे वांछा. करी विविध प्रकार । तान नापे वेमी रह्या, मन अप्ठे मार ॥ कपि० ॥ ३५ ॥ एक 'अंगारक' ज खेचर. घर आगा अगाह । कामवम्ये उन्मत्त हुओ. नात न करें विवाह ।। कपि० ॥ ३६ ॥ नाते पूछचं निमित्त नानी. पुत्रीनो वर कृण !! थायसे ए साच भाखो, हूं अ४३ भल मूण ।। कपि० ॥ ३७॥ मारसे जो साहसगति ने, गोई भलो भग्तार । रूप रूड़ा नहीं कडो. तुम्ह हुगे किनार । कपि० ॥ ३८ ॥ केम जाण्यो जाय प्रभुजी. तेहथीए काज। १ पशुतावालो (नुमन्न) : ए पारसी भाषानो शब्द । नो पर्य पाणी धाय देने उपरथी बसाया गया । मलोपट रहिन । HLamme ममेत। (२३६ ) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । दोहा (क्षेपक) नानासाकी नीति को. सुनकर म्हारी फाल । वजरंगो अंगीकुंवर, चोला शीघ्र सवाल ।। १ ।। क्षेपक तर्ज राधेश्याम- मन करीये मगरूरी इतनी, धूल मांय मिल जायेगी। जब नीर हमारे चालेंगे, तब मनकी मनमें रह जायेगी । में छोटा हूँ या मोटा, यह भी मालूम पड़ जायेगी। अब जोश हमाग देख आपकी, होम हवा उडजायेगी ।। ढाल मूलगी- नृप महेन्द्र 'गुरेन्द्र' नी परे, चढ्यो पुत्र माही मांही युद्ध मच्यो, बान में विण हेन ।। कपि० ॥ १७ ॥ अंजना सुत आगेरे, गुभट दीधा मोड । प्रचंट वाए उटी जाए, तण नणीतो कोड || कपि० ॥ १८ ॥ प्रदान कीति आगी लडीयो, लडे चित ने चाय । दो वीर पिशावलीया, आपममें न टलाय ।। कपि० ॥१९॥ हनुमन्ने मुविवार कीघो, आज मुझे धिकार । म्यामानानी काम विधमे, ह लगावी वार || कपि० ॥ २० ॥ माग में एक क्षण में, मायकुल-क्षयथाय । काम प्रारम्भ्यो कम्यं, गोच उपज्यो आय | कपि० ॥ २ ॥ भांजी ग्ध माथी भुजबले, गांधी लीघा मोय । कामटेन्द्र नग्न्द्र माहीयो. गूगी एम होय ।। कपि• ॥ २० ॥ मामी छोट दीया, 'आप प्रगटी नाम | गरने साल टीयो भी तुम्ट, तदना ए काम | कपि० ॥ २३ ॥ का लंका. तुम्ह प्रभुन पाम । - मा मावा. पाममो चढ़ ग्राम ।। कपि० ॥ २४ ॥ कर नगार नाने. टोहाना गिर चुदी । म मद मजन या नंच ।। कपि ॥२५॥ का सर मुझा मुर्मयो, अनि टीटी आन । m m - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२३७ ॥ आपणो आप थकी शंकी, आप पावे लाज || कपि० ।। २६ ।। स्वामी काम प्रयाण कीजे. पन्थ में कल्याण । डोईजो कही आप प्रभुने, चल्यो करी मण्डाण || कपि० ॥ २७ ॥ बाटमें पर सिद्ध 'दधिमुख', आईयो इक द्वीप । साधु दो काउसग्गे दीठा, ध्याने लीन अतिव ।। कपि० ॥ २८॥ पाखतीही तीन कन्या, राखी मन एकन्त । करे विद्या तणो साधन. देवगति न लहन्त ॥ कपि० ॥ २९ ॥ लागीयो दवझाल पसरी. आवीयो प्रभु१ धाय । उदधीनं जल आणी अधिकं. लीयो तेह बुझाय । कपि० ॥३०॥ आधुवन्दी कहै कुंधरी, स्वामी सांभलो वात । आधु उपद्रव टालीयोए, नहीं तो बलिजात ॥ कपि० ।। ६१ ।। म माह्यने लीये सिद्ध विद्या, एह हमारी जोय । णही काले फले तरुवर. एह अतिशय कोय ॥ कपि० ॥ ३२ ॥ छही प्रभु आप कौन तुम ? ताम दीये ज्याय । गर 'दधिमुख' अछे नीको. अवर पुर में आप कपि०॥ ३३॥ यतो गन्धर्व रूडा, कुसुम माला नाग । अमे छ नस कुंवरी, नितणे अवतार || कपि० ॥ ३४ ॥ चरा बहतरे वांछा, करी विविध प्रकार । त नापे बेसी रह्या, मन अप्ठे मार ।। कपि० ।। ३५ ।। क 'अंगारक' ज खेचर. धर आशा अगाह । मवस्ये उन्मत्त हुओ. तात न करे विवाह ।। कपि० ।। ३६ ॥ ते पूछा निमित्त ज्ञानी. पुत्रीनो वर कृण ! | यसे ए माच भाखो हं अभल मुण ॥ कपि० ।। ३७ ।। रसे जो माहसगति ने, मोई भलो भरतार । प रूडो नहीं कडो, तुम्ह हुसे किग्तार ! कपि० ॥ ३८॥ म जाण्यो जाय प्रभुजी, तेहथीए काल । अभुतावालो (हनुमन्त) २ए फारशी भागनो शारे। नेनो अर्थ गो थाय ते उपरथो नग्माया लायक। भलो कपट रहिन। -AARMAnamAJAN (२३६) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । - दोहा (क्षेपक) नानासाकी नीति को. सुनकर म्हारी फाल । बजरंगी अंगीकुंवर, बोला गीघ्र सवाल ॥१॥ क्षेपक तर्ज राधेश्याम- मत करीये मगरूरी इतनी, धूल मांय मिल जायेगी। जब तीर हमारे चालेंगे, तब मनकी मनमें रह जायेगी। में छोटा हूँ या मोटा, यह भी मालूम पड जायेगी। अब जोग हमारा देख आपकी, होस हवा उडजायेगी । ढाल मूलगी- नृप महेन्द्र 'गुरेन्द्र' नी परे, चढ्यो पुत्र समेत । मांदा मांही युद्द मच्यो, बात में विण हेन || कपि० ॥ १७ ॥ अंजना गुत आगेरे, मुभट दीधा मोट। प्रचंट बाए उडी जाग, तृण तणीतो कोड ।। कपि० ।। १८ ॥ प्रदान कीनि आवी लटीयो, लडे चित न चाय । दो वीर विशा पलीया, आपममें न टलाय || कपि० ।। १९ ।। हनुमन्ते मुविचार कीघो, आज मुझे धिकार । मामीनानी काम विच में, nह लगानी बार || कपि० ॥ २० ॥ मारी लेउं में एक क्षगमें, मायकुल-क्षयथाय । वाम प्रारम्भ्यो कम्य, मोच उपज्यो आय || कपि० ॥ २ ॥ भांजी ग्य माग्दी भुजबर, बांधी लीया मोय । मरेन्द्र नन्द माहीयो, गाथी एम होय ।। कपि. ॥ २२ ॥ चम्मलागी बोट दीघा, आप प्रगटी नाम । माने दुरदीयो यी नुम्द, नंदना ए काम ।। कपि० ।। २३ ।। माई का मार्ग लंका तुम्ह, प्रभुने पाम । नो अपमा पायाधी. पाममो बह ग्राम II कपि० ।। २४ ।। मोकाट रसायनाने. दोहावी गिर चवी। यता मद. मजन ग्गा नंब ।। कपि० ॥ २५ ॥ कान्दी र मुन्ना मायो, प्रांग दीटी आज ।
M श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २३७ ) आपणो आप थकी शकी, आप पावे लाज । कपि० ॥ २६ ।। स्वामी काम प्रयाण कीजे. पन्थ में कल्याण । होईजो कही आप प्रभुने, चल्यो करी मण्डाण || कपि० ॥ २७ ॥ वाटमें पर सिद्ध 'दधिमुख', आईयो इक द्वीप । माधु दो काउसग्गे दीठा, ध्याने लीन अतिव ।। कपि० ॥ २८॥ पाखतीही तीन कन्या. राखी मन एकन्त । करे विद्या तणो साधन, दैवगति न लहन्त ॥ कपि० ॥ २९ ॥ लागीयो दवझाल पसरी. आवीयो प्रभु१ धाय । उदधीन जल आणी अधिकं. लीयो तेह बुझाय ।। कपि० ॥३०॥ साधुवन्दी कहै कुंवरी, स्वामी सांभलो वात । साधु उपद्रव टालीयोए, नहीं तो बलिजात ।। कपि० ॥ ६१ ।। तुम साह्यने लीये सिद्ध विद्या, एह हमारी जोय । विणही काले फले तरुवर. एह अतिशय कोय ॥ कपि० ॥३२॥ पूछही प्रभु आप कौन तुम ? ताम दीये जयाय । नगर 'दधिमुख' अछे नीको. अवर पुर में आव ॥कपि०॥ ३३॥ गयतो गन्धर्व रूडा, कुसुम माला नार । ए अमे छऊ तस कुंवरी, गतितणे अवतार ।। कपि० ॥ ३४ ॥ खेचरा बहुतरे वांछा, करी विविध प्रकार । तात नापे वेसी रह्या, मन अपूठे मार ॥ कपि० ॥ ३५ ॥ एक 'अंगारक' जखेचर, धर आशा अगाह । कामवम्ये उन्मत्त हुओ. नात न करे विवाह ।। कपि० ॥ ३६ ॥ नाते पूचं निमित्त ज्ञानी. पुत्रीनो वर कृण ! । थायसे ए माच भाखो. हूं अहं भल मूण ॥ कपि० ।। ३७ ॥ मारसे जो माहसगनि ने. मोई भलो भरतार । रूप रूडी नहीं डो. तुम्ह इसे किग्तार ।। कपि० ॥ ३८ ॥ केम जाण्यो जार प्रभुजी. नेहथीए कान । १ पनुतापालो (हनुमना) २ ए फारशी भाषानो । नेनो र्य पाणी पाच ते उपरथी पणापा र १३ भन्नो कण्ट रहिन । wmom श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। - दोहा (क्षेपक) नानामाकी नीति को. सुनकर म्हारी फाल । बजरंगी अंगोकुंवर, चोला गीघ्र सवाल ॥ १ ॥ क्षेपक तर्ज राधेश्याम- मत करीये मगरूरी इतनी, धूल मांय मिल जायेगी । जर तीर हमारे चालेंगे, तब मनकी मनमें रह जायेगी ।। में छोटा हूं या मोटा, यह भी मालूम पड जायेगी । अन जोग हमाग देख आपकी, होस हवा उडजायेगी । दाल मूलगी-- नृप महेन्द्र 'मुग्न्द्र' नी परे, चढ्यो पुत्र समेत । मांही मांही युद्ध मच्यो, बात में विण हेन ।। कपि० ॥ १७ ॥ अंजना गुत आकगेरे, सुभट दीधा मोड । प्रचंट बाए उडी जाए, तृण नणीतो कोड ।। कपि० ।। १८ ॥ प्रदन कानि आत्री लड़ीयो. लई चित्त न चाय । दो वीर विगो बलीया, आपममें न टलाय || कपि० ॥ १९ ॥ हनुमन्ने मुविचार कीयो, आज मुझे धिकार । मामीनातो काम विच में, एह लगायी बार || कपि० ॥ २० ॥ मार्गले में एक क्षणने, मायकुल-क्षयथाय । काम प्रारम्भ्यो कम्यं, शोच उपज्यो आय || कपि० ॥ २ ॥ भी ग्य माग्यी मुजरे, बांधी लीधा माय । महेन्द्र नन्द माहीया. गुम्बी एम हाय ।। कपि० ।। २२ ॥ काल मी नोट दीधा, आप प्रगटी नाम । ने दुःन दीयों थी तुम्ह, नंदना ए काम ।। कपि० ॥ २३ ॥ मालेका तुम्हें प्रभने पाम । - या पावाची. पाममो बह ग्राम ।। कपि० ।। २४ ।। कटगाव नने. दोहीवांटिगर गयो । माय मद मजन या न्दंब ।। ऋदि० ॥ २५ ॥ रहनुमा मृगीयो, आम्ब टीटी आज ।
, , श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। ( २३६ ) वेठो । तोड तमु उच्छाली तवही, नाम निज सुनाय दीयो जब ही ।। सत्य० ॥ ७४ ॥ दोहा मुलगा-- अभ्र थकी आदित्य ज्यू, नीकलीयो बडवीर । आलन आवे रंचही, साऐ रह्यो शरीर ॥ ५ ॥ तास कीयो प्राकारवर, नगरी लंका पास । कर्परनी परे तोडके, नांखी दीयो आकाश ॥ ६॥ रखवालो प्राकारनो३, वज्रमुखो नसुनाम । मारी लीधो झूझतो, शूर समारे काम ।। ७॥ ढाल गुनचालीशमी तर्ज-श्री महावीर स्वामी आया-(गजराकी) हनुमन्त चीर आयो, असगाय४ असुहायो. सयण जने मन भायो, आग्यो जेम बुलायो । टेर ॥ १ ॥ पवननो वंश कहायो, सुरतरु५ सुहायो । गय रायों कहायो, कुले कलश चढायो ।। हनु० ॥२॥ कदहीन थाये कायो, खले जाय न खायो । गुणी आले गीत गायो किणही, नचि छायो ।। हनु० ॥ ३ ॥ जगत में सुजश छायो, अंजनीनो रे जायो। थिर करी पावठायो, न चले रे चलायो॥ हनु० ॥ ४॥ रामने काम धायो, भलो चोल पायो । भूपने चित्त भायो. खरी खबर लेई आयो ।। हनु० ॥ ५ ॥ वज्रमुखनी ' कुंवारी, सा करे गेप भारी । हनुमन्त साथे आई. मांडेरे लड़ाई ।। हनु० ॥ ६ ॥ तेहना शस्त्र कापी, मूलगे रूप थापी । जोर न कोई होवे, तर मम्मुख जोवे ॥ हनु० ॥ ७ ॥ मन्मथ याणे चींधी, कहे वात सीधी । १ पादला । २ सूर्य । ३ कोट । ४ शनु । ५ फ्ल्पवृत ! ६ मत ( कपटी) भी ठगाय नहीं। Aslim (२३) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। कयों थी एटले पापी, मेलव्यो दव साज || कपि० ॥ ३९ ॥ तुम ममावीये शान्ती हुई, हुई विद्या सिद्धि । माम छटे सीजती, तुम दर्शन आज प्रसिद्धि ।। कपि० ।। ४० ॥ चरी' मधली कही भाखी, जाणीयो पति देव । कुंलरी हरगी ताम प्रभुजी, चालीयो तन खेव ।। कपि० ॥ ११ ॥ कुंवरील मुग एह मांभली, मोहतो भूपाल । लेई दल नल गमपासे, आवीया ततकाल ।। कपि० ॥ ४२ ॥ ढालए अडतीगीरे, करण काज वीगज । केशागत मुनिंद माग्वे, आवीयो अति गाज । कपि० ॥ ४३ ।। दोहा (गुड़ महार गगे) उतपतिन आत्रीयो, लंका ममीपे जाम । विद्याने आगालीका, दीठो 'हनुमन्त' ताम ।। १ ।। काली निगा होय जेहवी, तेहया तस आकार । घार महारं उगमणी, बोले 'हनुमन्त' लार |॥ २ ॥ मनि होण? कपी ? किहां चन्यो, करू आज आहार । थागही ए. ननु नण, नो तू जाणे मार ॥ ३ ॥ टाल क्षेपक तर्ज बडया-- हाथ गाली गहा वाय नन्दन नदा, चालीओ आवीयो दुग्ग पामे। ताम अनिश्याम डगवणी छे घणी, विद्या आगा लीका एम भाने ।' हाथ ।।। ।। रे मति हीण कपि तूं किहां चालीया, मीगमणी कर आन नेगे। तुही जिम मार जाण भली अटकली, जम इहां और नही आये फेरी ॥ हाय ।।२।। दोहा मृतगा- दाम गुर मार्गया. हनुमन्न पेठो मांय । मदद मार्ग गदा मृफलाणी मृग प्राय ॥४॥ टाल नेक मुलगी विवि माह पटी. भीम युद्ध कान मेंटो, गदाले मिडममा
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दिईटीटी. उगान युद्र रुग्न मंटो, गदा मिंहमां श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । कयों थी पटले पापी, मेलव्यो दव साज || कपि० ॥ ३९ ॥ तुम ममावीये शान्ती हुई, हुई विद्या सिद्धि । माग छटे सीजती, तुम दर्शन आज प्रसिद्धि ॥ कपि० ॥ ४० ॥ चगेट मधली कही भाखी, जाणीयो पति देव कुंबरी हरखी ताम प्रभुजी, चालीयो तन खेव ॥ कपि० ।। ४१ ॥ कुंबरी मृग एह मामली. मोहतो भूपाल । लेई दल बल गमपासे, आवीया ततकाल | कपि० ॥ ४२ ॥ ढालय अडतीगीरे, करण काज वीगज । केगगज मुनिंद भावे, आधीयो अति गाज || कपि० ॥ ४३ ।। दोहा (गुड़ महार गगे) उतपतिन आवीयो, लंका ममीपे जाम । विद्याने आगालीका, दीठो 'हनुमन्त' ताम ॥१॥ काली निशा होय जहवी, तेहवा तस आकार | पोर महा उगमणी, बोले 'हनुमन्त' लार ॥ २ ॥ मनि हीण ? कपो ? किहां चल्यो, करू आज आहार । थागही ए ननु नणं, तो तू जाणे मार ।। ३ ।। टाल क्षेपक तर्ज ग्यइका--- हाथ माली गदा वायु नन्दन तढा, चालीओ आवीयो दरग पामे। नाम अनिश्याम डरावी छ घणी, विद्या आगा लीका एम माम 'हाय ।। १ ।। रे मति हीण कपि तूं किहां चालीयो, मीगमणी का आज नेगे। तुहीं जिम मार जाणे भली अटकली, जम इहां भानही आ फेरी ॥ हाथ ॥ २ ॥ नग्न मुमुन यमार्गयो, हनुमन्त पेठो मांय । पीय दद मार्ग गढा मुकलागी मुम्ब प्राय ॥ ४ ॥ टान नाक मृन्दगी दोहा मूलगा- SAAurwwre श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२३६ ) वेठो । तोड तसु उच्छाली तवही, नाम निज सुनाय दीयो जब ही। सत्यः॥ ७४ ।। दोहा मुलगा- अभ्र थकी आदित्य२ ज्यू, नीकलीयो वडवीर । आलन आवे रंचही, साऐ रह्यो शरीर ॥५॥ तास फीयो प्राकारवर, नगरी लंका पास । कर्परनी परे तोडके, नांखी दीयो आकाश ॥ ६ ॥ रखवालो प्राकारनो३, वज्रमुखो तसुनाम । मारी लीधो झुझतो, शूर समारे काम ।। ७ ।। ढाल गुनचालीशमी तर्ज-श्री महावीर स्वामी प्राया-(गजराकी) हनुमन्त वीर आयो. असगाय४ असुहायो. सयण जने मन भायो, आग्यो जेम बुलायो ।। टेर ॥१॥ पवननो वंश कहायो, सुरतरु५ सुहायो । गय रायों कहायो, कुले कलश चढायो॥ हनु० ॥२॥ कदहीन थाये कायो, सले जाय न खायो। गुणी आले गीत गायो किणही नवि छायो । हनु० ॥ ३॥ जगत में सुजश छायो. अंजनीनो रे जायो। थिर करी पावठायो. न चले रे चलायो ।। हनु० ॥ ४॥ रामने काम धायो, भलो गोल पायो। भूपने चित्त भायो. खरी खबर लेई आयो ।। हनु० ॥ ५॥ पजमुखनी' कुंवारी, सा करे गेप भारी । हनुमन्त साथै आई. मांडेरे लड़ाई ॥ हनु० ॥६॥ तेहना शस्त्र कापी, मूलगे रूप धापी । जोर न कोई होवे, तर मम्मुख जोवे ।। हनु० ॥ ७॥ मन्मथ चाणे पींधी, कहे वात सीधी। १ यादला । मूर्ग ! ३ कोट । ४ रातु । ५ कप गल (ग्दी) भी ठगाय नही।
४.) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। तुम रूपे गनी. कर सेव माची ।। हनु० ॥ ८॥ पारनो ने लेवा. कीया एह केवा । अब तुम पाय लागो, सुदगा मुझ जागी । हनु० ॥९॥ हनुमन्तं ताम परणी, करी आप घरणी। गती रही जाग आग, प्रभुने काम लागे ॥ हनु० ॥ १० ॥ लहुनगे? गे? आये, यह मन्मान पावे । पाय प्रणमन्न पूगे, महु वात में शूरो ।। हनु० ॥ ११ ॥ आगों को कामी, कहतो अभिगमो। गयनी गणी आणी, करी मर्व दिशाकाणी ॥ हनु० ।। १२ ।। आपीये मोरे पालो. थाए मर दिया आछी। कीजीये गयगजी, नहीं विणममे काजी ।। हनु० ॥ १३ ॥ रह, कही जमाई !, ममनाव्यो रे माई । पाकी नाग दाजे नहीं जीव रगोजे ।। हनु० ॥ १४ ॥ चार मुगा गम लागी. झगड येऊं मर जागी। मटा कवण चलगे. मंगों में धीय टलगे ।। हनु० ॥ १५ ॥ नपक न मुलगी पारसी कहां है फरमाया, वर्गाचे देवग्मण जावी, कोई मत युद्ध म्यादी । लहका वचन मान लोधा, कपि का कारन मब मीधा टान मुलगी ? आदेगा पामी, रेवनमा घामी । अग मी माता. बममा मांही विदिना ॥ हनु० ॥ १६ ॥ पानी या गं. न्याय नींद में न मावे । ग.वि लोके वाणी ।। हनु०॥ १७ ।। गोयनको जग विनोंक। टी. दनुमन्ने पदाटी ।। हनु. १८ ॥ नही उमः । माग का प्रमाग गया बालपदी यंदर । Aman , + । दीपाव श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२४१ ) अलकर तो गाल फरसे, नयणे तो नीर बरसे। आगले कीच मातो, जाय अधिक ही थातो ॥ हनु० ॥ १९ ।। बदन चिलखो देखाय, हीमे जेम कमलनी थाय । अतिपदार चंद्र जेहबो, तनु देखीजे एहवो ।। हनु० ॥ २० ॥ उष्णता श्वास बाले, अधरनी४ शोहटाले। ध्यायती राम नाम, नहीं अवरों सूं काम || हनु० ॥ २१ ।। मलिनछे वस्त्र वेपे, मलिन काया विशेषे । देवी विदेही माता, देखतां लहीये साता ॥ हनु० ॥ २२ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज-गवरल ईसरजी वातां सुनके पतो लगायो. हनुमन्त नवल वागमें आयो, सीता माता की शुद्ध पायो । सीता झुले विबाके माही कपि छिटकावे मूंदड़ी ।। सीता माता का खोला में हनुमत डारी मुंदड़ी|टेर।।१।। ढाल मूलगी विद्याए गुप्त होई, मूंदडी आणे सोई । मायनी गोद मूके, प्रभुनी शीख न चूके। हनुः ॥ २३ ॥ डाल क्षेपक तर्ज-गवरल ईशरजी सीता देखत ही पहीचानी, याहै रघुवर की सहीलाणी । यहां पर कौन जिनावर आणी । मनमें करी कल्पना लेकर कण्ठ लगाई मंदडी ॥ सीता माता की ॥ २ ॥ पू० रेख-श्री नवमलजी म० कृत क्षेपक तर्ज-पैया पाहें मचायत शोर । मुंदरीया कैसे आवे इण ठाय ॥ टेर ॥ . मुन्दरिया या प्रभुजी के करंकी, खिण भर अलगीन धायामु. ११॥ देख मुन्दरी प्रति सिप इनपर, चोलत मुख से पाय 1 मु० ॥२॥ अरि मुन्दरी तूंभी चिलुरी, प्रभु की नगी हुई नाय ।। म ॥३॥ आज थकि । निय जानकी. महु पातीत न माय ॥१०॥४॥ एह मुन्दरी अलग हुई मो. प्रभु रिपत के माय ॥ मु० ॥ ५ ॥ एम कान चित्त अनि अकुलानी, नयनों में नीर चला 111 चोटलो। २ समारो पदमा । ३ ऊना ४ोटनो शोभा। +44 Prev भी जेन पर रामायण तृतीय खण्ड। *+vwwww ढाल क्षेपक मूलगी योगे प्रभुजी तो मरीया, हाय यह काम क्या करीया. वचन मदीन ऊचरीया । लायो कुण नर सुर या पंखी, जानकी दिल मां गंसी ॥ मत्प० ।। ७६ ॥ जानकी मनमें विलयानी, आपद ए आई अनजानी, करे दुःख पर की गनी । पामाङ्ग फुरक्यो तिनवारी, शकुन तब थापे गुणकारी ।। मन्य० ।। ७७ ॥ दाल क्षेपक तर्ज मल्ली जिन बाल ब्रह्मचारी ।। काग तम यहांमे उपनाना । गम यो बननाम जिन्हीकी समर तुरत लाना ॥ टेर । आगम निगम की बात जगतमें, तुमसे नहीं छांना । फार दुकालर जोग विजोगन, वग्ने जे वांना ॥ काय० ॥१॥ कागोबर गिरमत मांटी, गाये पूगणा। गि भारपरीने ध्याउ, बंछित फल पाना || काग० ॥ २ ॥ आमोज माममें आदर देवे, अधिका मन्माना । नमी भाव नुम गन्तोग, पीछे माय माना || काग० ॥३॥ गनर रिलमन कुगल इवेनो, ननदो टीकाण । रती जायगा जाय वीगजो, तुम्ह मम कुण इयाणा ।। काग ॥ ४ ॥ यी वातकदी मीनाजी. हियमे हपाना । पर काम उमानमान्य, मोता मान मांना ।। काग ।। ५॥ दाल मुलगी- नवनिमी, मीतामनमा हम्पी। नमः मिल्या नाथजी आर्ट ।। हनु ।। २४ ॥ आई मृगादे. लंकपति दम्पदि । रानी रंगनांडे ग्माली ।। हनु ।। २५ ।। मीनारतुझा जगई। • नन्गमधीमता के पासपी थी। एम है,लेबिटा के ममः।
-- A श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२४३) मोकली फेरनारी, मानसे वात थारी ॥ हनु ॥ २६ ॥ स्वामी नूं काम करवा, पापसं पिण्ड भरवा । वनविणे पांवधारे, सुख किस्यु इन्कारे ॥ हनु ॥ २७॥ राजियां राय राजे, रावण राय विराजे । राणियां तूं ही रूडी मेलवे वात कूड़ी ॥ हनुमा ॥२८॥ नग जड्या हेमनीका पीतले थाय फीका । । असरखे पुरुप तीका, न लहै शोभजीका हनु ।। २९ ।। देव गयो थो वर्गमी जाम जोवे विमासी । आणी लंकेश मेली, थाय अब क्यूं न भेली ॥ हनु ।। ३०॥ हूं अने अवर रमणी, अछां हंसगमणी । ताहरी दासी थासां, ताहरू दीवू सासां ।। हनु ॥ ३१ ॥ काने साही रे छाली, तेहवी एहवी वाली । पुरुष थी न हीय अलगी, विपय आग जब सलगी॥ हनु ॥३२॥ , स्वामीजी नियम लीधा, साधुजी ए रे दीधा | अण इच्छन्ती दारा कीया तस परिहारा ।। हनु ।। ३३ ॥ तेहथी वार वारे, आ हं पास थारे । स्वामी ने स्वामी जाणे. आवे वात सह ठाणे ॥ हनु ॥ ३४ ॥ ढाल क्षेपक मूलगी- 'रावण' ने पति पणे कीजे, काज ज्यूं वंछित ही सीजे, नर मव को लाहो ही लोजे । सती कहै चोले किण दावे, निलज तुझ लाज नहीं आवे ।। सत्य ।। ७८ ॥ ढाल मूलगी- आडीयो भाली देमं, एहना प्राण ले । एल्वी बात कही वे, जाणमे गीस लहे वे ।। हनु ।। ३५ ।। आवीयो राम स्वामी, अन्तरनोरे जामी। लक्ष्मण वीर भणीयो, नणद पति जेणे हणीयो ।। हनु ।। ३६ ।। मारीयो कन्त देखे, प्रत्यक्ष एह पेसे। माहरो पोल ए माचो, जाणोजे जग में जानो ॥ हनु ॥ ३७ ।। -
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श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड
लचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज अलगी रहनी-
होय निनंक मोता इम बोले, सुन मन्दोदरी वाणी ।
सहाग चटकां करवाऊं, तो जाणे रघुवर राणी ॥
अलगी रहनी. तुम दुनी ने कुण छेडे ।
तुं कम पड़ी मुझ केंडे ।। अलगी रहनी ॥ १॥
पापण कुलहीणी कड़ी, रुड़ो बात न मजे ।
दुरे रह तं वयं मन्नावे, मीता इण पर गूंजे ।। अलगी ॥ २ ॥
रीमाणी गणी अफुलाणी, किम जाणी थे पोले ।
मुष्टी ऊपाटी मीता ऊपर, हनुमन्तजी नव बोले ॥ अलगी ॥३॥
यामी श्री नथमलनी कृत दाल पक नर्ज मवि पनीया भरन कैसेजाना।
इम बोटे हनुमन्त यानी. तं मुनरे मन्दोदरी गनी ॥ टेर ।।
'गरन' यह अकाज कीनो. विप घोल हलाहल पीनोजी ।
आमिर में होमी हानी ।। हम यो रे ।। १ ।।
मनी मीनान हर लायो, यह कृजम मुला में छायोनी।
संघट में वस्तु धीगनी 11 हम || २ ।।
तुम घर में यह नहीं रहमी. फिट फिट मघलामोजी ।
प्रान हानकी नीमानी. इम ।। ३ ।।
गम प्रपल चलबागे, लक्ष्मन की छवि है न्यागजी।
नहीं गान घर अगवानी ।। दम ।।१।।
(दोहा नेपक)
gramin निज कप, दीठो हनुमन्त नेण ।
शी कितक है, कया आमा वण || ||
पानमनदन टालनपद-मनवा मममी कीर-
admit कर मगाजमार, आमां मंडी कीवी ।
वाटे. मी गला में लीधी । म्हाने मंडोलागनी
का सानां. भूषन मागनी || टं ॥ १ ॥
":"'मनोविज्ञानी नती।
छोटी सी तो डाने ॥ २ ॥
भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ।
(२४५)
नीच कामतो दुत पणा को, करतां लाज न आवे ।
सात पीडीमें कलंक लगायो, थो समपूत जय थावे ॥ म्हाने० ॥३॥
हनुमन्त भाखे सुणो सासुजी, मेतो आछो कीधो ।।
छोड़ अन्यायी न्यायी झेल्यो, 'राघव' शरणो लीधो ।
मेंतो साचू चोलूंजी, झूठ तणो पखपात तीने रामने झेलूजी ।।टेरा॥४॥
दूत पणा करता रयं मेंणी, भडवा पणेछे म्हेणी ।।
तुझे भडवी कहके दृती, देखलीची तुझ रेणी ।। नो० ॥ ५ ॥
स्वा० नेमीचदजी म. कृत क्षेपक-ढाल तर्ज-लावणी
पाछी जावण लागी बोल सुण अबको, उभी रहे मन्दोदर नार लेनी
जालनको । टेर । अपर सुणो मेरी बात गम जोरूठो, थन लांबी
पहिरामी हाथ हियो क्यों फूटो। थारो अल्प दिनोको सुम्ब जाणजे
म्यूटो २ ओ सतियों केगे मुख वचन नहीं हुवे अठो।। जोवचन
अठो होय जगत होय डबको ।। उभी० ॥ ॥ तूं इणपे आई चलाय
वचन इम बोली २ कुलनी आच गमाय लाजने खोली, तुझमें नहीं
गुणसार फली ज्यो फोली ।। सज आई सिणगार जगत की गोली
जो होय सती का लक वचन कहे यको ॥ उभी० ॥ ॥ भोग
दलाली काज वनी तूं दृती, लम्पट का सुन बोल चढी किम भूति
लागी इणके केड हड़कणी कुती, इण लग्वणो के न्याय पडे शिर
झूती, कुलखणी गडाल उट्यो क्यों भभको ॥ उभी० ॥ ३|| अब
आवे के रघुनाथ गवणना जमजे. पहरी लम्बी नणदल हाथ अरे
नहीं समझे। मैं करडा कया चोल दोपतूं समजे, सेठा गखो नेम
पियु नेदमजे, सुर्योदय की आश पड़े जद सको। उभी० ॥४॥
हाल मुलगी-
लाजनां चीज सोई, धोठी में धोठी होई।
कां मुझने सीजावे, नाम पर ही पुलाचे ॥ १० ॥ ३८ ॥
भूपने आयी भाग्य, पेली पाणी न्हाव ।
योलत कार्डन राखे, ए फल तूंन पाखे ॥ १८ ॥ ३१ ॥
~~~" (12) श्री जैन पद रामायण तृतीय सण्ड । (दोहा क्षेपक) गनी कई गवन भणी, हा हा थयो अकाज | हनुमन्न मुम फिट फिट करी; बहु लाजी में आज ॥ १॥ मृगचरतीत दान क्षेपक- कन्दोरे ऊंची लटके मखी तागचलके. की मन्दोदरी मामलोग मनकीजो, प कारजमहा दुःखदाय आप मानीलीजी पग्नाग को मंगनमतकीजो, या सतियों मायगिरोमणी २ मतमोजो ॥ में देगी- नाय तपाय मानमेरी लीजो पग्नारी की गंगनिमनकीजी ॥ ? || वाणी चंद याआकसीरे मतकीजो, उण परमाद नहीं निलमात नाथमानीलीजो परनारी, कोड ऊपाय कियां मोरे मनकीजी, या हरगिज नावहाय वातमानी || पर ॥ २ ॥ गद जिमहटकरजी मनि मानीलीजो, ग्यो जगमे अपयश छाय मान मेगेलोजी ।। पर || राममणी गवन कहे रे मन कीजो । तूं मरिन में जाय | मानमेरी पर ॥ ३॥ टाल मूलगी- दो दो दिश नाणी, दोई में कौन गाणी । पनी नारे मनेह, गोला ऊपरे प्रेण ॥ हनु || ४० ।। पर नापने बटो, वोट मां है रे पेड़ो। जीतने अनि माती, मा कद, मोर्ड आयो ।। हनु ॥ ४? 1) दाल नी एकदावी, बीम नवमी मुहावी । देवी रही गोल दावे, कागजनी गावे ।। हनु ।। ४२ ॥ ( दोदा यामावर्ग गर्ग) मनन्त नव प्रगट मयो, प्रण में मीना पाय । गान गुलामा कुगल छे. मुम्ब मानो तुम माय ॥ १ ॥ बार तद कोई कहा, उदधि नयाँ क्यं पह ? गजले के थान के किप्यं करेन्द्र नेह ॥ २ ॥ टाल दायरन्त देगाजी महतो- र हनुमन्न वाणी, माता न स्यां चिला आणी, रघुवर मई में न को मेहा श्री रघुवर जाय तुम देदो मंदो ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। (२४६) mins वीर विराध वीराजीयो, सुभट पणे सुविशेष । महेन्द्रादिक मोटका, खेचर अवर अशेष ॥ १०॥ एक एक थी आगला, सुभट महा झझार । शूर वीरने साहसी. अम्बर थम्भन हार ॥ ११ ॥ पंचमिली मिमलितकरी, पहेलो मोकलो दुत । खघर करे सीतातणी, तिहां किम्यू के सूत ।। १२ । वानर सहु अवलोकीया, वानर पतिने टाय । कोईन आव्यो तामहं लीयो बुलाई माय ॥ १३ ॥ ढाल चालीशमी-तर्ज राजचियोंने राज पीयारो- राजा राघव रायों राय कहायो, दल बल सबल मिलायो। खबर करेवा हूं मोकलीयो, आयो के प्रभु आयो ।। राजा ॥१॥ मुद्रिका प्रभु करनी आणी, तेहथी जाण्यो साचो । अहिनाणी विण कौन पतिजे, एरे वडांकी वाचो ।। राजा ।। २ ॥ देवो चूडोमणो १ मुझने वेगी, वेगे अपूछो जाऊ । अवसर साध्यां आदर पा नहींतर भौर २ कहाऊ ।। गजा ३ ॥ डाल क्षेपक तर्ज ख्याले की, मुनि श्री किशनलालजी कृत. वात पूर्वली सुनी जानकी, हर्प हिये न समाय । हनुमन्त भाखे को पारणो, वनफल लाऊं जायनी ॥ इकवीश दिनोंसं, सीता सतवन्ती कीनो पारणो॥ टेर ॥ १ ॥ देव रमन उगान में सकोई, अमृत फल सुखदार । सीता भाखेतोड मतलाजे, लाजे पच्या ऊठायजी ॥ इक ॥२॥ लेवनगयो रसाल वाग में, वुद्ध करी पल पर । वृक्ष ऊपाडी किया अधोमुख, पकड़ उच्छाले दरजी । इक ।। ३ ॥ मीता भाखे सुनरे बन्धव. करे किम्यू ए काम । भूमी पड्या लाजेतुम भारुपो. राक्षसनो भय पाम ॥ इक ॥ ४॥ क्रीम रंगकरी फल लायो, पुंज कीयो निण ठाम ! कहै सीता इतना कुण सामी. कीनो पाप निझामजी || १ माप रो पोर - गर्म
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(१८) श्री जैन पद रामायण तृतीय स्वएड।
साहम गति नृप मारीयो, वा नर पति ने काज ।
कीयो किकिंधा पुरी, उम्बामी विराजे आज ॥ ४ ॥
क्षेपक.-गधे श्याम रामायण मे से
हनुमान के वचन सुन. मिटा सभी सन्देह ।
दून जान रघुगज का, हुआ हृदय से नेह ।।
बोली-हनुमान ! कुगल मय है, प्राणों के नाथ अच्छेतो हैं ।
लक्ष्मण जी की क्या हालत, ? भाई के माथ नीकेतो हैं ।।
शिम तरह अंगूठी आई यहां, यह बात मुझे समजा ओतो ।
किम नगद तुम्हाग माथ हुआ, यह बात मुझे पतला ओतो ।।
फिर यह बतलाओ, महागज रहते हैं गाद भी कभी कभी ।
मुन दाखिया को ये दाम-भंजन, करते हैं याद भी कभी कभी ।
प्यारे को प्यारी मुन्दरी यह. लायाहं पनीर निशानी के ।
हां. मांद हैदोनों भाई, ज्यों धान रहे वे पानी के ।।
लंका पाउदा बाजेगा अब ममय वह आने वाला
शिक्षाम ग्रंम दिल में धग्येि. किर गम पचाने वाला है ।।
गरज के होते नाव है क्या, जो जरा अंधारी रह जाये।
जर अदला आये गंगा में नय मला युग सव यह जावे ।।
दोहा मुलगा
देश दियोग तुम्हारदे, गम नपं दिनगत ।
१. पापत नपे. तर मतम जात ॥५॥
पिको ही बादी, हिमंतोही फिरन्त ।
मानषिको हीयो, पागनि अधिक करन्त ॥ ६ ॥
वटी को धनयमे, कटी ही गोंगे मोघ ।
कादा बात सामीनी, 'आपनी प्रति आलोच ।। ७ ।।
दाता पनि मन्त्रावी. को घणी निगदीय ।
दिनलीवनदायी, पण भारतीय ॥८॥
कटक गियी टी. प्रादि नृप मुग्रीव ।
नादल मला. अगति बन्न अव ॥२॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२४६ ) वीर विराध वीराजीयो, सुभट पणे मुविशेष । महेन्द्रादिक मोटका, खेचर अवर अशेप ।। १० ।। एक एक थी आगला, सुभट महा झझार । शूर वीरने माहसी, अम्बर थम्भन हार ॥ ११॥ पंचमिली मिमलितकरी, पहेलो मोकलो दूत । खबर करे सीनानणी, तिहां किम्यूं छे सूत ।। १२ ।। वानर सहु अवलोकीया, वानर पतिने दाय । कोईन आव्यो तामहूं लीयो बुलाई माय ॥ १३॥ ढाल चालीशमी- तर्ज गजवियोंने राज पीयारो- राजा राघव रायों राय कहायो, दल पल सरल मिलायो। खवर करेवा हूं मोकलीयो, आयो के प्रभु आयो ।। राजा ॥१॥ मुद्रिका प्रभु, करनी आणी, तेहथी जाण्यो साचो । अहिनाणी विण कौन पतिजे, एरे वडांकी वाचो ।। राजा ॥२॥ देवो चूडोमणो १ मुझने वेगी, वेगे अपूठो जाऊ । अवसर साध्यां आदर पा. नहींतर भौर २ कहाऊं ।। राजा ३॥ ढाल क्षेपक तर्ज ख्याल की, मुनि श्री फिशनलालजी कृत. चात पूर्वली सुनी जानकी, हर्प हिये न समाय । हनुमन्त भाख करो पारणो, वनफर लाऊं जायजी ।। इकवीश दिनोंस, सीता मतवन्ती कीनो पारणो । टेर ॥ १ ॥ देव रमन उगान में सकोई, अमृत फल सुखदाय । सीता भाखेतोड़ मतलाजे, लाजे पट्या ऊठायजी ॥ इक ।। २॥ लेवनगयो रसाल वाग में, बुद्ध करी बल पर । वृक्ष ऊपाड़ी किया अधोमुख. पकड़ उछाले दरजी ॥ इक ॥३॥ सीता भाखे सुनरे बन्धव, करे किस् ए काम । भूमी पट्या लाजेतुम भाइयो. राक्षसनो भय पाम ॥ ३० ॥ ४ ॥ जोन रंगकरी फल लायो, पुंज कीयो निण ठाम | कई मीता इतना कृण यामी. कीनो पाप निकामजी || १ माथ गे दोर - सूर्य ----- --- ~~~~~ ? श्री जैन पद रामायण तृतीय स्खएड । माहस गति नृप मारीयो, वा नर पतिने काज । फीधो किकिंधा पुरी, उस्वामी विराजे आज ॥ ४ ॥ क्षेपका-राधे श्याम रामायण में से हनुमान के वचन सुन. मिटा सभी सन्देह । दन जान रघुगज का, हुआ हृदय से नेह ।। चोली-हनुमान ! कुशल मत्र है, प्राणों के नाथ अच्छेतो हैं । लक्ष्मण जी की क्या हालत, ? भाई के साथ नीकेतो हैं । किम तरह अंगूठी आई यहां, यह बात मुझे समजा ओतो । किम नम्ह तुम्हाग माथ हुआ, यह बात मुझे बनला ओतो ।। फिर यह बतलाओ, महागन रहते हैं गाद भी कमी कभी । मुज दुनिया को वे दृग्य-भंजन, करते हैं याद भी कभी कभी प्यारे को प्यारी मुन्दरी यह, लायाहूं बतौर निशानी के । हो, अद्र है. दोनों भाई, ज्यों धान रहे वे पानी के ।। लंका पर डा बाजेगा अब ममय बद्द आने वाला है। दिशाम प्रेम दिल में धग्येि. फिर राम पचाने वाला है ।। साल के होने तार क्या, जो जग अंधारी रह जाये। १३ अहला आये गंगा में नव भला बुग मय वह जावे ।। दोहा मूलगा- देशी वियोग तुम्हारड़े. गम तपे दिनगत । दामनन, पम्पत नसे. तपम तक जात ॥५॥ पा विठो हो वाइटो. हिमंतोही फिग्न्त । लामा तुमविली हीयो. आरति अधिक करन्त ॥६॥ कदीदी को धमयमे, की ही गोगे माघ । काटा वान वामीजी, आग्नी अनि आलोच ॥ ७ ॥ साना पद ममसारणी, को घणी निरा दी । अरदिन लांब दी. पारतीय ॥८॥ कटर मियो एकटी. आदि नृप मुग्रीव । -- -~- श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२४६ ) वीर विगध वीगजीयो, सुभट पणे मुचिशेप । महेन्द्रादिक मोटका, खेचर अवर अशेष ॥ १० ॥ एक एक थी आगला. सुभट महा झुझार । शूर चीरने माहसी, अम्बर थम्भन हार ॥ ११ ॥ पचमिली मिमलितकरी, पहेलो मोकलो दूत । खपर करे सीतानणी, तिहां किस्युं छे मन ।। १२ ।। वानर महु अवलोकीया, वानर पतिने दाय । कोईन आव्यो तामह लीयो बुलाई माय ॥ १३ ॥ ढाल चालीशमी- तर्ज राजवियोंने राज पीयारो- राजा राघव रायों गय कहायो, दल बल सबल मिलायो। खवर करेवा हूं मोकलीयो, आयो के प्रभु आयो ।। राजा ॥१॥ मुद्रिका प्रभु करनी आणी, तेहथी जाण्यो साचो । अहिनाणी विण कौन पतिजे, एरे बडांकी वाचो ।। राजा ॥ २ ॥ देचो चूडोमणो १ मुझने वेगी, वेगे अपूछो जाऊ । अवसर साध्या आदर पा. नहींतर भौर २ कहाऊ ।। गजा ३ ।। ढाल क्षेपक तर्ज ख्याल की, मुनि श्री किशनलालजी कृत. चात पूर्वली सुनी जानकी, हर्प हिये न समाय । हनुमन्त भाखे को पारणो, वनफल लाऊं जायजी ।। इकवीश दिनांसं. सीता सतवन्ती क्रीनो पारणो । टेर ।। १॥ देव रमन उधान में सकोई, अमृत फल मुखदाय । मीता भाखेतोड़ मतलाजे, लाजे पट्या ऊठायजी ॥ इक ॥ २ ॥ लेवनगयो रसाल वाग में, बुद्ध करी पल पर । वृक्ष ऊपाही किया अधोमुस, पकड उच्छाले दरजी ।इफ ॥३॥ मीता भाखे सुनरे बधव, करे किए काम । भूमी पन्या लाजेतुम भाग्यो, राक्षसनो भय पाम ॥ इक ।। ४ ।। मीन रंगकरी फल लायो. पंज कीयो तिण ठाम ! कई सीता इतना कुण यामी. कीनो पार निकामजी II || १ माथ गे बोर - मूरी t
(४८)
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड।
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साहम गति नृप मारीयो, वा नर पतिने काज ।
फीधो किकिंधा पुरी, उस्वामी विराजे आज ॥ ४ ॥
क्षेपः-गधे श्याम रामायण मे से
हनुमान के वचन सुन. मिटा सभी सन्देह ।
दूत जान रघुगज का, हुआ हृदय से नेह ।।
पोली-हनुमान ! कुशल सब है, प्राणों के नाथ अच्छेतो हैं ।
लक्ष्मण जी की क्या हालत, ? भाई के माथ नीकेतो हैं ।।
किस तरह अंगूठी आई यहां, यह बात मुझे ममजा ओतो ।
किम नम्ह तुम्हाग माथ हुआ, यह बात मुझे बतला ओतो ॥
फिर यह बतलाओ, महागन रहते हैं गाद भी कभी कभी ।
मुज दुःखिया को ये दुःप-भंजन, करते हैं याद भी कभी कभी ॥
प्यारे को प्यारी मुन्दरी यह, लाया पनीर निशानी के ।
हां, अच्छे हैं. दोनों भाई, ज्यों धान रहे वे पानी के ।।
लंका पा इट्टा बाजेगा अब ममय वह आने वाला है।
विशाग प्रेम दिल में धरिये. फिर राम पचाने वाला है ।।
गाज के होते नार है क्या, जो जग अंधारी रह जाये।
जर अदला आवे गंगा में नर भला युग मव बह जाये ।।
दोहा मुलगा-
देवी पियोग तुम्हाण्डे, गम नपं दिनगन ।
दागनल पायत नपं. तपम तक जात ॥५॥
पार क्लिो हो बाछड़ी. हिमंतोही फिरन्त ।
नामा नुनविला हीयो. आनि अधिक कान्त ॥ ६॥
कदीदी को घमघमे, कटी ही गोगे मोघ ।
काना बाने म्वामीनी, पानी अनि आलोच ॥ ७ ॥
बाना पनि मनसावी. कोणी निरा दीग ।
जय दिन लीये नेदी, पण आरतीय ईसा ॥८॥
नियः ई. एकटी. आदि नृप मुग्रीव ।
मई मनदल मत्रो, भागते यन्न अतीव ॥९॥
(२४६ ) mvb Annar . श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । वीर विराध वीराजीयो, सुभट पणे सुविशेष । महेन्द्रादिक मोटका, खेचर अवर अशेष ।। १० ।। एक एक थी आगला, सुभट महा झुझार । शूर वीग्ने साहसी, अम्बर थम्भन हार ॥ ११ ॥ पंचमिली मिमलितकरी, पहेलो मोकलो दूत । खबर करे सीनानणी, तिहां किस्युं छे मूत ॥ १२ ॥ वानर सहु अवलोकीया, वानर पनिने दाय । कोईन आव्यो तामहं लीयो बुलाई माय ॥ १३ ॥ ढाल चालीशमी तर्ज राजवियोंने राज पीयारो- राजा राघव रायों राय कहायो, दल चल सबल मिलायो। खबर करेवा हूँ मोकलीयो, आयो के प्रभु आयो ।। राजा ॥१॥ मुद्रिका प्रभु करनी आणी, तेहथी जाण्यो साचो अहिनाणी विण कौन पतिजे, एरे वडांकी चाचो ।। राजा ॥२॥ देवो चूडोमणो मुझने वेगी, वेगे अपूछो जाऊ । अवसर साध्यां आदर पा. नहींतर भौर २ कहाऊं ।। गजा ३ ॥ दाल क्षेपक तर्ज ख्याल की, मुनि श्री किशनलालजी कन. वात पूर्वली सुनी जानकी, हर्प हिये न समाय । हनुमन्त भाखे को पारणो, वनफल लाऊं जायजी ।। इकवीश दिनों, सीता सतवन्ती कीनो पारणो ।। टेर ॥ १॥ देव रमन उद्यान में सकोई, अमृत फल सुखदाय । मीना भाखेतोड मतलाजे, लाजे पटया ऊठायनी ॥ इक ।। २ ।। लेवनगयो रसाल वाग में, बुद्ध करी पल पर । वृक्ष ऊपाही किया अधोमुख. पकर उच्छाले दरजी ।। इक ॥३॥ मीता भाखे सुनर बन्धव, करे किम्पंप काम ! भूमी पट्या लाजेतुम भाख्यो, राक्षसनो भय पाम । इक ॥ ४ ॥ क्रीग रंगकरी फल लायो. पुंज कीयो निम ठाम । कई सीता इतना कुण गामी. कीनो पाप निकामजी ||५|| १ मापसे गरेर - ४४- V -~~ ~~~- . (२९८) श्री जन पद रामायण तृतीय स्वएड। साहम गति नृप मारीयो, वा नर पति ने काज । कीयो किकिंधा पुरी, उस्वामी विराजे आज ॥ ४॥ तेपकः-गधे श्याम रामायण मे से हनुमान के वचन सुन. मिटा सभी सन्देह । दूत जान रघुगज का, हुआ हृदय से नेह ।। चोली-दनुमान ! कुगल सब है, प्राणों के नाथ अच्छेतो हैं । लक्ष्मण जी की क्या हालत, ? भाई के माथ नीकेनी है ।। किस तरह अंगूठी आई यहां, यह बात मुझे समजा ओतो । फिम नाह तुम्हाग माथ हुआ, यह बात मुझे बतला ओतो ।। फिर यह बतलाओ, महागज रहते हैं गाद भी कभी कभी । मुन दुखिया को ये दाग-भंजन, करते हैं याद भी कभी कभी । प्यार को प्यारी मुन्दरी यह, लायाह बतौर निशानी के । हां, अछ हैं. दोनों भाई, ज्यों भान रहे वे पानी के ।। लंका पर उवा बाजेगा अब ममय वह आने वाला है। पिदमाम प्रेम दिल में धग्येि. फिर राम पचाने वाला है। गर के होते नार है क्या, जो जग अंधारी रह जाये। च अदला आये गंगा में नव भला युग मय बह जावे ।। दोहा मूलगा- देवी वियोग तुम्हाण्डे, गम तपे दिनगत । दामन पावन तणे. नपं जेम तमजात ।। ५ ।। पास विलो हो बाटो, हिमंतोही फिन्त । मा दुविठी हायो, आरति अधिक करन्न ॥ ६॥ कटीडी को धनयम, कटी ही गोंगे मोघ । कानावाने पानीनी, पानी अनि आलोच ॥ ७ ॥ माना पनि मनानी, कवणी निगदीग । अरदिन नत्र देदी, पारतीय ईग ।।८।। कर मियो के एकटी, आदि नृप मुग्रीव । ममनटलमटो, अति बन्न अनीय ॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । we harm - वीर विराध वीराजीयो, सुभट पणे मुविशेष । महेन्द्रादिक मोटका, खेचर अवर अशेष ॥ १० ॥ एक एक थी आगला, सुभट महा झझार । शूर वीग्ने माहसी, अम्बर थम्भन हार ॥११॥ पंचमिली मिसलितकरी, पहेलो मोकलो दत । खघर करे सीतानणी, तिहां किस्यूं छे सूत ।। १२ ।। वानर सहु अवलोकीया, वानर पतिने दाय । कोईन आव्यो नामहूं लीयो बुलाई माय ।। १३ ।। ढाल चालीशमी-तर्ज गजवियोंने राज पीयारो- गजा राघव रायों राय कहायो, दल बल समल मिलायो। खबर करेवा हूं मोकलीयो, आयो के प्रभु आयो ।। राजा ॥१॥ मुद्रिका प्रभु करनी आणी, तेहथी जाण्यो साचो । अहिनाणी विण कौन पतिजे. एरे चडांकी वाचो ।। राजा ॥ २ ॥ देवो चूडोमणो १ मुझने वेगी, वेगे अपूछो जाऊ । अवसर साध्या आदर पा. नहींतर भौर २ कहाऊ ।। गजा ३ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज ख्याल की, मुनि श्री किशनलालजी कृत. वात पूर्वली सुनी जानकी, हर्प हिये न समाय । हनुमन्त भाखे को पारणो, वनफल लाऊ जायजी ।। इकवीश दिनोंसू, सीता सतवन्ती कीनो पारणो ।। टेर ।। १ ।। देव रमन उद्यान में सकोई, अमृत फल मुखदाय । मीना भाखेतोड मनलाजे, लाजे पट्या ऊठायजी । इक ।। २।। लेवनगयो रमाल वाग में, बुद्ध करी पल पर । वृक्ष उपाही किया अधोमुख, पकड़ उछाले दरजी ॥ इक ॥३॥ सीता भाखे सुनरे चन्धव, करे किस् ए काम । भूमी पड्या लाजेतुम भाख्यो, राक्षसनो भय पाम । इक ॥ ४ ॥ कीरा रंगकरी फल लायो, पुंज कीयो निण ठाम ! कई मीता इतना कुण यामी. कीनो पाप निझामजी || ६ माथ रोबोर - मूर - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड भावे जितना आप अगेगे, में खामू अपर तमाम | परम मोदमे कियो पारणो, भूग्व गमाई ताम जी ॥ इक ॥ ६॥ मंन्ट टलियो धर्म प्रमादे, फली मनीग्थ माल । देग पराक्रम गम दतका, बोले सीता बालजी ॥ इक ।। ७ ।। धन्ग मान जिन उदेर धरीयो, गखन सगला सूत । निग्मीय तूं आनन्द मांही. वाह रं अंजनी पूतजी ।। इक ॥ ८ ॥ ढाल मुलगी गयर प्रभुनी पामी मीता, अभिग्रह पूराणो। हनुमन्न हाशे दिन इक बीगम, भोजन तो लेवाणो। राजा ॥४॥ मीना भाग नृटामणी लेओ. वेगही वेग सिधायो । गयर लमां थी पापीथी, मतिरे असाना पायो । गजा ॥५॥ नेपफ ढाल तर्ज मूंदडीकी- मंया भगो भोजन पाऊं,देयो हदम तोड़ फल खाऊं,दरखन नौ २ फल पाऊं।। अम अपना वल दिखलाऊं, इस विध लायो माटो । मोता माता ॥९॥ कहवे मीता सुन हनुमान, यहां है निशिचा अनि बलवान, नोक मार गिरावे आन ।। फिर में गहर के मर जाऊं, यहीं रह जाये मुंदडो ॥ मीतामाता ॥१०}} ढाल मूलगी- हनुमन्न नाम हमीने गोरे, मांत वातन जाणी। प्रम परमाद को देखो, बोरे अधिकं नाणी ।। गना० ॥६॥ रस न गच्याम ( गधेश्याम गमायगामें मे ) योगी माता नुाद डोट मे पर्वता कार है निशिचारी। * लसा के प्राधय है, यह मुनको भाग ।। रन मुनदेही नुमनने. पर्यत मृमेकमा अंग कग । दिनाकर उनका दुलाग को. मनका समस्न मन्देह हग ।। दे दी बड़ी उममें, कुछ नही तारीफ हमार्ग है । पटटी गम प्रताप प्रवल और पूर्ण कृपा तुम्हारी है। मन' प्राण मग वाणी, मृन मीता न मन्तोष किया। - वर मागर दी, इपित यह आगिवांट दिया। m .
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २५१) ढाल मूलगी तुझने तो खांधे वेसाड़ी, लेई जाऊं आजो। रावन राक्षकनां दल मोडू, नो जाणो शिर ताजो ।। राजा ॥७॥ सीता भारवे एसप साचो. जेय कहो तेम करस्यो। सीता नाम धयों थी तो, पर पुरुष न जावे फरस्यो । राजा ॥८॥ जेती ढील करो छो तेती, प्रभुने आरती थासे । धर्म नहीं हमने तुम कहवो, स्वामी वसे दुःख वासे । राजा ॥९॥ वानर जात तणी चपलाई, रावण राक्षस देखे । रामचंद्र ना सेवक एडवा, मनमें भय सुविशेष ॥ गजा ॥१०॥ मत्य वती कहै प्रभु सं कहजो, नाम तणे आधारे । जीवी , ई के मरी जाती, विरह देव तुम्हारे ।। राजा ॥ ११ ॥ क्षेपक:-~~ राधेश्याम इन वृक्षांपर माता देखो, फल कैसे शोभा देते हैं। सुन्दरता अन्त भई सुन्दर, सुन्दर मन को हर लेते हैं ।। दोचार तोड़ फल खाटू में, एसी तवियत में आय रही । आज्ञा देदो माता मुझको. तरियत मेरी लल चाय रही ।। सीता चोली इन वृक्षांपर के. वेटा अनेक भट रखवाले हैं। तोड़ना फलों का दूर रहा, मारे जाते आने वाले हैं। (दोहा:-क्षेपफ) खाने फल इस नागके, चेटा ! टेडी सोर । देख लेंय यदि निशाचर, तोडा लेंगे चोर ।। क्षेपक राधेश्याम इस तुच्छ निशाचर दलका श्या, मनमोन किया तुमने भारी । कुल दुःप नहोवे तुमकोतो, आता दे दीजे महनारी ।। परवाह न कुछ ग्यवालों की. पवार इन्द मनाने की। परवाह फक्त मोय माता है. श्री मुम्से आता पाने की। मन मुहित आधा देदीने. दरो क्या रंग दिया ऊंगा। इस लंक पुरी की मैनाको. रणविधा आज दिला ऊंगा ।। भ श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । AN , लाप तुम्हारे से जननी, रामादल आज उजागर हो । विजयीही पवन पुत्र रणमें, भयभीत दुष्ट दशकन्धरहो।। बल बुद्धि देखकर हनुमन्त की, मीयको कुछ २ विश्वास हुवा । असमंजम दुर हुवा मनका,चिन्ता का तनक विनाश हुवा ।। पोली मीठे फल वायो सुत, फल मीठे रहे नमीप तुम्है ।। आगियांद विजयी होवे, मीठेफल हो मलमीच तुम्है॥ ढाल मूलगी- लेई चटामणोने चाल्यो, 'मोता' ने पगे लागी। देव रमण ये बनने भांजवा, हनुमन्तनी मति जागी ॥राजा।। १२ 'रक्तागोक' विषये रे निमुगो, पफुल विषय अकुलाणो । अफरणा अनि आम्र भांजया, अमर्प तो अधिकाणो । गजा ||१३|| 'चम्पक' माथे कम्पन आणे, मंद अति मन्दोर । निंदय 'कदली' दल कापेवा, फली रयो वन मोर ॥ गजा ||१४|| क्षेपक राधेश्याम आतां भग्नी देगी डाली. उम तरु में वह डाली न रहीं। दे नजर डाल जिम डाल पे, कापि वह डाल गिरी लाली न रहीं। फल लान. २ चुन २ ग्वाय, कये २ नीचे डाले। टान एक फल वृक्षांपर. जो पड़ा पवन गुनके पाले ।। वानी में उम हाली पर, कपिट २ कर जाता था। नोर नोट कुछ माता था, कुछ मागा बीच बहाता था ।। १ टन अनाक वाटिका की, फिर मारे वृक्ष हिला दाने । नीनी पाटाल दिये, कुछ मागावीच महा दाले ॥ टाल मूली अनगांना नांग्यान पाली । पान र कान टीने म क न मानी ।। गा||१५|| मराटनाला गाम अनि मंचाही। गया. हा दगा मादी ।। गजा 11१६॥ -- M ~" भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२५३) घुरको करी कपि मामी अयो, जाये नाम पुलाया । एक एक थी आगे नासे, खायारे यहां खाया | राजा ॥ १७ ॥ जाई पुकार्यो राजा रावण, वानर भांजी वाडी। मखरा तर तो कोई न गल्यू. वाडी सर्व उनाड़ी ॥राजा ॥१८॥ कोई ना हथियार छिनाया, कोई साधा फाडी। कोई ना मुख कान विलया, इजत तो अति पाड़ी ।। राजा॥१९॥ सुभट लेई नृप-नन्दन आयो. दोई लदिया भारी । वानर तो बल वन्त विशेपे, सोई लीधा मारी || राजा ।। २० ॥ क्षेपक.. राधेश्याम फुर्ति से कपि मारी छलांग, दिल पर या लेश नहीं भयका । मारी इक लात घुमा कपिने, दिया तोड कलेजा अक्षयका ।। अक्षयगिरते मत्र मैन भगी, दौड लंका में आई है। भय भीत पुकार करें भारी, लंका पति नेरी दुहाई है ।। कुछ अंग भंग निशिचर कीने, कुछ पकड़ जमी से मार दिये। अध मरे भाग कुछ असुर गये, कुछ पैरों नीचे कुचल दिये ।। मर्दन सत्र असुर किये पल में, थर थर थर सब थरी तेथे । अब नहीं भूल यहां आवेंगे, करते यो भागे जाते थे । वा अमन पहुंच जावें गह में, ईश्वर का ध्यान लगावेंगे। जिन्दे जब तक रहै दुनियों में, इससे लडने नहीं आयेंगे । उस कपि बलकारी भटने, फुलपाडी नोड़ २ डाली। विध्वंस अशोक वाटिका की. मुनलक न रही वहां हरियाली ! जहां सघन लगाये मारी थे, तहां नाघ हो गया उजियाला। स्या पयान कर हम वानर का महाराज मार हमको डाला। करतून याद कर २ उम की, दिल दहमन भारी माता है। गात कीट पतंग सम नाथ भई, हरजर्जा वोही दिसलना है।। कर अंग भंग छोरा हमको. दुर्गति भी कीनी भारी है। हम जय अशोक वाटि कामे, अब नाकन नी मागे रुन्त जर यादकर उसकी, दिल बीच पर होताई।
भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । यह काल कगल प्रलय आया, या अजल कालका शौला है। यह वानर या आफतह, पनवीर वोर बलवां काहै । हिम्मत नहीं सन्मुख जानेकी, छुप २ पेडांसे झांका है। अक्षय कुमार के मरतेही फिर पैर हमारे ऊखड गये। लेजान लफ को भागदोये, भयभीत हुवे सरपछाड़ गये । अक्षय कुमार का मरनामुन, दशकंधर शौचमें छाया है। न्या गलना बड़ी बडी मनको, फिर धोर हृदयमें लाया है ।। दोहा क्षेपक- प्रकल बली द कन्धने, सबै बंधाया धीर । मुलगाया दरबार में, इन्द्रजीत बलवीर ॥ बेटा अशोक टिकावीच, एक महापली कपि आया है। अजय कुंवार को लातमार, जिमने मुर धाम पठाया है ।। कुट मुभट माथमें लेजाओ, मीधे अगोक उपवन जाओ। जिम नोर यने उगनौर पुत्र, केदी कर कपि को ले आओ। मर्वयाः बन्दि के विदेह नन्दनी के पद कन द्वद, पेटयों वाटिका में द्वार पाटन महार के । गाये कल भार टार तोरि के उग्यारे तक, वाग । आयो गम-जन को उचार गृथय ममेत भट किंकर हजाग्न .. बाधिक पिच्छ ग्न्छ अच्छको पछारके। कालमो कगल मन नादको बहाल किनो, केगरी चार चीर मुफनको मारक ।।?।। दहिगे दंग घननाट को निनाद किनी, मार के ममग्र मैन्य मट मर को महालालन की चौट में महान ग्य घोडे चार, मम मंटर मटका मटाटे । विम्य रिलोकी पर वरिको शिर्ड कोर करी पदी लोक हट की छटा। कमर्ग किमोग लोल दल में लोटी पट कयों पटाम: 1 टान मुलामी- मी नहीं अति. इन्द्रजीत आवे । बिर्मन यमन माम मामी दारे । गा ? | य
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ।
(२५५)
क्षेपक राधे श्याम-
गर्जना नई अन्दाज नया, सामान नया सव साज नया ।
दिन आजमया रण रागनया, रणको आया रणवाज नया ॥
ढाल मुलगी-
पहिलातो चाणांसू लड़िया, विविध परे बलवन्ता ।
खडग आदे आयुद्ध छतीसे, सम्बाहै मति मंता ॥ राजा ।। २२॥
इन्द्र जीतजी जेजे मूके शस्त्र महा दुःखदाई ।
विचेहीथी छेदी नखे. वानर एह बढाई ।। राजा ।। २३ ॥
इन्द्र जीतना भट तमघाया. जाये सघला नाठा, ।
वारं अगज ! अनेरा आगे, वानर थी अति बाठा ।। राजा ॥२४॥
भट भागा शस्त्र बल भागो, इन्द्रजीत नवी नाठा ।
नाग पास वाणेकर वानर, वांध लीयो अति काठो। राजा ॥२५॥
आणी मेल्यो रावण आगे, रावण हर्प नमावे ।
सेवक तूं आजन्म तणो सुझ, आज रामे चिन्त दोघो राजा॥२७॥
वनवासी फल शाकाहारी. मेला लूगडां लासो।
भील किम्यू तूंशो पूरसे, थारा मननी आसो।। राजा ॥ २८ ॥
अवर कामनी नीठपडी थी, इहां कोई आवे।
अबतो प्राण पट्याछे सांसे. छूटेवा नविपावे ॥ राजा ॥ २९ ॥
पहीलो थो भाणेज जमाई. प्राण थकी ही प्यागे।
वन्दी वान हुयो अववेगे, मीता लेई पधारो || गजा || ३ ||
ओनो धृता पूर्व शिरोमणी, आप चली क्यू नाया ।
अंगा रातो अति धग धगता. भलिपरे हाध गहायागजा॥३१॥
सेवक वर महारालो धोरी. अवर
दत
कहायो।
ते माटेरे अवध्य अछेगण, एह विटम्य करायो || राजा ॥ ३२ ॥
हंतो सेवक कदको धागे, कदका तुम मुझ म्बामी ।
लाजन पामो झूठ कहता, मान न मास कामी ॥ राजा ॥३३॥
एक वार पवनं जय राजा, आयो यो बोलायो।
धरण तणा बन्दी बाना थी, पर बना जोडायो । राजा ॥ ३४ ॥
२५४ ) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । यह काल कगल प्रलय आया, या अजल कालका शौला है। यह बानम्है या आफतह, बनवीर वोर बलवां काहै । हिम्मत नहीं सन्मुख जानेकी, छुप २ पेडांसे झांका है ।। अक्षय कुमार के मरतेही फिर पैर हमारे उखड गये। लेनान लक को भागदोये, भयभीत हुवे सवपछाड़ गये । अक्षय कुमार का मरनामुन, दशकंधर शौचमें छाया है। न्या कलना बड़ी बडी मनको, फिर धोर हृदयमें लाया है । दोहा क्षेपक- प्रबल वली दग कन्धने, मर्य बंधाया धीर । पुलवाया दरबार में, इन्द्रजीत बलवीर ।। बेटा अशोक चटिकावीच, एक महाबली कपि आया है। अक्षय कुं यार को लातमार, जिमने मुर धाम पठाया है ।। कुछ मुभट माथमें लेजाओ, मीधे अशोक उपवन जाओ। जिग नोर बने उमतौर पुत्र, केदी कर कपि को ले आओ। मवैया- पन्दि के निदेह नन्दनी के पद का द्वद, पेट्यो बाटिका में द्वार पालन महार के। पाये फल भार टार नोरि के उखारे तरु, बाग को उजायों गम-जग को उचार यथय गमेत भट किंकर हजाग्न की गांधि के विपन्छ रच्छ, अच्छ को पछार के। कालमो कगल भन नारको बहाल फिनी, कदाग कुंवार वीर मुकनको मारके ।।२।। दूर हिने दंग धननाद को निनाद किनो, मार के ममग्र मैन्य मट मट अलो गटाटे। लातन की चोट से महान ग्य घोई चार. मापी मंदार मट : क्यों मटारदे । विग्य मिलाकी पर वैरिको विकी कोर करी दी छोक कट क्यों छटासंद कमर्ग किमोरी 17वांगेनामी नोट लन में लोटी पट क्यों पटाम् ।।२।। टार मतमी -- मो कार चलो अनिन्द्र जीत बा। निम्नीने या मन नीति माम दावे || Pa ||२१ ॥
ते माटे रे अवध्य अछेयण, एह विटम्ब करायो ।। राजा ॥३२॥ लाजन पामो मठ कोता, मानन भाख कामी ॥ राजा ॥३३॥ श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २५५) क्षेपक राधे श्याम- गर्जना नई अन्दाज नया, सामान नया सब साज नया । दिन आजनया रण रागनया, रणको आया रणवाज नया ॥ ढाल मूलगी- पहिलातो वाणांमं लडिया, विविध परे पलवन्ता । खडग आदे आयुद्ध छनीसे. सम्बाहै मति मंता ।। राजा ॥ २२ ॥ इन्द्र जीतजी जेजे मूके शस्त्र महा दुःखदाई । विचेहीथी छेदी नांखे. वानर एह चढाई ।। राजा ।। २३ ।। इन्द्र जीतना भट तनघाया. जाये सघला नाठा, । वारं अगज! अनेरा आगे, वानर थी अति बाठा ॥ राजा ॥२४॥ भट भागा शस्त्र बल भागो, इन्द्रजीत नवी नाठा। नाग पास वाणेकर वानर, पांध लीयो अति काठो॥राजा ॥२५॥ आणी मेल्यो रावण आगे, रावण हर्ष नमावे । सेवक तूं आजन्म तणो सुझ, आज रामे चिन्त दीधो ॥राजा॥२७॥ वनवासी फल शाकाहारी. मेला लूगडां लासो। भील किम्यूं तूंशी पूरसे, धारा मननी आसो ॥ राजा ॥ २८ ॥ अवर कामनी नीठपडी थी, इहां कोई आवे । अवतो प्राण पट्याछे सांगे, छूटेवा नविपावे ॥ राजा ॥ २९॥ पहीलो यो भाणेज जमाई. प्राण थकी हो प्यारो। चन्दी वान हुयो अबवेगे, मीता लेई पधारो ॥ गजा ॥३०॥ ओतो धृता धूर्त शिरोमणी, आप चली क्यू नाया। अंगा रातो अति धग धगता. भलिपरे हाथ गहायागजा॥३१॥ सेवक वर महाराछो घोरी, अवर दन कहायो। इंतो सेवक कदको धागे, कदका तुम मुन्न म्वामी । एक बार पचनं जय गजा, आयो यो दोलायो। वरुण तणा बन्दी खाना थी, नर नेचर जोडायो । राजा ॥३४ श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड। मक बार पण आयो थो, स्वामी नो तेडायो । वरुण गुनं रणमें घेर्यो थो, नप तुम्हाने मेल्हायो। राजा ।। ३५ गर्म पानी माय कराणी, पाय पक्षे नविरेणो । लम्पट नग्गं बात करन्तां, पापे पिण्ड भरेणो । राजा ॥ ३६॥ हो तो कोई न दे. अनुजा एकने जीती । ग्गयो है जे नुदाने गर्ग, वसुधा यात विदीती ॥ राजा ॥३७॥ दाल पार्न चासनी यामी श्री नथमलजी न~ सुन महागजा कटुक वचन मुगसे थो कपहन बोलीये । करे, कपिगना इण वचनों सुनो, अमल मृग्ग्य मनतो लीये ॥टेर।। ग्गर की नारी हग्लायो, जगमें तुझ अपजश छायो । थेलने कालो लगायो, मुन महागजा ॥ १ ॥ है, गीता मन्यानी नाग, तिनकं तूंजाणे कर प्यारी । कामात आई, गर धारी ।। गुन ॥२॥ गुग्रीव भामण्डल मागना, जमु मेये आणा गिरताजा । रोगी को कामी कात्रा ।। मुन ॥३॥ दम मगने जब अग्मी, मोटी ही गुमट तिहां मम्मी। को उनर्गट हण करमी । गुन ॥ ४ ॥ है मोटशियान कटाई, माना मिलने मुजग गाई । गरि वामन धाई ।। मुन || || गवान की आगी, मायोथी कंवल नाणी। मिटयानी हे पागो मुन ॥६॥ दार मन्तगी- , मग माग गयी. वदन नीर पर वाहै। 44 दा करना. मोदी नें चाहे ।। गजा ॥ ३८॥ ही मंडी. पंर मित्रा कर गयी। TEEमा पाद, मायी जा !! 36 || ? मत * का दगा दीदी को बन गयीय टोर, गया? वर्ग श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। . छाती मुझ छोले । मुझे कुण मार लेने मुंडो, ऊंणीको दीसे छे झंडो॥ सत्य व्रत ॥ ७९ ॥ दाल मूलगी- एम सुणो कोप्यो अति वानर, नाग पास ने तोड़े । कमल नाल सूं कुंजर बांध्यो, कहो करण नर छोड़ें। राजा ॥ ४० ॥ विधुत पात तणी परे पड़ियो, रायनो मुकुट पाड़ी। खण्डो खण्ड करीने नांखे, कोण विचारी बाडी ॥राजा॥४१।। ग्रहो ग्रहो रावण भारवे, रीमघणी विस्तारी। ताम मूलंक निशंक पणेरे, विध्वंसी निरधारी ॥ राजा॥४२॥ ढाल क्षेपक मूलगी-- सहश्र थम्भ मेलही पारे, लंकाको विध्वंसे ज्यारे, कोलाहल मचिदो है सारे । राम को दुत ही आयो. प्रलय सो करने देखायो ॥ सत्य० ॥८॥ (वैष्णव मत की रामायण मे हनुमानजी से लंका दहन काकथन म प्रकार है ) व्याख्यान में कहना था न कहना चाहा की इन्द्रा पर निर्भ रहे (नागफास में बधे हुवे हनुमानजी को मारने के लिये गवण सुन फ भटः पवन सुत के पास माये) तर्ज मूंदड़ो को- जपतो मारन उमको लागे, वसनहीं चलता हनुमंत आगे. निशिचर देख २ कर भागे । गू नहीं मरु में हरगिज मेरे पाम संजीवन मूंदड़ी || सीतामाता० ।। ११ ॥ में नो मोत बताऊं मेरी, लायो तेल ई तुम गहरी, अपनो मन कर रायन देरी। पूंछको पांधक आग लगायो जल्दी पचाये मुंदड़ी ॥ सीतामाता० ॥ १२ ॥ सब लंका की सई मंगाई उससे पूछ यांध लपटाई, दीना अपर नेल गिराई । उसमें आग लगाई देय याद कर लीनी मंदड़ो । गीता. माना० ॥१३॥ पहिले गरन सन्मुन्न जाई. चांकी दाही मुछ जला, पीछे लंका में फिरवाई | लंका जला दीगे हनुमान हिया विचराखी मंदो। सीतामाता ॥ १४ ॥ का सिर के अन्द- पाई, घर एक विभीषण का नाही, पाकी मर पर आग लगाई ।
(२५) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ममुद्रमें जाय पूजाई पूंछ कारज कर लीनो मूंदडी ॥ सीता माता० ॥ १५ ॥ दोहा क्षेपक- सीता पासे आवीयो, अब जाऊं छू मात । चरी सुनाईने चल्यो, ले नारी ने साथ ॥१॥ ढाल मूलगी- क्रीडा रंग करीने रगोलो, आयो वारम लाई । राम नमी चूड़ामणि आप्यू, लीधो कण्ठ लगाई ॥ राजा ॥ ४३॥ चुडामणि छाती चांप्यो, जाणे मीता आनी । आज मिली वारं पारं, फरसे हैये लगावी ॥ राजा ॥ ४४ ॥ दाल क्षेपक तर्ज पनजी मूडेयोल- अरज रघुवरसेरे, कही हकिकत नाथ जानकी बड़ी जिगरसेरे टेर। सिंहनाद कर कपट दयानन, मीता हरी कदरसेरे । लेआयो गद लक मांय, रथ बैठ अधरसेरे ।। अरज ।। १ ।। पाग अगोको जाग ऊनागे, बहुत डरे निशि चरसेरे । गामी मह गत कष्टदे, बडी फजरसेरे ।। अरज ॥ २ ॥ हाथ जोड हनुमन्न मीया मृध. कही हकीकत हम्सेरे । जो निन्ना गम आंगमे, आम वग्मे ।। अरज ।। चात पाली मृगी प्रभुका, व्याकुल चिन्त अन्दरसेरे । पाननिया मोना मन्यमन्ती, विपतमें नम्मे ॥ भरज ॥४॥ पर मया श्री गम गुनो हनुमान, का शुद्ध अदे मिय के जिय माही । पर लेनिनादी कलंक गवन की वन ही बन छांदो । जारत अमीना मती, मरक्योन गई हमने विद्युगही। पंकन. यम बन मोजा पावन नांही ।। १ ।। द्वान मननी- विदा हतीया मिलीया आनी, बीचे दृवाजे कामो । देनजनांपनी माया, मला मली कहै गमा। गना ।। १५ ।। रारी चालीगनी, मीता गुददागी ।
-~~ ~~~-- श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २५६ ) केशराज' राघव सुखपायो, सभा सहुहर खाणी ।। राजा ॥ ४६॥ दोहा रामग्री रागे 'राम नाम रलियामणो, राम नाम थो एक । सोना शुद्ध लही इहां. राम स्वरूपअनेक ॥१॥ राम अने लक्ष्मण भला, सुग्रीवादिकदेख । सुभट महा शूरापणे, कटक मिल्यो सुविशेष ।। २ ।। भामण्डल मण्डलपति, वड वानर नल नीर । जम्मवान अंगज भला, कपिपति नन्द सलील ॥३॥ श्री महेन्द्र महिमानीलो, पवनंजय नो पूत । प्रबल महाबलि आगलो, राखण सघलामृत ।। ४॥ वीर विराध विशेपीयो. राम सुपेण उदार । इत्या दिक नामे भला, अवर लहै कुण पार ॥५॥ ढाल क्षेपक तर्ज जगतगुरु तशला नन्दन वीर ।। रामहुकम तिण अवसरेरे. वानर लाखों कोड़। आवी मिलीया एकठारे, दोड़े होडा होड़ । सती की वार चढे रघुविर टेर ॥ १ ॥ आयुध छत्तीसे करधररे, पकतर टोपनी आव। हय गय रथ भट दीयतारे, पायक रयाछे फार ॥ सतीकी ।।२।। निज २ रा परिवारसूरे, जाई मिलीयो साथ । शूग रण रसमें रमेरे, मिलीया पाली चाथ ॥ सतीकी ॥३॥ सिशे सिधाको सिद्ध करोरे, करजो स्वामनो काम । मतना पूठ देखाल जोरे, ज्यू वधसी तुम्ह मान ॥ सतीकी ॥४॥ विविधा युध भलके तिहार. हर्ष वंदन हमीया । किकि धाथी चालीयारे, श्री रघु वर तिणवार ॥ सतीकी ॥ ५॥ दोहा मूलगान विद्याधर विशामली, मिलीया केई कोड़ो। चाहर ए सीता तणी, आणी मही यहोडी ।। ६॥ आप आपणे साधमें, नौवत केरोनाद । . . - --- - भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड समुद्रमें जाय पूजाई पूंछ कारज कर लीनो मूंदड़ी ॥ सीता माता० ॥१५॥ दोहा क्षेपक- गीना पासे आगीयो, अब जाऊं छू मात । चरी मुनाईने चल्यो, ले नारी ने साथ ॥१॥ दाल मूलगी. कीटा रंग करीने रगोलो, आयो नारम लाई । गम नमी चडामणि आप्प, लीधो कण्ट लगाई ॥ राजा ॥ ४३॥ चुडामगि छानीयं चाप्यो, जाणे मीता आनी । आ7 मिली या वार, फरसे ये लगावी ॥ राजा ।। ४४ ॥ टान क्षेपक तर्ज पनजी मुडयोल- अरतमारे, कही हकिकत नाथ जानकी पड़ी जिगरसेरे टे। मिदनाद कर कपट दगानन, मीता हरी कदरसेरे । रेमायो गाला मांय, रथ पेठ अधग्सेरे ।। अरज ॥ १॥ चाग प्रमाक जाग ऊनागे, बहुत टरे निशि चरमेरे । मी मह गल करंदे, पडी फजम्मेरे ।। अरज ॥ २ ॥ हाय जोड हनुमन गोया गृध. कही हकीकत हासेरे । निम्मर गम प्रायमे, आंसु बग्मे ।। अरज ।। पार पटी मुगी प्रमका, व्याकुल चिन्न अन्दरमेरे । प्रविया मोना मत्यपनी, विपन में तम्मे ॥ श्रमज ॥४॥ गार मया- को श्रीगम गुतो हनुमान, कछु शुद्ध अद मियक जिय माही । पदक चिनादी कलंक गवन की वन ही वन छांहो।। बद माता गती, मायान गर हमने विगही। प्रद रहने यम आयन बोजा पावन नांही ।। १ ॥ दार मुन्गी-- विटा यी गलीयर प्रा. व दवान कामी। देवर प्रतीमाया. कोपली गमी || गा T: नालीदानी, मटा दलदान । maa vvvv श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २५६ ) केशराज' राघच सुखपायो, सभा सहुहर खाणी ॥ राजा ।। ४६॥ दोहा रामग्री रागे 'राम नाम रलियामणो, राम नाम थो एक । सीता शुद्ध लही इहां, राम स्वरूपअनेक ॥ १॥ राम अने लक्ष्मण भला, सुग्रीवादिकदेख । सुभट महा शूरापणे, कटक मिल्यो सुविशेप ।। २ ।। भामण्डल मण्डलपति, वड वानर नल नीर । जम्मवान अंगज भला, कपिपति नन्द सलील ॥३॥ श्री महेन्द्र महिमानीलो, पवनंजय नो पूत । प्रवल महाबलि आगलो, राखण सघलामूत ॥ ४॥ वीर विराध विशेषीयो. राम सुपेण उदार । इत्या दिक नामे भला, अवर लहे कुण पार ।। ५॥ डाल क्षेपक तर्ज जगतगुरु तशला नन्दन वीर ।। गमहुकम तिण अवसरेरे. वानर लाखों फोड । आवी मिलीया एकठारे, दोड़े होहा होड़ । सती की वार चढे रघुविर टेर ॥१॥ आयुध छतीसे करधरेरे, चकतर टोपनी आव। हय गय रथ भट दीयतारे, पापक रयाई फार ॥ मतीकी ॥२॥ निज २ रा परिवारसूरे, जाई मिलीयो साथ । शूग रण रसमें रमेरे, मिलोया पाली बाध ।। मतीकी ॥३॥ सिधो सिघायो सिद्ध करोरे, करजो स्वामनो काम । मनना पूट देखील जोरे, व्यं रघसी तुम्ह मान । मतीकी ॥४॥ विविधा युध भलके तिहार, हर्ष बदन हंसीया । फिकि धाथी चालीयार, श्री रघु कर निणार ।। सतीकी ॥ ५॥ दोहा मूलगा--- विचाधर विशामली, मिलीया ई कोड़ी। वाहर ए सीता तणी, आणी मही रहोड़ी॥६॥ आप जापणे माघमें, नौपन करोनाद | A -hun भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ममुद्रमें जाय पूजाई पूंछ कारज कर लीनो मूंदडी ॥ सीता माना० ॥ १५॥ दोहा क्षेपक-- मीना पासे आवीयो, अन जाऊं ड्र मात । नरी गुनाईने चन्यो, ले नारी ने साथ ॥१॥ ढाल मूलगी- कोडा रंग करीने रगोलो, आयो बारम लाई । गम नमो नृडामणि आप्यू, लीयो कण्ठ लगाई ।। राजा ॥ ४३ ॥ गडामणि छातीमं नांप्यो, जाणे गीता आनी । आज मिली चार वासं, फरगे हैये लगानी ॥ राजा ॥ ४४ ॥ डाल चोषक वर्ग पनजी गुडेयोल- अग्रगारमेरे कही किकत नाथ जानकी पड़ी जिगरसेरे टेर। मिदनाद कर कपट दशानन, गीता हरी कदररोरे । आगी मालक मांय, रथ चैट अधरसरं ।। अरज ॥ १ ॥ शाग ताकमें जाग ऊनागे, बदन टरे निशि चम्मेरे । गानी गा गत कटद, पटी फारमेरे ।। अरज ॥ २ ॥ दाय जोर हनुमन गोया मृध. कही हकीकत हम्मेरे । जोनिया गम अगिगे, आंग वगरे । अपज ।। बात ही गुणः प्रमका, गाल चिन्न अन्दरमेरे। प्रायः गोवा मन्यानी. पितम नामे ।। भान ।।४।। आ गया अगर मनी हनुमान, कह शुद्ध अहे मियक निय माही रबिनली कलंक गवन की वन ही बन छह ।। पर अमीना मना. माययोन गई हमने विगंही। पंदने, गन पाकर गांजन पावत नांदी ॥ १ ॥ टाट मुली विदा पानी. बीचे दुवान कामी । प्रमती सदी ईगमा 11 ग ४ 17 नदी वरीयानी माता याद नहानी। 4 + श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २५६) केशराज' राघव सुखपायो, सभा सहुहर खाणी । राजा ॥ ४६॥ दोहा रामग्री रागे 'राम नाम रलियामणो, राम नाम थो एक । सीना शुद्ध लही इहां. राम स्वरूपअनेक ।। १ ।। राम अने लक्ष्मण भला, सुग्रीवादिकदेख । सुभट महा शूरापणे, कटक मिल्यो सुविशेष ॥२॥ भामण्डल मण्डलपति, वड वानर नल नीर । जम्बवान अंगज भला, कपिपति नन्द सलील ।।३।। श्री महेन्द्र महिमानीलो, पवनंजय नो पूत । प्रबल महाबलि आगलो, राखण सघलामून ।।४।। चीर विराध विशेषीयो. राम सुषेण उदार । इत्या दिक नामे भला, अवर लहै कुण पार ॥५॥ ढाल क्षेपक तर्ज जगतगुरु तराला नन्दन चौर ।। रामहुकम तिण अवसरेरे. वानर लाखों कोड़। आवी मिलीया एकठारे, दोड़े होडा होड़ । सती की वार चढे रघुचिर टेर ॥ १॥ आयुध छतीसे करधरैरे, चकतर टोपनी आव। इय गप रथ भट दीयतारे, पायक रयाई फाय ॥ सतीकी॥२॥ निज २ रा परिवारमंरे, जाई मिलीयो साथ । शूग रण रममें मेरे, मिलीया पाली बाघ । मतीकी ॥३॥ सिपो सिधायो सिद्ध कगेरे, करजो स्वामनो काम । मतना पूठ देखील जोरे, ज्यू पधनी तुम्ह मान | मत्तीकी ॥ ४ ॥ विविधा युध मलके तिहार. इए चंदन हमीयार । किफि धायी चालीयारे, श्री रघु वर निबार ।। मतीकी ॥ ५॥ दहा मूलगान विद्याधर विद्यामली, मिलोया केई कोडी। बाहर ए सीता तणी, आनी महीपदोनी॥६॥ आप आपणे मायमै, नौपन केरोनाद !
4. M ) भी जैन पर रामायण तृतीय सएड । अम्बानी गाजीरगो. सुण्यो न जाये साद ॥७॥ शुभ मेला शुभ मुहते. शुभही शकुन विचार । गगन पन्ध चान्या मह, गधवजीनी लार ॥ ८ ॥ कामनानी शमी - न भूली मानण है मत्यगुरु-- 'ग' आगोही, मुमट सपला शूर। उनी नीकलील, जेम दलनो पर ।। राधय० ॥१॥ filme नाम पिनान, विविध वेश विशेष । fair गिरिध नेजा, सिविध ग्थ नरेश ।। राधन ॥ २। सिरियन पिरिघ हाथी, विविध ग्थ नर होई । farरना हथियार हाण, विविध पाजा जोई ।। रापब० ॥ ३ गपति नाय, पालीतो अभिगम । तिमी मगर चार, गिरिध पग्विार गम || गपय० ॥४॥ या मन गरे गिला, हगांनी हिंगार । मागी अधिको, ग्यता चित्कार || गपा० ॥ ५ ॥ :: गभटकंग, पर कायर ग्राण । १४. मीना याचे, मदनी गं प्रणाम || गपर॥ ६ ॥ विमान कईनी गागा । दादी गगने चलिया गाज || गवव ॥ ७॥ 3: TET भारावेरवा गिरिपामी। देशाला 'गमुद्र मंत्र यामी ॥ गयय० ।। ८ । मदनी का दीदार काम । मटीमा मंग्राम || राघव ॥५॥ श्री. 'गत वांग्या 'नाना। - कान काटाल गया॥१, | 1:या रिहामान। श्री. परम | गयर० ।। ११ ॥ मई सन्दः दीन प्रधान ! * वारदा M anmaavrt. श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। (२६१) आणी 'लक्ष्मण' भणी दीधी, पामीने सन्मान || गधव० ॥१२॥ रात रही ने प्रातः चाल्या, राय 'सेतु' 'समुद्र। साथ लाग्या भर्म भाग्या. हुवा अधिक अक्षुद्र ।। राघव० ॥ १३ ॥ सुवेलाद्री चाली आया, निहां गय 'सुवेल' । जीती लीधो साथ किधो, कान लागी वेल ।। गधर• ॥१४॥ लंका नगरी प्रत्ये चाल्या. हंस द्वीपे जाय । 'हंस रथ नृपे जीतने तिहां, रह्या राघव राय || गधर ॥ १५ ॥ आशनो आवीयो राघव. मोन रासे मन्द । संचों सघलोही जाण्यो, राय रवीनो नन्द ॥ राघच ॥ १६ ॥ लंकाने ए ग्रह लाग्यो, लंकनो रे विणास । होय शे एमही जाणो, लोक पाम्या त्रास ।। राघव ॥ १७ ॥ युद्धने सम्बाहीये अति, होई अति हमीयार । लंकपति सामन्त शूरा, महा झंझणहार || गमय ।॥ १८ ॥ नामयी 'मारित्व' मोटो. 'हम्न' राय 'प्रहम्त' । सारणादिक सहम केई, निगाचर मदमस्त ।। गधय ।। १६ ॥ लंकपनि रणतूर ताजा. ई कोडी नेवार । ताडिवा आदेश आये, गौग्नो नहीं पार ।। राघव ॥ २० ॥ लंकपति लहू आगो. करे ग अरदास । काई उतावला थाओ. शौचमे सुनचाम राघव ।। २१ ॥ अणविमास्यो काम कीधो, ते पाटो कुल लाज। अजहुँ आतुर होईगांधी, नहीं सुधरे काज ।। राघय ॥ २२ ॥ मुनि भी रूपचन्नाजी ऋत, डाल क्षेपक तर्ज प्रनी सपी लो करदार- अरज करूं मैं बारम्बार, मुनो चीर ! करो विचार टेस! को विभीषण गुनहगवण पाटी देदो में परनार | अज || या नहीं माने तूं क्यूं ताने, ज्ञाने गर जग मनि मिग्दार PATR प्राण गमामी जान नजामी, गाली नोन मर गंगार मिरन ॥३॥ १मन्द-यानि शनिश्वर मीनराशी पापा मेरी परगा।
भी जेन पर गमागण तृतीय गएड। म्हारी जान नपावे, जिय दुगपावे, जिणगू कहूं धूं धरकरप्यार । दानी बानां थई है, अरच्यातां, जातां लंक ने कीधी खुवार ॥५॥ कोटागला उठाई वही है पुण्याई, न्याई करता पर उपकार ॥६॥ लोक हमामी फिर पछतागो. पामो पग्भव दुःस अपारा।अरज७।। में नहीं जाना होमी फनीती, बांका पुण्य है अपरम्पार ।।अरजथा (गगगी वानपर न लावणी की- कहै. दरकन्धर गुनो विभीषण, बान गुणोनी इक.म्हारी. गगम लिमन दीय मीलला म्हारे ऋदिनो नहीं पारी ।।कह।।१।। सम्म कर्ण गा नीर हमारं, प्रबल चली कहो कुन पाले । नीत माजीने दन्द्रन, ग्णमे बाण कही कुणझाले ॥ कहै २ ॥ कनक कोट मादमी गाई. भार्ट विभीषण मुण लीजे । गल चार अाहणी दार. नादक बाद नहीं की कहै ॥३॥ जदयनी नग्मार्ट. पवन देवती अंगन झारे । मी उदक हमारे, कही अबई फिगर मार ॥ कहै ॥ ४ ॥ चमाता मा दारे, कांदगा, ऋदि देग मुरपनि लाज । महाग. तीन मगर मैंने माजे ॥ कहै ।।५।। वन गरि गम कर गरे, वासी शाम अपार लहै । मान जाये, पायानो कृष्णपार करे ।। कहे ॥ ६ ॥ * गदा, माता न करत्यारी। izान गो. मग मांदी अधिकारी ।। कहै ।। ७।। दारनामी द, दि | ई. दर वार मंद । गवत्र || २ || हाम। नरदेहार गवद २४|| चम", द ट। पापी मन नागदा - १ श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२६३) इन्द्रकी श्री थकी अधिकी. ताहरी छे देव । काई खोवे रंक होवे, एक करी अह मेव ।। राघव ॥ २६॥ इन्द्र जीत कहन्त काका, जन्म डरपण प्राहि । पित कीतातनं कुल, तात सहोदर नाही ।। राघच ॥ २७ ॥ इन्द्र जीत ए नाम म्हारो. इन्द्र जीतूं जंग । कोण लक्ष्मण राम राजा, रहै तूं रसरंग ॥ राघव ॥ २८ ॥ ढाल क्षेपक तर्ज- होगे की-सुगणा धूलचन्दजी कृत-- इन्द्रजीत कहै सुण काका, थे दूध लजाया माका ।। टेर ।। रावण राय नगंसुर नायक. सण्डवय जग जांका । पकड़ी टेक कवह न छोडे, थे क्यों करो निकमा हाका ।। जानो नहीं पराक्रम म्हांका ॥ इन्द्रजीत० ॥? ॥ राम रु लिछमन दोय भीलडा, वनमांही वाम उनीका ।। दल बलको कछु जोर न जिनों के, निकमा वतावो थाका || जानों नहीं तेज लंकाका ॥ इन्द्रजीत ॥२॥ वक्त पड्यां देवेला वारो, ए लक्षण है थांका । निर्वल शीख देवे क्षत्री कं, धिक २ जन्म जिनांका ।। लेबां सही जीत पताका ।। इन्द्रजीत० ॥३॥ डाल मूलगी- पेला थे छत्तयों रावण, भाखी झूठी बात । मारीयो मैं राय दशरथ, एह तुहा अवदात ॥ राघव० ॥ २९ ॥ इहां माहरी दाद मांहै. आचीया छ दोय । चाहै छो ऊपारीयां तूं. मगो नहीं अरिहोय ॥ गपर० ॥ ३० ॥ जाणीवे छे गम मिलीयो, चाल मांही विचार । कृप पाणी जिस्यो होने, निस्यो चहम मसार ।। राधब० ॥ ३१ ॥ लहु भाखे पुत्र नामल, नहीं अनि नेह । जिसो देन्द्र निनो भारए भारीयों तुम छह ।। गयय० ॥३२॥ पुत्र नहीं तूं ग गरिमो. करण कुलनी वेद । दुधनो मंदो धागे. काई जाणे मैद || गधयः ।। ३३ ।।
भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ।
मामी कामी पणे पिता तप, अंध मांही गिणाय |
जन्म अंध ममान तूंनो, आज थकी काहिबाय || राघव० ॥ ३४॥
पुराने नारिन नाहरे, भलो पणो न देखाय ।
भानी जिमु भाग्ने, लंक तो न रहाय ॥ राघवः ॥ ३५ ॥
नेपक मवैया
लंग दुग्ग नेरे, मंग कुम्भकर्ण जैसे ।
चंटे बडे बांके योध कहीये क्रपानकी ।
पाणी फगग कीनो., चन्द्रनिशा निवाम लीनो।
गवि है ग्मोगा और कहा करी है वखान की ।।
गनी है, मन्दोदरी निधानी, रूप रम्भा जैगी।
गाजे गज गज द्वार. टोटणा मजान की।
करत विभीषण नो, जानकी फेर देयो ।
जानती न लायो है. निगानी घर जानकी ।
रही जो गुमट भट विकट बजरंग जमे ।
कम २ कीना काम, थांगं कहा छानकी ।।
पार. उगी, इन्द्रजीत ; पछार्यो ।
लक. प्रजान्यो है. भग मिकान की ।
'आय अब गा तुम भागलिगोगे कहां।
पागदप आंग काल, लागी नप वानकी ।।
पिता, पानको फेर देयो।
जानकी न लाया निशानी घर जानकी ॥
राला मतगी-
बरन मुगुम कापही धात्री, अग्दिी प्रांगा करनी, बोले यू मुम
मला। पटानटी विभीषण ने मामं, पर पंछित ही
मा मा अनलो८||
दार मूलगी-
नयम कोरया मगल ।
Har मायने, उटगी नाकाल।। गवद ॥ ३॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। ( २६५) विभीषण ऊठीयो सामो, सामो लाग्या वीर । कुम्भकर्ण ने 'इन्द्रजीत' ज, धाई आया धीर ।। राधव० ॥ ३७ ।। विचे एडीने कीया अलगा, हाथीया जेम सोई। चित्त फाट्यो रायजीनो, मेलवे नहीं कोई ॥ राघब० ॥ ३८॥ मत रहो मुझ नगरमांहै, अलग जाजे दर । उणही ने भेलो होई, रहै गम हजूर ।। राधब० ॥ ३९ ।। मारीये छे सांच बोलो, झुडे जगपती आय । विभीपण सो भलो भाई, नाचोयो नृपदाय ।। राघव० ॥ ४० ॥ रायने पगे लागी चाल्यो, लेई निज परिवार । तीग अक्षौहणी लसकर. लागीयो तमु लार ॥ गय० ।। ४१ ।। इस द्वीपे चाली आयो, रामने दरवार । सुग्रीवादिक नाम राजा, करे शौच अपार ॥ राघब० ॥ ४२ ॥ बैरियों विश्वास न होवे, तेहीमें ए रक्ष । स्वामीजीना अति जतन करवा, कई प्रभु प्रत्यक्ष राघव०॥४३|| मोकल्यो जन राम पासे. खबर करवा हेत । रामजी 'सुग्रीच' सामा, मांडीरया नेत ॥ राघव०॥४४॥ कह कपिपती राक्षमानो, न ऊपजे विनाम। भेद लेही माहीलो हूं, भाखिमसो उन्लास ॥ राघव० ॥ ४५ ॥ नाम एक 'विशाल' खेचर, भावही मुविशाल । धर्मपक्षे धान्माए, धर्मनो प्रतिपाल !! गधय० ॥ ४६॥ मती मीता मणी करतां, चीननी नृप गाथ । सीजीयो अति गय गवण, कादियो ग्रही हाथ ।। गवण ॥७॥ चौग्ने चानणो ना गमे, इट न गमे गाच । लम्पटाने पीलन गमे, मामाची पान ।। गधन० ॥४८॥ जाई आगे हाथ गाही. गम आणे मांहीं। पार पडना लेई ऊंचो. मिन्या प्रभु गले चाही । गमय० ॥४९॥ पप गुलमोहनगमायण में से पहरी गमक विधाम विलोकी. सगो टकि इकटक पागेकी भीन पर गमागण तृतीय गण्ड। मन प्रलम्ब कंजारण लोचन, श्याम लगान प्रणत भय मोचन । मिंट का आयन उर मोहा, भानन अमित मदन मनमोहा ॥ नगन नीर पुशिल अति गाना, मनपरि धीर कही मृताता ।। दाल मुलगी- हम परे गार नाही. पूज्य तुम सुपमाग | आ7 नग दिन माहगेरे, देन दर्शन पाय ॥ राघव० ॥ ५० ॥ रोपकदोहा- श्रण गगहा गुनी आऊ, प्रभु भजन भयभीर । पाहि पानि हरण, शरण मुगद रघुनीर ।। भनु मदित मिन गिटागबोले वचन भक्त भयमारी। रेश मदिन परिमाग, कुमाल काठाहर वाम तुम्हाग ॥ दाल मुलगी आगा बेगो आज उपन्यो प्रेम । कार पुरेशीयो गाली, देवलाठी कम ।। गा० ।। ५१ ।। अपने घणा दिवगं, पल्या भला बोल । ईमानसिं जाना, मानी निमाल || गा० ॥५२॥ वन नाम पर छूटो, माईजी भन्न भूप । दरम मम गयो, चपन मग विम्य ॥ गय॥५३ || कई गमीय मानी न होहि । मुबाद जम नेम, आणीया ममजाडी । गयव० ।। ५४ रमका नाम नागकंग एनमलीम । रकन दातुननहियुवा हीम ॥ गयया ॥ ..॥ इदान, लंक आपाय। 32"दद अपना आया यमाय गवया ॥ १६ *दार ) बदनिट नही, प्रांग भावे जाम । पार्टीईटमल, दद जटा दाम 12 || मानांबादी मन, ममान । , y - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । लांब पणे चवड़ा पणे, जोजन वीश प्रमाण ॥२॥ वेला साधी वेगलूँ, कीधो कटक पडाव । राक्षस दल देखण तणो, आणे चित्त में चाव ।। ३ ।। धवनी शब्द सायर तणो, राम कटकनो साद । लंकातो बहिरी हुई, कोला हलनो नाद ॥ ४ ॥ क्षेपक ढाल मूलगी- मन्दोदरी 'रावण' समझावे, वार ए पुनरपि नहीं आवे, कन्ता? क्यूं दिलमें नहीं लावे | रामको तेज है भारी, प्रशंसे सारा नरनारी ॥ सत्य व्रत पालो ॥ ८२ ॥ क्षेपक सधैया- जेठ सुरापति जोय, एम आसाढत आणी, श्रवन न-बले सोस. जन्तु भाद्रवा वस जाणी। अममन है आसोज, कन्त कुल कानी वेसी, मिगसिर दीनो माग पोह माह आयां पेसी ।। नगराज भणे फागुन निकट, चेत २ कह सावरी, वैशाख एम वनिता वेद रखो मीत मती रामरी ॥ दोहा क्षेपक- पर सीया रो आवीयो, ऊनालो धन जान । वर सायत में जावमी, राज ऋद्धि मन्मान ।। वीगणी रहमी नहीं, रहमी सुधारी ! मोनारी जामी परी. को भाभी कुम्मारी।। धूलचंदजी फल, ढाल क्षेपक नर्स सावण साचो हो महाग मोजतिया मरदार। रघु पतिशायो हो म्हाग हठभीना भरतार, लेकेसर शुरु म्हारो जिय दुःख पायोहो. म्हारी अरजी लो अबधार ले || भेतो काट्यो भाई हो, शारे कार्ड आई मन मांग ।। रे ।। पेनो कुन्ति कमाई हो, कीधी काम अन्याय ॥ ॥२॥ जो कुशल चापो हो, चनो पो पाही मीन।ले.॥
. भी जैन पट गमायग्ण तृतीग गएड । जग मन मांही लागो हो.थे क्यों होवे फोगट फजीन ल० ॥३॥ आनी कामन आमी हो. थारे करना ही कोड उपाय || लं० ॥ मांगा जातो. शेती मांनो म्हारी माय ।। लं० ॥ ४ ॥ मुनि भी गतिमानती न डाल क्षेपक-तर्ज-सीता माता की- भाग मन्दोदरी महागन ? गंपदो मीता मुन्दरी ( टेर) धारे नार्ग महम अठार, प्यारे रायो तिनसे प्यार । मानी इन्द्राणी अपनार, रूपमे देमी पुरन्दरी ॥ भाग्वे० ॥ १ ॥ कला अजदन निगयो काज, जो तुम्ह मान लेयो महागज । नीना जाना दीग गज, पिछे पिछनामो पिया आप गाप ज्यू मी हुनन्दन ॥ मा० ॥ २ ॥ नट के बोल्यो गवण ताम, तेरी नाटी गलनमाम, अब नहीं ग्यो चालणको काम. परी जाय पार भी मिट जाग, क्यों लप २ करे लगुन्दरी ।। भागे ॥ ३ ॥ गगन द टाल पकनर्ज-मीजी ने पढ़ा भावे । भकम भूला मानी, आधर नावण रा बान, मन्दोदरी यूं सम- शा। मन मांगी मायया, वो गृथ लागी तुम माथ ।। मन्दी- ग पिन गु मममा ।। टंग ॥ १ ॥ गनी बछे मायया, थे किम गांवो, गज ।। मन्दी ।। नन्दा गला बदलीयों, और यर आगी गान ।। मन्दी० ॥ २ ॥ १४ाने श्रीन अप माफियो मीना लाय ।। मन्दो० ॥ मदनी दी. पर लंका दीपी है नाय ।। मन्दी० ॥ ३ ॥ र ना बने, या कामी कौन हवाल, ॥ मन्दी ।। मकिन नाति ना छोटे आपनी नार ।। मन्दी ।। ४ । निमी और दय कुल कमल, विनाय मन्दी। नियमाने अनी रमर पाय || मन्दी ।।" Taf निशानियाचा भकमन्दी ।। समरन दाग, सदन कंगन ॥ मन्दी॥६॥ दी गयो नई नहीला आपसीनान, मंगन, पागर ~~~~~~ - श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड । (२६६) नहीं जाने । कुणहै राम मुझआगे, देखत शिखी सर्प ही भागे ॥ सत्य ।।८३॥ दोहा मूलगा--- सम्बाहै शूगतणा, पहिरे वकतर टोप । प्रहस्तादिक सामन्ता. ओपे आछे ओप ॥ ५॥ कोई तो हाथी चढ्या, कोई हय असवार । कोई सिंहां ऊपरे, चहि मिक्या तेवार ॥ ६॥ कोई सर रथ बेसीया, कोई पलाणे महीप । कोई महिपीये वेसीया, कोई चिमान विशेष ॥ ७ ॥ आप आपणा साथम, आप आपणो जोर । महेलो देई स्वामीने, ऊभा गांधी कौर ॥ ८ ॥ क्षेपक ढाल मूलगी रावण को हुकमहीपावे, मिलण मिम निज २ घरआवे, सुभट स हुमनमे ऊमावे । मात कहै सनह पुत्र प्याग. लजाजे धमन म्हारा ।। मत्य ।। ८७॥ कायर की माता उमभाखे, शूर को मनमें डरराखे, आयां वंग ग्वाल परोताके। आपण सुबश नहीं चहीजे सुखे घर आयने रहीजे ।। मत्य ।। ८५।। स्वामी श्री चौधमल्लजी कृत क्षेपक साल तर्ज हांका मनिकर गर्व दिवाना- होपिया१ पांतर मत्ति जाईजो, ज्यूं त्यं का थे पाहा आईजो। नाहक देणोंजीव नाम ये मति मंडाई जोरे ।। पिया ॥१॥ मियां बीवी दोनोंहो राजी, काई करे सकमारे काजी । जराफ अर्जी मान मपलसे धे गम साईजोर ॥ पिया ॥२॥ पटा पुलोरी गर्न है किनके. दायपडे नी दीजो उनके । गुप नुप सेरोनाक धणीरी निकर चुगदको भी ॥ पिया ३ ॥ पाल पणामें टावर लारे. उनको तुम्ह विन गुप मचाले । होली कोण हवाल पिया, हम मनमें लाईलोनी ॥ पिया ४ ॥ जपर काम अगला को कहवे, मुस्किल पाडो आरन देवे। जोग मापारी महर पिया थे मत घबराईजोजी पिया || ५ ॥
। श्री जैन पर गमागण तृतीय गण्ड । । जगमन मांही लागोहो.थे क्यों होवे फोगट फजीत ल० ॥३॥ कामन आगीहो, थार करतां ही कोड उपाय ॥ लं० ॥ मांगा जागीतो. तो मानो म्हारी माय ।। लं० ॥ ४॥ मन भी गारामजी TT टाल पा-तर्ज-सीता माता की- भाग मन्दी महागज ? गंपदो गीता गुन्दरी (टेर) या नाग माग अठार, प्यारे रागो तिनसे प्यार । मानो इन्द्राणी आगार, रूप देगी पुग्न्दरी ।। भाग्ने० ॥ १ ॥ THI मदन गियो कान, जो तुम्ह मान लेगो महागज । नीता माता दी गन, पिछे पिटनामो पिया आप साप ज्यू प्राधान्दरी ॥ भा० ॥ २ ॥ नट के बोल्यो गनण नाग. नेरी नाटी किलनमाम, अब नहीं ग्यो चालणाको काम, पर्ग जाय का भी मिट गाय, गोला को लगुन्दरी ।। मागे ॥ ३ ॥ गरमल दानापन गगानी नपा भावे । *म मूला गरी, आवरण ग बाल, मन्दोदरी युगम- दा' । मनः मीना गायघा, गां गृध लाया तुम गाय ।। मन्दी- दः । पिने वं मम ।। टेर ॥ १ ॥ मावा किम गांगी गा॥ मन्दी० ॥ हा गया बदलीयी. और रघुवर आयो गा॥ गन्दी ।। २ || ११ मारे जाना पाप किया मीना लाय । मन्दी । करेन्दी दाग लंका दावा है नाय ।। मन्दी० ॥ 3 || TT नाम लीन, मी कामी कीन दयाल, ॥ मन्दा । * तिनका छोट आपनी नार । मन्दी ।।४।। -- निकी भोर व कुल कयर विनाम ॥ मन्दी ।। मान मना रवर पाय || मन्दा !: !! Ta निशानाम ॥ मन्दी ।। मो. 7 अगदर्दक पटी}} 3:27 Par गर. नांदगार .
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२६) नहीं जाने । कुणहै राम मुझआगे, देसत शिखी सर्प ही भागे । सत्य ।।८३॥ दोहा मूलगा -- सम्बाहै शूगतणा, पहिरे वकतर टोप । प्रहस्तादिक सामन्ता. ओपे आछे ओप ॥ ५॥ कोई तो हाथी चढ्या, कोई हय असवार । कोई सिंहां ऊपरे, चढि मिल्या तेवार ॥ ६॥ कोई सर रथ बेमीया, कोई पलाणे महीप । कोई महिपीये बेसीया, कोई विमान विशेष ।। ७ ।। आप आपणा साथ, आप आपणो जोर । महेलो देई स्वामीने, ऊभा वांधी कौर ।। ८ ।। क्षेपक टाल मूलगी गवण को हुकमहीपावे, मिलण मिस निज २ घरावे, सुभट स हुमनमे ऊमाचे ! मात कहै सुनहु पुत्र प्यारा, लजाजे दृधमत म्हारा ।। सत्य ॥ ८७ । कायर की माता उमभाखे, शूर को मनमें डरराखे, आयां चंग बाल परोताके। आपाणे मुजा नहीं चहीजे सुखे घर आयने रहीजे ।। सत्य ॥ ८५॥ स्वामी श्री चौधमल्लजी कृत क्षेपक ढाल तर्ज हांक मनिफर गर्न दिवाना- हांपिया? पांतर मति जाईजो, ज्यं त्यूं का थे पाला आईजो । नाहक देणोंजीव नाम थे मति मंडाई जोर ।। पिया ॥१॥ मियां चीयो दोनोंहो राजी, काई करे सकमारे काजी। जगफ अर्जी मान मपलले धे गम साईजोरे ॥ पिया ॥२॥ पटा पुलोरी गर्ज है किनके. दापपरे नो दीजो उनके। गुप चुप सेगेनाक घणी निजर चुगहनो मी पिया ३ ॥ भाल पणामें रावर लारे, उनको तुम्ह विन कुग पाले। होमी कोण हवाल पिया. इम मनमें साईजोजी पिया १ ॥ जपर काम अगडा को कहो, मुस्किल पानी पावन देवे । जोग मापारी महर पिना थे मन पपईजोगी !! पिया ॥ ५ ॥ कर - *) श्री जन पद गमायण तृतीय सण्ड। कार की नारी इमबोली, हल्लं लारे चाली भौली। गौममा क सुभटांने, नथमाल मनाई जोजी ॥ पिया ॥६॥ (नीराना का निज पतिसे कथन) म्यामी श्री चौथमलजी व शेपक डाल तर्ज गांधणजीरी- मलिनांगी नाणी लवेहो नग्यरजी. थे राठोडी रजपूत भागमत मा ईजोहो नम्वरजी उनक गम्भ स्थल भान जोहो नर० हाथी इन्दा मनात अजग मति लाई जोहो । नर ॥१॥दपट झपट रिपु दागजोती नग० म्हारे लाजो मोतियन कीमाल, भूलमन आईजो हो ना । मग करजोमति हो नम्बरजी अहंकार निगुण आगार । म गुन गाई जोहो. नर०||२|| मामी छतियों घड़जो हो नर० थांग नाम अमल, ग्ण पीर ॥ अरज महागजमं हो ना। कायरता करती मनिहो ना ज्यां लगे कलेजेनीर | वीर गधु वाजगं हो ना 1 ३11 मतो ग्ला भणीही ना थे जगक कीजो देर ॥ लेर में आग हो ना शावमिधावी मिद कगे हो नग० बांध को हो गरनाथ मुरु, ध्याना० ॥४॥ दोहा मुलगी मार्ग अनि सतहो. मगंना मुलनान । याय की गुप्ता. ग्य बंटी गमान ॥ १ ॥ वि: मन फर्ग, कम्मकाण दादन्न । दाहाहा, पायो अति मग मन्तः ॥ १० ॥ वा, इन्द्रजीती जाय। पगार, दमा, दण्टग होय ॥ ११ ॥ यीशा, 'मया गन्दादि अनेक । '' मी मट गमन्न मटेक ॥ १२ ॥ नानकोट। - कर्मचन्द , मेगन rani pari xzटमादानायी. .
AA- श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( २७१) रावण सामो आवही. हुंसियारी में होई ॥ १३ ॥ धूलचन्दजी कृत. ढाल क्षेपक तर्ज हारे कायथड़ा रंगरो रसियो महिला में हारक ललना ' रावण ' लड़या आवीयो, हां-होईने ढुसीयारो रे ललना गजरथ ऊपर वेसने हारेक-धरतो अंग अंहकारोरे ललना। जगत्रय तृण सम जाणतो, हारे-रावणजी तिणवारोरेललना राणा हारे-विविथ परे कर वीस में, हां ? आयुध धरतो आपोरे ललना। थर हरावे मेदनी, हां-धरतो अति सन्तापोरे || ललना ॥ रा०।२। हां-वांका जोध सुभट जीके, हां-पौरुप धरता पूरोरे ललना। एक २ थी आगला, हां-शूरां मांही शूरोरे ललना ।। रावण ||३|| हां-अक्षौहणी चउ सहस ले, हां-चालण लागो जामोरे ललना || लंका बारे नीकलतां, हां-शुकनथया निःकामोरे ।। ललना ॥ रा० १४१ हां-चिप बाबा सर जीमणा, हा-सामो वाजे वायोरे ललना । चीली बोवाडा करे, हां-दिशा गती देखायोरे ललना ॥ रावण ।।५।। हां-शकुन बारन्ता चालीयो, हां- वरजे लोक अपारोरे ललना । अभिमानी मानेनहीं. हां नहीं मिटे होषण हागेरे ललनारा०१६ ढाल बया लोशमी- तर्ज खडको- (फुलणा छन्दमेंभी गामफनेहे) आवीयो रावण लोक डरावणो, रावण रावलो पार नावे । छाईयो अम्बर कटक आडम्बरे, पयर निज परतणी फोन पाये||१ कोई हरिकेतु कोई रे अष्टापद, केतु कोई गजराज फेतु । गोर मंजार अहि कुर्कुटर फतुने.सुभट स्वामीनपा अधिक हेतु आ. २६ दण्ड कोई ग्रह खड़ग कोई संग्रह, कोई निज मुष्टिय सेल३ साई । कोई मुद्गर परिचायट कुटारीका शूल माही मनमें ऊमा ।आ. ३१ चीन योजन लग गम दल विस्तरे. अपर पनाम जोगन प्रमाणे । गुभट बोलावना धैये डोलावता. एकर एफनो भधिक नाणे मा. आप म्वामी नणी इलाध्यता अनि धणी करत निन्दापर यामी । १ सिंहका चित्रपाली यज्ञा (पेनु पदा)। पूरथा पर । ४ मोगल १५ एमालीप्रसंगा (सागर) - 42 dada 10) भोजन पन रामागण सूतीग गए। सर की नारी इमयोली. हवं लारे वाली भौली । पौषमा को गुमटाने, नथमाल मनाई जोजी ॥ पिया ।। ६ ।। (नोगहना मा निज पनिसे फथन) शामी श्री चौथमलजी रन पर ढाल तर्ज गांधणजीरी- नलिनांगी पाणी लपेटो नम्वरजी. थे राठोडी रजपूत भागमत मा मा नबजी उनक गम्भ स्थल भान जोहो नर० हाथी न्दा मग मनिलाई जोहो । नर ||१|| दपट झपट रिपु Train ना० म्हारे लाजो मानियन कीमाल, भूलगन आईजो हो गा। मान करनामनि हो नग्माजी अहंकार निगुण आगार । मम गुन गाई गोही. नर०॥२।। मामी छगियों झपड़जी हो नर० गि नाम अगर रणधीर || अग्ज महागजग ही ना कायरता परी मारिलो ना ज्यां गे कलेजगीर | वीर वधु वाजगं ही नर 1 ३॥ मतावान्ता भणीही ना० जगक पीजो देर ॥ लेर i in हो ना प्रमिधात गिर गेहाना बीच की हो माय पर ध्यान ना ॥१॥ दहा मुलगी-- inादी, गंना गुनान । धर्म पानी, ग्थ बेटो गजान || १. ॥ काम री कुम्भकर्ण दादन्नः । रा, माया अनि मय मन्तः ||१०|| "", THदा इन्द्रजीती जाय। नवर, दाट होय ॥११॥ marth, 'मयः गन्दादि अनंक। पामान, मट मामद गटक 1100 artी, पदपाय को। A t - trTarryालनमा man श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२७३) 'विघ्न' मारीलीयो, 'दुरिते' 'शुक' मारी जमगेह वास्यो |आ०१२॥ 'सिंहजघन्ये' हण्यो 'पृथितवर' वानरे, एटले सूर्य पण अस्तपामे । दोनों दल हट्या जे मुआते घट्या, प्रातः फरी मांडीया सुयश कामे || आ० । १३ ।। कपि सुभट मध्ये गजरथ वैमी नृप, आधीयो विविध आयुद्ध धारी । रामसैना प्रते प्रवल बल धारके, माचीयो एह संग्राम भारी ।। आ० ॥१४॥ 'गवण' राय हुंकार करवे करी, राक्षस चरण रण विषय रोपी रहीयो । वानग पग खस्या जाय पाछा धस्या, अवसर ताम 'सुग्रीव' लहीयो । आ० ॥१५॥ सलह सन्नाह करी धनुष्य वर कर धरी, राक्षसांने मुसे जाम आवे नाम 'हनुमन्त' भाखन्त 'सुग्रीव' मु, देव ! अब तुम रहो आप दावे ।। आ० ॥१६॥ क्षेपक सवैया- वानर ईश चढे रपमेंजद, पौनके पूत पुकार करी है । तिष्टरहो तुमपृष्ट रखोमुझ सृष्टिको नष्ट करीके करीहै ।। मानत ना तल नानहूमें चलको वचले हमसे झघरी है। योंकह मान लयो सयपे, ग्थ पौनसे वेग सवारी करीहै ॥ १ ॥ ढाल मूलगी- चढ्यो 'हनुमन्त' दुर्दन्त दलने दले, राक्षमान मुस आधी रोके। ताम वाचो धनुष्य वाण सम्भाल के, 'हनुमन्त ' बीर ने आपी रोके ।। आ० ॥ १७ ॥ हनुमन्ते' असघन छेदी चाया तणां, कहै बूढा हूं तो कोई चाहै । पंच परमेष्टी गुण परभव साधणो, बापजी लोटपो हेरे लाहै। आ०॥१८॥ एम सुणी ताम 'पजोदर' आवीयो, कह रे अज्ञानमें तूं काई बोले । आव उरहो चलीजरे अतुलीवली. हम तुम जोड ले एक तोले ।। आ०॥१९॥ कसीनी परे शब्द हियड़े धरी, आयीयो वीर हनुमन्त हामी । नोर्ड मारी लीयो बसनो तण कीयो. पालले कोई रासीन यानी मा०॥२॥ जागूमाली२ नृप नन्दन आयो, मोई ऊपाडी के नांगो दीनो}} १माली राक्षस । रापण्पुन। रे RArmane (७:) श्री जनपद रामायण तृतीय सएछ । नंरे अ त कुणरे अछे, आपममें रे भारखे घणेरी । आ० ५। गोगनारे निष्ट रे लिए रे, मत डरे आयुद्ध अलग नारवी । नहीं कर एक आयुद्ध गम्भालीले, आधी उन्हो बजाव चोट चासी ॥६॥ पाणपणा विविध भानिनणा. चक पग्धिा गदा फरसी खांडा । दरमुगर की चोट करवे गरी, गक्षमा यांनर लडता चांडा ||७|| पानग गजना जेमनन भाजता तेग गक्षमा तब जाय भागा । हमदाउदनबलवन्त अति, वानगमाथेतन आयलागा।आ।८ दाल चोप-तर्ज हारे कायथडा- कललना 'हम' प्रहम्नज आगीया. हार-मामा 'नल' ने 'नीलो' बरना विविध प्रकारे गुद थयो, हार-झंझे चारुही वीगेरे ललना गाया आगीयो।। देर॥६॥ होमगार अगनीनो, हां नल ऊपर मेलन्तो रे ललना । र कम्न दलीयोरे, हां-मनमें गेप घान्नोरेललना ग0 ||७|| होगा भर्गगण आफल्या, हां-कमान गयी कायोरे ललना । दिन आगमा मार्गया, हां-गमने दोनं मायोरे ।। ललना ग.1८1 दाल मुलगी मरे मागयो 'नील' 'प्रहप्त' ने. अम्मा पृष्पनी वृष्टि हुई। 'मदर गाना गा र दल लागीयो, प्रातः नृप मौकरे फोन जुर्ट }. 10-31.5 गया 'मान' शुक्र' 'माग्ण' 'सिंहग्य प्रवाय' 'बन्द गरिने उद्रामा' | 'मकर' 'या' 'भूप' 'कामान 'ग श्री विजय विमागव' सम्म मकामा ।। आ - 11:00 न' र 'मला 'यिन' नामथी, 'आक्रोग' 'पृप्यान' न' ना' ! 'दुर्ग:' 'नन्दन' 'कर प्रीनि' 'मुदु' वानग र अक्षर !! : 1122 || गय 'मागच' 'मन्नाप' अजाद नन्दन याना निमाम्यो । गक्ष 'उटाम' कपि दमट गाग्री का नाम है ये मत्र गरहनी गाथा में गायों, नगद गदही गम मेना की नाक, मुमट - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२७३ ) 'विन' मारीलीयो, 'दुरिते' 'शुक' मारी जमगेह वास्यो।आ०१२१ 'सिंहजघन्ये' हण्यो 'पृथिनवर' वानरे, एटले सूर्य पण अस्तपामे । दोनों दल हट्या जे मुआते घट्या, प्रातः फरी मांडीया सुयश कामे [[ आ० । १३ ॥ कपि सुभट मध्ये गजरथ वैमी नृप, आवीयो विविध आयुद्ध धारी । रामसैना प्रते प्रवल बल धारके, माचीयो एह संग्राम भारी ।। आ० ॥१४'रावण' राय हुंकार करवे करी, राक्षस चरण रण विषय रोपी रहीयो । वानग पग खस्या जाय पाछा धस्या, अवसर नाम 'सुग्रीव' लहीयो॥ आ०१५|| सलह सन्नाह करी धनुष्य वर कर धरी, गक्षसांने मुसे जाम आवे । ताम 'हनुमन्त' भाखन्त 'सुग्रीव , देव ! अब तुम रहो आप दाये ॥ आ॥१६॥ क्षेपक सवैया- चानर ईश बढे रणमें जद, पौनके पूत पुकार करीहै । तिष्टरहो तुमपृष्ट रखोमुझ सृष्टिको नष्ट करीके करीहै ।। मावत ना तल बानहमें पलको वचले हमसे झघरीहै । योंकह मान लयो सरपे, ग्ध पौनसे वेग सवारी करी ॥१॥ डाल मूलगी- चढ्यो 'हनुमन्त' दुर्दन्न दलने दले. राक्षसोन मुख आधी रोके। ताम बायो१ धनुष्य वाण सम्भाल के, 'हनुमन्न' चीर ने आवी रोके ।। आ० ।। १७ ।। 'हनुमन्ते' असपन छेढी चापा तणां, कई ढा तूं तो कोई चाहै । पंच परमेष्टी गुण परभव माधणो, बापजी लोटवो देरे लाहे ॥आ०॥१८॥ एम गुणी ताम 'पजोदर आचीयो, कह रे अज्ञानमें तूं कोई बोले । आर उरहो चलीजेरे अतुलीपली, हम तुम जोछे एक नोले ॥मा०॥१९॥ नरानी परे शब्द हिगड़े धरी. भावी यो वीर हनुमन्न' हाफी । मोई मारी लीयो वजनो तृण कीयो. पालने कांई रागीन पासी ॥२०॥ जम्मालीर नृप नन्दन आदीरो. मो? साडी के नापी दीनो। मालीराम गयनयुध । रे Amanantaraantar (30) श्री जैन पद रामायण तृतीय राण्ड । गझल महोदर ' प्रमुख बहुला मीली, अंजना अंगज घेरी लीनो HTTO ||२|| कोई नो भुज विप कोई तो मुख विपे. कोई तो पग मिकोई जानी। कोई नो से कीया सयल मारी लोया, हनु- मग लोग्नी गम तानी || आ०॥२॥ नोपा गवगा पान गरे कपिके कग्ने उल्टा चम तामम ना चपलाई। ना झगरी जवा जल में, मनकी चपलासुत पानसी नाई ।। जान गंधानमनितो छुटियो ठीकन प्रानकी बाजी जीताई । पास है पायानीक रंगहै रंगदै रंगहै टनके पितु माई ॥ १ ॥ टान मुलगी- माया बीच बटवानन शोमतो, गक्षमा बीच एबीर गोहै। भागा मगल ही ऊगनो गर ज्यु. जैमरे निमिग्नो ग्वोज गोहै ।। १ ॥ २३ ॥ गगां भग दगी अति कोपीयो. 'कुम्भकर्ण ज नपधाया। देव गान निम शल हाणे ग्रायो, कायगं धीरज या गया। आ॥ २१॥ कार्ड पाय हण्या कोई कपुर२ हण्या, कहा दाया अधिक त्राग्या कोर्ट मुद्गुर हुण्या कोई त्रिशले हाको अन्यान्य कपि एम विणाम्या |आ०॥ २५ ॥ देगी मकान गावी पायो, धाईया 'दधिमुग्य' ने 'महेन्दो' । गान्ट' गट' प्रभ गालक, धार्टया पटही म्होटा 10.20६: ए पट भृपने 'कुम्भकर्ण' व लट्टे अम्बर देय दोन विविध का बागना मंद यग्गायी, गांगिणी भापमें कन्न ?: नीट याणं कर्ग नीट विक्रयणा, गग रायन कीना जागृत वाण में नाम मुग्रीवजी, नेर मयलाई न । २८ ॥ 'रम्मक' जतणी ग्यन म्याथी, मग दानाही ग ! मृदगा काग्री कपिपनि ऊपरे, मा. अंगने वायवाना कि म म वृक्षो। मृदगी माज के नाम दुला स?" १ 3 - श्री जैन पद रामायण तृतीय सण्ड । ( २७५) कीया, सुग्रीव रायनो रथ प्रत्यक्षो। आ०॥३०॥ 'सुग्रीव' रायजी एक शीला मोटकी । रावणानुज' तणे शिरही पाहे । मुद्गरे तोडी नांखत सो दश दिशे. रजतणी पृष्ठी अधिकी उडाडे ||आ०॥३१॥ अम्बर छाहीयो काई सूजेनहीं. लोकना नयन मुख रजही भरीया। ताम, सुग्रीव जल वाणने मूकवे. रजही वैसाडी प्रकाग करीया ।आ० ||३२|| ताम वानरपति गक्षमां ऊपरे. रोप मोलियो तडित घात। तेह ने कोई उपचार लागेनहीं. मछियो तबकरे धरणी पाना आ० ॥३३॥ रावण उठीही ताम मंग्रामने ताम सुत इन्द्रजीत आई आगे। वीनवे वापने छोड मन्तापने. कवण आगे तूंनो युद्ध मांगे। आ॥ ॥३४। नहीं यम वरुण नहीं नहींया 'कुबेरजी', 'इन्द्र' सोतो तोसे नांय जीतो । ओघर चाकर ए अछे वनचर, ऊखलो कूटयो छेरे रीतो ॥ ३५ ॥ आपो आदेश मुझ एह संग्रामनो. दग्धी देसजो काम म्हारो। बापडा वानरा पान पाने करं, जाणजो जाईयो तोरे थारो ॥ आ॥ ३६ ।। होई सन्नट्ठ वद्ध ने युद्ध में आवीयो स्वमुखे सहुने ताम प्रचारे । किहार सुग्रीव हनुमन्न किहां लक्ष्मण राम जे चोट म्हारी सहारे || आ ॥ ३७॥ स्वामी श्रीरावतमलजी म. फुत क्षेपक टाल तर्ज-ख्यालको सुरपति जित आयो, सैना घबराईर श्री रघुनाथकी ।। टेर ।। इन्द्र जीत को आय देखी, भट सहु भागन लागा। पड़ी खलबली पेटमेसरे है. प्राण पड़न की जागाजी ।। सुर॥१॥ लक्ष्मण लुक वेठांकिहां मरे लेकर विलकी औट । विल चाहीर झट आउरोमर, चाय हमारी चौटनी । सुर ।। २ ।। कपिपति यहां से किहां गयोमर, ग्यो कहां रघुनाथ । रण भूमीमें रंग मंगरे, वेग यतार हाधनी ॥ सुर ।।३।। बाल मृनगी- त्रासोया वानरा माथ इम बोलीयो, नांसी हथियार तुमलग होवो । अगरे । सन्ताने माग्या नियममा धेरै धारीज्ञ नींद A देखे तमासो। विविध पर बाणनो मेह यग्मावतो, योगिणी आपमें सुग्रीव राये तब भांजी राल्यो । मुद्गर करग्रही कपिपति ऊपरे, (२७४) श्री जैन पद गमागण नीयन राक्षम 'महोदर ' प्रमुख बदला मीली, अंजना अंगज घेरी लीनो |आ०॥२१॥ कोई तो गुजविणे कोई तो मुन विणे. कोई नो पग विपे कोई लाती । कोई तो कमे कीया मगर मागे लोगा, हनु मन्त वीरनी रीस तानी || आ० ॥२॥ पा मगंगा बान चले कपिके करते कुलटा नाम नामम ना नपलाई। ना झखरी जवता जल में. मनकी चपलागुन पानी नाई ।। वान मंधानरु चिनो छुटियो टीकन प्रानकी बाजी जीनाई । बोलत है पग्वाहनीक रंग रंगी रंग इनके पितु माई ॥ १ ॥ दाल मृलगी- सायर वीच वडवानल१ गोमतो, गक्षमा बीच ए वीर मोहै । भांजीया मयल ही ऊगतो मर ज्यु. जैमरे निमिग्नी शोज सोहै। आ० ॥ २३ ।। गक्षमां भंग देवी अनि कोपीयो. 'कुम्भकर्ण' ज तब आप धायो । देव ईशान जिम शल हाये ग्रयो, कायगं धीरज थर थगयो ।। आ० ॥ २४ ॥ कोई पाये हण्या कोई कपुर हण्या, कोई हाथै हण्या अधिक वाम्या । कोई मुद्गुर हण्या कोई त्रिशूले हण्या, कोई अन्योन्य कपि एमविणाम्या आ०॥ २५ ।। देसी बलवन्त 'सुग्रीवजी' धाईयो, धाईया ' दधिमुख' ने ' महेन्दो। धाईया 'कुमुन्द' 'अंगद · प्रभु शालक ३, धाईया खटही म्होटा । नरेन्दो आ० ।।२६॥ ए खट भूपने 'कुम्भकर्ण' ज लड़े अम्बरे देव करत हासो ।। आ० ॥२७॥ नींद बाण करी नींद विकूणा, राक्षसे नींदवल शयन कीना। जागृत वाण सं ताम सुग्रीवजी, तेरे सघलाई ऊठाई लीना ॥०॥ २८ ॥ 'कुम्भकर्ण' ज तणो स्थने स्वारथी, आधीयो सो नहीं टलेही टाल्यो शा०॥२९॥ अंगने वायरे वानरा गिरिपड़े, गयवर स्फर्शथी जेम वृक्षो। मुद्गरे भाजके ताम टुकडा १ समुद्र की अग्नी । २ खुणी । ३ भामण्डल ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२७५) कीया, सुग्रीव रायनो रथ प्रत्यक्षो । आ० ॥३०॥ 'सुग्रीव' रायजी एक शीला मोटकी । रावणानुज' तणे शिरही पाहे । मुद्गरे तोडी नांखत सो दश दिशे. रजतणी वृष्ठी अधिकी उडाडे आ०॥३१॥ अम्बर छाहीयो कांई सजेनहीं. लोकना नयन मुख रजही भरीया। ताम, सुग्रीव जल वाणने मकवे. रजही वैसाडी प्रकाग करीया ॥आ० ||३२|| ताम वानरपति गक्षमां ऊपरे. रोप मोलियो तडित घात । तेह ने कोई उपचार लागेनहीं. मूछियो तबकरे धरणी पाना आ० ॥३३।। रावण उठीही ताम संग्रामने ताम सुत इन्द्रजीत आई आगे। वीनवे चापने छोड सन्तापने. कवण आगे तूंनो युद्ध मांगे ।। आ ॥ ॥३४ । नहीं यम वरुण नहीं नहींया 'कुवेरजी', 'इन्द्र' सोतो तोसे नाय जीतो । ओघर चाकर ए अछे बनचर, ऊखलो कूटयो छेरे रीतो ॥ ३५ ॥ आपो आदेश मुझ एह संग्रामनो, दुग्थी देखजो काम म्हांगे। चापडा वानरा पान पाने करूं, जाणजो जाईयो तोरे थारो ॥ आ॥ ३६॥ होई सन्नद्र यद्ध ने युद्व में आधीयो स्वमुखे सहुने ताम प्रचारे । किहार सुग्रीव हनुमन्त किहां लक्ष्मण राम जे चोट म्हारी सहारे || आ ॥ ३७ ।। स्वामी श्रीरावतमलजी म० कृत क्षेपक ढाल तर्ज-ख्यालको सुरपति जित आयो, सैना घबराईरे श्री रघुनाथकी ।। टेर।। इन्द्र जीत को आय देखी, भट सहु भागन लागा। पडी खलबली पेटमेसरे है. प्राण पड़न की जागाजी ॥ सुर॥१॥ लक्ष्मण लुक चैटांकिहां सरे लेकर विलकी औट। विल बाहीर झट आउरोमरे. चाख हमारी चौटनी ॥ नुर ।॥ २ ॥ फपिपत्ति यहां से विहां गयोमर, रयो कहां रघुनाथ । रण भूमीमें रंग संसरे, वेग बनायू हाथजी ।। मुर ।। ३ ।। बाल मृतगी-- त्रासोया वानरा साथ इम बोलीयो, नांनी इपिपार नुमभन्नग होयो । अणरे सन्तान माग्या नियममुन, धेरै धांगनई नींद ६ पुम्भकर्ण।
-- (२७१) श्री जैन पर गमागण नायगा। राक्षम ‘महोदर ' प्रमुग्प याला मीली, अंजना अंगन धेरी लीनो IIT०॥२१॥ कोई तो भुज विश कोई नो मुग्न निषे. कोई नो पग विपे कोई छानी। कोई नोगे कीया गगल मार्ग लोया, हनु. मन्त चीरनी रीम ताती || आ० ।। २२ ।। যা যা धान चले कपिके करते कुलटा चाल तामग ना नपलाई । ना झसरी जवना जल में, मनकी चपलागुत पानी नाई ।। वान संधानरु ऐचिवो छुटियो टीकन प्रानकी बाजी जीनाई। बोलत है परवाहनी के रंग रंग गह इनके पितु माई ॥ १ ॥ दाल गुलगी- सायर वीच वडवानल१ गोमतो, गक्षमा बीच ए बीर मोहै। भांजीया मयल ही ऊगतो मर ज्यं. जैमरे निमिग्नो ग्योज सोहै।। आ० ॥ २३ ॥ गक्षमां भंग देगी अति कोपीयो. 'कुम्भकर्ण' ज तब आप धायो । देव ईशान निम शूल हा ग्रयो, कायगं धीरज थर थगयो । आ० ॥ २४ ॥ कोई पाये हण्या कोई कपुर२ हण्या, कोई हाथे हण्या अधिक नाम्या । कोई मुद्गुर हण्या कोई निशूले हण्या, कोई अन्योन्य कपि एम विणास्या मा०॥ २५ ॥ देसी चलवन्त 'सुग्रीवजी' धाईयो, धाईया ' दधिमुम्ब ' ने ' महेन्दो'। धाईया 'कुमुन्द' 'अंगद' । प्रभु शालक ३, धाईया खटही म्होटा नरेन्दो ॥०॥२६॥ ए ग्वट भूपने 'कुम्भकर्ण' ज लड़े अम्बरे देव देखे तमासो । विविध पर पाणनो मेह वरमावतो, योगिणी आपमें करत हासो ।। आ० ॥२७॥ नींद वाण करी नींद विकूणा, राक्षसे नींदवल शयन कीना। जागृत वाणसं ताम सुग्रीवजी, ऊठाई लीना ||०॥ २८ ॥ 'कुम्भकर्ण' ज तणो रथने स्वारथी, सुग्रीव राये तब भांजी राल्यो । मुद्गर करग्रही कपिपति ऊपरे, आधीयो सो नहीं टलेही टाल्यो मा०॥२९॥ अंगने वायरे वानरा गिरिपड़े, गयवर स्फर्शथी जेम वृक्षो । मुद्गरे भाजके ताम टुकडा १ समुद्र की अग्नी । २ वृणी । ३ भामण्डल । सघलाई - -- श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२७५) कीया, सुग्रीव रायनो रथ प्रत्यक्षो । आ० ॥३०॥ 'सुग्रीव रायजी एक शीला मोटकी । रावणानुजर तणे शिरही पाहे । मुद्गरे तोडी नांखत सो दश दिशे. रजतणी वृष्ठी अधिकी उडाडे |आ०॥३१॥ अम्बर छाहीयो काई सजेनहीं. लोकना नयन मुख रजही भरीया। नाम, सुग्रीव जल वाणने मकवे. रजही वैसाडी प्रकाश करीया ||आ० ||३२|| ताम चानरपति राक्षसां ऊपरे, रोपनं मोलियो तडित घात। तेह ने कोई उपचार लागेनहीं. माछियो तबकरे धरणी पाता आ० ॥३३।। रावण उठीही ताम मंग्रामने नाम सुत इन्द्रजीत आई आगे। बीनवे वापने छोड मन्तापने. कवण आगे तूंतो युद्ध मांगे ।। आ ॥ ॥३४ । नहीं यम वरुण नहीं नहींया 'कुबेरजी', 'इन्द्र' सोतो तोसे नाय जीतो। ओघर चाकर ए अछे चनचर, अबलो कूटयो छरे रीतो ॥ ३५ ॥ आपो आदेश मुझ एह संग्रामनो, दग्थी देखजो काम म्हांगे। वापडा वानग पान पाने करु, जाणजो जाईयो तोरे थारो || आ ।। ३६ ॥ होई सन्नद्ध बद्ध ने युद्ध में आधीयो स्वमुखे सहुने ताम प्रचारे । किहार सुग्रीव हनुमन्त किहां लक्ष्मण राम जे चोट म्हारी सहारे ।। आ ॥ ३७॥ स्वामी श्रीराचतमलजी म. कुन क्षेपक ढाल तर्ज ख्यालको सुरपति जित आयो, सैना घवगईरे श्री रघुनाथकी ।। टेर ।। इन्द्र जीन को आय देखी, भट सहु भागन लागा। पड़ी खलबली पेटमेसरे है. प्राण परन की जागाजी ।। गुर॥१॥ लक्ष्मण लुक वेठांकिहां मरे लेकर विलकी औट ! विल चाहीर झट आउरोसरे. चास हमारी चौटजी ॥ नुर ॥२॥ फपिपति यहां से किहां गयोमर, ग्यो कहाँ रघुनाथ । रण भूमीमें रंग भुमरे, वेग वनाम हायनी ।। नुर ॥ ३ ॥ दाल गलगी- त्रासोया वानरा माय इम पीलीयो. नांसी हथियार तुमश्लग होवो । अणरं सुझलाने मान्या नियममुम, धेरै शरीजई नींद मुम्भरा। M RAA MPAN भी गमाग httre | गोगी । बा ।। ३८ ॥ मा म गाही, गान गगा बागी अभियो। गगनान गंगा गाग, मात्र Manा ३' ।। marriगामा EMAIT iiii पर पनि गायोरे मरना यानि - trail गलना गणमा जागा देगा। गान गंगना- For tra गाना || सदर ना हो, ।। FIRiगरे । ग १ ॥ मजगी गि दियोमा गागा पाहोगे । ki Aurn, mili अमिक रोग ।। ४० Anim ER IRRITrm IELTim, Enा आदि गणारे माना न गयो mil, ittinाणार सरना !! गगण || ११ || #traitr aft पागनो, का मूक माण निगा शेर सना । गम मीमी, नाम (ने) गंग Syn FARAL IN IT ||१२|| E-RI रागन, ct-नांग्या on गिलागेर सामना । मागणी मालीया. नानी तिलाशेरे मामा || गण ॥ १३ ॥ गी--- ragiri, Ananta' पानी, 3 मुगः न रे गोई । गग silap mms गीगा, नाग और बाग कोई ।। 'प्रा० ।। ११ ॥ पारमा उपचार हाई अलीगी, रोग पारगी आणि गण | और मग माग गदा पापणे, दिगो गम रशी शरणी ॥ 11 || १२ माग अनाग का गीगी, RELET'. । पानी निकाली दागोगा, 1 श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२७७) लटकतो जाय तेहनो शरीरो भा०॥४३॥. लहु कहै रामसं रावला बलविणे, प्रवल बल धारका एह होई । आनन१ अधिक ऊपर अछे तोही पण, सोह पावन्त ए नयन दोई ॥ आ०॥ ४४ ॥ बांधोया एह दो रायने नन्दने, लंक मांही जब लगे न जाई । तब लगे उद्यम कीजीये आकरो, पामीये सुजश अति एह छोड़ाई ।। आ० ॥४५॥ 'कुम्भकर्णे' 'हनुमन्त' जी काखमें, चापियो एह विपरीत मांही । विना 'सुग्रीवः 'हनुमन्त' 'भामण्डल', सैन सघलो अछे शून्यप्राही ।। आ० ॥ ४६ ।। मुनि श्री गवतमलजी कृत क्षेपक डाल तर्ज-ख्वाल की कोई अकल ऊपावोरे, पन्धन छुडवावो जावो वेगे सं ॥ टेर ।। सुनो श्री रघुनाथ' तिहारे, सैना के शिरमोड़ । अधिपति अपनी फौजका सरे, ताजा फल लीया तोडजीकोई।।। तीनों विनां तिहारी सेना, सपली दीसे सुनी। रसवती नव २ भांतकीसरे, एक कसर अन्नलूनी ॥ कोई ॥२॥ सुन्दर वर्ण शरीर श्यामजी, जिणमें रयो न जीव । काम नगारी कामिनियों का. पहतो परभव पीवजी कोई॥ ३ ॥ कह 'अंगद' कर जोडने मरे, राम ! गरीब निवाज ? हुक्म हुवे हनुमन्त वीर फो, लाऊं छुटाई आजजी ॥ कोई ॥४॥ हुकम हुवां सूं 'अंगद' चाल्यो, बालक 'रूप' वनार । कुम्भकर्ण के लारे लारे. रोनो रोतो जायजी || कोई ॥५॥ चावा चावा पापजी सरे, आऊं तुम्हारे माघ । रणमांही यहां कुण तुम लापो, यों कही पकड़ीयो हापजी ॥ ६ ॥ रूपाल कान्ला घोती योलसे, पालकतो गयो नाम । पोती पकड़नो है कर हीला. हनुमन्त उदो आकागजी कोxt७ १ विभापराने पाहा कि भामरान और मुशोर दा दोनों मुबादि नेय के समान है। पर गन्ध में मरने बालक र प पनराम हनुमान को शापा सा लिया है। और मूल नगपत में शुम्भमा के साथ मदने सममर हनुमान गेराया।
(२७८) श्री जेन पर गमागगा रनोग भएन। बाल मूलगी एहज वात करतां थकां अंगद, मुभट झंप्रत प्रभु साथ काठो। क्रोधवस धनुष्य ग्रही बाण नांग्ये तिसे, पानी अवकाश हनुमन्त नाठो || आ०॥४७॥ क्षेपक मयेगा धनुको नमात नमादीये भृपन को, पौनपूत तीजे घोस काहन विमारगो। माथे पृथ्वि नाथन के कते तोर डारं, ताकी सुन्दर त्रीयाकी देखो चंदड़ी ऊनाग्गो।। मूळपे ठहगते नींबू ऐसे महामानी भूप, एकना अनेक हको माजनो विगाड़गो । पायके ओसान हनुकूद गोफलागमार, कुम्भकर्णहुते छूट डेरा में पधाग्गो ॥१॥ डाल मूलगी कुम्भकर्णानुजर सलह साजी करी, भाई सुत आगले आवी मण्डे । राय सुग्रीव 'भामण्डल' भूपना, बन्धन छोडाववा अधिक तण्डे आ० ॥४८॥ इन्द्रजीत 'मेघवाहन' चित्त चिन्नवे. एहतो माहरे तात तोले । युद्ध जुगतो नहीं जाई टल भलं. एहतो शाख सिद्धान्त बोले । आ० ४९ ॥ नाग पासे करी यांधीया एह छे भूख तरसे रे सहजेही मरसे । मेलीए ए इहां लेई जासं किहां, परवशे होई नर काई करसे ||आ०॥ ५० ॥ मुंह टाली गया पांचौ में परिलह्या, कुम्भकर्णानुज राय पासे । आचीने अटकले कोई बल नविचले, बन्धन छोड़वा मति विमासे ॥ आ० ॥५१॥ आरती आणेघणी बन्धन छोडन भणी, राम रु लक्ष्मण दोई भाई । ताम चित सांभली देव वाचा करी, सुमरिये आज थाए सहाई ॥ आ० ५२ ॥ देव महालोचन वचन सूधो घणु, चिन्तव्यों आवीयो ततखेवा । सिंह निनाद विद्या रथ मूसल, हल देई साचबी राम १ विभीषण।
vavvare M - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२७६ ) सेवा ॥ आ० ॥५३॥ वीजली जेम चले नारा अरिनो करे, समरे साची गदा देवे दीधी । सार विद्यामहा गारुडी स्यन्दन१, आपी लक्ष्मण तणी सेव कीधी ।। आ० ॥ ५४॥ वारुणाग्नेय वायन्य आदेकरी, दोई भाई भणी अस्त्र आपे । जाणीयो खिदमत दारळू सेवक, थिर करी प्रेमनो भाव थापे ।। आ० ॥ ५५ ॥ लक्ष्मण वाहन भूत गरुड तदा, पेखवे पन्नग परहा पुलाया। राय सुग्रीव भामण्डल मोकला, ताम हुवा सहु आवी मिलाया ।आ०॥५६॥ हाल चालीश ने दोयमी एह छे, जय जयकार जग में जणाणो। 'केशराज' पुण्यवन्त श्री रामनो, सुजश साचो सहुमें सुणाणो।। ५७॥ दोहा क्षेपक- रावण कटकमें सांभन्यो, छूटा बन्दर वीर । दे ओलम्भो आकरो. आछा हुवा अधीर ।। क्षेपका- (राधेश्याम) धिक्कार तुम्हारे शास्त्रों पर, लम्बे चौडे आकारों पर । जो दश दश वीश वीश वानर, करजायें काम हजारों पर ।। आराम पसन्दो ? आलसियों ? क्यो दूध लजातेहो हो अपना । लंका विदेशीयों को देकर, अस्तित्व मिटाते हो अपना ।। जी जान लडाकर रखना है, इस जन्म भूमिकी इजात को । मुझसे भी पढ़ी चढी समझो, लंका नगरी की अजमन को । तुम वह हो जिनसे दुनियों को, इस दश कन्धर ने जीता है। तुम वह हो यह लंका धीश्वर, जिनकी ताकत से जीता है ।। जिमका राजा हो स्वर्ग जीन, कैलाश उठाने वाला है। जिसके नृपने नन्दी गृहमें यममी, ताकत को डाला है। उसकी यन उमके वर्ग. पनरों से पटे जमाने में,। तो मच मुर लाख लाग्य लानन, मदानी कोन कराने में। दोहा { मार गर्ग) अम्न हुयो रननी पनि, मुमट लहै, विश्राम । १ रथ %3D२ सूर्य। Mantrama mandarmanaraure - -- . (२८०) श्री जैन पद गमायण तृतीय गाद। प्राप्त हवा आवी मिल्या, माचविया मंग्राम ॥ १॥ राक्षस अति क्रोधे चढ्या, वानर मैन्य मथन्त । मध्य दहाडे शूकरा२, जिम सरवर टोलन्त ॥ २ ॥ देखी सेना भांजती, मुग्रीवादिक शरूर । करी घणी उठायणी राक्षस नाठा दूर ॥ ३॥ राक्षस भंग देखी करी, 'गवण' चढ्यो आप । • थर हरावे. मेदनी, करतो अति मन्ताप ॥४॥ ., .दावा नल ने आगले. नत्वर जेम दहाय । । तेम.रावण ने आगले. वानरतो न रहाय ॥ ५॥ रावण दीठो आवीयो. आप चढन्ता गम | 'विभीषण' वजी प्रभु, आपण चढियो नाम ॥ ६॥ ढाल तयांलीशमी तर्ज श्याम कल्याण- भजो नर राम, राम का दिन रूड़ा। रावण कीरे दशा कुदशाणी, जेही करे सोई कृडा ।। भजो ॥१॥ रावण उदधि पूर ज्यूं, आवही दल ठेल । साहामो हुवो चीर धीर, दोई हुवा मुह मेल ॥ भजो० ॥ २॥ रे रे मूढः ? वीर देखी, वस्तु केरी वानी । अवर राखी तूं दीयोरे, माहरे मुख आनी ॥ भजो० ॥ ३॥ जेम आहेडी खेलन्तो. आगे राखे श्वान । तेम रामे तूं कीयो, राखवा निज प्राण ॥ भजो. ॥ ४ ॥ नेहा न तूटे तुम्ह उपरे, जारे अपूठो होई। 'राम' 'लक्ष्मण' सैन्य मूं, आज हणीया हूं जोई ॥ भजो० ॥५॥ एह मांहै आवसे तूं . डररे करूं छू एह । आव थानक मूलगे, मूलगो मुझ नह ।। भजो० ॥६॥ भाई अमुहाई, शुद्ध सरल होई । ती कहै करे तैसी, कपट नाहीं कोई ॥ भजो० ॥ ७॥ राम आपही चढ्योथो, मेंही वरजीयो राखियो । १ भएडशूरा।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड । (२८१) von छते सेवक स्वामी काम, करत ना भल भाखीयो । भजो ॥ ८॥ स्वामीजी काम जाणी, युद्ध तणी मिस ठाणी । आवीयो छू देव ? आज, सोई सुणो मुजवाणो ॥ भजो ॥ ९ ॥ क्षेपक ढाल तर्ज लावणी-मुनि श्री रामचन्द्रजी कृत, विभीषण की बात सुनो वड़माई, थे राम थकी करोमेल वखत है आई ॥ टेर ॥ श्री राम दयाल कृपाल साल दुस्मनका. कुनझेले जो र महाराज उसी लिछमनका । महें चहसां महाराज मुझे फुरमायो पिन हटकर अरज मनाय मिलन मिस आयो । हस्त प्रहस्त से. जोधकटे छिनमाई. विभीपण ॥ १॥ धर र धरा धसकाय पाय जव धरसी सर रर चलमी वाण बहुत नर मरसी । अर रर करसी लोक एक नहीं अरसी, थररर हियो थर राय जर परसी । ऐसे लिछमन का जंग होसी रणमाई ॥ विभीषण ॥ २ ॥ मैं हितकी घोलं बात इसोमे मोचो. माथे पडियो पेच बसतछे पोचो । 'भा मण्डल सुग्रीव बंधेथेपासे, छिनमें छूटातेह हजून विमासे || उलटो परे मय वात सीता तर आई ।। विभीपण ॥ ३ ॥ गरुड़ा धिप मुर राय सहाय थयो भारी. वह दीधी अमोलक चीज हुवे नफ स्यारी । दोय बंधन शुद्ध रीत दीसे अवतारी, पर रमणी के भात पडे उपगारी । अजेन विगरी वात देवो फुर मार्ड ।। विभीषण ॥४॥ कर विद्यालो यात ठिकाने लाऊं, थे सर्व वातका जाण काई मम- झाऊं । अबके विगरी पात लगे नहीं कारी, नो वानां की चान मानो इक म्हारी लवाजी तात किमी माई। विभीषण ॥५॥ डाल मृलगी- सत्ती आपो रती गयो, सात रेहले आयी। मानो चोल एमोल, नहीं तर गुना माची ।। भजो० ॥१०॥ मरण भी में ना उसै रे, राज्य नणो नहीं कामी। लोक मुखे अपवाद गुनन्ना, में दुःख पाउंबानी।। भजो० ॥ ११ ॥ एह अपवाद मेटियां थो, संरक हुई गारो। कवण राम करण है, मानो वचन हमारी॥ मनी ॥ १२॥ mam (२८२) श्री जैन पद रामायण तृतीग गए। क्षेपक ढाल तर्ज पूर्वयन- तड़क भड़कला रीस पीम दोनों ने, तुं लंकाने धोयो मुख खबर *म्हाने । पिन देख जमीं के छेह काई मागने. वनगमी ने मार सेऊ सीताने ।। मुनि राम कहै सत्य बात ढले नहीं आई ॥ विभी- पण की ॥६॥ दाल मूलगी- खिजीयो अतिशय रावण, अजहूं एहिज वात ! कोढीया थारो कोढीया पण, न गयो रेरे कुपात ॥ भजो० ॥१३॥ भाई हत्या थी डरूं. लीयोथो तूंही बुलाय । रावण 'रूप' मूलगेरे, लीधो धनुष्प चढाय । भजो० ॥ १४ ॥ भाई वडो चाप थानके, तेहथी ए अरदास । करूं छू हूं वेगे आधी, पहुंचाह जम पास ॥ भनो० ॥ १५ ॥ दोई भाई की लड़ाई तब घणी अधिकाणी । माहां मांही ना टलाए शुद्ध मतेरे मण्डाणी ॥ भजो० ॥ १६ ॥ 'कुम्भकर्ण' इन्द्रजीत, अवर राक्षस धाया । 'राम' 'रामानुज' अपर, रायजी चली आया। भजो० ॥ ७॥ क्षेपक (राधेश्याम) दोहा-अवतो निशिचर सैन्य सब, आई करके जोर । वामें जैसे घिरे. उँमड धुमड घन घोर ।। आंधी की नाई बढे, वानर भी ततकाल । एक एक से भीड़ गये, कर किल्कार कराल ।। उफ ढोल और शंखों के स्वर, धरती दहलाये देते थे। बलवानों के गर्जन तर्जन आकाश हिलाये देते थे। 'झन झन ध्वनियो से एक और, खड्गादिक शस्त्र उच्छतते थे। दूसरी और खट-खट स्वर से गिरी-खण्ड मुष्ठिसे चलते थे। रण-रङ्ग स्थल में मतवाले, रजनीचर कीश नाच उट्टे । लाशों पर लाशों लोट ऊठी, शीशों पर शीश नाच ऊठे ॥ आशा से अधिक लडे वानर, उनरजनीचर बलवन्तो से।
nama न श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२८३) शस्खों की धारे हार गई, मुष्टिको नखों और दन्तोसे ।। कट कट कर जब निश्चिर-सेना, उस काल समरमें मरती थी। अन्याय न्याय का तब निर्णय, पृथ्विीकी लाली करती थी। छोटे २ वनरों द्वारा. होगई पराजय सल-दल की । जगने अधर्म की छाती पर, अवलोंकी जीत 'धर्म वलको !! दोहा-'अवनी-अकम्पन' आदि भट, इंझ गए जब जाय । जोये जब रण भूमि में, 'वज्रदन्त' अतिकाय ।। तब लंका के नाथसे, ले आझा वरदान । चला समरके वास्ते, इन्द' जीत बलवान ।। लंकामें सचमुच बढी हुई, ताकत इस इन्द्रजीत की थी। यह सेनाका सञ्चलकथ, युवराज की इसको पदवी यो ।। जीता था इसने इन्द्रलोक, यह इन्द्रजीत कह लाताहै। यह ही सबसे प्यारा बेटा, दशमुख का समजाता है ।। दोहा-उसी समय संग्राममें, आ पहुंचा धन नाद । वानर सेनामे तभी, व्यापा विपम विपाद । छलसे बलसे और कौशलसे, लडताथा यह योद्धा रणमें । छुपजाता कभी प्रगट होता, दिन करता कभी निशा रणमें । आकाश मार्ग पर जा जा कर, हड़ियों धरी वरमाता था। तक २ कर वीर वानरों पे. नाना विधि याण चलाता था ! लड़ते २ जप चूर हुई, तब डॉल ऊठो वानर सेना । 'रघुकुल के नाथ दुहाई है, यह चोल ऊठी वानर सेना ।। देखा जब रण भूमी में. वानर है लाचार । अज्ञाले 'रघुनाथ' को हुवे 'लपण' यार ।। आते ही चलवीरने, ग्ण में किया प्रकाग। एक बाण में असुर की, माया कन्दी नाम || इन्द्रजीन कहने लगा. सन्मुग्म इन्द निहार। २ अपर नाम नारा न
HuruRNA
(२८४) श्री जैन पद रामायण तृतीय गएट ।
ओहो ! बच्चों भी हुए, अब रण को तैयार ॥
यह युद्ध स्थल वीरों का है, चनों का विन्या नहीं।
धार हैं यहां कृपानों की, मिष्टानों का बाजार नहीं ।
जिन दांतों का सूखा न द्ध, दाग्य होता उन्हें तोडने में।
इसलिए लौट जाओ घर को. बुग है धननाद छोड़ने में
लखण लाल कहने लगा, करके कडी निगाह।
बुरा चौर की वात को, नहीं मानते शाह ।।
लका पर रघुकुल की कमान, इसकारण आकर कडकी है।
सत्यवती सीताजी की विरह ज्वाला, बदला लेने को भिड़की है।।
इसलिये सम्भलजा इन्द्रजीत. यह इन्द्रिय जीत बढ़ रहा है।
क्षत्री के काल जीत धनुपे, शायक जगजीत चढ रहा ।।
वह नहीं कहीं दन सकता है, जो बल रखता है मुष्ठों का।
रघुवंश आन का पूग है, कर देगा चूग दुष्टों का ।।
लखणलाल के चैन सुन, हुआ इन्द्रजीत लाल ।
आपस में अब भिड़ गये, दोनों वीर विशाल ।
खांडों पर खोंडे खडक ऊठे, पाणों पर बाण चोल ऊठे ।
वीरों का चोंका युद्ध देख पृथ्विी आकाश डोल ऊठे ।।
छोडा जब रिपुने मेघ वाण, तब इधर समीर वाण छोडा ।
वह लगा छोडने अग्नि-चाण, लक्ष्मण ने नीर बाण छोडा।
नाना प्रकार की चतुराई, दश-कन्धर तनय दिखाता था ।
कौशल-किशोर के कौशल से. वेकार वार होजाता था ।
हर तरह युद्धमें इन्द्रजीत. जब हार गया वेजान हुआ।
लक्ष्मण के हाथके बाणों से, गम खा खा के हैरान हुआ।
तव लगा सोचने 'क्या करीए' यहतो सामान प्रलय काहै ।
लक्ष्मण साधारण मनुज नहीं, सचमुच अवतार विजय काहै ॥
ढाल मूलगी-
राम 'कुम्भकर्ण लडे, इन्द्रजीत" जाम ।
लक्ष्मण संरे आवी अड़ियो, एह बडो संग्राम ।। भजो ॥१८॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२८५) 'नील' "सिहजधन्य, 'दुर्मुख", 'घटोदर" सं देख । 'स्वयम्भू' जई दुरमति' सं, नल ‘सम्भू' सुविशेष ।। भजो । १९ ।। 'अंगद' ने 'मयनेमय ' 'वीर विराध' 'सुग्रीव' । 'स्कन्द' 'चन्द्रनख निरूपम, माची रही अति रीव ।। भजो॥२०॥ 'श्रीदत्त' ज, 'जम्बूमाली', 'भामण्डल,' जी 'केतु' । 'इनुमन्त' 'कुम्भकर्णसुन' लाग्या रोप समेतु ।। भजो ॥ २१ ॥ 'कुन्द' ने 'धूमाक्षी' दाखी, 'किष्किन्धेश' 'सुमाली । 'चन्द्ररशिम 'सारण' साथे. माचियो युद्ध कराली । भजो ॥२२॥ 'लक्ष्मण' ऊपरे 'इन्द्रजीत' मेले तमाम बाण । 'लक्ष्मण टाले प्रगट पणे, शूरों को सुलमान ।। भजो ॥ २३ ॥ इन्द्रजीत पे अनुज१ मेले, नाग पास अब । तांतणिये गज तेम यांध्यो, कोई फुरियो नहीं शव । भजो ॥२४॥ स्थ में घाली ततकाल. 'चन्द्रोदर ले जाये। कटक मांही अति उच्छाए, राख्यो थानक ठाये !! भजो ॥ २५ ॥ 'कुम्भकर्ण ने नाग पासे, रामे बांधी लीयो। 'भामण्डल' हाथे देई, ते पहोंचाय दीयो । भजो ॥ २६ ॥ अवर राक्षसों मुआवी अड़ीया, वानरा भई आप । ते ते यांधी आंणीया. राम तणे परताप ।। भनो ।। २७ ।। मेघ वाहने चांधीयों, सांधिया शर नांही। दिवस फिरे देखो बैरी, जोर चले नहीं माही ॥ भजो ॥ २८ ॥ देखी नयन अति कुचयन. पामीया तर राय । चीर ऊपर शूल मेले. किंग ही ए मरिजाय ॥ भनी ॥ २९ ॥ शूल अन्तगल नाम. छेदीयो जेम केली। लक्ष्मण तो लीला मेरे, सुदिन येरी मेली ।। भजो ३ ॥ श्री धरणेन्द्र दन शक्ती, विजय नामे अमोघा । विन्य हेते गया गय. ऊपडी पलोया मजओ।।३।।
(२८६)
श्री जैन पद गमागण तृतीय सण्ड।
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धग धगन्ती जलती चलती, तड तडन्ती नादे।
अन्त मेघ तडित लेखा, फैरवी अन्हादे ।। भजो ॥ ३२ ॥
देव पाछा ओसरे, लोक न मेले नयन ।
देखतां घिरतः मिटे. ऊपजेरे कुचयन ॥ मजो ॥ ३३ ॥
राम कह सौमित्री ने, विभीपण नी लाज ।
आपने छे राखि ले ओ, मारे गक्षक गज ॥ भनो ।। ३४ ॥
शरणे आयों रोखणो. नहीं महाय कगय ।
अवालू नदियों तणी देखवा नटी जाय || भजो ॥ ३५ ॥
सौमित्री आगे हुओ, गरुड नो अमबार ।
रावणानुन पूठ दोयो. एह बगे व्यवहार ॥ भजो ॥ ३६ ।।
लक्ष्मण साथे कहै राय, आघो पाछो थाय ।
पर मरणे तुं कामरे, जो तुझ आवी दाय ॥ भजो ॥ ३७ ॥
क्षेपक राधेश्याम-
अबतक में खेल खिलाता था, अब खाजाने की बारी है।
इस शक्ती वाण की सूरत में आ पहुंचो मौत तुम्हारी है ।
इसका मारा बचता ही नहीं, दिन उगते प्राण गवाता है।
ज्यों ही यह तन पर पड़ती है तन मृतक तुल्य हो जाजा है ।।
इसलिए सम्भल ओ रघुवंशी, तूं आज न बचने पायेगा ।
कहै रावण ललकार अवे हम, लखण जीत कहलायेगा ।
हंस कर लक्ष्मण ने कहा, इस मद पर धिकार ।
चाण गये मुद्गर गये. गई खड्ग तल्वार ।
जो भी हथीयार तुम्हारे थे. उन सब ने हारी मानी है।
जय शस्त्र युद्ध में हार गये तो देव शक्ति को ठानी है।
ढाल मूलगी
भ्रमावी अति ही भ्रमाची, लक्ष्मण ऊपर तेह ।
रावण मूके रोपसूं रे, ताम हुचो अन्देह ॥ भजो ॥ ३८ ॥
सा आवन्ती देखी पेखी, सौमित्री सुग्रीव ।
'भामण्डल' 'नल' ने 'विगध, हनुमन्त शूर अतीव ॥भजो ॥३९॥
. न श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२८७) अस्त्रों सूं बलवन्त वारे, ताडे ताम अपार । अंकुश खोटो हाथीयो, जेम न माने कार ।। भजो ॥ ४० ॥ उरस्थले आवी पड़ी, मूर्छाणो नग्नाथ । हाहा कार हुओ घणो, शोचकरे सहु साथ ॥ भजो ।। ४१ ।। कोपी राम आवे ताम, सी रथ रसाल | राय तणो रथ रोपसूरे, तोडियो ततकाल ॥ भजो ॥ ४२ ॥ वीजोत्रीजी चऊयो पंचमां ग्थ देसी । तृण तणो पर तोडी नांखे, राघव रोप विशेषी ॥ भजो ।। ४३ ।। रावण चिन्तमं चिन्तये, भाई नणों दुःख भूरी । एतो हुवो आंधलो, रहीये एथी दूरी ।। भजो ॥ ४४ ॥ लंकामें नृप आवीयो, आथमीयो दिनकार ! दुःखन जावे देखीयो, आणी एह विचार ॥ भजो ॥ ४५ ॥ रावण भागो जाणीयो, फिरोया राम तेवार । लक्ष्मण पडियों देखतोरे, न ही शुद्ध लिगार || भजो ।। ४६ ।। मृ/ए धरती पडया, करी शीतल उपचार । उठाई बैठा किया, बोले लक्ष्मण लार ॥ भजो ॥४७॥ वत्स! तुमे क्यो फोहीया, क्योन प्रकागो वगण । शक्ती नहींजो वयणनी, कांई बतायो मयनं ।। भजो ॥४८॥ क्षेपक दाल तर्ज फपाली प्रसिख यता भी चीथमलजी म. न---- लगाजो तीर लिछमन के पड़े गस गाके भूमिपर । कह नय राम आंसू भर, ऊठो लक्ष्मण ऊठो लक्षमण ॥ १ ॥ सीया गवण के करजेमें. अरे तुमने करी पेली। मेरा इस वनमे बेली कौन, ज्यो लक्ष्मण उठो लक्ष्मण ॥ २ ॥ अरे रणवीच सेनाको, सिया नेरे हटायो कौन । गिगया क्यों धनुप्प नेने. उटो लक्ष्मण जो लक्ष्मण ॥ ३ ॥ ने हिम्मन पेही बन्धु, नाई कीजो लंका। बधागो धीर अपरामको, ऊलो राप स्लो लम४॥
ran. ~~ -- (२८) श्री जैन पद गमायण तृतीय मएट । अगर नफरत हो लड़नसतो, फिर वनको चले वापस । कुछ भीतो कहो भाई, ऊठो लक्ष्मण ऊठो लक्ष्मण ॥ ५॥ ढाल मृलगी- ए मुख देखे ताहगे, सुग्रीवादि नरेश । वोलन आपो छो तुमें, आणे आरती अशेस । भनो० ॥ ४९ ॥ रावण तो गयो जीवतो. ए थारे चित्त गेप । रावण मारे तो सही, आणो चित्त मन्तोप ॥ भजो० ॥ ५० ॥ तिष्ट निष्ट तूं कहां गयो, म्हागे भाई मारी । धनुष्य चान लेई चल्या, हनुमन्त कहे हाकारी ।। भजो० ५१ ॥ किहां चाल्या प्रभुजी तुमें. वैर विशोधन भाई । रावण तो लंका गयो, ताम फरयो पिछताई ।। भनो० ॥५२॥ नारी हरी भाई हण्यो, एह अवस्था आपी । मैं आयों नासी गयो, फिटे रावण पापो ॥ भजो० ॥ ५३॥ लक्ष्मण देखी मारीयोरे, प्रभु ने वेदन मारी। ए कामन होवे कायरों, देखो क्यूंन विचारी ॥ भजो० ॥ ५४॥ सुरदासजी कृत क्षेपक ढाल तर्ज पदरी- छोटारे मेरा भैया बोलना इकवार ।। टेर ।। मातारे वचनों नीकस्यारे, पिता केरे उपदेश । अयोध्यारे पुरीरा मानवीरे आँपां, आय वस्या परदेश ॥छोटा० ॥१॥ आवन्तड़ा दोय आत्रीयोरे, जाऊंगो में एक । माता सुमित्रा जसीरे कांई वतासं देख ॥ छोटा० ॥ २ ॥ जाईजो रे मीता जाई जोतो. लंका जाईजो गवण को राज । आंधा केरी लाकडी म्हारी, छिटक पडीछे आज ॥ छोटा० ॥३॥ क्षेपक राधेश्याम- गिरे लखण की देह पर, मूर्छा खाकर राम | वानर मण्डल में मचा, मातम और कोह राम ॥ कहते थे बडे २ वानरहा! विधना क्या उत्पात हुआ। रघुकुल पर उल्का पात हुआ कपिदल पर वज्राघात हुआ । - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२८९) ANAN जब लखण नहीं तो राम कहां! जय राम नहीं तो विजय कहां। जप विजय नहीं तो सीया कहां, जब सीया नहीं शुभ समय कहां ।। उनका तो ग्ण सीता पर था, लंका पर था उद्देश पे था । अपना रण परमारथ पर था. साहस पर था आदेश पेथा। था उनसे ज्यादा पक्षहमें लंका पर जय पाजाने का।। जय सहायता को साथ हुवे, तो पूरा कार्य करानेका ॥ संमार कहेगा-वनरोंने, वनमे बहकाये रघु वंशी। वनरेतो वनको भाग गये, सबकुछ खो बैठेरघु वंशी ।। लानतह ऐसेनीनेपर, जो नाम धगये अपना हम । बेहतर है इनके मागरमें, अस्तित्व मिटाये अपना हम । डाल मूलगी-- जाय घटन्ती जामनी, कीजे कोड उपकर्म ॥ प्रभु जीव्यों सहुजीवसे, म्होटो छे ए मर्म । भजो० ॥ ५५ ।। पतो नयां लीशमी, ढालं भली कहीवाय । केशगज गह देखो, पुण्ये पाप पुलाय ॥ भजी० ॥ ५६ ।। दोहा (मिन्धु रागे-~) सुन 'सुग्रीव' 'चिराध' 'नल', भामण्डल हनुमन्त । देव करो ए एहवी, तुम घर जावो तुरन्त ।। १ ।। नारोहरण बंधच गरण, दुःप रयो पदी । लंका न दीधी विभीपणा, ए दुःख मारे भूरी ॥२॥ क्षेपक नया मात को गोहन द्रोह दुमान को मोन न तात को धान दहे को। राजको लोभन प्राण को धोभन अंधु विछोहन अन्तन को ।। नेकन चिन्तु में भारत केशव, मोचन हकमें मौन रहेको । तारण भूभिमें राम कहै, मुम सोच विभीष भूप कहेको । टोहा मून्नगी m प्रातः वां रावणरणी, देई विभीषण गव । लक्ष्मण नाये लाग. सोनाम नहीं जा ANA ४-५ - ( २६०) श्री जैन पद गमायण तृतीय मण्ड। क्षेपक ढाल तर्ज बाहु वली खदा० श्रीराम मुनि कृत- अबहूं नहीं रहूंरे अटक्को, म्हारो मन लागो लिछमननं ॥ टेर। जानीथी क्या इयआई, बंधव धरा पटक्यो । अपहूं ॥१॥ यातो दुस्मन घर बैठी, धिक २ जीवत घटक्यो ।। अत्रहूं ॥२॥ मुझ संगे मुझ बंधव नीकस्यो, मुझ संग वनमें भटक्यो ।अपहूं।।३ राम बंधवनो होतही विरहो, फिट हीयाक्यूं नहीं फटक्यो|अबहूं॥४ क्षेपक ढाल तर्ज धूसोवाजेरे-धूलचंददी कृत, लक्ष्मण के रे बाणलग्यो शगती, रे लक्ष्मणके ॥ टेर ॥ रम कहै रे सुनो सब प्यारे, आजकरोरे ऐसी भगती ।। लक्ष्मणा।? लक्ष्मण वीरने जोरे जीवाड़े, देऊं म्होटोरराज सवाई धरतो ला|२ पुण्य फले जो दशरथ केरो, केरे जीवाडे सीत सती । ल. ||४|| नहीं भूलमें ऊपकार तुम्हारो, लक्ष्मण जिवणको कहो जुगती।ल०१४ दोहा मूलगा - कई विभीषण स्वामीजी, धीरज धरो अपार । कायर होईन थरहरो, उद्यम नो अधिकार ॥ ४ ॥ शक्ती हण्यां जीवे सही, ज्योंन ऊगे दिनकार । जब लग वरते जामनी, करलीजे उपचार। ५ ।। तंत्र मंत्र औपध जडी, कोईयक दाय उपाय । रात्री मांही कीजीये, जिम प्रभु सारो थाय ॥६॥ ढाल चमालीशमी तर्ज पथीडा वात कहो- जीवे हो जीवे वीरो वाल होरे, कोई करो तुम कामरे । वीजोरे काज सहु असुहामणोरे, ताम कहै श्रीरामरे ।। जीवे० ॥१' ढाल क्षेपक मूलगी- लिछमन को यहां से ले लीजे, लहु कहै अरजी सुन लीजे, इणी में जेज नहीं कीजे । ऊठाई निजकट के लाया, जापता इण विध करवाया ।। सत्य० ॥८६॥ ढाल मूलगी- सातज रे सात कोट फिया भलारे, चारकिया दरवार रे । राजारे राजा रखवाले रह्यारे, होईने हंसीयार रे ॥ जीवे ॥२॥ ।
wanN भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२६१) पूरव रे पूरब दिशिने बारणेरे, कपिपति ने हनुमन्त रे। 'दधिमुख'रे'दधिमुख स्कन्द"गंवाक्ष' सूर, तार गवय गुणवन्तरे।३ उत्तर रे उत्तर दिशे विहंगमारे, 'अंगद' 'कूरम' अंगरे । महेन्द्रजरे महेन्द्र सुपेणजीरे, चन्द्रश्मि सुचंग रे ॥ जीवे० ॥ ४॥ पश्चिम रे पश्चिम दिशे दुर्दर जयेरे. समर शील मन्मथ रे। 'नीलजरे' नील विजयने सम्भूवरे ए साते समर थरे । जीवे०॥५॥ दक्षिण रे दक्षिण दिशे भामण्डलूरे, वीर 'विराधज' मेद रे ।। गजनलरे गजलनने विभीपणूरे, भुवनजीत सुभेदरे।। जीवे० ॥६॥ माहरे मांह राघव राखीयोरे, सुग्रीवादिक ताम रे । जागे रे जागे योद्धा महाबलीरे, मति कोविणसे कामरे। जीवे० ॥७॥ (वाका से व्याख्यान में यदि शक्ति जाने का अधिकार पूर्ण न पच सके नो निम्नोक्त गाथा कहकर लक्ष्मणजी के शरीर में से शक्ति निकाल देनी चादीये) ढाल क्षेपक मूलगी- प्रातः हुवां शक्ति ही जावे. पिमल्या तनने फरसावे, प्रभुजी मुख साता पावे, लक्ष्मणजी पृछे है त्यारे, कोट ए एस्यो रसपारे ।। मत्य ॥ ८७ ॥ रघु पतिवात केहण लागो. शक्तिदे रावण नो भा गो तुमेंयहां आण्या धर रागो । कोटका जापता कीना, रात को सब पोहरा दीना || मत्य० ॥ ८८ ॥ दाल मूलगी-- सीतारे मीता ए हिज सों भलीरे, लक्ष्मण शक्ति प्रहाररे । प्रातः रे प्रातः प्राण प्रभुजी नजेरे. भाई अनि प्यार गाजी मारे मूच्छा आधी अति घणारे. धग्णी पटी नतकाल रे । करीरे करी शीतलता सरोरे, ऊठाई सारालरे ॥ जीवे ॥९॥ करणज रे करण बरे रोवे घणी रे. कग्नी अधिक विलापरे । थम्मेरे शम्मे तनु विद्याधरीरे, देह पडाडे आपरेशानी ||१०|| हावच्छ ? रेहा व लक्ष्मण कहां गयोरे, प्रधुनी पोरी आजरे। तुझ बिन रे तुम पिन क्षगनी नारिं, कसं महीं काजजीवार ! हा धिक् रेहा धिक् अधिक अभागणी रे, महारे कीधे देगारे ।
(२६०) श्री जैन पद गमायण तृतीय ग्वण्ट । क्षेपक ढाल तर्ज बाहु वली यहा० श्रीराम मुनि कृत- अपहुं नहीं रहेरे अटक्को, म्हारो मन लागो लिछमननं ॥ टेर॥ क्या जानीथी क्या हुयआई, बंधव धरा पटक्यो । अबहूं ॥१॥ सीयातो दुस्मन घर बैठी, धिक २ जीवत घटक्यो । अबहूं ॥२॥ मुझ संगे मुझ वंधव नीकस्यो, मुझ संगे वनमें भटक्यो ।अपह॥३ राम वंधवनो होतही विरहो, फिट हीयाक्यूं नहीं फटक्यो ।।अबहूं॥४ क्षेपक ढाल तर्ज धूसोवाजेरे-धूलचंददी कृत, लक्ष्मण के रे बाणलग्यो शगती, रे लक्ष्मणके ॥ टेर । रम कहै रे सुनो सब प्यारे, आजकरोरे ऐसी भगती ॥ लक्ष्मण।।१ लक्ष्मण वीरने जोरे जीवाड़े, देऊं म्होटोरराज सवाई धरती ला|२ पुण्य फले जो दशरथ केरो, केरे जीवाडे सीत मती ॥ ल० ॥४|| नहीं भूलूमें ऊपकार तुम्हारो, लक्ष्मण जिवणको कहो जुगती।ल०१४ - दोहा मूलगा . कई विभीपण स्वामीजी, धीरज धरो अपार । कायर होईन थरहरो, उद्यम नो अधिकार ॥ ४ ॥ शक्ती हण्यां जीवे सही, ज्योंन ऊगे दिनकार । जप लग वरते जामनी, करलीजे उपचार । ५।। तंत्र मंत्र औषध जड़ी, कोईयक दाय उपाय । रात्री मांही कीजीये, जिम प्रभु सारो थाय ॥६॥ ढाल चमालीशमी तर्ज पथोडा वात कहो- जीवे हो जीवे वीरो वाल होरे, कोई करो तुम कामरे । वीजोरे काज सहु असुहामणोरे, ताम कहै श्रीरामरे ॥ जीवे० ॥१' ढाल क्षेपक मूलगी- लिछमन को यहां से ले लीजे, लहु कहै अरजी सुन लीजे, इणी में जेज नहीं कीजे । ऊठाई निजकट के लाया, जापता इण विध करवाया ।। सत्य० ॥८६॥ ढाल मूलगी- सातज रे सात कोट फिया भलारे, चारकिया दरबार राजारे राजा रखवाले रह्यारे, होईने ईसीयार रे ॥ जीवे० ॥२॥ रे . - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२६३) दीठोरे दीठोहूं तबखेचरारे, सहश्र विनय तसनामरे । वयरजरे वयरज मैथुनने कारणे रे. मांड्यो नव संग्रामरे ॥जीव।।२६ शक्तिजरे शक्तिज चन्दरवा तणी रे, कीधो ताम प्रहाररे। आव्यो रे आव्यो हूं चली भूतले रे, नलहूं शुद्ध लगार रे ॥जी॥२७ कौशल्य१रे कौशल्य पुर उद्यानमें रे, पड़ियो पा दुःख रे । ओछोरे ओछो जले जेम माछलोरे, रंचन पाम सूख रे ॥ २८ ॥ भूपतिरे भूपति श्री भरतेश्वरुरे आई गयो अभिरामरे । करुणारे करुणा अधिकी ऊपनीरे, कोमल छे परिणाम रे ॥ २९ ॥ आणी रे, आणी गन्धाम्बूनदारे२, सींच्यो अंग सजोररे, । नाशी रे नाशी शक्ति गई सही रे, जेम जाग्यो थीचौररे ॥३०॥ हुओरे हुओ ताम समाधीयोरे. अचरीज अधिको पामरे । महीमारे महीमा गन्धाम्बू तणी रे, पूड़ीयो में शिर नाम रे ॥३२॥ भाई रे भाई तुम्हारो तव भणे रे. मारय वाहन एकरे । 'गजपुर रे गजपुर थी इहां आवीयो रे, साथै महीप३ अनेकरे ॥३२॥ तूदयो रे तूटयो भेसो एकजीरे, पड़ियो मारग वीचरे । माथेरे माथे पग दई चले रे. लोक जीके के नीचरे ।। ३३ ।। म्होटोरे म्होटो उपद्रवे मुओ रे, 'सतंकर' पनि देसरे । पवनजरे 'पवनज पुत्र' नामे भलो रे, देव हुओरे मनेग्यरे ॥ ३४ ॥ अवधजरे अवधि ज्ञान सू देखीयो रे. पूर्व भवान्तर जामरे । व्याधिज्ञरे व्याधि विधा देश में रे. पुर २ गाम ही गामरे ॥३५॥ द्रोणजरे द्रोण मेघना देश मेरे, नहीं व्याधी पेमाररे । मामोरे मामोजी में पूलीयरे. एरे करण विचारो॥३६ ।। पृथ्वीरे पृथ्वी सघली माहरी रे, अन्तर गई कायरे । जिमछेरे जीम निम माग कहोगे. ऋठ करां दृष्य थायरे ॥३७|| पोले ने चोले सोनम मामलों, प्रियंकग मुझ नारे । गेगी रोग पीटी भी घणीने. गर्भ नणो आधारे १३८ । १सयोला। नुगन्धो पानी। पार MAmar vya . क्रीडारे क्रीडा करवा कारणेरे सुन्दरी मुंशोभाऊंरे । जीव।।२५ ( २६२) श्री जैन पद गमागण तृतीय सार । स्वामी रे स्वामीन देवर भलोरे. पीडाए मुविशेष रे ।। जीवेग॥१२॥ मुझने मुझने विवर वसुधारा रे, दीये अब देवी आपरे । माहे रे माई ई पेमें सहीरे, ऊपरे वाले छापरे ।। जीवे० ॥१|| एटले रे एटले एक विद्या घरूर करुणा अति दामन्त रे । विद्या रेविद्या वर अब लोक नी रे, अवलोकी भावन्त रे॥जीवे०.४ वाई रे बाई आरति मनिकरोरे, लक्ष्मण लीला माह रे । प्रातः रेप्रातः ए उठसे सही रे, मिलसे गम उच्छाहर।।जीवे०।१५॥ सुमती रे सुसती हुईसा सुन्दरीर. कदी होवे परभात रे । वारुरे वारु वर्तिका सांभन्यो रे, दुःख देशान्तर जात रे ॥ १६ ॥ रावण रे गवण अति रस रंगमारे, लक्ष्मण मरियो जाणो रे । भाई रे भाई सुत नृप वांधीयारे, सुणी रोवे दुःखी आणी रे ॥१७॥ हा वत्स ! रे हा वत्स ! कुम्भकर्णजी रे. हा वत्स ! नन्द निरूपरे। इन्द्रजरे इन्द्रजीत घनवाहनूरे, 'जम्बू माली' अनूपरे ।। १८॥ अवरजरे अवर अनेरा गजीयारे, वन्धाणी तुम देह रे । मुझनेरे मुझने जीवतां थकां रे, अजन तमाशो एहरे ॥१९ ।। सुमरी रे ममरी गुण सुत भाई नारे, वारम्बार पड़न्त रे । बैठो रे बैठो कीजे फिरी फिरी रे, रमणी जेम रडन्त रे ।। २० ॥ एकजरे एक विद्या धर भलो रे, एटले आवे चालरे । पूर्वजरे पूर्व दिशीने पारणे रे. भामण्डल ने निहालरे ॥२१॥ भाखेरे भाखे वाणी अमीसमीरे, मेलबो राघव रायरे । लक्ष्मण रे लक्ष्मण जी जीवातणोरे, दाखूहूं उपायरे । जीवे ॥२२ भामण्डल रे भामण्डल, कर साहीयोर, आण्यो प्रभुने पासरे । चरणेरे चरणे लागी वीनवेरे, आणीने उल्हासरं ।। जीवे ।। २३॥ पुर वर रे पुरवर छे सगीत जीरे, शशि मण्डल भूपालरे । राणीरे राणी राजे सुप्रभारे, नन्दन हूं सुविशालरे ॥ जीवे ॥२४ नामेरे नामे छू प्रति चन्द जीरे, वैसी विमाने जाऊंरे । ॥
- श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२६५) स्नानोदक लावोसही, कोई म लायो चार ॥२॥ आज लगे सेवक हुता, आगे तुम मुझ भ्रात । भाई भिक्षा आपवे, राखो जग आख्यात ॥ ३॥ जिहां लगे जग जीवस, तिहां लगे उपकार । विसरमं नहीं तुम अछो, प्राण तणा दातार ।। ४ ।। दाल तालीशमी तर्ज चड़ो २ लाडा चार म लावो- सोई समाणो अवसर साधे, अवसर साधे स्वामी आराधे ।। टेर।। वैसी विमाने ते तप चलिया, विद्याधर विद्या बले पलिया । पुरी अयोध्या चालो आया, भरत नरेश्वर सोबत पाया ॥१॥ ऊपर भूमि ए मयज१ सुहाली, गलती राते नींद रसाली । अम्बरे रहा राग आलापी, नाद-बले लीयो राय जगावी ॥ २॥ जाग्यो भृप हुचो हसियारी. दश दिशे जोवे नजर पसारी। आगे उभा दीठा सोई, पूछे प्रभु कहो कारण कोई ॥ ३ ॥ 'भामण्डल' भाग्वे सब बातो. भग्त हीया में दुःख न समातो। ऊठी तय हो हुओ आगे, पैसी विमाने मारग लागे ॥ ४ ॥ कौतुक मंगल आया चाली, सोपन्तीररे जगावी वाली। 'द्रोण मेघ' नृप पासे जाची, सब गुण लक्षणवन्ती साची ॥५॥ कन्या महथ तणो परिवारो, ते सघली लागी तस लारो। प्रतिज्ञा छ सहुनी मरखी, एकज पति करवाने हरखी ॥६॥ 'भरत' अयोध्या ए पहोंचायो. भामण्डलजी आयो भायो। विशल्पा सघली लोधी, चाल्या तर हो दीलन कीधी ॥७॥ जल द्वीपे ऊजालो देसी, रविडग्यांनो भर्म विशेषी। अतिही वेगे विमान चलाये, वात कगंनो प्रभुरे आवे || सोई॥८ मह कोई आरतीया होना. कद आवे यो बाट जोता। सूर्य उदय पंकन विकमारे, देवी विशन्या मदु मुसपाये। मोई९ विशन्या प्रभुनो तन फासे जागे घे जलघर वाले। धूलचदजी रन पर ढाल नगारा गुरजो गुमनामटर ) म्हारा महाराजाशो भंग फम्स नदी २२ आह हीरे ॥र।। १ शया-२ मोनई- ( २६४) AAAAAFN श्री जैन पद रामायण तृतीय भएड । हुई रे हुई सही निरोगणी रे. पुत्री पण परधान रे । प्रसवीरे प्रसवो मुख समाधिमेरे, विशल्या अभीधान रे ॥ ३९ ॥ थारोरे थारो जेम तेम माहरोरे. देश हुतो समभायर । पुत्री रे पुत्री स्नान जले करी रे. सीच्याथी मुखथाय रे ॥ ४० ॥ पूछयोरे पूछयो मुनिवर एकदारे, सत्य भूती मुख दायरे । एछे रे एछे कौण विशेपथी रे, ज्ञाने मेद लहाय रे ॥ जीवे ।। ४१ द्राक्ष रे द्रक्ष थकी घणो रे, मीठी वाणी विशेपरे । पूरवरे पूरव भवना तपतणोरे, एफलछे मुविशेपरे । जीवे ॥ ४२ धाव?जरे घावने सराहणूरे, शल्य नणो अपाहररे । व्याधिन व्याधि सहुनी क्षयकरेरे, लक्ष्मणजी भरताररं ।। ४३॥ ए गुण रे एगुणनो फिरतारछेरे, स्नान तणो जलमाररे । अमृत रे अमृत हीथी गुण घणारे. सुर गुरु नल पाररं ॥४४॥ मुनिवर रे मुनिवरनी वाणी थकी रे, प्रत्यय लही प्रत्यक्षरे । जलनोरे जलनो प्रगट प्रभावजीरे, प्रगट्यो लोक समक्षरे ॥४५॥ एमजरे एम कहीने मुझ भणी रे, स्नानतणू जल दीघरे । छोटा छोटा नाख्यो देशमारे, देश निरोगी कीधरे ॥४६॥ ओहिजरे ओहिज जल सं सींचियोरे, मैं तुझ इण ही वार रे । शक्तिजरे शक्ति शल्य गयो घावहीरे, रुझ्यो क्षण ही मझाररे॥४७॥ भरत जरे भरतज ने मैं देखियो रे, जलनो प्रगट प्रभाव रे । आणो रे आणो अति ऊतावलू रे, छोडो अवर उपावरे ॥ ४८ ॥ हालजरे ढालज चम्मालीशमीरे, राम महा सुख पाय रे । जेहवी रे जेहवी तो भवतिव्यनारे, तेहवी मिलेही नहाय रे ॥४९॥ दोहा-वेलावल रागे 'भामण्डल' हनुमन्तजी. अंगद सुभट सलील । राम कहै चोलाय के. कामतणी नहीं ढील ॥ १ ॥ पहेला जाजो भरतपे, भरतमणी लेई लार । १ विशल्या के स्नान जल से घाव का संरोहण, शल्य का अपहार व्याधिका क्षय होगा, और इसका पति लक्ष्मण होगा। और श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२६५) AmrvNrvNr - स्नानोदक लायोसही, कोई म लायो वार ॥ २ ॥ आज लगे सेवक हुता, आगे तुम मुझ भ्रात । भाई भिक्षा आपवे, राखो जग आख्यात ।। ३॥ जिहां लगे जग जीवसं, तिहां लगे उपकार । विसरतूं नहीं तुम अछो, प्राण तणा दातार ॥ ४ ॥ ढाल तालीशमी तर्ज चड़ो २ लाडा पार म लावो- सोई समाणो अवसर साधे, अवसर साधे स्वामी आराधे ॥ टेर।। वैसी विमाने ते तय चलिया. विद्याधर विद्या चले पलिया । पुरी अयोध्या चालो आया, भरत नरेश्वर सोबत पाया ॥१॥ ऊपर भूमि ए सयज सुहाली, गलती राते नींद रसाली। अम्बरे रहा राग आलापी, नाद-रले लीयो राय जगावी ॥२॥ जाग्यो भृप हुयो हंसियारी, दश दिशे जोवे नजर पमारी । आगे ऊभा दीठा सोई, पूछे प्रभु कहो कारण कोई ॥३॥ 'भामण्डल' भाग्वे सब यातां. भरत हीया में दुःख न समातो। ऊठी तब ही हुओ आगे, सी विमाने मारग लागे ॥ ४॥ कौतुक मंगल आया चाली, सोवन्तीररे जगावी पाली । 'द्रोण मेघ' नृप पासे जाची, सप गुण लक्षणवन्ती माची ॥५॥ कन्या सहश्र तणो परिवारो, ते सघली लागी तस लागे। प्रतिज्ञा के सहुनी मरखी, एकन पति करवाने हरणी ॥६॥ 'भरत' अयोध्या ए पहोंचायो, भामण्डलजी आयो भायो। विशल्या सघली लोधी, चाल्या तर ही दीलन कीधी ॥७॥ जल द्वीपे ऊजालो देखी, रविजन्यानो भर्म विशेषो। अनिही वेगे विमान चलावे, वान करांनो प्रभुपे आवे॥सोई॥८ मह कोई आरतीया होना, कद आवे वो बाट जोता। सूर्य उदय पंकज विकमारे, देवी विशल्या नहु मुग्धपाये। मोई ९ विशन्या प्रभुनो नन फासे आगे वे जलघर परसे । धूलचंदजी एन और दाल नर्जाग गुगडी गमनानक की म्हारा महागजाम अंग फाल ही २२ आइप रहोरे ।।।। १ शयामोनी ई- ( २६६) १ श्री जैन पद गमायण तृतीय वराह । -- -na-turnAHA- ३ ॥ कर सेथी तन फरसनलागी, जिम जिम माता थावे । दावानलके ऊपर जाणे.अमृत मेह वरसावे ।। म्हारा ॥१॥ इण पापण ने यो कुण लायो, शक्ति एम विचारे । इणआगेहूं किमकर ठहरूं. लारं लागो म्हारे ।। म्हाग ॥ २॥ थरहर थरहर धूजन लागी, आतो वेरण म्हारी । फिट फिट फिट फिट दुनियोंकरसी, लाज गमासी मारी ॥ ३॥ सारंग नाठे सिंहनी आगल, गरुड़ थकी जिम सापो । रविना आगे तमतिम नासे. पुण्य थकी जिम पापो ॥ म्हरा ॥४॥ मन मुरझायो होगई बिलखी. शक्ति परी पुलाई । दांत पीमती नाठी देवी, जौर न चाले कोई ।। म्हाग ॥५॥ ढाल मूलगी- शक्ति महु देखन्तां नाठी, जेम नागणी मार्याथी लाठी ।। सोई॥१० सा जाती हनुमन्ते झाली, तव सान सके हिंडी हाली । जेम चीड़ी सिंचाणे साही, पूछन्तां बोलन्त उच्छाही ॥ ११ ।। प्रज्ञप्तीनी हूं लघु भगिनी. देवी रूपेछू शुभ लगिनी | केड़ पडी फेलं तसठामो, महा शक्तीछे महारूं नामो ॥सोई॥१२ धरणेन्द्रे रावण ने आपी, रावणे पणहूं थिरकरी थापी । कामसो थो रावण केरो, पण लक्ष्मणनो भाग भलेरो ॥ १३ ॥ पूर्व भवना तपनो जोरो, विशल्या देख्यों मनमोरो ।। थरहर थरहर करी धूनाणी, तेह भणी प्रभुमै नरहाणी ॥ १४॥ फिरी नवि आy साथ तुम्हारे, अब ए निश्वे उचित हमारे। अबके जो जोवेवा लहीसं, छानी मानो होई रहीम् ॥ १५ ॥ सघले दीधो तब फिटकारो, लज्जा पामी ने हारी जमारों । दोतां साथे लीधोजूनी, दुष्टि अगौचर हुई भूती ॥ सोई ॥ १६॥ विसल्या तनु फरसेफेरी, तिम तिम साता थाय घणेरी । वावना चन्दन लेपकराया, व्रण जाणू अति सुखपाया ।सोई १७ आलस्य मोड़ी ऊथ्यो स्वामी, सर्वप्रकारे साता पामी ।
(२६७) -... mm www भी जैन पद रामायण तृतीय सएड । देखे आंसू न्हांखेरामो, लक्ष्मण पूछे प्रभुने तामो॥ सोई॥१८॥ ए स्यां कोट किसा रखवाला, ऐसी वाला रूपरसाला । एस्यों आवे छेरे वधावा, एस्यों लोकों नारे मेलावा।।सोई॥१९॥ रामसहु विरतन्त सुनावे, विशन्या नी वात जणावे । कन्या सहश्र साथे सुहावे, विशल्या प्रभु विवाह करावे। सोई॥२०॥ धूलचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज धनवाली धन सुन्दरी सुखकारी म्हारे आंगणीये ऊगीयोजी सह्या अविचल सूर्य प्रकाश टेर।। गावे वधावे गौरडीजी काई, झीणेस्वर सुखकार। लक्ष्मण जी जिवित ऊर्याजी म्हारे हुओहै आनन्द अपार ||सु र लिछमन ने वींद वणावीयोजी काई, सहस बनी परिवार । इन्द्राणोसम औपतीजी काई, विशल्या पठनार ।। सु० ॥२॥ दान नेपुण्यकिया घणाजी काई, कियोहे उच्छच अपार । धर्म प्रसादे सहु मिट्योजी काई, एह म्होटो जंजाल ।। मु० ॥३॥ ढाल मूलगी सोलह हजारां नारीमांही, विशल्या पटगणी माही। जेम राघव ने 'सीता' राणी. तेम 'लक्ष्मण ने एह वखाणी ॥२१॥ विद्याधर ने वानर मिलीयां, आपण मांही कीजे रलियां। जन्मोच्छव जेम ओच्छव होवे, देवी देव तमासो जोये ॥२२॥ निशाणे तय पड़ियो घावो, आनन्दीयोरे अयोध्या गयो। साजन जनने अधिक उल्हासो, दुर्जन जन घरे पड़ीयो नासो ॥२३॥ 'सौमित्री जीवन्नो मुणीयो. 'रावण' आरतिवन्तो धुगियो । मामन्त मंत्री ने बोलावी, को मतो उणमारे आयी । मोई ॥२॥ पर मना आनी थी मीत में प्रीन के काज हित निननो मन रद्ध गीलगहा है। चन्दर चीरन जंग महोदधि देसत ही गलेश दहा है ।। गम रु लिडमन जोर चली मन गान पिनार रहा है। नेह की नाद दाह लगी नप एरे महाद! माद कहा है।
4-04-444 ( २६८) श्री जैन पद रामायण हतीय ग्यएड। स्मामी श्री नथमलजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज हांक मतिकर गर्व दिवाना रावण वचन मुनीने भासे, नीति वचन मंत्री मिल दाखे । अरज कगं करजोर और दिलमाय विचागेरे ।। मान प्रभु वचन हमारो(टेर)वचन हमारो मान आन हिरदामें धारोरे १ ; रामचन्द्र की सोता नारी, जिन्हई चाहो करनी प्यारी । यह सत्यवन्ती नार प्यार नहीं बंछे थारो रे मान ॥२॥ मानधरी ने सीता लाया, कुलने म्होटा कलंक चढाया । अपयश फेल्यो अपार नार कुल करण संहारोरे । मान ॥ ३॥ भाई पिण गयो तेहने पासे, प्रभुजी अब तूं क्यूं न विमासे । भाई सुत सामन्त तंतु बंधन को धारो रे । मान ॥ ४ ॥ आयो दूत जो लंका धूजाई. रघुवर को है प्रबल पुण्याई । शक्ति गई महाराज काज, यह कैसे सारो रे ॥ मान ।। ५ ।। सीता दीजे ढोल न कीजे, राम राय मनमां ही रीजे । सीजे सारो काम जाण ए मुंपां नारोरं ॥ मान० ॥६॥ ढाल मूलगी- सौ मित्री में शक्ति ए ताड्यो, जाण्यो थो ए मारी पाड्यो । रामजी मरसे हुआ प्रातो, नहीं जीवे विण लिछमन भ्रातो।।सोई०।२५ वानरड़ा सवि जासे भाजि. धणियों विन नवि लडसे पाजी। वाए वादल जासे फाटी विण औषधए व्याधिन काटी|सोई०।२६। भाई सुतसुं सहु छूठसे. नाग फासना बन्धन बट से । महेजेही सहु आवी मिलसे. दूध मांहीए शाकर भलसे ।।सोई०।२७ एती मांहीं कोई न हुई दैव तणी कारणी छे जुई । स्वप्नानो हुचो विवाहो, भाई सुतनी आरती अगाहो ॥सोई०।२८ मंत्री भाखे सीता छूटे- भाई सुतना बंधन बेटे । एजो प्रभुजी तुम नहीं करसों, मूभा केडे तुमही मरसो।।सोई०।२९। एह अनुनय? आघो राखो, भंडं कीधानों फल चाखो। १ शर्त ।। सीता वापिस देने से राम, रावण के भाई व पुत्रो को छोड़ सकते हैं। -
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (२६६)
आप दुःखे परने दुःख जाणो, तुम आगेही आगे ताणोसोई०३०
रावण मंत्रीवर अव गणिया, दत बोलाचोने इम भणीया।
राजा राघव पासे जाई. बात कहोजो में कहिवाई ।। सोई॥३॥
आयोते राघव दग्बारे, पोले रोख्यो ते प्रतिहारे।
प्रभु आदेशे आघो आयो. सभा देखन्तो अचरज पायो।सोई०३२॥
इन्द्र सभा तेहयो ए दीसे, प्रभुनी इन्द्रज विश्वा वीसे ।
सामानिक सुरजे नृप पासे, पगे लागीने वचन प्रकाशे ।सोई० १३३॥
ढाल क्षेपक मूलगी-
प्रभु ने नमस्कार कीधो. वचन यो चोले है सीधो, पत्र कर पद्म
के दीधो । रावण जो बात कही मुझने, सुणाऊ यात सोही तुमने
॥ सत्य० ॥८९॥
ढाल मूलगी-
रावण भाखे तुम्ह गुण सिन्धु, मेलो म्हारा ए मुत बन्यु ।
सीवा टाली लियो मुझ गजो, अर्थ लेईने सारो कालोसोई॥३४||
कन्या तीन हजारज आपूं. आगे सारी प्रीतिज थापूं।
इमही करतां नावे दाई, तो तुम सारू नहींछ काई मोई० ॥३५॥
राम कहे तूं कहजे तेहने. गज्य-अर्थी ते चाहै एहने ।
प्रमदा चाहूंन फेर अनेरी, गत मन कहीजो एहवी फेरी सोई॥३६
पूजी अर्ची ने ओ सीता, जो तुम यो विश्व विदिता।
तो हूँ मेलं एहनो एहो. माई मुतने आणी सने हो ।मोर्ड ॥३७॥
दत कई तुम स्वामी सयाणा, वचन कहो को अधिक अयाणा ।
त्रिया है ने हागे छोप्राणो, गवण रूट्यो नहीं को त्राणो । गोई॥३८॥
सौमित्री तुम्ह जीवित जाग्यो, नहधी तो तुम मुदिन पिठाण्यो।
अपके सौमित्री कपि आपो. तुम्ह मरसोग नियम थापी सोई॥३०
एकही गपण विवाहजना, रावण नो यस भाग देना ।
सूर्य उदय धी जाये नाशो, अन्धकार पर देगी रिमामी मो.
सौमित्रों कई छे तूं दनो, प्रभु अनुमारे हुई आरतो ।
फहम विना तूं बोले चोलो, देवाय ले पायो गोलो ।। मोई॥४१॥
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( ३००) श्री जैन पद रामायण तृतीय स्खएड।
फिट रावण नं जीव्यू आजो, बोलन्तों नविपामे लाजो।
जेहना वाल्हा नन्दन भाई, बंधी थकी न शके छोड़ाई ॥सोई॥४२
जारे कहै तुम्ह स्वामीसाने, एह कहीछे रघुवर नाथे ।
उन्दर विलतज आत्रीखेते, साचकर रे भावी जेते |सोई ॥४३॥
लक्ष्मणनी एतातीवाणी, मांभलता बानगडां जाणी ।
कण्ठे साही बाहीर कीधो, दतगयो प्रभुपासे सीधो । सोई ।।४४||
पांच अने एतो चालीशे. ढाल सफली सयस जगीसे।
'केशराज' ऋषि राय विचारे, साचो जीते झुट्ट हारे ॥सोई०॥४५॥
दोहा (केदारा रागे)
दृत कही श्रवणे सुणी, फरि तेव्या मंत्रोश ।
कहो मतो कीजे किस्यो, आरति वन्ता ईश ।।१॥
मंत्री दाखे देवजी, सो वातों की एक ।
कही सुणावों स्वामीने, स्वामी तजेजो टेक ॥२॥
सीता दीधा रामने, सरे सहु तुम काम ।
भाई सुत आवे घरे, रहै सहुनी माम ॥३॥
एह सुणीने भीतरे, आणे अधिकी रीस ।
कोईन सूधो सरदहै, किस्यूं करे मंत्रीश ॥ ४ ॥
ढाल छंमालीसमी । तर्ज श्रेणिक रायहूंरे अनाथी निग्रन्थ
रावण राय आशा अधिकी थाय. तेतोछोडीरे क्यू हीन जाय ॥ टेर।।
दशकन्धर एमचिन्तवे, हिवकीजे कोई उपाय ।
कवण ऊपाये जीतवू, एतो राम लक्ष्मण राय ॥ रावण ॥ १॥
आरती अधिकी ऊपनी भाई सुतनी अगाध ।
वश पडया छे पारके, ते छूटया न दीसे आज | रावण० ॥ २॥
अमोघ विजय शक्ती थी. कांईयन सर्यो काज ।
लक्ष्मण जीवतो, ऊगर्यो, केम रहेसे म्हारी लाज ।। रावण ॥३॥
अस्त्र शस्त्र बले करी, जीती न सकू राम ।
कोई उपायथी वश करी, सारु वंछित काम ॥ रावण ॥४॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (३०१ )
विद्या सहस्त्र साधी जीके. ते सहुने अव लोय ।
जेह थकी कारज सरे, तेतो आजन दीसे कोय ।। रावण ॥५॥
एकान्तिक विचारणा, कीधी नृपे ते सोई।
विद्याजे बहु रूपिणी, ते साध्यों कारज होई ।। रावण ॥६॥
ए विद्या ने साधवारे, उद्यमी थयो ईग ।
एहथी मुझ थायसे. कारज विश्वा वीश || रावण ॥ ७॥
एम विगासो आवीयो, पोपथ गाला माही।
गणि पीठिका ऊपरे, जाई बैठो रे ज्यांही !! रारण ॥८॥
मन थिर रासी आपणू, विद्याने समरन्त ।
प्रकट हुवे त्यों सुधी, लंक पति नियम धरन्त ।। रावण ॥ ९ ॥
मिटतो अण मेलतो, आसन पदम ठावन्त ।
जप माला ने कर ग्रही, विधि जाप जपन्त || रावण ॥१०॥
कहै देवी मण्डोदरी, तव पोलीया 'यम दण्ड' ।
दिवसतो, आठों लगे, कोरे धर्म प्रचण्ड ।। रावण ।। ११ ।।
आंबिल ने नीची करो, करो तप उपवार ।
दान द्यो शुद्ध भावलं. करिये शोल अभ्यास ॥ रावण ॥ १२ ॥
पडहो दीधो पुर विगे. सहु कोई करजो धर्म ।
नहीं करेतो मारवो, भावीर वाणी गर्म ।। रावण० ॥ १३ ॥
खेचरे आवी सुग्रीवसुं, एह जणावी बात ।
विद्या तो बहु रूपिणी. साधे विश्व विखायान ।। राधणः ॥ १४ ॥
कपि पति माखे रामनं. कीने कोई उपाय ।
सिंह भने चलि पांपर्यो, लीधीरे क्यूँ दिन जाय ॥ गवण ॥१५॥
एह विद्या साधया, नरिजावे को आज ।
एकही मीमो नविपड़े, बलार विणगे कान ।। गवण ॥ १६ ॥
रामकर थिरनापणे, पूरीयो पान ।
अन्तगर कोई मनिकरो, होई रे आतुर जान । सवय ॥१७॥
शाप ए सुग्रीवनी, करिपोरे उपकम।
मूलही थी छदवा, आतुर होई गर्म । रायम ॥ १८ ॥
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( ३००) 'श्री जैन पद रामायण तृतीय वएड ।
फिट रावण ने जीव्यूं आजो, बोलन्तों नविपामे लाजो।
जेहना बाल्हा नन्दन भाई, बंधी थकी न शके छोडाई ।सोई॥४२
जारे कहै तुम्ह स्वामीसाने, एह कहीछे रघुवर नाथे ।
उन्दर विलतज आवीखेते, साचकर रे भावी जते |सोई ॥४३॥
लक्ष्मणनी एतातीवाणी, सांभलता वानरडां जाणी ।
कण्ठे साही बाहीर कीधो, दनगयो प्रभुपासे सीधो । सोई ॥४४॥
पांच अने एतो चालीशे. ढाल सफली सयस जगीसे ।
'केशराज' ऋपि राय विचारे, साचो जीते झंट हारे ।सोई०४५।।
दोहा (केदारा रागे)
दृत कही श्रवणे सुणी, फरि तेब्या मंत्रीश ।
कहो मतो कीजे किस्यो, आरति वन्ता ईश ॥ १ ॥
मंत्री दाखे देवजी, सो वातों की एक ।
कही सुणावों स्वामीने, स्वामी तजेजो टेक ॥२॥
सीता दीधां रामने, सरे सहु तुम काम ।
भाई सुत आवे घरे, रहै सहुनी माम ॥ ३॥
एह सुणीने भीतरे, आणे अधिकी रीस ।
कोईन सूधो सरदहै, किस्यू करे मंत्रीश ॥ ४ ॥
ढाल छंमालीसमी । तर्ज श्रेणिक रायहूंरे अनाथी निर्गन्ध
रावण राय आशा अधिकी थाय. तेतोछोडीरे क्यू हीन जाय ।।टेर॥
दशकन्धर एमचिन्तवे, हिवकीजे कांई उपाय ।
कवण ऊपाये जीतवू, एतो राम लक्ष्मण राय ॥ रावण ॥ १॥
आरती अधिकी ऊपनी भाई सुतनी अगाध ।
वश पड्या छे पारके, ते छूटया न दीसे आज ॥ रावण ॥ २॥
अमोघ विजय शक्ती थी. कांईयन सर्यो काज ।
लक्ष्मण जीवतो, ऊगर्यो, केम रहेसे म्हारी लाज | रावण० ॥ ३॥
अस्त्र शस्त्र बले करी, जीती न सकू राम ।
कोई उपायथी वश करी, सारु वंछित काम ॥ रावण ॥४॥
(३०२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। --- ~~~ M. अंगदादिक आवीया, पामवा प्रशंस । गुप्त रावण पारवती, कर वारे विद्या भ्रंम ॥रावण ॥ १९ ॥ उपसर्ग अति आकरा, कीधा विविध प्रकार | ध्यान थी दश कंघरु, नहीं चन्यो लगार || रावण ॥ २० ॥ कहै अंगद राय राम तेज अखण्ड | जाणीयो ते तेहथी, मांड्यो रे एह पाखण्ड ॥ रावण ॥ २१ ॥ तेहहरी सीता सती, परोक्षे परपंच । देखतां मण्दोदरी. हूं लई जाऊं रे खंच ॥ रावण ॥ २२ ॥ साही लीधी सुन्दरी. जेहवी होय अनाथ । नजर आगे रे रोवती, लेई चाल्यो कपि माथ ॥ गवण ॥ २३ ॥ निभं छे वचने करी, अकट विकट अपार । विल २ शब्द करे घणूं. मण्दोदरी तिण वार ॥ रावण ॥ २४॥ धूलचन्दजी कृत क्षेपक ढाल तर्ज धर्म करोरे म्हारा वेलियां- प्रीतम ? पलने, खोल रे. कपि ए ले जावे कर जोर रे॥टेर। रोवे पोटे रानी अनाथज्यू, सबल करन्ती शौर रे ।। पी० ॥ १॥ ओ ध्यान कहो कांई आडोरे आसी, प्रीतम पकड़ोंनी योने दौररे ॥२॥ इजत गमावे देखो वानर म्हारी, नायक एह निटोलरे । प्री ॥३॥ वार वार विललाट करन्ती, पियु वोल बोल तूं बोल रे ॥ग्री ॥४॥ ढाल मूलगी एह उपसर्ग आकरा, कीधा रावण पास । मण्दोदरी राणी तणा राय न देखे नयणे तास ॥ रावण ॥ २५ ॥ ध्यान सूं लग लीनता निहाले नहीं निजनार । जाणी निश्चक आकरो, विद्या सिधी तिणवार ॥ रावण ॥ २६ ॥ गगन ने उद्योतती, धरे रूप रसाल । शीघ्र सूं रावण आगे, आवी विद्या तत्काल ॥ रावण ॥ २७ ॥ अन्तरीक्ष रही सन्मुखे, कहै विद्या ताम | ताहरो मननो वंछियो, मैं करूं सघलो काम ॥ रावण ॥ २८ ॥ विश्वने वश · आणवा, अछू हूं समर्थ । - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (३०३) कोण लक्ष्मण रामजी, अवरसह छे व्यर्थ ॥ रावण || २९ ॥ विद्या चायक सांभली. पाम्यो हप अपार । काज सयौं अब माहरो, गई चिन्ता रे अपार ।। रावण ॥३०॥ कहे रावण रायजी, तू कहे ते सहु साच । समय सम्भालेसही, अविचल रहे तुम वाच । रावण ॥ ३१ ॥ विसर्जी विद्यातदा, जाई पहोंची निज ठाम । वानरा पण रामने, करे आवी परणाम ।। रावण ।। ३२ ।। देवी मण्डोदरी अंगद तणो, निमुणी एह उदन्त । करतो हू हू कार अधिको, आवेरे घरही तुरन्त ॥ रावण ।।३३।। स्नान भोजन करी रावण, गर्ने पूरित गान । विद्यानीतो सहाय पामी, करसं सहुनो धान ।। रावण ।। ३४ ॥ धूलचंदजी फव-क्षपक डाल न कांगसीयारी म्हारा प्राणपति अभिमानी ने समझायण चालोरे ।। टेर।। मण्डोदरी रानी कहै वानी सुनलो चहनों सारीरे। प्रियतम ने समझावा काजे, चालो मेरी लारी। सोकड़ सहु हालोरे ।। म्हारा० ॥ १ ॥ सर सिणगार उतार्यों ननको, मनको हर्प मिटायो रे। सादा पुराणा वस्नर लेकर, वनिता येप बनायो रे ।। देखेसी व्हालोर ।। म्हारा० ॥ २ ॥ इणपर रूप विरूप करीने, रावणपे चली आई रे ।। आंस मांही आनं परसे. करे घणी नरमाई रे ।। म्हारी अरजी शालोरे || म्हारा० ॥ ३॥ || जपमधदछप्पर । आज है चार आदित्य वदे इस महिला पानी। दजो सोमन देख राज रहनी नहीं गनी ! मंगल चाऊंगन्द कन्य फिम बुद्ध कहा, विस्पनिने करसा जोर करने घ्यायो ।।
- (३०४) श्री जैन पद रामायण तृतीय स्बएछ। आज गया थावर इता कहे मन्दोदर कूकवे, लंक डाण जांण आणीलग्या मानी हट नहीं मूकवे ? क्षेपक ढाल तर्ज लावणी श्री रामगुनि कृत- कहे मन्दोदरी वात नाथ मुझ मांनो छोडो सीता की गैल आधी मत तां नां। रघुवर को महातेज जगत नहीं छांनो, घर फूटो महाराज भाई लियो कानों ॥ नौकर सब इनठौर दौर गये भाजी॥ दिन वदले महाराज लहत है पाजी ॥ तुमडूं को सिखवत नहीं कोई स्यांनो ॥ कहे मण्डोदरी ॥१॥ कुनजानी हस्त ग्रहस्त सभी घटनासी, कुनजानी रणवीच गंक्षस हटजासी । कुनजानी जम्यूमाली नंदकट जासी, कुनजानी सुग्रीव आदि छुट जासी । कुनजानी कपि रील जंगे अडजासी, कुनजानी गढलंक वंक वुडजासी। अठा आगे क्याहोसी जांने भगवांनो, कहे मण्डोदरी ॥ २ ॥ कुन जानीथी शक्ति खाली चलजासी, कुन जानी इन्द्रजोत जोधा बंधनासी । कुनजानी लिछमन वीर सहस परणेसी, कुनजानी वैरी फौज घेरो आय देसी । नन्दन बन्धनवीच देवर पिण जांना ॥ कोई- कहसी ऐसी बात नहींथी दांनो ॥ कहे मण्डोदरी ॥३॥ ॥ क्षेपक ढाल तर्ज हो पिऊ पथिड़ा। होपिउ मतवाला हजेयन समझो कायनो, भाईअरु नन्दन सघला वांधी यारेलो । होपिउ मतवाला सहुथाका समझायजो, शक्तिरे परमुख शस्त्र शरनहीं सांधीयारेलो ॥१॥ होपिउ मतवाला पव न देवगयो आजजो, धूवां फूका पिण कीधा हमे हाथमरे लो। होपिउ मतवाला दुर्गापिण गई भाजजो, आरतिनहीं हुईछे आज प्रभातसुरेलो ॥ २ ॥ होपिउ मतवाला सूर्यदेव गयो रूठजो, वेमाता पिण कोद्रव आज ना दलेरेलो । होपिउ मतवाला पुण्य पिणदीवी पूठजो, दिन२ निजदल राम अरिदलसे मिलेरेलो ॥ ३ ॥ क्षेपक ढाल तर्ज गैरोजी फूल गुलावरो। थे मानोजी सीखसुहामणी थेतो मांनो मानो नणदीरा वीर म्हारा - ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( ३०५) साहिया में निरखी परखी इक बातमें शील रखने रखे शरीरा ।। म्हारा सा-थे मांनो ॥१॥ ए रामचद्र की भारजा आतो सति योमे शिरताज ॥ म्हारा ॥ केवली आगे भाखीयो, कांई भूलगया महाराज | म्हारा ॥ थे मांनो ।। २॥थे जानकी लाया घरजानकी आतो प्रानकी लेवनहारा ॥ म्हारा थे मांनो ॥ ३॥ कुमी नहीं किणवातरी, थारे नारी सहस अठारा ।। म्हारा ॥ बलि जोयोनी वक्त विचारने, रही थोडीसी घणीगई लारा ||म्हारा थैमानो॥४॥ क्षेपक ढाल तर्ज दलाली लालनकी- कहे मण्डोदरी सुन पिया रावण, आज मूतीमें महिलां । होई उदासी नींद निवारी, मैं भूली सगली सहिलांजी । सीता ने लेई रामसं मिलो मांनो मांनो पियाजी, म्हारी सीख सीताने लेने रामसं मिलो ।। टेर ॥ १ ॥ इम करतां मुझ निद्रा आई, सुपनो एकज दीठो । कांई सुणाऊ तुझने आगे, पिण नाहघणो छे धीटोजी ॥सीता ॥२ राम चन्द्रजी की सेनाआई, फिर गई लंका दोली। लंकामांही आग लगाई घर २ मांही होलोजी ॥ सीता ॥३॥ मांही घान्यो तेल घिरतने, रघु पतिने आई रीसो। वीश हाथतो तूटा देख्या, तूटा देख्या दश शीसोजी ।। सीता ४ ओ सुपनो देखीने जागी, नयनो डार्यो नीर । अवहूं आई अरज करणने, मानों नणदीरा वीरजी ।। सीता ।। ५ । रत्नश्रवानी नात तुम्हारा, माता केकसी रानी । थे छोपोता मुमाली केरा, सघोने मन देवो पाणीजी ।। सीता६ चैथमन भी लंका लीधी, विखण्डाधिप कहारो। रामचन्द्र को दुःखदेवतो. क्यूं थे लंफ गम बोजी ।। सीना ॥ ७॥ राम राजा थे वह महापलिया, जिपने थे झरज कीधा । पिण मीताने लाया ऊताई, हानीने धमेढ़ा लीधाजी । मीता। म्होटी गण्यों नहस अष्टादरा, ये हो म्हांस नाय ।
(३०४) श्री जैन पद रामायण तृतीय खए। आज गया थावर इता कहे मन्दोदर कूकवे, लंक डाण जांण आणीलग्या मानी हट नहीं मूकवे ।। क्षेपक ढाल तर्ज लावणी श्री गममुनि शत- कहे मन्दोदरी वात नाथ मुझ मांनो छोडो सीता की गैल आधी मत तां नां। रघुवर को महातेज जगत नहीं छांनो, घर फूटो महाराज भाई लियो कांनी ॥ नौकर सब इनठौर दौर गये भाजी ॥ दिन वदले महाराज लड़त है पाजी ॥ तुमडूं को सिखवत नहीं कोई स्यांनो ॥ कहे मण्डोदरी ॥१॥ कुनजानी हस्त ग्रहस्त सभी घटनासी, कुनजानी रणवीच गंक्षस हटजासी । कुनजानी जम्बूमाली नंदकट जासी, कुनजानी सुग्रीव आदि छुटजासी । कुनजानी कपि रीछ जंगे अडजासी, कुनजानी गढलंक वंक वुडजासी। अठा आगे क्याहोसी जाने भगवांनो, कहे मण्डोदरी ॥ २॥ कुन जानीथी शक्ति खाली चलजासी, कुन जानी इन्द्रजोत जोधा बंधनासी । कुनजानी लिछमन वीर सहस परणेसी, कुनजानी वैरी फौज घेरो आय देसी । नन्दन बन्धनवीच देवर पिण जांनो ॥ कोई- कहसी ऐसी बात नहींथो दांनो ॥ कहे मण्डोदरी ॥३॥ ॥ क्षेपक ढाल तर्ज हो पिऊ पथिड़ा ।। होपिउ मतवाला हजेयन समझो कायजो, भाईअरु नन्दन सघला बांधी यारेलो । होपिउ मतवाला सहुथाका समझायजो, शक्तिरे परमुख शस्त्र शरनहीं सांधीयारेलो ॥ १॥ होपिउ मतवाला पत्र न देवगयो आजजो, धूवां फूका पिण कीधा हमे हाथरे लो। होपिउ मतवाला दुर्गापिण गई भाजजो, आरतिनहीं हुईछे आज प्रभानसंरेलो ॥२॥ होपिउ मतवाला सूर्यदेव गयो रूठजो, बेमाता पिण कोद्रव आज नां दलेरेलो । होपिउ मतवाला पुण्य पिणदीवी. पूठजो, दिन२ निजदल राम अरिदलसे मिलेरेलो ॥ ३ ॥ क्षेपक ढाल तर्ज गैरोजी फूल गुलावरो। थे मानोजी सीखसुहामणी थेतो मांनो मांनो नणदीरा वीर म्हारा , श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। ( ३०५) साहिया में निरखी परखी इक वातमें शील रखने रखे शरीरा ।। म्हारा सा-थे मानो ॥१॥ ए रामचन्द्र की भारजा आतो सति योमे शिरताज || म्हारा ।। केवली आगे भाखीयो, कांई भूलगया महाराज | म्हारा ।। थे मांनो ॥ २॥थे जानकी लाया घरजानकी आतो ग्रानकी लेवनहारा | म्हारा थे मांनो ॥ ३ ॥ कुमी नहीं किणवातरी, थारे नारी सहस अठारा । म्हारा ।। वलि जोरोनी वक्त विचारने, रही योडीसी घणीगई लारा | म्हारा थेमांनो॥४॥ क्षेपक ढाल तर्ज दलाली लालनकी- कहे मण्डोदरी सुन पिया रावण, आज सूनी में महिलां। होई उदासी नींद निवारी, मैं भूली सगली सहिलांजी ।। सीता ने लेई राम मिलो मांनो मांनो पियाजी, म्हारी सीख सीताने लेने राम मिलो ।। टेर ॥ १।। इम करतां मुझ निद्रा आई, सुपनो एकज दीठो। कांई सुणाऊ तुझने आगे, पिण नांदयणो छे धीटोजी ||सीता ॥२ राम चन्द्रजी की सेनाआई, फिर गई लंका दोली । लंकामांही आग लगाई घर २ मांही होलोजी ।। सीता ॥३॥ मांडी घान्यो तेल घिरतने, रघु पतिने आई रीसो । वीश हाथतो तूटा देख्या, तूटा देख्या दा शीसोजी। सीना ४ ओ सुपनो देखीने जागी, नयनो डार्यो नीर । अरहूं आई अरज करणने, मानों नणदीरा पीरजी ।। मीता ।। ५ । रत्ननवाजी नात तुम्हारा, माता के रुसी रानी । थे छोपोता सुमाली केरा, मघलोंने गत देवो पाणीजी। मीना चैत्रमन थी लंका लोधी, निमण्डाधिप कहारो। रामचन्द्र को दुःखदेवको, थे लंक गम बोजी ।। मीना ॥७॥ राम राजा वे यह महापलिया, जिणनं थे औरज कीधा ! पिण सीताने लागा उठाई, छानी में धमेदा लोधानी नीना ।।८ म्होटी राज्यों महन अधादश, ये हो म्हांग नाय ।
-~-~- - प्रभु अवतो ( ३०६) श्री जैन पद रामायण तृतीय गएउ। जो सीताथे पाछी नमुपो, तो खालीकरास्यो पिउ म्हाराहाथजी॥९ इतरा दिन तक राज्य करन्तां, दिन२ क्रान्ति सवाई। खसातामें बैठापिऊनी, आकांई कुमति कमार्टनी ॥ सीता ॥१० पर२ नेणां पाणी न्हांखे, पिन रावन वम नहीं आयो। पाकी रानीसो इमभाखे, थारी माता जणनेस्यु खायोजी ॥ ११ ॥ क्षेपक ढाल तर्ज अरजी सुन नेमहमारी- पेया मेरी एक नमानी, हग्लायोतू नार विरानी ॥ टेर ॥ रामचन्द्र की सीता लायो, गधरी अधिकानी । ॥ नारी तुझं कथन नमाने, क्यों तुम अकल भ्रमानी ।। छोड गुमानी. ॥ पिया ॥१॥ न्द्र सरीसो राज तुम्हारे, समुद्रसी खाई भरानी । सोवन कोट ओट लकाके, जिनमेंही लाय लगानी ।। खत अपनी नपिछानी ॥ पिया ॥२॥ थे कहता मुभ सैन्य अपर वली सोतो पास बंधानी । कुलको कन्दन क्यों करे पियुडा, तूटेला अतितानी ।। रामके पुण्य प्रधानी ॥ पिया ॥ ३ ॥ दोहा- सुनली वानां नारकी, उत्तर कुछ नहीं देह । शिक्षा सब खालोगई, ज्यों पत्थर पर मेह ॥ १ ॥ ढाल मूलगी- आप जणवा कारणे, आवे ते उद्यान । सती साथे वोलीयो, तब मनसाने अनुमान ॥ रावण ॥ ३५ ॥ नियम भंग तणोरे भय अती. भांजी हणवा देख । मारी देवर स्वामी थारो, सेवू तुझ सुवि शेष ॥ रावण ॥ ३६॥ ए अवसरे रायजीनो, व्रत भंज्योरे भाव । ते अवसरे अधो गतिने, नृप यांध्यो चौथी नो आय॥रावण।।३७ एह सुणन्तां कटुक वाणि, रायनी दुःखदाय । तास असाता थी धरती, पड़ीरे मूर्छाखाय ।। रावण ॥ ३८ ॥ . .
- on-am- श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड । (३०७) करी शीतलता ऊठाई, अभिग्रह कीधो सार । राम लक्ष्मण मूवां पीछे, त्यजवा चारे आहार ॥ रावण ॥३९॥ ॐ क्षेपक राधेश्याम रावन कहे सुन सुन्दर मुखी, चपल चतुर चित्तचौर । एक वार अनुराग से देखले मेरी और ।। मॅझधार में मेरी नौका है सो पार लगादे ए सीता । जिसराह में सच्ची राहत है, वह राह बतादे ए सीता ।। कर कृपा दृष्टि मेरे ऊपर किञ्चित् मुसका दे ए सीता । वमयही अर्ज है हे सीता, दीदार दिखादे ए सीता ।। हर तरह प्रार्थना करता था, हर तरह प्रीति दिसलाता था। फिर साम दाम और दण्ड भेद, चारो प्रकार समझाताथा ।। देख असुर की ढीठता, लगी हृदय में चौट । बोली नीची दृष्टिसे, कर तिनकेकी औट ।। हे मूर्ख याद रख यहतेरे, पिछले पापोंका साया है। जो सूने वनसे तूंमुझ को, इसजगह चुराकर लाया है ।। नो हजार जुगनू रोशनहों. लेकिन न कमलिनी सिलनी है। सुरज जिस समय निकलते हैं, वह उन्हींको देख चटकती हैं। मेरी यह आंस कमलिनी हैं. सूरज समान श्री रघुवर है तेरी यह मदमातीपाते, एक जुगनू सेभी कमतर है। मेरी और उनकी शानकोत. निशिचर कुछ पहचानना है। उन सरे करारे पाणोंकी. क्यों नहीं तू नास्त जानता है ।। अफ़सोस जो अभि सन्मुख होते, तोप्रभी तुझं रतलादेने । दमभर में शानो शोस्त को. मट्टी में तेरी मिलादेले ।। गर आज नहीं तो कल ही मही. नन्दी यो दिन भाता है। हे अभिमानी ! है हठधर्मी ! करनी सा फल न पाता है। क्रोधचा दगीरा को, मुनका यह गुप्तार । ओगे अपनी तालमी, और मंची गटार ।।
vour क्षेपक ढाल ( ३०८) .श्री जैन पद रामायण तृतीय मएड । बस खबरदार हो ए सीता, चलती है जुबां बहुत तेरी । क्या कानसे तूने सूनी नहीं, ताकत मेरी जुर्रत मेरी ॥ वस जन्द मानले हुक्म मेरा. वर्ना तेरा शर काटुंगा । यह गुस्ताखी तेजी तेरी, दमभर में अभी भुला दूंगा। तर्ज रगत नाटक- अरे रावण तूं धमकी दिखताकिसे, मुझे मरनेका खौफ खतरही नहीं। मुझे मारेगा क्या अपनी खेरमना, तुझे होनेकी अपने खबरही नहीं ॥ टेर ॥ १ ॥ क्यातूं सोनेकी लंक कामातकरे, मेरे आगे यह मिट्टी काघर ही नहीं। तेरी हस्तीहै क्या सिवा राम पिया, मेरी नजरीमें कोई बशरही नहीं ॥ २ ॥क्युं नहीं जीततू स्वयम्बर लायामुझे, मेरी चाहजो तेरे दिलमेंवसी । थातू कौन शहर मुझे देनी वता, क्या स्वयम्बरकी पहोंची खवरही नहीं ॥ ३ ॥ आवे इन्द्र नरेन्द्र जोमिलके सभी, क्या मजाल जो मेरा शीलहने । मेरे मनका सुमेरु हिलेगानहीं, मेरे मनमें किसोका डरही नहीं ॥४॥ चाह चन्द्र गरम हो यदि सूर्य भी शीतल, समुद्र मर्यादा भंगकरे । अनहोनी जोवानहुवे जोकभी, नोमनमेरु हमारा हिलेगानहीं ॥५॥ तूंने सहस अठारा जो रानीवरी हाय उन्हपरभी तुझको सबरही नहीं। परतिरिया में तूं ने जो ध्यान किया, क्या निगोद नरक का खतर ही नही ॥ ६ ॥ हुआसोतो हुआ अवमानकहा, मुझे राम पेजल्दी से देतू पठा । कहे न्यामत वगग्ना देखेगे यह, तोरे शरकी कसम तेरा शरही नहीं ॥७॥ क्षेपक राधेश्याम- बोली चलरे पातकी, क्यों करता बकवाद । मैनेजो पहीले कही, करले उसकू याद ॥ तू योद्धानहीं चौरहै अब, इसलिए तुझधिकारतीहूं ॥ तेरी सोनेकी लंकापर. नफरत की ठोकर मारतीहूं । सची सतवन्ती नारीका, सत् आसमान पर रहताहै ॥ व्रत पतिव्रता क्षत्रियाणीका; हरवक्त पान पर रहताहै ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( ३०१) तूमुझे अकेली देखआज, सीनाजोरी दिखलाताहै। पिंजरेमें फंसी सिंहनीको, नंगी तल्वार दिखाताहै। तल्चार मुझे मेरे तनको, हरिगिज भी काटनहीं सकती। मेरा पवित्र और पाकलहूं, नापाक यह चाट नहीं सकती। मेंबडी खुशीसे कहतीहूं, मुझपर तन्वार चलादे तू ॥ अहसान तेरा होगा मुझपर, जो दुःससे मुझे छुडादेतू । परयाद रहे वेकसका खू, रोयेगा तेरे दामन पर ।। यह ही तन्वार लालहोकर, आयेगो तेरी गर्दनपर । हसरत की निगाह है तारोंमें, और आसमान सब तकताहै। मुझ वेगुनाह मुझ बेकसका, यह खून कहीं छिपसकताहै ।। सन सना रहीहै हवाजोयह, सोमेलिए शहादतहै। 'दोझख की आग भभकतीहै, वह तेरेलिये कयामत है ।। ढाल मृलगी- काया-ममता छोडीने, तजी जीवीतव्य आश । शील समकित रासवाने, चैठी रे आगले ताम || रावण ॥४०॥ धीरज अवलम्बी करी, जाणी कर्म नो दोष । सती लंक पति ऊपरे, नहीं आण्यो रंचक रोप ।। रावण |४|| एह सांभली राय चिन्ते. राम सूंछे अतिप्यार । हूं चिपास करूं शं चले ! न मिले एहनो उनार ॥ गवण ॥४२॥ शक्ति ने हीना होवरे, धले पंकज जेम । माछलो तलफीमर, जलने न उपजे प्रेम ।। रावण ।। ४३ ॥ जिन धर्म नो मर्म जाणी काम-अधो दोई। एह अन्याय अधिक महोटो. में कीमो हेरे मोई रावण ॥४४॥ अण जुक्तो में कियो, विभीषण नो पोल । मान्यो नहीं मानने वस्य, माल रे भार सम नोल गर॥४५॥ तेरस दाल न लावी रागनुनि पून नहीं मान्यो विभीपर बोल दिवे पिटनायो, मनी भी दियो दुःख दाथ नही आयो ।। भाई बंधावाप परेर आयो।
VAR (३०८) .श्री जैन पद.गमागण तृनीय खण्ड । बस खबरदार हो ए सीता, चलती है जुबां बहुत तेरी । क्या कानसे तूने सूनी नहीं, ताकत मेरी जुरंत मेरी ॥ बस जन्द मानले हुक्म मेरा. वर्ना तेरा शर काढूंगा । यह गुस्ताखी तेजी तेरी, दमभर में अभी भुला दंगा। क्षेपक ढाल तर्ज रगत नाटक- अरे रावण तूं धमकी दिखताकिसे, मुझे मरनेका खौफ खतरही नहीं। मुझे मारेगा क्या अपनी खेरमना, तुझे होनेकी अपने खबरही नहीं ॥ टेर ॥ १ ॥ क्यातूं सोनेकी लंक कामातकरे, मेरे आगे यह मिट्टी काघर ही नहीं । तेरी हस्तीहै क्या सिवा राम पिया, मेरी नजरीमें कोई बशरही नहीं ॥ २ ॥क्युं नहीं जीततू स्वयम्बर लायामुझे, मेरी चाहजो तेरे दिलमेवसी । थातू कौन शहर मुझे देनी वता, क्या स्वयम्बरकी पहोंची खवरही नहीं ॥ ३ ॥ आवे इन्द्र नरेन्द्र जोमिलके सभी. क्या मजाल जो मेरा शीलहने । मेरे मनका सुमेरु हिलेगानहीं, मेरे मनमें किसोका डरही नहीं ॥४॥ चाह चन्द्र गरम हो यदि सूर्यभी शीतल, समुद्र मर्यादा भंगकरे । अनहोनी जोवानहुवे जोकभी, नोमनमेरु हमारा हिलेगानहीं ॥ ५॥ तूंने सहस अठारा जोरानीवरी हाय उन्हपरभी तुझको सवरही नहीं। परतिरिया में तूं ने जो ध्यान किया, क्या निगोद नरक का खतर ही नही ॥ ६॥ हुआसोतो हुआ अवमानकहा, मुझे राम पेजल्दी से देतू पठा । कहे न्यामत वगग्ना देखेगे यह, तोरे शरकी कसम तेरा शरही नहीं ॥७॥ क्षेपक राधेश्याम- बोली चलरे पातकी, क्यों करता बकवाद । मैंनेजो पहीले कही, करले उसकूँ याद ।। तू योद्वानहीं चौरहै अब, इसलिए तुझधिक्कारतीहूं । तेरी सोनेकी लंकापर. नफरत की ठोकर मारतीहूं । सच्ची सतवन्ती नारीका, सत् आसमान पर रहताहै ॥ व्रत पतिव्रता क्षत्रियाणीका, हरवक्त पान पर रहताहै । - भी जैन पद रामायण तृतीय स्मएड। (३०६) तूमुझे अकेली देखआज, सीनाजोरी दिखलाताहै ।। पिंजरेमें फंसी सिंहनीको, नंगी तल्वार दिखाताहै । तन्वार मुझे मेरे तनको, हरिगिज भी काटनहीं सकती ॥ मेरा पवित्र और पाकलह, नापाक यह चाट नहीं सकती। मेंबड़ी खुशीसे कहतीहूं, मुझपर तन्वार चलादे तू ॥ अहसान तेरा होगा मुझपर, जो दुःखसे मुझे छुडादेतू । परयाद रहे चेकसका खू, रोयेगा तेरे दामन पर ।। यह ही तल्वार लालहोकर, आयेगो तेरी गर्दनपर । हसरत की निगाह है तागेमें, और आसमान सब तकताहै। मुझ वेगुनाह मुझ वेकसका, यह खून कहीं छिपसकताहै ।। सन सना रहीहै हवाजोयह, सोमेरलिए शहादतहै। 'दोझख की आग भभकतीहै, वह तेरेलिये कयामत है ।। ढाल मृलगी- काया-ममता छोडीने, तजी जीवीतव्य आश। शील समकित राखयाने, बैठी रे आगले तास ॥ रावण ॥४०॥ धीरज अवलम्बी करी, जाणी कम नो दोष । सती लंक पति उपरे, नहीं आपयो ग्चक रोप ।। रावण ॥४१॥ एह सांभली गय चिन्ते. राम मूंछे अतिप्यार। विपास करूं शं पले ! न मिले पहनो उतार ॥ रावण ॥४२।। शक्ति ने हीना टोरे, थले पंकज जैम । माललो तलफीमर, जलने न उपजे प्रेम || गवण || ४३ ॥ जिन धर्म नो मर्म जाणी काम-अंघो होई। एह अन्याय अधिक महोटो. में कीधी छरे सोई रावण ॥४४॥ अण जुक्तो में फियो, विभीषण नो मोल ! मान्यो नहीं मानने वस्प, नाले रे शार सम नोल राण ॥४५॥ पर दात नर्स लावणी-गनमुनिल नहीं गांन्यो विभीपण शेल डिये पिटनायो, मनी भणी दियो दुःख हाथ नहीं आयो !! नाई बेटा बंधापाय पर आयो ।
AAAAAAA संग आयो ।। सती० ॥ नहीं मांन्यो॥४॥ हे सीता! चल ( ३१०) श्री जैन पद रामायण तृतीय सएड। मुझ लगी कुमति की संग यूं ही भरमायो । मैं कियो नहीं मिन धर्म कर्म बंधवायो। नहीं मांन्यो ॥? | लंका सो मुझ राज काज नहीं सुधर्यो, गुरु ज्ञानी का वचन जानत हूं विसयों ॥ निमित्तीक गोल अमोल जावे किमखाली, सह संपदा को खोय आपदा घाली ॥ आंख मीच होय अन्ध सती हर लायो । सती हर० ॥ नहीं ॥ २ ॥ अब आवे न पाछी वात हाथसे खोई, २॥ म्हां जैसो कोई नीच भयो नहीं कोई ॥ मण्डोदरी को स्वप्न साच दरसावे. इणपर रावण राय घणो पिछतावे ॥ शूर्पनखा मुझ बहिन मुझे भरमायो॥ मुझे० ॥ नहीं ॥ ३॥ क्षेपक राधेश्याम- कर लडाई रामसे, कटे भटन के शीश । लगा सोचने हृदय में, तब लंका के ईश ।। भाई को वैरी करने का क्या फल है देख लिया मैं ने । बदला मिलगया मुझे उसका, जो उसपर जुल्म किया मैं ने ॥ मैं भी कैसा मतवाला था, यों भाई को त्यागा मैने । भाई भाई ही था आखिर, क्यों भाई को त्यागा मैंने ॥ उसके मत पर मैं चलता तो. यश मिलता और भलाई थी। हा ? मैंने उलटे उसके हो, दर्वार में लात लगाई थो॥ ढाल मूलगी- परधाने परगट पणे, हूं वार्यों बहुवार । सो न मान्यो आज जाण्यो, मुखे पड़ी मुज छार ॥ रावण ॥४६॥ कुल कलंक्यो मैं आपणो, मैं काज न सार्यो कोय । हाथ घसेजे शोच करे वे, न लहेरे वेला सोय ।। रावण ।। ४७॥ क्षेपक ढाल तर्ज लावणी- कछू न विगर्यो हाल सीता जो सोपं ॥ सब सुधरे मनका काज झण्ड जश रौपू ॥ घाल विमान के मांय सेना के बारे । सती जावे राम के पास हुवे जशमारे । रावण एम विमास सती ? - .
WA श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ( ३११) लार रामने देऊ । अब अश्लील वचन मुख माय तुझे नहीं केंऊ।। इम कही सीता लेई गयो दिल गाड़े, पिण शूर्पनखा तो वैर पूर्वलो काढे | मुनि राम कहे संग नीच तणी दुःख दायो । तणी० ॥ नहीं ॥५॥ दाल मूलगी- मन अपूठो वालीयो, माठी जाणी परनार । भोग थकी विरक्त थयो, पाछी देवा कियो विचार ॥ रावण ||४८t दाल क्षेपक मूलगी- भूप तन मनमें आलोची, वातमें एह करी पोची, आखिर में उमर है ओछी । काम अब करणो है ऐसो, जगतितल जश फेले जैसो ॥ सत्य० ॥ ९० ॥ लेई तब सीता ने चाले, कहो कुण होत चने टाले, शूर्पनसा रावण के पाले ॥ बालकनो रूप धर्यो जाम, रुदन को शब्द करे नाम ॥ मत्य० ॥ ९१ ।। दोहा क्षेपक रावण आयो गिरिगुहा, देसे मांही बाल । क्यो रोवे आनन्द कर. कहीये थारो बदाल। राम मुनि कृत क्षेपफ दाल तर्ज किरणमार्यो म्हारो गौर वताव पापी सिक किम धार्यो किन पोंछ मुझे प्यारारं किम धार्यो रे, तीन लोक अवलोक करीने मेंतो चरण ग्रयां धांगरे । ग्रयां थांगरे । ग्रह्या० ।। किम ॥१॥ मोहमहि पतितात हमारो, मो मानमणी जाणेसाग जाणे ॥२॥ मुझर्छ राखण विरलाजगमें, मोप छोडसे जाते है जमवारारे ॥ ३॥ क्षेपक साल तर्ज निहालदेरी- मानी निर्मानी धयाजी कांई. शोभा नहीं मुलतान । पणी इतयों पठेत्री. जीवन मृत्यु समान ।। ॥ अवमानन जोडो मदिपतीजी ॥ देर ।। १ ॥ अनम नमान आपफोजी काई, विस्थ पदो राजान। भाप पोते परने नमोनी काई द्वारी भयो हेगन ।। ||२॥
G464 NAV ( ३१०) श्री जन पद गमायण तृतीय खण्ड। मुझ लगी कुमति की संग यू ही भरमायो । मैं कियो नहीं मिन धर्म कर्म बंधवायो। नहीं मांन्यो॥ ? || लंका मो मुझ राज काज नहीं सुधयों, गुरु ज्ञानी का वचन जानत हूं विसर्यो । निमित्तीक गोल अमोल जावे किमखाली, सह संपदा को खोय आपदा घाली ॥ आंख मीच होय अन्ध सती हर लायो । मती हर० ॥ नहीं ॥ २ ॥ अब आवे न पाछी वात हाथसे सोई, २॥ म्हां जैसो कोई नीच भयो नहीं कोई ॥ मण्डोदरी को स्वप्न साच दरसावे. इणपर रावण राय पणो पिछतावे || शूर्पनखा मुझ बहिन मुझे भरमायो । मुझे० ॥ नहीं ।। ३॥ क्षेपक राधेश्याम- कर लडाई रामसे, कटे भटन के शीश । लगा सोचने हृदय में, तब लंका के ईश ॥ भाई को वैरी करने का क्या फल है देख लिया मैं ने । बदला मिलगया मुझे उसका, जो उसपर जुल्म किया मैं ने ॥ मैं भी कैसा मतवाला था, यों भाई को त्यागा मैंने । भाई भाई ही था आखिर, क्यों भाई को त्यागा मैंने ॥ उसके मत पर मैं चलता तो. यश मिलता और भलाई थी। हा ? मैंने उलटे उसके हो, दर्वार में लात लगाई थी। ढाल मूलगी- परधाने परगट पणे, हूं वार्यो बहुवार । सो न मान्यो आज जाण्यो, मुखे पड़ी मुज छार ॥ रावण ॥४६॥ कुल कलंक्यो मैं आपणो, मैं काज न सार्यों कोय । हाथ घसेजे शोच करे वे, न लहेरे वेला सोय ।। रावण ।। ४७॥ क्षेपक ढाल तर्ज लावणी- कछू न विगर्यो हाल सीता जो सौ ॥ सब सुधरे मनका काज झण्ड जश रौपं ॥ घाल विमान के मांय सेना के बारे । सती जावे राम के पास हुवे जशमारे । रावण एम विमास सती संग आयो ॥ सती० ॥ नहीं मांन्यो ॥४॥ हे सीता! चल ?
.MHAR wwwvvv श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ( ३११) लार रामने देऊ । अब अश्लील वचन मुख मांय तुझे नहीं फेऊ ।। इम कही सीता लेई गयो दिल गाढ़े, पिण शूर्पनखा तो पैर पूर्वलो काढे ।। मुनि राम कहे संग नीच तणी दुःख दायो । तणी० ॥ नहीं ॥५॥ ढाल मूलगी- मन अपूठो वालीयो, माठी जाणी परनार । भोग थकी विरक्त थयो, पाछी देवा कियो विचार | रावण ॥४८॥ ढाल क्षेपक मूलगी- भूप तव मनमें आलोची, वातमें एह करी पोची, आखिर में उमर है ओछी । काम अब करणो है ऐसो, जगतितल जश फेले जैसो । सत्य० ।। ९० ॥ लेई तब सीना ने चाले, कहो कुण होत चने टाले, शूर्पनसा रावण → पाले ।। बालकनो रूप धर्यो जाम, रुदन को शब्द करे ताम ॥ सत्य० ।। ९१ ।। दोहा क्षेपक रावण आयो गिरिगुहा, देखे मांदी बाल । क्यो रोवे आसन्द करें. कहीये थारो हाल। राम मुनि कृत क्षेपक दाल तज फिरणमार्यो म्हारो मोर बताय पापी फिर किम धार्यो दिन पोंछ मुझे प्यारारे किम धार्यो रे, तीन लोक अवलोक करीने मेंतो चरण ग्रयां थांगरे । ग्रयां थांगर ।। ग्रया० ।। किम ॥१॥ मोहमहि पतिनात हमारो, मो मानमणी जाणेसारा जागे ॥२॥ मुझकुं राखण विरलाजगमें, भोप छोडेसे जाने जमवारारं ॥ ३॥ क्षेपक टासन निहालदेरी- मानी निमांनी पयाजी फाई. शोभा नहीं मुलतान । पणी ऊनयों पछेजी, जीवन मन्यु समान ।। ॥ अवमानन छोडो गदिश्तीजी ॥ टर॥2॥ अनम नमापन आपकोजी गई, विस्य पदो राजान । आप पोते परने ननोनी काई, दारी यो देरान || || २ ( ३१२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड। पहिला ए कारज किमकियाजी कांई, पहुंच विना परतीय । आणी अनस्थ कियाघणाजी, अब मतदो पाछी सीय ॥ अव ॥ ३॥ अब देतां ए योपिताजी कांई, शिर रहतां गयो नाक । नाक विना स्योंजीव वोजी कांई, दवम बलियो ढाक ॥ ॥४॥ मानगयां महातम गयोनी काई, विनमहातम जीवे सोय । दिवटथयां दीवातणोजी कांई, महिमा नकरे कोय ॥ अव॥५॥ स्यों जीववो हार्या तणोंजी कांई, दिनमें चन्दा जेम | मूल नमाने महितलेजी कांई अगनी जैसे हेम || अब ॥ ६॥ मान राखनो मानलोजी कांई मतद्यो पाछी सीत । 'काने सुनसो सबमुखेजी कांई, रावन थयो फजीत ॥अत्र ॥७॥ सम्बाहो बल आपणोजी काई देखी नचूकोदान । 'थांने जीते जंगमेंजी कांई, ऐसो कुणछे राव ॥ अव ॥ ८ ॥ दिनफिरणे मनफिरेजी कांई, गाढो कियो मान । मुझ आगे एकवणछेजी काई, जाने सकल जहान ॥ अव ॥९॥ क्षेपक सवैया- परकी तीय आणीघरे सुन, राजन मानकरी दलबलजोरे । वोर भिडे नर राजजुडे रुनिशाण धरे, विद्याधन फोरे ।। रामकी तेग विशेपभई अब हारिके, हासिल देतही लोरे । धिकहै नरनाथ निशाचर! टेकग्रही फिर टेककू छोरे ॥१॥ अकज मित्रजेमूह अकज सुतविनय विहीणो, अकज अंगविन नयण अकज महतो मतिहीणो । अकजमुनि जे अपढ अकजनिस नेही नारी, टेक विना नर अफज अफज गुण गोठ गिमारी ॥ अकज दास उद्यम विना. अकज कुलच्छन भूपना, कविगद कहे हो राय हर अकन कि हांने ऊपना ॥ २ ॥ कर्म प्रमाण नृप तीको सुत मोह महिपति को पुत्र मांन मुझे, मेरी जगमें वडाई है । स्वग लोक इन्द्र तिके मानत हमारी मोज, शुभ्र लोक दानव देवों सू लड़ाई है । मृत्यु लोक मांहि कोई नहीं देख्यो आपसो, करे श्री जैन पद रामायण तृतीय सण्ड। ( ३१३ ) इंढी सव ठौर मैंतो याही ठोर पाई है। अवमो वतावो ठौर ताकी लाग पीठ दौर मानकी तजत मरोर कोडी जातळू लजाई है ३॥ मान खोयो इन्द्र ज्यों ने दियो तुम्हें काठ माही, मान खोयो धनद जिनेन्द्र व्रत धारी है। मान खोयो वाली जिन्दै चिऊं. दिशि तुम्हे फे-यो, करके तपस्वाभये पडे ब्रह्म चारीहै। मानहार्यो चन्द्र सूर्य करत प्रकाश रसवती, मानहारी दुर्गा जिणे आरती उतारीहै । मृत्यु लोकमांही मुझे आप एक सरो धार्यो आजहु विसार्यो ताते लानत धिकारीहै ॥ ४ ॥ क्षेपक फुण्डलिया- मत रोवे मुझ तन बसे मही न दे सीन, मान मिटावे माहरो एह कहां की रीत-एह कहां को रीत, ले सीया निज घर आयो, पैठी रहे निश्चिन्त मान बल वध्यो सवायो । छूटे पुत्र ने बंधवा एहवो करूं उपाय, करिये तो सघला घरांसह आवे मुखदाय ॥१॥ तेपफ टाल मूलगी- वचन सुन रावन महागजा, धिक् प चिन्तवीयो कात्रा, मानगयां मृत्यु का साजा! सीता ने पाली ले आवे, मूलगे धानक विठवावे ।। सत्य० ॥ ९२ ।। डाल मूलगी- आज देवी नविषने, लोकोमा अपवाद । हारी दीधी एम सहु कद्दसे. मिटियो नृप उन्माद रावण ॥४॥ मीना ने तो कारणे, मैं कीधो संग्राम । काजन सीधो अपजश लीधो, लोक में कीधा कुनाममाण ||५|| गम लक्ष्मण इहां आणी, मान सबलो मारि । धर्म नो जश चोल रावण देणु अपूटी नारी ॥ रावण ॥ ५ ॥ अजय अधोगति पंच थी मति, भी न बजे कोई। विवेक मधली वीमरी, गति नेहवी मति होई । सपण ।। ५२ ॥ रात विप नृप चिन्तये. कब होने पर भान ।
( ३१४ ) श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड। HuN राम लक्ष्मण जीतीने, पाछी आफू हाथ ॥ रावण ॥ ५३॥ एम चिन्तववां चित्त मं, गई रात विहाय । प्रातः प्रभुजी सुणी वाता, खेतज रे मांडयो आय ॥रावण ॥५४॥ युद्ध सजीने जीपवा, चालण लाग्यो राय । दर्पण मुख नवि देखीयो, राणी वारे मत जाय ॥ रावण ॥५५॥ क्षेपक ढाल तर्ज नेमकी जानवनी भारी- रावण कू समझावन रानी, सीख नहीं मानत अभिमानी- रामकी नारी ले आयो, करूंगो मेरे दिलचायो । नारि वा कह्यो नहीं माने, वात दोई आपरी ताने । रामका पुण्य है भारी, दशा घर नहीं है प्रभु थारी ॥ दोहा-आयो राम महाबली, लंका लीधी घेर । वानर गर्जे अतिघणास यह. अवतो कन्था हेर । फेर नहीं वात बने आनी ॥ रावण दूं ॥१॥ रम्भासी रानी है थारे, सुरा सुर फिरत है लारे । सवी को कहन ही कीजे, सीता ने पाछी ही दीजे । जीव अरु राज ही रेवे, लोक सहु धन्य धन्य केवे ।। पीयातूं दिलमें नहीं सोचे. वखत ने क्योंनहीं आलोचे । दोहा- घर फूटो महाराजजी नहीं कोई तुमचो सेण ।। गई वखत फिर नावहीसरे, मान हमारो केण । चैन यह आखिरकोजानी ॥ रावन ॥ २ ॥ रावण कहे मण्दोदरी सेती, नारीकी तुच्छ बुद्धि एती ॥ विद्या बहु रूपिनी साधी, हमारी शक्ति बहु वाधी । राम रु लिछमन ने मारू, वंछित मुझकाज ही सारू । दोहा- लाऊं सबछोडाय ने मारूं, वानर राय । सीतासं सुखभोगवूसरे, जब हम तुम सुखथाय । वाय कहूं प्रगट नहींछांनी, ।। रावन ॥ ३ ॥ दोहा-- हठी हठसे नाहटे, मूके नहीं निजमान । समर करनने सज्जथयो, करझाली करपान ॥ १॥ .
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। ( ३१५) v Naranvr Mv.-- uv४ N५५ ढाल मूलगी- हाथथी खडग पट्यो, मान रह्यो कर सोय । चालन्तां शिरमुफट पड्यो, शकुन अशुद्धज होय ।। रावण ॥५६॥ विनाश काले आसनू, आवियोंथी कुचयन । देखी मंत्री बहु वारे, राय न माने कयण ॥ रावण चालियो अडम्बर घणूं, मत्सर धरन्तो आप | थर हराचे मेदनी, करतो अति सन्ताप ॥ रावण ॥ ५८॥ राक्षस अति आनन्दीया, शूरो देखी ईश । आडम्बर अति आकरो. जीतसे विश्वा वीश ।। रावण ।। ५९ ॥ क्षेपक छन्द विभगी-- रावनकी फोजां वधती मोजां, चलती दरोजां कंकाली। गयवर गाजन्ता तूग्वजन्ता, शूर लजन्ता तर चाली | हयवर हणणाटां वहतां घाटां, खुरां संघादा भूहाली । रथ चणणटां घणण घणाटां, तूटेचटां मतवाली ॥ ?॥ राक्षम वलवन्ता जोर वहन्ता, मूह गजन्ता तिहां आवे । चाजिन वजन्ना पीसे दन्ता, केई हसन्ता चिनभाये ॥ मुद्गर उछरन्ता हाक करन्ता, होई भय भ्रांना केई गावे । माने मदमन्ता होयकर तत्ता. माने गता धूजावे ॥ २ ॥ मानी मछराला रणे रसाला, पेट धृधाला मतवाला । सिन्दर सुण्डाला हाधीकाला, जाने वाला इंशाला ।। वकनर माला बडे हताला, मिरुध नदाला मलाला। क्रोधे करकाला लंकावाला. दानवसारा कई पाला ॥ ३ ॥ आपममें दोड़े होड़ा होड़े,म्छ मरोड़े वलयाले । कमनाह नोडे सरासजोरे. लम्बे कोई नही चाले। चानरडा दोडे सालीपोटे. गोडा कोई फिर चाले । भूचर भवभोरे शीन बहोरे, एबने तोरे नपाले ॥ ४ ॥ राक्षस गण देशीमान विशेषी, वमनी संखी नदिभाचो। रणभूमि धसेनी लानदियो, कपिपिशो पापायो ।।
(३१६)
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड
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वानर चढेसी आज्ञालेसी, रामनरेशी मनभायो।
लक्ष्मन शुभकेशी पीत मुवेशी, फतेकरेसी मानायो ॥ ५ ॥
क्षेपक राधेश्याम-
रावन कहे सुभटांगति, हृदय करो वलबांन ।
युद्ध स्थलमेदो मचा. जाकरके घमसान ॥
तेगे परशे तोमर मुद्धर, शर धन्वा भाले ले लोतुम ।
अस्त्रों शस्त्रों से सजितहो, रणमें आगे बढ खोलो तुम ॥
मैंभी चलताहूं साथ साथ. धावा आंधीसा करनाहै ।
या विजयी होकर जीनाहै, या वीर भूमि पे मरनाहै।
इस प्रकार सजकरचला, निशिचर कटक विशाल ।।
पृथ्वि थर्रानेलगी, दहलगए दिगपाल |
आंधीऔर वादलके समा, उठ उठ कर चढता जाताथा ।
निशिसी करदो निशिचर दलने, दिनमें दिनकरन दिखाताथा ।
रावण दल साथमें रावणके, जब रामादलमें जापहूंचा ॥
तोजय कोशनाधीश की कहकर, कपि कटक मुकाबिल आपहूंचा ॥
यह कोपा हुआ कटक क्षणमें खलभलकर, खलदल दलने लगा।
रावण की ऑखांके आगे, रावण दल पीछे चलनेलगा।
निजदल पीछे भागता, देखाजब दशभाल ।
तब तेवर तिरछेतने, तीर तके तत्काल ।
तीखे तीरोंने किया, जातेही यह काम ।
काईसा फटने लगा, वानर कटक तमाम ॥
देखीजब सौमित्रीने, त्रस्त हुई कपि सैन ।
तभी अरुण मार्तण्डके, तुल्य होगये नैन ।
ढाल मूलगी-
चाली रणमुख आवीयो, जीति करवाहेत ।
केशरी नीपरे गाजतो, पुण्य वीत्यो चित्त न देत ॥रावण ॥६०।।
ताम नरपति आप भाखे, कियां नृपति चौर ।
राम लक्ष्मण रक्षा करन्त, आवि देखू बलजार ॥रावण ॥ ६१॥
श्री बैन पद रामायण तृतीय खएउ। (३१७) hwa ताम सन्मुख होई भाखे, सुमित्रानो नन्द । आव लंकपति गर्व तजी मुख, आंपां लड़ आनन्द ।। रावण ॥६२॥ क्षेपक राधेश्याम सन्मुख लक्ष्मण को निरख, रावण कहे कर नाद । अरे ! आज फिर आगया ! रहीन पिछली याद ॥ उमवार भाग्य ने बचादिया, इसवार बचने न पायेगा। पहले मूछा ही आई थी, पर अबके प्राण गंवायेगा । वह सागर हूं बढ़ा अगर तो प्रलय-काल दिखलायेगा। वह ज्वाला मुखी शैल हूं मैं. फूटा तो जग जल जायेगा। लक्ष्मण बोले 'गर्वयह', यह घमण्ड दे त्याग । मैं मैं का अच्छा नहीं, होता जादा राग ।। है वही शक्ति शाली जगमें, जो नम्रभाव दिसलाता है। फलवाला जब नरु फलता है, नीचे को शुकता जाता है ।। मैना जो मैं-मैं कहती है, वह सबके मनको भानी है। चकरी जो मैं. मैं. कहती है वह गले दूरी फिरवानी है ।। वात काट फर बीच में, पोला गवण चाय । वो ! यह रणभूमि है, राज--प्रासाद है नांय । माहस और स्वाभिमान होतो, रणवीरों का आभूपण है। नाहर मा गर्जन तर्जन ही, म योद्धा के लक्षण है। मेना जो मैं-ना कहनी , पिंजरे में जन्म विनानी है। वकरी गर्दन कटवाती है. लेकिन में कभी न जाती है। जाती है बोले लसण, उसकी भी गद रेक । मैं बालीके लियेभी, आताहे दिन एक ॥ हड्डी और मांन अलहदाकर, जय शांत निकाली जानी है। उन आंतकी औजारों लेफिर, जब तांन ग्नाली जाती है। वह तांत फिसी पुनको पाले, हाथों में जिम दिन जानी। धुनियां जा रूई शुननाहै. सर तड़ी नदी गातीहै ।।
(३१८) श्री जैन पद रामायण तृतीय सएड । वचन युद्ध किया प्रवल, दोनों पुक्तिके जान । उत दशशिर इतहै लखण, छोडे निजवान । ढाल मूलगी- युद्ध मण्यो राम रावण, लड़े सुभट अपार । बाण लक्ष्मण तणा वरसे. जाणे वर्षे जल धार ।। रावण ।। ६३ ।। क्षेदक छन्द त्रिभंगी-- वानर अतिसोसे, भरियारोसे, होट मसोसे चलिआया । सुग्रीव भरोसे सवसन्तोपे, भरियाजोसे वरदाया । राक्षसने खोसे शतीसदीपे, लंक मसोसे रे भया । स्वामीने तोपे सदानिदोपे, रावन खोसे रघुनाया ॥ ६॥ वानर डेमण्डी वडा उमण्डी, रणना चण्डी आफरिया । शिर शिला प्रचण्डी राक्षस खण्डो, मारे अफण्डी लातरिया ॥ गुरजां झुण्डो मण्डी घणाघमण्डी, देखे चण्डी पाखरीया । एहवो पाखण्डी करदेभण्डी, देदे छण्डी परतिरिया ॥ ७ ॥ ढाल मूलगी- अस्त्र शस्त्र लडवेकरी. हूंसन राखी कोई । लंकपति सो रामानुज, विविध परे झंझाणादोई ।। रावण ॥ ६४ ॥ देखीवल लक्ष्मण तणोरे, शंकियो भूपाल । विद्या तव बहूरूपणी, समरे नृप तत् काल ।। गवण ॥ ६५ ।। विद्या आई अति ऊमाई, मांगे ए आदेश । हुक्म चाहूं स्वामी थारो, करूं कारज अशेप ॥ रावण ॥६६॥ ताम नृपति देई आदर, विद्या ने भाखन्त । एह अवसर विद्या थारो, कारज करी दाखन्त ॥ रावण० ॥ ६७ ॥ राय रावण करे आपण, रूपनो विस्तार । भूमी गगने पूठिपासे. दीसे, रौद्र अकार ।। रावण ॥ ६८ ॥ देखी रावण रूप अधिका. सुग्रीवादिक भूर । शौच ऊपनो अधिक मनमें, रायदीसे पाणीनू पूर ।। रावण ॥ ६९॥ ताम लक्ष्मण अधिक बलियो, गरुडनो असवार । जेमनटुओ फिरे नाचत, रावण केरीरे लार ।। रावण ।। ७० ॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( ३१६) क्षेपक त्रिभंगी- लक्ष्मन शरवाहे बड़े ऊमाहे, चित्तने चाहे रोपभरी। सणणणसावे साम्हांजा, प्रणगमावे चौट करी ।। रावण मनमाहे रोपभराहे. बाणहे जौर करी। मनमें उच्छाहे कपिदलहाहे, भरता आहे प्राणहरी ।। डाल मूलगी- अरुणा वर्तज धनुप्य लीधो, वजमुखो तेवाण । रावणने सन्मुख आवे. लक्ष्मण शूरों रो सुलतान ।। रावण ||७१॥ एक बाणेरे सो गुणोधावे, सोमांहीथी सहश्र । सहश्रयी लसक्रोड प्रगटे. पुण्य प्रभावे अस्त्र ।। रावण ॥ ७२ ।। क क्षेपक राधेश्याम प्रथिवीपर पड़नेलगे कट कट कट वजवान । मुर्दाकी वस्तीवना, लंका का मैदान ।। रघुकुल नायक केवाणों, रघुगल कीशान दिसाहीदी । उमप्रलय कालके धन्वाने, रणमें एक प्रलय मचाहीदी। जोवाण धनुष्यसे चलनाधा, उससे लासोबन जातेथे। इसतरह लक्ष्मणके कालबाग, लाखों को क्षणमें सातेथे॥ ज्यों आतिशबाजीका अंगार, लासोचिन गारियों कापरहै। त्यों लक्ष्मणका एक बाण, अगणित याणोंका सागरहै ।। विज्ञानकी पदवी ऊचीहै. विज्ञान वैत्ता जानतेहै। जोधात असम्भवहो उसको, विज्ञानी मम्भव मानतेहै ।। अबभी नित नये नये देसो. करताहै आविष्कार जगन । परउम त्रेतावाले युगमेथा, वैज्ञानिक भण्डार जगत ।। इतनाही कि एकनीर, लाखों शरीर घर जावाया । मुनने तो यह है एक नीर लामां शरीर पर आना था। थी यह उन्नत विज्ञान-कला, मन्त्रों की शक्ति भी यह । जो भी हो प्रभु के बाणों में, नाफल थी यह सूत्री धी गह ।। इस प्रकार को दुद से भर जप चले । युद्ध भूमि में रत.की, सरिता पनि प्रचण्ड । गानों दोनों मदमाने दल, मरिता केट दिगदान है।
(३२० ) श्री जैन पद रामायण तृतीग गए।
गज अश्व सिपाही-मरे हुए, जल जन्तु समान सुहाते हैं।
पड-रहे भंवर थे पहियों के तैरेथे, कछु ए ढालों के ।
पत्ते थे टुकड़े खालों के, छाये सिंवार थे बालों के ॥
मे दसके झाग दीखते थे. लहरें थी तूटे तीरों की।
ढायें गिरती थी आर पार, कट कट कर मृत शरीरों की॥
बढ बढ लड़ते थे मुख्य सुभट, क्षण भरभी नहीं बैठते थे।
वे मानों रणकी सरितामें, अच्छे तैराक तैरते थे।
असुरों का होने लगा, जब ज्यादा संहार ।
तव तो मानों मृत्यु का, गर्महुआ बाजार ॥
लाशों पर लाशें पटीं. रण वनगया मसान ।
दृश्य भयकर होगया, लंका के दरम्यान ।
गीधों के झुण्ड 'गोठ' करने, लाशों के पाम जुड़ रहे थे।
काकों के वृन्द चौंच फैला मुर्दो के निकट उडरहे थे।
श्वानोंकी टुकडी चीरफाड मृतकोंके थकड़े करतीथी ।
मजा अस्थियोंके हिस्सेपर, आपुसमें झगड़े करतीथी ।
वैतालियोंका तीर्थवना, संग्राम भूमिका दरियावह ।
प्रेतनियोंका पकवान हुआ, मुरदार मांस और मजावह ॥
योगनियों उसविरियां आकर, खप्पर को खूब सजातीथो ।
चामुण्डाकेलिये खोपरियोंको, उनकी करताल वजातीथी ।।
इस प्रकारसेही हुआ, घोर घना संग्राम ।
लखण वाणसे रावण विद्या, आहत हुई तमाम ।।
ढाल मूलगी-
जिहां देखे तिहां मारे, बाणसूं ते रूप ।
एहि वन्ध कुबन्ध हुओ, चक्रज समेरे भूप ॥ रावण ।। ७३ ॥
क्षेपक ढल मूलगी-
लक्ष्मण यह कितराहो मारे, रावण तब जोयोहै लारे अदश्यहो
विद्यागई त्यारे । रावण जबहुवो बलहीनो, चक्रने याद करलोनो
॥ सत्य ॥ १३ ॥
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( ३२१) नाम सुदर्शन तेहन, आयुधन शिरदार । आयुद्ध शालाथी नीकली, राय पासे आवे तिणवार ॥रावण ||७४॥ धसि आयो मन सुहायो, फेरवे ते चक्र । हरी लीयो अतिहोड़ मारे, न लिखेरे वेला वक्र रावण ||७५।। चक्र लेई फेरियो रे मेलियो तिणवार । आकाश मार्गे चालीयो, आयो लक्ष्मणनी लार ॥ रावण ।। ७६ ॥ राम सुभट कपि अति, चक आवन्तो देख । शोर मचियो कटके अधिको, शू कीजे उपकर्म विशेष रावण||७|| आवीया प्रदिक्षिणा देई, वासुदेव विनाण । तेजे करी रविमारिसो. बैठोरे दक्षिण पाण२ ।। रावण ७८॥ राय चिन्नवे वचन मुनिनो, साचही देखाय । भाई मंत्री कथन जेनां, ते सहुरे आज मिलाय ॥ रावण १७९।। लक्ष्मण भाखे चक्र बांधव, अवसर तुम परिवार । चश्य थया सहु महापरे, राय ज्यूरे अवर उपचार | रावण ॥८॥ राम भाखे लंक पतिसं, नहीं चक्र काज । आपो मीता जाऊं पालो, करो तुम्है मुसे राज ।। रावण ॥ ८१॥ देगी आरतिमाही बंधव, विभीषण बोलन्त । आप सीता राखी जीव. मेलि ओ तन्तो नन्न । रावण ||८२॥ धूलचंदजी न क्षेपक डाल तर्ज साना प्रीत लागीहो। लंका सरिसी सायधी, ममुद्रसी खाई हो। एतो सुखने छोडने, मत जावो भाई दो।। चन्धर ! बोलगांनो हो । टेर।॥ १ ॥ गांत नपीजे आरपरी, कालेजो फलकहो । अरजी टेली मायरी. नेणां जल इलकेहो ॥ बन्धरा राम नुनि रुन पर दान न पो सती करीगे। विभीषण की बात सुनीने, यसत नहीं है आनकी । सीतादीने दील न कीजे, बात नहीं छलाने की वि० TA Part AAVAN m Muv ( ३२२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड शक्तिगई गई सवविद्या, सुत बन्धु बन्ध वानेकी । पाँच नहीं भई सब जग केसी, म्हेणी देसी नृप रानेकी वि० ॥२॥ राज्य धानी सब रानी हारी, नहीं मानी कोई दानेकी । चक्र गयो तुझ दुस्मन हाथे, वखत आई जिय जानेकी ॥वि० ॥३॥ 'चार २ यह अरजी साहिब, किम रहे वस्तु विराने की । सीता सूपूं बलिसव रखू , दो आज्ञा पहुंचाने की । वि० ॥४|| हूं चाकर तू ठाकुर मेरो. मोझ करो लक थाने की। श्री रघुवरजी नेक कहत है, वरवत नहीं बहु तानेकी ।। वि० ।।५।। गुन्हमाफ कियो सवतांने, मन चूको अवमाने की। लक्ष्मन भाखे ओछन राखे, राम कहै परमाने की ॥ वि. ॥६॥ क्षेपक ढाल मूलगी- रावन कहै भोले क्यूं भृले, दीसे है थारो स्य सूने, उखारूं सब को जरामूले । जठे तठे आडो तूंही आवे, के नकटा लाज नहीं लावे ।। सत्यः ॥ ९४ ।। ढाल मुलगी- कोपीने तब कहे रावण, कहो किस्यो कहाव । चक्र लक्ष्मण ने मारूं, मेली मुष्टिनो घाव ।। रावण ।। ८३॥ एमकहतां राय लक्ष्मण, ऊपन्यो अतिरोप । फकियो तब रावण ऊपर, चक्र सुदर्शन घोप ॥रावण ।। ८४ ।। स्वा० नेमीचदजी कृत क्षेपक तर्ज खड़को- लक्ष्मण कलकल्यो, कोपमे पर जल्यो कड कड़ी भीड ने चक्र वावे । आकाशे भमावीयो सन नन चलावीयो, जारे वैरीनो शीश छेद लावे । हरि को पावीयो चक्र-वलावीयो ।। टेर ॥ १ ॥ रघु-सेना में जावतो, सुख वरतावतो. पुष्प जुई। महीमावस्तर तणी केसर सुगन्ध घणी, ए पंच प्रकारनी वृष्ठि हुई ।। ह०॥ २॥ गक्षम सेना मेंही चक्र आयो वही, तामघोर तो अन्ध कार हुवो। बावल विहामणी महा डरावणी, खार थकी अधिकोरे वो ॥ ह० ॥ ३ ॥ वर्षा हुई अगन पत्थर तणी, धूल रत्न-सुवर्ण ने भी जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । ( ३२३) कांकर ने फूंस कांटो। रंज उठीजती आंख पूरीजती उल्का- पातने शाल कांटो ॥ ह० ॥४॥ हड्डङ ताम हडबाट हुवो घणो. सड़डड़ सो अगन रा याण छूटे । धड धरती सहु धूजे घणी, तड़ड करती नाइतूटे ॥ ह० ॥ ५॥ यणणण ताम झणणाट हुवो घणो, घणणणजिम मृग राज गाने । फणणण जेम फुकार करत है अति, सणणण चक्र नो शब्द वाजे ।। ह० ॥६॥ दाल मूलगी आवन्तां चक देसीयो तव, वीर रस भूपाल । चक्र मुष्ठि प्रहार दीपो, एदधीरे बहु विमाल ॥ रावण ॥ ८५ ॥ बेहूं ने वे हाथे हणतां, हां वेनो चार । चक्रमांडियी चक्र निकलो, मस्तक छेयोताम । जेष्ठ कृष्णा एकादशी, दिवसे पधिम जाम ॥ रावण ।। ८७ ॥ महन चतुर्दश आयु भोगवी, अशुभ कर्म उपाय । ठामे चौथे जई ऊपन्यो किधांना फलपाय ॥ रावण ॥ ८८ ॥ दाल क्षेपक मनी-- शाख पूकारे । सन्ध० ॥ ९५ ।। दोदा नार- गक्षम नामे दम दिशे. भवानी मनमाय । भावि मिलिया गप विधीपन पुण्य विना रायजीए , नहीं कर्यो काई विचार | रावण ॥८६ ॥ कुसुम केरी वृष्टि हुई . देव दीये आशीष । जगत में जयकार अधिको , जीयो कोडी वरीय ॥ रावण ॥ ८ ९ ॥ दाल पट चालीसमीर , जातिया श्री गम । केगराज मुनीन्द्र भारख . नया छिन काम || गवण ॥ ९ ० ॥ अष्टम यह ' वामु ' ' चल ' देव जानो . निमण्डा घिपही पहिचानो . मानजो सपलाही भानो । हरि प्रति हारिने तो मारे , पाश धेय दिये गक्षमा . नादिभारण प्राय ॥१ ॥ जाति पतीजे जानिने अनि नमो विश्वास Wwra A ( ३२२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड शक्तिगई गई सवविद्या, सुत बन्धु बन्ध वानेकी । पाँच नहीं भई सब जग केसी, म्हेणी देसी नृप रानेकी ॥वि० ॥२|| राज्य धानी सब रानी हारी, नहीं मानी कोई दानेकी । चक्र गयो तुझ दुस्मन हाथे, वखत आई जिय जानेकी वि० ॥३॥ वार २ यह अरजी साहिब, किम रहे वस्तु विराने की । सीता सूपूं बलिसव रखू , दो आजा पहुंचाने की । वि० ॥४|| हूं चाकर तू ठाकुर मेरो. मोझ करो लक थाने की। श्री रघुवरजी नेक कहत है, वरवत नहीं बहु नानेकी । वि०॥५॥ 'गुन्हमाफ कियो सवतांने, मन चूको अवमाने की। लक्ष्मन भाखे ओछन राखे, राम कहै परमाने की ॥ वि० ॥६॥ क्षेपक ढाल मूलगी- रावन कहै भोले क्यू भूले, दीसे है थारो स्यू सूने, उखारूं सब को जरामूले । जठे तठे आडो तूंही आवे, के नकटा लाज नहीं लावे ।। सत्य ॥ ९४ ।। ढाल मुलगी- कोपीने तब कहे रावण, कहो किस्यो कहाव । चक्र लक्ष्मण ने मारूं, मेली मुष्टिनो घाव ।। रावण ।। ८३ ॥ एमकहतां राय लक्ष्मण, ऊपन्यो अतिरोप । फेंकियो तब रावण ऊपर, चक्र सुदर्शन घोप ॥रावण ।। ८४ ॥ स्वा० नेमीचदजी कृत क्षेपक तर्ज खड़को- लक्ष्मण कलकल्यो, कोपमें पर जल्यो कड कड़ी भीड ने चक्र चावे । आकाशे भभावीयो सन नन चलावीयो, जारे वैरीनो शीश छेद लावे । हरि को पावीयो चक्र-वलाचीयो । टेर ॥ १ ॥ रघु-सेना में जावतो, सुख वरतावतो. रन-सुवर्ण ने पुष्प जुई । महीमावस्तर तणी केमर सुगन्ध घणी, ए पंच प्रकारनी वृष्ठि 'हुई । ह०॥ २ ॥ गक्षम सेना मेंही चक्र आयो वही, तामघोर तो अन्ध कार हुवो । बावल विहामणी महा डरावणी, खार थकी अधिकोरे धुंवो ॥ ह० ॥ ३ ॥ वर्षा हुई अगन पत्थर तणी, धूल .
-- बा 4~~~~ भी जैन पद रामायण तृतीय सएड । (३२३ ) कांकर ने फँस कांटो। रंज उठीजती आंख बेरीजती उल्का- पातने शाल कांटो ।। ह० |४|| हडडड़ ताम हडडाट हुवो घणो, सडडड सो अगन रा बाण छूटे । धडडड़ धरती सहु धूजे धणी, तडडड़ करती नाइतूटे ।। ह० ॥ ५॥ झणणण ताम झणणाट हुवो घणो, घणणणजिम मृग राज गाजे । फणणण जेम फुकार करत है अति, सणणया चक नो शब्द वाने ।। ह० ॥ ६॥ ढाल मूलगी आवन्तां चक देखीयो तब, वीर रस भूपाल । चक्र मुष्ठि प्रहार दीधो, एहीरे बहु विशाल ।। रावण ।। ८५ ॥ बेहूं ने वे हाथे हणतां, हुआं चेनो चार । पुण्य विना रायजी ए, नहीं कर्यो काई विचार || रावण ।। ८६ ।। चक्रमांहिथी चक्र निकलो, मस्तक छेद्योताम | जेष्ट कृष्णा एकादशी, दिवसे पश्चिम जाम || रावण ।। ८७ ।। महम चतुर्दश आयु भोगवी, अशुभ कर्म उपाय । टामे चौथे जई उपन्यो किधांना फलपाय || गवण ।। ८८ ।। कुसुम केरी वृष्टि हुई. देव दीये आशीप । जगत में जयकार अधिको, जीवो कोडी वरीश || रावण ।। ८९ ॥ ढाल पट चालीशमीरे, जीतिया श्री राम । केगराज मुनीन्द्र भावं. मा वंछिन काम || गवण ॥ ९ ॥ दाल क्षेपक मूलगी- अष्टम यह 'वासु' 'चल' देव बानो. निखण्डा धिप ही पहिचानो, मानजी संघला ही आनो। हरि प्रति हरि ने तो मारे, पान या शाख पुकारे । मत्प० ॥ ९५ ॥ दोहामारगा- गक्षम नाये दा दिशे, भग आणी मनमाय । धपे दिये छ रानमां, नृप निमीपग मार ॥१॥ जाति पतीने जानिन, जानि नगोशिशाम । आदि मिलिगा एस्ठा, गम विभीषण पान !! २ ।। + . . (३२४) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। आयां प्रभुजी पाखती, प्रणमें प्रभुनापाय । दीलासो दोधोघणो, स्वमुख राघव राय ॥ ३॥ रावण पड़ियो देखन, विभीशण तिणवार | मूर्छाए धरणी ढल्यो, नरही शुद्ध लगार । क्षेमक ढाल तर्ज धूसारी- मुख वोलोनी बन्धव! अभिमानी ।। टेर । किम सूता रणभौमि विचमें, कहां गईतेरी ठकुरानी । मुख ॥१॥ वीरहोय खण्डनय जीता, तोआज्ञा चलाई मनमानी । मुख ॥२॥ व्यताकोभय नहीं मनआण्यो, जनकसुता लेघर आनी ॥३॥ निश्चय भविटरे नहींटारी, तो एह सदा केवल वानी ॥ मुख॥४॥ मैं म्हारो ओलम्भो टार्यो, कहीं नहीं कोई हो अगवानी ॥ ५॥ परतीय खातिर प्रणगंवाया, जबर हठी वनकरी हानी॥ मुख ॥६॥ हेवन्धव तूंमुझसे रूठो, नही बोलेतोकर शानी । मुख ।। ७ ॥ क्षेपक राधेश्याम- जयहोसहु आंतो विल्लाया यहमेंने क्या करवायाहै । हा! भाई होकर भाईका, रणमें संहार करायाहै । वहवड़ा भ्रातथा डरक्याथा, जोउसने लात लगाईथी । पर मैंने इतने परही हा! उससेली ठान लड़ाईथी। अपमान लातसे जब समझा, तवकहां धीरता रहीमेरी ॥ सजनता शान्ति शील छोडातो, कत्र गम्भीरता रहीमेरी । मैंतुच्छ संकुचित चित्तकाथा, यहगलती हुई मूझीसेथी । भाईथा वडासभी गुणमे, लंकाकी शान उसोसेथी। दोहा मुलगा- विभीषण निज भाईनो. शोक करे अतिस्वाम | पेटेछूरी मारतां. हाथ ग्रह्या श्री राम ॥ ४ ॥ मन्दोदरी आदिसहु, शोक करन्ती नार । रावण प्रियने रोवती, झुरेमनही मझार ॥ ५ ॥ क्षेपक ढाल तर्ज-हो पियु पंखीड़ा- होपिउ अभिमानी नहींमांन्यो मुझबोलजो, दाखीरे मैंभाखीवात vvvv AN Avon श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (३२५) थांने घणीरेलो ॥टेर॥ होपिउ अभीमानी नहींदासी दिलखोलजो आणीरे घराणी तिणदिन रघुवर तणीरेलो ॥१॥ होपिउ अभि मानी कहारही गमातेहजो, राज ऋद्धि त्यागी परभवथे गयारेलो । हो पिउ अभिमानी कहारयो तुझनेहजो, क्षणमाही तो परवश प्रभुजी तुमथ पारेलो ॥ २॥ होपिउ अभिमानी क्यों पोढया रणभूमिजो, तुम चिनरे अकुलावे जियड़ो मायरोरेलो दोपिउ अभिमानी नहीं छोड्यो मानने तुमजो निजकृत कमाई संगसिधाई थायरेरोलो ।।३।। होपिउ अभिमानी इसकेतीदेती ओलम्भजो. इसकेती देती ओलम्भजो रोतीरे मूळ ती भामन अति दुःख करेरेलो ।। क्षेपक राधेश्याम इनपरही मन्दोदरी, मुखसे करती हाय । पतिप्यारे को लारापे, गिरी पछाड़े साय ।। आंखे पसारकर दुःखियाने ग्राणेश्वरके ननको देखा। लोहुसे लथपथ छिन्न भिन्न अपने जीवन धनकोदेखा ।। चिल्लाईहाय सुहाग गया, शूगार गया साम्राज्य गया। घरके राजाके साथ साथ, घरकी रानी का राज्य गया ।। इस प्रकार घण्टा तलक, रोई दुःखिया नार । चुडिऐ तोडो हाथी. विहुए दिये उनार ।। जोशन्दथे उसट्टे दिलके, वह लिखने में ही नहीं। उस दुखियामनके पछतावे, सम्पूर्ण कहे जानेही नहीं ।। आँसु ऑकी इतनी धारवही, सारा शरीर आंच मगथा । एक नया ममुद्र नहोजाए, लंकाम बस यही भयथ ।। प्रभुने मन्दोदरीकी. दशा निहारी दीन । उधर विभीषण भूपको. देसा निपट मलीन । रहन सके आगे वडे, दिए बहुत उपदेश । दवे वियोगी मनीने, तर विपोगरे केस ।।
(३२६ ) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। क्षेपक ढाल मूलगी- वीर ए शूरपणे मूओ रावन सम राय नहीं हूओ, जगत अखियात एहु ओ। आस्वासन प्रभुजी दिलवावे, करोमत शोच समझावे।सत्य०९६॥ दोहा मूलगा- - . रामकरे समझावणी, कां रोवो सहु कोय । रावण रायां रावथो, अमरां अधिको जोय ॥६॥ वीर वृत्ति मांही मूओ, न मूओ कायर होय । शोकन करचो तेहथो, देखो चित्त अवलोय ॥ ७॥ संस्कार कायातणो, करो मत लायो वार । होती आवी थांहरे. सोई करो प्रकार ॥ ८ ॥ कुम्भकर्ण ने शत्रुजीत, घनवाहन ने आन । बन्धन छोडी मोकला, किया सहु राजान ॥ ९॥ सहू कुधुम्ब हुओ एकठो, आवि मिलीयो ताम | रोयां रीखियां खींजीयां. कर मृत्यु को काम ।। १० ॥ परवाली पावन करी, पूजी अग्ची काय । करी रत्नमय पिंजरो, लेई चाल्या ने गय ॥ ११ ॥ वावना चन्दन नी चिता, अगर घणो घनसार दहन कर्म विधि साचवी, पक्ष्म अने परिवार ॥ १२ ॥ पद्म सरोवर नाहिया, पछे जलांजली दीघ । प्रेत-कार्य रावण तणो, एटलो सघलो कीध ॥ १३ ॥ दिन केताने आंतरे. मिटे शोक सुजाण । कथा रही रावण तणी, आगे सुणो वखाण ॥ १४ ॥ ढाल सेतालीशमी तर्ज यदुपति जीत्यो रे- रघुपति जीत्यो रे. दशरथ नन्दन धीर ॥ रघु० ॥ लक्ष्मणनो वड़ वीर ।। रघु ॥ सत्यवतीनो कन्थ ॥ रघु० ॥ गिरु ओनो गुणवन्त ।। रघु० ॥ टेर ॥ नोनत केरा नादम, अम्बर रहियो गाजी । इन्द्र न आवे आसनेहो, सौर रह्यो अति लाजी ॥ रघु.॥१॥ - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड ( ३२७) घरघर रंग वधामणा, घर घर मंगलाचार । घर घर गुडी उछलेहो, मुख मुख जय जयकार ॥ रघु० ॥२॥ जीत तणा कडरवा घणा, गावे गुणिय अपार । धन्य सीता धन्य रामजीहो, धन्य लक्ष्मण अवतार ।। रघु० ॥ ३ ॥ हाथ पडी रावण तणे, तोये न खण्ड्यो शील । सीता धन्य ते कारणे हो. निर्मल गंग सलील ॥ रघु० ॥ ४॥ हठी हठ लेई रयो, मिलियो कटक अपार । गम धन्य ते कारणेहो, न तनी त्रियानी लार ।। रघु० ॥ ५ ॥ कांटो गयो तिहूं लोकनो, न तजे थो अभिमान । लक्ष्मण धन्य ते कारणेहो, मायों रावण मान ॥ रघु० ॥६॥ रामअने लक्ष्मण चंदे, वाणि अमिय समान । कुम्भकर्ण आदि करीहो. निमुणो सहु गजान ॥ रघु० ॥ ७ ॥ राज्य कगे आप आपणां. पहीला जेम थो तेम । आण यहो लक्ष्मण तणोदो, होसे तुमने खेम ॥ रघु० ॥ ८ ॥ एम सुणोने राजीया, आंमें नाप ताम | गद् गद् वाणि चोलिया हो, निसुणो श्रीरघुराम ।। रघु० ॥ ९ ॥ काज नहीं गही तणूं. अमारे एक लिगार । संजम लेई साधसांहो. अब हम मोक्ष दुवार । रघु ॥ १० ॥ 'कुसुमायुध' उद्यान में, "अप्रमेय यल' नाम । चार ज्ञान शू शोभना हो, आया मुनि अभिराम ॥ रघु० ॥ ११ ।। माधु हुआते केनली, तिणही रागो मझार । केवल भोछव कारपोहो. भावे देव उदार ॥ ग्यु: ।। १२ ।। प्रातः हुआ श्रीरामजी. मामिनी मं माघ । कुम्भकर्ण आदि कर्गहो. चान्या ते नर नाय ।। रघु० ॥ १३ ॥ देई प्रदक्षिणा पांदिया, साधु महा मुसकार । आगे बेशी सांभलेहो. धर्म नगो मुदिनार ॥ ॥१४॥ 'इन्द्रजीत' 'धनवाहन, पूर्व भवान्तर बात।
. ~~~ ( ३२८) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । पूछे भाखे केवलीहो, निसुणो ए अवदात ।। रघु० ॥ ५॥ 'कौशम्बी' नगरी विपे निर्धन भाई दोय । प्रथम 'पश्चिम' नामथीहो. साधु समीपे सोय ॥ रघु० ॥ १६॥ धर्म सुणी व्रत आदरी. महियल करी विहार | 'कौशम्बी' नगरी फिरीहो, आया ते अणगार ॥ रघु० ॥ १७ ।। 'नन्दीघोप' राजा भलो, 'इन्द्रमुखी' तसुनार । क्रिडा करत वसन्तनी हो, दीठो नयन पसार ॥ रघु० ॥ १८॥ 'पश्चिम' नियागूं करे, ए तप तणे प्रकार । एहवी क्रीड़ा कारीहो, इणही घरे अवतार ॥ रघु० ॥ ९ ॥ वर्यों पण माने नहीं, निन्दे नहीं निदान । काल करीने उपन्योहो राय घरे सन्तान ॥ रघु० ॥ २० ॥ 'रति वर्धन' नामे भलो, यौवन नो वयपाय । राज्य लही रामत करेहो, तप करणी फल दाय ॥ रघु० ॥ २१ ॥ प्रथम साधू मरी ऊपन्यो पंचम कल्पे देव । भाई राजा देखीयोहो, आयो सुग्नत् खेव ॥ रघु० ॥ २२ ॥ भेखधरी मुनिवर तणो, गति वर्धन नृप पास । पूर्व चरित्र सुणावतां हो, जाति स्मरण ताम || रघु० ॥ २३ ॥ संजम लीधो सादरो. पंचम स्वर्गे जाय । दोय देव शचि करीहो. क्षेत्र विदेहे आय ॥ रघु० ॥ २४ ॥ 'विबुध नगरे ऊपन्या, दोई भाई भूप । संयम पामी वाग्मोहो, पाम्या स्वर्ग अनूप ।। रघु० ॥ २५ ॥ तिहां थकी चवि आवीया, राजा रावण-गेह । ‘इन्द्रजीत' धनवाहन हो, भाई थया ससनेह ॥ रघु० ॥ २६ ॥ इन्द्रमुखी पट रागिनी, रति वर्धननी माय । ए राणी मण्डोदरी हो, थारी माय कहाय ॥ रघु० ॥ २७ ॥ इन्द्रजीत धनवाहनू , 'कुम्भकर्ण भूपाल-। अवरही बहु व्रतआदरे हो, पट कापिक प्रतिपाल ॥ रघु० ॥२८॥ राणीजी मण्डोदरी, आदि नारी अनेक ।
HAWAT श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (३२६) संजम सूधो आदरेहो, वारु एह विवेक ॥ रघु० ॥ २९ ॥ धूलचंदजी कृत-क्षेपक ढाल तर्ज जीरे मुनियों रो मेलो पुण्य पसायथी- जीरे, समता धारीने संजम आदर्यो, जीरे-दीवी संसायों ने पूठो, कर्मा पर काडी मूठो । मुगनीना लोभी, चारा जाऊंहो तोपे वा- रणा ॥ १॥ जीरे-प्यारा छ कापांना न्यारा पापसं. जीर-तपकर आतम ने तारी, माया ममता ने मारी, टाली हो कुमती कुनार ने ।। २ ।। जीरे-धन जिम थे गाजो, बाजो शूग्मा, जीरे आप मुगतीना रसीया. म्हारे हिरदा में वसिया. कसिया हो तम्बूड़ा शिवपुर जाणग ॥ ३ ॥ जीर-गुणगतो आगर मागर ज्ञानरा, जीरे-त्यागी चैरागी भरपूरो सत्य वन्ता-शूरो, आशाथे पूरो भव्य जीवोरी ॥ ४॥ जीरे-वणि अनमोलो तोली नहीं तुले जीरे-अमृ त ना प्यालापाओ । भाव विध २ रलामो, घणाही सुहायो नरना रने ॥ ५ ॥ जीर-सागई मुनिवर माला रतनोंकी, जीरे-भगवन्त वचनोंमें चालो । उलटा ज्ञाताने पालो. मालोहो मुनिर महियेल ऊपरे ॥ ६ । जीरे-पोपाड़ निवासी प्यासी ज्ञानरो. जीरे धूलचंद मुनि गुणगावे । मस्तक चरणों में नावे,तिरण तारण मुनिराजरे ॥७॥ दाल मुलगी- साधु नमी श्री रामजी, सौमित्री कपिनाथ । विभीषण आदिकरीहो, लारही लिया बहु माय ॥ रघु ॥ ३० ॥ शणगारी लंकापूरी, ओबनो अधिकार । विद्या धरीए कीजियोहो. मंगलनो विस्तार ॥ रघु । ३१ ।। वेत्रण बाट बनावतां, लंका मांही प्रवेश । शुभ वेला शुभ मुहूर्तमेंटो, कीधा राम नरेश ।। रघु ॥ ३२ ॥ क्षेपक दाल व पालकी. राम मुनि इन- गह लंका मायने, आउरे असवारी राजा रामको ।। टेर।। राम लक्ष्मण तो दोसे अधिका, हाथी होदे टा। तारा लोक दगाई देने, नगरी नांही पडा। A (३३०) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। दर्वाजामें वड़तां ऊचां, मोती झुम्बक देठारे || गढ़ ॥१॥ सावामण को मोती शोभे, बाजु सोहे और । राम चन्द्रजी दिलमें सोचे. इसो नदूनी ठौर । अयोध्या में गोभे ओतो, लेवां इसकूँ तौररे ।। गढ ॥ २ ॥ मनोगत भाव जाण कविवरने, बोले समस्या बोल । वमी चीजको वंछेन उत्तम, यह क्या और अमोल || एक एकसे अधिका धिकहै, देखो आगली पोलरे ।। गढ ॥ ३॥ सुनकर राम विचारे दिलमें, साचकहेछ एह । ए सब चीज विरानी इनसे, भूलन करना नेह ॥ अजब तरह की वस्तु देखत, कहतां न आवे छेहरे ॥ गढ ॥४॥ लोक तणेमुख शोभा सुनने, सीता पाम पधारे । सीता देखन की अभिलापा, सोजाणे करतारे ।। पग २ लाख पसावज देते, इनपर राम पधारे रे ॥ गढ ॥ ५॥ ढाल मूलगी- पुष्य गिरिने मस्तके. बैठीथी उद्यान । जाई जोई जानकीहो, जेहवी कही हनुमान ॥ रघु ॥ ३३ ॥ यांहि साई सुन्दरी, राघव लीधी गोद ।। जीवितव्यए नवू धर्यहो, प्रगट पणे प्रमोद ॥ रघु ॥ ३४ ॥ पिंजरने ए प्रणियो, हुओ एकठो आज । राघवजी अब जाणीयोहो, हूंरे अछु महाराज ॥ रघु ॥ ३५ ॥ महासती म्होदी सती, देव कहे आकाश । स्वर्ग मृत्यु पातालमें हो. पामी अति शावास ॥ रघु॥३६ आंसू सूं पगधोवतां. आवी करे प्रणाम । सौमित्री सोल्हासरसू , आज सर्या सहु काम ॥रघु॥३७॥ मस्तक चूंबी सादरो२, सीता दिये आशीष । चिरानन्दे३ चिग्जी वजेहो, सफली सयल जगीश ।। रघु ॥३८॥ भामण्डल प्रणमेंघणूं, बहिनी कहै चिरंजीव । १ स-उल्हास-आनन्द सहित, २ आदर सहित, इचिर-लांबो-आनन्द - श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड। (३३१) म्हारीए आशीस थीहो, वाधो आयु अतीव ।। रघु ॥ ३९ ॥ विभीषण सुग्रीव जी, हनुमन्त अंगद आया । चरण नमें मीता नणाहो, भूपतोजी भल भाय ॥ रघु ।। ४० 'कुमुदिनी विकसे घणं, देखी पूनम चन्द । सीता तेम प्रभु देसवेहो, पामी परमानन्द ।। रघू ।। ४१ ।। 'भुवना लंकृत हाथीए, चट्या सजोड़े राम । लक्ष्मण हाथी आगलेहो, जोड़ बनी अभिराम ॥रघु ॥४२॥ आया रावण मन्दिरे, पेख्यो प्रवर प्रासाद । सहस थम्भनो शोभतोहो, करे गगनसं वाद ॥ रघु ॥४३॥ लहु कहे घर माहरे, पूज्य पधारो आप | सह कोई जाणेमहीहो, प्रीत तणी ए थाय ॥ रघु ।। ४४ ।। राय तणूं मन राखवा, आवे घर प्रभुतास । भोजन भक्ति भली करीहो, उपजाव्यो उन्हास ॥रघु॥४५॥ पहिरावो परिवार, पोपी परिगल प्रेम । कर जोडीने वीनवेहो, राय विभीषण एम ॥ रघु ॥ ४६॥ ए घोडा एहाथोया, अरथ गग्थ भण्डार । हेम रलपट कुलशूहो, वस्तु अमोलक मार ।। रघु ॥ १७ ॥ ए लंका लीलावती. करो अपाणो ईश । ठकुरायन गवण नणोहो, छेलो विश्ग वीदा ॥ रघु।। १८ ।। लंका राज्य नणो करो, प्रभुजीने अगि शेष । ताम राम योन्या हमीहो, योल हमारो एक ।। रघु ।।१९।। लंका दीधी तुम्ह भणी, पहीलीही हम देख । आज तिलक मपी ताहरोहो, जागो शीयो मुरिशेप ॥४॥५॥ इन्द्र भवन में इन्द्रजिम, गर भवन में मामी । परिवरियो परिवारसं , आयो आनन्द पानी ॥ रघु ॥५१॥ सिंहोदर आदिकरी, नाम बहु ना नाह दोधी योजो कन्काहो, नाणे परिग उन्माद । र ५२ ॥
( ३३२) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड को लक्ष्मण को रामने, पग्णावी ते बाल । सर्व सुलक्षण गुणवतीहो, ग्मणो रूप रसाल ॥ रघु ॥ ५३॥ इन्द्र तणा सुख भोगवे. क्षण मांही दिन जात । छ वर्पतो बोलिगयाहो, अब मिलवा मान ॥ रघु ।। ५४ ॥ ढालज सेंता लीशमी. रंग विनोद विलाम । 'केशराझ श्री रामनेहो, पूर्व पुण्य प्रकाश || रघु ।। ५५ ॥ दोहा नह रागे- इन्द्रजीत घनवाहन, मरुस्थे लीमें जाय । महामुनि मुगतेगया, तीर्थ मेघस्थ थाय ॥ १ ॥ 'कुम्भ कर्ण शिव गतिलही. नदी नदी नर्भदा मांय । 'पृष्ट रक्षित नामे भलू, तीर्थ प्रवो त्यांय ॥२॥ अब माता 'अपराजिता' सुमित्रा सूं दोय । पुत्रोनी आरति करे. खबर न पावे कोह ॥ ३॥ खण्ड धातकीथी चली, आई गयो ऋपि देवर । पगे लागतां पूछही, माता सुण तनखेव ॥ ४ ॥ कां तुम अति आरति करो, कां तुम दुबले देह । . ..आंसू नांखी मायजी, उत्तर आये तेह ॥ ५ ॥ तात तणा आदेशथी, वत्स गया वनवास । सीता पण साथे हुई, पतिव्रता व्रत तास ॥ ६॥ सीता रावण अपहरी, करी घणो परपच । नन्दन हुआ वाहरूं, मेली कढकनो संच ॥ ७ ॥ राम अने रावण नणा, सुभटोंमे संग्राम | होतो रावण खीजियो, शक्ति चलावी ताम ॥८॥ लागी लक्ष्मणन हैये, पड़ियो मूर्छा खाय । विशल्या आदि आवीने, लेईगया खगराय ॥ ९ ॥ खबरन पामी आगली, ए अम आरतिहोय । १ विध्यस्थली २ नारद ऋषि- - श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड। ( ३३३) के जीवन्तो ऊगर्यो, केवत्स मुओ सोय ॥ १० ॥ नारद भाखे मतिकरो, आरती एह लगार । लक्ष्मण मार्यो नविमरे, जो रूठे करतार ।। ११ ।। जाऊं लंकापुरी, लाऊं सक्ष्मण राम । आरती भांज ताहरी, तोमुझ नारद नाम ।। १२ ।। एम कहीने आवीयो, राघवजीने पाम । माय मनोरथ पूरवा, एम करे अग्दास ।।१३।। ढाल अड़ताली शमी तर्ज रसीयानी (तथा प्रलगी रहनी- सुमित्रा अपगजीतारे, जोवे प्रभुजी नीवाट । लक्ष्मणजी ना धावनो, आणे अति उचाट हो मुणम्वामी ॥१॥ खबर न कोई पापहो सुण स्वामी, झूरी पिंजर थायहो सुण स्वा मी ।। टेर रयणी छमासी जायह सुण स्वामी रही घणं लीधो लायहो ।मु०॥२॥ पुत्रों ऊपर मायनोरे, होये नेह अपार । सुरभी नी परे देसीयो रे, चित्त रहे वत्स लार हो गसु०॥३॥ फिरे कुदन्ती वानरीरे, सुतने कण्ठ लगाए । माले सेवे पंखणीरे. लिये मुतनेरे वधाय हो |सु० ॥ ४ ॥ गर्भ धर वे पोसवेरे, पाले वे अभिगम । प्राण आपणा आपवेरे, सारे मुतनो काम हो । मु०॥५॥ माता गंगा सारपीरे, माता नीग्ध रूप । माता महियल मोटकीरे, माने म्होटा भूप हो । मुबाद। पणमुकी गणपनि बादोरे, अभिमाणी अतिभार । सानो हुमो गणपनीरं. शंकरे कीमा न्याय हो । नु० ॥७॥ वीर सामी माने धणं रे, जाहुना गमें मांटे। मानाने दुःन्य देई नरे, मंयम नहीं लीयो पाहे हो ।गु०॥८॥ व किम फदिए दाविपर, मानाने गुग देन । मुस दोषी संसारने रे, एह धर्म नो देन हो ।। गु.॥
( ३३४ ) श्री जैन पद रामायण तृतीय खएड। रूड़ा भाखे रामजीरे, नाराद मुं सुखपाय । लंकपति बोलाईके रे, भाखे प्रभु अकुलाय हो ।।सु० ॥१०॥ भूप! तिहारी भक्तिथीरे, विसर्या हम माय । आगेही खेच्या थकीरे, माताजी मरिजाय हो ।सु० ॥११॥ अवही जाई उतावलारे, मिलिये मातने आज । तो तो ए साचो पडे रे. कीधो सघलो काज हो ।।सु०॥१२॥ कहे विभीषण रायजीरे, मांग्या द्यो दिन सोल । ज्यू एती त्यू एटली रे, मांनो हमारो बोल हो ।सु०॥१३॥ } इन्द्रपूरीनी ओपमारे, आछी भांत अनूप । अयोध्या समरावसूरे, कहे लंकनो भूप हो ।। सु० ॥१४॥ विसर्यो ऋपिरायजीरे, मातापासे आय । चात कही सन्तोपनीरे, हर्ष हिये न समाय हो ।।सु ॥१५॥ कारीगर लंकातणारे, सुघड़ोंना सिरदार । अयोध्याए आवीयारे, कांई न लागी वार हो ।' सु०॥१६॥ जेम का तिमही कयू रे, चतुर पणे चित्त लावी । के देखो हरीनी पुरीरे, के देखो ए आवी हो ॥ सु० ॥२७॥ दहाड़े अब सत्तरमेंरे, पुष्पक नामे विमान । वैसी 'लक्ष्मण' रामजीरे, सोहम ने ईशान हो ।।सु० ॥२८॥ सीता विशल्या वलीरे, रामसुता सुकुमाल । सघली बैठी सन्मुखेरे, विद्याधरी सुविशाल हो ॥ सु०॥१९॥ 'विभीपण' सुग्रीवजी रे. भामण्डल हनुमान । अंगद सूं दक्षिण दिशे रे, बैठा पुरुष प्रधान हो ।।सु० ॥२०॥ वाम दिशे विशेपथी रे, बैठा राक्षस राय । पूठे सेवक सामटारे, लीयो विमान चलाय हो ॥सु० ॥२१॥ अयोध्याने आसना रे, आया जाण्या जाम । भरत भूप लघु भाईसूर, साहमा आवे ताम हो । सु०॥२२॥ १ शाकेन्द्र और ईशानेन्द्र एकत्रित हुवे जैसे- श्री जैन पद रामायण तृतीय खए। (३३५) ऊतरीया हाथी थकीरे, नजरे आया ईश । ईश विमाने ऊतारे, आणी अधिक जगीश हो।।सु०॥२३॥ क्षेपक राधेश्याम- राम-दरस के हेतु जब, अवध चला उमड़ाय । भरत भूप के सहितसर, हुए उपस्थित आय ॥ इतनेमें नेत्र भरतजी के, आकाश के ऊपर जाते हैं। उस समय अचानक निकल पड़ा, रघुराज हमारे आते हैं। इतनेमें वह पुष्पक विमान. कुछ और समीप नजर आया। आखिर को सबने क्या देखा, नभसे भूमण्डल पर आया। अब तीन गुणयुत तीन व्यक्ती, उसके अन्दरसे प्रकट हुए । माथही साथ आगे पीछे, जाहिर सब साथी सुभट हुए ।। उस राम लक्ष्मण पे दृष्टिजमी. आगेको भरत झपटते हैं। मेरे भइया, मेरे. भइया, कहकर चरणों में पड़ते हैं। श्री रामचन्द्रजी भी गद् गद् थे, हाथों पे उठा लिया बढ़कर। प्राणों से प्यारे भाई को, छानिसे लगालिया बढ़कर ।। ढाल मूलगी- भरत भृप भल भावसरे, रखो चरण गिर नाय । ऊठाई ऊंचों करीरे, लीधो कण्ठ लगाय हो । सु० ॥२४॥ मस्तक चरे रामजीरे, बारम्बार विशेष । शवधन एग लागनारे, दिये मन्मान नसाहो ।मु० ॥२५॥ शत्रुघ्न ने भरतजीर, लक्ष्मण ने परणाम । करता लमणजी करे, जैम की श्रीराम हो ।मु०॥२६॥ ताम विमाने एक ठार, बैठा बन्धव चार । दान शील तपभारमुरे, पामे मोम पार हो । म ॥२७॥ पहे लाही प्रगट पगेरे, आपोध्या ममगची । मेलीथी प्रभु आवतारे, पुनापि फिरी जापोहो ।। नु० ॥२८॥ पारधाम--- पातेही इमरापरफे. मानेदं श्री राम !
-~~-~- Nare (३३६) श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । अवध पूरी वनगईहै, एक अलौकिक धाम ।। जो नगरी सीता रामविना, एक बार दिखाई देतीथी । वह आज खुशोसे फूलागई गुल्जार दिखाई देतीथी ।। जो कली कभी मुरझाईथी, वह आज खुलपड़ी खिल आई । जहां अन्धकार का वासाथा, वहां आज धूपसी खिल आई ॥ जो वृक्षकभी पतझाड़मेंथे, वेफिर वाहम्मे आयेहैं । मालीको आता हुआजान. गुलफिर गुल्जारमें आयेहैं । सरजू की लहरें उठ उठकर, स्वागत की उमंग जतातीहै । वृक्षोंकी लता लहलहा कर, फूलोंका फर्श विछातीहै ।। कूपोंमें होगयाहै, अमृत जैसा नीर । तालाबांमें भरगया, मानों आके क्षीर । ढाल मुलगी- छांटी थोड़े पाणिएरे. रज सघली वपसावी । करी सुगन्धी धूपणेरे, फूलही फूल विछायी हो ।। सु० ॥ २९ ॥ तोरण नी रचना करीरे, गलिए गलिए देखी । घर घर गुडी उछलेरे, घर घर हर्प विशेपो हो ॥ सु० ॥ ३० ॥ वाजा विविध प्रकारनारे, भूमिअने आकाश । वाजे नीका नादसंरे, होई रह्यो उल्लासहो ॥ सु० ॥ ३१ ॥ नगरी मांही आवीयारे, माधव देखी मोर । ऊंची नजर विलोकवेरे, लोक करे वकोर हो ॥ सु० ॥ ३२ ॥ धूलचदजी कृत क्षेपक ढाल तर्ज दलाली लालनकी- अयोध्या फूलरहीरे. घर आयाहै लक्ष्मण राम ॥ टेर ॥ वर २ मांही रंगवधावो. गौरी मंगल गावे । सव सिणगार सजीने सारी, रघुपति सामी जावे ॥ अ० ॥ १॥ आज आंगणिये सुरतरु फलियो, अमृत मेह वरसाया । मुंह मांग्या तो ढलगया पासा, इन्द्र चली घरआया । अ० ॥ २ ॥ ढाल मुलगी- कनक तणे कुसुमे करीरे, भरि भरि मोती थाल ।
श्री जैन पद रामायण तृतीय खण्ड । (३३७ ) वधावे वनिता चलीरे, गावे गीत रसाल हो ॥ सु. ।। ३३ ।। वधावे वारु चलीरे, कामनी कलश उदार । दाने जल धर वरसतार. आया नृप दरवार हो । मु० ॥ ३४ ॥ उतरी ताम विमानथी रे. राम- सुमित्रा नन्द । महिल मांही मन रंगसं रे, आवे धरी आनन्दहो।। सु० ॥ ३५॥ पहेला कौशल्या तणा रे, चरणे नामें शीश । पाछे अवर माता भणी रे, माता दिये आशीश हो। सु० ॥ ३६ ।। सवैग्रो- मात को मोह सत्थ सीता को मैंभी लयो महानम मेरो । भरत की भक्ति सेव लक्ष्मण की. पोरम लयो पवन-मृत केरो॥ रावण राय जिल्लट गढ़ खाई. लंका मार कियो धन धेरो । ए सब पूर्व लेखहै मब, अवर प्रतापहे कैकेयी तेरो ॥१॥ सीता विशल्या सतीरे, कौशल्या पगेलागी । पिछ सासु अवरनीरे, लहे आशीश मुहागी हो । सु० ॥ ३७॥ जिसा सुतहम जन्मीयारे, नैमाही ममतोल । तुमपण नन्दन जन्मजोर, मानी हमारो बोल हो । मु.॥३८॥ फिरी फिरीमा आपरा जितारे. लहाण करो अंग। फरगं फासे शिरघणो, बी कहे मन रंग हो । मु० ॥ ३९ ।। वन्स तुम्हारो आज मेरे, हुयो जाग्यो जन्म । नयणे निरख्यो आपणोरे, धन्य करतानी कला हो ।मु०॥४०॥ कष्ट वणं बनवास रे, सीताने गर । तेतो आधु काहियरे,-जोने कीधी मे हो । मु० ॥ ४ ॥ ताततणी पर रामजी रे, मीनाए ने जेम । कहे लक्ष्मण नाममेरे हतो राख्यो एम से । नु० ॥ ४ ॥ माताजी उद्धत पणेरे, में कीमो अनियेक । सीना-गमरियोगनोरे , हेतु हुनो एक हो मु० ॥ १३ ॥ पण धारी आशा थोरे, बार बादल हाटी।
(३३८) श्री जैन पद रामायण तृतीय स्खएड । गयु सही आखी अणीरे, आया अरि निरघाटी से|सु० ॥४४|| ढालज अड़ तालीशमी रे, गई बहोड़ी नार । केशराज ऋपि राजजीरें, पुण्य बडो संसार हो ॥ सु०॥ ४५ ॥ * इति श्री जैन पद्य रामायणे * १ रामविलाप:, १० युद्ध वर्णनम् । २ वीर विराधाय राज्य प्रदानम् ११ लक्ष्मणोपरि शक्तिप्रहारः। ३ सुग्रोवस्य संकट मोचनम् . १० मन्दोदरी शीक्षा। ४ असालिकया लंकारक्षणम् , १३ बहुरूपिन्या विद्याऽधिकारः ५ विद्याधराणां रामेण सह- १४ रावण मृत्युः। १५ विभीषणाय राज्य प्रदानम्। ६ कोटि शिलाया अधिकार । " १६ अयोध्यायां रामस्य- ७ अंजनी सुतस्य लकाप्रस्थानत् " प्रत्यागमनम्। ८ सेनयासह रामस्य- १७ भरत मेलनम् । लंकाप्रस्थानम् । ९ विभीषणस्य शरणागतिः, ॥ तृतीय खण्डम् सम्पूर्ण ॥ वार्ता लापः। इत्यादि विविध विषयकम.
. श्री पीत रागाय नमः श्री जैनपद्य रामायण का चतुर्थ खण्ड दोहा मुगुरु बडो संसारमें, ज्ञान दान दातार । शिष्य सुगुरु सेन्यालहे, विद्यानो विस्तार ।। १ ।। 'राम सुलक्ष्मण आवीया, माता हर्ष अपार । तेमन जाणे आपणो, केजाणे किरतार ।। २।। 'भरत सुभक्ति करेभली, अवसर जाणी सार । उत्सव मण्डावे घणा, घर घर मंगलाचार ॥ ३॥ सेवक होई माचेव, स्वामी तणी अतिसेव । भूपतिनी पदवी तणो, नकरे को अहमेव ।। ४ ।। संयम लही स्वामी, भरतमणे मुविचार । राज्पग्रहो प्रभु आपणू. ९लेऊ संयमभार ॥ ५ ॥ संजम तोहूं सादरो, लेनो राजामाय । शईत शक्ति संपीगया, नप-पद केरी नाथ ॥ ६ ॥ आज लगे में राखीयो, एह तुम्हारो गज । दादाजी रे दयाकरो, सारूं आतम काज ।। ७ ॥ दाल गुणपचाभी तज नयनी (नमा उमसेन कोलोरे) क्षणगईरे मेरी धणगई, लापीणी मेरी क्षगगई ।। मोडिनो मेरी क्षणगई. क्षणगई फिरी नाचे मोई, अंजलीन रेजल जानूं जोई ॥टेर ॥१॥ समय समय मरन्नो जीव, पीतगणना पचन मदीप ।। ।
(३४.) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सएड । तनु साथे डोलन्ती छांय, कालरहे एपूरी बांह ॥ क्षण ॥ २॥ कालसू औषध नहीं है विनाण, जम रूट्यां नहीं राखे प्राण ॥ क्षण॥ जातक? ने जम खाई जाय, अण जातक सामूं नदिखाय॥क्षण ३॥ काले खाधोहु संमार, कालन खाधो जाय लगार ॥ क्षण ।। ॥क्षण ॥४॥ ! जरान पीड़े न ऊपजे रोग, नघटे इन्द्रीना वलयोग ॥ क्षण ॥ जवलग आवीन पूगेआव, तवलक करीजे धर्म की चाव ॥ क्षण॥५॥ जेनरा जरा जमथी नडराय. तेतोढीलो करेरे न्याय ॥ क्षण ॥ मन्दिर द्वारे लागा लाय, तवतो काईहोन कहाय । क्षण ॥ ६॥ सागर पल्लने आयु छेह, कोण विचारे गिणती एह ॥ क्षण ॥ जेदव बाले परवत प्राहे, क्योनवले खडतेदवमांहे ॥ क्षण ॥ ७ ॥ जग में भाख्यो सयल उपाय, घडी घटे क्षणहीना रहाय । क्षण ॥ चावण? चावी पन्थी पुलाय, पन्थी पन्थे न रहेवा पाय॥क्षण ॥८॥ एह सयाण पणे मुझ आज, जेम तेम सारूं आतमकाज ।। क्षण ॥ घर वालीने कीर्ति करन्त, मूर्ख शिरोमणी नामधरन्त ॥ क्षण ।।९॥ आली२ ओखे कहे श्रीराम, वत्स ! रहे वादे संयम काम ॥ क्षण ॥ राज्य करो तुम्ह पहिला जेम, जोमुझ साथे राखोप्रेम ॥क्षण ॥१०॥ आज्ञा कारी तुम अभिधान, तेतो जाणे सयल जिहान ॥ क्षण ॥ पहीली जेम तुम्ह मानी आण, अवही करोमुझ वोलप्रमाण॥क्षण||११ भरत भूप करीने जुहार, ऊठी चाल्यो लोपी-कार३ ।। क्षण ।। लक्ष्मण दौडी साह्यो हाथ, आणी वेसाड्यो नरनाथ ।। क्षण ।। १२॥ 'सीता' ने 'विशल्या' आद, राणी सहु आवी प्रल्हाद ॥ क्षण ।। देवरने समझावे तेह, सुन्दरी वचन वदे ससनेह ।। क्षण ॥१३॥ मुनि श्री रूपचन्दजी कृत क्षेपक ढाल तर्ज कमली वालेने- नृप वनिता यों समझाय रही, मत संयम लेवो देवरजी । सुन संयमकी छतियां धरकी, फिर मुखसे न केवो देवरजी ।टेर।। १ पथिक पन्थ मे खाद्य खाकर विश्राम नहीं करता है। पाणी दीने को आतुर होता है । २ आंसू सहित ।।
- श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३४१) हिय हेज धरी इम कहत सीया, सुन संयम की अकुलात जीया।। इतना दिन वनवास लीया, हम आये जायो ! देवरजी ।। नृप०१॥ संयम का मारग बहुत कठिन, चलनाहै खङ्ग की धार तच्छिण ।। मत करिये हठ तुम्ह होके दच्छिन, अवतो गम खावो देवरजी|नृप२॥ हो सुकुमार फल ज्यू गौर वदन, वहां करना है कर्मों का कदन ।। बड बन्धवकी अहो गुणके सदन, आणामें वेवो देवरजी ।।नृपा॥३॥ कहे लोक आयेघर राम सीया, जब भरतको संयम दिलायदिया। यह अपयश हमसे नजाय सया, घर रूप रहोहो देवरजी|नुपा॥४॥ दाल मूलगी- म्होटो भाई तात समान, क्यू न विचारे तूं राजान ॥ क्षण ।। सायर केम तजे मर्याद, एतो निश्चय विधि वाद ।। क्षण ।। १४ ।। विसारण संयम नी बात, जल क्रीडा कर पाने जात ।। क्षण ॥ देवर साथे घाले वाख, तुम्हनं खेलण कीअभिलाप क्षण |१५|| भाभियोंनो मन राखण हेत; चान्यो भूपति महिल ममेत क्षण। घठिका दोई करी जल ख्याल, जल काट ऊभो भूपाल ॥क्षण' ६॥ एटले गज 'भुवना लंकार', थम्भो ऊडे रोप अपार ॥ क्षण | आगो देसो नीयपरिवार, शोर मच्यो पडियो गजलार क्षया'७॥ थर हर धूजण लागी बाल, देखी हाथी अनि विकराल || क्षण || पुठे रासो सबली देवी, आयो नृप आगे नतलेगी । क्षण ॥ १८ ॥ मदकरी आँधो नेरे गयेन्द, नयण दीठो नन्त नरेन्द्र । क्षग ।। मद उत्तरियो नेणीवार, शान्त हुओ गज छाडी विकार क्षण||१९|| गज दर्शन देखी अभिगम. भूपनि पण पायो गुप नाम ॥ अग।। काने नादी लाली जेम, भूपनि आगे हाथी नेम । क्षण ॥ २० ॥ वात मुणी ने जावे धाय, राम गु लक्ष्मण सुभट मुहार ।। धन ॥ करी उपाय अनेके वाग, मदाने गड आन्योटा २२|| कुलभूषण ने भूपण देश. नमो नई पिग विशेष पाम मोमिनी भरत नश, चन्दन नारे लोकोकिन..२२॥
-~- ( ३४२) श्री जैन पद रामायण चतुथ खण्ड । पूछे पद्म कहो ऋपिराय, भरत देखी गज निमंद थाय ॥ क्षण ॥ देश सुभूपण केवल धार, भाखे भूपा सुणो सुविचार ||क्षण॥२३॥ ऋपमे१ लीधो संयम भार, साथे हुआ नृप चार हजार ।। क्षण ॥ एपणा समिती न लह्यो आहार, तापस हुआ ते तेहीवार ||क्षण॥२४ ग्रल्हादन सुप्रभ नृप-नन्द, ताप सना व्रतपाली अमन्द ॥ क्षण ॥ चन्दोदय सूर्योदय देख, भवमांहि भमिया सुविशेष क्षण ||२५।। चन्द्रोदय गजपुर में आय, हरिमति भूपति नन्द कहाय ॥ क्षण । वन्द्रलेखा सुउदर उत्पन्न, कुलंकर नामे वित्पन्न ।। क्षण || २६॥ 'सूयोदय' पणते पुग्मांहे, विश्व भृतिनो नन्दन प्राहे || क्षण ॥ अग्नि कुण्डा उदर अवतार, श्रुतिरति नामे कुल आधार ||क्षण।।२७ । 'कुलंकर' नृप पद पावन्त, तापस वनमें पग ठावन्त || क्षण ॥ विचेमिल्यो ज्ञानीअणगार, अभिनन्दन भाखे सुखकार ||क्षण२८॥ तापस पंचाग्नी साधन्त, जीवधणानो आणे अन्त ॥ क्षण ॥ लाकड अग्नि लगायो आप. तेमां है बलेछे साप ॥ क्षण ॥ २९ ॥ सो अहि पर भवनो तुम्ह वाप, क्षेमकर नामे लहे ताप ॥ क्षण ॥ काडी लाकड़ काट्यो नाग, जीव ऊगार्यो तेसो भाग ॥क्षण ॥३०॥ लाकड़ फाढ्यो माहे भुजंग, दीठो राजा हुओ विरंग ॥ क्षण ॥ दीक्षा ऊपर आणे भाव, 'श्रुतिरति' ताम कहन्त कहाव ।क्षण ।।३।। वय पाके दीक्षासू हेज, करवो काया आजश तेज ।। क्षण । एम सुणी भाग्यो उत्साह, लचिपचि मांही रह्यो नरनाह ॥क्षण॥३२॥ श्रीदामा' राणी छे तास, 'श्रुतिरति' साथे छे सुविलास । क्षण ॥ शक्या आयां पामी भेद, राजाजी करसे शिर छेद ॥ क्षण |॥३३॥ विपदेही मार्यों भरतार. वेगोही मूओते जार ।। क्षण ।। पापतणा फल एहिज जुरी, ए दोई भव भमिया भूरी ॥क्षण ॥३४॥ १ ऋपभदेव निराहारपणे मौनकर विचरने लगे, पीछे शेप मुनि नर्दोपाहार नमिलनेसे तापसहुए । उन्होंमेसे प्रल्हादन, और सुप्रभ जाना पुत्रों अधिक भवकर तेहुए चन्द्रोदय-और सूर्योदय हुए ।।
AvMArmy श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड (३४३) 'राजगृह' नगर में विप्र, 'कपिल' घरे आयात क्षिम " क्षण || 'सावित्री' उदर 'नामे' विनोद. वीजो 'रमण करन्त प्रमोदक्षिणा३५ रमण गयो भणयाने वेद, देशान्तर भणियो करी खेद ॥ क्षग ।। घर आवे निशी हुई जाम, यक्ष मन्दिरे लीधो विश्राम क्षण||३६|| वडा बंधवनी 'शाखा' नारी दत्तचिनम् प्रेम प्रकारी || क्षण || यक्ष मन्दिर में करी संकेत, सा आची मेलण नेत ॥क्षण ||३७ ।। पूठे आयो छे नमकन्त, दत्त न आयो ताम तुरन्त ॥ क्षण ।। रमण ऊठावी माणे भोग, नारी न बछे धन्य ते लोग क्षण||३८॥ काही खग करन्न प्रहार, भेद न जाणे कार्ड गमार ॥ क्षण || रमणर देखी सुपडियो नन्त, शाखाए निज हण्यो कन्त क्षण||३९॥ भवमें भमी 'धन' माण प्रसिद्ध, ३प पुत्र हुओरे समृद्ध ॥ मग ।। रमण हुओ सुत तेहनो जाण. लक्ष्मी उदरे भूपण मु वसाण क्षण ॥४० परणाची कन्या वत्रीश. सुखमाणेते विश्वावीश ।। क्षण || ऊपर भूमि बैठा स्वामी. रजनी केरे पश्चिम जाम ॥ क्षण ॥४॥ 'श्रीधर' ऋपिने केवल ज्ञान. ऊपजीयू छे अधिक प्रधान ।। क्षण ॥ केवल ओछव करवा देव, देसी धर्म तणो लहे भव अगा|४२।। ऊपर थकी ऊतारियोनन्द, नापि चन्दन भरे आनन्द ।। क्षग ।। वाटे जातां साप खाध, शुभ परिणामेशुभ गति लाध ॥ क्षण ॥४३॥ भला भलातो भवने लेत, भला भलातो दितरण देत ।। क्षण । भला भलाही पावे ठाम, भला भला गायत गुणग्राम . क्षण ।। ४४ जम्म् द्वीप अपर विदेह. रसपूर्ग नगरी गुणगेह ॥ धण ।। अचल नामा चक्रीया, पूग्ण हरिणी माय जगी • जण॥४५॥ 'प्रिय दर्शन' नाम परयुग. जाग गरग घग्नी सूत्र सग ।। बाल पणे गये वैराग धार नहीं परणेते लाग । क्षण ॥१६॥ मान पितान गखप हेन. कुंवर उप मान्या परणेन ।। सन रमाको दत्त समस्कार सामानो, मरे माथ गरे लगी। विनोद ने रमरा कोन पहिचान कर मे नारालार शाया अपने पनि विनोद को मार दिया।
२४४ ॥ श्री जन पद रामायण चतुथ खण्ड भति दुःख पामे म्हारे त्रास. गजमद छोडयो एम विमास |क्षणा५४॥ कन्या मेली हजारज तीन, परणायो कुंवर प्रवीण || क्षण ||४७॥ साठी सहश्र वर्ष ग्रहीगृह वास, बहुला कीधा तप उपवास क्षणा। अन्त समय आणी शुभ ध्यान, पाम्यो पंचम अमर विमान ||क्षण||४८ धन२ नो जीव करीने काल, भवमांही भमियो अमराल ||क्षण।। पोतनपुरमें ब्राह्मणवंश, शकुनाज्ञीमुख वंश वतंस ।। क्षण ॥ ४९ ।। मृदुमति नामे जन्मज लीध, भंडोजाणी काढी दीध ॥ क्षण ।। धूर्त सीख्यो माया जाल, आपाने ऊपायो साल ॥ क्षण ।। ५० ॥ घर आण्यो न तजे परपंच, वेश्या सरीसो मांडयो संच ॥ क्षण ॥ पीछे संयम व्रत प्रतिपाल, पंचम कल्प गयोते चाल ॥ क्षण ||५१|| गज भव कीधो माया भेली, गतितिर्यच लहीए मेली ।। क्षण ॥ गिरि वैताढ्य महामदमन्त, हाथी हुओए वलवन्त ।। क्षण ||५२|| 'प्रिय दर्शन' नो जीव जिकेव, भूपति भरत हुओरे तिकेच ॥क्षण।। भरत३-तनु गजेन्द्र दीठो दर्श, जातिस्मरण पाम्यो सरस || क्षण॥५३॥ भाई पुत्र पणानी प्रीति, क्यूं अबमें थाए विपरीती ॥ क्षण ॥ एह सुणी भरतेश्वरभूप, संजम आदयूँ रे अनूप ॥ क्षण ॥ साथ हुआ एक सहश्र नरेन्द्र, महियल विचरे भरत मुनीन्द्र ॥क्षण५५ आतम गुण आराधन कीध, समर समेरे सुधारस पीध ॥ क्षण। श, जय साधी संथार, पाम्यो भव सायरनो पार ।। क्षण |॥५६॥ हाथी नानाविध तपकार, अनशन आराधी अतिसार ॥ पाम्यो प्रत्यक्ष पंचम कल्प, सुख साता तिहां छेरे अनल्प४ ॥क्षण ५७ कैकेयी लियो संयम शुद्ध, पाल्यो टाली कर्म अशुद्ध ॥ क्षण ॥ माताजी गई मोक्ष मझार, जेहने नामे सदा जयकार ।। क्षण||५८॥ चौसठ हजार (जैन रामायणे) २ धन मरके योतनपुर नगर शकुनाज्ञो मुखनामक ब्राह्मण की स्त्री ब्रह्मपनि के उदर में मृदुमति नामक पुत्र पैदा हुआ। ३ भरत को देखने से हाथी को जातिस्मरण ज्ञान हुआ ।। ४ अन+अल्प-अल्प नही अर्थात् विशेष- मे marwaive श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३४५) एतो भाखी रूड़ी ढाल, ए गुण पचासमीय विशाल ॥ क्षण || केशराज कर शिरही चोड़ी, दोई भरतनमें करजोड़ी ॥ क्षण ५९॥ दोहा मल्हार रागे भरतभूप दीक्षा ग्रही. राज्य तणो रे विवेक । वासुदेव बलदेवनो, पदचीनो अभिषेक ॥ १॥ कीजे चित्त मं चिन्तवी, भूचर खेचर नरेश । आवी पूछे रामने, रामदियो आदेश ॥ २ ॥ मण्डप रचायो मोकलो, मांड्या पर मण्डाण । विधि सघ लीही साचवी. माजन मिल्या सुजाण ॥३॥ प्रथम कलश लक्ष्मण भणी, ढोलेते भूपाल । पछी कलश श्री रामने, दोलते मुविशाल ।। ४ ।। चामुदेव ए आठमो, ए अष्ठम बलदेव । राज्य करो मुविशेषथी. मुरनर सारे सेव ॥५॥ बासु देवने देवता सेवे आठ चार हजारे सेवीये, श्री बलदेव उदार ॥ ६ ॥ सोलह हजारों देशमें, मेहनी बरते आण } राजा सोलह हजारही. आणकरे सुप्रमाण ।। ७ ।। हयवर गयवर स्थपरु, लासज बंगालीश । पाला प्रौढ प्रतापस, क्रोहन अड़तालीदा ॥ ८ ॥ खेचर खरी खिजमत करे, भूचर भाग अखाइ । माने-मुर सेवा क, पारले राज्य प्रचण्ड ।। ९ ॥ ढाल पारामी तो हिबोलणानो---- है उस रघुपति के धर्म में राजे, मधला मुखिया लोकाटेर। अधिक नेहा अधिक मेहा, अधिक निपा होई। अधिक मुम्भी दूध आपे, अधिक फल ना जोई ।। भरिक लाभ लहन्त वणने, भरिक नाम माग (३४६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। अधिक पुत्र कलत्र कमला, अधिक पूरे आरा ॥ है उस ॥१॥ अधिक दान सुशील अधिका, अधिक तपही प्रकार । अधिक भावन पुज्य पावन, अधिक करणी सार || अधिक पोपह ने सामायिक, अधिकहीं आचार । अधिक अधि• सर्वतो, अधिकाई नो अधिकार ॥ हैं ॥ २ ॥ नहीं हिंसा नहीं झूठज, नहीं कोई चौर । नहीं लम्पट नहीं लोभी, नहीं भृडा भौर ॥ नहीं क्रोधी नहींमानी, नहीं रोप लिगार । नहीं वाद विवाद विकथा, नहीं को कलि कार ॥ हैं ॥३॥ नहीं आल कराल काल, पिशुनको जंजाल । नहीं को परपंच रंचही, कोन केहनो साल ॥ नहीं झार जूगार धूरत, नहीं दुखियो कोई । जेहनी उपमान जगमें, आपहीं प्रभुहो सोई ॥ हैं ॥ ४ ॥ राम आपे विभीषणने, राक्षसनो द्वोप । कपिपतिने द्वीप कपीनो, अछेजेही सदीप ॥ हनुमन्तने प्रवर श्रीपुर, श्री पति आपन्त । कुलकमेंजे चाली आया, ते तिहां थापन्त ॥ हैं ॥५॥ लंकतो पायाला प्रगटी, लहै वीर विराध । 'नीलने दे हनुपुर लाध ॥ रत्नजटी देवोपगीत, चन्द्रगति सुत देखी। 'स्थनू पुर नगर रूंपाचले, ए लहेज विशेपो ॥ हैं ॥ ६ ॥ यथायोग्य जेही जाण्या, तिसो तेहने देश । देईने सन्तो पीया, श्री राम सकल नरेश । गांव वाले गांव पायों, खेत वाले खेत । विमुखतो नर को नरहीयो, पद्म पृथिवी देत ॥ हैं ॥ ७॥ 'शत्रुघ्न झू रामभाखे, देश जेही सुहाय । सोई मांगों ताम मथुरा, आपही तस दाय ॥ ऋक्षपुर, प्रतिसूर्य । श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३४७) +UMNNN -~-~- राम भाखे वत्स ! मथुरा, पूरी अधिक दुसाधी१ । जाणी बूजी आपणे गले, कौन बांधे व्याधी ।। हैं ।। ८॥ 'मधु नृपने चमरे२ आप्यो अछे पहेलां शूल३ । अरिदणी तस हाथ आवे, प्रगट के प्रतिकूल ।। शत्रत कहे तुम्है हणियो, राक्षस नाथ निशंक । हूंही थारो भाई छूतो कोणे यह मधु रंक ॥ हैं ॥९॥ दियो मंथुरा ए तमासो, देखसू हूं जाय । राम आपी ताम मथुग, एह शीक सुणाय ॥ शूलवर्जे होई गाफल, छले करजो काम । बल अरु जोर नहीं को चलसे, सीसदे श्रीराम ।। हैं१०।। रामे भाथा अक्षह सायक, आपीया तसु दोई। सारथी जमवदन४ नामा, साथे दीधो सोई ।। धनुष्यदियो अर्णवावर्त, अग्निमुस शर सार । लक्ष्मणे आप्यांधी हर्षे, भाई नो जयकार ॥ हैं ॥ ११ ॥ शत्रुमतप चालीयोरे, करत शीघ्र प्रयाण । साधे दलवल सामटोरे. वाजही निशाण ॥ नदी तटे विश्राम लीधो, खबर दीधी गय । चनकुबेरे नारी सहित, मधुकेली कराय ।। है ।।१२।। अखना आगार माहे, शूलन रे निवैस । शम छल देई राते. करे पूरीय प्रवेश ।। वात सांभली मधु दौडीगो. आपही पुरमहि । शत्रुत ना सुभट पलिया. रोकियो ते पाहे ॥ हैं ।। १३ ॥ मधु-नन्दन लवण परे, मांडियो मंग्राम । लड़त अधिको युद्धने मुख, मारी लीयो नाम ।। रामना युद्ध आदिमां जैम, नारीगणे सर मारी ।। १दुसाध्या ४ाकुन्तान-दन-५ वरना TERRY mahanmitaaranpurnwweone - - (३४८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । जीतना घुरही वजाय, तेम एहने संहारी ॥ हैं ॥ १४ ॥ पुत्रनो वध सुणीने मधु, कोपियोरे कराल । शत्रुघ्न झू आवी अडियो, लड़े ताम भूपाल ॥ अस्त्र शस्त्रे चोट करवे, अधिक शूरातेह । देव असुरों जेममाचे, तेम माची एह ॥ हैं ॥ १५॥ धनुष्य तो तव अर्णवा वर्त. अग्निमुख तेवाण । सुमरियां सानिध्यकारीष्ठ, हरण अरिका प्राण ।। मरियो मधु जेम लुब्धक५, मारही मृगराज६ । घाव साल्यां मधु चिन्ते, हुओ एह अकाज ।। हैं ॥ १६॥ शूल नायो ना हणायो, सुप्रभा ७ नो नन्द । जन्म हार्यो कोन सार्यो, काजहं मतिमन्द ।। सेविया नहीं देव जिनवर, न किया तप प्रकाश । पात्र जाणी दान नदियो. आणी चित्त उल्हास ।। हैं ॥ १७ ॥ एह भावना भावतारे, राखी शुद्ध परिणाम । लही दीक्षा प्राण छोड्या, हुओ सुर अभिराम ॥ स्वर्ग त्रीजे देव देवी, सारही तम सेव । देह ऊपर कुसुम वरस्यां, जयो जयो मधु देव ॥ हैं ॥ १८ ॥ देव रूपेशूले जयकरी, चमरम् एवात । शत्रुघ्ने छल बले कीधो. मधु नृपनो धात ॥ मित्रमार्यों सुणी खींज्यो. तातश्री चमरेन्द्र । शत्रुघ्न ने आजमार्स, एम कहे एसुरेन्द्र ॥ हैं ॥ १९ ॥ १९॥ चलियो तब वेणुदारी, देव पूछे नास । किहां चाल्या मित्रहन्ता, तणो करवा नाश ।। वेणुदारी फिरी भाखे, तेहनों अधिकार । अर्द्ध चक्री पुण्यपूरो, अधिक वर्ते वार ॥ हैं ॥ २० ॥ धरणेन्द्र पासे लही रावण. शक्ति जीती जेण । ४ सहायकारी-५ पारधी-६ सिंह भिरत- - श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। ( ३४६ ) तीन लोक तणां कोंठो, हण्यो रावण तेण ॥ कोण मधु तस पति सरिसो, प्रभु तणो बल पामी । शत्रुध्ने मधु (ने) मारीयो छे, शान्ती हुभो स्वामी ॥ हैं ।। २१ ।। चमर भाखे शक्ति जीति, विशल्या सुपसाई । नारायण तो ना वखाणो, एहमें बल काई ।। तास अब चारिणी , सर्वयोग प्रभाव । तेहथी जई शत्रुघ्ननो, करूं ओछो आव ॥ हैं ॥ २२ ॥ एम कहीने चमर मथुरा, आधीयो ततकाल । लोक सुखिया देश नीको, देखीयो सुविशाल ।। प्रथम तोए प्रजा पीई, पछी पीई ईश । एम चिन्ती रोग पीड़ा, करें विश्वापीग ॥ हैं ।। २३ ।। रोगना उपचार कीधा, ताम विविध प्रकार । मन्नीपाती ने जेम मिश्री, तेम ए उपचार ।। ताम नृप कुल देवी समरी, सा कहे सुविचार । मधु मार्या चमर कोप्यो, तेहना ए सुविकार ॥ है ॥ २४ ॥ लोक दुसिया देखी राजा, करे अरती अपार । छींकनो मृायो माणम, जोवेही दिन कार ॥ शवन नव चालो आयो, राम-लक्ष्मण पाम । चमर कोप्यो केम कीजे करे ए अरदाम ॥ हैं।॥ २५ ॥ देश भूषण कुलभूपण, आपिया मुनि दोई। राम-लक्ष्मण-अनुन सं. बन्देही महु कोई ।। सात ने जो ग्रही मधुरा, कहो अनु कोण हेल ! देश भूषण गम में कहे, पूर्व भव मस्न ।। ।। २६ ।। शुस नो जीर मधुरा, उपग्यो बहु पार । नामे श्रीधर विन हुनो. कामनो अातार । सज पनि लोयो तेडो करण भोग मिला। आप चोर भाख्यो, पामीयों ने वास ।। २७ ।। हुक्म नृपने वध्य भूमिय, पापीयाने शिम
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-~urmut ~ - पुत्र वैराग । श्री-जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । एक दिवसे नट नाचे, देख ही सो भूप । राये पुरुप पिछानियो, सोई अंक अनूप ॥ पासे तेड़ी करी दिलासा, जन्म भूमि दीध । अचले अंक सुमित्र थाप्यो, विन्दु सिन्धु कीध ।। है ॥३५॥ समुद्राचार्य नी पासे, लेई संयम भार । स्वर्ग पांचमें होई आया, मनुष्य लोक सझार ॥ शम ए अचल हुओ, हेत मधुरा लार । अंक जीव कृतान्त आनन, सारथी तुम्ह सार ।। है ।। ३६॥ श्री प्रभापुर नगर नीको. श्री नन्दन' राय । धारणी उदर ऊपना सुत, सातही सुखदाय ॥ सुरनन्द श्रीनन्द श्री तिलक नामे जयन्त । सर्व सुन्दर चमर अने, जयमित्रजी गुणवन्त ॥ हैं ॥ ३७॥ श्री नन्दन रायसाथे, मास १ जातक पाट थाये, साधया शिव माग ।। प्रीतिकर गुरु पासे संयम, आदर्यो ततसेच । लही केवल मोक्ष पहतो, रायजी प्रापिदेव ।। हैं ॥ ३८ ॥ भाई साते शुद्ध संजम, पालता विहरन्त । लब्धी जंघा चारणीर. तपरले उपजन्त ॥ पुरी मथुग आवी रहीया, तामने चौमास ! छह अट्ठम दश द्वादश, करे तप उपास ॥ है।। ३९ ।। पारणो जई अवर नगरे, करी आवे माध ! नास तप आचार करणी, नणो अतिशय लाध ।। चमरे कीधा रोग मिटिया, हुमो नगर निरोग। अधिक ओछय रंग पर घर, नहीं सुपने शोग। ४.॥ नीतिलपुर-परिश्चंद ने मेल, धुकने नस का । एहतो औषधी प्राई. साधु ना मुपिरोष ॥ एक मास वाले पुर को राम्या मित कर, अपर गुमा महिला दीक्षित बना। २ पेशाब (अ) = ३ पर सेरram- में vomwwwml ~~ , (-३५२ ) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । वायरो तनु फरसी आवे, जले पग धोवाय । वाय पाणी फरसियोंथी, रोग सघला जाय ॥ हैं॥४१॥ अयोध्या ए आवीयाते, पारणाने काम । अर्हदत्त सेठ गृह आंगणे, आवी ऊभा स्वाम ।। भाव विन वंदना कीधी सेठे, संजम चन्त । साधु स्यां चौमासा मांहे, विहरन्ता विचरन्त ॥ हैं ॥ ४२ ॥ शेठ जाणे पूछियेरे, किस्यो तुम आचार । भेख दीसे साधुनोरे, फिरो छांड्या कार ॥ एम चिन्तवतोही रहियो, दियो बहुए आहार । लेई ऊपासरे आया, जिहीं छे अणगार ।। हैं ॥ ४३ ।। आचार्य श्रीनमी घुतिवर, कियो उठी प्रणाम । अवर साधु नकरे चन्दन, जाणी शंका ठाम ।। अशन कीधां पछि पूछयो, आचार्य ऋपि राज । पूज्य किहांथी पधारीया, किहां जासो आन! ॥ हैं ।। ४४ ॥ पुरी मथुरा थकी आया, जायसूं पण तत्र । एमकही ऋपि पांगर्या, आविया था यत्र ।। रूडा ऋषि संयमी शुद्धा, कृयाने पालन्त । , गगने आवे' गगने जावे, दोप सहु टालन्त ।। हैं ॥ ४५ ॥ शिष्य पूछे सुगुरु पासे, कोणए निग्रन्थ ! । सुगुरु भाखे साधु साचा, साधेही शिवपन्थ । लब्धि वन्त महन्त मुनिवर, माहे को नवि दोप ॥ एह सुणतां शिष्य मनमें, करे अति अफसोस ॥ हैं ॥ ४६॥ एह सांभली सोई श्रावक, करे पश्चात्ताप । मास कार्तिक सुदि सातम, चाली आया आप ।। करी वन्दना वीनवे तुम, गुणां भरीत आगाध.। पाय लागीने खमाऊं, खमो मुझ अपराध ॥ हैं.॥ ४७ ॥ सप्त ऋपि सुप्रसादथीरे, शान्ति सघले देश । .
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । ( ३५३ ) सुणी कार्तिक पूणिमें, आवियोरे नरेश ।। पाय नमी कहे साधुजीने, आहार लेवो मुझगेह । राज्य पिण्ड न ऋपि नेकल्ये, कहे मुनिवर तेह ॥ हैं॥४८॥ शत्रुघ्न तत्रफिरी भाखे, धन्य २ नाहरो धर्म । देव कृत यह रोग मिटियो, कर्या विन उपकर्म ।। कोई दिन तुम्ह इहां ठहरो, अवर ठाम विहार । मतिकरो अवतार नाहरो, करन जग उद्धार ।। है ।। ४९ ।। सप्तऋषि कहे सय १नकरे, साधु ममता भाव चाललं नविरया सिणही, चरण गुण चाव ।। देव अरिहन्त नेजधारो, साबु सेवा साधी । शील समकित शुद्ध पालो, जेम न उपजे व्याधी । है ॥५०॥ दाल ए पचासमीरे, साधुनो उपकार । अछे महोटा नहीं छोटा. गगन ने विस्तार ॥ 'केशराज कहे साधु गुणज्यु, गरुड़ आयां साय । नाशही तिम साधु अयां, पापने सन्ताप ।। है ।। ५१ ।। दोहा-(सारंग रागे) गिरि वैताट्य विशेपथी, दक्षिण श्रेणी देय । 'ग्नरथ राजाभलो, रलपुरे मुविशेष ॥१॥ चन्द्रमुखी उदर ऊपनी, मनोरमा सुकुमारी। एके ने परणाम. गय पच्चो मुविचारी ॥२॥ 'नारदे लक्ष्मण यो. मर गुण लक्षण बन्न । भाग्यवती ए भामिनी, जो धाप ओ कन्त ॥ ३॥ 'स्वरथ राजानणा, कोया ताम कुँधार । गौरत वैर निकारक अमपं बहे प्रहार ४ || का मतो ए कटिने. नारद नाशी जाय । पुरी अयोध्या भापीचो, लक्ष्मण लाग्यो पार । ५ ।। मनोरमान रूप पट, लियो लियो देसार ।
( ३५४) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । लक्ष्मण थयो अनुरागियो रूपे राच्यो राय ॥६॥ लक्ष्मण तवही चालियो, साथे हुआ श्री राम । राक्षस-खेचर सैन्य , आई गया अभिराम ॥ ७ ॥ रत्नरथ निज पुत्रसं, आवीकरी संग्राम । लक्ष्मण ते जीती लिया, वाज्या सुयश दुदाम ॥ ८॥ 'मनोरमा लक्ष्मण भणी, पुत्री देई प्रधान । 'श्री दामा श्री रामने, रीजया राजान ।। ९॥ साधी दक्षिण श्रेणीसहु, साध्या खग भूपाल । पुरी अयोध्या आवीया, राज्य करे सुविशाल ॥ १० ॥ लक्ष्मण ने अन्ते अरी. सोहे सोलह हजार । आठ अछे पट रागणी, इन्द्रणी अवतार ॥ १ ॥ विशल्या आदिकरी, रूपवती वनमाल | 'कल्याणमाला हतुर्थी, रत्नमाला मुखमाल ॥ १२ ॥ 'जीतपद्मा प्रगटीमहा. अभयवती अवधार । 'मनोरमा मनमोहनी, ए आठे पटनार ॥ १३ ॥ अढीसो नन्दन हुआ, शूर महा शूझार । जाया अग्र महेपियां. ए आठे सुत सार ॥ १४ ॥ विशल्या नो श्रीधरु, रूपवती नो एह । 'पृथ्वी तिलक सुहामणो, गुणमणि केरो गेह ॥ १५ ॥ वनमाला नो अर्जुन. उपमा अधिकी जास । जीतपद्मा नो जाणीये, श्री केशी सो उल्हास ॥१६॥ 'कल्याणमाला नोकह्यो, मंगल नाम अमन्द 'सुपार्श्व कीर्ती कल्पतरु, मनोरमा नो नन्द ॥ १७ ॥ रत्नमाला नों विमलजी, विमलसो नाम परिमाण । 'अभयवती नो एसही, सत्यकीर्ति सुनाम ॥ १८॥ चार कही श्री राम ने, सीता सती सरेख । 'प्रभावती ने रतिनिभा, श्रीदामा सुविशेष ॥ १९ ।। .
www. श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सण्ड । गर्भधर सीता सती, भलो सुपन अविलोय । आवेचवी विमानथी शरम सजोड़े दोय ॥ २० ॥ करेप्रवेश निज आनने, वीनवीयो भरतार । पुन युगल तुम्ह प्रसवसो, नहीं सन्देह लगार ।। २१ ।। शरभ विमान थकीचव्या, सुत मुझ असुखदाय । होसे ए जाणोसही, कहे अयोध्या राय ।। २२ ।। सीताकहे स्वामीसुणो, एशी आरती ईश । काम मकलही पाघरो करसे थी जगदीश ॥ २३ ॥ प्रीतघणी पहेलीअछे, प्रभुनी सीता माथ । अब ओधान धर्यापछी, अति मन्मानी नाथ ॥ २४ ॥ शौक्य बलेमनमें धणूं. अमर्ष मयोन जाय । पणवलको चालेनहीं, ताम करें उपाय ढाल एकावनमी- तर्ज हे रुक्मणी त तोसाची श्राविका-- शूलीथी अति आकरी, शूली शाक्य जोय । हो रघु पनि । शौक्य सरीसी शूलीका, अवरनदीसे कोय । हो रघुपति ॥१॥ शौक कहोक्यू-नाकरेगटेरा। मुई दुःखदाईहो रघु।। पूठन छगई पापणी फिट फिट एह सगाई हो रघुपति ।। शोक ॥ २ ॥ शस्त्र यकी नीखो वरो नास नीसो प्रताप हो र० । गरा छिप्यो रहे म्यान में, लियां उठे आपहो २० ॥ शो॥३॥ मापणी ही थी मापणी. सापणी गोक कायहोर। मापणी मने खालीये गोकन पचही लिलाय हो र.मो॥l आग थकी उनी वर्ग. ऊनी योकज होय हो ।। र.॥ कोकर चले जिम मीनरी. नेम पचलनी जार हो । मो०१५॥ नवलग धन भावतो, जवलग कांजी दूग्दो ।। २. ।। फाटे फांजी मेलप्पे. एरशन्न हजर हो । र, सो० ॥६॥ अम्बा माईया धमा, देवाय या मेट हो। र. प्रपल वापने नये, काटी गया यन नेद हो । मो.
( ३५६) - श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। आटो आछो तो घणो, कोलहे तूटे चाकहो ॥ र.॥ माणस फेरविया फिरे. जेम फिरन्तो चाक हो ॥ र.शो०॥८॥ वाहिरर मिलणे मिलीरही, मांहे कटका तीन हो ।। र. ॥ काकड़ीया में तेवसी, लेगो देखी प्रवीन हो । र. शो० ॥९॥ पारो३ वानी सू मिल्यो, हींगलूं कहिवाय हो । र. ॥ सोहगीना संयोगथी, छटकी अलगी जाय हो ॥र. शो॥२०॥ वा जांबू आंवली, चोथो जओ पोरहो ॥ र. ॥ पर कोमलता घणी, मांही अधिक कठोर हो। र. शो० ॥११॥ त्यवती साची सती, वसुधा मांही विख्यात हो ॥ र.॥ क्यां सा हलूई करो, अवरां कई वातहो । र. ।। शो० ॥१२॥ क्यां कहे सीता तणी, म्हार तूं सिरदार हो ॥र.॥ मे अमृत केलवे, काती हृदय मझार हो ॥र. ॥ शो० ॥१३॥ क दिवस रसरंग में, पूछे चितमें चावहो ।। र. ।। वण-रूप सोहामणू , हमने लिखी देखाव हो ।। र. शो० ॥१४॥ ता कहे सूं जाणीये, केहवो थो तस रूपहो ॥ र. ॥ 'तो कदहिन देखीयो, देखिया पांव अनूपहो ॥र. शो० ॥१५॥ । भाखे सुन सुन्दरी, सोई लिखो थे पांव हो ॥ र. ॥ ती धूर्त पणो करे, सीता सरल स्वभाव हो ॥ र. ॥शो० ॥१६॥ ता खिलि देखाड़िया, रावण पाय उदारहो।। र. क्यां ढांकी राखिया, पांच तणा आकार हो ॥ शु० ॥१७॥ मेष्ठी विसर्जी वेवसू , निज निज स्थानक जातहो ॥ र. ॥ गीता ओछी पाडवा, केवो घाल घाठ हो । र. ।। शो० ॥१८॥ ग-आकार देखाविया, जब आया श्री राम हो ॥ र. ।। छयां ए उत्तर दियो, व्हाली त्रियाना कामहो ॥र.॥शो० ॥१९॥ तो पावज पूजिये, जो तस साथे नेह हो । र. ॥ ति न मानी रामजी, शोक्य पलेखा एह हो। र. ॥शो० ॥२०॥ आप आपणी दासीने, तेड़ीने ते नार हो || र. ।। ॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। (३५७) गली गली बाजार में, सारी पूरी मझार हो ॥ र. शो० ॥ २१॥ सीता चित्त रावण वसे, सघले पाडे साद दो ॥ र.॥ साल सरिसो सालसे, लोक मुखे अपवाद हो ॥र. शो० ॥२॥ मास वसन्त विराजियो, प्रभु तिय साथ कहन्त हो ॥र.॥ गर्भ ही खेद निवा रवे, आयो एह वसन्न हो ॥र.शो० ॥२३॥ 'महेन्द्रोदय' नामथी, आछोछे उद्यान हो । र. ॥ विविध प्रकार विनोद नो, माहे म्होटो थान हो र... मोगा२४॥ क्रीडा करवा कारणे, चाल्यो जावा आज दो।॥र. } सीना कहे मुझ दोहली, उपन्यो श्री महागज हो शोक २५॥ तबही राम मंगावीया, बाग तणा पर फूलहो ।। २.।। सीता दोदल पूर्वा, रनिगा मण्डप अमूल हो ॥र. मो० ॥२६॥ पछे पानी में प्रभु, वनमें आया चाल हो । र. ।। विविध वसन्त विनोदमें, रचि रया छे ख्याल होमो० ॥२७॥ एटले सीता जीतणं, फरक्यं दक्षिण नगन हो । र । शंकी मन मांही घणी, लहिये कोई सुचयन हो । र. शोका२८॥ सीता प्रभुनी मू कहो, करे विचार नरेश हो ।।।। एतो एडवं देखीये, उपजे कोई कलेश हो ॥ ॥ गो० ॥२९॥ राक्षस ने हाथे चढी. दीठो राक्षस देश हो । र. 1. देव नतो रानी धयो, मन्नापनां विशेष दो बार शो० ॥ ३०॥ दिन गयो वर्ष वरोरे, आरती माहे उदाम हो । र. ! पार न पामे केवली, नणता दाम नाम हो 1.12 1|३|| प्रभुजी दे आमानना, एम करत महल हो ॥ २० ॥ १जाने परिदलोदी-मगारा में प्रविजन REETरा ३५. पारा को उपमा दोषी है । गगन सम्पनोसन' ठिाने. लाया में ना होगा नागये। मिन रायमा होता । TR मिमा से पारगमनागमे नाटक एसार मिलानस पारामा मागको उपमा सगो। ( पानी और पादान्त) (३५८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड। सुख दुःख आपद सम्पदा, लागीलार रहन्त हो र०॥शो० ॥३२॥ राम कहे घर जाई ने, कर कोई उपकर्म हो ॥ २० ॥ दान शीयल तप भावना, साचवे श्रीजिन धर्महो ॥२०॥शो० ॥३३॥ जिन धर्म नी सेवा करे, भाव विशुद्ध त्रिकाल हो ॥ २० ॥ आंपिल एकज धान्यनो, करत मिटे जंजालहो ॥२०॥शो० ॥३४॥ सीता आवी मन्दिरे, रहती सम्बर मांहि हो ॥ २० ॥ दानादिक विधि साचवे, आदर उच्छाहिहो ॥ २० ॥ शो० ३५। यलकर्या जगमें जिके, कोयन राखी खन्तहो ॥ २० ॥ एजिन वचने जाणजो, भावीहोवे ते अन्त हो ॥२०॥ शो० ॥३६॥ विजयसूर सुरदेवजी, पिंगलं ने मधुमानहो ॥ २० ॥ कालक्षेप काश्यप कह्यो, शूल सुधर अभिधानहो ॥२०॥शो० ३७॥ र साते अधिकारीया, म्होटा मेरु समान हो ॥ २० ॥ खबर दार करी थापीया. पुरुष महा परधानहो । र० ॥ शो०३८॥ राघव आगे आवीया, ऊभाकरिय प्रणामहो ॥ २० ।। पर हर लागा धूजवा, न सहाय प्रभु घामहो ॥२०॥शोक।। ३९ क्षेपक राधेश्याम रामायणमें से-- राज सभा का दृतथा. विजय नामी एक । लाताथा वह सभामें, पुर-सम्वाद अनेक ।। एक रोज ऐसी खबर, लायाथा बुद्धिवान । जिसने उसके लिएभी. कर डाला हैरान ॥ सोचेथा खड़ा खड़ा विजय. कैसे यह खबर सुनाऊँमैं ? कुछनहीं समझमें आताहै, क्योंकर यह वज्र गिराऊँ मैं? मुंह जभी खोलता हूं अपना, तो हृदय मना कर देता है । रखता हूं मुखको बन्द अगर, कर्तव्य खबर तव लेता हैं । अच्छा नौकरी प्रणाम तुझे, आगे यह काम न करना हैं । अवतो नौकर जिस बात का हूं, वह वात सभामें धरना हैं । छाती तू पत्थर की होजा, तब बोले मैं उन बोलोंको ।
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सएड। (३५६ )
वाणि तूं घोर घटा वनजा, तर वरसाऊँ उन ओलों को।
माता तुम्ह मुझे क्षमा करना, अपना मत नहीं सुनाता हूं।
तुम जैसे सतपर कायम हो, वैसेही फर्ज चुकाता हूं।
इस तरह हृदय को रद करके. दर में अनुचर बोल उठा।
राजेश्वर! बस इतना ही कहा, फिर कांपा फिर कुछ डोल उठा।
फिर कहा आज यह खबर है, इस वक्त क्षमा कीजिये मुझे।
एकान्त समय में अर्ज करूं, एसी आज्ञा दीजिये मुझे।
बस इतनाही कहसका, विजयवर का मुख चैन ।
आगे फिर वाणिरूकी, भरे नीरसे नैन ।
दशा देखकर दूतकी, चौल उठे श्री राम ।
कह डालो क्या बात है, रुकने का क्या काम ||
तुमतो हो सभा-दुत भाई, नितकी खबरें लाने वाले ।
एकान्त समयके फिकरे हैं, सक्को भ्रम पहुंचाने वाले ।।
यह सत्य है कोई वात आज, ज्वाला होकरके भड़की हैं।
कारण इस समय अचानकही, मेरी भी छाती घड़की हैं।
वामांग फड़कते हैं मेरे, व्याकुलता रहती जाती है ।
होता है विदित मेरे तनसे, आत्मा सी सिंचती जाती है।
फिरभी मैं आशा देता हूं, जो कुछहो प्रगट जरूर करो।
एकान्त समय में राम मुनें, इस भेद-भावको दूर करो।।
दाल मूलगी-
राम कहे भो भाइयो !, कां तुम्ह भारति वन्त हो ॥र।।
कां कम्पो नरुपातज्यूं, भाले विजय मदन्नहो ।।.।। मो॥४०॥
प्रभुजीसं एक वीनती, पण मोते न कहियाय दो ॥ र ॥
सांभलता अमहामणी, के प्रभु ने दुःसहाय हो यो० ॥४१॥
अण कहिपां लागे सही, सामी द्रोदनं पाए । र. ||
दुनदी में पहियो , नही सुन्दरी माप हो । र. ॥ शो ४२
राम कहे अभय मानजो. नीर नये नो दान हो ।। र.॥
तुमने में दी, सही, भावे लही प्रभु मानहो । मो० ॥ १३ ॥
~~~~~~~ ॥ ( ३६०.)। श्री जैन, पद रामायण चतुर्थ खण्ड । क्षेपक राधेश्याम- रोते रोते दूत तब, लगा - सुनाने हाल । क्षीर-सिन्धुमें शेप में, दिया जहर-को डाल ॥ बोला-पुरवासियोंमें, उद्या प्रश्न महान । जिसका श्री महाराज से, हैं सम्बन्ध प्रधान ।। ढाल मूलगी- देव ! सुणों देवी तणा, अति अपवाद प्रसिद्ध हो ॥र.॥ जण जण ने मुख आकरो, कान न जाये दीध हो ॥र.|| शो ४४॥ सु सवादो फल देखीने, कहो कौण न खाय हो ! ॥र. फूल सुगन्धों पेखके, रांध्यां विन न रहाय हो ।शो०॥ ॥४५॥ लेखण ने लिखि देखिये, घटिका जेम घसाय हो ॥ २० ॥ न रहै त्रिया विण भोगव्यां, नरए निरतो न्यायहो ॥०। शो० ४६ मांसाहारी मानवी, न त्यजे पायो मांस हो ॥ २० ॥ लम्पट नारी पामिके, नत्यजे सोबत तास हो । २०||शो ।। ४७ ।। भूखो भोजन पाय के, न रहे तेह लिगारहो ॥ २० ॥ नरहे तेम त्रिय पामके, नरजे विषय विकारहो ॥२०||शो ॥४८॥ अम्बर थी तूटे घणा, पंखी पंखणी पेखिहो ॥ २० ॥ क्यों वचे ओ पंखियो, आगे ऊभी देखि हो ॥२०॥ शो ।। ४९ ॥ सांभली जै छ एहवी, लोको केरी वाचहो ॥ २० ॥ शाण पणे सुविचारता, देखाये पण साच हो ॥ र. ॥ शो० ॥५०॥ लेई गयो .पण एकली, एकाकी ही आयहो ॥ र. ॥ काल- घणो घर तेहनें, रही पण देखाय हो । र. ॥ शो० ॥ ५१ ।। रावण तो विण भोगव्यां, रहियो होसे केम हो ॥ र. ॥ जाण्यो करसू.आपणो, छोतो संधू एमहो ॥ २० ॥ शो० ॥ ५२ ॥ छोती न लागे छे सही, म्होदा भांडा जेम हो ॥ र. ॥ जगमें जश अपयश पण, न विचारे छे प्रेम हो ॥र.||शो० ॥५३।। क्षेपक राधेश्याम- रावण के, कारण माताजी, थोड़े दिन रहीजो लङ्कामें । - .
M श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सएह । (३६१) यस इसी वातको दोष समझ, कुछ लोग पड़े हैं शामें ॥ कहते हैं-धर्म नीति रक्षक जव, रघुकुल मणिकी गद्दी है। तो पर-घर रह आनेवाली, नारी क्यों वरमें रक्खी है ? ॥ रैयत के पहिले वाजिब है, अपने पर राज करे राजा। निर्दोष रहै जिसमें शासन, वैसाही काम करे राजा ॥ शक्षित दलना का यह आन्दोलन, दिन पर दिन बढ़ता जाता है। राजा का इसमें चुप रहना, दलका पल और बहाता हैं। दाल मूलगी- अपजश एतो ए बड़ो, जाम अमे न समाय हो । र.॥ प्रभु ने आवी जणाधीयो. कीजे ज्यही मुहाय हो ॥र.॥ शो|५|| नाहना मुखथी महोटिका, बोले छे ए वोल हो ।। र. ।। सो वातों की एक है, जगमें जश ही अमोल हो।र, शो० ॥५५।। आदि नाथ आदि करी, आज लगे ए वंश हो ।। र॥ कोई न लागी कालिमा, पृथ्वी माहै प्रशंस हो र.॥ शो० ॥५६।। कीर्ति तो आजन्मनी, मतिडारो रघुनाथहो ॥ २० ॥ सीनाहुई नाहुई. बहुलो छ तिय साधहो ॥ र.1 शो० ॥ ५७ ।। वजाहत होई रहा. एतो बात मुणन्त हो ।। र. ।। सीता साथै कालजो. काहे वो एकन्न हो॥र.| शो० ॥५८॥ धीरज आदरी बालीया, महत्तरायं नाम हो । र. ।। भली जणाची वानए, काम जानो काम हो । मो० ॥ ५९॥ नहीं दिकं जरा आपवा, नियातो कोप मानहो । र ।। विसज्यां ने वेग, दुस है ये न समान हो।।। मो० ॥६॥ एकावनी दालमें. सकल मिया शुभ साज हो र. !! कैरागत सीता नणो, शोक्ये कीमा कारहो ! . ॥ शो ॥६१ सोहा पन्ना सोरा- राधि पधार्या रामनी, सुभरा काजे माद । बिहा जावे विहां सांभले, अपनग मुक अपरादशा रावनी लेई गयो, निहां ही पिकाल (३६२) । श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । जाणी सती आणी सही, राम अपूठी बाल ॥ २ ॥ वानी देखी वस्तुनी, सौजन, करे आहार | नारी रूप विलोकवे, ए जगनो व्यवहार ।। ३ ।। लेई गयो झख मारवा, झख मारणो' गमार । तिहांते झख मारी हसे. इहां किस्यो विचार ॥४॥ क्षेपक ढाल तर्ज समझ नर पाणी पतासा-धूलचंदजी सुराणा कृत- समझ नर भावी बल भारी, चेत नर। इस पर जोर चले नहीं किसका सुनजी नर नारी ॥ टेर ॥ फिरता २ धोबीपाड़े, रघुवरजी आवे, २, जिन २ मुख की वातां सुनतां दिलड़ो दुःख पावे । धोवी द्वारे धोवण ऊभी आडो खड़कावे, खोल किवाडी पियुडा म्हारा जिवडा घवरावे । रजक रीस में आकर कहता वात सुणों म्हारी.॥ इस पर० ॥ १॥ रात अंधेरी अर्ध निशी में वाहिर क्यों भटके ॥ २ ॥ कुमति-कुलछणनार-कलेशण मुझ उर में अटके ॥ जा जा जा तूं धोवी बोले घरमें नहीं राखू ॥२॥ राम सरीसो मैं नहीं रण्डी घात सची भाखू । विगरी सीता पाछी लायो सुनी वात खारी । रामजी सुनी वात खारी । इस पर० ॥ २॥ (दोहा) एम सुणीघर आवीया. राम न लाई वार । चरचे चौखा चौकसी, भेज्या नगरी मझार ।। ५॥ ओही कथानो केहवो ओहो जन समुदाय । आवी सुणावे रामने. तुरत फिरियो नहीं वाय ॥ ६॥ जेहतणे तो कारणे, रावणनो क्षय कीध । फिट विधि? तें सीतामणी, कौण अवस्था दीध ॥ ७ ॥ लक्ष्मणजी पण सांभली. लोक मुखे ए वात । जाणे पड्यो आकाशथी, वज्र तणो निर्घात ॥ ८॥ ढाल वावनमी तर्ज रेजीव! जिन धर्म कीजीये- लक्ष्मणजी तो एम वीनवेहो, राघवमूं कर जोडी । .
N श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३६३) कांकीजे तोड़ा तोडी, नहीं सीता मांही खोड़ी। त्योसाच कढाईव्होढी ॥ ल ॥१॥ पाणीमें पत्थर तरे. पश्चिमदि शेदिनकार । उगन्तो सही जाणीए, सीतान लोपे कार ॥ ल० ॥२॥ वैश्वानर शीलोपड़े, अमृत मारणहार । तोए सहीकर जाणजो, सीता न लोपे कार ।। ल०॥३॥ सायरना जल भीतरे, उडे रेणु अपार । तोए सहीकर जाणजो सीता न लोपेकार ॥ ल०॥४॥ पंकज पत्थर ऊपरे, पावे अतिविस्तार तोए सहीकर जाणजो, सीता न लीपे कार ॥ ल० ॥ ५ ॥ मूर्य आथमियां थकी, वर्ते, वासर वार । तोए सहीकर जाणजो, सीता न लोपे कार ।। ल० ॥ ६ ॥ मापतणे मुख ऊपजे, अमिय तणो रम मार । तोए सहोकर जाणजो, सीता न लोपेकार । ल० ॥७॥ साधु नाम ससारमें, जो पामे कलिकार । तोए सही कर जाणजो, सीता न लोपेकार ॥ ल० ॥ ८ ॥ ताल कूट विष खाइयां, आयुतणो अधिकार । तोए सहीकर जाणजो, सीना न लीपेकार !! ल० ॥ ९ ॥ अंधकार रन करे, चन्द्रनारे अंगार। तोए सहीकर जाणजो, सीना न लोपेझार ।। ल० ॥१०॥ निर्दय धर्म लहेषणो. अन्यायी जाधार । तोए सहीकर जाणतो. मीना न लोपेकार ।। ल०॥ ११ ॥ काव्य कला गांधणी, प्रगानी परिदार । तोप सहीकर जागजो, सीता न लोपेकार || ल० ॥ १२ ॥ क्षमा दया विण पांघही, तपही नपा प्राकार । नोए महीवर ज्ञापनो, नीता न लोपेकार ला ॥१३॥ अन्यमनि श्रुत सायलं, अगाहिये विचार ! १ निवासि। PMN4m (३६४ ) श्रीजन पद रामायण चतुर्थ खएड । तोए सहीकर जाणजो, सीता न लोपेकार ॥ ल० ॥१४॥ आंख विहूणो वांछही. देखं सब संसार । तोए सहीकर जाणजो, मीता न लोपेकार ॥ ल० ॥१५॥ चंचल चिन्तनो मानवी, ध्यान धरे सुखकार । तोए सहीकर जाणजो, सीता न लोपेकार ।। ल० ॥१६॥ प्रभु तुम्हने नवि वृजिए, अबलानं अतिरोप । सदोपही नवि छांडिये, एतोछे निर्दोष ॥ ल० ॥ १७ ॥ गम कहे महत्तर२ नगं, लाधी मुझही सुणाय । मैंपणकांने सांभली. हेगरेपण कही आय ॥ ल० ॥ ८॥ वातकाए अपजशतणी. मुझतो सही नजाय । सीता काढू घरथकी, जेमए कहण मिटाय ॥ ल० ॥ १९ ॥ दांतांदेई आंगुली, तवभाखे लघु भ्रात । झूसअछे तुम्ह माहरो, फिरिमत काढो वात॥ ल० ॥ २० ॥ क्षेपक राधेश्याम-रामायणमेंसे- लक्ष्मण बोला किसतरह, हैयहठीक उपाय । जांच लंकामें होचुकी, फिरभी त्यागी जाय ॥ हेदीनानाथ दयाकरिये, छाती छलनी होजातीहै । शब्दों की नहीं लड़ी है, यह कोंटोंकी लडी दिखातीहै ।। निर्दोपिनी नारीदण्डपाए, क्यायह अधर्म का काम नहीं । ऐसेकामों को करकेक्या, रघु कुलहोगा वदनाम नहीं । अबला अद्धांगिनी महासती. वेखता निकाली जाती है । पृथ्वी आकाश देखतेहो, ! कोशलपुर कैसाधाती हैं । धिक्है उसप्रजाकी रक्षापै, जोयं शिरपर चहजाय प्रजा । सन्तोष-पूर्ण शासनपरभी, पूरा सन्तोपन पाये प्रजा ॥ हम तरह तरह की शाक्षीसे, सन्तोपित करदेंगे सबको । मातामें कोई दोपनहीं, यह साबित करदेंगे सबको ।। - राज कर्मचारी=३ जासूस (भेद ) -
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श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड ।
( ३६५)
'दवजाना ऐसे अवसरपर, अपनी भीरूता बताता है।
सच्चा चुपरहे समयपरतो, झूठा सचाहो जाताहै ।।
फिरनहीं हाथ वहआयेगा, जोहाथांसे खोजायेगा।
गृह लक्ष्मीकोयदि त्यागेंगे, तो गृह उजड़हो जायेगा।
रोपधरी लक्ष्मणकहे, हमकोतोह क्रोध ।
चलो प्रजाके सामने. डटकर करे विरोध ॥
प्रभुफिर वोलेधैर्यधर. सोचो छोटे राम ।
नहीं खिलौनाहै कोई, है शासन का काम !!
शासन जवतलक नहींहोगा, अपनी इच्छाओंपर मनपर ।
तपतलक प्रभाव पड़ेगाक्या, पुर परिजन और पराजन पर ।।
रैय्यत पर भेंट चढ़ा देंगा गृह. को गृह लक्ष्मी को तनको ।
पर रैय्यत के होकर खिलाफ, कर सकना राम न शासनको।।
जिस जगह देवों से जांच हुई, आन्दोलन यहां न उठा है।
कपि-निश्वर-दल विश्वास सहित. सीता पर श्रद्धा रखता है ।।
शंकित है अवध इसलिये, में सीता का त्याग न करताहूं।
मन से तो हो सकता ही नहीं, तनसे यह साधन करता हूं।
दाल मूलगी-
पड़ह फिरायो शहरमें, मुंह जोइसे जे केई ।
मुंस करूं श्रीगमन, मैं मार को नई ॥ ल० ॥ २१ ॥
लोक पचन सीता सती, क्यूं छोड़े नरेश ।
उतावल अब छे धणी, पाठे हाथ सेल।ल. ॥ २२ ॥
मृन्ये मुंगी छै धणी, महंगी नहीं लगार ।
सीतानो संसार में, भाख्यो धन्य अवतार ल. ॥ २३ ॥
ओ दिन क्धुं न विचाों ही, जो दिन पयो वियोग।
माणस मुओं थी पणो, करता था अनि भोग ।।१०।२४ ॥
छाती फाटीनी पी पी, आन नो झाड़ लार ।
परसनो ज्यं भाद्रची, मीना मांद राय ॥ १० ॥ २५ ॥
- (३६६ ) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । आज हुई अलखामणी, मुणी लोक ना बोल । मति रे विमासो भाईजी, सीताछे निर्मोल || ल० ॥ २६ ॥ क्षण रूसे तसे क्षणे, भेद न कोई लहाय । पाहिज दृष्टि भासीया, लोक नहीं समझाय || ल० ॥ २७॥ राम कहै ए साचछे, परघर भंजन लोग । आविमिन्यो ए एहवो, दैव तणे संयोग ॥ ल० ॥२८॥ जब लग नयणे न निरखही. कही न कहणी कोई । कही कहीणी घावली पड़े, अधिक असाता होई ॥ ल० ॥२९॥ सजन तो कोपे नहीं, कोपि न भजे विकार । सज्जननो गुण ए वड़ो, वाल्यो वले ते वार ॥ ल० ॥ ३० ॥ सायर सायरता भजे, न हुए गांव-तालाव । सायर शरनो आंतरो, एम भाखे जिनराव || लव ॥ ३१ ॥ एक नरा एकज घरा, एकज पुरी प्रसिद्ध । दूर किया महु जगत में, अपजश पडहो दीध । ल० ॥ ३२ ॥ नारी सीता तुम्ह छांहड़ी, सुख दुःख लागी लार । छोडावी छूटे नहीं, कीधां कोटि प्रकार ॥ ० ॥ ३३ ॥ कहे विभीषण रायजी, सीतानी दऊं साख । राजा रावण आगलही, आपण आपो राख । ल० ॥ ३४॥ उपद्रव अति' आकरा, करी डरावी एह । दिलासा देई ने करी, तेही प्रभु दीधो छेह ॥ ल० ॥ ३५ ॥ जब आई मण्दोदरी, तब कीधी अतिभांड । बोलावी दृती कहे, मूंडे पड़ावी खांड ॥ ल० ॥३६॥ रावण साथ लडो घy , काणी सकलही चोर । फिट फिट कही बतलाचीयो, एकही शील सजोर ल०॥ ३७॥ पूज्य प्रसाद तुम्हारड़े, करी न कोई परवाह । कणावड़ी जे को हुवे, तो भय घरे अगाह ॥ ल० ॥ ३८ ॥ संस करूं एहनीवती, जो भाखो तुम्ह ईश । .
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। सतियों मांही शिरोमणि, सीता विश्वानीश । ल० ॥ ३९ ॥ लक्ष्मणजी भाखी रह्यो, भाखी रह्यो लंकेश । राम न मानी एकही, दिन तुझने आदेश • ल०॥४०॥ सीता थी विरचे नहीं, कोडी प्रकारे राम । बात कहन्तां विरचियो, जब सांभल्यो कुनाम ।। ल० ॥ ४१ ॥ सासु सुसरा सब फिर्या, मात पिताने भ्रात । एह कुनाम यकी फिरी, हनुमन्त केरी मात ।। ल० ॥ ४२ ॥ ए बावनमी दालमें, जेही जैम कीधां कर्म । 'केशराज' तेम भोगवे, ए जिन मतनो मर्म ।। ल० ॥ ४३ ।। दोहा वैराडो रागे- कृतान्त मुख सेनापति, साधे कहे श्रीराम । सीता कादो घरथकी, वेगे करो ए काम || अटवी माहे मेलजो, जिहां न कोई नी आश । आपणही मरि जायसे, पामी ने अतित्रास ।। २।। पगे लागीने रोवतां, करतो अधिक विखास१ । लक्ष्मण भासे राम में , स्वामी सुबो अरदाम ।। ३ ।। घर बाहिर किम काहीये, सीता सरीसी नार । गर्भवती मुविशेष थी, देखो वात विचार ॥ ४॥ मति चोलो मुझ आगले, पोल्यां में नहीं सार । काल रूप प्रभु होई रह्यो. अहि अहि कर्म विकार ॥५॥ रोपन्तो पर आवीयो, कोई न चाले सान। वात रिचार पड़ी धणं, माई बाप ममान ॥ ६ ॥ पफ राधेश्याम रानार में से-- लक्ष्मण रोते रहगया, गगा हदयनी टोल । लगे दालने पर वहां, गली न दालम टोल । आज्ञादे रसुवर उठे, किया न और पिनार । 'सहुलयमले उमदिवस, हुमा नहीं चाहार ।। emarAm wat- AHMAmit (३६८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । अपने मन्दिर के निकट, सर पृथिवीपर टेक । मनही मन चिन्ता लखण, करन लगे अनेक ॥ किसभांति आज्ञा का पालन, कर डाले आज्ञाकारी यह । किसतरह विसर्जन देवीका, मन्दिरसे करे पूजारी यह ।। है एक और आज्ञा-पालन. दूसरी और संकट अतिहै । उगले न बने खाये न वने, वह साप छछुन्दरकी गतिहै ।। हे विधना! साध्वी सीतापर. क्या वज्राघात किया तूने । जोमंगल-आश दिनोंसेथी. उसमें उत्पात कियातूने ॥ गृहीणीकापद जिसनेपाया, वह त्याज्य आजयों अतिशयहै। न्यायाधीश्वर यहन्यायहैतो, न्यायालय अन्यायालयहै । पूछे कोई उसके दिलसे. जिसपर यह आफन आतीहै । पति-सेवाकरती हुई सती, पति द्वारा त्यागी जातीहै । खुबजानताहूं सीता. निपिनी निष्कलंकिनीहै । गुणखानीहै क्षत्राणीहै, विदुषीहैं जनक नन्दनीहैं । इन्ही खयालोंमें लखण. पडे एकदम रोय । मुखसे यह निकला प्रगट, विधना कैसी होय ॥ मैं दोहा मूलगा- गिरिसमेतनी जातनो, दोहलोकरो प्रमाण । आज्ञा प्रभुनी छेकहै, सेनापति रे सुजाण ॥ ७॥ भद्रपणे साभामिनी, ऊठी चालो जाम । शकुन वर्जना अवगुणी, चाली जाये ताम ॥ ८ ॥ क्षेपक राधेश्याम-रायायणमेसे- कौशलके राज-मार्गसेजब, वहरथ जंगलको जाताथा । पीछेहटताथा अन्धकार, आगे प्रकाश दिखलाताथा ।। सचमुच उसदिन का वह तड़का, दुःख सुखसे मिला सवेराथा । कौशलके लिये अंधेराथा, जंगलके लिये उजेराथा ।। आकाशके तारे फीकेथे, चन्द्रमा उदासहो रहाथा । कणनहीं ओसके गिरतेथे, पृथ्वीपर व्योम रो रहाथा ।।
Marva N1 Mory । श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । दूसरी और लालिमालिये, सूरज रुक रुक कर उगताथा । उनमौती जैसी बुदांको, अति शीघ्र हंस सम चुगताथा ।। जवसाफ होगया सवमतला, तवनाची डाली हिलमिल कर । अवलोक प्रकृतिका यह रहस्य, सवकलो इंसपड़ो सिल खिल कर। पुष्योंके केदल वृक्षोंको तज स्थ-पथ परआय विखरतेथे । पक्षीअपने मीठे स्वरसे, माताका स्वागत करतेथे॥ दोहा मूलगा- पवन गतिए प्रेरीदियो, सारथी ए रथसार । गंगासागर ऊतरी, पहूंतो पेलेपार ।। ९ ।। 'सिंहनी नाद' अरण्यथी, आगेन चले सोई। आंखे आंसं नाखतो, सीता सामोजोई ॥ १० ॥ कमोन जाये काईहीं, आवेहै योभराय। फिटफिट जन्म सेवकतणो, काम दिया नटलाय ।। ११ ।। क्षेपक राधेश्याम-रामायणमेसे-- कहताहूंतो खुलनीनजुपां. चुपरहनेमें दम घुटनाहै। वह गाफिल कर्ज दारह में, नोभीतर भीतर लुटनाई !! आज्ञाका वच्छा समीने, माराहै मुझ हतभागीके । यह अत्याचार धर्मकाहै, जो शिरपरहै अनुरागी । बस इतनाही कहसके, नपनों वर्षे नीर । धीरहृदय पलमात्रमें. फिरहोगया अधीर ।। निकले सिंहनी गुफासेज्यों, अपने शिशुका रोदन सुनकर । रथसे उतरी त्यों मीता मान, मारधीका काम-कपन नुनकर ॥ पोलीं-स्वामीकी आजको, पापिहनान भूल को है। दासीकोनो पाशाभी. मामूली-फलकी है । मेरे और तुम्हारेक्या, नारेही जग हिनारहे। अरज वंशी गधा, पालके गौरव रघुपाद ।। वेवा करोगोडगे, जबधि विश्व प्रेमका। तुम्इ धोरन भरकर यह कादो, दामीको दोहे !!
W- मैं (३६८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खरड । अपने मन्दिर के निकट, सर पृथिवीपर टेक । मनही मन चिन्ता लखण, कग्न लगे अनेक ॥ किंसभांति आज्ञा का पालन, कर डाले आज्ञाकारी यह । किसतरह विसर्जन देवीका, मन्दिरसे करे पूजारी यह ।। है एक और आज्ञा-पालन. दूसरी और संकट अतिहै । उगले न वने खाये न वने, वह साप छछुन्दग्की गतिहै ॥ हे विधना! साध्वी सीतापर. क्या वज्राघात किया तूने । जोमंगल-आश दिनोंसेथी. उसमें उत्पात कियातूने ॥ गृहीणीकापद जिसनेपाया, वह त्याज्य आजयों अतिशयहै। न्यायाधीश्वर यहन्यायहैतो, न्यायालय अन्यायालयहै । पूछे कोई उसके दिलसे. जिसपर यह आफत आनीहै । पति-सेवाकरती हुई सती, पति द्वारा त्यागी जातीहै । खुबजानताहूं सीता. निपिनी निष्कलंकिनीहै । गुणखानीहै क्षत्राणीहै, बिदुपोहैं जनक नन्दनीहैं । इन्ही खयालोंमें लखण. पड़े एकदम रोय । मुखसे यह निकला प्रगट, विधना कैसी होय ।। दोहा मूलगा- गिरिसमेतनी जातनो, दोहलोकरो प्रमाण । आज्ञा प्रभुनी छेकहै, सेनापति रे सुजाण ॥ ७ ॥ भद्रपणे साभामिनी, ऊठी चालो जाम । शकुन वर्जना अवगुणी, चाली जाये ताम ॥ ८ ॥ क्षेपक राधेश्याम-रायायणमेंसे- कौशलके राज-मार्गसे जब, वहस्थ जंगलको जाताथा । पीछेहटताथा अन्धकार, आगे प्रकाश दिखलाताथा ।। सचमुच उसदिन का वह तड़का, दुःख सुखसे मिला सवेराथा । कौशलके लिये अंधेराथा, जंगलके लिये उजेराथा ।। आकाशके तारे फीकेथे, चन्द्रमा उदासहो रहाथा । कणनहीं ओसके गिरतेथे, पृथ्वीपर व्योम रो रहाथा ।।
- श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३६६) दूसरी और लालिमालिये, सूरज रुक रुक कर उगताथा । उनमौती जैसी बूदांको, अति शीघ्र हंस सम चुगताथा ।। जवसाफ होगया सबमतला, तननाची डाली हिलमिल कर । अवलोक प्रकृतिका यह रहस्य, सवकलो इंसपड़ी खिल खिल कर। पुष्योंके केदल वृक्षोंको तज रथ-पथ परआय विखरतेथे । पक्षीअपने मीठे स्वरसे, माताका स्वागत करतेथे ।। दोहा मूलगा- पवन गतिए प्रेरीदियो, सारथी ए रथसार । गंगासागर ऊतरी, पहूंतो पेलेपार ।। ९ ।। 'सिंहनी नाद' अरण्यधी, आगेन चले सोई। आंखे आंसं नाखतो, सीता सामो जोई ॥ १० ॥ कह्योन जाये काईहीं, आवेई योमराय । फिटफिट जन्म सेवकतणो, काम दिया नटलाय ।। ११ ।। क्षेपक राधेश्याम-रामायणमेसे- कहताईतो खुलतीनजुबां चुपरहनेमें दम घुटना है । वह गाफिल कर्ज दारहम, जोभीनर भीतर लुटताई ।। आज्ञाका वच्छा स मीने, माराहै मुझ हतभागीके । यह अत्याचार धर्मकाहै, जो शिरपरहे अनुरागीके ।। बस इतनाही कहसके, नयनों वर्षे नीर । धीरहृदय पलमानम. फिरहोगया अधीर ।। निकले सिंहनी गुफाज्यों, अपने शिशुका रोदन सुनकर रथसे उतरी त्यों सीना मान, मारधीका करण-कपन सुनकर ।। पोलीं-स्वामीकी मालाको. प पहनान भूलको है। दासीकोतो वजनाभी. मामली बड़ी-मूलकी ।। मेरे और तुम्हारेक्या, मारेही जग हितका है। सुरज वंशी गजेन्नरहें, रपुलके गौरव रवाई ।। बेवड़ा सेलोगे, जरा सिके अमकीहै। तुम्ह धोरज भरकर यह कहदो, दामीको पानाबादी है।।
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(३२७०)
श्री जैन पद रामायण चतुब खण्ड।
इन शब्दों से जब खिची, सकुचाहट की फांस ।
तवस्वारथी कहनेलगा, लेकर गहरी सांस ॥
हेमाता उमारमाहो तुम, मन-मन्दिरकी प्रतिमाहो तुम |
महिमाहो तुम मुपमाहोतुम, अणिमा होतुम गरिमाहो तुम ॥
लंकामें डंकावजालिया, परअवध वध किए देताहै ।
वस बास अशेक बटिकाका सारे शोकोंका नेताहै ॥
भारत की ऊँची नारीका, तुमनेतो चरित दिखायाहै ।
पर नगर वासियोंने इकको, अत्यन्त बूरा बतलायाहै ॥
वेकहतेहैं परवशतामें, जवप्रण गंवा देती माता ।
तबसच्ची पतिव्रता ओंकी, पदवीको. पालेती माता ।।
यह नहीं समझतीहै, दुनियों आचार्य परीक्षादी तुमने ।
पतिकेद्दित एकही निजप्राणोंकोरख, पतिप्राणकी रक्षाकी तुमने॥
वसः इसो एकही कारणसे, प्रभुने मुझे पढायाहै ।
वेटेके हाथों हीउसकी, माताका त्याग करायाहै ।।
प
दोहा मूलगा-
लेईगयो लंकाधणी, चित्तमैं आणी चाव ।
लोकोंने मुख आकरो, निसुणी एह कहाव ॥ १२ ॥
राज तज्यांछे रामजी, मेला यांही रान।
लक्ष्मण केरी वीनती, राम मुनी नहीं काम ॥ १३ ॥
ए वनश्वपद मुभर्यो, जेहवू जमनं गेह ।
मुझ मूकी केम जीवसे, प्रथम परिक्षण एह ॥ १४ ॥
एम सुणी मूर्छालही, रथथी ताम पडन्त ।
जाणे मूई सेनापति. आपण अधिक रडन्ते ॥१५॥
चेतलहे वन वायरे, फिरी फिरी मूर्च्छन्त ।
सुसती होईनेसती, तस साथे पूछन्त ॥ १६ ॥
दुरेकेट लीसापूरी, किहांअछे प्रभुआप ।
झगई जेछेड़ो ग्रही, कां दियो मुझ सन्ताप ॥ १७ ॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड। वतलायो जायेनहीं, एहि अवसर श्री राम ।। १८ ।। सा सेनापति मूंकहे, मुझ भाख्यो ए एम । तूं कहजेश्री रामने, नकहेतो मुझनेम ॥ १९ ॥ ढाल तेपनमी-तर्ज विलये राणी रुकमणी- सीताजी दे उलम्भडो, सुण ससनेही राम । तुमधी एम केम जियू, तुमे आशा विश्राम ॥ सीता फौजबांधी लडतीनहीं, नाकरती तुम्ह त्रास । शुद्धकरी मुझ काढतां, कीधां कारे विखास ।। सीताजी धरणेपण नविवेमती.नाकरती उपवास । लोकोंने नवि मेलती, कीधां कार विसास ।। सीताजी कृवे पण पड़ती नहीं, नालेती गलपाम । पेटे दूरी न विमारती, कीधां करे विसास ।। सीतार्ज कन्त भणी नवि क्रोध यी, नवि सानी विपनाम शाप न देती स्वामी ने, कीधां कारे विमास ।। मीता होई ने अति आफती. मेली लाकड़ पास । जुहर? पण करनी नहीं, कीधां कारे विसाम ।। सीत पर्वत धी पड़ती नहीं, मरती गेकी न वास । छेहड़ो पकड़ नवि संघड़ती, कीधां कार विसास ॥र्स जाणती थी मुत जन्म से. पहोंचसे सर आश । साज न मिलसे आंगणे, कीधां कार चिनात ॥ सहीर सुहागणी आरसे. पहिराम मु यख तास देसे अमृत आशिया का, की कार विमानसी गुरु गोत्र जमनावर, आगीने उम्दान। विधी नपली ही कर नही, की कार विमान ! नाना शं नेसी परे, रंग रिलाग । एफ न भारी पाथरी, काया और विमाननीता (३७२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । हूं जाणती थी माहरो, पूरो पुण्य प्रकाश । धणी भलो देवर भलो, कीधां कारे विसास सीताजी ॥ १२ ॥ अवरां ने अंधारड़ो माहरे छे उजास । दैव न शक्यो ओ साखही कीधी कारे विसास सीताजी॥१३॥ ऊंची नीची होवतां सांवा लेई निसास । दुःख आणी अति रोवती, कीधां कारे विसास ॥ सीताजी॥१४॥ किहां सीता कुसुमालिका, किहां वननो वास | एती करी न विचारणा, कीधां कारे विसास सीताजी ॥ १५ ॥ गुप्तपणे घर भीतरे, कां न कों शिर नास । भांड करी सब लोकमें, की कारे विसास ।। सीताजी ॥१६॥ देखाये अति चगचगो, रंग कुसुम्ब पतंग । उतरियो ही देखियो, राम तणो तिम रंग ॥सीताजी ॥ १७ ॥ नगरां? केरा वालिया, ओछां केरो नेह । ग्रहर घडी दिन आंतरे, रीतो देखे तेह' सीताजी ॥ १८ ॥ पहिला प्रहरनी छांहडी, घटती जाये जेम । राजचन्द्रनी प्रीतड़ी, 'मुझं तूं होई एम ।। सीताजी ॥ १९ ॥ विन्दु तणां करे सायरु, उत्तम माणस जेह । सायरनो तो विंदुओ, राम कियोरे एह ॥ सीताजी ॥ २० ॥ कोईयक गुणतो चित्त धरी, लेतो मुझने राख । राक्षस राक्षसणी कन्हे, पूछी लेतो साख ।सीताजी ॥२१|| लम्पट जे नरं लालची, तेह तणी सुणी वात । मन चोर्यो तुम मुझभणी, हो लक्ष्मण जीना भ्रात ||सीताजी।।२२।। आपणये अंगी करूं, केम करीजे दूर । १ नगर का मालिक (राजा) और नीच (ोळा) मनुष्य का प्रेम अल्प समय मे ही कम होजाता है । (रीतो-रिक्त =मुकायलो) इस सम्बन्धमे ऐसा कहा है यथा-ड्गर केरा वालिया, ओछा केरानेह । वहता वहे उतावला, छटक दिखावे छेह।।'
नित्य ऊठ। श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सण्ड। (३७३ ) शंकर ज्यू विष आदर्यो, राख्यो रहे हजुर ।। सीताजी ।।२३।। वडवानल सायर तणं, बाले जल सायर उन्हावे नहीं, राखी रह्योतिसु पूठ ।। सीताजी।।२४ ॥ जो प्रभुने सन्देह थो, कारे न लीधो साच । साचवष्ठो संसारमें, साचतणी वडवाच ॥ सीताजी ॥ २५ ॥ भोगवी सुकृत आपणं, चनही मांही वसन्त । प्रभु ए कारज केम करे, जेह थी लोक हसन्त ॥सीताजी ॥२६॥ राजा राच्या ही भला. चिराच्यां नहीं काज । राम न हुओ माहरो, अवरोंने सी लाज ? ॥ सीताजी ॥ २७ ॥ हूंस न राखी माननी. अपमाने नहीं पार । दोई पक्ष पूरो यहो, हो म्हारा भरतार ।। सीताजी ।। २८ ।। खीर नीरनो नेहलो, चन्द्र समुद्रां प्यार। आंपाने ए भोपमा, कियो किसो करतार ।। सीताजी ॥ २९ ॥ पंचही आश्रय सेवियां, सेव्यां पाप ार । शरणा चार नविकर्या, धर्म ही चार प्रकार मीताजी।। ३०॥ त्रि करण शुद्धन राखियां, मद आठे में की। इन्द्रिय पांचे पोखियां, चस्प यतांची न लीप मीनाजी ॥३१॥ विकथा चारे ममाचरी, सेव्यां कुम्पमन सान। कीधा चार कपायजी, पांच पदे विख्यात ॥ मीनाजी ।। ३२ ।। ते फल ए हे भोग, दोष न प्रभु लवलेश । कर्म लिख्यो फल पामिए, ए जिननो उपदेश नीनाजी ॥३३॥ रवि उग्यो देखेमा, घुबह ने अंधकार । धन बरसे जवामीओ. मुक्या बाय गमार मीनाजी ।। ३१॥ मान रसन्ते फेरड़े, पान न नहीं पाए। परज मेह रमन्ननो. कोई न दास दोष । मीनाजी ६ ३५ ॥ गमचन्द्र ना राना मुविया मदु लोका है मन माहे रदरई, पहप कभी योग नीनाजी ५ ३६ ।। ।
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MMM.. -- श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड। (३५) अई अई कर्मगति वांकड़ी, नहींछे केहने मान । तीर्थकर चक्रीसहु, नडियां एही जान ॥ २ ॥ रंककरी राजाकरे, राजाछे पणरंक । करेसही नवि मेटियां, जाये विधिना अंक ।। ३ ।। अघट्यो घाट घड़ेघणूं, घड़ियाने भाजन्त । माथेए तिहूं लोकने, देवसदा गाजन्त ॥ ४ ॥ फरि फरि रोवेधणी, पग पग चलन थकाय । दर्भाकुर कण्टक करी, पांच घणूं विधाय ॥५॥ क्षेपफ-राधेश्याम-रामायणमेसे- विरह षटा छारहीथी, घुमड़ घुमड़ जबघोर । पोलेधा तपइस तरह, विरहिनका मन मोर ।। तुम्हे तुम्हारी प्रजाको, दोपनहीं सुखधाम । दो सौतोकाहो रहा, था भीपण संग्राम ।। गृह लक्ष्मी ने स्वामी के संग, चौदह वरसों वनवास किया । उस राजलक्ष्मीके मदका, अपमान कराया इस किया ।। अपडाह निकाला उमने, जोवनमें मुझे पदापाहै। सम्पूर्ण रूपसे रानीवनः जीवन-धनको भरमायाहै ।। दुनियों में मुझसी दुःसी. औरन दूजीकोय । जिसने सारी आयुही, संकटमेंदी सोय ॥ कपारीसे व्याही करने में, किसदर पिताको त्रासहुआ । फिरज्योंही ससुरालय आयी, त्याही पनिको बनवान हुआ। गनीहोने जोगिनीहुई, पायाझोपड़ा महल-बदले । निमपरभी नहीं विधानाके, कालेकाले बदल बदले ।। लक्ष्मपका सहायको गॉमेना, रणको कठिन पचन कदकर । सुदभी स्वामीका गिरहनहा. उगलेका नगीमें रहकर ।। मेरेही कारण प्राजनाथ, गमगीन रहे कितनेही दिन ! मेरही सानिर मनकि, दरियाउरहे फिननेही दिन ।
(३७४) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएर । खल खंचने हूं परिहरी, कोन विचारी मर्म । मिथ्यात्वी उपदेश थी, मतिरे तजो जिनधर्म । सीताजी ॥३७॥ एम कही मूर्छा पड़ी, करी शीतल उपचार । करी सचेतन सुन्दरी, वचन वदे सुविचार || सीताजी ॥ ३८॥ राम विनाहूं दुःख लहूं, तिमही मुझ विण स्वाम । लेसे आरती आकरी, विविध परे दुःख पाम ।। सीताजी ॥ ३९ ॥ हूंतो हुई नाहुई, मुझ जैसी बहुलीदास । यत्नकरीजो आपणूं, प्रभु एमुझ अरदास ॥ सीताजी ॥ ४० ॥ जेहना घरमें जोवड़ो, लीजे ते प्रतिपाल । नाभि विना आराकरी. कहन नशके चाल ॥ मीताजी ॥ ४ ॥ सूर्यवंशे दीवड़ो, तूं शशिहर तूं भाण ।, तुं सुरतरु तूं जलहरूं, महिमा मेरु समान || सीताजी ॥ ४२ । तुं प्रभु सायर सारिसो, गुणे भरियो भरपूर । धणी पणे मैं पामीयो, पूर्व पुण्य अंकूर ॥, सीताजी ॥ ४३ ॥ कायम रहे तुझ साहिबी, कायम तू राजान । सयल कुटुम्बोंसे होईजो, प्रभु. तुम्हने कल्याण ॥ सीताजी॥४४ संभलावे मुझ मुखतणा, स्वामीने ए-बोल । चोल सहुने सुहामपा. आछा अनेरे अमोल ॥ सीताजी ॥४५॥ लक्ष्मणसं ए माहरी, केजे तूं आशीश । सेवाकरजो प्रभुतणी, प्रभु थारे जगदीश ।। सीताजी ॥ ४६ पन्थे शिव होजोतुने, रेवत्स! विश्वावीश । विदाय कियो सेनापति, जाई मिल्यो निज ईश ॥ सीनाजी ॥४७॥ त्रेपन मीए दालमें, सीतारां प्रभु कोप । 'केशराज सोने वधे, ताव्यांथी अति ओप ॥ सीताजी ४८ । (दोहा जयतश्री रागे) सत्यवती सांचीसती, फरे घणुं वनमाहे । यूथ भ्रष्ट जिम हरणली, आपे निन्दे प्राहे ॥१॥ । 4 - श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। ( ३७७) ~~-~- कलेश अशेश ढल्यो, सीता भाग्य अपार ||सु० ॥१॥ कवण अछो तुम्ह आप, आपणो नाम प्रकाशो। एह अरण्ये किसी तुम्हे, ए वडो तमासो ॥ निर्दयी थी निर्दय घणो. जेणे कीधो ए काम ! चौर अन्यायी आकरोहो, तेह त" ए काम ।। सु० ॥ २॥ आशका सब छोडी. जोडिने कर दोई। पूछू हूं तुझ पास, अधिक हूं अर्थी होई ।। तुझ पीडाए पीडयो, दया वसी दिल मांही। वीतक वीत्यूजे अछेहो, ते तुम्ह भाखा प्राही ॥ सु० ॥३॥ सुमति नाम प्रधान. ताम तस पासे आयी। कोमल वाणी प्रकाशी, वात नस कहे मुहावी ।। 'पुण्डरीक' पुग्नो धणी, गजवाहन' पून । 'बन्धुदेवी' जाइयो हो, रासण पर घर सूत ॥ सु० ४ ॥ वनजंघ जी राय, परम ए श्रावक कहियो। देव गुरु धर्म तत्वतणो, जेणे निक्षय लहियो॥ महोदर परनारीनो, विरुध रहन्न अपार । परदुःरा कापण छ घणोहो. जगमाही जरामार मु० ॥५॥ हाथी लेबा काज, भाजेही अटगी आयो। हाथी चादिया हाथ, नाम मन घरही चलायो।। गेज मुणीने ताठरू आयो इहां नरेश । भाई भणी अन भाचिये हो. बात विशेष अशेष ।। नु० ॥६॥ मुनि श्री रूपचन्दजी न रोपात न मेरे पापनेरे मुझको बालपरो पारणाया। कहदे मांडनेरे फ नाम रिती जिगरी वान ।।टेर । रूप अनूपा माल रािने. वडापगे की नाई। दास दाई इस घोर जंगलमें, कहो किन कारन आई । कददे ।।। नया दानव देव विद्याधर, अपहर नुहो विठाई ।।
( ३७६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । इतनेपरभी उसविधनाने, सुखसे नमुझे बिठलायाहै। इन्तहा कष्टकी यहकरदी. जोअब वनमें भिजवायाहै ।। जिसने अपने जीवन भरमें, आरामन देखा भाला हो । माङ्गलिक समय मेंस्वामीने, महलोंसे जिसे निकालाहो । ऐसी दुखियारी नारीको, हेवृक्षो कहींभी देखाहै । इतने कष्टों की मारीको, हे जीवो? कहींभी देखा है। सीता रह कसती नहीं, यों वियोग आधीन । नीर बिना संसार में, कहीं रही है 'मीन ।। इन्हीं विचारों में हुई, जब अत्यन्त अधीर । मूर्छाखा चेतन हुई, जबः चलता शीत समीर ।। 4 दोहा मूलगा- भाग्यवन्त माणस जिके, तेतो नवि सीदाय । दीठी सेना सामठी, आगे ऊभी आय ॥ ६ ॥ जीवत ने मरवातणू, भय नवि आणे कोय । नमोकार नाध्यान में, लोगां दीठी सोय ॥ ७ ॥ लोक तदाचित्त चिन्तवे. ए कोई वनदेवी । कारण कोई विचारवे, प्रगट-थई ततखेवी ॥ ८॥ रोज सुणी सीता तणं, स्वरनो जानन हार । नायक तो सेनातण, चित्त तूं करे विचार ॥९॥ गर्भवती साची सती, सीदाती अतिजाण । चाली आयो पाखती, सती तदा भय आण ॥१०॥ अलंकार सहु अंगना ऊतारी ने ताम । राजा आगे मेलिया. राखेवा निज माम ॥११॥ बहिन !-न विये मुझथकी, राजा भाखे रंग । अलंकार एताहरा, अखे रहो तुझ अंग ॥ १२ ॥ ढाल चौपनमी- तर्ज-नेमन माने कह्यो- सू भूपति आय मिलियो, वज्र सुजघ उदार ।
M श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। ( ३७७) कलेश अशेश ढल्यो, सीता भाग्य अपार ॥सु० ॥१॥ कवण अछो तुम्ह आप, आपणो नाम प्रकाशो। एह अरण्ये किसी तुम्हे, ए वडो तमासो ॥ निर्दयी थी निर्दय घणो. जेणे कीधो ए काम । चौर अन्यायी आकरोहो, तेह तणू ए काम ।। मु० ॥ २॥ आशका सब छोडी. जोडिने कर दोई। पूर्वी हूं तुझ पास, अधिक हूं अर्थी होई ॥ तुझ पीडाए पीडयो, दया वसी दिल माही । चीतक चीत्यूजे अछेहो, ते तुम्ह भासा प्राही ॥ सु० ॥३॥ सुमति नाम प्रधान. ताम तस पासे आवी । कोमल वाणी प्रकाशी, वात तस कहे सुहावी ।। 'पुण्डरीक' पुरनो धणी, 'गजवाहन' पूत । 'बन्धुदेवी' जाइयो हो, राखण पर घर मून ॥ मु० ४ ॥ वजय जी राय, परम ए श्रावक कहियो । देव गुरु धर्म तत्वतणो, जेणे निधय लहियो ।। महोदर परनारीनो, विरुध यहन्त अपार । परदुः कापण छे घणोहो. जगमाही जशमार ।।मु० ॥५॥ हाथी लेवा कान, आजेही अटवी आयो। हाथी चहिया वाय, ताम मन घरही चलायो । गेज सुणीने ताहरू आरो यहां नरेश । माई भी अन भाषिये हो. पान विशेष अशेष ।मु० ॥६॥ मुनि भोम्पयन्दनी शाप मेरे गनेरे मुझको कहदे मांडनेरे क नामें पिनी जिवरी रान ॥ देर । रूप अनुपम नपल सिराजे. बटायगे की बाई । दुःख दाई इस पोर जंगलमें, कहो किन काग्न आई । मदद।।१ अपरा दानर देर हिवाधर पदर तुझे रिटाई।।
H ( ३७६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । इतनेपरभो उसविधनाने, सुखसे नमुझे बिठलायाहै। इन्तहा कष्टकी यहकरदी. जोअव वनमें भिजवायाहै ।। जिसने अपने जीवन भरमें, आरामन देखा भाला हो । माङ्गलिक समय मेंस्वामीने, महलोंसे जिसे निकालाहो ॥ ऐसी दुखियारी नारीको, हेवृक्षोकहींभी देखाहै । इतने कष्टों की मारीको, हे जीवो? कहींभी देखा है। सीता रह कसती नहीं, यो वियोगं आधीन। नीर बिना संसार में, कहीं रही है 'मीन । इन्हीं विचारों में हुई, जब अत्यन्त अधीर । मूर्छाखा चेतन हुई, जबः चलता शीत समीर ।। दोहा मूलगा- भाग्यवन्त माणस जिके, तेतो नवि सीदाय । दीठी सेना सामठी, आगे ऊभी आय ॥ ६ ॥ जीवत ने मरवातणं, भय नवि आणे कोय । नमोकार नाध्यान में, लोगां दीठी सोय ॥ लोक तदाचित्त चिन्तवे. ए कोई वनदेवी । कारण कोई विचारवे, प्रगट-थई ततखेवी ॥ ८॥ रोज सुणी सीता तणं, स्वरनो जानन हार । नायक तो सेनातण, चित्त तूं करे विचार ॥९॥ गर्भवती साची सती, सीदाती अतिजाण । चाली आयो पाखती, सती तदा भय आण ॥१०॥ अलंकार महु अंगना ऊतारी ने ताम । राजा आगे मेलिया. राखेवा निज माम ॥११॥ बहिन !-न बिये मुझथकी, राजा भाखे रंग । अलंकार एताहरा, अखे रहो तुझ अंग ॥ १२॥ ढाल चौपनमी- तर्ज-नेमन माने कह्यो- सू भूपति आय मिलियो, वज्र सुजंघ उदार । ७.1. - श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३७६) धर्म ध्याने चित्त वासियो, आरती परही दाल । सुखसाना मांने घणीहो, पाछेही मन बाली ।। सु० ॥ १२ ॥ अवसेना पति आवी, रामने चरणे लागी । वातविशेष विचार, कहेछेने अनु रागी । 'सिंहनिनाद अरण्यमें, प्रभुमै मूकी देवी । वानमृणी स्थथी पडोहो, मूर्छाणी ननखेवी ।। सु० ॥ १३ ॥ गनवाये लही चेतन अने, फिरफिर मूळ आवे । शुद्धनरही लगार नाम. गाढी दुःख पावे ।। धीरज अति आलम्नीने, माताजी कही एह । मभलावी पण स्वामीने, वानमलीछे तेह ।। मु०॥ १४ ॥ उलम्मो नोणिए. मुणाची लीधो पहेला । विगत विगतमं वात, वातावो भाग्वी कहेला ।। जेमजेम निमुणे रामजी, सीता मुखना चयन । उपजनो जाये गणूहो, तैमरचित्तमें चयन ।। मु० ॥ १५॥ सदा गम तुम्ह काम, फियो सबलोही विमासी। कदहीन कीधो काम, जेहथी होवे हॉमी ।। भाग्य दोपतो महायर. ए अति उपज्यो मेष । सोनेन लागे श्यामताहो. स्वामी मदा निदीप ।। सु० ॥१६॥ लोगोनी मुणी बात, नाथजी तमें हमें छोड़ी। बालपणा की प्रीन. तृणम नाणी बोडी ।। मिथ्या दृष्टिनी गुणी, बानवनी विपरीत । छोडामनि जिनधर्म नहीं, गम्पोतो हुन्नन ॥ सु० ॥ १७ ॥ एम गुणो मुच्छां पच्या. नाग नेवार । लक्ष्मण कगै उपचार घणा, मृन्याही निवार ।। उदाई ऊमाफिया. वेदनती उनमान । किलांगई मीना ननीयो गान प्रान नमान ॥नु.॥१८॥ Pas तोही दुश्मन लोकमें हो, नारी नवि लाजन्त ॥ सु० ॥१०॥ (३७८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । एकाकी अबला को वनमें, नर कोई तजी अन्यायी ॥कहदे ॥२॥ हं मैं मांडनेरे क मां में वीती जितरी वान ।। टेर । दशरथ नृपनी पुत्र वधु में, रामचन्द्र घर नारी । भामण्डल की भगिनी हूं मैं, जनक विदेह दुलारी॥ कहूं मैं ॥३॥ ढाल मूलगी- एम सुणतां सचिव, राय परतीत सू राखी । धुरथी छेह लगे मांडी, वाततो सबली भाखी । रोवन्ती राखी वही, मंत्रीने भूपाल । पीली माटी पाणिये हो, गिवली हुवे ततकाल ||सु० ॥७il निष्कपट थी अति प्रगट पणे, भाखे तवते भूप । आज थकी तू वेहनी, बन्धु अछं अनूप ।। एक धर्म जेही करे, तेही सगो संसार । सगपण तोछे कारमोहो, स्वामी तजी क्यू नार ॥ सु० १८|| भामण्डल जेहवो जाणी, राज ! मुझ घरे पधारो । होई खिजमतदार. करूंछ सफल जन्मारो || अवधारो अरदास, ए सोचतणूं नहीं काम । वारम्बार विशेष थीहो, रायभणे अभिराम || सु० ९॥ पीयरिए धसि जायए, सासरे जो दुःखपावे । एहवात समरथ, त्रियाने कांईयन आवे ॥ सूधी वाटां चालतां, जोकांटा भाजन्त ॥ सु० ॥१०॥ लोक वचनथी राम, कामए कियो देखो । उतरियां थीरोप, तुम्ह सरिसो पेखो । गवेपण करसेवणी, सुखनहीं लहे लगार । चक्रवाक जिम एकलोहो, आणे आरति अपार सु०॥ ११ ॥ शिविकाए साडी, ताम सीताघर आणी । आधी राय वियोगे, तिहां रहे राघव-राणी ॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ वएड । ( ३७६ ) धर्म ध्याने चित्त वासियो, आरती परही हाल । सुखसाता माने घणीहो, पाछेही मन वाली ॥ सु० ॥ १२ ॥ अवसेना पति आवी, रामने चरणे लागी । वातविशेष विचार, कहेछेने अनु रागी।। 'सिंहनिनाद अरण्यमें, प्रभुमै मूकी देवी । वातसुणी स्थथी पड़ोहो, मूणिी ततखेवी ।। सु० ॥ १३ ॥ चनवाये लही चेतन अने, फिरफिर मूर्छा आवे । शुद्धनरही लगार ताम. गाढी दुःख पावे ।। धीरज अति आलम्बीने, मानाजी कही एह । सभलावी पण स्वामीने, वानभलीछे तेह ।। सु० ॥ १४ ॥ उलम्मो नोतेणिए, मुणावी लीधो पहेला। विगत विगतम वात, वातावी भाग्ची चहला ।। जेमजेम निमुणे रामजी, मीता मुसना वयन । उपजतो जाये गगृहो. तेमरनित्तमें चयन ॥ मु०॥ १५ ॥ मदा गम तुम्ह काम, फियो मचलोही विमामी । कदहीन कीधो काम, जेहधी होवे हाँसी ॥ भाग्य दोपतो महायरे, ए अति उपज्यो गेष । मोनेन लागे झ्यामताहो. स्वामी सदा निदोष ।। १० ।।१६।। लोकोनी मुणी बात, नाथजी नमें हमें छोड़ी। बालपणा की श्रीन, तूणनेम नाणी गोडी ॥ मिया हिनी सुपो. चानघणी विपरीत । छोडामनि नियम नहो, रायोको टरीत | गु०॥१७॥ पम गुणी मुहां पा. पुनाय नेवार । लक्ष्मण गरी उपचार पणा. मृगामी निरार | उठाई उ.नाशिमा, वेदनको समान ! किलोग नाता मनोहो. प्राममान में 70 १. ६ मे । ( ३७८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थं खण्ड । एकाकी अबला को वनमें, नर कोई तजी अन्यायी ॥कहदे ।।२।। कहूं मैं मांडनेरे क मां में बीती जितरी वात ।। टेर ।। दशरथ नृपनी पुत्र वधु में, रामचन्द्र घर नारी । भामण्डल की भगिनी हूं मैं, जनक विदेह दुलारी ॥ कहूंमैं ॥३॥ ढाल मूलगी-- एम सुणतां सचिव, राय परतीत सू राखी । धुरथी छह लगे मांडी, वाततो सघली भाखी ॥ रोवन्ती राखी वही, मंत्रीने भूपाल | पीली माटी पाणिये हो, गिवली हुवे ततकाल ||सु० ||७| निष्कपट थी अति प्रगट पणे, भाखे तबते भूप आज थकी तू वेहनी, बन्धु अछं अनुप ।। एक धर्म जेही करे, तेही सगो संसार । सगपण तोछे कारमोहो, स्वामी तजी क्यू नार ॥ सु० ॥८॥ भामण्डल जेहयो जाणी, राज ! मुझ घरे पधारो । होई खिजमतदार. करूंछू सफल जन्मारो ॥ अवधारो अरदास, ए सोचतणू नहीं काम । वारम्बार विशेष थीहो, रायभणे अभिराम ॥ सु० ९॥ पीयरिए धसि जायए, सासरे जो दुःखपावे । एहवात समरथ, त्रियाने कांईयन आवे ॥ सूधी वाटां चालतां, जोकांटा भाजन्त ॥ सु० ॥ १० ॥ तोही दुश्मन लोकमें हो, नारी नवि लाजन्त ॥ सु० ॥ १० ॥ लोक वचनथी राम, कामए कियो देखो । उतरियां थीरोप, तुम्ह सरिसो पेखो । गवेपण करसेवणी, सुखनहीं लहे लगार । चक्रवाक जिम एकलोहो, आणे आरति अपार सु०॥ ११ ॥ शिविकाए वेसाड़ो, ताम सीताघर आणी । आवी राय वियोगे, तिहां रहे राघव-राणी ॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सण्ड ।
( ३७६ )
धर्म ध्याने चित्त वासियो, आरती परही हाल।
सुखसाता मांने घणीहो, पाछेही मन वाली ॥ सु० ॥ १२ ॥
अवसेना पति आवी, रामने चरणे लागी ।
वातविशेष विचार, कहेछेते अनु रागी ।
'सिंहनिनाद अरण्यमें, प्रभुमै मूकी देवी ।
वानसणी स्थधी पडीहो. मूर्छाणी ननखेनी ।। सु० ।। १३ ।।
वनवाये लही चेतन अने, फिरफिर मूछा आवे ।
शुद्धनरही लगार नाम, गाही दुःस पावे ।।
धीरज अति आलम्बीने, माताजी कही एह ।
सभलावी पण स्वामीने, चातभलीछे तेह ॥ सु०॥ १४ ॥
उलम्भो तोतेणिए, सुणावी लीधो पहेला ।
विगत विगतमं वात, वातानी भाग्वी पहेलां ॥
जेमजेम निमुणे रामजी, मीता मुसना वयन ।
उपजतो जाये गणहो, तैमरनित्तमें चयन ।। मु० ।। १५ ।।
सदा राम तुम्ह काम, कियो सघलोही विमासी ।
कददीन कीधो काम, जेहथी हो हॉसी ॥
भाग्य दोपनो महायर. ए अनि उपज्यो रोप।
सोनेन लागे श्यामताहो. स्वामी सदा निदोग । मु० ॥१६॥
लोकोनी भुणी बात. नाथजी तमें हमें छोटी ।
बालपणा की प्रीत. तणनेम नाणी नोदी॥
मिथ्या दृहिनी मुणी, वानपणी विपरीत ।
लोडामनि बिनधा नहो, गन्यानो गुन्दरीन । मु. १।१७।।
पम गुणो मृन्यं पश्या, रघुनाथ नेवार ।
नमण करी उपचार पणा, मगही निमार ।।
उठाई माफिया. वेदनली जनमान ।
किदांगई मीता मनीलो, प्यारी प्राण ममान गु० ॥ १८ ॥
(३८०) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । लखण! भ्रततुम सखातुम, प्रियतुम, तुमहृदयेश । आजहृदय की कहेगा तुमसे यह अवधेश ।। थेमिलेहुए दोफूल. एक डालीके ऊपर खिलेहुए । जालिम हाथोंसे दोनोंहीटूटे, और दममें जुदेहुए ।। एकही वायुके झोंकेने, करडाले तितर-विनर दोनों। रस्ता निहारतेहैं अपना, होकरके इधर-उधर दोनों। ढाल मुलगी- लोकवचन विपव्याप, हुवोथो नृपने भारी । सीता वचन गारुडमंत्रे, लीधो उतारी ॥ घर आयानृप आपणे, तामकरे सम्भाल । महियलमे म्होटी सतीहो, वादिही दिएजन आल ।। सु० ॥१९॥ लोक वोक जगमांही, एतो न्याय कहाणा । परघर भंजन लोक, ए आज जणाणा ।। रूडोदेखो नाशके. भुंडेरावे१ भोर२ । भोरोंनो वाह्यो३ बहुहो, कीधो काम कठोर ॥ सु० ॥ २० ॥ बहेरी४ विकथा वात, पुरुष पुर देखण आंधो । मुंगी कहेण कुयोल, कहे पणन लिये सांधी ॥ परघर फरवा पांगुली, लूली परधन लेण । एह गुणोंनो धारणीहो. कहेणी कही कहो केण ॥ सु० ॥२१॥ मतो देण मंत्रीशसं, काम समाग्ण दासी । प्रीतवती प्रिय साथ, महासुख भोग विलासी । पुण्यवती प्रगटी खरी, क्षमावती संमार । होईनहीं होसी नहींहो, सोता सरिसी नार ।। सु० ॥ २२ ॥ १ खुशहोना= २ मूर्ख =३ ठगायाहुवा= ४- २० -पा० २१मी गाथा ओंका अर्थ वधिर केशिर वात श्रवण करनेका, आंधीकेशिर पुरुप देख नेका, गूगीके शिर फुवचन कहनेका, पांगली शिरपर-धर फिरनेका, और सीके शिरपर-धन हरण करनेका कथनावे, वैसा सीता के शिर यह न (भंठायाल.) आया हुवाहै।
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। ( ३८१) चन्द्र कमल शुरु भुंग, नागणी अठाम शशिहर । विमट्ठ पंकज-नाली, कलस जख केसरी वर ।। कुरमंत्र बकने फले, कोयल अने मराल । ए शब्दो केरी उपमाहो, सीताने सुविशाल ।। सु० ॥ २३ ॥ देवी कहीते दूरी, इद्रनी नारी अलगी। अमरी नहीं आसनी, आपणे कामे वलगी। देवीशची अमरी थकी, सीता रूप रसाल । दैवे दीधीथी खरीहो. मैंन रखाणो बाल ।। सु० ॥ २४ ॥ मुनिश्री रूपचन्द्र कृत क्षेपक-तर्ज नवीनरसोया- अनुचित करडाला यह कार्य, सीयाको भेनदिवी वनमें ॥ टेर ॥ जद सीयको लंकसे साथ करीथी, तदवहां मुरगण माप भरीधी। होगया वहां विश्वास पूर्णतया, दोपनहीं इसमें ।। अनु १॥ सौनोंने मिल कार्य कियायह, जिमसे जशकुम्भ फूट गया वह । कैसे स्कखू गृहवीच वातया, फैली पुग्जनमें || अनु ॥२॥ लक्ष्मण लहु आफर समझाया. कथन उन्होंका दायन आया । कर नादानी प्रति पुरानी, नोड़ दिवी छिनमें ।। अनु ॥ ३॥ कठिन-कटअब कैसे सहेगी, किन तिरमी फिनभूमी रहेगी। खुद मरजामो वनचर पासी, मोचत रघु मनमें । अनु ।। ४ ।। बाल मूलगी- लक्ष्मण भासे ताम, रामजी अवधारो। माणसनो एमहज, वात विगट्योही रिचागे॥ मरेन हजही वाहगे, तं रूसरिये काय । जेहन मानी वोनतीहो, कोईवे पस्तार ।मु० ॥ २५ ॥ गई निकायो वाय, स्वामी अपहीसम्भालो। पछी परस्पांमेह, कहिये मुघरे वरमालो। सप्रभारे मामीनी, जीपनी अगाई। हीसे सहो एम जामनोदो, पाटेको भागे । नु० ॥ २६ ॥ जानोसमी तुम्ह आप, करीने पना दिलामा !
(३८०) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। Nnnn nam लखण! भ्रततुम सखातुम, प्रियतुम, तुमहृदयेश । आजहृदय की कहेगा तुमसे यह अवधेश ।। थेमिलेहुए दोफूल. एक डालीके ऊपर खिलहुए । जालिम हाथोंसे दोनोंहीटूटे, और दममें जुदेहुए । एकही वायुके झोंकेने, करडाले तितर-विनर दोनों। रस्ता निहारतेहैं अपना, होकरके इधर-उधर दोनों। ढाल मुलगी- लोकवचन विपव्याप, हुवोथो नृपने भारी | सीता वचन गारुडमंत्रे, लीधो उतारी ॥ घर आयानृप आपणे, तामकरे सम्भाल । महियलमें म्होटी सतीहो, वादिही दिएजन आल ।। सु० ॥ १९॥ लोक वोक जगमांही, एतो न्याय कहाणा । परघर भंजन लोक, ए आज जणाणा ॥ रूड़ोदेखो नाशके. भुंडेराले१ - भोर२ । भोरोंनो वाह्यो३ बहुहो, कीधो काम कठोर ॥ सु० ॥ २० ॥ बहेरी४ विकथा वात, पुरुप पुर देखण आंधो । मूंगी कहेण कुबोल, कहे पणन लिये सांधी ॥ परघर फरवा पांगुली, लूली परधन लेण । एह गुणोंनो धारणीहो, कहेणी कही कहो केण ।। सु० ॥२१॥ मतो देण मंत्रीशमं, काम समाग्ण दासी । प्रीतवती प्रिय साथ, महासुख भोग विलासी ॥ पुण्यवती प्रगटी खरी, क्षमावती संमार । होईनहीं होसी नहींहो, सोता सरिसी नार ।। सु० ॥ २२ ॥ १ खुशहोना=२ मुर्ख =३ ठगायाहुवा-४-२० -पा० २१मी गाथा ओंका अर्थ वधिर केशिर वात श्रवण करनेका, आंधीकेशिर पुरुष देख नेका, गूगीके शिर फुवचन कहनेका, पांगली शिरपर-धर फिरनेका, और लुलीके शिरपर-धन हरण करनेका कथनावे, वैसा सीता के शिर यह कथन ( झठायाल ) पाया हुवाहै।
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । (३८३ ) सीताही भलू पावसेहो, नहीं अवरोंसूं लाग।। सु० ॥ ३३ ॥ दोहा आसावरी रागे- हाथी तो जग घणा, पण ऐरावति एक । उच्चेश्रव पण एकछे, अश्व अछेरे अनेक ॥ १ ॥ गंगोदक पण एकछे, पाणीनो नहीं पार । 'क्षीरोदधि' पण एकछे, 'अम्बुधि'' अवर अपार ।।२।। 'परमेष्ठी२ पण एकछे, मंत्र वणा गुणवन्त । सुदर्शन३ पण एकछे, अवर गिरि नहीं अन्न ॥ ३॥ दाता सुरतरु४ एकछे, अवर घणा दे दान । 'दशारणभद्र' पण एकछे, करे घणा अभिमान ||४|| 'शालिभद्र' पण एकछे, घणा भोगवे भोग । 'धूलिभद्र' पण एकछे, घणा ग्रहे जग योग ।। ५॥ तेम सीता पण एकछे, नारी नामछे लाय। आंपलिए पहुंचे नहीं, आंबानी अभिलाप ॥ ६ ॥ मास दिवस पूरा हुआ, शुभवेला शुभवार । सीताए सुत जन्मीया, युगल पणे सुपकार ॥ ७ ॥ डाल पचपनमी- तर्ज बाय गोदहिया गुरागारी। सीता स्वामीनी मुन जाया, नेनो युगल पणे मुग्यदाया । तर आनन्द अधिकापाया. तर गौरड़िए गुणगाया !! नब गुहिर निमाण गड़ाया ।। मीता ॥ १ ॥ ओलप अधिक मंडागा, बंधीवान हुडाया । मुन जायां जेम कीजिये. ही गय कगया ।। मीना ॥ २ ॥ पारममो दिन आपा, नन्दन नाम पाया । 'अनंगलाण हामणो, मदनाम वापा । मोना ॥ ३॥ पाच धारकरी पालीपा. भामनियां मनभाया। हाथो हार मनाने अमर चरीने नाया। माता ॥४॥ १ सनः-२ गगुरसरमा मता 3D Mu . -- (३८२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । सीता आणोगेह हमारी, सुणी अरदासा ।। अवर गयां आवेनहीं, अवरोंनो नहीं काज । त्रिया-हितेतो दौड़ियेहो, नहीं ए वातां लाज ।। सु० ॥२७॥ वयसीने विमाने स्वामी, चमुपति? साथे लोधो । खेचरने परिवारे चाल्यो, आलस नवि कीधा ।। 'सिंह निनाद-अरण्यमें, आपगया ततकाल । अतुरता मिलवात णीहो, जोजो जगनी ढाल ।। सु०॥२८॥ ऊमां आवीने तिहां, जिहां मूकीथी सीता ।। नयणे नावी नारी, ठामते दीठा रीता२ ।। थल जल तरु गिरि सोधीया, शुद्धन लागी कोई । कर पटकीने बोलियाहो, पांचांसू प्रभु सोई ॥ सु० ॥ २९॥ कपरे विलुरी वाघ, वेगकरी सिंह खाधी । कयेरे गिलो अजगरे, मूई भारण्डे लाधी ।। लेईगयो परद्वीपमें, आपां अलगी वात । आंसु ढाली वाहुड्याहो, राघवजी विललात ॥ सु० ॥ ३० ॥ फिरीआया पुरमांही, स्वामी अतिकम्ता शोगो । माहारूं घर घाल्यू हों, अहो पुरवासो लोगो? ॥ किस्यू करूं तुम साथजी, गेमघणी आवन्त । अबदोई कांईन गिमुंहो, गईतो नवि पाकन्त ॥ सु० ॥३१॥ प्रेत कामश्रीगम ताम, सीतानां करावे । शून्य रूपसहु देखी, हैयो अति आय भरावे ॥ हैयेतो दृष्टहीतो, आगे ऊभी आय । वचने पण श्री रामनेहो, सीता रहीरे सुहाय ॥ सु०॥३२॥ ए चौपनमीं ढाल, रामजी रहे उदासी । शोक्यों→ नसर्पू काम, फोकहे मांडी फांसी ॥ 'केशराज सीतातणू. जश अरु सौभाग्य । १ सेनापति (कप्तान) २रित्त-खाली श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३८३ ) सीताही भलं पावसेहो. नहीं अवरों लाग सु० ॥ ३३ ॥ दोहा श्रासावरी रागे- हाथी तो जगः घणा, पण ऐरावति एक । उच्चेश्रच पण एकछे, अश्व अछेरे अनेक ॥ १॥ गंगोदक पण एकछे, पाणीनो नहीं पार । 'क्षीरोदधि' पण एकछे, 'अम्बुधि' अवर अपार ।।२।। 'परमेष्ठी'२ पण एकछे, मंत्र वणा गुणवन्त । सुदर्शन३ पण एकछे, अवर गिरि नहीं अन्न ।। ३ ।। दाता सुतिरु४ एकछे, अवर घणा दे दान । 'दशारणभद्र' पण एकछे, करे घणा अभिमान ||४|| 'शालिभद्र' पण एकछे, घणा भोगवे भोग । 'धूलिभद्र' पण एकछे, घणा ग्रहे जग योग ॥ ५॥ तेम सीता पण एकछे, नारी नामछे लाख । आंचलिए पहुंचे नहीं, आंबानी अभिलाप ॥ ६ ॥ मास दिवस पूरा हुआ, शुभवेला शुभवार । सीताए मृत जन्मीया, युगल पणे सुसकार ॥ ७ ॥ दाल पचपनमी- तर्ज पाय गोदडिया गुणगारी। सीता स्वामीनी मुन जाया, नेतो युगल पणे सुगदाया। तव आनन्द अधिकापाया. ना गोड़िए गुणगाया || ना गुहिर निमाण गुहागा ॥ मीना ॥ १ ॥ ओख्य अधिक मंडाया. पंधीवान तुटाया । सुन आयां जेम कीजिये, ही गग सगा !! माना ॥ २ ॥ चाममो दिन आया. गन्दन नान घाया । 'अनंगलाण सुहामणो. मदनांना कायागा ! मीना ॥ ३॥ पांच धारी पालीगा, भामनियां मनाया। हाथो हाथ मंगारचे अमर गाने आपा मोना।।। १ सनु नपरोर मेगा - VarmeM MA -( ३८२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड। सीता आणोगेह हमारी, सुणी अरदासा ।। अवर गयां आवेनहीं, अवरोंनो नहीं काज : त्रिया-हितेतो दौड़ियेहो, नहीं ए वातां लाज ।। सु० ॥२७॥ वयसीने विमाने स्वामी, चमुपति? साथै लोधो । खेचरने परिवारे चाल्यो, आलस नवि कीधा ।। 'सिंह निनाद-अरण्यमें, आपगया ततकाल | अतुरता मिलवात णीहो, जोजो जगनी ढाल ॥सु० ॥२८॥ ऊभा आवीने तिहां, जिहां मूकीथी सीता ॥ नयणे नावी नारी, ठामते दीठा रीता२ ॥ थल जल तरु गिरि सोधीया, शुद्धन लागी कोई । कर पटकीने चोलियाहो, पांचांसू प्रभु सोई ॥ सु० ॥ २९॥ कपरे विलुरी वाघ, वेगकरो सिंह खाधी । कयेरे गिलो अजगरे, मूई भारण्डे लाधी ।। लेईगयो परद्वीपमें, आपां अलगी वात | आंसू ढाली बाहुड्याहो, राघवजी विललात ॥ सु० ॥ ३० ॥ फिरीआया पुरमांही, स्वामी अतिकम्ता शोगो। माहारूं घर घाल्यूर हों, अहो पुरवासो लोगो? ॥ किस्यू करूं तुम साथजी, गेमघणी आवन्त । अबदोई कांईन गिमुंहो, गईतो नवि पाकन्त ॥ सु० ॥३१॥ प्रेत कामश्रीगम ताम, सीतानां करावे । शून्य रूपमहु देखी, हैयो अति आय भरावे ।। हैयेतो दृष्टहीतो, आगे ऊभी आय । वचने पण श्री रामनेहो, सीता रहीरे सुहाय ॥ सु०॥३२॥ ए चौपनमीं ढाल, रामजी रहे उदासी । शोक्यों, नस' काम, फोकहे मांडी फांसी ॥ 'केशराज सीतातणू. जश अरु सौभाग्य । १ सेनापति (कप्तान) २रित्त-खाली .
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३८३ ) सीताही भलं पावसेहो. नहीं अवरोंभु लाग ।। सु० ॥ ३३॥ दोहा आसावरी रागे- हाथी तो जगमें घणा, पण ऐरावति एक । उच्चेश्रव पण एकछे, अश्व अछेरे अनेक ॥ १॥ गंगोदक पण एकछे, पाणीनो नहीं पार । 'क्षीरोदधि' पण एकछे, 'अम्बुधि' अवर अपार ।।२।। 'परमेष्ठी'२ पण एकछे, मन वणा गुणवन्त । सुदर्शन३ पण एकछे, अवर गिरि नहीं अन्न ॥ ३ ॥ दाता सुरतरु४ एकछे, अवर घणा दे दान | 'दशारणभद्र' पण एकछे, करे घणा अभिमान ||४|| 'शालिभद्र' पण एकछे, घणा भोगवे भोग । 'धूलिभद्र' पण एकछे, घणा ग्रहे जग योग ॥ ५ ॥ तेम सीता पण एकछे, नारी नामछे लास । आंचलिए पहुंचे नहीं, आंबानी अभिलाप ॥ ६ ॥ मास दिवम पूरा हुआ. शुभवेला शुभवार । सीताए मुत जनगीया, युगल पणे सुपकार ॥ ७ ॥ ढाल पचपनमी- तर्ज वायू गोदड़िया गुणगारी। सीता सामीनी सुत जाया, तो मुपदाया। नप आनन्द अधिकापाया, नर गोगड़िए गुणगाया ।। तर गुहिर निमाण गुडाया ॥ सीना ॥ १ ॥ ओला अधिक मंडाया. थीमान हुडापा । मुन जायां प्रेम कीजिये. ही गय कगया ।। मीना ॥ २॥ चारमगो दिन आया, नन्दन नान पाया । 'भनंगलपण गुहामणो, मदनांकुश कदमाया । मीना ॥ ३ ॥ पांच धारी पालीम, भामनियां मनमाया। हायो हाय मंचार अमर गाने भारा नोना ॥४॥ । समुद्र -२ ननुकार र ६ मे देवा - युगल पणे Tata - . .(३८२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । सीता आणोगेह हमारी, सुणी अग्दासा ।। अवर गयां आवेनहीं, अवरोंनो नहीं काज | त्रिया-हितेतो दौड़ियेहो, नहीं ए वातां लाज || सु० ॥२७॥ बयसीने विमाने स्वामी, चमुपति? साथे लोधो। खेचरने परिवारे चाल्यो, आलस नवि कीधा ।। "सिंह निनाद-अरण्यमें, आपगया ततकाल । अतुरता मिलवात णीहो, जोजो जगनी ढाल ।।सु०॥२८॥ ऊमां आवीने तिहां, जिहां मूकीथी सीता ।। नयणे नावी नारी, ठामते दीठा रीता२ ॥ थल जल तरु गिरि सोधीया, शुद्धन लागी कोई । कर पटकीने बोलियाहो, पांचांसू प्रभु सोई ॥ सु० ॥ २९॥ कपरे विलुरी वाघ, वेगकरी सिंह खाधी । कयेरे गिलो अजगरे, मूई भारण्डे लाधी । लेईगयो परद्वीपमें, आपां अलगी वात । आंसू ढाली बाहुड्याहो, राघवजी विललात ॥ सु० ॥ ३० ॥ फिरीआया पुरमांही, स्वामी अतिकरता शोगो । माहारूं घर घाल्यू हों, अहो पुरवासो लोगो ? ॥ किस्यू करूं तुम साथजी, गेमघणी आवन्त । अबदोई काईन गिऍहो, गईतो नवि पाकन्त ॥ सु० ॥३१॥ प्रेत कामश्रीगम ताम, सीतानां करावे । शून्य रूपसहु देखी, हैयो अति आय भरावे ।। हैयेतो दृष्टहीतो, आगे ऊभी आय | वचने पण श्री रामनेहो, सीता रहीरे सुहाय ।। सु०॥३२॥ ए चौपनमीं ढाल, रामजी रहे उदासी । शोक्यों, नस' काम, फोकहे मांडी फांमी ।। 'केशराज सीतातणू. जश अरु सौभाग्य । १ सेनापति (कप्तान) २रित्त-खाली .
vmannnnnwin. श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । भव्यजीव जाण्या खरा, पात्र शिरोमणि पात्रो । जीतीतो कोई नासके होई.माणम मात्रो ॥ सीता ॥ १८ ॥ विद्या विविध प्रकारनी, बहुतरे विज्ञानो । सिद्ध किया सिद्धारथे, म्होटा पुरस प्रधानो ।। सीता ॥ १९ ॥ वनजंघनी पुत्रिका, शशिचूला तस नामो । उदर लक्ष्मी रेवती तणे, उपजीछे अभिगमो । सीता ॥ २० ॥ कन्यावर वत्रीश, वनजंघजी तामो। अनंगलवण परणावीयो, कीधा उत्तम कामो ॥ सीता ।। २१ ।। पृथिवीपुर पति परगड़ो, पृथु नामा भूपाला । पटराणी अमृतवती, कन्या कनकमाला ।। सीता ।। २२ ।। मदनांकुश ने मांगतां, नाये ते राजानो। वंश अजाणे क्यूं हुवे, कन्या केरो दानो || सीता० ॥ २३ ॥ एम सुणी चही चालीयो, वनजंघ शर सांधी। व्याघ्ररथ पृथु सहायजी, जीती आफ्यो गांधी । सीता० ॥ २४ ॥ पृथु भूपति ए तेडियो, पोतन पुर पति धाई । चार न लागी आचीयो, कष्ट मित्र सहाई ।। सीता० ।। २५ ।। वन जंघे सुत तेडिया, चाले अति मण्डाणे । लवणाकुश तो चालिया, वा पण नवि माने || सीता ॥ २६ ॥ दोई पखे भट सामटा, मांच्यो अति संग्रामो । पृथु पल आगे भाजीया, बज जंप भट जामो । सीता० ॥२७॥ मातुल-सेना भांजती. लवणांस देखन्ना । करी उठावणी आझरी, चान्हा पृथु पसन्ना ।। सोता० ॥ २८ ॥ बाल तेक मूलगी- उभय दल आपस में मिडिया, नाना विध आयुध से नहिया, नर भूमिपर पडिया । भारती फोन देखी जाम, भुने रोग आई नाम ।। सत्यव्रतपालो ॥ १७ ॥ गए कई मुनिगे अपि गोरे, मारे क्यों मामने मोरे । नन्द दिन जीना तो चारो, नमन कर पा फिर जारो ॥ मन्प० ।। ९८ ।।
- - (३८४) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । चन्द्रकला,जेम वाधही, बालपणे चालाय | शूग शरभ तणीपरे, राजाजी रीजाया ॥ सीता ॥५॥ सासूजी पगे लागतां, दीधीथी आशीपो। हम सरखा सुतजन्मजो, कीधी सफल जगीसो । सोना ।। ६ । कौशल्या इक जाईयो, सीता दोई विदिता । कौशल्या थीतोघणो, अधिकाणी ए सीता ॥ सीता ॥ ७ ॥ सिद्ध पुत्रछे अणुव्रती, सिद्वारथ१ अभिधानो। विद्यायल ऋद्धिकरी. सविधि जाण सुजाणो । सीता ॥८॥ विदेह अदि क्षेत्रविषे, स्वेच्छा विहारे । गगनगति सोताघरे, भिक्षाने पधारे ॥ सोता ॥ ९ ॥ वारु भोजन पानसू, दीधो तसु अहारो। सुखपूछे सीताघणूं, उत्तर दिएते सारो ॥ सोता ॥ १० ॥ देव सुगुरु प्रसादथी, महारे वोतेही खेमो । दर्शन करूंजिन साधुना, शुद्ध धरूं व्रत नेमो । सीता ।। ११ सो पूछे सीतासती, कोण अवस्था थारी । चरित्र सुणावो आपेणो; धुरथीछह लगेभारी ॥ सोता ॥ १२ छाती भरी आवीघणी, भाईजाणी तासो । सो वानां राजाकरें, अतितो परघर वासो ॥ सीता ॥ १३ ॥ कहे अष्टांग निमित्तियो, करुणानी मति आणी-। सुन लवणांकुश सारिसा, शी आरती तुझ राणो ॥ सीता ॥ १४ शुभ लक्ष्मण करी शोभता, जेम लक्ष्मण रामो । 'लवणांकुश छे तेहवा. शा आरतिना ठामो ॥ सीता ॥ १५॥ देईअति आसासना, सीता सुसती कीध । आश वड़ो संसारमें, आशाए लंका लीध ।। सीता ॥ १६ ॥ प्रार्थना कीधी घणी, पुत्र पढावो भाई । वी मानी सिद्धारथे. हरखी सीता माई ॥ सीता ॥ १७ ॥ १ इस नाम वाले मुनि, ^^~ mhann श्री जैन पद रामायण चतुर्थ ग्वएड । (३८५) भव्यजीव जाण्या खरा, पात्र शिरोमणि पात्रो। जीतीतो कोई नासके होई माणम मात्रो ॥ सीता ॥ १८॥ विद्या विविध प्रकारनी, बहुतरे विज्ञानो । सिद्ध किया सिद्धारथे, म्होटा पुरप प्रधानो ।। सीता ॥ १९ ॥ बजजधनी पुत्रिका, शशिचूला तम नामो । उदर लक्ष्मी रेवती तणे, उपजीछे अभिरामो ।। सीता ।। २० ।। कन्यावर पत्रीश, वनजंघजी तामो। अनंगलवण परणावीयो, कीधा उत्तम कामो ॥ सीना ॥ २१ ॥ पृथिवीपुर पति परगड़ो, पृथु नामा भूपाला । पटराणी अमृतवती, कन्या कनकमाला ॥ सीता ।। २२ ॥ मदनांकुरा ने मांगतां, नाये ते राजानो। वंश अजाणे क्यूं हुवे, कन्या केरो दानो ॥ सीता० ॥ २३ ॥ एम सुणी चढी चालीयो, वनजंघ शर सांधी। व्याघ्ररथ पृथु सहायजी, जीती आपयो गांधी ।। सीता० ॥ २४ । पृषु भूपति ए तेडियो, पोतन पुर पति धाई। चार न लागी आवीयो, कष्टे मित्र सहाई ।। सीता० ॥ २५ ॥ वज्र जंघे सुत तेडिया, चाले अति मण्डायो । लवणाकुश तो चालिया, वज्या पण नदि माने ।। मीता ॥२६ । दोई पसे भट सामटा, मांट्यो अति संग्रामो। पृथु-पल आगे भाजीया, वन जंघ भट जामो ।। गीता० ।। २७ ! मातुल-सेना भांजती. लवणांमुश देवन्ना। करी उठावणी आफरी, चान्दा पृथु पेचना ।। मीनाः ॥ २८ ॥ पाल शेप मूलगो- उभय दल नापम में भिडिया, नाना रिध आयुष मेलानिया के नर भूमिपर पडिया । भाजती फौजदेवी जाम, प्रभु ने राम । ताम || सत्पातपालो ॥ ९७ ॥ प्रभु कहे सुनिये विजारे, जा क्यों मामने मोरे । चन्द दिन माना जो नारो, नमन कर फिर जारी ॥ मत्य० ॥ १८ ॥ -- - (३८६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । मुनि श्री रूपचन्दजी कृत ढाल क्षेपक तर्ज काईरे जबाव करूं रसिया- काईरे मिजाज करे अठो, झूठोजी झूठो साफ है झूठो, तो पर आज सीयासुत रूठो ॥ टेर | मिजाज करे क्यूं इतरो मन में, ओ सब साज उडेगो छिन में ॥ कां० ॥१॥ थोथा चणा जिम अधिको वाजे, मो आगे भाजतां तव कुल लाजे ॥ कां ।। ॥ २ ॥ निज वलमें क्यों भूले भोले ! तुने पकड़ पछाई एक ही ठोले ॥ कां०॥ ३॥ काहे करो ओख्यों काढ़ डरावे, क्या मझाल तूं हमको. जीत के जावे ॥ कां० ॥ ४॥ आंटीले भूप आये भगती में, तो सम ढोर किसी गिनती में ।। कां० ॥ ५॥ क्यों लड़ने को सन्मुख आवो, मर मम हाथों क्यों पाप लगावो कां० ॥ ६॥ कीडी पर कटकी नहीं करते, तो निर्बल वृद्ध से कबह न लरते ।। कां ॥ ७॥ वृद्ध पणे झघडो नहीं कीजे, श्री शार्दल शिष्य कहे समता ही लीजे ॥ कां० ॥ ८ ॥ ढाल क्षेपक मूलगी- छोरा ए बोलीरां वेड़ा, देख्या नहीं एवदार एडा, भागो मत आवो अब नेड़ा। मच्यो तव द्वन्द युद्ध भारी, पांध लियो पृथु ने तिणवारी ।। सत्य० ॥ ९९ ॥ ढाल मूलगी-- लवणांकुश हसि वोलिया, ए अण जाण्यो वंशो । तसु आगे क्यूं भांजता, पामी, वंश प्रशंसो ॥ सीता० ॥ २९ ॥ पृथु भाखे कुंवर सुणो, वंश जणाणो आजो । पराक्रम वंश न सही सके, अष्टापद घन गाजो ॥ सीता० ॥३०॥ 'वज्रजंघ' म 'पृथु' कहे, अंकुशनें मैं दीधी । कनक मालिका बालिका, परणायो पर सिद्धि ॥ सीता० ॥ ३१ रंगहुओ दोई नृप में, कीधो कटक पड़ावो । - एटले चाली आवियो, नारदजी ऋषि रावो ॥ सीता० ॥ ३२ रंग रली दोई दलां. देखी पूछे साधो । दीसो छो रस रंगमें, कहो किस्यो तुम्ह लाधो ! ॥सीता ॥ ३३ ।
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । ('३७ ) कन्या पृथु राजा तणी, "अंकुश में परणेतो। कीजे छे ते जाणवो, हर्प तणो संवे तो । सीता० ॥ ३४ ॥ सबलानो ए जोहरो, तेरे गुदिनो पावो । वश कहो कुंवरां तणां, जेम वधे चित्त चावो । सीता० ॥३५।। नारद भाखे नयणछे, तेतो देखे भानो । ए आंधाने पूछवो, किस्यो अछे रवि छानो । सीना० ॥३६।। आदि हुआ आदीश्वरू, आदि नाथ जगदीशो । भरत हुओ सुत तेहनो, ते पण धुरे चक्रीशो । सीता० ॥ ३७॥ पुरुप पनोता होवता, इणही वंश विख्यातो । पुरी अयोध्या प्रगटिया, राम मु लक्ष्मण भ्रातो ।। सीता० ॥३८॥ गर्भ विो जब ए हुता, लोक-वचन ने त्रासो । पामी राम दिवाड़ियो, सीता ने वन चासो ॥ सीता० ॥ ३९ ॥ रामचन्द्र ना नन्द छ, सीता उदर उत्पन्न । वंश इक्ष्वांकु ना विरो, म्होटा पुरप रतन्न ।। सीता० ॥ ४० ॥ अंकुश कहे ऋषि रायजी, भलोन कीधो एहो । कारण अति अबला भणी. क्युं देवाए छेटो ।। सीता० ॥ ४ ॥ लवण कहे ऋपिसा पुरी, कहो छे केतिक दूर ? | साठ अने शत् योजन, दीसे एह हजर ।। सीता ॥ ४२ ॥ वन जंप कहे कुंवरां, अप चालो निज थानो। लक्ष्मण राम देसाइय, शूरपणे मन मानो । सीता० ॥ ४३ ॥ मानी वात चिरोपथी पनघजी भासी। कनक माला परणावियो, अंम रविदामि-सामी ।। मीता०1४il पंचावनी गाल में, शूर नणो ने शूगे। पं.शगजी नो हुभे, जो पूर्व पुण्य अंगे। मीना० ॥ ४५ ॥ दो मोरड राग--- 'यसप पृथु रापती, लपणांस नीलार । चामा ददरत नामटे, गाधन र देश अपार ॥१॥ १ पाधीन पग्नेको AR "on (३८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। पहेलीतो लोकाक्षपुरी, लवणांकुश आवन्त । 'कुबेरकन्त जी रायजी, जीती जश पावन्त ॥२॥ रायकर्ण लंकाकपति, जीती लीधो जेह । भ्रातृशत विजयस्थली, आण मनाव्या एह ॥ ३ ॥ उतरिया गंगानदी, जिहांछे गिरि कैलाश । तिहाथी उत्तर नेदिशे, आयाधरी उन्हास ॥ ४॥ नन्दनचारु देशबहु, जीती लीधा स्वामी । सिंहल कुन्तल ए, जीत्याछे जश पामी ॥ ५ ॥ 'भूतरवादि कालाम्बु, नन्दी नन्दन देश । . 'भीम शूल शलभातल, साधीलिया सुविशेष ॥६॥ साधीलिया सुखमेंसहु, सिंधुना१ परकूल । अनारज२ ने आरजा, कीधो सघलो सूल ॥ ७ ॥ देशबहु साधिवल्या, साथेषणा भूपाल । पुण्डरीक पुरी आवीया, लवणांकुश सुविशाल ॥ ८॥ 'वज्रजंघ धन्य रायजी, जेहता ए भाणेज । एम सुणतां घर आवीया, माय मिलणनं हेज ॥ ९ ॥ 'लवणांकुश बहु राय , प्रणमे माता पाय । मातादें आशीपड़ी, वधजो अधिको आय ।। १० ।। नन्दननें नीकीपरे, करजे तुं करतार । राम-लक्ष्मण सारिसा, भूमितणा भरतार ॥ ११ ॥ वज्रजंधने कहे कुंवरां, एहछे अवसर सार । पुरी अयोध्या जायके, कीजे तात जुहार ॥ १२ ॥ 'लम्बाक कालाम्बू लंका, और सुकन्तल चूल । 'सरभानल ओदघणा, साथ हुआ अनुकूल ॥ १३ ॥ प्रयाणनी भम्भाभली, देवाड़े अभिराम । साहण वाहण सामटे, कुंवर चाल्या ताम ॥ १४ ॥ १ सिंधुनदीके पर नादेश २अनार्य -और. आर्य .
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। ~-~ M. प ढाल छपनमी तर्जकडवरांनी----- आवेरे दोई लवणांकुश सजी, साजी नात प्रत्ये। आपो देखावण करी विधिसाजा,चाल्या करी अधिक दिवाजा॥१॥ रोवन्ती माताजी बोले, किस्यूं करो तुम एहो । युद्धतणी विधि सजीवाल्या, मुझमन एह अन्देहो । आ० ॥२॥ पितृ पितृव्य२ तुम्ह दुर्जय३, पहुंची सकेन हीं देव । तीन लोकनो कण्टक रावण, मारी लियो ततखेव ॥ आ० ॥३॥ हँठतिके नवि वायेहाले, मेरु नविनाये कम्पे । म्होटातूं लवू नविगोवा, पुत्रांस मा-जम्मे । आ० ॥४॥ जलधर केरी गाजसुणीने, अष्टापद अति कोपे। कूदी कूदी निज गोड़ा तोड़े, पण घनने नपि लोपे ॥ आ० ॥५॥ विनय करेगा जोतुम्ह जावो, तो तुम्ह वेगाहोवो । पूज्य पूज्यां पीड़ प्राजे, एह विमासी जोवो ।। आ० ॥ ६॥ पतिविनमें तुम्हसुं मन यांध्यू. तुम्हविन सी गतिम्हारी । संकतणा छोरुमाछो येतो, मनहीं चलो, वारी ।। आ०१७॥ पुत्रकहे माजी तुम्ह साचा, जेम किगारा काजो। तेहि साधे न मिले मन मोती, तूटयां मंघ आकाशे || आग ८॥ माताजी कहे पुत्रनिमुणो, ए रहिवायो कामो। कातणदारी तारतणीपरे, जोड़ेही अभिगमो । आ० ॥९॥ पुत्र तुम्हाग हमलों पहयो, किम कहिमाचे चानो। छोहरा ए छोडली केरा, इमही कदसे नातो ॥ आ० ॥१०॥ आनन्द कारी नानहीने, युद्ध ननो नामो। कुल दोईनो उपल, सुन्दरछे संग्रामो ॥ था. ॥ ११ ॥ एमकहीने गया हुंदर, रोती मेली मापी । उत्माइयन्त महन्न कटकर, पुरही नम हारी ||१२ एटार दालनमा सम्पादन, दाग ही जागे। १ पिता (राम)-२ मा मर)- कोई भी दी। APNA sa --- अन्न ~~~ ~ ( ३६०) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । पन्थतणा तरु छेदी सूधो, कीधो पन्थ अपारो ॥ आ० ॥१३॥ ढाल क्षेपक मूलगी- अनुक्रम अवधपुरी आया, डेरा पुरवाहिर लगवाया, सैन्यसे पुरसव धेराया । दृतने खवर आयदीनी, राम रुलिछमन सुनलीनी । बत पालो १०० । सेनापति सेना ललकारी युद्धकी खूबकरी यारी, भुजास्फोठ सुभटकरे भारी । सैन्यद्वय आपसमें मिलिया, समर रा सौखी महाबलिया । सत्य ।। १०१ ।। ढाल मूलगी- सेनानीसूं अवी अडिया, अतिवलवन्ता दोई । नहीं सेनानी कारे सारे, एहसुणे प्रभु सोई । आ० ॥ १४ ॥ सौमित्री कहे एरे पतंगा, आतुर अति देखाता । आरति पराक्रम पावक मांही, करवा झंपापाता ॥ आ० ॥१५॥ एमकहीने राम-सुलक्ष्मण, सुग्रीवादिक लारो | युद्वभणी चाली सहामीआया, कोईन लाई वारो ॥ आ० ॥ १६ ॥ एटले नारद नेमुख सांभली, भामण्डलजी भाई ! गेवन्तीकहे भाई! मुझसू प्रभुजीतो ए कीधी । खुणस करीने तुम्ह भाणेजा, लडवानी मति लीधी । आ० ॥१८॥ 'भामण्डल कहे रामे करियो, जेमतुं त्यागी विगाड़ो । अणजाण्यांए दोई हणवा, करसे नहीं विचारो ॥ आ० ॥ १९ ॥ जबलगे विणसे एनहीं कारज, तवलग दौडीजावा । करूं निवेडो वात जणावी, रामहीं रोप मिटावा || आ० ॥ २० ॥ एममुणी सीता भामण्डल, बसी विमाने आवे । लवणांकुश धसी माताजीने, चरणे शीश नमावे || आ० ॥ २१ ॥ 'सीता कहे भामण्डल भाई, थोरो मामो साचो । माताने भाणेजा मांहे, नेह जणाणो जाचो || आ० ॥ २२ ॥ ल. उठाई ऊंचा, लीघा कण्ठ लगाई । र चुम्बी खोले वेसाडी, मामोकहे सुखदाई ॥ आ० ।। २३ ॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । + वीरतणी पती नी कीर्ति, पहिलीथी जगमाई । वीर मरनी कीर्ति वीजी, ए पामीते माही । आ. ॥ २४ ॥ वीरतणासुत वीर अछोतुम्ह. कामकरोरे विमासी । पितृ वंशों माथे लडतां, होसे जगमा हासी ॥ आ० ।। २५ ।। जेहने रणमा सजा गवण, आपणपे रे मगणो । प्रगटपणे एतोरे पचाडो, सघलेही रे गनाणो ॥ आ० ॥ २६ ॥ लवणांकुश कहे मामाजी तुम, बात कहो ए फीकी । आची मिल्यां उसरिया अलगां, बात न लागं नीकी । आ॥२७॥ एम कहन्तां दोई पक्षना, शूग अति गम्बाया । स्वामी तणो ए काम समारण, अधिकपणे उगाया }} आ० ॥२८॥ सुग्रीवादिक खगही खेनर. भूचर भटने उगवे । भामण्डल सेचर साये. गण्डे सरिये दावे ।। आ० ॥ २९ ॥ लवणांकुश अनुश मरिसा नीला, शर शिरोमणि शूग । राम तणा भट उपर आरो, जेम आवे जल पूरा ॥ आ० ॥३०॥ क्षेपक गणाम गमागम में से- इभी समय सेना-सदिन आ पहुंचे कपिराज । बोले-हे ला बालकों ! भलो रुप आज ।। अच्छानो यह है-धनुप बाग, धरती पर रो रमाई में । गुशीव देवकर डरता है, आजार न मोर कलाई में। लंका विजयी दलके शागे. मत या प्रत्यवाय फेगे। अपने सदन में जाकर के हमो नमो सर शिशुगण मेरो ।। तुम बोले क्या तुम्ही ओ. यानर पनि गुनी। भाग हमारे पुल गो. दो पके मार भय माय माहनगति से नुम्मने फिरनाम-लकर को गुलानामा हरदा गुरारक है जिनसे, उन गोदाको भरपाया था। वामपनी यह शुद्र के मेले की ! नाम दिया गुबगुल र !
(३६२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । बोले-बस वस मुंह बंध करो, क्यों विप टपकाये जाते हो। मट्टी के ढेले होकर तुम, गिरि-शिखरों से टकराते हो । ऐसा कह कर कुश के उपर, दौडे सुग्रीव मिटाने को। धाता है राहु दिवाकर पै, जिस तरह ग्रास कर जाने को ॥ लेकिन रास्तेही में कुश ने, सम्पूर्ण वीरता हरडाली । वाणों से नयनों के आगे, बस चहा चैंधिसी कर डाली। लड़ते लडते सुग्रीव थके, पर बालक का तन छुआ नहीं। कुश वैसेही मुसकाते थे, मानों अब तक कुछ हुआ नहीं । बोल उठे कुश-कर चुके, पूरा तुम अरमान । अब बच्चों का बाणभी, स्वीकारें श्रीमान् ॥ जैसेही कुशके धन्वासे छोटासा शर कुश का पहुंचा। सुग्रीव मूर्छावन्त हुवे, माथा घूमा कांपा पहुंचा ।। अङ्गद दौडा ज्यू ही उसने, कपिपति को गिरजाते देखा। आगया उबाल नेत्रों में, जब लव को मुसकाते देखा ॥ बादल की नाई आकर के-गर्जे-बच्चे ! क्यों हंसता है !। ऐसा होता ही आया है, दो लड़ते हैं एक गिरता है । राजा के गिरजाने का बदला, अङ्गद युवराज चुकायेगा। हो सावधान हंसने वाले, यह नाहर तुझे रुलायेगा । लव बोले क्यों व्यर्थ ही, बकता ओ बाचाल । नाहर तूं कबसे हुआ, ! विदित हमें सब हाल ॥ जबसे स्वामी घातीके पगमें, यह अपना शीप झुकाया तब से ही इस दुनियों में, नाहर पन तूने पाया है । अच्छा नाहरजी घर जाओ, क्यों प्राण गँवाने आये हो । यह रावण का दरवार नहीं, जो पैर जमाने आये हो । कैसे सह सकता भला, अंगद 'लव' के वैन । वाल-भास्कर की तरह, अरुण होगये नैन ।। गम्भीर गर्ज के साथ साथ बस गदा चलादी बच्चों पर । है - श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (३६३) लेकिन सबने देखा वह थी, 'कुश' के बाणों की नोकों पर ॥ इतनेमें लवने शरछोड़ा, शिर घूमा जिससे अंगद का । पृथ्वी पर गिरतो गया किन्तु, तन लाल था रीस अंगद का।। दाल मूलगी, सुग्रीचादिक 'भामण्डल' मू, पूछे ए कुण होई ? । 'भामण्डल' कहे सीता जाया, राम तणा सुत दोई |आ० ॥३१ ।। आवी सीता चरणे लाग्या, खैचर बैठा आगे । 'लवणांकुश' उठावणी आगे, राम तणा भट भागे ॥आ० ॥३२॥ जिहां तिहां रण रंगही खेले, हरि जेम- मृग-वन माही । रथ सारथी नेरे निसेदी, एक न कोई साही ॥ आ० ॥ ३३ ॥ राम सु लक्ष्मण सामा आया, देखी सुन्दर ताई। कोई शूर ऊपन्या आई, जोई रह्या लोभाई ॥ आ० ॥ ३४ ॥ नयणे नेह जणावे निजवं, पर पोसे देपो। नयणोंना निन्गाती, भारुया. लिरो लई सयल विशेपो आ॥३५॥ मनतो मिलवाने उमाहे, चलनी तामस जागे । एही अवसर छे कांई शानी, न रहे शंगर नग आगे ॥०॥३६॥ लवण कहे रघुपति मुरूडी, अरश लक्ष्मण साये। चोर सहस अक्षोहणीनो पनि, तुम हम्यो निज हाये ॥मा० ॥३७॥ मोरे हम तुम साथै अरिया, सुजश दियो जग नाथे। अन शरु सं अति लरियं, नहीं नर पयिं पाधे ।। जा० ॥३८ रावण मु लहतां न पाक्या, मो अब लामी। हमतो आदि भी अमलहमा, क्षत्रीनी ए सेनी ॥ आ. ॥३९॥ एमपीने राम-सु लमा. लपणां न दो गर । धनुप्प नामी सन्मान पाने, गेरु तगी पर और ना ॥४॥ जाम रानासा मे में- देसी र नित नापियों की, सर दिशी में भार! लक्ष्मपा नसान मोगरे, लड़ने को तयार . (३६४) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । सोचा-जगविजयी सेना का, इस तरह भागना लज्जा है । बच्चों से रघुकुल का दबना, सचमुच कलङ्क का टीका है। परखच्चे यह बच्चेक्याहै, वेजोड दिलेर जहांकेहैं । शायद ब्रह्माने प्रथमवार, सिरजे यहबच्चे वहांकहैं ।। अस्तु शीघ्रतासे वहां, पहुंचे यह बलवान । जहां बालके खड़ेथे, तानेहुए कमान । देखा-कितनेही योद्धागण, पृथिवीपर शयनकर रहेहैं । बातिनमें सबमें सॉसेहैं, जाहिरमें सभी मर रहेहैं । हतको देखातो आहतथा, आहत हतमा दिखाताथा । कितने हतथे कितने आहत, यहजोड नजोडा जाताथा ॥ वहशान्त विपिनकी तपोभूमि. उसऔर लालहो दमकीहै । उसलाली-मेंकुन्दन जैसो, शस्त्रोंकी ढेरी चमकीहै । मनों विपिन स्थलिने ओढा, यह सुख दुपट्टा तारो का । या लाल प्रभाने पहना है, यह गहना मुक्ताहारों का।। दूसरी और यह भी देखा-दो बच्चे धनुप-चढाये हैं । उस अवधपुरी के शासन-पर, अपना अधिकार जमाये हैं ॥ चोले-सुकुमारों ? धन्य तुम्हें, सचमुच अद्भुत बल पाया है । किष्किन्धा के गलिोंको , रणमे नीचा दिखलाया है । लेकिन रघुवर को-रघुकुल को, ब्रह्मा भी हरा नहीं सकता। सागर कितनाही बढे मगर, सूरज को डुबा नहीं सकता ।। इसलिए 'फौज को लौटादे, तुमसे रन करना ठीक नहीं । बच्चोंकोमार बाल-हत्या का, अघ निजशिर पर लेना ठीक नहीं । कुश बोले यह ठीक है, कहते जो श्रीमान् । किन्तु हमारी भी विनय, सुनिये धर कर ध्यान ॥ ईश्वर-भक्तों का प्रथम कर्म, ईश्वर की भक्ति करना है । फिर ईश्वर भक्तों ही की, इस जग में वृद्धि करना है ।। ईश्वर-भक्तों की वृद्धी को, धर्मी राजा आवश्यक है ।
। श्री जैन पद् रामायण चतुर्थ खण्ड। ( ३६५) सङ्गीत जमाने की खातिर, सन्दर वाजा आवश्यक है । हम खूब जानते हैं रघुपति, रैय्यत का पालन हारा है । लेकिन वह त्रिभुवन विजयी नर, नारी के द्वारा हारा है। सीता साध्वी के कष्टों ने, करदिया नष्ट उमके बल को । अब नहीं बढ़ाई जग देता, लदा किष्किन्धा कौशल को ।। इस लिए जगत का धर्म हुआ, उससे सिंहासन ले लेना। जो व्यक्ति योग्य हो शाशन के, उसको ही शाशनदे देना ॥ अतएव देश के नाते से, हम को यह धर्म चुकाना है। उस मद से भरे महिपतिका, मद सब विध्वंस कराना है अच्छा ये बातें जाने दो, अन योद्धा पन की बात करो। यातो वापिस घर को जाओ. या आश्रो रन की पात करो। लक्ष्मण बोले क्षत्री के प्रति, ऐसा कटु वाक्य न अच्छा है। क्षवीतो फिरने के बदले. ग्नमें कट जाना सीसा है ।। जिसने रावन को संहारा है, उसको तुम भीरू समझने हो। ठहरो इन वाणों से विंधकर, क्षण यम लोक पहुंचते दो।। अब क्या था दोनों तरफ, लिचे धनुप और धान । क्षण भर में होने लगा. युद्ध घोर घमसान ।। दाल मूनगी- एम सुगीने राम-गु लक्ष्मण. लवांडा दो वीर । धनुष्य चहानी सन्मुम गारे, मेरु नगी पर धीर 17, गमनणा स्थनो सारथियो, सेनापनिजे मुहावे । वरधनी लाण तणोरथ, सेड्ने जग पारे AT: 'धोगविराध लक्ष्मण ग्यभागे, पृथु तुम स्वनडे: रथ सारथिया चारही सरग, एक एक्ने ? - २ पिन पितृदय जागीताची. घरजीतो गंश। प्रमुभीपुरो नंदन नापे, चोट करन निक १२ । विविधायुये मिलिभपर, दो ईन बनायो । गमको खेद रपती, दिय बाल दिगो 133.
( ३६६ ) : श्री जैन-पद रामायण चतुर्थ-खण्ड । कहे सारथी हंयनहीं हाले, पीड़ाणा शरघावे । कर्या धावसं ताडतांही, पाछाही पगठावे ।। आ० ॥ ४५ ॥ रथ प्रभुजीनो सिथिलहुओअति. वयरिये अति ताड्यो । करी सिथिलता खेचत रश्मी, अरि तोही न नमाड्यो ।। आ० राम कहे न पड्या कर ढीला, कोई काम इण सारे । सो कर ढीला आज पड्याछे, सांसो कोण निवारे? ॥ आ॥ ४ वज्रा वर्ता धनुप धणीन. सघलू काम समारे । सोही मुंडो फेरी रहीयो, चातपड़ी अविचारे ।। आ० ।। ४८ मूसल-रत्न दलन वल अरिन, सो पण ढीलो पड़ियो । अरिगंजन अकुंश स हल ए, एही अहि न वि अड़ियो । आ० जक्ष हजारे से वितछे रे, हल मूसल ए स कामा । कोई अवस्था केरे केडे, हुआ आज निकामा ॥ आ० ॥ ५० राघवनां जेम जेम लक्ष्मण नां, सघलाही उप को । जेकीधा तेसामा नायां, जग जागन्तो धर्मो ॥ आ० ॥ ५१ । क्षेपक राधे श्याम रामायण में से लक्ष्मण जिस समय अग्नि-शर से, सर्वत्र अग्नि फैलाते थे। कुशल तभी बाण से जल वरसा; तत्क्षण उसे बुझाते थे। फिर लक्ष्मण अपना वाण छोडा, जब जल को घीसा करते । कुश तभी बाण से रेते के, घी को मट्टी सा करते थे । धीरे धीरे बड़ चला, वैज्ञानिक संग्राम । घटा जभी छाई इधर, उधर खिलगई वाम ॥ वाणों ही बाणों के द्वारा, नाना प्रकार के ज्वर आये । वाणों ही बाणों के द्वारा, सब नष्ट हुवे सब बिल गाये ॥ माया की सेनायें बनकर, लड़ती थी मरती जाती थीं। धोखे की शक्लें धाती थीं, वनती थीं मिटती जाती थीं। जब वैज्ञानिक युद्ध का, होने आया अन्त । तन्त्र शक्तियों की बनी, वह रण भूमि तुरन्त ॥
----- । श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । (३९७) उच्चाटन-मारण-वशीकरण-, सम्मोहन आदि तन्त्र आये इन तन्त्रों ने इन मन्त्रों ने, कितने ही कौतुक दिखलाये ॥ लड़ते थे कभी प्रगट होकर, ओर कभी गुप्त हो जाते थे नाना प्रकार की लीला से, वोरता वीर दिखलाते थे। ढाल मूलगी-- एटले अंकुश वाणे हणीयो, हेये लक्ष्मण काको। मूर्छाए पड़ियो स्थमाही, अंकुश कीधो शाको ।। आ० ।। ५२ ।। मूर्छाए पड्यो प्रभु पेसी, रथतो घाने चलायो । चीर विराध विचारी वारु. स्वामी संज्ञापायो । आ० ॥ ५३ ।। वीर विराध {प्रभु चोलियो. अनुचित कार्य तें कीघो। राम लड़े रस रंगे रणमें, मुझ रथ घरने लीधो ॥ आ० ॥ ५४ ॥ लेई रथ रणमें अरिने हणी. चक्रे छेदी शीशो । लक्ष्मणजी फरि रणमें आयो, उपनी छे अति रीसो ||आ०१॥५५॥ रे ? अंकुश कुंवरां तृण जेम तोडू. कोई न लाएं चारो। चक्र चलावे अरिने दावे, अंकुश मुतनी लारो॥ आ० ।। ५६ ५ देई प्रदक्षिणा पालो बलियो, लक्ष्मण ने करे वेठो । जेम तरु पंसी उड़ी अपूठो, आवी माले पेटो ।। आ... फिरी मुकीयो मो फिरी आयो, पण्डित ताम विचार गोतीने पहुंचे ए गुण गिरुमओ, सो ही क्यूं मारे :- राम-सु लक्ष्मण आरनी आणे, वाम देव बल देवा । ए दोई भाई अपनीया, पदवी ए हम लेगा ।। : एह पन्नमी वाले कुंपरा, किरनी अधिक देशाग केशराज जगजेता जैथी, ते आगे जा पाय : दोहा सपोग- 'सिनाथ मायरी, नारदमपि विधि करतां वन्दना, गाहो मुन्ट दुचिन्ता देसी रामने, नाद टन्ट' (३६८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । कोण कारण आरतितणूं. राघव कहे तुरन्त ॥ २ ॥ फोड़ादाधां ऊपरे, कांपीड़ो ऋपिदेव । भूमि पराई थापछे, आवे ए अहमेव ॥३॥ एआया बलियामहा, नहीं हमारो ताल । कारण ए आरतितणू, ऋपिभाखे सुविशाल ॥ ४॥ हर्प-थान विषवादयह, कांईकरो रघुनाथ । एह सुबोल सुहामणा निसुणो सघलो साथ ॥ ५॥ ए जाया सीतातणा, युगलपणे अभिराम | लवणांकुश अभिधानथी, पुत्र तुम्हारा राम ॥ ६॥ त्याग तणोदिन धुरथकी, युद्धतणो दिनअन्त | सम्भलायो श्री रामने, सीतानो विरतन्त ।। ७ ।। प्रभुजीने मिलवाभणी, आया आणीस्नेह । आप जणावण कारणे, करी देखावी एह ॥ ८ ॥ एहनीए अहिनाणिका, मनमूं करो विचार । चक्र अपूठोतो फर्यो, जो सगपण व्यवहार ॥ ९ ॥ अदिनाथनां पुत्रनी, निसुणी होसे वात । 'बाहुबल भाईतणी,चक्रेन कीधीघात ॥१०॥ तुमढालीने तुमतणी, अवरां शिर केमहोय । हाथीजाया हाथीया, साथे लडन्तो जोय ॥ ११ ॥ विस्मय पीड़ा खेदनो, हर्पहैये नसमाय । मूर्छाखाई धरणी पड्या, लीधा ताम उठाय ॥ १२ ॥ ओखेआंसू नांखता, लक्ष्मण लीयालार । पुत्रोंने मिलवा चल्या, कोईन लायावार ।। १३ ।। स्वस्थरथी तब ऊतर्या, आवन्ता प्रभुदेख । 'लवणांकुश सकुमारजी, विनयकरे मुविशेष ॥ १४ ॥ हाथांथी हथियारजे, अलगा नांख्या ताम । १ स्पन्दनथी-इति पाठान्तरे (अपने रथसे) .
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । ( ३६६)
राम-अने लक्ष्मण तणे, चरणकरे प्रणाम ॥ १५ ॥
ढाल सत्तावनमी-तर्ज बूढ़ा श्राडा डोकरा रे मोहना-
चन्दन शशीजल छांयडीरे नन्दना, शीतलहोई अपाररे नन्दन
॥ ते नवि पूजीहीरे नन्दना नन्दन वडो संसार रे ॥ नन्दन परम
पियारे ॥ टेर ॥ १ ॥ नन्दना रे नन्दन थी आनन्दरे, नन्दन है
सुख कन्दरे ।। नन्दन पूनमचन्द रे, उल्लासे वंश समुन्दरे ॥न-
न्दन परम ।।२।। सुत पाछे सुख सयलजीरे, नन्दना, पहेलू सुसतो
पूतरे॥ स्थितिनो थोभण पूतजीरे, नन्दना, पुत्र थकी घरसूतरे ।।
नन्दन ॥ ३॥ उठाई उंचा करीरे निन्दना ॥ लीधा कण्ठलगायरे
हलधरनेहरिजीतणेरे ॥नन्दना । हैन हैये नसमायरे ।। नन्दन ॥ ४॥
क्षेपक राधेश्याम-
ज्यू ही नाग्द से मुना, वैदेही-वृत्तान्त ।
वीर-भूमि पैवम तभी, बग्म उठा ग्म शान्ल ॥
क्षमा मांगने को पढे, लव-कुग दोनों भाय ।
आगे पट रघुनाथ ने, लाती लिया लगाय ॥
पुत्रों का और पिता का, यह प्रिय-मिलन निहार ।।
सुर-पुरसे बरसे मुमन. जगने की जयकार ।
लसन लाल ने जब लसे, युगल स्वरूप अनूप ।
कहा-अमंगल ग्ण हुआ. भाज सुमंगल रूप ॥
आशीवांद के लिए आन, प्रत्येक हृदय उमड़ाता है।
अभिवादन करने को तन का, हर रोम रोम हपाता है।
यह हार नहीं है जीत हुई, अपयश के भीतर यः पाके ।
कोशलने खुद पर जय पाई. परिपूर्ण परीचय में आके ।।
इस इसका निर्णय कोन करे, किरने यह युद्धस्थल जीता।
कोशल ने गइ दोनों बीते, इन दोनों ने कोमल नीता।
दार नवगी-
सोले लीधागांना रे, नन्दना ।। सिर मोकार ॥ दारा
नपनो करे नन्दना ! - पोो प्रेम भार रे ।। नन्दना ॥ ५॥
ww (४०० ) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड। शत्रुघ्न पगे लागतारे ॥नन्दना।। आलिंगिन अधिकार रे ।। लवणा- कुश पाय नमेरे, निन्दना।। ताम सहु परिवाररे ॥ नन्दन ॥६॥ दोई पक्षना राजीयारे, आनन्दना।। माहोमांहे उच्छाहरे | होवे रंग विनोदजीरे । नन्दना।। जाणे मांड्यो विवाह रे ॥ नन्दन०॥७॥ पराक्रम दीठो पुत्रोंनारे, ॥ नन्दना ॥ पुत्र पितामें मेलरे । मिलियो वचन आगोचरूरे, निन्दना।। दुधे साकर भेलरे ॥ नन्दन ||८|| निरखी हरखी जानकीरे नन्दना।। वात पडी सहु ठाम रे । वा हड़ी गई निज थानकेरे, नन्दना।। वैसी विमाने तामरे ।। नन्दन ॥ ९॥ सरखा पुत्र शोभियारे, निन्दना॥ थी लक्ष्मणजी राम रे । इन्द्र तणे घर ऊपन्या रे, ॥नन्दना॥ जयन्तक अभिराम रे ॥ नन्द- न० ॥ २० ॥ सरखा सुत छे कोई नारे ॥नन्दना॥ असरखारे अ- नेक रे । गाली देवाडण हारजीरे ॥नन्दना॥ जश बाला को एकरे ॥ नन्दन० ॥ ११ ॥ भामण्डलजी भाखीयूरे ॥नन्दना॥ ए नृपने सुपसायरे । ए तुम रसरंग देखीयोरे ॥नन्दना।। सु सन्मान्यो रायरे ॥ नन्दन० ॥ १२ ॥ भामण्डल जेम वाल्होरे ॥नन्दना ॥ महारो तो छ तेमरे । खीर नीर ज्यूं मिली रयोरे नन्दना॥ नृप झू प्रभुने प्रेम रे ।। नन्दन० ॥ १३ ॥ वेसी विमाने विराजता रे नन्दना ।। लक्ष्मण राम उच्छाहीरे । आगे बैठा पुत्रजीरे नन्दना । आवे नगरी मांहीरे ।। नन्दना० ॥ १४ ॥ ऊंची निवाये लोकजीरे ॥नन्दना।। मिलीया ख्याले आयरे । मुख मुख जय उच्चरेरे ॥ नन्दना ॥ धन्य धन्य राघव रायरे ।। नन्दन ॥ १५॥ उतरिया विमानथीरे नन्द- ना।। आवीने दरवाररे ।। ओच्छच मांड्यो अति घणोरे । नन्दना।। घर घर मंगलाचाररे ।। नन्दन० ॥ १६ ॥ नोवत वाजे नाद संरे ॥नन्दना।। नाचे पात्र अपाररे ॥ जड मंडिने वरसिया रे ॥ नन्दना।। वरस्या कंचन धाररे ॥ नन्दनः ॥ १७ ॥ लक्ष्मणजी सुग्रीवजी रे निन्दना।। विभीषण हनुमान रे । अंगद आदि सहु मिली रे ॥न- न्दना।। विनवियो राजानरे ।। नन्दन ॥ १८ ॥ राज-वियोगे पुत्र w+N श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड। (४०१) {रे ।। नन्दना । दिनकाट्याथा मानरे । परदेशों में एकलीरे नन्दना । रयणी छमासी जानो ॥ नन्दन ॥ १६ ॥ पतिने पुत्र वियोगिणीरे ॥ नन्दना ॥ योगिणी जेबी जोयरे ।। मरीजासे साटल बलीरे।। नन्दना ॥पातिक म्होटो होयरे।। नन्दन ॥ २० ॥ इहां लेईआचीयेरे ।। नन्दना ।। पामी प्रभु आदेशरे ॥ आगे इच्छा रावलीरे ॥ नन्दना ॥ पंचवाक्य सुविशेषरे ॥ नन्दन ।। २१ ॥ भाग्वे गघव राजीयोरे ॥ नन्दना ॥ बोलायीने कमरे॥ नन्दन ॥ ॥ २२॥ तेपक राधेश्याम रामायणमेसे--- रघुपतियोले-सीयामे पृथकन होगा राम । किन्तु करेगा वहनहीं, प्रज्ञा विरोधी काम ।। संमार सहश्रो रूपरचे. पर मुझको डिगानहीं सकता। नमामी चाहतोमुझको, इमहठसे हटानहीं मकता ॥ मेरी इसमें कुछरायनहीं, यहमर रंगत की मन है। जिसने उनकोवन भेजावह. महलोंमें फिर रस मफती है ।। बान्मीकिजीनेकहा, धन्य तुम्हें श्रीफन्त । दिसादिया संसारको, प्रज्ञा-प्रेमकाअन्त ।। मेगतो सम्मनियही. करोन माफाम । जिसके द्वारा विशमें, रघुलहो बदनाम । बहुमनसे होकरके विरुद्ध राजाका चलना ठीसनहीं । जपप्रज्ञा सिलाफ होरहीहै, तो सियाका स्पना नहीं । अच्चा र प्रथम प्रजासाठी. अजान मिटाया जायेगा। निम दपंप धुंधलापनो. उसको ननझाया जायेगा। इनने में ही सिंदचन्, गई परन हमार ! पोले मुनिमहागा है भाने श्रेय विचार । में सरथ पूर्वक रुदनाह दादो मिदागा। फिर महलोंने अपनी मां को अपने स्टो पहजागा (४००) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । शत्रुघ्न पगे लागतारे नन्दना।। आलिंगिन अधिकार रे ॥ लवणा- कुश पाय नमेरे, निन्दना।। ताम सहु परिवाररे ।। नन्दन० ॥६॥ दोई पक्षना राजीयारे, नन्दना।। माहोमांहे उच्छाहरे ॥ होवे रंग विनोदजीरे । नन्दना।। जाणे मांड्यो विवाह रे ।। नन्दन०॥७॥ पराक्रम दीठो पुत्रोंनारे, ॥ नन्दना । पुत्र पितामें मेलरे । मिलियो वचन आगोचरूरे, निन्दना।। दुधे साकर भेलरे ॥ नन्दन ॥८॥ निरखी हरखी जानकीरे नन्दना।। वात पडी सहु ठाम रे । बा हुड़ी गई निज थानकेरे, नन्दना। वैसी विमाने तामरे ॥ नन्दन० ॥९॥ सरखा पुत्र शोभियारे, ॥नन्दना।। थी लक्ष्मणजी राम रे । इन्द्र तणे घर ऊपन्या रे, ॥नन्दना॥ जयन्तक अभिराम रे ॥ नन्द- न० ॥ १० ॥ सरखा सुत छे कोई नारे ॥नन्दना|| असरखारे अ- नेक रे । गाली देवाडण हारजीरे ॥नन्दना॥ जश बाला को एकरे ।। नन्दन० ॥ ११ ॥ भामण्डलजी भाखीयूरे ॥नन्दना॥ ए नृपने सुपसायरे । ए तुम रसरंग देखीयोरे ॥नन्दना। सु सन्मान्यो रायरे ॥ नन्दन० ॥१२ । भामण्डल जेम वाल्होरे ॥नन्दना ॥ महारो तो छ तेमरे । खीर नीर ज्यूं मिली रयोरे नन्दना॥ नृप झू प्रभुने प्रेम रे ॥ नन्दन० ॥ १३ ।। वेसी विमाने विराजता रे नन्दना ।। लक्ष्मण राम उच्छाहीरे । आगे बैठा पुत्रजीरे नन्दना । आवे नगरी मांहीरे ।। नन्दना० ॥ १४ ॥ ऊंची निवाये लोकजीरे |नन्दना।। मिलीया ख्याले आयरे ।। मुख मुख जय उच्चरेरे ॥नन्दना ॥ धन्य धन्य राघव रायरे ॥ नन्दन ॥१५॥ उतरिया विमानथीरे नन्द- ना|| आवीने दरवाररे । ओच्छन मांब्यो अति घणोरे । नन्दना।। घर घर मंगलाचाररे । नन्दन० ॥ १६ ॥ नोबत वाजे नाद सूरे ॥नन्दना।। नाचे पात्र अपाररे । जड़ मंडिने वरसिया रे ॥ नन्दना॥ वरस्या कंचन धाररे ॥ नन्दनः ॥ १७ ॥ लक्ष्मणजी सुग्रीवजी रे निन्दना।। विभीषण हनुमान रे । अंगद आदि सहु मिली रे ॥न- न्दना|| विनवियो राजानरे ।। नन्दनः ॥ १८ ॥ राज-वियोगे पुत्र श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सएड। (४०१) झूरे ॥ नन्दना ॥ दिनकाट्याथा मातरे ॥ परदेश में एकलीरे नन्दना । रयणी छमासी जानो ॥ नन्दन ! १६ | पतिने पुत्र वियोगिणीरे ।। नन्दना ।। योगिणी जेहवी जोयरे ।। मरीजासे साटल बलीरे॥ नन्दना ॥पातिक म्होटो होयरे॥ नन्दन ॥ २०॥ इहां लेईावीयेरे ।। नन्दना । पामी प्रभु आदेशर ।। आगे इच्छा रावलीरे ॥ नन्दना ॥ पंचवाक्य सुविशेषरे ॥ नन्दन ।। २१ ।। भाग्वे राघव राजीयोरे ॥ नन्दना ॥ बोलायोजे कमरे ।। नन्दन ।। ॥ २२ ॥ क्षेपक राधेश्याम रामायणमेसे- रघुपतियोले-सीयाने पृथकन होगा राम ! किन्तु करेगा वह्नहीं, म निरोधी काम ।। संमार महश्रो रूपरचे. पर मुझको डिगानहीं सकता। ब्रह्माभी चाहेनोमुझको, इमहठसे हटानहीं माना ।। मेरी इममें कुछरायनहीं, यहमा रैयत की मन हे । जिसने उनकोचन भेजावह. महलोमें फिर ग्स सकतीहै ।। वाल्मीकिजीने कहा, धन्य तुम्हें धीरुन्त । दिसादिया संसारको, प्रना-प्रेगकाअन्त ।। मेरीतो सम्मतियही, फोन ऐनाफाम । जिसके द्वारा विश्व में, रघुकुलो बदनाम ॥ बहमनसे होकरके विरुद्ध, गनासा करना टीफनहीं। जपप्रज्ञा मिलाफ होरही है, तो सिंगाका सपना ठीकनहीं ।। अच्छा अप प्रथम पजाफाही. अनान मिटाग जायेगा। जिन दपणमें धुंधलापनहे, उनसे नम आगा इतने मेंही सिंहनन्, गः पान मा ! पोले-मुनिमहाराज का, है अनि विचार ।। में ग्राम पूकि कहनाई रह जादो मिटागा। फिर महलों में अपनी गांको, अरने पटरी पहननागा ।
. -- (४००) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। शत्रुघ्न पगे लागतारे नन्दना।। आलिंगिन अधिकार रे ॥ लवणां- कुश पाय नमेरे, निन्दना।। ताम सहु परिवाररे ॥ नन्दन० ॥६॥ दोई पक्षना राजीयारे, आनन्दना।। माहोमांहे उच्छाहरे ॥ होवे रंग विनोदजीरे । नन्दना।। जाणे मांड्यो विवाह रे ॥ नन्दन० ॥७॥ पराक्रम दीठो पुत्रोंनारे, ॥ नन्दना ॥ पुत्र पितामें मेलरे । मिलियो वचन आगोचरूरे, निन्दना।। दुधे साकर भेलरे । नन्दन ॥८॥ निरखी हरखी जानकीरे ॥नन्दना।। वात पडी सहु ठाम रे । बा हुडी गई निज थानकेरे, नन्दना।। वैसी विमाने तामरे ॥ नन्दन० ॥९॥ सरखा पुत्र शोभियारे, नन्दना॥ थी लक्ष्मणजी राम रे । इन्द्र तणे घर ऊपन्या रे, आनन्दना॥ जयन्तक अभिराम रे ।। नन्द- न० ॥ १० ॥ सरखा सुत छे कोई नारे ॥नन्दना।। असरखारे अ- नेक रे । गाली देवाडण हारजीरे ॥नन्दना॥ जश याला को एकरे । नन्दन० ॥ ११ ॥ भामण्डलजी भाखीयूरे ॥नन्दना॥ ए नृपने सुपसायरे । ए तुम रसरंग देखीयोरे ॥नन्दना।। सु सन्मान्यो रायरे ॥ नन्दन० ॥ १२ ॥ भामण्डल जेम वान्होरे नन्दना ॥ महारो तो छ तेमरे । खीर नीर ज्यूं मिली रयोरे नन्दना॥ नृप झू प्रभुने प्रेम रे ॥ नन्दन ॥ १३ ।। वेसी विमाने विराजता रे नन्दना ।। लक्ष्मण राम उच्छाहीरे । आगे बैठा पुत्रजीरे नन्दना । आवे नगरी मांहीरे ।। नन्दना०॥ १४ ॥ ऊंची निवाये लोकजीरे निन्दना।। मिलीया ख्याले आयरे ।। मुख मुख जय उच्चरेरे ॥नन्दना ॥ धन्य धन्य राघव रायरे ॥ नन्दन ।।१५॥ उतरिया विमानथीरे नन्द- ना।। आवीने दरवाररे । ओच्छय मांड्यो अति घणोरे । नन्दना।। घर घर मंगलाचाररे ।। नन्दन० ॥ १६ ॥ नोवत वाजे नाद संरे ॥नन्दना।। नाचे पात्र अपाररे । जड मंडिने वरसिया रे ॥ नन्दना॥ वरस्या कंचन धाररे ॥ नन्दनः ॥ १७ ॥ लक्ष्मणजी सुग्रीवजी रे निन्दना।। विभीषण हनुमान रे ॥ अंगद आदि सहु मिली रे |न- न्दना।। विनवियो राजानरे ।। नन्दनः ॥ १८ ॥ राज-वियोगे पुत्र Aru -- AN----- -- श्री जैन पद रामायण चतुर्थ लण्ड । (४०१) {रे ।। नन्दना ॥ दिनकाट्याथा मातरे । परदेशोंमें एकलीरे नन्दना ॥ रयणी छमासी जातरे ॥नन्दन ॥ १६ ॥ पतिने पुत्र वियोगिणीरे ।। नन्दना ॥ योगिणी जेहवी जोयरे ।। मरीजासे साटल बलीरे। नन्दना ॥पानिक म्होटो होयरे॥ नन्दन ॥२०॥ इहां लेईावीयेरे ।। नन्दना ।। पामी प्रभु आदेशरे ।। आगे इच्छा रावलीरे ॥ नन्दना ॥ पंचवाक्य सुविशेषरे ॥ नन्दन ॥ २१ ॥ भाग्वे राघव राजीयोरे ॥ नन्दना ।। बोलावोजे कैमरे । नन्दन । ॥ २२ ॥ क्षेपक राधेश्याम रामायणमेसे- रघुपनिनोले-सीयाने पृथकन होगा राम ! किन्तु करेगा वहनहीं, प्रा विरोधी काम ।। संमार महश्रो रूपरचे. पर मुझको डिगानहीं सकता। अमाभी चाइनोमुझको, इमहठसे हटानहीं सकता। मेरी इसमें कुछरायनहीं, यहसर रेंगन की मर्जी है । जिमने उनकोवन भेजावह, महलोंमें फिर रस सकतीहै ।। वान्मीकिजीनेकहा, धन्य तुम्हें श्रीकन्न । दिसादिया संसारको, प्रज्ञा-प्रेगकामन्त !! मेरीतो सम्मनियही, कगेन ऐनाकाम । जिसके द्वारा विश्यमें, रघुकुलदो बदनान ।। बहमनसे होकरके विरुद्ध राजाको चरना ठीकनहीं। अपग्रजा सिलाफ होरहीहै, नो सिधाका रखना टोकनी ।। अच्छा अब प्रधानाकादी. भान मिटाया जायेगा। निस दर्पयो भनापनो, उनको नमकाया जावेगा । इनने में ही मिंदवन, गई पान कुमार । बोल मुनिमहाराजका है अति र रिचार ।। में अपय पूर्वक बताई कह दो मिटागा ! फिर नदीने अपनी मां का एक पर चाकंगा।
(४०२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । कानोंकी सुनी नहीं, आंखोंकी देखीहुई सुनाऊंगा। उस सोतीहुई अयोध्याको, सीताका ज्ञान कराऊंगा ॥ फिरभी विश्वास न होगा तो, रैयतसे रनठन जायेगा। यह सहन शक्तिवाला हनुमत्, वस रुद्र-रूप बनजायेगा । पृथ्वी आकाश विलोकेंगे, उस समय कर्म इस सेवकका । ब्रह्मा और शंकर देखेंगे, उस समय धर्म इस सेवकका ॥ तामसी प्रकृतिका दुनियां से, अस्तित्व मिटाया जायेगा । सद्गुण की सामग्रीसे फिर, संसार वसाया जायेगा । यह जीवन सुफल तभीहोगा. यहओंखें सुखी तभी होंगी। जब सीतापति की वामांगी, कोशलकी साम्राज्ञी होंगी ।। वचनों से वजरंगके, दहल उठा संसार । हुआ तामसी प्रकृतीमें, भीषण हाहा कार ।। सुन वजरंगी का यह प्रण. वीरोंके हृदय फडक उट्टे ॥ अनुमोदन को बच्चों के भी, तर्कश मे तीर कडक उद्धे । सीयापति की इतने पर भी, वह दिव्य मूर्ति मुसकाती थी। घटनाकी घटा वरसतीथी, सूरज पर वृंदन आतीथी । ढाल मूलगी- भाखे राघव राजीयोरे ॥ नन्दना ॥ वोलावीजे कमरे । जन-अपवाद मिट्योनहींरे ! ॥ नन्दना ॥ तुमपण जाणोएमरे ॥ नन्दन॥ २२ ॥ हूंजाणूं सीता सतीरे ।। नन्दना ॥ सापण जाणे आपरे । दिव्य कियां सघलों मिटे रे ॥ नन्दना ।। लोक वचन सन्ताप रे ॥ नन्दन ॥ २३ ॥ सर्व लोकनी साखरे ॥ नन्दना ।। दिव्य कराऊं देवरे । मुंहडो फिर से लोकनोरे ॥ नन्दना ॥ साच लह्यां तनखेव रे॥ नन्दन ॥२४॥ भलू २ भूपे भण्यूरे ॥ नन्दना ॥ नगरी बाहिर जायरे । मण्डप मांड्यों मोटकोरे, ॥नन्दना ।। मंचक बहु मण्डायरे ॥ नन्दन ॥ २५ ॥ आवी बैठा राजीयारे ॥नन्दना।' विभीषण सुग्रीव रे । भूचरने खेचर सहुरे ॥ नन्दना ॥
श्री जैन पद रामायण चतुथ खण्ड। (४०३) -nnn आया जंगम जीवरे ॥ नन्दन ॥ २६ ॥ पुरी अयोध्या ए सहुरे ॥ नन्दना ॥ ते डाव्या सहु लोकरे । साच दियां लोगों खरूरे !! नन्दना ।। ज्यू फिरी नवि करे खोकरे ॥ नन्दन ॥ २७ ॥ प्रभु आदेशे चालीयोरे ।। नन्दना ॥ कपिपति लेवा तास रे । पुण्डरीक पुरी आवीयोरे ॥ नन्दना ॥ आणी अति उल्हास रे ।। नन्दन ॥ ॥२८॥ पग प्रणामी सीता तणारे ॥ नन्दना || तेम करे अरदासरे पुरी अयोध्या आयके रे ।। नन्दना ॥ सफल करो हम आशरे ।। नन्दन ॥ २९ ॥ पुष्पक नामे विमान ए रे ।। नन्दना ।। मोकल्यो रघुनाथ रे । मतूं करीने मोफल्यो रे ।। नन्दना ॥ एहूं मघले साथ रे ।। नन्दन ।। ३० । आज लगे समियुन थोरे ॥ नन्दना ।। अ- रण्ये नज्यान दुःख रे । बलि फिस्य करसे प्रभु रे ।। नन्दना ।। सय स्वामीनं सुखरे ॥ नन्दन ।। ३१ ।। मुनि श्रीरूपचन्दजी कृत टाल क्षेपक तर्ज पन्नजी मृडे बोल । माता जलदी चाल. चाल चाल बनिता कावासी वाट उडीहोर।। जन अपवाद थकी प्रभु थोने, काह दिया घर पारे हो। तो पिण अनुपम प्रेम केम, रघुनाथ विसारे हो । माना० ॥१॥ चिरह तुम्हारे कृश तन वोर, कारे मुख प्रभु हेगा हो। पां चिन तजसी प्राण जानमन, होटो भोगा हो ।। माता०॥२॥ थारी याद में लापजी को, मुप पंकन हुगलाणो हो। दर्शन प्यासी निन रहे उदामी, करुणा आगो हो । माना ||३|| साच कई माजीसा यां गिन, दिसे अयोध्या सुनीदी। आप आने में रंगरली होसी, निन दूनी हो ।। माना० ॥ ४ ॥ कपिपत्ति कहे कर जो मिया रो. रघुपनि मुदाने भेगा दो। अपुरी नालन नाकारो मन दल्यो हो । माना० ॥ ५ ॥ दाल मूलगी---- पुनरपि कपिपनि गीलवरे, ॥ नन्दना ।। शुद्धिकर या हारे । पुलाच्या रे तुम प्रमुरे ॥ नन्दना । गानाले गरे ।।३२॥ एम सुपी हरकी परीरे नन्दना ।। पांधी पसारे ।
(४०४) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । बैसोने विमानमेंरे ॥ नन्दना || आगेगई तबमातरे ॥ नन्दन । ॥ ३३ ॥ माहेन्द्रोदय वागमेंरे । नन्दना ॥ उतारीयु विमानरे । लक्ष्मण जई पगे लागीयोरे ॥ नन्दना ॥ पगेलाग्या नृप आनरे ॥ नन्दन ॥ ३४ ॥ आगेसी विनवेरे ॥ नन्दना ॥ घेर पधारो आ जरे । ए घरएपुर थाहरोरे ।। नन्दना ।। एथारोसहु राजरे ॥ नन्दन ॥ ॥ ३५ ॥ सतीकहे वत्स? साचएरे ॥ नन्दना ॥ पहिली करिसूं शुद्धिरे । पाछे जाणे केवलीरे ॥ नन्दना । जेउपजसे बुद्धिरे ।। नन्दन ॥ ३६ ॥ ए सघरों मम्भलाव्युरे ॥ नन्दना || राघवजीने आपरे ॥ सतीकने प्रभु आयकेरे ॥ नन्दना ॥ बोलेसीधा न्याय रे 1) नन्दन ॥ ३७ ॥ रावण साथे रागनोरे ॥ नन्दना ।। न हुवो छे लवलेश रे । धीज को धृति आदर्गरे । नन्दना । देखे लोग अशेप रे ।। नन्दन ॥ ३८ ।। हसी चोली तब जानकी रे |नन्दना ॥ प्राण नाथ ? अवधार रे । तुम्ह थी शाणो कौण छेरे ॥ नन्दना ॥ न करो काम विचार रे । नन्दन।।३९॥ वात कहन्तां विरचिया रे ॥ नन्दना ॥ लवणांकुश ना तात रे || ओछोतो ओ- छी करेरे || नन्दना ॥ पूरा पूरी बात रे ॥ नन्दन ॥ ४० ॥ झूठी जाणो छो मने रे, ॥ नन्दना ।। तो पहेलां द्यो दण्ड रे । पाछे करसं हूं सही रे, ॥ नन्दना ॥ धीज तणी पगमण्ड रे ॥ नन्दन । ४१ ।। राम कहे भद्रे ? सुणोरे ।। नन्दना ।। मैं नवि जाणी खोड ।। अवही जाणूं छू नहीं रे ॥ नन्दना || लोक करे मुखमौड ॥ नन्दन ॥ ४२ ॥ तेहथी ए मुझ ऊपनीरे ।। नन्दना ॥ उतारवा तुझ भार रे ।। दिव्य करो सह देखता रे, ॥ नन्दना ॥ साचे सह नो प्याररे । नन्दन ।। ४३ ॥ युक्तिवात कहे जानकोरे, निन्दना। दिव्य१ करूं हूं पंचरे । अग्नि में डाकी पडू रे ॥ नन्दना ॥ १ दिव्य-दिव्यज-अर्थात् धीज, मनुष्य अपराधी है निरपराधो-इसक परीक्षा के लिए पांच उपाय हैं। १ तुला = २ अग्नि = ३ जल = विप= ५ कोश । %3D J ro - श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सएड। (४०५) करूं को खल मंचरे ॥ नन्दन ॥ ४४ || चारल? ने चायूं महीरे ॥ नन्दना ॥ पिऊ२ तातो कोश रे । जीभेरे साहूं फालीयारे । न- न्दना ॥ चढू४ तुला ए सरोस रे ।। नन्दन ॥ ४५ ॥ इणमे जो तु. मने गमेरे ॥ नन्दना ॥ सोर्ड करो पर सादरे । शंका कोई मति आणजोरे ॥ नन्दना ॥ मुझने एह अल्हादरे ॥ नन्दन ।। ४६ ॥ सिद्धारथ ऋपि रायजीरे ।। नन्दना ॥ अन्तरिक्ष भामन्तरे । मतिरे वरांसो रामजीरे ॥ नन्दना ॥ दवावी दागन्तरे ॥ नन्दन ।।४७|| लोक सहु प्रभु आगलेरे।। नन्दना ॥ कर विनती आधीरे । सी- ताजी म्होटी सतीरे ॥ नन्दना ॥ शील तणे सुप्रभावीर निन्दन।। ४८॥ कहो तेही कीधो सहीरे नन्दना ॥ जगमें एही कहायरे।। रहे वाद्यो ए कामनेरे ॥ नन्दना ॥ समजी राघव रायरे ॥ नन्दन ॥ ४९ ।। हूतो समज सहीरे ॥ नन्दना ॥ मीता के निर्दीप रे ॥ दोप चहान्यू छो तुम्हेंरे ॥ नन्दना ॥ मुझने ए अफगोमरे नन्दन।॥५०॥ मीटा मुखड़ा आगरे । नन्दना ।। कड्या तुम पर पूटरे । पंचों में परमेश्वर नन्दना । चान पड़ी एअटरे ।। नन्दन ।। ५१ ।। कूर्म बिहानी परेरे ॥ नन्दना ॥ पद तुम्दारी जीरे । सिण मांही खिण चादीररे ॥ नन्दना !! आतुर पढ़े अपी हरे॥ नन्दन ॥ ५२ ।। काल फर्ग तुम भावसार । नन्दना ।। सीना छ सकलंकरे । म मन राम्य मामीन रे ।। नन्दना ।। किहां गयूंछ शंकरे ।। नन्दन ।। ५३ धान करावी लाकरो रे ॥ नन्दना || आज कर सामाचरे । नाच पड़ो मंमार मारे नन्दना ॥ मणि नधि धारे हाचरे नन्दना द्वाप नीनमानी सणीरे ॥ नन्दना ।। लारी नहडा शहारे । पुरा दो .टी . ॥ नन्दना । इन्धन नन्दन र ! नन्दन ।। ५५ ।। १मा : २६पाया ग) = ३. नासा को हाय में जाना ओम कारन = नग पर (ITRA - (४०६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। पत्तावनमीं ढालमेंरे ॥ नन्दना ॥ राघव थाप्यो धीजरे ॥ केशराज त्य-शीलथीरे, ॥ नन्दना ।। साच साचनं वीजरे ।। नन्दन ॥५६।। दोहा केदाररागे:- गिरि वैताये जाणिये, उत्तर श्रेणि मझार | हरि विक्रम वड राजवी, जय भूपण सुतसार ॥१॥ अठोत्तर शत कुंवरी, परणावी राजान । सुख भोगवतां आवीयो, मोह तणो अवसान ॥ २॥ मातुल-नंदन "हेमशिखर", किरण मण्डला नार ॥ वे मरजोद विलोकतां, वात पड़ी सुविचार ॥ ३॥ काटी दिधी कामिनी, आपण संयम धार । 'विद्युत् दृष्ठा' नाम थी, राक्षसणी थै ते नार ॥ ४ ॥ अयोध्याना उद्यानमां. ऋपि प्रतिमा प्रतिपन्न । राक्षसणी उपसर्ग थी, निश्चल राख्यो मन्न ॥ ५ ॥ साधु हुओ ते केवली, ओच्छच करवा काज ! इन्द्रदिक बहु देवता, आवी अधिक विराज ॥ ६ ॥ अवसर देखी धीजनो, देव दया पर प्राही । हरीजी साथे वोनवे, जोर बहे जग माही ।। ७॥ ज्ञानीजी निश्चल लहे, सीता सती अपार । दग्धे छे अवलाभणी, मूर्ख लोक गंवार ॥ ८ ॥ सीता सानीध्य? कारणे, अनीक२ पति अभिराम | मूकी हरि३ आपण करे, केवल ओछय काम ॥ ९ ॥ १सहायता, २ सेनापति, ३ इन्द्र दोहा के पहीली गाथा से लेकर नवमी गाथा तक का स्फस्टार्थ यह -कि हरि विक्रम राजा का पुत्र जय भूपण की किरणमंडला नामक त्री अपने मामा का पुत्र हेमशिखर के साथ ग्रासक्त थी। इस बात की जयभूषण को मालूम पड़ते ही अपनी स्त्री (किरणमंडला) को देश नकाला दे दिया । वह स्त्री मर कर विद्य दृष्ठा नाम की राक्षसणी हुई। और जयभूपण दाक्षा लेकर फिरते २ इस समय में अयोध्या के उपवन - Nrv श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । (४०७) रामतणा आदेश थी, दीयां काट धगाय । मिली रही ज्वाला बली, देख्यों ही न विजाय ॥१०॥ सीता-पायक? पारवती, आधी एम भासन्त । चीत राग अज साधु सुर, आप साखी राखन्त ।। ११ ॥ लोक पाल मह सांभलो. सूर्य चन्द्र बड़ देव । दिवस निशाना साखिया, तुम जाणो सहु भेव ।। १२ ।। मने करी वचने करी, काया ए करी जोय । जागत ने सोवन विणे, राम टाली नर कोय ॥ १३ ॥ जोको मैं वांग्यो हुवे, चाली करो मुझ छार । वैश्वानर जग सासीया, एह अछो तुमचार ।। १४॥ नहीं तर तूं पाणी हुजे. एम कही ततकाल । श्री नमोकारही सुमरती. डाके पड़िसा बाल ॥ १५॥ पड़तांही पहीली थई, अग्नि फिटी बार । निर्मल पाणी भरी, शील रणे सुप्रभाव ॥ १६ ॥ डाल क्षेपक तर्ज प्रलल्लानीः झल झलती मिलती घणारे लाल, शालो झाल अपाररे । सुजाण सीना । जाणे केस फूलीगा रे लाल, गना पेर अंगाररे । मुनाण मीता ॥१॥ धीज करे म्होटी मनीरे लाल ॥टेर ।। शील नणे परमाणरे ।। सुजाण मीना । लामण गम निहां बडारे लाल, गि- लीया राणो राणरे ॥ गु०॥ धोज ॥२॥ म्नान करो निर्मल जलेरे लाल. पावक पाने आपरे । मुजाण मीना । अभी जाणे दे- गांगनारे लाल, विगणो रूप दिसागरं । मु० पीन ॥३॥ ना में पारर 'फायोग्गन फिला ! यह रामली मार मुनि को या उप- नादिया । गुनि स्थिर रहे । भनिन्य नाचना माद के हर बार की प्राप्ती हुई। शनोनीलिये इन्दादिका आना हा 'पाप्रा में इन्टनेने मेलापन को माना कामा माप साल का मारा।
(४०८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । नारी मिलिया घणारे लाल, ऊभा बहु अकुलायरे ।।सुजाणसीता।। भस्म होसी इण आगमें रे लाल, राम करे अन्यायरे ॥ सु०॥ धीज ।। ४ ।। राघव विन वंछयो हुवेरे लाल, सुपना में नर कोपरे । सुजाण सीता । तो मुझ अग्नि प्रजालजोरे लाल, नहीं तर पाणी होयरे ।। सु० धीज ॥ ५॥ इम कही बैठी आगमेरे लाल, तुरत थयो अग्नि नीररे ॥ सुजाण सीता ।। जाणे द्रह जल से भरयो रे लाल, झूले मन धर धीर रे ।। सु० ॥ धीज ॥ ६ । ढाल मूलगी क्षेपक अग्नि मिट पानी जद होवे, लोक सब दश दिश ही जोवे, कलंक को बीज ही खोवे । कहो अब किणरो हे मूडो, करेगो सीता को मँडो । सत्यव्रत पालो ॥ १०२ ॥ प्रथमतो वातां जे ऊठी, वेतो सब आज हुई झूठी, इन्हीं पर शोकोंही रूठी । सीता है बिलकुल ही साची, सत्य अरु शील माही राची ॥ सत्य० ॥ १०३ ॥ ढाल अठावनमी-तर्ज नायकानी सिंहासन जल ऊपरेरे, ते उपर सा जायरे ॥ सीता ॥ हंसी ज्यूं पंकज उपरेरे, बैठी शोभा पाय रे ॥ सीता ॥१॥ सत्यवती साची सतीरे लाल टे। साचो जेहनो शीलरे सीता।। सुरवर सानिध्यकारीयारे लाल, शीलथकी अति लीलरे।सीता!॥२॥ अग्नि { ज्याला आकरी रे, धग धगता अंगाररे ।। सीता ।। सीताने शोले करी रे. सलिल हुआते सार रे ॥सीता सत्य०॥३॥ अर्ण वावर्त नामथीरे, चोखू छे ते चाप रे ।। सीता ।। सीताने शोले करी रे, राम चहोड़ियूं आपरे सीता|सत्य ||४|| हनुमन्त उदधि उलधियो रे, भंजिओ वर उद्यान रे । सीता ॥ सीताने शीले करी रे || सीजायो राजानरे ।। सीता सत्य०॥५॥ पत्थर पाणी ऊपरेरे । तारचिया श्रीराम रे || सीता ।। सीताने शीले करी रे, सरिया पंछित कामरे सीता| सत्य० ॥६॥ शक्ति प्रहारे ना मूओरे, सौमित्रीजी सोई रे ।। सीता ॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४०६) देवेने बलि दानवेरे. रावण तो न मराय रे ।। सीता ॥ सीताने शीले करी रे, मारि लियो सोई राय रे।। सीता ।। स० |८|| त्रिकोटी लंका पुरी रे, किहांहीन लगाव रे ।। सीता ।। सीताने शीले करी रे, लिधी विन उपाच रे ॥ सीता । स० ॥९॥ राम तजाई अरण्यमें रे, जिहां न आशा कोईरे |मीना ॥ सीताने शीले करीरे, रान विलावल होईरे ॥सीता॥ सत्य १०॥ पुत्र पनोता ऊपनारे, दोई ते सम नोल रे ॥सीता।। सीताने शीले करीरे.निका ते निरमोल रे ।। सीता।। सत्य ११।। लक्ष्मण जाई अड्यारे, तो नहीं पाम्या हागरे ॥सीता॥ सीताने शीले करीरे. सुराधा संमाररे ॥ सीता ॥ सत्य १२॥ पियरियो ने सासरियोरे. उज्याल्या कुल दोईरे ।। मीता ।। उज्माल्या पियु रामजीगे, अपकीर्ति मल धोई रे।। सीता ।। स०१३।। गुल २ शब्द सुदामणारे, कोई कर हूं कार रे ।। सीता ।। कोई भम्भाएभलारे, कोई जय २ कार रे॥सोना।। मत्य १४॥ कोई खल २ सांतमंरे, कोई दिल २ देवरे ।। सीना।। विविध प्रकारे चेष्टाए रे, देव करे नतसेपरे सीता सत्य १५ !! धौ ३ नादरे, बाजे मधुर मृदंगरे । मीना ।। ताल स्वर उपांग मेरे, होई रयो रसरंगरे।। मीना।। सत्य १६ ॥ कोई वजावे यांमली रे, कोई बजाये वीणरे।। मीना ।। तान रुमान अनुमानरे, होई गया लपलानरे। सोनाम०१७॥ कोई अलापं रागने रे, कोई मुरती घान्तरे । मोना ।। नावे नाम पागंगनारे, २ शन्द करन्नो सोना । मस्य १८|| चापीनं जरा वाधियो रे, जग मायर होला । मीना !! पगा दिशा चारमा रे, करलो अधिोलरे ।। मोना न० १९॥ मांना नाम नणावतारे, लाग्या नादा लोग माना। बनाया जाना रे, जागी बसनो जोगरे योगानन्य २० । विद्याधर ने वेगनरे, गाममा ने नासरे नीला।। पाणीनो र पामकेर, ना अनि गासागरे । मीना न.२१॥
கூட் . श्री बैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४११ ) अटवी माहे मेलतारे, सम्भल्यो नहीं सोचरे ॥सीना०॥सत्य०॥३४॥ सुप्रभावथी सुधारे, ताहरा सघला काजरे ॥ सीता॥ छेलू दुःखए मैंदियूरे, आगतणूता आजरे सीता।। सत्य ॥ ३५ ॥ इत्यादिक एतूंखमेरे, म्हाराअति अपराधरे ॥ सीता ॥ आपसुधारी आपणीरे, धन्य मानव भवलाधरे।। सीता ॥स० ॥३६ सीता भाखेस्वामीजीरे, काईकरो विखादरे ॥ सीता ।। जेहीमलो जगजाणयोरे. तेसहु तुम्ह प्रसादरे। सीता ।। स० ॥ ३७॥ जन अपवाद निवारवारे, नांखी आगमझाररे ।। सीना ।। हंजीवती ऊगरीरे, नामतणे आधाररे । सीना ॥ स० ॥ ३८ ॥ भूमण्डलनी रेणुधीरे, सूर्यझांखो थायरे । सीता ।। एगुणवाय तणूं घणूरे, रंणूनो नफहायरे ॥ मीता ॥म० ॥ ३९ ।। सापही माथे मींडकोरे, नाजन्तो देखायरे ।। सीना ।। एगुण मंवतणो घणोरे, मिंडकनो नकहायरे ॥सीता।।स०॥४० चैत्रहीमासे कोकिलारे, कूशब्द करायरे । सीता ।। एगुण आंचानोघणोरे, कोकिलनो नफहिनागरे । मोनासि०॥४१ नगर तणातो सालनारे, पाणीजे पूजायरे ॥ मीता ।। एगुण गंगाजी तणोरे, पाणीनो नणीनो नकदायरे ।। मीना स०४२ पारस फरस्यां लोहनरे. कंचन नाम धायर ।। मीता ।। पगुण पारसनो वणारे, लोहतणू नकहायरे । सीता ।। म०। ४३॥ पिपाहतका दिन आदिधीरे, आवतणो दिनदहरे ।। मीना।। नेकीत ना सामीनीरे, वही लगीछ देवरे ॥ नीनाम०॥४४ दुपहिरे राधिपार प्रभुजी धारो नामरे ।। सीना !! नमुरा नापि राखियोरे, एहपरेचा ठामरे । नाना । म० ॥ ४५ ॥ माहगे तारो लोकनोरे, कोन दीसे दोपरे ।। मीना ।। दोरजए का कमेनोरे, करोगगन रोग सीना ॥ परे पधारो ओपनर, पूरा गुमनांगरे । मीना !! भोगशिप भन भारत, पुराना भयोगरे । सीता । म + wrwwwA (४१२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। ढाल क्षेपक तर्ज-नवकार ही मन्त्र बड़ा है। घर चलना तुम्हें जरूरी. कहे राघवजी धर प्यार के टेर ॥ वीती जो वात विसारो, चित्तकी मम चिन्ता टारो, प्रियमान कयोहि व म्हारो, गुण सन्ज नभाव निहार के, मम करो कामना पूरी ॥ घर० ॥ १ ॥ धरलिया जनम धन तेरा, सत्य शील दृढाया गहरा, मन मुदित होगया मेरा, दो झट पट वैन उचार के, नहीं पूरी अयोध्या दूरी ॥ घर० ॥ २ ॥ होगई बात जो हूगी प्रिय ! याद प्रीत कर जूनी, तुम विना अयोध्या सूनी. मेरे अवगुण दूर निवार के, मैं कह छोड़ मगरूरी || घर० ॥ ३ ॥ सब सम्पद सुख को भोगो, झट पट अब चलो ओरोगो, मिटजाय मोर मन शोगो, ( शुभ उदय मिल्यो संयोगो) अब कथन मेरो अवधार के करदो सन माफ कसूरी ॥ घर०||४|| रघुपति कसर नहीं राखी, कही भिन भिन रखीन वाकी, मुनि भयरव इण पर भाखी. आपरगट मध्य पीपार के, धन्य सत्य शील में पूरी ।। घर० ॥ ५॥ ढाल मूलगी-- सीता भाखे स्वामीजीरे, सरियु तुम्ह सन्मानरे । सीता ।। सांयम लेसंसादरोरे, नरजन्म सुख आनरे ।। सीता ।। स०॥४८॥ एमकहीं ऊपाड़ीयारे. स्वहाथे शिरकेशरे । सीता ।। प्रभुजीने पकडावीयारे, जिन नाजेम सुरेशरे । सीता ।। म० ॥ ४९ प्रभुजी तब मूच्छित पब्यारे, नरही शुद्धलगाररे॥ सीता ॥ 'जयभूपण श्रीगुरुमुखरे, लीधो संयम धाररे । सीता ॥स०॥५६ सुव्रता गुरुणीकनेरे, सीखे विविध विशालरे ।। सीता ॥ परम महासुख पामीयूरे मट्यो सहु जंजालरे ॥ सीता ॥ म० ॥५? अट्ठाव नमी ढालमेरे, पटकायिक प्रतिपालरे । सीता ॥ केशराज धन्य एसतीरे, नमिये चरण त्रिकालरे ॥सीता ॥म०||५२ - श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सएड । m-~- -~-- दोहा (धन्या श्री रागे) चन्दन सिंच्योप्रभु, थयो सचेतन जाम। किहांगई सीता सती, राम कहे अभिराम ॥ १ ॥ भोभोभूचर सेचरो,भक्त महाछो भूर । लुंचित-वेशा कामिनी, मेलोआणी हजुर ॥ २ ॥ रेलक्ष्मण ? तेनासुणी, ए सघला ही लोक। हांसोकरेछ . देखी म्हारो शोक ॥३॥ धनुष्यग्रहे रोप भर्यो, लक्ष्मण भासे ताम । ए सहु सेवक स्वामिना, कोण हांसीनो ठाम ।। ४ ।। प्रभुजीजेम सीता तजी, दोपतणो डरआण । तेमसीता संसारए, तज्यो भवभय आण ॥ ५ ॥ प्रभु आगल शिर लोचियूं. जग भूपण गुरु पाम । संयमलीधो सादरो, ममता वनवास ॥ ६॥ जयभूपण प्रभु केवली, आज हुवाछे देव । आपनई ओछपकरो. चरण कमलनी ने ॥ ७ ॥ तिहां अछे सीता सती, बैठी मतियां माहि। दर्शन कीजे देवीनं आपण पे उच्चाहि ॥ ८ ॥ महजपणा में आनीया, राम करे मुविचार । शुभ गुरु पे मंगम लियो, धन्य २ सीता नार ॥ ९ ॥ एम रुही परिवार सं. जयभगत गुरु मंग। आवी पाय प्रणमी करी, देशना गुणी मुनंग ॥ १० ॥ देशना अन्ने पछि, हं हं भव्य जमण ! तुमने नहीं अभव्यता, भद्र! पणे तुम भए । ११ ॥ एदिन भो शिशपांगतो, पामी काल शान ! जन्म जरा भय दाल, मो. तुम दो पुपान ||१२|| मंगम स्नि मिागनि नहीं, नेनो में न लेगार। लहान मागे मोदिनी में दिनलार !! १३६ (४१२ ) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। ढाल क्षेपक तर्ज-नवकार ही मन्त्र बड़ा है घर चलना तुम्हें जरूरी, कहे राघवजी धर प्यार के ॥टेर ॥ बीती जो वात विसारो, चित्तकी मम चिन्ता टारो, प्रियमान कयोहि व म्हारो, गुण सज्ज नभाव निहार के, मम करो कामना पूरी || घर० ॥ १ ॥ धरलिया जनम धन तेरा, सत्य शील दृढाया गहरा, मन मुदित होगया मेरा, दो झट पट बैन उचार के, नहीं पूरी अयोध्या दूरी ॥ घर० ॥ २ ॥ होगई बात जो हूगी प्रिय ! याद प्रीत कर जूनी, तुम विना अयोध्या सूनी. मेरे अवगुण दूर निवार के, मैं कहू छोड़ मगरूरी ॥ घर० ।। ३ ।। सब सम्पद सुख को भोगो, झट पट अब चलो ओरोगो, मिटजाय मोर मन शोगो, ( शुभ उदय मिन्यो संयोगो) अब कथन मेरो अवधार के करदो सब माफ कसूरी ॥ घर०॥४॥ रघुपति कसर नहीं राखी, कही भिन भिन रखीन वाकी, मुनि भयरव इण पर भाखी. आपरगट मध्य पीपार के, धन्य सत्य शील में पूरी || घर० ॥ ५॥ ढाल मूलगी- सीता भाखे स्वामीजीरे, सरियु तुम्ह सन्मानरे ॥ सीता ॥ सांयम लेसंसादरोरे, नरजन्म सुख आनरे । सीता ॥ स० ॥४८॥ एमकहीं ऊपाड़ीयारे, स्वहाथे शिरकेशरे ।। सीता ।। प्रभुजीने पकड़ावीयारे, जिन नाजेम सुरेशरे ॥ सीता । स०॥ ४९ प्रभुजी तब मूच्छित पड्यारे, नरही शुद्धलगाररे । सीता ।। 'जयभूपण श्रीगुरुमुखेरे, लीधो संयम धाररे। सीता॥स०॥५६ सुव्रता गुरुणीकनेरे, सीखे विविध विशालरे ।। सीता ॥ परम महासुख पामीयूरे मट्यो सहु जंजालरे ॥ सीता ।। स० ॥५१ अट्ठाव नमी ढालमेरे, पटकायिक प्रतिपालरे । सीता ।। केशराज धन्य एसतीरे, नमिये चरण त्रिकालरे ।।सीता ॥स०५२ . श्री जैन पद रामायण चतुर्थ सएड । (४१३) दोहा (धन्या श्री रागे) चन्दननं सिंच्योप्रभु, थयो सचेतन जाम । किहांगई सीता सती, राम कहे अभिराम ॥१॥ भोभोभूचर खेचरो,भक्त महाछो भूर । लुचित-वेशा कामिनी, मेलोआणी हजुर ॥२॥ रेलक्ष्मण ? तेनासुणी, ए सपला ही लोक । हांसीकर के हर्पसं. देखी म्हारो शोक ॥ ३॥ धनुष्यग्रहे रोपेभयों, लक्ष्मण भासे ताम | ए सह सेवक स्वामिना, कोण हांसीनो ठाम ॥ ४ ॥ प्रभुजीजेम सीता तजी, दोपतणो डरआण । तेमसीता संमारए, तज्यो भवभय आण ॥ ५ ॥ प्रभु आगल शिर लोचियूं. जग भूपण गुरु पास । संयमलीधो सादरो, समतामं वनवाम ॥ ६ ॥ जयभूषण प्रभु केवली, आज हुवाछे देव । आपलई ओछपकरो, चरण कमलनी सेव ।। ७ ॥ तिहां अछे सीता सती, बैठी मनियां मांहि । दर्शन कीजे देवीनं आपण पे उच्छाहि ॥ ८॥ सहजपणा में आचीया, राम फरे मुविचार । शुभ गुरु पे संयम लियो, धन्य २ मीना नार ॥९॥ एम कही परिवार मुं. जयभूपण गुरु मंग। आवी पाय प्रणगी करी, देशना गुणी मुचंग ॥१०॥ देशना अन्ते पृद्धि, ई भव्य भव्य । तुगने नहीं अभव्यता, भद्र ! Xो तुम भव्य !! ११॥ पहिज भचे शिव पांगतो, पानी काल मान ! . मंचन चिन मिनि नहीं, ने नो में न जाय। जन्म जरा भप दाल मो . तुमपुरण भान ॥१२ ॥ लक्ष्मप सारे मोहिनी , मेंहनत्यवार ।। १३ ॥
(४१४) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड।
ऋपि भाखे चिन्ता नहीं, भोगवी पद वलदेव ।
आपही प्रति बूजसो, जिनमत ए भेव ।। १४॥
विभीपण भाखे भल्लू, सीता रावणे लीध ।
किण कर्मे लक्ष्मण हण्यो, रावण पणे प्रसिद्ध ॥ १५ ॥
भामण्डल सुग्रीव हूं, लवणांकुश ए दोय ।
किसे कमें करी ऊपन्या, प्रभु भक्ता सहु कोय ॥ १६ ॥
ढाल एगुणसाठमी तर्ज- मईड़ा दानी वे।
स्वामी भाखे सयल विचार, दक्षिण भरत अछे भलो !
भाखे स्वामी वे खेमपुरे, नयदत्त वणिक बसे गुण आगलो भा०१
सुनन्दा उदर दोई, नन्दन धुर धनदत्त छ ।
भाखे०वसुदत्त विशेष, याज्ञवल्क्य सुमित्तछे । भा० ॥ २ ॥
तिणही नगर मझार, सागरदत्त वसे सही ।
भाखे गुणधर नामे नन्द, गुणवती कन्याकही ॥ भा० ॥३॥
'सागर दत्ते दीध, धनदत्त ने सा सुन्दरी ।
भाखे जाणी सरखी जोड, लालचतो कोनाधरी ॥ भा० ॥ ४ ॥
रत्नप्रभा तसमात, अर्थ तणेलोभेकरी ।
भाखे शेठअछे श्रीकान्त, तेहने दीधी दीकरी ॥ भा० ॥ ५ ॥
याज्ञवल्क्ये जाणी, जणावी मित्रोंभणी ।
भाखे वसुदत्ते निशिजाई, हष्यों श्रीकान्त ने हणी भा• ॥६॥
श्री कान्ते पणतेह, मारीलियो तब नासतां ।
भाखे एसुधो व्यवहार, विणसे परही विनामतां भा० ॥७॥
'विन्ध्या वनमेंआय, मृगहुआते दोयवे ।
भाखे गुणवंती नोजीव, हुई हिरणली सोयवे ॥ भा० ॥८॥
हरणी केरेहेत, मुआदोई कुरंगवे ॥ भाखे० ॥
सलिया काल अपार, जगमें करतां जंगवे ।। भाखे ॥९॥
सो धनदत्त तैवार, भाई मूओते सांभली ।
भाखे हुओ अधिक उदास, घरथी चाल्यो नीकली ॥ भा०॥१०॥
-~~YAM Nunt -vruN श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४१५) राते लागीभूख, ताम मुनीश्वर देखीया। भाख० भोजन केरेकाम. वारुबचन विशेषीया ।। भाखे ॥ ११ ॥ संग्रह नकरेसाधु. दिनहींतो राने किस्य । भाखें० तुम्ह सरिसाने रात्री, भोजनक्यो मनमें वस्यं ।। भा० ॥१२ प्रतियोधाणो सोई, श्रावक हुआ साचलो। भाखे स्वर्ग सुधर्मे देव, आगेकी अब सांभलो ।। भा०॥ १३ ॥ महापुर नगर मझार, मेरु सेठ प्रिया धारणी । भाखे० पद्मरूचि सुत सार, श्रावक मतिसुस कारणीभा०॥१४॥ एकदिन गोकुल जात, पड़ियो वृषभ विलोकीयो । भाखे० दयातणो मतियाणो. मंत्र राज तेहने दियो। भा०||१५|| छत्र छाय नरेन्द्र, श्रीदत्ता उदर ऊपन्यो । भाखे वृपभध्वज अभिधान, नन्द निरूपम नीपन्यो|भा०॥१६॥ कुंवर करतो केली, आयोहियाने चालो । भासे० जिहां मूओछेवेल, देखी ऊपज्यूं मनरली ॥ भा० ॥२७॥ जानिस्मरण पामी. ताम करावे देहगे। भासे० उपकारीनेहित, कुंवर कुंवर रोहरो। भा० ॥ १८ ॥ भीतालेख्न रूप, बद्ध यूपभनो नामवे । भासे० सेठही रूपअनूप, जेमओ योकामये ।। भा० ॥ १९ ॥ पलाणीयो हयएक, नेपासे रानीयो। आरक्ष नरने एह, भूपनिने नुन भागीयो । भ० ॥ २० ॥ एहना रूपनो जाग, महारी पाले आगो । भास कर तस उपकार, फियोगुणनो मानो । मा० ॥ २१ ॥ एमकही घरेज्ञाय, एटने संठ पधारीयो । भासेगोकुल मांहीवान, पररूची अमारीया ॥ मार ॥ २२ ।। भीते आलेख्यू जे निय. देसी शिमर पामीयो। भावे भारती लही शुद्ध पारण आयो बानीयो । नाग २३॥ पूछे भासे लेट. म्हात या काम।
(४१६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । भाखे० कुंवर करे परणाम, आप प्रकाशो नामवे ॥ भा० ॥ २४ ॥ प्रभुजी तुम्ह सुपसाय, पायो पद अभिरामवे । भाखे० तूं मेरा गुरुदेव, तुझडूं करूं सलामवे ॥ भा० ॥ २५ ॥ भोगविए ए राज्य, तुम्हारो आपीयो। भाखे० पुरमांही बडवीर, आपसमो कर थापीयो । भा० ॥२६॥ सेठ अने सुकुमार, श्रावक ना व्रत पालवे । भाख० स्वर्ग दूसरे देव, विलसे सुख चिरंकालवे । भा० ॥ २७ ॥ गिरि वैताढ्य विख्यात, नगरी नन्दावर्तये | भाखे नन्दीश्वर अभिधान, राजा राज्य करन्तवे ॥ भा० ॥ २८ ॥ पारूचि सो देव, करतो अति आनन्द वे । भाखे० ० कनक प्रभानी कूख, नन्दन नयनानंदवे ॥ भा० ॥ २९ ॥ राज्य करी व्रत लीध, स्वर्ग पंचमें जायवे । भाखे० पूर्व विदेह मझार, क्षेमा नगरी आयो । भा० ॥ ३० ॥ विपुला वाहन राय, नारी पौमावे उदरे । भाखे० श्री चन्द्र नरेन्द्र. राज्य तणी पदवी वरे ॥ भा० ॥ ३१ ॥ गुप्ति समाधी समीप, संयम लीधो सादरो । भाखे० ब्रह्मलोकनो देव, होई आयो पाधरो ॥ भा० ॥ ३२ ॥ ए अष्टम बलदेव, देवे सेव्या सदैव वे। भाखे० वृपभ ध्वजनो जीव, राजाए सुग्रीववे ॥ भा० ॥ ३३ ॥ जे हुतो श्रीकान्त, भव में भमियो भूरीवे । भाखे० पाटणकन्द मृणाल, होई पुण्य अंकूरखे ॥ भा० ॥ ३४ ॥ वन सुकण्ठ नरेश, हेमवती नो जाईयो । शम्भू नाम लहन्त, साजन मन भाईयो । भा० ॥ ३५ ॥ हुतो वसुदत्त, हुओ शम्भू भूपनो। भाखे० विजय पुरोहित नारी, ननचूड़ा अनूपजो. ॥ भा० ॥ ३६॥ नामे तो श्रीभूति, नन्दन नीको जाणीयो। भाखे० गुणवती भवमाहे, भूपति ठाणे आणीयो ॥ भा० ॥३७॥ ० -- . भी जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४१७) श्रीभूति ने घरनार, नाम प्रणामें सरस्वती । भाख० वेगवती सुकुमारी, ऊपजी अधिक कलावती भा० ॥३८॥ सा यौवन वयपाय, एक दिन गई उद्यानवे । भाखे० एकध्याने प्रतिपन्न. माधु रह्यो शुभ ध्यानवे ॥ भा० ॥३९ लोक करन्तासेव, एहयोदेखी साधुवे । भास. आणीद्वप अतीव, सामाखे अपराधरे । भा० ॥ ४० ॥ नारीसाथे एह. भोगवतो वरभोगवे । भाखे० मैदीठो एआज, तामफिर्या सहुलोगवे ।। भ० ॥ ४१ ।। ऋषिकरे काउसगा. प्रगट पणेतो एमकही । भखे० उत्तरसे एदोप. तोमैं पारेवो सही । भ० ॥ ४२ ॥ सुरेकरी सानिध्य, वेगवती मुख मीवेवे । भाखे० आकुल व्याकुल थाय. पावेदःस अतिववे । भा० ॥ ४३ ।। एह सुणीने वान. माचित्रों वासी घणी । भास० भयमानी मनमाहै. भाख अवगुण आपण / भा० ।। ४४ ॥ 'मुदर्शन मुनिपाम, आविलोक घणामिल्गा । भाख० खमजो मुझ अपराध. तुम तपस्वी तेमाभल्या भा० ॥४५ सांमी नांख्यों खेह, सूर्य झांग्बोनापच्यो । भाखे० तुमने देसी निर्दोप, फिस्यर के नर यापदो भा० ॥ ४६॥ तुझ रूट्यां जगमाही. कोईनहीं जो रापिले । भाखे० क्षमाकरो ऋषिराय, धामुखी एम भापोले । भा० ॥ १७ एम सुणन्तांलोक, पुनरपि सेवा साचो । भाले० पायक धर्मेमाघ, वेगवनी मनराचवे ।। मा- ॥ ४ ॥ राजा देसीरूप. वेगवती गीयो । भाखे कन्याकरे काज, पुरोहित नर जागियो । मा० १९ ॥ मिथ्याष्टि जाणी, कन्या नापे नाचे। भाखे० जोर लोधीवाल, जनक गोकरी पान ।। भा० ॥ ५ ॥ चित्रफियोरे नियाण, राजाने बापरे । भास होनी वन प्रमाणमह एह उपापमा १५
(४१६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड ।
भाखे० कुंवर करे परणाम, आप प्रकाशो नामवे ॥ भा० ॥ २४ ॥
प्रभुजी तुम्ह सुपसाय, पायो पद अभिरामवे ।
भाखे० तूं मेरा गुरुदेव, तुझळू करूं सलामवे ॥ भा० ॥ २५ ॥
भोगविए ए राज्य, तुम्हारो आपीयो।
भाखे० पुरमांही बडवीर, आपसमो कर थापीयो । भा० ॥२६॥
सेठ अने सुकुमार, श्रावक ना व्रत पालवे ।
भाख० स्वर्ग दूसरे देव, विलसे सुख चिरंकालवे । भा० ॥२७॥
गिरि वैताढ्य विख्यात, नगरी नन्दावर्तने ।
भाखे नन्दीश्वर अभिधान, राजा राज्य करन्तवे ॥ भा० ॥ २८ ॥
पद्मरूचि सो देव, करतो अति आनन्द वे ।
भाखे० कनक प्रभानी कूख, नन्दन नयनानंदवे ॥ भा० ॥ २९ ॥
गज्य करी व्रत लीध, स्वर्ग पंचमें जायवे ।
भाखे० पूर्व विदेह मझार, क्षेमा नगरी आयवे ॥ भा० ॥३०॥
विपुला वाहन राय, नारी पौमावे उदरे ।
भाखे० श्री चन्द्र नरेन्द्र. राज्य तणी पदवी वरे ॥ भा० ॥ ३१ ॥
गुप्ति समाधी समीप, संयम लीधो सादरो ।
भाखे० ब्रह्मलोकनो देव, होई आयो पाधरो ॥ भा० ॥ ३२॥
ए अष्टम बलदेव, देवे सेव्या सदैव वे ।
भाखे० वृपभ ध्वजनो जीव, राजाए सुग्रीववे ॥ भा० ॥ ३३ ॥
जे हुतो श्रीकान्त, भव में भमियो भूरीवे ।
भाखे० पाटणकन्द मृणाल, होई पुण्य अंकूरवे । भा० ॥ ३४ ॥
' वन सुकण्ठ नरेश, हेमवती नो जाईयो ।
भाखे० शम्भू नाम लहन्त, साजन मन भाईयो । भा० ॥ ३५ ॥
जे हुतो वसुदत्त, हुओ शम्भू भूपनो ।
भाखे० विजय पुरोहित नारी, ननचूडा अनूपजो. ॥ भा० ॥ ३६॥
नामे तो श्रीभूति, नन्दन नीको जाणीयो ।
भाखे० गुणवती भवमाहे, भूपति ठाणे आणीयो ॥ भा० ॥ ३७॥
भी जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । (४१७) श्रीभृति ने घरनार, नाम प्रणामें सरस्वती । भाखे० वेगवती सुकुमारी. ऊपजी अधिक कलावती भा० ॥३८|| सा यौवन वयपाय, एक दिन गई उद्यानवे । भाखे० एकध्याने प्रतिपन्न. साधु रह्यो शुभ ध्यानवे ॥ भा० ॥३९ लोक करन्तासेव, एहयोदेखी साधुवे । भाख० आणीद्वेष अतीच. साभाखे अपराधये ॥ भा० ॥ ४० ॥ नारीसाथे एह. भोगवतो वरभोगवे । भाखे० मैंदीठो एआज, तामफिर्या सहुलोगः ॥ भ० ।। ४१ ।। ऋषिकरे काउसगा. प्रगट पणेतो एमकही। भरखे० उत्तरसे एदोप. तोमै पारेचो मही ।। भ० ।। ४२ ।। सुरेकरी सानिध्य, वेगवती मुख मीवेवे । भाखे० आकुल व्याकुल थाग. पावेदःस अतिववे ।। भा० ॥ ४३ ।। एह सुणीने चात. मावित्रों वासी घणी। भाग्ये० भयमानी मनमाहे, भाखे अवगुण आपणू || भा० ॥ ४४ ॥ 'मुदर्शन मुनिपाम, आचिलोक घणामिल्या ! सांमी नांख्यों खेह, मूर्य झांग्बोनापन्यो । भाखे० तुमने देखी निर्दोष, फिस्यरके नर वापो मा० ॥ ४६॥ तुझ रूठ्यां जगमांही. कोईनहीं जो रासिले । भाखे० क्षमारो ऋपिराय, थाऊपुसी एम भापोले । भाव ॥ ५७ पम सुणन्तालोक, पुनरपि से माना। भासक श्रावक धर्मेसाध, वेगानी मनगनो !! भा० ॥ १८ ॥ राजा देसीरूप, वेगवनी राचीयो। भाखेर कन्याफेरे कान, पुरोहित नर बानियो । मा० ॥ ४ ॥ मिथ्याटि जाणी, कन्या ना नातवे । भाले जोरे लोधीपाल, जनक पोकी धागो || भा० ॥ ५.।। जिनफिगर निगाम, सदाने साहाय। भासे होजो रचन प्रभाग, मह एक उपाग || ना ॥ ५ ॥ भाख ० खमजो मुझ अपराध . तुम तपस्वी तेमाभल्या भा ०॥१५ . (४१८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। दिन थोडाघर राख, छोडी दीधी ब्राह्मणो । भाखे० आरजिका अभिराम, हरिकान्ता पासेभणी । भा० ॥५२॥ मरण तणेहूंहेतु, होजो शम्भूनेहणी । भाखे० ग्रहीसंयम सुरलोक, पामीगति पंचम तणी भा०॥ ५३॥ जनक तणेघरआय, सोताजीए ऊपनी । भाखे० ० वयर विलय नचिजाय, जेमभाखी तेम नीपनी|भा०॥५४ मुनिवर जी ने जेह, झूठो आल चढावीयो । भाखे० झूठो आलज एह, लोकांमांही पावीयो ॥ भा० ॥ ५५ ॥ भवमें भमत अपार, शम्भु जीव सुहामणो । भाखे० कुशध्वज छे विप्र, रूडो ने रलियामणो ॥ भा० ॥ ५६ ॥ सावित्री तम नारी, उदरे लियो अवतारवे । भाखे० नन्दन नामे प्रभास, सुन्दर ने सुखकारवे ॥ भा० ॥ ५७ ॥ विजयसिंह नी पास, संयम लीधो सादरा । भाखे० दुक्कर तप जय कार, सहे परिपह आकरा ॥ भा० ॥५८ ॥ गिरी समेते जात. कनकप्रभ विद्याधरूं । भाखे० ऋद्धि तणो विस्तार, देखी भोग पुरन्दरू || भा० ॥ ५९॥ ए तप तणोही प्रकार, म्हारे ऋद्धिज एहची । भाख० होजोकरेही निपाण, जेहवी गति मति तेहवी ॥भाखे।।६० जईतीजे सुरलोक, देवतणा सुखभोगवी- भाखे० आयुकर्म नेअन्त, आयोते सुरवरचवी ॥ भा० ॥ ६१ ॥ हुओ रावण राय. भाई तुम्हारो ए वडो । भाखे० महुरायां गिरताज, वसुधामांहे वांकडो ॥ भा०॥ ६२ ॥ में याज्ञवल्क्य नो जीव, भमतोए भवसिन्धुवे । -माखे० एतं उपज्यो आय. गवण नो लघुबन्धुबे ॥ भा० ॥ ६३ ॥ श्रीभृति इण्योजे राय, पृथिवी एपहीली गयो । भाखे० पुर मले सुप्रतिष्ठ, पुनर्वसु खेचर थयो। भा० ॥ ६४ ॥ क्षेत्र विदेह मझार, पुष्डरिकीणी छे विजय । -
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श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४१६ )
भाखे० नामे त्रिभुवनानन्द, चक्री भगवंतही भजय ।। भा०६५ ।।
अनंग सुन्दरी तास, पुत्री अमरी अवतरी ।
भाखे० पुनर्वसु तसदेखी, लेईचाल्यो तस अपहरी । भा० ।। ६६
चकी सुभटे आय, पन्धे रोक्यो पापीया।
भाखे० अकुलाणो झुझन्त, सुभटअति सन्तापीया ।। भा० ॥ ६॥
अनंगसुन्दरी बाल, यान थकी डाकी खरी ।
कोई निकुंझमझार. आवीपडीसा सुन्दरी ॥ भा० ॥ ६८ ॥
पुनर्वसु लेईदिक्ष, आगे सुखियो थायजो।
भाखे० कीधो एह निदान, ए सुन्दरीहं पायजो। भा० ॥ ६९।।
भोगवो सुरपद सार,
विविधप्रकारे झूझियो।
भाखे० दशरथ घर अवतार, ए प्रभु लक्ष्मणजी हुभो।मा०७०॥
वसती बनहर मझार, राज-सुता अविरुधये ।
भार० नपतो उग्न अपार. कम्तीभाव विशुद्धवे ।। भावे ।। १ ।।
अन्त समय आराधी. मन्यार मूतीसती।
भाखे० अजगर आवा गलन्त, आनिमें नपडी रती || भा०७२
पीजे कल्ये घमाप, हुई विशल्या हो
भाखे० लक्ष्मण नेसुखदाय, दिन२ वधनो नेहो । मा० ॥७३॥
गुणवतो नोधात, गुणधर नाम धरायपे ।
भाले० समारतो मय अमार. कुण्डल मण्डित धाय । भा०५||
धारा व्रत प्रनिपाल, फीधो धर्म विकालरे ।
मीता महोदर एह, भामण्डल भूपालये । भा० ॥ ४५ ॥
कामन्दी पुग्मांदी, नाम देव ना पुरावे ।
भाखे० इशामा उदर पनार. गण घग्ना नसरे भा७ि६॥
'मुनन्द' यमुनन्द अन्न हुभो भकारपे।
भासे० प्रनिलायो मनिया नाम सामने पारी भा-
उनर कुल भरलेई. मुधर लो।
भारखे० सामन्दी गजान, तिरदन जालोकरे ।। मा० ॥ ७८ ॥
(४१८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। दिन थोडाघर राख, छोडी दीधी ब्राह्मणो । भाखे० आरजिका अभिराम, हरिकान्ता पासेभणी । भा० ॥५२॥ मरण तणेहूंहेतु, होजो शम्भूनेहणी । भाखे० ग्रहीसंयम सुरलोक, पामीगति पंचम तणी भा०॥ ५३॥ जनक तणेघरआय, सोताजीए ऊपनी । भाखे० चयर विलय नविजाय, जेमभाखी तेम नीपनी||भा०॥५४ मुनिवर जी ने जेह, झूठो आल चढावीयो । भाखे० झूठो आलज एह, लोकांमांही पाचीयो ॥ भा० ॥ ५५ ।। भवमें भमत अपार, शम्भु जीव सुहामणो । भावे० ० कुशध्वज छे विप्र, रूड़ो ने रलियामणो । भा० ॥५६॥ सावित्री तम नारी, उदरे लियो अवतारवे । भाखे० नन्दन नामे प्रभास, सुन्दर ने सुखकारखे ॥ भा०॥५७ ॥ विजयसिंह नी पास, संयम लीधो सादरा । भाखे० दुक्कर तप जय कार, सहे परिपह आकरा ॥ भा० ॥ ५८॥ गिरी समेते जात. कनकप्रभ विद्याधरूं । भाखे० ऋद्धि तणो विस्तार, देखी भोग पुरन्दरू | भा० ॥ ५९॥ ए तप तणोही प्रकार, म्हारे ऋद्धिज एहवी. भाख० होजोकरेही निपाण, जेहवी गति मति तेहवी |भा||६० जईतीजे सुरलोक, देवतणा सुखभोगवी- भाखे० आयुकर्म नेअन्त, आयोते सुग्वाचवी ॥ भा० ॥ ६१ ।। दुओ गवण राय. भाई तुम्हारो ए वडो । भाखे० ० महुरायां शिरताज, वसुधामांहे वांकड़ो ॥ भा०॥ ६२ ॥ 'याज्ञवल्क्य नो जीव, भमतोए भवसिन्धुवे । भाखे० एतं उपज्यो आय. गवण नो लघुबन्धुवे ॥ भा० ॥ ६३ ॥ श्रीभृति हण्योजे राय, पृथिवी एपहीली गयो । भाखे० पुर भले सुप्रतिष्ठ, पुनर्वसु खेचर थयो। भा० ॥ ६४ ॥ क्षेत्र विदेह मझार, पुष्डरिकीणी के विजय ।
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । (४१६ ) भाखे० नामे त्रिभुवनानन्द, चक्री भगवंतही भजय ।। भा०६५॥ अनंग सुन्दरी तास, पुत्री अमरी अवतरी । भाखे० पुनर्वसु तसदेसी, लेईचाल्यो तस अपहरी ।। भा० ।। ६६ चक्री सुभटे आय, पन्थे रोक्यो पापीया। भाखे० अकुलाणो युझन्त, सुभटअति सन्तापीया || भा० ॥ ६७॥ अनंगसुन्दरी याल, यान थकी डाकी खरी । कोई निकुंझमझार. आवीपडीसा सुन्दरी । भा० ॥ ६८॥ पुनर्वसु लेईदिक्ष, आगे मुखियो थायजो। भाखे० कीधो एह निदान, ए सुन्दरीहूं पायजो। भा० ॥ ६९ ।। भोगको सुरपद सार, विविधप्रकारे झियो । भाखे० दशरथ घर अवतार, ए प्रभु लक्ष्मणजी हुभो । भा०७०।। वसती बनहर मझार, राज-मुता अनिरुधये । भाखे० तपनो उग्र अपार, कम्तीभाव विशुद्धवे । भाखे ।। ७१ ।। अन्त समय आराधी. मन्यारं मूतीसती । भाखे. अजगर आवो गलन्त, आरति नपटो रती । भा०७२ चीजे कन्ये वसाप, हुई विशल्पा पहने । भाखे० लक्ष्मण नेसुसदाय, दिनर यतो नेहरे ॥ मा० ॥७३॥ गुणवतो नोनात, गुणधर नाम धरायचे । भाखे० नमारतो मर मार, छुरडल मण्डित बागरे माला श्रापक मत पनिपाल, कीमो धर्म त्रिकालरे । मीता सहोदर पह, भामण्डल भूपाल । भा० ।। ५५ ।। काफन्दी पुरमाही, राम दाना पुनो। भाखे० दशामा उदर अवनार, गवण घग्ना वारेमा७६॥ 'सुनन्द' सुनन्द अन्य, ओमकारपे। भाषे० प्रतिला यो मुनिएफ नागपागने पार HEESH उत्तर कुरु भालेई. मुप र लोकरे । भास० कारन्दी गवान, निरन जागकरे ।। मा. ७८॥
(४२०)
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड।
सुदर्शनाजी मांय, दोई सुतउदर धारीया ।
भाखे० प्रियंकर प्रसिद्ध, शुभंकर शुभकारीया || भा० ॥ ७९ ॥
राज्यकरी व्रतपाली, देवहुआ ग्रैव्येकवे ।
भाखे० लवणांकुश एदोई, सीता सुत सुविवेकवे ॥ भा० ॥ ८॥
सुदर्शनाजी माय, भवान्तर नी जेहये ।
गखे० सिद्धारथ साथाय, जेही पढाया एहवे ।। ० ॥ ८१ ।।
ए मुनि वचन सुणन्त, बहुजनने वैराग्यो ।
भाखे० ग्रही संयम पावन्त, सेनानी सौभाग्यवे । भा० ॥ ८२॥
राम नमी ऋषिपाय, पायाअति सन्तोप वे ।
भाखे० आरति गईसुखथाय, प्रीती तणा अति पोपवे | भा० ।।८३
एगुण साठमी ढाल, भवान्तर अवदातवे ।
भाखे० केशराज ऋपिराजमें, वारुकही एवातवे ॥ भा० ॥ ८४ ॥
दोहा (सारंग सोरठी रागे)-
सीता पासे चालिके, तबआया श्री राम ।
सुकुमालांगी स्वामिनी, कठण घj एकाम ॥१॥
शीत तापना क्लेशअति, क्षुधा त्पानी व्याय ।
रहेको मेलेलूगड़े, जिनमत नीए छाय ॥ २॥
भारथकी ए भारअति, म्होटो संयम भार ।
क्यूंनिवर्तसे एभणी, सांसो एह अपार ॥ ३ ॥
राजा रावण-आगले, राखी रही निजटेक ।
राखजे संयम विपय, साचीटेक अनेक ॥ ४॥
एम विमासी वन्दना, किधी राघव राय ।
लक्ष्मण आदे प्रणमीया, सीताजीना पाय ॥ ५ ॥
स परिवारे रामजी, अयोध्या आवन्त ।
गुण गातां सीता तणा, गाढो सुख पावन्त ॥ ६ ॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४२१) mwww.xvv ~ranvwr- ढाल साठमी- तर्ज-ओंभूनी-अथवा-खेगावन्त सुण भगवन्तनोजी- सतियों में सीता साचीजी, सुरवर दीधी साखी (टेर) भलि २ मुख भाखी ॥ स० ॥ श्री मुखे भाखी रामजी जी, शील सहाय राखीयो जी मा॥ तीरथ में साचो मुहीजी. चीरथ चारु ही देसी । मंत्रों में माचो सुणोजी, श्री नमोकार निशेपी । स० ॥२॥ दानों में साचो कह्योजी, जीवतणू जगदान । व्रतों में साचो कहोजी. साचो शील प्रधान ॥ स० ॥ ३ ॥ नियमों में साचो भण्योजी, नियम नो सन्तोप । साचो तप तपियां तणोजी. समता रमनो पोप ।।म०॥ ४ ॥ दुपार तप तपने करीजी. सेनापनिजी सोई। स्वर्गे पहुंन्यो पांचमेजी, परम महा सुसहोई ।। स० ॥ ५ ॥ माठ वर्ष लगे स्वामीनीजी, विविध परे तप कीध । काया कीधो दृवलीजी, नरभवन् फल लीध ॥ म० ॥ ६ ॥ अहोनिशा तेतीरानोजी, अनशन अनि आराधी । दश विध आराधन करीबी, समरस नो रसमाधी । स० ॥७॥ सागातो बाधीशनोजी, पायो पूगे भार । अच्युन इन्द्र पद भोगजी, मीना पुण्य प्रभाव ॥ न० ॥८॥ गिरि वैताट्ये जाणीवनी, कंगन पुर पमिद्ध । कनकरय राजा भलोजी, राज्य करे नन्छ । य० ॥१॥ मन्दाकिनी मुमानुनीजी, चन्द्रमुखी उदास । पुत्री दोई परवामी, सपम्बर मण्डप नाम ।। १० ॥ १० ॥ राम मु लमा नेपाली पुत्रने परिवार । भागा आदम्पर पगेनी, नत्वा जर जयकार ||११॥ लाग 'बरे मन्दाकिनी नी, पन्दमुनी नउमाल। 'असनेमागे धमीजी, पहिगरे पम्मान ।। म० । १२ !!
(४२०)
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड।
सुदर्शनाजी मांय, दोई सुतउदर धारीया ।
भाखे० प्रियंकर प्रसिद्ध, शुभंकर शुभकारीया ॥ भा० ॥ ७९ ॥
राज्यकरी व्रतपाली, देवहुआ गैव्येकवे ।
भाखे० लवणांकुश एदोई, सीता सुत सुविवेकवे ॥ भा० ॥ ८ ॥
सुदर्शनाजी माय, भवान्तर नी जेहये ।
भाखे० सिद्धारथ साथाय, जेही पढाया एहवे ॥॥ ० ॥ ८१ ॥
ए मुनि वचन सुणन्त, बहुजनने वैराग्यो ।
भाखे० ग्रही संयम पावन्त. सेनानी सौभाग्यवे ॥ भा० ॥८२॥
राम नमी ऋषिपाय, पायाअति सन्तोष के ।
भाखे० आरति गईसुखथाय, प्रीती तणा अति पोपवे ॥ भा० ।।८३
एगुण साठमी ढाल, भवान्तर अवदातवे ।
भाखे० केशराज ऋपिराजमें, वारुकही एवातवे ॥ भा० ॥ ८४ ।।
दोहा (सारंग सोरठी रागे)-
सीता पासे चालिके, तवआया श्री राम ।
सुकुमालांगी स्वामिनी, कठण घणूं एकाम ॥१॥
शीत तापना क्लेशअति, क्षुधा त्पानी व्याय ।
रहेको मेलेलूगड़े, जिनमत नीए छाय ॥ २॥
भारथकी ए भारअति, म्होटो संयम भार ।
क्यूनिवर्तसे एभणी, सांसो एह अपार ॥ ३ ॥
राजा रावण-आगले, राखी रही निजटेक ।
राखजे संयम विपय, सानीटेक अनेक ॥४॥
एम विमासी वन्दना, किधी राघव राय ।
लक्ष्मण आदे प्रणमीया, सीताजीना पाय ॥ ५ ॥
स परिवारे रामजी, अयोध्या आवन्त ।
गुण गातां सीता तणा, गाढो सुख पावन्त ॥ ६॥
श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड ।
(४२१)
ढाल साठमी-
तर्ज-ओभूनी-अथवा-खेमावन्त सुण भगवन्तनोजी-
सतियों में सीता साचीजी, सुरवर दीधी साखी (टेर)
भलि २ मुख भाखी॥ स० ॥
श्री मुखे भाखी रामजी जी, शील सहाय राखीयो जी मना॥
तीरथ में साचो मुहीजी. नीरथ चारु ही देखी।
मंत्रों में साचो सुणोजी, श्री नमोकार विशेपी ॥ स० ॥ २ ॥
दानों में साचो कडोजी, जीवतणं जगदान ।
व्रतों में साचो कडोजी. साचो शील प्रधान ।। स० ॥ ३ ॥
नियमों में साचो भण्योजी, निगम बडो सन्तोष ।
साचो तप तपियां तणोजी. समता रसनो पोप म०॥४॥
दुकर तप तप करीजी. सेनापनिजी सोई ।
स्वर्गे पहुंच्यो पांचमेजी, परम महा सुसहोई ।। म० ॥ ५ ॥
साठ वर्ष लगे स्वामीनीजी, विविध पर तप कीध ।
काया कीधा देवलीजी, नरभवन् फल लीध ।। ग० ॥ ६ ॥
अहोनिशा तेतीशनोजी, अनशप अति पागधी ।
दश विध आराधन करीजी, समरस नो रस मागी। स० ॥ ७॥
मागरतो याशिनोजी, पायो पूगे आप !
अच्युन इन्द्र पद भोगपंजी, मीता पुण्य प्रभार || ॥८॥
गिरि पैताये जाणीवेजी, कंचन पुर प्रसिद्ध ।
कनफरथ गजा भलोजी, राज्य को समृदु । म ॥५
गन्दाकिनी गुमानुनीजी, चन्द्रमुबी उम्दामा
पुनी दोई परमपाती, मगम्बर मण्डप नाम ।। १० ॥१०॥
राम मु लक्ष्मण कियात्री, पुधने परिवार।
आया नादम्मा घणेजी, चन्यो जग जगतार 10॥ ११ ॥
ला 'बरे' मन्दाकिनी नी, चन्द्रमुनी नउमाल ।
'महुश' नागे धनी, पहिराव वामान न ॥ १२ ॥
, - (४२२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। लक्ष्मण कुंवर कोपियाजी. अहाईसो वरसार । लवणांकुश ने आगलेजी, मांडवे युद्ध अपार ।। स० ॥१३॥ लवणांकुश भाखे भलीजी, काकोजी ते वाप | प्रीतपनोतो छेघणोंजी. गुंकरवो सन्ताप || स० ॥ १४ ॥ अवध्यछे भाई भणीजी, तेहथी वध नविथाय । गज केसरीने आगलेजी, बोलन्तां नलजाय ॥ स० ॥१५॥ शर्माणा सुमता थयाजी, वैराग्ये वन वास | अनुमति मांगी वापनीजी, आया मुनिवर पास ।। स० ॥१६॥ अढाईसो एकठाजी, कुंवर एकही वार | 'महावल मुनि श्रीमुखेजी, लीधो संयम भार ।। स० ॥ १७ ॥ लवणांकुश कुंवर तणोजी, कीधो तब विवाह । स्वामी अयोध्या आवीयाजी. हुओघणो उत्साह ॥ स० ॥ १८ ॥ 'भामण्डल भूपालनेजी, उपर भूमिआय । बहुविध भावे भावनाजी, चित्तने लिये समझाय ।। स० ॥ १९ ॥ वशकरी श्रेणीदोईनेजी, वर्तावी जय आण । अवजो दीक्षा लीजियेजी, तो सबलोमु प्रमाण ॥ स० ॥ २० ॥ एम चिन्तवतां तेहनेजी, माथे विद्युत् पात | देवकुरु एजई ऊपन्याजी, सुखमांही दिनजात ।। स० ॥ २१ ॥ एक दिवस हनुमन्तजी जी, मेरु गिरिपे जाय । चैत्रमासे क्रीडा करीजी, मन रलियापत थाय । स० ॥ २२॥ वाटे आवन्तां थकांजी, रवि आथमतो देख । एह स्वरूप संसारनंजी, चित्त चिन्ते सुविशेष ॥ स० ॥ २३ ॥ दिनने आदे ऊगीयोजी, वध्यो मध्य दिन ताय । घट्योदिन घटवे करीजी, माणम एम गणाय । स० ॥ २४ ॥ पुत्र पनोतो पाटबीनी, राज-भार थापन्त । दीक्षा महोत्सव मांडियोजी, दानघणूं आपन्त ॥ स० ॥ २५ ॥ 'धर्मरन गुरु पाखतीजी, लीधो संयम भार ।
श्री जैन पद रामायण चतुथ स्पण्ड । (४२३) vh-MINurry . १ " सुन्दरी साडी सातसेजी, लागीप्रभुने लार || स० ॥ २६ ॥ खावे पीवे पहिरवेजी, करवे भोग विलास । प्रेम कराचे पानीजी, मांडी एप्रिय आश ।। स० ।। २७ ।। अलूणी सीला चाढवेजी, प्रिय साशे वैराग्य । करेतिका धन्य कामनीजी, माथे शिननं माग ।। सः ॥ २८ ॥ आर्जिका लक्ष्मीवतीजी, प्रवर्तिनी कहिवाय । साथैरहे ए साधवीजी, पढेगुणे सुपपाय ॥ स० ।। २९ ॥ साचो संयम पालवेजी, कर्मतणो क्षयकार । हनुमन्त हुआ केरलीजी, पाम्या भवनो पार ॥ स० ॥ ३० ॥ हनुमन्त-दीक्षा सांभलीजी, चित चित्त श्री राम । कष्टग्रा दीक्षातणोजी, छांडो विषय मुखठाम ॥ स० ॥ ३१ ॥ सौधर्म-हरि अधि एकरीजी जाणीएह परणाम । विपय महागति कर्म फीजी, कड़े ममाए नाम ॥ म० ॥ ३२ ॥ चर्मगरीरी-गमजीरे, करे धर्मनी हांसी । वसाणे विपया धणीजी, न बदे वचन विमामी । सु० ॥ ३३ ।। हाहाम जाण्योसहीजी, लक्ष्मण-राम-मोह । वचन् अगोचर छेषणोंजी, कोईन पावे ॥ सा ॥ ३४ ॥ नाम चन्या दो देवताजी, पुरी अयोध्या भाग । नेह परिक्षा कारणेजी, मांडे एह उपाय ।। म० ।। ३५ !! लक्ष्मणने मागा करीजी, देगा नदेन । अलेउर म रोगनोनी, कल्पासरे ननपेय !! न० ॥ ३६॥ प? पर? हा? पपनयनानी, पचिनी अधिक पुकार रोमरण अकालनबी, कफि फिरता नः ॥ ३७ 1 बक्षस्थल देवणीती, मायेदुटा का मेली नेते मानुनीनी, करनी पर ला २०६८ विलोसी सिवाद मंत्री, मारो नक्षमा भा जीवित्वन जीस्तिनी, भाई भा जा ॥ ३५ ॥ ।
, (४२२) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। लक्ष्मण कुंवर कोपियाजी. अढाईसो वरसार । लवणांकुश ने आगलेजी, मांडवे युद्ध अपार ॥ स० ॥१३॥ लवणांकुश भाखे भलीजी, काकोजी ते बाप । प्रीतपनोतो छेघणोंजी. सूंकरवो सन्ताप ॥ स० ॥ १४ ॥ अवध्यछे भाई भणोजी, तेहथी वध नविथाय । गज केसरीने आगलेजी, बोलन्तां नलजाय ॥ स० ॥१५॥ शर्माणा सुमता थयाजी, वैराग्ये वन वास | अनुमति मांगी पापनीजी. आया मुनिवर पास ।। स० ॥१६॥ अढाईसो एकठाजी, कुंवर एकही वार । 'महाबल मुनि श्रीमुखेजी, लीधो संयम भार ।। स० ॥ १७॥ लवणांकुश कुंवर तणोजी, कीधो तब विवाह । स्वामी अयोध्या आवीयाजी. हुओघणो उत्साह ॥ स० ॥१८॥ 'भामण्डल भूपालनेजी, उपर भूमिआय ! बहुविध भावे भावनाजी, चित्तने लिये समझाय । स० ॥ १९ ॥ वशकरी श्रेणीदोईनेजी, वर्तावी जय आण । अवजो दीक्षा लीजियेजी, तो सघलोमु प्रमाण ॥ स० ॥ २० ॥ एम चिन्तवतां तेहनेजी, माथे विद्युत् पात | देवकुरु एजई ऊपन्यानी, सुखमांही दिनजात ।। स० ॥ २१ ॥ एक दिवस हनुमन्तजी जी, मेरु गिरिपे जाय । चैत्रमासे क्रीडा करीजी, मन रलियापत थाय । स० ॥ २२ ॥ वाटे आवन्तां थकांजी, रवि आथमतो देख । एह स्वरूप संसारनंजी, चित्त चिन्ते मुविशेष ॥ स० ॥ २३॥ दिनने आदे ऊगीयोजी, वध्यो मध्य दिन ताय । घट्योदिन घटवे करीजी, माणस एम गणाय ॥ स० ॥ २४ ॥ पुत्र पनोतो पाटवीत्री, राज-भार थापन्त । दीक्षा महोत्सव मांडियोजी, दानधणूं आपन्त ॥ स० ॥ २५ ॥ 'धर्मरन गुरु पाखतीजी, लीधो संयम भार । 4
४२।
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Muv
श्री जैन पद रामायण चतुथ ग्वएड ।
सुन्दरी साडी सातसेजी, लागीप्रभुने लार ॥ स० ॥ २६ ।।
खावै पीवे पहिरवेजी, करवे भोग विलास ।
प्रेम करावे पानीजी, मांडी एप्रियसूं आश ।। स० ॥ २७॥
~णी सीला चाढवेजी, प्रिय साथे वैराग्य ।
रेतिका धन्य कामनीजी, साथे शिवनं माग ।। स० ॥२८॥
र्जिका लक्ष्मीवतीजी, प्रवर्तिनी कहिवाय ।
रहे ए साधवीजी, पढेगुणे मुखपाय ।। स०.॥ २९ ॥
साचो संयम पालवेजी, कर्मतणो क्षयकार ।
इनुमन्त हुआ केवलीजी. पाम्या भवनो पार ॥ स० ॥ ३० ॥
हनुमन्त-दीक्षा सांभलीजी, चित चित्तं श्री राम ।
कटग्रा दीक्षातणोजी, छांडी विषय मुसठाम ॥ स० ॥ ३१ ॥
सौधर्म-हरि अवधि एकरीजी जाणोएह परणाम ।
विपय महागति कर्मफीनी, कहे ममाए नाम ।। स० ॥ ३२ ॥
चर्मशरीरी-गमजीरे, करें धर्मनी हांसी।
वखाणे विपया घणीजी, न वदे वचन विमामी ।। स० ॥ ३३ ॥
हाहामें जाण्योसहीजी, लक्ष्मण-राम-मनेह ।
वचन् अगोचर छेघणोंजी, कोईन पावेव्ह ।। म० ॥ ३४ ॥
नाम चल्या दो देवताजी, पुरी अयोध्या आय ।
नेह परिक्षा कारणेजी, मांडे एह उपाय ॥ म० ॥ ३५ ॥
लक्ष्मणने माया करीजी, देगाने नेदेव ।
अन्तेउर महु रोवनोजी, करुणवरे ननखैर ॥ म० ॥ ३६ ।।
पर? पम? दा? पमनयनानी, पग्निी अधिक पुकार !
रोरेगरण अकालनजी, कफिन्गू किनार! । मः ॥ ३७॥
वक्षस्थल हटेपणीती, माछूटा देश ।
मेलीनने मानुनीजी. करनी अधिर रशम ॥ ३८ ॥
पिलोफी विवाद मंजी, भाव लक्षात भूप।
जीवित्पनं जीविनयात्री, भाई भा जन्ा । म ॥ ३९ ॥
४२४) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । ति कहन्तां मरिगयोजी, फिटरे पापी काल । तरियो छलवट करीजी, रघुपतिस्यों भूपाल ॥ स० ॥ ४० ॥ ह कहन्त स्वमीनोजी, पचनां साथे जीव । नेकलीगयो ततक्षण तदाजी, आतुर पणे अतीव ॥ स० ॥ ४ ॥ संहासन बैठा थकाजी, हेमथम्भ अवथम्भि ॥ मांख पसार्योही रह्योजी, लेप विम्ब निरदम्भि ॥ स० ॥ ४२ ॥ क्ष्मण मूओ जाणिकेजी, देवकर विखवाद । हास्यथकी अनरथ हुओजी, वहीगयो परसाद ॥ स० ॥ ४३ ॥ वश्वाधार विशेपथीजी, ओयों हणियो एह । यात्ताप करी घणोजी, स्वर्ग गया सुरतेह ॥ स० ॥ ४४ ॥ न्तः पुरिनी पद्मनीजी, मूओ जाणी कन्त । कूटे पीटे आवटेजी, रोवे अति विलवन्त || स० ॥ ४५ ॥ शोक वचन श्रवणे सुणीजी, राघव धसि आवन्त । अमंगल अजाणीयाजी, मण्डे किस्यो तुरन्त ।। सः ॥ ४६ ॥ जीवेछे मुंझभाईजीजी, एमसू केम मरन्त ? | मूच्छियो कोई प्रकारथीजी, तब उपचार करन्त ।। स० ॥ ४७ ॥ वैद्य बुलाया वेगसुंजी, पूछयूँ ज्योतिष जाण । तंत्र मंत्र उपकर्म अतिजी, कीधा आप प्रमाण || स० ॥ ४८ ॥ कोइयन आयो पाघरोजी, ताम प्रभु मू य । संज्ञापामी ने सरोजी, करुण स्वरे विललाय || स० ॥ ४९ ।। शत्रुघ्न सुग्रीवजीजी. विभीपण लंकेश । दुःखे अधिकं आरड़ेजी. रोवे राय अशेष ॥ स० ॥ ५० ॥ कौशल्यादिक मायजीजी, नयणे नांखे नीर । छोडिने वडयोर नेजी, गया विललाई वीर ॥ स. ॥ ५१ ॥ मार्ग मार्ग पन्थमेंजी, घर घर हाटे हाट । शोकमय सहुको हुआजी, पड़ी अचिन्ती वाट ।। स० ॥ ५२ ।। लवणांकृश प्रभुने नमीजी, अनुमति मांगे आप | सी जैन पद रामायण चतुर्थ राण्ड । (४२५) ए संसार असारछेजी, यमनो प्रबल प्रताप ॥ स० ॥ ५३ ।। अमृनघोप मुनिशपेनी, पामी उत्तम दिक्ख । मोक्ष गया मुनिवर सहीजी, आगधी गुरु शिक्स ।। स०॥५४॥ भाईने पुत्रों तणोजी पामी घणो वियोग । फिरी फिरी मूर्छाए प्रभुजी, वधतो जाये शोग । स० ॥ ५५ ॥ भाईजीए तुम्ह विनाजी, पुत्रो दीधी पूठ । हजु किस्यूं आगे हुसीजी, निहांथी वेगो ऊट ।। स० ।। ५६ ।। मोहे मूणिो घणोजी, जाण्यो गम नरेश । विभीपणादिक रायजोजी, मगझाचे सुविशेष ॥ म० ॥ ५७ ॥ धीरा मांही धीग्तुजी, वीरों को शिरताज । लज्जा कारी लोकजी. अधिर पणुं तजि आज ॥ म०॥ ५८ ॥ एह मुणी अति कोपियोजी, होट डमी बोलन्न । प्रवल वायने वाजवेगी, डुंगर नवि डोलन्त ।। स• ॥ ५९ ।। जीवछे मुझ माईजीजी, मुआ तुम्हारा भ्रात । देवोतुम्हे दाग उनावलोजी, अपसर बहियोजान ।। म ॥ ६१ ।। पलि वलितं भाईजीजी, काई लगावे गार छिद्रलई करसे घगूंजी, दर्जन एह पेमार, १३ म० ।। ६२ ।। अथवा दुर्जन देखगांजी, कोपेनही गजान । एमकही सांधे धरीजो, नयो भनेरे पान । म० ।। ६३ ।। स्नान करावे हायरंजी, अंगूछीन ग । विलेपन विधि मानीनो, सन फार अनिरंग ।। म०॥६४॥ थालभरी भोजन नणोजी, मके प्रांगा। भाईजी नागेगोयनो, यो मोटी बाप । मः ॥ ६ ॥ कदही कार गेपिजी, रे चार अनेक । मानक पातकनी परेजी, गपगपडे विकास पोहावी में पार केली. आपट्टी भी पार र गोरो र - (४२४ ) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । वात कहन्तां मरिगयोजी, फिटरे पापी काल । छेतरियो छलवट करीजी, रघुपतिस्यों भूपाल ।। स० ॥ ४० ॥ एह कहन्त स्वमीनोजी, वचनां साथे जीव । निकलीगयो ततक्षण तदाजी, आतुर पणे अतीव ॥ स० ॥ ४ ॥ सिंहासन बैठा थकाजी, हेमथम्भ अवथम्भि ॥ आंख पसार्योंही रह्योजी, लेप बिम्ब निरदम्भि ॥ स० ॥ ४२॥ लक्ष्मण मूओ जाणिकेजी, देवकर विखवाद । हास्यथकी अनस्थ हुओजी, वहीगयो परसाद ॥ स० ॥ ४३ ॥ विश्वाधार विशेपथीजी, ओयों हणियो एह । पश्चात्ताप करी घणोजी, स्वर्ग गया सुरतेह ॥ स० ॥४४॥ अन्तः पुरिनी पद्मनीजी, मूओ जाणी कन्त । कूटे पीटे आवटेजी, रोवे अति विलवन्त ॥ स० ॥ ४५ ॥ शोक वचन श्रवणे सुणीजी, राघव धसि आवन्त । अमंगल अजाणीयाजी, मण्डे फिस्यो तुरन्त ।। सः ॥ ४६ ॥ जीवेछे मुझभाईजीजी, एम केम मरन्त ? | मूच्छियो कोई प्रकारथीजी, तब उपचार करन्त ।। स० ॥ ४७ ।। वैद्य बुलाया वेगसुंजी, पूछयूं ज्योतिष जाण । तंत्र मंत्र उपकर्म अतिजी, कीधा आप प्रमाण ॥ स० ॥४८॥ कोइयन आयो पाधरोजी, ताम प्रभु मू य । संज्ञापामी ने खरोजी, करुण स्वरे विललाय ॥ स० ॥ ४९ ।। शत्रुन्न सुग्रीवजीजी. विभीपण लंकेश । दुःखे अधिक आरड़ेजी. रोवे राय अशेप ॥ स० ॥ ५० ॥ कौशल्यादिक मायजीजी, नयणे नांखे नीर । छोडिने वडबोर नेजी, गया विललाई वीर ॥ स• ॥ ५१ ॥ मार्ग मार्ग पन्थमेंजी, घर घर हाटे हाट । शोकमय सहुको हुआजी, , पड़ी अचिन्ती वाट ।। स० ॥ ५२ ॥ लवणांकृश प्रभुने नमीजी, अनुमति मांगे आप ।
भी जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । ( ४२५) ए संसार असारछेजी, यमनो प्रबल प्रताप ॥ स० ॥ ५३ ॥ अमृतघोप मुनिशपेजी, पामी उत्तम दिक्ख । मोक्ष गया मुनिवर सहीजी, आराधी गुरु शिक्स ।। स० ॥५४॥ भाईने पुनों तणोजी पामी घणो वियोगः । फिरी फिरी मूछाए प्रभुजी, वधतो जाये शोग ।। स० ॥ ५५ ॥ भाईजीए तुम्ह विनाजी, पुत्रों दीधी पूछ । हजु किस्यूं आगे हुसीजी, तिहाथी वेगो ऊठ ।। स० ॥ ५६ ।। मोहे मूछाणो घणोजी, जाण्यो राम नरेश । विभीपणादिक रायनीजी, ममझाये मुविशेष ।। म० ॥ ५७ ॥ धीरा मांही धीरतुजी, वीरों को गिरताज । लज्जा कारी लोकमेंजी. अधिर पणुं तजि आज ।। स०॥ ५८॥ एह सुणी अति कोपियोजी, होठ उसी बोलन्त । प्रवल वायने वाजवेगी, इंगर नवि डोलन्त ।। स० ॥ ५९॥ जीवछे मुझ भाईजीजी, मुआ तुम्हारा भात । देवोतुम्हे दाग उतावलोजी, अवमर बहियोजान ।। स० ॥ ६१ ॥ वलि वलितं भाईजीजी, कांई लगाये चार । छिद्रलई करसे वगूंजी, दुर्जन एह पेमार ॥ म० ॥ ६२ ।। अथवा दुजैन देखनांनी, कोपेनहीं राजान । एमकही पधि धरीजो, यो अंगरे पान ।। म० ॥ ६३ ॥ स्नान करावे हाथजी, अंगूलीने अंग। विलेपन विधि मारवाजो, गम करे अनिरंग ॥ म॥ ६४ ॥ धालभी भोजन नमोजी, मुके आगे भाग। भाईजी आरोगोयनी, योले मीठी बाण म० } ६५॥ कदही अंकार गेपिरुजी, र वार अनेक। मम्नस बालकनी पसी, गपगाडे विक। न !! पोटाची ने पाल केसी, भापी पी पां। गोगामें कारर . ( ४२६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । कानेलागी वात करेजी, कहि२ धाले वाय ॥ सं० ॥ ६७ ।। ए विध पोपे मोहिनीनी, न लहे शुद्ध लगार । वोलीगया खट्मास जबजी, वैरीकरे विकार ।। स० ॥ ६८ ॥ इन्द्रजीत ने सुंदनाजी, नन्दन महामय वन्त । अपरही वयरी घणाजी, निसुणो ए विग्तन्त ॥ स० ॥ ६९ ॥ 'अयोध्या ए आवीयाजी, गुप्तपणे ततकाल । सूनी जाणीने गुफाजी, जेम आवन्त सीयाल ।। स० ॥ ७० ॥ खवर लेई श्री रामजीजी, अंकारोयो बन्धु । धनुष्य बाणने करग्रहीजी, गाजन्तां जेम सिन्धु ॥ स• ॥ ७१॥ आसन कम्पे अवधिसूजी, आवे देव जटायु । देवघणा परिवर्योजी, करवा राम सहायु२ ।। स०|| ७२ ॥ सुरवर सानिध्य साचवेजी, तेनहीं कहने पाडी । विभीपणादिक खेचराजी, अलगाकिया तेताड़ी ।। स० ॥ ७३ ।। लजाणा संयम ग्रहोजी. भेट्यो गुरु अतिवेग । तेग फरीनहीं राजनीजी, तामग्रही व्रत वेग । स० ॥ ७४ ।। ढाल भणीए साठमीजी, जेहनां चरम शरीर । 'केशराज वश मोहनेजी, हुआ अधिक अधीर । स० ॥ ७५ ॥ दोहा (गोडी रागे) देव जटायु रामने, देखावे दृष्टान्त । समझावा ने कारणे, आव्यो छे एकान्त ॥१॥ पंकज रोपे शील उपरे, सींचे सूको वृक्ष । उग्वर बेते अकालही, वावे वीज प्रत्यक्ष ॥ २ ॥ पाणी पीले रंतनी. ताम कहे श्रीराम | किस्यू करेरे मानवी, मूढ़ पणानों काम ? ॥ ३॥ पंकज ऊगे पाणिए, पाणी विण न उगन्त । जल सींच्ये मूसलं, क्यूही नवि फूलन्त ॥ ४ ॥ १ पूरेहुवे २ सहाय= २ कमल- श्री जैन पद रामायण चतुर्थ वएड । (४२७) चीज न ऊगे जल विना, उखर खेत विशेष । वेलू पिल्यां पाणिए, मूर्ख नेल मत देस ॥५॥ तत्र योल्यो हसि देवता, एजो एमज होय । मूओ फरी जीवे नहीं, स्वामी विमासी जोय ॥ ६ ॥ एम कलां कोप्या घj, आलंगीने१ देह । कहे दुरजा दृष्टिथी. आणूं छू तुझ छेत् ॥ ७॥ सेनापतिर सुर लोकथी, जटायु नो उपाय । देखे जब लागे नहीं. मोहमें रहे रघुगय ॥ ८॥ आप उपायज केलये, मई नारी एक । खाँधे धरीने आवीयो, राम वदे मुविशेष ।। ९ ।। एकां मुर्ख धीट नर, मूई नारी खांध । लेई फरे लेशे नहीं, मूमो आयुखो सांध ॥ १० ॥ स्वामी ? अमगल कहां कहो, ए मुझ व्हाली नार । हैया थकी नपि उतरे, राम हे सुविचार ।। ११ ।। हाला धी व्हालो हुवे, मूओ फरि नालन्त । मृआ गयाते शौचना, शोभन को पावन्त ।। १२ । पर उपदेशो जग पणो, आप न मगो कोई । गम मोहे मोही रहा, नाम कहे सुर सोई ।। १३ ॥ इंगर बलनो देखीए, पग नले नदि देगन्न । छिद्र परामा पमिए, पोताना न पेपन्न ।। १४ ॥ ए वचने प्रति दृजियो, प्रभुनी आगो टाम । लक्ष्मण भाईजी नही, मृभो आगे ए गम ॥ १५ ॥ नपने दोई देशला, आपणो देवार । पगलागी प्रमुनीनो, सो पहला मार ॥१६॥ संस्कार कागतो. गन कियो नेवार । आपड़वा जापा, लेगा र भार १७11 (सनमा करारमा मानिat% + कापन ( ४२६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। कानेलागी वात करेजी, कहि२ घाले वाय ॥ स०॥ ६७ ॥ ए विध पोपे मोहिनीजी, न हे शुद्ध लगार । वोली१गया खट्मास जबजी, वैरीकरे विकार ।। स०॥ ६८ ॥ इन्द्रजीत ने सुंदनाजी, नन्दन महामय वन्त । अपरही वयरी घणाजी, निसुणी ए विग्तन्त ॥ स० ॥ ६९॥ 'अयोध्या ए आवीयाजी, गुप्तपणे ततकाल । सूनी जाणीने गुफाजी, जेम आवन्त सीयाल ॥ स० ॥ ७० ॥ खवर लेई श्री रामजीजी, अंकारोयो बन्धु । । धनुष्य वाणने करग्रहीजी, गाजन्तां जेम सिन्धु ॥ स• ॥ ७१ । आसन कम्पे अवधिसूजी, आवे देव जटायु । देवघणाझं परिवर्योजी, करवा राम सहायु२ ।। स०॥ ७२ ॥ सुरवर सानिध्य साचवेजी, तेनहीं कहने पाडी । विभीपणादिक खेचराजी, अलगाकिया तेताड़ी ।। स० ॥ ७३ ।। लजाणा संयम ग्रह्योजी. भेट्यो गुरु अतिवेग । तेग फूरीनहीं राजनीजी, तामग्रही व्रत वेग ।। स० ॥ ७४ ॥ ढाल भणीए साठमीजी, जेहनां चरम शरीर । 'केशराज वश मोहनेजी, हुआ अधिक अधीर ।। स० ॥ ७५ ॥ दोहा (गोडी रागे) देव जटायु रामने, देखावे दृष्टान्त | समझावा ने कारणे, आव्यो छे एकान्त ॥ १॥ पंकज रोपे शील उपरे, सींचे सूको वृक्ष । उग्वर बेते अकालही, चावे वीज प्रत्यक्ष ॥ २ ॥ पाणी पीले रेतनी. ताम कहे श्रीराम | किस्यू करेरै मानवी, मूढ पणानों काम ? ॥ ३॥ पंकज३ ऊगे पाणिए, पाणी विण न उगन्त । जल सींच्ये मूसलं, क्यूही नवि फूलन्त ॥ ४ ॥ १ पूरेहुवे = २ सहाय= २ कमल= श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४२७ ) वीज न ऊगे जल विना, उखर खेत विशेप । वेलू पिन्यां घाणिए, मूर्ख तेल मत देख ॥५॥ तब वोल्यो हसि देवता, एजो एमज होय । मूओ फरी जीवे नहीं, स्वामी विमासी जोग ॥ ६ ॥ एम कयां कोप्या घj, बालंगीने१ देह । कहे दुरजा दृष्टिथी. आणू छु तुझ छेह ॥ ७॥ सेनापतिर सुर लोकथी, जटायु नो उपाय । देखे जब लागे नहीं. मोहमें रह रघुराग ॥ ८॥ आप उपायज केलये, मूई नारी एक । खोंधे धरीने आवीयो, गा वदे मुविशेष ॥९॥ एकां मूर्ख धीट नर, मई नारी समांध । लेई 'फरे लेशे नहीं, मूभी आयुखो सांध ॥ १० ॥ स्वामी ? अमंगल कहां कहो, ए मुझ व्हाली नार । हैया थफी नपि उतरे, गम कहे मुविचार ।। ११ ।। व्हाला थी व्हालो हुने, भूगो फरि नावन्त । म्आ गयाते शोचता, शोभन को पारन्त ।। १२ ।। पर उपदेशो जग घणो, आप न ममो कोई। गम मोहे मोही रसा, ताम कहे मुर मोई ।। १३ ।। इंगर बलतो देखीए, पग नले नपि देगन्न । छिद्र पराया पेसिप, पोताना न पेगन १४॥ ए पचने प्रति यूनियो, प्रभुजी आयो ठाम । लक्ष्मण भाईती नदी, मुभो हालेर गम् ॥ १५ ॥ तरने दोई देवता, आपणो देखार । पगेलागी अनुजीवणे, सगे पहना जा ॥१६॥ संस्कार कामावलो. गम किलो भापया अपनाया गया ना ॥१७॥ राम सगरम भार3 RAIL (४२८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। शत्रुघ्न ने राजनी, पदवी आये ईश | शत्रुघ्न इच्छेनहीं, संयम साथे जगीश ॥ १८ ॥ लवण-तणो अंगजअछे, अनंगदेव उदार ! राज-भार तस अपियो, ओछवकरी अपार ॥ १९ ॥ ढाल इकसठमी तर्ज हामेरे पूज्यजी हा मेरे गुरुजी धन्य प्रभु रामजी धन्य परिणामजी, पृथ्वीमें प्रशंसवे । धन्य तुम्ह तातजी धन्यतुझ मातजी. धन्यतेरा कुलवंशवे धन्या? मुनिसुव्रतने तीर्थे वर्ते, सुव्रतजी गणधारवे । अहंदासे वताव्यो सद्गुरु, भवजल तारण हारवे ॥ धन्य ॥ २ ॥ शत्रुघ्न-सुग्रीव-विभीषण, वीर विराध उदारवे । सोलेहजार नरेश्वर साथे, रामहुवा व्रतधारवे ॥ धन्य ॥ ३॥ वरनारी संयमत्रत लीधो, सहम तदा सतीशवे । श्रीमती आरजिका केरी, सेवकरे निश दीसवे ॥ धन्य० ॥ ४ ॥ पंचाचारी शुद्धाहारी, समितीगुप्ति प्रतिपालवे । शीलसुधारी परउपगारी, पट्कापिक रखवालवे ॥ धन्य० ॥५॥ छठअठम आदि तपकीजे, विविध अभिग्रह वन्तवे । कंचन नीपरे काय कसीजे, गुरु गिरुवा गुण वन्तये ॥ धन्य ॥६॥ चवदेपूर्व अंग इग्यारे. पढ्या बुद्धि प्रमाणवे । पण्डित राज शिरोमणीसाचा, सयविधि जाण सुजाणवे ॥धन्या॥७॥ आसेवन नेग्रहण शिक्षा, दो सिक्या गुरुने संगवे । गुरुकुलवासे साठवयं लगे, रहिया मनने रंगवे ॥ धन्य ॥ ८॥ गुरु आदेशे उग्रविहारी, एकाकी विचरन्तवे । तीनही रात्रे ध्यान तणेवल, अवधि अति उपजन्वे ।। धन्य ॥९॥ चउद रनात्मक लोकविलोके, जेमतो फलकर मांहीवे । अनुन अधिक वेदन अनुभवतो, दोठो नरके प्राहीवे ॥धन्य।।१०।। प्रभुजी चिन्ते जब ई हतो, नामे श्री धनदत्तवे । लक्ष्मणजी हुनो लघुभाई, वमुदत्त सुदत्तः ॥ धन्य ।। ११ ।। . A श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड । उहांपण मुझेकाने मूओ, भवमें भमतो भृरोवे । इहांपण लक्ष्मण मुझसाथे, रह्योनित्य हजुरीवे ।। धन्य० ॥ १२ ॥ वरस सो कुँवर पणेरे, मण्लीक शयतीनवे । दिग्विजय चालीस वर्पलगे, पदवीधर प्रवीनवे ॥ धन्य० ॥ १३॥ इग्यारे हजार पांचसे ऊपर. वरम विदिता माठ वे। सर्वायु नस बार महश्रनं, दीसे ग्रन्थ ही पाठ वे ॥धन्य०॥१४॥ अविरतीने बलि नर्के पहुंत्यो. कृत कौनो जोरवे । जैसो कीजे तसो लहिये. काई करो नर शौर वे ॥ धन्य० ॥१५॥ एमचिन्तवतां राम ऋपीश्चर, कर्म हणेवा हेतवे । तपजप अधिका अधिका कीजे. ममता भाव समेत ॥धन्य०॥ १६॥ दो१ उपवास किया दिनतीजे, लेना कान आहाखे । 'स्यन्दनस्थल रे नगरे पउधारे, जयणानी गतिमारयोधिन्य०॥१७॥ चन्द्रही जेम चकोरादेसे, तेम पुगना सह लोकवे । सन्मुसाया प्रणमेपाया, ए शुगनो संयोगवे ।। धन्य० ॥१८॥ आप आपणा घरनेद्वारे, भोजन फेग थालये । आगेमके भक्तिन चूके, आणीभार रमालये ।। धन्य० ।। १९ ।। लोक शब्द थी शौरमच्यो अति, हाथीभंजे थम्म । ऊंचाफान करे अतिघोड़ा, हुभो अधिक अचम्भरे धिन्य० ॥२० ओमाहाग्न लीघोरामे, चलिनाया नृपगेहरे। 'प्रनिनन्दी भूपेप्रनिलाम्पा, भागीधर्म मनेहवे ॥ धरः ॥ २१ ॥ प्रभुजीनो पारणी पहुंत्यो, उपज्यो अनि उन्दाम। पंचसुदिव्य प्रमिताहा. उद्घोपा नाकानरे । अगः ॥२२॥ प्रभुजी वनमें चिनचिन्ने, पुरमाही नविजारे। क्षोभषणो लोगोंने उपम्पो. दमदाई नदि पाय ॥२३ अन मुजतो बनने विमिन्या सादायी । नहीतर पर अमितहकोयो, काया ना मान मन ॥२३४६ १ पिस पास से समापन परमार - -. * .
(४२८) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। शत्रुघ्न ने राजनी, पदवी आये ईश । शत्रुघ्न इच्छेनहीं, संयम साथे जगीश ॥ १८ ॥ लवण-तणो अंगजअछे, अनंगदेव उदार । राज-भार तस अपियो, ओछवकरी अपार ॥ १९ ॥ ढाल इकसठमी-तर्ज हामेरे पूज्यजी हा मेरे गुरुजी धन्य प्रभु रामजी धन्य परिणामजी, पृथ्वीमें प्रशंसवे । धन्य तुम्ह तातजी धन्यतुझ मातजी. धन्यतेरा कुलवंशवे ॥धन्या? मुनिसुव्रतने तीर्थे वर्ते, सुव्रतजी गणधारवे । अहंदासे वताव्यो सद्गुरु, भवजल तारण हारखे ॥ धन्य ॥२॥ शत्रुघ्न-सुग्रीव-विभीपण, वीर विराध उदारवे । सोलेहजार नरेश्वर साथे, रामहुवा व्रतधारवे ॥ धन्य ॥ ३॥ वरनारी संयमवत लीधो, सहम तदा सतीशवे । श्रीमती आरजिका केरी, सेवकरे निश दीसवे ॥ धन्य० ॥ ४ ॥ पंचाचारी शुद्धाहारी, समितीगुप्ति प्रतिपालवे । शीलसुधारी परउपगारी, पट्कापिक रखवालवे ।। धन्य० ॥५॥ छठअठम आदि नपकीजे, विविध अभिग्रह वन्त । कंचन नीपरे काय कसीजे, गुरु गिरुवा गुण वन्तवे ॥धन्य ॥६॥ चवदेपूर्व अंग इग्यारे. पढ्या बुद्धि प्रमाणवे । पण्डित राज शिरोमणीसाचा, सबविधि जाण सुजाणवे ॥धन्या|| आसेवन नेग्रहण शिक्षा, दो सिक्या. गुरुने संगवे । गुरुकुलवासे साठवर्ष लगे, रहिया मनने रंगवे ।। धन्य ।। ८॥ गुरु आदेशे उग्रविहारी, एकाकी विचरन्तवे । तीनही रात्रे ध्यान तणेवल, अवधि अति उपजन्वे ॥ धन्य ॥९॥ चउद रनात्मक लोकविलोके, जेमतो फलकर माहीवे । अनुन अधिक वेदन अनुभवतो, दोठो नरके ग्राहीवे ॥धन्य।।१०।। प्रभुजी चिन्ते जब ई हतो, नामे श्री धनदत्तवे । लक्ष्मणजी हुतो लघुभाई, यमुदत्त सुदत्तत्रे ॥ धन्य ।। ११ ॥
VYA श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड । (४२६) उहांपण मुझेकाजे मूओ, भवमें भमतो भरीवे । इहांपण लक्ष्मण मुझसाथे, रह्योनित्य हजुर्गवे ।। धन्य० ॥ १२ ॥ वरस सो कुँवर पणेरे, मण्लीक शयतीनवे । दिगविजय चालीस वर्पलगे, पदवीधर प्रवीनवे ॥ धन्य० ॥ १३॥ इग्यारे हजार पांचसे ऊपर, वरम विदिता साठ वे। सर्वायु नस बार सहश्रन, दीसे ग्रन्थ ही पाठ वे ॥धन्य०॥१४॥ अविरतीने बलि नर्के पहृत्यो, ऋत कौनो जोरवे । जैसो कीजे तसो लहिये. कार्ड करो नर शौर वे ॥ धन्य० ॥१५।। एमचिन्तवतां राम ऋपीचर, कर्म हणेवा हेतवे । नपजप अधिका अधिका कीजे, समता भाव ममेनरे ॥धन्य०॥१६॥ दो१ उपवास किया दिनतीजे. लेवा काज आहार। 'स्यन्दनस्थल२ नगरे पउधारे, जयणानी गतिमारबोधिन्या१७॥ चन्द्रही जेम चकोगदेसे, तेम पुगना महु लोकने । सन्मुसाया प्रणमेपाया, ए शुननो संयोगरे । धन्य० ॥१८॥ आप आपणा घरनेद्वारे, भोजन केग थालये । आगेमूके भक्तिन चूके, आणीभार ग्मालये ॥ धन्य० ॥ १९ ॥ लोक शब्द थी शौरमच्यो आने, हाथीभंजे धम्गरे । ऊंचामान करे अतिघोडा, हुमो अधिक अचम्भ धन्य० ॥२० ओमाहाग्न लीधोगमे. चलि भागा नृपगेइये। 'प्रतिनन्दी भूपेपनिलाभ्या, वाणीधने मनेदये ।। धन्यः ॥ २१ ॥ प्रभुजीनो पारणो पहुंयो. उपज्यो अनि उन्हामरे । पंचमुदिव्य प्रसिद्भाहा, उद्घोषण मामामारे ॥ धन्य० ॥ २२ ॥ प्रभुजी वनमें चित्तनिलो, पुरमादी नविता। शोभषणो लोगोंने उपयो, दुःपदाई नदि वाले धन्य० ॥२२ अन मूजनो धन, विरे, निन्या नादादी मारे। नहींना राह अभियाकीधी, सानप उपाय बना १ दिवस के उपासपी नमामीन नाप मारने
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(४३६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खण्ड। -(कलश)- राम-लक्ष्मण अने रावण, सती सीतानी चरी। कही भाखी चरित्र साखी, वचन रचनाए करी ॥१॥ संघ रंग विनोद वक्ता, अने श्रोता सुख भणी । केशराज मुनिंद जम्पे. सदा हर्प वधामणी ॥ २ ॥ H 卐 - इति श्री जैनपद्य रामायणे-भरत दीक्षाग्रहणं-मधुमरणं-शजुन्नराज्य प्रदानं-सीतोपरिकलंक-सीता वनवासं-लवणांकुशयो-जन्म-विद्यापठन- लवणांकुश पाणिपीडनं-राम-लक्ष्मण सार्ध-युद्ध-सीताग्निप्रवेशं-सीता दीक्षा ग्रहणं-देवमाया-लक्ष्मण मरणं-रामदीक्षा-मोक्षप्राप्ति-पूर्वभव वर्णनमादि-विषयकं चतुर्थ-खण्डं समाप्ति मफणीत- इति श्री जैनपद्य-रामायणं सम्पूर्णम् कल्याण मस्तु- इत्यहम्- इत्यहम् इत्यहम लिखितं श्री शार्दूलशिष्य मुनि रूपेन्दुना शुभं भूयात्- - मुद्रक:-- राम-श्याम प्रिटिंग प्रेस कटला बाजार, जोधपुर.
प्रदम् परिशिष्ट (१) गीत [१] तर्ज-सद्देल्या हे प्रांषो मोरियो राज कंवर रलियावणा, नयणांग हे धन जीवन जेह के, हरमावण हिवड़ा तपा, परसावण हे आनन्दरस मेह के, रघुनन्दन मन मोहियो [ टेर] एतो किसा हे नगरराराजवी? अवनीपत हे रिण घर अवतार? के, किण विध. इण पुर आविया, हिवड़ा रा है हरलेवण हार के, रघुनन्दन मन मोहियो [२] एतो प्रवध नगर ग है गजनी, राहुल ग है जागंबरज चंद के, सीय-सुगम्बर निरसा मठे पाया है पनो मानन्द कन्द गुनन्दन मन मोहियो [३] एतो नेह नगर रा है राजी, मानन्द गोदरसे मापान के, नयय-निवाजप माविया, जग जीपराई मायांग दी वाल के, रसुनन्दन ना मोहियो [४] (४३६) श्री जैन पद रामायण चतुर्थ खएड। -~ -(कलश)- राम-लक्ष्मण अने रावण, सती सीतानी चरी। कही भाखी चरित्र साखी, वचन रचनाए करी ॥१॥ संघ रंग विनोद वक्ता, अने श्रोता सुख भणी । केशगज मुनिंद जम्पे. सदा हर्प वधामणी ॥ २ ॥ 卐 इति श्री जैनपद्य रामायणे-भरत दीक्षाग्रहणं-मधुमरणं-शनुन्नराज्य प्रदानं-सीतोपरिकलंक-सीता वनवासं-लवणांकुशयो-जन्म-विद्यापठनं- लवणांकुश पाणिपीडनं-राम-लक्ष्मण सार्ध-युद्ध-सीताग्निप्रवेशं-सीता दीक्षा ग्रहणं-देवमाया-लक्ष्मण मरणं-रामदीक्षा-मोक्षप्राप्ति-पूर्वभव वर्णनमादि-विपयकं चतुर्थ-खण्डं समाप्ति मफणीत- इति श्री जैनपद्य-रामायणं सम्पूर्णम् कल्याण मस्तु- इत्यहम्- इत्यहम् इत्यहम् लिखितं श्री शार्दूलशिष्य मुनि रूपेन्दुना शुभं भूयात्- - - मुद्रक:- राम-श्याम प्रिटिंग प्रेस कटला बाजार, जोधपुर.
३ सीताजी तथा सखियां री सलाह गीत [३] तर्ज-यालम छोटो रे ओ धनुप बड़ो विकराल, रघुवर छोटो रे, कमल जिसो तन राम रो, श्रो धनुप यजर सो जाण, रघु० ॥१॥ पड़ो कठण पण पिता कियो, कोई रंच न कियो विचार, रघु० ॥२॥ धनुप चढ़ो कै मत चढ़ो, म्हारो राम भंवर भरतार रघु० ॥ ३ ॥ छोटो छोटो मत कहो, यो प्रण ब्रह्म परेस रघु० ॥४॥ सूरज छोटो सो सो लगे, कोई जग में करे प्रकाश, रघु०॥ ५ ॥ रघुवर चाप चढावमी, कोई इसमें फेर न फार, ०॥६॥ वरात चढे है गीत [५] त-सारी रघुवर री रात पपी मारी रे, सियार री ।। टेर ॥ मुंडाला सुमेर सा सजिया ममर-विमसी अम्बारी रे, १० चंचज्ञ हय चिग चाज गुहार नापे मोर मनोहारी रे. र. रंग रतीला पाजा पाने, शम्द हुने प्रानन्दकारी रे, रघुरू देव सकल भूपत मिल माया, हाने मया पर धारी रे, र
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गीत [२] तर्ज-जलो म्हारी जोड़ रो उदयापुर माल्हे हे
कंवर दशरथ तणा, कोई जादु कीनो है।
भंवर मन भावमा, म्हारो मन हर लीनो है ॥ टेर ।
म्हे थाने माली ! वरजिया हे, रघुवर रुख मत जोय ।
सुखरी सीख सुणी नहीं जद,
बैठी तन मन खोय || कंवर ॥१॥
रघुवर-रुख लागो नहीं हे सखी !, तो तन मन किण काम,
वे हिज तन मन सफल हे सखी,
ज्यो रचियो रंग राम, ॥ कं० ॥२॥
जे नयणा छाकां छई, सखी राम-रूप-रस चाख.
दुजी दिस नहिं देखसी वाने,
लोम दिखावो लाख ॥ कंवर ॥३॥
दया दीठ जिण दिस हुई, जाणू दुनिया रा चूका दाम,
कोड़ काम करणा मदा यांरी,
एक अदा रो काम, ॥ कंवर ॥४॥
श्रवण वयण सुख ना सुणे, सखी ! नारद सारद वीण,
लज तज लारे लग रया है,
अली बडा २ परवीण ॥ कंवर ॥५॥
सुर तरु तो सूको लगे है, अली! अमरत फीको होय,
लूखो जग तिणने लगे अली,
जिण लीना ए जोय ॥ कंवर ॥६॥
'ए सूरज सूरज तणा हे, सखी ! ए चंदारा ही चन्द,
ए मनमथ मनमथ तणा हे अली,
ए इन्दर रा ही इन्द ।। कंवर ॥७॥
सीताजी तथा सखियां री सलाह गीत [३] तर्ज-यालम छोटो रे ओ धनुप पड़ो विकराल, रघुवर छोटो रे, कमल जिसो तन राम रो, मो धनुप बजर सो जाण, रघु० ॥१॥ पड़ो कठण पण पिता कियो, कोई रंच न कियो विचार, रघु० ॥२॥ धनुप चढ़ो कै मत चढ़ो, म्हारो राम भंवर भरतार रघु०॥ ३ ॥ छोटो छोटो मत कहो, मो प्रण ब्रह्म परेस रघु०॥४|| छोटो सो लगे, ई जग में करे प्रकाश, रघु०॥ ५ ॥ रघुवर चाप चटारसी, कोई इणमें फेर न फार, रघु०॥६॥ वरात चढे हे गीत [४] त-सारी रघुवर री रात रखी भारी रे, सियापारी ।। टेर ।। चंचल हय चिन चाल नुकास्य नारे मोर मनोहारी रे, र. रंग रसीला बागा बाजे, राद हुई भानन्दकारी रे, 17 मुंडाला मुमेर मा सजिया भा - विमाया मम्मागरे , देव सफल भूपत मिसमासादाने पक्षाचा पार ४ गीत [५] तर्ज-बामण का सांवरिया ! तूं जीवन री है जड़ी, राम प्यारा रे ! तूं हिवडा रो है हार ॥ १॥ रघुवर प्यारा रे, हारे गम प्यारा रे ! हारे गोविन्द प्यारा रे, नेह लग्यो सो निभायले रे ।। टेर ।। सांवरिया ! तूं सरखर में हंसला, राम प्यारा रे ! म्हे चातक तं मेह ॥२॥ राम प्यारा रे ! नेह लग्यो सो निभायले रे सांवरिया ! म्हे भंवरा तूं कुंज है, राम प्यारा रे ! म्हे चकोर तूं चन्द ॥३॥ राम प्यारा रे ! नेह लग्यो सो निभायले रे सांवरिया ! म्हे जलचर तूं नीर है, राम प्यारा रे ! तूं जीव ॥४॥ राम प्यारा रे ! नेह लग्यो सो निभायले रे श्री सीताजीरो पति-प्रेम गीत [६] तर्ज-कांई रे जवाब करूँ रसिया कांई रे जवाब करूं हरि सूं ? जवार करूंगी, जवाब करूंगी, रामैयारा चरणां में लपट रहूंगी। सांवरियारा चरणां रो ध्यान धरूंगी काई रेजवाच करूं हरिमं ॥ टेर।। पलकां रे ऊपर पग धर आजो, ओ हिवड़ारे पासण आप विराजो, कांईरे० ॥१॥ म्हे' काया कहोजी ! प्रभूजी ! थांने किण विलमाया ? तो दासी रे महला विलम्ब मूं माया, काईरे० ॥२॥ भाप, विना म्हारो भवन अलूनो, तो माप विना सर ही जग सूनो, काईरे० ॥३॥ आप मिन्यां सरही सुस मानं, तो श्राप मिन्यां धन जीवन जानू, काईरे० ॥४॥ ले पग पूर मधुर मन मांज, तो यो अंजन म्हारा नया में मांजू, कांइरे०॥॥ नेहरे नीर चरण जुग धोम, तो प्रेम पदारथ भोग परोसं काईरे० ॥६॥ चरण पियूख प्रेम टू पीऊं, तो इण रामैया ने जोया ही जीऊं, काईरे० ॥७॥ प्रेम पलंग पर प्रसु पोढाऊ, तो पाय पलोट परम सुख पाऊं, कोइरे ||८|| श्रीरामजी सीताजी ने समझावे : गीत [७] त~-पविहानीकामेरी पिता-वचन पाला पन ना वचन पाल भाषां प्यारी ! प्राय-नियाजीमान विरानोहे! सारा मानो म्हांग। तान मगर री लेग कीमी, मां पीरज मार्ग, दिन आना कोई मनामे हो माम मितां पापा!
ऊगे भाण हजार प्रभूजी जे ऊगे भाण. हंजी तो ही आप बिना छे अंधार, प्रभूजी० ॥६॥ नेह निहावण हार प्रभूजी थेतो नेह निहावण हार० हांजी म्हारा भव भवरा भरतार, प्रभूजी० ॥७॥ सीताजी श्रीरामचन्द्रजीरो हुकम पायो अब सासूजी सूं विदा मांगे गीत [११] तर्ज-पणिहारी बीकानेरी हुकम हुवो सुसराजी सा रो, चरस चतुरदस वन-चारी, प्राण प्रियाजी म्हारा वन में पधारे हो पति-सेवा ही सुखकारी चिरा लागो पीतमरे चरणां, भवन रहा रुचि नहीं म्हारी, हुकम करो तो साम् ! पिव संग जाऊंसा ! पति-सेवा ही सुखकारी सीख सुणी म्हे मात पितारी, पति परमेसर तनुधारी, पति विन गति पतनी ने नाहीं हो, पति-सेवा ही सुखकारी धन धन है थारा पिता सियाजी, धन धन माता थारी, ज्यांने थाने लाड़ी ! लाड लाडाया है, पति-सेवा ही सुखकारी, कौशल्याजीरो उपदेश गीत [१२] तर्ज-पणिहारी परम धरम पतिव्रत कहयो, सुण सीताजी, यो सारांरो सोर सीताजी ! पति जग में परकाश है, सुण सीताजी, पति विन घोर अंधार सीताजी !
जग पूजे पति पूजतां, सुण सीताजी!
सुर सेवे पति-सेव, सीताजी !
पति परमेसर सारिखो, सुण सीताजी !
पति देवांरो देव, सीताजी !
पति भजतां जग जीतजे, सुण सीताजी!
कदे न होवे हार, सीताजी !
पति सेयां सुख संपजे, सुण सीताजी !
पति पूज्यां भवपार, सीताजी !
पति नयणांरी पूतली, मुण सीताजी!
पति हिडारो हार, सीताजी !
पति जीवणरी है जडी, सुण सीताजी !
पति प्रातम आधार, सीताजी !
पतिव्रता री प्रशंसा
गीत [१३] -द्वां सगीजीपा भावे
हां पतिव्रत-पालनहारी, धन्य धन्य घाती पर नारी ॥टेर।।
धन्य वंश जिण वा जाइ, धन मुनराश बटे परवाई।
धन्य पुरुष जिसने या न्याही,
धन्य धन्य धरणी उटे वा पार पधारी रे, पनि !!१॥
पति के प्रेम रहे नित गती. मान पिता मन माद स्टाग।
नाम मगुर में सुर उपजाती,
प्रम चन्द्र नन्दिका, गीलाम्न उजियारी रे, पतिः ॥ २ ॥
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स्त्रियां रो राम-विरह वर्णन
गीत [१४] तर्ज-जलो म्हारी जोड़ रो
सनेही सांवरो बणगो बन-वासी हे !
रसीलो रामजी अब कद घर आसी हे ! ॥ टेर ॥
नयणां रो अंजन सांवरो, म्हारे हिवडा रो रंजनहार ।
गंजन दुःख परजातणो, अोतो भव-भंजन भरतार,
सनेही ॥१॥
जिण वन रघुनन्दन बसे हे सखी ! सो नन्दन वन जाण,
चरण धरण, हरि जिण धरे, हूं तो पल पल वारूं प्राण,
सनेही ॥२॥
सुर नर रो तन जे हुवो हे सखी! तो आवे किण काम,
वनरा पशु पन्छी भला है, वे तो नयन निहारे राम,
सनेही० ॥ ३॥
राम बसे जिम जंगलां हे सखी! सो हिज सुरग निवास,
राम-विहूणो सुरग ही सखी ! तन उपजावे त्राम,
सनेही ॥४॥
चन तो बडभागी बड़ो, सखी रमे जठे रघुराज ।
रान प्रभू त्यागी तिका, आतो अवध अभागी पाज,
सनेही० ॥ ५ ॥
अवध प्रजा म्हांने करी, दिया रघुवंशी भरतार ।
राम-विछोहो क्युं कियो, प्रोतो काई भूलो करतार,
सनेही० ॥ ६॥
११ २ गीत [१५] तर्ज- राम विना तो म्हारे सुख ही सूल । राम विना तो म्हारे धान ही धूल ।। राम विना तो म्हारे हार ही सांप। राम रिना तो म्हारो पुन ही पाप ।। रोम विना तो म्हारे पीत ही रार । राम विना तो म्हारे जीत ही हार ॥ रोम विना तो म्हारे हरख ही सोग। राम विना तो म्हारे भोग ही रोग। तर्ज-रोक्षण दो निरागोर गीत [१६] किण विध विस-यो जाय, रामैयो म्हांस किण विध विमन्यो जाय । योजी म्हारो दशरथ राजकुंवार, योजी म्हांग जनक सुता भरतार, मांवरियो म्हास पलकन विमन्यो जाय ।। टेर ।। हरि हिवडे गे हार, अली हे ! म्हारो प्राणां गे प्राण प्राधार । हां हे म्हागे जनम मुघारण हार, हा हे म्हांगे मरण मिटाव हार, मारियो ॥१॥ यानन्द ग बागार, प्राली है माग सुपड़ा समरदार, हा जो तो निराधागाधार,
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स्त्रियां रो राम-विरह वर्णन
गीत [१४] तर्ज-जलो म्हारी जोड़ रो
सनेही सांवरो बणगो बन-वासी हे !
रसीलो रामजी अब कद घर आसी हे ! ॥ टेर ॥
नयणां रो अंजन सांवरो, म्हारे हिवडा रो रंजनहार ।
गंजन दुःख परजातणो, अोतो भव-भंजन भरतार,
सनेही ॥१॥
जिण वन रघुनन्दन बसे हे सखी ! सो नन्दन वन जाण,
चरण धरण, हरि जिण धरे, हूं तो पल पल वारूं प्राण,
सनेही ॥२॥
सुर नर रो तन जे हुवो हे सखी! तो आवे किण काम,
वनरा पशु पन्छी भला है, वे तो नयन निहारे राम,
सनेही० ॥ ३॥
राम बसे जिम जंगलां हे सखी! सो हिज सुरग निवास,
राम-विहणो सुरग ही सखी ! तन उपजावे त्राम,
सनेही ॥४॥
घन तो बडभागी बड़ो, सखी रमे जठे रघुराज ।
रान प्रभू त्यागी तिका, आतो अवध अभागी आज,
सनेही० ॥ ५॥
अवध प्रजा म्हांने करी, दिया रघुवंशी भरतार ।
राम-विछोहो क्यु कियो, श्रोतो कांई भूलो करतार,
सनेही० ॥ ६॥
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१२
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हां हे ओतो निरधन रो धन सार
सांवरियो० ॥२॥
प्रेम रो पारावार,
अली हे अोतो सारां रो ततसार ।
हां हे हरि नेह निभावम हार,
हां हे प्रभु पार लगावण हार,
सांवरियो॥३॥
जोवे न कुल आचार,
अली हे ओतो नहिं गुण रूप अपार ।
हां हे हरि रीझे नेह निहार,
हांहे अोतो भगती-वस भरतार,
सांवरियो० ॥४॥
देखो भूल अपार,
अली हे वांने भूल रह्यो संसार ।
हां हे तो ही वो नहिं भूलण हार,
हां हे हरि सबरी करा संभार,
सांवरियो |॥ ५ ॥
भरतजी आदि पाछा अयोध्या जावता
श्रीरामजी ने विनती करे।
गीत [२७] तर्ज-समदण जावांला थारी बलिहारी है
रघुवर ! दरसण देवसने वेगो आईजो।
प्यारा प्रभू ! प्रेमरा प्यासां ने मत तरसाईजा ।।
वचन पिता रा पालो,
सतपथ चालो, धरम संभालो स्वामी !
ज्यूं निज वचन निभाईजो ॥ रघु० ॥ १ ॥
१३ चवदा परस वितावो, उणरे दूने ही दिन प्रावो, स्वामी ! प्रागे मत विलम्ब लगाईजो ॥ रघु० ॥२॥ श्राप दया मय नामी, अन्तरजामी, सुख रा सागर स्वामी ! जिवहारी जलन मिटाइजो ॥ रघु० ॥ ३ ॥ सूर्पनखां आई गीत [१८] तन-परजी मून्द्र घोल योल बोल हिजडारा जिनडा! काइ थारी मरजी रे ? बालम ! मुन्डे बोल ॥ टेर ।। सुन्दर रूप अनुपम जोवन, सो उन किरा विध माया रे ? भोग भोगवा जोग, जोग किम लीनो काया रे, बालम |॥२॥ थोरै जिसो नहीं नर सुन्दर, म्हारे जिसी न नारी रे ।। मा जोड़ी जग मांय, विधाता एक उतारी रे, सालम् ||२|| तीन लोक रो राजा रावण, मो है म्हारो भाई रे। म्हा नेह निभाय, पार पाय प्रभुनाई रे, बालम० ॥ ३ ॥ प्रभुरो उत्तर गीत [१] ता-यासमोटोरे उन्धर छोटो है ! भामा तर भरतार बन्धक ।। म्हाने चोटो परसो, कोई सुन्दर का प्रमा, घर ||१|| स्पाम बरत नहीं. वो गौर रख दीदार, प-1121 म्हारे तो ग तुन्दरी, कोई नही उपरेप नार, दमाः ॥३॥ .
१४ सूर्पनखां लछमणजी ने कहे है गीत [२०] तर्ज-झरोखा झालो देजा है भांगडली म्हारे सूं मोह करलो हो साजन जी ! थारी मूरत मो मन मोह्यो, हिरदा मूं मोने वरलो हो साजन जी! श्रीराम वचन (प्रभु विरहलीला करे) गीत [ २१ ] तर्ज-रुण झुणियो ले हे सरिता रा हंसलां ! थे महर करो । सीता ने वेग बतीय, ओ उपकार करो ॥ ऊजल थारी जात है, थे महर करो । कोई ऊजल खान र पान, ओ उपकार करो ।। हे सूवा ! हे सारिका ! थे महर करो। सीता रो पतो बताय, ओ उपकार करो ॥ हे धारणरा हेरमां! थे महर करो। सीतारी बात सुणाय, प्रो उपकार करो ।। बनवासी पशु पंछियां, थे महर करो । म्हारी सारा ही करो सहाय, ओ उपकार करो ॥ हे तरुवर ! हे वेलड़ी! थे महर करो । प्यारी रो पतो बताय, यो उपकार करो ।। पर-हित कारण प्रगटिया, थे.महर करो । म्हारा जीवरी जलन मिटाय, प्रो उपकार करो। है सूरज ! हे चन्द्रमा ! थे महर करो। म्हांने विछड़ी प्रिया मिलाय, यो उपकार करो ॥ जीवजड़ी म्हांसू वीचड़ी, थे कृपा करो। म्हांसू उल विन जियो न जाय,प्रो उपकार करो। , परिशिष्ट (२) भामंडल और सीता का पूर्वभव का सम्बन्ध और उनका जन्म भरतक्षेत्र में दारुग्राम था । उसमें वसुभूति नामक ब्राह्मण रहता था । उसकी स्त्री का नाम अनुशा था। इनके पुत्र का नाम प्रतिभूति था। प्रतिभूति की सी सरसा एक फयान नामक नाहाए पर आसक्त दोगई और वदनाहरण उसे साथ लेकर भाग गया। कहा है "जो काम से आतुर होते हैं उन्हें न भर दोता है, लज्जा होती है। अतिभूति अपनी सी की खोज करने के लिए भून की भांति भूतल पर भटकने लगा। जय वान उमात पिता को मालूम दुई ता वे भी अपने पुर और पुत्रवधू को ढूंढने के लिए पर देश को चल पडे। घूमते मते, किसी समय उन्हें एक साशु मिले । साधु को भाऊ माय से नमस्कार कर उनका धपिरेश सुनने के लिए बैंठ गये। धर्मापदेश सुनने से उन्हें ससार से चराग्य घोगया चोर पसुभूति तथा मनुशा दानों पति-पतन साधु समीप दीक्षा ली। मका गुप की मामा कर अनु. केश, फमतीनानाभा क पास जाकर रहने लगी। बारिता पालन करते करते कुछ समय पश्चात् दाना ने शीर पापाग किपा मोर दोनों सोयम स्वामें में। वहां से च कर वसुन्नति का जीप तास पर्वत पर समानुर नगर का पदमति नाम राम दुसा और अनुगमी देवली से पार मी गपुप्पी नाम की रानी भतिभूति की खी सरसा भी जिसे मान र चला था. TGT को मार रानीपास २ पुत्र हुत्रा। दीक्षा लेली और वह काल करके ईशान देवलोक में देवी रूप से उत्पन्न हुई। अतिभूति अपनी स्त्री की खोज करता करता कुछ समय के अनन्तर मर गया और चिरकाल तक संसार में भटक कर एक बार हंस का वालक हुआ। उसे सेन नामक पक्षी लेकर खाने लगा, पर दैवयोग से वह किसी प्रकार उससे छूट गया और जैसे तैसे उड़ता उड़ता एक साधु के पास पाकर गिर पड़ा । उस समय उसके प्राण सिर्फ कण्ठ में शेष रह गये थे। इस प्रसंग पर महा करुणासागर उन मुनि ने उसे नवकार मन्त्र सुनाया। मन्त्र के प्रभाव से वह हस बालक श्रायु समाप्त होने पर किन्नर लोक में दल हजार वर्ष की आयु वाला देव हुअा। वहां से चल कर वह विदग्ध नामक नगर के राजा प्रकाशसिंह की प्रवरा रानी के उदर से कुण्डलमण्डित नामक पुत्र हुआ। भोगोपभोग में प्रासक्त कयान, मृत्यु का ग्रास बन कर भवाटवी में भटकता भटकता चक्रपुर नगर के गजा चक्रध्वज के उपाध्याय धूम्रकेतु की स्वाहा नामक स्त्री के उदर से उसका नाम पिंग रखा गया। राजा चक्रध्वज की कन्या अति- 'सुन्दरी तथा पिंग एक ही गुरु के पास विद्याभ्यास करते थे । वहां दोनों का श्रापस में प्रेम होगया। मौका पाकर पिंग ने अति सुन्दरी का हरण किया और वहां से भाग कर विदग्ध नामक नगर में जाकर 'हने लगा। वहां वह घास तथा लकड़ियां बेच कर किसी प्रकार अपना निर्वाह करने लगा, क्योकि गुणहीन पुरुषो का पेट ऐसे कार्य किये विना भरता ही नहीं है। एक बार उस नगर के राजकुमार कुण्डल मण्डित की F अतिसुन्दरी पर पड़ गई । चार अांखें होते ही दोनों की पर में प्रीति बंध गई। इसके बाद अपने पिता के डर से कुन्डलमंडित गुप्त रूप से अतिसुन्दरी को साथ लेकर वहां से निकल भागा और किसी पर्वत पर जाकर वहां मकान बना कर रदने लगा। अतिसुन्दरी के वियोग से व्याकुल होकर पिंग पागल की तरह इधर उधर फिरने लगा। उसे किसी समय गुप्ताक्ष प्राचार्य के दर्शन होगये। उनसे धर्मोपदेश सुन कर उसने दीक्षा धारण करली पर अतिसुन्दरी का अनुराग उसके अन्तःकरण . नामके ।
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४ नामक नगर में धप नामक व्यापारी की स्त्री सुन्दरी के उदर से तुम्हारा जीव वरुण नाम से पुत्र रूप में जन्मा । वह अत्यन्त उदार था। उस भव में अपने उदार स्वभाव के कारण वह साधुओं को इच्छा से भी अधिक दान देता था। वहां से काल करके तुम देव. लोक में देव हुए। फिर वहां से भी चल कर तुम पुष्कला नामक नगरी में नन्दिघोंस राजा की रानी पृथ्वी देवी की कुंच से नन्दि- वर्धन नामक पुत्र हुए। राजा नन्दिघोस तुम्हें राज सिंहासन पर विठा कर यशोधर नामक मुनि के समीप दीक्षित होगये । वे आयु पूर्ण करके अवेयक देवलोक में देव हुए, और तुम श्रावक-धर्म का पालन करके आयु समाप्त होने पर काम करके ब्रह्म देवलोक में उत्पन्न हुए । वहां से चलकर तुम्हारा जीव पूर्व महाविदेह क्षेत्र में वैताब्य पर्वत की उत्तर दिशा की तरफ शशिपुर नामक नगर में विद्याधरो के स्वामी रत्नमाली की स्त्री विद्युल्लता के उदर से महा पराक्रमी सूर्यजय नामक पुत्र हुना। एक बार रत्नमाली राजा ने विद्याधरों के अत्यन्त अभिमानी राजा वजनयन को जीतने के लिए सिंहपुर नगर में आकर, बाल, वृद्ध, स्त्री, पशु तथा उपवन सहित नगर को जलाना प्रारंभ किया। उस समय एक पूर्वजन्म में उपमन्यु नामक उपाध्याय था। उसका जीव सहस्त्रार स्वर्ग में देव हुआ था। वह वहां से आकर रत्नमाली से कहने लगा-'हे रत्नमाली ! यह घोर पातक मत कर। पूर्वजन्म में तूं भूरिनन्दन नामक राजा था। उस समय तूंने मांस-भक्षण न करने की प्रतिज्ञा की थी। पर उस प्रतिक्षा का पालन नहीं किया। इस कारण कितनेक भवों में भटक कर किसी पुण्य के प्रताप से तूं रत्नमाली राजा हुआ अतएव अनेक मवों में भ्रमण कराने वाला ऐसा घार कृत्य मत कर । देव के इस प्रकार के वचन सुन कर रत्नमाली चुपचाप बैठा रहा। देय इसके बाद पूर्वभव का वृत्तान्त कहने लगा-“हे राजन् ! पहले में उपमन्यु नामक उपाध्याय था। उस समय स्कन्द नामक पुरुप ने मुके मार डाला था । मर कर मै हाथी हुआ। हाथी को पकड़ कर भूरिनन्दन राजा अपने घर ले आया। कुछ समय वहां रहने के बाद एक बार संग्राम में जाने से मेरी मृत्यु होगई । मृत्यु के पश्चात् उसी भूरिनन्दन राजा की रानी गधारा के उदर से मेरा जीव अरि- सूदन नामक पुत्र हुआ। उस भव में मुझे जातिस्मरण शान उत्पन्न
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६ थे। करता था। उसके एक दूत का नाम अमृतस्वर था। अमृतस्वर की त्री उपयोगा के उदर से उदित तथा मुदित नाम के दो पुत्र अमृतस्वर का वसुभूति नामक एक ब्राह्मण मित्र था। उसके साथ उपयोगा का प्रेम सम्बन्ध होगया। वह अपने प्रेमी से कहने लगी- 'अगर तुम मेरे पति (अमृतस्वर) को मार डालो तो हम लोग निर्भय होजायेंगे।" वसुभूति ने उपयोगा की बात स्वीकार करली और वह अमृतस्वर को मार डालने का अवसर खोजने लगा। कहा भी है—'कामी पुरुष कौन-सा कुकृत्य नहीं कर डालता है ?' कुछ दिनो वाद अमृतस्वर और वसुभूति, राजा के काम से विदेश जाने के लिए निकले । मौका पाकर वसुभूति ने राह में ही अमृतस्वर का काम तमाम कर दिया और स्वयं नगर में आकर लोगों से कहने लगा- 'अमृतस्वर स्वयं परदेश चला गया है और एक विशेष प्रयोजन से मुझे पीछे लौटा दिया है। उसने उपयोगा से कहा-'लो, हमारे तुम्हारे सम्भोग में विघ्न डालने वाले अमृतस्वर को, तुम्हारे कथना- नुसार मैंने यमलोक भेज दिया है।' उपयोगा ने कहा-'बहुत अच्छा किया' पर जव तक मेरे ये दोनों पुत्र जीवित है तब तक हम लोग मनचाही मौज नहीं लुट सकते । अगर ये दोनों मर जायें तो बस, फिर कोई अड़चन नही रह जायगी। वसुभूति घोला 'तुम चिंता न करो। मैं इन्हें भी मार डानंगा।' देवयोग से इनकी इस गुप्त मत्रणा का हाल वसुभूति की स्त्री को मालूम होगया। उसके हृदय में ईर्पा की आग भड़क उठी और उसने उपयोगा के पुत्र उदित और मुदित को यह सारी घटना कह सुनाई । यह सुनते ही उदित के क्रोध का पार न रहा । उसने अवसर पाकर वसुभूति की जीवन-लीला समाप्त करदी। वसुभूति मर कर नलपल्ली में म्लेच्छ हुआ। तदन्तर किसी समय विजयपर्वत राजा ने मतिवर्धन नामक मुनि से धर्मदेशना सुन कर दीक्षा धारण की । और उदित तथा मुदित दोनो भाईयो ने भी दीक्षा ग्रहण की। ये दोनो साधु साथ साथ विहार करते हुए कर्मयोग से वे रास्ता भूल जाने के कारण नलपल्ली नामक उसी म्लेच्छ वस्ती में पहुँच गये । वही वसुभूति का जीव म्लेच्छ हुआ था। इन दोनों साधुग्रो को देखते ही उसे जाति स्मरण शान होगया। पूर्वभव की घटना स्मरण हो पाने से पूर्व वैर का स्मरण करके वह मुनियों को माग्ने दौड़ा पर म्लेच्छों के राजा ने उनकी रक्षा की।
- म्लेच्छ राजा और इन मुनियो का पूर्वभव का सम्बन्ध यह था- म्लेच्छ राजा पूर्वजन्म में एक मृग था। उसे एक शिकारी ने मारा था उदित और मुदित मुनियो के जीव वटा किसान रूप में थे, उस समय मृग को शिकारी से बचाया था। इसी कारण ग्लेच्छ राजा ने इनफी रक्षा की। भाखिर वहां से विहार कर के दानो मुनि धर्म-कृत्य करके अन्त में अनशन धारण कर काल करके महागुक नामक स्पर्ग में सुन्दर और सुकेश नामक दो देव हुए । वसुभूति का जीव म्नेच्छ यानि भोग कर मरने के बाद चिरकाल तक अनेकानेक योनियो में घार वेदनाए सहन करता हुआ, एक बार किसी शुभ कर्म के योग से, अत्यन्त कठिनाई से मनुष्य रूप में उत्पस हुप्रा। उस जन्म में तापम दाकर मरने के पश्चात् ज्योतिष्क देवलोक में यह धूमकेतु नाम देव हुप्रा. तदनन्तर उदित तथा मुदित के जीव महाशुफ्र स्वर्ग में सफर मरत. क्षेत्र में अरिष्ट नगर के राजा प्रियवद की रानी पद्यावती के उदर से रत्नरथ और चित्ररथ नाम के दो पुत्र हुए । ज्योतिक देवलोक से भ्रष्ट होकर धूमकेतु भी उसी राजा की कनका नामफ दूसरी रानी के दर से अनुद्धर नामक पुत्र सुधा। वह रत्नरथ और चिघर के साथ वैर करने लगा, पर इन दोनों ने उसके प्रति कभी भी दप नदी किया। कुछ समय के बाद राजा प्रियंवद ने रत्नरथ को गज सिंदा. सन पर बिठा कर, शेप दो पुत्रों को युवराज-पद दिया और साप यह दिन का अनशन फरक, फाल कर देवलोक में देय होगया। राजा रत्नरथ राज्य का संचालन करने लगा। एक समय की बात है। युवराज मनुधर ने किमी गजा की कन्या की मैंगनी की। राजा ने यह कन्या भनुपरकोन म्याद फर राजा रत्नर को मार दी। इससे मनुला पाग बनाया और राज्य में लूटमार मचाने लगा। आप कर उसकी गुप मरम्मत की और उसे छोड़ दिया। नर पद नाम होगया हो किसी सी के साथ समानम दोमया मीर 36ी नपस्थापित होगई। इस कारण मृत्यु ८ पाद चिरकाज न करने फरने फिली फर्म उदय से फिर मनुध भय की प्रापित गई भर में भी उसने नापस टीशा अगीपार फरमान-रहिमri इससे मरने के बाद शनिक नाम देवता KAR नामक देव हुश्रा। रत्नरथ और चित्ररथ नामक दोनों भाई धर्म लाभ करके, जिन-दीता अंगीकार करके, अन्त में अच्युन कल्प नामक स्वर्ग में अतिबल और महाबल नामक महद्धिक देव हुए। वहां से चल कर सिद्धार्थ नगर में क्षेमंकर राजा की रानी विमला देवी की कुंख से कुलभूषण और देवभूषण नाम से हम दोनों भाई पुत्र रूप में जन्मे । हम क्रमशः बडे हुए तो हमारे पिताजी ने घोष नामक उपाध्याय के पास अध्ययन करने के लिए हमें भेज दिया। बारह वर्ष तक उपाध्याय के घर रह कर हम दोनो ने विद्याभ्यास किया। तेहरवां वर्ष लगने पर हम समस्त कलाओ में कुशल होगये। तव घोष उपाध्याय हमें राजमन्दिर में ले आये । वहां राजमहल की खिड़की में बैठी हुई एक राजकन्या को देख कर, उसके लावण्य के कारण हमारे अन्तःकरण में काम विकार जागृत होगया । अज्ञानवश हमारी दृष्टि उसके सम्बन्ध में विकृत होगई । हम राजा के पास आये । हमने सीखी हुई सब कमाएँ' उन्हें बताई । महाराज ने प्रसन्न होकर उपाध्याय को अच्छी सील (विदाई ) देकर विदा किया। हम पिताजी की प्राशा लेकर अपनी माता को नमस्कार करने के लिए अन्त पुर में गये । वहां वह कुमारी माता के पास बैठी दिखलाई दी। उस समय हमारी माता ने हम कहा-'यह कनकप्रभा तुम्हारी बहिन है। जब तुम दोनों भाई उपाध्याय के यहां पढने चले गये तब इसका जन्म हुआ था। यह चात तुम्हें अब तक मालूम नहीं है।' माता के मुख से यह वृत्तान्त सुन कर हम लज्जित हुए । अज्ञानवश अपनी वहिन के साथ काम- । भोग भोगने की इच्छा होने के लिए हमें धिक्कार है । ऐसा समझ कर वैराग्य होनाने से हम तत्काल वहां से निकल पडे और गुरु के पास पहुँच कर दीक्षित होगये । कुछ दिनो वाद हम शरीर से निरपेक्ष होकर और अहंकार का परिहार कर इस पर्वत पर करके कायोत्सर्ग ध्यान में रहे। हमारे पिता क्षेमंकर राजा हमारे वियोग से अनशन व्रत लेकर काल करने के बाद गरुड़ देवलोक में महालोचन देव हुए । एक बार अपने अंग के कम्पन से उन्होंने समझा कि हमारे ऊपर कोई उपसर्ग
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१० उदर से पुत्र रूप पुत्र रूप से उत्पन्न हुश्रा । उसका नाम रतिवर्द्धन रक्खा गया, क्रमशः वह यौवन अवस्था में पाया और राजगद्दी पर प्रारूढ हुआ। इसके बाद वह अपने पिता की तरह अपनी पत्नी के साथ क्रीडा करने लगा, प्रथम नामक दुसरे मुनि कालधर्म पाकर तपस्या के योग से पंचम कल्प देवलोक में एक महान् ऋद्धि-धारी देव हुए । देव ने अवधिज्ञान द्वारा अपने पूर्वजन्म के भाई की उत्पत्ति जानी और उसे बोध देने के उद्देश्य से वह मुनि का वेष धारण कर उसके पास आया। राजा रतिवर्द्धन ने विनयपूर्वक वन्दना करके उसे आसन पर पिठलाया। इसके बाद मुनि-वेषधारी देव ने बन्धु-प्रेम से प्रेरित होकर अपना और उसका पूर्वभव कह सुनाया। पूर्वभव सुनने से रतिवर्द्धन राजा को जाति-स्मरण शान उत्पन्न होगया और उसने विरक्त होकर दीक्षा अंगीकार करली। वहां से काल करके तुम दोनों भाई विदेह क्षेत्र में विवुद्ध नगर के राजा हुए । वहां तुम दोनों ने धर्म- देशना सुन कर दीक्षा धारण की और अन्त में देह त्याग कर अच्युत देवलोक में उत्पन्न हुए। यहां से चलकर इन्द्रजीत तथा मेघवाहन नाम से तुम दोनो भाई प्रतिवासुदेव गवण के पुत्र हुए हो रतिवर्द्धन की माता इन्दुमुस्त्री वहां से काल करके अनेक भव करने के गद तुम्हारी माता मन्दोदरी हुई है। राजा भरत और भुवनालंकार हाथी का पूर्वभव-संबंध श्री ऋषभदेव स्वामी के साथ चार हजार राजाओं ने दीक्षा ग्रहण की थी। उनमें से श्रीऋपभदेव भगवान आहार का त्याग करके और मौन धारण करके विवरने लगे। अतएव उनके साथ दीक्षा लेने वाले सब तापस आहार के बिना दुःखी होने लगे। इन तापतो में चन्द्रोदय तथा सूर्योदय नामक दो तापस प्रहादन सुप्रभ राजा के पुत्र थे। काल करके अनेक भवों में चिरकाल तक भटकने के बाद, उनमें से चन्द्रोदय गजपुर के राजा हरमति की रानी चन्द्र- लेखा की कुंस्र से कुलंकर नामक पुत्र हुआ। सूरोदय भी उसी नगर में विश्वभूति ब्राह्मण की अग्निकुण्डा पत्नी के उदर से श्रुतिरति नामक पुत्र हुआ । राजकुमार कुलकर यौवन अवस्था प्राप्त होने पर सिंहासन पर प्रासीन टुया। एक बार पद तापसो के आश्रम में गया - ।
था। वहां अभिनन्दन नामक अवधिज्ञानी साधु ने उसले कहा-इस अाश्रम में पचाग्नि साधन करने वाला एक नपनी जलाने के लिए लक्कड़ लाया है। उसमें एक माप है । वह तुम्हारे पूर्वजन्मो में से एक जन्म का क्षेमकर नामक पितामह है । अतण्य उस ल को चीर कर उसकी रक्षा करो मुनि का कथन सुन कर गधा कुकर दुःखी हुए और तत्काल ही उन्होने लपक निरवाया। उममें सर मुच एक मांप निकला। यह देख कर राजा कलकर को बेगम हो आया और उन्होंने दीक्षा लेने का विचार किया। उनने तिरति ब्राह्मण राजा से करने लगा- राजन् 'इस धर्म का नाम स्था: अगर आपकी इच्छा हो दी तो वृक्षावन्धा में उसे अंगीकार करना। इस समय क्यो दुख भोगना चाहिये। नामरा का यह कथा सुन कर कुलकर ने दीक्षा लेने का शानद त्याग दिया । राजा मी पली श्रीदामा का इस उपाध्याय (धुतिरति ) का अनुचित सम्बन्ध था। एक गर उसने सोचा अगर हमारे कार्य की पर राजा को लग गई झन्झट मिटेगी |मा विचार करके श्रीदामाने उपाध्यार फी सलाद से अपने पति कुलफर राजा को विप देकर मार डाला। इसके बाद कुछ दिनो में शुतिरति पारा भी भर गया। ये दोनों दीर्घ काल नक नाना प्रकार की यानियों में भटकते फिरे । उRs पाद फिनी समय राजगृह नगर में कपिज नारा की सी सावित्री थे उदाते ध्ययन करने के लिए परदेश गया पार कर समर बाद पैदा प्रध्ययन फरक वह अपने घर लौट रहा था। जब यद गद नगर र नजदीक प्रापचा नथ गरि दोजाने हारा दी REL के मन्दिर में मारा ! उसी गद IR मा पिनाना श्री साग, दल नामक एक मामला साथ मन करके RRE उस पोडे पोहे विनाद भी भाग जान मार की ही म उसके साथ माग भागने क लिए उता ! arisir ने अपने भाई को पहचान न मन TRAIT I am दगा । न रमर की इस रमन घातले जाने की 2 ~ नये । बिनोद दो कम करके किनारस पुखी समानी माता तो वह हमें मार डालेगा । अनपर मेंही राना सामार याला विनोद और गमए नामक दो गुगल पुत्र जन्मे । उनले स्मरावा .
१२ भटकता उसकी स्त्री लक्ष्मी के पेट से भूपण नामक पुत्र हुआ। यौवन श्रयस्था प्राप्त होने पर पिता की आज्ञा से बत्तीस कन्याप्रो के साथ उसका विवाह हुआ। एक बार रात के समय स्त्रियो के साथ क्रीडा करता हुआ वह बैठा था। उसी पिछली रात्रि में श्रीधर नामक एक मुनि को केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ। देवताओ ने केवलज्ञान का - महोत्सव किया। यह देख कर धर्म के प्रति उसकी रुचि जागृत हुई। अतएव वह उसी समय उठ कर उन साधुओ को वन्दना करने के लिए चल पड़ा। रास्ते में जाते समय उसे एक सांप ने काट खाया । उस समय उसके परिणाम शुभ थे, अतएव काल करके उसने शुभ गति पाई । तदनन्तर जम्बू द्वीप के महाविदेह क्षेत्र में, हनुपुर नगर में, अचल चक्रवर्ती राजा की महारानी हरिणी की कुक्षो से वह प्रियदर्शन नामक धर्मतत्पर पुत्र हुआ। वहां उसने दीक्षा लेने की इच्छा की, पर अपने पिता की आज्ञा से तीन हजार कन्याओ के साथ उसने विवाह किया, फिर भी उसका अन्तःकरण वैराग्यमय ही बना रहा। गृहवास में रहते हुए भी चौसठ हजार वर्ष उत्तम तप करके वह ब्रह्मलोक स्वर्ग में देव हुश्रा घन सेठ मर कर लम्बे समय तक संसार में परिभ्रमण करता हुआ पोतनपुर नगर में शकुनाग्निमुख ब्राह्मण की पत्नी ब्रह्म- पत्नी के उदर से मृदुमति नामक पुत्र हुअा। वह पुत्र अविनयी था। अतएव उसके पिता ने उसे बाहर निकाल दिया। परन्तु कुछ समय याद समस्त कलाएँ सीख कर वह घर लौट आया। घर आकर वह रात दिन जुआ खेलने लगा। उसे जीतने में कोई भी समर्थ न ही उसने यहुत सा धन कमा लिया। फिर उसी नगर रहने वाली यसन्तसेना नामक वैश्या के साथ उसका प्रेम-सम्बन होगया और उसने खूब भोग भोगे। अन्त में वैराग्य होने से उस दीक्षा धारण करली। शक्ति के अनुसार चारित्र का पालन कर व भी ब्रह्म देवलोक में उत्पन्न हुअा। वहां से चल कर पूर्वजन्म माया दोप के कारण वह वैताट्य पर्वत पर भुवनालंकार नामक हाथ हुया है। प्रियदर्शन का जीव भी ब्रह्म देवलोक से चलकर तुम्हा यद महाभुज भाई भरत हुआ है। इनका दर्शन होते ही हाथी 4 है और वह मद रहित होगया है। का 1-विचार करने से रोद्र भय नहीं रहता।' में सका, अतएव जाति-स्मरण मान हुआ शत्रुघ्न के पूर्वभव का वृत्तान्त । शत्रुधन का जीव एक बार मथुरा नगरी में उत्पन्न हुआ। वह किसी समय साधुप्रो की सेवा करने वाला श्रीधर नामक बाहाण हुआ, वह बहुत रूपवान था । एक बार वह रास्ते में जा रहा था तय वहां के राजा की रानी ललिता की नजर उस पर पड़ गई । गनी उस पर मोहित होगई । कामभोग भोगने की इच्छा से रानी ने उसे अपने पास युलाया। श्रीधर के जाने पर राजा भी अचानक यहा आ पहुँचा। इससे ललिता बहुत घबराई। श्रीधर को देखकर राजा चिल्लाया- 'चोर है चोर इसे पकड़ लो।' राजा के कर्मचारी नत्कान दौडे और श्रीधर को पकड़ कर यांध लिया। गा फी भाशा पाकर कर्मचारी उसे सूली पर चढाने के लिए ले गये। उस समय कल्याण नामक एक साधु ने श्रीधर को देखा। उसे देखकर मुनि ने जान लिया कि यह मासण साधु मेयक है। अतएव मुनि ने उसे छार देने के लिए राजा को समझाया। राजा ने उसे छोड़ दिया और तत्काल ही दीता लेली। दीक्षा पालन कर शरीर का सन्न होने पर वह स्वर्ग चला गया। स्वर्ग से चल कर या मथुरा के गानन्द्रमार की रखी कांचनप्रभा के उदर से अचल नामक पुष हुशा। प्रवल राजा याद प्रम को बहुत प्यारा था, मतपर उसीको राय मिलेगा, यह साच कर उसके भानुप्रभ आदि पाठ सतिले भाईयो को कमोद वर्मा और वे उसे मार डालने का प्रपन्न करने लगे। प्रधानमन्त्रीको रहस्य मालूम दोगया और उसने सना को सामान कर दिया। अचल वहा से भाग गया। पाने में एक जंगल माया पोरगर में कांटा चुनने के कारा परगने दगा । यह दोहरी र का निवासी, अपने पिता भाग बाहर निकाला एका. #HES एक पुरुषलाड़ियों का नारा किये जा रहा था। उसने - रोत देश भारा नीचे उतारा नव परमे से दा for दिया| arfarत जाने पर वेदना कम से अ.१६- 'तुमने बहुत सा किया है। 4 नु मना कि मप में 5 पादुमा हे.
१२ अचल वहां से रवाना होकर कौशाम्बी नगरी पहुँचा। वहां उसने सिहगुरु नामक प्राचार्य के समीप अनुर्विद्या का अभ्यास करने वाले गजा इन्द्रदत्त को देखा । अचल ने भी उसे अपना घशुप चलाना बताया। इससे प्रसन्न होकर राजा इन्द्रदत्त ने पृथ्वी अपनी कन्या उसे प्रदान करदी। अचल ने बलवान होकर अंग आदि । देश जीत लिये । इसके बाद उसने मथुरा नगरी पर चढाई करदी और भानुप्रभ आदि पाठो सौतेले भाईयो को कैद कर लिया। तय उसके पिता चन्द्रप्रभ ने, अपने पुत्रों को छुड़ाने के लिए अपने प्रधान मन्त्री को उसके पास भेजा । अचल के पास आकर प्रधानमन्त्री ने भानुप्रभ आदि को छोड़ने की प्रार्थना की । उस समय अचल ने अपना संपूर्ण पूर्व वृत्तान्त कह कर उसे विदा किया। प्रधानमन्त्री ने सारा वृत्तान्त राजा चन्द्रप्रभ से निवेदन किया । राजा चन्द्रप्रभ अचल के ऊपर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और यद्यपि अवल सबसे छोटा था फिर भी मथुरा में लाकर उसका राज्यभिषेक कर दिया । अचल पर ईर्पा रखने वाले भानुप्रभ आदि आठो पुत्रों को देश-निकाला देदिया। पर अचल ने उन्हें वापिस बुलाकर अदृष्ट सेवक बना लिया। इसके बाद एक बार अचल राजा ने नाट्यगृह अपने पैर का कांटा निकालने वाले अंक को देखा । उसने उसी समय सेवको को मेज कर अंक को अपने पास युला लिया और उसकी जन्मभूमि श्रावस्ती नगरी का राज्य उसे दे दिया। दोनो एकता पूर्वक राज्य करने लगे। कुछ समय बीत जाने के बाद अचल और अंक ने विरक्त होकर समुद्रगुप्ताचार्य के समीप दीक्षा धारण करती। दोनो दीक्षा पालन करके अन्त में ब्रह्म देवलोक में जन्म ग्रहण किया। अचल का जीव वहां से चल कर यह तुम्हारा छोटा शत्रुधन हुआ है। पूर्वजन्म के मोह के कारण उसे मथुरा नगरी का रान्य लेने की इच्छा हुई। अंक का जीव ब्रह्म देवलोक से श्राकर तुम्दाग यह कृतान्तवदन नामक सेनापति हुअा है। राम, लक्ष्मण, सीता विभीषण, रावण, सुग्रीव लवणांकुश आदि का पूर्वभव वृत्तान्त प्राचीन काल में दक्षिणाघ भरत क्षेत्र में क्षेमपुर नामक एक नगर था। वहां नयदत्त नामक एक वाणिक निवास करता था उसकी सुनन्दा नामक स्त्री के उदर से धनदत्त और वसुदत्त नाम दो पुत्र उत्पन्न हुए । याज्ञवल्क्य नामक एक ब्राह्मण के साथ उस मित्रता थी। उसी नगर में एक सागरदत्त नामक दुसरा वाणिक : रहता था। उसकी पत्नी रत्नप्रभा के पेट से उत्पन्न गुणधर नाम पुत्र और गुणवती कन्या थी। सागरदत्त ने अपनी कन्या गुणपती नयदत्त के पुत्र धनदत्त को देदी और उसकी पत्नी ने द्रव्य के लो से उसी नगर में रहने वाले श्रीकान्त नामक सेठ को देदी । याश वरस्य को यह समाचार मालूम हुधा तो उसने धनदत्त तथा वसुनच से कह दिया ! शोध से पाग बबूला होकर वसुदत्त श्रीकन्न्त क मार डालने के लिए रात में रवाना दुधा। वहां उसने श्रीकान्त फ मारा और श्रीकान्त ने तलवार से वसुद को मार डाला । मरने के बाद दोनो विध्याटवी में मृग हुए । गुणवती भी प्रविघाहित अवस्था में ही मर कर उसी अटवी में मृग के रूप में जन्मी। उसके लिए फिर दोनों मृग आपस में लडे और दोनो की मृत्यु दांगई। गरस्परिक पैर के कारण वे दोनो अनेक भयो में मटरते फिरे । । इघर धनदत्त अपने भाई यमुदत्त की मृत्यु से दुःखी पुमा गत में भटक रहा था, तब उसे भूग लगी। उसी समय उसकी कुछ साधुश्री पर जा पढ़ी। उसने उनसे माना मांगा। मुनियों में से एक ने कहा-'माधु तो दिन में भी प्रशानी नही रखने, ऐला होत हुए भी तुम्हें रात में भोजन मांग कर थाने को इच्या पयारा ऐसे अंधकार में मन को कौन देश सकता है। इस प्रकार पाकर उसके कानो में वोधगी अमृत शासकर मुनि यहां में बने गये। तत्पश्चात् काल का पनदत्त साधर्मदेवी माना की आयु पूर्ण करके बदमदापुर नगर में महाRE की धारिणी शो की अभ से पनि नामक पुषमा यौवा पा प्रास होने पर किसी समर पद अपनी हासेपार गरur कोशर गोरुक की मार गया। गत में उR मा हर बेल देसे। उस दल में क्या उRT हो पा र से रातो पास गया औरaat ki पापी (RAKE मन मुनापा । उनले का एक मात्र देह त्या TERE- १६ , .... - मन्त्र के प्रताप से, उसी नगर में, छत्रछाय राजा की रानी श्रीदत्ता के उदर से वृषभध्वज नामक पुत्र हुमा। वह बड़ा होकर इच्छानुसार इधर उधर डालता फिरता था। एक बार वह वैलो के पहले वाले स्थान पर पाया) पूर्वजन्म के दर्शन से उसे वहां जातिस्मरण शान होगया। उसने उस स्थान पर एक मकान बनवाया और उसकी दीवाल पर मरणासन्न चैलो के चित्र बनवाये । साथ ही बैलों के कान में नवकारमन्त्र सुनाने वाले पुरुष को चित्रित किया। इसके बाद उसने वहां पहरेदार नियत कर दिये और उन्हें हिदायत करदी कि इन चित्रो को जो मनुष्य यथार्थ-साक्षात् की तरह देखे, उसकी खातरी करके उसी समय मेरे पास आकर निवेदन करना । इस प्रकार व्यवस्था करके वृपमध्वज कुमार अपने महल को चला गया। इसके बाद कुछ दिन व्यतीत होजाने पर वह पद्मरुचि सेठ वहां पाया और उसने दीवाल पर चित्र देखे । चित्र देख कर वह चकित सा रह गया और कहने लगा-यह सब मुझे लक्ष्य करके चित्रित किया गया है। यह बात पहरेदारो ने वृषभध्वज के पास जाकर निवेदन की । वृषभध्वज वहां आया और पद्मरुचि से पूछने लगा-इन चित्रो का श्राप क्या वृत्तान्त जानते हैं ? तव पद्मरुचि ने कहा-पहले मरते हुए इन बैलों को मैने नवकारमन्त्र सुनाया था। इस बात को जानने वाले किसी पुरुप ने यहां मेरा चित्र अंकित किया है । इतना सुनते ही वृषभध्वज ने उसे नमस्कार किया और कहा- यह जो वृद्ध चैल अंकिन है, वह मैं हूँ। आपके द्वारा सुनाये गये नवकारमन्त्र के प्रभाव से मैं राजपुत्र हुअा हूँ। इस तिर्यञ्च योनि में कृपा करके आपने मुझे नवकारमन्त्र न सुनाया होता तो फिर मुझे वैसी ही योनि मिलती। यह आपका ही प्रताप है। अतएव श्राप मेरे स्वामी, गुरु तथा देव हैं। यह राज्य भी मुझे आपके ही प्रताप से मिला है अतएव उसे आप ही स्वीकार कीजीये और उसका उपभोग कीजिये। इसके बाद पद्मचि तथा वृषभध्वज श्रावक के व्रतों का पालन करते हुए दिन विताने लगे। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत होजाने पर दोनों प्रायु का अन्त होने के बाद ईशान देवलाक में महान् ऋद्धिधारी देव हुए। उनमें से पदारुचि का जीव स्वर्ग से चल कर मेरु की पश्चिम दिशा में, वैताट्य पर्वत पर नन्दावर्श नगर में राजा नन्दीश्वर की स्त्री कनकमाली की कंस मे नयनानन्द नामक पुत्र हुआ। बहुत समय राज्य का सुन भोग कर, अन्त में दीक्षा ग्रहण करके, काल करके माहेन्द्र देवलोक में देय हुआ। वहां से चल कर पूर्व महाविदेश क्षेत्र में क्षेमा नगरी के नरपाल विपुलवाहन की रानी पद्मावती के उदर से श्रीचन्द नामक पुत्र हुआ। धद फिर बहुत समय तक राजभोग भोग कर समाधिगुप्त मुनि के समीप दीक्षा महण करके. प्रायु पूर्ण होने पर काल कर नहा देवलोक का इन्द्र हुश्रा। वहां से चलकर पा नामक यलवान गजा राम हुआ, और वृपभध्वज ईशान स्वर्ग से चल कर, कितनेक भव करक यद सुमीच - थीकान्त का जीव मृग भय के पश्चात् अनेक पर्यायों में भ्रमण करता हुधा मृणाल कन्द पसन में बजजम्यू नामक राजा की स्त्री हेमवती के उदर से शभु नामक पुत्र हुआ। वसुबत्त का जीवनी इसी प्रकार अनेक भवा में भटकने के बाद शंभु राजा के उपाध्याय विजय झी पत्नी रत्नचूड़ा की कुंशा से श्रीभूति नामक पुत्र हुना। गुणवती भी भव-भ्रमण करके श्रीभूति की खी शाश्वती के उपर से वेगवती नामकी कन्या हुई। वेगवती जर यौवा अपस्या में भाई तय उसने ए बार मानव-समूह द्वारा पदनीय सुदर्शन नामक प्रतिमाधारी माधु को देख कर उनका उपहास किया। वह बोली- 'प्रो हो । आज यह साधु दिखाई पड़ा है। पहले तो यह श्रोता साथ कीडा करता फिरता था। उन ख्रिा का इसने और की मेज रपसी है। न मालूम कयों ऐसों को नाग पन्दना करते हैं? वरती के इस प्रकार करने से जनता की भाउन मुनि पर नही रही और लोगों ने उन पर शेपारोपर करके उन माशुरन को ना करना प्रारम्भ कर दिया। पापस्या देध मुनि ने प्रतिभा की-xam मुझ पर लापा घर कान मिट अब मैं शानदी कसंगा।' इस प्रकार की प्रतिक्षा करने पर पता कर से गरी मुझ पर सून नागई। वेग के पिता ने सोचा साधु के माये मिया तक माने ना ६ २६ भयानक है । तर ने पेशी कापूर लिहार किरा! R RANI र वेदना में पीदिन और पिता * मा से भील गरी सुन मुल पर
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२ पृष्ठ पंक्ति २७ २७ ३० ३० ३२ अशुद्ध अशामतो मयरनी रांघत ट्यां योगणोए हूत सहथ हूंसियार रावती महियर साहा प्राती अजया कहूं २ २२ २३ २५ २७ १२ २० ३४ ३४ ४४ २४ १३ ४६ ४८ २५ ७३ ३ शुद्ध अशातो भयरवनी रांघत ही ट्यां योगणीए दूत सहश्र हँसीयारी रोवती सहियर साही प्रीती अजपा करूं गुप्ती संयम वोनावी उद्यम शिक्षा भांति विवेकए राघवजी पतित राघव राजा तृपा जुबाजुत्रा प्रावीयो प्राप कहे ८१ १ १०६ ६ १०७ १३ १८ २८ . सजम वालावी उघम शाक्षा भांतो विविकए राघवजी पतिन राघव राज तृष्णा जुऊनांजी प्रावायो पाय ११२ १३७ १४० १४४ १४६ १४६ १४७ १५१ १५६ १६० २० ६ २३ २३ २ २० ૨૨ २६
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पंक्ति अशुद्ध कोशनाधीश ततूकाल आभूपण १५ १६ १८ १ पुक्को के भया ६ ३ जा ववि प्रदश्ये हानो थपा ३० २६ २७ ५ ६ A যঃ कोशलाधीश ३१६ तत्काल ३१६ आभूषण ३१७ युक्ति ३१८ भाया ३१८ जावे ३१६ चली ३१६ अदृश्य ३२० हीनो ३२० थया ३२५ इम ३२५ घटां ३२५ में आते ही ३२५ पद्म ३२६ कायोना ३२६ वाणि ३२६ भाया ३३१ थाप ३३१ पधरावी ३३१ आपे ३३२ नारद ३३४ त्रिकूट ३३७ अपराजिता ३३७ पद्म ३४१ ऋपमे ६४२ शका ३४२ इम्य ३४३ शेचुंजय ३४४ करे पाले ૨૫ २० १८ ६ १२ धंटां में तेही पदम कापोना वणि भाय थाय पहिरावी आये नाराद त्रिक्लट आपराजिता पदम ऋपमे शंक्या ३ ११ १४ १ ११ १७ २७ ३ २२ ११ १६ शबुंजय पारेले २१
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६ पंक्ति ३९८ १८ २५ है १४ १ अशुद्ध शुद्ध पृष्ठ ढाली टाली वीतवे वीनवे ४०३ श्राप आय ४०४ इन्द्रदिक इन्द्रादिक ४०६ सीताने शीले करीरे युद्धे जीत्यो जोईरे ४०६ वात व्रत ४३० काये कापे ४३० चढको चटको કેર मोग भोग ४३२ ढाले ढोले ४३३ ब्रह्मचर्य रक्षा में तवि नवि २२ ३ २३ मोर * परिशिष्ट (४) धन्यवाद - । जिन महानुभावों ने मेरे उत्साह की वृद्धि करने के लिए ग्राहक अणि में पहिले ही से अपना नाम लिखाकर उदारता प्रकट की है अतः उन मज्जनों को मैं हृदय से धन्यवाद दे रहा हूँ और भविष्य में भी मेरे कार्य में सहयोग देते रहें, यही प्रार्थना करता हुप्रा उनके नाम नीचे लिख देता हूं। श्री सेठ विजयतलाजी चंपालालजी गुलेका पुल नग ५१ शीधन लाधुगमजी अगरबन्दी रतनलालजीमानमहाजी श्री सेठ सिम्भुरामजी गगारामजी फार्म के मालिक सेठगामी मूथा पु. नग २५ मुकन्दा असराजजी कालुरामजी मूथा कनकमलजीबोहरा अमरावजी पेपरवन्दजी संबलेवा सेडलिसीवाना पुषी गुडेकदा . १२ औधपुर सेठ किसोरम फिरची मोदी मीयों की भी गुनीनीकी धर्मपत्नी उपजीलाली समली सीनीकी धर्मपत्री श्री पास नदम मारन्दना , कपनमाजीनगर ६ नागौर २ ५ " X X w स्थानकवासी संघ बालोतरा , मूलचन्दजी आसारामजी ५ गढ सीवाणा छोगमलजी मूलचन्दजी जिनाणी ५ गढ सिवाणा जैन स्थानकवासी शान मुनि मण्डल पुतस्कालय जालोर जैन वर्धमान सभा ५ যুগান্ধা मगनीरामजी कपूरचन्दजी वोरा पाली उम्मेदमलजी सिरदारमलजी नाहर ५ देवलो (पाऊवा) जैन थी संघ करमावस मालियों की करमावस जैन श्री संघ बिरांटियां (मेला का ) बिटिया " अमरचन्दजी गजराजजी समदड़िया नानपा " नानक पुस्तकालय १५ विजयनगर , 'किस्तूरचदजी मुणोत की धर्मपत्नी गंगाबाई ५ पीपाड़ " सूरजमलजी मिश्रीमलजी मुणोयत पीपाड़ मोतीलालजी सोनराजजी बोरों पीपाड़ ,, हरखचन्दजी मोतीलालजी कोठारी पीपाड़ जुगराजजी जवन्तराजजी खिंवसरा पीपाड़ पेमराजजी बोहरा पिपलिया किसनलालजी लूनिया पिपलिया नथमलजी मूलचन्दजी सादड़ी श्री संघ झूटा * * * * * * * * " " -जो महाशय कम से कम पांच पुस्तकों के ग्राहक बने हैं उन महानुभावों के नाम अंकित किये गये हैं। भवदीयः- जैनोपदशक वैद्य, धूलचन्द सुराणा पीपाड़ सीटी.
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