Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Vairagyaopdeshak Vividh Shad Sangrh
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COC/ Secm भु GIG श्री जिनायनमः 35573 वैराग्योपदेशक विविध षदसंग्रह. antones 5ोनी Lic- पंडित श्रीयसोविजय, विनय विजय तथा ज्ञानसारजी व्याजित. तने द्वितीयावृत्तिन यथामति मंसोधन करावीन, श्रावक, नीमसिंह माणके श्री मोहमयी पत्तन मन्ये निर्णयमागर कापमानामा उपावी प्रसिद्ध क्यों में ploatcollientistial-calcitonic कहा-cordKIROEN imairirniori मया १९५८ मने १९०२ वैशाख यदि त्रयोदश frnions OGUJI
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प्रस्तावना. सर्व सुझ जैनवांधवोने मालुम थाय जे आ श्री "वेराग्योपदेशक विविधपद संग्रह." नांमनो श्र- त्यंत रमणीक, वैराग्यथी नरेलो, संसार स्वरूपने बतावनारो, तथा पदोनां चमत्कारोथी नरेलो ग्रंथ आपणा महामाननीक उपाध्याय श्री यशोविजय- जी; विनय विजयजी तथा ज्ञानशारंजी महाराज रचेल ठे, तेमां प्रथम "जसविलास" पंडित यशो- विजयजी कृत, तथा “विनय विलास" पंडित विनय विजयजी कृत, श्रने "ज्ञान विलास” पंडित ज्ञान सारजी कृत ठे. या ग्रंथ एटलो तो रसिक तथा जै- नवर्गना श्रावक, श्राविकाने माटे उपयोगी ठेके- तेनुं अत्रे प्रस्तावनामां कंश पण वर्णन नहि करता, श्रमो ते ग्रंथ, श्राधथी ते अंतसुधि वांचीने तेनो रहस्य हृदयमां धारण करवानी अमारा सुझ जैन बांधवोने जलामण करीएं पश्यें तथा केटलाएक दृष्टी दोष अने बुद्धि दोष रही गया इशे तेनुं श्र.
श जश विलास ॥ पद वीजें ॥ ॥ राग सारंग ॥ कंतविनु कहो कौन गति नारी ॥ टेक ॥ सुमति सखी जई वेगी मनावो, कहे चे. तन सुन प्यारी ॥ कंत॥१॥ धन कन कंचन महल मालिए, पिज बिन सवहि उजारी ॥ निखाजोग लहु सुख नाही,पियु वियोग तनु जारी॥ कंत॥२॥ तोरे प्रीत पराइ सुरिजन,अबते दोष पुकारी॥घर नंजनके कहन न कीजें,कीजे काज विचारी॥कंत ॥३॥ विन्रम मोह महामद विजुरी, माया रेन अं- धारी ॥ गर्जित अरति लवे रति दाजुर, कामकी नश् श्रसवारी ॥कंत॥४॥ पिउ मिलवकुं मुफ मन तलफे, में पिज खिजमतगारी॥तुरकी दे गये पिल मुकुं, न लहे पीर पीयारी॥ कंत ॥ संदेश सुनी आए पिउ उत्तम, नर बहुत मनुहारी ॥ चिदानंद घन सुजस विनोदें, रमे रंग अनुसारी॥त॥६॥ ॥ पद त्रीजुं ॥ ॥ राग धन्याश्री ॥ परम गुरुजैन कहोक्यौं होवे, गुरु उपदेश बिना जन मूढा, दर्शन जैन बिगोवे । परम गुरु जैन कहों क्यों होवे ॥टेक॥१॥ कहत कृ 3 जश विलास पानिधि समजल जीले, कर्म मयल जो धोवें ॥व- हुल पापमल अंग न धारे,शुद्ध रूप निज जोवे॥प- रम॥२॥ स्यादवाद पूरन जो जाने, नय गर्जित ज- स वाचा ॥ गुन पर्याय अव्य जो बूळे, सोश्जेन दे साचा ॥परम॥३॥ क्रिया मूढमति जो अज्ञानी, चालत चाल श्रपूठी ॥ जैनदशा उनमेही नाही, कहे सो सबही जूती ॥परमा पर परनति अपनी कर माने, किरिया गर्वे घेहेलो ॥ उनकुं जैन कहो क्यु कहियें, सो मूरखमें पहिलो परम॥५॥ ज्ञान नाव ज्ञान सवमांही, शिव साधन सई हिए ॥नाम खसे काम न सीके, नाव उदासे रहिए ॥ परम ॥६॥ ज्ञान सकल नय साधन साधो,क्रिया झानकी दासी ॥ क्रिया करत् धरतुहे ममता, याहि गले में फांसी ॥परमा क्रिया विना ज्ञान नहिं कबहुँ, किया ज्ञान विनु नांही ॥ क्रिया ज्ञान दोउ मिलत रहतुहे, ज्यों जल रस जलमांही ॥ परम ॥७॥ किया मगनता वाहिर दीसत, झान शक्ति जस नांजे ॥ सदगुरु शीख सुने नहीं कवटुं, सो जन ज- नतें खाजे परमगाए। तत्व बुधि जिनकी परनति .
४ जशविलास हे , सकल सूत्रकी कूची ॥ जग जसवाद वदे उन हीको, जैन दशा जस ऊंची ॥ परम ॥१०॥ इति॥ ॥ पद चोडुं ॥ ॥ राग धन्याश्री ॥ परम प्रनु सब जन शब्दें ध्यावे ॥ जब लग अंतर जरम न जांजे, तवलग को- ऊन पावे ॥ परम प्रतु॥१॥ टेक ॥सकल अंस देखे जग जोगी, जो खिनु समता श्रावे ॥ ममता अंध न देखे याको, चित्त चिहुँ उरे ध्यावे ॥ परम प्रनु॥२॥ सहज शक्ति अरु नक्ति सुगुरुकी,जो चित्त जोग जगावे ॥ गुण पर्याय उव्यसुं अपने, तो लय कोउ लगावे ॥ परम प्रजु० ॥३॥ पढत पूरान वेद अरु गीता, मूरख अर्थ न जावें ॥श्त ऊत फरत ग्रहत रसनाही, ज्यौं पशु चर्वित चावे॥ परम प्रजु ॥॥ पुजलसे न्यारो प्रजु मेरो, पुजल श्राप बिपावे॥ उनसे अंतर नहीं हमारे, अब कहां जागो जावे ॥ परम प्रजु० ॥५॥ अकल अलख अज अजर निरं- जन, सो प्रज्जु सहज सुहावे ॥ अंतरजामी पूरन प्र- गट्यो, सेवक जस गुन गावे॥परम प्रनु०॥६॥ति॥ , ५ जशविलास ॥ पद पांचमुं॥ ॥ राग उपर प्रमाणे ॥ चेतन जो तुं ज्ञान अ- ज्यासी ॥ आपहि बांधे आपहि बोडे, निजमति शक्ति विकासी ॥ चेतन ॥२॥ टेक ॥जो तुं श्राप खन्नावें खेले, भासा मेरी उदासी॥ सुरनर किन्नर नायक संपति, तो तुज घरकी दासी॥ चेतन॥२॥ मोद चोर जन गुन धन लूसे, देत श्रास गल फांसी। श्रासा बोर उदास रहेजो, सो उत्तम संन्यासी ॥ चेतन ॥३॥ जोग लइ पर श्रास धरतहे, याही जगमें हांसी ॥ तुं जाने में गुनकुं संचु, गुनतो जावे नासी ॥चेतना पुजलकी तुं श्रास धरतहे,सो तो सबहिं विनासी ॥ तुतो निन्नरूप हे जनतें, चिदा- नंद अविनासी॥ चेतन ॥५॥ धन खरचे नर बहुत गुमाने, करवत लेवे कासी ॥ तोजी पुःखको अंत न श्रावे, जो श्रासा नहिंघासी ॥चेतन॥६॥ सुखजल विषम विषय मृगतृष्णा, होत मूढमति प्यासी ॥ वित्रम नूमि नइ पर श्रासी, तुं तो सहज विलासी ॥चेतन॥ ७॥ याको पिता मोह पुःख जाता, होत विषय रति मासी ॥जव सुत जरता श्रविरत्ति प्रानी,
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जशविलास
मिथ्यामति दे हांसी ॥ चेतन ॥ ७ ॥ श्रासा बोर
रहे जो जोगी, सो होवे सिव वासी॥ उनको सुजस
बखाने ज्ञाता, अंतरदृष्टि प्रकासी ॥चेतनाणाति॥
॥ पद व्हुं॥
॥ राग कनडो ॥ अजब गति चिदानंद घनकी
॥ टेक ॥ नव जंजाल शक्तिसुं होवे, उलट पुलट
जिनकी ॥ अजवा॥नेदी परनति समकित पायो,
कर्मवन घनकी॥सी सवल कग्निता दीसे, को-
मलता मनकी ॥ अजब० ॥२॥ नारी नूमि जयं-
कर चूरी, मोहराय रनकी ॥ सहज अखंड चंमता
याकी, उमा विमल गुनकी ॥ अजब० ॥ ३ ॥ पाप-
वेली सब ज्ञान दहनसे, जाली नववनकी ॥ शीत-
लता प्रगटी घट अंतर, उत्तम लबनकी ॥ अजब
॥॥ उकुरा जगजनते श्रधिकी, चरन करन घ-
नकी ॥झकि वृद्धि प्रगटे नीज नामे, ख्याति अर्कि-
चनकी॥ अजब० ॥ ५॥अनुनव बिनु गति कोजन
जाने, अलख निरंजनकी ॥ जस गुन गावत प्रीती
निवाहो, उनके समरनकी ॥ १० ॥६॥
जशविलास ॥ पद सातमुं॥ ॥ राग सारंग ॥ जिन लाग रह्यो परनावमें, टे- क ॥ सहज खन्नाव लखे नहिं अपनो, परियो मोह जंजालमें ॥ जिउ ॥१॥ वं मोद करे न- हि करनी, डोलत ममता वाउमें ॥ चहे अंध ज्यु जलनिधि तरवो, वेटो काणे नाउमें ॥ जिन ॥२॥ अरति पिशाची परवश रहेतो, खिनहु न समस्यो श्राउमे॥ श्राप बचाय सकत नहिं मूरख, घोर वि- षयके घाउमें ॥ जिज ॥३॥ पूर्वपुण्य धन सवहि ग्र- सतहे, रहतन मूल वढाउमें । तामें तुज केसे बनी श्रावे, नय व्यवहारके दाउमें ॥ जिन ॥४॥ जस कहे अब मेरो मन लीनो, श्रीजिनवरके पाउमें ॥ याहि कल्यान सिछिको कारन, ज्युं वेधकरस खाउमें ॥ जिज ॥५॥ इति ॥ ॥ पद आठमुं॥ ॥राग विलाजल ॥ मेरे साहिब तुम हि हो,श्री पास जिणंदा ॥ खिजमतगार गरीव हुँ, मे तेरा बं- दा ॥ मेरे० ॥ १॥ टेक ॥ में चकोर करूं चाकरी, जब तुमहिं चंदा ॥ चक्रवाक में हुश रहों, जब , जशविलास तुमहिं दिणंदा ॥ मेरे ॥२॥ मधुकरपरे में रन. जनुं, जब तुम अरविंदा ॥ जक्ति करौं खगपति परे, जब तुमहिं गोविंदा ॥ मेरे ॥३॥ तुम जब गर्जित धन नये, तब में शिख बंदा ॥ तुम सायर जब में तदा, सुरसरिता श्रमंदा ॥ मेरे ॥ ४ ॥ दूर करो दादा पासजी, नवपुःखका फंदा ॥वाचक जश कहे दासकुं, दियो परमानंदा ॥मेरे॥५॥इति॥ ॥पद नवमुं॥ ॥ राग सामेरी ॥ मेरे प्रजुसुं प्रगट्यो पूरन राग ॥ टेक ॥ जिन गुन चंद किरनसुं उमग्यो, सहज समुख अथाग ॥ मेरे ॥ १ ॥ध्याता ध्येय जये दोन एकहु, मिट्यो नेदको नाग ॥ कुल बिदारी बले जव सरिता, तव नहिं रहत तडाग ॥ मेरे ॥ ॥५॥ पूरन मन सब पूरन दीसे, नहिं सुबिधाको लाग ॥ पाउ चलतपनही जे पहिरे, नहि तस कंटक लाग॥ मेरे॥ ३ ॥ जयो प्रेम लोकोत्तर जूठो, लोक बंधको ताग ॥ कहो कोज कबु हमतो न रूचे, बुटि एक वीतराग ॥ मेरे ॥ ४ ॥ वासत हे जिन गुन मुफ दिलकुं, जेसो सुरतरु बाग ॥ोर वास- ॥ - जशविलास नालगेन तातें,जस कदे तुंवडनाग॥मेरे ॥५॥इति॥ ॥ पद दशमुं॥ ॥ राग गोडसारंग तथा पूर्वी ॥ पसारी कर लीजे,श्कुरस नगवान ॥ चढत सिखा श्रेयांस कुम- रकी, मानु निरमल ध्यान ॥ पसारी॥१॥ टेक ॥ में पुरुषोतम करकी गंगा, तुं तो चरन निदान ॥ श्त गंगा अंवर तर जनकुं, मानुं चली असमान ॥ ॥पसारी॥२॥ किधो विधु विंव सुधातूं चाहत, श्राप मधुरता मान ॥ किधो दायककी पुण्य परंपर, दाखत सरगविमान ॥ पसारी ॥३॥ प्रजुकर . कुरस देखी करत है, ऐसी उपमा जान ॥ जश कहे चित वित पात्र मिलावें, युं जविकुं जिन ना- न ॥ पसारी॥४॥ इति ॥ ॥ पद अगीयारमुं॥ ॥ राग अडाणो ॥ शीतल जिन मोहि प्यारा ॥ टेक ॥ जुवन विरोचन पंकज लोचन, जिनके जिन हमारा ॥ शीतल ॥१॥ ज्योतिशुं ज्योत मिलत जव ध्यावे, होवत नहि तव न्यारा ॥ वांधी मूठी खुले जव माया, मिटे महा भ्रम जारा ॥ शीतल ॥२॥ - म १० , जशविलास तुम न्यारे तब सबहि न्यारा, अंतर कुटुंब उदारा॥ तुमही नजिक नजिक हे सवहीं, शद्धि अनंत अ- पारा ॥ शीतल ॥३॥ विषय लगनकी श्रगनि बू- जावत, तुम गुन अनुत्नव धारा ॥न मगनता तुम गुनरसकी, कुन कंचन कुन दारा ॥ शीतल ॥४॥ शीतलता गुन होर करत तुम, चंदन काह बिचारा॥ नामेहीं तुम ताप हरतहे, वाकुं घसत घसारा ॥ ॥ शीतल ॥ ५॥ करहु कष्ट जन बहुत हमारे, नाम तिहारो श्राधारा ॥ जस कहे जनममरण ज- य नागो, तुम नामे नवपारा॥शीतल॥६॥ इति ॥ ॥ पद बारमुं॥ ॥ राग वेलावल ॥ प्रनु तेरो वचन सुन्यो जब- हीथे सुविहान ॥ टेक ॥ तबहीथे तत्त्व दाख्यो, चा- ख्यो रस ध्यान ॥ नाव नाली ए जागी, मानुं कीधो सुधापान ॥ प्रजु तेरो॥ १॥ श्रुतचिंता ज्ञान सोतो, खीर नीर वान ॥ विषय तृष्णा बुकावे, सोहि साचो ज्ञान ॥ प्रज्जु तेरो ॥२॥ गायन हरन तातें, नादे धरे कान ॥ तेसेहिं करत मोहिं, संत गुन ध्यान ॥ प्रज्जु तेरो० ॥३॥ प्रानतें अधिक सांझ, केसे कडं जशविलास प्रान ॥ प्रानथी अजिन्न दाख्यो, प्रत्यक्ष प्रमान ॥ प्रजुतेरो०॥४॥ निन्न ने अभिन्न कलु, स्याहादें वान ॥ जस कहे तु हे तु हैं, तुं हैं जिन जान ॥ प्र० ॥५॥ ॥ पद तेरमुं॥ ॥राग परज ॥ चेतन राह चले ऊलटे ॥ टेक ॥ नखशिखलो बंधनमां बेठे, कुगुरु वचन गुलटे ॥ चेतन ॥१॥ विषय विपाक जोग सुख कारन, ठि- नमें तुम पलटे ॥ चाखी ठोर सुधारस समता, ज- वजल विषय घटे ॥ चेतन ॥२॥ नवोदधि नि- च रहे तुम ऐसे, श्रावत नाहिं तटे ॥ जिहां ति- मिंगल घोर रहतुहे, चार कषाय कटे ॥ चेतनः ॥ ॥३॥ वरविलास वनिता नयनके, पडे पास पल- टे॥ श्रव परवश नागे किहां जाओगे, काले मोह- जटे ॥ चेतन ॥४॥ मन मेले जो किरिया कीनी, उगे लोक कपटे ॥ उनकुं फल वितुं लोग मिटेगो, तुमकुं नांहि रटे ॥ चेतन ॥ ५ ॥ सीख सुनी अव रहो सुगुरुके, चरणकमल निकटे ॥ युं करते तुम सुजस बहोगे, तत्त्वज्ञान प्रगटे॥चेतन॥६॥इति॥
१२ जशविलास ॥ पद चौदमुं॥ ॥राग नायकी कनडो॥ चेतन ममता वांड परी- री, दूर परीरी ॥ चेतन ॥ टेक ॥ पर रमनिसुं प्रे- म न कीजें, श्रादरी समता थाप वरीरी॥ चेतन०॥ ॥१॥ ममता मोह चंडालकी बेटी, समता संयम नृप कुमरीरी ॥ ममता मुख पुगंध असत्यें, सम- ता सत्य सुगंध जरीरी॥ चेतन ॥२॥ ममतासें लरते दिन जावे, समता नहिं को साथ लरीरी, ममता हेतु बहुत हे कुश्मन, समताके कोऊ न श्र- रीरी ॥ चेतन ॥३॥ ममताकी उर्मति हे थाली, डाकिनी जगत अनर्थ करीरी ॥ समताकी शुनम- ति हे आली, परउपगार गुणे समरीरी ॥ चेत- न ॥४॥ ममता पुत्त नए कुंल खंपन, सोक बि- योग महा मत्सरीरी ॥ समता सुत होवेगे केवल, रहे दिव्य निशान धुरीरी ॥ चेतन ॥ ५॥ सम- ता मग्न रहे जो चेतन, जो ए धारे शीख खरीरी॥ सुजसविलास लहेगो तो तुं, चिदानंदघन पदवि वरीरी॥ चेतन ॥६॥ इति ॥ ॥
जशविलास १३. ॥पद पन्नरमुं॥ ॥रागनायकी कनडोयागति कौन हे सखी तोरी, कोन हे सखी तोरी ॥ टेक ॥ इत उत युहि फिर- त हे घहेली, कंत गयो चित चोरी ॥यागति॥१॥ चितवत हे बिरहानल बुजवत, सिंच नयन जल जोरी ॥ जानत हे उहां हे वडवानल, जलण ज- दयो जिहुँ श्रोरी ॥ यागतिः ॥२॥ चल गिरना. र पिया दिखलाईं,नेह निहावन धोरी ॥ हलि मिति मुगति मोहोलमें खेले, प्रनमे जस या जोरी ॥याग- ति॥३॥ इति ॥ ॥पद शोलमुं॥ ॥राग सारंग ॥ हम मगन जए प्रनु ध्यानमें, टेक ॥ बिसर गइ ऽविधा तन मनकी, अचिरा सु- त गुन शानमें ॥ हम ॥१॥ हरिहर ब्रह्म पुरंद- रकी शकि, श्रावत नांहि कोल मानमें ॥ चिदानंद- की मोज मची हे, समतारसके पानमें ॥ हम ॥ । २ ॥ इतने दिन तुं नांदि पिलान्यो मेरो, जन्म गमायो अजानमें ॥ अवतो अधिकारी होइ वेठे, प्रजु गुन अखय खजानमें ॥ हम ॥३॥ गइ दी- -- १४ जशविलास नता सवही हमारी, प्रजु तुज समकित दानमें ॥ प्रनु गुन अनुनवके रस आगे, श्रावत नही कोज म्यानमे ॥ हम ॥४॥ जिनहि पाया तिनहि वि- पाया, न कहे कोउके कानमें ॥ ताली लागी जब अनुजवकी, तब जाने कोउ शानमें ॥ हम ॥५॥ प्रनु गुन श्रनुजव चंद्रहास्य ज्यो, सोतो न रहे म्या- नमें ॥ वाचक जश कहे मोह महा अरि, जीत लीयो हे मेदानमें ॥ हम ॥ ६ ॥ इति ॥ ॥ पद सत्तरमुं॥ ॥ राग काफी ॥ देखतही चित्त चोर लीयो हे, देखतही चित्त चोर लीयो ॥ सामको नाम रुचे मोहि अह निस, साम विना कहा काज जीयो । देखतही० ॥१॥ टेक ॥ सिझवधूके लीए मुफ बोरी, पशुधनके सिर दोष दीयो॥ परकी पीर न जाने तासों, वैर वसायो जो नेह कीयो ॥ देखत- ही० ॥२॥प्रान धरं में प्रानपिया बिन, वजहथें मोहि कठिन हियो । जस प्रनु नेमि मिले दुःख डायो, राजुल शिवसुख अमृत पियो ॥ देखत ही ॥३॥ इति ॥
जशविलास १५ ॥ पद अढारमुं॥ ॥ राग कल्याण ॥ सदुने प्रनु नेटे, अंतरीक प्र- नु नेटे ॥ स ॥ टेक ॥ जगत वछल हित दाइ, सण ॥ मोह चोर जब जोर फिरावत, तब समरवो प्रनु नेटे ॥ स ॥१॥ ओर सखा चार दिवस- के, साच सखा प्रजु वेठे ॥ इतनो श्राप विवेक वि- चारो, मायामें मत लेटे ॥ स० ॥२॥ नामणडे तो नूख न जांगे, विनुं नोजन गए पेटे ॥ जगवंत जक्ति विना सवि निष्फल, जस कहे जक्तिमें जेटे ॥ स ॥३॥इति ॥ ॥ पद ओगणीशमुं॥ ॥ राग धन्याश्री ॥ जिन चरण सरन ग्रहुं ॥ टेक ॥ हृदयकमलमें ध्यान धरतुहे, सिर तुज था- ण वहुं ॥ जिन ॥१॥ तुज सम खोल्यो देव ख- लकमें, पैट्ये नांहिं कहुं ॥ तेरे गुनकी जपुं जपमा- ला, अहनिसि पाप दहुं । जिन ॥ ॥ मेरे मनकी तुम सब जानो, क्या मुख बहुत कडं, कहे जस वि- जय करो तुम साहिब, ज्यु जव उःख न लहुँ । जिनम्॥३॥इति ॥
. , १६ जशविलास ॥ पद वीशमुं॥ ॥ राग जयजयवंती ॥ श्रजव वनीहे जोरी, अर्धग धरीहे गोरी ॥ शंकर शंकहि ठगेरी, गंगसिर धरीदे ॥ १० ॥१॥ प्रेमके पीवत प्याले, होत म- हा मतवाले, न चलत तिहूं पाले, असवारी खरी हे॥॥॥ ज्ञानीको एसो उत्साह, समता- के गले बांह, सिरपर जगनाह, श्राण सुर सरीहे ॥श्रण ॥३॥ लोकके प्रवाह नाहि, सुजस वि- लास मांहि, चिदानंदघन गहि, रति अनुसरी हे ॥ अ० ॥४॥ इति ॥ ॥ पद एकवीशमुं॥ ॥ राग उपर प्रमाणे ॥ धर्मके विलास वास, ज्ञा- नके महा प्रकास, दास नगवंतके, उदास नाव लगे हें ॥ समता नदीतरंग, अंगही उपंग चंग, म- जन प्रसंग रंग, अंग जगमगेहें ॥ धर्म ॥१॥ कर्मके संग्राम घोर, लरे महा मोह चोर, जोर ता- को तोरवेंकुं, सावधान जगेहें ॥ शीलको धरी स- नाह, धनुख महा उत्साह, ज्ञान बानके प्रवाह, सब वेरी नगे हें ॥ धर्म ॥२ ॥थायो हे प्रथम सेन, . , जशविलास कामको गयो हे रेन, हरिहर ब्रह्म जेण, एकलेने उगेहें, क्रोध मान माया लोन, सुनट महा अखोज, हारे सोय बोड योन, मुख दे नगेहें ॥ धर्म ॥३॥ नोकषाय नये खीन, पापको प्रताप हीन, श्रोर जट जये दिन, ताके पग उगेहें॥ कोउ नहीं रहे गढे, कर्म जो मिले ते गाढे, चरनके जिदा काढे,करवाल नगेहें ॥ धर्मः ॥४॥ जगत्रय नयो प्रताप, तपत अधिक ताप, तातें नाहिं रही चाप, श्ररी तगतगे- हैं। सुजस निसान साज, विजय वधाइ लाज, ए- से मुनिराज, ताकुंहम पाय लगेहें॥धर्म ॥५॥इति ॥ ॥पद बावीशमुं॥ ॥ राग रामकली ॥ रुपनदेव हितकारी, जगत गुरु रुपनदेव हितकारी ॥ टेक ॥ प्रथम तीर्थंकर प्रथम नरेसर, प्रथम यति ब्रह्मचारी॥ रुपनदेव ॥ ॥ १॥ वरसी दान देई तुम जगमें, इसति इति निवारी ॥ तेसी काही करतु नांही करुना, साहिव बेर हमारी ॥ रुपना॥ मांगत नहिं हम हाथी घोरे, धन कन कंचन नारी ॥ दियो मोहि चरन क- मखकी सेवा, याहि खगत मोहि प्यारी॥ पन ॥
१७ जश विलास ॥३॥ जव लीला वासित सुर डारे, तुपर सबही उवारी ॥ में मेरो मन निश्चल कीनो, तुम आणा सिरधारी ॥ षन ॥४॥ ऐसो साहिब नहिं को- उ जगमें, यासुं होय दिलदारी ॥ दिलहि दलाल प्रेमके बिचे, तिहां हठ खेंचे गमारी॥षन॥५॥ तुमहि साहिब में हुं बंदा, या मत देऊ विसारी ॥ श्रीनय बिजय विबुध सेवकके, तुमहो परम उपका- री॥षन ॥६॥ ॥ पद त्रेवीशमुं॥ ॥ राग वेलावल ॥ गौतम गणधर नमियें हो, अह निसि गौतम गणधर नमियें ॥ टेक ॥ ना- म जपत नवही निधि पश्एं, मन वंडित सुख लहि- एं हो ॥ अहम् ॥ १॥ घर अंगन जो सुरतरु फ- लियो, कहा काज बन नमियें ॥ सरस सुरनि घृत जो हुवे घरमें, तो क्यों तैले जमियें हो ॥ श्रदः॥ ॥॥ तेसी श्रीगौतम गुरु सेवा, श्रोर गेर क्यु रमियें ॥ गौतम नामें जवजल तरिएं, कहा बहुत तनु दमियें ॥ अहः॥३॥ गुण अनंत गौतमके स- मरन, मिथ्यामति विष गमियें ॥ जस कहे गौतम . RAM AGO जशविलास गुनरसबागें, रुचत न हें हम श्रमिय।श्रहणाति॥ ॥ पद चोवीशमुं॥ ॥राग नट्ट ॥ सुखदारे सुखदा, दादो पासजी सुखदाइ ॥ ऐसो साहिव नहिं कोउ जगमें, सेवा कीजें दील ला ॥ सुख ॥ १ ॥ सब सुखदाइ ए- इ निनायक, एहि सायक सुसहाश् ॥ किंकरकुं करे शंकर सरिसों, श्रापे अपनी ठकुराइ ॥ सुख ॥ ॥२॥ मंगल रंग वधे प्रनु ध्याने, पापवेली जाए करमाइ ॥ सीतलता प्रगटे घट अंतर,मिटे मोड़की गरमा॥ सुख० ॥३॥ कहा चिंताम- निकुं, जो में प्रनु सेवा पा॥श्रीजसविजय कहे द- र्शन देख्यो॥घर आंगन नवनिधिश्राशासुखण॥॥इति ॥पद पचीशमुं॥ ॥ राग देशाख ॥ अवमें साचो साहिव पायो, टेक ॥ याकी सेव करतहुँ याकुं, मुज मन प्रेम सु- हायो ॥ श्रवण ॥१॥ गकुर थोरन होवे अपनो, जो दीजे घर मायो ॥ संपति अपनी खिनुंमें देवे, वेतो दिल में ध्यायो॥श्रवण ॥२॥रनकी जन क- रत चाकरी, दूरदेश पाय घासे ॥अंतरयामी ध्याने करुं सुरतरु --- २० जशविलास दीशे, वेतो अपने पासें ॥ श्रबण ॥३॥ ओर कव हुँ कोउ कारन कोप्यो, बहुत उपाय न तूसे ॥ चि- दानंदमें मगन रहतुहेवेतो कबहुं न रुसे॥श्रवण ओरनकी चिंता चिंतीन मिटे,सब दिन धंधे जावे ॥ थिरता गुन पूरन सुख खेले, वेतो अपने नावें ॥ श्रबण ॥ ५॥ पराधीन हे जोग ओरको, जातें होत वियोगी॥सदा सिद्ध समता विलासी, वेतो निजगुन नोगी॥अब ॥ ६ ॥ ज्यौं जानो त्यौँ युगति न जानो, में तो सेवक उनको॥पक्षपात तो परसुं होवे, रागं धरतहुं गुनको ॥ श्रब० ॥ ७॥ नाव एक हे सब ज्ञानीको, मूरख नेद न नावे ॥ अपनो साहि- ब जो पहिचाने, सो जस लीला पावे ॥०॥७॥ ॥पद बवीशमुं॥ ॥ राग नूप कल्याण ॥सयनकी नयनकी बयनकी . बबी नीकी ॥ मयनकी गोरीतकी लगी मोहि श्र- वियां ॥ मनकी लगन नर अंगनीय लागे अली, क- लन परत कबु कहा कहुं बतीयां॥सयनकी॥१॥ मोहन मनाउ मानी, कहा बनी रति बानी, शिवा देवीके नंदन मानो बिनतियां ॥ गुन गहो जस जशविलास बहो घर रहो सुख लहो, उःख गमो मुऊ समो रंग रमो रतियां ॥ सयनकी॥ ॥ इति ॥ ॥ पद सत्तावीशमुं॥ ॥ राग काफी हुशेनी ॥साहिब ध्याया मन मो- हना, अति सोहना नवि वोहना ॥साहिवाटेक॥ थाजते दिन सफल मेरे, मानुं चिंतामनी पाया ॥ साहिब० ॥१॥ चोस मिलिय पूज्यो, ईशानी गुन गाया ॥ साहिव०॥ ॥ जनम महोचव करे देव, मेरुशिखर ले श्राया ॥ हरिको मन संदेह जा- नी, चरनन मेरु चलाया ॥ साहिब० ॥ ३॥ यहि वैताल रूप देखी, देवें न वीर खोनाया॥ प्रगट नये पाय लागी, वीरनाम बुलाया ॥ साहिव० ॥४॥ इंश पूठे वीर कहे, व्याकरन नीपाया॥ मोहिथी नि- शाल घरन, डेहिं वीर पढाया ॥ साहिव० ॥ ५ ॥ वरसी दान दे धीर, ले। व्रत सुहाया ॥ सालतले ध्यान ध्यातां, घाती धन खपाया ॥ साहिव०॥६॥ लहि अनंत ज्ञान श्राप, रूप जगमगाया॥जस कहे हम सो वीर, ज्योतिसुं ज्योति मिलाया ॥सा॥
२५ जशविलास ॥ पद अठावीशमुं॥ ॥ राग केदारो दरबारी॥ श्रावे हाथी दल सा- ज गाजते, नेमजी घर श्रावे, ए देशी ॥ प्रज्जुबल दे- खी सुरराज, लाजतो श्म वोले ॥ देखो बल नांग्यों ज्रम सेरो, कोनहि जग तुम तोले ॥ प्रजु ॥ १ ॥ टेक ॥ चरन अंगुठे कंपित सुरगिरि, मानुं नाचत डोले ॥श्न मिसि प्रनु मोहि उपर तूने, हरख हि- याको खोले ॥ प्रजुत ॥२॥ मरत शेषधर हरत महोदधि, जय नंगुर नूगोले ॥ दिसि कुंजर दि- ग्मूढ नए तब, सबहिं मिलत एक टोले ॥प्रजु ॥ ॥३॥ लीला बाल अवाल पराक्रम, तीन नुवन धंधोले ॥जस प्रजु वीर मरेर अव कीजें, बहुरि हुन परिहु नोले ॥ प्रजु ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ पद ओगणत्रीशमुं॥ ॥ राग उपर प्रमाणे ॥ प्रन्नु धरी पीठ वेताल बाल, सात ताललों वाधे ॥ काल रूप विकराल न- यंकर, लागत अंबर श्राधे ॥ प्रजुम्॥१॥ टेक ॥ बाल कहे को वीर ले गयो, परिजन देव श्राराधे ॥ तिल त्रिनाग चित्त वीर न खोज्यो, बल अनंत कुन जशविलास २३ बाधे ॥ प्रजु ॥२॥ वढत रहे नांहि सुरनिपण, जानु मोहि विराधे ॥ कुलिश कठिन दृढ मुष्टि मास्यो, संकुचित तनु मन दाधे । प्रनु० ॥३॥ सुर कद्दे परतख मोहि नयोहे, पानी रस विण खाधे ॥ जस कहे जे प्रसंस्यो तैसो, तुंदि वीर शिव साधे।। प्रन्नु० ॥४॥ इति ॥ ॥ पद त्रीशमुं॥ ॥ राग श्रीराग ॥ श्रच मोही ऐसीआय वनी ॥ टेक ॥ श्री संखेश्वर पास जिनेसर, मेरे तुं एक धनी ॥ श्रवण ॥१॥ तुं विनुं कोउ चित न सुहावे,श्रावे कोडि गुनी ॥ मन दोरे तुज ऊपर रसिओ, अति जिम कमल जनी ॥ श्रवण ॥२॥ तुज नामें सवि संकट चूरे, नागराज धरनी ॥ नाम जपो निसिवा- सर तेरो, या सुन मुज करनी ॥ श्रव० ॥३॥ को- पानल उपजायत उर्जन, मथन वचन थरनी ॥ना. म जपुं जलधार तिहां तुज, धारं कुःख हरनी ॥ श्रवण ॥४॥ मिथ्यामति बहु जन हे जगमां, मदन धरे धरनी॥ जनतें हम तुज नक्ति प्रजावे,ज- य नहें एक कनी॥थव॥५॥ सजान नयन सुधा- २४ जशविलास रस अंजन, पुरजन रवि जरनी ॥तुज मूरत निरखे सो पावे, सुखजस लील घनी ॥श्रवण॥ ६॥ इति ॥ ॥ पद एकत्रीशमुं॥ ॥ राग प्रजाति ॥ विमलाचल नित वंदिये, की- जे एहनी सेवा ॥ मानु हाथ ए धर्मनो, शिवतरु फल लेवा ॥ विमलाचल ॥१॥ टेक ॥ उज्वल जिनग्रह मंडले, तिहां दीपे उत्तंगा ॥ मानु हिमगि- रि विन्रमे, आइ अंवर गंगा ॥ विमलाचल॥२॥ को अनेरु जग नहीं, तीरथ ए तोले ॥ एम श्री मुख श्रागलें, श्री सीमंधर बोले ॥ विमलाचल ॥ ॥३॥ जे सघलां तीरथ करे, यात्रा फल लहिएं ॥ तेहथी ए गिरि नेटतां, शतगुणु फल लहिएं ॥ वि- मलाचल ॥४॥ जन्म सफल होए तेहनो, जो ए गिरि वंदे॥सुजस विजय संपद लहे, ते नर चिर नंदे ॥ विमलाचलम् ॥ ५ इति ॥ ॥ पद बत्रीशमुं॥ ॥ राग देव गंधार ॥ देखो मा अजब रूप जि- नजीको ॥ देखो०॥ टेक ॥ उनके श्रागें थोर सबन- को, रूप लगे मोदि फीको ॥ देखो॥१॥ लोचन जशविलास १५ करुना अमृत कचोले, मुख सोहे अति नीको ॥क- वि जस विजय कहे यों साहिब, नेमजी त्रिजुवन टीको ॥ देखो ॥ इति ॥ ॥ पद तेत्रीशमुं॥ ॥ राग गुर्जरी पूर्वी ॥ बाला रूप शाला गले, मा- सा सोहे मोतनकी ॥ करे नृत्य चाला गोरी, टोरी मिलि नोरीसी ॥ देवरकुं रहि घेरी, सेना मानु का- म केरी, गुनगाती श्रावे तेरी, करे चित चोरिसी॥ विवाह मनावे थाली, पहिरी दखण फाली, वाकुं निहाले बाली, ठोडी लाज होरीसी ॥ तोजी नेमि खामि गज, गामी जस कामी जस, धामी रहे ग्र- हि मौन ध्यान, धारा वन दोरीसी ॥१॥ इति ॥ ॥ पद चोत्रीशमुं॥ ॥ राग धन्याश्री॥ जवलग आवे नहिं मन ठाम ॥टेका तवलग कष्ट क्रिया सवि निष्फल, ज्यौं गगने चित्राम ॥ जवलग ॥१॥ करनी बिन तुं करे मोटा, ब्रह्मवति तुक नाम ॥ श्राखर फल न सहेगो ज्यों जग, व्यापारी विनु दाम ॥ जवलग ॥ ॥२॥ मुंग मुमावत सवहि गडरिया, हरिण रोक २६ जशविलास बन धाम ॥ जटाधार वट जस्म लगावत,रासन स हतु हे घाम ॥ जवलग ॥३॥ एतेपर नहीं यो- गकी रचना, जो नदि मन विश्राम ॥ चित अंतर पर बलवकुं चिंतवत, कहा जपत मुख राम ॥ जव- लग ॥ ॥ वचन काय गोपें दृढ न धरे, चित्त तुरंग लगाम ॥ तामे तुं न लदे शिवसाधन, जिन कण सुने गाम ॥ जबलग ॥ ५॥ पढो ज्ञान धरो संजम किरिया, न फिरावो मन गम ॥ चिदानंद घन सुजस विलासी, प्रगटे श्रातमराम ॥ जवल- ग० ॥ ६॥ इति ॥ ॥ पद पांत्रीशमुं॥ ॥ राग सोरग ॥ चतुरनर सामायक नय धारो ॥ टेक ॥ लोक प्रवाह गंडकर अपनी, परिणति शुक विचारो ॥ चतुरनर ॥१॥ अव्यत अखय अनंग श्रातमा, सामायक निज जातें ॥ शुद्धरूप समतामय कहीएं, संग्रह नयकी वातें ॥ चतुरन- र ॥२॥ अब व्यवहार कहे युं सब जन, सामा- यक हुश् जावे ॥ तातें आचरना सो माने, ऐसा नै- गम गावे ॥ चतुरनर ॥३॥ श्राचरना रिजुसूत्र जशविलास सिथलकी,बिनु उपयोग न माने ॥ श्राचारी उपयो- गी श्रातम, सो सामायक जाने ॥ चतुरनर॥४॥ शब्द कहे संजत जो ऐसो,सो सामायक कहिये।चो- थे गुनगने श्राचरना,उपयोगें निन्न लहियें ॥ चतु- रनर ॥ ५॥ अप्रमत्त गणे ाको, समनिरूढ नय साखी ॥ केवल ज्ञान दशा थिति उनकी, एवं- जूते नाखी ॥ चतुरनर ॥ ६ ॥ सामायक नय जो हु न जाने, लोक कहे सो माने ॥ ज्ञानवंतकी सं- गति नाहीं, रहियो प्रथम गुनगने ॥ चतुर ॥७॥ सामायक नर अंतर दृष्टे, जो दिनदिन अन्यासें ॥ जग जसवाद लहे सो वैठो, ज्ञानवंतके पासें ॥ चतुरनर० ॥७॥ ॥ पद उत्रीशमुं॥ ॥ राग विहागडो ॥ सवल या गक मोह मदि राकी ॥ टेक ॥ मिथ्यामतिके जोरे गुरुकी, वचन शक्ति जिहां थाकी ॥ सवल ॥ १॥ निकट दशा बांग जम उंची, दृष्टि देतहे ताकी न करे किरिया जनकुं नाखे, नहि जवथिति पाकी ॥ सवल ॥२॥ जाजन गत नोजन को बांडी, दसत्तर जिऊं दोरे॥
2G जशविलास गहत ज्ञानकुं किरिया त्यागी, होत श्रोरकी श्रोरें॥ सबल० ॥३॥ ज्ञानवात निसुनि सीर धूने, लागे निज मतिमीठी॥जो कोउ खोल कहे किरियाको, तो माने नृप चीठी ॥सबला ज्यु कोज तारु जलमें पेसी, हाथ पान न हलावे ॥ छानसेती किरिया सब लागी, युं अपनो मत गावे ॥ सवल० ॥ ५ ॥ जैसे पाग कोउ सिर वांधे, पहिरन नहिं लंगोटी। ससुरु पास किना बिनु सीखे,श्रागम बात त्युं खो- टी॥ सबल॥६॥ जैसे गज अपने सिर ऊपर, बार श्रापही मारे ॥ ज्ञान ग्रहत क्रिया तुलारत, श्रदपबुझि फल हारे ॥ सवल० ॥७॥ ज्ञान क्रिया दोउ शुद्ध धरेगे, शुरू कहे निरधारी ॥ जस प्र- ताप गुननिधिकी जाजं, उनकी में बलिहारी ॥ स- बल ॥ ॥ इति ॥ ॥ पद सडनीशमुं॥ ॥ राग काफी जंगलो ॥ चेतन अव मोहि दर्शन दीजे ॥ टेक ॥ तुम दर्शन शिवसुख पामीजे, तुम दर्शन नव बीजे ॥ चेतन ॥ १॥ तुम कारन तप संयम किरिया, कहो कहांलों कीजे ॥ तुम दर्शन जशविलास ए बिनु सव या फूही,अंतर चित्त न नीजे ॥ चेतना ॥२॥ क्रिया मूढमति कहे जन केश, ज्ञान ओर- कुं प्यारो ॥ मिलत नावरस दोउ न लाखे, तुं दोनुते न्यारो ॥चेतन॥३॥ सबमें हे थोर सबमें नाही, पूरन रूप एकेलो ॥ आप स्वनावे वे किम रमतो, तुं गुरु अरु तुं चेलो ॥ चेतन ॥॥ अकल अलख प्रजु तुसब रूपी,तुं अपनी गति जाने॥श्रगम रूप श्रागम अनुसारें, सेवक सुजस वखाने॥चेतन ॥५॥इति ॥ ॥ पद अडत्रीशमुं॥ ॥ राग नीम पलासी ॥ राम चिरीया चेहरीहो ॥ एदेशी ॥ मन कितहुं न लागे हेजेंरे ॥ मन ॥ टेक ॥ पूरन श्रास न अली मेरी, अविनासीकी सेजेंरे ॥ मन ॥१॥अंग अंग सुनि पिउ गुन ह- रखे, लागो रंग करेजेंरे ॥ एतो फिटायवो नवि फिटे, करहु जोर जोरेजेरे ॥ मन ॥ २ ॥ योग धनालंबन नहिं निष्फल, तीर लगो ज्युं वेजेंरे ॥ अवतो नेद तिमिर मोहि नागो, पूरन ब्रह्मकी से- जेरे ॥ सुजस ब्रह्मके तेजेरे ॥ मन ॥३॥ इति ॥
३० जशविलास -- ॥पद ओगणचालीशमुं॥ ॥ राग शोनी ॥ चिदानंद अविनासीहो, मेरो चिदानंद थविनासी हो ॥ टेक ॥ कोर मरोर कर- मकी मेटे, सहज खन्नाव विलासीहो॥ चिदानंद० ॥ ॥१॥ पुजल मेल खेलजो जगको, सोतो सवहि बिनासीहो॥ पूरन गुन अध्यातम प्रगटें, जागे जोग उदासीहो ॥ चिदानंद॥ २॥ नाम नेख किरिया- कुं सबही, देखे लोक तमासीहो ॥ चिन मूरत चे- तन गुन चिने, साचो सोज सन्यासीहो ॥ चिदानं- द॥३॥ दोरी देवारकी किति दोरे, मति व्यव- हार प्रकासीहो ॥ श्रगम अगोचर निश्चय नयकी, दोरी अनंत अगासी हो ॥ चिदानंद ॥ ४ ॥ ना नाघटमें एक पिडाने, श्रातमराम उपासी हो ॥ने- द कलपना में जम चूल्यों, बुब्ध्यो तृष्णा दासीहो॥ चिदानंदम् ॥ धर्म सिछि नवनिधि हे घटमें, कहा ढुंढत जर काशीहो ॥ जस कहे शांत सुधारस चा- ख्यो, पूरन ब्रह्म श्रन्यासीहो ॥ चिदा ॥ ६ ॥ ॥ पद चालीशमुं॥ ॥ राग होरी ॥ हरी नारी टोले मिलि रंग हो जशविलास ३१ होरी ॥टेक ॥फाग रमे तजी लाल, रंग होहोरी, देव- रकुं घेर रही ॥ रंगहो ॥ व्याह मनावन काज खास ॥रंग ॥१॥ ताल कंसाल मृदंगसुं॥ रं- ग० ॥ मधुर वजावत चंग लाल ॥ रंग ॥ गयव गुलाल नयन नरे॥ रंग ॥ वश्न वजावे अनंग लाल ॥रंग ॥२॥ पिचकारी ांटे पीय ॥रंग॥ जरी जरी केसर नीर लाल रंग ॥ मार्नु मदन करती उटा ॥रंग ॥ श्रलवे उडावे अंबीर लाल ॥रंग ॥३॥ योवन मद मदिरा वाकी ॥ रंग॥ गावत प्रेम धमाली लाल ॥ रंगाराचत माचत नाचती ॥रंगा कोतुकसुं करे थाली लाल रंगणा ॥४॥सोहे मुख तंवोलसुं ॥रंग॥ मानु संध्यायुत चंद लाल ॥ रंग ॥ पूरित केसर फुलेलसुं॥ रंग ॥ जरत मेह ज्यु बुंद लाल ॥रंग ॥ ५ ॥ थण जुज मूख देखावती ॥रंग ॥ बाद लगावत कंठ लाल ॥ रंग ॥ कहे देवर परनो पीया ॥ रंग ॥ परना- बिन पुरुष उलंठ लाल ॥रंग०॥६॥ रूख मिलित रहे वेलीमुं ॥रंग॥सागर गंगा रंग लाल ॥ रंग ॥ जान गंगाने अजानवें ॥ रंग॥ किलं न करो त्रिया इश जशविलास संग लाख ॥ रंग ॥ ७॥ युं विलास हरीनारीके ॥ रंग ॥ देखी धरे प्रनु मोन लाल ॥ रंग ॥स्त्री शिशु स ह न तजे ॥ रंगण॥ करे वचन श्रम को न लाल ॥ रंग ॥ ॥ जनके जाने कहा नयो॥ रंगण॥ मनको मान्यो प्रमान लाल ॥ रंग॥ चतुर- न चूके नेमजी ॥रंग ॥ पाए सुजस कट्यान लाल ॥ रंग॥ ए॥ इति ॥ ॥पद एकतालीशमुं॥ ॥ जयजय जयजय पास जिणंद ॥ टेक ॥ अं- तरीक प्रन्नु त्रिजुवन तारन, नविक कमल उहा- स दिणंद ॥ जय० ॥१॥ तेरे चरन शरन में कीने, तुं बिनु कुन तोरे जवफंद ॥ परम पुरुष परमारथ दरशी, तुं दिये नविककुं परमानंद ॥ जय० ॥२॥ तुं नायक तुं शिव सुख दायक, तुं हित चिंतक तुं सुखकंद ॥ तुं जन रंजन तुं नव जंजन, तुं केवल कमला गोविंद ॥ जय० ॥३॥ कोडि देव मिलिके कर न शके, श्क अंगुठ रूप प्रतिबंद ॥ ऐसो अद्-, जुत रूप तिहारो, वरषत मानुं अमृतको बुंद॥जय०॥ ॥४॥ मेरे मनमधुकरके मोहन, तुम हो विमल जशविलास ३३ सदस अरविंद. ॥ नयन चकोर विलास करतुहे, देखत तुम मुख पूरनचंद ॥ जय० ॥५॥ दूर जावे प्रनु तुम दासनतें, कुःखदोहग दालिज अघदंद ॥ वाचक जस कहे सहस फलतें तुमहों, जे बोले तु. म गुनके वृंद ॥ ज० ॥६॥ ॥ पद वेतालीशमुं॥ ॥राग धन्याश्री॥ वामानंदन जगदानंदन, से- वकजन श्रासा विसराम ॥ नेक निजर करी मोहि पर निरखो, तुम हो करुनारसके धाम ॥ वामा० ॥ ॥१॥ टेक ॥ इतनी नूमि प्रनु तुमही थान्यो, प- रिपरि बहुत वढा माम ॥ अव उ चार गुनगन बढावत, लागत हे क्या तुमकुं दाम ॥ वामा ॥ ॥२॥अहनिसि ध्यान धरुं हुं तेरो, मुखथी न वि- सारं तुम नाम ॥ श्रीनयविजय विबुध सेवक कहे, तुम हो मेरे श्रातमराम ॥ वामा० ॥३॥ ॥ पद तेतालीशमुं॥ ॥राग काफी ॥ अजीत देव मुफ वालहा, ज्यु मोरा मेहा ॥ टेक ॥ ज्यु मधुकर मन मालती, पंथी मन गेहा । श्रजीत ॥१॥ मेरे मन तुंदि रुच्यो, प्र- ३ ३४ जशविलास नु कंचन देहा ॥ हरीहर ब्रह्म पुरंदरा, तुज श्रागें केहा ॥श्रजीत॥२॥ तुंही श्रगोचर को नहीं, सजन गुन रेहा ॥ चाहे ताकुं चाहिये, धरी धर्म सनेहा ॥ अजित ॥३॥ नक्ति वचल जग तारनो, तुं वि- रुद वदेहा ॥ वीतराग हुए वालहा ॥ क्युं कर्म री बेहा ॥अजित ॥ ४ ॥ जे जिनवर हे नर- तमें, एरावत विदेहा ॥ जस कहे तुज पद प्रणमतें, सब प्रणमे तेहा ॥ श्रजित ॥ ५ ॥ ॥ पद चुमालीशमुं॥ ॥ राग गोडी ॥ संजव जिन जब नयन मिल्यो हो ॥ टेक ॥ प्रगटे पूरव पुण्यके अंकुर, तबतें दिन मोहि सफल वस्यो हो ॥ संचव ॥१॥श्र- गनमें श्रमियें मेह वूठे, जन्म तापको व्याप गढ्यो हो ॥ जैसी नक्ति तैसी प्रनु करुना, श्वेत संखमें उध मिल्यो हो ॥ संजव० ॥२॥ मरत फि- रत हे उरही दीलतें, मोह मन जिणे जगत्रय बढ्यो हो ॥ समकित रतन लेहु दरिसणतें,अब न जाऊं कुगति रव्यो हो ॥ संजव० ॥३॥ नेह नजर तर निरखतही मुज, प्रजुसुं हियडो हेज हल्यो .
जशविलास ३५ हो ॥ श्रीनयविजय विबुध सेवककुं ॥ साहिब सु- रतरु होय फल्यो हो ॥ संनव ॥१॥ इति ॥ ॥ पद पीसतालीशमुं॥ ॥राग नह ॥ प्रजुतें हियडो हेज हव्यो हो ॥ टेक ॥ याकी सोजा विजित तपस्या, कमल करतुं- हे जलचारी॥ विधुके सरन गयो मुख थरिके, बन- ते गगन हरिण हारी ॥ प्रजु ॥ १॥सहजहि श्र- जन मंजुल निरिषत,खंजन गरव दियो मारी॥बिन खर हे चकोरकी सोला, अग्नि नखे सो फुःखलारी॥ प्रजुते ॥२॥ चंचलता गुन लियो मीनको, अलि ज्युं तारी हे कारी ॥ कहुँ सुनगता केती इनकी, मोहि सवहि अमरनारी ॥ प्रजुतें ॥३॥ घूमत हे समता रस पाने, जैसे गजवर मद नारीतीन जुवनमां नही को श्नको, अभिनंदन जिन अनुका- री॥ प्रजुते ॥४॥ मेरे मन तो तुमहि रुचत हे, परे कुन परकी लारी॥ तेरे नयनकी मेरे नयनमें, जस कहे देउ लबिश्शवतारी॥प्रजुतें ॥५॥ इति ॥ ॥पद तालीशमुं॥ ॥ राग मारु ॥ सुमति नाथ साचाहो ॥ टेक ॥ , ३६ जशविलास पर पर परखतहि नया, जैसा हीरा जाचाहो ॥ ओर देव सवि परहस्या, में जाणी काचाहो ॥ सुमति०॥ ॥१॥ तेसी किरिया हे खरी, जैसी तुज वाचाहो ॥ ओर देव सवि मोहें जया, सवि मिथ्या माचाहो ॥ सुमति ॥ ५॥ चउरासी लखवेषमा, हुं बहु पर नाचाहो ॥ मुगति दान देश साहिबा, अब करहो ऊंचाहो ॥ सुमति॥३॥ लागी अग्नि कषायकी, सब गेरही आचाहो ॥ रक्षक जाणी श्रादस्या, में तुम शरन माचाहो ॥ सुमति ॥ ४ ॥ पक्षपात नहिं कोउसुं,नहिं लालच लांचाहो॥श्रीनय विजय सु- शिष्यको, तोसुं दिल राचाहो॥ सुमति ॥५॥इति ॥ ॥ पद सुडतालीशमुं॥ ॥ राग पूरवी. ॥ घमि घमि सांजरे सांसलूना, घमि घमि ॥ टेक ॥ पद्म प्रनु जिन दिलसें न बि- सरे, मानु कियो कबु गुनको टूना ॥ दरसन देख- तही सुख पाजं, तो चिन होतहुं उन्ना मूना ॥ घ- मि ॥१॥ प्रजुगुन ज्ञान ध्यान बिधि रचना, पान सुपारी काथा चूना ॥ राग जयो दिलमें थायोगें, रहे. बिपाया बाना बुना ॥ घमि ॥२॥ प्रजुगुन
जशविलास
चित्त वांध्यो सव साथे, कुन पेसे ले। घर खूनी ॥
राग जग्या प्रजुसु मोहि परगट, कहो नया कोऊ
कहो जूना ॥ घमि ॥३॥ लोक लाजसें जो चित
चोरे, सोतो सहज विवेकही सूना ॥ प्रजुगुन ध्या-
न विगर भ्रम नूला, करे किरिया सो राने रूना ॥
घमि० ॥ ४ ॥ मेंतो नेह कियो तोहि साथे, श्रव
निवाह तोतो वश् हुना॥जस कहे तो विन श्रोरन
से, अमिय खाश्कुन चाखेचूना॥घमि०॥५॥ति॥
॥ पद अडतालीशमुं॥
॥ राग श्मन कल्याण ॥ ऐसे सामी सुपार्श्वसें
दिल लगा, उःखजगा सुख जगा जगतारणा ॥रा-
जहंसकुं मानसरोवर, रेवा जल ज्युं वारणा ॥
ऐसे ॥१॥ टेक॥ मोरकुं मेह चकोरकुं चंदा, मधु
मनमथी चित्त गिरना ॥ फूल अमूल जमरकी अं-
वही, कोकिलकुं सुखकारना ॥ ऐसे ॥२॥ सीता-
कुं राम काम ज्यु रतिकुं, पंथीकुं घर वारना ॥ दानी
कुं त्याग याग वह्मनकुं, योगीकुं संयम धारना ॥
ऐसे ॥३॥ नंदनवन ज्युं सुरकुं वसन, न्यायीकुं
न्याय निहारना ॥ यु मेरे मन तुहि सुहायो, थोर
३७ जशविलास तो चिततें उतारनां ॥ ऐसे ॥४॥ श्रीसुपार्श्व दरिश- न पर तेरे, कीजें कोमी उवारना॥श्रीनय विजय विबु- धसेवककुं, दियो समता रस पारना॥ऐसे॥५॥इति ॥ ॥ पद ओगणपचाशमुं॥ ॥ राग रामग्री ॥श्रीचंद्रप्रन जिनराज राजे, वदन पूनमचंदरे ॥ नविक लोक चकोर निरखत, लहे परमानंदरे ॥ श्रीचंद्र० ॥ १॥ टेक ॥ महमहे महिमाएं जसनर, सरस जस अरविंदरे ॥ रण कणे कविजन जमर रशिया, लहि सुख मकरंदरे ॥श्री चं॥२॥ जस नामे दोलत अधिक दिये, टले दोहग दंदरे ॥ जस गुन कथा नव व्यथा मां- जे, ध्यान शिवतरु कंदरे ॥ श्री चंद्र० ॥३॥ विपुल हृदय विशाल नुजयुग, चलित चाल गयंदरे ॥ श्र- तुल अतिशय महिमा मंदिर, प्रणत सुरनर वृंदरे॥ श्री चं७० ॥४॥ में दास चाकर प्रन्नु तेरो, शीष्य तुज फरजंदरे ॥जसविजय वाचक श्म विनवे, टालो मुज नव फंदरे ॥ श्री चंड० ॥५॥ इति ॥ ॥ पद पचाशमुं॥ ॥राग केदारो ॥ में कीनो नहीं तो बिन ओर जशविलास ३ए सुं राग ॥ टेक ॥ दिनदिन वान चढे गुन तेरो, ज्यु कंचन परजाग ॥ श्रोरनमें हे कषायकी कलिका, सो क्यु सेवा लाग ॥ में कीनो॥१॥राजहंस तुं मा- नसरोवर , श्रोर अशुचि रुचि काग ॥ विषय जु- जंगम गरुम तुं कहिये, ओर विषय विषनाग ॥ में कीनो ॥२॥ोर देव जल डीलर सरिखे, तुं तो समुख अथाग ॥ तुं सुरतरु जग वंचित पूरन, ओर तो सुको साग ॥ में कीनो ॥३॥ तु पुरुषोत्तम तुंदि निरंजन, तुं शंकर वडनाग ॥ तुं ब्रह्मा तुं बु- कि महावल, तुंहि देव वीतराग ॥ में कीनो॥४ सुविधिनाथ तुज गुन फूलनको, मेरो दिल दे वाग॥ जस कहे जमर रसिक होइ तामें, लीजें नक्ति पराग ॥ में कीनो० ॥५॥ ॥ पद एकावनमुं॥ ॥ राग फागनी देशी ॥ चज कसाय पाताल कल श जिहां, तृष्णा पवन प्रचंम ॥ वहु विकल्प कहो- ब चढतुहे, थारति फेन उदंड ॥ १ ॥ नवसायर नीषण तारीएं हो, श्रहो मेरे ललना ॥ पासजी विजुवन नाथ दिलमें, ए विनति धारिये हो॥ ॥ + - ४० जशविलास ॥॥ जरत उदाम काम वडवानल, परत सैल गिरी शृंग ॥ फिरत व्यसन बहु मगर तिमिंगल, करतहे निमग उमंग ॥ ॥३॥ जमरी याके बिच जयंकर, उलटी गुलटी वाच ॥ करत प्रमाद पिशाच सहित जिहां, अविरति व्यंतरी नाच ॥ श्र॥४॥ गर्जत अरति फुरति रति विजुरी, होत बहोत तोफान ॥. सागतियोरकुं गुरु मलबारी, धरम जिहाज निदान ॥ १० ॥५॥ जुरई पाटे ए जिन अति जोरी, सहस अढार शीलंग ॥ धरम जिहाज तिन सज करी चलवो, जस कहे शिव- पुर चंग ॥ १० ॥६॥ ॥पद बावनमुं॥ ॥ऽख टलियां मुख दीठे हो मुज सुख उपनोरे, नेव्यो नेट्यो वीर जिणंदरे ॥ हवे मुज मनमंदिर- मां प्रज्जु श्रावी वसोरे, पामुं पामुं परमानंदरे ॥०॥ ॥१॥पीठ बंध हां कीधो समकीत वज्रनोरे, काढ्यो काढ्यो कचरो ने भ्रांतिरे॥हां अति उंचा सोहे चा- रित्र चंचुआरे, रूडी रूडी संवर नांतिरे ॥ ० ॥ ॥२॥ कर्म विवर गोखे श्हा मोति जुमकारे, जुले जशविलास ४१ जुले धीगुण थापरे ॥ वार नावना पंचाली अचरय करेरे, कोरी कोरी कोरणी काउरे ॥०॥३॥हां श्रावी समता राणीसुप्रजुरमोरे, सारि सारि थिरता सेजरे ॥ किम जर शकशो एकवार जो श्रावशोरे, रंज्या रंज्या हियमानी हेजरे ॥ ७० ॥ ४ ॥ वय- ज थरज सुनी प्रनु मनमंदिर थावियारे, श्रापे तुग तुग विजुवन नाणरे ॥ श्री नयविजय विवुध पय सेवक जणेरे, तेणे पाम्या पाम्या कोमि कट्या- परे ॥ ॥ ५॥ इति ॥ ॥ पद त्रेपनमुं॥ ॥ सजन राखत रीतिनली, विनु कारन उपकारी उत्तम, जाइ सहज मिति ॥ उनकी मन परि- नति काली, जैसी होय गली ॥ स०॥१॥ोरन- को देखत गुन जगमें, उन जाये जली ॥ फल पावे गुन गुनको ज्ञाता, सऊन हेज हली ॥ स० ॥ ॥२॥ऊंच इति पद वेगे ऽर्जन, जाइ नांहिं व- उपग्रह उपर वेठी मीनी, होत नहिं उजसी॥ स०॥३॥ विनय विवेक विचारत सङान, नज कराव जली ॥ दोष लेश जो देखे कबहुँ, चाखे
n
४२
,
जशविलास
चतुर टली ॥ स॥४॥ श्रव में ऐसो सऊन पायो,
जनकी रीत नली ॥ श्रीनय विजय सुगुरु सेवातें,
सुख रस रंग रली ॥ स ॥५॥ इति ॥
॥ पद चोपनमुं॥
॥ श्राज श्रानंद नयो, प्रनुको दर्शन लह्यो, रोम
रोम सितल जयो, प्रनु चित्त थायो हे॥श्राामन
हुँते धास्या तोहे, चलके श्रायो मन मोहे, चरण
कमल तेरो, मनमें ठहरायो हे ॥ श्राप ॥ १॥ श्र-
कल श्ररूपी तुंही, अकल अमूरति योही, निरख
निरख तेरो, सुमति\ मिलायो हे॥श्रा॥२॥ सुम-
ति खरूप तेरो, रंग नयो एक अनेरो, वाइरंग था-
त्म प्रदेशे, सुजस रंगायो हे ॥ श्रा० ॥३॥इति ॥
॥पद पंचावनमुं॥
॥ ज्ञानादिक गुण तेरो, अनंत अपर अनेरो ॥
वाही कीरत सुन मेरो, चित्तहुँ जस गायो दे॥
ज्ञान ॥ १॥ तेरो ग्यान तेरो ध्यान, तेरो नाम मेरो
प्रान, कारण कारज सिको, ध्याताध्येय ठहरायो हे
॥ झा ॥२॥ बूट गयो भ्रम मेरो, दर्शन पायो में
तेरो॥चरण कमल तेरो, सुजस रंगायो हे॥ज्ञा॥३॥
, जशविलास ४३ ॥ पद उप्पनमुं॥ ॥ बाद बादीसर ताजे, गुरु मेरो गड राजे, पंच महावत जहाज, सुधर्मा ज्युं सवायो हे॥ वा ॥ ॥३॥ विध्याको वडो प्रतापसंग, जल ज्युं उठत तुरंग, निरमल जेसो संग, समुल कहायो हे ॥ बाप ॥२॥ सत्तसमुख जस्यो, धरम पोत तामे तस्यो, शील सुखान वालम, क्षमालंगर मास्यो हे॥ वा ॥३॥ सहम संतोष करी, तपतो तपी ह्या ज- री, ध्यान रंजक देत धरी, मोला ग्यान चलायो हे॥ बाध ॥ ४ ॥ एसो जहाज क्रियाकाज, मुनिराज सजो साज, दया मया मणि माणिक, ताहिमें जरा- यो हे ॥ वा ॥५॥ पुण्य पवन श्रायो, सुजस ज- हाज चलायो, प्राणजीवन एसो माल, घर बेठे पा- यो हे ॥ वाच ॥६॥ इति ॥ ॥पद सत्तावनमुं॥ ॥एरी श्राज श्रानंद नयो मेरे तेरो, मुख निरख निरख रोम रोम शीतल जयो अंगोअंग ॥ ए० ॥ सुरु समजल समता रस जीलत, आनंद रंग न- यो अनंतरंग ॥ ए॥१॥ एसी थानंद दशा प्र.
जशविलास गटी चित्त, अंतर ताको प्रजाव चलत, निरमल गंगवाही गंग॥समता दोउ मिल रहे, जस विजय जीलत ताके संग ॥ ए० ॥२॥ ॥पद अहावनमुं॥ ॥ जो जो देखे वीतरागने, सो सो होशे वीरा- रे ॥ बिन देखे होसे नहीं कोश, कांश होए अधी- रा रे ॥ जो ॥१॥ समय एक धनहीं घटसी, जो सुख कुःखकी पीमारे ॥ तुं क्युं सोच करे मन कू- मा, होवे वज्र जो हीरारे ॥ जो ॥२॥ लगे न तीर कमान बान क्यु, मारी सके नही मिरारे॥ तुं संजार पुरुष बल अपनो, सुख अनंत तो पीरारे॥ जो ॥३॥ नयन ध्यान धरो वा प्रजुको, जो टारे जव नीरारे ॥ सजसचेतन धरम निज अपनो, जो तारे नव तीसरे ॥ जो ॥४॥ इति ॥ ॥ पद ओगणसापमुं॥ ॥ नजन बिनुं जीवित जेसे प्रेत, मलिन मंदम- ति डोलत घर घर, उदर नरनके देत ॥न ॥१॥ उर्मुख वचन बकत नित निंदा, सजान सकल पुःख देत ॥ कबहुँ पापको पावत पैसो, गाढे धुरीमे देत॥
जशविलास ४५ ज॥३॥गुरु ब्रह्मन थचुत जन सजान, जातन कवण निवेत ॥ सेवा नहीं प्रजु तेरी कवहु, जुवन नीलको खेत ॥ न ॥ ३ ॥ कथे नहीं गुन गीत सु- जस प्रनु, साधन देव अनेत ॥ रसनारस विगारो कहांखों, बुडत कुटुंव समेत ॥ न० ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥पद सापमुं॥ ॥ प्रनु तेरो गुन शान, करत महा मुनि ध्यान, समरत श्रागे जाम, हृदेमें समायो हे॥ प्रजु० ॥ ॥१॥ मन मंजन कर लायो, सुख समकित उह- रायो, वचन काय समजायो, एसे प्रजुकुं ध्यायो हे॥॥२॥ ध्यायो सही पायो रस, अनुजव जाग्यो जस, मिट गयो भ्रमको रस, ध्याता ध्येय स- मायो दे ॥ प्र० ॥ ३॥ प्रगट जयो महा प्रकास, ज्ञानको मदा उदास ॥ एसो मुनिराज ताज, ज- स प्रनु गयो दे॥ प्रण ॥४॥ ॥ पद एकसपमुं॥ ॥राग कनमो ॥ ए परम ब्रह्म परमेश्वर, परम थानंदमयि सोहायो ॥ ए परतापकी सुख संप- ची बरनी न जात मोपें, ता सुख अलख कहायो॥
६ , ४६ जशविलास ए॥१॥ता सुख ग्रहवेकुं मुनि मन खोजत, मन मंजन कर ध्यायो । मनमंजरी जश, प्रफुल्लीत द- सा लश, तापर नमर लोनायो॥ ए॥शानमर श्र- नुन्नव जयो, प्रजुगुन वास लह्यो ॥चरन करन तेरो, अलख लखायो ॥ एसी दशा होत जव, परम पुरुष तब, पकरत पास पगयो ॥ ए॥३॥ तव सुजस नयो, अंतरंग आनंद लह्यो, रोम रोम सीतल न- यो, परमात्म पायो॥ अकल स्वरूप नूप, कोऊ न परखत कूप, सुजस प्रनु चित श्रायो ॥ ए॥४॥ ॥ पद बासमुं॥ ॥ राग ध्रुपद ॥ केसे देत कर्मनकुं दोस, मन नि- वहे वेहे श्रापुकानो ॥ ग्रहे राग अरु दोष ॥1॥ विषयके रस श्राप नूलो, पाप सो तन गेस के॥१॥ देवधर्म गुरुकी करी निंदा, मिथ्यामतके जोस ॥के ॥२॥ फल उदय नइ नरक पदवी, नजोगे केको संग ॥ के ॥३॥ किए श्रापुं कर्म जुगतें, अब कहा करो सोस ॥के॥४॥ दुःख तो बहु काल वीत्यो, लहे न सुख जल श्रोस०॥ के० ॥ ५॥क्रोध मान माया लोन, नस्यो तन घट गेस ॥ के॥६॥ चेत चेतन 0 -- ४७ जशविलास पाय सुजस, मुगति पंथसो पोस ॥1॥ इति ॥ ॥ पद त्रेसमुं॥ ॥ राग गोडी सारंग ॥ तुहारे शिर राजत श्र- जब जटा, बारये मानुं गयल न बारत ॥ सीस स- पगार बटा ॥ तुहारे ॥१॥ किधुं गंगा श्रमरीस सुर सेवत, यमुना उन्नय तटा। गिरिवर सिखरें एह अनोपम, उन्नत मेघ घटा ॥ तु ॥२॥ केसे बाल लगे नवि नवजल, तारत अति विकटा ॥ ह. रि कहे जस प्रजु झपन रखो ए, हम हिं अति उ- खटा ॥ तु० ॥३॥ ॥पद चोसपमुं॥ ॥ राग बिहाग ॥ माया कारमीरे, माया म करो चतुर सुजाण ॥माया वायो जगत वलुधो, दुःखीयो थाय अजान ॥ जे नर मायायें मोहि रह्यो, तेने सु- में नही सुख गम ॥ माया ॥ १ ॥ न्हाना मोटा नरखी माया, नारीने अधकेरी ॥ वली विशेपे अधिकी माया, गरढाने जाजेरी मायामा॥ माया कामण माया मोहन, माया जग धूतारी ॥ मायाथी मन सहुनुं चलीयुं, लोजीने बहु प्यारी ॥माया॥
जशविलास ॥३॥ माया कारन देश देशांतर, अटवी वनमा जाय ॥ जहाज वेसीने छीप छीपांतरें, जइ सायर जंपलाय ॥ माया ॥ ४॥ माया मेली करी बहु नेली, लोने लक्षण जाय ॥ जयथी धन धरतीमां गाढे, उपर विसदर थाय ॥ माया ॥५॥ योगी जति तपसी संन्यासी, नग्न थइ परवरिया ॥ जंधे मस्तक अग्निता, मायाथीन जगरिया ॥ माया॥ ॥६॥ शिवनूति सरिखो सत्यवादी, सत्यघोष कहेवाय ॥ रत्न देखी तेनुं मन चलियु, मरीने पु- गति जाय ॥ माया ॥ ७॥ लोन धरत मायायें रमियो, पमियो समुन मोकार ॥ मुठ माखनीयो थश्ने मरियो, पोतो नरक मोकार ॥ माया॥७॥ मन वचन कायायें माया, मूकी वनमां जाय ॥ धन धन ते मुनिश्वर राया, देव गांधर्व जस गाय ॥ मा- या ॥ ए ॥ इति ॥ ॥ पद पांशपमुं॥ ॥ कब घर चेतन श्रावेंगें, मेरे कब घर चेतन आवेंगे ॥ टेक ॥ सखिरि लेबु बलैया बार बार ॥ मेरे कब० ॥ रेन दीना मानुं ध्यान तुं साढा, कब जशविलास ४ए हुंके दरस देखावेंगे ॥ मेरे कब० ॥१॥ विरह दी- वानी फिरु ढुंढती, पीज पीन करके पोकारेंगे ॥ पीज जाय मले ममतासे,काल अनंत गमागे ॥मेरे कवण ॥२॥ करुं एक उपायमें उद्यम, अनुभव मित्र बो- लावेंगे ॥ श्राय उपाय करके अनुन्जव, नाथ मेरा समजावेंगे ॥ मेरे कव ॥३॥ अनुजव मित्र क- हे सुनो सादेव, अरज एक अवधारेंगे ॥ ममता त्याग समता धर अपनो, वेगें जाय मनावेंगे ॥ मेरे कब०॥४॥अनुनव चेतन मित्र मिले दोऊ, सुम- ति निशान घुरावेंगे ॥ विलसत सुख जस लीलामें, अनुनव प्रीति जगावेंगे ॥ मेरे कवण ॥५॥ इति ।। ॥ पद गसपमुं॥ ॥ राग मोतीमानी देशी ॥ सूरत मंगन पास जिणंदा, थरज सुणो टालो पुःख दंदा ॥ साहेवा रंगीला हमारा, मोहना रंगीला ॥ तुं सादेव हुँ ढं तुज चंदा, प्रीति वनी जैसी कैरव चंदा ॥सार तुजसुं नेह नहीं मुज काचो, घणही न जांजे हीरो जाचो सा॥ देतां दान ते कांश विमासो, लागे मुज मन एह तमासो ॥ सा॥२॥ केडलागा ते केड न Ահ जशविलास गेमे, दीयो वंबित सेवक करमे ॥ सा ॥ थखय खजानो तुज नवी खूटे, हाया थकी तोसुं नवी बूटे ॥ सा० ॥ ३ ॥ जो खिजमतमां खामी दाखो, तो पण निज जाणी हित राखो॥ सा ॥ जेणे दीधुं जे तेहज देशे, सेवा करशे ते फल लेशे ॥सा॥४॥ धेनु कूप श्राराम खनावे, देतां देतां संपत्ती पावे ॥ सा॥तिम मुजने तमो जो गुण देशो, तो जगमां जस अधिक वहेशो ॥ सा ॥ ५॥ अधिकुं श्रोतुं किशुं रे कहावो, जिमतिम सेवक चित्त मनावो ॥ सा ॥ माग्या विण तो माय न पिरसे, ए उखाणो साचो, दिसे ॥ सा ॥६॥ श्म जाणीने विनती कीजें, मोहनगारा मुजरो लीजें ॥ सा ॥ वाचक जस कहे खमिये श्रासंगो, दियो शिव सुख धरी अवि- हड रंगो ॥ सा ॥ ७ ॥ इति ॥ पद सडसपमुं॥ ॥ राग श्राशावरी॥चेतन मोहको संग निवारो, ग्यान सुधारस धारो ॥चे॥१॥ मोह महातम मल दूरेरे, धरे सुमति परकास ॥ मुक्ति पंथ परगट करेरे, दीपक ज्ञान विलास ॥ चे ॥२॥ ज्ञानी ज्ञान म- , जशविलास ५१ गन रहेरे, रागादिक मल खोय ॥ चित्त उदास क- रनी करेरे, कर्मबंध नहिं होय ॥॥॥लीन जयो व्यवहारमें रे, युक्ति न उपजे कोय ॥दीन नयो प्रजु पद जपेरे, मुगति कहांसुं होय ॥ चे ॥ ४॥ प्रनु समरो पूजो पढोरे, करो वीविध व्यवहार ॥ मोद खरूपी श्रातमारे, ग्यान गमन निरधार ॥चे ॥ ॥५॥ ज्ञान कला घट घट वसेरे, जोग जुगतिके पार ॥ निज निज कला उद्योत करेरे, मुगति होय संसार ॥ चे ॥६॥ बहु विध क्रिया कलेसशुं रे, शिव पद न लहे कोय ॥ग्यान कला परगाससों रे, स- हज मोद पद होय ॥ चेण ॥ ७॥श्रनुनव चिंताम- णि रतनरे, जाके हइए परकास ॥ सो पुनीत शिव पद सहेरे, दहे चतुर्गतिवास ॥ चे ॥७॥ महिमा सम्यक् ग्यानकीरे, अरुचि राग वल जोय ॥ क्रिया करत फल सुजतेरे, कर्म बंध नहिं होय ॥चे॥ए॥ नेद ग्यान तवलों जलोरे, जवलों मुक्ति न होय॥ परम जोति परगट जिहारे, तिहां विकल्प नहिं को- 'य ॥ चे ॥ १० ॥ नेद ग्यान साबू नयोरे, समरस निर्मल नीर ॥ धोवी अंतरातमारे, धोवे निज गुण चीर ॥ चे ॥ ११॥ राग विरोध विमोह मलीरे, ए- । .
1 ए जशविलास ही श्राश्रव मूल ॥ एही करम बढायकेंरे, करे धर्मकी नूल ॥ चे॥१२॥ ग्यान सरूपी श्रातमारे, करेग्या- न नहिं ओर ॥ अव्यकर्म चेतन करे रे, एह व्यवहा- रकी दोर ॥ चे० ॥ १३ ॥ करतां परणामी अव्य रे, कर्मरूप परिणाम॥किरिया परजयकी फिरतरे, वस्तु एकत्रय नाम ॥०॥ १४ ॥ करता कर्म किया करेरे, क्रिया करम करतार ॥ नाम नेद बहुविध नये रे, व- स्तु एक निर्धार ॥ चे ॥ १५ ॥ एक कर्म कर्तव्य- तारे, करे न करता दोय ॥ तेसें जस सत्ता सधिरे, एक नावको होय ॥ चे ॥ १६ ॥ इति ॥ ॥पद अडसमुं॥ ॥ राग धन्याश्री ॥ जबलग उपसमनांहिं रति, तब लगे जोग धरे क्युं होवे, नाम धरावे जति ॥ जब० ॥१॥ कपट करे तुं बहु विध नाते, क्रोधे जले बति ॥ ताको फल तुं क्या पावेगो, ग्यान विना नां. हिं बती॥ जब० ॥२॥ नूख तरस ओर धूप सहतु हे, कदे तु ब्रह्म वति ॥ कपट केलवे माया मंझे, म- नमें धरे व्यकती ॥ जब० ॥३॥जस्म लगावत ठग- ढो रहेवत, कहत हे हुं वसति ॥ जंत्र मंत्र जमी जशावलास ५३ बूटी खज, लोजवश मूढ मति ॥ जब० ॥ ४ ॥वडे . बढे बहु पूर्वधारी, जिनमें सक्ति हति ॥ सोजी उप- सम ठगेमी वीचारे, पाये नरक गति ॥ जव० ॥ ५ ॥ कोउ गृहस्थ कोज होवे वैरागी, जोगी जगत जति॥ अध्यात्म जावें उदासी रहेगो, पावेगो तवही मुग- ति ॥ जय० ॥ ६॥ श्री नय विजय विवुध वर राजे, जाने जग कीरति॥श्री जसविजय उवद्याय पसायें, हेम प्रनु सुख संतति ॥ जय० ॥ ७॥इति ॥ ॥पद अगणोतेरमुं॥ ॥राग रामग्री॥ चंडप्रनु जिनराज राजे, वदन पूनम चंदरे॥नविक लोक चकोर निरखत, लहे पर- मानंदरे ॥ चं ॥ १॥ महमहे महिमायें जमर, रस जस अरविदरे ॥रणकणे नविजन चमर र- सिया, सहि सुख मकरंद रे ॥ चं॥२॥जस नामें दोपत अधिक दीपे, रले दोहग रंदरे । जसगुण कथा नवव्यथा जांजें, ध्यान शिवतरु कंद रे ॥ चं॥ ॥३॥ विपुल हृदय विशाल जुजयुग, चलत चाल गयंदरे ॥ श्रतुल अतिसय महिमा मंदिर, प्रणत सुर नर वृंदरे ॥०॥ ४ ॥ हुंदास चाकर देव तारो, - પષ્ટ जशविलास सिस तुज फरजंदरे ॥ जसविजय वाचक एम वि- नवे, टाल मुज नव फंद रे ॥ चंड० ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ पद सित्तेरमुं॥ ॥ राग काफी ॥ तो बिना श्रोर न जाचुं जिनं- दराय ॥ तो ॥ टेक ॥ में मेरो मन निश्चय किनो, एहमां कलु नहिं काचुं ॥ जिनंदराय ॥ तो॥१॥ तम चरन कमलपर पंकज मन मेरो, अनुभव रस जर चालुं ॥ अंतरंग अमृत रस चाखो, एह वचन मन साचुं ॥ जी ॥ तो॥२॥ जस प्रन्नु ध्यायो महारस पायो, अवर रसें नहिं राचुं ॥ अंतरंग फ रस्यो दरसन तेरो, तुज गुण रस रंग माचुं॥जी॥ ॥ तो ॥३॥इति ॥ ॥ पद इकोतेरसुं॥ ॥ राग प्रनाती ॥ दृष्टि रागें नवि लागिये, वली जागियें चित्तें ॥ मागियें शिख ज्ञानी तणी, हठ नांगीएं नित्यें ॥ दृष्टि ॥१॥जे बता दोष देखे नहिं, जिहां जिहां अति रागी ॥ दोष अबता पण - दाखवे, जिहांथी रुचि नांगी ॥ ६ ॥२॥ दृष्टि राग चले चित्तथी, फरे नेत्र विकरालें ॥ पूर्व उप- , जशविलास ५५ कार न सांजले, पडे अधिक जंजाले ॥ ६ ॥३॥ वीर जिन जव हुता विचरता, तव मंखली पूत्तो ॥ जिन करी जड जने आदस्यो, श्हां मोह अति धू- तो ॥ ॥४॥धि भंडार रमणी तजी, नजी आप मति रागो ॥ दृष्टि रागें जमाली लह्यो, नवि नवजल तागो ॥ ६ ॥५॥ वली श्राचार्य सावद्य जे, हुश्री अनंत संसारो ॥ दृष्टि राग खमति पणे थयो, महानिशीथ विचारो ॥ ॥ ६ ॥ हुवे जि- न धर्म श्राशातना, अजाण्यु कहे रंगें ॥ मंग था- गलें जिनवरें, वंदियो नगवश् अंगें ॥ दृ ॥ ७ ॥ ग्रामना नटने मूर्खनो, मिल्यो जेहवो जोगो ॥ - टिराग मिल्यो तेहवो, कथक सेवक लोगो॥ ६ ॥ ॥ ७॥ आपण गोठडी मीठमी, हठीने मन लागे ॥ ज्ञानी गुरु वचन रलियामणां, कटुक तीरस्यां वागे॥ दृ ॥ एहष्टिरागें भ्रम उपजे, वधे ज्ञान गुण रा- गें ॥ एहुमां एक तुमें श्रादरो, नलो होय जे श्रागें ॥ दृ०॥ १० ॥ दृष्टि रागी कदा मत हुवो, सदा सुगुरु अनुसरजो ॥ वाचक जसविजय कहे, हित शिख मन धरजो ॥ दृ ॥ ११ ॥ इति ॥
५६ जशविलास 1 ॥ पद बहोंतेरमुं॥ ॥ राग गोडी ॥ जब लगें समता दणुं नहिं आवे, जबलगें क्रोध व्यापक हे अंतर, तबलगें जो- ग न सोहावे ॥ ज० ॥१॥ बाह्य क्रिया करे कपट केलवे, फिरके महंत कहावे ॥ पक्षपात कबहु नहिं बोडे, उनकुं कुगति बोलावे ॥ जब० ॥२॥ जिन जोगीने क्रोध किहांतें, उनकुं सुगुरु बतावे ॥ नाम धारक जिन्न जिन्न बतावे ॥ उपसम विनु कुःख पावे ॥ ज० ॥३॥क्रोध करी खंधक श्राचारज, हु- श्रो अग्निकुमार ॥ दंडकी नृपनो देश प्रजात्यो, न- मियो नव मोकार ॥ ज ॥४॥ संब प्रद्युम्न कुमार संताप्यो, कष्ट दीपायन पाय॥ोध करी तपनो फल हाखो, कीधो हारका दाय ॥ जण ॥ ५॥ काउस्स- ग्गमां चढ्यो श्रति क्रोध, प्रसन्न चंद्र झषिराय ॥ सातमी नरक तणां दल मेली, कडवां तेन खमाय॥ जण ॥ ६॥ पार्श्वनाथने उपसर्ग कीधो, कमठ नवं- तर धीच ॥ नरक तिर्यंचनां दुःख पामी,क्रोध तणां फल दी ॥ ज० ॥ ७॥ एम अनेक साधु पूर्वधर, तपिया तप करी जेह ॥ कारज पझे पण ते नवि जशविलास टकिया, क्रोध तणुं वल एह ॥ ज ॥ ७॥ समता जाव वली जे मुनि वरिया, तेहनो धन्य अवतार ॥ खंधक ऋषिनी खाल उतारी, उपसमें उतारयो पार॥ जम् ॥ ए ॥ चंडरुष श्राचारज चलतां, मस्तक दीया प्रहार ॥ समता करतां केवल पाम्यो, नव- दीक्षित श्रणगार ॥ ज०॥ १० ॥ सागरचंद→ शीश प्रजाब्युं, नीसनसेन नरेंज ॥ सुमता नाव धरी सु- रलोकें, पोतो परम आनंद ॥ ज० ॥ ११॥ खेमा कर- तां खरच न लागे, नांगे कोड कलेस॥अरिहंत देव श्राराधक थाये,वाधेसुजस प्रवेशाज॥१॥इति ॥ ॥ पद तहोतेरसुं॥ ॥राग धन्याश्री॥प्रनु मेरे तुं सव वातें पूरा, पर- की श्राश कहा करे प्रीतम, ए किण वातें श्रधूरा ॥ प्रजु ॥१॥ परवश वसत लहत परतद उःख, सवहीं वासें सनूरा ॥ निजघर श्राप संचार संपदा, मत मन होय सनूरा ॥प्रनु॥२॥ परसंग त्याग लाग निजरंगें, थानंद वेली अंकूरा ॥ निज अनुजवरस खागे मीठा, ज्यु घेवर में खूरा ॥ प्रजु०॥३॥अपने ख्याल पलकमें खेले, करे शत्रुका चूरा ॥ सहजानंद एन जशविलास अचल सुख पावे, घूरे जगजसनूरा॥प्रजुपाति॥ ॥ पद चम्मोतेरमुं॥ ॥ अथ श्री पूजाविधिनु पार्श्व जिन स्तवन ॥ ॥ शालिना जोगी रह्यो । ए देशी ॥ पूजाविध मांदे लावियेंजी, अंतरंग जे नाव ॥ ते सवि तुऊ श्रागल कहुंजी,साहेब सरल खन्नाव। सुहंकर अवधारो प्रजुपास ॥ ए आंकणी ॥ दातण करतां नाविएंजी, प्रजुगुण जल मुख सुख ॥ ऊल उतारी प्रमत्तताजी, हो मुफ निर्मल बुद्धं ॥ सु॥ ॥२॥ जतनायें स्नानें करीजी, काढो मेल मिथ्या- त॥ अंगुठो अंग शोषवीजी, जाणो हुँ अवदात ॥ सु० ॥३॥ हीरोदकनां धोतियांजी, चित्तवो चित्त संतोष ॥ श्रष्टकर्म संवर जलोजी, श्राउपडो मुहको- श ॥ सुम् ॥४॥ोरशीयो एकाग्रताजी, केसर न- क्ति कल्लोल ॥श्रका चंदन चिंतवोजी, ध्यान घोल रंग रोल ॥ सु ॥ ५॥ नाल वढं आणा चलीजी, तिलकतणो तेह नाव ॥ जे बाजरण उतारीयेंजी, ते उतारो निज नाव ॥ सु॥६॥ जे निर्माल उतारि- येंजी, ते तो चित्त उपाध, पखाल करंतां चिंतवोजी, जशविलास निर्मल चित्त-समाध ॥ सु० ॥ ७॥ अंग खूहणां वे धर्मनांजी, श्रात्म स्खलाव जे अंग ॥ जे आजरण पढेरावीएंजी, ते खन्नाव निजचंग ॥ सु ॥७॥ जे नववाडी विशुहताजी, ते पूजा नव अंग ॥ पं- चाचार विशुद्धता जी, तेह फूल पंचरंग ॥ सु० ॥ ॥ ए॥ दीवो करतां चिंतवोजी, ज्ञान दीपक सुप्र- कास ॥ नयचिंता घृत पूरियुजी, तत्त्व पात्र सुविला- स ॥ सु॥ १० ॥ धूप रूप अति कार्यताजी, कृष्णा- गरुनो जोग ॥ शुद्ध वासना मह महेजी, ते तो अनुजव योग ॥ सु ॥ ११॥ मद स्थानक अड गंडवाजी, तेइ श्रष्ट मंगलिक ॥जे नैवेद्य निवेदियें- जी, ते मन निश्चल टीक ॥ सु० ॥ १५ ॥ लवण उ- तारी नावीएंजी, कृत्रिम धर्मनो त्याग ॥ मंगल दीवो थति जसोजी, सुङ धरम परजाग ॥ सु ॥ १३ ॥ गीत नृत्य वाजिंत्रनोजी, नाद थनाद असार ॥ स- मरति रमणी जे करीजी, ते साचो येश्कार ॥सु०॥ ॥ १४ ॥ नावपूजा एम साचवीजी, सत्य वजारे घंट ॥ विजुवन मांदे ते विस्तरेजी, टाले कर्मनो कं- ट॥ मु०॥ १५ ॥ एणी परें जावना नावतांजी, सा. हेब जस सुप्रसन्न ॥ जनम सफल जग तेहनोजी, ६० जशविलास तेह पुरुष धन धन ॥ सु ॥ १६ ॥ परम पुरुष प्रनु सामलाजी, मानो ए मुज सेव ॥ दूर करो नव श्राम- लोजी, वाचक जस कहे देव ॥ सु०॥ १७ ॥ इति ॥ ॥ पद पंचोतेरमुं॥ ॥ राग गोडी ॥ संजव जिन नयन मिल्योहे, प्रगटे पुण्यके अंकूर ॥ ए आंकणी॥ तवथें दिन मो- ही सफस वट्यो हे ॥ अंगणे अमीयें मेह वुग, जनम तापको व्याप गल्यो हे ॥ संन ॥ १॥ जै- सी चक्ति तैसी प्रनु करुना, स्वेत संखमें दूध मि- व्यो हे॥दर्शनथे नवनिधि रिधि पाइ, पुःख दोहग सब दूर टल्यो हे ॥ संजण ॥२ ॥ मरत फिरत हे दूरहिं दिलथे, मोहमदल जिणे जगत्र जदयो हे॥ समकित रत्न लहुँ दरिसनसें,अब नवि जाउं कुगति रख्यो हे ॥ संजः ॥३॥ नेह नजर जर निरखन- ही मुज, प्रजुसु हैयडो हेज हव्यो हे॥ श्री नयवि- जय विबुध सेवककुं, साहेब सुरतरु होय फल्यो है। ॥ संज॥४॥ इति ॥
विनयविलास
६१
॥अथ।
॥ श्रीविनय विलास प्रारंभः॥
॥ पद पेहेलु ॥
॥ राग जयजयवंती ॥ सजन सलूने लाल,
चरन न ठोरुं ताल, मेरे तो अजव माल, तेरो
जजनहे ॥१॥ दोलत न चाटुं दाम, काम सुंन
मेरे काम, नाम तेरो आगे जांम, जिउको रंजन
हे ॥२॥ तेरो हुं श्राधीन लीन, जल ज्युं मगन
मीन, तीन जग केरो प्रनु, फुःखको नंजन हे
॥३॥ नानि मरु देवानंद, नयन आनंदचंद, चरन
विनय तेरो,अमियको अंजन दे ॥ ४ ॥
॥ पद बीजूं॥
॥राग कनडो दरवारी ॥ या गति ठोरदे गुन
गोरी ॥ तु गुन गोरी ॥ टेक ॥ श्रचरिज एडं मि-
से शशि पंकज, विच जमुना वहे नोरी ॥ या गति॥
॥१॥ चल गिरनार पिया दिखलाईं, बहुरि जोरि
रति होरी ॥ मुगति मद्दसमें मिले राजुल नेम. वि-
नय नमे कर जोरी या गति ॥२॥
विनयविलास ॥ पद त्रीजुं॥ ॥ राग कल्याण नूपाल ॥ मेरी गति मेरी मति, मेरी रति मेरि बति, मेरो पिया मेरो जिया, यदुपति यतियां ॥ मेरी० ॥१॥ मेरो ज्ञान मेरो ध्यान, मेरो प्रान मेरो त्रान, मेरो जश सुनि अनिधान, मोहि उ- बसति बतियां ॥ मेरी० ॥२॥ गए गिरनार मोकुं, बारि रस डारि तोज, रहि चित्त दिन रति, जे. से दीया बतियां ॥ मेरी ॥३॥मेरे तुहिं मेरे तुहि, शिवा देवी नंद तुंदि, मानो पिया राजुलकी, विनय बिनतियां ॥ मेरी ॥४॥ इति ॥ ॥ पद चोथु ॥ ॥ राग दरबारी कनडो ॥ पुरमति मारदे मेरे प्रानी ॥टेक॥ जूठी सब संसारकी माया, जूठी गरव गुमानी ॥पुरमति॥१॥ श्राप न बफे मोह निंदसुं, मोले पुनियां दिवानी ॥ वीतराग दुःख मारण दि- लसुं, विनय जपो शुद्ध ज्ञानी ॥पुरमति॥॥ति॥ ॥ पद पांचमुं॥ ॥ राग भूपाल तथा गोडी ॥ प्यारे काहेकुं ल- ॥
विनयविलास ६३ लचाय ॥ टेक ॥ या दुनियांका देख तमासा, दे- खतहि सकुचाय ॥ प्यारेण ॥१॥ मेरी मेरी करत हे बाउरे, फीरे जिज अकुलाय ॥ पलक एकमें व- हुरि न देखे, जलबुंदकी न्याय ॥ प्यारे ॥२॥को- हि विकल्प व्याधिकी वेदन, लही शुद्ध लपटाय ॥ ज्ञान कुसुमकी सेज न पाइ, रहे अघाय अघाय ॥ प्यारे ॥३॥ किया दोर चिटुं श्रोर जोरसे, मृग तृष्णा चित्तलाय॥प्यास बुजावन बुंद न पायो, यौँ- हि जनम गुमाय ॥ प्यारेण ॥४॥ सुधा सरोवर हे या घटमें, जिसतें सव सुःख जाय ॥ विनय कहे रुदेव दिखावे,जो लाज दिल गय प्यारे॥५॥इति॥ ॥पद व्हुं॥ ॥ राग सामेरी ॥ पिउजी मोहि दरिसन दीजी एंरे ॥ टेक ॥ तेरे दरशनकी में प्यासी, तुंकहा ज- यो उदासी ॥ पिउजी ॥१॥ पिउ पिल जपतें न टुक, नयनो निंदकी वाजीर ॥ तव देखा पिन प्रेमसें फूनी, संकुचि रहि में लाजीरे ॥ पिउजी ॥ ॥२॥ रसिक न राख्यो हृदेसुं नीरी, सखिमें वहु- त वरांसीरे ॥ श्रव पाजं तो पाउ न बोरु, रा रंग ६४ विनयविलास ॥ बिलासी रे ॥ पिउजी॥३॥ पिउके गुनकी मोतन माला, कंठ करौं जप मालीरे ॥ चकित जये मेरे लोचन चिहुं श्रोर, सुरिजन पंथ निहालीरे ॥ पिन- जी० ॥४॥ कहे मति जारी जीवन प्यारे, में हूं तेरी वंदीरे ॥ गोद बिगलं बिनय विनोदें, घर था- वो आनंदी रे ॥ पिउजी ॥ ५॥ इति ॥ ॥ पद सातमुं॥ ॥ राग मिश्रित बिहागडो ॥ प्यारे प्रीतमजी हठ बोरो ॥ टेक ॥ तोरन श्राए फिरे कुन कारन, कीहें रच्यों या गोरो ॥ प्यारे ॥ १॥ मोसु कीनी ऐसी उगाइ, जैसे करत गोरो ॥ फूठ जगतमें कांहि दिखायो, एसो ब्याह बरघोरो ॥ प्यारे० ॥ ॥२॥ में तो नाह न बोरं नव जवको. जूस्यो प्रेम- को जोरो॥अबतो चरन बिनय मोहि दीजें, रा. जुल करत निहोरो ॥ प्यारे ॥३॥इति ॥ ॥ पद आठमुं॥ ॥ राग जयजयवंती ॥ सुरतमंडन पास, देखत अति उदास, सुजस सुवास जास, जगतमें जो- तहे ॥ सुरत मोहनरूप, सुर नर नमे नूप, अकल , विनयावलास ६५ सरूप सामि, अधिक उद्योत हे ॥१॥ नमत जमत नव, पायो प्रनु अनिनव, सुरतरु सुख सव, देयन प्रवीन दे ॥ तेरा करूं गुन ग्यान, सोज दिन सुविहा- न, तिहारे चरन मेरो, दिल लयलीन हे ॥२॥ मुगट कुंडल माल, रतन तिलकनाल, सुगुन रसाल लाल, पूजा वनि हेमकी ॥ केसर कपूर फूल, धूप धरंबहुमूल, विनयकुंदिजे टुक, निजरज्युं प्रेमकी॥३॥ ॥ पद नवमुं॥ ॥ राग मेघ महार ॥ जिउ प्रान मेरे मोहन, करं बिनती दोउ करही जोर ॥ विन गुन्हा क्यों बोरि सिधाए, महर करहु यादो सिरके मोर ॥ जि- ज॥१॥ विरद विज्ञान जग्यो मेरे जिउमें, पिन पिउ देखु सबही तोर ॥ सूफ न परत अजव गतिया कबु, कीधो विजोग संजोगकी दोर ॥जीज ॥२॥ पलक एक कल न परत मोकुं, पिट पिट रटत हो तही जोर ॥ चमक लोह ज्यौं खेंच दि मन, चले प्रेमकी वांद मरोर ॥ जिज ॥३॥ लियो बीन म- न मानिक मेरो, जिनको मूल हये लख करोर ॥ तो अब मोहि दिजे मन अपनो, करदो नीबाज पिज ५ - - -- ६६ विनयविलास मकरो जोर ॥ जिनम् ॥४॥ रतन तीन दीजें राजु लकुं, नयो रंगरस ऊकही जोर ॥ विनय सदा सेव हु सुखदार, समुदराज शिवा देवी किसोर ॥ जि- जा ॥ ५॥ इति ॥ ॥पद दशमुं॥ ॥ राग जेजेवंती ॥ श्रजहुं कहालौं प्यारे, रहोगे हमसुं न्यारे, वाहितो धुतारि प्यारि, तुम चित्त ना- ३ हे॥१॥ बहुत विगोश् खोइ, इनही सकल गुन॥ लोगनमें शोना तुम, जति यु बढाइ हे ॥२॥ ह- मकुं काहेकुं मानो, वाहिसो तिहारो तानो॥ जानोगें श्रापहि वातो, जैसी फुःखदा हे ॥३॥ सबनकुं प्यारी नारी, माया हे जगतदारी ॥ इनसेंतें यारी जारी, श्राखर बुराश् हे ॥४॥ जूतेहि दिखावे नेह, पाथरकी जैसी त्रैद ॥ बटकी दाखेंगी बेह, अंत तो पराश हे ॥ ५ ॥ कहे ज्ञान कला जिज, जानो सो करहो पिज, जैसी हे तैसी तो तुम, विनये सुना- ३ हे ॥६॥ इति ॥ ॥ पद अगीआरमुं॥ राग बिहागडो ॥ सांश सलूनाकेसें पाऊरी, मन विनयविलास थिर मेरा न होय ॥ दिन सारा बातोमें खोया, र- (मनी गुमाइ सोय ॥ सांइ० ॥१॥ टेक ॥ वेर बेर वर ज्यामें दिलकुं, बरज्या न रहे सोय ॥ मन र मद- मत्त वाला कुंजर, अटके न रहे दोय ॥ सांइ० ॥ ॥२॥ठिन ताता विन शीतल होवें, विनुक हसे वि- नु रोय ॥ दिनु हरखे सुख संपति पेखी, डिनु रे सब खोय ॥ सां ॥३॥ वृथा करत हे कोरी कुराफत, नावी न मिटे कोय ॥ या कीनी में याहि करुंगी, यौही नीर विलोय ॥ सांइ० ॥४॥ मन बागा पिन गुनको मोती, हार वनावं पोय ॥ विन- प कहे मेरे जिउके जीवन, नेकनिजर मोहे जो- प॥ सांइ० ॥५॥ इति॥ ॥पद वारसुं॥ ॥राग नट ॥ थिर नांहिरे थिर नाहि, यावत धन यौवन थिर नांहि ॥ पलक एकमें ठेह दिखावत, जे. सी बादलकी गहि ॥ थिरण ॥१॥ टेक ॥ मेरे मेरे कर मरत विचारे, मुनियां अपनी करी चाही। कुलटा स्त्री ज्यो उलटा होवे, या साथ किसिके ना याहि ॥ थिर ॥२॥ कहे दुनियां कहा इसे -- ६७ विनय विलास बाउरे, मेरी गति समजौं नांहिं ॥ केतेही ठोरे में प्यासे, केते र गहे वांदि ॥ थिर ॥३॥ सयन सनेह सकल दे चंचल, किसके सुत किसकी मा॥ रितु बसंत शिर रूख पात ज्यौं, जाय परोगे को कां- ही ॥ थिर ॥ ४॥ अजरामर अकलंक अरूपी, स. ब लोगनकुं सुखदाय ॥ विनय कहे नव उःख वं- धनतें, बोडनदार वे सांश् ॥ थिर ॥ ५॥ ॥ पद तेरमुं॥ ॥ राग बिहागडो॥ मन न काहुके वश, मन कीए सब वश, मनकी सो गति जाने, याको मन व- श हे॥१॥ पढोहो बहुत पाउ, तप करो जै पाहार, मन वश कीए बिनु, तप जप बराहे ॥२॥ काहेकुंफी- रे हे मन, काहु न पावेगो चेन, विषयके उमंगरंग, कलु न फुरसहे ॥३॥ सोउ शानी सोउ ध्यानी, सोज मेरे जीया यानी॥जिने मन वशकियो, वाहिको सुजश हे ॥४॥ विनय कहे सौ धनु, याको बिनु, सां सां सां सांझ, सांसें तिरस हे॥५॥इति ॥ पद चौदमुं॥ ॥ राग श्रीराग॥ अजब तमासा श्क नास्या ॥ मनु दिनु विनयविलास ६ए टेक ॥ कोज जात हे दोनु जोरे, पिठला श्रगिला मुंहास्या ॥थजव०॥॥श्राय नजीक मले जव पीठ- 'खा, तव श्रगिला छरिङ दोरे ॥ पिठला जोर स जोख्या चाहे, श्रगिला दोरतहि दोरे ॥ श्रजव० ॥ ॥२॥ खोह खाडका चेन विचारे, श्रागिला अांखो मुदि मगें ॥ पिठला वापरा लिनु ग्नुि अटके, कय- रेफखर जाय लगे ॥ अजव० ॥३ ॥ तव प्रजुने एक उंर पगया, उने जाय भागिला वांध्या ॥ पि- उसा तवयं रहा उदासी, साहिवने वहु सुख सा. ध्या ॥ अजव०॥४॥ एक नीच श्रति एकहि मध्यम, एक उत्तम प्रजुकुं प्यारा ॥ या तिनोकुं विनय पि. ठान्यो, रहो श्रधमसेतीन्यारा ॥अजव ॥५॥ति॥ ॥पद पन्नरमुं॥ ॥राग नेरव ॥ जागो प्यारे नयो सुविहान, श्री तीर्थकर उदयो नान ॥ जागो० ॥ ए टेक ॥ पाए जविक मन कमल विकास, उड गए थोगुन नरम उदास ॥जागो॥१॥नयन ग्घारी विलोको कंत,मोद- तिमिर श्रव थायोग्यंत ॥प्रगटी ज्ञान कक्षाकी ज्योत, मुगति पंथ श्रव जयो उद्योत ।। जागो० ॥२॥ सुपtandinatandan --- विनय विलास , 3. नमें मूंकी रह्यो मेरे लाल, इन विधि गया अनंता काल ॥ अव सुहनेका गेडो ख्याल, या सव फूहा मिथ्या जाल | जागो ॥३॥ या अपावन माया सेज, उसपर पिऊका इतना हेज ॥ सुकलध्यान प- खारो अंग, युं प्रगटे तुम निर्मल रंग॥जागो ॥४॥ पिउ निरखो जिनराज दिनंद, कहे मति नारी मि- टे युं निंद ॥ श्राप संजालो खोली नेत, विनयकरी विनवो पिउ चेत ॥ जागो ॥५॥ ॥पद शोलमुं॥ ॥राग॥ हुसेनी॥ खुदाके बंदे बेसीर मत ल्यो बज गारी ॥ एदेशी ॥ सुन सुहागिन बे दिलकी बात ह. मारी ॥ टेक ॥ में सोदागर दूर बिदेशी, सोदाकर- ने आया ॥ देखत तोकुं नूलिगया सब, तोहिसुं चित्त लाया ॥ सुन ॥१॥ निसी वासर तेरे रस राता, अपने काम न बजे ॥ तेरे विरह दरदतें ड- रपूं, क्यु पुस्मनसें फूळ ॥ सुन॥२॥ सुंदरी तें कबु कामन कीया, तुज बिनु पलक न जावे ॥ लोचन लागी रहे तेरी लालच, उर कबु न सोहावे ॥सुन०॥ ॥३॥ श्ररथ गरथ सब तुजे खिलाया, दमरा ए-
विनयविलास
क न कमाया ॥ क्युंकर जा मिलुं सांकुं, व्याया
'कलु न लाया ॥सुना॥ विनयवती तुं खरी पियारी,
जो श्रव करी हुशीयारी ॥ मुंदसी करे तो मितुं
सांइसुं, अविहड करुं अयारी ॥ सुन ॥५॥इति ॥
॥ पद सत्तरमुं॥
राग उपर प्रमाणे ॥ काया कामनी वेलाल, सुनी
कहे जिऊरा ॥ मेंहु बंदी वेलाल, तुं मेरा पिऊरा॥
पिऊरा सुनि वे करुं विनती, म करी ओरसे नेहरे ॥
दो दिवसकी या दाम दोलत, देत विनुमें वेहरे
॥१॥ तुं गुमास्ता वेलाल, अपने शेठका ॥ ले जा
यगा वेलाल, हुकमी ठेठका ॥ ठेठका आवे हु-
कम जब तुहीं, पलक श्क न शके रही ॥ तो कहा
मूरख करे धंधा, अंते तेरा को नहीं ॥ ॥ हो ने
खुथा वेलाल, अपने सांइका,
नाडु
नाइक पाश्का ॥ पाश्का नाहक चोरी उसका, जब
नवि देत जवापरे ।। तब ताहिकुं दे दूर दोजख, टोप
. देखे थापरे ॥३ ॥ सोदा हक्कका वेलाल, एसा
कीजीएं, होवे फायदा वेलाल, साहिब रीजीएं ।
रीजीएं साहिव युं निवाजे, श्राप उःखने उकरे ॥
चोरीए वेलाल,
. विनय विलास विनती इतनी मानी वालिम, वेपरवाही मत करे ॥४॥ तुं परदेशका वेलाल, पंथी प्राहुणा, प्रीत में बांधी वेलाल, क्युं रहुं तो विना ॥ तुं विना क्युं करी, रहुं फुःख नरी, सती युं संगें चर्बु ॥ सांश्को करी विनय सहन, युं अन्नेदें तुज मियूँ ॥ ५॥इति ॥ ॥ पद अढारमुं॥ ॥ राग श्राशावरी ॥ कहा करूं मंदिर कहा करूं दमरा, न जानुं कहां तुं उड बेठेगा जमरा ॥जोरी जोरी गए बोरी माला, उड गए पंखी पड रह्या माला ॥ कहा ॥१॥ टेक ॥ पवनकी गठरी केसें उराउ, घर न बसत आय बेठे बटाउ । अगनी बु- कानी काहेकी कारा, दीप बीपे तब केसें उजारा ॥ कहा ॥२॥ चित्रके तरुवर कवडं न मोरे, माटि- का घोरा केतेक दोरे ॥ धुंएकी हेरी तूरका थंना, जहां खेले हंसा देखो अचंना ॥ कहा०॥३॥फिरि फिरि आवत जात ऊसासा, लांपरे तारेका कैसा विश्वासा॥ या कुनियांकी जूठी हे यारी, जैसी ब- ना बाजीगर बारी॥ कहा० ॥४॥परमातम अवि- चल अबिनासी, सोहे शुद्ध परम पद वासी ॥ वि- विनयविलास ७३ नय कहे वे साहिब मेरा, फिर न करूं था पुनियामे फेरा ॥ कहा ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ पद ओगणीशमुं॥ ॥ राग काफी ॥ किसके चेले किसके पूत, श्रा- तमराम अकिला अवधूत ॥ जिउ जानले ॥ श्रहो मेरे ज्ञानीका घर सुत ॥ जिउ जानले, दिल मान- ले ॥१॥श्राप सवारथ मिलिया अनेक, आए इ- केला जावेगा एक ॥ जिज ॥ दि॥ ॥ मढी गिरंदकी फूठे गुमान, आजके काल गिरेंगी निदा- न ॥ जि ॥ दि० ॥३॥ तीसना पावडली वर जोर, वायु काहेकुं साचो गोर ॥ जिण ॥ दि० ॥४॥श्रा- गि अंगिठी नावेगी साथ, नाथ रमोगे खाली हाथ ॥ जि ॥ दि० ॥ ५॥ श्राशा जोली पत्तर लोन, विष- य निदा नरी नायो थोन ॥ जिण ॥ दि० ॥६॥ करमकी कंथा डारो दूर, विनय विराजो सुख नर- पूर ॥ जि ॥ दि॥ ॥ इति ॥ ॥ पद वीशमुं॥ ॥ राग श्राशावरी ॥ घोरा जूग हे रे तुं मत त्रूले असवारा ॥ टेक ॥ तोहि मुघा ए लगतुहे प्यारा, ୨୪ विनयविलास ए अंत होयगा न्यारा ॥ घोरा ॥ १॥ चरे चीज अरुमरे केदसुं, जवट चले अटारा ॥ जीन करे तव सोया चाहे, खानेकुं हुशिआरा ॥ घोरा० ॥५॥ खूब खजीना खरच खिलावों, यो सव न्यामत चा. रा॥ सवारीका अवसर होवे, तब गलिया होवे गमारा ॥ घोरा॥३॥ छिनु ताता दिनु प्यासा हो वे, खिजमत (बहुत) करावनहारा ॥ दूर दोर जंगल में मारे, कूरे धनी बिचारा ॥ घोरा ॥ ४ ॥कर हो चोकमा चातुर चोकस, द्यो चावक दोयचारा ॥ इन घोरेकुं विनय सिखार्ज, युं पावोनवपारा॥ घोरा०॥५॥ ॥ पद एकवीशमुं॥ ॥ राग आशावरी ॥ पांचो घोरे एक रथ जूता, साहिब ऊसका जितर सूता ॥ खेडु जसका मद मतवारा, घोरेकुं दोरावनहारा ॥ पांचो ॥१॥ टेक ॥ घोरे जूठे ओर ओर चाहे, रथकुं फिरि फि- रि उवट वाहे ॥ विषम पंथ चिहुं उर अंधियारा, तोनि न जागे साहिब प्यारा ॥ पांचो॥२॥ खेछ रथकुं दूर दोरावे, बेखबर साहिब फुःख पावे ॥ रथ जंगलमां जाय असुळे, साहिब सोया कबुथ न विनयविलास १५ बूळ ॥ पांचो ॥३॥ चोर उगोरे जहां मिलि श्राये, दोनुकुं मदप्याला पाए ॥ रथ जंगल में जीरण कीना, मालधनीका उदारी लीना ॥पांचो॥धाधनी जग्या तब खेड्डु वांध्या, रासी परांना ले सिर सांध्या ॥चोर जगे रथ मारग लाया, अपना राज विनय जिक पाया ॥ पांचो ॥५॥ इति ॥ ॥ पद वावीशमुं॥ ॥राग सोरठ ॥ चतुर विचारो चतुर विचारो, "ते कुण कहियें नारीजी ॥ पीउथी क्षण एक न रहे अलगी, कुलवंती अति सारीजी ॥ च ॥ १॥ ना- चे माचे प्रियसुंराचे, रमे जमे प्रीय सार्थेजी ॥ एक दिने सा वाली तरुणी, नवि ग्रहवाये हाथेंजी ॥०॥ ॥॥ चीर चीवर पहेरी सा सुंदरी, जंडे पाणी पेसेजी ॥ पण नींजाये नहीं तस कांश, अचरज ए जग दीसेजी ॥ च ॥३॥ वादल काले मरे तत- कालें, श्रातप योगें जीवेजी ॥ अंधारामां जो निसि जाय, तो देखाउंदीवेजी ॥ च ॥४॥ अवधि क हुंडं मास एकनी, थापो श्ररथ विचारीजी ॥कीर्ति उ६ विनय विलास विजय वाचक शिष्य जंपे, बुध जननी बलिहारी- जी ॥ च ॥५॥ इति ॥ ॥ पद त्रेवीशमुं॥ ॥ राग श्राशावरी ॥ जोगी एसा होय फरुं, पर- म पुरुषशुं प्रीत करूं ॥ उरसें प्रीत हरं ॥ १ ॥निर विषयकी मुजा पहेलं, माला फीराऊं मेरा मनकी ॥ ग्यान ध्यानकी लाठी पकरु, ननूत चढाऊं प्रजुगुन- की ॥२॥शील संतोषकी कंथा पहेरु, विषय ज- लावू धूणी ॥ पांचं चोर पेरें करी पकरूं, तो दिलमें न होय चोरी हुंणी ॥३॥ खवर लेज में खिजमत तेरी, शब्द सींगी बजाऊं ॥ घट अंतर निरंजन वेलें, वासु लयलगाऊं ॥ ४ ॥ मेरे सुगुरुने उपदेश दिया हे, निरमल जोग बतायो॥ विनय कहे में उनकुं ध्या- कं, जिने सुख मारग दिखायो ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ पद चोवीशमुं॥ ॥ मगध देशको राज राजेसर ॥ एदेशी ॥ जंग- लथी एक जायो चोपद, नयर वसंतो दीगे॥ नवि बीये नवी नासे त्रासे, बेसे थिर अति धीगे॥१॥ चतुर नर अर्थ विचारी कहियें ॥ चतुराई निवहीयें ॥
उप विनयविलास चतुरनर॥नहिंतोगरव न वहियें॥ चतु॥ एटेक॥ जीव दया पालक रंगीलो,आवियो तुम काम ॥अंगुल प्रघुयुगगुरु सरवाले, निधि अदर तस नाम ॥चतु॥ ॥२॥ घनरिपु तसरिपु तसरिपु सेवक, मंदिर नं- दन जेद ॥ तरुणो पण निज दारिखोले, खेले ने नि- त नेह॥ चतु०॥३॥ रोग रहित काया अति नि- मल, पण तस एक विकार॥ पी पीश्ने नाकें नाखें, न रहे पेटें थाहार ॥ चतु० ॥॥ तात सहोदर तास नपुंसक, पासे वेतुं सोहे ॥ विनय नणे जे अर्थ कहे ते, पंमितना मन मोहे ॥ चतु० ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥पद पचीशमुं॥ ॥राग श्राशावरी ॥ साधु नाश् सोहे जैनका रागी, जाकी सुरत मूल धुन लागी ॥ सा॥टेक ॥ सो साधु श्रष्ट करमसुं जगडे, सुन वांधे धर्मशा- खा ॥॥ सोहं शब्दका धागासांधे, जपे शजंपा सा- खा ॥ साधु ॥१॥ गंगा यमुना मध्य सरसति, अधर वहे जलधारा ॥ करीब स्नान मगन हुइ वेठे, तोड्या कर्म दल जारा ॥ साधु ॥५॥ श्राप थ- ज्यंतर ज्योति बिराजे, अंकनाल ग्रहे मूला ॥ परिम Jo विनय विलास , , दिशाकी खमकी खोलो, (तो) वाजे अनहद तूरा ॥ साधु ॥ ३ ॥ पंचनूतका नरम मिटाया, बछे मांहिं समाया ॥ विनय प्रजुसुं ज्योत मिलि जव, फिर संसार न आया ॥ साधु ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ पद ग्वीशमुं॥ ॥ राग गोमी ॥ शांति तेरे लोचन हे श्रनिया- रे॥ शांग ॥ टेक ॥ कमल ज्यौं सुंदर मीन ज्यौं चं. चल, मधुकरथी अति कारे ॥शां ॥१॥जाकी म- नोहरता जीत बनमें, फिरते हरिन बिचारे॥ चतुर चकोर परानव निरखत, वपरे चुनत अंगारे॥शां॥ ॥५॥ उपशम रसके अजब चकोरे, मानो बिरंची संजारे ॥ कीर्ति विजय वाचक को विनयी, मोकों हे अति प्यारे ॥ शां ॥३॥ इति ॥ ॥ पद सत्तावीशमुं॥ ॥ राग गोडी ॥ तोलों बेर बेर फिर श्रावेंगें, जीक जीवन मेरे प्यारे पीयुकी, जो जो सोजन पा- वेंगे ॥ तोलों ॥१॥ बिहर दिवानी फिरुं हुं ढुंढती, सेज न साज सुहावेंगे ॥रूपरंग जोबन मेरी सहि यो, पीयु बिन केसे देह देखावेंगे ॥तोलों ॥२॥ नाथ
विनय विलास
gù
निरंजनके रंजनकुं, वोत सिणगार वनावेंगे ॥ करले
वीना नाद नगीना, मोहनके गुन गावेंगे॥ तोलों
॥३॥ देखत पीयुकुं मनि मुगताफल, जरी नरी
थाल वधावेंगे॥प्रेमके प्याले, ग्याननी चाले, विरहकी
प्यासवुजावेंगे॥तोलो॥भासदारही मेरेंजीमें पी-
ऊजी,पीयुमें जीउ मिलावेंगे ॥ विनय ज्योतिसें ज्यो-
तमिलेगी,तव श्हां वेह नश्रावेंगे तोलों ॥५॥इति॥
॥पद अठावीशमुं॥
॥ राग धन्याश्री॥ मेरी सजनी झपन चंडानन
नमुं, वारिषेण नगवंत ॥ वर्षमान जिन प्रणमियें,
लहीयें सुख अनंत ॥ मेरे आतम सासय जिन मु.
ख जोय, जिम सासय सुख होय ॥ मेरे श्रातम॥
॥१॥ ए आंकणी ॥ नवन पतिनां नवन वहोत्तर,
साखने सातज कोमी ॥ एटले प्रासादे कह्या, जिन
चार नमुं करजोमी ॥ मे॥॥ज्योतिपी व्यंतर तणा-
जे, नगर विमान असंख, तिहांसंख्य प्रासादें कहा
जिन, चार नमुं सह संख॥ मे ॥३॥ ति लोके गुण
सजी, अधिक शत वत्रीश ॥ जिन जवन तिहां
चार जिन ए. नमतां पूगे जगीस ॥ मे॥४॥ लाख
ចុច विनय विलास चोरासी सहस सत्ता, णवअधिक वीश ॥ जर्मन लोक प्रासाद जिन ए, नमियें नामी शीश ॥मे॥५ पंचवर्ण उदार मणिमय, सप्त दस्त प्रमाण ॥ के धनु सय पंच परिमित, एजिन मूरति जाण ॥ मे॥ ॥६॥ इंसादिक सुर सयल पूजे, करे समकित सु- क॥केसर चंदन अगर पूजा, रचे नाव विशुद्ध ॥ मे ॥ ७॥ घणा सुरवर लहियें जिनपद, पूजतां ए जिन चार ॥ ध्यान धरतां एह प्रजुनु, बहिये नवनो पार ॥ मेव ॥ ॥ श्री कीर्ति विजय उवका- य केरो, लहे ए पुण्य पसाय ॥ सासता जिन शु. पियें एणीपर, विनय विजय उवकाय॥मेणाति॥ ॥ पद ओगणत्रीशमुं॥ ॥ राग नूपाल ॥ श्री विमलाचल मंगन श्रादि- जिना, प्रह उठी वंदो एक मनां ॥ माता मरुदेवानं- दना, नावें दीगे नयन श्रानंदना ॥ वि ॥१॥ रवि उदयो जग पंकजवना, विकसत बूटा अलि बंध. नां होवे निंदित जो निज लोचनां, आतमहितमन आलोचनाविणा॥चंचल ए तन धन जोबनां, बी- जो सरण नको जिन जीवनांनाइसफल करोरे जी- विनयविलास १ वनां, करि विनय जजोजगजीवनां॥ विति॥ ॥ पद त्रीशमुं॥ ॥ सुख पूरण सोजा घणी, प्रजुपास जिणंदा ॥ राज रोग रण जयहरे, जिम घन अरविंदा ।। सु॥ ॥१॥अश्वसेन वामा तणो, सुत नमे सुरिंदा ॥ ना- म जपतां तेदनु, तूटे नव फंदा ॥ सु० ॥२॥ पउ माव सानिध करे, धनद धरणिंदा ॥ जजो स्वामी एक चित्तयु, मधुकर अरविंदा ॥ सु० ॥ ३॥ प्रजु देखी मन उखसे, जेम कुमुदिनी चंदा ॥ सार वखत वनित दीयो, एम विनय नणंदा ॥ सु॥४॥ ॥ पद एकत्रीशमुं॥ ॥राग ॥ रामकाली ॥ अजव जोत हे तेरी, हो श्रातम, अजव जोत दे तेरी ॥ तुं परमातम तुं परमागम, लवकि रिकि सव तेरी ॥ हो॥१॥ सिद्ध बुद्ध हे तुं सिकि साधक, तुं गुनकुं सम चंगे- री॥ तेरो गुन गोरस गुनवेकुं, मुदित जश् मति मेरी॥ हो॥२॥ चिदानंद चेतन तुं चातुर, सुर- ति सुख तुं हे चेरी ॥ नूलो कहा जमे या नवमें, न- ३ अनंती फेरी ॥ हो० ॥३॥ दूर नहिं पा घटमें ६ विनयविलास , तोहे सब, ब्रह्म ग्यानकी सेरी ॥ माया मोह तिमिर दल, ग्यान कला गति घेरी ॥हो ॥४॥ खरूप संजारो अपनो, धर्मति दूर उखेरी ॥ श्राप ही श्रापसों श्राप विचारो, मुगति न अब मेरी ॥ ॥ हो ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ पद बत्रीशमुं॥ ॥ राग रामकली ॥श्रब क्युं न होत उदासी, हो बातम ॥ अब क्यु न॥ ए श्रांकणी ॥ उलट पलट घट घेरी रही है, क्युं तुम श्राशा दासी ॥ हो ॥ ॥१॥ निसि बासर उनसुं तुम खेलो, होत खलक- मां हांसी ॥ बोरो विषम विषयकी श्राशा, ज्युं नि- कसें नव फांसी ॥ हो ॥२॥पूरण जश्न कबहीं कि- सकी, कुरमति देत विसासी ॥ जो बोरी नहीं सो- बत इनकी, तो कहा जये सन्यासी॥ हो ॥३॥ रूपरही सुमति पटराणी, देखो हृदय विमासी ॥ मुफ रहेहो क्या मायामें, अंते बोरी तुम जासी ॥ हो ॥४॥ श्राश करो एक विनय विचारी, अवि चल पद अविनासी ॥ श्राशा पूरण एक परमेसर, सेवो शिवरपुरवासी ॥ हो ॥५॥इति ॥
३
विनयविलास
॥पद तेत्रीशमुं॥
॥ सरसति पाये लारं, मारे वचनविलास ॥
विजयाणंद सूरिंदनी, जावें नपशुं नास ॥ सहगुरु-
ना गुण गातां, माता हो। सुखपास ॥ नरहरि ना-
री सारी, होय घर अंगण दास ॥ १ ॥ सकल कला
श्रन्यासी, वासी रहे सुगम ॥ श्रीमंत साइनो नंदन,
वंदन श्रति अजिराम ॥ महिमाहे महिमा निधि,
जासतणुं वरनाम ॥ जापथी पाप टले सब, लहियें
दोलत दाम ॥२॥ जास तणा गुन गाजे, बाजे देश
विदेश ॥ चरण कमल आणंदे, वंदे सयल नरेस ॥
तास तणा गुण वोर्बु,खोबुं मुगति निवेश॥मानव नव
मुख जीहां, दीहा सफल करेस॥सिणगार देयनो जा
यो, गायो नक्तियें श्राज॥पुण्य अनंता लीधां, सीधां
वंलित काज ॥ सोनागी वेरागी, सुंदर मुनि सिर-
ताज ॥ लव सायर उतारे, तारे जिम वमजहाज ॥
॥४॥ कीर्तिविजय उवकाय पसाय लश्नलेजाव ।
गठपति गायो पायो, ऊलट सरले नाव ॥ जिहां-
बगें चंब दिवाकर, मानस नाम तलाव ॥ तिहांस-
में जयवंता गुरु, होजो पुण्यप्रजाव ॥५॥
ច विनयविलास ॥ पद चोत्रीशमुं॥ ॥ बावा हम बिचार करलागे, हम बिचार लागे ॥ बा० ॥ टेक ॥ मनमें चिंता रहि न कोज, कुःखजरम नोनागे ॥ बा० ॥१॥ गुरुका शब्द तीर तरकसमें, करे कमान बिचारी॥साचे सो रन स- मसेर हमारे, तो ग्यान घोडे असवारी ॥ बा ॥ ॥॥ गोरव काज वसीला कीया, चेहेरे नाम लिखाया ॥ सत्य काज संतोष लगामी, तेजीका चा- बक लाया ॥ बा ॥३॥ प्रेम प्रीत बिच जामन दीना, तुरत बरात लखाइ॥ नाम खजाना जगत अलुफा, तो खुब चाकरी पा ॥ बा ॥ ४ ॥ हांस- ल दाम खरच कलु नांहीं, तागीर करे न कोई ॥ विनयकं दरसन उमदी खिजमत, जाग्य विना न बत इनवा 10 ॥५॥इति ॥ रूवरही सु ॥ पद-पांत्रीशमुं॥ मुझ रहेहो। आदि जिन ध्यायो, चरणारविंद ज- हो ॥ ४ ॥ नदयो प्रनु मुख सूर ॥ श्रा० ॥ टेक॥ चल पद अजियो, त्रिहुं लोक आनंद लह्यो । सेवो शिवरपुरचंड शीतल जरपूर ॥श्रा०॥९॥ घर विनय विलास ५ घर मंगल गयो, बुद्धि विवेक थायो ॥ गुरुके चरण शायो, सुकर समकित पायो ॥ था ॥ शनी केतु राहु चलायो, विनय पद तिहां पायो । नवनिधान शुभ शिव वधू पहोचायो ॥ श्रा० ॥२॥ इति ॥ ॥पद बत्रीशमुं॥ ॥ परम पुरुष तुंहि, अकल अमूरति युही,अकल अगोचर जूप, वरन्यो न जात हे ॥परमा॥ टेक॥ तिन जगत नूप, परम वचनरूप, एक अनेक तुंही,गि- न्यो न गिनात हे ॥ परम ॥२॥ अंग अनंग नां- हिं, त्रिजुवनको तुं सांई, सव जीवनको सुखदा, सुखमें सोहात हे ॥ परम० ॥३॥ सुख अनंत तेरो, प्रह्योहु न आवे घेरो, इंसादिक हेरो, तोढुं न हिं पात हे॥ परम ॥ ४ ॥ तुंही अविनाशी कहा- यो, खखेमें न कानहीं थायो विनय करी जो चायो, ताकुं प्रनु पायो दे ॥ परम ॥ ५॥ इति ॥ ॥ पद साडनीशमुं॥ ६ ॥राग थाशावरी॥माया महा उगणी में जानी ॥ माया० ॥ टेक ॥ त्रिगुन फांसा देकर दोरत, वोल- त अमृतवानी ॥ माया ॥१॥ केसव घर कमला - ចទី जशविलास - होश बेठी,संजु घर जवानी ॥ ब्रह्माघर सावित्रि हो. ३ बेठी, इंज घर इंशाणी ॥ माया ॥२॥ पोथी होइ बेठी, तीरथीयाकुं पानी ॥ योगी घर जनूत हो बेठी, राजाके घर रानी ॥माया॥३॥ किनें माया हीरो करलीनो, किने ग्रही कोरीजानी॥ कहत विनय सुनो अब लोको, उनके हाथ बिका- नी॥ माया ॥४॥ इति ॥ ॥इति श्रीजशविलास तथाश्रीविनय विलास संपूर्ण.॥
B झान विलास ॥ ही श्रीअसिथाजसायनमः॥ ॥अथ॥ ॥ श्रीझान विलास प्रारंजः॥ ॥पद पदेढुं॥ ॥ राग नैरव ॥ चारित्र पति श्री चारित्र पावं, नवनिधि श्रीगृह ध्येयं ॥ चा ॥ टेक ॥ जक्ति जर निर्जर गण ननित, नित्यं क्रम मर्चेयं ॥ चा० ॥१॥ -रितु शर घन वैडूर्य मणि छवि, रविकर रुचि सुश- रीरंकज मकरंदोत्कट सम वदनं, दसन कुंदल हीर ॥ चा० ॥२॥ नम्रित धनुपूरण शशि नयनं, शांति सुधारस रूपं ॥अनुपमउत्कट गुण गण जलधि, परमा- नंद सरूपं ॥चा॥३॥ गंजीरोत्कट शरत्रि सझुण, युक्त वचामृत पेयं ॥ त्रिजुवन गत जवि धर्मुपशमनं, शिवतरुवीज देयं ॥ चा ॥४॥ पुष्पफलान्वित सुरतरुलब्धं,वंबित पूरण एयं ॥ चारित्रनंदी श्रीसंत- तिदायक, पार्श्व चारित्र जिन झेयं ॥चा॥५॥इति॥ ॥पद बीजुं॥ ॥ राग नैरव ॥ जोर जयो उठ जागो मनुवा, नज ज्ञानविलास साहिब नाम संजारो॥ नो ॥ टेक ॥ सुतां सुतां रयन विहानी, अब तुम नींद निवारो ॥ मंगलका, रि अमृत वेला, थिरचित्त काज सुधारो ॥ जो ॥ ॥१॥ खिनजर जो तुं याद करेगो, सुख नीपजेगो सारो ॥ वेला वीत्यां दे पबतावो, क्यु कर काज सुधारो ॥ नो० ॥२॥ घरव्यापार दिवश वितायो, राते निंद गमायो॥ इन वेला निधि चारित्र श्रादर, झानानंद रमायो ॥ नो ॥३॥ इति ॥ ॥ पद त्रीजुं॥ ॥ राग भैरव ॥ मेरे तो मुनि वीतराग, चित्त मांहे जोई ॥ मेरे ॥ टेक ॥ और देव नाम रूप, दूसरोन कोई ॥ मेरे ॥१॥ साधनके संघ खेल खे- ल, जाति पांत खोई ॥ अबतो वात फैल ग, जाने सब कोई ॥ मेरे ॥२॥ घाति करम जसम बाण, देदमें लगाई ॥ परमयोग सुकन्नाव, खायक चित्त लाई ॥ मेरे ॥३॥ तंबूतो गगन नाव, नूमि श- यन जाई॥ चारित नवनिधि सरूप, ज्ञानानंद नाई॥ मेरे ॥४॥ इति ॥
झान विलास
नए
॥पद चोधुं॥
॥ राग नैरव ॥ ब्रह्मरूप ज्योतिरूप, चित्तमां सं-
'जारके ॥ ब्रह्म ॥ टेक ॥ निर्मल जाको रूप विरा-
जे, अव्य जाग वीतराग, स्वगुन नोग परम योग,ज्ञान
दरश एकरूप, जगतनास कारके ॥ ब्रह्म ॥१॥
अक्षय अविचल गुणगणधामी, परमरूप बातम रूप,
सिझसरूप विश्वनूप, वाल तरणिरोचिरूप, दरव नाव
नासके ॥ ब्रह्म ॥२॥ परमानंद चेतनमय मूरति,
'रिपुनिकंद बोधकंद, सुख श्रमंद वलवृंद, तत्वरंग
चारितनंद, ज्ञानानंद वासके ॥ ब्रह्म॥३॥इति ॥
॥ पद पांचमुं॥
॥राग नैरव ॥ ब्रह्मज्ञान कांति देख, आनंद
अंग पश्यां ॥ ब्रह्मम् ॥ टेक ॥ नव्य जन संसटाल,
तिन लोक प्रतिपाल ॥ करम वरग रहित होय,
सासत गुण लहियां ॥ ब्रह्म ॥१॥ सहज निजप-
द पहिचान, शुभ अशुन नाव जान ॥ सकल पर-
जन विनाव, दूरथी तजैयां ॥ ब्रह्म ॥२॥ फटिक
सम खधमान, विमल गुण गण निधान ॥ परम-
निधि चारितरूप, ज्ञानानंद लदियां ॥ ब्रह्म ॥३॥
ए ज्ञानविलास ॥ पद बहु॥ ॥राग वेलावल ॥ साहिब वास पहिचानियें, जानो तेहनो नाव ॥ वह जान्या बिन ए तनु, पा- हन सम गव ॥ साहिव०॥ १॥झाने ग्येयकी ए- कता, ध्याने ध्येय समाय ॥ निज अनुनव घट जो- श्ये, कहावें स्योरमाय ॥साहिवण॥२॥वेद पुरानमें कलुनहीं,नहीं कलुवाको सहिनान॥गं निधि चारि- तरूपमय, ज्ञानानंद सुजान॥ साहिब०॥३॥ति॥ ॥पद सातमुं॥ ॥ राग वेलावल ॥ या नगरीमें क्युं कर रहनां, रा- जा लूंट करे सो सहना ॥ या ॥टेक॥ नहीं व्या- पार शहां को चाले, नही कोई घरमांहें गहना ॥ या० ॥१॥ तसकर पण निज दाव विचारे, नेद निहाले फिर फिर रहना ॥ नारी पांच शीपाश् साथै, रमण करे नित कुणसें कहना ॥ या ॥२॥ अंजलि जल जिम खरची खूटे, आखर ग दिन देगा पर- ना ॥ यातें नवनिधि चारित संयुत, ग ज्ञानानंद हेगा सरना ॥ या ॥३॥ इति ॥
ज्ञानविलास ॥पद आठमुं॥ ॥राग वेलावल ॥ साधो ना देखो नायकमा- या ॥ सा ॥टेक॥ पांच जातका वेस पहिराया, बहु विध नाटक खेल मचाया ॥ सा॥१॥ लाख चौ. रासी योनिमांहे, नानारूपें नाच नचाया ॥ चव- दह राजलोक गत कुलमें, विविध जांतिकर नाव दिखाया ॥ सा॥२॥अजतक नायक धायो नां- हिं, हारगयो कहुँ कुनसें नाया॥यातें निधि चारित्र सहायें, अनुपम ज्ञानानंद पदनाया ॥ सा ॥३॥ ॥ पद नवमुं॥ ॥राग वेलावल ॥ श्रवहीं प्यारे चेतले, घर पूं- जी संजारो ॥ श्रवः ॥ टेक ॥ सहु परमाद तुं बां- मदे, निरखो कागल सारो ॥१०॥१॥ मगरूरी तुम मत करो, नहिं परगल तुऊ माया ॥ पूंजी तो जेठी घणी, व्यापार वधाया ॥ १० ॥२॥ गांफिल होय कर मतरहे, पग देख फिलावो, घटमें निधि चारित गही, ज्ञानानंद रमावो ॥ श्र० ॥३॥ ॥ पद दशमुं॥ ॥ राग वेलावल ॥ प्यारे चित्त विचारले, तुं क N एश ज्ञान विलास हांसें श्राया ॥ बेटा बेटी कवन हे, किसकी यह माया ॥ प्यारे ॥ १॥ श्रावनो जावनो एकलो, कु- ण संग रहाया ॥ पंथक होयकर जालमें, कैसे लप- ट्यो नाया ॥ प्यारे ॥२॥ नीसर जावो फंदसे, ग जिनमें नाया॥ जो निधि चारित श्रादरे,ज्ञाना- नंद रमाया ॥ प्यारे ॥३॥ इति ॥ ॥ पद अगीआरमुं॥ ॥राग श्राशावरी ॥ श्रवधू सुता क्यां इस मठ- में ॥ १० ॥ टेक ॥ इस मठका हे कवन जरोंसा, पम जावे चटपटमें ॥ अ॥ बिनमें ताता जिनमे शीतल, रोग शोग बहु मठमें ॥ श्र० ॥ १॥ पानी किनारे मठका वासा, कवन विश्वास एतटमें॥॥ सूता सूता काल गमायो, अजहुँन जाग्यो तुं घटमें ॥ श्र०॥२॥ घरटी फेरी बाटो खायो, खरची न बांधी वटमें ॥ ॥ इतनी सुनी निधि चारित्र मिलकर, ज्ञानानंद श्राए घटमें ॥ १० ॥३॥ ॥ पद बारमुं॥ ॥राग श्राशावरी ॥ बिनजारा तें खेप जरीना- री॥ बि॥टेक॥चारदेसावर खेप करी तम, लाज ज्ञान विलास खह्यो बहु नारी ॥ वि० ॥ फिरता फिरतां जयो तुं नायक, खाखी नाम संजारी ॥ वि०॥१॥सहसला- ख करोमां उपर, नाम फलायो सारी॥ विबेटा पोतरा बहु घर कीना, जगमें संपत्त सारी ॥ वि०॥ ॥५॥ खूटी खरची सदगयो डेरो, पळगयो टांगो जारी॥ वि०॥ विन खरचीत कवन संजारे, टांडे- की नई खवारी ॥ वि० ॥३॥ पहेले देखी पग जो राखे, निधि चारित तुं धारी ॥ वि०॥ झानानंद पदश्रादरतो, खरची होती सारी ॥ वि०॥४॥इति ॥ ॥ पद तेरमुं॥ ॥राग श्राशावरी ॥योगी तेरा सूना मंदिर क्युं॥ योगी ॥ टेक ॥ वहु महनतकर मंदिर चुनियो, अब नहीं वसता क्युं ॥योगी ॥१॥ तीरथजल- कर एहने धोया, लोग सुरनि दरव क्युं ॥ योगी॥ जसमजूत ए मंदिर ऊपर, घास लगाया क्युं ॥ यो- गी० ॥२॥ रामनाम एक ध्यानमें योगी, धूनी ज्यु- की त्युं ॥ योगी० ॥ एह विचार करी नाश् साधो, .नवनिधि चारित स्यु ॥ योगी० ॥३॥ इति ॥
ए
ज्ञानविलास
॥ पद चौदमुं॥
॥ राग श्राशावरी ॥ अवधू वह जोगी हम माने
जो हमकुं सबगत जाने ॥ १० ॥ ब्रह्मा विष्णु महे
सर हमही, हमकुं श्सर माने ॥श्रण ॥१॥ चर्क
बल वासुदेव जे हमहीं, सबजग हमकुं जाने ।
श्रण ॥ हमसे न्यारा नहिं कोई जगमें, जग परमि
त हम माने ॥ १० ॥२॥ अजरामर अकलंकत
हमहीं, शिववासी जेमाने॥०॥निधि चारित झा
नानंद जोगी, चिद्घननामजे माने॥१०॥३॥इति।
॥पद पंदरमुं॥
॥ राग आशावरी ॥ साधो नाइ नहिं मिलिय
हम मीता ॥ सा ॥ टेक ॥ मीता खातर घर घर
नटकी, पायो नहिं परतीता ॥ सा ॥ जहां जाई
ताहां अपनी अपनी, मत पख नांखे रीता ॥ सा।
॥१॥ संसय करूं तो कहे बिनाला, वल्बज रूसे नीता
॥सा०॥श्त उतसे अधविचमें जूली, कैसे कर दिन
वीता ॥ सा ॥२॥श्रागम देखत जग नवि देखु
जिम जल जख पग रीता ॥सा॥ तिनथी हव श्रम
निधि चारित युत, ग ज्ञानानंद मीता ॥सा ॥३॥
ज्ञानावयास ए ॥ पद शोलमुं॥ ॥राग रामकली ॥ नानारंग गहन कानन विच, चार दिनारा देख तमासा ।। ना० ॥ टेक ॥ रंग सुरंग फुली वनराश, नित नित देखत रहत उहा- सा॥ ना ॥१॥ठोटे मोटे बहु विध तरुवर, कर- म हेतु मदमाता ॥ पंच सखी सुख पवने हिलमि- ब, अंगोआंग जूले रंगराता ॥ ना० ॥२॥ केतेश् पात फूल फल जडगए, केतेश् पाके पाता ॥ रह .ग सांख पुण वसंत समय गत, केते जयगए फूल फस पाता ॥ ना० ॥ ३॥ फिर निर धूत पवन योगें कर, जलवुद वुदका वासा ॥ग दिन चट- पट सवही चलगए, जिम जल विच वतासा ॥ ना० ॥ ४॥ उलट पलट तरु देख्यो वनमें, तुरतही जयो उदासा ॥ यातें नवनिधि चारित्र नंदे, ज्ञाना- नंद सुख खासा ॥ ना० ॥५॥ इति ॥ ॥पद सत्तरमुं॥ ॥राग रामकली ॥निज थासाका वडा नरो- सा, पर थासा हे गलकी पासा ॥ नि॥ टेक ॥श्रा. पहि परकी आस करतहे, केसे पूर करे ते थासा ।।
ए ज्ञान विलास नि ॥ १॥ पर श्रासा खिन खिन रमवमियो, रह- कर देख्यो खूब तमासा ॥ निण ॥ श्रासा दासिके वस कूकर, जटके गलिगलि घरघर वासा ॥ नि॥ ॥॥निज भासीकी श्रास करंता, जटपट पूरण होवे बासा ॥ नि ॥ एह विचार करी जाश्साधो, पामो नवनिधि चारित खासा ॥ नि०॥३॥ ॥पद अढारमुं॥ ॥ राग रामकली ॥ कुण जाणे साहेबका वासा, जिहां रहताइ साहिब साचा ॥ कु० ॥ टेक ॥ सा- धु होय के जलमें बूडे, जिम मबलीकाहे जल वासा ॥ कु० ॥ १ ॥ बामण होयकर गाल बजावे, फेरे काकी माल तमासा ॥ गौमुखि हाथें होठ हलावें, तिणका साहिब जोवे तमासा ॥ कु०॥२॥ मुलां होयकर बांग पुकारे, क्या कोई जाणे साहि- ब बहेरा ॥ कीडीके पग नेजर वाजे, सोबी साहि- व सुनता गहेरा ॥ कु० ॥ ३॥ कंठ काठ केश मुह- मो बांधे, काला चीवर पहरे तमासा ॥ बोत अबो- तका पानी पीवे, जद अन नोजनकी श्रासा ।। कुण् ॥ ४॥ साधु नए असवारी बेसे, नृपपरनीति झान विलास प करे सुख खासा॥पंचाग्नि केश ताप तपत हे, देह खा- ख रासनपर जासा ॥ कु० ॥५॥ श्राप दरव था- भल के राखे, देव नाम परसाद लगाता ॥ घंट व- जाडी श्रापहिं खावे, नित नित साहिवकुं दिख- लाता ॥ कु०॥६॥ सरवंगी जे सवकुं माने, थपनी अपनी मतिमें बहुरा ॥ साहेव सव नटवाजी देखे, जग जनकारज वस नया बहुरा ॥ कु० ॥७॥ इम कर नहिं कोई साहेव मिलता, जगमें पाखंग स- वही कीता ॥ चारित्र ज्ञानानंद विना नहिं, सम: जो जगमें तन को मीता ॥ कु० ॥ ॥ इति । ॥ पद जंगणीशमुं॥ ॥ राग रामकली ॥ वालो माहरो क्यों नटके परवासा, तुजमठ निरखो सादेव वासा ॥ वाण ॥ टेक ॥ विनु अनुभव ताकुं नहिं जाने, देखे कैसे उजासा ॥ वाण ॥१॥ नहिं मानस नहिं नारी सा- हिव, नांहि नपुंसक बागम नासा ॥ पांचो रंग जाके नहिं दिसे, तामें नहिं गंध रसकावासा ॥ वाण ॥२॥ नहिं नारी नहिं इलका साहेव, नहिं रू- खा नांहि चिकनासा ॥ शीता ताता जाके न पावे, លច झान विलास अप्रतिबंध श्रागति गति जासा ॥ वा० ॥३॥ कोश संघयण जाके नहिं पावे, नहिं को संगण निवा सा ॥ जां देखे तां एकही साहिव, जग नल पर- मितहे जसु वासा ॥ वा० ॥४॥ सो साहब तुं अ. पना मठमें, निरखो थिर चित्त ध्यान सुवासा ॥ चारित ज्ञानानंद निधि श्रादर, ज्योतिरूप निज- नाव विकासा ॥ वा० ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ पद वीशमुं॥ ॥ राग रामकली ॥ जान न बामन काजी साधो, साहबकी गति है गी न्यारी ॥ जाण ॥ टेक ॥ ज- तपाद व्यय दरव परयायें, एक अनेक गहे पुन सारी ॥ सा ॥ १ ॥ थिरता एक समय गत जाके, उतपाद व्यय पण ध्रुव सारी॥ अस्ति नास्ति नास्ति श्रास्तिकहे, आगम मांहें अव्य विचारी ॥सा॥ ऐसी बात हम कबहुँ न जानी, किनही मुख सुन नांहि संजारी ॥ चरम नयन कर नहिं हम निर- खी, अनुपम सादवाद गुण धारी ॥ सा ॥३॥ चन निखे सात नये कर, सातें नंग समाधि संजारी ॥ निधि चारित्र ज्ञानानंद श्रनुजव, एए झान विलास निदचे सादेव जाणे सारी ॥ सा ॥४॥ इति ॥ ॥पद एकवीशमुं॥ ॥ राग टोडी ॥ सुनो पिया तम सुखसें विचरो री, नंदन वनकी सयल करोरी ॥ सु० ॥ टेक ॥ मे- रे वापको वाप मनोहर, वहुविध तरुतल चिरधरो- री॥ सुम् ॥ १॥ नारी समीयुत तरुतल वेस्यो, उः ख सुखकी सहु वात करेरी॥ फुग मंतरी परिकर युत शालो, आयो अंगोधेग मिरैरी ॥ सु० ॥२॥ (सासु था| सखीयुत श्राइ, मनकी मोजां मिल नि- कस्योरी॥ धरमराजको परिकर सघलो, थाय मि- यो मन शुभ विकस्योरी ॥ सु० ॥३॥दव चेतन सहु निज परिवारें, वसतां अनुनव वात करेरी ॥ निधि चारित्र ज्ञानानंद साथे, ज्ञान लहर पामे ज- लीय परेरी ॥ सु० ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ पद वावीशमुं॥ ॥राग टोडी ॥दूर रहो तम दूर रहो तम दूर र- होरी, मोसुं तो तम दूर रहोरी ॥ दू० ॥ टेक ॥ ३- तने दिन श्रमने सुःख दीg, थारे संग कर सुख न खहोरी ॥ दू० ॥ १॥ तीन लोककी उगनी तूंही, १०० झान विलास तुजसम नहिं कोई एहवो करेरी ॥ मीठो बोली हिरिदय पैसे, लाम करे वहु नांत परेरी ॥ दू । ॥ २॥ सागरमें तुं था हव ताबे, पाडे गोतो देय टरेरी॥तुज कुटिलाका कवन नरोसा, बोलतही तुं घात करेरी ॥ दू॥ ॥ ३ ॥ इहां सेती तुं दूर परीजा यहां थारी मति नांह लहेरी॥ चारित झानानंद र खवालो, अम प्यारी मोरे पास रहेरी ॥ दू० ॥ ४ । ॥ पद त्रेवीशमुं॥ ॥ राग टोडी ॥तूंही पिया मन गमतो मिल्योरी, उर गेर मन नांहिं मिल्योरी ॥ तूं। ॥ टेक ॥ हूं तो- सुं कलु नहिं चाहुँ, केवल अंगें रमन करोरी ॥तूं॥१॥ केवल तनमय एकत नावो, मोसुं प्रेमें प्रीति करो- री ॥श्राप दृष्टि सखि श्रातम साथे, वात करो तम सुख वचरोरी ॥ तूं ॥२॥ मनुवो सुनकर घरनी बानी, पास वसारे प्रीत करेरी ॥ चारित ज्ञानानंद सहायें, वालो धीरज चित्त धरेरी॥तूं॥३॥इति ॥ ॥ पद चोवीशमुं॥ ॥ राग टोडी ॥ प्यारे तम चगान खरोरी,शां- ति खमंग तम तेग करोरी॥ प्या॥ टेक ॥धरम झानविलास १०१ राज लसकर तमसाथे, मोटो मंतरी संग लरोरी ॥ --प्या० ॥१॥ मोहराज मकरध्वज गजपर, थायो सनखिन कोप करेरी ॥ चउ सुत मंतरियुत वहु लसकर, रणकारण सावधान लरेरी ॥प्या॥२॥ वालो संयम वक्तरधारी, धरम टोप धर खमंग गहे- री ॥ श्रागमसाथें रणमें जूजे, उर्धर रिपुदल ह- नन गरी ॥ प्या० ॥३॥ सातनो खयकर तीन पाड्या, श्राप शोलनो घात करेरी ॥ एक एक पट गने मारु, चोथो क्रोधनो घात चरेरी ॥ प्या० ॥ ॥४॥ दशमे सुखम लोन पिठामी, कूद्यो वारम गन लहेरी॥मोहराजने गजसे पाड्यो, एकहिं हाथ घात वहेरी ॥ प्या० ॥५॥जीत नगारो तेह वजायो, तेरमी नूमें सुख विचरोरी ॥ काची दोय घमी रण जीती, चारित झानानंद वरोरी॥प्या॥६॥इति॥ ॥ पदपच्चीशमुं॥ ॥राग टोमी ॥ मेरो पिया हे परम सन्यासी, कवन करे हे पियाकी हांसी ॥ मे ॥ टेक ॥ वर- जित ईमा पिगला मारग, सुखमना घर अनिलापी॥ मे ॥१॥ यम नियम आसन अनुरंगी, प्रत्याहार --- १०२ झानविलास ध्यान धारणवासी ॥ प्राणायाम समाधि सुरंगी, मृ लोत्तर सुविलासी ॥ मे ॥२॥ रेचकपूरक कुंज क नेदें, वादर मन वशकारी॥ चरम रंध्र मध्यगेहे पूरी, अनहद नाद विचारी ॥ मे ॥३॥ बादर योग युगति सहु थिरता, श्रातम ध्यान विलासी॥ पांचवरण पण तत्व सुदर्शी, परमातम गत जासी ॥ मे ॥ ४॥ परमातम अनुसारे करतां, निज सहु नाव विकासी ॥ चारित ज्ञानानंद सन्यासी, जाने तिण निजवासी ॥ मे ॥ ५॥ इति ॥ ॥ पद ग्वीशमुं॥ ॥राग श्राशावरी फाग ॥कैसें विचार करोना साधु, दिव्य विचारें मन श्राराधो॥ कै ॥ टेक । जो परथम सिझगति अनुनवियें, संसृति विण कहां सिक होय साधो ॥ कै ॥ १॥ संसृति चजगति नेद कहावे, तीन नेद तीग वेद सुजानो ॥ नारक तिरि जो परथम कहियो, निरजर नर बिनतें कैसे मानो ॥ कै ॥२॥ चनगति परथम जेह बखान नरनारी कुण पहिले जायो ॥ बीज जाड पहिले कु- ण कहिये, ग विना ग किहांसें थायोकै॥३॥ maha ॥ -- ज्ञान विलास १०३ इनकी श्रादि किहां कुण जाणे, बागम दिव्य वि. चार प्रमाणो ॥ चारित झानानंदें अनुजव, ए सहु जाव अनादि बखानो ॥ कै० ॥ ४ ॥इति ॥ ॥ पद सत्तावीशमुं॥ ॥ राग श्राशावरी ॥ श्रदनूत एक अचंलो दे- खो, अबतक जानुं नहिं को लेखो॥१०॥टेक॥ जंगलमांहे मोटो चरखो, कवन बनायो चालत पेखो॥ अ॥१॥ नोटीसी कीमी तेइनें कांते,श्राव पहर श्रह निसि मन जायो॥ चालत चालत थाकत नाहिं, इतनो वस यामें किहांसें श्रायो ॥१॥२॥ रूडी तेहनी नहि कहिं दीसे,का जाने कहां राखी नायो ॥ संघलाइ जनने चरखो दीसे,थागल पाडल रून दिखायो ॥१०॥३॥कीडी थाकतां चरखो न चाले, केसोनयो हरामी देखो॥ तिनतें चारित झा- नानंद जे,श्रापमते रहे तम ते पेखो॥॥॥इति॥ ॥पद अहावीशमुं॥ ॥राग आशावरी ॥ अदभूत एक थचंनो ना- री, निरख समज श्रापोश्राप विचारी ॥१०॥टे- क ॥ पारावाररहित सागर विच, नाव एक जिहां ,
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१०४
झान विलास
निरखो नारी ॥ दांडी पांच चलावे जाकुं, पतवारी
ग हे सुखकारी ॥ ॥१॥चनदिसि चित्रित
पाट पटंवर, जीतर साहव सुता सारी ॥ चनदिसि
तेन तरंड फिरतहे, वालो साहव गांफल जारी ।
श्रम ॥२॥शैल सुनत उठ बेठे साहब, नाज गए
जिहां तसकर सारी ॥ चारित ज्ञानानंद संजारी
श्रानंद हरख लहे हुशिधारी ॥ श्र॥ ३ ॥ इति ।
॥ पद उंगणत्रीशमुं॥
॥ राग श्राशावरी ॥ राम राम सब जगहि मा.
ने,राम रामको रूप न जाने ॥ रा०॥ टेक ॥ कवण
राम कुण नगरी वासो, कहांसें आयो किहां नयो
वासो ॥ राम् ॥ १॥ राम राम सहु जगमें व्यापी,
राम विना हे कैसे बालापी ॥ राम विनाहे जंगल
वासा, पाडे को जाकी न करे आसा ॥रा॥॥ रा.
महि राजा रामदि राणी, राम रामहि हैरोतानि ॥
रटन करतदे कवन रामको, कैसो रूप बतावो वा-
को ॥ राम् ॥३॥ जे के वाको रूप बतावे, तेहिज़
साचो मुज मन नावे ॥ सो निधि चारित ज्ञानानं-
दें, जाने आपनो राम थानंदें ॥रा ॥४॥इति ॥
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॥ झानविलास १०५ ॥ पद त्रीशमुं॥ ॥राग श्राशावरी ॥ योगसमाधि योग थाधारो, थागमाहें तत्त्व विचारो ॥ यो ॥ टेक ॥ कान- नपरले खार कीनारे, अनुपम एक नगर सुखका- रो॥ यो ॥१॥ जामें जीव अनंत रहाते, कुण समरथ ते गिणतां मानो ॥ सादि अनंता श्रायु जे- हनो, बहुविध परिगल रिकि वखानो ॥ यो॥२॥ जंचनीच जिहां नेद नहीं हे, सव जन नूपति नाव निहालो ॥ चारित झानानंद संजालो, जिम पामो पुरिवास विशालो ॥ यो ॥ ३ ॥ इति ॥ ॥ पद एकत्रीशमुं॥ ॥ राग तुमरी ॥ मंदिर एक बनाया हमने ॥ मंदिर ॥ टेक ॥ जिस मंदिरके दश दरवाजे, एक बुंदकी मायारे ॥ नानो पंखी जाके अंतर, राज करे चित्त लाया रे ॥ मं ॥१॥ दाड मांस जाके नहिं दीसे, रूपरंग नहिं जायारे ॥ पंख न दीसे कहसे पिगर्नु, षटरस नोगें नायारे ॥ मंग ॥२॥ जातो आतो नहिं कोई देखे, नहिं कोई रूप बतावेरे ॥ सब जग खायो तो पण नूखो, तृप्ति कबहिं न पा- MAmureen १०६ ज्ञानविलास वेरे ॥ मं० ॥३॥ जालम पंखी तालम मंदिर, पाडे कोन बतावेरे ॥ वह पंखीको जो कोइ जाने, सो ज्ञानानंद निधि पावेरे ॥ मं० ॥४॥इति । ॥ पद बत्रीशमुं॥ ॥ राग तुमरी ॥ इतना काम करे जे जोगी, सोश योग न जानेरे ॥ ३० ॥ टेक ॥ मूंग मूंमाया जस्म लगाया, जोगी ना हम जानेरे ॥ वक्तर पहेरी रण कुंजीतें, सो योगी हम जानेरे ॥ इत० ॥ १ ॥राजा वसकर पांचों जीते, पुर्धर दोयने मारेरे ॥ चार काटके सोल पिलामे, सोश योग सुधारेरे ॥ श्त० ॥ ॥२॥ जागृत नावें सरव समय रहे, परमचारित्र कहावेरे ॥ ज्ञानानंद लहेर मतवाला, सो योगी म- न जावेरे ॥ इत० ॥३॥ इति ॥ ॥ पद तेत्रीशमुं॥ ॥ राग तुमरी॥ वादिनकुं नहिं जाना जबतक, कैसा ध्यान लगाया रे ॥ वा० ॥ टेक ॥ जटा वधा- री नस्म लगाश, गंगा तीर रहायारे ॥ उरध बाह आतापना लेश, योगी नाम धरायारे ॥ वा ॥१॥ चार वेद ध्वनि सूत धारकर,वामण नाम कहायारे॥ m १०७ , झानविलास शासतर पढके ऊगडे जीते, पंमित नाम रहायारे॥ वा॥२॥ सुन्नत करके श्रद्धा वंदे,सीया सुन्नी कहा यारे ॥ वाको रूप न जाने कोश, नवि केश बतलाया- रे॥ वा० ॥३॥ जे केशवाको रूप पहिचाने, तेहि- ज साच जनायारे ॥ ज्ञानानंद निधि अनुजव योगें, ज्ञानी नाम सुहायारे॥ वा ॥४॥ इति ॥ ॥पद चोत्रीशमुं॥ ॥ राग तुमरी ॥ ऐसो योग रमावो साधो ॥ऐ- सो योग रमावोरे ॥ ऐ० ॥ टेक ॥ बरम विनूति अंग रमावो, नावोरे ता अंतर घटमें, श्रातमध्यान लगावोरे ॥ ऐ७ ॥ ॥१॥ धरम शुकल दोय मुंदरा धारो, कनदोरो सम सारोरे ॥ सुन संयम कोपीन बिचारो, जोजन निरजरा धारोरे ॥ ऐ ॥२॥ अनुजव प्याला प्रे- म मसाला, चाख रहे मतवाला रे ॥ ज्ञानानंद ल. हेरमें जूले, सो योगी मदवालारे ॥ऐ०॥३॥इति॥ ॥पद पांत्रीशमुं॥ ॥ राग बुमरी ॥ हुँ सहलानी जानुं हुं तुम, काहे कुं जटकावे रे ॥ ९ ॥ टेक ॥ जटकत नटकत न दया तीर मन ॥ज्ञान शोच- Wave २०० ज्ञानविलास हुं हरानी, तूं मत रीस चढावेरे ॥ ९ ॥ १॥ ए. तला काल नपुंसक जानी, मंदिरमाह रहावे रे ॥ सघलाइ मानसने तूं ठेले, एहि श्रचंनो श्रावे रे॥ ढुं० ॥२॥ थासपास ना श्रमने देखी, कुटिला नाव जनावे रे ॥ वहज सांजल मोकुं बांके, मोरी हुरमत जावे रे ॥ ९० ॥ ३॥ तूं तो निरसज जयो मतवालो, थारी कवन चलावे रे ॥ श्रम वहन झा- नानंदसाथें, अंगोअंग मिलावे रे ॥९॥४॥इति ॥ ॥ पद त्रीशमुं॥ ॥ राग वसंत ॥ योगी यासें चित्त रमायो, या. की नगति करत हुँ ॥ यो ॥ टेक ॥ मेरो तो योगी बालो नोलो, बरमचारी मन नायो यो॥ जो यह देखे सोश लोनावे, मतवालो जग जायो॥ योग॥१॥ योगी खातर घर घर नटकी, यह योगी अब पायो ॥ योग ॥ अमनें वक्षन याकुं मान्यो, मेरो चित्त लोनायो । यो ॥२॥ निरलोनी निकलंकी योगी, योगी योग रमायो । यो०॥ निधि चारित ज्ञानानंद मूरति ॥ प्राण पियारो पायो । यो ॥३॥ इति ॥
ज्ञानविलास १०ए ॥ पद साडनीशमुं॥ ॥ राग वसंत ॥ देखी रंग नारी, सतिय शिरोम- णे नाई ॥ दे० ॥ टेक ॥ रूपवंत जे नागी जटके, सवहि के मन नाई ॥ देव ॥ १ ॥ सघलाइ मानस तेह रमावे, मुनि जन शोना दाई॥ देव ॥ जोगी जन तिन नांहि वतावे, योगी चित्त रमाई ॥ दे॥ ॥२॥ पंडित याकुं लाड करतहे, अहनिसि चित्त रमाई ॥ दे॥ योगीसर अंगोअंग रमावे, हाथो हाथ जूलाई ॥ दे० ॥ ३॥ श्नने निरखी मुनि म- नचाले, ध्यान धरे चित्त लाई ॥ देव ॥ निधि चा- रित ज्ञानानंद पायो, या नारी चित्त श्राई ॥दे०॥४॥ ॥पद अडत्रीशमुं॥ ॥ राग वसंत ॥ सुणलीजो पिताजी, योगीयासें चित्त रमायो । सु० ॥ टेक ॥ अह निसि योगी के संग वेसी, जग जन लाज गमायो ॥ सु ॥१॥ अपने मनरूचि श्रम ए कीधो, चनदिशि वात फ- - लायो ॥ सु० ॥ मेरे तो घरसे काम नही हे, योगी पास रहायो । सु० ॥२॥ इतनी कहकर घरसें नि- कसी, योगी वहन नागरे ॥ सा निधिचारित झा- १२० झान विलास नानंद योगी, मिलकर थंग मिलायो ।सु॥३॥ इति ॥ पद उंगणचालीशमुं॥ ॥ राग वसंत ॥ में कैसे रहुं सखी, पियागयो प- रदेशो ॥में॥ टेक ॥ रितु वसंत फूली वनराश, रंग सुरंगीत देशो ॥में॥१॥ दूरदेश गये लालची वाल- म, कागल एको न श्रायो॥ में ॥ निर्मोही निस्नेही पिया मुऊ, कुण नारी लपटायो ॥ में ॥ २॥ वसंत मासनी रात अंधारी, कैसें विरह बुजायो ॥ में ॥ इतने निधि चारित पुत वहन, ज्ञानानंद घर श्रा- यो ॥ में ॥३॥ इति ॥ ॥पद चालीशमुं॥ ॥राग वसंत ॥ मेरे पियाकी निशानी, मोरे हा- थन श्रावे ॥मे०॥ टेक॥ रूपी कहुं तो रूप न दीसे, कैसें करी बतलावे ॥ मे ॥ १ ॥ जोति सरूपी तेद विचारूं, करमबंध कैसें नावे ॥ मे ॥सिक सना- तन उपजन बिनसन, कैसे विचार सुहावे ॥ मे ॥ ॥२॥ वेद पुरानमें नहिं कहि दीसे, किणपर नाव रमावे ॥ मे ॥ यातें चारित ज्ञानानंदी, एकहिं रूप कहावे ॥ मे ॥३॥ इति ॥ ॥
संग कब ज्ञानविलास ॥ पद एकतालीशमुं॥ ॥ राग सारंग ॥ क्योंकर महिल बनावे पिया- रे ॥ क्यों ॥ टेक ॥ पांच नूमिका महल बनाया, चित्रित रंग रंगावे ॥ क्यो ॥१॥ गोखें वेगे नाटिक निरखे, तरुणी रस ललचावे, श्क दिन जं- गल होगा मेरा, नहिं तुज जावे ॥ क्यों ॥२॥ तीर्थंकर गणधर बल चकि, जंगल वास रहा. वे ॥ तेहना पण मंदिर नहिं दीसे, थारी कवन च- लावे ॥क्यों॥३॥ हरिहर नारद परमुख चक्षगए, तूं क्यों काल वितावे ॥ तिनतें नवनिधि चारित श्रादर, ज्ञानानंद रमावे ॥ क्यों ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ पद बेंतालीशमुं॥ ॥ राग सारंग ॥ क्या मगरूरी बतावे पियारे ॥ क्या ॥ अपनी कहा चलावे ॥ पि क्या० ॥ टेक ॥ कवन देश कुण नगरीसें श्राया, कहां तुझ वास रहावे ॥ पि॥१॥ कहा जिनस तुम लाए मगरू, किसबिध काल बितावे ॥ कहा जाने का मकसद हे- गा, कैसो विचार रहावे ॥ पि॥२॥ चार दिनां- की चादनी हेगी, पाटे अंधार वतावे ॥ घर घर Aamarthya ज्ञानावेसास -4 ram फिरतां थाराहि मानस, अंगुलीयां दिखलावे ॥ पि०॥३॥ तिनतें तूं मगरूरी ठांडी, जग सम समता लावे ॥ तो नवनिध चारित्र सहायें, ज्ञानानंद पद पावे ॥ पि०॥४॥ इति ॥ ॥ पद तेतालीशमुं॥ ॥ राग सारंग ॥ विन वालम कहो कुण गति माहरी, वालम ही गति नारी ॥ वि० ॥ टेक॥सुनो सखी तुम वेग मनावो, सश्यां लावो निहारी॥ बिन ॥१॥ चांदनी राते मकरध्वज शर, थायलग्यो- मुःखकारी ॥ विरहव्यथायें अमने खिनजर, सुख नहिं पामे सारी॥ बिन ॥ २ ॥ जलविन मबली सम टलवलती, विरहजाल न जारी ॥ इतने ज्ञा- नानंद वालम थाए, चारितसंग सुखकारी॥वि॥३॥ ॥ पद चुमालीशमुं॥ ॥ राग सारंग ॥ सेठ बेठे सारंग महलमें॥से टेक ॥ सेठानी मोह नरपति बेठी, बेटा चार श्रनो- पमें ॥ से०॥ मिथ्या मकरध्वज जसु नाई, व्यापारें गणि कोपमें ॥से॥१॥ उंची हाट बिबात बिबा, सुए करे नवरंगमें ॥ से ॥ कनक रतननां नूखन ॥ .
झानावलास ११३ पहियां, वांके से रंगमें ॥ से० ॥२॥ लेखन का- गल स्याही राखी, सेठ कहलाए नगरमें ॥ से ॥ बातें लोक जमा सहु राखी, परखी मेली कुगारमें ॥ से॥३॥ तेहने कागल कटको दीधो, नया निचिंता पलकमेंसे॥ सहसलाख कोडोनां कागल, लेवे देवे खलकमें ॥ से॥४॥ चार दिशावर हाट करी जिन, जारी सराफ परदेशमें ॥से०॥ सेठ कहे हम करोड पतिहे, हम सम नहिं कोश्देशमें ॥से॥५॥जवजन सह निजमांगन श्राया, कीधो दिवालोमगनमें।सेगा अवतो शेठ योगी नये नागे,माल दीधो सहु सुजनमें ॥से० ॥६॥ जैसेतेसे एकल चल गए, कवमी नहिं रंग वाटमें ॥ दाट सुजन कोश्नहिं साथे, जर खरावी वाटमें॥ से॥॥एह विचार करी ना प्यारे, पुण्य पाप लीयो हाथमें ॥ से० ॥ तिनतें नवनिधि चारित अविचल, ज्ञानानंदजयो साथमें ॥ से ॥ इति ॥॥ ॥ पद पिस्तालीशसुं। ॥ राग सारंग ॥ साहिव हे तेरे संगमें ॥सा॥ टेक ॥ जाके दरव अपरिमित होगा, कवहिन खूटे जंगमे ॥ लेना देनां कतु नहिं जाके, लोगो अह- M ११४ ज्ञान विलास निसि रंगमें ॥ सा॥१॥ जिम जिम जोगे ति- म तिम वाधे, क्यु चटके मति चंगमें ॥ मृगमद गंधे मृग सम नटके, घट अनुनव नहिं रगमें । सा॥३॥निर्मल गंगानीर जे लाधो, खारी कुण पीवे वाटमें ॥ तिनतें निजघर चारित संयुत, ज्ञानानंद जोवो गठमें ॥ सा ॥३॥ इति ॥ ॥ पद तालीशमुं॥ ॥ राग कहेरबा ॥ सश्यां मुज गेंदा मंगायदे, गेंदाकी श्राश् हे बहार ॥ ए चाल ॥ यार मोह ना- री मिलायदे, यारोंका याही हे मिलाप ॥ या ॥ टेक ॥ रूपवंत मोह नारी मिलायदे, उत्तम कुल गु- ण धाप ॥ या ॥१॥ पहिली नारी मुऊ नटकायो, परघर रमवा ढाल ॥ या ॥ ते मुज दूतापण क- हलायो, जग जन कहेते बिनाल ॥ या॥२॥ सुकुलीनी मोहे नारी मिले जो, तो श्रम चित्त सु- ख जाय ॥ या ॥ इतनी सुनकर खायक मंतरी, सुमतिनो मेलन कराय॥या ॥३॥घरनी संगें हरख धरीने, अंग रहे लपटाय ॥ या०॥ चारित्र श्रादर ज्ञानानंदें, नवनिधि सहज लहाय ॥ या ॥४॥ ॥ .
ज्ञानविलास १२५ ॥ पद सुडतालीशमुं॥ ॥राग कहेरवा ॥ किस मिस जालं पणिहार कूवे, पर श्रासन योगीका ॥ए चाल ॥ कुण मिस पियाकुं मनाय, मिलियो पिउ परदेशीका ॥ कुण् ॥ टेक ॥ देश नगर नहिं जानुं जाको, जात पात न जनाय ॥ मि॥१॥ नाम गोत जाको कलु नांहिं, कैसें निरखं नाय ॥ मि ॥ निर्मोही निःसनेही पिया मुज, कुण रीते समजाय ॥ मि ॥२॥ मोसें , पहेलें लाड करेथो, मुज विन खिन न रहाय ॥ मि॥ अवतोमोसें रूसक चाल्यो, वात न पूछे ना. य ॥ मिण ॥३॥ विरव्यथायें तन मुज जूरे, किणसुं कहियें धाय ॥ मि ॥ पिज संयम सुन स- मता साथे, ज्ञानानंद रमाय ॥ मि॥॥ति॥ ॥ पद अडतालीशमुं॥ ॥ राग कहेवा ॥ मेरे नोले नवाव, कलकत्ते. की सयरकुं से चलोजी ॥ ए चाल ॥ मेरी प्यारी सुनाहे, श्रवतो तम श्रम संग चलोजी ॥ मे॥ टे- क॥ दोय घोडेपर श्रम कियो जीन, तम पण चालो प्यारी संग थदीन ॥ मे ॥१॥ जल पण नांहिं ११६ ज्ञान विलास अब हम हाथ, ढील न करो प्यारी चलो हम सा- थ ॥ मे ॥ तम खातर श्रम कुःख वहु कीन, प्या- री मत गंडे अमने दीन । मे० ॥ ॥ नारी कहे परो जारे निगोद, थारे मारे कुण करे वात निखो. द ॥ मे ॥ श्रम अव चावू किंदां थारे संग धूत, तुं मूरख शिर मोल कुमूत ॥ मे ॥३॥ इतनी सुनकर नयो ते उदास, कुटिला श्रवलानी कुण क- रे श्रास ॥ मेण ॥ तिन अवसर लही निधि चारित्त, झानानंद मूरति नजे सुख चित्त॥मे॥४॥इति । ॥ पद उंगणपचाशमुं॥ ॥ राग कहेरबा ॥ एक श्रचंनो मुज मन वशि- यो ॥ ए० ॥ टेक ॥ चालतो हालतो मूंगर दीगे, विचमें एक सिखर उंचो वसियो।ए॥१॥ोटा पांच शिखर जसुं चउदिशि, नाना तरु विण मंडित रहि- यो॥ ए ॥ सरव काल सागर विच रहितो, कवन चलावे ते अम कहियो ॥ ए० ॥२॥ मानस नहिं. कोइ तेहमां दिसे, ध्रुव श्रध्रुवपणो तेहमें रहियो ॥i ए ॥ सुगर बिच नवनिधि चारित्र युत, ज्ञानानंद मूरति गुण गहियो ॥ ए॥३॥ इति ॥
झान विलास ॥ पद पचाशमुं॥ ॥ राग कहेरवा ॥ बोरी वामनकी, गेरी वाम- नेकी, अंगिया कुं अंतर लगायके चली ॥ हाथमें पिंजरा गुलावकी उमी, नरे बजारमें घुरती खडी।। ए चाल ॥ मोरे नोले पिया, मोरे नोले पिया, मो- पर जाउमा मालकें चले ॥ मो० ॥ टेक ॥ मेरे हि- रदय विच राखती, कतु नहिं मारे तोसुं रति ॥ मो० ॥ मोसे पिया तम काह उदास, हुँ थारे ग चरणारी दास ॥ मो० ॥ १ ॥ जो थारा मनमें रहि एसी डंस, पेहेलेहि जानति करति रूस ॥ मो० ॥ विन वालम मेरो विगमे काल, क्योंकर वीते हाल निहाल ॥ मो० ॥२॥ अवलाके पति गति मति जान, अनुपम शील भूषण गुणखान ॥ मोरे ॥ श्तने नवनिधि चारित्र रंग, मिलगए ज्ञानानंद सुरंग ॥ मोरे ॥३॥ इति ॥ ॥ पद एकावनमुं॥ ॥ राग सोरठ ॥ प्रीतके को फंदें पडो ना ॥ ए चाल ॥ वालम नारिके फंदें पडो ना॥ वा ॥ टेक ॥ जो तम नारीके फंदमें पडिहो, कोटिजतन . ११७ ज्ञानविलास मन राखो रहे ना ॥ वा ॥ १॥ नारी कालीना- गन सरिखी, देखत चित्त मामामोल करे रे ॥वा ॥ नारीसंयोगें बरमदत्त परमुख, नरकें पुरधर उरक चरे रे ॥ वा ॥२॥श्राईकुमर मुनि नारि संयो- गें, वरस चवीस गिहिवास कियो रे ॥ वा ॥ नारीकी प्रीतें इनानव परनव, सुख न लहे पगबंध नयो रे ॥वा॥३॥ उत्तम नर श्न नाहिं बतावे, ध्यान धरे वनमांद रहे रे ॥ वा० ॥ निरमल निजगुन श्रा- तम ध्याने, सुख समाधि नाव लदे रे ॥वा ॥४॥ तिनतें वालम तम पण समजो, कुटिलानी प्रीतमी परिहरो रे ॥ वा ॥ मोसुं तो निधि चारित्र श्रादर, ज्ञानानंद सुख रमण करो रे ॥ वा० ॥ ५॥ इति ॥ ॥पद बावनमुं॥ ॥ राग सोरठ ॥ देश माहरो पियाकुं बताय दि- जो रे, मेंतो लेजंगी जोगनियाको वेस ॥ दे० ॥ ए चाल॥कोश् सखी पियाकुं बतावैरी, मेंतो जाऊंगी वालम पास ॥को॥टेक ॥सारी जग्या पूढीयो, वाल, मजीको देश ॥कोश्कोसाच नहिं लह्यो, जो कागल पहुँतें देश ॥ कोण ॥१॥ ज्ञानी ज्ञानी सब कहे, झानविलास १९ए मोकुं न दीसें ज्ञान ॥में तोसाचो जव कडं, पिया रूप कहे मान ॥ कोण ॥२॥ सजान ऐसो जो मिले, पियाकुं कागल मेल ॥ कागल वांची मुज लखे, पाठो उत्तर खेल ॥ कोण ॥३॥ जवलग कागल तेहनो, नहिं श्रावे श्रमपास ॥ तवलग जूठी वात सहु, नहि पम मोकुं श्रास ॥ को ॥॥ इतने एह विचारमें, निधि चारितके संग॥श्राए ज्ञानानंद पिन, रमण करे सुखरंग ॥ को॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ पद त्रेपनमुं॥ ॥राग सोरठ ॥ मेंतो कैसे पियाकुं सेउरी, पि- या मेरो योगियांको वेस ॥ में ॥ टेक ॥ में तो क- न्या नूपकी, जाने सकल जिहान ॥ घरसे निकलुं कुण परें । कहो सखी चतुर सुजान ॥ में ॥ १ ॥ सतिय शिरोमणी श्रम विरुद, वरमचारी शिर मोल ॥ दीसुं नहिं जग लोकमें, माहरो मोल अमोल ॥में ॥२॥ विनपरण्या उत्तम पुरुप, ध्यान धरे दीनरात ॥ ५ ते पण दरशन माहरो, दरश न लहे तिलमात्त ॥ में॥ ॥३॥ में तो मन गमतो कियो, ठांडी जग जन वाद ॥ दूर मत रहे वालम मिले, पसरे जग जस- , १२० झानविलास वाद ॥ मे० ॥ ४॥ कन्या एह विचारता, श्राय मि- ले ततकाल ॥ ज्ञानानंद योगी पिया, चारित युत जगपाल ॥ में ॥५॥ इति ॥ ॥पद चोपनमुं॥ ॥ राग सोरठ ॥कोश्योगी हमकुं जानेरी ॥ मेरो कोश नामकुं जान ॥ कोण ॥ टेक ॥ मानस नहिं ह- म नारी नांहिं, नांहिं नपुंसक जान ॥ कोइ० ॥१॥ दादा बावा नहि हम काका, नाहम कुणके बाप ॥ को० ॥ नाना मामा हम नहि मोसा, कोसें नहिं थालाप ॥ को० ॥२॥ बेटा पोतरा गोलक नांहिं, नाती कुहिता न जान ॥ दादी चाची बेटी पोती, ना हम नारी मान ॥ को ॥३॥ गुरु चेला नहिं हम काढूके, योगी नोगी नांह ॥ कोण ॥ पांच जा- तमें नहिं हम कोश, नहिं को कुल बांह ॥ कोण ॥ ॥४॥ दरशन ज्ञानी चिद्घन नामी, शिववासी हम जान॥ कोण ॥ चारित्र नवनिध अनुपम मूरति, शा- नानंद सुजान ॥ को ॥ ५॥ इति ॥ ॥ पद पंचावनमुं॥ ॥ राग सोरठ ॥ बझी दगाबाज, रे तूं बमि द- , झान विलास गावाज, प्यारी तूं वमिदगावाज ॥ टेक ॥ तेरे खा- तर मूंगर दरि विच, रही कुःख सह्यो में अपार ॥ हांसी खूसी वहु नातरां कीधां,तूं कांश जूलि गवार ॥ रे तूं वमि ॥१॥ कवडी साटे तेरे खातर, माहरो किधो मोल ॥ ढूंढक योगी यति सन्यासी ॥ मुंमि- त कियो ते रोल ॥रे तूं बमि ॥२॥ मुहमो वांधी कान ते फाडी, वहुविध वेस कराय ॥ कपट करी स. हु पाखंग कीधा, जन लूंट्यो मन नाय ॥ रेतूंव- मि० ॥३॥घर घर जटक्यो तेरे साथे, पोतें पापन- राय ॥ श्रवतूं काह न बोले मोसुं, तुं कपटीनी दि- खलाय ॥ रेतूं वमि०॥४॥ ऐसो देखी जयोहूं उदा- सी, निधि चारित्र लहाय ॥ ज्ञानानंद चेतनमय मूर- ति, ध्यान समाधि गहाय॥ रे तूं वमिण ॥५॥इति ॥ ॥ पद उपनमुं॥ ॥राग महार ॥ प्यारे सादेवशुं चित्त लावोरे, सादेव दूर कहलावो रे ॥ प्या० ॥ टेक ॥ सादेव एकही है जग व्यापी, नहि कहे नेद लहावे रे ॥ प्या॥॥ जे के साहेव नेद वतावे, ते वहुरा जग पावे ॥पारसनाथ कहे कोश्वरमा, विष्णु शिव कहे- ज्ञानविलास लावे रे ॥ प्या॥२॥ ध्यान ध्येय ग पारस रूप, ज्योतिरूप बरम नावे ॥केवलान्वयी झानी ते विष्णु,, शिववासी शिव जावे रे॥प्या॥३॥ जोतिरूप सा- हेव तो गही, तिनसुंध्यान लगावो॥निधि चारित्र ज्ञानानंद मूरति,ध्यानसमाधि समावोरे॥प्या॥४॥ ॥ पद सत्तावनमुं॥ ॥ राग महार ॥ देखो पिया श्रागम जहवेरी आयो, नाना नूखन लायो ॥ दे ॥ टेक ॥ विनय कनकनो घाट बनायो, संयम रतन लगायो॥नि- रमल ज्ञानको हीरक बिचमें, दरशन मानक ना- यो ॥ दे ॥ १॥ खायक वैडूर्यनी पंगति, मौक्तिक ध्यान लगायो ॥ सुमिति गुपति लीलम वियूम जि- हां, शेष तत्त्व कहलायो ॥ दे ॥२॥ए सहु नूषण मोल अमोला, निरखत चित्त लोनायो । हरष नि- धि चारित निहालो,ज्ञानानंद रमायो॥ दे॥३॥ इति ॥ पद अठावनमुं॥ ॥ राग मबहार ॥ ज्ञानकी दृष्टि निहालो, वाल- म तुम अंतर दृष्टि निहालो ॥ वा ॥ टेक ॥ बाह्य दृष्टि देखे सो मूढा, कार्य नांहिं निदालो ॥ धरम
झान विलास
१२३
धरम कर घर घर चटके, नांहिं धरम दिखालो ॥
वा० ॥ १॥ वाहिर दृष्टि योग वियोगें, होत महा-
मतवालो ॥ कायर नर जिम मद मतवालो, सुख
विनाव निहालो ॥ वा ॥२॥ वाहिर दृष्टि योगें
जविजन, संमृति वास रहानो॥ तिनतें नवनिधि चा-
रित श्रादर, ज्ञानानंद प्रमानो ॥ वा ॥३॥इति ॥
॥ पद उंगणसाग्मुं॥
॥राग मल्हार ॥ ज्ञानकी दृष्टि विचारो, साधो
जाश् श्रातम दृष्टि संजारो॥ सा० ॥ टेक ॥ अनु-
करमें शुष्ज्ञाने अनुलव, ज्ञेय सकल सुविचारो॥
झाने शेयकी एकता श्रादर, बहिरातम सुं निवारो ॥
सा ॥१॥ शानदृष्टि जे अंतर जावें, सुखरूचि
रूप पहिचानो, अंतरातम ज्ञानातम नावें ॥ होय
परमातम जानो ॥ सा ॥ ॥ परमातम ते निजगुन
जोगी, चारित ज्ञान वखानो ॥ ज्ञानानंद चेतनमय
मूर्ति, आनंद जावसु जानो ॥ सा ॥३॥ इति ॥
॥पद सापमुं॥
॥ राग मल्हार ॥ अनुनव ज्ञान संनारो, साधो
जा मत एकंत हा वारो ॥ सा ॥ टेक ॥ ज्ञान
१२४ झान विलास विना जे किरिया नांखे, अंध नर सम वन मोले श्रागममां ते देश श्राराधक, सर्व विराधक वोले ॥- साम् ॥ १॥ किरिया गंमी ज्ञान जे माने, पंगुल नर सम जानो ॥ सरव श्राराधक दिव्य विचारें, दे. शविराधक मानो ॥ सा ॥ २॥ तिनतें ज्ञान स- हित जे किरिया, करतां कारज सारो ॥ जिम अंध पंगुल दोनु मिलकर, वनसें निसरे सारो ॥ सा ॥ ॥३॥तिनतें एकंत मत पख बांडी, अंतरजाव वि- चारो ॥ अनुपम नवनिधि चारित संयुत, ज्ञानानंद संजारो ॥ सा॥४॥इति ॥ ॥ पद एकशठमुं॥ ॥ राग बिहाग ॥ सूनो सखी मोकुं खूट मचा- यो ॥ सू० ॥ टेक ॥ बहु वासरसें विनय व्यथायें, अंगें फुःख रहायो । एक दिन मजान सनान करी श्रम, नूषन अंग रहायो ॥ सू० ॥ १॥ रंग कसूबा चूनमी पहिरी, पांचमी वरत रहायो । ग योगी मतवालो श्रायो, नोलें जगति लहायो ॥सू॥ दि- नजर मोसें गीत गवायो,सांजे नाच नचायो॥ रंग- महल बिच सेजें पोढी, सोने रंग ललचायो ॥ सू०॥
ज्ञानविलास १२५ ॥३॥ तनमय एकंत अंगे लपट्यो, रयणे नींद वि- कायो॥ नणदी पण हसी दोडी आई, मोकुं तो मच- कायो ॥ सू॥४॥जोर नयो उठ नाग्यो योगी, ना जानुं विगमायो । सखि कहे खामिनि कुमलानी, मौनकरी सरमायो॥ सू० ॥ ५॥ तिन अवसर नि- पदी तिहां वोली, हसकर करवत लायो। रातें नि- विचारित नित्यसाथे, ज्ञानानंद खेलायो॥सू॥६॥ ॥ पद वाशमुं॥ ॥ राग विहाग ॥ मेरो पिया सखि देख मनावो॥ मे ॥ टेक ॥ पिया विना रंग महेल विच, सूनी स- हेज रहायो ॥ खान पान दुःखदायक मोकुं, क्यु कर जिय समजायो । मे० ॥१॥ शोल श्रृंगार ए विरह व्यथायें, केसे रयण विलायों ॥ अंग अंग कि- न जंगुर माहरो, तेसें कहुँ चित्त लायो॥ मे ॥२॥ इतने चारित मितके संगे, ज्ञानानंद पिया पायो । गरीषम तापें जिम जल वरखन, सेज धरी मचका- यो ॥ मे ॥३॥ इति ॥ ॥ पद त्रेशरमुं॥ ॥राग विहाग ॥ तुं बाबूराने क्युं मारे मूढ ॥
, १२६ ज्ञान विलास तुं ॥ टेक ॥ वालो नोलो हम वालूडो, नहिं क्यु- ३ जाने गूढ ॥ वागामांहे खेले श्रह निश, वात वि. चारो मूढ ॥ तुंम् ॥ १॥ खेलन मिस गेरो थारा पासे, रमण करे चित्त खोल ॥ तुं फुसलाइ नित्य जटकावे, इतयुत करे मममोल ॥ तुं० ॥२॥ निर्द- य निर्धन नहिं तुझ सरिखो, नहिं क्युश माने नि- गेर ॥ इतने चारित ज्ञानानंदे, गेरो वियो चित्त ठोर ॥ तु ॥३॥ इति ॥ ॥पद चोशपमुं॥ ॥ राग बिहाग ॥ जगगुरु निरपख कोन दिखा- या ॥ नि ॥ टेक ॥ अपनो अपनो हठ सहु ताने, कैसें मेल मिलाय ॥ वेद पुराना सबहीं थाके, तेरी कवन चलाय ॥ ज॥१॥सब जग निज गुरुताके कारन, मदगज उपर गय ॥ ग्यान ध्यान कबु जा- ने नांहिं, पोतें धर्म बताय ॥ ज०॥॥चोर चोर मिल मुलकनें खूट्यो, नहिं को नृप दिखलाय ॥ किनके बागल जा-पूकारे, अंधो अंध पलाय ॥ ज० ॥३॥ श्रागम देखत जग नवि निरखं, मन ग- मता पख जाय ॥ तिनतें मूरख धर्म धर्म कर, मत-
ज्ञानावलास
r
बुडे मन लाय ॥ ज० ॥४॥श्न कारण जग मत पख
बांडी, निधि चारित्र लहाय ॥ ज्ञानानंद निज जावें
निरखत, जग पाखंड लहाय ॥ ज० ॥ ५॥ इति ॥
॥ पद पांशग्मुं॥
॥ राग विहाग ॥ जगगुरु मूरख जगत जना-
य ॥ ज० ॥ टेक ॥ मूरख मूरख वहुलो जग जन,
पंडित केश जाय ॥ पंडित मूरख वहु जन
दीसे, जग मतलव लहे नाय ॥ज ॥१॥पंमित
पंमित नहिं को जगमें, कवहीं कोई जनाय ॥
दिव्य विचारी तेइनें जाखे, संसृति अलप गिनाय ॥
ज ॥२॥ तेहनु दर्शन जगमें उर्लन, ते तारक जग
मांद ॥ तिनतें नवनिधि चारित जावे, ज्ञानानंद
श्रथाह ॥ ज॥३॥ इति ॥
॥पद गशपमुं॥
॥ राग रामग्री ॥ निरपखता मोकुं नाश, पिया
तम ॥ नि० ॥ टेक ॥ पक्षपातमें घर घर जटकी,
नहिं निरपख दिखला ॥ पि० ॥ संवेगी संवेगन
कीनी, योगी योगन नाइ॥ पि० ॥१॥ सन्यासी
सन्यासन कीनी, वामण वामणी ला॥ पि ॥ रा-
,
१२७ झान वलास मसनेही रामकी प्यारी, यतिगण यतिनी जाय॥पिण॥ ॥अपने अपने मत पख गहेला, सहु नया बहु- राक्ष ॥ पि ॥ पण ना जाएं कोण हे साचो, अपनी तो जरमा ॥ पि० ॥३॥ दिव्य विचारें निज अनु. नवतां, जग पाखंम दिखा॥ पि० ॥ निधिचारित एक ज्ञानानंदनो, विमल वचन सतलाइ ॥ पि०॥४॥ ॥ पद सडशपमुं॥ ॥ राग रामग्री ॥ वालम वचन सुहाश् ॥ पिया श्रम वा ॥ पक्षपात नहिं दिव्य विचारें, निज अ-- नुनव दिखला॥पि॥॥इंडिय सुख विरमण यति कहिये, दश यति धर्म धरा॥ पि ॥ नव उद वि- गन संवेगी कहियें, योग चरण जे योगी ॥ पि० ॥ चारित्र नाव सन्यासी जानी, बरामन बरम गुण नोगी ॥ पि ॥२॥ साहिब रमण ते रामका प्यारा, एक रूप सहु ना ॥ पि० ॥ निधि चारित्र ज्ञानानंद अनुनव, ध्यान समाधिसुहा॥ पि॥४॥ ॥ पद अडशठमुं॥ ॥ राग रामग्री ॥ नारी प्रेम निवारो, साधो ना- ३ कुटिला नारि निवारो ॥ सा ॥ टेक ॥ कुटिला- झानविलास नारी योगें साधो, तुम गति चल दिसी फेरो ॥ सा ॥ ते तुम मोह मदपान कराक्ष, श्तजत कलह विखेरो ॥ सा ॥१॥ निर्जर पण एहनी थाह न पामे,नूपर पंमिता जाणो ॥शाणीके पगतल लोटे, इंसादिक परमाणो ॥ सा०॥२॥ नारी प्रेम विलू) ढोलो, नहिं क्युं समजे घेलो ॥सा॥ तिनतें नव निधि चारित संगें, ज्ञानानंदमें खेलो ॥ सा॥३॥ ॥ पद अगनोरमुं॥ ॥राग रामग्री॥ नारी प्रेम लगावो, साधो नाई, नानी नारी रमावो ॥ सा॥ टेक ॥ण संयोगें योग जगावो, सहज शक्ति शुज जावो ॥ सा० ॥ निज परजावने देखे योगी,हणजर अंग लपटावो। सा ॥१॥ अविनाशी अकलंकता तुम गुन,तेहिज शुन श्राचारो।सा॥ जम पुगल इन नावसे न्यारा, एदनी ममता वारो॥सा॥२॥ महोटा सहु योगी पण वंडे, एहनो संग सुखकारो ॥सा ॥ निधि चा रित ज्ञानानंद प्रेमें, खेले नारीप्यारो॥सा०॥३॥इति॥ ॥पद सीतेरमुं॥ ॥ राग रामग्री ॥ श्रनुजव योग रमावो, साधो + १३० ज्ञान विलास नाश, निजघट अंतर नावो ॥ सा॥ टेक ॥ मेरा तेरा कहा करतहे, नहिं कतु तेरा जावो ॥ सा ॥ जग जन किरिया कहा दिखलावे, कहा जग जन समजावो ॥ सा ॥१॥ निज निजमत पख हर- ता वारो, अंतर नाव विचारो ॥ सा० ॥ हालाहल अज्ञान निवारो, ज्ञान सुधारस धारो ॥ सा ॥२॥ तत्व विचारें प्रेम लगावो, निजगुण विमल निपावो॥ साण ॥ नवनिधि चारित प्रेमें श्रादर, ज्ञानानंद र- मावो ॥ सा० ॥३॥ इति ॥ ॥ पद कोतेरमुं॥ ॥ राग जंगलो ॥ तुम सखि निरखोरे वा, सो- तमी लेग श्रम वालमवा ॥ तु ॥ टेक ॥ आगे आगे पिया चलतहे, पावें सोतमी बा ॥ दासी प- ण बे तेहनें साथें, कुटिला चित्त लोजाइ॥तु॥१॥ श्रमने लक्षण एहवो दीसे, वालम गये जरमा ॥ मोद नूपतिके जालें श्रटक्यो, अव नहिं निकले बार ॥तु॥२॥ क्रोधादिक तेहने रखवाला, कोट विष- य पुःखदाय॥ तेहने चनदिसि सात बिसनहे, अहोनिश लंपट सांई ॥ तु० ॥३॥ दासी युत कु ज्ञान विलास १३१ टिला तिन पासे, रमण करे चित्त लाश ॥ मदिरा पाने तेमतवालो, विकथा चउ बतलातु०॥४॥ 'ग्राहक व्यापक जोगें लंपट, सुख বিলাল सुहा॥ संसृति संग सहु अपनो जाने, विगमे काल सदा ॥ तु ॥५॥श्न अवसर निधि चारित्र निरखे, ज्ञानानंद सहा ॥ जोले पंखीका देख तमासा, गु- ए संवेग रमा॥ तु० ॥६॥ इति ॥ ॥ पद वदोत्तेरमुं॥ ॥राग जंगलो॥धीरज धारोरे वा, सांजल खा- मिनी वाणी सखी कहे ॥धी० ॥ टेक॥ समता स- खी पियु निरखन चाली, बागम मंत्री नाइ ॥3. र्धर चार सुलट संग सेश, गम गम निरखा ॥ धी० ॥१॥ निरखत निरखत मोहके वाडे, श्रा गुपत रहा ॥ श्राप सखि ए चार सुनट युत, तेह- ने पासे गश्॥धी० ॥ ॥ श्रागम मंत्री गुपत र- हीने, अवसर नाव जनाइ ॥अपनो अपनो दाव विचारे,ततपर कारज जाय ॥धी॥३॥ मोहनो प. रिकर धागम निरखी, सघसा चित्त चमकाई ॥ धर्म राजको परिकर निरखी, नाग राहु नकनाश् ॥ १ - ܕܬ 1 १३२ ज्ञान विलास धी० ॥ ४॥ सुमति श्रागम मंत्री साथें, वालूमो नि- कसा ॥ हरखें श्राव्यां निज घरमांहें, राणी मेल करा ॥ धी० ॥ ५॥ तिन अवसर निधि चारित्र श्रादर, झानानंद रमाइ ॥ अनुभव प्याला प्रेम म- साला, रंगें पान करा॥धी॥६॥इति ॥ ॥ पद तहोंतेरमुं॥ ॥राग जंगलो ॥ तुम किदां चाट्यो रे सांश, तुम साथें हुं योगन न श्रव ॥ तु॥ टेक ॥ तेरे खात- र हम घर बांडी, थारे संग चित्त ला॥ किन पर हमने गंभिके चाले, केसे प्रीत लगाइ॥ तु॥१॥ किन कारन अमने पुःख दीनो, काहे कुं घर मूका- ३॥ घात विश्वास करे कहा मोसुं, कुणने पुकारु जा ॥ तु ॥२॥ सांइ कहे श्रम घरकी याही, रीत पुरानी जा॥ जवलग तेल दिपकमां बाती, तबल- ग श्रम तम ना॥ तु० ॥३॥ इतनी कहकर सांश चाल्यो, अपने गम सुहाइ ॥ अनुपम नवनिधि चा- रित्र श्रादर, ज्ञानानंद रमा॥ तु ॥४॥इति ॥ ॥ पद चम्मोतेरमुं॥ ॥ राग जंगलो।।मुनि तम निरखोरे जा, जाति- झानविलास १३३ नाव न तजा॥मुणाटेक॥ जे केश गंगानिर पखाले, काली ऊरण लाइ ॥ विविध जांतकर महनत कीनी, 'तोपण सित नहिं जाइ ॥ मु०॥१॥ कर्त्तानी ति- हां बुधि नहिं चाले, नहिं औषध गुण लाइ ॥ जा- तिरंग तेहनो नहिं पलव्यो, कहा करे चतुराई॥ मु० ॥२॥ तेहनी किरिया सघली फोकट, ज्ञान फो- कटता जा ॥ तिन कारण निधि संयम अनुजव, झानानंद रमाइ॥ मु०॥३॥ इति ॥ ॥पद पंचोत्तेरसुं॥ ॥ राग जंगलो ॥ श्रनुजव लावोरे योगी, निज घट मांहि रमावो ॥ श्र० ॥ टेक ॥ श्रनुजव झान जगतमें दुर्लज, अलप संसृतिने जा ॥ उर्जव्य अन्नव्य जीवने, थनुन्नव नांही लहा॥०॥१॥ कमवी तुबमी कोसों जटकी, श्रमशठ तीरथ न्हा. ३॥ तोपण तुंबडी कटुता न गंडी, कहा तीरथ फरसा ॥१०॥२॥ तिनतें निजघट अंतर निर- खो, अनुजव शैलि सुहाइ ॥ तनमय नवनिधि चा- रित्रयोगें, ज्ञानानंद लहा॥ १० ॥ ३ ॥ इति ॥ ॥ इति श्री ज्ञान विलास संपूर्णः ॥
१३४ संयम तरंग ॥अथ। ॥ ॥ श्रीसंयम तरंगः प्रारभ्यते ॥ ॥ पद पहेलु॥ ॥ राग नेरव ॥ योगनंद श्रादरकर संतो, अरुण पुति लय लावो ॥ यो ॥ टेक ॥ अंतर पटचक्र सो. धन करकें, वंकनाल कर नावो ॥ यो ॥१॥ चंड सूरज मारज जुग तजकर, सुषमन परवाह जानो ॥ कुंनक रेचक पूरक नावें, प्रत्याहार प्रमाणो॥ यो॥ ॥२॥धारण ध्यान समाधि सपतम, श्वास रोधन करतानो ॥ अनुपम अनहद धनी अनुयोगें, सोहं सोहं गानो॥यो॥३॥सोहं सोहं रटना रटतां, नव- निधि संयम नायो ॥ ज्ञानानंद परमातम रोचि, देखत हरख लहायो ॥ यो० ॥४॥ इति ॥ ॥ पद बीजुं॥ ॥ राग नेरव ॥ जग जन निंदडी तजकर संतो, योग निंद संजारो ॥ ज० ॥ टेक ॥ नाना लबधि निधाननुं थानक, सकल संपद श्राधारो ॥ ज ॥
संयम तरंग १३५ ॥१॥ विविध विषमय देखि नवि श्छे, निर्लेपी वी- -तरागो ॥ शत्रु मित्र समजाव रहे नित्य, दरढासन ध्यान जागो॥ ज०॥२॥ योग निंद लय नावें जि- नने, कोइ न करे अपगारो ॥ मीत समान सेवे ज- सुरिपुगण, वचन फले जगसारो ॥ जण ॥३॥ तसकर श्वापदनो जसु नवि नय, पंचविजय लहे सारो ॥ निधिचारित ज्ञानानंद श्रादर, परमानंद निहा- रो॥ ज॥४॥ इति ॥ ॥पद त्रीजुं॥ ॥राग नेरवी ॥प्राणपिया तम ऐसी सवजी पी- वोरे ॥ प्रा० ॥ टेक ॥ निज सुन परिणति अनुपम सवजी, तिखीमरी विवेक लेवो रे॥ प्रा० ॥ तत्त्व वि- चार विविध सुमसाला, उपसम कंकर कूमी मेवो रे ॥ प्रा० ॥१॥ कुटिल निवृत्ति समता प्रेमें, संयम रगडा ताणो रे ॥ प्रा०॥ धरम शुकल पय सुरजीस- र केरा, संवर साफ गुठानो रे ॥ प्रा० ॥२॥ श्र- नुनव ज्ञानका रतन पियाला, नर नर समता पिला- वे रे ॥ प्रा० ॥ निधि चारित्र ज्ञानानंद योगी, पी. बत ध्यान लगावे रे ।। प्रा० ॥३॥ इति ॥
१३६ संयम तरंग ॥ पद चोथु ॥ ॥ राग नैरवी ॥ गगन मंडलगत परम अरुण रुचि नायो रे ॥ गण ॥ टेक ॥ चंद कहुं तो चंदन निरखं, तरणि पिण न जनायो रे ॥ ग ॥ तेल सि- खा बिन दीप न निरखू, जगमग रुचि सुखदायो रे ॥ ग॥ १॥ धन समीर परमुख उपाधि, रहित रु- चिर दरसायो रे ॥ ग ॥ सब जग व्यापी पांचहि जाते, पण नहिं नाव रमायो रे ॥ ग॥२॥ पंडित योगी सघले थाके, निज हठ पख लपटायो रे ॥ गण ॥ श्रापहिं निरखे श्रापहिं जाने, सहज समाधि जगायो रे ॥ग ॥३॥ तव घर घरकी जरमना मे- टी, सहज रूप परखायो रे ॥ गण ॥ निधि संयम झानानंद योगी,ज्योति निरख हरखायोरे॥ग ॥४॥ ॥पद पांचमुं॥ ॥ राग वेलावल ॥ निज परिणति चित्त धारियें, पर परणति तज सार॥नि टेक ॥ जवलग रहे पर परिणति, तबलग नव वम धार ॥नि॥१॥अपनी पूंजी लख नहि, कुमता संग चित्त खोल ॥ राजपूत होय परमते, ते कायर सममोल पनिणा॥ किंपाक संयम तरंग १३७ फलसम रूप रेह, जवसंग सुख जेह ॥ अंतर हा- लाहल लही, पुर्धर छुःखद लगेह ॥ नि ॥३॥ काचखंड तुं वांडदे, चिंतामणिकुंजील ॥ नवनिधि संयम श्रादरी, झानानंदे हील ॥ नि० ॥४॥इति । ॥ पद उहुं॥ ॥ राग वेलावल ॥ पर परिणतिकुं तज करी, निज परिणति लहे सार ॥ प०॥ टेक ॥ निज परि- णति कर जस सहे, जनय लोक सुखकार ॥१०॥२॥ मुंगी होय जिम इलिका, मुंगी सर अनुराग ॥ अर- नी अगनी परगटें, पय गत सर पिष जाग ॥ प० ॥ ॥२॥ जिम शशिथी अमृत लहे, पारस कनक विचार ॥तिम निज परिणति आचस्यां, सहजें पर- संगवार ॥ प० ॥३॥ समता संग रमण करे, चार सखियुत तेह ॥ नवनिधि संयम तनमय, झानानं- द सुख गेह ॥ १०॥४॥ इति ॥पद सातमुं॥ ॥ राग काफी॥ चेतन तुं क्यों फरे नूला, हिमो- खा करमका फोला॥ए चाल ॥साधो तम निजघटमें देखो, मत पख हपता नहिं पेखो ॥ सा० ॥ चेतन A १३७ संयम तरंग ॥ विनाव दे सबद्दी, अपनो न गंड हे कवही ॥ सा ॥१॥ को प्रकारें नहिं देखो, उपर वीजको देखो॥ रासन गंगाजल धोयो, तोपण लोटे उ- कडायो ॥ सा ॥२॥ सूकर पायसकुं ढमी, श्र- शुचि जोगें जे मंमी ॥ मधु घृतकर सींचो तवहीं, नींब न मीगे होय कवहीं ॥ सा ॥३॥ ज्ञानी ध्यानी के वेषी, निजमत पखपातें पेखी ॥तिनतं अनुभव झानानंदें,सुनजो चारित्रश्रानंदें॥सा॥४॥ ॥पद आठमुं॥ ॥ राग काफी ॥ देखो प्यारे सब जग कलही, नहिं को शांति मूरत पेही ॥ दे॥ मुनिजन उपसम गुण धारी, कलही कोप कारण सारी॥ दे ॥१॥ सेकुं तसकर सहु गावे, तसकर सेठ करी लावे ॥ सतवादीकुं कहे कूमा, मिरखाकुं सत कहे मूंमा ॥ दे ॥५॥ कमल प्रन सूरी जानो, श्रुति दृष्टांत कहे मानो॥ तिनतें निधि चारित धारी, नजो झा- नानंद अधिकारी ॥ दे ॥३॥ इति ॥ ॥पद नवमुं॥ ॥ राग काफी॥सब जग जन अपनी ताने, जिहां ॥
संमय तरंग
१३ए
कोश्न परमाने ॥स० ॥ टेक ॥ जे कोश परमानकू
प्रबे, तानातानी कर हु ॥ सा ॥१॥ गीतारथनी
नहिं माने, कहीएतो पाखंग सहु जाने ॥ श्रुति गत
साची नहिं जावे, जग जन कूड सङ नावे ॥ सा॥
२॥मतवाला श्रम बहु मलिया,नहि कोश्परमार्थी क
विया ॥ तिनतें निधि संयम चित्ते, जजे झानानंद
सुख नित्यं ॥ सा ॥३॥इति ॥
॥ पद दशमुं॥
॥राग काफी ॥ मतलबियो जग जन देखो,
को उपगारी नहिं पेखो ॥ म ॥ टेक ॥ उनियां
पटुतर स्वारथकी, पाठ न पूछे परमारथकी। म॥
१॥ गत यौवन निःसनेही, तरुणी पण विषयी न
रेही ॥ जोजन पाडे नहिं जावे, अमृत पण कांजी
कुण खावे ॥ म ॥२॥ एह विचारें मुनि समजो,
पर उपगारक गुन बूजो॥ अनुपम निधि चारित पावो,
(जिम ) निर्मल ज्ञानानंद नावो॥ म॥३॥इति ॥
॥ पद अगीआरमुं॥
॥ राग फाग ॥ इमरी चुनमी किन वोरीरो लो-
गों ॥ ए चाल ॥ श्रबलानी ग वात सुनो पिया, ऐसी
१४० संमय तरंग योगतें कुमकुम न खेलो होरी रे ॥ १० ॥ टेक ॥ तुम न्हानी वहू सखि संयोगें, जमतवाली दोरी रे ॥०॥ कुटि- ला साथें तुमें पण पहोता, मदनवागां खेली होरी रे॥१०॥ १॥ अविरतनां पकवान जिहां तुम, हरखे जोजन जोरीरे ॥ १०॥ मिथ्या नाव गुलाल उमाइ, फोरी रे ॥श्रम ॥३॥ इंडिय विषय जिहां रंग पिचकारी, मोहराजकी जोरी रे ॥ १० ॥ चार कथायें तुं मतवालो, रंग मचायो होरी रे ॥श्र० ॥३॥ ऐसी होरी खेली तोपण, तृपत न न ते गोरी रे ॥ ॥ ग्यारमी नूमसें तुमने नाखी, लेग खेलन होरी रे ॥१०॥ ॥४॥ अबतो पिया मन मांहे समजो, नारी वचन चित्त जोरी रे ॥ १०॥ जिम चारित्र युत ज्ञाना- नंदें, नवनिधि पामे दोरी रे ॥ श्रण ॥ ५॥ इति ॥ ॥पद बारमुं॥ ॥ राग होरी॥होरी खेले कानहिया॥ मेरो अब केसे निकसन होय दश्यां ॥ एचाल ॥ होरी खेले वालमिया, मेरो अब केसे जावनो होय दश्यां । हो ॥ टेक ॥ पंच महाव्रत वाघा पहेरी, शील वि- %D समय तरंग १४१ नूखन से सश्यां ॥ ज्ञान गुलाल अबीर उमाकुम- कुम शांति जरे सश्यां ॥ होग॥१॥ संयम रंग सुरंग जरीने, पिचकारी आगम से सश्यां ॥ समता साथै सुमति गुप्ति सखी, होरी खेले ताथश्यां ॥ हो॥ ॥२॥ शुज समकित पकवाननुं जोजन, चेतन हर- ख धरे सश्यां ॥ निधि चारितयुत ज्ञानानंदें, निज- गुन होरी वरे सश्यां ॥ दो० ॥३॥ इति ॥ ॥ पद तेरमुं॥ ॥ राग तुमरी ॥ पर विकथा तुं कहा करतहे, अपनी न काह विचारतहे रे ॥ १० ॥ टेक ॥ जग- में पर विकथा कर संतो, ज्ञान ध्यान विगमावतहै रे॥१०॥ १॥अपनी विकथा काह न धारे, पोते पुरित जरावतहै रे ॥ गर्दा संयम दिव्य विचारे, अंतरजाव दिखावतेहै रे ॥ ५० ॥२॥ जवलग अपनी कथनी न जाने, कहा उपदेश सुनावत है रे॥ निधि चारित्र झानानंद निजपद, काह न चि- त रमाक्तहे रे ॥ प० ॥ ३ ॥ इति ॥ ॥ पद चोदमुं॥ ॥ राग तुमरी ॥ गगन प्रदेश रसास काम इग, १४२ संयम तरंग नन परमित जसु गया रे ॥ ग० ॥ टेक ॥ तिनपर अरुण प्रन गज मैथुन, करत कलोल सुनाया रे ॥ गण॥१॥ ताद जामको पान चुगत दे, अनादि अनंत तसु संगें रे ॥ ता नीचे एक रहत मरगवा, खाधो गज निज रंगें रे॥ग ॥२॥ गरदन मित जसु बाहर दीसे, कैसें जीवन वंडे रे ॥ कालांतर तेहथी गज जायो, मृगहन नरपति लंबे रे ॥ गण ॥३॥ जिन दिन जे गज नरपति जाने, अपनो खोज ग- मावे रे ॥ तव निधि चारित्र ज्ञानानंदें, मातंग था- सन पावे रे ॥ ग ॥४॥ इति ॥ ॥पद पंदरमुं॥ ॥ राग सोयनी॥ दीपक होत उजियारो ॥दी॥ टेक ॥ बिन दीपक मंदिर अंधियारो, केसे करे रु- चियारो ॥ दी॥१॥ घोर घटायें रयण अंधारी, जान न पदारथ सारो ॥ दी॥॥जमजम योगें ए. कत परिणति, निजगुण दीप वीसारो ॥ दी ॥३॥ बिन दीपक चेतन जयो पशुपर, खनाव विनाव सधारो ॥ दी ॥४सबजग तप जप किरिया विरथा, बातम अनुजव धारो ॥ दी० ॥५॥ बिन ॥
संयम तरंग २४३ अनुजव अंधक नर ढूंढत, अनुनव दीप जगारो॥ दी० ॥ ६ ॥ तातें अवधू मत ठहराणी, झेय ज्ञान सुविचारो ॥ दी॥७॥ तेहथी निधि चारित रिधि पामी, ज्ञानानंद निहारो॥ दी० ॥ ७ ॥ इति ॥ ॥ पद शोलमुं॥ ॥ राग सोयनी ॥ प्यारी नेह लगारो ॥ प्या॥ टेक ॥ बिनप्यारी घर घरमें नटकत, कायर नाव दे- खारो ॥ प्या० ॥ १॥ कुमतियोगें चार नगरमें, विविध रूप विसतारो ॥ प्या० ॥२॥ पांच जातका वेस पहराया, निजप्यारी विन हारो ॥ प्या॥३॥ तेवीस विषयके फंदमें नाखी, पापथान विलगारो ॥ प्या ॥४॥ हास्यादिक वज्र कोटें घेख्यो, निजसु- ध बुध बिसरारो ॥ प्या० ॥ ५॥ तिनतें प्यारी युत निधिचारित, ज्ञानानंद लहे सारो ॥ प्या० ॥६॥ ॥ पद सत्तरमुं॥ ॥ राग वरुवा ॥ एक समीरका सहर बना हे,श्र- दलूत पंच बाजार तना हे ॥ ए॥ टेक ॥ दस मार- 'ग दसही दरवाजे, चन थासा चल नगर विराजै ।। एते॥१॥तेवीस वसंत जिहां नितप्रति दीपे, खेत RA 399 संयम तरग देत सब जगकुंजीपे ॥ ए॥ थाना जाना एकही कालें, एक विना रहे नगर विचालें ॥ ए॥२॥ एक दरवगत नित्य अनित्यें, चटपट नाव वसे सब- चित्तें ॥ ए०॥ जिन दिन सघलो खोज गमावे, तो निधिचारित्र झान निपावे ॥ ए॥३॥ इति ॥ ॥ पद अढारमुं॥ ॥ राग वरुवा ॥गुरुगम अनुजव शैली धारो, इस पदका निर्वाह बिचारो ॥ गु०॥ टेक ॥ सरव समर रवि रुचिकर हीना, विविध स्वापदयुत गहन वि लीना ॥गुण॥१॥ काला मिरगा निज बल वन राजा नितप्रति राज अखंड समाजा ॥ गु० ॥ निर्दय नि ज वैरीगण मारे, मास विना न नखे खिन सारे । गु०॥५॥ चक्री हरिबल परमुख जोधा, पिण मि रगा नवि वस किया सोधा ॥गुण॥ तेहने पिन मिरर खिन जख कीधा, कुन समरथ वस करने सीधा । गुम्॥३॥ श्रमर बिरुद दरवें जग धारे, मरन जीव न नवि बेहुं सारे ॥ गु० ॥ गदिन हरिथी नपुंस क जायो, अनंतवती पिण नहिं तोलायो ॥ गुण। ॥४॥ एकहि घातें मिरगने मारयो, कंठी रवनो संयम तरंग १४५ राज सुधास्यो ॥गु०॥ तव निधिचारित्र कमला संगें, पहै निर्मल ज्ञानानंद रंगें ॥ गुण ॥ ५॥ इति ॥ ॥पद उंगणीशमुं॥ ॥ राग जंगला ॥ ज्ञान विचारो रे जा, गुरुग- म शैली श्रादर संतो ॥शा॥ टेक ॥ गगनमंडल ग. त विविध तूर धनी, घोर स्वरेकर वाजें ॥ पाथोरण बिन धनाधन वरसे, गिरीषम तापसमाजै॥ज्ञा ॥ ॥१॥ यामें रहत बतासा कोरा, वजर गलै गता- ने ॥ वासर विन अरुण प्रज जासै, तेजें फलहल ना- ने ॥हा॥२॥ मानस नहिं जिम मानस मेला, निरखत सहै श्रानंदें ॥ निधिचारित ज्ञानानंद प्रे- में, रमण करे सुखकंदें ॥ज्ञा० ॥३॥ इति ॥ ॥ पद वीशमुं॥ ॥राग जंगलो ॥ ग्यान विचारो सांई, फटपट अनुजव प्रीत लगासी ॥ग्या॥ टेक ॥ जीर्ण कुटीयें चंपाथेगस, कां लग वास रहासी ॥ धनाधन वरस- त तटनी पूरे, श्रापोआप वहासी ॥ग्या ॥१॥ तातें श्रवधू चारने वरजी, निज सासू बतलावो ॥ चार पांच सखि वरगें हिल मिल, मोकुं हिरदय नावो ॥ १० P- १४६ संयम तरंग , ग्या० ॥२॥ श्रष्टादस विध नोजन जिमो, तिरिवे- णी जल न्हा ॥ पत्रिम पावड साला मारग, बार उ. घाडो सां ॥ ग्या॥३॥ विविध वाजिब धनि सां. जल निरखे, मुगताफल तरुसां ॥तव निधि चारित्र ज्ञानानंदें, नाचे हरख जरा ॥ ग्या ॥४॥ इति । ॥ पद एकवीशमुं॥ ॥ राग तिवाना ॥ जोगीयासें यारी कीनी हो, ज्ञान दिनंदा ॥ जो ॥ टेक ॥ ज्ञान दिनंदा विजु- वन चंदा, तटनी तटनि वसंदा, बरम नाव कबोट धरंदा, घाती जसम विपंदा ॥ जो ॥१॥ सादि सांत दृढ श्रासनधारी, सुं निज परिणति नायी। ज्ञेय मसाला प्रेमका प्याला, योग नींद लय लायी। जो॥२॥ तत्त्वविचार जटा वधारी, अनहद धुनि चित्त लाइ॥ निधिचारित्र सुन नंद मचका ॥जो ॥३॥इति ॥ ॥ पद बावीशमुं॥ ॥ राग तिवाना ॥ गगनें घन निरखानी हो, हर- ख खहानी ॥ गण ॥ टेक ॥ तिहां शुचि इग अमि. सर निरखानी, परमानंद निसानी ॥ तट मुगताफ- सेजें प्यारी, ज्ञाना-
संयम तरग
१४
ख तरु सोजानी, फल फूल साख न जानी हो ।
ह० ॥ ग ॥१॥ हेवें योगी वैस्यो ध्यानी, गता-
गति कोइन जानी ॥ गरजारव चपला पुति मानी,
किरमिर वरसे पानी हो ॥ ६ ॥ ग ॥२॥ सुगुरें
खाया मोतीपानी, अजरामर दरसानी ॥ निगुरे नूख
तिरिषा परिमलानी, नहिं पामे गुण खानी हो ।
ह० ॥ ग ॥ ३॥ आपहिं निरखे श्रापहिं जानी,
श्रागल कहा वखानी॥निधि संयम ज्ञानानंद योगी,
अमिवस रहे सहलानी हो ॥ह ॥ग॥४॥इति ॥
॥पद त्रेवीशमुं॥
॥ राग मल्हार ॥ पिउ मेरा निजघर आवै रे॥
पि० ॥ टेक ॥ वालम तुमनणी कुटिला निसिदिन,
पर घर घर नटकावै ॥ सानपरें निर्लज गुण श्रादर,
रंकनाव दिखलावै रे ॥ पि ॥१॥ कवन खोट
निजघरमें वालम, धन कोगर धरावै ॥ सेजें सुख
मुज साथे लोगो, जिम मन वंबित पावै रे ॥ पि०॥
॥५॥ राजा सांजल मोह नृपहनसें, थाशे बहुत
खरावी ॥ पिउ तातें कुटिला संग वरजो, घरमें वै-
सो सिताबि रे॥ पि० ॥३॥ इतनीसांजल या मुफ
२४ संयम तरंग %D घरनी, निदचै तेदने जानी ॥ निधि संयम ते वानी धारी, झानानंद बिलसानी रे ॥ पि०॥४॥इति ।- ॥ पद चोवीशमुं॥ ॥ राग मल्हार ॥ मेरी तुं मेरी काहाडरे ॥ मे ॥ टेक ॥ मेरी प्यारी गुण गण नूषित, हिरदय हा- रपरे ॥ तुजविन नांहिं रहुं किण गमें, जिम शिव सगति चरे रे ॥ मे ॥१॥श्म पियुवाणी सांजल महिषी, परम परमोद वहै ॥ दंपति मिलकर सेजें बैसें, अंतर तत्व गहै रे ॥ मे ॥२॥ अंगो अंग फरसन कर प्रेमें, घन मुगतिक वरसावै ॥ तव नि- धि संयम ज्ञानानंदें, शीतल नाव निपावै रे ॥मे॥३ ॥पद पच्चीशमुं॥ ॥रागी गोमी॥ निजधन काह गमावै ॥ संतोनि- ज० ॥ टेक ॥ बोए काम बंबूलके तैनें, आंब कहांसें खावे ॥ वेलू पीलत तेल न नीकलैं, मूरख जग कद- लावै ॥सं॥॥ कोपी फणिधर रिजुता न पामे, तीम जमवंस निहालो । सेलडी गांठें रस नवि पामे, खं- जन सेत न जालो ॥सं॥॥ अनुपम दूधे साप खि- लावै, हालाहल होय जावै ॥ घनथी पिन मगसिल सयम तरग १४ए नवि नीजे, निवडे मधूता न पावै ॥ सं० ॥३॥ एह -विचार करी ना संतो, निधि चारित्र रमावो ॥तव झानानंद पद अनुजवतां, कमला सहज निपा- वो ॥ सं॥४॥ इति ॥ ॥ पद ग्वीशमुं॥ ॥राग गोमी॥ तनमय सदागम सेवो ॥ श्रव- धू ॥ त ॥ टेक ॥ जवलग सदागम सेवन नांहि, पखपातें लपटेवो ॥ रतन पुंज पाहन सुत जाने, चंदन इंधन सम देवो ॥ श्रम ॥१॥ मोटे मोटे पा- हन तरुवर, रतन चंदन दिखलावे ॥ रासन कूतर हय गज मोलें, लेवे ते मूढ कहावै ॥ १० ॥२॥ रतन कंवल वलकल चीवरसम, चर्वण घृत पूरमा- ने ॥ सकस वसतु ग मोल चलावै,खोट साच न- वी जाने ॥ १० ॥३॥ श्रन्याय पूर जन पदमें रद- कर, क्युंकर साज गमावो ॥ तेथी निजघर संय- म आदर, ज्ञानानंद रमावो॥ ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥पद सत्तावीशमुं॥ ॥ राग विहाग ॥दमक सान संग वारो॥संतो॥ हा ॥ टेक ॥ पवनवेग निज हय पर चढकर, कुंत + १५० संयम तरंग कृपाण शरधारो ॥ कूतरा कूतरी दासी इनकर, वजरें नूधर पामो ॥ संग ॥१॥ विषहर अमृतपान संयोगें, निर्विष नाव वधारो॥ सदागम संयम धर नृप था- ना, निखिलपुरें वरतारो ॥ सं० ॥ २ ॥ जवलग ती- नो हमक न मारे, दरशन नाण न पावो ॥तेद वि. ना संयम पिण नाहिं, साध्य सिकि किम नावो ॥ सं० ॥ ३ ॥ साधक सुन साधन नवि पामें, तेहथी हमक निवारो ॥ निधि सयंम ज्ञानानंद अनुनव, परमानंद सुख धारो॥ सं० ॥ ४ ॥ ॥ पद अहावीशमुं॥ ॥ राग बिहाग ॥ हमक सान संग नावो॥श्रब- धू ॥ ह ॥ टेक ॥ जिम जिम निर्मल धनाधन व- रसे, महि नवपद्धव रावों,तिम तिम हमकिय वायु विकारें, थहनिस हरक सरावो ॥॥१॥ काली कुतरी पण बे तेहवी, सरिखो जोग मिलायो। नि- जमति जोगें गिरिवर चढियो, जाति संगति टला- यो ॥ अ० ॥ २॥ नृपविन नृपनिति ते चलावे, जग जन मान न माने ॥ तेदने गुरु जन हित बतलावे, तोपिन थान न जाने ॥ अ०॥३॥ दनक हमक ब- +..
संयम तरंग १५१ हु मसे जग जनने, नगरें अपजस गावे ॥ सन्मुख -विष्टायें पाइन नाखे, पोतें अशुचि जरावे ॥१०॥ ॥४॥ पखपाती श्रुति निति विलोपी, चामना दा- मना चलावे ॥ तेहथी निधि संयम झानानंद, सु- धारस अनुजव पावे ॥ श्र० ॥ ५ ॥ इति ॥ ॥ पद उंगणत्रीशमुं॥ ॥ राग कल्यान ॥ ऐसी तुं कली उमाश, संतो ॥ ऐ० ॥ टेक ॥ ममता सूतरमो लेकर, तृष्णा मांज लगाइ ॥ सं ॥ १॥ कुतूहल रंग विरंग तुकली, मूर्ग तीली सुहाइ ॥ विविध माया धनुष जाके, लटकन मिथ्या लहाइ ॥ सं० ॥२॥ कुटिल प्रवृत्ति पवन वरतें, गगने शेप वधा॥ कोक लेकर मोर लीनी, न- यन विषय वरधा॥सं॥३॥ कापत कापत थाप वध गये, परजावें हरखा ॥ तिनतें ज्ञानानंद नवनिधि, बेसेही संयम नाइ ॥ सं० ॥ ४ ॥ इति ॥ ॥ पद त्रीशमुं॥ ॥ राग कल्यान ॥ ऐसा पतंग चढाइ, संतो।। ऐ०॥ टेक ॥ ध्यान पतंग वर ज्ञान चित्रित, संयम मोरी खगा। संच॥ १॥ मरुदंग पदमासन घर १५ सयम तरग कर, खेचरी मुजा धार ॥ सूखम पवने गगन मंग- ल गत, दृष्टि पतंग पर सार ॥ सं० ॥२॥ गुण श्रे- णी गत कोक टालो, अप्रमत्त नाव वधार ॥ सहस पर थकत थिति खय, जग जस सूर विचार ॥ सं॥३॥ सकल पररिधि काप संतो, वीर प्रमोद नराय ॥झानानंद नवनिधि संयम, नाचै निरख हरखाय ॥ सं० ॥४॥ इति ॥ ॥ पद एकत्रीशमुं॥ ॥राग कीकोटी जंगला॥ श्रनुजव रस गत माती, रंग राती ॥था टेक ॥ गगन मंगलगत ग श्रमि सरवर, निरखत प्रमद जराती ॥ ता तट ग मुग- ताफल तरुवर, निकलंक फूल फल नाती ॥ २० ॥ ॥१॥ मुगतक श्रमिजल खावत पीवत, रंग खुमा- र घुमाती ॥ रं० ॥ श्रह निशि शशि रवि करत वि- कारा, पुर्धर तिमिर हराती ॥ रं ॥२॥ अनहद धुनि संग शंकर नाचे, निस्पृह नाव रमाती॥ २० ॥ निधि चारित्र ज्ञानानंद रंगें, गावत नाटक रा- ती॥रं ॥३॥ इति ॥
संयम तरंग ૫૨ ॥पद बत्रीशमुं॥ ॥राग किंकोटी जंगला ॥ विरथा जनम गमाया, योग न जाया ॥ वि० ॥ टेक ॥ जगमें पहेले हमही जनमे,मात जनक पडे जाया ॥ विणा मामा मामी नाना नानी, पडे गुरुजाइ रमाया ॥ वि० ॥१॥ जग समफन या केम समझाइ, मो मन नांही रमाया वि०॥ चेखेने निज गुरु जनमाया, गुरुने शीस न- नाया ॥ वि०॥शा पहेले योगी पाने जोगी, अना- दि अनंत नोगाया वि०॥श्रापहिं मात जनक गुरु चेला, जगमांही जरमाया ॥ विण ॥ ३॥ पाहन वा- इन बेसी थूके, अंधो अंध चलाया ॥ वि० ॥ तिन- ते संतो निधि संयमयुत, ज्ञानानंद सुहाया॥विधा ॥ पद तेत्रीशमुं॥ ॥ राग चावक ॥ वालमियारे, विरथा जनम ग- माया ॥टेक॥ परसंगत कर दसदिसि जटका, परसें प्रेम लगाया। परसें जाया पररंग जाया, परकुं नो- ग लगाया रे॥ वि०॥ माटी खाना माटी पीना, माटीमें रम जाना ॥माटी चीवर माटी नूखन, माटी रंगसो नीनारे ॥ वि०॥२॥ परदेशीसे ना- , ॥ रे॥ १५४ संयम तरंग तरा कीना, मायामें लपटाना ॥ निधि संयम ज्ञा- नानंद अनुन्नव, गुरुविन नांहिं लहानांरे ॥ वि॥३॥ ॥पद चोत्रीशमुं॥ ॥ राग चाबक ॥ योगिया रे, गुरु विन ज्ञान न नाया ॥ टेक ॥ पुर्धर केसरी बकरी जाइ, बकरी वाघ बंधाया ॥ बकरी चहुटे वाघ नचावे, देखेजन हरखाया ॥ गु० ॥ १॥ तुरिय वेग हय चाबुक योगें, नाग कुटुंब मसाया ॥ समय अनादें इतउत नटके, मम झायें जरमाया रे ॥ गु० ॥२॥ खिन- नर ज्ञानकी वात न जानी, अनुजव वासन नाया ॥ गुरु किरीया संयम ज्ञानानंद, चरण कमल लपटा. या रे ॥ गु० ॥३॥ इति ॥ ॥ पद पांत्रीशमुं॥ ॥ राग बसंत ॥ अचरज एक नजरगत श्रायो, ज्ञानी गुरु बतलायो ए॥ टेक॥ त्रिजुवनमें एक बाल कुमारी, बिरुद सति कहलाया ए ॥१०॥१॥ वि. न घरमां ग पलमें निपने, नंदन तिन सुखदायी ए ॥ रूप अनूपा चार दीकरी, ते पिन योगन जा ए ॥ श्र० ॥२॥ जेह जनक ते वखन तेहना, मात , ।
संयम तरंग १५५ विना जग जाया ए ॥ ते कया चिदानंदें परनी, योगी नाव रमाया ए॥ ॥३॥ सेजें दोन- नुजव रंगे, यह निसि प्रेम लगाया ए ॥ निधि संयम झानानंद योगी, गुरु किरिया दरसायाए॥०॥४॥ ॥पद ग्त्रीशमुं॥ ॥राग वसंत ॥ विविध तूर धुनि नन मंगलगत, ज्ञानी मुनि दिखलाया ए॥ टेक॥ चनविह घन शु- पिर तत वितत, घोर सरें संजलाया ए॥ वि०॥९॥ चंद सूरज परकास सुनावें, योगी साधन साधना र ॥ श्रनुजव तत्त्वसु झान खुमारी, कवहु न उतरे थाराधना ए॥विणा॥ तूर नहिं पन तूर धनि सुन, नवनिधि सहज निपाया ए ॥ संयम ज्ञानानंद लहे नव, नाचे हसे हरखाया ए ॥ वि० ॥३॥ इति । ॥ पद साडनीशमुं॥ ॥ राग किंफोटी ॥ रहो वंगलेमें वालम करूं तोहे राजीरे ॥टेक ॥ निज परिणतिका अनु- पम बंगखा, संयम कोट सुगाजीरे ॥ रहो० ॥ चरण करण संपतति कंगुरा, थनंत विरज थंज साजीरे ।। ॥ २० ॥१॥ सीतजूमी पर निर्जय मेले, निरवेद प- २५६ संयम तरंग रम पद लारे ॥र० ॥ विविध तत्त्व विचार सुख- मी, ज्ञान दरस सुरनि ना रे ॥ र ॥२॥ अह- निस रवि शशि करत विकासा, सलील अमीरस धाश् रे ॥र०॥ विविध तूर धुनि सांजल वालम, सादवाद अवगा रे ॥ र० ॥३॥ध्येय ध्यान लय चढीहे खुमारी, उतरे कबहु न रामी रे ॥ र ॥ सुन निधि संयम घरनी वाचा, झानानंद सुख धामी- रे॥ र ॥४॥ इति ॥ ॥ इतिश्री संयम तरंगः संपूर्णः ॥
श्रष्टपद। ॥अथ॥ श्रीजशोविजयजी कृत आनं- दघनजीनी स्तुतिरूप अष्टपदी। प्रारंजः ॥ ॥ पद पदेयूँ ॥ ॥राग कनडो॥ मारग चलत चलत गात, श्रा- मधन प्यारे ॥ रहत श्रानंदजर पूर ॥ मा० ॥ ता- को सरूप नूप, त्रिहु लोकथें न्यारो ॥ बरखत मुख पर नूर ॥ मा० ॥ १ ॥ सुमति सखीके संग, नित नित दोरत ॥ कबहु न होतही दूर॥ जशविजय कहे। सुनो हो थानंदधन, हम तुम मिले हजूर ॥मा॥२॥ ॥ पद वीजें। ॥ आनंद घनको श्रानंद, सुजशही गावत ॥ रह- त थानंद सुमता संग॥ श्रानंदन ॥ सुमति सखी ओरनवल श्रानंदघन, मिल रहे गंग तरंग॥यानं॥ ॥१॥ मन मंजन करके निर्मल कीयो हे चित्त,
१५६ २०
अष्टपद।
जसविजय जीलत ताके संग ॥ एरी॥३॥इति
॥पद आठमुं॥
राग कानडो ताल ॥ श्रानंदघनके संग
धा
॥ रामिले जव, तव थानंद सम नयो सुजस,
साद
चढ़ी हं पावे.लोहा जो फरसत, कंचन होतही ताके क
॥ श्रा० ॥१॥ खीर नीर जो मिल रहे थानंद जर
सुमति सखीके संग नयो हे एकरस ॥ जव ख।
सुजस डास, नये सिक खरूप लीये धस ।
सन पावन
॥ति
मानंदघनजीन
स्तुतिपक ॥ श्रनिदै गर्णा ॥
समाया ॥
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इतिश्रा कोज श्रानंद तथा विनय
विलास श्रने ज्ञान विलासाख्य
रागमाला समाप्ताः
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१५
ලම මම ලග ලගම
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