Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shrimaddhishagvaryagdadhartanyavagsen

Das,khemraj Krishan · 2011/04

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। ----- "Hi: Lit (अपिल देवप्रधानां शिगंभूषणः) श्रीमद्धिपग्वयंगदाधरतनयवङ्गमेन- .....वितुपा विरचितः । गगहानामा नाम भाटीया नमनः । - खमगन श्रीमान अगिः समान "श्री":":. : मुंग -- .. - ० ० । . ० ० :.. Pun : कविवर श्रीलालाशालिग्रामजी वैश्य। पुस्तक मिलनेका ठिकाना- तथा- खेमराज श्रीकृष्णदास, गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेंकटेश्वर" प्रेस-कल्याण- "श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेस-मुंबई. मुंबई. यह पुस्तक खेमराज श्रीकृष्णदासने बम्बई खत्याडी ७ वी गली खम्बाटा लेन निन 'श्रीवेंकटेश्वर' स्टीम् प्रेसमें अपने लिये छापकर यहीं प्रकाशित की । 14.- .-. " .......

Fastesscessiscessestice अर्पण-पत्रिका. श्रीमन्निखिलगुणनिकेतन परमोदार धीरचरित श्रेष्ठिवर्य श्रीखमराज श्रीकृष्णदासजी "श्रीवेङ्कटेश्वर "स्टीम् प्रेसाध्यक्ष बम्बई । महोदय ! देशी भाषाके ग्रंयकारोंको आश्रय देने में आपका अलौकिक यत्न है, संस्कृत साक्षरमण्डलमें आपने उत्तम प्रतिष्ठा प्राप्त की है। हिन्दी साहित्यका उद्धार करनेमें आप सदैव यत्नवान रहते हो । योग्य- का आदर करनेमें आप प्रसिद्ध परीक्षक और गुणज्ञ हो। तथा गो, ब्राह्मण, अनाथ, विधवा और दीन भारत- वासियोंकी रक्षा करनेमें आप सबसे अग्रसर हो। अत एव आपके पवित्र नाम के साथ यह 'भापाटीकासमेत बङ्गन्सेन" ग्रन्थ सप्रेम, सादर और सविनय समर्पित किया जाता है। विनयावनत, शङ्करलाल हरिशङ्कर. agseas

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भूमिका। जबसे हिन्दूसौभाग्यका निष्फलक मयंक अस्ताचलमें अस्त हुआ है, जबसे भारतलक्ष्मी अन्तर्हिता हुई है, जयसे आर्यभूमिमें वारंवार यवन लोगोंका पदार्पण हुआ है और जयसे राजनीति, समाजनीति . और 'धम्मनीति विशेप विप्लव (गोलमाल) हुआ है उस समयसे आर्य ऋपिरोक्त प्रायः सम्पूर्ण हिन्दूशास्त्र तुमसे हो गये और उन्हीं के साथ भरताका महापरत्न और समस्त पृथ्वीका गौरवस्वरूप हमारा आयुर्वेद . शाख भी अतिशय शोपनीय अवस्थाको प्राप्त हो गया। हिन्दूराजाओंके समय समस्त शाखाको चर्चा थी, विद्याको उम्मल आभा भारतवर्षको प्रकाशित करती थी, उस समय हमारा आयुर्वेदशाम्न सम्पूर्ण चिकित्साशास्त्रोंकी अपेक्षा अष्ठ और भारतसन्तानकी स्वारस्यरक्षाका एकमात्र अवलम्य समझा जाता था । आयुर्वेदीय चिकित्सा सम्पूर्ण चिकित्साओंकी मूल और.भारतसन्तानकी मायके समान हितकारिणी चिकित्सा समझी जाती थी। पूर्वकालमें हमारे पूर्वपुरुप आयुर्वेदीय चिकित्सा प्रभावसे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्यलाभ करके धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष इस पुरुषार्थचतुष्टयका साधन करते हुए दीर्घकालतफ सुखपूर्वक संसारयात्राको व्यतीत करते थे । आयुर्वे- दीय नियमानुसार चलनेसे यहाँ कदापि रोगसंकट उपस्थित नहीं होता था। कदाचित् कोई रोग उत्पन्न हो गया तो एक बार उससे मुक्त होनेपर फिर कभी भी किसीको रोगफी भीपण मूर्तिके दर्शन नहीं करने पड़ते थे। आयुर्वेदीय चिकित्सा पूर्ण होनेके कारण भारतसन्तानको कभी किसी विदेशी चिकित्साका आश्रय नहीं लेना पड़ता था। इस देशमें उत्पन्न होनेवाली साधारण वनस्पतियों के द्वारा उसके रोग दूर किये जाते थे। हमारे देश में उत्पन्न हुई औपधियां हमारी प्रकृतिके अनुफूल होने के कारण प्राचीन महर्पियोंने ठीक हमारे लिये ही आयुर्वेदशास्त्रकी रचना की थी। आयुर्वेदशास्त्र फेवल भारतमें ही सर्वोत्कृष्ट चिकित्साशास्त्र नहीं समझा जाता था, बल्कि कभी समस्त पृथ्वीभरके चिकित्साशास्त्रों में आयुर्वेदशास्त्रने अत्युच्च आसन ग्रहण किया था । जिस समय अस्य और मिश्रदेश प्राचीनताके अभिमानमें चूर्ण थे, जब पुराने रोम और प्रौक देश सभ्यताकी शेखी निमम थे, जिस समय सभ्यशिरोमाण पृथ्वीका आभूपणस्वरूप यूरोप देश अस- भ्यताके घोर अन्धकारसे आच्छादित था, तबसे ही हमारा आयुर्वेदशास्त्र सम्पूर्ण चिकित्साशास्त्रों में प्राचीन और सर्वोत्कृष्ट समझा जाता है। आयुर्वेद की प्राचीनता और उत्कृष्टता विषयमें कतिपय विदेशी विद्वानोंके मत नीचे लिखे जाते हैं। अबसे अनुमान तेरहसौ वर्ष पहले भुवनविजयी ग्रीकदेशाधिपति महावीर एलेकजेंडर असाध्य रोगोंकी चिकित्साके लिये भारतवर्षीय वैद्योंको सदैव पड़े यत्न और सत्कार के साथ अपने यहाँ - पारदसौ वर्ष पहले बुगदादपति खलीफा हारूरसौद आयुर्वेदीय चिकित्साको पृथ्वीभरकी सम्पूर्ण चिकित्साओंमें अष्ठ समझकर अपनी शरीररक्षाके लिये सदेव भारतवर्षीय वैद्योंको अपने राजमंदिरमें उपस्थित रखता था। अयुल उल नामक प्रसिद्ध अर्थी भाषाके ग्रन्थम लिखा है कि अष्टम शताब्दी में भारतवर्षके पीडत 'लोग बुगदादकी राजसभामें उपस्थित होकर आयुर्वेद और ज्योतिषशाषकी शिक्षा देते थे । 'सरक, ससस और वेदान' यह तीन भारतवर्षसे अरवदेशमें लाये गये । मालूम होता है कि ये तीनों ग्रंथ चरक, सुश्त, निदान इन तीनोंके अपभ्रंश नामान्तर है। हकीम जालीनूस अपने रिसालेमें लिखते हैं कि, आयुर्वेदविद्या प्रथम मारतवर्षसे मिसरमें आई फिर मिसरसे यूनान और अरघदेशमें गई । वह यह भी लिखता है कि, मेरे गुरु अफलातूंने भारत- वर्षमें जाकर कालज्ञानके ३६ लक्षण और बहुतसे प्रथ पढ़े | उनमेंसे कुछ सारभाग संग्रह करके रखता था ।

भूमिका। एक काठकी तस्तीपर लिखाकर सदैव अपने गले में जामेके भीतर पहने रहते थे और कभी किसीको प्रगट नहीं होने देते थे। जब उनकी मृत्युका समय समीप आ गया तब उन्होंने अपनी स्त्रीसे कहा कि, इस तस्तीको मेरी कमरमें गाड़ देना और इस विषयको अत्यन्त गुप्त रखना । स्त्रीने उनकी आज्ञानुसार उस तस्तीको पतिकी लाशके साथ कवरमें गाड़ दिया। इस प्रकार उस तस्तीको कबरमें गड़ी हुई देखकर मुझे अत्यन्त आश्चर्य हुआ और मैंने विचार किया कि, गुरुजी आप तो मरे ही किन्तु अपनी विद्याको भी मार गये। तय मैंने गुरुजीकी कयरको खोदकर तस्तीको निकाल लिया। पश्चात् उस विद्यामें मैंने अच्छे प्रकार योग्यता प्राप्त की, फिर मेरी देखादेखी अरसतूं आदि विद्वानोंने हिन्दुस्तानमें जाकर आयुर्बेदको अध्ययन किया। सुप्रसिद्ध डॉक्टर ओयाज भी आयुर्वेदीय चिकित्साके विपयों कहते हैं कि, हिन्दुस्तानकी आर्य्यचिकित्सा सम्पूर्ण चिकित्साओंकी मूल है और सम्पूर्ण संसार उसका ऋणी है । प्रोफेसर जे. एफ. रायल. डी. आर. एल. एम्. जी. सी. जो कि, प्रथम बंगारकी सेनाके डॉक्टर थे और एशियाटिक व मेडिकल य फिजीकल सोसायटी एडिंगवर्ग और मेडीको सर्जीकल सोसायटी लंड. नके मेम्बर थे । वह अपने व्याख्यानमें कहते हैं कि-हिन्दुओंका आयुर्वेदशास्त्र बहुत प्राचीन है, अरव और चूनानवालोंसे कहीं पहला है । किसी समय अरवदेशमें आयुर्वेदीय चिकित्साका विशेष प्रचार था। अरबवालोंने पहले आर्यचिकित्सासे ही चिकित्सांकी शिक्षा प्राप्त की थी। अभीतक उस देशमें श्वासरोगमें धतूरेके बीज और कृमिरोगमें कौंच के बीज व्यवहार किये जाते हैं। सुप्रसिद्ध संस्कृतशास्त्र के पूर्ण विद्वान् प्रोफेसर होरेस, हेमेन, विलसन् एम्. ए. एफ. आर. एस्. प्रसीडेन्सी मेडिकल सोसाइटी कलकत्ता और प्रोफेसर ऑफ संस्कृत युनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ फोर्ट जो कि,अत्यन्त विख्यात और संस्कृतविद्याके पूर्ण पारगामी माने जाते हैं, उन्होंने लिखा है कि-भारतवर्षमें बहुत पुराने समयसे चिकित्सा, ज्योतिष और दर्शन आदिके पारदर्शी विद्वान विद्यमान हैं। जिस समय युरोपदेशमें शरीरविद्या (एनाटमी ) का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था उस समय भारतवा. सियोंने जैसी औषधिचिकित्सा और शस्त्रचिकित्सामें पारदर्शिता दिखाई थी उसी प्रकार शरीरविद्याकी भी उन्नति को थी। इत्यादि प्रमाणोंसे सिद्ध होता है कि,हमारा आयुर्वेदशास्त्र सम्पूर्ण चिकित्साशास्त्रोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। हमारा आयुर्वेदशास्त्र जिस गम्भीर सत्यके ऊपर प्रतिष्ठित है उस प्रकार अन्य चिकित्सा शास्त्रोंकी दृढं नीव नहीं है । कारण कि-जिनका ज्ञान, भूत, भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों कालके विषयको निर- तर हस्तामलकवत् अवलोकन करता है, आयुर्वेदशास्त्र उन्हीं त्रिकालदर्शी मुनिबन्दोंकी असाधारण अन्धे. पणाका अपूर्व फल है। यद्यपि देशके सौभाग्यसे फिर आयुर्वेदकी आलोचनाका समय आ गया है । इस समय मृतप्राय आयचिकित्सा भारतसन्तानको अपनी ओर आकर्षित देखकर फिर जीवित होना चाहती है। यद्यपि अनेक भारतवासियोंकी आर्यचिकित्साके ऊपर फिर दिनपर दिन प्रीति बढ़ती जाती है परन्तु इसकी जितनी उन्नति होनी चाहिये उसके अभी शतांश भी नहीं हुई जो लोग देश में शिक्षित और सभ्य संसारमें अग्रसर समझे जाते हैं उनकी देशी चिकित्सामें किञ्चित् भी श्रद्धा नहीं हैं । उनकी दृष्टि में देशी चिकित्सा अतीव धृणाके योग्य समझी जाती है। आज कल पाश्चात्य चिकित्सापद्धति अत्यन्त आडम्बर और सौन्दर्यपूर्ण होनेके कारण सभ्यसं. सारमें श्रेष्ठ समझो जाती है। भारत के प्रत्येक स्थानमें यडे घड़े विशाल मेडिकलहॉलखुले हुए हैं। उनमें लाल, पाली,हरी,अनेक प्रकारकी सुन्दर काँचकी शीशियां नवीन भारतको दृष्टिमें अपूर्व चकाचौंध उत्पन्न कररही हैं। मुन्दर दीर्घाकृति साइनबोर्ड, विलायती, मेज,टेबुल, कुर्सी, विलायती बने हुए अनेक प्रकारके अस्त्र और यन्त्रों को बाह्य रचनायें भारतवासियों के हृदय में अद्भुत चमत्कार उत्पन्न कर रही हैं । सर्वत्र सभ्यस- माजमें डॉक्टरोंका ही आहान हो रहा है । वैद्य लोग विचारे मूर्ख या निरे गवार समझे जाते हैं। । 1 - । भूमिका । भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त, किसने ही मेडिकल कॉलेज,कितने ही अस्पताल, और फिराने ही चिकि- साइय प्रतिष्ठित है । परन्तु हमारी भारयचिकित्सा इन सर्व साधनोंसे शून्य होनेपर भी अन्य चिकित्सा- माकी अपेक्षा अगौता सर्वोत्कृष्ट पदपर प्रतिष्ठित है। प्रायः देखा जाता है कि जमतक रोग सहज होता द,जयता यल मांस का क्षय नहीं होता और जयता रोगजड़ नही पकड मातबतक रोगको दूर करने लिये अनेक दायटर सगर्य होते हैं, किन्तु जन रोग सांपातिक आकार धारण कर लेता है और जब शरीर. गत रस, मधिर, मांस, मजादि सप्त धातुमें विशेष रूपसे विकृत होकर आयु क्षीण हो जाती है उस समय कोई भी डॉक्टर रोगको दूर करने के लिये सार्य नहीं होता,ग्य र एक यद्यमहाशय ही समर्थ हो सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि यदि अप भी आयुर्वेदशानकी अच्छे प्रकारसे आलोचना कीजाय एवं शिक्षित समाज आयुर्वेदीय चिकित्सा का अनुसरण करे वो सम्पूर्ण जगत् अपश्य मुक्तकंठसे आयुर्वेदकी मा स्वीकार फरफ उसका एकान्त पक्षपाती बन जायगा। घरकामें लिखा है-"विविध खलु रोगविशेषानं भवति। तद् यथा-आरतोपदेशः प्रत्यक्षमनुमानश्चेति । विविध त्यस्मिन शानसमुदाये पूर्णमाप्वोपदेशात हानं ततः प्रत्यक्षानुमानाभ्यां परीक्षोपपद्यते । किं पनुद्दिष्ट 'पूर्व प्रत्यक्षानुमानाभ्यां परीक्ष्यमाणो विधान" (घरक-विमानस्थान-चतुर्थ अध्याय)। अर्थात् रोगका ज्ञान तीन प्रकारसे होता है जैसे-आप्तोपदेश-प्रत्यक्ष और अनुमानसे । इन तीनों उपायों में प्रथम आप्तोपदेश द्वारा (रोगका ) ज्ञान प्राप्त होता है फिर प्रत्यक्ष और अनुमानो द्वारा उसकी परीक्षा होती है। किन्तु जो पहले ही आतोपदेशके द्वारा जाना नहीं गया उसकी प्रत्यक्ष और अनुमानके द्वारा किस प्रकार परीक्षा हो सकती है? पर इस महावाक्यके द्वारा यह कदामि सम्भव नहीं हासकता कि आप्तोपदेशवार्जित, प्रत्यक्ष और ..अनुमानपरायण पाश्चात्यपडितगण सफडोंचा जगत्को पृथा विज्ञान धुयें के द्वारा उद्भासित करनेपर भी अभीतक प्रकृतसत्यताक पहुँचकर कृतकार्य हुए हो । देखो! आप्तोपदेशक द्वारा किस प्रकार ज्ञान प्राप्त होता है उसको यहां दिखात हाप्तगण कहते हैं कि यह रोग रोगका प्रकोषक है, इसप्रकार रोगका पूर्वरूप, रूप, साध्यासाध्यलक्षणादि प्रथम आमोप- देशके द्वारा जानकर पश्चात् प्रत्यक्ष और अनुमानके द्वारा इसकी परीक्षा आरम्भ करते हैं । जसे-राजय- क्ष्माके उत्पन्न होने से पहले रोगीको स्वप्नमें काफ, शुक और मयूरादिके दर्शनका ज्ञानका होता है, परन्तु बिना आप्तोपदेशके हम उक्त स्वप्न पृत्तान्तको किस प्रकार जान सकते है। और रोगीके निकट किस- प्रकार स्वप्नसम्बन्धी विषयक यात पूछ सकते हैं? और जो हम आप्तोपदेशक द्वारा पहलेसे ही यह बात जान कि राजयक्ष्माके पूर्वरूपमें उपर्युक काक, शुमादिक पक्षी दिखाई देते हैं तब तो किंचित् लक्षण प्रतीत होते ही स्वप्नसम्बन्धी सम्पूर्ण विषय रोगीसे अच्छे प्रकार मालूम करके राजयक्ष्माका सहजेंमें निर्णय कर सकते हैं। आप्तगण कहते है कि-" असाध्यो बलवान् यश्च केशसामन्तकृयरः" अर्थात् जिस घर में रोगीके बालोंमें गांठेसी गुंद जाती है वह ज्वर अत्यन्त बलवान् और असाध्य जानना। पहले हम यदि आप्तोपदेश द्वारा इन अरिष्टके लक्षणों को नहीं जानते तो रोगीको परीक्षा कर- के समय उसके बालोंकी ओर कभी लक्ष्य नहीं देंत ? महर्षि कहते हैं- "वायुः पित्तं कफश्चोक्ता शरीरे दोपसंग्रहः । मानसः पुनरुदिष्टो रजश्च तम एव च" ॥ अर्थात-पात, पित्त और कफ यह सीन शारीरिफ दोप और रज, तम यह दी मानसिक दोप इन सम्पूर्ण शारीरिक और मानसिक दोपोंक विकृत होनेसे सब प्रकारके शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न । ।

(६) भूमिका। होते हैं । जो आप्तोपदेशक द्वारा पहलेसे ही यह वत्त्व नहीं मालूम होता तो बात, पित, कफ (शारीरिक दोप) और रजस्तम (मानसिफ दोप) के विषय में किस प्रकार हम ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं , अवएव इनके प्रकोप और शमनादिके सम्बन्धमें सर्वथा अन्धकार. होनेसे अन्यान्य चिकित्साशास्रोन उपर्युक दोपोंके विषयमें कुछ भी उल्लेख नहीं किया है। रोगोत्पत्ति होनेसे पहले ही रोगको कहनेवाले आप्तोपदेशका परिहार करके केवल प्रत्यक्ष और अनु. मानके द्वारा रोगका ज्ञान प्राप्त करता कदापि सम्भव नहीं हो सकता। आयुर्वेदाचार्य महात्मा महर्षिगग कहते हैं कि-मध्या आहार और विहारादिके द्वारा वातपित्तादि दोप विकृत अथवा वद्धिन होकर रसरतादि सप्तधातुओंको विकृत करके पातुवैषम्य अथवा अनेक प्रका रके रोगोंकी उत्पत्ति करते हैं। इन मुख्य दोपोंके विषयमें अच्छे प्रकारसे परिचय नहीं होनेसे किसप फार रोग और चिकित साका ज्ञान होना सम्भव हो सकता है ? आज दश ग्यारह वर्षसे देशका सर्वनाश करनेवाले प्लेगसी चिकित्सा लिये संसारमें चारों ओर कोलाहल मच रहा है। इसको किसी प्रसिद्ध रोगके नागो साय जाद देने एवम् इसकी यथार्थ चिकि- रसाकी अन्वेपणाके लिये आज कितनेक वपोंसे गवर्नमेन्टके द्वारा उत्साहित किये हुए यहुतसे विज्ञान विशारद डॉक्टर नियत हुए हैं । वे अपने अपने कल्पित उपायोंका अबलम्बन फरके अनेक प्रकारके यत्न और औषधियोंकी कल्पना कर रहे हैं। किन्तु उनकी चिकित्सासे प्लेगके रोगियोंका अभीतक कुछ भी हितसाधन नहीं हुआ। जहाँ चिकित्साफा नाम सुनकर असाध्य रोगी भी एकबार निराशाको त्यागकर शय्यासे उठ बैठते हैं वहीं आज उक्त चिकित्साके नामसे रोगी एकदम भयभीत हो जाते हैं। परन्तु आयुर्वेदज्ञ वैद्य प्रथम आप्तोपदेशके द्वारा इसको ज्ञानके अधीन करके पश्चात् इसकी चिकित्सा करने में जरा भी विचलित नहीं होते । महर्षि चरकाचार्य अपनी संहितामें लिखते हैं कि- "विकारनामाशलो न जिहीयात् कदाचन । नहि सर्वविकाराणां नामतोऽस्ति ध्रुवा स्थितिः॥॥ अर्थात् जो कभी किसी रोगका नाम समझमें नहीं आये तो वैद्यको उसमें लाजत नहीं होना चाहिये क्योंकि शास्त्रमें कुछ रोगोंके नाम लिखे नहीं हैं। रोग अनन्त हैं। उन सबका वैद्यक ग्रंथों में भी विवरण मिलाना सर्वथा असम्भव है। इस विषय में महर्षि चरक कहते हैं कि- “स एव कुपितो दोपः समुत्थानविशेषतः। स्थानान्तरंगतश्चैव जनयत्यामयान् बहून् । तस्माद्विकारप्रकृतिरधिष्ठानान्तराणि च । समुत्थानविशेषाश्च बुद्धा कर्म समाचरेत् ॥ अर्थ-एक दोष कुपित होकर कारणविशेषसे शरीरके मिन २ स्थानों में जाकर नानाप्रकारके रोगों- को उत्पन्न करता है इस कारण रोगको प्रकृति, स्थान और निदानकी विशिष्टतापर विशेष ध्यान रखकर चिकित्सा करनी चाहिये। अपि च " यथा शकुनयः सर्वदिक्षु परिपतन्तः स्वच्छायां नालियर्तन्ते तथा स्वधातुवैषम्ये निमित्ताः सर्वयिकारा वातपित्तफा नातिवर्तन्ते । वातपिचकफानान्तु पुनः समुत्थानसंस्थानप्रकृतिविशेपान अभिसमीक्ष्य तदात्मकानपि च सर्वविकारस्तानेयोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः " अर्थ-जिस प्रकार पक्षी समस्त दिशाओं में परिभ्रमग करनेपरभी अपनी छायाको उल्लंघन करनेके लिये समर्थ नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण रोग स्वधातुके विकृत होनेसे उत्पन्न हुए होनेपर भी बात, 4 भूमिका। (७) - पत्त और कफके उलंघन करनेको समर्थ नहीं होते। इस देशके विद्वानों ने वात, पित्त और कफका निदान, यान, लक्षण, प्रकृति और सगयक विचारको हृदयङ्गम करके समस्त रोगोंको वात, पित्त और कफ इस पित्रय अन्तर्गत किया है। इस कारण देश, काल और पात्रके भेदसे रोग चाहे किसी प्रकारका. वीन आकार क्यों न धारण करे किन्तु वह वातज, पित्तज अथवा समिक, द्वन्द्वज, अथवा सान्निपातिक. नमेंसे किसी न किसी प्रकारका अवश्य होगा। आयुर्वेदीय चिकित्सक ऐसे नवीन रोगोंको देखकर कदापि भयभीत नीं होते। महर्षियोंने समस्त रोगोंको वात, पित्त और कफ इन तीन दोोक अन्तर्गत करके जगतका महान् उपकार किया है। कितने ही मनुष्योंका कहना है कि-जिस प्रकार डॉक्टर लोग अनेक यन्त्रों के द्वारा सहजमें ही रोगीका निर्णय करते हैं, उस प्रकार वैधलोग कदापि सहजमें रोगका नर्णय नहीं कर सकते । किंतु उनकी यह बात कुछ युक्तिसंगन नहीं जान पड़ती। क्योंकि-देखो ! राजयक्ष्मा या हृदयरोगमें डॉक्टरलोग (स्टेथास्कोप) नामक यंत्र के द्वारा शब्दके तारतम्यसे रोगका सिद्धान्त निश्चय करते हैं । किन्तु वैद्यलोगोंका केवल नाडीपरीक्षाके द्वारा स्पर्श मात्रके तारतम्यसे रोगका निर्णय करना जितना लिए और सूक्ष्म है उतना स्टेथास्कोपके द्वारा वक्षस्थल या हृदयकी परीक्षा करके शब्दके तारतम्यको जानना कठिन और सूक्ष्म नहीं है। इसके अतिरिक्त महर्षि- यांने अ.युर्वेदीय चिकित्सकोंके लिये एक और भी उत्तम सुभीता कर दिया है कि उन्होंने प्रत्येक रोगके इस प्रकार वैशेषिक लक्षण वर्णन किये हैं कि जिनके द्वारा नाड़ीके विना स्पर्श किये ही वैद्य महाशय यक्ष्मा और हृदय आदि रोगीका सहजमें ही निश्चय कर सकते हैं । किन्तु डॉक्टर महोदय स्टेथासकोपके सिवाय अन्य किसी प्रकार भी उक्तरोगोंके निर्णय करने में समर्थ नहीं हो सकते । अत एव जिन डॉक्टरोंकी श्रवणशक्ति नष्ट होगई है, उनके लिये राजयक्ष्ना और हृदयरोगका निर्णय करना सर्वथा असम्भव जान पड़ता है। विशेषकर जिस स्थानमें विशेष कोलाहल होरहा हो अथवा चित्तकी प्रवृत्ति किसी अन्य विषयमें लगी हो ऐसे अवसरपर डॅक्टर महोदय कदापि उक्त रोगी परीक्षा कर-- नेमें कृतकार्य नहीं हो सकते । अतएव स्पष्ट सिद्ध होता है कि आयुर्वेदीय वैद्योंका रोगपरीक्षाका प्रकार अत्यन्त समीचीन है। अन्तर्विद्रधि (यावसेस) रोग के विषय में कुछ चरकके वचन लिखते हैं। "अथासां विद्रधीनां साध्यासाध्यत्वविशेषविज्ञानार्थ स्थानकलिंगविषमुपदेक्ष्यामः । तत्र प्रधानमर्मजायां विद्रुध्या हद्दन-- समकप्रमोहकासाः क्लोमजायान्तु विपाका मुखशापगलग्रहाः, यकृजायां श्वास: प्लीहजायां मुखश्वासो- परोधः वृकजायाँ पार्श्वपृष्ठफटिमहः, नाभिजायां हिकार, कुक्षिजायां कुक्षिपाश्र्वान्तरांसशूलं, वंक्षणजायां सचिसादः, पस्तिजायां कृच्छ्रमूत्रपूर्तिवर्चस्त्वञ्चेति- अर्थात् हृदय में विद्रधि होनेपर हृदयमें पीडा, तमा, श्वास, इन्द्रियों में अज्ञान और खांसी उत्पन्न होती है । कोमस्थानमें विद्रधि होनेसे पियास,मुखशोष और गलस्तम्भरोग उत्पन्न होता है । यकृतमें विद्रधि होनेसे श्वास और प्लीहाके स्थानमें विद्रधि होनेसे श्वासोच्छ्रासका अवरोध, वृक्कादेशमें विद्रधि होनेसे पार्श्व, पृष्ठं और कटि प्रदेश स्तब्ध होजाता है । नाभिमें विद्रधि होनेसे हिफारोग उत्पन्न होता है । कुक्षिमें विद्रधि होनेसे कोख, पसबाडे और स्कंधप्रदेशों में शूल होता है । वंक्षणमें विधि होनेसे ऊरुदेशमें अव. सन्नता होती है। बस्तिमें विद्रधि होनेसे मूत्रका कठिनतासे उतरना और विष्ठामें दुर्गन्ध होती है । इत्यादि वैशेषिकलक्षणोंके द्वारा वर्तमान आयुर्वेदीय चिकित्सक स्थानीय अथवा यांत्रिकरोगोंके निर्णय करनेमें कदापि असमर्थ नहीं हो सकते । किन्तु यहां यह अवश्य स्वीकार करना होगा कि, यांत्रिक परीक्षाके द्वारा यह समस्त रोग और भी स्पष्टरूपसे विदित हो जाते हैं। शरत्कालमें जब पित्तथर कुपित होता है उसमें टेम्परेचर अर्थात शरीरकी गर्मी अत्यन्त अधिक -१०३. १०४ डिग्री तक हो जाती है, जीभ पीली पड़ जाती है, आहारमें एक साथ अनिच्छा होजाती है, तृषा, प्रलाप और हल्दीके समान पतले दस्त होने लगते हैं। डॉक्टर लोग ऐसे रोगीको देखकर लक्ष: णोंके वाहुल्यमे अतिशय भयभीत होजाते हैं और तत्काल उत्तको रेमिटेट फीवर मान लेते हैं । उस समय - (८) भूमिका । रोगीको तात्कालिक अवस्थाको देखकर केवल लक्षणदर्शी डॉक्टर भ्रममें पड़ जाते हैं । परन्तु वैद्य महाशय ऐसे रोगीको देखकर तत्काल पितके प्रकोपका समय समझकर अनायास पित्तज्वर निश्चय करते हैं । शरत्कालमें पित्तवर प्राकृत होता है अतएव वह उससे कुछ मी विचलित नहीं होते क्योंकि "प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः' अर्थात्-वसन्। अथवा, शरत्कालमें प्राकृतज्वर सुखः साध्य होता है । अब प्रसंगवश प्राकृतवरके लक्षण यहां लिखते हैं... वशिरवसन्तेषु वाताद्यैः प्रातःक्रमात अर्थात् वर्षाकालमें वातज्वर, शरत्कालमें पित्तमर और वसन्तऋतु में कफज घर प्राकृत होते हैं । अतएव जब शरत्कालमें रित्तचा कुपित होता है तब वह चाहे किाना ही भयंकर आकार क्यों न धारण करे किन्तु गन्धर्वनगरके समान शीघ्र ही नष्ट होजाता है । इस विषय में चरक किस प्रकार अपना वैज्ञानिक मत प्रकट करते हैं, यहां उसे उद्धृत करते हैं:- " ज्वर तुल्यनुदोषत्वं प्रमेह तुल्यदूप्यता। रक्तगुल्ये पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् अर्थात् ज्वरमें यदि दोपोंके साथ ऋतुकी तुल्यता हो, प्रमेहगे दोपोंके साथ दूप्यकी तुल्यता हो और रक्तगुल्म यदि पुरातन होजाय तो उपयुक्त अर, प्रमेह और रक्तगुल्म यह तीनों सुखसाध्य होते हैं । किन्तु अन्यान्य रोग दोपोंके साथ ऋतुकी तुल्यता होनेसे दोपोंके साथ दूप्य की तुल्यता होनेसे अथवा पुरातन होजानेस अत्यन्त कष्टसाध्य हो जाते हैं । यहां ऋतुके साथ दोषोंकी तुल्यता क्या है उसको संक्षेपरूपते लिखते हैं । शीतकालमें सूर्यको किरणोंकी मृदुता,दिनकी अल्पता,रात्रिके समयकी वृद्धि और चन्द्रमाकी किरणोंकी प्रबलता आदिके हुनेसे उत्पन्न हुए शीतके प्रभावसे मनुष्यों के शरीरमें कफ संचित होता है फिर पापके महीनेसे सूर्यके उत्तरायण होनेसे सूर्य की किरणों के द्वारा मनुष्यों के शरीरमें संचित हुआ कफ क्रमसे द्रवीभूत होकर वसंतऋतुमें कुपित होता है इस कारण सन्तऋतुको कफका समय निश्चय किया है। अतएव कफदोपके साथ वसन्तऋतुकी तुल्यता होनेसे वसन्तकालोत्पन्न कफवर प्राकृत है । प्राकृतज्वर चाहे कितना ही भयंकर रूप क्यों न धारण करे किन्तु वह सुख- साध्य ही होता है । इसप्रकार वर्षाऋतुके शीतसे अभ्यस्त मनुध्योंका शरीर शरदकालमें हठात् सूर्यकी किरणोंसे संतापित होजाता है। वर्षामें संचित हुआ पित्त शरत्कालमें प्रकुपित होता है इसकारण शरत्काल पित्तका समय है । भतएव पित्तदोपके साथ शरहतुकी तुल्यता होनेसे शरत्कालमें पितज्वर प्राकृत है । इसलिये इसकी चाहे कितनी ही भयंकर आकृति क्यों न हो किन्तु प्रकृत आयुर्वेदीय चिकित्सकगण उसको देखकर किंचित् मात्र भी भयमीत नहीं होते । यह रोग अन्य ऋतुओंमें उत्पन्न होनेसे वैकृत और अत्यन्त दुःसाध्य होता है। उक्त साधारण रोगोंमें डॉक्टरोंके भयभीत होजानेका कारण केवल वात पित्त और कफझी मन- भिज्ञता प्रतीत होती है । डॉक्टर महोदय मूत्र में शर्करा (चीनी) को देखते ही अत्यन्त चमत्कृत हो जाते हैं तथा रोगको अत्यन्त गहन बताने लगते हैं। किन्तु वैद्य महाशय शर्कराको देखकर कदापि आकुलित नहीं होते । कारण कि-वह अच्छे प्रकारसे जानते हैं कि-कफजनित दश प्रकारके प्रमेहोंमें शर्करा प्रमेह भी होता है सो अत्यन्त सुखसाध्य है । इस समय पश्चिमीय अनचिकित्साकी इतनी उन्नति देखकर अनेक भारतवासी कहते है कि यूरोपीय शखचिकित्सा सम्पूर्ण चिकित्साओंको अपेक्षा अधिक फलप्रद एवं सर्वोत्कृष्ट चिकित्सा है। किन्तु चरक, सुश्रुत प्रभृति आयुर्वेदीय ग्रंथोंके पढ़नेसे उनका यह श्रम सहज ही दूर हो सकता है। इस देशमें भी कमी आर्यभत्रचिकित्साने विशेप उन्नति की थी । सुश्रुतके मतसे सम्पूर्ण: अस्त्रचिकित्साओंकी अपेक्षा आयुर्वेदीय अखचिकित्सा अतिशय श्रेष्ठ समझी जाती है।

, भूमिका। (९) पूर्वकालमें अनचिकित्साने इतनी उन्नति की थी कि जिसकी रामायणादि पुराणोंमें अभीतक कथा पुनाई पड़ती है। पूर्वकालमें अख, खड्ग, गदा, मुष्टि और प्रस्तरादिके द्वारा युद्ध होता था। एक योद्धा कमसे आठ दश दिनपर्यन्त युद्ध करना रहता था । उस समय धनुपके द्वारा छोड़े हुए बाण सम्पूर्ण शरीर में विधजाते थे । शस्त्राघातसे शरीर में अनेक प्रकार के क्षत होजाते थे एवम् अस्थि चूर्णित,भग्न और स्फीत होकर घोर पीडा उत्पन्न होजाती थी। उस समय हमारे पूर्वचिकित्सक शल्योद्धार, प्रणरोपण,अणशोधन, भामसंधानादि चिकित्साओंके द्वारा तत्काल व्रणकी पीडाका शमन कर देते थे । यहाँतक कि दूसरे दिन ही योद्धा लोग फिर स्वस्थ और सबल शरीरसे संग्राम करने में तत्पर होजाते थे। इस प्रकार अनेक प्रकारकी घटनाओं को देखनेसे स्पष्टरूपसे विदित होता है कि प्राचीन समयमें इस देशमें अस्त्रचिकित्साने अत्यन्त उन्नति की थी। रामायण में लिखा है कि-जय रावणने लक्ष्मणके हृदय में शाति(शेल)का प्रहार किया था उस समय लक्ष्मणके वक्षस्थलमें क्षत और अस्थि भन्न होकर रुधिरका वमन होने लगा था।तब सुपेण वैद्यने विशल्यकरणी,अस्थिसंधानकारिणी आदि कई एक औषधियोंके द्वारा तत्काल रुधिरको बंद करके अस्थिसंधान और व्रणरोपण क्रिया करी थी । यह रीति आज तक भी हमारे देश में प्रचलित है । रुधिरका वमन या रुधिरका साव होनेपर विशल्यकरणी व्यवहार की जाती है और आधा- तजनित क्षतरोगमें अस्थिसंहारिणी व्यवहृत होती है । अन आयुर्वेदीय अधिकित्सा किस क्रमसे अवनतिको प्राप्त हुई सो कहते हैं। पहले इस देश के समस्त ऋपि, मुनि, महात्मा, योगी,बडे बडे विद्वान पंडित,वैद्य और सर्वसाधारण मनुष्यों को देशी लता वृक्ष आदि वनौपधियों के प्रत्यक्ष और आश्चर्यजनक गुण ज्ञात थे । अतएव वे अत्यन्त भयंकर क्षत और अस्थिभन्नादि. रोगोंमें आश्चर्य और प्रत्यक्षफलप्रद साधारण लतादृशादि वनौपधियों का प्रयोग करके सहज में ही बड़े २ जटिल रोगोंको दूर कर देते थे । केवल अनचिकित्साके लिये कभी किसी भारतवासीको अन्य वैद्यका आह्वान नहीं करना पड़ता था । इस प्रकार जब साधारण वनौषधियोंके द्वारा विना अस्त्रचिकित्साके ही बड़े २ भयंकर व्रणादि रोग संहजमें आरोग्य होने लगे तय अस्त्रचिकित्सास भारतवासियोंको अश्रद्धा और भय उत्पन्न होने लगा। उससे यहांतक अश्रद्धा हुई कि, वैद्यमहाशय भी क्रम २ से अस्त्रचिकित्साको बिलकुल भूल गये और अस्त्र- शिक्षाके पठन पाठनका सर्वथा त्याग कर दिया। इस प्रकार पूर्वोक्त कारणों से देशी अम्रीचकित्साकी इतनी अवनति होगयी । अभी कुछ काल पहले इस देशमें बड़े २ वैद्य विद्यमान थे. वह अनेक दुस्तर और भयंकर, क्षतादि रोगोंको एकमात्र साधारण वनौषधियों के द्वारा आराम कर देते थे। किन्तु समयके परिवर्तनसे उक्त पद्योंकी संख्या कमक्रमसे अल्प होती गई । एवं देशी औषधियोंके ऊपरसे उच्चश्रेणीफे लोगोंका विश्वास और अद्धा उठती गई । सर्वत्र डॉक्टरी चिकित्साका प्रचार हो गया इससे प्रायः प्रत्यक्षफलप्रद समस्त देशी औषधियाँ छिप गई। आजकल डॉक्टर लोग जिन बड़े २ व्रणोंको विना अस्त्रचिकित्साके द्वारा आराम नहीं कर सकते. उन व्रणोंको पहिले वैद्यलोग साधारण औपधियोंसे आरोग्य कर देते थे। अबतक भी कहीं - साधारण आयुर्वेदीय द्रव्योंका अतुल प्रभाव देखा जाता है। पश्चिमीय चिकित्सापद्धतिके अनुसार प्रायः सब प्रकारके व्रण मुख होजानेपर विना अनचिकित्साके कदापि आरोग्य नहीं होसकते । परन्तु आयुर्वेदीय वैद्य सब प्रकारके व्रगों में गुख होजानेपर या बिना मुख हुए ही केवल सामान्य प्रलेपादिकी आपाधयोंसे आरोग्य कर देते थे। भारतवमें नाना जातिके लता वृक्ष विद्यमान हैं। वह केवल प्रकृतिकी शोभा बढाने के लिये ही नहीं हैं बल्कि अनन्तगुणसम्पन्न दिव्य वनौषधियाँ हैं। पहले इन ही वनापधियों के प्रभावसे भारतवासी सय प्रकार के रोगोंसे वंचित रहकर स्वस्थ शरीरसे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते थे । आजकल इनही वनौ पधियोंकी आलोचनाके अभावसे भारतवासी चिररोगी, कायर और दीन होरहे हैं । किन्तु जो सर्वदा सत्यके ऊपर स्थित हैं उनकी बार वार अवनति होनेपर भी अन्तमें अवश्य जय होती है । जगन्फे - (१०) भूमिका। इसी नियमानुसार अब फिर आयुर्वेदकी उन्नतिका समय परिवर्तित होता दीखता है। अवनतिके घोरान्धकारको समाप्त करके आयुर्वेदशास्त्र अब फिर धीरे २ उन्नतिकी अरुण किरणोंको प्रकीर्ण करने लगा है। भारतके प्रत्येक प्रांतमें आयुर्वेदशास्त्रकी यत्किंचित् चर्चा सुनाई देने लगी है । अनेक भारतवासी पश्चिमीय चिकित्साके चाकचक्यपर मोहित होनेपर भी एकवार फिर निराधार आर्यचिकित्साकी ओर झुकते दिखाई देते हैं। वंगदेशवासी पंडितलोग आचिकित्साको भारतकी मुख्य चिकित्सा बनानेका यत्न कर रहे हैं। उन्हीके सद् उद्योगसे भारतके अनेक स्थानों में आज अनेक आयुर्वेदीय विद्यालय, पाठशालायें, चिकि- स्सालय, शिक्षालय और औषधालय स्थापित हो रहे हैं । जिस प्रकार वंगदेशी विद्वन्मंडली आयुर्वेदका वास्तविक उद्धार करने में सर्वथा कटिबद्ध हो रही है उसी प्रकार दक्षिण, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य- प्रदेश और पश्चिमोत्तरदेशके मनुष्य भी आयुर्वेद के प्रचारके लिये धीरे धीरे अग्रसर होने लगे हैं। इस प्रकार क्रमशः हमारी भारतकी प्राचीन संस्कृत विद्या फिर उन्नतिके मार्गमें पद स्थापन करती दिखाई देती है । अनेक प्रकारके प्राचीन और अर्वाचीन संस्कृत ग्रंथ मूल और टीका समेत मुद्रित होते जोत हैं । एवं चरक, सुश्रुत, वाग्भट, भावप्रकाश, माधवनिदान, शाइधर, चक्रदत्त और हारीतसंहिता आदि कितने ही आयुर्वेदीय ग्रंथ भी संस्कृत टीका और भापाटीका समेत छपकर प्रकाशित हो रहे हैं। यद्यपि आजतक उपर्युक्त चिकित्साशास्त्रसम्बधी चरक, सुश्रुतादि अनेक प्राचीन आर्पमन्य विविध प्रकारसे अनेक स्थानों में छप चुके हैं और छपते जाते हैं किन्तु इनके द्वारा सर्वसाधारणको अधिक लाभ होता नहीं दीखता । कारण कि, चरक, सुश्रुतादि ग्रन्थ विपयोंके बाहुल्य और गहनतासे आज- कलेक अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको अधिक उपयोगी नहीं हो सकते । एवं भावप्रकाशादि अर्वाचीन ग्रंथ उक्त रिपयोंकी संक्षिप्तता और अल्पता होनेके कारण सबको लाभकारी नहीं होसकते । अतएव इसी अमा. वको दूर करने के लिये आयुर्वेदभण्डारके उज्वलरत्नस्वरूप इस "वंगसेन" ग्रंथका प्रादुर्भाव हुआ है। वैद्यकभण्डारमें पहुसेन बहुमूल्य महापरत्न है। इसकी चिकित्सापद्धति अन्य चिकित्साशास्त्रोंकी अपेक्षा अतिशय श्रेष्ठ है । जो विषय अन्य चिकित्साशास्त्रों में अपूर्ण हैं घे इसमें पूर्णरीतिसे वर्णन किये गये ह । और, जो विपय अन्य ग्रंथों में अत्यन्त क्लिष्टतासे वर्णित है वे इसमें अत्यन्त सरल रीतिसे निरूपण किय गये हैं। ग्रंथकारने इसमें कितने ही नवीन रोगोंका निदान और चिकित्सा लिखी है जो कि आजकल इस देशमें अधिकतासे पाये जाते हैं । किंतु अन्य वैद्यकर्मयों में उन रोगोंका । कहीं नामता भी नहीं लिखा है। ग्रंथकारने विशेपकरके इसमें प्राचीन आर्य ग्रंथोंके क्रमसे अनुभूत सिद्धयोग कहे हैं। जिस प्रकार इसकी चिकित्साका क्रम अतिशय श्रेष्ठ है उसी प्रकार रोगनिर्णय, वातपित्तादिदोपनिरूपण, रसरक्तादि सप्तधातुनिरूपण, वात,पित्त और कफके क्रमसे देश, काल एवं रुग्ण प्रकृतिका वर्मन,वसन्तादि पट्ऋतु, दिनचर्या, रात्रिचा, ऋतुचर्या, औषधियोंके गुण दोप, निघंटुखंड, कालज्ञान, अष्टीवपरी- श्रा आदि अन्यान्य विषय भी अन्य ग्रंथों की अपेक्षा श्रेष्ठ कहे हैं। जो विषय अन्य ग्रंथों में आठ.आठ दश २ शोकोंमें वर्णित हैं, वे इसमें केवल एक दो शोकोंमें अत्यन्त सुगम रीतिसे कहे हैं । इस प्रथके प्रयोगों के अनेक ग्रंथकार अपने २ ग्रंथों में संग्रह करते हैं इससे भी इस अंथको उत्कृष्टता सिद्ध होती है । भिवशिरोमणि वनसेनने ठीक आजकलके मनुष्योंकी प्रकृतिके अनुसार ही इसकी रचना की है। इस ग्रंथके प्रयोग चक्रदत्त, भैषज्यरत्नावली आदि अनेक ग्रंयोंमें पाये जाते हैं। आयुर्वेदीय विद्यालयों में यह ग्रंथ अत्यन्त आदरपूर्वक पढ़ाया जाता है। इस पथके आधारसे जाना जाता है कि इसके. बनानेवाले मिपावर वंगसेनका जन्म विक्रमकी ग्यारहवीं शताब्दीमें बंगालके कांतिकावास या कान्तिनगरमें गदाधर वैधके घर हुआ था | वंगसेनका समय चक्रपाणिदत्तसे पहले जान पड़ता है। क्योंकि इस ग्रंथके घृत तैलादि अनेक सिद्धप्रयोग चक्रपाणि. दत्तने अपने प्रथम संग्रह किये हैं ।

भूमिका। (११) ". चक्रपाणिदत्त वीरभूमि देशवासी प्रसिद्ध रोप्रवल नामक दत्तकुलमें उत्पन्न नारायणदत्तका पुत्र और नरदत्तका शिष्य था और वह वैद्य भानुदत्तके अन्तरंगभावसे गौड़राज्यकी पाकशालाका अध्यक्ष हुआ था। इसका प्रादुर्भाव ७९० के लगभग जान पड़ता है। कितने ही वैध कहते हैं कि वंगसेन वैद्य अबसे अनुमान५००सौ वर्ष पहले मुजफ्फरपुर जिलेके कांति नगरमें विद्यमान थे। हमारे प्रियवर मित्र वैद्यराज रामेश्वरानन्दजीने विशेष अनुसंधानके द्वारा निश्चय किय है कि वंगसेन अबसे ४०० वर्ष पहिले वंगालके पूर्व विभागके श्रीपुर राज्यमें उपस्थित थे। हमने भी, वंगसेनका जीवन के लिये बहुत प्रयत्न किया, किन्तु शीघ्रताके कारण ठीक ठीक उनकी जाति,कुल, समय आदिका पता मालूम नहीं होसका इसका हमे खेद है। यद्यपि यह ग्रन्थ अगतक संस्कृतमूल दो तीन स्थानोंगें छप चुका है, किन्तु केवल मूल मात्र होने के कारण सर्वसाधारणको उपयोगी नहीं होसकता ऐसा विचारकर सुप्रासद्ध विद्वद्वर्य श्रीमदायुर्वेदोद्धारक कविराज लाला शालिग्रामजीने इस वेगसेनका अनुवाद करना प्रारम्भ किया, किंतु उसकी समाप्तिके पूर्व ही आप यक्ष्मारोगसे पीड़ित होगये। लालाजीने यक्ष्माके एक दो लक्षण प्रतीत होते ही आठ नौ महीने पहले ही मुझसे कह दिया था कि " अबकी बार मुझे, 'जराजनित शोष' हुआ है, अतएव मेरे शरीरका विश्वास मत करना और इस बङ्गसेनका अनुवाद पूर्ण कर देना तथा अन्यान्य भैपज्यभास्कर प्रभृति मेरे अपूर्ण प्रथोंकी पूर्ति कर दना" । मैंने उक्त कविराजको आज्ञाको सर्वथा शिरोधार्य समझकर इसका अनुवाद पूर्ण किया और यथा अवकाश लालाजीके अन्यान्य ग्रन्थोंकी भी पूर्ति की जायगी । लाला शालिग्रामजीका जन्म वैक्रमीय संवत् १८८८ आश्विन शुक्ल तृतीयाको मुरादाबाद के सुप्र- सिद्ध सेठ लाला आनन्दस्वरूपके घर हुआ । आपकी रुचि बालकपनसे ही विद्या और कला कौशलमें विशेष जान पड़ती थी.। यद्याप आपकी अवस्थाका बहुतसा पूर्वभाग पाल्यक्रीडामें ही व्यतीत हुआ था, परन्तु पीछे थोडे ही समयमें आपने सम्पूर्ण कार्यों में अपूर्व दक्षता प्राप्त कर ली थी। परिणाम यह हुआ कि आप थोडे ही समयमें अच्छे विद्वान् बन गये । आप बडे परोपकारी थे। केवल परोपकारकी दृष्टिसे आपने अपने जीवन में बहुतेरे फाम किये जिनका उल्लेख करनेके लिये यहां स्थान नहीं है। लालाजीका अपूर्व धैर्य, अतुल साहस, असीम उद्योग और अद्भुत कलाकौशल आदि गुण थोड़े समयमें ही सम्पूर्ण संसारमें विख्यात होगये । आप जिस प्रकार सत्यप्रतिज्ञ और धीरचरित थ, उसी प्रकार धर्मात्माओंमें अग्रगण्य और सजनों में माननीय समझे जाते थे। जो २ गुण लालाजीमें विद्यमान थे, वे गुण आजकलके बडे २ धीशक्तिसम्पन्न विद्वानोंमें भी नहीं देखे जाते । आप राज- नीति, धर्मनीति और समाजनीतिके पूर्ण ज्ञाता एवं देश और कालके जानने में प्रसिद्ध पंडित थे। पूर्व अवस्थासे ही आपको नीति, धर्मशास्त्र, वैद्यक, ज्योतिष और साहित्यके संबंधी ग्रंथोंको पढनेका विशेष अनुराग था । आपने अल्प समयमें कितने ही नाटक,उपन्यास, धर्मशास्त्र और वैधकके विविध प्रन्थोंकी रचना की । आपके अबतक वैद्यक ग्रन्थों में से आयुर्वेदीय औषधिकोप, राजवल्लभनिघण्टु, शालिग्रामनि- घण्टुभूपण, रसरत्नाकर, भावप्रकाश, धन्वंतरि, अर्कप्रकाश, द्रव्यगुण, योपदेवशतक आदि ग्रन्थ छप चुके है। और शेप जो अपूर्ण ग्रन्थ हैं वे भी पूर्ण करके शीघ्र ही प्रकाशित किये जायेंगे । लालाजीके यद्यपि कोई पुत्र नहीं था परन्तु वे अपने दाहिन माई हरिशंकरको पुत्रसे भी अधिक प्रिय समझते थे, अतएव इनको वे सदैव अपने निकट रखते थे। हरिशंकरजीने भी उनके समीप रह कर उनके अनेक गुणोंका अनुकरण किया । संवत १९५४ में उन्होंने इस नग. रमें एक आयुर्वेदोद्धारक नामक नौपघालय स्थापन दिया और उसका सम्पूर्ण स्वत्वाधिकार मुझे और भाई हरिशंकरको प्रदान किया । भाजतक हम दोनों, उस औषधालयको उसी ममसे पला रहे है। जिस प्रकार प्रात:कालके छ यस दशा यजेतक और सन्ध्याके चार बजे से छः यजेतक लालाजी इस भीषधालयमें नित्य उपस्थित होकर समस्त अभ्यागत रोगियोंका विना मूल्य भौषधि और । . :

(१२) भूमिका। व्यवस्थादि प्रदान किया करते थे, उसी प्रकार हम दोनों प्रातः छः पजेसे दश बजेतक और सन्न्याको चार बजेसे छः बजेतक औषधालयमें उपस्थित होकर समस्त अभ्यागत रोगियोंको विना मूल्य औषधि और व्यवस्थादि प्रदान करते हैं। जब यह वंगसेन मुझे लालाजीने अनुवाद करने के लिये दिया था, तब इस ग्रन्धको देखकर जितनी मुझे प्रसन्नता हुई थी उतना ही दुःख भी हुआ। कारण कि-यह मूलप्रन्थ इतना ही अशुद्ध था कि इसमें कहीर श्लोकका आशय भी अच्छे प्रकारसे समझमें नहीं आता था । यद्यपि मैंने इसको यथामति शुद्ध किया है तथापि इसमें अशुद्धियां अवश्य रह गई होंगी अतःसहदय पाठक मुझे अल्पज्ञ समझकर क्षमा करेंगे भी पत्र. द्वारा सूचित करनेकी उदारता दिखायेंगे। इसके अनुवाद करने तथा वगसेनकी जीवनी भादिके खोज करने में श्रीयुत-वैद्यराज पण्डित दुर्गाद- तजी-प्रान्त, मुरादाबाद । श्रीयुत, वैद्यराज-भोलानाथजी शर्मा, लाहौर । श्रीयुत वैद्य रामेश्वरानन्दजी, चम्बई । श्रीमान् पोडत मुकुन्दशास्त्री ओझा-प्रपन्नाहाटी, दर्भगा आदि महानुभावोंसे विशेष सहायता मिली थी, अतः उक्त समरत महानुभावोंका में अत्यन्त कृतज्ञ हूँ । मैंने जिनेंद्रदेवकी कृपासे और सम्पूर्ण युद्धवद्योंके अनुग्रहसे लालाशालिग्रामजीकी आज्ञानुसार इस ग्रंथका अनुवाद समाप्त किया है। भवदीय-अनुगृहीत, वैद्य-शंकरलाल हरिशंकर, "आयुर्वेदोद्धारक-औषधालय,"-मुरादावाद. . 1 श्री। भाषाटीकासह वङ्गसेनस्थविषयानुक्रमणिका। पृष्ठ. ज्वरके लक्षण ... " " पातके लक्षण ... " पातके लक्षण ... " " " पातके लक्षण. " " विषय. पृष्ट. विषय. विपय. ग्रन्धारम्भ । ? औषधप्राशनविधि २४ पित्तककाधिक सन्निपात- नगलाचरण १ वातज्वरचिकित्सा सज्जनप्रार्थना पित्तन्वरचिकित्सा । २५ कफवाताधिकशीधकारीसन्नि- दुर्जनप्रार्थना पित्तम्बरके लक्षण २५ पातक लक्षण निदानपंचक। चिकित्सा वाताल्पण विस्फोटक सन्नि- ऋतुप्रकरण कफज्वरचिकित्सा । २८ पित्तोल्वण आशुकारी सन्नि- जलप्रकरण कफज्वरलक्षण २८ प्रकृतिलक्षण ९. चतुर्भद्रावलेहिका २९ कफोल्बण कंपन सन्निपातके देशप्रकृतिलक्षण ११ वातपित्तज्वरचिकित्सा।३० लक्षण २८ चिकित्सापादचतुष्टय वातपित्तज्वरके लक्षण ३० हीनवात मध्यपित्त और अधि. वैद्यलक्षण चिकित्सा ककफ वैदारिक सन्नि रोगीलक्षण *१२ मधुकादि काथ औषधिलक्षण पित्तश्लेप्मज्वरचि. मध्यवात,हनिपित्त,अधिककफ. परिचारिकलक्षण कर्कोटक सन्निपातके लक्षण, कित्सा। पित्त कफज्वरके लक्षण अधिकवात, मध्यपित्त और ३१ त्याज्य रोगी हीनकफसंमोहकसन्निपात १४ चिकित्सा ३२ आयुर्वेदलक्षण ३९ १५ अमृताटक 'रोगगणना हीनयात वृद्धपित्त और मध्य कण्टकायादि कफोल्यण सन्निपातके ज्यराधिकार। १५ पंचतिक्तकाथ । उत्तम लंघन होने के लक्षण...:९ भाङ्गादिगण लक्षण आधिकवात हीनपित्त और मध्य कफजन्य सन्नि- 'अत्यन्त लंघन होनेके दोप. वातकफज्वरचिकित्सा।३४ ज्वरमें जलपानविधि वातकफवरके लक्षण मध्यवात अधिक पित्त और ज्वरमें पेया देने की विधि चिकित्सा हीनफफोल्वणसन्निपातके आरोग्यपंचक २१ ३५ लक्षण आमज्वरमें औपधि देनेसे हानि,, चातुर्भद्रक त्रिदोपारण कूटपाकल सन्नि. पच्यमान ज्वरके लक्षण पात ज्वरके लक्षण... निरामजरके रक्षण चालुकास्वेद . ३६ सन्निपात चिकित्सा... सन्निपातचिकित्सा । ३६ उत्तम होन और अधिक लंपन घर पचनेकी अवधि सन्निपातनिदान ३६ होनेके लक्षण ४२ सन्निपातके लक्षण " तन्द्राके लदाण. वातवरपर साधारण पाचन २३ वातपित्ताधिक वभ्रसन्निपाद अभिन्यास ज्वरके लक्षण ४९ औषधिप्राशनमन्त्र ज्वरके रक्षण ३७ चिकित्सा... ... के लक्षण ... " पातके लक्षण " ... " आमज्वरके लक्षण ... २२ दशमूल " " ज्वरमें औपधि देनेका समय..." वातज्वरके लक्षण ... ...

(१४) भाषाटीकासह बङ्गसेनकी- 'आगन्तुक ज्वर ... ... ... .. " चार यूप ७७ " ... " ... " " ' पहर तल ६१ " लाक्षादि तेल ... " ... ... पंडिंग यूप .. " ... ... विषय. पृष्ट. विषय. पृष्ट. विषय. पृष्ट. ५२ बलाद्य तेल त्रिदोषातिसार- विषमज्वर । ५४ पटोलादि स्नेह चिकित्सा। ९६ पटोलाधनुवासन वर्धमान पिप्पली यहच्छालिपादि ९६ चन्दनानुवासन माहेश्वर धूप ७६ पञ्चमूलादि विधारनेहपाकलक्षण ९८ चन्दनादि घृत ५९ विलपाकविधि कुटज पुटपाक कल्याण घृत आरग्वधनिरूह यस्ति... " श्योनाक पुटपाक महाकल्याण घृत ६० (निरूहमात्राकल्पनाविधि " न्यग्रोधादि पुटपाक पट्पल घृत धनिष्ठादिनक्षत्रोत्पन्न वरावधि, "शुण्ठी पुटपाक अमृत पदपलधृत धनिष्ठादि वस्त्ययन ... ७९ पुटपाक लक्षण कलके कृष्णादि गण सर्वोपधि वर्ग ८० कुटजावलेह पध्यापध्य... ८१ द्वितीय कुटजावलेह दाह शीतादि निदान... अतिसाराधिकार । ८३ तृतीय कुटजावलेह पद्मक तल... ६४ कुटजाप्टकावलेह अतिसार निदान रसादि धातुगत वर लक्षण अंकोट वटक १०१ खण्ड यूप... सप्तधातुगत स्वरचिकित्सा ६५ "वत्सकाधगुटिका जीर्णज्वाके लक्षण अंकोटगुटिका आमपाचन विधि द्राक्षादि काथ अपराजितावलेह द्वितीय आमपाचन विधि शिरोविरेचन ६८ पडङ्ग घृत धान्यपञ्चक क्षीरपाफविधि कुटजाद्य घृत चतुःसमा गुटी (सहाग घृत कालिक हरीतकी महाबित्व तेल "कलिशाच चूर्ण पिप्पल्यादि तेल " वातपित्तातिसारके लक्षण ७१ १०३ क्षीररक्षाय तल वातपित्ताविसारकी चिकित्सा , " ममशीद चूर्ण ८८ कफपित्तातिसारके लक्षण जीर्णज्वर। ७२ पित्तातिसारकी कफपित्तातिसारकी चिकित्सा १०४ गडूच्यादि पृत ७२ चिकित्सा। ९० वातकफादिके लक्षण क्षीर पट्रपल घृत चिकित्सा घान्यक घृत दशमूला क्षीरपट्परत घलाच घृत पित्तातिसारमें फाय छतीसारकी चिकित्सा... शोधातिसारचिकित्सा वृक्ष्वासाय पृत ७३ रक्तातिसारकी शाक और भयातिसारकी मंजिष्टा वृत चिकित्सा। ९१ चिनित्सा युलित्याच पृत रादि ९१ कल्याणावलेह गिारेमलिकतिघृत ९२ आमातिसारकी चिकत्सा अंगारपानल पिच्छपस्ति आमपापन विधि टाक्षादि रोल प्रवादिकाचिकित्सा महाक्षादि चल कफातिसार । ९५/>यूपणाध पुन स्थानादि गट ७५ नागरादि यटक ९६ पिच्चावरित ... " " फोक्कुट धृत चासादि पृत पारी घृत " . " ... ... " ... " ... " ... पटूपरण रोल पट्तम तल ... ... " ... " पादरी पूरा ... " विषयानुक्रमणिका। पृष्ठ " .. विषय. १२३ द्वन्द्वज बवासीरके कारण १३६ त्रिदोपज बासौरके कारण १३७ यवासीरके पूर्व लक्षण चात्तज बवासीरके लक्षण १२४ वावज बवासीरकी चिघिसा ,, लवणादि क्षार १२५/पित्तज बवासीरके लक्षण १३८ पित्तज बवासीरकी चिकित्सा कफज बवासीरके लक्षण कफज बवासीरकी चिकित्सा ,, त्रिदोपज और सहज बवासी- ... " " ... शतावरी घृत . रके.लक्षण ... . " विपय. पृष्ट. विपय. पुरीपक्षय ... १०९ हरिद्रादि क्षार •असाध्य लक्षण महाक्षार विगतातीसार लक्षण. ११० वार्ताकुगुटिका ज्वरातिसार मध्वारिष्ट मधुक पुप्रासव चिकित्सा। ११० दशमूलासब नागरादि १११ पिंडासव होगीद वृद्दत पत्रकार घृत... गुडूच्यादि शेमहापरघृत व्योपादि चूर्ण निदोपज प्रहणी कदवंगादि वटक ग्रहणीरोग। ११३ संग्रहणी पूर्वरूप आरुष्कर धृत ११४ संग्रहणीके लक्षण समहणी निदान और रूप पिप्पल्यादि चूर्ण संग्रहणीकी चिकित्सा हिंग्वष्टक मसूर धृव गोतक्रके गुण । चित्रकादि गुटिका द्विपंचमूलाध घृत ११७ बृहयांगेरी घृत पञ्चमूलाध घृत ११८ अष्टघलक घृत शुण्ठी घृत बृहयोगेरी घृत बृहन्मसूरदि घृत पित्तज प्रणी कापत्थाप्टक रसाजनादि चूर्ण मधूकपुष्पासव पाठादि काथ चूर्ण नागराध चूर्ण १२० महाकल्याणगुड सडुलोदक विधि द्वितीय कल्याणगुड भूनिम्ब प पूर्ण तृतीय कल्याणगुड पाठा चूर्ण चतुर्थ कल्याणगुड कूप्माण्ड कल्याण गुड ... " " ... " चांगेरी घृत ... " " महदमि घृत मिल्वादि घृत... " ... " १२६ सहज बवासीरकी चिकित्सा सयप्रकारको वधासीरकी चिकित्सा १२७ कृष्ण सादि धूप १२९ नृकेशादि धूप... निशादि लेप १३० सिद्धयोग यूपणाद्य चूर्ण पूतिकादि योग १३१ विडंगसारादि काथ १४.१ गुडाद्य चूर्ण हरिद्रादि प्रलेप गुदस्वेद १४२ १३२/घृतभर्जित हरीतकी १३३ अपामार्गादि योग तिलादियोग १३४ सूरण पुटपाक कृष्ण तिलादि प्रयोग... १३५) वार्ताक पुटपाक गुड हरीतकी... " " कल्याण गुड.. " " ... ... " . चन्दनाध घृत किराताध घृत मसूरादि घृत १२१ बहुशा लिगुड... ... " कलिंग धृत " " १३६ तक योग सार कल्प अपराजितावेलह कफपणी रोगकी चिकित्सा अर्शरोग। यवागूविधि १२२ अर्शरोगकी संख्यापूर्वक पिपल्यादि चूर्ण, संप्राप्ति भल्लातकक्षार वातज बवासीरके कारण दुरालभादि क्षार १२३ पित्तज बवासीरके कारण भूनिम्यादि क्षार कफज बवासीरके कारण पाठादि योग... १४३ ... " प १३६ शोणितनाव विधि (उदकपट्रपलघृत पलाशक्षारघृत चव्याधत " ...

मापार्टीकासह यसनकी- " ... १६१ रमपानी लक्षा ... दन्त्यादिल ... .. . ... ... " ... ... " মেয়াদি শূণ .4. ... " ... चनुरूमा मोदक "" " . ... " विषय. वि. होयरादि पून १४४/लोहाष्टक १५७ भागासान गरित पच्या सद १५८ विधानी लगा गृहदमि पर "परम " पिष्टपणे लक्षण पासासादिल ६४५/लोद परिणाम सक्षण १७ पृहकासासादिल रक्तार्शनिदान | १६१ अजीतपिर १४६ यातायधन्य १६२/ अपिपिता যা শূণ सामान्य पिकिन लिया धूर्ग पटुगादि पूर्ण " पन्दनादिदा मिमुग पूर्ण पसागरण गीतादि योग द्वितीय मणिमुरा पूर्ण समार्फर पूर्ण कमरयशरादि भारपण "गा यपानट पूर्ण पल्यात तर पुटजादिन १६३ दिगुमादाम पूर्ण विजय पूर्ण মাফলা महानिमा पूर्ण दावी महापांगरी पून १६४ावस्यामुश राज १८१ १४८ टिगरम हिम १६५ गालामुग्य पूर्ण म्यलारण मोदक {ਝਣ ਦਾ पादार नज मुरणपिण्डी विप्रमादि मायायमेह.... १६६ समर चूर्ण मृदसूरणामोदक मन मापन मरियादि पुष अगस्त्यमोदक गागरादि पूर्ण प्राणदा गुटिका फालपुष्पादिभार १६७ गतुषट्पटएर यांकावन मोदक अमयाट १६८/महापदपल पृत भयानक गुड़ यन्त्रकार ਪਰ ਕਦੇ "मरियादि पटाला गुहाविरण "धान्यजीरयः पून १८३ किपिधारात भल्ल तकविधान १५२ प्रतिहारमाया योगराजगुग्गुष्ट "जीरफत धर्मशास्लमण भीमाशालगुड १५३ साध्यासाध्या गुडाक अमित लोहवर्णन । १५४ मुखमाध्यलक्षण अचुक १८५ म.टायलक्षण चुनसन्धानाविधान मृदुलमण असाध्यलक्षण वृदगुरुसन्धानयियान याप्य लक्षण कण्डार लक्षण अजीर्णनिदान। १७३ क्षारगुड़ १८६ मुंडजातिमृदुलोहगुण तीक्ष्णभेद १५५ चिकित्सा १७४/द्वितीय क्षारगुह कान्वलोहभेद विपूचिकादिनिदान । १८६ पर योगर हुन्ताल वाजरादि अमिमांचकी चिकित्सा.विधि १७५विधिका लक्षण १८६ लोहक भेद अजीर्णरोग अजीर्णनिदान .-१७६ विलम्यिकाके लक्षण अग्निमुखलोह ... १५७] सामान्याजीर्णलक्षण ....अजीर्णमें आमके कार्य ... ... ... " १७१ धान्यकृत ... , १७२ धान्यात ११ ... " १ ... " कुण्ड लक्षण १७३ चित्रगुट्र ... " अहमंह गुण ". ... अलसके लक्षण ... परलोह गुण विषयानुक्रमाणका। (१७) पाठ. . " पित्तके लक्षण ... ... ... " " ... ... " ... " " त्रिफलादि घृत विडंगादि घृत ... ... " ... पानकीके लक्षण विपय. विषय. पृष्ठ. 'विपय. पृष्ठ १९८ पैत्तिक रक्तपित्तके लक्षण असाध्य लक्षण १८७ कटुकाध घृत जीहारके लक्षण व्योपादि धृत १९९ द्वन्द्वजऔर सन्निपातज रक्त- विचिकाके उपद्रव १८८ देवदार्यादित रजनित्रिफला धृत रक्तपित्त के उपद्रव २०९ चिकित्सा अरसादि तेल दन्तीपत असाध्य लक्षण योगराज चिकित्सा अंजन १८९. २०० पत्रादि चूर्ण द्वितीय अंजन शिवगुटिका १९० २११ यूपणांदिवटी " श्यामाघृत २१६ भस्मकनिदान-चि० । १९० कामलारोगनिदान । २०१ दूर्वाद्य तेल - कृमिरोगनिदान । १९१ कुम्भकामला २०१ तृणपञ्चमूली क्षीर पेटमें कृमि होजानेके लक्षण१९१ चिकित्सा चन्दनाय चूर्ण चिकित्सा १९२ अष्टादशांग गुटिका २०२ दूर्वाद्य धृतः २१७ १९३ - धात्रीलोह महादूर्वाध घृत हरिद्रादि घत २०३ शुंगाध घृत २१८ पिप्पलादि चूर्ण १९४ गुडूची धत " |शतावरी घृत सावित्रवटक पाण्डुरोगका भेद बृहच्छतावरी घृत मशकहर धूप १९५ हलीमक । २०३ वासाद्य घृत भुजंगादिनाशक धूप ... ...२०४ वासात २१९ विडंग तेल चिकित्सा बृहद्वासाघृत - अपथ्य सिंताधवलेह कामदेवघृत अमृतादि घृत , अनंतादिघृत २२० पांडुरोग। १९५ नवायसचूर्ण दूर्वादि तैल पाण्डुरोगके पूर्वलक्षण... १९५ मण्डूरवटक २०५ मधुकादि गुटिका पाण्डुरोगके उत्पन्न होनेके बृहन्मण्डूरवटक खण्डकूष्माण्ड २२१ , निम्बादिगुटिका पाण्डु रोगका पूर्वरूप... १९६ मण्डूर गुटिका २०६ |वासाखण्ड २२२ वातज पाण्डुरोगके लक्षण .. विभीतक्यादि गुटिका सूरणाक. मण्डूरवनवटक द्वितीय वासाखण्ड कफज पाण्डुरोगके लक्षण विडंगाद्यवलेह खण्डखाद्य लोह २२३ असाध्य पाण्डुरोगके लक्षण आमलक्यवलेह २०७| अमृताख्य लोहरसायन मृत्तिकाभक्षणजन्य पांडुरोग खदिरलेह खण्डादि-लोह २२४ कल्याणगुह राजयक्ष्मनिदान। २२६ १९७ पुनर्नवादि काथ "पूर्वलक्षण २२६ " राजयक्ष्माके त्रिरूपलक्षण रक्तपित्तनिदान । २०८] पद्रूपलक्ष्ण पूर्वलक्षण ... २०८:दोपभेदेस एकादशरूपलक्षण २२७ १९८ लैष्मिक रक्तपित्तके लक्षण द्वितीय पटूरूपलक्षण "वातिक रक्तपित्तके लक्षण "साध्यासाध्यता " " कारण द्वितीय खण्डकूष्माड़ ... " " .पित्तज पाण्डुरोगके लक्षण .." " " ... " ... ... ... " ध्य विशेष लक्षण 'असाध्य लक्षण चिकित्सा दशमूलादि फाथ लोहादि मोदक मूर्धादि घृत " " .

دون भाषाटीकासह घनसेनकी- 'विपय. ... ... ... ... ... " ... २४३ वासकूष्माण्ड ... " ... ... वलादि घृत " ... पिप्पल्यादि घृत कुलीरादि घृतः ... " ... ... ... " ... २५७ विपय. पृष्ठ. विषय. यवायशोशादिजन्य क्षयरो. उच्चटाद्य मोदक २४० उरःक्षतजकासरोग- गके लक्षण २२७ क्षतक्षयाधिकार । २४० निदान । २५. व्यवायशपिाक लक्षण २२८ पूर्वरूप २४१ शोकशोपीके लक्षण चिकित्सा असाध्य लक्षण जराशापीके लक्षण अन्यश इक्ष्वाधवलेह २४२ अध्वशोपीके लक्षण चिकित्सा क्षीरपाक २५३ व्यायामशोपीके लक्षण एलादि गुटिका व्रणशोपीके लक्षण यथाह धृत क्षयजकासनिदान ।२५३ चिकित्सा चिकित्सा २५४ पडङ्गन्यूप २२९ वदंष्ट्रादि घृत जीवन्स्यायनुवर्तन २३१ द्राक्षादि घृत सितोपलादिले २३२ अमृतप्राश २४४ तालीसादिचूर्णगुटिका सार्पगुड द्विपंचमूलादि घृद्ध महातालीसादि चूर्ण सर्पिमोदक २४५ अश्वगन्धादि घृत २५५ २५६ पिप्पल्याचवळेह तालीसादि चूर्ण २३३ कासरोगनिदान । २४६ क्षयकास कर्परादि.चूर्ण " पूर्वरूप २४६ कासश्वास जातीफलादि चूर्ण वातज कासके लक्षण शृंगादि चूर्ण २३४ चिकित्सा धूमपान यवान्यादि चूर्ण १. कण्टकाऱ्यादि काथ " दशमूलादि घृत २४७ सूक्ष्मैलादि चूर्ण २५८ भाङ्गोदिघृत कुनट्यादि लेह अमृतादि घृत " हरीतक्यादि मोदक २३५/चित्रकाधवलेह समशर्कराचूर्ण बृहत्समशर्कर चूर्ण पित्तजकासनिदान- खर्जूरादि चूर्ण पूर्वकचिकित्स। २४८ विभीतकावलेह मारिचादि चूर्ण .. एलादिमन्थ पट्प्रस्थ घृत २४९ जीवन्त्यादि चूर्ण दशमूलीत व २३६ द्वितीय क्षीरघृत पद्मकादि चूर्ण २५९ पडङ्ग घृत जीवन्त्याद्य घृत कफकासानदान सिंहामृतघृत पिप्पलीधृत चिकित्सा । २४९ कण्टकारि घृत द्वितीयकण्टकारि धृत पाराशरघृत नवांगयूप २४९ घृत "शटयादि घृत तृतीय कण्टकारि घृत छागलाय धृत २३७ वृहत्केट कार्यादि घृत घलागर्भ धृत कण्टकारी लेह चन्दनादि तेल व्याघ्री हरीतकी शंतपाक तैल. २३८ कट्फलादि काथ २५१ वृहदगस्त्य हरीतकी घासावलेह लवंगादिसमशर्कराचूर्ण वसिष्ठ हरीतकी सर्पिगुड़. दशमूलाध घृत च्यवनप्राशावलेह ...९३९ श्रृंगराज तेल द्वितीयकुलस्थ गुड़ ... , रानादि घृत i ... ... वासादि घृत यलादि घृत २४८ ... " " " " ... ... " " " श्वदंष्ट्रादि " ... २५० बृहद्वासकादिघृत व्योपाय घृत निर्गुण्डी घृत २६१ २६२ ... ... ... " कुलित्थ गुरु २६ ...

विषयानुक्रमणिका.! १९.) पृष्ट, विपय. ... ... ... २६५ चव्यादि चूर्ण अनजाके लक्षण " गम्भीराके लक्षण ... " ... " २६६/महाखाण्डव चूर्ण २८२/पूर्वरूप " " " २६८ सूक्ष्मैलादि चूर्ण व्यात्री घृत " ... २६९/पूर्वरूप २८४ शुमके लक्षण ऊर्वधासके लक्षण छिन्नश्वासके लक्षण " विपय. पृष्ठ. विषय. हिक्काधिकार । २६४ शृंगादि घृत २७७ अन्नजाके लक्षण २२१ सम्प्राप्ति निदाधिकादि लह २७८/उपसर्गजाके लक्षण २६४ चिकित्सा २९२ पूर्वरूप कण्टकाधित वाततृपा यमलाके लक्षण अरोचकाधिकार । २७९) पित्ततृषा क्षुद्राके लक्षण अरुचि चिकित्सा २७९ कफतृपा कलहंस कांजी २८१ क्षयजतृपाकी चिकित्सा २९४ महाहिक्काके लक्षण दाडिमादि चूर्ण मुच्छाधिकार । २९५ असाध्य लक्षण खाण्डव चूर्ण ..२९५ चिकित्सा वातजमू के लक्षण सुपूतिकीटाद्य चूर्ण २६७ यवानांखाण्डव चूर्ण लवंगादि चूर्ण... पित्तजमूर्छाके लक्षण तारीक्षीराध घृत २९६ २८३ कफजमू के लक्षण दशमूलाध घृत सान्निपातिक मू के लक्षण श्वासरोगाधिकार ।२६८ पूर्वरूप छर्दिरोगाधिकार । २८३/रक्तजमू के लक्षण २६८ मदा और विपकी मू के ल. महाश्वासके लक्षण २९७ वातछाके लक्षण तन्द्राके लक्षण | असाध्य लक्षण संन्यासके लक्षण तमश्वासके लक्षण चिकित्सा चिकित्सा प्रतमकन्धासके लक्षण'. २७०) पित्तछर्दिके लक्षण श्रमनाशनी गुटिका क्षुद्रश्वासके लक्षण चिकित्सा २८५ श्वासादिकी चिकित्सा २७१ कफछर्दिके लक्षण २८६| मदात्ययाधिकार । २९९ शृंग्यादिचूर्ण मदात्ययका निदान शट्यादिचूर्ण २७३ त्रिदोषज छर्दिके लक्षण " त्रिगुण मदके लक्षण ३०० असाध्य लक्षण वातज मदात्ययके लक्षण... ३०१ चिकित्सा २८७|पित्तज मदात्ययके लक्षण, मनःशिलादिलेह २८८ कफज मदात्ययके लक्षण... " २८९/त्रिदोपजनित मदात्ययके लर". २७४ आगन्तुजछानिदान परमदके लक्षण चिकित्सा " पानाजीणके लक्षण मुंगगजल छर्दिचिकित्सा "पानविभ्रमके लक्षण क्षीरपिप्पली उपद्रव २९० असाध्य लक्षण माझींगुट तृषारोगाधिकार । २९० उपद्रव फलिस्थगुड २७५ वातजतृपानिदान २५० ध्वंसक और विशेषके लक्षण : स्वरभेदरोगाधिकार । २७५/पित्तजतृपाके लक्षण ... २९१/चिकित्सा २७६ मतजतृपाके लक्षण , अष्टांग लवण चिकित्सा ३०३ .(क्षयजतृपाके लक्षण चव्यादि चूर्ण आरमजाके लक्षण ...मधुत्रिफलागुड़ाईक योग । ... " ... २९८ २७२/चिकित्सा " ... २९९ ... हिंस्रादि घृत सौवर्चलादि घृत धुलित्यादि घृत 'तिकादि घृत द्वितीय कुलित्यादि घृत.. सुवहादि घृत ... ... पनकादि घृत " "" " ... " ... " ... ३०२ असाध्यके लक्षण " फासमावि घृत..

(२०) भाषांटीकासहवासेनकी- ... ..३१६/शिमल " ... ३२५ ... ... पफाशयस्यवायुके कार्य " " उन्मादके सामान्य कारण है " विषय. पृष्ठ विपय. मिपय. शवायरीपुनर्नवादित ...३०४ विगतोन्मादके लक्षण त्याज्यरोगी .३०५ भूतोन्मादफे एक्षण जीवनीय यमक दाहरोगनिदा देवप्रहमासराफे रक्षण वातव्याधि- नाधिकार । ३०५ असुरमहजुष्टफे लक्षण निदान । गन्धर्वग्रहमासतके लक्षण चिकित्सा ...३०५ यक्षप्रहमासतके लक्षण पूर्वरूप और रूप भामलक्यादि खंड "कोठाभित घायुफे कार्य्य.... " ..३०६ पितृमहनसितके लक्षण कुशादिधृत तेल ५. सर्वागावि वायुके पार्य "सहमसितके रक्षण .३१७ रफज दाह गुलामें स्थित पायुके या कार्य " राक्षसाहमासिबके लक्षण ... चिकित्सा ३०७ आमासय स्थित वायुके कार्य ३२७ तृपानिरोधज दाह प्राराक्षसप्रीसतके लक्षंण, " पिशाचप्रसित उन्मादके लक्षण, इन्द्रियाम स्थित घायुफे कार्य ) चिकित्सा रक्तपूर्णकोष्ठज दाह असाध्य लक्षण चिकित्सा " देवादिकाका आवेशका समय " रसधातुगत यायुके लक्षण ... " रगत यायुफे लक्षण महाधूप ३१८ उन्मदिरोगाधिकार। ३०८ मांसमेदागत घायुके लक्षण..." अपस्माररोगा- ममास्थिगव वायुके लक्षण...." धिकार। ३१८ शुगतवायुके लक्षण और.सम्मावि ३०८ अपस्मारका निदान ...३१९/शिरागतवायुके लक्षण उन्मादका पूर्वरूप पातज उन्मादके लक्षण | अपस्मारका पूर्वरूप वातज अपस्मारके लक्षण लक्षण ३०९/पित्तज अपस्मारफे लक्षण पित्तफफाश्रित प्राणवायुके कार्य कफज अपस्मारफे लक्षण ..." पित्तफफाभित उदानवायुके. त्रिदोपज अपस्मारके लक्षण ३२० । कार्य्य . ...३२८ असाध्य लक्षण पिचकफाश्रित सामानवायुके ३१० अपस्मारके वेगका समय फाय ... चिकित्सा चिकित्सा पित्तफफाभित अपानवायुके जलमृतके लक्षण ३२१ कार्य सिद्धार्द्धकालन परंकया तेल ३२३ पित्तकफाधित व्यानवायुके घ्यूपणादि पति ३१२/निकला तेल सारस्वत चूर्ण चिकित्सा ३१३ कूष्माण्डक घृत "वेशवार: .३३९ स्वल्पपंचगव्य घृत. "वाजिगन्धादि गण ... ३२४ रसोन पेय ...३१४ महाचैतस वं स्वल्प रसोन पिण्ड .३३० काथकी विधि चैतस लशुन योग घृत मधूक वृत .३२५ साल्वण स्वेद .३३१ ३१५, काश्मरी घत महासाल्वण स्वेद चन्दनादि तैल .३३२ कटभी तेल पटूघरण योग ... " सायुगत और सन्धिगत वायुके " पित्तज उन्मादके क्षण फफज उन्मादके लक्षण सन्निपात उन्मादके लक्षण शोफज उन्मादके लक्षण विपज उन्मादके लक्षण उन्मादके असाध्य लक्षण... " " " ... ... " लक्षण माझी घृत ... हिंग्वादि घृत महापशाचिक घृत सारस्वत घृत 'पानीयकल्याण घृत महाकल्याण घृत महापंचगव्य धृत " ... " " " द्वितीय पतस घृत निशादि घृत वचादि घृत तीन काथ. " विषयानुक्रमणिका। पलादि घृतमण्ड महावला तेल तेल... " सहचरादि तेल ३५० ... ... महाकल्याणक तैल ... " " " ... " महानारायण तेल ... अवस्थाविशेष ... ... ... ... " महामाप तेल पृष्ठ. विपय. विपय. विषय. पृष्ठ. फैतक्यादि तैल.. ३३३ भल्लातकादि घृत ३४० पलाशैरीय तेल ३४८ '" मूक मिन्मिण और गद्गदका निदान हनुग्रहके लक्षण, , द्वितीय महाबला ३४९ चिकित्सा उपरोक्त तीनों रोगोंकी चि० जिहास्तम्भके लक्षण ३३५ सारस्वत घृत " महासहचरादि तैल चिकित्सा " कल्याणकलेह ३४१ विष्णुप्राक्त अंगवर तेल - मन्यास्तम्भके लक्षण मूत्रावरोधके लक्षण ३५१ मन्यास्तम्भकी चिकित्सा स्थान नाम लक्षणके अनुसार स्वल्पनारायण तेल ३५२ कुजलक्षण वातव्याधिनिदान मध्यम नारायण तेल कुजकी चिकित्सा आक्षेपकवातके सामान्य ले० शिरोग्रह के लक्षण " आक्षेपवायुके अपतन्त्रक और मापतेल ३५४ शिरोग्रहकी चिकित्सा. अपतानक इन दोनों भेदोंकी वृहन्मापादि तेल ३५५ बाहुशोषका निदान " महामापादि तेल गृध्रसीके लक्षण... ३३६] दण्डापतानकके लक्षण.. ३४२ सामिप महामाप तैल ३५६ विधाचीके लक्षण " धनुस्तम्भके लक्षणे शतावरीआदिको खोदनेकामंत्र३५७ बाहुशोपकी चिकित्सा... , अन्तरायामके लक्षण ३५८ मापतल... ३३७ वाहायामके लक्षण मापतैल खज और पंगुके लक्षण आक्षेपकके भेद " चतुर्विंशतिका प्रसारिणी तेल ३५९ कलाय खजके लक्षण. असाध्यत्व शुक्त बनाने की विधि.. पादहर्पके लक्षण चिकित्सा पिंचपल्लवके द्वारा शुद्धि पाददाह्के लक्षण " महास्नेह... ३४३ नखशुद्धि ३६१ कोष्टुशार्प के लक्षण , हरिद्रावचाशुद्धि. वातकण्टकके लक्षण मरिचादिनस्य.. ३४४ मस्तकशुद्धि चिकित्सा विभीनकादि चूर्ण शैलजशुद्धि 'वाताष्ठीला निदान ३३८/पक्षाघातके लक्षण " खट्टाशीशुद्धि प्रत्यष्ठीलाके लक्षण पक्षाघातकी चिकित्सा... ३४५ शिलारसादि शुद्धि दोनोंकी चिकित्सा ३३९ मोदि नये,. महामापतल 'तूनी निदान ग्रन्थिकादि तैल... शतकप्रसारणी तेल 'प्रतितून के लक्षण मापतैल... निशतीप्रसारणी तेल 'दोनोंकी चिकित्सा ३४६ कुब्जप्रसारिणी तेल तन्द्राके लक्षण एरण्डादि गुग्गुल सप्तशतिका महाप्रसारिणीतल. तन्द्राको चिकित्सा त्रयोदशांग गुग्गुल महाप्रसारिणी तेल आध्मानके लक्षण स्यायभुवगुग्गुलु वटी ३४७ गन्धहस्ती प्रसारिणी तेल पत्रलवण और स्नेहलवण अष्टादश शतक प्रसारिणीतैल ३६७ तिल्वकाख्यधृत.... आजितप्रसारिणी तेल ३६८ प्रत्याध्मानकी चिकित्सा ३४. रानादि.घृत "३७१ ३४८ मूलकादि तेल दशमूलादि घृत कंप और खल्लीवातकी चि० .. भश्वगन्धादि तेल " ... " " ... तिल्वक घृत ... " - ... " " ... ... ... ... " " ... " आदित्यपाक गुग्गुल " ... " ... ... प्रत्याधमानके लक्षण आध्मानकी चिकित्सा... ... " ... रसोन,तेल ... कंपवातके लक्षण खल्ली के लक्षण अश्वगन्धादि घृत ... " दशमूलादि तैल छागलादि घृत " ... ३७२ (२२) भाषाटकांसद बनसेनकी- ... ... ... ... शावरी घृत गुहूची घृत " ... ... ... " " अमृतादि धृत ... " ... ... ...४०९ । ... " धातजं गृध्रसकि लक्षण ... ३७६ अमृताइयतल ३७६ नागवलाल " " शृंगवेरादि घृत ... ... पुनर्नवा गुग्गुलु " ... पथ्यादि गुग्गुलु ३९२ योगराजगूगल ... ... विषय. पृष्ट. विषय. पृष्ठ विषय. शतावरी तेल नयकार्षिक फाथ ३७२ ३८५/साध्यासाव्य विचार ४०४ ३८७ आमवातकी चिकित्सा क्लाघृत पथ्य ३७३ , कटिमहके लक्षण ४०६ साध्यासाध्यता कटिमहकी चिकित्सा ४०७ आदतरोगनिदान। ३७३ अमृतादि घृत " अमृतादि चूर्ण वातादितके लक्षण ३७४ द्वितीय अमृतादि घृत " लघुरानादि पित्तजनित आदतके लक्षण द्वितीय गुडूची घृत ... "महारानादि फफजनित अर्दितके लक्षण ३८८ राखादशमूल फार्थ ४०८ मिश्रित अर्दितके लक्षण महागुडूची घृत " अलम्युपादि चूर्ण... असाध्य लक्षण "पिण्डतल ३८९ आमादि चूर्ण अर्दित रोगकी चिकित्सा " द्वितीय पिण्डतल. द्वितीय अलम्बुपादि चूर्ण दशमूलादिौरतेल ३७५/गुडूचीतल " वैश्वानर चूर्ण गृध्रसीनिदान । " शुण्ठी घृत ३९०] द्वितीय शुण्ठी घृत.. ...४१० वातकफजनित गृध्रसीके ल० दशपाकवला तेल "कांजिकादि घृत गृध्रसीकी चिकित्सा शतपाकसहस्रपाकवला तेल दशमूलकी औषधि ३९६ अजमोदादि पटकं अमृतादि गुग्गुलु ... ४११ लशुनादि घृत ३७९ सूर्यप्रभावटिका "शुण्ठी खण्ड अश्वगन्धाल ३९४ रसोन पिण्ड ४१२ सैन्धवादिल सिंहनाद गुग्गुलु ... " प्रसारिणी तेल गोक्षुरादि तैल द्वितीय सिंहनाद गुग्गुलु.. ३९५ द्विपंचमूलादि तैल चन्द्रप्रभावटिका ३९६ वृहत्सैन्धवादि तैल धातरक्ताधिकार। ३८० शिलाजितुशोधन विधि ४१३ वातरक्तका निदान ३८० योगसारामत... वातरककी सम्प्राप्ति पथ्य वातरकके पूर्वलक्षण ऊरुस्तम्माधिकार । ३९९, शूलरोगाधिकार । ४१४ वाताधिक वातरक्तके लक्षण ३८१) पूर्वरूप ४०. शूल निदान ... ४१४ रक्ताधिक वावरकके लक्षण ऊरुम्तम्भके लक्षण चिकित्सा पित्ताधिक वातरक्तके लक्षण असाध्यलक्षण बलादि चूर्ण कफवातरक्तके लक्षण ऊरुस्तम्भकी चिकित्सा... तुम्बरादि चूर्ण असाध्य लक्षण ३८२/रास्नादिकाथ ४०२/पित्तशूल निदान ४१६' कुष्ठादि वैल "पित्तशूलकी चिकित्सा साध्यासाध्यप्रकार वातरक्तकी चिकित्सा आमवातरोगाधि०१४०३ कफशूलनिदान ,४१८ अपथ्य ३८३ आमवातका पूर्वरूप ४०३ कफशूलकी चिकित्सा आमवातके सामान्य लक्षण द्वन्द्वज और त्रिदोषज शूल अमया गुड ३८४ विशेष लक्षण ४१९ गुग्गुल वर्ग अत्यन्त बढे हुए आमवातकेल०, आमशूलनिदान " ... कशोर गुग्गुल " ... " " ... ... ... ... १९.८/निरूह १९९/पथ्यापथ्य ... ... " ... " ... " " ... ४१५ " ... " • वातरक्तके उपद्रव ... "" अष्टकटूबर तेल ४०२ कुशादि घृत ... " ... ४०४/चिकित्सा विषयानुक्रमणिका। (२३) पृष्ठ. विषय. ... पिप्पली घृत ... ४२०/लोहादि लेह " " " " ... ... " ... " " " " " " ... • ४३४ हिंग्याध घृत ४३५ पध्य ... " ... ... विषय. • पृष्ठ. विपय. चिकित्सा ४४२ ४१९) गुडपिप्पली घृत ४३० द्विरुचराहिंग्वाध चूर्ण हिंग्वाद्य चूर्ण एरण्डसप्तक का बचाथ चूर्ण ४४३ शूल स्थान कोलादि मण्डूर गुल्मरोगाधिकार । ४४३ कफवातज शूल पार्श्वशूल के लक्षणः भीमवटकमण्डूर गुल्मका सामान्य रूप ४४३ कुक्षिशूल के लक्षण क्षीरमण्डूर ४३१ गुल्मकी सम्प्राप्ति हृदयशूल के लक्षण शतावरीमण्डूर गुल्मका पूर्वरूप মহরত तारामण्डूर गुड " गुल्मक साधारण लक्षण मूत्रशूलके लक्षण ४२॥ पुनर्नवादि मण्डूर ४३२ गुल्मकं कारण और लक्षण विशूल के लक्षण ; वह यूपणाध मण्डूर वातगुल्मी चिकित्सा '४४४ विट्शूलकी चिकित्सा नारिकेल लवण " हिंगुपंधक हिंग्यादि चूर्ण अयोगुग्गुलु ४३३ यूपणाध घृत ४४५ वृहत्तुम्युदि चूर्ण ४२२ आमलक खण्ड (हपुपाद्य धृत तुम्वुवादि चूर्ण अथान्नद्रवशूलनिदान " चित्रकाद्य धृत विश्वादि चूर्ण चिकित्सा रुचकादि चूर्ण गुडमण्डूर ४४६ पुनर्नवादि म्वेद ४२३ कलायचूर्णगुटिका " (पित्तगुल्मके कारण हिंग्यादि वटक उदावतरोगाधिकार १४३६ पित्तगुल्मकी चिकित्ता ...', ४२४ एरण्डाय धृत उदावतका निदान ४३६ पकगुल्म लक्षण बीजपूरादि घृत ४२५ असाध्य लक्षण ४३७ त्रायमाणाध घृत शूलघृत चिकित्सा द्राक्षाध घृत शूलके उपद्रव अन्यत् उदावतभेद निदान ४३८ पथ्य अपथ्य चिकित्सा ४३९ कफगुल्मके लक्षण परिणामशूलनिदान १४२६ श्यामादि " कफगुल्मकी चिकित्सा फलेवात ४४० क्षारपट्पल घृत... बातजपरिणामशूल ४२६ नारायणचूर्ण पित्तपरिणाममूलके लक्षण गुडाष्टक भल्लातकाच घृत... मिकपरिणामशूलके लक्षण " मूलकाध घृत द्वितोपज और त्रिदोषज परि- , दंतीहरीतक्यवलेह ४४९ णाम भूलके लक्षण आनादरोगाधिकार ।४४१ पध्य चिकित्सा निदान ४४१ द्वन्द्वजगुल्म विडंगाध मोदक ४२७ असाध्य क्षण हिंग्वादि चूर्ण शम्बूकादि मोदक ..., ४२८ आनाहरोगको चिकित्सा द्वितीय हिंग्वादि चूर्ण त्रिफलादि लोह विवृताद्या चटिका ४४२/पथ्य तु:समलेह फलवात त्रिदोपगुल्मके लक्षण ४२९/रामठाचा यात त्रिदोपगुल्मफी चिकित्सा ४५१ त्रिफलादि.लोह त्रिताधा गुढी धात्रीफलक घृत सामुदादि चूर्ण त्रिकुटाचा वा " ... " " ... :: ५ व्योपाध घृत " " स्थिराध धृत " मिश्रकस्नेह ... " ... " " ... भक्तवारी गुटिका " " ... विचाय पूर्ण ... ...

(२४) भाषाटीकासहवासेनकी- ... ... ... रोगके लक्षण ... " ... ४७० ... ... ... ... ... मूत्रापातका निदान अर्जुन घृत " ... ... ... " " । ... ... ४६४/ मूत्र प्रन्थिके लक्षण ४७२ संप्राप्ति ... " " ... ... " विपय. पृष्ठ पिपय. पृष्ट. पिपय. भाजापट्पल घृत ४२ तिका पूर्ण ४६१ शुक्रजमूगाच्छ्रफी चिकित्सा ४६८ दन्तीव पथ्य मलजनित मूत्रकृच्छ्ररोगके विन्दुधव , त्रिदोपज मौर.कृमिजनित हदय. लक्षण दधिघृत. सुफुमारकुमारक पुनर्नवादि नीलिनीघृत उपद्रव बचायतल ४५४ चिकित्सा १६२ मूत्राघातरोगा- कांकायनगुटिका यस्लम घृत ४६३ धिकार । हिंग्वादि वटिका ४५५/भीरवाइम पूत ४७० आरोग्यवाटिका... "यातकुण्डलिकाके लक्षण नादेयी क्षार ४५६यलाध पूत अष्ठोलाके लक्षण हिंग्यादि पूर्ण उरोमहाधिकार । ४६३ पातपस्तिके लक्षण रफगुल्मकी संप्राप्ति निदान वरोमह निदान और संप्राप्ति मूत्रातीतके लक्षण और लक्षण लक्षण ४६३ मूत्रजठरफे लक्षण रक्तगुल्मकी चिकित्सा "चिकित्सा ४६४ मोत्संगके लक्षण शताहादि फल्क तिलकाय ।४६४ मूत्रकृच्छरोगाधिकार मूत्रक्षयके लक्षण पलाश क्षार घृत मूत्रकृच्छको निदान मूत्रशुक्रके लक्षण कहार घृत वातात्पन्न मूत्रकृच्छुके लक्षण ४६५ उष्णवातके लक्षण असाध्य लक्षण... पित्तोत्पन्न मूत्रकृच्छ्के लक्षण मृप्रसादके लक्षण हृदयरोगाधिकार । ४५८ विविधातके लक्षण फफज मूत्रकृच्छ्रके लक्षण यस्तिकुण्डलके लक्षण हृदयरोगका निदान ४५८ सन्निपातोद्भव मूत्रकृच्छूके लक्षण, ४७३ वातज हृदयरोगके लक्षण शल्यज मूत्रकृच्छू के लक्षण मूत्राघातको चिकित्सा... हृदयरोगकी चिकित्सा... पुरीपज मूत्रकृच्छके लक्षण शिलोद्भिदादि तल पुष्करादि फल्क ४५९ अश्मरीजन्यमूत्रकृच्छ्के लक्षण । धान्यगोक्षुरक घृत भद्रावह घृत पुष्करादि फाथ , शुक्रजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण हरीतक्यादि घृत चिकित्सा क्षीद्रार्द्धभाग.घृत ४७६ पुनर्नवादि तेल पुनर्नवाद्य मिश्रक पथ्य अश्मरीरोगाधिकार।४७६ पित्तजमूत्रकृच्छ्रकी चिकित्सा पित्तज हृदयरोगके लक्षण तणपंचमूल अश्मरीरोग निदान चिकित्सा शतावर्यादि काथ सम्प्राप्ति अर्जुनक्षीरपाक ४६०/एार बीजादि पान पूर्वरूप ककुभादि चूर्ण. हरीतक्यादि काथ सामान्य लक्षण ४६७ वातोल्बण पधरीकी चि. धेयस्याध घृत विकण्टाद्य घृत. कफज मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा ." .एलादि काथ पथ्य त्रिदोपज मूत्रकृच्छ्रकी चिकित्सा, वरुणादि काथ फफजहृदयरोगके लक्षण अभिघातजनित मूत्रकृच्छूकी चिकित्सा.. ४६१] चिकित्सा .४६८वीरतरादि गणे " " " ... ... ... विदारी घृत ... ... " " १७६ ... " ... " ... कसेरुकाध घृत... शतावरी घृत " शुण्ठ्यादि काथ स्थिराध घृत पापाणभेदादि घृत .......

विषयानुक्रमणिका। (२५) पृष्ठ. ४८८/चिकित्सा ... ... ... " ... " . " ... " ... " ... " , " " विषय. पृष्टः विषय. पृष्ठ. विपय. पित्तोल्यणअश्मरीके लक्षण. ४७८ स्त्रियोंके प्रमेह न होनेका मेदवृद्धिके लक्षण ४९८ पिचोल्यणअश्मरीकी कारण ४९९ चिकित्सा ४७९ असाध्यलक्षण उद्वर्तन कुशादि घृत' सर्वप्रमेहोंकी उपेक्षा करनेसे अमृतादि गुग्गुलु फफोल्बणाश्मरीनिदान...., मधुमेह होता है , दशांग गुग्गुलु कफोल्मण अश्मरीकी चिकित्सा मधुमेहशब्दकी प्रवृत्तिमें कारण४८९/लोहरसायन वरुणादि घृत प्रमेहोंकी उपेक्षा करनेसे दश लोहारिष्ट प्रकारको पिडिका ... व्योपाद्य सत्तुप्रयोग शुक्रजाईमरीनिदान ४८० दशप्रकारकी पिंडिकाओंके ल. त्रिफलादि तैल उपद्रव अरिष्ट प्रमेहकी पिड़िकाओंके लक्षण महासुगन्धित तेल शुक्रजाश्मरीकी चिकित्सा प्रमेहको पिडिकाओंमें दोपोंका उदररोगाधिकार । ५०५ पञ्चमूलादि घृत, निर्णय ४८१ , उदररोगका निदान वरुण तेल ४८२ विनाप्रमेहफे पिड़िकाओंका उदररोगकी सम्प्राप्ति कुशादि तैलं होना ४९० उदररोगके पूर्व लक्षण पिंडिकाओंकी असाध्यता सामान्य चिकित्सा , उदररोगके सामान्य लक्षण वरुणादि चूर्ण पिडिकाओंके उपद्रव उदररोग संख्या ४८३ वरुणकगुड़ प्रमेहरोगकी चिकित्सा... वातोदरके लक्षण कुलित्थाद्य घृत ४८१ महमें हितकारक पदार्थ साध्यासाध्य विचार शरादि पंच मूल धृत प्रमेहरोगमें त्याज्य पदार्थ अजातादकके लक्षण वरुणघृत न्यग्रोधादि चूर्ण ..... ४९३ वातोदरकी चिकित्सा वीरतरादि तेल त्रिकटवायो गुटिका एरण्डादि तेल द्वितीय वीरतरादि तेल ४८५ दाडिमाद्य घृत ४९४ सामुद्राय चूर्ण पुनर्नवादि तैल गोक्षुरादि चूर्ण गुटिका... दशमूलपट्पल घृत, प्रमेहरोगाधिकार । ४८ सिंहामृत घृत " दशमूलाध घृत प्रमेहका निदान ४८६ ४९५ लशुन तेल प्रमेहकी संप्राप्ति अर्जुनादि घृत वातैल पित्तादर निदान दोपदूप्योंका वर्णन गोक्षुराद्यवलेह ४९६ पित्तोदरकी चिकित्सा... पूर्वरूप सार लेह " कफोदरनिदान सामान्य लक्षण असनादि योग कफोदरचिकित्सा शिलाजितु स्वर्णमाक्षिक और सन्निपातोदरनिदान दश कफप्रमेहोंके लक्षण रौप्यमाक्षिक प्रयोग ..." चिकित्सा प्रमेह पिडिकाओंकी. नागराध यमक चिकित्सा ४९८ पटोलादि चूर्ण ५१३ १८८ प्रमेहसे आरोग्य हुएकी परीक्षा. ५१४ मदरोगांधिकार । ४९८ नाराच धृत मदरोगका निदान. ... ४९८ द्वितीय नाराच घृत प्रमेहका अरिष्ट |मेदवृद्धिकी सम्माप्ति " " " ". ... " धान्वंतर घृत " " " " " . प्रमेहके कारण " ४८७ " ... पित्तके छः प्रमेहोंके लक्षण वात ४ प्रमेहोंके लक्षण प्रमेहके उपद्रव कफप्रमेहके उपाय पित्तजप्रमेहके उपद्रव पातजप्रमेहके उपद्रव नारायणंचूर्ण .. "महाक्षार " त्रितादि घृत.. " *M भाषाटीकासह यंगसनकी- ... " ... शोधों के रक्षण ... ... " " F বি ঘর ... . ... ... " ... पिपय. विषय. विषय. ५६५ शोधरोगाधिकार! ५२९/निमुटादि लोह शालीपीपल " शोध रोगका निदान ५२९/सोयोदर लोद प्लीदोदरनिदान ५१६ मामान्य लक्षण मन्त्राद्धरोगा- प्लीहादरकी चिकित्सा ५१७ वातज शोध लक्षण धिकार। ५४ ययान्यादि पूर्ण ५१८ पिराज शोधके लक्षण ५३०/मद्धिनिदान ५ विहंगादि चूर्ण कपाल शोध लक्षण " यावादिजन्य शसि सग मल्लातफ मोदक गज और सन्निपातन मृगजपरिक लक्षण अभया यटक " भन्नाले लक्षण अभिपातन शोमके लक्षण अग्निमुस लवण इसकी उपेक्षा करनेका फल रिपज शोध लक्षण.... पदनल कपूर असाध्य क्षण दोपपरत्वसे सूगनका स्थाना• महिपटूप्रस्थ भूत अपज्य न्तरफथन "भन्नाद्रिकी चिफिरसा चित्रकादि घृत शोधक कृयादि भेद ५३१ पचवल्ल मध्य लक्षण प्राक्षा पूत " शिरावध शंखद्राय ५२१ आमयुफ शोधके रक्षण फुरण्टरोग निदान और शोयकी चिकित्सा रोहीतकाच घृत लक्षण महारोहीवक वृत्त पुनर्नवारिले ५३३ पुरण्टरोगका चिकित्सा द्विदोषज और विदोपज फदलीक्षार तेल ५२२ शतपुप्पाच पृत शायकी चिकित्सा... ५३४ गन्धर्वहस्त रेल माणादि गुटिका मानाम ५३७ गृहचूर्ण अधरोगाधिकार । ५८ क्षारीपप्पली ५२ द्वितीयगुडचूर्ण ५३८ प्रध्न (पद) का निदान हत्यारीपप्पली. पुनर्नवाघ पूर्ण प्रध्नरोगकी चिकित्सा अभया लवण "गोमूत्र मण्डूर पिल्लांच चूर्ण यकृतोदर निदान ५२४) पुनर्नवाध घृत वृहत्सैन्धवाद्य तेल यकृतोदरकी चिकित्सा द्वितीय पुनर्नवादि घृत ५३९) गलगण्डरोगाधिकार.५. गलगण्डका निदान गलगण्डकी सम्माप्ति पद्धगदोदरक लक्षण वातिकगलगण्डके लक्षण क्षतांदरके लक्षण ५२५ स्थलपद्मफादि घृत कफजगलगण्डके लक्षण उत्पत्तिसहित जलोदरके लक्षण, पञ्चकोलक त मदजगलगण्डके लक्षण शुप्फमूलकादि तेल चिकित्सा असाध्य लक्षण तसादिप्रदेह क्षारगुटिका ५४० गलगण्डकी चिकित्सा यवादिल उदरादि लोह ५२६] शैलादितल हिंस्राद्य तेल साध्यासाध्य विचार ५२५ पञ्चमूलादि तेल कतिपय योग ५२८ सहरीतकी शाखोटाद्य तेल आद्रकघृत "दशमूल हरीतकी ५४१ काञ्चनारगुग्गुल गर्टिका. वादित पथ्य ... चित्रकलेह . " ... ... ... ... " ५ ... " " चिनक घृत विपली व चित्रकादि घृत द्वितीय चित्रक घृत माणक धृत ... ... " " " " | अमृताद्य चेल ... . पक्ष्यापथ्य विषयानुक्रमणिका। (२७) " । ... ... " ... " ... ... ... ... ... " गुआद्य तेल " तुम्बी तेल " " ... विषय. विश्य. पृष्ट. विपय. पृष्ठ. गण्डमालारोगा. पित्तजनोपदके लक्षण ... ५६३/ व्रणशाथाधिकार । ५७५ धिकार। ५५३ कफजीपदके लक्षण शोथका पूर्वरूप गण्डमालाऔर अपचर्चा. अराध्य लक्षण व्रण पाक ५७६ স্থ ५६४ ... ५५३ श्लोपदकी चिकित्सा अपफ व्रणशोथके लक्षण साध्य और असाध्य लक्षण गोमूत्रहरतिको पच्यमान प्रणशोथके लक्षण :: गण्डमालाकी चिकित्सा कृष्णाद्य मादक "पकरणशोथके लक्षण चंदनाद्य तेल पिप्पलाद्य चूण " गम्भीरपाकके लक्षण व्यापाथ तैल ५५४) वृद्धदारुक चूर्ण " सूजनमें एक दोपउत्पन्न काकादन्यादि तेल निर्गुण्ड्यादि मण्ड ५६७ होनेके समय तीनों दोपोंका महाअजमादाय तेल द्वितयिपिप्पल्यादि चूर्ण प्रादुर्भाव होता है ...५७७ वचाद्य घृत ५५५/काकादन्यादि क्षार ,, शोथके पकने में मतान्तर चक्रमर्दादिसिन्दूर तल सोरेश्वरघृत ५६८/पत्रणमेंसे राध न निकालनेका • ਜਿਹ ਰਿਚ दन्ती घृत परिणाम घद्धदारुफ पृत और तेल.., ५६९ व्रणशोथके पकापक जाननेमें विडंगाध तैल वैद्यके गुणदोप शाखोटकविल्वाध तेल विद्राधेरोगाधिकार । ५६९ व्रणरोग निदान वातजनणके लक्षण त्रिफलादि गुग्गुल विद्रधिका संप्राप्तिपूर्वक निदान ५६९ पित्तजवणके लक्षण -. प्रन्थिरोगाधिकार। ५५६ वातजविद्रधिके लक्षण कफजत्रणके लक्षण ५७८ वातजग्रन्थिके लक्षण पित्तजविद्राधेके लक्षण ५७० रक्तज और द्वन्द्वजत्रणके लक्षण , - पित्तजग्रन्थिके लक्षण कफजीवद्रधिके लक्षण सुखसाध्यव्रणके लक्षण फाजप्रन्धिके लक्षण पकनेके अनन्तर उनका स्राव मेजप्रन्थिके लक्षण सन्निपातजाविद्राधिके लक्षण कृच्छसाध्य और असाध्यन्त्रणके लक्षण आगन्तुकविद्राधिके लक्षण... साध्यासाध्य लक्षण रक्तजविद्रधिके लक्षण दुष्टवणके लक्षण प्रन्थिको चिकित्सा अन्तर्विद्रधिके लक्षण शुद्धव्रणके लक्षण भरनेवाले व्रणके लक्षण अर्बुदरोगाधिकार ५५९ विद्राधिके स्थान व्याधि विशेपसे व्रणको कृच्छ्र- अर्बुदरोगका संप्राप्ति निदान ५५९ साध्यासाध्यता साध्यत्व कहते हैं : - रक्तादक संप्राप्ति लक्षण ५६० विद्रधिक साध्यासाध्य लक्षण उपद्रव मांसावुदके लक्षण अध्यर्बुदके लक्षण स्तन विद्रधि त्रणरोगकी चिकित्सा ५७२ विद्रधिकी चिकित्सा वृहन्न्यग्रोधादि लेप उपनाह द्रव्य ५८१ भूनिम्बाध चूर्ण अर्बुदकी चिकित्सा (रक मोक्षण वरुणकाध घृत श्लीपदरोगाधिकार।५६३ फरस धृत " शस्त्रस भदन निषेध .५७५)शोधन शोपदका निदान ....५६३ प्रियंग्वाघ तेल वाल्लासीपके लक्षण प्रणरोगियोंका भोजन " द्विपश्वमूली तेल अपथ्य ३ ... ५५७ " .... ... হিয়াল স্কুল ... " ... " " ... " स्राव निर्गम ... " ... " " द्विरचुदके लक्षण, अर्बुद न पकनेका कारण ... ... " " (२८) माराटीकासह बस सनकी- " " ... " ... " ..4 लांगली घृत ८ ... . " .. " ... " " ... " " ... ... ५९८ भगदरका पूर्वरूप " विषय. पृष्ट. विषय. पृय. विषय. आगन्तुकवणरोगा- सप्तविंशतिक गुग्गुड ५९४ पित्तजसाडीव्रणकी चिकित्सा ६०३ धिकार । ५.७ अग्निदग्धरण निदान श्यामा घृत ६०४ अमिदग्धकी चिकित्सा आगन्तु सघणकी संख्या और ५९५/कफजनाहीयणकां चिकित्सा संशाति ५८७/पथ्यादि लेप " स्वर्जिकाच वेल छिनक क्षण मधूनिटष्टाय पृत .... ५९६ संघवाध तेल भिन्नके लक्षण " शल्यजनासीघ्रणको चिकित्सा, कोष्टके लक्षण पटोली तेल "पुरम्भीकाद्य तेल इन भेदोंके लक्षण चन्दनाथ तल मेपरोममपी आमाशयस्थित रतके लक्षण ५८८ अपथ्य कर्पूराद्य तेल पकाशयख्यके लक्षण प्रणप्रन्थिकी चिकित्सा ५९७ स्वजिकाद्य तेल वित्रणके लक्षण. कम्पिल्लक तेल सप्ताङ्ग गुग्गुल क्षतके रक्षण भग्नरोगाधिकार । ५९७ भगन्दररोगा- पिचितके लक्षण सन्धिभनके सामान्य लक्षण ५९७ धिकार। ६०६ धृष्टके लक्षण काण्डभनके सामान्य लक्षण शल्यसाहितत्रणके लक्षण कटसाध्य वातजशतेपानक भगन्दरके फोप्ठभेदके लक्षण असाध्य लक्षण असाध्यके लक्षण भनरोगकी चिक्त्सिा ... ५९९ निदान और लक्षण... '६०७ मोमें चोट लगनेसे जोत्रण होता आभागुग्गल ६०० वित्तिक उष्टुग्रीव भगन्दरके निदान और लक्षण... है उसका सामान्य लक्षण ५८९ लाक्षादि गुग्गलु मर्मरहित शिराविद्धके लक्षण गन्यतैल सीमकपरिसावा लक्षण स्नायुविद्धके लक्षण सन्धिविद्धके लक्षण साध्यतादि अस्थिविद्धके लक्षण विशेष उपदेश ६०२ मगन्दरलक्षण शल्यसम्बन्धी उन्मार्ग मर्मविद्धके लक्षण अपथ्य मांस मर्म व्रणके लक्षण भमआरोग्यके लक्षण... 'भगन्दरक लक्षण व्रणायामके लक्षण साध्यासाध्य लक्षण ५९० नाडीव्रणरोगा- सर्वप्रणके लक्षण ‘धिकार। भगन्दररोगकी चिकित्सा ६०२ आगन्तुकमणकी चिकित्सा विष्यन्दन तेल , नाडीव्रणकी संख्यारूप निशाध तेल गुग्गुलवाटिका ५९२ सम्प्राप्ति अमृत गुग्गुलु वातजनाडीव्रणके लक्षण करवरािद्य तेल पित्तज नाडीव्रणके लक्षण... विक्ताद्य घृत कफज नाडीव्रणके लक्षण... ६०३ पथ्यापथ्य जोतकाद्य तल द्विदोपजनाडीव्रणके लक्षण उपदेशरोगा- विपरीतमल्ल तल ... ५९३ त्रिदोपजनाडीव्रणके लक्षण.. धिकार। दशल्यजनाविणके लक्षण वातोपदंशके लक्षण साध्यासाध्य लक्षण पित्तोपदंशवारकोपदंशके , नाडीव्रणकी चिकित्सा लक्षण कफोपदंशके लक्षण.... " अवस्थानुसार मनकी ६०१ त्रिदोपजन्यशम्बूकावर्त " " ६०९ " " जात्यादि घृत नवकार्पिक गुग्गुलू " " ... " ६११ कुठार तेल दुर्वाय तेल " नृल तेल वटिका गुग्गुल " (हिंसाध तेल " विषयानुक्रमणिका। (२९) ... " कुष्ठके पूर्वरूप ... " " " - | कुष्ठपर लेप धत्तूर तेल " ... " ... ... " " ... " पथ्य ... " ... " पपिकाके लक्षण ... " प्रथितके लक्षण " ... विपया विषय. विषय. पृष्ठ. पृष्ठ. त्रिदोषज उपदंशके लक्षण ६११ प्रकार कथन ६२० निम्बादि महाकपाय ६२९ असाध्य लक्षण ६२१ मजिष्ठादि महाकपाय... उपदेशकी उपेक्षाका फल कपालकुष्ठके लक्षण उदयमार्कण्ड महाकपाय लिङ्गार्शके लक्षण ६१२ औदुम्बरकुष्ठ के लक्षण ... ६३१ उपदेश रोगोंकी चिकित्सा मण्डलकुष्ठके लक्षण ६३२ करलाध धृत ६१४ ऋक्षजिह्वकुष्टके लक्षण श्रीवास घृत ६३३ भूनिम्याद्य तेल ६१५ पुण्डरीककुष्टके लक्षण " सिन्दूराध तैल आगारधूमाथे तेल , सिध्मकुष्टके लक्षण " वहत्सिन्दूराद्य तेल गोजी तेल काकणकुष्ठके लक्षण ६२२ अर्क तैल जम्व्याध तेल , ग्यारहक्षुद्रकोढोंके लक्षण "त्रिफलाद्य गुटिका कोशातकी तेल चर्मकुष्ठके लक्षण " शशांकलेखादि लेह किटिभकुष्ठके लक्षण त्रिफलाद्य मोदक लंगाशंकी चिकित्सा ६१६ वपादिककुष्टके लक्षण महाभल्लातक शुकदोषरोगाधिकार ६१६ अलसककुष्टके लक्षण " पञ्चनिम्यादि चूर्ण ६३६ ६१६ दद्रुमण्डलकुष्ठके लक्षण. त्रिफलाद्य चूर्ण अष्ठीलांके लक्षण , चर्मदलकुष्ठके लक्षण पथ्याध वटक , पामाकुष्ठके लक्षण तिक्तपटक घृत कुम्भिकाके लक्षण कच्छुकुष्ठके लक्षण पञ्चतिक्तक घृत अलजीके लक्षण विस्फोटककुष्टके लक्षण... द्वितीय पश्चतितक मुदितके लक्षण , शतारुकुष्ठके लक्षण गुग्गुलुपश्चतिकक घृत संमूढपिडिकाके लक्षण... विचचिकाके लक्षण ६२३ द्वितीयगुग्गुलपञ्चतिक्तक घृत , अवमन्थपिडिकाके लक्षण ६१७ वातजादिकुष्ठोंके लक्षण... महातिक्तक घृत ६३९ पुष्करिकाके लक्षण , सप्तधातुगतकुष्ठोंके लक्षण 'स्पर्शहानिके लक्षण रसगतकुष्ठके लक्षण महावज्रक घृत ६४० रक्तगत कुष्ठके लक्षण खादिराद्य घृत मांसगतकुष्ठके लक्षण महाखदिर धृत स्वपाकके लक्षण मेदोगतकुष्ठके लक्षण मेपशृङ्गथाद्य तेल ६४१ शोणितार्बुदके लक्षण अस्थिमज्जागतकुष्ठके लक्षण मांसार्बुदके लक्षण , शुमायगतकुष्ठके लक्षण |साध्यासाध्य विचार प्रधानदोपके लक्षण ६४२ ६१८ श्वित्र लक्षण मरिचाद्य तल असाध्य लक्षण दोपभेदसे लक्षण भेद द्वितीय मरिचाध तेल शूफदोपकी चिकित्सा ,चित्रकी साध्यासाध्यता... दावा तेल ६२५ तृतीयमारेचाद्य तेल ६४३ .६१९/सांसर्गिक रोग चतुर्थमरिचाद्य तेल कुष्ठरोगाधिकार । ६२० कुष्ठरोगकी चिकित्सा विपतैल ६४४ कुष्ठरोगका निदान ६२० खदिराष्टक ६२९/सोमराजी सैल '६४५ कुष्ठ उत्पन्न होनेके विशेषकारण नयरूपाय श्वेतकरवीराद्य तेल " " ... " " " " ... वज़क धृत " उत्तमाके लक्षण शतपोनकके लक्षण " ... " " " " ... " " मांसपाकके लक्षण विद्रधिके लक्षण तिलंकालकके लक्षण वनक तेल महावत्रक तेल ६२४ तृण तैल बृहत्तण तेल ... " ... " ... " ".

(३०) भाषाटीकासह वनसेनकी- ... 4 " नीली पृत " .. महानीलो पृत " " विसर्पक उपद्रव " " " विश्य. पृ. विषय. एय. विश्य. गण्डीरायल ६४५/ द्राक्षादि गुटिफा ६६. साध्यासाध्य विचार स्नुपान सेल विसर्परोगाधिकार । ६६० विस्फोटफफे उपद्रय फनकविन्दुनामारिष्ट विसर्पक सायप्रसार ६६०/विस्फोटकाको चिकित्सा... पध्यापध्य ६४६ पिसर्पके दोपदूप्य ६६ दमांग लंप ६७२ वित्रकुष्ठकी चिकित्सा घातजविसर्पके लक्षण पद्मक घृत सोमराजो प्रत ६४८ पित्तज विसपके लक्षण पशतिफक पत्र " फफगायेसपके लक्षण . শিক্ষা বই , सनिपातसविसर्पके लक्षण..." म्नायुरोगाधिकार। ६७१ ज्योतिष्मवी सेल ६४९ वातपित्तन आग्नेयधिसके विपतेल सायुरोगको चिकित्सा ... ६५१ लक्षण " मनिष्ठादि प्रलेप उदर्दशीतपित्तकोठा- वातपित्तोद्भव मन्यि मसारिकारोगा- धिकार। ६४९/ विसर्पके लक्षण धिकार। ६७२ गीतापिचके पूर्वरूप ६४९ कफपित्तोत्पन्नकर्दमफ विसर्पके उदर्द या शीतपित्तके लक्षण ६५० लक्षण मसूरिफाके पूर्वरूप ...६७२ फोढ के लक्षण , क्षतजविसर्पके लक्षण वातजाममूरिफाके लक्षण... ६७३ उदर्दको चिकित्सा पित्तनमसूरिकाके लक्षण... सिद्धार्थकाद्वर्तन ६५१ साध्यासाध्य रक्षण रजमसूरिकाके लक्षण... " अम्लपित्ताधिकार । ६५२ विसर्परोगफी चिकित्सा... कफजमसूरिकाके रक्षण... ६५२/दनांग लेप विदोपजमसूरिफाके लक्षण ६६४ प्रथम अधोगत अम्ल. चर्मपिडिका वृषाध.घृत ६६६ रोमान्तिक गारवाध घृत ६६७/सप्तधातुगत मसूरिकाके लक्षण६७४ अम्लपित्तको विशेष अवस्था माध्यासाध्य विचार विस्फोटकरोगा- साध्यासाध्या मूरिकाका मरिष्ट अम्लपिच में दोषोंका संसर्ग ६५३ धिकार। ६६७/अथान्यग्रन्थान्तरात् दोपभेदोंसे लक्षणभेद विस्फोटकफा स्वरूप मसुरिकाका अन्यभेद कफपित्तके लक्षण.. वातजविस्फोटकके लक्षण मसूरकाको चिकित्सा ६७६ अम्लपित्तकी चिकित्सा पित्तजविस्फोटकके लक्षण ६५६ कफजविस्फांटकके.लक्षण पटोलादि काथ ६७८ कफपित्तात्मक विस्फोटकके निम्बादि काय रसामृतचूर्ण ६५७ लक्षण ६६८ साध्यासाध्य विचार " वातपित्तात्मक विस्फोटकके ६८१. वृहन्नारिकेल खण्ड . क्षुद्ररोगाधिकार। ६८२ नारिकेलामत ६५८/कफवातात्मक विस्फोटक अजगल्लिकाके लक्षण अविपत्यकर चूर्ण लक्षण अजगल्लिकाकी चिकित्सा... पिप्पलाधवलेह " त्रिदोषजन्य विस्फोटकके विवृतापिड़िका के लक्षण ..." ६६० लक्षण , इन्द्रवृद्धाके लक्षण रक्तजविस्फोटककेलक्षण... गर्दभिकाके लक्षण अम्लपिचके लक्षण ... " पित्त के लक्षण ऊर्धगत अम्लपितके लक्षण · , ... फरल ... " ... ... " (धूप " पिप्पली धृत शतावरी घृत. " ६५९ नारिकेल खण्ड दावी घृत - ... M खण्ड कूपमाण्ड द्राक्षाय धृत. " विषयानुक्रमणिका । विपय पापाणगर्दभके लक्षण " मूषकाद्य तेल ७०१ " ... " ... " ... " ... " स्तुह्याद्य सैल " ... " " " ... " " गुखादि सैल ६८५ कीचकाध तेल . ... " ... विपय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. ६८२ कदरके लक्षण ६९०वल्मीकके असाध्य लक्षण. .७०० पतसिंकाके लक्षण ६.३ कदरकी चिकित्सा गुदभ्रंशके लक्षण जालगर्दभके लक्षण चिप्यके लक्षण , गुदभ्रंशकी चिकित्सा.... इरिवल्लिकाके लक्षण "चिप्यको चिकित्सा कक्षाके लक्षण 1. कुनखके लक्षण... ६९१ द्वितीयमूपकाध तैल गन्धनान्नाके लक्षण कुनसकी चिकित्सा तृतीयमूपकाद्य तेल विवृता पिडिकाकी चिकित्सा अलसके लक्षण ६९२ चतुर्थमूपकाद्य तेल अन्त्रालजाक लक्षण . अलसकी चिकित्सा शूकरदंष्ट्रके लक्षण यवप्रख्याके लक्षण ६८४ अरुपिकाके लक्षण शूकरदंष्ट्रकी चिकित्सा,... ७०२ : कच्छीपकाके लक्षण अरुषिकाकी चिकित्सा मेध्याविक तेल अन्त्रालजीकी चिकित्सा ६९३/परिवर्तिकाके लक्षण अनुशयीके लक्षण मांसी तेल परिवर्तिकाकी चिकित्सा अनुशयीकी चिकित्सा दारुणकके लक्षण अवपाटिकाके लक्षण विदारकाके लक्षण दारुणककी चिकित्सा ६९४ अवपाटिकाकी चिकित्सा विदारकाकी चिकित्सा निरुद्धप्रकाशके लक्षण... शर्कराके संपामि लक्षण निरुद्धप्रकाशको चिकित्सा शर्करावुदके लक्षण चित्रकल सन्निरुद्धगुदके लक्षण ७०४ शर्कराबुंदकी चिकित्सा सन्निरुद्धगुदकी चिकित्सा जंतुमणिका निदान इन्द्रलुप्तके लक्षण अहिपूतनके लक्षण ", इन्द्रलुप्तकी चिकित्सा ::. अहिपूतनकी चिकित्सा 'जंतुमाणिकादिकी चिकित्सा स्नुह्यादिखालित्यहर तेल ६९६ पटोल घृत ... मुखदूपिफाके लक्षण ६८६ यष्टीमधुकाद्य तैल वृषणकच्छूके लक्षण पलितके लक्षण वृषणकच्छूकी चिकित्सा... पलितकी चिकित्सा निम्बबीज तैल: चर्मकीलकी चिकित्सा मुखदूपिफादिको चिकित्सा केतक्यादि तैल ६९७/क्षुद्ररोगोंकी सामान्य चि० मुखपर लेप करनेकी मात्रा- नीलबिन्दु तेल मुखरोगाधिकार। ७०६ : - और लेप करनेकी विधि काश्मर्याद्य तेल मुखरोगोंका निदान हरिद्राद्य तेल ... ६८८ केशरचन तेल ६९८ वातिकओष्ठरोगके लक्षण... मजिठाध तेल केतस्याद्य तेल कनक तैल ६८९ मयूरचित्ताय तेल सैष्मिक ओष्ठरोगके लक्षण कुंकुमाद्य तेल सन्निपातिकके लक्षण प्रपौण्डरीकाच तेल ६९९ रक्तज ओष्ठरोगके लक्षण... " पद्मिनीकण्टककी चिफित्सा अग्निरोहिणीके लक्षण मांसजनित ओष्ठरोगके लक्षण, आग्निरोहिणीकी चिकित्सा मेदज ओप्टरोगके लक्षण... वल्मीकका निदान तथा लक्षण, अभिधातजके लक्षण ६९०वल्मीकको चिकित्सा मुखरोगकी चिकित्सा. जन्मत तेल " मनःशिलाद्य तेल मुखरोगके लक्षण ७०८ "झंगराज तैल " . मापके लक्षण " ... ... ... " ... ... " " 'न्यच्छके लक्षण व्यंगके लक्षण 'नालिकाके लक्षण " चर्मकोलके लक्षण " ... " ... " पैत्तिकओष्ठरोगके लक्षण... " पयिनीकण्टफके लक्षण मधूक तैल " " पाददारोफे लक्षण पादंदारीकी चिकित्सा पोदिकाध तेल . " ७०० साम भाषाटीकासह वसेनकी- पृष्ठ. ... ७२४ . सितादि घृत " ७२६ ... ... " ७२६ ... ... ... " ... " " ... " ... ७२८ " विषय. विषय. पृष्ठ. विषय. दतवेष्ठरोगनिदान । ७०९) जिहारोगनिदान । ७१८ मौसतानके लक्षण दतवेष्टरोगों की संख्या और: वावज जिहारोगके लक्षण ७१८ विदारीके लक्षण ७०९/पित्तज जिहारोगके लक्षण... " गलरोगोंकी चिकित्सा....... '७२५, शीतादके लक्षण कफज जिहारोगके लक्षण... दन्तपुप्पुटके लक्षण अल्लासके लक्षण कालक चूर्ण पनिक चूर्ण दन्तवेष्टके लक्षण उपजिहाके लक्षण यवंक्षारादि गटिका शोपिरके लक्षण "जिद्वारोगकी चिकित्सा ७१९ क्षार गुटिका 'महाशौपिरके लक्षण तालुरोगनिदान । ७१९ सर्वमुखगतरोगका परिदरके लक्षण उपकुशके लक्षण ७१० तालुगत गुण्डी रोगके लक्षण ७१९ निंदान। ७२६ वैदर्भके लक्षण तुंडिकेरीके लक्षण ७२० वातजमुखपाकके लक्षण - खल्लिचर्द्धनके लक्षण अभूपके लक्षण पित्तजमुखपाकके लक्षण करालके लक्षण कच्छपके लक्षण ,कफजमुखंपाकके लक्षण अधिमांसके लक्षण.. ताल्वर्युदके लक्षण सर्वमुखगतरोगोंकी चिकित्सा७२७ मांससंघातक लक्षण पांचप्रकारकी दन्तनादियोंके स्नैहिक धूम वालपुप्पुटके लक्षण सर्वसरोपकम लक्षण वालुशोपके लक्षण यष्टीतेल दन्तरोगका निदान वालपाकके लक्षण मुखरोगों में असाध्य रोग' ७२९ कृमिदन्तके लक्षण " तालुरोगकी चिकित्सा मखगत समस्त असाध्य रोग, भंजनेक लक्षण गलरोगका निदान । ७२१ कर्णरोगाधिकार । ०२९ दन्तहर्षके लक्षण ७११ दन्तविद्राधिके लक्षण रोहिणीके लक्षण वातजाके लक्षण... ७२२ दन्तशर्कराके लक्षण पाधिर्यके लक्षण कपालिकाके लक्षण पित्तजाके लक्षण.... कफजाके लक्षण, श्यावदन्टके लक्षण कर्णस्रावके लक्षण " निदोपजाके लक्षण हनुमोक्षके लक्षण... रक्तजाके लक्षण कर्णकण्डू के लक्षण दन्तरोगकी चिकित्सा कर्णगूथके लक्षण'. "रोहिणीकी मारनेकी अवधि भद्रमुस्तादि वटिका कर्णप्रतिनाहके लक्षण कण्ठशाटूकके लक्षण दन्तोपक्रमः ७१४ अधिजिह्नके लक्षण कृमिकर्णके लक्षण विदा- दिल वलयके लक्षण ७२३ कानमें पतंगादि कृमि घुसनेके बलासके लक्षण लक्षण "एकवृन्दके लक्षण द्विविध कर्णविद्रधिके लक्षण हरिद्राद्य तेल... " वृन्दके लक्षण कर्णपाकके लक्षण Filशतन्नीके लक्षण पूतिकर्णके लक्षण इरिमेदाद्य तेल ... ७१७ गिलायुके लक्षण कर्णशोथादिकोंके लक्षण ....७३१ स्वल्पखदिरवाटेका "गलविद्रधिके लक्षण. वातज कर्णरोगके लक्षण.. महासंदिरवटिका गलोधके लक्षण पित्तज कर्णरोगके लक्षण पध्यापथ्य ७१८ स्थानके लक्षण ७२४ कफज कर्णरोगके लक्षण... ... ... ७२१ कर्णरोगका निदान ... " कर्णनादके लक्षण ... " " " कर्णक्ष्वेडके लक्षण ... " ... " " ७१२ ... ... ... वकुलाद्य तेल... सहचराद्य तेल " ... ६ लाक्षाद्य तेल विषयानुक्रमणिका। ... " ... ... ७४१/धवाद्य तेल... वलाहयाद्य तेल रसाचनाद्य तेल मुस्तफादि तैल... " ... " ... " ... ... ... " ... ... . ... ... .. " " " .. ... " ... " " विषय. ; विषय. विषय पृष्ठ. पृष्ठ. पृष्ठ. ७५० सन्निपातज कर्णरोगके लक्षण ७३१ प्रतिनस्यके लक्षण परिपोटकके लक्षण नासापाकके उत्पातके लक्षण "पूयरतके लक्षण उन्मन्थकके लक्षण ... "क्षवथुके लक्षण, दुःखवर्द्धनके लक्षण आगन्तुक क्षवथुके लक्षण.. क्षीरघृत... ७५१ परिलेहीके लक्षण ७३२ अंशथुके लक्षण " गृहधूम तैल... कर्णरोगोंकी चिकित्सा "दीतके लक्षण " शितल 'दीपिका तेल, ७३३ प्रतिनाहके लक्षण : ७४२ करवीराद्य तेल रास्ना गुग्गुलु "नासानायके लक्षण व्योपाद्य तेल.. कर्णपूरणविधि ७३४ अन्यमतसे नासानायके लक्षण " नेत्ररोगाधिकार । ७५१ मात्रा.लक्षण " नानापरिशोपके लक्षण " आभिष्यन्दके लक्षण ७५२ श्योनाक तैल. "आमपीनसके लक्षण " वाताभिष्यन्दके लक्षण... हिंग्वादि तेल पकपीनसके लक्षण " पित्ताभिप्यन्दके लक्षण.. देवदादितल "पानसरोगकी चिकित्सा ... पिप्पल्यादि तेल " कफाभिप्यन्दके लक्षण पञ्चमूल्यादि यूप... रक्ताभिप्यन्दके लक्षण एरण्डादि तेल ७३५ कटूफलादि चूर्ण अभिष्यन्दसे अधिमन्यकी उ० सूकरवसा " कटुनिकादि चूर्ण और गुटिका७४३ दोपभेदसे कालमर्यादा ७५३ स्वर्जिकाल व्योपाद्यचूर्ण ७४४ आमयुक्त नेत्ररोगके लक्षण निरामके लक्षण बिस्वतेल " त्रिकटुकाद्य तेल सशोथ और शोथरहित नेत्रः अपामार्ग तेल. ". शिा तैल पाफके लक्षण राजरसायन मधुशुतके लक्षण , हताधिमन्थ के लक्षण पिप्पली तैल:.. लक्षण जव्वाद्य तेल ७३७ विपगर्भ तेल शुण्ठी तेल और घृत शुष्काक्षिपाकरोगके लक्षण ७५४. पंचवल्कलले प्रतिश्यायका निदान ७४६ अन्यतोवातके लक्षण ७३८ चतुष्पर्ण सेल चयादिकक्रमसे इसका दूसरा अम्लाध्युपितके लक्षण... निदान... प्रतिश्यायका पूर्वरूप शिराहर्पके लक्षण कुष्टाय तल वातिक प्रतिश्यायके लक्षण ७४७/पांच रोगोंकी चिकित्सा पतिक प्रतिश्यायके लक्षण गन्धकायतल वृक्षादन्याध घृत ७५९ मिक प्रतिश्यायके लक्षण'." वासफादि काय कर्णपालीकी ७६६ द्वितीयवासफादि फाय... चिकित्सा । ७३९ शतावरी तेल दुष्टप्रदिश्यायके लक्षण त्रिफला अथषा पथ्यादिकाय७६७ रुधिरजन्य प्रतिश्यायके लक्षण, कृष्णगतरागनिदान । ७६७ जीवनीय तेल भसाध्य लक्षण... सत्रणरोगके लक्षण नासारोगा नासिफागवअन्यान्यरोग... "सत्रणशुक्रके साध्यासाध्य क्षण: ७४० वृद्धिको प्राप्त हुआ प्रतिश्याय७४८ अप्रणशुक्रके रक्षण नासारोगनिदान और नासिकागतमर्श औरअर्बुदके ल०, अनर्णशुक्रकी अपराभेदसे ... ७४०/प्रविश्यायी चिकित्सा... ME मसाध्यता मयूरनालाध वैल ७३६ व्याघ्री तेल " क्षार तेल " " ... " ७४५) वातपयके ... " . " चतुष्पल्लव तेल शिरोत्पातके लक्षण " " " " " शम्बूफ तेल " , त्रिदोपज प्रतिश्यायके ल०... " ... ... ७४० " धिकार। पीनसके टक्षण भाषाटीकासद वङ्गसेनकी- ... " " " शृंगराजल " अन्यच्च " " " " " " चूर्णाजन ... पटोलाद्य घृत " " ७८३ वचादि काथ ७९७ " ... ... विषय. पृष्ठ. विपय. पृष्ठ. विषय, -अत्रणशुक्रकी अवस्थादोपसे धूमदृष्टिके लक्षण ७७८ विभीतकाद्य तेल, ७९४. असाध्यता ७६७ हस्वजात्यके लक्षण त्रिफलाय तेल अक्षिपाकात्ययके लक्षण ७६८ नकुलाध्यके लक्षण गोमयतेल अजकाजात के लक्षण गम्भीरप्टिके लक्षण अन्यमतसे अजकाके लक्षण आगन्तुज लिंगनाशके लक्षण ,, द्वितीय श्रृंगराजसैल अनिमित्त लिंगनाशके लक्षण अजिततेल अजकाजातकी साध्यांसाध्यता साध्यासाध्य ७७९/नीलोत्पलाद्य तेल कृष्गंगतरोंगोंकी चिकित्सा दृष्टिगतरोगकी चिकित्सा नृपवल्लभतेल " लामज्जकाद्यसन ७७० नेत्ररोगमें पथ्य महापिप्पल्याच तेल दन्तवात ७७१ नेत्ररोगमें अपथ्य अथ कृष्णगतकी चिकित्सा ७९६ ७७२ रानादि घृत ७८० मरिचादि चूर्णाचन ... ... ७७३ पित्ततिमिरकी चिकित्सा मेपशृंगाद्यजन द्राक्षाद्य घृतं कफातिभिरकी चिकित्सा मनःशिलाद्यसन कृष्णाद्य तेल भास्करवात बृहच्छशफांद्य घृत ७७४ अन्धसुदर्शक अञ्जन सुखावती वर्ति दृष्टिगतरोगका अथ नकान्धकी चिकित्सा ७८४ मुक्तादि महाजन अथ दृष्टिरोगको चिकित्सा, ७९८, निदान । ७७४ चन्द्रोदयादि वर्ति अथ शुक्लगतरोगका निदान ... हरीतक्यादि पति प्रस्तामके दूसरे पदलगत दोपोंका लक्षण ... स्वभाव ७७४/ त्रिफलादि वर्ति शुक्लार्मके लक्षण तृतीयपटलगतदोपोंके लक्षण ७७५ शङ्खादि वटी चतुर्थपटलगततिमिरके लक्षण , कुसुमिका वर्ति | अधिमांसामके लक्षण दोपविशेपके द्वारा रूपोंका चन्दनादि वर्ति दीखना व्योपादि वात शुक्तिरोगके लक्षण पित्तजलिंगनाशके लक्षण ७७६ नागार्जुनाञ्जन अर्जुन के लक्षण कफलिंगनाशके लक्षण ". शशच गर्भ मपी रक्तजलिंगनाशके लक्षण ,शावादि चूर्णाजन... शिराजालके लक्षण परिम्लायिसज्ञक लिंगनाशके नयनामृताञ्जन ७८७ शिराजपिडिकाके लक्षण मनःशिलादि अञ्जन बलासके लक्षण वातादिजन्यनेत्रके वर्णानुसार शीशक शलाका 'लिंगनाशके छः प्रकार ७८९ शुकगतरोगकी चिकित्सा नेत्रनिर्माणप्रकार | ७८९ परिम्लायि मण्डलके लक्षण वातादिकारणभूतसे उत्पन्न ७९१ निदान । नेत्रमण्डल के रूपविशेषः ७७७ मध्यमत्रिफलाद्य घृत " उपनाहके लक्षण दृष्टिरोगकि नाम तथा संख्या महात्रिफलाधघृत' पित्तदिग्ध एवं दिवान्धके द्वितीय महात्रिफलांद्य घृत स्राव अथला नेत्रनाडीके लक्षण ७९२ ত भास्कराचं घृत पर्वणी तथा अलजाके लक्षण ८०१ ७९३ कफविदग्धंदष्टि और नवान्धः महापटोलाय धृत कृमिग्रन्थिके लक्षण रक्षण रानाध घृत .... ७९४ सन्धिजरोगको चिकित्सा..., " ... " रक्तार्मके लक्षण ... " " " स्नायवर्मके लक्षण ७९९ ..." " 1 " .. " पिष्टकके लक्षण " " ... " लक्षण " ... ." ... सन्धिजरोगका. " फलत्रिकाद्य घृत ... ८०० '८०० ...

विषय. त्याज्य चिकित्सा ... ... " " ... ... अशोक घृत " ... " वर्मबन्धके लक्षण " ... " " " ... ... " ' ... " " " विषयानुक्रमणिका। पृष्ट. विषय. पृष्ट. विषय. पृष्टः वर्मजरोगका पिमक शिरोरोगके लक्षण ८०९ वातजन्यप्रदरके लक्षण... ८२३ निदापजप्रदरके लक्षण... निदान । ८०२ त्रिदोपजाशिरोरोगके लक्षण उत्संगिनीके लक्षण रक्तंजशिरोरोगके लक्षण... ८१० असाध्यप्रदररोगवाली स्त्रोकी रसादिधातुक्षयजन्यशिरोरोगके कुम्भिकाके लक्षण चिकित्सानिवृत्ति के पश्चात् लक्षण पाथकीके लक्षण कृमिजशिरोरोगके लक्षण शुद्धार्तवके लक्षण वर्मशर्करके लक्षण स्त्रीरोगकी चिकित्सा ८२४ अशोवर्मके लक्षण सूर्यावर्त के लक्षण ८२७ पुप्यानुग चूर्ण अनन्तवातके लक्षण शुष्काके लक्षण अंजननामिकाके लक्षण अविभेदके निदान और शीतकल्याण धृत ८२८ पहलवमके लक्षण लक्षण ८०३ शतावरी घृत शंखके लक्षण ८११ मुद्धृत छिएवमके लक्षण शिरोरोगकी चिकित्सा... शिरोमस्ति ८१२ वर्मकर्दमके लक्षण शाल्मलधृित काश्मरीधृत श्याववर्मके लक्षण (मयूरघृत सोमरोगका निदान प्रच्छिन्नवमके लक्षण लघुमयूरघत ८१३ सोमरोगके लक्षण अछिन्नवर्मके लक्षण महामचूर घृत सोमरोगकी चिकित्सा ... | पलादि घृत मण्डूर ८१४ वातहतवमके लक्षण मूत्रातिसारके लक्षण वर्मार्बुदके लक्षण पित्तजाशरोरोगकी चिकित्सा ,, स्त्रियों के विद्वेपकी चिकित्सा रुधिरजन्यशिरोगकोचि० .. ८१५ হৗসিবাহক তালা कफजशिरोरोगको चिकित्सा योनिरोगका निदान। ८३१ हरिद्राय तेल योनिरोगको चिकित्सा... ८३३ पविन्दु घृत ८१६ गुडूच्यादि घृत पविन्दु तल " गुडूच्यादेवल जीवकाद्य तेल अथ गर्भप्रद्योग वर्मजरोगको चिकित्सा बलाद्य तेल लक्ष्मणाय घृत यज शिरोरोगकी चिभित्ता, 'पिल्लरोगका विडंग तेल ८१८ गत्पादनविधि ८०५/अपामार्गके तेल " वृहत्कल्याणधृत ८३७ पिल्लरोगकी चिकित्सा ... ८०६/सूर्य्यावर्त्तरोगकी चिकित्सा " वृहत्फल घृत ८३८ उपपल्मकी चिकित्सा स्त्रीरोगाधिकार । ८२२ वृद्धदारुक.घृत अय सशल्य नेत्र लक्षण ... ८०८ नष्ट आवको चिकित्सा सशल्य नेत्रकी चिकित्सा... ८२२ अथ संजातगर्भके लक्षण अब प्रदररोगका निदान नागोदरके लक्षण शिरारोगाधिकार।८०९] प्रदरफे सामान्य लक्षण ८२३ गर्भनाय और गर्मपातके मिरोरोगका निदान ८०९/अन्यन्त रुधिर बहनके उपद्रय अवधिपूर्वक लक्षण कफजप्रदरफे लक्षण गर्भमाय और गर्भपातको पिचमनितप्रदरफे लक्षण चिकित्सा ... " " निमेपके लक्षण ८०४ ... " " लगणके लक्षण विसवमके लक्षण फुञ्चनके लक्षण पक्ष्मकोपके लक्षण पक्षमशातके लक्षण " शवाहा तेल ८१७नताद्य. तेल. ... " ... " फल घृत ... निदान । . ... अयोपपदमके रक्षण ८०७ जीवकाद्य तेल ८२० शतावरी घृत " थातज शिरोरोग लक्षण पिचजशिरोरोगफे लक्षण... की (३६) भाषाटीकासह घनसेनकी- ... . गााद्य धृत " चांगेरी घृत " सोमघृत ८७६ " ....८७७ " ... ... ... ... " " " ... विषय. विषय, पृष्ठ | विषय. अकालपातमें . निदानपूर्वक करवीराद्य तेल ८५८ राक्षाध घृत दृष्टान्त ८३९ कर्पूराद्य तेल मूढगर्भके लक्षण ८४० योनिकंदनिदान । ८५० लाक्षाय धृत मूढगर्भफी आठप्रकारको गति वातादिभेदसे रूप ८५९ असाध्य मूढगर्भ और गर्मिणोके पाठाघवृत योनिकन्दकी चिकित्सा लक्षण मृतगर्भके लक्षण बालरोगाधिकार1 ८६० अष्टमङ्गल घृत गर्भमरण हेतु यालरोगका निदान ८६० कुमारकल्याण घृत असाध्य लक्षण वातदूपित दूधके लक्षण , खदिराध धृत प्रीतमासगर्भिणीकाचिकित्सा ८४२/पित्तदूपित दूधके लक्षण.. , अवस्थाविशेपसे बालकोंको गर्भिणा ज्वरकीरिकित्सा ८४४ कफदूपित दूधके लक्षण घृतपान गाभणो प्रसव बिलम्बका बालकोंकी अन्तर्गत पीडा सिद्धार्थकादि घृत चिकित्सा जाननेका उपाय ८६१ मधुकपान . ... अथ मकसशूलका निदान ८४८ बालरोगोंकी चिकित्सा द्विपंचमूलाध घृत ८७८ मकल्लशूलकी चिकित्सा पलकपादि धूप विचाद्यवृत সুরক্ষায় ভাল सत्वगादि धूप श्यामाध घृत सूतिका रोगका निदान .. विसर्पमहापद्मरोगके लक्षण ८६७ नागराध घृत अथ सूतिकारोगोंकी चि० ८४९/उसकी चिकित्सा क्षीरद्वयाध धृत प्रतापलश्वर रस ८५२/ कुकूणकके लक्षण ८६८/विभोतकाद्य तेल कुकूणककी चिकित्सा द्वितीय यवादि यूप पारिगर्भिकका यालमह निदान पिप्पल्यादि यूप निदान । ८६९ सामान्यग्रहप्रसितके लक्षण तृवीययवादि-यूप ८५३ पारिगर्भिककी चिकित्सा . ८७० बालप्रहको चिकित्सा ... ८७९ पिम्पल्यादि काथ तालुकण्टकरोगका निदान , स्कन्दमहजुष्टकेलक्षणा८७९. पिप्पल्याध.घृत तालुपाक रोगकी चिकित्सा. भद्रोत्कटाय घृत ८५४ व्रणपश्चातफरोगके लक्षण ८७१रक्षाविधि स्कन्दग्रहजुष्टको चिकित्सा ८७९ पञ्चजीरक-गुड़ प्रणपश्चात्तकी चिकित्सा... ८८० अथ स्तनरोगका निदान स्कन्दापस्मारमहजुष्टनिदान ८८१ स्वनरोगको चिकित्सा तस्य चिकित्सा उपशीर्षरोगका अथ स्तन्यरोगका निदान सुरसादि गण शुद्ध दुग्धके लक्षण ८५६] निदान। ८७२ अष्टमूत्र तैल स्तन्यरोगको चिकित्सा उपशीपरोगकी चिकित्सा "काकोल्यादित अन्यान्य रक्षण दन्तरोगका निदान ८७३ शकुनिग्रहका निदान ८८३ सस्य चिकित्सा दन्तरोगकी चिकित्सा " शकुनिग्रहकी चिकित्सा वनकालिक, ८७४/रेवतीमहका निदान दन्तदंष्ट्र के लक्षण रेवतीमहकी चिकित्सा अलम्बुपाद्य तेल दन्तदंष्ट्रफी चिकित्सा ... पूतनाग्रहजुटके लक्षण ... ८८४ श्रीपीवल. ८५८/अन्यरोग पुतनामहजुष्टको चिकित्सा कासीसाध ल अवगत्याच घृव. ८७५ मन्धमूतना मह निदान. , ... " यवादि धूप लाक्षाद्य तेल " " ... ... ... " शय्यामूत्र चिकित्सा ८७२ ... . ... " ... . ... " ... " ... ८५७ अथ प्रायश्चित्त মুম্বা ... " ... " विषयानुक्रमणिका । (.३७) ८९५/गरविप ...' ९०५ ... ... ... " " वैद्यके गुण " विपके लक्षण " " ... ... " ... " ... " निषय. पृथ. विषय. पृष्ट. विषय. पृष्टः अन्धपूतनाग्रहको चिकित्सा ८८५ गरविप ८८६ लूताविपकी उत्पत्ति और वृपाद्य घृत शीतपूतनाग्रहके लक्षण ९०६. शीतपूतनाग्रहकी चिकित्सा निरुक्ति ... ८९६ लताविपकी चिकित्सा... मुखमण्डिकाका निदान ... आखुदूपाविपके लक्षण मूपकविषकी चिकित्सा... ९०७ मुखमण्डिकाकी चिकित्सा, ८८७ असाध्य मूसेके लक्षण अलकविपकी चिकित्सा नेगमेपग्रहका निदान . , कृकलासदष्टके लक्षण वृश्चिकविपकी चिकित्सा ९०८ नेगमेपमहकी चिकित्सा , वृश्चिकदष्ट के लक्षण ८९७/नखदन्तजाविपकी चिकित्सा ९०९ प्रहरसितके लक्षण ८८८ असाध्यश्चिकदष्टके लक्षण खर्जुरविपकी चिकित्सा ग्रहबाधांकी चिकित्सा "कणभदष्टके लक्षण जलौकाविपकी चिकित्सा ९१० विपरोगाधिकार । ८८९ उञ्चिटिंगदष्टके लक्षण ... कीटविपकी चिचित्सा... ८८९ मण्डूकदष्टके लक्षण पिपीलिकादिविपकी चिकित्सा ८९० मत्स्यविपके लक्षण असाध्य लक्षण 'पाकशालाका विधान ९११ जलीकाविपके पथ्य लक्षण ९१२ विष देनेवालेके लक्षण महगाधिकाके लक्षण जलदोपादियोगा- 'विपयुक्त अन्नकी परीक्षाका शतपदीविषक लक्षण धिकार । प्रकार ८९१ मशकविपके लक्षण विपरोगको चिकित्सा असाध्य मशकदशके लक्षण ८९८ .रसायनाधिकार । ९१४ स्थावरविपक सामान्य कार्य मक्षिकादशके लक्षण मधुशुक्त ९१४ क्षारविषक कायम ८९२/ चतुष्पादादिकोंके विपके गहतक ९१५ पिप्पल्यादि पद धृत धातुविपके कार्य विपलिसशस्त्रहतके लक्षण विए उतरे हुए मनुष्य के लक्षण पालियर्धन चतुःस्नेह चिकित्सा शिवगुटिका... जंगम विपके लक्षण , दोपविशेपसे विपमेदक लक्षण८९९ गुग्गुलुरसायन ९१७ चिकित्सा गन्धककल्प. गन्धकरसायन ८९३ जंगमविषकी चिकित्सा... ९०० विपरोगको सामान्य चिकित्सा, अरिष्टवन्धन गन्धकद्रुति सर्पदंशको असाध्यत्व "गन्धकयोग "आपणच्छेद दाहादि क्रिया दूपीविपके लक्षण गन्धककल्प... ८९४ दूषविपके कार्य तार्य अगद ताम्र रसायन ९१९ अस्थानविपसे उत्पन्न दूपी- द्वितीय ताम्ररसायन महागद दशाङ्गधूप पञ्चामृतरस. दूधीविपके प्रकोपका समय चन्द्रोदयाऽगद ९२३ ८९५ प्रकुपितदूषीविपके पूर्वरूप सूर्योदयोऽगद द्वितीय ताम्रक अमृतधृत (ताम्रामृताख्यरसायन दूपी विपके भेदोंसे विकार भेद, नागदन्त्याय धुत पर्पटाख्य रसायन दूपीविपशन्दकी निरुक्ति तण्डुलीयत गन्धकरसायन दूपीविप साध्य, याप्य और अभ्रकल्प ९२५ मृत्युपाशापह घृत ९०५/महाबल विधानानक असाध्य अन्नक " . ... साधारण लक्षण. ... विषपानके लक्षण " ... " ... सर्पविपके लक्षण 'विपके दश गुण - " ... ... . ... ... " ... ... विपके लक्षण " ... ... ९२२ " ... " ९०४ ताम्रक प्रफुपित दूपाविषके रूप. " " " 4 ". अजेयघृत " (३८) भाषाटीकासह वेगसेनकी- ९२९/मांसमर्म ९३० सायुमर्म ... " " गोधूमाय धृत ... ... ... ." ९७४ ... विपय. पृष्ठ. विश्य. विषय. पृष्ट उमाभाषितअभ्रक ९४४ दृपित माविकी चिकित्सा ९६१ ततीय अन्नक शिरामर्म बाजीकरण प्रयोग ,९६२, पानीय भकवटी "पालिका ९६३. द्वितीय पानीय भक्तवटी... अस्थिमम्म रसाला तृतीय पानाय भत्तवटी... सन्धिमर्म "हदश्वगन्धादि घृत चतुर्थ पानीय भक्तबटो... ९३१ मम्मौके पांच विकल्प , अश्वगन्धादि घृत ५६४ पञ्चम पानीयमकवटी सधःप्राणनाशक मम " शतावरोव अत्रक संधान कालान्तरमाणहारक मर्म •, वाजीकरणविधान पठो पानीयमक्तवटी... विशल्यन मर्म ९३२ ९४५/नपुंसकत्व कथन वकल्यकर मम्म " शवावरीघृत ९६८ लोहरसायन । ९३३) मर्माघातसे मृत्युका कारण ९४६ मापघृत सूर्य्यमयूखसे लोह मारण...९३३ वावजरागेगणना सूर्यमयूखके द्वारा अभ्रक मारण,,पित्तजनितरोगगणना ९४७ जीन्वतीयमक ९६९ सप्तम पानीय भत्तवाटिका... .९३४ कफके पास रोग गुडकूष्माण्ड ९७० सर्वतोभद्रलोह रसायनविधि ९४८वार्यक्षयके कारण और लक्षण९७१ वातलमप्रकृतिवाले रोगीके लिय रसायन श्रृंगराजरसायन ९४९/ स्नेहपानाधिकार । ९७१ जलपान ९५२ स्नेहपानका निषेध कफपित्तप्रकृतिवाले रोगियों के लिये रसायन मधुहरोतकी ९५३ अस्निग्धगावके लक्षण ९३७ आमवातादिरोगोंपर दिव्य र० लोहगुग्गुलु श्वासादिव्याधियोंपर रसायन ९३८ नारसिंह चूर्ण ९५४ वातरकादिरागापर.रसायन সঘাষ মুণ स्नेहपानका फल प्लीहादिगिोंपर रसायन । वृद्धदारु कल्प स्वदाधिकार। ९७५". ज्योतिष्मतीतलपानावधि... राजयक्ष्मापर रसायन ९३९ ९५६ अच्छे प्रकारसे स्वेदित किये वातजनहारोगपर रसायन लाहरसायन हुएके लक्षण ९७७ पिचजग्रहणीपर रसायन... दासरसायन ९५७ अत्यन्त स्विन्नके लक्षण . कफजमणीपर रसायन नागार्जुन लोह वमनाधिकार। ९७८ वातपैत्तिकमणीपर रसायन ९४० स्थालीपाकविधि ९५९ पथ्यापथ्य सारस्वत घृतः वातकफजमहणीपर रसायन गुडूच्यादि घृत विरेचनाधिकार १९८२. पित्तकफजग्रहणीपर रसायन चतुपकुवलय घृत ९६० अभयाद्य मोदक लोहाभक मणिभद्र मोदक खर्पराख्य रसायन अष्टांगमंगल.घृत गुडाद्य मोदक ....९८६, शिरोबस्तिप्रकार ९४२ पथ्यापथ्य पथ्यापध्य ..९८८ मम्मनिर्देश ९४३ रसायनका विशेष कल संक्थिमर्म ५६१) बस्तिकम्माधिकार १९८८ वाजीकारणा- अदर और रोगतमर्म यस्तियन्त्र निर्माण विधि':..९८९ पृष्टमम्म ९६१ गुडूची तेल बाहुमने पित शुक्रके लक्षण ९६१ जीवत्याद्य यमक जनमर्म चाजीकरण चिकित्सा निरूहण विधि ... " . ... " स्निग्धके लक्षण अतिस्निग्धके लक्षण " " " " ... ... ९८५ ... ... .:. ९४१ द्वितीय सारस्वतधृत ... ... धिकार। ... " ... " ...

विषयानुक्रमणिका। (३९) विषयः, . ...१०७३ " ... ...१०१९ तेलवर्ग ... " ... ... पृष्ठ. विषय. पृष्ठ विषय. अन्यच्च, ९९९ कवलाधिकार । १०१५ क्षीरवर्ग ...१०७२ द्वादशप्रस्त ...१००२ कवलशुद्धिके लक्षण '...१०१६ दधिवर्ग पिच्छिल बस्ति ...१००३ अशुद्ध कवलके लक्षण तक्रवर्ग ...१०७४ उत्क्लेशन बस्ति नस्याधिकार ।१०१६ नवनीत और घृत वर्ग दोपहर वस्ति शुद्ध नस्यके लक्षण ...१०७५ शमन बस्ति अन्यथ मधवर्ग शोधन पस्ति "हीन शुद्धिके लक्षण इनुवर्ग ...१०७६ लेखन बस्ति " अतिशुद्धिके लक्षण मद्यवर्ग " वहण वस्ति ...१००४ स्वस्थवृत्ताधिकार ।१०२१ मूत्रवर्ग ..१०७७ मधुवैलिक यस्ति द्रव्यगुणाधिकार। १०२७ अरिष्टाधिकार । १०७८ यापन पस्ति ...१००५ प्रतिनिधि दूतलक्षण ...१०७८ ...१०३३ दूत शुभके लक्षण ...१०८० क्षीर बस्ति ...१००६ ...१०८१ संशोधन संशमन स्वप्नाधिकार ...१०८२ रसद्रव्यादिकोंका कालज्ञान ...१०८५ वर्गाधिकार । १०४१ नेत्रपरीक्षा एरण्डाध निरूह ऋतुचर्याधिकार ..१००७ ...१०४४ आरोग्यदृष्टिके लक्षण ...१०९५ .२००८ ...१०५०/मुखपरीक्षा घान्यवर्गाधिकार जिह्वापरीक्षा मांसवाधिकार ....१०११ ...१०५२/मूत्रपरीक्षा 'धूमपानाधिकार । २०११ / व्यंजनमांसव्यंजनाधिकार १०६१ दीपनपाचनद्रव्यलक्षणा- शाकफलवर्गाधिकार ...१०५५, अन्य प्रकारसे मूत्रकी परीक्षा१०९६ धूमपानका निषेध ...१०१३ मत्स्यव्यंजनगुणाधिकार ...१०६७ धिकार। द्रवद्रव्याधिकार । १०७०वंगसेनोत्पत्ति ११०० धूमपानका काल ...१०२४ तायवर्ग ...१०७० टीकाकारोक्त विज्ञप्ति वर्णन ११०१ शुद्ध बस्ति ... गणपाठाधिकार । २०३६ शकुन लक्षण मूत्र बस्ति ... वैतरण स्ति अर्धमात्रिक निरूह " ....१०९४ स्वस्थके लक्षण " पथ्य अथोत्तरवस्ति विधि अपिय " अन्यञ्च " इति भाषाटीकासह वङ्गसेनस्थविषयानुक्रमणिका समाप्ता।

২০ওিটিese passade

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अथ भाषाटीकासहितो वङ्गसेनः प्रारभ्याने ।
मालाचरणम् ।
नत्वा शारदपादपमयुगलं ममाप्तवाचां चयं
गत्या पारमशेषपूर्वभिपजा सद्दान्धवागनिघः।
श्रीमत्पण्डितबङ्गसेनाचित तनामिका संदिता
शालग्रामपदाभिध नकलितो व्याख्याति विद्वन्मुदे ॥ १॥
-numantravarture
44.MARIKA.
ondartantri AAMANARw.ame.
ग्रन्थारम्भः।
देण्यफलभरिपला तदानीं ताग्वि-
ध्यान्या गिरीशमपदाय पनामपर्ण
धस्य मिथुनस्य विमोचनाय ॥३॥
गृद्धानुपास्य भिषामलदानीभ । अप नम गौम भार साये मनुष्यांका
श्रीवासनभिपजा गन्दु यद्यपद्धसिद्ध नेपाना म्हाभाधिक ष तप आपमे सीनता ही
: प्रयोगनिवदो या लिख्यतन्मिन ॥२॥ और यात्रा निंग क्या यह जना अर्थात् अन्धपार
नमान मा परना इस प्रकार मिथुन (प)
में श्रीनगर, प्रमोगदया प्यार
गरम हो सपना अपना होगा ॥३॥
मर और गरमापरपूर्ण पाको दर
कान्तिकावासनिर्जातश्रीगदाधरसू.
पद्धपापी मान पर और उनकी उगिनी
সিনা স্বল্প বয়, বি গে স্যা।
नुना । क्रियते घासनन चिकित्सा-
इम मन्या लिला हूँ॥२॥
सारसंग्रहः॥४॥
साजनमाना।
गिरायास' नगरमें उत्पन्न श्रीगदाधरका
नत्वा शिव प्रथमतः प्रणिपत्य चण्डी पुरम मनसेन, इस चिरिसासारसंपदपा पनाना
बाग्दवता तदनु, तातपर्द गुळं च ।
है।॥४॥
संगृह्यते किमपि यत्सुजनस्तदा चैती हदि तिष्ठति यस्यैष चिकित्सातत्त्व-
विधातुमुचितं तदनुग्रहेण ॥ २॥ संग्रहः । सनिदानचिकित्सायां न
प्रथम जिय, पार्वती और सरस्वती देवीको दरिद्रात्यसा भिपक ॥ ५॥
वदना कर पभान पिता और गुरुके घरणकमलोफो जिस चाफेहदय में यह चिकित्सातत्यसंग्रह स्थित
प्रणाम कर दनक अनुप्राहसे में इस प्रन्यमें जो कुछ रहना है वह बैग निदान और चिकित्सा विषयमें
संमह कानाउसफो सभा पृपा कर ध्यान कदापि दरिद्रताको नाम नहीं होता अर्थात् यह निदान
सहित पिपित्मा जानने में निपुण ले जाता है,
दुर्जनप्रार्थना।
उसका किसी और शाखफी निदान और चिकित्सा में
हतुर्जनः परंगुणेषु भवाशानां द्वेषः
आवश्यकता नहीं रहती, यही पर्याप्त है ॥५॥
किमेष सहजो गुणितापहारीयाच्यापि
धमार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलम-
(गत हताय' इति पाठान्तरम् । (२) इत्यस्तार•
त्तमम् । रोगास्तस्यापहरिः श्रेयसों
शिक: पाठ इति केचिन् ।
जीवितस्य च ॥६॥
देकर पढें ॥२॥

बङ्गसेने भापाटीकासहिते- - . धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उनम मूल (जर) कोई शब्द आये तो उसको निदानयाचक हैं। जाने। आरोग्य है और रोग उमफे, कल्याणक और जीवन जिम जम्भाई आदिसे उत्पन्न होनेवाली व्याधिया के हरने वाले है ॥६॥ ज्ञान हो उनको पूर्वरूप कहत है। फिर वह व्याधि दोष तेषां प्रशमनोपायमतिदुर्वाररंदसम् । (पान पिन कफ) से यहुधा अप्रगट हो। शंका- ग वादिक दोपोसे अप्रगट होगी नो. व्याधिका: बमहे नातिविस्तीर्ण सनिदानं होना असम्भव है क्योंकि वारणा बाता: '. चिकित्सितम॥७॥ उन अत्यन्त दुर्निवार्य पैगयाले रोगाके निदान हो सकते हैं। उनर-इस पदका यह अर्थ है कि दिक दोष हैं। जब दोपही नाहीं तो रोग कैसे प्रगट और चिकित्सा सहित शमन करनेवाले उपायर्याको दोष ( वात पित्त कफ) का व्याधिक अल्ल होनस अनावश्यक विस्तार रहित पूर्ण म्पमे कहते ॥७ अप्रगद रुप होगा अर्थात् योहा २ होना. अतएव 'निदानं पूर्वमपाणि सपाण्युपशय तत्तत् ज्वरादिव्याधिका अपने अपने अप्रगट रमण। स्तथा । सम्प्रातिश्चेति विज्ञान रोगाणां । पूर्वरूप से वैसे ही होते हैं । अव कहते हैं कि पूर्वरूप पञ्चधा स्मृतम् ॥ ८॥ दो प्रकारका है, एक सामान्य दूसरा विशिष्ट ! निदान, पूर्वरूप, रूप, उपराय और सम्प्रामि यह सामान्यप्रामृप (पूर्वरूप ) उसे कहते है जैसे दोप रोग जाननेके पांच कारण है अर्थात् इनके द्वारा ( वात पित्त कफ) से दूपित धातु उसके बिगड़नेसे : रोगका ज्ञान होता है ।। ८ ।। प्रगट होनेपाल अरादि व्याधिमात्रहीकी प्रतीति येनाहारविहारेण रोगाणामुद्भवो हो औरवात आदि दोषोंके चिद न मालूम हो जस "प्रमोऽरतिविवर्णत्वमिनि' अर्थात चरम नम हो; भवेत । क्षयो वृद्धिश्च दोषाणां मनका न लगना, दहका विवर्ण इत्यादि लक्षण। निदानं हि तदुच्यंत ॥ ९॥ और जिसमें होनहार रोगारम्भक दोप उनके चिह्न जिम आहार और बिहार के द्वारा रोगोंकी उसके एक अंशकी प्रनीति हो इसका विशिष्ट प्राप्त पत्ति तथा वातादि दोपोंका क्षय और वृद्धि होती है। कहते हैं, जसे " जुंभात्यर्थ समीरणान्" अर्थात् उसको निदान कहते हैं ॥ ९ ॥ जाइका आना फेवल बातक दोपसे ही है। इनमें निमित्तहत्वायतनप्रत्ययोत्थानकारण। होनहार रोग कौन घर, उसफा आरम्भक दोप निदानमाहुः पर्यायैः प्रामपं यन कॉन वात, उस यातका एक अंग कौन जंभाई, पेस " लक्ष्यते ॥ १० ॥ उत्पित्सुरामयो और भी ज्ञानने चाहिये । इस विशिष्ट पूर्वरूपमें'. दोपविशेषणानधिष्ठितः । लिङ्गम- जंभाई आदि रूप देखकर कदाचित् पूर्वरूपको रूप व्यक्तमल्पत्वाद्याधीनां तद्यथाय- न सगझना चाहिये । क्योंकि यह तो केवल व्याधिक आरम्भक दोपमात्रका सूक्ष्म चिह्न है । इस घातको.. थम् ॥ ११॥ तदेव व्यक्ततां यातं दृष्टांत देकर समझाते है-दृष्टान्त । जैसे तृणके रूपमित्यभिधीयते। संस्थानं व्यजनं समूहको छोटी अग्निकी चिनगारी गिरनेसे 'धूम लिङ्गं लक्षणं चिह्नमाकृतिः ॥१२॥ (धुआँ) मात्र प्रकट देखकर हाथ, वस्त्र आदिके जिस लक्षणसे उत्पन्न होनेवाले रोगका ज्ञान हो मारनेमे ही शांति करे सकते हैं, परन्तु जय. अग्नि उसको पूर्वरूप कहते हैं जिसे कि, ज्वरके पूर्वमें श्रम एक साथ जोरसे प्रचलित हो गई तब शान्त नहीं आदिका होना घरका पूर्वरुप है । होसके एमे ही विशिष्ट पूर्वरूपके अल्प होनेसे अब निदानके पर्याय वाचक शब्दोको कहते हैं- चिकित्सा करनेमे शांति कर सकते हैं, परन्तु जय रूप निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान और कारण ये होगया तब उसका उपाय नहीं हो सकता है इसी निदानके पर्यायवाचक शब्द शास्त्र व्यवहारके अर्थ से पूर्वरूप और रूपमै भेद है । अब कहते हैं पूर्व- मुनीश्वरोंने कहे हैं। इनके कहनेका कारण यह है कि रूप और रूप इन दोनोंमे कोई शारीरिक अर्थात, व्यवहारक लिये अर्थान् शास्त्र में इन छहों शब्दोमस शरीरसे सम्बन्ध रखते हैं और कोई मानसिक .

निदानाधिकारः। 7 प्रकार और - गत् मनसे सम्बन्ध रखते हैं । शारीरिक - जैसे जैसे श्रम और वातसे प्रगट ज्वरोंमें मांसका रस रमें मुखका विरस होना, देह भारी, नेत्रोंस और चावल । इसमें हेतु कौन श्रम और वात,ये कव गिरना इत्यादिक और मानसिक जैसे मनका शान्त हो. जब श्रम और वात-हरणकर्ता पथ्य जगह न लगना और अपने हितकारक वचनोंमे मिले, ऐसा पश्य कौन है मांसरस और चावलोंका तिन होना तथा खट्टे चरपरे पदार्थ पर मन भात, ये श्रम और वातके विपरीत हैं अर्थान् नाशक उना । जब पूर्वोक्त प्राम्प प्रगट होजाय तब उसको है। ऐसे ही हेतुविपरीत विहार कहिये आचरण कौन कहते हैं। और संस्थान, व्यञ्जन, लिंग, जसे दिनके सानेसे प्रकट कफपररातमें जागना, यहां अण, चिह्न और आकृति ये छ र.ब्द रूपके पर्याय- हेतु कौन हुए कि दिनका साना, उससे प्रष्ट दोप चक है ।। १०॥ ११ ॥ १२ ॥ कौन कफ है,यह कफ कब शान्त हो जब जिस हेतुसे उपशयः। प्रगट हुआ उस हेतुसे विपरीत आचरण किया जाय, हेतुव्याधिविपर्यस्तविपर्यस्तार्थकारि- तो दिनके सोनेपर उलटा आचरण कौन है रातमें णाम् । औषधानविहाराणामुप- जागना, तो यह हेतुविपरीत आचरण हुआ । इसी योगं सुखावहम् ॥ १३ ॥ विद्यादु- उदाहरण व्याधिविपरीत आदिके बुद्धिमान मनुष्य म्वयम् समझ लेवे । जो उपायो पशयं व्याधेः स हि सात्म्यामिति लक्षण कह है उससे विपरीत लक्षण अनु- स्मृतम् । विपरीतोऽनुपशयो व्याध्य पायके हैं और व्याधिका असात्म्य अर्थात अस- सात्म्यमिति स्मृतः॥ १४॥ अब उपशयके लक्षणको कहते हैं:-हेतुविपरीत, है ॥ १३ ॥ १४ ॥ मान नाम उसी अनुपशयका पर्यायवाचक शब्द याधिविपरीत, हेतुव्याधिविपरीत, हेतुविपर्यस्ता- कारी, व्याधिविपर्यस्तार्थकारी, हेतुव्याधिवि- सम्प्राप्ति। पर्यस्तार्थकारी ऐसे जो औपध अन्न ( पथ्य ) विहार यथा दुष्टेन दोषेण यथा चातुविसर्पता। (आचरण) इनका सेवन सुखकारक जानना उसको व्याधिका उपशय कहते हैं। इसका तात्पर्य निवृत्तिरामयस्यासों , सम्माप्तिर्जा- यह हैं कि, रोगी और रोगका हेतु इनको सुखकारक तिरागतिः॥१५॥ जो औषध पथ्य आचरणरूप प्रयोग उसको उपाय दोप कहिये वात पित्त कफ इनका दुष्ट होना कहते हैं और व्याधिसात्म्य ये पर्यायवाचक नाम उमी | नाम कुपित होना अनेक प्रकारका है अर्थात् स्वका- उपशयक हैं । सुखकारकके कहनेसे यह प्रयोजन है। रण या दूसरेके कारण करके एसे कुपित दाप अपने कि दाह और प्यासयुक्त नवीन मरमें शीतलजलका स्थानको छोडकर देहमें ऊपर नीचे निरछे विचरते पीना व्यायिका बढानेवाला है इससे शीतल जल है उस विचरनेसे जो रांग प्रकट हो उसको सम्प्राप्ति सुखकर्ता न हुआ अतएव शीतल जलको उपाय न कहते हैं और जानि तथा आगनि ये दोनों पर्याय- समझना चाहिये परंतु दाहयुक्त प्यासमें शीतल जल वाचक नाम उसी सम्प्राप्तिके है. तात्पयार्थ यह है उपाय माना जायगा क्योंकि मुखकारक है ।। कि मनुष्यके देहमें वात पित्त कफ ये सम्पूर्ण दोप (अब क्रमसे उदाहरण लिखते हैं।) वडकर जैसे रोगको प्रगट फरें सही उसको सम्प्रामि हेतुतिवरील औषध-जैसे शीतकफम्परम सौंठ, तो कहते हैं । उदाहरण-जैसे कुपित दोपोंका आमाश• इसमें प्रथम समझना चाहिये कि, यहां हेतु कौन है यमें प्रवेश होनेसे और उस स्थानमें इतन्ततो गमन. कि, सर्दी उसका शीनल धर्म है तो अब शीत कफ करनेसे और पकाशयमें रहनवाली अग्निको बाहर यह कब शान्त हो जय कि सदी और कफसे विपरीत निकालनेमे तथा उसी जठर अग्निस सर्व दहके तम औपध मिले ऐसी ऑपध गुंठो सी और कफ होनेसे यह ज्वर है, ऐसा जो निश्चय किया जाता है दोनोंको शान्त करती है तो शीतकफवरमें हेतुवि- उसीको संप्राप्ति कहते हैं, ऐसे ही अतिमागदि रोगोंकी परीत औपथ सौंठ हुई। ऐसे ही हेतुविपरीत अन्न ! संप्राप्ति जाननी चाहिये ।। १५ ।। - .

(४) वङ्गसेने.भाषाटीकासहिते- संख्याविकल्पप्राधान्यबलकालाविशे जानना जस रागक प्रति जो निदान कहा यह. पतः। सा मिटाते यथात्रैव वक्ष्य निदान सम्पूर्ण रोगीको उत्पन्न करनेवाला है या तेष्टी त्वरा इति ॥ १६ ॥ एकदेश, ऐसे ही पूर्वरूप भी समस्त अवयवों करके अव संप्रासिके भेद कहते है, सा कहिये सो व्याधिका प्रकाशक है या एकदेशसे इत्यादि ॥१८॥ संख्यादि विशेषण करके पांच प्रकारको है जैसे १ नक्तदिनर्तुभुक्तांशाधिकालो यथा- संख्या २ विकल्प ३ प्राधान्य ४ बल ५ काल. बलम् ॥ १९॥ जैसे इसी ग्रंथमें आगे आठ प्रकारका ज्वर, पांच नक्त (रानि) दिन (दिवस) ऋतु (वस प्रकारको साँसी कही जायगी अर्थात् रोगोंकी तादि ) भुक्त (आहार) इनका अंश कहिये एक- गणनाको ही संख्यारूप सम्प्राप्ति कहते हैं ॥ १६॥ देश उसको यथादोप (वात, पित्त, कफ) के अनुः दोषाणां समवेतानां विकल्पोऽशा सार व्याधिका काल अर्थात् रोगके घटने वढनेके, शकल्पना । स्वातंत्र्यपारतन्त्र्या- हेतुका समय आने । उदाहरण दिखाते हैं। जैसे 'भ्यां व्यायः प्राधान्यमादिशेत्॥१७॥ रात्रिके तीन भाग करे प्रथम, मध्य और अन्त्य मिल हुए दोप कहिये वात पित्त कफ इनके । का, अन्त्यभाग वातका है । ऐसे ही दिन में तो रात्रिका प्रथमभाग कफका, मध्यभाग पित अंशांशका अनुमान करना उसको विकल्प-तान भाग करे तो पूर्वाह कफका, मध्याह पित्तका रूप सम्प्राप्ति कहते हैं, जैसे धूएँके निकलनेसे यह । अपराह वातका है । ऐसे ही मत, जैसे, वसंतऋत पर्वत आग्निवाला है, ऐसे ही इस रागाके देहमें वात . में कफ, शरदऋतु में पित्त और वर्षामें बात कुपित का अंश विशेष है काहेसे कि वातके अंश विशेष होता है। ऐसे हा भोजनका, जैसे भोजन करने मिलनसे इसी अनुमानको विकल्पसंप्राप्ति कहते हैं। समय कफका काल और अन्नके पचनेके समय उदाहरण-जैसे रूखी शीतल हलकी और फला- पित्तका काल और जब भले प्रकार परिपक होगया नेवाली इत्यादि गुणयुक्त जो पवन उसका रूक्ष तय वातका काल, इसके जाननसे यह प्रयोजन है आदि गुणयुक्त कसला रस वातको सर्वाश करके कि, जिस दोपे (वात, पित्त, कफ) का जी बढानेवाला है। ऐसे ही कटुरस सर्व भाव करप काल कहा ह उसका उसी २ काल में जान लेना पित्तका बढानेवाला है अर्थात् कटु, उष्ण, तशित्व कठिन मालूम नहीं हाता ।। १९ ॥ करके हाँग पित्तको वढाने वाली है । ऐसे ही मधुर-1 इति भाता निदानार्थस्ततद्वयासेनो रस जैसे भैसका दूध यह सर्व भाव करके वढाने वाला है इत्यादि । इसमें "दोपाणाम्" जो पदिश्यते ॥२०॥ बहु- वचन है सो दोपोंके पृथक् पृथक् ग्रहणके वास्ते है इति काहिये यह संक्षिप्त प्रकारसे जो निदानार्थ और "समवेतानाम्" यह पद जो है सो मुद्वज और कहा उसे विस्तारपूर्वक प्रतिरोगके निदान पूर्वरूपादि. सन्निपातके ग्रहणनिमित्त धरा है । व्याधिकी स्वत- करके कहेंगे ॥२०॥ न्त्रता और परतंत्रता करके प्रधानता और अप्र- सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता धानता कही है, जैसे स्वतंत्र ज्वरको प्रधानता है और ज्वराधीन श्वास आदि रोगोंको अप्रधानता है । अर्थात् । धाहितसेवनम् ॥२१॥ मलाः। तत्प्रकोपस्य तु प्रोक्तं विधि- ज्याधिकी स्वतंत्रतासे प्रधानता और परतंत्रतास अप्रधानता जाननी चाहिये ॥ १७ ॥ अब पूर्व कहे निदान के दो भेद कान सन्निकृष्ट हेत्वादिकारावयवर्मलाबलविशे- और विप्रकृष्ट उसमें सम्मिट कौन वातादिफ समीपके कारण करके सर्व रोगोंका कारण है सो पणम्॥१८॥ हेतु आदि शब्दोंसे हेतु, पूर्वरूप और रूप इन (पित, कफ) ये सम्पूर्ण रोगाके कारण होते हैं और कहते हैं "सर्वेषामिति" कुपित हुए जो मल (यात, के सर्व अवयव (लक्षण ) मिलनेसे व्याधिको पल. वान् जानना और थोड़े लक्षण मिलनसनिक अक प्रकारका अपव्यसवन करना ही है ॥ २१ ॥ उन वात, पित्त, कफ दापोंके कोपका कारण कफ निदानाधिकार। निदानार्थकरोरोगो रोगस्याप्णुपजा अत्र उसी रोग उत्पन्न करनेवाली व्याधि की विचित्रता दिखाते हैं, जैसे कोई एक रोग दूसरे यते । तद्यथा ज्वरसन्तापाद्क्तपित्त- का कारण हो अर्थात् दूसरे रोगको प्रगट कर आप मुदीर्यते ॥ रक्तपिताज्ज्वरस्ताभ्यां शांत हो जाता है। जैसे ज्वरके संतापसे रक्तपित्त श्वासश्चाप्युपजायते । प्लीहाभि होता है उस समय ज्वर दूर हो जाय और रक्तपित्त वृद्धचा जठरं जठराच्छोफ एव च ॥ रह जावे । और कोई रोग दूसरे रोगको प्रगट कर अशोभ्यो जाठरं दुःखं गुल्मश्चाप्युप आप जैसाका तैसा बना रहता है, जैसे बवासीर जायते ॥ प्रतिश्यायाद्भवकासः नहीं जाय और गुल्म तथा उदररोग पैदा होते हैं। कासात्सायते क्षयः। क्षयो रोगस्य इस प्रकार मनुष्योंके घोर लेशदायक मिले हुए हेतुत्वे शोषस्याप्युपजायते ॥ २२ ॥ रोग देखने आते हैं । विशप करके चिकित्सा कोई प्रश्न करे कि जो, पूर्व कह आये हैं यह विरुद्ध होनेसे ये रोग कृच्छतम होते हैं ॥२४॥ ही निदान है अथवा इसके व्यातीरक्त और इसलिये तस्माद्यत्नेन सद्वैधरिच्छद्रिः सिद्धि- कहते हैं रोगका रोग भी निदान होता है अर्थात् जो मुत्तमाम् । ज्ञातव्यो वक्ष्यते योग्य निदानसे कार्य होता है वह ही रोगसे भी होता है, ज्वरादीनां विनिश्चयः॥ २५॥ इसवास्ते दृष्टांत देकर कहते हैं "तयथेति" जैसे अब कहे हुए निदानादिपचकद्वारा रोगनिवृत्ति ज्वरसंतापसे रक्तापित्त प्रगट होता है और रक्तपित्तसे रूप सिद्धिकी इच्छा करके अवश्य जानने योग्यको ज्वर और रक्तपित्त व ज्वरसे श्वास प्रगट होता है कहते हैं "तस्मात्" इति इसी कारण उत्तम सिद्धि और प्लीहाके बढ़नेसे जैसे उदररोग और उदररोगसे हमको प्राप्त हो ऐसी जिन सद्वैद्योंकी इच्छा है उन सूजन, बवासीरसे जस उदररोग और गुल्म को ज्वरादि रोगोंका निदान जो आगे कहते हैं वह (गोला) रोग, दिनमें सोने आदिकोंसे जुकाम यलसे जानना चाहिये ॥ २५ ।। ता है और जुकामसे खांसी तथा खांससे ओज- रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौषधम्। प्रभृति धातुओका क्षय होता है। यह क्षयरोग (राज ततः कर्म भिषक पश्चाज्ञानपूर्व समा- यक्ष्मा ) संपूर्ण रोगोंमें राजा है और शोपको भी प्रगट करता है ॥२२॥ चरेत् ॥२६॥ ते पूर्व केवला रोगाः पश्चाद्धत्वर्थका- वैद्यको चाहिये कि प्रथम रोगकी परीक्षा करें रिणः । उभयार्थकरा दृष्टास्तथैव पीछे औपध की परीक्षा करै फिर ज्ञानपूर्वक चिकित्सा करै ।। २६ ।। कार्यकारिणः॥२३॥ यस्तुरोगमविज्ञाय कर्माप्यारभते भिषका चे रोग प्रथम स्वतंत्र होत हैं और पीछे जब वल अप्योषधविधानजस्तस्यसिद्धिर्यदृच्छया।। मिल गया तो वे ही हेत्वर्थकारी अर्थात् रोगके उत्पन्न जो वैध रोगोंको बिना जाने चिकित्सा करता फरनेवाले होते हैं, जैसे ज्वरसे रक्तपित्त होता है। है चाहे वह औपघमें प्रवीण भी हो तथापि उसकी इस प्रकार रोग उभयार्थकारी अर्थात् कार्य-कारण सिद्धि प्रारब्धके अधीन है ।। २७ ।। रूप हैं,सारांश यह कि स्वतंत्र रोग होनेसे कार्यरूप हैं और अन्य रोगका कारण होनेसे कारणरूप हैं।।२३॥ अप्योषधविधानतः . सर्वभषज्यको- कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा विदः । देशकालप्रमाणजस्तस्य निवर्त्तते । न प्रशाम्यति चाप्यन्यो सिद्धिर्न संशयः॥२८॥ हेतुत्वं कुरुतेऽपिच ॥ एवं कृच्छ्रतमोह और सर्व आपधियोंके जानने में प्रवीण है तथा जो वैद्य सम्पूर्ण औपधियोंके विधानको जाननेवाला नणां दृश्यते व्याधिसंकरः ॥२४॥ देश और कालो प्रमाणको जानता है, उसको सिद्धि में पुछ संशय नहीं ॥ २८ ॥ . शोपरम' इति पाठान्तरम् ।

(६) यङ्गसेने भाषाटीकासहिते- भैपज्याहारचेष्टानां यो न वेत्ति गुणा कोई रांग तो स्यमावसे याज्य होते हैं और. कोई गुणम् । न स वेत्ति भिपक्सम्यक्तव्य साध्यकी उपेक्षा करनेमे याय हो जाते है, कोई स्वास्थ्यहिताहितम् ॥ २९॥ स्वभावसे ही असाध्य होते है और कोई पाप्यगंग जो पैदा औषध, आहार और रोगीको नेप्टाको उपेक्षा अर्थान उनकी चिकित्सा नहीं करनेमे गुण अवगुणोंको नहीं जानता यह उसके स्वास्थ्य असाध्य होनात है।३४॥ संबन्धी हित और अहितको भी अच्छप्रकारसे नहीं साभ्या' याप्यत्वमायान्ति याभ्याचा- जान सकता ॥ २९॥ साध्यतां तथा नन्ति प्राणानसाध्या आदावन्ते रुजां नान प्रयतत चिकि स्नु नराणां निष्क्रियावताम् ॥ ३५॥ त्सका साध्यासाध्यविभागजस्ततः चिकित्सा नहीं करनेवाले मनुष्यों के माध्यरोग कुर्य्याश्चिकित्सितम् ॥ ३० ।। याय होजाते हैं, याप्यरोग असाध्य होजाते हैं और , असाध्यरोगप्राणोंका नाश करते हैं।॥ ३५ ॥. साध्य और असाध्य रोगको जाननवालावर प्रथम रोगको अच्छे प्रकारसे जाने फिर उसकी चिकित्सा जातमात्र चिकित्स्यस्तु नापश्योऽल्प- करें ।।३।। तया गदः । वदिशविपस्तुल्यः यस्तु रोगविशेपनः सर्वभपज्यको स्वल्पोऽपि विकरोत्यसो ॥३६॥ विदः देशकालप्रमाणजस्तस्य रोग उत्पन्न होने ही उसका यत्न करना चाहिये सिद्धिर्न संशयः ॥३१॥ यह न ममहो कि, रोग तो अभी उत्पन्न हुआ, साध्य जो वैध सम्पूर्ण रोगों और सय औपपियोंके है अथवा जरामा ही है ऐसी उपेक्षा न करे । क्यों विधानमें प्रवीण है तथा देश और कालकि, थोड़े दिनोंका उत्पन्न हुआ अल्प हीरोग, अग्नि, प्रमाणको जाननेवाला है, उसको निस्संदेह सिद्धि शत्रु और त्रिपके समान अनेक प्रकारके विकारीको होती है ।। ३१॥ उत्पन्न कर देता है ॥ ३६॥ दर्शनस्पर्शनमश्नाधिज्ञानं विधा स च प्रकुपितो दोपः समुत्थानविशे- मतम् । आदो दृशस्ततः स्पर्शाच्छी पतः । स्थानान्तरगतश्चापि विकारा- तादिप्रश्नतोऽपरम् ।। ३२ ॥ न्कुरुते बहून् ।॥ ३७॥ दर्शन (देसना), स्पर्श छुना और प्रश्न (Jछना)। वहीं दोप कालान्तर में अनेक कारणोंसे कुपित होकर . इन तीन प्रकारसे रोगका ज्ञान होता है, वहां प्रथम | पश्चात् स्थानान्तर में जाकर यहतसे विकारोंको उत्पन्न : मल, मूत्र, जिहादिकको देखे, पश्चात् रोगीके शारी- कर देता है ॥ ३७॥ रफो टूकर शीतादिकफो जाने फिर उससे सम्पूण | निवृत्तोऽपि पुनर्व्याधिः स्वल्पेनायाति हाल पूछे ॥३२॥ 'कृच्छोपायः सुखोपायो द्विविधः हेतुना । क्षीणे मागें कृते दोपः शेषः साध्य उच्यते । असाध्यो द्विविधी सूक्ष्म इवानलः ॥ ३८ ॥ ज्ञेयो याप्यो यश्चाप्रतिक्रियः॥३३॥ आराम हुआ रोग, दोषोंके द्वारा क्षीण किये कप्टसाध्य और मुंखसाध्य ऐसे साध्य दो जरासी अग्निकी चिनगारीके समान फिर प्रचण्ड हुए मार्गमे शेप रह जाने पर अल्प कुपथ्य करनेसे ही प्रकारका है. तथा असाध्य भी दो प्रकारका है, एक हो जाता है ॥ ३८॥ याप्य और दूसरा अचिकित्स्य अर्थात् त्याज्य ॥ ३३॥ कर्मजा याप्या:, . केचित्प्रकृत्येव सांध्या व्याधयः केचिदोषजा संन्ति चापरे । कर्मदीपोवाश्चान्ये याप्या उपेक्षिताः । स्वभावाद्या- धयोसाध्याः केचिद्याच्या उपोक्ष- कर्मजास्ते स्वहेतुकाः ॥ ३९ ।। कोई व्याधि कर्मज होती है और कोई दोपज होती. ताः ॥ ३४॥ हैं और कोई व्याधि कर्मज और दोपज दोनों मिला --

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(८) वनसेने भाषाटीकासहिते- . माघ और ऋतुप्रकरण। दुर्जर होता, है । जो औटाकर धर्त्तनमें ही मुंह ढक: वर्षा नभोनभायौ तु तत्र वायुः प्रकु- कर शीतल किया गया हो ऐसा. शृतशीतल जल प्यति । पित्तं प्रायेण रक्तञ्च शरदा- त्रिदोपनाशक होता है ॥ ५४॥ शिवनकात्तिकौ ॥ ५० ॥ प्रावृट् नभोनभस्यो च. इपोजो तु श्रावण और भादोंको वर्षाऋतु कहते हैं, वर्षाक- शरन्मतो । मार्गपोषों तु हेमन्तः तुमें घायु कुपित होती है, आश्विन और कार्तिकको शिशिरो माघफाल्गुनी ॥ वसन्तश्चे- शरदऋतु कहते हैं, शरदऋतु, प्रायः पित्त और वैशाखी निदाघः शुचिशुक्ल रुधिर कुपित होते हैं ।। ५०॥ भाक॥ ५५॥ हेमन्ती मार्गपोषौ तु वातलो रूक्ष श्रावण और भादोंको प्रावृट्ऋतु कहते हैं, कार एव तु । तद्वञ्च शिशिरो माघः और कार्तिकको शरदऋतु कहते हैं, मार्गशिर और फाल्गुनश्च प्रकीर्तितः॥५१॥ पोपको हमन्तऋतु कहते हैं, माघ और फाल्गुनको मार्गशिर और पोपको हेमन्तऋतु कहते हैं. हेमन्त ऋतु कहते हैं, ज्येष्ट और आषाढको ग्रीष्मऋतु शिशिरऋतु कहते हैं, चैत्र और वैशाखको वसन्त ऋतु वातकारक और कहत ह ॥ ५५ ॥ फाल्गुनको शिशिरऋतु कहते हैं, शिशिर ऋतुके गुण भी उसीके समान है ॥ ५१ ।। प्रादृट्काले शृतं तोयं दद्याचाष्टगुणं वसन्तश्चेत्रवशाखा तस्मिश्लेप्मा जलम् । अष्टभागावशिष्टं तु निदी- प्रवर्तते। ज्येष्ठापाठी च विख्याती पमुदकं पिबेत् ॥ ५६ ॥ निदाघः पित्तवानपि ॥५२॥ प्राट्तु अष्टावशेप अर्थात सेरभरका आधपाव : चन और वैशाखको वसन्तऋतु कहते हैं, वसन्त- शेप रहा और औटाकर शीतल कियाहुआ निदीप जल पीना चाहिये ।। ५६॥ ऋतुमें कफ कुपित होता है । ज्येष्ठ और आपादको श्रीमप्मऋतु कहते हैं. ग्रीष्मऋतुमें पित्त कुपित होता। शरदि षड्गुणं तोयं दत्त्वा. कथित- है।। ५२ ॥ माचरेत् । षष्ठभागावशिष्टन्तु पिव- जलप्रकरण। दोषहरं जलम् ॥ ५७ ॥ यथर्तुक्रमनिर्दिष्टं जलं 'काथ्य च शरद्ऋतुमें पष्ठावशेष अर्थात् तीन पाव जलको वक्ष्यते । वर्षासदकमादाय पचेत्तत्स आटांच, जब औटते २ आध पाव रह जाय तब उस -तभागिकम् । अष्टभागावशिष्टं तु दोपनाशक जलको पावे ॥ ५७ ।। निदोपमुदकं पिबेत् ॥ ५३॥ हेमन्ते च शृतं तोयं दत्त्वा पञ्चगुण जिसप्रकार ऋतुओंमें जलके काथका क्रम कहा है। जलम् । पञ्चभागावशिष्टन्तु निदों- उसीको अब कहता है,वर्षाऋतुमें जल लेकर औटाये | षमुदकं पियेत् ॥ (१) जब पचते २ सात भाग जल जाय अर्थात् सेरभरका हेमन्तऋतुमें सवासेर जलको औटाचे, जय आंधपा बाकी रह जाय तव उस अष्टावशेष निर्दोप औटते २ पावभर जल पाकी रह जाय तब उस जलको पीवे ।। ५३ ॥ पंचावशेष निर्दीप जलको पीवे ।। (१) धारापातन विष्टम्भि दुर्जरं पवना शिशिरे च शृतं तोयं दत्त्वा हतम् । शृतशीतं निदोषघ्नं वाप्या चतुर्गुणं जलम् । चतुर्भागावशिष्टन्तु तर्भावितं भुवि ॥ ५४॥. निदोषमुदकं पिवेत् ॥ (२) धही औटा हुआ जल धारारूपसे पतित होनेपर दिशशिर ऋतुमें चतुर्थाश शेप अर्थात् सेर विष्टभकारक होता है और वायुसे ताडित होनेपर जलको आटावे जब औटते २ पाच भर चाकी रह । .

(९) निदानाधिकारः। " जाय तव शीतल करके उस निदाप जलको समय होता है. एक, दो, तीन इन भागोंसे दुष्ट पीवे ॥ (२) दोपोंको क्रमले शोधन करे ॥ ६०॥ ६१ ।। ६२॥ वसन्ते त्रिगुणं तोयं दत्त्वा कथितमा शीते शीतप्रतीकारमुप्णे चैवोप्णवा- चरेत् । तृतीयभागशिष्टन्तु पिवेदोप रणम् । कृत्वा कुर्याक्रियां प्राप्तां क्रियाकालं न हापयेत् ।। ६३ ॥ हरं जलम् ॥ ५८॥ (३) शीत कालमें शीतका प्रतिकार करते हुए और उष्ण वसन्तऋतुमें तीन भागका एक भाग जल थाकी रह जाय अर्थात् तीनपाव जळको औटाव जय कालमें उप्णताका प्रतिकार करतेहुए चिकित्सा करे : औटते २एक पाव रह जाय तब उसको शीतल करके किन्तु समयके विपरीत कदापि चिकत्सा न करे पान करे ।। ५८ ॥ (३) तथा क्रियाके कालको न जाने दे अर्थात् समयपर चिकित्सा करे ॥ ६३ ॥ ग्रीमे च द्विगुणं तोयं दया वापि अत्रात वा क्रियाकाले माते वा न भिषग्वरः। अधोंदकावशिष्टन्तु पिव- दोषहरं.जलम ॥ ५९॥ कृता क्रिया । क्रिया हीनातिरिक्ता च साध्यप्वपि न सिध्यति ॥ ६४ ग्रीष्मऋतुमें अविशेष अर्थात् एकसेर जलको औटावे जब ऑटते २ आधासेर वाकी जल रह जाय जो वैद्य अप्राप्तसमयमें चिकित्साको करता है और माप्तसमयमें अथवा क्रियाके समयमें क्रिया नहीं करता तब उसको शीतल करके पान करे॥ ५९॥ है यह क्रियाहीन वैद्य साध्य रोगोंको भी नहीं सिद्ध कोपः शेरद्वसन्तयु बहुकालेयु कर सकता ॥६४॥ शान्तितः ॥ कफपित्तानिलाः पूर्व यात्युदीर्ण. शमयति नान्यव्याधि मध्यान्तेषु व्यवस्थिताः। वयोहोरा करोति च । सा क्रिया न तु, या विभुक्तानां सन्धिप्यपि कफानिली ॥ व्याधि हरत्यन्यमुदीरयेत ॥६५॥ ॥६॥वायोः प्रत्यूषसायाहे जीर्णान्ते जो वढे हुए रोगको शमन करे तथा दूसरे रोगको च विसर्पणम् । पित्तस्याहो निशश्चार्ट उत्पन्न नहीं करे उसको चिकित्सा कहते हैं. किन्तु जीर्णमाने च लक्षयेत् ॥ ६१ ॥ उसको चिकित्सा नहीं कहते कि जो एक रोगको तो. भुक्तमात्रप्रदोषे तु पूर्वाह्ने लेप्मणो नष्ट करे और दूसरेको उत्पन्न करे ।। ६५ ।। : भवेत् । एकद्वित्रिविभागेन दुष्टान्दो- प्रकृतिलक्षण। पान्विशोधयेत् ॥ ६२ ॥ शुक्रासुग्गर्मिणीभोज्यचेष्टा गर्भाश- शरद् और वसन्तऋतुमें कुपित हुए वातादिदोप मान्तरे । यः स्यादोपोऽधिकरतन बहुत कालमें शांत होते हैं. कफ, पित्त और वात प्रकृतिः सतधोदिता ।। ६६॥ तीनों दोपं अवस्था, दिन, रात्रि और भोजन, इनके पुरुप और स्त्रीके संयोगके गमय वीर्य, , प्रथम, मध्य और अंतभागमें व्यवस्थित हैं अर्थात् स्रीका भोजन, स्नीकी पटा और गमीशम मा प्रथम बाल्यावस्थामें कफ, दूसरी तरुणावस्थामजानमा दोप, अधिक हो उसी दोगय अनुसार it पित्त और अंत अर्थात् वृद्धावस्था वायुका समय जोधको प्रकृति होती है.. ग, प्रकार Ar, मनि होता है, दिनके प्रथमभागमें कफ,मध्यमें पित्त, अन्तमें वातादिदोपसे सात प्रकारकी यादी ।। ६६ ॥ बानका समय होता है, रातके प्रथमभागमें कफ. कृशी मक्षाल्पकेशश्च चायिती होता है । मोशन करते समय कफ, भोजन के पत्ते वातप्रकृतिको नरः ॥ च स्थिरः । यहयाग्टयंग मध्यभागमें पित्त और रात्रिके अंतमें बानका समय समय पित्त और भोजन के पच जानेपर वायुका समय होता है तथा इनकी संधियोंमें कफ और वायुका अलगावट, वानप्रकनियाल माय .

(१०) बङ्गसेने भापाटीकासहिते- . . . स्थित गद्दी रहे, बहुत बोलनेवाले और स्त्रमग आफा विपजातो यथा कीटो न विषण शमें जानेवाले अर्थात् प्रायः मुपने आफागमें गमन विपद्यते । तद्वत्प्रकृतयो मर्त्य शक्नु- करते हैं । ६७ ॥ वन्ति न बाधितुम् ॥७२॥ अकालपलिती गारः प्रस्वेदी कोपनी जिस प्रकार विपसे उत्पन्न हुधा फीडा विषके बुधः । स्वमेऽपि दीप्तिवत्प्रेक्षी पित्त- द्वारा पाहिन नहीं होता उसी प्रकार प्रयागत प्रकृतिको नरः॥६८॥ दोष उसी प्रकृतियाले मनुष्यको पीडित " नहीं पित्तप्रकृतिकाले मनुष्य विना समय (योडी- करते ॥७२॥ अवस्था) में सफेद बालोंवाले,गौरवर्ण, अधिक पसी- वायुः सामो विवन्धाग्निसादस्तम्भन- नेवाले, फ्रोधस्वभावी, पंडित और स्वप्नमें सूर्य, कृजनः । वेदनाशोफनिस्ताद फ्रमः चन्द्रमा, अग्नि इन्यादि दीम पादायको देग्यते है ॥ ६८॥ शोऽङ्गानि पीडयेत् ।। ७३ ॥ स्थिरचित्तः सुबद्धाः सुव्रतः निग्ध- फूजन, पीड़ा, सूजन, तोडनेके समान वेदना और आमयुक्त वायु-वियन्ध, अग्निकी मंदवा, स्तम्भ,- मूर्द्धजः । स्वर जलाशयालोकी क्रममे सब अंगोंको पीडित करता है ॥७३॥ : श्लेप्मप्रकृतिको नरः ।। ६९ ॥ विचरागपञ्चापि गृह्णाति कुपितो कफप्रकृनिवाला मनुष्य स्थिरचित्तवाला, गठीले भृशम् । स्नेहाद्यवृद्धिमायाति मेधे शरीवाला,मुडौल, सदाचारी, चिकने वालोंसे युक्त सूर्योदये निशि ॥ ७४ ।। और स्वप्न में जलाशयको देखनेवाला होता है ॥६॥ एकसाथ सब अंगों में विचरण करती है और संमिश्रेर्लक्षणेज्ञेया द्वित्रिदोषानुगा वारंवार कुपित होती है तया नेहादिक (तैलादि) नराः । दोपश्चेद्रससद्भावे व्याधित. पदार्थोसे वृद्धिको प्राप्त होतीहै एवं मेघके समय, सूर्या- प्रकृतिः स्मृतः॥ ७० ॥ दय और रात्रिमें बढ जाती है ।। ७४ ।। दो दोपोंके लक्षणों के होनेस द्वन्द्वज प्रकृति और निरामो विशदी सक्षी निविधी- तीन दोपोंके होनेसे विदोपज प्रकृति होती है, दोप) ऽल्पवेदनः । विपरीतगुणः शान्तिं और रसभावके होनेसे रोगीकी व्याधिन प्रकृति कही स्निग्धर्याति विशेषतः।। ७५ ॥ है ।।७०॥ निरा मवायु-विशद, रूखी, वियन्धरहित, अल्प. प्रकृतिमिह नराणां भौतिकी कवि- वेदना युक्त, सामवायुसे विपरीत गुणीवाली और दाहुः पवनदहनतोयैः कीर्तिता- कीर्तिता- विशेषकर स्निग्ध पदार्थोसे शांत होती है ।। ७५ ।। स्तास्तु तिस्रः । स्थिरविपुलशरीरः दुर्गन्धं हरितं श्यावं पित्तमम्लरसं पार्थिवश्च क्षमावान् शुचिरथ चिर गुरु । अम्लिकाकण्ठहदाहकर सार्म जीवी नाभस: खेमहद्भिः ॥ ७१ ॥ विनिर्दिशेत् ॥ ७६ ॥ कोई २ वैद्य कहते हैं कि, मनुष्योंकी प्रकृति पंच सामपित्त-दुर्गन्धित, हरित, श्यामरंगका, खट्टे महाभूतोंसे बनी है जैसे कि पचन (पात), अग्नि रसवाला, भारी तथा सद्दापन व कंठ और हृदयमें (पित्त) और जल ( कफ) इन तीन महाभूतीवाले दाहको उत्पन्न करता है ।। ७६ ।। मनुष्योंकी प्रकृति तो ऊपर कह चुके,अब दो पृथ्वी आतानं पित्तमत्युणं रसे कटकम- और आकांश प्रकृतिवाले मनुध्यांके लक्षण कहते हैं, स्थिरम् । पकं विगन्धि विज्ञेयं रुचि जो मनुष्य स्थिर और पुष्ट शरीरवाला हो तथा वह्निवलप्रदम् ।। ७७ ।। क्षमावान् हो उनकी पृथ्वी प्रकृति जानना । जो शुद्ध निराम पित्त-ताम्रवर्ण, अत्यंत उष्ण, रसमें कटु आत्मावाला हो और बहुतकाल पर्यन्त जोवे उनकी | और चंचल होता है एवं पक, 'गंधरहित, रुचि आकाशप्रकृति जाननी ॥७१।।' कारक, आग्नि और बलकारक होता है ।। ४७ ॥

निदानाधिकारः। (१२, - फेनिलस्तंतुलः 'श्यावः कण्ठदेशेऽव उचिते वर्तमानस्य नास्ति देशकृत तिष्ठति । सामो: बलाशो दुर्गन्धः भयम् । आहारस्वप्नचेष्टादी तद्दे क्षुदुद्वारविघातकृतं ।। ७८ ।। शस्य गुणे सति ॥ ८३ ।। साम कफ फेनिल(झागोंसे मिला हुआ),तंतुवार, जो मनुष्य उचित आहार और विहार करते श्याव, कंठमें रुकनेवाला, दुर्गन्धित तथा छींक और उनको दुष्टदेशका कुछ भी भय नहीं, इसलिये कि 'उकारको रोकनेवाला है ।। ७८ ॥ देशमें रहे उसके अनुसार ही आहार, निद्रा फेनवान्पिण्डितः पाण्डुनि सारोगन्ध चेष्टा करनी चाहिये ।। ८३ ।। एव च । पक्वः स एव विज्ञेयः स्वेद मिथ्यादृष्टा विकाराहि दुराख्याता वान्वक्त्रशुद्धिकृत् ।। ७९ ।। स्तथैव च । यथा दुप्परिपृष्टाश्च मोह पका हुआ कफ झागोदार, गोठवाला, पांडुवर्ण, येयुश्चिकित्सकान् ॥ ८४ ॥ सारहीन, गंधरहित, पसीनसे युक्त और मुखको शुद्ध जिन रोगोंको वैद्यने अच्छे प्रकारसे नहीं दे करनेवाला होता है ।। ७९ ॥ और जिन रोगों का समस्त हाल रोगीने वैसे देशप्रकृतिलक्षण। नहीं कहा तथा जिन रोगोंका हाल वैद्यने रोग बहूदकनगोनूपः कफमारुतरोग- अच्छे प्रकार नहीं पूँछा ऐसे रोग वैद्यको मोहित हैं,इसलिये वैद्यको उचित है कि,अच्छे प्रकारसे रो वान् । जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च की चेष्टाको देखे और समस्त व्यवस्था रक्तपित्तगदोत्तरः॥८॥ तथा रोगी भी वैद्यको अच्छे प्रकारसे सब जिसमें बहुतसे जलाशय और पर्वत हों उसको सुना दे ।। ८४ ।। अनूपदेश कहते हैं, अनूपदेश--कफ और वायुके चिकित्सापादचतुष्टय। रोगोंको उत्पन्न करता है. जिसमें थोडे जलाशय और थोडे वृक्ष हो उसको जीगलदेश कहते हैं, वेद्यो व्याध्युपसृष्टश्च भैषज्यं परिच जांगलदेश--रक्त और पित्तके रोगोंको उत्पन्न करता रकः । एते पादाश्चिकित्सायाः कम्म है।। ८०॥ साधनहेतवः ॥८५॥ संश्लिष्टलक्षणोपेतो देशः साधारणो वैद्य, रोगी, औषध और परिचारक ये चिकि- मतः। समाः साधारणे यस्माद्वर्षा-साधन हेतु हैं ।। ८५ ।। के चार पाद चिकित्सा कर्म हैं और येही (कार शीतोष्णंमारुताः । समता तेन दोषाणां तस्मात्साधारणो वरः॥८॥ वैद्यलक्षण। जिसमें दोनों देशोंके लक्षण मिलते हों उसको तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्व साधारणदेश कहते हैं. साधारणदेशमें वर्षा, शीत, कृती। लहस्तः शुचिः शूरः सक उष्ण और पवन समान होते हैं, इस कारण साधारणदेश पस्करमेषजः॥८६॥ प्रत्युत्पन्नमति सब देशोंमें उत्तम है ।। ८१ ॥ मानव्यवसायी प्रियंवदः। सत्यधर्मर स्वदेशे निचिता दोषास्त्वयस्मि- कोपमागताः । बलवन्तम्तथा न यश्च स भिषपदमश्नुते ॥ ८७ ॥ स्युर्जलजावा स्थलाहताः ॥८२॥ जो आयुर्वेद शास्त्रके तत्वार्थको अच्छे प्रक जानता हो, जिसने अन्य वैद्यकी कोई क्रि- अपने देशमें संचित हुप दोप अन्य देशमें कुपित अनेकवार देखा हो और अपने आप चिकित्सा हो तो परशन नहीं होते, असाप्रकार जलंदशक धी क्रियामें कुशल हो, हलके हाथवाला हो, दोष स्थलगे और बलदेशक दीप जलमें कुपित हो, शर (गंभीर रोगीको देखकर घबड़ाये न हानपर बलवान नहीं होते।। ८२।। सर्वमकारक चिकित्साके उपकरण और. औषधि .

(१२) वनसेने भाषार्टीकासहिते- युक्त हो, अत्यन्त तीक्ष्णबुद्धिवाला, महाबुद्धिमान, वा विना चिकित्साके तीनों पाद गुणवान् भी उद्योगी, प्रियवचन बोलनेवाला और सत्यधर्ममें हो तो भी व्यर्थ है,जैसे अध्वर्युके बिना यज्ञमें उद्गाता, तत्पर ऐसा वैद्य उत्तम होता है ।। ८६ ।। ८८ ।। होता और बहा निरर्थक है ।। ९३ ।। रोगीके लक्षण । वद्यस्तु गुणवानेकस्तारयेदातुरं सदा। आयुप्मान्सत्यवान्साध्यो द्रव्यवाना प्लवं प्रतितरहीनं कर्णधार इवा- त्मवानपि । उच्यते व्याधितः पादो म्भसि ॥ ९४॥ वैद्यवाक्यकृदास्तिकः ॥८८॥ गायुप्मान्, सत्यधर्मपरायण, साध्य, द्रव्ययान्, एक गुणवान् वैदा ही संदय रोगियोंको रोगल्स इष्टमित्रांसे युक्त, वैधकी आशाको माननेवाला और सागरसे तारता है जैसे प्रतितर (भीतरसे सहारा आस्तिक ऐसा रोगी अच्छा कहा है ।। ८८ ।। लगानवाल अन्य मनुष्यों) के बिना अफेला मल्लाह ही नावको पार लगाता है ॥ ५४॥ औषधलक्षण । अथ मान। प्रशस्तदेशसम्भूतं प्रशस्त हनि चोड़- तम् । अल्पमा महावीर्य गन्धवर्ण जालान्तरगते भानो रजो यदणु रसान्वितम् ॥ ८९॥ दोषनमग्लानिक दृश्यते। तेश्चतुर्भिर्भवेहिक्षालिक्षाषड्डू- रमविकारि विपर्यये । समीक्ष्य काले भिश्च सर्षपः ॥ ९५॥ दत्तं च भैषज्यं पाद उच्यते ॥९०॥ सूर्यको किरणे जो धरके जाली, झरोखे, रोसन- उत्तम देशमें उत्पन्न हुई, शुभ दिनमें उखाडी हुई, दान और धमालॉग पहती है और उनमें जो. अल्प मात्रा वाली और अत्यन्त वर्यवान् तथा गंध रजके प्रसरेणु दीखते हैं उन चार त्रसरेणुओंकी एक वर्ण और रससंयुक्त, देोपनाशक,ग्लानि और विकार | लिक्षा होती है,छ: लिक्षाकी एक सरसों होती है ९५ नहीं करनेवाली और विचारकर उत्तम समयमें दीगई ऐसी औपध उत्तम होती ह ।। ८९ ।। ९०॥ पट्सर्षपर्यवस्त्वेको गुम्नेका च यवै. परिचारकलक्षण। त्रिभिः । गुजाभिर्दशभिः प्रोक्ती स्निग्धोऽनुगृप्मुर्वलवान्युक्तो व्याधि- माषको ब्रह्मणा पुरा ॥ ९६॥ तरक्षणे । वेद्यवाक्यकृदश्रान्तः पादः छःसरसोंका एक जो होता है, तीन जयोंकी एक परिचरो मतः॥९१॥ गुजा, देश गुजाका एक मासा होता है ॥ ९६ ।। स्नेहयुक्त, ग्लानिरीहत, बलवान, रोगोकी रक्षा चत्वारो मापकाः शाणास्तवयं करनेमें चतुर और वैद्यके वचनोंमें श्रद्धा करनेवाला ऐसा कोलसंज्ञितम् । वटकं द्रंक्षणं चैव परिचारक उत्तम होता है ।। ९१॥ कर्पस्तट्विगुणो भवेत् ॥ ९७ ॥ गुणवद्भिस्त्रिभिः पादश्चतुर्थों गुणवा- चार मासेका एक शाण होता है, दो शाणका भिषक् । व्याधिमल्पेन कालेन एक कोल होता है, वढक और द्रक्षण यह कोलके : महान्तमपि साधयेत् ॥ १२ ॥ नाम हैं, दो कोलका एक कर्प होता है.।। ९७ ।। औपध, रोगी और पारचारक ये तीनों गुणवान् पाद और चौथा गुणवान् वैद्य ये चारों पाद अल्पकाल अक्षः पिचुः पाणितलं कर्ष - तच में ही यडे २ रोगोंको आरोग्य कर देते हैं ॥ ९२ ।। सुवर्णकम् । विडालपदकं तुल्यं वैद्यहीनाख्यः पादा गुणवन्तो किश्चिञ्च कवलग्रहम् ॥ ९८॥ ऽध्यपार्थकाः । उद्गातृहोतृवह्माणो अक्ष, पिचु, पाणितल, कर्प, सुवर्णक, बिॉलपद, यथाऽध्वर्यु विनावरे ॥.९३ ॥ तुल्य, किंचित् और कालग्रह य कर्षके पर्याय हे।।९८॥ . -- निदानाधिकारः। (१३) . द्वाभ्यामर्धपलं ताभ्यां शुक्तिश्चापि दो पलका एक प्रसृत होता है, उसको पोडशक भी तदुच्यते । स्याच्चतुष्कार्षिकं चैव पलं | कहते हैं, पोडश द्रोणकी एक खारी होती है, दश धरणकी एक तुला होती है ।। १०५ ॥ सर्वत्र निश्चितम् ॥ ९९ ॥ दो कर्षका आधा पल होता है, उसको शुक्ति भी चत्वारः कुडवः प्रस्थ: स शराबद्वयं कहते हैं, चार कर्पका एक पल होता है ।। ९९ ।। मतम् ! पलानि चैव विद्वद्भिः पोड- यत्प्रकुचं, पलं मुष्टिस्तथा विल्वं शैव प्रकीर्तिताः॥ १०६॥ प्रस्थाश्च- चतुर्थिका । षोडशिका समुद्दिष्टा त्वार एव स्युराहकोऽष्टशरावकः । पलमेकं प्रमाणतः ॥ १००॥ कंसः स एव विज्ञेयः स तु पात्रं च प्रकुञ्च, पल, मुष्टि, बिल्व, चतुर्थिका और पोड पण्डितः ॥ १०७॥ अपि मानविदो शिका यह पलके नाम हैं ।। १०० ॥ ह्येष चतुप्पष्टिपलो मतः । चत्वारश्चा- रक्तिकादिषु मानेषु यावत्सु कुडवेषु ढको द्रोणः स द्वात्रिंशच्छरावक: च । शुष्कद्रवाद्रद्रव्याणां तुल्यमानं ॥१०८ ॥ शूपार्द्ध नल्वणं चैव कलशो प्रकीर्तितम् ।। १०१॥ घट एव च । अयं च पलसंख्यातः रत्तीसे लेकर कुडवपर्यंत सूखे, गीले आर पत्तले पदार्थ समान लेने चाहिये ॥ १०१॥ पट्पञ्चाशच्छतद्वयम् ॥ १०९॥ काथद्रव्यस्य बाहुल्यादुदकं स्वल्प- चार कुडवका एक प्रस्थ होता है, उसको शराव- मेव च । सम्यक्पाकं न मुञ्चन्ति द्वय आर पोडशपल भी कहते हैं। चार प्रस्थका एक आढक होता है, उसको अष्टशराव,कंस, पात्र , हीनवीर्य्यन्तु केवलम् ॥ १०२ ॥ और चतुःपष्टि पल भी कहते हैं। चार आढकका काथद्रव्योंके अधिक और जलके अल्पहानसे अच्छे | एक द्रोण होता है, उसको द्वात्रिंशच्छरावक, शूपी , प्रकारसे पाक नहीं होता अर्थात् केवल हीनवीर्य नल्वण, कलश और घट कहते हैं । इसकी पलसंख्या होता है। १०२॥ २५६ होती है ॥ १०६ । । १०७ ॥ १०८॥ आद्रव्यद्रवद्रव्यपलेरष्टाभिरेव च । ॥ १०९॥ शुप्कद्रव्यचतुप्केण कुडवः समुदा- द्रोणद्वयं च शूर्पः स्यात्स कुम्भ हृतः ॥ १०३॥ इति चोच्यते । चतुप्पष्टिशरावोऽसौ गीले पदार्थ और पतले पदार्थाका आठ पलका व्यवहारार्थमुच्यते ॥११॥ कुडव हाता है और सूखे पदार्थाका चार पलका कुडव होता है ।। १०३॥ दा द्रोणका एक शूर्प होता है। उसको कुम्भ और चतुप्पलस्तु कुडवः स शरावाई चतुप्पष्टि शराब भी व्यवहार के लिये कहते हैं।।११० उच्यते । मानिकाप्टो पलान्येव धरणं स द्वादशपलानीह शतानां पञ्च दशभिः पलेः ॥ १०४॥ चोच्यते । गोणी द्रोणाश्च चत्वारः चार पलका कुडव होता है उसको अर्द्धशराव भी स शराहशतं मतम् । अष्टाविंशति कहते हैं, आठ पलकी मानिका होता ह, दस पलका संयुक्तं सर्वथा सूक्ष्मबुद्धिभिः ॥२१॥ पलानां तु सहस्रकं चतुर्विशतिक द्वाभ्यां पलाभ्यां प्रसृतं तञ्च पोडशकं स्मृतम् । प्रस्थादिमानमारभ्य द्रव्या- विदुः । खारी च षोडश द्रोणा दश- 'देर्द्विगुणान्वितम् । कुडवोऽपि कचि- दृष्टं यथा दन्तीघृते स्मृतम् ॥ ११२ ।। धरण होता है ।। १०४ ।। भिर्धरणेस्तुला ॥ १०५॥"

(१४) वङ्गसेने भाषाटीकासहिते- , , M इसकी पलसंख्या ५१२ होता है, चार द्रोणकी एक रोगियोंकी विधिपूर्वक चिकित्सा करे, वैद्य लोभसे गोणी है, उसके एकसौ अट्ठाईस ( १२८) शराब निर्धन पुरुषोस धन लेकर चिकित्साकं पुण्यको बचे तथा १३२४ पल होते हैं, प्रस्थसे लेकर आगेको जो नहीं - किन्तु जो मनुष्य समर्थ और धनवान हो द्रव्य लेना हो तो दुगुना लेना चाहिये जैसे कि,दती-उनसे आजीविकाके लिये धन लेने की इच्छा करे घृतमें लिये जाते हैं। ॥ १११ ॥ ११२ ।। ११४ ॥ ११५ ।। ११६ ॥११७ ॥ वैणवाक्षायसादीनां भाण्डं तु चतुरं- चिकित्सितं शरीरं यो न निष्क्री- गुलम् । विस्तीर्णमथ वृत्तं च कुडवं णाति दुर्मतिः । स यत्करोति तं विनिर्दिशेत् ॥ ११३ ॥ सुकृतं तत्सर्व भिपगश्नुते ॥ ११८ ।। बुडवपरिमाण--बाँस, काठ और लोहे आदिका जो दुष्टबुद्धि मनुष्य, अपने शरीरकी चिकित्सा. चार अंगुल चौडा, चार अंगुल गहरा ऐसा एक कराता है और वैयको उसका कुछ बदला नहीं देता गोल पान सामान्य वस्तु डालनेके लिये बनाया जाता तो उसका उस शरीरके द्वारा किया हुआ समस्त है उसको फुडव परिमाण कहते हैं ॥ ११३ ।। पुण्य वैद्यको प्राप्त होजाता है ॥ ११८॥ क्वचिदर्थः क्वचिन्मेत्री कचिद्रमः त्याज्य रोगी। क्वचिद्यशः । कर्माभ्यासः कचिंचव, चण्डः साहसिको भीतः कृतघ्नो चिकित्सा नास्ति निष्फला ॥ ११९ ॥ व्यन एव च। यो वैद्यनृपतिद्वेष्टा चिकित्सा करनेसे कहीं धनकी प्राप्ति होती है, सद्वष्टा शीकपीडितः॥११४॥ याह कही मित्रता होती है, कहीं धर्म, कहीं यश और छिको मुमूर्षुश्च विहीनः करणेश्च कही क्रिया करनेका अभ्यास बढ़ता है। इसप्रकार यः। वरी वैद्यविदग्धश्च श्रद्धाहीनः चिकित्सा करना कहीं भी निष्फल नहीं होता११९।। सुशङ्कितः ॥ ११५॥ भिषजामभिधे कुचेल: कर्कशः स्तन्धो ग्रामीण: यश्च नोपक्रम्या भिपग्विधाः । एतातु स्वयमागतः। शस्यते यश्च वद्योन पाचग्न्वद्या बहून्दोषानवाप्नुयात् ११६ धन्वन्तरिसमो यदि ।। १२०॥ अभ्योन्य समुपक्रम्या नराः सर्वरु- जो वैध मैले कुचैले वस्त्रवाला, ' अप्रिय बचन : पक्रौः। नव कुर्वीत लोभेन चिकि बोलनेवाला,मूर्ख, व्यवहारमें अकुशल, प्रामका रहने- सापुण्यविक्रयम् । ईश्वराणां सु- बाला.बिना बुलाये अपने आप आयाहुआ धन्वंतरिके समान हो तो भी उसका आदर नहीं होता।।१२०।।. मतां लिप्सतार्थन्तु वृत्तये ॥ १७ ॥ जो अत्यन्त आधी, दुम्माइसके काम करनेवाला, म वधी नहि योऽसाध्यानारभेत डरपोक, उपकारको न माननवाला,हठ करनेवाला,बैद्य, चिकित्सितुम् । अवैद्यजीविकासि- - संजन और शजासे द्वे५ करनेवाला, शोकस पीडित. - द्विः स्याघृणाक्षरवत्कचित् ॥१२१॥ स्वेच्छाचारी. मग्नकी इच्छा करनेवाला, शिथिल लो असाध्यरोगकी चिकित्सा करना. आरम्भ इन्द्रियों बाला, वैरी,वैद्यपर विश्वास नहीं करनेवाला, करना है वह वैद्य नही अर्थात् कुवैद्य है। ऐसे कुवै श्रद्धारहित और वैद्यकं वचनामें शंका करनेवाला ऐसे की जीविकासिद्धि कदाचित् घुणाझरन्यायके रोगीको धको चिकित्सा नहीं करनी चाहिये तथा समान होजाती है ।। १२१ ।। जो वैपके समान हो और जो वैशका गर्नेवाला हो ऐसे रोगाफी भी चिकित्सा नहीं करे क्योंकि ऐसे माषान्नं विग्रहे मेहे यवमद्यं. मदा- रोगियोंकी चिकितसा करनेसे वैद्य अत्यन्त अपवादको । त्यये । अशुद्धिपूर्वमप्याशु सेवितं... प्राम होना है, इनके सिवा अन्यान्य सर्व प्रकारके भेषजं भवेत् ॥ १२२ ।। ', । .

ज्वराधिकारः। (१५) . जैसे कि मूर्ख मनुष्य भी शीघ्र ही विड्ग्रह और डिको । भगन्दरोपदंशी च शूकदोप- प्रमेहरोगमें प्रथम मापान और मदात्यय रोगमें जौकी स्त्वगामयः॥१३॥ शीतपित्तमुदर्दश्च मदिरा सेवन करे तो औषधि होजाती है ॥ १२२ ॥ कोठश्चैवाम्लपत्तिकः । विसर्पश्च स- आयुर्वेदोदितां यक्तिं कुर्वन्ति स्वहि- विस्फोटः सरोमन्तीमसृरिका ॥१३२॥ ताय ये । पुण्यायुर्बुद्धिसंयुक्ता नीरो- क्षुद्रास्यकर्णनासादृक्छिर स्त्रीयालका- गास्तु भवन्ति ते ॥ १२३॥ मयाः । विषं इत्ययमेवात्र ज्ञेय जो मनुष्य अपने हितके लिये आयुर्वेदोक्त युक्तिको उद्देशसंग्रहः ॥ १३३ ।। 'पालन करते हैं वे पुण्य, आयु और युद्धियुक्त होकर सदेव नीरोग रहते हैं ।। १२३ ।। (सब रोगोंकी गणना लिखते हैं:-) आयुर्वेदलक्षण। ज्यर, अतिसार, संग्रहणी, अर्श (बवासीर ), अजीर्ण, विपूचिका, अलस, बिल्लम्बिका, कृमिरोग, आयुर्हिताहितं व्याधेर्निदानं शमनं पांडुरोग, कामला, हलीमक, रक्तपित्त, राजयक्ष्मा, तथा । विद्यते यत्र विद्वद्भिः ‘स उरःक्षत, कास ( खाँसी), हिधारोग, श्वास, स्वर- चायुर्वेद उच्यते ॥ १२४ ॥ भेद, अरोचक, छाई (वमन), तृपारोग, मूरोिग, जिसमें आयुका हित, अहित, रोगका निदान पानात्ययादिरोग, दाहरोग, उन्मादरोग, अपस्मार, 'और उसके शमनके उपाय विद्यमान हो उस शास्त्रको वातरोग, वानरन, ऊमस्तम्भ, आमवात, शूलरोग, विद्वान् आयुर्वेद कहते हैं ॥ १२४ ।। पंक्तिशूल, आनाहरोग, उदावत, गुल्मरोग, हृदयरोग, रोगगणना। मूत्रकृच्छ, मूत्राघात, अमरीरोग, प्रमेह, मधुमेह, प्रमेहपिटिका, मेदोरोग, उदररोग, गोथरोग, अंड- ज्वरोऽतिसारो ग्रहणी चाशोऽजीर्ण वृद्धि, गलगण्डरोग, गण्डमाला,ग्रंथिरोग, अर्बुदरोग, . विचिका । अलसः सविलम्बी.च शीपदरोग, विद्रधि, व्रणशांफ, व्रणरोग, नाडीत्रण, कृमिरुपाण्डकामलाः ॥ १२५ ॥ भमरोग, भगन्दर, उपदंशरोग, शुकदोष, कुमादि त्वचाके रोग, शीतपित्त, उदर्द, कोठरोग,अम्लपित्त, हलीमकं रक्तपित्तं राजयक्ष्मा उर:- विसर्परोग, रोमान्तिका, मसूरिका, क्षुद्ररोग, मुखरोग, क्षतम् । कासो हिक्का तथा श्वासः कर्णरोग, नासारोग, नेत्ररोग, शिरोरोग, स्त्रीरोग, स्वरभेदस्त्वरोचकः ॥ वालरोग, वियरोग ये रोग इस ग्रंथमें कहे जायेंगे छर्दिस्तृष्णा च मृर्छा च रोगाः ॥१२५॥१२६॥१२७॥१२८॥१२९॥१३०॥१३१ ।। पानात्ययादयः । दाहाख्यस्त्वपरो. ।।१३२॥१३३॥ न्मादश्वापस्मारोऽनिलामयः॥१२७॥ इति निदानाधिकारः। वातरक्तमुरुस्तम्भ आमवातोऽथ शलरुक् । पङ्क्तिजं शूलमानाह अथ ज्वराधिकारः । उदावतॊऽथ गुल्मरुक ॥ १२८ ॥ हृद्रोगो मूत्रकृच्छ् च मूत्राघातं तथा ज्वरः समस्तरोगाणां यतो राजेति ऽश्मरी । प्रमेहो मधुमेहश्च पिटिकाच विश्रुतः । अतः प्रथमतस्तस्य प्रव- प्रमेहजाः ॥ १२९ ।। मेदोदोपोदरं, क्ष्यामि चिकित्सितम् ॥ १३४ ॥ शोथो वृद्भिश्च गलगण्डकः। गण्डमाला ततो प्रान्थिरवंदं श्लीपद ततः।।१३०॥ ज्वर सकल रोगोंका राजा है ऐसा सुना जाता है, विद्रधिव्रणशोफी च वाव्रणी भग्नना- इसकारण सबसे पहले ज्वरकी चिकित्सा कहता हूँ ॥ १३ ॥ .

(१६) वासने भापाटीकासहिते- दक्षापमानसंबद्धरुद्रनिःश्वाससम्भवः। सर्वलिङ्गसमावायः . सर्वोपको ज्वरीष्टधा पृथग्द्वन्द्रः सङ्घातागन्तुजः पजे । सुपरन्यतराभ्यां च संसद स्मृतः ॥ १३५॥ न्द्रजं विदुः ॥ १४० ॥ ज्वर दभके अपमानसे प्रोधित हुए महादेयके श्या निोपज ज्वरमें तीनों दोपोंके लक्षण होते हैं ससे उत्पन्न हुआ है और वह पृथक् (यातज, पिराज, और द्वन्मजयरके पूर्व में अन्यान्य दोदोपॉके मिटे हुए कफ.ज), इन्द्रज-(वातपित्तज, कफपित्तज, वान लक्षण होते है ॥ १४॥ कफन), विदोपज-(सन्निपान जिसमें वात, पित्त, ज्वरस्य पूर्वरूपेषु वर्तमानपुबुद्धिमान। फफ तीनों मिले हुए हों) और आगन्तुज-(आभि- पायसापरेवारी ततः स लभते पातादिजनित) इन भोसे आठ प्रकारका ह॥१३॥ सुखम् ॥ १४१ ॥ विधिर्मारुतजेवेष दुष्टाहारविहाराभ्यां दोषाधामाश- पत्तिकेषु विरेचनम् । मृदुप्रच्छर्दन याश्रयाः । वहिनिरस्य कोष्ठाग्नि तद्वत्कफजयु विधीयते । सर्व विदोष- ज्वरदाः स्यू रसातुगाः॥ १३६॥ जेयूक्तं यथादोपं विकल्पयेत् ॥ १४२ ।। दुष्ट आहार और दुष्ट विहारके करनेसे वातादिदोष स्वेदावरोधः सन्तापः सर्वाङ्गग्रहणं आमाशयमें स्थित होकर कोठेके अग्निको गरमीको तथा । युगपद्यत्र रोगे तु स ज्वरी, याहर निकालकर रसमें प्राप्त होकर ज्वरको उत्पत्र व्यपदिश्यते ॥ १४३॥ दोपः सवेगव करने हैं ॥ १३६ ॥ हुधा समुद्रातर्विभार्गगैः। विक्षिप्य: अमोतिर्विवर्णत्वं वरस्यं नयनप्लवः। मानोन्तरनिर्भक्त्याशु बहिश्चरः१४४ इच्छाद्वेपो मुहुश्चापि शीतवातात- रुणाद्ध चाप्यपां धातुं यस्मात्तस्मा पादियु ॥१३७॥ जृम्भाङ्गमदों गुरुता ज्ज्वरातुरः। भवत्यत्सप्णगात्रश्च स्वि- रोमहोरुचिस्तमः। अप्रहपश्च शीतं द्यति न च सर्वशः॥ १४५ ॥ परिपे. च भवत्युपत्स्यति ज्वरे ॥ १३८ ।। कान्मदेहांध स्नेहान्सशोधनानि च। बिना परिश्रम किये नम मालूम होना,कही चित्त दिवास्वप्नं व्यवायच व्यायाम 'न लगना, शरीरका रंग बदल जाय,मुखमें नारसना, शिशिरं जलम् । क्रोधप्रवातभोज्यांच" नेत्रों में जल भर आना, शीतवायु और धूपमें वारंवार वर्जयेत्तरुणज्वरी ॥ १४६॥ इच्छा और वारंधार अप्रीतिका होना, जम्भाइयोंका अब ज्वरके पूर्वरूपकी चिकित्सा कहते हैं । वात- आना, अंगोंका इटना, शरीरमें भारीपन, रोमांच वरके पूर्वररूपमें रोगीको घी पिलावे तो उसको सुख होना, भोजनमें अमचि, अंधकारदर्शन, हर्पका नाश प्राप्त होता है । पित्तज्वरके पूर्वरूपमें मृदु विरेचन ई .और गीतका लगना थे ज्वरके पूर्वरूप हैं अर्थात् और कफके पूर्वरूपमें मृदु वमन करावे। विद्रोपज्जर : ज्वरके पहिले ये लक्षण होते हैं ।। १३७॥१३८|| के पूर्वरूपमें दोषोंकी कल्पना कर यथादोषानुसार सामान्यतो विशेषात जृम्भात्यर्थ स- कर्म करे । परके लक्षण-पसीनेकान 'मीरणात् । पित्तान्नयनयोहः कफा सन्तापका होना और सम्पूर्ण अंगोंमें पीडाफा होना दबारुचिस्तथा ॥ १३९ ॥ ये सब लक्षण जिसमें एक साथ हो उसको ज्वर कहते, हैं। वातादिदोप वेगवान् हो इधर उधर फलकर एवं ये सामान्य पूर्व लक्षण कहे, अब कुछ विशेष तिर्यग्गामी होकर भीतरी अग्निको बाहर निकाल कहते हैं । वातज्वर में प्रथम जम्भाई अधिक आती हैं, देते हैं। उस अग्निके निकलनेसे पसीना रुक जाता है पित्तज्वरम नेत्रों में दाह होता है और कफज्वरमें अन्नसे ! इसकारण सब शरीर गरम हो जाता है तब । अरुचि होती है ।। १३९ ।। ज्वरातुर कहते हैं। ज्वरमें परिपेक(जलादिकसे शरीरको आना, उसको Fr ज्वराधिकारः। (१७) सींचना.) चन्दनादिका , शरीरमें लेप करना, आनद्धः स्तिमितदोपर्यावन्तं काल- तैल धृतादिक स्निग्ध पदाथोंका सेवन, वमन, विरेच- मातुरः । तावत्कालन्तु लम्वनमभी- नादि फर्म, दिनगे सोना, मैथुन करना, दंड कसरत यात्तु विरिक्तवत् ॥ १५१ ॥ आदि करना, शीतल जलका सेवन, क्रोध, वायुका सेवन और भोजन ये सय, नवीन 'ज्परवाला मनुष्य जबतक ज्वररोगी दोपोंसे घिरा रहे तबतक उसको त्याग देवे ॥१४१॥ १४२॥ १४३ ।। १४४॥ हलका अन्न विरिक्त (जुलाप लिए हुए) के समान देना उचित है ॥ १५१॥ १४५॥ १४६।। शोधछर्दिमदो सूर्छा तृष्णा भ्रम सातत्यात्स्वाद्यभावाच पथ्यं द्वेप्य- मरोचकः प्राप्नोत्युपद्रवानेतान्परि त्वमागतम् । कल्पनाविधिमितत्तः पेकादिसेवनात् ॥१४७॥ . प्रियत्वं गमयेत्पुनः ॥ १५२ ।। यदि मचीन ज्वरवाला उपरोक्त परिपेकादि बहुत दिनोंतक निरंतर सेवन करने और स्वादिष्ट सेवन करे तो उसके शोथ (सूजन), यमन, मद, न होनसे पथ्य द्वेपभावको प्राप्त हो जाता है-अर्थात् मूर्छा, तृपा, भ्रंम और अचि आदि उपद्रव उत्पन्न उससे अरु हो जाती है तब उसको वैय अनेक होते हैं ।। १४७ ॥ प्रकारकी कल्पनाओंसे सुन्दर करें ॥१५२॥ : ज्वरित ज्वरभुक्तं वा भोजयल्लाभो- अरुचौ मातुलुङ्गस्य केसरं साज्यसे- नम् । लेप्मक्षये प्रवृद्धोमा बलवान- न्धवम् । धात्रीद्राक्षासितानां चा नस्तदा । वेगापायेऽन्यथा तद्धि कल्कमास्येन धारयेत् ।। १५३ ॥ ज्वरवेगाभिवर्द्धनम् ।। १४८॥ इति, तरुणवरविधिः। जो ज्वरसे पीडित हो अथवा जो ज्वरसे मुक्त हो गया हो उसको अवश्य हलका भोजन कराना चाहिये। को घी और सैंधे नोनमें मिलाकर अथवा आमले, जो ज्वरमें अरुचि हो तो विजौरे नींबूकी केशर क्योंकि कफके क्षय होनेसे गरमी बदजाती है और उससे जठराग्नि प्रबल हो जाती है इसलिये वेग दाख और मिश्री इनके कल्कको मुखमें धारण करे ॥१५३ ।। हलके होने पर पध्य देना चाहिए नहीं तो दोप. वेग को प्राप्त होकर ज्वरके वेगको वढा देते हैं ।। १४८॥ विनापि भेषाधिः पथ्यादेव निव- ज्वरितो हितमश्नायाद्यद्यप्यस्याऽरु- तते । न तु पथ्यविहीनस्य भेषजानां चिर्भवेत् । अन्नकाले ह्यशुञ्जानः क्षी- शतिरपि ॥ १५४ ॥ यते म्रियतेऽथवा ।। १४९ ॥ केवल पथ्य सेवन करनेसे ही विना औपधके अतएव ज्वरवाले मनुष्यको यदि अरुचि भी हो भी रोग नष्ट हो जाते हैं किन्तु कुपथ्य सेवन करने तो भी हितकारक पदार्थोको भक्षण कराये, क्योंकि वाले मनुष्यके सैकडो औपधियोंके सेवन करनेसे भी अन्न देने के समय भोजन नहीं , करनेसे ज्वररोगी आरोग्य नहीं होते ॥ १५४ ॥ क्षीण हो जाता है अथवा मर जाता है ।।१४९।। शालयो रक्तशाल्याद्याः शस्यन्ते गुर्वमिप्यन्धकाले च ज्वरी नाद्या पष्टिकादयः । यवाग्वोदनलाजार्थे । कथञ्चन । न तु तस्याहितं भुक्तमा ज्वरितानां ज्वरापहाः ॥ १५५ ॥ . गुपे वा सुखाय च ॥ १५० ॥ शालियान, लाल शालिधान, पष्टिकधान (साठी) - ज्वरोगीको भारी और अभिप्यन्दी पदा- ये सब धान ओदन (भात), खोलें और यवागू थोंका भोजन तथा विना समय कदापि भोजन नहीं बनाने के लिये लेवे । ओदन (भात) और खालोको खाना चाहिये, क्योंकि यह उसकी आयु और सुखके यवागू ये सब ज्वररोगियोंके ज्वरको हरनेवाले हैं ।। १५५॥ - . लिए हितकारक नहीं होता ।। १५० ।।

(१८) वङ्गसेने भाषाटीकासहिते- 1 मुद्दान्मसूरांश्चणकान्कुलित्थान्समकुष्ठ न च्यवन्तेन पच्यन्ते कषायेस्तम्भिता कान् । यूषार्थे यूपसात्म्यानां ज्वरि मलाः । तिर्यग्विमार्गगाः स्थित्वा तानां प्रकल्पयेत् ॥ १५६॥ घोरं कुर्युर्नवज्वरम् ॥ १६१ ॥ मूंग, मसूर, चने, कुलथी और मोठ ये यूपके क्याथसे स्तम्भित हुए दोप न निकलते हैं और न लिए देने चाहिए ।इनमसे जौनसा चूप । ज्वररोगीको पचते हैं किन्तुतियग्गामी होकर घोर नवीन ज्वर सात्म्य (माफिक) होवे वही उसको देना चाहिए।।१५६ को उत्पन्न करते हैं ॥ १६१ ॥ पटोलपत्र सफलं कुलकं कारवल्लकम् । आमाशयस्थो हत्वाग्निंसामो मार्गान् कर्कोटकं कठिलं च विद्याच्छाकं ज्वरे पिधापयन् । विदधाति ज्वरं घोरं हितम् ॥ १५७ ॥ तस्माल्लङ्घनमादिशेत् ॥ १६२॥ वातादिदोप आमाशयमें स्थित होकर आमके पटोलपत्र, पटोलफल, मीठे परवल, करेला, ककोडा और पुनर्नवा इनका शाक ज्वरमें हित- साथ मिलकर जठराग्निको नष्ट कर शरीरके स्रोत को रोक करके ज्वरको उत्पन्न करते हैं इसकारणं कारी है ॥ १५७ ॥ आमको पचनेके लिये, जठराग्निको दीपन करनेके लावान्कपिजलानेणांश्चकोरानुपचक्र लिये और स्रोतोंको शुद्ध करनेके लिये ज्वर में अवश्य, कान् । सकुरङ्गान्कालपुच्छान्हरि- लंघन कराने चाहिये ॥ १६२ ।। णान्पृषताञ्छशान् । प्रदद्यान्मांससा लडनेन. क्षयं नीते दोघे संक्षिते. ल्यानांज्वरितानांज्वरापहान्॥१५८॥ उनले विज्वरत्वं लघुत्वच क्षुच्चैवास्यो लवा, कपिजल ( तीतर),एण ( काला हिरन), पजायते ॥ १६३ ॥ चकोर, चकवा, कुरंग, कालपुच्छ, पृपतमृग और लंघन करनेसे वातादि दोष क्षय होकर जठराग्नि , शशक (खरगोस) इन जीवोंका मांस ( मांस दीपन होती है तथा ज्वरकी हीनता, लघुता और क्षुधा भोजी ) ज्वररोगीको देना चाहिये । परन्तु जिस उत्पन्न होती है ॥ १६३ ।। रोगीको जिस जीवकामांस सात्म्य (माफिक) हो वही शरीरलाघवकरं यद्रव्यं कर्म वा उसको. देना चाहिये,ये ज्वरको हरनेवाले हैं,जो मांस पुनः । तल्लङ्घनमिति ज्ञेयं बृंहणं तु. नहीं खाते उनके लिये यह विधि नहीं है ॥१५८।। न कषायं प्रशंसन्ति नराणां तरुण- पृथग्विधम् ॥ १६४॥ ज्वरे । कायनाकुलीभूता दोषा जेतुं जो द्रव्य या कर्म शरीरमें लघुता उत्पन्न करे उसको लंघन कहते हैं और बृहण इसके पृथक् अर्थात् सुदुस्तराः ॥१५९ ॥ विपरीत है ॥ १६४ ।। नवीन ज्वरवाल रोगियोंको क्वाथ नहीं देना चाहिये क्योंकि क्त्रायसे दोप आकुलित हो जाते हैं। बलाविरोधेनाथैनं लङ्घनेनोपपाद- फिर उनको जीतना अत्यन्त दुस्तर हो जाता है१५९ / येत् । बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थों हि दोषा वृद्धाः कपायण स्तम्भितास्त- क्रियाक्रमः॥१६५॥ रुणज्वरे । स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते वैद्यको चाहिये कि, इस प्रकार लंपन कराव कुर्वन्ति विषमज्वरम् ॥ १६० ।। जिससे रोगीके शरीरका यल नष्ट न हो, क्योंकि नवीन ज्वरमें काथके देनेसे दोप वृद्धिको प्राप्त बलके अधीन आरोग्य है, जिसं आरोग्यके लिये गाह होकर स्तम्भित हो जात हैं, स्तम्भित दोप न पचते सब क्रियाकल्प कहा गया है ।। १६५ ।। और न शमन होते हैं किन्तु विषम ज्वरको उत्पन्न तद्धि मारुतक्षुत्तृष्णामुखशोपभ्रमा करते हैं ।। १६०॥ विते। कार्य न वाले युद्धे वा-गर्भिण्यां. .

ज्वराधिकारः। (१९) . न च दुर्बले।न तथाध्वश्रमकोधकाम- दुर्वलता, मनमें पारम्वार भ्रमका होना, सदैव शोकभवे ज्वरे ।। १६६।। ऊर्वयातके उपयोंका होना, हदयमें ग्लानिका होना, वह लंधन वातरोगी, तपास पोडित, 'घासे देह, जठराग्नि और बलका नाश होना; ये सब लक्षण पीडित, मुखशोपी, भ्रमरोग, यालय, पद्ध, गाभणी अत्यन्त लंघन करनेसे होते हैं ॥ १७० ॥ १७१ ॥ खी, दुर्वल मनुष्य और मागके चलनेले के हुए ज्वरमें जलपानविधि । मनुप्यको तथा श्रम, क्रोध, काम और शोकस उत्पन्न तृप्यतः सलिलं चोणं दद्याद्वातक- हुए ज्वरम नहीं करने चाहिए ।। १६६ ।। फज्वर । तद्धि मार्दवकृदोपस्रोतसा सद्यो भुक्तस्य वा जाते ज्वरे सामे शीतमन्यथा ।। १७२ ॥ विशेषतः । वमन वमनाईस्य पथ्य यात कफवरमें तृपा लगनेपर रोगीको उग्ण जल मित्याह वाग्भटः॥ १६७ ॥ देना चाहिये, गरम जल दोपोंको शमन और शरीरके वाग्भटने कहा है कि भोजन करनेके पश्चान् मोतोको मृदु फरनेवालाहै । शीतल जल इससे विपरीत तत्काल.ज्वरके आ जाने पर विशेप कर आम ज्वरके गुणोंवाला है ।।१७२।। होनेपर वमन कराने योग्य रोगोंको वमन कराना पित्तमद्यविपोत्येपु पित्तकैः शृतशी- 'हितकर है ।। १६७ ॥ तलम् । मुस्तापर्पटकोशीरचन्दनोदी- उत्तम लंघन होनेके लक्षण । च्यनागरः। शृतं शीतं जलं दद्या- वातमूत्रपुरीपाणां विसर्गे गावला तृड्दाहज्यस्शान्तये ।। १७३॥ घवे । हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धो तन्द्रा- पित्तरोग, मविकार और विपके उत्पन्न हुए क्लमे गते ॥ १६८॥स्वेदे जाते रुची रोगोंमें कंडवी औपधियों के द्वारा जलको औटाकर क्षुत्पिपासासहोदये । कृतं लखन- पश्चान् शीतल करके पीनेको देवे । नागरमोथा, मादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मानि॥१६९॥ सोंठ इनको जलमें औटावे, जप औट चुके तब खुव पित्तपापडा, खस, लालचन्दन, सुगन्धवाला और, अपानवायु, मूत्र और मलका यथानियमसे शीतल करके छान लेये. यह जल तपा, दाह और -निर्गत होना, देहमें हलकापन, हृदय, डकार, कंठ ज्वरको शांत करनेके लिये देवे ॥ १३ ॥ और मुख इनका शुद्ध होना, तन्द्रा और ग्लानिका 'न होना, पसीनोंका आना, रुचिका उत्पन्न होना, पादशेषः कषायः स्यात् प्रसाध्यः पोडशेऽम्भसि । कथितोऽन्तः षडङ्गा- क्षुधा और तृपाका एक साथ लगना और आत्मामें किसी प्रकारकी पाड़ा न होना, ये सब लक्षण उत्तम दिर्न निषिद्धो नवज्वरे ।। १७४.॥ लंघन होनेवाले रोगीके हैं ।। १६८ ॥ १६९ ।। जिसमें काथ द्रव्य सोलहगुने जलमें पकाकर. अत्यंत लंघन होनेके दोष । चतुर्थाश शेप रक्ख जाय उसको कपाय कहते हैं । इसकारण पडङ्गादि जल तरुणवरमें निपिद्ध नहीं पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च कासः शोपो मुखस्य है ।। १७४ ॥ च । क्षुत्प्रणाशो रुचिस्तृष्णा दौर्बल्यं ज्वरमें पेया देने की विधि। श्रोत्रनेत्रयोः ॥ ७० ॥ मनस: लडिताय हिता पेया . यथास्वं संभ्रमोऽभीक्ष्णमृर्ववातः कमी हदि। पाचनः कृता । दीपनी पाचनी लध्वी देहाग्निबलहानिश्च ' लंडन्नेऽतिकृते ज्वरानिां ज्वरापहा ।। २७५॥ लंघन करनेवाले रोगीके लिये पेया अत्यन्त अत्यन्त लंघन करनेके दोष-शरीरको 'सत्र हितकारी है, वह यथादोपानुसार पाचन द्रव्यांसे सन्धियोंमें पीडा, शरीरमें हडफूटन, खाँसी, मुखशोष, बनाई हुई दीपन, पाचन, हलकी और अररोगीके क्षुधाका नाश, अंगचि और तृपा, कान और नेत्रों में वरको हरनेवाली है ५१७५।। भवेत् ॥ १७२ ॥ - (२०) बङ्गसेने-भाषाटीकासहिते- लटना पनमलेन पिप्पल्या सह धा- वलावृक्षाम्लकालामठकलशीयांव न्यया। महत्या पश्नमृल्याथ व्याघ्री नाश्ताम् । अखेदनिद्रातृष्णातः दुस्पर्शगोक्षरः॥ १७६ ॥ससिद्धं भिप पियेत्पेयां सशर्कराम् ।। १८२ ।। गाहारंप्रयभीततथाक्रमम् ।वातपित्ते सिटी, इंगली, घर, आमले, पत्रिपर्णी, श्लेप्मापित्त कफवाते त्रिदोपजे ॥१७॥ शालिपी इनकी पेया बनाकर मिश्री मिलाकर लघुपंचमूल-- ( शालिपी, पश्निपर्णी, छोटी पीनेसे पसीनेका न आना, निद्रा , और तृषाको कटेरी, वही कटेरी और गोखरू) के द्वारा पेया पीडा दूर होती है ॥ १८२ ।। यनाकर वातपित्तज्वरमें देये। पीपल और धनियेक लिन यवागू मन्दाग्निपिपासान्नि द्वारा बनाई पेया कफपित्तम्यरमें हितकारी है पाययेत् । मदात्यये मद्यनित्ये ग्रीमे बृहत्पंचमूल-(येल, श्योनाक, कुम्भेर,पाढर, अरणी) पित्तकफोत्थिते । ऊध्र्वगे रक्तपित्त के द्वारा सिद्ध की हुई या क.फ.वात-वर में देये 'कटेरी, जवासा और गोखुरु इनके फायके द्वारा च यवागर्न हिता ज्वरे ॥ २८३ ॥ सिद्ध कियेहुए अन्नको निदोपज्जरमें देवे ।। १७६ ॥ मंदाग्नि और तृपातुर रोगीको यवागू नहीं देनी ॥२७७॥ चाहिये तथा मदात्ययरोगी, सदैव मदिरा पानेवाले वात वा सकफे पित्ते सामे वा तरु- । मनुष्यको ग्रीष्मऋतु, पित्तकफोस्वरोग, ऊर्यगत णज्वरे । आद्यमण्डं प्रशंसन्ति पटो- रक्तपित्तरोग और ज्वररोगमें यवागू नहीं देनी चाहिये ।। १८३॥ लमगधान्वितम् ।। १७८ ॥ वात्तज्वर, कफचर अथवा पित्तज्वर, आमज्वर, तत्र तर्पणमेवाग्रे देयं स्याल्लाजस- किंवा तरुणज्वरमें प्रथम परवल और पीपलके द्वारा भिः । ज्वरापहैः फलरसर्यक्तं सम- सिद्ध किया हुआ मंड देना अत्यन्त हितकारी है | धुशर्करः॥ १८४ ॥ ॥१७८॥ ज्वरमें प्रथम खीलोंके सत्तुओंके साथ ज्वरनाशक: पेयां वा रक्तशालीनां वस्तिपार्श्व फलोंका रस, शहद और मिश्री मिलाकर तर्पण शिरोरुजि । श्वदंष्टाकण्टकारीभ्यां दे ॥ १८४ १५ सिद्धी ज्वरहरी पिवेत् ।। १७९ ॥ स्याद्धितः साधितो यूपस्त्वष्टादश- 'लाल शालिवानाकी पेयाको पस्ति, पार्श्वरोग और गुणे जले । शृतं पश्चगुणे भक्तं विले शिरोरोगमें देव । गोखरू और कटेरीके द्वारा सिद्ध च चतुर्गुणे ॥ १८५॥काथ्यध्याञ्जलि को हुई पेया ज्वरमें देवे ॥ २७९ ।। क्षुण्ण श्रपयित्वा जलाढके । अर्धशतेन विबद्धवर्चाः सयवां पिप्पल्यामलकः तेनाथ यवाग्वाधेव कल्पयेत् ॥ १८६ ।। भृताम् । समिती पिवत्पेयां ज्वर- .दोपानुलोमिनीम् ॥ १८० ।। अठारह गुने जलमें सिद्ध किया हुआ थूप हितकारी मलबद्धतामे-जी, पीपल और आमलोंके द्वारा और विलेपी चौगुने जलमें सिद्ध करना चाहिये। है तथा भातको पाँचगुने जलमें सिद्ध करना चाहिये। सिद्ध की हुई पेया पान करे। ज्वर और वातादि काथ द्रव्य चार पल लेकर खूब कूटकर एक आठक दोपोंको अनुलोमन करनेके लिये पेयामें घी मिलाकर जलमें पकाये, जब आधा भाग जल बाकी रह जाय पीवे ।। १८॥ कासे श्वासे च हिक्का पञ्चमूली- तब उसको यवागू कल्पना करे ।। १८५ ॥ १८६ ।। शृता पिवेत् ॥ १८१॥ वृद्धवेद्याः पलं द्रव्यं प्राहयन्त्याढके, खाँसी, श्वास और हिकारोगमें पंचमूलके द्वारा जले । भेषजस्यातिवाहुल्यात् कदा सिद्ध की हुई पेया पीवे ।। १८१ ॥ चिदरुचिर्भवेत् ।। १८७ ॥ ८ ज्वराधिकारः। (२१) वृद्ध वैद्य एक पल द्रव्यको लेकर एक माढक जलमें यदि बहुत दोपवाले और मंदाग्निवाले रोगीके पकाते हैं। कदाचित् औपधिकी बाहुल्यतासे अशाचे सात दिनके पश्चात् ज्वर रहै और उसमें लंघन, होजाये तो-॥ १८७॥ उष्ण जल वथा यवागू आदिके देनसे भी दोष न पचे तो-।। १९२ ॥ तदप्सु शृतशीतासु पडङ्गादि प्रयु- ज्यते । कर्षमा ततो द्रव्यं साधये तदा तं मुखवरस्यतृप्णारोचकनाश- प्रस्थिकेऽम्भाति । अर्धशतं प्रयोक्तव्यं नः । ज्वरनेः पाचनद्यः कपायः पानपेयादिसंविधों ।। १८८ ॥ समुपाचरेत् ॥ १९३ ॥ पडंगादिक द्वारा औटाकर स्वयं शीतल किया हुआ उसको गुसकी विरसता, तृपा,अरुचि और ज्वर- जा पानेको देये । एक वर्ष औषधि लेकर एक नाशक तथा हृदयको हितकारी ऐसे काथरूपी जरन - प्रस्थ जलमें पकाये, जय आधा जल माकी रह जाय पाचन दे ॥ १९३॥ तयं उसको पान पेयादिके काममें लावे ।। १८८।। कधि पिप्पलाशुण्ठ्योः कल्कद्रव्यस्य आमज्वरके लक्षण। वा पलम् । विनीय पाचयाक्तया लालाप्रसेकहल्लासहृदयाशुद्धयरोच- वारिप्रस्थेन चापरान् ॥१८९ ॥ काः । निद्रालस्याविपाकास्यवैरस्यं पीपल और सांठ आधा २ कप और कल्क द्रव्य गुरुगात्रता ॥ १९४ ॥ क्षुन्नाशोबहु- एक पल , लेकर विधिपूर्वक एक प्रस्थजलमें मृत्रत्वं स्तब्धता वलवावरः । आम- पकावे ।। १८९ ॥ यूषांश्च रसकांश्चैव कल्केनानेन साध- ज्वरस्य लिङ्गानि न दद्यात्तत्र भेष- येत् । बिल्वप्रमाणो घृततेलभृष्टो जम् ॥ १९५ ॥ भेषजं ह्यामदोषस्य यूपो रसो वाप्युपकल्पनीयः ॥ कपा- भूयो वर्धयति ज्वरम् । शोधनं शमः . नीयं वा करोति विषमज्वरम्॥१९६५ यपानपथ्यानेदशाहेऽतिलडिन्ते । आमज्वरके लक्षण-मुखसे लारका गिरना, उप- सर्पिर्दद्यात्कफे क्षीणे वातपित्तोत्तरे काईका आना, हृदयमें ग्लानि, अरुचि, निद्राका अधिक ज्वरे ॥ १९०॥ आना,आलस्य, दोपोंका अच्छे प्रकारसे नहीं पचना, फिर इस कल्क साथ यूप और रसादि सव सिद्ध | मुखमें विरसता, शरीरमें भारीपन, क्षुधाका नाश, फरे । यूप और रसादिको एक पल तेल अथवा बहुत पेशाबका आना, देहम जडता और ज्वरका घृतादिसे भूनना चाहिये, धारह दिन लंघन करनेके बलवान होना गे सब आमज्वरके लक्षण हैं । आम- पश्चान् धातपित्तज्वरमें कंफके क्षीण होनेपर फाथ, ज्वरमें औपध नहीं देना चाहिये, आमज्वरमें औषध पान और पथ्यांदिके साथ घृत देना चाहिये ।।१९०॥ देनेसे ज्वरकी वृद्धि करती है तथा शोधन और पकेपु दोपेप्यमृतं तद्विषोपममन्यथा । शमन औपध देनेसे विपमज्वरको उत्पन्न करता है . दशाहात्परतो दाने ज्वरोपद्रवद्धि ॥१९४॥।॥ १९५ ॥ १९६ ।। कृत् ।। १९१ ॥ घेत दस दिनके पश्चात् ज्वरकी २३ अवस्थामें आमज्वरमें औषध देनेसे हानि । देनेसे : अमृतके समान गुग करता है, अपक दापयेद्दोपहरणं मोहादामज्वरे तु. अवस्थाम विपके समान अवगुणोंको उत्पन्न करता यः। स सुप्तं कृष्णसर्प वा करानेण है तथा ज्वरके उपद्रवोंको चढाता है ।। १९१ ।। परामृशेत् ॥.१९७ ॥ बहुदोषस्य मन्दाग्नेः सप्तरात्रात्परे जो आमज्वरमें मोहके वश होकर दोषनाशक ज्वरे । लईनाम्युयवागूभिर्यदा दोषो औषध देता है, यह सोते हुए काले साँपको अपने , हाथसे छूकर जगाता है ।। १९७१। , न पच्यते ॥ १९२ ।।

(२२) वङ्गसेन भापाटीकासहिते- पच्यमान ज्वरके लक्षण । पारावर सात दिनमें, पिताम्बर दा दिन और ज्यरवेगोऽधिका तृष्णा प्रलापश्वसनभ्र- ऋमिक ग्यर याद दिनमें पता है ।। २०२-11 . पत्तिके वा ज्वरे देयमल्पकालसम- मा: मलप्रवृत्तिरुत्तोशः पच्यमानस्य त्थिते । अचिरज्वरितस्यापि भेपन लक्षणम् ॥ १९८॥ ज्वरका वेग अधिक हो, तृश, प्रलाप, धाम, दोपपाकतः ॥ २०३।। अम, मलमूनादिकी प्रगति और उयफाई हो तो आषधि देना चाहिये और जो वही पित्तम्बर बहुत अल्पकालके उत्पन्न हुए पित्तवरमें दर्शवे दिन पच्यमान ज्यरका लग जानना चाहिये ।। १९.८॥ निरामज्वरके लक्षण। फालका उत्पन्न हुआ हो तो दोपोंके पचनेपर औषधि देनी चाहिये ।।२०३॥ 'शुरक्षामता लत्वं च गात्राणां ज्वर- पाययेदातुरंसामं पाचनं सप्तमेहनि। मार्दवम् । दोपप्रवृत्तिरुत्साहो निरा- शमनेनाथवा दृष्ट्वा निरामं समुपा- मग्वरलक्षणम् ।। १९९॥ चरेत् ॥ २०४॥ अब निरागग्यरके लक्षण कहता हूँ-भुधाका लगना, शरीरमें लघुता, ज्वरफा मंद होना, वातादि दोपॉफी औषधि देव और निरामयरयाले रोगीको तत्काल आमवरयाले रोगीको वा सात दिन पाचन प्रवृत्ति होना और उत्साह होना, ये निरामयरके शमनीय औषधि देधे ॥२०४॥ लक्षण जानने ॥ १९९ ॥ ज्वरमें औषध देनेका समय । पीताम्बुर्लद्धितः क्षीणोजीर्णी भुक्त:: मृदा ज्वरे लघी देहे प्रचलेयु मलेगु पिपासितः। न पिवेदोपधं जन्तु: च। पकं दो विजानीयाज्ज्वरे देयं संशोधनमयेतरत् ॥ २०५॥ तदीपधम् ।।२००॥ जिसने तत्काल जल पिया हो; जो लपन करनेसे जय ज्वर मंद होजाय, शरीर हलका होजाय,मल क्षीण होगया हो, अजीर्ण रोगो, जिसने तत्काल चलायमान होजाय तय दोपोंको पक जानकर आपथ भोजन किया हो और प्याससे व्याकुल ऐसे मनुष्योंको देवे ।। २०० ।। कदापि संशोधन (वमन, विरेपन) औषधि नहीं देवे ।। २०५॥ दोपप्रकृतिकृत्यादेतेषां पकलक्षणम् । पक्कोऽप्यनिहतो दोपो देहे तिष्ठन्महा- वातज्वरके लक्षण। त्ययम् । विषम वा ज्वरं कुर्यादल वेपथुर्विपमो वेगः कण्ठोष्ठपरिशोष- व्यापदमेव वा ॥ २०१ ।। णम् । निद्रानाशः क्षवस्तम्भो गात्राणां, वात, पित्त और कफ इन तीनो दोपोंकी प्रकृतिको रौक्ष्यमेव च ॥ २०६॥ शिरो. विकृति हो जाय तय पकके लक्षण जानने । जो दोप। हृद्रात्ररुग्वक्त्रवरस्यं गाढविटकता। '.पंक होगया हो, परंतु शरीरमेंसे न निकाला गया हो तो वह शरीरमं रहता हुआ अत्यंत हानि करता है या शूलाध्माने जम्भण च भवत्यनिलजे, तो विषमज्वरको उत्पन्न करता है अथवा यलका ज्वरे॥२०७॥ नाश करता है ।। २०१॥ अब वातज्वरके लक्षण कहते हैं-कंप होना, ज्वर पचनेकीअवधि। ज्वरका विषम वेग, कंठ और होठोंका सूखना, वातिकः सप्तरात्रेण. दशरात्रेण निद्राका नाश, छींकका न आना, शरीरमें रूखापन, . पैत्तिक । मिको द्वादशाहेन ज्वरः शिर, हृदय और शरीर में पीड़ा, मुखमें विरसता, पाकं नियच्छति ।। २०२ ।। मलका गाढा होना, शूल और अफारेका होना. तथा जम्भाईका आना ये सब लक्षण बातम्बरमें "दोपप्रवत्तिरटाहो निरामज्वलशम्" इत्यपि पाठः। होते हैं ।। २०६॥ २०७ ॥ 7 ज्वराधिकारः। (२३) वातज्वरपर साधारण पाचन । कायद्रव्यपले वारि द्विरष्टगुणमिप्यते। नागरं देवकाष्ठं च धान्यकं बृहतीद्व चतुर्भागावशिष्टं तु पेयं पलचतुष्ट- यम् । दद्यात्पाचन पूर्व ज्वरिताना यम् ॥२१३॥ ज्वरापहम् ।।२०८॥ एक पलं फाथकी औपधि लेकर सोलह गुन जलमें सोंठ, देवदार, धनियाँ, कटेरी और बड़ी फटेरी पकाये, जब चौथा भाग वाकी रह जाय तब उस इनका पाचन (फाथ ) बनाकर ज्वरवाले रोगीको चार पल फाधको पान करे ।। २१३ ।। देवे तो ज्वर दूर होता है.। २०८ ।। दीप्तानलं महाकायं पाययेदनलि हिमवाहिन्थ्यशलाभ्यां प्रायो व्याप्ता जलम् । अन्ये त्वर्द्ध परित्यज्य प्रस्थति वसुन्धरा । सौम्यासौम्यं हिमं हेम तु चिकित्सकाः ॥२१४ ॥ माग्नेयं वेभ्यमीपधम् ।। २०९॥ जिन मनुष्योंकी जठराग्नि दीपन है, जिनका हिमालय और विंध्याचल पर्वतसे प्रायः सम्पूर्ण शरीर वडा और हष्ट पुष्ट है उनको एक कुडव परि- पृथ्वी व्याप्त है । हिमालय पर्वतपर उत्पन्न होने माण फाथ देना चाहिये, परन्तु अन्य आचार्य वाली औषधियाँ शीतल और सौम्य होती है एवं कहते हैं कि उनको आवा फुडय परिमाण काल देना विंध्याचल पर्वतपर उत्पन्न होनेवाली ओपधियाँ चाहिये ।।२१४॥ आग्नेय अर्थात् गरम और असौम्य होती हैं ॥२०९।। काथत्यागमनिच्छन्तस्त्वष्टभागावशे- द्रव्याण्यभिनवान्येव प्रशस्तानि पितम् । पारम्पर्योपदेशेन वृद्धवेद्याः क्रियाविधी। ऋते गुडघृतक्षीद्रधान्यक पलद्वयम् ॥२१५॥ प्णाविडङ्गतः॥ २१०॥ किन्तु अरुचि होनेके कारण प्राचीन वैद्य काथके चिकित्सा-कर्ममें सम्पूर्ण द्रव्य नवीन हो लेने भागको पचाकर अष्टावशेप अर्थात् आठवा भाग उत्तम होते हैं । परन्तु गुड, घी, शहद, पीपल वाकी रखते हैं और उस दोपल काथको पिलाते और पायडिबंग ये पुराने ही उत्तम होते हैं ॥२१०॥ हैं ॥२१५ ॥ यत्र येन प्रधानेन द्रव्यं समनुगृह्यते । औषधप्राशनमंत्र। तत्संज्ञकः स वै योगो भवतीति ब्रह्मदक्षाविरुद्रन्द्रभूचन्द्रार्कानिला- विनिश्चयः॥२११॥ दयः । ऋषयः सोपधिग्रामा भूतस- जिस योगमें जो द्रव्य प्रधानरूपसे ग्रहण किया छाश्च पान्तु वः॥२१६॥ जाता है वह योग उसी द्रव्यके नामसे कहा जाता ब्रह्मा, दक्ष, आश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र, पृथ्वी, है ऐसा निश्चय है ॥२११॥ चन्द्रमा, सूर्य, वायु आदिदेवता, ऋपि, सम्पूर्ण औपधियाँ और भूतोंके समूह ये सब तुम्हारी रक्षा. मात्रोतमा पलेन स्यात् त्रिभिश्चाक्षश्च करें।। २१६॥ मध्यमा । जवन्या स्यात्पलार्धेन स्नेह रसायनमिवर्षीणां देवानाममृतं य- कायोषधेपु च ॥ २१२॥ था। सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यभिद- स्नेहकायादि औषधियोंकी एक पलकी मात्रा मस्तु ते॥२१७॥ उत्तम, तीन कर्पकी मात्रा मध्यम और दो कर्पकी 'मात्रा जपन्य होती है ।। २१२ ॥ जिस प्रकार ऋपियोंको रसायन, देवताओंको अमृत और नागोंके लिये सुधा है उसीप्रकार यह गुड़, घी, शहद कर्षणमें पुराने लेने और हणमें नवीन औपधि तुम्हारे लिये गुणकारी हो ।। २१७ ।।. २ "अनला" इत्यपि पाठः। । लेने चाहिये ऐसा शिष्ट सम्मत है ।।

वनसेने भापाटीकासहिते-
नहीं घटात
अथोषप्राशनविधि। शीघ्रं विपाकमुपयाति बलं न
तनोपविश्य विश्रान्तः प्रसन्नवदने हिंस्यादन्नावृतं नचमुहुर्वदनान्निरेति।
क्षणः । औपधान्हेमरजतमृद्राजन प्राग्भुक्तसवितमौषधमेतदेव दयाचं
परिस्थितान् ॥२१८ ॥ पिवत्प्रसन्न वृद्धशिशुभीरुवराङ्गनाभ्यः॥ २२३ ।
हृदयः पीत्वा पात्रमधोमुखम् । नि:क्षि-
प्याचम्य सलिलं ताम्बूलाधुपयो-
परन्तु वृद्ध, वालक, भीर (डरपोक) और
इनको भोजनसे पहिले सेवन कराई हुई
औष
जयेत् ॥ २१९ ॥
शान पच जाती है और बलको
प्रसन्न हैं मुख और नेत्र जिसके ऐसे रोगीको तथा अन्नसे आवृत (आच्छादित) होनेके. कार
आरामसे बैठावे । पश्चात् औषधिको सोना चाँदी या वारंवार मुखसे भी नहीं निकलती है इस कारण उन
मिट्टीके वर्तनमें करके देखें । रोगी उसको पीकर | मनुष्योंको भोजनसे पहले हो औषधि सेवन करा
पतनको उलटा करके गेर देवे, फिर जल लेकर पुल्ला चाहिये ।। २२३ ॥
करके मुखशुद्धिक लिये पान आदिकोचावे ।।२१८॥
वातज्वरचिकित्सा।
।।२१९॥
वीर्याधिकं भवति भेषजमन्नहीने बिल्खादेः पञ्चमूलस्य कायः स्याद्वा-
हन्यात्तथामयमसंशयमाशु चैव । तिकज्वरे । पाचन पिपलीमूलगुडू-
तवालवृद्धयुवतीमृदुभिश्च पीतं ग्लानि चीविधजोऽथवा ॥ २२४ ॥
परां समुपयाति बलक्षयं च ।। २२० ॥
बैल, श्योनाक, फुम्मेर, पाढर और अरणी इनक
अन्नरहित औषधि आधिक वीर्यवाली होती है । फाथ बनाकर अथवा पोपरामूल, गिलोय और सो
और वह निःसंदेह शीघ्र ही रोगको दूर करता है । इनका पाचन वनाकर वातवरमें दे ।। २२४ ॥
जो उसी अनरहित औषधिको पालक, वृद्ध, स्त्री
और कोमल प्रकृतिवाले मनुष्य सेवन करें तो उनके न शोधयति, यदोषान्समात्रोदीरय-
ग्लानि उत्पन्न होकर दलका नाश होता है ।।२२०।। त्यपि । समीकरोति विपमांस्तत्संश-
अनुलोमोनिला स्वास्थ्य क्षुतृष्णा मनमुच्यते ॥ २२५॥
सुमनस्कता । लयुत्वमिन्द्रियोद्गार-
जो निगडे दोपोंको शुद्ध नहीं करे तथा समान
शुद्धि पधाकृतिः ॥ २२१ ॥ दोपोंको बढावे नहीं और विषम दोपोंको समान
· वायुका अनुलोमगतिसे संचार होना, शरीरमें करे उसको संशमन औपधि कहते हैं ।। २२५ ॥
स्वस्थता, क्षुधा और तृषाका लगना, मनकी प्रसन्नता,
किराताव्दामृतोदीच्यवृहतीद्वयगो-
शढ़ियोंमें हलकापेन और शुद्ध डकारका आना, ये
आपधि जीर्ण होजानेके लक्षण हैं ।। २२१ ।।
क्षुरः सिस्थिराफलशीविश्वे: हाथों
ओपधशेपे भुक्तं पीतश्च ताप, स
वातज्वरापहः ।।१२६ ॥
शेपाने । न करोति गदोपशमं प्रको-
चिरायता, नागरमोधा, गिलोय, सुगन्धवाला,
पयत्यन्यरोगांश्च ।। २२२॥
कटेरी, घड़ी कटेरी, गोखरू, दिनपर्णी, शालिपर्णी
: जो मनुष्य प्रथम औपाधिको पीकर पश्चात् उसके और सोंठ इनका फाथ बनाकर पौनेसे वातवर दूर
ऊपर भोजन करता है अथवा जो प्रथम भोजन कर
होता है ॥ २२६॥
पश्चात् उसके ऊपर औषधि पीता है यह औषधि । पञ्चमुलीवलारानाकुलत्यः सह
उसके रोगको शमन नहीं भारती, किन्तु अन्यान्य
पोकरे: । 'पर्वभदं
शिर कम्म
रोगीको उत्पन्न करती है ॥२२२॥
निहन्ति पवनम्वरम् ॥ २२७ ॥

ज्वराधिकारः।
पंचमूलकी सब औषधियें, विरेटी, रायसन,
पित्तज्वरचिकित्सा।
फुलवी और पोहकरमूल इनका फार्थ बनाकर पान
करनेसे सन्धियोंकी पीडा, शिरका कॉपना और
वात्तज्वर नष्ट होता है ॥२२७॥
पित्तज्वरके लक्षण ।
तीक्ष्णोष्णदाहतृणमूर्छामदास्यकटुता-
पिप्पली शारिवा द्राक्षायला चांशु-
भ्रमाः । प्रलापो घ्राणकण्ठोष्टमुख-
मती तथा । एषोऽपि परमः सिंड्रो
पाकोऽक्षिसाश्रुता ॥२३३ ॥ शीता-
सातज्वरविनाशनः ॥ २२८॥
भिलाषिता पीतमलनेत्रनखत्यचः ।
पीपल, उसया, दाख, खिरैटी और शालिपर्णी पित्तोगारातिसारौ च पैतिकज्वर-
इनका काढा वातज्यरको अवश्य नष्ट करता है।।२२८।। लक्षणम् ॥ २३४॥
द्राक्षा गुडची काश्म> बायमाणा ज्वरका अत्यंत तीक्ष्ण और उघ्ण वेग, दाह, तृपा
सशारिवा। निक्वाथ्य सगुड क्वार्थ
मूी, मद, मुखमें कटुता,भ्रम,प्रलाप (बेतुकी बात
तथा नासिका, कंठ, होठ और मुखका पाक, नेत्रों
पिबेद्वातकृते ज्वरे ।। २२९ ।।
आँसुओंका भर आना, शीतकी अभिलापा,मल, नेत्र
दाख, गिलोय, कुम्भेर,धमार, वनपसा और उसवा नख और त्वचा इनका पीला होना, पिचकी डका
इनको काढे में गुड मिलाकर वातज्वरमें पाये॥२२९॥ आना और पीला अतिसारका होना ये लक्षा
दर्भ बला गोक्षरक पिबेत्पादावशेषि-
पित्तज्वरके जानने चाहिए ।।२३३॥२३४ ।।
तम् । शर्कराघृतसंयुक्तं पिबेद्वातज्व-
चिकित्सा।
रापहम् ॥ २३० ॥
दाहवम्यर्दितं क्षामं निरन्नं तृष्णया-
डाभ, खिरैटी और गोखर इनका चतुर्थीश शेष न्वितम् । शर्करामधुसंयुक्तं पाययेल्ला-
अर्थात् सेरभरका पावभर जल बाफी रखकर उसमें जतर्पणम् ॥२३५॥
मिशी और घी मिलाकर वातज्वर में पानफरे।।२३०॥
दाह और वमनसे पीडित, कृश, क्षुधा और तृपार
शर्करादाडिमाभ्याश्च द्राक्षादाडिम पीडित ऐसे पित्तज्वरवालको खीलोफे सत्तमें मिश्र
योत्तथा । वैरस्ये धारयेत् कल्कं
और सहल मिलाकर सेवन करावे ॥२३५ ।।
गण्डूपश्च तथा हितम् ॥ २३१ ।।
कलिङ्गकट्फलं मुस्तं पाठा कटुकरो-
मिश्री और अनार अथवा दाख और अनार इनका
हिणी । पकं सशर्कर पीतं पाचनं
फाल्क बनाकर मुखमें गण्डूप (कुल्ला) धारण करनेसे
पत्तिके ज्वरे ॥२३६॥
मुखको पिरसता दूर होती है ।। २३१॥
इन्द्रजौ, कायफल, नागरमाथा, पाद और कुटर्क
आम पचेदनिलजे हितो नित्यं रसौ- इनके वाघमें मिश्री मिलाकर पान करे तो पित्तज्य
दनः। मुगामलकापस्तु गाढविट्के
दूर हो ।। २३६ ॥
शर्करामधुरो हन्ति कषायः पत्तिक
गतज्वर में नित्य रसोदनका सेवन करता आमको
ज्वरम् । चन्दनोशीरश्रीपणीपरूप-
पाता है। वातज्वरमें यदि मल्लविवन्ध होवेतो मूंग
कमधूकजः ॥२३७ ॥
लालचन्दन, खस, कुन्भर, फालसा और महुएकी
इति वातवरचिकित्मा।
हाल इनके काढ़ेमें मिश्री मिलाकर पीने से पित्तज्वर
दूर होता है ।। २३७ ।।
विधीयते ।। २३२॥
और आमलोंका यूप देवे ॥ २३२ ॥

(२६)
वनसेने भापाटीकासहिते-
,
गुडूचीपतरोभाणा शारिवोत्पलयो गिय और आमलेका अधया केवल पिचर..
स्तथा । शर्करामधुरो कायः पीत: हेका ही काय पानसे दाद मुखोप और भ्रमयुक्त
पित्तञ्चरापहः ॥ २३८ ॥
पित्तग्मार दूर होता है ।। २४३ ॥
गिटोय, पद्माव, लोध, अनंतमूल और कमल
रोधोत्पलामृतापभशारिवाणा : सश-
या कमलगट्टेको गिरी इनके फायम मिश्री डालकर
करः। कायः पित्तवरं हन्यादयवा.
पान करनेसे पित्तवर नष्ट होता है ।।२२८॥
पर्पटोद्भवः ।।२४४॥
दुरालभापर्पटकभियंगुभूनिम्बवासा लोग, कमल, गिलोय, पद्मास और अनंतमूल
करोहिणीनाम्।जलं पिवेच्छरया इनके पायमें मिश्री मिलाकर पीनेसे पित्तन्यर दूर
वगाढं तृष्णास्तपित्तज्यरदाहयुक्त:२३९
होता है। अथवा फेवल पित्तपापका ही काथ पीनेसे.
“धमाना, पित्तपापदा, मेंहदीके फूल, चिरायता,
पित्तज्वर दूर होना है ॥ २४४ ।।
अहसा और फुटको इनके फाथमें सोंड मिलाकर पर्पटामृतधातणां काथः पित्तज्वर
पौवे तो तृपा, रक्तपित्त और दाहसहित ज्वर दूर जयेवादाक्षारग्वधयोश्चापि काश्मा
होता है ।। २३९ ॥
अथवा पुनः॥२४५।।
द्राक्षामयापर्पटकादतिक्ता का स पित्तपापदा, गिलोय और आमले इनका काथ
शम्याकफलं विदध्यात् । प्रलापमू पित्तज्वरको दूर करता है । अधवा दास, अमलनास
निमदाहमोहतृष्णान्विते पित्तभवे
और कुम्भेरका छाथ भी पित्तज्वरको दूर करता
है।॥ २४५ ॥
न्वरे तु ।। २४० ॥
दास, हरड़, पित्तपापडा, नागरमोथा, कुटकी
एक: पर्षटकः श्रेष्ठ: पित्तज्वरबिना-
और अमलतासका गूदा इनका फाय यनाकर पीनेसे शनः। किं पुनर्यदि युज्येत चन्दनो;
प्रलाप, मूर्छा, भ्रम, दाह, मोह, और तृपायुक्त पित्त शीरनागरैः ॥ २४६ ॥
ज्वर दूर होता है ।। २४०॥
इकला पित्तपापड़ाही पित्तवरका नाश करनेके
पटोलयवधान्याकमधुकं मधुसंयुतम् । लिये उत्तम है। यदि उसमें लालचन्दन, खस और.
हन्ति पित्तज्वरं दाहं तृष्णाश्चैव प्रमा-
सोठ मिलाकर दिया जाये तो क्या कहना है २४६॥
थिनीम् ॥ २४२ ॥
विश्वपर्षटकोशीरधनचन्दनसाधितम्।
.. पटोलपत्र, इन्द्रजौ, धनियाँ और मुलैठी इनके दद्यात्सुशीतलं वार तृट्छर्दि-
भाथमें शहद मिलाकर पान करनेसे पित्तज्वर, दाह ज्वरदाहनुत् ॥ २४७ ॥
और तृपा दूर होती है ॥ २५१ ॥
सोंठ, पित्तपापड़ा, खस, नागरमोथा और लाल-
पटोलयवनिकाथो मधुना मधुरी-
चन्दन इनका काथ बनाकर खूय शीतल करके पान ..
‘कृतः । तीनपित्तज्वरोन्मी पानतृड् फरे तो तृपा, यमन, ज्वर और दाह दूर होता-
दाहनाशनः ॥ २४२॥
है।। २४७ ॥
पटोपलने और इन्द्रजी इनके काथमें शहद डाल गुडूची मुस्तधान्याकं मभूकं कटरो-
कर पीये तो तीत्र पित्तज्वर, तृपा और दाह दूर होती हिणी । तृष्णाशलारुचिच्छीदेपित्त-
है ।। २४२॥
ज्वरहरो गणः ॥ २४८ ॥
गुडूच्यामलकैर्युक्तः केवलो बापि
पर्पटः। पित्तज्वरं हरेनूर्ण दाहशी-
गिलोय, नागरमाथा, धनियां, मुलैठी और कुटकी
इन औषधियोंका समूह तृषा, शुल, अशाचे, वमन
पभ्रमान्वितम् ।। २४३॥
और पित्तज्वरको नष्ट करता है.॥ २४८॥

ज्वराधिकारः। (२७). - किरातामृतधान्याकचन्दनाशीर सुगन्धवाला,धनियाँ, नागरमोथा, चन्दन, मुलैठी, पर्पटः । सपनः कृतः काथो हन्ति अडूसा और खस इनके काधमें मिश्री और शहद मिलाकर पान करनेसे घोर रक्तपित्त, तृपा, दाह - पित्तभवं ज्वरम् । दाहहल्लासमरुचि- और ज्वर दूर होता है ॥ २५३ ॥ मुक्तशवमथुक्लमान् ॥ २४९ ॥ चिरायता, गिलोय, धनियां, लालचम्दन, खस, भूनिम्बातिविपालोधमुस्तकेन्द्रयवा- पित्तपापड़ा और पद्माख इनका काथ-पित्तज्वर, दाह, मृताः'वासकं नागरं बिल्वं कषायो उबकाई, अरुचि, उत्क्लेश, वमन और लम( ग्लानि) माक्षिकान्धितः । श्वासं कासच को दूर करता है ।। २४९ ॥ विभेदं रक्तपित्तज्वरं जयेत् ॥२५४॥ ससितो निशि पर्युपितः प्रातर्धान्या चिरायता, अतीस, लोध, नागरमोथा, इंद्रजी, कतण्डलकाथः । पीतः शमयत्यचि- गिलोय, अडूसा, सोंठ और वेलगिरी इनके काथमें रादन्तर्दाहं ज्वरं घोरम् ॥ २५० ।। शहद मिलाकर पान करनेसे श्वास, खाँसी, मलभेद और रक्तपित्तज्वर नष्ट होता है ।। ५५४ ॥ रात्रिमें धनियेके चावलोंको भिजो देवे । पश्चात् मुबहको काथ बनाकर मिश्री मिलाकर पीनेसे बहुत तिक्तावालकभूनिम्बश्यामापर्पटवा- दिनोंकी भीतरी दाह और घोर ज्वर दूर होता सकैः । शृतं जलं सितायुक्तं रक्त- है ।। २५०॥ पित्तज्वरं जयेत् ॥२५५॥ चन्दनं मधुकं द्राक्षां कटुकां सदुरा कुटकी, सुगन्धवाला, चिरायता, अनंतमूल, लभाम् । चन्दनादिगणः प्रोक्तो पित्तपापडा और अडूसा इनके काथमें मिश्री मिला- हन्याद्दाहज्वरारुचिम् ॥ २५१ ॥ कर पान करनेसे रक्तपित्तज्वर दूर होता है ॥२५५ । पथ्यां तेलघृतक्षाद्रेलिहदाहज्वराप- लाल चन्दन, मुलेठी, दाख, कुदकी और जवासा इन सब औषधियोंको चन्दनादिगण कहते हैं, यह हाम् । कासासृपित्तवीसर्पश्वासान हन्ति वमीनपि ॥२५६.॥ 'चन्दनादिगण दाह, ज्वर और अरुचिको नष्ट करता है ।। २५-१ ॥ हरडको पिसकर तेल, घी और शहदके साथ मुद्गानामालीचूर्ण यष्टीमधुकसाधि- मिला कर चाटनेसे दाह, ज्वर, खाँसी, रक्तपित्त, विसर्प, श्वास और वमन दूर होती है ।। २५६ ।। तम् । पाक्यं शीतकापायं वा पिधे- पित्तज्वरापहम् ॥२५२ ॥ हम्र्ये शुभ्राभ्रसंकाशे शशांककरशी- भूगका चूर्ण १ कुड़व और मुलैठीका चूर्ण १ तले । मलयोदकसिक्ते वा सुप्यारिप- कुड़व; दोनों को मिलाकर काथ चनाचे फिर शीतल त्तज्वरी नरः ।।२५७ ॥ हो जाने पर उसको छानकर पीनेसे अथवा उपर्युक्त मनोहर और अत्यन्त निर्मल आकाशके समान चूर्णको रात्रि में शीतल जलमें भिजाकर सरेको स्वच्छ चन्द्रमाकी किरणोंसे शीतल और जिसमें छानकर पानसे पित्तज्वर नष्ट होता है ।। २५२॥ चन्दनादिका जल छिड़का गया हो ऐसे घरमें हीबेरं धान्यकं मुस्तं चन्दनं मधुय- पित्तज्वरवाला रोगी शयन क्रे ।। २५७ ॥ टिका । वृपोशीरयुतः काथः शर्करा जिहातालुगलक्लोमशोपे मूर्ति च मधुसंयुतः। रक्तपित्तं जयत्युग्रं तृष्णा- दापयेत् । केसरं मातुलुङ्गस्य मधुसै- न्धवसंयुतम् ॥ २५८ ॥ . दाहज्वरापहः ।। २५३.॥

(२८) दनसेने भापाटीकासहिते- जो जिहा, ताल, गला, मुख, कंठ, छोम . मातुलुङ्गशिफाविश्वकायस्थासन्धिको- (पिपासास्थान) और मस्तक इन स्थानों में शोप हो, द्भवम् । कफन्वरे समारं पाच तो विजौरे नींधूकी फसरको शहद और संधे नमकके वा कणादिकम् ॥ २२३॥ साथ मिलाकर सेवन करावे ॥ २५८ ॥ विजौरे नीबूकी जड़, साँठ, हरड और पीपलामूल हरीतकी प्रियङ्गुश्चपिप्पली लोयमेव इनके काम जवासार डालकर पीनेसे अथवा पिण- बादा: हरिद्रातेजीही संक्षौद्रमुखः ल्यादि पाचन पीनसे कफज्वर नष्ट होता है ।। २६३ ।। धावने ॥ २५९ ॥ एतेन कटुभावाच विफला निवृता मुस्तं कटुकं सकलि- मुखरोगध शाम्यति । वक्त्रं विशदता ङ्गकम् । पटोलारग्वधं चैव रोहिणी मेति भक्तच्छन्दश्च जायते ॥ मुद्गयूपी चित्रकं समम् । काथः क्षौद्रयुतः दनो देयः सितया पत्तिके ज्वरे ॥२६॥ श्लेप्मज्वरकासगलामये ॥ २६४ ॥ हरड, फूलप्रियंगु, पीपल, लोध, दारुहलदी, हलदी त्रिफला, निसोत, नागरमोथा, त्रिकुटा, इन्द्रजी, : और तेजबल इनको जलमें भिजोकर छान लेवे फिर पटोलपत्र, अमलतास, फुटकी और चीता · इनके शहदमें मिलाकर वारंवार कुल्ले करे, इस प्रकार मुख काथमें शहद डालकर कफवर, खाँसी और गलरोग धोनेसे मुखकी कटुता और समस्त मुखरोग नष्ट में पोवे ।। २६४ ।। होते हैं तया मुखमें निर्मलता और अन्नमें गाचे निम्यविधामृतारुिशठी भूनिम्ब- उत्पन्न होती है । पित्तज्वरमें मूंगका यूप और भात पोप्करम् । पिप्पली बृहती चेति खाँडके साथ मिलाकर सेवन करे ।। २५९ ।। २६० ॥ काधो हन्ति कफज्वरम् ।। २६५ ।। इति पित्तज्वरचिकित्सा। नीमकी छाल, सोंठ, गिलोय, शतावर, कचूर, चिरायता, पोहकरमूल, पीपल और बड़ी कटेरी इनका, कफज्वरचिकित्सा हाथ कफज्वरको नष्ट करता है ।। २६५ ।। कुष्ठमिन्द्रयवं मुर्वा पटोलं .वापि कफज्वरलक्षण। साधितम् । पिवेन्मरिचसंयुक्त कासश्वासप्रतिश्यायप्रसकारुचिछ सक्षौद्रं कफजे ज्वरे ॥२६६ ॥ द्रयःनिद्रा गुरुत्वं हल्लास स्तमित्यं कूठ, इन्द्रजौ, मूर्वा(चरनहार) और पटोलपत्र . मधुरास्यता ॥ २६१ ॥ शीतरोमा- इनके काश्रमें काली मिर्चीका चूर्ण और शहद श्चता शक्लियं मलाक्षिकरजवाचिः । मिलाकर पीनेसे काबर नष्ट होता है ।। २६६ ।। "उष्णाभिलाषिता चोत श्लेमिकबर त्रिफलापटोलवासाछिनरुहातिक्तरो- लक्षणम् ॥ २६२॥ हिणीपग्रन्था । मधुना श्लेप्मसम- खाँखो, श्वास, प्रतिश्याय (जुकाम) और परि- त्थे दशमूलीवासकस्य वा काथः॥ पैक (नासिकामुखादिकसे पानीका गिरना), मात्राक्षौद्रतादीनां काथे रेनहे. सुबू- असाचे, वमन, निद्रा और शरीरका भारी होना, णवत् ॥२६७ ॥ उबकाई आना, भीने कपडेसे ढके हुएके मान त्रिफला, पटोल, अडूसा, गिलोय, कुटकी और देहका होना, मुखमें मधुरता, शीतका लगना, रोमांच वच इनके काथमें शदह डालकर अथवा दशमूल. का होना, मल, नेत्र, नख और त्वचाका सफेद होना और अहसके माथमें शहद मिलाकर पोत्रो काथ और उप्णता (गर्मा) की अभिलापाका होना ये और नहोंमें शहद और घृतादिकी मात्रा चूर्ण फफम्वरके लक्षण जानने ।। २६१।२६२।। समान जाननी ।। २६७ ।।

ज्वराधिकारः। (२९) soamasan , सतच्छदं गुडूचीच निम्ब स्फूर्जकमेव फायफल, पोहकरमूल, पपिट और काकड़ा- च । काथयित्वा पिवत्तीय सावंगी इनका पूर्ण करके शहसमें मिलाकर चाटे तो कफजे बरे ॥२६८॥ दवास, खाँसी, ज्यर और फफ दूर होता है ॥२५॥ सतयन, गिलोय, नीगकी छाल और रों, इनफा लिहेज्ज्वरातत्रिफला पिप्पली सम- साथ यनाकर और उस पाथमें शहद मिलाकर पानसे माक्षिकाम् । कासे खासे च मधुना फनर नष्ट होता है ।। २६८ ॥ सर्पिपा च तुम्बी भवेत ।। २७४ ॥ आमलक्यभया कृष्णा चित्रकश्चेत्ययं फफम्बरवाला रोगी शिफला और पापलक गणः । सर्वज्वरकफातङ्के भेदी दीप-चूर्णको शहदमें गिलाकर चाटे सथा ग्लॉसी और नपाचनः ।। २६९ ॥ स्वासमें येही अवलेह शहद और पीमें मिला चाटे ।। २७४॥ आमले, हरड, पपिल और चीता, यह आमलक्या- देगण सर्वप्रकारके फफम्बर में देना चाहियो यह भेदन, कट्फलं पाकरं शृङ्गीं-मुस्तकं कटुकं पिन और पाचन है ।। २६९ ।। शठीम् । समस्तान्येकेशो वापिः तिक्तानिम्बविपाव्योपशकाहाभिः सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ॥२७५॥ आई- कस्वरसक्षाद्रलिझात्कफविनाशनम् । शतं जलम् । पित्कफज्वरं घोर शलानिलारुचिच्छर्दिकासश्वासक्ष- हन्ति काससमान्वितम् ॥ २७० ॥ यापहम् ॥ २७६ ॥ पुटकी नीम, अतीस, त्रियुटाऔर इन्द्रजी इनका कायफल,पाइकरमूल, काकहासिंगी, नागरमोथा, काय पान करनेसे स्त्रांसी सहित पोर . कफज्यर नष्ट त्रिफुटा और कचूर इन सबको समान भाग लेकर होता है ।। २७० ॥ पारीक चूर्ण करके उस चूर्णको अथवा एक २ के सिन्धुवारदलका कणाढयं कफजे चूर्णको अदरखके रसमें और शहद में मिलाकर चाटे ज्वरे। जहन्याश्च चले क्षीणे कणे च तो कफ, शूल, वात, अरुचि, वमन, साँसी और पिहिते पिवेत् ॥ २७१ ॥ क्षयरोग दूर होता है ।। २७५ ॥ २७६ ।। सम्हालूके पत्तोंके काडेको पीपलका चूर्ण मिलाकर क्षौद्रोपकुल्यासंयोगः श्वासकासज्व- कफचर ,जंघाओंके बल की क्षीणता और बधिरतामें रापहः । प्लीहानं हन्ति हिक्काच पीवे ।। २७१॥ बालानाञ्च प्रशस्यते।। २७७॥ मुस्तं मधुकबीजानि त्रिफला कटुरी- पीपलके चूर्णको शहद में मिलाकर चाटे तो श्वास, हिणी। परूपकाणि निष्काथः कफ- खाँसी, ज्वर, प्लीहा और हिचकी दूर होती है । यह ज्वरविनाशनः ॥ २७२ ।। बालकोंको अत्यन्त हितकारी है ।। २७७ ।। नागरमोथा, महुएके वीज, त्रिफला, कुटकी और | कर्पश्चूर्णस्य कल्कस्य गुटिकानाच फालसकी छाल, इनका काथ कफज्वरको नष्ट सर्वशः। द्रवः शुबत्यावलेढव्यः पात- व्यश्व चतुर्द्रवैः॥२७८॥ चतुर्भद्रावलेहिका। चूर्ण, कल्क, गुटिका और वाटिकादिको एक एक कट्फलं पीकर कृष्णा. शृङ्गी च तोलाप्रमाण प्रयोग करना चाहिये । लेहन करके सेवन करना हो तो दर पदार्थ (घृत, शहद आदि ) मधुना, सह । श्वासकासज्वरहरः दो तोले प्रमाण और पान करके सेवन करना हो तो श्रेष्ठो लेहः कफान्तकृत् ।। २७३ ॥ द्रवपदार्थ चौगुने लेने चाहिये ॥२७८ ।। . - करता है ।। २७२ ।।

(३०) वङ्गसेने भाषाटीकासहिते- : मात्राया नास्त्यवस्थानं दोषमग्निवलं | योंमें पीडा और जम्माइयाँका आना ये सब लक्षण वयः । व्याधि द्रव्यश्च कोष्ठश्च वीक्ष्य वातपित्तज्वरके जानने ।। २८४॥ मावां प्रयोजयत् ।। २७९ ।। चिकित्सा। औषधिकी मात्राका कोई निश्चित नियम नहीं है किन्तु दोप, अग्नि, बल, अवस्था, व्याधि, औषधि संसृष्टदोषेषु हितं संसृष्टमयपाचनम् और कोठा इन सयको अच्छे प्रकारसे देखकर औप निदिग्धिकाबलारास्नात्रायमाणाम धिकी मात्रा देवे ।। २७९ ।। तायुतः । मसूरविदलः क्वाथो वात- अजाजीशर्करायुक्तो दाडिमीस्वरसेन पित्तज्वरं जयेत् ॥ २८५ ॥ तु । रुचिप्यो मधुना युक्तः कर्तव्यः द्वन्द्वज दोपोंमें मिश्रित अर्थात् उन २ दोपोंमें कही कवलग्रहः॥२८० ॥ मुद्गयूपौदनश्चापि हुई औषधियोंको मिलाकर पाचनदेवे ।कटेरी,घिरटी, देयः कफसमुत्थि ॥२८१ ॥ रायसन, नायमान, गिलोय और मसूरकी दाल' जीरा, खाँड और अनारका स्वरस इनमें शहद इनका धाध वातपित्तज्वरको दूर करता है ।। २८५।। मिलाकर मुखमें कवल धारण करे। यह रुचिकारक त्रिफलाशाल्मलीरास्नाराजवृक्षार- है । कफज्वरमें मूमंका यूप और भात पकैः । शृतमम्बुहरत्याशु वातपित्त- देवे ॥२८०॥॥२८१॥ भवं ज्वरम् ॥ २८६॥ इति कफज्वरचिकित्सा। त्रिफला, सेमल, रायसन, . अमलतास. और वातपित्तज्वरचिकित्सा। अडूसा इनका काथ वातपित्तज्वरको नष्ट करता है ॥२८६॥ किराततिक्तममतां द्राक्षामामलकी वातपित्तज्वर देयमापधं पञ्चमेऽहनि । शटीम् । निष्काथ्य,पित्तानिलजे तं पित्तश्लेष्मज्वरे देयमोपधं “सप्तमे क्वार्थ सगुडं पिवेत् ॥ २८७ ॥ ऽहनि ॥ २८॥ अत अव च सप्ताहा चिरायता, गिलोय, दाख, आमले और कचूर. 'द्वातश्लेष्मज्वरे पिवेत् ॥ २८३ ॥ इनके काथमें गुड मिलाकर पीनेसे वातपित्तज्वर नष्ट वातपित्तज्वरमें पाँचवें दिन औपधि देनी चाहिये, होता है ।। २८७ ।। पित्तकफज्वरमें. सातवें दिन औपधि देनी चाहिये । और वातकफज्वरमें नवमें दिन औषधि मधुकादिकाथ। देवे।। २८२ ॥ ॥ २८३ ॥ वातपित्तज्वरके लक्षण। मधुकं शारिवा द्राक्षा मधूकं चन्द तृष्णा मुर्छा भ्रमो दाहः स्वप्ननाशः नोत्पलम् । काश्मरीफलकं लोध शिरोरुजा । कण्ठास्यशोपो वमयू त्रिफला पकेशवरम् ॥२८८ ॥ पर: रोमहर्षोऽरुचिस्तथा । पर्वभेदश्च जृम्भा पकं, मृणालश्च न्यसेदुत्तमवारिणि । च वातपित्तज्वराकृतिः॥२८४॥ मधुलाजसितायुक्त तत्पीतमुपितं- अब बातपित्तम्वरकै लक्षण कहते हैं-नृपा, मूर्छा, निशि ॥ २८९ ॥ वातपित्तज्वर दाह 'श्रम, दाह, निद्राका न आना, शिरमें पाडा,कंठ और तृष्णामू रुचिनमान् । शमयेद्रत मुखमें शोप, वमन,गेमांचौका होना, अमांच, सन्धि पित्तश्च जीमृतमिव भारुतः ॥ २९० । 7 , ज्वाधिकारः । M मुलेठी, सरिवन,दाख,महुआ, लाल चन्दन,कमल, आरग्वधफलं मुस्तं यष्टीमधुकमेव च कुम्भेरका फल, लोध, त्रिफला, कमलेकेशर, फालसे उशीरमभया चव हरिद्रा दारुप्ताह- और कमलकी नाल इन सबको समानभाग लेकर या ॥ २९६ ॥ पटोलं पिचुमादश्च स्वच्छ जल में रातको मिजो देवे फिर प्रातःकाल छान तथा कटुकरोहिणी । एभिः सिद्धः कर शहद सीलें और मिश्री मिलाकर पीनेसे यह बात- कषायः स्याद्वातपित्तभव ज्वरे॥२९॥ पित्तज्वर, दाह, तृपा, मूर्छा; अमचि, भ्रम और रक्तपित्तको नष्ट करता है, जिस प्रकार पवन बादलोंके अमलतासका गूदा, नागरमोथा, मुलैठी, खस, समुहको नष्ट कर देता है॥ २८८ ॥२८९ ॥२९॥ हरड़, हल्दी, दारुहल्दी, पटोलपात, नीमको छाल विश्वामृताब्दभूनिम्बः पञ्चमूलीस और कुटकी इनका काध वातपित्तज्वरमें हितकारी मन्वितेः । कृतः कपायो हन्त्याशु है ।। २९६ ।। २९७॥ वातपित्तोत्तरं ज्वरम् ।। २९१.॥ कफपित्तहरा . मुद्गाः कारवेल्लादय- सौंठ, गिलोय, नागरमोथा,चिरायता और पंच स्तथा। प्रायेण न तु ते देया वात- मूलकी समस्त औपधिय, इन सबका फाथ बनाकर पित्तोद्भवे ज्वरे। शुलोदावर्तविष्टम्भ- पीनेसे शीघ ही वातपित्तज्वर दूर होता है ॥२९१ ॥ जनका ज्वरवर्धनाः॥२९८॥ बलाभाद्र्धमृतरण्डचन्दनोशीरपर्पटे। मूंग, करेला आदि पदार्थ प्रायः कफपित्तनाशक उपकुल्याब्दहीबेरैः कपायश्च पिव है अतएव इनको वातपित्तज्वरमें नहीं देना चाहिये, . त्ततः । पर्वभेदशिरकम्पं वातपित्त- क्योंकि इनको देनेसे शूल, उदावत और विष्टम्भ ज्वरं जयेत् ॥ २९२॥ इनको उत्पन्न करते हैं तथा घरको बढाते हैं ।।२९८।। खिरैटी,भारंगी, गिलोय,अंडकी जड़, लाल चन्दन, दाडिमामलमुद्गानां यूपस्त्वनिलपै- खस, पित्तपापड़ा, पीपल,नागरमोथा और सुगंधयाला त्तिके । मुद्गामलकयूषस्तु वातपित्ता- इनका काढा सन्थियोंकी पोड़ा, शिरका कांपना और त्मके हितः॥२९९ ॥ वातपित्तज्वरको नष्ट करता है ।। २९२ ।। गुडूची पर्पटं मुस्तं किरातं विश्वभे- देना चाहिये, मूंग और आमलोंका चूप भी वातपित्त- अनार, आमले और मूंगका चूप बातपित्तज्वरमें पजम् । वातपित्तज्वरे देयं पञ्चभद्र ज्वरमें हितकारी है ॥ २९९ ॥ मिदं शुभम् ॥ २९३ ॥ महादाहे विधातव्यो यूपश्चणक- गिलोय, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, चिरायता और सोंठ यह पंचभद्रनामक क्वाथ यातपित्तचरेम देना सम्भवः ॥ ३०० ॥ चाहिये ।।२९३ ॥ जो वातपित्तज्वरमें अत्यंत दाह हो तो चनेका वृप नीलोत्पलमुशीराणि बला पद्मकमेव देना चाहिये ॥ ३००॥ च । काश्मरी मधुकं द्राक्षा मधूकं स- इति वातपित्तज्वरचिकित्सा । परुषकम् ॥ २९४ ॥ पेयः शीतकपा पित्तश्लेष्मज्वरचिकित्सा। योऽयं वातपित्तज्वरापहः । सप्रलापं -समोहश्च शमयत्पत्तिकं ज्वरम्।।२९५।। नीलकमल, नालोफर,खस,खिरैटी,पद्माख,कुम्भेर, पित्तकफज्वरके लक्षण मुलठी, दाख,महुआ और फालसे इनका हिमवनाफर मुहुर्दाहो मुहुः शीतं स्वेदस्तम्भों पावै तो यह वातापत्तज्यरको नष्ट करता है तथा मुहुर्मुहुः। मोहः कासोऽसचिस्तृष्णा मलाप और मोहयुक्त पितवर दूर होता लामापत्तप्रवर्तनम् । लिप्ततितास्यमा तन्द्रा पित्तश्लेप्मज्वराकृतिः॥ ३०१ । है ।।२९।।२९५५ adi Int (३२) वनसेने भापाटीकासहिते- , अब कफपित्तजरके लक्षण याहते है, पारंवार दाह पटोलपत्र, चन्दन, पुरनहार, कुटकी, पाई. और हो, वारंवार शीत लगे, पारंवार पसीना आवै, वार गिलोय इनका काय पित्तकाम्यर, अरुचि, यमन,ध्यर वार शरीर जकर जाये, येहोशी हो, साँसी, अरुचि, और सुजली तथा विपका नाशक है ॥३०६ ॥ तृपा, कफ और पित्तका गिरना, मुख फफरी लिपासा सशर्करामक्षमात्रां । कटकामुणवा- रहे तथा पित्तसे गुखमें कड़ापन हो और तन्द्रा हो, रिणा । पीत्वा ज्वरं जयजन्तुः कफ ये पिसफफायरके लक्षण हैं ।। ३०१ ।। पित्तसमुद्भवम् ।। ३०७ ॥ चिकित्सा एक तोला प्रमाण युटकोफे चूर्णको लेकर मिश्र मिलाकर गरमजल के साथ पान करे तो कफपिराजन्य गुडूची निम्बधन्याकं पनकं चन्दना- ज्वर दूर होताह ॥ ३०७॥ न्वितम् । तृष्णादाहज्वरच्छर्दिपित्त त्रिफला बायमाणा च मृद्रीका कटु 'श्लेप्मज्वरापहः ॥ ३०॥ रोहिणी । पित्तश्लप्मज्वरे ह्येषां ।। गिलोय, नीम, धनियाँ, पन्नास और लालचन्दन कपायो ह्यनुलोमनः॥३०८॥ इनका पाथ तृपा, दाह, ज्वर वमन और पिराकफाय- निफला, त्रायमान, दास और कुटकी इनका रको नष्ट करता है।॥३०२ ॥ फाथ पित्तकफायरमें अनुलोमन करनेवाला है३०८॥ गुडूची निम्बधायाकं पाकं चन्द वासकं पाकाष्ठञ्च नागर- चन्दना-. नानि च। तृष्णादाहारुचिच्छर्दिसर्व- मृते । पटोलं. धान्यकश्चैव काथी ज्वरहरो गणः ॥३३॥ मधुसमायुतः । कफपित्तज्वरं शूलं गिलोय, नीम, धनियाँ, पद्माख और लालचन्दन दाहं हन्त्यंघ्रिपाणिपु ॥ ३०९ ॥ इन सब औपधियोंका फाथ तृपा, दाह, अरुचि, यमन फुड़ेकीछाल, पद्माख, सोंठ, लालचन्दन,गिलोय, और सर्व प्रकारके ज्वरोको हरनेवाला है ।। ३०३॥ पटोलपत्र और धनियाँ इनके . फाथमें शहद, पटोल पिचुमन्दश्च त्रिफला मधुकं मिलाकर पान करनेसे कफपित्तज्वर, शूल और हा बला। साधितोऽयं कपायच पित्त- पाँचोंकी दाह दूर होती है ।। ३०९ ॥ श्लेप्मभवे ज्वरे ।। ३०४॥ पटोले वालकञ्चैव मुस्तकं रक्तचन्द- पटोलपार, नीमकी छाल, त्रिफला, मुलैठी और नम्। पाठा मूर्वामृता शुंठी चोशीरं खिरैटी इनका काढ़ा पित्तकफञ्चरमें देना चाहिये कट्टराहिणी । समभागेः शृतं तोयं ॥३०४॥ सर्वज्वरहरं पिवेत् ॥ ३१०॥ दीपनं कफविच्छोद पित्तवातानुलो- पटोलपत्र,सुगन्धवाला, नागरमोथा,लाल चन्दन मनम् । ज्वरघ्नं पाचनं भेदि सृष्टं पाद, मूर्वा, गिलोय, सोंठ, खस और कुटकी इन सवको समान भाग लेकर काथ बनाकर पीनेसे सर्व धान्यपटोलयोः ॥ ३०५ ॥ प्रकारके ज्यर नष्ट होते हैं ।। ३१० ।। धनियां और पटोलपातका काथ-अग्निको दोपन सनागरं पर्यटक पिवद्वा सदुराल- करनेवाला, कफनाशक, पित्त और वातको अनुलो भम् । किराततितकं मुस्तं गुडूची मन करनेवाला, ज्वरनाशक, पाचन और भेदक विश्वभेषजम् । पाठामशीर सोदी- है ।। ३०५॥ च्यं पिबेच्च ज्वरशान्तये ॥ ३११ ।। पटोलं चन्दनं मूतिक्तापाठामृता ज्वरन्नो दीपनश्चैव कपायो दोषपा; गणः । पित्तश्लेष्मारुचिच्छर्दिज्वर- चनः। तृष्णारूचिप्रशमनों. मुखव- कण्डूविपापहः ।।३०६ ।।- रस्यनाशनः॥३१२॥ .

ज्वराधिकारः। (३३) सोठ और पित्तपापड़ा इनका फाथ अथवा धमासा, फैटरी, गिलोय, भारंगी, सोंठ, इन्द्रजी, जवासा, चिरायता· पदया, नागरमोथा, गिलोय, सोंठ, पाद, चिरायता, चन्दन, नागरमोथा,पटोलपत्र और फुटकी. सस और बुगन्धयाला, इनका फाय फफपित्तज्वर-नके फाथको पान करनेसे पित्तकफज्वर नष्ट होता है को शमन करने के लिये पीये। यह काथ ज्वरनाशक, तथा दाह, तृपा, अरुचि, वमन, खाँसी, हृदयरोग दीपन, दोपपाचक, नृपा, अरुचि और मुखकी नीर- | और शूल रोग दूर होता है ॥ ३१६ ॥ ३१७ ।। सताको दूर करना है ॥ ३११ ।। ३१२ ॥ पश्चतिक्तकाथ। यवं पर्पटकं धान्यं पटालं निम्बसा- क्षुद्रामृताभ्यां सह नागरेण सपुष्कर धितम् । पिवेत्सशर्कराक्षाद्रं पित्तश्ले चैव किराततिक्तम् पिनेकपायं प्मज्वरापहम् ।। ३१३ त्वथ पञ्चतिक्तं ज्वरं निहन्त्यष्टविधं इन्द्रजी, पित्तपापदा, धनियाँ, पटोलपत्र और समस्तम् ॥ ३१८ ॥ नीमकी छाल, इनके फायमें शहद और मिश्री कटेरी, गिलोय, सौंठ,पोहकरमूल और चिरायता मिलाकर पीये तो पित्तकफचर नष्ट होता है।३१३॥ इनका फाथ आठों प्रकारके ज्वरोंको नष्ट करता है ॥३१८॥ अमृताष्टक ''अमृतेन्द्रयवारिष्टं पटोलं कटुरो- भाङ्गादिगण। हिणी नागरं चन्दनं मुस्तं पिप्पली- भाङ्गीपुष्करमूलञ्चमुस्तकंकण्टकारि- का त्रिकण्टकबृहत्यौ च कर्णिनी- चूर्णसंयुतम् । अमृताष्टकमित्येतत्पि- नागरेः शृतः।।३१९।।एपभागादिको तश्लप्मज्वरापहम् ॥ ३१४॥ नाम्ना पित्तश्लेष्मज्वरापहः । हल्लासा- गिलोय, इन्द्रजी,नीमफी छाल, पटोलपत्र, कुटकी, रोचकच्छर्दितृष्णादाहविधन्धनुत् ३२०॥ साठ, लाल चन्दन और नागरमोथा, इनके काथमें पपिलका चूर्ण डालकर पान करनेसे पित्तकफचर भारंगी, पोहकरमूल, नागरमोथा,फटेरी, गोखरू, नष्ट होता है । इसको आमृताष्टक कहते हैं ॥ ३१॥ बड़ी कटेरी, शालिपर्णी, पृदिनपर्णी और सोंठ इन को भाग्यादिक कहते हैं। यह भाग्यादिगण पित्तकफ- कफपित्तवमिकण्डूज्वरवीसर्पदाहनुत् । ज्वरनाशक तथा उबकाई, अरुचि, वमन, तृपा, दाह कपायः परिपीतस्तु शृङ्गवेरपटो- और विवन्धनाशक है ॥ ३१९ ।। ३२० ।। : लयोः ॥ ३१५॥ नागरेन्द्रयवं मुस्तं चन्दनं कटुरो- अदरख और पटोलपत्रका फाथ पान करनेसे कफ, हिणी । पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं कषायन्तु पित्त, वमन, खुजली, ज्वर, विसर्प और दाह दूर पिबेन्नरः। भ्रममू रुचिच्छर्दिपित्त- होता है ।। ३१५॥ श्लेप्मज्वरापहः॥ ३२१ ।। कण्टकार्यादि। सोंठ, इन्द्रजी, नागरमोथा, लाल चन्दन और. कुटकी इनके काथमें पीपलका चूर्ण डालकर पान कण्टकार्य्यमृता भाङ्गी नागरेन्द्रयवा करनेसे श्रम, मूर्छा, अरुचि, वमन और पित्तकफ- सकम् । भूनिम्बं चन्दनं मुस्तं पटोलं ज्वर नष्ट होता ह ।। ३२१ ॥ कटुरोहिणी ॥३१६॥ कषायंपाययेदे द्राक्षा शम्याकधान्याकं कटुका मुस्त- अंथिकम् । काथं हन्यादुदावर्त शुलं रुचिच्छर्दिकासहद्रोगशुलतुत् ।। ३१७ ॥ पित्तकफज्वरम् ॥ ३२२ ॥ तत्पित्तश्लेप्मज्वरापहम् । दाहतृष्णा- (३४) वनसेने मापाटीकासहिते- कृतः दाख, अमलतास, धनियाँ, कुटकी, नागरमोथा वातकफज्वरचिकित्सा और पोपलामूल इनका फाय उदायत, शूल और पित्त- कफयरको नष्ट करता है ॥ ३२२ ॥ पटोलयवधान्याकमुद्दामलकचन्दनम्। वातकफज्वरलक्षण। पत्तिक. श्लप्मपित्तोत्थे ज्वरे तृट्छ- स्तमित्यं पर्वणां भेदो निद्रा गौरवमेव :र्दिदाहतुत् ।। ३२३ ॥ च । शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कास पटोलपत्र, इन्द्रजी, धनियाँ, मूंग, आमले और कम्पोऽरुचिस्तथा । सन्तापो मध्य- लालचन्दन इनके फायको पित्तज्यर और कफापत्त- वेगश्च वातश्लप्मज्वराकृतिः॥३२७ ।। ज्वरमें पीनेसे तृपा, यमन और दाह दर होती शरीर गीले कपडेसे ढकासा मालूम हो, संधियों है ॥३२३।। पीटा हो, निद्रा अधिक आय, देदमें भारीपन, शिर पीड़ा, जुकाम, साँसी, फम्प, अन्नमें अमाचे, संता सपत्रपुप्पवासाया रसः क्षोद्रसिता- और ज्यरका गमध्यम हो, ये वातकफबरके लक्ष गुतः कफपित्तज्वरं हन्तिसामुपित्तं जानने ॥३२७॥ सकामलम् ॥ ३२४ ॥ चिकित्सा। पत्ते और फूल सहित अइसका रस निकाल क्षुद्रामृतानागरपुष्करायः कर पश्चात् उसमें मिश्री और शहद मिलाकर कपायः कफमारुत्तोतरे सश्वासका. पान करे तो कफ-पित्त-ज्वर, रक्तपित्त और कामला रोग दूर होता है ।। ३२४ ॥ सारुचिपार्श्वरुक्करे ज्वरे त्रिदोषप्रम- वेपि शस्यते ॥ ३२८॥ पटोल पिचुमन्दश्च त्रिफला मधुकं कटेरी, गिलोय, सोंठ और पोहकरमूल, इनय यवाः । साधितोऽयं कपायः स्यारिप- फायनाकर कफवातज्वरमें पीवें इससे श्वास, खॉर्स तक्षेपमभवे ज्वरे ।। ३२५॥ अरुचे, पसलियोंकी पाहा और त्रिदोपजनितंब पंटोलपात, नीमकी छाल, त्रिफला, मुलैठी और / भी दूर होता है ॥ ३२८ ।। इन्द्रजी. इनका फाथ । पित्त कफञ्चरम देना मुस्तापर्पटकं शुण्ठी गुडूची सदुरा चाहिये ।।.३२५ ॥ लभा । कफवातारुचिच्छर्दिदाहशो- मुस्तपर्पटकरातनिहेण प्रसाधितः । पज्वरापहः ।। ३२९ ॥ ''कफपित्तज्वरहरो यूपी धान्यपटो नागरमोथा, पित्तपापडा, सोंठ, गिलोय और लयोः ॥ ३२६॥ धमासा, इनका काथ वातकफ, अरुचि, चमन, दाह नागरमोथा, पिसपापडा और चिरायता, इनका शोप और ज्वरको दूर करता है ।। ३२९ ।। सिद्ध किया हुआ नियूह अथवा धनियाँ और पटोल- मातुलुङ्गफलकेसरोवृतः सिन्धुजन्म- "पत्रका चूप कफपित्तज्वरनाशक है ।। ३२६ ।। मरिचान्वितो मुखे । हन्ति वातकफ निम्बकोलकयूपस्तु हितः पित्तकफा- रोगमास्यगंशोषमाशु जडतामरोध- त्मके॥३२७॥ कम्॥ ३३०॥ ... नीमको छाल और पटोलपत्र इनका यूप भी पित्त-को एकत्र पीसकर मुखमें धारण करनेसे, वातफफजन्य विजौरे नी. केशर, सैंधानोन और मिरच, कफवरमें हितकारी है ।। ३२७ ।। इति पित्तरलेप्मवरचिकित्सा । 'मुखशोप, मुखकी जड़ता, विरसता और अरुचि शीघ्र दूर होती है ॥३३॥ - , ज्वराधिकारः 4 आरम्बधग्रन्थिकमुत्तातिताहरीतकाभिः दारूपर्पटभागार्चन्दवचाधान्यककटफ. लासामयाधिश्वपतीककाधी हिंगु- :: कथितः कयायः । सामे साले कफवातयुक्त ज्वरे हितो दीपन मधृत्कटः ॥३३७॥कफवातवरे पीतो पाचतच॥३३॥ हिकाशोपगलग्रहान् । खासकासम- अमलताम, पीपलामूल, नागरमाया, फुटको और मेहांश्च हन्यात्तमिवाशनिः॥३३८ ।। हरड़ इना पाय-आनशूल और फावातमुक्त करने ! देवदाग, पिनपापडा, भारंगी, नागरमोथा, यच, हितकारक नया दापन और पाचन है॥ ३३१ ।। धनियों, कायाल, हरद, सोंठ और दुर्गन्धकरंज आरोग्यपनका इनके पायहींग और बाद चालकर पीये तो वातवरमें पिचा हुआ हिफा, शोप, गटप्रद श्वास, पिप्पली पिप्पलीनलं चयचित्रक- खांसी और प्रमह श्वन उपद्रवोंको नष्ट करता है नागरादीपनीय शृतो वर्ग:कफानिर से वृक्षको यम नष्ट कर देता है ॥३३७ ॥३३८ ।। गदापहः॥३२॥ दशमूलीरसः पीतः कणाट्यश्च कफा- पीपल, पपिलामूल, पदय, चीता और मोठ इन- का भय दीपन और कफलातक रोगोंका नामक निले । अविपाकेतिनिद्रायां पार्व- रुश्वासकासक॥ ३३९॥ कामावरम दशाभूलके व पोपलका चूर्ण चातुर्भद्रका ढालकर पीनेसे ज्वर, अजीर्ण, अतिनिद्रा, पसलीकी किराततिक्तंमुस्तं च गुडूची विश्वभप- पाद्य, ध्यान और बॉसी दूर होती है ॥३३९।। जम् । चातुर्भद्रकभित्याहुतिश्लेप्म- दशनृल। ज्वरापहम् ॥ ३३॥ पण्यों हत्या गोकण्टो विल्वोऽग्निम- चिरायता, नागरमोथा, गिलोय और नोट इनको यनोरलुः । काश्मरी पाटला चेति चातुर्मद्रक कहते है। यह वातकफ्के लरफो नष्ट करता सन्निपातहरो गणः ॥३४० ।। ॥३३३॥ शालिप . पृदिनपर्णी, कटेरी,बडी फैटरी,गोखुरु, पिप्पलीभिः शत तोयमनभिप्पंदि । वेलगिरी अरणी, इयोनाक, पुम्भैर और पाढल इन दीपनम् ।वातशमविकारनं ज्वरघ्नं । औषधियोंके समूहको दशमूल कहते हैं, यह दशमूल सन्निपाक्नाशक है ।। ३४० ॥ प्लीहनाशनम् ॥३३४॥ पोपलका फाय-अनभिप्यन्दी, दापन, वातकफके। तृष्णान्विते वातकफांतिगले सश्वा- विकारका नाशक, वरनागर और प्लीहायो' नष्ट सकासारुचिवद्धविटके । हितं जलं करता है।॥ ३३४.॥ दीपनपाचनश्च पटोलशुण्ठीयवपिप्प- निम्यामृता विश्वदारु कटफलं कटु- लीनाम् ॥ ३४ ॥ की वचा कषायं पाययेदाशु वातले- पटोलपत्र, सौंठ, इन्द्रजी और पीपल, इनका मन्चरापहम् ।।३३५ ॥ पर्वभेदः शिर:- काय तृपायुक्त वात-कफ्लोग, शूल, श्वान, खाँनी, शूलकासारोचकपीडितम् ॥ ३३६ ॥ अरुचि और मलबद्धता इनमें हितकारक, दीपन नीनी अल, गिलोय, सौंठ, देवार कायफल, और पाचन है ।।३४१ ॥ कुटकी और वचं इनका सादा वातकफलर, सान्य- पीनसश्वासवाधिये जापर्वास्थि- योकी पीडा, शिरःशूट, लॉती और अचि इनसे शुलिनि। वातवर "पीडित मनुष्यको पिलारे ॥ २३५ ॥३३६॥. विधानक्षित ॥ ३४२॥ है (३६). वङ्गासेने भापाटीकासहिते- . पीनसरोग, श्वास, बधिरता, जंघा, संधि और करनसे या विना समय भोजन करनेसे और अनेक अस्थिशूलमें तथा कफवातवरमें विधि जाननेवाला प्रकारके मिश्रित पदार्थोके सेवन करनेसे सन्निपात स्वेद कर्म करावे ।। ३४२ ॥ कुपित होते हैं ॥ ३४५ ॥ वालुकास्वेद । अब सन्निपातके लक्षण कहतेहैं। खपरभृष्टपटास्थितकाञ्जिकसंसिक्तवा क्षणे दाहः क्षणे शीतमस्थिसन्धि- 'लुकास्वदेः। शमयति वातकफामय- शिरोरुजा। सनावे कलुषेरक्त निर्भुग्ने मस्तकशूलाङ्गभंगादीन् ॥३४३ ॥ चापि लोचने॥३४६॥ सस्वनी सरुजी' कर्णी कण्ठः शुरिवावृतः । तन्द्रा एक खोपड़ेमें वालको भरकर उसको खूब गरम करके रोगीक समीप धरे और रोगीको वस्त्रले ढक मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोरु- देवे । पश्चात् वालूके ऊपर काँजीके छोटे देदेकर चिर्भमः ॥३४७ ॥ परिदग्धा खरस्पी "पसीना निकाले । यह वालुकास्पद-वातकफके रोग, जिहा रस्तांगता परम् । ष्ठीवन रक्त:- शिरकी पीड़ा और सब शरीरकी पीडाको शांत पित्तस्यकफेनोन्मिश्रितस्य च ॥३४८॥ करता है अथवा बाराको खोपडेमें खुव तपाकर शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो : पश्चात् उसकी कपड़ेमें पोटली बनाकर उस पोटली को कॉजीमें भिजोकर स्वेद देवे, इसको भी वालूका हदि व्यथा । स्वेदमूत्रपुरीषाणां स्वेद कहते हैं ॥ ३४३ ॥ चिरादर्शनमल्पशः ॥३४९॥ कृशत्वं', नातिगात्राणां सततं कण्ठकूजनम् स्रोतसां मार्दवं कृत्वा नीत्वा पावक कोठानां श्यावरतानां मण्डलानाच माशयम् । हत्वा वातकफस्तम्भ दर्शनम्॥३५०॥मूकत्वंस्रोतसांपाको स्वेदोज्वरमपोहति ।।३४४ ॥ गुरुत्वमुदरस्य च । चिरात्पाकच वालुकास्वेद-शरीरके स्रोतोंको मृदु अर्थात् शुद्ध दोषाणांसन्निपात ज्वराकृतिः॥३५१॥ करता है, अग्न्याशयको यथास्थानमें स्थापित करता है, वातकफको स्तम्भताको और ज्वरको दूर करता क्षणमें दाह हो, क्षणमें शीत लगे, हट्टा, (जोड) और शिरमें पीड़ा हो, नेत्र आसूर्युक्त है।। ३४४॥ कलुपित (गँदले ), लाल और देढे. हों, कानोंमें ' पुष्करमूलयूपस्तु वातश्लेमादिके हितः। शब्द और पीड़ा हो, कंठ काटोंसे घिरा हुआ हो, वातकफज्वरमें पोहकरमूलका यूप हितकारक है। तन्द्रा (ऊँपना),मोह (वेहोशी ), प्रलाप (वृथा इंति वातकफज्वरचिकित्सा । वकवाद ), खाँसी, श्वास, अरुचि और भ्रम हो, जीभ अग्निसे जलीहुई सी मालूम हो तथा खरखरी सन्निपातचिकित्सा। हो, सम्पूर्ण अंग शिथिल हो जाय, कफ मिले हुए रक्त और पितको यूके, शिरको इधर उधर लुढकाचे, तृपा हो, निद्रा न आवे, हृदयमें पीड़ा, पसीना, मून सन्निपातनिदान। और मल ये बहुत कालमें थोड़े २ निकलें, शरीर वराधिकरन्नपानेरजीर्णाध्यशनेन च । अत्यन्त कृश (दुवला) न हो, निरन्तर कंठ बोले, व्यामिश्रसेवनान्चापि सन्निपातः प्रकु- शरीरमें काले, पीले और लाल मिले रङ्गके गोल २ चकत्ते पड जायें, भूकता ( गूगापन ) हो, . कान प्यति ॥ ३४५॥ नासिकादि शरीरके स्रोतोंका पकना, उदर में भारी विरुद्ध (समयविरुद्ध, संयोगविरुद्ध, स्वभाव- पन और वातादि दोपोंका बहुत कालमें पकना ये सबै देशविरुद्ध) ऐसे अन्न और पानको सेवन करनेसे, सन्निपातज्वरके लक्षण जानने चाहिये ।। ३४६ ।। अजीर्णमें भोजन करनेसे अथवा भोजन पर भोजन' ३४७ ।। ३४८ ॥ ३४९ ॥३५० ।। ३५१ ॥ संधि T ज्वराधिकारः। (३७). दोषे विवद्धे नष्टेऽनौसर्वसंपूर्णलक्षणः। अर्थात् पूर्वोक्त बभ्रुनामक सन्निपातका नाम विधु भौर पित्तकफाधिक सन्निपातका नाम फल्गु कहा सन्निपातज्वरो साध्यः कृच्छ्रसाध्य- है ॥३५४ ॥ ३५५ ॥ ३५६ ।। स्ततोऽन्यथा ॥३५२॥ जिसमें सर्वदोप बढे हुए हों, जठराग्नि नष्ट हो कफवाताधिक शीघ्रकारी ई हो और सम्पूर्ण लक्षण मिलते हों वह सन्निपात सन्निपातके लक्षण। र असाध्य है और इससे अन्यथा अर्थात् दोप बढ़े श्लेप्मानिलाधिको यस्य सन्निपातः हों, अग्नि कुछ दीपन हो और थोडे लक्षण हों तो ३ कृच्छुसाध्य है ३५२ ।। प्रकुप्यति । तस्य शीतज्वरो मुर्छा वातपित्ताधिक व सन्निपात क्षुत्तृष्णा पार्श्वसंग्रहः ॥३५॥ शुलम- स्विद्यमानस्य हिक्का श्वासश्चजायते। “ज्वरके लक्षण। असांध्यः सन्निपातोऽयं शीघ्रकारी- वातपित्ताधिको यस्य सनिपातश्च ति कथ्यते ॥ नहि जीवत्यहोरात्रमा कुप्यति । तस्य ज्वरो मदस्तृष्णामुख नेनाविष्टविग्रहः ।। ३५८ ॥ शोषप्रमीलिकाः । आध्मानारुचित- जिस मनुप्यके कफवाताधिक सन्निपात कुपित न्द्राश्च कासवासभ्रमलमाः।मुनिभि- होता है उसके शीतज्वर, मूर्छा, तृपा क्षुधा और पस चचनामायंसन्निपात उदाहृतः ३५३ ॥ लियोंमें पीडा, शूल, पसीनेका न आना, हिचकी , जिसके वातपित्ताधिक सन्निपात कुपित होता है और श्वासका अधिक वढना, ये सब लक्षण स मनुष्यके ज्वर, मद ( बेहोशी), तृपा, मुख- असाध्य हैं, इसको शीघ्रकारी सन्निपात कहते हैं गोप, नेत्रोंका मिचना, अफारा, अरुचि, तन्द्रा,खांसी, | इस सन्निपातवाला रोगी एक दिनरात भी नहीं घास, भ्रम और क्लम( ग्लानि) ये सव लक्षण होते जीता ॥ ३५७. ॥ ३५८ ॥ है। इसको मुनियोंने वसन्निपात कहा है ॥३५३।। वातोल्बण विस्फोरकसन्नि- पित्तकफाधिकसन्निपातके लक्षण। पातके लक्षण। पित्तश्लप्माधिको यस्य सन्निपातः प्रकुंप्यति । अन्तर्दाहो बहिः शीतं कासः श्वासस्तमो मूर्छा प्रलापो 'तस्य तृष्णा प्रवर्द्धते ॥३५४ ॥ तुद्यते मोहवेपथू । पार्श्वयोर्वेदना जृम्भा दक्षिणं पार्श्व मुखशोषगलग्रहाः। । कपायत्वं मुखस्य च । वातोत्तरस्य ठीवति रक्तपित्तं च कृच्छ्रात्कण्ठवं रूपाणि सन्निपातस्य लक्षयेत् ॥३५९॥ दूयते ॥३५५॥ विभेदश्वासहिकाश्च एष विस्फोरको नाम्रा .सन्निपातः वर्द्धन्ते सप्रमीलिकाः । विधुः फल्गुश्च सुदारुणः॥ तो नाम्ना सन्निपाताबुदाहृतौ ॥३५६॥ खाँसी, श्वास, अंधकारदर्शन, मूर्छा, प्रलाप, जिस मनुप्यके पित्तकफाधिक सन्निपात कुपित | आना आर मुखमें कसैलापन, ये सब लक्षण जिसमें मोह, कम्प, पसलियोंमें पीडा, जम्माईका अधिक होता है उसके शरीरके भीतर दाह हो और बाहरसे हो उसको वातोल्वण दारुण विस्फोरक सन्निपात शीत लगे, सूपा बढ जावे, दहनी पसलीमें पीडा हो, | जानना ।। ३५९ ।। मुखशोप, गला रुक जाय, रुधिर मिला पित्त थूके, पितॉल्वण आशुकारी सन्त्रि के लक्षण! हो, हिचकी आवे' और नेत्रं मिचेसे जावं इनको अतिसारो भ्रमो मूळ मुखपाकस्त- विद्वानोंने विधु और फल्गु नामक सन्निपात कहा है थैव च । गात्रे च बिन्दवो रक्ता दाह कठिनतास कठसे बोला जाय, दस्त होने लगे, श्वास (३८) वङ्गसेने 'भाषाटीकासहित- स्तीवः प्रजायते ॥ ३६० ॥ पित्तोत्त जिसके होनवात, मध्यपित्त और अधिक करके रस्य स्पाणि सन्निपातस्य लक्षयेत् । कोपसे सन्निपात होता है, उसके पन्हीं दोपोंके क्रमसे; भिपग्भिः सन्निपातोऽयमाशुकारी | पौड़ा करतेहुए लक्षण होते हैं अर्थात् उसमें वातजन्य प्रकीर्तितः॥ ३६॥ उपद्रव अल्प, पित्तजन्य उपद्रव मध्यम और कप 'अनिसार (दस्तहों), नम, मूर्ती, मुखका पकना, जन्य उपद्रप अधिक तथा अधिक पीड़ा फरते हैं, ऐसे शरीरमें लालबिंदुओंका पढ़ना और तीन दाहका होना | कि अल्पशूल और कमरमें पीड़ा ये हानवातके लक्षण । ये लक्षण जिसमें हो उसकों पित्तोल्वण आशुकारी जानने । मध्यदाह, पीड़ा और भ्रम ये मध्यपित्तके लक्षण जानने तथा अत्यंत ग्लानि यह अधिक कपका सन्निपात जानना ।। ३६१ ।। लक्षण है इत्यादि । एवं शिर, मुख, मन्या, हृदय और कफोल्वण कंपनसन्निपातक लक्षण । जिहामें पीडा हो, नेत्र मिचेसे जायें, श्वास, हिचकी, खाँसी, जहता हो, बेहोशी होवे।इसके उत्पन्न होनेही जडता गद्गदा वाणीरात्रो निद्राभव यदि चिकित्सा की जाब तो कदाचित् आराम होजाय त्यपि । प्रस्तब्धे नयने चैव मुखमाधु पश्चात् नहीं. इस सन्निपातमें कानकी जहमें दारण र्यमेव च॥३६॥ कफोत्तरस्य रूपाणि सूजन उत्पन्न होती है, जिसके प्रभावसे मनुष्य बड़े, सन्निपातस्य लक्षयेत् । मुनिभिस्सन्नि-दुःखसे जीता है । इस दारणसन्निपातको पैदारिक पातोऽयमुक्तः कम्पनसंज्ञकः ॥ ३६३ ।। कहते हैं, तीन रात्रिके पश्चात् इसकी औषधि करनी वृथा है ॥३६४॥३६५||३६६।३६७॥३६॥ शरीरको जड़ता, गद्गद बोलना, रात्रिमें नींद आना, नेत्रों की टकटकीसी लगी रहना और मुखमें मधुरता, मध्यवात, हीनपित्त, अधिककफ- कर्कोटक सन्निपातके लक्षण। ये सब लक्षण जिसमें हो उसको कफोल्वण कंपन सन्निपात जानना ।। ३६२ ॥ ३६३ ।। मध्यहीनाधिकर्यस्य सन्निपातो यदा हीनवात मध्यपित्त और, अधिककफ भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा- वेदारिक सनिपातके लक्षण । दोपवलाश्रयाः॥३६९ ॥ अन्तदाहो विशेषोऽत्र प्रवक्तुं न च शक्यते । रक्त- हीनमध्याधिर्यस्य वातपित्तकफैः मालतकैनव लक्ष्यते मुखमण्डलम् ॥ क्रमात।सन्निपातः प्रभवति पीडयन्दो- ॥ ३७० ॥ यत्नेनाकर्पितः श्लेप्मा हद्- पदर्शनात् ।। ३६४ ॥ अल्पशूलं कटी- यान्न प्रसिच्यते । इपुणेवाहतं पाव तोदो मध्ये दाहो रुजा भ्रमः । भृशं तुद्यते खन्यते हदि ॥ ३७१ ।।. प्रमी क्लमः शिरोवक्रमन्याहृदयवानुजः ।। लिकावासहिक्कावर्धन्ते तुंदिने दिना ॥३६५|| प्रमीलिकाःश्वासहिक्काका जिह्वा दग्धा खरस्पर्शा.गलः शरि- सजाड्यविसंज्ञताः । प्रथमोत्पन्नमेतत्तु वावृतः॥ ३७२ ॥ विसर्ग नाभिजा- साधयेत्तु कदाचन ॥३६६॥ एतस्मि नांति कृजते च कपोतवत् । अतीव न्सन्निपाते तु कर्णमूले सुदारुणा । श्लेप्मणा पूर्णः शुष्कवक्त्रोष्ठतालुकः।। पिटिका जायते जन्तुर्यया कृच्छ्रेण ॥ ३७३ ॥ तन्द्रानिद्रातियोगात्तों जविति॥३६७ ॥सर्वेदारिकसंज्ञोऽयं हतवाहिहतद्युतिः । न चाति भजते सन्निपातः सुदारुणः । विरात्रात्पर ग्लानि विपरीतानि यच्छति ॥३७४ा: मतस्य व्यर्थमौषधकल्पनम् ।। ३६८।। आयम्यते च बहुशः सरक्त ष्ठीवते- ज्वरांधिकारः। (३९) ऽल्पशः एप कर्कोटको नाम्ना सनि हीनवात, वृद्धपित्त और मध्यकफो- पातः सुदारुणः ।। ३७५ ॥ 'ल्यण सत्रिपातके लक्षण। जिसके मध्ययात, हीनपित्त और अधिक फसे हीनातिवृद्धमध्येस्तु सन्निपातो यदा सन्निपात होता है उसके उन्हीं दोषोंके अनुसार क्रमसे भवेत । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा- हीन, मध्य और अधिक रोग होते हैं, शरीरफ भीतर दोपवलाश्रयाः॥ ३७८ ॥ हृदयं दह्यते दाह होना,घोलने में असमर्थता, मुखमण्डलंका आलके चास्य यकृत्प्लीहान्त्रफुफ्फुसाः रंगफे समान लाल होना, घलपूर्वफ आकर्षित किया। पच्यन्तेऽत्यर्थमूर्ध्वाधःपूयशोणित- हुआ भी कफ हदयसे याहर नहीं निकलता, पसलि- निर्गमः ।। ३७९ ॥ योंमें तीर चुभनेकीसी पीडा, हृदयमें खोदनेके समान पीडा,नेत्र मिचेसे जाय,धास और हिचकी दिन प्रति हीनवात, इद्धपित्त और मध्यकफके कोपसे जो दिन बढ़ते जाय, जमि जलीहुईसी और खरखरी हो, सान्निपात होता है, उसमें उन्हीं दोपोंके क्रमसे हीन, अधिक और मध्यम रोग होते हैं । हृदयमें जलन, कंठमें कांटे पड जायें,बेहोशी में मल मूत्रको त्याग देवे, अधिक कफसे परिपूर्ण हो जानेसे कण्ठ कबूतरके यकृत, प्लीहा, ऑते और फेफड़ा यह पर्फ जाते हैं, . समान कुंजे, मुख, ओष्ठ और ताल सूख जाय, तन्द्रा है ।। ३७८ ॥ ३७९ ॥ ऊर्व और अधोमार्गसे राध और रुधिर निकलता. और निद्रा होवे, जठराग्नि नष्ट होजाय, कांति (शरी- रकी शोभा) जाती रहे,अधिक ग्लानि न हो, विपरीत अधिकवात,हीनपित्त और मध्यकफ- चेष्टा करे और थोड़ा २ रुधिर मिला यूके, ये दारुण जन्य सन्निपातके लक्षण । सन्निपात 'कर्कोटक' नामसे प्रसिद्ध है ॥ ३६९ ॥ प्रवृद्धहीनमध्यैस्तु वातपित्तकफेश्च या ॥३७०॥३७१॥३७२॥३७३॥३७४॥३७५ ।। तेन रोगास्त एवोक्ता यथारोगवला- अधिकंवात, मध्यपित्त और हीनकफ- श्रयाः । प्रलापायाससंमोहकम्पमू- , संमोहकसन्निपातके लक्षण । ारतिभ्रमाः॥३८०॥ मन्यास्तम्भेन मृत्युश्च तत्राप्येताद्विशेषणम् । प्रवृद्धमध्यहीनैश्च सन्निपातो यदा अधिकवात, हीनपित्त और मध्यमकफके कोपसे भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा- जो सन्निपात होता है, उसमें उन्हीं दोपानुसार क्रमसें रोग होते हैं । तथा प्रलाप, श्रम, मोह, कम्प, दोपबलाश्रयाः॥ ३७६ ॥ प्रलापाया- मूर्छा, घेचैनी,भ्रम और मन्या नाड़ीके स्तम्भसे ससंमोहकम्पमूर्छारतिभ्रमाः । एक मृत्युका होना ये विशेष लक्षण होते हैं ॥ ३८० ॥ पक्षाभिघातस्तु तत्राप्येतद्विशेषतः । मध्यवात, अधिकपित्त और हीनक- एष संमोहको नाम्ना सन्निपातः फोल्यणसन्निपातके लक्षण । सुदारुणः ।। ३७७॥ मध्यप्रवृद्धहीनेश्च सन्निपातो यदा अधिकवात, मध्यपित्त और हीनकफके कोपसे | भवत्। तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा- जो सन्निपात होता है, उसमें उन्हीं दोपोंके अनुसार रोगबलाश्रयाः॥३८१ ॥ मोहमला- नमसे अधिक, मध्य और हानरोग होते हैं । प्रलाप, पमूर्छाः स्यु स्तम्भकम्पशिरोग्रहाः। भ्रम और एक औरका अंग रह जाना इन विशप कासश्चासौ भ्रमस्तन्द्रा संज्ञानाशी लक्षणों से युक्त दारुण सन्निपातको संमोहक ' कहते हृदि ग्रहः ॥ ३८२. ॥ खेभ्यो रक्तं हैं ॥ ३७६ ।। ३७७ ॥ विसृजति तत्राप्येतद्विशेषणम्। अर्वावं (३८). वङ्गसेने भापार्टीकासहित- स्तीत्रः प्रजायते ॥ ३६० ।। पित्तोत्त जिसके होनवात, मध्यपित्त और अधिक कफके. रस्य रूपाणि सन्निपातस्य लक्षयेत् । कोपसे सन्निपात होता है, उसके एन्हीं दोपोंके क्रमसे भिवग्भिः सनिपातोऽयमाशुकारी पीड़ा करतेहुए लक्षण होते हैं अर्धान् उसमें वातजन्य, प्रकीर्तितः॥३६१ ॥ उपद्रव अल्प, पित्तजन्य उपद्रव मध्यम और कफ.. जन्य उपद्रय अधिक तथा अधिक पीदा फरते हैं, जैसे : अतिसार (दस्तहों), श्नम, मूछी, मुखका पकना, कि अल्पशूल और कमरमें पोदा ये हानवातेके लक्षण शरीरमें लालविंदुओंका पड़ना और तीव्र दाहका होना जानने । मध्यदाह, पीड़ा और भ्रम ये मध्यपित्तके ये लक्षण जिसमें हो उसको पित्तोल्यण आशुकारी लक्षण जानने तथा अत्यंत ग्लानि यहअधिक कफका सन्निपात जानना ॥ ३६१ ॥ लक्षण है इत्यादि । एवं शिर, मुख, मन्या, हृदय और कफोल्बण कंपनसनिपातके लक्षण । जिहामें पीडा हो, नत्र मिचेसे जावें, श्वास, हिचकी, खाँसी, जडता हो, बेहोशी होवे।इसके उत्पन्न होतेही जडता गगदा वाणीरात्रौ निद्रा भव यदि चिकित्सा की जाव तो कदाचित् आराम होजाय' त्यपि। प्रस्तब्धे नयने चैव मुखमाधु पश्चात् नहीं. इस सन्निपातमें कानकी जड़में दारुण र्यमेव च॥३६२॥ कफोत्तरस्य रूपाणि | सूजन उत्पन्न होती है, जिसके प्रभावसे मनुष्य बड़े सन्निपातस्य लक्षयेत् । मुनिभिस्सन्नि- | दुःखसे जीता है । इस दारुणसन्निपातको वैदारिक पातोऽयमुक्तः कम्पनसंज्ञकः॥३६३ ।। कहते हैं, तीन रात्रिके पश्चात् इसकी औषधि करनी. पृथा है ।।३६४॥३६५॥३६६।३६७||३६८।.. शरीरकी जड़ता, गद्गद बोलना, रात्रिमें नींद आना, नोंकी टकटकीसी लगी रहना और मुखमें मधुरता, मध्यवात, हीनपित्त, अधिककफ- कर्कोटकसन्निपातलक्षण। ये सब लक्षण जिसमें हों उसको कफोल्वण कंपन सन्निपात जानना ॥ ३६२ ॥ ३६३ ।। मध्यहीनाधिर्यस्य सन्निपातो यदा हीनवात मध्यपित्त और अधिककफ भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा; वेदारिक सनिपातके लक्षणं । दोपबलाश्रयाः॥३६९ ॥ अन्त हो, हीनमध्याधिकैर्यस्य वातपित्तक: विशेषोऽत्र प्रवक्तुं न च शंक्यते । रक्त मालतकैनव लक्ष्यते मुखमण्डलम् ॥ क्रमात्। सन्निपातः प्रभवति पीडयन्दो- ॥३७० ॥ यत्नेनाकर्षितः श्लेप्मा हृद- घदर्शनात् ॥ ३६४ ॥ अल्पशूलं कटी- यान्न प्रसिच्यते । इपुणेवाहतं पावै तोदो मध्ये दाहो. रुजा भ्रमः । भृशं तुद्यते खन्यते हदि ॥ ३७१ ॥ प्रमी- क्लमः शिरोवक्रमन्याहृदयवाग्नुजः ॥ लिकावासहिक्कावर्धन्तेतु दिने दिन। ॥३६॥प्रमीलिकाःश्वासहिक्काका जिह्वा दग्धा खरस्पर्शा गलः शूकैरि- सजाध्यविसंज्ञताः। प्रथमोत्पन्नमेतत्तु वावृतः॥ ३७२ ॥ विसर्ग नाभिजा- साधयेनु कदाचन ॥३६६॥ एतस्मि नाति कूजते च कपोतवत् । अतीव न्सन्निपाते तु कर्णमूले सुंदारुणा' । श्लेप्मणा पूर्णः शुष्कवक्त्रोष्टतालुकः।। पिटिका जायते जन्तुर्यया कृच्छ्रेण ॥ ३७३ ॥ तन्द्रानिद्रातियोगा? जीवति॥३६७ ' ॥सवेदारिकसंज्ञोऽयं, हतवहिर्हतद्युतिः । न चाति भजते सनिपातः सुदारुणः । त्रिरात्रात्पर ग्लानि विपरीतानि यच्छति ॥३७४॥. मेतस्य व्यर्थमापधकल्पनम् ॥ ३६८ ॥ आयम्यते च बहुशः सरक्तं छीवते.

ज्वराधिकारः। (३९) 1 N . ऽल्पशः। एष कर्कोटको नाम्ना सन्नि- हीनवात, वृद्धपित्त और मध्यको- पातसुदारुणः॥३७५॥ ल्यण सन्निपातके लक्षण । जिसके मध्यवात, हनिपित्त और अधिक कफसे हीनातिवृद्धमध्यैस्तु सन्निपातो यदा सन्निपात होता है उसके उन्हीं दोषोंके अनुसार क्रमसे भवेत । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा- हीन, मध्य और अधिक रोग होते हैं, शरीरके भीतर दोपवलाश्रयाः॥ ३७८ ॥ हृदयं दह्यते दाह होना,बोलनेमें असमर्थता, मुखमण्डलका आलके चास्य यकृल्लीहान्त्रफुफ्फुसाः । रंगके समान लाल होना, बलपूर्वक आकर्षित किया पच्यन्तेऽत्यर्थमूर्ध्वाधःपूयशोणित- हुआ भी कफ हृदयसे बाहर नहीं निकलता, पसलि- निर्गमः॥ ३७९॥ योंमें तीर चुभनेकीसी पीडा, हृदयमें खोदनेके समान पीडा,नेत्र मिचेसे जाय,श्वास और हिचकी दिन प्रति हीनवात, वृद्धापत्त और मध्यकफके कोपसे जो दिन बढ़ते जायँ, जभि जलीहुईसी और खरखरी हो, सान्निपात होता है, उसमें उन्हीं दोपोंके क्रमसे हीन, कंठमें कांटे पडजायँ,वेहोशीमें मल मूत्रको त्याग देवें, अधिक और मध्यम रोग होते हैं । हृदयमें जलन, अधिक कफसे परिपूर्ण हो जानेसे कण्ठ कबूतरके यकृत, प्लीहा, ऑतें और फेफड़ा यह पक जाते हैं, अर्व और अधोमार्गसे राध और रुधिर निकलता समान कुंजे, मुख, ओष्ठ और तालु सूख जायँ, तन्द्रा और निद्रा होवे, जठराग्नि नष्ट होजाय, कांति (शरी है ॥ ३७८ ॥ ३७९ ॥ रकी शोभा ) जाती रहे,अधिक ग्लानि न हो, विपरीत अधिकवात हीनपित्त और मध्यकफ- चेष्टा करे और थोड़ा २ रुधिर मिला थूके, ये दारुण जन्य सन्निपातके लक्षण । सन्निपात कर्कोटक' नामसे प्रसिद्ध है ।। ३६९ ॥ ॥३७०॥३७॥३७२॥३७३॥३७४॥३७५ ।। प्रवृद्धहीनमध्यस्तु वातपित्तकफैश्च यः। तेनरोगास्त एवोक्ता यथारोगवला: अधिकवात, मध्यपित्त और हीनकफ श्रयाः । प्रलापायाससंमोहकम्पमू- संमोहकसन्निपातके लक्षण। ारतिभ्रमा॥३८०॥मन्यास्तम्भेन मृत्युश्च तत्राप्येताद्विशेषणम् । प्रवृद्धमध्यहीनैश्च सन्निपातो यदा अधिकवात, हीनापत्त और मध्यमकफके कोपसे भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा; जो सन्निपात होता है, उसमें उन्हीं दोपानुसार दोपबलाश्रयाः ॥ ३७६ ॥ प्रलापाया- ममसे रोग होते हैं । तथा प्रलाप, श्रम, मोह, कम्प, मूळ, वेचैनी,भ्रम और मन्या नाड़ीके, स्तम्भसे ससंमोहकम्पमूरितिभ्रमाः। एक मृत्युका होना ये विशेष लक्षण होते हैं. ॥ ३८० ।। " पक्षाभिघातस्तु तत्राप्येतद्विशेषतः । एष संमोहको' नाना सन्निपातः मध्यवात, अधिकपित्त और हीनक- फोल्वणसन्निपातके लक्षण। सुदारुणः॥ ३७७॥ मध्यप्रवृद्धहीनेश्च सन्निपातो यदा अधिवात, मध्यपित्त और हीनकफके कोपसे भवत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथा- जो सन्निपात होता है, उसमें उन्हीं दोपोंके अनुसार ममसे अधिक, मध्य और हानरोग होते हैं। प्रलाप, रोगवलाश्रयाः॥३८१ ॥ मोहमला- अग, यहोशी, कम्प, मूळ, चिचका कहीं न लगना, पमृगः स्यु स्तम्भकम्पशिरोग्रहा। भ्रम और एक औरका अंग रह जाना इन . विशेष कासधासौ भ्रमस्तन्द्रा · संज्ञानाशो लक्षणोंसे युक्त दागंण मनिपातको 'संमोहक' कहते हृदि ग्रहः ।। ३८२ ॥ खेभ्योरिक्त है।॥ ३७६ ।। ३७७ ॥ विसृजति तत्राप्येतद्विशेषणम् । अवाक (४०). वनसेने भापाटीकासहिते- विरावान्मृत्यश्च तन्द्री वा स्तब्धलो. सब प्रकार ज्यरोमें लो जो लक्षण होते है चनः। एप तयाणां नामानि याम्य ये सब लक्षण इस फूटपाकल मनिपायम होते क्रकचपाकलाः ॥ ३८३॥ हैं । यह दारुण व्याधि-यम, शंख और अमिक समान भयंकर है । इस सनिपातरोगो केवल मध्यवात, अधिकपित्त और होनकाके फोपसे प्यासमान ही माता है, सय शरीर जकड़ जाता जो सन्निपात होता है, उसमें उन्हीं दोपोयलानुसार और नेत्र पत्थरो समान स्थिर होजावे । तीन क्रमसे रोग होते हैं। मोह, प्रलाप, मूली, अंधकार- दिन पशान् यह मनुष्यको मार देता है । इस समि- दर्शन, कम्प, शिरोरोग, खाँसी, श्वास, भ्रम, तन्द्रा, पातरोगीको देखकर मूर्सलोग नानाप्रकारकी कपोल- अचेत होजाना, हृदयमें पीडा, मुखनासिका आदिसे कल्पना करते हैं। कोई कहता है कि, यह कुममय राधिरका निकलना,तन्द्राका होना और नकर यय- (आधीरातके समय } चौराहा, मशानभूमि आदि- राना ये विशेष लक्षण हैं । यह सन्निपात तीन दिनमें है। स्थानों में गया इससे यहां राक्षमीने दवालिया हो. मनुप्यको मार देता है । उपरोक्त तीनो-सन्निपाताके कोई कहता है कि-इसको देवाने प्रस लिया है, कोई . क्रमसे याम्य, क्रकच और पालक नाम जानने ॥ कहता है कि यक्षिणीने प्रसाद, कोई अक्षराक्षसकी ॥३८१ ॥ ३८२ ॥ ३८३ ।। याधा पतलाता है, कोई पिशासित और कोई गुह्य.. त्रिदोषोल्वण कूटपाकल सन्निपात कमसित करता है। कोई कहता है कि, इसके शिरमें ज्वरके लक्षण। चोट लगी है, कोई कहता है कि, इसने कुलदेवताका सर्वदपिः प्रकुपितं सन्निपातं नियोध, कोई नक्षत्रकी पीड़ा कहता है, कोई कहता है कि पूजन नहीं किया था अतः अब उन्होंने इसे दवालिया. मे। त्रयाणामपि दोषाणां सर्वरूपाणि इमने विपक्षण फरलिया है, इमप्रकार 'मूहलोग लक्षयेत् ॥ ३८४॥ यानि स्वरचिकि अनेक प्रकारको कल्पना करतेहै परन्तु बालोग इसको त्सायां रूपाण्युक्तानि कृत्स्नशः। ते: कूटपाकल सन्निपात कहते हैं ॥ ३८ ॥ ३८५ ॥ सर्वैरेव सम्पूर्णविज्ञेयः कूटपाकलः।। ३८६ ।। ३८७ ॥ ३८८ ।। ।।३८९ ।। ३९०.।। ॥ ३८५ च्याधिभ्यो दारुणेभ्यश्च कूटस्थैर्जायतेदोपर्यलिभिकूटपाकलम्। वजशस्त्राग्निसनिमः । केवलोच्या त्रयोदशविधं प्रोक्तं सनिपातस्य संपरमः स्तब्धाङ्ग स्तब्धलोचनः ।। लक्षणम् ।। ३९२ ॥ ॥३८६ ॥ त्रिरात्रात्परमेतस्य जन्तो. यह पलवान फूटस्थ दापोस उत्पन्न होता है इस- हरति जीवितम्।तदावश्यन्तु तं दृष्ट्वा कारण इसको फूटपाकल सन्निपात कहते हैं । इस मूढो व्याहरते यतः॥ ३८७॥ धर्पितो प्रकार, तेरहप्रकारके सन्निपातोंके लक्षण कोहहैं३९१॥ राक्षसेनूनमवेलायां चरन्ति ये । अम्बया ब्रुवते केचिद्यक्षिण्या ब्रह्मरा अथ सन्निपातचिकित्सा। क्षसेः ॥ ३८८ ॥ पिशाचगुह्यश्चैव तथान्यमस्तके हतम् । कुलदेवार्चना- 'वयते वापि हीनस्य हियत यच्छि- द्वीनं पितं कुलदेवतः।। ३८९ ॥ नक्ष- तस्य च । कफस्थानानुपूा वा अपीडामपरे गरकति चापरे । सत्रिपातज्वरक्रिया ॥ ३९२ ।। वदन्ति सन्निपातन्तु, भिपजाः कूट अव सन्निपातकी चिकित्सा कहते हैं-हीन दोपको पाकलम् ।। ३९०।- वढाकर और बढ़े हुए दोपको घटाकर कपके स्थानसे सीनों दोपोंके उल्वण होनेसे सन्निपात 'कुपिठ प्रारम्भ करके सन्निपातकी चिकित्सा करना उत्तम होता है उसमें तीनों दोपोंके सब लक्षण होते हैं। है॥३९२।।

ज्वराधिकारः ।। (४१) हीनस्य . वर्धनाद्धानिर्वृद्धंयोरिति जो मनुष्य सन्निपातरोगमें प्रलाप करते हुए मनु- निश्चयः। हापनादतिवृद्धस्य हीनयो- प्यफो घृतपान करावे, अथवा भोजनमें घृत देवे तो इन दोनों विधियोंसे रोगी मरजाता है ॥ ३९८ ॥ घृद्धिसम्भवः॥३९३ ॥ सन्निपातेन तप्यन्तं पावरुक्तालुशो- सन्निपातमें होन दोपको. बढ़ाना और बढ़ेहुए पिंको घटाना अथवा अत्यंत वृद्धको हीन करना और षिणम् । यःपाययेजलं शीतं स मृत्यु- निको बढाना इस प्रकार क्रिया करनी चाहिये३९३ / नरविग्रहः ॥ ३९९ ॥ ततः समत्वं दोपाणामामस्थानं सन्निपातरोगमें तृपासे पीड़ित तथा पसलियोंकी कफस्य तु । तत्रस्थानां क्रियां तद्व पीड़ा और तालुशोपसे पीड़ित रोगीको यदि शीतल दिति ज्वरविनिर्णयः॥ ३९४ ॥ जल पिलावे तो उस वैद्यको मृत्युरूप जानना ॥३९९ पश्चात् सब दोपोंमें प्रथम कफ और आमक स्थानसे समुद्रतरणं ह्येतद्वदन्ति भिषगी- चकित्सा प्रारम्भ करनी चाहिये अर्थात् प्रथम कफ श्वराः।मृत्युना सह योद्धव्यं सन्नि- और आमको दूर करना चाहिये, ऐसा सव. ज्वरोंमें पातचिकित्सुना ॥४०० ॥ नेश्चय है ।। ३९४॥ जो सन्निपातकी चिकित्सा करता है वह वैद्य यथा दोपोच्छ्यञ्चव ज्वराञ्छेपानुपा- साक्षात् मृत्युके साथ युद्ध करता है, उसको प्राचीन चरेत् । निर्हरोत्पित्तमेवादी ज्वरेषु वैद्य समुद्रसे तारनेवाला कहते हैं ।। ४००॥ समवायिपु । दुनिवारतरं तद्धि ज्वरा संनिपातार्णवे मग्नं योऽभ्युद्धरति तेषु विशेषतः॥ ३९५॥ मानवम् । कस्तेन न कृतो धर्मः जिस प्रकार दोप वढे हुए हों उसी प्रकार सम्पूर्ण काश्च पूजां न सोऽर्हति ॥ ४०१॥ ज्वरोंकी चिकित्सा करें। समवाथि (मिलेहुए) ज्वरमें प्रथम पित्तको शमन करना चाहिये. कारण, पित्त सन्निपातरूपी समुद्रमें डूबेहुए रोगीको जो उद्धार अत्यंत दुर्निवार्य है और ज्वररोगपीड़ित शरीर में करता है उसने कौनसा धर्म नहीं किया ? और यह विशेप कर दुर्निवार्य हो जाता है ।। ३९५ ।। कौनसी पूजाको प्राप्त नहीं होता है ? ॥४०१।। ' सन्निपाते क्षुधात यो भोजयेत्पिशि- श्लेप्मनिग्रहमेवादो कुर्याद्वयाधी त्रिदो- सौदनम् । स कथं भिषगाख्याति षजे। निरस्ते श्लेप्मणिह्यस्य स्रोतस्सृद्धा- 'लभेन्मूढो नराधमः॥३९६॥ टितेषु च । लाघवं जायतेह्यस्य तृष्णा जो नराधम सन्निपात ज्वरमें रोगीको क्षुधाके | चैवोपशाम्यति ॥ ४०२॥ समय मांस और भात खानेको देता है, वह मूर्ख सन्निपातज्वरमें प्रथम कफको दूर करे, क्योंक किस प्रकार वैद्य कहा जा सकता है ? ॥ ३९६ ॥ जय कफ निकल जायगा तब सब शरीरके छिद्र शुद्ध सन्निपाते तु दाहार्थ. यः सिञ्चेच्छी- होजायेंगे और शरीर भी हलका हो जायगा फिर तृपा तवारिणां । आतुरः स कथं जीवे. भी शांत हो जायगी ।। ४०२।। द्भिपग्वा स कथं भवेत् ॥ ३९७ ॥ लङ्घनं वालुकास्वेदो नस्यं निष्ठीवनं सन्निपातरोगमें दाहसे पीडित मनुप्यको जो वैद्य तथा । अवलेहोऽजनश्चैव प्राक्प्रयोज्यं शीतल जलसे सींचता है तो वह रोगी कैसे जी सक- ता है ? और वह वैद्य वैद्य कैसे होसकता है ३९७ ।। त्रिदोषजे ॥ ४०३ ॥ सन्निपातेन लंघन, वालुकास्वेद, (चालूसे सेककर पसीना मतुज विलपन्तन्तु यो निकालना), नास देना, निष्ठावन(कुल्ले करना), अव- घृतम् । पाययेद्भोजयेद्वापि तो च | लेह और अंजन ये सब सन्निपातमें प्रथम प्रयोग स्यातामुभी वधम् ॥ ३९८ ।। कराने चाहिये ।। ४०३ ।। ,

(४२)
वासन भापाटीकासहिते-
H
.
विरानं पभरात्रं वा दशरावमथापि शस्तं गुलद्वितस्यादो विधाय कर-
वालिनं संनिपात' कादारोग्यद लग्रहम्॥४०९॥
र्शनात् ।। ४०४॥
मनिपातमें मामफारसे लंगन किये हुए मनु-
तीन या पाँच गनि अथवा सात गनि किया दायको प्रथम यबल धारण कराना चाहिये ।। ४८९८
राधि या आरोग्य होनेपर्यत सन्निपातमें लंघन कराने
लाजसहकपथ्यं स्यासन्धनाव-
पाहिये ।।४०४॥
णितम् । तज्जीयंत्यविनेन रोगी
दोषाणामे साशक्तिले हने या सहित
जीवेत्तदा युवम् ॥ ४१०।।
rणुता । नहि दोपक्षयं कश्चित्सहते
लखनादिकम् ॥ ४०५॥
सॉलॉक सीको सधे नमक के साथ मिलाकर
सन्निपातरोगोको देये,जो यह अच्छे प्रकारसे पयजाय
जितने दिनोंतक रोगी लंधन महमके उतने दिनों और कुछ रिफार न लावे तो रोगी निशय जीता'
पर्यत दोषोंका चल जानना चाहिये क्योंकि दोपोंके है॥४१०॥
नाश होनेपर ऐसा कौन मनुष्य है जो लंघनफो सह रक्तपित्तहरत्वेन दाहज्वरकृत तथा|
लेंचे।॥४०५॥
सक्तवः शीतवीर्याः स्युलोजपूर्वा
कफपित्ते द्रवे धातू सहेते लखनं महत् । हिता न ते॥४११ ॥
आमक्षयादूर्ध्वमपि वायर्न सहते सीलोंके सनरतपित्त और दाहवरको नष्ट करने
क्षणम् ॥४०६॥
है इसकारण शीतवाध्य है, शीतवीर्य होने के कारण.
कफ और पित्त ये दोनों पतले पदार्थ हैं, इसकारण सनिपातमें हितकारी नहीं हैं ।। ४११ ।।
ये बहुत लंधनोंको सह सकते हैं। आमके क्षय होनेपर, पाचनो दीपनो लाजमण्डस्तनोष्ण
केवल वायु शेप रहजाता है, यह एक क्षण भी लंघन | इप्यते । अतोऽयं दशमूलादिसाधि-
नहीं सह सकता है ।। ४०६॥
तोऽयं भिषग्मतः॥१२॥
"उत्तम, हीन और अधिक लंघन खीलोंका माह-पाचन, दीपन और उष्ण है। इस
होनेके लक्षण ।
लिये इसको दशमूलादि औषधियों काथमें सिद्ध
फरके देना चाहिये ।। ४१२॥
प्लान्यङ्गगौरवे श्रद्धाषिकृतिहीनलद्धि-
ते । प्रकांक्षालाघवो प्लानिः स्वस्थता
पञ्चमुष्टिकएपण विकण्टककृतेन च।
सुप्रसनता ॥ ४०७ ॥ उपद्रवनिवृत्तिश्च
त्रिदोपशमनार्थ विकण्टेनैव साध.
सम्यतिलक्षणम् । संमोहः सन्धि येत् ॥ ४१३ ॥ यक्कोलकुलत्थानां
शधिल्यं वातरक्चातिलचित॥ ४०८ ॥ सद्गामलकशुण्ठ्ययोः । एकैकं मुष्टि-
शविरम ग्लानिं, भारीपन, अश्रद्धा ये विकार भादाय पचेष्टगुणे जले ।। ४१४ ॥
होनलंघनके हैं । भोजनमें इच्छा, शरीरमें। पञ्चमुष्टिक इत्येष वातपित्तकफापहः।
हलकापन, ग्लानिका नाश, स्वस्थता, प्रसन्नता और शस्यते गुल्मशूले च श्वासे कासेक्षये
पूर्ण उपवाको निवृत्ति ये अच्छे प्रकारसे लंघन होनेके । ज्वरे ॥४१५ ॥
लक्षण हैं। माह, संधियों में शिथिलता और वातके
पंचमुष्टिकयुपकी ओपधियोंकी गौखुरुके काथमें
रोग ये लक्षण अत्यंत लंघन करनेमें होते हैं ॥४७॥ डालकर विधिपूर्वक यूष सिद्ध कर त्रिदोपशमन करनेके,
लिये देवे । जौ, बेर, कुलथी, मूंग और- आमले
॥४.८॥

ज्वराधिकार (४३) , प्रत्येकको एक २ मुट्टी लकर अठगुने जलमें पकाये, सुरसार्जकनिर्यासः समधुव्योपसन्ध- जव ग्रंप पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छान लवे फिर उसमें थोडासा साठका चूर्ण डाल देवे । वः । महाश्लेप्मानिलोद्रेकसंज्ञानाश-. इसको पंचमुष्टिकचूप कहत हैं। यह पंचमुष्टिकयुप विमोक्षणः ॥४२२॥ वात, पित्त और कफनाशक है तथा गुल्म, शूल, श्वास, तुलसीका स्वरस, शहद,राले, त्रिकुटा और सेंधा- खाँसी, क्षय और ज्वरमें हितकारी है।।४१३||४१४॥ नोन इन सबको एकत्र मिलाकर चाटे तोवढे हुए कफ- ॥४१५॥ वात नष्ट हों तथा चैतन्य उत्पन्न होता है ।। ४२२ ।। यवकोलकुलत्यैश्च मुद्गामलकसंयुतः । मधूकसारसिन्धूत्थवचाषणकणा समाः। धान्याकविश्वयुक्तच यूपो वातकफा श्लक्ष्णं पिष्ट्वाभ्भसा नस्यं कुत्सिंज्ञा- पहः॥४१६॥ सप्तमुष्टिक इत्येप सन्नि प्रबोधनम् ॥ ४२३॥ पातज्वरापहः । कफवातामदोषहनः कण्ठद्धक्रशोधनः॥४१७ ॥ आर्द्रक- महुएका सार, सैंधानोंन, वच,काली मिरच और पीपल इन सवको समान भाग लेकर जलमें बारीक स्वरसोपेतं सैन्धवं सकटुत्रयम् । आ पीसकर नास लेनेसे संज्ञाका ज्ञान होता है ।। ४२३।। कण्ठं धारयेदास्ये निष्ठीवेञ्च पुनः पु- स्विन्नमामलकान्पिष्ट्वाद्राक्षया सहसंम- नः॥४१८ ॥ तेनास्य हृदयेश्लेप्माम- जेत् । विश्वभपजसंयुक्तं मधुना सह न्यापार्धशिरोगलात् । लीनोऽप्याकृ- प्यते शुष्को लाघवंचास्य जायते४१९ लेहयेत् ।। ४२४ ॥ तेनास्य शाम्यते मूर्छा कासः श्वासस्तथैव च ॥४२५॥ पर्वभेदो ज्वरो मूर्छा निद्राधासगला- मयाः । मुखाक्षिगौरवं जाड्यमुत्क्लेश- सीजेहुए आमले, मुनका और सोंठ इन सबको चोपशाम्यति॥४२०॥ सकृष्वित्रिचतुः एकत्र पीस शहद के साथ चाटनेसे मूर्छा, खाँसी और श्वास ये सब दूर होते हैं ।। ४२४ ।। ४२५॥: कुर्यादृष्ट्वा दोपवलावलम् । एतद्धि परमं प्राहुर्भेषजं संनिपातिनाम् ४२१।। अष्टाङ्ग मधुना लिह्यादाकस्वरसेन वा। संमोहंदारुणं हन्ति तन्द्राकास- जी, वेर, कुलथी, मूंग, आमले, धनियाँ समन्वितम् ॥ ४२६ ॥ और सोंठ प्रत्येकको ४-४-तोले लेकर पूर्वोक्त विधिसे चूप बनावे । इसको सप्तमुष्टिकचूप कहते अष्टांग अवलेहको शहद अथवा अदरखके रसमें है । यह सप्तमुष्टिकयूप वातकफनाशक तथा सान्नि-मिलाकर चाटनेसे तन्द्रा और खाँसी संयुक्त बेहोशी: पातज्वर, कफ, वात और आमदापनाशक है एवं दूर होती है ।। ४२६ ।। कंठ, हृदय और मुखको शुद्ध करता है । सैंधानोन, कटफलं पुष्करं भागीं व्योष यासश्च सोंठ, मिरच, पीपल इनके चूर्णको अदरखके रसमें कारवी । श्लक्ष्णंचूर्णीकृतश्चैतन्मधुना मिलाकर मुखमें धारण करे,जो कफ आवे तो उसको वारंवार थूकता रहे। इस प्रकार करनेस हृदय,मन्या, सह लेहयेत् ॥ ४२७ ॥ एषाक्लेहिका पसली, शिर और गलेमें लिसाहुआ भी कफ खिंचकर हन्ति सन्निपातं सुदारुणम् । हिका वाहर निकल जाता है और शरीर हलका हो जाता है, श्वासश्च कासश्च कण्ठरोग नियंच्छति संधियोंकी पीड़ा, ज्वर, भूछी, निद्रा, श्वास, गलरोग, मुख नथा नेत्रोंकी गुरुता, शरीरकी जड़ता और उप- ॥ ४२८॥ एतद्योज्यं :कफोद्रेके चूर्ण- काई दूर होती हैं । इसप्रकार दोपोंका बलायल माईकजे रसे। ऊर्ध्वजन्नुगदनी या विचार कर दो, तनि या चार बार करे, यह सान्नि: सायंकाविलेक्षिका। अधोरोगहरी पातरोगियोंकी उसम औषधि है ।। ४१६-४२१।। . या तु सा पूर्व भोजनान्मता ॥४२९ ॥. - (४४) वनसेने मापारीकासहित- 1 । . फायफल, पोदकरमूल, भारंगो, गिटा, जयामा स्फुटित जिदामुच्छुकां मधुपिटया। और फलोजी इन सबकी गया महीन पीसकरा- द्राक्षया साश्यया चास्यं लेपयंत्सं. दमें मिलाकर चांद तो दागणरानिपाय, दिया, न्याम, नितिनः ॥ ४३५॥ घस्जिदोजहां सॉसी और कंठरोग नष्ट होते है। इस गुणको सिन्धुभ्यूपर्णः साम्लवेतसः ॥४३६॥ काकी अधिकता अदरक रसग मिलाफर पर करे । जो अबला, जलन और अधोगत रोगीको ভন্ন সশসল ফখ গান লাগাঃ हरण करनेवाट उनको मायाफे नगय मातानसे दोने में गम अधिरोप वरपर फरते ६ या जाम प्रथम देगा चाहिये ।। १२७ ॥ ४२८ ॥ १२९॥ यो मरमरा और पीसी पर दी हैंमार मुना मरिच पिप्पली शुण्ठी पक्ष्या लोभ्रं हद अधया भीमें पीसकर जिलापर. सेर करना सपुष्करम् भूनिम्यकटुका मुष्ठं यवा- चाहिये। तो जियाद होगायोमानान और नी कट्फलं तथा॥ ४३० तानि त्रियुटेक पूर्णको अगलयन रसमें मिलाकर पिसे ॥१३४॥1॥४३५॥ ४३६ ।। समभागानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत । स्वदोद्गम भ्रष्टकुलत्यचूर्णनिपातनं प्रस्वंदे कण्ठरोधं च सन्धी मर्दनमि- शस्तमिति वन्ति । मुत्राश तस्मिा प्यते । एतदुद्धलनं मोक्तं सन्निपातहरं न्यहुपिच्छिलत्वाच्छीतस्य जन्तीः परम् ।।४३२॥ परिता सरत्वात् ।। ४३७ ।। त्रिगुटा, हरड़, लेप, पोहकरमूल,चिरायता, फुटफी, कूठ, अजवायन और फायफल इन सयको समान मभिपात मग्में घात पसीना भावे सो सुनाई भाग लेकर पारीक पूर्ण करले, इसको अधिक पसी- फुलयाको पीसकर शरीरमें गर्दन करना चाहिये । हम के आनेमें, कंठरोध और मंधियोंकी पादा होनेपर पसीनेमें पन पिच्छिलता होने के कारण और उसमें शरीरमें मर्दन करे । यह उत्तम उदूलन सन्निपान- शीघ्र ही गीतफें फैलजानेसे गत्काल रोगीको मृत्युदोला नाशंक है ॥ ४३० ॥ ४३१ ।। ६॥ ४३७ ॥ सर्वेषु सन्निपातेपु नक्षादमवचारयेत्। चूर्ण यथा कट्रफलकृष्णजीरक लोभ्रं शीतोपचारिक्षौद्रं स्थाच्छीतं चात्र गवां काननविटपुरातनम् । तिता विरुध्यते॥ ४३२॥ सपथ्या लवर्ण तजिनमुलनं स्वेद- सम्पूर्ण सन्निपातोंमें मधु नहीं देना चाहियोफारण विकारजित्परम् ।। ४३८ ।। यह है कि, मधुभक्षण करनेफे पन्नात् शतिल उप फायफल, कालाजीरा, लोध, पुराने आरने उपले, चार करनेकी आवश्यकता होती है, किन्तु सन्निपातमें पुटकी, हरड, नमक और अखन इन सयको पाकि शीतल उपचार वर्जित है ॥ ४३२ ।। पीसकर शरीरमें मटनेसे पसीनका आना बंद होजाता क्रियाभिस्तुल्यरूपाभिः क्रियासांक- हे ॥४३८॥ यमिप्यते । भिन्नरूपतया तास्तु न भूनिम्बःकारवी तितावचा कटफलज कुर्वन्ति हि दूषणम् ॥४३४ ॥ रजः । उडूलनं विदोपोत्थे ह्यभिष्य- जो एक समयमें एकसी दो चिकित्सा की जाती दिनि च ज्वरे ।। ४३९ ॥ हैं उनको संकरक्रिया कहते हैं, उक्त क्रिया पृथक् चिरायता, कालाजारा,कुटफी, पच और कायफल “पृथक् करनेसे दोपकारक नहीं होती हैं ।। ३४४ ।। इन सबको चारीक पीसफर जदूरन करे, गह त्रिदोष- यदास्वल्पानिलको तालुक्कोमगतो. ज्वर और आभप्यन्दिज्वरमें हितकारी है ।। ४३९ ॥ श्रितो कातामधिकं शोषं जिहा-- बिल्वोऽग्निमन्धः स्योनांकःकाश्मरी या: खरतां तथा ॥ ४३४ ॥ तदा तां पाटला स्थिरा। त्रिकण्टकः पृष्टपर्णी . .

ज्वराधिकारः
'(४५)
वृहती कण्टकारिका । दशमूलमिदं विदोष ज्वरमें देवे, यदि दस्त लानेकी आवश्यकता
वाससन्निपातज्वरापहम् ॥४४०॥ अ हो तो निसोतका चूर्ण डाल कर देवे ।। ४४५ ।। ।
विपाकानिललप्मतन्द्रापाचार्तिकास- दशमूली शठी शृङ्गी पोकरं सदुरा-
नुत् । पिप्पलीचूर्णसंगुक्त हत्कण्ठम लभम् । भाी कुटजवीजच पटोलं
हनाशनम् ॥४४१॥ महान्ति यानि कटुरोहिणी ॥ ४४६ ॥ अष्टादशाङ्ग
मूलानि काष्ठग नि यानि च। तेषां इत्येपः सन्निपातज्वरापहः । कासह-
तु वल्कलं
ग्राह्यं द्वस्वमूलानि गृहपार्धार्तिश्चासहिक्कावमीहर:४४७॥
कृत्स्नशः॥४४२॥
दशमूल, कचूर, काकडाशिंगी, पोहेकरमूल,
वेलगिरी, अरणी, सोनापाठा, कुम्भेर, पाढल, धमासा, भारङ्गी, इन्द्रजी, पटोलपत्र और कुटकी इन
शालपर्णी, पृश्निपर्णी, गोखरू, यही कटेरी और सब औषधियोंको अष्टादशांग कहते हैं। यह अष्टादशांग
कटेरी इन सब औपधियोंके समुदायको दशमूल कहते क्याथ सन्निपातज्वर, खांसी, हृदयरोग, पसलियोंकी
हैं । यह दशमूल,श्वास, सन्निपातन्वर, अजीर्ण, वात, पीडा, श्वास, हिचकी और वमनको, दूर करता है ।।
कफ, तन्द्रा, पाववेदना आर खांसीको नष्ट करता है। । ४४६।। ४४७॥
इसमें पीपलका चूर्ण मिला लिया जाय तो हृदय और दशमूलीकपायन्तु पुष्कराहकणायुत-
• कंठवरोधको दूर करता है । इनमें जिन औपाधि-
योको बढी जड़ें हैं और जो छालसे लिपटी हुई हैं। विते॥४८॥
म् । सन्निपातज्वरे देयं श्वासकासतृषा-
उनके छाल रेने चाहिये और जिनकी छोटी जड़ें हैं
उनका सर्वांग लेना चाहिये ॥४४०-४४२ ।।
दशमूलके क्याथमैं पोहकरमूल और पीपलका
दशमूलस्य निर्मूहः कट्फलादिरजो-चूर्ण
डालकर श्वास, खांसी और तृपा युक्त सन्निपा-
तज्वरमें देना चाहिये ।। ४४८ ॥
गुतः तुल्याईकरसोपेतो मृत्युकल्प
ज्वरं जयेत् ॥ ४४३॥
वृहत्या पुष्कर भागीं शठी शङ्गी दुरा-
दशमूलके निर्वहमें कायफल आदिका चूर्ण और
लभा । वत्सकस्य च वीजानिपटालं
समानभाग अदरखका रस मिलाकर पान करे तो कटुरोहिणी ।। ४४९ ।। वृहत्यादिगणः
मृत्युकल्पके समान ज्वरको भी नष्ट करता है।४३३॥
प्रोक्तःसन्निपातज्वरापहः श्वासादि-
पञ्चमृलीकिरातादिगणो योज्यस्त्रि पुच सर्वेषु हितःसोपवेषु च ॥ ४५०॥
दोपजे । पित्तोत्कटे च मधुना कणया वडी केटरी, कटेरी, पोहकरमूल, भारङ्गी, कचूर,
वाकफोत्कटे॥४४४॥
काकडा शिंगी,धमासा,इन्द्रजी,पटोलपात और कुटकी
त्रिदोपज्वरमें पञ्चमूलके क्वाथमें किरातादिगणकी| इन औषधियों के समूहको वृहत्यादिगण कहते हैं। यह
औपधियोंको मिलाकर प्रयोग करे एवं पित्ताधिकसन्नि- वृहत्यादिगण सन्निपातश्वरनाशक है तथा श्वासादि सब
पातमें पञ्चमूलके क्वाथको शहद के साथ और कफा- उपद्रव सहित त्रिदोपञ्चरम हितकारीह४५०॥४४९॥
धिकमें पञ्चमूलकेक्वाथको पीपलके साथदेवे ॥४४४॥ सठीपुष्करमूलं च व्याघ्री शङ्गी दुराल-
चिरज्वरे वातकफोल्बणे वा त्रिदोषजे भा। गुडूची नागरं पाठा किरातं कटु-
वा दशमूलमिश्रः । किराततिक्तादि. रोहिणी॥४५१॥ एप शट्यादिको वर्ग:
गणःप्रयोज्य:शुद्धार्थनेवानिवृता सन्निपातज्वरापहः। कासद्हपार्धा-
तिश्वासे तन्द्रयाश्च शस्यते ॥ ४५२ ।।
दशमूल,'चिरायता, नागरमोथा, गिलोय और कचूर, पोहेकरमूल, कटेरी, काकडाशिंगी,धमासा,
सोंठ इनका क्याथ पुराने वातकफोल्वणज्वरमें अथवा | गिलोय, सोंठ, पाढ, चिरायता और फुटकी इन सब-
३
विमिश्रः॥४४५॥

(४६)
वनसेने भाषाटीकासहिते-
औपधियों के समूहको शट्यादिवर्ग कहते हैं । यह कायफल, नागरमोथा, वच, पाठ, पोहकरमूल,
शट्यादिवर्ग सन्निपातम्वरनाशक है, तथा ग्यांसी, जीरा, पित्तपापडा, देवदारु, हरड, काकडाशिंगी,
हृदयरोग, पसलियोंकी पीडा, श्वास और तन्द्रामें पीपल, चिरायता, सोंठ, भारङ्गी, इन्द्रजी, कुटकी,
हितकारी है ॥ ४५१ ॥ ४५२ ।।
कचूर, मुगन्धत्तण और धनियां इन सबको समान
भाग लेकर क्वाथ बनाकर हींग और अदरका
शटी पुष्करमूलन्तु गुडूची विश्वभेष-
रस मिलाकर पान करे तो. कर्णमलोत्पन्न सूजन,
जम् । विकण्टकं वायमाणा पिप्पली
गलाश्रित शोथ, कफवातज्वर, खांसी, श्वास,हिचकी
सदुरालभा॥४५३॥ व्याघ्री पर्पटकं
और हनुस्तम्भादिरोग दूर होते हैं। इसमें दशमूलका
रानाऽभया कटुकरोहिणी । देवदारु
काथ मिलाकर पीये तो यह सन्निपातवर और
वचा भाङ्गी समभागान कारयेत् ॥ सर्वप्रकारके अभिन्यास घरको दूर करता है ।-
॥४५४॥ एप शव्यादिको वर्गः सत्रि ॥४५७ ॥ ४५८॥४५९ ॥ ४६०।।
“पातज्वरापहः । कासं श्वासं दिवा दारुनागरभूनिम्बधान्यत्तिक्ताकलि-
निद्रां रात्री जागरणं तथा । मुखशीर्ष गजैः । गजाहादशमूलाग्देर्मृत्युकल्प
तृपां दाहं त्रिदोपञ्च नियच्छति॥४५५।। ज्वरं जयेत् ॥ ४६१ ॥ अष्टादशाङ्ग
कचूर, पोहेकरमूल, गिलोय, सोंठ, गोखुरु, धन इत्येष सन्निपातज्वरापहः । कासह-
‘पसा, पीपल, धमासा, कटेरी, पित्तपापडा, रायसन, दग्रहणार्धातिवासहिकावमाहरेत४६२॥
हरड, कुटकी, देवदारु, वच और भारङ्गी इन सब
आपधियोंके समुदायको वृहच्छट्यादिवर्ग कहते हैं।
देवदार,मोठ,चिरायता,धनियां, घुटकी, इन्द्रजी,
और नागरमोथा, "इनके
यह शब्यादिवर्ग सन्निपातज्वर, खांसी, वास, दिन गजपीपल, दशमूल
में सोना, रात्रिमें जागना, मुखशोप, नृपा, दाह और काथको अष्टादशांगफाथ कहते हैं । यह अष्टादशांग,
त्रिदोपको नष्ट करता है ।। ४५३ ॥ ४५४॥४५५ ॥
काथ सन्निपातन्वरको नष्ट करता है तथा खांसी,
पित्ताधिक्ये तु शट्यादिहत्यादिः और वमनको दूर करता है ।। ४६१ ॥ ४६२ ।।
हृदयको पीडा, पसलियोंकी पांडा, श्वास, हिचकी
कफाधिके । वात्तोत्तरे सत्रिपाते कद-
फलादि प्रशस्यते ॥४५६॥
गुडूची चन्दनं पद्मनागरेन्द्रयवास-
वित्ताधिकसन्निपातमें शट्यादिकाथ, कफाधिक
कम् । अभयारग्वधोशीरपाठा धान्या-
मन्निपातमें वृहत्यादि और वातावकसनात दरोहिणी ॥ ४६३॥ कपायं पायये-
कदफलादिक्वाथ हितकारी है ॥ ४५६ ॥
देतत्सिप्पलीचूर्णसंयुतम्। तन्द्राकास-
कटुफलाब्दवचापाठापुष्कराजाजिप-
ज्वरश्वासपिपासादाहनाशनः॥४६॥
पटः । देवदार्वभयाशङ्गीकणाभूनि-
विण्मृत्वानिलविष्टम्भाविदोपमभवस्य
म्बनागरः ॥ ४५७ । भाकिलिङ्गक-
च । गुडूच्यादिगणो ह्येष पाचनो
टुकाशटीकत्तृणधान्यकैः । समाशेः
दीपनः परः।।४६५॥
साधिता काथो हिंग्वाकरसर्युतः॥ गिलोय, लाल चन्दन, पद्माख, सोंठ, इन्द्रजी,
॥ ४५८ ॥ कर्णमृलोद्भवं शोथ हन्ति जवासा, हरड, अमलतास, खस, पाढ, धनियां,
.नागरमोथा और कुटकी इनके काथमें पीपलका
मन्यागलाश्रयम् । कफवातज्वरं श्वासं
कासं हिकां हनुग्रहम् ॥ ४५९ ॥
चूर्ण डालकर पान, करानेसे तन्द्रा, खांसी, ज्वर,
श्वास, पियास, दाह, विदोपके कुपित होनेसे मल,
दशमृलयुतो. ह्येप सन्निपातज्वरं
जयेत् । अभिन्यासं समस्तश्च कटफ-
मूत्र और वायुका अवरोध ये दूर होते हैं । यह गुडू-
च्यादिगण पाचन और दीफ्त है ।। ४६३ ॥ ४६४ ॥
लादिनियच्छति ।। ४६० ।
॥४६५ ॥

अमृतादशमूलीभ्यां साधितं विधि- पिकं जलम् ।।४७२ ॥ तत्सन्निपातदा- वज्जलम्सन्निपातन्याहन्यात्त्योद हनं पानमाले प्रपूजितम् । दीर्घकाल- 'शविधं नृणाम् ॥४६६॥ प्रयुक्तानां ज्वरिणाममृतोपमम्।।४७३।। । 'गिलोय और दशमूला झारा विधिपूर्वक सिद्ध- फायपल, त्रिफला, देवदार, चन्दन, फारसा, किया हुआ पाय रोरह प्रकारके सन्निपातोंको नष्ट निमुटा, पास और यस इनका फाथ बनाफर पान करता है।॥ ४६६ ॥ फरनेसे समिपातवर और उसकी हा दूर होती है। विपशुण्ठी दशमूली छिन्ना पाठा च या काय पाहुन दिनोंके ज्वरपाले मनुष्यके लिए पिप्पलींद्रयवः । सकिराततिक्तवासा अमृतफे समान है ॥ ४७२ ॥ ४७३ ।। शमयति हतोजसं सद्यः ॥४६७॥ समुस्तं पञ्चमूलच दद्याद्वातोत्तरे गदे। अतसी, माठ, दशमूल, गिलोय, पाद, पीपल, भृशोणं वा सुखोष्णं वा दृष्ट्वा दोप- इन्द्रजी, चिरायना और अहसा, इनका क्याथ "बरसे क्षीणरोगीको तत्काल आगेग्य करता है ४६७ अलावलम् ॥ ४७४ ॥ • यूपणदशमूलशुण्ठीभाईछिन्नोद्भ- पंचमूल और नागरमोथा इनका फाथ बनाकर वोद्भवः कायापीतःशमयति सहसा दोपोंके पलायलको विचार कर अधिक उष्ण अथवा मंदोष्ण चानोल्यण सन्निपातज्वरमें देवे ॥ ४७४ ।। ज्वरमुग्रं सन्निपाताख्यम् ॥ ४६८ ॥ त्रिपुटा, दशमूल, मोठ, भारंगी और गिलोय! कफोत्तरे वृहत्यादिगणश्च दशमूलजः। परूपकाणि त्रिफला देवदारु सकट- इनका क्याथ पान करनेसे शीघ हो सनिपात' ज्वर दूर होता है ॥ ४६८॥ फलम् । पित्तोत्तरे नृणामेतत्सन्निपात द्विपञ्चमूली पप्रथा विश्वा गृध्रनखी- चिकित्सितम् ॥ ४७५॥ द्वयम्। कफवातहरः काथः संन्निपात- कंफाधिक- सनिपातमें युदत्यादिगणकी औपपि, हरः परः॥ ४६९॥ दशमूलकी औपधि, फालसेकी छाल,त्रिफला, देवदार और कायफल इनका काढा देवे ॥ ४७५ ।। दशमूल, बच, सोंठ, घर और झडयेर (किसीके मतसे कांआठोही और मकोय) इनका फाथ सन्नि- मुस्ता पर्पटकोशीरदेवदारुमहोप- पात ज्वरको नष्ट करता है ।। ४६९ ॥ धम् । त्रिफला धन्वयासश्च नीली सिंहास्यपर्पटारिष्टं यष्टिधान्याकनाग- कांपिल्लकं त्रिवृत् ।। ४७६॥ किरातति- रम् ।दास्यगन्धन्द्रयवाः श्वदंष्टा- क्तकंपाठाबला कटुकरोहिणी । मधुकं ग्रन्थिकं तथा ॥ ४७० ॥ एषां कंपायम- पिप्पलीमूलं मुस्ताद्यो गण उच्यते : :'हनि सन्निपातज्वरे पियेत् । श्वासाति- ॥४७७ ॥ अष्टादशाङ्गमुदकं सन्निपा- -सारकासन्नं शलारुचिहरं परम् ४७१॥ तज्वरापहम् ।।४७८ पित्तोत्तरे सन्नि- पाते हितमुक्तं मनीषिभिः । मन्या- अडूसा, पित्तपापडा, नाम,मुलैठी,धनियां, सोंठ, देवदार, वच, इन्द्रजी, गोखरू और पीपलामूल, गदे ॥ ४७९ ॥ स्तम्भ उरोघाते हनुस्तम्भे .शिरो- इनका काथ बनाकर दिनमें पान करनेसे सन्निपात- ज्वर, श्वास,अतिसार, खाँसी, शूल और अरुचि दूर खस, देवदार, सोंठ, त्रिफला,धमासा,नीलकी छाल, पित्ताधिक सन्निपातमें नागरमोथा, पित्तपापड़ा, कट्फलं त्रिफलादारु चन्दनं संपरूप- कवीला, निसोत, चिरायता, पाट, खिरैटी, कुटकी, कम् । कटकं पद्मकोशीविपत्का- मुलेठी और पीपलामूल इन सब औपाधियोंके समूहको मुम्ताद्यगण कहते हैं । यह अष्टादशांग काथ सन्निपा- , होती है ॥ ४७० ।-४७१॥

(४८) वङ्गसेने भाषाटीकासहिते- तज्वरनाशक है, विशेष कर पित्तोल्यण सन्निपात में स्या वक्ष्यामिलक्षणम्॥१८६॥ उन्मी- अतीव हितकारी है तथा मन्यास्तम्भ, ऊरुस्तम्भ,हनु लितविनिर्भुग्ने परिवर्तिततारके। स्तम्भ और शिरोरोगमें अत्यन्त हितकारी है।।४७६|| ॥७७ ॥ ४७८॥ ४७९ ॥ भवतस्तस्य नयने लुलिते चलपक्ष्मणी व्योषाहत्रिफलारिष्टपटोलीतिक्तव- ॥१८॥ निवृत्ताननदन्तोष्ठं मुहुरुत्ता- त्सकैः । सभूनिम्बामृतापाठस्त्रिदोप- नशायिनम् । पिच्छिलोच्छिन्नतन्तुश्च .. ज्वरजिज्जलम् ॥ ४८० ॥ कण्ठे श्लेप्मास्य गच्छति॥४८८ ॥ त्रिकुटा,त्रिफला, नीमकी छाल, पटोलपत्र,कुटकी, कण्ठमार्गविरोधश्च वैकृतं चोपजायते । इन्द्रजौ, चिरायता, गिलोय और पाढ इनका काथ सोऽर्वाचित्ररात्रं साध्यः स्यादसाध्य- त्रिदीपजनित ज्वरको नष्ट करता है ॥ ४८०॥ स्तु ततः परम् ॥ ४८९.॥ बिल्वकं त्रिवृता दातीसमूलं चतुर आमाशयमें आम और कफके संचित होनेसे जो ड्रयलम् । पक्कं कषायं विस्राव्य नीली-दृढ़ सन्निपात ज्वर उत्पन्न होता है उसके शांत होने- चूर्णविमिश्रितम् ॥ ससपिक पिवे पर शीघ्रही तन्द्रा उत्पन्न होती है। पतले रस और सूर्ण सन्निपाते विरेचनम् ॥ ४८१ ॥ दूध आदि पदार्थोंको सेवन करनेसे, दिनमें सोनेसे 'बेलगिरी, निसोत, दंती और अमलतास, इनकी दुर्बल और अल्पवायुवाले मनुष्यके कफ कुपित होकर जडके काथमें नीलका चूर्ण और घी मिलाकर पान वायुके मार्गको रोक्कर धमनियों में प्रवेश करके घोर करे तो सन्निपातरोगीको अच्छे प्रकारसे विरचन हो । तन्द्राको उत्पन्न करता है । अव उस तन्द्राके लक्षण जाताहै ।।४८१॥ कहता हूँ। तन्द्रापाले मनुष्यके नेत्र आधे मिचेसे कम्पप्रलापनं यस्यसंज्ञानाशश्च दारु- अथवा टेढसे प्रतीत हों, तारोंको इधर उधर फेरे, णः। रसैश्च लाववतैश्च कलिङ्गे शश- नेत्र जड़से हो जायें तथा गिरेसे मालूम हो, पलक स्थिर हो जाय,होंठ उपरको सिमट जायँ, दांत वाह- तितिरः॥ १८२ ॥ तर्पयेत्मापुराणेन से दीखने लगें, पारंवार चित्त होकर सोवे,चिपकता सर्विषाऽभ्यंजयेदपि। बलारानागुडू- हुआ गाढे. कफका टेंट मुखमें आवे और उससे च्यायेस्तेलेच, परिषेचयेत् ॥ ४८३॥ कंठमार्ग रुक जाय,इसप्रकार अनेक विकार होते हैं। जिस रोगीके 'कम्प "हो, प्रलाप करे और संज्ञा यह तन्द्रा तीन दिनतक तो साध्य है पश्चात् असाध्य जाती रहे तो उसको लवा, बटेर, चिड़ा, कबूतर | हो जाती है ।। ४८४॥ ४८५॥४८६॥४८॥४८८ ॥ और तीतर इनके मांसरसको पिलाये, पश्चात् रोगीके ॥ ४८९॥ शरीरसे पुराने.धीको मलकर तर्पण करे तथा खिरैटी, ज्योतिप्मत्यास्तथा तैलं मूलं पिण्डा- रायसन और गिलोय इत्यादिक द्वारा सिद्ध किया रकस्य च तन्द्राविनाशनं श्रेष्ठं नस्य- हुआ तेल गरीरमें लगाव ।। २८२ ॥ ४८३ ।। कर्मणि योजितम् ॥ ४९० ॥सन्धवं तन्द्राके लक्षण। श्वेतमरिचं सर्पपः कुष्टमेव च । मृत्रेण. आचितामाशयकफे . सन्निपातज्वरे पिष्ट्वा वस्तस्ये नस्यं तन्द्राविना शान्तेऽप्यवश्यं तस्याशु तन्द्रा शनम् ॥ ४९१ ॥ समुपजायते ॥ ४८४ ॥अभिद्रवरस- मालकांग का तेल और पिंडारको जड दोनको क्षीरदिवास्वप्ननिपवणात्। दुर्वलस्या- एकत्र पीसकर नरय देनेसे तन्द्रा दूर होती है। संधा- ल्पवातस्य जन्तोः श्लेप्मा प्रकुप्यति मोन सजिनके वीज सरसों और कूट इन सबको ॥४८५॥ वायुमार्ग समावृत्य धमनी एकत्र यकरके मूत्र में पीसकर नास लेनेसे तन्द्रा दूर रनुसत्य सःतन्द्रां सुधोरां जनयेत्त-. होती है ॥ ४९० ॥ ४९१ ।। + ज्वराधिकारः । (४९) असुराहयगन्धस्य विट्चूर्णमधुसंयु किञ्चिदभिन्यासः स उच्यते । प्रत्या- 'तम्। अञ्जनाद्वोधयेन्मुग्धं तन्द्रितेस ख्येयः . स भूयिष्ठं कश्चिदेवात्र निपातिनम् ॥४९॥ जातीपुप्पं प्रवा सिध्यति ॥ ५००॥ लञ्च मरिचरोहिणी वचा। सैन्धवं व वातादि तीनों दोष कुपित होकर हृदयके लोतीमें स्तमूत्रेण तन्द्रानाशनमुत्तमम्॥४९३॥ प्राप्त होकर आमसे विवद्ध और प्रथित होकर बुद्धि, गंधक और विलवणके चूर्णको शहदमें मिलाकर इन्द्रिय और मनके अनुगामी होकर घोर अभिन्यास कांसके पाळमें घिसकर नेत्रों में अंजन लगानेसे ज्वरको उत्पन्न करते हैं। इसके होनेसे रोगी शरी- रमें निश्चष्टता, बोलनेमें असमर्थता, नेत्र और कानों में तन्द्रावाला रोगी 'चैतन्य हो जाता है । 'चमे- लोक फूल, मूंगा, कालीमिरच, कुटकी, यच और जडता, देखने, सूंघने, छूने और सुनने में असमर्थता सेंधानोन इन सबको एकत्र वकरेके मूत्रमें पीसकर करनेपर वारंवार करवटें लेवे अर्थात् किसीप्रकार चैन होती है । तथा वह शिरको इधर उधर पटके, शयन नाम देनेसे तन्द्रा दूर होती है ॥ १९२॥ ४९३॥ नहीं हो, आहारमें अरुचि, कूजे, उसके शरीरमें : अयोरजश्वेतलोध्रमजन मरिचं तथा। तोडनेकेसी पीडा हो और कंठसे थोडा वोले, इसको गोपित्तेन समायुक्तं तन्द्रानाशनमुत्त अभिन्यास सन्निपात कहते हैं । वह सन्निपातरोगी मम् ॥४९४॥ प्रायः नष्ट हो जाता है, कदाचित् कोई नौरोग लोहेका चूर्ण, सफेद लोध, अंजन, काली मिरच होता है ॥ ४९६-५००॥ और गोरोचन इन सबको एकत्र पीसकर नेत्रोंमें सप्ताहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथा- आंजनेसे तन्द्रा दूर होती है ॥ ४९४ ॥ पि वा । ते नन्ति संहता धातोः सन्निपातज्वरोत्पन्नां युक्त्या तन्द्रां - पाकान्मुश्चन्ति चान्यथा ॥५०१ ॥ 'जयेद्भिपत उपद्रवः कष्टतमोज्वराणां इस सन्निपातरोगमें सात दिनमें या दश दिनमें सविशेषतः॥ ४९५॥ या बारह दिनमें धातुओंकर पाक होनेसे रोगीको सन्निपात ज्वरमें उत्पन्न हुई तन्द्राको पेश बडी मृत्यु होती है और दोपोंका पाक होनेसे रोगसे मुक्ति युक्तिसे जीते, क्योंकि ज्वरमें विशेषकर यह अत्यंत होती है ॥ ५०.१ ॥ कटतम उपद्रव है ॥४९५ ॥ एततु हारीतस्त्वाह : प्रन्ति मुश्चन्ति अभिन्यासज्वरके लक्षण। वा नरम् । दिवसैर्द्विगुणैः सतनका- वयश्च कुपिता दोषाउरःस्रोतोऽनुगा दशभिः क्रमात् ।। ५०२ ॥ भृशम् ।' आमा विबद्धा प्रथिता अन्य आचार्य कहते हैं कि-धातु और दोपोंके बुद्धीन्द्रियमनोऽनुगाः ॥ ४९६ ॥ पचनेके अनुसार सन्निपात १४ या ९. अथवा ११ जनयन्ति महाघोरमभिन्यासं ज्वरं दिनमें मनुष्यको मारदेता है अथवा छोड़ देता है५-२ नृणाम् । प्रस्तब्धगात्रस्त्ववाग्मी नष्ट दुर्गेऽभसि यथा मग्नं भाजनं त्वरया चेष्टोनं कांक्षते ॥ १९७॥ न च दृष्टि बुधः गुडीयात्तलमप्राप्तधाभिन्यास- भंवत्तस्य समर्थारूपदर्शने । नच गन्ध पीडितम् ॥५०३ ॥ निद्रोपेतमभि- रसस्पर्शशब्दान्माप्याथ बुध्यते॥४९८॥ न्यासं क्षिप्रं विद्याद्धतोजसम् ॥५०४॥ शिरो लोठयतेऽभीक्ष्णमाहारं नाभि- जिसप्रकार अथाह जलमें गिरे हुए यर्तनको सलीमें नन्दति । कूजते तुद्यते चेवे प्रतिप पहुँचनेसे पहले ही पा लेना पादिये, उसीप्रकार तिच हीयते ॥ ४९९ ॥ कलं प्रभापते अभिन्याससनिपातमे पीडित रोगीका शीघ्र ही यल वइसने भापाटीकासहिते- *. करना चाहिये, क्योंकि इसमें निद्राके आनेपर रोगी "भारंगी, पोहकरमूल, रायसन, पेलगिरी, नागर- तत्काल हतवीर्य हो जाता है ॥५०३ ।। ५०४ मोथा, सोंठ, दशमूल, पीपल और अतीस इनके चिकित्सा। धाथमें हींग और अदरखका रस तथा पीपलका चूर्ण डालकर पोवे तो घोर अभिन्यास सन्निपातम्बर, • कारधीपुष्कररण्डलायन्तीनागरामृताः हृदय और पसलियोंका माल एवं अंकारा तत्काल दूर । दशमूली शटी शृङ्गीवासामा होता है ।। ५०९ ॥ ५१० ॥ पुनर्नवाः ॥ ५०५ ॥ तुल्या मूत्रण बीजपूरकविल्वाश्मभेदकहतीद्वयम। निष्क्वाथ्य पीता स्रोतीविशोधनम् । सकाशकं तथैरण्डं जले चाटगुणे अभिन्यासज्वरायासमाशु नन्ति स्मृतम् ॥५११॥ पक्त्वा गोमुत्रसंपृक्तं : समुद्धतम् ।।५०६॥ विडसावर्चलान्वितम् । हस्तिंशल- कलौंजी, पोहकरमूल, अंडकी जड, वनपसा, मानाहमभिन्यासे ज्वर हितम् ५१२॥ सौंठ, गिलोय, दशमूल,कचूर, काकहाशिंगी,अडूमा, भारंगी और पुनर्नवा इन सबको समान भाग लेकर बडी कटेरी, काँस और अंडको जड इन सबको विजोरे नीबूकी जह, बेलगिरी,पापाणभेद कटेरी, गोमूत्रमें फाथ बनाकर पान करे तो सत्र शरीरके समान भाग लेकर अठगुने जलमें पकाये । जय सोत शुद्ध होजाते हैं और शीन ही अभिन्यास ज्वर साथ तैयार हो जाय तब उसमें गोमूत्र, विडलपण नष्ट हो जाता है ।। ५०५ ।। ५०६ ।। और काला नोन मिलाकर पान करे । इससे हृदय मातुलुङ्गाश्मभिद्विल्वव्याघ्रीपाठारु और यस्तिका शल, आनाह तथा अभिन्यासचर नष्ट धूकजः । वाथो लवणमूनाढयोऽभि- ) होता है ॥ ५११ ॥ ५१२ ॥ न्यासानाह शुलनुत् ॥ ५०७।। दन्ती द्रवन्ती बृहतीमेरण्ड वीजपूर- विजौरे नीचूकी जड़,पापाणभेद, बेलगिरी, फटेरी, कम् । श्यामा व्याघ्रीश्च निकाथ्या- :पाद और अंडकी जड़ इनके काथमें गोमूत्र और भिन्यासे बहुवर्चसि ॥ ५१३ ॥ सैंधानोन मिलाकर पान करे तो अभिन्यासज्वर, आनाई और शुल दूर होता है ॥५॥ दंती, मूसाकर्णी, चही कटेरी, अंडका जइ विजौरे, नींयूकी जड, अनंतमूल और कटेरी इनका काथ व्याघ्रीदुरालभाभा शटीशङ्गीसपी पान करनेसे अभिन्यास ज्वर और मलकी अधिकता प्करम्। पक्काम्बु श्लेप्महदेयमभिन्यास दूर होती है ॥ ५१३ ॥ प्रशान्तये ।।५०८॥ सिंही व्याध्यमृता द्राक्षा अजाजी कटेरी, घमासा, भारंगी, कपूर, काकडासिंगी सकटुत्रिकम् । शृङ्गी विडङ्गश्च सम • और पोहकरमूल इनका काध पान करनेसे कफ. पक्त्वा विसाव्य साधयेत् ॥ ५१४ ।। और अभिन्यासज्वर दूर होता है ।। ५०८।। “वृताक्तस्तण्डुलैभृष्टैः पेयामुष्णां ज्वरी भाङ्गी पुष्करमूलश्च राना बिल्वं समु- पिबत् । हिक्कावासी च.कासी च स्तकम् । नागरं दुशमूलश्च पिप्पली- तथाभिन्यासपीडितः ॥ विवद्धवात- विषसाधितम् ॥ ५०९॥ हिंग्याईक- वित्रः पानमेतत्प्रयोजयेत् ॥५१५॥ सोपेतं पिप्पलीचूर्णसंयुतमासन्निपा- तन्वरं घोरमभिन्यासश्च दारुणम् । कटाई, वडो कटेरी, गिलोय, दाख,जीरा,त्रिकुटा, काकडशिंगी और घायविडंग इन सबको समान हत्पार्श्वशूलमानाहं सद्यः पीतं निय भाग लेकर काथ बनाये। फिर धीमें मुने हुए चाव- च्छति॥५१०॥ लौकी पेया बताकर उस कायमें मिलाकर गरमा- ज्वराधिकारः। (५१) गरमपीवे इससे हिचकी,श्वांस,खांसी,अभिन्यासज्वर, शिरसके बीज, पीपल, काली मिरच और सैंधा- वायु, मल और मूत्रकी पद्धता दूर होती है ॥५१४|| नॉन इन सबको एकत्र गोमूत्रमें पीसकर अंजन 1.५१५ ॥ वनांवे । इस अंजनको नेत्रों में लगानेसे अथवा लशुन, बृहती पोकरं भाी शटी शृङ्गी मनसिल और वच इनका अंजन बनाकर नेत्रों में लगानेसे चैतन्य उत्पन्न होता है ॥ ५२१ ॥ दुरालभा । पक्त्वा पानं प्रशंसन्ति श्लेप्मा तेनोपशाम्यति ॥ ५१६ ॥ शिरीषचीज मरिचं बस्तमूत्रेण तत्स- चंडी कटेरी, पोहकरमूल, भारंगी,कचूर, काकडा मम्। अननं तदभिन्यासे संज्ञाबोधन- शिंगी,धमासा, इनका काथ बनाकर पान करनेसे मिप्यते ॥ ५२२ ॥ कफ शांत होता है ॥ ५१६ ॥ शिरसके बीज और काली मिरच इनको एकत्र विवृद्विशालाकटुकात्रिफलारग्वधैः वकरेक मूत्रमें पीसकर नेत्रोंमें ऑजनेसे संज्ञा उत्पन्न कृतः । सक्षारो भेदनः काथः पेयः । होती है ॥ ५२२ ॥ सर्वज्वरापहः॥५१७॥ मातुलुङ्गरसं. तस्य हिंगुशुण्ठीयुतं निसोत, इन्द्रायण, कुटकी, त्रिफला और अमल- तास इनके काथमें जवाखार डालकर पान करे । मुखे । दद्यात्मधमनं तीक्ष्णं कटतिक्तो- यह भेदन और सर्वप्रकारके ज्वरोंको हरनेवाला पसंहितम् ॥ ५२३ ।। है ।। ५१७ ॥ विजोरके रसम हींग और सोठ मिलाकर मुखम तिक्ताभयानिवृदन्तीफलं वै राजवृक्ष धारण करे तथा तीक्ष्ण और चरपरी एवं कडवी जम् । क्षाराढयः सैन्धवोपेतः काथो । औषधियोंको नेत्र, नाक और कानमें फूंके ॥५२३॥ भेदी ज्वरापहः॥ ५१८॥ .. पटोलपत्रं सुपवी बृहती कण्टका- कुटकी, हरड, निसोत, जमालगोटा और अमल रिका । मरिचं पिप्पली बिल्वं चिर तास इनके काथमें जवाखार और सेंधानोंन डालकर बिल्वं सचित्रकम् ॥५२४॥ करञ्जबीजं पान करनेसे विरेचन होकर ज्वर दूर होता है।।५१८॥ मजिष्ठा त्रायन्ती विश्वभेषजम् । आईकस्वरसौपतं सिन्धूत्थं सकटुत्रि- गलप्रबोधन-श्रेष्ठमभिन्यासज्वरा कम् । प्रबोधाय मुखे दद्यान्नस्यञ्च मरिचेन वै ॥ ५१९॥ पहम्॥ ५२५॥ ; अदरखके रसमें सैंधानोन और त्रिकुटेके चूर्णको पटोलपात,करेला,वडी कटेरी,कटेरी,कालीमिरच, मिलाकर चैतन्य करनेके लिये मुखमें धारण कर पीपल, वेलगिरी, करंज, चीता, करंजवीज, मीठ, ‘अथवा काली मिरचोंको अदरखके रसमें पीसकर वायमाण और सोंठ इनका काथ कंटको शुद्ध करता नास लेवे ।। ५१९ ।। है और अभिन्यासज्वरको नष्ट करता है ।। ५२४ ।। मातुलङ्गाईकरसं कोणं त्रिलवणा- ॥ ५२५॥ न्वितम्। अन्यद्वा सिद्धविहितं नस्यं करनो बिल्वमनिष्ठे नायन्त्यग्निः तीक्ष्णं प्रयोजयेत् ॥ ५२० ।। पटोलकम् । बृहत्यो सुपवी · पोषं विजारे नीबू और अदरखके रसमें तीनों लवणोंके काथः स्याद्गलशोधनः ।। ५२६ ।। चूर्णको मिलाकर कुछ गरम करके, उसका अथवा करंजकी छाल,बेलगिरी, मजीठ,त्रायमाण, चीता, अन्यान्य तीक्ष्ण औषधियोंका नास देवे ॥ ५२०॥ । पटोलपात,बडी कटेरी, कटेरी, करेला और त्रिकुटा शिरीपचीजगोमूत्रकृष्णामरिचसैन्धवैः। इनका फाथ कंठको शुद्ध करता है ॥५२६।। अञ्जनं स्यात्मबोधाय सरसोनशिला- १ लसुन मैनशिल और क्वको उपरोक्त भानकी औषधियोंमें ही मिलाकर भजन करावे । वचः ।। ५२२ ॥

वासने भाषाटीकासहिते- चिकित्सिते कृतेऽप्येवं यस्य संज्ञान अभिघात (तलवार, लाठी आदिकी चोट लगनेसे, जायते । ललाटे पादयोऽपि तस्य या वृक्ष, पर्वतादिसे गिरनेसे, अभिचार(श के द्वारा किये हुए मरणादि प्रयोगोंके करनेसे), अभिशाप (गुरू दाहः प्रशस्यते॥ ५२७॥ आदिकै शापसे) और अभिपंग( भूतादिकफी याचा इन सब उपरोक अंजन नस्य आदिके प्रयोग और कामादिके वेगसे )इन सब कारणोंसे यातादिक करनेसे भी संज्ञा उत्पन्न न हो अर्धान् येहोशी दूर दोप फुपित होकर आगन्तुक ज्वरको उत्पन्न करते हैं वह न हो तो लोहेको सलाईको अनिमें तपाकर रोगीके आगन्तुक ज्वर-वात, पित्त और कफ इन भेदोंसे तीन दोनों पाँव और ललाटमें दाग देवे ॥५२७ ॥ प्रकारका है जिस दोपकी अधिकता हो उसे जाने । सन्निपातस्बरस्यान्ते कर्णमूले सुदा- श्यावास्यता विपकृते दाहोऽतीसार.. रुणः । शोथः सजायते तेन कश्चिदेव एव च। भक्तारुचिःपिपासा च तोदश्च विमुच्यते ॥ ५२८ ॥ सह मूर्च्छया ॥५३॥ औषधीगन्धजे सन्निपातज्वरके अंतमें कानको जहमें घोर सूजन उत्पन्न होती है, उस सूजनसे कोई रोगी बचता है१२८ मृच्छा शिरोरुग्वमथुस्तया ॥ ५३५ ।। तं जयेच्छोधितस्त्रावः सर्पिःपानप्रले विपके योगसे उत्पन्न हुए ज्वरमें मुखपर काला- पनः। प्रदाहैः कफपित्तन्नेर्वमनः कवल पन, दाह, अतिसार, भोजनमें अरुचि, तृपा, तोडने ग्रहः ॥ ५२९॥ केसी पीड़ा और मूच्छी यह सय लक्षण होते हैं ५३४ उसको रुधिरनाव (जोक आदि लगाना), घृतपान, रोग और यमन ये सब लक्षण होते हैं।५३५॥ औपघकी गंधसे जो ज्वर आता है उसमें मूर्छा, दाग दना, कफपित्तनाशक, यमन और कवलप्रह आदि उपचारोंसे जीते ।। ५२९ ।। कामजे चित्तविभ्रंशस्तन्द्रालस्यमभो. जीर्णानां रक्तशालीनां ज्वरघ्नकाथ जनम् । हृदये वेदना चास्यं गांवञ्च साधितः । प्रसृतस्त्वीदनी द्विस्त्रिः परिशुप्यति ॥५३६ ॥ कायों यूपादिकोऽपि वा ॥ ५३० ।। कामज्वरमें चित्तभ्रम होना, तन्द्रा, आलस्य, सचेन्जीर्यत्यविघ्नेन ज्वरी जीवेत्तदा भोजनमें अमाचे, हृदयमें पोडा और शरीरकासूखना ध्रुवम् ॥ ५३१ ॥ ये सम लक्षण होते हैं ।। ५३६ ।। ज्वरनाशक काथमें पुराने लाल शालिचावलोंका भयात्मलापः शोकाञ्च भवेत्कोपाच भात अथवा यूपादिक दो या तीन प्रसृत परिमाण वेपथुः । अभिचाराभिशापाभ्यां मोह- सिद्ध करके देवे, जो यह निर्विध पचजाय तो रोगी स्तृष्णा च जायते ॥ भूताभिषगा-' : निश्चय वच जाता है ।। ५३० ।। ५३१ ।। दुद्वेगो हास्यरोदनकम्पनम् ॥५३७।। गरिकं पांशुक शुण्ठीवचाकटफलका भय और शोफसे उत्पन्न हुये बरमें रोगी प्रलाप जिकः । कर्णशोथहरो लेपःसन्निपात करता है, कोपसे उत्पन्न हुये ज्यरमें काँपता है, अभि- ज्वरे भृशम् ॥ ५३२॥ चार और अभिशापसे उत्पन्न हुये ज्वरमें मोह और गेग, धूल, सोंठ, वच कायफल इन संबको एकत्र तृपा होती है, भूतबाधासे उत्पन्न हुये अभिपंग ज्वरमें कांजीमें पीसकर गरम करके कानकीज में लगात्रे, । उद्वेग, हास्य, रोना और कम्प होता है ॥ ५३७ ।। इमसे कर्णगीय दूर होता है ।। ५३२ ।। कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं आगन्तुकज्वर। यो मलाः । भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति अभिघाताभिचाराभ्यामभिशापाभि- भूतसामान्यलक्षणाः ।। ५३८॥ पणतः आगन्तुर्जायते दोपर्यथास्वन्तं 'काम, शोक और भयसे वात कुपित होती है, विभावयेत ।। ५३३ ॥ क्रोधसे पित्त कुपित होता है, एवं भूतबाधासे - तीनों 'ज्वराधिकारः । दोप फुपित होते हैं और वे ही भूतोंके सामान्य विसर्पण'ज्वरो यश्च यश्च विस्फोटक- लक्षण होते हैं, (जिस भूतका जैसा लक्षण हो तत्समान ज्वरः। तचादी सर्पिप: पानं कफपि-' लक्षण हो जाता है) ॥ ५३८ ॥ तोत्तरे भवेत् ॥ ५४४ ॥निम्बदारु अभिचाराभिशापोत्थी ज्वरी होमा कषायं वा हितं सौमनसं तथा । श्रम- दिभिर्जयेत् ।।दानस्वस्त्ययनातिथ्य- क्षयोत्थे भुजीत घृताभ्यक्तं रसौद- रुत्पातग्रहपीडजाः॥५३९ ॥ नम् ॥ ५४५॥ अभिचार और अभिशापसे उत्पन्न हुये ज्वरको होम, दान, स्वस्तिवाचन, पुण्याहवाचन और अतिथि जिसके विसर्पसे अथवा विस्फोट कसे कफपित्ता- पूजनसे जीते ।। ५३९।।। धिक ज्वर उत्पन्न हो तो उसको प्रथम घृत पान करावे, पश्चात् नीमकी छाल और देवदारुका काय भूतविद्यासमद्विष्ट्रवन्धावेशनताडने। पिलावे अथवा चमेलीके पत्तोका काथ पान करावे, 'जयेद्भूतांभिषकोत्थ मनःस्वास्थ्यश्च श्रम और क्षयसे उत्पान हुये ज्वरमें घृतसंयुक्त रसोदन मानसः ॥५४०॥ को भक्षण करे ।। ५४४ ॥५४५॥ भूताभिपंगोत्था ज्वरको बंध, आवेशन और ताड- नादि कर्मोसे जीते और मानसिक स्वरको मनको रोगोत्थानप्रकोपाभ्यां . यो ज्वरो स्वस्थ करनेसे जीते ॥ ५४०॥ जायते नृणाम् । शमयेत्पाचयेद्वापि औषधीगन्धविषजो . विपपित्तप्रवा- यथायोगैश्चिकित्सकः॥ ५४६॥ धनैः। जयेत्कायर्मतिमान्सर्वगन्ध अन्यान्य रोगों के उत्पन्न होनेसे अथवा कुपित कृतभिषक् ।। ५४१॥ होनेसे जो ज्वर उत्पन्न होता है उसमें यथादोपानुसार औषधि और विपकी गन्धसे उत्पन्न हुये ज्वरको शमन और पाचन अपधि देवे ॥ ५४६. ॥ "विप और पित्तनाशक औपधियोंसे अथवा सम्पूर्ण सुग स्त्रीणामप्यप्रजाताना प्रजाताना न्धित औपधियोंके काथसे जीते ।। ५४१ ॥ तथाऽहितः। स्तन्यावतरणे चैव ज्वरो क्रोधजे पित्तजित्काम्ये नााः सद्वा दोषैः प्रकुप्यति । तस्य प्रशमनं कार्य क्यमेव च।आश्वासेनेष्टलाभेन वायोः यथादोषविधानतः॥ ५४७ ॥ प्रशमनेन च । हर्पणैश्च शमं यान्ति पुत्रवाली अथवा विनापुत्रवाली खियाके अहित- कामशोकभयज्वराः॥५४२ ॥ कामा कारक कारणोंसे और स्तनों में दूध प्रवर्तन होनेसे दोप स्क्रोधज्वरो नाशं क्रोधात्कामसमु- कुपित होकर ज्वरको उत्पन्न करते हैं, उसमें यथा- द्भवःयातिताभ्यामुभाभ्याश्च भय दोपानुसार औपधि देनी चाहिये ॥ ५४७ ।। शोकसमुत्थितः ॥ ५४३ ॥ अभिघातज्वरे कुर्याक्रियामुष्ण- शोधसे उत्पन्न हुये ज्वरमें पित्तनाशक क्रिया विवर्जिताम् । कषायमधुरस्निग्धा और कामज्वरमें सुन्दर खियोंके मधुरवचनोंके द्वारा यथादोषमथापि वा ।। ५४८ ॥ उपचार करे । समझानेसे-धीरज बंधानेसे, इष्टपदा- थोंके मिलनेसे, यातनाशक यत्नोंसे और हर्पजनक वार्ता तथा दोपानुसार कपैली, मधुर और स्निग्ध औपीय अभिधातज्वरमें उष्णवर्जित अर्थात् शीतल क्रिया अथवा अन्य पिजनक पदार्थोसे काम, शोक और भयसे उत्पन्न हुआ ज्वर दूर होता है। कामसे क्रोध- 'देवे ॥५४८॥ धेर नष्ट होता है और क्रोधसे कामज्वर नष्ट होता अभियातज्वरो नश्येत्पानाभ्यङ्गेन है तथा काम और प्रोधसे भयज्वर एवं शोकज्वर दूर सर्पिपः । मध्यर्द्रव्यश्च सात्म्यश्च तथा मांसरसोदनैः॥ ५८९ ॥ । होता है ।। ५४२॥ ५४३ ।।.

(५२) वङ्गसेने भापाटीकासहिते- चिकित्सिते कृतेऽप्येवं यस्य संज्ञा न अभियात (नलबार, लाठी आदिकी चोट लगनेस, जायते । ललाटे पादयो,पि तस्य या वृक्ष, पर्वतादिसे गिरनेसे, अभिचार(शत्रु के द्वारा किये हुए मरणादि प्रयोगोंक करनेसे), अभिशाप (गुरू दाहः प्रशस्यते ।। ५२७ ।। आदिफ शापसे) और अभिपंग(भूतादिककी बाधा इन सब उपरोक्त अंजन नस्य आदिके प्रयोग और कामादिके वेगसे )इन सब कारण से वातादिक करनेसे भी संज्ञा उत्पन्न न हो अर्थात् येहोशी दूर। दोप फुपित होकर आगन्तुक ज्वरको उत्पन्न करते हैं, यह . न हो तो लोहेकी सलाईको अनिमें तपाकर रोगीके आगन्तुक ज्वर-पात, पित्त और कफ इन भेदोंसे तीन दोनों पाँव और ललाटमें दाग देवे ॥५२७ ॥ प्रकारका है जिस दीपकी अधिकता हो उसे जाने । सन्निपातज्वरस्यान्ते कर्णमूले सुदा- श्यावास्यता विषकृत दाहोऽत्तीसार: रुणः । शोथः सञ्जायते तेन कश्चिदेव एव च। भक्तारुचिःपिपासा च तोदश्च विमुच्यते ॥ ५२८ ॥ सह मूर्छया ॥५३४|| औषधीगन्धजे सनिपातज्वरके अंतमं कानकी जडमें घोर उत्पन्न होती है,उस सूजनसे कोई रोगी वचता है१२८ मूर्छा शिरोरुग्वमथुस्तथा ॥ ५३५ ॥ तं जयेच्छोधितनावः सर्पिःपानप्रले विपके योगसे उत्पन्न हुए ज्वरमें मुखपर काला- पनैः। प्रदाहः कफपित्तन्नेर्वमनेः कवल पन, दाह, अतिसार, भोजनमें अरुचि, तृपा, तोडने अहः ।। ५२९ ॥ केसी पौड़ा और मूळ यह सब लक्षण होते हैं ५३४ उसको मधिरत्राय (जोक आदि लगाना), घृतपान, रोग और धन ये सब लक्षण होते हैं।५३५।। औपकी गंधसे जो ज्वर आता है उसमें मूर्छा, दांग देना, कफपित्तनाशक. वमन और कवलप्रह आदि उपचारोंसे जीते ।। ५२९ ।। कामजे चित्तविभ्रंशत्तन्द्रालस्यमभी- जीर्णानां रक्तशालीनां ज्वरमकाथ जनम् । हृदये वेदना चास्यं गावच साधितः । प्रस्तृतस्त्वोदनो द्विस्त्रिः परिशुष्यति ॥५३६॥ कार्यों यूषादिकोऽपि वा ॥ ५३० ॥ कामज्वरमें चित्तभ्रम होना, तन्द्रा, आलस्य, स चेजीर्यत्यविनेन ज्वरी जीवेत्तदा भोजनमें अमाचे, हृदयमें पीडा और शरीरका सूखना शुवम् ॥ ५३१ ॥. ये सब लक्षण होते हैं ।। ५३६ ।। ज्वरनाशक काथमें पुराने लाल शालिचावलोंका भयात्मलापः शोकाच्च भवत्कोपाच भात अथवा यूपादिक दो या तीन प्रसृत परिमाण वेपथुः । अभिचाराभिशापाभ्यां मोह- सिद्ध करके देवे, जो यह निर्विन्न पचजाय तो रोगी स्तृष्णा च जायते ॥ भूताभिषङ्गा- निश्चय बच जाता है ॥ ५३० ।। ५३१ ॥ दुद्वेगो हास्यरोदनकम्पनम् ॥५३७॥ गरिकं पांशुक शुण्ठीवचाकटफलका भय और शोकसे उत्पन्न हुये ज्वरमें रोगी प्रलाप जिकः । कर्णशोथहरो लेपःसन्निपात-. करता है। कोपसे उत्पन्न हुये ज्वरमें काँपना है, अभि- ज्वरे भृशम् ।। ५३२॥ चार और अभिशापसे उत्पन्न हुये ज्वरमें मोह और गेम, धूल, सोंठ, वच कायफल इन संघको एकत्र तृपा होती है, भूतबाधासे उत्पन्न हुये अभिपंग ज्वरमें कोजीमें पीसकर गरम करके कानकीन डमें लगात्रे, । उद्वेग, हास्य, रोना और कम्प होता है ॥ ५३७ ।। इससे कर्णगोथ दूर होता है ।। ५३२ ।। कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं. आगन्तुकज्वर। त्रयो मलाः । भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति अभिघाताभिचाराभ्यामभिशापाभि- भूतसामान्यलक्षणाः॥ ५३८॥ पनन्तः। आगन्तुर्जायते दोषैर्यधास्वन्तं 'काम, शोक और भयसे वात कुपित होती है, विभावयेत् ॥ ५३३ ॥ क्रोधसे पित्त कुपित होता है, एवं भूतबाधासे तीनों .

ज्वराधिकारः। (५३) ܪܢ M नम् ॥५४५॥ होप फुपित होते हैं और ये ही भूती सामान्य विसण ज्वरो यश्च यच विस्फोटक- लक्षण होते हैं, (जिस भूतका जैसा लक्षण हो तत्समान ज्वरः । तत्रादौ सर्पिपः पानं कफपि- लक्षण हो जाता है)। ५३८॥ ., तोत्तरे भवेत् ॥ ५४४ ॥ निम्बदारु- अभिचाराभिशापोत्थो ज्वरो होमा कषायं वा हितं सौमनसं तथा। श्रम- दिमिर्जयेत् । दानस्वस्त्ययनातिथ्य- क्षयोत्ये भुजीत घृत्ताभ्यक्तं रसोद- रुत्पातग्रहपीडजा ।। ५३९ ।। अभिचार और अभिशापसे उत्पन्न हुये ज्वरको होम, दान, स्वस्तिवाचन, पुण्याहवाचन और अतिथि जिसके विसर्पसे अथवा विस्फोट कसे कफपित्ता- पूजनसे जीते ।। ५३९॥ धिक ज्वर उत्पन्न हो तो उसको प्रथम घृत पान भुंतविद्यासमुद्दिष्टेबन्धावेशनताडनैः। करावे, पश्चात् नीमकी छाल और देवदारुका काथ पिलावे अथवा चमेली के पत्तोंका काथ पान करावे, जयेद्भूताभिषङ्गोत्थं मनास्वास्थ्यश्च श्रम और क्ष्यसे उत्पान हुये ज्वरम घृतसंयुक्त रसोदन मानसैः॥ ५४० ।। को भक्षण करे ।। ५४४ ॥ ५४५ ॥ : भूताभिपंगोत्थ ज्वरको बंध, आवेशन और ताड- रोगोत्थानप्रकोपाभ्यां यो ज्वरो मादि कर्मोसे जीते और मानसिक ज्वरको मनको स्वस्थ करनेसे जीते || ५४०॥ जायते नृणाम् । शमयेत्पाचयेद्वापि औषधीगन्धविषजो विषपित्तप्रवा- यथायोगैश्चिकित्सकः॥५४६ ॥ धनः । जयेत्कपायमतिमात्सर्वगन्ध अन्यान्य रोगों के उत्पन्न होनेसे अथवा कुपित कृतर्भिपक ॥५४१॥ होनेसे जो ज्वर उत्पन्न होता है उसमें यथादोपानुसार औषधि और विपकी गन्धसे उत्पन्न हुये ज्वरको शमन और पाचन अपधि देवे ॥ ५४६. ॥ विप और पित्तनाशक औपधियोंसे अथवा सम्पूर्ण सुगं- स्त्रीणामप्यप्रजाताना प्रजातानां न्धित औपधियोंके काथसे जीते ॥ ५४१ ।। तथाऽहितः। स्तन्यावतरणे चव ज्वरो क्रोधजे पित्तजित्काम्ये नाDः सदा दोपैः प्रकुप्यति । तस्य प्रशमनं कार्य क्यमेव च। आश्वासेनेष्टलाभेन वायोः यथादोषविधानतः॥ ५४७ ॥ प्रशमनेन च । हर्षणेश्च शमं यान्ति पुत्रवाली अथवा विनापुत्रवाली खियाके अहित- कामशोकमयज्वरा ॥५४२ ॥ कामा कारक कारणोंसे और स्तनोंमें दूध प्रर्वतन होनेसे दोप क्रोधज्वरो नाशे. क्रोधात्कामसमु- कुपित होकर ज्वरको उत्पन्न करते हैं, उसमें यथा- द्भवः । यातिताभ्यामुभाभ्याञ्च भय दोपानुसार औषधि देनी चाहिये ।। ५४७ ।। शोकसमुत्थितः॥ ५४३॥ अभिधातज्वरे कुर्याक्रियामुष्ण- क्रोधसे उत्पन्न हुये ज्वरमें पित्तनाशक क्रिया विवर्जिताम् । कषायमधुरस्निग्धा और कामज्वरमें सुन्दर स्त्रियों के मधुरवचनोंके द्वारा यथादोषमथापि वा ॥५४८॥ उपचार करे । समझानेसे-धीरज बंधानेसे, इष्टपदा- यौके मिलनेसे, वातनाशक यत्नांसे और हर्पजनक वार्ता अभिधातज्वरमें उष्णवर्जित अर्थात् शीतल निया अधवा अन्य हपजनक पदार्थोस काम, शाक और तथा दोपानुसार कपैली, मधुर और स्निग्ध औपधि भयसे उत्पन्न हुआ जर दूर होता है । कामसे क्रोध- घर नष्ट होता है और क्रोधसे कामज्वर नष्ट होता अभिघातज्वरो नश्येत्पानाभ्यङ्गेन है तथा काम और क्रोधसे भयज्वर एवं शोफावर दूर सर्पिपः । मेध्यैर्द्रव्यश्च सात्म्यश्च तथा मांसरसोदनः ॥ ५४९॥ देवे ।।५४८॥ ोता है ॥ ५४२ ।। ५४३ ॥

'यशासन भाषाटीकासहिते-
अभिगागावग्ग पुनपान कराये और उसके शरीर ससाई या शाह याद्वादशाहमया-
पर पृतकी मालिश फर्गय मया रोगीको प्रतिक । पिया । सन्तत्यायोऽपिस स्था.
अनुसार मेधाजनक और साल्य मांसरस और भाग
सन्ततःस निगद्यते ।। ५५४ ।।
आदि द्रव्य देवे ।। ५४९ ॥
सात या दा भया याग दिन में जो पराब ए.
व्यवधश्रमात्यध्यभादंशसमुद्भवान।
सा पक्ष ग, घटे पद नहीं उस समरहते
ज्यरानुपाचरेत्पूर्व
सुम्निग्धक्षीर ६॥५५॥
भोजनेः॥५०॥
अहोरांव सततका द्राकालावनुवनंती
व्यय (बधा इंदन, भदन), गम्मत (योधना),
परिश्रम (अधिकमार्गका पलना ) और गिरने अन्येशुष्कस्त्वहोरात्रादेककालं प्रब-.
शरीर भंग होने पर इन कारणोंसे उत्पन्न हुम बरमें
संत ॥५५५ ॥ तृतीयकस्तृतीयाति
प्रथम सिग्ध और दूधका भोजन देवे ।। ५५० ।।
तुर्थेवि चतुर्थकः । केभिभूताभिष-
इनि आगन्तुकन्यनिकित्सा । कोत्थ वर्त विषमज्वरम् ॥५५६ ।।
विषमज्वर ।
सताम्बर दिन रात दो समयमें दीपार आवाद
अन्येचुप्पयर रातदिनमें एफ.यार आता है। तृतीयस
पर तीसरे दिन गाता और पातुधिययर चौथे
दिन आता है । कोई था मृतामिपंगत्य परको
दापोऽल्पोऽहितसम्भूतो ज्वरोत्सष्टस्य विपगग्पर कह ॥ ५५५ ।। ५५६ ।।
वा पुनः धातुमन्यतमं प्राप्य करोति
यः स्यादनियतात्कालाच्छीतोष्णा-
विषमज्वरम् ।। ५५१॥
भ्यां तथैव च । गतश्चापि विषमास
अरसे युग हुये मनुष्यके अल्पदाप भी गुपक्ष्य। ज्वरो विषमः स्मृतः ।। ५५७ ।।
आहारादि द्वारा कुपित होकर रक्तादि किसी धातुमें
जो ज्यरशीत और उष्ण कारणासे विना समय
प्राप्त होकर विषमज्वरको उत्पन्न करत है ।। ५५१॥
आ जाय और जिसका वेग भी विषगो उसको
..संततः सततोऽन्यास्तृतीयकचतु-विषम उमर कहते हैं ।। ५५७ ।।
र्थको ।सन्ततो रसधातुस्थः सततो
कफपित्ताधिकमाही पृष्ठाद्वातकफा-
रक्तधातुगः। भिपजा चेव विजयः त्मकः । वातपित्ताच्छिरोमाही
सोन्येाः पिशिताश्रितः ॥ ५५२ ॥ त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ॥ ५५८ ॥
मेदोगतस्तृतीयेऽति ह्यस्थिमजागत: अय तृतीयकज्यरके तीन भेद कहते हैं, जो तृती-
पुनः । कृश्चिातुर्थिक चौरमंतकं यक ज्वर कफपित्तसे उत्पन्न होता है वह प्रथम विश-
रोगसकरम् ।। ५५३॥
स्थानसे प्रकट होकर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो
यह विषमज्वर, संतत, सतत, अन्येशुष्क, तृती- प्रथम पीठसे प्रकट होकर सब शरीरमें फैल जाता है
जाता है । जो वात कफसे उत्पन्न होता है, यह
यक और धातुर्थिक इन भेदोसे पांच प्रकारका है। और जो तृतीयकम्वर पातापित्तसे उत्पन्न होता है वह
बेदाप रसमें प्राप्त होकर संततज्वरको उत्पन्न करते
है, रक्त धातुमें प्राप्त होकर सततज्वरको उत्पन्न करते प्रथम शिरसे प्रकट होकर सर्वशरीरमें विस्तृत हो
हैं,मांसमें प्राप्त होकर अन्येशुष्कज्वरको उत्पन्न करते हैं, जाता है ।। ५५८ ॥
भेदमें जाकर तृतीयकश्वरको उत्पन्न करते हैं, अस्थि चातुर्थिको दर्शयति प्रभावं द्विविध
और मजामें प्राप्त होकर मृत्युस्वरूप रोगसंकर चातु ज्वरः जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्व शिर-
र्थिकज्वरको उत्पन्न करते हैं ।। ५५२॥ ५५३ ।। सोऽनिलसम्भवः ॥५५९ ॥

Shrimaddhishagvaryagdadhartanyavagsen

Author
Das,khemraj Krishan
Title
Shrimaddhishagvaryagdadhartanyavagsen
File name
Shrimaddhishagvaryagdadhartanyavagsen
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2011/04
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
553147
Barcode
99999990044324.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
wVKv6GDa7z4
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