Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Rajasthan Me Sanskrit Sahitya Ki Khoj
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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला
प्रधान सम्पादक
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
-
[सम्मान्य मालक, रावस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठाम, घोरपुर]
ग्रन्थाङ्क ३१
राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज
हे पिय में
एक विशिष्ट विवरणी
रेसक
श्रीधर रामकृष्ण भाण्डारकर
प्रकाशफ
राजस्थान राज्य मस्थापित
राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान)
RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE JODHPUR
राजस्थान पुरातन पत्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यत: अखिल भारतीय तया विशेषत: राजस्थानदेशीय पुरातनकालोन
संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रग, राजस्थानी, हिन्दी आदि भापानिवद्ध
विविध वाङ्मयप्रकागिनी विशिष्ट ग्रन्थावलि
मधान सम्पादक
पद्मश्री जिनविजय मुनि, पुरातत्त्वाचार्य
सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर;
ग्रॉनरेरि मेम्बर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी;
निवृत्त सम्मान्य नियामक ( मॉनरेरि डायरेक्टर ),
भारतीय विद्याभवन, बम्बई; प्रधान सम्पादक,
सिंघी जैन ग्रन्थमाला, इत्यादि
ग्रन्थाङ्क ३१
राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज
के विषय में
एक विशिष्ट विवरणी
लेखक
श्रीधर रामकृष्ण भाण्डारकर
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )
,
राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज
के विषय में
एक विशिष्ट विवरणी
लेखष
श्रीधर रामकृष्ण भाण्डारकर
अनुवादक
प० ब्रह्मदत्त त्रिवेदी
एम ए साहित्याचाय, काध्यतीर्थ
प्रकाशनकर्ता
राजस्थान राज्याशानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान)
खिस्तान्द १९६३
विक्रमाद २०२०
प्रथमावृत्ति ७५०
भारतराष्टीय शवाद १८८५
मूल्य ३००
मुद्रक-विवरणी और प्रपनामानुक्रमणिपा, श्री जयमम्मे प्रेस, जयपुर
मुखपृष्ठ, सपालपोय वक्तव्य और परिगिप्ट प्रादि के मुद्रक-श्री हरिप्रसाद पारीप, साधना
प्रेम, जोधपुर
विषय - सूची
विपय
पृ० स०
१
से ७७
क सेढ
१. संचालकीय वक्तव्य
२. राजस्थान मे संस्कृत साहित्य की खोज के विषय मे एक
विशिष्ट विवरणी
३. ग्रन्थनामानुक्रमणिका
४. जैसलमेर के हस्तलिखित संस्कृत ग्रन्थों के प्रसिद्ध भंडारों के
विषय मे डॉ० व्हूलर का अभिमत (हिन्दी अनु०)
५. जैसलमेर से लिखा गया डॉ० व्हूलर का पत्र, इंडियन एण्टीक्वेरी
के सम्पादक के नाम (हिन्दी अनु०)
१ से ४
४-५
संचालकीय वक्तव्य vocals बम्बई के शिक्षा विभाग ने राजस्थान और मध्य भारत में प्राचीन हस्त- लिखित अथ भडारो की खोज के लिए सन् १९०४-०५ ई० मे एलफिंस्टन कॉलेज, बम्बई के प्रोफेसर श्रीधर रामकृष्ण भडारकर को प्राज्ञा प्रदान को । तदनुसार वे मन् १६०५ और १९०६ ई० के प्रारभ मे अपने दौरे पर निक्ले और कार्य पूरा होने पर शिक्षा विभाग को उन्होने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। वह मूल रिपोर्ट अग्रेजी म सन् १९०७ मे प्रकाशित हुई थी। सरकार की ओर से हस्तलिखित ग्रथो की वोज के प्रसग मे यह दूसरी यात्रा थी। डॉ० भडारकर की इस रिपोर्ट में उज्जैन, इन्दोर, ग्वालियर, वीकानेर, भटनेर, नागोर, अलवर, जयपुर और जैसलमेर आदि स्थानो के उन गथ-भडारो का विवरण उस समय उनमें उपलब्ध महत्वपूर्ण ग्रन्थो की टिप्पणियो सहित दिया गया है, जो इस दिशा में कार्य करने वालो के लिए प्राथमिक मार्ग-निदर्शन करने जैसा है । इसी उद्देश्य को लक्ष्य मे रख कर जन मन् १९५० ई० में राज- स्थान सरकार द्वारा इस प्रतिष्ठान की 'राजस्थान पुरातत्त्व मदिर' के रूप में सस्थापना की गई तो हमने इस विवरणी का हिंदी अनुवाद करा कर मदिर की ओर से उसे प्रकाशित करने का विचार किया। इससे दो उद्देश्यो की पूर्ति होती थी-एक तो यह कि मून रिपोट प्राय दुर्लभ्य हो चुकी थी और दूसरा यह वि पुरातत्त्व मदिर के द्वारा भी राजस्थान के सग्रहो का सर्वेक्षण कर के उनकी जानवारी शोध-विद्वानो को कराना अभिप्रेत था । स्पष्ट है कि प्रस्तुत रिपोर्ट का अधिकाग भाग राजस्थान के ही ग्रथ-भडारो मे, जिनमे जमलमेर के भडार मुग्य हैं, सम्बद्ध है । साथ ही, ऐसे अनुवादो से हिन्दी की ग्रथ स्मृद्धि में भी वद्धि हो जाती है। इन्ही बातो को ध्यान में रखते हुए हमने इस रिपोट का हिंदी अनुवाद पुरातत्त्व मदिर के तत्कालीन शोध सहायक श्री ब्रह्मदत्त त्रिवेदी, एम० ए०, साहित्याचाय, काव्यतीथ से कराया । पुस्तक का मुद्रण प्राय कई वष पूव पूर्ण हो चुका था। परतु हम इस रिपोट से सम्बद्ध कुछ अन्य सामग्री आदि के भी उपलब्ध होने की प्रती करते रहे जो पर्याप्त तलाश करने पर भी प्राप्त न हो मकी, अत अब इस पुस्तक को इसके -
[ २ ]
प्रस्तुत रूप मे ही प्रकाशित किया जा रहा है। इसको उपयोगिता बढ़ाने और
शोधकर्ता विद्वानों के सौकर्य के लिए ग्रंथ नामानुक्रमणिका एवं मूल रिपोर्ट में
उल्लिखित डॉ० हूलर के २६ जनवरी १८७४ के पत्र और जैसलमेर-भंडारों के
विषय मे उनके अभिमत के अनुवाद भी लगा दिए गए है।
आशा है कि इस पुस्तक का प्रकाशन शोधकर्ता विद्वानों के लिए लाभप्रद
सिद्ध होगा।
श्रावणी तीज,
सं० २०२० ।
अनेकान्त विहार,
मुनि जिनविजय
अहमदाबाद।
राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज के विषय मे एक विशिष्ट विवरणी . - महोदय, शिक्षा विभाग के स०-३०१ और ६६० के सरकारी प्रस्तानों के अनुमार (जिनका दिनाङ्क क्रमश १४ दिसम्बर, १९०४ और १० अप्रेल, १६०५ है ) सन १९०५ और १९०६ के श्रारम्भ मे किये गये मध्यभारत और रानपूतानां के अपने दौर का नियलिसित निवरण सेगा में प्रस्तुत करता है। प्रथम प्रस्तार की एक प्रतिलिपि मुझे सन् १९०४ के क्रिसमस अवकाश में मिली परन्तु फरवरी मास के पहले मैं किसी प्रकार अपने महाविद्यालय के कार्यभार से मुक्त न हो सका। श्रत फररी मास में मुझे कालेन से अबसर मिलते ही मैंने अपना दौरा आरम्भ किया। ३-जिस स्थान पर पहला दौरा करने की, कई कारणवश मेरी इच्छा थी, वह था जैसलमेर । यह नगर मरुस्थल के मध्य में है और वहा से सन्निकट रेलवे का स्टेशन ६० (नने ) मील दूर है। यहा प्राय ऊटों पर ही यात्रा होती है। श्री डाक्टर बूहलर जिन्होंने १८७४ के जनरी मान मे इम स्यान का दौरा किया था, लिखते हैं-"मरुधर प्रदेश का यह विकट स्थान, जहा परान पानी और नहरु के रोग की प्रचुरता है, अल्प काल के लिए ठहरना भी कम स्टदायक नहीं होता।" पश्चिमी राजपुताना राज्यों के तत्कालीन रेजिडेण्ट महोदय भी, निनसे मेरी मुलागत सन् १६०४ मे हुई, इस यात्रा को निम्ट, दुसपट और कष्टमाध्य बताते थे । श्री डा. बूहलर एक माह से अधिक नहीं ठहर पाये ऐमा मुझे बताया गया है। एम स्थान का प्रमुख जैन-भण्डार (पुस्तकालय), जो एक जैन मन्दिर से सम्बंधित है, अपनी सुरक्षित हस्तलिम्पित पुस्तकों के लिए प्रमिद्ध है। इसके स्वत्याधिरारी पुरुषों द्वारा दिये गये प्रतिपचतो के अनुमार, नि मेरे निरीक्षणार्थ यह भंडार सोल दिया जायगा, मुझे यह समुचित लगा कि म यसमर का जल्दी से जल्दी लाम उठाया जाय । श्रन्या यह डर था कि कहीं वे + उम समय, इस प्रसिद्ध मएडार के सम्बध में, जो पर रहोंने जेसलमेर से सम्पादक महोदय इरियन एगोरी चे निया उस दिनार २: जनवग १८७४ है, जबकि उनने पार ढा. जसेबी ने ६ दिन तक वहां कार्य मन्थन कर लिया था (निन्द ३, पृष्ठ ८०-९०) उनका अन्य पर जो बनिन की एस्मा के मम्मुष सी यवर ने प्रस्तुत रियाया वह बीकानरम दिनार १४ पर्ग का लियाहुया है (इण्डि एगी. ४, १०८) मनमेर से बीमार का यात्रा में उन्हें कई दिन लो हार्गे और यह हो सकता है कि बाद में लिमु गरेपन को भेजने के पूर्व वह वहां पद रिन में पारे में। . - ४- परन्तु २] राजस्थान पुरातत्व * लोग अपनी राय न बदल दें। दुर्भाग्य से श्री डा. बृहलर की, राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) में किये गये अपने दौरे की सविस्तर विवरणी, जिसे वे सन् १८८०-८१ में प्रकाशित करना चाहते थे, उनके मृत्युपर्यन्त ( सन् १८६८ ई० तक) न प्रकाशित होने से, ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि वह सारी रिपोटे खो गई होगी। उन्होंने ८ जून, सन् १८८० की रिपोर्ट में लिखा था-"सन् १८७३-७४ का शरत्कालीन दौरा, जो मैंने राजपूताना में किया उसकी विस्तृत रिपोर्ट और साथ-साथ उस समय मेरे द्वारा खरीदी हुई पुस्तकों का विवरण, जो संक्षेप से मैंने तैयार किया है, उसे, लम्बे टेवुलर आकार में, मुझे विश्वास है कि मैं जल्दी से जल्दी इस वर्ष प्रकाशित कर दूंगा।” परन्तु खरीदी हुई पुस्तकों की वह मूची और सन् १८७३-७४ में नकल की हुई पुस्तकों की विवरणी, श्री डा० कीलहोर्न महोदय की रिपोर्ट के साथ प्रकाशित हुई। इस प्रकार ऊपर जिक्र की गई और तैयार की गई विस्तृत रिपोर्ट का केवल यही अंश प्रकाश में आया है। इन्हीं कारणों से जैसलमेर की यात्रा और उस स्थान के प्रमुख पुस्तक-भण्डार में हस्तलिखित पुस्तकों के परीक्षण कार्य को, जिसके लिए मुझे कार्यभार सौंपा गया था, मैंने कठिनतम, अत्यावश्यक और महत्त्वपूर्ण समझा । यह हो जाने पर मुझे ऐसा लगा कि अवशिष्ट कार्य तुलनात्मक दृष्टि से कम कठिनता से हो जायगा। जैसा मैंने दिनाङ्क अप्रेल १६०४ की अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट के अनुच्छेद ११ में बताया था, पश्चिमी राजपूताना राज्यों ( स्टेट्स ) के श्री रेजिडेण्ट महोदय ने लिब दिया था, कि अपनी यात्रा प्रारम्भ करने के एक पक्ष पूर्व, मैं उनसे पत्र व्यवहार करू जिससे मेरे लिए यात्रा के साधन प्रस्तुत किये जा सकें । मैं यह सूचना, अपना दौरा आरम्भ करने को स्वतन्त्र होते ही दे सकता था और मैने ऐसा ही किया । पत्र-व्यवहार करने और जैसलमेर को प्रस्थान करने के बीच के समय का उपयोग, मैंने इन्दौर और उज्जैन के ग्रन्थ भण्डारों के देखने में किया। उस समय तक उज्जैन में प्लेग नहीं रहा। इस स्थान पर मेरी प्रारम्भिक यात्रा के आदि और अन्त में प्लेग फैली हुई थी, और जब उज्जैन जैसे स्थान पर एक वार प्लेग का आक्रमण हुआ तो यह निश्चय नहीं किया जा सकता कि कब फिर से इस संक्रामक रोग का आविर्भाव वहां हो जाय। साथ ही कुछ काम इन्दौर में करना वाकी रह गया था, अतः शीघ्राति- शीघ्र अवसर से हाथ न धो बैठने के लिये लाभ उठाया गया। ५- मेरे प्रथम सरकारी प्रस्ताव के प्राप्त करने की तिथि और महाविद्यालय में अपने कार्यभार से अवसर पाने की तिथि के बीच में, मैंने अपने सहायक व सहायकों को ढूंढने की चेष्टा की, जिन्हें नियुक्त करने की मुझे आज्ञा मिल चुकी थी। जैसा कि अपने पत्र संख्या ३१ दिनाङ्क १२ जुलाई, १६०४ में मैंने बताया, मुझे आशा थी कि शास्त्री रामचन्द्र दीनानाथ + को, जिनकी जैन साहित्य के शास्त्रीय ज्ञान की योग्यता बहुत अधिक थी और जिनको श्री डा० बूहलर, कील्होर्न, पिटरसन व भाण्डारकर जैसे महानुभावों के साथ हस्त- * यह दीर्घ काल पूर्व की सूचना मेरी लौटती यात्रा के लिये बहुत ही परेशानी की और श्राराम के बिना की होने से, बहुत ही अपर्याप्त सिद्ध हुई । उस अवसर पर मेरी यात्रा के साधन असन्तोषजनक थे । + शास्त्रीजी का ३ या ४ मास पूर्व परलोकवास हो गया, यह बात मुझे उस दिन मालूम हुई २६ जून १६०७)। +r * गजधान म मस्तन माहित्य की सोन [३ लिखित पुस्तकों के गर्य का दीर्घकालीन अनुभव था, नियुक्त कर सकूगा । परन्तु अपने घरेलू कार्यों को कठिनाई के कारण उहे अस्वीकार करना पड़ा और मुझे इस प्रान्त से अपने साथ ले जाने के लिए शास्त्री न मिल मा । अन्त मे मुझे बताया गया कि एक पण्डित राजपूताना में है निमने एक स्टेट मे हस्तलिखित पुस्तक मग्रहालय के अध्यक्ष के रूप में काम किया था और उमा सूचीपत्र बनाया था । उमर प्राप्त प्रमाण-पत्रों और हस्तलिखित पुस्तकों के सम्बन्ध में उसके व्यवहारयोग्य ज्ञान से मैंने मोचा कि यह योग्यतापूर्वक काम निभा देगा। श्रत मैंने से नियुक्त कर लिया। बाद में मुझे पता लगा कि अनवधानता, एवं स्वच्छता और स्पष्ट लेखन के अभार के दोप, जो प्राय ऐसे कार्यों के सम्पादन में होते हैं और जिनके लिए हस्तलिसित पुस्तकों के अनुस धान एवं अन्वेपण-कर्ता विद्वान् शिकायत किया करते हैं, उसमें पूर्णतया विदामान थे । इसके साथ ही संस्कृत व्याकरण को अभ्यासपूर्वक पढने पर भी उसका लेख परिशुद्ध नहीं होता था । उसे दन्त्य, तालव्य और मूर्धन्य पगारों की जानकारी नहीं के बराबर थी। यह इस देश के परिडतों की विशेष दोपप्रणाली है। इतना होने पर भी मुझे उसका अत्यधिक सुन्दरतम उपयोग करना पड़ा। - इस प्रकार जब मैं जाने को उद्यत हुआ तन से नियुक्त कर श्री डा. कीलहोर्न के परामर्शानुमार कार्य नहीं कर ममा जिसस मैंने अपनी पूर्व रिपोर्ट के अनुच्छेद ३ मे वर्णन क्यिा है और ना ही में से प्रारम्भिक कार्य करने के लिए मेरे पहले भेज सका। मैंने उम तरह के प्रारम्भिक कार्य को करने के लिए उम (पण्डित) को जन १९०५ रे अप्रेल रे अन्त मे अपनी प्रथम यात्रा पूरी कर चुका तर नियुक्त क्यिा । - इन्दौर मे मैंने चार नृतन पुस्तक-सग्रहों को देसा जहा मैं पूर्व अपमर पर नहीं जा समा या । इनमे से एक मे अनुपयोगी सूची थी, दुसरे मे केवल मुद्रित पुन्त मगृहीत थीं। कामचालन ठीक रहा था। उसकी अवस्था दयनीय थी। तीसरा सग्रह छोटा परन्तु अच्छा था और चौथा महत्त्वपूर्ण था। ८- कुछ विशेष महत्वपूर्ण हस्तलिसित पुस्तकें, जिन्हें में देख पाया, निम्नलिखित हैं- विलोम सहिता (चाज)। सामरिधान माण्य (सायपत)। ६ मुपभगान। प्रातिशारय दीपिका (वेद में प्रयुक्त स्वर एप सस्कारों के सम्बन्ध के नियम )-श्री सदाशिव अमिहोती कृत । अन्य मप्र में प्राप्त एक हस्तलिग्नित प्रति मे रचनासर दम लेखक का पुन पताया गया है। पात्यायन श्रौत-मूत्र-भाग्य - श्री काशीनाथ दीनितकृत । कात्यायन-श्रीत-पद्वति - मिश्र वैद्यनाथ कृत । श्राहिताग्ने हनिर्णय - भट्टराम कृत । रत्नगुम्फ (अग्निहोत्र प्रायश्चित्त)। उस पिोर्ट के अनुच्छेद ३ ओर ५ म 'श्री डा. कालहोर्न' ये घले 'डा० पृहलर' मूल में प्रशुद्ध पा है। S ४] * राजस्थान पुरातत्व + यज्ञदीपिका विवरण - श्रीभास्कर कृत । वर्णरत्नदीपिकाशिक्षा - अमरेश कृत । सश्राद्धछाग भाष्य कात्यायन के स्नान पूत्र पर याज्ञिकचक्रचूडामणि छाग की टीका है। यजुविधान (माध्यन्दिनीय)। सूक्तानुक्रमणिका - श्री जगन्नाथ कृत । अग्निहोत्रप्रयोगरक्षामणि - भरद्वाज अनन्त सोमयाजी के सुपुत्र रामचन्द्र दीक्षित कृत । वाजपेय पद्धति - दामोदर त्रिपाठी के पुत्र रामकृष्ण अपर नामक नानाभाई कृत । यज्ञतन्त्र सुधानिधि - उद्गात प्रकरण । आश्वलायन-श्रोत-सूत्र-वृत्ति - श्री देवत्रात कृत । दुरूह शिक्षा - अप्पयदीक्षित कृत । खादिर गृह्यसूत्र - श्री रुद्रस्कन्दाचार्य की टीका समेत । तण्डालक्षण सूत्र (सामवेद)। कल्पानुपद सूत्र ( )। पञ्चविधि सूत्र। द्राह्यायण श्रौतसूत्रीय औद्गात्र सोम सूत्र । वेदाङ्ग ज्योतिष पर टीका - श्रीशेष कृत । त्रिस्थली सेतु-गया प्रकरण - श्री रामभट्ट आकूत कृत । ललितास्तवरत्न - श्री शङ्कराचार्यस्वामि कृत । रामायण सार संग्रह - श्री निवासाचार्य कृत । चतुर्वर्ग-चिन्तामणि-परिशेप-खण्ड - इष्टापूर्तधर्म-निरूपण और सर्वदेवताप्रतिष्टाकर्म पद्धति (प्रतिष्ठा हेमाद्रि)। पर्वनिर्णय - श्री गणपति रावल कृत । प्रतिष्ठोल्लास-श्री शिवप्रसाद कृत । कालमाधवकारिका व्याख्यान - बैजनाथ भट्ट सूरि कृत । प्रायश्चित्तेन्दुशेखर - काशीनाथ कृत । स्मृतिदर्पण - श्रीसरस्वतीतीर्थ कृत । हस्तलिखित ग्रन्थ की मिति शक १४४४ (चित्रभानु)। दत्तकक्रम संग्रह - श्रीकृष्णतर्कालङ्कार भट्टाचार्य कृत । शुद्धिपदपूर्वक चन्द्रिका (शुद्धि चन्द्रिका)- धर्माधिकारिक रामपण्डितसूनुनन्दपण्डित अपरनामधेय विनायक कृत । धर्मशास्त्र सुधानिधि श्राद्धचन्द्रिका - दिवाकर भट्ट कृत । संन्यास पद्धति - विश्वेश्वर सरस्वती कृत । हिरण्यकेशीय अग्निमुख । हिरण्यकेशीय स्मार्त्तप्रयोगरत्न :- वैशम्पायन महेशभट्ट कृत । पराशरस्मृति - विवृति - विद्वन्मनोहरा। १ • राजन्यान में सस्त साहिय का सोज- स्मृत्यर्थसार - १४५४ मम्बत् में प्रतिलिपि की गई। नामपन्ध शतक - श्री भरदेव पण्डित रचित । प्रशस्ति के पद्यों में उपाय, युग आदि फे नाम सल्लम है। शिवचरित - श्री हरदत्त हत । गाधाममशती - श्री कुलाग्देवरचित्तटीका ममेत । चम्यूराव्य - श्री समरपुगर कृत । महाभाग्य प्रटीप - प्रकाशनारायण दीक्षित के पुत्र और अशातीक्षित के पौर अप्पय दीक्षित के भाई नोलस्एठनीतित कृत । परिमापेन्दुशेखर दीका मर्गमहला। काव्यप्रकाश टीस काव्यदीपिका । मर्यनारायण अध्वरीद के पुत्र और धर्मनीतित के पोर साम्बगिय कृत। तत्त्वसमाम पर टीका। भीमासा कुतूहुल - कमलाकर रचित । श्लोकगातिर - १४५६ (जर) गर म लिसी गई प्रति । न्यायशुद्ध - १६८३ मन्यत् में प्रतिलिपि की गई। नारायणोपनिषद् भाग्य -मायण कृत । युद्ध बलम सम्प्रदाय के अन्य। शिरमफिरमायन-पाशीनाय त ! शिर मूत्रमात्तिक - परराहत, जो मालम होता है कि कृष्णनाम नाम से भी अभिहित होता था। ग्राममूनार्य संग्रह - श्रीगठारि पृत - मन्मयत वेदान्तशुद्धरहस्य के राशिवकोप मुनि पे गुम्देव ही। शिवमिद्धातोवर -श्री कागीनाय त । मापदार्थाटीरा-मिनमापिणी की प्रतिलिपि १५०० शफ में की हुई। अनुमानमरि मार। उपनामप्रह प्रामपृत। राहनोधारागिन - श्री रामरिगोर रचित । यत्त प्रमग महपरिन्छ। अनुमिनिनिम्मा टीकामहित. दोनों के रचयिता रामनारायए । 'गैरागमे गिपएमु समस्या उपरय शान्तिफ्ल्प प्ररोग। : मा बाग मारा () मेवार भी मेटाउनतिन (ना !) परमानापान सामाननगरसनामा।
६ ] » राजस्थान पुरातत्त्व मैं एक जैन उपाश्रय ६- जब १६०५ सन में मैं उज्जैन गया तो वहॉउपनयन एवं विवाह के संस्कारों की बड़ी धूम थी। अतः उस समय कुछ संग्रहालयों को मै नहीं देख सका । फिर दूसरे वर्ष इस स्थान पर थोडे समय के लिये आया। इन दोनों यात्राओं में मैने १४ संग्रहालयों को घूम फिर कर देखा । इनमें से केवल ४ या ५ को तो सादी सूचियां थीं । प्रायः ६, या ७ के सम्हालने के काम को उनके सञ्चालक लोग ठोक रूप में कर रहे थे । एक में बहुत पुरानी हस्तलिखित पुस्तकें होने पर भी उनका क्रम बहुत ही अस्तव्यस्त था । हस्तलिखित ग्रन्थों में एक का भी पृष्ठ पूरा नहीं था । उसका मालिक जो वहुत वृद्ध था इसी वजह से लना के मारे पहले तो हस्तलिखित पुस्तक दिखलाने में सङ्कोच करता था; दूसरा, संग्रहालय चूहों, दीमकों जैसे पुस्तकभक्षी कीटकों की दया पर आश्रित था। में (जैनयतियों के अल्प वासस्थान में) केवल पुस्तक सूचि देख सका । क्यों कि उस की चावी नहीं मिल सकी । परन्तु सूचि बतलाती थी कि हस्त- लिखित पुस्तकें साधारण प्रकार की थीं । एक दूसरे अन्य संग्रहालय में, जो हस्तलिखित पुस्तक संग्रह के लिये प्रसिद्ध था, मुझे केवल एक तालिका मात्र दिखलाई गई। साथ ही मैंने परीक्षणार्थ कुछ हस्तलिखित पुस्तकों को नंध ली। परन्तु उनमें से बहुत कम पुस्तकें मेरे निवास स्थान पर लाई गई । ऐसा मुझे बताया गया कि जो आदमी इन्हें मेरे पास लाया था वह चुपचाप ही उन हस्तलिखित पुस्तकों को बड़ी संख्या में वेच रहा था। इतने विशाल मौलिक प्राचीन संग्रह में, अव जो बची थीं, उनकी संख्या नगण्य रह गई। दो पुस्तक संग्रहों में कुछ बहुत ही प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ हैं। १०- मेरी प्रथम यात्रा के सिलसिले में मुझे बताया गया कि उज्जैन के कुछ संग्रहालयों की सूचियां ग्वालियर दरबार के विशेष आदेश से वना ली गई हैं और यह विश्वास दिलाया गया कि वे मेरे निमित्त ही वनाई गई थीं। इनके लिये मैंने अपनी दूसरी यात्रा के पूर्व, पाने की चेष्टा की परन्तु ये मुझे अपनी दूसरी यात्रा के समाप्त करने पर बम्बई में मिलीं। साथ ही मुझे मन्दसौर तथा अन्यान्य अप्रसिद्ध स्थानों के संग्रहालयों को सूचियां मिलीं। उज्जैन से प्राप्त सूचियां दो या तीन हैं। इनमें से कोई सी भी मेरे पास पहले भी आती तो कोई उपयोग में नहीं आती। ११- इनमें के कुछ विशेष महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ निम्नलिखित हैं:- हेरम्बोपनिषद् । पञ्चीकरणोपनिषद् - भवदेव कृत । मण्डल ब्राह्मण पर टीका - सायण कृत। षडङ्गव्याख्या - भवदेव कृत । अष्टाध्यायी ब्राह्मण भाष्य यज्ञ सम्बन्धी साहित्य के कई ग्रन्थ । सर्वानुक्रमणिका परिभापोदाहरण । आपस्तम्व-सूत्र वृत्ति - विष्णु भट्ट कृत । पुष्पिका में ग्रन्थकर्ता का नाम चौण्डप लिखा है। शङ्कर के संक्षेप सार ( वेदोचारण से सम्बन्धित ) पर टीका - विनायक भट्ट उपाध्याय कृत। चातुर्ज्ञान । सायण कृत।
. * राजस्थान में सस्तन साहित्य का सोज * [10 चौधायन कल्पसूत्र पर टीका - सायण कृत (इण्डिया ऑफिस पृ०५१ ए)। हस्तलिखित प्रति जो मैंने देसी सरे प्रारम्भिक पदा में, 1 'प्रयीमत्रमयी कल्प' और 'पिक्त' पढा, जन कि इण्डिया प्रॉफिस स्थित हस्तलिखित प्रति मे 'त्रयीनामयी कल्प' और 'पित उल्लेख है। पारसलायन गृह्यसूर भाष्य - श्री देवस्वामी सिद्धान्त (न्ती) कृत। चौवायनस्वर्ग-द्वारेष्टिप्रयोग - दुण्डिराज कृत! पौधायन-कपालसारिका भारदीपिका - नारायण ज्योतिप कृत ! सादस्यतत्त्वदीप - श्रीपति के पुन वासुदेव द्विवेदी कृत। अमिहोरकर्म मीमासा। अग्निष्टोमोपोद्धात - द्ररिड रामचन्द्र कृत । बौधायन बृहस्पतिसरसारिका - गोरिन्ट कृत । कुण्डमाला - जगदीश त । मूल्याध्याय पर टीका-विट्ठल के पुत्र वालाण और दीक्षित कामदेव रचित । आश्वलायन श्रौत-मूत्र पर टीकायें - देवनात और सिद्धान्तीकृत। नौधायनचयनमूनव्यारया (महाग्निसर्वस्व ) - बासुदेव दीक्षित कृत । बौधायनशुल्बसून दीपिका-द्वारकानाथ यज्वन कृत । बौधायनीत मर्मस्य - शेषनारायण कृत । तैत्तिरीयम्बरसिद्धान्तचन्द्रिका - श्रीनिवास कृत । सामसूरवृत्ति। बौधायनश्रौतसूत्र। भारद्वाजसूनपरिभाषा। (ऋग्वेदीय) पाएटरीक हौत्र प्रयोग। होगालोक - श्रीशिवराम कृत। आश्लायनमूनानुमारि प्रयोग - विष्णुगृहस्वामी कृत। दशरात्रप्रयोग - विष्णुगृह स्वामी कृत । पारस्करगृह्यमूविवरण - रामपण कृत । परशुरामा पमून पर टीका- रामेश्वर कृत । लघुमारिका-विष्णुशर्म एन । अनिमुन्य (सत्यापाढी आपस्तम्ब)। भारद्वाज या परिगेपमूत्र। प्रतिक्षामून - ज्योत्स्ना। (रजु ) साम्प्रदायिक चातुर्मास्यमयोग। स्नानमूनभाग्य - यानिकचकचूडामणिधागमन । कान्यायन श्रौत सूत्रमाप्य और ( यजुर्वेदीय ) श्राद्धदीपिका - काशी दीनित त ! और प्रयोग-व्यस्टेशापरनामधेय नारायण कृत ! I प्रगलिग का इण्डिया मोरिम कटलो।
السا * राजस्थान पुरातत्त्व । कपाल कारिका भाष्य श्री गोपालोपाध्याय के पौत्र पुरुषोत्तम के पुत्र मौद्गल्य- मयूरेश्वर कृत। दर्शपूर्णमासपदार्थदीपिका - वेणीराजोपनामक नारायण भट्ट के पौत्र नरहरि के पुत्र काएव साम्राज भट्ट कृत । कात्यायन श्रौत सूत्रपद्धति - पद्मनाभ कृत । पौण्डरीक सम्बन्धी कुछ पुस्तके । प्रयोगदीपिका - बलभद्र के पुत्र देवभद्र कृत । इष्टकापूरणभाष्य (क्रात्यायनीय)- अनन्त कृत । चयन पद्धति - उत्कलदेशवासिश्रीनरहरि कृत । आधानादि चातुर्मास्यान्त प्रयोग ( काण्व )। विष्णुशतपदीस्तोत्र विवरण - रामभद्रकृत । गणपति सहस्रनाम व्याख्या - नारायणकृत, हस्तलिाखत पुस्तक का समय (शकवत्सर) १३३६ जय। संस्काररत्नमाला भाष्य - गोपीनाथ कृत । स्मृतिकौस्तुभ - राजधर्म। दिनकरोद्योत - व्यवहार। कालनिर्णयदीपिका - नृसिंह कृत, १३३१ (शक ) विरोधी नामक सम्वत्सर में रचित । आचार रत्न-लक्ष्मणभट्ट कृत। मातृगोत्रनिर्णय - लौगाक्षिकृत । दर्शपूर्णमास प्रयोग - गोविन्दशेष और अनन्तदेव कृत । मनुस्मृतिटीका, मनुभावार्थ चन्द्रिका या दीपिका - रामचन्द्र कृत । अनालम्बुकायाः कर्मकरणविचाराः । दानभागवत - वणि कुवेरानन्द कृत । द्वथामुष्यायण दत्तक निर्णय - विश्वनाथ कृत । दत्तक कुतूहल - दैवज्ञ पुरुपोत्तम पण्डित कृत । पद्मपद्मिनी प्रकाश (धर्म) एक उद्धृत भाग । शास्त्रदीप (धमे ०)। प्रयोगसार - विश्वनाथ कृत । मुहूर्त मार्तण्ड टीका - चातुर्मास्ययाजी अनन्तदेव कृत । संध्याविवरण - श्रीरामाश्रम कृत । विद्यागोपाल चरणाचनपद्धति - लक्ष्मीनाथापरनामक चिदानन्दनाथ कृत । प्रायश्चित्तचिन्तामणि (अपूर्ण)। प्रासाद प्रतिष्ठा - महाशर्मकृत । ज्ञानदीपिका (प्रायश्चित्त)- शङ्कराचार्य कृत । दामोदरपद्धति (धर्म)।
* राजस्थान में सस्थत साहित्य री खोज * [t दानशाक्य समुश्य - योगीश्नर कृत 1 । रूपनारायणीय - उदयसिंह राजराज कृत । रूपनारायण उदयसिंह के एक विरुद को बताता मालूम होता है। क्यों कि यह प्रतापत 'गजपति' के बहुत से निरुटों में से एक है जिम के नाम पर प्रतापमार्तण्ड का निर्माण किया था। मिथिला मे करिपक नाम वाले जिनके अन्त में 'नारायण' श्राता है, कई एक राजा हुा । ऐसे वैकल्पिक नाम वाले राजाओं मे एक रूपनारायण है (इफकृत क्रोनोलोजी पृ० ३०५)। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पुस्तकालय मे रूपनारायणीय की एक हस्तलिखित प्रति है जिसका समय डा० आमटे ने सन १६५० ईस्वी बताया है । इसलिये इस पुस्तक की ममाप्ति १५३० ईस्वी मे होनी चाहिए। गायत्रीप्रिवृति - श्री प्रभूताचार्य कृत । प्राचारदीपिमा-दीक्षित गोविन्द के पुत्र नारायण कृत । प्रतापमार्तण्ट - पुरुषोत्तमदेव 'गजपति के पुत्र प्रतापरुद्र कृत । यह 'गजपति' और म्पनारायण जैसे निरुतों से अलकृत है। उनमे से एक निरुत 'नकोटिकर्णाटक फलवरगेश्वर' है। हाल ने कल के बदले में केरल पढा मालूम होता है या क्ल को गलत पढ लिया हो और उन्हें पता नहीं कि वरग का क्या उपयोग हो ( कण्ट्रीब्यूशन, पृ० १७१ ) । मुझे विश्वास है कि क्लवरग कुल्वर्ग है। दानप्रदीप -भट्ट माधन कृत । गुजरात मे करण के राजा राघर ने अन्यकर्ता के पूर्वज वासुदेव को श्रामन्त्रित किया था जो दधिराहन से श्राया था। यह टोलकीया जाति का श्रौदीय था । वासुदेव के वंशजों का क्रम इस प्रकार रहा है -नरसिंह, नीघ, राम, विष्णुशर्मा और भट्टमाधा। गृह्यप्रदीपकमाप्य - श्रीपति के पौत्र और श्रीकृष्णजी के पुत्र नारायण द्विवेदीकृत । स्मार्तोल्लास - पुप्फरपुर निवासी' निम्बाजी के पुत्र शिवप्रसाद पाठक कृत । शक १६१० या १६६० (नगो नृपति ) शक मे इसका निर्माण हुआ। इसी प्रन्थकर्ता द्वारा रचित एक प्रतिष्ठोल्लाम, उपरितन भाग मे (पृाउ ४ पर) देखा गया है और मध्य प्रान्त मे कीलहोर्न के हस्तलिरियत पुस्तक सूचिपर मे यह श्रोतोलाम नाम से भी मिलता है। धर्मशास्त्र सुधानिधि ( देखिये पृष्ठ १) प्रायश्चित्त मुक्तावली भारद्वान महादेव भट्ट के पुन दिवार कृत। संस्कार गणपति, काण्ड १०और श्राद्ध गणपति । काण्व कण्ठाभरण श्रौपामनविधि - वाजसनेयि अनत भट्ट त । पर्य निर्णय - श्री हरिशहर के पौत्र और 'पाठक' रामचन्द्र के पुत्र गंगाधर त । रूठकल्पद्र म - उद्धर के पुन अनन्तदेय कृत। स्वानुभूतिनाटक - त्र्यम्बर पण्डित के पुत्र अनन्त पण्डित कृत । हस्तलिखित प्रति का सम्बत् १८०५ है। गारपिन् वैजयन्ती-धर्माधिकारी नन् पंडितके पौत्र और वेणी पडित पुन गोपीनाथ कृत । 1 ये और ऐम हा अफ परिशिष्ट २ में उद्धृत प्रभाग को बताते हैं । , - प १०] गजस्थान पुरातत्व भावविलास - रुद्रकवि कृत । विश्वेशलहरी - खण्डराज कृत । हितोपदेश टीका - गोकुलचन्द्र कृत । हनुमन्नाटक-टीका - राघवेन्द्र कृत, १५३० वर्प में रचित सम्बत् का नाम नहीं है। वृत्तमुक्तावली - मल्लारि कृत । काव्यप्रकाश दीपिका। काव्यप्रकाश टीका, काव्यादर्शविवेकिनी - श्री पद्मनाभ के 'पुत्र' नृसिंह के पौत्र श्रीरे ( या ये) ल्हदेव कृत । हस्तलिखित प्रति अत्यन्त प्राचीन है। काव्यप्रकाश टीका - श्री सरस्वती तीर्थ (या नरहरि ) रचित । छन्दःकौस्तुभ -- श्री विद्याभूपण कृत ।। छन्द कौस्तुभ - राधादामोदर कृत विद्याभूपण की टीका समेत ।। मीमांसार्थ प्रदीप - काण्वशंकर शुक्ल कृत । अंगत्वनिरुक्ति (मीमांसा)- मुरारि कृत । मयूख मालिका - सोमनाथ कृत । मीमांसार्थप्रकाश - केशव पौत्र अनन्त पुत्र श्री केशव कृत । यह (सुरेश्वर ) वात्तिकसार वेदान्तोपनिषद् भी कहा जाता है । (बर्न तज्जोर, पृ० ६५.) महावाक्य विवरण, आनन्द निष्टाष्टक और पञ्चदशोपनिपद् - श्री रामचन्द्र कृत । नन्दिकेश्वर कारिका विवरण । कैवल्योपनिपदीपिका - श्री विद्यारण्य कृत । वाक्यसुधा पर टीकायें - ब्रह्मानन्द भारती और शङ्कर कृत । लघुवाक्य वृत्ति टीका। विवेक सार टीका - वेदान्तवल्लभ लक्ष्मीराम त्रिवेदी कृत । पाखण्ड मुखमर्दनचपेटिका - श्री विजयरामाचार्य कृत । भगवद्भक्तिविलास - श्री गोपालभट्ट कृत । अधिकार संग्रह - वेङ्कटनाथार्य कृत । भाव प्रकाशिनी टीका श्रीनिवास रचित सहित ! विशिष्टाद्वीतराद्धान्त - श्री निवासदास कृत । सिक्षुगीता केवल दो ही पृष्ट हैं । आरम्भ - द्विजउवाच नायं जनो से सुखदुःखहेतुः । सिद्वसिद्धान्त पद्धति - श्री गोरक्षनाथ कृत । अप्राङ्ग टीका - अरुणंद त कृत । सिंहसुधानिधि - काशीराज के कुटुम्बज भारत शाह के पुत्र बुंदेलखंड के राजराज देवीसिंह कृत। योगपयोनिधि - महेश भट्ट कृत । + ये विभिन्न स्थानो मे, दो भिन्न २ दिनो मे दिखाई गई । इनके नाम जैसे मैने विवरण में दिये हैं वैसे ही मिलते हैं ( पृष्ट ४५ और ४७ भी देखिये ) । m * सनस्थान में संस्कृत साहित्य का खोज * शार्ङ्गधर सहिता - काशीनाथ वैद्य रचित टीकामह । सुदर्शनसहिताया पातीश्वरसम्वादे ज्यास्त्रविचार । योपनीलाम-मानन्द नाथ कृत। मृत्युलाङ्गलनिधि (मर)। रत्नदीपिरा-चण्डेश्वर कृत । नर्तन निर्णय - कर्णाटर के पुण्डरीक चिट्ठल कृत । अन्त मे अन्य कर्ता ने राग चन्द्रोदय नामक अपने एक ग्रन्थ का उल्लेख किया है । १० - उज्जैन मे अपने हस्तगत मार्य को समाप्त कर मैने प्रचम असमर पर जैसलमेर के लिये प्रस्थान क्यिा । पूर्व र्प (सन १९०४) के अगस्त माम में स्टेट के दीवान महोदय ने मुझे यह लिखते हुए पूछा कि ताम्बर जैन कामेन्स का प्रस्ताव है कि जैसलमेर के समस्त जैन पुस्तक भएटारों की पुस्तक मूचि वनाई जाय । उनने साथ में एक आदर्श प्रतिलिपि की प्रति मुझे भेजकर मेरी तरफ मे कुछ पानश्यक सुधार वधार के परामर्श मागे। मैंने यह समझते हुए कि का प्रेम अपने लिये सूचिपर वना रही है, यह सुझान दिया कि प्रत्येक हस्तलिमित पुस्तक जो महत्त्वपूर्ण हो उन के श्रादि और अन्त के भागों के मार पर ऐसे ग्रन्थों के क्लेवर के वे अश जिनमे ऐतिहा- सिक मूचना पाई जावे, अवश्य ही जोड दिये जाय । परन्तु पुन्तर मूचि निर्माण का काम सटाई में पड़ गया । क्यों कि उस समय जैसलमेर के जैन सम्प्रदाय चालों तथा जैन श्वेताम्बर' सभा के प्रतिनिधियों के बीच मतभेद हो गया। अपने जैसलमेर पहुंचने पर मुझे पता लगा कि सम- झौता हो चुका और प्रमुख भण्डार मे उन सम्पूर्ण हस्तलिखित पुस्तको के सम्बन्ध की पुस्तक सूची टेनुलर श्रामर में (पर्व परामृष्ट भागों के जोड दिना) वनाली गइ । परतु आगे का कार्य कुछ नये मतभेट के पहलू उ संडे हो जाने से फिर स्थगित सा हो गया । १३ - जैसलमेर पहुँचने के बाद घण्टे भर मे ही में कार्य में लग गया । मैं दीमान मान से मिला और उन्होंने एक अध्ययनशील एन प्रौढ पण्डित को बुला भेजा जिसे अधिक सद्भावनापूर्ण वातावरण की अवस्था मे, पूर्व वर्षों मे, भलीभाति सुरक्षित स भण्डार मे, सरलता से जाने पिया जाता और यह वहा से हस्तलिखित पुस्तके भी अपने लिये ले लिया करता। वह इस बात से खर परिचित था कि हस्तलिखित पुस्ती का कौनसा मग्रह समे है। उसने आते ही मेरे लिये भएटारों की निम्नलिखित मूची तैयार कर दी ९-बडा भएडार सैना का नो सम्भवनाथ मन्दिर के नीचे (एक अन्धेरो भूगर्भगत गुफा मे) स्थित है। भएटार ~ परतरगच्छ रेडे पाश्रय में। ३- मग्रहालय - विरुसाह रे घर मे। भण्टार - तपागच्छ पाश्रय में । लोकगार के उपाश्रय मे। श्राचार्य गन्द्र के मन्त्रदान का। संग्रह - तलोटिया व्यामा का। +-राज्यसीय मग्रहालय अनय दिलान राममल मे। ४ - ६- १२] * राजस्थान पुगतच्च * - ----- ६ में - संग्रहालय - यति ईगरसिंहजी का। १० - संग्रहालय - वत्सपाल पुरोहित का। १४ - यहां तुलना के लिये डाक्टर भांडारकर महोदय द्वारा १८८३-८४ की अपनी रिपोर्ट पृष्ट १ में दिये गये पाटण के जैन पुस्तक संग्रहालयों के विवरण को पढ़ना अन्यधिक मनोरन्जनकारी होगा। "जैनों का प्रत्येक गच्छ या सम्प्रदाय जो किसी शहर में रहता है अपने दीक्षित साधुओं अल्प समय तक निवास के लिये एक स्थान रखता है और प्रत्येक उपाश्रय के साथ लगा हुआ एक बड़ा या छोटा पुस्तकालय भी होता है। यह पुस्तकालय सम्पूर्ण गच्छ की सम्पत्ति के रूप होता है और इसका दायित्व उस सम्प्रदाय के प्रमुख सदगृहस्थवर्ग के हाथों में होता है। जब कभी एक साधु उस उपाश्रय में स्थायी रूपेण निवास करने लगता है तो पुस्तकालय उसकी देखरंग्य में आजाता है और व्यवहारतः वह स्वामी बन जाता है।" १५ - उपाश्रय और पुस्तकालय प्रायः उन गलियों और पाड़ों के नाम से ही पुकारे जाते हैं, जहां इनकी स्थिति होती है। परन्तु जैसलमेर एक छोटा शहर है, उसमें न अधिक गलियां और न पाड़े ही हैं और ऊपर की सूची से यह देखा जा सकता है कि उपाश्रयों के नाम गच्छों के ऊपर रक्खे गये हैं । सम्भवनाथ मन्दिर में अभी कोई जैनयति नहीं रहता । परन्तु कुछ बो पूर्व एक जैनयति सचमुच इसके अन्तर्गर्भ गृहस्थित पुस्तक संग्रह का स्वामी था। वह मुझे ऊपरवाली मूची देने वाले पण्डित का घनिष्ट मित्र था अतः उसने उसे इस संग्रह को देखने की अनुमति देरक्खी थी। इस समय पुस्तक भण्डार पूर्णरूप से पञ्च (टूस्टी) लोगों के हाथ में है। ऐसे भण्डारों के सम्बन्ध में जो जैसलमेर एवं अन्य स्थानों पर है ऐसी प्रथा है कि प्रत्येक व्यक्तिगत ट्रस्टी उस भण्डार के अपना ताला और कुजी रखता है। और जब तक सब कुंजियों एक साथ नहीं लाई जातों कोई भण्डार नहीं खोला जा सकता । ऐसी परिस्थितियों में, ऐसा होता है कि जब तक एक भी पञ्च ना करने वाला होगा यदि जबर्दस्ती ताला न तोड़ा जाय तो भण्डार खुल ही नहीं सकता । ऐसी वात जैसलमेर के बड़े भण्डार के विपय में मेरे साथ दो बार हुई । यह इस विना पर नहीं कि किसी भी पञ्च को मेरे कार्य या वेहतर खोज के सरकारी काम को आगे बढ़ाये जाने से इनकारी हो; बल्कि केवल इसलिये कि उन लोगों में से एक ट्रस्टी का कान्फरेन्स के कार्य को चालू रखने देने में घोर विरोध था । कान्फरेन्स ने जिस पण्डित को सूचिपत्र तैयार करने का कार्य भार दिया था वह मुझे सहायता देने को तैयार हो गया और मैंने उसका यह सहयोग + ऐसे साधु लोग साधारणतय जाति या संस्कृत मे यति शब्द से कहे जाते हैं। यति का मुख्य रूप में वह अभिप्राय है जो पुरुष दुनियां से विरक्त जीवन व्यतीत करे । परन्तु प्राय. वर्तमान यति लोग गृहस्थ जीवन यापन करते हैं जिनके पुत्र कलत्र हैं और वे व्याज पर रुपया दिया करते हैं। केवल वे वैवाहिकविधि विधानपूर्वक नहीं सम्पन्न करते । फलत. अब अस्मिताशाली जैन गृहस्थ लोग ऐसे यति या जति और संसार से विरक्तिशील साधुओं के बीच भेद करने लग गये हैं । पिछले विरक्तिशील पुरुषो को वे साधु के नाम से पहचानते हैं । दोनों के प्रति प्रदर्शित सम्मान भी एक सा नहीं होता यद्यपि पहली श्रेणिवाले व्यक्तियो का न्यूनाधिक रूप से प्रभाव है। एक बात और भी कही जा सकती है। मुझे कुछ जैन यति वैष्णव या विष्णु के भक्त मिले । यह देखा जाता है कि पूर्वी हिन्दुस्तान में जैन लोग प्रसिद्ध रूप से वैष्णव और अवैष्णव में विभाजित हैं । ( इण्डि० एएटो. भा० १६ पृ० १६४ )। - * रावस्थान म सस्कृत साहिय खोन * [१३ स्वीकार किया। परन्तु उम माम व्यक्तिने उसकी उपस्थिति पर आपत्ति की, जन कि दूसरे पञ्च उसके पक्ष में थे। ऐसे अवमरों पर वाध्य होकर मुझे दीगन माहब को कष्ट देना पडता । फिर भी उन्होंने अपने घरेलू धन्धों, रोग और नियत राज्य कार्य के मामलों मे व्यस्त होने पर भी, तुरन्त ऐसे मौको पर मभो सम्भव सहायता मुझे दी। मेरे जैसलमेर मे निगाम करते हुए सम्पूर्ण कार्य को सम्पादन करने का श्रेय मुख्य रूप से उनी सहायता को है। मेरे ठहरने के अन्तिम दिनों मे तो उन्हें रेजिडेण्ट महोत्य से मुलाकात करने को जोधपुर जाना पडा । परन्तु तो भी उनकी अनुपस्थिति में एक मुमलमान सजन श्री नियाज अली ने, उनके स्थानापन्नरूप मे, मुझे अपनी पूरी मौहार्दपूर्ण सेवायें अर्पित करें। दीपान महोन्य उन लोगों की रग रग जानते थे अत मग्रहालय में प्रवेश करने के सम्बन्ध मे मुझे लिसने के पहले उन्होंने दूरदर्शिता से सभी पश्चों द्वारा एक मम्मिलित शर्तनामा (एग्रीमेण्ट) लिसमा कर हस्ताक्षर करना लिये थे। <६ - मेरे जैसलमेर पहुचने के कुछ दिनों पहिले ही एक सजन, जो वहीं का रहने नाला था परन्तु कराची म्युनिसिपैलिटी की नौकरी कर रहा था, छुट्टी पर जैसलमेर अाया हुआ था। यह मुझे बताया गया कि इस स्थान पर मेरे कार्य को आगे बढाने मे उसका प्रभान अधिक लामकारी सिद्ध हो सकेगा । परन्तु उसका प्रकाश समय व्यतीत प्राय होचुका था और वह जल्दी ही कराची जाने वाला था। श्रीक्लेक्टर महोदय क्राची ने मेरे अनुरोध करने पर, कराची म्युनिसिपेलिटी (नगरपालिस) के सभापति के रूप में, उसके अवकाश काल को कुछ समय तक के लिये और वढा दिया । इसलिये, उस श्रादमी ने, और जैन कान्फरेन्स के पण्डित तथा दूसरे स्थानीय पण्डित ने निसका जिक्र ऊपर पिया गया है, मुझे निरन्तर विभिन्न प्रकार से सहायता प्रदान की । मुश्किल से ही कोई राज्यर्मचारी इस बात को जानता होगा कि जैसलमेर का राजीय हस्तलिखित पुस्तक भएटार कहा है या कोई राजकीय हस्तलिखित पुस्तक भण्डार है भी कि नहीं । परन्तु उपर बताये गये तीन पण्डितों की दी हुई सूचि से यह निश्चित था कि भण्डार अश्य है, और फलत यह एक काठ के वक्म में वन्द किया हुश्रा मिल भी गया, जिसे कई वपी तक पोला ही नहीं गया था । वास्तव में यह संग्रह न बहुत वडा है, न साहित्यिक दृष्टिकोण से वैमा कुछ महत्वपूर्ण ही है कि जिममें हस्तलिखित पुस्तकों की अलभ्य प्रतिया हो। यह भण्डार, निमे डा. चूहलर महोन्य को दिखाने के लिये सोला गया था, मुझे देखने की अनुमति दी गई और श्री यूहलर को निसाने के बाद मे कोई ३० वर्ष से अधिक का समय होगया है, यह ताला चारी मारकर धन्द ही पडा रस्सा गया । १७ - उपरोक्त सूचि में उल्लिसित भएडारों मे प्रथम भण्डार के सम्बन्ध में श्री डा. चूहलर ने अपनी मंक्षिप्त रिपोर्ट १८७३-७४ (गफ रिकार्टस् पृष्ट ११७) मे उसमा पारमनाथ मन्दिर रे नीचे होना लिया है । परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि यह सम्भवनाथ मन्दिर के अधस्तन माग म हैं। दोनों मन्दिर एक दूसरे के जोड मे ऐसे बने हुए है कि एक ही मन्दिर के चे दो भाग मालूम होते हैं। मम्भरनार मनिरमम्यत १५५ किम वर्ष मे अर्थात् ईशगीय मन् १४२८ मे बना था, जन, जमा कि मन्दिर के कीर्ण लेख से स्पष्ट है, परिसिंह सिंहामनासीनथे । इममा और दूमरे उत्तीर्ण लग्नी या मंतिम विवरण मैने एक परिशिष्ट, में जो इसी रिपोर्ट से मल्लम है, दिया है। ये मर मैन और महकारी पण्डितों ने जमलमेर मे देये है। दुर्भाग्य से में इन लेग्मो की आप (उप्रेमन) के लिये अपने माय मामग्री नहीं ले गया था। क्योंकि मेरा अनुमन्धान गप टमरे . .
+ १४ ]] राजस्थान पुरातत्त्व ही ढंग का था। साथ में ऐसे उत्कीर्ण लेखों को भी मुझे पढ़ना होगा इसको मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी। अन्ततः मैंने सभी उत्कीर्ण लेखों को पढ़ लिया और उनकी प्रतिलिपियां मेरे पण्डित ने कर दी । ऐसा करने में मुझे अपने अन्य सहयोगियों को पूर्ण सहायता मिली। इनमें कुछ तो बड़ी कठिनाई के साथ पढे गये। बहुत सी नकलें (प्रतिलिपियां) तो उस समय ली गई जब मैं और और कार्यो में व्यस्त था और परिणामतः यह कार्य मेरे निरीक्षण में नहीं वनपाया। ऐसा मालूम होता है कि कहीं कहीं कुछ अक्षर छूट गये हो। फिर भी जो कुछ परिशिष्ट में संक्षिप्तरूपेण सारांश दिया गया है मुझे विश्वास है कि वह सब शुद्ध है। १८ - कहना न होगा कि मेरे जैसलमेर पहुंचने के दूसरे ही दिन से सर्वप्रथम बड़े भण्डार का ही कार्य आरम्भ किया गया । एक सूचि के न होने से मुझे इस संग्रह की प्रत्येक हस्तलिखित पुस्तक की जांच करने को बाध्य होना चाहिए था और इसमें महीनों तक समय लगाने की जरूरत होती। श्री डा० बूहलर अपनी संक्षिप्त रिपोर्ट १८७३-७४ (गफ के रिकोर्डस् पृष्ट ११८) में लिखते हैं कि श्री डा० जैकोबी की सहायता से उन्होने भण्डार के हस्तलिखित ग्रन्थ की प्रत्येक प्रति को देखा और साथ २ रघुवंश के कुछ अंशों की टीका नकल की एवं अपने हाथों से विल्हण के विक्रमाङ्कदेव चरित की सम्पूर्ण पुस्तक की प्रतिलिपि की । परन्तु मुझे सन्देह है कि उन्हें भण्डार की प्रायः वाईस सौ २२०० संख्या जितनी हस्तलिखित ग्रन्थों को प्रतियां दिखाई गई कि नहीं। वास्तव में भण्डार के सम्बन्ध में उनका निम्नलिखित विवरण इस विषय में बहुत ही निर्णयात्मक है:- "एक यति द्वारा ६० वर्ष पूर्व बनाई हुई 'बृहज्ज्ञानकोप' की एक प्राचीन सूचि के अनुसार उस समय इसमें ४२२ भिन्न २ ग्रन्थ थे । फिर भी जैसा मैने देखा, यह स्पष्ट है कि वह सूचि बड़ी असावधानी से बनाई गई है और उस समय पुस्तक संख्या ४५० से ४६० तक पहुंच गई थी। इस समय तो यह केवल किसी समय के एक बड़े सुन्दर संग्रहालय का अवशेपमात्र रह गया है। भण्डार में अब भी प्रायः ४० पोथियां या बण्डल हैं जिनमें सुरक्षित ताड़ पत्र की हस्तलिखित प्रतियां हैं। साथ ही बहुत अधिक अस्तव्यस्त ताड़पत्र पर अङ्कित पुस्तके हैं । ॥ ४ या ५ छोटे बक्स हैं जिनमें कागज, पर लिखे हस्तलिखित ग्रन्थ हैं और कुछेक दर्जन कागज पर लिखे ग्रन्थों के फटे और विखरे पन्नों के बण्डल हैं।" सचमुच ही जैसा यहां बताया गया है अब भी विखरे और टूटे ताड़ पत्रों का ढेर और कुछ वण्डल हैं जिनमें फटे पुराने विखरे कागज हैं । परन्तु यह बड़ा भण्डार स्थित पुस्तकालय अन्य भण्डारों से निश्चय ही ताड़ पन और कागज पर लिखे हस्तलिखित ग्रन्थों के संग्रह के लिये अपे- क्षाकृत श्रेष्ठतर है । श्री डा० बूहलर सारी हस्तलिखित प्रतियों को किस कारण नहीं देख सके यह उनके वर्णन से ही स्पष्ट होता है । "ओसवाल समाज का पञ्च जो भण्डार का अधिकारी है वहुत हो क्रुद्ध स्वभाव का है। उसके प्रति रावल को कभी कभी अनुरोध करना पड़ता है । संग्रह का कुछ भाग दिखलाकर वह कह देता कि यही सब कुछ है बाकी तो फटे पुराने पन्ने हैं।" कारण * इण्डियन एण्टी०४, पृ० ८२ । * इण्डि० एण्टो. ३ पृ० १० । । भण्डार के सम्यक्परीक्षण के बाद भी मुझे एक खाली स्तम्भ में पहले न देखे हुए कई अन्य हस्तलिखित ग्रन्थो का सुरक्षित होना बताया गया। इसी तरह एक ग्रन्थो के अच्छे संग्रह के ईटो की दीवार के अन्दर चिन दिये जाने का उल्लेख जो पिटरसनने (. अपनी रिपोर्ट, पृ० २ पर ) किया वह यहा उल्लेखनीय मालूम देता है ।
* राजस्थान में सरूत साहित्य से खान * [१५ इसका यह होसकता है कि ग्रन्थ भण्डार के सम्पूर्ण सग्रह को दिसलाने की उसकी अनिच्छा हो या धैर्य का प्रभार या दोनो ही वाते हों। जिसमार्य के लिये किसी प्रकार का भत्ता नहीं दिया जाता उमको करने के लिये कई दिन तक पुस्तके दिखलाने को बैठे रहना बहुत धैर्य का काम है, और विशेष रूप से ऐसे श्रादमी के लिये जिमकी इसमें किसी प्रकार की दिलचस्पी नहीं होती। हस्तलिखित ग्रन्या की प्रतियों को निराल र देना और दूमरे लोगों के द्वारा उन सर को देसते जाना, ऐना होना और भी श्रवाञ्छनीय होता है। अत में जैसलमेर के एक अन्य स्थानों के एन सभी यति महानुभाषी और अन्य सननो का कृतज्ञतापूर्ण आभार मानूगा जिन्होंने इस प्रकार मेरी पूरी सहायता की। कभी भी काम करते करते यह टर घरकर बैठता कि कहीं वे लोग धैर्य न सो बैठे। श्रत मेरे अनुसवान का कार्य जैसा मैं सोचता था उससे कम ही पूर्णता से समाप्त किया जासका। २६ टाक्टर श्री यूहलर के विवरण मे, उपरोक्त अनुच्छेद मे ही, १२० वर्षो से भी पूर्व बनाई गई एक प्राचीन सृचि का भी उल्लेख है। परन्तु अपना कार्य प्रारम्भ करने के प्रात काल ही कान्करेन्म के पण्डित ने मुझे सूचना दी कि उसने सग्रह की अधिकतर पुस्तको की एक नई सूचि बना ली है । उसने यह भी बताया कि इसकी एक प्रति कान्फरेन्स के अधिकारियों के पाम जयपुर भेज दी गई है और १ प्रति भण्डार में सुरक्षित है। तानुसार मैंने पहले दिन ज्न पुस्तकों की जाच की जिनका सूचि-पत्र तैयार होना था और भण्डार को सुरक्षित सूचि को मैंने मागा जो नई बनाई गई थी । म दिन का मेरा कार्य समाप्त होने पर मैं सबेरे दूमरे दिन कुछ समय तक बैठा और मैंने २०० से कुछ अधिक हस्तलिखित पुस्तको की सरया, नाम, अादि लिखे और उनकी सूचि देसी । यह इसलिये किया गया कि रिचरण क सम्बन्ध मे मेरी जानकारी कुछ ठीक हो । ब्राह्मण प्रन्यों के सम्बन्ध मे सिवाय कुछ एक सूचना के, जैसे कि केवल सरया, नाम और यह ग्रन्थ दूसरे दर्शन का है (जैनेतर वर्मानुयायियों का), सूचि मे और क्सिी तरह का पल्लेस नहीं था। बात यह थी कि प्स सूचि का सम्बन्ध तो केवल जैन कान्फरेन्स से था और वह नल जैन साहित्य तक ही सीमित थी। हस्तलिखित पुस्तकों के निरीक्षण का कार्य दो यति महानुभावों के तत्त्वावधान में किया गया जिनमे एक प्राचार्यगच्छ और दूसरे सरतरगच्छ के थे। ये लोग अपने अपने पाश्रयो से भएडार मे आया करते थे। दूसरे पञ्च लोगों की अवधानता वरावर रहा करती थी, जिनमें एक या दो हम लोगों के निरीक्षण ममय मे भण्डार मे उपस्थित ही रहते थे। इस निरीनण कार्य को उन यति लोगो की सुविधा को देखते हुए मध्यान्ह से पहले हम लोग नहीं कर पाते थे। उनकी उपस्थिति नियत म्प से होमा इसलिये मैं अपने मन्यात्वाहका से, जो दीगन महोदय ने मेरे लिये रम छोडे थे, उन्हें बुलाने के लिये भेज दिया करता। एक और वात यह भी थी कि यति लोग दूसरी बार अपना भोजन सूर्यास्त से पूर्व अपने हाथों बनाते ये। अत जन मैं अपना कार्य प्रारम्भ करता सरे कुछ समय बाद ही वे लोग पारपार अपने जाने का बहाना र मुझे अपना उस दिन का कार्य शीघ्र ही ममाम करने को वाय करते थे। परन्तु में अपना काम यथाक्रम जारी रसता और मे चन्द नहीं करता । जब मैं उनलोगो का विश्वासभाजन होगया तो वे लोग मुझे अन्तर्गर्भगृह से कुछ वस्तुए, जिनरी में प्रतिलिपिया २० - , १६] * राजस्थान पुरातल बनाना चाहता, बाहर लाने देते थे। मैं अपने पण्डित के साथ विशेष यत्नपूर्वक नियत समय के बाद भी अपना काम करता ही रहता। २१- संग्रह की दुरवस्था के विषय में इधर उधर विग्वरे ताड़-पत्रों के ढेर और फटे हुए कागज पत्रों के ढेर को देखकर यही कहा जा सकता है कि समय और अनवधानता दोनोंने ही अपने आधिपत्य से वहां पर विनाश का कार्य प्रारम्भ कर दिया है । इस परिणाम का प्रभाव उन बृहदाकारवाली ताडपत्रीय पुस्तकों की प्रतियों पर भी कम नहीं हुआ । प्रत्येक ताड़-पत्र की हस्तलिखित पुस्तक (जिन में एक या अधिक पुस्तकें लिखी हुई हैं) दो लकड़ी की पट्टियों के बीच वांधी गई है । फिर उसे एक कपड़े के वन्धन में बांधकर कई ऐसे बन्धनों को एक मोटे कपड़े में सुरक्षित रूप से लपेट कर रस्सी से ठीक तरह से बांध दिया गया है । इन वण्डलों को यथा- क्रम व्यवस्थित नहीं रखा गया है । क्यों कि लंबाई में ये भिन्न २ आकार के होने से इनको पत्थर के खानों में (जो जिसमें समागया उसे वहीं पर ) रब दिया गया है । प्रत्येक बण्डल पर संख्या लगी है । परन्तु कुछ पर दो दो संख्यायें हैं; एक तो पुरानी संख्या है जिसको बिना काटे छोड़ दिया गया है, दूसरी नई है जो कान्फरन्स के पण्डित द्वारा लगाई गई है । इसलिये हमें पुस्तक निरीक्षण कार्य में कुछ सन्देह और उलझन का सामना करना पड़ा । इससे यह बात हुई कि कुछ हस्तलिखित ग्रन्थ, जिनको मुझे अवश्य जांचना चाहिये था, बिलकुल ही नहीं खोले जासके । सम्भवतः अशुद्ध संख्या या पुरानी संख्या जो उन वण्डलों पर लगी हुई थी वह मुझे पढ़कर सुनाई गई, जब कि मेरे द्वारा लिखी संख्या नूतन थी । ऐसे ग्रन्थों में, जिन्हें खोला नहीं गया कुछ तो ऐसे थे जिनके लेखन काल का मैं मिलान करना चाहता था । क्यों कि वे बहुत प्राचीन थे । डा० बूहलर ने सम्बत् ११६० की हस्तलिखित पुस्तक को अपने द्वारा देखी गई भण्डार की उन प्राचीन पुस्तकों में प्राचीनतम लिखा है (गफ पृ० ११७)। परन्तु नूतन सूचि के अनुसार उससे भी पुरानी, कम से कम सात, पुस्तके उपलब्ध हुई हैं जिनका समय ६२४, १००५, ११२०, ११२७, ११३६, ११४४, और ११५५ सम्वत् है । इनमें से ११२७ और ११३६ सम्वत्सरों को मैंने मिलान कर देखा । दो प्रतियों का समय, सूचि देखते समय मेरे दृष्टिगोचर न होने से अपने निरीक्षणार्थ दर्ज न कर सका । दो प्रतियां विलकुल निकाली ही नहीं गई और एक प्रति जिस पर सम्वत् ६२४ लिखा है हरिभद्र की विवृतिसहित “दशवकालिक" की हस्तलिखित प्रति है, इसका समय मै सरलता से नहीं खोज सका। २२ - उपयुक्त हस्तलिखित पुस्तकों में से एक ग्रन्थ जो मुझे देखने को मिला उसका नाम है वस्तुपाल प्रशस्ति ( वस्तुपाल की प्रशंसा में कविता) जिसके रचयिता श्री जयसिंह कवि हैं । इसका आरम्भ चालुक्यवंश के विवरण के साथ मूलराज प्रथम से हुआ है। मूलराज के विपय में यह बताया गया है कि उसने कच्छप को पराजित कर (सुकृतसंकीर्तन २, ६) सिन्धु- राज ( सम्भवतः मालवराज ) से युद्ध कर गौरव पदवी पाई। साथ ही दक्षिण के छत्तीसराज- वंशों द्वारा वह सेवित हुआ । भीमदेव के सिंहासनारूढ़ होते ही श्री (राजकीय गरिमा) ने भोज के बाहुपाश को, वाणी ने उसके मुख को और करवाल ने उसके हाथ को छोड़ दिया। जयसिंह सिद्धराज के घोड़ों के विपय में यह लिखा है कि उनके खुरों से उठी हुई धूलि ने मालवराज की कीर्ति रूपिणी स्त्री के मुख को म्लान कर दिया (सुकृत० २, ३४) कुमारपाल की ऐसी प्रशस्ति वतलाई गई है कि उसने जैन धर्म को अधिकाधिक संरक्षण एवं सहायता दी, * रानन्धान म सरात साहित्य दो घोर । [१७ अर्णोराज (माम्भर के अधिपति) को भयभीत किया, वृक्षण का घेरा डाला (सुमृतसकोर्तन २,४१ - ४३ और कीत्तिकौमुदी २,४७-४८) और स्मररिपु (शिव, जिसने कामदेव को भस्म रिया) महादेव की महिमा प्रशस्त की । अन्तिम विवरण का सम्बन्ध, सम्भवत सोमनाथ मन्दिर के पुननिर्माण कार्य से है। भीमदेव द्वितीय ने, चालुक्य लावण्यप्रसाद को, अपनी कीर्ति को अधिकाधिक विस्तृत करने का कार्य मौंपा। चालुक्य लारण्यप्रसार के पुत्र वीरधवल ने, भीमदेव से अपने लिये कोई मचित्र का नाम बताने का अनुरोध किया। इसके उत्तर मे भीमदेव ने वस्तुपाल और तेज पाल का नाम प्रस्तुत किया जो उसके आश्रय में श्रीकरण के उच- पद पर श्रामीन (सम्भवत मुरय मचिर के पर पर) थे। साथ ही उनसी सेवाय भी वीर- धवल के यहा हस्तान्तरित कर दी । ऐमा करते हुए उसने दो वशों का क्म दिया है । यह सोमेसर के सुरथोत्मर (डा० भाण्डारकर की रिपोर्ट १८८३-८४, पृष्ट २१ ) और मोमेश्वर रचित यस्तुपालप्रशस्ति, जो श्रावू पर्वत के तेज पाल मन्दिर में उपलब्ध होती है, पणित राजवंशों से माम्य रसता है (कीत्तिकौमुदी, परिशिष्ट पृष्ट १-१०)। कीत्तिकौमुदी के ३, ५१-५२ मे ऐसा लिम्बा है कि लावण्यप्रमाद ने इन दोनों मचिों के विषय मे स्वय सोचा, परन्तु अरिसिंह रचित सुकृतमीर्तन के मर्ग ३ के निरण का अंश, जो दम प्रशस्ति के वर्णन से बहुत प्रति माम्य रसता है उमरे अनुमार, भीमदेव स पितामह कुमारपाल भीमदेव को स्वप्न में दीवा और ग्मने यह मम्मति दी रि लावण्यप्रमार को अपने प्रमुग्न महायक के रूप मे रग्वे, माथ ही उसे मन का स्वामी (सर्वेश्चर ) बना कर पीरधवल को उत्तराधिकारी वना दे । जय दूसरे दिन प्रात काल भीमदेव ने यह प्रस्तार पिता और पुत्र के सामने रक्खा तो वे रानी होगये और पुन ने भीमदेव से एक मचिव का नाम बताने का अनुरोध किया, जिसको भीमदेव ने प्रशस्ति में वर्णित कथन के अनुसार कहा है (सा- यूहलर का सुस्तमकीर्तन पृ. ४२१६) । दोनों भाईयों के पूर्वजों के सम्बन्ध में प्रशस्ति बतलाती है कि मोम, देवताओं में केवल तीर्थकृट् को पूय मानता था, विद्या के धुरन्धरा मे अपने गुरु हरिभद्र को और स्वामियों में मिद्धेश को ही अधिक मानता था (सुस्त० ३,५०)। यह हरिभद्र तत्त्वप्रनोध के कर्ता के रूप में अभिन्न ही हो सकता है (प्राय मम्वत १२२५) और मोमेश्वर कृत प्रशस्ति के ७५ में लोक मे वर्णित सिद्धेश वास्तव मे जमिह मिद्वरान है। जन पीरपाल मारन राजाओं (मारवाड के राजा लोग) पर आक्रमण करने के लिये चला, तर वस्तुपाल ने यदु मिहन की सेना के समुद्र को अस्तव्यस्त किया । उसने नाभेय, नो शगुञ्जय का आभूषण है, के मामने इन्द्रमण्डप का निर्माण राया । टममे उममें से कई कीर्ति प्रख्यात कार्यों का वर्णन किया गया है। जैसे, शत्रुञ्जय, पादलिप्त नगरी और अर्यपालित ग्राम जैसे मुन्टर स्थानो के सन्निकट पडी • सुन्र झीली का निर्माण, उन्नयन्त पर्वत पर मन्दिरों का निर्माण । स्तम्भ प्रभु के मन्दिर का जीर्णोद्धार, जिममे, नाभेय और नेमिनार की अविम(निना हाय की नी)मूर्तिया है। एक बार तेज पाल ने अपने बडे भाई से, श्री जयसिंह मृरि (प्रशम्नि के रचयिता) द्वारा उसको मनाये गये काव्य का वर्णन क्यिा, जिसके सुनने का अमर जर यह मुत्रन की पूजा करने के लिये भृगुपुर (भडोच ) गया, तन मिला था। इस काव्य में परि ने मुनत के मन्दिर के लिये, वामके ग्यम्भों के स्थान पर २५ म्वर्ण- अटित म्तम्भों (कल्याण -एड) के लिये प्रार्थना गरी थी। इनके लिये वस्तुपाल तथा तेज पाल की कीर्तिगाथा गाई गई है। म प्रशस्ति मा निर्माण उमी भंट रे पलक्ष्य में पिया गया है । श्रन्त में १८] * राजस्थान पुरातल में जयसिंह ने अपना नाम दिया है और स्वयं को प्रभु मुव्रत के चरण कमलों के चञ्चरीक भ्रमर के रूप में बतलाया है। २३ - इन हस्तलिखित ग्रन्थों में दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, हम्मीर-मद-मर्द न(हम्मीर के मान का मर्दन)-लेखक जयसिंह । यह भी ऊपर वर्णित पुस्तक के समान ही लकड़ी की पट्टियों के बीचमें बांधी हुई है । इस ग्रन्थ का नाम डॉ. बूहलर को दिखलाई गई सूचि में दिया हुआ था परन्तु उन्हें ढूंढने पर इस पोथी का पता न चला। स्वर्गीय श्री एन० जे० कीर्तने, जिनकी दृष्टि में नय- चन्द्रपूरि द्वारा लिखित हसीर काव्य की हस्तलिखित प्रतिभाई और जिसका उन्होंने सम्पादन किया, वे उसे, मूचि में बताये गये इस ग्रन्थ के समान ही समझते हैं। परन्तु अब इस हस्तलिखित पुस्तक की प्रति उपलब्ध हो गई है, अतः यह स्पष्ट है कि दोनों पुस्तकें समान नहीं हैं । नयचन्द्र सूरि कृत ग्रन्थ, हम्मीर की कीर्ति के गुणगान के लिए लिखा गया काव्य है। प्रस्तुत ग्रन्थ एक श्रद्ध ऐतिहासिक । नाटक है, जिसका प्रतिपाच विषय है हम्मीर का अभिमान नूर करना । प्रस्तावना जो विवरण, ग्रन्थकार द्वारा दिया गया है, वह निन्न प्रकार है-- 'पूर्व समय में भृगुनगरी में एक सूरि (जैन आचार्य) वीर मूरि नामक थे, जिनकी सुत्रत के चरणों में पूर्ण भक्ति थी । उसके जयसिंह नामक कवि एक शिष्य था जो परपन कवियों की बुद्धिरूपी समुद्र के लिये अगस्त्य था (अगस्त्य जो समुद्र को पान कर सुखाने वाले थे ) और जिनके पाद पद्मों के सेवन की अभिलापा सैकड़ों जैनश्वेताम्बर (मिताम्बर) यति लोगों को रहा करती थी। उसने वीरधवल की, जो कि चालुक्यवंश के वन में कल्पतरु (यथाकाम इच्छा पूर्ण करने वाला ) वृक्ष था, कीत्ति के अवतारभूत इस सुन्दर नाटक की रचना की। इस नाटक में नवों रसों की पूर्ण निष्पत्ति है।' अन्त में नाटक वस्तुपाल को समर्पित किया गया है। उपरोक्त प्रशस्ति और इस नाटक में आया हुआ एक पद्य के समान है। इस विवरण से, इस नाटक के रचनाकार और ऊपर सूचित प्रशस्ति के निर्माता को पहिचान लेना सम्भव है । हस्तलिखित प्रति के अन्त में १२८६ सम्बत का निर्देश है जो इस नाटक (रूपक) का निर्माणकाल हो सकता है। मैंने इसकी एक प्रतिलिपि करवाई और उसके अधिकांश भाग की मूलप्रति से तुलना करवाई । परन्तु हस्तलिखित प्रति को पढ़ना कोई सरल कार्य नहीं था। एक काव्य के समान यह ग्रन्थ पद्यमय नहीं होने से छन्द का इस में कोई विशेप प्रयोग नहीं हुआ है । साथ ही इस का अधिकांश भाग गद्यमय और प्राकृतभाषानिबद्ध है और इस से कठिनाई दूनी बढ़ती है। इस कठिनाई के साथ, यद्यपि हस्तलिखित ग्रन्थ के सब पृष्ठ सुरक्षित अवस्था में है, फिर भी कम से कम आधे दर्जन पन्नों के अक्षर बिलकुल घिसे हुए हैं और कई पन्ने एक दूसरे की रगड़ से बिलकुल काले हो गये हैं। इस रूपक का संक्षिप्त विवरण देना मनोरञ्जक होगा। इस रूपक का अभिनय, सर्व प्रथम स्तम्भेश्वर में भीमेश्वर के मेले पर किया गया बताया है । यह मही नदी के मुहाने पर दक्षिण + यह बताना बहुत कठिन है कि नाटक मे कितना सत्याश है । + मतिकल्पलता यस्य मनःस्थानकरोपिता । फलं गुर्जरभूपाना संकल्पितमकल्पयत् ॥ .
* राजस्थान म संस्कृत साहिया साब * . पार्च मे, उसके कुएडल स्थान (एक कर्ण भूपण) की शोभा बढाता है । जयन्तसिंह ने अपनी जनता के मनोरञ्जनार्थ नमों रसों से पूर्ण इस रूपक के अभिनय की प्राज्ञा दी वताई है । कारण यह बताया है, कि जनता को, अभिनेताओं द्वारा सेले गये केवल भयानक रसके प्रकरणों के देखने से, बहुत ही अरुचि हो गई थी। अत इस रूपक का अभिनय प्रारम्भ किया गया । सूत्रधार, एम प्रशस्त अवसर पर, अपने प्रकरण की अभिनेय सामग्री को प्रस्तुत करने मे, स्वय को बधाई देता है । सभी अभिनेता बहुत अच्छे कलाकार हैं । जयन्तसिंह सचिव प्रमुख दर्शकों में हैं । इस नाटक का चरितनायक वीरता और गौरस गरिमा का स्थान श्री वीरधवल प्रभु है, साथ ही कनि जयसिंह मूरि की अनुपम कविप्रतिभा है। प्रस्तावनानन्तर वीरधरल और तेज पाल परस्पर वर्तालाप करते हुए दिखाये गये हैं। प्रथम वीरधवल वस्तुपाल की प्रशसा के पुल याधता है और तेज पाल वीरपाल की प्रशंमा के । इसी बीच चीरधरल, श्रीवस्तुपाल द्वारा एक अवसर पर प्रदर्शित वुद्धिचातुर्य की प्रशमा करता है। यदुराजा की सेना ने सुदृरवर्ती स्थान से भाकर लाट देश ने स्वामी सिंह को भयभीत कर दिया है। भयत्रस्त मालन नरेश ने भी सिंह की शफि को, अपने सहयोग को बीच में ही हटा कर, और कमजोर बना दिया है । यह महयोग उसे अपने मित्रमण्डल से मिलता था। ऐसी परिस्थितियों मे, वस्तुपाल ने अपने चातुर्य मे, सिंह को, जो पहले शत्रू था वीरधवल का मित्र बना दिया । वीरधवल, मग्रामसिंह के पड्यन्त्र का, जो उसने पीर सबल के विरुद्ध किया था, वस्तुपान ने मि तरह 'भण्डा फोड' किया उमा भी वर्णन करता है । इमरा दसरे एक स्थान पर शाम नाम बतलाया गया है। यह मिन्धुराज का पुत्र और लाटदेश के राजा सिंह का भतीजा था। उस समय सग्रामसिंह, अपने पैर पैर को ध्यान मे रख कर, सिंहण के सेनापतियों को अपने साथ, ले गया, जब कि वीरधवल मग (मारवाड) रानात्रों को पराजित करने में लगा हुआ था, और वह वीरधवल का पीछा करने लग गया। फिर वर्तमान परिस्थिति साश्रयतरण किया गया है । राजा सिंहण उसके विरुद्ध कूच कर चुका है । माथ ही प्स मेनारूपी समुद्र मे नटियो की तरह अनेक राजा लोग श्राफर मिल गये हैं। सिंहण को सिन्धुराज के पुत्र ने ही ऐमी तैयारी के लिये पूर्व प्रेरणा दी और जिसकी ईर्ष्या वस्तुपाल के द्वारा की गई युद्धगरिमा के कारण और अधिक बढ़ गई। दूमरी और पीरधवल के विरुद्ध, तुरुक सेनापति ने, अपनी महती सेना से पृथ्वी को कपाते हुए, श्राममण कर दिया है । इतना ही नहीं मालना के राजा ने भी, अपने महायम रद राजा लोगो के माय, वीरपाल से युद्ध ठानने का पम्त निविय किया है। चारो ओर से ऐसी परिस्थितियों के दनार पड़ने पर भी, नह कहता है, रि यस्तपाल में वृद्धिचातुर्य से उसे अवश्य ही इन कठिनाइयों से छटकारा मिलेगा। श्रन वस्तुपाल प्रवेश करता है । वह रातारे कार्यों मे तेन पाल के पुन लारण्यसिंह द्वारा प्रदर्शित असीम अध्यवसाय और क्रियाशक्ति की प्रशमा करता है । वह कहता है कि लागण्यसिंह ने अपने गुप्तचरों को प्रतिपक्षी राजाओं के पास भेज दिया है जहा उन्होंने उन विपक्षी राना लोगों के मान्धिविग्रहिकों (यद्ध और शान्ति रे मचिय ) का पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया है। वह यह भी पता किचर लोग परपनी रानायो की पारप का काम करते हैं । अत राजा लोग जनरेहायों से मैची जाने वाली गटिया के समान है। फिर पारस्परिक प्रशंसात्मक चर्चा होती है निममे वीरधवल द्वारा पञ्चग्राम के युद्ध मे प्रर्शित वीरता की तेज पाल प्रशमा करता है। तब वीरधवल यह घोपणा करता है रि उमसी इन्छा कम से कम हम्मीर पीर पर आक्रमण करने - २०] - राजस्थान पुरातत्त्व की है। क्योंकि उसका अमात्य ही, अपने बुद्धिवल के प्रभाव से, अन्य सैकड़ों परपक्षी राजा लोगों के हराने में पर्याप्त है । वस्तुपाल सहमत हो जाता है। परन्तु एक भागने वाले शत्रु का पीछा करना चाहिए इसके विरुद्ध वह सकारण अपनी सलाह देता है । तब उसे वह यह परामर्श देता है, कि मरुदेश के राजा लोगों को, इसके पूर्व ही कि वे समीपवर्ती आ रहे म्लेच्छ चक्रवर्ती से अपना गठवन्धन कर लें, अपने पक्ष में, मिला लेना चाहिए। वह कहता है, कि इस प्रकार, म्लेच्छ चक्रवर्ती अपनी भयभीत बुद्धि से हक्का - वक्का हो जायगा; जब कि उसे पता चलेगा कि वीर- धवल अत्यन्त निकट आ पहुंचा है। ऐसा कहते हुए वह अपने भाई तेजःपाल से कानाफूसी करता है । सम्भवतः यह कहने के लिये ही, कि वीरधवल बिना खूनखच्चर किये ही सफलता से युद्ध में विजयी बनेगा । इस समय तक मध्यान्ह हो जाता है और प्रथम अङ्क समाप्त होता है । एक दीर्घकालीन नाट्य आरम्भ होता है जिसमें लावण्यसिंह (तेजःपाल का पुत्र ) रङ्ग- मञ्च पर पदार्पण करता है। इस समय संध्या काल हो गया है और वह संध्याकालीन दृश्य का अति मनोरंजक वर्णन करता है । इसके बाद वह वर्तमान स्थिति पर विचार करता है । वस्तुपाल के आक्रमण कर देने से मरुदेश के राजा लोग, म्लेच्छ राजा की सेना द्वारा उनके प्रदेश में म्लेच्छा- क्रमण हो जाने के कारण, भय और निराशा की आशंका में, वीरधवल से मैत्री सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं । उनके नाम हैं सोमसिंह, उदयसिंह और धारावर्प । इसी प्रकार सौराष्ट्र रूपी नायिका के विखरे वालों में रत्नरूप ( सौराष्ट्र का प्रान्त स्त्रीरूप में वर्णित किया गया) भीमसिंह भी, मदनदेवी के पुत्र वीरधवल के प्रेम के वृक्ष के 'पाके' फलों को एकत्रित करने के लिये ( मैत्री सम्बन्ध स्थापित करने के लिये )शीघ्रता करता है । तब लावण्यसिंह, वस्तुपाल उपायों की प्रत्याशित सफलताओं की शुभ कामना चाहता है। जब यदु राजा ने वीरधवल पर आक्रमण कर दिया था तो महीतट और लाटदेश के राजा क्रमशः विक्रमादित्य और सहजपाल सम्मिलन कर एकता कर ली थी। परन्तु अब उनमें फुट हो गई है और दोनों ही एक दूसरे से इर्ष्यापूर्ण प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं कि उन्हें वीरधवल का सौहार्द प्राप्त हो । और जव महा नदियां ( राजा लोग) वीरधवल के सेना रूपी समुद्र से मिल रही हैं तो छोटी नदियां भी (छोटे राजा भी) वैसा ही कर रही हैं। लावण्यसिंह इस बात पर आश्चर्य प्रगट करता है कि दक्षिण और मालवा के राजा लोगों के किये गये आक्रमणों की कूच को रोकने के लिये उसने जो दो गुप्तचर भेजे थे वे अभी तक क्यों नहीं लौटे। [यहां पर एक संपूर्ण पत्र के अक्षर अस्पष्ट हो गये हैं] पन्ना उलटने पर, हम लावण्य- सिंह को विस्तार से सारे समाचार बताते हुए निपुणक को देखते हैं, कि कैसे वह और सुवेग, जो दूसरा 'दूत' है, सिंहण के 'विश्वास भाजन' बन गये। निपुणक ने सिंहण को यह समझाया, कि गुर्जर प्रदेश का सीमा प्रदेश, हम्मीर की सेना से ना भ्रष्ट किया जा रहा है और वीरधवल हठात् उसके विरुद्ध कूच कर चुका है । सिंहण ने यह अवसर गुजरात पर आक्रमणार्थ उपयुक्त समझा । निपुणक कहता है कि उसने सिंहण को, प्राप्तकाल में आक्रमण न करने के उपयुक्त अवसर के लिये मनाया, और जब हम्मीर से लड़ते लड़ते उसकी (वीरधवल की) शक्ति क्षीण होने लगे तब, तुरन्त वह, युद्ध क्षेत्र में कूद जाय; और अभी तो वह गुजरात और मालवा देशों की ओर जानेवाली सड़कों पर ही अपनी फौज के साथ डटा रहे। वह कहता है कि सिंहण तदनुसार ही तापी (तपन- तनया) नदी के किनारे आनन्द से दिन काटने लगा। दूसरा आवेदन वह यह करता है कि किस के ने * रानम्यान में ससत साहिय की खोज * [२१ प्रकार मुग और उसने सिंहण और सग्रामसिंह के बीच भेद उत्पन्न कर दिया। उसने पहले ही राजा देवपाल के नामादित्त घोडे को, सप्रामसिंह को भेट करने के लिये, प्राप्त किया। सुवेग ने अपने आपरो, एक पत्र के साथ जो दीसने में साली था और जिसे सूर्य की धूप में रसने से उसके अक्षर स्पष्ट दीस पडते, पाडने दिया। यह पत्र, जो देवपाल द्वारा अपने करदाता प्रधान राजा मण्डलेश्वर सग्रामसिंह को भेजा गया था, इस मावार्थ से अङ्कित था, कि वह इस अश्वरूपी रत्न को स्वीकार करे जो भेजा गया है, और उसे यह आज्ञा दी गई कि वह अपने सैन्य शिविर से तर तफागे न वढे जन तक कि एक अप्रत्याशित भाक्रमण से वह (देवपाल) इस राजा से युद्ध न ठान ले जो गुर्जर देश की ओर कूच कर रहा था। इस मे आदेशरूपेण यह भी परामर्श था, कि अपने पितृवधवर (पिता के यध से किया गया वैर) के समुद्र के उम पार, अपनी सद्गस्पी नौका से उतर जाय । तव निपुणक को, जो कि सिंहणदेव का उस समय विश्वासपात्र बन रहा या, यह कहा गया कि इस घोडे के सम्बन्ध में सत्य • मालूम करें । वह बाहर गया और समामसिंह को सूचना दिलवाई कि सिंहणदेन उसके विरुद्ध उमडा पडा है । एमने फिर नापिस लौट कर समामसिंह को सूचना दी कि घोडे पर मालवाधीश का नाम असित है (देवपाल, इस प्रकार मालवाधीश का नाम दिसाया गया है)। समामसिंह भय से भाग ग्रडा होता है, और निपुणक कहता है कि अर सिंहण ने, मालना के विरुद्ध लडने को, कच कर दी है ओर देवपाल उमरा साथ देने को आगे बढता है। फिर निपुणक और लावण्यसिंह वीरधवल को इस बात की सूचना देने को प्रस्थान करते है । माथ ही 'प्रदेशक' समान होता है। दूसरे अङ्क में प्रस्तुपाल रगभूमि पर श्राता है । वह चन्द्रज्योत्स्नाधवलित रानि का विशडम्पेण निम्पण करता है । वह सिंहण और सग्रामसिंह के बीच उत्पन्न हुए द्वैधीभाव को (सुग से) जान कर पहत्त प्रसन्न होता है और यह मोचता है कि समामसिंह की सहायता के निना, सिंहण को उस देश के विषय मे जानकारी रसनेवाला निर्देशक मिलेगा नहीं। अत वह प्रेमकारी श्रामण करने में अशक्त ही रहेगा । तर यह मग्रामसिंह की सर प्रशमा करता है। पहले मरे द्वारा मिहण की सेना पर की गई विजय का वर्णन करते हुए कहता है, कि जब रेवा के किनारे (नर्मातट पर), अर्जुन (कार्तवीर्य) द्वारा रावण का अभिमान चूर चूर कर दिया गया, उस समय के उत्पन्न विस्मय रम को भी मने गौण वना डाला। साथ ही उसने यह भी प्रतिपादन क्यिा, कि नाना भेंटों ओर चापलूसी के पार्तालाप से, यह उसके साथ मैत्री स्थापित करने की पूर्ण चेष्टा कर रहा है । इसी समय यह मम्याद भी आता है कि संग्रामसिंह ने शीव्रता से स्तम्भतीर्थ पर कूच कर दी है। इस दुष्टता से कद्ध होकर वस्तुपाल एक अधिकारी (भुननक) को बुला भेजता है जो सग्रामसिंह के प्रतिनिधिरूप मे वहा है, ओर शूरपाल के योग्य सेनापतिल में अपनी फौजों और इधर रानालोगों को इस स्थान के मरतणार्थ भेजता है। मुवनक अन्दर श्राता है और मारी युद्ध की साजसज्ञा को देखता है। साथ ही वह वस्तुपाल के मुह से यह धमकी देते हुए सुनाता हूँ कि मही नदी के रक्त से रनित जल के द्वारा समुद्र के जल को भी लाल बना ढालगा। उसे इस बात पर आश्चर्य होता है कि मग्रामसिंह की सेना के धागे चढने का ममाचार रिस प्रार सर्वत्र फैल गया, और सारी तैयारी, जो इतनी शीघ्रता मे हुई उन पर श्राश्चर्य प्रगट करते हुए मप्रामर्मिरे मैयमञ्चालन के तय को अन्चीगर कर देता है। यह करता है कि उनमा म्यामी तुभम और तुरग लोगा की अाशों की गुतलाहट मेटने - २२ ] - राजस्थान पुरातन के लिये वीरधवल का साथ देने को, वह यह निश्चय कर के कि अपने स्वामी के लिये यही मार्ग प्रशस्ततर होगा, गुर्जर युद्धक्षेत्र में प्रयाण कर चुका है। तदनुसार यह मन ही मन, कार्य किये जाने के लिये, उसके पास सम्बाद भिजवाने का पक्का निश्चय कर लेता है। वस्तुपाल अपने हृदय में बात को छिपाने की प्राकृति से कहता है कि चाहे जो भी कुछ हो तुम्हारे लिये यही उचित है कि तुम अति शीघ्र अपने स्वामी के पास चले जाओ। ऐसा कह कर बह से अपदस्थ पदच्युत) कर देता है । तब निपुणक' की ओर देखने पर उसे पता लगता है कि निपुणक ने निश्चयशील संग्रामसिंह को मही नदी को पार करने के लिये छोड़ा था। वस्तुपाल उस समय धवलक की रक्षार्थ स्तम्भतीर्थ की ओर प्रयाण करने का छह निश्चय कर लेता है। तृतीय अङ्क में वीरधवल और तेजपाल रङ्गभूमि में आते हैं। प्रातःकाल का समय है। वीरधवल प्रभातवेला के सुन्दर दृश्य का लम्बा और अत्यन्त आकर्षक वर्णन करता है। वीर- धवल यह जिक्र करता है कि सिन्धुराज के पुत्र ने उसके साथ मैत्री स्थापित कर ली है। बीरधवल, मेदपाट पृथ्वी के (मेवाड़ के ) शिरोभूपण स्वरूप उम जयतल का सम्बाद पाने की प्रतीक्षा में है, जिसने इसका साथ नहीं दिया और जिसके विरुद्ध हम्मीर ने ऋच कर दी है। उसी क्षण अवश्य प्राप्त किये जाने योग्य समाचार मिल जाते हैं । एक गुप्तचर कमलक. हम्मीर के वीरों द्वारा सारे मेवाड़ के जलाये जाने का समाचार लाता है । वह तटमार के भयकर समाचार विस्तृत रूप से बताता है । अन्त में वह कहता है कि वह (कमलक ) तुमक के छा वेप में, (उसी वेपभूपा को पहने वता कर)आवाज मारने लगा “भाग जाओ" "वीरधवल था पहुंचा है।" तब भय के मारे तुरुष्क सभी दिशाओं में भगने लगे और लोग अपने रक्षक (वीरधवल) के दर्शनार्थ आगे बढ़ने लगे। उनके बीच कमलक ने अपना छद्म वेप उतार दिया और उन्हें यह बताया कि वीरधवल हम्मीर की सेना का पीछा कर रहा है। साथ ही जितनी अधिक उत्सुकता से जनता आगे बढती जाती थी उतनी ही शीघ्रता से शत्रु भागे जाते थे। वीरधवल कहता है कि म्लेच्छों को छोड़कर उसके सभी शत्रु अपने सचिव के बुद्धि-चातुर्य से, पददलित एवं विजित कर लिये गये । तब तेजःपाल ने उत्तर दिया कि वस्तुपाल द्वारा हम्मीर पर विजय प्राप्त्यर्थ कार्यरूप में प्रयोग करने के लिये ऐसे ही उपाय सोचे गये हैं। इसके बाद फिर प्रवेशक आता है जिसमें तुरुष्क वेप में दो गुमचर उपस्थित होते हैं, अर्थात् एक कुवलयक और दूसरा शीघ्रक, जो दोनों सगे भाई हैं। शीघ्रक कहता है कि तेजपाल की आज्ञानुसार वह बगदाद के अधिपति और इतर म्लेच्छप्रान्तीय देशों के स्वामी के पास, स्वयं को खप्परखान का दूत बताता हुआ उपस्थित हुआ। उसने खलीप को कहा कि मीलच्छीकार अपनी दुराग्रहपूर्ण धृष्टता से खलीप की आज्ञाओं का भली प्रकार पालन नहीं करता । खलीप ने उसके हाथों एक आदेश भिजवाया जिसमें ग्वापरखान को यह कहा गया कि वह मीलच्छीकार को हथकड़ी और वेड़ियों से जकड़ कर खलीप के पास भिजवा दे। वह (शीघ्रक) यह आदेश खप्परखान के पास ले गया। वह मीलच्छीकार के विरुद्ध हो गया । इसी समय शीघ्रक ने गुप्तरूप से मीलच्छीकार के पुत्र को, अपने पिता के विरुद्ध उठाये जाने वाले इस * या सुवेग । इस स्थान पर सिवाय 'निपुणकं प्रति' शब्द के कोई रङ्ग निर्देशक शब्द नहीं जिसमे यह मालम हो कि दोनों ही रङ्ग भूमि पर हैं। .
, * रानम्धान में सस्कृत सादिय को बोन * [ २३ कदम की सूचना दी और उस पुत्र ने अपने पिता के पास, इस सम्वाद को सूचित करने के लिये शीतक को भिनगा दिया । फलत शीघ्रका तत्कालीन प्रस्थान मीलच्छीकार को सूचित कर दुसी बनाने के लिये था। चतुर्य अङ्क मे मीलन्छीकार चिन्ता, क्रोध, निराशा और लना के भावावेश की स्थिति मे, अपने अमात्य ईसप के साथ बताया गया है। यह सपरसान सम्बन्धित सम्वाद के विषय में अपने अमात्य से परामर्श ले रहा है । एकाएक ही उस स्थान पर आवाजें और शोरगुल होता है और कुछ सिपाही, आसपास मारकाट मचाते हुए, वडी तेजी से उधर वढ रहे हैं। मीलच्छीकार के विषय मे बडी सरगर्मी से पृछताछ हो रही है। उसकी आनाज और उसके प्रति वीरधवल की ललकार सुनाई पड़ती है। मीलन्छीकार ओर मा मत्री यहा से भाग निक- लते हैं। वीरधनल प्रवेश करता है । उसे अपने शत्र का, अपने हाथों से रिना वध किये, भाग निक्लने पर निराशा होती है । इसी समय, द्वारभट्ट द्वारा वीरधवल का यशोगान किया जाता है (एक भाट मैनिक वर्दी में उसके साथ आता है)। वह तेजपाल को बुला भेजता है । दोनों के बीच कुल गार्तालाप होता है जिसमे वीरधवल कहता है, कि हम्मीर जैसे कापुरुप (कायर आदमी) का, जो उसके नाम से ही यर्स उठता है, वह पीछा नहीं करना चाहता और फिर यह तो वस्तुपाल के द्वारा रचे गये पायो मे ही हतोत्माह हो गया है। अड्वसमामि के समय मध्याह्न काल है। पञ्चम अङ्क मे कञ्चुकी (अन्त पुर का प्रतिवेशी) श्राता है । यह धरलक मे ऐसे समाचार की प्रतीक्षा कर रहा है कि जिमसे यह वीरधवल की रानी जयतल्लदेवी को मान्त्वना दे सरे। से यह समाचार मिलता है कि युद्धक्षेत्र मे हम्मीर के पैर छूट गये हैं और वीरधवल धवलक लौटने को प्रस्थान कर चुका है। फिर पीरबल और तेज पाल एक नरविमान पर प्रान्ड हो कर प्रवेश करते है। मार्ग मे मुन्टर नज्यों का दर्शन, वर्णन और प्रशमन करते हैं, वह अर्बुदाचल, जिसरे निस्ट पशिष्ट ऋपि की पर्णकुटी है, परमार यश की वह राजधानी चन्द्रारती जिसे ऋपि रशिष्ट ने वसाया, सरस्वती नदी जो मानो अपने, पवित्र करने वाली उपस्थिति के रहते भी पापो को नष्ट करने के लिये, अन्त मलिला होरपी में समा गई है, यह स्थान सिद्धपुर जहा इस नदी से पूर्व दिशा मे, पार्थस्थित रुद्रमहाराल के दर्शन होते हैं, गुर्जर राजाओं की वह राजधानी (अन्हिल पट्टन) निमके पाम ही एक बडी सीन मिद्वमागर है (जो सहस्रलिंग कहलाती है), और वह साभ्रमती जिस के तट पर वर्णवती पुरी है, और निमको लहरो की आगाज से उत्पन मृदङ्ग पनि पर लनणप्रमा- के हाथ मे के पिले हाए कमलपुष्पों पर लक्ष्मी नृत्य करती मी मा म देती है। अन्त में वे धनला पहच जाते हैं। पीरधवल शहर के बाहर एक उगान मे अपने विजय प्रवेश की प्रतीक्षा मे ठहरता है। वहा उममा अपनी रानी और पिटपा से मिलाप होता है (यहा पर रानी का नाम जैरदेवी दिया गया है ) जर नियप्रदेश रा समय होता है तो रस्तुपाल और तेजपाल अपने घोडो पर मगार हो कर पाते हैं। तेज कहता है कि वस्तुपाल ने अपने बुद्धिवल से हम्मीर मीलन्द्रीमार को शान्तिमन्धि के लिये हाथ बढाने को बाध्य क्यिा है। मीलच्छीमार के दो गुरु रती और स्टी, गलीप से मो लिये मिहामन पर बेटे रहने देने के पक्ष में आदेश लाते हुए, गलीप के मंत्री पनीन के साथ, समुद्र मार्ग से यात्रा करते हैं। रहे परड कर स्तम्भतीर्थ में बैन कर लिया जाता है। इन लोगारे लिये क्षतिपूर्ति देने के . - -PraPAL - * . । २४] निमित मीलन्धी जर जीवगायन ग (भीम) " मान in हो जाता है। नगर में की। पार भनभावन भूनना की प्रार्थना करताना मार मांगने का मते, "पोर मांग मस्तान वाः कोपोर विमा ननुपाल को किया गया "म प्रहार गीर पर माय: मनोनिगान में- प्रतिपादित किया गया । २६- निम्नलिपित निशाना गांर (Intr", , प्रन्चलता जयसितक प्रतिक्षित)zi गाना :- मदनदेवी (वीरवल की माता); सीमादेवी ! महि ( यस्तुपाल का पुत्र ); नाय नि: (har TEHR) पानी फारः सिंह, लादा का रामाय- in Marat का भनीजा; और मालया क. भगवान : men मोममित, उदयमित और पागप माग. Eangr: r; टपा विक्रमादित्यः लाटदेन का अभिपति ना "मीर मेगा | २७ - इनमें से सभी नाम मोतियोगी नया में होने में गुजरात के निहाल में प्रनित। मादेशगरि नाम नाम । महजपाल के लिये लावण्यग्निः ने गन पटनाओं पर नाटक मनगिन नमान्न में उल्लेख किया है। सिंह का नाम भीरबल ने नाममा मेनिया समनः ये दोनों नाम एक ही व्यक्ति के । कीर्तितीही कप में नाग. राजा का उल्लेख किया गया है। गापि यहां को वित्तिय नामनिर्देशन पानिपान सिंह के साथ वंश का सम्बन्ध और मालवा के. देवपाल कमाय फटनीतिक मानन्ध, सम्भवतः हम एमी रूपक से शात होते है । उसे वीरधवल के प्रति रियर वाला र किम के प्रति निजपितृवधर रखने वाला बताया गया है। कीर्तिकौमुदी (मर्ग, ५१४६८) में उभी कापून उसकी प्रशंसा करता हु-प्रा बताया गया है और यहां उसकी यपाल द्वारा प्राधिप प्रशंसा करवाई गई है। देवपाल का नाम दो शिलानकों में उपलब्ध होता है। एक जयपुर याने और दूसरे हरसौदा वाले शिलालम्ब में (रिटी भाग १६. पृ२५ और भाग २०. पृ० ५३, ३१० ) । यह जैतगी का पिता ही है जिसमें राज्य काल में शायर ने अपने धर्मामृत पर, सम्बत् १३०० विक्रमाब्द में, अपनी टीका बनाई (पा० भण्डारकर की रिपोर्ट. सन १८५३- ८४ पृष्ट १०५) । उदयपुर के शिलालेखों में से एक पर उसका समय सम्बन निता गया है. * ये दोनों नाम एक ही राजा के हैं. यह बात फौतियोमी मर्ग ४ प ६, ७२ पौर सर्ग : पद्य ४१ से स्पष्ट है । इस के विरुद्द मतसंकीर्तन में पर भी नहीं मिलता। पहला कदानित शंव है। संग्रामसिंह का सहायक राजा मानते है (पृ. ३६ ) + कम से कम उस बनावटी पन में ऐमा बनाया गया है। के .
* राजस्थान में मन माहिय का खोज * [२५ और यह प्रस्तुत नाटक के समय से मिलता है। मारनाड के राजाओं का कीर्तिकौमुदी मे वर्णन है परन्तु उनका नाम निर्देश नहीं दिया गया । हमें उनमें से तीन के नाम यहा मिलते है । इनमें से धारावर्प का नाम चतुर्विशतिप्रबन्ध मे पाया है और उदयसिंह । को, चाहमाननश के अश्व- राज शापा के जावालिपुर के राजा के रूप मे, केतु के पौत्र और समरसिंह के पुत्र के रूप मे, बताया है । इसी प्रकार उसमें सुराष्ट्र के भीमसिंह को भद्रेश्वर का भीमसिंह बताया गया है। महीतट का विक्रमादित्य एक नया नाम है । कीर्तिकौमुदी में (सर्ग ४, श्लोक ५७ ) गोद्रनाथ (गोद्रह के अधिपति) का वर्णन किया गया है, और चतुर्विशतिप्रवन्ध मे घुघुलु का महीतट के गोहर (गोधरा) मे शामन करना बताया गया है । (कीर्तिकौमुदी पृ. २३-२४)। मेवाड का जयतल, जैत्रसिंह मातृम होता है । वीरधवल की रानी जैतलदेवी और जैत्रदेवी के नाम यह बताते हैं कि जैत्र और जैतल एक दूसरे रूपमे बदले जा सकते है । मेगाड मे एफलिंग जी के मन्दिर के स्तम्भ पर सिंह का समय निक्म सम्वत् १२७० अक्षितह (भारनगर इन्सक्रिप्मन्म, पृष्ट ६३)। २८ - चतुर्थ सर्ग में (कीर्तिकौमुदी) लवणप्रसाद और वीरधवल की दक्षिण के राजा सिंहण से की गई लडाई का वर्णन पाता है, जिममे यह क्रम पक्ष विपक्ष के वोरी के घमासान युद्ध के रूप में वर्णित है । मोमेश्वर के द्वारा दिये गये निसरण और प्रस्तुत नाटक के प्रथम श्रङ्क में वीरधवल द्वारा वर्णित भूतकाल के घटनाक्रम की मगति वरावर बैठती है और इस हस्त लिग्नित पुस्तक का लेग्ननकाल रिम्म सम्बत् १२८६ (या १२३० ईमनीय वत्सर) है। २८ - अब प्रश्न यह -ठता है कि यह हम्मीर कौन है ? मभी उपरोक्त दिये गये वर्णनों से यही मालूम होता है कि वह एक तुर्क है और हम्मीर, अमीर का परिवर्तित स्प है । इमा, उदाहरण स्वम्पमें, जो महोवा के शिलालेस मे या तो सुमुक्टीन या गजनी के महमूद के नाम के लिये हम्मीर या इम्बोर दिया गया है, उसे ले मरते हैं । जिस म्प मे हम्मीर को शान्ति सन्धि की वार्ता करनी पड़ी, जो इस नाटक में वर्णित है, म क्यानर का श्राधार दो मिन • स्थली पर, चतुर्विंशतिप्रवन्ध और मेरुतुग त प्रनन्धचि तामणि ग्रन्थ मे उपलब्ध होता है (कीर्तिकौमुदी पृ०४-२५) प्रबन्धचिन्तामणि में उन पुरुषों के लिये विशेष नाम का निर्देश नहीं किया गया है जिनके साथ यह चालासरी रंगली गई, परन्तु से रेचल म्लेच्छपति सुरगाण (म्लेच्छों का राना सुलतान) नाम से बताया गया है। दूमरे में मुरत्राण मोजतीन नाम विशेष रूप से निर्दिष्ट किया परन्तु इम नाम की, नाटक में उद्धृन भीलन्छीकार मे कभी भीमगति नहीं बैठ सकती। दिल्ली का शाहंशाह, निमका नाम नाटक में अभिप्रेत है, म मोचता हूँ कि सुलतान शममुद्दुन्या यादीन अबुल मुनाफर अल्तमम या मनेप मे मुलतान शमसुद्दीन है । वह दिल्ली के सिंहासन पर १०१० दम्पी मन मे यंठा और २३५ ईन्धी मन मे मर गया । अयं की बुद्धिमत्ता ये लक्षणे से, जो उमरे प्रत्यर कार्य में व्या होते हैं, में श्रमीर शिकार (शिकार बाने का प्रधान ) का पर कुतुनुद्दीन द्वारा दिया गया । में मोचता है कि अमीरगिभर काही परिवर्तित नाम मील- च्छीमार है (इलियट और डामन ग भारतर्ग, प्रथ मग्या २, पृष्ट ३.०८) और १४. स्त्री मन में पीर मे कोई भी मुईनुद्दीन नाम राला पुम्प राज्य करता हुश्रा नहीं मालुम है वीरधवल के पुत्र वीग्म का समर - देमिरे पर नारस । गया काव्य + में २६ ]] > राजस्थान पुरातत्व होता और वीरधवल का राज्य काल १२३३ ईस्वी से १२३८ ईस्वी तक है । राजशेखर के चतुर्वि- शतिप्रवन्ध का निर्माण काल १४०५ सम्बत् , और मेरुतुङ्ग के ग्रन्थ का १३६१ विक्रम सम्वत् है। जयसिंह का ग्रन्थ समकालीन रचना है और वह इस विषय में यदि किसी मनुप्य के साथ, किसी प्रकार की चालाकी खेली गई हो, जिसका विवरण अपर दिया हुआ है, अधिक ठीक और उपयुक्त उतर सकता है। ३०- तेजःपाल के पुत्र के रूप में लावण्यसिंह का नाम एक कल्पना का परामर्श करता है। यह नाम कीर्तिकौमुदी और अन्य स्थलों पर आता है । सुकृत संकीर्तन ऐतिहासिक रचनाकार अरिसिंह के विषय में, राजशेखर कृत प्रवन्धकोष में ऐसा कहा गया है कि उसके शिष्य अमरचन्द्र ने, जिसको उसने कविता रचने की शिक्षा दी थी, सर्व प्रथम विशलदेव के साथ उसका परिचय करवाया। परन्तु डा० बूहलर, इस काव्य के सम्बन्ध में लिखे गये अपने निवन्ध में बताते हैं, कि जब कभी एक भारतीय कवि अपने चरितनायक की उदारता को प्रशंसा करता है, तब या तो उसके (कवि के) सम्मानप्राप्ति के उपलक्ष्य में या सम्मान प्राप्ति की आशा में, कवि द्वारा उसआश्रय दाता का प्रशस्तिगान किया जाता है। यह बात एक निनोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि वस्तुपाल द्वारा वह उदारतापूर्वक पुरस्कृत कर दिया गया है । इसलिये अरिसिंह को, जब कि वस्तुपाल के हाथ में सत्ता थी, उस के समन राजदरवार अवश्य उप- स्थित होना चाहिए। विशलदेव के राज्यासनारूढ़ होते ही वस्तुपाल की सत्ता छिन गई और १२६८ विक्रम सम्वत् में उसका परलोकवास हो गया । फलतः डा० बूहलर का विचार है कि राजशेखर का कथन निःसन्देह गलत है- अर्थात् अमर पण्डित और उसके द्वारा अरिसिंह सर्व प्रथम विशलदेव के राजत्व काल में (सं० १२६६ - १३१८ ) धोलका में गये सही नहीं मालूम देता और न उपयुक्त आधार पर ही आश्रित है । नैपध महाकाव्य के कर्ता श्रीहर्ष कवि के सम्बन्ध में डा० बूहलर स्वयं कहते हैं, कि राजशेखर को - जिसने १४ वीं शताब्दी के मध्य में रचना की - ऐसे पुरुष के सम्बन्ध में, जो कुमारपाल के समय क (११४३ - ७४ ईस्वी सन् ) में जीवित था, इस प्रकार की विश्वस्त सूचना, प्राम हो सकने की आशा की जा सकती है । इसलिये एक ऐसे पुरुष के सम्बन्ध की विश्वस्त सूचना, जो बाद में विशल देव(१२३८ - ६१ ई० सन् ) के समय में था, अवश्य ही इससे भी अधिक विश्वसनीय कही जा सकती है। दूसरे, वस्तुपाल भले ही अधिकार विहीन होगया हो, फिर भी, समृद्ध तो बहुत रहा होगा ही और उसकी स्थिति कवियों को पुरस्कृत करने की रही होगी। मेरुतुङ्ग ने अपनी प्रवन्धचिन्तामणि में, उसके द्वारा सोमेश्वर को पुरस्कृत किया जाना बतलाया है (पृष्ठ २८८, श्री रामचन्द्र शास्त्रिकृत संस्करण)। भले ही अरिसिंह का पिता लावण्यसिंह के रूप में न हो, अतः अरिसिंह तेजःपाल का पौत्र न हो । जब वस्तुपाल अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा में था और शत्रुञ्जय के पास जाने को तैयार था, उस समय उसने अपने I प्रकरणगत श्लोक जो उनके विचार से सर्वथा विश्सनीय है द्वितीय सर्ग का ५३ वा श्लोक है ( ५४, भूल से छपा है) श्रीवस्तुपालसचिवस्तुतिनित्यरक्तान् पुंसस्तथात्यजदकिंचनता विरक्ता । मन्दैव देववचसापि तथा प्राय(प्र) याति न प्रातिवेश्मिकनिकेतमुखेऽपि तेषाम् ॥ जर्नल, बॉम्बे वाञ्च रॉयल एशियाटिक सोसाइटी भाग १० पृष्ट ३५ । यह हेतु अधिक तेजःपाल के पुत्र * राजरथान म मस्कृत साहिय की खोज * [२५ पास अपने पुत्र जयन्तसिंह और भ्राता तेज पाल को बुला भेजा, माथ ही अपने पुत्र या पुरों और पौर ना पौत्रों को भी (बूलर कृत सुकृतसीर्तन, पृष्ट ६ नोट २)। अत तेज पाल के एक पौत्र था । श्रन यदि अरिमिह ही एक ऐमा पौन हो तो डॉ. बूहलर के मन्देहों के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता । चाहे वस्तुपाल के हाथ से अधिकार चले जाने के बाद, यह कवियों को पुरस्कृत न कर सम हो । साथ ही इस बात से यह और भी स्पष्ट हो जाता है, कि क्यों अमरचन्द ने सुकृतसकीर्तन के प्रत्येक मर्ग के अन्त मे, ४ पद्यों मे से ३ मे, वस्तुपाल के गुणों की प्रशसा करते हुए उसे आशीर्वाद दिया और चतुर्थ है जिसका कि पूर्व प्रतिपादित घटनाक्रम से विशेष सम्बन्ध नहीं है, अरिसिंह के प्रगल्म करित्व निर्माणशक्ति की प्रशमा की ? जो उद्धरण पूर्व पृष्ठ को पादटिप्पणी में दिया गया है वह अमरचन्द्र की कृति का भाग है। अरिसिंह ने वस्तुपाल की मृत्यु होने पर या उसके सत्ताधिकार छिन जाने पर, विशलदेव का मरनणाश्रय प्राप्त कर लिया हो (एक स्थायी नियुक्ति और उन्च वेतन जो बाद मे दुगुनी करदी गई ) अथवा उममा वस्तुपाल मे अत्यधिक निस्ट सम्पर्क होने से , उमने ऐसा न किया हो, और इमलिये कदाचित उमरे शिप्य अमरचन्द्र के द्वारा प्रथम परिचय करवा दिया गया हो। अन्य प्रमुख हस्तलिग्नित पुस्तकों में से, जो भण्डार में हैं, निम्नलिखित उद्धृत की आती है- भट्टि काव्य की एक प्रति निसरे अन्त मे पुष्पिका मे इस प्रकार लिसा है "इति वलभी वास्तव्य श्रीस्वामीसूनोभेट्टिब्राह्मणस्य कृतौ रामकाव्य समामम।" (देखिए निवेदी का मस्करण- प्रस्तावना पृष्ठ १७) चक्रपाणिविजयकान्य ~ लक्ष्मीधर मृत । दक्षिण कालेज मग्रहालय की प्रति स० २८, सन ७३ -७४, इस पो गोली प्रतिलिपि होनी चाहिए। प्रस्तावना मे लेखम लिखता है कि गौड में शाडिल्य कुल के यश पाली का एक भट्टकोशल नाम ग्राम है जिसके अधिवासी केशन के सेवा-परायण भक्त हैं। मी वश में नरसाहन भट्ट, अजीत, वैकुण्ठ, श्रीस्तम्भ और लक्ष्मीधर ने जन्म लिया ।इनमे से प्रत्येक उत्तरोत्तर पुरत्व का अधिकारी बना । ग्रन्थकार किमी एक भोजदेव के राजदरवार में रहा करता था । मर्ग के विपय निम्नाङ्कित है- यलिवर्णन, हर- प्रसान्न, उपावर्णन, कार्तिकेय युद्ध आदि। कर्पूरमञ्जरी पर टीका - कर्पूरकुसुमनाम्नी श्रीप्रेमराज कृत - जो कि मूर्यकुल के महिगल परिवार के आभूषण प्रयागनाम का पुत्र था। हस्तलिखित प्रति का निर्माण काल म० १५३८ है। दमयन्ती-चम्पू पर चण्डपाल की टीका की प्रतिमा १४८ट की। रघुवंश पर धर्ममेरु कृत टीस। रघुयश टीम रत्नगणि कृत सरत १९(१)६४ मे रचित । हलायुध के कविरहस्य की प्रति, रविधर्म की टीका युक्त, सम्बत् ११६ की। पूरप्रकरण की एक प्रति जिसमे रचनागर ने स्वय को पसगेपर मरि काशिय कहा है। चन्द्रदूत माव्य - उम्बुनाग करिस्त - हस्तलिखित पुस्तक का मम्बत् १३५२ है। गीतगोविन्द पर टीका-मारदीपिस। एक निरहिणी प्रलापफेलि - जगद्वर रचित, केवल ५पय का। विजयप्रगस्ति काव्य - मैंने यह नाम जैन कान्फरेन्स पे लिये तैयार की गई मूचि में देखा, परन्तु जब मैंने इसे नेग्नना चाहा तो दुर्भाग्य मे यह नहीं मिला । , - २ ليسا २६] * राजस्थान पुरातत्व इस नाम का श्रीहर्ष, जो नैपधकार प्रसिद्ध कवि है, रचित एक महाकाव्य है परन्तु वह प्राप्त नहीं हुआ। इसी प्रकार भर्तृहरि चरित नामक ग्रन्थ, सूचि में उल्लिम्बित है परन्तु उसका भी पता नहीं लग पाया। व्याकरण - जावालिपुर में सं० १०८० में वर्धमान और जिनेश्वर के परमप्रिय बुद्धि- सागर रचित । संसार के हितार्थ उसने पञ्चग्रन्थी (इस नाम का ग्रन्थ या पांच ग्रन्थ ) लिखी। प्रारम्भ के शब्दों से ग्रन्थ का नाम शब्द - लक्ष्म - लक्षण मालूम पड़ता है । इसी ग्रन्थकार का एक दूसरा ग्रन्थ भी भण्डार में है जिसका नाम प्रमाण - लक्ष्म - लक्षण है। हरिभद्रकृत पञ्चाश- काख्य प्रकरण पर अभयदेव की टीका में बुद्धिसागर को "शब्दादिलच्मप्रतिपादक" कहा है ( इण्डियन एण्टीक्वेरी ११, २४८ ए। सम्बन्धोद्योत - रभसनन्दी कृत । इस ग्रन्थ में कारक सम्बन्ध का प्रतिपादन किया गया है । इसलिये इसका प्रतिपाद्य विपय व्याकरण है, न कि वेदान्त, जैसा कि विश्वास किया जाता है । उद्भटालङ्कार पर टीका - उद्भटालङ्कार सार संग्रह, कोंकण प्रतिहारेन्दुराजकृत (चूहलर की काश्मीर रिपोर्ट, पृष्ठ ६४) दक्षिण कालेज संग्रह में सं०६४, सन् ७३ - ७४ की प्रति, इसी हस्त- लिखित पुस्तक की प्रतिलिपि होनी चाहिए । ग्रन्थकार मुकुल ब्राह्मण का शिष्य था जिसके लिये उसने ग्रन्थारम्भ में और अन्त में सुन्दर प्रशास्त लिखी है। कल्पलताविवेक, कल्पपल्लव का परिशिष्ट; काव्यकल्पलता पर टीका । विवेक के साथ टीका भी है । एक हस्तलिखित पुस्तक का सम्वत् १२०५ या ११४६ ईस्वी सन है । परन्तु यह अशुद्ध मालूम देता है। क्यों कि काव्यकल्पलताकार “१३ वें शतक के मध्य में अवस्थित थे" ( देखिए डाक्टर भाण्डारकर की रिपोर्ट ८३-८४, पृष्ट ६)। जयदेव का छन्दः शास्त्र । यह सूत्र रूप में है । हस्तलिखित प्रति का समय सम्बत् ११६० या ११३४ ईस्वी सन् है । जयदेव का ग्रन्थ उनमें से एक है जो ११ वीं शताब्दी के अन्त में और १२ वीं शताब्दी के प्रारम्भकाल में होने वाले जिनवल्लभ सूरि द्वारा पढ़े गये थे। (देखो, सुमति गणी के ग्रन्थ में से कुछ जैन युगप्रधानों के जीवन चरित पर दिये गये मेरे उद्धरण भाण्डारकर की रिपोर्ट २-८३, पृष्ट ४७ और २२८ ) इस पर हर्षट की लिखित एक टीका है जो भट्ट मुकुलक का पुत्र था । दक्षिण कालेज की संख्या ७२ की पुस्तक, इसी हस्तलिखित ग्रन्थ की प्रतिलिपि होनी चाहिये, जो कि इस भण्डार में मूल और टीका समेत उपलब्ध है। छन्दोविचित - श्री विरहाङ्क कृत । यह प्राकृत में है। इस पर चन्द्रपाल के पुन गोपाल कृत टीका भी है । अन्त में मृल को 'कह सिद्धच्छन्द' बतलाया है और टीका को कृतसिद्ध विवृति कहा गया है। एक छन्दोनुशासन जिनेश्वर रचित, श्री मुनिचन्द्र कृत टीका समेत । दूसरा छन्दोऽनुशासन - जयकीत्ति सूरि कृत । व्यक्तिविवेक जिसे वर्नेल ने तम्जोर वाले अपने सूचिपत्र में निबद्ध किया है। उसमें प्रथम पङ्क्ति पूर्ण नहीं है । प्रथम शब्द 'अनुमानान्त' के स्थान में 'अनुमानान्तर्भावम् है ।
* राजरपान में सरस्व-साहित्य की खान * (२५ इसलिए प्रकार का उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि व्यञ्जना अथवा वह वृत्ति, जिससे कोई भारव्यञ्जित हो या परामृए किया जाय, यह अनुमान के अतिरिक्त और दूसरी वस्तु नहीं है । अन्यकार महाकवि श्यामलाल का शिष्य और श्रीधर का पुत्र था । राजसरस्त काव्यमीमांसा, प्रथमाधिकरण, कपिरहस्य । शाकुन्तल के एफ टीका फार सारा काव्यमीमासाकार का उल्लेख किया गया है (आक्सफोड कैटेलॉग १३५ ए) प्रथमाधिकरण का कुछ अश अन्हिलवाड़ पाटण मे प्राप्त हुआ है (पिटरसन की रिपोर्ट, पञ्चम भाग, पृ० १६) जैसलमेर भण्डार मे हस्तलिखित प्रति पूर्ण सुरक्षित रूप में उपलब्ध नहीं हुई। प्रारम्भ मे प्रन्यकार लिखता है कि "हम काव्य र सम्बन्ध में इस प्रकार विचार करेंगे जैसा स्वयम्भूने श्रीकण्ठ, परमेष्ठी, वैकुण्ठ तथा अन्य ६४ शिष्यों को, जिनम इच्छा- जन्म होता है, पढ़ाया था। उनमे सरस्वती का पुत्र काव्यपुरुष भी था। उसको प्रजापति ने दिव्यचक्षु देकर कान्य विद्या का बोध कराया । उसने १८ अधिकरणों मे विस्तृत रूप से इस काव्यज्ञान को देवताओं को सिखाया। इनमे से इन्द्र ने कावरहस्य, सुवर्णनाभ ने रीतिनिर्णय प्रचेताने भानुप्रासिक, यमने यमक, शेष ने शब्दश्लेप, पुलस्त्य ने वास्तय, औपफायन ने भोपाय, पाराशर ने अति य, उतध्य ने अश्लिप, नन्दिकेश्वर ने रसाधिकारिक, विपण ने देवाधिकरण, पमन्यु ने गुणोपादानिक का अध्ययन किया । इनमें से प्रत्येक ने एक एक प्रकरण को ल कर विस्तारपूर्वक मन्य निमाण किया । परन्तु, उना विस्तार अत्यधिक हो जाने से उस विद्या (विज्ञान) का कुछ अशों मे लोप हो गया । इसलिये सम्पूर्ण को सक्षिप्त कर, १८ अधिकरणों में, निरूपण किया गया है। फिर प्रकरण और भाविकरण गिनाये गये हैं। शास्त्रमह (प्रथमाध्याय), शास्त्र निर्देश, काव्यपुरुपोत्पत्ति, पद- वाक्यविवेक, पाठप्रतिष्ठा वाक्यविधियां, फविविशेष, कविचर्या, राजचर्या, काकु प्रकाश, शन्दार्थहरणोपाया कविसमय, देशकालविभाग, और भुनकोश, - य सप प्रथम अधिकरण मे हैं। कविरहस्य मे अन्धकार यह प्रतिज्ञा करता है कि इसमे सूत्र और भाग्य होगा । कर्ता यायावर फुल का राजशेखर है । उसने मुनिलोगों के विस्तृत मतों को सक्षिप्त करके काव्यमीमांसा प्राय पनाया है । हस्तलिखित प्रति का समय १२१६ सम्बत् है । समय और इस यात को देखते हुए कि अन्धकार यायावर कुल का था, उसके प्रसिद्ध नाटककार राजशेखर होने की फाई थप्तम्भावना नहीं है । यह अन्य नाटककार के उन छ प्रवन्धो में से हो सकता है जिनका उल्लेख उसने याल रामायण के आदि में किया है। परन्तु यह तभी हो सकता है जब कि 'प्रयन्ध' शन्द से उसका आशय केवल नाटक सम्बन्धी पर कान्य प्रन्यों ही से न हो। राजानक मम्मट और पलक रचित काव्य प्रकाश की एक प्रति मिली है जो समापति व.माप्त महाराजाधिराज परमभट्टारक कुमारपाल के राज्यानुशासन मे १२१५सम्बत् मे लिखी गई थी 1 कुमारपाल के लिए एक भतिरिक्त विशेषण यह दिया गया है-निजभुजविक्रमरणा- मणविनिर्जित-शाकम्भरीभूपाल' अर्थात् जिसने युद्धक्षेत्र में अपने पाहुयल के पराक्रम से शाकम्भरी (साम्भर) के राजा को जीत लिया। साम्भर का राजा यस्तुत भणेराज है ३.] राजस्थान पुरातत्व * . - - - . . ~ (देखिये बॉम्वे गेजेटियर ग्रन्थ. १, भाग. १, पृष्ठ १८४, फुटनोट) और इस प्रकार उस पर सम्वत् १२१५ या ११५६ ईस्वी सन् के पूर्व में की गई विजय से तात्पर्य है। नन्दिताख्य (ढ्य ? ) प्राकृतछन्दोवृत्ति-रत्नचन्द्रकृत, जो माण्डव्यपुरगच्छ के देवा- चार्य का शिष्य था (पिटसेन रिपोर्ट ३, पृष्ट २२४,) ब्रह्मसिद्धि पर टीका का एक अंश । अन्त में ये शब्द है- "तृतीयकाण्डम । प्रसिद्धि- कारिकाः समाप्ताः." तत्त्वप्रबोधसिद्धिसिद्धालन - भट्ट मोघदेव मिश्र के पुत्र श्रीहरिहरकृत । सर्वसिद्धान्तप्रवेशक - न्याय, बैशेषिक, जैन, सांख्य, बौद्ध, मीमांसा और लोकायक्तिक सिद्धान्तों का निरूपण करनेवाला छोटा ग्रन्थ । धर्मोत्तर-टिप्पण (अर्थात धर्मोत्तराचायकृत न्यायविन्दु पर टीका) मल्लवाद्याचार्यकृत। तत्त्वसंग्रहपञ्जिका कमलशीलकृत, ग्रन्थ का विषय न्याय है। यागसुधानिधि यादवसूरिकृत, ग्रन्थ का विषय ज्योतिप है। वराहमिहिरकृत लघुजातक पर टीका, मतिसागरोपाध्यायकृत । संगीतसारसर्वस्व के हस्तलिखित ग्रन्थ का एक पत्र हृदयेशकृत । पत्र में संता-परि- भाषाय निरूपित हैं। 'कर्मविपाक गर्गऋपिकृत; एक टीका समेत । यह हस्तलिखित प्रति नलंकच्छ में सं. १२६५ में लिखी गई, 'जब जयतुङ्गिदेव राज्य करता था । इसको लिखनेवाला जिनवल्लभवंशीय जिनेश्वर का भक्त कोई चित्रकूटनिवासी था । यह जयतुङ्गिदेव मालव का राजा होना चाहिए। अनेकान्तजयपताका पर मुनिचन्द्र सूरि की टीका की एक प्रति जो सम्वत् १९७१ में रची गई थी। हितोपदेशामृत (मागधी में)'सं. १३१० में निर्मित जव विशालदेव राज्य करता था। विमलसूरिकृत पद्मचरित की एक प्रति जो भृगुकच्छ (भड़ौच) में सं. ११६८ मे जयसिंहदेव के राजत्व-काल में बनाई गई। एक श्लाक में,'जो अन्त में उद्धृत है महा- वीर निर्वाण के ५३६ वर्ष बाद इस ग्रन्थ का निर्माण काल बतलाया गया है। नेमिचन्द्रसूरिकृत पृथ्वीचन्द्रचरित की एक प्रति, सम्बत् १२२५ में लिखित । यह प्रन्थ सम्बत् ११३१ में रचा गया । ग्रन्थकार वही नेमिचंन्द्र मालूम होता है, जो लॉट के रिकार्ड्स की तपागच्छपट्टावली में ३६ वां हैं। सार्द्धशतकवृत्ति को हस्तलिखित प्रति, चन्द्रगच्छ के अजितसिंहकृत, निर्माण समय ११७१ सम्वत् । गर्गऋपि के कर्मविपाक पर टीका की प्रतिलिपि सम्बत् १२२७ में की गई। हरिभद्र के पञ्चसंप्रह, उपदेशपदप्रकरण, लघुक्षेत्रसमास, संग्रहणीसूत्र, जीवाभि- गमाध्ययन पर टीकाएं । लघुक्षेत्रसमासवृत्ति के अन्त में एक पद्य में, विक्रम सम्वत् का पञ्चाशीतिकवर्ष ग्रन्थ-निर्माण-काल दिया हुआ है। यहां पश्चाशीतिक का अभिप्राय ५८० समझना चाहिए। .
• रानन्यान में सन्नत मागिरी साज- [३१ . . . हरिभद्र का उपदेशपद - वर्धमानमूरिस्त टौरा सहित । एक हस्तलिखित पुस्तक पर ममय ११६३ और दूसरी पर १०१२ मम्वत् उद्धत है। हरिभद्रत समरादित्यचरित की प्रतिलिपि, ममय १४० सम्वत् । ललितविस्तर, हरिभद्रकृत । हरिभद्र [शिष्य ?] स्त-कुवलयमाला इम्तलिाखत प्रति का समय ११३६ सम्यत है। चन्द्रप्रमचरित मिद्धमूरिस्त: १९३० सम्बत् मे रचित । यह सम्बत उन मिद्ध- मूरि के नादागुम ही है, जिहाने ११९२ मम्बत मे हत्तेरसमामगृत्ति लिखी थी। हरिभद्रमत-धर्मानन्दुप्रकरण पर टीका । नन्दिटोका-दुर्गपटव्यारया-धनेश्वरभिष्य पन्द्ररिस्त । हस्तलिपित पुस्तक का समय १२२६ मन्बत् है। सिद्धमेन दिवारपत, सम्मतिसूत्र, श्रमयदेवसार की टीका समेत, जो प्रद्युम्नमार का शिष्य था। यएड १ यार। माम्बातिकृत प्रशमति, हरिभद्राचार्यकृत अमरिका ममेत, हस्तलिास्त पुस्तक का ममय ११८५ सम्बत् है। नागरवाचकर भाग्यमहित उमाम्या तर तत्त्वार्य । नागरवाचक स्वय दमास्वाति का दूसरा नाम है । (पिटरमन ३, परिशिष्ट पृष्ट ८४ धौर, पारशिष्ट पृष्ट ७६) । पदेशरन्ली-मिल्लमालवगीय 'क्डुयराय' (फटुाराज) पुत्र थामडात । (पिटर. मन ३, पृ० ३६,४०) त्यन्नमूत्राटीका समेत, नीरा सम्वन् ११४४ मे यश प्रभसृरि द्वारा बनाई गई है। समहणी मटी । टीका ११३८ नम्बत मे शालिभद्र के द्वारा बनाई गई। यह यही शालिमद है जिममा रस पिटरमन ने अपनी रिणर्ट ८, परिशिष्ट पृ० मे नीचे की पोर मे तोमरी पति में क्यिा है, हस्तलिम्पित प्रयश, लेवनराल १२०१ मम्बत् है। जिनदत्तमारटन, प्रारतपट्टारली की नफन । यह सम्बन ११७१ मे प्रसिद्ध नगर पहन में जयसिंहदेर के राज्य में यनार गई। धर्मविधिप्रकरण नाममूरिन। त• प्रति मन्यन १६६ है। अमरदर की रिपारमनवृत्ति की प्रतिलिपि म०.१६५ । सम्वेगरगगाला धीवुद्धिनागरमरि + निय निनचन्द्रमरिन । समय ०३ स. अगाविद्या। महापुम्पचरित मानयरि के शिष्य गीलाचार्यरत । हस्तलिग्नि प्रति का ममय १.३मम्बत है। २२-इन र मस्टार को देखते हुए घर ममद में प्रान पुग्न थाधर मात्यपूर्ण नही थी उनम मेने उन नाइपनीर हन्तलिस्नि पुग्नकों के माय पागर पर निम्ति प्रतिया थी, और मायनो में प्रम दिलकुन्न अनम्यम्न थाम्ननिपिन बिपरम गुमन महत्यपूर्ण पुग्न पानि में देय पाया- १२] * राजस्थान पुरातत्व लघु-भागवत गोस्वामीकृत वृहद् बामनपुराण जगतसिंहयशोमहाकाव्य के तीन सर्ग जो मेवाड़ के राजा कर्ण के पुत्र जगतसिह के सम्मान में श्री हर्ष के नैषधीय-काव्य की प्रतिस्पर्धा-स्वरूप, श्रीकृष्ण के पुत्र भट्टमण्डन द्वारा रचा गया । हरविजय की ताडपत्रीय प्रतिलिपि सं. १२२८ । दुर्वाससः पराजय काशीनाथकविकृत । विष्णु-भक्ति-विषयक एक नाटक; इसके लिये ऐसा बताया गया है कि सूत्रधार ने इसे मथुरा में रङ्गमञ्च पर प्रस्तुत किया था। लटकमेलक प्रहसन की एक हस्त लिखित प्रति सं. १६०२ की। कुमारसम्भव टीका लक्ष्मीवल्लभकृत । सुभापितों के संग्रह की आधुनिक समय की एक प्रति । इसमें न तो संप्रहकर्ता का और न उद्धृत श्लोकों के रचयिता महानुभावों के नाम लिखे गये हैं। परन्तु, विक्रमादित्य को राज- सभा के मानेजानेवाले नवरत्न कवियों का परिगणन किया गया है, साथ ही प्रत्येक का बनाया हुआ एक एक श्लोक भी दिया गया है। पद्य निम्नलिखित हैं १. धन्वन्तरि-'मित्रं स्वच्छतया' आदि, यह पद्य सुभापतशाङ्गधर भादि में भाना है, परन्तु वहां इसके निर्माता का नाम नहीं दिया है। २ क्षपणक-'अथौ लाघवमुत्थितो निपतनं कामातुरो लाञ्छनम्' आदि। ३. अमर-'नीतिभूमिभूजां मातगुणवता हीरगनानां धृतिः' आदि। ४. शड्कु-'धर्मः प्रागेव चिन्त्यः' आदि । यह पद्य राजनीति प्रन्य,स्मृतियां, भारत, तथा रामायण से उधृत श्लोकों में शाङ्गधर पद्धति में लिखा हुआ है। ५. वेतालभट्ट-'कापण्येन यशः क्रुधा गुणचयो दम्भेन सत्यं कुधा' भादि । ६. घटकपर–'मूर्ख शान्तस्तपस्वी क्षितिपतिरलसो मत्सरो धमेशीनो' भादि, यह पच षटकपर काव्य में नहीं मिलता। ७. कालिदास -'स्त्रीणां यौवनमथिनामनुगमो रामः प्रतापः सतां आदि । ८. वराहमिहिर-'विद्वन् सल्पदि (संसदि पाक्षिकः परिणतो मानी परिछा गृही' आदि। है. वररुचि -हत्खातान् प्रतिरोपयन्' आदि; यह वल्लभदेव द्वारा विना कतृ नाम के भौर शारङ्गधरपद्धति में राजनीति आदि में से उद्धृत श्लोकों में पाता है। रघुटीका - धर्ममेरुकृत । कातन्त्रविस्तार - करणदेयोपाध्याय श्रीवर्धमानकृत । एक प्रति लिङ्गानुशासन - दुर्गोत्तमकृत सटीक । काव्यप्रकाशटीका - भवदेवमिश्रकृत । यह शक सं० १६६३, लक्ष्मण सम्वत् ५२४ में गङ्गातट पर पट्टन में बनाई गई, जब कि शाहजहां पृथ्वी का शासन करता था। रचियिता मिभ श्रीकृष्णदेव का पुत्र और भवदेव ठक्कर का शिष्य था। 1 * सनस्थान में संस्कृत माहित्य की खोत [३३ भगवद्गीतामृततरहिणी (पुष्टिमार्गीय)। ताविकचूडामणिकृत प्रमाणमजरी की एक प्रति, लेस्बन ममय स०१४७० विमान्द और शम सवत १३३५। एक जातक- परमहस परिनाजकाचार्य यामनहत । पराशरतुल्य - गङ्गाधररचित । फलकल्पलना-एक वार्षिक कन मन्ध, गुर्जरमण्डल के नृसिंह कपि रचित । ज्योतिषमणिमाला को एक प्रति । अन्न मे पुप्पिका के पूर्व निम्नलिखित श्लोक है "सम्वन्याभ्रयुगद्विचन्द्र समये चापाढमासे मिते " पक्षे पञ्चमी शुक्रवारकरभे सौभाग्ययोगान्विते । अदीज्यो (औदीन्णे १) हरनाथवशतिलकम्नस्यात्मज [ ] केशर नस्य स्वात्मजनीकमस्य पठनात्म (मी) र्थे च कृत्या मुदा ।। इति श्रीकेशरिरविताया ज्योतिषमणिमालाया गोरजलग्नाधिकारे अष्टादशम (दश) स्तषफ १८ । इति श्री मणिमालासमाप्त सम्बत् १७५० वर्षे ।" इस ज्योतिष्मणिमाला के सम्बन्ध मे कुछ गडबड मालूम होती है । नोटिसेज ऑव सस्कृत म्यनुस्क्रिप्टस्, मन्थ, पृष्ठ २०९-१० पर इस नाम वाले अन्य का प्ल्लेख किया गया है, इसमे प्रकार का नाम कहीं नहीं लिया है फिर भी डॉ० आमट (कैटेलोगस् केटेलोगरम भाग २, पृ० ४४) बीरानेर सूचिपर के पृ० ३०५ मे लिखे गये ज्योतिपिमणिमाला से इसकी समानता बतलाते हैं, परन्तु नोटिसेज में दिये गये प्रस्तुत उद्धरणों से यह अभिनान असम्भर माम होता है । जो अन्य मैंने देखा है वह बीकानेर सूचीपत्र में उल्लिखित ग्रन्थ से समानता रसता है । रचनाकाल को बतानेगाली पद्यशब्दापाली समान है केवल एक शब्द का अन्तर है । गाग रब्द, जो पिछली हस्तलिखित बीकानेर की पुस्तक में हैं, के नदले पूर्व प्रति में हमने गरी शन्द देखा है इसलिये पूर्व की में इसका रचना काल पिछली से ४०० वर्ष प्रचोन दिखाया गया है (स. १६४० के बदले स० १४० है,) डा० पिटरसन के अलवर पूचीपर सरया(७८३) मे एक ज्योतिर्मणिमाला नाम है,जिसको उन्होंने बीकानेर सूचीपत्र की उल्लिसित हस्तलिखित प्रति के ममान बतलाया है । परन्तु, डॉ ऑफ्रेट इस अभिज्ञान को ठीक नीं मानते (कैटलोगम् कैटेलोगरम, भाग २, पृष्ट २०१) परन्तु, फिर भी कुछ ऐसी बातें है जो इस पुस्तक की प्रस्तुत ज्योतिषमणिमाला से समानता यतलाती हैं। दोनों ही मे कर्ता और कर्ता का पिता क्रमश केशर और हरिनाथ है और प्रन्थ की समाप्ति 'गोरजलग्नाधिकारे अष्टादश स्तरक' के नाम से होती है । इसलिये यदि अलवर में पलन्ध प्रन्थ मेरे द्वारा देख गये इस अन्य के समान हो. तो वह बीकानेरपाले अन्य के भी अवश्य समान है। परन्तु, उपर दिये गये उद्धरण और अलपर मूचीपत्र मे उद्धृत इसके पक्षसाधक उद्धरण इतने भिन्न हैं कि पृथक् र अन्यों से उनकी समानता निलकुल नहीं हो सकती । केवल हस्तलिखित प्रतियों में प्रतिपादित विपय मूचि के मीलान मे ही इस बात को सुलमाया जा सकता है।
2 - . ३३] : राजस्थान पुरातत्व और शिष्य थे जो उसके नहीं बल्कि ३ अन्य स्थविरों के थे । एक अवसर पर प्रयोग को देख कर प्रसन्नमना आचर्य ने कहा कि यदि ऐसे अवसर पर मैं किसी भी पुरुष के सिर पर अपना हाथ रख दूंगा तो वह प्रसिद्ध बन जायगा । ८३ शिष्यों ने इस कृपा के लिये अनुरोध किया जिसकी उन्हें स्वीकृति मिल गई । और वे ८३ शिप्य आचार्य पद को प्राप्त कर भिन्न २ प्रान्तों में आचार्य बन गये। इस प्रकार ८४ गच्छ बन गये। वर्द्धमान के समय अर्बुदाचल पर्वत पर, ऋषभदेव के मंदिरनिर्माण के संबंध में, ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्माणों ने वहां पर अपना तीर्थ होने का दावा किया परन्तु रुपया देने से उनका संतोष हो गया। 'अणहिल्ल र' में एक ओर जिनेश्वर और बुद्धिसागर तथा दूसरी ओर चैत्यवासियों के बीच हुए झगड़े का विस्तृत विवरण है । अन्त में, चैत्यवासियों के पराजय के कारण उनका नाम 'कंवलाः' रखा गया । सम्वेगरङ्गशाला के रचयिता जिनचन्द्र के बारे में लिया गया है कि उसका दिल्ली में मौजदीन सुरत्राण ने बड़े सम्मान से बहुमान किया । अभयदेव ने एक धार्मिक व्याख्यान के प्रसङ्ग में शृङ्गार आदि नवरसों का असामयिक वर्णन करने के पाप के प्रायश्चित रूप में जो अत्यधिक आत्मोत्सर्ग किया उसको भी वर्णन है । जिनदत्त का एक लम्बा विवरण दिया है जिसमें बताया गया है कि उन्होंने एक अवसर पर कुछ योगिनियों से (स्त्रीविशेष जो जादू की शक्ति रखती है) सात वरदान सात शर्तो पर लिये ।उनमें से दो शर्त निम्नलिखित हैं (१) जो कोई भी जिनदत्त का नाम उच्चारण करेगा उसे बिजली आदि का डर नहीं रहेगा; और (२) कोई भी सद्गृहस्थ जो खरतरगच्छ का अनुयायी होगा वह सिन्ध जाकर धनवान बन जायगा । योगिनियों ने इस बात की भी पहले सूचना दी कि खरतर- गच्छ के नेता जिनमें पूर्ण बल न हो, वे दिल्ली, भरूकच्छ, उज्जैन, मुलतान, उच्छ और लाहौर में रात्रिवास न करें । ऐसा बताया जाता है कि एक बार उनके जीवनकाल में कुछ ब्राह्मणों ने एक मृतक गौ को वृद्ध नगर के जिन चैत्य में डाल दिया, और यह अफ- वाह फैलाते रहे कि जैनों के देवता गोसंहारक हैं । तब जिनदत्त ने गाय को जिला दिया, वह फिर शिव के मन्दिर में गई और वहीं मूर्ति पर गिर कर मर गई । एक वार उसने विक्रमपुर में संक्रामक बीमारी से केवल जैनों को ही नहीं बल्कि माहेश्वरों ( शिवजी के उपासक लोगों ) को भी बचाया, जिसके फलस्वरूप बहुत से माहेश्वर जैनधर्म के अनुयायी होगये । जिनचन्द्र (सं० ४६) के समय, जो १३७८ सम्वत् में निवार्ण को प्राप्त हुए, गच्छ को राजगच्छ का विशेष सम्मानयोग्य नाम प्राप्त हुआ । जिनकुशल ने जैसलमेर में जसधवल की आजा से चिन्तामणि पार्श्वनाथ की मूर्ति बनवाकर स्थापित की । मेरे द्वारा इस पुस्तक के परिशिष्ट १ में दिये गये जैसलमेर से प्राप्त पाश्वनाथ के मन्दिर के शिलालेखों से विदित होगा कि जिनकुशल से पट्टावली क्यों आरम्भ हुई। उसके शिष्य विनयप्रभ ने अपने भाई की समृद्धि के लिये गौतमरास की ग्चना की । अब भी जिनकुशल संसार में "दादाजी" नाम से विख्यात है । वेगड़ खरतर शाखा के उद्भव का कारण यह दिया है कि एक बार जिनोदय के समय, धर्मवल्लभ को आचार्य बना दिया गया। परन्तु, उसके दोषों के कारण उसे स्थानच्युत कर दिया गया। इसी तनाव से धर्मवल्लभ ने गुस्से में आकर इस वेडखरतर शाखा की • राजस्थान में संरत-साहित्य समाज . [ ३० स्थापना की। जिनोन्य के श्रार से १६ यनियों से ज्यादा इस सम्प्रदाय में यति नहीं हो सकते, जन कोई वीसना होता है तो एक मर जाता है। निनर्धन सूरिने चतुर्थनत (ब्रह्मचर्यपालन) किस प्रकार भाकिया योर किन प्रसार उप्तका पर निनभद्र को दिया गया इसका भी वर्णन है। उसने जैसलमेर के पार्श्वनाथ मन्दिर में मूर्ति की स्थिति के लिये दसल को इमलिय फुल साधुओं ने नेतृत्व किया और राय मागने के लिये सभी स्थानों से गच्छ के सदस्यों को भाणसोलग्राम नामक स्थान पर युला भेजा । अतिम जिनराज के शिष्य भादु को निश्चित कर सागरचन्द्राचाय ने सन भकार के सह का लाभ उठाया और भादु को चित निधियों से पट्ट का आमन दिया । भाणसोलग्राम मे मार भगाराका सम्मेलन इस भाति हुआ । यह निर्वाचित व्यक्ति माणसालिक गोत्र का था, भादु उसका मूल नाम, भरणी नक्षत्र, भद्रकरण (ज्योतिष के हिमान से दिन का एक भाग भद्रकरण कहलाता है) भट्टारक पद और जिनभद्रमूरि इस निर्गचित व्यक्ति को नया नाम दिया गया। परन्तु,जिनार्धन सूरि सो इस प्रकार पदच्युत होगया था, उसका नाम कम से कम, नैसलमेर के पार्श्वनाथ मन्दिर मे जब तक इन दो शिलालेखों को स्थिति है तन तक स्थायी रहेगा। मरे निर्देश मे ही मन्दिर का निर्माण कार्य पूरा हुया, साथ ही विधि विधान से इसकी प्रतिष्टा की गई। सागरचन्द्र, जिन्होंने विरुप रूप से जिनपर्धन का नाम रखने में पूर्ण सहायता दी, वही • महाशय हो सझते हैं जिनका इन दोनों शिलालेखों मे से दूसरे में उल्लेप हुआ है । जिनहस । (५E) के विषय में कहा जाता है कि पातिसाही, आगरा ने कुछ समय तक जिनहस के विरुद्ध कान भरे जाने के कारण धवलपुर मे झूठी अफवाहों के आधार पर उसे कैद कर लिया परन्तु, बाद में छोड़ दिया और बादशाह को अनुकूलता प्राप्त हुई । रारल मालदेव का जिनचन्द्र (मरया ६१ को) सन १६१० मे जैसलमेर मे सूरिपद का प्रतितापूर्ण सम्मान देने के सम्बन्ध मे नामोल्लेस है । इसलिये इम स्थान पर रामलों की सूचि में जोडे लाने के लिये जैसतमेर के शिलालेखों पर एक नाम ओर मिला। इस जिनचन्द्र के विषय में धर्मसागर और अन्य लोगों के साथ विरोध पडा करने और अभयदेव सरतरगच्छ का है, इसकी सत्यता के सम्बन्ध में विचरण पाता है । यह धर्मसागर प्रमचनपरीक्षा का की हो सकता है जिसको मैने थारम्भ में पहले देगा (डा० भाण्डारकर की रिपोर्ट १८८३-८४ पृष्ठ १५१ से १५५) । धर्मसागर ने जिनहम को अपना सममामयिक बताया है और उसका अन्य रचना समय १३०६ सम्बत है । यह न तो पारली में घृत ममय से मेल साता है और न लाट की दी हुई मारभून तालिका से ही। अकार ने जिनचट (स०६१) को युग-प्रधान की पदगी से विभूपित किया और अस्वर की इच्छा से निनसिंह उसका सत्तराधिकारी घोषित किया गया । १६६६ मम्बन में जिनचन्द्र ने सलेमपातिमाहि के द्वारा निकाले गये समस्त जैनों के खिलाफ एक फरमान का निरोध किया क्योरि बादशाह सलीम ने एक यति को, जिसे अपने सुन्दर गायनादि के कारण वह बहुत अधिक चाहता था, एक दिन अपनी बेगम के साथ पान करते हुए देखकर निकाला था। . - ३८] * राजम्मान पुरातत्त्व मेरा प्रथम दौरा जैसलमेर का कार्य पूरा होते २ समाप्त हो चुका, तब मैंने अपने पण्डित को बीकानेर भेजा । वह इसी क्षेत्र का निवासी था। मैंने उसे इम प्रदेश में स्थित हस्तलिखित पुस्तक-सग्रहालयों के सम्बन्ध में उपयुक्त जानकार मममा ताकि वह सभी संग्रहों की सूचना ले सके और उनकी एक एक ग्थूल रूपरेखा तथा एक सूचि संचार करले । वह इस काम में तब तक पूर्ण रूप से व्यस्त रहा जब कि अपने दृमरे दौरे पर जाने के लिए उसने मेरा साथ न कर लिया। अपने दूसरे दौर में प्रथम स्थान जो मैंने देखा वह उदयपुर था । जनवरी मन ११.४ में मेवाड़ के रेजीडेण्ट महोदय ने मुझे सूचित किया कि मेवाड़ दरबार ने उन्हें यह रिणर्ट दी है कि उदयपुर में राजकीय पुस्तकालय में संस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्थों का अच्छा संग्रह है और उनके निरीक्षणार्थ मैं आ सकता हूँ। फिर, उसी वर्ष अप्रेल में उन्होंने मुझे उस स्थान के व्यक्तिगत संग्रहों की भी सूचना दी। उसी वर्ष के अन्त में उन्होंने मुझे फिर लिखा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से यह ज्ञान किया है कि उदयपुर के जिन संग्रहों का उन्होने उल्लेख किया है उनमें संस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्थों के अमूल्य संग्रह हैं। उन्होंने फिर मुझे यह लिखा कि उस समय उदयपुर में 'लेग की. संक्रामक बीमारी फैली होने के कारण मेरे लिये यात्रा करना शक्य नहीं होगा। यह जानते हुए कि प्लेग का आक्रमण फिर से किसी भी समय होजाय और यह आशा करते हुए कि रेजिडेण्ट महोदय की सूचनानुसार मेरा काम उदयपुर में ही सन्तोपजनक रूपसे पूरा हो सकता है क्योंकि रजिडेन्ट महोदय को ऐसे कार्य में पूरी दिलचस्पी है, अतः सर्व प्रथम मैंने उदयपुर जाने का ही निश्चय किया । १६०५ के दिसम्बर के मध्य में १ या २ दिन पहले उन्होंने मुझे लिखा कि मेरे आगमन और दौरे की सूचना उन्होंने उदयपुर दरवार को देदी है। और जब मैं १५ जनवरी १६०६ के दिन उदयपुर पहुंचा तो पूछताछ करने से पता चला कि उदयपुर दरवार द्वारा कोई भी आदेश उस समय तक मेरे पुस्तकालय निरीक्षण के सम्बन्ध में अधिकारियों को प्राप्त नहीं हुआ था। दीवान साहव को, जिनसे मिलने के लिये मुझे कहा गया था, यह भी पता नहीं था कि उनके पास ऐसा कोई सग्रह भी है या नहीं । उस समय रेजिडेण्ट और दरवार महोदय दौरे पर पधारे थे । परन्तु मेरे एक मित्र श्रीगौरीशङ्कर ओझा, जो स्वयं एक अच्छे पुरातत्वज्ञ हैं, और दूसरे उस स्थान के पुलिस सुपरिण्टेण्डट, इन दोनों महानुभावों की सहायता से मैंने व्यक्तिगत भण्डारों को देखने का अपना काम सन्तोपजनक रीति से किया । अन्त में, दरवार के आवश्यक आदेश भी विलम्ब से प्राप्त हो गए जिससे मुझे राजकीय संग्रहालय को देखने का भी अवसर मिल ही गया। ३७-यहां मैंने राजकीय पुस्तकसंग्रह सहित ११ संग्रहालयों को देखा । इनमे सबसे बड़ा राजकीय संग्रहालय है । यह सुरक्षित और व्यवस्थित है परन्तु, हस्तलिखित पुस्तके खुले • राजानम मराज-माहिय गे माज १ मिताभदाना में हैं जहां चूह यही सरजना में पहुंच सकते हैं। पर व्यक्तिगत जैन मप्रहालय और दमरा जैन भएद्वार ये दोनों ही मुख्याम्थित और सुरनित थे अन्य मप्रहों की देखभाल मली प्रकार नहीं हो रही थी। पनमें से दो तो एक ममर यहुत ही सुन्दर पुस्तकभएर रह पुके थे । यहा राजकीय मनालय की चार धन्य गेनीन मप्रहालयों की मंपिपा बनी एसी। २८-इन हनिपित प्रतियों में, निह मन नम्वा, निम्ननिम्पिन प्रमुम्ब - आश्यलायनमूपृत्ति-पिद्धतालसन्त नियामीन । गीतमधर्मम्न पर एन सी टी मितातरा, रचनाकान ६ म: देवीमाहाम्य कौमुदी-रामा स्त। भगनी-पर-पुष्पाञ्जलि । एक पुराणानुक्रमणिस -जिमम पुराणा रे नाम और मसिम मायगई। म्मृति-प्रयध-मप्रा-लोक - गारामनडीयन सत्य कल्पतम् - लक्ष्मीरियत यह श्रीपिटरमन द्वारा अपनी १८८२-३ नी रिपोर्ट में पृष्ट १००-१११ मे मूच्युपनियत किया गया | जमा कि श्री पिटरमन (अपनी रिपोर्ट १८८४-८९ये माय मलम परिशिष्ट पुस्तस्पचि मे) अनुमान करते है और क्य रत्नाकर शीर्षक मानते है, वह सब भूल मान है। माधन साल-निर्णयशरिका पर भट्ट श्रीनीलकण्ट पौत्र भगदर-पुत्र भा- माम्बरी टीशा पीरमिटोग्य परिमाणमया- यह चौपम्या मम्मत मीरी में प्रमाशिनमा ममें प्रकाश परिगगिन है जिनका इम पन्ध मे समावेग है।म परिभाषा अनिरिक मेने लवण और पूजाप्रकाश भी देग । हिनहानिम मराज पीरानेर ये मरम्यनी नाहार में मैंने गोति धर्म रिणक, निफिन्सा और प्री को छोपर मप रामदेव प्रांर १४ प्रारा जो रि प्रारगिर पिचरण में जो परिनापा प्रकारे मन में कि प, और जो उनमें से यार ये है, उन माथ मलती। परगुराम प्रताप पर नियर जामय यमनोत्र के मापानी प्रभाग अग निर्मित हिम रातरानेर निजामशाह ने सम्मानित किया । प्रताप का पिता पद्मनाभ या! पारिस-सादिना - पनी या रिपय प्रतिशतरने पानी। उस धर्म मुटुम-मवरी - सापरणार । मिनिय-पक्रपाशिन शानिश (.) अनमोरनामा मामनाया विश्न। - • राजस्थान पुगतान सभ्यालङ्करण-गोविन्दभट्टकृत - एक पद्य-संग्रह जिसमें सभी कृतियों के रचयितांत्रों के नाम दिये गये हैं। प्रवोधचन्द्रोदयकौमुदी - प्रबोधचन्द्रोदय पर टीका सदात्ममुनिकृत । अन्य के अन्त में वंशावली दी हुई है परन्तु, एक अन्तिम पत्र जिममें इसका एक अंश था, विलकुल खोगया । टीकाकार का सन्यासी बनने से पहले मूलनाम गदाधर था । हस्तलिखित (मैन्युस्क्रिप्ट का समय सम्बत् १५७१ और शक १४३६ सम्बत् है।) रघुटीका - मुनिप्रभगणिके शिष्य धर्ममेरुकृत । सम्वादसुन्दर -जिसमें बहुत सुन्दर छोटे २ वार्तालाप हैं; शारदापायो; गाग यगुञ्जयोः हारिद्रयपद्मयोः, लोकलक्ष्योः, सिंहीहांस्तन्यो; सनन्दनयोः, गोधूमचणकदोः पञ्चानामिन्द्रयाणां दानशीलतपोभावानां । विद्वभूषण पर टीका मूल लेखक के शिष्यद्वारा सारसंग्रह - शम्भुदासकृत एक संग्रह । श्रवणभूषण - नरहरि कृत । हरिहरभूपण काव्य - गंगारामविकृत । सुभाषितसारसंग्रह - मिश्र पुरुषोत्तम के पुत्र मिश्रठाकुर कृत । पाणिनीयव्याश्रय विज्ञप्तिलेख : असंधि और हल संधि । नलोदय पर मनोरथ कविकृत टीका विबुधचन्द्रिका । अनधरायव पञ्चिका - मुक्तिनाथार्य के पुत्र विष्णुऋन । बहुत ही प्राचीन प्रतिलिपि है धनञ्जय के द्विसमाधान या राघव पाण्डवीय पर एक टीका। पद कौमुदी-नमिचन्दरचिन । नेमिचंद्र विजयचन्द्र पण्डित के अन्तेवासी देवनान्द का शिष्य था । नामचन्द्र कृन राघव पाण्डवीय को प्रति लिपि बूहलर के १८७२-७३ को संग्ख्या १५४ के नंग में इसी टीका की प्रति है। शृङ्गार तरङ्गिणी - सूर्यदासकृत गीतगोविन्द पर शंकर मिश्र की टीका कातन्त्रलघुवृत्ति - भावसेनविद्यकृत षड्भापाविचार (संस्कृत और पांच प्राकृन) सारस्वत पर टीका - मोहन मधुसूदन के अनुज दत्त परिवार के मथुरावास्तव्य ब्राह्मण द्वारिक के पुत्र तर्कतिलक भट्टाचार्यकृत । इन्होंने अपने प्रिय शिष्यों के अनुरोध पर वैशेषिक सूत्रों पर प्रारम्भ की गई टीका को छोड़कर इसे टोड नामक नगर में जब जहांगीर राज्य करता था, सम्बत् १६७२ में लिखी । यह राजेन्द्रलाल के नोटिसेज • रानस्थान में सात-साहित्य की खोज [४१ (८, पृ००८३-४) मे लिखे गये कालमाधवीय विचरण के रचयिता ही है जो १६७० मम्बत् मे रचा गया था। इसलिखित प्रति का ममय १६६१ सम्पन् है। वाग्भटालङ्कारवृत्ति - वाचक नानप्रमोगणित । सलेमशाहि और नवोट्टपति गजसिंह के रान काल में स० १६८१ में विरचित । मारनाड या जोधपुर का राना गजमिह उस समय शासन करता था। लघुकाव्यप्रकाश-रचयिता का नाम अज्ञात । जिसमे काव्यप्रकाश कारिकाश (इन्भाग) ही समझाया गया है और उसका अर्थ बताने वाले गटा भाग को नहीं सममाया गया है। मञ्जरी विरास - रस मञ्जरी पर एक टीका , कौडिन्य गोत्रो नृसिंहाचार्य के पुत्र गोपालाचार्य रन, उमरा दूमरा नाम योपदेव है (स्टेन, पृष्ठ ६३ और २७१-३) युगन्तवेदा- धरणीगण्येगिरोक्त्मरे । रध्र का अभिप्राय है ६, इसलिये समय १५६४ है न कि स्टेन द्वारा श्रारलिन १४८४ समत् । यद्यपि इसमे काल नहीं लिखा गया है परन्तु बदलते रहने वाले वर्ष का अगिरस् नाम देने से यह शक समय है, इस बात को प्रगट रता है । इसलिये स्टेन के द्वारा बनाये गये हस्तलिखित अन्य का समय भी शक सम्वत् होगा चाहिए । श्रत समय १५१४ है। छन्गेमजरी पर टीका - वशीयादन कृत। हेमचन्द्र पृत छन्दोऽनुशासन स्योपज्ञ टीका या मलद्वारसग्रह ( या अलवार संग्रह) वीरवर अमृतानन्द या अमृतानन्द योगी रचित । भक्ति राजा के पुत्र और सूर्य पर चन्द्र पुल दोनो के आभूपण-यस्प राजा मन्म ने अन्यार से अनुरोध किया कि उसके लिये प्रलवार माहित्य के भिन्न विषयों का, जिनसे पहले अलग २ टीशों में बताया गया है, एक सरल म्प मे निम्पण दिया जाय । मम नामक दो राजा कोन- मण्डलीय राजवश मे प्रसिद्ध है अर्थात १) मन्म चोड़, द्वितीय और ()मम मत्य द्वितीय या मन्म सत्ति । प्रथम वेट का पुत्र था निसरा नामकरण भक्ति के साथ पार्यवर्ती रह सकता है। मन चोल का ममय ११६५ और ११५३ ई० मन् पे बीच में कहीं भी हो सस्ता है पाच्य निम्पण-रामवि पृत । इममे जो उदाहरण रिये गये हैं वे मन अन्यकार के भ्याचिा है और उनका सम्बन्ध राममिह या राम हरि से है। रमपद्मावर - गगाधर कृत जो यमराज का पुत्र और श्रीराम का अनुज था। महामीमामामाप्य-श्री पटशिंगचार्य । प्रात्माकोध-जिसमा पुरतर ये पार्य पर परमार्थयोध नाम दिया है जो हरि- नाय पे शिप्य रामनाथ के शिष्य मुकुन्दमणि पृत है । इसकी रचना प्रयपार ने दम ममय पी जय जैत्रपाल ने विनयापनत होकर यिाय यास्तविक तत्य को यालयोधार्थ निम्पस परोपी प्रार्थना की। मरेप शारीरय पर टीका ममेत, टीकाकार रामतीर्थ शिप्य अग्निाचा पुरुषोत्तम मिश्रा पृमारतपराजर्टीका - पुतिमिद्धात (निम्यार) मजरी - ४२] * राजरधान पुरातत्व औदुम्बरी संहिता-उदुम्बरपिकृन जो निम्बार्क-शिष्य था। गीतातात्पर्य-विट्ठल दीक्षित । भक्तिरसाब्धि-करिणका-गोविन्ददास के पौत्र और भगवहास के पुत्र गंगाराम रचित । भावार्थदीपिका-गौरीकान्त-महाकवि कृत । लक्षण समुच्चय-भिन्न २ पारिभापिक शब्दों की व्याख्या बताने वाला ग्रन्थ । तर्कभाषाविवरण - माववभट्ट कृत जिसे प्रकाशानन्द का अन्तेवासी बतलाया गया है। वराहमिहिर संहिता की हस्तलिखित प्रति जिसका समय सं० १५५७ है, जो महा- राव श्री सूर्यमल्ल के राज्यानुशासन में जोधपुर में लिखी गई। बृहज्जातक टीका-केरली । हस्तलिखित प्रति अपूर्ण है और ग्रन्थकार का नाम मुझे नहीं मिल सका । टीका का प्रारम्भ "या होरा रचिता वराहमिहिराचार्येण" से होता है। अमरभूपण-अमरसिह रचित नहीं, जैसा कि पिटरसन के अलवर सूचिपत्र (पृ- ७३ ) में उद्धृत है, परन्तु उसके नाम के ऊपर यह रचा गया, जैसा कि उसी सूचीपत्र के पृ० १६८ के सारोद्धार में बताया गया है। अन्त में दिये गये श्लोकों में रचयिता का नाम मथुरात्मज लिखा है । श्लोक जो कम से कम प्रति में हैं बहुत अशुद्ध हैं और अमरसिंह की वंश प्रशस्ति इस प्रकार उद्धत की गई है:- राणा उदयसिह, शक्तिसिंह, भाणसिंह, पूरण, रावल १, मोहवर्मा और अमरेश । हस्तलिखित ग्रन्थ युवानसिंह का है और समय सं० १८६१ और शक १७५६ है । युवानसिंह मेवाड़ का जवानसिंह ही मालुम देता है। (ईस्वी सन् १८२८-३८)। सिद्धान्तकौस्तुभ - लल्लगौलाध्याय और रोमश । मिताङ्क सिद्धान्त - विश्नाथ मिश्र द्वारा शक १५३४ में रचित । सिद्धान्तसुन्दर - गणिताध्याय - नागनाथ के पुत्र ज्ञानराज कृत समय ६.क १५४२ है । सिद्धान्तबोधप्रकाश (ज्योतिप)-जगन्नाथ देवज्ञ कृन । लीलावती प्रकाश - वर्धमान कृत सं० १६६५ । खवायण संहिता - आरम्भः- शवायणं धूम्रपुत्रं रोमकाचार्यो वइति (Cf.) ऑक्सफोर्ड ३३८ बी० )। त्रिकालज्ञानविश्वप्रकाशचूड़ामणि - श्री शिव कृत | योग समुच्चय - गणपति कृत । रचनाकार व्यास महोत्तम का पुत्र था जो ब्राह्मण मल्लदेव का पुत्र था। चण्डीसपर्याक्रम - कल्पवल्ली - श्री निवास कृत । 'रूपावतार और रूपमण्डन - सूत्रधार मण्डन कृत । मैंने ये और निम्नलिखित ग्रन्थ हस्तलिखित रूप में जो वास्तुविद्या पर हैं एक प्राचीन भवन - निर्माता के वंशज के अधिकार में देखे । उसका नाम चम्पालाल है। उस सजन पास एक ताम्रपत्र है जिसमें यह बताया गया है कि उसे (मण्डन ) मोकलान ने गुजरात से विशेष रूप से बुलवाया था क्योंकि मेवाड़ दरवार में उस समय कोई विशिष्ठ * राजस्थान में संतत साहित्य की खोज [४३ - स्थापत्य कला विज नहीं था और उसे एक गांव भंट रुप मे दिया आदि । इस ताम्रपत्र का समय १४६२ है। मोक्लान यही मोकन है जिसने १२६८ ईस्वी सन् मे अपने भाई को गद्दी से उतार दिया था। यह कहा जाता है कि मण्डन ने कुम्भलगढ और उसके भाई नाथ ने चित्रकूट बनाया। वास्तुमञ्जरी - सूत्रधार नाय कृत यह क्षेत्र का पुत्र और उक्त मण्डन का भाई था। द्धारधोरणी - स्थपति गोविन्द कृत जो मडन का पुत्र था। कालनिधि (स्थापत्य) सूत्रधार गोपिन का । द्वारदीपिका - उसी रचनाकार द्वारा रचित । गृहवास्तुसार - ठकुर फेरु जो परम जैन चन्द्र श्रीधकलस परिवार का पुत्र था। १३७२ (सम्बत् १ ) मे यह प्रास्तपन्य क्माणपुर में लिखा गया है । प्रमाणमञ्जरी (स्थापत्य)- मल्लकृत जो कि मुज और भोज के कुल के आभूपण भानु रान का स्थपति था। नानाविधकुए इप्रकार - मल्लकन जो नकुल स्थपति का पुत्र था। नकुल सौम्मेल दुर्ग के अधिपति भानुराज स प्रधान स्थपति था। भुवनदेवाचार्योक्त - अपराजिनपृच्छा। वास्तुराज - सूत्रधार राजसिंह । । क्षीरार्णन - विश्वकर्मा द्वारा रचित । कुण्डोयोतदर्शन - नीलकण्ठ भट्ट के पुत्र शकर भट्ट कृत । यह भास्कर नामक टीका प्रथकार के पिता द्वारा एडोद्योत पर है और १७२८ मे रची हुई है। श्रीपति द्विदी के पुत्र विश्वनाथ कृत टीका स्वरचित ग्रन्थ कुण्डरत्नाकर पर । पास्तुतिला - पुष्पिका मे अन्यकर्ता, उसके पिता और उसके पितामह का नाम दिया हुआ है। परन्तु पुष्पिका बहुत अशुद्ध है और केवल पिता का नाम केशवाचार्य स्पष्ट म्प में दिया हुआ है। विश्ववल्लभ- मथुरा के ब्राह्मण कुलोत्पन्न मिश्र चक्रपाणि रचित । इसमे कुए -खोदना, उद्यान लगाना, आदि विपयों का निरूपण क्यिा गया है । इसकी रचना उदयसिंह मेवाड़ाधिपति के ज्येष्ठ पुत्र श्री प्रतापसिंह की इच्छा से हुई है । अन्त मे दिया हुआ सम्वत १६३४ ही इसका रचनाकाल हो सकता है। ग्रामडकृत पदेश कन्दली। लघुसतपट्टक - जिन वल्लभस्त । मरणप्समाधि (जैन) हम्नलिखित अन्य का समय स० १५४२ है । उपदेशतरङ्गिणी । (जैन) कहानिया हैं। प्रमोधचिनामणि-जयशेखर कृन जो सम्बत् १८६० में निर्मित স্থা स्थानागमूल-शुद्धि-रिचरण - जो अभयदेर सूरि के अनुज देवचद्र द्वारा स० १२४६ मे रचा गया है। प्रथकार के आध्यात्मिक गुरुओं की यशारली अन्त मे दी हुई है। ३६-अपने उदयपुर प्रयास में एक दिन के लिये मैं बल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायियों क ४४ ] * राजस्थान पुरातन wwmtmleone को तीर्थ-भूमि नाथद्वारा गया । मैंने वहां पर दो संग्रहालयों के सम्बन्ध में मुन रकरवा था । एक बड़े महाराज का और दूसरा छोटे महाराज का । पहला मैं देख सका और दूसरे के लिये मुझे बताया गया कि उसका देखना सम्भव नहीं । जैसो कि श्राशा थी, इसमें बलम- सम्प्रदाय के ग्रन्थों का ही वाहुल्य था । निम्नलिखित कुछ उत्कृष्ट ग्रन्थ मैन यहां पर देखे। सारसंग्रह-शम्भुदास कृत मृगांशतक-कण कवि कृत । एक कंकाण करि बलभदेवकृत सुभाषितावली तथा सूक्ति कर्णामृत में भी पाया है। रोमावली शतक-रामचन्द्रभट्ट दत्त कृत। एक विरुदावली - अकवरीय कालिदास कृत । एक कादम्बरी की हम्नलिखित प्रति जिसमें बाण कवि के पुत्र का नाम पुलिन्द दिया हुआ है जबकि स्टेन के मेन्युस्क्रिप्ट में (२६६ पृ०) पुलिन है । इस नाम के लिये श्री गौरी- शङ्कर ने मेरा ध्यान पहले भी प्राकृष्ट किया था, जिसे वे उदयपुर स्थित विक्टोरिया म्यूजियम के एक हस्तलिखित ग्रन्थ में देख चुके थे। व्यकि विवेक - उस राजा की वंशावली दी हुई है जिसके नाम से इसका निर्माण हुआ था । सरयू नदी के इस ओर एक यो (गो ?) रक्षा या नारायणपुर था । वहाँ (१) अमरसिह, (२) विक्रमसिह ( १ ) का पुत्र, (३) तेजसिंह (२) का पुत्र, (४) शक्तिसिंह (३) का पुत्र, (५) जयसिंह (४) का पुत्र जिमने युद्धक्षेत्र में दो सुरत्राणों से सामना कर सिंह का विरुद्ध सत्य ही अन्वर्थ कर दिया, (६) रामसिंह (५) का पुत्र, (७) चामुण्डसिंह (६) का पुत्र जिसने अयोध्या के यवन राजा को पराजित किया और दिल्ली के पातशाह का खजाना लूटा । इसका दूसरा नाम रुद्रसिह था और एक विकृत पंक्ति से उबडाज भी मालूम देता है। वह अकालघन ( एक वादल जिसकी किसी विशेष ऋतु की मर्यादा नहीं होती ) कहलाया क्योंकि सभी समय वह सोने की बौधार किया करता था। उस राजा ने ही अपना नाम स्थायी करने के लिये इस टीका को वन- वाया । यह तिलकरत्न और अकालघन नाम से भी कही जाती है। मीमांसा कारिका - वल्लभकृत । जैमिनीमूत्रभाष्य-उसी के द्वारा । वल्लभ के अनुभाग्य पर इच्छाराम की टीका भाख्यप्रदीप नामक । पीताम्बरसूनु पुरुषोत्तम रचित एक दूसरी टीका । वेदान्ताधिकरणमाला - उसीके द्वारा निर्मित जो कि वल्लभभाष्यानुसारिणी होनी चाहिए। मानमनोहर-वागीश्वराचार्य के पुत्र बादिवागीश्वर कृत । इस ग्रन्थकार और इस की रचनाओं के सर्वदर्शनसंग्रह और अन्य स्थलों में जैमिनी दर्शन पर उद्धरण है (हाल, पृष्ठ ४४ और आक्सफोर्ड सूचिपत्र २४५ व, २४७ अ) हस्तलिखित पुस्तक का समय १५४७ हैं। परमानन्दविलास ( वैद्यक ) वलभद्र के पुत्र परमानन्द कृत । - * राजस्थान म सस्पत-साहित्य की खोज [४५ तुरह परीक्षा-गाधर कृत । अश्वशास्त्र-जयरत्त कृत। रखपरीना-अगस्त्य कृत। इस माह की कुछ पुस्तक अवलोकनार्थ दे दी गई थी अत मूचि में लिखे गये उप्रेताल्लभ को मैं न पोज सका। 20--दयपुर से में वीरानेर चला गया जमा कि मैंने अपनी पहली रिपोर्ट के अनुच्छेद ५७ मे लिया है। इस स्थान (बीकानेर) पोलिटिकल एजेण्ट से पूछने पर मुझे यह उत्तर मिला कि राज्य के पुस्तकालय के अतिरिक कोईयक्तिगत अथवा सार्वजनिक हस्तलिखित पुस्तकों का मग्रहालय नहीं है । चूति स्टेट पुस्तालय की मभी हस्तलिमित सस्कृत प्रन्थों को सूचि श्री राजेन्द्रलाल द्वारा बनायी जा चुकी है, ऐमा विश्वाम किया जाता था। प्रत में यह सोचने लगा था कि इस स्थान पर मेरा जाना निन्देश्यक होगा । परन्तु एल्फिन्स्टन कालेज के पएडित ने जो इसी भाग का निवासी था, मुझे सूचित किया कि श्री राजेन्द्र- लाल द्वारा मूचिनिबद्ध किये जाने के उपरान्त भी बहुत अधिक हस्तलिखित अन्य बिना मूचि बनाये रान्य पुस्तकालय मे रह गये हैं। इसके अतिरिक्त जैसलमेर से प्राप्त पट्टायली में भी, जिसमा निररण ऊपर दिया गया है, बीकानेर एक ऐसा स्थान बताया गया है जहा से माभार पूर्वक बहुत अधिक निमन्त्रण पत्र कई उच्च जैनाचार्यों के पास आया करते थे और वे लोग उन निमरण-पत्रों का आग्रह मान कर उन म्यानों पर जाया करते थे। इसलिये बीकानेर जैसे स्थान में ऐसी थाशा की जा सकती है कि यहा जैन भण्डारों की स्थिति अवश्य है . माय ही यह पडित जो मेरे माथ काम करने के लिये विशेष रूप मे नियुक्त किया गया था, बीकानेर का निवासी था और उमीने मुझे विश्वास दिलाया था कि उम स्पान मे और भी बहुन से हस्तलिमित पुस्तकों के मण्डार हैं । इसलिये मैंने जैसलमेर से लौट कर से बीकानेर भेज दिया, जैसा कि उपर बताया जा चुका है। अपने अयनीय कार्यानय मे राज्य के भडार को मर्माह सुदर मुचि बनाने के अतिरिक्त अन तक यह १६ अन्यान्य छोटे या यहे मप्रहालयों की मूपि बना चुका था । इन १६ मे से ३ नाम समहालय थे। अशिष्ट मर जैन ममहालय थे। मेरे पण्डित ने उन प्रामणों के नाम ला दिये जिनको या तो यह जानता था या जिन लिये यह जानता था कि अमुक के पास हस्तलिखित अन्य है । परन्तु ऐसे लोगों से किमी भी प्रकार की थाशा नहीं थी कि वे उसे अपने लिये भी हस्तलिखित अन्य दिग्वाने और मूचि बनाने का अनुरोध करने पर मान जायेंगे। मेरे यीकानेर पहुंचने पर बीकानेर दरवार ने एक अफसर को श्राक्षा दी कि पह मुझे उन मभी स्यामियों या अधिगरी व्यक्तियों के पास ले जाय जिनके अधिकार में मप्रहालय हों, जो श्रमतक दृढ लिये गये हों या दृटे जा मकते हों। यह उन लोगों से अनुरोध करके मना कि वे अपने मप्रद मुझे निम्मा दे और मेरे अनुसंधान कार्य में समी प्रकार फी आरश्या महायना दे। एक या दो स्थानों को छोड फिमी जैन- मप्रहालय में क्मिी प्रसर फी आपत्ति नहीं लानी पड़ी। दूसरे जैनो को इन भण्डारों पे ४८] * राजस्थान पुरातत्व ANS- - कर्णामृत टीका - नारायण भट्ट कृत । सेवनभावना हरिदास कृत। दुष्टदमन - भट्ट कृष्ण होशिग कृत टीका समेत, जो कि जनस्थान निवासी भट्ट रामेश्वर का लड़का था। कलिकान्तकुतुक नाटक रामकृष्ण कृत। ऋतुसंहार टीका - अमरकीत्ति सूरि कृत । भत हरि टीका- पुष्कर व्यास के पुत्र नाथ कृत । दमयन्तीविवरण - चण्डपाल कृत । किरात पर प्रकाशवपे की टीका। चन्द्रविजयप्रबन्ध - श्रीमाल कुलालङ्करण मंडनामात्य कृत। रामकीर्ति प्रशस्ति - जनार्दन की टीका समेत । रामशतक - ठक्कुर सोमेश्वर कृत । रामचन्द्रदशावतारस्तुति - हनुमान्कृत । अन्त में भर्तृहरि के प्रसिद्ध श्लोक जैसे, 'लोभश्चेद, दौर्मव्यान' आदि आते हैं । यह खण्डप्रशम्ति का उद्धृत अंश है । नेमिदूतकाव्य - झञ्झरण कवि कृत - टीका पण्डित गुणविजय कृत । कविता में कुछ पद्य हैं जिनकी अन्तिम पंक्ति मेघदूत के श्लोकों की अन्तिम पंक्ति के अनुरूप रक्खी गई है। अन्यापदेशशतक - उजती वंश के मैथिल मधुसूदन कृत । कलकाष्टक। मूर्खाष्टक । मेघदूत टीका - शृङ्गारसद्दीपिका-चतुर्भुज और मल्हायी के शिष्य कमलाकर कृत। यह पंडित गंगाधर और शेष नृसिंह को प्रणाम करता है। कालिदास के विद्वविनोद पर विद्वजनाभिरामा टीका । नलविलास नाटक - रामचन्द्रकृत, निर्माण सम्बत् १५१६ । सूत्रधार मुरारि का जो अनर्धराघव का रचनाकार है, वर्णन करता है। कुमारसम्भववृत्ति अर्थालापनिका - लक्ष्मीवल्लभगणिकृत । नैषध टीका धीरसूनु गदाधर कृत जो शांडिल्य गोत्रज है । टीकाकार ने ग्रन्थकार का विवरण दियाहै जिसकी राजशेखर के वर्णन से तुलना की जा सकती है जैसा चूहलरने संक्षेप किया है (जर्नल ऑव दी बोम्बे ब्रान्च ऑव रॉयल एशियाटिक सोसाइटी भाग, १०. ३२-५)। वाराणसी में गोविन्दचन्द्र नामक राजा था ! उसके दरवार में पंडितों का भूषण श्रीहर्ष रहता था जिसने खण्डन (खण्डनखण्डखाद्य) ग्रन्थ लिखा । उसने साहित्य की उपेक्षा की और प्रमाण (दर्शन) में बहुत परिश्रम किया । जव कभी वह राजदरवार में आता उसके द्वषी कई व्यक्ति जो अपने को साहित्य के ज्ञान में उससे कहीं अच्छा समझते थे सङ्केतिक आखों से एक दूसरे को देखा करते थे। एक अवसर पर उसने उनको ऐसा करते देख लिया और पूछने पर उसको इसका पूरा पता लग गया । इसलिये उसने नेषधचरित *सरम्यान में सरस्नु-साहित्य की खोज । [rt लिखा जिसमे प्रमुख म्प से शृङ्गार का निवास है और इसे राजा के पास लेगया। राजा उससे बहा प्रसन हुआ और से दो जगह अानन दिये, एक तक्किों के बीच में दूसरा साहित्यकों में और नानुसार ही राजदरवार में दो ताम्बूल गे से भेंट देने की स्वीकृति दी। हर्ष को कपिपरिहत नाम से कहा जाने लगा । जन वह कविता लिखने लगा तो उसने चिन्तामणि मन्त्र की इमलिये शरण ली कि उसको कोनसा चरित्र नायक चुनना चाहिए और वह नल को चुनने को प्रोत्मादित हुआ। राजशेखर ने से जयन्तचन्द्रका समसामयिक कहा है। गदाधर उसको इस समय से श्राधी शताब्दी पहले मानता है यदि गोविन्दचन्द्र से उसका अभिप्राय जयन्तचन्द्र के पितामह से है और अन्य व्यक्ति से नहीं जिसको म उस तिथि से पूर्व थर तक किसी भी रूप मे नही जानते है (जर्नल आर दी बोम्वे प्राञ्च ऑर दी रायल एशियाटिक सोसाइटी १०, ३७ इरिहयन पन्टी भाग २ पृष्ठ ७२-३ और जर्नल ऑर दी नी नी आर० एसो. ११ पृष्ट २०४-७)। नेपपकाच्य विद्याधर कोटीका समेत ! सायकलिझन मेघाभ्युन्य काव्य पर लक्ष्मीनिवास की टीका । मानाङ्क, मेपाभ्युन्य मान्य का प्राय रचना करने वाला माना जाता है । सम्भवत साररेलि उसका दूसरा नाम हो। वृगवन कान्य-टीका समेत । जन्युना। कृत चन्द्रदूत पर टोका। मम्बादसुन्दर - विवरण उपर दिया गया । शलक्षण - पररुचि स्ला सारस्वतमार टीका, मिलानरा-हरिदेव द्वारा १७६८ में निर्मित । सारस्वत सून वृत्ति - तर्क तिलक रन जो उपर लिखी गई है। मध्यकौमुदी विलास-शिवराजधानी में मुनिकुलोत्पन्न गोवर्द्धन के पुत्र रघुनापात्मज जयरा रचित । प्रक्रियामार- वाशीनाथ कृत। धातुमचरी- काशीनाथ कृत। गनशोमा - भट्टोनिदीक्षित के शिय नीलकण्ठ कृत । यह शुक्र जनार्दन का पुत्र और यत्नाचार्य का दौहित्र था। लघुमार, पमधिया- पिनायर पुत्र रघुनाय फूल । रघुनाथ ने भट्टोजिदीनित से परजलि का महामात्र प्रार अन्य शास्त्र पढे और इस अन्य को युद्धनगर में लिखा। शनिीदिपमा - मुनि श्री कृष्णन (घही प्रन्य जिमका लेख म० २००७ में राजेन्द्र लाल के नोटिस में दिया गया है)। अपगन्दसस्टन - भामर्ष यत। गुणाफियपोटशिरा मूत्र (पारियनुमार) मटीर-मूलप्रन्य का रचनाकार अयमोम 7 . ५०] 7 राजस्थान पुरातत्व सूरि का शिष्य गुण विनय है। उस समय गुणसिंह पट्ट पर आसीन था (पिटरसन ]V इण्डि. एण्टी०)। वाक्यप्रकाश उदय धर्म रचित। निर्माण काल सं० १५०७ । षट्कारकपरिच्छेद - महोपाध्याय रत्नपाणि कृत । पाणिनीय परिभाषा सूत्र व्याडिकृत (३ पत्रे )। प्राकृतव्याकरण चएड कृत। माधवीयकारिका विवरण - तर्कतिलक भट्टाचार्यकृत । परिभाषावृत्तिललिता - पुरुषोत्तम कृत । सुन्दरप्रकाशशब्दार्णव ( उणादि साधन ) प्रममेरु के शिप्य पद्मसुन्दर कृत ! हस्तलिखित पुस्तक का समय सं० १६१८ ( पिटरसन ,४, इ०)। रत्नावली - सारस्वत परिभाषा न्यायावतार सूत्र पर टीका - श्री जिनहर्ष सूरि के शिष्य दयारत्नकृत । दौर्गसिंहकातन्त्रवृति टीका की एक हस्तलिखित प्रति, जिस पर वीरसूरि के शिष्य गुणकीर्ति ने शालिभद्र के लिये एक टिप्पण सम्बत् १३६६ में अहिल घाटक में, जब अलपखां राज्य करता था, लिखा । यह अलपखां सुलतान अलाउद्दीन का साला और अलाउद्दीन के पुत्र खिजरखां का श्वसुर था ( इलियट और डासन ३, पृष्ट १५७ और २०८) टीकाकार प्रानसूरि श्री देवप्रभसूरि के शिष्य हैं जो चन्द्रकुल के धर्म- सूरि का शिष्य है और धर्मसूरि का शिष्य पनप्रभ है । इस रचना का एवं विचारसागर कर्ता एक ही है। ( पिटरसन इण्डियन० ए० पृ० ३०।) प्रबोधचन्द्र (व्या०) रामकृष्ण सूनु गतकलंक कृत । उकिरत्नाकर (षटकारकोदाहरण) - साधु सुन्दरगणि कृत । श्योक योजनोपाय - सूरि के पुत्र नीलकण्ठ कृत जो पद्माकर दीक्षित का पौत्र था इसमें श्लोक योजना पर ३० पद्य हैं। शब्दप्रकाश-माधवारण्यकृत। द्वयाक्षरनाममाला और मातृका नाममाला सौमरिकृत । एकाक्षरनाममाला - वररुचि कृत। साहित्यकल्पद्रम (सम्वद्धित) - राजराज सूरसिंह के पुत्र कर्णसिंह । ये दोनों बीकानेर के ईश्वी सन् १६३१ और १६१३ में राजा थे। वृत्तरत्नाकार -चिरजीव कृत । काव्यप्रकाश पर भवदेव कृत टीका जो जैसलमेर में देखी गई। काव्यप्रकाश टीका, सार दीपिका - विनय समुद्र गणि जो जिनमाणिक्य मुनि के शिष्य थे, उनके शिष्य वाचक गुणराजगणि कृत । रामचन्द्रिका - लक्ष्मीधरात्मज विश्वेश्वर कृत । प्राकृतपिङ्गल टीका - चित्रसेन भट्ट कृत ।
* रजस्थान में संस्कृत-साहित्य को खोज * वृत्तरत्नाकरवृत्ति -सुकवि हृदयानन्दिनी - सुल्हण कृत । हस्तलिखित अन्य मी प्रति का समय १५६० मम्बत् है। छन्द सुन्दर या प्रतापनौतुक पर टीका-मूल और टीका दोनों ही नरहरि भट्ट ने जो स्वयभू भट्ट का पुत्र और विचारण्य का शिष्य है, बनाई है। इसमे भिन्न २ छन्दों को उदाह- रण रूप में दिया गया है जोन्तोत्र हिलाता है। प्राकृतरन्द कोप - रत्नशेखर कुत । वृत्तसार - नृसिंह मिश्रात्मज पुष्कर मिश्र स्त सम्पूर्ण अन्य दो पन्नों पर ही लिखा हुश्रा है। राधादामोदर कवि कृत छन्द कौस्तुभ पर विद्याभूषण की टीका वाग्भटालङ्कार टीका ज्ञान प्रमोदिका - वामनाचार्य प्रमोदगणि द्वारा सम्बत् १६८१ मे लवेरा मे गनसिंह के शासनकाल में रचित ! यह गजसिंह मारवाड का था। पातञ्जल चमत्कार - चन्द्रचूह कृत जिसने योग का रहस्य प्रमाकर से सीखा था। अधिकरण कोमुदी - रामपण कृत । गुरु चन्द्रोदय कौमुदी - रामनारायण कृत अष्टोत्तर- सहस्त्र महाकान्य रत्नावली १०८ उपनिषदों मे से वासुदेवेन्द्र सरस्वती के शिप्य रामचद्र द्वारा संकलित । अद्वैतसुधा - सारस्वतोपनिपट, जिसे रघुनश भी कहते हैं, पर टीका । इसका रचयिता लक्ष्मण पण्डित, जिसका पिता तमूरि था, ब्रह्मज्ञानी कुल का भूपण था। अन्यकार पर उत्तम श्लोक्तीर्थ महामुनि की बडी कृपा थी। रघुरश का तात्पर्य बतलाते हुए ऐसा प्रयत्न मिया गया है कि उसमे से वेदान्त सम्म धी अर्थ का विशदीकरण हो । भगवद्भक्ति विलाम - गोपालभट्ट कृन । तत्त्वनिणय - वरदराज कृत । निम्मानित्य कृत दशश्लोकी पर हरिन्यासदेव की टोका । प्रानन्दतीर्थ की सदाचार स्मृति पर प्रमाणसग्रहणी टीका । तत्त्वसम्बोध • रामनारायण कृत । भक्तिहस निगृत्ति - भक्तिनरगिणी • रघुनाथ टन। शाण्डिल्य सहिता (भक्ति)। खण्डनवण्डसाद्य टीका, विद्या सागरी - अभयानन्द के शिष्य आनन्दपूर्ण कृत । टीकारका उपनाम विद्यासागर था। विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त - वेट्टाचार्य के शिष्य श्रीनिवास दासानुदास कृत । उपदेश पञ्चक सटीक • भूधर कृत । विवेकमार - रामेन्द्र कृत ! न्याय प्रदीपिरा- उनासीनाचार्य ब्रह्मदास शिष्य रामदास कृत । न्यायारतार मूत्र - सिद्धसेन निवार कृत।
५२]] * राजस्थान पुरातत्व शुभविजय विरचित तर्कभाषा विववण का केवल अन्तिम पत्रा । समय सं. १६६५ वि.। तर्कभाषा पर टीका - गंगाधर के पुत्र मुरारिभट्ट कृत । हस्तलिखित पुस्तक समय १६६२ सम्वत् । दूसरी हस्तलिखित पुस्तक में ग्रन्थकार को मुरवैरी लिखा है जो मुरारि ही है। विद्यादर्पण (न्याय ) - हरिप्रसाद कृत । तर्कलक्षण - मणिकान्त भट्टाचार्य कृत । वरदराज कृत नार्किक रक्षा पर सरस्वती तीर्थ की टीका । न्यायसार पर टीका, न्यायमालादीपिका महेन्द्रसूरि शिष्य जयसिंहसूरि कृत । आनन्दानुभव की तर्कदीपिका पर टीका अद्वयाश्रम पूज्यवाद के शिष्य अद्वया- रण्यमुनि कृत । समय १६२२ सम्वत् । न्यायप्रदीप - गोपीकान्त कृत । न्यायसिद्धान्तदीप - शशिधर कृत । १६३१ संवत् की प्रतिलिपि सिद्धान्त शिरो- मणि जैसे ज्योतिष ग्रन्थों सुश्रुत, आत्रेयसंहिता, भावप्रकाश, चरक, अष्टांगहृदय और इस पर अरुणदत्त टीका आदि आयुर्वेद ग्रन्थों की भी बहुत सी प्राचीन प्रतिलिपियां हैं । वृद्धगार्गीय ज्योतिश शास्त्र । ग्रहभावप्रकाश टीका - भट्टोत्पल कृत । वर्षतन्त्र या नीलकण्ठताजित । १५०६ शकाब्द में गर्गगोत्रोत्पन्न - चिन्तामणि, के पौत्र एवं अनन्त के पुत्र नीलकण्ठ द्वारा विरचित । कर्ण कुतूहल पर टीका पद्मनाभ कृत । रामकृत 'समर सार' पर उसके अनुज भरत की टीका | टीकासार समुच्चय जिसमें भिन्न २ वर्षों पर टिप्पणियां हैं। ग्रन्थकार ने रुद्रस्वामी की शुक्ल टीका का उद्धरण दिया है। हस्तलिखित प्रति पर समय १३२२ सम्बत् लिखा है। यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि यह ग्रन्थ निर्माण- काल है अथवा लिपिकाल है। जातकार्णव - वराहमिहिर रचित । शौनकीय विवाहपटल - प्रतिलिपि सम्बत् १५८८ है, जब हुमायूं मुगल आगरा में राज्य करता था। महेन्द्रसूरि के यन्त्रराज पर मलयेन्दु सूरि की टीका । श्रीपति कृत जातक पद्धति पर बल्लाल दैवज्ञ के पुत्र कृष्णदैवज्ञ की टीका । नीलकण्ठ कृत संज्ञातन्त्र । प्रश्नावली मुनिमाधवानन्द शिष्य जड़भारत कृत । बुधसिंह शर्मा कृत प्रशोधनी टीका स्वरचित ग्रहणादर्श पर । अमृतकुम्भ - राम के पुत्र नारायण द्वारा सं० १५८२ में लिखित ।
* राजस्थान में संस्तत - साहित्य की खोज * [५३ सम्वत्सरोत्सवकाल निर्णय - पुरुषोत्तम रचित । लीलावती टीका- परशुरामत । लीलावती टीका - सुवर्णकार भीमदेव सूनु मोपदेव कृन । सामुद्रिक - अमरसिंह सूनु दुर्लभराज कृत । शाहधरदीपिका - आढमल्ल रन । पायापाय निनोध - क्यदेव कृत । कौतुकचिन्तामणि -- प्रताप मद्रदेव कृत । कुलप्रदीप शैवमत कुलकमलदिनाकर विद्यारुण्ठ ने श्रीरामकण्ठ से पढ कर अन्य- कार को पढाया और आदेश किया कि इमका सरल और छोटा रिचरण जो सर्वजन सुपोध्य हो लिसो । अन्यमार की कामना है कि कौल (कुलीन ) इसे पढ़ेंगे और प्रसन्न होंगे। शिवार्चन चन्द्रिका ४६ प्रकाशों में । कौलसएन-गौड काशीनाथ द्विज कृत । पञ्चायतन प्रकाश (मन्त्र)- चक्रपाणि शत । लौकिक न्याय सग्रह - वही ग्रन्थ है जो राजेन्द्रलाल की टिप्पणि में सख्या ३१३६ पर अङ्कित है। केरल इसकी पुष्पिका मे प्रन्थकार का नाम रघुनाथदासजी का लिसा है। वालचन्द्र प्रकाश (धर्म० ज्यो० आयुर्वेः आदि) पद्मनाभ के पुत्र विश्वनाथ कृत । राजाधिराज राय दोल के पुत्र वालचन्द्र ने लिखवाया। श्यैनिकशास्त्र (मृगया ) रुदेव कृत । असम याण - गामनानुसत शास्त्र - बीरम कृत जिसमें प्रन्थकार ने वात्स्यायन के काम सूर के रिपयों को आर्या छन्दों में लिखा है। जयमगला की एक प्रति, कामसूत्र पर टोका जिसमें २,३ स्थलों पर निम्नलिखित पुष्पिरायें हैं "इत्यपरार्जुनभुजवलमल्लराज-नारायण चौलुक्यचूडामणि-महाराजाधिराज श्रीमद्विसलदेवस्य भारती भाण्डागारे श्री वात्स्यायनीय काममूत्र टीसयां जयमगलामि धानाया" आदि कामसूत्र के अग्रजी अनुवादकर्ता ने अपने अन्य में जो बनारस की हिन्दु कामशाख सोसाइटी (समिम इण्डि० इरोटिक पृ० २४५) के लिये प्रसाशित हुई है। इसकी हस्तलिखित प्रति मे से इसी पुष्पिका का प्रतिरूप उद्धृत किया है । वेवर की वलिन स्थित हस्तलिखित पुस्तक सरया २२३८ और राजेन्द्रलाल की हस्तलिखित पुस्तक प्रति स २१०७ मे यह पुष्पिका इस प्रकार है । "इति अपरार्जुन जाल मल्लराज नारायण महाराजाधिराज चौलुम्य चूड़ामणि श्रीमहीमलदेवस्य भारती इत्यादि" यह सर इसी बात को बतलाते हैं कि यह टीका बीसलदेर के लिये लिसी गई। चौलुक्य राजा महीमल्ल नामक कोई नहीं हुआ जब तक कि यह वीसलदेव की पदयी न हो। वीसलदेव सन् १९४३ से १०६१ सन् तक राज्य करता था और स्कमिड् ने टीकाकार का १३ वीं शताब्दी मे होना यतलाया है।
५४] * राजस्थान पुरातन विनोद संगीतसार - हस्तलिखित प्रति पुरानी है। सन्मति टीका - प्रद्युम्न मूरि शिष्य अभय देव कृत । घासुपूज्य चरित - विजयनिह सूरि के शिष्य वर्धमान कृव । उपमितभवप्रपञ्चकथा . हरिभद्र शिष्य सिद्धरचित । धर्मरत्न करण्डक सटीक - अभयदेव शिप्य वर्धमान कृत । टीका सम्बत् ११७२ में दायिक कूप में लिखी गई और राजा जयसिंह को समर्पित की गई । उत्तराध्ययनसूत्र पर लक्ष्मीवल्लभ कृत टीका। कल्लकिरणारलीव्याख्या - धर्मसागरगणि रचित सं० १६२८ । पुष्यमालावचूरि निर्माण सम्बत् १५१२ । एकोभाव स्तोत्र टीका - वादिराज कृत। सोमकीाचार्य कृत प्रद्युम्नचरित - निर्माण - समय अस्पष्ट है, सिद्धान्तसारोद्धार-खरतर गच्छी जिनहर्पसूरि के शिष्य कमलयमोपाध्य य कृत । जैनमतीय रामचरित्र-हेमाचार्य कृत । विद्यालय स्थान-जयवल्लभ कवि कृत । न्यायार्थमज पिकान्यास मूल और टीका दोनो ही हेमहंसगणि कृत हैं । सिद्धहेमचन्द्राभिधान - शब्दानुशासन द्वयानयवृत्ति जिनेश्वर मूरि के शिष्य अभयतिलकगणि कृत। विदग्धमुखमंडन पर टीका - नरहरिभट्ट कृत । - एक ध्यान शास्त्र, आचार्य शुभचन्द्र द्वारा जिनपति सूत्र से सार रूप उद्धृत जैन तर्क भापा-यशोविजयगणि कृत । स्थानावृत्ति - मेघराज मुनि विरचित । सोमशतक प्रकरण - सोमप्रभाचार्य कृत । प्रबोधचिन्तामणिकाव्य - कवि जयशेखर कृत । सूक्तिश्रेणि - गुण विजय नहोपाध्याय कृत । उत्तराध्ययन वृत्ति, सुख बोध, सम्वत् ११२६ में नेमिचन्द्रसूरि द्वारा रचित । नेमि- चन्द्रसूरि का उस समय की तपागच्छ पट्टावलियों में भी उल्लेख है। प्रशमरति पर अवचूरि - मानदेव के शिष्य हरिभद्रसूरि कत रचना का सम्बत ११८५ है। जिनवल्लभ कृत पिण्ड विशुद्धि पर उद्यसिंहसूरि की वृत्त सं० १२६५ । विचार संग्रह - आगमों के समुद्र में से अमृत रूप में तपागच्छ के कुलमण्डन द्वारा सं० १४४३ में दोहन किया गया (पिटरसन, ४ इन्डि० ए०)। मेघदूत या नेमि जिनचरित - सागण के पुत्र विक्रम कृत मेघदूत के श्लोकों की अन्तिम पंक्तियां चतुर्थ पाद में समस्यापूर्ति की भांति प्रयुक्त हुई हैं। में • राजस्थान में सस्कृत-माहित्य की खोज . [५५ . रिसम्वाद शतक समयसुन्दर कत - सूत्र और वृत्तियों के अन्तर का निरूपण करता है। पदेश रत्नाकर - मुनि सुन्दर सूरि कृत (पिटरसन, ४५ ए)। शृडारवैराग्यतरङ्गिणी - शनार्थवृत्तिकार मोमप्रभाचार्य कृत। इसी पर सुस घोधिनी टी- नन्दलाल रचिन । द्विजवदनचपेट का (क वेदाजुरा)- हरिभद्रसूरि कृत । द्विजयदनचपेटा वेद.कुश - हेमचन्द्र कृत। इसमे पुराणों, धर्मशास्त्रों विवेक विलास आदि से समुद्रत मारवाक्य है। धर्मसर्वस्व (माचार के आधार भूत सिद्धान्त सिखाने के लिये है)। विदग्धमुरमण्डन पर टीका - ताराभिद्य कति रचित । प्राकृत विजालऊ पर टीका-रत्नदेव द्वारा सं० १३६३ मे निर्मित । ४२-अब मैं बीकानेर राजकीय संग्रहालय के सम्बन्ध मे लिखता है । यह देखकर अत्यन्त मन्तोप हुआ कि हस्त० ग्रन्थ सुरक्षित और सुन्दर ढग से सञ्जित थे। जिस किसी यन्डल को देखने की जरत पडे से सरलता से देखा जा सकता था। मुझे यह बताया गया कि महाराजा का ध्यान इस ओर है कि एक सुन्दर कक्ष में जो कि एक सुन्दर भवन मे बनाया जारहा है तथा जिम के साथ साथ और भी मकान बनेंगे, इसे रस्सा जायगा। मैंने इस बात का पहले भी उल्जेस किया है कि मुझे यह बताया गया था कि राजेन्द्रलाल के सूचिपन के अतिरिक मग्रहालय मे रि भी प्रन्थ हैं जिन्हें उस (पूचिपर) मे सम्मि- लित नहीं क्यिा गया था। मुझे यह सूचना ठीक ही मिली थी। सूचिम्न वन जाने के याद ये अतिरिक्त हस्तलिखित अन्य न परीदे ही गये थे और न सप्रहालयाधिकारी अध्यक्ष ने उस समय सूचिपर बनाने के लिये उन्हें प्रस्तुत ही पिया। सम्भवत उसे यह सन्देह हुश्रा हो कि तो पुस्तक मूचि मे लिसी जारही है उनका न मालूम क्या उपयोग हो। मैं उन पुस्तकों में से कुछ की मूचि दू गा जो सूचिपर मे नहीं आई थीं श्रीतूकभाष्य - काटक लिङ्गण भट्ट रचित । फात्यायनश्रीतमूनमाप्य - अननदेन कृत । श्रान्हा लहरी - मानी महापार कृन ! इसको सरया राजेन्द्रलाल के मूचिपत्र में ४७४ है परन्तु इसकी रचना स. १६३५ उसमे नहीं दिया हुया है। प्रायश्चित्तप्रदीपिका-केशर वृत - ग्रन्थकार का नाम पार्स में लिखे "करावी" शब्द से लिया गया है। प्रयकार का करन है कि (आपस्तम्बीय) प्रायश्चितप्रकाश भास्करराय द्वारा रचित २०० पद्यों में धूर्त स्वामी के अनुसार विशदरूपेण प्रतिपादित किया गया और वह रचय अपने बुद्धिस्य पदों को सरलता से सुबोध हो सके, इस लिये अन लिस रहा है। भास्करराय ग्रन्थ श्रापरतन्त्र प्रायश्चित शतही होना चाहिए जिसे चल ने अपने तन्जौर के सूचिपत्र पृष्ठ २७६ मे उद्धृत किया है और शतद्वयी में जो भाष्य पा सकेत है वह धूर्तस्वामी का है।
५६] * राजस्थान पुरातत्व * पराशर टोका - विद्वन्मनोहरा-नन्दपण्डित कृत माधवकारिकाव्याख्यान - नीलकण्ठ सुत भट्टशङ्कर पुत्र भट्ट शंव रचित । लक्ष्मीधर भट्ट के कृत्यकल्पतरु के नीत राजधर्म, व्यवहार और कालकाण्ड । पूर्व सूचित परशुराम प्रताप की एक प्रतिलिपि १५५६ सं० की । गोविन्दमानसोल्लास या मानसोल्लास, गोविन्ददत्त कृत । देवादित्य, करणटि वंश के राजा हरसिंह का सचिव था । उसका पुत्र गणेश्वर अपने बड़े भाई वीरेश्वर मंत्री का उसी प्रकार भक्त था जैसे लक्ष्मण राम के भक्त थे, प्रस्तावना में आगे बताया गया है कि यह गणेश्वर मिथिला के राजा द्वारा अङ्ग प्रान्त के महासामन्त पद पर नियुक्त किया गया था। उसका पुत्र गोविन्द था। अब यह जान लेना कठिन नहीं है कि हरसिंह कौन व्यक्ति था। हरसिंह नामक एक नेपाल का निवासी भी है जिसे श्रीभगवान्लाल द्वारा इण्डि. एण्टी. में (पृ. १८८ ) प्रकाशित नैपाल के एक शिलालेख में 'कर्णाट चूडामणिरित्र' बताया गया है, यद्यपि आधुनिक नेपाल की राजवंशावलियों में वह कर्णाटक वंश के ठीक बाद में आता है। दूसरे शिलालेख में उसका नाम हरिसिंह लिखा है और बताया गया है कि उसने मिथिला में तड़ाग खुदवाये और नेपाल को बसाया (पृष्ठ १६०-१) । उसका समय वंशावली के अनुसार १३२४ ईस्वी सन् है। भवेश का पुत्र मिथिला का निवासी हरसिंह भी है, जिसके राज्य में चण्डेश्वर द्वारा १३१४ ईस्वी सन् में रत्नाकर नामक ग्रन्थ लिखा गया था (हॉल का सांख्यप्रवचनभाष्य पृ० ३६ )। ये दोनों और वर्तमान हरिसिह एक ही नाम वाले हैं। भवेश का पुत्र हरिसिंह इनसे पृथक् है जिसका उल्लेख सन्मिश्रमिशरु के -विवादचन्द्र में हुआ है .(अक्सफोर्ड कैटेलोग पृष्ठ २६६ ए०)। गोविन्दमानसोल्लास का उल्लेख राघवानन्द भट्टाचार्य विरचित मलमास- तत्त्व में भी हुआ है जिसकी स्थिति १४३१ और १६१२ ईस्वी सन के बीच में थी। शृङ्गारसरसी-मिश्र लटक के पुत्र मिश्रभाव कृत । इसमें शृगार सम्बन्धी भिन्न २ पदार्थों का पद्य रूप में निरूपण है। पद्यमुक्तावली-रुद्रन्यायवाचस्पति भट्टाचार्य के पुत्र गोविन्द भट्टाचार्य कृत । सूक्तिमुक्तावली विद्यानिवास भट्टाचार्य के पुत्र विश्वनाथ कृत सुकृतकल्लोलिनी अर्थात् वस्तुपालान्वय (वंश) की प्रशस्ति उदयप्रभ कृत । इसका आरम्भ "चापोत्कट वनराज. योग- राज आदि" से होता है। पाठ अष्टक - जैसे हंसाष्टक, मयूराष्टक, गजाटक आदि । सुभापितरत्नाकर - निर्मलनाथ के पुत्र उमापति पण्डित कृत । हॉल की गाथासप्तशती पर टीकाए कुलनाथदेव, प्रमुख सुकवि और मण्डल भट्ट तनय माधव भट्ट कृत । अंतिम व्यक्ति मिहिरवंशके कृष्णदास के द्वारा टीका लिखवाने को प्रेरित किया गया। दुष्टदमन पर टीका। कविंद्रचन्द्रोदय, राजेन्द्रलाल की टिप्पणी में सं०८१५ पर लिखा हुआ ग्रन्थ । उक्त .
• राजस्थान में ससत-साहित्य को सोम * पद्य से ' शीक पद्य की टिप्पणी मे सग्रहकर्ता का नाम विद्यानिधि कमिंद्र दिया हुआ है । परन्तु श्री रानंद्रलाल द्वारा उकृत 'श्रीमतमाशी । एव स्वय ग्रन्यकार के, 'विपयाह अन्तिम से पूर्व वाली पक्ति से निहित होगा कि यह नाम सही नहीं है । कृष्ण तो सप्रहकर्ता का नाम है और चियानिधान (अथवा विद्यानिधि) कवीन्द्र आचार्य सरस्वती इस प्रथ के वर्ता हैं जिनकी प्रशस्ति मे काशी, प्रयाग र अन्य कितने ही स्थानो के कपियों के पद्य इसमे सग्रहीत हैं। इसी राजकीय सप्रहालय में इसी कवि की प्रशंसा मे निर्मित एक और अन्य भी है जिसका नाम 'सर्वविद्यानिपान करीन्द्राचार्य सरस्पतीना लघुविजयचन्द पुस्तकम्' है । इस पर एक टीका है । इन प्रशस्तियों का विषय अन्य कार है जिसे कनिन्द्रकल्पद्र म, हसदूत- काव्य श्रादि पुसा लिखने का श्रेय है। जगदम्बाभरण जगन्नाथ पण्डित इत। - घाभापक शतक। - अमरुशतक पर टीका सञ्जीवनी - अर्जुननर्मदेव रचित, जो भोजकुल के राजा सुभटवर्मा का पुत्र है । इमी अन्य पर नन्दिकेश और अनवेमभुपाल कृत अन्य टीकाय । सुन्दरीशता - उप्रेक्षावल्लभ गोकुलभट्ट वृत्त । यह सम्बत् १६४८ मे लिखी हुई है जय प्रकार लाहोर में रहते हुए पृथ्वी का शासन कर रहा था । यह करिता काव्यमाला भाग १ में प्रकाशित हुई निसे १६५३ सम्वत् की हस्तलिखित पुस्तक से मिलाकर छापा गया । है। पिता निर्माण समय उसमें नहीं बतलाया गया है। अधरशतक - यत्साचार्य के दोहित्र शुक्ल जनाइन और हीरा के पुत्र भट्ट मण्डन के शिष्य शैव करि नीलकण्ठ कृन (ओष्ठ शतक के समान ही है, वेबर का बलिन फैटेलोग पृ. १७१) । शदशोभा को बनाने नाला ही इस प्रथ का निर्माता है जिसका ऊपर विव- रए श्रागया है। विरहिणी मनोरिनोद ~ पदमात्र प्रमाशिका टीका समेत-मूज और टीका दोनों का की विनय (विनायक ?) कपि । शृगारमनीवनी - नीलमणि के पौत्र गौरीपतिपुत्र हरिदेव मिश्र कृत । शृंगारपश्चाशिका - पाणीग्लिास दीक्षित कृत। गीतगोविन्न टीमा, साहित्यरत्न माला अनजनाथ और म्हात्रा के पुत्र गेप कम- लाफर कृत । इम हस्तलिखित प्रति पर शक सरत् १५७८ लिया है। कृष्णगीता - मोमनाथ कृत । यह गीतगोपिद और गद की ऐसी ही कृतियों के समान। नलग्लिासनाटक और निर्भरभीमव्यायोग - आचार्य हेमचन्द्र के शिप्य राम- चन्द्र रवि कृत। अनपरापर पर टीका, रहस्यादर्श-देवप्रभ कृन । लिगदुर्गभेदनाटक (पीर रस प्रधान और गोल शान्ति रस युक्त )-दादम्भट्ट - ५] • राजत्लान पुरातत. -MARow-more Arm e ----- .. परमानन्द रचित । कंसवध टीका -शेष कृष्ण सुत वीरेश्वर कृत । सम्भवतः इस नाटक के कर्ता शेप कृष्ण ही है। उपानिरुद्ध नाटक - काशी के किसी राजा लक्ष्मीनाथ कृत । नरोत्तम और काशीनाथ उसके बाद, सिहासन के अधिकारी बताये गये हैं। (विभावन-?) कुसुमावचय लीला नाटक - मधुसूदन सरस्वती कृत । कर प्रहसन जैसे प्रासङ्गिक, सहदयानन्द, विबुधमोहन, अद्भुत तरंग, सभी प्रन्थ गौड़ विद्यानाथ के पौत्र लाल मिश्र के पुत्र हरिजीवन मिश्र रचित है। राजारामसिंह के आदेश से अद्भुत तरंग लिखी गई। प्रन्थकार की लिखी विजयपारिजात ( राजेन्द्रलाल की सं० १२६) बी हस्तलिखित पुस्तक मिली है जो १७३० में लिखी हुई है । इसलिये रामसिह वह नहीं हो सकते जो १७५० ई० में जोधपुर में सिंहासनासीन थे। कलिकान्ता कुतूहल प्रहसन त्रिपथी कल्याण कर के पुत्र रामकृष्ण त । उपरिवाएत कलिकान्ता कुतुक नाटक पुस्तक को समान प्रति मालूम होती है। गोरी दिगम्बर प्रहसन - शङ्कर मिश्र कृत । कादम्बरी पर टीकायें - वालकृष्ण और सोमयाज्ञिक मुद्गल महादेव कृत । पासवदत्ता पर टीका-प्रभाकर कृत। गुणमन्दारमञ्जरी- रङ्गनाथ रचित । सीतामणिमञ्जरी- रामानन्द स्वामी कृत । गोपालविलास - मधुसूदन यति कृत । मुकुन्दविलास - पुरुषोत्तम तीर्थ के शिष्य रघूत्तम तीर्थ कृत । कृष्णलीलामृतलहरी विट्ठल दीक्षित के पुत्र दैवज्ञ रघुवीर दीक्षित कृत । भगवतत्प्रसाद चरित - यमुना और विश्वनाथ के पुत्र दामोदर कृत और इस पर एक टीका भी है। चण्डीशतक टीका - धनेश्वर कृत यह ब्राह्मण सोमनाथ या दशकुर ज्ञाति के सोमेश्वर का पुत्र है। हस्तलिखित प्रतिका सं० १९२५ है । ऋतुवर्णन काव्य -दुर्लभ कृत सटीक । उदार राघव - मल्लारि कृत । रामचरित काव्य - रवूत्तम कृत । ब्रह्मदूत काव्य - न्याय वाचस्पति भट्टाचार्य कृत। गोपालाचार्य कृत यमक महाकाव्य - रामचन्द्रोदय, स्वरचित टोका समेत । लक्षमण पण्डित कृत राघव पाण्डवीय टीका। नलोदय पर टीकायें गणेश कवि और सर्वज्ञ मुनि कृत । पदार्थ (प्रकाशिका)। शतश्लोकी काव्य - राक्षस मनीषी कृत । यह सटीक है, टीकाकार शान्त कुटुम्बी • राजस्थान में सरत-साहित्य की जोत्र. . राश्य करता था। 1 अध्यक्ष नेपथ पर टीकायें-विद्याधर और पण्डित लक्ष्मण रचित (गूढार्थ प्रकाशिका)। प्रतिनैपय काव्य -नन्दनन्दन कृत यह स० १७०८ में विरचित है, जर शाहजहा रघुवंशावली दुर्घटोचय - राजकुण्ड कृत । एक पद्यावली, जिसकी हस्तलिखिन पुस्तक का समय १६४६ सभ्यत् है इसका सम्पादक फेवल अपने को द्विजसन्धु लिखता है। उसने ऐसे श्लोक ( रचयिताओं के नाम के साथ) सकलित किये हैं, जिनमें मुकुन्द भगवान की स्तुति है। इसमें जयदेच एव विल्व मगज के बनाये हुए पद्य नहीं हैं। वाक्यभेदविचार - अनन्तदेव कृत। वाक्यपदीय - वाक्य वएड टीका पुष्पराज कृत । प्रयुतवल्यात मंजरी-प्रन्यकार कहता है कि उसने भट्टमल की अद्भुत पुस्तक भाज्याव चन्द्रिका से उपयोग में आनेवाले मूल शब्दों का साह किया है। एकार्याख्यातपति- भट्टमल्ल कृत । वृत्तमरूपयली और वृत्तमुक्तावलीतरल-मल्लारि छत । अलङ्कारतिनक-भानुदत्त रुत । शिशुवोध काव्यालङ्कार - कवि माधर सुत विष्णुदास कवि मत । चतुरचिनामणि - मिश्र सन्दोह मूनु गगाधर कृत । गगारतिलक टीका, रसतरङ्गिणी,-द्रविड़ हरि भट्ट सूनु गोपाल भट्ट रचित । कवि धीरेय मल्लारि कृत। सहस्राधिकरण सिद्धान्त प्राश (मीमासा) भट्ट नारायण सुत भट्ट शहर कृत। पचपाटिका टी- श्रानन्द पूर्ण या विद्यासागर त । यह खण्डनखएडसाय का टीपयर विद्यासागर ही मालूम पड़ता है। वेदान्त प्रकियाहार - धर्मकृत | मूकिमुस्तारली (द्वत निवासम्बन्धिनी) दत्त सूरि के पुत्र और महामुनि उतम श्लोक तीर्थ के कृपा पात्र लक्ष्मण कृत। विष्णु भक्ति चन्द्रोदय - नृसिंहास्य मुनि द्वारा शक १३४७ में रचित गीतार्य विवरण - विद्याधिराज तीर्थ के शिष्य विश्वेश्वर तीर्थ कृत । सत्यनाथ यति कृत अभिनगा यह अव दीक्षित फूत माधव मुसमर्दन के खण्डन में लिया गया है। काट रहस्य, मिश्र शहर कुन -प्रन्यकार ने लिखा है कि जो पल उसके पिता माप- नाथ ने उसे उपदेश दिया उसीय इसमें निरूपण किया गया है। हस्तलिखित प्रदिपा समय ५५१ शक है। यायचन्द्रिका मेरार के पौत्र अनन्त के पुत्र मान्यानदिन केराव जा - anamarathe ६.] * राजस्थान पुरातत्व * सामुद्रिकतिलक - दुर्लभराज कृत । प्राग्वाट वंश का आहिल्ल भीमदेव का मुख्य सचिव था । उसका पुत्र राजपाल और पौत्र नरसिंह था। नरसिंह का पुत्र दुर्लभराज था जिसे कुमारपाल ने महत्तम बना दिया था । उसके पुत्र जगदेव का भी उल्लेख है । कुमारपल ने सन् ११५३ ई० से ११७२ ई. तक राज्य किया । रसरत्नप्रदीप ( या दीप) रामराज कृत । ग्रन्थकार काष्ठा के टाक वंश का था। एक बंशायली भी दी हुई है । यह हरिश्चन्द्र से प्रारम्भ होती है । हरिश्चन्द्र का पुत्र साधारण था। साधारण के तीन पुत्र थे लक्ष्मणसिंह, सहजपाल और मदन । लक्ष्मणसिंह के राजगी पर होने का कहीं उल्लेख नहीं है । इसी कुल में रत्नपाल राजा हुआ, उसी के पुत्र का नाम रामराज है। प्रस्तुत प्रन्थ राजा साधारण की इच्छा से निर्मित हुया। यह ऊपर लिखे हुए साधारण से भिन्न था, सम्भवतः रामराज का बड़ा भाई हो। प्रन्थकार ने उनके ग्रन्थों की एक पद्य बद्ध सूची दी है। इन पद्यों एवं राजलक्ष्मी के पद्यों में समानता है ( बाक्सफोर्ड ३२१ अ. दृष्टवेयम आदि ) यथा कर्कचण्ड के स्थान पर काफचण्ड, सुश्रुत के स्थान पर संसृति, शक्तगमम् के स्थान पर शक्त्यागमम् । काष्टा का अन्तिम टाक राजा मदनपाल प्रसिद्ध है। प्रस्तुत ग्रन्थ में इस वंश के दो और राजाओं के नाम दिए हुए हैं । परन्तु इनमें से पूर्व राजा और मदनपाल के बीच कितने राजा और हुए, यह नहीं बताया गया है। संगीतरत्नाकर टीका सुधाकर नाम्नी-सिहभूपाल कृन । इस ग्रन्थ के अन्त की पुठिपका इसी संग्रहालय में रसार्णवसुधाकर नामक हस्त- लिखित ग्रन्थ के अन्त में दी हुइ पुष्पिका से 'विरचित' तक हूबहू मिलती हुई है। इसलिए स्पष्टतः रसार्णवसुधाकर और संगीतरत्नाकर टीका एक ही राजवंशी सुधाकर की रचनाएं हैं । पहले ग्रन्थ के सम्बन्ध में वर्नेल ने अपने तञ्जोर के सूचीपत्र में (जहां इसे केवल रसार्णव लिखा है ) कहा है कि प्रारम्भिक ग्रन्थकार गत (१८ वी) शताब्दी का तंजोर का रामा ही बताया गया है। शृङ्गारहार-महाराजाधिराज हम्मीर कृत । ग्रन्थकर्ता कहता है कि मैंने उन गहानु- भावों के विचारों का संग्रह किया है जिन्होंने गीत, वाद्य और नृत्य ( गाने, बजाने और नाचने की कला ) का ज्ञान प्राप्त कर ग्रन्थ रचना की है। ऐसे ग्रन्थ कत लोगों में उसने ब्रह्मा, ईश, गौरी, भरत, मतङ्ग, शार्दूलक, काश्यप, नारद, विशाखिल, दन्तिल, नन्दिकेश, रम्भा, अजुन, याठिक, रावण, दुर्गशक्ति, अनिल और अन्य कोहल, अश्वतर, कम्बल, राजा जैत्रसिंह, रुद्रट, राजा भोज और विक्रम, सम्राट केशिदेव, सिहण, राजा गणपति, और जय- सिंह तथा अन्य राजा लोगों का उल्लेख किया है। सङ्गीतमकरंद-वेद या वेद बुद्ध कृत जो अनंत का पुत्र और दामोदर का पौत्र था । यह दामोदर ही संगीतदर्पणकार हो सकता है। सङ्गीतसारकलिका-शुद्ध सुवर्णकार मोषदेव कृत । एक अत्यन्त जीर्ण प्रति-ऊपर लीलावती टीका मोपदेव कृत का वर्णन किया जा चुका है। विदग्धामुखमण्डन टीका-वोटिका-गौरीकान्त-सार्वभौम भट्टाचार्य कृत । - • राजस्थान में संत साहित्य की खोज 1 रिग्यमुसमएडन टीका-श्रवणभूषण नरहरि कृत। ४३ - दौरे से लौटने पर पोलिटिकल एजेएट और बीकानेर दरवार के सौजन्य से मुझे श्रीमाप्य की हस्तलिखित प्रति धार रूप से 'वम्बई सस्कृत सिरीज' मे सम्पादन करने के लिए. प्राप्त हुई। ४४ - बीकानेर से मैं हनुमानगढ (भटनेर) गया जो इसी राज्य मे है । यहा पर मेरा सहायक अट पर यात्रा करते हुए दुर्घटना का शिकार हो गया और कई दिनों तक यह मुझे बिलकुल सहायता न दे सका तथा वाती दौरे में भी पूर्णरूप से सक्रिय सहयोग न दे सका। ४५ - श्री ए कनित्रम ने १८७० मे लिखते हुए बताया कि उन्होंने इस गढी में एक १० या १० फोट लम्या और ६ फीट चौड़ा कमरा इसलिसिन प्रन्या से प्राधा भरा हुश्रा देग्या जिनमें सबसे ऊपर रक्सी पुस्तकों में से उन्होंने एक ताडपत्रीय हस्तलिखित पुस्तक को उठा कर देखा और इसमे रचनाकाल स. १२०० मिना अर्थात् ईस्वी सन् ११४४ (गक के रिकार्डस् पृ०८२ )। जन श्री बृहलर १८७४ में इस स्थान पर पुस्तक देसने के लिये पाये तो उन्हें ताडपत्रीय हस्तलिखित ग्रन्थों का सत्रह नहीं मिला । फिर भी उन्हें ८०० हस्त निसित प्रथों का पुस्तकालय दिसलाया गया (गफ के रिकार्डस् ४० ११६) मैंने यहा जो फुल देसा यह एक पडी सन्दूक थी जो कागज पर लिसे हस्तलिसित प्रन्यों से भरी हुई थी । कुछ पुस्तकें कपड़े मे वधी थी, कुछ सुली हुई और अव्यवस्थित रूप मे थी । यह गढी दिलकुल बुरी अवस्था में है । जो लोग यहा रहते थे उन्हे रहने के लिए स्थान बनाने को क्ति के बाहर जगह दी हुई है और वे यहारहने लग गये हैं। किले में जहा सन्दूक रक्सी थी यह स्थान भी रिलकुल गन्दा और भ्राट मा था। इस हरतलिखित अन्य सप्रहालय का उत्तराधिसरी एक छोटा बालक है जो कि मैं समन्ता हूँ कि पटियाला मे पढ़ रहा है। ४६ - कुछ हस्तलिखित प्रथ जो मैंने यहा देस निम्नलिखित हैं धर्मतत्वकलानिधि (धर्मशास्त्र ) नागमल्ल पुत्र राजा पृथ्वीचन्द्र (या पृप्नीचद्र- देव) न । इमकी प्रतिन्निपी मम्बत् १५३० में की गई जर पृथ्वीचद्र देव शासन करता था। प्रयकार से अपने विरुदों (पापियों) की एक लम्बी सूची है। फुमारपालचरित का पक्ष्म सर्ग - कृष्णपीयगच्छ के जयसिंहसूरि द्वारा रचित । यह यही फाल्य है जिसको नयचन्नपूरि ने अपने हम्मीरकाव्य में अपने गुरु जयसिंहमूरि द्वारा रचित लिखा है (जीने का समरण भूमिका पृष्ठ ६ और भूल अन्य पृ० १३२)। शृगारदर्पण - पदमुन्र परि कृत जिपके पढ़ने से, प्रयकार को प्राशा थी कि अपयर अपनी स्त्री (मुद्रावती) पर राजी हो जायगा। पञ्चतन्त्र की एक प्रतिलिपि जो फिरुजशाहि तुगलर के राज्यकाल में सम्बत् १४२६ में पी गई थी। सारसग्रह (बंधक) दिग्ज याक्षिक श्रीधर और इसी के पुत्र गौर जाति के शिय- रवान।
६२] * राजस्थान पुरातल लीलावतीकथावृत्ति, वल्लालसेन वृत अद्भुत सागर, बासुदेव हिन्दी (खण्ड १), किर- णावली (न्याय), श्यामशकुन, कुक्कोक कृत । रतिरहस्य और वृत्तरत्नाकर पर सुल्हण कृत टीका के हस्तलिखित ग्रंथों की प्रतियां जिनका समय क्रमशः सम्वत् १४६१,१५१६,१५५७,१६१४, १६२६, १६३४ और १६४४ है। ४७ - फिर मैं जोधपुर राज्य की सीमा में नागौर स्थान पर गया । यहां मुझे कुछ भी महत्त्वपूर्ण वस्तु देखने को नहीं मिली । मुझ दो जैन अथ संग्रहालयों का पता बताया गया । प्रथम, साधारण जैन धर्म ग्रन्थों, टीकाओं और अन्यान्य पुस्तकों का एक छोटासा संग्रह है और दूसरे संग्रह के लिये मुझे बताया गया कि एक श्री पूज्यपाद के पास उसकी चावी थी जो १०,१५ वर्ष पूर्व किसी अज्ञात स्थान को चले गये । एक ब्राह्मण के पास कुछ हस्तलिखित प्रन्थ थे परन्तु ये बहुत साधारण कोटि के थे। ४८ - यहां से मैंने अलवर को प्रस्थान किया। अपनी ओर से पूछताछ करने पर १६०३ के नवम्बर मास में मुझे वही उत्तर मिला जो बीकानेर से मिला था। परन्तु, फिर भी १ या २ पण्डितों ने मुझे विश्वास दिलाया कि एक स्टेट संग्रहालय के अतिरिक्त अल- वर में कुछ निजी व्यक्तिगत हस्तलिखित ग्रन्थों के संग्रह हैं और मैं निराश नहीं हुआ। मैंने राजकीय संग्रहालय देखा । यह सुव्यवस्थित रूप में था और ऐसा मालूम होता था कि इसकी भली प्रकार व्यवस्था की जाती है। मुझे यह भी पता लगा कि स्थानीय पण्डितों द्वारा जिनसे मिलने का मुझे अवसर मिला, इसका बहुत सुन्दर उपयोग किया गया है। एक पण्डित के प्रभाव से जिनसे मेरा परिचय भरतपुर में हो चुका था और एक दूसरे पण्डित की सहायता से जिसको कौन्सिल के प्रमुख सदस्य ने मुझे संग्रह घुमा फिरा कर दिखलाने की आज्ञा दी गई थी, मैं यहां के संग्रहालयों को बिना कठिनाई के देख सका। ऐसा मुझे लगा कि इन संग्रहालयों के स्वामियों को अपने इन भण्डारों को दिखलाने में किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं है। सम्भवतः यह उन्होंने इस उदाहरण से महसूस किया हो कि पिटरसन महोदय द्वारा राजकीय संग्रहालय की छपी सूचि तैयार किये जाने से हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज में कितना अधिक लाभप्रद कार्य हुआ है । इसमें कोई भी ऐसा आपत्तिजनक उद्देश्य होने का संदेह नहीं उठता। सचमुच अलवर में एक पण्डित ने जो पञ्जाब विश्वविद्यालय की कई संस्कृत की उपाधि परीक्षायें उत्तीर्ण था मेरे लिये बम्बई संस्कृत सीरीज में प्रकाशन व सम्पादन किये जाने वाले ग्रन्थ श्रीभाष्य की हस्तलिखित पुस्तक की प्रति उधार में दी। मैंने ६ संग्रहों की जांच की जिनके मालिक ब्राह्मण थे और सम्पूर्णतः ये संग्रह सुरक्षित एवं व्यवस्थित थे। ४६ - कुछ हस्तलिखित ग्रन्थ जो उपादेय हैं उनकी सूचि नीचे दी जाती है :- चक्षुषोपनिषद् । अग्निब्राह्मण (सामवेद)। गोभिजगृह्यसूत्र की सम्वत १६४० की प्रति । पारस्करगृह्यकारिका - रेणुकाचार्य कृव ।
• राजरपान में सात-साहित्य की खोज. [६३ लाट्यायनश्रोतसूत्रभाष्य - रामकृष्ण दीक्षित स्त। कर्म-रिपाक-कृष्णदेर रुत । निर्माणकाल १४३२ समत्सर है जब नन्दभद्र का राजा दुर्गसिंह था जिसकी रानी अन्यिका और सचिन कर्णकएठोरव था । अन्धकार के पिता का नाम पद्मनाभ व्यामथा। नलोदय-सटीक - मिश्र प्रभाकर मैथिल कृत । अमरूशतक सटीक -ज्ञानानन्द या श्रीलक्ष्मी रविचन्द्र कृत । ( यह वही प्रन्य है, जो राजेन्द्रलाल के नोटिसे। मे २६६३ सस्या पर अङ्कित है)। गीतगोविन्द पर टीका मैथिल कृष्णदत्त छन । मूल का तात्पर्य शिय के ऊपर नाम हो इस प्रकार प्रतिपान किया गया है। पद्यामृतसरोपर - काश्यपगोत्रोद्मा रामचन्द्र सूनु लक्ष्मण न । रसाल्पद्रुम (एक सग्रह) चतुर्भुज मिश्र द्वारा सकलित । इसमें रचनाकर्ता फपियों के नाम दिये हुए हैं । यह सायनासा की इच्छा से समलित किया गया। अमरकोप - बुधमनोहरा टीका समेत महादेव कृत जिसे स्वयम्प्रकाशतीर्थ द्वारा सन्यासी की पदरी मिली। प्रेमसम्पुट (काव्य) विश्वनाथ पक्राति कृत, स. १६०६, जिसमे राधा-कण विषयक रति का वर्णन है। नव्यकाव्यपराश पी (स्वी) मानन्द पितृनाम कान्यकुन्जतिलक रघुनन्दन इष्टकापुर नियासी कृन । न्त्तर भारत में 'स' के यदल 'प' प्रयुक्त होता है और इसका उधारण प्राय 'ख' की पिया जाता है । इस लिये सीमानन्द का दूसरा स्प पीमानन्द है, जो स्पटत तत्त्व ममास व्यारया, न्यायरत्नाकर या न्याय क्लोल का रचयिता ही है (हाल्स कण्ट्रीन्यूरान पृष्ठ ४ और १० हस्तलिखित प्रय बहुत प्राचीन है । विकमार्तण्ट - गोरक्षनाथ कृत । योगारयान - यातल्क्य कृत इसे पुप्पिका मे याज्ञवल्क्योपनिषद् नाम से कहा गया है। प्रेमपत्तनिका- रसिकोत्तमस कृत । चमत्कारचिन्तामणि सटीक धमेश्वर मालयीय फत । सूर्यसिद्धान्त - चण्डेश्वरीय भाष्य समेत । सिद्धान्तसिन्धु (ज्योपित) नियानन्द द्वारा शाहजहा के मादेश से बनाया गया । परकन्याख्या-चक्रदत्तीय । ५०- अलवर से मैं राजगढ गया जो इसी राज्य में है । अलर मे ही मुझे राजगढ़ पाले उन महानुभागे के नाम मिल गये थे, पिनके पास हस्तलिखित पुस्तकों का सह मैंने इस स्थान के हाकिम के पास पहले ही भेज दिया था और इस सम्मन्ध में उसने जो प्रबन्ध किया यह इतना पूर्ण था कि अपने उतरने के स्थान पर परते ही अपना काम भारम्म फर सच । समद कोई पढे नहीं ये थौर उनकी सपया था। इन ६४] * राजस्थान पुरातल - ४ थी, उनमें दो के सुरक्षित होने पर भी किसी प्रकार की क्रमिक व्यवस्था नहीं थी। निम्न- लिखित हस्तलिखित ग्रन्थ उनमें महत्वपूर्ण हैं : श्रानन्दवृन्दावनचम्पू - केशव कृत । सारसंग्रह शम्भुदास कृत (संग्रह न कि धर्मशास्त्र का प्रन्य )। काव्यकौस्तुभ -- एक अपूर्ण प्रति । वृत्तरत्नाकरटीका - श्रीकण्ठ मूरि कृत ! वृत्तमाणिक्यमाला - त्रिमल्ल कृत । अलङ्कारशेखर - माणिक्यचन्द्र कृत ( १५६३ ईस्वी सन् राजाज् 'पॉव विगतः डफ पृ० ३०६-७ ) देखिर बूहलर की कश्मीर रिपोर्ट पृष्ठ C. २८ C. २६ और इण्डिया ऑफिस कैटेलोग ३४६-७ । छन्दःकौस्तुभ - राधादामोदर कृत टीका समेत । टीकाकार उसका शिप्य विद्या- भूषण। ज्ञानदर्पण - निम्बार्क कृत। करणवैष्णव - शुकदेव भट्ट सुनू शकर कृत । शाङ्गधर टीका - आदमल्ल कृत। चिकित्सासारोदधि - नन्दकिशोर मिश्र कृत । ५१-दूसरे स्थान पर जहां मैं गया वह मन्दसौर था। यहां मैंने जो संग्रह देखे वे सब जैन संग्रह थे। उनमें से एक व्यक्तिगत था जिसके केवल ध्वंसावशेप चचे थे और बाकी तीन दिगम्बर मन्दिरों के थे । दिगम्बर लोग, मुझे पहले भी मालूम था, अपनी पुस्तकों पर चमड़े की जिल्द को आपत्तिजनक समझते हैं और विशेष रूप से उन पुस्तकों को अपने मन्दिरों में नहीं रखते । इसके विपरीत श्वेताम्बर लोग इसके लिये किसी प्रकार का विरोध या आपत्ति नहीं उठाते । भले ही पुस्तकों पर चमडे की जिल्द हो या उन्हें चमड़े की वक्स में जो उनके मन्दिर में सुरक्षित हो रखवा दिया गया हो । यहां मुझे पता चला कि वे उन की भी आपत्ति करते है । मुझे मन्दिर में एक भी पुस्तक को नहीं छूने दिया गया क्योंकि मैं ऊनी वस्त्र पहने हुए था । एक भादमी मेरी दरी के उस ओर बैठा हुआ मुझे पुस्तकें जो मैं चाहता दिखाता जाता था। एक संग्रह में तो सभी पुस्तकें प्रायः अभी की प्रतिलिपि कर ग कर रक्खी गई थी। मुझे एक संग्रह में जैनेन्द्रव्याकरण की प्रतिलिपि मिली और दूसरे मे तत्वार्थवृत्ति ( करणानुयोग) सर्वार्थसिद्धि नामक - पृज्य स्वामी कृत और एक कथाकोश मल्लिभूपण के शिष्य ब्रह्मनेमिदत्त कृत मिले । इसके आगे अन्य महत्त्वपूर्ण उल्लेख योग्य ग्रन्थ नहीं थे। ५२- किशनगढ़ राज्यान्तर्गत सलेमाबाद में मैंने सुन रक्खा था कि निम्बाके सन्न- दाय की धार्मिक गद्दी है और वेदान्त सम्बन्धी निम्बार्क सम्प्रदाय के अन्य वहां मिल जावेंगे । राज्याधिकारियों के द्वारा मैंने वहां के हस्तलिखित ग्रन्थों की तालिका मंगवाई। यह संग्रहालय हस्तलिखित ग्रंथ संख्या को देखते हुए बहुत छोटा है।
• राजस्थान में संत-साहित्य की खोज. - हस्तलिखित प्रयों मे से कुछ ये है कश्मीर के केशर भट्ट के कुछ प्रथ जैसे चैप्णवधर्ममीमांसा और भूचक्र । दिग्विजय। वेदान्तसूत्रों पर निम्बार्कभाष्य वेदान्तकौस्तुभ श्रीनिवासाचार्य कृत । ब्रझममाप्य - मास्कराचार्य कृत | कश्मीर के केरार भट्ट का जीवन चरित । पुरुषोत्तममृत वेदान्तरत्नमञ्जूपा और वेदान्तसूबद्रम । निम्या प्रादुर्भान। हरिव्यासदेन कृत - मिद्धात रत्नापली । नारदपाश्चराना कई स्थानों से मुझे मूचियां प्राप्त हुई जिनमें अधिकाश वैप्टेन ल्यूथर्ड द्वारा भेजी गई थी, चे देनाम (बडी शासा) जापरा, रामपुरा, राजगढ (मध्यभारत), अजयगढ, मुथालिया, भावुमा रतलाम, मुलतान और भरतपुर एजेन्सी से श्रआइ थी । इन मूचियो को मागते हुए यह अनुरोध किया गया था कि इनमे हस्तलिखित प्रन्य हों और ये भी मस्कन के ही होने चाहिए । जहा अन्यसरी के नाम आयें यहा अपेक्षित स्थान पर उन्हें रिसलाना चाहिए । मुश्किल से ही ऐसी कोई तालिका होगी जिसमें उल्लिखित निर्देशों का पालन किया गया हो । इन मूचियों में ज्योतिष और वैद्यक के आधुनिक प्रन्य ही अधिक सरया में लिसे गये थे। निम्नलिखित प्राय उल्लेखनीय हैं देवास (यडी शासा) फुमारपालप्रसन्ध-१४६२ सम्बत् में सोमपुन्दरशिष्यजिनमण्डन द्वारा रचित । रसिरजीवन- गदाधरभट्ट कृत । सिकन्दरसाहित्य - रघुनाथमिश्रत । नारदपवार । याचारम्मए - नृमिहाश्रम पृत। ज्योतिश्चन्द्राचि - स्वमहान। पापती- वराहमिहिरकृत । येद्यमास्करोदय - धरन्तरिकन । समराङ्गणमूबधार - मोजदेवन । पक रिणवली की प्रति - हरदत्तकृत । रामपुर । माच-तिनक। अलरारभेदनिया माहिल्यग्दममारपी- सटीक ।
राजस्थान पुरातत्य भाषाभूषणयुत उपमाविलास । ५४ - अपने दौरे को पूरा करके मैं कैप्टेन ल्युअर्ड से मिला । सेण्ट्रल इण्डिया के एजेण्ट महोदय ने मुझे लिखा था, जैसा कि मैंने अपनी पहली रिपोर्ट के ६५ अनुच्छेद में बताया है कि कैप्टेन ल्यूअर्ड को आशा है कि उन्हे जैन सम्प्रदाय के लोगों और अन्य लोगों को इस खोज के काम में सहयोग देने को समझाने में पूरी सफलता मिलेगी। साथ ही श्री ल्यूअर्ड ने भी मेरो पहले वाली रिपोट को पढ़ कर स्वयं लिखा था कि यह ग्वाज, जिसके लिये मैं (श्रीधर. आर. भा.) प्रस्थान कर चुका हूँ, न्यूनाधिक रूप में उसकी बाल्यावस्था में है और वह इसे पूर्ण यौवन में विकासोन्मुख तो देखना चाहेंगे ही । इसलिये में यह जानना चाहता था कि इस प्रकार पूर्वप्रतिज्ञात सहायता के साथ अपना काम जारी रखने के लिये उन्होंने कितने हस्तलिखित ग्रन्थों के अधिकारी और मालिकों को मनाने में साफ- लता प्राप्त की। उन्होंने मुझे लिखा, कि "जैसी मैंने (ल्यूअर्ड ने) श्राशा कर रक्खी थी वैसी सफलता न मिलने के कारण मैं खेद प्रगट करता हूं। ५५ - बस यहां जिस विशेष उद्देश्य के लिये मेरी सेवायें दौरा करने के हेतु लगाई गई थी वह समाप्त हुआ । मेरे अभी के दो दौरों और प्रारम्भिक खोज के दौरे के फल- स्वरूप मुझे यह मानना पड़ता है कि कुछ संग्रह इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनके सूचिपत्र वना लिये जाकर छपवा दिये जाने चाहिए क्योंकि उनका कोई भी ग्रन्थ अस्तव्यस्त व विकृत अवस्था में पड़े रहने देने जैसा नहीं है । सर्व प्रथम रीवा, जयपुर, जोधपुर, किशनगढ़, दो कोटा, उदयपुर और बीकानेर के राजकीय संग्रहालय हैं। ५६ - जयपुर का संग्रहालय जिसका मैं उल्लेख कर रहा हूँ वह नहीं है जो मुझे दिखलाया गया (अपनी पूर्व रिपोर्ट के अनुच्छेद ३७ में ) मुझे पूर्ण विश्वास है कि वह दूसरा ही होना चाहिए । यह अधिक महत्वपूर्ण है जैसा कि मैंने अपनी पहली रिपोर्ट में पूर्वोल्लिखित अनुच्छेद में संकेत दिया है। पण्डित राधाकृष्ण ने वायसराय महोदय को दिये गये १० मई १८१८ के अपने पत्र में जो कि हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज के लिये सरकार द्वारा इस सस्था के उद्गम का कारण है लिखा था “बहुत ही अलभ्य पुस्तकें (महाराज जयपुर ) के उदार पूर्वजों द्वारा राजा मानसिंह के समय से ही संग्रहीत की गई हैं । व्हिटलेस्टोक्स ने इस पत्र पर लिखे गये अपने नोट में "राजकोय पुस्तकालय की संग्रह सूचि जैसी कि जयपुर के पोलिटिकल एजेण्ट द्वारा प्राप्त की गई" का उल्लेख किया है (गफ पृ० १ और ३)। श्री पिटरसन ने अपनी.१८८२-८३ सन् की रिपोर्ट पृष्ठ ४५ में लिखा है कि उन्होंने "तीन दिन ध्यान पूर्वक पुस्तकालय को देखने मे बिताये । इस थोड़े से समय को देखते हुए हमारी ग्रन्थ सूचि में जोड़ने के निमित्त जल्दी जल्दी से आवश्यक प्रन्थों की टिप्पणी मात्र लेने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं किया जा सकता था।" इस प्रकार जिस पुस्तकालय को मुझे दिखाया गया वह वर्णित पुस्तकालय नहीं हो सकता । पिटरसन ने अपनी दूसरी रिपोर्ट में यह भी लिखा कि जयपुर दरवार ने अपने पुस्तकालय की, जिसका वणन पूर्व रिपोर्ट में किया जा चुका, पुस्तकों का सूचि-पत्र वनाये * राजस्थान में संस्तत-साहिय को जोन . [. - जाने के परामर्श को बडी प्रसन्नता पूर्वक मान लिया था और यह काम थव और आगे प्रगति कर चुका होगा। ५७-बीकानेर राजकीय संग्रहालय का कुछ भाग सूचि-निबद्ध कर लिया गया है। परन्तु, यह और भी अधिक उपयुक्त होगा यदि राजेन्द्रलाल के बनाए हुए सूचिपत्र मे उसका पूरक भाग जोड दिया जाय जो ऐसी पुस्तकों का हो जिनका उस सूचि-पर में नामो. लेख नहीं हुआ है। ५८-मैंने पहले भी यह बताया था कि जोधपुर में राजकीय सग्रहालय व्यवस्थित रूप में नहीं है परन्तु अब जोवपुर दरवार ने निचय कर लिया है कि इसे सुव्यवस्थित कर लिया जाय और सूचि-पत्र बनवा दिया जाय । महक्मा सास के सीनियर मैम्बर (प्रधान सदस्य ) ने मेर विचार इस विषय पर मागे और मैंने उन्हें उनके पास भेज भी दिये हैं। ५६-फिर, कुछ जैन भएडार हैं जो प्रमश में लाने योग्य हैं। (१) जैसलमेर का पडा भण्डार, कम से कम एक बीकानेर मे व एक जोधपुर मे है। बीकानेर का एक बडा भण्डार निसके विषय में मैं कह रहा हू, अभी एक जैन सद्गृहस्थ के अधिकार मे है और इसको दूसरे श्रादमी के अधिकार मे न जाने देने के लिये उसे न्यायालय में बहुत अधिक लडना पडा । क्याफ उसे रिशास था कि ऐसा करने से वह सग्रह दुरव्यवस्था और विकृति को प्राप्त हो जायगा । उसे सूचित कर दिया गया है और वह इसकी सूचि पना देने के परामर्श को मानने के लिए तैयार है । जैसलमेर के बड़े भण्डार के सम्बन्ध मे मुझ श्राशा है कि ट्रस्टी महानुभागों के मानने पर शोघ्र ही उसका सुचि-पत्र बनाने दिया जा सकेगा । परन्तु, उन लागों को मना कर प्रतिदिन सूचिपन के काय को करते रइने देने का प्रश्न सरलता से ही हल होजाय और कोई बाधा न खडी हो, यह सरल काम नहीं होगा । दीनान महोदय और ट्रस्टी महानुभानों की, जिनको मैंने उनके उत्तरदायित्व के बहुत ही उपयुफ पाया, सहायता से बहुत सम्भव है सूचि तैयार हो सकती है । अत में यह बताना है कि कोटा के मन्दिरा मे ब्राह्मण अन्यों के सग्रहालय का भी सूचि पर बन जाना चाहिए । सूचिपर का आकार मैंने अपनी पूर्व रिपोर्ट के ६६ अनुच्छेद मे बता ही ६०-जैन सग्रहालयों के सम्बन्ध मे एक प्रश्न विचारणीय है। वर्तमान समय में जैन समाज में अत्यधिक जागरूक प्रवृत्तिया काम कर रही हैं और वे लोग जहा सम्भव हो उन उन स्थानों का सूचिपत्र बनाने दे रहे हैं। यदि जैन समाज ऐसे सूचिपर बनना कर हे छपना तो सरकार के लिए ऐसा करना व्यर्थ ही होगा। इसलिये मैने मन्त्री महो- दय खतावर जैन कान्फरेन्स से सूचि-पर बनाने के विषय में कान्फरेन्स के विचारों के सम्बध में पूछताछ की। मैने उनसे पूछा (१) क्या यह सच है, जैसा मुझे बताया गया है कि सूचि-पत्र बनाने का उद्देश्य केवल यहो माराम करना है कि तीन विभिन्न स्थानों के समहालया में कौन से जैन ग्रन्य मिलते है और किस स्थान पर हैं, एव क्या उनका दिया है।
* राजस्थान पुरातत्व संग्रह पूर्ण बनाना है ? (२) क्या जैन कान्फरेन्स का विचार सभी स्थानों पर स्थित सारे जैनपुस्तक भण्डारों की सूचि बनाने का है अथवा केवल पाटन और जैसलमेर के भण्डारों की सूची बनाने का ? (३) क्या सभी अथवा कुछ सूचियां प्रकाशित की जावंगी ? (४) क्या इन सूचियों में भण्डार स्थित ब्राह्मणग्रन्थों का भी उल्लेख रहेगा ? और (५) क्या इन प्रकाशित होने वाली अथवा हस्तलिखित प्रति के रूप में रक्खी जाने वाली सूचियों में केवल प्रत्यनाम, कत नाम, पत्र संख्या, पंक्तियां और अक्षर और समय का ही उल्लेख होगा अथवा प्रतियों में से ऐले ऐसे स्थल भी उद्धृत किए जानेंगे जैसे क शान्तिनाथ भण्डार की सूचि में पिटरसन ने दिए हैं। उनके उत्तर का कुछ अंश यहां उद्धृत किया जाता है :--"हमें ज्ञात हुआ है कि हमारे बहुत से बहुमूल्य प्राचीन अन्य पुरातन समय में ऐसे भण्डारों में छुपा दिए गए थे और इन भण्डारों के संरक्षक अथवा अन्य व्यक्ति, जिनका इन पर अधिकार है, इनको खोलने तथा जीर्ण पुस्तकों का उद्धार करने के लिए तत्पर नहीं हैं । हमने जैसलमेर और पाटण के भण्डारों की सूची बनालो है. और अब हमारे पण्डित लोग अन्य भण्डारों की सूचियाँ बनाने में लगे हुए हैं। कतिपय भण्डारों की सूचियां तैयार हो जाने पर हमारा विचार है कि उनकी तुल न करके यह देखा जावे कि किन किन पुस्तकों की मरम्मत पर तुरन्त ध्यान दिया जाना चाहिए । जो अन्य सम्प्रति प्रचार में नहीं है उनकी प्रतिलिपियां करा लेने का भी हमारा विचार है जिससे कि भविष्य में भण्डारों को बार बार में खोलने की आवश्यकता न पड़े । एक केन्द्राय पुस्तकालय या ऐसो ही कोई संस्था कायम करने की बात भी हमारे ध्यान में है । यह योजना अभी तक पूर्ण- रूप में विकसित नहीं हुई है परन्तु हमें आशा है कि समय आने पर यह अवश्य पूरी होगी । सूचियों को मुद्रित कराने के विषय में तो जब सभी सूचियां तैयार हो जायेंगी तभी निर्णय किया जा सकेगा। अभी तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि सम्भवतः हम इन सूचियों को छपावेंगेही" इससे यह मालूम होता है कि कान्फरेन्स का उद्देश्य मुख्यतया साहित्यिक दृष्टि- कोणवाला नहीं है परन्तु उसका सम्बन्ध केवल अप्रचलित जैन साहित्य से है जिसमें आध्यात्मिक और लौकिक साहित्य सम्मिलित है। तदनुसार जो सूचियां जैसलमेर के बड़े भंडार में मैने देखी, जो कान्फरेन्स की ओर से बनाई गई थी, उसमें प्रत्येक हस्तलिखित ग्रन्थ के सम्बन्ध में यह विवरण था कि उस ग्रन्थ के पुनरुद्वार की आवश्यकता है या नहीं और यदि है तो तत्काल या अन्यथा । साथ ही ब्राह्मण ग्रन्थों के सम्बन्ध में केवल नाममात्र का उल्लेख था । 'अन्यदर्शनीय' लिखने के अतिरिक्त और कोई सूचना उनके सम्बन्ध की थी ही नहीं। सूचि में कोई सारोद्धार नहीं था । ऐसी परिस्थितियों में जैन संग्रहों के सूचि-पत्र भी गवर्नमेण्ट की ओर से बनवाने और छपवाने होंगे। ६१-कुछ और भी बातें हैं जिनपर मुझे अपना विवरण देना है। उनका सम्बन्ध मेरी पहली यात्रा और उससे सम्बन्धित रिपोर्ट से है। इन्दौर में मैंने उस समय श्रीमन्त सरदार किबे महोदय के पास एक पौराणिक की प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकें देखी थी।
* राजस्थान में सस्त-साहित्य की खोज * [६६ कुछ दिनों बाद ही वह पौराणिक प्लेग का शिकार हो गया । परिणामत वे सभी प्रन्य सरदार महोदय के हो गये और उन्होंने कुछ ही समय पूर्व इन्हे नम्बई की एशियाटिक मोसोइटी को दे दिया। ६२-- उस रिपोर्ट के अनुच्छेद १३वें में मैंने इन्दौर के ३ या ४ शास्त्रियों के अधि. कार में हस्तलिखित प्रन्यों के होने की सूचना लिसी थी। ये लोग प्लेग से मर गये थे। अर वे अन्य गुम रूप से उन लोगों के हाथ बेचे जा रहे हैं जिनको उन पुस्तकों की सुरक्षा में कोई भी रुचि नहीं है । मैंने दीवान साहव को यह अनुरोध करते हुए लिखा था कि वे इस विनाश को रोकने के लिये उपयुक्त दिशा में कार्य करें। मुझे पता नहीं कि राज्य के और और कार्यों में व्यस्त दीवान साहब ने मेरे परामर्श पर कोई ध्यान दिया या नहीं। ६३-मैंने शूलपाणि की याज्ञवल्क्य पर टीका की एक प्रति इन्दौर में और कल्याण भट्ट कृत टीका सहित नारदस्मृति की एक प्रति चुनरी में देखी थी। न्यूर्जवर्ग के प्रोफेसर श्री जोली ने, जिनके अध्ययन का एक प्रधान विपय 'धर्म' रहा है, इनको देखा और मुझे लिखा कि इन दोनों को प्रतिलिपि करवा कर उनके पास भेजी जाय । साथ में उन्होंने यह भी लिखा की मेरी यात्राओं का परिणाम बहुत महत्वपूर्ण है । श्रागे फिर लिखते हुए उन्होंने मुझे बताया है कि याज्ञवल्क्य की टीकाओं पर लिखे जाने वाले एक निवन्ध में शूलपाणि की हस्तलिखित पुस्तक की अन्वेपणा के महत्व पर वे प्रकाश डालेंगे। इस इस्त- लिखित पुस्तक के स्वामी और पदी दरवार के सौजन्य से मैंने इन दोनों पुस्तकों को दरत में ले लिया और उन प्रतियों को इन प्रोफेसर के पास भिजवा दिया है । मुझे पता है कि जब मैं पुस्तक मागने गया तो शूनपाणि टीका के मालिक को इस बात का स्वप्न मे भी पता नहीं था कि यह पुस्तक उनके पास है। ६४- इसी प्रकार मेरी यह रिपोर्ट एक दूसरे विद्वान् के लिये भी अतीय उपयोगी सिद्ध हुई है । जब कभी मैंने बौधायन श्रोत-सूत्र, जिसकी पूर्ण प्रति अभी तक नहीं मिली है के भागों के सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट में लिखा, मुझे यूटेक्ट के डाक्टर पैलेण्ड का पूरा २ ध्यान रहता था जो इस सूत्र के सम्पादन कार्य में लगे हुए थे। उन्होंने उन विशेष विशेष स्थानों को नोट कर मेरे पास भेजा जिनके न होने से उनका काम अधूरा था। साथ ही उनकी मूलप्रतियों को उधार में भेजने के लिये अथवा कम से कम उनकी प्रतिलिपि करवा फर भिजवाने के लिये भी मुझे उहोंने लिसा था । उन्होंने लिया कि "मैं ही नहीं बल्कि सारा गैत्रानिक मसार जो सरहत के अध्ययन में पूरी दिलचस्पी रखता है, आपके इस उपकार के लिये बहुत अधिक कृतज्ञता प्रकट करेगा।" सौभाग्य से घार, ग्वालियर, और सनन में कुछ संग्रहालयों के स्वामी ऐसे उदार मना थे जिन्होंने मुझे पुस्तके उधार दे दी और में उन मूल प्रन्यों को इण्डिया आफिस के मार्फत उन प्रोफेसर महोदय के पास भेज सका। वे यथा समय वापिस भी लौटा दी गई हैं। डा. कैलेण्ड कहते हैं "कुछ हस्त- लिखित प्रतिया नो बहुत ही महत्वपूर्ण थी। कुछ श्रश श्रर भी यच गए हैं, जिनके लिये हे अतिरिक मामग्री की श्रापरयस्ता पड़ेगी। ये गालियर के तीनों प्रारमी जिनके ७०] * राजस्थान पुरातत्व * . पास इन सूत्रों की १ या अधिक प्रतियां थीं, मेरे उस स्थान पर जाने के वाद शीघ्र ही मर गये । मैंने उनसे इन्हें लेने की बहुत चेष्टा की परन्तु कोई फल न मिला । ६५-ग्वालियर के राजकीय संग्रहालय में स्थित 'विक्रम विलास' की हस्तलिखित प्रति को, जिसका मैंने अपनी पूर्व रिपोर्ट में विवरण दिया है, अन्त में मैंने दरबार साहव और रेजिडेण्ट महोदय के सौजन्य से प्राप्त कर ही लिया। मैंने इसकी प्रशस्तियों का उपयोग बम्बई एशियाटिक सोसाइटी की शताब्दी के अवसर पर पड़े गये अपने निबन्ध में भली प्रकार किया। ६६-मेरी गत रिपोर्ट लिखते समय मुझे किशनगढ़ के जवानसिंह संग्रहालय की सूचि मिली है जिसे मैंने अनुच्छेद ४७ में लिखा है। इसमें कोई महत्वपूर्ण सामग्रो नहीं है। ६७- अनुच्छेद २० वें में मैंने इस बात का जिक्र किया है कि एक हस्तलिखित ग्रन्थ मुझे शाहपुरा (राजपूताना ) में यजुर्वेद पर रावणकृत भाष्य के रूप में दिखाया गया जो कि वाजसनेयीसंहिता पर महीधर का भाष्य निकला। इसके बाद मैंने रीवां से एक मित्र द्वारा प्राप्त सूचि में इसके उल्लेख को इस प्रकार देखा 'वेदभाप्य-रावण महीधर कृत' यह इस बात को बताता है कि कुछ लोगों ने यजुर्वेद पर महीधर के भाष्य को ही रावण का भाष्य समझा है। ६८-इस कार्य के लिये अपने सम्पर्क में आने वाले पोलिटिकल अफसरों को मैं बारम्बार धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने समान रूप से सौजन्य प्रदर्शित किया और साथ में बीकानेर महाराज को भी हार्दिक धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने मेरे कार्य में सर्वाधिक मनोयोग दिया और दिलचस्पी ली । राजपूताना के माननीय ए० जी० जी० और विभिन्न दरवारों के प्रति भी अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करता हूं, जिन्होंने कस्टम आफिसरों (राहदारी व जकात के अधिकारियों ) द्वारा किये जाने वाले कष्टप्रद निरीक्षणों से मुझे छुटकारा दिलवाया। श्रीधर रा० भाप्डारकर -:टटटटटटटट.
१ - परिशिष्ट -१ जैसलमेर के उत्कीर्ण लेख संख्या चिन्तामणि पार्श्वनाथ के मन्दिर से उध्दृत यह उत्कीर्ण लेस मन्दिर के प्रतिष्ठादि कार्यों के सम्बन्ध में हुए महोत्सों की प्रशस्ति रूप में तैयार किया गया है। इसका अधिकाश भाग गद्य मय है । मन्दिर का निर्माण कराने वाले उकेशरशीय और रवान्वय श्रेष्ठि लोगों (वैश्यों) की एक लम्बी वशाली दी हुई है। उनके कुछ पूर्वजों को प्रसिद्ध प्रसिद्ध यात्राओं का वर्णन तिथि समेत दिया गया है। फिर एक खरतर पट्टारली जिनकुशल से जिनराज तक की दी हुई है और उसमें जिनवर्द्धन को उम समय पट्ट पर आसीन यताया गया है। जिनबर्द्धन ने ही बेष्ठि लोगों द्वारा बननाए हुए मन्दिर और उसमे स्थापित मूर्तियों की प्रतिष्टा सम्बत् १४७३ में लक्ष्मणरान के राज्य- काल में कराई। प्रशस्ति की रचना जयसागर गणि ने की। संख्या - २ उसी मन्दिर से यह सम्पूर्ण पा यद्ध है। प्रथम दो श्लोक पार्श्वनाय की प्रशसा में और १ पप जैस. लमेर की प्रशसा में लिया गया है । फिर राजा लक्ष्मण को वशायली दी गई है। इस वश के राजा लोग यदुकुन से सम्बन्धित यताये गये है । वशाली जैत्रसिंह से प्रारम्भ होती है। जैनसिंह के पुत्र मूलदेव (या मूलराज) और रत्नसिंह ने उसी प्रकार पृपी की रक्षा की जैसे प्राचीन काल में राम और लक्ष्मण ने की थी। रत्नसिंह का पुत्र घटसिंह था जिसने मिहरूप में म्लेच्छ रूपी हाथियों से बलात् वपदरी को छीन लिया । मूलराज का पुत्र देवराज था, देवराज का पुत्र केहरी और हरी के लक्ष्मण हुए। अन्तिम व्यक्ति लक्ष्मण की प्रशमा में ६ श्लोक लिने गये हैं, जिनमें यह बताया गया है कि यह मूरीश्वर मागरचन्द्र के पादपद्मो का पूजा या ! सम्पूर्ण चान्द्रकुल की पट्टा घली निनकुराल से जिनराज तक दी हुई है । निनरान ये आदेश और शिता से मन्दिर का निर्माण कार्य लक्ष्मणसे ये रामाल में मरतर मघ द्वारा प्रारम्भ किया गया और (पुरार्धन्तु) १४५६ मरत् में सागरचन्द्र ने एमकी आना से गर्भगृह मे मूर्ति स्थापित की। जिनद्धन के निर्देशानुसार मन्दिर का निर्माण - कार्य सम्बत् १४७३ में पूरा कर दिया गया। तब ऐसे नगर को जिसमें ऐमा सुन्दर मन्दिर यनाने का सौभाग्य मिला, यह राजा जिसपे राज्य म यह घना और वह सप निसने इसका निर्माण करवाया और आगे भपिय में जो लोग इमा दर्शन करने याने होंगे, उन सब अपने २ सौभाग्पये लिये बधाई दी गई है। निनमदिर 'लक्ष्मणविहार' कहलाता है। प्रशस्ति का बनाने वाला साधु कीर्तिरार है।
७२ * राजस्थान पुरातत्व * ३ संख्या उसी मन्दिर से उध्दृत मन्दिर में वयरसिंह के राजस्वकाल में सम्वत् १४६३ में पार्श्वनाथ की मूर्तिस्थापना का वर्णन है। संख्या -४ लक्ष्मीनारायण मन्दिर से इसमें जैसलमेरु को वणिग् विश् (व्यापारी लोगों का) एक अजेय नगर और यादव- कुल के राजाओं द्वारा शासित बताया गया है। फिर जैत्रसिंह से लक्ष्मण तक एक वंशावली दी गई है जिसमें उत्कीर्ण लेख संख्या २ में उद्धृत रत्नसिंह और घटसिंह को छोड़ दिया गया है । लक्ष्मण के पुत्र वैरीसिंह ने मन्दिर की प्रतिष्ठा विक्रम सं० १४६४ (अतीतः धीता हुआ) और भाटिक संवत् ८१३ (प्रवर्तमान) में करवाई । तव गद्य में ऊपर दी गई वंशावली ही वैसी की वैसी जैतसिंह से लिखी गई है और यह बताया गया है कि पञ्चायतन प्रासाद वैरीसिंह द्वारा सब इच्छाओं की पूर्त्यर्थ और लक्ष्मीनारायण प्रीत्यर्थ प्रतिष्ठित किया गया। संख्या - ५ सम्भवनाथ मन्दिर से (मन्दिर जिसके नीचे बड़ा भण्डार है ) जैसलमेर की प्रशसा इस रूप में की गई है कि शक्तिशाली म्लेच्छ राजाओं ने भी यह स्वीकार किया कि हजारों की संख्या में भी शत्रुओं द्वारा इसे अधिकार में करना कठिन है । फिर यदु राजाओं के कुल को प्रशंसा की गई है । इस वश को वंशावली गद्य में है, जा जैतसिंह से प्रारम्भ होती है तथा रावल श्री दूदा को रत्नसिंह और घटसिंह के बीच में रख दिया गया है । केहरी को इसमें केसरी बतलाया है । वशावली वैरीसिंह के साथ ही समाप्त हो जाती है । फिर चन्द्रकुल (जैनों का एक सम्प्रदाय) के खरतर विधि पक्ष की पट्टावली आरम्भ होती है जिसका आरम्भ वर्द्धमान से है । इसमें कुछ साहित्यिक और अन्य बातें भी हैं जिनका सम्बन्ध कई नामों से है । जिनमें बहुतसी प्रसिद्ध हैं । निम्नलिखित ध्यान देने योग्य हैं - जिनवल्लभ के उत्तराधिकारी जिनदत्त को अम्बिकादेवी द्वारा युग प्रधान की उपाधि दी गई थी। इसका उल्लेख जिनदत्तकृत सन्दोहदोलावली पर जिनसागर रचित टीका में है। पट्टावली के अन्त में जिनभद्र का नाम आता है। जिनबर्द्धन को छोड़ दिया गया है। इसका कारण स्वभावतः वही है जो कि क्लात कृत ऑनोमैस्टिकन (पृष्ठ ३४) में दिया गया है । जिनभद्र के शील, विद्या और उपदेशों की प्रशंसा की गई है । उसकी सच्छिक्षा से बिहार (मन्दिर) बनवाये गये, कई स्थानों में मूर्तियां रक्खी गई और अणहिल पाटण * राजस्थान में सस्त - साहित्य को खोज - . जैसे स्थानों में विद्या के रत्नों के खजाने (पुस्तकालय) विधिपक्ष श्राद्ध सङ्घ द्वारा बनाये गये। इस उत्कीर्ण लेख के अनुसार वैरीसिंह, अम्बकदास और क्षितीन्द्र जैसे राजा लोग उसके चरणों के पूजक थे। फिर मन्दिर निर्माताओं की यशापली दी गई है जो चोपड़ा गौत्र और उशाशके थे। सम्वत् १४८६ में रहोंने शगुब्जय और रैयत की तीर्थयात्रा की तथा १४६० में पञ्च. भ्युद्यापन किया। जिनभद्र के उपदेश से उन्होंने वैरीसिंह के राजत्यकाल में १४६४ सम्वत् इस मन्दिर का निर्माण करवाया। प्रतिष्ठा सम्बन्धी महोत्सव स. १४६७ में हुधा जब जिनभद्र ने सम्भवनाथ की ३०० मूर्तियों तथा अन्य मूर्तियों की स्थापना की, उनमें सम्भर नाथ मूल नायक थे। इन महोत्सव विधियों में बैरी सिंह ने भाग लिया । तदनन्तर खरतर विधिपन के किसी जिनकुशल मुनीन्द्र के लिये तीनों लोकों में विजयप्राप्ति की अभिलाषा प्रगट की गई है। प्रशस्ति की रचना वाचक जयसागर के शिष्य वाचनाचार्य सोमकुञ्जर द्वारा की गई है। संख्या-६ उसी मन्दिर से इस पट्टावली में मेरे द्वारा सरकार के लिये १८८३-८४ में खरीदे गये हस्तलिखित अन्धों (जैनश्वेताम्बर सम्प्रदाय सम्बधी) की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है जैसा कि प्रव- चन परीक्षा में यताया गया है (डा० भाण्डारकर की रिपोर्ट १९८३-८४ पृष्ठ १५२) । यह भी जिनमद्र तक है । इसमे जिनार्द्धन को छोड़ दिया गया है। इस उत्कीर्ण लेख में पताया गया है कि वाचनाचार्य रत्नमूर्तिगण के उपदेश से एक तप पट्टिका सम्मत् १५६५ में स्थापित की गई, जब जिनभद्र पट्ट पर आसीन थे और चाचिगदेव सिंहासनासीन थे। संख्या -७ शान्तिनाथ मन्दिर से यह उत्कीर्ण लेख अधिकतर गुजराती गध में है । अन्त में एक वाक्य तथा २ श्लोक सस्कृत में हैं श्रारम्भ में भी एक सस्कृत श्लोक है । उत्कीर्ण लेख में तीर्थयात्राओं और मन्दिरों के निर्माणकार्य का वर्णन है। इसमें निम्नलिखित शारली है रावल चाचिगदेन, रालि देवकरण, रावल जयतसिंह । अन्तिम व्यक्ति स० १५८३ में गद्दी पर था और लूण फरण उसका उत्तराधिकारी था। देवकरण के सम्बन्ध में ऐमा लिखा है कि १५३६ सम्बत में वह शासन कर रहा था, जिस यर्प इस मन्दिर की प्रतिष्ठा की गई । जयतसिंह का भी १५८१ सम्पत्र में गद्दी पर होने का उल्लेख किया गया है। सख्या महादेव मन्दिर से इसमें महारावल हरिजन के पुत्र रावल भीमसिंह की महिषी द्वारा १६७३ (उन्नीत) * राजस्थान पुरातन . सम्बत् चैकम, शक १५३८ और भाटिक ६६.३ प्रवर्तमान सम्पन् में मन्दिर निर्मित किया गया, इसका विवरण है। संख्या -६ गिरिधारीजी के मन्दिर से इसमें महारावल मूलराजजी द्वारा पुरुषोत्तम भगवान का मन्दिर सम्बन. १८५२ या शक १७१७ में बनवाया गया, यह उल्लेख है। उत्कीर्ण लय अशतः संस्कृत में है और अंशतः हिन्दी की एक बोली में। संख्या हनुमान् के मन्दिर से इसमें 'महारावल' मूलराजजी द्वारा युधिष्ठिर सं० ४८६८, मायन १८५४ या शक १७१६ में ६ मन्दिरों का निर्माण करवाने का उल्लेख है। उपर्युक्त शिलालेख और रिपोर्ट में दी हुई पट्टावली से जैसलमेर के महारावलों और उनके समय के सम्बन्ध में कुछ सूचनाप और कुछ थोडीसी निश्चित तिथियों का पता चलता है जो सूची में दिखाये गये हैं- १ - जैतसिंह या जैत्रसिंह । २ - मूलराज, १ का पुत्र । ३ - रत्नसिंह, १ का पुत्र (डफ की क्रोनोलोजी पृष्ठ २६०.१ में दी गई मूचि में नहीं है। ४ - दूदा (केवल सख्या ५ पाली में ) । ५ - घटसिंह, ३ का पुत्र । ६ - देवराज, २ का पुत्र । ७ - केसरी या केहरी, ६ का पुत्र । ६- लक्ष्मण, ७ का पुत्र सम्बत् १४५६,१४७३ । ६ - वैरीसिंह या वयरसिंह, ८ का पुत्र । (सं०४) सम्वत् १४६३,१४६४ (भाटिक सं०८१३), १४६७ । १०. चाचिग सं० १५०५ । ११ - देवकरण सं० १५३६ । १२ - जयतसिंह सं० १५८१,१५८३ । १३ • लूणकरण सम्भवतः १२ का पुत्र । १४ - मालदेव (बलदेव, डफकी क्रोनोलोजी में) का द्वितीय पुत्र (टॉड), सं० १६१२ । १५ - हरिराज । १६ - भीमसिंह १५ का पुत्र सम्बत् विक्रम १६७३ या भाटिक ६६३ । २५ - महारावल - मूलराज सं० १८५२, १८५४ • राजस्थान में सस्कृत-साहिय को खोज - जैसलमेर के रावल थोर महारावल भाटी जाति के थे और यह पता चला कि वे कभी कभी एक सम्बत् चलाते थे जिसे वे 'भाटिक' सम्बत् कहते जो विक्रमी संवत् काल से ६८०-१चो पीछे का है। ऊपर वाले उत्कीर्ण लेखों में से केवल ३ में अर्थात सरया (२),(४) और (५) में वशारली जैत्रसिंह से आरम्म होती है। सरया (४) में फिर रत्नसिंह और घटसिंह के नाम एक साय छोड दिये गये हैं, इसका सम्भवत यह कारण हुआ हो कि वे मूलराज की सीधी वशपरम्परा में नहीं थे । रत्नसिंह उसका छोटा भाई था और घटसिंह उसका भतीजा । प्रिन्सेप और डफ कुन क्रोनोलोनी को पुस्तकों के अन्त में दी गई जैसलमेर के महा रायलों की तालिका में रत्नसिंह का नाम छोड दिया गया है । परन्तु स० (५) स्पष्ट बत- लाती है कि रत्नसिंह राजा था और सरया (२) यह कहती है कि मूलराज और रत्नसिंह ने जिस प्रकार प्राचीन काल में राम और लक्ष्मण ने पृथ्यी का उपभोग किया वैसे ही किया । कर्नल टॉड के विवरण के अनुसार यद्यपि गोरी आलाउद्दीन की सेना द्वारा डाले गये घेरे में मूलराज और रत्नसिंह दोनों १२६५ ईस्वी सन् में काम आयेछ । फिर भी यह यहुन सम्भर है कि रत्नसिंह का राज्यतिलक न हुआ हो । वह एक सम्मिलित रूप का राजा माना गया हो जैसा कि कीर्ण लेस स० (२) में राम और लक्ष्मण के साथ उनकी तुलना की गई है। इन तीन उत्तीर्ण लेखों में जो ऊपर बताये गये हैं दूदा या दूदू केरल सरया (१) मे श्राया है, उसका नाम प्रिन्सेप की सूची मे अन्त में दिया गया है न कि हफ की सूची के अन्त में । दूदू इस वश का सीधा अधिकारी नहीं था बल्कि उसे कुछ वर्ष याद चुन लिया गया जब कि मूलराज और रत्नसिंह का पतन हो चुका था। टॉड के विवरण से हमे पता चलता है कि घेरे के समय जिसमें देवराज का पिता फाम श्राया था देवराज वुसार में ही परलोक सिधार गया । इसलिये उसका नाम न तो डफ की सूचि में और न प्रिन्सेप को सूचि में पाता है। उपर्युक्त उत्कीर्ण लेसों में केरल पाची संख्या वाले लेस में उसका राजा होने का उल्लेख आया है। दूसरे दो केवल उसे मूलराज का पुत्र यताते हैं । ये दोनों लेख उन लोगों का समर्थन करते है निनकी यह राय है कि ये दोनों सिंहासन पर ठे थे, इसमें कदापि किसी यात पा सदेह नहीं है। शुद्धि पत्र और पूरक टिप्पणियां पृ०६,१६ 'श्राक्सफोर्ड' के स्थान पर 'इण्डिया आफिस' होना चाहिए। जायालीपुर जिससे उदयसिंह का मम्मध है, जबलपुर से समता रखता है, ऐसा माना गया है (पॉम्ये गजेटियर इन्डेक्स पृ० २०३) परन्तु यह धोलका से बहुत दूर माराम होता है मौर में इमको जालोर के साथ मिलाना चाहता हूँ तथा इस उदयसिंह को मैं रानस्थान, भाग२, पृ०२२० ।
७६ * राजस्थान पुरातत्त्व * श्रीमाल या भीनमाल से सम्बन्धित मानता हूँ जो शिलालेख VII-IX-VI और VIII वोम्बे गेजेटियर परिशिष्ट [पृष्ठ ४७४ ] में उल्लिखित है । श्रीजावल और श्रीजावलीपुर सं. (५) और सं. (१४) में उसी सीरीज के अन्दर प्रथम अभिज्ञान के ही पन को प्रबल करते मालूम होते हैं । राजा का नाम, उसके पिता का नाम ( समरसिंह ) वंश का नाम (चाहुमान : उत्कीर्ण लेख १३ में) और समय (सम्वत) १२६२,१२७४, १३०५ ( उत्कीर्ण लेखों में) और जावलीपुर का जालोर के साथ अभिज्ञान यदि ठीक हो तो द्वितीय अभिज्ञान का समर्थन हो जाता है। पृष्ठ-४४ नीचे से १-२१ वी पंक्ति "सरयू नदी के इस प्रोर" के स्थान में "सरय्ववार देश में" होना चाहिए और अनुच्छेद (पैराग्राफ) के अन्त में पृष्ठ ४५ पर निम्नलिखित शब्द जोड़े जाने चाहिए "उदयसिंह रूपनारायापीय का कत्ता (पृष्ठ ६) । जयमाधव मानसोल्लास का रचयिता भी इसी घंश का मालूम होता है जैसा कि इस प्रन्ध में लिखा है (इण्डिया आफिस कैटलोग; पृष्ठ ५५० - १ और डा. भण्डारकर की रिपोर्ट १८८१-८२ पृष्ठ २-अनुच्छेद ५)" गोविन्द मानसोल्लास ( पृष्ठ ५६) ( स्मृति) रत्नाकर : हरसिंह के सचिव चण्डेश्वर रचित | यह स्मृति रत्नाकर सात भागों में विभक्त है। इसमें और उसी ग्रन्थकार द्वारा रचित कृत्यचिन्तामणि में हरसिंह और चण्डेश्वर के कई विवरण दिये गये हैं (इण्डिया आफिस केटेलोग पृष्ठ ४१०-४ और ५११-२ और राजेन्द्रलाल के नोटिसेज संख्या १८४२,१६२१,२०३६,२०६६,२३८४, और २३६८) हरसिंह के लिये मिथिलाधिप, कर्णाटवंशोव, कर्णाटभूमिपति, कर्णाटाधिप जैसी पदवी लगाई गई है । देवादित्य उसका सचिव था और उसे तीरभुक्ति विषय (तिर- हुत) का रहने वाला बतलाया गया है। देवादित्य का पुत्र महासान्धिविप्रहिक ठक्कुर वीरेश्वर का पुत्र महासान्धिविप्रहिक ठक्कुर चण्डेश्वर था। चण्डेश्वर को मिथिलाधिप मंत्रीन्द्र नेपालाखिलभूमिपालजयी, नेपालाखिल भूमिपालपरिग्वा कहा गया है । शक १२३६ (१३१४ ई० सन्) जो ग्रन्थ में लिखा गया है वह कहीं भी रत्नाकर ग्रन्थ के या उसके किसी भी भाग के निर्माण का काल नहीं लिखा गया है परन्तु, वह चण्डेश्वर द्वारा तुलादान विधि- सम्पादन करने का समय है इस विवरण से यह विदित होगा कि गोविन्दमानसोल्लास का कर्ता चण्डेश्वर का भतीजा और वीरेश्वर के छोटे भाई गणेश्वर का पुत्र था। हरिसिंह के पिता के नाम के सम्बन्ध में इतिहासकारों में एक राय नहीं हैं। कई विद्वान् महानुभावों ने इस नाम को कई तरह से बताया है जैसे शक्तसिंह, कर्मसिंह, भूपाल- सिंह । श्री हॉल इसे रत्नाकर ग्रन्थ से उद्धृत कर भवेश बतलाते हैं । परन्तु यह नाम हस्त- लिखित प्रन्थ की प्रतियों के विभिन्न भागों से उद्धत अंशों में कहीं नहीं आया है। यदि यह सन्मिश्र मिशरू द्वारा लिखित हरसिंह हो तो उसके द्वारा दिया गया उसके पिता का नाम भी भवेरा है परन्तु, हरसिंह के उत्तराधिकारियों के नाम जो उसने दिये हैं वे सिल्वन लेवी द्वारा दिये गये नामों से मेल नहीं खाते (बी. नेपाल पृष्ठ २२६) फिर भी उसके द्वारा • राजस्थान में संस्कृत - साहित्य की खोज . उल्लिखित हरसिंह मिथला के पाखा से सग्रहीत ठाकुर वश की वशावली की अनुक्रमणिका में आये हुए भवेश्वर या भवसिंह का पुत्र हो सकता है जो इण्डि० एण्टी० भाग १५ पृष्ठ १६६ में है। उस अनुक्रमणिका के अनुसार उसके पुत्रों में से एक का नाम नरसिंह या दर्प नारायण था और उसकी द्वितीय स्त्री से उत्पन्न पुत्रों में एक का नाम चन्द्रसिंह था । विद्या पति ने इस चन्द्रसिंह का ही अपनी दुर्गामक्तितरङ्गिणी में उल्लेख किया है । नरसिंह जिसकी रानी धीरमती के (या विवादचद्र के अनुसार धीराके) अनुरोध से विद्यापति ने अपना “दानास्यारलीप्रन्य" लिखा था वह इस चन्द्रसिंह का पिता होना चाहिए (देखिए इण्डिया बैटलोग पृष्ठ ८७४-६ और राजेद्रलाल के नोटिसेज स ० १८३०) ।
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* ग्रन्यनामानुक्रमणिका प्रन्यनाम पृष्ठ ग्रन्थनाम पृष्ठ । ६ m अग्निब्राह्मण (सामवेद) ६२ अग्निमुप (सत्यापाढी आपस्तम्ब) ७ अग्निप्टोमोद्धात (रामचन्द्र द्रविड) -७ अग्निहोतकर्ममीमासा अग्निहोत्र प्रयोग रतामणि (रामचन्द्र दीक्षित) ७ श्रङ्गनिया ३४ अद्भुततरङ्ग (हरिजीवन मिश्र) ५८ अद्भुत मागर ६२ अद्व तमुधा (सारस्वतोपनिषट्टीका लक्ष्मणपण्डितकृता) ५१ अधरशतक (जनार्दन) श्रधरशतक (नीलकण्ठ) अधिकरणकौमुदी (रामकृष्ण) अधिकारसंग्रह (वेष्टनावार्य) १० अनघराघवपञ्चिका (विष्णु) श्रनराधर टीका (देवप्रम) अन्यापदेशशतक (मधुमूदन मैथिल) अनालम्वुकाया कर्मरणविचारा श्रनुमानमणिसार अनुमितिनिरूपण सटीक (रामनारायण) अनेकान्तजपपताका टीका (मुनि चन्द्रमूरि) ३० अपरानितचा (भुगनदेवाचार्य) ४३ अपशरसण्डन (मामा) अभिननगदा (सत्यनाय यति) मरकोप मदीक (महादेव) अमरभूषण (मयुरात्मज) ४० अमृतयुम्म (नारायण) अमगता सजीवनीटीस (अर्जुनधर्मदेर) ५७ अमरुशतक सटीक (ज्ञानानन्द या लक्ष्मी रविचन्द्र ६३ अलङ्कारतिलक (भानुदत्त) अलवारभेदनिर्णय अलङ्कारशेपर (माणिक्यचन्द्र) ६४ अवधूतसागर (वल्लालसेन) ३४ श्रश्वशास्त्र (जयदत्त) ५५ अष्टाङ्ग टीका (अरुणदत) अष्टाङ्गदय अष्टाङ्गहदय टीका (अरुणदल) ५२ अष्टाध्यायी ब्राह्मणभाप्य (सायण) ६ अष्टोत्तरसहममहाकाव्यरत्नावली (रामचद्र) ५१ भारयातचन्द्रिका (भट्ट मल्ल) आचारदीपिका (नारायण) श्राचाररत्न (लक्ष्मणभट्ट) श्राठअटक आधानानिचातुर्मास्यान्त प्रयोग (काएर) श्रात्मानोध (मुकुन्दमणि) आत्मानुशासन ( पानाग) श्रानन्दनिवाष्टक (रामचड़) १० श्रानदान चम्पू (शिर) ६४ श्रापस्तम्नप्रायश्चित्तशतद्वयी (तस्वामी) ५५ प्रापस्तम्बमूत्रपति (विष्णुभट्ट) ६ आमाणशतक पाल्हादलहरी (नानीमहापात्र) श्राश्वलायनगृह्ममूनमाप्य दिनस्वामी मिद्रान्ती) श्राश्चानायनम्बपत्ति (वैविधवृद्धतालवृत्तनिगमी) ३६ पारलायनम्नानुसारिप्रयोग (विष्णुमत स्वामी) . ५ ७ • राजस्थान में संशन माहिल सीमोन - . Mix ra m ग्रन्थनाम पृष्ठ प्रन्यनाम गृष्ठ ३ - ५. श्राश्वलायनश्रौतसूत्र परं टीकाएं (देवत्रात और सिद्धान्ती) ७ आश्वलायनौतसूत्रवृत्ति (देवत्रात) ? आहिताग्नेहनिर्णय (भट्टगम) प्रात्रेयसंहिता ५२ एप्टकापूरणभाव्य (कात्यायनीय) (अनन्त) पुष्टापूर्तधर्मनिरूपण उक्तिरत्नाकर (पट कारकोदाहरण) (सुन्दरगणि) ५० उग्ररथशान्तिकल्पप्रयोग उत्प्रेक्षावल्लभ उत्तराध्ययनवृनिमुखबोध (नेमिचन्द्रमरि) ५४ उत्तराध्ययनसूत्र टोका (लक्ष्मीवल्लभ) ५४ उदभटालझार टीका २८ उद्धारराघव (मल्लारि) उद्धारधोरणी (गोविन्दस्धपति) उपदेशकन्दली (आसड़) ३१,४३ उपदेशतरङ्गिणी उपदेशपञ्चक सटीक (भूधर) उपदेशपद (हरिभद्र) ३१ उपदेशपदप्रकरण (हरिभद्र) उपदेशरत्नाकर (सुन्दरसूरिमुनि) ५५ उपमानसड्ग्रह (प्रगल्भ) उपमितिभवप्रपञ्चकथा (सिद्ध) ५४ ऊपानिरुद्ध नाटक (लक्ष्मीनाथराजा) ५८ ऋग्वेदीयपौण्डरीकहोत्रप्रयोग पभगान ऋतुवर्णनकाव्य सटीक (दुर्लभ) ५८ ऋतुसंहार टीका (अमरकीर्तिसूरि) ४८ एकार्थाख्यातपद्धति (भट्ट मल्ल) ५६ एकाक्षरनाममाला (वररुचि) एकीमावस्तोत्र टीका (वादिराज) ५४ श्रीदुम्बरी महिना (दुम्मर मृपि) ४२ अगानिमलिमीमांसा (मुरारि) १० कथाकोप (बामनेमिदन) १४ লিঙ্গামায়ে (मौदगन्यमयूरेश्वर) कर्णकुतुहल ( पहानाम) कर्णामृत दीश (नारायण भट्ट) ५६ करप्रकरणा कर्परमञ्जरी टीका (प्रेमगन) कर्मप्रकाश टीका ( नारायण भट्ट) ३४ कर्मविपाक (कृष्णदेव) ६३ कर्मविपाक (गर्ग ऋषि) ३० करणपणय (शहर) ६४ कल्पकिरणायली व्याख्या (धर्ममागर गलि) ५४ कल्पपल्लव २८ कल्पलताधिवेक २८ कल्पानुपदसूत्र (सामवेद) कलाष्टक कलिकान्ताकुतुक नाटक (रामकृण) कलिकान्ताकुतूहल प्रहसन (रामकृष्ण-त्रिपथी कल्याणकर पुत्र) ५६ कविकुतूहल (धौरेय मल्लारि) ५६ कविरहस्य २६ कविरहस्य टीका (रविधर्म) २७ कवीन्द्रकल्पद्रम ५६ कवीन्द्रचन्द्रोदय (कवीन्द्राचार्य) ५७ कह सिद्धच्छन्द (छन्दोविचिति) (विरहाङ्क) कृष्णगीता (सोमनाथ) ४ ३ ५७ • अन्धनामानुकमावत* ग्रन्थनाम प्रन्थनाम ५८ PC कृष्णलीलामृतलहरी (रघुवीर दीनित) कृष्णस्तवराज टीका (भुतिसिद्धान्त मञ्जरी) ४१ कृत्यकल्पतरु (लक्ष्मीधर) ३६,५६ कृत्यरत्नाकर (लक्ष्मीधर) २६ कृतसिद्धविवृत्ति (गोपाल) कागवण्ठाभरण औपासनविधि (अनन्त भ) काणरहस्य (शङ्कर मिश्र) ५६ कात्यायनीतपूत्रपति (पद्मनाभ) कात्यायनश्रौतसूत्र भाष्य (अनन्तदेव) ५५ कात्यायनश्रौतसूत्र भाष्य (काशीनाथ दीक्षित) ३,७ कात्यायनीतपद्धति (बैद्यनाथ मिश्न) कातन्वलघुवृत्ति (भायसेन विद्य) कातन्त्रविचार (वर्द्धमान) ઉર गदम्बरी कादम्बरी टीका (काल) कादम्बरी टीका (मुद्गल महादेव) ५८ कालनिर्णयकारिका (माधव) ३६ कालनिर्णयकारिका टीका (साम्ब) ३१ कालनिर्णयदीपिका (नृमि) कालनिधि (स्थापत्य) (गोपिन्द सूत्रधार) कालमाधकारिकाव्याख्यान (पैजनाय भट्ट सरि) कालमाषयीयविवरण (ततिलक भट्टाचार्य) काव्यकल्पनना टोका मायकौस्तुभ काव्यनिरूपण (रामकृषि) काव्यप्रकाश (मम्मट और अधर) २६ काव्यप्रकाश दीका (भवदेव मिश्र) ३.५० काव्यप्रकाशटीका (गुणराज गणि) ५. काव्यप्रकाशटीफा (परस्पतीतीर्थ या नरहरि) १० काव्यप्रकाशदीपिका (माम्नशिन) काराप्रकाशटोका (काव्यदीपिका) ५ काव्यमाला "काव्यमीमासा (राजशेखर) ह कायादर्शविवेक्निी(रेवा येल्हदेव) १० फिरणावली (हरदत्त) ६०,६५ किरातटीका (प्रकाशवर्ष) कीर्तिकौमुदी १७,२४,२५,०६ कुण्डमाला (जगदीश) कुण्डरत्नाकर टीका (विश्वनाथ) १२ कुण्डोद्योतदर्शन (शङ्कर भट्ट) कुमारपालचरित का पञ्चमसर्ग (जयसिंह मूरि) कुमारपालप्रपन्ध (जिनमण्डल) ६५ फुमारसम्भवटीका (लक्ष्मीरल्लम) २२ कुमारसम्भववृत्ति धर्थालापनिया (लक्ष्मीपल्लम गणि) कुवलयमाला (हरिभद्र शिप्य) ३१ युसुमाग्चयलीला नाटक (मधुसूदन सरस्वती) केशवभट्ट (कश्मीर) का जीवनचरित ६५ कैवल्योपनिषदीपिश (पिवारण्य) कौतुकचिन्तामणि (प्रतापददेय) ५३ चौलपाण्डन (काशीन्पथ गौत्र) ३ में ८ * राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज । ग्रन्थनाम पृष्ठ ग्रन्थनाम पृष्ठ ५८ २७ चन्द्रदृत टीका कंसवध टीका (वीरेश्वर) खण्डनखएखखाद्य (पं. श्रीहप) ४८ खण्डनखण्डखायटीका (विद्यासागर) ५८ खण्डनखण्डखाचटोका विद्यासागरी (आनन्दपूर्ण) ५१ खरतरपट्टावली (क्षमा कल्याण) ३५ खावयण संहिता ४२ खादिरगृह्यसुत्र सटीक (रुद्रस्कन्दाचार्य) गणपतिसहस्रनामव्याख्या (नारायण) गद्यारविन्दवैजयन्ती (गोपीनाथ) ६ गाथासप्तशती टीका (कुलनाथदेव) ५६ (माधव भट्ट) ५६ ग्रहणादर्श पर प्रबोधिनी टीका (बुधसिंह शर्मा) ५२ ग्रहभावप्रकाशटीका (भट्टोत्पल) गृह्यप्रदीपक भाष्य (नारायण द्विवेदी) है गृहवास्तुसार ( ठक्कुरफेस) गायत्रीविवृत्ति (प्रभूताचार्य) ह गीतगोविन्द टीका २७ (कृष्णदत्त मैथिल) ६३ (शेषक्रमलाकर) (शङ्कर मिश्र) ४० गीतातात्पर्य (विठ्ठल दीक्षित) ४२ गुणमन्दारमञ्जरी (रङ्गनाथ) गुणकित्वपोडशिकासूत्र सटीक (गुणविजय) ४६ गुरुचन्द्रोदयकौमुदी (रामनारायण) ५१ गोपालविलास (मधुसूदनयति) ५८ गोभिलगृह्यसूत्र કર गौतमधर्मसूत्रटीका (हरदत्त) ३६ गौरीदिगम्बर प्रहसन (शङ्कर मिश्र) ५८ चक्रपाणिविजय काव्य (लक्ष्मीधर) २७ चण्डीशतकटीका (धनेश्वर)) चण्डीसपर्याक्रम (श्रीनिवास) ४२ चतुर्वर्गचिन्तामणिपरिशेपखण्ड चतुरचिन्तामणि (गङ्गाधर) ५६ चतुर्विशतिप्रवन्ध (राजशेखर) २५,२६ चन्द्रदूत काव्य (जम्बुनाग) ४६ चन्द्रप्रभचरित (सिद्धसूरि) ३२ चन्द्रविजयप्रवन्ध (मण्डनामात्य) ४८ चम्पूकाव्य (समरपुङ्गव) चमत्कारचिन्तामणि (धर्मेश्वर मालवीय) चयनपद्धति (नरहरि) चरक चरक व्याख्या चाक्षुषोपनिषद् ६२ चातुर्जान चिकित्सासारोदधि (नन्दकिशोर मिश्र) चैत्यवन्दनसूत्र सटीक (यशः प्रभ सूरि) ३१ ८ ५२ ४३ छन्दः कौस्तुभ (राधादामोदर कवि) १०,५१,६४ छन्दः शास्त्र (जयदेव)- २८ छन्दः सुन्दर (नरहरि भट्ट) ५१ छन्दोमञ्जरी टीका (वंशीवादन) ४१ छन्दोऽनुशासन (हेमचन्द्र) (जयकीर्ति सूरि) २८ छन्दोऽनुशासन (जिनेश्वर कृत) टीका (मुनि चन्द्र) २८ ४१ * प्रधनामानुक्रमणिका - २६ ४८ ग्रन्यनाम छन्दोनिचिति (विरहाक) जगतसिंहयशोमहाकाव्य (मण्डन भ) ३२ जगदम्बाभरण (ननन्नाथ पण्डित) ५७ जयचन्द्रिका (शियदेव) ३४ जयमाला जातक (सामन-परमहस- परिम्राजकाचार्य) ३३ जातकपद्धति टीका (कृष्णदैवज्ञ) ५२ जातकार्णव (वराहमिहिर) जासकामृत (श्रादिशर्मा) जिनयुगलचरित (जयसिंह सूरि) ३४ जिनशतकपन्निका (साम्यसाधु) ३४ जीवाभिगमाध्ययन टीका (हरिभद्र) ३० जैनतर्कभाषा (यशोविजयगणि) ५४ मैनमतीय रामचरित्र (हेमाचार्य) ५४ जैनेन्द्रव्याकरण जैमिनीयसूत्रभाष्य (वल्लभ) ४४ व्योतिपचन्द्रार्करचि (रुद्रम) ६५ ज्योतिपमणिमाला (केश) टीकाकारसमुच्चय ५२ तीपिका टीका (अद्वयारण्य मुनि) ५२ तभापा टीका (मुरारिमट्ट) तभापाविवरण (माधवमट्ट) (शुविजय) ५० तलक्षण (मणिकात भट्टाचार्य) ५२ एडालक्षणसूत्र (मामवेद) तत्त्वनिर्णय (वरदराज) सतप्रवोध (हरिभद्र) तत्त्वप्रबोधमिद्विसिद्धाञ्जत (हरिहर) ३० तमम्बोध (रामनारायण) तत्वसमास परटीश नत्यसइप्रहपन्जिका (कमलशील) ३० तन्या (ग्मास्वाति) प्रन्यनाम तत्त्वार्थवृत्ति (कररणानुयोग सर्वार्थ- सिद्धि) (पूज्य स्वामी) ६४ तन्त्रमहार्णव ३४ तार्किकरताटीका (सरस्वती तीर्थ) ५२ तिथिनिर्णय (चक्रपाणि) ३६ तिलस्मञ्जरी (ताडपत्रीय) तुरङ्गपरीक्षा (शाङ्गधर) तैत्तिरीयस्वरसिद्धान्तचन्द्रिका (श्रीनिवासी ७ दत्तकक्रमसाह (कृष्णतर्कालकार भट्टाचार्य) ४ दत्तककुतूहल (पुरुषोतम) दमयन्तीचम्मूटीका (चण्डपाल) २७ दमयन्तीविवरण (भएडपाल) दर्शनसत्तरी वृत्ति दर्शपूर्णमासपदार्थदीपिका (काएर साम्राज भट्ट) दर्शपूर्णमासप्रयोग (गोविन्द शेष और अनन्त देव) ८ दशरावप्रयोग (विष्णुगृढ स्वामी दशवशालिक १६ दशश्लोकोटीका (हरिव्यासदेव) ५१ द्वयामुष्यायणदत्तकनिर्णय (विश्वनाथ) ८ द्वयाक्षरनाममाला (मोभरि) दानप्रदीप (माधवम) दानभागवत (कुवेरानन्द) दानवाक्यसमुच्चय (योगीश्वर) दामोदरपद्धति द्राह्मायणश्रौतसूत्रीयश्रौद्गात्र- सोमसुत्र ४ द्वारदीपिका (गोरिन्द मृत्रधार) ४३ दिनकरोद्योतन्यरहार द्विनवदनचपेटावेदाइकुश (हेमचन्द्र) ५५ . 2022 or w is an ८ • राजस्थान में मंरात साहित्य की खोज । (च) प्रन्यनाम प्रन्थनाम ४० द्विसमाधान या राघवपाण्डवीय टीका (धनजय) दुर्वाससःपराजय नाटक (काशीनाथ कवि) ३२, ४७ दुरूशिक्षा (अप्पय्य दीक्षित) ४ दुश्मन टीका ५ ५ (कृष्णाहोशिंगभट्ट) ४८, ५६ देवीमाहात्म्यकौमुदी (रामकृषण) ३६ दैवज्ञविलास (कञ्चवल्लार्य) ३४ दौर्गसिंहकातन्त्रवृत्ति टीका (प्रद्य म्नसूरि) ५० धर्मतत्वकलानिधि (पृथ्वीचन्द्र) ६१ धर्मरत्नकरण्डक (बद्ध मानाचार्य) ३४ धर्मरत्नकरण्डक सटीक (बर्द्धमान) ५४ धर्मरत्नवृत्ति (शान्ति सूरि) ३५ धर्मविन्दुप्रकरण (हरिभद्र) ३१ धर्मविधिप्रकरण (नन्नसूरि) ३१ धर्मशास्त्रसुधानिधि (दिवाकर) ६ धर्मशास्त्रसुधानिधि श्राद्धचन्द्रिका (दिवाकर भट्ट) ४ धर्मसर्वस्व धर्मामृत धर्मोत्तर टिप्पण (मल्लवाद्याचार्य) ३० धर्मोपदेशमाला (जयसिंहाचार्य) ३४ धातुमजरी (काशीनाथ) ५४ नर्त्तननिर्णय ११ नन्दिनेश्वरकारिकाविवरण नन्दिटोका-दुर्ग पर व्याख्या (चन्द्रसूरि) ३१ नलविलासनाटक (रामचन्द्र) ४८, ५७ नलोदयटीका (गणेश कवि) (सर्वज्ञमुनि) ५८ बिबुधचन्द्रिका (मनोरथ) ४० नलोदय सटीक (प्रभाकर मैथिल) ६२ नव्यकाव्यप्रकाश (खीमानन्द) नवग्रहमख (वशिष्ठोत) नवतत्वप्रकरण टीका (धनदेव) ३४ न्यायचन्द्रिका (केशब) न्यायप्रदीप (गोपीकान्त) ५२ न्यायप्रदीपिका (रामदास) न्यायशुद्ध न्यायसार टीका (विजयसिंहसूरि) ३४ न्यायसार टीका-न्यायमाला दीपिका (जयसिंह मूरि) ५२ न्यायसिद्धान्तदीप (शशिधर) ५२ न्यायार्थमज्ञपिकान्यास सटीक (हेमहंसगणि) ५४ न्यायावतारसूत्र (सिद्धसेन-. दिवाकर) ५१ नानाविधकुण्डप्रकार (मल्ल) ४३ नामबन्धशतक (भवदेव) नारदपञ्चरात्र नारायणोपनिषद् भाष्य (सायण) ५ निर्णयसिन्धु निम्बार्कप्रादुर्भाव ६५ निर्भरभीमव्यायोग (रामचन्द्र कवि) ५७ नेमिदूतकाव्य (झन्माण कवि) नेमिदूतकाव्य टीका (गुणविजय) ४८ नैषधकाव्य टीका (विद्याधर) १६,५६ नैषधचरित (श्री हर्ष) नैषधटीका (लक्ष्मण पण्डित) ५६ (गदाधर) ४८ पञ्चप्रन्थी (बुद्धिसागर) पञ्चतन्त्र ६१ पञ्चदशोपनिषद् (रामचन्द्र) १० पञ्चपक्षी (वराहमिहिर) ६५ पञ्चपादिका टीका (विद्यासागर) ५६ पञ्चलिङ्गी टीका (जिनपति) ३४ our ८ * प्रधनामानुक्रमणिका - प्रन्यनाम पृष्ठ प्रथनाम पृष्ठ पञ्चविधिसूत्र पुराणानुक्रमणिका पञ्चसङ्ग्रह (हरिभद्र) पुष्पमालावरिनिर्माण पञ्चायतनप्रकाश (चक्रपाणि) ५३ प्रक्रियासार (काशीनाथ) ५६ पञ्चाशकास्यप्रकरण (हरिभद्र) प्रतापकौतुक (नरहरि भट्ट) पञ्चीकरणोपनिषद् (भवदेव) प्रतापमार्तण्ड (प्रतापरुद्र) ६ पायापथ्यविनोध (स्यदेव) प्रतिनैपधकाव्य (नन्दनन्दन) ५६ पद्मचरित (विमलसूरि) प्रतिष्ठाहेमाद्रि पद्मपद्मिनीप्रकाश प्रतिष्ठोल्लास (शिनप्रसाद) ५,६ पद्यमुक्तावली (गोविन्द भट्टाचार्य) ५६ प्रतिज्ञासूत्र-ज्योत्सना पद्यामृतमरोवर (लक्ष्मण) प्रद्युम्नचरित (सोमकीाचार्य) ५४ पद्यापली (द्विजयन्धु) ५६ प्रयन्धकोप (राजशेखर) २६ पदकौमुदी (नेमिचन्द्र) प्रबोधचन्द्र (गतकलङ्क) ५. पर्वनिर्णय (गणपति राग्ल) प्रयोधचन्द्रोदयकौमुदी पनिर्णय (गङ्गाधर) 8 (सदात्ममुनि) ४० परमानन्दग्लिास (परमानन्द) ४४ प्रबोधचिन्तामणि (जयशेखर) ४३ ४४ परशुरामकल्पसूत्र टीका (तमेश्वर) ७ प्रबन्धचिन्तामणि (मेरुतुङ्ग) परशुरामप्रताप (सानाजी- प्रमाणलक्ष्म-लक्षण (बुद्धिसागर) २८ प्रताप राना) ३६७५६ प्रमाणमञ्जरी (तार्किक चूडामणि) ३३ पराशर टीका-विद्वन्मनोहरा प्रमाणमञ्जरी (स्थापत्य) मल्ल कृत ४३ (नन्दपण्डित) ५६ प्रयुक्तारख्यात मञ्जरी पराशरतुल्य (गङ्गाधर) प्रयोगटीपिका (देवभद्र) पराशरम्मृति-विवृति-विद्वन्मनोहरा ४ प्रयोगसार (विश्वनाथ) परिभाषावृत्ति-ललिता (पुरुषोत्तम) ५० अपचनपरीक्षा (धर्मसागर) परिमापे दुशेखर टीका सर्वमङ्गला ५ प्रश्चनसारोद्धारवृत्ति पृथ्वीचन्द्रचरित (नेमिचन्द्रमूरि) ३० (सिद्धसेनसूरि) ३१ पाम्बएर मु वमर्दनचटिश प्रश्नारली (जडभरत-मुनि (विजयरामाचार्य) माधवानन्द शिष्य) ५२ पाणिनीय द्वयाश्रयविज्ञप्ति लेप प्रशमरति (उमास्नाति) पाणिनीय परिभाषासूत्र प्रशमरति अपरि (हरिभद्र सूरि) ५४ (ध्याडित) ५० प्राकृत छन्द कोप (रत्नशेस्वर) पातम्नलचमत्कार (चन्द्रचूड) प्रास्तदन्दोवृत्ति (रत्नचन्द्र) पारस्करगृह्यकारिका (रेणुकाचार्य) ६२ प्रातपट्टावली (जिनदत्त सूषि) ३१ पारस्कर गृह्यमूरविवरण (रामकृष्ण) ७ प्रास्तपिलालटीका (चित्रसेन भट्ट) ५० परशुद्धि (द्वारकेश) प्रारतम्याकरण (चण्ड) पिण्ड विशुद्धि (जिनमल्लम) प्राकृतविजालर टीका (रलदेव) ५५ - 33 के राजस्थान में संस्न साहित्य की योज - (ज) ग्रन्यनाम ३ ८ ४४ ग्रन्थनाम पृष्ठ प्रातिशाख्यदीपिका (सदाशिव अग्निहोत्री) प्रायश्चित्तप्रकाश (भास्कर राय) ५५ प्रायश्चित्तसार (गोकुलचन्द्र) प्रायश्चित्तचिन्तामणि अपूर्ण प्रायश्चित्तप्रदीपिका केशव) ५५ प्रायश्चित्तेन्दुशेखर (काशीनाथ) प्रासङ्गिक (हरिजीवन मिश्र) ५८ प्रासादप्रतिष्ठा (महाशर्म) प्रेमपत्तनिका (रसिकोत्तमंस) प्रेमसम्पुट काव्य (विश्वनाथ चक्रवर्ती) ६३ फलककल्पलता (नृसिंह कवि) ३३ ब्रह्मदूत काव्य (वाचस्पति भट्टाचार्य) ५८ ब्रह्ममीमांसा भाष्य (कण्ठशिवाचार्य) ४१ ब्रह्मसिद्धिकारिका ३० ब्रह्मसिद्धि टीका ३० ब्रह्मसूत्रभाप्य (भास्कराचार्य) ६५ ब्रह्मसूत्रार्थसङ्ग्रह (शठारि) वालचन्द्रप्रकाश (विश्वनाथ) बालरामायण २६ बौधायनकपालकारिका भावदीपिका (नारायण ज्योतिप) वौधायनकल्पसूत्र टीका (सायण) बौधायनचयनसूत्रव्याख्या (महाग्नि- सर्वस्व वासुदेवदीक्षित) बौधायनवृहस्पतिसवकारिका (गोविन्द) बौधायनशुल्बसूत्रदीपिका द्वारकानाथ यज्वन्) बौधायनस्वर्गद्वारेष्टिप्रयोग (दुण्डिराज) बौधायनश्रौतसर्वस्व (शेषनारायण) बौधायनश्रौतसूत्र भक्तिरसाधिकणिका (गङ्गाराम) १२ भक्तिहंसविवृत्ति (रघुनाथ) ५१ भगवत्प्रसादचरित (दामोदर) भगवतीपद्यपुष्पाञ्जलि ३६ भगवद्गीतामृततरङ्गिणी ३३ भगवद्भक्ति विलास (गोपालभट्ट) १०.५ भट्टिकाव्य २८ भत हरिचरित २८ भत हरि टीका (नाथ) भाख्यादीप (इच्छाराम) भावप्रकाश भावविलास (रुद्रकवि) १० भावार्थदीपिका (गौरीकांतमहावि) १२ भाष्यत्रयवार्तिक (झानविमल सूरि) ३५ भापाभूषणयुत उपमाविलास भारद्वाज या परिशेषमूत्र भारद्वाजसूत्र परिभाषा भिक्षुगीता भूचक्रदिग्विजय (केशवभट्ट) ६५ सक्षरीविकास ४१ मण्डलब्राह्मण पर टीका (सायण) ६ मध्यकौमुदीविलास (जयकृष्ण) ४६ मनुस्मृतिटीका, मनुभावार्थचन्द्रिका या दीपिका (रामचन्द्र) मयूखमालिका (सोमनाथ) १० मरणसमाधि मलमासतत्व (राघवानन्दभट्टाचार्य) ५६ . महापुरुपचरित्र (शीलाचार्य) ३१ महाभाष्यप्रदीप (नीलकण्ठ दीक्षित) ५ महावाक्यविवरण (रामचन्द्र) मातृकानाममाला (सौभरि) मातृगोत्रनिर्णय (लौगाक्षि) माधवकारिकाख्यान (शम्बभट्ट) २६ ५ ५३ ७ • प्रपनामानुक्रमणिका . ग्रयनाम ग्रन्यनाम १० ४८ ३ पृट माधवीयकारिवाविवरण (तर्फतिलक भट्टाचार्य) ५० मानमनोहर (वादिवागीश्वर) मानसोल्लास (गोविन्द) मिताकद्धिान्त (निश्वनाथ मिय)२ मीमासागपारिता (वल्लभ) मीमासा-युतूहल (यमगार) ५ मोमासायप्रकाश (वेगव) मीमासायंप्रदीप (काण्वरावरगुवन) १० मुकुन्दविलास (रघूत्तमतीय) ५८ मुद्रादीपिका (महेनर) मुहूर्तमानण्ड टीका (अनन्तदेव) मूर्याष्टक मूल्याध्याय पर टीवाए (बालपण और दीक्षितवामदेवा) ७ मेघदूतटीया गाररमदीपिका (कमलारर) ४८ मेघदूत यानेमिजिनचरित (विक्रम)५८ मेघाभ्युदयकाव्य टीवा (लक्ष्मीनिवास) ४६ मृगावरातक (क्करणकवि) मृत्युलाङ्गलविधि (मन्त्र) ११ यजुविधान यजु साम्प्रदायिक्चातुर्मासस्य प्रयोग ७ यन्त्रराज टीका (मलयेन्दु मूरि) ५२ यमकमहाकाव्य (गोपालाचाय) ५८ यजतन्त्रसुधानिधि यज्ञदीपिकाविवरण (श्रीभास्वर) ४ योगपयोनिधि (महेश भट्ट) १० योगसमुन्बय (गणपति) योगसुधानिधि (यादवमूरि) ३० योगाख्यान (याज्ञवल्क्य) यौवनोल्लास (उमानन्दनाय) पृष्ठ रघुकाव्यदीपिका-सन्देहविपोपधि (वृष्ण भट्ट) ४७ रघुफाव्यदुर्घटसग्रह (राजकुण्ड) ४७ रघु टीका (धममेर) २७, २,४० रघुवा रघुवर टीका (रत्नगगि) रघुवंशकाव्यत्ति (समयमुदर) ४७ ग्घुवम टीका (गुणविजय गरिण) ४७ "घुवमटीकातत्त्वायदीपिका (नवनीत) ४७ ग्युवमा टीका, पञ्जिका (वल्लन प्रानन्द यति) ४७ रघुपावलीदुर्घटोचय (राजकुण्ड) ५६ रलगुम्फ रत्लदीपिया (चण्डेश्वर) रलपरीक्षा (अगस्त्य) ४५ रत्नाकर (चण्डेश्वर) रत्नावलीमारस्वतपरिभाषा टीका (दयारत्न) ५० रतिरहस्य टीका (सुल्हण) रमकल्पद्रम (चतुर्भुज मिश्र) रसपद्मावर (गङ्गाधर) ४१ रसग्लप्रदीप (रामगज) रमिजीवन (गदाधर भट्ट) राघवपाण्डवीयटीका(लक्ष्मण प०)५८ रामकीतिप्रशस्ति टीका (जनार्दन)४८ रामचन्द्रदशावतारस्तुति(हनुमान) ४८ रामचन्द्रिवा (विश्वेश्वर) रामचरितकाव्य (रघूत्तम) ५८ रामगतक (ठक्कुर मोमेश्वर) रामायणमारमग्रह(श्रीनिवासाचार्य)४ रुद्रकल्पद्रुम (अनन्तदेव) राम काव्य २७ ४८ (ग) * राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज Here ग्रन्थनाम पृष्ठ नन्यनाम पृट ७ ४१ १० रूपनारायणीय(उदयसिंह राजराज) रूपमण्डन (मण्डन सूत्रधार) ४२ रूपावतार (मण्डन सूत्रधार) ४२ रोमावलीशतक (रामचन्द्र भट्ट) ४४ लघुकारिका (विष्णुशर्मा। लघुकारिका (संस्कार प्रतिपादक ग्रन्थ) (विप्गुगर्मा) ४७ लघुकाव्यप्रकाश लघुजातक टीका (वराहमिहिर) ६० लघुजातक वार्तिकविवरण टीका (मतिसागरोपाध्याय) ३४ लघुभागवत (गोस्वामी) ३२ लघुभाष्य (पञ्चसन्धियां) । रघुनाथ) ४६ लघुवाक्यवृत्ति टोका लघुविजयछन्द: पुस्तकम् ५७ लघुस्तव टीका (लध्वाचार्य) लघुसङ्घपट्टक (जिनवल्लभ) ४३ लघुक्षेत्रसमास (हरिभद्र) ३० ३२ लल्लगोलाध्याय और रोमश ४२ ललितविस्तरा (हरिभद्र) ललितास्तवरत्न (शंकराचार्यस्वामी)४ लक्षणसमुच्चय ४२ लाट्यायनश्रौतसूत्र भाष्य (रामकृष्ण दीक्षित) ६३ लिङ्गदुर्गभेद नाटक (दादम्भट्ट परमानन्द) ५७ लिंगानुशासन (दुर्गोत्तम) ३२ लीलावतीकथावृत्ति (वल्लालसेन) ६२ लीलावती टीका (मोषदेव) ५३ लीलावती टीका (परशुराम) लीलावती प्रकाश (वर्द्ध मान) ४७ लौकिकन्यायसंग्रह (रघुनाथदासजी) ५३ व्यक्तिविवेक २८,४८ व्यवहारमार व्याकरण (बुद्धिसागर) वर्णरत्नदीपिकागिक्षा (अमरेश) ४ वराहमिहिर संहिता ४२ वल्लभअणुभाप्य टीका (पुरुषोतम)४४ वर्पतन्त्र या नीलकण्ठताजिक (नीलकण्ठ) ५२ वस्तुपालप्रगस्ति (जयसिह कवि) १६ वाक्यभेदविचार (अनन्तदेव) वाक्यप्रकाश (उदयवर्म) ५० वाक्य-प्रदीप टीका (पुष्पराज) ५६ वाक्यसुधा पर टीकाएं (ब्रह्मानन्द भारती और शंकर) १० वाग्भटालङ्कार टीका, ज्ञानप्रमोदिका (प्रमोदगणि) ५१ वाग्भटालारवृत्ति (वाचकज्ञान प्रमोदगरिण) ४१ वाचारम्भरण (नृसिहाथम) ६५ वाजपेयपद्धति (रामकृष्ण अपरनाम नाना भाई) ४ वार्षिण सहिता वास्तुतिलक ४३ वास्तुमञ्जरी (नाथ सूत्रवार) वास्तुराज (राजसिह सूत्रधार) ४३ वासवदत्ता टीका (नारायण) (प्रभाकर) वासुदेवहिन्डी (खण्ड १) (कुक्कोक) ६२ वासुपूज्यचरित (वर्द्धमान) विक्रमाङ्कदेवचरित लटकमेलक प्रहसन ४३ ४७ ५३ ४२ १४ • प्रयनामानुक्रमणिका. (2) ग्रयनाम पृष्ठ ग्रन्यनाम पृष्ठ १० ५४ ५२ ४८ " ४५ विवारसागर विचारसग्रह (कुलमण्डन) विजयप्रशस्ति काव्य विजयपारिजात (हरिजीवन मिथ)५८ विद्यागोपाल-चरणाचनपद्धति (चिदानन्दनाथ) विद्यादपरण (हरिप्रसार) विद्यालयम्यान (जयवल्लभ कवि) ५४ विद्वद्भपण टीका (शम्भुदाम) ४० विद्विनोद टीका विदग्धमुपमण्डन टीवा (नरहरि भट्ट (ताराभिघ पपि) (सार्वभौम भट्टाचार्य) ६० विनोदसद्गीतसार विपायमूत्रवृत्ति (अभयदेव) ३१ विवुधमान (हरिजीवन मिथ) ५८ विरहिणीप्रलापवेलि (जगदर) २७ विरहिणीमनोविनोद विनय (विनायक ?) कवि ७ विरदावली(कालिदास अक्वरीय)४४ विलामसहिंता विवादचद्र विवेकमञ्जरी (प्रासह) विवेकमारी टीका (बालचद्र) ३४ विवेक्मातण्ड (गोरखनाथ) विवेकसार (रामेन्द्र) विवेकमारटीका लक्ष्मीरामनिवेदी)१० विश्ववल्लभ (चक्रपाणि मिय। विश्वेशलहरी (खण्डराज) १० विशिष्टाद्वैतसिद्धान्त (श्रीनिवास) १० विशिष्टाद्वैतसिद्धान्त (धीनिवासदासानुदास) ५१ विमम्वादशतक (समयसुन्दर) विगृपूजनपद्धति (हरिद्विज) विष्णुभक्तिचन्द्रोदय (विश्वेवरतीय) विष्णुगतपदीस्तोगविवरण (राममद्र) ८ वीरमित्रोदय-परिमापाप्रकार वेदाङ्गज्योतिप पर टीपा (शेष) ४ वेदान्तकौस्तुम (श्रीनिवासाचाय) ६५ वेदान्तप्रक्रियाहार (कूर्म) वेदान्नरत्नमञ्जूषा (पुरपोत्तम) ६५ वेदान्तमूपद्रुम । पुग्पोत्तम) ६५ वेदान्ताधिकरणमाला(पुग्पोत्तम) ४४ वैद्यभाम्बरोदय (धन्वन्तरि) वैराग्यपञ्चाशतिका (सोमनायरवि) वैष्णवधममोमासा (केशवभट्ट) ६५ वणवधममुरद्र ममञ्जरी (सङ्घपणशरण) ३६ वृत्तमारिणक्यमाला (निमस) ६४ वृत्तमुक्तावली । मल्लारि) १०,५६ वृत्तमुक्तावलीतरल मिलारि) ५६ वृत्तरत्नाकर (चिरञ्जीव) वृत्तरत्नाकर टीका मुल्हण) ६२ (कण्ठसूरि) ६४ वृत्तरत्नाकरवृत्ति (सुल्हण) वृत्तसार (पुष्कर मिश्र) वृत्तिदीपिका कृष्णमुनि) वृद्धगार्गीय (ज्योतिषशास्न) ५२ वृन्दावनकाव्य सटीक वृहज्जातक टोका-करली ४२ वृहत्तप्रकाश-शब्दपरिच्छेद वृहद्वामनपुराण ३२ ३ ५६ , ४३ (ठ) * राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज ग्रन्थनाम पृष्ठ ग्रन्यनाम पृष्ट वृहज्ज्ञान कोष ४० ह ५ ५ ४० ५ वृहत्क्षे त्रसमासवृत्ति (सिद्धमूरि) ३१ १४ श्रवणभूषण (नरहरि) श्राद्धगणपति श्राद्धदीपिका (काशी दीक्षित) श्रीसूक्तभाष्य (लिङ्गण भट्ट) श्रौतोल्लास (शिवप्रसाद पाठक) शृङ्गारतरंगिणी (मूर्यदाम) शृङ्गारतिलक टीका, रसतरंगिणी (गोपाल भट्ट) ५६ शृङ्गारदर्पण (पद्मसुन्दर कवि) ६१ शृङ्गारपञ्चाशिका (वारणीविलास दीक्षित) ५७ शृङ्गारवैराग्यतरंगिणी (सोमप्रभाचार्य) ५५ शृङ्गारवैराग्यतरंगिणी टीका (नन्दलाल) ५५ शृङ्गारहार (हम्मीर महाराजाधिराज) ६० शृङ्गारसरसी (भावमिश्र) ५६ शृङ्गारसञ्जीवनी (हरिदेव मिश्र) ५१ श्यामशकुन (कुक्कोक) ६२ श्येनिकशास्त्र (रुद्रदेव) ५३ श्लोकयोजनोपाय (नीलकण्ठ) श्लोकवार्तिक शतश्लोकीकाव्य (राक्षषमनीषी) ५८ शब्दप्रकाश (माधवारण्य) शब्दवोधप्रकाशिका(रामकिशोर) ५ शब्दलक्ष्यलक्षण (बुद्धिसागर) २८ शब्दलक्षरण (वररुचि) ४९ शब्दशोभा (नीलकण्ठ) ४९,५७ शरीरस्थान सटीक (अरुणदत्त) ३४ गाकुलल २६ गाण्डिल्य संहिता ११५१ गाङ्ग घर टीका (बाढमल्ल) ६४ शाङ्गधरदीपिका (सामना) गास्त्रदीप शिवचरित (हरदत्त) निवभक्तिरसायन (कागीनाथ) गिवसिद्धान्तगेखर (कागीनाथ) ५ शिवमूत्रवार्तिक (वरदराज) शिवार्चनचन्द्रिका शिशुपालवधमार टोका (वल्लभ) ४७ शिशुवोधकाव्यालङ्कार (विष्णुदास कवि) ५६ शुद्धिपदपूर्वकचन्द्रिका (शुद्धिचन्द्रिका) (नन्दपण्डित अपरनाम विनायक) ४ गौनकीयविवाहपटल ५२ पट्कारकपरिच्छेद (रत्नपाणि) ५० पडङ्गव्याख्या (भवदेव) पड्भापाविचार स्थानाङ्गमूल-शुद्धि-विवरण (देवचंद्र) ४२ स्थानांगवृत्ति (मेघराज मुनि) ५४ स्नानसूत्र भाप्य (छाग) स्मृत्यर्थसार स्मृतिकौस्तुभ-राजधर्म स्मृतिदर्पण (सरस्वती तीर्थ) स्मृतिप्रवन्धसंग्रह श्लोक (गंगारामजड़ी) ३६ स्मार्तोल्लास (शिवप्रसाद पाठक) 8 स्यादिशब्दसमुच्चय (अमरचन्द्र) ३४ स्वानुभूतिनाटक (अनन्तपण्डित) ६ ६ ४ ५ ४ ". अन्यनामानुक्रमणिका . (ड ) ग्रन्थनाम पृष्ठ E ३४ ३ ४० सगीतमकरन्द विदबुद्ध) ६० सगीतरलाकर टीका (सुधाकर) (मिह भूपाल) ६० सगीतमारकलिका (मोपदेव) सगीतसारसर्वस्व (हृदयेग) ३० सदाचार-स्मृतिप्रमाणसग्रहणी टीका (मानन्दतीर्थ) ५१ सन्मति टीका (अभयदेव) सन्यासपद्धति (विश्वेश्वरसरस्वती) ४ सप्तति टीका (मलयगिरि) सप्तपदार्थी टीका ५ सप्तव्यसनकया (सोमकोति) ३४ सभ्यालकरण (गोविन्द भट्ट) सम्बन्धोद्योत (रभमनन्दी) सन्मतिसूत्र (सिद्धसेन दिवाकर) ३१ सम्वत्सरोत्सव-काल-निर्णय (पुरुषोत्तम) ५३ सम्वादसुन्दर ४०,४६ सम्वेगरगशाला (जिनचन्द्रसूरि) ३१ समरमारनाटक सटीक (शुमचद्र) ३४ समयमार टीका (भारत) ५२ समराङ्गण सूत्रधार (भोजदेव) ६५ समरादित्य चरित (हरिभद्र). ३१ सवदेवताप्रतिष्ठाकर्मपद्धति मर्वसिद्धात प्रवेशक सर्वानुक्रमणिकापरिभापोदाहरण ६ सर्वालङ्कार संग्रह (अमृतानन्द) ४१ सश्राद्धदाग भाप्य सहृदयानन्द (हरिजीवन मिश्र) ५८ सहम्माधिकरणसिद्धान्तप्रकाश (शकर भट्ट) ५६ सग्रहणी टीका (मलयगिरि) ३४ ग्रन्यनाम पृष्ठ सग्रहणी सटीक (शालिभद्र) सग्रहणीतून (हरिभद्र) सन्ध्याविवरण (रामात्रम) सस्कारगरणपत्ति (काण्ड १-२) सस्काररत्नमालाभाप्य (गोपीनाथ) सक्षेपशारीरक टीका (पुरुषोत्तममिथ अग्निचित) ४१ सक्षेपसार टीका (विनायक भट्ट) ६ सज्ञातन्त्र (नीलकण्ठ) ५२ सादस्यतत्त्वदीप (वासुदेवद्विवेदी) ७ सार्द्धशतकवृत्ति (अजितसिंह) सामविधान (सायण) सामसूत्रवृत्ति सामुद्रिक (दुर्लभराज) सामुद्रिकतिलक (दुर्लभराज) सारस्वत टीका (तर्कतिलक भट्टाचार्य) ४० सारस्वतसार टीका मिताक्षरा (हरिदेव) ४६ सारस्वतसूनवृत्ति (तर्कतिलक) ४६ सारसग्रह (शम्भुदास) सारसग्रह (शिववैद्य) साहित्यकल्पद्रुम (कर्णसिंह) साहित्यसूक्ष्मसारणी सटीक मिक्न्दर-साहित्य (रघुनाथ मिश्र) ६५ मिद्धसिद्धान्तपद्धति (गोरक्षनाथ) १० सिद्धहेमचन्द्राभिधान (अभयतिलक गणो) ५४ सिद्धान्तकौस्तुभ सिद्धातबोधप्रकाश (जगन्नाथ देवज्ञ) ४२ सिद्धातरलावली (हरिव्यास देव) ६५ ४ (ढ) 64 * राजस्थान में संस्कृत साहित्य की खोज * ग्रन्थनाम पृष्ठ ग्रन्यनाम पृष्ठ १० ४ ६ सिद्धांतशिरोमणी ५२ सिद्धातसारोद्धार (कमलयमोपाध्याय) ५४ सिद्धांतसिन्धु (नित्यानन्द) सिद्धातसुन्दर गणिताध्याय (ज्ञानराज) ४२ सिद्धांतसग्रहभूषा (शाति सूरि) ३५ सिहसुधानिधि (देवीसिह) सीतामरिणमञ्जरी (रामानन्दस्वामी)५८ सुकृतकल्लोलिनी (उदयप्रभ) सुकृतसङ्कीर्तन २,६, (अरिसिह) १६,१७,२६ २७ सुदर्शनसहितायां पार्वतीश्वर- सवादे उग्रास्त्रविचारः ११ सुन्दरप्रकाश शब्दार्णव (पद्मसुन्दर) ५० सुन्दरीशतक (गोकुल भट्ट) ५७ सुभाषितमुक्तावली (हरजीव्यास) ४७ सुभाषितरत्नाकर (उमापति पं०) ५६ सुभाषितसारसंग्रह (ठाकुर मिश्र) ४० सुवृत्ततिलक ६५ सुश्रुत ५२ सूक्तानुक्रमणिका (जगन्नाथ) सूक्तिमुक्तावली (विश्वनाथ) ५६ सूक्तिमुक्तावली (लक्ष्मण) ५९ सूक्तिरेणी (गुणविजय) ५४ सूर्यसिद्धांत ६३ सूक्ष्मार्थविचारसार (जिनवल्लभ) ३४ सेवनभावना (हरिदास) सोमशतकप्रकरण (सोमप्रभाचार्य)५४ हनुमन्नाटक टीका (राघवेन्द्र) हम्मीरकाव्य (नयचन्द्रसूरि) १८,६१ हमीरमदमई न (जर्यासह) १८ हरविजय (ताडपत्रीय) ३२ हरिविक्रमचरित महाकाव्य (जयतिलक) ३५ हरिहरभूपरण काव्य (गङ्गाराम कवि) ४० हितोपदेश टीका (गोकुलचन्द्र) १० हितोपदेश वैद्यक (कण्ठशम्भु) ३८ हितोपदेशामृत (मागधी) हिरण्यकेगीय अग्निमुख हिरण्यकेशीय स्मार्तप्रयोगरत्न (वैशम्पायन महेश भट्ट) ४ हेरम्योपनिपद होत्रप्रयोग (व्यङ्कटेश अपरनाम नारायण) ७ हौत्रालोक (शिवराम) हसदूत काव्य क्षीरार्णव (विश्वकर्मा) ४३ क्षेत्रसमास टीका (मलयगिरि) ३४ त्रयीजगत्रयी कल्प त्रिकालज्ञान विश्वप्रकाश चूड़ामणि (टीका) ४२ त्रिस्थलीसेतु गयाप्रकरण (रामभट्ट आकूत) ४ ज्ञानदर्पण (निम्बार्क) ६४ ज्ञानदीपिका (प्रायश्चित्त) (शङ्कराचार्य) ८ ज्ञानार्णव (शुभचन्द्र आचार्य) ५४ ७ ५७ ७ ४ ४८ १० जैसलमेर के हस्तलिसित सस्कृत-ग्रयों के प्रसिद्ध भण्डारो के विषय मे डॉ० हूलर का अभिमत [लिन एकेडमी के कार्य-विवरण, मार्च १८७४ से श्री शहर पाडुरङ्ग, पडित एम ए उपजिलाधीश, सूरत द्वारा अग्रेजी में अनूदित J* प्रो. वेयर ने जैसलमेर मन्दिर रे हातलिखित प्र पनाग्रह के विषय में प्रो जे लर पायोमानेर रोलिसित ता० १४ फरयरी पा पत्र प्रस्तुत किया था।' गरासमेर में, जिसको नाप सगना यारहयों सताब्दी में मध्य में नाटो राजपूों को प्राचीन राजधानी सोदया ये विष्यसमें पचात् रक्सी गई थी, शियों की एक यही तो है। परम्परागत अनुपति के अनुसार हा लोगों के पूयर राजपूतों ये साप सादया मार्य और हीं से पारसनाप (पावाय) पोए प्रति पवित्र मनि को भपने माय जममेर में साये। मूति के लिये जिनभद्रमूरि पत्यायपान में नहीं गता में एम देवालय । निर्माण हुमा, जिसमें कमा ६ मदिर विभिन्न तीरों को प्रतिष्ठा हेतु और जोएं । समन्दिर और समस्त राजपूताना, मालया एय मध्यनारस में अपना यापार घार रपयों पे सान्दनाहार मान पाले अन समाज द्वारा जगलमेर ने जापपरे मुग्य स्थान पमै सरी प्रसिद्धि प्राप्त की है परत, यहाँ पे मार पर्यात पुनरामयपी याति मिल १२ से गणत्र पसी है जो कि गुजरातियों पे मनायगार ससार रेगनी ऐमे भारों में घर पर है। प्राए मेरो माया रे मु'य नईयों में में हार प्रतीप्रति प्राप्त साधर गरी सामाजिदिन तर पचापा। पोरी पठTIE पास में हमएम्पको गुमाने में सपस प्रा और शाम ना कि भातार fairn विप में पत पु" पायदा कराया है,पितु उस मामपालय महामान है। ६.५ प एरपति द्वारा सपारको प्राचीन गधी के प्रागार रामरो में .२२ विधि र पोनो पुप मने देगा माट ज्ञात होता है जिपर मोहरी यसपना ईपीपौर इस समय विद्यमान प्रापीमा ५० म ६. तर • आदर-धो पुरषोरामलाल मेनारिया, एम , माहिया ' T U rfor'न एटीपवरी । १०४ ArAR: तार सप मात्रा पर राम गामा दिम १२१० को गईhrefrnोदिम नगरrfare'-I.!"
[ २ ] थी। इन हरतलिखित ग्रन्यो मे से अधिकांश ताद-पत्रों पर लिखित है और इनकी तिथियां बहुत प्राचीन काल तक गई हुई है। वर्तमान में तो किसी समय के गौरवपूर्ण सग्रह का प्रय- शेष मात्र रह गया है । इस भण्डार में अब भी सुरक्षित ताडपत्रीय प्रन्यो के लगभग ४० बस्ते अर्थात् घण्डल; बिखरे प्रौर त्रुटित ताडपत्रों का एक बड़ा ढेर; कागज पर लिये ग्रन्थों से भरी हुई चार या पांच छोटी पेटिणं और फटे तथा अस्त-व्यस्त कागजों के कुछ दर्जन बण्डल है। पूर्ण रूपेण सुरक्षित ताडपत्रीय ग्रन्थो में, जो मभी एफ शैली में नहीं किन्तु एक ही लेखनी द्वारा लिखे गये है, बहुत थोदी जैन रचनाएं हैं । इनमें से यहां फेदन धर्मोत्तरवृत्ति, कमला शीलतर्क, प्रत्येक वुद्धचरित, विशेषावश्यक और सूत्रों के कतिपय प्रंश एवं हेमचन्द्र- व्याकरण (अध्याय १-५) पा एक बड़ा भाग तथा अनेकार्थ-सग्रह की एक टीका है, जो हेमचन्द्र को समस्त कृतियो को टोकाओं के रूप में स्वयं ग्रन्यकार द्वारा निर्मित हुई है। अन्तिम कृति का शीर्षक अनेकार्थ-फरव.कौमुदी है। इसकी खोज इस सीमा तक महत्त्वपूर्ण है कि अनेकार्थ-कोश को प्रामाणिकता अब तक सन्देहास्पद रही है और अब इनकी प्राप्ति के पश्चात कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता। शेष ताडपत्रीय ग्रन्थों में काव्यालंकार, न्याय और छन्द-शास्त्र प्रादि ब्राह्मण ग्रन्थ है। महाकाव्यो में रघुवंश एवं नेपघीय [चरित] है जिनमें से अपर काव्य की विद्याधर रचित एक प्राचीन और दुर्लभ्य टीका है (देखें- गुजरात के हस्तलिखित संस्कृत ग्रन्यों का सूचीत्र न० २, पृ० ६०, ग्रन्यांक १२४) । फिर वहां जयमङ्गल कृत टीका सहित भट्टि फान्य भी है इनके अतिरिक्त हमें निम्नलिखित नवीन और बड़ी कृतियां उपलब्ध हुई : विल्हन अथवा विल्हण 'कृत विक्रमाजूचरित, उपेन्द्र हरिपाल फुत गौड़वधतार और भट्ट लक्ष्मीधर कृत चक्रपाणिकाव्य । २ इनमें से विक्रमाचरित सर्वोपरि महत्त्व का है । यह ऐतिहासिक कृति है, जिससे सोमेश्वर प्रथम अपरनाम पाहवमल्ल, सोमेश्वर द्वितीय अर्थात् भुवनफमल्ल और विक्रमादित्यदेव अपर नाम त्रिभुवन मल का इतिहास प्राप्त होता है।४ तीनों ही के विषय में सुप्रसिद्ध है कि वे ११वीं शताब्दी में दक्षिण में कल्याणकटक के शासक थे और चालुक्य वश से सम्बद्ध सोलंकी नाम से विशेष प्रसिद्ध थे। बिल्हण ने अपना स्वयं का इतिहास भी पर्याप्त विस्तार के साथ लिखा है और वह कहता है कि विक्रमादित्यदेव ने उसको विद्यापति की उपाधि प्रदान की थी। ज्ञात होता है कि उसने इस ग्रन्थ का निर्माण अपनी वृद्धावस्था में विक्रमादित्य के शासनकाल में किया, फलस्वरूप वह उस राजा के इतिहास का केवल अंश मात्र लिख सका। इस काव्य के १८ सर्ग है और इसमें २५४५ १ १ स्यात् यह रचनाकार का नाम है । विचारणीय है कि रघुवंश के अनेक टीकाकारो ने जयमङ्गला टीका और इसके कर्ता का जयमङ्गलाकार के रूप मे उल्लेख किया है। २ राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर द्वारा "राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला" मे प्रका- शित, ग्रन्थाङ्क २० । -हि० अनु० । 3 देखे-इण्डियन एण्टीक्वेरी, वो. १, पृ० १४१ । 6 वही, पृ० ८१-८३, १५८ और वो० २ पृ० २६७-६८ । , श्लोक है। विम्हण ने रघुवन को प्रादर्श मान कर प्राय प्रत्येक सग में छद-परिवतन किया हैं। यह कहता है कि उसने वैदर्भी रोति में यह काव्य लिखा है कि तु उसको भाषा बहुत कठिन है । उसके शब्दाडम्बर से काध्य को प्रभावगीलता में यूनता मा गई है। फिर भी इसमें कतिपय पद ऐसे हैं जो वास्तव में कवित्वपूर्ण है और हमारी इचिों के अनुकूल लिसं गये हैं। इनके अतिरिक्त हमें अनेक सूत्रों द्वारा पहले से ज्ञात विक्रम के सामरिक अभियानों के साथ और भी बहुत सूचनाए मिलती हैं जो बहुत मनोरन्ना है । इस प्रकार हमें ज्ञात होता है कि सोमेश्वर द्वितीय विद्यम का ज्येष्ठ नाता या और इसी के द्वारा वह सिंहासनच्युत किया गया था। बिल्हण ने सोमेश्वर का चित्रण एक पागल प्राइमी के रूप में दिया है जो अपने अधिक प्रतिभा सम्पन्न भाई के प्रति घोर घृणा- भाव को वह्न करता था और परिणामत जिसने कल्याण से पलायन के पश्चात् उसको पट फर दिया । पठिनाई पूवक और केवल कुलदेवता शिव की प्राज्ञा से ही विक्रम उसके भाई के विरुद्ध युद्ध कर सफा था । युद्ध में यह विजयी हुप्रा और उसने सोमेश्वर को दी बनाया। दूसरा रचिफर प्रसङ्ग एव स्वयवर का वणन है, जो करहाटपति की पुत्री द्वारा प्रायोजित किया गया पौर जिसमें उसने विक्रम को अपना पति चुना। विहण ने अपने स्थय के इतिहास में इस बात का दुप प्रकट पिया है कि वह घारापति भोज के पास न जा सका । भोज और मुन्न की उदारता की प्रशसा की गई है । जब मैं भोज का प्रसङ्ग देता तो यह बता देना उपयुक्त होगा कि हमने एक ब्राह्मण मे भोग का फरण प्राप्त किया है जिसका समय शक सपत ६६४ (१०४२ ई०) है, साप ही जैसलमेर कण्डार में इस महान परमार राजा के प्रेमाख्यान का एक प्रा है जिमका शीपक शृगारमन्जरीफयानक है । क्यामि विक्रमाद्वपरित मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगा इसलिये मने स्वय इमको प्रतिलिपि करने का निश्चय किया और यह काप अपने सहपानी' मित्र डॉ० जेकोषो की सौहादपूण सहायता से पूरा मोलान करने सहित सात दिन म पूर्ण हुआ। प्रय बहुत सुदर है, इसमें स्था-स्थान पर गोश्न धौर टिप्पणिया मङ्कित है । इस पर लेसन-मयत प्रङ्कित नहीं है। परतु एक पश्चात्लस में लिखा है कि यह एय सेटमल्ल प्रौर जेठसिंह के द्वारा स. १३४३ में खरीदा गया था। पौडवघसार एक विस्तृत प्राकृतकाव्य है, इसमें राजा यशोवमन को प्रशस्ति है। प्रति में दोका और सरहत छाया भी दी गई है। अन्य का विभाजन सों में न हो कर फुसकों में हुमा ह। चक्रपाणिभाव्य जिसमें विष्णु का गुणगान हुआ है, अधिक विस्तार का नहीं है। सभवत इसका ममय ग्यारहवीं शताब्दी से बार का है। इनके अतिरिक्त भण्डार में चार नाटक भी है जिनके नाम प्रचोपचोदप, मुद्राराक्षस, वेणीसहार और अनघराघर है। प्रतिम नाटक सटीक है। गद्यकाव्यों का प्रतिनिधित्व सुबघु कृत वासवदत्ता द्वारा होता है । अलङ्कार- नास्त्र के बहुत महत्त्वपूर्ण प्रय प्राप्त होते है । ज्ञात कृतियों में दण्डी यिस० ११६१ (११०५ ई०) या काव्यादश है। मम्मट का काव्य प्राश भी सोमेश्वर को टीका सहित प्राप्त है जो, म समन्ताह एक नई टीश है। इनके अतिरिक्त चामनाचार्य पृन उदभटाल- 1 दखिये-यो० ३,५००६-१०।
डी. लिट् । राजस्थान पुरातन ग्रन्थ-साला प्रधान सम्पादक-पभश्री मुनि जिनविजय, पुरातत्त्वाचार्य प्रकाशित अन्य १. संस्कृत, प्राकृत. प्रपन्नश १ प्रमाणसंजरी, तातिवाचूडामणि मर्वदेवाचार्य हत, सम्पादक - मौमांगन्यायरी पं० पट्टाभिरामशास्त्री, विद्यासागर । मूल्य-६.०० २. यन्त्र राजरचना, महाराजा-सवाई जयसिंह-कारित । नम्पादय-ग्य पं० फवारनाथ ज्योतिविद, जयपुर। मून्य-१.७५ ३. महपिपुलवैभवम्. स्व० पं० मधुसूदनयोना-पगीत, भाग १, सम्पाद-म प० गिरिधरगर्मा चतुर्वेदी। मूल्य-१०.. ४. महर्पिकुलवैभवम्, स्व० पं० मधुसूदन भोझा प्रणीत, भाग २, गूगमात्रम् गाबाद-70 श्रीप्रद्युम्न प्रोझा। मूल्य-४.०० ५. तर्कसंग्रह, अन्तंभट्टकृत, सम्पादक-गॉ. जितेन्द्र जेटनी, एम ए., पी-एन. डी., मूग-३.०० ६. फारकतंबंधोद्योत, पं० रभमनन्दीत, नम्पादक-डॉ० हरिप्रमाद नारत्री, एम. ए., पी-एच डी.। मूल्य-१.७५ ७. वृत्तिदीपिका, मोनिकृष्णभट्टयात, गम्पादक-रव.पं. पुरुषोत्तमार्मा चतुर्वेदी, माहित्याचार्य । मूल्य-२.०० ८. शब्दरत्नप्रदीप, अज्ञातफतृक, सम्पादका-कॉ. हरिप्रसाद शास्त्री, एम. ए., पी-एच.डी. मूल्य-२.०० ६. कृष्णगीति, कवि सोमनाथविरचित, सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्प-१.७५ १०. नृत्तसंग्रह, प्रजातकर्तृक सम्पादिका-डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए., पी-एच. डी., मूल्य-१.७५ ११. शृङ्गारहारावली, श्रीहर्पकवि-रचित, सम्पादिका-ॉ. प्रियवाना शाह, एम. ए., पी-एच.डी., डी.लिट् । मूल्य-२.७५ १२. राजविनोदमहाकाव्य, महाकवि उदयराजप्रणीत, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायगा बहुरा, एम. ए., उपसञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-२.२५ १३. चक्रपाणिविजय महाकाव्य, भट्टलक्ष्मीधरविरचित, सम्पादया-पं० श्रीकेगवराम कागीराम शास्त्री। मूल्य-३.५० १४. नृत्यरत्नकोश (प्रथम भाग), महाराणा कुम्भकरणंहात, मम्पादक-प्रो. रसिकलाल छोटा- लाल पारिख तथा डॉ. प्रियवाला शाह, एम. ए, पी-एच. डी., डी. लिट् । मूल्य-३.७५ १५. उत्तिरत्नाकर, साधमुन्दरगरिणविरचित, सम्पादक-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजयजी, पुरा- तत्त्वाचार्य, सम्मान्य संचालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर । मूल्य-४.७५ १६. दुर्गापुष्पाञ्जलि, म०म० पं० दुर्गाप्रमादद्विवेदिकृत, सम्पादक-पं० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी, साहित्याचार्य । मूल्य-४.२५ १७. कर्णकुतूहल, महाकवि भोलानाथविरचित, इन्हीं कविवर की अपर सस्कृत कृति श्रीकृष्ण- लीलामृत सहित, सम्पादक-प० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम. ए., मूल्य-१.५० १८. ईश्वरविलासमहाकाव्य, कवि कलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचित, सम्पादक-भट्ट श्रीमथुरा- नाथशास्त्री, साहित्याचार्य, जयपुर । स्व. पी के. गोड़े द्वारा अग्रेजी मे प्रस्तावना सहित । मूल्य-११.५० १६. रसदीपिका, कविविद्यारामप्रणीत, सम्पादक-पं० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम.ए. मूल्य-२.०० २०. पचमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्टविरचिव, सम्पादक-भट्ट श्रीमथुरानाध शास्त्री, साहित्याचार्य । मूल्य-४.०० २१ काव्यप्रकाशसंकेत, भाग १ भट्टसोमेश्वरकृत, सम्पाo-श्रीरसिकलाल छो० पारीख, अग्रेजी में विस्तृत प्रस्तावना एव परिशिष्ट सहित मूल्य-१२०० २२. काव्यप्रकाशसंकेत, भाग २ भट्टसोमेश्वरकृत, सम्पा०-श्रीरसिकलाल छो० पारीख, मूल्य-८.२५ [ २ ] " " . २३ वस्तुरनकोष प्रातकतक, सम्पा०-डॉ० प्रियवाला शाह । भूल्य-४०० २४ बाकण्ठवधम, प० दुर्गाप्रमाद्विवेदिकृत, सम्पा०-१० श्रीगङ्गाधर द्विवेदी । मूल्य-४०० २५ धो भुवनेश्वरीमहास्तोत्र, ममाप्य, पृथ्वीधराचायविरचित, पवि पद्मनाभकृत भाष्य- महित पूजापञ्चाङ्गासिनित । सम्पा०-प योगोपालनारायण बहुरा। मूल्य-३७५ २६ रलपरोक्षावि सप्त प्रप-सग्रह ठक्कुर फेक विरचित, सशोषक-पद्मश्री मुनि जिन विजय, पुरातत्त्वाचाय। मूल्य-६२५ २७ स्वपभूध द, महाकवि स्वयमूहत, मम्पा० प्रो० एच डी वेलणकर 1 विस्तत भूमिका (अग्रेजी में) एव परिशिष्टादि सहित मूल्य-७७५ २८ वत्तजातिसमुच्चय पवि विरहारचिता मूल्य-५२५ २६ रुधिदपण, अनातात , मूल्य-६०० ३० फर्णामृतप्पा भट्ट सोमेश्वर कृत सम्पा०-पद्मश्री मुनि जिनविजय । मूल्य-२२५ २ राजस्थानी और हिन्दी ३१ पाहडदेप्रमय, महावि पद्मनाविरचित, सम्पा०-प्रो० के वो ध्यास, एम ए। मूल्प-१२२५ ३२ श्यामया रोमा, अविवर जान-रचित, सम्पा०-डों दशरथ शर्मा मौर श्रीनगरचन्द नाहटा। मूल्य-४७५ १३ लाथा-रासा, चारण कविया गोपालदानविरचित, सम्पा०-थोमहताब द सारंड। मूल्य-३७५ ३४ यांकीदासरी ज्योत, पविराजी वाकीदासरचित, सम्पा-श्रीनरोत्तमदास स्वामी, एम ए , विद्यामहोदधि। मूल्य-५५० ३५ राजस्थानी माहिायतग्रह, भाग १, सम्पा०-श्रीनरोत्तमदास स्वामी, एम ए । मूल्य-२२५ ३६ राजस्थानी साहित्यसग्रह, भाग २, सम्पा०- to-श्रीपुरुषोत्तमलाल मेनारिया, एम ए, साहित्यग्ल। मूल्य-२७५ ३७ क्वीद्र कल्पलता, कवीद्राचाय सरस्वतीदिरचित, सम्पा०-श्रीमती रानी लक्ष्मी- कुमारी चूडावत । मूल्य-०० ३८ जुगलविलास, महाराज पृथ्वीमिहकृत, मम्पा०-योमती रानी लक्ष्मीकुमारी चूडावत। मूल्य-१७५ २६ भगतमाळ, ब्रह्मदासजी चारण वृत्त सम्पा-श्री उदराजजी उज्ज्वल । मूल्य-१७५ ४. रावस्था पुरातत्व मदिरके हस्तलिचित प्रयोको सूची, भाग १ मूल्य-७५० ४१ राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठानके हस्तलिम्पित प्रत्योंकी सूची, भाग २॥ मूल्य-१२०० ४२ मुहता नणसीरी स्यात, भाग १, मुहता नसीहत सम्पा० श्रीबद्रीप्रसाद सावरिया। मूल्य-८५० २, ४४ रघुवरजसप्रकारा, सिनाजी प्राडाकृत, सम्पाo-श्री सीताराम लाळस । मूल्य-६५० ४५ राजस्थानी हस्तलिखित प्रय-सूची भाग १ स पप्रश्री मुनि श्रीजिनविजय । मूल्य-४५० मूल्य-८२५ ४६ राजस्थानी हस्तलिखित प्रष-सूची, भाग २ -सम्पा०-श्री पुरषोत्तमलाल मेनारिया एम ए, साहित्यरत्न ४७ धीरवाण, ढाढी वादरकृत, मम्पाo-श्रीमती रानी लदमीकुमारी चूडावत । मूल्य-२७५ ४८ स्व० पुरोहित हरिनारायणगी विद्याभूषण-प्रय-सप्रह-सूची, सम्पा०-श्रीगोपाल नारायण मूल्य-४५० बहरा, एम ए और श्रीलक्ष्मीनारायण गास्वामी, दीक्षित । ४६ सूरजप्रयास, भाग १-कविया करणीदानजा कृत, सम्पा०-श्री सीताराम लालसा मूल्य-६२५ मूल्य-८०० २ ५१ रोहतरण रामराजा हि कृत-गम्पा०-श्री रामप्रसाद दाधीच, एम ए मूल्य-६५० ५२ मत्स्यप्रदेश को हिन्दी-साहित्य को देन, प्रो मोतीलाल गुप्त एम ए पी-एच ही मूल्य-७०० मूल्य-४०० ५३ घातपितास फाग मनातक्त'क, सम्मा०-श्री एम सी मोदी। मूत्य-५५० ५४ राजस्थान में संस्कृत साहित्य की सोज-एस मार भाण्डारवर, हि दो-अनुवादर श्री घात निवेदो, एम ए, माहिल्याचाय, काश्यतीय ५५ समदर्जा प्रापाय हरिभद्र, श्री सुपलालजी सिंघवी, मूल्म-३०० ४३ . " .
[ ३ ] प्रेसों मे छप रहे ग्रंथ -- संस्कृत १. शकुनप्रदीप, लावण्यगमरचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविनय । २. त्रिपुराभारतीलघुस्तय, लघुपण्डितप्रणीन, सम्पा०-पानी मुनि श्रीजिनयिमय। ३. वालशिक्षाव्याकरण, ठक्कुर संग्रामनिहरनित, सम्पा०-पाश्री मुनि श्रीजिनविजय । ४. पदार्यरत्नमजूपा, पं० कृपा मिथविरचित, सम्पा०-पात्री मुनि श्रीजिन विजय । ५. नन्दोपाल्यान, अशातकर्तृक, नम्पा०-८० वी जे. सांडेमरा ! ६. चान्द्र व्याकरण, आचार्य चन्द्रगोमिविरचित, समाल-श्री बी. टी. दोगी। ७. प्राकृतानन्द, रघुनाथकवि-रचित, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । ८. फदिकौस्तुभ, पं० रघुनाथरचित, मम्पाल-श्री एम. एन. गोरे । ६. एकाक्षर नाममाला-सम्पाo-मुनि श्री रमणिविजय । १०. नत्यरत्नफोश, भाग २, महाराणा कुंभकरणप्रणीत, सम्मा०-श्री पार. मी. पारिम यो डॉ. प्रियवाला शाह । ११. इन्द्रप्ररथप्रबन्ध, सम्पा०-डॉ. दशरथ दार्मा। १२. हमीरमहाकाव्यम्, नवचन्द्रसूरिकृत, तम्पा०-पत्री मुनि प्रीजिनविनय । १३. वासवदत्ता, मुबन्धुकृत, सम्पा०-डॉ० जयदेव मोहनलाल गुलि । १४. वृत्तमुक्तावली, कविकलानिधि श्रीकृष्ण भट्ट कृत; सं० पं० नट्ट श्री मयुरानाथ पात्रो १५. प्रागमरहस्य, स्व० पं० सरयूप्रसादजी द्विवेदी वृत, सम्पा०-मो० राजस्थानी और हिन्दी १६. मुंहता नेणतीरी स्यात, भाग ३, मुहता नैरगतीकृत, नम्पाo-श्रीबद्रीप्रसाद साकरिया । १७. गोरा बादल पदमिणी चऊपई, कवि हेमरतनकृत सम्पा०-धीउदयसिंह भटनागर, एम.ए. १५. राठौडरी वंशावली, सम्पा०-पयत्री मुनि श्रीजिनविजय । १६. सचित्र राजस्थानी भाषासाहित्यग्रन्यतूची, सम्पा०-पद्मश्री मुनि श्रीजिनविजय । २०. मीरां-बृहत्-पदावली, स्व० पुरोहित हरिनारायणजी विद्याभूपण द्वारा सातित, सम्पा०-पभश्री मुनि श्रीजिनविजय । २१. राजस्थानी साहित्यसंग्रह, भाग ३, संपादक-श्रीलक्ष्मीनारायण गोस्वामी। २२. सूरजप्रकाश, भाग ३, कविया करणीदानकृत सम्पा०-श्रीसीताराम लाळम । २३ रुक्मिणी-हरण, सायाजी झूला कृत, तम्पा० श्री पुस्पोत्तमलाल मेनारिया, एम.ए.,मा.रत्न २४. सन्त कवि रज्जद : सम्प्रदाय और साहित्य, डॉ० ब्रजलाल टर्मा । २५. पश्चिमी भारत की यात्रा, कर्नल जेम्स टोड, हिन्दी अनु० श्रीगोपालनारायण बहुरा, एम.ए. २६. स्थूलिभद्रकाकादि, सम्पा०-डॉ० आत्माराम जाजोदिया। अंग्रेजी Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts Part I, R.O.R.I. ( Jodhpur Collection ), ed., by Padamashree Jin vijaya Muni, Puratattvacharya. 28. A List of Rare and Reference Books in the R.O.R.I., Jodhpur, compiled by P.D. Pathak, M.A. विशेष-पुस्तक-विक्रेतायो को २५% कमीशन दिया जाता है। गङ्गाधर द्विवेदी। 27
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