Shree Abhya Jain Granthalya,bikaner

Shri Parvchansar

Kundkund Aachrya · 2011/07

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प्रथमावृत्ति : श्री पाटनी दि० जैन ग्रन्थमाला, मारोठ (राजस्थान)
१००० प्रतियां, वि० सं० २००६
द्वितीयावृत्ति : श्री दि० जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़ (गुजरात)
२२०० प्रतियां, वि० सं० २०२१
:
तृतीयावृत्ति : श्री वीतराग सत् साहित्य प्रसारक ट्रस्ट, भावनगर
२१०० प्रतियाँ, महावीर जयन्ती, वि० सं० २०३२
मूल्य १२ रु० : [लागत का ७५%]
इस ग्रन्थ का मूल्य कम करने हेतु प्राप्त हुई आर्थिक सहायता :-
२५०१) श्री मित्रसेनजी, दिल्ली
१२५) श्रीमती धापुवाई जैन, इन्दौर
१०१) श्री कहान मित्र मण्डल, भावनगर
१००) श्री मिश्रीलालजी पाटनी, इन्दौर
प्राप्ति-स्थान : (१) श्री दि० जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट
सोनगढ़ ३६४२५० (सौराष्ट्र-गुजरात)
(२) पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-४, वापूनगर, जयपुर ३०२००४
मुद्रक :
जयपुर
प्रिण्टर्म
मिर्जा इस्माइल रोड
जयपुर (राजस्थान)

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पू० श्री कानजी स्वामी 'प्रवचनसार का स्वाध्याय करते हुए :
पास में श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक आदि शास्त्र रसे हैं।

ויי" प्रकाशकीय [तृतीयावृत्ति यह प्रसन्नताका प्रसंग है कि भगवान श्री कुंदकुंदाचार्य विरचित प्रवचनसार शास्त्रका यह तृतीय संस्करण प्रकाशित हो रहा है । इसकी प्रथमावृत्ति श्री पाटनी दि० जैन ग्रन्थमाला, मारोठ द्वारा वि० सं० २००६ में तथा द्वितीयावृत्ति वि० सं० २०२१ में श्री दि० जन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट, सोनगढ़ द्वारा प्रकाशित हुई है। पू० गुरुदेव श्री कानजी स्वामीने इस शास्त्र पर कई बार प्रवचन किए और शास्त्रके गहन विषयको जनसुलभ किया । पू० स्वामीजीके प्रभावना उदयसे इस शास्त्रकी मांग बढ़ती रही-फलस्वरूप यह तृतीय संस्करण आपके सम्मुख प्रस्तुत है । पू० स्वामीजीकी प्रेरणा से विद्वान पं० हिंमतलाल जेठालाल शाहने इस शास्त्रकी श्रीमद् अमृतचन्द्राचार्यदेवकृत 'तत्त्वप्रदीपिका' टीकाका गुजराती अनुवाद किया था। उसीका यह हिन्दी अनुवाद पं० परमेष्ठीदासजी न्यायतीर्थने किया है । अतः समग्र जैन समाज पर उक्त विद्वानोंका अतीव उपकार है । ट्रस्टको ओरसे हम उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। श्री दि० जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़ने इस शास्त्रको छपानेकी अनुमति दी तथा लागत मूल्यने कममें बेचनेका व और कई प्रकारका सहयोग दिया, इसके लिए हम ट्रस्टके अत्यन्त आभारी हैं। मुमुक्षुगण इस ग्रन्थका अधिक लाभ ले सको, इस हेतु लागत मूल्य में २५% कमी की गई है। दाताओं को ओरने जो रकमें मूल्य कम करने के लिए आई हैं, उनको नामावली मुखपृष्ठके पीछे दी गई है। हम उन सबके अत्यन्त आभारी हैं। श्री मीमचन्द जेठालाल शेठने अपने शास्त्र-प्रकाणनके अनुभवले मुभाष दिये हैं । डॉ० हुकमचन्दजी भारिल्लले ग्रन्थ-प्रकाशनमें समय-समय पर मार्गदर्शन प्राप्त हुला है। धी जतीगजी भाई व श्री मगनलालजीने प्रेस मैटर तैयार करने में खान प्रम उठाया है। पं० नंवरलालजी पोल्याका. जयपुरने प्रूफ-संशोधनका गुरुतर दायित्व लगनले वहन किया है । जयपुर प्रिप्टस, जयपुरके श्री मोहनलालजी जनने ग ग्रंथका सुन्दर दंगसे मुद्रण कार्य सम्पन्न किया है । उपगेन नभी महानुभावों के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करना हम हमारा पुनीत कर्तव्य मानते है ।

भावनगर,
महावीर जयन्ती, वि००:::
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।। श्री वीतरागायनमः ।। उपोद्घात [गुजराती प्रथम संस्करण का हिन्दी अनुवाद] । भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत यह प्रवचनसार नामक शास्त्र 'द्वितीय श्रुतस्कंध' के सर्वोत्कृष्ट आगमोंमें से एक है। द्वितीय श्रुतस्कंधकी उत्पत्ति कैसे हुई यह पट्टावलियोंके आधारसे संक्षेपमें हम सब विचार करें आजसे २४७४ वर्ष पूर्व इस भरतक्षेत्रको पुण्य भूमिमें जगत्पूज्य परम भट्टारक भगवान महावीरस्वामी मोक्षमार्गका प्रकाश करनेके लिये समस्त पदार्थोका स्वल्प अपनी सातिशय दिव्यध्वनि के द्वारा प्रगट करते थे। उनके निर्वाणके वाद पांच श्रुतकेवली हुये, जिनमेंसे अन्तिम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहु थे। वहां तक तो द्वादशांग शास्त्रको प्ररूपणासे निश्चय-व्यवहारात्मक मोक्षमार्ग यथार्थरूपमें प्रयतित रहा। तत्पश्चात् काल दोपसे क्रमशः अंगोंके ज्ञानकी व्युच्छित्ति होतो गई और इस प्रकार अपार जानसिंधुका बहुभाग विच्छिन्न होनेके बाद दूसरे भद्रवाहुस्वामी-आचार्यको परिपाटी (परम्परा) में दो समर्थ मुनि हुये । उनमेंसे एकका नाम श्रीधरसेनाचार्य और दूसरेका श्री गुणधराचार्य था। उनसे प्राप्त जानके द्वारा उनकी परम्परामें होनेवाले आचार्योने शास्त्रोंकी रचना की और वीर भगवान के उपदेश का प्रवाह चालू रखा। श्रीधरसेनाचार्यको अग्रायणीपूर्वके पंचम वस्तुअधिकारके महाकर्म प्रकृति नामक चीये प्रामृतका मान था। उस ज्ञानामृतमेसे प्रमशः उनके वादके आचार्यों द्वारा पदसण्डागम, धवन, महाधवल, जयधवल, गोम्मटसार, लब्धिसार, आपणासार आदि शास्त्रोंकी रचना हुई। मप्रकार प्रथम श्रुतस्तंय की उत्पत्ति हई। उसमें जीव और कर्मके संयोगसे होनेवाली आत्माकी नंसार पर्यायका, - गुणस्थान, मार्गणा आदिका - वर्णन है, पर्यायाधिका नयको प्रधान करके कथन है । म नयको अशुद्ध द्रव्यापिक भी कहते हैं, और अध्यात्म भापामें अशुद्ध निश्चयनय अथवा व्यवहार कहते हैं । ५

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- भगवान कुन्दकुन्दाचार्य द्वारा रचित अनेक शास्त्र हैं, जिनमें से थोड़े से वर्तमानमें विद्यमान हैं । त्रिलोकीनाथ सर्वजदेवके मुखसे प्रवाहित श्रुतामृतकी सरितामेंसे भर लिये गये अमृतभाजन वर्तमान में भी अनेक आत्माथियोंको आत्मजीवन प्रदान करते हैं। उनके समयसार, पंचास्तिकाय और प्रवचनसार नामक तीन उत्तमोत्तम शास्त्र 'नाटक त्रय' अथवा 'प्राभृत त्रय' कहलाते हैं। इन तीन परमागमोंमें हजारों शास्त्रोंका सार आजाता है। भगवान कुन्दकुन्दाचार्यके वाद लिखे गये अनेक ग्रंथों के वीज इन तीन परमागमोंमें विद्यमान हैं, - ऐसा सूक्ष्म दृप्टिसे अभ्यास करने पर स्पष्ट ज्ञात होता है । श्री समयसार इस भरतक्षेत्रका सर्वोत्कृष्ट परमागम है। उसमें नवतत्वोंका शुद्धनयकी दृष्टि से निरूपण करके जीवका शुद्ध स्वरूप सर्व प्रकार से - आगम, युक्ति, अनुभव और परम्परासे - अति विस्तारपूर्वक समझाया है । पंचास्तिकायमें छह द्रव्यों और नव तत्वोंका स्वरूप संक्षेपमें कहा गया है । प्रवचनसारमें उसके नामानुसार जिन प्रवचनका सार संगृहीत किया गया है । जैसे समयसारमें मुख्यतया दर्शनप्रधान निरूपण है उसीप्रकार प्रवचनसारमें मुख्यतया ज्ञानप्रधान कथन है । श्री प्रवचनसारके प्रारम्भमें ही शास्त्रकर्ताने वीतरागचारित्रके लिए अपनी तीव्र आकांक्षा व्यक्त की है । बारम्बार भीतर ही भीतर (अंतरमें) डुबकी लगाते हुए आचार्यदेव निरन्तर भीतर ही समाये रहना चाहते हैं । किन्तु जब तक उस दशाको नहीं पहुंचा जाता तब तक अंतर अनुभवसे छूटकर बारम्वार बाहर भी आना हो जाता है । इस दशामें जिन अमूल्य वचन मौक्तिकोंकी माला गुथ गई वह यह प्रवचनसार परमागम है । सम्पूर्ण परमागममें वीतराग चारित्रको तीवाकांक्षाकी मुख्यध्वनि गूज रही है। ऐसे इस परम पवित्र शास्त्रके मध्य तीन श्रुतस्कन्ध हैं। प्रथम श्रुतस्कन्धका नाम ज्ञानतत्त्व- प्रजापन है । अनादिकालसे परोन्मुख जीवोंको कभी ऐसी श्रद्धा नहीं हुई कि 'मैं ज्ञानस्वभाव हूँ और मेरा सुख मुझमें ही है। इसीलिए उसकी परमुखापेक्षी-परोन्मुखवृत्ति कभी नहीं टलती। ऐसे दीन दुखी जीवों पर आचार्यदेवने करुणा करके इस अधिकारमें जीवका ज्ञानानन्दस्वभाव विस्तारपूर्वक समझाया उसीप्रकार केवलीके ज्ञान और सुख प्राप्त करनेकी प्रचुर उत्कृष्ट भावना वहाई है । "क्षायिक ज्ञान ही उपादेय है, क्षायोपशमिकज्ञानवाले तो कर्मभारको ही भोगते हैं। प्रत्यक्षजान ही ऐकान्तिक सुख है, परोक्षजान तो अत्यन्त आकुल है; केवलीका अतींद्रिय मुख ही सुख है, इंद्रियजनित सुख तो दुःख ही है; सिद्ध भगवान स्वयमेव ज्ञान, मुख और देव हैं, घातिकर्म रहित भगवानका सुख सुनकर भी जिन्हें उनके प्रति श्रद्धा नहीं होती वे अभव्य (दूरभव्य) हैं" यों अनेकानेक प्रकारले आचार्यदेवने केवलज्ञान और अतींद्रिय, परिपूर्ण सुखके लिये पुकार की है । केवलोके ज्ञान और आनन्दके लिए आचार्यदेवने ऐसी भाव भरी धुन मचाई है कि जिसे सुनकर -- पढ़कर सहज ही ऐसा लगने लगता है कि विदेहवासी सीमंधर भगवानके निकटसे, केवली भगवन्तोंके भुण्टमेंसे भरतक्षेत्र में आकर तत्काल ही कदानित आचार्यदेवने यह अधिकार रचकर अपनी हृदयोमियाँ व्यक्त की होन प्रकार मान और मुनका अनुपम निरूपण करके इस अधिकारमें आचार्यदेवने मुमुक्षुओंको अतींद्रिय ज्ञान और मुगकी नि तथा श्रद्धा वाराई है, और अन्तिम गाथाओंमें मोह-राग-द्वेषको निर्मूल करनेका जिनोक्त पचाय उपाय नक्षेपमें बताया है। द्वितीय श्रुतस्वान्धका नाम शेयतत्य-प्रजापन है । अनादिकालने परिश्रम कारला मा जीवना कुछ कर चुका है, किन्तु उसने रव-परवा भेद विज्ञान कभी नहीं किया । उनीली गानुभव मला -

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शास्त्रमें नहीं है । हृदयमें भरे हुए अनुभवामृतमें ओतप्रोत होकर निकलती हुई दोनों आचार्यों देवोंकी वाणीमें कोई ऐसा चमत्कार है कि वह जिस जिस विषयको स्पर्श करती उस उस विषय को परम रसमय, शीतल-शीतल और सुधास्वंदी बना देती है । इसप्रकार तीन श्रुतस्कन्धोंमें विभाजित यह परम पवित्र परमागम मुमुक्षुओंको यथार्थ वस्तु- स्वरूपके समझने में महानिमित्तभूत है। इस शास्त्र में जिनशासनके अनेक मुख्य मुख्य सिद्धान्तों के वीज विद्यमान हैं। इस शास्त्रमें प्रत्येक पदार्थको स्वतन्त्रताकी घोषणा की गई है तथा दिव्यध्वनिके द्वारा विनिर्गत अनेक प्रयोजनभूत सिद्धान्तोंका दोहन है । परमपूज्य कानजी स्वामी अनेकवार कहते हैं कि - "श्री समयसार, प्रवचनसार, नियमसार आदि शास्त्रोंकी गाथा-गाथामें दिव्यध्वनिका संदेश है। इन गाथाओंमें इतनी अपार गहराई है कि उसका माप करने में अपनी ही शक्तिका माप होजाता है। यह सागर गम्भीर शास्त्रोंके रचयिता परमकृपालु आचार्यदेवका कोई परम अलौकिक सामर्थ्य है । परम अद्भुत सातिशय अन्तर्वाह्य योगोंके विना इन शास्त्रोंका रचा जाना शक्य नहीं है । इन शास्त्रोंकी वाणी तैरते हुए पुरुषकी वाणी है, यह स्पष्ट प्रतीत होता है। इसकी प्रत्येक गाथा छ?-सातवें गुणस्थानमें झूलते हुए महामुनिके आत्मानुभव से निकली हुई है। इन शास्त्रोंके कर्ता भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेव महाविदेह क्षेत्र में सर्वज्ञ वीतराग श्री सीमंधर भगवानके समवसरणमें गये थे, और वहां वे आठ दिन रहे थे, यह बात यथातथ्य है, अक्षरशः सत्य है, प्रमाणसिद्ध है । उन परमोपकारी आचार्यदेवके द्वारा रचित समयसार, प्रवचनसार आदि शास्त्रों में तीर्थकर देवकी ॐकारध्वनिमेंसे ही निकला हुआ उपदेश है।" भगवान कुन्दकुन्दाचार्यकृत इस शास्त्रको प्राकृत गाथाओंकी 'तत्त्वदीपिका' नामक संस्कृत टीका श्री अमृतचन्द्राचार्य (जो कि लगभग विक्रम संवत् की १०वीं शताब्दीमें होगये हैं) ने रची है । जसे इस शास्त्रके मूलकर्ता अलौकिक पुरुष हैं, वैसे ही इसके टीकाकार भो महा समर्थ आचार्य हैं । उन्होंने समयसार तथा पंचास्तिकायकी टोका भी लिखी है और तत्त्वार्थसार, पुरुषार्थसिद्धय पाय आदि स्वतन्त्र ग्रन्थोंकी भी रचना की है । उन जैसी टीकायें अभी तक किसी अन्य जनशास्त्रकी नहीं हुई है । उनकी टीकाओंके पाठकोंको उनकी अध्यात्मरसिकता, आत्मानुभव, प्रखर विद्वत्ता, वस्तुस्वरूपको न्यायपूर्वक सिद्ध करनेकी असाधारण शक्ति, जिनशासनका लत्यन्त गम्भीर ज्ञान, निश्चय व्यवहारका संधिवद्ध निरूपण करनेकी विरलशक्ति और उत्तम काव्य शक्तिका पूरा पता लग जाता है। गम्भीर रहस्योको अत्यन्त संक्षेपमें भर देने की उनकी शक्ति विद्वानोंको आश्चर्यचकित कर देती है। उनकी देवी टोकायें ध्रुतकेवलोके वचनों जैसी हैं । जैसे मूल शास्त्रकारके शास्त्र अनुभवयुक्ति आदि समस्त समृद्धियोंसे समृद्ध है वैसे ही टीकाकारकी टोकायें भी उन उन नवं समृद्धियोंसे विभूषित हैं। शासन मान्य भगवान् कुन्दकुन्दाचार्यदेवने इस कलिकालमें जगद्गुर तीर्थकरदेव जना कार्य किया है और श्री अमृतचन्द्राचार्यदेवने मानो कि वे कुन्दकुन्दभगवान्को हदय में बैठ गये हो मप्रकारले उनके गंभीर आणयोंको यथार्थतया व्यक्त करके उनके गणधर जैसा कार्य किया है। श्री अमृतचन्द्राचार्य द्वारा रचित काव्य भी अध्यात्मरन और आत्मानुभवको मस्तीने भरपूर है । श्री समयसारको टीकामें आनेवाले काव्यों (कलमों) ने श्री परमभदेव ने मम मुनियों पर गहरी छाप जमाई है, और बाज भी तत्वज्ञान तथा अध्यात्मन्यगे नरे हा दे मधुर बना -

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ભગવાન શ્રી કુંદકુંદાચાર્યદેવ વાઢાં તાડપત્ર ઉપર શાસ્ત્ર લખે છે.
--

RAMA
ॐ
भगवान श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवके
सम्बन्धमें उल्लेख
वन्द्यो विभु वि न कैरिह कोण्डकुन्दः
कुन्द-प्रमा-प्रणायि-कोति-विभूषिताशः ।
यश्चारु-चारण-कराम्बुजचञ्चरीक -
श्चक्रे श्रुतस्य भरते प्रयतः प्रतिष्ठाम् ।।
चन्द्रगिरि पर्वत - शिलालेख]
...
अर्थ :- कुन्दपुष्पकी प्रभाको धारण करने वाली जिनकी कीतिके द्वारा दिशायें
विभूषित हुई हैं, जो चारणोंके-चारणऋद्धिधारी महामुनियोंके सुन्दर हस्त-कमलों के
भ्रमर थे और जिन पवित्रात्माने भरतक्षेत्र में श्रुतकी प्रतिष्ठा की है, वे विभु कुन्दकुन्द
इस पृथ्वी पर किससे वंद्य नहीं हैं ?
"कोण्डकुन्दो यतीन्द्रः॥
रजोभिरस्पृष्टतमत्वमन्त -
बाह्यऽपि
संव्यञ्जयितुं यतोशः।
रजःपदं भूमितलं विहाय
मन्ये चतुरंगुलं सः ॥
[विगिरि - गिलालेग]
अर्थ :- यतीश्वर (श्री कुन्दकुन्दस्वामी) रजःस्थानको-भूमितलको छोड़कर चार
अंगुल ऊपर आकाशमें गमन करते थे, उसके द्वारा मैं ऐमा समनता हूँ कि वे अन्तरमें
तथा बाह्यमें रजसे (अपनी) अत्यन्त अस्पृष्टता व्यक्त करते थे (अंतरमें वे रागादिक
मलसे अस्पृष्ट थे और वाह्य में धूलसे अस्पृष्ट थे ।)
चचार

अर्थ :- (महाविदेह क्षेत्रके वर्तमान तोटाना) को गो गो :
हुए दिव्यज्ञानके द्वारा श्री पचनन्दिनारने (श्री मालामाले ) |
तो मुनिजन सच्चे मार्गको कैसे जानते ?
हे कुन्दकुन्दादि आचार्यों ! आपके वना भी सम्मानगंगानों सा पामर को
परम उपकारभूत हुये हैं । उसके लिये मैं आपको अयंत कितनगरकार
करता हूँ।
[...]
जासके मुखारविंदतें प्रकाश भास वृन्द ।
स्यादवाद जैन वैन इन्दु फुन्दफुन्द से ॥
तासके अन्यासतें विकास भेदज्ञान होत ।
मूढ सो लख नहीं फुचद्धि फुन्दकुन्दसे ।।
देत हैं अशीस शोस नाय इन्द्र चन्द्र जाहि
मोह-मार-खंड मारतंड कुन्दकुन्दसे ॥
शुद्धबुद्धिवृद्धिदा प्रसिद्धरिद्धिसिद्धिदा।
हुए, न हैं, न होंहिंगे, मुनिंद कुन्दकुन्दसे ।।
[कविवर वृन्दावनदास]
।

नमः श्री सिद्धेभ्यः । नमोऽनेकान्ताय । श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीतः श्री पवचनुसारः -१- ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन श्रीमदमृतचन्द्रसूरिकृततत्त्वप्रदीपिकावृत्तिः ( मङ्गलाचरणम् ) सर्वव्याप्येकचिद्र पस्वरूपाय परात्मने । स्वोपलब्धिप्रसिद्धाय ज्ञानानन्दात्मने नमः ॥ १ ॥ श्रीजयसेनाचार्यकृततात्पर्यवृत्तिः । नमः परमचैतन्यस्वात्मोत्यसबसम्पदे । परमागमनाराय सिद्धाय परमेष्ठिने ।। श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल गाथाओं और श्रीमद् अमृतचन्द्रसूरिकृत तत्त्वप्रदीपिका नामक टीकाका हिन्दी भाषानुवाद [ सर्व प्रथम, ग्रंथके प्रारंभमें श्रीमद्भगवत्कृन्दकुन्दाचार्यदेवविरचित प्रात गाथावद्ध श्री प्रवचनसार नामक शास्त्रकी 'तत्त्वप्रदीपिका' नामक संस्थल टीका रचयिता श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव उपरोक्त लोकोंके हाग मङ्गलाकार बन्ने हा नानानन्दस्वरूप परमात्माको नमस्कार करते हैं :-] 1 २ -प्रवचनसार- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान हेलोल्लुप्तमहामोहतमस्तोमं जयत्यदः । प्रकाशयज्जगत्तत्त्वमनेकान्तमयं महः ॥ २॥ परमानन्दसुधारसपिपासितानां हिताय भव्यानाम् । क्रियते प्रकटिततत्त्वा प्रवचनसारस्य वृत्तिरियम् ॥ ३ ॥ अथ खलु कश्चिदासन्नसंसारपारावारपारः समुन्मीलितसातिशयविवेकज्योति- अथ प्रवचनसारव्याख्यायां मध्यमरुचिशिष्यप्रतिबोधनार्थायां मुख्यगौणरूपेणान्तस्तत्त्ववहि- स्तत्त्वप्ररूपणसमर्थायां च प्रथमत एकोत्तरशतगाथाभिर्ज्ञानाधिकारः, तदनन्तरं त्रयोदशाधिकशतगाथा- भिर्दर्शनाधिकारः, ततश्च सप्तनवतिगाथाभिश्चारित्राधिकारश्चेति समुदायेनैकादशाधिकत्रिशत- प्रमितसूत्रैः सम्यग्ज्ञानदर्शनचारित्ररूपेण महाधिकारत्रयं भवति । अथवा टीकाभिप्रायेण तु सम्यग्ज्ञान- ज्ञेयचारित्राधिकारचूलिकारूपेणाधिकारत्रयम् । रणाधिकारत्रयम् । तत्राधिकारत्रये प्रथमतस्तावज्ज्ञानाभिधानमहा- धिकारमध्ये द्वासप्ततिगाथापर्यन्तं शुद्धोपयोगाधिकारः कथ्यते । तासु द्वासप्ततिगाथासु मध्ये 'एस सुरासुर -' इमां गाथामादिं कृत्वा पाठक्रमेण चतुर्दशगाथापर्यन्तं पीठिका, तदनन्तरं सप्तगाथापर्यन्तं सामान्येन सर्वज्ञसिद्धिः, तदनन्तरं त्रयस्त्रिशद्गाथापर्यन्तं ज्ञानप्रपञ्चः, ततश्चाष्टादशगाथापर्यन्तं सुखप्रपञ्चश्च त्यन्तराधिकारचतुष्टयेन शुद्धोपयोगाधिकारो भवति । अथ पञ्चविंशतिगाथापर्यन्तं ज्ञानकण्डिकाचतुष्टयप्रतिपादकनामा द्वितीयोऽधिकारश्च त्यधिकारद्वयेन, तदनन्तरं स्वतन्त्रगाथा- चतुष्टयेन चैकोत्तरशतगाथाभिः प्रथममहाधिकारे समुदायपातनिका ज्ञातव्या । अर्थ :- सर्वव्यापी ( सबका ज्ञाता-दृष्टा ) एक चैतन्यरूप ( मात्र चैतन्य ही ) जिसका स्वरूप है और जो स्वानुभव प्रसिद्ध है ( अर्थात् शुद्ध आत्मानुभवसे प्रकृष्टतया सिद्ध है ) उस ज्ञानानन्दात्मक ( ज्ञान और आनन्दस्वरूप ) उत्कृष्ट आत्माको नमस्कार हो। [ अब अनेकान्तमय ज्ञानकी मंगलके लिये श्लोक द्वारा स्तुति करते हैं :- अर्थ :- जो महामोहरूपी अंधकारसमूहको लोलामात्रमें नष्ट करता है और जगतके स्वरूपको प्रकाशित करता है ऐसा अनेकांतमय तेज सदा जयवंत है । [अब श्री अमृतचंद्राचार्यदेव श्लोक द्वारा अनेकांतमय जिनप्रवचनके सारभूत इस 'प्रवचनसार' शास्त्रकी टीका करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं -] अर्थः - परमानन्दरूपी सुधारसके पिपासु भव्य जीवोंके हितार्थ, तत्त्वको (वस्तुस्वरूपको) प्रगट करनेवाली प्रवचनसारकी यह टीका रची जा रही है । [ इसप्रकार मंगलाचरण और टोका रचनेकी प्रतिज्ञा करके, भगवान् कुन्द- गुन्दाचार्यदेवविरचित प्रवचनसारकी पहली पाँच गाथाओंके प्रारम्भमें श्री अमृतचन्द्रा- चार्यदेव उन गाथाओंकी उत्थानिका करते हैं।

जैन शास्त्रमाला] -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- - ३ रस्तमितसमस्तकान्तवादाविद्याभिनिवेशः पारमेश्वरीमनेकान्तवादविद्यामुपगम्य मुक्त- समस्तपक्षपरिग्रहतयात्यन्तमध्यस्थो भूत्वा सकलपुरुषार्थसारतया नितान्तमात्मनो हिततमां भगवत्पंचपरमेष्ठिप्रसादोपजन्यां परमार्थसत्यां मोक्षलक्ष्मीमक्षयामुपादेयत्वेन निश्चिन्वन् प्रवर्तमानतीर्थनायकपुरःसरान् भगवतः पंचपरमेष्ठिनः प्रणमनवन्दनोपजनितनमस्करणेन संभाव्य सर्वारम्भेण मोक्षमार्ग संप्रतिपद्यमानः प्रतिजानीते इदानी प्रथमपातनिकाभिप्रायेण प्रथमतः पीठिकाव्याख्यानं क्रियते, तत्र पञ्चस्थलानि भवन्ति; तेवादी नमस्कारमुन्यत्वेन गाथापञ्चक, तदनन्तरं चारित्रसूचनमुख्यत्वेन 'संपज्जइ णिव्वाणं' इति प्रभृति गाथात्रयमय शुभाशुभशुद्रोपयोगत्रयसूचनमुख्यत्वेन 'जीवो परिणमदि' इत्यादिगाथासूत्रद्वयमथ तत्फलकथनमुग्यतया 'धम्मेण परिणदप्पा' इति प्रभृति सूत्रयम् । अथ शुद्धोपयोगध्यातुः पुरुपस्य प्रोत्साहनार्य शुद्धोपयोगफलदर्शनार्थ च प्रथमगाथा, शुद्धोपयोगिपुरुषलक्षणकथनेन द्वितीया चेति 'अश्मयमादसमुत्वं' इत्यादि गाथाद्वयम् । एवं पोठिकाभिधानप्रथमान्तराधिकारे स्थलपञ्चकेन चतुर्दशगाथामिन्समुदायपातनिका । तद्यथा- अव कश्चिदासन्नभव्यः शिवकुमारनामा स्वसंवित्तिसमुत्पन्नपरमानन्दकलक्षणसुखामृतविपरीत- चतुर्गतिसंसारदुःखभयभीतः, समुत्पन्नपरमभेदविज्ञानप्रकाशातिमयः, समस्तदुर्नयैकान्तनिराकृतदुराग्रहः, परित्यक्तसमस्तगमित्रादिपक्षपातेनात्यन्तमव्यस्थो भूत्वा धर्मार्थकामेभ्यः सारभूतामत्यन्तात्म- हितामविनश्वरां पंचपरमेष्ठिप्रसादोत्पन्नां मुक्तिश्रियमुपादेयत्वेन स्वीकुर्वाणः, श्रीवर्धमानस्वामितीर्थ- करपरमदेवप्रमुखान् भगवतः पंचपरमेष्ठिनो द्रव्यभावनमस्काराभ्यां प्रणम्य परमवारित्रमाश्रयामीति प्रतिनां करोति- अब, जिनके संसार समुद्रका किनारा निकट है, सातिशय (उत्तम) विवेकज्योति प्रगट होगई है ( अर्थात् परम भेद विज्ञानका प्रकाश उत्पन्न होगया है ) तथा समस्त एकांतवादरूप अविद्याका अभिनिवेश* अस्त होगया है ऐसे कोई (आसन्नभव्य महात्मा- श्रीमद्भगवत् कुन्दकुन्दाचार्य), पारमेश्वरी (परमेश्वर जिनेन्द्रदेवकी) अनेकान्तवादविद्याको प्राप्त करके, समस्त पक्षका परिग्रह (शत्रुमित्रादिका समन्ल पक्षपात) त्याग देनेने अत्यन्त मध्यस्थ होकर, 'सर्व पुरुषार्थ में सारभूत होनेसे आत्माके लिये अत्यन्त हिततम भगवन्त पंचपरमेष्ठीके प्रसादसे उत्पन्न होने चोग्य, परमार्थनत्य (पारमार्थिक गतिने सत्य), अक्षय (अविनागी) मोक्ष लक्ष्मीको "उपादेयरुपने निश्चित करते हुए प्रवतमान समिनिदेश-अभिप्राय निकाय; आग्रह। पुरपार्थ धर्म, अ. काम गरन चार दु (पुरध-प्रयोजनो मे) मोक्ष ही सारभूत प्रेत तास्थिय है। मिनट हिदाः। • प्रगा८ प्रगमता, नपा । १ उपादेय रहण करने योग्य, (मोक्षली हिम्म, मटर उपादेश है।)

४ -प्रवचनसार- -- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान - अथ सूत्रावतारः एस सुरासुरसणुसिक्वंदिदं धोघाइकम्ममलं । पणसालि वढमाणं तित्थं धमस्स कत्तारं ॥१॥ सेसे पुण तित्थयरे ससम्वसिद्धे विसुद्धसब्भावे । ससणे य णाणलणचरित्ततववीरियायारे ॥२॥ पणमामीत्यादिपदरखण्डनारूपेण व्याख्यानं क्रियते-पणमामि प्रणमामि । स कः । कर्ता एस एपोऽहं अन्यकरणोद्यतमनाः स्वसंवेदनप्रत्यक्षः । कं । बड्डमाणं अवसमन्तादृद्धं वृद्धं मानं प्रमाणं ज्ञानं यस्य स भवति वर्धमानः, 'अवाप्योरलोपः' इति लक्षणेन भवत्यकारलोपोऽवशब्दस्यात्र, तं रत्नत्रया- त्मकप्रवर्तमानवर्मतीर्थोपदेशक श्रीवर्धमानतीर्थकरपरमदेवम् । क्व प्रणमामि । प्रथमत एव । किविशिष्टं । सुरासुरमणुसिदवंदिदं त्रिभुवनाराध्यानन्तज्ञानादिगुणाधारपदाधिष्ठितत्वात्तत्पदा- भिलापिभिस्त्रिभुवनाधीशैः सम्यगाराध्यपादारविन्दत्वाच्च सुरासुरमनुष्येन्द्रवन्दितम् । पुनरपि किविशिप्टं। धोदघाइफम्ममलं परमसमाधिसमुत्पन्नरागादिमलरहितपारमार्थिकसुखामृतरूपनिर्मल- नीरप्रक्षालितधातिकर्ममलत्वादन्येपां पापमलप्रक्षालनहेतुत्वाच्च धौतघातिकर्ममलम् । पुनश्च किलक्षणम् । तित्थं दृष्टश्रुतानुभूतविपयसुखाभिलापरूपनीरप्रवेशरहितेन परमसमाधिपोतेनोत्तीण- संसारसमुद्रत्वात् अन्येषां तरणोपायभूतत्वाच्च तीर्थम् । पुनश्च किरूपम् । धम्मस्स कत्तारं निरुप- रागात्मतत्त्वपरिणतिरूपनिश्चयधर्मस्योपादानकारणत्वात् अन्येषामुत्तमक्षमादिवहुविधधर्मोपदेश- तीर्थके नायक (श्री महावीरस्वामी) पूर्वक भगवंत पंचपरमेष्ठीको 'प्रणमन और वन्दनसे होनेवाले नमस्कारके द्वारा सन्मान करके सर्वारम्भसे (उद्यमसे) मोक्षमार्गका आश्रय करते हुए प्रतिज्ञा करते हैं । अव, यहाँ (भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यविरचित) गाथासूत्रोंका अवतरण किया जाता है । गाथा १-५ अन्वयार्थ :- [एषः] यह मैं [सुरासुरमनुष्येन्द्रवंदितं] जो 'सुरेन्द्रों, असुरेन्द्रों और 'नरेन्द्रोंसे वन्दित हैं तथा जिन्होंने [धौतघातिकर्ममलं घाति कर्ममलको धो डाला है ऐमे [तीर्थ] तीर्थरूप और [धर्मस्य कर्तारं] धर्मके कर्ता [वर्धमानं] श्री वर्द्धमान- स्वामीको [प्रणमामि] नमस्कार करता हूँ। प्रणमन-देहने नमस्कार करना । वन्दन-वचनले स्तुति करना । नमस्कारमें प्रणमन और वन्दन दोनोंका ममादेश होता है। २ नुरेन्द्र ऊर्वलोकवासी देवोंके इन्द्र । अधोसुरेन्द्र अलोकवासी देवोंके इन्द्र । । नरेन्द्र (मध्यलोकवामी) मनुष्यों के अधिपति, राजा । सुर - असुर - नरपतिवंद्यने, प्रविनष्ट घातीकर्मने । प्रणमन करूं हूँ धर्मकर्ता तीर्थ श्रीमहावीरने ॥ १ ॥ [ 3 .

-ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापत- जैन शास्त्रमाला] ते ते सव्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगं । वंदामि य वट्टते अरहंते माणुसे खेत्ते ॥३॥ एष सुरासुरमनुष्येन्द्रवन्दितं धौतघातिकर्ममलम् । प्रणमामि वर्धमानं तीर्थ धर्मस्य कर्तारम् ॥१॥ शेषान् पुनस्तीर्थकरान ससर्वसिद्धान विशुद्धसद्भावान् । श्रमणांच ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्याचारान् ॥ २ ॥ तांस्तान् सर्वान् समकं समकं प्रत्येकमेव प्रत्येकम् । वन्दे वर्तमानानहतो मानुषे क्षेत्रे ॥३॥ कत्वाच्च धर्मस्य कर्तारम् । इति क्रियाकारकसम्बन्धः । एवमन्तिमतीर्थकरनमस्कारमुख्यत्वेन गाथा गता ॥१।। तदनन्तरं प्रणमामि । कान् । सेसे पुण तित्थयरे ससवसिद्ध शेषतीर्थकरान्, पुनः ससर्वसिद्धान् वृषभादिपार्श्वपर्यन्तान् शुद्धात्मोपलब्धिलक्षणसर्वसिद्धसहितानेतान् सर्वानपि। कथंभूतान् । विसुद्धसभावे निमंलात्मोपलब्धिबलेन विश्लेपिताखिलावरणत्वात्केवलज्ञानदर्शनस्वभावत्वाच्च विशुद्धनद्भावान् । समणे य भ्रमणशब्दवाच्यानाचार्योपाध्यायसाधूश्च । किलक्षणान् । णाणदंसण- चरित्ततववोरियायारे सर्वविशुद्धद्रव्यगुणपर्यायात्मके विद्वस्तुनि यासी रागादिविकल्परहितनिश्चल- चित्तवृत्तिस्तदन्तर्भूतेन व्यवहारपञ्चाचारसहकारिकारणोत्पन्नेन निश्चयपञ्चाचारेण परिणतत्वात् सम्यग्ज्ञानदर्णनचारित्रतपोवीर्याचारोपेतानिति । एवं शेषत्रयोविंशतितीर्थकरनमस्कारमुख्यत्वेन गाथा [पुनः] और [विशुद्धसद्भावान् ] विशुद्ध 'सत्तावाले [शेषान् तीर्थकरान] शेप तीर्थकरोंको [ससर्वसिद्धान्] सर्व सिद्धभगवन्तोंके साथ ही, [च] और ज्ञानदर्शन- चारित्रतपोवीर्याचारान्] ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार युक्त [श्रमणान् ] 'श्रमणोंको नमस्कार करता हूँ। [तान तान् सर्वान् ] उन उन सबको [च] तथा [मानुपे क्षेत्रे वर्तमानान] मनुप्य क्षेत्र में विद्यमान अर्हतः] अरहन्तोको समकं समपं] नाथ हो साथ ~ समुदाय- सपने और प्रत्येक एव प्रत्येक] प्रत्येक प्रत्येकाको - व्यक्तिगत वंदे बन्दना करता है। गना मस्तित्व। घमण-आचार्य उपाध्याय और माधु । दली शेष तीर्थकर अने सौ सिद्ध गुहास्तित्यने । मुनि ज्ञान हग -चारित्र तप - वीर्याचरण मंयुत्ताने ॥ २ ॥ सर्वने साथे प्रत्येकाने प्रत्येकाने । पंदु पली मनुष्य क्षेत्रे दर्तता अहलने ।। ।। . - ते तथा

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ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- - जैन शास्त्रमाला तदनु विशुद्धसद्भावत्वादुपात्तपाकोत्तीर्णजात्यकार्तस्वरस्थानीयशुद्धदर्शनज्ञानस्वभावान शेषानतीततीर्थनायकान्, सर्वान सिद्धांश्च, ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्याचारयुक्तत्वात्संभावित- परमशुद्धोपयोगभूमिकानाचार्योपाध्यायसाधुत्वविशिष्टान श्रमणांश्च प्रणमामि ॥२॥ तदन्वेतानेव पंचपरमेष्ठिनस्तत्तव्यक्तिव्यापिनःसर्वानेव सांप्रतमेतत्क्षेत्रसंभवतीर्थकरासंभवा- न्महाविदेहभूमिसंभवत्वे सति मनुष्यक्षेत्रप्रतिभिस्तीर्थनायकैः सह वर्तमानकालं गोचरीकृत्य युगपद्युगपत्प्रत्येकं प्रत्येकं च मोक्षलक्ष्मीस्वयंवरायमाणपरमनैर्ग्रन्थ्यदीक्षाक्षणोचितमंगला- चारभूतकृतिकर्मशास्त्रोपदिष्टवंदनाभिधानेन सम्भावयामि ॥३॥ अथैवमर्हत्सिद्धाचार्योपा- गता ।।२।। अब ते ते सव्वे तांस्तान्पूर्वोक्तानेव पञ्चपरमेष्ठिनः सर्वान् वंदामि य वन्दे, अहं कर्ता। कथं । समगं समगं समुदायवन्दनापेक्षया युगपद्युगपत् । पुनरपि कथं । पत्तेगमेव पत्तेगं प्रत्येकवन्दना- पेक्षया प्रत्येकं प्रत्येकम् । न केवलमेतान् वन्दे । अरहंते अर्हतः । किविशिष्टान् । वट्टते माणुसे खेत्ते वर्तमानान् । कत्र । मानुपे क्षेत्रे । तथा हि- साम्प्रतमत्र भरतक्षेत्रे तीर्थकराभावात् पञ्चमहाविदेह- स्थितधीसोमन्धरस्वामितीर्थकरपरमदेवप्रभृतितीर्थकरैः सह तानेव पञ्चपरमेष्ठिनो नमस्करोमि । कया। करणभूतया मोक्षलक्ष्मीस्वयंवरमण्डपभूतजिनदोक्षाक्षणे मङ्गलाचारभूतया अनन्तनानादि- सिद्धगुणभावनारूपया मिभक्त्या, तथैव निर्मलसमाधिपरिणतपरमयोगिगुणभावनालक्षणया योगभक्त्या चेति । एवं पूर्व विदेहतीर्थकरनमस्कारमुन्यत्वेन गाथा गतेत्यभिप्रायः ॥ ३ ॥ अथ किच्चा है, जो तीर्थताके कारण योगियोंको तारनेमें समर्थ हैं, धर्मके कर्ता होनेसे जो शुद्ध स्वल्पपरिणतिके कर्ता हैं, उन परम भट्टारक, महादेवाधिदेव, परमेश्वर, परमपूज्य, जिनका नामग्रहण भी अच्छा है ऐसे श्री वर्द्धमानदेवको प्रवर्तमान तीर्थकी नायकताके कारण प्रथम ही, प्रणाम करता हूँ ।।१।। तत्पश्चात् जो विशुद्ध सत्तावान् होनेसे तापसे उत्तीर्ण हुए (अन्तिम ताव दिये हुए अग्निमेंने बाहर निकले हुए) उत्तम सुवर्णके समान शुद्धदर्शनजानस्वभावको प्राप्त हुए हैं, ऐसे गेप 'अतीत तीर्थकरोंको और सर्वसिद्धोंको तथा नानाचार, दर्शनाचार, चान्त्रिाचार, तपाचार और वीर्याचारयुक्त होनेने जिन्होंने परम शुद्ध उपयोग भूमिकाको प्राप्त किया है, ऐसे श्रमणोंको - जो कि आचार्यत्व, उपाध्यायत्य और माधुत्वम्प विणेपोंसे विशिष्ट (भेदयुक्त) हैं उन्हें - नमस्कार करता हूँ ।। || तत्पश्चात् इन्हीं पंचपरमेष्ठियोंको, उन-उस व्यक्ति (पर्यायमें) व्याज होने- याले नभीवो, वर्तमानमें इन क्षेत्रमें उत्पन्न तीर्थकोंका अनाव होने और महाविदह- क्षेत्र में उनका सद्भाव होनेसे मनुष्यक्षेत्रमें प्रदर्तमान तीर्थनादम्युनः दर्तमानकालगोचर कारचे, (महाविदेहक्षेत्र में वर्तमान श्री सीमंधरादि तीर्थकोंकी मानि मानों मनी पंच 'नीत करत होग, भतकालीन ।

ध्यायसर्वसाधूनां प्रतिवन्दनाभि वानप्रदत्तवारेण भागभान भागमा निर्भरेतरेतरसंवलनवलक्लिीननिखिलरबपरविभागतमा प्रवृत्तातं नमामा ।।। तेषासेवाहत्सिद्धाचार्योपाध्यायतर्वसाधूनां विगुलमागदर्शनधानत्वेन सहजाननकाना- भावात्मतत्त्वश्रद्धानावनोधलक्षणसम्यवनमानसंपादकमाश्रमं समासान सम्मानजान- संपन्नो सूत्वा, जीवत्कषायफणतया पुजयन्यसंप्राप्तिहेतुभूतं सरागनारित मापतितमपि कृत्वा । कम् । णमो नमस्कारम् । केन्दः । यरहंताणं सिवाणं तह णमो गगारा अभिमनगाणं साहूणं चेव अर्हत्सिद्धगणधरोपाच्या गसाधन्यव व । कतिसंयोपोन्यः । सोसि मोगः । ति पूर्वगाथात्रयेण कृतपञ्चपरमेष्ठिनमारोपसंहारोऽयम् ॥ ४ ॥ एवं परमेटिनमकार कला कि करोमि । उवसंपयामि उपगंपा गमाश्रयामि । किम् । सम्मं साम्यं नारितम् । गरमात् ति भवति । जत्तो णिवाणसंपत्ती यस्मानिर्वाणसंप्राप्ति: । किं कृत्वा पूर्व । समासिज गमागास प्राय । कम् । विसुद्धणाणदसणपहाणासम विशुद्धज्ञानदर्शनलक्षणप्रधानाधमम् । केषां सम्बंधित्वेन । तेसि तेगां पूर्वो- क्तपञ्चपरमेष्ठिनामिति । तथाहि-ग्रहमाराधकः, एते नाहदादय आराध्या, इत्यारागाराधक विकल्परूपो परमेष्ठी भगवान वर्तमानकालमें ही विद्यमान हों, इसप्रकार अत्यन्त भक्तिो कारण भावना भाकर - चितवन करके उन्हें) युगपद् युगपद् अर्थात् समुदायरूपसे और प्रत्येक प्रत्येकको अर्थात् व्यक्तिगतरूपसे 'संभावना करता हूँ। किस प्रकारसे संभावना करता हूँ ? मोक्ष लक्ष्मीके स्वयंवर समान जो परम निर्ग्रन्थताकी दीक्षाका उत्सव ( आनन्दमय प्रसंग ) है उसके उचित मंगलाचरणभूत जो कृतिकर्मशास्त्रोपदिष्ट वन्दनोच्चार (कृतिकर्मशास्त्र में उपदेशे हुए स्तुतिवचन) के द्वारा सम्भावना करता हूँ।। ३ ।। अब इस प्रकार अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय तथा सर्व साधुओंको प्रणाम और वन्दनोच्चारसे प्रवर्तमान द्वतके द्वारा, भाव्यभावक भावसे उत्पन्न अत्यन्त गाढ़ "इतरेतर मिलनके कारण समस्त स्वपरका विभाग विलीन होजानेसे जिसमें 'अद्वैत प्रवर्तमान है ऐसा नमस्कार करके, उन्हीं अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व- . १ संभावना-संभावना करना, सन्मान करना, आराधन करना । २ कृतिकर्म=अंगवाह्य १४ प्रकीर्णकोंमें छट्ठा प्रकीर्णक कृतिकर्म है जिसमें नित्यनैमित्तिक क्रियाका वर्णन है । 3 भाव्य-भाने योग्य; चितवन करने योग्य; ध्यान करने योग्य अर्थात् ध्येय । भावक भावना करनेवाला, चितवन करनेवाला, ध्यान करनेवाला अर्थात् ध्याता । ४ इतरेतरमिलन एक दूसरेका परस्पर मिल जाना अर्थात् मिश्रित हो जाना । ५ अद्वैत-पंच परमेष्ठीके प्रति अत्यंत आराध्य भावके कारण आराध्यरूप पंच परमेष्ठी भगवान् और आराधक- रूप अपने भेदका विलय होजाता है। इस प्रकार नमस्कारमें अद्वैत पाया जाता है। यद्यपि नमस्कारमें प्रणाम और वंदनोच्चार दोनोंका समावेश होता है इसलिये उसमें द्वत कहा है, तथापि तीव्र भक्तिभावसे स्वपरका भेदविलीन हो जानेको अपेक्षासे उसमें अद्वैत पाया जाता है ।

- ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- - । जैन शास्त्रमाला] दूरमुत्क्रम्य सकलकषायकलिकलङ्कविविक्ततया निर्वाणसंप्राप्तिहेतुभूतं वीतरागचारित्राख्यं साम्यमुपसंपद्ये । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैक्यात्मकैकाग्यं गतोऽस्मीति प्रतिज्ञार्थः । एवं तावदयं साक्षान्मोक्षमार्ग संप्रतिपन्नः ॥५॥ अथायमेव वीतरागसरागचारित्रयोरिष्टानिष्टफलत्वेनोपादेयहेयत्वं विवेचयति संपज्जदि णिव्वाणं देवासुरमणुयरायविहहिं । जीवस्स चरित्तादो दसणणाणप्पहाणादो ॥६॥ द्वतनमस्कारो भण्यते । रागाद्युपाधिविकल्परहितपरमसमाधिवलेनात्मन्येवाराध्याराधकभावः पुनर- द्वैतनमस्कारो भण्यते । इत्येवंलक्षणं पूर्वोक्तगाथात्रयकथितप्रकारेण पञ्चपरमेष्ठिसम्बंधिनं द्वैताद्वैत- नमस्कारं कृत्वा । ततः किं करोमि । रागादिभ्यो भिन्नोऽयं स्वात्मोत्यसुखस्वभावः परमात्मेति भेदज्ञानं, तथा स एव सर्वप्रकारोपादेय इति रुचिरूपं सम्यक्त्वमित्युक्तलक्षणनानदर्शनस्वभावं, मठचैत्यालयादिलक्षणव्यवहाराश्रमाद्विलक्षणं, भावाश्रमरूपं प्रधानाश्रमं प्राप्य, तत्पूर्वकं क्रमायातमपि सरागचारित्रं पुण्यबन्धकारणमिति ज्ञात्वा परिहत्य निश्चलशुद्धात्मानुभूतिस्वरूपं वीतरागचारित्र- महमाश्रयामीति भावार्थः । एवं प्रथमस्थले नमस्कारमुख्यत्वेन गाथापञ्चकं गतम् ।। ५ ॥ अयोपादेय- भूतस्यातींद्रियसुखस्य कारणत्वाद्वीतरागचारित्रमुपादेयम् । अतींद्रियसुखापेक्षया हेयस्येन्द्रियसुखस्य कारणत्वात्सरागचारित्रं हेयमित्युपदिशति - संपज्जदि संपद्यते । किम् । णिवाणं निर्वाणम् । कथम् । सह । कैः । देवासुरमणुयरायविहवेहि देवासुरमनुष्यराजविभवः । कस्य । जीवस्त जीवस्य । कस्मात् । चरित्तादो चारित्रात् । कथंभूतात् । दसणणाणप्पहाणादो सम्बग्दर्शनञानप्रधानादिति । तद्यथा - आत्माधीननानसुखस्वभावे शुद्धात्मद्रव्ये यन्निवलनिर्विकारानुभूतिरूपमवस्थानं तल्लक्षण- निश्चयचारित्राज्जीवस्य समुत्पद्यते । किम् । पराधीनेन्द्रियजनितमानमुख विलक्षणं, स्वाधीनातीन्द्रिय- रूपपरमजानमुग्वलक्षणं निर्वाणम् । सरागचारित्रात्पुनर्देवासुरमनुप्यराजविभूतिजनको मुन्यवृत्त्या साधुओंके आश्रमको, - जो कि (आश्रम) विशुनानदर्शनप्रधान होनेसे 'सहजशुद्ध- दर्शनज्ञानस्वभाववाले आत्मतत्त्वका श्रद्धान और जान जिसका लक्षण है ऐसे सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानका सम्पादक है उसे - प्राप्त करके, सम्यग्दर्शनमानसम्पन्न होकर, जिसमें कपायकण विद्यमान होनेसे जीवको जो पुण्यवन्धकी प्राप्तिका कारण हो मराग चारित्रको - वह (सराग चारित्र) कमसे प्रा पहने पर भी (गुणम्यान-आरो- हणके क्रममें बलात् अर्थात् चारित्रमोहके मन्द उदयने आ पड़ने पर भी)-दूर उल्लंघन 'महाजशुद्धदर्शनशानरवभावयाले गहन गुरु दर्शन और धान निमा ग्यमाद । २ मंपादन प्राप्त करानेवाला, उत्पन्न करनेवाला। पपायवाण-यापायका गृहमांश। सुर असुर - मनुजेन्द्रो तणा दिनदो नहित निर्वाचनी । प्राप्ति परे चादिप्रथी जोद नानदान मुरुब थी ।। ६॥ 3

-प्रवचनसार-
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[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
स्वरूपे चरणं चारित्रं, स्वसमयप्रवृत्तिरित्यर्थः । तदेव वस्तुस्वभावत्वाद्धर्मः । शुद्ध-
चैतन्यप्रकाशनमित्यर्थः । तदेव च यथावस्थितात्मगुणत्वात्साम्यम् । साम्यं तु दर्शनचारित्र-
मोहनीयोदयापादितसमस्तमोहक्षोभाभावादत्यन्तनिर्विकारो जीवस्य परिणामः ॥ ७ ॥
अथात्मनश्चारित्रत्वं निश्चिनोति-
परिणमदि जेण दव्वं तरकालं तस्मयं ति पण्णत्तं ।
तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेयन्वो ॥८॥
अथाभेदनयेन धर्मपरिणत आत्मैव धर्मो भवतीत्यावेदयति-परिणमदि जेण दव्वं तक्काले तम्मय ति
पण्णत्तं परिणमति येन पर्यायेण द्रव्यं कर्तृ तत्काले तन्मयं भवतीति प्रज्ञप्तम् यतः कारणात्, तम्हा
धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेदवो ततः कारणात् धर्मेण परिणत आत्मैव धर्मो मन्तव्य इति ।
निजगुद्धात्मपरिणतिरूपो निश्चयधर्मो भवति । पञ्चपरमेष्ठयादिभक्तिपरिणामरूपो व्यवहा
धर्मम्तावदुच्यते । यतस्तेन तेन विवक्षिताविवक्षितपर्यायेण परिणतं द्रव्यं तन्मयं भवति, ततः पूर्वोक्त-
धमंहयेन परिणतस्तप्तायःपिण्डवदभेदनयेनात्मैव धर्मो भवतीति ज्ञातव्यम् । तदपि कस्मात्, उपादान-
कारणमहणं हि कार्यमिति वचनात् । तच्च पुनरुपादानकारणं शुद्धाशुद्धभेदेन द्विधा। रागादिविकल्प-
रहितस्यसंवेदनजानमागमभाषया शुक्लध्यानं वा केवलज्ञानोत्पत्तौ शुद्धोपादानकारणं भवति ।
अगुद्वात्मा तु रागादीनामशुद्धनिश्चयेनाशुद्धोपादानकारणं भवतीति सूत्रार्थः । एवं चारित्रस्य संक्षेप-
सुचनपेण द्वितीयस्थले गाथात्रयं गतम् ॥ ८ ॥ अथ शुभाशुभशुद्धोपयोगत्रयेण परिणतो जीवः शुभा-
वह क्षोभ है। मोह और क्षोभ रहित परिणाम, साम्य, धर्म और चारित्र यह सब
पर्यायवाची हैं ।। ७ ॥
अब आत्माकी चारित्रता (अर्थात् आत्मा ही चारित्र है ऐसा) निश्चय करते हैं :-
गाथा ८
अन्वयार्थ :- [द्रव्यं] द्रव्य जिस समय [येन] जिस भावरूपसे [परिणमति]
परिणमन करता है [तत्कालं] उस समय [तन्मयं] उस मय है [इति] ऐसा
[प्रज्ञप्तं] (जिनेन्द्र देवने) कहा है; [तस्मात्] इसलिये [धर्मपरिणतः आत्मा]
धर्मपनिात आत्माको [धर्मः मन्तव्यः] धर्म समझना चाहिये ।
टोका :- वास्तवमें जो द्रव्य जिस समय जिस भावरूपसे परिणमन करता है,
वह द्रव्य उस समय उष्णतारूपसे परिणमित लोहेके गोलेकी भांति उस मय है,
लिये यह आत्मा धर्मरूप परिणमित होनेसे धर्म ही है । इसप्रकार आत्माकी
मागिता मिल हुई।
जे भावमा प्रपने दरव, ते काल तन्मय ते का।
जीवद्रव्य तेथी धर्ममां प्रणमेल धर्म ज जाणवु ॥८॥

-ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापत-
धर्मों
-
जैन शास्त्रमाला
परिणमति येन द्रव्यं तत्कालं तन्मयमिति प्रज्ञप्तम् ।
तस्माधर्मपरिणत आत्मा
मन्तव्यः ॥८॥
यत्खलु द्रव्यं यस्मिन्काले येन भावेन परिणमति तत् तस्मिन् काले किलौष्ण्यपरि-
णतायः पिण्डवत्तत्मयं भवति। ततोऽयमात्मा धर्मेण परिणतो धर्म एव भवतीति सिद्धमात्मत-
श्चारित्रत्वम् ॥८॥
अथ जीवस्य शुभाशुभशुद्धत्वं निश्चिनोति
जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा सुहो असुहो ।
सुद्धेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसन्भावो ॥६॥
जीवः परिणमति यदा शुभेनाशुभेन वा शुभोऽशुभः ।
शुद्धेन तदा शुद्धो भवति हि परिणामस्वभावः ॥६॥
शुभशुद्धोपयोगस्वरूपो भवतीत्युपदिति -- जीवो परिणदि जदा सुहेण असुहेण वा जीव: कर्ता
यदा परिणमति शुभेनाजुभेन वा परिणामेन सुहो असुहो हवदि तदा शुभेन शुभो भवति, अशुभेन
वाशुभो भवति । सुद्धण तदा सुद्धो हि शुद्धेन यदा परिणमति तदा शुद्धो भवति, हि स्फुटम् ।
कथंभूतः सन् । परिणामसमभावो परिणामसद्भावः सन्निति । तद्यथा-यथा स्फटिकमणिविशेपो
निमलोऽपि जपापुप्पादिरक्तकृष्णश्वेतोपाधिवशेन रक्तकृष्णश्वेतवर्णो भवति, तथाऽयं जीवः स्वभावेन
शुद्धबुद्धकस्वरूपोऽपि व्यवहारेण गृहस्थापेक्षया यथानंभवं सरागसम्यक्त्वपूर्वकदानपूजादिशुभानुष्ठानेन,
तपोधनापेक्षया तु मूलोत्तरगुणादिशुभानुप्ठानेन परिणत: गुभो नातव्य इति । मित्र्यात्वाविरति-
भावार्थ :- सातवीं गाथामें कहा गया है कि चारित्र आत्माका ही भाव है । और
इन गाथामें अभेदनयसे यह कहा है कि जने उष्णताम्प परिणमित लोहेका गोला स्वयं
ही उप्णता है - लोहेका गोला और उप्णता पृथक् नहीं है, इसी प्रकार चारित्रभावसे
परिणमित आत्मा स्वयं ही चारित्र है ।। ८ ।।
अब यहाँ जीवका गुभ, अशुभ और शुद्धन्द (अर्यात पर जोय ही शुभ, अगुग
और शुद्ध है ऐसा) निश्चित करते हैं ।
गाथा ९
अन्वयार्थ [जीपः] जीव [परिणामस्वभाद:] परिनामस्वभावी होने
[यदा] जब [शुभेन वा अशुभेन] शुभ या अशुन नावार [परिणमनि] परिमन
शुभ ये अशुभमां प्रणमतां गुन . अगुन आरमा दने ।
शुद्धे प्रणमतां शुद्ध परिणाम स्वभावी होड़ने ॥६॥

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ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-
-
जैन शास्त्रमाला]
अथ परिणामं वस्तुस्वभावत्वेन निश्चिनोति
पत्थि विणा परिणामं अत्थो अत्थं विणेह परिणामो ।
दव्वगुणपज्जयत्यो
अत्थो अत्थित्तणिवत्तो ॥१०॥
नास्ति विना परिणाममर्थोऽथ विनेह परिणामः ।
द्रव्यगुणपर्ययस्थोऽर्थोऽस्तित्वनिर्वृत्तः ॥१०॥
न खलु परिणाममन्तरेण वस्तु सत्तामालम्वते । वस्तुनो द्रव्यादिभिः परिणामात्
पृथगुपलम्भाभावान्निःपरिणामस्य खरशृङ्गकल्पत्वादृश्यमानगोरसादिपरिणामविरोधाच्च ।
परिणामिनोः परस्परं कथंचिदभेदं दर्शयति - णस्थि विणा परिणामं अत्यो मुक्तजीवे तावत्कथ्यते,
सिद्धपर्याय:पशुद्धपरिणामं विना शुद्धजीवपदार्थो नास्ति । कस्मात् । संजालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽपि
प्रदेशभेदाभावात् । अत्यं विणेह परिणामो मुक्तात्मपदार्थ विना इह जगति शुद्धात्मोपलम्भलक्षण:
रंगमें परिणमित होता है तब स्वयं ही शुद्ध होता है, उसीप्रकार आत्मा भी जब
निश्चय रत्नत्रयात्मक शुद्धोपयोगमें परिणमित होता है तव स्वयं ही शुद्ध होता है ।
सिद्धान्त बन्योंमें जीवके असंख्य परिणामोंको मध्यम वर्णनसे चौदह गुणस्थान-
म्प कहा गया है। उन गुणस्थानोंको संक्षेपसे 'उपयोग' रूप वर्णन करते हुए, प्रथम
तीन गुणस्थानोंमें तारतम्य पूर्वक (घटता हुआ) अशुभोपयोग, चौथेसे छठे गुणस्थान
तक तारतम्य पूर्वक (वढ़ता हुआ) शुभोपयोग, सातवैसे बारहवें गुणस्थान तक
तारतम्य पूर्वक शुद्धोपयोग और अन्तिम दो गुणस्थानोंमें शुद्धोपयोगका फल कहा गया
है, - ऐसा वर्णन कथंचित् हो सकता है ।। ६ ।।
अब परिणाम वस्तुका स्वभाव है यह निश्रय करते हैं :-
गाथा १०
अन्वयार्थ :- [इह] इस लोकमें (परिणाम विना] परिणामले बिना [अर्थः
नास्ति] पदार्थ नहीं है, [अर्थ पिना] पदार्थके बिना | परिणामः] परिणाम नहीं है ;
[अर्थः] पदार्थ द्रव्यगुणपर्ययस्थः] द्रव्य-गण-पर्याय में सनेवाला नीर अनित्यनियंत्तः ।
(उत्पादव्ययध्रौव्यमय) अस्तित्वने बना हुआ है।
टोका :- परिणामके बिना वन्तु अस्तिन्य धारण नी करती, योकि यन
च्यादिवे दाग (द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावने) परिणामने भिट अनुभव (देवों में नहीं
आती, क्योंकिः (१) परिणाम रहित वस्तु गधे नींग नमान है, (२) दवा मग,
परिणाम दिण न पदार्थ, ने न पदार्थ दिण परिणाम है।
गुण-प्रय-पर्यय स्थित ने अस्तित्व निट पदार्थ ॥2॥

- ----प्रवचनसार-- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अन्तरेण वस्तु परिणामोऽपि न सत्तालालम्बते । स्वाश्रयभूतस्य परतुनोऽभावे निराश्रयस्य परिणामस्य शून्यत्वप्रसंगात् । वस्तु पुनरूद्धतासामान्यलक्षणे द्रव्ये सहभाविविशेषलक्षणेषु गुणेषु क्रमभाविविशेषलक्षणेषु पर्यायेषु व्यवस्थितमुत्पादव्ययध्रौव्यमयास्तित्वेन निर्वतित- निवृत्तिमच्च । अतः परिणामस्वभावमेव ।। १०॥ सिद्धपर्यायरूपः शुद्धपरिणामो नास्ति । कस्मात् । संज्ञादिभेदेऽपि प्रदेशभेदाभावात् दव्यगुणपज्जयत्यो आत्मस्वरूपं द्रव्यं तत्रैव केवलज्ञानादयो गुणाः सिद्धरूपः पर्यायश्च, इत्युक्तलक्षणेगु द्रव्यगुणपर्यायेषु तिष्ठतीति द्रव्यगुणपर्यायस्थो भवति । स क: कर्ता । अत्यो परमात्मपदार्थः, सुवर्णद्रव्यपीतत्वादि- गुणकुण्डलादिपर्यायस्थसुवर्णपदार्थवत् । पुनश्च किंरूपः । अस्थित्तणिव्वत्तो शुद्धद्रव्यगुणपर्यायाधारभूतं यच्छुद्धास्तित्वं तेन निर्वृत्तोऽस्तित्वनिवृत्तः, सुवर्णद्रव्यगुणपर्यायास्तित्वनिवृत्तसुवर्णपदार्थवदिति । अयमत्र तात्पर्यार्थः । यथा -- मुक्तजीवे द्रव्यगुणपर्यायत्रयं परस्पराविनाभूतं दर्शितं तथा संसारिजीवेऽपि मतिज्ञानादिविभावगुणेषु नरनारकादिविभावपर्यायेषु नयविभागेन यथासंभवं विज्ञेयम्, तथैव पुद्गलादिष्वपि । एवं शुभाशुभशुद्धपरिणामव्याख्यानमुख्यत्वेन तृतीयस्थले गाथाद्वयं गतम् ।। १० ।। दिखाई देनेवाले गोरस इत्यादि (दूध, दही वगैरह) के परिणामोंके साथ 'विरोध आता है। (जैसे - परिणामके बिना वस्तु अस्तित्व धारण नहीं करती उसीप्रकार) वस्तुके विना परिणाम भी अस्तित्वको धारण नहीं करता, क्योंकि स्वाश्रयभूत वस्तुके अभावमें (अपने आश्रयरूप जो वस्तु है वह न हो तो) निराश्रय परिणामको शून्यताका प्रसंग आता है। और वस्तु तो 'ऊर्ध्वतासामान्यस्वरूप द्रव्यमें, सहभावी विशेषस्वरूप (साथ ही साथ रहनेवाले विशेष-भेद जिनका स्वरूप है ऐसे) गुणोंमें तथा क्रमभावी विशेषस्वरूप पर्यायोंमें रही हुई और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यमय अस्तित्वसे बनी हुई है; इसलिये वस्तु परिणाम-स्वभाववाली ही है । भावार्थ :- जहाँ जहाँ वस्तु दिखाई देती है वहाँ वहाँ परिणाम दिखाई देता है । जैसे - गोरस अपने दूध, दही, घी, छाछ इत्यादि परिणामोंसे युक्त ही दिखाई देता है । जहाँ परिणाम नहीं होता वहाँ वस्तु भी नहीं होती। जैसे कालापन, स्निग्धता इत्यादि परिणाम नहीं हैं तो गधेके सींगरूप वस्तु भी नहीं है । इससे सिद्ध हुआ कि वस्तु परिणाम रहित कदापि नहीं होती। जैसे वस्तु परिणामके विना नहीं होती उसीप्रकार परिणाम भी वस्तुके बिना नहीं होते, क्योंकि वस्तुरूप आश्रयके विना परिणाम १ यदि वस्नुको परिणाम रहित माना जावे तो गोरस इत्यादि वस्तुओंके दूध, दही आदि जो परिणाम प्रत्यक्ष दिखाई देते है उनके साथ विरोध आयेगा। पालकी अपेक्षामे स्थिर होनेको अर्थात् कालापेक्षित प्रवाहको ऊर्ध्वता अथवा ऊंचाई कहा जाता है । ऊर्वता- गामान्य अर्थात् अनादि-अनन्त उच (कालापेक्षित) प्रवाहसामान्य द्रव्य है । - २ जैन शास्त्रमाला]] ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-- अथ चारित्रपरिणामसंपर्कसम्भववतोः शुद्धशुभपरिणामयोपादानहानाय फल- मालोचयति--- धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपयोगजुदो। पावदि णिबाणसुहं सुहोवजुत्तो य सग्गसुहं ।। ११ ॥ अथ वीतरागमनागचारित्रनंजयोः शुशुभोपयोगपरिणामयोः संक्षेपेण फलं दर्शयति - धम्मेण परिणदप्पा अप्पा धर्मण परिणतात्मा परिणतस्वरूपः सन्नयमात्मा जदि मुद्धसंपयोगजुदो यदि चेच्छुद्रोपयोगानिधानभुसंप्रयोगपरिणामयुतः परिणतो भवति पावदि णिवाणनुहं तदा निर्वाणमुखं प्राप्नोति । सुहोवजुत्तो व सनगनुहं शुभोपयोगयुतः पणिनः नन् स्वर्गमुवं प्राप्नोति । इतो विस्तरम् - ह धर्मगदेनाहिनालक्षणः सागारानगारपस्तथोत्तमक्षमादिनक्षणो रत्नत्रयात्मको वा, तथा मोह- क्षोमाहित आत्मपरिणामः शुक्रवन्तुस्वभावति गृह्यते । स एव धर्मः पर्यायान्तरेण चारित्रं भण्यते । - किसके आधयले रहेंगे ? गोरसम्प आश्रयके विना दूध, दही इत्यादि परिणाम किसके आधारने होंगे? और फिर वस्तु तो द्रव्य-गुण-पर्यायमय है। उसमें त्रैकालिक ऊर्य प्रवाह- सामान्य द्रव्य है, और साथ ही साथ रहनेवाले भेद वे गुण हैं, तया क्रमशः होनेवाले भेद वे पर्यायें हैं। ऐसे द्रव्य, गुण और पर्यायकी एकतासे रहित कोई वस्तु नहीं होती। दूसरी रोतिसे कहा जाय तो, वस्तु उत्पाद-व्यय-धोव्यमय है अर्थात् वह उत्पन्न होती है, नष्ट होती है और स्थिर रहती है । इसप्रकार वह द्रव्य-गुण-पर्यायमय और उत्पाद- व्यय-ध्रौव्यमय होनेसे उसमें क्रिया (परिणमन) होती ही रहती है। इसलिये परिणाम वस्तुका स्वभाव ही है ।। १० ॥ अब जिनका चारित्र परिणामके साथ सम्पर्क (जन्यन्य) है ने जो शुद्ध और शुभ (दो प्रकारके) परिणाम हैं उनके ग्रहण नया स्वागये लिये (जल परिणाम ग्रहण और शुभ परिणामके त्यागके लिये) उनका फल विचारले :- गाथा ११ अन्दयार्थ :- [धर्मेण परिणतात्मा] धर्मले पनि मन वाला मामा] आत्मा [यदि] यदि [शुरूसंप्रयोगयुतः] मुल उपयोग में तो नो [निर्वामु] मोक्ष मुखको प्राप्नोति प्राप्त करता है [शुभोपपुतः च] मं पविभोरवाटकाला हो तो (स्वर्गमुई) स्वर्गके मुखको (दो) प्राप्त करना है । -- भावार्थ:-जैसे घी बनावन: जमीनजना मनकामना । जल जाते हैं, इसीप्रकार चारित्र बनावगे मोर दाता है, it infi - दान, पूजा, पंच-महावन, देवगुरु धर्म प्रति नग वादियो............। सराग (शुभोपयोगवाला) चारित्र विरोधी शनि गहिर है और दोनगा या । जो धर्म परिणत स्वरूप जिव शुद्धोपयोगी होय तो। ते पामतो निर्वाण सुख, ने स्वर्ग सुख शुभ युक्त जो ॥११॥ - जैन शास्त्रमाला -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- १६ अथ चारित्रपरिणामसंपर्कासंभवादत्यन्तहेयस्याशुभपरिणामस्य फलमालोचयति असुहोदएण आदा कुणरो तिरियो भवीय गैरइयो । दुक्खसहसैहि सदा अभिह दो भमदि अच्चंतं ॥१२॥ अशुभोदयेनात्मा कुनरस्तिर्यग्भूत्वा नैरयिकः । दुःखसहस्रः सदा अभिद्रुतो भ्रमत्यत्यन्तम् ।। १२ ॥ यदायमात्मा मनागपि धर्मपरिणतिमनासादयनशुभोपयोगपरिणतिमालम्बते तदा चान्त्रिपरिणामानभवादयन्तहेवल्याशुभोपयोगस्य फलं दर्शयति - असुहोदयेण अशुभोदयेन आदा आत्मा कुणरो तिरियो भवोय णेरइयो कुतर स्तियंजनारको भूत्वा । किं करोति । दुक्खसहस्सेहिं सदा अभिधुदो नदि बच्चतं दुःवसहन : सदा सर्वकालमभिद्रुतः कादयित: पीडितः सन् संसारे अत्यन्तं भ्रमतीति । तथाहि-निविकारशुद्रात्मतत्त्वात्रि पनिश्चयसम्यक्त्वस्य तव शुद्धात्मन्यविक्षिप्त- चिनवृनिम्पनिश्चयचारित्रस्य च विलक्षणेन विपरीताभिनिवेशजनकेन दृष्टश्रुतानुभूतपञ्चेन्द्रिय- बन्ध होता है। जैसे ठंडा घी शीतलता उत्पन्न करता है इसीप्रकार वीतराग चारित्र साक्षात् मोक्षका कारण है ।। ११ ।। अब चारित्र परिणामके साथ सम्पर्क रहित होनेसे जो अत्यन्त हेय है ऐसे अशुभ परिणामका फल विचारते हैं गाथा १२ अन्वयार्थ :- [अशुभोदयेन] अशुभ उदयने [आत्मा] आत्मा [कुतरः] कुमनुप्य [तिर्यन्] तिर्यच [नरयिक:] और नारकी [भूत्वा] होकर [दुःखसहन :] हजारों दुःखाने [सदा अभिद्र तः] सदा पीड़ित होता हुआ [अत्यंतं भ्रमति] (संसारमें) अन्यन्त भ्रमण करता है। टीका :- जब यह आत्मा किंचित् मात्र भी धनवरिमनिको प्राण न करता हुआ अणुगोपयोग परिणतिका अवलम्बन करना , नरक गुमन, मिन और नारकीय रूपमें परिश्रमण करता हुआ (ताप) जागे दुसरे का अनुभव करता है; इसलिये मानिसके लेगमात्रमा नी जमात मी, मासयोग अपनीयही ।।१।। आत्मा पुनर लिमर ने नारदो। नित्ये तहत तुःसे पीड़ित संसारमा अति अति भो ।।१२॥ अशुभोदये २० -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान कुमनुष्यतिर्यङ्नारकभ्रमणरूपं दुःखसहस्रवन्धमनुभवति । ततश्चारित्रलवस्याप्यभावा- दत्यन्तहेय एवायमशुभोपयोग इति ।। १२ ।। एवमयमपास्तसमस्तशुभाशुभोपयोगवृत्तिः शुद्धोपयोगवृत्तिमात्मसात्कुर्वाणः शुद्धोप- योगाधिकारमारभते । तत्र शुद्धोपयोगफलमात्मनः प्रोत्साहनार्थमभिष्टौति - अइसयमादसमुत्थं विसयातीदं अणोवममणतं । अधुच्छिण्णं च सुहं सुद्धवओगप्पसिद्धाणं ॥ १३ ॥ अतिशयमात्मसमुत्थं विषयातीतमनौपम्यमनन्तम् । अव्युच्छिन्नं च सुखं शुद्धोपयोगप्रसिद्धानाम् ॥ १३ ॥ आसंसारापूर्वपरमा तालादरूपत्वादात्मानमेवाश्रित्य प्रवृत्तत्वात्पराश्रयनिरपेक्ष- विषयाभिलापतीव्रसंक्लेशरूपेण चाशुभोपयोगेन यदुपाजितं पापकर्म तदुदयेनायमात्मा सहजशुद्धात्मा- नन्दकलक्षणपारमाथिकसुखविपरीतेन दुःखेन दुःखितः सन् स्वस्वभावभावनाच्युतो भूत्वा संसारेऽत्यन्तं भ्रमतीति तात्पर्यार्थः । एवमुपयोगत्रयफलकथनरूपेण चतुर्थस्थले गाथाद्वयं गतम् ॥ १२ ॥ अथ गुभाशुभोपयोगद्वयं निश्चयनयेन हेयं ज्ञात्वा शुद्धोपयोगाधिकार प्रारभमाणः, शुद्धात्मभावना- मात्मसाकुर्वाणः सन् जोवस्य प्रोत्साहनार्थ शुद्धोपयोगफलं प्रकाशयति । अथवा द्वितीयपातनिका-यद्यपि सुनोपयोगफलमगे नानं सुखं च संक्षेपेण विस्तरेण च कथयति तथाप्यत्रापि पीठिकायां सूचनां इनप्रकार यह (भगवान कुन्दकुन्दाचार्य देव) समस्त शुभाशुभोपयोगवृत्तिको (गुभउपयोगाप और अशुभ उपयोगरूप परिणतिको) अपास्त कर (हेय मानकर, तिरस्कार करके, दूर करके) शुद्धोपयोगवृत्तिको आत्मसात् (आत्मरूप, अपनेरूप) करते हुप शुद्धोपयोग अधिकार प्रारम्भ करते हैं। उसमें (पहले) शुद्धोपयोगके फलकी मात्मा प्रोत्साहनके लिये प्रशंसा करते हैं । गाथा १३ अन्वयार्थ :- [शुद्धोपयोगप्रसिद्धानां] शुद्धोपयोगसे 'निप्पन्न हुए आत्माओंका (वेजली और मिडोंका) [मुखं] सुख [अतिशयं] अतिशय [आत्मसमुत्थं] आत्मोत्पन्न ....... पास होना; पतन होना; सिद्ध होना। (शुद्धोपयोगसे निप्पन्न हुए अर्थात् शुद्धोपयोग "।) अन्वंत, आत्मोत्यन, विषयातीत, अनुप अनंत ने । विच्छेद होन के मुत्र अहो ! शुद्धोपयोग प्रसिद्ध ने ॥१३॥ -- - जैन शास्त्रमाला] -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- २१ त्वादत्यन्तविलक्षणत्वात्समस्तायतिनिरपायित्वान्नरन्तर्यप्रवर्तमानत्वाञ्चातिशयवदात्मसमुत्थं विषयातीतमनौपम्यमनन्तमव्युच्छिन्न च शुद्धोपयोगनिष्पन्नानां सुखमतस्तत्सर्वथा प्रार्थनीयम् ॥१३॥ अय शुद्धोपयोगपरिणतात्मस्वल्पं निरूपयति सुविदिदपयत्यसुत्तो संजमतवसंजुदो विगदरागो। समणो समसुहदुक्खो भणिदो सुद्धोवओगो त्ति ॥ १४ ॥ सुविदितपदार्थसूत्र : संयमतपःसंयुतो विगतरागः । श्रमणः समसुखदुःखो भणितः शुद्धोपयोग इति ॥ १४ ॥ सूत्रार्थजानवलेन स्वपरद्रव्यविभागपरिज्ञानश्रद्धानविधानसमर्थत्वात्सुविदितपदार्थसूत्रः। करोति । अथवा तृतीयपातनिका-पूर्व शुद्धोपयोगफलं निर्वाणं भणितमिदानी पुननिर्वाणस्य फलमनन्तनुवं कथयतीति पातनिकायस्यार्थ मनसि धृत्वा मूत्रमिदं प्रतिपादयति- अइसयं आसंसा- राद्देवेन्द्रादिनुवेन्योऽप्यपूर्वाद्भुतपरमाहादरूपत्वादतिशयस्वरूपं, आदसमुत्थं रागादिविकल्परहितस्व- शुद्धात्मसंविनिसमुत्पन्नत्वादात्मसमुत्यं, विसयातीदं निविषयपरमात्मतत्त्वप्रतिपक्षभूतपञ्चेन्द्रिय- विपयातीतत्वादिषयातीतं, अणोवमं निरुपमपरमानन्दकलक्षणत्वेनोपमारहितत्वादनुपम, अणंतं अनन्तागामिकाले विनाशाभावादप्रमितत्वाहानन्तं, अन्वुच्छिणं च असातोदयाभावानिरन्तरत्वाद- विच्छिन्नं च नुहं एवमुक्तविशेषणविशिष्टं मुग्वं भवति । केपाम् । सुवओगप्पसिद्धाणं वीतरागपरम- सामायिकशब्दवाच्यशुद्धोपयोगेन प्रसिद्धा उत्पन्ना येऽहंसिद्धास्तपामिति । अत्रेदमेव मुखमुपादेयत्वेन निरन्तरं भावनीयमिति भावार्थः ।। १३ ।। अथ येन शुद्धोपयोगेन पूर्वोन्मुन्वं भवति तत्परिणतपुराण- [विषयातीतं] विषयातीत (अतीन्द्रिय) [अनौपम्यं] अनुपम [अनन्तं] अनन्त (अविनाणी) [अव्युच्छिन्न च] और अविच्छिन्न (अदृट) है। टोका :- (१) अनादि संसारले जो पहले कभी अनुभव में नहीं आया ऐसे अपूर्व, परम अद्भुत आहादरूप होनेने 'अनिमय', (२) भामाशा की आय लेकर (ग्बाश्रित) प्रवर्तमान होनेरे 'आन्मोल्पान', (:) पनपने निरोनेने (, रस, गंध, वर्ण और शयके तथा संकल्पविकल्पो, आधी मनोने) विषयातीत', (४) अत्यन्त विलक्षण होनेने (अन्य मुलीने मांगा कि मवाना होनेने) 'अनुपम, (५) सुमन्त आगामी कालमें कभी भी नारा मात्र न होने सुदिदित सूत्र पदार्थ, संघम तप नहित दोदराय ने । सुख दुःपमा सम प्रमणने मुखोपयोग जिनो आहे ॥१४॥ [ , २२ -प्रवचनसार- सकल- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-फहान सकलषड्जीवनिकायनिशुम्भनविकल्पात्पंचेन्द्रियाभिलाषविकल्पाच्च व्यावात्मनः शुद्ध- स्वरूपे संयमनात्, स्वरूपविश्रान्तनिस्तरङ्गचैतन्यप्रतपनाच्च संयमतपःसंयुतः । मोहनीयविपाकविवेकभावनासौष्ठवस्फुटीकृतनिर्विकारात्मस्वरूपत्वाद्विगतरागः । परम- लक्षणं प्रकाशयति - सुविदिदपयत्थसुत्तो सुप्ठु संशयादिरहितत्वेन विदिता ज्ञाता रोनिताश्च निजशुद्धात्मादिपदार्थास्तत्प्रतिपादकसूत्राणि च येन स सुविदितपदार्थबो भण्यते । संजमतवसंजुदो वाह्य द्रव्येन्द्रियव्यावर्तनेन पड्जीवरक्षणेन चाभ्यन्तरे निजशुद्धात्मसंवित्तिबलेन स्वरूपे संयमनात् संयमयुक्तः, वाह्याभ्यन्तरतपोबलेन कामक्रोधादिशत्रुभिरखण्डितप्रतापस्य स्वशुद्धात्मनि प्रतपनाद्विजय- नात्तपः संयुक्तः । विगदरागो वीतरागशुद्धात्मभावनावलेन समस्त रागादिदोषरहितत्वाद्विगतरागः । समसुहदुक्खो निर्विकारनिर्विकल्पसमाधेरुद्गता समुत्पन्ना तथैव परमानन्दसुख रसे लीना तल्लया निर्विकारस्वसंवित्तिरूपा या तु परमकला तदवष्टम्भेनेष्टानिष्टेन्द्रियविपयेपु हर्पविपादरहितत्वात्सम- 'अनन्त' और (६) बिना ही अन्तरके प्रवर्तमान होनेसे 'अविच्छिन्न' सुख शुद्धोपयोगसे निष्पन्न हुए आत्माओंके होता है, इसलिये वह (सुख) सर्वथा प्रार्थनीय (वांछनीय) है ।। १३ ॥ अब शुद्धोपयोगपरिणत आत्माका स्वरूप कहते हैं :- गाथा १४ अन्वयार्थ :-[सुविदितपदार्थसूत्रः] जिन्होंने (निज शुद्ध आत्मादि ) पदार्थोको और सूत्रोंको भली भाँति जान लिया है, [संयमतपःसंयुतः] जो संयम और तपयुक्त हैं, [विगतरागः] जो वीतराग अर्थात् राग रहित हैं [समसुखदुःखः] और जिन्हें सुख-दुःख समान हैं, [श्रमणः] ऐसे श्रमणको (मुनिवरको) [शुद्धोपयोगः इति भणितः] 'शुद्धोपयोगी' कहा गया है । टीका :- सूत्रोंके अर्थके ज्ञानवलसे स्वद्रव्य और परद्रव्यके विभागके 'परिज्ञानमें श्रद्धानमें और विधानमें (आचरणमें) समर्थ होनेसे (स्वद्रव्य और परद्रव्यकी भिन्नताका ज्ञान, श्रद्धान और आचरण होनेसे) जो श्रमण पदार्थोंको और (उनके प्रतिपादक) सूत्रोंको जिन्होंने भलीभांति जान लिया है ऐसे हैं, समस्त छह जीवनिकायके हननके विकल्पसे और पंचेन्द्रिय सम्बन्धी अभिलाषाके विकल्पसे आत्माको व्यावृत्त करके आत्माका शुद्धस्वरूपमें संयमन करनेसे, और स्वरूपविश्रान्त निस्तरंग 'चैतन्यप्रतपन १ परिज्ञान-पूरा ज्ञान; ज्ञान । व्यावृत्त करके-विमुख करके; रोककर; अलग करके । 3 स्वरूपविश्रान्त स्वरूप में स्थिर हुआ। " निस्तरंग तरंग रहित; चंचलता रहित; विकल्प रहित; शांत । प्रतपन होना=3 प्रतापवान होना, प्रकाशित होना, देदीप्यमान होना । २ ५ -ज्ञाततत्त्व-प्रज्ञापन- - जैन शास्त्रमाला २३ कलावलोकनाननुभूयमानसातासातवेदनीयविपाकनितितसुखदुःखजनितपरिणामवैषम्य- त्वात्समसुखदुःखः श्रमणः शुद्धोपयोग इत्यभिधीयते ।। १४ ।। अथ शुद्धोपयोगलाभानन्तरभाविशुद्धात्मस्वभावलाभमभिनन्दति उक्ओगविसुद्धो जो विगदावरणंतरायमोहरओ। भूदो सयमेवादा जादि परं यभूदाणं ॥१५॥ उपयोगविशुद्धो यो विगतावरणान्तरायमोहरजाः । भूतः स्वयमेवात्मा याति पारं ज्ञेयभूतानाम् ॥ १५ ॥ मुखःत्रः । समणो एवंगुणविशिष्टः श्रमणः परममुनिः मणिदो सुद्धोवओगो त्ति शुद्धोपयोगी भणित इत्यभिप्रायः ।। १४ ।। एवं शुद्रोपयोगफलभूतानन्तसुन्वस्य शुद्धोपयोगपरिणतपुल्पस्य । कयनरूपेण पञ्चमन्यले गायायं गतम् ।। इति चतुर्दशगाथाभिः स्यनपञ्चकेन पीठिकाभिधानः प्रथमोऽन्तराधिकारः समाप्तः ।। होनेसे जो संयम और तपयुक्त हैं, सकल मोहनीयके विपाकले भेदकी भावनाकी उत्कृष्टताने (नमस्त मोहनीय कर्मके उदयसे भिन्नत्वकी उत्कृष्ट भावनासे) निविकार मान्मन्बापको प्रगट किया होनेसे जो वीतराग है, और परमकलाके अवलोकनके कारण साता वेदनीय तथा असाता वेदनीयके विपाकसे उत्पन्न होनेवाले जो सुख-दुःख उन मुन्व-दुःख जनित परिणामोंकी विपमताका अनुभव नहीं होनेने (परम सुखरसमें लोन निविकार म्ब संवेदनम्प परमकन्नाके अनुभवके कारण इष्टानिष्ट संयोगों में हर्ष शोकादि विषय परिणामों का अनुभव न होनेसे) जो 'समन्वदुःव हैं, ऐसे श्रमण शुद्धोपयोगी कहलाते हैं ।। १४ ।। अब, शुद्धोपयोगकी प्राप्तिके बाद तत्काल (अन्नर पड़े दिना) होनेवाली गु आन्मन्वभाव (केवनमान) प्राप्तिकी प्रशंसा करने :- - गाथा १५ अन्दयार्थ:- (:) जो (उपयोगदिगदः) मोन 4 ग' मा (Err ::::: - उपयोग दिगुरु से मोहादि पानी ग्ल से। चमेद तल थदो पदो गन्त के पास हो।

२४ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दपुन्द-कहान यो हि नाम चैतन्यपरिणामलक्षणेनोपयोगेन यथाशक्ति विशुद्धो भूत्वा वर्तते स खलु प्रतिपदमुद्धिचमानविशिष्टविशुद्धिशक्तिरुग्रन्थितासंसारबदृढतरमोहग्रंथित- यात्यंतनिर्विकारचैतन्यो निरस्तसमस्तज्ञानदर्शनावरणान्तरायतया निःप्रतिघविजृम्भि- तदनन्तरं सामान्येन सर्वज्ञसिद्धिर्ज्ञानविचारः संक्षेपेण शुद्धोपयोगफल नेति कयनरूपेण गाथा- सप्तकम् । तत्र स्थलचतुष्टयं भवति, तस्मिन् प्रथमस्थले सर्वज्ञस्वरूपकथनार्थ प्रथमगाथा, स्वयम्भू- कथनार्थ द्वितीया चेति ‘उवओगविसुद्धो' इत्यादि गाथाद्वयम् । अथ तस्यैव भगवन उत्पादव्ययध्रीव्य- स्थापनार्थ प्रथमगाथा, पुनरपि तस्यैव दृढीकरणार्थ द्वितीया चेति 'भंगविहीणो' इत्यादि गाथाद्वयम् । अथ सर्वश्रद्धानेनानन्तसुखं भवतीति दर्शनार्थ 'तं सव्वट्ठवरिटु' इत्यादि सूत्रमेकम् । अथातीन्द्रिय- ज्ञानसौख्यपरिणमनकथनमुख्यत्वेन प्रथमगाथा, केवलिभुक्तिनिराकरणमुख्यत्वेन द्वितीया चेति 'पक्खीणधाइकम्मो' इति प्रभृति गाथाद्वयम् । एवं द्वितीयान्तराधिकारे स्थलचतुष्टयेन समुदाय- पातनिका । तद्यथा - अथ शुद्धोपयोगलाभानन्तरं केवलज्ञानं भवतीति कथयति । अथवा द्वितीय- पातनिका - कुन्दकुन्दाचार्यदेवाः सम्बोधनं कुर्वन्ति, हे शिवकुमारमहाराज, कोऽप्यासन्नभव्यः संक्षेप- रुचिः पीठिकाव्याख्यानमेव श्रुत्वात्मकार्य करोति, अन्यः कोऽपि पुनविस्तररुचिः शुद्धोपयोगेन संजात- - [आत्मा] वह आत्मा [विगतावरणान्तरायमोहरजाः] ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और मोहरूप रजसे रहित [स्वयमेव भूतः] स्वयमेव होता हुआ [ज्ञ यभूतानां] ज्ञेयभूत पदार्थोंके [पारं याति] पारको प्राप्त होता है । टीका :- जो (आत्मा) चैतन्य परिणामस्वरूप उपयोगके द्वारा यथाशक्ति विशुद्ध होकर वर्तता है, वह (आत्मा), जिसे पद पद पर (प्रत्येक पर्यायमें) 'विशिष्ट विशुद्ध शक्ति प्रगट होती जाती है, ऐसा होनेसे, अनादि संसारसे बंधी हुई हढ़तर मोहग्रन्थि छूट जानेसे अत्यन्त निर्विकार चैतन्यवाला और समस्त ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तरायके नष्ट हो जानेसे निर्विघ्न विकसित आत्मशक्तिवान स्वयमेव होता हुआ शेयताको प्राप्त (पदार्थों) के अन्तको पा लेता है । यहां (यह कहा है कि) आत्मा ज्ञानस्वभाव है, और ज्ञान ज्ञेय प्रमाण है; इसलिये समस्त शेयोंके भीतर प्रवेशको प्राप्त (ज्ञाता) ज्ञान जिसका स्वभाव है ऐसे आत्माको आत्मा शुद्धोपयोगके ही प्रसादसे प्राप्त करता है । भावार्थ :- शुद्धोपयोगी जीव प्रतिक्षण अत्यन्त शुद्धिको प्राप्त करता रहता है; और इसप्रकार मोहका क्षय करके निर्विकार चेतनावान होकर, बारहवें गुणस्थानके . विशिष्ट विशेष; असाधारण; खान ।

- -- जैन शास्त्रमाला] --ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- २५ तात्मशक्तिञ्च स्वयमेव भूतो ज्ञेयत्वमापन्नानामन्तमवाप्नोति । इह किलात्मा ज्ञान- स्वभावो, ज्ञानं तु ज्ञेयमानं; ततः समस्तज्ञेयान्तर्वतिज्ञानस्वभावमात्मानमात्मा शुद्धोपयोगप्रसादादेवासादयति ॥१५॥ अथ शुद्धोपयोगजन्यस्य शुद्धात्मस्वभावलाभस्य कारकान्तरनिरपेक्षतयाऽत्यन्त- मात्मायत्तत्वं द्योतयति - तह सो लद्धसहावो सव्वण्हू सव्वलोगपदिमहिदो । भूदो सयमेवादा हवदि सयंभु ति णिद्दिको ॥१६॥ सर्वजस्य ज्ञानसुन्वादिकं विचार्य पश्चादात्मकार्य करोतीति व्याख्याति - उवओगविसुद्धो जो उपयोगेन शुद्धोपयोगेन परिणामेन विशुद्धो भूत्वा वर्तते यः विगदावरणंतरायमोहरओ भूदो विगतावरणान्तगय- मोहरजोभूतः सन् । कथम् । सयमेव निश्चयेन स्वयमेव आदान पूर्वोक्त आत्मा जादि याति गच्छति । किं । पारं पारमवनानम् । केपाम् । णेयभूदाणं जेयभूतपदार्थानाम् । सर्व जानातीत्यर्थः । अतो विस्तरः- यो निर्मोहमुद्रात्मसंवित्तिलक्षणेन शुद्धोपयोगसंनेनागमभापया पृथक्त्ववितर्कवीचार- प्रथमशुक्लच्यानेन पूर्व निरवशेष मोहक्षपणं कृत्वा तदनन्तरं रागादिविकल्पोपाधिरहितस्वसंवित्ति- लक्षणेनंकत्ववितर्कावीचारसंजद्वितीयशुक्लव्यानेन क्षीणकपायगुणस्थानेन्तमुहर्नकालं स्थित्वा तस्यैवान्त्यसमये ज्ञानदर्शनावरणवीर्यान्तरायाभिधानघातिकमंत्रयं युगपट्टिनाशयति, स जगत्त्रयकाल- प्रयवतिसमस्तवस्तुगतानन्तधर्माणां युगपत्प्रकाशकं केवलनानं प्राप्नोति । ततः स्थितं शुद्धो- पयोगात्सर्वनो भवतीति ।। १५ ।। अथ शुद्धोपयोगजन्यस्य शुद्वात्मस्वभावलाभस्य भिन्नकारकनिरपेक्ष- वेनात्माधीनत्वं प्रकाणयति - तह सो लद्धसहावो यथा नियन्त्लयलक्षणशुद्धोपयोगप्रसादात्सर्व जानानि नथैव मः पूर्वोक्तलधणुद्वात्मस्वभाव: सन् मादा अयमात्मा हदि सयंभु ति गिट्ठिो अन्तिम समयमें ज्ञानावरण ; दर्णनावरण और अन्तरायका युगपद्धय करके समस्त जेयोंको जाननेवाले केवलज्ञानको प्राप्त करता है । इसप्रकार शुजोपयोगमे ही शुद्धात्मस्वभावका लाभ होता है ।। १५ ।। अब, शुद्धोपयोगसे होनेवाली गुहात्मस्वभावको प्राप्ति या कामोंगे निरपेक्ष (स्वतंत्र) होनेसे अत्यन्त आत्माधीन है. (नेगमात्र मापन नो प्रगट करते है :- गाथा १६ अन्वयार्थ :- [तथा] प्रकार | स: आरमा] आमा नित्यम्बनायः] स्वभावको प्राप्त [ सर्वज्ञः] गर्व [सदलोसपनिमहिन:]: मीन लोक अधिपनियोंसे पूजित [रचयमेव भूतः ] रजयनेदभा ने भार] nic है. इति निदिए: ऐना जिनेचने का। गाव. म. errier कीव थे २८ - ले,

२६
-प्रवचनसार
[भमान
योहान
तथा स लब्धस्वभावः सर्वज्ञः सर्वलोकपतिमहितः ।
भूतः स्वयमेवात्मा भवति स्वयम्भूरिति निदिष्टः ॥१६॥
अयं खल्वात्मा शुद्धोपयोगभावनानुभावप्रत्यस्तमितरामस्तघातिकर्मतगा समुपलका-
शुद्धानन्तशक्तिचित्स्वभावः, शुद्धानन्तशक्तिशायकस्वभावेन स्वतन्त्रत्वाद्गृहीतकर्तुत्ला-
धिकारः, शुद्धानन्तशक्तिज्ञानविपरिणमनस्वभावेन प्राप्यत्वात् कर्मत्वं कलगन्, शुद्धानन्त-
शक्तिज्ञानविपरिणमन[स्वभावेन साधकतमत्वात् करणत्वमनुविभाणः,गुनानन्तशक्तिज्ञान-
विपरिणमनस्वभावेन कर्मणा समाश्रियमाणत्वात् संप्रदानत्वंदधानः, शुद्धानन्तशक्तिमान-
विपरिणमन] समये पूर्वप्रवृत्तविकलज्ञानत्वभावापगमेऽपि सहजज्ञानस्वभावेन ध्र वत्वालम्ब-
नादपादानत्वमुपाददानः शुद्धानन्तशक्तिज्ञानविपरिणमनस्वभावस्याधारभूतत्वादधिकरण-
स्वयम्भूर्भवतीति निर्दिष्ट: कथितः । किविशिष्टो भूतः । सव्वण्हू सव्वलोगपदिमाहिदो भूयो मर्वशः
सर्वलोकपतिमहितश्च भूतः संजातः । कथम् । सयमेव निश्चयेन स्वयमेवेति । तथाहि - अभिनकाम-
चिदानन्दैकचैतन्यस्वभावेन स्वतन्त्रत्वात् कर्ता भवति । नित्यानन्दैकस्वभावेन स्वयं प्राप्यत्वात्
कर्मकारकं भवति । शुद्ध चैतन्यस्वभावेन साधकतमत्वात्करणकारकं भवति । निर्विकारपरमानन्दै क-
टीका :- शुद्ध उपयोगकी भावनाके प्रभावसे समस्त घातिकर्मोके नष्ट होनेसे
जिसने शुद्ध अन्तशक्तिवान चैतन्य स्वभावको प्राप्त किया है, ऐसा यह (पूर्वोक्त)
आत्मा, (१) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञायक स्वभावके कारण स्वतंत्र होनेसे जिसने
कर्तृत्वके अधिकारको ग्रहण किया है ऐसा, (२) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे
परिणमित होनेके स्वभावके कारण स्वयं ही प्राप्य होनेसे (स्वयं ही प्राप्त होता
होनेसे) कर्मत्वका अनुभव करता हुआ, (३) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे
परिणमित होनेके स्वभावसे स्वयं ही साधकतम (उत्कृष्ट साधन) होनेसे करणताको
धारण करता हुआ, (४) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे परिणमित होनेके
स्वभावके कारण स्वयं ही कर्म द्वारा समाश्रित होनेसे (अर्थात् कर्म स्वयंको ही
देनेमें आता होनेसे) सम्प्रदानताको धारण करता हुआ, (५) शुद्ध अनन्तशक्तिमय
ज्ञानरूपसे परिणमित होनेके समय पूर्वमें प्रवर्तमान 'विकलज्ञानस्वभावका नाश होने
' विद्यालज्ञान अपूर्ण (मति ध्रुतादि) ज्ञान ।
सर्वज्ञ, लब्ध स्वभावने त्रिजगेन्द्र पूजित ए रीते ।
स्वयमेव जीव थयो थको तेने स्वयंभू जिन कहे ॥१६॥

२७ -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- जैन शास्त्रमाला] त्वमात्मसात्कुर्वाणः, स्वयमेव षट्कारकोरूपेणोपजायमानः, उत्पत्तिव्यपेक्षया द्रव्यभाव- भेदभिन्नघातिकर्माण्यपास्य स्वयमेवावि तत्वाद्वा स्वयंभूरिति निर्दिश्यते । अतो न परिणतिलक्षणेन शुद्धात्मभावल्पकर्मणा समाश्रियमाणत्वात्संप्रदानं भवति । तथैव पूर्वमत्यादिज्ञान- विकल्पविनाशेऽप्यखण्डितकचैतन्यप्रकाशनाविनश्वरत्वादपादानं भवति । निश्चयशुद्धचंतन्यादिगुण- स्वभावात्मनः स्वयमेवाधारत्वादधिकरणं भवतीत्यभेदपट्कारकोल्पेण स्वत एव परिणममाणः पर भी सहज ज्ञानस्वभावसे स्वयं ही ध्रुवता का अवलम्बन करनेसे अपादानताको धारण करता हुआ, और (६) शुद्ध अनन्तशक्तियुक्त ज्ञानरूपसे परिणमित होनेके स्वभावका स्वयं ही आधार होने से अधिकरणता को आत्मसात् करता हुआ - (इस प्रकार) स्वयमेव छह कारकल्प होनेसे, अथवा उत्पत्ति - अपेक्षा से 'द्रव्य-भावभेदसे भिन्न घातिकर्मोको दूर करके स्वयमेव आविर्भूत होनेसे, 'स्वयंभू' कहलाता है । यहाँ यह कहा गया है कि - निश्चयसे पर के साथ आत्मा का कारकताका सम्बन्ध नहीं है, कि जिससे शुवात्मस्वभावको प्राप्तिके लिये सामग्री (बाह्य साधन) ढूंढनेकी व्यग्रतासे जीव (व्यर्थ ही) परतंत्र होते हैं । भावार्थ :- कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण नामक छह कारक हैं। जो स्वतंत्रतया-स्वाधीनतासे करता है वह कर्ता है: कर्ता जिसे प्राप्त करता है वह कर्म है; साधकतम अर्थात् उत्कृष्ट माधनको करण कहते हैं: कर्म जिसे दिया जाता है अथवा जिसके लिये किया जाता है वह सम्प्रदान है: जिसमेंने कर्म किया जाता है, वह ध्र ववस्तु अपादान है, और जिनमें अर्थात् जिसके आधार में कर्म किया जाता है वह अधिकरा है । यह छह कारक व्यवहार और निश्चयके भेदसे दो प्रकारके हैं। जहाँ परके निमित्त से कार्य की निद्धि कहलाती है की कहार काम हैं, और जहां अपने ही उपादान कारण ने कार्य की मिलि ही जानी। कहां निग्न कारक हैं। व्यवहार कारकोंका दृष्टान्त इन प्रकार दंड, चत्र, चीवर इत्यादि कारण है: कुमार जल भरा माता इनलिए जल भरनेवाला सम्प्रदान है; टोकनी में मिट्टी का नाम टोकरी अपादान है. और पृथ्वीके आधार पर पाला म-मायमेदो मित पालिका - .

२८ --प्रवचनसार- - . [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान निश्चयतः परेण सहात्मनः कारकत्वसम्बन्धोऽस्ति, यतः शुद्धात्मस्वभावलाभाय सामग्री- मार्गणव्यग्रतया परतंत्रभू यते ॥१६॥ सन्नयमात्मा परमात्मस्वभावकेवलज्ञानोत्पत्तिप्रस्तावे यतो भिन्नकारकं नापेक्षते ततः स्वयंभूर्भवतीति है । यहाँ सभी कारक भिन्न-भिन्न हैं। अन्य कर्ता है; अन्य कर्म है; अन्य करण है; अन्य सम्प्रदान; अन्य अपादान और अन्य अधिकरण है । परमार्थतः कोई द्रव्य किसीका कर्ता - हर्ता नहीं हो सकता, इसलिये यह छहों व्यवहार कारक असत्य हैं। वे मात्र उपत्ररित असद्भूत व्यवहारनयसे कहे जाते हैं। निश्चयसे किसी द्रव्यका अन्य द्रव्यके साथ कारणताका सम्बन्ध है ही नहीं । निश्चय कारकोंका दृष्टान्त इस प्रकार है :- मिट्टी स्वतन्त्रतया घटरूप कार्यको प्राप्त होती है इसलिए मिट्टी कर्ता है और घड़ा कर्म है । अथवा, घड़ा मिट्टीसे अभिन्न है इसलिए मिट्टी स्वयं ही कर्म है; अपने परिणमन स्वभाव से मिट्टीने घड़ा बनाया इसलिए मिट्टी स्वयं ही करण है; मिट्टीने घड़ारूप कर्म अपनेको ही दिया इसलिए मिट्टी स्वयं सम्प्रदान है; मिट्टीने अपनेमेंसे पिंडरूप अवस्था नष्ट करके घटरूप कर्म किया और स्वयं ध्रुव बनी रही इसलिए वह स्वयं ही अपादान है; मिट्टीने अपने ही आधार से घड़ा बनाया इसलिए स्वयं ही अधिकरण है। इसप्रकार निश्चयसे छहों कारक एक ही द्रव्यमें हैं। परमार्थतः एक द्रव्य दूसरे की सहायता नहीं कर सकना और द्रव्य स्वयं ही, अपनेको, अपनेसे, अपने लिए, अपनेमेंसे, अपनेमें करता मलिए निश्चय छह कारक ही परम सत्य हैं । उपरोक्त प्रकारसे द्रव्य स्वयं ही अपनी अनन्त शक्तिरूप सम्पदासे परिपूर्ण गलिए स्वयं ही छह कारकरूप होकर अपना कार्य करनेके लिए समर्थ है, उसे लाता नामकी कोई सहायता नहीं कर सकती। इसलिए केवलज्ञान प्राप्तिके इच्छुक मामाको बाह्य सामग्रीको अपेक्षा रखकर परतंत्र होना निरर्थक है । शुद्धोपयोगमें नी आमा स्वयं ही छह कारकम्प होकर केवलज्ञान प्राप्त करता है। वह आत्मा समानानिवान नायकम्वनावने स्वतन्त्र है इसलिए स्वयं ही कर्ता है; स्वयं किवाले येवलनानको प्राप्त करनेसे केवलज्ञान कर्म है, अथवा केवलज्ञानसे मा होनेने आत्मा स्वयं ही कर्म है; अपने अनन्त शक्तिवाले परिणमन '? ? मायनकेवलनानको प्रगट करता है, इसलिए आत्मा स्वयं ही 2. मानेको हो वनदान देता है, इसलिये आत्मा स्वयं ही सम्प्रदान है;

जैन शास्त्रमाला]] ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- अथ स्वायम्भुवस्यास्य शुद्धात्मस्वभावलाभस्यात्यन्तमनपायित्वं कथंचिबुत्पादव्यय- ध्रौव्ययुक्तत्वं चालोचयति भंगविहूणो य भवो संभवपरिवज्जिदो विणासो हि । विज्जदि तस्सेव पुणो ठिदिसंभवणाससमवाओ ॥१७॥ भङ्गविहीनश्च भवः संभवपरिवजितो विनाशो हि । विद्यते तस्यैव पुनः स्थितिसंभवनाशसमवायः ॥१७॥ भावार्थः ॥ १६ ॥ एवं सर्वनमुन्यत्वेन प्रथमगाथा । स्वयंभूमुन्यत्वेन द्वितीया चेति प्रथमस्थले गाथाहयं गतम् ।। अथास्य भगवतो द्रव्याथिकनयेन नित्यत्वेऽपि पर्यायाथिकनयेनानित्यत्वमुपदिशति - भंगविहीणो य भवो भङ्गविहीनश्च भवः जीवितमरणादिममताभावलक्षणपन्मोपेक्षासंयमरूप- शुद्रोपयोगेनोत्पत्रो योऽसो भवः केवलज्ञानोन्पाद: । म किविशिष्टः । भङ्गविहीनो विनागरहितः । संभवपरिवज्जिदो विणासो त्ति संभवपरिजिनो विनाश इति । योनी मिथ्यात्वरागादिसंसरणप- संसारपर्यायस्य विनाश: । न किविशिष्टः । संभवविहीन: निर्विकारात्मतत्त्वविलक्षणरागादि- अथवा, अपने मेंसे मति श्रुतादि अपूर्ण ज्ञान दूर करके केवलज्ञान प्रगट करता है इसलिये और स्वयं सहज ज्ञान स्वभावके द्वारा वहना है इसलिये स्वयं ही अपादान है, अपनेमें ही अर्थात् अपने ही आधारसे केवलज्ञान प्रगट कन्ना है. इसलिये स्वयं ही अधिकरण है । इसप्रकार स्वयं छह कारकम्प होता है, इसलिये वह 'स्वयंभू' कहलाता है। अनादिकालने अनि दृढ़ बंधे हुए (नानाव, दर्शनावरण. मोहनीय और अंतरायरूप) द्रव्य तथा भाव पानिकोको नष्ट करके स्वयमेव आविर्भत हमा अर्थात् किसीकी सहायताके बिना अपने आप ही ज्ययं प्रगट हुआ नलिने म्या कहलाता है ।।१६॥ अब इस ग्वयंभूके गुलामन्चमावली प्रावि विमानना और थंचित् (कोई प्रकाग्ने) उन्पाद-चय-श्री मानाया :- गाथा ६५ -- अन्वयार्थ :- [भाविहीनः च भव:] ::::: विनाश सहित उत्पाद और संभवपरिजिल ]ि: प्ययहीन उत्पादने बयार न तेने जपली उत्पाद और विचारनी ३० F 1 , -~ -- . ... प्रसादसे हुआ अन्य महात्मन. मग .:..::. ::: प्रलयाभावाविहीनः । गा काम :::: परिजितः । अनोदय मिल जाना न विप्रतिषियते, गडहिनोलेन मंगमा समवेतत्वात् ।।१७॥ परिणामामामानिन.. :::::: नाग्नि । विदि नामेव पुलो हिदिगंगा: :: ::: ::::::.:::..;, "; । तस्यैव भगवन: :: :: :: :: : . बिनाम:. बनाना : पर्यायाचिकान नीलामी: ।।। :::::::::::::: [तस्य एव पुनः] उनके हो शिर नियति भवनाशरामनाम: 1 : और विताणका नमवाय मिलाप, एकजना किमान । टीका :- वान्तवमें बन शुागलभानको प्रान आमा गोपयोग (शुमायभान पसे) उगाई रे , : उतरूपसे प्रलयका अभाव होनेसे बिनाग रहित है; और (उग आमा योग प्रसादसे हुआ) जो अगुद्वात्मस्वभावले विनाश है वह पुनः उगतिका अभाव होनेगे, उत्पाद रहित है । इनसे (यह कहा है कि) उरा आत्माके सिद्धापरी अविनाशीपन है। ऐसा होनेपर भी उस आत्माके उत्पाद, व्यय और धोव्यका गमवाय विरोधको प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वह विनाश रहित उत्पादके साथ, उत्पाद रहित विनाशके साथ और उन दोनोंके आधारभूत द्रव्यके साथ समवेत (तन्मयतासे युक्त एकमेक) है। भावार्थ :- स्वयंभू सर्वज्ञ भगवानके जो शुद्धात्म स्वभाव उत्पन्न हुआ वह कभी नष्ट नहीं होता, इसलिये उनके विनाशरहित उत्पाद है; और अनादि अविद्या जनित विभाव परिणाम एक बार सर्वथा नाशको प्राप्त होनेके वाद फिर कभी उत्पन्न नहीं होते, इसलिये उनके उत्पाद रहित विनाश है । इसप्रकार यहां यह कहा है कि वे सिद्धरूपसे अविनाशी हैं । इसप्रकार अविनाशी होनेपर भी वे उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्त हैं; क्योंकि शुद्ध पर्यायकी अपेक्षासे उनके उत्पाद है, अशुद्ध पर्यायकी अपेक्षासे व्यय है और उन दोनोंके आधारभूत आत्मत्वकी अपेक्षासे ध्रौव्य है ।।१७।। अब, उत्पाद आदि तीनों (उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य) सर्व द्रव्योंके साधारण है जो शुद्धात्मयभावने । - -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-- ३१ जैन शास्त्रमाला अथोत्पादादित्रयं सर्वद्रव्यसाधारणत्वेन शुद्धात्मनोऽप्यवश्यंभावीति विभावयति उप्पादो य विणासो दिज्जदि सवस्स अजादस्स । पज्जाएण दु केणवि अहो खलु होदि सन्भूदो ॥१८॥ उत्पादश्च विनाशो विद्यते सर्वस्यार्थजातस्य । पर्यायेण तु केनाप्यर्थः खलु भवति सद्भूतः ॥१८॥ इत्यते नवामूपि विडम्बन्पे विनयं पढायंत्रादिति निन्पयनि-उप्पादो व विणालो विज्जदि नवल अहजास्त उत्पादन विनाम विचने तावन्सच्याजानन्य पदार्थसमूहस्य । केन कृत्वा । पज्जाएणदु केवि पत्रायेण नु केनापि वियमितेनायव्यञ्जननपेण स्वभावविभावस्पेण वा । म वार्थः किविशिष्टः । अट्टो खलु होदि सन्मूदो अर्थः बन्नु फुट मनाभूतः सत्ताया अभिन्नो भवतीति । इसनिय गुहारमा (केवली भगवान और मिद्ध भगवान) के भी 'अवश्यम्भावी है ऐना व्यक्त करते हैं :- गाथा १८ अन्वयार्थ :- [उत्पादः] किसी पर्यायने उन्याद [विनाशः च] और किसी पर्यायले विनाश [सदस्य] नवं [अर्थजातस्य ] पदार्थमात्रके [विचते] होना है: [देन अपि पर्यायेण तु] और किसी पर्यायने [अर्थः] पदार्थ निभूतः खतु भवति] बान्नव में प्रव है। टीका :- जैसे उनम स्वर्णकी बाबन्दम्य वांगने उनि दियाई देती है. पूर्व अवरधामपने बनने वाली अंगूठी इत्यादिक परीवर्ग विमानला जाना है और पीलापन न्यादि पर्यायने दोनों में (बालबन्न और नवी में) पनि-किनारीमान न होने से प्रीव्यय दिवाई देना है। उनका माना, किनी पर्याय विनाण और विनी पर्याय श्री... : नामि। गर्ग (यह कहा गया कि.) :- आमा भी : श्रीमाप कि अवयम्भावी । १ बामाका; महाला: । उत्पार तेग दिनानी कोई पानी कोई पर ही . परा है वचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द कहान यथाहि जात्यजाम्बूनदस्याङ्गदपर्यायेणोत्पत्तिया; पूर्वव्यवस्थितांगुलीयकादि- पर्यायेण च विनाशः, पीततादिपर्यायेण तूभयत्राप्युत्पत्तिविनाशावनासादयतः ध्रुवत्वम् । एवमखिलद्रव्याणां केनचित्पर्यायेणोत्पाद: केनचिद्विनाशः केनचिध्रौव्यमित्यवबोद्धव्यम् । अतः शुद्धात्मनोऽप्युत्पादादित्रयरूपं द्रव्यलक्षणभूतमस्तित्वमवश्यंभाचि ॥१८॥ तथाहि - सुवर्णगोरसमृत्तिकापुरुषादिमूर्तपदार्थेषु यथोत्पादादित्रयं लोके प्रसिद्ध तथैवामूपि मुक्तजीवे । यद्यपि शुद्धात्मरुचिपरिच्छित्तिनिश्चलानुभूतिलक्षणस्य संसारावमानोत्पन्न कारणनमयनानपर्यायस्य विनामो भवति तथैव भवति तथैव केवलनानादिव्यक्तिरूपस्य कार्यममयसारपर्यायस्योत्पादश्च भवति, तथाप्युभयपर्यायपरिणतात्मद्रव्यत्वेन प्रौव्यत्वं पदार्थत्वादिति । अथवा यथा जेयपदार्थाः प्रतिक्षणं भङ्गत्रयेण परिणमन्ति तथा ज्ञानमपि परिच्छित्त्यपेजया भङ्गत्रयेण परिणनति । पदस्थानगतागुरु- लघुकगुणवृद्धिहान्यपेक्षया वा भङ्गत्रयमववोडव्यमिति सूत्रतात्पर्यम् ।। १८ ।। एवं सिद्धजीवे द्रव्यार्थिक भावार्थ :- द्रव्यका लक्षण अस्तित्व है और अस्तित्व उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप है । इसलिये किसी पर्यायसे उत्पाद, किसी पर्यायसे विनाश और किसी पर्यायसे ध्रौव्यत्व प्रत्येक पदार्थके होता है । प्रश्न :- 'द्रव्यका अस्तित्व उत्पादादिक तीनोंसे क्यों कहा है ? एकमात्र ध्रौव्यसे ही कहना चाहिये; क्योंकि जो ध्रुव रहता है वह सदा बना रह सकता है ?' उत्तर :- यदि पदार्थ ध्रुव ही हो तो मिट्टी, सोना, दूध इत्यादि समस्त पदार्थ एक ही सामान्य आकारसे रहना चाहिये; और घड़ा, कुंडल, दही इत्यादि भेद कभी न होना चाहिये । किन्तु ऐसा नहीं होता अर्थात् भेद तो अवश्य दिखाई देते हैं । इसलिये पदार्थ सर्वथा ध्रुव न रहकर किसी पर्यायसे उत्पन्न और किसी पर्यायसे नष्ट भी होते हैं । यदि ऐसा न माना जाये तो संसारका ही लोप हो जाये । इसप्रकार प्रत्येक द्रव्य उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यमय है, इसलिये मुक्त आत्माके भी उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य अवश्य होते हैं। यदि स्थूलतासे देखा जाये तो, सिद्ध पर्यायका उत्पाद और संसार पर्यायका व्यय हुआ तथा आत्मत्व ध्रुव बना रहा। इस अपेक्षासे मुक्त आत्माके भी उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य होता है । अथवा, मुक्त आत्माका ज्ञान ज्ञेय पदार्थोके आकारल्प हुआ करता है इसलिये समस्त ज्ञेय पदार्थोंमें जिस जिस प्रकारसे जयादादिक होता है उस-उस प्रकारसे ज्ञानमें उत्पादादिक होता रहता है, इसलिये मुक्त आमाके समय समय पर उत्पाद-व्यय-प्रौव्य होता है । अथवा अधिक सूक्ष्मतासे देखा जाय तो, अगुल्लघुगुणमें होनेवाली पटगुनी हानि वृद्धिके कारण मुक्त आत्मामें समय- समयपर उसाद-व्यय-प्रौव्य वर्तता है। यहाँ जैसे सिद्धभगवानके उत्पादादि कहे हैं - - -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- - जन शास्त्रमाला]] अथास्यात्मनः शुद्धोपयोगानुभावात्स्वयंभुवो भूतस्य कथमिन्द्रियविना ज्ञाना- नन्दाविति संदेहमुदस्यति पक्खीणघादिकम्मो अण तवरवीरिओ अहियतेजो। जादो अदिदिओ सो णाण सोक्खं च परिणमदि ।।१६।। प्रक्षीणघातिकर्मा अनन्तवरवीर्योऽधिकतेजाः । जातोऽतीन्द्रियः स जानं सौख्यं च परिणमति ॥१६॥ नयेन नित्यन्वेऽपि विवक्षित पर्यायणोत्लाव्ययाव्यस्थापनरूपेण द्वितीयस्थले गाथाद्वयं गतम् । अय तं पूर्वोक्तमत्र ये मन्यन्ने ते सम्यग्दृष्ट्यो भवन्ति, परम्पत्या मोक्षं च लभन्त इति प्रतिपादयति तं सवरिट्ट इ8 अमरासुरप्पहाणेहि । ये नहंति जोवा तेसि दुक्खाणि खोयंति ॥ १ ॥ तं सव्यवरि ने सर्वार्थनिळ8 इप्टमभिमतं । कैः । अमरासुरप्पहाणेहि अमरासुर- प्रधानः । ये सद्दहति ये श्रवति गोत्रन्ते जोवा भव्यजीवाः । तेसि तेपाम् । दुक्खाणि वीतराग- पारमार्थिकमन्बविलक्षणानि दुःखानि । खोयंति विनायं गच्छन्ति, इति सूत्रायः ॥ १॥ एवं निर्दोपिपरमात्मश्रानान्मोक्षो भवतीति कथनम्पेण तृतीयस्थले गाथा गता ॥ अथास्यात्मनो निर्विकारस्वसंवेदनलक्षणशुद्रोपयोगप्रभावात्सर्वनत्वे सतीन्द्रियविना कयं नानानन्दाविति पृष्ठे प्रत्युत्तरं ददाति -- परयोणघादिकम्मो जानाधनन्नवनुष्यस्वन्यपरमात्मद्रव्यभावनालभनगुनोपयोग- उनीप्रकार केवली भगवानके भी यथायोग्य समझ लेना चाहिये ।।१८।। अब, शुद्धोपयोगके प्रभावसे स्वयंभू हुए इस (पूर्वोक्त) आमाके, इन्द्रियोंके बिना जान और आनन्द बने होता है ? ऐसे नंदेहका निवारण करने है :- गाथा १९ अन्वयार्थ :- [प्रक्षीणघातिकर्मा] जिनके पानिक सयको नो. [अतीन्त्रियः जातः] जो अतीन्द्रिय होगया है, [अनन्तदरनीय: अनन्न किमानम बी और [अधियतेजाः] 'अधिक जिनका (नवलमान श्रीरांना [:] गला वा (स्वयंभ आत्मा) [जानं गौर च] Em: [मिति] पणिमन करता। पिय उला; म । प्रक्षीण पाति फर्म, अनहद , अधिक जाने। दिय-सतीत पल आत्मा मानलार ६॥

३४ " अयं खल्वात्मा शुद्धोपयोगनागत संपृक्तत्वादतीन्द्रियो भूतः सन्निखिलान्तरायमानमा योगे. प्रलयादधिककेवलनानदर्शनाभिधानतेजाः, गगल्समोनोगामा स्वभावमात्मानमासादयन् स्वयमेव स्वपर कामाला जाताना गो च भूत्वा परिणमते । एवमात्मनो जानानन्त्री सामान । मन पराना- त्वादिन्द्रियविनाप्यात्मनो ज्ञानानन्दी संभवतः ।।१६।। वलेन प्रक्षीणघातिकर्मा सन् । अणंतबरयोरियोजना | Fir। अहिगोगो अधिकतेजाः । अत्र तेजः शब्देन केवलगानवर्णन नालम् । आयोग : If fifter: संजातः । कथंभूतः । अणिदियो अनिन्द्रिय इन्द्रियनियमावान I ffff६. । णाणं सोक्खं च परिणमदि केवलनानमनन्तनी न परिणीनि।.: ... ना मानेन किमुक्तं भवति, आत्मा ताव निश्चयेनानन्तजाननुगमभाग गए कर्मप्रच्छादितज्ञानसुखः सन् पश्चादिन्द्रियाधारण किमानाजानं गान पनि । पुनर्निर्विकल्पस्वसंवित्तिवलेन कर्माभावो भवति तदा भयोगमाभागादियानि माया- तीन्द्रियज्ञानं सुखं चानुभवति । ततः स्थितं इन्द्रियाभायेति लकीयानन्तशानं मग नानुमानित । तमणि टीका :- शुद्धोपयोगके सामर्थ्यसे जिसके घातिकर्म धगको प्राप्त हुए क्षायोपशमिक ज्ञान-दर्शनके साथ असंपृक्त (संपर्क रहित) होनेगे जो अतीन्द्रिय होगया है, समस्त अन्तरायका क्षय होनेसे अनन्त जिसका उत्तम वीर्य है, समस्त ज्ञानावरण और दर्शनावरणका प्रलय हो जानेसे अधिक जिसका केवलज्ञान और केवलदर्शन नामक तेज है - ऐसा यह (स्वयंभू) आत्मा, समस्त मोहनीयके अभावके कारण अत्यंत निर्विकार शुद्ध चैतन्य स्वभाववाले आत्माका (अत्यन्त निविकार शुद्ध चैतन्य जिसका स्वभाव है ऐसे आत्माका) अनुभव करता हुआ स्वयमेव स्वपर- प्रकाशकता लक्षण ज्ञान और अनाकुलता लक्षण सुख होकर परिणमित होता है । इसप्रकार आत्माका, ज्ञान और आनन्द स्वभाव ही है। और स्वभाव परसे 'अनपेक्ष होने के कारण इन्द्रियोंके विना भी आत्माके ज्ञान और आनन्द होताहै । भावार्थ :- आत्माको ज्ञान और सुखरूप परिणमित होनेमें इन्द्रियादिक पर निमित्तोंकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि जिसका लक्षण अर्थात् स्वरूप स्वपर- प्रकाशकता है ऐसा ज्ञान और जिसका लक्षण अनाकुलता है ऐसा सुख आत्माका स्वभाव ही है ।।१६।। २ अनपेक्ष स्वतंत्र; उदासीन; अपेक्षा रहित ।

जैन शास्त्रमाला] ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- - अथातीन्द्रियत्वादेव शुद्धात्मनः शारीरं सुखदुःखं नास्तीति विभावयति सोक्खं वा पुण दुक्खं केवलणाणिस्स पत्थि देहगदं । जम्हा अदिदियत्तं जादं तम्हा दु तं णेयं ॥२०॥ कम्मात् । स्वभावस्य परापेक्षा नाम्नीत्यभिप्रायः ।। १६ 11 अयातीन्द्रियत्वादेव केवलिनः जीरा- घारोद्भूतं भोजनादिमुन्वं सुधाब्दुिःवं च नास्तीति विचारयति-सोक्खं वा पुण दुपवं केवलणाणिस्त पत्थि नुवं वा पुनःवं वा केवलजानिनो नास्ति । कयंभूतम् । देहगदं देहगनं देहावाजिह्वन्द्रियादि- समुन्वन्नं कवनाहारादिमुखम्, अमातोदयजनितं क्षुधादिदुःवं च । कस्मानास्ति । जम्हा अदिदियत्तं जावं य-मान्मोहाविधानिकर्माभावे पञ्चेन्द्रियविषयव्यापारहितत्वं जातम् । तम्हा दु तं प्रेयं तन्मावतीन्द्रियत्वातोन्तीन्द्रियमेव तज्जानं मुखं त्र नेयमिति । तद्यथा- लोहपिण्डसंसर्गाभावा- दनियंया धनधानपिट्टनं न नभते तथावमात्मापि लोह पिण्डस्थानीयेन्द्रियग्रामाभावात् मांसारिकसुख- दुःवं नानुभवतीत्यर्थः । कश्चिदाह-केवलिनां भुक्तिस्ति, औदाकिनीरमद्भायात् । असवद्यकर्मोदय- सदाबाहा । अस्मादिवत् । परिहारमाह-नद्भगवतः शरीरमांगारिकं न भवति किनु परमौदारिकम् । नया चोक्तं - "बस्फटिकमका तेजोमूर्तिमयं वपुः । जायते क्षीणदोषस्य सप्तधातुविवजितन्" ।। यन्चोनमनधोव्यसद्भावाना परिहारमाह - यया ब्रोधादिवीजं जनसहकारितारणसहितम- इगदिकार्य जनयति तथेत्रासदेचकर्म मोहनीयसहकारिकारणसहितं झुधादिकार्यमुत्लादयति । याम्मान् । 'मोहम्म बलेण याददे जीवं' इति वचनान् । यदि पुनर्मोहाभावेऽपि भुधादिपरोयहं जनयति नाहि. बधगेगापिगेषहमपि जनयतु, न च तथा । तदपि कम्मात् । “मुक्त्युपसर्गाभावान् इति वचनान् । अन्यदपि दूपणमस्ति । यदि क्षुधावाधास्ति तहि धामीणग्नन्नवार्य नास्ति । नव क्षुधादुःन्वितम्यानन्तमुवमपि नाग्नि । जिह्वन्द्रियपनिनिनिम्पमनिनानपरिणतन्य केवलज्ञानमपि न संभवति । अथवा अन्यदपि कारणमस्ति । मनधान्यापेक्षया महेंगांनोनन्तगुणोनि । ततः कारणान् गगणिमध्ये निम्बकणिकावदनछोयो विमानोति न माने । संवाद अब अतीन्द्रियताके वारण ही गुड आत्माके (केवनी भगवानो) सानोरिल गुण दम्य नहीं है. यह व्यक्त करने है :- -- गाथा २० अन्वयार्थ :- { वेचलशानिनः ] नानीमा श्री मोरयं] गुन्य वा पुनः तु] मारिन , ritr | अतीन्द्रियत्वं जातं] अनोकिया उनमा मदन जानना चाहिये। या गत नशी गुरप में. नी हा. हलने । अभी अलोनियता पई से ए .

टीका :- जैने अग्निको लादपिण्डक नन पदाला का व (अर्थात् अग्नि लोहेके गोलके पुद्गलाक बिलामी - उनको मिनि .:) उसीप्रकार शुद्ध आत्माके (अर्थात् केवलज्ञानी भगवानरः) इन्द्रिय गानमा इसोलिये जैसे अग्निको घनके घोर आघातोंकी परम्परा नहीं है (लोक गायनमाका अभाव होने पर धनके लगातार आघातांकी भयंकर मार गिनार नहीं पाता) इसीप्रकार शुद्ध आत्माके शरीर सम्बन्धी मुख दुःख नहीं हैं ।

-ज्ञानतत्त्व-प्रनापन- - जैन शास्त्रमाला] ३७ यत एव शुद्वात्मनो जातवेदस इव कालायसगोलोत्कूलितपुद्गलाशेषविलासकल्पो नास्तीन्द्रियग्रामस्तत एव घोरधनधाताभिघातपरम्परास्थानीयं शरोरगतं सुखदुःखं नस्यात् ॥२०॥ अथ जानस्वरूपप्रपञ्चं सीस्यस्वल्पप्रपञ्चं च क्रमप्रवृत्तप्रवन्धद्वयेनाभिदधाति । तत्र केवलिनोऽतीन्द्रियजानपरिणतत्वात्सर्व प्रत्यक्ष भवतीति विभावयति. परिणमदो खलु णाण पच्चरखा सव्वदव्वपज्जया । सो व ते विजाणदि उग्गहपुवाहि किरियाहिं ॥२१॥ विशेषात्कटा मुक्ति नि प्रच्छन्ना विद्यते । तहि परमीदारिकारीरत्वाद्भुक्तिरेव नास्त्ययमेवातियः कि न भवति । तत्र तुप्रच्छनमुन्नी मायास्थानं दन्यवृत्तिः, अन्येऽपि पिण्ड शुद्धिकथिता दोषा बहवो भवन्ति। ते चान्लन नमान्ने नातव्याः । अन बाध्यात्मग्रंयत्वात्रोच्यन्त इति । अयमत्र भावार्थ:- इदं वस्तुम्बापनेव नातव्यमत्राग्रहो न कर्तव्यः । कस्मात् । दुराग्रहे मति रागद्वेगोत्पत्तिर्भवति तत्र निविकारचिदानकम्भावपरमात्मभावनाविधानो भवतीति ।। २० ॥ एवमनन्तनानसुख- ग्यापने प्रथमगाथा केवनिमुक्तिनगकरण द्वितीया ति गायायं गतम् । इति मानगाथाभिः स्थलचतुष्टयेन मामान्यन संसिद्धिनामा द्वितोगेन्तराधिकार: - समाप्तः ।। भय ज्ञानप्रपञ्चाभिधानान्नाधिकार अन्त्रिगद्गाया भवन्ति । ताप्ली स्यनानि । तेम्बानी के.वनमानस्य सर्व प्रत्यक्ष भवतीति कवनमुन्यन्वेन परिणमयो बनु इत्यादिनाथायन, अधात्म- मानयोनिश्चयेनासंन्यानप्रदेशत्येऽपि व्यवहारेण सर्वगनन्यं भवतीत्यादिक वनमुन्यावेन सादा पाणपगाणं' यादिगायापचयानतः परमाननी: संगमनगर मुनया माजी जाणमहायो' इत्यादिगाथापञ्चकम, अथ नियव्यवहार्ग लियानादिमुलन्दन कोहि नदेन वादियचनुष्टयम्, अथ वनमानाने कालत्रयांवगिनियमान, विजन धादिपज्नयाम, अथ येत्रनमान बन्धकाणन निगम न. निगु गगायो अन्धकारणमिमादिना पण मधाका कि भावार्थ :- चवनी भगवान गीर भी fr::m गग नहीं होना मानिये उन नबनानी ! अन्न, जानने र दरपामारी :::::::::: ही अभिमानाने .मेने मा:::::: यानी भगवान राम :: :: :- -- . पद हारने । जाण नही है गने का ?

गाथा २१ अन्वयार्थ :- [खलु] वास्तवमें [ज्ञानं परिणममानस्य] ज्ञानरूपसे (केवल- ज्ञानरूपसे) परिणमित होते हुए केवलीभगवानके [सर्वद्रव्यपर्यायाः] सर्व द्रव्य-पर्यायें [प्रत्यक्षाः] प्रत्यक्ष हैं; [सः] वे [तान् ] उन्हें [अवग्रहपूर्वाभिः क्रियाभिः] अवग्रहादि क्रियाओंसे [नैव विजानाति] नहीं जानते । टीका :- केवलीभगवान इन्द्रियोंके आलम्बनसे अवग्रह-ईहा-अवाय पूर्वक क्रमसे नहीं जानते, (किन्तु) स्वयमेव समस्त आवरणके क्षयके क्षण ही, अनादि अनन्त, अहेतुक और असाधारण ज्ञानस्वभावको ही कारणरूप ग्रहण करनेसे तत्काल ही प्रगट होनेवाले केवलज्ञानोपयोगरूप होकर परिणमित होते हैं; इसलिये उनके समस्त द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावका अक्रमिक ग्रहण होनेसे समक्ष संवेदनकी (प्रत्यक्ष ज्ञानको) आलम्बनभूत समस्त द्रव्य-पर्यायें प्रत्यक्ष ही हैं । भावार्थ :- जिसका न आदि है और न अंत है, तथा जिसका कोई कारण नहीं और जो अन्य किसी द्रव्यमें नहीं है, ऐसे ज्ञान स्वभावको ही उपादेय करके, केवल- ज्ञानको उत्पत्तिके बीजभूत शुक्लध्यान नामक स्वसंवेदनज्ञानरूपसे जब आत्मा परिणमित होता है तब उसके निमित्तसे सर्व घातिकर्मोका क्षय हो जाता है और उस क्षय होनेके समय ही आत्मा स्वयमेव केवलज्ञानरूप परिणमित होने लगता है। वे केवलज्ञानी जानतत्त्व-प्रनापन- ३६ - जन शास्त्रमाला] समस्तावरणक्षयक्षण एवानाधनन्ताहेतुकासाधारणभूतज्ञानस्वभावमेव कारणत्वेनोपादाय तदुपरि प्रविकसत्केवलनानोपयोगीभूय विपरिणमते, ततोऽस्याक्रमसमानान्तसमस्तद्रव्य- क्षेत्रकालभावतया समक्षसंवेदनालम्बनभूताः सर्वद्रव्यपर्यायाः प्रत्यक्षा एव भवन्ति ॥२१॥ अथास्य भगवतोऽतीन्द्रियनानपरिणतत्वादेव न किंचित्परोसं भवतीत्यभिप्रेति णत्यि परोक्खं किंचि वि समंत सव्वक्खगुणसमिद्धस्स । अक्खातीदस्स सदा सयमेव हि जाणजादस्स ॥२२॥ नास्ति परोक्षं किंचिदपि समन्ततः सक्षिगुणसमृद्धस्य । अक्षातीतस्य सदा स्वयमेव हि जानजातस्य ॥२२॥ पनिच्चिन्याका परिणतन्य तस्मिन्नेव धणे क्रमप्रवृनमायोपमिकनानाभावादकमनमायान्तसमान- द्रव्यक्षेत्रकालभावनया सर्वव्यगुणपर्याचा अन्यान्मनः प्रत्यक्षा भवन्तीत्यभिप्रायः ।। २१ ॥ अथ नर्व प्रत्यक्ष भवतीयन्वयन पेण पूर्वनो भणितमिदानीं तु पर्गझ किमपि नास्तीति तमेवार्य व्यतिरेकेण यति - पदिय परोप किचि वि अन्य भगवत: पगे किमपि नाति। शिविशिष्टस्य । समंत सम्वन्वगुणसमिकल्स समन्तत: सर्वात्मप्रदेश: नामस्त्येन वा न्यनगन्यवनपििचनिन्- मन्द्रियगुणसमृद्रस्य । नहि किमक्षसहिनस्य । नेत्रम् । मयतातोदस्त आतीतस्येन्द्रियव्यापार- रहितल्य, अथवा द्वितीयव्याख्यानम् - अक्ष्णोति जानेन व्याप्नोतीत्यक्ष आत्मा तद्गुणममुद्रस्य । सदा .. भगवान श्रावोषणमिक जानवाले जीवोंकी भांति अवग्रह-ईहा-अवाय और धारणात्प सामने नहीं जानते किन्नु सर्व न्य, क्षेत्र, काल, भावको युगपत् जानते हैं । इसप्रकार उनके सब कुछ, प्रत्यक्ष होता है ।।२१।। अब, अतीन्द्रिय जानम्प परिणमिन होने ही इन भगवानको कुम भी पोज नहीं है, ऐसा अभिप्राय प्रगट करने है :- अन्वयार्थ :- [सा अक्षानीलर समृकण्य] जो गई ओगे (मामा) :.. मेर शामजानायर को विपिन अपि तुरन भी पोश जाति पनो का , मनः । तरानाक सर ने र ४० -प्रवननमार--- भिमान योजना अस्य खलु भगवतः समस्तादरणक्षयक्षण एवं सांसानिशारिभित्तिनिपत्तिवला- धानहेतुभूतानि प्रतिनियतविषयग्राहोण्यक्षाणि तैरतीतस्य, परागन्यवर्णगारिकोन- रूपैः समरसतया समन्ततः सवरेवेन्द्रियगुणैः समृदस्य, स्वयमेव सागरत्येन स्वरकाशन- क्षममनश्वरं लोकोत्तरज्ञानजातस्य, अक्रमसमाकान्तसमरतद्रव्योजकालभावतया न किंचनापि परोक्षमेव स्यात् ॥२२॥ अथात्मनो ज्ञानामाणत्वं ज्ञानस्य सवंगतत्वं चोद्योतयति - सर्वदा सर्वकालम् । पुनरपि किरूपस्य । सयमेव हि णाणजाद नगमेव हि केवलज्ञानरपेण जातस्य परिणतस्येति । तद्यथा - अतीन्द्रियस्वभावपरमात्मनो विगोवानि कमप्रनिहेतुभूनानी- न्द्रियाण्यतिक्रान्तस्य जगत्त्रयकाल त्रयतिसमस्तपदार्थयुगपत्त्याप्रतीतिसमर्थमविनश्चर मग- प्रतिभासमयं केवलज्ञानं परिणतस्यास्य भगवतः परोक्षं किमपि नास्तीति भावार्थ: ।। २२।। एवं केवलिनां समस्तं प्रत्यक्ष भवतीति कथनरूपेण प्रथमस्थले गाथायं गतम् । अशात्मा ज्ञानप्रमाणो भवतीति ज्ञानं च व्यवहारेण सर्वगतमित्युपदिशति - आदा णाणपमाणं ज्ञानेन सह होनाषिकस्या- टीका :-- समस्त आवरणके क्षयके क्षण ही जो भगवान) सांसारिक ज्ञानको उत्पन्न करनेके बलको कार्यरूप देनेमें हेतुभूत ऐसी अपने अपने निश्चित विषयोंको ग्रहण करनेवाली इन्द्रियोंसे अतीत हुए हैं, जो स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्दके ज्ञानरूप सर्व इन्द्रिय - गुणोंके द्वारा सर्व ओरसे समरसरूपसे समृद्ध हैं (अर्थात् जो भगवान स्पर्श, रस, गंध, वर्ण तथा शव्दको सर्व आत्मप्रदेशोंसे समानरूपसे जानते हैं) और जो स्वयमेव समस्तरूपसे स्वपरका प्रकाशन करनेमें समर्थ अविनाशी लोकोत्तर ज्ञानरूप हुए हैं, ऐसे इन (केवली) भगवानको समस्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावका अक्रमिक ग्रहण होनेसे कुछ भी परोक्ष नहीं है । भावार्थ :- इन्द्रियका गुण तो स्पर्शादिक एक-एक गुणको ही जानना है, जैसे चक्षुइन्द्रियका गुण रूपको ही जानना है अर्थात् रूपको ही जानने में निमित्त होना है । और इन्द्रियज्ञान क्रमिक है। केवलीभगवान इन्द्रियोंके निमित्तके विना समस्त आत्मप्रदेशोंसे स्पर्शादि सर्व विषयोंको जानते हैं, और जो समस्तरूपसे स्व-पर प्रकाशक है ऐसे लोकोत्तर ज्ञानरूप (लौकिकज्ञानसे भिन्न केवलज्ञानरूप) स्वयमेव परिणमित हुआ करते हैं; इसलिये समस्त द्रव्य-क्षेत्र-काल और भावको अवग्रहादि क्रम रहित जानते हैं इसलिये केवली भगवानके कुछ भी परोक्ष नहीं है ।।२२।। अव, आत्माका ज्ञानप्रमाणपना और ज्ञानका सर्वगतपना उद्योत करते हैं :- .

जैन शास्त्रमाला ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ४१ आदा णाणपमाणं गाणं णेयप्पमाणमुद्दिठें । णेयं लोयालोयं तम्हा गाणं तु सव्वगयं ॥२३॥ आत्मा ज्ञानप्रमाणं ज्ञानं जेयप्रमाणमुद्दिष्टम् । नेयं लोकालोकं तस्माज्जानं तु सर्वगतम् ॥२३॥ आत्मा हि 'समगुणपर्यायं द्रव्यम्' इति वचनात् जानेन सह होनाधिकत्वरहितत्वेन परिणतत्वात्तत्परिमाणः, ज्ञानं तु ज्ञेयनिष्ठत्वाबाह्यनिष्ठदहनवत्तत्परिमाणं; जेयं तु भावादात्मा नानप्रमाणो भवति । तथाहि - 'समगुणपर्यायं द्रव्यं भवति' इति वचनाद्वर्तमानमनुष्यभवे वर्तमानमनुष्यपर्यायप्रमाणः, तर्थव मनुप्यपर्यायप्रदेशतिनानगुणप्रमाणन प्रत्यक्षेण दृश्यते यथायमान्मा. तथा निश्रयतः नवंदेवाच्यावाधाक्षयपुग्वायनन्नगुणाधारभूतो योऽसी केवलज्ञानगुणस्त- प्रमाणोऽयमात्मा । णाणं णेयप्पमाणमुठ्ठि दाह्यनिष्ठनहनवत् जानं नेयप्रमाणमुद्दिष्टं कथितम् । णेयं लोयालोयं जेयं लोकालोकं भवति । शुद्धबुद्धकस्वभावसर्वप्रकारोपादेयभूतपरमात्मद्रव्यादिषड्- गाथा २३ अन्वयार्थ :- [आत्मा] आत्मा [ज्ञानप्रमाणं] जान प्रमाण है; [जातं] जान [जेयप्रमाणं] जेय प्रमाण [उद्दिष्ट] कहा गया है। [यं लोकालोकं] नेय लोकालोक है [तस्मात् ] इसलिये [जानं तु] जान [सर्वगतं] सवंगत - नवं व्यापक है। टीका :- 'समगुणपर्यायं द्रव्यं (गुण-पर्याय अर्थात् युगपद् सर्वगुण और पर्याय ही द्रव्य है) इस वचनके अनुसार आन्मा मानने होनाधिकतारहितनपने परिणमित होने के कारण ज्ञानप्रमाण है, और जान मनिष्ठ होने, वानिक भांति, शेय प्रमाण है। जेय तो लोक और अलोकतं. बिना काम. नाल पर्यावमालाये आलिगित स्वम्पगे मृचिन (प्रगटान), नान भी प्र व गा पदव्य-समूह, अर्थात न । भन्न कृत है.) इलिये नि:पापा र का समान, tra । (iii .. - जीचर जानप्रमाण भार: FT. ! में जय लोपालोर 西 -जानतत्त्व-प्रजापन- जैन शास्त्रमाला] ४३ ज्ञानप्रमाणमात्मा न भवति यस्येह तस्य स आत्मा । हीनो वा अधिको वा ज्ञानाद्भवति ध्र वमेव ॥२४॥ हीनो यदि स आत्मा तत् ज्ञानमचेतनं न जानाति । अधिको वा ज्ञानात् ज्ञानेन विना कयं जानाति ॥२५॥ युगलम् । यदि खल्वयमात्मा होनो नानादित्यभ्युपगम्यते, तदात्मनोऽतिरिच्यमानं ज्ञानं स्वाश्रयभूतचेतनद्रव्यसमवायाभावादचेतनं भवत् पादिगुणकल्पतामापन्नं न जानाति । यदि अथात्मानं ज्ञानप्रमाणं ये न मन्यन्ते तत्र होनाधिकान्वे दूपणं ददाति - पाणप्पमाणमादा ण हदि जस्सेह ज्ञानप्रमाणमात्मा न भवति यस्य वादिनो मनेत्र जगति तस्स सो आदा तस्य मते स आत्मा होणो वा अहिओ वा जाणादो हवदि धुवमेव होनो वा अधिको बा नानात्मकामाद् भवति निश्चितमेवेति ।। २४ । होणो जदि सो आदा तं जाणमचेदणं ण जाणादि होनो यदि म आत्मा तदानेरभावे सति उष्णगुणो यथा शोतलो भवति तथा स्वाश्रयभूतचेतनात्मकद्रव्यसमवायाभावात्त- गाधा २४-२५ अन्वयार्थ :- [इह] इन जगतमें [यस्य ] जिसके मतमें [आत्मा] आत्मा [ज्ञानप्रमाणं] जानप्रमाण [न भवति] नहीं है, [तस्य] उनके मतमें [सः आत्मा] वह आत्मा [ध्रुवम् एव अवच्च [जानात् होनः वा] जानने हीन [अधिकः वा भवति] अथवा अधिक होना चाहिये । [यदि] यदि [सः आत्मा] वह आत्मा [हीनः] जानने हीन हो [तत्] तो वह [जानं] जान | अचेतनं] अचेतन होनेने न जानानि] नहीं मानेगा. [जाना अधिक: वा] और यदि (आत्मा) मानने अधिमा को को मा जानन पिना] जानके विना [कथं जानाति] गे जानेगा ? टीका :- यदि यह स्वीकार किया जा आत्माने आगे बढ़ जानेवाला जान (आ .. होनेवाला जान) अपने आप्रया : पाधि गुण जना लोगों जाये नि. या आमा जानने : .. जानेगे (मान वानी बारा : होनेशन हिजा नगा नामा .

--प्रवचनसार- ४६ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान विषयत्वात्सा अपि सर्वगतदानाव्यतिरिक्तस्य भगवतस्तस्य ते विषया इति भप्तित्वात्तद्गता एव भवन्ति । तत्र निश्चयनयेनानाकुलत्वलक्षणसौख्यसंवेदनत्वाधिष्ठा- नत्वावच्छिन्नात्मप्रमाणजानस्वतत्त्वापरित्यागेन विश्वज्ञेयाकाराननुपगम्यावबुध्यमानोऽपि व्यवहारनयेन भगवान् सर्वगत इति व्यपदिश्यते । तथा नैमित्तिकभूतज्ञेयाकारानात्म- ज्यानवलोक्य सर्वेर्यास्तद्गता इत्युपर्यन्ते, न च तेषां परमार्थतोऽन्योन्यगमनमस्ति, संयंत्रव्यागां स्वरूपनिष्ठत्वात् । अयं नमो ज्ञानेऽपि निश्चयः ॥२६॥ अधात्मज्ञानयोरेकत्वात्यत्वं चिन्तयति - गाणं अप्प त्ति मदं वट्टदि जाणं विणा ण अप्पाणं । तम्हा णाणं अप्पा अप्पा पाणं व अण्णं वा ॥२७॥ ज्ञानमात्नेति मतं वर्तते जावं दिना नात्मानम् । तरमात् ज्ञानमात्मा आत्मा ज्ञानं वा अन्यद्वा ॥२७॥ - मग परत जगतमपरित्यजन्नेव लोकालोकंपरिच्छिनत्ति । ततः कारणाद्वयवहारेण भागनगन कान नीलपीतादिवहिःपदार्था आदर्श विम्बवत् परिच्छित्याकारेण ::: :: :: सातारागारमार्गका भूता अर्थाकारा अयर्था भण्यन्ते । ते च ज्ञाने माननाम: !! २६ ॥ अथ ज्ञानमात्मा भवति, आत्मा तु ज्ञानं :::: तारयनि-पान अप ति गदं भानमात्मा भवतीति मतं सम्मतम् । ! जिजामान र विनात्मानं जीवमन्यत्र घटपटादौ न वर्तते । निष्ठ (अपने-अपने स्वरूपमें निश्चल अवस्थित) हैं । :::रमेंनी निविन करना चाहिये । (आत्मा और ज्ञेयोंके सम्बन्धमें ना है, जीवामान और जेयोंके सम्बन्धमें भी समझना - . ( रमअन्यन्त्रका विचार करते हैं गाथा २७ :-] न आना है [इति मतं] ऐसा जिनदेवका नरे दिना (अन्य किनी द्रव्यमें) [ज्ञानं न वर्तते] - जिसने आन्ना दिना नहि ज्ञान थे। द. जैद नान हे या अन्य 2 ॥२७॥ M -- -जानतत्त्व-प्रजापन- ४७ जन शास्त्रमाता] यतः शेषसमस्तचेतनाचेतनवस्तुसमवायसंबन्धनिल्सुकतयाऽनाद्यनन्तस्वभावसिद्ध- समवायसंबन्धमेकमात्मानमाभिमुख्येनावलम्व्य प्रवृतत्वात् तं विना आत्मानं ज्ञानं न धारयति, ततो ज्ञानमात्मैव स्यात् । आत्मा त्वनन्तधर्माधिष्ठानत्वात् ज्ञानधर्मद्वारेण ज्ञान- मन्यधर्मद्वारेणान्यदपि स्यात् । कि चानेकान्तोऽत्र बलवान् । एकान्तेन ज्ञानमात्मेति ज्ञान- स्याभावोऽचेतनत्वमात्मनो विशेषगुणाभावादभावो वा स्यात् । सर्वयात्मा ज्ञानमिति निराश्रयत्वात् ज्ञानन्याभाव आत्मनः पपर्यायानावस्तविताभाविनस्तस्याप्यभावः स्यात् ।। २७॥ नम्हा जाणं लप्पा नस्मान नायते कयंत्रिस्नानमारमंत्र स्यात् । इति गायापादत्रयेण जानस्य सचिवात्मत्वं स्थापितम् । बप्पा पाणं च अण्णं वा आमा तु मानधमंडारेल बानं भवति, गुपयो विधवारेणान्या नियमो नास्तीति । नच्या - यदि पुनरेकान्तेन जानमात्मेति मण्यते नका कानगुणमात्र एवानमा प्रात: मुन्नाविधर्माणामकामो नालि । नया मुखवीर्यादिधर्म- समूहानाबादामामात्रः, आत्मन आधारभूतल्याभावावायग्रभूवन्ध मानगुणस्यायभावः, इत्येकान्ते मान योग्यभावः । तस्माकपंनिज्मानमात्मा न मयति । अयमत्राभित्राय:- मान्मा व्यापको मानं व्याप्यं ततो मानमात्मा स्यात्. आत्मा तु मानमयका भवनोति। या बोनम् - व्यापक जान नहीं होता, [तस्मात्] इसलिये [जानं आत्मा] बान आत्मा है; [आत्मा] और मान्मा [जानं वा] (नान गुण द्वारा) जान है [अन्यत् वा] अथवा (मुवादि अन्य गुण द्वार) अन्य है। टीका :- क्योंकि शेष नमन वेतन नया अंतन सन्तुओंके माय गमवाय- सम्बन्ध नहीं है, इसलिये जिनके साथ अनादि अनन्न विभावपिल मिवामपन्य है ने एव, आत्माका अनि निकटतया (अभिनवर) बनलमा मनमान जान बान आत्माक बिना अपना अग्निातनी समानामा दी । और आमा नो अनन्त धोका अभियान, जान और अन्य धग का भी। और पि, गणेः का. (मामा " कर माना जमिनमान: या जागा होगा, : मी शेर ..

४६
-प्रवनगलार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-महान
विषयत्वात्सर्वेऽर्था अपि सर्वगतमानाव्यतिरिक्तस्य भगवतस्तन्य ते विपया इति
भणितत्वात्तद्गता एव भवन्ति । तत्र निश्चयनयेनानाकुलत्वलक्षणसौग्यसंवेदनत्वाधिष्ठा-
नत्वावच्छिन्नात्मप्रमाणज्ञानस्वतत्त्वापरित्यागन विश्वयाकाराननुपगम्यावबुध्यमानोऽपि
व्यवहारनयेन भगवान् सर्वगत इति व्यपदिश्यते । तथा नैमित्तिकभूतज्ञेयाकारानात्म-
स्थानवलोक्य सर्वेऽर्थास्तद्गता इत्युपर्यन्ते, न च तेषां परमार्थतोऽन्योन्यगमनमस्ति,
सर्वद्रव्याणां स्वरूपनिष्ठत्वात् । अयं नमोक्षानेऽपि नियः ॥२६।।
अथात्मज्ञानयोरेकत्वान्यत्वं चिन्तयति -
पाणं अप्प ति सदं वट्टदि जाणं विणा ण अप्पाणं ।
तम्हा णाणं अप्पा अप्पा पाणं व अण्णं वा ॥२७॥
ज्ञानमात्मेति मतं वर्तते ज्ञातं दिना नात्मानम् ।
तस्मात् ज्ञानमात्मा आत्मा ज्ञानं वा अन्यद्वा ॥२७॥
[भवति । इत्यंभूतं स्वस्वरूपं] देहगतमपरित्यजन्नेव लोकालोकं परिच्छिनत्ति । ततः कारणाद्वयवहारेण
सर्वगतो भण्यते भगवान् । येन च कारणेन नीलपीतादिवहिःपदार्था आदर्जे विम्बवत् परिच्छित्त्याकारेण
ज्ञाने प्रतिफलन्ति ततः कारणादुपचारेणार्थकार्यभूता अर्थाकारा अप्यर्था भण्यन्ते । ते च ज्ञाने
तिष्ठन्तीत्युच्यमाने दोपो नास्तीत्यभिप्रायः ।। २६ ॥ अथ ज्ञानमात्मा भवति, आत्मा तु ज्ञानं
सुखादिकं वा भवतीति प्रतिपादयति - गाणं अप्प त्ति मदं ज्ञानमात्मा भवतीति मतं सम्मतम् ।
कस्मात् । वदि णाणं विणा ण अप्पाणं ज्ञानं कर्तृ विनात्मानं जीवमन्यत्र घटपटादौ न वर्तते ।
नहीं होता, क्योंकि सर्व द्रव्य स्वरूपनिष्ठ (अपने-अपने स्वरूपमें निश्चल अवस्थित) हैं ।
यही क्रम ज्ञान में भी निश्चित करना चाहिये । (आत्मा और ज्ञेयोंके सम्बन्धमें
निश्चय-व्यवहारसे कहा गया है, उसीप्रकार ज्ञान और ज्ञेयोंके सम्बन्धमें भी समझना
चाहिये) ।। २६ ॥
अव, आत्मा और जानके एकत्व-अन्यत्वका विचार करते हैं :-
गाथा २७
अन्वयार्थ :- [ज्ञानं आत्मा] ज्ञान आत्मा है [इति मतं] ऐसा जिनदेवका
मत है। [आत्मानं विना] आत्माके विना (अन्य किसी द्रव्यमें) [ज्ञानं न वर्तते]
छे ज्ञान आत्मा जिनमते आत्मा विना नहिं ज्ञान छ ।
ते कारणे हे ज्ञान जीव, जीव ज्ञान छ वा अन्य छे ॥२७॥

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ४७ जैन शास्त्रमाला] यतः शेषसमस्तचेतनाचेतनवस्तुसमवायसंबन्धनिरुत्सुकतयाऽनाद्यनन्तस्वभावसिद्ध- समवायसंबन्धमेकमात्मानमाभिमुख्येनावलम्ब्य प्रवृत्तत्वात् तं विना आत्मानं ज्ञानं न धारयति, ततो ज्ञानमात्मैव स्यात् । आत्मा त्वनन्तधर्माधिष्ठानत्वात् ज्ञानधर्मद्वारेण ज्ञान- मन्यधर्मद्वारेणान्यदपि स्यात् । किं चानेकान्तोऽत्र बलवान् । एकान्तेन ज्ञानमात्मेति ज्ञान- स्याभावोऽचेतनत्वमात्मनो विशेषगुणाभावादभावो वा स्यात् । सर्वथात्मा ज्ञानमिति निराश्रयत्वात् ज्ञानस्याभाव आत्मनः शेषपर्यायाभावस्तदविनाभाविनस्तस्याप्यभावः स्यात् ।। २७॥ तम्हा णाणं अप्पा तस्मात् ज्ञायते कथंचिज्जानमात्मैव स्यात् । इति गाथापादत्रयेण ज्ञानस्य कथंचिदात्मत्वं स्थापितम् । अप्पा णाणं च अण्णं वा आत्मा तु ज्ञानधर्मद्वारेण ज्ञानं भवति, सुखवीर्यादिधर्मद्वारेणान्यता नियमो नास्तीति । तद्यथा - यदि पुनरेकान्तेन ज्ञानमात्मेति भण्यते तदा ज्ञानगुणमात्र एवात्मा प्राप्तः सुखादिधर्माणामवकाशो नास्ति । तथा सुखवीर्यादिधर्म- समूहाभावादात्माभावः, आत्मन आधारभूतस्याभावादाधेयभूतस्य ज्ञानगुणस्याप्यभावः, इत्येकान्ते सति द्वयोरप्यभावः । तस्मात्कथंचिज्ज्ञानमात्मा न सर्वथेति । अयमत्राभिप्रायः- आत्मा व्यापको ज्ञानं व्याप्यं ततो ज्ञानमात्मा स्यात्, आत्मा तु ज्ञानमन्यद्वा भवतीति । तथा चोक्तम् - 'व्यापक जान नहीं होता, [तस्मात् ] इसलिये [ज्ञानं आत्मा] जान आत्मा है; [आत्मा और आत्मा [ज्ञानं वा] (ज्ञान गुण द्वारा) ज्ञान है [अन्यत् वा] अथवा (सुखादि अन्य गुण द्वारा) अन्य है। टीका :- क्योंकि शेष समस्त चेतन तथा अचेतन वस्तुओंके साथ 'समवाय- सम्बन्ध नहीं है, इसलिये जिसके साथ अनादि अनन्त स्वभावसिद्ध समवायसम्बन्ध है ऐसे एक आत्माका अति निकटतया (अभिन्न प्रदेशरूपसे) अवलम्बनकरके प्रवर्तमान होनेसे ज्ञान आत्माके विना अपना अस्तित्व नहीं रख सकता; इसलिये ज्ञान आत्मा ही है । और आत्मा तो अनन्त धर्मोका अधिष्ठान (-आधार) होनेसे ज्ञानधर्मके द्वारा ज्ञान है और अन्य धर्मके द्वारा अन्य भी है । और फिर, इसके अतिरिक्त (विशेष समझना कि) यहाँ अनेकान्त बलवान है। यदि यह माना जाये कि एकान्तसे ज्ञान आत्मा है तो, (ज्ञानगुण आत्मद्रव्य हो जानेसे) जानका अभाव हो जायेगा, (और ज्ञानगुण का अभाव होनेसे) आत्माके अचेतनता आजायेगी अथवा विशेष गुणका अभाव होनेसे आत्माका अभाव हो जायेगा । यदि समवाय सम्बन्ध-जहां गुण होते हैं वहां गुणी होता है और जहां गुणो होता है वहाँ गुण होते हैं, जहां गुण नहीं होने वहाँ गुणी नहीं होता और जहाँ गुणी नहीं होता वहाँ गुण नहीं होते - इस प्रकार गुण-गुणीका यभिम प्रदेगार सम्बन्ध; तादात्म्यसम्बन्ध है।

४८
-प्रवचनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
अथ ज्ञानज्ञेययोः परस्परगमनं प्रतिहन्ति
णाणी णाणसहावो अट्ठा णेयप्पगा हि णाणिस्स ।
रूवाणि व चक्खूणं णेवण्णोण्णेसु
वट्टति ॥२८॥
ज्ञानी ज्ञानस्वभावोऽर्था ज्ञेयात्मका हि ज्ञानिनः ।
रूपाणीव चक्षुषोः नैवान्योन्येषु वर्तन्ते ॥२८॥
नदलिप्ठं व्याप्यं तन्निप्ठमेव व' ।। २७ ।। इत्यात्मज्ञानयोरेकत्वं, ज्ञानस्य व्यवहारेण सर्व-
गतत्वमित्यादिकयनरूपेण द्वितीयस्थले गाथापञ्चकं गतम् । अथ ज्ञानं ज्ञेयसमीपे न गच्छतीति
निलिनोति - गाणी गाणसहावो ज्ञानी सर्वशः केवलज्ञानस्वभाव एव । अट्ठा णेयप्पगा हि गाणिस्स
जगत्वयकालत्रयतिपदार्था जेयात्मका एव भवन्ति न व ज्ञानात्मकाः । कस्य । ज्ञानिनः । रूपाणि व
चपत पेयजोगेनु वट्टति ज्ञानी पदार्थाश्चान्योन्यं परस्परमेकत्वेन न वर्तन्ते । कानीव, केपां
यह माना जाये कि सर्वथा आत्मा ज्ञान है तो, (आत्मद्रव्य एक ज्ञानगुणरूप हो जानेपर
मानका कोई आधारभूत द्रव्य नहीं रहनेसे) निराश्रयताके कारण ज्ञानका अभाव हो
जायेगा अथवा (आत्मद्रव्यके एक ज्ञानगुणरूप हो जाने से) आत्माकी शेष पर्यायोंका
(मुख, वीर्यादि गुणोंका) अभाव हो जायेगा और उनके साथ ही अविनाभावी
मन्बयाले आत्माका भी अभाव हो जायेगा। (क्योंकि सुख, वीर्य इत्यादि गुण न हों
को जामा मो नहीं हो सकता) ॥ २७ ।।
अब, मान और शेयके परस्पर गमनका निषेध करते हैं (अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय
में प्रवेः नहीं करते ऐसा कहते हैं ।) :-
गाधा २८
अन्नवा :- [ज्ञानो] आत्मा [ज्ञानस्वभावः] ज्ञान स्वभाव है [अर्थाः हि]
जानिनः] आमाके [जेयात्मकाः] ज्ञेय स्वरूप हैं, [रूपाणि इव चक्षुषोः]
कमी पदार्थ) नेत्रों का ज्ञेय है वैसे [अन्योन्येषु] वे एक-दूसरे में
न एक नंले नहीं बनने ।
:- पदार्थ स्वलक्षणभूत पृथक्त्वके कारण एक दूसरेमें नहीं
र नेट और पी पदार्थकी भांति ज्ञानशेयस्वभाव-सम्बन्धसे
जान शनादभाद अों नेयम्प हे 'ज्ञानो' ना।
का ये नेत्रो तगां, नहि बर्तता अन्योन्यमां ॥२८॥

-ज्ञानतत्व-प्रज्ञापन- ४६ जैन शास्त्रमाला] ज्ञानी चार्थाश्च स्वलक्षणभूतपृथक्त्वतो न मिथो वृत्तिमासादयन्ति किंतु तेषां ज्ञान- ज्ञेयस्वभावसंवन्धसाधितमन्योन्यवृत्तिमात्रमस्ति चक्षुरूपवत् । यथा हि चलषि तद्विषयभूत- रूपिद्रव्याणि च परस्परप्रवेशमन्तरेणापि ज्ञेयाकारग्रहणसमर्पणप्रवणान्येवमात्माऽर्थाश्चान्यो- न्यवृत्तिमन्तरेणापि विश्वज्ञेयाकारग्रहणसमर्पणप्रवणाः ॥ २८ ।। अथार्थेष्ववृत्तस्यापि ज्ञानिनस्तवृत्तिसाधकं शक्तिवैचित्र्यमुद्योतयति - ण पविट्टो गाविट्ठो णाणी येसु रूवमिव चक्खू । जाणदि पस्सदि णियदं अक्खातीदो जगमसेसं ॥२६॥ - संबंधित्वेन । रूपाणीव चक्षुपामिति । तथाहि - यथा रूपिद्रव्याणि चक्षुषा सह परस्परं संवन्धाभावेऽपि स्वाकारसमर्पणे समर्थानि, चलूपि च तदाकारग्रहणे समर्थानि भवन्ति, तथा त्रैलोक्योदरविवरवर्ति- पदार्थाः कालत्रयपर्यायपरिणता जानेन मह परस्परप्रदेशसंसर्गाभावेऽपि स्वकीयाकारसमर्पणे समर्था भवन्ति, अखण्डकप्रतिभासमयं केवलनानं तु तदाकारग्रहणे समर्थमिति भावार्थः ।। २८ ।। अथ ज्ञानी जेयपदार्थेषु निश्चयनयेनाप्रविष्टोऽपि व्यवहारेण प्रविष्ट इव प्रतिभातीति शक्तिवैचित्र्यं दर्शयति होनेवाली एक दूसरेमें प्रवृत्ति पाई जाती है । (प्रत्येक द्रव्यका लक्षण अन्य द्रव्योंसे भिन्नत्व होनेसे आत्मा और पदार्थ एक दूसरे में नहीं वर्तते, किन्तु आत्माका ज्ञानस्वभाव है और पदार्थोका ज्ञेय स्वभाव है, ऐसे ज्ञानज्ञेयस्वभावरूप सम्वन्धके कारण ही मात्र उनका एक दूसरे में होना नेत्र और रूपी पदार्थोकी भाँति उपचारसे कहा जा सकता है)। जैसे नेत्र और उनके विषयभूत रूपी पदार्थ परस्पर प्रवेश किये बिना ही ज्ञेयाकारों को ग्रहण और समर्पणकरने के स्वभाववाले हैं, उसी प्रकार आत्मा और पदार्थ एक दूसरेमें प्रविष्ट हुए विना ही समस्त नेयाकारोंके ग्रहण और समर्पणकरनेके स्वभाववाले हैं। (जिस प्रकार आँख रूपी पदार्थोमें प्रवेश नहीं करती और रूपी पदार्थ आँखमें प्रवेश नहीं करते तोभी आँख रूपी पदार्थोके जेयाकारोंके ग्रहण करने - जाननेके - स्वभाववाली है और रूपी पदार्थ स्वयंके जेयाकारोंको समर्पित होने - जनानेके ~ स्वभाववाले हैं, उसीप्रकार आत्मा पदार्थो में प्रवेश नहीं करता और पदार्थ आत्मामें प्रवेश नहीं करते तथापि आत्मा पदार्थोके समस्त जेयाकारोंको ग्रहण करलेने - जानलेनेके स्वभाववाला है और पदार्थ स्वयंके समस्त नेयाकारोंको समर्पित होजाने - ज्ञात होजानेके स्वभाववाले हैं।) १।२८ ।। अब, आत्मा पदार्थोमें प्रवृत्त नहीं होता तथापि जिससे (जिस शक्तिवैचित्र्यसे) उसका पदार्थोमें प्रवृत्त होना सिद्ध होता है उस शक्तिवैचित्र्यको उद्योत करते हैं :-

-भावनातार-
[गमन भोमान-पहान
न प्रविष्टो नाविष्टो नानी शेयेषु रूपमिव पशुः ।
जानाति पश्यति नियतमक्षातीतो जगदशेषम् ॥२६॥
यथा हि चक्षू रूपिद्रव्याणि स्वप्रदेशैरसंस्पृशदाविष्टं परिच्छामाकरमात्मसात्तुर्वन्न
चाप्रविष्टं जानाति पश्यति च, एवमात्माप्यक्षातीतत्वात्प्राप्यकारिताविनारगोचरदर-
तामवाप्तो ज्ञेयतामापन्नानि समस्तवस्तूनि स्वप्रदेशैरसंस्पृशन्नाविष्टः शक्तिवैचित्र्यवशतो
ण पविट्ठो निश्चयनयेन न प्रविष्टः, णाविट्ठो व्यवहारेण न नाप्रविष्ट: किंतु प्रविष्ट एन । ग क: कर्ता ।
णाणो ज्ञानी । केपु मध्ये । णेयेसु नेयपदार्थेषु । किमिव । रुखमिव बसू रूपविषये नारिख ।
एवंभूतस्सन् किं करोति । जाणदि पस्सदि जानाति पश्यनि च । णियदं निश्चितं गंशयरहितं ।
किविशिष्टः सन् । अदखातीदो अक्षातीतः । किं जानाति पश्यति । जगमसेसं जगदशेयमिति । तथा
गाथा २९
अन्वयार्थ :- [चक्षुः रूपं इव] जैसे चक्षु रूपको (ज्ञेयोंमें अप्रविष्ट रहकर तथा
अप्रविष्ट न रहकर जानती-देखती है) उसीप्रकार [ज्ञानी] आत्मा [अक्षातीतः]
इन्द्रियातीत होता हुआ [अशेषं जगत् ] अशेष जगतको (-समस्त लोकालोकको) [ज्ञेयेषु]
ज्ञेयोंमें [न प्रविष्टः] अप्रविष्ट रहकर [न अविष्टः] तथा अप्रविष्ट न रहकर [नियतं]
निरन्तर [जानाति पश्यति] जानता-देखता है ।
टीका :- जिसप्रकार चक्षु रूपी द्रव्योंको स्वप्रदेशोंके द्वारा अस्पर्श करता हुआ
अप्रविष्ट रहकर (जानता-देखता है) तथा ज्ञेय आकारोंको आत्मसात् (निजरूप)
करता हुआ अप्रविष्ट न रहकर जानता-देखता है; उसीप्रकार आत्मा भी, इन्द्रिया-
तीतताके कारण 'प्राप्यकारिताकी विचारगोचरतासे दूर होता हुआ जेयभूत समस्त
वस्तुओंको स्वप्रदेशोंसे अस्पर्श करता है, इसलिये अप्रविष्ट रहकर (जानता-देखता है)
तथा शक्तिवैचित्र्यके कारण वस्तुमें वर्तते समस्त ज्ञेयाकारोंको मानों मूलमेंसे उखाड़कर
ग्रास कर लेनेसे अप्रविष्ट न रहकर जानता-देखता है । इसप्रकार इस विचित्र शक्तिवाले
आत्माके पदार्थों में अप्रवेशको भाँति प्रवेश भी सिद्ध होता है।
१ प्राप्यकारिता-ज्ञेय विपयोंको स्पर्श करके ही कार्य कर सकना-जान सकना । (इन्द्रियातीत हुए आत्मामें प्राप्य-
कारिताके विचारका भी अवकाश नहीं है) ।
ज्ञये प्रविष्ट न, अणप्रविष्ट न, जाणतो जग सर्वने ।
नित्ये अतींद्रिय आतमा, ज्यम नेत्र जाणे रूपने ॥२६॥

जैन शास्त्रमाला
-ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-
वस्तुतिनः समस्तज्ञेयाकारानुन्मूल्य इव कवलयन्न चाप्रविष्टो जानाति पश्यति च । एव-
मस्य विचित्रशक्तियोगिनो ज्ञानिनोऽर्थेष्वप्रवेश इव प्रवेशोऽपि सिद्धिमवतरति ।। २६ ।।
अथैवं ज्ञानमर्थेषु वर्तत इति संभावयति -
रयणमिह इन्दणीलं दुद्धज्झसियं जहा सभासाए ।
अभिभूय तं पि दुद्धं वट्टदि तह णाणसट्ठलु ॥ ३०॥
रत्नमिहेन्द्रनीलं दुग्धाध्युषितं यथा स्वभासा ।
अभिभूय तदपि दुग्धं वर्तते तथा ज्ञानमर्थेषु ॥ ३०॥
हि- यथा लोचनं कर्तृ रुपिद्रव्याणि यद्यपि निश्चयेन न स्पृशति तथापि व्यवहारेण स्पृशतीति
प्रतिभाति लोके । तथायमात्मा मिथ्यात्वरागाधात्रवाणामात्मनश्न संवन्धि यत्केवलजानात्पूर्व
विशिष्टभेदनानं तेनोत्पन्न यत्केवलज्ञानदर्शनद्वयं तेन जगत्त्रयकालत्रयवर्तिपदार्थानिश्चयेनास्पृशन्नपि
व्यवहारेण स्पृशति, तथा स्पृशनिव ज्ञानेन जानाति दर्शनेन पश्यति च । कथंभूतस्सन् । अतीन्द्रिय-
सुखास्वादपरिणतः सन्नक्षातीत इति । ततो जायते निश्चयेनाप्रवेश इव व्यवहारेण नेयपदार्थेषु
प्रवेशोऽपि घटत इति ॥ २६ ।। अथ तमेवार्थ हप्टान्तद्वारेण दृढयति - रयणं रत्नं इह जगति ।
।
भावार्थ :-
यद्यपि आँख अपने प्रदेशोंसे रूपी पदार्थोको स्पर्श नहीं करती
इसलिये वह निश्चयसे शेयोंमें अप्रविष्ट है तथापि वह रूपी पदार्थोंको जानती-देखती है,
इस लिये व्यवहारसे यह कहा जाता है कि 'मेरी आँख वहुतसे पदार्थोमें जा पहुँचती है।'
इसीप्रकार यद्यपि केवलनानप्राप्त आत्मा अपने प्रदेशोंके द्वारा ज्ञेय पदार्योको स्पर्श नहीं
करता इसलिये वह निश्चयसे तो ज्ञेयोंमें अप्रविष्ट है तथापि जायक-दर्शक शक्तिकी
किसी परम अद्भुत विचित्रताके कारण (निश्चयसे दूर रहकर भी) वह समस्त
नेयाकारोंको जानता-देखता है, इसलिये व्यवहारसे यह कहा जाता है कि 'आत्मा
सर्वव्य-पर्यायोंमें प्रविष्ट हो जाता है।' इसप्रकार व्यवहारसे नेय पदार्थोमें आत्माका
प्रवेश सिद्ध होता है ।। २६ ।।
अव, यहाँ इसप्रकार (दृष्टांतपूर्वक) यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान पदार्थोंमें
प्रवृत्त होता है :-
ज्यम दूधमां स्थित इन्द्रनीलमणि स्वकीय प्रभा वड़े।
दूधने विषे व्यापी रहे, त्यम ज्ञान पण अर्थो विषे ॥३०॥

[ । गाशा ३० अन्वयार्थ :- [यया] जसे [व्ह ] : जगाने का [इन्द्रनीलं रत्नं] इन्द्रनील रत्न [स्वभासा] साली प्रभाग तर अगिता उस दूधमें [अभिभूय] व्याप्त होकर [पतंते] वर्गना. [तथा गो पार [ज्ञानं | ज्ञान (अर्थात् जातृद्रव्य) [ [अर्थपु] पदामि गावसकरना; टोका :- जैसे दूधमें पड़ा हुआ इन्द्रनील रहल अपने प्रभागार में व्यान होकर वर्तता हुआ दिखाई देता है, उनीप्रकार 'गवेदन (577) भी आगारो अभिन्न होनेसे कर्ता-अंशसे आत्मताको प्राप्त होता हुआ जानम्प कारण-अंगके द्वारा कारणभूत पदार्थों के कार्यभूत समस्त ज्ञेयाकारों में व्याप्त हुआ वर्नना है, इसलिये कार्य में कारणका (-ज्ञेयाकारोंमें पदार्थोका) उपचार करके यह कहने में विरोध नहीं आता कि 'ज्ञान पदार्थोंमें व्याप्त होकर वर्तता है।' भावार्थ :- जैसे दूधसे भरे हुए पात्र में पड़ा हुआ इन्द्रनील रत्न (नीलमणि) सारे दूधको (अपनी प्रभासे नीलवर्ण कर देता है इसलिये व्यवहारसे रत्न और रत्नको प्रभा सारे दूधमें) व्याप्त कही जाती है, इसीप्रकार ज्ञेयोंसे भरे हुए विश्व में रहनेवाला आत्मा समस्त ज्ञेयोंको (लोकालोकको) अपनी ज्ञानप्रभाके द्वारा प्रकाशित करता है अर्थात् ' प्रमाणदृष्टिसे संवेदन अर्थात् ज्ञान कहने पर अनन्त गुणपर्यायोंका पिंड समझमें आता है । उसमें यदि कर्ता, करण आदि अंश किये जायें तो कर्ता-अंश वह अखंड आत्मद्रव्य है और करण-अंश वह ज्ञानगुण है। २ पदार्थ कारण हैं और उनके ज्ञेयाकार (द्रव्य-गुण-पर्याय) कार्य हैं ।

जैन शास्त्रमाला]
-ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-
--
अथवमर्था ज्ञाने वर्तन्त इति संभावयति
जदि ते ण संति अट्ठा णाणे णाणं ण होदि सव्वगयं ।
सव्वगयं वा णाणं कहं
कहं ण णाणढ़िया अट्ठा ॥ ३१ ॥
यदि ते न सन्त्यर्था ज्ञाने ज्ञानं न भवति सर्वगतम् ।
सर्वगतं वा ज्ञानं कथं न ज्ञानस्थिता अर्थाः ।। ३१ ।।
नास्तीति ।। ३० ।। अथ पूर्वसूत्रेण भणितं जानमर्थेषु वर्तते व्यवहारेणात्र पुनरर्था ज्ञाने वर्तन्त
इत्युपदिशति - जइ यदि चेत् ते अट्ठा ण संति ते पदार्थाः स्वकीयपरिच्छित्त्याकारसमर्पणद्वारेणादणे
विम्बवन्न सन्ति । कब । णाणे केवलनाने । णाणं ण होदि सवगयं तदा जानं सर्वगतं न भवति ।
सध्वगयं वा णाणं व्यवहारेण सर्वगतं जानं सम्मतं चेद्भवतां कह ण णाणट्ठिया अट्ठा तहि व्यवहारनयेन
जानता है इसलिये व्यवहारसे आत्माका ज्ञान और आत्मा सर्वव्यापी कहलाता है ।
(यद्यपि निश्चयसे वे अपने असंख्य प्रदेशोंमें ही रहते हैं, ज्ञेयोंमें प्रविष्ट नहीं होते) ॥३०॥
अब, ऐसा व्यक्त करते हैं कि इस प्रकार पदार्थ 'जानमें वर्तते हैं :
गाथा ३१
अन्वयार्थ :-
[यदि] यदि [ते अर्थाः] वे पदार्थ [ज्ञाने न संति] जानमें न हों
तो [ज्ञानं] जान [सर्वगतं] सर्वगत [न भवति] नहीं हो सकता [वा] और यदि
[ज्ञानं सर्वगतं] ज्ञान सर्वगत है तो [अर्थाः] पदार्थ [ज्ञानस्थिताः] ज्ञानस्थित [कथं
न] कैसे नहीं हैं ? (अर्थात् अवश्य हैं)
टीका :- यदि समस्त स्व-ज्ञेयाकारोंके समर्पण द्वारा (ज्ञानमें) अवतरित होते
हुए समस्त पदार्थ ज्ञानमें प्रतिभासित न हों तो वह ज्ञान सर्वगत नहीं माना जाता ।
और यदि वह (ज्ञान) सर्वगत माना जाये, तो फिर (पदार्थ) साक्षात् ज्ञानदर्पण-
भूमिकामें अवतरित विम्बकी भांति अपने-अपने जेयाकारोंके कारण (होनेसे) और
१
म गाथामें भी 'मान' गन्दसे अनन्त गुण-पर्यायोंका पिडरूप ज्ञातद्रव्य ममनना चाहिये ।
२ बिम्ब-जिसका दर्पण में प्रतिबिम्ब पड़ा हो वह । (जानको दर्पणको उपमा दी जाये तो, पदार्थोक भयाकार बिम्ब
समान है और मानमें होनेवाले जानको अवस्थारूप नेवाकार प्रतिविम्ब समान हैं) ।
नद होय अर्थों ज्ञानमां, तो जान सौ-गत पण नह ।
ने सर्वगत छे जान तो क्यम ज्ञानस्थित अयों नहीं ? ॥३१॥

[भगवान पीन्दन्द कहान यदि खलु निखिलात्मीयवाकारसमर्पणवाणावतीर्णाः सर्वेऽर्था न प्रतिभान्ति ज्ञाने तदा लन्स सर्वगतमभ्युपगरयेत । लन्युपगम्त वा सर्दगतम् तहि साक्षात् संबेदनमुकुरुन्द- भूमिकायतीर्ग (प्रति) विन्धस्थानीयस्वीयस्वीयसंवेधाकारकारणानि परम्परया प्रति- विम्बस्थानीयवेधाकारकारणानीति कार्य न मानस्थायिनोऽर्था निश्चीयन्ते ॥ ३१॥ - - स्वकीयज्ञेयाकारपरिच्छितिसमर्पणद्वारेग नरिथता अर्थाः नायं न भवन्ति किंतु भवन्त्येवेति । अत्रायमभिप्राय: - यत एव व्यवहारेण जेयपरिच्छित्याकारग्रहणहारेण ज्ञानं सर्वगतं भण्यते, तस्मादेव जेयपरिच्छित्वाकारसमर्पणद्वारेण पदार्थी पगि व्यवहारेण बानगता भण्यन्त इति ।। ३१।। अथ ? 'परम्परासे प्रतिबिम्बके समान शेयाकारोंके कारण होनेसे पदार्थ कैसे जानस्थित निश्चित नहीं होते ? (अवश्य हो ज्ञानस्थित निश्चित होते हैं) भावार्थ :-- दर्पण में मयूर, मन्दिर, सूर्य, वृक्ष इत्यादिके प्रतिबिम्ब पड़ते हैं । वहाँ निश्चयसे तो प्रतिबिम्ब दर्पणकी ही अवस्थायें हैं, तथापि दर्पणमें प्रतिबिम्ब देखकर कार्यमें कारणका उपचार करके व्यवहारसे यह कहा जाता है कि 'मयूरादिक दर्पणमें हैं।' इसीप्रकार ज्ञानदर्पणमें भी सर्व पदार्थोके समस्त ज्ञेयाकारों के प्रतिविम्ब पड़ते हैं अर्थात् पदार्थोके ज्ञेयाकारोंके निमित्तसे ज्ञानमें ज्ञानकी अवस्थारूप ज्ञेयाकार होते हैं (क्योंकि यदि ऐसा न हो तो ज्ञान सर्व पदार्थों को नहीं जान सकेगा) । वहाँ निश्चयसे ज्ञानमें होनेवाले ज्ञेयाकार ज्ञानको ही अवस्थायें हैं, पदार्थोके ज्ञेयाकार कहीं ज्ञानमें प्रविष्ट नहीं है। निश्चयसे ऐसा होनेपर भी व्यवहारसे देखा जाये तो, ज्ञानमें होनेवाले ज्ञेयाकारोंके कारण पदार्थोके ज्ञेयाकार हैं, और उनके कारण पदार्थ हैं - इसप्रकार परम्परासे ज्ञानमें होनेवाले ज्ञेयाकारोंके कारण पदार्थ हैं; इसलिये उन (जानकी अवस्थारूप) ज्ञेयाकारोंको ज्ञान में देखकर, कार्यमें कारणका उपचार करके व्यवहारसे ऐसा कहा जा सकता है कि 'पदार्थ ज्ञानमें हैं' ।। ३१ ।। अब, इसप्रकार (व्यवहारसे) आत्माकी पदार्थोके साथ एक दूसरे में प्रवृत्ति होनेपर भी, (निश्चयसे) वह परका ग्रहण-त्याग किये बिना तथा पररूप परिणमित हुए विना सबको देखता-जानता है इसलिये उसे (पदार्थोके साथ) अत्यन्त भिन्नता है ऐमा बतलाते हैं :- १ पदार्थ साक्षात् स्वज्ञेयाकारों के कारण हैं (अर्थात् पदार्थ अपने-अपने द्रव्य-गुण-पर्यायोंके साक्षात् कारण हैं) और परम्पराने नानको अवस्थारूप याकारोंके (ज्ञानाकारोंके) कारण हैं । २ प्रतिविम्ब नैमित्तिक कार्य है और मयूरादि निमित्त-कारण है।

जैन शास्त्रमाला]] -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- अथैवं ज्ञानिनोऽथैः सहान्योन्यवृत्तिमत्त्वेऽपि परग्रहणमोक्षणपरिणमनाभावेन सर्व पश्यतोऽध्यवस्यतश्चात्यन्तविविक्तत्वं भावयति - गेण्हदि गेव ण मुंचदि ण परं परिणमदि केवली भगवं । पेच्छदि समतदो सो जाणदि सव्वं णिरवसेसं ॥३२॥ गृह्णाति नैव न मुञ्चति न परं परिणमति केवली भगवान् । पश्यति जानाति सर्व निरवशेषम् ।। ३२ ।। जानिनः पदार्थः सह यद्यपि व्यवहारेण ग्राह्यग्राहकसम्बन्धोऽस्ति तथापि संश्लेपादिसम्बन्धो नास्ति, तेन कारणेन नेयपदार्थैः सह भिन्नत्वमेवेति प्रतिपादयति - गेहदि णेव ण मुंचदि गृह्णाति नैव मुञ्चति नैव ण परं परिणमदि परं पर द्रव्यं नेयपदार्थ नैव परिणमति । स कः कर्ता । केवली भगवं केवली भगवान् सर्वज्ञः। ततो जायते परद्रव्येण सह भिन्नत्वमेव । तहि कि परद्रव्यं न जानाति । पेच्छदि समंतदो सो जाणदि सत्वं णिरवसेसं तथापि व्यवहारनयेन पश्यति समन्ततः सर्वद्रव्यक्षेत्रकालभावैर्जानाति च समन्ततः स गाथा ३२ अन्वयार्थ :- [केवली भगवान् ] केवली भगवान [परं] परको [न एव गृह्णाति] ग्रहण नहीं करते, (न मुंचति) छोड़ते नहीं, [न परिणमति] पररूप परिणमित नहीं होते; [सः] वे [निरवशेष सर्व] निरवशेषरूपसे सवको (सम्पूर्ण आत्माको, सर्व ज्ञेयोंको) [समन्ततः] सर्व ओरसे (सर्व आत्मप्रदेशोंसे) [पश्यति जानाति] देखते- जानते हैं। यह आत्मा, स्वभावसे ही परद्रव्यके ग्रहण-त्यागका तथा परद्रव्यरूपसे परिणमित होनेका (उसके) अभाव होनेसे, स्वतत्त्वभूत केवलनानरूपसे परिणमित होकर निष्कंप निकलनेवाली ज्योतिवाला उत्तम मणि जैसा होकर रहता हुआ, (१) जिसके सर्व ओरसे (सर्व आत्मप्रदेशोंसे) दर्शनजानशक्ति स्फुरित है ऐसा होता हुआ, 'निःशेषरूपसे परिपूर्ण आत्माको आत्मासे आत्मामें संचेतता-जानता-अनुभव करता है, अथवा (२) एकसाथ ही सर्व पदार्थोके समूहका साक्षात्कार करने के कारण ज्ञप्तिपरिवर्तनका टीका :- ' निःशेपम्पसे कुछ भी किचित् मात्र प न रहे इसप्रकार से। नाक्षात्कार करना-प्रत्यक्ष जानना । - प्रभु केवली न ग्रहे, न छोडे, पररूपे नव परिणमे । देखे अने जाणे निःशेषे सर्वतः ते सर्वने ।।३२।।

[भगवान पोगन्याय-महान अयं खल्वात्मा स्वभावत एव परद्रव्यग्रहणसोक्षणपरिणमनाभावात्यतत्त्वभूतकेवल- ज्ञान स्वरूपेण विपरिणम्य निष्कम्पोन्मजाज्ज्योतिर्जात्यमणिकाल्पो भूत्वाऽवतिष्ठमानः समन्ततः स्फुरितदर्शनज्ञानशक्तिः, तमस्तसेन निःशेषतयात्मानमात्मनात्मनि संचेतयते । अथवा युगपदेव सर्वार्थसार्थसाक्षात्करणेन अप्तिपरिवर्तनाभावात् संभावितग्रहणमोक्षण- लक्षणक्रियाविरामः प्रथममेव समस्तपरिच्छेयाकारपरिणतत्वात् पुनः परमाकारान्तरम- परिणममानः समन्ततोऽपि विश्वमशेषं पश्यति जानाति च एवमस्यात्यन्तविविक्त- त्वमेव ॥ ३२॥ सर्व निरवशेषन् । अथवा द्वितीयव्याख्यानम् - अभ्यन्तरे कामक्रोधादि बहिविषये पन्नेन्द्रियविपयादिक वहिव्यं न गृह्णाति, स्वकीयानन्तज्ञानादिचतुष्टयं च न मुञ्चति यतस्ततः कारणादयं जीवः केवल- ज्ञानोत्पत्तिक्षण एव युगपत्सर्व जानन्सन् परं विकल्पान्तरं न परिणमति । तयाभूतः सन् किं करोति । स्वतत्त्वभूतकेवलज्ञानगेतिषा जात्यमणिकल्पो निःकम्पनैतन्यप्रकाशो भूत्वा स्वात्मानं स्वात्मना - अभाव होनेसे जिसके 'ग्रहणत्यागरूप क्रिया विरामको प्राप्त हुई है ऐसा होता हुआ, पहलेसे ही समस्त ज्ञेयाकाररूप परिणमित होनेसे फिर पररूपसे - आकारान्तररूपसे नहीं परिणमित होता हुआ सर्व प्रकारसे अशेष विश्वको, (मात्र) देखता-जानता है । इसप्रकार (पूर्वोक्त दोनों प्रकारसे) उसका (आत्माका पदार्थोसे) अत्यन्त भिन्नत्व ही है। भावार्थ :- केवलोभगवान सर्व आत्मप्रदेशोंसे अपनेको ही अनुभव करते रहते हैं; इसप्रकार वे परद्रव्योंसे सर्वथा भिन्न हैं। अथवा, केवलीभगवानको सर्व पदार्थोका युगपत् ज्ञान होता है इसलिये उनका ज्ञान एक ज्ञेयमेंसे दूसरेमें और दूसरेसे तीसरेमें नहीं बदलता तथा उन्हें कुछ भी जानना शेष नहीं रहता इसलिये उनका ज्ञान किसी विशेष ज्ञेयाकारको जाननेके प्रति भी नहीं जाता; इसप्रकार भी वे परसे सर्वथा भिन्न हैं। (यदि जाननक्रिया बदलती हो तभी उसे विकल्प पर - निमित्तक रागद्वेष हो सकते हैं और तभी इतना परद्रव्यके साथका सम्बन्ध कहलाता है। किन्तु केवली- भगवानको ज्ञप्तिका परिवर्तन नहीं होता इसलिये वे परसे अत्यन्त भिन्न हैं ।) इसप्रकार केवलज्ञानप्राप्त आत्मा परसे अत्यन्त भिन्न होनेसे और प्रत्येक आत्मा स्वभावसे केवली- भगवान जैसा ही होनेसे यह सिद्ध हुआ कि निश्चयसे प्रत्येक आत्मा परसे भिन्न है ।।३२।। इप्तिरियाका ददलते रहना अर्थात् ज्ञानमें एक ज्ञेयको ग्रहण करना और दूसरेको छोड़ना तो ग्रहण-त्याग है। इसप्रकारका ग्रहण-त्याग वह क्रिया है, ऐसी क्रियाका केवलीभगवानके अभाव हुआ है। आकारान्तर-अन्य आकार।

-ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन--
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जैन शास्त्रमाला]
अथ केवलज्ञानिश्रुतज्ञानिनोरविशेषदर्शनेन विशेषाकांक्षाक्षोभं क्षपयति
जो हि सुदेण विजाणदि अप्पाणं जाणगं सहावेण ।
तं सुदकेवलिमिसिणो भणंति लोगप्पदीवयरा ॥ ३३॥
यो हि श्रुतेन विजानात्यात्मानं ज्ञायकं स्वभावेन ।
तं श्रुतकेवलिनमृषयो भणन्ति लोकप्रदीपकराः ॥ ३३ ॥
स्वात्मनि जानात्यनुभवति । तेनापि कारणेन परद्रव्यैः सह भिन्नत्वमेवेत्यभिप्रायः ।। ३२ ।।
एवं ज्ञानं ज्ञेयरूपेण न परिणमतीत्यादिव्याख्यानरूपेण तृतीयस्थले गाथापञ्चकं गतम् । अथ यथा
निरावरणसकलव्यक्तिलक्षणेन केवलज्ञानेनात्मपरिजानं भवति तथा सावरणकदेशव्यक्तिलक्षणेन
केवलज्ञानोत्पत्तिवीजभूतेन स्वसंवेदनज्ञानरूपभावश्रुतेनाप्यात्मपरिनानं भवतीति निश्चिनोति । अथवा
द्वितीयपातनिका - यथा केवलनानं प्रमाणं भवति तथा केवलज्ञानप्रणीतपदार्थप्रकाशकं श्रुतज्ञानमपि
परोक्षप्रमाणं भवतीति पातनिकायं मनसि धृत्वा मूत्रमिदं प्रतिपादयति - जो यः कर्ता हि स्फुटं .
सुदेण निर्विकारस्वसंवित्तिरूपभावश्रुतपरिणामेन विजाणदि विजानाति विशेषेण जानाति विषय-
सुखानन्दविलक्षणनिजशुद्धात्मभावनोत्यपरमानन्दकलक्षणसुखरसास्वादेनानुभवति । कम् । अप्पाण
निजात्मद्रव्यम् । जाणगं जायकं केवलज्ञानस्वरूपम् । केन कृत्वा । सहावेण समस्तविभावरहित-
स्वस्वभावेन तं सुयकेलि तं महायोगीन्द्रं श्रुतकेवलिन भणंति कथयन्ति । के कर्तारः। इसिणो
ऋषयः । किविशिष्टाः । लोयप्पदीवयरा लोकप्रदीपकरा लोकप्रकाशका इति । अतो विस्तरः
युगपत्परिणतसमस्तचंतन्यशालिना केवलजानेन अनाद्यनन्तनिष्कारणान्यद्रव्यासाधारणस्वसंवेद्यमान-
परमचैतन्यसामान्यलक्षणस्य परद्रव्यरहितत्वेन केवलस्यात्मन आत्मनि स्वानुभवनाद्यथा भगवान्
अब केवलनानीको और श्रुतज्ञानीको अविशेषरूपसे दिखाकर विशेष आकांक्षाके
क्षोभका क्षय करते हैं (अर्थात् केवलनानीमें और श्रुतनानीमें अन्तर नहीं है ऐसा
बतलाकर विशेष जानने की इच्छाके क्षोभको नष्ट करते हैं) :-
गाथा ३३
अन्वयार्थ :- [यः हि] जो वास्तवमें [श्रुतेन] श्रुतज्ञानके द्वारा [स्वभावेन
ज्ञायकं] स्वभावसे ज्ञायक (अर्थात् नायकस्वभाव) [आत्मानं] आत्माको [विजानाति]
जानता है [तं] उसे [लोकप्रदीपकराः] लोकके प्रकाशक [ऋषयः] ऋपीश्वरगण
[श्रुतकेवलिनं भणन्ति] श्रुतकेवली कहते हैं ।
टीका :- जैसे भगवान, युगपत् परिणमन करते हुए समस्त चैतन्यविशेषयुक्त
श्रुतज्ञानथी जाणे खरे ज्ञायकस्वभावी आत्मने ।
ऋषिओ प्रकाशक लोकना श्रुतकेवली तेने कहे ॥३३॥

-प्रवचनसार- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यथा भगवान्द युगपत्परिणतसमस्तचैतन्यविशेषशालिना केवलज्ञानेनानादिनिधन- निष्कारणासाधारणस्वसंचेत्यमानचैतन्यसामान्यमहिम्नश्च तकस्वभावेनैकत्वात् केवल- स्यात्नन आत्मनात्मनि संचेतनाद केवली, तथायं जनोऽपि क्रमपरिणममाणकतिपयचैतन्य- विशेषशालिना श्रुतज्ञानेनानादिनिधननिष्कारणासाधारणस्वसंचेत्यमानचैतन्यसामान्य- महिम्नश्च तकस्वभावेनैकत्वात् केवलस्यात्मन आत्मनात्मनि संचेतनात् श्रुतकेवली । अलं विशेषाकांक्षाक्षोभेण, स्वरूपनिश्चलैरेवावस्थीयते ॥ ३३ ॥ कंबलो भवति, नथायं गणधरदेवादिनिश्चय रत्नत्रयाराधकजनोऽपि पूर्वोक्तलक्षणस्यात्मनो भावश्रुत- जानेन न्यमवेदनान्निश्चयथुनके वली भवतीति । किच - यथा कोऽपि देवदत्त आदित्योदयेन दिवसे पति, नी किमपि प्रदीपेनेति । तथादित्योदयस्थानीयेन केवलज्ञानेन दिवसस्थानीयमोक्षपर्याये भगवानान्मान पश्यति, संसारी विवेकिजन: पुननिणास्थानीयमंमारपर्याये प्रदीपस्थानीयेन रागादि- विरगहतपन्मसमाधिना निजात्मानं पश्यतीति । अयमत्राभिप्राय: - आत्मा परोक्षः, कथं ध्यानं केवलज्ञानके द्वारा, 'अनादिनिधन- निष्कारण- असाधारण- "स्वसंवेद्यमान चैतन्य- सामान्य जिसकी महिमा है तथा जो 'चेतकस्वभावसे एकत्व होनेसे केवल (अकेला, गुल, अन्वट) है ऐसे आत्माको आत्मासे आत्मामें अनुभवकरनेके कारण केवली हैं; उनीप्रकार हग भी, क्रमशः परिणमित होते हुए कितने ही चैतन्यविशेषोंसेयुक्त अतमानके द्वारा, अनादिनिधन-निष्कारण-असाधारण-स्वसंवेद्यमान-चैतन्यसामान्य जिसकी महिमा है तथा जो चेतक स्वभावके द्वारा एकत्व होनेसे केवल (अकेला) है ऐसे आमाको आत्मा आत्मागे अनुभवकरनेके कारण श्रुतकेवली हैं। (इसलिये) विशेष आकांक्षा क्षोभले वन हो; (हम तो) स्वरूपनिश्चल ही रहते हैं । भावार्थ :- भगवान समस्त पदार्थोको जानते हैं, मात्र इसलिये ही वे 'केवली' भी कमाते, किन्तु केवल अर्थात् शुद्ध आत्माको जानने-अनुभव करनेसे 'केवली' यो । केवल (-शुद्ध) आत्माको जानने-अनुभव करनेवाला श्रुतज्ञानी भी नानी बहलाता है । केवली और श्रुतकेवलीमें इतना मात्र अन्तर है कि - जिसमें को नमन्त विप एक ही नाथ परिणमित होते हैं ऐसे केवलजानके द्वारा केवली नाममात्रा अनुभव करते है और जिसमें चैतन्यके कुछ विशेष क्रमशः परिणमित - वन (चंजमाम आदि नया अन्त रहित है)। २ निष्कारण-जिसका कोई कारण मायाजो अन्य कि.मी द्रव्य में न हो, ऐमा । स्वसंवेद्यमान स्वतः राननेवाला; दशंकनायक। आत्मा निश्चयसे परद्रव्यके तथा दिल, माय चेतावभावरूप ही है, इसलिये वह परमार्थसे केवल जैन शास्त्रमाला] --ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन--- - अथ ज्ञानस्य श्रुतोपाधिभेदमुदस्यति- सुत्तं जिणोवदिट्ठ पोग्गलदव्वप्पहिं वयहिं । तंजाणणा हि णाणं सुत्तस्स य जाणणा भणिया ॥ ३४ ॥ जिनोपदिष्टं पुद्गलद्रव्यात्मकैर्वचनैः। तज्ज्ञप्तिहि ज्ञानं सूत्रस्य च ज्ञप्तिर्भणिता ॥ ३४ ॥ सूत्रं क्रियते इति सन्देहं कृत्वा परमात्मभावना न त्याज्येति ॥ ३३ ।। अथ शब्दरूपं द्रव्यश्रुतं व्यवहारेण जानं निश्चयेनार्थपरिच्छित्तिरूपं भावश्रुतमेव ज्ञानमिति कथयति । अथवात्मभावनारतो निश्चयश्रुत- केवली भवतीति पूर्वसूत्रे भणितम् । अयं तु व्यवहारश्रुतकेवलीति कथ्यते - सुत्तं द्रव्यश्रुतम् । कथम्भूतम् । जिणोवदिटुं जिनोपदिष्टम् । कैः कृत्वा । पोग्गलदवप्पगेहि वयणेहिं पुद्गलद्रव्यात्म- कैदिव्यध्वनिवचनैः । तं जाणणा हि णाणं तेन पूर्वोक्तशब्दश्रुताधारेण ज्ञप्तिरर्थपरिच्छित्ति न भण्यते होते हैं ऐसे श्रुतज्ञानके द्वारा श्रुतकेवली केवल आत्माका अनुभव करते हैं; अर्थात्, केवली सूर्य के समान केवलनानके द्वारा आत्माको देखते और अनुभव करते हैं तथा श्रुतकेवली दीपकके समान श्रुतजानके द्वारा आत्माको देखते और अनुभव करते हैं, इसप्रकार केवली और श्रुतकेवलीमें स्वरूपस्थिरताकी तरतमतारूप भेद ही मुख्य है, कम-बढ़ (पदार्थ) जाननेरूप भेद अत्यन्त गौण है। इसलिये अधिक जाननेको इच्छाका क्षोभ छोड़कर स्वरूपमें ही निश्चल रहना योग्य है। यही केवलज्ञान-प्राप्तिका उपाय है ।। ३३ ।। अब, ज्ञानके श्रुत-उपाधिकृत भेदको दूर करते हैं (अर्थात् ऐसा बतलाते हैं कि श्रुतनान भी जान ही है, श्रुतरूप उपाधिके कारण जानमें कोई भेद नहीं होता) : - गाथा ३४ अन्वयार्थ :- [सूत्रं] मूत्र अर्थात् [पुद्गलद्रव्यात्मकः वचनः] पुद्गलद्रव्यात्मक वचनोंके द्वारा [जिनोपदिष्टं] जिनेन्द्र भगवानके द्वारा उपदिष्ट वह [तज्जप्तिः हि] उसकी नप्ति [ज्ञान] जान है [८] और उसे [सूत्रस्य ज्ञप्तिः] मूत्रकी जप्ति (श्रुतनान) [भणिता कहा गया है। पुद्गलस्वरूप वचनोथी जिन-उपदिष्ट जे ते सूत्र है। छ ज्ञप्ति तेनी ज्ञान, तेने नूत्रनी अप्ति कहे ॥३४॥ -

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事。 पाए। उरा (उत्तर) :- कोनी किताबो :: : 11 (प्रश्नमें) विरोधी निया कही गई. : ) { 11 1) i) | प्रथम, उत्पत्तिरूप किया तो 'नो माग ...: ... { {{{{. कथनसे विरुद्ध ही है; परन्त अनि HिI fifth ffff, fift. . प्रकाशनक्रियाकी भांति, उत्पनिमियागे प्रिय (: ५ १.६) । जैसे जो प्रकाश्यभूत परको प्रकाशित गरमा काम प्रकाशित करनेके संवन्धमें अन्य प्रकाणात आवमानसी, म स्वयमेव प्रकाशन क्रियाकी प्राप्ति है; उगीप्रकार जो अपना परको जानना के से जायक आत्माको स्व ज्ञेयके जानने के संबन्ध में अन्य नायक आनना नहीं होनी, क्योंकि स्वयमेव ज्ञान-क्रिया की प्राप्ति है। (इसरो सिद्ध हआ किमान ग्बको भी जान सकता है।) १ कोई पर्याय स्वयं अपने मेंसे उत्पन्न नहीं हो सकती, किंतु वह द्रव्यो आधागे - उपगंगे उत्पन्न मानी : क्योति यदि ऐसा न हो तो द्रव्यरूप आधारके बिना पर्याय उत्पन्न होने लगें और जो बिना तरंग होने लगे; किन्तु यह सब प्रत्यक्ष विरुद्ध है; इसलिये पर्यायके उत्पन्न होने के लिये द्रव्यमा आधार आवश्यक है। इसी प्रकार मानः पर्याय भी स्वयं अपने मेंसे उत्पन्न नहीं हो सकती; वह आत्मद्रव्यो उ म जाति ठीक हो है। परन्तु ज्ञान पर्याय स्वयं अपनेसे ही ज्ञात नहीं हो सकती यह बात यथार्थ नहीं है । आत्म द्रव्यमेने उत्पन्न होनेवाली ज्ञानपर्याय स्वयं अपनेसे ही ज्ञात होती है। जैसे दीपयरूपी आधार से उत्पन्न होने वाली प्रकाश पर्याय स्व-परको प्रकाशित करती है, उसी प्रकार आत्मारूपी आधार से उत्पन्न होने वाली जान पर्याय स्वपरको जानती है । और यह अनुभव सिद्ध भी है कि ज्ञान स्वयं अपनेको जानता है ।

जैन शास्त्रमाला] -ज्ञानतत्त्व प्रज्ञापन- ६५ -- । , . । अथातिवाहितानागतानामपि द्रव्यपर्यायाणां तादात्विकवत् पृथक्त्वेन ज्ञाने वृत्ति- मुद्योतयति - तक्कालिगेन सव्वे सदसन्भूदा हि पज्जया तासि । वट्टन्ते ते णाणे विसेसदो दव्वजादीणं ॥ ३७॥ तात्कालिका इव सर्वे सदसद्भता हि पर्यायास्तासाम् । वर्तन्ते ते ज्ञाने विशेषतो द्रव्यजातीनाम् ॥ ३७॥ सर्वासामेव हि द्रव्यजातीनां त्रिसमयावच्छिन्नात्मलाभभूमिकत्वेन क्रमप्रतपत्स्वरूप- संपदः सद्भ तासद्ध ततामायान्तो ये यावन्तः पर्यायास्ते तावन्तस्तात्कालिका इवात्यन्त- संकरेणाप्यवधारितविशेषलक्षणा एकक्षण एवाववोधसौधस्थितिमवतरन्ति । न खल्वेतद- (प्रश्न-) : आत्माको द्रव्योंकी ज्ञानरूपता और द्रव्योंको आत्माकी ज्ञेयरूपता कैसे (-किसप्रकार घटित) है? - (उत्तर) :- वे परिणामवाले होनेसे । आत्मा और द्रव्य परिणामयुक्त हैं, इसलिये आत्माके, द्रव्य जिसका 'आलम्बन हैं ऐसे ज्ञानरूपसे (परिणति), और द्रव्योंके, ज्ञानका अवलम्बन लेकर ज्ञेयाकाररूपसे परिणति अबाधितरूपसे तपती है - प्रतापवंत वर्तती है। (आत्मा और द्रव्य समय-समय पर परिणमन किया करते हैं, वे कूटस्थ नहीं हैं; इसलिये आत्मा ज्ञान स्वभावसे और द्रव्य ज्ञेय स्वभावसे परिणमन करता है, इसप्रकार ज्ञान स्वभावमें परिणमित आत्मा जानके आलम्बनभूत द्रव्योंको जानता है और नेय-स्वभावसे परिणमित द्रव्य ज्ञेयके आलम्बनभूत ज्ञानमें-आत्मामें- ज्ञात होते हैं । ) ।। ३६ ।। अव, ऐसा उद्योत करते हैं कि द्रव्योंकी अतीत और अनागत पर्याय भी तात्कालिक पर्यायोंकी भांति पृथकरूपले ज्ञानमें वर्तती हैं :- जानके भयभूत द्रव्य आलम्बन अर्थात् निमित्त है । यदि मान शेयको न जाने को मानना मानव था ? जयबा जान आलम्बन अर्थात् निमित्त है। यदि यशानमें ज्ञात न हो तोपमापत्य क्या ? ते द्रव्यना सद्भूत-असद्भूत पर्ययौ सौ दर्तता। पर्याय जेम, विशेषपूर्वरः ज्ञानमां ।।३।। तत्यालना -~~ --- | मन भोमानहान युक्त हुन विशाः कृष्यते हिलाराम ना मातीतमनागतं वा वस्तु चिन्तयतः संविधालन्मितस्तलाकारः। संविदः; गया हि नित- याशिवाहितानाशपस्थितानां वर्तमानामा मायाकाराः साक्षादेकक्षण सुधार्थः ॥ ३६ ।। एवं निश्चयश्रुत केवरिया: ... भिजाननिराकरगोन कानयस्वरूपकथनेन न स्यने गागान माम् । नानागार्गागा गर्न मानजाने मांगना इदृश्यन्त इति नियनि - सध्ये सदराता राना मदना अणि पर्यायाः ये हिस्फुजे ते पूर्वोक्ताः पर्याया वर्तन्ने प्रतिभागने लगा। णाणे केवलज्ञाने । - शंभूता तशालि तात्कालिका इव वामाना इव । कानाम्यगिनः । तासि दव्यजादोणं तासां प्रानद्धा शुद्धजीवद्रव्यादिद्रव्यजानीनामिति । मनमः। 7 कस्मात् । विसेसदो ] - गाथा ३७ अन्वयार्थ :- तिासाम द्रव्यजातीनाम् ] उन (जीवादि) द्रव्यजातियों की सर्वे] समस्त सदसद्भूताः हि] विद्यमान और अविद्यमान [पर्यायाः] पर्यायें [तात्कालिकाः इ०] तात्कालिक (वर्तमान) पर्यायोंकी भाँति, [विशेषतः] विशिष्टता-पूर्वक (अपने- अपने भिन्न-भिन्न स्वरूपमें) [ज्ञाने वर्तन्ते] ज्ञानमें वर्तती हैं । टीका :- (जीवादिक) समस्त द्रव्यजातियोंकी पर्यायोंकी उत्पत्तिकी मर्यादा तीनोंकालकी मर्यादा जितनी होनेसे (वे तीनोंकालमें उत्पन्न हुआ करती हैं इसलिये), उनकी (उन समस्त द्रव्य-जातियोंकी), क्रमपूर्वक तपती हुई स्वरूप-सम्पदा बाली (-एकके बाद दूसरी प्रगट होनेवाली), विद्यमानता और अविद्यमानताको प्राप्त जो जितनी पर्यायें हैं, वे सब तात्कालिक (वर्तमानकालोन) पर्यायोंकी भांति, अत्यन्त 'मिश्रित होनेपर भो सब पर्यायोंके विशिष्ट लक्षण स्पष्ट ज्ञात हों इसप्रकार, एक क्षणमें ही, ज्ञानमंदिरमें स्थितिको प्राप्त होती हैं । यह (तीनोंकालकी पर्यायोंका वर्तमान पर्यायोंकी भाँति ज्ञानमें ज्ञात होना) अयुक्त नहीं है; क्योंकि - (१) उसका दृष्टके साथ (जगतमें जो दिखाई देता है - अनुभवमें आता है उसके साथ) अविरोध है । (जगतमें) दिखाई देता है कि छमस्थके भी, जैसे वर्तमान वस्तुका चितवन करते हुए जान उसके आकारका अवलम्बन करता है उसीप्रकार भूत और भविष्यत वस्तुका चितवन करते हुए (भी) ज्ञान उसके आकारका अवलम्बन करता है। १ जानमें ममस्त द्रव्योंकी तीनोंकानको पर्यायें एक ही साथ ज्ञात होने पर भी प्रत्येक पर्यायका विशिष्ट स्वरूप -प्रदेश, काल, आकार इत्यादि विशेषतायें स्पष्ट ज्ञात होता है; संकर - व्यतिकर नहीं होते। - - जैन शास्त्रमाला] -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापत-- ६७ एवावभासन्ते, तथा संविद्भित्तावपि । - किंच सर्वज्ञेयाकाराणां तादात्विकत्वाविरोधात्; यथा हि प्रध्वस्तानामनुदितानां च वस्तूनामालेख्याकारा वर्तमाना एव, तथातीतानामना- गतानां च पर्यायाणां ज्ञेयाकारा वर्तमाना एव भवन्ति ।। ३७ ॥ स्वकीयस्वकीयप्रदेशकालाकारविशेषः सकरव्यतिकरपरिहारेणेत्यर्थः । किंच - यथा छमस्थपुरुपस्या- तोतानागतपर्याया मनसि चिन्तयतः प्रतिस्फुरन्ति, यथा च चित्रभित्तो बाहुबलिभरतादिव्यतिक्रान्त- ल्पाणिणिकतीर्थकरादिभावित्पाणि च वर्तमानानीव प्रत्यक्षेण दृश्यन्ते तथा चित्रभित्तिस्थानीय- केवलनाने भूतभाविनश्च पर्याया युगपत्प्रत्यक्षेण दृश्यन्ते, नास्ति विरोधः । यथायं केवली भगवान् पन्द्रव्यपर्यायान् परिच्छित्तिमात्रेण जानाति, न च तन्मयत्वेन. निश्चयेन तु केवलज्ञानादिगुणाधारभूतं स्वकीयसिपर्यायमेव स्वसंवित्त्याकारेण तन्मयो भूत्वा परिच्छिनत्ति जानाति. तथासनभव्यजीवेनापि निजशुद्वात्मसम्यक्श्रद्धाननानानुष्ठानरूपनिश्चयरत्नत्रयपर्याय एव सर्वतात्पर्येण जातव्य इति (२) और ज्ञान चित्रपटके समान है। जैसे चित्रपटमें अतीत, अनागत और वर्तमान वस्तुओंके 'आलेख्याकार साक्षात् एक क्षणमें ही भासित होते हैं; उसीप्रकार ज्ञानरूपी भित्तिमें (-जानभूमिकामें, ज्ञानपटमें) भी अतीत, अनागत और वर्तमान पर्यायोंके जेयाकार साक्षात् एक भणमें ही भासित होते हैं । (३) और सर्व याकारोंको तात्कालिकता (वर्तमानता, साम्प्रतिकता) अविरुद्ध है। जैसे नष्ट और अनुत्पन्न वस्तुओंके आलेख्याकार वर्तमान ही हैं, उसीप्रकार अतीत और अनागत पर्यायोंके नेयाकार वर्तमान ही हैं । भावार्थ :- केवलनान समस्त द्रव्योंकी तीनों कालकी पर्यायोंको युगपद् जानता है । यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि जान नष्ट और अनुत्पन्न पर्यायोंको वर्तमान कालमें कैसे जान सकता है ? उसका समाधान है कि - जगतमें भी देखा जाता है कि अल्पन जीवका ज्ञान भी नष्ट और अनुत्पन्न वस्तुओंका चितवन कर सकता है, अनुमानके द्वारा जान सकता है, तदाकार हो सकता है: तब फिर पूर्ण ज्ञान नष्ट और अनुत्पन्न पर्यायौंको क्यों न जान मर्केगा ? जानशक्ति ही ऐनी है कि यह चित्रपटकी भांति अतीत और अनागत पर्यायोंको भी जान सकती है। और आलेल्यवत्तिकी भांति. द्रव्योंकी संयन्त्र भक्ति ऐनी है कि उनकी अतीत और अनागत पर्यायें भी जानमें मेवाण होती है -जात होती है। इसप्रकार आत्माको अद्भुत मानक्ति और व्याकी अद्भुत यन्त्र- त्तिावे. कारण केवलनानमें समस्त द्रव्योंकी तीनोंकालको पर्याचोंका ही ममय में भामिन होना अविरल है ।। ३७ ।। . नदीप सिविल वर योन्द ।

६८
--प्रवचनतार-
भगवान शोकुन्दकुन्द-कहान
अथालद्भूतपर्यायाणां कथंचित्सद्भूतत्वं विदधाति
जे पेव हि संजाया जे खलु गट्ठा भवीय पज्जाया ।
ते होंति असन्भूदा पज्जाया णाणपच्चक्खा ॥ ३८ ॥
ये नैव हि संजाता ये खलु नष्टा भूत्वा पर्यायाः ।
ते भवन्ति असद्भूताः पर्याया ज्ञानप्रत्यक्षाः ।। ३८ ॥
ये खलु नाद्यापि संभूतिमनुभवन्ति, ये चात्मलाभमनुभूय विलयमुपगतास्ते किलास-
इता अपि परिच्छेदं प्रति नियतत्वात् ज्ञानप्रत्यक्षतामनुभवन्तः शिलास्तम्भोत्कीर्णभूत-
माविदेववदप्रकरमाप्तिस्वरूपाः सद्भता एव भवन्ति ॥ ३८ ॥
तात्पर्यम् ।। ३७ ।। अथातीतानागतपर्यायाणामसद्भूतसंज्ञा भवतीति प्रतिपादयति - जेणेव हि संजाया
जे खलु णडा भवीय पज्जाया ये नैव संजाता नाद्यापि भवन्ति, भाविन इत्यर्थः । हि स्फुटं ये च खलु नप्टा
विनष्टाः पर्यायाः । किं कृत्वा । भूत्वा । ते होंति असम्भूदा पज्जाया ते पूर्वोक्ता भूता भाविनश्च पर्याया
-
-
अब, अविद्यमान पर्यायोंकी (भी) कथंचित् (-किसी प्रकारसे; किसी अपेक्षासे)
विद्यमानता बतलाते हैं :-
गाथा ३८
अन्वयार्थ :- [ये पर्यायाः] जो पर्यायें [हि] वास्तवमें [न एव संजाताः] उत्पन्न
नहीं हुई हैं, तथा [ये] जो पर्यायें [खलु] वास्तवमें [भूत्वा नष्टाः] उत्पन्न होकर नष्ट
होगई हैं, [ते] वे [असद्भूताः पर्यायाः] अविद्यमान पर्यायें [ज्ञानप्रत्यक्षाः भवन्ति
जान प्रत्यक्ष हैं।
टीका :- जो (पर्यायें) अभी तक भी उत्पन्न नहीं हुई और जो उत्पन्न होकर
नष्ट होगई हैं, वे (पर्यायें) वास्तवमें अविद्यमान होने पर भी, ज्ञानके प्रति नियत
होनेसे (जानमें निश्चित-स्थिर-लगी हुई होनेसे, ज्ञानमें सीधी ज्ञात होनेसे) 'ज्ञानप्रत्यक्ष
वर्तती हुई, पापाण स्तम्भमें उत्कीर्ण, भूत और भावी देवों (तीर्थंकरदेवों) की भाँति
प्रत्यक्ष-अक्षये प्रति - अक्षके मम्मुख - अक्षके निकटमें - अक्षके संबंध हो ऐसा । [अक्ष-ज्ञान; आत्मा 1]
जे पर्ययो अणजात छ, वली जन्मीने प्रविनष्ट जे।
ते सौ असद्भूत पर्ययो पण ज्ञानमा प्रत्यक्ष छे ॥३८॥

- जैन शास्त्रमाला] -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ६६ अथैतदेवासद्भूतानां ज्ञानप्रत्यक्षत्वं दृढयति जदि पच्चक्खमजादं पज्जायं पलयिदं च णाणस्स। ण हवदि वा तं गाणं दिव्वं ति हि के परूवेति ॥ ३६॥ यदि प्रत्यक्षोऽजातः पर्यायः प्रलयितश्च ज्ञानस्य । न भवति वा तत् ज्ञानं दिव्यमिति हि के प्ररूपयन्ति ॥ ३६॥ अविद्यमानत्वादसद्भूता भण्यन्ते । णाणपच्चक्खा ते चाविद्यमानत्वादसद्भूता अपि वर्तमानज्ञान- विपयत्वादृयवहारेण भूनार्था भण्यन्ते, तथैव नानप्रत्यक्षाश्चेति । यथायं भगवान्निश्चयेन परमानन्दैक- लक्षणसुखम्बभावं मोक्षपर्यायमेव तन्मयत्वेन परिच्छिनत्ति, परद्रव्यपर्यायं तु व्यवहारेणेति; तथा भावितात्मना पुरुषेण रागादिविकल्पोपाधिरहितस्वसंवेदनपर्याय एव तात्पर्येण नातव्य:, बहिर्द्रव्य- पर्यायाश्च गौणवृत्त्येति भावार्थः ।। ३८ ।। अथासद्भूतपर्यायाणां वर्तमानज्ञानप्रत्यक्षत्वं दृढयति - जइ पच्चक्खमजायं पज्जायं पलइयं च णाणस्स ण हवदि वा यदि प्रत्यक्षो न भवति । स कः। अजातपर्यायो भाविपर्यायः । न केवलं भाविपर्यायः प्रलयितश्च वा । कस्य । ज्ञानस्य । तं गाणं दिव्वं ति हि के पति तनानं दिव्यमिति के प्ररूपयन्ति, न केऽपीति । तथा हि- यदि वर्तमानपर्यायवदतीतानागतपर्याय ज्ञानं कर्तृ क्रमकरणव्यवधानरहितत्वेन साक्षात्प्रत्यक्षं न करोति, तहि तत् जानं दिव्यं न भवति । वस्तु- अपने स्वरूपको अकम्पतया (जानको) अपित करती हुई (वे पर्यायें) विद्यमान ही हैं ।। ३८ ।। अव, इन्हीं अविद्यमान पर्यायोंकी जानप्रत्यक्षताको दृढ़ करते हैं :- गाथा ३९ अन्वयार्थ :- [यदि वा] यदि [अजातः पर्यायः] अनुत्पन्न पर्याय [च] तथा [प्रलयितः] नष्ट पर्याय [ज्ञानस्य] जानके (केवलनानके) [प्रत्यक्षः न भवति] प्रत्यक्ष न हो तो [तत् ज्ञानं] उस ज्ञानको [दिव्यं इति हि] 'दिव्य' [के प्ररूपयंति] कौन प्ररूपेगा? टीका :- जिसने अस्तित्वका अनुभव नहीं किया और जिसने अस्तित्वका अनुभव कर लिया है ऐसी (अनुत्पन्न और नष्ट) पर्यायमात्रको यदि जान अपनी निर्विघ्न विकसित, अखंडित प्रतापयुक्त प्रभुशत्तिके (-महा सामध्यं) हारा बलात् अत्यन्त आत्रमित कर (-प्राप्त करे), तथा वे पर्यायें अपने स्वरूपसर्वस्वको अमन अर्पित करें अजात-दिनष्ट पर्यायो तणी प्रत्यक्षता । नव होय जो, तो ज्ञानने 'दिव्य' कोण काहे भला ? ॥ . जाने मनोमान-कसान ७० यदि खत्वसंभावितभादं समाक्तिगत, पर्यायजानकाशितम्भितामणित- प्रतापप्रभुशक्तितया प्रसनत नितान्तलाकार नापितस्वरसावमात्मानं प्रतिनियतं ज्ञानं न करोति, तदा तस्य कुतस्तनी रियता स्यात् । अतः कालाप्राप्तस्य परिच्छेदस्य सर्वनेतदुपपन्न ॥ ३६॥ अथेन्द्रियज्ञानत्यंत प्रतीनमसुत्पन्न ज्ञातुमशक्यनिति वितर्कयति - अत्थं अणिति ईहापुहिं जे विजाति । तेरि परोक्त मूलं गादुम्मसक्क ति पण्णत्तं ॥ ४० ॥ अर्थसक्षनिपतितमीहापूर्वये विजानन्ति । तेषां परोक्षभूतं ज्ञातुमसत्यमिति प्रज्ञप्तम् ।। ४० ।। वस्तु ज्ञानमेव न नवनीति । यथायं केवली परकीयद्रव्यपर्यायान् यद्यपि परिच्छित्तिमात्रेण जानाति, तथापि नियनयेन सहजानन्दैकस्वभावे स्वशुद्धात्मनि तन्मयत्वेन परिच्छित्ति करोति, तथा निर्मल- विवेकिजनोऽपि यद्यपि व्यवहारेण परकीयद्रव्यगुणपर्यायपरिज्ञानं करोति, तथापि निश्चयेन निर्विकारस्वसंवेदनपर्याये विषयत्वात्पर्यायेण परिज्ञानं करोतीति सूत्रतात्पर्यम् ॥३६॥ अथातीतानागत- (-एकही साथ ज्ञानमें ज्ञात हों) इसप्रकार उन्हें अपने प्रति नियत न करे (-अपनेमें निश्चित न करे, प्रत्यक्ष न जाने), तो उस ज्ञानकी दिव्यता क्या है ? इससे (यह कहा गया है कि) पराकाष्ठाको प्राप्त जानके लिये यह सव योग्य है । भावार्थ :- अनन्त महिमावान केवलज्ञानकी यह दिव्यता है कि वह अनन्त द्रव्योंकी समस्त पर्यायोंको (अतीत और अनागत पर्यायोंको भी) सम्पूर्णतया एक ही समय प्रत्यक्ष जानता है ।। ३६ ।। अब, इन्द्रियजानके लिये नष्ट और अनुत्पन्नका जानना अशक्य है (अर्थात् इन्द्रियनान ही नष्ट और अनुत्पन्न पदार्थोंको-पर्यायोंको नहीं जान सकता) ऐसा न्यायसे निश्चित करते हैं। गाथा ४० अन्वयार्थ :- [ये] जो [अक्षनिपतितं] अक्षपतित अर्थात् इन्द्रियगोचर [अर्थं] ईहादिपूर्वक जाणता जे अक्षपतित पदार्थ ने। तेने परोक्ष पदार्थ जाणवु शक्य ना-जिनजी कहे ॥४०॥ ..".. How जैन शास्त्रमाला] --ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ये खलु विषयविषयिसन्निपातलक्षणमिन्द्रियार्थसन्निकर्षमधिगम्य क्रमोपजायमानेने- हादिकप्रक्रमेण परिच्छिन्दन्ति, ते किलातिवाहितस्वास्तित्वकालमनुपस्थितस्वास्तित्वकालं वा यथोदितलक्षणस्य ग्राह्यग्राहकसंबंधस्यासंभवतः परिच्छेत्त न शक्नुवन्ति ।। ४० ।। सूक्ष्मादिपदार्थानिन्द्रियनानं न जानातीति विचारयति - अत्यं घटपटादिनेयपदार्थ । कथंभूतं । अक्ख- णिवदिदं अक्षनिपतिनं इन्द्रियप्राप्नं इन्द्रियसंबद्धं । इत्यंभूतमर्थ ईहापुन्वेहि जे विजाणंति अवग्रहहावाया- दिक्रमेण ये पुन्पा विजानन्ति हि स्फुट तेति परोक्खमूदं तेषां सम्बन्धि जानं परोनभूनं मत् णादुमसक्क ति पप्णत्तं सूक्ष्मादिपदार्थान् ज्ञातुमशक्यमिति प्रजप्तं कथितम् । कैः । नानिभिरिति । तद्यथा-चक्षुरादी- न्द्रियं घटपटादिपनार्यपा गत्वा पवादयं जानातीति सन्निकलक्षणं नैयायिकमते। अथवा संक्षेपेणेन्द्रि- वार्थयोः मंबंधः मन्निकर्ष : म एव प्रमाणम् । न च सन्निकर्ष आकाशाचमूर्तपदार्थषु देशांतरितमे दिपदार्थेषु कालान्तरितनामरावणादिपु स्वभावान्तरितभूतादिषु तथवातिसूक्ष्मेष परत्रेतोवृत्तिपुद्गलपरमाण्वादिषु व न प्रवर्तते । कस्मादिति चेत् । इन्द्रियाणां स्यूलविषयत्वात्, तथैव मूर्तविषयत्वाच्च । ततः कारणादि- न्द्रियनानेन नबनो न भवति । तत एव त्रातीन्द्रियज्ञानोत्पनिकारणं रागादिविकल्परहितं स्वसंवेदनज्ञानं विहाय पञ्चेन्द्रियमुन्वन्ताधनभूतेन्द्रियजाने नानामनोरथविकल्पजालल्पे मानसजाने च ये रति कुर्वन्ति ते सर्वनपदं न लभन्ते इति मूत्राभिप्राय: ।। ४० ।। अथातीन्द्रियनानमतीतानागतमूक्ष्मादिपदार्थान् पदार्थको [ईहापूर्वः] ईहादिक द्वारा [विजानन्ति] जानते हैं, [तेषां] उनके लिये [परोक्षभूतं] 'परोलभूत पदार्थको [ज्ञातु] जानना [अशक्यं] अशक्य है [इति प्रजप्त] ऐसा सर्वनदेवने कहा है । - विषय और विपयीका सन्निपात जिसका लक्षण (-स्वरूप) है, ऐसे इन्द्रिय और पदार्थके 'सन्निकर्पको प्राप्त करके, जो अनुक्रमसे उत्पन्न ईहादिकके क्रमने जानते हैं वे उसे नहीं जान सकते जिसका स्व-अस्तित्वकाल बीत गया है तथा जिसका स्व-अस्तित्वकाल उपस्थित नहीं हुआ है क्योंकि (अतीत-अनागत पदार्थ और इन्द्रियके) यघोक्त लक्षण (-यथोक्तस्वरूप, ऊपर कहा जना) "ग्राह्यग्राहकसम्बन्धका असंभव है। - भावार्थ :- इन्द्रियोंके साथ पदार्थका (अर्थात् विषयीके नाय विषयका) मन्निपं- सम्बन्ध हो तभी (अवग्रह-ईहा-अवाय-धारणारूप क्रमसे) इन्द्रियान पदार्थको जान सकता है । नष्ट और अनुत्पन्न पदार्थोके साथ इन्द्रियोंका मन्निकर्प-सम्बन्ध न होने में इन्द्रिय जान उन्हें नहीं जान सकता । इसलिये इन्द्रियनान हीन है. हेय है !! ४० ।। पोक्ष-अक्ष पर अर्थात् अक्षणे दूर होवे ऐमा; इन्द्रिय बमोचन । २ मनिपान मिलाप, गंध होना दर । : मनिका, मनाना। सिमानामा प्रहार दिया।

७२
अशातीन्दिरमालय
अपदेले सगले तान पला।
लयं
गतान ... ।।१।।
--
।
अप्रदेश नजो
प्रलयं गतं जाना-माना :-
' ।।
4
जानातीत्युपदि गान - अपदेनं मला.': :: :: :: :: :: : 1.11
स्वरूपं मुत्तं मूतं पृद्गुनका अमुत्तक :: :: :: A1111 111
भाविनं प्रलय गत नातोनमे मन पूगेम बंगा: :: :: :: :: ini
भणियं तदतानमतीविन णित लेनेव गा. 5:41
अब, ऐसा स्पष्ट करते है कि नीति जानो नो जाता ।
वह (सव) संभव है
गाथा ४१
अन्वयार्थ :-[अप्रदेशं] जो जान अप्रदेशको, [ सप्रदेशं गतदेणको, [ मूर्त ] गूर्ताको,
[अमूर्त च] और अमूर्तको तथा [अजातं] अनुगन्न [न] ओर [प्रलयंगतं] नाट
[पर्यायं] पर्यायको [जानाति] जानता है, [तत् ज्ञानं] बह जान [अतीन्द्रियं ]
अतीन्द्रिय [भणितम् ] कहा गया है ।
टीका :- इन्द्रियज्ञान उपदेश, अन्तःकरण और इन्द्रिय इत्यादिको 'विरूप-
कारणतासे (ग्रहणकरके) और उपलब्धि (-क्षयोपशम), संस्कार इत्यादिको अंतरङ्ग
स्वरूप-कारणतासे ग्रहण करके प्रवृत्त होता है; और वह प्रवृत्त होता हुआ सप्रदेशको
हो जानता है क्योंकि वह स्थूलको जाननेवाला है, अप्रदेशको नहीं जानता, (क्योंकि वह
सूक्ष्मको जाननेवाला नहीं है); वह मूर्तको ही जानता है क्योंकि वैसे (मूर्तिक) विषयके
साथ उसका सम्बन्ध है, वह अमूर्तको नहीं जानता (क्योंकि अमूर्तिक विपयके साथ
विरूप=ज्ञानके स्वरूपसे भिन्न स्वरूपवाले । (उपदेश, मन और इन्द्रियां पौद्गलिक होने से उनका म्प ज्ञानके
स्वरूपसे भिन्न है । वे इंद्रियज्ञानमें बहिरंग कारण हैं।)
-
१
(
जे
जाणतु
अप्रदेशने, सप्रदेश, मूर्त, अमूर्तने ।
पर्याय नष्ट-अजातने, भाख्यु अतींद्रिय ज्ञान ते ॥ ४१ ॥

जैन शास्त्रमाला] -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ७३ इन्द्रियज्ञानं नाम उपदेशान्तःकरणेन्द्रियादोनि विरूपकारणत्वेनोपलब्धिसंस्कारादीन अन्तरङ्गस्वरूपकारणत्वेनोपादाय प्रवर्तते; प्रवर्तमानं च सप्रदेशमेदाध्यवस्यतिस्थूलोप- लम्भकत्वान्नाप्रदेशम् ; मूर्तमेवावगच्छति तथाविधविषयनिवन्धनसद्भावान्नामूर्तम्; वर्त- मानमेव परिच्छिनत्ति विषयविषयिसन्निपातसद्भावान्न तु वृत्तं वय॑च्च । यत्तु पुनरना- वरणमतीन्द्रियं ज्ञानं तस्य समिधूमध्वजस्येवानेकप्रकारतालिङ्गितं दाह्य दाह्यतानति- क्रमाद्दाह्यमेव यथा तथात्मनः अप्रदेशं सप्रदेशं मूर्तममूर्तमजातमतिवाहितं च पर्यायजातं ज्ञेयतानतिक्रमात्परिच्छेद्यमेव भवतीति ॥ ४१।। अथ ज्ञेयार्थपरिणमनलक्षणा क्रिया ज्ञानान्न भवतीति श्रद्दधाति परिणमदि णेयमळं णादा जदि णेव खाइगं तस्स । णाणं ति तं जिणिदा खवयंतं कम्ममेवुत्ता ॥ ४२ ॥ - मानसनानं च त्यक्त्वा ये निर्विकल्पसमाधिस्प स्वसंवेदनजाने समस्तविभावपरिणामत्यागेन रति कुर्वन्ति त एव परमाबादकलक्षणसुखस्वभावं सर्वनपदं लभन्ते इत्यभिप्रायः ।। ४१ ।। एवमतीताना- गतपर्याया वर्तमानजाने प्रत्यक्षा न भवन्तीति बौद्धमतनिराकरणमुख्यत्वेन गाथात्रय. तदनन्तरमिन्द्रि- यज्ञानेन सर्वनो न भवत्यतीन्द्रियज्ञानेन भवतीति नैयायिकमतानुसारिशिप्यसंबोधनार्थ च गाथाद्वय- मिति समुदायेन पञ्चमन्थले गाथापञ्चकं गतम् ।। अथ रागद्वेषमोहाः बन्धकारणं, न त्र ज्ञानमित्यादि- इन्द्रियज्ञानका सम्बन्ध नहीं है); वह वर्तमानको ही जानता है क्योंकि विपय-विपयीके मन्निपात सद्भाव है, वह प्रवर्तित हो चुकनेवालेको और भविप्यमें प्रवृत्त होनेवालेको नहीं जानता (बयोंकि इन्द्रिय और पदार्थके सन्निकर्षका अभाव है)। परन्तु जो अनावरण अतीन्द्रिय ज्ञान है उसे अपने अप्रदेश, मप्रदेश, मुर्त और अमूर्त (पदार्थ मात्र) तथा अनुत्पन्न एवं व्यतीत पर्यायमात्र, जेवताका अतिक्रमण न करनेने जेय ही है - जैसे प्रज्वलित अग्निको अनेक प्रकारकाधन. काहानामा अतिक्रमण न करनेमे, बाह्य ही है । (जैसे प्रदीप्त अग्नि दाह्ममात्रको -चनमायको-जला देनी है. उनीप्रकार निरावरण जान नेयमारको - द्रव्यपर्यावमात्रयो - जानता है। ।। ४ ।। अब, गेली श्रद्धा व्यत्त, बारते हैं कि जेय पदार्थ पनियमन कर गनी (नेयार्थपरिणमनन्याप) निया जानमेंने इत्याद नही माली - जोर अर्थ परिणरे जाता, न क्षादियमान। ते कर्मने ज अनुभवे हे अन जिन्देदो !!: 1 ७४ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान परिणमति ज्ञेयमर्थं ज्ञाता यदि व क्षायिकं तस्य । ज्ञानमिति तं जिनेन्द्राः क्षपयन्तं कर्मवोत्तवन्तः ।। ४२ ॥ परिच्छेत्ता हि यत्परिच्छेधमर्थ परिणति तन्न तस्य सकलकर्मकक्षक्षयप्रवृत्तस्वाभा- विरूपरिच्छेवनिदानगथवा ज्ञानमेव नास्ति तस्य; यतः प्रत्यर्थपरिणतिद्वारेण मृगतृष्णा- घोसारलंभार लाकर णमानसः सुदुःसहं कर्मभारमेवोपभुजानः स जिनेन्द्र रुद्गीतः ॥४२॥ नयनरपेण गायापचापर्यन्नं व्याख्यानं करोति । तद्यथा-यस्येष्टानिष्टविकल्परूपेण कर्मवन्धकारण- नतेन नेविषये पनिणमनमस्ति तस्य क्षायिकज्ञानं नास्तीत्यावेदयति-परिणमदि यमटुंणादा जदि नीलमिदं पीमिमियादिविकल्पल्पेण यदि जेयार्थ परिणमति ज्ञातात्मा व खाइगं तस्स गाणं ति नयात्मनः . विमान वास्ति । अथवा ज्ञानमेव नास्ति । कस्मान्नास्ति । तं जिणिदा खवयंतं काम्नमेवुत्ता सपकार र नापन्न जिनेन्द्राः कर्तारः उक्तवन्तः । किं कुर्वन्तम् । क्षपयन्तमनुभवन्तम् । विमेव ।कमा : नितिमाग्नहजानन्दैकसुखस्वभावानुभवनशून्यः मन्नुदयागतं स्वकीयकमैव स अनु- भयान न मानमित्यर्थः । अथवा द्वितीयव्याख्यानम् - यदि ज्ञाता प्रत्यर्थ परिणम्य पश्चादर्थ नातिना अर्थानामानन्त्यात्सर्वपदार्थपरिज्ञानं नास्ति । अथवा तृतीयव्याख्यानम्-बहिरङ्गजेय- पामार यदा भल्यावस्थायां चिन्तयति तदा रागादिविकल्परहितं स्वसंवेदनज्ञानं नास्ति, तद- भाव आधिकमानमेव नोत्पद्यते इत्यभिप्रायः ।। ४२ ।। अथानन्तपदार्थपरिच्छित्तिपरिणमनेऽपि ज्ञानं गाथा ४२ अन्वयार्थ :-[जाता जाता [यदि] यदि [ज्ञेयं अर्थ ] ज्ञेय पदार्थरूप [परिणमति] पजिमिन होता हो तो [तस्य] उनके [क्षायिकं ज्ञानं] क्षायिक ज्ञान [न एव इति] कान। जिनेन्द्राः] जिनेन्द्रदेवोंने [तं] उसे [कर्म एव] कर्मको ही [क्षपयन्तं] नमक वाला [उत्तावन्तः] कहा है। दीका :- यदि माता नेय पदार्थरूप परिणमित होता हो, तो उसे सकल कर्मवनके 2. मानवाभाविक जानपनका कारण (क्षायिक ज्ञान) नहीं है; अथवा उसे की. मोंकि प्रत्येक पदार्थापन परिणतिके द्वारा मृगतृष्णामें जलसमूहकी जी भावनावाला वह (आत्मा) अत्यन्त दुःसह कर्मभारको ही भोगता है भावार्थ:- पदार्थकपने परिणामन करना अर्थात् 'यह हरा है, यह पीला है' का पदायों में परिणामन करना वह कर्मका भोगना है, ज्ञानका नहीं। 7 मादा लोग दवार महजम्पमे जानते रहना वही नानका स्वरूप - नये सामान नि होना, वह नानका स्वरूप नहीं है ।।४२।।

जानतत्त्व-प्रज्ञापन- - ७५ जैन शास्त्रमाला] अथ कुतस्तहि ज्ञेयार्थपरिणमनलक्षणा क्रिया तत्फलं च भवतीति विवेचयति - उदयगदा कम्मंसा जिणवरवसहहिं णियदिणा भणिया । तेसु विमूढो रत्तो दुट्ठो वा बंधमणुभवदि ॥ ४३॥ उदयगताः कर्माशा जिनवरवृषभः नियत्या भणिताः । तेषु विमूढो रक्तो दुष्टो वा बन्धमनुभवति ।। ४३ ।। बन्धकारणं न भवति, न च रागादिरहितकर्मोदयोऽपीति निश्चिनोति - उदय गदा कम्मंसा जिणवर- वसहेहि णियदिणा भणिया उदयगता उदयं प्राप्ता: कर्माशा जातावरणादिमूलोत्तरकर्मप्रकृतिभेदाः जिनवरवृपभैनियत्या स्वभावेन भणिताः, किंतु स्वकीयशुभाशुभफलं दत्वा गच्छन्ति, न त्र रागादिपरिणामरहिताः सन्तो बन्धं कुर्वन्ति । तहि कथं बन्धं करोति जीवः इति चेत् । तेसु विमूढो - (यदि ऐसा है) तो फिर ज्ञेय पदार्थरूप परिणमन जिसका लक्षण है ऐसी (ज्ञेयार्थपरिणमनस्वरूप) क्रिया और उसका फल कहाँले (किस कारणसे) उत्पन्न होता है, ऐसा अव विवेचन करते हैं :- गाथा ४३ अन्वयार्थ :- [उदयगताः कर्माशाः ] (संसारी जीवके) उदयप्राप्त कर्माश (नानावरणीय आदि पुद्गलकर्मके भेद) [नियत्या] नियमले [जिनवरवृपभैः] जिनवर वृपभोंने [भणिताः] कहे हैं । [तेषु] जीव उन कर्माशोंके होने पर, [विमूढः रक्तः दुष्टः वा] मोही, रागी अथवा हेपी होता हुआ [बन्यं अनुभवति ] बन्धका अनुभव करता है। टीका :- प्रथम तो, संसारीके नियमसे उदयगत पुद्गल कांग होते ही हैं । अब वह संसारो, उन उदयगत कर्माणों के अस्तित्वमें, चेतने-जानते-अनुभव करने हए. राग-द्वेपमें परिणत होनेसे ज्ञेय पदार्थोमें परिणमन जिनका लक्षणपनी (मेवानपरिणमन- स्वरूप) त्रियाके साथ युक्त होता है; और इसीलिये मित्यावे. फलभूत बन्धका अनमय करता है । इसमे (ऐसा कहा है कि) मोहवे उदयने ही (नोहणे. उत्यो गुन होनक कारणसे हो) प्रिया और त्रियाफल होता है, जानने नहीं । मोह- , भाख्यां जिने कामों उदयगत नियमची मनाने! ते कर्म होतां मोही-रागो-हेपी दंघ अनुभवे ।। ४ ।।

~प्रवचनसार- - [ भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अथैवं सति तीर्थकृतां पुण्यविपाकोऽकिंचित्कार एवेत्यवधानपति पुण्णफला अरहता सि किरिया पुणो हि ओदइया । मोहानीहि विहिदा तम्हा सा खाइग त्ति सदा ॥४५॥ पुण्याला अर्हन्तस्तेषां किया पुहि औयिकी। मोहादिभिः पिहिता तस्मात् सा धाथिकोति मता ॥ ४५ ॥ ।। ८४ ।। अथ पूर्व यक्त गादिरहित कर्मोदयो बन्धकारणं न भवति विहारादिक्रिया च, तमेवार्थ मागनरेश हानि -- पुग्णकला मरता पञ्चमहाकल्याणपूजाजनक त्रैलोक्यविजयकरं यत्तीर्थकरनाम वर्ग नकलभुता अहलो भवन्ति । तेति किरिया पुणो हि ओदइया तेपां या दिव्यध्वनि- पवन व्यापागनिका निक्रियाजुद्धात्मतत्त्वविपरीतकर्मोदय जनितत्वात्सर्वाप्यौदयिकी भवति हि एम् । मोहाबीहि बिरहिया निर्मोहाहात्मतत्त्वाच्छादकममकाराहङ्कारोत्पादनसमर्थमोहादिविरहित- मानः नन्हा का साया त्ति मदा तस्मात् सा यद्यप्यौदयिकी तथापि निर्विकारशुद्धात्मतत्त्वस्य नप्रकार होनेसे तीर्थंकरोंके पुण्यका विपाक अकिंचित्कर ही है (-कुछ करता नहीं है, न्यभावका किंचित् धात नहीं करता) ऐसा अव निश्चित करते हैं :- गाथा ४५ अन्वयार्थः--[ अहंन्तः] अरहन्त भगवान [पुण्यफलाः] पुण्यफलवाले हैं [पुनः हि] मेषां प्रिया] उनकी क्रिया [औदयिको] औदयिकी है; [मोहादिभिः विरहिता] मानि [तस्मात् ] इसलिये [सा] वह [क्षायिकी] क्षायिकी [इति मता] जा: -लभगवान जिनके वास्तव में पुण्यरूपी कल्पवृक्षके समस्त फल ग हैं ऐसे ही हैं, और उनकी जो भी क्रिया है वह सब उसके - नाव उत्पन्न होनेके कारण औदयिकी ही है। किन्तु ऐसी होने वाली) होने पर भी वह सदा औदयिकी क्रिया महामोहराजाकी में उत्पन्न होती है इसलिये मोहरागद्वेषरूपी 'उपरंजकोंका ......... दिनद)। के पुनरल अर्हत, ने अर्हतकिरिया उदयिकी । मंदियी विहिन तेथी ते क्रिया क्षायिक गणी ।। ४५ ।।

जैन शास्त्रमाला] -जानतत्त्व-प्रज्ञापन- - ७६ । अर्हन्तः खलु सकलसम्यक्परिपक्वपुण्यकल्पपादपफला एव भवन्ति । क्रिया तु तेषां या काचन सा सर्वापि तदुदयानुभावसंभावितात्मसंभूतितया किलौदयित्येव । अथैवंभूतापि सा समस्तमहामोहमूर्धाभिषिक्तस्कन्धावारस्यात्यन्तक्षये संभूतत्वान्मोहरागद्वेषरूपाणामुप- रज्जकानामभावाच्चैतन्यविकारकारणतामनासादयन्ती नित्यमौदयिको कार्यभूतस्य बन्ध- स्याकारणभूततया कार्यभूतस्य मोक्षस्य कारणभूततया च क्षायिक्येव कथं हि नाम नानु- मन्येत । अथानुमन्येत चेत्तहि कर्मविपाकोऽपि न तेषां स्वभावविघाताय ॥ ४५ ॥ अथ केवलिनामिव सर्वेषामपि स्वभावविघाताभावं निषेधयति - विक्रियामकुर्वती सती माविकीति मता। अत्राह शिष्यः - 'औदयिका भावाः बन्धकारणम्' इत्या- गमवचनं तहि वृथा भवति । परिहारमाह - औदयिका भावा बन्धकारणं भवन्ति, परं किंतु मोहो- दयसहिताः । द्रव्यमोहोदयेऽपि सति यदि शुद्धात्मभावनावलेन भावमोहेन न परिणमति तदा बंधो न भवति । यदि पुनः कर्मोदयमात्रेण बन्धो भवति तहि संसारिणां सर्वदैव कर्मोदयस्य विद्यमानत्वात सर्वदैव बन्ध एव, न मोक्ष इत्यभिप्रायः ।। ४५ ।। अथ यथार्हतां शुभाशुभपरिणामविकारो नास्ति अभाव होनेसे चैतन्यके विकारका कारण नहीं होती इसलिये कार्यभूत बन्धकी अकारण- भूततासे और कार्यभूत मोक्षकी कारणभूतताले मायिकी ही क्यों न माननी चाहिये ? (अवश्य माननी चाहिये) और जब क्षायिकी ही माने तब कर्मविपाक (-कर्मोदय) भी उनके (अरहन्तोंके) स्वभावविघातका कारण नहीं होता (एमा निश्चित होता है)। भावार्थ :- अरहन्त भगवानके जो दिव्यध्वनि, विहार आदि क्रियाएं हैं वे निष्क्रिय शुद्ध आत्मतत्त्व के प्रदेशपरिम्पंदमें निमित्तभूत पूर्वबह कर्मोदयले उम्पन्न होती हैं मलिये औदयिकी हैं। वे क्रियाएं अरहन्त भगवान के चैतन्यविकाररूप भावक उत्पन्न नहीं करतीं, क्योंकि (उनके) निर्मोह शुद्ध आत्मतत्त्वके नगदपमोहन विकार में निगिनत मोहनीयकर्मका क्षय हो चुका है । और वे त्रियाएं उन्हें, गगपगो का अभाव हो जाने नवीन वन्धमें कारणम्प नहीं होती, परन्तु वे पूर्व कर्मोके अनमें सामाकि जिन कर्मोके उदयसे वे क्रियाएं होती हैं वे नार्म अपना नगर पर माने। इसप्रकार मोहनोयकर्मको क्षयने उत्पन्न होनेने और को अपने मन होनेने अरहंत भगवानको बह औदायिकी क्रिया धापिकी बहलानी ।। अब, कोवलीभगवानकी भांति नमन्त जीवावे. बनावमानमा सामोरे निषेध करते है :- ८२ -प्रवचनसार [भगवान श्रीगुन्यसुन्द-कहान तत्कालकलितवृत्तिकमतीतोदकालकलितवृत्तिकं चाप्येकपद एव समन्ततोऽपि सकलमप्यर्थजातं, पृथक्त्ववृत्तस्वलक्षणलक्ष्मीकटाक्षितानेकप्रकारञ्जितवैचित्र्यमितरेतर- विरोधधापितासमानजातीयत्वोद्दामितवैषम्यं क्षायिकं ज्ञानं किल जानीयात् तस्य हि करोति । तद्यथा - अत्र ज्ञानप्रपञ्चव्याख्यानं प्रकृतं तावत्तत्प्रस्तुतमनुसृत्य पुनरपि केवलनानं सर्वज त्वेन निरूपयति - जं यज्ज्ञानं कर्तृ जाणदि जानाति । कम् । अत्थं अर्थ पदार्थमिति विशेप्यपदम् । कि- विशिष्टम् । तक्कालियमिदरं तात्कालिकं वर्तमानमितरं चातीतानागतम् । कथं जानाति । जुगवं युग- पदेकसमये समंतदो समन्ततः सर्वात्मप्रदेणैः सर्वप्रकारेण वा । कतिसंन्योपेतम् । सव्वं समस्तम् । पुनरपि किविशिष्टम् । विचित्तं नानाभेदभिन्नम् । पुनरपि किरूपम् । विसमं मूर्तामूर्तचेतनाचेतनादि- जात्यन्तरविशेविसदृशं । तं गाणं खाइयं भणियं यदेवंगुण विशिष्टं ज्ञानं तत्क्षायिकं भणितम् । 1 गाथा ४७ अन्वयार्थ :- [यत्] जो [युगपद्] एकही साथ [समन्ततः] सर्वतः (सर्व- आत्मप्रदेशोंसे) [तात्कालिकं] तात्कालिक [इतरं] या अतात्कालिक, [विचित्रविषमं] विचित्र (-अनेक प्रकारके) और विषम (मूर्त, अमूर्त आदि असमान जातिके) [सर्व अर्थ] समस्त पदार्थोंको [जानाति] जानता है [तत् ज्ञानं] उस ज्ञानको [क्षायिकं भणितम्] क्षायिक कहा है । टोका :- क्षायिक ज्ञान वास्तवमें एक समयमें ही सर्वतः (सर्व आत्मप्रदेशोंसे), वर्तमानमें वर्तते तथा भूत-भविष्यत कालमें वर्तते उन समस्त पदार्थोंको जानता है जिनमें 'पृथक्पसे वर्तते स्वलक्षणरूप लक्ष्मीसे आलोकित अनेक प्रकारोंके कारण वैचित्र्य प्रगट हुआ है और जिनमें परस्पर विरोधसे उत्पन्न होनेवाली असमानजातीयताके कारण वैषम्य प्रगट हुआ है । (इसी वातको युक्तिपूर्वक समझाते हैं :-) क्रम-प्रवृत्तिके हेतुभूत, भयोपशम-अवस्थामें रहनेवाले ज्ञानावरणीय कर्मपुद्गलोंका उसके (क्षायिक ज्ञानके) अत्यन्त अभाव होनेसे वह तात्कालिक या अतात्कालिक पदार्थ-मात्रको समकालमें ही प्रकाशित करता है; (क्षायिक ज्ञान) सर्वतः विशुद्ध होनेके कारण प्रतिनियत प्रदेशोंकी विशुद्धि (सर्वतः विशुद्धि) के भीतर डूब जानेसे वह सर्वतः (सर्व आत्म- प्रदेशोंते) भी प्रकाशित करता है; सर्व आवरणोंका क्षय होनेसे, देश-आवरणका क्षयोपशम न रहनेसे वह सवको भी प्रकाशित करता है, सर्वप्रकार ज्ञानावरणके क्षयके कारण (-सर्व प्रकारके पदार्थोको जाननेवाले ज्ञानके आवरणमें निमित्तभूत कर्मके क्षय होनेसे) दम्पोंके भिन्न-भिन्न वतनेवाले निज-निज लक्षण उन द्रव्योंको लक्ष्मी-सम्पत्ति-शोभा हैं।

जैन शास्त्रमाला] ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-- - ८३ क्रमप्रवृत्तिहेतुभूतानां क्षयोपशमावस्थावस्थितज्ञानावरणीयकर्मपुद्गलानामत्यन्ताभावात्ता- कालिकमतात्कालिकं वाप्यर्थजातं तुल्यकालमेव प्रकाशेत; सर्वतो विशुद्धस्य प्रतिनियत- देशविशुद्धरन्तःप्लवनात् समन्ततोऽपि प्रकाशेत; सर्वावरणक्षयाद्देशावरणक्षयोपशमस्या- नवस्थानात्सर्वमपि प्रकाशेत; [सर्वप्रकारज्ञानावरणीयक्षयासर्वप्रकारज्ञानावरणीयक्षयो- पशमस्य विलयनाद्विचित्रमपि प्रकाशेत; ] असमानजातीयज्ञानावरणक्षयात्समानजातीय- जानावरणीयक्षयोपशमस्य विनाशनाद्विषममपि प्रकाशेत । विनाशनाद्विषममपि प्रकाशेत । अलमथवातिविस्तरेण, अनिवारितप्रसरप्रकाशशालितया क्षायिकज्ञानमवश्यमेव सर्वदा सर्वत्र सर्वथा सर्वमेव जानीयात् ॥ ४७ ॥ अभेदनयेन तदेव सर्वनस्वरूपं तदेवोपादेयभूतानन्तमुखाधनन्तगुणानामाधारभूतं सर्वप्रकारोपादेयरूपेण भावनीयम् । इति तात्पर्यम् ।। ४७ ।। अथ यः सर्व न जानाति स एकमपि न जानातीति विचारयति- असर्वप्रकारके ज्ञानावरणका क्षयोपशम (-अमुक ही प्रकारके पदार्थोंको जाननेवाले जानके आवरणमें निमित्तभूत कर्मोका क्षयोपशम) विलयको प्राप्त होनेसे वह विचित्र को भी (अनेक प्रकारके पदार्थो को भी) प्रकाशित करता है; असमानजातीय-ज्ञानावरणके भयके कारण (असमानजातिके पदार्थोको जाननेवाले जानके आवरणमें निमित्तभूत कर्मोके क्षयके कारण) समानजातीय जानावरणका क्षयोपशम (समान जातिके हो पदार्थोको जाननेवाले जानके आवरणमें निमित्तभूत कर्मोका भयोपशम) नष्ट होजानेसे वह विपम को भी (-असमानजातिके पदार्थो को भो) प्रकाशित करता है । अथवा, अनिविस्तारसे पूरा पड़े (कुछ लाभ नहीं) ? जिनका अनिवार (रोका न जा सके ऐसा अमर्यादित) फैलाव है ऐसा प्रकाशमान होने क्षायिक ज्ञान अवश्यमेव सर्वदा सर्वत्र सर्वथा सर्व को जानना है । भावार्थ :- वामपूर्वक जानना, नियत आत्मप्रवेगाने ही जानना. अमुकलो ही जानना - इत्यादि मर्यादायें मति -श्रुतादि क्षायोपणमिक शानमें ही नभय । क्षाधिका- जानके अमर्यादित होनेने एक ही नाथ सर्व आत्मप्रदेशोंने नीनों कादही पर्याय साथ सर्व पदार्थोको - उन पदाकि अनेक प्रकारले और किम जानिहोनी- जानता है अर्थात् योयलमान एक ही समय में सर्व आत्मप्रवेशोंने समान दोन काल भावको जानता || ८७ ।। अब, ना निश्चित करते है कि जो सदको नहीं जानता ही भीती - जानता :- ८४ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान - अथ सर्वमजाननेकमपि न जानातीति निश्चिनोति जो ण विजाणदि जुगवं अत्थे तिक्कालिगे तिहुवणत्थे । णादं तस्स ण सक्कं सपज्जयं दत्वमेगं वा ॥४८॥ यो न विजानाति युगपदर्थान् त्रैकालिकान् त्रिभुवनस्थान् । ज्ञातु तस्य न शक्यं सपर्ययं द्रव्यमेकं वा ॥४८ ।। इह फिलंकमाकाशद्रव्यमेकं धर्मद्रव्यमेकमधर्मद्रव्यमसंख्येयानि कालद्रव्याण्यनन्तानि जीवद्रव्याणि । ततोऽप्यनन्तगुणानि पुद्गलद्रव्याणि । तथैषामेव प्रत्येकमतीतानागतानुभू- यमानभेदभिन्ननिरवधिवृत्तिप्रवाहपरिपातिनोऽनन्ताः पर्यायाः। एवमेतत्समस्तमपि समुदितं जो पविजापदि यः कर्ता नैव जानाति । कथम् । जुगवं युगपदेकक्षणे । कान् । अत्ये अर्थान् । कथं- मृतान् । तिपकालिगे विकालपर्यायपरिणतान् । पुनरपि कथंभूतान् । तिहुवणत्थे त्रिभुवनस्थान् । पादं तस्स ण सक्कं तस्य पुरुषस्य सम्बन्धि ज्ञानं ज्ञातुं समर्थ न भवति । किम् । दव्वं ज्ञेयद्रव्यम् । वियिजिप्टम् । सपज्जयं अनन्तपर्यायसहितम् । कतिसंख्योपेतम् । एगं वा एकमपीति । तथा हि- आमाजद्रव्यं तायदेक, धर्मद्रव्यमेकं, तथैवाधर्मद्रव्यं च लोकाकाशप्रमितासंख्येयकालद्रव्याणि, ततोऽनन्त- गुणानि जीवद्रव्याणि, तेन्योऽप्यनन्तगुणानि पुद्गलद्रव्याणि । तथैव सर्वेपां प्रत्येकमनन्तपर्यायाः, गलमयं यं ताबननेक विवक्षितं जीवद्रव्यं ज्ञातृ भवति । एवं तावद्वस्तुस्वभावः । तत्र तथा दहनः समान मान मन नमस्तदाताहेतुकसमस्तदाह्याकारपर्यायपरिणतसकलैकदहनस्वरूपमुष्णपरिणत- गावागारमामान (न्यीयस्यभायं) परिणमति, तथायमात्मा समस्तं ज्ञेयं जानन् सन् समस्त- . गाथा ४८ अन्वयार्थ :- [यः] जो [ युगपद्] एकही साथ [त्रैकालिकान त्रिभुवनस्थान] मार गिभुवनन्ध (-तीनों कालके और तीनों लोकके) [अर्थान] पदार्थोको [न दिजानाति ] नही जानता, [तस्य ] उसे [सपर्ययं] पर्याय सहित [एक द्रव्यं वा] एक भी {ज्ञातु न गयं] जानना शक्य नहीं है । टोमा:- हम विश्वमें एक. आकागद्रव्य, एक धर्मद्रव्य, एक अधर्मद्रव्य, असंख्य ना कर अनन्त जीवद्रव्य तथा उनमे भो अनन्तगुने पुद्गल द्रव्य हैं, और उन्हीं के न नगन और वर्तमान ने (तीन) प्रकारोंसे भेदवाली 'निरवधि जा नदि युगपद् विकालिक त्रिभुवनस्थ पदार्थ ने । देने पर एक पण नहि द्रव्य जाणवु शक्य छ । ४८ ।।

जैन शास्त्रमाला] - ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ज्ञेयम् । इहैवैकं किंचिज्जीवद्रव्यं ज्ञातृ । अथ यथा समस्तं दाह्य दहन दहनः समस्तदाह्य- हेतुकसमस्तदाह्याकारपर्यायपरिणतसकलैकदहनाकारमात्मानं परिणमति, तथा समस्तं ज्ञेयं जानन् ज्ञाता समस्तज्ञेयहेतुकसमस्तज्ञेयाकारपर्यायपरिणतसकलैकज्ञानाकारं चेतनत्वात् स्वानुभवप्रत्यक्षमात्मानं परिणमति । एवं किल द्रव्यस्वभावः । यस्तु समस्तं ज्ञेयं न जानाति स समस्तं दाह्यमदहन समस्तदाहहेतुकसमस्तदाह्याकारपर्यायपरिणतसकलैकदहनाकार- यहेतुकसमस्तनेयाकारपर्यायपरिणतसकलैकाखण्डनानरूपं स्वकीयमात्मानं परिणति जानाति परिच्छिनत्ति । यथैव च स एव दहनः पूर्वोक्तलक्षणं दाह्यमदहन सन् तदाकारेण न परिणमति, तथाऽमापि पूर्वोक्तलक्षणं समस्तं नेयमजानन् पूर्वोक्तलक्षणमेव सकलंकाखण्डनानाकार स्वकीय- मात्मानं न परिणमति न जानाति न परिच्छिनत्ति । अपरमप्युदाहरणं दीयते - यथा कोऽप्यन्धक आदित्यप्रकाश्यान् पदार्थानपश्यन्नादित्यमिव, प्रदीपप्रकाश्यान् पदार्थानपश्यन् प्रदीपमिव, दर्पणस्थ- 'वृत्तिप्रवाहके भीतर पड़ने वाली (समा जानेवाली) अनन्त पर्यायें हैं। इसप्रकार यह समस्त (द्रव्यों और पर्यायोंका) समुदाय ज्ञेय है । उसीमें एक कोई भी जीवद्रव्य जाता है । अव यहाँ, जैसे समस्त दाह्यको दहकती हुई अग्नि समस्त-दाह्यहेतुक (-समस्त दाह्य जिसका निमित्त है ऐसा) समस्तदाह्याकारपर्यायल्प परिणमित सकल एक 'दहन जिसका आकार (स्वरूप) है ऐसे अपने रूपमें (-अग्निरूपमें) परिणमित होती है, वैसे ही समस्त शेयको जानता हुआ जाता (-आत्मा) समस्तजेयहेतुक समस्तजेयाकारपर्याय- रूप परिणमित सकल एक ज्ञान जिसका आकार (स्वरूप) है ऐसे निजरूपसे-जो चेतनताके कारण स्वानुभवप्रत्यक्ष है उस-रूप - परिणमित होता है । इसप्रकार वास्तवमें द्रव्यका स्वभाव है । किन्तु जो समस्त नेयको नहीं जानता वह (आत्मा), जैसे समस्त दायको न दहती हुई अग्नि समस्तदायहेतुक समन्तदायाकाग्पर्यायल्प परिणमित सकल एक दहन जिसका आकार है ऐसे अपने रूपमें परिणमित नहीं होता उसी प्रकार, समन्तीयहेतुक समस्तजेयाकारपर्यायरूप परिणमित सकल एक जान जिसका आकार है ऐने अपने रूपमें - स्वयं चेतनतावे कारण स्वानुभव प्रत्यक्ष होने पर भी - परिणमित नहीं होता, (अपनेवो परिपूर्णतया अनुभव नहीं करता - नही जानता) मप्रकार यह फलित होता है कि जो सबको नहीं जानता वह अपनेयो (-आमारो) नही जानता । भावार्थ :- जो अग्नि काप्ठ, तृण, पत्ते त्यादि ममन्द दादानों को नही जलाता, उसका दहनस्वभाव (वाप्यादियः नमन्त दात्य जिला निमित है मा) पनि पान यनमा: उत्पाद - merअस्तित्व, परित। राधान् = साता परिपूर जलाना, दाना।

--प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान मात्मानं दहन इव समस्तज्ञेयहेतुकसमस्तज्ञेयाकारपर्यायपरिणतसफलैकज्ञानाकारमात्मानं चेतनत्वात् स्वानुभवप्रत्यक्षत्वेऽपि न परिणमति । एवमेतदायाति यः सर्व न जानाति स आत्मानं न जानाति ॥४८॥ अर्थकमजानन सर्व न जानातीति निश्चिनोति- दवं अणंतपज्जयसेगमणंताणि दव्वजादाणि । ण विजाणदि जदि जुगवं किध सो सव्वाणि जाणादि ॥ ४६॥ द्रव्यमनन्तपर्यायमेकमनन्तानि द्रव्यजातानि । न विजानाति यदि युगपत् कथं स सर्वाणि जानाति ॥ ४६ ।। विम्बान्यपश्यन् दर्पणमिव, स्वकीयदृष्टिप्रकाश्यान् पदार्थानपश्यन् हस्तपादाद्यवयवपरिणतं स्वकीय- देहाकारमात्मानं स्वकीयदृष्ट्या न पश्यति, तथायं विवक्षितात्मापि केवलज्ञानप्रकाश्या पदार्थान- जानन् सकलाखण्डैककेवलज्ञानरूपमात्मानमपि न जानाति । तत एतत्स्थितं यः सर्व न जानाति स आत्मानमपि न जानातीति ॥ ४८ ।। अथैकमजानन् सर्व न जानातीति निश्चिनोति - दव्वं द्रव्यं अणंतपज्जयं अनन्तपर्यायं एग एक अणंताणि दव्वजादीणि अनन्तानि द्रव्यजातीनि जो ण विजाणदि समस्तदाह्याकारपर्यायरूप परिणमित न होनेसे अपूर्णरूपसे परिणमित होता है - परिपूर्णरूपसे परिणमित नहीं होता, इसलिये परिपूर्ण एक दहन जिसका स्वरूप है ऐसी वह अग्नि अपने रूप ही पूर्ण रीतिसे परिणमित नहीं होती; उसी प्रकार यह आत्मा समस्त द्रव्य-पर्यायरूप समस्तज्ञेयको नहीं जानता, उसका ज्ञान (समस्त ज्ञेय जिसका निमित्त है ऐसे) समस्तज्ञेयाकारपर्यायरूप परिणमित न होनेसे अपूर्णरूपसे परिणमित होता है - परिपूर्ण रूपसे परिणमित नहीं होता, इसलिये परिपूर्ण एक ज्ञान जिसका स्वरूप है ऐसा वह आत्मा अपने रूपसे ही पूर्ण रीतिसे परिणमित नहीं होता अर्थात् निजको ही पूर्णरीतिसे अनुभव नहीं करता - नहीं जानता । इसप्रकार सिद्ध हुआ कि जो सवको नहीं जानता वह एकको - अपनेको (पूर्ण रीतिसे) नहीं जानता ।। ४८ ।। अब, ऐमा निश्चित करते हैं कि एकको न जाननेवाला सवको नहीं जानता :- गाथा ४९ अन्वयार्थ :- [यदि] यदि [अनन्तपर्यायं] अनन्त पर्यायवाले [एक द्रव्यं] एक जो एक द्रव्य अनन्तपर्यय तेम द्रव्य अनन्तने । युगपद न जाणे जीव, तो ते केम जाणे सर्वने ? ॥ ४६।।

जन शास्त्रमाला -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- आत्मा हि तावत्स्वयं ज्ञानमयत्वे सति ज्ञातृत्वात् ज्ञानमेव । ज्ञानं तु प्रत्यात्मवति प्रतिभासमयं महासामान्यम् । तत्त प्रतिभासमयानन्तविशेषव्यापि । ते च सर्वद्रव्यपर्याय- निबंधनाः । अथ यः सर्वद्रव्यपर्यायनिवन्धनानन्तविशेषव्यापिप्रतिभासमयमहासामान्य- रूपमात्मानं स्वानुभवप्रत्यक्षं न करोति स कथं प्रतिभासमयमहासामान्यव्याप्यप्रतिभा- यो न विजानाति अनन्तद्रव्यसमूहान् किध सो सव्वाणि जाणादि कथं स सर्वान् जानाति जुगवं युगपदेकसमये, न कथमपीति । तथा हि - आत्मलक्षणं तावज्जानं तच्चाखण्डप्रतिभासमयं सर्वजीव- साधारणं महासामान्यम् । तच महासामान्य ज्ञानमयानन्तविशेषव्यापि । ते व ज्ञानविणेपा अनन्त- द्रव्यपर्यायाणां विषयभूतानां नेयभूतानां परिच्छेदका ग्राहकाः । अखण्डकप्रतिभासमयं यन्महासामान्य तत्स्वभावमात्मानं योऽसी प्रत्यक्षं न जानाति स पुरुषः प्रतिभासमयेन महासामान्येन ये व्याप्ता अनन्त- ज्ञानविषपान्तेषां विषयभूताः येऽनन्तद्रव्यपर्यायास्तान् कथं जानाति, न कथमपि । अथ एतदायातम् यः आत्मानं न जानाति स सर्व न जानातीति । तथा चोक्तम् -- "एको भावः सर्वभावस्वभायः सर्वे भावा एकभावस्वभावाः । एको भावस्तत्त्वतो येन बुद्धः सर्व भावास्तत्त्वतस्तेन वुद्राः ।।" अत्राह शिव:- आत्मपन्जिाने सति सर्वपरिज्ञानं भवतीत्यत्र व्याख्यातं, तत्र तु पूर्वसूत्रे भणितं सर्वपरिजाने द्रव्यको (-आत्मद्रव्यको) [अनन्तानि द्रव्यजातानि] तथा अनन्त द्रव्यसमूहको [युगपद् ] एक ही साथ [न विजानाति] नहीं जानता [सः] तो वह पुल्प [सर्वाणि] सब को (-अनन्त द्रव्यसमूह को) [कथं जानाति] कैसे जान सकेगा? (अर्थात् जो आत्म- द्रव्यको नहीं जानता हो वह समस्त द्रव्यसमूहको नहीं जान सकता) । प्रकारान्तरले अन्वयार्थ :- [यदि] यदि [अनन्तपर्यायं] अनन्त पर्यायवाले [एक द्रव्यं ] एक द्रव्यको (-आत्मद्रव्यको) [न विजानाति] नहीं जानता [सः] तो वह पुरुष [युगपद्] एक ही साथ [सर्वाणि अनन्तानि द्रव्यजातानि] सर्व अनन्त द्रव्य-समूहको [कथं जानाति] कसे जान सकेगा ? टीका :- प्रथम तो आत्मा वाग्नवमं स्वयं ज्ञानमय होनेने मातृत्व कारण मान ही है; और ज्ञान प्रत्येक आत्मामें वर्तता (-ता) हुआ प्रनिभानमय मानामान्य है। वह प्रतिभासमय महासामान्य प्रतिभानमय अनन्त विशेषोंने समान होनेवाला; और उन विणेपोंके (-भेदोंके) निमित्त सर्व द्रव्यपर्याय । अबको पुरण नवं पर्याय जिनके निमित्त है, ऐसे अनन्त विपोंमें व्याप्त होनेवाले प्रतिमानमः मामामा आमाका स्वानुभव प्रत्यक्ष नहीं करता, वह (पुराप) प्रतिमानमा महामानव द्वार 'न्याय (-व्याप्य होने योग्य) जो प्रतिभासमय अनन्त विप है उनी निमितभन चं म नामान्य माप और मार दिया । - ८८ . ? { MT समयानन्तविशेषनिबन्धनभूतसर्वव्यापार Hi न जानाति स सर्व न जानाति । अन्य सर्वज्ञानात्माननाममाना। एवं च सति ज्ञानमयत्वेन स्वसंचेत रुत्वादात्मनो जातको गाने frier- भासप्रतिभास्यमानयोः स्वस्यामवल्मायामयोगसंगलकामनामनामां- मात्मनि निखातमिव प्रतिभाति । योयं न स्यात् तना जाना परिपूतिमायतनामागार परिपूर्णस्यैकस्यात्मनोऽपि ज्ञानं न सिद्धयेत् ॥४६॥ सत्यात्मपरिजानं भवतीति । यधेर ताना.. "MITr आत्मपरिजानाभावे चात्मभावनाक, तभाने नमानो.:-:- प्रमाणभूतश्रुतज्ञानेन सर्वपदार्था जायन्ते । समिति मेोsi HTTER छद्मस्थानामपि विद्यते, तच्च व्याप्तिमान पालनानतिमा माने। अथवा स्वसंवेदनज्ञानेनात्मा ज्ञायते, ततभा भावना निरो, गाHिTETोन- ज्ञानभावनया केवलनानं च जायते । इति नास्ति दोर: ।। १६ } TT THII गांजो न द्रव्यपर्यायोंको कैसे प्रत्यक्ष कर सकेगा ? (नहीं कर सकेगा) दारोगा फलित हुआ कि जो आत्माको नहीं जानता वह सबको नहीं जानता। अब इससे ऐसा निश्चित होता है कि सर्वके ज्ञानरो आत्माका ज्ञान और आत्माले ज्ञानसे सर्वका ज्ञान (होता है); और ऐसा होनेसे, आत्मा ज्ञानगमताके कारण स्वसंचेतक होनेसे, ज्ञाता और शेयका वस्तुरूपसे अन्यत्व होनेपर भी प्रतिभास और प्रतिभास्यमानकर अपनी अवस्थामें अन्योन्य मिलन होनेके कारण (ज्ञान और शेय, आत्माकी -ज्ञानकी अवस्थामें परस्पर मिश्रित - एकमेकरूप होनेसे) उन्हें भिन्न करना अत्यन्त अशक्य होनेसे मानो सब कुछ आत्मामें 'निखात (प्रविष्ट) होगया हो इसप्रकार प्रतिभासित होता है - ज्ञात होता है । (आत्मा ज्ञानमय होनेसे वह अपनेको अनुभव करता है - जानता है, और अपनेको जाननेपर समस्त ज्ञेय ऐसे ज्ञात होते हैं मानों वे ज्ञानमें स्थित ही हों, क्योंकि ज्ञानको अवस्थामेंसे ज्ञेयाकारोंको भिन्न करना अशक्य है ।) यदि ऐसा न हो तो (यदि आत्मा सबको न जानता हो तो) ज्ञानके परिपूर्ण आत्मसंचेतनका अभाव होनेसे परिपूर्ण एक आत्माका भी ज्ञान सिद्ध न हो । भावार्थ :- ४८ और ४६ वीं गाथामें ऐसा बताया गया है कि जो सबको नहीं जानता वह अपनेको नहीं जानता, और जो अपनेको नहीं जानता वह सबको नहीं जानता । अपना ज्ञान और सबका ज्ञान एक साथ ही होता है। स्वयं और सर्व इन दोमेंसे एकका ज्ञान हो और दूसरेका न हो यह असम्भव है । १ निखात खोदकर भीतर गहरा उतर गया हुवा; भीतर प्रविष्ट हुआ।

-ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- - जैन शास्त्रमाला ८९ अथ क्रमकृतप्रवृत्त्या ज्ञानस्य सर्वगतत्वं न सिद्धयतीति निश्चिनोति उप्पज्जदि जदि णाणं कमसो अछे पडुच्च णाणिस्स । तं व हवदि णिच्चं ण खाइगं व सव्वगदं ॥ ५० ॥ उत्पद्यते यदि ज्ञानं क्रमशोऽर्थान् प्रतीत्य ज्ञानिनः । तन्नव भवति नित्यं न क्षायिकं नैव सर्वगतम् ॥ ५० ॥ भवतीति व्यवस्थापयति - उप्पज्जदिदि गाणं उत्पद्यते ज्ञानं यदि चेत् । कमसो क्रमशः सकाशात् । किं कृत्वा । मळे पडुच्च नेयार्थानाधित्य । कस्य । पाणिस्स जानिनः आत्मनः तं व हदि पिच्चं उत्पत्तिनिमित्तभूतपदाधविनाये तस्यापि विनाश इति नित्यं न भवति । ण खाइगं जानावरणीयकर्म- धयोपशमाधीनत्वात् भाविकमपि न भवति । णेव सबगदं यत एव पूर्वोक्तप्रकारेण पराधीनत्वेन नित्यं न भवति, अयोपणमाधीनत्वेन भायिकं च न भवति, तत एव युगपत्समस्तद्रव्यक्षेत्रकालभावानां यह कथन एकदेश जानकी अपेक्षासे नहीं किन्तु पूर्णजानकी (केवलज्ञानकी) अपेक्षासे है।। ४६ ।। अब, ऐसा निश्चित करते हैं कि क्रमशः प्रवर्तमान जानकी सर्वगतता सिद्ध नहीं होती : गाथा ५० अन्वयार्थ :- [यदि] यदि [जानिनः ज्ञानं] आत्माका जान [क्रमशः] क्रमशः [अर्थान् प्रतीत्य] पदार्थोका अवलम्बन लेकर [उत्पद्यते] उत्पन्न होता हो [तत्] तो वह (नान) [न एव नित्यं भवति] नित्य नहीं है, [न क्षापिकं] क्षायिक नहीं है, [न एव सर्वगतम्] और सर्वगत नहीं है । टोका जो ज्ञान प्रमश: एक एका पदाका अवलन्दन लेकर प्रकृति करना है वह (ज्ञान) एक पदार्थके अवलम्बनले उत्पन्न होकर दूसरे मामले अबलम्बनगे नाट होजानेसे नित्य नहीं होता तथा कार्मोदयके कारण एकः पकिती प्रान कर फिर अन्य व्यक्तिको प्राप्त करता है इसलिये हाधिक भी न गवा , अगन्ना- क्षेत्र-काल-भावको प्राप्त होने में (-जागने में ) असमर्प ने पाना मगन नही। - [ यनि-प्रगटता; दिद, मेर। जो मान 'ज्ञानी' नु उपजे प्रामगः अाप अबकी। तो नित्य नाहि, क्षाधिक नहि ने गर्दगत नहि जान ।। ५.० ।।

६०
-प्रवचनसार--
-
भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
यत्किल क्रमेणैकैकमर्थमालम्ब्य प्रवर्तते ज्ञानं तदेकार्थालम्बनादुत्पन्नमन्यार्थालम्बनात्
प्रलीयमानं नित्यमसत्तथा कर्मोदयादेका व्यक्ति प्रतिपन्नं पुनर्व्यक्त्यन्तरं प्रतिपद्यमानं
क्षायिकमप्यसदनन्तद्रव्यक्षेत्रकालभावानाक्रान्तुमशक्तत्वात् सर्वगतं न स्यात् ॥ ५० ॥
अथ योगपद्यप्रवृत्त्यैव ज्ञानस्य सर्वगतत्वं सिद्धयतीति व्यवतिष्ठते
तिक्कालणिच्चविसमं सपलं सव्वत्थसंभवं चित्तं ।
जुगवं जाणदि जोण्हं अहो हि णाणस्स माहप्पं ॥५१॥
त्रैकाल्यनित्यविषमं सकलं सर्वत्रसंभवं चित्रम् ।
युगपज्जानाति जैनमहो हि ज्ञानस्य माहात्म्यम् ॥ ५१ ॥
परिज्ञानमामाभावात्सर्वगतं न भवति । अत एतत्स्थितं यद्ज्ञानं क्रमेणार्थान् प्रतीत्य जायते तेन
नवंजो न भवति इति ।। ५० ।। अथ युगपत्परिच्छित्तिरूपज्ञानेनैव सर्वज्ञो भवतीत्यावेदयति – जाणदि
जानाति । किं कर्तृ । जोण्हं जैनज्ञानम् । कथम् । जुगवं युगपदेकसमये । अहो हि णाणस्स माहप्पं
अहो हि स्फुटं जैननानस्य माहात्म्यं पश्यताम् । किं जानाति । अर्थमित्यध्याहारः । कथंभूतम् ।
तियकालपिच्चविसयं त्रिकाल-विषयं त्रिकालगतं नित्यं सर्वकालम् । पुनरपि किविशिष्टम् । सयलं
ममत्तम् । पुनरपि कयंभूतम् । सम्वत्य संभवं सर्वत्र लोके संभवं समुत्पन्न स्थितम् । पुनश्च किरूपम् ।
भावार्थ :- क्रमशः प्रवर्तमान ज्ञान अनित्य है, क्षायोपशमिक है; ऐसा क्रमिक
मानवाला पुरुष सर्वन नहीं हो सकता ।। ५० ।।
अब ऐसा निश्चित होता है कि युगपत् प्रवृत्तिके द्वारा ही ज्ञानका सर्वगतत्व सिद्ध
Pram(अर्थात् अक्रमने प्रवर्तमान ज्ञान ही सर्वगत हो सकता है) :-
गाथा ५१
अग्नवार्य :- [काल्यनित्यविषम तीनों कालमें सदा विषम (असमान
आदित). [गर्वत्र संभवं] गर्व क्षेत्रके [चित्रं] अनेक प्रकारके [सकलं] समस्त पदार्थोंको
[जन] निदेवका ज्ञान [युगपत् जानाति] एक साथ जानता है [अहो हि] अहो !
[जाना माहात्म्यम् ] मानका माहात्म्य !
होगा :- वास्तबमें क्षायिक जानका, सर्वोत्कृष्टताका स्थानभूत परम माहात्म्य है।
समान एक मायही नमस्त पदार्थोका अवलम्बन लेकर प्रवृत्ति करता है वह
निये नियम, विविध, सकल पदार्थगण सर्वत्रनो।
जिनजान लागे युगपदे,महिमा अहो ए ज्ञाननो ! ॥५१॥

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ६१ जैन शास्त्रमाला] क्षायिकं हि ज्ञानमतिशयास्पदीभूतपरममाहात्म्यं । यत्त युगपदेव सर्वार्थानालम्ब्य प्रवर्तते ज्ञानं तट्टकोत्कीर्णन्यायावस्थितसमस्तवस्तुज्ञेयाकारतयाधिरोपितनित्यत्वं प्रतिपन्न- समस्तव्यक्तित्वेनाभिव्यक्तस्वभावभासिक्षायिकभावं त्रैकाल्येन नित्यमेव विषमीकृतां सकलामपि सर्वार्थसंभूतिमनन्तजातिप्रापितवैचित्र्यां परिच्छिन्ददक्रमसमाक्रान्तानन्तद्रव्य- क्षेत्रकालभावतया प्रकटीकृताद्भुतमाहात्म्यं सर्वगतमेव स्यात् ।। ५१ ॥ अथ ज्ञानिनो ज्ञप्तिक्रियासद्भावेऽपि क्रियाफलभूतं वन्धं प्रतिषेधयन्तुपसंहरति ण वि परिणमदि ण गेण्हदि उप्पज्जदि णेव तेसु अछेसु । जाणग्णवि ते आदा अबंधगो तेण पण्णत्तो ॥५२॥ चित्तं नानाजातिभेदेन विचित्रमिति । तथा हि - युगपत्मकलग्राहकमानेन सर्वनो भवतीति ज्ञात्वा कि कर्तव्यम् । ज्योतिष्कमन्त्रवादरससियादीनियानिखण्डविज्ञानानि मूडजीवानां वित्तवमत्कारकारणानि परमात्मभावनाविनाशकानि च तत्राग्रहं त्यक्त्वा जगत्त्रयकालत्रयसकलवस्तुयुगपत्प्रकाशकमविनश्वर- मखण्डकप्रतिभासरूपं सर्वनशब्दवाच्यं यत्केवलनानं तस्यवोत्पत्तिकारणभूतं यत्समस्तरागादिविकल्प- जालेन रहितं सहजशुद्धात्मनोऽभेदनानं तत्र भावना कर्तव्या, इति तात्पर्यम् ।। ५१ ।। एवं केवल- जान - अपने में समस्त वस्तुओंके नेयाकार 'टंकोत्कीर्ण - न्यायसे स्थित होनेसे जिसने नित्यत्व प्राप्त किया है और समस्त व्यक्तिको प्राप्त कर लेनेसे जिसने स्वभावप्रकाशक भाविकभाव प्रगट किया है ऐसा-त्रिकालमें सदा विपम रहनेवाले (-असमान जातिरूपले परिणमित होनेवाले) और अनन्त प्रकारोंके कारण विचित्रताको प्राप्त सम्पूर्ण सर्व पदार्थोके समूहको जानता हुआ, अक्रमसे अनन्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावको प्राप्त होनेने जिसने अद्भुत माहात्म्य प्रगट किया है ऐसा नवंगत ही है। भावार्थ :- अनमसे प्रवर्तमान जान एका मेयने के प्रति नही दालना लिये नित्य है, अपनी समस्त शत्तियोंके प्रगट हो जाने वापिका ने अमिरमानवाला पुरुप ही सर्वज हो सकता है । सर्वत्रके इस गानका कोई परम जान मार ॥५॥ अब, ज्ञानीके (-बोवलगानी आत्मावः) क्षित्रियामा मदनापरी मां. त्रियावे फालरूप बन्धना निषेध करने गए उपकार करो याद करानी आत्माये जाननेकी प्रिया होने पर भी दन्ध नीना, माया पूर्ण करते हैं) बोलायम नमामि उत्तररातिकोमि ।

६४
[भगवान श्रीन्यान्य-कह
अथ ज्ञानादभिशस्य सौल्यस्य स्वरूप प्रपञ्जयन ज्ञानसीरपयोः हेयोपादेयत्वं चिन
यत्ति-
अस्थि अनुत्तं सत्तं अदिदियं इंदियं च अत्थेसु ।
गाणं च तहा सोक्खं ते परं च तं णेयं ॥ ५३॥
अस्त्यमूर्त मूर्तमतीन्द्रियमन्द्रियं चार्थेषु ।
ज्ञानं च तथा सौख्यं यत्तषु परं च तत् ज्ञेयम् ।। ५३ ।।
एवं रागद्वेषमोहरहितत्वात्लेवलिनां बन्धो नास्तीति गन्थनरूपेण ज्ञानप्रपञ्नसमाप्तिमुख्यत्वेन
चैकसूत्रेणाष्टमस्थलं गतम् ।
अथ ज्ञानप्रपञ्चव्याख्यानानन्तरं ज्ञानाधारसर्वनं नमस्कारोति
तस्स णमाई लोगो देवासुरमणुअरायसंबंधो।
भत्तो करेदि णिच्चं उवजुत्तो तं तहा वि अहं ।। ६२ ॥
करेदि करोति । स कः । लोगो लोकः । कथंभूतः । देवासुरमणुअरायसंबंधो देवासुरमनुष्यराज-
संबन्धः । पुनरपि कथंभूतः । भत्तो भक्तः । णिचं नित्यं सर्वकालम् । पुनरपि किंविशिष्ट: । उवजुत्तो
उपयुक्त उद्यतः । इत्थंभूतो लोकः कां करोति । णमाइं नमस्यां नमस्क्रियाम् । कस्य । तस्स तस्य
पूर्वोक्तसर्वज्ञस्य । तं तहा वि अहं तं सर्वशं तथा तेनैव प्रकारेणामपि ग्रन्थकर्ता नमस्करोमीति ।
अयमत्रार्थः- यथा देवेन्द्रचक्रवर्त्यादयोऽनन्ताक्षयसुखादिगुणास्पदं सर्वज्ञस्वरूपं नमस्कुर्वन्ति, तथैवाह-
मपि तत्पदाभिलापी परमभक्त्या प्रणमामि ।।१२।। एवमप्टाभिः स्थलात्रिंशद्गाथास्तदनन्तरं
(अव, पूर्वोक्त आशयको काव्यद्वारा कहकर, केवलज्ञानी आत्माकी महिमा
बताकर यह ज्ञान-अधिकार पूर्ण किया जाता है ।)
अर्थ :- जिसने कर्मोको छेद डाला है ऐसा यह आत्मा भूत, भविष्यत और
वर्तमान समस्त विश्वको (अर्थात् तीनों कालकी पर्यायोंसे युक्त समस्त पदार्थोंको) एक
ही साथ जानता हुआ भी मोहके अभावके कारण पररूप परिणमित नहीं होता, इसलिये
अब, जिसके समस्त ज्ञेयाकारोंको अत्यन्त विकसित ज्ञप्तिके विस्तारसे स्वयं पी गया है
ऐसे तीनोंलोकके पदार्थोंको पृथक् और अपृथक् प्रकाशित करता हुआ वह ज्ञानमूर्ति मुक्त
ही रहता है।
इसप्रकार ज्ञान - अधिकार समाप्त हुआ।
अर्थोनु ज्ञान अमूर्त, मूर्त, अतीन्द्रिय ने ऐन्द्रिय छ ।
के सुखपण एकुंज, त्यां परधान जे ते ग्राह्य छे ॥ ५३॥

-ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- १५ जैन शास्त्रमाला अत्र ज्ञानं सौख्यं च मूर्तमिन्द्रियजं चैकमस्ति । इतरदमूर्तमतीन्द्रियं चास्ति । तत्र यदमूर्तमतीन्द्रियं च तत्प्रधानत्वादुपादेयत्वेन ज्ञातव्यम् । तत्राद्य मूर्ताभिः क्षायोपशमिकी- भिरुपयोगशक्तिभिस्तथाविधेभ्य इन्द्रियेभ्यः समुत्पद्यमानं परायत्तत्वात् कादाचित्कं, क्रम- कृतप्रवृत्ति सप्रतिपक्षं सहानिवृद्धि च गौणमिति कृत्वा ज्ञानं च सौख्यं च हेयम् । इतर- नमस्कारगाथा चेति समुदायेन त्रयस्त्रिशसूत्रनिप्रपञ्चनामा तृतीयोऽन्तराधिकारः समाप्तः । अथ मुखप्रपञ्चाभिधानान्तराधिकारेप्टादश गाथा भवन्ति । अत्र पञ्चस्थलानि, तेपु प्रथमस्थले 'अत्यि अमुत्त' इत्याधिकारगाथासूत्रमेकं, तदनन्तरमतीन्द्रियज्ञानमुन्यत्वेन 'जं पेच्छदो' इत्यादि सूत्रमेकं, अथेन्द्रियज्ञानमुख्यत्वेन 'जीवो सयं अमुत्तो' इत्यादि गाथाचतुष्टयं, तदनन्तरमतीन्द्रियमुखमुख्यतया 'जादं सयं' इत्यादि गाथाचतुष्टयं. अथानन्तरमिन्द्रियसुखप्रतिपादनरूपेण गाथाष्टकम्, तत्राप्यष्टकमध्ये प्रथमत इन्द्रियनुखस्य दुःवत्वस्थापनार्थ 'मणासुरा' इत्यादि गाथायं, अथ मुक्तात्मनां देहाभावेऽपि मुखमन्तोति नापनार्थ देहः मुन्वकारणं न भवतीति कथनरूपेण 'पप्पा इट्टे विसये' इत्यादि मूत्रद्वयं, नदनन्तरमिन्द्रियविषया अपि सुखकारणं न भवन्तीति कयनेन 'तिमिरहरा' इत्यादि गाथाद्वयम् , अतोऽपि सर्वजनमन्कारमुल्यत्वेन 'तेजोदिछि इत्यादि गाथायम् । एवं पञ्चमस्थले अन्तरस्थल चतुष्टयं भवतीति मुग्वप्रपञ्चाधिकारे समुदायपातनिका ।। अयातीन्द्रियमुवल्योपादेयभूतस्य स्वरूपं प्रपञ्चय- नतीन्द्रियनानमतीन्द्रियसुन्वं चोपादेव मिति, यत्पुनरिन्द्रिय नानं नुखं च तद्धेयमिति प्रतिपादनम्पेण अब, जानसे अभिन्न सुखका स्वरूप विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए ज्ञान और सुखकी हेवोपादेयताका (अर्थात् कौनसा जान तथा सुख हेय है और कौनसा उपादेय है वह) विचार करते हैं :- गाथा ५३ अन्वयार्थ :- [अर्थेषु ज्ञान] पदार्थ सम्बन्धी जान (अमूर्त मूर्त] अमूर्त या मूर्त, [अतीन्द्रियं ऐन्द्रियं च अस्ति] अतीन्द्रिय या ऐन्द्रिय होता है; [च तथा सीरयं] और इसीप्रकार (अमूर्त या मूर्त, अतीन्द्रिय या ऐन्द्रिय) सुन्न होता है। [तेगु न यत् पर] उसमें जो प्रधान उन्याप्ट है [तत् नेयं] यह उपादेयम्प जानना । टीका :- यहाँ, (ज्ञान तथा गुन्य दो प्रयागा : ) :नमा गुममा और 'न्द्रियज है; और दूसरा (भान नधा गुन्य) अमन नी । उगम जो अमूर्त और अतीन्द्रिय पार प्रधान होनेने जगायराना ! वा, पाला ज्ञान तथा गुन गुतंरप गेली धागा उस प्रकारकी हन्द्रियों का उत्पन्न होता हुआ पानीले . बियोगमा

[
[गान पोनाल-कहान
त्पुनरमूर्ताभिश्चतन्यानुविधायिनीभिरेकाफिनीभिरेयात्मपरिणाममक्तिभिस्तगावियेन्योऽती-
न्द्रियेभ्यः स्वाभाविकचिदाकारपरिणानेभ्यः समुत्पद्यमानमत्यन्तमात्मागत्तत्वान्नित्यं,
युगपत्कृतप्रवृत्ति निःप्रतिपक्षमहानिवृद्धि च मुख्यमिति कृत्वा ज्ञानं सौरयं तोपादेयम् ॥५३।
अथातीन्द्रियसौख्यसाधनीभूतमतीन्द्रियज्ञानमुपादेयमभिष्टौति -
जं पेच्छदो अमत्तं मुत्तेसु अदिदियं च पच्छण्णं ।
सयलं सगं च इदरं तं जाणं हदि पच्चक्खं ॥५४॥
प्रथमतस्तावदधिकारस्थलगाथया स्थलचतुष्टयं मूनयति - अत्यि अस्ति विद्यते । किं कर्तृ । णाणं
ज्ञानमिति भिन्नप्रक्रमो व्यवहितसम्बन्धः । किविशिष्टम् अमुतं मुत्तं अमूर्त मूर्त न । पुनरपि किवि-
शिष्टम् । अदिदियं इंदियं च यदमूर्त तदतीन्द्रियं मूर्त पुनरिन्द्रियजम् । इत्यंभूतं ज्ञानमस्ति । केपु
विपयेषु । अत्येसु ज्ञेयपदार्थेषु, तहा सोक्खं च तथैव जानबदमूर्तमतीन्द्रियं मूर्तमिन्द्रियजं च सुखमिति ।
जंतेसु परं च तं णेयं यत्तेषु पूर्वोक्तज्ञानसुखेपु मध्ये परमुत्कृष्टमतीन्द्रियं तदुपादेयमिति ज्ञातव्यम् ।
तदेव विवियते - अमूर्ताभिः क्षायिकीभिरतीन्द्रियाभिश्चिदानन्दकलक्षणाभिः शुद्धात्मशक्तिभिरुत्पन्नत्वा-
दतीन्द्रियज्ञानं सुखं चात्माधीनत्वेनाविनश्वरत्वादुपादेयमिति, पूर्वोक्तामूर्तशुद्धात्मशक्तिभ्यो विलक्षणाभिः
क्षायोपशमिकेन्द्रियशक्तिभिरुत्पन्नत्वादिन्द्रियजं ज्ञानं सुखं च परायत्तत्वेन विनश्वरत्वाद्धेयमिति
'प्रवृत्त होनेवाला, 'सप्रतिपक्ष और सहानिवृद्धि है इसलिये गौण है ऐसा समझकर
वह हेय है अर्थात् छोड़ने योग्य है; और दूसरा ज्ञान तथा सुख अमूर्तरूप ऐसी 'चैतन्यानु-
विधायी एकाकी आत्मपरिणामशक्तियोंसे तथाविध अतीन्द्रिय स्वाभाविक-चिदाकार-
परिणामोंके द्वारा उत्पन्न होता हुआ अत्यन्त आत्माधीन होनेसे नित्य युगपत् प्रवर्तमान,
निःप्रतिपक्ष और हानिवृद्धिसे रहित है, इसलिये मुख्य है, ऐसा समझकर वह (ज्ञान
और सुख) उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य है ।। ५३ ।।
अब, अतीन्द्रिय सुखका साधनभूत (-कारणरूप) अतीन्द्रिय ज्ञान उपादेय है
इसप्रकार उसकी प्रशंसा करते
२
मूर्तिक इन्द्रियज ज्ञान क्रमसे प्रवृत्त होता है; युगपत् नहीं होता; तथा मूर्तिक इन्द्रियज सुख भी क्रमशः होता है,
एक ही साथ सर्व इन्द्रियोंके द्वारा या सर्व प्रकारसे नहीं होता।
सप्रतिपक्ष प्रतिपक्ष - विरोधी सहित । (मूर्त इन्द्रियज ज्ञान अपने प्रतिपक्ष अज्ञानसहित ही होता है,
मूतं इन्द्रियज सुख उसके प्रतिपक्षभूत दुःख सहित ही होता है ।
महानिवृद्धि हानिवृद्धि सहित ।
४ चैतन्यानुविधायी-चैतन्यके अनुसार वर्तनेवाली; चैतन्यके अनुकूलरूपसे - विरुद्धरूपसे नहीं वर्तनेवाली।
और
देखे अमूर्तिक, मूर्तमांय अतीन्द्रिने प्रच्छन्नने ।
ते सर्वने पर के स्वकीयने, ज्ञान ते प्रत्यक्ष छे ॥ ५४॥

-जानतत्त्व-प्रज्ञापन- १७ जैन शास्त्रमाला] यत्प्रेक्षमाणस्यामूर्त मूर्तेष्वतीन्द्रियं च प्रच्छन्नम् । सकलं स्वकं च इतरत् तद्ज्ञानं भवति प्रत्यक्षम् ॥ ५४॥ अतीन्द्रियं हि ज्ञानं यदमूर्त यन्मूर्तेष्वप्यतीन्द्रियं यत्प्रच्छन्नं च तत्सकलं स्वपर- विकल्पांतःपाति प्रेक्षत एव । तस्य खल्वमूर्तेषु धर्माधर्मादिषु, मूर्तेष्वप्यतीन्द्रियेषु तात्पर्यम् ॥ ५३ 11 एवमधिकारगाथया प्रथमस्थनं गतम् । लय पूर्वोक्तमुपादेयभूतमतीन्द्रियनानं विशेषेण व्यक्तीकरोति - जं यदतीन्द्रियं ज्ञानं कर्तृ । पेच्छदो प्रेममाणपुरुषस्य जानाति । कि किम् । अमुत्तं अमूर्तमतीन्द्रियनिरूपरागसदानन्दकसुखस्वभावं यत्परमात्मद्रव्यं तत्प्रभृति समस्तामूर्तद्रव्य- समूह मुत्तेतु अदिदियं च मूषु पुद्गलद्रव्येषु यदतीन्द्रियं परमाण्वादि । पच्छणं कालाणुप्रभृतिद्रव्य- रूपेण प्रच्छन व्यवहितमन्तरितं. अलोकाकामप्रदेशप्रभृति क्षेत्रप्रच्छन्न, निर्विकारपरमानन्दैकमुखा- स्वादपरिणतिरूपपरमात्मनो वर्तमानसमयगतपरिणामास्तत्रभृतयो ये समस्तद्रव्याणां वर्तमानसमय- गतपरिणामास्ते कालप्रच्छन्नाः. तस्यैव परमात्मन: निरूपशुव्यवनपर्याय: पद्रव्याणां व घे यथासंभवं व्यवनपर्यायान्तेवन्तभूताः प्रतिसमयप्रवर्तमानपत्प्रकारप्रवृतिहानिरूपा अर्थपर्याया भावप्रच्छन्ना भण्यन्ते । सयलं तत्पूर्वोक्त समस्तं जेयं हिया भवति । कमिति चेत् । सगं च इदरं किमपि यथासंभवं स्वद्रव्यगनं इतरत्पन्नव्यगनं च। तदुभयं यतः कारणाजानाति तेन कारणेन तं गाथा ५४ अन्वयार्थ :- [प्रेक्षमाणस्य यत् ] देखनेवालेका जो ज्ञान [अमूर्त] अमूर्तको, [मूतपू] मूर्त पदार्थोमें भो [अतीन्द्रियं] अतीन्द्रियको, [च प्रच्छन्नं] लोर प्रच्छनको, [लकनं] इन सबको - [स्वकं च इतरत् ] स्व तथा परको-देखता है, [तद् ज्ञानं] वह नान [प्रत्यक्षं भवति] प्रत्यक्ष है। टीका :- जो अमूर्त है, जो मूर्त पदार्थो भी अतीन्द्रिय है, और जो 'प्रचत है. उन सबको - जो कि ग्ब और पर इन दो भाग नमा जाना है मे-अनन्दित मान अवन्य देवता है। अमूर्त धर्मास्तिकाय अनिकायमाति, नाम भी अतीन्द्रिय परमाणु इत्यादि, तप्रायमें प्रकार बालबाट । जो कान धर्मास्तिकाय बगा), क्षेत्र में प्राणीमातालमे प्रछन अमाम्प्रतिक (अतीत-अनागन) पनि नपा: 'अन्नलीन मुधम पर्याय है, उन सबका - जो जीप - उन वास्तव में उस अतीन्द्रिय धान यापन ; (का कीमान देवता) बमोकि पा. (अतीदिन भान) Fi; समाय ::::::::: गुनी *- म -प्रवचनसार- नाम अतस्त- - [भगवान भोमकुम कहान परमाण्वादिषु, द्रव्यप्रच्छन्नेषु कालादिषु, क्षेत्रप्रच्छन्नेवलोकालाशप्रदेशादिगु, कालप्रमा न्नेष्वसांप्रतिकपर्यायेषु, भावप्रच्छन्नेषु स्यूलपर्यायान्तीनसूक्ष्मपर्यायेषु सर्वेष्वपि स्वपर- व्यवस्थाव्यवस्थितेष्वस्ति द्रष्टुत्वं, प्रत्यक्षत्वात् । प्रत्यक्ष हि ज्ञानमुद्भिन्नानन्तशुद्धिसन्नि- धानमनादिसिद्धचैतन्यसामान्यसंबन्धमेकनेवामनामानमात्मानं प्रतिनियतमितरां सामग्री- ममृगयमाणमनन्तशक्तिसद्भावतोऽनन्ततामुपगतं दहनस्येव दाह्याकाराणां ज्ञानस्य ज्ञेया- काराणामनतिक्रमाचथोदितानुभावमनुभवत्तत् केन निवार्यत दुपादेयम् ॥ ५४॥ अथेन्द्रियसौख्यसाधनीभूतमिन्द्रियज्ञानं हेयं प्रणिन्दति जीवो सयं अमुत्तो मुत्तिगदो तेण मुत्तिणा मुत्तं । ओगेण्हित्ता जोग्गं जाणदि वा तं ण जाणादि ॥ ५५ ॥ णाणं तत्पूर्वोक्तज्ञानं हदि भवति । कथंभूतम् । पच्चक्खं प्रत्यक्षमिति । अवाह शिप्यः-ज्ञानप्रपञ्चा- धिकारः पूर्वमेव गतः; अस्मिन् सुखप्रपञ्चाधिकारे सुखमेव कथनीयमिति । परिहारमाह - यदतीन्द्रियं ज्ञानं पूर्व भणितं तदेवाभेदनयेन सुखं भवतीति ज्ञापनार्थ, अथवा ज्ञानस्य मुख्यवृत्त्या तत्र हेयोपादेय- चिन्ता नास्तीति ज्ञापनार्थ वा । एवमतीन्द्रियज्ञानमुपादेयमिति कथनमुख्यत्वेनैकगाथया द्वितीयस्थल गतम् ॥५४॥ अथ हेयभूतस्येन्द्रियसुखस्य कारणत्वादल्पविषयत्वाच्चेन्द्रियज्ञानं हेयमित्युपदिणति - प्रगट हुआ है, ऐसे चैतन्यसामान्यके साथ अनादिसिद्ध सम्बन्धवाले एक ही "अक्ष' नामक आत्माके प्रति जो नियत है (अर्थात् जो ज्ञान आत्माके साथ हो लगा हुआ है आत्माके द्वारा सीधा प्रवृत्ति करता है), जो (इन्द्रियादिक) अन्य सामग्रीको नहीं ढूंढता और जो अनन्तशक्तिके सद्भावके कारण अनन्तताको (-बेहदताको) प्राप्त है, ऐसे उस प्रत्यक्ष ज्ञानको-जैसे दाह्याकार दहनका अतिक्रमण नहीं करते उसीप्रकार ज्ञेयाकार ज्ञानका अतिक्रम (उल्लंघन) न करनेसे यथोक्त प्रभावका अनुभव करते हुए (-उपर्युक्त पदार्थोको जानते हुए) कौन रोक सकता है ? (अर्थात् कोई नहीं रोक सकता।) इसलिये वह (अतीन्द्रिय ज्ञान) उपादेय है ।। ५४ ।। अव, इन्द्रियसुखका साधनभूत (कारणरूप) इन्द्रियज्ञान हेय है - इसप्रकार उसको निन्दा करते हैं - - ? अक्षआत्माका नाम 'अक्ष' भी है । (इन्द्रियज्ञान अक्ष अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा जानता है; अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष मान अक्ष अर्थात् आरमाके द्वारा ही जानता है ।)

--- - ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- && - जैन शास्त्रमाला] जीवः स्वयममूर्तो मूर्तिगतस्तेन मूतन मूर्तम् । अवगृह्य योग्यं जानाति वा तन्न जानाति ॥ ५५ ॥ इन्द्रियज्ञानं हि मूर्तोपलम्भकं मूर्तोपलन्यं च । तद्वान् जीवः स्वयममूर्तोऽपि पंचेन्द्रि- यात्मकं शरीरं मूर्तमुपागतस्तेन ज्ञप्तिनिष्पत्ती बलाधाननिमित्ततयोपलम्भकेन मूर्तेन मूर्त स्पर्शादिप्रधानं वस्तूपलभ्यतामुपागतं योग्यमवगृह्य कदाचित्तदुपर्यु परि शुद्धिसंभवादव- गच्छति, कदाचित्तदसंभवान्नावगच्छति,परोक्षत्वात् । परोक्षं हि ज्ञानमतिदृढतराज्ञानतमो- ग्रन्थिगुण्ठनानिमीलितल्यानादिसिद्धचैतन्यसामान्यसंवन्धत्याप्यात्मनः स्वयं परिच्छेत्तु - मर्यमसमर्थस्योपात्तानुपात्तपरप्रत्ययसामग्रीमार्गणव्यग्रतयात्यंतविसंष्ठुलत्वमवलम्बमानमन- जोबो सयं अमुत्तो जीवस्तावच्छक्तिरूपेण शुद्धद्रव्याधिकनयेनामूर्तातीन्द्रियज्ञानसुखस्वभावः, पञ्चादना- विबन्धवमान् व्यवहान्नयेन मुत्तिगदो मूर्तशरीरगतो मूर्तशरीरपरिणतो भवति । तेण मुत्तिणा तेन मृतंगरीरेण मृतशरीराधारोत्पन्नमृतद्रव्येन्द्रियभावेन्द्रियाघारेण मुत्तं मूर्त वस्तु ओगेप्हित्ता अवग्रहादिकेन E गाथा ५५ अन्वयार्थ :- [स्वयं अमूर्तः] स्वयं अमूर्त ऐसा [जीवः] जीव [मूर्तिगतः] मूर्त शरीरको प्राप्त होता हुआ [तेन मूर्तेन] उस मूर्त शरीरके द्वारा [योग्यं मूर्त] योग्य मूतं पदार्थको [अवग्रह्य] 'अवग्रह करके (-इन्द्रियग्रहणयोग्य मूर्त पदार्थका अवग्रह करके) [तत्] उसे [जानाति ] जानता है [वा न जानाति] अथवा नहीं जानता (-कभी जानता है और कभी नहीं जानता) । टीका :- इन्द्रियनानको 'उपलम्भक भी मूतं और 'उपनन्य भी मूतं है । बह इन्द्रियज्ञानवाला जीव स्वयं अमूर्त होने पर भी मून-पंचेनियात्मक शरीरको प्राप्त होता हुआ, जप्ति उत्पन्न करने में बल-धारणका निमिन होनेने जो उपतम्भन ऐसे उस मूर्त (शरीर) के द्वारा मूतं ऐसी 'स्पादिप्रधान कानुनी - कोरियोग हो १ अतिमानगे किगी पदायो मानमेगा मा पार भवा, अयाय, मो धारणा जग। उपसागर बतानेवाला, जागो गित । (EFERENCE T पलर बनाने PHIRE जिसमेग, गधोका मारा। पोते अमूर्तिदः जीद मूलंगरगत र भी। पाली योग्य मूर्त सही जाणे. पदीय नही ।। १४ ।। - - १०० सार -- [भगवान भोगुन्दान्त-महान तायाः शक्तः परिस्खतनालितान्तमिलतीचूत महामोहमल्लस्य जीवववरणत्वात् परपरि- पतिप्रतिताभिप्रायमपि बरे पले शास्तविकासमानुपलम्भसंभावनामेव परमार्थतोऽर्हति । अतद्धेय ॥ ५५ ॥ क्रमकरणव्यवधानरूपं कृत्वा जोन तत्पीदिमत था। कलंगुतम् । इन्द्रियग्रहणयोग्मं जाणदि वा तण्ण जाणादि स्वावरणक्षयोपशमयोग्यं किमपि भूल जानाति, विशेषक्षयोपशमाभावात् सुक्ष्म न जानातोति । अयमन भावार्थ:- इन्द्रियनानं वापि व्यवहारेण प्रत्यक्ष भणते, तथापि निश्चगेन केवलज्ञानापेक्षया परोक्षमेव । परोक्षं तु यातांशेन सूक्ष्मार्थ न जानाति तावतांशेन नित्तरोदकारणं भवति । सेवञ्च दुःखं, ततो दुःखजनकवादिन्द्रियनानं हेयमिति ॥ ५५ ॥ अथ नक्षुरादीन्द्रियज्ञानं अर्थात् जो (इन्द्रियोंके द्वारा) उपलभ्य हो उसे - अवग्रह करके, कदाचित् उससे आगे- आगेको शुद्धिके सद्भावके कारण उसे जानता है और कदाचित् अवग्रहसे आगे आगेकी शुद्धिके असद्भावके कारण नहीं जानता, क्योंकि वह (इन्द्रिय ज्ञान) परोक्ष है । परोक्षज्ञान, चैतन्यसामान्यके साथ (आत्माका) अनादिसिद्ध सम्बन्ध होने पर भी जो अति दृढ़तर अज्ञानरूप तमोग्रन्थि (अन्धकारसमूह) द्वारा आवृत हो गया है, ऐसा आत्मा पदार्थको स्वयं जाननेके लिये असमर्थ होनेसे 'उपात्त और अनुपात्त परपदार्थ- रूप सामग्रीको ढूंढ़नेको व्यग्रतासे अत्यन्त चंचल-तरल-अस्थिर वर्तता हुआ, अनन्त- शक्तिसे च्युत होनेसे अत्यन्त 'विक्लव वर्तता हुआ, महामोह-मल्लके जोवित होनेसे पर- परिणतिका (-परको परिणमित करनेका) अभिप्राय करनेपर भी पद पद पर ठगाता हुआ, परमार्थतः अज्ञानमें गिने जाने योग्य है । इसलिये वह हेय है । भावार्थ :- इन्द्रियज्ञान इन्द्रियोंके निमित्तसे मूर्त स्थूल इन्द्रियगोचर पदार्थोको ही क्षायोपशमिक ज्ञानके अनुसार जान सकता है। परोक्षभूत वह इन्द्रिय ज्ञान इन्द्रिय, प्रकाश, आदि वाह्य सामग्रीको ढूंढनेकी व्यग्रताके (-अस्थिरताके) कारण अतिशय चंचल-क्षुब्ध है, अल्प शक्तिवान होनेसे खेद खिन्न है, परपदार्थोंको परिणमित करानेका अभिप्राय होने पर भी पद पद पर ठगा जाता है (क्योंकि पर पदार्थ आत्माके आधीन परिणमित नहीं होते) इसलिये परमार्थसे वह ज्ञान 'अज्ञान' नामके ही योग्य है । इसलिये वह हेय है ।। ५५ ।। अव, इन्द्रियां मात्र अपने विषयोंमें भी युगपत् प्रवृत्त नहीं होती, इसलिये इन्द्रिय- ज्ञान हेय ही है, ऐसा निश्चय करते हैं :- उपात्तप्राप्त (इन्द्रिय, मन इत्यादि उपात पर पदार्थ हैं) अनुपात्त-अप्राप्त (प्रकाश इत्यादि अनुपात्त पर पदार्थ हैं) 3 विक्लव-सिप्त; दुःसी, घबराया हुआ। २ सानतत्त्व-प्रज्ञापन- - १०१ जैन शास्त्रमाला]] अथेन्द्रियाणां स्वविषयमात्रेऽपि युगपत्प्रवृत्त्यसंभवाद्धेयमेवेन्द्रियज्ञानमित्यवधारयति- फासो रसो य गंधो वण्णो सहो य पोग्गला होति । अक्खाणं ते अक्खा जुगवं ते गेव गेण्हति ॥५६॥ स्पर्शो रसश्च गन्यो वर्णः शन्दश्च पुद्गला भवन्ति । अक्षाणां तान्यक्षाणि युगपत्तान्नव गृह्णन्ति ॥ ५६ ॥ कपादिश्वविषयमपि युगपन्न जानाति तेन कारणेन हेयमिति निश्चिनोति ~ फासो रसो य गंधो वष्णो सहो य पुग्गला होति स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः पुद्गला मूर्ता भवन्ति । ते व विषयाः । केपाम् । अक्खाणं वगनादीन्द्रियाणां । ते अवखा तान्यक्षाणोन्द्रियाणि कर्तृ णि जुगवं ते व गेहंति युगपत्तान् गाधा ५६ अन्वयार्थ :-[स्पर्शः] स्पर्श, [रसः च] रस, [गंधः] गंध, [वर्णः] वर्ण [ [शब्दः च] और शब्द [पुद्गलाः] पुद्गल हैं, वे [अक्षाणां भवन्ति] इन्द्रियोंके विषय हैं [तानि अक्षाणि] (परन्तु) वे इन्द्रियाँ [तान्] उन्हें (भी) [युगपत्] एक साय [न एव गृहन्ति] ग्रहण नहीं करती (नहीं जान सकती) 1 टीका :- मुख्य स्पर्श, रस, गंध और वर्ण - यह पुद्गलके मुख्य गुण है। मुख्य नेप-रम-गंव-वर्ण तथा शब्द जो कि पुदगल हैं -नियों द्वारा ग्रहण होने योग्य (-जात होने योग्य), है । (किन्तु) इन्द्रियोंके जान भी गुगपद (एम गाय) ग्रहण नहीं होते (-जानने में नहीं आते), कोकि भोपालमत्री मनकामीनिनी। दिनांक जो क्षयोपशम नामकी अलग जाति की मनोकरी भांनि अमिन, प्रनिबानी होने से अनेकनः प्रमाण मिले (.:: नारा पिनांगो जानने के लिये अनमः । भी नमस्तयोंके बिरयोगा (किरन पाया) : नी, वयोनिन्द्रा जान पर। , स, गंध, पाली परणार भयो, तेमनेय न निको पुरा । :

܀ ܂ -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- जन शास्त्रमाला] १०३ परदव्वं ते अक्खा व सहावो त्ति अप्पणो भणिदा। उवलद्धं तेहि कधं पच्चक्खं अप्पणो होदि ॥ ५७ ॥ परद्रव्यं तान्यक्षाणि नैव स्वभाव इत्यात्मनो भणितानि । उपलब्धं तः कयं प्रत्यक्षमात्मनो भवति ॥५७॥ आत्मानमेव केवलं प्रति नियतं किल प्रत्यक्षं । इदं तु व्यतिरिक्तास्तित्वयोगितया परद्रव्यतामुपगतरात्मनः स्वभावतां मनागप्यसंस्पृशद्भिरिन्द्रियरुपलन्योपजन्यमानं न नामात्मन: प्रत्यक्षं भवितुमर्हति ॥ ५७ ।। प्रत्यक्षं न भवतीति अवल्यापयति-परदव्वं ते अक्खा तानि प्रमिहान्याणीन्द्रियाणि पन्द्रव्य भवन्ति । काम्य । आत्मनः । णेव सहावो त्ति अप्पणो भणिदा योनी विशुद्रनानदर्शनस्वभाव आत्मनः नंबन्धी तत्स्वभावानि निश्चयेन न णितानीन्द्रियाणि । कम्मात् । भिन्नास्तित्वनिप्पनत्वान् । उबल तेहि उपलब्धं ज्ञानं यत्त न्द्रियविषयभूत वस्तु नरिन्द्रियैः कवं पच्चरखं अप्पणो होदि नहन्तु कयं प्रत्यक्ष भवत्यान्मनो, न कयमचीनि । नयंत्र व नानामनोरयव्याप्तिविषये प्रतिपाच- प्रतिवादकादिविकल्पजालमा यन्मनस्तनपीन्द्रियनानवनिश्चयेन पनरोमं भवतीति जावा कि कतव्यम् । मकानंदाबण्डप्रत्यक्ष निभानमयपरमज्योतिःकान्णभूते स्वगुदात्मन्बम्वभावनास मुत्यनयन्माबाद- कलक्षणमुग्यविन्याकान्परिणनिरूपे गगादिविकल्पोपाधिनहित बनवेदनमाने भावना या स्वभावः इति ] उन्हें आत्मस्वभावरूप [न एव भणितानि] नहीं कहा है: [तः] उनके हांग [उपनब्धं] ज्ञान [आत्मनः] आत्माका [प्रत्यक्षं] प्रत्यक्ष [कथं भवति ] कै हो सकता है ? टीका :- जो केवल आन्माकं प्रति ही नियत हो वह (मान) वास्तव में प्रत्यक्ष है । यह (इन्यिनान) नो, जो भिन्न अस्तित्रवानी होने को प्रान और आत्मस्वभावत्यको किचिन्मात्र म्याग नही करनी (भारनियमान भी नही है.) गगी नियविकाग उपलब्धि कारोः (पानी जानकार) उत्पन्न होना, मनिये का. (मान) : गयाना। भावार्थ :- जो नीचा आत्माकाग जान पाया पोकामा जानता :::::: नियो परापर, जीबदनाद भारी नाले । नापीपल प्रत्यक्ष पई गन !

m १०४ -- हति अथ परोक्षप्रत्यललवाणनुमान ... जं परदो विग्णाणं तं तु गो-ति अणिम मोरा । जदि केलेण पात जोवेग पनना ।। ५८ ।। यत्परतो विज्ञानं तत्त, पोटामिति गितमा । यदि केवलेन जातं भवति हि जोोल प्रस्ताम् ॥ ५८ ।। इत्यभिप्रायः ।। ५७ ।। अब पुनर्शन कमरे मे - जं परतो शिक्षा तंतु परोक्ख ति मणिदं यत्परता कामानिमान पग्जिाम नामिभिणिम् । रेणु विपयेषु । असु शेयपदार्थेषु । जदि केवलेण गाद हादि नाम जान भानि हि स्फुटम् । केन कर्तृभूतेन । जीवेण जोवेन । तर पन्ना भगोरिलो पिरतरः- परोक्ष और प्रत्यक्ष के लक्षण बतलाते है : -- अव, गाथा ५८ अन्वयार्थः-- [परतः] परके द्वारा होनेवाला [यत् ] जो [अर्थेतु विज्ञान] पदार्थ सम्बन्धी विज्ञान है [तत् तु] वह तो [परोक्षं इति भणितं] परोक्ष कहा गया है, [यदि] यदि [केवलेन जोवेण] मात्र जीवके द्वारा हो [ज्ञातं भवति हि] जाना जाये तो [प्रत्यक्षं] वह ज्ञान प्रत्यक्ष है । टोका :- निमित्तताको प्राप्त (निमित्तरूप बने हुए) ऐसे जो परद्रव्यभूत अंत:- करण (मन), इन्द्रिय, परोपदेश, 'उपलव्धि, संस्कार या प्रकाशादिक हैं उनके द्वारा होनेवाला जो स्वविषयभूत पदार्थका ज्ञान, वह परके द्वारा प्रादुर्भावको प्राप्त होनेसे 'परोक्ष'-के रूपमें जाना जाता है, और अंतःकरण, इन्द्रिय, परोपदेश, उपलब्धि संस्कार या प्रकाशादिक सब परद्रव्यकी अपेक्षा रखे विना एकमात्र आत्मस्वभावको ही कारण- रूपसे ग्रहण करके सर्व द्रव्य-पर्यायोंके समूहमें एक समय ही व्याप्त होकर प्रवर्तमान ज्ञान वह केवल आत्माके द्वारा ही उत्पन्न होनेसे 'प्रत्यक्ष' के रूपमें जाना जाता है । ' उपलब्धि ज्ञानावरणीय कर्मके क्षयोपशमके निमित्तसे उत्पन्न पदार्थोको जाननेकी शक्ति । (यह 'लब्ध' शक्ति जब 'उपयुक्त' होती है, तभी पदार्थ ज्ञात होता है।) २ प्रादुर्भावको प्राप्त प्रगट, उत्पन्न । 3संस्कार-पूर्व ज्ञात पदार्थको धारणा । चक्षुइन्द्रिय द्वारा रूपी पदार्थको देखने में प्रकाश भी निमित्तरूप होता है। अर्थो तणु जे ज्ञान परतः थाय तेह परोक्ष छ । जीवमात्रथी ज जणाय जो, तो ज्ञान ते प्रत्यक्ष छे ।। ५८ ॥

जानतत्त्व-प्रज्ञापन- - जन शास्त्रमाला] १०५ यत्तु खलु परद्रव्यभूतादन्तःकरणादिन्द्रियात्परोपदेशादुपलव्धेः संस्कारादालोकादेर्वा निमित्ततामुपगतात् स्वविषयमुपगतस्यार्थस्य परिच्छेदनं तत् परतः प्रादुर्भवत्परोक्षमित्या- लक्ष्यते । यत्पुनरन्तःकरणमिन्द्रियं परोपदेशमुपलब्धिसंस्कारमालोकादिकं वा समस्तमपि परद्रव्यमनपेक्ष्यात्मस्वभावमेवैकं कारणत्वेनोपादाय सर्वद्रव्यपर्यायजातमेकपद एवाभिव्याप्य प्रवर्तमान परिच्छेदनं तत् केवलादेवात्मनः संभूतत्वात् प्रत्यक्ष मित्यालख्यते । इह हि सहजसोख्यसाधनीभूतमिदमेव महाप्रत्यक्षमभिप्रेतमिति ॥ ५८ ॥ अर्थतदेव प्रत्यक्ष पारमार्थिकसौख्यत्वेनोपक्षिपति- जादं सयं समंतं णाणमणंतत्यवित्थडं विमलं । रहिवं तु ओग्गहादिहिं सुहं ति एगतियं भणिदं ॥५६॥ जातं स्वयं समंतं जानमनन्तार्थविस्तृतं विमलम् । रहितं त्ववग्रहादिभिः सुखमिति ऐकान्तिकं भणितम् ॥ ५६ ।। इन्द्रियमनःपरोपदेमालोकादिवहिङ्गानिमिनभूनानयव त्र ज्ञानावणीअक्षयोपशमनिनायग्रहणान्ति- सपाया उपलब्धेन्वधारणपसंस्काराचान्तरङ्गकारणभूतान्नकाशापद्यते यकिनान नवनवीन- त्यात्परोक्षमित्युच्यते । यदि पुनः पूर्वोन्नमस्तपन्द्रव्यमनध्य केबलाच्छुकम्वभावात्परमात्मनः नकाशात्समुत्पद्यते ततोऽमनामानमात्मानं प्रतीयोत्तवमानवानन्यभं भवतीनि ममाभिप्रायः ।। ५.८ ।। एवं हेयभूतंन्द्रियज्ञानकायन मुख्यतया गावाचतुष्टयन तृतीयन्थन गतम् । अधाभवनोन पनविशेषण- विशिष्टं वनजानमेव मुबमिति प्रतिपाति - जादं जात उत्पन्नम् । किन। मा वलनानम् । कथं जातम् । मयं वयमेव । पुनरपि किविशिष्टम । समन पग्लिन। पुनर्गत किया। वहाँ (इन गाथामें ) सहज नुम्वका माधनभून एका वहीं नहाया मान कानीय माना गया है - उपादेय माना गया है (मना आणव नमभना ।। ।। अब, उसी प्रत्यक्षजानको पारमाधिक मुम्बन नमान गाथा अन्वयार्थ :- स्वयं जातं] अपने मापी जानता हुआ) [अनन्तार्थचिरतृतं] आगाम पाम: :: : [अवरहादिभिः रहितं] अबका दिन :: ar] :: का कालिया गयति भणितं सा !::: स्वयमेव जात, समंत, यं शिल अपग्रहहादिरहित, दिलमान पन्न {MITTER १०८ अथ केवलस्यापि परिणामा - गंगालियां नातोति प्रत्याचष्टे- जं केवलं ति पाणं तं सोपलं परिणम न सो नेत्र । खेदो तस्स ण अणिको जम्हा घाबी गस जादा ॥ ६०॥ यत्केवलमिति सानं तल्लोरयं परिणाम मानव । खेदस्तस्य न भणितो यस्मात् शातीनि भयं जातानि ॥ ६ ॥ अथानन्तपदार्थपरिच्छेदनात्मवलनानेऽपि सेदोऽस्तोनि मिति परिमा:-- जाल ति गाणं तं सोखं यत्केवलमिति ज्ञानं तत्सीय भवति, नरमात खेदो तरसण मणिको तार निभान गरेको दुःखं न भणितम् । तदपि कस्मात् । जम्हा घादो सा जादा गरमानमोनिशामिणि शर्य गतानि । तहि तस्यानन्तपदार्थपरिच्छित्तिपरिणामो कुन कारण मिति । गम् । परिणमंग सो व तस्य केवलज्ञानस्य नंबन्धी परिणामश्च न एक गुमना एनि। सानो नितार:- ज्ञानदर्शना- वरणोदये सति युगपदर्थान् ज्ञातुमशक्यत्वात् कमकरणव्यवधानमाणे रो भनति, आगरणागाभावे अव, ऐसे अभिप्रायका खंडन करते हैं कि 'केवलज्ञानको भी परिणामके द्वारा 'खेदका सम्भव होनेसे केवलज्ञान ऐकान्तिक सुख नहीं है :- - गाथा६० अन्वयार्थ :- [यत्] जो [केवलं इति ज्ञान] 'केवल' नामका ज्ञान है [तत् सौख्यं] वह सुख है [परिणामः च] परिणाम भी [सः च एव] वही है [तस्य खेदः न भणितः] उसे खेद नहीं कहा है (अर्थात् केवलज्ञानमें सर्वज्ञदेवने खेद नहीं कहा) [यस्मात् ] क्योंकि [घातीनि] घातिकर्म [क्षयं जातानि] क्षयको प्राप्त हुए हैं । टीका :- यहाँ (केवलज्ञानके सम्बन्धमें), खेद क्या, (२) परिणाम क्या तथा (३) केवलज्ञान और सुखका व्यतिरेक (-भेद) क्या, कि जिससे केवलज्ञानको ऐकान्तिक (१) खेदके आयतन (-स्थान) घातिकर्म हैं, केवल परिणाममात्र नहीं। घातिकर्म . सुखत्व न हो ? १ रोद थकावट; संताप; दुःस । जे ज्ञान 'केवल' तेज सुख, परिणाम पण वणी तेज छ । भाख्यो न तेमां खेद जेथी घातिकर्म विनिष्ट छ । ६० ।।

जानतत्त्व-प्रज्ञापन- जैन शास्त्रमाला] १०६ अत्र को हि नाम खेदः, कश्च परिणामः, कश् केवलसुखयोर्व्यतिरेकः, यतः केवल- स्यकान्तिकसुखत्वं न स्यात् । खेदस्यायतनानि घातिकर्माणि, न नाम केवलं परिणाम- मात्रम् । घातिकर्माणि हि महामोहोत्पादकत्वादुन्मत्तकवदस्मित्तबुद्धिमाधाय परिच्छे- द्यमर्थ प्रत्यात्मानं यतः परिणामयन्ति, ततस्तानि तस्य प्रत्यर्य परिणम्य श्राम्यतः खेदनि- दानतां प्रतिपद्यन्ते । तदभावात्कुतो हि नाम केवले खेदस्योद्नेदः । यतश्च त्रिसम- यावच्छिन्नसकलपदार्थपरिच्छेचाकारवैवल्यप्रकाशनास्पदीभूतं चित्रभित्तिस्थानीयमनन्त- स्वरूपं स्वयमेव परिणमत्केवलमेव परिणामः, ततः कुतोऽन्यः परिणामो यद्वारेण पनि युगपद्गहणे केवनमानस्य वेदो नास्तीति नुवमेव । नव तस्य भगवतो जगत्त्रयकालत्रयवति- नमस्तपायुगपत्तरिच्छित्तिनमधमवण्डकन् प्रत्यक्षपरिच्छिन्तिमयं स्वरूपं परिणमत्सत् केवल- जानमेव परिणामो, न व केवलज्ञानाद्भिनरिणामोम्नियेन वेदो भविष्यति । अथवा परिणामविपये द्वितीयव्यान्यानं क्रियते - युगपदनन्नपदार्थनिच्छिनिरिणामेऽपि बीर्यान्तरायनिवपक्षयादनन्त- वीर्यवान् बदकारणं नास्ति. तथंव व शुवात्मनदेशेषु समन्मीमावन परिणममानानां सहजगुन्द्रा- नन्दकलक्षणमुग्वन्सास्वादपरिणतिम्पामात्मनः सकामावभिन्नामनाकुलतां प्रति मेरे नास्ति । महा मोहके उत्पादक होनेसे धतूरेकी भांति 'अतत्में तत् बुद्धि धारण करवाकर आत्माको जेयपदार्थके प्रति परिणमन कराते हैं; इसलिये वे घातिकम, प्रत्येक पदार्थके प्रति परिणमित हो-होकर थकनेवाले आत्माके लिये बदके कारण होते हैं । उनका (घातिकर्मोका) अभाव होनेने केवलनान में बंद कहाँने प्रगट होगा? (-) और नीनकालरूप तीन भेद जिसमें किये जाते हैं ऐसे नमन्त पनाकी मेवाकामा (विविधनाको प्रकाशित करनेका म्यानमृत कवनमान, चित्रित दीवाली नि.मा) ही अनन्तम्बम्प बयमेव परिणमित होनेने केवलमान मान गये परिणाम कहीं है कि जिनसे पदकी उत्पनि हो ? (:)र, मनमक स्वभावप्रतिघातके अभावके कारण निर्माण अननसको म कानिक लोकालोक-आकान में व्याप्त का ? ::- आमाने अभिन्न या मुग्य-लक्षणभूत अमान : नवी लिये बेचनगान और नयनागिन :: नतम तारण जिगना :.. Sri नामासनाEri माल । निदान; या पार । EMEta Tari. दहीवलत a: .. F - ११२ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान स्वभावप्रतिघाताभावहेतुकं हि सौख्यम् । आत्मनो हि दृशिज्ञप्ती स्वभावः तयो- र्लोकालोकविस्तृतत्वेनार्थान्तगतरनेल व स्वच्छन्दविजृम्भितत्वाद्भवति प्रतिघाताभावः । ततस्तद्धेतुकं सौख्यमभेदविवक्षायां केवलस्य स्वरूपस् । किंच केवलं सौख्यमेव; सर्वानिष्ट- प्रहाणात्, सर्वेष्टोपलम्भाच्च । यतो हि केवलावस्थायां सुखप्रतिपत्तिविपक्षभूतस्य दुःखस्य साधनतामुपगतमज्ञानमखिलसेव प्रणश्यति, सुखस्य साधनीभूतं तु परिपूर्ण ज्ञानमुपजायेत, ततः केवलमेव सौख्यमित्यलं प्रपञ्चेन ॥ ६१ ।। अथ केवलिनामेव पारमार्थिकसुखमिति श्रद्धापयति जो सद्दहति सोदखं सुहेसु परग्नं ति विगदघादीणं । सुणिण ते अभदा भव्वा वा तं पडिच्छंति ॥ ६२ ॥ तयोः प्रतिघात आवरणद्वयं, तस्याभावः केवलिनां, ततः कारणात्स्वभावप्रतिघाताभावहेतुकमक्षया- नन्तनुखं भवति । यतश्च परमानन्दैकलक्षणसुखप्रतिपक्षभूतमाकुलत्वोत्पादकमनिष्टं दुःखमज्ञानं च नप्टं, यतश्च पूर्वोक्तलक्षणसुखाविनाभूतं त्रैलोक्योदरविवरवर्तिसमस्तपदार्थयुगपत्प्रकाशकमिष्टं ज्ञानं च लब्धं, ततो जायते केवलिनां ज्ञानमेव सुखमित्यभिप्रायः ।। ६१ ॥ अथ पारमार्थिकसुखं केवलिनामेव, केवलज्ञान सुख ही है, क्योंकि सर्व अनिष्टोंका नाश हो चुका है और सम्पूर्ण इष्टकी प्राप्ति हो चुकी है। केवल-अवस्थामें, सुखोपलब्धिके विपक्षभूत दुःखोंके साधनभूत अज्ञानका सम्पूर्णतया नाश हो जाता है और सुखका साधनभूत परिपूर्ण ज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिये केवल ही सुख है । अधिक विस्तारसे वस होओ ।। ६१ ।। अव, ऐसी श्रद्धा कराते हैं कि केवलज्ञानियोंको ही पारमार्थिक सुख होता है गाथा ६२ अन्वयार्थ :- '[विगतघातिनां] जिनके घातिकर्म नष्ट होगये हैं उनका [सौख्यं] गुम [ मुरोपु परमं] (सर्व) मुखोंमें परम अर्थात् उत्कृष्ट है' [इति श्रुत्वा] ऐसा वचन मुनयर [न श्रद्दधति] जो श्रद्धा नहीं करते [ते अभव्याः] वे अभव्य हैं; [भव्याः वा] और भव्य [तत्] उसे [प्रतीच्छन्ति ] स्वीकार (-आदर) करते हैं - उसकी श्रद्धा सनी 'घातिकर्मविहीननु सुख सौ सुखे उत्कृष्ट छ । प्रद्धे न तेह अभव्य है, ने भव्य ते संमत करे ।। ६२॥

- ज्ञानतत्त्व-प्रजापत-- ११३ जैन शास्त्रमाला न श्रद्दधति सौख्यं सुखेषु परममिति विगतघातिनाम् । श्रुत्वा ते अभव्या भव्या वा तत्प्रतीच्छन्ति ।। ६२ ।। इह खलु स्वभावप्रतिघातादाकुलत्वाच मोहनीयादिकर्मजालशालिनां सुखाभासेऽ- प्यपारमाथिको सुखमिति रूढिः । केवलिनां तु भगवतां प्रमीणघातिकर्मणां स्वभावप्रति- घाताभावादनाकुलत्वाच्च यथोदितस्य हेतोर्लक्षणस्य च सद्भावात्पारमार्थिक सुखमिति श्रद्धेयम् । न किलवं येषां श्रद्धानमस्ति ते खलु मोससुखसुधापानदूरवर्तिनो मृगतृष्णाम्भो- मनारिणां ये मन्यन्ते तेमव्या इति नित्यति - जो सहति नेत्र अनि न मन्यन्ते । किम् । मोरयं निर्विकारपरमालादकमुषम् । कयंभूतं न मन्यन्ते । गुहेनु परमं ति मुनेत्र मध्ये नदेव पन्म- मुन्वन् । केषां संबन्धि यन्मुखम् । विगदघादोणं विगतघातिकमणां केलिनान । कि कृत्वापि न मान्ने । मुणिकूण 'जादं सयं नमनं' इत्यादिपूर्वोकगाथात्रयविनप्रकारेण श्रुत्वापि । ते अमन्या ते अभव्याः । ते हि जोवा बमानकाले सम्यक्त्वम्भव्यत्ववत्यभावानभव्या मण्यन्ते, न पुनः नबंधा । मन्त्रा वा तं पडिच्छति ये वर्तमानकाले सम्यक्त्वत्पमव्यवनियरिणतान्तिनि ते तदनन्नमुन्वमित्रानी मन्यन्ते । ये त्रसम्यक्त्वम्पभव्यत्वव्यत्या भाविकाले पनिमिष्यन्ति ने दूर- मला अग्ने बलानं कुर्युनिति । अयमत्रार्थ:- मारणार्थ तलबरगृहीततस्यास्य सनिक पोन्द्रिय- नमिष्टं न भवति, तथापि तलबस्थानीयचारित्रमोहोदयन मोहितः सन्निवरागवामोन्मुखमन- टीका :- इस लोकमें मोहनीयआदिकर्मजालवालोंके स्वभावप्रतिघातके कारण और आकुलताके कारण मुखाभान होने पर भी उस मुखामानको ‘मुख कहने की अवारमाथिक मादि है; और जिनके घातिक्रमं नष्ट हो चुके है में केवलीभगवानके, न्यभावप्रतिघातके अभावके कारण और अनाकुलताके कारण मुखी योन कारण और लक्षणका सन्द्राव होनेने पारमार्थिक गुन्द - ली प्रमाणे गोद। जिन्हें ऐसी श्रद्धा नहीं है वे – मोक्षगुवक नयापानने का मनेवा -मार जनसमूहको हो देखने (-अनुभव करने ) है; और जीवन में (प्रा) करते हैं वे शिवश्री के. (-मोमलनी ) भाजन- आगे जाकर स्वीकार करेंगे वे दूरमय है। भावार्थ :- कवलीभगवानगी पानमसार समका स्वीकार आदर - प्रमा नती करनी जागेत, बचन सुनवार अंतरंगने जसको मा जाने --- , - १ PER:माद:।। म!

११४
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भारमेवाभव्याः पश्यन्ति । गुनियो :
समासन्नमव्याः भवन्ति ।
अथ परोक्षजानिनामपारमागि
मणुआसुरारिंदा अहिट या निर्णय हो ।
असहंता तं दुर्ग रति मिना ॥३॥
मनुजासुसमरेका अभिता ।
असहमानास्ता बानो ना॥३॥
भमानः सन् सरागसमष्टिगनिमाको [.: if
its"
शुद्धोपयोगिनस्तेगां, मलयानां सामान :: :::::... ...
दुःखं प्रतिभाति । तथा चोक्तम् - " : { . 4.5 111. ! Mg
दहति झपाणां किमङ्गपुनरजमशागः" ।।६ को मो.
मुख्यतया गाथाचतुष्टयेन चतुर्थस्थलं गतम् । अब में मारिया कामाला-
जो वर्तमानमें श्रद्धा करते हैं वे आसनमा जोर जोगिमा करंगे थे
दूरभव्य हैं ।। ६२ ।।
अव, परोक्षज्ञानवालोंके अपारमार्थिक इन्द्रिगगुगका निनार करते है :-
गाथा ६३
अन्वयार्थ :- [मनुजासुरामरेन्द्राः] मनुष्येंद्र (चक्रवर्ती) अनुरेन्द्र और सुरेन्द्र
[सहजैः इन्द्रियः] स्वाभाविक (परोक्षज्ञानवालोंको जो स्वाभाविक है ऐसी) इन्द्रियोंसे
[अभिद्र ताः] पीड़ित वर्तते हुए [तद् दुःखं] उस दुःखको [असहमानाः] सहन न कर
सकनेसे [रम्येषु विषयेषु] रम्य विपयोंमें [रमन्ते] रमण करते हैं ।
टीका :- प्रत्यक्ष ज्ञानके अभावके कारण परोक्ष ज्ञानका आश्रय लेनेवाले इन
प्राणियोंको उसकी (-परोक्ष ज्ञानकी) सामग्रीरूप इन्द्रियोंके प्रति निजरससे ही
(-स्वभावसे ही) मैत्री प्रवर्तती है। अब इन्द्रियों के प्रति मैत्रीको प्राप्त उन प्राणियोंको,
उदयप्राप्त महामोहरूपी कालाग्निने ग्रास वना लिया है, इसलिये तप्त लोहेके गोलेकी
सुर-असुर-नरपति पीड़ित वर्ते सहज इन्द्रियो वड़े।
नव सही सके ते दुःख तेथी रम्य विषयोमा रमे ॥ ६३ ॥

-जानतत्त्व-प्रजापन- जैन शास्त्रमाला] अमोपां प्राणिनां हि प्रत्यक्षजानाभावात्परोलज्ञानमुपसर्पतां तत्सामग्रीभूतेषु स्वरसत एवेन्द्रियेषु मैत्री प्रवर्तते । अय तेषां तेषु मैत्रीमुपगतानामुदीर्णमहामोहकालानलकवलितानां तप्तायोगोलानामिवात्यन्तमुपात्ततृष्णानां तहखवेगमसहमानानां व्याधितात्म्यतामुपगतेषु रम्येषु विषयेषु रतिल्पजायते । ततो व्याधिस्थानीयत्वादिन्द्रियाणां व्याधिसात्म्यसमत्वा- हिपयाणां च न छत्रस्यानां पारमाथिकं सोख्यम् ।। ६३ ।। अय चावदिन्द्रियाणि तावत्वभावादेव दुःखमेवं वितर्कयति - जेसि विसएसु रदी तेसिं दुक्खं वियाण सन्भावं । जइ तं ण हि सम्भावं वावारो णत्यि विसयत्यं ।। ६४ ॥ येषां विषयेषु रतिस्तेषां दुःखं विजानीहि स्वाभावम् । यदि तन्न हि स्वभावो व्यापारो नास्ति विपयार्यम् ।। ६४ ॥ मणमामुरान्तिा मनुजामुगमरेन्द्राः । कयंभूताः । अहिन्दुवा इंडियेहि सहजेहि अभिताः सरिताः जिला: । : । इन्द्रियः महः । मसंहका तं दुकावं लबो कमलहमानाः मन्नः । रमते दिनगनु नम्मे मन्ति विषयेषु रम्यामानेषु इति । अब वितर:- मनुबाको जीवा अमृतांतीदिनानमुखाबाद- मनमाना: मन्नः मून्द्रिबहानमुबनिमिनं नि मनपञ्चनिय मंत्रों कुन्नि । नन ननलोद- गोजानामुमायणमिव विषयेषु नोवतृष्णा जायते । नां तृष्णामनमाना विजयाननुभवन्ति इति । नतीजायने पचनियाणि व्याविन्यानीयानि. विपनाम कानीनगरकानीमा पनि मानिां बारन गुण्यं नास्ति ।। ६ ।। अथ न्यायविनिययावागतानि - मि बिसयम रखी भोलि (-जन गरम किया हुआ लोहका गाला पानीको गीतको मोहना है माल कृष्णा उत्पन्न हुई है ; म दुःयक बंगको सहन न कर पाने के नमान (जगने घोडामा आराम जैसा अनुभम का काम मिनि मानहानी । धि अनिवार समान होनीव .. अब, नमः । .. अभयाशं :- [ri] feri ] (ो विय तिमी को हेम होर मार : ६८ !

- जन शास्त्रमाला]] -जानतत्त्व-प्रनापन- ११७ अथ मुक्तात्मसुखप्रसिद्धये शरीरस्य सुखसाधनतां प्रतिहन्ति पप्पा इळे विसये फासेहि समस्सिदे सहावेण । परिणममाणो अप्पा सयमेव सुहं ण हवदि देहो ।। ६५॥ प्राप्येप्टान विषयान् स्पर्शः समाश्रितान् स्वभावेन । परिणममान मात्मा स्वयमेव सुखं न भवति देहः ।। ६५ ।। ।। ६४ ॥ एवं परमार्थनेन्द्रियमुखस्य दुग्यस्थापनार्य गाथाद्वयं गतम् । अथ मुक्तात्मनां शरीराभावेऽपि मुखमस्तीति जापनार्थ शरीरं नुबकारणं न स्यादिति व्यक्तीकरोति - पप्पा प्राप्य । कान् । इ8 विसये अष्टपञ्चेन्द्रियविषयान् । कथंभूतान् । फाहिं समस्सिदे सनातीन्द्रियरहित वात्मनविलक्षणः वनादिभिनिद्रियः समाधितान् सम्यक् प्राप्यान ग्राह्यान, इत्यंभूतान विषयान प्राप्य । म कः । माया आत्मा कर्ता । किविशिष्टः । सहावेण परिणममाणो अनन्तमुखोपादानभूत ब्रान्मस्वभाववि- पर्गतनागुडसुबोपादानभूतनाद्वान्मस्वभावेन परिणममानः । इत्यंभूतः मन लयमेव मुहं स्वयमेवेन्द्रि- मुन्न भवति परिणामनि । म यदि देहो देवः पुन चेतनत्रामुग्वं न भवनोति । अयमत्रार्थः- कानमें फिर बकरेका मूत्र डालता दिखाई नहीं देता और जिसका बाव भर जाता है वह फिर लेप करता दिवाई नहीं देता - इसीप्रकार उनके विषय व्यापार देखने में नहीं आना चाहिये ; किन्तु उनके वह (विषयप्रवृत्ति) तो देखी जाती है । इसने (मिल हुआ कि) जिनके इन्द्रियाँ जीवित हैं ऐसे परोक्षनानियोंके दुन्य स्वाभाविक ही है। भावार्थ :- परोक्षजानियोंके स्वभावाने ही दुग्ध है, क्योंकि उनके विषयों में नि बनती है। कभी-कभी नो वे, असह्य नष्णाकी वाहने (नीर मानी ) माने नवाकी परवाह न करके क्षणिक इनिधिकों को कसाबसे ही गुन्य नको तो विषयाम गिननी माता नाट होगया हो बा, बाहा मीनोपमा यो :::: जानियोंके , मामा ।।। अन्न, शत; आमा म ..., . करने । (मि.ग. ! :: ममान मंगामा:::: in ) :- कालमाधित IT for . fort :::: terrai ममेट कर .| ܀ -- जैन शास्त्रमाला]] -ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- ११६ अर्थतदेव दृढयति एगंतेण हि देहो सुहं ण देहिस्स कुणदि सग्गे वा। विसयवसेण दु सोखं दुक्खं वा हवदि सयमादा ।। ६६ ॥ एकान्तेन हि देहः सुखं न देहिनः करोति स्वर्गे वा। विषयवशेन तु सौख्यं दुःखं वा भवति स्वयमात्मा ॥६६॥ अयमत्र सिद्धांतो यहिव्यवक्रियिकत्वेऽपि शरीरं न खलु सुखाय कल्प्येतेतोप्टानाम- निष्टानां वा विषयाणां वशेन सुखं वा दुःखं वा स्वयमेवात्मा स्यात् ।। ६६ ।। भवन, देवारी दिव्यं तन्किन सुन्वकारणं भविष्यतीत्यागवां निकोनि- एगंज हि व्हो मुहं न हिल्स गुदि एकान्तेन हिम्फुट देहः कर्ता मुन्न न करोनि । कस्य । देहिनः मंगारिजीवन्ध । क्व । सगे ना आम्नां तावन्मनुष्याणां मनुष्यदेहः मुन्वं न करोति, स्वर्ग वा योजो दिव्यो देवः सोऽयु- पना विहाय नुवं न करोति । विसयवसेण तु सोप्यं दुर वा हयादि सयमादा किंतु निश्चयेन निविषयामूनंम्बाभाविकमकानन्दकनुवस्वभावोऽपि व्यवहारेणानादिकमंबन्धवाहियाधीनत्वेन परिणम्य सांसारिकामु दुवं वा स्वयमान्मव भवति, नव देह इत्यभिप्राय: ।। ६६ } एवं मुळामनां है। उसमें शरीर कारण नहीं है ; क्योंकि मुन्वय परिणति और शरीर सर्वथा भिन्न होने के कारण मन्त्र और शरीर में निश्चयने किंचित्रमात्र मी कायंकारकता नहीं है ।। ६५।। अब, हली बातको दृढ़ करते हैं :- . गाथा६६ अन्वयार्थ :- [एकान्तेन हि एकांगी अमांत मित्र या कभी [:] गरीर [देहिम:] पनीरी (आमाला) । Fifमा पियवोन तु] परन्नु विषयान, वाणगे rit] आमा भन] स्वयं आत्मा। टीपा:- यहां य: शिra {4. ...:.: .:.. नही सकता'; मान का काली रगेय ए ए३ नो । पण दिलाया।

१२०
-प्रयननसार..
-
[भगवान शोमान महान
अथात्मनः स्वयमेव सुखपरिणामशक्तियोगित्वादिषयाणामिनिकरत्वं योतयति -
तिमिरहरा जइ दिट्ठी जणस्स दीवेण णत्थि कायव्वं ।
तह सोक्खं सयमादा विसया किं तत्थ कुव्वंति ॥ ६७ ॥
तिमिरहरा यदि दृष्टिर्जनस्य दीपेन नास्ति कर्तव्यम् ।
तथा सौख्यं स्वयमात्मा विषयाः किं तत्र कुर्वन्ति ॥ ६७ ॥
यथा हि केषांचिन्नक्तंचराणां चक्षुपः स्वयमेव तिमिरविकरणशक्तियोगित्वान्न
तदपाकरणप्रवणेन प्रदीपप्रकाशादिना कार्य, एवमस्यात्मनः संसारे मुक्तौ वा स्वयमेव
देहाभावेऽपि सुखमस्तीति परिजानार्थ संसारिणामपि देहः मुख कारणं न भवतीति कथनरूपेण गाथाद्वयं
गतम् । अथात्मनः स्वयमेव सुखस्वभावत्वान्निश्चयेन यथा देहः सुखकारणं न भवति तथा विषया
अपीति प्रतिपादयति - जइ यदि दिट्ठी नक्तंचरजनस्य दृष्टिः तिमिरहरा अन्धकारहरा भवति जणस्स
जनस्य दीवेण पत्थि कायवं दीपेन नास्ति कर्तव्यं । तस्य प्रदीपादीनां यथा प्रयोजनं नास्ति तह
भावार्थ :- शरीर सुख-दुःख नहीं देता। देवोंका उत्तम वैक्रियिक शरीर सुखका
कारण नहीं है और नारकियोंका शरीर दुःखका कारण नहीं है । आत्मा स्वयं ही इप्ट-
अनिष्ट विषयोंके वश होकर सुख-दुःखकी कल्पनारूपमें परिणमित होता है ।। ६६ ।।
अव, आत्मा स्वयं ही सुखपरिणामकी शक्तिवाला होनेसे विषयोंकी अकिंचित्करता
बतलाते हैं
गाथा ६७
अन्वयार्थः - [यदि] यदि [जनस्य दृष्टिः] प्राणोकी दृष्टि [तिमिरहरा]
तिमिरनाशक हो तो [दीपेन नास्ति कर्तव्यं] दीपकसे कोई प्रयोजन नहीं है, अर्थात्
दीपक कुछ नहीं कर सकता, [तथा] उसीप्रकार जहाँ [आत्मा] आत्मा [स्वयं] स्वयं
[सौख्यं] सुखरूप परिणमन करता है [तत्र] वहाँ [
[विषयाः] विषय [किं कुर्वन्ति]
क्या कर सकते हैं ? ।
टीका :- जैसे किन्हीं निशाचरोंके (उल्लू, बिल्ली, भूत इत्यादि) नेत्र स्वयमेव
अन्धकारको नष्ट करनेकी शक्तिवाले होते हैं, इसलिये उन्हें अंधकार नाशक स्वभाव-
वाले दीपक-प्रकाशादिसे कोई प्रयोजन नहीं होता, (उन्हें दीपक-प्रकाश कुछ नहीं
जो दृष्टि प्राणीनी तिमिरहर, तो कार्य छ नहि दीपथी ।
ज्यां जीव स्वयं सुख परिणमे, विषयो करे छे शूतहीं? ॥६७ ॥

जानतत्त्व-प्रज्ञापन- न शास्त्रमाला] १२१ - सुखतया परिणममानस्य सुखसाधनधिया अधुर्मुपाध्यात्यमाना अपि विषयाः कि हि नाम कुर्युः।। ६७ ॥ अयात्मनः सुखस्वभावत्वं हटान्तेन दृत्यति सयमेव जहादिच्चो तेजो उण्हो य देवदा गभसि । सिद्धो वि तहा गाणं सुहं च लोगे तहा देवो ॥ ६८ ॥ स्वयमेव यथादित्यस्तेजः उष्णश्च देवता नभसि । सिद्धोऽपि तथा ज्ञानं सुखं च लोके तथा देवः ॥ ६८ ॥ सोगवं सयमाता दिनया कि तत्य मुनि नया निविषयामूर्नमवंदेमाहाशनहजानन्दकलमण- मुन्नम्वभावो निधनार्मव, तत्र मृतो नसारे वा विषयाः किं कुर्वन्ति न किमपोनि मात्र: ।। ६ ।। अचान्मनः नुवस्वभावत्वं नानावभावत्वं त्र. पुनरपि दृष्टान्तेन हनि - सयमेव जहादिच्चो तेजो उहो व देवदा पानामि कारणान्तरं निन्थ्य स्वयंमंत्र ययादिन्यः परप्रकाशन तेजो भवति, नयंत्र चस्वयमेवोपणो भवति, तथा त्रामानिजनानां देवता भवति । व बिन: । नभनि । सिनो करना,) इनीप्रकार - यद्यपि अनानी 'विषय सुबके माधन है ऐनी बुद्धि के द्वारा व्यर्थ ही विषयों का अध्यान (-आश्रय) करते है तथापि - नमान्में या मुनिमें वयमेव मुन- गए परिणमिन न आल्माका विपय क्या कर नबने ? भावार्थ :- संसार में या मोक्ष में आत्मा अपने मान की समामिल होना है. उसमें विषय अकिचित्कार है, अर्थात् ध नहीं करने । गुपका कारण मानकर व्यर्थ ही उनमा अवलंटन :: : ।। अब, आत्माका गुरुस्वभावयमांगका : . गाथा आदया :- यथा]]::::::::::mir अपने बाप तेज: ] संग. राण:::::::: कालो कोकामे [गि १] ... मा: । मार भारमा सत्यमे PET ...! रमेव नावतिर ए. ३

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--ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन- १२३ जैन शास्त्रमाला अथ शुभपरिणामाधिकारप्रारम्भः । अथेन्द्रियसुखस्वरूपविचारमुपफममाणस्तत्साधनस्वल्पमपन्यस्यति - देवदजदिगुरुपूजासु चेव दाणम्मि वा सुसीलेसु । उदवासादिसु रत्तो सुहोवओगप्पगो अप्पा ॥६६॥ देवतायतिगुरुपूजासु चंब दाने वा सुशोलेषु । उपवासादिप रक्तः शुभोपयोगात्मक आत्मा ॥६६॥ नयंयानन्तजानादिगुणस्तवनेन स्तुत्यं च यदिब्यमात्मस्वन्वं तत्स्वभावत्वानव देवनंति । नतो जायते मृतात्मनां विपयनपि प्रयोजनं नाम्लोनि ।। ६ ।। एवं न्यभावनैव सुखस्त्रनाववाहिपया अपि मनात्मनां मुन्वकारणं न भवन्तीतिकवनम्मेण गावाचं ननम् । अवानी श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवाः पूर्वोक्तनमणानन्तमुवाधारभूतं मनं बस्तुम्नवेन नमकुर्वन्ति- स्वम्पवान होनेने देव है । इसलिये उन मामाको सुबमायनामान (जो मुखरे साधन नहीं है परन्तु मुम्बके साधन होनेका आभानमात्र जिनमें होता है ऐसे) विनोंने बन हो। भावार्थ:- सिद्ध भगवान किमी प्रामाकान्णकी अमाव बिना नही स्वपरप्रकाणक मानम्प है, अनन्न आत्मिक आनलाई काम मिझ भगवानकी भांति ही नत्र जीवांका याव; लम्बी भाव छोड़कर निगदम्बी परमाननम्नमाका f.. 1 " - रगप्रकाराला --0 अब, यहाँ शुभ परिणामका गिरना इदिगगगरका मामी .:.::- (-भोपयोगका) र कार :- गुरदेव पालिपूजा एवं दान में : जोर रत्तः स्पासाह, . ::

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जैन शास्त्रमाला] -जानतत्त्व-प्रजापन- अथ शुभोपयोगसाध्यत्वेनेन्द्रियसुखमाख्याति समाप्तः ।। इत अव्वं पञ्चविंशतिगात्रापर्यन्तं जानकाण्डिकावतुष्टयाभिधानोऽधिकारः प्रारभ्यते । नत्र पञ्चविंशतिगावामध्ये प्रथमं नावच्छुभाशुभविपचे मृतत्वनिगकरणार्य 'देवजन्गुिर' न्यादि दशगावापर्यन्नं प्रयमनानाण्डिका कलते । तदनन्तन्माप्तात्मन्बम्पपन्जिाविषये मूत्वनिग- करणार्य चत्ता पाबारंभ इत्यादि सुप्तगाघापर्यन्नं हिनीयवान शिडका, अयानल म्यगुणपर्याय- परिजानविपये मूल्यनिराकरणार्य 'बादी इत्यादि गायाण्डकपनं लोकानकडिका। तदनन्तरं स्वपातन्त्रपरिजानविषये मूवनिताकरणार्य ‘णाणपगं' इत्यादि गाथायेन चतुर्वनान- कण्डिका । इति जानकापिकावष्याभिधानाधिकार समुनयपातनिका । अदानी प्रवमनान- कण्डिकायां स्वतन्त्रवान्यानेन गाथाचतुष्टयं. तदनन्त पुण्यं जीवस्य विषयतजामुन्यादरतोनि कयन- संर्पण गावाचतुष्टयं, नन्नन्नामुपनंहारम्पेण गाथायं. इनि बनवपन्न रमेण मान्लान नित्यते । नत्रा - अत्र यपि पूर्व गावानेन्द्रियमुबम्वन् मणिनं नापि पुनपि न दिल्ली कथयन मन तन्नायकं शुभोपयोगं प्रतिवादति, अवका दिनीयवाननिका - बोटिकायां गन भोपयोगबन मृत्रिनम्बयानोमिनियमविशेषविचारमन्नाव नमानेन विकिरोनि- देवददिगुरुपूजानु चेव वाणम्मि वा सुमोलेन देवनानिमामु माने या मुलीने उवामादिमु रत्तो नयंत्रोपनानादिपुत्र ग्न, मन: अप्पा जीव नहोवशेगोको भने नि । नया हि-देवता निविपरमात्मा, इन्द्रियजन भेदाभदानबागकाम्नथिनां भयानां जिनवीभावात्रा गुर . : . विम्बातीनां च प्रधानभयं व्यभावच्या प्रमा, माहानियवान का -- नर्थ दोपवासादिजिनगुणसंपन्यादिविधिगया। मानो नगर पंचामानुलाने बिन, म जान्न : गुमायांनी म .:: :: पयोगग मामिलायागं गणपति - गुण अली बाबा .. भावार्थ :- सर्वाप कि मामा घा...: आगधना तथा जग आगधनान श्री किय जय कारणामका में प्रात:::: ... उनकी प्रतिमा पजामें, RITTER...:. : ... गीतको तथा उपनामादिगा : पीर पियानगर :::: का मापयोगी ।।। . . ब, । New Rai ..

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जानतत्त्व-प्रतापन- जन शास्त्रमाला] सौख्यं स्वभावसिहं नास्ति सुराणामपि सिमुपदेशे । ते देहवेदनाता रमन्ते विपयेष रन्ये ।।७१॥ इन्डियनपभाजने हि प्रधाना दिवोकनः । तेषामपि स्वाभाविकं न सतु सुखमल्लि, प्रत्युत तेषां स्वाभाविकं दुःखमेवावलोक्यते, यतन्ते पञ्चेन्द्रियात्मकारोरपिशाचपोडया परचमा नाप्रपातल्यानीयान्मनोनविषयानभिपतन्ति ॥ १ ॥ किसानकायमानीवाडानकारणन मिलतत्र कल्वामात्रिक मुखं नवभामिळ भाले । तर परित्र मुराणं पि आम्नां मनुष्यायोनां मुळ नावीनार्माः नाति मिति मिलनवि- प्रमाणे पामार्ग । के कणा मंनि किसानु रमन नमामाभावाने देवायो देवे- नाका: श्रीरका: गायिका: गलो रमन्ते कि थानाति । बच विनर बनने नयमानीयमहाजमानिये. भोगवन मानमायामोमाजमननुर. मिलने यानीमा निरः न दि. माननीयमहार मियामादिमागे नाट: सन मन्युयानीवासिन्युनकनी न यानीमनमानले विमान मन माने मान amaryानीय मनुमान था , मा गुमनाम ऑक -प्रवचनतार- १२८ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अथैवमिन्द्रियसुखस्य दुःसत्तायां युक्तयावतारितायामिन्द्रियसुखसाधनीभूतपुण्य- निर्वर्तकशुभोपयोगस्य दुःखसाधनीभूतपापनिर्वतकाशुभोपयोगविशेषादविशेषत्वमवतारयति- णरणारयतिरियखुरा भजन्ति जदि देहसंभवं दुक्खं । किह सो सुहो व अनुहो उनओगो हवदि जीवाणं ॥७२॥ नरनारकतिर्यक्रतुरा भजन्ति यदि देहसंभवं दुःखं । कथं स शुभो वाऽशुभ उपयोगो भवति जीवानाम् ॥७२॥ निश्चयेन दुःखत्वं ज्ञात्वा तत्साधकशुभोपयोगस्याप्यशुभोपयोगेन सह समानत्वं व्यवस्थापयति- परणारयतिरियतुरा भजति जति देहसंभवं दुक्खं सहजातीन्द्रियामूर्तसदानन्दकलक्षणं वास्तवसुखमल- गमानाः सन्तो नरनारकतिर्यकसुरा यदि चेदविशेषेण पूर्वोक्तपरमार्थसुखाद्विलक्षणं पञ्चेन्द्रियात्मक गरीलोत्पन्न निश्चयनयेन दुःखमेव भजन्ते सेवन्ते, किह सो सुहो व असुहो उवओगो हवदि जीवाणं इसप्रकार युक्तिपूर्वक इन्द्रियसुखको दुःखरूप प्रगट करके, अब इन्द्रियसुखके साधनभूत पुण्यको उत्पन्न करनेवाले शुभोपयोगकी, दुःखके साधनभूत पापको उत्पन्न करनेवाले अशुभोपयोगसे अविशेषता प्रगट करते हैं गाथा ७२ अन्वयार्थ :- [नरनारकतिर्यकसुराः] मनुष्य, नारकी, तिर्यंच और देव (-सभी) [ यदि] यदि [देहसंभवं] देहोत्पन्न [दुःखं] दुःखको [भजति] अनुभव करते हैं। [जीवानां] तो जीवोंका [सः उपयोगः] वह (शुद्धोपयोगसे विलक्षण-अशुद्ध) उपयोग [गुनः या अशुभः] शुभ और अशुभ दो प्रकारका [कथं भवति] कैसे है ? (अर्थात् नहीं है) टोका :- यदि शुभोपयोगजन्य उदयगत पुण्यकी सम्पत्तिवाले देवादिक (अर्थात् गुभोपयोगजन्य पुण्यके उदयसे प्राप्त होनेवाली ऋद्धिवाले देव इत्यादि) और अनोपयोगजन्य उदयगत पापकी आपदावाले नारकादिक - यह दोनों स्वाभाविक सुखके भाबके कारण अविगेपम्पमे (-विना अन्तरके) पचेन्द्रियात्मक शरीर सम्बंधी दुःखका । अनुभव करते हैं, तब फिर परमार्थसे शुभ और अशुभ उपयोगकी पृथक्त्वव्यवस्था पी ली। तिर्यच-नारक-मुर-नरो जो देहगत दुख अनुभवे । तो जीवनो उपयोग से शुन ने अशुभ कई रीत छ ?।। ७२ ॥

जनमास्यमाना]
यदि शुभोपयोगजन्यममुद्रोणपुण्यसंपदस्त्रिमादयोऽशुभोपयोगजन्यपर्यागतपातका-
पदो बा नारकाव्य, उभयेऽपि स्वाभाविक्रमवाभावावविशेषेण पञ्चेन्द्रियात्मकमरोर-
प्रत्ययं दुःखमेवानुभवन्ति । तत: परमार्थतः शुभाशुभोपयोगयोः पृथक्त्यव्यवस्या-
नातिप्प ।। ७२ ॥
अब गुभोपयोगजन्यं फलवत्यु विषेण प्रणासन्युपगम्योत्यापति -
कुलिनाउहरकत नुहोवोगप्प;हिं भोहि ।
देहादीणं विद्धि करेंति महिना वाभिरता ॥७३॥
अनिमायुधनजनाः गुभोपयोगात्म: भागः ।
कहानीनां वृद्धि कुन पत्रिका अभिन्नाः ॥७॥

१३०
-प्रवचनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
यतो हि शत्राश्चक्रिणश्च स्वेच्छोपगतै गैः शरीरादीन् पुण्णन्तस्तेषु दुष्टशोणित इव
जलौकसोऽत्यन्तमासक्ताः सुखिता इव प्रतिभासन्ते, ततः शुभोपयोगजन्यानि फलवन्ति
पुण्यान्यवलोक्यन्ते ॥७३॥
अर्थवमभ्युपगतानां पुण्यानां तुःखबीजहेतुत्वमुद्भावयति -
जदि संति हि पुण्णाणि य परिणामसमुद्भवाणि विविहाणि
जणयंति विसयतहं जीवाणं देवदंताणं ॥७४॥
पनि सन्ति हि पुण्यानि च परिणामसमुद्भवानि विविधानि ।
जनयन्ति विषयतृष्णां जीवानां देवतान्तानाम् ॥ ७४॥
तृप्तिसमुत्पादकं विषयतृष्णाविच्छित्तिकारकं च स्वाभाविकसुखं तदलभमाना दुष्टशोणिते जलयूका
श्वासताः सुखाभासेन देहादीनां वृद्धिं कुर्वन्ति । ततो ज्ञायते तेषां स्वाभाविकं सुखं नास्तीति ।। ७३ ॥
अब पुण्यानि जीवस्य विपयतृष्णामुत्पादयन्तीति प्रतिपादयति - जदि संति हि पुण्णाणि य यदि
चेन्निश्चयेन पुण्यपापरहितपरमात्मनो विपरीतानि पुण्यानि सन्ति । पुनरपि किंविशिष्टानि । परिणाम-
समुद्भवाणि निर्विकारस्वसंवित्तिविलक्षणशुभपरिणामसमुद्भवानि विविहाणि स्वकीयानन्तभेदेन
बहुविधानि । तदा तानि किं कुर्वन्ति । जणयंति विसयतण्हं जनयन्ति । काम् । विषयतृप्णाम् ।
[
गाथा ७३
अन्वयार्थ :- [कुलिशायुधचक्रधराः] वज्रधर और चक्रधर (-इन्द्र और चक्रवर्ती)
[शुभोपयोगात्मकः भोगः] शुभोपयोगमूलक (पुण्योंके फलरूप) भोगोंके द्वारा [देहा-
दीनां] देहादिको [वृद्धि कुर्वन्ति] पुष्टि करते हैं और [अभिरताः] (इसप्रकार)
भोगोंमें रत वर्तते हुए [सुखिताः इव] सुखी जैसे भासित होते हैं । (इसलिये पुण्य
विद्यमान अवश्य है)
टीका :- शकेन्द्र और चक्रवर्ती अपनी इच्छानुसार प्राप्त भोगोंके द्वारा शरीरादिको
पुष्ट करते हुए - जैसे गोंच (जोंक) दूपित रक्तमें अत्यन्त आसक्त वर्तती हुई सुखी जैसी
भागित होती है, उसीप्रकार - उन भोगोंमें अत्यन्त आसक्त वर्तते हुए सुखी जैसे भासित
होते है : इमलिये शुभोपयोगजन्य फलवाले पुण्य दिखाई देते हैं (अर्थात् शुभोपयोगजन्य
वाले पुलोंका अस्तित्व दिखाई देता है)
परिणामजन्य अनेक विध जो पुण्यनु अस्तित्व छ ।
तो पुण्य से देवान्त जीवने विषयतृष्णोद्भव करे ॥७४ ॥

जानतत्व-जार जन गास्त्रमाला] यदि नामवं गुभोपयोगपरिणामकृतसमुत्पत्तीन्यनेक प्रकाराणि पुज्यानि विजंत इत्यन्युपगम्बने, तवा तानि कृता समस्तांसारिणां वितृष्णामाय- मेव समुत्यायन्ति । न बनु तृष्णामन्नण दुष्टगोपित व जलकानां समस्तांसारिणां पिये प्रतिरबलोचते । अबलोरले चना । नतोतु पुण्यानां वृष्णायतनत्वमाधि- मुवामनानप्यधि नमे ॥५४॥ राजीवाना अनुभूतभागाकाथाननिकाला नामबहान जानिमाको नाम wami मिनिनिमाविका नका कमाल नि मानामिनामा कार्यकर वात्रा मनन कि ! - - - जाय ।।: नि ----

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- -- जन गास्त्रमाला] अब ते पुनन्त्रिकमावतानाः कृल्न मारिणः समुद्रीगणाः पुष्यनिवतिताभिरपि तृष्णाभिटुंबवीजतचायन्तान्त्रिताः मन्तो मृगतृष्णान्य इवाम्मानि त्रिवेन्यः सोरया- भिन्नपन्ति । तह संतापगममहमाना अनुभवन्ति - विवाद जनाथुला इव, ताब- घान् क्षयं यान्नि । बचा हि जलायुकानणादोजेन विजयमानन मा कुरेण मतः ममात्रयमाणा दाष्टमीलालमभिन्नानमन्तदेवानुभवन्यज्ञानयाद दिलान्ते, एकममो अपि पुष्तामानिनः पापनालिन र नृपयाजेन विजयमानेन या कुरेश प्रमतः ममात्रम्यमाणा विषयभिलपनम्नानानुभवनमालयात मिनायने । अनः पुल्यानि मुन्नाभानन्य पद नानानि न्युः ।। ७५ ।। -- 1 =:::::- 3 ; - - - - - a; . नया नाममा ranा : - ! -- ani: अमर ::: :: . नाम गगन जाक ( गाजिया वानर सपा की जाती की. :- सी प्रकार या . .. imi :::::;.. Tीवानीगी ! ........::-

१३४
-प्रवत्तनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
अथ पुनरपि पुण्यजन्यस्येन्द्रियसुखस्य बहुधा दुःखत्वमुद्योतयति.
सपरं बाधासहिदं विच्छिणं बंधकारणं विसमं ।
जं इन्दिरहि लद्धं तं सोक्खं दुक्खमेव तहा ।। ७६ ॥
सपरं बाधासहितं पिच्छिन्न वन्धकारणं विषमम् ।
यविन्तियैलब्ध
तत्सौख्यं दुःखमेव
तथा ।। ७६ ।।
वहुधा दुःखत्वं प्रकाशयति - सपरं सह परद्रव्यापेक्षया वर्तते सपरं भवतीन्द्रियसुखं, पारमार्थिकसुखं तु
परद्रव्यनिरपेक्षत्वादात्माधीनं भवति । वाधासहियं तीव्रक्षुधातृष्णाद्यनेकवाधासहितत्वाबाधासहित-
मिन्द्रियसुखं, निजात्मसुखं तु पूर्वोक्तसमस्तवाधारहितत्वादव्यावाधम् । विच्छिण्णं प्रतिपक्षभूतासातो-
दयेन सहितत्वाद्विच्छिन्न सान्तरितं भवतीन्द्रियसुखं, अतीन्द्रियसुखं तु प्रतिपक्षभूतासातोदयाभावान्नि-
रन्तरम् । बंधकारणं दृष्टश्रुतानुभूतभोगाकाङ्क्षाप्रभृत्यनेकापध्यानवशेन भाविनरकादिदुःखोत्पादक-
कर्मबन्धोत्पादकत्वाद्वन्धकारणमिन्द्रियसुखं, अतीन्द्रियसुखं तु सर्वापध्यानरहितत्वादबन्धकारणम् ।
अब, पुनः पुण्यजन्य इन्द्रियसुखको अनेक प्रकारसे दुःखरूप प्रकाशित करते हैं :-
गाथा ७६
अन्वयार्थ :- [यत्] जो [इंद्रियैः लब्धं] इंद्रियोंसे प्राप्त होता है [तत् सौख्यं]
वह सुख [सपरं] परसम्बन्धयुक्त, [बाधासहितं] बाधासहित [विच्छिन्न] विच्छिन्न
[बंधकारणं] बंधका कारण [विषमं] और विषम है; [तथा] इसप्रकार [दुःखम
एव] वह दुःख ही है।
टीका :- परसम्बन्धयुक्त होनेसे, बाधा सहित होनेसे, विच्छन्न होनेसे, बन्धका
कारण होनेसे, और विषम होनेसे, इन्द्रियसुख - पुण्यजन्य होनेपर भी - दुःख ही है ।
इन्द्रियसुख (१) 'परके सम्बन्धवाला' होता हुआ पराश्रयताके कारण पराधीन
है, (२) 'वाधासंहित' होता हुआ खाने, पीने और मैथुनकी इच्छा इत्यादि तृष्णाकी
व्यक्तियोंसे (तृष्णाकी प्रगटताओंसे) युक्त होनेसे अत्यन्त आकुल है, (३) 'विच्छिन्न'
होता हुआ असातावेदनीयका उदय जिसे 'च्युत कर देता है ऐसे सातावेदनीयके उदयसे
च्युत करना हटा देना; पदभ्रष्ट करना; (सातावेदनीयका उदय उसकी स्थिति अनुसार रहकर हट जाता है
और असाता वेदनीयका उदय आता है)
परयुक्त, वाधासहित, खंडित, बंधकारण, विषम छ ।
जे इन्द्रियोथी लब्ध ते सुख मे रोते दुःख ज खरे ॥ ७६ ॥

जन मात्रमाला] -नापन- सपरत्वात् बाबासहितत्वात् विच्छित्रत्वा बंधकारणत्या विण्यत्वाच्च पुण्यजन्य- मपोन्द्रियमुन्यं कुन्यमेव स्यात् । सपरं हि लन् परप्रत्ययत्वात् पराधीनतया, बाधासहितं हि महानायोन्यायपस्यातिभिस्तृष्णाव्यनिमिपेतत्वाद् अत्यन्ताकुलल्या, अत्यन्ताकुललया, विनिधन मनोयोदयाच्यावितमधोदयप्रवृत्ततया मानविपनतया, धकार हि महिनोपभोगमार्गानुलानरागादियोधनानुमारमंगच्छमानननपांमुपदनाबामह तया, विप्र हिनदभिवृद्रियनिहाणिपरिणवादनान्तविमलता = खमेव भवति । अचं पुष्यमपि पापामाधनमायानन् ।। ७ । मग पुण्यापयोर्गोपन निकिन्नुपमहानि - ण हि माद जो एवं पात्य विलयो नि पृष्णावा । योगमपारं मोहसंच बन्यो " for E. REETE Dural । बि 22 मा pairo ri--- मानना अनु र 2:कनार .... र ::::::::: (:: ) 11 :::: का (1)ी । नमः .imi :: 17:31 1 भार:. :... .. -- .

[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान नहि भन्यो एवं नाति विशेष इति पुण्यपापयोः । हिमति घोल संसार मोहसंछन्नः ॥ ७७॥ लामुलकावण गायोलोमामि गुलदुःखद्वैतमिव च न खलु परमार्थतः पुण्यपापनमजतिकते, जमनाहानमाविशेषत्वात् । यस्तु पुनरनयोः कल्याण- पुण्यानि जीवस्य तृष्णोत्पादकत्वेन दुःखकारणानि भवन्तीति कथनरपेण द्वितीयस्थले गाथाचतुष्टयं गतम् । अथ निश्चयेन पुण्यपार विशेपो नास्तीति कथयन् पुण्यपापयोाख्यानमुपसंहरति - ण हि लष्णदि जो एवं हि मन्यते य एकः । किम् । णत्थि विसेतो त्ति पुण्णपावाणं पुण्यपापयोनिश्चयेन विशेषो नास्ति । स किं करोति । हिदि घोरमपारं संसारं हिण्डति भ्रमति । कम् । संसारम् । कथंभूतन् । घोरन अपारं कामव्यापेक्षया । कथंभूतः । लोहसंघण्णो मोहप्रच्छादित इति । तथा हि - -- गाथा ७७ - . अन्वयार्थ :- [एवं] इसप्रकार [पुण्यपापयोः] पुण्य और पापमें [विशेषः नास्ति] अन्तर नहीं है [इति] ऐसा [यः] जो [न हि मन्यते] नहीं मानता, [मोहसंछन्नः] वह मोहाच्छादित होता हुआ [घोरं अपारं संसारं] घोर अपार संसारमें [हिण्डति] परिभ्रमण करता है । टीका :- यों पूर्वोक्त प्रकारसे, शुभाशुभ उपयोगके द्वैतकी भाँति और सुखदुःखके द्वैतकी भाँति, परमार्थसे पुण्यपापका द्वैत नहीं टिकता - नहीं रहता, क्योंकि दोनोंमें अनात्मधर्मत्व अविशेष अर्थात् समान है । (परमार्थसे जैसे शुभोपयोग और अशुभोपयोग- रूप द्वैत विद्यमान नहीं है, जैसे ' सुख और दुःखरूप द्वैत विद्यमान नहीं है, उसीप्रकार पुण्य और पापरूप द्वैतका भी अस्तित्व नहीं है; क्योंकि पुण्य और पाप दोनों आत्माके धर्म न होनेसे निश्चयसे समान ही हैं । ) ऐसा होने पर भी, जो जीव उन दोनोंमें - सुवर्ण और लोहेको बेड़ीकी भाँति - अहंकारिक अन्तर मानता हुआ, अहमिन्द्रपदादि- सम्पदाओंके कारणभूत धर्मानुराग पर अत्यन्त निर्भररूपसे (-गाढ़रूपसे) अवलम्बित है, वह जीव वास्तवमें चित्तभूमिके उपरक्त होनेसे (-चित्तकी भूमि कर्मोपाधिके निमित्तसे रंगी हुई - मलिन विकृत होनेसे) जिसने शुद्धोपयोग शक्तिका तिरस्कार किया है, ऐसा मुस=इन्द्रियसुस पुण्य और पापमें अन्तर होनेका मत अहंकारजन्य (अविद्याजन्य, अज्ञानजन्य है) । नहि मानतो-रीत पुण्ये पापमां न विशेष छ । ते मोहथी आच्छन्न घोर अपार संसारे भमे ॥ ७७ ॥ २ - न गान्त्रमाला] कालायसनिगच्योरिवाहनारिक विशेषमभिनन्यमानोहमिन्द्रपनाविलंपदा निदानमिति निर्भरतरं धर्मानुरागमवलम्बने स बलप त्तितया तिरस्कृतमुनोपयोगतिर मंगारंगारीरं दुग्धमेवानुभवति ।। ७४ ।। नवमयाग्निभागुभोपयोगाविरोध: समलमपि नगतमहामन्त्रीपद भवाय मुनिश्रितमना: मुद्रोपोगमधिनमति एवं विविवत्यो जो कब्जेन न रागर्मति दोलंदा। उनयोगविसनो नो बेटि देहम दुवं ॥ ७ ॥ एवं विस्तायों यो च्येषु न रागन का। उपयोगविगतः न अति गोद } -अदननसार- १३८ [भगवान भोगुन्दान्त-कहान यो हि नाम शुभानामशुभानां च भावान्तामविशेषदर्शनेन सम्यकपरिच्छिन्नवस्तु- स्वरूपः ल्वपरविभागादस्थितेषु समनेषु तसगापर्यायेषु द्रव्येषु रागं पं चाशेपमेव परि- वर्जयति स किलैकान्तेनोपयोगविशुद्धतया परित्यक्तपरद्रव्यालम्बनोऽग्निरिवायःपिण्डादन- नुष्ठितायःसारः प्रचण्डघनघातस्थानीयं शारीरं दुःखं क्षपयति । ततो ममायमेवैकः शरणं शुद्धोपयोगः ॥ ७ ॥ वा निजशुद्धात्मद्रव्यादन्येषु शुभाशुभसर्वद्रव्येषु राग द्वेपं वा न गच्छति उवओगविसुद्धो सो रागादि- रहितशुद्धात्मानुभूतिलक्षणेन शुद्धोपयोगेन विशुद्धः सन् सः खवेदि देहब्भवं दुक्खं तप्तलोहपिण्ड- स्थानीयदेहादुद्भवं अनाकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसुखाद्विलक्षणं परमाकुलत्वोत्पादकं लोहपिण्डरहि- तोऽग्निरिव घनघातपरंपरास्थानीयदेहरहितो भूत्वा शारीरं दुःखं क्षपयतीत्यभिप्रायः ।। ७८ ।। गाथा ७८ [ अन्वयार्थ :- [एवं] इसप्रकार [विदितार्थः] वस्तुस्वरूपको जानकर [यः] जो [द्रव्येषु] द्रव्योंके प्रति [राग द्वषं वा] राग या द्वेषको [न एति] प्राप्त नहीं होता, [सः] वह [उपयोगविशुद्धः] उपयोगविशुद्ध होता हुआ [देहोद्भवं दुःखं] देहोत्पन्न दुःखका [क्षपयति] क्षय करता है। टीका :- जो जीव शुभ और अशुभ भावोंके अविशेषदर्शनसे (-समानताकी श्रद्धासे) वस्तुस्वरूपको सम्यक्प्रकारसे जानता है, स्व और पर ऐसे दो विभागोंमें रहनेवाली, समस्त पर्यायों सहित समस्त द्रव्योंके प्रति राग और द्वेषको निरवशेषरूपसे छोड़ता है, वह जीव, एकान्तसे उपयोगविशुद्ध (-सर्वथा शुद्धोपयोगी) होनेसे जिसने परद्रव्यका आलम्बन छोड़ दिया है ऐसा वर्तता हुआ- लोहेके गोलेमेंसे लोहेके 'सारका अनुसरण न करनेवाली अग्निकी भाँति - प्रचंड घनके आघात समान शारीरिक दुःखका क्षय करता है । (जैसे अग्नि लोहेके तप्त गोलेमेंसे लोहेके सत्वको धारण नहीं करती इसलिये अग्नि पर प्रचंड घनके प्रहार नहीं होते, उसीप्रकार परद्रव्यका आलम्बन न करनेवाले आत्माको शारीरिक दुःखका वेदन नहीं होता।) इसलिए यही एक शुद्धोपयोग मेरी शरण है ।। ७८ ॥ अव, सर्व सावद्ययोगको छोड़कर चारित्र अङ्गीकार किया होनेपर भी यदि मैं शुभोपयोगपरिणतिके वश होकर मोहादिका उन्मूलन न करू', तो मुझे शुद्ध आत्माकी. सार-सत्व, घनता, कठिनता । उन्मूलन जड़मूलसे निकाल देना; निकन्दन । १ २२ जैन गास्त्रमाला जय यदि सर्वसावच्योगमात्य चरित्रमुपस्थितोऽपि गुभोपयोगानुतिगतया मोहादोनोन्मूलयामि, ततः कुनो में मुद्रात्मनाम इति मरम्मेपोतिष्ठते- चत्ता पाचारंभ समुदिो वा महम्मि रियस्मि । ण जहदि जदि मोहादी ग लहदि लो अपनं सुद्धं ॥ ७॥ त्वया पापारम्भ बमुश्यितो का मुने । ननहानि यति मोहानोन नमने न आम गुन ।। || १४२ [ना-Tam यो हि नामार्हन्तं द्रव्यत्यगुण पर्यो पनि नन्तिम नामा परिजिनति, उभयोरपि निश्चयेनाविशेषात् । महतोऽपि पावागत कार्यरत परिमात्मा पं, ततस्तत्परिच्छेदे सर्वात्मपरिच्छेदः । तान्यो का, अनाविशेषणं गुणः, अन्वयव्यति- रेकाः पर्यायाः । तत्र भगवत्यहति सर्वतो दिनुढे निभूमिकमपि स्वमनसा समय मुत्पश्यति । यश्च तनोऽयमित्यन्वयस्तद्व्यं, बच्चात्ययाश्रितं नेतन्यमिति विशेषणं स गुणः, चैकसमयमात्रावधृतकालपरिमाणतया परस्परपरावृत्ता अन्वयव्यतिरेकारते पर्यायाभि- द्विवर्तनग्रन्थय इति यावत् । अथैवमस्य त्रिकालमप्येककालमाकलयतो मुक्ताफलानीव ये भूतममूर्तमसंख्यातप्रदेणं शुद्धतन्यान्वयरूपं द्रव्यं नेति । इलंत गुणपगरगाणं पूर्णमल भिगाने परमात्मनि ज्ञात्वा पश्वानिश्चयनयेन तदेवागमवारपरभूतयाऽध्यात्मभाषगा निजगुदात्मभावना- भिमुखरूपेण सविकल्पस्वसंवेदनज्ञानेन तथैवागमभानयाधःप्रवृत्ति करणापूर्ण करणानिवृत्तिकरणसंश- दर्शनमोहक्षपणसमर्थपरिणामविशेषवलेन पश्चादात्मनि योजगति । तदनन्तरमविकलास्वरूप प्राप्ते, अन्वयके आश्रित रहनेवाला 'चैतन्य' विशेषण वह गुण है, और एक समय मात्रकी मर्यादावाला कालपरिमाण होनेसे परस्पर अप्रवृत्त 'अन्वयव्यतिरेक वे पर्यायें हैं - जो कि चिद्विवर्तनकी [-आत्माके परिणमनकी] ग्रन्थियाँ [गांठे] हैं । अब, इसप्रकार त्रैकालिकको भी [-त्रैकालिक आत्माको भी] एक कालमें समझ लेनेवाला वह जीव, जैसे मोतियोंको झूलते हुए हारमें अन्तर्गत माना जाता है, उसी- प्रकार चिद्विवर्तीका चेतनमें ही संक्षेपण [अंतर्गत] करके, तथा विशेपणविशेष्यताकी वासनाका अन्तर्धान होनेसे - जैसे सफेदीको हारमें अन्तर्हित किया जाता है, उसी- प्रकार -चैतन्यको चेतनमें ही अन्तर्हित करके, जैसे मात्र "हारको जाना जाता है, उसीप्रकार केवल आत्माको जानने पर, उसके उत्तरोत्तर क्षणमें कर्ता-कर्म-क्रियाका विभाग क्षयको प्राप्त होता जाता है इसलिये निष्क्रिय चिन्मात्र भावको प्राप्त होता है; ' अन्वयव्यतिरेक-एक दूसरेमें नहीं प्रवर्तते ऐसे जो अन्वयके व्यतिरेक । २ विशेषण गुण है और विशेष्य वो द्रव्य है। 3 अंतर्धान अदृश्य होजाना । ४ अंतहितगुप्त; अदृश्य । ५ हारको सरीदनेवाला मनुष्य हारको खरीदते समय हार, उसकी सफेदी और उसके मोतियों इत्यादिको परीक्षा करता है, किन्तु बादमें सफेदी और मोतियोंको हारमें ही समाविष्ट करके उनका लक्ष छोड़कर वह मात्र हारको ही जानता है । यदि ऐसा न करे तो हारके पहिनने पर भी उसकी सफेदी आदिके विकल्प बने रहनेसे हारको पहननेके सुजका वेदन नहीं कर सकेगा।

- जन गात्रमाला] प्रलम्ने पालम्ने चिहिवर्तात्रेतन एब मंक्षिप्य बियपवित्ववासनान्तर्गनानव- लिमाननिय प्रालम्बे चेतन एव चैतन्यमनहितं विधाय के प्रालमित्र केवलमात्मानं परिच्छिन्दतस्तदुत्तोतरक्षणक्षोग्रमाण जन्यिाविभागतया निषि चिन्मानं भावमधिगतम्य जातस्य मरियाकम्पवृत्तनिमनालोशम्यामात्र निराशनया मोहनमः प्रलीयते । यवं नब्यो मग्रा मोहवाहिनीवियोपाय: ।। ८० ॥ अचवं प्राप्तचिन्तामपि में मानो उन्नति जानि जीवो ववगदमोहो उबलन्द्रो तनमपणो सम्म । जहदि नदि रागदोने को आपाणं लहदि मुलं ॥१॥ ।

१४४
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जीदो समतोल सा :-
जाति यति नमः मात्मानं लगते शुजन् ।। ८१ ॥
एवमुपणितरवल्लोषागे दोर त सागामार मुगलम्यापि यदि नाम
रागद्वेषौ नि लवति तदा गुनगामात ति। यदि पुनः पुनरपि तावनुवर्तते तदा
चारित्रमोहनंज्ञवीरोऽस्तीति मस्यामा मागितामणेः राणा जागीति
कथयति - जीयो डोव कर्ता ! निनिति । बगदमोजोसमा निपतिमानिनानिदर्शन-
मोहः । पुनरपि किविशिष्ट: ।
सामान नाया । तिनं परमानकनगावात्म-
तत्वम् । कस्य संबन्धि । अप्पको निमगुगतानः । पम् । सम्म राम्गत मशगादिरहितत्पन
जहदि जदि रागोरो गुजात्मानुभूतिलक्षणयीत रागनास्तिपतिको नारिसमोसंज्ञो रागागो गदि
त्यजति सो अप्पाणं लहदि तु स एवमभेद रत्ननगणितो लोगः शुकरामानमात्मानं लभते
अब, इसप्रकार मैंने चिंतामणि-रत्न प्राप्त कर लिया है तथापि प्रमाद चोर
विद्यमान है, ऐसा विचार कर जागृत रहता है
गाथा ८१
अन्वयार्थ :- [व्यपगतमोहः] जिसने मोहको दूर किया है और [सम्यक् आत्मनः
तत्त्वं] आत्माके सम्यक् तत्वको (-सच्चे स्वरूपको) [उपलब्धवान् ] प्राप्त किया है
ऐसा [जीवः] जीव [यदि] यदि [रागद्वे पौ] रागद्वेषको [जहाति] छोड़ता है, [सः]
तो वह [शुद्धं आत्मानं] शुद्ध आत्माको [लभते] प्राप्त करता है ।
टीका :- इसप्रकार जिस उपायका स्वरूप वर्णन किया है, उस उपायके द्वारा
मोहको दूर करके भी सम्यक् आत्मतत्वको (यथार्थ स्वरूपको) प्राप्त करके भी यदि
जीव रागद्वेषको निर्मूल करता है, तो शुद्ध आत्माका अनुभव करता है । (किन्तु) यदि
पुनः-पुनः उनका अनुसरण करता है, -- रागद्वेषरूप परिणमन करता है, तो प्रमादके अधीन
होनेसे शुद्धात्मतत्वके
अनुभवरूप चिंतामणि-रत्नके चुराये जानेसे अन्तरंगमें खेदको प्राप्त
होता है । इसलिये मुझे रागद्वेषको दूर करनेके लिये अत्यन्त जागृत रहना चाहिये ।
भावार्थ :-८० वीं गाथामें बताये गये उपायसे दर्शनमोहको दूर करके, अर्थात्
सम्यक्दर्शन प्राप्त करके जो जीव शुद्धात्मानुभूतिस्वरूप वीतरागचारित्रके प्रतिबन्धक राग-
जीव मोहने करी दूर, आत्मस्वरूप सम्यक् पामीने ।
जो रागद्वेष परिहरे तो पामतो शुद्धात्मने ॥१॥

जन गास्त्रमाना] प्रमावतन्त्रतया लुण्ठितगुवात्मतत्त्वोपनभत्रिन्तानोन्नतान्यति । अनोमा नागने- निषेधायात्यन्तं जागन्तिव्यन् ॥2॥ अधायमेवंको भगतिः मुख्यमनुस्योपगिलो नियमाय गमाथिकः पन्या इति मनि व्यवस्थापयति मन्ने वि व अरहता तंग विधाण विकम्मना । किच्चा तधोक्स णिबाना ते नमो नि ।।२।। मपि नाइलन रियानेन निमः । कृत्या तो निनाम्न नमानेन्नः ॥८}} ३ १४६ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यतः खल्वतीतकालानुभूतक्रमप्रवृत्तयः समस्ता अपि भगवन्तस्तीर्थकराः, प्रकारान्त- रस्यासंभवादसंभावितकै तेनामुनैवैकेन प्रकारेण क्षपणं कर्माशानां स्वयमनुभूय, परमाप्ततया - इत्युपदेशं कृत्वा णिव्वादा निर्वृता अक्षयानन्तसुखेन तृप्ता जाताः, ते ते भगवन्तः । णमो तेसि एवं मोक्षमार्गनिश्चयं कृत्वा श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेवास्तस्मै निजशुद्धात्मानुभूतिस्वरूपमोक्षमार्गाय तदुपदेश- केन्योऽर्हद्भूयश्च तदुभयस्वरूपाभिलापिणः सन्तो 'नमोस्तु तेभ्य' इत्यनेन पदेन नमस्कारं कुर्वन्तीत्य- भिप्रायः ।। ८२ ।। अथ रत्नत्रयाराधका एव पुरुपा दानपूजागुणप्रशंसानमस्कारार्हा भवन्ति नान्या इति कथयति. दंसणसुद्धा पुरिसा णाणपहाणा समग्गचरियत्था । पूजासक्काररिहा दाणस्स य हि ते णमो तेसि ॥ १७ ॥ दसणसुद्धा निजशुद्धात्मरुचिरूपनिश्चयसम्यक्त्वसाधकेन मूढत्रयादिपञ्चविंशतिमलरहितेन तत्त्वार्थश्रद्धानलक्षणेन दर्शनेन शुद्धा दर्शनशुद्धाः । पुरिसा पुरुपा जीवाः । पुनरपि कथंभूताः । णाण- पहाणा निरुपरागस्वसंवेदनज्ञानसाधकेन वीतरागसर्वज्ञप्रणीतपरमागमाभ्यासलक्षणज्ञानेन प्रधानाः समर्था: प्रोढा ज्ञानप्रधानाः । पुनश्च कथंभूताः । समग्गचरियथा निविकारनिश्चलात्मानु- भूतिलक्षणनिश्चयचारित्रसाधकेनाचारादिशास्त्रकथितमूलोत्तरगुणानुष्ठानादिरूपेण चारित्रेण समग्राः परिपूर्णाः समग्रचारित्रस्थाः पूजासक्काररिहा द्रव्यभावलक्षणपूजा गुणप्रशंसा सत्कारस्तयोरा योग्या भवन्ति । दाणस्स य हि दानस्य च हि स्फुटं ते ते पूर्वोक्तरत्नत्रयाधाराः। णमो तेसि नमस्तेभ्य इति नमस्कारस्यापि त एव योग्याः ।। १७ ।। एवमाप्तात्मस्वरूपविषये मूढत्वनिरासार्थ गाथासप्तकेन द्वितीयज्ञानकण्डिका गता। अथ शुद्धात्मोपलम्भप्रतिपक्षभूतमोहस्य स्वरूपं भेदांश्च प्रतिपादयति - गाथा ८२ अन्वयार्थ :- [सर्वे अपि च] सभी [अर्हन्तः] अरहन्त भगवान [तेन विधानेन] उनी विधिने [क्षपितकर्माशाः] कर्माशोंका क्षय करके [तथा] तथा उसीप्रकारसे [उपदेशं कृत्वा] उपदेश करके [निर्वृताः ते] मोक्षको प्राप्त हुए हैं [नमः तेभ्यः] उन्हें नमस्कार हो। टीका :- अतीत कालमें क्रमशः हुए समस्त तीर्थकर भगवान, 'प्रकारान्तरका अगनब होनेसे जिसमें द्वेत संभव नहीं है, ऐसे इसी एकप्रकारसे कर्माशों (ज्ञाना- बरमादि कर्म भेदों) का क्षय स्वयं अनुभव करके (तथा) 'परमाप्तताके कारण • सपना र प्ररार (कर्मक्षय एक ही प्रकारने होता है, अन्य-प्रकारसे नहीं होता, इसलिये उस कर्मक्षयके र अर्थात् दोपपता नहीं है)। परम अन; परम विश्वासपात्र (तीर्थकर भगवान सर्वज्ञ और वीतराग होनेसे परम आप्त हैं, यथार्य १४७ जन मामाला] परेशामप्यायवामिदानीत्य वा मुनणां तक तदुपदिय नि:समध्याश्रिताः, ततो नान्य निर्माणमच्याते। अलमवा प्रलपितेन । व्यवस्थिता तिनन । नमो भगवः ।। २॥ अब गुवात्मनामनिर्यान्यनो मेहब बना अनिकाल विभाति दशदिएन मुढो भावो जोवन हदि मोहोति । यदि तेगच्छणो पप्पा सनं ३ टोसं वा ।।३।। लागि सही मायने जन्म भकति मेह नि। अनि नाम: प्राय गर्ग वा का।

१४८ [भमान मानहान यो हि जागतिक पूर्वागत समारोग जीवा तल्लापतिपति- लक्षणो हो भायः साल कोर : T: सागमामा परमात्मतव्यतन परगुणमात्मगुणतया परपयाला न तिमामानः प्रातरातरसंस्कारतया परद्रव्योवाहरहरुलाबानो, होगा तेऽपि प्रतिता तो रनितारनिते विषयेषु राग पाहपलिया, तुतार हितः सेतुबन्ध इचधा विदार्गमाणा नितरां क्षोभमुपैति । अतो मोहराम हिनभूमितो मोहः ॥८३ ॥ वच्छन्नो झस्पितः सन्नभिनायतपरीतन धोभेण यो सपनलनं विपयंगं गलति । कि कृत्वा । पणा राबोर ना निर्विकारतुद्धात्मनो पितरोतमिष्टानिटेन्द्रिगविणगेगु हनिपारण चारित्रमोहसंशं रागढे पं का प्राध्यति । अनेन किमुक्त भवति । मोहो वर्णनमोहो गरे पदार्ग चारित्रमोहने ति विभूनिको मोह इति ।। ८३ ।। अग दुःसहेतुभूतबन्धस्य कारणभूता रागद्वेष मोहा गाथा ८३ अन्वयार्थ :- [जीवस्य] जीवके [द्रव्यादिकेषु मढ़ः भावः] द्रव्यादि सम्बन्धी मूढ़ भाव (-द्रव्यगुणपर्यायसम्बन्धी जो मूढ़तारूप परिणाम) [मोहः इति भवति] वह मोह है [तेन अवच्छन्नः] उससे आच्छादित वर्तता हुआ जीव [रागं वा द्वेषं वा प्राप्य] राग अथवा द्वषको प्राप्त करके [क्षुभ्यति] क्षुब्ध होता है । टीका :- धतूरा खाये हुए मनुष्यकी भाँति, जीवके जो पूर्व वणित द्रव्य-गुण- पर्याय हैं उनमें होनेवाला 'तत्व-अप्रतिपत्तिलक्षण मूढ़ भाव वह वास्तवमें मोह है । उस मोहसे निजरूप आच्छादित होनेसे यह आत्मा परद्रव्यको स्वद्रव्यरूपसे, परगुणको स्वगुणरूपसे, और परपर्यायोंको स्वपर्यायरूप समझकर - अंगीकार करके, अति रूढ़ दृढ़तर संस्कारके कारण परद्रव्यको ही सदा ग्रहण करता हुआ, 'दग्ध इन्द्रियोंकी रुचिके वशसे अद्वैतमें भी द्वैत प्रवृत्ति करता हुआ, रुचिकर-अरुचिकर विषयोंमें रागद्वेष करके अति प्रचुर जलसमूहके वेगसे प्रहारको प्राप्त सेतुबन्ध (पुल) की भाँति दो भागोंमें - तत्व अप्रतिपत्तिलक्षण= तत्वको अप्रतिपत्ति (-अप्राप्ति, अज्ञान, अनिर्णय) जिसका लक्षण है ऐसा। २ दग्ध-जली हुई; हल्की; शापित । ('दग्ध' तिरस्कारवाचक शब्द है) 3 इन्द्रियविषयोंमें - पदार्थोमें 'यह अच्छे हैं और यह बुरे' इसप्रकारका द्वैत नहीं है; तथापि वहां भी मोहाच्छादित जीव अच्छे-बुरेका द्वैत उत्पन्न कर लेते हैं ।

नगान्प्रमाला] अधानिष्टकार्यकारणत्वमभिधाय विभूमिकस्यापि मोहय मनमासूत्रपति मोहेण व सगेण व दोसण व परिणदल जीवल्म । जार्याट विविहो बंछो तम्हा से संबदबा ॥८४ ॥ मोन या गणवा वा जिन जीवन्न । सामने विग्धिो नामानं मंसचिनलाः ॥ ४॥ . . -- ....

.
१५०
[भगवान पोरा-TATI
एवमस्य तत्वाप्रतिपत्तितिमीलिया, मोरेन या रागेण वाहण का परिणतन्य,
तृणपटलावच्छन्नगर्तसंगतस्य करेनोगामासकरय प्रतिदिग्दर्शनोजतप्रविधावितम्य
च सिन्धुरस्येव, भवति नान नानापियो । ततोऽमो अनिष्टकार्यकारिणो मुमुक्षणा
भोहरागद्वेषाः सम्यन्निर्मूलकापं कपित्या भाषणीयाः ॥४॥
अथामी अमोभिलिङगैरुपलन्योद्भवन्त एव निशुम्भनीया इति विभावयति -
अङ्के अजधानहगं करुणाभावो य तिरियमणुएसु ।
बिसएसु य पसंगो मोहस्सेदाणि लिंगाणि ॥ ८५॥
-
सर्वप्रकारोपादेयभूतस्वाभाविकसुखविपरीतस्य नारकादिदुःसस्य कारणभूतो विविधबन्धो जायते ।
तम्हा ते संखबइदव्वा यतो रागद्वेपमोहपरिणतस्य जीवस्येत्यंभूतो बन्धो भवति ततो रागादिरहित-
शुद्धात्मध्यानेन ते रागद्वेषमोहा सम्यक क्षपयितव्या इति तात्पर्यम् ।। ८४ ।। अथ स्वकीयस्वकीयलिङ्ग
रागद्वेषमोहान् ज्ञात्वा यथासंभवं त एव विनाशयितव्या इत्युपदिशति - अढे अजधागहणं शुद्धात्मा-
दिपदार्थे यथास्वरूपस्थितेऽपि विपरीताभिनिवेशरूपेणायथाग्रहणं करुणाभावो य शुद्धात्मोपलब्धिलक्ष-
णपरमोपेक्षासंयमाद्विपरीतः करुणाभावो दयापरिणामश्च अथवा व्यवहारेण करुणाया अभावः ।
भावार्थ :- (१) हाथीको पकड़नेके लिये धरतीमें खड्डा बनाकर उसे धाससे
ढक दिया जाता है, वहां खड्डा होनेके अज्ञानके कारण उस खड्डे पर जानेसे हाथी गिर
पड़ता है और वह इसप्रकार पकड़ा जाता है। (२) हाथीको पकड़ने के लिये सिखाई
हुई हथिनी भेजी जाती है; उसके शारीरिक रागमें फंसनेसे हाथी पकड़ा जाता है
(३) हाथी पकड़नेकी तीसरी रीति यह है कि उस हाथीके सामने दूसरा पालित हाथी
भेजा जाता है; उसके पीछे वह हाथी उत्तेजित होकर लड़नेके लिये दौड़ता है और
इसप्रकार वह पकड़नेवालोंके जालमें फंस जाता है ।
उपर्युक्त प्रकारसे जैसे हाथी (१) अज्ञानसे, (२) रागसे या (३) द्वषसे अनेक
प्रकारके बन्धनको प्राप्त होता है उसीप्रकार जीव (१) मोहसे, (२) रागसे या
द्वपसे अनेक प्रकारके बन्धनको प्राप्त होता है, इसलिये मोक्षार्थीको मोह-राग-द्वेषका
भलीभांति-सम्पूर्णतया मूलसे ही क्षय कर देना चाहिये ।। ८४ ।।
अर्थों तणु अयथाग्रहण, करुणा मनुजतिर्यचमां ।
विषयो तणो वणी संग, - लिंगो जाणवां आ मोहनां ॥२५॥

जनमारमाला म जमाकरणामात्र नियंत मनुषु । विध प्रमङ्गो मोहनानि लिङ्गानि ।। ८५ ।। अनामयानातिपन्या नियमनुषु वापिकावुलमा , मोहम- भांविषयमंगेन नगमनभीष्टपात्रमा पनि विभिनिधिगच भगिनि यदि त्रिमित्रोध मोही किन्तमः ।।५।।

परिशानाभावे जोहो भवतीति र पूर्व तदर्भमागमामानं कारगति । अषता गगुणपर्याय-
स्वैरहत्परिज्ञाना तात्मारिकानं नोति मत तदारमनिशानगिममागमाभ्यासमपेक्षत इति पात-
निकाद्वयं जनागि धृतः। रामगिदं निषादयति - जिसमायो अढ़े पत्तासादीहि बज्झयो णियमा
जिनशास्त्रात्मकाया बुद्धात्मातिपदान प्रत्यवादिषमाध्यमानम्ग जानतो जीवस्य निगमानि-
श्वयात् । किं फलं भवति : सोपनि मोहोदचयो दुरभिनिवेगकारकारी मोहोपनयः धीगते प्रलीगते
--
वे दर्शनभोहके चिह्न हैं, इष्ट विषयोंमें प्रीति रागका चिह्न है और अनिष्ट विषयोंमें
अप्रीति द्वेषका चिह्न है । इन चिह्नोंसे तीनों प्रकारके मोहको पहिचानकर मुमुक्षुओंको
उसे तत्काल ही नष्ट कर देना चाहिये ।। ८५ ।।
अब मोहक्षय करनेका उपायान्तर (दूसरा उपाय) विचारते हैं :-
गाथा८६
अन्वयार्थ :- [जिनशास्त्रात्] जिनशास्त्र द्वारा [ प्रत्यक्षादिभिः] प्रत्यक्षादि
प्रमाणोंसे [अर्थान् ] पदार्थोंको [बुध्यमानस्य] जाननेवालेके [नियमात्] नियमसे
[मोहोपचयः] 'मोहोपचय [क्षीयते] क्षय हो जाता है [तस्मात्] इसलिये [शास्त्रं]
शास्त्रका [समध्येतव्यम् ] सम्यक् प्रकारसे अध्ययन करना चाहिये ।
टीका :- द्रव्य-गुण-पर्यायस्वभावसे अरहंतके ज्ञान द्वारा आत्माका उस प्रकारका
ज्ञान मोहक्षयके उपायके रूपमें पहले (८० वी गाथामें) प्रतिपादित किया गया था, वह
वास्तवमें इस (निम्नलिखित) उपायान्तरकी अपेक्षा रखता है। (वह उपायान्तर क्या
है सो कहा जाता है:-
मोहोपचयः-मोहका उपचय । (उपचय-संचय; समूह)
शास्त्रो वडे प्रत्यक्ष आदिथी जाणतो जे अर्थ ने ।
तसु मोह पामे नाश निश्चय; शास्त्र समध्ययनीय छे ॥८६॥

अंदगास्त्रमाना] - पक्किल गुणपर्णपल्भावनाको जानावासनस्तानानं मोहयोपान प्रायः प्रतिपन्नदानन्धपायानमिदमधने। दिविहिनचनमा जोपजना मनोमाधिनं गार प्रमान्य बोलनकाशित नवनानियत्रः महायव्यानंदोवापिना पकाना नविधिना मा. जान नन्दनः ममानव बन्नुलानं निचलनः संचन एकानन्दाकिला- कान मापनम: । उनी हिमपा पन्जायनं भारत- परिणामेन मम्मीरमानमुगमानन्द ।।।।

१५४ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अथ कथं जैनेन्द्र शब्दब्रह्मणि किलार्थानां व्यवस्थितिरिति वितर्कयति दव्वाणि गुणा तेसिं पज्जाया अठ्ठसण्णया भणिया । तेसु गुणपज्जयाणं अप्पा दव त्ति त्ति उवदेसो ॥ ८७॥ पज्जाया अठ्ठलण्णया भणिया द्रव्याणि गुणास्तेषां द्रव्याणां पर्यायाश्च त्रयोऽप्यर्थसंज्ञया भणिताः कथिता अर्थसंज्ञा भवन्तीत्यर्थः । तेसु तेपु त्रिपु द्रव्यगुणपर्यायेपु मध्ये गुणपज्जयाणं अप्पा गुणपर्यायाणां संबंधी आत्मा स्वभावः । कः इति पृष्टे । दव्व ति उवदेसो द्रव्यमेव स्वभाव इत्युपदेशः, अथवा द्रव्यस्य कः स्वभाव इति पृष्टे गुणपर्यायाणामात्मा एव स्वभाव इति । अथ विस्तर:- अनन्तज्ञान- सुखादिगुणान् तथैवामूर्तत्वातीन्द्रियत्वसिद्धत्वादिपर्यायांश्च इयति गच्छति परिणमत्याश्रयति येन कारणेन तस्मादर्थो भण्यते । किम् । शुद्धात्मद्रव्यम् । तच्छुद्धात्मद्रव्यमाधारभूतमियति गच्छन्ति अव, जिनेन्द्र के शब्द ब्रह्ममें अर्थोकी व्यवस्था (-पदार्थोंकी स्थिति) किस प्रकार है सो विचार करते हैं गाथा ८७ अन्वयार्थ :- [द्रव्याणि] द्रव्य, [गुणाः] गुण [तेषां पर्यायाः] और उनकी पर्यायें [अर्थसंज्ञया] 'अर्थ' नामसे [भणिताः] कही गई हैं। [तेषु] उनमें, [गुणपर्यायाणाम आत्मा द्रव्यम् ] गुण-पर्यायोंका आत्मा द्रव्य है (गुण और पर्यायोंका स्वरूप-सत्व द्रव्य ही है, वे भिन्न वस्तु नहीं हैं) [इति उपदेशः] इसप्रकार (जिनेन्द्रका) उपदेश है । टीका :- द्रव्य, गुण और पर्यायोंमें अभिधेयभेद होने पर भी अभिधानका अभेद होनेसे वे 'अर्थ' हैं [अर्थात् द्रव्यों, गुणों और पर्यायोंमें वाच्यका भेद होनेपर भी वाचकमें भेद न देखें तो 'अर्थ' ऐसे एक ही वाचक (-शब्द) से ये तीनों पहिचाने जाते हैं । उसमें (इन द्रव्यों, गुणों और पर्यायोंमेंसे), जो गुणोंको और पर्यायोंको प्राप्त करते हैं - पहुँचते हैं अथवा जो गुणों और पर्यायोंके द्वारा प्राप्त किये जाते हैं - पहुँचे जाते हैं ऐसे ''अर्थ' वे द्रव्य हैं, जो द्रव्योंको आश्रयके रूपमें प्राप्त करते हैं - पहुँचते हैं - अथवा आश्रयभूत द्रव्योंके द्वारा प्राप्त किये जाते हैं - पहुँचे जाते हैं ऐसे 'अर्थ' वे • ' धातुमने 'आई' मन्द बना है। 'ऋ' अर्थात् पाना, प्राप्त करना, पहुंचना, जाना । 'अर्थ' अर्थात् (१) जो पा - प्राप्त करे - पहुँचे, अयवा (२) जिसे पाया जाये - प्राप्त किया जाये - पहुँचा जाये । द्रव्यो, गुणो ने पर्ययो सौ 'अर्थ' संज्ञा थी कह्यां । गुण-पर्ययोनो आतमा छे द्रव्य जिन-उपदेशमां ॥८७॥ जो गुण हैं, जो - रंना मान्यमाना] च्याणि गुणाने या अनंजया भपिताः । ने गुणानामामात्मा नियुः ।। माणिक गुण पांचाळ अभिमभिधानानेन यां: । गुणा- गानिर्यान गुणपाल पनि कार्याणि व्यायामानर्यात गर्न न हानि का अर्वा गुणाः कणि अमर्गणमानेन : अमन नायक मि १५६ [भगवान भोगन्दकुन्द-कहान वा अर्थाः पर्यायाः । यथा हि सुवर्ण पीतनादीन गुणान् कुण्डलादीभ पर्यायानिति तैरयं- माणं वा अर्थो द्रव्यस्थानीयं, यथा च सुवर्णनाभवत्येनेतितेनागभूतेनार्यमाणा वा अर्थाः पीततादयो गुणाः, यथा व सुवर्ण क्रमपरिगानेनेति तेन क्रमपरिणामेनार्यमाणा वा अर्थाः कुण्डलादयः पर्यायाः । एकाधनादि । यया चैतेषु सुवर्णपीततादिगुणकुण्डलादिपर्यायेषु पीततादिगुणकुण्डलादिपाणां सुवर्णावपृथग्भावात्सुवर्णमेवात्मा तथा च तेषु द्रव्यगुण- पर्यायेछु गुणपर्यायाणां द्रव्यापुनरभावाद्रव्यमेवात्मा ॥ ८७ ॥ अथैवं मोहक्षपणोपराभूजनेश्वरोपदेशलाभेऽपि पुरुपकारोऽर्थक्रियाकारोति पौरुषं व्यापारयति द्रव्यस्य कः स्वभाव इति पृष्टे पूर्वोक्तगुणपर्याया एव । एवं शेषद्रव्यगुणपर्यायाणामप्यर्थसंज्ञा वोद्धव्येत्यर्थः ।। ८७ ।। अथ दुर्लभजैनोपदेशं लब्ध्वापि य एव मोहरागद्वेपानिहन्ति स एवाशेष- और जैसे इन सुवर्ण, पीलापन इत्यादि गुण और कुण्डल इत्यादि पर्यायोंमें (-इन तीनोंमें, पीलापन इत्यादि गुणोंका और कुण्डल इत्यादि पर्यायोंका) सुवर्णसे अपृथक्त्व होनेसे उनका (-पोलापन इत्यादि गुणोंका और कुण्डल इत्यादि पर्यायोंका) सुवर्ण ही आत्मा है, उसीप्रकार उन द्रव्य गुण पर्यायोंमें गुण - पर्यायोंका द्रव्यसे अपृथक्त्व होनेसे उनका द्रव्य ही आत्मा है (अर्थात् द्रव्य ही गुण और पर्यायोंका आत्मा-स्वरूप-सर्वस्व- सत्व है)। भावार्थ :- ८६ वी गाथामें कहा है कि जिनशास्त्रोंका सम्यक् अभ्यास मोहक्षयका उपाय है । यहाँ सँक्षेपमें यह बताया है कि उन जिनशास्त्रोंमें पदार्थोकी व्यवस्था किस- प्रकार कही गई है। जिनेन्द्रदेवने कहा है कि - अर्थ (पदार्थ) अर्थात् द्रव्य, गुण, और पर्याय । इसके अतिरिक्त विश्व में दूसरा कुछ नहीं है, और इन तोनोंमें गुण और पर्यायोंका आत्मा (-उसका सर्वस्व) द्रव्य ही है। ऐसा होनेसे किसी द्रव्यके पर्याय अन्य द्रव्यके गुण और पर्यायरूप किंचित् मात्र नहीं होते, समस्त द्रव्य अपने-अपने गुण और पर्यायोंमें रहते हैं। - ऐसी पदार्थोंकी स्थिति मोहक्षयके निमित्तभूत पवित्र जिनशास्त्रोंमें कही है ।। ८७ ।। अव इसप्रकार मोहक्षयके उपायभूत जिनेश्वरके उपदेशकी प्राप्ति होनेपर भी पुरुषार्थ 'अर्थक्रियाकारी है इसलिये पुरुषार्थ करता है अभियाकारी प्रयोजनभूत क्रियाका (सर्वदुःखपरिमोक्षका) करनेवाला । गुण और १ .

- रंगायमाना] जो मोहरागदोसे णिहदि उबनभ जोहबदेस । सो सबदुरखमोर, पावदि अचिरेण कालेण ॥ ८ ॥ जो मोहन पानिन्न उपलन् जनमुन । न मनमोक्ष मनोनित गानेन । = !! हिमाचीनि समाजपये कमा नमुनापिनयमिकन्या निधानपयाथानीय 7 एक मोहगार हुन कि न निग्लिरिमोट मित्रमेयानोनि. नागे यान: वालमाणिन्ति ! अन र मन थपका का निर्णयामि ।। == 11 "aria-~ोहमा :: ...: ne - ........... -----------........... --------...........::.:. .......... .

१५८
-प्रवचनसार
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
अथ स्वपरविवेकसिद्धरेव मोहक्षपणं भवतीति स्वपरविभागसिद्धये प्रयतते -
णाणप्पगमप्पाणं परं व दत्वत्तणाहिसंबद्धं ।
जाणदि जदि णिच्छयदो जो सो मोहक्खयं कुणदि ॥८६॥
ज्ञानात्मकमात्मानं परं च द्रव्यत्वेनाभिसंबद्धम् ।
जानाति यदि निश्चयतो यः स मोहक्षयं करोति ॥८६॥
त्यर्थः ।। ८८ ।। एवं द्रव्यगुणपर्यायविपये मूढत्वनिराकरणार्थ गाथाषट्केन तृतीयज्ञानकण्डिका गता।
अथ स्वपरात्मनोभेंदज्ञानात् मोहक्षयो भवतीति प्रज्ञापयति - णाणप्पगमप्पाणं परं च दव्वत्तणाहिसंबद्धं
पर अतिदृढ़ता पूर्वक उसका प्रहार करता है वही सर्व दुःखोंसे मुक्त होता है अन्यथा
नहीं) इसीलिये सम्पूर्ण आरम्भसे (प्रयत्नपूर्वक) मोहका क्षय करनेके लिये मैं पुरुषार्थका
आश्रय ग्रहण करता हूँ ।।८८ ।।
अब, स्व-परके विवेककी (-भेदज्ञानकी) सिद्धिसे ही मोहका क्षय हो सकता है,
इसलिये स्व-परके विभागकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करते हैं :-
गाथा ८९
अन्वयार्थ :- [यः] जो [निश्चयतः] निश्चयसे [ज्ञानात्मकं आत्मानं] ज्ञानात्मक
गेले अपनेको [च] और [परं] परको [द्रव्यत्वेन अभिसंबद्धम्] निज निज द्रव्यत्वसे
मंक (संयुक्त) [यदि जानाति] जानता है, [सः] वह [मोह क्षयं करोति] मोहका
अप करता है।
टोका :- जो निश्चयमे अपनेको स्वकीय (अपने)
चैतन्यात्मक द्रव्यत्वसे संबद्ध
(-मंजुन.) और परको परकीय (दूसरेके) 'यथोचित द्रव्यत्वसे संबद्ध ही जानता है, वही
(जीव), जिनने कि सम्यकल्पसे स्व-परके विवेकको प्राप्त किया है, सम्पूर्ण मोहका
अव करता है । इसलिये मैं स्व-परके विवेकके लिये प्रयत्नशील हूँ ।। ८६ ॥
रोड - नेनन या अचेतन (पुद्गलादि द्रव्य परकीय अचेतन द्रव्यत्वसे और अन्य आत्मा परकीय
है)
जे ज्ञानरूप निज आत्मने, परने वणी निश्चय वडे ।
यत्वथी संबद्ध जाणे, मोनो क्षय ते करे ॥८६॥

-- - जन मामाला] वयस्कोग्रेन नन्यामना मानं परं न निन च्यायनाभित्र निकपत: पनियनि. मगर मगमलकपवित्र: मलं मी अपर्णन । अनः पर अब नया मनो विधानयुपमहानि तम्हा जिगमगाटो नहिं आई परं = बने। अभिगच्च हिम्मोह उच्च हि अपणो अमा कम्माजिनांदगुणगाया 5 छ। गिन्छनु निमोमिन मा आमा ! . ...

१६२ | भगवान भोलान-महान यो हि नातानि रग मातिन सामान्यमनुवजन्त्यपि सम्पास्तित्वे- नाश्लिष्टविशेषाणि द्रव्याणि स्नपरायच्यारिलिन्दश्रयानो वा एवमेव श्रामण्ये- नात्मानं दमयति स खलु न नाम भमणः १ गतस्ततोऽपरिचिलनरेणुकनककणिकाविशेषा- धूलिधावकात्कनकलाम इव निरुपरागालातत्योपलम्भलक्षणो धपिलम्भो न संभूति- मनुभवति ॥ ६१ ॥ श्रमणो न भवति, तस्माच्छुद्धोपयोगलाणधोऽपि न संभवतीति निश्मिनोति -- सतासंबई महासत्ता- संबन्धेन सहितान् एदे एतान् पृोजगुदजीवादिपदार्थान् । पुनरपि किनिशिष्टान् । सविसेसे विशेष सत्तावान्तरसत्ता स्वकीयस्वकीयस्वरूपगत्ता तया राहितान् जो हि णेब सामण्णे सद्दहदि यः कर्ता द्रव्यश्रामण्ये स्थितोऽपि न श्राद्धने हि स्फुटं ण सो समणो निजसुद्धात्मनिरुणनिश्चयसम्गात्वपूर्वक- परमसामायिकसंयमलक्षणश्रामण्याभावात्स श्रमणो न भवति । इत्थंभूतभावश्रामण्याभावात् तत्तो धम्मो ण संभवदि तस्मात्पूर्वोक्तद्रव्यश्रमणात्सकाशान्निरूपरागशुद्धात्मानुभूतिलक्षणधर्मोऽपि न संभव तीति सूत्रार्थः ।। ६१ ।। अथ 'उवसंपयामि सम्म' इत्यादि नमस्कारगाथायां यत्प्रतिज्ञातं, तदनन्तरं इसप्रकार जिसने स्व-परका विवेक निश्चित किया है ऐसे इस आत्माको विकार- कारी मोहांकुरका प्रादुर्भाव नहीं होता । भावार्थ :- स्व-परके विवेकसे मोहका नाश किया जा सकता है । वह स्व-परका विवेक, जिनागमके द्वारा स्व-परके लक्षणोंको यथार्थतया जानकर किया जा सकता है ।। ६० ॥ अब, न्यायपूर्वक ऐसा विचार करते हैं कि - जिनेन्द्रोक्त अर्थोके श्रद्धान विना धर्म लाभ (शुद्धात्मअनुभवरूप धर्मप्राप्ति) नहीं होता . गाथा ९१ अन्वयार्थ :- [यः हि] जो (जीव) [श्रामण्ये] श्रमणावस्थामें [एतान् सत्ता- संवद्धान सविशेषान् ] इन 'सत्तासंयुक्त सविशेष पदार्थोकी [न एव श्रद्दधाति] श्रद्धा नहीं करता, [सः] वह [श्रमणः न ] श्रमण नहीं है; [ततः धर्मः न संभवति] उससे धर्मका उद्भव नहीं होता (अर्थात् उस श्रमणाभासके धर्म नहीं होता ।) सत्तासंयुक्त अस्तित्ववाले । २ सविशेष-विशेषसहित; भेदवाले; भिन्न-भिन्न ।

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तरकालं तम्मयं तिपणत, नाता : धर्मत्वमासूत्रायितुमुपकान्तं. यानि : मो. जुदो पायदि णिवाणनुहं इति निर्यालयकोमोनिका, अभालभोग- योगी च विरोधिनी निचली. शुनोपयोगानोगा, तामाको नागनो ज्ञाना- नन्दो सहजी समुद्योतयता संबेदनाका गुनान प्राजिनामा ससाना कप शुद्धोपयोगप्रसादेन प्रसाध्य परमनिरपहासात्मतातां पारमेरोपन्तिम पगतः बताया- तामवाप्य नितान्तमनाकुलो भूत्या प्रलीन भेदवासनोनोग सागं साज गारमोग- वतिष्ठते- श्रमणाद्धर्मोऽपि न भवति । नहि कायं धमणो भनि. निपटे र पान शामगिरणा- तक्कालं तम्मयं ति पण्णत्तं, तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेगव्यो' इसप्रकार (८ वी गाथामें) जो आत्माका धर्मत्व कहना प्रारम्भ किया और जिसकी सिद्धिके लिए धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपओगजुदो, पावदि णिब्याणगुरु' इसप्रकार (११ वीं गाथामें) निर्वाणसुखके साधनभूत शुद्धोपयोगका अधिकार प्रारम्भ किया, विरोधी शुभा- शुभ उपयोगको नष्ट किया (हेय बताया), शुद्धोपयोगका स्वरूप वर्णन किया, शुद्धो- पयोगके प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले ऐसे आत्माके सहज ज्ञान और आनन्दको समझाते हुये ज्ञानके स्वरूपका और सुखके स्वरूपका विस्तार किया, उसे (-आत्माके धर्मत्वको) अब किसी भी प्रकार शुद्धोपयोगके प्रसादसे 'सिद्ध करके, “परम निस्पृह, आत्मतृप्त (ऐसी) पारमेश्वरी प्रवृत्तिको प्राप्त होते हुये, कृतकृत्यताको प्राप्त करके अत्यन्त अना- कुल होकर, जिनके 'भेदवासना की प्रगटताका प्रलय हुआ है, ऐसे होते हुये, (आचार्य भगवान) 'मैं स्वयं साक्षात् धर्म ही हूँ' इसप्रकार रहते हैं, (-ऐसे भावमें निश्चल स्थित होते हैं):- १ जिसकी सिद्धिके लिये आत्मा को धर्मरूप बनवाने का जो कार्य साधना के लिए । २ अर्थ - धर्मपरिणत स्वरूपवाला आत्मा यदि शुद्ध उपयोगमें युक्त हो तो मोक्षके सुखको पाता है । 3 सिद्ध करके साधकर । (आत्माको धर्मरूप रचने का जो कार्य साधना था उस कार्य को. महापुरुषार्थ करके शुद्धोपयोग द्वारा आचार्य भगवान ने सिद्ध किया।)। ४ परकी स्पृहासे रहित और आत्मामें ही तृप्त, निश्चयरत्नत्रयमें लीनतारूप प्रवृत्ति । ५ भेदवासना भेदरूप वृत्ति; विकल्प-परिणाम ।

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--प्रवचनसार- १६६ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान शब्दब्रह्मणे । स्वस्ति तन्मूलायात्मतत्त्वोपलरमाय च, यत्प्रसादादुद्ग्रन्थितो झगित्येवा- संसारबद्धो सोहान्थिः। स्वस्ति च परमवीतरागचारित्रात्मने शुद्धोपयोगाय, यत्प्रसादादयमात्मा स्वयमेव धर्मो भूतः ।। ६२।। मन्दाक्रांता छन्द % आत्मा धर्मः स्वयमिति भवन प्राप्य शुद्धोपयोगं नित्यानन्दप्रसरसरसे ज्ञानतत्त्वे निलीय। उद्यतः । पुनरपि कथंभूतः । महप्पा मोक्षलक्षणमहार्थसाधकत्वेन महात्मा धम्मो ति विसेसिदो समणो जीवितमरणलाभालाभादिसमताभावनापरिणतात्मा स श्रमण एवाभेदनयेन धर्म इति विशेपितो मोहक्षोभविहीनात्मपरिणामरूपो निश्चयधर्मो भणित इत्यर्थः ।। ६२ ।। अथैवंभूतनिश्चयरत्नत्रय- परिणतमहातपोधनस्य योऽसौ भक्ति करोति तस्य फलं दर्शयति जो तं दिहा तुट्ठो अनुभुत्तिा करेदि सक्कारं। वंदणणमंसणादिहिं तत्तो सो धम्ममादियदि ॥१८॥ जो तं दिट्ठा तुट्ठो यो भव्यवरपुण्डरीको निरुपरागशुद्धात्मोपलम्भलक्षणनिश्चयधर्मपरिणतं पूर्वसूत्रोक्त मुनीश्वरं दृष्ट्वा तुण्टो निर्भरगुणानुरागेण संतुष्टः सन् । किं करोति । अन्भुद्वित्ता करेदि सरकारं अभ्युत्थानं कृत्वा मोक्षसाधकसम्यक्त्वादिगुणानां सत्कारं प्रशंसां करोति वंदणणमंसणादिहिं तत्तो सो धम्ममादियदि 'तवसिद्धे णयसिद्धे' इत्यादि वन्दना भण्यते, नमोऽस्त्विति नमस्कारो भण्यते, तत्प्रभृतिभक्तिविशेषः तस्माद्यतिवरात्स भव्यः पुण्यमादत्ते पुण्यं गृह्णाति इत्यर्थः ।। १८ ॥ अथ तेन पुण्येन भवान्तरे किं फलं भवतीति प्रतिपादयति- तेण णरा व तिरिच्छा देवि वा माणुसिं गदि पप्पा । विहविस्सरियेहि सया संपुण्णमणोरहा होति ।। ६ ॥ इसलिये वीतरागचारित्ररूपसे प्रगटताको प्राप्त (-वीतरागचारित्ररूप पर्यायमें परिणत) मेरा यह आत्मा स्वयं धर्म होकर, समस्त विघ्नोंका नाश हो जानेसे सदा निष्कंप ही रहता है । अधिक विस्तारसे वस होओ ! जयवंत वर्तो 'स्याद्वादमुद्रित जैनेन्द्र शब्द- प्रहा ; जयवंत व” शब्दब्रह्ममूलक आत्मतत्त्वोपलब्धि - कि जिसके प्रसादसे, अनादि गंगारो बंधी हुई मोहग्रंथि तत्काल ही छूट गई है; और जयवंत वर्तो परम वीतराग- नाग्जिन्यम्प शुद्रोपयोग कि जिसके प्रसादसे यह आत्मा स्वयमेव धर्म हुआ है ।। ६२ ।। 'दिर का इनामदादी छापवाला जिनेन्द्रका द्रव्यथुत । - जिनमगल काया है।

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भगवान शोमा इति प्रवचनसारवृत्ती तत्वोनिका कोमलमतना दिन जानतत्त प्रज्ञापनो नाम प्रथमः श्रुतस्तत: समाप्तः ।। इति श्री जयसेनाचार्यगातागो तानो पुराना मनालीम गाथामादिं कृत्वा हासप्ततिगाराभि: शुलोपोगाणार. तमाम मामा पञ्चविंशतिगाथाभिर्ज्ञानकण्डिकानतुष्टयाभिधानो निगोशिकार. नाम पनामा सम्यक्त्वकथनरूपेण प्रथमा गाया. नल नावारपुरा नर्मः संभालोति जोणिमोदितीला द्वितीया चेति स्वतन्नगाथाद्वयम्, तल निवायसंगताना योगो भनि नरोकिने 'जो तं दिवा' इत्यादि गाथाद्वयम् । इत्यधिकारद्येन पृषभुत गावानाटयाने होत रगत गावाभि ज्ञानतत्त्वप्रतिपादकनामा प्रथमो महाधिकारः समाप्तः ।। १ ।। इस प्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दानार्यदेवप्रणीत ) श्रीप्रवचनसार शास्त्र श्रीमद्अमृतचंद्राचार्यदेवविरचित तत्त्वदीपिका नामक टीकामें ज्ञानतत्व प्रथम श्रुतस्कन्ध समाप्त हुआ। प्रज्ञापन नाम .

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-प्रवचनसार- - १६८ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान इति प्रवचनसारवृत्तौ तत्त्वदीपिकायां श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां ज्ञानतत्त्व- प्रज्ञापनो नाम प्रथमः श्रुतस्कन्धः समाप्तः ।। इति श्री जयसेनाचार्यकृतायां तात्पर्यवृत्ती पूर्वोक्तप्रकारेण 'एस सुरासुरमणुसिंदवंदियं' इतीमां गाथामादिं कृत्वा द्वासप्ततिगाथाभिः शुद्धोपयोगाधिकारः, तदनन्तरं 'देवदजदिगुरुपूजासु' इत्यादि पञ्चविंशतिगाथाभिर्ज्ञानकण्डिकाचतुष्टयाभिधानो द्वितीयोऽधिकारः, ततश्च 'सत्तासंवद्धदे' इत्यादि सम्यक्त्वकथनरूपेण प्रथमा गाथा, रत्नत्रयाधारपुरुपस्य धर्मः संभवतीति 'जो णिहदमोहदिट्ठी' इत्यादि द्वितीया चेति स्वतन्त्रगाथाद्वयम्, तस्य निश्चयधर्मसंज्ञतपोधनस्य योऽसौ भक्ति करोति तत्फलकथनेन 'जो तं दिट्टा' इत्यादि गाथाद्वयम् । इत्यधिकारद्वयेन पृथग्भूतगाथाचतुष्टयसहितेनैकोत्तरशतगाथाभिः ज्ञानतत्वप्रतिपादकनामा प्रथमो महाधिकारः समाप्तः ।। १ ।। इस प्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत ) श्रीप्रवचनसार शास्त्रकी श्रीमद्अमृतचंद्राचार्यदेवविरचित तत्त्वदीपिका नामक टीकामें ज्ञानतत्व प्रज्ञापन नामक प्रथम श्रुतस्कन्ध समाप्त हुआ । --

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१७४
1 ...
MAIN
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अमानुगतिवि:
लो पज्जए कि
आदतहाहि कि मनाया गया ॥६॥
प्राय: ।। .:.:
::.के पर मिजो
पर्याचा निरताः जोर गि
पुद्गलात्मक लेत. ...: । नोभी पदों
अपने स्थूल अगुलना मा पा . 4:for
होने के कारण अनेकवी गिति गुणागामा, शीकार गमा
द्रव्योंमें अपने-अपने मूग अगुकलागुणारा माग : नेपाली गागातित
हानिवृद्धिरूप अनेकत्यकी अनुभूति का गलामा मामी : जोर जोरो पटमें.
रूपादिकके स्व-परके कारण प्रवर्तमान पुनोत्तर भागामें होनेवाले तारतम्मो कारण
देखनेमें आनेवाले स्वभावविशेषरूप अनेकत्वको आपत्ति या गुणात्मक निभातपर्याग हे,
उसोप्रकार समस्त द्रव्योंमें, स्पादिके या नानादिके स-परके कारण प्रवर्तमान पूर्वोत्तर
अवस्था में होनेवाले तारतम्यके कारण देखने में आनेवाले समभावविशेषता अनेकत्वणी
आपत्ति वह गुणात्मक विभावपर्याय है।
वास्तवमें यह, सर्व पदार्थोके द्रव्यगुणपर्यायस्वभावको प्रकाशक 'पारमेश्वरी
व्यवस्था भली-उत्तम-पूर्ण-योग्य है, दूसरी कोई नहीं; क्योंकि बहुतसे ( जीव )
पर्यायमात्रका ही अवलम्बन करके, तत्त्वकी अप्रतिपत्ति जिसका लक्षण है ऐसे मोहको
प्राप्त होते हुये परसमय होते हैं।
भावार्थ :- पदार्थ द्रव्यस्वरूप है। द्रव्य अनन्तगुणमय है। द्रव्यों और गुणोंसे
पर्यायें होती हैं । पर्यायोंके दो प्रकार हैं :- १-द्रव्यपर्याय, २-गुणपर्याय । इनमेंसे द्रव्य-
पर्यायके दो भेद हैं :- १-समानजातीय - जैसे द्वि-अणुक, त्रि-अणुक इत्यादि स्कन्ध
२-असमानजातीय - जैसे मनुष्य देव इत्यादि । गुणपर्यायके भी दो भेद हैं :-१-स्वभाव-
पर्याय - जैसे सिद्धके गुणपर्याय २-विभावपर्याय - जैसे स्वपरहेतुक मतिज्ञानपर्याय ।
परमेश्वरकी कही हुई।
पर्यायमां रत जीव जे ते 'परसमय' निदिष्ट छ ।
आत्मस्वभावे स्थित जे ते 'स्वक-समय' ज्ञातव्य छे ॥ ६४ ॥

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.. मासूत्रयन्ति, ते खलु मा ... for मनुष्यादिगतिपु तहिगोषु नाटिका : infr. वैकरूपमेवात्मानमुपलभमाना अधिनमागेको कृतसमस्तक्रियामुटुग्या मनुष्याको रामगोगा पागोडा तेच्युता ये ते समोरया::. ::::::::::. :: .. . . ! | Gr ठिदा ये पुनरात्मक निमगवा मा जाIFE है ऐसे-'यह मैं मनुष्य हो । जनी नगनु अरोर पर कार-गा- कारसे ठगाये जाने हुये, अविननिमोनागिलाममा माग गे गा कर, जिसमें समस्त क्रियाकलापको छानोने लगाना जाता होगा पर आग करके रागी-द्वेपी होते हुए पर मन को मारी गंगकारण (-पगरण कर्मके साथ युक्त होजानने) वास्तव में 'परममा अनि परममय परिणमित होते हैं। और जो 'असंकीर्ण द्रव्य गुण-पर्यागोरो गुस्थित भगवान आत्माले स्वभावका- जो कि सकल विद्याओंका एक मूल है उसका-आश्रग करके गणोक्त आत्मस्वभावकी संभावनामें समर्थ होनेसे पर्यायमात्र प्रतिके बलको दूर करके आत्माके स्वभावमें ही स्थिति करते हैं (-लीन होते हैं), वे-जिन्होंने सहज-विकशित अनेकान्तदृष्टि से समस्त एकान्तदृष्टिके 'परिग्रहके आग्रह प्रक्षीण कर दिये हैं, ऐसे-मनुप्यादि गतियों में और उन गतियोंके शरीरोंमें अहंकार-ममकार न करके अनेक कक्षों (कमरों) में संचारित रत्नदीपककी भाँति एकरूप ही आत्माको उपलब्ध (अनुभव) करते हुये, अविचलित- . २ आत्मव्यवहार-आत्मारूप वर्तन, आत्मारूप कायं, आत्मारूप व्यापार । मनुष्यव्यवहारमनुष्यरूप वर्तन (मैं मनुष्य ही हूं। ऐसी मान्यतापूर्वक वर्तन) । 3 जो जीव परके साथ एकत्वकी मान्यतापूर्वक युक्त होता है, उसे परसमय कहते हैं । ४ असंकीर्ण= एकमेक नहीं ऐसे; स्पष्टतया भिन्न [भगवान् आत्मस्वभाव स्पष्ट भिन्न-परके साथ एकमेक नहीं ऐसे- द्रव्यगुणपर्यायोंसे सुस्थित है | ५ परिग्रह स्वीकार; अंगीकार । । संचारित लेजाये गये । (जैसे भिन्न-भिन्न कमरों में लेजाया गया रत्नदीपक एकरूप ही है, वह किंचितमात्र भी कमरेके रूपमें नहीं होता, और न कमरेकी क्रिया करता है, उसीप्रकार भिन्न-भिन्न शरीरों में प्रविष्ट होनेवाला आत्मा एकरूप ही है, वह किंचित्माय भी शरीररूप नहीं होता और न शरीरकी क्रिया करता है - इसप्रकार ज्ञानी जानता है।) - .

.: benden १७८ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अपरित्यक्तस्वभावेनोत्पादव्ययध्रुवत्वसंबद्धम् । गुणवञ्च सपर्यायं यत्तद्रव्यमिति अवन्ति ॥६५॥ इह खलु यदनारब्धस्वभावभेदमुत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेण गुणपर्यायद्वयेन च यल्लक्ष्यते तद्रव्यम् । तत्र हि द्रव्यस्य स्वभावोऽस्तित्वसामान्यान्वयः, अस्तित्वं हि वक्ष्यति द्विविधं, स्वरूपास्तित्वं सादृश्यास्तित्वं चेति । तत्रोत्पादः प्रादुर्भावः, व्ययः प्रच्यवनं, ध्रौव्यमव- स्थितिः । गुणा विस्तारविशेषाः, ते द्विविधाः सामान्यविशेषात्मकत्वात् । तत्रास्तित्वं नास्तित्वमेकत्वमन्यत्वं द्रव्यत्वं पर्यायत्वं सर्वगतत्वमसर्वगतत्वं सप्रदेशत्वमप्रदेशत्वं मूर्त- त्वममूर्तत्वं सक्रियत्वमक्रियत्वं चेतनत्वमचेतनत्वं कर्तृत्वमकर्तृत्वं भोक्तृत्वमभोक्तृत्वम- गुरुलघुत्वं चेत्यादयः सामान्यगुणाः । अवगाहहेतुत्वं गतिनिमित्तता स्थितिकारणत्वं वर्तनायतनत्वं रूपादिमत्ता चेतनत्वमित्यादयो विशेषगुणाः । पर्याया आयतविशेषाः, लक्षणत्रयं सूचयति-अपरिच्चत्तसहावेण अपरित्यक्तस्वभावमस्तित्वेन सहाभिन्न उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं उत्पादव्ययीव्यैः सह संयुक्त गुणवं च सपज्जायं गुणवत्पर्यायसहितं च जं यदित्यंभूतं सत्तादिलक्षण- त्रयसंयुक्त तं दव्यं ति वुच्चंति तद्रव्यमिति व वन्ति सर्वज्ञाः । इदं द्रव्यमुत्पादव्ययध्रौव्यैर्गुणपर्यायैश्च ते गाथा ९५ hood अन्वयार्थ :- [ अपरित्यक्तस्वभावेन ] स्वभावको छोड़े विना [ यत् ] जो [उत्पादव्ययध्रुवत्वसंवद्धम् ] उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यसंयुक्त है [च] तथा [गुणवत् सपर्यायं] गुणयुक्त और पर्यायसहित है, [तत्] उसे [द्रव्यम् इति] 'द्रध्य' [अवन्ति] कहते हैं । यहाँ ( इस विश्व में ) जो, स्वभावभेद किये बिना, 'उत्पाद-व्यय- प्रीव्यत्रयगे और गुणपर्यायद्वयसे लक्षित होता है, वह द्रव्य है। इनमेंसे (स्वभाव, उत्पाद, व्यय, प्रीव्य, गुण और पर्यायमेंसे) द्रव्यका स्वभाव वह 'अस्तित्वसामान्यरूप दाद--प्रोत्रम उत्पाद, व्यय और प्रीव्य - यह विपुटी (तीनोंका समूह) । मारगुल मोर पर्याय - यह युगल (दोनोंका समूह) न होताना होता है. पहिचाना जाता है। [(१) उत्पाद-व्यय-प्रौप्य तथा (२) गुणपर्याय ये और दम र लक्ष्य है। अवर, है, है पेमा एकम्प भाव द्रव्यका स्वभाव है । (अन्यय=एकरूपता सदृश्यभाव ।) शेट्या विना ज स्वभावने उत्पाद-व्यय-ध्र व युक्त छ । बलो गुण ने पर्यय सहित जे, 'द्रव्य' भाख्यु तेहने ।। ६५॥ .

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१७८
[गगवान भोल्यान्म-महान
अपरित्यक्तस्वभावेनोत्पादव्ययावत्वरांबदम् ।
गुणवच्च सपर्यायं यत्तद्रव्यमिति द्रवन्ति ॥६५॥
इह खलु यदनारब्धस्वभावभेदमुत्पादच्ययनौव्यत्रयेण गुणपर्यायदयेन च यल्लक्ष्यते
तद्रव्यम् । तत्र हि द्रव्यस्य स्वभावोऽस्तित्वसामान्यान्वयः, अस्तित्वं हि वक्ष्यति द्विविध,
स्वरूपास्तित्वं सादृश्यास्तित्वं चेति । तत्रोत्पादः प्रादुर्भावः, व्ययः प्रच्यवनं, ध्रौव्यमव-
स्थितिः । गुणा विस्तारविशेषाः, ते द्विविधाः सामान्यविशेषात्मकत्वात् । तत्रास्तित्वं
नास्तित्वमेकत्वमन्यत्वं द्रव्यत्वं पर्यायत्वं सर्वगतत्वमसर्वगतत्वं सप्रदेशत्वमप्रदेशत्वं मूर्त.
त्वममूर्तत्वं सक्रियत्वमक्रियत्वं चेतनत्वमचेतनत्वं कर्तृत्वमकर्तृत्वं भोक्तृत्वमभोक्तृत्वमा
गुरुलघुत्वं चेत्यादयः सामान्यगुणाः । अवगाहहेतुत्वं गतिनिमित्तता स्थितिकारणत्वं
वर्तनायतनत्वं रूपादिमत्ता चेतनत्वमित्यादयो विशेषगुणाः । पर्याया आयतविशेषाः, ते
लक्षणत्रयं सूचयति-अपरिच्चत्तसहावेण अपरित्यक्तस्वभावमस्तित्वेन सहाभिन्न उप्पादव्वयधुवत्तसंजुतं
उत्पादव्ययध्रौव्यैः सह संयुक्त गुणवं च सपज्जायं गुणवत्पर्यायसहितं च जं यदित्यंभूतं सत्तादिलक्षण-
त्रयसंयुक्त तं दव्वं ति वुच्चंति तद्व्यमिति व वन्ति सर्वज्ञाः । इदं द्रव्यमुत्पादव्ययभ्रीव्यैर्गुणपर्यायश्च
-
गाथा ९५
अन्वयार्थ :- [ अपरित्यक्तस्वभावेन ] स्वभावको छोड़े बिना [ यत् ] जो
[उत्पादव्ययध्रुवत्वसंबद्धम् ] उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यसंयुक्त है [च] तथा [गुणवत् सपर्यायं]
गुणयुक्त और पर्यायसहित है, [तत्] उसे [द्रव्यम् इति] 'द्रध्य' [अवन्ति] कहते हैं ।
टीका :- यहाँ ( इस विश्वमें ) जो, स्वभावभेद किये बिना, 'उत्पाद-व्यय-
ध्रौव्यत्रयसे और गुणपर्यायद्वयसे लक्षित होता है, वह द्रव्य है। इनमेंसे (स्वभाव,
उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य, गुण और पर्यायमेंसे) द्रव्यका स्वभाव वह 'अस्तित्वसामान्यरूप
१ उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यत्रय-उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य - यह त्रिपुटी (तीनोंका समूह) ।
२ गुणपर्यायद्वय-गुण और पर्याय -- यह युगल (दोनोंका समूह)
3 लक्षित होता है लक्ष्याप होता है. पहिचाना जाता है। [(१) उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य तथा (२) गुणपर्याय वे
लक्षण हैं और द्रव्य वह लक्ष्य है।]
४ अस्तित्वसामान्यरूप अन्वय= 'है, है, है' ऐसा एकरूप भाव द्रव्यका स्वभाव है । (अन्वय=एकरूपता सदृश्यभाव ।)
छोड्या विना ज स्वभावने उत्पाद-व्यय-ध्र व युक्त छ ।
वलो गुण ने पर्यय सहित जे, 'द्रव्य' भाख्यु तेहने ॥६५॥

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१८० -प्रवचनसार--- । - [भगवान श्रीकुन्मान्य कहान पात्तमलिनावस्थं प्रक्षालितममलावस्थयोत्पद्यमानं तेनोत्पादेन लक्ष्यते । न च तेन सह स्वरूपभेदमुपवजति, स्वरूपत एव तथाविधत्वमवलम्बते । तथा द्रव्यमपि समुपात्तप्राक्त- नावस्थं समुचितबहिरङ्गसाधनसन्निधिसद्भावे विचित्रबहुतरावस्थानं स्वरुपकर्तृकरणसा- मर्थ्यस्वभावेनांतरङ्गसाधनतामुपागतेनानुग्रहीतमुत्तरावस्थयोत्पद्यमानं तेनोत्पादेन लक्ष्यते । न च तेन सह स्वरूपभेदमुपव्रजति, स्वरूपत एव तथाविधत्वमवलम्बते । यथा च तदेवोत्तरीयममलावस्थयोत्पद्यमानं मलिनावस्थया व्ययमानं तेन व्ययेन लक्ष्यते । न च तेन सह स्वरूपभेदमुपत्नजति, स्वरूपत एव तथाविधत्वमवलम्बते । तथा तदेव द्रव्यम- प्युत्तरावस्थयोत्पद्यमानं प्राक्तनावस्थया व्ययमानं तेन व्ययेन लक्ष्यते । न च तेन सह स्वरूपभेदमुपनजति, स्वरूपत एव तथाविधत्वमवलम्बते । यथैव च तदेवोत्तरीयमेककाल- मलावस्थयोत्पद्यमानं मलिनावस्थया व्ययमानमवस्थायिन्योत्तरीयत्वावस्थया ध्रौव्यमाल- म्बमानं ध्रौव्येण लक्ष्यते । न च तेन सह स्वरूपभेदमुपनजति, स्वरूपत एव तथाविधत्वम- तैः सह सत्ताभेदं न करोति , स्वरूपत एव तथाविधत्वमवलम्बते । तथाविधत्वं कोऽर्थः । उत्पादव्यय- ध्रौव्यगुणपर्यायस्वरूपेण परिणमति । तथा सर्वद्रव्याणि स्वकीयस्वकीययथोचितोत्पादव्ययध्रौव्यस्तथैव गुणपर्यायैश्च सह यद्यपि संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभिर्भेदं कुर्वन्ति तथापि सत्तास्वरूपेण भेदं न कुर्वन्ति, स्वभावत एव तथाविधत्वमवलम्वन्ते । तथाविधत्वं कोऽर्थः । उत्पादव्ययादिस्वरूपेण परिणमन्ति । स्वरूपकर्ता और स्वरूपकरणके सामर्थ्यरूप स्वभावसे अनुगृहीत होने पर, उत्तर अवस्थासे उत्पन्न होता हुआ वह उत्पादसे लक्षित होता है; किन्तु उसका उस उत्पादके साथ स्वरूपभेद नहीं है, स्वरूपसे ही वैसा है। और जैसे वही वस्त्र निर्मल अवस्थासे उत्पन्न होता हुआ और मलिन अवस्थासे व्ययको प्राप्त होता हुआ उस व्ययसे लक्षित होता है, परन्तु उसका उस व्ययके साथ स्वरूपभेद नहीं है, स्वरूपसे ही वैसा है उसीप्रकार वही द्रव्य भी उत्तर अवस्थासे उत्पन्न होता हुआ और पूर्व अवस्थासे व्ययको प्राप्त होता हुआ उस व्ययसे लक्षित होता है; परन्तु उसका उस व्ययके साथ स्वरूपभेद नहीं है, वह स्वरूपसे ही वैसा है। और जैसे वही वस्त्र एक ही समयमें निर्मल अवस्थासे उत्पन्न होता हुआ, मलिन अवस्थासे व्ययको प्राप्त होता हुआ और टिकनेवाली ऐसी वस्त्रत्व-अवस्थासे ध्र व रहता हुआ ध्रौव्यसे लक्षित होता है; परन्तु उसका उस ध्रौव्यके साथ स्वरूपभेद नहीं है, स्वरूपसे ही वैसा है; इसीप्रकार वही द्रव्य भी एक ही समय उत्तर अवस्थासे उत्पन्न होता हुआ, पूर्व अवस्थासे व्यय होता हुआ, और टिकनेवाली ऐसी द्रव्यत्वअवस्थासे ध्र व रहता हुआ ध्रौव्यसे लक्षित होता है। किन्तु उसका उस प्रौव्यके साथ स्वरूपभेद नहीं है, वह स्वरूपसे ही वैसा है ।

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द्रव्यस्य १८२ [भगवान श्रीकुन्दन्द-महान सब्भावो हि सहाको गुहि रागपज्जएहि चित्तेहि । ददवस्स सदाकालं उप्पादध्वयधुवत्तेहिं ॥६६॥ सद्भावो हि स्वभावो गुणैः स्वकपर्ययश्चित्रैः । सर्वकालमुत्पादव्ययध्रुवत्वैः ।।६।। स्वभावो भवति । दव्वल्स मुक्तात्मद्रव्यस्य । तच्च स्वरूपास्तित्वं यथा मुक्तात्मनः राकाशात्गृयग्भूतानां पुद्गलादिपञ्चद्रव्याणां शेपजीवानां च भिन्न भवति, न न तथा । कैः सह । गुणेहि सगपज्जएहि केवलज्ञानादिगुणैः किञ्चिदूनचरमणरीराकारादिस्वकपर्यायैश्च सह । कथंभूतैः । चित्तेहि सिद्धगतित्व- मतीन्द्रियत्वकायत्वमयोगत्वमवेदत्वमित्यादिबहुभेदभिन्न : । न केवलं गुणपर्यायैः सह भिन्न न भवति । उप्पादव्वयधुवत्तेहिं शुद्धात्मप्राप्तिरूपमोक्षपर्यायस्योत्पादो रागादिविकल्परहितपरमसमाधिरूपमोक्ष- मार्गपर्यायस्य व्ययस्तथा मोक्षमोक्षमार्गाधारभूतान्वयद्रव्यत्वलक्षणं प्रीव्यं चेत्युक्तलक्षणोत्पादव्यय- ध्रौव्यैश्च सह भिन्न न भवति । कथम् । सव्वकालं सर्वकालपर्यन्तं यथा भवति । कस्मात्तैः सह भिन्न न भवतीति चेत् । यतः कारणाद्गुणपर्यायास्तित्वेनोत्पादव्ययध्रीव्यास्तित्वेन च कर्तृभूतेन शुद्धात्मद्रव्यास्तित्वं साध्यते, शुद्धात्मद्रव्यास्तित्वेन च गुणपर्यायोत्पादव्ययध्रौव्यास्तित्वं साध्यत इति । तद्यथा--यथा स्वकीयद्रव्यक्षेत्रकालभावैः सुवर्णादभिन्नानां पीतत्वादिगुणकुण्डलादिपर्यायाणां संबन्धि यदस्तित्वं स एव सुवर्णस्य सद्भावः, तथा स्वकीयद्रव्यक्षेत्रकालभावः परमात्मद्रव्यादभिन्नानां केवलज्ञानादिगुणकिंचिदूनचरमशरीराकारादिपर्यायाणां संबन्धि यदस्तित्वं स एव मुक्तात्मद्रव्यस्य सद्भावः । यथा स्वकीयद्रव्यक्षेत्रकालभावैः पीतत्वादिगुणकुण्डलादिपर्यायेभ्यः सकाशादभिन्नस्य सुवर्णस्य - गाथा ९६ अन्वयार्थ :- [सर्वकालं] सर्वकालमें [ गुणैः ] गुण तथा [ चित्रैः स्वकपर्यायैः ] अनेक प्रकारकी अपनी पर्यायोंसे [उत्पात्दव्ययध्रुवत्वैः]और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यसे [द्रव्यस्य सद्भावः] द्रव्यका जो अस्तित्व है, [हि] वह वास्तवमें [स्वभावः] स्वभाव है टीका :- अस्तित्व वास्तवमें द्रव्यका स्वभाव है; और वह (अस्तित्व) अन्य साधनसे 'निरपेक्ष होने के कारण अनादि-अनन्त होनेसे तथा अहेतुक, एकरूप वृत्तिसे ' अस्तित्व अन्य साधनको अपेक्षासे रहित - स्वयंसिद्ध है इसलिये अनादि-अनन्त है। २ अहेतुक-अकारण, जिसका कोई कारण नहीं है ऐसी। 3 वृत्ति वर्तन; वर्तना वहः परिणति । ( अकारणिक एकरूप परिणतिसे सदाकाल परिणमता होनेसे अस्तित्व विभावधर्मसे भिन्न लक्षणवाला है । ) उत्पाद-ध्रौव्य-विनाशथी, गुण ने विविध पर्यायथी। अस्तित्व द्रव्यनु सर्वदा जे, तेह द्रव्यस्वभाव छ । ६६ ॥

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१८४ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान कुण्डलादिपर्यायाणां च स्वरूपसुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तस्य कार्तस्वरास्तित्वेन निष्पा- दितनिष्पत्तियुक्तैः पीततादिगुणैः कुण्डलादिपर्यायैश्च यदस्तित्व कार्तस्वरस्य स स्वभावः, तथा हि द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा द्रव्यात्पृथगनुपलभ्यमानैः कर्तृ करणा- धिकरणरूपेण गुणानां पर्यायाणां च स्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तस्य द्रव्यास्तित्वेन निष्पादितनिष्पत्तियुक्तैर्गुणैः पर्यायश्च यदस्तित्वं द्रव्यस्य स स्वभावः । यथा वा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा पीततादिगुणेभ्यः कुण्डलादिपर्यायेभ्यश्च पृथगनुपलभ्यमा- नस्य कर्तृकरणाधिकरणरूपेण कार्तस्वरस्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तैः पीततादिगुणैः सकाशादभिन्नस्य सुवर्णस्य संबन्धि यदस्तित्वं स एव कटकपर्यायोत्पादकङ्कणपर्यायव्ययतदुभयाधार- भूतसुवर्णत्वलक्षणध्रौव्याणां स्वभावः, तथा स्वद्रव्यादिचतुष्टयेन मोक्षपर्यायोत्पादमोक्षमार्गपर्यायव्य- रूपसे गुणोंके और पर्यायोंके स्वरूपको धारण करके प्रवर्तमान द्रव्यके अस्तित्वसे जिनकी उत्पत्ति होती है, ऐसे गुणों और पर्यायोंसे जो द्रव्यका अस्तित्व है, वह स्वभाव है (द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे सुवर्णसे भिन्न न दिखाई देनेवाले पोतत्वादिक और कुण्डलादिकका अस्तित्व वह सुवर्णका ही अस्तित्व है, क्योंकि पीतत्वादिकके और कुण्डलादिकके स्वरूपको सुवर्ण ही धारण करता है, इसलिये सुवर्णके अस्तित्वसे ही पीतत्वादिककी और कुण्डलादिक की निष्पत्ति-सिद्धि होती है; सुवर्ण न हो तो पोतत्वादिक और कुण्डलादिक भी न हों, इसीप्रकार द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे द्रव्यसे भिन्न नहीं दिखाई देनेवाले गुणों और पर्यायोंका अस्तित्व वह द्रव्यका ही अस्तित्व है, क्योंकि गुणों और पर्यायोंके स्वरूपको द्रव्य ही धारण करता है, इसलिये द्रव्यके अस्तित्वसे ही गुणोंकी और पर्यायोंकी निप्पत्ति होती है, द्रव्य न हो तो गुण और पर्यायें भी न हों। ऐसा अस्तित्व वह द्रव्यका स्वभाव है ।) अथवा, जैसे द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे 'जो पीतत्वादि गुणोंसे और गुण्डलादि पर्यायोंसे पृथक् नहीं दिखाई देता; कर्ता-करण-अधिकरणरूपसे सुवर्णके म्यापको धारण करके प्रवर्तमान पीतत्वादिगुणों और कुण्डलादिपर्यायोंसे जिसकी मिपन्नि होती है, - ऐने सुवर्णका, मूलसाधनपनेसे उनसे निप्पन्न होता हुआ, अस्तित्व है, वह स्वभाव है; उसी प्रकार द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे गुणोंसे जो को को और पटनादि पर्वादों । { मुवर्ण का अस्तित्व निष्पन्न होने में उपजने में, या सिद्ध होने में ::. दि और लादि पर्याय है।)

जैन शास्त्रमाला -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- १८५ कुण्डलादिपर्यायैश्च निष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य कार्तस्वरस्य मूलसाधनतया तैनिष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभावः, तथा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा गुणेभ्यः पर्यायेभ्यश्च पृथगनुपलभ्यमानस्य कर्तृकरणाधिकरणरूपेण द्रव्यस्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्त - गुणैः पर्यायैश्च निष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य द्रव्यस्य मूलसाधनतया तैनिष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभावः । किंच - यथा हि द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा कार्तस्वरात्पृ. थगनुपलभ्यमानः कर्तृ करणाधिकरणरूपेण कुडलाङ्गदपीत्तताद्युत्पादव्ययध्रौव्याणां स्वरूप- यतदुभयाधारभूतमुक्तात्मद्रव्यत्वलक्षणध्रौव्येभ्यः सकाशादभिन्नस्य परमात्मद्रव्यस्य संवन्धि यदस्तित्वं स एव मोक्षपर्यायोत्पादमोक्षमार्गपर्यायव्ययतदुभयाधारभूतमुक्तात्मद्रव्यत्वलक्षण प्रौव्याणां स्वभाव और पर्यायोंसे जो पृथक नहीं दिखाई देता, कर्ता-करण- 'अधिकरणरूपसे द्रव्यके स्वरूपको धारण करके प्रवर्तमान गुणों और पर्यायोंसे जिसकी निष्पत्ति होती है, - ऐसे द्रव्यका, मूलसाधनपनेसे उनसे निष्पन्न होता हुआ जो अस्तित्व है, वह स्वभाव है । (पीतत्वादिकसे और कुण्डलादिकसे भिन्न न दिखाई देनेवाले सुवर्णका अस्तित्व वह पोतत्वादिक और कुण्डलादिकका ही अस्तित्व है, क्योंकि सुवर्णके स्वरूपको पीतत्वादिक और कुण्डलादिक ही धारण करते हैं, इसलिये पीतत्वादिक और कुण्डलादिकके अस्ति- त्वसे ही सुवर्णकी निष्पत्ति होती है, पीतत्वादिक और कुण्डलादिक न हों तो सुवर्ण भो न हो; इसीप्रकार गुणोंसे और पर्यायोंसे भिन्न न दिखाई देनेवाले द्रव्यका अस्तित्व वह गुणों और पर्यायोंका ही अस्तित्व है, क्योंकि द्रव्यके स्वरूपको गुणों और पर्यायें ही धारण करती हैं इसलिये गुणों और पर्यायोंके अस्तित्वसे ही द्रव्यकी निष्पत्ति होती है । यदि गुणों और पर्यायें न हो तो द्रव्य भी न हो । ऐसा अस्तित्व वह द्रव्यका स्वभाव है (जिसप्रकार द्रव्यका और गुण-पर्यायका एक ही अस्तित्व है ऐसा सुवर्णके दृष्टान्त पूर्वक समझाया, उसीप्रकार अब सुवर्णके दृष्टान्त पूर्वक ऐसा बताया जा रहा है कि द्रव्यका और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यका भी एक ही अस्तित्व है।) जैसे द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे, सुवर्णसे जो पृथक् नहीं दिखाई देते, कर्ता-करण- अधिकरणरूपसे कुण्डलादि उत्पादोंके, बाजूबंधादिव्ययोंके और पीतत्वादि १ गुण-पर्यायें ही द्रव्यकी कर्ता, करण और अधिकरण है; इसलिये गुण-पर्याय ही द्रव्यका स्वरूप धारण करती है। २ जो-जो कुण्डलादि उत्पाद, बाजूबंधादि व्यय और पीतादि ध्रीव्य । 3 सुवर्ण ही कुण्डलादि-उत्पाद, बाजूबंधादि-व्यय और पीतत्वादि ध्रांव्यका कर्ता, करण तथा नविकरण है; इसलिये नुवर्ण ही उनका स्वरप धारण करता है। (मुवर्ण ही पुण्डलादिरूपने उत्पन्न होता है, दारूबंगादि- रूपने नष्ट होता है और पीतत्वादिरूपने अवस्थित रहता है।)

-प्रवचनसार- १८६ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान मुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तस्य कार्तस्वरास्तित्वेन निष्पादितनिष्पत्तियुक्त : कुण्डलाङ्ग- दपीतताद्युत्पादव्ययध्रौव्यैर्यदस्तित्वं कार्तस्वरस्य स स्वभावः, तथा हि द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वा द्रव्यात्पृथगनुपलभ्यमानैः कर्तृकरणाधिकरणरूपेणोत्पादव्ययध्रौव्याणां स्वरूपसुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तस्य द्रव्यास्तित्वेन निष्पादितनिष्पत्तियुक्त रुत्पादव्यय- ध्रौव्यर्यदस्तित्वं द्रव्यस्य स स्वभावः । यथा वा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन - इति । एवं यथा मुक्तात्मद्रव्यस्य स्वकीयगुणपर्यायोत्पादव्ययध्रौव्यैः सह स्वरूपास्तित्वाभिधानमवान्त- धौव्योंके स्वरूपको धारण करके प्रवर्तमान सुवर्णके अस्तित्वसे जिनकी निष्पत्ति होती है, ऐसे कुण्डलादि-उत्पाद, वाजूवंधादिव्यय और पीतत्वादि ध्रौव्योंसे जो सुवर्णका अस्तित्व है, वह (सुवर्णका) स्वभाव है; उसीप्रकार द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे जो द्रव्यसे पृथक् दिखाई नहीं देते, कर्ता-करण-अधिकरणरूपसे उत्पाद-व्यय-ध्रौव्योंके स्वरूपको धारण करके प्रवर्तमान द्रव्यके अस्तित्वसे जिनकी निष्पत्ति होती है, ~ ऐसे उत्पाद-व्यय-ध्रौव्योंसे जो द्रव्यका अस्तित्व है वह स्वभाव है। (द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे द्रव्यसे भिन्न दिखाई न देनेवाले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्योंका अस्तित्व है वह द्रव्यका ही अस्तित्व है; क्योंकि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्योंके स्वरूपको द्रव्य ही धारण करता है, इसलिये द्रव्यके अस्तित्वसे ही उत्पाद, व्यय और ध्रौव्योंकी निष्पत्ति होती है । यदि द्रव्य न हो तो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य भी न हों। ऐसा अस्तित्व वह द्रव्यका स्वभाव है।) अथवा जैसे द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालसे या भावसे कुण्डलादि-उत्पादोंसे बाजूबंधादि- व्ययोंसे और पीतत्वादिध्रौव्योंसे जो पृथक् नहीं दिखाई देता; कर्ता-करण-अधिकरणरूपसे गुवर्णके स्वरूपको धारण करके प्रवर्तमान कुण्डलादि-उत्पादों, वाजूवंधादिव्ययों और पीतत्वादिध्रौव्योंसे जिसकी निप्पत्ति होती है, - ऐसे सुवर्णका, मूलसाधनपनेसे उनसे निप्पन होता हुआ, जो अस्तित्व है, वह स्वभाव है । उसीप्रकार द्रव्यसे, क्षेत्रसे, या भावने. व्यय-ध्रौव्योंसे जो पृथक् दिखाई नहीं देता, कर्ता-करण- 'अधिकरण- 'पको धारण करके प्रवर्तमान उत्पाद-व्यय-ध्रौव्योंसे जिसकी निप्पत्ति मुलसाधनपनेसे उनसे निष्पन्न होता हुआ जो अस्तित्व है, वह कालसे . . और याधिकरण है. इसलिये उत्पाद-यय-प्रौव्य ही द्रव्यके स्वरुपको .. जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- १८७ वा कुण्डलाङ्गदपीतताद्युत्पादव्ययध्रौव्येभ्यः पृथगनुपलभ्यमानस्य कर्तृ करणाधिकरण- रूपेण कार्तस्वरस्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्तः कुण्डलागदपीतताध त्पादव्यय- ध्रौव्यनिष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य कार्तस्वरस्य मूलसाधनतया तैनिष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभावः, तथा द्रव्येण वा क्षेत्रेण वा कालेन वा भावेन वोत्पादव्ययध्रौव्येभ्यः पृथग- नुपलभ्यमानस्य कर्तृकरणाधिकरणरूपेण द्रव्यस्वरूपमुपादाय प्रवर्तमानप्रवृत्तियुक्त रुत्पा- दव्ययप्रौव्यनिष्पादितनिष्पत्तियुक्तस्य द्रव्यस्य मूलसाधनतया तनिष्पादितं यदस्तित्वं स स्वभावः ॥६६॥ - इदं तु सादृश्यास्तित्वाभिधानमस्तीति कथयति रास्तित्वमभिन्नं व्यवस्थापितं तथैव समस्तपद्रव्याणामपि व्यवस्थापनीयमित्यर्थः ।। ६६ ।। अथ सादृश्यास्तित्वशन्दाभियां महासत्तां प्रजापयति-इह विविहलक्खणाणं इह लोके प्रत्येकसत्ता- स्वभाव है। (उत्पादोंसे, व्ययोंसे और प्रौव्योंसे भिन्न न दिखाई देनेवाले द्रव्यका अस्तित्व वह उत्पादों, व्ययों और प्रौव्योंका ही अस्तित्व है; क्योंकि द्रव्यके स्वरूपको उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य हो धारण करते हैं, इसलिये उत्पाद-व्यय और ध्रौव्यों के अस्तित्वसे ही द्रव्यकी निष्पत्ति होती है। यदि उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य न हों तो द्रव्य भी न हो । ऐसा अस्तित्व वह द्रव्यका स्वभाव है।) भावार्थ :- अस्तित्वके और द्रव्यके प्रदेशभेद नहीं है; और वह अस्तित्व अनादि- अनन्त है तथा अहेतुक एकरूप परिणतिसे सदा परिणमित होता है, इसलिये विभाव- धर्मसे भी भिन्न प्रकारका है। ऐसा होनेसे अस्तित्व द्रव्यका स्वभाव ही है । गुण-पर्यायोंका और द्रव्यका अस्तित्व भिन्न नहीं है; एक ही है; क्योंकि गुण- पर्यायें द्रव्यसे ही निष्पन्न होती हैं, और द्रव्य गुण-पर्यायोंसे ही निष्पन्न होता है । और इसीप्रकार उत्पाद-व्यय-धोव्यका और द्रव्यका अस्तित्व भी एक ही है। क्योंकि उत्पाद- व्यय-ध्रौव्य द्रव्यसे ही उत्पन्न होते हैं, और द्रव्य उत्पाद-व्यय-नोव्योंसे ही उत्पन्न होता है। इसप्रकार स्वरूपा-स्तित्वका निरूपण हुआ ।। ६६ ।। अब यह (नीचे अनुसार) सादृश्य-अस्तित्वका कथन है :-

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जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- १८९ 11 उदिसा खलु - इह किल प्रपञ्चितवैचित्र्येण द्रव्यान्तरेभ्यो व्यावृत्य वृत्त न प्रतिद्रव्यं सीमानमासूत्रयता विशेषलक्षणभूतेन च स्वरूपास्तित्वेन लक्ष्यमाणानामपि सर्वद्रव्याणामस्तमितवैचित्र्यप्रपञ्च प्रवृत्य वृत्त प्रतिद्रव्यमासूत्रितं सीमानं भिन्दत्सदिति सर्वगतं सामान्यलक्षणभूतं सादृश्या- स्तित्वमेकं खल्ववबोधव्यम् । एवं सदित्यभिधानं सदिति परिच्छेदनं च सर्वार्थपरामशि स्यात् । यदि पुनरिदमेव न स्यात्तदा किंचित्सदिति किंचिदसदिति किचित्सञ्चासच्चति किचिदवाच्यमिति च स्यात् । तत्त, विप्रतिषिद्धमेव प्रसाध्यं चैतदनोकहवत् । यथा हि धम्म जिणवरवसहेण पण्णत्तं धर्म वस्तुस्वभावसंग्रहमुपदिशता खलु स्फुटं जिनवर- वृपभेण प्रजप्तमिति । तद्यथा-यथा सर्वे मुक्तात्मनः मन्तीन्युक्त सति परमानन्दकलक्षणमुखामृतरसा- स्वादरितावस्थलोकाकाशप्रमितशुद्धासंख्येयात्मप्रदेणैस्तथा किंचिदूनचरमशरीराकारादिपर्यायैश्च मंकरव्यतिकरपरिहारम्पजातिभेदेन भिन्नानामपि सर्वेपां मिद्धजीवानां ग्रहणं भवति, तथा 'सर्व सत्' जैसे बहुतसे, अनेक प्रकारके वृक्षोंको अपने अपने विशेपलक्षणभूत स्वरूपास्तित्वके अवलम्बनसे उत्पन्न होनेवाले अनेकत्वको, सामान्य लक्षणभूत'सादृश्यदर्शक वृक्षत्वसे उत्पन्न होनेवाला एकत्व तिरोहित (अदृश्य) कर देता है, इसीप्रकार वहुतसे, अनेकप्रकारके द्रव्योंको अपने-अपने विशेष लक्षणभूत स्वरूपास्तित्वके अवलम्बनसे उत्पन्न होनेवाले अनेकत्वको, सामान्यलक्षणभूत सादृश्यदर्शक 'सत्' पनेसे ('सत्' ऐसे भावसे, अस्तित्वसे, 'है' पनेसे) उत्पन्न होने वाला एकत्व तिरोहित कर देता है। और जैसे उन वृक्षोंके विषयमें सामान्यलक्षणभूत सादृश्यदर्शक वृक्षत्वसे उत्पन्न होनेवाले एकत्वसे तिरोहित होनेपर भी (अपने-अपने) विशेपलक्षणभूत स्वल्पास्तित्वके अवलम्बनसे उत्पन्न होनेवाला अनेकत्व स्पप्टतया प्रकाशमान रहता है, (बना रहता है, नष्ट नहीं होता); उसीप्रकार सर्व द्रव्योंके विपयमें भी सामान्यलक्षणभूत सादृश्यदर्शक 'सत्' पनेसे उत्पन्न होनेवाले एकत्वले तिरोहित होने पर भी (अपने-अपने) विशेपलक्षणभूत स्वरूपास्तित्वके अवलम्बनले उत्पन्न होनेवाला अनेकत्व स्पष्टतया प्रकाशमान रहता है । [बहुतसे (संख्यापेक्षासे अनेक) और अनेकप्रकारके (अर्थात् आत्र, अशोकादि) वृक्षोंका अपना-अपना स्वरूपास्तित्व भिन्न-भिन्न है, इसलिये स्वम्पास्तित्वकी अपेक्षाने उनमें अनेकत्व है, परन्तु वृक्षत्व जो कि सर्व वृक्षोंका मामान्य लक्षण है और जो सर्व वृक्षों में सादृश्य बतलाता है, उसकी अपेक्षाने सर्व वृक्षोंमें एकत्व है। जब इस एकत्व- को मुख्य करते हैं तब अनेकत्व गौण हो जाता है: इसीप्रकार बहुतसे (अनन्त) २ तिमोहित तिरोभूत; आरजादिनः जन्म ! . सायटममानव ।

१६० MER वहूनां बहुविधानामनोकहानामात्मीयामोगा गिलाममा सम्मास्वित्यगा- वष्टम्भेनोतिप्नानात्वं, सामान्यलक्षण पगून बायोसामिनालोकोनोमागितमेवं तिरियति । तथा बहूनां वह विधानां कमाणामागोगात्मीया विशेषताणभूतस्य स्वरूपास्तित्वस्यावष्टम्मेनोत्तिष्ठनानात्वं सामान्यलक्षणभूतेन शाहगोदासिना सदित्यस्य भावेनोत्थापितमेकत्वं तिरियति । यथा न तेषामनोलहानां सामान्गताणभूतेन साहश्यो- द्भासिनानोकहत्येनोत्थापितेनैकत्वेन तिरोहितमपि विशेषलक्षणभूतस्य र वरूपास्तित्वाव. एटम्भेनोत्तिष्ठन्नानात्वमुचवाकास्ति, तथा सर्वद्रव्याणामपि सामान्गलक्षणभूतेन सादृश्यो- द्भासिना सदित्यस्य भावनोत्थापितेनैकत्वेन तिरोहितमपि विशेषलक्षणभूतस्य स्वरूपा- स्तित्वस्यावष्टम्भेनोत्तिष्ठन्नानात्वमुच्चकास्ति ।। ६७ ।। इत्युक्त संग्रहनयेन सर्वपदार्थानां ग्रहणं भवति । अगवा सेनेगं वमिमित्युक्त अभारत्यादिपदार्थानां निम्बानादिवृक्षाणां स्वकीयस्वकीयजातिभेदभिरानां गुगपदग्रहणं भनति तथा रा रादित्युक्त राति सादृश्यसत्ताभिधानेन महासत्तारूपेण शुद्धसंगहनयेन सर्वपदार्थानां स्वजात्य विरोगेन ग्रहणं भवती- और अनेक (छह) प्रकारके द्रव्योंका अपना-अपना स्वरूपास्तित्व भिन्न भिन्न है इसलिये स्वरूपास्तित्वकी अपेक्षासे उनमें अनेकत्व है, परन्तु रात्पना (अस्तित्वपना, 'है' ऐसा भाव) जो कि सर्व द्रव्योंका सामान्य लक्षण है और जो सर्वद्रव्योंमें सादृश्य वतलाता है उसकी अपेक्षासे सर्वद्रव्योंमें एकत्व है। जब इस एकत्वको मुख्य करते हैं तब अनेकत्व गौण हो जाता है। और इसप्रकार जब सामान्य सत्पनेको मुख्यतासे लक्षमें लेने पर सर्व द्रव्योंके एकत्वकी मुख्यता होनेसे अनेकत्व गौण हो जाता है, तब भी वह (समस्त द्रव्योंका स्वरूप-अस्तित्व संबंधी) अनेकत्व स्पप्टतया प्रकाशमान ही रहता है।] (इसप्रकार सादृश्य अस्तित्वका निरूपण हुआ) ।। ६७ ।। द्रव्योंसे द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति होनेका और द्रव्यसे सत्ताका 'अर्थान्तरत्व होनेका खण्डन करते हैं । (अर्थात् ऐसा निश्चत करते हैं कि किसी द्रव्यसे अन्य द्रव्यकी उत्पत्ति नहीं होती और द्रव्यसे अस्तित्व कोई पृथक् पदार्थ नहीं है) :- अब, गाथा ९८ अन्वयार्थ :- [द्रव्यं] द्रव्य [स्वभावसिद्धं] स्वभावसे सिद्ध और [सत् इति] (स्वभावसे ही) 'सत्' है, ऐसा [जिनाः] जिनेन्द्रदेवने [तत्त्वतः] यथार्थतः [समाख्यात- - . अर्थान्तरत्व = अन्यपदार्थपना ।

जैन शास्त्रमाला]
-ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन-
१६१
अथ द्रव्यद्रव्यान्तरस्यारम्भं द्रव्यादर्थान्तरत्वं च सत्तायाः प्रतिहन्ति
दव्वं सहावसिद्धं सदिति जिणा तच्चदो समक्खादा ।
सिद्धं तध आगमदो णेच्छदि जो सो हि परसमओ ॥६८॥
द्रव्यं स्वभावसिद्धं सदिति जिनास्तत्त्वत: समाख्यातवन्तः ।
सिद्धं तथा आगमतो नेच्छति यः स हि परसमयः ॥ १८ ॥
त्यर्थः ।। ६७ ।। अथ यथा द्रव्यं स्वभावसिद्धं तथा तत्सदपि स्वभावत एवेत्याख्याति--- दव्वं सहाव-
सिद्धं द्रव्यं परमात्मद्रव्यं स्वभावसिद्धं भवति । कस्मात् । अनाद्यनन्तेन परहेतुनिरपेक्षेण स्वतः सिद्धेन
केवलनानादिगुणाधारभूतेन सदानन्दैकरूपसुखसुधारसपरमसमरसीभावपरिणतसर्वशुद्धात्मप्रदेशभरिता-
वस्थेन शुद्धोपादानभूतेन स्वकीयस्वभावेन निप्पन्नत्वात् । यच्च स्वभावसिद्धं न भवति तद्रव्यमपि न
भवति । ह्यणुकादिपुद्गलस्कन्धपर्यायवत् मनुप्यादिजीवपर्यायवच्च । सदिति यथा स्वभावतः सिद्धं
तद्रव्यं तथा सदिति सत्तालक्षणमपि स्वभावत एव भवति, न च भिन्नसत्तासमवायात् । अथवा यथा
द्रव्यं स्वभावतः सिद्धं तथा तस्य योऽसौ सत्तागुणः सोऽपि स्वभावसिद्ध एव । कस्मादिति चेत् ।
सत्ताद्रव्ययोः संजालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽपि दण्डदण्डिवद्भिनप्रदेशाभावात् । इदं के कथितवन्तः । जिणा
तच्चदो समक्खादा जिनाः कर्तारः तत्त्वतः सम्यगाव्यातवन्तः कथितवन्तः सिद्धं तह आगमदो
वन्तः] कहा है; [तथा] इसप्रकार [आगमतः] आगमसे [सिद्धं] सिद्ध है; [यः]
जो [न इच्छति] इसे नहीं मानता [सः] वह [हि] वास्तवमें [परसमयः]
परसमय है।
टोका :- वास्तवमें द्रव्योंसे द्रव्यान्तरोंकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि सर्व
द्रव्य स्वभावसिद्ध हैं । ( उनकी ) स्वभावसिद्धता तो उनको अनादिनिधनतासे
है; क्योंकि 'अनादिनिधन साधनान्तरकी अपेक्षा नहीं रखता। वह गुणपर्यायात्मक
ऐसे अपने स्वभावको ही-जो कि मूल साधन है उसे धारण करके स्वयमेव सिद्ध हुआ
वर्तता है।
जो द्रव्योंसे उत्पन्न होता है वह तो द्रव्यान्तर नहीं है, 'कादाचित्कपने के कारण
२
अनादिनिधन आदि और अन्तले रहित । (जो अनादिमनन्त हो उनकी निद्धिक निये अन्य माधनको आव-
श्यकता नहीं है।)
कादाचित्य कदाचित् - किसीसमय हो ऐला; अनित्य ।
द्रव्यो स्वभावे सिद्ध ने 'सत्' - तत्वतः श्री जिनो कहे।
मे सिद्ध छे आगम थकी, माने न ते परसमय छे ॥ ६ ॥

----प्रवचनसार--- ११८ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अथोत्पादव्ययप्रौव्याणां परस्पराविनाभावं दृढ़यति ण भवो भंगविहीणो भंगो वा पत्थि संभवविहीणो। उम्पादो वि य भंगो ण विणा धोत्रेण अत्थण ॥ १०० ।। न भवो भङ्गविहीनो भङ्गो वा नास्ति संभवविहीनः । उत्पादोऽपि च भङगो न विना ध्रौव्येणार्थेन ।। १०० ॥ स्वरूपसत्तारूपेण प्रथमगाथा, महासत्तारूपेण द्वितीया, यथा द्रव्यं स्वतःसिद्धं तथा सत्तागुणोऽपीति कथनेन तृतीया, उत्पादव्ययभ्रीव्यत्वेऽपि सत्तैव द्रव्यं भण्यत इति कथनेन चतुर्थीति गाथाचतुष्टयेन सत्तालक्षणविवरणमुख्यतया द्वितीयस्थलं गतम् । अथोत्पादव्ययध्रौव्याणां परस्परसापेक्षत्वं दर्शयति - ण भवो भंगविहीणो निर्दोपपरमात्मरुचिरूपसम्यक्त्वपर्यायस्य भव उत्पादः तद्विपरीतमिथ्यात्वपर्यायस्य भङ्ग विना न भवति । कस्मात् । उपादानकारणाभावात्, मृत्पिण्डभङ्गाभावे घटोत्पाद इव । द्वितीयं अव, उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यका परस्पर 'अविनाभाव दृढ़ करते हैं :- गाथा १०० अन्वयार्थ :- [भवः] उत्पाद [भङ्गविहीनः] भंग रहित [न] नहीं होता, [वा] और [भङ्गः] भंग [संभवविहीनः] विना उत्पादके [नास्ति] नहीं होता; [उत्पादः] उत्पाद [अपि च] तथा [भङ्गः] भंग [ध्रौव्येण अर्थेन विना] ध्रौव्य पदार्थके विना [न] नहीं होते । टीका :- वास्तवमें 'सर्ग 'संहारके बिना नहीं होता और संहार सर्गके बिना नहीं होता; "मृष्टि और संहार 'स्थिति (प्रौव्य) के बिना नहीं होते, स्थिति सर्ग और संहार के बिना नहीं होती। जो सर्ग है वही संहार है, जो संहार है वही सर्ग है; जो सर्ग और संहार है वही १ अविनामाव-एक विना दूसरे का नहीं होना बह; एक-दूसरे बिना हो ही नहीं सके ऐसा भाव । २ नंगाय; नान सद, त्यति । महारनामः । दिनदना; वहना; धीम्य । उत्पाद भंग विना नहीं, संहार सर्ग विना नहीं । उत्पाद तेमज भंग, प्रौव्य-पदार्थ विण वर्ते नहीं ॥ १०० ।।

जैन शास्त्रमाला -जेयतत्व-प्रज्ञापन- १६ न खलु सर्गः संहारमन्तरेण, न संहारो वा सर्गमन्तरेण, न सृष्टिसंहारो स्थिति- मन्तरेण, न स्थितिः सर्गसंहारमन्तरेण । य एव हि सर्गः स एव संहारः, य एव संहारः स एव सर्गः, यावेव सर्गसंहारौ सैव स्थितिः, यैव स्थितिस्तावेव सर्गसंहाराविति । तथाहि - य एव कुम्भस्य सर्गः स एव मृत्पिण्डस्य संहारः, भावस्य भावान्तराभावस्वभावेनाव- भासनात् । य एव च मृत्पिण्डस्य संहारः, स एव कुम्भस्य सर्गः, अभावस्य भावान्तरभाव- स्वभावेनावभासनात् । यौ च कुम्भपिण्डयोः सर्गसंहारौ सैवमृत्तिकायाः स्थितिः, व्यति- रेकमुखेनैवान्वयस्य प्रकाशनात् । यैव च मृत्तिकायाः स्थितिस्तावेव कुम्भपिण्डयोः च कारणं मिथ्यात्वपर्यायभङ्गस्य सम्यक्त्वपर्यायरूपेण प्रतिभासनात् । तदपि कस्मात् । "भावान्तर- स्वभावरूपो भवत्यभाव" इति वचनात् । घटोत्पादरूपेण मृत्पिण्डभङ्ग इव । यदि पुनर्मिथ्यात्वपर्याय- भङ्गस्य सम्यक्त्वोपादानकारणभूतस्याभावेऽपि शुद्धात्मानुभूतिरुचिरूपसम्यक्त्वस्योत्पादो भवति, तह्य पादानकारणरहितानां खपुष्पादीनामप्युत्पादो भवतु । न च तथा । भंगो वा णत्यि संभवविहीणो परद्रव्योपादेयरुचिरूपमिथ्यात्वस्य भङ्गो नास्ति । कथंभूतः । पूर्वोक्तसम्यक्त्वपर्यायसंभवरहितः । स्थिति है; जो स्थिति है वही सर्ग और संहार है । वह इसप्रकार :- जो जो कुम्भका सर्ग है वही 'मृत्तिकापिण्डका संहार है; क्योंकि भावका भावान्तरके अभावस्वभावसे अव- भासन है। (अर्थात् भाव अन्यभावके अभावरूप स्वभावसे प्रकाशित है - दिखाई देता है ।) और जो मृत्तिकापिण्डका संहार है वही कुम्भका सर्ग है, क्योंकि अभावका भावान्तरके भावस्वभावसे अवभासन है; (अर्थात् नाश अन्यभावके उत्पादरूप स्वभावसे प्रकाशित है।) और जो कुम्भका सर्ग और पिण्डका संहार है वही मृत्तिकाकी स्थिति है, क्योंकि 'व्यतिरेक अन्वयका अतिक्रमण (उल्लंघन) नहीं करते, और जो मृत्तिकाकी स्थिति है वही कुम्भका सर्ग और पिण्डका संहार है, क्योंकि व्यतिरेकोंके द्वारा ही 'अन्वय प्रकाशित होता है । और यदि ऐसा ही (ऊपर समझाया तदनुसार) न माना जाय तो ऐसा सिद्ध होगा कि 'सर्ग अन्य है, संहार अन्य है, स्थिति अन्य है।' (अर्थात् तीनों पृथक हैं ऐसा माननेका प्रसंग आजायगा ।) ऐसा होने पर (क्या दोष आता है, सो समझाते हैं) : * 'व्यतिरेकामुपेन....प्रमणात्' के स्थान पर निम्न प्रकार पाठ चाहिये ऐसा लगता है, "व्यतिरेकानामन्वयानति- प्रामणान् । वैव च मृत्तिकायाः स्थितिस्तावेव गुम्भपिण्ठयोः सर्गसंहारी; व्यतिरेय मुगिनवान्वयम्य प्रकाशनात् ।" हिन्दी अनुवाद हम संशोधित पाठानुसार किया है । मृत्तियापिण्टमिट्टीफा पिण्ड । २ व्यतिरेक-भेद; एकाया दूसरेप न होना वह ; 'यह वह नहीं है' ऐ नानका निमित्तभूत भिजाय । अन्यथ- एकरुपता; साहस्पता; 'यह वही है ऐसे मानका कारपन्त एपरचय ।

-प्रवचनसार- । । - २०० [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान सर्गसंहारौ, व्यतिरेकाणामन्वयानतिक्रमणात् । यदि पुनर्नेदमेवमिष्येत तदान्यः सर्गोऽन्यः संहारः अन्या स्थितिरित्यायाति । तथा सति हि केवलं सर्ग मृगयमाणस्य कुम्भस्योत्पादन- कारणाभावादभवनिरेव भवेत्, असदुत्पाद एव वा। तत्र कुम्भस्याभवनौ सर्वेषामेव भावानामभवनिरेव भवेत् । असदुत्पादे वा व्योमप्रसवादीनामप्युत्पादः स्यात् । तथा केवलं संहारमारभमाणस्य मृत्पिण्डस्य संहारकारणाभावादसंहरणिरेव भवेत्, सदुच्छेद एव वा। तत्र मृत्पिण्डस्यासंहरणौ सर्वेषामेव भावानामसंहरणिरेव भवेत् । सदुच्छेदे वा कस्मादिति चेत् । भङ्गकारणाभावात्, घटोत्पादाभावे मृत्पिण्डस्येव । द्वितीयं च कारणं सम्यक्त्व- पर्यायोत्पादस्य मिथ्यात्वपर्यायाभावरूपेण दर्शनात् । तदपि कस्मात् । पर्यायस्य पर्यायान्तराभाव- रूपत्वात्, घटपर्यायस्य मृत्पिण्डाभावरूपेणेव । यदि पुनः सम्यक्त्वोत्पादनिरपेक्षो भवति मिथ्यात्व- केवल सर्ग-शोधक कुम्भकी (-व्यय और ध्रौव्यसे भिन्न मात्र उत्पाद करनेको जानेवाले कुम्भकी) 'उत्पादन कारणका अभाव होनेसे उत्पत्ति ही नहीं होगी; अथवा तो असत्का ही उत्पाद होगा। और वहाँ, (१) यदि कुम्भकी उत्पत्ति न होगी तो समस्त ही भावोंकी उत्पत्ति ही नहीं होगी। (अर्थात् जैसे कुम्भकी उत्पत्ति नहीं होगी उसीप्रकार विश्वके किसी भी द्रव्यमें किसी भी भावका उत्पाद ही नहीं होगा, - यह दोप आयगा); अथवा (२) यदि असत्का उत्पाद हो तो व्योम-पुष्प इत्यादिका भी उत्पाद होगा, (अर्थात् शून्यमेंसे भी पदार्थ उत्पन्न होने लगेंगे, - यह दोष आयगा ।) और केवल व्ययारम्भक (उत्पाद और ध्रौव्यसे रहित केवल व्यय करनेको उद्यत मृत्तिकापिण्डका) संहारकारणका अभाव होनेसे संहार ही नहीं होगा; अथवा तो सत्का हो उच्छेद होगा। वहाँ, (१) यदि मृत्तिकापिण्डका व्यय न होगा तो समस्त हो भावोंका नहार ही न होगा, (अर्थात् जैसे मृत्तिकापिण्डका संहार नहीं होगा उसीप्रकार विश्वके किसी भी द्रव्यमें किसी भावका संहार ही नहीं होगा, - यह दोप आयगा); अथवा (२) यदि नत्का उच्छेद होगा तो चैतन्य इत्यादिका भी उच्छेद हो जायगा, (अर्थात् समस्त द्रव्योंका सम्पूर्ण विनाश हो जायगा;- यह दोष आयगा ।) और केवल स्थिति प्राप्त करने को जानेवाली मृत्तिकाकी, व्यतिरेकों सहित मदनमानिका कारण। योगासने पूल = (उसाद और ६२६ टिन) अंकला ध्रवाना, केबल यिनिपना; अकेला अवस्थान । [अन्य। ही होता है पनि प्रोन पाद-व्ययसहित ही होगा, अकेला नहीं हो सकता। जगे उतार :-मार य नहीमका प्रबनी द्रब्धका अंग है समन द्रव्य नहीं। , T - जैन शास्त्रमाला] -~-ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापने- २०१ संविदादीनामप्युच्छेदः स्यात् । तथा केवलां स्थितिमुपगच्छन्त्या मृत्तिकाया व्यतिरेका- क्रान्तस्थित्यन्वयाभावादस्थानिरेव भवेत्, क्षणिकनित्यत्वमेव वा । तत्र मृत्तिकाया अस्थानौ सर्वेषामेव भावानामस्थानिरेव भवेत् । क्षणिकनित्यत्वे वा चित्तक्षणानामपि नित्यत्वं स्यात् । तत उत्तरोत्तरव्यतिरेकाणां सर्गेण पूर्वपूर्वव्यतिरेकाणां संहारेणान्वयस्यावस्थानेना- विनाभूतमुद्योतमाननिर्विघ्न–लक्षण्यलाञ्छनं द्रव्यमवश्यमनुमन्तव्यम् ।। १०० ।। अथोत्पादादीनां द्रव्यादर्थान्तरत्वं संहरति - उप्पादहिदिभंगा विज्जते पज्जएसु पज्जाया । दवे हि संति णियदं तम्हा दव्वं हवदि सव्वं ॥ १०१॥ उत्पादस्थितिभङ्गा विद्यन्ते पर्यायेषु पर्यायाः । द्रव्ये हि सन्ति नियतं तस्माद्रव्यं भवति सर्वम् ।। १०१ ।। पर्यायाभावस्ती भाव एव न स्यात् । कस्मात् । अभावकारणाभावादिति, घटोत्पादाभाव मृत्पिण्डाभावस्य इव । उप्पादो वि य भंगो ण विणा दव्वेण अत्येण परमात्मरुविरूपसम्यक्त्वस्योत्पा- दस्तद्विपरीतमिथ्यात्वस्य भङ्गो वा नास्ति । कं विना । तदुभयाधारभूतपरमात्मरूपद्रव्यपदार्थ विना। कस्मात् । द्रव्याभावे व्ययोत्पादाभावान्मृत्तिकाद्रव्याभावे घटोत्पादमृत्पिण्डभङ्गाभाववदिति । यथा सम्यक्त्वमिथ्यात्वपर्यायव्ये परस्परसापेक्षमुत्पादादित्रयं दर्शितं तथा सर्वद्रव्यपर्यायेषु द्रष्टव्य- स्थितिका - अन्वयका - उसके अभाव होनेसे, स्थिति ही नहीं होगी ; अथवा तो क्षणिकको ही नित्यत्व आजायगा । वहाँ (१) यदि मृत्तिकाकी स्थिति न हो तो समस्त ही भावोंकी स्थिति नहीं होगी, (अर्थात् यदि मिट्टी ध्रुव न रहे तो मिट्टीकी ही भाँति विश्वका कोई भी द्रव्य ध्रुव ही नहीं रहेगा, - टिकेगा ही नहीं यह दोप आयगा ।) अथवा (२) यदि क्षणिकका नित्यत्व हो तो चित्तके क्षणिक-भावोंका भी नित्यत्व होगा; (अर्थात् मनका प्रत्येक विकल्प भी त्रैकालिक ध्रुव हो जाय, - यह दोष आयगा ।) इसलिये द्रव्यको 'उत्तर उत्तर व्यतिरेकोंके सर्गके साथ, पूर्व पूर्वके व्यतिरेकोंक संहारके साथ और अन्वयके अवस्थान (नीव्य) के साथ अविनाभाववाला, जिसको निविघ्न (अबाधित) विलक्षणतारूप लांछन प्रकाशमान है ऐसा अवश्य नम्मत करना ।। १०० ।। उत्तर उतर-बाद वादके। लांछन चिह्न। उत्पाद तेन ज ध्रौव्य ने संहार वर्ते पर्यये । ने पर्ययो द्रव्ये नियमथी, सर्व तेथी द्रव्य छे ।। १०१ ।।

२०२ --प्रवचनसार- - भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान उपाययोव्याणि हि पर्यायानालम्बन्ते, ते पुनः पर्याया द्रव्यमालम्बन्ते । ततः समाननातकमेव द्रव्यं न पुन व्यान्तरन् । द्रव्यं हि तावत्पर्यायरालम्ब्यते । समुदायिनः ममुकायामप्रत्यत् पादपवत् । यथा हि समुदायो पादपः स्कन्धमूलशाखासमुदायात्मकः मलमायाभिरालम्बित एवं प्रतिभाति, तथा समुदायि द्रव्यं पर्यायसमुदायात्मकं पर्यागान्त्रितमेव प्रतिभाति । पर्यायास्तूत्पादव्ययध्रौव्यरालम्ब्यन्ते उत्पादव्ययध्रौव्या- १. 200। मोगायत्रीव्याणि द्रव्येण सह परस्पराधाराधेयभावत्वादन्वयद्रव्या- मा मनोविज्ञान - उत्पाद ट्ठिदिभंगा विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावात्मतत्त्वनिर्विकार- वि भणे स्वसंवेदननानविलक्षणाज्ञानपर्यायरूपेण भङ्गः, तदुभया- निम्ब्युिक्तलमणास्त्रयो भङ्गाः कर्तारः। विज्जते विद्यन्ते तिष्ठन्ति । विवारस्वगंवेदनमानपर्याये तावदुलादस्तिष्ठति स्वसंवेदनज्ञान- नभयानागात्मद्रव्यत्वावस्थारूपपर्यायेण प्रौव्यं चेत्युक्तलक्षण- माया द हि संति ते नोक्तलक्षणज्ञानाज्ञानतदुभयाधारात्मद्रव्यत्वावस्था- । गिल निश्निनं प्रदेशाभेदेगि स्वकीयस्वकीयसंज्ञालक्षणप्रयोजना- : यो अन्तिरत्वको नष्ट करते हैं; (अर्थात् यह सिद्ध करते सोमा पदार्थ नहीं हैं) म जैन शास्त्रमाला -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २०३ णामंशधर्मत्वात् बीजाङ कुरपादपत्ववत् । यथा किलाशिनः पादपस्य बीजाङ कुरपादपत्व- लक्षणास्त्रयोंऽशा भङ्गोत्पादध्रौव्यलक्षणैरात्मधर्मरालम्बिताः सममेव प्रतिभान्ति, तथा- शिनो द्रव्यस्योच्छिद्यमानोत्पद्यमानावतिष्ठमानभावलक्षणास्त्रयोंऽशा भङ्गोत्पादध्रौव्यलक्षण- रात्मधर्मरालम्विताः सममेव प्रतिभान्ति । यदि पुनर्भङ्गोत्पादध्रौव्याणि द्रव्यस्यैवेष्यन्ते दिभेदेन । तम्हा दव्वं हवदि सव्वं यतो निश्चयाधाराधेयभावेन तिष्ठन्त्युत्पादादयस्तस्मात्कारणा- दुत्पादादित्रयं स्वसंवेदनज्ञानादिपर्यायत्रयं चान्वयद्रव्याथिकनयेन सर्व द्रव्यं भवति । पूर्वोक्तोत्पादा- दित्रयस्य तथैव स्वसंवेदनज्ञानादिपर्याय त्रयस्य चानुगताकारेणान्वयरूपेण यदाधारभूतं तदन्वयद्रव्यं वृक्षाश्रित ही हैं - वृक्षसे भिन्न पदार्थरूप नहीं हैं, उसीप्रकार पर्याय द्रव्याश्रित ही हैं, द्रव्यसे भिन्न पदार्थरूप नहीं हैं ।) और पर्यायें उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यके द्वारा आलम्वित हैं (अर्थात् उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य पर्यायाश्रित हैं) क्योंकि उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य अंशोंके धर्म हैं ( 'अंशीके नहीं); वीज, अंकुर और वृक्षत्वकी भाँति । जैसे अंशीवृक्षके वीज अंकुर-वृक्षत्वस्वरूप तीन अंश, व्यय- उत्पाद-ध्रौव्यस्वरूप निज धर्मोसे आलम्वित एक साथ ही भासित होते हैं, उसीप्रकार अंशी-द्रव्यके, नष्ट होता हुआ भाव, उत्पन्न होता हुआ भाव, और अवस्थित रहनेवाला यह तीनों अंश व्यय-उत्पाद-ध्रौव्यस्वरूप निजधर्मोके द्वारा आलम्बित एक साथ ही भासित होते हैं । किन्तु यदि (१) भंग, (२) उत्पाद और (३) प्रौव्यको (अंशीका न मानकर) द्रव्यका ही माना जाय तो सारा 'विप्लव को प्राप्त होगा। यथा - (१) पहले, यदि द्रव्यका ही भंग माना जाय तो क्षणभंगसे लक्षित समस्त द्रव्योंका एक क्षणमें ही संहार होजानेसे द्रव्यशून्यता आजायगी, अथवा सत्का उच्छेद हो जायगा । (२) यदि द्रव्यका ही उत्पाद माना जाय तो समय-समय पर होनेवाले उत्पादके द्वारा चिह्नित ऐसे द्रव्योंको प्रत्येकको अनन्तता आजायगी। (अर्थात् समय- समयपर होनेवाला उत्पाद जिसका चिह्न हो ऐसा प्रत्येक द्रव्य अनन्त द्रव्यत्वको प्राप्त होजायगा) अथवा असत्का उत्पाद होजायगा; (३) यदि द्रव्यका ही धोव्य माना जाय तो क्रमश: होनेवाले भावोंके अभावके कारण द्रव्यका अभाव आयगा, अथवा क्षणिकपना होगा। भाव; , अंशी अंशोंबाला; अंशोंका बना हुआ। (द्रव्य अशी है।) * विघ्नव अंधाधुंधी, उथलपुथल ; घोटाला; विरोध । भण-विनाश जिनका लक्षण हो ऐसे ।

-प्रवचनसार-- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान उत्तराबादीनां वितर्यमाणः क्षणभेदो हृदयभूमिमवतरति । अवतरत्येवं यदि द्रव्यमात्म- योग्यते आमनवायतिटते आत्मनैव नश्यतीत्यभ्युपगम्यते । तत्त नाभ्युपगतम् । पर्याया- मामेबोचावादयः कुतः क्षणभेदः । तथाहि - यथा कुतालदण्डचक्रचीवरारोप्यमाणसंस्का- मनियों व एब बर्धमानस्य जन्माणः स एव मृत्पिण्डस्य नाशक्षणः स एव च कोटिन- गाभिनय मुनिकायव्य स्थितिक्षणः । तथा अन्तरङ्गबहिरङ्गसाधनारोप्यमाणसंस्कार- नत्रयो - एयोतपर्यायस्य जन्मक्षणः स एव प्राक्तनपर्यायस्य नाशक्षणः स एव च विधिमय व्यत्वस्य स्थितिक्षणः । यथा च वर्धमानमृत्पिण्डमृत्तिकात्वेषु प्रत्येक- मागवाव्ययत्रीयाणि विस्वभावस्पशिन्यां मृत्तिकायां सामस्त्येनंकसमय एवाय- करना उतरनातनपयद्रव्यत्वेषु प्रत्येकवर्तीन्यप्युत्पादव्ययध्रौव्याणि विस्वभाव पनि नामदन समय एवावलोक्यन्ते । यथैव च वर्धमानपिण्डमृतिकात्ववर्ती- मोति मतिब न वस्त्वन्तरं, तथैवोत्तरप्राक्तनपर्यायद्रव्यत्ववर्तीन्यप्युत्पाद- .

जैन शास्त्रमाला] ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २०७ - -- अथ द्रव्यस्योत्पादव्ययध्रौव्याण्यनेकद्रव्यपर्यायद्वारेण चिन्तयति. पाडुब्भवदि य अण्णो पज्जाओ पज्जओ वयदि अण्णो। दव्वस्स तं पि दव्वं णेव पणळं ण उप्पण्णं ॥१०३॥ प्रादुर्भवति चान्यः पर्यायः पर्यायो व्येति अन्यः । द्रव्यस्य तदपि द्रव्यं नैव प्रणष्टं नोत्पन्नम् ।। १०३ ।। मुख्यतया गाथात्रयेण तृतीयस्थलं गतम् । अथ द्रव्यपर्यायेणोत्पादव्ययध्रौव्याणि दर्शयति - पाडुन्भवदि य प्रादुर्भवति च जायते । अण्णो अन्यः कश्चिदपूर्वानन्तज्ञानसुखादिगुणास्पदभूतः शाश्वतिकः । स कः । पज्जाओ परमात्मावाप्तिरूपः स्वभावद्रव्यपर्यायः । पज्जओ वयदि अण्णो पर्यायो व्येति विनश्यति । कथंभूतः । अन्यः पूर्वोक्तमोक्षपर्यायाद्भिन्नो निश्चयरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिरूपस्यैव मोक्षपर्याय- सम्पूर्णतया (सभी एकसाथ) एक समयमें ही देखे जाते हैं; इसीप्रकार उत्तर पर्यायमें, पूर्वपर्यायमें और द्रव्यत्वमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य प्रत्येकतया (एक-एक) प्रवर्तमान होनेपर भी 'त्रिस्वभावस्पर्शी द्रव्यमें वे सम्पूर्णतया ( (तीनों एकसाथ) एक समयमें ही देखे जाते हैं। और जैसे रामपात्र, मृत्तिकापिण्ड तथा मिट्टीपनमें प्रवर्तमान उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य मिट्टी ही हैं, अन्य वस्तु नहीं; उसीप्रकार उत्तर पर्याय, पूर्व पर्याय, और द्रव्यत्वमें प्रवर्तमान उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य द्रव्य ही हैं, अन्य पदार्थ नहीं ॥ १०२ ।। अव, द्रव्यके उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यको अनेकद्रव्यपर्याय द्वारा विचारते हैं : -- गाथा १०३ अन्वयार्थ :- [द्रव्यस्य] द्रव्यकी [अन्यः पर्यायः] अन्य पर्याय [प्रादुर्भवति] उत्पन्न होती है [च] और [अन्यः पर्यायः] कोई अन्य पर्याय [व्येति] नष्ट होती है; [तदपि] फिर भी [द्रव्यं] द्रव्य [प्रणष्टं न एव] न तो नप्ट है, [उत्पन्नं न न उत्पन्न है (-वह ध्रुव है।) 'त्रिस्व भावस्पर्शी तीनों स्वभावोंको स्पर्श करनेवाला । (द्रव्य उत्पाद, व्यय और प्रौव्य-दन नीनों ग्यभायोंको धारण करता है।) २ अनेकद्रव्यपर्याय एकले अधिक द्रव्योंके संयोगसे होनेवाली पर्याय । उपजे दरवनो अन्य पर्यय, अन्य को विणले वली। पण द्रव्य तो नथी नष्ट के उत्पन्न द्रव्य नथी तहीं ।। १०६ ।।

-~-प्रवचनतार-- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान उत्युदराबादीनां बितवर्यमाणः क्षणभेदो हृदयभूमिमवतरति । अवतरत्येवं यदि द्रव्यमात्म- बोदवाने आत्मनेवावतिटते आत्मनैब नश्यतीत्यभ्युपगम्यते । तत्त नाभ्युपगतम् । पर्याया- मामेबो याबादयः कुतः क्षणभेदः । तथाहि - यथा कुलालदण्डचक्रचीवरारोप्यमाणसंस्का- मनियो का बर्धमानस्य जन्मक्षणः स एव मृत्पिण्डस्य नाशक्षणः स एव च कोटिद्व- गधित निकायस्य नियतिक्षणः । तथा अन्तरङ्गबहिरङ्गसाधनारोप्यमाणसंस्कार- मन्त्रिी, एवोत्तरपर्यायस्य जन्मक्षणः स एव प्राक्तनपर्यायस्य नाशक्षणः स एव च प्रियाधिमन्य व्यत्वस्य स्थितिक्षणः । यथा च वर्धमानमृत्पिण्डमृत्तिकात्वेषु प्रत्येक- मारायच्याणि त्रिस्वभावस्पशिन्यां मृत्तिकायां सामस्त्येनैकसमय एवाव- सोने का उनानपर्यायव्यत्वेषु प्रत्येकवर्तीन्यप्युत्पादव्ययध्रौव्याणि त्रिस्वभाव- मालयन समय एवावलोक्यन्ते । यथैव च वर्धमानपिण्डमृत्तिकात्ववर्ती- मोति तियन वस्त्वन्तरं, तथैवोत्तरप्राक्तनपर्याय द्रव्यत्ववर्तीन्यप्युत्पाद- विकल्वर्यान्तरम् ।। १०२ ॥ .

जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २०७ - अथ द्रव्यस्योत्पादव्ययध्रौव्याण्यनेकद्रव्यपर्यायद्वारेण चिन्तयति पाडुब्भवदि य अण्णो पज्जाओ पज्जओ वयदि अण्णो। दव्वस्स तं पि दव्वं णेव पणठं ण उप्पण्णं ॥१०३ ॥ प्रादुर्भवति चान्यः पर्यायः पर्यायो व्येति अन्यः । द्रव्यस्य तदपि द्रव्यं नैव प्रणप्टं नोत्पन्नम् ॥१०३ ॥ मुख्यतया गाथात्रयेण तृतीयस्थलं गतम् । अथ द्रव्यपर्यायेणोत्पादव्यय ध्रीव्याणि दर्शयति - पाडुभवदि य प्रादुर्भवति च जायते । अण्णो अन्यः कश्चिदपूर्वानन्तज्ञानसुखादिगुणास्पदभूतः शाश्वतिकः । स कः। पज्जाओ परमात्मावाप्तिरूप: स्वभावद्रव्यपर्याय: । पज्जओ वयदि अण्णो पर्यायो व्येति विनश्यति । कथंभूतः । अन्यः पूर्वोक्तमोक्षपर्यायाद्भिन्नो निश्चयरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिरूपस्यैव मोक्षपर्याय- सम्पूर्णतया (सभी एकसाथ) एक समय में ही देखे जाते हैं; इसीप्रकार उत्तर पर्यायमें, पूर्वपर्याय में और द्रव्यत्वमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य प्रत्येकतया (एक-एक) प्रवर्तमान होनेपर भी 'त्रिस्वभावस्पर्शी द्रव्यमें वे सम्पूर्णतया (तीनों एकसाथ) एक समयमें ही देखे जाते हैं। और जैसे रामपात्र, मृत्तिकापिण्ड तथा मिट्टीपनमें प्रवर्तमान उत्पाद, व्यय और प्रौव्य मिट्टी ही हैं, अन्य वस्तु नहीं; उसीप्रकार उत्तर पर्याय, पूर्व पर्याय, और द्रव्यत्वमें प्रवर्तमान उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य द्रव्य ही हैं, अन्य पदार्थ नहीं ।। १०२ ।। अव, द्रव्यके उत्पाद-व्यय-धोव्यको 'अनेकद्रव्यपर्याय द्वारा विचारते हैं :- गाथा १०३ अन्वयार्थ :- [द्रव्यस्य] द्रव्यकी [अन्यः पर्यायः] अन्य पर्याय [प्रादुर्भवति] उत्पन्न होती है [च] और [अन्यः पर्यायः] कोई अन्य पर्याय [व्येति] नष्ट होती है। [तदपि] फिर भी [द्रव्यं] द्रव्य [प्रणप्टं न एव] न तो नष्ट है, [उत्पन्नं न] न उत्पन्न है (-वह ध्र व है।) 'विस्वभावस्पर्शी तीनों स्वभावोंको स्पर्श करनेवाला। (व्य उत्पाट, व्यय और प्रोग्य - इन तीनों ग्यमावोंगी धारण करता है।) अनेकद्रव्यपर्याय-एकसे मधिया द्रव्योंके संयोगने होनेवाली पर्याय । उपजे दरवनो अन्य पर्यय, अन्य को विणले दली। पण द्रव्य तो नथी नष्ट के उत्पन्न द्रव्य नथो तहीं ।।१०३।।

स्थिर रहता होनेसे आम्रफल एक वस्तुको पर्यायों द्वारा उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य है, उसीप्रकार २१० पानामगार और, जैसे पीतभावसे उत्पन्न होता हरितभावसे नष्ट होता और आम्रफलरूपसे [ भगवान भोलान्द लहान एकद्रव्यपर्याया हि गुणपर्यायाः, गुणपर्यावाणामेलद्रव्यलात् । एक द्रव्यत्वं हि तेषां सहकारफलवत् । यथा फिल सहकार फलं स्वपमेय हरितभावात् पादुभावं परिणमत्सूर्यो- त्तरप्रवृत्तहरितपाण्डुभावाभ्यामनुभूतात्मसत्ताक हरितपागडुभावाभ्यां सममविशिष्टसत्ता- कतयैकमेव वस्तु न वस्त्वन्तरं, तसा द्रव्यं स्वयमेव पूर्वावस्याबस्थितगुणादुत्तरावस्थावस्थि- तगुणं परिणमत्पूर्वोत्तरावस्थानस्थितगुणाभ्यां ताभ्यामनुभूतात्मसत्ताकं पूर्वोत्तरावस्थाव: स्थितगुणाभ्यां सममविशिष्टसत्ताकतयैकमेव द्रव्यं न द्रव्यान्तरम् । यथैव चोत्पद्यमानं पाण्डुभावेन, व्ययमानं हरितभावेनावतिष्ठमानं सहकारफलत्वेनोत्पादव्ययध्रौव्याण्येक- वस्तुपर्यायद्वारेण सहकारफलं तथैवोत्पद्यमानमुत्तरावस्थावस्थितगुणेन, व्ययमानं पूर्वाव स्थावस्थितगुणेनावतिष्ठमानं द्रव्यत्वगुणेनोत्पादव्ययध्रौव्याण्येकद्रव्यपर्यायद्वारेण द्रव्यं भवति ।। १०४॥ कं परिणमति । गुणदो य गुणंतरं निरुपरागस्वसंवेदनज्ञानगुणात् केवलज्ञानोत्पत्तिबीजभूतात्स- काशात्सकलविमलकेवलज्ञानगुणान्तरम् । कथंभूतं सत्परिणमति । सदविसिद्ध स्वकीयस्वरूपत्वाच्चिद्र पास्तित्वादविशिष्टमभिन्नम् । तम्हा गुणपज्जाया भणिया पुण दव्यमेव त्ति तस्मात् कारणान्न केवल पूर्वसूत्रोदिताः द्रव्यपर्यायाः द्रव्यं भवन्ति, गुणरूपपर्याया गुणपर्याया भण्यन्ते तेऽपि द्रव्यमेव भवन्ति । अथवा संसारिजीवद्रव्यं मतिस्मृत्यादिविभावगुणं त्यक्त्वा श्रुतज्ञानादिविभावगुणान्तरं परिणमति, पुद्गलद्रव्यं वा पूर्वोक्तशुक्लवर्णादिगुणं त्यक्त्वा रक्तादिगुणान्तरं परिणमति, हरितगुणं त्यक्त्वा पाण्डुरगुणान्तरमाम्रफलमिवेति भावार्थः ।।१०४।। एवं स्वभावविभावरूपा द्रव्यपर्याया गुणपर्यायाच स्वयं ही पूर्व अवस्थामें अवस्थित गुणमेंसे उत्तर अवस्थामें अवस्थित गुणरूप परिणमित होता हुआ, पूर्व और उत्तर अवस्थामें अवस्थित उन गुणोंके द्वारा अपनी सत्ताका अनुभव करता है, इसलिये पूर्व और उत्तर अवस्थामें अवस्थित गुणोंके साथ अवशिष्ट सत्तावाला होनेसे एक ही द्रव्य है, द्रव्यान्तर नहीं। (आमके दृष्टान्तकी भाँति, द्रव्य स्वयं ही गुणकी पूर्व पर्यायमेंसे उत्तरपर्यायरूप परिणमित होता हुआ, पूर्व और उत्तर गुणपर्यायोंके द्वारा अपने अस्तित्वका अनुभव करता है, इसलिये पूर्व और उत्तर गुणपर्यायोंके साथ अभिन्न अस्तित्व होनेसे एक ही द्रव्य है, द्रव्यान्तर नहीं ; अर्थात् वे वे गुणपर्यायें और द्रव्य एक ही द्रव्यरूप हैं, भिन्न- भिन्न द्रव्य नहीं हैं।) - . उत्तर अवस्थामें अवस्थित गुणसे उत्पन्न, पूर्व अवस्थामें अवस्थित गुणसे नष्ट और जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २११ - - तम्हा अथ सत्ताद्रव्ययोरनर्थान्तरत्वे युक्तिमुपन्यस्यति ण हदि जदि सहव्वं असधुव्वं हवदि तं कहं दव्वं । हवदि पुणो अण्णं वा दव्वं सयं सत्ता ॥ १०५।। न भवति यदि सद्रव्यमसद्ध्वं भवति तत्कथं द्रव्यम् । भवति पुनरन्यद्वा तस्माद्रव्यं स्वयं सत्ता ॥ १०५ ।। नयविभागेन द्रव्यलक्षणं भवन्ति इति कथनमुख्यतया गाथायेन चतुर्थस्थलं गतम् । अथ सत्ताद्रव्य- योरभेदविषये पुनरपि प्रकारान्तरेण युक्ति दर्शयति - ण हवदि जदि सहव्वं परमचैतन्यप्रकाशरूपेण स्वल्पेण स्वरूपसत्तास्तित्वगुणेन यदि चेत् सन्न भवति । किं कर्तृ । परमात्मद्रव्यं । तदा असद्धवं होदि असदविद्यमानं भवति ध्रुवं निश्चितम् । अविद्यमानं सत् तं कहं दव्वं तत्परमात्मद्रव्यं कथं भवति, किंतु नैव । स च प्रत्यक्षविरोधः । कस्मात् । स्वसंवेदनजानेन गम्यमानत्वात् । अथाविचारित- रमणीयन्यायेन सत्तागुणाभावेप्यस्तीति चेत्, तत्र विचार्यते - यदि केवलनानदर्शनगुणाविनाभूत- स्वकीयस्वरूपास्तित्त्वात्पृथग्भूता तिष्ठति तदा स्वरूपास्तित्वं नास्ति, स्वरूपास्तित्वाभावे द्रव्यमपि नास्ति। अथवा स्वकीयस्वरूपास्तित्वात्सनालक्षणप्रयोजनादिभेदेऽपि प्रदेशरूपेणाभिन्नं तिष्ठति द्रव्यत्व गुणसे स्थिर होनेसे, द्रव्य एकद्रव्यपर्यायके द्वारा उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य है । भावार्थ :- इससे पूर्वकी गाथामें द्रव्यपर्यायके द्वारा (अनेक द्रव्यपर्यायोंके द्वारा) द्रव्यके उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य बताये गये थे। इस गाथामें गुणपर्यायके द्वारा (एकद्रव्यपर्याय- के द्वारा) द्रव्यके उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य वताये गये हैं ।। १०४ ।। अव, सत्ता और द्रव्य अर्थान्तर (भिन्न पदार्थ, अन्य पदार्थ) नहीं होनेके सम्बन्धमें युक्ति उपस्थित करते हैं :- + ( गाथा १०५ अन्वयार्थ :- [यदि] यदि [द्रव्यं] द्रव्य [सत् न भवति] (स्वरूपसे ही) सत् न हो तो - (१) [ध्रुवं असत् भवति ] निश्चयसे वह असत् होगा; [तत् कायं द्रव्यं] (जो असत् होगा) वह द्रव्य कैसे हो सकता है ? [पुनः वा] अथवा (यदि असत् न हो) तो (२) [अन्यत् भवति] वह सत्ताले अन्य (पृथक् ) हो ! (नो नी कैसे हो सकता है ? ) [तस्मात् ] इसलिये [द्रव्यं स्वयं] द्रव्य स्वयं ही [सत्ता] है । जो द्रव्य होय न सत्, ठरे ज असत्, बने क्यम द्रव्य ? वा भिन्न ठरतु सत्त्वधी ! तेथी स्वयं ते सत्त्व छे ।। १०५॥

२१२ -~~-प्रवचनसार [भगवान श्रीमान्द-महान यदि हि द्रव्यं स्वरूपत एव सत्र त्यातना हितगी गतिः सराहा गवति, रात्तातः पृथग्वा भवति । तत्रासद्धवद्धोव्यस्यासंभवादात्मानमधारयद्रव्यमेवारतं गच्छेत् । सत्तातः पृथग्भवत् सत्तामन्तरेणात्मानं धारयत्तावन्मात्रप्रयोजनां सत्तामेवास्तं गमयेत् । स्वरूपतस्तु सद्भवध्रौव्यस्य संभवादात्मानं धारयद्रव्यमुद्गच्छेत् । सत्तातोऽपृथग्भूत्वा चात्मानं धारयत्तावन्मात्रप्रयोजनां सत्तामुद्गमयेत् । ततः स्वयमेव द्रव्यं सत्वेनाभ्यु- पगन्तव्यं, भावभाववतोरपृथक्त्वेनान्यत्वात् ।। १०५ ।। तदा संमतमेव । अत्रावसरे सौगतमतानुसारी कश्चिदाह - गिद्धगर्मागमत्ताहरण शुद्धात्मद्रव्य मुपचारेणास्ति, न च मुख्यवृत्त्येति । परिहारमाह - सिद्धगर्गागोपादान कारणभूतपरमात्मद्रव्याभावे सिद्धपर्यायसत्तैव न संभवति, वृक्षाभावे फल मिव । अत्र प्रस्तावे नैयागिकमतानुसारी कश्चिदाह - हवदि पुणो अण्णं वा तत्परमात्मद्रव्यं भवति पुनः किंतु सत्तायाः सकाशादन्यद्भिन्नं भवति पश्चात्सता. समवायात्सद्भवति । आचार्याः परिहारमाहुः- सत्तासमवायात्पूर्व द्रव्यं सदसद्वा, यदि सत्तदा सत्तासमवायो वृथा, पूर्वमेवास्तित्वं तिष्ठति; अथासत्तहि खपुष्पवदविद्यमानद्रव्येण सह कथं सत्ता समवायं करोति, करोतीति चेत्तहि खपुप्पेणापि सह सत्ता कर्तृ समवायं करोतु, न च तथा । तम्हा दव्वं सयं सत्ता तस्मादभेदनयेन शुद्धचैतन्यस्वरूपसत्तैव परमात्मद्रव्यं भवतीति । यथेदं परमात्मद्रव्येण सह शुद्धचेतनासत्ताया अभेदव्याख्यानं कृतं तथा सर्वेषां चेतनाचेतनद्रव्याणां स्वकीयस्वकीयसत्तया सहाभेदव्याख्यानं कर्तव्यमित्यभिप्रायः ।। १०५ ।। टीका :- यदि द्रव्य स्वरूपसे ही 'सत् न हो तो दूसरी गति यह हो कि वह (१) असत् होगा, अथवा (२) सत्तासे पृथक् होगा। वहाँ, (१) यदि वह असत् होगा तो, प्रौव्यके असंभवके कारण स्वयं स्थिर न होता हुआ द्रव्यका ही अस्त हो जायगा; और (२) यदि सत्तासे पृथक् हो तो सत्ताके बिना भी स्वयं रहता हुआ, इतना ही मात्र जिसका प्रयोजन है ऐसी सत्ताको ही अस्त कर देगा। किन्तु यदि द्रव्य स्वरूपसे ही सत् हो तो - (१) ध्रौव्यके सद्भावके कारण स्वयं स्थिर रहता हुआ, द्रव्य उदित होता है, (अर्थात् सिद्ध होता है); और (२) सत्तासे अपृथक् रहकर स्वयं स्थिर (-विद्यमान) रहता हुआ, इतना ही मात्र जिसका प्रयोजन है ऐसी सत्ताको उदित (सिद्ध) करता है । , २ 3 १ नन्-मौजूद । असत् नहीं मौजूद ऐसा। अस्त नष्ट । [जो असत् हो उसका टिकना - मौजूद रहना कैसा ?' इसलिये द्रव्यको असत् माननेसे, अभावका प्रसंग आता है अर्थात् द्रव्य ही सिद्ध नहीं होता। * सत्ताका कार्य इतना ही है कि वह द्रव्यको विद्यमान रखे। यदि द्रव्य सत्तासे भिन्न रहकर भी स्थिर रहे तो फिर सत्ताका प्रयोजन ही नहीं रहता, अर्थात् सत्ताके अभावको प्रसंग आजायेगा। द्रव्यके जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २१३ अथ पृथक्त्वान्यत्वलक्षणमुन्मुद्रयति पविभत्तपदेसत्तं पुत्तमिदि सासणं हि वीरस्स । अण्णत्तमतभावो ण तब्भवं होदि कधमेगं ॥ १०६ ॥ प्रविभक्तप्रदेशत्वं पृथक्त्वमिति शासनं हि वीरस्य । अन्यत्वमतद्भावो न तद्भवत् भवति कथमेकम् ॥ १०६ ।। अथ पृथक्त्वलक्षणं किमन्यत्वलक्षणं च किमिति पृष्टे प्रत्युत्तरं ददाति - पविभत्तपदेसत्तं पुधत्तं पृथक्त्वं भवति पृथक्त्वाभिधानो भेदो भवति । किविशिष्टम् । प्रकण विभक्तप्रदेशत्वं भिन्न- प्रदेशत्वम् । किंवत् । दण्डदण्डिवत् । इत्थंभूतं पृथक्त्वं शुद्धात्मद्रव्यशुद्धसत्तागुणयोर्न घटते । इसलिये द्रव्य स्वयं ही सत्त्व (सत्ता) है ऐसा स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि भाव और 'भाववान्का अपृथक्त्व द्वारा अनन्यत्व है ।। १०५ ।। अव, पृथक्त्वका और अन्यत्वका लक्षण स्पष्ट करते हैं :- गाथा १०६ अन्वयार्थ :- [प्रविभक्तप्रदेशत्वं] विभक्तप्रदेशत्व वह [पृथक्त्वं] पृथक्त्व है, [इति हि] ऐसा [वीरस्य शासनं] वीरका उपदेश है । [अतद्भावः] अतद्भाव (उस- रूप न होना) वह [अन्यत्व] अन्यत्व है। [न तत् भवत् ] जो उसरूप न हो [कथं एकम् भवति] वह एक कैसे हो सकता है ? (कथंचित् सत्ता द्रव्यल्प नहीं है और द्रव्य सत्तारूप नहीं है, इसलिये वे एक नहीं हैं।) टीका :- विभक्त प्रदेशत्व (भिन्न प्रदेशत्व) पृथक्त्वका लक्षण है। वह तो सत्ता और द्रव्यमें सम्भव नहीं है, क्योंकि गुण और गुणीमें विभक्तप्रदेशत्वका अभाव होता है- शुक्लत्व और वस्त्रकी भांति । वह इसप्रकार है कि जैसे - जो शुक्लत्वके ~ गुणके - प्रदेश हैं वे ही वस्त्रो - गुणीके - हैं, इसलिये उनमें प्रदेशभेद नहीं है; इसीप्रकार जो सत्ताके - गुणके-प्रदेश हैं वे ही द्रव्यके - गुणीके - हैं, इसलिये उनमें प्रदेशभेद नहीं है । भाववान् भाववाला 1 [द्रव्य भाववाला है और सत्ता उसका भाव है। वे परम धाम अनन्य। पृथक्त्व और अन्यत्वका भेद जिस अपेक्षासे है उस अपेक्षाको लेकर उनके दिपा तामी गापा वने, वह यहां नहीं लगाना चाहिये, किन्तु यहाँ अनन्यत्वको अपृयवत्वक अपने ही समनाना चाहिये। जिन वीरनो उपदेश अम-पृथक्त्व भिन्न प्रदेशता । अन्यत्व जाण अतत्पणु'; नहि ते-पणे ते क पा ? ।। १०६ ।।

२१४ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान प्रविभक्तप्रदेशत्वं हि पृथक्त्वस्य लक्षणम् । तत्तु सत्ताद्रव्ययोर्न संभाव्यते, गुणगुणिनोः प्रविभक्तप्रदेशत्वाभावात् शुक्लोत्तरीयवत् । तथाहि - यथा य एव शुक्लस्य गुणस्य प्रदेशास्त एवोत्तरीयस्य गुणिन इति तयोर्न प्रदेशविभागः, तथा य एव सत्ताया - कस्माद्धेतोः । भिन्न प्रदेशाभावात् । कयोरिव । शुक्लवस्त्रशुक्लगुणयोरिव । इदि सासणं हि वोरस्स इति शासनमुपदेश आज्ञेति । कस्य । वीरस्य वीराभिधानान्तिमतीर्थकरपरमदेवस्य । अण्णत्तं तथापि तो सत्ता और ऐसा होनेपर भी उनमें ( (-सत्ता और द्रव्यमें) अन्यत्व है, क्योंकि (उनमें) अन्यत्वके लक्षणका सद्भाव है । 'अतद्भाव अन्यत्वका लक्षण है । वह द्रव्यके है ही, क्योंकि गुण और गुणीके तद्भावका अभाव होता है - शुक्लत्व और वस्त्रकी भांति । वह इसप्रकार है कि:- जैसे एक चक्षुइन्द्रियके विषयमें आनेवाला और अन्य सब इन्द्रियोंके समूहको गोचर न होनेवाला शुक्लत्व गुण है वह समस्त इन्द्रिय- समूहको गोचर होनेवाला ऐसा वस्त्र नहीं है; और जो समस्त इन्द्रियसमूहको गोचर होनेवाला वस्त्र है वह एक चक्षुइन्द्रियके विषयमें आनेवाला तथा अन्य समस्त इन्द्रियोंके समूहको गोचर न होनेवाला ऐसा शुक्लत्व गुण नहीं है, इसलिये उनके तद्भावका अभाव है; इसीप्रकार, 'किसीके आश्रय रहनेवाली, "निर्गुण, एक गुणकी बनी हुई, "विशेषण विधायक और "वृत्तिस्वरूप जो सत्ता है वह किसीके आश्रयके बिना रहने- नभाद= (पचित्) उमरा न होना; (कचित्) उसरूप न होना (कथंचित्) अतद्रूपता । द्रव्य कनि मारो नही और मत्ता यावंचित् द्रव्यरूपसे नहीं है, इसलिये उनके अतद्भाव है। नायगा होना, उगम होना, तद्रूपता । :ना इस आसन रहती है. द्रव्यको किसीका आश्रय नहीं है । [जैसे घड़े में घी रहता है, उसीप्रकार द्रव्य गया नही रहली (मोरि पट्टे और घीमें तो प्रदेशभेद है) किन्तु जैसे आममें वर्ण गंधादि हैं उसीप्रकार द्रव्यों है, किन्तु महिना नि है, द्रा गगवाला है। जैसे आम वर्ग, गंध, स्पर्शादि गुणयुक्त कार. या अन्य रिमो गुगवाला नहीं है, क्योंकि न तो वर्ण सूघा जाता है और न स्पर्श किया -::. : और मानवाला, बीयं गुणवाला इत्यादि है, परन्तु ज्ञानगुण कहीं वीर्य गुणवाला नही हैमोकार द्रा अनन्त गुणोंवाला है, परन्तु सत्ता गुण वाली नहीं है । (यह ::: ::: ११३ रनको गुणवाला नहीं समझना चाहिये क्योगि दण्डी और दण्ड में प्रदेश र ::त्रिदेशी है। -:" दाई ।

जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २१५ गुणस्य प्रदेशास्त एव द्रव्यस्य गुणिन इति तयोर्न प्रदेशविभागः। एवमपि तयोरन्यत्व- मस्तितल्लक्षणसद्भावात् । अतद्भावो ह्यन्यत्वस्य लक्षणं, तत्तु सत्ताद्रव्ययोविद्यत एव गुणगुणिनोस्तद्भावस्याभावात् शुक्लोत्तरीयवदेव । तथाहि -- यथा यः किलैकचक्षुरिन्द्रिय- प्रदेशाभेदेऽपि मुक्तात्मद्रव्यशुद्धसत्तागुणयोरन्यत्वं भिन्नत्वं भवति । कथंभूतम् । अतभावो अतद्भावरूपं संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदस्वभावम् । यथा प्रदेशरूपेणाभेदस्तथा संज्ञादिलक्षणरूपेणाप्यभेदो भवतु, को वाला, गुणवाला, अनेक गुणोंसे निर्मित, 'विशेष्य, विधीयमान और वृत्तिमानस्वरूप ऐसा द्रव्य नहीं है, तथा जो किसीके आश्रयके विना रहनेवाला, गुणवाला, अनेक गुणोंसे निर्मित, विशेष्य, विधीयमान और वृत्तिमानस्वरूप द्रव्य है वह किसीके आश्रित रहने- वाली, निर्गुण, एक गुणसे निर्मित, विशेषण, विधायक और वृत्तिस्वरूप ऐसी सत्ता नहीं है, इसलिये उनके तद्भावका अभाव है। ऐसा होनेसे ही, यद्यपि सत्ता और द्रव्यके कथंचित् अनर्थान्तरत्व (-अभिन्नपदार्थत्व, अनन्यपदार्थत्व) है तथापि, उनके सर्वथा एकत्व होगा ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये ; क्योंकि तद्भाव एकत्वका लक्षण है । जो उसरूप ज्ञात नहीं होता वह (सर्वथा) एक कैसे हो सकता है ? नहीं हो सकता; परन्तु गुण-गुणी-रूपसे अनेक ही है, ऐसा अर्थ है । भावार्थ :- भिन्न प्रदेशत्व वह पृथक्त्वका लक्षण है, और अतद्भाव वह अन्यत्वका लक्षण है । द्रव्यमें और गुणमें पृथक्त्व नहीं है फिर भी अन्यत्व है । प्रश्न :- जो अपृथक् होते हैं उनमें अन्यत्व कैसे हो सकता है ? उत्तर :- उनमें वस्त्र और शुभ्रता (सफेदी) की भांति अन्यत्व हो सकता है । वस्त्रके और उसकी शुभ्रताके प्रदेश भिन्न नहीं है, इसलिये उनमें पृथक्त्व नहीं है । . . ' विशेष्य - विशेषताको धारण करनेवाला पदार्थ; लक्ष्य ; भद्य पदार्थ ~ धर्मों। [ी मिठाम, नरबी, मनिकता आदि मिश्रीके विशेष गुण है, और मिश्री इन विशेष गुणोये विणेपित होती हुई अर्थात् उन विपनाओंगे मात होती हुई, उन भेदोसे भेदित होती हुई एक पदार्थ है; और जंमें पान, दान, चारित की त्यादि लामा, विशेषण हैं और आत्मा उन विशेषणोंमे विणेपित होता हुआ (लक्षित, मदित, पहचाना जाता आ) पदार्ग, उसोप्रकार सत्ता विशेषण है और द्रव्य विशेष्य है। (यहां यह नहीं भूलना चाहिये कि दिन बार विपनाक प्रदेशभेद नहीं है।) २ विधीयमान - रचित होनेवाला । (सत्ता इत्यादि गुण द्रव्य के रचयिता है और न उनके दाग या निवासा पदार्थ है।) पत्तिमान धियाना, अस्तित्ववाला, घिर गयाना । (मता नियमान जवाब और अस्तित्व नरवरप है।)

-प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान विषयमापद्यमानः समस्तेतरेन्द्रियग्रामगोचरमतिकान्तः शुक्लो गुणो भवति, न खलु तदखिलेन्द्रियग्रामगोचरीभूतमुत्तरीयं भवति, यच्च किलाखिलेन्द्रियग्रामगोचरीभूतमुत्तरीयं भवति, न खलु स एकचक्षुरिंद्रियविषयमापद्यमानः समस्तेतरेन्द्रियग्रामगोचरमतिक्रान्तः शुक्लो गुणो भवतीति तयोस्तद्धावस्याभावः । तथा या किलाश्रित्य वतिनी निर्गुणैक- गुणसमुदिता विशेषणं विधायिका वृत्तिस्वरूपा च सत्ता भवति, न खलु तदनाश्रित्य वर्ति गुणवदनेकगुणसमुदितं विशेष्यं विधीयमानं वृत्तिमत्स्वरूपं च द्रव्यं भवति यत्तु किलाना- श्रित्य वति गुणवदनेकगुणसमुदितं विशेष्यं विधीयमानं वृत्तिमत्स्वरूपं च द्रव्यं भवति, न खलु साश्रित्य वतिनी निर्गुणैकगुणसमुदिता विशेषणं विधायिका वृत्तिस्वरूपा च सत्ता भवतीति तयोस्तद्भावस्याभावः । अत एव च सत्ताद्रव्ययोः कथंचिदनान्तरत्वेऽपि सर्व- थैकत्वं न शङ्कनीयं, तद्भावो ह्यकत्वस्य लक्षणम् । यत्तु न तद्भवद्विभाव्यते तत्कथमेकं स्यात् । अपि तु गुणगुणिरूपेणानेकमेवेत्यर्थः ॥ १०६ ॥ दोप इति चेत् । नैवम् । ण तब्भवं होदि तन्मुक्तात्मद्रव्यं शुद्धात्मसत्तागुणेन सह प्रदेशाभेदेऽपि संनादिरूपेण तन्मयं न भवति । कथमेगं तन्मयत्वं हि किलकत्वलक्षणं । संज्ञादिरूपेण तन्मयत्वाभावे कथमेकत्वं, किंतु नानात्वमेव । यथेदं मुक्तात्मद्रव्ये प्रदेशाभेदेऽपि संज्ञादिरूपेण नानात्वं कथितं तथैव सर्वद्रव्याणां स्वकीयस्वकीयस्वरूपास्तित्वगुणेन सह ज्ञातव्यमित्यर्थः ।। १०६ ।। अथातद्भाव ऐसा होने पर भी शुभ्रता तो मात्र आँखोंसे ही दिखाई देती है, जीभ, नाक आदि शेप चार इन्द्रियोंसे ज्ञात नहीं होती । और वस्त्र पाँचों इन्द्रियोंसे ज्ञात होता है। इसलिये (कथंचित्) वस्त्र वह शुभ्रता नहीं है और शुभ्रता वह वस्त्र नहीं है । यदि ऐसा न हो तो वस्त्रकी भाँति शुभ्रता भी जीभ, नाक इत्यादि सर्व इन्द्रियोंसे ज्ञात होना चाहिये । किन्तु ऐसा नहीं होता। इसलिये वस्त्र और शुभ्रतामें अपृथक्त्व होने पर भी अन्यत्व यह सिद्ध होता है। इसीप्रकार द्रव्यमें और सत्तादि गुणोंमें अपृथक्त्व होने पर भी अन्यत्व है; क्योंकि द्रव्यके और गुणके प्रदेश अभिन्न होने पर भी द्रव्यमें और गुणमें संज्ञा-संख्या- लक्षणादि भेद होनेसे (कथंचित्) द्रव्य गुणरूप नहीं है और गुण वह द्रव्यरूप नहीं है ।। १०६ ।। अब, अतद्भावको उदाहरण द्वारा स्पष्टरूपसे बतलाते हैं :- 1 4 गाथा १०७ अन्वयार्थ :-[सत् द्रव्यं] 'सत् द्रव्य' [सत् च गुणः] 'सत् गुण' [च] और जैन शास्त्रमाला]] -यतत्व-प्रज्ञापन- - २१७ - अथातभावमुदाहृत्य प्रथयति सद्दव्वं सच्च गुणो सच्चेव य पज्जओ त्ति वित्थारो। जो खलु तस्स अभावो सो तदभावो अतब्भावो ।। १०७ ।। सद्रव्यं संश्च गुणः संश्न व च पर्याय इति विस्तारः । खलु तस्याभावः स तदभावोऽतद्भावः ।। १०७ ।। विशेषेण विस्तार्य कथयति - सद्दव्वं सच्च गुणो सच्चेव य पज्जओ त्ति वित्थारो सद्रव्यं संश्च गुणः संश्च व पर्याय इति सत्तागुणस्य द्रव्यगुणपर्यायेषु विस्तारः । तथा हि - यथा मुक्ताफलहारे सत्तागुण- स्थानीयो योऽसौ शुक्लगुणः स प्रदेशाभेदेन किं किं भण्यते । शुक्लो हार इति शुक्लं सूत्रमिति शुक्लं मुक्ताफल मिति भण्यते, यश्च हारः सूत्रं मुक्ताफलं वा तैस्त्रिभिः प्रदेशाभेदेन शुक्लो गुणो भण्यत इति तद्भावस्य लक्षणमिदम् । तद्भावस्येति कोऽर्थः । हारसूत्रमुक्ताफलानां शुक्लगुणेन सह तन्मयत्वं प्रदेशाभिन्नत्वमिति । तथा मुक्तात्मपदार्थे योऽसी शुद्धसत्तागुणः स प्रदेशाभेदेन किं किं भण्यते । सत्तालक्षणः परमात्मपदार्थ इति सत्तालक्षणः केवलजानादिगुण इति सत्तालक्षणः सिद्धपर्याय [सत् च एव पर्यायः] 'सत् पर्याय' - [इति] इस प्रकार [विस्तारः] (सत्तागुणका) विस्तार है । [यः खलु] (उनमें परस्पर) जो [तस्य अभावः] 'उसका अभाव' अर्थात् 'उसरूप होनेका अभाव' है [सः] वह [तदभावः] 'तद्-अभाव' [अतद्भावः] अर्थात् अतद्भाव है। टोका :- जैसे एक 'मोतियोंकी माला 'हार' के रूपमें, 'सूत्र' (धागा) के रूपमें और 'मोती' के रूपमें - (त्रिधा) तीन प्रकारसे विस्तारित की जाती है, उसीप्रकार एक 'द्रव्य, द्रव्यके रूपमें, 'गुण' के रूपमें और 'पर्याय' के रूपमें - तीन प्रकारसे विस्तारित किया जाता है। और जैसे एक मोतियोंकी मालाका शुक्लत्व गुण, 'शुक्ल हार,' 'शुक्ल धागा, और 'शुक्ल मोती', ~ ऐसे तीन प्रकारसे विस्तारित किया जाता है, उसीप्रकार एक द्रव्यका सत्तागुण 'सत् द्रव्य,' 'सत्गुण', और 'सत्पर्याय', - ऐसे तीन प्रकारले विस्तारित किया जाता है। मोतियोंकी माला-मोती या हार, मौक्तिकमाला । 'सत् द्रव्य' 'सत् पर्याय', 'सत् गुण'-तत्वनो विस्तार थे। नथी ते-पणे अन्योन्य तेह अतत्पण ज्ञातव्य हे ।। १०७ ।।

भावार्थ :- एक आत्माका विस्तारकथन में 'आगद्रव्य' म्पमें जानादिगुण' के रूप में और 'सिद्धत्वादि पर्याय' के रूप में - तीन प्रकार वर्णन किया जाता है । इसीप्रकार सर्व द्रव्योंके सम्बन्धमें समझना चाहिये । १ २ अन्यगुण-सत्ता के अतिरिक्त दूसरा कोई भी गुण । तद्-अभाव= उसका अभाव; (तद्-अभाव =तस्य अभावः) तभाय अतदभावका लक्षण (त्याप); अतदभाव अन्यत्वका कारण है।

जैन शास्त्रमाला] ---ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन-- यथा चैकस्मिन् मुक्ताफललग्दाम्नि यः शुक्लो गुणः स न हारो न सूत्रं न मुक्ताफलं यश्न हारः सूत्रं मुक्ताफलं वा स न शुक्लो गुण इतोतरेतरस्य यस्तस्याभावः स तदभावलक्षणोऽ- तद्भावोऽन्यत्वनिवन्धनभूतः । तथैकस्मिर द्रव्ये यः सत्तागुणस्तन्न द्रव्यं नान्यो गुणो न पर्यायो यच्च द्रव्यमन्यो गुणः पर्यायो वा स न सत्तागुण इतीतरेतरस्य यस्तस्याभावः स तदभावलक्षणोऽतद्भावोऽन्यत्वनिवन्धनभूतः ॥ १०७ ।। अथ सर्वथाऽभावलक्षणत्वमतद्धावस्य निषेधयति - गुगो वाच्यो न भवति । इत्येवं परस्परं प्रदेशाभेदेऽपि योसी संज्ञा दिभेदः स तस्य पूर्वोक्तलक्षणतना- वन्याभावस्तदभावो भण्यते । स च तदभावः पुनरपि किं भण्यते । अतद्भाव: संजालक्षणप्रयोजनादिभेद इत्यर्थः । यथात्र शुद्धात्मनि शुद्धसत्तागुणेन सहाभेदः स्थापितस्तथा यथासंभवं पर्वद्रव्येषु ज्ञातव्य और एक आत्माके अस्तित्व गुणको 'सत् आत्मद्रव्य', 'सत् जानादिगुण' और 'सत् सिद्धत्वादि पर्याय' - ऐसे तीन प्रकारसे विस्तारित किया जाता है; इसीप्रकार सभी द्रव्योंके सम्बन्धमें समझना चाहिये। और एक आत्माका जो अस्तित्व गुण है वह आत्मद्रव्य नहीं है, (सत्ता गुणके विना) नानादिगुण नहीं है, या सिद्धत्वादि पर्याय नहीं है; और जो आत्मद्रव्य है, (अस्तित्वके सिवाय) नानादिगुण है या सिद्धत्वादि पर्याय है वह अस्तित्व गुण नहीं है - इसप्रकार उनमें परस्पर अतद्भाव है, जिसके कारण उनमें अन्यत्व है। इसोप्रकार सभी द्रव्योंके सम्बन्धमें समझना चाहिये । इसप्रकार इस गाथामें सत्ताका उदाहरण देकर अतद्भावको स्पप्ठतया सम- भाया है। (यहाँ इतना विशेष है कि जो सत्ता गुणके सम्बन्धमें कहा है, वह अन्य गुणों के विषयमें भी भलीभांति समझ लेना चाहिये । जैसे कि :- मना गुणगी भांनि एक आत्माके पुरुषार्थ गुणको 'पुरुषार्थी आत्मद्रव्य' 'पुग्यार्थी ज्ञानादिगुण और 'गुम्यार्थी मित्र- त्वादि पर्याय' ... इसप्रकार विस्तरित कर सकते हैं। अभिनप्रदा होनेने प्रकार विस्तार किया जाता है, फिर भी संजा-लक्षण-प्रयोजनादि भेद होनेने पुरवायगुगयो नया आत्मद्रव्यको, जानादि अन्य गुण और सिद्धत्वादि पर्यायको अनदनाक है. हो कि उनमें अन्यत्वका कारण है ।। १०७ ।। सर्वथा अभाव वर अतद्भावका लक्षप, नया नियमाने :-

२२२
-----प्रवचनसार--
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
सुवर्णत्वस्याभावः सुवर्णत्वस्याभावे सुवर्णस्याभाव इत्युभगशून्यत्वं, तथा द्रव्यस्याभावे
गुणस्याभावो गुणस्याभावे द्रव्यस्याभाव इत्युभयशून्यत्वं स्यात् । यथा पटाभावमात्र एव घटो
घटाभावमात्र एव पट इत्युभयोरपोहरूपत्वं तथा द्रव्याभावमात्र एव गुणो गुणोभावमात्र
एव द्रव्यमित्यत्राप्यपोहरूपत्वं स्यात् । ततो द्रव्यगुणयोरेकत्वमशून्यत्वमनपोहत्वं चेच्छता
यथोदित एवातद्भावोऽभ्युपगन्तव्यः ।। १०८ ।।
अथ सत्ताद्रव्ययोर्गुणगुणिभावं साधयति -
जो खलु दव्वसहावो परिणामो सो गुणो सदविसिट्ठो ।
सदवठ्ठिदं सहावे दव्वं ति जिणोवदेसोयं ॥१०६॥
यः खलु द्रव्यस्वभावः परिणामः स गुणः सदविशिष्टः ।
सदवस्थितं स्वभावे द्रव्यमिति जिनोपदेशोऽयम् ।। १०६॥
सुवर्णत्वगुणस्याप्यभावः, तथा सत्तागुणप्रदेशेभ्यो भिन्नस्य मुक्तजीवद्रव्यस्याभावस्तथैव मुक्तजीवद्रव्य-
प्रदेशेभ्यो भिन्नस्य सत्तागुणस्याप्यभावः इत्युभयशून्यत्वं प्राप्नोति । यथेदं मुक्तजीवद्रव्ये संज्ञादिभेद-
भिन्नस्यातद्भावस्तस्य सत्तागुणेन सह प्रदेशाभेदव्याख्यानं कृतं तथा सर्वद्रव्येषु यथासंभवं ज्ञातव्य-
मित्यर्थः ॥ १०८ ।। एवं द्रव्यस्यास्तित्वकथनरूपेण प्रथमगाथा, पृथक्त्वलक्षणातद्भावाभिधानान्यत्व
लक्षणयोः कथनेन द्वितीया, संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदरूपस्यातद्भावस्य विवरणरूपेण तृतीया, तस्यैव
द्रव्य होगा; - इसप्रकार इसमें भी (द्रव्य-गुणमें भी) 'अपोहरूपता आजायगी,
केवल नकाररूपताका प्रसङ्ग आजायगा ।)
इसलिये द्रव्य और गुणका एकत्व, अशून्यत्व और 'अनपोहत्व चाहनेवालेको
यथोक्त ही (जैसा कहा वैसा ही) अतद्भाव मानना चाहिये ।। १०८ ।।
अव, सत्ता और द्रव्यका गुण - गुणीपना सिद्ध करते हैं :-
(अर्थात्
गाथा १०९
अन्वयार्थ :-[यः खलु] जो, [द्रव्यस्वभावः परिणामः] द्रव्यका स्वभावभूत
(उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक) परिणाम है [सः] वह (परिणाम) [सदविशिष्टः गुणः]
'सत्' से अविशिष्ट (सत्तासे अभिन्न है ऐसा) गुण है । [स्वभाव अवस्थितं] 'स्वभावमें
अनपोहब-अपोहरूपताका न होना; केवल नकारात्मकताका न होना ।
परिणाम द्रव्यस्वभाव जे, ते गुण 'सत्' अविशिष्ट छ ।
'द्रव्यो स्वभावे स्थित सत् छ'-अ ज आ उपदेश छे ॥ १०६ ॥

२२३ जैन शास्त्रमाला] -क्षेयतत्त्व-प्रज्ञापन- द्रव्यं हि स्वभावे नित्यमवतिष्ठमानत्वात्सदिति प्राक् प्रतिपादितम् । स्वभावस्तु द्रव्यस्य परिणामोऽभिहितः । य एव द्रव्यस्य स्वभावभूतः परिणामः, स एव सदविशिष्टो गुण इतीह साध्यते । यदेव हि द्रव्यस्वरूपवृत्तिभूतमस्तित्वं द्रव्यप्रधाननिर्देशात्सदिति संशन्धते तदविशिष्टगुणभूत एव द्रव्यस्य स्वभावभूतः परिणामः द्रव्यवृत्तहिं त्रिकोटि- समयपशिन्याः प्रतिक्षणं तेन तेन स्वभावेन परिणमनाद्रव्यस्वभावभूत एव तावत्प- दृढीकरणार्थ च चतुर्थीति द्रव्यगुणयोरभेदविपये युक्तिकथनमुन्यतया गाथाचतुष्टयेन पञ्चमस्थल गतम् । अथ सत्ता गुणो भवति, द्रव्यं च गुणी भवतीति प्रतिपादयति - जो खलु दव्वसहावो परिणामो यः खनु स्फुटं द्रव्यस्य स्वभावभूत: परिणामः पञ्चेन्द्रियविषयानुभवरूपमनोव्यापारोत्पन्नसमस्त- मनोरथरूपविकल्पजालाभावे सति यश्चिदानन्दकानुभूतिरूपः स्वस्थभावस्तस्योत्पादः, पूर्वोक्तविकल्प- जालविनाशो व्ययः, तदुभयाधारभूतजीवत्वं प्रीव्यमित्युक्तलक्षणोत्पादव्यय ध्रीव्यात्मकजीवद्रव्यस्य स्वभावभूतो योऽसी परिणामः सो गुणो स गुणो भवति । स परिणामः कथंभूतः सन्गुणो भवति । सदविसिट्ठो सतोऽस्तित्वादविशिष्टोऽभिन्नस्तदुत्पादादित्रयं तिष्ठत्यस्तित्वं चैकं तिष्ठत्यस्तित्वेन सह कथमभिन्नो भवतीति चेत् । “उत्पादव्ययीव्ययुक्नं सत्” इति वचनात् । एवं सति सत्तैव गुणो भवतीत्यर्थः । इति गुणव्याख्यानं गतम् । सदवद्विदं सहावे दव्व त्ति सदवस्थितं स्वभावे द्रव्यमिति । द्रव्यं परमात्मद्रव्यं भवति । किं कर्तृ । सदिति । केन । अभेदनयेन । कथंभूतम् । नत् अवस्थितम् । क्व । उत्पादव्ययभ्रीव्यात्मकस्वभावे। जिणोवदेतोयं अयं जिनोपदेश इति 'सदवट्टिदं सहावे दव्वं - अवस्थित (होनेसे) [द्रव्यं] द्रव्य [सत्] सत् है' - [इति जिनोपदेशः] ऐसा जो (६६ वी गाथामें कथित) जिनोपदेश है [अयम् ] वही यह है । (अर्थात् ६६ वी गाथाके कथनमेंसे इस गाथामें कथित भाव सहज ही निकलता है ।) टीका:- द्रव्य स्वभावमें नित्य अवस्थित होनेसे सत् है, - ऐसा पहले (हवीं गाथामें) प्रतिपादित किया गया है; और (वहाँ) द्रव्यका स्वभाव परिणाम कहा गया है । यहाँ यह सिद्ध किया जा रहा है कि जो द्रव्यका स्वभावभूत परिणाम है वही 'सत्' से अविशिष्ट (अस्तित्वसे अभिन्न ऐसा - अस्तित्वसे कोई अन्य नहीं गेला) गुण है । द्रव्यके स्वरूपका वृत्तिभूत ऐसा जो अस्तित्व द्रव्यप्रधान यमन के द्वारा 'सत्' शब्दसे कहा जाता है उससे अविशिष्ट (उस अस्तित्वन अनन्य ) गुगमन ही द्रव्य- स्वभावभूत परिणाम है; क्योंकि द्रव्यकी 'वृत्ति (अस्तिन्य) तीन प्रकार समयको (भूत, भविष्यत्, वर्तमान कालको) स्पणित करती होनेने (यह वृनि - अस्तित्व) प्रतिक्षण उस-उस स्वभावरूप परिणमित होती है । वृत्ति-पर्तना; अस्तित्वमा पहा रियाना कर।

और व्यतिरेकव्यक्तियोंको गौण कर दिया जाता है, इसलिये द्रव्यके सद्भावसंबद्ध उत्पाद टीका :-गामार कनोनि ( Fr) गोपाल लक्षणमाला अनादिनिधन यह द्रव्य सत्-मनभावमें (अस्तिहारमा) को प्राप्त होता है। द्रव्यका वह उत्पाद, द्रव्यको 'अभिनेता राणा गभाना ही है और गर्गायों को अभिधेयताके समय असद्भावरांबदही के । गे माया ममगार हैं :- जब द्रव्य ही कहा जाता है - पर्यायें नहीं, तब उत्पत्तिचिनाण रहित, गुग- पत् प्रवर्तमान, द्रव्यको उत्पन्न करनेवाली 'अन्वयक्तियों के द्वारा, उत्पत्तिविनाशलक्षण- वाली, क्रमशः प्रवर्तमान, पर्यायोंकी उत्पादक उन-उन 'व्यतिरेकव्यक्तियोंको प्राप्त होने- वाले द्रव्यको 'सद्भावसंवद्ध ही उत्पाद है; सुवर्णकी भांति । जैसे :- जब सुवर्ण ही १ अकलंक निर्दोष (यह द्रव्य पूर्वकथित सर्वप्रकार निर्दोष लक्षणवाला है ।) २ अभिधेयता कहने योग्यपना; विवक्षा; कथनी । 3 अन्वयक्ति अन्वयरूपशक्ति । (अन्वयशक्तियां उत्पत्ति वीर नाशने रहित है, एक ही साथ प्रवृत्त होती हैं और द्रव्यको उत्पन्न करती हैं । ज्ञान, दर्शन, चारित्र इत्यादि बात्मद्रव्यको अन्वयशक्तियां है।) ४ मतिरेकव्यक्ति भेदरूप प्रगटता । [व्यतिरेकव्यक्तियां उत्पत्ति विनाशको प्राप्त होती हैं, क्रमशः प्रवृत्त होती हैं, और पर्यायोंको उत्पन्न करती हैं । श्रुतज्ञान, केवलज्ञान इत्यादि तथा स्वरूपाचरण चारित्र, यथास्यातगारिस इत्यादि आत्मद्रव्यको व्यतिरेकव्यक्तियां हैं । व्यतिरेक और अन्वयक अयोंके लिये १९वें पृष्ठका फुटनोट (टिप्पण) देखें। ५ सद्भावसंवद्ध सद्भाव -- अस्तित्व के साथ संबन्ध रखनेवाला, -- संकलित । [द्रव्यको विवक्षाके समय अन्वय शक्तियोंको मुख्य (सत्-उत्पाद, विद्यमानका उत्पाद) है। ] M - जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २२७ प्रभवावसानजिताभियोगपद्यप्रवृत्ताभिव्यनिष्पादिकाभिरन्वयशक्तिभिः प्रभवावसान- लाञ्छनाः क्रमप्रवृत्ताः पर्यायनिष्पादिका व्यतिरेकव्यक्तीस्तास्ताः संक्रामतो द्रव्यस्य सद्भावनिवद्ध एव प्रादुर्भावः हेमवत् । तथाहि - यदा हेमैवाभिधीयते नाङ्गदादयः पर्यायास्तदा हेमसमानजीविताभियोगपद्यप्रवृत्ताभिर्हेमनिष्पादिकाभिरन्वयशक्तिभिरङ्ग- दादिपर्यायसमानजीविताः क्रमप्रवृत्ता अङ्गदादिपर्यायनिष्पादिका व्यतिरेकव्यक्तीस्तास्ताः संक्रामतो हेम्नः सद्भावनिवद्ध एव प्रादुर्भावः । यदा तु पर्याया एवाभिधीयन्ते न द्रव्यं तदा प्रभवावसानलाञ्छनाभिः क्रमप्रवृत्ताभिः पर्यायनिष्पादिकाभिर्व्यतिरेकव्यक्तिभिस्ता- भिस्ताभिः प्रभवावसानजिता योगपचप्रवृत्ता द्रव्यनिष्पादिका अन्वयशक्तीः संक्रामतो द्रव्यस्यासद्भावनिबद्ध एव प्रादुर्भावः हेमवदेव । तथाहि - यदाङ्गदादिपर्याया एवाभिधी- यन्ते न हेम तदाङ्गदादिपर्यायसमानजीविताभिः क्रमप्रवृत्ताभिरङ्गदादिपर्यायनिष्पादिका- पश्चाज्जिनदीक्षां गृहीत्वा स एवेदानी रामादिकेवलिपुरुषो निश्चयरत्नत्रयात्मकपरमात्मध्यानेनानन्त- मुखामृततृप्तो जातः, न चान्य इति, तदा सद्भावनिबद्ध एवोत्पाद: । कस्मादिति चेत् । पुरुषत्वेना- विनष्टत्वात् । यदा तु पर्यायनयविवक्षा क्रियते, पूर्व सरागावस्थायाः सकाशादन्योऽयं भरतसगरराम- - कहा जाता है - वाजूबंध आदि पर्यायें नहीं, तब सुवर्ण जितनी स्थायी, युगपत् प्रवर्तमान, सुवर्णकी उत्पादक अन्वयशक्तियोंके द्वारा, वाजूबंध इत्यादि पर्याय जितने स्थायी, क्रमशः प्रवर्तमान, बाजूबंध इत्यादि पर्यायोंकी उत्पादक उन-उन व्यतिरेकव्यक्तियोंको प्राप्त होनेवाले सुवर्णका सद्भावसंवद्ध ही उत्पाद है । और जव पर्यायें ही कही जाती हैं, द्रव्य नहीं, तब उत्पत्तिविनाश जिनका लक्षण है ऐसी, क्रमशः प्रवर्तमान, पर्यायोंको उत्पन्न करनेवाली उन-उन व्यतिरेकव्य- क्तियोंके द्वारा, उत्पत्तिविनाश रहित, युगपत् प्रवर्तमान, द्रव्यको उत्पादक अन्वयक्तियों- को प्राप्त होनेवाले द्रव्यको 'असद्भावसंबद्ध ही उत्पाद है; नुवर्णको ही भांति । वह इसप्रकार जब बाजूबंधादि पर्यायें ही वाही जाती हैं - नुवणं नहीं, तब बाबंध त्यादि पर्याय जितनी टिकानेवाली, क्रमश प्रवर्तमान, बाजूबंध इत्यादि पर्यायांची उत्पादक उन- उन व्यतिरेक-व्यत्तियोंके द्वारा, सुवर्ण जितनी टिवानेवाली, गुगपत् प्रयतमान, मुवर्णकी उत्पादक अन्वयणत्तियोंको प्राप्त सुवर्णके असद्भावयुक्त ही उत्पाद है। अगदभादगंबर-अस्तित्व के साथ संबंधवाला-संकलित। पर्यापोटी विधान और अन्वयानियोंकी गौण दिया जाता है, इसलिये द्रव्य रामाबगर माद ( गाद)] -- २२८ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान हेमनिष्पादिका भिर्व्यतिरेकव्यक्तिभिस्ताभिस्ताभिहेमसमानजीविता योगपद्यप्रवृत्ता अन्वयशक्तोः संक्रामतो हेम्नोऽसद्भावनिबद्ध एव प्रादुर्भावः । अथ पर्यायाभिधेयतायाम- प्यसदुत्पत्तो पर्यायनिष्पादिकास्तास्ता व्यतिरेकव्यक्तयो यौगपद्यप्रवृत्तिमासाद्यान्वयशक्ति- त्वमापन्नाः पर्यायान् द्रवीकुर्युः, तथाङ्गदादिपर्यायनिष्पादिकाभिस्ताभिस्ताभिर्व्यतिरेकव्य- क्तिभियोगपञ्चप्रवृत्तिमासाद्यान्वयशक्तित्वमापन्नाभिरङ्गदादिपर्याया अपि हेमोक्रियेरन् । पाण्डवादिकेवलिपुरुषाणां संवन्धी निरुपरागपरमात्मपर्यायः स एव न भवति, तदा पुनरसद्भावनिबद्ध एवोत्पादः । कस्मादिति चेत् । पूर्वपर्यायादन्यत्वादिति । यथेदं जीवद्रव्ये सदुत्पादासदुत्पादव्याख्यानं अब, पर्यायोंकी अभिधेयता (कथनी) के समय भी, असत्-उत्पादमें पर्यायोंको उत्पन्न करनेवाली वे-वे व्यतिरेकव्यक्तियाँ युगपत् प्रवृत्ति प्राप्त करके अन्वयशक्तिपनेको प्राप्त होती हुई पर्यायोंको द्रव्य करता है (पर्यायोंकी विवक्षाके समय भी व्यतिरेक- व्यक्तियाँ अन्वयशक्तिरूप बनती हुई पर्यायोंको द्रव्यरूप करती हैं); जैसे बाजूबंध आदि पर्यायोंको उत्पन्न करनेवाली वे-वे व्यतिरेकव्यक्तियाँ युगपत् प्रवृत्ति प्राप्त करके अन्वय- शक्तिपनेको प्राप्त करती हुई बाजूबंध इत्यादि पर्यायोंको सुवर्ण करता है तदनुसार । द्रव्यकी अभिधेयताके समय भी, सत्-उत्पादमें द्रव्यकी उत्पादक अन्वयशक्तियाँ क्रमप्रवृत्तिको प्राप्त करके उस-उस व्यतिरेकव्यक्तित्वको प्राप्त होती हुई, द्रव्यको पर्यायें (पर्यायरूप) करती हैं; जैसे सुवर्णकी उत्पादक अन्वयशक्तियां क्रमप्रवृत्ति प्राप्त करके उस-उस व्यतिरेकव्यक्तित्वको प्राप्त होती हुई, सुवर्णको वाजूबंधादि पर्यायमात्र (पर्यायमात्ररूप) करती हैं। इसलिये द्रव्याथिक कथनसे सत्-उत्पाद है, पर्यायाथिक कथनसे असत्-उत्पाद है - यह वात अनवद्य (निर्दोप, अबाध्य) है भावार्थ :- जो पहले विद्यमान हो उसीकी उत्पत्तिको सत्-उत्पाद कहते और जो पहले विद्यमान न हो उसकी उत्पत्तिको असत्-उत्पाद कहते हैं । जब पर्यायोंको गौण करके द्रव्यका मुख्यतया कथन किया जाता है, तब तो जो विद्यमान था वही उत्पन्न होता है, (क्योंकि द्रव्य तो तीनों कालमें विद्यमान है); इसलिये द्रव्यार्थिक नयमे तो द्रव्यको सत्-उत्पाद है; और जव द्रव्यको गौण करके पर्यायोंका मुख्यतया कथन किया जाता है तब जो विद्यमान नहीं था वह उत्पन्न होता है (क्योंकि वर्तमान जय भूतकालमें विद्यमान नहीं थी), इसलिये पर्यायाथिक नयसे द्रव्यके असत्उत्पाद है।

जैन शास्त्रमाला] ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- २२६ - द्रव्याभिधेयतायामपि सदुत्पत्तौ द्रव्यनिष्पादिका अन्वयशक्तयः क्रमप्रवृत्तिमासाद्य तत्तद्वय- तिरेकव्यक्तित्वमापन्ना द्रव्यं पर्यायीकुयुः । तथा हेमनिष्पादिकाभिरन्वयशक्तिभिः क्रमप्र- वृत्तिमासाद्य तत्तद्वयतिरेकमापन्नाभिहेमाङ्गदादिपर्यायमात्री क्रियेत । ततो द्रव्यार्थादे- शात्सदुत्पादः, पर्यायार्थादेशादसत् इत्यनवद्यम् ॥ १११ ।। अथ सदुत्पादमनन्यत्वेन निश्चिनोति जोवो भवं भविस्सदि परोऽमरो वा परो भवीय पुणो । किं दव्वत्तं पजहदि ण जहं अण्णो कहं होदि ।। ११२ ।। जीवो भवन भविष्यति नरोऽमरो वा परो भूत्वा पुनः । कि द्रव्यत्वं प्रजहाति न जहदन्यः कथं भवति ।। ११२।। कृतं तथा सर्वद्रव्येषु यथासंभवं ज्ञातव्यमिति ॥ १११ ।। अथ पूर्वोत्तमेव सदुत्पादं द्रव्यादभिन्नत्वेन विवृणोति -- जीवो जीवः कर्ता भवं भवन परिणमन् सन् भविस्सदि भविष्यति तावत् । कि कि भविप्यति । निर्विकारशुद्धोपयोगविलक्षणाभ्यां शुभाशुभोपयोगाभ्यां परिणम्य परोऽमरो वा परो नरो देवः परस्तिर्यनारकम्पो वा निर्विकारशुद्धोपयोगेन सिद्धो वा भविष्यति । भवोय पुणो एवं पूर्वोक्त- यहाँ यह लक्ष्यमें रखना चाहिये कि द्रव्य और पर्याय भिन्न-भिन्न वस्तुएं नहीं है; इसलिये पर्यायोंकी विवक्षाके समय भी, असत् उत्पादमें, जो पर्याय हैं वे द्रव्य ही हैं, और द्रव्यकी विवक्षाके समय भी, सत् उत्पादमें, जो द्रव्य है वे पर्याय ही हैं ।। १११ अब (सर्व पर्यायों में द्रव्य अनन्य है अर्थात् बह का वही है, इसलिये उनके सत्- उत्पाद है - इसप्रकार) सत्-उत्पादको अनन्यत्वके द्वारा निश्चित करते हैं :- । - गाथा ११२ अन्वयार्थ :- [जीवः] जीव [भवन् ] परिणमिन होता आ [नरः] मनुष्य, [अमरः] देव [वा] अथवा [परः] अन्य (तिर्यच, नाही ना मित्र) [भविष्यति होगा, [पुनः] परन्तु [भूत्वा] मनुष्य देवादि होवर [वि.] नया कर द्रवयं प्रजाति द्रव्यत्वको छोड़ देता है ? [न जहत्] नहीं छोड़ता हुमा पा. [अन्यः पापं भवति ] अन्य कंगे हो सकता है ? (अर्थात् वह अन्य नहीं, वहका वही है ।) जीर परिणमे तेथी नरादिया ये भो; पप-राये। छोरतो प्रयत्मने ? नहि छोडतो परम भन्न थे ।। ११२ ।।

मानासन यारिमा जति सोग । यस्तु हव्यर नसूताना लि.: :: নিবি “মুনা শসা एकात कामगरे । लोगो सलाम । तथाहि -- जोबो Far शाररियामानुर योन पर्यायेण दवाय पर्यायललितत्ति- स्वादोन मिति । सहरका न तेन कि द्रव्यत्वभूतामन्याशक्तिमुज्झति, नोति । यदि नोकि यमलो नाम मात्, गेन प्रकटितनिकोटिसत्तारुः स एव न स्यात् ।।११।। -- कारेण नापिकीमामानम् । भान् वर्तमानकानापेक्षा, भावति भाविकाला. पेक्षया. भूत्वा भूतकालापा नेति काल नये नैनं मुलागि कि दातं पजहदि कि अगला परित्यजति । सर्या द्रव्याधिजन्येन व्यत्य न लजति, द्रव्यादितो न भाति । अण्णो कहं हवादि अन्यो भिन्न: पणं भवति । किंतु द्रव्यान्ययक्तिरूपेण नापनिनलोत्पादः स एवेति गाभिमा इति भावार्थः टीका :- प्रथम तो द्रव्य द्रव्यत्वभूत अन्वयशक्तिको कभी भी न छोड़ता हुआ सत् (विद्यमान) ही है । और द्रव्यके जो पर्यायभूत व्यतिरेकव्यक्तिका उत्पाद होता है उसमें भी द्रव्यत्वभूत अन्वयशक्तिका अच्युतपना होनेसे द्रव्य अनन्य ही है, (अर्थात् उस उत्पादमें भी अन्वयशक्ति तो अपतित-अविनप्ट-निश्चल होनेसे द्रव्य बहका वही है, अन्य नहीं ।) इसलिये अनन्यपनेके द्वारा द्रव्यका सत्-उत्पाद निश्चित होता है, (अर्थात् उपरोक्त कथनानुसार द्रव्यका द्रव्यापेक्षासे अनन्यपना होनेसे, उसके सत्-उत्पाद है, - ऐसा अनन्यपने द्वारा सिद्ध होता है ।) इसी बातको (उदाहरण से) स्पष्ट किया जाता है :-. जीव द्रव्य होनेसे और द्रव्य पर्यायों में वर्तनेसे जीव नारकत्व, मनुष्यत्व, देवत्व और सिद्धत्वमेंसे किसी एक पर्यायमें अवश्यमेव (परिणमित) होगा। परन्तु वह जीव उस पर्यायरूप होकर क्या द्रव्यत्वभूत अन्वयशक्तिको छोड़ता है ? नहीं छोड़ता । यदि नहीं छोड़ता तो वह अन्य कैसे हो सकता है कि जिससे त्रिकोटि सत्ता (तीनप्रकारकी सत्ता, त्रैकालिक अस्तित्व) जिसके प्रगट है ऐसा वह (जीव), वही न हो ? (अर्थात् तीनों कालमें विद्यमान वह जीव अन्य नहीं, वहका वही है ।) भावार्थ :- जीव मनुष्य-देवादिक पर्यायरूप परिणमित होता हुआ भी अन्य नहीं हो जाता, अनन्य रहता है, वहका वही रहता है; क्योंकि 'वही यह देवका जीव है, जो पूर्वभवमें मनुष्य था और अमुक भवमें तिर्यच था' ऐसा ज्ञान हो सकता है । तिर्यचत्व, -- जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- अथासदुत्पादमन्यत्वेन निश्चिनोति - मणुवो ण होदि देवो देवो वा माणुसो व सिद्धो वा । एवं अहोज्जमाणो अणण्णभावं कधं लहदि ।। ११३॥ , मनुजो न भवति देवो देवो वा मानुषो वा सिद्धो वा । एवमभवन्ननन्यभावं कथं लभते ॥ ११३ ॥ ।। ११२ ।। अथ द्रव्यस्यासदुत्पादं पूर्वपर्यायादन्यत्वेन निश्चिनोति - मणुवो ण हवदि देवो आकुलत्वोत्पादकमनुजदेवादिविभावपर्यायविलक्षणमनाकुलत्वरूपस्वभावपरिणतिलक्षणं परमात्मद्रव्यं इसप्रकार जीवकी भाँति प्रत्येक द्रव्य अपनी सर्व पर्यायोंमें वहका वही रहता है, अन्य नहीं हो जाता, अनन्य रहता है। इसप्रकार द्रव्यका अनन्यपना होनेसे द्रव्यका सत्- उत्पाद निश्चित होता है ।। ११२ ।। अव, असत्-उत्पादको अन्यत्वके द्वारा निश्चित करते हैं :- गाथा ११३ अन्वयार्थ :- [मनुजः] मनुष्य [देवः न भवति] देव नहीं है, [वा] अथवा [देवः] देव [मानुषः वा सिद्धः वा] मनुप्य या सिद्ध नहीं है; [एवं अभवन् ] ऐसा न होता हुआ [अनन्य भावं कथं लभते ] अनन्यभावको कैसे प्राप्त हो सकता है ? टोका :- पर्याय पर्यायभूत स्वव्यतिरेक व्यक्तिके काल में ही मत् (विद्यमान) होनेसे, उससे अन्य कालोंमें असत् (अविद्यमान) ही हैं। और पर्यायोंका व्यत्व मृत अन्वयशक्तिके साथ गुंथा हुआ (एकरूपतासे युक्त) जो जमानुपाती (अमानुगार) स्वकालमें उत्पाद होता है उसमें पर्यायभूत स्यव्यति चयनिका पाने माना होनेगे, पर्यायें अन्य ही हैं। इसलिये पर्यायोंकी अन्यताके द्वारा द्रव्यमा - जो कि पर्यायोकि स्वरूपका कर्ता, करण और अधिकरण होनेसे पर्यायाने अपृषक । मा- निश्चित होता है । इस बातको (उदाहरण देकर) स्पष्ट करते है :- मानय नथी नुर, सुर पण नहि मनुज रे नहि मिल थे। ए रीत नहि होतो थको परम ते अनन्दप रे ॥ -- २३२ पर्याया हि पर्यायभूताला लागत: भार मानल्यकाले भवन्त्यसन्त एव । गश्न पर्यायाणां क्या मार यानुरगुन, कानुपानी स्काले प्रादुर्भावः तस्मिन्पर्याय भूताया आत्मपतिदेवत: पूरगमनात्यया अग एन । ततः पर्यायाणामन्यत्वेन निधीयते पर्यावरवर मात करणाधिकरण भूतलोन पर्यायेभ्योऽभूतस्य द्रव्यस्यासदुत्पादः । तथाहि -- न हि मनुजरियवशो वा सितो वा स्यात् न हिरिदशो मतुजो वा सिद्धो वा स्यात् । एवमसत् कथमनन्यो नाम रगात् गेनान्य एक न स्यात् । येन च निष्पद्यमानमनुजादिपर्यायं जायमानवलयादिविकारं काञ्चनगिव जीवद्रगमपि प्रतिपदमन्यन्न स्यात् ।। ११३ ।। यद्यपि निश्चयेन मनुष्यपर्याय देवगणे न समानं तभागि गनुजो लोग भाति । रमात् । नाग- काले मनुष्यपर्यायस्यानुपलम्भात् । देवो वा माणुसो व सिमो वा देतो वा गणो न भवति स्वात्मोप- लब्धिरूपसिद्धपर्यायो वा न भवति । कस्मात् । पर्गागाणां परस्परं भिकाललात्, गुवर्णद्रव्ये कुण्डलादिपर्यायाणामिव । एवं अहोज्जमाणो एवमभवरान् अणण्णभावं कलहदि जनभावकत्वं कथं लभते, न कथमपि । तत एतावदायाति अरादावनिवनोत्पादः पूर्वपर्यायादिलो भवतीति मनुष्य वह देव या सिद्ध नहीं है, और देव, वह मनुष्य या सिद्ध नहीं है। इसप्रकार न होता हुआ अनन्य (वहका वही) कैसे हो सकता है, कि जिससे अन्य ही न हो और जिससे मनुष्यादि पर्यायें उत्पन्न होती हैं ऐसा जीव द्रव्य भी - वलयादि विकार (कंकणादि पर्यायें) जिसके उत्पन्न होती हैं ऐसे सुवर्णकी भाँति - पद-पद पर (प्रति पर्याय पर) अन्य न हो ? [जैसे कंकण, कुण्डल इत्यादि पर्यायें अन्य हैं, (भिन्न- भिन्न हैं, वे की वे ही नहीं हैं) इसलिये उन पर्यायोंका कर्ता सुवर्ण भी अन्य है, इसी- प्रकार मनुष्य, देव इत्यादि पर्यायें अन्य हैं, इसलिये उन पर्यायोंका कर्ता जीवद्रव्य भी पर्यायापेक्षासे अन्य है ।] भावार्थ :- जीवके अनादि अनन्त होने पर भी, मनुष्य पर्यायकालमें देवपर्यायकी या स्वात्मोपलब्धिरूप सिद्धपर्यायकी अप्राप्ति है अर्थात् मनुष्य, देव या सिद्ध नहीं है, इसलिये वे पर्यायें अन्य अन्य हैं । ऐसा होनेसे, उन पर्यायोंका कर्ता, साधन और आधार जीव भी पर्यायापेक्षासे अन्यपनेको प्राप्त होता है। इसप्रकार जीवकी भाँति प्रत्येक द्रव्यके पर्यायापेक्षासे अन्यपना है । इसप्रकार द्रव्यको अन्यपना होनेसे द्रव्यके असत् - उत्पाद है, - ऐसा निश्चित होता है ।। ११३ ।। अव, एक ही द्रव्यके अन्यपना और अनन्यपना होनेमें जो विरोध है, उसे दूर करते हैं । (अर्थात् उसमें विरोध नहीं आता, यह बतलाते हैं) :- ?

- जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- अथैकद्रव्यस्यान्यत्वानन्यत्वविप्रतिषेधमुद्धनोति - दवट्ठिएण सव्वं दव्वं तं पज्जयट्ठिएण पुणो । हवदि य अण्णमणण्णं तक्काले तम्मयत्तादो ॥ ११४ ॥ द्रव्याथिकेन सर्व द्रव्यं तत्पर्यायाथिकेन पुनः । भवति चान्यदनन्यत्तत्काले तन्मयत्वात् ।। ११४ ।। ।। ११३ ।। अयंकद्रव्यस्य पर्यायस्सहानन्यत्वाभिधानमेकत्वमन्यत्वाभिधानमनेकत्वं च नविभागेन दर्शयति, अथवा पूर्वोक्तसद्भावनिवद्धासद्भावनिवद्धमुत्पादद्वयं प्रकागन्तरेण समर्थयति - हवदि भवति । किं कर्तृ । सव्वं दवं सर्व विवक्षिताविवक्षितजीवद्रव्यम् । किविशिष्टं भवति । अणणं अनन्यमभिन्नमेकं तन्मयमिति । केन सह । तेन नारकतिर्यङ्मनुप्यदेवरूपविभावपर्यायसमूहेन केवलज्ञानाद्यनन्तचतुष्टय- गाथा ११४ अन्वयार्थ :- [द्रव्याथिकेन] द्रव्याथिक (नय) से [सर्व] सब [द्रव्यं] द्रव्य है: [पुनः च] और [पर्यायाथिकेन] पर्यायाथिक (नय) से [तत्] वह (द्रव्य) [अन्यत्] अन्य-अन्य है, [तत्काले तन्मयत्वात् ] क्योंकि उस समय तन्मय होनेसे [अनन्यत्] (द्रव्य पर्यायोंसे) अनन्य है। टीका :- वास्तवमें सभी वस्तु सामान्य-विशेषात्मक होनेसे वस्तुका स्वल्प देखनेवालोंके क्रमशः (१) सामान्य और (२) विशेषको जाननेवाली दो आंखें हैं :- (१) द्रव्याथिक और (२) पर्यायाथिक । इनमेंसे पर्यायार्थिक चक्षुको सर्वथा बन्द करके जब मात्र गुलो व्यानिक चक्षुके द्वारा देखा जाता है तव नारकपना, तिर्यचपना, मनुष्यापना. देशपना कर मिल पना- पर्यायस्वरूप विणेपोंमें रहनेवाले एक जीवसामान्य को देखने वाले शीर विगीन देखनेवाले जीवोंको 'वह सब जीव द्रव्य है' ऐसा नामिन होला ! माणिक चक्षुको सर्वथा बन्द करके मात्र खुली हुई पराधिक गोहानाहीय. द्रव्यमें रहनेवाले नारकपना, तिर्यचपना, मनुष्यपना, देवपना जी का - पांच । द्रव्याथियो बधं द्रव्य हे ने है अर्गादि । दे अन्य, जेधी ते समय ताप होई ।।१४।।

३१४ -प्रवचनसार- - जीवको इस स्वरूपास्तित्वको पद-पद पर लक्ष्यमें लेना योग्य है । यथा - यह (जानने में [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान रेकलक्षणः पर्यायस्तत्त्रयात्मकं, या पूर्वोत्तरव्यतिरेकस्पशिना चेतनत्वेन स्थितिर्यावुत्तर- पूर्वव्यतिरेकत्वेन चेतनस्योत्पादव्ययौ तत्त्रयात्मकं च स्वरूपास्तित्वं यस्य नु स्वभावोऽहं स खल्वयमन्यः । यच्चाचेतनत्वान्वयलक्षणं द्रव्यं, योऽचेतनाविशेषत्वलक्षणो गुणो, योऽचेतनत्वव्यतिरेकलक्षणः पर्यायस्तत्त्रयात्मकं, या पूर्वोत्तरव्यतिरेकस्पशिनाचेतनत्वेन स्थितिर्यावुत्तरपूर्वव्यतिरेकत्वेनाचेतनस्योत्पादव्ययौ तत्त्रयात्मकं च स्वरूपास्तित्वम् यस्य तु स्वभावः पुद्गलस्य स खल्वयमन्यः । नास्ति मे मोहोऽस्ति स्वपरविभागः ।। १५४ ।। शुद्धोत्पादव्ययध्रौव्यत्रयात्मकं च यत्पूर्वोक्त स्वरूपास्तित्वं तेन कृत्वा त्रिधा सम्यगाख्यातं कथितं प्रतिपादितम् । पुनरपि कथंभूतं आत्मस्वभावम् । सवियप्पं सविकल्पं पूर्वोक्तद्रव्यगुणपर्यायरूपेण सभेदम् । य इत्थंभूतमात्मस्वभावं जानाति, ण मुहदि सो अण्णदवियम्हि न मुह्यति सोऽन्यद्रव्ये, स तु भेदज्ञानी विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावमात्मतत्त्वं विहाय देहरागादिपरद्रव्ये मोहं न गच्छतीत्यर्थः ।। १५४।। १) 'पूर्व और उत्तर व्यतिरेकको स्पर्शकरनेवाले चेतनत्वरूपसे जो ध्रौव्य और (२-३) चेतनके उत्तर तथा पूर्व व्यतिरेकरूपसे जो उत्पाद और व्यय - यह त्रयात्मक (ऐसा) स्वरूप-अस्तित्व जिसका स्वभाव है ऐसा मैं वास्तवमें यह अन्य हूँ, (अर्थात् मैं पुद्गलसे ये भिन्न रहा)। और (१) अचेतनत्वका अन्वय जिसका लक्षण है ऐसा जो द्रव्य, (२) अचेतना विशेषत्व जिसका लक्षण है ऐसा जो गुण और (३) अचेतन- त्वका व्यतिरेक जिसका लक्षण है ऐसी जो पर्याय – यह त्रयात्मक (ऐसा स्वरूप अस्तित्व) तथा (१) पूर्व और उत्तर व्यतिरेकको स्पर्शकरनेवाले अचेतनत्वरूपसे जो ध्रौव्य और (२-३) अचेतनके उत्तर तथा पूर्व व्यतिरेकरूपसे जो उत्पाद और व्यय - यह त्रयात्मक ऐसा स्वरूप-अस्तित्व जिस पुद्गलका स्वभाव है वह वास्तवमें (मुझसे) अन्य है । (इसलिये) मुझे मोह नहीं है; स्वपरका विभाग है । भावार्थ :- मनुप्य, देव इत्यादि अनेकद्रव्यात्मक पर्यायोंमें भी जीवका स्वरूप- अस्तित्व और प्रत्येक परमाणुका स्वरूप-अस्तित्व सर्वथा भिन्न-भिन्न है । सूक्ष्मतासे देखने पर वहाँ जीव और पुद्गलका स्वरूप-अस्तित्व (अर्थात् अपने-अपने द्रव्य-गुण-पर्याय और प्रौव्य-उत्पाद-व्यय) स्पष्टतया भिन्न जाना जा सकता है । स्व-परका भेद करनेके लिये आता हुवा) चेतन द्रव्य-गुण-पर्याय और चेतन प्रौव्य-उत्पाद-व्यय जिसका स्वभाव है पूर्व अपात् पहलेका; और उत्तर अर्थात वादका। (चेतन पूर्व और उत्तरकी दोनों पर्यायोंको स्पर्श करता है। दम ओशाने प्रौव्य है; बादको वर्यान् वर्तमान पर्यायको अपेक्षा उत्पाद है और पहलेको पगिकी अपेशागे जैन शास्त्रमाला] -लेयतत्त्व-प्रज्ञापन- - अथात्मनोऽत्यन्तविभक्तत्वाय परद्रव्यसंयोगकारणस्वरूपमालोचयति अप्पा उवओगप्पा उवओगो णाणसणं भणिदो। सो वि सुहो असुहो वा उवओगो अप्पणो हवदि ॥ १५५ ।। आत्मा उपयोगात्मा उपयोगो ज्ञानदर्शनं भणितः । सोऽवि शुभोऽशुभो वा उपयोग आत्मनो भवति ॥ १५५ ।। एवं नरनारकादिपर्यायः सह परमात्मनो विशेषभेदकथनरूपेण प्रथमस्थले गाथात्रयं गतम् । अयात्मनः पूर्वोक्तप्रकारेण नरनारकादिपर्यायः सह भिन्नत्वपरिज्ञानं जातं, तावदिदानी तेषां संयोगकारणं कथ्यते - अप्पा आत्मा भवति । कथंभूत: । उवओगप्पा चैतन्यानुविधायी योऽसावुपयोगरतेन निवृत्तत्वादुपयोगात्मा । उवओगो गाणदंसणं भणिदो स चोपयोग: सविकल्पं नानं निर्विकल्प ऐसा मैं इस (पुद्गल) से भिन्न रहा; और यह अचेतन द्रव्य-गुण-पर्याय तथा अचेतन श्रीव्य-उत्पाद-व्यय जिसका स्वभाव है ऐसा पुद्गल यह (मुझसे) भिन्न रहा । इसलिये मुझे परके प्रति मोह नहीं है; स्व-परका भेद है ।। १५४ ।। अव, आत्माको अत्यन्त विभक्त करनेके लिये परद्रव्य के संयोगके कारणका स्वरूप कहते हैं गाथा १५५ अन्वयार्थ :- [आत्मा उपयोगात्मा] आत्मा उपयोगात्मक है: [उपयोगः] उपयोग [जानदर्शनं भणितः] जान-दर्णन कहा गया है; [लपि और [आत्मनः] आत्माका [सः उपयोगः] वह उपयोग [शुभः अगुभः वा] शुभ अवकाशाम भवति] होता है। टोका :- वास्तवमें आत्माको परद्रव्यने नयोगवा माग पनि। प्रथम तो उपयोग वास्तव में आत्माका स्वभाव यत्रोयिनमा (उपयोग चैतन्यका अनुसरण करणे होनेवाला) परिणाम:। १ उपयोगविणेप उपयोगमा भेद, प्रकार या सगन प्रकारका ! -..-.:..:-...- 1; या १५६ वी गामामे महंग।) के आतमा उपयोगरप, उपयोग हसन-न। उपयोग से आत्मा लणो गुन दा साभार : ।। -

-प्रवचनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
-
आत्मनो हि परद्रव्यसंयोगकारणमुपयोगविशेषः । उपयोगो हि तावदात्मनः
स्वभावश्चतन्यानुविधायिपरिणामत्वात् । स तु ज्ञानं दर्शनं च, साकारनिराकारत्वेनो-
भयरूपत्वाच्चैतन्यस्य । अथायमुपयोगो द्वेधा विशिष्यते शुद्धाशुद्धत्वेन । तत्र शुद्धो
निरुपरागः, अशुद्धः सोपरागः । स तु विशुद्धिसंक्लेशरूपत्वेन द्वविध्यादुपरागस्य द्विविधः
शुभोऽशुभश्च ।। १५५॥
अथात्र क उपयोगः परद्रव्यसंयोगकारणमित्यावेदयति.
उवओगो जदि हि सुहो पुण्णं जीवस्स संचयं जादि ।
असुहो वा तध पावं तेसिमभावे ण चयमत्थि ॥१५६ ॥
उपयोगो यदि हि शुभः पुण्यं जीवस्य संचयं याति ।
अशुभो वा तथा पापं तयोरभावे न चयोऽस्ति ॥ १५६ ॥
दर्शनमिति भणितः । सो वि सुहो सोऽपि ज्ञानदर्शनोपयोगो धर्मानुरागरूपः शुभः, असुहो विषयानु
रागरूपो द्वेपमोहरूपश्चाशुभः । वा वाशब्देन शुभाशुभानुरागरहितत्वेन शुद्धः । उवओगो अप्पणी
हवदि इत्थंभूतस्त्रिलक्षण उपयोग आत्मन: संवन्धी भवतीत्यर्थः ।। १५५ ॥ अथोपयोगस्तावन्नरना-
रकादिपर्यायकारणभूतस्य कर्मरूपस्य परद्रव्यस्य संयोगकारणं भवति । तावदिदानी कस्य कर्मणः के
उपयोगः कारणं भवतीति विचारयति - उवओगो जदि हि सुहो उपयोगो यदि चेत् हि स्फुटं शुभी
ज्ञान तथा दर्शन है, क्योंकि चैतन्य 'साकार और निराकार ऐसा उभयरूप है । अब
इस उपयोगके शुद्ध और अशुद्ध ऐसे दो भेद किये गये हैं । उसमें, शुद्ध उपयोग निरुपराग
(निर्विकार) है; और अशुद्ध उपयोग सोपराग (सविकार) है । और वह अशुद्ध
शुभ और अशुभ ऐसे दो प्रकारका है, क्योंकि उपराग विशुद्धिरूप और संक्लेशरूप ऐसा
दो प्रकारका है (अर्थात् विकार मन्दकपायरूप और तीव्रकपायरूप ऐसा दो
प्रकारका है)।
भावार्थ :- आत्मा उपयोगस्वरूप है। प्रथम तो उपयोगके दो भेद हैं - शुद्ध
अशुद्ध । और फिर अशुद्ध उपयोगके दो भेद हैं, शुभ तथा अशुभ ।। १५५ ॥
उपयोग
और
' मार-आगरवाला या भेदवाला; सविकल्प; विशेष ।
२ निरागार-बार रहित; भेदरहित; निर्विकल्प मामान्य ।
उपयोग जो शुभ होय, संचय थाय पुण्य तणो तहीं।
ने पापसंचय अशुभयो; ज्यां उभय नहि संचय नहीं ॥ १५६ ॥

जैन शास्त्रमाला]] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- उपयोगो हि जीवस्य परद्रव्यसंयोगकारणमशुद्धः । स तु विशुद्धिसंक्लेशरूपोपराग- वशात् शुभाशुभत्वेनोपात्तद्वैविध्यः, पुण्यपापत्वेनोपात्तकै विध्यस्य परद्रव्यस्य संयोगकारण- त्वेन निवर्तयति । यदा तु द्विविधस्याप्यस्याशुद्धस्याभावः क्रियते तदा खलुपयोगः शुद्ध एवावतिष्ठते । स पुनरकारणमेव परद्रव्यसंयोगस्य ॥ १५६ ।। अथ शुभोपयोगस्वरूपं प्ररूपयति भवति । पुण्णं जीवत्स संचयं जादि नदा काले द्रव्यपुण्यं कर्तृ जीवस्य संचयमुपवयं वृद्धि याति बध्यत इत्यर्थः । असुहो वा तह पावं अशुभोपयोगी वा तथा तेनैव प्रकारेण पुण्यवध्यपापं संचयं याति । तेसिमभावेण चयमस्थि तयोरभावे न वयोऽस्ति । निर्दोपिनिजपरमात्मभावनारूपेण शुद्धो- पयोगवलेन यदा तयो यो: शुभाशुभोपयोगयोरभावः क्रियते नदोभयः संचयः कर्मवन्धो नास्तीत्यर्थः ।। १५६ ।। एवं शुभाशुभशुद्धोपयोगत्रयस्य नामान्यकथनपण हिनीयस्थले गाथाद्वयं गतम् । अथ अब यह कहते हैं कि इनमें कौनसा उपयोग पन्द्रव्यके संयोगका कारण है :- - गाथा १५६ अन्वयार्थ :- [उपयोगः] उपयोग [यदि हि] यदि [शुभः] शुभ हो [जीवस्य] तो जीवके [पुण्यं] पुण्य [संचयं याति] संचयको प्राप्त होता है [तथा वा अशुभः] और यदि अशुभ हो [पापं] तो पाप संचय होता है । [तयोः लभावे] उनके (बोनोंके) अभावमें [चयः नास्ति] मंचय नहीं होता । टीका :- जीवको परदयके संयोगका कारण अगुल योग । रवि नथा संवनेशरूप उपरागके कारण शुभ और अशुभम् पने विविधतानी गानोलामा जो पुण्य और पापम्पसे द्विविधतानो प्राप्त होता, पला जोमयोग कारणम्हापसे काम करता है । (उपगग मन्ना कामावर पीरीयामा है, इसलिये अशुद्ध उपयोग भी शुभ-अशुभ दी तो. मोयो पुण्यरूप परद्रव्यके मंयोगका कारण होता और गोत्र संयोगका कारण होता है । ) किन्तु जब दोनों मासे... जाता है तब बास्तबमें उपयोग की नाक का अकारण ही है । (अर्थात् शुतोपयोग पर नाम: अब भोपयोगवा मानाने :- । .

मैं कर्ता-प्रयोजक विना भी (अर्थात् मैं उनके मैं कर्ता (हुए) विना भी वे वास्तवमें किये जाते हैं । इसलिये उनके कर्तृत्वका पक्षपात और मैं, स्वतन्त्ररूपसे शरीर, वाणी तथा मनका कारक (कर्ता) ऐसा जो अचेतन ३२२ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान शरीरं च वाचं च मनश्च परद्रव्यत्वेनाहं प्रपा, ततो न तेषु कश्चिदपि मम पक्षपातोऽस्ति । सर्वत्राप्यहमत्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । तथा हि - न खल्वहं शरीरवाङ मनसा स्वरूपाधारभूतमचेतनद्रव्यमस्मि; तानि खलु मां स्वरूपाधारमन्तरेणाप्यात्मनः स्वरूपं धारयन्ति । ततोऽहं शरीरवाड्मनःपक्षपातमपास्यात्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । न च मे शरीर- वाङ मनःकारणाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कारणमन्तरेणापि कारणवन्ति भवन्ति । ततोऽहं तत्कारणत्वपक्षपातमपास्यास्भ्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र रमात्मद्रव्याद्भिन यन्मनोवचनकायत्रयं निश्चयनयेन तन्नाहं भवामि । ततः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । ण कारणं तेसि न कारणं तेषाम् । निर्विकारपरमालादकलक्षणसुखा- मृतपरिणतेर्यदुपादानकारणभूतमात्मद्रव्यं तद्विलक्षणो मनोवचन कायानामुपादानकारणभूतः पुद्गल- पिण्डो न भवामि । ततः कारणात्तत्पक्षपात मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । कत्ता ण हि कारइदा अणुमंता [न वाणी] न वाणी हूँ; [तेषां कारणं न] उनका कारण नहीं हूँ [कर्ता न] कर्ता नहीं हूँ, [कारयिता न] करानेवाला नहीं हूँ; [कर्तृणां अनुमन्ता न एव] (और) कर्ताका अनुमोदक नहीं हूँ। टीका :- मैं शरीर, वाणी और मनको परद्रव्यके रूपमें समझता हूँ, इसलिये मुझे उनके प्रति कुछ भी पक्षपात नहीं है। मैं उन सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। वह वास्तवमें मैं शरीर, वाणी और मनके स्वरूपका आधारभूत ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ, मैं स्वरूपाधार (हुए) विना भी वे वास्तवमें अपने स्वरूपको धारण करते हैं । इसलिये मैं शरीर, वाणी और मनका पक्षपात छोड़कर अत्यन्त मध्यस्थ हूँ । और मैं शरीर, वाणी तथा मनका कारण ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ (हुए) विना भी वे वास्तवमें कारणवान् हैं । इसलिये उनके कारणपनेका पक्षपात छोड़कर यह मैं अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। और मैं स्वतंत्ररूपसे शरीर, वाणी तथा मनका कर्ता ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ छोड़कर यह मैं अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। इसप्रकार :- । मैं कारण - जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- ३२३ शरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कर्तारमन्तरेणापि क्रिय- माणानि । ततोऽहं तत्कर्तृत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- शरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यप्रयोजकत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकप्रयोजकमन्त- रेणापि क्रियमाणानि ! ततोऽहं तत्कारकप्रयोजकत्वपक्षपातमपास्यात्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्रशरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यानुनातृत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकानु सातारमन्तरेणापि क्रियमाणानि । ततोऽहं तत्कारकानुज्ञातृत्वपक्षपातमपास्यात्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः ।। १६० ॥ अथ शरीरवाङ मनसा परद्रव्यत्वं निश्चिनोति देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिहिट्ठा । पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदवाणं ॥१६१॥ देहश्च मनो वाणी पुद्गलद्रव्यात्मका इति निदिष्टाः । पुद्गलद्रव्यमपि पुनः पिण्डः पिण्डः परमाणुद्रव्याणाम् ।। १६१ ॥ व पात्तीणं वार्ता न हि कारयिता अनुमन्ता नैव कर्तृणाम् । बगुवामभावनाविपये यकृतकारिता- नुमतम्बापं नदि लक्षण यन्मनोवचनकायविषये कृतकान्तिानमतम्बम् नत्रा भवामि । ततः कारणानत्यक्षपानं मुक्त्वान्यन्तमध्यम्योऽम्मीति तात्ययंम् ।। १६० ।। अब कायवार मनमां मुबादम- वार्ताका प्रयोजक - उनका करानेवाला - हुए विना भी) वे वान्लवमें किये जाते हैं। इसलिये यह मैं उनके कर्ताके प्रयोजकपनेका पक्षपात छोटल अन्यन्न मध्यम है। और मैं स्वतन्त्रम् पये पीर, वाणी तथा मनमा कारक जीवन का उगवा अनुमोदया नहीं हूँ; मैं कर्ता - अनुमोदया बिनाभी (रो मोटा Fए बिना भी) वे वास्तव में किये जाते हैं। गणिर उनके पक्षपात छोटकर यह मैं अन्यन्त मध्यग्ध ।। ६० ।। अब, वीर, वाणी और मनवा पायाना :- ६ 44 गाथा १६१ अन्वयार्थ :- देहः र मनः दाणी] . या मन, दाणी तेम दो पालापाप FिETE ! में से पागलाय व परमाणसोलो रिट रे ॥१६ र नही है; में वर्मा -प्रयोजक विना भी (अर्थात् मा - (हा) विना भी वे वास्तव में कारणवान् हैं । इसलिये उनके कारणपनेका पक्षपान बनी (हप) बिना भी वे वास्तव में किये जाते हैं । इसलिये उनके कतत्वका पक्षपात नयमानीर, वाणी तथा मनका कारक (कर्ता) ऐमा जो अनेरा ३२२ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान शरीरं च वाचं च मनश्च परद्रव्यत्वेनाहं प्रपद्य, ततो न तेषु कश्चिदपि मम पक्षपातोऽस्ति । सर्वत्राप्यहमत्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । तथा हि - न खल्वहं शरीरवाङ मनसा स्वरूपाधारभूतमचेतनद्रव्यमस्मि; तानि खलु मां स्वरूपाधारमन्तरेणाप्यात्मनः स्वरूपं धारयन्ति । ततोऽहं शरीरवाड्मनःपक्षपातमपास्यात्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । न च मे शरीर- वाङ मनःकारणाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कारणमन्तरेणापि कारणवन्ति भवन्ति । ततोऽहं तत्कारणत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- रमात्मद्रव्याद्भिन्न यन्मनोवचनकायत्रयं निश्चयनयेन तन्नाहं भवामि । ततः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । ण कारणं तेसि न कारणं तेषाम् । निर्विकारपरमालादैकलक्षणसुता- मृतपरिणतेर्यदुपादानकारणभूतमात्मद्रव्यं तद्विलक्षणो मनोवचनकायानामुपादानकारणभूतः पुद्गल. पिण्डो न भवामि । नतः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । कता ण हि कारइदा अणुमंता [न वाणी] न वाणी हूँ; [तेषां कारणं न] उनका कारण नहीं हूँ [कर्ता न] कर्ता नहीं हूँ, [कारयिता न] करानेवाला नहीं [कर्तृणां अनुमन्ता न एव] (और) कर्ताका अनुमोदक नहीं हूँ। टीका :- मैं शरीर, वाणी और मनको परद्रव्यके रूपमें समझता हूँ, इसलिये मुझे उनके प्रति कुछ भी पक्षपात नहीं है। मैं उन सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ हूँ । वह चालयों में शरीर, वाणी और मनके स्वरूपका आधारभूत ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं है, मैं स्वम्पाधार (हुए) विना भी वे वास्तवमें अपने स्वरूपको धारण करते हैं । मलिये मैं गरीर, वाणी और मनका पक्षपात छोड़कर अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। और मैं गरीर, वाणी तथा मनका कारण ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ। मैं कारण कोटका यह मैं अत्यन्त मध्यस्थ है। और में स्वतंत्ररूपने शरीर, वाणी तथा मनका कर्ता ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं है। अत्यन्त मध्यन्य है। मप्रकार :- जन शास्त्रमाला] क्षेयतत्त्व-प्रज्ञापन- - शरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कर्तारमन्तरेणापि क्रिय- माणानि । ततोऽहं तत्कर्तृत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- शरीरबाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यप्रयोजकत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकप्रयोजकमन्त- रेणापि क्रियमाणानि ! ततोऽहं तत्कारकप्रयोजकत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्रशरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यानुनातृत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकानु. ज्ञातारमन्तरेणापि क्रियमाणानि । ततोऽहं तत्कारकानुज्ञातृत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः ।। १६० ।। अब शरीरवाङमनसा परद्रव्यत्वं निश्चिनोति- देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिहिट्ठा । पोरगलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदवाणं ॥ १६१ ॥ देहश्च मनो वाणी पुद्गलद्रव्यात्मका इति निदिष्टाः । पुद्गलद्रव्यमपि पुनः पिण्डः परमाणद्रव्याणाम् ॥ १६१ ।। णेब कालोणं वार्ता न हि कारयिता अनुमन्ना नेत्र कन णाम् । स्त्रशुधात्मभावनाविपचे बन्नकाग्निा- नुमनाय नहिलक्षण यन्मनावचनकायविषये मृतकान्तिानमनत्र तत्रा भवामि । सन: काममानपक्षपान मुक्त्वान्यन्नमध्यम्योरमीनि नात्वयंम् ।। १६० || अब गायन मन लाम- कर्ताका प्रयोजक - उनका करानेवाला - हुए बिना भी) वे वानवमें किये जाते हैं। नलिये यह मैं उनके कर्ताके प्रयोजयापनेका पक्षपान छोडमा अत्यन्त माया। और मै स्वतन्त्र पसे पनीर, वाणी नया मनमा मानना उसका अनुमोदक नहीं हूँ; मैं कर्ना - अनुमोदन बिनानी : मोटा हुए बिना भी) वे वास्तव में किये जाने । पक्षपात रोकार यह में अन्यन्त मध्यग्ध ।। ६ ।। अब, परी, वाणी और मका : - - मा १६६ आपयार्थ :-- देहः समनः पाणी] ::: मग, दाणी तेम जगाया Hो । ने र पगलाय ना मोनो रे !

---प्रयतनसार- (हुए) विना भी वे वास्तवमें कारणवान् हैं । इसलिये उनके कारणपनेका पक्षपात मैं कर्ता (हुए) विना भी वे वास्तव में किये जाते हैं । इसलिये उनके कर्तृत्वका पक्षपात और मैं, स्वतन्त्ररूपसे शरीर, वाणी तथा मनका कारक (कर्ता) ऐसा जो अचेतन द्रव्य है उसका प्रयोजक नहीं हूँ; मैं कर्ता - प्रयोजक विना भी (अर्थात् मैं उनके ३२२ [भगनान योमन्द-महान शरीरं च वाचं च मनश्र परद्रव्यत्वेनाहं प्रपा, ततो न तेतु कश्रियपि मम पक्षपातोऽस्ति । सर्वत्राप्यहमत्यन्तं मध्यस्थोऽरिम । तथा हि -- न गल्यहं शरीरवाङ मनसा स्वरूपाधारभूतमचेतनद्रव्यमस्मि; तानि खलु मां स्वरूपाधारमन्तरेणाप्यात्मनः स्वरूपं धारयन्ति । ततोऽहं शरीरवाड्मनःपक्षपातमपास्यात्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । न च मे शरीर- वाङ मनःकारणाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कारणमन्तरेणापि कारणवन्ति भवन्ति । ततोऽहं तत्कारणत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- रमात्मद्रव्याद्भिन्न यन्मनोवचनकायत्रयं निश्चयनगेन तना भयागि । ततः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । ण कारणं तेसि न कारणं तेषाम् । निविकारगरमाहादैकलक्षणसुखा- मृतपरिणतेर्यदुपादानकारणभूतमात्मद्रव्यं तद्विलक्षणो मनोवचन कायानामुपादान कारणभूतः पुद्गलः पिण्डो न भवामि । ततः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । कता ण हि कारइदा अणुमंता [न वाणी] न वाणी हूँ; [तेषां कारणं न] उनका कारण नहीं हूँ [कर्ता न] कर्ता नहीं हूँ, [कारयिता न] करानेवाला नहीं हूँ; [कर्तृणां अनुमन्ता न एव] (और) कर्ताका अनुमोदक नहीं हूँ। टोका :- मैं शरीर, वाणी और मनको परद्रव्यके रूपमें समझता हूँ, इसलिये मुझे उनके प्रति कुछ भी पक्षपात नहीं है। मैं उन सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ हूँ । वह वास्तवमें मैं शरीर, वाणी और मनके स्वरूपका आधारभूत ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ, मैं स्वरूपाधार (हुए) विना भी वे वास्तवमें अपने स्वरूपको धारण करते हैं। इसलिये मैं शरीर, वाणी और मनका पक्षपात छोड़कर अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। और मैं शरीर, वाणी तथा मनका कारण ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ। मैं कारण छोड़कर यह मैं अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। और मैं स्वतंत्ररूपसे शरीर, वाणी तथा मनका कर्ता ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ मैं अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। इसप्रकार:- छोड़कर यह - जैन शास्त्रमाला] ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- ३२३ शरीरवाङ्मनःकारकाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कर्तारमन्तरेणापि क्रिय- माणानि । ततोऽहं तत्कर्तृत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- शरीरबाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यप्रयोजकत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकप्रयोजकमन्त- रेणापि क्रियमाणानि । ततोऽहं तत्कारकप्रयोजकत्वपक्षपातमपास्यात्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्रशरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रच्यानुनातृत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकानुः नातारमन्तरेणापि क्रियमाणानि । ततोऽहं तत्कारकानुनातृत्वपक्षपातमपास्यात्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः ।। १६० ॥ अथ शरीरवाङमनसां परद्रव्यत्वं निश्चिनोति- देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिहिट्ठा । पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो हि पुणो पिंडो परमाणुदवाणं ॥ १६१ ।। देहश्च मनो वाणी पुद्गलद्रव्यात्मका इति निदिष्टाः । पुद्गलद्रव्यमपि पुनः पिण्डः परमाणद्रव्याणाम् ।। १६१ ।। णेब पात्तीणं वार्ता न हि कारयिता अनुमन्ता नंब क णाम् । बदाममायनाविपचे अन्तराग्निा- नुमत वापं नदिनक्षण यन्मनोवचनकायविषये ऋतकान्तिानमनम्बम् नत्रा भवामि । नन: कारणानत्यक्षपानं मुक्त्वान्यन्नमव्यम्योऽस्मीति तात्वयंम् ।। १६० ।। अब जलवा मनमांजाम. कर्नाका प्रयोजक उनका करानेवाला - हुए बिना भी) वं बाल विवे जाते हैं। मिलिग्रे यह मै उनके कर्ताय प्रयोजकपनेका पक्षपान छोड़कर अन्तमा । और में स्वतन्त्रम् पगे शरीर, बाणी नया मनमा बाम मनन , उनका अनुमोदक नहीं है। मैं वार्ता - अनुमोदन किना हर बिना भी) वे वास्तव में किये जाते है। . पक्षपात छोटकर यह अत्यन्त माया ।।। अब, गर, वाणी और मनन PREM - .. गाथा १६१ अत्ययार्थ :- देहः म मनः वाणी]. कार. दाणी तेग जापागार Here ! में पागल कर या माको ११ १.६ का प्रयोजन नहीं है; मैं वर्ता - प्रयोजक विना भी (अर्थात् मैं उगा. - , और मैं शरीर, वाणी तथा मनका कारण ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं है। मैं कारण (हए) विना भी वे वास्तव में कारणवान् हैं । इसलिये उनके कारणपनेका पक्षपात मैं वर्ना (हा) विना भी वे वास्तव में किये जाते हैं । इसलिये उनके कर्तृत्वका पक्षपात में, बितन्त्रमपमे शरीर, वाणी तथा मनका कारक (कर्ता) ऐसा जो अनेनन ३२२ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुरद-कहान शरीरं च वाचं च मनश्च परद्रव्यत्वेनाहं प्रपद्य, ततो न तेषु कश्चिदपि मम पक्षपातोऽस्ति । सर्वत्राप्यहमत्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । तथा हि -- न खल्वहं शरीरवाङ मनसां स्वरूपाधारभूतमचेतनद्रव्यमस्मि; तानि खलु मां स्वरूपाधारमन्तरेणाप्यात्मनः स्वरूपं धारयन्ति । ततोऽहं शरीरवाड्मनःपक्षपातमपास्यात्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । न च मे शरीर- वाङ मनःकारणाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कारणमन्तरेणापि कारणवन्ति भवन्ति । ततोऽहं तत्कारणत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- रमात्मद्रव्याद्भिन्न यन्मनोवचनकायत्रयं निश्चयनयेन तन्नाहं भवामि । ततः कारणात्तत्पक्षपात मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । ण कारणं तेसि न कारणं तेपाम् । निर्विकारपरमाह्लादकलक्षणसुजा- मृतपरिणतेयदुपादानकारणभूतमात्मद्रव्यं तद्विलक्षणो मनोवचनकायानामुपादानकारणभूतः पुद्गत- पिण्डो न भवामि । नतः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । कत्ता ण हि कारइदा अणुमंतर [न वाणी] न वाणी हूँ; [तेषां कारणं न] उनका कारण नहीं हूँ [कर्ता न] कर्ता नहीं हूँ, [कारयिता न] करानेवाला नहीं हूँ; [कर्तृणां अनुमन्ता न एव] (और) कर्ताका अनुमोदक नहीं हूँ। टीका मैं शरीर, वाणी और मनको परद्रव्यके रूपमें समझता हूँ, इसलिये मुझे उनके प्रति कुछ भी पक्षपात नहीं है। मैं उन सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। वह वास्तव में मैं शरीर, वाणी और मनके स्वरूपका आधारभूत ऐसा अचेतन द्रा नहीं हूँ, मैं स्वरूपाधार (हुए) विना भी वे वास्तवमें अपने स्वरूपको धारण करते हैं । इमलिये मैं शरीर, वाणी और मनका पक्षपात छोड़कर अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। होड़कर यह मैं अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। और मैं स्वतंत्ररूपमे शरीर, वाणी तथा मनका कर्ता ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं है। कोटकर यह मैं अत्यन्त मध्यम्य है। । इसप्रकार:- जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रजापन- ३२३ .. शरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कर्तारमन्तरेणापि क्रिय- माणानि । ततोऽहं तत्कर्तृत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- शरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यप्रयोजकत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकप्रयोजकमन्त- रेणापि क्रियमाणानि ! ततोऽहं तत्कारकप्रयोजकत्वपक्षपातमपास्यात्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्रशरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यानुनातृत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकानु. जातारमन्तरेणापि क्रियमाणानि । ततोऽहं तत्कारकानुजातृत्वपक्षपातमपात्यात्म्ययमत्यन्तं मध्यस्यः ।। १६० ॥ अथ शरीरवाङमनना परद्रव्यत्वं निश्चिनोति - देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिहिट्ठा । पोग्गलदवं हि हि पुणो पिंडो परमाणुदवाणं ॥ १६१॥ देहश्च मनो वाणी पुद्गलद्रव्यात्मका इति निविष्टाः । पुद्गलद्रव्यमपि पुनः पिण्डः परमाणद्रव्याणाम् ॥ १६१ ॥ णेय यानीणं गार्ता न हि कारबिना अनुमन्ना नंब क णाम् । बगुवामभावनाविपचे यन्त्रकारिता- नुमनवमर्ष नविलक्षण यमनीवचनकायविषय ऋतकान्तिानमनम्बर ना मामि । नमः कारणानत्यक्षपानं मृबन्यान्यन्नमध्यायोमीति नापर्यम् ।। १६० ।। अत्र कायदाइ मन्या साम- कर्ताका प्रयोजक - उनका करानेवाला - हुए बिना भी) में वास्तव में किये जाते है। मनिये चार मैं उनके कर्ता के प्रयोजकपनेका पक्षपान छोडमा अन्य मया । और मैं ग्वतन्त्रमापसे गीर, बाणी नया मनमा कमजन उसका अनुमोदक नहीं है। मैं वर्ना - अनुमोदक विणा भी... मोर नए बिना भी) वे वास्तव में किये जाते है। परपात छोटकर यहमें अन्यन्त माया ||: ।। अब, गगन, वाणी और मनमान: भाका १६५ अवयार्थ :- देहः ६ गन: दाणी ] ::::::: मान, पाणी देर के गुगल Hare ! न पागलाय व मोरे :१६५ मैं कर्ता - प्रयोजक विना भी (अर्थात मैं उनके (हुए) विना भी वे वास्तव में कारणवान् हैं । इसलिये उनके कारणपनेका पक्षपात मैं कर्ता (हुए) विना भी वे वास्तवमें किये जाते हैं । इसलिये उनके कर्तृत्वका पक्षपात और मैं, स्वतन्त्ररूपसे शरीर, वाणी तथा मनका कारक (कर्ता) ऐसा जो अचेतन ३२२ [भगवान मोदरान शरीरं च वाचं च मनभ परद्रव्यत्वेनाहं प्रपा, ततो न ते कालिदापि मम पक्षपातोऽस्ति । सर्वत्राप्यहमत्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । तथा हि - न गाह शरीरवाऊ मनसां स्वरूपाधारभूतमचेतनद्रव्यमस्मि ; तानि सतु मां स्वरूपाचारमन्तरेणाप्यात्मनः स्वरूप धारयन्ति । ततोऽहं शरीरवाड्मनःपक्षपातमपास्यात्यन्तं मध्ययोऽस्मि । न त मे शरीर- वाङ मनःकारणाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कारणमन्तरेणापि कारणवन्ति भवन्ति । ततोऽहं तत्कारणत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र रमात्मद्रव्याद्भिन्न यन्मनोवननकाययं निश्चयनयेन तराई भवामि । नतः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । ण कारणं तेसि न कारणं तेषाम् । निर्विकारसरमालादैशलक्षणमुगा- मृतपरिणतेर्यदुपादानकारणभूतमात्मद्रव्यं तद्विलक्षणो मनोवनन कागानामुपादान कारणभूतः पुद्गल- पिण्डो न भवामि । ततः कारणानपक्षपानं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । कत्ता ण हि कारइदा अणुमंता [न वाणी] न वाणी हूँ; [तेषां कारणं न ] उनका कारण नहीं हूँ [कर्ता न] कर्ता नहीं हूँ, [कारयिता न] करानेवाला नहीं हूँ; [कर्तृणां अनुमन्ता न एव] (और) कर्ताका अनुमोदक नहीं हूँ। टोका :- मैं शरीर, वाणी और मनको परद्रव्यके रूप में समझता हूँ, इसलिये मुझे उनके प्रति कुछ भी पक्षपात नहीं है। मैं उन सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। वह वास्तवमें मैं शरीर, वाणी और मनके स्वरूपका आधारभूत ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ, मैं स्वरूपाधार (हुए) विना भी वे वास्तवमें अपने स्वरूपको धारण करते हैं । इसलिये मैं शरीर, वाणी और मनका पक्षपात छोड़कर अत्यन्त मध्यस्थ हूँ । और मैं शरीर, वाणी तथा मनका कारण ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ । मैं कारण छोड़कर यह मैं अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। और मैं स्वतंत्ररूपसे शरीर, वाणी तथा मनका कर्ता ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ। अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। इसप्रकार:- । छोड़कर यह मैं ine जैन शास्त्रमाला] यतत्त्व-प्रज्ञापन- ३२३ .. शरीरवाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कर्तारमन्तरेणापि क्रिय- माणानि । ततोऽहं तत्कर्तृत्वपक्षपातमपाल्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- शरीरबाङ मनःकारकाचेतनद्रव्यप्रयोजकत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकप्रयोजकमन्त- रेणापि क्रियमाणानि : ततोऽहं तत्कारकप्रयोजकत्वपक्षपातमपास्यात्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्रशरीरवाड मनःकारकाचेतनद्रव्यानुनातृत्वमस्ति; तानि खलु मां कारकानु जातारमन्तरेणापि क्रियमाणानि । ततोऽहं तत्कारकानुजातृत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्ययः ।। १६० ।। अय गरीरवाङ मनसां परद्रव्यत्वं निश्चिनोति - देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिहिट्ठा । पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदवाणं ॥ १६१ ॥ देहश्च मनो वाणी पुद्गलद्रव्यात्मका इति निदिष्टाः । पुद्गलद्रव्यमपि पुनः पिण्डः परमाणद्रव्याणान् ।। १६१ ।। णेब पानीणं कर्ता न हि कारथिना अनुमन्ना नेत्र क णाम् । स्त्रशुद्रामभावनावियो बनानान्तिा- नृमनावर नहिलक्षण यन्मनोवचनकाय विषयं कृतकान्तिानमनाया नत्रा मामि । मनः कारणानरक्षपानं मुक्वान्यन्नमध्यस्योरमीति नाचवंम् ।। १६० ।। अत्र सामना गात या प्रयोजक - उनका करानेवाला - हा विना भी) के कान में कि जाते है। इसलिये यह मैं उनके कति प्रयोजकापनेका पक्षपान छोटका प्रसन्न मा और में स्वतन्त्र पसे गीर, वाणी या मनमः REP उनका अनुमोदय नहीं है; मे वार्ता - अनुमोदक किना; ए विना भी) वे बारत बमें किये जाने । पक्षपान छोरनारया में अन्यन्त माया.. !! अब, FR, वाणी और मनका :- ::: -- गाथा १.५ अचगार्थ :- देह पर गनः पाणी] :: :: ::. मन, पाणी हेग गला : तो पगला नो र !! FE, ': - Fe या प्रयोजक नहीं है। मैं कर्ता - प्रयोजक विना भी (अर्थात् में उन । (हुए) विना भी वे वास्तवमें कारणवान् हैं । इसलिये उनके कारणपनेका पक्षपात में कर्ता (हुए) विना भी वे वास्तव में किये जाते हैं । इसलिये उनके कतृत्वका पक्षपात रम, ग्वनन्त्रमपन गरीर, वाणी तथा मनका कारक (कर्ता) ऐसा जो अनेतन ३२२ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान शरीरं च वाचं च मनश्न परद्रव्यत्वेनाहं प्रपद्य, ततो न तेषु कश्चिदपि मम पक्षपातोऽस्ति । सर्वत्राप्यहमत्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । तथा हि - न खल्वहं शरीरवाङ मनसां स्वरूपाधारभूतमचेतनद्रव्यमस्मि ; तानि खलु मां स्वरूपाधारमन्तरेणाप्यात्मनः स्वरूपं धारयन्ति । ततोऽहं शरीरवाड्मनःपक्षपातमपास्यात्यन्तं मध्यस्थोऽस्मि । न च मे शरीर- वाङ मनःकारणाचेतनद्रव्यत्वमस्ति; तानि खलु मां कारणमन्तरेणापि कारणवन्ति भवन्ति । ततोऽहं तत्कारणत्वपक्षपातमपास्यास्म्ययमत्यन्तं मध्यस्थः । न च मे स्वतन्त्र- रमात्मद्रव्याद्भिन यन्मनोवचनकायत्रयं निश्चयनयेन तन्नाहं भवामि । ततः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । ण कारणं तेसि न कारणं तेपाम् । निर्विकारपरमाह्लादेकलक्षणसुखा- मृतपरिणतेर्यदुपादानकारणभूतमात्मद्रव्यं तद्विलक्षणो मनोवचनकायानामुपादानकारणभूतः पुद्गल पिण्डो न भवामि । ततः कारणात्तत्पक्षपातं मुक्त्वात्यन्तमध्यस्थोऽस्मि । कत्ता ण हि कारइदा अणुमंता [न वाणी] न वाणी हूँ; [तेषां कारणं न] उनका कारण नहीं हूँ [कर्ता न] कर्ता नहीं हूँ, [कारयिता न] करानेवाला नहीं हूँ; [कर्तृणां अनुमन्ता न एव] (और) कर्ताका अनुमोदक नहीं हूँ। टीका :- मैं शरीर, वाणी और मनको परद्रव्यके रूपमें समझता हूँ, इसलिये मुझे उनके प्रति कुछ भी पक्षपात नहीं है। मैं उन सबके प्रति अत्यन्त मध्यस्थ हूँ । वह वास्तव में मैं शरीर, वाणी और मनके स्वरूपका आधारभूत नहीं है, मैं स्वरूपाधार (हुए) विना भी वे वास्तवमें अपने स्वरूपको धारण करते हैं । इसलिये मैं शरीर, वाणी और मनका पक्षपात छोड़कर अत्यन्त मध्यस्थ हूँ । और मैं शरीर, वाणी तथा मनका कारण ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं हूँ। मैं कारण होड़कर यह मैं अत्यन्त मध्यस्थ हूँ। और मैं स्वतंत्ररूपने शरीर, वाणी तथा मनका कर्ता ऐसा अचेतन द्रव्य नहीं है। कोटका पद में अत्यन्त मध्यस्थ है। इसप्रकार :- - ऐसा अचेतन द्रव्य जैन शास्त्रमाला यतत्त्व-प्रजापन- ३२५ यदेतत्प्रकरणनिर्धारितं पुद्गलात्मकमन्तोंतवाङ मनोहंतं शरीरं नाम परद्रव्यं न तावदहमस्मि, ममापुद्गलमयस्य पुद्गलात्मकशरोरत्वविरोधात् । न चापि तस्य कारण- हारेण कहारेण कर्तृ प्रयोजकद्वारेण कत्रनुमन्तहारेण वा शरीरस्य कर्ताहमस्मि, ममाने- कपरमाणुद्रव्यकपिण्डपर्यायपरिणामस्याकतुं रनेकपरमाणुद्रव्यकपिण्डपर्यायपरिणामात्मक- शरीरकर्तृत्वस्य सर्वया विरोधात् ॥ १६२ ।। अथ कथं परमाणद्रव्याणां पिण्डपर्यायपरिणतिरिति संदेहमपनुदति - पते मया पुगना कया पिंडा नत्र ते पुदगला मया कृता: विण्डा । तम्हा हि नदेहोऽहं नम्मादेही न भवाम्यहं । विस्कुट । कत्ता वा तस्स देहान कर्ता वा न भवामि नन्य देवयनि । अयमत्रार्थ - हो न भवामि । कममात् । अगरीनसहनशुतन्यरिणतन मम देलविरोधात । वनो कान भवामि नम्य देहाय । नपि कम्मान । निक्रियपरमत्रिज्योतिपरिणतन्वन मम देवकत्व. विगंधाविति ।। १६२ ।। पत्र यायवाइमनसा मुकामना मह भगवनम्वेण चतुर्थम्मन नावात्रयं गाथा १६२ अन्वयार्थ :- [अहं पुद्गलमयः न ] मै पुद्गलमय नही हूँ और [ते पुद्गलाः] वे पुद्गल [मया ] मेरे द्वारा पिण्डं न कृताः] पिण्डदान नहीं किये गये है. [तस्मात् हि] इनलिये [अहं न देहः ] मैं देह नहीं है, [बा] नया [तस्य देहाय अर्ता] उम काका कता नहीं है। दीया :- प्रथम नो, जो यह प्रकरणी निर्वाणि युगवा . द्रव्य - जिनके भीतर वाणी और मनमा गमावली क्योंकि अपुद्गनगय गंगा में गन्ना गया पर उग (पनीर) ने कारण बारा, ना धाग. नाम :::::::: हामनीका नाता में नहीं, क्योंकि न !" परिणामना अवा गा में नरः पाया बीकानम्पिोनेगा 4: ।।:: :: - । का गंदा ...!" 29 ३२४ । एक पिण्डपर्यायरूपसे परिणाम है, क्योंकि अनेक परमाणुद्रव्योंके स्वलक्षणभूत स्वरूपा- [IT भोपाल महाग शरीरं च वाक् च मना जोगापि परसगं, पगल: पापा । पुद्गलद्रव्यत्वं तु तेषां पुद्गलद्रव्यत्वलक्षणभूतस्यर पारितत्वनिभित नात् । मागि गुगलद्रव्यं त्वने- कपरमाणुद्रव्याणामेकपिण्डपर्यायेण परिणामः । अनेकारमाण व्यवलक्षणभूतस्वरूपा- स्तित्वानामनेकत्वेऽपि कार्यचिदेकत्वेनावभागनात् ॥ १६१ ।। अथात्मनः परद्रव्यत्वाभावं परद्रव्यकर्तृत्वाभायं च सापयति णाहं पोग्गलमइओ ण ते मया पोग्गला कया पिंडं । तम्हा हि ण देहोऽहं कत्ता वा तस्स देहस्स ।। १६२ ॥ नाहं पुद्गलमयो न ते मया पुद्गलाः कृताः पिण्उम् । तस्माद्धि न देहोऽहं कर्ता वा तस्य देहस्य ॥ १६२॥ स्वरूपात्परद्रव्यत्वं व्यवस्थापयति - देहो य मणो वाणी पुग्गलदव्यप्पग ति णिहिट्ठा देहश्च मनो वाणी तिम्रोऽपि पुद्गलद्रव्यात्मका इति निदिष्टाः । कस्मात् । पहारेण जीवेन हैकत्येपि निश्चयेन परमचैतन्यप्रकाशपरिणतेभिन्नत्वात् । पुद्गलद्रव्यं कि भगते । पुग्गलदव्यं हि पुणो पिडो परमाणु दव्वाणं पुद्गलद्रव्यं हि स्फुटं पुनः पिण्डः समूहो भवति । केपाम् । परमाणुद्रगाणामित्यर्थः ।।१६१॥ अथात्मनः शरीररूपपरद्रव्याभावं तत्कर्तृत्वाभावं च निरूपयति - जाहं पुग्गलमइओ नाहं पुद्गलमयः । पुद्गलद्रव्यात्मक [इति निर्दिष्टाः] हैं, ऐसा (वीतरागदेवने) कहा है [अपि पुनः और [पुद्गल द्रव्यं] वे पुद्गलद्रव्य [परमाणुद्रव्याणां पिण्डः] परमाणुद्रव्योंका पिण्ड है टीका :- शरीर, वाणी और मन तीनों ही परद्रव्य हैं, क्योंकि वे पुद्गल- द्रव्यात्मक हैं । उनके पुद्गलद्रव्यपना है, क्योंकि वे पुद्गलद्रव्यके स्वलक्षणभूत स्वरूपात स्तित्वमें निश्चित (रहे हुए) हैं। उस प्रकारका पुद्गलद्रव्य अनेक परमाणुद्रव्योंका स्तित्व अनेक होने पर भी कथंचित् (स्निग्धत्व-रूक्षत्वकृत बंधपरिणामकी अपेक्षासे) एकत्वरूप अवभासित होते हैं ।। १६१ ।। अब आत्माके परद्रव्यत्वका अभाव और परद्रव्यके कर्तृत्वका अभाव सिद्ध करते हैं :- १ शरीरादिरूप। हुँ पौद्गलिक नथी, पुद्गलो में पिंडरूप कर्यो नथी । तेथी नथो हुँ देह वा ते देहनो कर्ता नथी ।। १६२॥

जैन शास्त्रमाला] -जेयतत्त्व-प्रज्ञापन- ३२७ परमाणुहि यादिप्रदेशानामभावादप्रदेशः. एकप्रदेशसद्भावात्प्रदेशमात्रः, स्वयमने- कपरमाणु द्रव्यात्मकशब्दपर्यायव्यक्त्यसंभवादशब्दश्च । यतश्चतुःस्पर्शपञ्चरसद्विगन्धपञ्च- वर्णानामविरोधेन सद्भावात् स्निग्धो वा हक्षो वा स्यात्, तत एव तत्य पिण्डपर्याय- परिणतिरूपा हिप्रदेशादित्वानुभूतिः । अथवं स्निन्धरक्षत्वं पिण्डत्वसाधनम् ।। १६३ ।। अथ कीदृशं तत्स्निग्धदक्षत्वं परमाणोरित्यावेदयति- एगुत्तरमेगादी अणुस्स णिद्धत्तणं च लुक्खत्तं । परिणामादो भणिदं जाव अणंतत्तमणुभवदि ॥ १६४ ॥ एकोत्तरमेकाधणोः स्निग्धत्वं वा रुक्षत्वन् । परिणामाङ्गणितं यावदनन्तत्वमनुभवति ।। १६४ ।। नयमसहो य व्ययं व्यक्तिरपणामतः । गवं विपणत्रयविशिष्ट: मन् णिलो नानुबयो वा स्निग्धों वा सो वा यतः कारणासंभवति तनः कारणान् दुपदेनादिन्तमभवदि विदशादिमा धमनु- भवनीनि । तथा हि - यथायमात्मा गुब्युडकम्बभावेन बन्धहितोऽपि पावनयेन नियानी- बागभावेन मक्षथानीयहेषभावेन यदा परिणति नका परमागमविनयनेल बन्धमनुभति. तथा परमाणुपि ग्वभावेन बन्ध रहितोऽपि या अन्यकारणभूनियनमाजेन पनिपलों भवान नका पुद्गलान्तरेण मह विभावपर्यायम्पं बन्धमनुभवतीत्यर्थ: ।। १६ ।। अथ को अभिनय क्षिमिनि पृष्टे प्रत्युत्ला दवाति - एगुतरमेगादी एकोनामेवादि। किन। पित्त नुस्मतं जिम्याचं रक्षा कर्मनापन्न । णि णनं कथिन । विन। जतमा यदि अनगाव मननपर्यन यायदनुभवाति प्राप्नोति । सामान्य मान । परिवाि. परिणामिन्याटियर्थः । कग्य मंन्धि । अणुग्म अणी: मम । - जनाजागोमतिपीक्षा नावृत्रियम्नेग्थानीय गगन म अब यह बतलाते है कि परमाणान का रिमा - ::- - Irani गाभा १६ अन्वयार्थ :-- | अणो:] परमाणने, प]ि .:. : एमासे ( एक अविभाग प्रतिवेदगे) Ter": जन्य नमः [अनन्तरवर अनुभवति । प्रापमाननार (निया TERE: pधी बायो amir ... + . meroine ३२८ [भगानीमुन रहान परमाणोहिं तावदस्ति परिणाम: तस्य बस्तुर भागलगानतिगात् । ततम् परिणामादुपात्तकादाचित्कवत्तिव्यं चित्रगुणगोगित्यात्परमाणोरेका कोत्तरानन्तायसाना- विभागपरिच्छेदव्यापि स्निग्धत्वं वा रुक्षत्वं वा भवति ।। १६४ ।। विशुद्धिसंक्लेशस्थानीयमादि कृत्या परमागमा गित र मेलोमानिमिर ने गार्गमा गाते. नया पुद्गलपरमाणुद्रव्येऽपि स्निग्धत्वं सक्षल न चम्मकारणभुनं पूर्वोत्तमामाक्षिारायणक्तिवादान्तेना- गुणसंज्ञां जघन्यशक्तिमादि कृत्वा गुणसं नाविभागपरिवरितीनामाभियोगेन शनिविशेषण गते । किपर्यन्तं । यावदनन्तसंख्यानम् । कस्मात् । पुद्गलबाग परिणामिलात. परिणामस्य वस्तु स्वभावादेव निपेधितुमशक्यत्वादिति ॥ १६ ॥ अजान कीरशास्निगमलालगुणात् पिण्डो भवतीति [भणितम्] (जिनेन्द्रदेवने) कहा है । टीका :- प्रथम तो परमाणुके परिणाम होता है क्योंकि वह (परिणाम) वस्तुका स्वभाव होनेसे उल्लंघन नहीं किया जासकता । और उस परिणामके कारण जो 'कादा- चित्क विचित्रता धारण करता है ऐसा, एकसे लेकर एक-एक बढ़ते हुए अनन्त अविभाग प्रतिच्छेदों तक व्याप्त होनेवाला स्निग्धत्व अथवा रूक्षत्व परमाणुके होता है क्योंकि परमाणु अनेक प्रकारके गुणोंवाला है । भावार्थ :- परमाणु परिणमन वाला है, इसलिये उसके स्निग्धत्व और रूक्षत्व एक अविभाग- 'प्रतिच्छेदसे लेकर अनन्त अविभाग प्रतिच्छेदों तक तरतमताको प्राप्त होते हैं। अब यह बतलाते हैं कि कैसे स्निग्धत्व-रूक्षत्वसे पिण्डपना होता है :- गाथा १६५ अन्वयार्थ :- [अणुपरिणामाः] परमाणु-परिणाम, [स्निग्धाः वा रूक्षाः वा] ' कादाचित्क-किसी समय हो ऐसा; क्षणिक; अनित्य । २ विचित्रता=अनेकप्रकारता; विविधता; अनेकरूपता (चिकनापन और रूखापन परिणामके कारण क्षणिक अनेकरूपता - तरतमता, तारतम्यता धारण करता है) । 3 किसी गुण में (अर्थात् गुणकी पर्याय में ) अंशकल्पना करनेपर, उसका जो छोटेसे छोटा (निरंश) अंश होता है उसे उस गुणका (अर्थात् गुणको पर्यायका) अविभाग प्रतिच्छेद कहा जाता (करीसे गाय के दूधर्म और गायसे भैसके दूधमें सचिक्कणताके अविभागी प्रतिच्छेद अधिक होते हैं। धूलसे राखमें और राखसे वाचूमें हक्षताके अविभागी प्रतिच्छेद अधिक होते है।)

३२६ - जैन शास्त्रमाला] -जेयतत्त्व-प्रजापन- अथात्र कोहशास्निग्धरूक्षत्वात्पिण्डत्वमित्यावेदयति- णिद्धा वा लुक्खा वा अणुपरिणामा समा व विसमा वा । समदो दुराधिगा जदि बज्झन्ति हि आदिपरिहोणा ॥ १६५ ।। स्निग्धा वा रुक्षा वा अणुपरिणामाः समा वा विषमा वा । समतो चधिका यदि बध्यन्ते हि यदि बध्यन्ते हि आदिपरिहोणाः ।। १६५ ।। - प्रग्ने समाधानं ददाति - वति हि बध्यन्ते हि कुटम् । के। कमंतापत्राः अणुपरिणामा सण- परिणामा: । अणुपरिणाममनात्र परिणामपरिणता अणको गृयन्ते । कयंभूताः । णितावा नुवन्या या स्निग्धपरिणामपरिणता वा रुक्षपरिणामपरिणता वा। पुनरपि किविमिष्टाः । समा व विसमा बा द्विशक्तिवतःशक्तिपशक्त्यादिपरिणतानां सम इनि गंजा, विनिरनियप्नक्यातिपरिणतानां विषम प्रति गंगा । पुनश्न किंम्पा: । नमो दुराधिगा जदि गमन नमसंन्यानात्मकामाद हान्यो मृणान्यामधिका यदि वेत् । कथं हिगुणायिकत्वमिति चेत् । एक दिगुणनिष्ठति विनीयोऽपि हिना - ग्निग्ध हो या मक्ष हों [समाः वा विषमाः वा] सम अंगवान हो या विषम संगवाने हो [यदि समतः चधिकाः] यदि नमानसे दो अधिक अंश बाल हों को [वध्यन्ते हि ] बंधते हैं, [आदि परिहीनाः] जघन्यांग वाले नहीं बंधने । टोका :- समानने दो गुण (अंग) अधिक निधन्द का कमान्न हो नो कम होना है, यह उत्सगं (मामान्य नियम) है; क्योंकि नियन्त्रमा पी हिमाधिमाका होना बह परिणामक (परिणमन करानेवाला) होने का है। यदि एक गुण स्निग्धत्व या मधन्य हो नी धनी एक गुण स्निग्धन्य या मक्षत्वव परिणग्य पति : . मि r ग्य = परिणगत कामी गोवा पदोप, मामाका; जिमनावाला काम Ar: FOnासाना परमाण नाम : TRोरोभिन । {गामाया दमानमार) Rai, ii !... :: ... : REER: H 1 सोनिम अथवा र meter : जोगणElme rite :

३३४ | यो अथात्मनः पुद्गलपिण्डानेतत्याभागात - ओगाढगाढणचिदो पोग्गलकाहि गब्बदो लोगो। सुमेहि बादरेहि य अपाओग्गेहि जोहि ।। १६८ ।। अवगाढगाढनिचितः पुद्गल कार्य: रातो लोकः । सूक्ष्मैर्वादरंभाप्रायोग्योंग्गः ॥ १६८॥ भवतीति ॥ १६७ ।। अथात्मा चमकाते वयोगगनान् ािंगा गागनी गानेगति - ओगाढगाढणिचिदो अवगाहावगाहा नैरन्तण निनितो मतः । से। लोगो लोत: । कणं गतः । सव्वदो सर्वतः सर्वप्रदेशेषु । कं: कतृ भूतैः । गुग्गलकाहि परगना: । fifrणि: । सुरुमेहि बादरेहि य इन्द्रियग्रहणायोग्यैः सूक्ष्भस्तद्गहण गोगदिश्च । पुना पुनः । अप्पाओग्गेहि अति सूक्ष्मस्थूलत्वेन कर्मवर्गणायोग्यतारहितः । पुनश फिनिमिष्टेः । जोगहि अतिगुमनलागावातम- निश्चित होता है कि द्वि-अणुकादि अनन्तानन्त पुद्गलोंका पिण्उकर्ता आत्मा नहीं है ।।१६७ ।। अब ऐसा निश्चित करते हैं कि (जिसप्रकार आत्मा पुद्गलपिण्डका करने वाला नहीं उसी प्रकार) आत्मा पुद्गलपिण्डका लानेवाला (भी) नहीं है : لسه गाथा १६८ अन्वयार्थ :- [लोकः] लोक [सर्वतः] सर्वतः [सूक्ष्मैः बादरः] सूक्ष्म तथा बादर [च] और [अप्रायोग्यः योग्यः] कर्मत्वके अयोग्य तथा कर्मत्वके योग्य [पुद्गलकार्यः] पुद्गलस्कंधोंके द्वारा [अवगाढगाढनिचितः] (विशिष्ट प्रकारसे) अवगाहित होकर गाढ़ (-घनिष्ठ) भरा हुआ है । टोका :- सूक्ष्मतया परिणत तथा बादररूप परिणत, अति सूक्ष्म अथवा अति स्थूल न होनेसे कर्मरूप परिणत होनेकी शक्तिवाले होनेसे कर्मरूप परिणत होनेकी शक्तिसे रहित - ऐसे पुद्गलकायोंके द्वारा, अवगाहकी विशिष्टताके कारण परस्पर बाधा किये विना, स्वयमेव सर्वतः (सर्व प्रदेशोंसे) लोक गाढ़ भरेल छे सर्वत्र पुद्गलकायथी। बादर-सूक्ष्मथी, कर्मत्वयोग्य-अयोग्यथी ॥ १६८ ।। तथा अति सूक्ष्म अथवा अति स्थूल अवगाढ़ आलोक --- न मास्माना यतो हि सुनत्यपरिणग्जिानिमन्वयनमान बरिगलन गनियोगिभिरनिटमस्यूनला तयोगिनिमाबगाइलिंक परकापमान: समेत मन पर पुदगलकागा निचिनी लोकः । बनो. नामानना योऽग्नि ।।१६।। मधामनः पृपिकानां कमलयागमायानि कम्मत्तणपाओग्गा मंछा जीवन परिमाया। गच्छंति कम्ममा जहि जवेग पनिामिका ॥१९॥ कामयामोग्याः गान्ति मनाई :::::::: ..

-प्रवचनसार-
तब फिर जीवका, शरीरादि सर्वपरद्रव्योंसे विभागका साधनभूत, असाधारण
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
ओरालिओ य देहो देहो वेउविओ य तेजसिओ।
आहारय कम्मइओ पोग्गलदव्वप्पगा सवे ॥ १७१॥
औदारिकश्च देहो
देहो वैक्रियिकश्च तेजसः ।
आहारकः कार्मणः पुद्गलद्रव्यात्मकाः सर्वे ॥ १७१ ।।
यतो ह्यौदारिकवैक्रियिकाहारकतैजसकार्मणानि शरीराणि सर्वाण्यपि पुद्गलद्रव्या-
त्मकानि । ततोऽवधार्यते न शरीरं पुरुषोऽस्ति ।। १७१ ॥
अथ कि तहि जीवस्य शरीरादिसर्वपरद्रव्यविभागसाधनमसाधारणं स्वलक्षणमित्या-
वेदयति-
औदारिकश्च देहः देहो वेविओ य देहो वैक्रियकश्च तेजइओ तेजसिक: आहारय कम्मइयो आहारकः
कार्मणश्च पुग्गलदव्वप्पगा सव्वे एते पञ्च देहा : पुद्गलद्रव्यात्मकाः सर्वेऽपि मम स्वरूपं न भवन्ति ।
कस्मादिति चेत् । ममाशरीरचैतन्यचमत्कारपरिणतत्वेन सर्वदेवाचेतनशरीरत्वविरोधादिति ।।१७१ .
एवं पुद्गलस्कन्धानां बन्धव्याख्यानमुख्यतया द्वितीयस्थले गाथापञ्चकं गतम् । इति 'अपदेसो परमाणू
इत्यादि गाथानवकेन परमाणुस्कन्धभेदभिन्नपुद्गलानां पिण्डनिष्पत्तिव्याख्यानमुख्यतया द्वितीय-
विशेषान्तराधिकारः समाप्तः । अथैकोनविंशतिगाथापर्यन्तं जीवस्य पुद्गलेन सह बन्धमुख्यतया
व्याख्यानं करोति, तत्र पट्स्थलानि भवन्ति । तेष्वादी 'अरसमरूव' इत्यादि शुद्धजीवव्याख्यानेन
गार्थका, 'मुत्तो रूवादि' इत्यादिपूर्वपक्षपरिहारमुख्यतया गाथाद्वयमिति प्रथमस्थले गाथात्रयम् ।
अन्वयार्थ :- [औदारिकः च देहः ] औदारिक शरीर, [वैक्रियिकः देहः] वैक्रियिक
शरीर, [तेजसः] तैजस शरीर, [आहारकः] आहारक शरीर [च] और [कार्मणः]
कार्मण शरीर - [सर्वे ] सव [पुद्गलद्रव्यात्मकाः] पुद्गलद्रव्यात्मक हैं ।
टीका :- औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये शरीर सब
पुद्गलद्रव्यात्मक हैं । इससे निश्चित होता है कि आत्मा शरीर नहीं है ।। १७१ ।।
गाथा १७१
म्वलक्षण क्या है, सो कहते हैं :-
जे देह औदारिक, ने वैक्रिय-तेजस देह छ ।
कार्मण-आहारक देह जे, ते सर्व पुद्गलरूप छे ॥ १७१ ॥

www.et - । अरलमन्यमगंधं अनं मागणमलई । जान निगराहणं लोहिया ॥ १४ ॥ सम्ममममनः ननागुणमादक। जनपिया जीवन भादगा Triaमानमा कामना गया REEMEETara । मानानं तु ................................ .... ::.: ..................................... ....... .... . --- -प्रवचनसार- अर्थकी प्राप्ति होती है। (३) जैसे धुएंसे अग्निका ग्रहण (ज्ञान) होता है, उसीप्रकार जिसका ग्रहण नहीं होता वह अलिगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा अनुमेय मात्र (केवल लिंगो ही परका ग्रहण नहीं होता वह अलिगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा अनुमातामाग अनुमानमे ही ज्ञात होने योग्य) नहीं है' ऐसे अर्थको प्राप्ति होती है। (५) जिसके (केवल अनुमान करनेवाला हो) नहीं है' ऐसे अर्थकी प्राप्ति होती है। (६) जिसके ३४० [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान तस्य स्वजीवद्रव्यमात्राश्रितत्वेन स्वलक्षणतां बिभ्राणं शेषद्रव्यान्तरविभागं साधयति । अलिङ्गग्राह्य इति वक्तव्ये यदलिङ्गग्रहणमित्युक्त तद्बहुतरार्थप्रतिपत्तये । तथाहि (१) न लिगैरिन्द्रियग्राहकतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येत्यतीन्द्रियज्ञानमयत्वस्य प्रतिपत्तिः । (२) न लिंगैरिन्द्रियग्राह्यतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षाविषयत्वस्य । (३) न लिंगा- दिन्द्रियगम्या मादग्नेरिव ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वकानुमानाविषयत्वस्य । (४) न लिंगादेव परैः ग्रहणं यस्येत्यनुमेयमात्रत्वाभावस्य । (५) न लिंगादेव परेषां ग्रहणं यस्येत्यनुमातृमात्रत्वाभावस्य । (६) न लिंगात्स्वभावेन ग्रहणं यस्येति प्रत्यक्षज्ञातृत्वस्य । कथनमुख्यतया 'रत्तो बंधदि' इत्यादि गाथात्रयम् । अथ भेदभावनामुख्यत्वेन 'भणिदा पुढवी' इत्यादि सूत्रद्वयम् । तदनन्तरं जीवो रागादिपरिणामानामेव कर्ता, न च द्रव्यकर्मणामिति कथनमुख्यत्वेन 'कुव्वं सहावमादा' इत्यादि षष्ठस्थले गाथासप्तकम् । यत्र मुख्यत्वमिति वदति तत्र यथासंभव- मन्योऽप्यर्थो लभ्यत इति सर्वत्र ज्ञातव्यम् । एवमेकोनविंशतिगाथाभिस्तृतीयविशेषान्तराधिकारे समुदायपातनिका । तद्यथा - अथ किं तहि जीवस्य शरीरादिपरद्रव्येभ्यो भिन्नमन्यद्रव्यासाधारणं स्वस्वरूपमिति प्रश्ने प्रत्युत्तरं ददाति - अरसमरूवमगंधं रसरूपगन्धरहितत्वात्तथा चाव्याहार्यमाणा- स्वजीवद्रव्याश्रित होनेसे स्वलक्षणपनेको धारण करता हुआ, आत्माका शेष अन्य द्रव्योंसे विभाग (भेद) सिद्ध करता है । जहाँ 'अलिंगग्राह्य' कहना है वहां जो 'अलिंगग्रहण' कहा है, वह बहुतसे अर्थोकी प्रतिपत्ति (प्राप्ति, प्रतिपादन) करनेके लिये है। वह इसप्रकार है :- (१) ग्राहक (ज्ञायक) जिसके लिंगोंके द्वारा अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा अतीन्द्रियज्ञानमय है' इस अर्थकी प्राप्ति होती है । (२) ग्राह्य (शेय) जिसका लिंगोंके द्वारा अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा इन्द्रियप्रत्यक्षका विषय नहीं है' इस लिंग द्वारा, अर्थात् इन्द्रियगम्य (इन्द्रियोंसे जानने योग्य चिह्न) द्वारा जिसका ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है । इसप्रकार 'आत्मा इन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वक अनुमानका विषय नहीं है' ऐसे अर्थको प्राप्ति होती है। (४) दूसरोंके द्वारा - मात्र लिंग द्वारा ही जन गारप्रमा {} ਜੋ ਜੇਹੀਦਤ ਅੱਜ = = =:- : : () : : : : : : :- : : ਅਦਾ ਸਵਾਲ :3 c) • । ਦੁਰਵਰਤਣ ਜ ਦ ਗ ਹf= ਛੇਵ ॥ (: : : : ਹੰਸ--ਭਾਦਤ ਦੇ ਰਾਸ- 7; ; ; : : : : : , 1 : : : : : : : t ३४२ -प्रवचनसार- - । अर्थात् स्त्री, पुरुष और नपुंसक वेदोंका ग्रहण नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इसप्रकार अर्थात् अर्थावबोधविशेप जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा पर्याय- (२०) लिंग अर्थात् प्रत्यभिज्ञानका कारण ऐसा जो ग्रहण अर्थात् अर्थावबोध सामान्य [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यस्येति शुक्रातवानुविधायित्वाभावस्य । (१४) न लिंगस्य मेहनाकारस्य ग्रहणं यस्येति लौकिकसाधनमात्रत्वाभावस्य । (१५) न लिगेनामेहनाकारेण ग्रहणं लोकव्याप्तिर्यस्येति कुहुकप्रसिद्धसाधनाकारलोकव्याप्तित्वाभावस्य । (१६) न लिंगानां स्त्रीपुन्नपुसकवेदानां ग्रहणं यस्येति स्त्रीपुन्नपुंसकद्रव्यभावाभावस्य । (१७) न लिंगानां धर्मध्वजानां ग्रहणं तेनालिङ्गग्रहणो भवति । तदपि कस्मात् । स्वयमेवातीन्द्रियाखण्डज्ञानसहितत्वात् । तेनैव लिङ्ग- शब्दवाच्येन चक्षुरादीन्द्रियेणान्यजीवानां यस्य ग्रहणं परिच्छेदनं कतु” नायाति तेनालिङ्गग्रहण उच्यते । तदपि कस्मात् । निर्विकारातीन्द्रियस्वसंवेदनप्रत्यक्षज्ञानगम्यत्वात् । लिङ्ग धूमादि तेन धूमलिङ्गोद्भवानुमानेनाग्निवदनुमेयभूतपरपदार्थानां ग्रहणं न करोति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि कस्मात् । स्वयमेवालिङ्गोद्भवातीन्द्रियज्ञानसहितत्वात् । तेनैव लिङ्गोद्भवानुमानेनाग्निग्रहणवत् परपुरुषाणां यस्यात्मनो ग्रहणं परिज्ञानं कतु नायाति तेनालिङ्गग्रहण इति । तदपि कस्मात् । विषयोंका उपभोक्ता नहीं है' ऐसे अर्थकी प्राप्ति होती है । (१३) लिंग द्वारा अर्थात् मन अथवा इन्द्रियादि लक्षणके द्वारा ग्रहण अर्थात् जीवत्वको धारण कर रखना जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा शुक्र और आर्तवको अनुविधायी (अनुसार होनेवाला) नहीं है' ऐसे अर्थकी प्राप्ति होती है । (१४) लिंगका अर्थात् मेहनाकार (पुरुषादिकी इन्द्रियका आकार) का ग्रहण जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा लौकिकसाधनमात्र नहीं है' ऐसे अर्थकी प्राप्ति होती है । लिंगके द्वारा अर्थात् अमेहनाकारके द्वारा जिसका ग्रहण अर्थात् लोकमें व्यापकत्व नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इसप्रकार 'आत्मा पाखण्डियोंके प्रसिद्ध साधनरूप आकारवाला लोकव्याप्तिवाला नहीं है' ऐसे अर्थकी प्राप्ति होती है। (१६) जिसके लिंगोंका 'आत्मा द्रव्यसे तथा भावसे स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक नहीं है' इस अर्थकी प्राप्ति होती है (१७) लिंगोंका अर्थात् धर्मचिह्नोंका ग्रहण जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार 'आत्माके वहिरंग यतिलिंगोंका अभाव है' इस अर्थकी प्राप्ति होती है । (१८) लिंग अर्थात् गुण ऐसा जो ग्रहण अर्थात् अर्थावबोध (पदार्थज्ञान) जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है। इसप्रकार 'आत्मा गुणविशेषसे आलिगित न होने वाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है' ऐसे अर्थकी प्राप्ति होती है। (१९) लिंग अर्थात् पर्याय ऐसा जो ग्रहण विशेषसे आलिंगित न होनेवाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है ऐसे अर्थकी प्राप्ति होती है । (१५) संन मामाना अनि कति निनिगाभारत (%D = निमी मिनाली मुलाकात। १६ ची मावि पापानानीकाजलयात । म का मामा पनि लामालगुलान :: म्यान निमन्त्री मतो मत्रादिगणों बदि कामह नविनको दावीत !!! पत्रों का नाम:

३४४
--प्रवचनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
मूर्तयोहि तावत्पुद्गलयो रूपादिगुणयुक्तत्वेन यथोदितस्निग्धरूक्षत्वस्पर्शविशेषा-
दन्योन्यबन्धोऽवधार्यते एव । आत्मकर्मपुद्गलयोस्तु स कथमवधार्यते; मूर्तस्य कर्म-
पुद्गलस्य रूपादिगुणयुक्तत्वेन यथोदितस्निग्धरूक्षत्वस्पर्शविशेषसंभवेऽप्यमूर्तस्यात्मनो
रूपादिगुणयुक्तत्वाभावेन यथोदितस्निग्धरूक्षत्वस्पर्शविशेषासंभावनया चैकाङ्गविकल-
त्वात् ॥१७३ ॥
अथैवममूर्तस्याप्यात्मनो वन्धो भवतीति सिद्धान्तयति
रूवादिएहि रहिदो पेच्छदि जाणादि रूवमादीणि ।
दव्वाणि गुणे य जधा तह बंधो तेण जाणीहि ॥ १७४ ॥
रूपादिक रहितः पश्यति जानाति रूपादीनि ।
द्रव्याणि गुणांश्च यथा तथा बन्धस्तेन जानीहि ॥ १७४ ॥
नास्ति । कैः कृत्वा । फासेहि अण्णमणेहि स्निग्धरूक्षगुणलक्षणस्पर्शसंयोगैः । किविशिष्टः । अन्योन्यः
परस्परनिमित्तैः । तविवरीदो अप्पा बन्झदि किध पोग्गलं कम्मं तद्विपरीतात्मा बध्नाति कथं पौद्गलं
कर्मेति । अयं परमात्मा निर्विकारपरमचैतन्यचमत्कारपरिणतत्वेन बन्धकारणभूतस्निग्धरूक्षगुण
स्थानीयरागद्वेषादिविभावपरिणामरहितत्वादमूर्तत्वाच्च पौद्गलं कर्म कथं बध्नाति, न कथमपीति
पूर्वपक्षः ॥ १७३ ।। अथैवममूर्तस्याप्यात्मनो नयविभागेन वन्धो भवतीति प्रत्युत्तरं ददाति
रूवादिएहि रहिदो अमूर्तपरमचिज्ज्योतिःपरिणतत्वेन तावदयमात्मा रूपादिरहितः । तथाविधः सन्
टीका :- मूर्त ऐसे दो पुद्गल तो रूपादिगुणयुक्त होनेसे यथोक्त स्निग्धरूक्षत्वरूप
स्पर्शविशेष (बंधयोग्य स्पर्श) के कारण उनका पारस्परिक बंध अवश्य समझा जा
सकता है; किन्तु आत्मा और कर्मपुद्गलका बंध होना कैसे समझा जा सकता है ?
क्योंकि मूर्त ऐसा कर्मपुद्गल रूपादिगुणयुक्त है, इसलिये उसके यथोक्त स्निग्धरूक्षत्वरूप
स्पर्शविशेषका संभव होने पर भी अमूर्त ऐसे आत्माको रूपादिगुणयुक्तता नहीं है इसलिये
उसके यथोक्त स्निग्धरूक्षत्वरूप स्पर्शविशेषका असंभव होनेसे एक अंग विकल है ।
(अर्थात् बंधयोग्य दो अंगोंमेंसे एक अंग अयोग्य है - स्पर्शगुणरहित होनेसे बंधकी
योग्यतावाला नहीं है ।) ॥ १७३ ।।
अब ऐसा सिद्धान्त निश्चित करते हैं कि आत्मा अमूर्त होने पर भी उसको इस-
प्रकार बंध होता है :-
जे रीत दर्शन-ज्ञान थाय रूपादिनु गुणद्रव्यनु ।
ते रोत बंधन जाण मूर्ति रहितने पण मूर्तनू ॥१७४॥

:४५ -- जन मामाना] पेन प्रकारेण स्पादिहिनो नापि वानमा पनि मानिने प्रकारेण साविकको नपिन: मदान: किन ले: अन्ना पानि जानानि यत्रापि प्रयोगनिवान्नान । म लावा. मोर चिन्नु मानणायालयापलटन । नया अन्य बागल वली दलकामायने जाननान कर S:- . am - :::::: :: ::... अर :::::: -::-: 5.

-प्रवचनसार- बंधो ? मूर्तिक कर्मपुद्गलोंके साथ बंध है' वहां परमार्थत: अमूर्तिक आत्माका मूर्तिक कर्मपुद्गलोंके ३४६ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान संवन्धः, विषयभावावस्थितवलीवर्दनिमित्तोपयोगाधिरूढवलीवर्दाकारदर्शनज्ञानसंबंधो बलीवर्दसंबन्धव्यवहारसाधकस्त्वस्त्येव, तथा किलात्मनो नीरूपत्वेन स्पर्शशून्यत्वान्न कर्म- पुद्गलैः सहास्ति संबन्धः, एकावगाहभावावस्थितकर्मपुद्गलनिमित्तोपयोगाधिरूढराग- समवसरणे प्रत्यक्षजिनेश्वरं दृष्ट्वा विशेषभेदज्ञानी मन्यते मदीयाराध्योऽयमिति । तत्रापि यद्यप्यव- लोकनज्ञानस्य जिनेश्वरेण सह तादात्म्यसंबन्धो नास्ति तथाप्याराध्याराधकसंवन्धोऽस्ति । तह तेण जाणोहि तथा वन्धं तेनैव दृष्टान्तेन जानीहि । अयमत्रार्थः - यद्यप्ययमात्मा निश्चयेनामूर्तस्त- थाप्यनादिकर्मवन्धवशाद्व्यवहारेण मूर्तः सन् द्रव्यबन्धनिमित्तभूतं रागादिविकल्परूपं भाववन्धोपयोगं निमित्त हैं ऐसे उपयोगारूढ़ रागद्वेषादिभावोंके साथका संबंध कर्मपुद्गलोंके साथके वंधरूप व्यवहारका साधक अवश्य है । भावार्थ :- 'आत्मा अमूर्तिक होनेपर भी वह मूर्तिककर्मपुद्गलोंके साथ कैसे वंधता है ?' इस प्रश्नका उत्तर देते हुए आचार्यदेवने कहा है कि - आत्माके अमूर्तिक होने पर भी वह मूर्तिक पदार्थों को कैसे जानता है ? जैसे वह मूर्तिक पदार्थों को जानता है उसीप्रकार मूर्तिक कर्मपुद्गलोंके साथ बंधता है । वास्तवमें अरूपी आत्माका रूपी पदार्थोके साथ कोई संबंध न होनेपर भी अरूपीका रूपोंके साथ संबंध होनेका व्यवहार भी विरोधको प्राप्त नहीं होता । जहाँ ऐसा कहा जाता है कि 'आत्मा मूर्तिक पदार्थको जानता है' वहाँ परमार्थतः अमूर्तिक आत्माका मूर्तिक पदार्थके साथ कोई संबंध नहीं है; उसका तो मात्र उस मूर्तिक पदार्थके आकार रूप होनेवाले ज्ञानके साथ ही संबंध है और उस पदार्थाकार ज्ञानके साथके संबंध कारण ही 'अमूर्तिक आत्मा मूर्तिक पदार्थको जानता है' ऐसा अमूर्तिक-मूर्तिकका संबंध- रूप व्यवहार सिद्ध होता है । इसीप्रकार जहाँ ऐसा कहा जाता है कि 'अमुक आत्माका साथ कोई सम्बन्ध नहीं है; आत्माका तो कर्मपुद्गल जिसमें निमित्त हैं ऐसे रागद्वेपादि- भावोंके साथ ही सम्बन्ध (बंध) है और उन कर्मनिमित्तक रागद्वेपादि भावोंके साथ सम्बन्ध होनेसे ही 'इस आत्माका मूर्तिक कर्मपुद्गलोंके साथ बंध है' ऐसा अमूर्तिक- मुर्तिकका बन्धल्प व्यवहार सिद्ध होता है । पद्यपि मनुष्यको स्त्री-पुत्र-धनादिके साथ वास्तवमें कोई सम्बन्ध नहीं है, मनुष्यने गवा भिन्न हैं, तथापि स्त्री-पुत्र-धनादिके प्रति राग करनेवाले मनुष्यको रागका बन्धन होनेने और उस रागमें स्त्री-पुत्र-धनादिके निमित्त होनेसे व्यवहारसे ऐसा अवश्य

जैन शास्त्रमाला]
-ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन-
३४७
द्वषादिभावसंबन्धः कर्मपुद्गलवन्धव्यवहारसाधकस्त्वस्त्येव ।। १७४ ।।
अथ भावबन्धस्वरूपं ज्ञापयति
उवओगमओ जीवो मुज्झदि रज्जेदि वा पदुस्सेदि ।
पप्पा विविध विसये जो हि पुणो तेहिं सो बंधो ।। १७५ ।।
उपयोगमयो जीवो मुह्यति रज्यति वा प्रष्टि ।
प्राप्य विविधान विषयान यो हि पुनस्तैः स बन्धः ।। १७५ ।।
करोति । तस्मिन्सति मूर्तद्रव्यकर्मणा सह यद्यपि तादात्म्यसंबन्धो नास्ति तथापि पूर्वोक्त दृष्टान्तेन
संश्लेपसंवन्धोऽस्तीति नास्ति दोषः ।। १७४ ।। एवं शुद्धवुद्धकस्वभावजीवकथनमुख्यत्वेन प्रथमगाथा,
मूर्तिरहितजीवस्य मूर्तकर्मणा सह कथं वन्धो भवतीति पूर्वपक्षल्पेण द्वितीया, तत्परिहाररूपेण तृतीया
चेति गाथात्रयेण प्रथमस्थलं गतम् । अथ रागद्वेषमोहलक्षणं भाववन्धस्वरूपमाख्याति - उवओगमओ
जोवो उपयोगमयो जीव:, अयं जीवो निश्चयनयेन विशुद्धनानदर्शनोपयोगमयस्तावत्तथाभूतोऽप्यनादि-
बन्धवशात्सोपाधिस्फटिकवत् परोपाधिभावेन परिणतः सन् । किं करोति । मुज्झदि रज्जेदि वा
पदुस्तेदि मुह्यति रज्यति वा प्रद्वेष्टि द्वेपं करोति । किं कृत्वा पूर्व । पप्पा प्राप्य । कान् । विविधे
।
-
कहा जाता है कि 'इस मनुष्यको स्त्री-पुत्र-धनादिका बन्धन है; इसीप्रकार, यद्यपि
आत्माका कर्मपुद्गलोंके साथ वास्तवमें कोई सम्बन्ध नहीं है, वे आत्मासे सर्वथा भिन्न
हैं, तथापि रागद्वेषादि भाव करनेवाले आत्माको रागद्वेषादि भावोंका बन्धन होनेसे
और उन भावों में कर्मपुद्गल निमित्त होनेसे व्यवहारले ऐसा अवश्य कहा जासकता है
कि 'इस आत्माको कर्मपुद्गलोंका वन्धन है ।। १७४ ।।
अव भावबंधका स्वरूप बतलाते हैं :-
गाथा १७५
अन्वयार्थ :- [यः हि पुनः] जो [उपयोगमयः जीदः] उपयोगमय जीव [विविधान्
विषयान् ] विविध विषयोंको [प्राप्य] प्राप्त करके [मुह्यति ] मोह करता है, [रज्यति]
राग करता है, [वा] अथवा [प्रष्टि] द्वेप करता है, [स:] वह जीव [:] उनके
द्वारा (मोह-राग-द्वपके द्वारा) [वन्धः] वन्धरूप है
विविध विषयो पामीने उपयोग-आत्मद जीद ने।
प्रद्वेष-राग-विमोहनावे परिणमे ते
बन्ध हे ॥१७॥

-- ३४८ -प्रवचनसार- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अयमात्मा सर्व एव तावत्सविकल्पनिर्विकल्पपरिच्छेदात्मकत्वादुपयोगमयः । तत्र यो हि नाम नानाकारान् परिच्छेद्यानर्थानासाद्य मोहं वा रागं वा द्वषं वा समुपैति स नाम तैः परप्रत्ययैरपि मोहरागद्वषैल्परक्तात्मस्वभावत्वान्नीलपीतरत्तोपाश्रयप्रत्ययनील- पीतरक्तत्वैरुपरक्तस्वभावः स्फटिकमणिरिव स्वयमेक एव तद्भावद्वितीयत्वाद्वन्धो भवति ॥ १७५ ॥ अथ भाववन्धयुक्ति द्रव्यवन्धस्वरूपं प्रज्ञापयति भावेण जेण जीवो पेच्छदि जाणादि आगदं विसये। रज्जदि तेणेव पुणो बज्झदि कम्म त्ति उवदेसो ॥ १७६ ॥ भावेन येन जीवः पश्यति जानात्यागतं विषये । रज्यति तेनैव पुनर्बध्यते कर्मेत्युपदेशः ॥ १७६ ॥ विसये निविषयपरमात्मस्वरूपभावनाविपक्षभूतान्विविधपञ्चेन्द्रियविषयान् । जो हि पुणो यः पुनरित्थंभूतोऽस्ति जीवो हि स्फुटं, तेहि संबंधो तैः संबद्धो भवति, तैः पूर्वोक्तरागद्वेषमोहैः कर्तृ भूत- ोहरागद्वेपरहितजीवस्य शुद्धपरिणामलक्षणं परमधर्ममलभमानः सन् स जीवो बद्धो भवतीति । अत्र योऽसी रागद्वेपमोहपरिणामः स एव भावबन्ध इत्यर्थः ।। १७५ ॥ अथ भाववन्धयुक्ति द्रव्यबन्ध- टोका :- प्रथम तो यह आत्मा सर्व ही उपयोगमय है, क्योंकि वह सविकल्प और निर्विकल्प प्रतिभासस्वरूप है (अर्थात् ज्ञान - दर्शनस्वरूप है ।) उसमें जो आत्मा विविधाकार प्रतिभासित होनेवाले पदार्थों को प्राप्त करके मोह, राग अथवा द्वेष करता है, वह आत्मा काला, पीला, और लाल 'आश्रय जिनका निमित्त है ऐसे कालेपन, पीलेपन और लालपनके द्वारा उपरक्त स्वभाववाले स्फटिकमणिकी भाँति - पर जिनका निमित्त है ऐसे मोह, राग और द्वे पके द्वारा उपरक्त (विकारी, मलिन, कलुपित,) आत्मस्वभाववाला होनेसे, स्वयं अकेला ही बंध (बंधरूप) है, क्योंकि मोहरागद्वेषादि- भाव उसका 'द्वितीय है ।। १७५ ।। - साम्रपजिसमें स्फटिकमगि रखा हो वह पाय । • द्विनी-दूमरा ['बन्ध तो दोके बीच होता है, अकेला आत्मा वंधस्वरूप कैसे हो सकता है ?' इस प्रश्ना उनर यह है कि - एक तो आत्मा और दूमरा मोहरागढ पादिभाव होनेसे, मोहरागद्वेषादिभाव के द्वारा मधिनम्वभावदाना आत्मा स्वयं ही भावबंध है।] जे भावी देखे अने जाणे विषयगत अर्थने । तेनाथी दे उपरक्तता वली कर्मबंधन ते पडे ॥१७६।।

जैन शास्त्रमाला -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- - ३४६ अयमात्मा साकारनिराकारपरिच्छेदात्मकत्वात्परिच्छेद्यतामापद्यमानमर्थजातं येनैव मोहरूपेण रागरूपेण द्वेषरूपेण वा भावेन पश्यति जानाति च तेनैवोपरज्यत एव । योऽयमुपरागः स खलु स्निग्धरूक्षत्वस्थानीयो भावबन्धः । अथ पुनस्तेनैव पौद्गलिकं कर्म वध्यत एव, इत्येष भाववन्धप्रत्ययो द्रव्यबन्धः ।। १७६ ।। अथ पुद्गलजीवतदुभयवन्धस्वरूपं ज्ञापयति - - स्वरूपं च प्रतिपादयति-भावेण जेण भावेन परिणामेन येन जीवो जीवः कर्ता पेच्छदि जाणादि निविकल्पदर्शनपरिणामेन पश्यति सविकल्पज्ञानपरिणामेन जानाति । किं कर्मतापन्न, आगदं विसये आगतं प्राप्तं किमपोष्टानिष्टं वस्तु पञ्चेन्द्रियविषये। रज्जदि तेणेव पुणो रज्यते तेनैव पुन: आदिमध्यान्तवजितं रागादिदोषरहितं चिज्ज्योतिःस्वरूपं निजात्मद्रव्यमरोचमानस्तथैवाजानन्सन् समस्तरागादिविकल्पपरिहारेणाभावयंश्च तेनैव पूर्वोक्तज्ञानदर्शनोपयोगेन रज्यते रागं करोति इति भाववन्धयुक्तिः । वज्झदि कम्म त्ति उवदेसो तेन भाववन्धेन नवतर द्रव्यकर्म बध्नातीति द्रव्यवन्धस्वरूपं चेत्युपदेशः ।। १७६ ।। एवं भावबन्धकथनमुख्यतया गाथाद्वयेन द्वितीयस्थलं गतम् । अथ पूर्वनवतर- अब, भावबंधकी युक्ति और द्रव्यवन्धका स्वरूप कहते हैं :- गाथा १७६ - अन्वयार्थ :- [जीवः] जीव [येन भावेन] जिस भावसे [विषये आगतं] विपया- गत पदार्थको [पश्यति जानाति] देखता है और जानता है, [तेन एव] उसीसे [रज्यति] उपरक्त होता है; [पुनः] और उसीसे [कर्म वध्यते] कर्म बंधता है;- (इति) ऐसा (उपदेशः) उपदेश है। टीका :- यह आत्मा साकार और निराकार प्रतिभासस्वरूप (नान और दर्शन- स्वरूप) होनेसे प्रतिभास्य (प्रतिभासित होने योग्य) पदार्थसमूहको जिस मोहरूप, रागरूप या द्वेषरूप भावसे देखता है और जानता है, उसीले उपरक्त होता है । जो यह उपराग (विकार) है वह वास्तवमें' स्निग्धरूक्षत्वस्थानीय भावबंध है । और उसीसे अवश्य पौद्गलिक कर्म बंधता है । इसप्रकार यह द्रव्यबंधका निमित्त भावबंध है ।। १७६ ॥ अव पुद्गलबंध, जीववंध और उन दोनोंके बंधका स्वरूप कहते हैं :- ( ' स्निग्धरक्षत्वस्थानीय स्निग्धता और रुक्षताके समान । (जने पुद्गलमे दिदि निधनाना art, उसीप्रकार जीव में रागद्वेषरूप विकार गायबन्ध है)

[भमान योगमाय पहान
फासेहिं पोग्गलाणं बंधो जीवरस रागमादीहि ।
अण्णोण्णमवगाहो पोग्गलजीवप्पगो भणिदो ॥ १७७॥
स्पर्शः पुद्गलानां बन्धो जीवस्य रागादिभिः ।
अन्योन्यमवगाहः पुद्गलजीवात्मको भणितः ।। १७७ ॥
यस्तावदत्र कर्मणां स्निग्धरूक्षत्वस्पर्शविशेषरेकत्वपरिणामः स केवलपुद्गलबन्धः ।
यस्तु जोवस्यौपाधिकमोहरागद्वेषपर्यायरेकत्वपरिणामः स केवलजीवबन्धः। यः पुनः
जीवकर्मपुद्गलयोः परस्परपरिणामनिमित्तमात्रत्वेन विशिष्टतरः परस्परमवगाहः स
तदुभयवन्धः ।। १७७ ।।
पुद्गलद्रव्यकर्मणोः परस्परबन्धो, जीवस्य तु रागादिभावेन सह बन्धो, जीवस्यैव नवतरद्रव्यकर्मणा
सह चेति त्रिविधवन्धस्वरूपं प्रजापति - फासेहि पुग्गलाणं बंधो स्पर्शः पुद्गलानां बन्धः । पूर्वनवतर
पुद्गलद्रव्यकर्मणोर्जीवगतरागादिभावनिमित्तेन स्वकीयस्निग्धस्क्षोपादानकारणेन न परस्परस्पर्श-
संयोगेन योऽसौ वन्धः न पुद्गलबन्धः । जोवस्स रागमादीहि जीवस्य रागादिभिः । निरुपराग-
परमचैतन्यरूपनिजात्मतत्त्वभावनाच्युतस्य जीवस्य यद्रागादिभिः सह परिणमनं स जीवबन्ध इति ।
अण्णोण्णस्सवगाहो पुग्गलजीवप्पगो भणिदो अन्योन्यस्यावगाहः पुद्गलजीवात्मको भणितः । निर्विकार-
स्वसंवेदनज्ञानरहितत्वेन स्निग्धरूक्षस्थानीय रागद्वेषपरिणतजीवरय बन्धयोग्यस्निग्धरूक्षपरिणाम-
परिणतपुद्गलस्य च योऽसौ परस्परावगाहलक्षणः स इत्यंभूतबन्धो जीवपुद्गलबन्ध इति त्रिविधबन्ध-
गाथा १७७
अन्वयार्थ :- [स्पर्शः] स्पर्शोके साथ [पुद्गलानां बंधः] पुद्गलोंका बंध,
[रागादिभिः जीवस्य] रागादिके साथ जीवका बंध और [अन्योन्यम् अवगाहः] अन्योन्य
अवगाह वह [पुद्गलजीवात्मकः भणितः] पुद्गलजीवात्मक बंध कहा गया है ।
टीका :- प्रथम तो यहाँ, कर्मोका जो स्निग्धता - रूक्षतारूप स्पर्शविशेषोंके साथ
एकत्वपरिणाम है सो केवल पुद्गलबंध है; और जीवका औपाधिक मोह-राग-द्वेषरूप
पर्यायोंके साथ जो एकत्व परिणाम है सो केवल जीवबंध है; और जीव तथा कर्मपुद्गल-
के परस्पर परिणामके निमित्तमात्रसे जो विशिष्टतर परस्पर अवगाह है सो उभयबंध
है । [अर्थात् जोव और कर्मपुद्गल एक दूसरेके परिणाममें निमित्तमात्र होवें, ऐसा
(विशिष्टप्रकारका-खासप्रकारका) जो उनका एकक्षेत्रावगाहसंबंध है सो वह पुद्गल-
जीवात्मक बंध है ।] ।। १७७ ।।
रागादि सह आत्मा तणो, ने स्पर्श सह पुद्गलतणो ।
अन्योन्य जे अवगाह, तेने बंध उभयात्मक कहो ॥१७७॥

जैन शास्त्रमाला] -शेयतत्त्व-प्रज्ञापन ३५१ - अथ अध्यनन्धस्य भाववन्धहेतुकत्वमुज्जीवति - सपदेसो सो अप्पा तेसु पदेसेसु पोग्गला काया। पविसंति जहाजोग्गं चिळंति हि जति बज्झंति ॥ १७८ ।। सप्रदेशः स आत्मा तेषु प्रदेशेषु पुद्गलाः कायाः । प्रविशन्ति यथायोग्यं तिष्ठन्ति च यान्ति वध्यन्ते ।। १७८ ।। अयमात्मा लोकाकाशतुल्यासंख्येयप्रदेशत्वात्सप्रदेशः । अथ तेषु तस्य प्रदेशेषु कायवाङ् मनोवर्गणालम्बनः परिस्पन्दो यथा भवति तथा कर्मपुद्गलकायाः स्वयमेव लक्षणं नातव्यम् ।।१७७।। अथ 'वंधो जीवस्स रागमादीहि' पूर्वसूत्रे यदुक्तं तदेव रागत्वं द्रव्यवन्धस्य कारणमिति विशेपेण समर्थयति - सपदेसो सो अप्पा स प्रसिद्धात्मा लोकाकाशप्रमितासंख्येयप्रदेश- त्वात्तावत्सप्रदेशः । तेसु पदेसेसु पुग्गला काया तेषु प्रदेशेषु कर्मवर्गणायोग्यपुद्गलकायाः कर्तारः पविसंति प्रविशन्ति । कथम् । जहाजोगं मनोवचनकायवर्गणालम्वनवीर्यान्तरायक्षयोपशमजनितात्मप्रदेशपरि- स्पन्दलक्षणयोगानुसारेण यथायोग्यम् । न केवलं प्रविशन्ति चिट्ठति हि प्रवेशानन्तरं स्वकीयस्थिति- कालपर्यन्तं तिष्ठन्ति हि स्फुटम् । न केवलं तिष्ठन्ति जंति स्वकीयोदयकालं प्राप्य फलं दत्वा गच्छन्ति, बज्झति केवलज्ञानाद्यनन्तचतुष्टयव्यक्तिल्पमोक्षप्रतिपक्षभूतबन्धस्य कारणं रागादिकं लब्ध्वा पुनरपि अब, ऐसा बतलाते हैं कि द्रव्यवंधका हेतु भावबंध है :- - गाथा १७८ अन्वयार्थ :- [सः आत्मा] वह आत्मा [सप्रदेशः] सप्रदेश है; [तेपु प्रदेशेषु] उन प्रदेशोंमें [पृद्गलाः कायाः] पुद्गलसमूह [प्रविशन्ति] प्रवेश करते हैं, [यथायोग्य तिष्ठन्ति] यथायोग्य रहते हैं, [यान्ति] जाते हैं, [च] और विध्यन्ते] बंधते हैं। टीका :- यह आत्मा लोकाकाशतुल्य असंख्यप्रदेशी होनेने प्रदेश है। उनके इन प्रदेशोंमें कायवर्गणा, वचनवर्गणा और मनोवर्गणाका आलम्बनवाला परिस्पन्द (कम्पन) जिस प्रकारसे होता है, उस प्रकारले कर्मपुद्गलके समूह स्वयमेव परिपन्दवाले होते हुए प्रवेश भी करते हैं, रहते भी हैं, और जाते भी हैं; और यदि जीवके मोह-नाग- - सप्रदेश छे ते जीव, जीवप्रदेशमां आवे अने। पुद्गलसमूह रहे यथोचित, जाय हे, बंधाय है ।।१७।।

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जैन शास्त्रमाला -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- ३५३ - यतो रागपरिणत एवाभिनवेन द्रव्यकर्मणा वध्यते, न वैराग्यपरिणतः; अभिनवेन द्रव्यकर्मणा रागपरिणतो न मुच्यते वैराग्यपरिणत एव, बध्यत एव संस्पृशतैवाभिनवेन द्रव्यकर्मणा चिरसंचितेन पुराणेन च, न मुच्यते रागपरिणतः; मुच्यत एव संस्पृशतवा- भिनवेन द्रव्यकर्मणा चिरसंचितेन पुराणेन च वैराग्यपरिणतो, न बध्यते; ततोऽवधार्यते द्रव्यवन्धस्य साधकतमत्वाद्रागपरिणाम एव निश्चयेन बन्धः ।। १७६ ।। अथ परिणामस्य द्रव्यवन्धसाधकतमरागविशिष्टत्वं सविशेष प्रकटयति परिणामादो बंधो परिणामो रागदोसमोहजुदो। असुहो मोहपदोसो सुहो व असुहो हदि रागो॥१८०॥ परिणामाद्वन्धः परिणामो रागद्वोषमोहयुतः । अशुभौ मोहप्रद्वषो शुभो वाशुभो भवति रागः ॥१८० ।। मुच्यते कर्मभ्यां रागरहितात्मा। मुच्यत एव शुभाशुभकर्मभ्यां रागरहितात्मा, न च वध्यते । एसो बंधसमासो एप प्रत्यक्षीभूतो बन्धसंक्षेपः । जीवाणं जीवानां सम्बन्धी। जाण पिच्छयदो जानीहि त्वं हे शिष्य, निश्चयतो निश्चयनयाभिप्रायेणेति । एवं रागपरिणाम एव वन्धकारणं ज्ञात्वा समस्तरागादि- विकल्पजालत्यागेन विशुद्धन्नानदर्शनस्वभावनिजात्मतत्त्वे निरन्तरं भावना कर्तव्येति ।।१७६।। अथ जीवपरिणामस्य द्रव्यवन्धसाधकं रागाद्युपाधिजनितभेदं दर्शयति - परिणामादो बंधो परिणामात्स- और चिरसंचित (दीर्घकालसे संचित ऐसे) पुराने द्रव्यकर्मसे बंधता ही है, मुक्त नहीं होता; वैराग्यपरिणत जीव संस्पर्श करने (सम्बन्धमें आने वाले नवीन द्रव्यकर्मसे और चिरसंचित ऐसे पुराने द्रव्यकर्मसे मुक्त ही होता है, वधता नहीं है। इससे निश्चित होता है कि - द्रव्यवन्धका साधकतम (उत्कृष्ट हेतु) होनेसे रागपरिणाम हो निन्नयसे बन्ध है ।। १७६ ।। अब, परिणामका द्रव्यवन्धके साधकतम रागसे विशिष्टपना सदिप प्रगट करते हैं (अर्थात् परिणाम द्रव्यबन्धके उत्कृष्ट हेतुभूत रागने विशेषतावाला होता है ऐसा भेद सहित प्रगट करते हैं) :- गाथा १८० अन्वयार्थ :- [परिणामात् बंधः] परिणामसे वन्द है, [परिणामः नागढेष- परिणामथी छे बंध, राग-दिमोह-पनी युक्त जे । छे मोह-तुप अगुन, राग अगुभ वा गुन होय हे ॥१०॥ । -

-
ते
जाय तो, शुभपरिणाम वह पुण्य है और अशुभ परिणाम वह पाप । स्वात्मद्रव्यमें
प्रवर्तमान ऐसा शुद्ध परिणाम मोक्षका कारण है; इसलिये यदि कारणमें कार्यका उपचार
अव, जीवकी स्वद्रव्यमें प्रवृत्ति और परद्रव्यसे निवृत्तिकी सिद्धिके लिये स्व-परका
३५६
-प्रवचनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
द्वौ विशिष्टपरिणामस्य विशेषौ, शुभपरिणामोऽशुभपरिणामश्च । तत्र पुण्यपुद्गलबन्ध
कारणत्वात् शुभपरिणामः पुण्यं, पापपुद्गलबन्धकारणत्वादशुभरिणामः पापम् । अवि-
शिष्टपरिणामस्य तु शुद्धत्वेनैकत्वान्नास्ति विशेषः । स काले संसारदुःखहेतुकर्मपुद्गल-
क्षयकारणत्वात्संसारदुःखहेतुकर्मपुद्गलक्षयात्मको मोक्ष एव ।। १८१॥
अथ जीवस्य स्वपरद्रव्यप्रवृत्तिनिवृत्तिसिद्धये स्वपरविभागं दर्शयति
भणिदा पुढविप्पमुहा जीवणिकायाध थावरा य तसा।
अण्णा ते जीवादो जीवो वि य तेहिंदो अण्णो ॥ १८२॥
भणिताः पृथिवीप्रमुखा जीवनिकाया अथ स्थावराश्च त्रसाः ।
अन्ये
जीवाज्जीवोऽपि
तेभ्योऽन्यः ॥ १८२॥
निश्चयमध्ये शुद्धोपयोगः कथं लभ्यत इति शिष्येण पूर्वपक्षे कृते सति प्रत्युत्तरं ददाति - वस्त्वेकदेश-
परीक्षा तावन्नयलक्षणं, शुभाशुभशुद्धद्रव्यावलम्बनमुपयोगलक्षणं चेति; तेन कारणेनाशुद्धनिश्चयमध्येऽपि
शुद्धात्मावलम्बनत्वात् शुद्धध्येयत्वात् शुद्धसाधकत्वाच्च शुद्धोपयोगपरिणामो लभ्यत इति नयलक्षण
मुपयोगलक्षणं च यथासंभवं सर्वत्र ज्ञातव्यम् । अत्र योऽसौ रागादिविकल्पोपाधिरहितसमाधिलक्षण-
शुद्धोपयोगो मुक्तिकारणं भणितः स तु शुद्धात्मद्रव्यलक्षणाद्धये यभूताच्छुद्धपारिणामिकभावादभेदप्रधान-
द्रव्याथिकनयेनाभिन्नोऽपि भेदप्रधानपर्यायाथिकनयेन भिन्नः। कस्मादिति चेत् । अयमेकदेशनिरावरणत्वेन
क्षायोपशमिकखण्डज्ञानव्यक्तिरूपः, स च पारिणामिकः सकलावरणरहितत्वेनाखण्डज्ञानव्यक्तिरूपः,
अयं तु सादिसान्तत्वेन विनश्वरः, स च अनाद्यनन्तत्वेनाविनश्वरः । यदि पुनरेकान्तेनाभेदो भवति तह
घटोत्पत्ती मृत्पिण्डविनाशवत् घ्यानपर्यायविनाश मोक्षे जाते सति ध्येयापपारिणामिकस्यापि विनाशो
भवतीत्यर्थः । तत एव ज्ञायते शुद्धपारिणामिकभावो ध्येयरूपो भवति, ध्यानभावनारूपो न भवति ।
फस्मात् । ध्यानस्य विनश्वरत्वादिति ।।१८१।। एवं द्रव्यवन्धकारणत्वात्
भावयन्ध एव निश्चयेन बन्ध इति कथनमुख्यतया गाथात्रयेण चतुर्थस्थलं गतम् । अथ जीवस्य
भावार्थ :- परके प्रति प्रवर्तमान ऐसा शुभ परिणाम वह पुण्यका कारण है और
अशुभ परिणाम वह पापका कारण है; इसलिये यदि कारणमें कार्यका उपचार किया
किया जाय तो, शुद्ध परिणाम वह मोक्ष है ।। १८१ ।।
।
मिथ्यात्वरागादिविकल्परूपो
विभाग बतलाते हैं :
स्थावर अने उस पृथ्वीआदिक जीवकाय कहेल जे ।
ते जीवयी थे अन्य तेम ज जीव तेथी अन्य छे ॥१८॥

जैन शास्त्रमाला]
-क्षेयतत्त्व-प्रज्ञापन-
य एते पृथिवीप्रभृतयः षड्जीवनिकायास्त्रसस्थावरभेदेनाभ्युपगम्यन्ते ते खल्वचेतन-
त्वादन्ये जीवात्, जीवोऽपि च चेतनत्वादन्यस्तेभ्यः । अत्र षड्जीवनिकायात्मनः पर-
द्रव्यमेक एवात्मा स्वद्रव्यम् ।। १८२ ।।
अथ जीवस्य स्वपरद्रव्यप्रवृत्तिनिमित्तत्वेन स्वपरविभागज्ञानानाने अवधारयति.
जो णवि जाणदि एवं परमप्पाणं सहावमासेज्ज ।
कीरदि अज्झवसाणं अहं ममेदं ति मोहादो ॥ १८३॥
यो नैव जानात्येवं परमात्मानं स्वभावमासाद्य ।
कुरुतेऽध्यवसानमहं ममेदमिति मोहात् ।। १८३ ।।
1
स्वद्रव्यप्रवृत्तिपर द्रव्यनिवृत्तिनिमित्तं पड्जीवनिकायः नह भेदविज्ञानं दर्शयति - भणिदा पुढविप्पमुहा
भणिताः परमागमे कथिताः पृथिवीप्रमुग्वाः । ते के 1 जीवणिकाया जीवसमूहाः । अघ अथ । कथंभूताः ।
यावरा य तसा स्थावराश्च त्रमाः । ते च किंविशिष्टाः । अण्णा ते अन्ये भिन्नास्ते । कस्मात् ।
जोवादो शुद्धबुद्धकजीवस्वभावात् । जीवो वि य तेहिंदो अपणो जीवोऽपि च तेभ्योऽन्य इति । तथाहि -
टोत्कीर्णनायककस्वभावपरमात्मतत्वभावनारहितेन जीवेन यदुपाजिनं त्रयस्यावरनामकर्म तदुदय-
जनितत्वादचेतनत्वाच्च बसस्थावरजीवनिकाया: शुद्धचैतन्यस्वभावजीवाद्भिन्नाः । जीवोऽपि च तेभ्यो
विलक्षणत्वाद्भिन्न इति । अत्रैवं भेदविनाने जाते सति मोक्षार्थी जीवः स्वद्रव्ये प्रवृत्ति परद्रव्ये निवृत्ति
गाथा १८२
अन्वयार्थ :- [अथ] अब [स्थावराः च प्रसाः] स्थावर और जम ऐसे जो
[पृथिवीप्रमुखाः] पृथ्वी आदि, [जीव निकायाः] जीवनिकाय [भपिताः] कहे गये हैं,
[ते] वे [जीवात् अन्ये] जीवसे अन्य हैं, [च] और [जीवः अपि] जीय भी
[तेन्यः अन्यः] उनसे अन्य है।
टीका :- जो यह पृथ्वी
जो यह पृथ्वो इत्यादि पट् जीवनिकाय अनन्यावरके भेदपूर्वक माने
जाते हैं, वे वास्तव में अचेतनत्वके कारण जीवने अन्य है, और जीव भी चननन्यके
कारण उनले अन्य है । यहाँ (यह कहा है कि) पद् जोवनिकाय आमाको परदव्य है,
आत्मा एक ही स्वद्रव्य है ।। १८२ ।।
परने स्वने नहि जाणतो ये रीत पानी वनावने ।
ते 'आ हूं, आ मुज' अम अध्ययनान मोह पकी परे ॥१६॥

-- भावार्थ :- जिसे स्व-परका भेदविज्ञान नहीं है वही परद्रव्यमें अहंकार ~ ममकार करता है, भेदविज्ञानी नहीं । इसलिये परद्रव्यमें प्रवृत्तिका कारण भेदविज्ञानका अभाव ३५८ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यो हि नाम नैवं प्रतिनियतचेतनाचेतनत्वस्वभावेन जीवपुद्गलयोः स्वपरविभाग पश्यति स एवाहमिदं ममेदमित्यात्मात्मीयत्वेन परद्रव्यमध्यवस्यति मोहान्नान्यः । अतो जीवस्य परद्रव्यप्रवृत्तिनिमित्त स्वपरपरिच्छेदाभावमात्रमेव सामर्थ्यात्स्वद्रव्यप्रवृत्तिनिमित्त तदभावः ॥१८३ ॥ अथात्मनः किं कर्मेति निरूपयति च करोतीति भावार्थः ॥१८२।। अथैतदेव भेदविज्ञान प्रकारान्तरेण द्रढयति- जो णवि जाणदि एवं यः कर्ता नैव जानात्येवं पूर्वोक्तप्रकारेण । कम् । परं पड्जीवनिकायादिपरद्रव्यं, अप्पाणं निर्दोपि- परमात्मद्रव्यरूपं निजात्मानम् । किं कृत्वा । सहावमासेज्ज शुद्धोपयोगलक्षणनिजशुद्धस्वभावमाश्रित्य । कोरदि अज्झवसाणं स पुरुषः करोत्यध्यवसानं परिणामम् । केन रूपेण । अहं ममेदं ति अहं ममेदमिति । ममकाराहंकारादिरहितपरमात्मभावनाच्युतो भूत्वा परद्रव्यं रागादिकमहमिति देहादिक ममेतिरूपेण । कस्मात् । मोहादो मोहाधीनत्वादिति । ततः स्थितमेतत्स्वपरभेदविज्ञानवलेन स्वसंवेदन- ज्ञानी जीवः स्वद्रव्ये रति परद्रव्ये निवृत्ति करोतीति ।।१८।। एवं भेदभावनाकथनमुख्यतया सूत्रद्वयन पञ्चमस्थलं गतम् । अथात्मनो निश्चयेन रागादिस्वपरिणाम एव कर्म, न च द्रव्यकर्मेति प्ररूपयति - अब, यह निश्चित करते हैं कि - जीवको स्वद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त स्व-परके विभागका ज्ञान है, और परद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त स्व-परके विभागका अज्ञान है :- गाथा १८३ अन्वयार्थ :- [यः] जो [एवं] इसप्रकार [स्वभावम् आसाद्य] स्वभावको प्राप्त करके (जीव-पुद्गलके स्वभावको निश्चित करके) [परम् आत्मानं] परको और स्व को [न एव जानाति] नहीं जानता, [मोहात्] वह मोहसे [अहम्] यह मैं हूँ, [इदं मम] यह मेरा है' [इति] इसप्रकार [अध्यवसानं] अध्यवसान [कुरुते] करता है । टोका :- जो आत्मा इसप्रकार जीव और पुद्गलके (अपने-अपने) निश्चित चेतनत्व और अचेतनत्वरूप स्वभावके द्वारा स्व-परके विभागको नहीं देखता, वही आत्मा 'यह मैं हूँ, यह मेरा है' इसप्रकार मोहसे परद्रव्यमें अपनेपनका अध्यवसान करता है, दूसरा नहीं । इससे (यह निश्चित हुआ कि) जीवको परद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त स्व- परके ज्ञानका अभावमात्र ही है और (कहे विना भी) सामर्थ्यसे (यह निश्चित हुआ कि) स्वद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त 'उसका अभाव है। ही है, और स्वद्रव्यमें प्रवृत्तिका कारण भेदविज्ञान ही है ।। १८३ ।। उमा अभाव-स्वारके ज्ञान अभावका भभाव; स्व-परके मानका सद्भाव ।

जैन शास्त्रमाला] -ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन- ३५६ कुव्वं सभावमादा हवदि हि कत्ता सगस्स भावस्स । पोग्गलदत्वमयाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं ।। १८४॥ कुर्वन् स्वभावमात्मा भवति हि कर्ता स्वकस्य भावस्य । पुद्गलद्रव्यमयानां न तु कर्ता सर्वभावानाम् ।। १८४ ।। आत्मा हि तावत्स्वं भावं करोति, तस्य स्वधर्मत्वादात्मनस्तथाभवनशक्तिसंभवेना- वश्यमेव कार्यत्वात् । स तं च स्वतन्त्रः कुर्वाणस्तस्य कर्तावश्यं स्यात्, क्रियमाणश्चात्मना स्वो भावस्तेनाप्यत्वात्तस्य कर्मावश्यं स्यात् । एवमात्मनः स्वपरिणामः कर्म । न त्वात्मा पुद्गलस्य भावान् करोति, तेषां परधर्मत्वादात्मनस्तथाभवनशक्त्यसंभवेनाकार्यत्वात् । कुछ समावं कुर्वन्स्वभावम् । अत्र स्वभावशब्देन यद्यपि शुद्धनिश्चयेन शुद्धबुद्धकस्वभावो भण्यते, तथापि कर्मवन्धप्रस्ताव रागादिपरिणामोऽप्यशुद्धनिश्चयेन स्वभावो भण्यते । तं स्वभावं कुर्वन् । स कः । आदा आत्मा। हवदि हि कत्ता कर्ता भवति हि स्फुटम् । कस्य । सगस भावस्त स्वकीयचिद्रूपस्व. भावस्य रागादिपरिणामस्य । तदेव तस्य रागादिपरिणामरूपं निश्रयेन भावकर्म भण्यते । कस्मात् । अव यह निरूपण करते हैं कि आत्माका कर्म क्या है :- गाथा १८४ अन्वयार्थ :- [स्वभावं कुर्वन् ] अपने भावको करता हुआ [आत्मा] आत्मा [हि] वास्तवमें [स्वकस्य भावस्य] पने भावका [कर्ता भवति ] कर्ता है; [तु] परन्तु [पुद्गलद्रव्यमयानां सर्वभावानां] पुद्गलद्रव्यमय सर्व भावोंका [फर्ता न] कता नहीं है। टीका :- प्रथम तो आत्मा वास्तवमें स्व भावको करता है, क्योंकि वह (भाव) उसका स्त्र धर्म है, इसलिये आत्माको उसरूप होनेकी (परिणमिन होनेकी) शक्तिका संभव है, अत: वह (भाव) अवश्यमेव आत्मा का कार्य है । (इनप्रकार) वह (आत्मा) उसे (स्व भावको) स्वतंत्रतया करता हुआ उसका कर्ता अवश्य है और व भाव आत्माके द्वारा किया जाता हुआ आत्माके द्वारा प्राप्त होनेने अवश्य ही आत्माका कर्म है । इसप्रकार स्व परिणाम आत्माका कर्म है । - निज भाव पारतो जीव छेरा खरे निज भावनो। पण ते नथी वार्ता सपाल पुद्गलदरवनय भादनी ।।१८८11 ३५८ -प्रवचनसार-- - दूसरा नहीं। इससे (यह निश्चित हुआ कि) जीवको परद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त स्व. करता है, भेदविज्ञानी नहीं । इसलिये परद्रव्यमें प्रवृत्तिका कारण भेदविज्ञानका अभाव [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यो हि नाम नैवं प्रतिनियतचेतनाचेतनत्वस्वभावेन जीवपुद्गलयोः स्वपरविभार पश्यति स एवाहमिदं ममेदमित्यात्मात्मीयत्वेन परद्रव्यमध्यवस्यति मोहान्नान्यः । अते जीवस्य परद्रव्यप्रवृत्तिनिमित्त स्वपरपरिच्छेदाभावमात्रमेव सामर्थ्यात्स्वद्रव्यप्रवृत्तिनिमित्त तदभावः ॥१८३ ।। अथात्मनः किं कर्मेति निरूपयति च करोतीति भावार्थः ॥१८२।। अथैतदेव भेदविज्ञानं प्रकारान्तरेण द्रढयति - जो णवि जाणदि एवं यः कर्ता नैव जानात्येवं पूर्वोक्तप्रकारेण । कम् । परं पड्जीवनिकायादिपरद्रव्यं, अप्पाणं निर्दोषि- परमात्मद्रव्यरूपं निजात्मानम् । किं कृत्वा । सहावमासेज्ज शुद्धोपयोगलक्षणनिजशुद्धस्वभावमाश्रित्य कोरदि अज्झवसाणं स पुरुषः करोत्यध्यवसानं परिणामम् । केन रूपेण । अहं ममेदं ति अह ममेदमिति । ममकाराहंकारादिरहितपरमात्मभावनाच्युतो भूत्वा परद्रव्यं रागादिकमहमिति देहादिक ममेतिरूपेण । कस्मात् । मोहादो मोहाधीनत्वादिति । ततः स्थितमेतत्स्वपरभेदविज्ञानवलेन स्वसंवेदन- ज्ञानी जीवः स्वद्रव्ये रति परद्रव्ये निवृत्ति करोतीति ।।१८३।। एवं भेदभावनाकथनमुख्यतया सूत्रद्वयेन पश्चमस्थलं गतम् । अथात्मनो निश्चयेन रागादिस्वपरिणाम एव कर्म, न च द्रव्यकर्मेति प्ररूपयति - अब, यह निश्चित करते हैं कि - जीवको स्वद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त स्व-परके विभागका ज्ञान है, और परद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त स्व-परके विभागका अज्ञान है :- गाथा १८३ अन्वयार्थ :- [यः] जो [एवं] इसप्रकार [स्वभावम् आसाद्य] स्वभावको प्राप्त करके (जीव-पुद्गलके स्वभावको निश्चित करके) [परम् आत्मानं] परको और स्व को [न एव जानाति] नहीं जानता, [मोहात्] वह मोहसे [अहम् ] यह मैं हूँ, [इदं मम] यह मेरा है' [इति] इसप्रकार [अध्यवसानं] अध्यवसान [कुरुते करता है । जो आत्मा इसप्रकार जीव और पुद्गलके (अपने-अपने) निश्चित चेतनत्व और अचेतनत्वरूप स्वभावके द्वारा स्व-परके विभागको नहीं देखता, वही आत्मा 'यह मैं हूँ, यह मेरा है' इसप्रकार मोहसे परद्रव्यमें अपनेपनका अध्यवसान करता है। परके ज्ञानका अभावमात्र ही है और (कहे विना भी) सामर्थ्यसे (यह निश्चित हुआ कि) स्वद्रव्यमें प्रवृत्तिका निमित्त 'उसका अभाव है । भावार्थ :- जिसे स्व-परका भेदविज्ञान नहीं है वही परद्रव्यमें अहंकार - ममकार [ - टीका :- ही है, और स्वद्रव्यमें प्रवृत्तिका कारण भेदविज्ञान ही है ।। १८३।। उनका अभाव-स्वपरके जानवे अभावका अभाव; स्व-परके जानका सद्भाव ।

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३५६
जैन शास्त्रमाला
यतत्त्व-प्रज्ञापन-
कुव्वं सभावमादा हवदि हि कत्ता सगस्स भावस्स ।
पोग्गलदव्वमयाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं ॥ १८४॥
कुर्वन् स्वभावमात्मा भवति हि कर्ता स्वकस्य भावस्य ।
पुद्गलद्रव्यमयानां न
कर्ता सर्वभावानाम् ॥ १८४॥
आत्मा हि तावत्स्वं भावं करोति, तस्य स्वधर्मत्वादात्मनस्तथाभवनशक्तिसंभवेना-
वश्यमेव कार्यत्वात् । स तं च स्वतन्त्रः कुर्वाणस्तस्य कर्तावश्यं स्यात्, क्रियमाणश्चात्मना
स्वो भावस्तेनाप्यत्वात्तस्य कर्मावश्यं स्यात् । एवमात्मनः स्वपरिणामः कर्म । न त्वात्मा
पुद्गलस्य भावान् करोति, तेषां परधर्मत्वादात्मनस्तथाभवनशक्त्यसंभवेनाकार्यत्वात् ।
tv
कुच्वं समावं कुर्वन्स्वभावम् । अत्र स्वभावशब्देन यद्यपि शुद्धनिश्चयेन शुद्धबुद्धकस्वभावो भण्यते,
तथापि कर्मवन्धप्रस्ताव रागादिपरिणामोऽप्यशुद्धनिश्चयेन स्वभावो भण्यते । तं स्वभावं कुर्वन् । स कः ।
आदा आत्मा। हवदि हि कत्ता कर्ता भवति हि स्फुटम् । कस्य । सगस्स भावस्स स्वकीयचिपस्व-
भावस्य रागादिपरिणामस्य । तदेव तस्य रागादिपरिणामरूपं निश्चयेन भावकम भण्यते । कस्मात् ।
अब यह निरूपण करते हैं कि आत्माका कर्म क्या है
गाथा १८४
अन्वयार्थ :- [स्वभावं कुर्वन् ] अपने भावको करता हुआ [आत्मा] आत्मा [हि]
वास्तव में [स्वकस्य भावस्य] अपने भावका [पर्ता भवति ] कर्ताः [तु] परन्तु
[पुद्गलद्रव्यमयानां सर्वभावानां] पुद्गलद्रव्यमय सर्व भावोंका [पर्ता न] सा नहीं है।
टोका :- प्रथम तो आत्मा वास्तव में स्व भावको करता है, क्योंकि वह (भाव)
उसका स्व धर्म है, इसलिये आत्माको उतरूप होनेकी (परिणामिन होनेकी) गावितका
संभव है, अत: वह (भाव) अवश्यमेव आत्मा का कार्य है । (इसप्रकार) वर (आत्मा)
उसे (व भावको) स्वतंत्रतया करता हुआ उसका कर्ता अवश्य है अंग र भाव
आत्माके द्वारा किया जाता हुआ आत्माके द्वारा प्राप्य होनेने अवश्य ही आत्माला वर्म
है । इसप्रकार स्व परिणाम आत्माका कर्म है ।
निज भाव करतो जीव हे वार्ता सरे निज भावनो।
पण ते नयी पर्ता सफल पुद्गलदरबमय भादनो ॥१८॥

३६० --प्रवचनसार- । - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान स तानकुर्वाणो न तेषां कर्ता स्यात्, अक्रियमाणाश्चात्मना ते न तस्य कर्म स्युः । एवमात्मनः पुद्गलपरिणामो न कर्म ॥१८४ ।। अथ कथमात्मनः पुद्गलपरिणामो न कर्म स्यादिति संदेहमपनुदति - गेण्हदि णेव ण मुंचदि करेदि ण हि पोग्गलाणि कम्माणि । जीवो पोग्गलमज्झे . वट्टण्णवि सव्वकालेसु ॥ १८५॥ गृह्णाति नैव न मुञ्चति करोति न हि पुद्गलानि कर्माणि । जीवः पुद्गलमध्ये वर्तमानोऽपि सर्वकालेषु ॥ १८५॥ तप्तायःपिण्डवत्तेनात्मना प्राप्यत्वाव्याप्यत्वादिति । पोग्गलदव्वमयाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं चिद्रूपात्मनो विलक्षणानां पुद्गलद्रव्यमयानां न तु कर्ता सर्वभावानां ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मपर्याया- णामिति । ततो ज्ञायते जीवस्य रागादिस्वपरिणाम एव कर्म, तस्यैव स कर्तेति ।।१८४।। अथात्मनः कथं द्रव्यकर्मरूपपरिणामः कर्म न स्यादिति प्रश्ने समाधानं ददाति - गेहदि णेव ण मुंचदि करेदि ण हि पोग्गलाणि कम्माणि जीवो यथा निविकल्पसमाधिरतः परममुनिः परभावं न गृह्णाति न मुञ्चति न च करोत्युपादानरूपेण लोहपिण्डो वाग्नि तथायमात्मा न च गृह्णाति न च मुञ्चति न च करोत्युपादानरूपेण पुद्गलकर्माणीति । किं कुर्वन्नपि । पुग्गलमझे वट्टण्णवि सव्वकालेसु क्षीरनीरन्यायेन पुद्गलमध्ये परन्तु, आत्मा पुद्गलके भावोंको नहीं करता, क्योंकि वे परके धर्म हैं, इसलिये आत्माके उस-रूप होनेकी शक्तिका असंभव होनेसे वे आत्माका कार्य नहीं हैं। (इसप्रकार) वह (आत्मा) उन्हें न करता हुआ उनका कर्ता नहीं होता और वे आत्माके द्वारा न किये जाते हुए उसका कर्म नहीं हैं। इसप्रकार पुद्गलपरिणाम आत्माका कर्म नहीं है ।। १८४॥ अव, 'पुद्गलपरिणाम आत्माका कर्म क्यों नहीं है' - ऐसे सन्देह को दूर करते हैं :- गाथा १८५ अन्वयार्थ :- [जीवः] जीव [सर्वकालेषु] सभी कालोंमें [पुद्गलमध्ये वर्तमान अपि] पुद्गलके मध्यमें रहता हुआ भी [पुद्गलानि कर्माणि] पौद्गलिक कर्मोको [हि] वास्तवमें [गृह्णाति न एव] न तो ग्रहण करता है, [न करोति] न करता है। जीव सर्वकाले पुद्गलोनी मध्यमां वर्ते भले । पण नव ग्रहे, न तजे, करे नहि जीव पुद्गलकर्मने ॥१८५॥ [न मुचति] न छोड़ता है, और

जैन शास्त्रमाला]
-ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन-
न खल्वात्मनः पुद्गलपरिणामः कर्म, परद्रव्योपादानहानशून्यत्वात् । यो हि यस्य
परिणमयिता दृष्टः स न तदुपादानहानशून्यो दृष्टः, यथाग्निरयःपिण्डस्य । आत्मा तु
तुल्यक्षेत्रवतित्वेऽपि परद्रव्योपादानहानशून्य एव । ततो न स पुद्गलानां कर्मभावेन
परिणमयिता स्यात् ।। १८५॥
अयात्मनः कुतस्तहि पुद्गलकर्मभिरुपादानं हानं चेति निरूपयति
स इदाणि कत्ता सं सगपरिणामस्स दन्वजादस्स ।
आदीयदे कदाई विमुच्चदे कम्मधूलोहि ॥ १८६ ॥
स इदानी कर्ता सन् स्वकपरिणामस्य द्रव्यजातत्य ।
आदीयते कदाचिद्विमुच्यते कर्मवलिभिः ॥१८६॥
वर्तमानोऽपि सर्वकालेषु । अनेन किमुक्त भवति । यथा सिद्धो भगवान् पुद्गलमध्ये वर्तमानोऽपि
परद्रव्य ग्रहणमोचनकरणरहितस्तथा शुद्धनिश्चयेन शक्तिरूपेण संसारी जोवोऽपीति भावार्थः ।।१८५।।
अथ यद्ययमात्मा पुद्गलकर्म न करोति न च मुञ्चति तहि बन्धः कथं, तहि मोक्षोऽपि कमिति प्रश्ने
टीका :- वास्तवमें पुद्गलपरिणाम आत्माका कर्म नहीं है, क्योंकि वह परद्रव्यके
ग्रहण-त्यागसे रहित है; जो जिसका परिणमानेवाला देखा जाता है वह उसके ग्रहण-
त्यागसे रहित नहीं देखा जाता; जैसे - अग्नि लोहेके गोलेमें ग्रहण-त्याग रहित होती
है । आत्मा तो
तुल्य
क्षेत्र में वर्तता
हुआ भी (परद्रव्यके साथ एकमेत्रावगाही होनेपर भी)
परद्रव्यके ग्रहण-त्यागसे रहित ही है । इसलिये वह पुद्गलोंको कर्मभावसे परिणमाने-
वाला नहीं है ।। १८५ ।।
तव (यदि आत्मा पुद्गलोंको कर्मरूप परिणमित नहीं करता तो फिर) आत्मा
किसप्रकार पुद्गल कर्मोके द्वारा ग्रहण किया जाता है और छोड़ा जाना है ? इसका
अव निरूपण करते हैं :-
गाथा १८६
अन्वयार्थ :- [सः] वह [इदानों ] अभी (संसारादन्याने) [द्रव्यजातन्य ] द्रव्य
(आत्मद्रव्यसे) उत्पन्न होनेवाले स्विकपरिणामत्य] (अल) परिकाममा
[पर्ता सन् ] कर्ता होता हुआ [कर्मधूलिभिः] कमरजने [आदीयते] ग्रह, दिया जाता
है और [कदाचित् विमुच्यते] कदाचित् छोड़ा जाता है ।
ते
हाल
द्रव्यजनित निज परिणामनो एता बने।
तेथी ग्रहाय अने पदापि मुकार ऐ को दटे ॥६॥

[भगवान योजनान कहान मिथ्यात्वरागादि- अशुद्धपरिणामेन सोऽयमात्मा परद्रव्योपादानहानशून्योऽपि सांपतं गंगारावर मागां निमितमात्रीकृत- परद्रध्यपरिणामस्य स्वपरिणाममात्ररय द्रव्यत्यभूतलाकेवलग कालगन् नर्तृत्वं, तदेव तस्य स्वपरिणाम निमित्तमात्रीकृत्योपात्तकर्मपरिणागाभिः पुद्गलगुलोभिविशिष्टावगाह रूपेणोपादीयते कदाचिन्मुच्यते च ॥ १८६॥ अथ किंकृतं पुद्गलकर्मणां वैचित्र्यमिति निरूपयति - प्रत्युत्तरं ददाति - स इदाणि कत्ता संग इदानी कर्ता मन् । स पुनःक्तिलक्षण आत्मा, इदानी कोऽर्थः एवं पूर्वोक्तनविभागेन, कर्ता सन् । कस्य । सगपरिणामस्स निनितारनित्यानन्कलक्षणपरमसुखामृत- व्यक्तिरूपकार्यसमयसारसाधकनिनगरत्ननगात्मकारणरागगगार विलक्षणरग विभावरूपस्य स्वकीयपरिणामस्य । पुनरपि किविशिष्टस्य । दव्यजादा स्वकीयात्गद्रव्योपादान- कारणजातस्य । आदोयदे कदाई कम्मधूतीहि आदीगते वध्यते । काभिः । कर्मभूलीभिः कर्तु भूताभिः कदाचित्पूर्वोक्तविभावपरिणामकाले । न केवल मादीगते, विमुच्चदे विशेषेण मुच्यते त्यज्यते ताभिः कर्मधूलीभिः कदाचित्पूर्वोक्तकारण समयसारपरिणतिकाले । एतावता किमुक्तं भवति । बध्यते शुद्धपरिणामेन मुच्यत इति ॥१८६।। अथ यथा द्रव्गकर्माणि निश्चयेन स्वयमेवोत्पद्यन्ते तथा सो यह आत्मा परद्रव्यके ग्रहण-त्यागसे रहित होता हुआ भी अभी संसारावस्थामें, परद्रव्यपरिणामको निमित्तमात्र करते हुए केवल स्वपरिणाममात्रका - उस स्वपरिणामके द्रव्यत्वभूत होनेसे - कर्तृत्वका अनुभव करता हुआ, उसके इसी स्वपरिणामको निमित्तमात्र करके कर्मपरिणामको प्राप्त होती हुई ऐसी पुद्गलरजके द्वारा विशिष्ट अवगाहरूपसे ग्रहण किया जाता है और कदाचित् छोड़ा जाता है । भावार्थ :- अभी संसारावस्थामें जीव पौद्गलिक कर्मपरिणामको निमित्तमात्र करके अपने अशुद्ध परिणामका ही कर्ता होता है (क्योंकि वह अशुद्ध उत्पन्न होता है), परद्रव्यका कर्ता नहीं होता। इसप्रकार जीव अपने अशुद्ध परिणामका कर्ता होने पर जीवके उसी अशुद्ध परिणामको निमित्तमात्र करके कर्मरूप परिणमित होती हुई पुद्गलरज विशेष अवगाहरूपसे जीवको ग्रहण 'करती है, और कभी (स्थितिके अनुसार रहकर अथवा जीवके शुद्ध परिणामको निमित्तमात्र करके) छोड़ती है ।। १८६ ।। अव पुद्गल कर्मोंकी विचित्रता (ज्ञानावरण, दर्शनावरणादिरूप अनेकप्रकारता) को कौन करता है ? इसका निरूपण करते हैं । कर्मपरिणत पुद्गलोंका जीवके साथ विशेप अवगाहरूपसे रहनेको ही यहाँ कर्मपुद्गलोंके द्वारा जीवका ग्रहण टीका :- परिणाम स्वद्रव्यसे -- होना' कहा है।

-शेयतत्त्व-प्रज्ञापन-
३६३
जैन शास्त्रमाला]
परिणमदि जदा अप्पा सुहम्हि असुहम्हि रागदोसजुदो ।
तं पविसदि कम्मरयं जाणावरणादिभाहिं ।। १८७ ।।
परिणमति यदात्मा शुभेऽशुभे रागद्वेषयुतः ।
तं प्रविशति कर्मरजो ज्ञातावरणादिभावः ।। १८७॥
अस्ति खल्वात्मनः शुभाशुभपरिणामकाले स्वयमेव समुपात्तवैचित्र्यकर्मपुद्गल-
परिणामः, नवधनाम्बुनो भूमिसंयोगपरिणामकाले समुपात्तवैचित्र्यान्यपुद्गलपरिणामवत् ।
नानावरणादिविचित्रभेदरूपेणापि स्वयमेव परिणमन्तीति कथयति - परिणमदि जदा अप्पा परिणमति
यदात्मा। समस्तशुभाशुभपरद्रव्य विषये परमोपेक्षालक्षणं शुद्रोपयोगपरिणामं मुक्त्वा यदायमात्मा
परिणमति । क्व । सुहम्हि असुहम्हि शुभेऽशुभे वा परिणामे । कायंभूतः मन् । रागदोसजुदो रागद्वेषयुक्तः
परिणत इत्यर्थः । तं पविसदि कम्मरयं तदा काले तत्प्रसिद्धं कमरजः प्रविशति । कैः कृत्वा ।
-
गाथा १८७
अन्वयार्थ :- [यदा जव [आत्मा] आत्मा [रागद्वेषयुतः] रागद्वेषयुक्त होता
हुआ [शुभे अशुभे] शुभ और अशुभमें [परिणमति] परिणमित होता है, तब [कर्मरजः]
कर्मरज [ज्ञानावरणादिभावः] ज्ञानावरणादिरूपले [तं] उसमें [प्रविशति ] प्रवेश
करती है।
टीका :- जैसे नये मेघजलके भूमिसंयोगम्प परिणामके मनन्न अन्य पुगनपरिणाम
स्वयमेव वैचित्र्यको प्राप्त होते हैं, उसीप्रकार आन्मार गुमानम परिणाम के समय
कर्मपुद्गलपरिणाम वास्तवमें स्वयमेव विचित्रताको प्राप्त होने का सप्रकार है
कि - जैसे, जब नया मेघजल भूमिसंयोगम्प परिणमित होला । तर अन्य पुदगल
स्वयमेव विचित्रताको प्राप्त हरियाली, कुकुरमुत्ता (हत्ता), और गोर (चातुर्मानमें
उत्पन्न लाल कीड़ा) आदिरूप परिणमित होता है, इसीप्रकार जब वह आत्मा गागडे
वशीभूत होता हुआ शुभाशुभभावरूप परिणमित होता है, न अच. बोगदागने प्रविष्ट
होते हुए कर्मपुद्गल स्वयमेव विचित्रताको प्राप्त जानादनमादि भावर परिमित
होते हैं।
जीद राग यी युत्त ज्वारे परिपने गुन-नमुननां ।
जानावरणरत्यारिभादे एमलि प्रग त्यां ॥१८॥

३ एकाग्रचित्तानिरोधएम. ही विषय में - ध्येयमें-विचारको रोकना; [एकाग्रचिन्तानिरोध नामक ध्यान है।) -प्रवचनसार--- (अशुद्धद्रव्यके निरूपणस्वरूप) व्यवहारनयमें अविरोधरूपसे मध्यस्थ रहकर, शुद्धद्रव्यके परद्रव्यसे भिन्नत्वके कारण आत्मारूप ही एक अनमें चिन्ताको रोकता है, वह एकाग- चिन्तानिरोधक (एक विपयमें विचारको रोकनेवाला आत्मा) उस एकाग्रचिन्ता- निरोधके समय वास्तवमें शुद्धात्मा होता है। इससे निश्चित होता है कि शुद्धनयसे ही अव ऐसा उपदेश देते हैं कि ध्र वत्वके कारण शुद्धात्मा ही उपलब्ध करने [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यो हि नाम स्वविषयमात्रप्रवृत्ताशुद्धद्रव्यनिरूपणात्मकव्यवहारनयाविरोधमध्यस्थः, शुद्धद्रव्यनिरूपणात्मकनिश्चयनयापहस्तितमोहः सन्, नाहं परेषामस्मि, न परे मे सन्तीति स्वपरयोः परस्परस्वस्वामिसंवन्धमुद्धय, शुद्धज्ञानमेवैकमहमित्यनात्मानमुत्सृज्यात्मान- मेवात्मत्वेनोपादाय परद्रव्यव्यावृत्तत्वादात्मन्येवैकस्मिन्नने चिन्तां निरुणद्धि, स खल्वेकान- चिन्तानिरोधकस्तस्मिन्न काग्रचिन्तानिरोधसमये शुद्धात्मा स्यात् । अतोऽवधार्यते शुद्धनयादेव शुद्धात्मलाभः ।। १६१ ।। अथ ध्रुवत्वात् शुद्ध आत्मैवोपलम्भनीय इत्युपदिशति निराकृत्य । पश्चात् किं करोति । णाणमहमेक्को ज्ञानमहमेकः, सकलविमलकेवलज्ञानमेवाहं भावकर्म- द्रव्यकर्मनोकर्मरहितत्वेनैकश्च । इदि जो झायदि इत्यनेन प्रकारेण योऽसौ ध्यायति चिन्तयति भावयति । क्व । झाणे निजशुद्धात्मध्याने स्थितः सो अप्पाणं हवदि झादा स आत्मानं भवति ध्याता । स चिदानन्दैकस्वभावपरमात्मानं ध्याता भवतीति । ततश्च परमात्मध्यानात्तादृशमेव परमात्मानं लभते । तदपि कस्मात् । उपादानकारणसदृशं कार्यमिति वचनात् । ततो ज्ञायते शुद्धनयाच्छुद्धात्मलाभ इति ।।१६१।। अथ ध्रुवत्वाच्छुद्धात्मानमेव भावयेऽहमिति विचारयति - 'मणे टोका :- जो आत्मा, मात्र अपने विषयमें प्रवर्तमान अशुद्धद्रव्यनिरूपणात्मक निरूपणस्वरूप निश्चयनयके द्वारा जिसने मोहको दूर किया है ऐसा होता हुआ, 'मैं परका नहीं हूँ, पर मेरे नहीं हैं' इसप्रकार स्व-परके परस्पर 'स्वस्वामिसम्बन्धको छोड़कर, 'शुद्ध ज्ञान ही एक मैं हूँ' इसप्रकार अनात्माको छोड़कर, आत्माको ही आत्मरूपसे ग्रहण करके, शुद्धात्माकी प्राप्ति होती है ।। १६१ ।। योग्य है :- , जिनपर स्वामित्व है वह पदार्थ और स्वामोके वीचके संबंधको; म्व-स्वामि संबंध कहा जाता है। २ सम-विपन, पेय; आलम्बन । %D जैन शास्त्रमाला] --जयतत्व-प्रज्ञापन- ३७१ एवं णाणप्पाणं दंसणभूदं अदिदियमहत्थं । ध्रुवमचलमणालंवं मण्णेऽहं अप्पगं सुद्ध ॥१६२॥ एवं ज्ञानात्मानं दर्शनभूतमतीन्द्रियमहार्थम् । ध्रुवमचलमनालम्बं मन्येऽहमात्मक शुद्धम् ॥१६॥ आत्मनो हि शुद्ध आत्मव सदहेतुकत्वेनानानन्तत्वात् स्वतःसिद्धत्वाच ध्र वो, न किंचनाप्यन्यत् । शुद्धत्वं चात्मनः परद्रव्यविभागेन स्वधर्माविभागेन चैकत्वात् । तच्च ज्ञानात्मकत्वादृशंनभूतत्वादतीन्द्रियमहार्थत्वादचलत्वादनालम्बत्वाच्च । तत्र ज्ञानमेवात्मनि विभ्रतः स्वयं दर्शनभूतस्य चातन्मयपरद्रव्यविभागेन स्वधर्माविभागेन चास्त्येकत्वम् । इत्यादिपटखण्डनारूपेण व्याख्यानं क्रियते - मण्णे मन्ये व्यायामि सर्वप्रकारोपादेयत्वेन भावये। मकः । अहं अहं कर्ता । कं कर्मतापत्रम् । अप्पगं सहजपरमालावलक्षणनिजात्मानम् । किविजिप्टम् । सुद्धं नागादिसमस्तविभावरहितम् । पुनरपि किविगिष्टम् । धुवं दलोत्कीर्णनायकम्वभावत्वेन ध्रुवम- विनश्वरम् । पुनरपि कथंभूतम् । एवं णाणप्पाणं दसणभूदं एवं बहुविधपूर्वोक्तप्रकारेणावण्डेकजान- गाथा १९२ अन्वयार्थ :- [अहम् ] मैं [आत्मकं] आत्माको [एवं] इस प्रकार [ज्ञानात्मानं] जानात्मक, [दर्शनभूतम् ] दर्शनभूत, [अतीन्द्रियमहार्थ] अतीन्द्रिय महा पदार्थ [ध्र वम्] ध्रुव, [अचलम् ] अचल, [अनालम्बं] निगलम्ब और [गुबन] गन [मन्ये ] मानता हूँ। टीका :- शुद्धात्मा 'सत् और अहेतुक होनेने अनादि-मनन और म्यतःसिल, इसलिये आत्माके शुद्धात्मा ही ध्रव है, (उराके) दूसरा पाटनी प्रदनी । आमा शुद्ध इसलिये है कि उसे परद्रव्यसे विभाग (मिनरच) और विभाग, इसलिये एकत्व है । वह एकत्व आत्माके (१) भानामगरने के कारः, () दांनभन पने के कारण, (३) अतीन्द्रिय महा पदार्थापने के कारण, (४) अनादेशमा. श्रीर (५) निरालम्बपनेके कारण है । १ . गरयिमान; तिरपदाला : निदाना। भारतब - जिया कारण नहीगा; माना । अशीत दर्शन-ज्ञान हे. इन्द्रिय-अतीत महारे। मानु-जालंदन रहित, जीव हाट, निकल, प्रबहे ।।१।। - . ::: तथा प्रतिनियतापमान:::mi रसगन्धवर्णगुणगदपनगा तो IIIIIIमान स्पर्शादिग्रहणात्मकम्यमर्माविभागेन नाराम् । IITTETर्माण नागना TET :. :: ::३३.६. :: :: : २०१३ . कालोन्दिमयमानम्। मनमोह। पो Fitni | पुन नियमानम् । असतं निनाममनमो... । इनमेंसे (१-२) जो ज्ञानको दी जाने में रहता है और जो स्वयं दर्शनभूत है ऐसे आत्माका अतन्मय (ज्ञान-र्शन रवि शा) पर गो भिन्नता है। और स्वधर्मसे अभिन्नत्व है. इसलिये उसके एकल ) जोर जो 'प्रतिनिक्षित स्पर्श-रस-गंध-वर्णरूप गुण तथा शब्दाला पर्यागको गाण करमेनाली अनेक इन्द्रियोंका अतिक्रम (उल्लंघन ) करके, समस्त स्पर्श-ररा-गंध-नर्णय गुणों और शया पर्यायको ग्रहण करनेवाला एक सत् महा पदार्ग, गे आत्माका इन्द्रियात्मक परद्रव्यसे विभाग है, और स्पर्णादिके ग्रहणस्वरूप (ज्ञानम्वरूप) स्वामसे अविभाग है. इसलिये उसके एकत्व है, (४) और क्षणविनाशरूपसे प्रवर्तमान शेयगर्यायोंको (प्रतिक्षण नष्ट होनेवाली ज्ञातव्य पर्यायोंको) ग्रहण करने और छोड़नेका अभाव होनेरो जो अचल है ऐसे आत्माको शेयपर्यायस्वरूप परद्रव्यसे विभाग है और तन्निमित्तक ज्ञानस्वरूप स्वधर्मसे अविभाग है, इसलिये उसके एकत्व है; (५) और नित्यरूपसे प्रवर्तमान (शाश्वत ऐसा) शेयद्रव्योंके आलम्बनका अभाव होनेसे जो निरालम्ब है ऐसे आत्माका शेय परद्रव्योंसे विभाग है और तन्निमित्तक ज्ञानस्वरूप स्वधर्मसे अविभाग है, इसलिये उसके एकत्व है। इसप्रकार आत्मा शुद्ध है क्योंकि चिन्मात्र शुद्धनय उतना ही मात्र निरूपण- स्वरूप है (अर्थात् चैतन्यमात्र शुद्धनय आत्माको मात्र शुद्ध ही निरूपित करता है) । और यह एक ही (यह शुद्धात्मा एक ही) ध्रुवत्वके कारण उपलब्ध करनेयोग्य है । किसी पथिकके शरीरके अंगोंके साथ संसर्गमें आनेवाली मार्गके वृक्षोंकी अनेक छायाके समान अन्य जो अध्र व (अन्य जो अध्रुव पदार्थ) उनसे क्या प्रयोजन है ? । प्रतिनिश्चित प्रतिनियत । (प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने नियत विषयको ग्रहण करती है; जैसे चक्षु वर्णको ग्रहण करती है।) ज्ञेय पर्यायें जिसकी निमित्त हैं ऐसा जो ज्ञान, उस-स्वरूप स्वधर्मसे (ज्ञानस्वरूप निजधर्मसे) आत्माकी २ अभिन्नता है।

-- जैन शास्त्रमाला -जेयतत्त्व-प्रजापन- ३७३ ग्रहणमोक्षणाभावेनाचलस्य परिच्छेद्यपर्यायात्मकपरद्रव्यविभागेन तत्प्रत्ययपरिच्छेदात्मक- स्वधर्माविभागेन चास्त्येकत्वम् । तथा नित्यप्रवृत्तपरिच्छेद्यद्रव्यालम्बनाभावेनानालम्बस्य परिच्छेद्यपरद्रव्यविभागेन तत्प्रत्ययपरिच्छेदात्मकस्वधर्माविभागेन चास्त्येकत्वम् । एवं शुद्ध आत्मा, चिन्मात्रशुद्धनयस्य तावन्मात्रनिरूपणात्मकत्वात् अयमेक एव च ध्र वत्वा- दुपलब्धव्यः किमन्यरध्वनीनाङ्गसंगच्छमानानेकमार्गपादपच्छायास्थानीयैरध्र वैः ।।१६२।। अथाध्र वत्वादात्मनोऽन्यन्नोपलभनीयमित्युपदिशति देहा वा दविणा वा सुहदुक्खा वाध सत्तुमित्तजणा । जीवस्स ण संति ध्रुवा धुवोवओगप्पगो अप्पा ॥१६३।। देहा वा द्रविणानि वा सुखदुःखे वाथ शत्रुमित्रजनाः । जीवस्य न सन्ति ध्रुवा ध्रुव उपयोगात्मक आत्मा ।।१६३।। पुनरपि किविशिष्टम् । अणालंवं स्वाधीनद्रव्यत्वेन मालम्बनं भारतावन्यमपि नमस्तपनाधीनपर- द्रव्यालम्बनरहितत्वेन निरालम्बनमित्यर्थः ।। १६२।। मथात्मनः पृथग्भूनं दहादिकमध्रुवत्वाचन भावनीयमित्याख्याति - ण संति धुवा ध्रुवा अविनश्वरा नित्या न नन्ति । कम्य । जीवस्स जीवस्य । भावार्थ :- आत्मा (१) ज्ञानात्मक, (२) वर्णनम्प, (३) इन्द्रियों के विना ही सवको जाननेवाला महा पदार्थ, (४) जेय-पर पर्यायोंका ग्रहण-त्याग न करनेगे अचल और (५) नेय-परद्रव्योंका आलम्बन न लेनेने निरालम्ब है; इसलिये वह एक। इसप्रकार एक होने से वह शुद्ध है । ऐसा शुद्रामा ध्र व होनेगे. यही एक उपलका करने योग्य है ।। १६२ ।। अब, ऐसा उपदेश देते हैं कि अघ्र बपने कारण प्रामा निकिक, मग कुछ भी उपलब्ध करने योग्य नहीं है :- गाथा १९३ अन्वयार्थ :- [देहाः दा शरीर, [विणानि वा अन्. मुदद [वा अथ] अथवा [शत्रुमित्रजनाः] शमित्रजन ( मा [ोग्य] अब [प्रपाः न सन्ति] ध्रव नहीं है: [प्रवः] 5.द तो [उपयोगाय: मामा उपयोगात्मक आत्मा है। लक्ष्मी, सरीर, सुख-दुःख जयवागत्र-मित्र जनो। जीदने नयी दाई प्रद, अव उपयोग-झामर ।।६।।

३७४ -प्रवचनसार- . युगपत्परिच्छित्तिसमर्थकेवलज्ञानदर्शनोपयोगात्मक इति । एवमध्रुवत्वं ज्ञात्वा ध्रुवस्वभावे स्वात्मनि [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान आत्मनो हि परद्रव्याविभागेन परद्रव्योपरज्यमानस्वधर्मविभागेन चाशुद्धत्व- निबन्धनं न किंचनाप्यन्यदसद्ध तुमत्त्वेनाद्यन्तवत्त्वात्परतः सिद्धत्वाच्च ध्रु वस्ति । ध्रुव उपयोगात्मा शुद्ध आत्मैव । अतोऽध्र वं शरीरादिकमुपलभ्यमानमपि नोपलभे, शुद्धात्मा- नमुपलभे ध्रुवम् ॥ १६३ ॥ अथैवं शुद्धात्मोपलम्भात्कि स्यादिति निरूपयति जो एवं जाणित्ता झादि परं अप्पगं विसुद्धप्पा । सागारोऽणागारो खवेदि सो मोहदुग्गठिं ॥ १६४॥ य एवं ज्ञात्वा ध्यायति परमात्मानं विशुद्धात्मा । साकारोऽनाकारः क्षपयति स मोहदुर्ग्रन्थिम् ।। १६४॥ के ते । देहा वा दविणा वा देहा वा द्रव्याणि वा, सर्वप्रकारशुचिभूताहेहरहितात्परमात्मनो विलक्षणा औदारिकादिपञ्चदेहास्तथैव च पञ्चेन्द्रियभोगोपभोगसाधकानि परद्रव्याणि च । न केवलं देहादयो ध्रुवा न भवन्ति, सुहदुक्खा वा निर्विकारपरमानन्दैकलक्षणस्वात्मोत्यसुखामृतविलक्षणानि सांसारिक- सुखदुःखानि वा । अध अहो भव्याः सत्तुमित्तजणा शत्रुमित्रादिभावरहितादात्मनो भिन्नाः शत्रुमित्रा- दिजनाश्च । यद्येतत् सर्वमध्रुवं तर्हि किं ध्रुवमिति चेत् । धुवो ध्रुवः शाश्वतः । स कः । अप्पा निजात्मा । किविशिष्टः । उवओगप्पगो त्रैलोक्योदरविवरतित्रिकालविषयसमस्तद्रव्यगुणपर्याय- भावना कर्तव्येति तात्पर्यम् ।। १६३ ।। एवमशुद्धनयादशुद्धात्मलाभो भवतीति कथनेन प्रथमगाथा । जो परद्रव्यसे अभिन्न होनेके कारण और परद्रव्यके द्वारा 'उपरक्त होनेवाले स्वधर्मसे भिन्न होनेके कारण आत्माको अशुद्धपनेका कारण है, ऐसा (आत्माके अतिरिक्त) दूसरा कोई भी ध्रुव नहीं है, क्योंकि वह 'असत् और हेतुमान् होनेसे आदि-अन्तवाला और परतःसिद्ध है; ध्रुव तो उपयोगात्मक शुद्ध आत्मा ही है। ऐसा होनेसे मैं उपलभ्यमान अध्रुव ऐसे शरीरादिको-वे उपलब्ध होने उपरक्त-मलिन; विकारी [परद्रव्यके निमित्तसे आत्माका स्वधर्म उपरक्त होता है ।] असत =अस्तित्व रहित (अनित्य); [धन-देहादिक पुद्गल पर्याय है, इसलिये असत् हैं, इसीलिये आदि- हेतुमान् सहेतुक; जिसकी उत्पत्तिमें कोई भी निमित्त हो ऐसा। [देह-यनादिकी उत्पत्तिमें कोई भी निमित्त होता है, इसलिये वे परतः सिद्ध हैं; स्वतः सिद्ध नहीं।] -आ जाणी, शुद्धात्मा वनी, ध्यावे परम निज आत्मने । साकार अण-आकार हो, ते मोहनथि क्षय करे ॥१४॥ टीका :- २ अन्तवाली हैं।

जैन शास्त्रमाला] -शेयतत्त्व-प्रज्ञापन- - ३७५ अमुना यथोदितेन विधिना शुद्धात्मानं ध्रुवमधिगच्छतस्तस्मिन्नेव प्रवृत्तः शुद्धात्मत्वं स्यात्। ततोऽनन्तशक्तिचिन्मात्रस्य परमस्यात्मन एकाग्रसंचेतनलक्षणं ध्यानं स्यात् । ततः सा- कारोपयुक्तस्यानाकारोपयुक्तस्य वाविशेषेणकाग्रचेतनप्रसिद्धरासंसारबद्धढतरमोहदुर्ग्रन्थे- रुद्ग्रथनं स्यात् । अतः शुद्धात्मोपलम्भस्य मोहग्रन्थि भेदः फलम् ।। १६४ ।। शुद्भनयाच्छुद्रात्मलाभो भवतीति कथनेन द्वितीया । ध्रुवत्वादात्मक भावनीय इति प्रतिपादनेन तृतीया । आत्मनोऽन्यदध्रुवं न भावनीयमिति कथनेन चतुर्थी चेति शुद्रात्मव्याख्यानमुन्यत्वेन प्रथमस्थले गाथाचतुष्टयं गतम् । अथवं पूर्वोक्तप्रकारेण शुत्रात्मोपन्नम्मे ननि कि फलं भवतीति प्रश्ने प्रत्युत्तरमाह - झादि ध्यायति जो यः कर्ता । काम् । अप्पगं निजात्मानम् । कथंभूतम् । परं परमानन्त- जानादिगुणाधारत्वात्परमुत्कृष्टम् । कि कृत्वा पूर्वम् । एवं जाणित्ता एवं पूर्वोक्तप्रकारेण स्वात्मो- पलम्भलक्षणस्वसंवेदनजानेन ज्ञात्वा । कथंभूतः सन् ध्यायनि । विमुद्धप्पा व्यानिपूजालाभादिसमस्त- मनोरथजालरहितत्वेन विशुद्धात्मा चन् । पुनरपि कथभूतः सागरोणागारो नागागेनागार: । अथवा साकारानाकारः । महाकारेण विकल्पेन वर्तते नाकागेनानोपयोगः, अनाकाने निविकल्पो दर्शनोपयोग- स्ताभ्यां युक्तः साकारानाकारः । अथवा नाकार: सविकल्पो गृहन्या. अनाका निर्विकल्पमतपोधनः । अथवा सहाकारेण लिङ्गन चिह्नन बनते नाकारो यनिः, अनाका बाक्तिो गहन्यः । खवेदि सो मोहदुग्गठि य एवंगुणविशिष्ट: क्षपति स मोहग्रन्थिम् । मोह एव दुन्धि. मोहन्धिः शुद्धात्म- गचिप्रतिवन्धको दर्णनमोहस्तम् । स्थितमेनन् - आन्मोपनम्मन्य मोहनन्धिविनाम एव ननः पर भी - उपलब्ध नहीं करता, और ध्र व ऐसे गुद्वात्माको उपलब्ध करता हूँ ॥१६॥ इसप्रकार शुद्धात्माकी उपलब्धिसे यया होना है वह अब निम्पण की है :- गाथा १९४ -- अन्वयार्थ : [यः] जो [एवं ज्ञात्वा ऐसा जानकार [fagaरमा निमामा होता हुआ [परमात्मानं] परम आत्मावा [ध्यायति ] मानता. :- [साकारः अनाकारः] साकार हो वा अनावार ! मोह रवि दुका [रयान] क्षय करता है। टोका :- इस यथोक्त विधिके द्वारा जो शुक्रामाशोना मी प्रवृत्तिके द्वारा शुद्धात्मत्व होता है । इसलिये अनन्तनिया मिस 'एकात्रसंचेतनलक्षण यान होता है: और इलिये (३ (सदियल्प) उपयोगदालेको बा अनाकार (निविन ना 'दिमयमा मा :: :: :: : पदा (वि. स.--. १ १ ज्ञेयज्ञायकस्वरूप सम्बन्ध टाला नहीं जासकता, इसलिये यह अशक्य है कि ज्ञेय ज्ञायकमें ज्ञात न हो, इसलिये {... समाप्ति सिद्धभूत निसातकोलितमजितसमायतितपनि Titffer पर्यायप्राग्भारमगावस्यमा गम्भीर गायति रामनं शेयज्ञायकलक्षणसंबन्धस्यानिया नामानिमामान पनि गालाति- ज्ञायकस्वभावेनेस्यरुप्य मनुजफन्तमाशार मनोज ति मोहेनाममा गणमान शुद्धात्मानमेष मोहमुत्तार यथास्थित प्रातिनि:: संपतियो । सामेल भवन चास्यवं दर्शनविशुद्धिमूलया सम्यग्ज्ञानोपयुक्ततपात्यन्तमगासापरतलासामोरपि साक्षात्सिद्धभूतस्य स्वात्मनस्तथाभूतानां परमात्मनां न नित्यमेत तोकपरागणवलक्षणो भावनमस्कारः ॥ २००॥ सन् । उद्विदो उपस्विनः परिणतः ।। निम्ममराम्गि समागमारामारहितलेन निर्ममत्वलक्षणे परमगाम्याभिगाने चोत रामनारित तत्परिणतानिजामामामाने नातथाहि - अहं तावत्केवलज्ञानदर्शनस्वभावलेन जायक मोतीर्णभातः । सातारा रातो गम न केवल स्वस्वाम्यादयः परद्रव्यसंबधान सन्ति । निनोन गशागारांनमो नास्ति । तत: कारणात्रामस्त- परद्रव्यममत्वरहितो भूत्वा परगसाम्गलक्षणे निजामनि तिष्ठानोति । किन 'उपरांपयामि सम्म इत्यादिस्वकीयप्रतिमा निर्वाहयन्स्यगमणि गोक्षमार्गपरिणति रवीकरोगेा यदुक्त गाथापातनिका- प्रारम्भे तेन किमुक्त भवति - ये तो प्रतिज्ञां गृहोला सिदि गतास्तरेत गा प्रतिज्ञा वस्तुवत्या नोता । कुन्दकुन्दाचार्यदेवः पुननिदर्शनाधिकारहयरूपग्रन्थसमाप्तिम्पेण रामाप्ति नीता, शिवकुमार. महाराजेन तु तद्ग्रन्थश्रवणेन च । कस्मादिति चेत् । ये मोशं गतारतेषां सा प्रतिज्ञा परिपूर्णा जाता, न च तेषाम् । कस्मात् । चरमदेहत्वाभावादिति ।। २०० ।। एवं शानदर्शनाधिकारसमाप्तिरूपेण चतुर्थस्थले गाथाद्वयं गतम् । प्रतिबिम्बित हुए हों, इसप्रकार - एक क्षणमें ही जो (शुद्धात्मा) प्रत्यक्ष करता है, 'ज्ञेयज्ञायकलक्षण संबंधकी अनिवार्यताके कारण ज्ञेय-ज्ञायकको भिन्न करना अशक्य होनेसे विश्वरूपता को प्राप्त होनेपर भी जो (शुद्धात्मा) सहज अनन्तशक्तिवाले ज्ञायकस्वभावके द्वारा एकरूपताको नहीं छोड़ता, जो अनादि संसारसे इसी स्थितिमें (ज्ञायक भावरूप ही) रहा है और जो मोहके द्वारा दूसरे रूपमें जाना – माना जाता है उस शुद्धात्माको यह मैं मोहको उखाड़ फेंककर, अतिनिष्कम्प रहता हुआ यथास्थित (जैसाका तैसा) ही प्राप्त करता हूँ। इसप्रकार दर्शनविशुद्धि जिसका मूल है ऐसी, सम्यग्ज्ञानमें उपयुक्तताके कारण अत्यन्त अव्याबाध (निर्विघ्न) लीनता होनेसे, साधु होने पर भी साक्षात् आत्मा मानों समस्त द्रव्यरूपताको प्राप्त होता है।

- जैन शास्त्रमाला]. -जेयतत्त्व-प्रजापन- ३८७ शालिनी छन्द जनं नानं जेयतत्त्वप्रणेतृ स्फोतं शब्दब्रह्म सम्यग्विगाह ।। संशुखात्मद्रव्यमात्रकवृत्त्या नित्यं युक्तं : स्थीयतेऽस्माभिरेवम् ॥ १० ॥ शालिनी छन्द नेयोकुर्वन्नञ्जसासोमविश्व जानीकुर्वन नेयमाक्रान्तभेदम् । आत्मीकुर्वन् जानमात्मान्यभासि स्फूर्जत्यात्मा ब्रह्म संपद्य सद्यः ॥११॥ एवं निजगुदात्मभावनाम्पमोक्षमार्गेण ये सिद्धि गना ये च तदासयकास्तेषां दनाधिकारा- पेक्षयावसानमङ्गलार्थ ग्रन्यापेक्षया मध्यमङ्गलार्थ च नत्पदाभिन्नापी भूत्वा नमस्कार करोनि- दसणसंमुद्धाणं सम्मण्णाणोबजोगजुत्ता। अव्वाबाधरदाणं णमो णमो मिदमारणं ।। *१४॥ णमो णमो नमो नमः । पुनः पुनर्नमस्वरोमोति भक्तिप्रवपं पनि । केन्यः । सिद्धसारण मिसाधुन्यः । सिद्धशब्दवाच्यस्वात्मोपलब्धिलक्षणालिदंन्यः, मायालयाच्यमोभमाधकानार्यो- पाध्यायसाधुभ्यः । पुनरपि कथंभूतेभ्यः । दसणसंमुखाणं मूत्रमादिपविनिमननमायन. मंझेभ्यः । पुनरपि कथंभूतेभ्यः । सम्मण्णाणोबजोगगुत्ताणं नमामियान, नम्मोलोग: गम्यग्नानोपयोगः, योगो निर्विकल्पसमाधिर्वीतराग पारिमित्यर्थः, नाम्यांना सामोरयोग- मुक्तारतेन्यः । पुनश्च विस्पेभ्य: । अध्यासापरवाणं गम्यमानादिमाग. तेभ्यश्च ।। १४॥ इति नगर कारगाधासहितरपन चटोर giri: मसान ऐसा यह निज आत्माको तथा तथाभूत (सिमभूत) परमात्माको ' मोना जिसका लक्षण है ऐसा भावनमस्कार सदा ती स्वयमेवी:cc [अब लोक द्वारा जिनेन्द्रोत्ता शब्दवहा को सम्यक अन्याममा पाल शाला अर्थ :-सप्रकार यतत्वको सगभानेवाले जैन साल्में - विदा -- सम्यक्तया अवगाहन करके (इसकी लगामर, महामि उनका निकालकर) हम मान लआरमद्रव्यरुप एकात्तिने (पारिलिने) नवान !! र गोमाग; भार :: ERATE] * .:: {e garTER! .

- इति श्रीजयसेनाचार्यकृतायां तात्पर्यवृत्ती 'तम्हा तस्स णमाई' इत्यादिपञ्चत्रिंशद्गाथापर्यन्तं ज्ञानरूप करता हुआ (अनेक प्रकारके ज्ञेयोंको ज्ञानमें जानता हुआ) और स्व-परप्रकाशक [अव श्लोक द्वारा, द्रव्य और चरणका संबंध बतलाकर, ज्ञेयतत्व -प्रज्ञापन नामक द्वितीयाधिकारकी और चरणानुयोगसूचक चूलिका नामक तृतीयाधिकारकी अर्थ :-चरण द्रव्यानुसार होता है और द्रव्य चरणानुसार होता है-इसप्रकारचे दोनों परस्पर अपेक्षासहित हैं। इसलिये या तो द्रव्यका आश्रय लेकर अथवा तो चरणका ३८८ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान वसन्ततिलका छन्द द्रव्यानुसारि चरणं चरणानुसारि द्रव्यं मिथो द्वयमिदं ननु सव्यपेक्षम् । तस्मान्मुमुक्षुरधिरोहतु मोक्षमार्ग द्रव्यं प्रतीत्य यदि वा चरणं प्रतीत्य ॥१२॥ एवं 'अत्थित्तणिच्छिदस्स हि' इत्याद्येकादशगाथापर्यन्तं शुभाशुभशुद्धोपयोगत्रयमुख्यत्वेन प्रथमो विशेपान्तराधिकारस्तदनन्तरं 'अपदेसो परमाणू पदेसमेत्तो य' इत्यादिगाथानवकपर्यन्तं पुद्गलाना परस्परवन्धमुख्यत्वेन द्वितीयो विशेषान्तराधिकारस्ततः परं 'अरसमरूव' इत्याद्यकोनविंशतिगाथापर्यन्तं जीवस्य पुद्गलकर्मणा सह बन्धमुख्यत्वेन तृतीयो विशेपान्तराधिकारस्ततश्च 'ण चयदि जो दु ममत्ति' इत्यादिद्वादशगाथापर्यन्तं विशेषभेदभावनाचूलिकाव्याख्यानरूपञ्चतुर्थो विशेषान्तराधिकार इत्येकाधिकपञ्चाशद्गाथाभिविशेषान्तराधिकारचतुष्टयेन विशेषभेदभावनाभिधानश्चतुर्थोऽन्तरा- धिकारः समाप्तः । सामान्यज्ञेयव्याख्यानं, तदनन्तरं 'दव्वं जीव' इत्यायेकोनविंशतिगाथापर्यन्तं जीवपुद्गलधर्मादिभेदेन विशेषज्ञेयव्याख्यानं, ततश्च 'सपदेसेहि समग्गो' इत्यादिगाथाष्टकपर्यन्त सामान्यभेदभावना, ततः परं [अव श्लोकके द्वारा मुक्तात्माके ज्ञानकी महिमा गाकर ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापनाधिकारकी पूर्णाहुति की जा रही है।] :- अर्थ :- आत्मा ब्रह्मको (परमात्मत्वको, सिद्धत्वको) शीघ्र प्राप्त करके, असीम (अनन्त) विश्वको शीघ्रतासे (एक समयमें) ज्ञेयरूप करता हुआ, भेदोंको प्राप्त ज्ञेयोंको ज्ञानको आत्मारूप करता हुआ, प्रगट-दैदीप्यमान होता है ।। ११ ।। संधि वतलाई जाती है ।] :- आश्रय लेकर मुमुक्षु (नानी, मुनि) मोक्षमार्गमें आरोहण करो।

जैन शास्त्रमाला] क्षेयतत्व-प्रज्ञापन ३८६ इति तत्त्वदीपिकायां प्रवचनसारवृत्ती श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां यतत्त्व- प्रज्ञापनो नाम द्वितीयः श्रुतस्कन्धः समाप्तः ।। २॥ 'अन्यित्तणिच्छिदस्त हि' इत्याघेकाधिकपञ्चागद्गायापर्यन्तं विशेषभेदभावना चेत्यन्तराधिकार- चतुष्टयेन प्रयोदशाधिकशतगाथाभिः सम्यग्दर्शनाधिकारनामा नेयाधिकारापरसंनो द्वितीयो महा- विकार:समाप्त: ॥२॥ इसप्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचायंदेव प्रणीत) श्री प्रवचनसार शास्त्रकी श्रीमदमृतचन्द्राचार्यदेवविरचित तत्वदीपिकानामक टोकाका यह 'जेयतत्त्व-प्रजापन' नामक द्वितीयश्रुतस्कंध (का भाषानुवाद) समाप्त हुआ।

चरणानुयोगसूचक चूलिका [उसमें, प्रथम श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव श्लोकके द्वारा अब इस-आगामी गाथाकी [अर्थ :- ] द्रव्यकी सिद्धि में चरणकी सिद्धि है, और चरणकी सिद्धिमें द्रव्यकी सिद्धि है - यह जानकर, कर्मोसे (शुभाशुभ भावों से) अविरत दूसरे भी, द्रव्यसे -३- अथ परेषां चरणानुयोगसूचिका चूलिका । द्रव्यस्य सिद्धौ चरणस्य सिद्धिः द्रव्यस्य सिद्धिश्चरणस्य सिद्धौ । बुद्ध्वेति कर्माविरताः परेऽपि द्रव्याविरुद्धं चरणं चरंतु ॥ १३ ॥ इति चरणाचरणे परान् प्रयोजयति कार्य प्रत्यत्रैव ग्रन्थः समाप्त इति ज्ञातव्यम् । कस्मादिति चेत् । 'उवसंपयामि सम्म' इति प्रतिज्ञासमाप्तेः। अतःपरं यथाक्रमेण सप्ताधिकनवतिगाथापर्यन्तं चूलिकारूपेण चारित्राधिकार व्याख्यानं प्रारभ्यते । तत्र तावदुत्सर्गरूपेण चारित्रस्य संक्षेपव्याख्यानम् । तदनन्तरमपवादरूपेण तस्यैव -३- चरणानुयोगसूचक चूलिका अव दूसरोंको चरणानुयोगकी सूचक 'चूलिका है । उत्थानिका करते हैं।] अविरुद्ध चरण (चारित्र) का आचरण करो। - इसप्रकार (श्रीमद् भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव इस आगामी गाथाके द्वारा) दूसरोंको चरण (चारित्र) के आचरण करनेमें युक्त करते (जोड़ते) हैं चुलिना जो शास्त्र में नहीं कहा गया है उसका व्याख्यान करना, अथवा कहे गये का विशेष व्याख्यान करना तत्र * इन्द्रवज्रा छन्दॐ TT दोनों पयायोग्य व्याख्यान करना । - % 3D जैन शास्त्रमाला] --चरणानुयोगसूचक तूलिका ३६१ 'एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदं धोदघाइकम्ममलं । पणमामि वडमाणं तित्यं धम्मस्त फत्तारं ।। सेसे पुण तित्ययरे ससव्वसिद्ध विसुद्धसम्भावे । समणे च णाणसणचरिततव. वीरियायारे ॥ ते ते सन्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तनं । वदामि य वट्टते अरहते माणुसे खेत्ते ।।' एवं पणमिय सिद्धे जिणवरवसहे पुणो पुणो समणे ॥ पडिवज्जदु सामण्णं जदि इच्छदि दुक्खपरिमोक्खं ॥ २०१।। एवं प्रणम्य सिद्धान् जिनवरवृषभान पुनः पुनः श्रमणान् । प्रतिपद्यतां श्रामण्यं यदीच्छति दुःखपरिमोक्षम् ॥ २०१।। चारित्रस्य विस्तव्याख्यानम् । ततश्च श्रामण्यापरनाममोक्षमार्गव्याख्यानम् । तदनन्तरं शुभोपयोग- व्याख्यानमित्यन्तराधिकारचतुष्टयं भवति । तत्रापि प्रथमान्तराधिकारे पद स्थानानि । ‘एवं पर्णामन्य सिद्धे' इत्यादिगाथासप्तकेन दीक्षाभिमुग्वपुरुषस्य दोक्षाविधानकथनमुन्यतया प्रथमस्थलम् । अतःपरं 'वदममिदिदिय' इत्यादि मूलगुणकथनरूपेण द्वितीयस्थले गाथाहयम् । तदनन्त गुव्यवस्थानापनार्थ निगरगहणे' इत्यादि एका गाथा, तथैव प्राचिनकथनमुग्यतया 'पयनम्हि इत्यादि गाथामिति समुदायेन नृतीयस्थले गाथात्रयम् । अथाचारादिशात्राधिनत्रमेण नपोधनस्य नक्षेपसमाचारकपना 'अधिवासे व' इत्यादि चतुर्थस्थले गाथात्रयम् । तदनन्तरं भावहिमाद्रव्यदिनानिहागाई अपयना वा चरिया' इत्यादि पध्वमस्थले मूत्रपटमित्येकविणनिगाथामिः धिमपन्न प्रमाधिकारे समुदायपातनिका । तद्यथा – अथासनभव्यजीवांचारित्रं नि - परिवजनिकला जीव गेनु । [अब गाथाके प्रारंभ करने से पूर्व उनकी नंधिक निश्री अमृतनमानादेवने पंच परमेष्ठीको नमस्कार करने के लिये निम्नप्रकारने मानन-न भिवानी प्रथम तीन गाथायें लिखी हैं :- "एस सुरासुरमसिदयंदिवंधोदयाराममा। पणमामि वहमाणं तित्थं पम्मम एमा ।। सेसे पुण तित्थयरे ससम्पनि मिला। समणे णाणदंसणचरिततीनियामा ।। ते ते सध्दे समगं समग पत्तगट एन । वंदामि य पट्टते अरस्ते मापने गेने ।। अब. रा अधिकारको गाया प्रारंभ करते हैं - मा. सोनी और सीमापार मेरोत प्रणमो सिह, जिनकपन दिने । प्रामणा अंगीत परो. अभिलाद जोन : !!

३६२ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यथा ममात्मना दुःखमोक्षार्थिना, 'किच्चा अरहताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं । अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेवि सव्वेसि ॥ तेसि विसुद्धदसणणाणपहाणासमं समासेज्ज । उवसंपयामि सम्म जत्तो णिव्वाणसंपत्ती ॥' इति अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधूनां प्रणतिवन्दनात्मकनमस्कारपुरःसरं विशुद्धदर्शनज्ञानप्रधानं साम्यनाम श्रामण्यमवान्तर- ग्रन्थसन्द भयसंभावितसौस्थित्यं स्वयं प्रतिपन्नं, परेषामात्मापि यदि दुःखमोक्षार्थी तथा किम् । सामण्णं श्रामण्यं चारित्रम् । यदि किम् । इच्छदि जदि दुक्खपरिमोक्खं यदि चेत् दुःखपरिमोक्ष- मिच्छति । स कः कर्ता । परेषामात्मा । कथं प्रतिपद्यताम् । एवं एवं पूर्वोक्तप्रकारेण 'एस सुरासुर- मणुसिंद' इत्यादिगाथापञ्चकेन पञ्चपरमेष्ठिनमस्कारं कृत्वा ममात्मना दुःखमोक्षार्थिनान्यः पूर्वोक्त- भव्यैर्वा यथा तच्चारित्रं प्रतिपन्न तथा प्रतिपद्यताम् । किं कृत्वा पूर्वम् । पणमिय प्रणम्य । कान् । सिद्धे अञ्जनपादुकादिसिद्धिविलक्षणस्वात्मोपलब्धिसिद्धिसमेतसिद्धान् । जिणवरवसहे सासादनादिक्षीण- कपायान्ता एकदेशजिना उच्यन्ते, शेपाश्चानागारकेवलिनो जिनवरा भण्यन्ते, तीर्थकरपरमदेवाश्च जिनवरवृपभा इति, तान् जिनवरवृषभान् । न केवलं तान् प्रणम्य, पुणो पुणो समणे चिञ्चमत्कारमात्र- निजात्मसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपनिश्चयरत्नत्रयाचरणप्रतिपादनसाधकत्वोद्यतान् श्रमणशब्दवा- च्यानाचार्योपाध्यायसाधूंश्च पुनः पुनः प्रणम्येति । किंच पूर्वं ग्रन्थप्रारम्भकाले साम्यमाश्रयामीति । गाथा २०१ अन्वयार्थ :- [यदि दुःखपरिमोक्षम् इच्छति] यदि दुःखोंसे परिमुक्त होनेकी (छुटकारा पानेकी) इच्छा हो तो, [एवं] पूर्वोक्त प्रकारसे (ज्ञानतत्व-प्रज्ञापनकी प्रथम तीन गाथाओंके अनुसार) [पुनः पुनः] वारंवार [सिद्धान् ] सिद्धोंको, [जिनवरवृषभान] जिनवरवृपभोंको (अर्हन्तोंको) तथा [श्रमणान् ] श्रमणोंको [प्रणम्य] प्रणाम करके, [श्रामण्यं प्रतिपद्यताम्] (जीव) श्रामण्यको अंगीकार करो। टोका :- जैसे दुःखोंसे मुक्त होनेके अर्थी मेरे आत्माने - "किच्चा अरहंताणं गिद्धाणं तह णमो गणहराणं । अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेव सवेसि ।। तेसिं विसुद्धदं- मणणाणपहाणासमं समासेज। उवसंपयामि सम्म जत्तो णिव्वाणसंपत्ती।" इसप्रकार अहंन्तों, मिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों तथा साधुओंको प्रणाम-वंदनात्मक नमस्कारपूर्वक 'विशुद्धदर्शनज्ञानप्रधान साम्यनामक श्रामण्यको - जिसका इस ग्रंथमें कहे हुए (ज्ञानतत्य प्रजापन और जयतत्वप्रज्ञापन नामक) दो अधिकारोंकी रचना द्वारा सुस्थितपन हुआ है बहान नवजापनरी चौथी और पांचवीं गाया है। ETE - बदनमा है। (विशेषके लिये देखो पृष्ठ ४ का फुटनोट) नामप्रधान दिन में विशुद्ध दर्शन और ज्ञान प्रधान है ऐसा। [माम्य नामक श्रामण्य में विगुन दर्शन - जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- तत्प्रतिपद्यताम् । यथानुभूतस्य तत्प्रतिपत्तिवर्मनः प्रणेतारो वयमिमे तिष्ठाम इति ।।२०१॥ अथ श्रमणो भवितुमिच्छन् पूर्व किं किं करोतीत्युपदिशति आपिच्छ बंधुवग्गं विमोचिदो गुरुकलत्तपुत्तेहिं । आसिज्ज णाणसणचरित्ततववीरियायारं ॥२०२।। आपृच्छ्य बन्धुवर्ग विमोचितो गुरुकलत्रपुत्रः । जानदर्शनचारित्रतपोवीर्याचारम् ।। २०२ ।। आसाद्य शिवकुमारमहाराजनामा प्रतिनां करोतीति भणितम्, इदानीं तु ममात्मना चारित्र प्रतिपन्नमिति पूर्वापरविरोधः । परिहारमाह - ग्रन्थप्रारम्भात्पूर्वमेव दीक्षा गृहोता निष्ठति, परं किंतु अन्यकरण- व्याजेन क्वाप्यात्मानं भावनापरिणतं दर्शयति, वापि शिवकुमारमहाराज. चाप्यन्यं भव्य जीवं बा। तेन कारणेनात्र ग्रन्थे पुम्पनियमो नास्ति, कालनियमो नास्तीत्यभिप्राय: ।।०१।। अथ धमजो भवितुमिच्छन्पूर्व क्षमितव्यं करोति - 'उबट्टिदो होदि सो नमो अन्यत्रं पाठगायायां यानानं तिष्ठति तन्मनलि धृत्वा पूर्व किं कृत्वा श्रमणो भविष्यतीनि व्याव्यानि - आपिच्छ आय पृष्ट्वा । यम् । बंधुवग्गं बन्धुवर्ग गोत्रम् । ततः कथंभूतो भवति । विमोनिदो विमोत्रिकान्यको भवति । वतुं भूनः । गुरपालत्तपुत्तेहि पितृमातृकानपुत्रः । पुनर्गय कि हल्ला धमनो विन। मानिन आसाद्य आश्रित्य । कम् । णाणदमणचरित्ततयबीरियाया जानानातिनीको नाममा अथ बिस्तर: - अहो बन्धुवर्गपितृमातृकन पुत्राः, मयं मनीयामा मानर्मातानिन स्वकीयचिदानन्यस्वभावं परमात्मानमेव नियमनानादिका विदः :: 77 चायति, तेन कारणेन मां मुश्चत यूयमिति क्षमितव्य नागेनि मा. उसे - स्वयं अंगीकार किया, उसीप्रकार दूसगेगा आमा गाने अर्थी (इच्छुका) हो तो, उसे अंगीकार गरे । उग (मामा) र जो 'यथानुभूत मार्ग है उसके प्रणेता रम बाप :: : अब, श्रमण होनेका इच्छुक पारले क्या-क्या नाम: गाथा २०२ अन्वयार्थ :- (प्रामण्याथी) (प्रामण्याची) [दाधुवनम् आमा [गुरपालपुनः विमोचितः] बोने. स्त्री और में मुम शानदार यामागमागा (1) भाम निया। बंधुजनोनी दिवाय लई, स्त्री-पुत्र-मादीलामी दी। एग-भाग-लप-दाग्नि दीवार मानवी :::: - ३६४ -पाननसार प्रवर्तमान आत्माओ! इस पुरुषका आत्मा किंचित्मात्र भी तुम्हारा नहीं है, - इसप्रकार [भगवान भोजन-सहान यो हि नाम श्रमणो भवितुमिन्यति स पूर्वमेव मार्गमायो. गुर कलापुरेन्य आत्मानं विमोचयति, ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्यानारमासीदति । तथाहि -- एवं बन्शुवर्ग- मापृच्छते, अहो इदंजनशरीरवन्धुवर्गतिन आत्मानः, अस्य जनस्य आत्मा न किननापि युष्माकं भवतीति निश्चयेन यूयं जानीत; तत आपृष्टा यूयं ; अयमात्मा अयोनिज्ञान- ज्योतिः आत्मानमेवात्मनोऽनादिबन्धुमुपसर्पति । अहो इदंजनशरीरजनकस्यात्मन्, अहो इदंजनशरीरजनन्या आत्मन्, अस्य जनस्यात्मा न युवाभ्यां जनितो भवतीति निश्चयेन निजात्मतत्त्वसर्वप्रकारोपादेयरुचिपरिमिछत्तिनिश्चलानुभूति समस्तपरदनानिवृत्तिलक्षणतपश्चरण- स्वशक्त्यनवगृहनवीर्याचाररूपं निश्चयपनानारमानारादिनरण गन्यकथिततत्साधकव्यवहारपत्राचार चाश्रयतीत्यर्थः । अत्र यद्गोत्रादिभिः सह क्षमितव्ययारणानं कृतं तबमातिप्रसंगनिषेधार्थम् । तर चारित्रतपोवीर्याचारम् आसाद्य] ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्रानार, तपाचार और वीर्याचारको अंगीकार करके टोका :- जो श्रमण होना चाहता है, वह पहले ही बंधुवर्गसे (सगेसंबंधियोंसे) विदा माँगता है, गुरुजनों (बड़ों) से, स्त्री और पुत्रोंसे अपनेको छुड़ाता है, ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचारको अंगीकार करता है। वह इस- प्रकार है :- बंधुवर्गसे इसप्रकार विदा लेता है :- अहो ! इस पुरुपके शरीरके बंधुवर्गमें तुम निश्चयसे जानो । इसलिये मैं तुमसे विदा लेता हूँ। जिसे ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज अपने आत्मारूपी अपने अनादिबंधुके पास जारहा है । अहो ! इस पुरुषके शरीरके जनक (पिता) के आत्मा ! अहो ! इस पुरुषके शरीरकी जननी (माता) के आत्मा ! इस पुरुषका आत्मा तुम्हारे द्वारा जनित (उत्पन्न) नहीं है, ऐसा तुम निश्चयसे जानो। इसलिये तुम इस आत्माको छोड़ो । जिसे ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज आत्मारूपी अपने अनादिजनकके पास जारहा है । अहो ! इस पुरुषके शरीरकी रमणी (स्त्री) के आत्मा आत्माको रमण नहीं कराता, ऐसा तू निश्चयसे जान । इसलिये तू इस आत्माको छोड़। जिसे ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज अपनी स्वानुभूतिरूपी अनादि-रमणीके पास जारहा है । अहो ! इस पुरुषके शरीरके पुत्र आत्मा ! तू इस पुरुषके आत्माका जन्य (उत्पन्न किया गया - पुत्र) नहीं है, ऐसा तू निश्चयसे जान । इसलिये तू इस तू इस पुरुषके जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- युवां जानीतं; तत इममात्मानं युवां विमुञ्चतं; अयमात्मा अद्योन्निनानज्योतिः आत्मानमेवात्मनोऽनादिजनकमुपसर्पति । अहो इदंजनशरीररमण्या आत्मन्, अस्य जन- स्यात्मानं न त्वं रमयसीति निश्चयेन त्वं जानीहि तत इममात्मानं विमुञ्च ; अयमात्मा अद्योगिननानज्योतिः स्वानुभूतिमेवात्मनोऽनादिरमणीमुपसर्पति । अहो इदंजनशरीरपुत्र- स्यात्मन, अस्य जनस्यात्मनो न त्वं जन्यो भवसीति निश्चयेन त्वं जानीहि; तत इम- मात्मानं विमुञ्च; अयमात्मा अघोद्भिन्नज्ञानज्योतिः आत्मानमेवात्मनोऽनादिजन्यमुप- सर्पति । एवं गुरुकलत्रपुत्रेन्य आत्मानं विमोचयति । तथा अहो कालविनयोपधानबहुमाना- निह्नवार्यव्यञ्जनत्तदुभयसंपन्नत्वलक्षणज्ञानाचार, न शुद्धस्यात्मनस्त्वमसीति निश्चयेन जानामि तथापि त्वां तावदासीदामि यावत्त्वत्प्रसादात् शुद्धमात्मानमुपलमे । अहो नियमो नास्ति । कथमिति चेत् । पूर्वकाले प्रचुरेण भरतसगरमपाण्डवादयो नजान एवं जिनदीक्षा गृहन्ति, तत्परिवारमध्ये यदा कोऽपि मिथ्याप्टिभंवति तदा धमन्योपसर्ग कगेतीति । यदि पुनः कोऽपि मन्यते गोत्रसम्मतं कृत्वा पश्चात्तपञ्चरणं करोमि तस्य प्ररेण कारणमेव नास्ति. कथर्माण आत्माको छोड़ । जिसे जानज्योति प्रगट हुई है ऐसा यह आत्मा आज आमाली याने अनादि जन्यके पास जारहा है । - इसप्रकार बड़ोंसे, स्त्रीने और पुत्रने अपने को छुड़ाता है। (यहाँ ऐसा समभाना चाहिये कि जो जीव मुनि होना बाना बगे सर्वप्रकार से विरक्त ही होता है । इसलिये युटुम्बकी नामनिया नियम नहीं है । इसप्रकार युटुम्बके भरोसे रहने पर नो, यदि पनि नहीं दे तो मुनि ही नहीं हुआ जासवेगा । मप्रकार धारण करनेका नियम न होने पर भी, तुरट जोको मुटुम्बको समभानेकी भावनासे पूर्वोत्त प्रकारने सुनकर, कुटुम्बमें यदि कोई अल्पसानी जीवीको अब निम्न प्रकारले पंचाचारको अंगीकार माना: (जियप्रकार धुपगंग विदा ली. मालेको प्रकार - जो काल, दिन, पान. मान, नि::::: पानासार! निशाने जात. म. मीका ܃ ܃ - ततो हि श्रामण्यायों प्रणतो: ... पानामानामा विरतिप्रवृत्तिसमानात्मरूपमामय गा पा मारणानारमा गुणाढ्य, सकललौकिकजननिःशयोगको मोतियोजितनाब कुलविशिष्ट, अन्तरङ्गशुद्धरूपानुमापारिजागा निशि, गंगामायणात- कुलरूपवयोभिविशिष्यवार मनोम्।ि दाम्।। गणपति निव- परमात्मतत्वभावनासमिनिन माना। मणि tour: मामाभागला. साधकदीक्षादायक मानार्थम् । तं पिपणदोन समानामाभिfr. Tणोनि मानिने रूपेण । पडिच्छ मं हे भगवन्. अनन्तमालाननगुणा राणा जनाले माभाग भावसहितजिनदोक्षायाः प्रदानेन प्रसादेन मां परो । मिगुहिलो न केवल प्रणतो गाथा २०३ अन्वयार्थ :- [श्रमणं ] जो श्रमण है, [गुणाल्य] गुणाटर है, [कुलरूपवयो विशिष्टं ] कुल, रूप तथा वयसे विशिष्ट है, और [श्रमणः इष्टतरं] श्रमणोंको अति इष्ट है [तम् अपि गणिनं] ऐसे गणीको [माम् प्रतीच्छ पति] 'मुझे स्वीकार करो ऐसा कहकर [प्रणतः] प्रणत होता है (प्रणाम करता है) [च] और [अनुग्रहीतः] अनुगृहीत होता है। टीका :- पश्चात् श्रामण्यार्थी प्रणत और अनुगृहीत होता है । वह इसप्रकार है कि आचरण करने में और आचरण करानेमें आनेवाली समस्त विरतिकी प्रवृत्तिके 'समान आत्मरूप - ऐसे श्रामण्यपनेके कारण जो 'श्रमण' है; ऐसे श्रामण्यका आचरण करनेमें और आचरण करानेमें प्रवीण होनेसे जो 'गुणाढ्य' है ; सर्व लोकिक जनोंके द्वारा निःशंकतया सेवा करने योग्य होनेसे और कुलक्रमागत (कुलक्रमसे उतर आनेवाले) क्रूरतादि दोषोंसे रहित होनेसे जो 'कुलविशिष्ट है; अंतरंग शुद्धरूपका अनुमान करानेवाला बहिरंग शुद्धरूप होनेसे जो 'रूपविशिष्ट' है, बालकत्व और वृद्धत्वसे होनेवाली 'बुद्धिविक्लवताका अभाव होनेसे तथा 'यौवनोद्रेकको विक्रियासे रहित बुद्धि होनेसे जो 'वयविशिष्ट' है; और यथोक्त श्रामण्यका आचरण करने तथा आचरण कराने सम्बन्धी 'पौरुषेय दोषोंको समान तुल्य, बरावर, एकसा, मिलता हुआ। [विरतिकी प्रवृत्तिके तुल्य आत्माका रूप अर्थात् विरतिकी प्रवृत्तिसे मिलती हुई - समान आत्मदशा सो धामण्य है ।] २ विक्लवता अस्थिरता; विकलता। 3 यौवनोद्रेक-यौवनका जोश, यौवनकी अतिशयता। ४ पौरपेय-मनुप्यके लिये संभक्ति ।

जन शास्त्रमाला --चरणानुयोगसूचक चूलिका--- बुद्धिविक्लवत्वाभावाद्यौवनोद्रेकविक्रियाविविक्तबुद्धित्वाच क्योविशिष्ट, निःशेपितयथोक्त- श्रामण्याचरणाचारणविषयपौरुषेयदोषत्वेन मुमुक्षुभिरन्युपगततरत्वात् श्रमगरिष्टतरं च गणिनं शुद्धात्मतत्त्वोपलम्भसाधकमाचार्य शुद्धात्मतत्त्वोपलम्भसिद्धया मामनुगृहाणेत्युपतर्पन प्रणतो भवति । एवमियं ते शुद्धात्मतत्त्वोपलम्भसिद्धिरिति तेन प्रार्थितार्थेन संयुज्यमानो- ऽनुगृहीतो भवति ।।२०३ ।। अथातोऽपि कीदृशो भवतीत्युपदिशति - पाहं होमि परसिं ण मे परे पत्थि मज्वमिह किंचि । इदि णिच्छिदो जिदिदो जादो जधजादरुवघरो ।। २०४ ।। नाहं भवामि परेषां न मे परे नास्ति ममेह किंचित् । इति निश्चितो जितेन्द्रियः जातो यथाजातरूपधरः ।। २०४ ।। भवति, तेनाचार्येणानुगृहीतः स्वीकृतश्च भवति । हे भव्य, निम्मानमारे कुर्नभवोधि प्राप्त निजणुद्धात्मभावनारूपया निश्चयचतुर्विधाराधनया मनुष्यजन्म सफल कुरियनेन प्रकारेशानुगृहीतो भवतीत्यर्थः ।।२०३।। अथ गुरुणा स्वीकृतः सन् कीणों भवतीविनि - पाहं होमि परेसि नाई निःशेषतया नष्ट कर देनेसे मुमुक्षुओंके द्वारा (प्रायश्चित्तादिके लिये) जिनका बहाश्रम लिया जाता है इसलिये जो 'श्रमणोंको अतिष्ट' है, ऐसे गणी के निकट - यामतत्यती उपलब्धिके साधक आचार्यके निकट - 'गुहारमतत्वको मतिर मिलिने मुझे अनुगृहीत करो' ऐसा कहकर (श्रामण्यार्थी) जाता हलाला मारा तुझे शुद्धात्मतत्वकी उपलब्धिरूप सिद्धि' ऐगा (काका) र ग (न श्रामण्यार्थी) 'प्राथित अर्थसे संयुक्त किया जाना : 15.21 पश्चात् वह कसा होता है, सो उपदेण काय :- - . : - गाथा २०४ अन्वयार्थ :- [अहं] [परेषां] दूसरोमा नाम [ पर मेरे नहीं हइस लोक में [मम मा पनि नति नहीं । - [इति निश्वितः] ऐसा निश्चयवान् गर जिकिर [रधागातर पपर:] यथाजातरुपयर (नागापन गरा प्रतिमा मांगी गया। परनो नई, पर ऐन मुज, मारोई ! -कोरीत निश्चित ने जिले कापा: । hrad ४०२ -प्रवचनसार- - और फिर, आत्माके यथाजातरूपधरपने से दूर किया गया जो अयथाजातरूप- होते हैं ऐसे जो (१) ममत्वके और 'कर्मप्रक्रमके परिणाम, (२) शुभाशुभ उपरक्त उपयोग और 'तत्पूर्वक तथाविध योगकी अशुद्धिसे युक्तता तथा (३) परद्रव्यसे [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान आत्मनो हि तावदात्मना यथोदितक्रमेण यथाजातरूपधरस्य जातस्यायथाजातरूप- धरत्वप्रत्ययानां मोहरागद्वषादिभावानां भवत्येवाभावः, तदभावात्त तद्भावभाविनो निवसनभूषणधारणस्य मूर्धजव्यञ्जनपालनस्य सकिंचनत्वस्य सावद्ययोगयुक्तत्वस्य शरीर- संस्कारकरणत्वस्य चाभावाद्यथाजातरूपत्वमुत्पाटितकेशश्मश्रुत्वं शुद्धत्वं हिंसादिरहितत्वम- प्रतिकर्मत्वं च भवत्येव, तदेतबहिरंग लिंगम् । तथात्मनो यथाजातरूपधरत्वापसारिता. ज्योतिविलक्षणा वाह्यद्रव्ये ममत्वबुद्धिमूर्छा भण्यते, मनोवाक्कायव्यापाररहितचिञ्चमत्कारप्रतिपक्षभूत आरम्भो व्यापारस्ताभ्यां मूरिम्भाभ्यां विमुक्त मूर्छारम्भविमुक्तम् । जुत्तं उवजोगजोगसुद्धीहि निर्विकारस्वसंवेदनलक्षण उपयोगः, निर्विकल्पसमाधिर्योगः, तयोरुपयोगयोगयोः शुद्धिरुपयोगयोग- शुद्धिस्तया युक्तम् । ण परावेखं निर्मलानुभूतिपरिणतेः परस्य परद्रव्यस्यापेक्षया रहितं,न परापेक्षम् । टीका :- प्रथम तो अपनेसे, यथोक्तक्रमसे 'यथाजातरूपधर हुए आत्माके अयथाजातरूपधरपनेके कारणभूत मोहरागद्वेषादिभावोंका अभाव होता ही है; और उनके अभावके कारण, जो कि उनके सद्भावमें होते हैं ऐसे (१) वस्त्राभूषणका धारण (२) सिर और डाढ़ी-मूछोंके वालोंका रक्षण, (३) सकिंचनत्व, (४) सावद्ययोगसे युक्तता तथा (५) शारीरिक संस्कारका करना, इन (पांचों) का अभाव होता है। जिससे (उस आत्माके) (१) जन्मसमयके रूप जैसा रूप, (२) सिर और डाढ़ी-मूछके वालोंका लोंच, (३) शुद्धत्व, (४) हिंसादिरहितता तथा (५) अप्रतिकर्मत्व (शारीरिक शृगार-संस्कारका अभाव) होता ही है । इसलिये यह बहिरंग लिंग है । धरपना, उसके कारणभूत मोहरागद्वेषादिभावोंका अभाव होनेसे ही जो उनके सद्भावमें २ ( सापेक्षता; इस (तीनों) का अभाव होता है। इसलिये (उस आत्माके) (१) मूर्छा और आरम्भसे रहितता, (२) उपयोग और योगकी शुद्धिसे युक्तता तथा (३) परकी अपेक्षासे रहितता होती ही है । इसलिये यह अंतरंग लिंग है ॥२०५ - २०६।। २ यथाजातरूपधर- (आत्माका) सहजरूप धारण करनेवाला । अयथाजातरूपधर-(आत्माका) भसहजरूप धारण करनेवाला । 3 किचन निम पास कुछ भी (परिग्रह) हो ऐसा । । कर्मप्रकमकामको अपने ऊपर लेना; काममें युक्त होना, कामकी व्यवस्था । ५ तत्यवंक = परन (मलिन) उपयोगपूर्वक ।

४०३ जन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- यथाजातस्पधरत्वप्रत्ययमोहराग पादिभावानामभावादेव तद्भावभाविनो ममत्वकर्म- प्रक्रमपरिणामस्य शुभाशुभोपरत्तोपयोगतत्पूर्वकतथाविधयोगाशुद्धियुक्तत्वस्य परद्रव्य- सापेक्षत्वस्य चाभावान्मारम्भवियूक्तत्वमुपयोगयोगशुद्धियुक्तत्वमपरापेक्षत्वं च भवत्येव, तदेतदन्तरंग लिंगम् ।। २०५ । २०६॥ अर्थतदुभलिंगमादायतदेतत्कृत्वा च श्रमणो भवतीति भवतिक्रियावां बन्धुवर्ग- प्रच्छन क्रियादिशेपसकलक्रियाणां चंककत कत्वमुद्योतयत्रियता प्रामण्यप्रतिपत्तिर्भवतीत्युप- विपति- आदाय तं पि लिंगं गुरुणा परमेण तं गमंसित्ता। सोच्चा सवदं किरियं उवहिदो होदि सो समणो । २०७।। आदाय तदपि लिगं गुरुणा परमेण तं नमस्कृत्य । श्रुत्या सव्रतां क्रियामुपस्थितो भवति स प्रमणः ।। २०७॥ अघुणम्भवपारणं पुनर्भवविनाशकाबामपरिणामाधिपानभंवर मोक्ष मनन. कारणम् । जेण्हं जिनम्य गंबन्धी जिनेन प्रोन या जैनम् । एवं पवित्रा निम्। निगं भावनियमिति । निद्रव्यविमानन !!:::::: निमादाय पूर्व भाविनंगमनयन यमुना पाचामा किसानी को गया श्रमणी भवतीत्याग्याति -- आटाय नं पि लिगं माना होगा । गाथंभूतम् । नामिनि प्रियाध्याहारः। मेन बाम । गुफा प. अब (श्रामण्यार्थी) इन दोनों निगोंगो नारी होला -मप्रकार मलिनियाग, संगने का ? प्रियाओंका एक ना दिखना प गर्न ( हानी है, सा उपदे पाने :- N गाथा २० दियार्थ :- [परगेण गुरणा परम गुरदार : लिगोगो [आदाय ] मामा करणे. [ नगरल्य ही मालिका नाम साईना: ६ -- मूल परमगुरु महन्तदेव तथा उत्तरपरमगुरु दीक्षाचायंके प्रति अत्यन्त आराध्यभावके कारण आराध्य परमगुरु ४०४ गनगनार और आराधक ऐसे निजका भेद अस्त होजाता है। भाव्य और भावकके अर्थके लिये देखो पृष्ठ ८ का पाद टिप्पण । *इसका स्पष्टीकरण प्रथमकी ५ गाथाओंके टिप्पण पत्र में देखिये। 3 भावस्तुतिवन्दनामय-भावस्तुतिमय और भाववन्दनामय । ४ समयमें (आत्मद्रव्यमें, निजद्रव्यस्वभावमें) परिणमित होना सो सामायिक है। [भगोदर ततोऽपि श्रमणो भवितुमिचयन लिंग तगादत्ते गुग नगमति, प्रक्रिये शृणोति, अथोपतिष्ठते; उपस्थितश्च पर्याप्तश्रामण्यसामयीक यमणो भवति । तयाहि - तत इवं यथाजातरूपधरत्वस्य गमकं बहिरंगमन्तरंगमपि लिगं प्रथममेन गुरुणा परमेणाहंदट्टार- केण तदात्वे च दोक्षाचार्येण तदादानविधानप्रतिपादकत्येन व्यवहारतो दीयमानत्वाइस- मादानक्रियया संभाव्य तन्मयो भवति । ततो भाव्यभावकभावप्रत्तेतरेतरसंचलनप्रत्यस्त- रूपेणार्हद्भट्टारकेण, दीक्षाकाले तु दीक्षागुमणा । लिगणानसारं न मंरिता तं गुरु नमस्कृत्य, सोच्चा तदनन्तरं श्रुत्वा । काम् । किरियं हियो नहत्प्रति मणाम् । किनिमिष्टाम् । रावदं समता व्रतारोपणसहिताम् । उढिदो ततश्लोपस्थितः स्वस्तः सन् होदि सो समणो स पूर्वोक्तस्तपोधन इदानी श्रमणो भवतीति । इतो विस्तर:- पूर्वोक्तलिजाय राहणानन्तरं पूर्वोत्तपमानारमाश्रयति, श्रुत्वा] व्रत सहित क्रियाको सुनकर [उपस्थितः] उपस्थित (आत्माके समीप स्थित) होता हुआ [सः] वह [श्रमणः भवति ] श्रमण होता है । टोका :- तत्पश्चात् श्रमण होनेका इच्छुक दोनों लिंगोंको ग्रहण करता है, गुरुको नमस्कार करता है, व्रत तथा क्रियाको सुनता है और उपस्थित होता है ; उपस्थित होता हुआ श्रामण्यकी सामग्री पर्याप्त (परिपूर्ण) होनेसे श्रमण होता है । वह इसप्रकार- परम गुरु - प्रथम ही अर्हतभट्टारक और उस समय (दीक्षाकालमें) दीक्षाचार्य - इस यथाजातरूपधरत्वके सूचक वहिरंग तथा अंतरंग लिंगके ग्रहणकी-विधिके प्रतिपादक होनेसे, व्यवहारसे उस लिंगके देनेवाले हैं । इसप्रकार उनके द्वारा दिये गये उन लिंगोंको ग्रहण क्रियाके द्वारा संभावित-सम्मानित करके (श्रामण्यार्थी) तन्मय होता है। और फिर जिन्होंने सर्वस्व दिया है ऐसे 'मूल और उत्तर परमगुरुको, 'भाव्यभावकताके कारण प्रवर्तित *इतरेतरमिलनके कारण जिसमेंसे स्व-परका विभाग अस्त होगया है ऐसी नमस्कार क्रियाके द्वारा संभावित करके-सम्मानित करके 'भावस्तुति वन्दनामय होता है । पश्चात सर्व सावद्ययोगके प्रत्याख्यानस्वरूप एक महाव्रतको सुननेरूप श्रुतज्ञानके द्वारा समयमें परिणमित होते हुए आत्माको जानता हुआ सामायिकमें आरूढ़ होता है । पश्चात २ - जैन शास्त्रमाता]] ~चरणानुयोगसूचक चूलिका- मितस्वपरविभागत्वेन दत्तसर्वस्वमूलोत्तर परमगुरुनमस्क्रियया संभाव्य भावस्तववन्दना- मयो भवति । ततः सर्वसावद्ययोगप्रत्यास्यानलक्षणकमहाव्रतश्रवणात्मना श्रुतजानेन समये भवन्तमात्मानं जानन् सामायिकमधिरोहति । ततः प्रतिक्रमणालोचनप्रत्याख्यानलक्षण- क्रियाश्रवणात्मना श्रुतज्ञानेन कालिककर्मन्यो विविच्यमानमात्मानं जानन्नतीतप्रत्युत्पन्ना- नुपस्थितकायवाड मनःकर्मविविक्तत्वमधिरोहति । ततः समस्तावकर्मायतनं कायमुत्सृज्य यथाजातरूपं स्वरूपमेकमेकाणालम्ब्य व्यवतिष्ठमान उपस्थितो भवति उपस्थितस्तु सर्वत्र समदृप्टित्वात्साक्षाच्छमणो भवति ।। २०७ ।। अथाविच्छिन्नसामायिकाधिस्ढोऽपि श्रमणः कदाचिच्छेदोपस्थापनमहंतीत्युपदिशति. वदसमिदिदियरोधो लोचावस्सयमचेलमण्हाणं । खिदिसयणमदंतवणं ठिदिभोयणमेगभत्तं च ॥२०॥ ततश्चानन्तनानादिगुणम्मरणरूपेण भावनमस्कारेण तव तणनियाकन कानमा च गुरु नमकरोनि । ततः परं ममम्नभाणमनिणानिनि कालिमान परमसामायिकन्नतमागेहति स्त्रीयागेति । मनोबचनवायः तयाग्निानुनको समस्तणुभाशुभवामन्यो भिन्ना निजगुलामपरिणविलक्षणा माग त्रिक भण्यते । तागेपणानन्न तां च शृणोनि । नो निमाधिक मामा भवति । ततश्चेवं परिपूर्णश्रमणगामन्यां मन्यां पनि :: :: :. दीक्षाभिमुन्वपुगपग्य दीक्षाविधानमाथामायन्यन प्राय : गामायिकगंयमे यदा न्युनो भवति नवा मनिवास ... ....." 'प्रतित्रामण-आलोचना-प्रत्यारयान-घर पनिया :; वार्मो से विवित्त (भिन्न) निये जाने वाला माना जाता मन-वचन-वायसंबंधी काँसे चिविताता (भिसा) यावर कविः आयतनशून कायका उ. राग (? एवायो एकाग्रतया अवलम्बित करने का... तोता हुआ, रायंन समष्टिगने का मामा :::: अधिक सामाचिका में आराहोने की मान्य, का दमक . है . - -प्रवचनसार- अन्वयार्थ :- [व्रतसमितीन्द्रियरोधः] व्रत, समिति, इन्द्रियरोध, [लोचावश्यकम्] प्रगटताएँ) होनेसे हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहकी विरतिस्वरूप पांच प्रकारके व्रत तथा उसकी 'परिकरभूत पाँच प्रकारकी समिति, पांच प्रकारका इन्द्रिय- . परिकर अनुमरण करनेवाला समुदाय; अनुचरसमूह; [समिति, इन्द्रियरोध, इत्यादि गुण पांच प्रतापी नहि स्नान-दातण, अंक भोजन, भूशयन, स्थितिभोजनं ॥ २० ॥ ४०६ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान एदे खलु मूलगुणा समणाणं जिणवरेंहिंपण्णत्ता । तेसु पमत्तो समणो छेदोवट्ठावगो होदि ॥२०६॥ [जुग्मं] व्रतसमितीन्द्रियरोधो लोचावश्यकमचेलमस्नानम् । क्षितिशयनमदन्तधावनं स्थितिभोजनमेकभक्त च ॥ २०८॥ एते खलु मूलगुणाः श्रमणानां जिनवरैः प्रज्ञप्ताः । तेषु प्रमत्तः श्रमणः छेदोपस्थापको भवति ॥ २०६॥ [युग्मम्] वदसमिदिदियरोधो व्रतानि च समितयश्चेन्द्रियरोधश्च व्रतसमितीन्द्रियरोधः । लोचावस्मयं लोचञ्चा- वश्यकानि च लोचावश्यकं, "समाहारस्यैकवचनम्" । अचेलमण्हाणं खिदिसयणमदंतवणं ठिदिभोयण मेगभत्तं च अचेलकास्नानक्षितिशयनादन्तधावनस्थितिभोजनकभक्तानि । एदे खलु मूलगुणा समणाग जिणवरेहि पण्णत्ता एते खलु स्फुटं अष्टाविंशतिमूलगुणाः श्रमणानां जिनवरैः प्रज्ञप्ताः । तेसु पमत्तो समणो छेदोवट्ठावगो होदि तेपु मूलगुणेषु यदा प्रमत्तः च्युतो भवति । सः कः । श्रमणस्तपोधनस्तदाकाले छेदोपस्थापको भवति । छेदे व्रतखण्डने सति पुनरप्युपस्थापकश्छेदोपस्थापक इति । तथाहि - निश्चयेन गाथा २०८-२०९ लोच, आवश्यक, [अचेलम् ] अचेलपना, [अस्नानं] अस्नान, [क्षितिशयनम् ] भूमिशयन, [अदंतधावनं] अदंतधावन, [स्थितिभोजनम् ] खड़े-खड़े भोजन, [च] और [एकभक्त] एकवार आहार - [एते] ये [खलु] वास्तवमें [श्रमणानां मूलगुणाः] श्रमणों के मूलगुण [जिनवरैः प्रज्ञप्ताः] जिनवरोंने कहे हैं; [तेषु] उनमें [प्रमत्तः] प्रमत्त होता हुआ [श्रमणः] श्रमण [छेदोपस्थापकः भवति] छेदोपस्थापक होता है । टीका :- सर्व सावद्ययोगके. प्रत्याख्यानस्वरूप एक महाव्रतकी व्यक्तियाँ (विशेष, पछि होते ही है, इमलिये समिति इत्यादि गुण पांच व्रतोंका परिकर अर्थात् अनुचर समूह है] । व्रत, समिति, लुंचन, आवश्यक, अणचेल, इन्द्रियरोधनं, । -आ मूलगुण श्रमणो तणा जिनदेवथी प्रज्ञप्त छ । तेमां प्रमत्त थतां श्रमण छेदोपस्थापक थाय छ । २०६ ।।

४०७ जन शास्त्रमाला]] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- सर्वसावद्ययोगप्रत्याख्यानलक्षणेकमहाव्रतव्यक्तिवशेन हिसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रह- विरत्यात्मकं पञ्चतयं व्रतं, तत्परिकरच पञ्चतयो समितिः पञ्चतय इन्द्रियरोधो लोच: पट्तयमावश्यकमचेलक्यमस्नानं क्षितिशयनमदन्तधावनं स्थितिभोजनमेकमत एते निर्विकल्पसामायिकसंयमविकल्पत्वात् श्रमणानां मूलगुणा एव । तेषु यदा निर्विकल्प- सामायिकसंयमाधिस्तत्वेनानन्यस्तविकल्पत्वात्प्रमाति तवा केवलकल्याणमात्रायिनः कुण्डलवलयांगुलीयादिपरिग्रहः किल श्रेयान, न पुनः सबंया कल्याणलाम एवेति संप्रचार्य विकल्पनात्मानमुपस्थापयन् छेदोपस्थापको भवति ॥ २० । २०६॥ अथास्य प्रवज्यादायक इव छेदोपस्थापकः परोऽप्यन्तीत्याबायंविकल्पप्रज्ञापनहारे. णोपदिशति - मूलमात्मा, नग्य केवलनानाद्यनन्नगुणा मूलगुणान्तं च निर्वियममाधि काममामाविकाभिमानेन नियंकरतेन मोमबीजभूतेन माने जाने गति न प्रकामा ! ने आरोन नमावि मूलगुणव्यनिकारणत्वात् निश्चयमूनगुणो भनि । प्रा निर्विकास कार जीवस्तदा यथा कोऽपि नुवर्णार्थी पुगपः सुवर्णमलभमानानन्त वि बीन गर्वथा त्यागं करोति ; नथायं जीवोऽपि निश्चयमलगुणभियान गृहनि । छेदे गन्युपग्यापनं छोपरथापनम् । अत्रका बैन करना गंक्षपण पन्द्रमहारतम् भनि । नेपांवमानांचा गुणभेदा भवन्ति । तेषां च मूलगुणानां ना ? चरित्रगदुत्तरगुणा भन्नि । नयां न क्षणार्थ :- प्रेक्षाभायनादयानन्यभिप्राय: ।। २०८: ।। ::":"

वाली (हठ रहित) ईर्या-भाषादि संबन्धी शुभ परिणति वह व्यवहारसमिति है । [जहाँ शुद्धात्मस्वरूपमें सम्यक् - परिणतिरूप दशा नहीं होती वहां शुभ परिणति हठ सहित होती है। वह शुभपरिणति व्यवहारसमिति भी 3 अशुद्धोपयोगके बिना अप्रयत आचार कभी नहीं होता, इसलिये जिसके अप्रयत आचार वर्तता है उसके भशुद्ध ४१८ 127 अशुद्धोपयोगोऽन्तरंगोटः परपोतो तिरंगः । शेराद्धा तदसद्धावे वा तदविनाभाविनाप्रयतामा पनि योगमाय गुनिश्चित हिंसाभावप्रसिद्धेः, तथा तदिनाभाविना प्रमाला प्रतिगोगाम हातपरस्य परप्राणव्यपरोपसद्धावेऽपि बनाप्रसिद्ध गा निश्चित हिसाभारगिसोपानरंग एप हिसारूपेण द्विवियोमानाति - मरद ग जिाद न जोतो, मानाय fferenा मिना वा जोवतु वा जीन:, प्रगल हिममा निधामा fr; नीर मरणे या निर्विकारस्वयित्तिलक्षणालाना निमामिमा भवति । पयदस्स पत्यि यंधो बालागारपालामा नास्ति। केन मेरोण सामानेण । वैठने, खड़े होने, चलने इत्यादिमें अप्रगत आमरण होता वही निगमसे अशुद्धोपयोग तो होता ही है, इसलिये अप्रगत आनरण व ही है, हिसा ही है ।। २१६ ।। छेदके अन्तरंग और बहिरंग ऐसे दो प्रकार बतलाते हैं :- गाथा २१७ अन्वयार्थः- [जीवः ]जीव [म्रियतां वा जीवतु वा] मरे या जिये, [अयताचारस्य] अप्रयत आचारवालेके [हिंसा] (अंतरंग) हिंसा [निश्चिता] निश्चित है; [प्रयतस्य समितस्य] 'प्रयतके, 'समितिवान्के [हिंसामात्रेण] (बहिरंग) हिंसामाग्रसे [बन्धः] बंध [नास्ति] नहीं है। अशुद्धोपयोग अंतरंग छेद है; परप्राणोंका व्यपरोप (विच्छेद) वह बहि- रंगछेद है। इनमें से अन्तरंग छेद ही विशेष बलवान है, बहिरंग छेद नहीं; परप्राणोंके व्यपरोपका सद्भाव हो या असद्भाव, जो अशुद्धोपयोगके बिना नहीं होता ऐसे 'अप्रयत आचारसे प्रसिद्ध होनेवाला (जाननेमें आनेवाला) अशुद्धोपयोगका सद्भाव प्रयत-प्रयत्नशील, सावधान, संयमी [प्रयत्नके अर्थ के लिये देखो गाथा २११ का फुटनोट ।] शुद्धात्मस्वरूपमें (मुनित्वोचित) सम्यक् 'इति' अर्थात् परिणति वह निश्चय समिति है । और उस दशा में होने नहीं है ।] अब, टीका :- क्योंकि - २ - ४१६ जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- छेदो बलीयान् न पुनर्वहिरंगः । एवमप्यन्तरंगच्छेदायतनमात्रत्वाहिरंगच्छेदोऽन्युप- गम्येतंव ।। २१७ ॥ अय सर्वथान्तरंगच्छेदः प्रतिपेध्य उत्युपदिशति - कायंभूनस्य पुरुषस्य । समिदस्म समितस्य शुभारमस्वन्ने नांगतो गन: परिणत: ममिततम्य ममिनम्ध, व्यवहारेणाविषद्रमितियुनम्म ३ । अयमत्राथ; - स्वम्भावनानिनवप्राणन विनासकारणभृता नगाणिनितिमहिना भरते, नगापनदिनानिमित्तभूतः परजीवघालो हामहिमति द्विधा हिमा मातम्या । किनु विशेष:-हिङ्गाहमा मन्तवा ना भवन. स्वस्थभावना- पनि प्राणघाने मार निमहिमा नियमेन मनोति । नत: बाराव मुनि ||१|| अन्य तमेवार्थ हटान्तवान्निाभ्यां दृति - उन्नानिम्हि पाए नियामिदम्म निगमायाए । आयाधेज्ज पुन्निगं मरिज जोगमाज ।। १५ ।। जिनके पाया जाता है, उसके हिलाके मदभावकी निति निमिन है और उनकार जो अशुद्धोपयोगके बिना होता है, ऐसे 'वन आत्रा गित होनेवाला आलोयोगका अगदभाव जिनके पाया जाता है उसके. पाणोंके अगं नाक में भी की अनिटि होनेने, हिमाय अभावी प्रनिति निकिन गरी ( अंगरंग छेद ही विशेष बलवान वहिगीर अनन्ग द्रवका आयनन मात्र, लिग (::: पाहिये अर्थात उसे मानना ही चाहिये । लोपयोगगा नाम: और पुराने प्राणोंका कि !! - ; .... जीद मायानगर जिरो. : गहिया होतीस... ri गमे, परम: :: : र... मोगमा निरनी हो नीता ।। ६५ ।। २. सास- भावार्थ :- . है में

४२०
-प्रवचनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
अयदाचारो समणो छस्सु वि कायेसु वधकरोत्ति मदो।
चरदि जदं जदि णिच्चं कमलं व जले णिरुवलेवो ॥२१८।।
अयताचारः श्रमणः षट्स्वपि कायेषु वधकर इति मतः ।
चरति यतं यदि नित्यं कमलमिव जले निरुपलेपः ।। २१८ ।।
।
ण हि तस्स तणिमित्तो बंधो सुहुनो य देसिदो समये ।
मुच्छा परिग्गहो चिय अज्झप्पपमाणदो दिट्ठो ॥ *१६ ॥ (जुम्म)
उच्चालियम्हि पाए उत्क्षिप्ते चालिते सति पादे । कस्य । इरियासमिदस्स ईर्यासमितितपो-
धनस्य । क्व । णिग्गमत्थाए विवक्षितस्थानानिर्गमस्थाने । आबाघेज्ज आवाध्येत पीडयत । स कः।
कुलिगं सूक्ष्मजन्तुः । न केवलमावाध्येत, मरिज्ज म्रियतां वा। किं कृत्वा। तं जोगमासेज्ज तं
पूर्वोक्त पादयोगं पादसंघट्टनमाश्रित्य प्राप्येति । ण हि तस्स तणिमित्तो बंधो सुहुमो य देसिदो
समये न हि तस्य तन्निमित्तो बन्धः सूक्ष्मोऽपि देशितः समये; तस्य तपोधनस्य तन्निमित्तो सूक्ष्म-
जन्तुघातनिमित्तो बन्धः सूक्ष्मोऽपि स्तोकोऽपि नैव दृष्टः समये परमागमे । दृष्टान्तमाह-मुच्छा परिग्गहो
च्चिय मूर्छा परिग्रहश्चैव अन्झप्पपमाणदो दिवो अध्यात्मप्रमाणतो दृष्ट इति । अयमत्रार्थः - मूळ
परिग्रहः' इति सूत्रे यथाध्यात्मानुसारेण मूर्छारूपरागादिपरिणामानुसारेण परिग्रहो भवति, न च
वहिरङ्गपरिग्रहानुसारेण; तथात्र सूक्ष्मजन्तुधातेऽपि यावतांशेन स्वस्थभावचलनरूपा रागादिपरिणति-
गाथा २१८
अन्वयार्थ :-
[अयताचारः श्रमणः] अप्रयत आचारवाला श्रमण [षट्सु अपि
कायेषु] छहों काय संबंधी [वधकरः] वधका करनेवाला [इति मतः] माननेमें-कहने में
आया है; [यदि] यदि [नित्यं] सदा [यतं चरति] प्रयतरूपसे आचरण करे तो
[जले कमलम् इव] जलमें कमल की भांति [निरुपलेपः] निर्लेप कहा गया है ।
टीका :- जो अशुद्धोपयोगके विना नहीं होता ऐसे अप्रयत आचारके द्वारा
(ज्ञात) होनेवाला अशुद्धोपयोगका सद्भाव हिंसक ही है, क्योंकि छहकायके प्राणोंके
व्यपरोपके आश्रयसे होनेवाले बंधकी. प्रसिद्धि है; और जो अशुद्धोपयोगके बिना होता
है ऐसे प्रयत आचारसे प्रसिद्ध होनेवाला अशुद्धोपयोगका असद्भाव अहिंसक ही है,
क्योंकि परके आश्रयसे होनेवाले लेशमात्र भी बंधका अभाव होनेसे जलमें झूलते हुए
कमलकी भांति निर्लेपताकी प्रसिद्धि है । इसलिये उन-उन सर्वप्रकारसे अशुद्धोपयोगरूप
प्रसिद्ध
मुनि यत्नहीन आचारवंत छ कायनो हिंसक कह्यो ।
जलकमलवन निर्लेप भाख्यो, नित्य यत्नसहित जो ॥ २१८ ॥

- जैन भास्त्रमाला वरणानुयोगसूत्रक वृलिका- यतस्तदविनाभाविना अप्रयतावारत्वेन प्रसिद्धचदशुद्धोपयोगसद्भावः पटकायप्राण- व्यपरोपप्रत्ययवन्धप्रमिया हिलक एब स्यात् । यतश्च तहिनाभाविना प्रयतावारत्वेन प्रसिद्धचदगुद्धोपयोगासद्भावः परप्रत्ययवन्धलेशस्याप्यभावाजलदुतंतितं কৃমিৰ निरुपलेपत्वप्रसिद्ध हिंसक एव स्यात् । ततस्ततः सर्वः प्रकारशुद्रोपयोगरूपोऽन्तरगच्छेदः प्रतिषेध्यो यस्तदायतनमात्र भूतः परप्राणच्यपरोपम्पो बहिरङ्गच्छेदो दूरादेव प्रतिपिङ्गः स्यात् ।। २१८ ॥ अयंकान्तिकान्तरंगच्छेदत्वादुपधिस्तत्प्रतिपय इत्युपदिति - हवदि व ण हवदि वंधो मदम्हि जीवेऽध कायचेम्हि । बंधो इदि समणा छड्डिया सव्वं ॥ २१६ ॥ भवति वा न भवति बन्यो मृते जोत्र कायचेष्टायाम् । बन्धो ऽवमुपरिनि प्रमणान्यनारन्तः मन ॥२१॥ नक्षण भावहिमा नायनांगेन उन्धो भवति, न न पादनमा ::. पणिनिलक्षणभावहिमा नास्ति । नम: कारणामबाप मा.:-::- उनमन्द्रः सर्वथा प्रतिषेध्य युनिर्माण - स्यामागे तिलायन भयनाचार: प्रयागतः । चक: । मो. नागे निमदो पदावपि भाग बधागे हिमापार :::: : ::::: नाथं । यथा भनि जदं यतं यमप, दि. ग.::--:'rmatiry. पन्नेको चामलमय जने निरपलेप ग RTE- - . :::::::: परिणामपुरम: पाजीवल लोच. पप nehy ::- ...... ! ....." नास्ति । नत: नागारमात्मभायम 2................. ध्रुवसुवधीदो ܇ ܀ अन्तरंग द निपंय - गागरे यार,.... परमाणपोपप गि भावार्थ :- मायोमे प्रयास कोर प्रयन-भादान मोदी ::: ."-:-... ...... का पानी दिया--- का समगना । 1 हम पिया सही और भारत में : तहमा ४२२ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान - । यथा हि कायव्यापारपूर्वकस्य परप्राणव्यपरोपस्याशुद्धोपयोगसद्भावासद्भावान्याम- नैकान्तिकबन्धत्वेन छेदत्वमनैकान्तिकमिष्टं, न खलु तथोपधेः, तस्य सर्वथा तदविनाभा- वित्वप्रसिद्धयदैकान्तिकाशुद्धोपयोगसद्धावस्यकान्तिकबन्धत्वेन छेदत्वमैकान्तिकमेव । अत अथ बहिरङ्गजीवघाते बन्धो भवति, न भवति वा, परिग्रहे सति नियमेन भवतीति प्रतिपादयति हवदि व ण हवदि बंधो भवति वा न भवति बन्धः। कस्मिन्सति । मदम्हि जीवे मृते सत्यन्यजीवे । अध अहो । कस्यां सत्याम् । कायचेटुम्हि कायचेप्टायाम् । तहि कथं बन्धो भवति । बंधो धुवमुवधोदो बन्धो भवति ध्र वं निश्चितम् । कस्मात् । उपधेः परिग्रहात्सकाशात् । इदि इति हेतोः समणा छड्डिया सव्वं श्रमणा महाश्रमणाः सर्वज्ञाः पूर्व दीक्षाकाले शुद्धबुद्धकस्वभावं निजात्मानमेव परिग्रह कृत्वा, शेषं समस्तं बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहं छदितवन्तस्त्यक्तवन्तः । एवं ज्ञात्वा शेपतपोधनैरपि निजपर- मात्मपरिग्रह स्वीकारं कृत्वा, शेषः सर्वोऽपि परिग्रहो मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च त्यजनीय अब, उपधि (परिग्रह) को ऐकान्तिक अन्तरंग-छेदत्व होनेसे उपधि अन्तरंग छेद- की भाँति त्याज्य है, ऐसा उपदेश करते हैं :- गाथा २१९ अन्वयार्थ :- [अथ] अब (उपधिके संबंधमें ऐसा है कि), [कायचेष्टायाम्] कायचेष्टापूर्वक [जीवे मृते] जीवके मरने पर [बन्धः] बंध [भवति] होता है [वा] अथवा [न भवति] नहीं होता; [उपधेः] (किन्तु) उपधिसे-परिग्रहसे [ध्रुवम् बंधः] निश्चय ही बंध होता है; [इति] इसलिये [श्रमणाः] श्रमणों (अर्हन्तदेवों) ने [सर्व] सर्व परिग्रहको [त्यक्तवन्तः] छोड़ा है । टीका :- जैसे कायव्यापारपूर्वक परप्राणव्यपरोपको अशुद्धोपयोगके सद्भाव और असद्भावके द्वारा अनेकांतिक बंधरूप होनेसे उसे (कायव्यापारपूर्वक परप्राणव्यपरोपको) छेदपना 'अनैकांतिक माना गया है, वैसा उपधि-परिग्रह का नहीं है। परिग्रह सर्वथा अशुद्धोपयोगके बिना नहीं होता, ऐसा जो परिग्रहका सर्वथा अशुद्धोपयोगके साथ अवि- नाभावित्व है उससे प्रसिद्ध होनेवाले 'ऐकान्तिक अशुद्धोपयोगके सद्भावके कारण परिग्रह तो ऐकान्तिक बंधरूप है, इसलिये उसे (परिग्रहको) छेदपना ऐकान्तिक ही है । इसीलिये भगवन्त अर्हन्तोंने – परम श्रमणोंने – स्वयं ही पहले ही सर्व परिग्रहको छोड़ा है; और इसीलिये दूसरोंको भी, अन्तरंग छेदकी भांति प्रथम ही सर्व परिग्रह छोड़ने योग्य है, क्योंकि वह (परिग्रह) अन्तरंग छेदके बिना नहीं होता । . बनेकान्तिक अनिश्चित; नियमरूप न हो; ऐकांतिक न हो। २ ऐकान्तिक निश्चित; अवश्यंभावी; नियमरूप ।

संन शास्त्रमाला] ~~वरणानुयोगदक चूलिका--- ४२३ एव भगवन्तोऽहंन्तः परमाः श्रमणाः स्वयमेत्र प्रागेव सर्वमेवोपधि प्रतिषिद्धवन्तः। अत एव चापरंरप्यन्तरङ्गच्छेवदत्तनान्तरीयकत्वात्मागेव सर्व एवोपधिः प्रतिपेयः ।। २१६ ।। वक्तव्यमेव किल यत्तदोषमुक्त मेतावतंव यदि चेतयतेत्र कोऽपि । व्यामोहजालमतिदुस्तरमेव ननं नितनस्य वचसामतिविस्तरेऽपि ।।१४।। पति । अत्रेदमून भवति - पृवचनमानमत्राण गणादिग्जिाममनिमहिना मानिने भनि नियमेन वन्धी भनि । परजीवनात पुनर्मति वा नभनीति नियमोनाम्नि पन्द्रह सालमा मुच्छांपरिहण 7 नियमेन भवनि 18 II भावदियानदेन पाने भावार्थ :- अशुद्धोपयोगका अमदभाव ही, नापि कायकी बलनवलनादि दिया होनेने परजीवोंके प्राणोंका चान होजाना है। जिले के बाद के घालने बंध होनेका नियम नहीं है; - अशुद्धोपयोग मात्र होनेवाले काले दान परप्राणोंके पानगे तो बंद होता है, और आगोरी अम्मार होने का पूर्वक परप्राणोंके घालरी बंध नहीं होता; इनकार पानगे बंधवा होना अनेकान्तिक होने के का 17 नहीं है। जंगे भावये बिना भी प्राणीका प्रात: :::::::: समापि परिग्रहका ग्राण को गाय, गाय - ता है. वह अणदीपयोगका सदमा :::::::::::::::: ना कालिया-निधित-नियम होनही परम श्रमण जग और आगोको भी 15. समोर नाम :: :: : r] :- :- ओ :::::: 40. म ३ .

४२४
IITTER
अथान्तरजनपदप्रतिष एवागमुनिपति
ण हि णिरवेक्खो चागो ण हदि भितरस आतविगदी ।
अविसुद्धस्स य चित्ते कहं णु कम्मापओ विहिदो ॥ २२० ॥
न हि निरपेक्षरत्यागो न भवति भिभोराशयगिन्तिः ।
अविशुन्द्रस्य च निते करं नु कर्मशागो विहितः ।। २२० ।
गाथापट्कं गतम् । इति पूर्वोक्त रमेण पाणिमितिमायाभिः पोलो मर्ग-
चारित्रव्याख्याननामा प्रथमोऽन्तराभिशार: समानः । जागरं नारि देशालाममंगम
रूपेणापवादव्याख्यानार्थ पाठप मेण जिदगा शामितियोगिता प्रायसे । ता नारि
स्थलानि भवन्ति । तस्मिन्प्रथमस्थले निर्गगोमालामाले : गिलो नागो'
इत्यादि गाथापकम् । अन टीकागां गायागं नास्ति । तदनन्तरं मांगात्मा गानलक्षणगामाणिक,
संयमासमर्थानां यतीनां संयमशीनजानोपकरणनिमित्त मागागागागलेन को जेण ण निजदि
इत्यादि सूत्रत्रयम् । तदनन्तरं स्त्रीनिर्वाणनिराकरणमानलेला नदि ण हि लोग इत्यादोकादश
गाथा भवन्ति । ताश्चामतचन्द्रटीकायां न सन्ति । ततः परं क्षारांगमारागर्थस्य तपोधनस्य
देशकालापेक्षया किंचित्संयमसाधकशरीरस्य निर लगातारादिराकारितारणं ग्राममिति पुनरप्यपवाद
विशेपव्याख्यानमुख्यत्वेन 'उवयरणं जिणमग्गे' इत्याकादशगाथा भवन्ति । अटीकायां गाथाचतुष्टयं
नास्ति । एवं मूलसूत्राभिप्रायेण प्रिंशद्गाथाभिः, टीकापेक्षा पुनदिशगाधाभिः द्वितीयान्तराधिकारे
समुदायपातनिका । तथाहि-अथ भावशुद्धिपूर्वकबहिरणपरिग्रहपरित्यागे कृते राति अभ्यन्तरपरिगह-
परित्यागः कृत एव भवतीति निर्दिशति-हिणिरक्खो चागो न हि निरपेक्षस्त्यागः यदि नेव
परिग्रहत्यागः सर्वथा निरपेक्षो न भवति किंतु किमपि वस्त्रपामादिक ग्रामिति भवता भण्यते,
तहि
हे शिष्य ण हवदि भिक्खुस्स आसयविसुद्धी न भवति भिक्षाराशयविशुद्धिः, तदा सापेक्षपरिणामे सति
अब, इस उपधि (परिग्रह) का निषेध वह अंतरंग छेदका ही निषेध है, ऐसा
उपदेश करते हैं :-
गाथा २२०
भवति]
अन्वयार्थ :- [निरपेक्षः त्यागः न हि] यदि निरपेक्ष (किसी भी वस्तुकी अपेक्षा
रहित) त्याग न हो तो [भिक्षोः] भिक्षुके [आशयविशुद्धिः]भावकी विशुद्धि [न
नहीं होती; [च] और [चित्ते अविशुद्धस्य] जो भावमें अविशुद्ध है उसके [कर्मक्षयः]
कर्मक्षय [कथं नु] कैसे [विहितः] हो सकता है ?
निरपेक्ष त्याग न होय तो नहि भावशुद्धि भिक्षुने ।
ने भावमां अविशुद्धने क्षय कर्मनो कइ रीत वने ॥ २२० ॥

४२५ जन शास्त्रमाला --चरणानुयोगसूचक पूलिका- न खलु बहिरङ्गसंगसद्भावे तुषसद्भावे तण्डलगताशुद्धत्वस्येवाशुद्धोपयोगरूपस्यान्त- रङ्गच्छेदस्य प्रतिषेधः, तनावे च न शुद्धोपयोगमूलस्य कंवल्यस्योपतम्भः । अतोऽशुद्धो. पयोगरूपस्यान्तरंगच्छेदस्य प्रतिषेधं प्रयोजनमपेभ्योपविधीयमानः प्रतिपेयोऽन्तरंगच्छेद- प्रतिषेध एव स्यात् ।। २२० ।। अयंकान्तिकान्तरंगच्छेदत्वमुपविस्तरेणोपदिशति- किध तम्हि पत्यि मुच्छा आरंभो वा असंजमो तस्स । तध परदव्वम्मि रदो कधमप्पाणं पसाधयदि ॥२२१ ॥ कथं तम्मिन्नास्ति मूर्छा आरम्भो वा असंयमस्तस्य । तथा परद्रव्ये क्यमात्मानं प्रसाध्यति ॥२२१ ।। रतः भिक्षीरतपोधनम्य चित्तशुद्धिनं भवति । मनिहाय हि दिन क तपोधनग्य चिने मनमि दि, स्फुटं यहं तु कम्माओ विडियो को दिन किने कथमपि । अनेनंतकुन भति-यथा वहिपमा मनकाममा जति नथा विद्यमाने वा बहिरमपरिग्रहाभिन्ना कि निमन शुद्ध गि पुनविशिष्ट्यंगग्यवंयपरिग्रहत्यागो भनि नाबिर fm. न न भवति ।।२०।। अथ नमव परिग्रन्यागत गेण्डदिव नपर भायणनिय नि। जद मी प्रगानंबो हटाना , बन्थयार निमायणमा . विजनटि पाणामी print art-1 गेणा विणा घोषा int, irr: पतं मला. पी . टीपा:- जग चिलगो, गदगा : अगमताका त्याग (ना, गा), ... .. आगजोपयोगर र अंगना वल्य (गाय) f..: योगरा. नि:: भानेपामा :: भागापमान - Fr परापर :- (२) उपधि संबंधी 'कर्मप्रक्रमके परिणाम जिसका लक्षण है ऐसा आरम्भ, अथवा (३) शुद्धात्मस्वरूपकी हिंसारूप परिणाम जिसका लक्षण है ऐसा असंयम अवश्यमेव होता ही है; तथा उपधि जिसका द्वितीय हो (अर्थात् आत्मासे अन्य ऐसा परिग्रह जिसने ग्रहण किया हो) उसके परद्रव्य में रतपना (-लीनता) होनेके कारण शुद्धात्मद्रव्यकी साथ- -प्रवचनसार- ४२६ । [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान उपधिसद्भावे हि ममत्वपरिणामलक्षणाया मूर्छायास्तद्विषयकर्मप्रक्रमपरिणाम- लक्षणस्यारम्भस्य शुद्धात्मरूपहिसनपरिणामलक्षणस्यासंयमस्य वावश्यंभावित्वात्तथोपधि- गेण्हदि व चेलखंडं गृह्णाति वा चेलखण्डं वस्त्रखण्ड, भायणं भिक्षाभाजनं वा अत्थि त्ति भणिदं अस्तीति भणितमास्ते । क्व । इह सुत्ते इह विवक्षितागमसूत्रे जदि यदि चेत् । सो चत्तालंबो हवदि कहें निरालम्बनपरमात्मतत्त्वभावनाशून्यः सन् स पुरुपो बहिर्द्रव्यालम्बनरहितः कथं भवति, न कथमपि ; वा अणारंभो निःक्रियनिरारम्भनिजात्मतत्त्वभावनारहितत्वेन निरारम्भो वा कथं भवति, किंतु सारम्भ एव; इति प्रथमगाथा। वत्यक्खंडं दुद्दियभायणं वस्त्रखण्डं दुग्धिकाभाजनं अण्णं च गेहदि अन्यच्च गृह्णाति कम्बलमृदुशयनादिकं यदि चेत् । तदा किं भवति । णियदं विज्जदि पाणारंभो निजशुद्धचैतन्यलक्षणप्राणविनाशरूपो परजीवप्राणविनाशरूपो वा नियत निश्चितं प्राणारम्भः प्राणवघो विद्यते, न केवलं प्राणारम्भः, विक्खेवो तस्स चित्तम्मि अविक्षिप्तचित्तपरमयोगरहितस्य सपरिग्रह- पुरुषस्य विक्षेपस्तस्य विद्यते चित्ते मनसीति । इति द्वितीयगाथा। गेण्हइ स्वशुद्धात्मग्रहणशून्यः सन् गृह्णाति किमपि वहिर्द्रव्यं ; विधुणइ कर्मधूलि विहाय बहिरङ्गधूलि विधूनोति विनाशयति; धोवई निर्मलपरमात्मतत्त्वमलजनकरागादिमलं विहाय बहिरङ्गमलं धौति प्रक्षालयति; सोसेइ जदं तु खित्ता निर्विकल्पध्यानातपेन संसारनदीशोषणमकुर्वन् शोषयति शुष्कं करोति यतं तु यत्नपरं तु यया भवति । किं कृत्वा । आतपे निक्षिप्य । किं तत् । पत्तं व चेलखंडं पात्रं वस्त्रखण्डं वा। निर्भयशुद्धात्मतत्त्वभावनाशून्यः सन् विभेति भयं करोति । कस्मात्सकाशात् । परदो य परतश्चौरादेः । पालयदि परमात्मभावनां न पालयन्न रक्षन्परद्रव्यं किमपि पालयतीति तृतीयगाथा ॥ *१७-१६ ॥ अब, 'उपधि वह ऐकान्तिक अन्तरंग छेद है' ऐसा विस्तारसे उपदेश करते हैं " . आदवे बिभेदि - गाथा २२१ अन्वयार्थ :- [तस्मिन् ] उपधिके सद्भावमें [तस्य] उस (भिक्षु) के [मूळ] मूर्छा, [आरम्भः] आरंभ [वा] या [असंयमः] असंयम [नास्ति] न हो [कथं] यह कैसे हो सकता है ? (कदापि नहीं हो सकता), [तथा] तथा [परद्रव्ये रतः] जो पर द्रव्यमें रत हो वह [आत्मानं] आत्माको [क] कैसे प्रसाधयति] साध सकता है ? टीका :- उपधिक सद्भावमें, (१) ममत्व परिणाम जिसका लक्षण है ऐसी मूर्दा, ? कताका अभाव होता है; इससे उपधिके ऐकान्तिक अन्तरंग छेदपना निश्चित होता ही है। 'म = काममे युक्त होना; कामको व्यवस्था ।

देय जंन मास्त्रमाला -चरणानुयोगसूत्रक चूलिका- हितोयल्य परद्रव्यरतत्वेन शुद्धात्मद्रव्यप्रसाधरुत्वाभावानु ऐकान्तिकान्तरंगच्छेदत्वमुपधेर- बघायंत एव । इदमत्र तात्पर्यमेवंविधत्वमुपधेरवधार्थ न सर्वथा संन्यन्तव्यः ।। २२१ ।। कस्यचित्ववचित्कदाचित्कयंत्रित्कभित्रुधिरप्रतिपिलोऽप्यन्तीत्यपादमुप- दिशति छेदो जेण ण विज्जदि गहणविसन्गेलु सेवमाणस्त । समणो तेणिह बट्टदु कालं वित्तं विद्याणित्ता ।। २२२ ।। छेदो येन न विद्यते ग्रहणविमर्ग' मेवमानस्य । श्रमणस्तेनेह वर्तता कालं क्षेत्रं विजाय ।। २२२ ।। - अघ नपरिग्रहग्य नियमेन चिनजनंनोति विकारान-निट हिनदि मुना समन्वहिनविच मन्याम्परिणबिना मृी नथ कारबाट का कारिक्षनपुर । आरंभो वा मनीयचनका निमार्गहनामलावटी बिमदग्न्येव ; अगंजमो नम गुवामानुनिधिमणामी काम : गपरिग्रहग्य । परम्यग्मियो नव निमम :: ::: गपरिग्रहगार: बाथ मान्मान प्रमाञयान, नम: ।। -: सम्बोधनार्थ निग्रन्थ मोडमार्गग्यापन या प्रकार : पंजायमान्यभाये गन्यायमणीमानापम::: ::: ::'" . . यहां यह तात्पर्य है कि - पत्रि. (2... सा निश्चित करके उसे गधा छोमा :: ' : किसी वः कती कमी किसी CATE ... यादका उपदण गारत अब, अपयार्थ :- गाबिसगा]. विरजन नगन बार TEE कबिरा कहा, लेगी। का निवर. मा: राणे सर्ग - - - ४३४ -प्रवचनसार- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान व्यञ्जकदर्शनादिपर्यायतत्परिणतपुरुषविनीतताभिप्रायप्रवर्तकचित्तपुद्गलाश्च भवन्ति । लिंगम्हि य इत्योणं थणंतरे णाहिकक्खपदेसेसु स्त्रीणां लिङ्ग योनिप्रदेशे, स्तनान्तरे. नाभिप्रदेशे, कक्षप्रदेशे च, भणिदो सुहुमुप्पादो एतेषु स्थानेषु सूक्ष्ममनुष्यादिजीवोत्पादो भणितः । एते पूर्वोक्तदोषाः पुरुषाणां किं न भवन्तीति चेत् । एवं न वक्तव्यं, स्त्रीपु बाहुल्येन भवन्ति । न चास्तित्व मात्रेण समानत्वम् । एकस्य विषकणिकास्ति, द्वितीयस्य च विपपर्वतोऽस्ति, कि समानत्वं भवति । किंतु पुरुषाणां प्रथमसंहननवलेन दोपविनाशको मुक्तियोग्यविशेषसंयमोऽस्ति । तासि कह संजमो होति ततः कारणात्तासां कथं संयमो भवतीति ।। *२६ ।। अथ स्त्रीणां तद्भवमुक्तियोग्यां सकलकर्मनिर्जरा निघयति- दि दंसणेण सुद्धा सुत्तज्झयणेण चावि संजुता। घोरं चरदि व चरियं इत्थिस्स ण णिज्जरा भणिदा ॥२७॥ दि दंसणेण सुद्धा यद्यपि दर्शनेन सम्यक्त्वेन शुद्धा, सुत्तज्झयणे चावि संजुता एकादशा मपाध्ययनेनापि संयुक्ता, घोरं चरदि व चरियं घोरं पक्षोपवासमासोपवासादि चरति या चारि. इत्विास नगिज्जरा भणिदा तथापि स्त्रीजनस्य तद्भवकर्मक्षययोग्या सकलनिर्जरा न भणितेति भागः। किन यथा प्रथममंहननाभावात्स्त्री सप्तमनरकं न गच्छति, तथा निर्वाणमपि । "पुवेदं वेदंता पुरिसाजे गगरिमारता । सेसोदयेण वि तहा झाणुवजुत्ता य ते दु सिझति" इति गाथाकथितार्याभिप्राय भायात्रीणां नवं निर्वाणमिति चेत् । तास भावस्त्रीणां प्रथमसंहननमस्ति, द्रव्यस्त्रीवेदाभावात मानामनिकाली कामोदेकोऽपि नास्ति । द्रव्यस्त्रीणां प्रथमसंहननं नास्तीति कस्मिन्नागने FATEमोवारणगाथा - "अंतिमतिगसंघडण णियमेण य कम्मभूमिमहिलाण । समयमा यति जिहि णिढ़ि।। अथ मतम् - यदि मोक्षो नास्ति तहि भवदीयम) { if मरोणम् । परिहारमाह - तदुपचारेण कुलव्यवस्थानिमित्तम् । न चोपचार मा प्राध्य देवदत्त इत्यादिवत् । ताचोक्तम् - मुख्याभावे राति प्रयोजन ' हा याने पर 'आत्मतत्व-द्योतक, 'सिद्ध उपदेशरूप वचनपुद्गल; तथा मा अध्ययन किया जाता है ऐगे, नित्यबोधक, अनादिनिधन शुद्ध आत्मात्यको ::त्रि को सार्थ अनुज्ञानके माधनभूत शब्दात्मक सूत्रपुद्गल; और (४) शूल को कानेवाली जो दर्शनादिक पर्याय, जनरूप परिणमित पुरुष के प्रति " : प्रवर्तित करनेवाले चित्रपुद्गल । 7. निषेध नहीं है उसके उपरोक्त चार भेद है।) + M .. ते (अपवादमार्ग में for जन शास्त्रमाला ~~चरणानुयोगसूचक लिका- इदमत्र तात्पर्य, कायवचनमनसो अपि न वस्तुधनः ।।२२५॥ निमिनं त्रीपत्रान: प्रवनंते । किन यदि तवं मोमो भवनियोग नहोमिनाया निकाया अनदिने दीक्षितः माधुः कथं बन्यो भनि । मंत्र यमनः किन बन्या अति यात्री । ति भवन्मने माननीयंकरः नीति कायने, नवययनम् । नीयंका ति मधमानविजयामिभावना: पृवंभवे भार्वायत्वा पत्रावन्नि मन्यानोवस मंगो कचनानिकोकिनोनि। किन यदि मलितीर्थकरी बान्यः कोषिकास्त्रो मृत्वा निर्वाणं गतः नत्रिीस्त्रनिमाराधना किन नियने मतिः। यदि पूर्वोतोपर: नन्ति स्त्रीणां नदि मानामिणोलोमोनुभवारनको जिनदीमा गृहीत्या विशिष्टनपान कवं पोडमा गता इनिन । परिवारमा - नत्र को नास्ति, तस्माम्बर्गावागय पुगपचंदन मोकं याम्यम् । इदमाशो नाति नाम कोप नि । कमत्र नाट्यम् - स्वयं मम्मेवानच्य.नि विवादोन नंनद । विवाद नागोपोनिमंति, नत बामगावना नयनीति ।।: यानि बगान - नं पहिन्यनिगं नासि जिनहि। पुलग्योता ममणीनो बसपनाम:॥ लमहा यामागचे मोक्षी नास्ति नरमायामा पनि दि नप्रतिस्पं यात्रप्रावरणामहिनं नि किमान मात्रा कम पुन्नर पदोजुला रमणीयो ग्लोवायुगाहर नि:---- चिनधिमापन किनिविकार भयो ::: भण्यने, : गुलर पोभियंगा: ला पोयना - । -: । ......... विविणिताः। नागपापानागोग : .............. आचरणं गायां नातागमालाग":.:..:.:..::.:....:. गुलीग एम. ii inter; गुमा एrirat frammarr: Trt... ' चणेरा नीरा एयगो पर ."": :: :: :: : शाय: । यो गाम वि:::.:::. पा, र ममता: । Pririt जोगो किन, नमाभिराम .. भावार्थ:-समा ति: :: : मा 3 . - .

द्रव्यलिङ्गम् । किविशिष्टम् । जहजादरूचं यथाजातरूपं, यथाजातमाशब्देनाय व्यवहारेण संगपरित्याग
परिग्रह उपकरणभूत हैं, इसलिये अपवादमार्ग में उनका निषेध नहीं है, तथापि वे
अब, अनिषिद्ध ऐसा जो शरीर मात्र उपधि उसके पालनकी विधिका उपदेश
रूपापवादव्याख्यानस्य विशेषविवरणं करोति - इदि भणिति भणितं कथितम् । किम् । उवयर
उपकरणम् । क्व । जिणमग्गे जिनोक्तमोक्षमार्ग । किमुपकरणम् । लिंग शरीराकारपुद्गलपिण्डल
निर्विकारपरमचिज्ज्योतिःस्वरूपपरमात्मतत्त्वप्रतियोधकं सारभूतं सिद्धोपदेशरूपं गुरूपदेशवचनम् ।
न केवलं गुरूपदेशवचनं, सुत्तज्झयणं च आदिमध्यान्तवजितजातिजरामरणरहितनिजात्मद्रव्य-
विनयपरिणाम उपकरणं भवतीति निदिष्टः । अनेन किमुक्त भवति - निश्चयेन चतुर्विधमेवो.
स्वकीयनिश्चयरत्नत्रयशुद्धिनिश्चयविनयः, तदाधारपुरुपेषु भक्तिपरिणामो व्यवहारविनयः । उभयोगम
पकरणम् । अन्यदुपकरण व्यवहार इति ।। २२५ ॥ अथ युक्ताहारविहारलक्षणतपोधनस्य स्वरूप
माख्याति-इहलोगणिरावेक्खो इहलोकनिरापेक्षः, टोत्कीर्णज्ञायकैकस्वभावनिजात्मसंवित्तिविनाशक
४३६
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अथाप्रतिषिद्धशरीरमागोपधिपालनजियानमा
इहलोगणिरावेक्खो अप्पविदो परम्हि लोगम्हि ।
जुत्ताहारविहारो रहिदकसाओ हवे समणो ।।२२६॥
इहलोकनिरापेक्षः अप्रतिबद्धः परस्मिन लोके ।
युक्ताहारविहारो रहितकमायो भवेत् श्रमणः ॥२२६॥
जो रयणत्तयणासो सो भंगो जिपरेहि णिनिट्रो।
सेसं भंगेण पुणो ण होदि सल्लेहणागरिको ।। *३० ।।
जो रयणत्तयणासो सो भंगो जिणवरेहि णिदिवो गो मागनाशः स भामो जिनपरेनिदिष्टः ।
वशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजपरमात्मतत्त्यसगरमाजालानुष्यानापो गोऽगी निगरत्नप्रगस्वभाव
स्तस्य विनाशः स एव निश्चयेन नाशो भानो जिननिदिष्टः । सेशं भंगेण पुणो शेषभङ्गेन पुनः
शेपखण्डमुण्डवातवृषणादिभङ्गेन ण होदि सल्लेहणाअरिहो न भवति रालेगनाई। लोकदुगुञ्छाभपेन
निर्ग्रन्थरूपयोग्यो न भवति । कोपीनग्रहणेन तु भावनायोग्गो भवतीत्यभिप्रायः ॥ ३० ॥ एक
स्त्रीनिर्वाणनिराकरणव्याख्यानमुख्यत्वेन कादशगागामितीय रणलं गतम् । अथ पूर्वोक्तस्योपकरण
युक्त नग्नरूपं, निश्चयेनाभ्यन्तरेण शुद्धबुद्धकस्वभावं परमात्मस्वरूपं । गुरुययणं पि य
गुरुवचन
-
वस्तुधर्म नहीं हैं ।।२२५॥
करते हैं:
आ लोकमां निरपेक्ष ने परलोक-अणप्रतिवद्ध छ ।
साधु कषायरहित, तेथी युक्त आर-विहारी छे ॥२२६॥

जन शास्त्रमाता] ~चरणानुयोगसूचक भूतिका- अनादिनिधनंकल्पशुखात्मतत्त्वपरिणतत्वावनिलकमपुदगल विपाकात्यन्तविविक्त- स्वभावत्वेन रहितकपायत्वात्तदात्वमनुष्यत्वेऽपि लपातमनुप्यव्यवहारहितत्वेनेहलो- कनिरापेक्षत्वात्तथा भविष्यमादिभावानुभूतितृष्णान्यन्वेन परलोकाप्रतिबद्धत्वानु. परिच्छेद्यार्थीपलम्भप्रसिद्ध्यर्थप्रदीपपूरणोत्सर्पणस्थानीयान्यां गुहात्मतत्वोपलम्मलि- अययंतच्छरीरसंभोजनसंचलनाभ्यां युक्ताहारविहारोहियात् श्रमणः । इमत्र तात्पर्यम्- यतो हि रहितकपायः ततो न तच्छरीरानुरागेण दिव्यशरीरानुरागण वाहारविहारयो. पानिपूजालाभम्हलोवाकालमाहित. अप्परिको पम्मि नोम्ति अनिकः निलो नषभरण न दियदेवाचीग्विाविमोगा मवन्तीनिसिलीनिक कनि. विहारो हो युनाहारविहारी भवेन् । य। ममणो अम: । पुनर्गकिमाने नि:यापायावमपर्मविनयबाटाभन हिनवादानि । अमत्र:-:-. गाथा २२६ अन्वयार्थ :- [ श्रमणः ] श्रमण [ हितगाय: [हलोय. निरापेक्षः ] हम लोकमें निम्न श्रीर को [ अप्रतिवहः ] अप्रनित होनी | युनामाना: भन .. सोना है।

अनुरागसे आहार-विहारमें अयुक्तरूपसे प्रवृत्त नहीं होता; किन्तु शुद्धात्मतत्वकी [ अनेषणम् ] एषणारहित ( एषणदोषसे रहित ) होती है; [ अथ ] इसलिए { योगा- रयुक्त्या प्रवर्तत । शुद्धात्मतत्त्वोपसम्भसामामाणिपालनामा केलतं युक्ताहार- विहारः स्यात् ॥२२६॥ अथ युक्ताहारविहारः साक्षादनाहारविहार एवेत्युपदिशति - जस्स असणमप्पा तं पि तवो तप्पडिच्छगा रामणा। अण्णं भिक्खमणेसणमध ते समणा अणाहारा ॥२२७॥ यस्यानेषण आत्मा तदपि तपः तत्प्रत्येकाः श्रमणाः । अन्यभक्षमनेषणमथ ते श्रमणा अनाहाराः ॥२२७॥ निरपेक्षत्वेन नि:कवायत्वेन च प्रदीपस्थानीगशरीरे तलरथानीगं गासमा दया पटपटादिप्रकाश्य- पदार्थस्थानीयं निजपरमात्मपदार्थमेव निरीक्षते रा एक युक्ताहारविहारो भगति, न पुनरन्यः शरीर- पोपणनिरत इति ॥ २२६ ।। अथ पन्नदशप्रमादस्तपोधनः प्रमत्तो भवतीति प्रतिपादयति यहाँ ऐसा तात्पर्य है कि :- श्रमण कपायरहित है इसलिये वह शरीरके ( वर्तमान मनुष्य-शरीरके ) अनुरागसे या दिव्य शरीरके ( भावी देवशरीरके ) उपलब्धिकी साधकभूत श्रामण्यपर्यायके पालनके लिये ही केवल युक्ताहारविहारी होता है ।।२२६॥ अब, युक्ताहारविहारी साक्षात् अनाहारविहारी ( अनाहारी और अविहारी ) ही है ऐसा उपदेश करते हैं :- गाथा २२७ अन्वयार्थ :- [ यस्य आत्मा अनेषणः ] जिसका आत्मा एषणारहित है ( अर्थात् जो अनशनस्वभावी आत्माका ज्ञाता होनेसे स्वभावसे ही आहारकी इच्छासे रहित है ) [तत् अपि तपः ] उसे वह भी तप है; ( और ) [ तत्प्रत्येषकाः ] उसे प्राप्त करनेके लिये ( अनशनस्वभाववाले आत्माको परिपूर्णतया प्राप्त करनेके लिये ) प्रयत्न करनेवाले [ श्रमणाः ] श्रमणों के [ अन्यत् भक्षम् ] अन्य ( स्वरूपसे पृथक् ) भिक्षा [ ते श्रमणाः ] वे श्रमण [ अनाहाराः ] अनाहारी हैं। आत्मा अनेषक ते य तप, तत्सिद्धिमा उद्यत रही। वण-अषणा भिक्षा वली, तेथी अनाहारी मुनि ॥२२७।।

- 1 - M जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगलचक चूलिका- ४३६ स्वयमनशनस्वभावत्वादेषणादोपशून्यभक्ष्यत्वाचा युक्ताहारः सातादनाहार एवं स्यात् । तचाहि-यस्य सकलकालमेव सकलपुद्गलाहरणशून्यमात्मानमवयुदयमानस्य सकलाशनतृष्णाशून्यत्वात्स्वयमनशन एव स्वभावः, तदेव तस्यानगनं नाम तपोन्सरजस्य बलीयस्त्वात् ; इति कृत्वा ये तं स्वयमनशनस्वभावं भावयन्ति प्रमणाः, ताप्रतिषिद्धये कोहादिएहि चहि विविकहाहि तहिदियणमा। समणो हटि पमतो उवजुतो गेहमिहाहि ॥ ३१॥ हवदि क्रोधादिपद्रवामप्रमाहितचिमत्कारमात्रामभावनायुः मन भनि । कर्ता । समणो मुखदुःखादिसमत्रितः श्रमण: । निर्वािणाटो भनि । पमनोमन मनो। अन्वा । कोहादियहि चहि वि चतुमिपि शोधादिभिः. विवाह जोर का:-:. तहिदियाणमत्थेहि तथैव पन्नेन्द्रियाणामः स्वादिविष्य । पुनरि. बहुत नुमः परिणतः । कान्याम् । हणिवाहि म्नेहनिहास्यामिति ।।३१।। या मुपदिशति - जस्स यस्य मुनेः नंबन्धी अप्पा लामा । विधि । भावनोत्पग्नमुग्यामृताहारेण तृप्तत्यान्न वियते गणमानाया बायको नम्य नदेव निश्चयेन निगहानात्मभावनामधान रिमा -":.... श्रमणाः, तनिश्चयोपवामलक्षणं तपः प्रतीनिमाजमा . निजपरमात्मतत्वादन्यजिन्न हेयम् । किम । अणेगणं :- भूगम् । भिपावं भिक्षायां भयं अध्यं । अध भय Enar - ।

४४० गम्यतेति ॥२२७॥ निज शक्तिना गोपन विना तप साथ तन योजेल छे ।।२२८॥ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान चैषणादोषशून्यमन्यभक्षं चरन्ति, ते किलाहरन्तोऽप्यनाहरन्त इव युक्ताहारत्वेन स्व- भावपरभावप्रत्ययवन्धाभावात्साक्षादनाहारा एव भवन्ति । एवं स्वयमविहारस्वभाव- त्वात्समितिशुद्धविहारत्वाच्च युक्तिविहारः साक्षादविहार एव स्यात् इत्यनुक्तमपि अथ कुतो युक्ताहारत्वं सिद्धयतीत्युपदिशति- केवलदेहो समणो देहे ण ममत्ति रहिदपरिकम्मो । आजुत्तो तं तवसा अणिगूहिय अप्पणो सत्ति ॥२२८॥ केवलदेहः श्रमणो देहे न ममेति रहितपरिकर्मा । आयुक्तवांस्तं तपसा अनिगूह्यात्मनः शक्तिम् ॥२२८।। श्रमणा आहारग्रहणेऽप्यनाहारा भवन्ति । तथैव च नि:क्रियपरमात्मानं ये भावयन्ति, पञ्चसमिति- सहिता विहरन्ति च, ते विहारेऽप्यविहारा भवन्तीत्यर्थः ॥ २२७ ॥ अथ तदेवानाहारकत्वं प्रकारान्त- रेण प्राह - केवलदेहो केवलदेहोऽत्यपरिग्रहरहितो भवति । स कः कर्ता । समणो निन्दाप्रशंसादिसम- इसप्रकार ( जैसे युक्ताहारी साक्षात् अनाहारी ही है, ऐसा कहा गया है उसीप्रकार ), ( १ ) स्वयं अविहारस्वभाववाला होने से और ( २ ) समितिशुद्ध ( ईयासमितिसे शुद्ध ऐसे ) विहारवाला होनेसे युक्तविहारी ( युक्तविहारवाला श्रमण ) साक्षात् अविहारी ही है - ऐसा अनुक्त होनेपर भी ( गाथामें नहीं कहा जाने पर भी ) समझना चाहिये ।।२२७।। अव, (श्रमणके) युक्ताहारीपना कैसे सिद्ध होता है सो उपदेश करते है :- अन्वयार्थ :- [ केवलदेहः श्रमणः ] केवलदेही ( जिसके मात्र देहरूप परि, ग्रह वर्तता है, ऐसे ) श्रमणने | देहे ] शरीरमें भी [ न मम इति ] 'मेरा नहीं है ऐसा समझकर [ रहितपरिकर्मा ] 'परिकर्म रहित वर्तते हुए, [ आत्मनः ] अपने ' परिरमशोभा; मृद्गार; मंस्कार; प्रतिकम । केवलशरीर मुनि त्याय ' मान' जाणी वण-प्रतिकर्म छ । गाथा २२८ ४४६ जन शास्त्रमाला -~-चरणानुयोगसूचक चूलिका- यतो हि श्रमणः श्रामण्यपर्यायसहकारिकारणत्वेन केवलव्हमात्रस्योपः प्रलहा. प्रतिपेयकत्वात्केवलदेहत्वे सत्यपि देहे कि किवण इत्यान्प्रिान्तनसूत्रयोतितपरमेघराभि- प्रायपरिग्रहेण न नाम ममायं ततो नानुग्रहाहः किंतपेभ्य एवेति परित्यत्तसमनकारत्वा- द्रहितपरिकर्मा स्यात् । ततस्तन्ममत्वपूर्वकानुविताहारग्रहणाभावाचुक्ताहारत्वं सिवये दे। यतश्च समस्तामप्यात्मशक्ति प्रकव्यननन्तरसूत्रोदिनानमनस्वभावलक्षणेन तपना तं देह सर्वारम्भेणाभियुक्तवान् स्यात्, तत आहारग्रहणपरिणामात्मकयोगध्वंसाभावता- हारेण च युक्ताहारत्वं सिद्धयत् ।। २२८ ।। चिनः श्रमणः । नहि कि ममत्वं भवित । नवं । केहि समनदिपस्किमो . हिनदियार्मा, "ममनि पनिवजामि णिमर्मान कीआनंद अगर बोगरे ।।" नि पन्नोकथिन मग देहवि ममत्वर्गहनः । मानो जमानामा नपना । कि त्वा । अणिगृहिय अनि नछादनमाला । -. आत्माकी [ शक्ति ] निको [ निग्रह गरे किना । ] उसे ( शरीरको ) [ आयुक्तावान ] चुन लिया । -- +-+ -प्रवचनसार- योग्याहाररहित इति । एतावता किमुक्त भवति । एवंविशिष्ट विशेषणयुक्त एवाहारस्तपोधनानां भावार्थ :- श्रमण दो प्रकारसे युक्ताहारी सिद्ध होता है; (१) शरीर पर ममत्व आहारवाला है । और (२) 'आहारग्रहण आत्माका स्वभाव नहीं है' ऐसा परिणाम- स्वरूप योग श्रमणके वर्तता होनेसे वह श्रमण युक्त अर्थात् योगी है और इसलिये उसका ४४२ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अथ युक्ताहारस्वरूपं विस्तरेणोपदिशति - एक्कं खलु तं भत्तं अप्पडिपुण्णोदरं जहालद्धं । चरणं भिक्खेण दिवा ण रसावेक्खं ण मधुमंसं ॥ २२६ ॥ एकः खलु स भक्तः अप्रतिपूर्णोदरो यथालब्धः। भैक्षाचरणेन दिवा न रसापेक्षो न मधुमांसः ॥२२६ ॥ मिति । अनेन किमुक्त भवति - यः कोऽपि देहाच्छेपपरिग्रहं त्यक्त्वा देहेऽपि ममत्वरहितस्तथैव तं देह तपसा योजयति स नियमेन युक्ताहारविहारो भवतीति ।। २२८ ।। अथ युक्ताहारत्वं विस्तरेणात्याति- एक्कं खलु तं भत्तं एककाल एव खलु हि स्फुटं स भक्त आहारो युक्ताहारः । कस्मात् एकभक्त नेव निर्विकल्पसमाधिसहकारिकारणभूतशरीरस्थितिसंभवात् । स च कथंभूतः । अप्पडिपुण्णोदरं यथाशक्त्या न्यूनोदरः । जहालद्धं यथालव्धो, न च स्वेच्छालब्धः । चरणं भिक्खेण भिक्षाचरणेनैव लब्धो, न च स्वपाकेन । दिवा दिवैव, न च रात्री। ण रसावेक्खं रसापेक्षो न भवति, किंतु सरसविरसादौ सम- चित्तः । ण मधुमंसं अमधुमासः, अमधुमांस इत्युपलक्षणेन आचारशास्त्रकथितपिण्डशुद्धिक्रमेण समस्ताः (योगीका) आहार है; इसलिये उसके युक्ताहारीपना सिद्ध होता है । न होनेसे उसके उचित ही आहार होता है, इसलिये वह युक्ताहारी अर्थात् उचित आहार युक्ताहार अर्थात् योगीका आहार है ।। २२८ ।। अव युक्ताहारका स्वरूप विस्तारसे उपदेश करते हैं :- - गाथा २२९ अन्वयार्थ :- [खलु] वास्तवमें [सः भक्तः] वह आहार (युक्ताहार) [एकः] एक बार [अप्रतिपूर्णोदरः] ऊनोदर [यथालब्धः यथालव्ध (जैसा प्राप्त हो वैसा), [भक्षाचरणेन] भिक्षाचरणसे, [दिवा] दिनमें [न रसापेक्षः) रसकी अपेक्षासे रहित और [न मधुमासः] मधु-मांस रहित होता है । आहार ते अक ज, उणोदर ने यथा-उपलब्ध छ । भिक्षा वडे, दिवसे, रमेच्छाहीन, वण-मधुमांस छ । २२६ ॥ - ४४ जन गास्त्रमाला] --चरणानुयोगसूचक चूलिका- एककाल एवाहारो युक्ताहारः, तावतंव श्रामण्यपर्यायसहकारिकारशरोरस्य धारण- त्वात् । अनेककालस्तु शरीरानुरागसेव्यमानत्वेन प्रसहा हिमायतनोक्रियमाणो न युक्तः, शरीरानुरागसेवकत्वेन न च युक्तस्य । नतिपूर्णीदर एवाहासे युक्ताहारः तत्वाऽति- हतयोगत्वात् । प्रतिपूर्णोदरस्तु प्रतिहत्तयोगत्वेन वंचित् हिमायतनीभवन न वृत्तः, प्रति- हतयोगत्वेन न च युक्तस्य । यथालव्ध एवाहारो युक्ताहारः तस्यंत्र विरोप्रियत्वलक्षणा- नुरागशून्यत्वात् । अयथालव्धस्तु विशेषप्रियवनक्षणानुरागसेव्यमानत्वेन प्रसहा हिंसा- यतनीक्रियमाणो न युक्तः, विशेषप्रियत्वलक्षणानुरागसेवन न ३ वृत्ताच । भिक्षा. चरणेनैवाहारो युक्ताहारः, तस्यबारम्भशून्यत्वात् । अभावान वारम्भमभवगाजित गुनाहारः । परमाधिनि चेन् । विद्यानन्दकालमनियाधाना विवि नु निश्चयनयेनाहिमा, नालायकन्या बहिरङ्गपरजीवनापरवाना मा. द्विविधापि नत्र युनाहारे संभनि । यन्त हिर्गमकाना न ! - वहिलक्षणभूनाया हव्यभावम्याचा हिंगायाः समागम ::-::- परवेमु म आमेनु म पित्रमाणामुमोट। संतलियमुबानो नजमाची जो पयामपसमापी । सो यिल णि िनीrairi':::. m ४५० -प्रवननसार- उत्सर्ग और अपवादसे जिसकी वृत्ति (अस्तित्व, कार्य) प्रगट होती है ऐसा स्याद्वाद निर्वलताका लक्ष रखे विना मात्र उत्सर्गका आग्रह रखकर केवल अति कर्कश आचरणका करना चाहिये जिसमें हठ भी न हो और शिथिलताका भी सेवन न हो । सर्वज्ञ भगवानका मार्ग अनेकान्त है। अपनी दशाकी जाँच करके जैसेभी लाभ हो उसप्रकारसे वर्तन करनेका [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान तन्न श्रेयानपवादनिरपेक्ष उत्सर्गः । देशकालजस्यापि बालवृद्भश्रान्तग्लानत्वानुरोधेनाहार- विहारयोरल्पलेपत्वं विगणय्य यथेष्ट प्रवर्तमानस्य मृहाचरणीभूय संयम विराध्यासंयतजन- समानीभूतस्य तदात्वे तपसोऽनवकाशतयाशक्यप्रतिकारो महान् लेपो भवति, तन्न श्रेयानुत्सर्गनिरपेक्षोऽपवादः । अतः सर्वथोत्सर्गापवादविरोधदौस्थित्यमाचरणस्य प्रतिषेध्यं, तदर्थमेव सर्वथानुगम्यश्च परस्परसापेक्षोत्सर्गापवादविजृम्भितवृत्तिः स्याद्वादः ॥२३१॥ यदि कथंचिदीपधपथ्यादिसावद्यभयेन व्याधिध्यथादिप्रतीकारमकृत्वा शुद्धात्मभावनां न करोति तर्हि महान् लेपो भवति; अथवा प्रतीकारे प्रवर्तमानोऽपि हरीतकीव्याजेन गुभक्षणवदिन्द्रियसुखलाम्पटयेन संयमविराधनां करोति तदापि महान् लेपो भवति । ततः कारणादुत्रार्गनिरपेक्षमपवादं त्यक्त्वा शुद्धात्मभावनारूपं शुभोपयोगरूपं वा संयममविराधयन्नीपधपथ्यादिनिमित्तोत्पन्नाल्पसावद्यमपि बहुगुण- राशिमुत्सर्गसापेक्षमपवाद स्वीकरोतीत्यभिप्रायः ।। २३१ ।। एवं 'उवयरणं जिणमग्गे' इत्याद्येकादश- देशकालज्ञको भी, यदि वह वाल-वृद्ध-श्रांत-ग्लानत्वके अनुरोधसे जो आहारविहार है, उससे होनेवाले अल्पलेपको न गिनकर उसमें 'यथेष्ट प्रवृत्ति करे तो (अर्थात् अप- वादसे होनेवाले अल्पबन्धके प्रति असावधान होकर उत्सर्गरूप ध्येयको चूककर अपवादमें स्वच्छन्दपूर्वक प्रवर्ते तो), मृदु आचरणरूप होकर संयम विरोधीको-असंयतजनके समान हुए उसको - उससमय तपका अवकाश न रहनेसे, जिसका प्रतीकार अशक्य है ऐसा महान लेप होता है । इसलिये उत्सर्ग निरपेक्ष अपवाद श्रेयस्कर नहीं है । इससे ( ऐसा कहा गया है कि ) उत्सर्ग और अपवादके विरोधसे होनेवाला जो आचरण का दुःस्थितपना वह सर्वथा निषेध्य (त्याज्य) है, और इसीलिये परस्पर सर्वथा अनुगम्य (अनुसरण करने योग्य) है । भावार्थ :- जबतक शुद्धोपयोगमें ही लीन न हो जाया जाय तबतक श्रमणको आचरणकी सुस्थितिके लिये उत्सर्ग और अपवादकी मैत्री साधनी चाहिये । उसे अपनी हठ नहीं करना चाहिये; तथा उत्सर्गरूप ध्येयको चूककर मात्र अपवादके आश्रयसे केवल मृदु आचरणरूप शिथिलताका भी सेवन नहीं करना चाहिये। किन्तु इस प्रकारका वर्तन सापेक्ष भगवान का उपदेश है। १ यथेष्ट स्वच्छंदतया, इच्छाके अनुसार । , Y५६ - सन गारमाना] ~णानुयोगइन्त्रक चन्तिका इत्येवं वर्ष पुगणपुर विशिष्यावर मत्सर्गापास्त विचन्हह्वीः पृथग्भनिकाः । आक्रम्य यतो निवृत्तिमनुनां कृत्वा अति: मन भित्तामान्यविशेषमामिनि निजाच्ने करोतु नितिन ॥१५॥ -इत्यावरणप्रजापन समाप्तम् । अथ श्रामण्यापन्नाम्नो मोक्षमार्गन्धकारटनमपन्य मापनं तानन्यनमाधनमते प्रथममागम एवं व्यापारयति- एयरगगदो नमणो एयरगं णिच्छिन्न अत्येसु । णिच्छित्ती आगमको आगमट्टा नको जेहा॥१२॥ ऐकाम्यगनः श्रमण: कारनिनि । निचिनिगगमन आगमनाया करे ?

४५२ --प्रवननसार-~- न - अथैकाग्यगतः टीका:-प्रथम तो, श्रमण वास्तवमें एकाग्रता को प्राप्त ही होता है; एकाग्रता वास्तवमें आगमके बिना पदार्थोका निश्चय नहीं किया जा सकता; क्योंकि सकलपदार्थसार्थके यथातथ्य ज्ञान द्वारा सुस्थित अंतरंगसे गम्भीर है ( अर्थात् आगमका [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान श्रमणो हि तावदकाम्यगत एव भवति । ऐकायं तु निश्मितार्थस्यैव भवति । अर्थ- निश्चयस्त्वागमादेव भवति । तत आगम एव व्यापारः प्रधानतरः, न तान्या गतिरस्ति । यतो न खल्वागममन्तरेणार्था निश्चतुं शक्यन्ते, तस्येव हि त्रिसमयप्रवृत्तत्रिलक्षणसकल. पदार्थसार्थयाथात्म्यावगमसुस्थितान्तरङ्गगम्भीरत्वात् । चार्थनिश्रयमन्तरेणकाप्रयं सिद्धयेत्, यतोऽनिश्चितार्थस्य कदाचिनिश्चिकीर्षाकुलितचेतसः समन्ततो दोलायमानस्यात्य- न्ततरलतया, कदाचिचिकीर्षाज्वरपरवशस्य विश्व स्वयं सिसृक्षोविश्वव्यापारपरिणतस्य तदनन्तरं भेदाभेदरत्नत्रयस्वरूपमेव मोक्षमार्ग इति व्यायानरूपेण 'आगमपुब्बा दिट्ठी' इत्यादि द्वितीयस्थले सूत्रचतुष्टयम् । अतःपरं द्रव्यभावसंयमकथनरूपेण 'नागो य अणारंभो' इत्यादि तृतीयस्थते गाथाचतुष्टयम् । तदनन्तरं निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गोपसंहार मुख्यत्वेन 'मुज्झदि वा' इत्यादि चतुर्थस्थले गाथाद्वयम् । एवं स्थलचतुष्टयेन तृतीयान्तराधिकारे समुदायपातनिका । तद्यथा- अब, श्रामण्य जिसका दूसरा नाम है ऐसे एकाग्रतालक्षणवाले मोक्षमार्गका प्रज्ञापन है। उसमें प्रथम, उसके (मोक्षमार्गके) मूल साधनभूत आगममें व्यापार (प्रवृत्ति) कराते हैं:- अन्वयार्थ :- [ श्रमणः ] श्रमण [ ऐकान्यतः ] एकाग्रता को प्राप्त होता है। [ ऐकायं ] एकाग्रता [ अर्थेषु निश्चितस्य ] पदार्थोके निश्चयवान्के होती [ निश्चितिः ] ( पदार्थोंका ) निश्चय [ आगमतः ] आगम द्वारा होता है; [ ततः ] इसलिये [ आगमचेष्टा ] आगममें व्यापार [ ज्येष्ठा ] मुख्य है । पदार्थोंके निश्चयवान्के ही होती है; और पदार्थोंका निश्चय आगम द्वारा ही होता है; इसलिये आगममें ही व्यापार प्रधानतर ( विशेष प्रधान ) है। दूसरी गति ( अन्य कोई मार्ग ) नहीं है । उसका कारण यह है कि :- आगम ही, जिसके त्रिकाल ( उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप) तीन लक्षण प्रवर्तते हैं ऐसे ही अंतरंग, सर्व पदार्थोके समूहके यथार्थज्ञान द्वारा सुस्थित है इसलिये आगम ही समस्त पदार्थोके यथार्थ ज्ञानसे गम्भीर है )। गाथा २३२ जनमाप्रमाला] -चरणानुयोगमूचना लिका- प्रतिक्षणविज़म्भमाणक्षोभतया. कदाचिभुक्षामादिनस्य वियं व मोन्यतयोपासाय सागप्रदोपफल्माप्रितचित्तवृत्तनिष्टानिष्टविभागेन नितम्य प्रतिवन्नुपरिजममानाचा त्यन्तविनस्थलतया, कनिमयनिक्रियनिभाग युगपदापीनधिमनियन भगवन्तमा- स्मानमपन्यतः सततं यत्र्यमेव स्यात् । न काखमन्तरेण प्रामवं नित्यंत. कोनका रयस्थानेकमेवेदमिति पश्यतस्तथाप्रत्ययाभिनिदिष्टम्यानेजमेडेमिति जानतस्तथानुभूतिमा सितम्यानेकमेवेमितिप्रत्यविकल्पव्यावृत्तनमा मंतनं प्रवनमानाय नथान्तिपिता कात्मप्रतीत्यनुभूतिवृत्तिस्वरूपसम्पादनमानचान्त्रिपरिणनिम्नगिनिनियम नत्त्वकाग्याभावात् गुद्वात्मतत्त्वप्रनिम्यं श्राममे न यान । अतः या बोधमां- अमला भवति। नन्कारममागमानांकन श्रमणो भनि । असायम, जगन्यकाल विमानमानलक्षमायामा मग परिपातः श्रमको भर्माण । एम:- मायाजायजमायभात्री योगी - Brian 7 . इससे आगमज्ञान - तत्वार्थश्रद्धान और संयतत्वके युगपतपनेको ही मोक्षमार्ग- हिमा :: :: :: :: :: : : स्वपविभागाभागान :: :: :: :: :: :: :: :: :: निकारघातिनो नमामो :: PREDITE जयन रनमात्रमनिन ! सिवात् । अमिनोग को पाने न सिदत् । अत गजान पोमा गोमाग नियम्येत ।। २३६॥ निरनिमा :::::. ::.. 11:11.! .. 11-1ft TEAM भवनिसानो नो ! ! it.fy गयो न भनि । नमः शि:11: । ६.१, १.१५ ।। २३६ ।। टोका :-- इस लोक में भारत में, it. fiffffiगे आगगपूर्वक 'तत्वार्थधज्ञानलक्षण वाली स्टिमे जो राग उनी म सो गंगम नहीं होता. क्योंकि ( १ ) सगरो भागो अभावकारण काया और कागायों के साथ एकताका अध्यवसाय करनेवाले गे ने जीन, निपयोंकी अभिलापाका नहीं होनेसे छह जीवनिकायके घाती होकर गताः ( राव और गे ) प्रवृत्ति करते हैं, इसलिये उनके सर्वतः निवृत्तिका अभाव है। ( अर्थात् किसी भी ओरसे-किंचित्मात्र भी निवृत्ति नहीं है ), तथापि ( २ ) उनके परमागमान अभावके कारण शेय- समूह को क्रमशः जाननेवाली 'निरर्गल ञप्ति होने में जाना आत्मतत्वमें एकाग्रताकी प्रवृत्तिका अभाव है। ( इसप्रकार उनके संयम सिद्ध नहीं होता ) और ( इसप्रकार ) जिनके संयम सिद्ध नहीं होता उन्हें 'सुनिश्चत ऐकायपरिणततारूप श्रामण्य ही - जिसका दूसरा नाम मोक्षमार्ग है वही - सिद्ध नहीं होता। १ तत्वार्थधद्धानलक्षणवाली-तत्वार्थका घद्धान जिसका लक्षण है ऐसी। [ सम्यग्दर्शनका लक्षण तत्वार्थश्रद्धान २ जिन जीवोंको स्वपरका भेदज्ञान नहीं है उनके भले ही कदाचित पंचेन्द्रियों के विपयोंका संयोग दिखाई न देता हो, छह जीवनिकायकी द्रव्य हिसा न दिखाई देती हो और इसप्रकार संयोगसे निवृत्ति दिखाई देती हो, तथापि काया और कपायके साथ एकत्व माननेवाले उन जीवों के वास्तव में पंचेन्द्रियके विपयोंकी अभिलापाका निरोध v है । वह आगमपूर्वक होता है । आगमका चिह्न 'स्यात्' कार है ] सिद्ध निरोध . नहीं है, हिंसाका किंचित्मात्र अभाव नहीं है और इसप्रकार परभावसे किंचित्मात्र निवृत्ति नहीं है । 3 निरर्गल=निरंकुश; संयमरहित; स्वच्छन्दी। सुनिश्चित-दृढ़ (दृढ़तापूर्वक एकाग्रतामें परिणमित होना सो धामण्य है।) ४ . जन गाम्नमाना -वाणानुयोग विका- अयागमनानतत्त्वाचंधवानसंपतत्वानामयोगपद्यस्य मोक्षमागत्वं विधयति- ण हि आगमेण सिज्मदि सहहणं जदि विपत्यि अत्येषु । सहहमाणो अत्ये असंजदो वा न णिवादि ।। २३७ ।। नयागमेन नियति प्रदान गपि नाम । श्रधान अर्थानमंयतो निर्वानि ॥७॥ अवागमहानन्यायधमानमयमलानां श्रीगधामांना मी ---..-आ। निजमादि भागमनियमनन न मिलन. माहित आहे :- माग्नि परमारमादिपवाया। महरमाणो मले बाम का ----11::-:. कार्यान, अनजदो या णिच्याद कियायाधीनयना - t-2----- पना होनेका नियम होता है ।। १६ ।। अब, ना मित्र मान्ने है कि - आगमनमा :: पानुपनेको मोक्षमार्गन्ध बदिन नहीं होना :- शतसहस्रकोटिभिः कथंचन निस्त- पर्यायस्य विनाशे सति तस्य पारिणामिकभावस्यापि विनाशः प्राप्नोति । एवं वहिरात्मान्तरात्म- कारणमिति प्रतिपादयति - जं अण्णाणो कम्मं खवेदि निर्विकल्पसमाधिरूपनिश्चयरत्नत्रयात्मक भवशतसहस्रकोटिभिः । तंणाणी तिहिं गुत्तो तत्कर्म ज्ञानी जीवस्त्रिगुप्तिगुप्तः सन् खवेदि उस्सासमेत्तेण तपादिरूप उद्यमसे पकते हुए, रागद्वेषको ग्रहण किया होनेसे सुखदुःखादि विकारभाव- रूप परिणमित होनेसे पुन: संतानको आरोपित करता जाय इसप्रकार, लक्षकोटिभवों- को स्यात्कारकेतन आगमज्ञान, तत्वार्थश्रद्धान और संयतत्वके युगपत्पनेके अतिशयप्रसादसे प्राप्त की हुई शुद्धज्ञानमय आत्मतत्वकी अनुभूति जिसका लक्षण है ऐसे ज्ञानीपनके सद्भावके कारण काय-वचन-मनके कर्मोके 'उपरमसे त्रिगुप्तिता प्रवर्तमान होनेसे प्रचण्ड इससे आगमज्ञान, तत्वार्थश्रद्धान और संयतत्वका युगपत्पना होनेपर भी आत्म- . उपरम-विराम, अटक जाना वह, रुक जाना वह; [ जानीके ज्ञानोपनके कारण काय-वचन-मन संबंधी कार्य ४६६ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यदज्ञानी कर्म क्रमपरिपाट्या वालतपोवैचित्र्योपक्रमेण च पच्यमानमुपात्तरागद्वेषतया सुखदुःखादिविकारभावपरिणतः पुनरारोपितसंतानं भवशत रति, तदेव ज्ञानी स्यात्कारकेतनागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वयोगपद्यातिशयप्रसादासा- दितशुद्धज्ञानमयात्मतत्त्वानुभूतिलक्षणज्ञानित्वसद्भावात्कायवाङ मनःकर्मोपरमप्रवृत्तत्रिगुप्त बहिरात्मावस्था तावदशुद्धा, मुक्तिकारणं न भवति । मोक्षावस्था शुद्धा फलभूता, सा चाग्रे तिष्ठति । एताभ्यां द्वाभ्यां भिन्ना यान्तरात्मावस्था सा मिथ्यात्वरागादिरहितत्वेन शुद्धा । यथा सूक्ष्मनिगोतज्ञाने शेषावरणे सत्यपि क्षयोपशमनानावरणं नास्ति तथानापि केवलनानावरणे सत्यप्येकदेशक्षयोपशम- ज्ञानापेक्षया नास्त्यावरणम् । यावतांशेन निरावरणा रागादिरहितत्वेन शुद्धा च तावतांशेन मोक्षकारण भवति । तत्र शुद्धपारिणामिकभावरूपं परमात्मद्रव्यं ध्येयं भवति, तच्च तस्मादन्तरात्मध्यानावस्या- विशेषात्कथंचिद्भिन्नम् । यदैकान्तेनाभिन्न भवति तदा मोक्षेऽपि ध्यानं प्राप्नोति, अथवास्य ध्यान परमात्मकथनरूपेण मोक्षमार्गो ज्ञातव्यः । अथ परमागमानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वानां भेदरत्नत्रय- रूपाणां गेलापकेऽपि, यदभेदरत्नत्रयात्म निर्विकल्पसमाधिलक्षणमात्मज्ञानं, निश्चयेन तदेव मुक्ति- विशिष्टभेदज्ञानाभावादज्ञानी जीवो यत्कर्म क्षपयति । काभिः करणभूताभिः । टीका :- जो कर्म (अज्ञानीको ) क्रमपरिपाटीसे तथा अनेक प्रकारके बाल- द्वारा चाहे जिस प्रकार ( महा कष्टसे ) अज्ञानी पार कर जाता है, वही कर्म, ( ज्ञानी उद्यम से पकता हुआ, रागद्वेपके छोड़नेसे समस्त सुखदुःखादि विकार अत्यन्त निरस्त हुआ होनेसे पुनः संतानको आरोपित न करता जाय इसप्रकार उच्छ्वासमात्रमें ही लीलासे ही ज्ञानी नष्ट कर देता है। ज्ञानको ही मोक्षमार्गका साधकतम संमत करना । एक जाने से ग्रिगुप्तता प्रवतंती है।] भवसयसहस्सकोडीहिं --- नाप्रमाला] ~~~णानुयोगमा निका- त्यान् प्रचण्डोपत्रामपच्यमानमपहस्तितमाम प्रनया निम्नमातमुखदुःशादिविकारः पुनन्नारोपित नानमुच्छाममात्रेणेव नीनां पालन । सन आगमनाबान- मंधनत्यागपत्रेयात्मनानमेव मोक्षमार्गमायनममनुमन्नन्न । अचात्मनानन्याय मांगमज्ञानानन्याध्यानधनवान श्रीमान कमिन्यनुगाग्नि - ४६८ --प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कह परमाणुपमाणं वा मुच्छा देहादिएसु जस्स पुणो। विज्जदि जदि सो सिद्धि ण लहदि सव्वागमधरो वि ॥ २३६ ॥ परमाणुप्रमाणं वा मूर्छा देहादिकेषु यस्य पुनः । विद्यते यदि स सिद्धि न लभते सर्वागमधरोऽपि ।। २३६ ।। यदि करतलामलकीकृतसकलागमसारतया भूतभवद्भावि च स्वोचितपर्यायविशिष्ट- मशेषद्रव्यजातं जानन्तमात्मानं जानन् श्रद्दधानः संयमयंश्चागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयत- त्वानां योगपद्येऽपि मनाङ मोहमलोपलिप्तत्वात् यदा शरीरादिमूर्चीपरक्ततया निरुपरा- गोपयोगपरिणतं कृत्वा ज्ञानात्मानमात्मानं नानुभवति तदा तावन्मात्रमोहमलकलङ्क- संयतत्वानां योगपद्यमप्यकिंचित्करमित्युपदिशति - परमाणुपमाणं वा मुच्छा देहादिएसु जस्स पुणो विज्जदि जदि परमाणुमात्रं वा मूर्छा देहादिकेषु विपयेषु यस्य पुरुपस्य पुनविद्यते यदि चेत्, सो सिद्धि ण लहदि स सिद्धि मुक्ति न लभते । कथंभूतः । सव्वागमधरो वि सर्वागमधरोऽपीति । अयमत्रार्थः- सर्वागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वानां योगपद्ये सति यस्य देहादिविपये स्तोकमपि गाथा २३९ अन्वयार्थ :- [पुनः] और [यदि] यदि [यस्य] जिसके [देहादिकेषु] शरी- रादिके प्रति [परमाणुप्रमाणं वा] परमाणुमात्र भी [मूर्छा] मूर्छा [विद्यते] वर्तती हो तो [सः] वह [सर्वागमधरः अपि] भले ही सर्वागमका धारी हो तथापि [सिद्धि न लभते] सिद्धिको प्राप्त नहीं होता। टीका :- सकलं आगमके सारको हस्तामलकवत् करनेसे (हथेलीमें रक्खे हुए आंवलेके समान स्पष्ट ज्ञान होनेसे) जो पुरुष भूत-वर्तमान-भावी 'स्वोचित पर्यायोंके साथ अशेप द्रव्यसमूहको जाननेवाले आत्माको जानता है, श्रद्धान करता है और संय- मित रखता है, उस पुरुपके आगमज्ञान-तत्त्वार्थश्रद्धान-संयतत्वका युगपत्पना होनेपर भी, यदि वह किंचित्मात्र भी मोहमलसे लिप्त होनेसे शरीरादिके प्रति (तत्संबंधी) ' स्वोचित=अपनेको उचित, अपने-अपने योग्य । [आत्माका स्वभाव त्रिकालको स्वोचित पर्यायों सहित समस्त द्रव्योंको जानना है।] अणुमात्र पण मूर्खा तणो सद्भाव जो देहादिके । तो सर्व आगमधर भले पण नव लहे सिद्धत्वने ॥ २३६ ।।

जन गास्त्रमाना] ~रणानुगमन निता- कोलिकाकोलितः कर्मभिविमुच्यमानो न नियति । अत आत्मानमयमागमज्ञान- तत्त्वयंघद्धानयतत्वयोगपछमनियन्मे ।। अयागमज्ञानतत्वायंप्रदानमंधनयोगपछामजानोनयमान - पंचसमिदो तिगुत्तो पंचेंदियनी जिकमाओ । दलणणाणनमन्गो लमणो लो संजनो भपितो।।१०।। पञ्चमिन्द्रिगुप्तः पत्रनियमनी जिला पालः । वनमानसमनः मतः न गंगनी -प्रवचनसार- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-मान कल्यनेकान्तवेतनागमनानबलेन सकतपदार्थजेयाकारकरम्बितविरादकज्ञाना- जारमामानं श्रयानोऽनुभवनात्मन्येव नित्यनिश्चला वृत्तिमिच्छन् समितिपतकाल, मिननितिनबमसाधनीकृतगरोरपात्रः क्रमेण निश्चलनिरुद्भपंचेन्द्रियगारतया समु. नकाबाड मनोव्यागारो भूत्वा निवृत्तः परद्रव्यचङक्रमणनिमित्तमत्यन्तमात्मना साम सनादेनीभूतर्भाप स्वभावभेदात्परत्वेन निश्चित्यात्मनंव कुशलो मल्ल इस - उन मात्रमाला] -वरणानुयोगमा निया- मुनिर्भनिप्पीडय निप्पीच्य समानमत्रमेण जी त्याजान. मनु ममतल. न्धोऽपि विडोमिनप्तिमात्रबभावनाबपिनामनन्त्रोपमानिनिया माधानंदन पत्र न्यान् । नव नागमनाननवाजानवयोमानतीन मिति ।। २४० ।। मित्रागमनानसन्मानानमंटन कोहनप्रणमिन्यनुशास्ति- नमनत्तुबंधवग्गो नमसहयग्यो पनगजिनमो। लमलोट्ट कंचणो पण जोविमरण नमो नमतो ॥११॥ समगबन्धुवर्ग: नमनाया जाता। ममन्नोटकाननः पुननिन -:: :: :

माना चाहिये - विजिम गयनके आगमान-मसायं. ४७२ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान संयमः सम्यग्दर्शनज्ञानपुरःसरं चारित्रं, चारित्रं धर्मः, धर्मः साम्यं, साम्यं मोहक्षोभ- विहीनः आत्मपरिणामः । ततः संयतस्य साम्यं लक्षणम् । तत्र शत्रुबन्धुवर्गयोः सुख- दुःखयोः प्रशंसानिन्दयोः लोष्टकाञ्चनयोर्जीवितमरणयोश्च समम् अयं मम परोऽयं स्वः, अयमालादोऽयं परितापः, इदं ममोत्कर्षणमिदमपकर्षणमयं ममाकिञ्चित्कर इदमुपकारक- मिदं मसात्मधारणमयमत्यन्तविनाश इति मोहाभावात् सर्वत्राप्यनुदितरागद्वेषद्वैतस्य, सततमपि विशुद्धदृष्टिज्ञप्तिस्वभावमात्मानमनुभवतः, शत्रुबन्धुसुखदुःखप्रशंसानिन्दालोष्ट- काञ्चनजीवितमरणानि निविशेषमेव ज्ञेयत्वेनाक्रम्य ज्ञानात्मन्यात्मन्यचलितवृत्तयत्किल इत्युपदिति कोऽर्थः इति पृष्टे प्रत्युत्तरं ददाति। एवं प्रश्नोत्तरपातनिकाप्रस्तावे क्वापि क्वापि यथासंभव- मितिशब्दस्यार्थी ज्ञातव्यः- स श्रमणः संयतस्तपोधनो भवति । यः किंविशिष्टः । शत्रुवन्धुसुखदुःस. निन्दाप्रशंसालोप्टकाञ्चनजीवितमरणेपु समः समचित्तः इति । ततः एतदायाति - शत्रुवन्धुसुखदुःख निन्दाप्रशंसालोप्टकाञ्चनजीवितमरणसमताभावनापरिणतनिजशुद्धात्मतत्त्वसम्यश्रद्धानज्ञानानुष्ठान- मपनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्ननिर्विकारपरमाह्लादैकलक्षणसुखामृतपरिणतिस्वरूपं यत्परमसाम्यं तदेव जिसको समता है, [समलोष्टकाञ्चनः] जिसे लोष्ट (मिट्टीका ढेला) और सुवर्ण समान है, [पुनः] तथा [जीवितमरणे समः] जीवन-मरणके प्रति जिसको समता यह श्रिमणः] श्रमण है । टीका :- संयम, सम्यग्दर्शनजानपूर्वक चारित्र है; चारित्र धर्म है; धर्म साम्य है; माम्य मोरक्षोभ रहित आत्मपरिणाम है । इसलिये संयतका, साम्य लक्षण है । वहां, ( १ ) शत्रु-बंधुवर्गमें, ( २ ) सुख-दुःखमें, ( ३ ) प्रशंसा-निन्दामें, (८) मिट्टीके देने और सोने में, (५) जीवित-मरणमें एक ही साथ, (१) 'यह मेरा पर (मनु) है, यह म्ब (म्बजन) है;' (२) 'यह आह्वाद है, यह परिताप है,' (३) बह गंग नसण ( कीति ) है, यह अपकर्षण ( अकीर्ति ) है,' ( ४ ) 'यह मुझे चिमार है, या उपकारक ( उपयोगी ) है,' ( ५ ) 'यह मेरा स्थायित्व है, यह सन्न बिना है' इसप्रकार मोहके अभावके कारण सर्वत्र जिससे रागद्वेषका देत मानही होता, जो सतत विशुद्धदर्शनज्ञानस्वभाव आत्माका अनुभव करता है, र सवार ) जय-बन्धु, मुन्न-दुःख, प्रगंगा-निन्दा,लोट-कांचन और जीवित निकिताना ही ( अन्नरके बिना ही ) जेयरूप जानकर ज्ञानात्मक आमा शनि प्रचलित हई है; उस पुरुपको वास्तव में जो गर्वतः माम्ग है यः ।

जनमास्त्रमाला] -रणानुयोगमा निका- मत: नान्यं तलिबागमज्ञानतत्वाप्रदानमंचनाचीगपघामानयोगका मंदकर नमणमालक्षणीयम् ।। २४१ ।। अमेय मित्रागमनानतन्वाधवानगंगनदीमामानीनगना. मंकाज्यलक्षणग्राममापनाम मोसमागंलनममन- दलणणाणचरित्तेलु तीन जगवं गर्माहवो जो दु। एयग्गगदो त्ति मदो नामण्णं तम्म पडिपानं ॥२४॥ गंननानचरित्रं त्रिषु युगलममुखिनो स्तु। ऐकायगत इनि मनः धामनग्य !! ::

४७६ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान - अयानकायस्य मोक्षमार्गत्वं विघटयति - मुज्झदि वा रज्जदि वा दुस्सदि वा दव्वमण्णमासेज्ज । जदि समणो अण्णाणी बज्झदि कम्मेहि विविहिं ॥ २४३ ॥ मुह्यति वा रज्यति वा द्वेष्टि वा द्रव्यमन्यदासाद्य । यदि श्रमणोऽज्ञानी बध्यते कर्मभिविविधैः ॥ २४३ ॥ यो हि न खलु ज्ञानात्मानमात्मानमेकमग्रं भावयति, सोऽवश्यं ज्ञेयभूतंद्रव्य- मन्यदासीदति । तदासाद्य च ज्ञानात्मात्मज्ञानाद्धृष्टः स्वयमज्ञानीभूतो मुह्यति वा, रज्यति वा, द्वेष्टि वा; तथाभूतश्च वध्यत एव, न तु विमुच्यते । अत अनकायस्य न मोक्षमार्गत्वं सिद्धयेत् ॥ २४३ ॥ न भनि लस्य मोक्षाभावं दर्शयति - मुज्झदि वा रज्जदि वा दुस्सदि वा दव्यमण्णमासेज्ज जानि कामना मनि बा. द्रष्टि वा, यदि नेत् । कि कृत्वा द्रव्यमन्यदासाद्य प्राप्य । रा कः । रामणो न । कसा वाले अण्णाणी अजानी भवति । अज्ञानी सन् बज्झदि कम्मेहि विविहेहि मी नाति-योनिविकारस्यसंवेदनशानेनैकाग्रो भूत्वा स्वात्मानं न जानानि मर। राताभिवानन्कनिजस्वभावाच्च्युतो भवति । ततश्रा रागोषमो? :::: मनमिणा वगत इति । ततः कारणान्मोक्षाथिभिरेकाग्रत्वेन स्वस्वरुप लामें परिणति बांधकर ( लोन करके ) अचलरूपसे अवलम्बन १. यो ) उचलमित चेतनाके चेतनाके अतुल विकासको अल्पकालमें : ....... - अनेकाग्रताय मोक्षमार्गपना घटित नहीं होगा मा नहीं है ) - गाथा २४३ - ई - दिदि [ श्रमण: ] श्रमण, [ अन्यत् द्रव्यम् आगार को [ अज्ञानी । अनाना हानाहा, [ महानि या ] गा: - दा ! , [ टि वा अयादेप करना , ३.. वध्यने ] बंधया है। सरका: जानी पो मोटी। 7 व दाने या वर ।। ८ ।।

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४७८
-प्रवचनसार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
यस्तु ज्ञानात्मानमात्मानमेकमग्रं भावयति, स न ज्ञेयभूतं द्रव्यमन्यदासीदति। तदना-
साद्य च ज्ञानात्मात्मज्ञानादभ्रष्टः स्वयमेव ज्ञानीभूतस्तिष्ठन्न मुह्यति, न रज्यति, न दृष्टिः
तथाभूतः सन् मुच्यत एव, न तु बध्यते । अत ऐकायस्यैव मोक्षमार्गत्वं सिद्धयेत्
॥२४४॥ - इति मोक्षमार्गप्रज्ञापनम् ।।
अथ शुभोपयोगप्रज्ञापनम् । तत्र शुभोपयोगिनः श्रमणत्वेनान्वाचिनोति-
समणा सुद्धवजुत्ता सुहोवजुत्ता य होंति समयम्हि ।
तेसु वि सुद्ध वजुत्ता अणासवा सासवा सेसा ॥२४॥
श्रमणाः शुद्धोपयुक्ताः शुभोपयुक्ताश्च भवन्ति समये ।
तेष्वपि शुद्धोपयुक्ता अनास्त्रवाः सास्त्रवाः शेषाः ॥२४५॥
पुनरयोगिचरमसमये भविष्यति, तेन कारणेनेदानीमस्माकं सम्यक्त्वभावनया भेदज्ञानभावनया न
पूर्यते, चारित्रं पश्चाद्भविष्यतीति । नवं वक्तव्यम् । अभेदनयेन ध्यानमेव चारित्रं तच्च ध्यान
केवलिनामुपचारेणोक्त, चारित्रमप्युपचारेणेति । यत्पुनः समस्तरागादिविकल्पजालरहितं शुद्धात्मा
नुभूतिलक्षणं सम्यग्दर्शनज्ञानपूर्वकं वीतरागछद्मस्थचारित्रं तदेव कार्यकारीति । कस्मादिति चेत् ।
तेनैव केवलज्ञानं जायते यतस्तस्माचारित्रे तात्पर्य कर्तव्यमिति भावार्थः । किंच उत्सर्गव्याख्यानकाले
श्रामण्यं व्याख्यातमत्र पुनरपि किमर्थमिति परिहारमाह - तत्र सर्वपरित्यागलक्षण उत्सर्ग एव
मुख्यत्वेन च मोक्षमार्गः, अत्र तु श्रामण्यव्याख्यानमस्ति, परं किंतु श्रामण्यं मोक्षमार्गो भवतीति
मुल्यत्वेन विशेषोऽस्ति ॥ २४४ ।। एवं श्रामण्यापरनाममोक्षमार्गोपसंहारमुख्यत्वेन चतुर्थस्थले गायाद्वयं
टीका :- जो ज्ञानात्मक आत्मारूप एक अग्र (विषय) को भाता है वह ज्ञेयभूत
अन्य द्रव्यका आश्रय नहीं करता; और उसका आश्रय नहीं करके ज्ञानात्मक आत्माके
ज्ञानसे अभ्रष्ट ऐसा वह स्वयमेव ज्ञानीभूत रहता हुआ, मोह नहीं करता, राग नहीं
करता, द्वेष नहीं करता, और ऐसा (अमोही, अरागी, अद्वेपी) वर्तता हुआ (वह) मुक्त
ही होता है, परन्तु वंधता नहीं है ।
इससे एकाग्रताको ही मोक्षमार्गत्व सिद्ध होता है ।।२४४।।
इसप्रकार मोक्षमार्ग प्रज्ञापन समाप्त हुआ।
अब, शुभोपयोगका प्रज्ञापन करते हैं। उसमें ( प्रथम ), शुभोपयोगियोंको
भ्रमणम्पमें गौणतया बतलाते हैं।
शुद्धोपयोगी श्रमण थे, शुभयुक्त पण शास्त्रे कया।
शुद्धोपयोगी छे निरालव, शेप सास्रव जाणवा ॥२४५॥

नगरप्रमाला -उरणानुयोगमूत्र निन- य खनु प्रामप्यपरिणति प्रतिमायापि, जोगिन पाना मानपनि प्रवृत्तमुविगुमिनप्तिम्वभावात्मतत्त्वनिम्न गुनोपयोग मकान में घने ने तदुपरनिविष्टाः कषायकुण्ठीकृत गनायो, निनान्नमुन मनम: तु मनम् । अत्र भोपचोगिनां नाना E-- *- ममम मम मागमे । अनि । समय-::-. योगमाः मोरयोगिन En: । महोत्रनाम यात्रामा पाया। का भी सांग ना:- मोगिनां 7 सामान , -प्रवचनसार- अन्वयार्थ :- [श्रमणपु] श्रमणोंके प्रति [वन्दननमस्करणाभ्यां] वन्दन - नमस्कार टीना:- सामोपयोगियोंके गद्रात्माक अनुरागयुक्त चारित्र होता है, इसलिये जितने ४८२ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अथ शुभोएयोगिधमणानां प्रवृत्तिमुपदर्शयति - वंदाणसंसह अन्सुहाणाणुगमणपडिवत्ती। समणेतु समावणओ ण णिदिदा रागचरियम्हि ॥२४७॥ वन्दननसस्करणाभ्यामभ्युत्थानानुगमनप्रतिपत्तिः । नमणेषु श्रमापनयो न निन्दिता रागचर्यायाम् ॥ २४७ ॥ नेव निषिद्धा । क्व । राच्यरियम्हि शुभरागचर्यायां सरागचारित्रावस्थायाम् । का न निन्दिता । चंदणणमंसणेहि अदभुद्वाणानुगमणपडिवत्ती वन्दननमस्काराभ्यां सहाभ्युत्थानानुगमनप्रतिपत्तिप्रवृत्तिः । सरणेनु समावणो श्रमणेषु श्रमापनयः रत्नत्रयभावनाभिघातकश्रमस्य खेदस्य विनाश इति । अनेन भावार्थ :- मात्र शुद्धात्मपरिणतिरूप रहने में असमर्थ होनेके कारण जो श्रमण पर ऐसे अर्हन्तादिके प्रति भश्लिसे तथा पर ऐसे आगमपरायण जीवोंके प्रति वात्सल्यसे चंनल [अस्थिर] हैं उस श्रमणके शुभोपयोगी चारित्र है, क्योंकि शुद्धात्मपरिणति पर- द्रव्यप्रवृत्ति [पर द्रव्यमें प्रवृत्ति के साथ मिली हुई है, अर्थात् वह शुभभावके साथ मिश्रित है ।। २४६ ।। अब, शुभोगयोगी श्रमणोंकी प्रवृत्ति बतलाते हैं गाथा २४७ सहित [अभ्युत्थानानुगमन प्रतिपत्तिः] 'अभ्युत्थान और अनुगमनरूप विनीत प्रवृत्ति करना नया [ श्रमापनयः ] उनका श्रम दूर करना वह [ रागचर्यायाम् ] रागवर्या [न निन्दिना] निन्दित नहीं है । विनिमात्र को है पनि श्रमणों के प्रति जो बन्दन-नमस्कार-अभ्युत्थान अनुगमर्ग नवर। भगोन वंदन, नमन, अनुगमन, अभ्युत्थान दो शनिवारणा न दिदित रागयत चर्या विणे ।। २४३ ।।

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४८४ -प्रवचनसार- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अनुजिघृक्षापूर्वकदर्शनज्ञानोपदेशप्रवृत्तिः शिष्यसंग्रहणप्रवृत्तिस्तत्पोषणप्रवृत्तिजिनेन्द्र- पूजोपदेशप्रवृत्तिश्च शुभोपयोगिनामेव भवन्ति, न शुद्धोपयोगिनाम् ।। २४८ ।। अथ सर्वा एव प्रवृत्तयः शुभोपयोगिनामेव भवन्तीत्यवधारयति उवकुणदि जो वि णिच्चं चादुव्वण्णस्स समणसंघस्स । कायविराधणरहिदं सो वि सरागप्पधाणो से ॥२४६॥ उपकरोति योऽपि नित्यं चातुर्वर्णस्य श्रमणसंघस्य । कायविराधनरहितं सोऽपि सरागप्रधानः स्यात् ॥ २४६ ।। ननु शुभोपयोगिनामपि क्वापि काले शुद्धोपयोगभावना दृश्यते, शुद्धोपयोगिनामपि क्वापि काले शुभोपयोगभावना दृश्यते, श्रावकाणामपि सामायिकादिकाले शुद्धभावना दृश्यते, तेषां कथं विशेषो भेदो ज्ञायत इति । परिहारमाह - युक्तमुक्त भवता, परं किंतु ये प्रचुरेण शुभोपयोगेन वर्तन्ते ते यद्यपि क्वापि काले शुद्धोपयोगभावनां कुर्वन्ति तथापि शुभोपयोगिन एव भण्यन्ते । येऽपि शुद्धोप- योगिनस्ते यद्यपि क्वापि काले शुभोपयोगेन वर्तन्ते तथापि शुद्धोपयोगिन एव । कस्मात् । बहुपदस्थ प्रधानत्वादाम्रवननिम्ववनवदिति ॥ २४ ॥ अथ काश्चिदपि याः प्रवृत्तयस्ताः शुभोपयोगिनामेवेति नियमति - उवकुणदि जो वि पिच्चं चादुव्वण्णस्स समणसंघस्स उपकरोति योऽपि नित्यं । कस्य । चातुर्वर्णस्य श्रमणसंघस्य । अत्र श्रमणशब्देन श्रमणशब्दवाच्या ऋषिमुनियत्यनगारा ग्राह्याः। "देशप्रत्यक्षवित्केवलभृदिहमुनिः स्यादृषिः प्रसृतद्धिरारूढः श्रेणियुग्मेऽजनि यतिरनगारोऽपरः साधुवर्गः । टीका :- अनुग्रह करनेकी इच्छापूर्वक दर्शनज्ञानके उपदेशकी प्रवृत्ति, शिष्य- ग्रहणकी प्रवृत्ति, उनके पोषणकी प्रवृत्ति और जिनेन्द्रपूजनके उपदेशकी प्रवृत्ति शुभोप- योगियोंके ही होती है, शुद्धोपयोगियोंके नहीं ।। २४८ ॥ अब, ऐसा निश्चित करते हैं कि सभी प्रवृत्तियाँ शुभोपयोगियोंके ही होती हैं : -- गाथा २४९ अन्वयार्थ :- [यः अपि] जो कोई (श्रमण) [नित्यं] सदा [कायविराधनरहितं] (छह) कायकी विराधनासे रहित [चातुर्वर्णस्य] चारप्रकारके [श्रमणसंघस्य] श्रमण संघका [उपकरोति] उपकार करता है, [सः अपि] वह भी [सरागप्रधानः स्यात्] रागकी प्रधानतावाला है। वण जीवकायविराधना उपकार जे नित्ये करे । चउविध साधुसंघने, ते श्रमण रागप्रधान छ ॥ २४६ ।।

ਦੀ 7} - - frਨਰ ਦਫ ਨਾ ਕਰਨ ਵਾਲ= ==== ਕਢੀ , ਸ: ਰਣ[ ਚ ਸ. ੨ ਦੁਝ = : : : : : : ਹਨ : ਸਵਾਸ -- - ਕਿ ਲfਫ ਵੀ ਫੇਲ : ਦ ਵਿ ਚ ਵੀ ਨਹੀਂ ਹੈ : ਦਾ . ਵਾਰ ਵਾਲਾ: ਲਸਣ ਦਾ ਨਈ -प्रवचनसार- ४८६ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यो हि परेषां शुद्धात्मवृत्तित्राणाभिप्रायेण वैयावृत्त्यप्रवृत्त्या स्वस्य संयमं विराधयति, स गृहस्थधर्मानुप्रवेशात् श्रामण्यात् प्रच्यवते । अतो या काचन प्रवृत्तिः सा सर्वथा संयमाविरोधेनैव विधातव्या । प्रवृत्तावपि संयमस्यैव साध्यत्वात् ॥ २५० ॥ जदि कुणदि कायखेदं वेज्जावच्चत्यमुज्जदो यदि चेत् करोति कायखेदं पट्कायविराधनाम् । कयंभूतः सन् । वैयावृत्त्यार्थमुद्यतः । समणो ण हवदि तदा श्रमणस्तपोधनो न भवति । तहि किं भवति । हवदि अगारी अगारी गृहस्थो भवति । कस्मात् । धम्मो सो सावयाणं से पकायविराधनां कृत्वा योऽसौ धर्मः स श्रावकाणां स्यात्, न च तपोधनानामिति । इदमत्र तात्पर्यम् - योऽसौ स्वशरीर पोपणार्थ शिष्यादिमोहेन वा सावधं नेच्छति तस्येदं व्याख्यानं शोभते, यदि पुनरन्यत्र सावद्यमिच्छति वैयावृत्त्यादिस्वकीयावस्थायोग्ये धर्मकार्ये नेच्छति तदा तस्य सम्यक्त्वमेव नास्तीति ।। २५० ॥ अब गाथा २५० अन्वयार्थ :- [ यदि ] यदि ( श्रमण ) [ वैयावृत्यर्थम् उद्यतः ] वैयावृत्तिके लिये उद्यमी वर्तता हुआ [ कायखेदं ] छय कायको पीडित [ करोति ] करता है तो वह [ श्रमणः न भवति ] श्रमण नहीं है, [ अगारी भवति ] गृहस्थ है; [क्योंकि [ सः ] वह [ छह कायकी विराधना सहित वैयावृत्ति ] [ श्रावकाणां धर्मः स्यात् ] धावकोंका धर्म है। टोका :- जो [श्रमण] दूसरेके शुद्धात्मपरिणतिकी रक्षा हो ऐसे अभिप्रायसे यावृत्यकी प्रवृत्ति करता हुआ अपने संयमकी विराधना करता है, वह गृहस्थधर्म प्रवेश कर रहा होनेसे थामण्यसे च्युत होता है। इससे [ ऐसा कहा है कि ] जो भी प्रवृत्ति हो वह मर्वया संयमके साथ विरोध न आये इसप्रकार ही करनी चाहिये, क्योंकि प्रवृत्तिमें भी मंयम ही साध्य है। भावार्थ :- जो श्रमण छह कायकी विराधना सहित वैयावृत्यादि प्रवृत्ति करता है, वह गृहस्थधर्म में प्रवेश करता है; इसलिये श्रमणको वैयावृत्यादिकी प्रवृत्ति मप्रकार करनी चाहिये कि जिससे संयमकी विराधना न हो। यहां इतना विशेष समझना चाहिये कि - जो स्वशरीर पोषणके लिये या मादि मोहले मावद्यको नहीं चाहता उसे तो वैयावृत्यादिमें भी सावद्यकी नहीं करनी चाहिये, वह गोभा पद है। किन्तु जो अन्यत्र तो सावद्यकी इच्छा करे किन्तु अपनी अन्याक बोन्द वैवावृत्यादि धर्मकार्य सावधको न चाहे उगरे में ही नही है ।। २० ।

४८७ - जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- अथ प्रवृत्तेविषयविभागे दर्शयति - जोण्हाणं णिरवेक्खं सागारणगारचरियजुत्ताणं । अणुकंपयोवयारं कुव्वदुः लेवो जदि वि अप्पो ॥ २५१ ॥ जनानां निरपेक्षं साकारानाकारचर्यायुक्तानाम् । अनुकम्पयोपकारं करोतु लेपो यद्यप्यल्पः ।। २५१ ॥ यद्यप्यल्पलेपो भवति परोपकारे, तथापि शुभोपयोगिभिर्धर्मोपकारः कर्तव्य इत्युपदिशति - कुव्वदु करोतु । स कः कर्ता शुभोपयोगी पुरुषः । के करोतु । अणुकंपयोवयारं अनुकम्पासहितोपकारं दयासहितं धर्मवात्सल्यम् । यदि किम् । लेवो जदि वि अप्पो "सावद्यलेशो बहुपुण्यराशी" इति दृष्टान्तेन यद्यप्यल्पलेपः स्तोकसावधं भवति । केपां करोतु । जोण्हाणं निश्चयव्यवहारमोक्षमार्ग- अव प्रवृत्तिके विषयके दो विभाग वतलाते हैं [ अर्थात् अव यह बतलाते हैं कि शुभोपयोगियोंको किसके प्रति उपकारकी प्रवृत्ति करना योग्य है और किसके प्रति नहीं ] :- । गाथा २५१ अन्वयार्थ :- [ यद्यपि अल्पः लेपः ] यद्यपि अल्प लेप होता है तथापि [ साकारानाकारचर्यायुक्तानाम् ] साकार-अनाकार चर्यायुक्त [ जनानां ] जैनोंका [अनुकम्पया] अनुकम्पासे [निरपेक्षं] निरपेक्षतया [उपकारं करोतु] (शुभोपयोग से) उपकार करो। टोका :- जो अनुकम्पापूर्वक परोपकारस्वरूप प्रवृत्ति उसके करनेसे यद्यपि अल्प लेप तो होता है, तथापि अनेकान्तके साथ मंत्रीसे जिनका चित्त पवित्र हुआ है ऐसे शुद्ध जैनोंके प्रति - जो कि शुद्धात्माके ज्ञान-दर्शनमें प्रवर्तमान ' वृत्तिके कारण साकार- अनाकार चर्यावाले हैं उनके प्रति, - शुद्धात्माकी उपलब्धिके अतिरिक्त अन्य सवकी अपेक्षा किये विना ही, उस प्रवृत्तिके करनेका निषेध नहीं है; किन्तु अल्प लेप- वृत्ति-परिणति; वर्तन; वर्तना दह । भान साकार है और दर्शन अनाकार है। छ अल्प लेप छतार दर्शनशानपरिणत जनने। निरपेक्षतापूर्वक करो उपकार अनुकंपा दई ।। २५१ ।।

-प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान या किलानुकम्पापूर्विका परोपकारलक्षणा प्रवृत्तिः सा खल्वनेकान्तमैत्रीपवित्रित- चित्तेषु शुद्धेषु जैनेषु शुद्धात्मज्ञानदर्शनप्रवृत्तवृत्तितया साकारानाकारचर्यायुक्तषु शुद्धा- स्मोपलम्भेतरसकलनिरपेक्षतयैवाल्पलेपाप्यप्रतिषिद्धा; न पुनरल्पलेपेति सर्वत्र सर्वथैवा- प्रतिषिद्धा, तत्र तथाप्रवृत्त्याशुद्धात्मवृत्तित्राणस्य परात्मनोरनुपपत्तेरिति ॥ २५१ ।। अथ प्रवृत्तेः कालविभागं दर्शयति - रोगेण वा छुधाए तण्हाए वा समेण वा रूढं । दिट्ठा समणं साहू पडिवज्जदु आदसत्तीए ॥ २५२ ॥ रोगेण वा क्षुधया तृष्णया वा श्रमेण वा रूढम् । दृष्ट्वा श्रमणं साधुः प्रतिपद्यतामात्मशक्त्या ।। २५२ ॥ परिणतजनानाम् । कथम् । णिरवेक्खं निरपेक्षं शुद्धात्मभावनाविनाशकख्यातिपूजालाभवाञ्छारहित यथा भवति । कथंभूतानां जनानाम् । सागारणगारचरियजुत्ताणं सागारानागारचर्यायुक्तानां श्रावक- तपोधनाचरणसहितानामित्यर्थः ।।२५१। कस्मिन्प्रस्तावे वैयावृत्त्यं कर्तव्यमित्युपदिति - पडिवज्जदु वाली होनेसे सबके प्रति सभी प्रकारसे वह प्रवृत्ति अनिषिद्ध हो ऐसा नहीं है, क्योंकि वहाँ ( अर्थात् यदि सबके प्रति सभी प्रकारसे की जाय तो ) उस प्रकारकी प्रवृत्तिसे परके और निजके शुद्धात्मपरिणतिकी रक्षा नहीं हो सकती। भावार्थ :- यद्यपि अनुकम्पापूर्वक परोपकारस्वरूप प्रवृत्तिसे अल्प लेप तो होता है, तथापि यदि ( १ ) शुद्धात्माकी ज्ञानदर्शनस्वरूप चर्यावाले शुद्ध जैनोंके प्रति, तथा ( २ ) शुद्धात्माकी उपलब्धिकी अपेक्षासे ही, वह प्रवृत्ति की जाती हो तो शुभोपयोगीके उसका निषेध नहीं है । परन्तु, यद्यपि अनुकम्पापूर्वक परोपकारस्वरूप प्रवृत्तिसे अल्प ही लेप होता है तथापि ( १ ) शुद्धात्माकी ज्ञानदर्शनरूप चर्यावाले शुद्ध जैनोंके अतिरिक्त दूसरोंके प्रति, तथा ( २ ) शुद्धात्माकी उपलब्धिके अतिरिक्त अन्य किसी भी अपेक्षासे, वह प्रवृत्ति करनेका शुभोपयोगीके निषेध है, क्योंकि इसप्रकारसे परको या निजको शुद्धात्मपरिणतिकी रक्षा नहीं होती ।। २५१ ।। अव, प्रवृत्तिके कालका विभाग बतलाते हैं ( अर्थात् यह बतलाते हैं कि शुभोपयोगी श्रमण को किस समय प्रवृत्ति करना योग्य है और किस समय नहीं ) आकांत देखी श्रमणने श्रम, रोग वा भूख, प्यासथी। साधु करो सेवा स्वशक्तिप्रमाण अ मुनिराजनी ॥ २५२ ।।

४८६ जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- यदा हि समधिगतशुद्धात्मवृत्तेःश्रमणस्य तत्प्रच्यावनहेतोः कस्याप्युपसर्गस्योपनिपातः स्यात्, स शुभोपयोगिनः स्वशक्त्या प्रतिचिकीर्षा प्रवृत्तिकालः । इतरस्तु स्वयं शुद्धात्मवृत्त समधिगमनाय केवलं निवृत्तिकाल एव ॥ २५२ ॥ अथ लोकसंभाषणप्रवृत्ति सनिमित्तविभागं दर्शयति प्रतिपद्यतां स्वीकरोतु । कया । आवसत्तीए स्वशक्तया । स कः कर्ता । साहू रत्नत्रयभावनया स्वात्मानं साधयतीति साधुः । कम् । समणं जीवितमरणादिसमपरिणामत्वाच्छ्रमणस्तं श्रमणम् । दिट्ठा दृष्ट्वा । कथंभूतम् । रुढं रूढं व्याप्तं पीडितं कदर्थितम् । केन । रोगेण वा अनाकुलत्वलक्षणपरमात्मनो विलक्षणेनाकुलत्वोत्पादकेन रोगेण व्याधिविशेषेण वा, छुधाए क्षुधया, तण्हाए वा तृष्णया वा, समेण वा मार्गोपवासादिश्रमेण वा । अत्रेदं तात्पर्यम् - स्वस्थभावनाविघातकरोगादिप्रस्तावे वैयावृत्त्यं करोति, शेषकाले स्वकीयानुष्ठानं करोतीति, ।। २५२ ।। अथ शुभोपयोगिनां तपोधनवैयावृत्त्यानिमित्तं गाथा २५२ अन्वयार्थ :- [ रोगेण वा ] रोगसे, [ क्षुधया ] क्षुधासे, [ तृष्णया वा ] तृपासे [ श्रमेण वा ] अथवा श्रमसे [ रूढम् ] आक्रांत [ श्रमणं ] श्रमणको [ दृष्ट्वा ] देखकर [ साधुः ] साधु [ आत्मशक्त्या ] अपनी शक्तिके अनुसार [ प्रतिपद्यताम् ] वैयावृत्यादि करो। टीका जव शुद्धात्मपरिणतिको प्राप्त श्रमणको, उससे च्युत करे ऐसा कारण - कोई भी उपसर्ग - आजाय, तव वह काल, शुभोपयोगीको अपनी शक्ति के अनुसार 'प्रतिकार करनेकी इच्छारूप प्रवृत्तिका काल है; और उसके अतिरिक्तका काल अपनी शुद्धात्मपरिणतिकी प्राप्तिके लिये केवल निवृत्तिका काल है । भावार्थ :- जव शुद्धात्मपरिणतिको प्राप्त श्रमणके स्वस्थ भावका नाश करनेवाला रोगादिक आजाय तव उस समय शुभोपयोगी साधुको उनकी नेवाकी इच्छारूप प्रवृत्ति होती है, और शेष कालमें शुद्धात्मपरिणतिको प्राप्त करनेके लिये निज अनुष्ठान होता है ।। २५२ ।। अब लोगोंके साथ बातचीत करनेकी प्रवृत्ति उसके निमित्तके विभाग सहित वतलाते हैं ( अर्थात् शुभोपयोगी श्रमणको लोगोंके साथ बातचीतकी प्रवृत्ति किस निमित्तसे करना योग्य है और किस निमित्तले नहीं, सो कहते हैं ) प्रतिकार-उपाय; सहाय ।

-प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान वेज्जाबच्चणिमित्तं गिलाणगुरुबालवुड्ढसमणाणं । लोगिगजणतंभासा ण णिदिदा वा सुहोवजुदा ॥ २५३ ॥ दयावृत्यनिमित्तं ग्लानगुरुवालवृद्धश्रमणानाम् । लौकिकजनसंभापान निन्दिता वा शुभोपयुता ।। २५३ ॥ समधिगतगुदात्मवृत्तीनां ग्लानगुरुशालवृद्धश्रमणानां वैयावृत्यनिमितमेव शुद्धा. मलियननंभावगं प्रसिद्ध, न पुनरन्यनिमित्तमपि ॥ २५३ ।। गुलाब गुलोपयोगस्य गौणमुस्यविभागं दर्शयति शुद्धात्मपरिणतिसे विरुद्ध ऐसे रागके साथ संबंधवान है; और वह शुभोपयोग गृहस्यों के ४६१ जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- एसा पसत्थभूदा समणाणं वा पुणो घरत्थाणं । चरिया परेत्ति भणिदा ताएव परं लहदि सोक्खं ॥२५४ ॥ एषा प्रशस्तभूता श्रमणानां वा पुनर्गृहस्थानाम् । चर्या परेति भणिता तयैव परं लभते सौख्यम् ।। २५४ ।। स्तपोधनगीणवृत्त्या श्रावस्तु मुख्यवृत्त्या कर्तव्य इत्याख्याति - भणिदा भणिता कथिता । का कर्मतापन्ना । चरिया चर्या चारित्रमनुष्ठानम् । किंविशिष्टा। एसा एपा प्रत्यक्षीभूता। पुनश्च किरूपा। पसत्यभूदा प्रशस्तभूता धर्मानुरागरूपा । केषां संवन्धिनी। समणाणं वा श्रमणानां वा पुणो घरत्थाणं गृहस्थानां वा पुनरियमेव चर्या परेत्ति परा सर्वोत्कृप्टेति । ताएव परं लहदि सोपखं तयैव शुभोपयोगचयंया परंपरया मोक्षसुखं लभते गृहस्थ इति । तथाहि - तपोधनाः शेषतपोधनानां वैयावृत्त्यं कुर्वाणाः सन्तः कायेन किमपि निरवद्ययावृत्त्यं कुर्वन्ति; वचनेन धर्मोपदेशं च । गाथा २५४ अन्वयार्थ :- [एषा] यह [प्रशस्तभूता] प्रशस्तभूत [चर्या] चर्या [श्रमणानां] श्रमणोंके (गौण) होती है [वा गृहस्थानां पुनः] और गृहस्थोंके तो [परा] मुख्य होती है, [इति भणिता] ऐसा (शास्त्रोंमें) कहा है; [तया एव] उसीसे [परं सौख्यं लभते] (परम्परासे) गृहस्थ परम सौख्यको प्राप्त होता है । टीका इसप्रकार शुद्धात्मानुरागयुक्त प्रशस्तचर्यारूप जो यह शुभोपयोग वणित किया गया है वह यह शुभोपयोग, शुद्धात्माकी प्रकाशक सर्वविरतिको प्राप्त श्रमणोंके कषायकणके सद्भावके कारण प्रवर्तित होता हुआ, गीण होता है, क्योंकि वह शुभोपयोग - । तो, सर्वविरतिके अभावसे 'शुद्धात्मप्रकाशनका अभाव होनेने कपायके सद्भावके कारण प्रवर्तमान होता हुआ भी, मुख्य है, क्योंकि - जैसे ईधनको स्फटिकके संपर्कसे सूर्यके तेजका अनुभव होता है (और इसलिये वह क्रमशः जल उठता है) उसीप्रकार - गृहस्थको रागके संयोगसे शुद्धात्माका अनुभव होता है, और (इसलिये वह शुभोपयोग) क्रमशः परम निर्वाणसौख्यका कारण होता है। चारित्रदशामें प्रवर्तमान उग्र शुखात्मप्रकाशनको ही यहां मुशात्मप्रकासन मिना'; मम्मष्टि मापक उगका अभाव है । शेप, दर्शनापेक्षासे तो सम्पष्टि गहस्पले भी मुहारमाला प्रशासन है ही। आ शुभ चर्या होय गृहस्पने तेना बडे जा २५४ ॥ १ ..

४६२
[
मागोमासान
एवमेप शुद्धात्मानुरागयोगिप्रशस्तनारिप उगणितः शुभोपयोगः तमगंगुशात्म-
प्रकाशिकां समस्तविरतिमुपेयुगां करायकासद्धानात्प
वात्प्रतंगानः शुशात्मवृत्तिविरुद्धराग
संगतत्वाद्गौणः श्रमणानां; गृहिणां तु समरतविरतेरभावेन शुदात्मप्रकाशनरयाभावा-
कषायसद्भावात्पवर्तमानोऽपि, स्फटिकसंपणार्फतेजस इवैधसां, रागसंयोगेन शुजात्मनोऽनु-
भवात्कमतः परमनिर्वाणसौख्यकारणत्वाच मुरयः ॥ २५४ ।।
अथ शुभोपयोगस्य कारणवपरीत्यात् फलवपरीत्यं साधयति -
रागो पसत्थभूदो वत्थुविसेसेण फलदि विवरीदं ।
णाणाभूसिगदाणिह बीजाणिव सस्सकालम्हि ।। २५५॥
रागः प्रशस्तभूतो वस्तुविशेषेण फलति विपरीतम् ।
नानाभूमिगतानीह वीजानीव सस्यकाले ॥२५५॥
शेषमीषधान्नपानादिकं गृहस्थानामधीनं, तेन कारणेन वैयावृत्त्यरूपो धर्मो गृहस्थानां मुख्यः,
तपोधनानां गौणः । द्वितीयं च कारणं - निर्विकारचिच्चमत्कारभावनाप्रतिपक्षभूतेन विषयकपाय-
निमित्तोत्पन्ने नात रौद्रदुर्ध्यानद्वयेन परिणतानां गृहस्थानामात्माश्रितनिश्चयधर्मस्यावकाशो नास्ति,
वैयावृत्त्यादिधर्मेण दुनिवञ्चना भवति, तपोधनसंसर्गेण निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गोपदेशलाभो भवति ।
ततश्च परंपरया निर्वाणं लभन्ते इत्यभिप्राय: ।। २५४ ।। एवं शुभोपयोगितपोधनानां शुभानुष्ठान-
भावार्थ :- दर्शनापेक्षासे तो श्रमणको तथा सम्यग्दृष्टि गृहस्थको शुद्धात्माका
ही आश्रय है, परन्तु चारित्रापेक्षासे श्रमणके मुनियोग्य शुद्धात्मपरिणति मुख्य होनेसे शुभो-
पयोग गौण है और सम्यग्दृष्टि गृहस्थके मुनियोग्य शुद्धात्मपरिणतिको प्राप्त न हो
सकनेसे अशुभवंचनार्थ शुभोपयोग मुख्य है । सम्यग्दृष्टि गृहस्थके अशुभसे (-विशेष अशुद्ध
परिणतिसे ) छूटने के लिये प्रवर्तमान जो यह शुभोपयोगका पुरुषार्थ वह भी शुद्धिका
ही मन्दपुरुषार्थ है, क्योंकि शुद्धात्मद्रव्यके मंद आलम्बनसे अशुभ परिणति बदलकर
शुभ परिणति होती है और शुद्धात्मद्रव्यके उग्र आलम्बनसे शुभपरिणति भी बदलकर
शुद्धपरिणति होजाती है ॥ २५४ ।।
अब, ऐसा सिद्ध करते हैं कि शुभोपयोगको कारणकी विपरीततासे फलकी विप-
रीतता होती है :-
फल होय छे विपरीत वस्तुविशेषथी शुभरागने ।
निष्पत्ति विपरीत होय भूमिविशेषथी ज्यम बीजने ॥ २५५ ॥

- ४६३ जैन शास्त्रमाला -चरणानुयोगसूचक चूलिका- यथैकेषामपि वीजानां भूमिवैपरीत्यान्निष्पत्तिवपरीत्यं, तथैकस्यापि प्रशस्तराग- लक्षणस्य शुभोपयोगस्य पात्रवैपरीत्यात्फलवैपरीत्यं कारणविशेषात्कार्यविशेषस्यावश्यं- भावित्वात् ।। २५५ ॥ अथ कारणवैपरीत्यफलवपरीत्ये दर्शयति छदुमत्थविहिदवत्थुसु वदणियमज्झयणझाणदाणरदो। ण लहदि अपुणभावं भावं सादप्पगं लहदि ॥ २५६ ॥ छद्मस्थविहितवस्तुषु व्रतनियमाध्ययनध्यानदानरतः । न लभते अपुनर्भावं भावं सातात्मकं लभते ॥ २५६ ।। कथनमुख्यतया गाथाष्टकेन द्वितीयस्थलं गतम् । इत अर्ध्व गाथापट्कपर्यन्तं पात्रापात्रपरीक्षामुख्यत्वेन व्याख्यानं करोति । अथ शुभोपयोगस्य पात्रभूतवस्तुविशेपात्फलविशेपं दर्शयति - फल दि फलति, फलं ददाति । स कः । रागो रागः । कथंभूतः । पसत्यभूदो प्रशस्तभूतो दानपूजादिरूपः । कि फलति । विवरीदं विपरीतमन्यादृशं भिन्नभिन्नफलम् । केन करणभूतेन । वत्थुविसेसेण जघन्य- मध्यमोत्कृष्टभेदभिन्नपात्रभूतवस्तुविशेषेण । अत्रार्थे दृष्टान्तमाह - णाणाभूमिगदाणिह बीजाणिव सस्सकालम्हि नानाभूमिगतानीह वीजानि इव सस्यकाले धान्यनिप्पत्तिकाल इति । अयमत्रार्थः - यथा जघन्यमध्यमोत्कृष्टभूमिविशेषेण तान्येव बीजानि भिन्नभिन्नफलं प्रयच्छन्ति, तथा स एव वीजस्थानीय- शुभोपयोगो भूमिस्थानीयपात्रभूतवस्तुविशेषेण भिन्नभिन्नफलं ददाति । तेन किं सिद्धम् । यदा पूर्वसूत्रकथितन्यायेन सम्यक्त्वपूर्वकः शुभोपयोगो भवति तदा मुख्यवृत्त्या पुण्यवन्धो भवति, परंपरया निर्वाणं च । नो चेत्पुण्यवन्धमात्रमेव ॥ २५५ ।। अथ कारणवपरीत्यात्फलमपि विपरीतं भवतीति गाथा २५५ अन्वयार्थ :- [इह नानाभूमिगतानि वीजानि इव] जैसे इस जगतमें अनेक प्रकारकी भूमियोंमें पड़े हुए बीज [सस्यकाले] धान्यकालमें विपरीतरूपसे फलते हैं, उसीप्रकार [प्रशस्तभूतः रागः] प्रशस्तभूत राग [वस्तुविशेषेण] वस्तु-भेदसे (-पात्र भेदसे) [विपरीतं फलति] विपरीतरूपसे फलता है । टीका :- जैसे वीज ज्यों के त्यों होने पर भी भूमिकी विपरीतताने निम्पत्तिको विपरीतता होती है, (अर्थात् अच्छी भूमिमें उसी बीजका अच्छा अन्न उत्पन्न होता है, और खराव भूमिमें वही खराव होजाता है या उत्पन्न ही नहीं होता), उनीप्रकार छयस्थ-अभिहित ध्यानदाने व्रतनियमपटनादियः । रत जीव मोक्ष लहे नहीं, बस भाव शातात्मक लहे ।। २५६ ।।

४६४ -प्रवचनसार-- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान शुभोपयोगस्य सर्वज्ञव्यवस्थापितवस्तुषु प्रणिहितस्य पुण्योपचयपूर्वकोऽपुनर्भावोप- लम्भः किल फलं, तत्तु कारणवैपरीत्याद्विपर्यय एव । तत्र छद्मस्थव्यवस्थापितवस्तूनि कारणवैपरीत्यं; तेषु व्रतनियमाध्ययनध्यानदानरतत्वप्रणिहितस्य शुभोपयोगस्यापुनर्भाव- शून्यकेवलपुण्यापसदप्राप्तिः फलनैपरीत्यं तत्सुदेवमनुजत्वम् ॥ २५६ ।। तमेवार्थ द्रढयति - ण लहदि न लभते । स कः कर्ता। वदणियमझयणझाणदाणरदो व्रतनियमा- ध्ययनध्यानदानरतः । केषु विपये यानि बतादीनि । छदुमत्थविहिदवत्थुसु छद्मस्थविहितवस्तुपु अल्पज्ञानिपुरुषव्यवस्थापितपात्रभूतवस्तुपु । इत्थंभूतः पुरुषः कं न लभते । अपुणब्भावं अपुनर्भव- शब्दवाच्यं मोक्षम् । तर्हि किं लभते । भावं सादप्पगं लहदि भावं सातात्मकं लभते । भावशब्देन सुदेवमनुष्यत्वपर्यायो ग्राह्यः । स च कथंभूतः । सातात्मकः सद्वद्योदयरूप इति । तथाहि - ये केचन निश्चयव्यवहारमोक्षमार्ग न जानन्ति, पुण्यमेव मुक्तिकारणं भणन्ति, ते छद्मस्थशब्देन गृह्यन्ते, न च गणधरदेवादयः । तेः छद्मस्थैरज्ञानिभिः शुद्धात्मोपदेशशून्यर्ये दीक्षितास्तानि छद्मस्थविहितवस्तूनि भण्यन्ते । तत्पात्रसंसर्गेण यव्रतनियमाध्ययनदानादिकं करोति तदपि शुद्धात्मभावनानुकूलं न भवति, ततः कारणान्मोक्षं न लभते । सुदेवमनुष्यत्वं लभत इत्यर्थः ।। २५६ ।। अथ सम्यक्त्वव्रतरहितपात्रेषु प्रशस्तरागस्वरूप शुभोपयोग ज्योंका त्यों होनेपर भी पात्रकी विपरीततासे फलकी विपरीतता होती है, क्योंकि कारणके भेदसे कार्यका भेद अवश्यम्भावी (अनिवार्य) है ।। २५५ ।। अव कारणकी विपरीतता और फलकी विपरीतता बतलाते हैं :- गाथा २५६ अन्वयार्थ :- [छद्मस्थविहितवस्तुषु] जो जीव छद्मस्थविहित वस्तुओंमें (छद्मस्थ- अज्ञानीके द्वारा कथित देव-गुरु-धर्मादिमें) [व्रतनियमाध्ययनध्यानदानरतः] व्रत-नियम- अध्ययन-ध्यान-दानमें रत होता है वह जीव [अपुनर्भावं] मोक्षको [न लभते] प्राप्त नहीं होता, (किन्तु) [सातात्मकं भावं] सातात्मक भावको [लभते] प्राप्त होता है । टीका :- 'सर्वज्ञस्थापित वस्तुओंमें युक्त शुभोपयोगका फल पुण्यसंचयपूर्वक मोक्षकी प्राप्ति है । वह फल, कारणको विपरीतता होनेसे विपरीत ही होता है । वहां, छद्मस्थस्थापित वस्तुयें वे कारणविपरीतता है; उनमें व्रत-नियम-अध्ययन-ध्यान-दानरत- रूपसे युक्त शुभोपयोगका फल जो मोक्षशून्य केवल 'पुण्यापसदकी प्राप्ति है वह फलकी विपरीतता है; वह फल सुदेव-मनुप्यत्व है ।। २५६ ।। . सर्वज्ञस्थापित-सर्वज्ञ कयित। पुण्यापमद-पुण्य अपसद, मधमपुण्य, हतपुण्य । १ w- - ४६५ - जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- अथ कारणवपरीत्यफलवपरीत्ये एव व्याख्याति अविदिदपरमत्येसु य विसयकसायाधिगेसु पुरिसेसु । जुळें कदं व दत्तं फलदि कुदेवेसु मणुवेसु ।। २५७ ।। अविदितपरमार्थेषु च विषयकपायाधिकेषु पुरुषेषु । जुष्टं कृतं वा दत्तं फलति कुदेवेषु मनुजेषु ॥ २५७ ।। यानि हि छमस्थव्यवस्थापितवस्तूनि कारणवैपरीत्यं; ते खलु शुद्धात्मपरिज्ञान- शून्यतयानवाप्तशुद्धात्मवृत्तितया चाविदितपरमार्था विषयकषायाधिकाः पुरुषाः तेषु शुभोपयोगात्मकानां जुष्टोपकृतदत्तानां या केवलपुण्यापसदप्राप्तिः फलवैपरीत्यं तत्कुदेव- मनुजत्वम् ॥ २५७ ॥ भक्तानां कुदेवमनुजत्वं भवतीति प्रतिपादयति - फलदि फलति । केषु । कुदेवेसु मणवेसु कुत्सितदेवेषु मनुजेषु। किं कर्तुं । जुटुंजुष्टं सेवा कृता, कदं व कृतं वा किमपि वैयावृत्त्यादिकम्, दत्तं दत्तं किमप्याहारादिकम् । केषु । पुरिसेतु पुरुषेषु पात्रेषु । किविशिष्टेषु । अविदिदपरमत्येनु च अविदित- परमार्थेषु च, परमात्मतत्त्वश्रद्धानज्ञानशून्येषु । पुनरपि किस्पेषु। विसयकसायाधिगेतु विषय- कपायाधिकेपु, विषयकपायाधीनत्वेन निविषयशुद्धात्मस्वरूपभावनारहितेषु इत्यर्थः ।। २५७ ।। अध अव (इस गाथामें भी) कारणविपरीतता और फलविपरीतता ही बतलाते हैं :- - বাধ্য ২৪ अन्वयार्थ :- [अविदितपरमार्थेषु] जिन्होंने परमार्थको नहीं जाना है, [च] और [विषयकषायाधिकेषु] जो विषय - कपायमें अधिक हैं, [पुरपेषु] ऐले पुरुषोंके प्रति [जुष्टं कृतं वा दत्तं] सेवा, उपकार या दान [कुदेवेषु मनुजेपु] बुदेवरूपमें कुमनुष्यरूपमें [फलति] फलता है । टीका :- जो छअस्थस्थापित वस्तुयें हैं वे कारणविपरीतता है; ये विपरीत कारण] वास्तवमें [१] शुद्धात्मनानसे शून्यताके कारण, 'परमार्थफे अजान' और [२] शुद्धात्मपरिणतिको प्राप्त न करनेसे 'विषयकपायमें अधिक' पने पुरुष है। उनके प्रति शुभोपयोगात्मक जीवोंको - सेवा, उपकार या दान करनेवाले जीवोंको-को फेवन पुण्यापसदकी प्राप्ति वह फलविपरीतता है; वह [फल ] कृदेवमनुप्यत्व है ।।२५७।। परमार्थथी अनभिल, दिपयरूपायलधिक जनोपरे । उपकार-सेवा-दान सर्व फुदेवमनुजपणे पन्ने ।। २५७ ।। - - -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान अब कारणवपरीत्यात् फलमविपरीतं न सिध्यतीति श्रद्धापयति - जदि ते विसयकसाया पाव त्ति परूविदा व सत्थेसु । किह ते तप्पतिवद्धा पुरिसा णित्यारगा होति ॥ २५८ ॥ यदि ते विषयरुपायाः पापमिति प्ररूपिता वा शास्त्रेषु । कायं ते तत्प्रतिबद्धाः पुरुषा निस्तारका भवन्ति ॥ २५८ ॥ विषय गणस्तावत्यापमेव; तद्वन्तः पुरुषा अपि पापमेव तदनुरक्ता अपि पापा. नाम्यान पालेव मन्ति । ततो विषयकवायवन्तः स्वानुरक्तानां पुण्यायापि न कल्प्यन्ते, पुनः गानिस्तारणाय । ततो न तेभ्यः फलमविपरीतं सिद्ध्येत् ॥ २५८ ।। - - ४६७ जैन शास्त्रमाला -चरणानुयोगसूचक चूलिका- अथाविपरीतफलकारणं कारणमविपरीतं दर्शयति उवरदपावो पुरिसो समभावो धम्मिगेसु सब्वेसु । गुणसमिदिदोवत्तेवी हवदि स भागी सुमग्गस्स ॥ २५६ ॥ उपरतपापः पुरुषः समभावो धार्मिकेषु सर्वेषु । गुणसमितितोपसेवी भवति स भागी सुमार्गस्य ॥ २५६ ।। उपरतपापत्वेन, सर्वमिमध्यस्थत्वेन, गुणग्रामोपसेवित्वेन च सम्यग्दर्शनज्ञान- चारित्रयोगपद्यपरिणतिनिवृत्त काग्र्यात्मकसुमार्गभागी, स श्रमणः स्वयं परस्य मोक्षपुण्या- यतनत्वादविपरीतफलकारणं कारणमविपरीतं प्रत्येयम् ।। २५६ ।। दातृ णां पुण्यविनाशका एवेति ।। २५८ ।। अथ पात्रभूततपोधनलक्षणं कथयति -- उपरतपापत्वेन, सर्वधार्मिकसमदशित्वेन, गुणग्रामसेवकत्वेन च स्वस्य मोक्षकारणत्वात्परेषां पुण्यकारणत्वाच्चेत्यंभूत- गुणयुक्तः पुरुषः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रैकाग्यलक्षणनिश्चयमोक्षमोर्गस्य भाजनं भवतीति ।। २५६ ।। . विषयकषायवान् पुरुषरूप विपरीत कारणका फल अविपरीत नहीं होता । ) ॥२५८।। अव अविपरीत फलका कारण ऐसा जो 'अविपरीत कारण' वह बतलाते हैं :- . गाथा २५९ अन्वयार्थ :- [उपरतपापः] जिसके पाप रुक गया है, [सर्वेषु धामिकेषु समभावः] जो सभी धार्मिकोंके प्रति समभाववान है, और [गुणसमितितोपसेवी] जो गुणसमु- दायका सेवन करनेवाला है, [सः पुरुषः] वह पुरुष [सुमार्गस्य] सुमार्गका [भागी भवति] भागी होता है । (अर्थात् सुमार्गवान् है) टोका :- पापके रुक जानेसे सर्वधर्मियोंके प्रति स्वयं मध्यस्थ होनेने और गुण- समूहका सेवन करनेसे जो श्रमण सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रके युगपतपनेरूप परिणतिमे रचित एकाग्रतास्वरूप सुमार्गका भागी (सुमार्गशाली-सुमार्गका भाजन) है वह निजको और परको मोक्षका और पुण्यका आयतन (स्थान) है इसलिये वह (श्रमण) अविपरीत कलका कारण ऐसा 'भविपरीत कारण' है, ऐसी प्रतीति करनी चाहिये ।। २५६ ।। - ते पुरुष जाण सुमार्गशाली, पाप-उपरम जेहने । समभाव ज्यां सौ धामिरे, गुणसमूह सेवन जेहने ॥ २५६ ।।

४१८
राशन-मा
[ भगान
श्रीमान
अथाविपरीतफलकारणं कारणविपरोनंगागाति -
असुभोवयोगरहिदा तुद्ध बजुत्ता सुहोबजुत्ता बा।
णित्थारयति लोगं तेतु पसत्थं लहदि भत्तो ।। २६० ॥
अशुभोपयोगरहिताः शुदोपयुक्ताः शुभोपयुक्ता वा ।
निस्तारयन्ति लोकं तेषु प्रशस्तं लभते भक्तः ।। २६० ॥
अथ तेपामेव पानभूततपोधनाना प्रकारान्तरेण लक्षणमुपलक्षगति - शुशेषगोगशुभोपयोगपरिणतपुरुषाः
पात्रं भवन्तीति । तद्यथा- निर्विकल्पसमाभिवलेन शुभाशुभोपयोगरगरहित काले कदानिद्वीतराग-
चारिप्रलक्षणशुद्धोपयोगयुक्ताः, कदाचित्पुनर्मोहदेषाणुभरागरहितकाले सरागनारिलाणशुभोप-
योगयुक्ताः सन्तो भव्यलोक निस्तारयन्ति, तेषु च भक्तो भन्यवर पुण्डरीक: प्रशस्तफलभूतं स्वर्ग लभते,
अब, अविपरीत फलका कारण, ऐसा जो ‘अविपरीत कारण' है उसे विशेष
समझाते हैं :
गाथा २६०
अन्वयार्थ :-
[अशुभोपयोगरहिताः] जो अशुभोपयोगरहित वर्तते हुए [शुद्धोप-
युक्ताः ] शुद्धोपयुक्त [ वा ] अथवा [ शुभोपयुक्ताः ] शुभोपयुक्त होते हैं, वे
( श्रमण ) [ लोकं निस्तारयन्ति ] लोगोंको तार देते हैं; ( और ) [ तेषु भक्तः ]
उनके प्रति भक्तिवान जीव [ प्रशस्तं ] प्रशस्त ( पुण्य ) को [ लभते ] प्राप्त
करता है।
यथोक्त लक्षणवाले श्रमण ही - जो कि मोह, द्वेष और अप्रशस्त
रागके उच्छेदसे अशुभोपयोगरहित वर्तते हुए, समस्त कषायोदयके
कदाचित् शुद्धोपयुक्त [ शुद्धोपयोगमें युक्त ] और प्रशस्त रागके विपाकसे कदाचित
शुभोपयुक्त होते हैं वे - स्वयं मोक्षायतन [ मोक्षके स्थान] होनेसे लोकको तार
हैं, और उनके प्रति भक्तिभावसे जिनके प्रशस्त भाव प्रवर्तता है ऐसे पर जीव पुण्यके
भागी ( पुण्यशाली ) होते हैं ।। २६० ।।
टीका :-
-
विच्छेदसे
देते
अशुभोपयोग रहित श्रमणो - शुद्ध वा शुभयुक्त जे ।
ते लोकने तारे; अने तद्भक्त पामे पुण्यने ॥ २६० ॥

४88
जैन शास्त्रमाला]
-चरणानुयोगसूचक चूलिका-
यथोक्तलक्षणा एव श्रमणा मोहद्वेषाप्रशस्तरागोच्छेदादशुभोपयोगवियुक्ताः सन्तः,
सकलकषायोदयविच्छेदात् कदाचित् शुद्धोपयुक्ताः प्रशस्तरागविपाकात्कदाचिच्छुभोप-
युक्ताः, स्वयं मोक्षायतनत्वेन लोकं निस्तारयन्ति; तद्भक्तिभावप्रवृत्तप्रशस्तभावा भवन्ति
परे च पुण्यभाजः ॥ २६० ।।
अथाविपरीतफलकारणाविपरीतकारणसमुपासनप्रवृत्ति सामान्यविशेषतो विधे-
यतया सूत्रद्वतेनोपदर्शयति -
दिट्ठा पगदं वत्थु अन्भुट्ठाणप्पधाणकिरियाहि ।
वट्टदु तदो गुणादो
विसेसिदवो ति उवदेसो ॥ २६१ ।।
दृष्ट्वा प्रकृतं वस्त्वभ्युत्थानप्रधानक्रियाभिः ।
वर्ततां ततो गुणाद्विशेषितव्य इति उपदेशः ।। २६१ ।।
परंपरया मोक्षं चेति भावार्थः ।। २६० ।। एवं पात्रापात्रपरीक्षाकथनमुख्यतया गाथापट्केन तृतीयस्थलं
गतम् । इत ऊवं आचारकथितक्रमेण पूर्व कथितमपि पुनरपि दृढीकरणार्थ विशेषेण तपोधनसमाचार
कथयति । अथाभ्यागततपोधनस्य दिनत्रयपर्यन्तं सामान्यप्रतिपत्ति, तदनन्तरं विशेषप्रतिपत्ति
दर्शयति - बट्टदु वर्तताम् । स कः। अत्रत्य नाचार्यः। कि कृत्वा । दिट्ठा दृष्ट्वा । किम् । वत्यु
तपोधनभूतं पात्रं वस्तु । किविशिष्टम् । पगदं प्रकृतं अभ्यन्तरनिरुपरागशुद्धात्मभावनाजापकबहिरङ्ग-
निग्रंन्यनिर्विकाररूपम् । काभिः कृत्वा वर्तताम् । अन्भुट्ठाणप्पधाणकिरियाहिं अभ्यागतयोग्याचार-
अब, अविपरीत फलका कारण ऐसा जो 'अविपरीत कारण उसकी उपासनारूप
प्रवृत्ति सामान्य और विशेषरूपसे करने योग्य है ऐसा दो सूत्रों द्वारा बतलाते हैं -
गाथा २६१
अन्वयार्थ :- [प्रकृतं वस्तु] 'प्रकृत वस्तुको [दृष्ट्वा ] देवकर [प्रथम तो]
[ अन्युत्थानप्रधाननियाभिः ] 'अभ्युत्थान आदि मियाजाने [ वतंताम् ] [श्रमण]
वर्ती; [ ततः ] फिर [ गुणात् ] गुणानुनार [ विगेपितव्यः ] भेद करना, -
९
प्रकृत पस्तु-अदित परतु; भविपरीत पात्र (जन्मतर-निगम का बादनायो शानदाना
जो बहिरंग-
निध-निर्विकारस्प है उस रूपवाले घमणको यहां प्रत-दाद' कहा है।)
अन्त्थान-सम्मानार्थ सटे हो जाना और सम्मुम जाना।
दर्ता भ्रमण,
प्रकृत वस्तु
देखी
अन्युत्पान आदि मिया की।
पछी दर्तनीय
गुणानुसार
विपदो ॥ २६ ॥

५००
-प्रवचनसार-
-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
श्रमणानामात्मविशुद्धिहेतौ प्रकृते वस्तुनि तदनुकूलक्रियाप्रवृत्त्या गुणातिशयाधान-
मप्रतिषिद्धम् ॥ २६१ ॥
अब्भुट्ठाणं गहणं उवासणं पोसणं च सक्कारं ।
अंजलिकरणं पणमं भणिदमिह गुणाधिगाणं हि ॥ २६२ ॥
अभ्युत्थानं ग्रहणमुपासनं पोषणं च सत्कारः ।
अञ्जलिकरणं प्रणामो भणितमिह गुणाधिकानां हि ।। २६२ ॥
विहिताभिरभ्युत्थानादिक्रियाभिः । तदो गुणादो ततो दिनत्रयानन्तरं गुणाद्गुणविशेषात् विसेसिव्वो
तेन आचार्येण स तपोधनो रत्नत्रयभ
यभावनावृद्धिकारणक्रियाभिविशेपितव्यः ति उवदेसो इत्युपदेशः
सर्वज्ञगणधरदेवादीनामिति ॥२६१ ।। अथ तमेव विशेपं कथयति । भणिदं भणितं कथितं इह
[ इति उपदेशः ] ऐसा उपदेश है।
टीकाः - श्रमणोंके आत्मविशुद्धिकी हेतुभूत प्रकृत वस्तु ( श्रमण ) के प्रति
उसके योग्य ( श्रमण योग्य ) क्रियारूप प्रवृत्तिसे गुणातिशयताका आरोपण करनेका
निषेध नहीं है।
भावार्थ :- यदि कोई श्रमण अन्य श्रमणको देखे तो प्रथम ही, मानो वे अन्य
श्रमण गुणातिशयवान् हों इसप्रकार उनके प्रति ( अभ्युत्थानादि ) व्यवहार करना
चाहिये । फिर उनका परिचय होनेके बाद उनके गुणानुसार बर्ताव करना
चाहिये ।। २६१ ।।
( इसप्रकार पहला सूत्र कहकर अब इसी विषयका दूसरा सूत्र कहते हैं:-)
गाथा २६२
अन्वयार्थ :- [ गुणाधिकानां हि ] गुणोंमें अधिक (श्रमणों) के प्रति [ अभ्युः
त्यानं ] अभ्युत्थान, [ ग्रहणं ] ग्रहण ( आदरसे स्वीकार ), [ उपासनं ] उपासन
(सेवा), [ पोषणं ] पोपण (उनके अशन, शयनादिकी चिन्ता), [सत्कारः] सत्कार
( गुणों की प्रशंसा ), [ अञ्जलिकरणं ] अञ्जलि करना ( विनयपूर्वक हाथ जोड़ना )
[ च ] और [ प्रणामः ] प्रमाण करना [ इह ] यहाँ [ भणितम् ] कहा है ।
गुणयो अधिक श्रमणो प्रति सत्कार, अन्युत्थान ने ।
अंजलिकरण, पोपण, ग्रहण, सेवन अहीं उपदिष्ट छे॥ २६२ ॥

नन शास्त्रमाला -~~~चरणानुयोगसूचक चूलिका- श्रमणानां स्वत्तोऽधिकगुणानामभ्युत्थानग्रहणोपासनपोषणसत्काराञ्जलिकरण- प्रणामप्रवृत्तयो न प्रतिषिद्धाः ।। २६२ ।। अथ श्रमणाभासेषु सर्वाः प्रवृत्तीः प्रतिषेधयति - अन्भुट्ट्या समणा सुत्तत्थविसारदा उवासया । संजमतवणाणड्ढा पणिवदणीया हि समणेहिं ।। २६३ ।। अभ्युत्थेयाः श्रमणाः सूत्रार्थविशारदा उपासेयाः । संयमतपोज्ञानाध्याः प्रणिपतनीया हि श्रमणैः ।। २६३ ।। अस्मिन्प्रथे । केषां संवन्धी । गुणाधिगाणं हि गुणाधिकतपोधनानां हि स्फुटम् । किं भणितम् । मन्भुट्ठाणं गहणं उवासणं पोसणं च सत्कारं अंजलिकरणं पणमं अभ्युत्थानग्रहणोपासनपोपणसत्कारा. खलिकरणप्रणामादिकम् । अभिमुखगमनमभ्युत्थानम्, ग्रहणं स्वीकारः, उपासनं शुद्धात्मभावना- सहकारिकारणनिमित्तं सेवा, तदर्थमेवाशनशयनादिचिन्ता पोपणम्, भेदाभेदरत्नत्रयगुणप्रकाशनं सत्कारः, बद्धावलिनमस्कारोऽयलिकरणम्, नमोऽस्त्वितिवचनव्यापार: प्रणाम इति ।। २६२ ।। अचाभ्यागतानां तदेवाभ्युत्थानादिकं प्रकारान्तरेण निदिशति - अट्ठया यद्यपि चारित्रगुणेनाधिका न भवन्ति, तपसा वा, तथापि सम्यग्नानगुणेन ज्येष्ठत्वाच्छ्र तविनयार्थमन्युत्येयाः अभ्युत्थानयोग्या भवन्ति । के ते । समणा श्रमणा निर्ग्रन्थाचार्याः । किविशिष्टा: । सुत्तत्यविसारदा विशुद्धज्ञानदर्शन- स्वभावपरमात्मतत्त्वप्रभृत्यनेकान्तात्मकपदार्थेपु वीतरागसर्वनप्रणोतमार्गेण प्रमाणनयनिक्षेपैविचार टोका :-श्रमणोंको अपनेसे अधिक गुणवान ( श्रमण ) के प्रति अभ्युत्थान, ग्रहण, उपासन, पोषण, सत्कार, अंजलिकरण और प्रणामरूप प्रवृत्तियां निषिद्ध नहीं हैं ।। २६२ ।। अब श्रमणभासोंके प्रति समस्त प्रवृत्तियोंका निषेध करते हैं : - गाथा २६३ अन्वयार्थ :- [श्रमणः हि] श्रमणोंके द्वारा [मूत्रार्यविशारदाः] मूत्रायविशारद (सूत्रोंके और सूत्रकथित पदार्थोके जानमें निपुण) तथा [संयमतपोजानादयाः] मंयम- तपनानाढय, (संयम, तप और आत्मनानमें समृद्ध) [प्रमणः] अमन [अन्युत्थेयाः उपासेयाः प्रणिपतनीयाः] अभ्युत्थान, उपासना और प्रणाम करने योग्य है । मुनिसूत्र-अर्थ प्रवीण संबमनानतपनमृद्धने । प्रणिपात, अन्यत्पान, सेवा साधुझे कर्तव्य है ।। २६३ ।।

-प्रवचनसार-
-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
सूत्रार्थवैशारद्यप्रवर्तितसंयमतपःस्वतत्त्वज्ञानानामेव
श्रमणानामभ्युत्थानादिकाः
प्रवृत्तयोऽप्रतिषिद्धा, इतरेषां तु श्रमणाभासानां ताः प्रतिषिद्धा एव ।। २६३ ।।
अथ कीदृशः श्रमणाभासो भवतीत्याख्याति
ण हवदि समणो त्ति मदो संजमतवस्त्तसंपजुत्तो वि।
जदि सद्दहदि ण अत्थे आदपधाणे जिणक्खादे ॥ २६४ ॥
न भवति श्रमण इति मतः संयमतपःसूत्रसंप्रयुक्तोऽपि ।
यदि श्रद्धत्ते नार्थानात्मप्रधानान् जिनाख्यातान् ।। २६४ ॥
चतुरचेतसः सूत्रार्थविशारदाः । न केवलमभ्युत्थेयाः, उवासेया परमचिज्ज्योतिःपरमात्मपदार्थ-
परिज्ञानार्थमुपासेयाः परमभक्त्या सेवनीयाः । संजमतवणाणड्डा पणिवदीया हि संयमतपोज्ञानाढयाः
प्रणिपतनीयाः हि स्फुटं । बहिरङ्गन्द्रियसंयमप्राणसंयमबलेनाभ्यन्तरे स्वशुद्धात्मनि यत्नपरत्वं
संयमः । बहिरङ्गानशनादितपोवलेनाभ्यन्तरे परद्रव्येच्छानिरोधेन च स्वस्वरूपे प्रतपनं विजयनं तपः ।
बहिरङ्गपरमागमाभ्यासेनाभ्यन्तरे स्वसंवेदनज्ञानं सम्यग्ज्ञानम् । एवमुक्तलक्षणैः संयमतपोज्ञानराठ्याः
परिपूर्णा यथासंभवं प्रतिवन्दनीयाः । कैः । समहि श्रमणैरिति । अत्रेदं तात्पर्यम् - ये बहुश्रुता अपि
चारित्राधिका न भवन्ति, तेऽपि परमागमाभ्यासनिमित्तं यथायोग्यं वन्दनीयाः। द्वितीयं च कारणम्
ते सम्यक्त्वे ज्ञाने च पूर्वमेव दृढतराः, अस्य तु नवतरतपोधनस्य सम्यक्त्वे ज्ञाने चापि दाढच नास्ति ।
तहि स्तोकचारित्राणां किमर्थमागमे वन्दनादिनिषेधः कृत इति चेत् । अतिप्रसंगनिषेधार्थमिति ।।२६३।।
टीका :- जिनके सूत्रोंमें और पदार्थोमें विशारदपनेके द्वारा संयम, तप और स्व-
तत्वका ज्ञान प्रवर्तता है उन श्रमणोंके प्रति ही अभ्युत्थानादिक प्रवृत्तियां अनिषिद्ध हैं,
परन्तु उनके अतिरिक्त अन्य श्रमणाभासोंके प्रति वे प्रवृत्तियाँ निषिद्ध ही हैं ।। २६३ ।।
अब, कैसा जीव श्रमणाभास है सो कहते हैं :
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गाथा २६४
अन्वयार्थ :- [ संयमतपःसूत्रसंप्रयुक्तः अपि] सूत्र, संयम और तपसे संयुक्त होने
पर भी [ यदि] यदि (वह जीव) [जिनाख्यातान् ] जिनोक्त [आत्मप्रधानाच] आत्मप्रधान
[अर्थान् ] पदार्थोका [न श्रद्धत्ते] श्रद्धान नहीं करता तो वह [श्रमणः न भवति]
श्रमण नहीं है, - [इति मतः] ऐसा (आगममें) कहा है ।
शास्त्र कहा - तपसूत्रसंयमयुक्तपण साधु नहीं।
जिन-उपत आत्मप्रधान सर्व पदार्थ जो श्रद्धे नहीं ॥ २६४ ॥

- जैन शास्त्रमाला] चरणानुयोगसूचक चूलिका ५०३ आगमज्ञोऽपि, संयतोऽपि,तपःस्थोऽपि जिनोदितमनन्तार्थनिर्भरं विश्व स्वेनात्मना ज्ञेयत्वेन निष्पीतत्वादात्मप्रधानमश्रद्दधानः श्रमणाभासो भवति ॥ २६४ ॥ अथ श्रामण्येन सममननुमन्यमानस्य विनाशं दर्शयति- अववददि सासणत्थं समणं दिट्ठा पदोसदो जो हि । किरियासु णाणुमण्णदि हवदि हि सो गठ्ठचारित्तो ।। २६५ ।। अपवदति शासनस्थं श्रमणं दृष्ट्वा प्रद्वेषतो यो हि । क्रियासु नानुमन्यते भवति हि स नष्टचारित्रः ।। २६५ ॥ जय श्रमणाभानः कोहशो भवतीति पृप्टे प्रत्युत्तरं ददाति - ण हवदि समणो स श्रमणो न भवति त्ति मदो इति मतः सम्मतः । क्व । आगमे । कयंभूतोऽपि । संजमतवसुत्तसंपजुत्तो वि संयमतप:श्रुतैः संप्रयुक्तोऽपि सहितोऽपि । यदि किम् । जदि सहहदि ण यदि चेन्मूत्रयादिपञ्चविंशतिसम्यक्त्वमल- सहितः सन् न श्रद्धत्ते, न रोचते, न मन्यते । कान् । अत्ये पदार्थान् । कयंभूतान् । आदपधाणे निर्दोपिपरमात्मप्रभृतीन् । पुनरपि कयंभूतान् । जिणखादे वीतरागसर्वजिनेवरेणाख्यातान्, दिव्यध्वनिना प्रणीतान्, गणघरदेवग्रंन्यविरचितानित्ययः ।। २६४ ।। अथ मार्गस्थधमणपणे दोष टीका :- आगमका ज्ञाता होनेपर भी, संयत होनेपर भी, तपमें स्थित होनेपर भी, जिनोक्त अनन्त पदार्थोसे भरे हुए विश्व को - जो कि ( विश्व ) अपने आत्मासे ज्ञेयरूपसे पिया जाता होनेके कारण 'आत्मप्रवान है उसका जो जीव श्रदान नहीं करता वह श्रमणाभास है ।। २६४ ।। अव, जो श्रामण्यसे समान हैं उनका अनुमोदन ( आदर ) न करनेवालेका विनाश बतलाते हैं : गाथा २६५ अन्वयार्थ :- [यः हि] जो [शासनस्पं श्रमगं] गासनस्य (जिनदेवके शासन में स्थित ) श्रमणको [दृष्ट्वा] देखकर [प्रपतः] हेपमे [अपवदति ] उनका अपवाद करता है और [नियासु न अनुमन्यते] (मकामादि) क्रियाओक करनेमें अनुमत (प्रसन्न) नहीं है [सः नष्टचारित्रः हि भवति] उनका चारित्र नष्ट होता है। मात्मप्रधान जिसमें मारमा प्रधान है ऐला; मा मस्त दिनो सान: मन पर शि- विश्व के समस्त पदामि-प्रधान है। मुनि शासने स्पित देखीने जेपी निदा परे । अनुमत नहीं किरिया विधे, ते नात करण नमो करे ॥२६५ ।। - [ .

अब, जो श्रामण्यमें अधिक हो उसके प्रति जैसे कि वह श्रामण्यमें हीन (अपनेसे :::::: ":"r-r7 श्रमणं शासनस्तमपि प्रोगामात मिन प्राणिना चारित्रं नश्यति ।। २६५ ।। अथ श्रामण्येनाधिकं होनमिवानरतो विनाशं गर्शगति गुणदोधिगस्त विणयं पडिच्छगो जो वि होमि रामणो त्ति होज्ज गुणाधरो जदि सो होदि होदि अणंतसंसारी ।। २६६ ।। गुणतोऽधिकस्य विनयं प्रत्येपको योऽपि भवामि घमण इति । भवन गुणाघरो यदि भवत्यनन्तसंसारी ॥ २६६ ॥ दर्शयति - अववददि अपवदति दुपयत्यपवादं करोति । गकः। जो हि ग: कर्ता हि स्फुटम् । कम् । समणं श्रमणं तपोधनम् । कगंभूतम् । सासणत्यं शासन निश्चयपहारमोक्षमार्गस्थम् । कस्मात् । पदोसदो निर्दोपिपरमात्मभावनाविलक्षणात प्रदेशातपायाव । कि कत्या पूर्वम् । दिट्ठा दृष्ट्वा । न केवलं अपवदति, णाणुमण्णदि नानुमन्यते । कासु विणगे । किरियासु यथायोग्य वन्दनादिक्रियासु । हवदि हि सो भवति हि स्फुटं सः । किंविशिष्टः। णट्टचारित्तो कथंचिदति- प्रसंगानप्टचारित्रो भवतीति । तथाहि - मार्गस्थतपोधनं हवा गदि कनिमात्सर्यवशाहोपग्रहणं करोति तदा चारित्रभ्रष्टो भवति स्फुटं; पश्चादात्मनिन्दां कृत्वा निवर्तते तदा दोपो नास्ति, कालान्तरे वा निवर्तते तथापि दोपो नास्ति । यदि पुनस्तत्रैवानुवन्धं कृत्वा तीनकषायवशादतिप्रसंग करोति तदा चारित्रभ्रष्टो भवतीति । अयमत्र भावार्थः - बहुश्रुतै रल्पश्रुततपोधनानां दोपो न ग्राह्यस्तैरपि तपोधनः किमपि पाठमात्रं गृहीत्वा तेषां दोपो न ग्राह्यः, किंतु किमपि सारपदं गृहीत्वा स्वयं भावनैव कर्तव्या। कस्मादिति चेत् । रागद्वेषोत्पत्ती सत्यां बहुश्रुतानां श्रुतफलं नास्ति, तपोधनानां तपःफलं चेति ॥ २६५ ।। अत्राह शिष्यः - अपवादव्याख्यानप्रस्तावे शुभोपयोगी व्याख्यातः, टीका :- जो श्रमण द्वेषके कारण शासनस्थ श्रमणका भी अपवाद बोलता है और ( उसके प्रति सत्कारादि ) क्रियायें करनेमें अनुमत नहीं है, वह श्रमण द्वेषसे 'कषायित होनेसे उसका चारित्र नष्ट हो जाता है ।। २६५ ।। . मुनिपने में नीचा) हो ऐसा आचरण करनेवालेका विनाश बतलाते हैं :- - . कपायित-क्रोधमानादिक कपायवाले; रंगित; विकारी। जे हीनगुण होवा छतां 'हुं पण श्रमण छु' मदकरे । इच्छे विनय गुण-अधिक पास, अनंतसंसारी बने ।।२६६ ॥

जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- स्वयं जघन्यगुणः सन् श्रमणोऽहमपीत्यवलेपात्परेषां गुणाधिकानां विनयं प्रतीच्छन् श्रामण्यावलेपवशात् कदाचिदनन्तसंसार्यपि भवति ।। २६६ ॥ अथ श्रामण्येनाधिकस्य हीनं सममिवाचरतो विनाशं दर्शयति पुनरपि किमर्थ अत्र व्याख्यानं कृतमिति । परिहारमाह - युक्तमिदं भवदीयवचनं, किंतु तत्र सर्वत्याग- लक्षणोत्सर्गव्याख्याने कृते सति तत्रासमर्थतपोधनैः कालापेक्षया किमपि जानसंयमगीचोपकरणादिक ग्राह्यमित्यपवादच्याख्यानमेव मुख्यम् । अत्र तु यथा भेदनयेन सम्यग्दर्शनजानचारित्रतपश्चरणरूपा चतुर्विधाराधना भवति, सेवाभेदनयेन सम्यक्त्वचारित्ररूपेण द्विधा भवति, तत्राप्यभेदविवक्षया. पुनरेव वीतरागचारित्राराधना, तथा भेदनयेन सम्यग्दर्शनसम्यग्ज्ञानसम्यकचारित्ररूपस्त्रिविध- मोक्षमार्गो भवति, स एवाभेदनयेन श्रामण्यापरमोक्षमार्गनामा पुनरेक एव, स चाभेदरूपो मुख्यवृत्त्या 'एवन्गगदो समणों' इत्यादिचतुर्दशगाथाभिः पूर्वमेव व्याख्यातः । अयं तु भेदरूपो मुख्यवृत्त्या शुभोपयोगरूपेणेदानी व्याख्यातो, नास्ति पुनरुक्तदोष इति । एवं समाचार विशेषविवरणरूपेण चतुर्थस्थले गाथाष्टकं गतम् । अथ स्वयं गुणहीनः सन् परेपां गुणाधिकानां योऽसौ विनयं वाञ्छति, तन्य गुणविनाशं दर्शयति - सो होदि अणंतसंसारी स कचिदनन्तसंसारी संभवति । यः कि करोति । पडिच्छगो जो दु प्रत्येपको यस्तु, अभिलापको पेक्षक इति । कम् । विणयं वन्दनादिविनयम् । कस्य संवन्धिनम् । गुणदोधिगस्स बाह्याभ्यन्तररत्नत्रयगुणाभ्यामधिकस्यान्यतपोधनस्य । केन कृत्वा । होमि समणो ति अहमपि श्रमणो भवामीत्यभिमानेन गण । यदि किम् । होज्जं गुणाधरो जदि निश्चयव्यवहाररत्नत्रयगुणाभ्यां हीनः स्वयं यदि चेद्भवतीति । अयमत्रार्थः - यदि चेद्गुणाधिकम्यः सकाशाद्गर्वेण पूर्व विनयवाञ्छां करोति, पश्चाहिवेकवलेनात्मनिन्दा करोति, तदानन्तसंसारी न भवति, यदि पुनस्तत्रैव मिथ्याभिमानेन ग्यातिपूजालाभार्थ दुराग्रहं करोति तदा भवति । अथवा यदि कालान्तरेऽप्यात्मनिन्दा करोति तथापि न भवतीति ।। २६६ ।। अय स्वयमधिक गुणा: सन्तो यदि गाथा २६६ अन्वयार्थ :- यः] जो श्रमण [यदि गुणाधरः भवन् ] गुणों में हीन होनेपर भी [अपि श्रमणः भवामि ] 'मैं भी श्रमण हूँ' [इति] ऐसा मानकर अर्थात् गर्व करके [गुणतः अधिकस्य ] गुणों में अधिक (ऐने श्रमण) के पानले [विनयं प्रत्येषक:] विनय (करवाना) चाहता है [सः] वह [अनन्तसंसारी भवति ] अनन्तनंजारी होता है। टीका :- जो श्रमण स्वयं जघन्य गुणोंवाला होनेपर भी मैं नी श्रमण मे गर्वके कारण दूसरे अधिक गुणवालों (भ्रमणों) ने विनयकी छा करता है, वह धामण्यके गर्वके वशसे कदाचित् अनन्त संसानी भी होता है ।। २६६ ।। अब, जो भ्रमण धामण्यने अधिक हो वह, जो अपने दोन मा नि समान जैसा (अपने बराबरी वाले जना) आचरण करे तो या विकाराने :- .

-- -- . [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान यतः सकलस्यापि विश्ववाचकस्य सल्तक्ष्मणः शब्दब्रह्मणस्तद्वाच्यस्य सकलस्यापि सल्लक्ष्मणो विश्वस्य च युगपदनुस्यूततदुभयज्ञेयाकारतयाधिष्ठानभूतस्य सल्लक्ष्मणो ज्ञातृ- तत्त्वस्य निश्चयनानिश्चितसूत्रार्थपदत्वेन, निरुपरागोपयोगत्वात् समितकपायत्वेन, बहु- शोऽभ्यस्तनिष्कम्पोपयोगत्वात्तपोऽधिकत्वेन च सुप्ठ संयतोऽपि सप्ताचिःसंगतं तोयमिवा- वश्यंभाविविकारत्वात् लौकिकसंगादसंयत एव स्यात् । ततस्तत्संगः सर्वथा प्रतिषेध्य एव ॥ २६८ ॥ अथ लौकिकलक्षणमुपलक्षयति 'जे अजधागहिदत्था' इत्यादि गाथापश्नकम् । एवं द्वात्रिंगद्गाथाभिः स्थलपन केन चतुर्थान्तराधिकारे समुदायपातनिका । तद्यथा - अथ लौकिकसंसर्ग प्रतिपेधयति - णिच्छिदसुत्तत्यपदो निश्चितानि ज्ञातानि निर्णीतान्यनेकान्तस्वभावनिजशुद्धात्मादिपदार्थप्रतिपादकानि सूत्रार्थपदानि येन स भवति निश्चितसूत्रार्थपदः, समिदकसाओ परविपये क्रोधादिपरिहारेण तथाभ्यन्तरे परमोपशमभावपरिणत- निजशुद्धात्मभावनाबलेन च शमितकपायः, तवोधिगो चावि अनशनादिवहिरङ्गतपोबलेन तथैवाभ्यन्तरे शुद्धात्मतत्त्वभावनाविपये प्रतपनाद्विजयनाच्च तपोऽधिकश्चापि सन् स्वयं संयतः कर्ता लोगिगजण- संसगं ण चयदि जदि लौकिकाः स्वेच्छाचारिणस्तेषां संस! लौकिकसंसर्गस्तं न त्यजति यदि वेद संजदो ण हवदि तहि संयतो न भवतीति । अयमत्रार्थः - स्वयं भावितात्मापि यद्यसंवृतजनसंसर्ग न त्यजति तदातिपरिचयादग्निसङ्गतं जलमिव विकृतिभावं गच्छतीति ।।२६८ ।। 'जिसने कषायोंको शमित किया है ऐसा' हो, और (३) निष्कंप उपयोगका 'बहुशः अभ्यास करनेसे 'अधिक तपवाला' हो, - इसप्रकार (इन तीन कारणोंसे) जो जीव भलीभांति संयत हो, वह भी लौकिक (जनोंके) संगसे असंयत ही होता है, क्योंकि अग्निकी संगतिमें रहे हुए पानीकी भांति उसे विकार अवश्यंभावी है । इसलिये लौकिक संग सर्वथा निषेध्य ही है। भावार्थ :- जो जीव संयत हो, अर्थात् (१) जिसने शब्दब्रह्मको और उसके वाच्य- रूप समस्त पदार्थों को जाननेवाले ज्ञातृतत्वका निर्णय किया हो, (२) जिसने कषायोंको शमित किया हो (३) और जो अधिक तपवान् हो, वह जीव भी लौकिकजनके संगसे असंयत हो होता है; क्योंकि जैसे अग्निके संगसे पानीमें उष्णतारूप विकार अवश्य होता है, उसीप्रकार लौकिकजनके संसर्गको न छोड़नेवाले संयतके असंयततारूप विकार अवश्य होता है । इसलिये लौकिक जनोंका संग सर्वप्रकारसे त्याज्य ही है ।। २६८ ।। अब, 'लौकिक' (जन) का लक्षण कहते हैं :

५०६ जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- णिग्गंथं पन्वइदो बदृदि जदि एहिहिं कस्मेहिं । सो लोगिगो त्ति भणिदो संजमतवसंपजुत्तो वि ॥ २६६ ॥ नैर्ग्रन्थ्यं प्रद्रजितो वर्तते यद्यैहिकैः कर्मभिः । त लौकिक इति भणितः संयमतपःसंप्रयुक्तोपि ॥२६६ ।। प्रतिज्ञातपरमनन्थ्यप्रव्रज्यत्वावुर्ढसंयमतपोभारोऽपि मोहबहुलतया श्लयीकृतशुद्ध- चेतनव्यवहारो मुहुर्मनुष्यव्यवहारेण व्याधूर्णमानत्वादैहिककर्मानिवृत्तौ लौकिक इत्यु- च्यते ।। २६६ ।। - 1 अयानुकम्पालक्षणं कथ्यते तिसिदं व क्खिदं वा दुहिदं दळूण जो हि दुहिदमणो । पडिवज्जदि तं किवया तस्सेसा होदि अणुकंपा ॥*३६ ॥ तिसिदं भक्खिदं वा दुहिदं दळूण जो हि दुहिदमणो पडिवज्जदि तृपितं वा बुभुक्षितं वा दुःखितं वा दृष्ट्वा कमपि प्राणिनं यो हि स्फुटं दुःखितमनाः सन् प्रतिपद्यते स्वीकरोति । के कर्मतापन्नम् । तं तं प्राणिनम् । कया। किवया कृपया दयापरिणामेन । तस्सेसा होदि अणुकंपा तस्य पुरुपस्यैपा प्रत्यक्षीभूता शुभोपयोगरूपानुकम्पा दया भवतीति । इमां चानुकम्पां ज्ञानी स्वस्थ- भावनामविनाशयन् संक्लेशपरिहारेण करोति । अज्ञानी पुनः संश्लेशेनापि करोतीत्यर्थः ।। *१६॥ अब लौकिकलक्षणं कथयति - जिग्गंयो पव्वइदो वस्त्रादिपरिग्रहरहितत्वेन निर्ग्रन्योऽपि दोक्षाग्रहणेन प्रश्नजितोऽपि वट्टदि जदि वर्तते यदि चेत् । कः । एहिगेहि कम्मेहि ऐहिकः कर्मभिः भेदाभेदरत्नमय- भावनाशक: ख्यातिपूजालाभनिमित्तज्योतिषमन्त्रवादवेदकादिभिरहिकजीवनोपायकर्मभिः । सोलोगिगो ति भणिदो स लौकिको व्यावहारिक इति भणितः । किविशिष्टोऽपि । संजमतय संजुदो चापि द्रव्यरूपसंयमतपोभ्यां संयुक्तचापीत्यर्थः ।। २६६ ।। अयोत्तमसंसर्गः कर्तव्य इत्युपदिशति - तम्हा गाथा २६९ अन्वयार्थ :- [नन्थ्यं प्रवजितः] जो (जीव) निर्ग्रयरूपले दीक्षित होने के कारण [संयमतपःसंप्रयुक्तः अपि] संयमतपसंयुक्त हो उसे भी, [यदि सः] यदि यह [ऐहिकः कर्मभिः वर्तते ] ऐहिक कार्यों सहित वर्तता हो तो, [लोपि.शः इति भणितः] 'नोकिया' कहा गया है। टोका :- परमनिर्ग्रथतारूप प्रव्रज्याकी प्रतिमा ली होनेने जो नीद मंयमनके भारको वहन करता हो उसे भी, वदि उन मोहकी बहुलतावे कारण मुळचेतन व्य. निग्रंथरूप दीक्षा वडे संयमतपे संपृक्त जे। लौकिक कह्यो तेने च, जो छोडे न अहिक कर्मने ।। २६९ ।।

--प्रवचनसार--- [भगवान श्रीमान्द-महान यतः सकलस्यापि विश्ववाचकस्य सल्लक्ष्मणः शब्दब्रह्मणस्तद्वान्यस्य सकलस्यापि सल्लक्ष्मणो विश्वस्य च युगपदनुस्यूततदुभयज्ञेयाकारतयाधिष्ठानभूतस्य सल्लक्ष्मणो ज्ञातृ- तत्त्वस्य निश्चयनानिश्चितसूत्रार्थपदत्वेन, निरुपरागोपयोगत्वात् समितकपायत्वेन, बहु- शोऽभ्यस्तनिष्कम्पोपयोगत्वात्तपोऽधिकत्वेन च सुष्ठु संयतोऽपि सप्ताचिःसंगतं तोयमिवा- वश्यंभाविविकारत्वात् लौकिकसंगादसंयत एव स्यात् । ततस्तत्संगः सर्वथा प्रतिपेध्य एव ।। २६८ ॥ अथ लौकिकलक्षणमुपलक्षति 'जे अजधागहिदत्था' इत्यादि गाथापञ्चकम् । एवं द्वात्रिंशद्गाथाभिः स्थलपश्च केन चतुर्थान्तराधिकारे समुदायपातनिका । तद्यथा - अथ लौकिकसंसर्ग प्रतिषेधयति - णिच्छिदसुत्तत्यपदो निश्चितानि ज्ञातानि निर्णीतान्यनेकान्तस्वभावनिजशुद्धात्मादिपदार्थप्रतिपादकानि सूत्रार्थपदानि येन स भवति निश्चितसूत्रार्थपदः, समिदकसाओ परविपये क्रोधादिपरिहारेण तथाभ्यन्तरे परमोपशमभावपरिणत- निजशुद्धात्मभावनाबलेन च शमितकपायः, तवोधिगो चावि अनशनादिबहिरङ्गतपोबलेन तथैवाभ्यन्तरे शुद्धात्मतत्त्वभावनाविषये प्रतपनाद्विजयनाच्च तपोऽधिकश्चापि सन् स्वयं संयतः कर्ता लोगिगजण- संसग्गं ण चयदि जदि लौकिका: स्वेच्छाचारिणस्तेषां संसर्गो लौकिकसंसर्गस्तं न त्यजति यदि चेत् संजदो ण हवदि तहि संयतो न भवतीति । अयमत्रार्थः - स्वयं भावितात्मापि यद्यसंवृतजनसंसर्ग न त्यजति तदातिपरिचयादग्निसङ्गतं जलमिव विकृतिभावं गच्छतोति ॥२६८ ।। 'जिसने कषायोंको शमित किया है ऐसा' हो, और (३) निष्कंप उपयोगका 'बहुशः अभ्यास करनेसे 'अधिक तपवाला' हो, - इसप्रकार (इन तीन कारणोंसे) जो जीव भलीभांति संयत हो, वह भी लौकिक (जनोंके) संगसे असंयत ही होता है, क्योंकि अग्निकी संगतिमें रहे हुए पानीकी भांति उसे विकार अवश्यंभावी है । इसलिये लौकिक संग सर्वथा निषेध्य ही है । भावार्थ :- जो जीव संयत हो, अर्थात् (१) जिसने शब्दब्रह्मको और उसके वाच्य- रूप समस्त पदार्थों को जाननेवाले ज्ञातृतत्वका निर्णय किया हो, (२) जिसने कषायोंको शमित किया हो (३) और जो अधिक तपवान् हो, वह जीव भी लौकिकजनके संगसे असंयत हो होता है; क्योंकि जैसे अग्निके संगसे पानीमें उष्णतारूप विकार अवश्य होता है, उसीप्रकार लौकिकजनके संसर्गको न छोड़नेवाले संयतके असंयततारूप विकार अवश्य होता है । इसलिये लौकिक जनोंका संग सर्वप्रकारसे त्याज्य ही है ।। २६८ ।। अब, 'लौकिक' (जन) का लक्षण कहते हैं :- ३ - बहुशः (१) बहुत; खूब (२) बारंवार ।

५०६ न शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- णिग्गंथं पव्वइदो वट्टदि जदि एहिहिं कस्मेहि । सो लोगिगो त्ति भणिदो संजमतवसंपजुत्तो वि ॥२६६ ॥ नम्रन्थ्यं प्रव्रजितो वर्तते यद्यैहिकः कर्मभिः । स लौकिक इति भणितः संयमतपःसंप्रयुक्तोपि ॥ २६६ ।। प्रतिज्ञातपरमनैर्ग्रन्थ्यप्रव्रज्यत्वादुडूढसंयमतपोभारोऽपि मोहबहुलतया श्लथीकृतशुद्ध- चेतनव्यवहारो मुहुर्मनुष्यव्यवहारेण व्याधूर्णमानत्वादैहिककर्मानिवृत्तौ लौकिक इत्यु- च्यते ॥ २६६॥ वा अयानुकम्पालक्षणं कथ्यते तिसिदं बुभुक्खिदं वा दुहिदं दळूण जो हि दुहिदमणो । पडिवज्जदि तं किवया तस्सेसा होदि अणुकंपा ।। *३६ ॥ तिसिदं बुभुक्खिदं वा दुहिदं दळूण जो हि दुहिदमणो पडिवज्जदि तृपितं वा बुभुक्षितं दुःखितं वा दृष्ट्वा कमपि प्राणिनं यो हि स्फुटं दुःखितमना: सन् प्रतिपद्यते स्वीकरोति । के कर्मतापन्नम् । तं तं प्राणिनम् । कया। किवया कृपया दयापरिणामेन । तस्सेसा होदि अणुकंपा तस्य पुरुपस्यैषा प्रत्यक्षीभूता शुभोपयोगरूपानुकम्पा दया भवतीति । इमां चानुकम्पां ज्ञानी स्वस्थ- भावनामविनाशयन् संक्लेशपरिहारेण करोति । अज्ञानी पुनः संक्लेशेनापि करोतीत्यर्थः ।। *३६ ॥ अथ लौकिकलक्षणं कथयति -णिग्गंथो पव्वइदो वस्त्रादिपरिग्रहरहितत्वेन निम्रन्योऽपि दीक्षाग्रहणेन प्रबजितोऽपि वट्टदि जदि वर्तते यदि चेत् । कैः । एहिगेहि कम्मेहि ऐहिकः कर्मभिः भेदाभेदरत्नमय- भावनाशक: ख्यातिपूजालाभनिमित्तंर्योतिषमन्त्रवादवेदकादिभिरैहिकजीवनोपायकर्मभिः। सोलोगिगो त्ति भणिदो स लौकिको व्यावहारिक इति भणितः । किविशिष्टोऽपि । संजमतवसंजुदो चाथि द्रव्यरूपसंयमतपोभ्यां संयुक्तश्चापीत्यर्थः ।। २६६ ।। अयोत्तमसंसर्गः कर्तव्य इत्युपदिशति - तम्हा गाथा २६९ अन्वयार्थ :- [नर्ग्रन्थ्यं प्रवजितः] जो (जीव) निर्ग्रयरूपमे दीक्षित होने के कारण [संयमतपःसंप्रयुक्तः अपि] संयमतपसंयुक्त हो उसे भी, [यदि सः] यदि वह [ऐहिकः कर्मभिः वर्तते] ऐहिक कार्यों सहित वर्तता हो तो, [लोफियः इति भणितः] 'लौकिक' कहा गया है। टोका :- परमनिर्ग्रथतारूप प्रव्रज्याकी प्रतिना ली होनेने जो जीव संयमताके भारको वहन करता हो उसे भी, यदि उन मोहकी बहुलनाके कारण मुलचनन काय. निग्रंथरूप दीक्षा बडे संयमतपे मंयुक्त लौकिक कहो तेने य, जो छोडे न अहि कर्मने ।। २६६ ।।

५१०
-प्रवचनसार-
-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान
अथ सत्संगं विधेयत्वेन दर्शयति
तम्हा सलं गुणादो समणो समणं गुहिं वा अहियं ।
अधिनसदु तम्हि णिच्चं इच्छदि जदि दुक्ख परिमोक्खं ॥ २७० ॥
तस्मात्समं गुणात् श्रमणः श्रमणं गुणर्वाधिकम् ।
अधिवसतु तत्र नित्यं इच्छति यदि दुःखपरिमोक्षम् ।। २७० ॥
यस्माद्धीनसंसर्गाद्गुणहानिर्भवति तस्मात्कारणात् अधिवसदु अधिवसतु तिष्ठतु । स कः कर्ता । समणो
श्रमणः । क्व । तम्हि तस्मिन्नधिकरणभूते । णिच्चं नित्यं सर्वकालम् । तस्मिन्कुत्र । समणं श्रमणे ।
लक्षणवशादधिकरणे कर्म पठ्यते । कथंभूते श्रमणे । समं समे समाने । कस्मात् । गुणादो वाह्या-
भ्यन्तररत्नत्रयलक्षणगुणात् । पुनरपि कथंभूते । अहियं वा स्वस्मादधिके वा। कैः । गुर्गोहं
मूलोत्तरगुणैः । यदि किम् । इच्छदि जदि इच्छति वाञ्छति यदि चेत् । कम् । दुक्खपरिमोक्खं
स्वात्मोत्थसुखविलक्षणानां नारकादिदुःखानां मोक्षं दुःखपरिमोक्षमिति । अथ विस्तरः - यथाग्नि-
हारको छोड़कर निरंतर मनुष्यव्यहारके द्वारा चक्कर खानेसे 'ऐहिक कर्मोसे अनिवृत्त
हो तो, 'लौकिक' कहा जाता है ।। २६६ ।।
अब, सत्संग विधेय (-करने योग्य) है, ऐसा बतलाते हैं
गाथा २७०
अन्वयार्थ :- [तस्मात् ] (लौकिकजनके संगसे संयत भी असंयत होता है)
इसलिये [यदि] यदि [श्रमणः] श्रमण [दुःखपरिमोक्षम् इच्छति] दुःखसे परिमुक्त
होना चाहता हो तो वह [गुणात्समं] समान गुणोंवाले श्रमणके [वा] अथवा [गुणैः
अधिकं श्रमणं तत्र] अधिक गुणोंवाले श्रमणके संगमें [नित्यम् ] सदा [अधिवस्तु]
निवास करो।
टोका :- आत्मा परिणामस्वभाववाला है इसलिये अग्निके संगमें रहे हुए पानीकी
भाँति (संयतके भी) लौकिकसंगसे विकार अवश्यंभावी होनेसे संयत भी असंयत ही हो
जाता है । इसलिये दुःखमोक्षार्थी (दु:खोंसे मुक्ति चाहनेवाले) श्रमणको (१) समान
' ऐहिक-लौकिक ।
तेथी श्रमणने होय जो दुःखमुक्ति केरी भावना ।
तो नित्य वसवु समान अगर विशेष गुणीना संगमां ॥२७० ॥

: ५११ . - -- जैन शास्त्रमाला] -चरणानुयोगसूचक चूलिका- यतः परिणामस्वभावत्वेनात्मनः सप्ताचिःसंगतं तोयमिवावश्यंभाविविकारत्वा- लौकिकसंगात्संयतोऽप्यसंयत एव स्यात्। ततो दुःखमोक्षार्थिना गुणैः समोऽधिको वा श्रमणः श्रमणेन नित्यमेवाधिवसनीयः तथास्य शोतापवरककोणनिहितशीततोयवत्सम- गुणसंङ्गावगुणरक्षा शीततरतुहिनशर्करासंपृक्तशीततोयवत् गुणाधिकसंगात् गुण- वृद्धिः ।। २७० ॥ *इत्यध्यास्य शुभोपयोगजनितां कांचित्प्रवृत्ति यतिः सम्यक् संयमसौष्ठवेन परमां झामन्निवृत्ति क्रमात् । हेलाकान्तसमस्तवस्तुविसरप्रस्ताररम्योदयां ज्ञानानन्दमयी दशामनुभवत्वेकान्ततः शाश्वतीम् ॥ १७ ॥ इति शुभोपयोगप्रज्ञापनम् । संयोगात जलस्य शीतलगुणविनाशो भवति तथा व्यावहारिकजनसंसर्गात्संयतस्य संयमगुणविनाशो भवतीति नात्वा तपोधनः कर्ता समगुणं गुणाधिकं वा तपोधनमाश्रयति, तदास्य तपोधनस्य यया शीतलभाजनसहितशीतलजलस्य शीतलगुणरक्षा भवति तथा समगुणसंसर्गाद्गुणरक्षा भवति । यया च तन्येव जलस्य कर्पूरशर्करादिशीतलद्रव्यनिक्षेपे कृते सति शीतलगुणवृद्धिर्भवति तथा निश्चयव्यवहार- रत्नत्रयगुणाधिकसंसर्गाद्गुणवृद्धिर्भवतीति नूत्रार्थः ।। २७० ।। इतःपरं पञ्चमस्थले संक्षेपेण संसार- गुणवाले श्रमणके साथ अथवा (२) अधिक गुणवाले श्रमणके साथ सदा ही निवास करना चाहिये । इसप्रकार उस श्रमणके (१) गीतल घरके कोने में रखे हुए शीतल पानीकी भांति समान गुणवालेकी संगतिले गुणरक्षा होती है और (२) अधिक शीतल हिम (वरफ) के संपर्क में रहनेवाले शीतल पानीकी भांति अधिक गुणवाले के संगसे गुणवृद्धि होती है ।। २७० ।। अव श्लोक द्वारा यह कहते हैं कि श्रमण क्रमशः परम निवृतिको प्राप्त करने शाश्वत ज्ञानानन्दमयदशाका अनुभव करो :-] [अर्थ :-] इसप्रकार शुभोपयोगजनित किनिन् प्रवृनिका सेवन करके यनि सम्यक् प्रकारसे संयमके सौप्ठव (श्रेष्ठता, मुन्दनना) ने कमा: परम मिनिको प्राप्त होता हुआ; जिसका रम्य उदय समस्त वस्तुममूह के बिन्तारको नीलामात्र प्राप्त हो जाता है (जान लेता है) ऐसी जाती नानानन्दनयी दबाया कानन : (मेयल, सर्वथा, अत्यन्त) अनुभव करो। * इसप्रकार गुभोपयोग-प्रमापन पूर्ण हुआ। मालविमोहित इन्द।

५१४
[भगा योगदानान
अजधाचारविजुत्तो जत्थपदणिछिदो पसंतणा।
अफले चिरं ण जीवदि इह तो संगुणणसामगाणो ॥२७२॥
अयथाचारवियुक्तो यथार्थपदनिधितः प्रशान्तात्मा ।
अफले चिरं न जीवति इह स संपूर्णक्षामयः ।। २७२ ॥
मोक्षस्वरूपं प्रकाशयति - अजधाचारविजुतो निश्नपत्यवहारपसानारभावनापरिणतत्वाश्यवानार
वियुक्तः, विपरीताचाररहित इत्यर्थः, जपत्यपदनिच्छिदो मायनिजपरमात्मादिपदार्थ-
परिज्ञानसहितत्वाद्यथार्धपदनिश्चितः, पसंतप्पा विशिष्टपरमोपणमभावपरिणतनिजात्मद्रव्यभावना:
सहितत्वात्प्रशान्तात्मा, जो यः कर्ता सो संपुण्णसामण्णो म संपूर्णश्रामण्णः सन् चिरं ण जीवदि चिरं
गाथा २७२
अन्वयार्थ :- [यथार्थपदनिश्चितः] जो जीव यथार्थतया पदोंका तथा अर्थो
(पदार्थों) का निश्चयवाला होनेसे [प्रशान्तात्मा] 'प्रशान्तात्मा है और [अयथाचार
वियुक्तः] अयथाचार (-अन्यथाआचरण, अयथार्थआचरण) रहित है, [सः संपूर्णश्रामण्यः]
वह संपूर्ण श्रामण्यवाला जीव [अफले] अफल (-कर्मफल रहित हुए) [इह] इस
संसारमें [चिरं न जीवति] चिरकाल तक नहीं रहता (-अल्पकालमें ही मुक्त होता है ।)
टीका :- जो (श्रमण) त्रिलोककी चूलिका (कलगी) के समान निर्मल विवेकरूपी
दीपिकाके प्रकाशवाला होनेसे यथास्थित पदार्थनिश्चयसे उत्सुकताका निवर्तन करके
स्वरूपमंथर रहनेसे सतत 'उपशांतात्मा' वर्तता हुआ, स्वरूपमें एकमें ही अभिमुख-
रूपसे विचरता (क्रीड़ा करता) होनेसे 'अयथाचार रहित' वर्तता हुआ नित्य ज्ञानी हो,
वास्तवमें उस सम्पूर्ण श्रामण्यवाले साक्षात् श्रमणको मोक्षतत्व जानना, क्योंकि पहलेके
सकल कर्मोके फल उसने लीलामात्रसे नष्ट कर दिये हैं इसलिये और वह नूतन
कर्म-
, प्रशांतात्मा-प्रशांतस्वरूप; प्रशांतमूर्ति; उपशांत; स्थिर हुआ।
२ स्वरूपमंथर स्वरूपमें जमा हुआ [मन्यरका अर्थ है सुस्त, आलसी । यह श्रमण स्वरूपमें तृप्त तृप्त होनेसे मानो
वह स्वरूपसे बाहर निकलनेको सुस्त या आलसी हो, इस प्रकार स्वरूपप्रशांतिमें मग्न होकर रहा है।
अयथाचरणहीन, सूत्र-अर्थसुनिश्चयी उमशांत जे,
ते पूर्ण साधु अफल आ संसारमा चिर नहि रहे ॥ २७२॥

५१५
जैन शास्त्रमाला]
-चरणानुयोगसूचक चूलिका-
यस्त्रिलोकचूलिकायमाननिर्मलविवेकदीपिकालोकशालितया यथावस्थितपदार्थ-
निश्चयनिवतितौत्सुक्यस्वरूपमन्थरसततोपशान्तात्मा सन् स्वल्पमेकमेवाभिमुख्येन चरन्नय-
थाचारवियुक्तो नित्यं ज्ञानी स्यात्, स खलु संपूर्णश्रामण्यः साक्षात् श्रमणो हेलावकीर्ण-
सकलप्राक्तनकर्मफलत्वादनिष्पादितनूतनकर्मफलत्वाच्च पुनः प्राणधारणदन्यमनास्कन्दन
द्वितीयभावपरावर्ताभावात् शुद्धस्वभावावस्थितवृत्तिर्मोक्षतत्त्वमवबुध्यताम् ॥ २७२ ॥
अथ मोक्षतत्त्वसाधनतत्त्वमुद्घाटयति-
सम्म विदिदपदत्था चत्ता उवहिं बहित्थमज्झत्थं ।
विसयेसु णावसत्ता जे ते सुद्धा त्ति णिद्दिट्ठा ॥२७३ ।।
सम्यग्विदितपदार्थास्त्यक्त्वोपधि बहिस्थमध्यस्थम् ।
विषयेषु नावसक्ता ये ते शुद्धा इति निर्दिष्टाः ॥ २७३ ।।
बहुतरकालं न जोवत्ति, न तिष्ठति । क्व । अफले शुद्धात्मसंवित्तिसमुत्पन्नमुखामृतरसास्वादरहितत्वे-
नाफले फलरहिते संसारे । किन्तु शीघ्र मोक्षं गच्छतोति । अयमन भावार्थः - इत्यंभूतमोक्षतत्त्व-
परिणतपुरुष एवाभेदेन मोक्षस्वरूपं ज्ञातव्यमिति ।। २७२ ।। अथ मोक्षकारणमाख्याति - सम्म
विदिदपदत्या संशयविपर्ययानध्यवसायरहितानन्तनानादिस्वभावनिजपरमात्मपदार्थप्रभृतिसमस्तवस्तु-
विचारचतुरचित्तचातुर्यप्रकाणमानसातिणयपरमविवेकज्योतिपा सम्बन्विदितपदार्थाः ।
पुनरपि
विरूपा: 1 विसयेसु णावसत्ता पञ्छन्द्रिविषयाधीनरहितत्वेन निजात्मतत्त्वभावनापपरमसमाधि-
फलोंको उत्पन्न नहीं करता इसलिये पुन: प्राणधारणरूप दीनताको प्राप्त न होता हुआ
द्वितीय भावरूप परावर्तनके अभावके कारण शुबस्वभाव 'अवस्थित वृत्तिवाला
रहता है ।। २७२ ।।
अव मोक्षतत्वका साधनतत्व प्रगट करते हैं:
गाथा २७३
अन्ययार्थ :- [सम्यग्यिदितपदाः] नम्बर (वार्यनया) पदार्योको जानते
हुए [ये] जो [बहिस्थमध्यस्थम् ] पहिला लया अंतरंग [उपधि] परिग्रहको
नयरियत स्थिर, [ग संपूर्ण भागमायाले जीवको दी..
की भादरा रहता। बाद में पिर पनि नि ?
जाणी यथार्थ पदापने, तत्री मंग नदांद्यने,
आसत्त. नहि दियो दिने, 'ई' भारमा मने ॥२७॥

~~प्रवचनगार-
[भगवान श्रीकुन्दकुन्द कहान
अनेकान्तकलितसकलज्ञातृज्ञेयतत्त्वयथावस्थितस्वरूपपापित्यशोण्डाः सन्तः समस्त-
बहिरङ्गान्तरङ्गसङ्गतिपरित्यागविविक्तान्तश्चकचकायमानानन्तशक्तिनैतन्यभास्वरात्मत-
स्वस्वरूपाः स्वरूपगुप्तसुषुप्तकल्पान्तस्तत्त्ववृत्तितया विषयेपु मनागप्यासक्तिमनासादयन्तः
समस्तानुभाववन्तो भगवन्तः शुद्धा एवासंसारटितविकटकर्मकवाट विघटनपटीयसाध्य-
वसायेन प्रकटीक्रियमाणावदाना मोक्षतत्त्वसाधनतत्त्वमववुध्यताम् ॥ २७३ ॥
अथ मोक्षतत्त्वसाधनतत्त्वं सर्वमनोरथस्थानत्वेनाभिनन्दयति
सुद्धस्स य सामण्णं भणियं सुद्धस्स सणं गाणं ।
सुद्धस्स य णिव्वाणं सोच्चिय सिद्धो णमो तस्स ॥ २७४ ॥
शुद्धस्य च श्रामण्यं भणितं शुद्धस्य दर्शनं ज्ञानम् ।
शुद्धस्य च निर्वाणं स एव सिद्धो नमस्तस्मै ॥ २७४ ।।
संजातपरमानन्दैकलक्षणसुखसुधारसास्वादानुभववलेन विषयेषु मनागप्यनासक्ताः । किं कृत्वा । पूर्व
स्वस्वरूपपरिग्रहं स्वीकारं कृत्वा, चत्ता त्यक्त्वा । कम् । उवहिं उपधि परिग्रहम् । किविशिष्टम् ।
बहित्थमज्झत्थं वहिस्थं क्षेत्रवास्त्वाद्यनेकविधं मध्यस्थं मिथ्यात्वादिचतुर्दशभेदभिन्नम् । जे एवंगुण-
विशिष्टाः ये महात्मानः ते सुद्ध ति णिदिवा ते शुद्धाः शुद्धोपयोगिनः इति निर्दिष्टाः कथिताः । अनेन
व्याख्याननेन किमुक्त भवति - इत्थंभूताः परमयोगिन एवाभेदेन मोक्षमार्ग इत्यववोद्धव्यम् ।।२७३॥
[त्यक्त्वा] छोड़कर [विषयेषु न अवसक्ताः] विषयोंमें आसक्त नहीं हैं, [ते] वे
[शुद्धाः इति निर्दिष्टाः] 'शुद्ध' कहे गये हैं ।
टीका :- अनेकान्तके द्वारा ज्ञात सकल ज्ञातृतत्व और ज्ञेयतत्वके यथास्थित
स्वरूपमें जो प्रवीण हैं, अन्तरंगमें चकचकित होते हुए अनन्तशक्तिवाले चैतन्यसे
भास्वर (तेजस्वी) आत्मतत्वके स्वरूपको जिनने समस्त बहिरंग तथा अन्तरंग संगतिके
परित्यागसे विविक्त (भिन्न) किया है, और (इसलिये) अन्तःतत्वकी वृत्ति (आत्माकी
परिणति) स्वरूप गुप्त तथा सुषुप्त (जैसे कि सो गया हो) समान (-प्रशांत) रहनेसे
जो विषयोंमें किंचित् भी आसक्तिको प्राप्त नहीं होते, - ऐसे जो सकल-महिमावान्
भगवन्त 'शुद्ध' (शुद्धोपयोगी) हैं उन्हें ही मोक्षतत्वका साधनतत्व जानना । (अर्थात्
वे शुद्धोपयोगी ही मोक्षमार्गरूप हैं), क्योंकि वे अनादि संसार से रचित - बन्द
--
रे 'शुद्धने श्रामण्य भाख्युं, ज्ञान दर्शन शुद्धने, ।
छे शुद्धने निर्वाण, शुद्ध ज सिद्ध, प्रणमु तेहने ॥ २७४ ॥

सिद्धः स जैन शास्त्रमाला ~~चरणानुयोगसूचक चूलिका- ५१७ यत्तावत्सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रयोगपद्यप्रवृत्तकाग्यलक्षणं साक्षान्मोक्षमार्गभूतं श्राम- ण्यं तच्च शुद्धस्यैव । यच्च समस्तभूतभवद्भाविव्यतिरेककरम्वितानन्तवस्त्वन्वयात्मकविध. सामान्यविशेषप्रत्यक्षप्रतिभासात्मकं दर्शनं ज्ञानं च तत् शुद्धस्यैव । यच्च निःप्रतिघ- विजृम्भितसहजज्ञानानन्दमुद्रितदिव्यस्वभावं निर्वाणं तत् शुद्धस्यैव । यश्च टोत्कीर्णपर- मानन्दावस्थासुस्थितात्मस्वभावोपलम्भगम्भीरो भगवान् शुद्ध एव । अलं वाग्वि- अथ शुद्धोपयोगलक्षणमोक्षमार्ग सर्वमनोरथस्थानत्वेन प्रदर्शयति - भणियं भणितम् । किम् । सामण्णं सम्बन्दननानचारित्रकान्यलक्षणंशत्रुमित्रादिसमभावपरिणतिरूपं साक्षान्मोक्षकारणं यच्छ्रामण्यम् । तत्तावत्कस्य । सुद्धस्स य शुद्धस्य च शुद्रोपयोगिन एव । सुद्धस्स देसणं गाणं त्रैलोक्योदरविवरवति- त्रिकालविषयसमस्तवस्तुगतानन्तधमकसमयसामान्यविशेपपरिच्छित्तिसमर्थ यदर्शनमानस्यं तच्छु- द्वन्यैव । सुस्सय णिवाणं अव्यावाधानन्तसुखादिगुणाधान्भूतं पराधीनरहितत्वेन स्वायत्तं यनिर्वाणं तच्छुद्धस्यैव । सो चिय सिद्धो यो लौकिकमायानुनरमदिग्विजयमन्त्रयन्त्रादिसिविलक्षणः स्वशुद्वात्मोपलम्भलक्षण: टोत्कीर्णनायक कस्वभावो नानावरणाचष्टविधकमरहितत्वेन सम्यक्त्वा- घष्टगुणान्तर्भूतानन्तगुणसहितः सिद्धो भगवान् स चंब शुद्धः एव । णमो तस्त निर्दोपिनिजपरमात्मन्या- रहे हुए विकट कर्मकपाटको तोड़ने-खोलनेके अति उग्र प्रयत्नसे पराक्रम प्रगट कर रहे हैं ।। २७३ ।। अब मोक्षतत्वके साधनतत्वका (अर्थात् शुद्धोपयोगीका) सवं मनोरयोंके स्थानके रूपमें अभिनन्दन (प्रशंसा) करते हैं :- गाथा २७४ अन्वयार्थ :- [शुद्धस्य च ] गुल (पोपयोगी)को [ [प्रामपं भणितं श्रामण्य वाहा है, [शुद्धस्य च] और शुद्धको [दानं भानं] बनना हान का गुसस्य च] शुद्धयो [निर्वाणं] निर्वाण होता; [न: एक की मी) [मितः] गिर होता है; [तस्मै नमः] उसे नमार हो । टीका : --प्रथम तो, सम्पादनमान-चाग्नि गरी प्रमान एकाग्रता जिसका लक्षण है। ऐसा जो साक्षात् भोजनान प्रानाम, , समस्त भूत-वर्तमान-गादी व्यतिरे याने मार गिनिन (मिश्रित काम भी अपचायः जो कि जरा. (३) मानकर ) कि दिला. दर प जो (1) पर्णन और (:) न होने से निति माजालानन्दगी मुशामाला (साधित नही दी) -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान स्तरेण, सर्वमनोरथस्थानस्य मोक्षतत्त्वसाधनतत्त्वस्य शुद्धस्य परस्परमङ्गाङ्गिभावपरि- पतभाव्यभावकभावत्वात्प्रत्यस्तमितस्वपरविभागो भावनमस्कारोऽस्तु ॥ २७४ ।। अथ शिप्यजनं शास्त्रफलेन योजयन शास्त्रं समापयति - बुज्झदि सासणमेयं सागारणगारचरियया जुत्तो। जो सो पवयणसारं लहुणा कालेण पप्पोदि ॥ २७५ ॥ बुध्यते शासनमेतत् साकारानाकारचर्यया युक्तः । यः स प्रवचनसारं लघुना कालेन प्राप्नोति ।। २७५ ॥

- जैन शास्त्रमाला] -~-चरणानुयोगसूचक चूलिका- यो हि नाम सुविशुद्धज्ञानदर्शनमात्रत्त्वरूपव्यवस्थितवृत्तिसमाहितत्वात् साकारा- नाकारचर्यया युक्तः सन् शिष्यवर्गः स्वयं समस्तशास्त्रार्थविस्तरसंक्षेपात्मकश्रुतज्ञानोपयोग- पूर्वकानुभावेन केवलमात्मानमनुभवन शासनमेतबुध्यते स खलु निरवधित्रिसमयप्रवाहाव- स्थायित्वेन सकलार्थसार्थात्मकस्य प्रवचनस्य सारभूतं भूतार्थस्वसंवेद्यदिव्यज्ञानानन्दस्व- भावमननुभूतपूर्व भगवन्तमात्मानमवाप्नोति ।। २७५ ।। - । स शिप्यजनः कर्ता । कम् । पवयणसारं प्रवचनसारमन्दवाच्यं निजपरमात्मानम् । केन । लहुणा कालेण स्तोककालेन । यः किं करोति । जो बुज्झदि य: शिष्यजनो वुध्यते जानाति । किम् । सासणमेयं शास्त्रमिदं । किं नाम । पवयणसार प्रवचनसारं, - सम्यग्नानस्य तस्यैव नेयभूतपर- मात्मादिपदार्थानां तत्साध्यस्य निविकारस्वसंवेदनमानस्य च, तव तत्त्वाधिद्धानलक्षणसम्यग्दर्शनस्य तहिषयभूतानेकान्तात्मकपरमात्मादिद्रव्याणां तेन व्यवहारसम्यक्त्वेन साध्यस्य निजशुद्धात्मचिल्प- निश्चयसम्यक्त्वस्य च, तथैव च अतसमितिगुप्त्याउनुष्ठानरूपस्य मरागचारित्रस्य तेनैव साध्यस्थ स्वशुद्धात्मनिश्चलानुभूतिरूपस्य वीतगगचारित्रस्य च प्रतिपादकत्वात्प्रवचनसाराभिधेयम् । कयंभूतः सः शिप्यजनः । सागारणगारचरियया जुत्तो सागारानागारचया युक्तः । आभ्यन्तररत्नमयानुठान- मुपादेयं कृत्वा बहिरङ्गरत्नत्रयानुप्ठानं सागारचर्या धावकचर्या । बहिरङ्गरत्नत्रयाधारेणान्यन्तररत्न- वयानुप्ठानमनागारचर्या प्रमत्तसंयतादितपोधनवयत्यर्थः ।। २७५ ॥ इति गाघापञ्चकेन पञ्चरत्नमंज टीका :- [लघुना कालेन] अल्प कालमें ही [प्रवचनसारं]प्रवचनके सारको (भगवान आत्माको) [प्राप्नोति] पाता है । 'सुविशुद्धनानदर्शनमात्र स्वरूपमें अवस्थित परिणतिमें लगा होने साकार-अनाकार चर्याने युक्त वर्तता हुआ, जो मिप्यवर्ग स्वर नमन मामलों अयोंकि *विस्तारसंक्षेपात्मक श्रु तज्ञानोपयोगपूर्वक प्रभाव द्वारा केवल आमाको अनुभवता हुआ, इस उपदेशको जानता है, वह वास्तव में, भूनानवेज दिया जानानन्द जिममा स्वभाव है, पूर्वकाल में कभी जिसना अनुभव ना दिला, हे भगवान आनाको प्राप्त करता है - जो कि जो आत्मा तीनों कालने, निरप्रिया मानानेगे माल पदार्थोके समूहात्मक प्रवचनका सारभूत। ।।६।। .. .. आत्माया स्वरप मान्न सुविधा न ::7::::::: २ विरतारसंक्षेपात्ममा विस्तारात्मद या रक्षेपाता। ता पारमानिया - (मस्या), पसंदे, fai:::.- प्रवचन सरन का समानापार कर. :: मायाम, यो घरको नम:'.-..-:-. ... ही परम : यसको الب परिशिष्ट सैंतालीस नय ननु कोऽयमात्मा कथं चावाप्यत इति चेत्, अभिहितमेतत् पुनरप्यभिधीयते । आत्मा हि तावच्चैतन्यसामान्यव्याप्तानन्तधर्माधिष्टात्रेकं द्रव्यमनन्तधर्मव्यापकानन्तनयव्याप्येक- श्रुतज्ञानलक्षणप्रमाणपूर्वकस्वानुभवप्रमीयमाणत्वात् । तत्तु द्रव्यनयेन चिन्मात्रम् १ । पर्यायनयेन तन्तुमात्रवद्दर्शनज्ञानादिमात्रम् २ । अस्तित्वनयेनायोमयगुण- कामु कान्तरालतिसंहितावस्धलक्ष्योन्मुखविशिखवत् स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावरस्तित्ववत् ३ । पटमात्रव- अत्राह शिप्य:- परमात्मद्रव्यं यद्यपि पूर्व बहुधा व्याख्यातम्. तथापि संक्षेपेण पुनरपि कथ्यतामिति । भगवानाह - केवलज्ञानाद्यनन्तगुणानामाधारभूतं यत्तदात्मद्रव्यं भण्यते । तस्य न नवैः प्रमाणेन च परीक्षा क्रियते । तद्यथा - एतावत् शुद्धनिश्वयनयेन निरुपाधिस्फटिकवत्समस्तरागादि- विकल्पोपाधिरहितम् । तदेवाशुद्धनिश्चयनयेन सोपाधिस्फटिकवत्समस्त नगादिविकल्पोपाधिसहितम् । [अव टीकाकार श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव परिजिष्टरूपसे कुछ कहते हैं :-] 'यह आत्मा कौन है (कैसा है) और कैसे प्राप्त किया जाता है ऐसा प्रश्न किया किया जाय तो इसका उत्तर (पहले ही) कहा जा चुका है और (यहाँ) पुनः कहते हैं : प्रथम तो, आत्मा वास्तवमें चैतन्यसामान्यले व्याप्त अनन्त धर्माका अधिष्ठाता (स्वामी) एक द्रव्य है, क्योंकि अनन्त धर्मोमें व्याप्त होनेवाले जो अनन्त नय है उनमें व्याप्त होनेवाला जो एक श्रु तज्ञानस्वरूप प्रमाण है, उस प्रमाणपूर्वक व्यानुभयगे (वह आत्मद्रव्य) प्रमेय होता है (ज्ञात होता है) । वह आत्मद्रव्य द्रव्यनयसे, पटमात्रकी भांति, निम्मान (अर्यात आमाकानी चैतन्यमात्र है, जैसे वस्त्र वस्त्रमात्र है तदनुसार ।) :. आत्मद्रव्य पर्यायनयसे, तंतुमात्रकी भांनि, दानशानादिनार (ति आमा पर्यायनयसे दर्शनज्ञानचारित्रादिमान है, जैने यन्त्र नुमाय।) :. आत्मद्रव्य अस्तित्वनयसे स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावनेवार : - डोरी और धनुपके मध्य में स्थित, संधानदणामें कहा और पानी भांति । (जैसे कोई वाण स्वद्रव्यले लोहमर है, रोग : स्थित है. स्वकालने संधान-दशा में है, अनि धनुष पर बना दी स्वभावले नध्योन्मुख है अर्थात् निगान बीर ::-: ::::::

५२२ (मन र नास्तित्वनयेनानयोमयागुणकामुकाराला हिलामालगोगाजासनिशिगवत- परद्रव्यक्षेत्रकालभाव स्तित्ववत् ४ । असिनालिनोलायोगगानयोगगगुणकामु- कान्तरालवत्यंगुणकामकान्तरालतिसंहितावर संहितावशाल योन्गुणाल गोगुणात- नविशिसवत् क्रमतः स्वपरद्रव्योत्र कालभातरस्तित्वनास्तिलगत् ५ । अवक्तव्यनगेना- योमयानयोमयगुणकामु कान्तरालववंगुणका कान्तरालयतिसंहितावरणासंहितावस्थल- क्ष्योन्मुखालक्ष्योन्मुसप्राक्तनविशिरावत् गुगपत्स्वपरद्रगक्षेत्रकालभाबरवक्तव्यम् ६ । शुद्धस तव्यवहारनयेन शुदगरमागणवर्णानामामारभूतपुदगलपरमाणुनलेवलशानादिशुद्धगुणा- नामाधारभूतम् । तदेवाशुमार तयवहार नगेनाशुदस्पर्शरसगावर्णानामामारभूतपणुकादिस्कन्ध- स्वचतुष्टयसे अस्तित्ववाला है।) आत्मद्रव्य नास्तित्वनयसे परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे नास्तित्ववाला है; अलोह- मय, डोरी और धनुपके मध्यमें नहीं स्थित, संधानदशामें न रहे हुए और अलक्ष्योन्मुख ऐसे पहलेके बाणकी भांति । (जैसे पहले का बाण अन्य बाणके द्रव्यकी अपेक्षासे अलोह- मय है, अन्य वाणके क्षेत्रको अपेक्षासे डोरी और धनुपके मध्यमें स्थित नहीं है, अन्य वाणके कालकी अपेक्षासे संधानदशामें नहीं रहा हुआ और अन्य बाणके भावकी अपेक्षासे अलक्ष्योन्मुख है, उसोप्रकार आत्मा नास्तित्वनयसे परचतुष्टयसे नास्तित्व- वाला है ।) ४. आत्मद्रव्य अस्तित्वनास्तित्वनयसे क्रमशः स्वपरद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे अस्तित्व- नास्तित्ववाला है; - लोहमय तथा अलोहमय, डोरी और धनुपके मध्यमें स्थित तथा डोरी और धनुषके मध्यमें नहीं स्थित, संधान अवस्थामें रहे हुए तथा संधान अवस्थामें न रहे हुए और लक्ष्योन्मुख तथा अलक्ष्योन्मुख ऐसे पहलेके वाणकी भाँति । (जैसे पहलेका बाण क्रमशः स्वचतुष्टयकी तथा परचतुष्टयकी अपेक्षासे लोहमयादि और अलोहमयादि है, उसीप्रकार आत्मा अस्तित्व-नास्तित्वनयसे क्रमशः स्वचतुष्टय और परचतुष्टयकी अपेक्षासे अस्तित्ववाला और नास्तित्ववाला है ।) ५. आत्मद्रव्य अवक्तव्ययनसे युगपत् स्वपरद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे अवक्तव्य है; - लोह- मय तथा अलोहमय, डोरी और धनुषके मध्यमें स्थित तथा डोरी और धनुषके मध्यमें नहीं स्थित, संधान अवस्थामें रहे हुए तथा संधान अवस्थामें न रहे हुए और लक्ष्योन्मुख - अलक्ष्योन्मुख ऐसे पहलेके बाणकी भाँति । (जैसे पहले का बाण युगपत् स्व- जन शास्त्रमाला]] -परिशिष्ट- ५२३ अस्तित्वावक्तव्यनयेनायोमयगुणकामु कांतरालवतिसंहितावस्थलक्ष्योन्मुखायोमयानयोमयगु- णकामु कान्तरालवयं गुणकामु कान्तरालवतिसंहितावस्थासंहितावस्थलक्ष्योन्मुखालक्ष्यो- न्मुखप्राक्तनविशिखवत् स्वद्र व्यक्षेत्रकालभावयुगपत्स्वपरद्रव्यक्षेत्रकालभावश्चास्तित्ववदव- क्तव्यम् ७ । नास्तित्वावक्तव्यनयेनानयोमयागुणकामु कान्तरातवयंसंहितावस्यालक्ष्योन्मु- वन्मतिनानादिविभावगुणानामाधारभूतम् । अनुपचरितासद्भूतव्यवहारनयेन ड्यणुकादिस्कन्धेषु संश्लेशबन्धस्थितपुद्गलपरमाणुवत्परमौदारिकगरीरे वीतरागसर्वनवा विवक्षितकदेस्थितम् । - चतुष्टयकी और परचतुष्टयकी अपेक्षासे युगपत् लोहमयादि तथा अलोहमयादि होनेसे अवक्तव्य है, उसीप्रकार आत्मा अवक्तव्यनयसे युगपत् स्वचतुष्टय और परचतुष्टयकी अपेक्षासे अवक्तव्य है।) ६. आत्मद्रव्य अस्तित्व-अवक्तव्य नयसे स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे तथा युगपत् स्वपरद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावले अस्तित्ववाला-अवक्तव्य है (स्वचतुष्टयसे) लोहमय, डोरी और धनुपके मध्यमें स्थित, संधान अवस्था में रहे हा और लक्ष्योन्मुल ऐने तथा (युगपत् स्व-परचतुष्टयने) लोहमय नया अलोहमय. डोरी और धनुपके मध्य में स्थित तथा डोरी और धनुपके मध्यमें नहीं स्थित, मंधान अवस्था में रहे हए नया गंधान अवस्थामें रहे हुए और लक्ष्योन्मुग्य तथा अलक्ष्योन्मुख गने पहले के वाण की भांति । [जैसे पहलेका वाण (१) स्वचतुष्टयने नया एक ही गाय विपरनतुष्टयकी अपेक्षासे (१) लोहमयादि तथा ) अवमान उगीतकार मामा अग्नित्य- अवक्तव्यनयसे (१) स्वचतुष्टयमी तथा (6) दुगन मनुष्टया अपेक्षा (2) अस्तित्वाला तथा (२) अवत्तव्य ।।].. आत्मद्रव्य नास्तित्व-अवतानपने पद क्षेत्रमा नाम था नगर स्वपरद्रव्य-क्षेत्र-काल-भादने नाम्लिा पाला-अमर : - (नाटो) मय, डोरी और धनुपके मध्य में नहीं पिता का श्रीमा ऐने तथा (युगपत् दपरचतुष्टयसे) को नका हमारी मध्यमें नियत तपाजोगे और नुपके मन नही दिया । तथा गमान अवस्था नगर * - :: बाणकी भांति। [ने पहले सरकारको मान : :- " ५२६ -प्रवचनसार- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान फलवदव्यापि १७ । नित्यनयेन नटवदवस्थायि १८ । अनित्यनयेन रामरावणवदन- वस्थायि १६ । सर्वगतनयेनविस्फारिताक्षचक्षुर्वत्सर्ववति २० । असर्वगतनयेन मीलिताक्ष- चक्षुर्वदात्मवति २१ । शून्यनयेन शून्यागारवत्केवलोद्भासि २२। अशून्यनयेन लोकाक्रांत- नोवन्मिलितोद्भासि २३ । ज्ञानज्ञेयाद्वैतनयेन महदिन्धनभारपरिणतधूमकेतुवदेकम् २४ । कथ्यताम् । भगवानाह - सकलविमलकेवलज्ञानदर्शनस्वभावनिजपरमात्मतत्त्वसम्यश्रद्धानज्ञाना- नुष्ठानरूपाभेदरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिसंजातरागाद्युपाधिरहितपरमानन्दैकलक्षणसुखामृतरसा- स्वादानुभवमलभमानः सन् पूर्णमासीदिवसे जलकल्लोलाभितसमुद्र इव रागद्वेषमोहकल्लोलावद- आत्मद्रव्य विशेषनयसे, उसके एक मोतीकी भाँति, अव्यापक है (अर्थात् आत्मा विशेषनयसे अव्यापक है, जैसे पूर्वोक्त मालाका एक मोती सारी मालामें अव्यापक है ।) १७. आत्मद्रव्य नित्यनयसे, नटकी भांति, अवस्थायी है (अर्थात् आत्मा नित्यनयसे नित्य-स्थायी है, जैसे राम-रावणरूप अनेक अनित्य स्वांग धारण करता हुआ भी नट तो वहका वही नित्य है ।) १८. आत्मद्रव्य अनित्यनयसे, राम-रावणकी भांति, अनवस्थायी है (अर्थात् आत्मा अनित्यनयसे अनित्य है, जैसे नटके द्वारा धारण किये गये राम-रावणरूप स्वांग अनित्य हैं ।) १६. आत्मद्रव्य सर्वगतनयसे, खुली हुई आंखकी भाँति, सर्ववर्ती (सबमें व्याप्त होने- वाला) है । २०. आत्मद्रव्य असर्वगतनयसे, मींची हुई (वन्द) आँखकी भांति, आत्मवर्ती (अपनेमें रहनेवाला) है । २१. आत्मद्रव्य शून्यनयसे, शून्य (खाली) घरकी भांति, एकाकी (अमिलित) भासित होता है । २२. आत्मद्रव्य अशून्यनयमे, लोगोंसे भरे हुए जहाजको भांति, मिलित भासित होता अनममुहान आत्मदब्ध जानक्षेय-अद्वैतनयमे ( जान और ज्ञेयके अद्वैताप नयरी ), महाग परिणत अग्निकी भांनि, एक |२८. + जन शास्त्रमाला] -परिशिष्ट- ५२७ ज्ञानज्ञेयतनयेन परप्रतिविम्बसंपृक्तपंणवदनेकम २५ । नियतिनयेन नियमितीष्ण्यवह्नि- वनियतस्वभावभाति २६ । अनियतिनयेन नियत्यनियमितौण्यपानीयवदनियतस्वभाव- भासि २७ । स्वभावनयेनानिशिततीक्ष्णकण्टकवत्संस्कारानर्थक्यकारि २८ 1 अवस्वभाव- नयेनायस्कारनिशिततीक्ष्णविशिषवत्संस्कारसार्थक्यकारि २६ । कालनयेन निदाघदिव- सानुसारिपच्यमानसहकारफलवत्समयायत्तसिद्धिः ३० । अकालनयेन कृत्रिमोमपाच्यमा- स्वस्थम्पेण क्षोभं गच्छत्ययं जीवस्तावत्कालं निजशुदात्मानं न प्राप्नोति इति । स एव वीतराग- सर्वज्ञप्रणीतोपदेशात् एकेन्द्रियविकलेन्द्रियपच्छेन्द्रियनंजिपर्याप्तमनुप्यदेशकुलस्पेन्द्रियपटुत्वनिाध्या- आत्मद्रव्य जानजेतनयसे, परके प्रतिबिंवोंसे संपृक्त दर्पणकी भाँति, अनेक है (अर्थात् आत्मा ज्ञान और जेयके द्वैतरूपनयसे अनेक है, जैसे पर-प्रतिबिम्बोंके संगवाला दर्पण अनेकरूप है ।) २५. आत्मद्रव्य नियतिनयले नियतस्वभावरूप भासित होता है, जिसकी उष्णता नियमित (नियत) होती है ऐसी अग्निकी भाँति । [आत्मा नियतिनयने नियतस्वभाव- वाला भासित होता है, जैसे अग्निके उप्णताका नियम होनेने अग्नि नियतस्वभाववाली भासित होती है । ] २६. आत्मद्रव्य अनियतनयसे अनियनस्वभावरूप भामित होता है, जिसके उष्णता नियति (नियम) से नियमित नहीं है ऐने पानीको मानि। (आत्मा अनियतिनगगे अनियतस्वभाववाला भासित होता है, जंगे पानी (ग्निो निमिसगे होनेवाली) उष्णता अनियत-होनेसे पानी अनियतस्य भाववाला माभिरमा २७. आत्मद्रव्य स्वभावनयले संस्थागो निभानेवाला (वामानों स्वभावनयसे संस्कार निरपयोगी।), जिनची शिजीने नोट की निशानी हो (किन जो स्वभावसे ही नुकोला है) ऐले पने पटियो मानि ! ::. आत्मद्रव्य अस्वभावनचरी मंगामी मारने आमा अरबभावनयरो संस्कार उपयोगी है.). जिनमोकार करने लहारने तारा नोगा निकाली गई होनेट आत्मामालनपोजिसनो मिति ::: दिनोंदे अनुसार पकनेगले जारपदी नि। .

५२८ -प्रवचनसार-- [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहानं नसहकारफलवत्समयानायत्तसिद्धिः ३१ । पुरुषकारनयेन पुरुषकारोपलब्धमधुकुक्कुटीक- पुरुषकारवादिवद्यत्नसाध्यसिद्धिः ३२ । देवनयेन पुरुषकारवादिदत्तमधुकुक्कुटीगर्भलब्ध- माणिक्यदैववादिवदयत्नसाध्यसिद्धिः ३३ । ईश्वरनयेन धात्रीहटावलेह्यमानपान्थबालकव. पारतन्त्र्यभोक्त ३४ । अनीश्वरनयेन स्वच्छन्ददारितकुरङ्गकण्ठीरववत्स्वातन्त्र्यभोक्त ३५। गुणिनयेनोपाध्यायविनीयमानकुमारकवद्गुणग्राहि ३६ । अगुणिनयेनोपाध्यायविनीयमान- कुमारकाध्यक्षवत् केवलमेव साक्षि ३७ । कर्तृनयेन रञ्जकवद्रागादिपरिणामकर्तृ ३८ । युष्यवरबुद्धिसद्धर्मश्रवणग्रहणधारणश्रद्धानसंयमविषयसुखनिवर्तनक्रोधादिकपायव्यावर्तनादिपरंपरादुर्ल- पर आधार रखती है, गर्मी के दिनोंके अनुसार पकनेवाले आमकी भांति ।] ३०. आत्मद्रव्य अकालनयसे जिसकी सिद्धि समयपर आधार नहीं रखती ऐसा है, कृत्रिम गर्मीसे पकाये गये आम्रफलकी भांति । ३१. आत्मद्रव्य पुरुषकारनयसे जिसकी सिद्धि ,यत्नसाध्य है ऐसा है, जिसे पुरुषकारसे 'नीवूका वृक्ष प्राप्त होता है (-उगता है) ऐसे पुरुषकारवादीकी भाँति । ऐसे पुरुषकारवादीकी भाँति । [पुरुषार्थनयसे आत्माकी सिद्धि प्रयत्नसे होती है, जैसे किसी पुरुषार्थवादी मनुष्यको पुरुषार्थसे नीबूका वृक्ष प्राप्त होता है ।] ३२. आत्मद्रव्य दैवनयसे जिसकी सिद्धि अयत्नसाध्य है (-यत्न विना होता है) ऐसा है; पुरुपकारवादी द्वारा प्रदत्त नीबूके वृक्षके भीतरसे जिसे (विना यत्नके, दैवसे) माणिक प्राप्त हो जाता है ऐसे दैववादी की भाँति । ३३. आत्मद्रव्य ईश्वरनयसे परतंत्रता भोगनेवाला है, धायकी दुकानपर दूध पिलाये जानेवाले राहगीरके बालककी भाँति ।३४. आत्मद्रव्य अनीश्वरनयसे स्वतंत्रता भोगनेवाला है, हिरनको स्वच्छन्दता (स्वत- न्त्रता, स्वेच्छा) पूर्वक फाड़कर खा जानेवाले सिंहकी भाँति । ३५. आत्मद्रव्य गुणीनयसे गुणग्राही है, शिक्षकके द्वारा जिसे शिक्षा दी जाती है ऐसे कुमारकी भांति । ३६. आत्मद्रव्य अगुणीनयसे केवल साक्षी ही है (-गुणग्राही नहीं है), जिसे शिक्षकके द्वारा शिक्षा दी जारही है ऐमे कुमारको देखनेवाले पुरुष (-प्रेक्षक) की भांति । ३७. मगन टीमें 'मधुकाटी शब्द है, जिसका अर्थ यहाँ 'नोबुका वृक्ष' किया है; किन्तु हिन्दी टीकामे श्री गाई हेमगजीने 'मयुधना' अर्थ किया है ।

५२९ जैन शास्त्रमाला] -परिशिष्ट- अकर्तृ नयेन स्वकर्मप्रवृत्तरञ्जकाध्यक्षवत्केवलमेव साक्षि ३६ । भोक्तृनयेन हिताहितान्न- भोक्तृव्याधितवत्सुखदुःखादिभोक्तृ ४० । अभोक्तृनयेन हिताहितान्नभोक्तृव्याधिताध्यक्ष- धन्वन्तरिचरवत् केवलमेव साक्षि ४१ । क्रियानयेन स्थाणुभिन्नमूर्धजातदृष्टिलब्धनिधाना- न्यवदनुष्ठानप्राधान्यसाध्यसिद्धिः ४२ । ज्ञाननयेन चणकमुष्टिकोतचिन्तामणिगृहकोण- वाणिजवद्विवेकप्राधान्यसाध्यसिद्धिः ४३ । व्यवहारनयेन वन्धकमोचकपरमाण्वन्तरसंयुज्य- । भान्यपि कथंचिकाकतालीयन्यायेनावाप्य सकलविमलकेवलनानदर्शनस्वभावनिजपरमात्मतत्त्वसम्यक- आत्मद्रव्य कर्तृनयसे, रंगरेजकी भाँति, रागादि परिणामका कर्ता है (अर्थात् आत्मा कनियसे रागादिपरिणामोंका कर्ता है, जैसे रंगरेज रंगनेके कार्यका कर्ता है ।) ३८. आत्मद्रव्य अकर्तृ नयसे केवल साक्षी ही है (-कर्ता नहीं), अपने कार्य में प्रवृत्त रंगरेजको देखनेवाले पुरुष (प्रेक्षक) की भांति । ३६. आत्मद्रव्य भोक्त नयसे सुखदुःखादिका भोक्ता है, हितकारी- अहितकारी अन्नको खानेवाले रोगीकी भांति । [आत्मा भोक्तानयसे मुखदुःखादिको भोगता है, जैसे हिन- वारक या अहितकारक अन्नको खानेवाला रोगी मुव या दुःखको भोगता है । ४०. आत्मद्रव्य अभोवतृनयसे. केवल नाक्षी ही है, हितकारी-अहितकारी अन्नको खानेवाले रोगीको देखनेवाले वैद्यकी भांति । [आत्मा अभोक्तानयो केवल नाक्षी हो - भोत्ता नहीं; जैसे सुख-दुःखको भोगनेवाले रोगीको देखनेवाला वन का नो वन साक्षी ही है । ४१. आत्मद्रव्य नियानयसे अनुष्ठानवी प्रधानता मिसिनोमा: योग गिर फूट जाने पर दृष्टि उत्पन्न होकर जिने निधान माना भी मार। | क्रियानयसे आत्मा अनुष्ठानकी प्रधानताने मितिको गरिमामा पन्धरके खम्भेके साथ सिर फोड़नेले सिरके का दिया दर होने पराये और निधान प्राप्त हो, उस प्रकार ।] ४६. आत्मान्य ज्ञाननयने विवेककी प्रधानताको मिति र चिन्तामणि-रल मनीदनेवाले परके कोनेने ! भागाको विवेकनी प्रधानताने मिति होती है. मुहीमा बना देगार चितामणि-मन: :: ::.

५३० ---प्रवचनसार- - [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान मानवियुज्यमानपरमाणुवद्वन्धमोक्षयोतानुवति ४४ । निश्चयनयेन केवलवध्यमानमुच्य- मानबन्धमोक्षोचितस्निग्धरूक्षत्वगुणपरिणतपरमाणुवद्वन्धमोक्षयोरद्वैतानुवति ४५ । अशुद्ध- नयेन घटशरावविशिष्टमृण्मात्रवत्सोपाधिस्वभावम् ४६ । शुद्धनयेन केवलमृण्मात्रव- निरुपाधिस्वभावस् ४७ । तदुक्तम् - "जावदिया वयणवहा तावदिया चेव होंति णयवादा। जावदिया णयवादा तावदिया चेव होंति परसमया ॥" "परसमयाणं वयणं मिच्छं खलु होदि सव्वहा वयणा । जइणाणं पुण वयणं सम्मं खु कहंचि वयणादो।" एवमनया दिशा श्रद्धानज्ञानानुचरणरूपाभेदरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिसंजात रागाद्युपाधिरहितपरमानन्दैकलक्षण- आत्मद्रव्य व्यवहारनयसे बंध और मोक्षमें 'द्वैतका अनुसरण करनेवाला बंधक है, (बंध करनेवाले) और मोचक (मुक्त करनेवाले) ऐसे अन्य परमाणुके साथ संयुक्त होनेवाले और उससे वियुक्त होनेवाले परमाणुकी भाँति । [व्यवहारनयसे आत्मा बंध और मोक्षमें (पुद्गलके साथ) द्वैतको प्राप्त होता है, जैसे परमाणुके बंधमें वह परमाणु अन्य परमाणुके साथ संयोगको पानेरूप द्वैतको प्राप्त होता है और परमाणुके मोक्षमें वह परमाणु अन्य परमाणुसे पृथक् होनेरूप द्वैतको पाता है, उस प्रकार । ] ४४. आत्मद्रव्य निश्चयनयसे वंध और मोक्षमें अद्वैतका अनुसरण करनेवाला है, अकेले बध्यमान और मुच्यमान ऐसे बंधमोक्षोचित स्निग्धत्वरूक्षत्वगुणरूप परिणत परमाणु- की भांति । [निश्चयनयसे आत्मा अकेला ही बद्ध और मुक्त होता है, जैसे बंध और मोक्षके योग्य स्निग्ध या रूक्षत्वगुणरूप परिणमित होता हुआ परमाणु अकेला ही बद्ध और मुक्त होता है, उस प्रकार ।] ४५. आत्मद्रव्य अशुद्धनयसे, घट और रामपात्रसे विशिष्ट मिट्टी मात्रकी भाँति, सोपाधिस्वभाववाला है । ४६. आत्मद्रव्य शुद्धनयसे, केवल मिट्टी मात्रकी भाँति, निरुपाधिस्वभाववाला है। ४७. इसलिए कहा है :- जावदिया वयणवहा तावदिया चेव होंति णयवादा । जावदिया णयवादा तावदिया चेव होंति परसमया ।। . द्वंतद्वित्व, द्वंतपन, [व्यवहारनयसे आत्माके बन्ध में कर्मके साथके संयोगको अपेक्षा आती है इसलिये द्वैत है भोर आत्माको मुक्तिमें कर्मके वियोगकी अपेक्षा आती है इसलिये वहां भी द्वैत है ।]

जैन शास्त्रमाला] -परिशिष्ट- ५३१ प्रत्येकमनन्तधर्मव्यापकानन्तनयनिरूप्यमाणमुदत्वदन्तरालमितवलनीलगाङ्गयामुनोदक- भारवदनन्तधर्माणां परस्परमतद्धावमात्रेणाशक्यविवेचनत्वादमेचकस्वभावैकधर्मव्यापकैक- मित्वाद्यथोदितकान्तात्मात्मद्रव्यम्। युगपदनन्तधर्मव्यापकानन्तनयव्याप्येकश्रुतजानलक्षण- प्रमाणेन निल्प्यमाणं तु समस्ततरङ्गिणीपयःपूरसमवायात्मकंकमकराकरवदनन्तधर्माणां मुवामृतलास्वादानुभयन्नामे नत्यमावास्या दिबसे जन्नकल्लोलोभरहितसमुद्र व रागद्वेषमोहाल्लोल- परसमयाणं वयणं मिच्छं खलु होदि सबहा क्यणा । जइणाणं पुण वयणं सम्म त्रु कहंचि वयणादो ।। [अर्थ :- जितने 'वचनपंथ हैं उनने वास्तवमें नयवाद है; और जितने नयवाद हैं उतने ही परसमय (पर मत) हैं । परनमयों (मिथ्यामतियों) का वचन सबंधा (अर्थात् अपेक्षा विना) कहा जानेके कारण वास्तव में मिथ्या है; और जनोंका वचन कयंचित् (अर्थात् अपेक्षा सहित) कहा जाता है इसलिये वास्तव में सम्यक है।] इस प्रकार इन (उपरोक्त) मृत्रनानुमान (अर्थात् ४७ नयों में समझाया है उस विधिसे) एक-एक धर्ममें एक-एक नय (व्याप), उपप्रकार अनन्त धमों में व्यापक अनन्त नयोंये निरूपया किया जाय तो, नमुत्रके भीतर मिलनेगले जन-नीन गगा-यमुनाने जलसमूहबी भाँति, अनन्तधर्मोको परमन मनमात्रमात्रा करने में अगर होनेगे, आत्मद्रव्य 'अमेचक स्वभावाला, की नागीने गोरा एकान्तात्मक (एकाधम बाप) । पापा का नाम व्याप्त होने वाला एक अलमानावर प प्रमाण मानणारे जनसमूहले समवायारमनः (नमुकाम? वन्तुरूप पृषक मारमा अगा:" बाप्त होनेवाला, एनामी गोमोह : . २. में । है न -प्रवचनसार- - ५३२ [भगवान श्रीकुन्दकुन्द-कहान वस्तुत्वेनाशक्यविवेचनत्वान्मेचकस्वभावानन्तधर्मव्याप्येकमित्वात् यथोदितानेकान्ता- त्मात्मद्रव्यम् । ॐ शालिनी छन्द स्यात्कारश्रीवासवश्यनयोः पश्यन्तीत्थं चेत् प्रमाणेन चापि । पश्यन्त्येव प्रस्फुटानन्तधर्म- स्वात्मद्रव्यं शुद्धचिन्मात्रमन्तः ॥ १६॥ इत्यभिहितमात्मद्रव्यमिदानीमेतदवाप्तिप्रकारोऽभिधीयते - अस्य तावदात्मनो नित्यमेवानादिपौद्गलिककर्मनिमित्तमोहभावनानुभावपूणितात्मवृत्तितया तोयाकरस्ये- वात्मन्येव क्षुभ्यतः क्रमप्रवृत्ताभिरनन्ताभिर्जप्तिव्यक्तिभिः परिवर्तमानस्य ज्ञप्तिव्यक्ति- क्षोभरहितप्रस्तावे यदा निजशुद्धात्मस्वरूपे स्थिरो भवति तदा तदेव निजशुद्धात्मस्वरूपं प्राप्नोति ।। एक समय नदीके जलको जाननेवाले ज्ञानांशसे देखा जाय तो समुद्र एक नदीके जलस्व- रूपज्ञात होता है, उसीप्रकार एक समय एक धर्म को जाननेवाले एक नयसे देखा जाय तो आत्मा एक धर्म स्वरूप ज्ञात होता है; परन्तु जैसे एक ही साथ सर्व नदियोंके जलको जाननेवाले ज्ञानसे देखा जाय तो समुद्र सर्व नदियोंके जलस्वरूप ज्ञात होता है, उसीप्रकार एक ही साथ सर्वधर्मोको जाननेवाले प्रमाणसे देखा जाय तो आत्मा अनेक धर्मस्वरूप ज्ञात होता है । इसप्रकार एक नयसे देखने पर आत्मा एकान्तात्मक है और प्रमाणसे देखने पर अनेकान्तात्मक है।] अब इसी आशयको काव्य द्वारा कहकर "आत्मा कैसा है" इस विषय का कथन समाप्त किया जाता हैं :] [अर्थ :-] इसप्रकार स्यात्कारश्री (स्यात्काररूपी लक्ष्मी) के निवासके वशीभूत वर्तते नयसमूहोंसे (जीव) देखें तो भी और प्रमाणसे देखें तो भी स्पष्ट अनन्त धर्मोंवाले निज आत्मद्रव्यको भीतर में शुद्ध चैतन्यमात्र देखते ही हैं । इस प्रकार आत्मद्रव्य कहा गया। अब उसकी प्राप्तिका प्रकार कहा जाता है :- प्रथम तो, अनादि पौद्गलिक कर्म जिसका निमित्त है ऐसी मोहभावना (मोहके अनुभवके) प्रभावसे आत्मपरिणति सदा चक्कर खाती है, इसलिये यह आत्म ५३३ जैन शास्त्रमाता] -परिशिष्ट- निमित्ततया ज्ञेयभूतासु वहिरर्थव्यक्तिषु प्रवृत्तमंत्रीकस्य शिथिलितात्मविवेकतयात्यन्त- वहिर्मुखस्य पुनः पोद्गलिककर्मनिर्मापकरागद्वेपतमनुवर्तमानस्य दूरत एवात्मावाप्तिः । अथ यदा त्वयमेव प्रचण्डकर्मकाण्डोच्चण्डीकृताखण्डनानकाण्डत्वेनानादिपोद्गलिककर्म- निमितस्य मोहस्य वध्यघातकविभागनानपूर्वकविभागकरणात् केवलात्मभावानुभाव- निश्चलोकृतवृत्तितया तोयाकर इवात्मन्येवात्तिनिष्प्रकम्पस्तिष्ठन् युगपदेव व्याप्यानन्ता नप्तिव्यक्तीरवकाशाभावान्न जातु विवतंते, तदास्य अप्तिव्यक्तिनिमित्ततया नेयभूतासु वहिरर्थव्यक्तिषु न नाम मंत्री प्रवर्तते; ततः सुप्रतिष्ठितात्मविवेकतयात्यन्तमन्तर्मुखीभूतः पौद्गलिककर्मनिर्मापकरागप तानुवृत्तिदूरीभूतो दूरत एवाननुभूतपूर्वमपूर्वज्ञानानन्द- स्वभावं भगवन्तमात्मानमवाप्नोति । अवाप्नोत्वेव नानान्दात्मानं जगदपि परमा- त्मानमिति ।। समुद्रको भांति अपनेमें ही क्षुब्ध होता हुआ क्रमशः प्रवनमान अनन्त 'जप्तिव्यक्तियोंसे परिवर्तनको प्राप्त होता है, इसलिये नप्तिव्यक्तियोंके निमिनन्प होनेसे जो मेयभूत हैं ऐसी वाह्यपदार्थव्यक्तियोंके प्रति उनकी मंत्री प्रवतंती है, इसलिये आत्मविवेक मिनिल हुआ होनेसे अत्यन्त बहिर्मुख ऐसा वह पुनः पौगलिक कर्मके चयिता नागपतम्प परिणमित होता है और इसलिये उसके आत्मप्राप्ति की। परन्तु अब जा पही आत्मा प्रचण्ड कर्मकाण्ड द्वारा अन्य जानकारी प्रना करनेमे अनादि-पोटनिर. कार्मरचित मोहवो 'वध्य-पातकके विभागमान (मा) र आत्मभावनाके [आत्मानुभवया प्रभाव पnिton माजी मार अपने में ही अति निप्पंप रहता ,आ एम नाम: अवकाशक अभावके कारण सांधा :::::::: प्तिव्यक्तियोंके निमित्तरूप होनेने जो उसे वास्तव में मंत्री नहीं प्रपती राम मा होने के कारण अत्यन्त मतका - .:.: रागदपर्वतरप परिणतिरोदर होता रेमाची भगदान आत्माको अनिल नयात्मक परमात्मादी नदी। है Prit

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जैन शास्त्रमाला -~~-परिशिष्ट- मालिनी छन्द इति गदितमनीचस्तत्त्वमुच्चारचं यत्, चिति तदपि किलाभूत्कल्पमन्नी हुतस्य । अनुभवतु तदुच्चश्चिञ्चिदेवाघ यस्माद्, अपरमिह न किंचित्तत्त्वमेकं परं चित् ।। २२ ।। समाप्तेयं तत्वदीपिका टीका । इति श्रीजग्रसेनाचार्य कृतायां तान्पयंवृनी एवं पूर्वोक्तरमेण 'एस दुरापुर हत्याकोनामत- गाथापर्यन्तं नम्यग्जानाधिकारः, तदनन्तरं तम्हा सम्म जमाः' इत्यादि प्रयोदमानलगायापर्यन्न नेयाधिकारापरनामा सम्यक्त्वाधिकारः, तदनन्तर एवं पणमिव मिळे' इत्यादिमाप्तननिमायापन चारित्राधिकार ति महाधिकारत्रयेणेकारमाधिकत्रिमतगाथामिः प्रवचननारामृतं समाप्तम् ।। समाप्तेयं तात्पर्यवृत्तिः प्रवचनलारस्य । [अव काव्य द्वारा चैतन्यकी महिमा गाकर वही एक अनुभव करने योग्य है मी प्रेरणा करके, इस परम पवित्र पन्मागमको पृाहति की जाती है :- [अर्थ :-] इसप्रकार इन परमागममें ] अमनपने मनावर. जोनमारने | जो थोड़ा-बहुत तत्व बाहा गया है, वह न चलमें वास्तव में अग्निमें होगी बन्नु समान बाहा] हो गया है। अग्नि को नाबानी, मानो पुछ होमा ही न गया हो ! नीकान :::. निना वर्णन किया जाय तथापि मानी कम : जाता है; चैतन्यकी अनन्त महिमा नि::: इसप्रकार तुद्धताको प्राप्त होता :::: अनुभव करो (अर्थात् उस तिर क्योंकि इस लोक में दूसरा पुरानी सप्रकार श्रीमानलमा श्रीमद् अमृतपदाचायंदेवपिन चालालात नमन :- . .

साधक जीवकी दृष्टि अध्यात्ममें सदा निश्चयनय ही प्रधान है, उसीके आश्रयसे धर्म होता है । शास्त्रों में जहाँ विकारी पर्यायोंका व्यवहारनयसे कथन किया जावे वहां भी निश्चयनय को ही मुख्य और व्यवहारनयको गौण करनेका आशय है ऐसा समझना चाहिये । क्योंकि पुरुषार्थ के द्वारा अपने में शुद्ध पर्यायको प्रगट करने अर्थात् विकारी पर्यायको टालने के लिये सदा निश्चयनय ही आदरणीय है । उस समय दोनों नयोंका ज्ञान होता है, किन्तु धर्मको प्रगट करनेके लिये दृष्टिमें दोनों नय कदापि आदरणीय नहीं हैं । व्यवहारनयके आश्रयसे कभी आंशिक धर्म भी नहीं होता, प्रत्युत उसके आश्रयसे रागद्वेषके विकल्प ही उठा करते हैं। छहों द्रव्य, उनके गुण और उनकी पर्यायोंके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये कभी निश्चयनयकी मुख्यता और व्यवहारनयकी गौणता रखकर कथन किया जाता है, और कभी व्यवहारनयको मुख्य करके और निश्चयनयको गौण रखकर कथन किया जाता है। स्वयं विचार करे उसमें भी कभी निश्चयनयकी और कभी व्यवहारनयकी मुख्यता की जाती है। अध्यात्मशास्त्र में भी जीवकी विकारी पर्याय जीव स्वयं करता है तो होती है, और वह जीवका अनन्य परिणाम है - इसप्रकार व्यवहारनयसे कहा या समझाया जाय, किन्तु उस प्रत्येक समयमें दृष्टिमें तो निश्चयनय एक ही मुख्य और आदरणीय है - ऐसा ज्ञानियोंका कथन है। शुद्धता प्रकट करनेके लिये कभी निश्चयनय आदरणीय होता है और कभी व्यवहारनय - ऐसा मानना भूल है। तीनों कालमें एकमात्र निश्चयनयके आश्रयसे ही धर्म प्रगट होता है - ऐसा समझना चाहिये । साधक जीव प्रारंभसे अंत तक निश्चयकी ही मुख्यता रखकर व्यवहारको गीण ही करता जाता है, जिससे साधक दशामें निश्चयकी मुख्यताके बलसे साधकके शुद्धताकी वृद्धि ही होती जाती है और अशुद्धता टलती ही जाती है । इसप्रकार निश्चयकी मुख्यताके बलने पूर्ण केवलज्ञान होने पर वहाँ मुख्यत्व गौणत्व नहीं होता और नय भी नहीं होते।

श्री प्रवचनसारको वर्णानुक्रम गाथासूची पृष्ठ गाया पृष्ठ २० ४१८ २७२ ५१४ असुभोवयोगरहिदा अनुहोदयेण आदा अमुहोवोगरहितो १२ २४४ आ ४० ८० २३४ १४ ४६१ अनयमावसमुत्यं अजधाचारविजुत्तो अट्ट अजधागण अट्ट नु जो ण मुभादि अत्यं अक्वणिव दिद अस्थि अमुत्तं मुत्तं अस्थित्तणिच्छिदस्स भत्यि नि य णत्यि ति अत्था बन्नु दव्यमयो अधिगगुणा सामण्णे अधिवाने व विवासे अपदेसं गपदेनं आगमन माह आगमपुब्बा दिट्टी आगमहोणो समणो आगाममणिविट्ट आगालामबगाहो २३ ४५५ १४० १६१ २६७ सादा काममनिममी २ अपदगो परमाणू ८.६ अपयत्ता वाचरिया अपरिचतराहावणुप्पाद अप्पटि उधि आप उनओगापा आपा परिणागप्पा अगाणं गाणं अमनमा गमणा अयदाचागमणो अरममावमग ri.:: .

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- गाथासूची ५३६ गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ २०५ ४०१ १५७ ६१ २२७ ४३८ १४८ जो जाणादि जिणिदे जो जाणदि मोजाणं जो वि जादि एवं जो पविजाणदि जो णिहदमोहगंठी जो मिहामोहट्टिी जोहा जिरवेक्वं जो मोहरागोने २३८ ४६५ ६० ४७ ४८७ १०८ २२० १०४ जो हि मुढेण ५४ ६६ १०५ ठाणपिज्जविहान ४४ २४५. जधजादनवजाद जय ते णभप्पदेसा जन्स असणमप्पा जस्त ण संति जं अण्णाणी कम्म जं केवलं ति णाणं जं तकालियमिदरं जंदव्वं तण्ण गुणो जंपरदो विपणाणं जं पेच्छदो अमुत्तं जादं मयं समत्तं जायदि व ण सदि जिणसत्थादी अट्ट जीवा पोग्गलकाया जीवो परिणमदि जीवो पाणणिवतो जीवो भवं भविस्मदि जीबो बबगदमोहो जीवो गयं अगुत्तो झुलो गृहेण आदा जे अजधागहिवरथा जणव सिजाया यो पज्जवेगुणिया गि विरागनी जोदियादिविजई कोजामिना श्रीको ११० पति जी नदिन नि १ १८८ --600:--:-- १० ८१ r-:-:-:-: . r: Pir.x-ig . . -r ܀ ' .; -r- ' : - - ? r . - -. r -::

५४० प्रवचनसार गाथा पृष्ठ মাথা पृष्ठ २४ १३२ ते पुण उदिण्णतण्हा तेरि विसुराण १२४ " ६ ६१ १११ द ४६ ११४ २३३ २८ ४६ १६० १२७ २६२ ३२४ णाणप्पमाणमादा णाणं अट्ठवियप्पो णाणं अत्यंतगयं णाणं अप्प ति मदं णाणी णाणसहावो णाहं देहो ण मणो णाहं पोग्गलमइओ णाहं होमि परेसिं"संति णाहं होमि परेसिं णिग्गंथं पव्वइदो णिच्छिदसुत्तत्थपदो णिद्धत्तणेण दुगुणो णिद्धा वा लुक्खा वा णिहद घणघादिकम्मो णो सद्दहति सोक्खं १६२ १६१ १६१ २६६ १५४ २०४ ३६१ ८३ १४७ २६६ ५०६ दयट्टिएण सव्वं दव्यं अणंतपज्जय दव्वं जीवमजीवं दव्यं सहायसिद्धं दव्वाणि गुणा तेसिं दव्वादिएसु मूढो दंसणणाणचरित्तेसु दसणणाणुवदेसो दिट्ठा पगदं वत्) दुपदेसादी खंदा देवदजदिगुरुपूजासु देहा वा दविणा देहो य मणो २४२ ४७३ २४८ ४८३ २६८ १६६ १६५ ३३० ४९९ ३२६ २६१ १६७ ३३२ १६७ ६६ १२३ ६२ ११२ १६३ १६१ ३२३ त ३७ ध धम्मेण परिणदप्पा १७ ११ ६० प १५६ ६२ ३८४ २४७ my ४०६ तकालिगेव सव्वे तम्हा जिणमग्गादो तम्हा णाणं जीवो तम्हा तह जाणित्ता तम्हा दु णस्थि कोई तम्हा समं गुणादो तह सो लद्धसहावो तं सम्भावणिवद्धं तिक्काल णिच्चविसम तिमिरहरा जइ दिट्ठी २०० १२० २७० १६ २११ ६५ ११७ ५७ १०३ २५ ३१२ १५४ पक्खीणघादिकम्मो पयदम्हि समारद्ध पप्पा इ8 विसये परदव्वं ते अक्खा परमाणुपमाणं वा परिणमदि चेदणाए परिणमदि जदा परिणमदि जेण परिणमदि णेयमट्ठ ४६८ २३६ १२३ ५१ २५२ १२० १८७ १७० १२ ते ते कम्मत्तगदा ते ते सव्वे समगं ३ ५ ४२ ७३ ५४१ गाथासूची- गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ २६६ १०४ २०६ ३४३ परिणमदि सयं मुत्ता इंदियगेज्मा मुत्तो स्वादिगुणो मोहेण व रागेण ८४ १४६ परिणमदो खलु :५० १८० २५० १२२ १७६ १५२ २१३ ३० २४० ४६९ २५५ ४६२ रत्तो वंधदि कम्म रयणमिह इंदणीनं नगो पसत्यभूदो स्वादिहि रहिदो परिणामादो बंधो परिणामो सयमादा पविभत्तपदेसत्तं पंचममिदो तिगुत्तो पाइन्भवदिय पाणावाचं जीवो पाणेहि चहि पुण्णफला अरहंता पोग्गलजीवणिवद्धो २०७ ३४४ १४६ १७४ २५२ १४७ नोगेण वा धाए ४५ ल १२८ २६४ २६७ लिंगरगहणे तेमि निगेहि जेहि दवं लोगालोगेनु भो : .8 १०१ फासो रसोय गंधो फासेहिं पुग्गलाणं १७७ ३५० व १०५ २३० ८४६ बालो वा बुट्टो २७५ मुज्झदि सासणमेयं १. भ १८२ ..... २१५. भणिदा पुढवि- भत्ते वा खमणे भंगविहणो य भावेण जेण जीवो :-.:-- -- যতামরা मणो ण होदि मन्द जियद मारंभदिन मुस्मदिदा रज्जवि . ..

५४२ प्रवचनसार - गाया पृष्ठ गाथा पृष्ठ ८२ १४५ मरर वावाहित समावी हिमहाबो माओवादेमी १८२ सब्वे विय अरहंता संपज्जदि णिवाणं मुतं जिणोवविद्ध ६ है ३९७ मुद्रम य सामण्णं २७४ १४ २१ १०२ ३५४ मा २४१ ४०१ सुविदिदपयत्मसुत्तो मुहपरिणामो पुग्णं सेसे पुण तित्ययरे सो वा पुण दुरा सो सहामि २ 4 ५१५ २० -----नी :::-:-:-- ७१ २६ ह २१३ १२१ हादि र ण हादि तीणो जदि सो आदा - ४५६ २५ * कलशकाव्योंकी वर्णानुक्रम सूची * . श्लोक पृष्ठ आत्मा धर्म: स्वयमिति ... ५ ... ... २० ५३४ ... २२ ... .... ... ४५१ ४७५ ४ ... १० ११ मानन्दामृतपूर इति गदितमनीचे: इत्यध्यास्य शुभोपयोग इत्युच्छेदात्परपरिणते: इत्येवं चरणं पुराणपुरुषः इत्येवं प्रतिपत्तुराणय जाननप्येप विवं जनं ज्ञानं जेयतत्त्व भयोयुर्वन्नजसा तन्त्रस्यास्य शिखण्डि ट्रव्यमामान्य विज्ञान व्यस्य गिद्री चरणरय व्यानुसारि चरणं द्रव्यान्तरव्यतिकरा निश्रित्यारमन्यधिकृत परमानन्द मुधारग काव्यमेव किन ध्याये किल मायापिका यासाश्रीवासवर मामी ... ६ ... . ... १२ . .. : *" .

५४२ प्रवचनसार गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ ७६ १३४ ८२ १४५ ६ ह १८२ २८३ १३८ २०३ ३४ ५६ ३६७ २७४ ५१६ २४५ ४७८ सव्वे वि य अरहंता संपज्जदि णिव्वाणं सुत्तं जिणोवदिट्ठ सुद्धस्स य सामण्णं सुविदिदपयत्यसुत्तो सुहपरिणामो पुण्णं सेसे पुण तित्थयरे सोक्खं वा पुण दुक्खं सोक्खं सहावसिद्धं १४ २१ १०२ सपरं वाधासहिदं सम्भावो हि सहावो समओ दु अप्पदेसो समणं गणि गुणड्ढे समणा सुद्धवजुत्ता समवेदं खलु दव्वं समसत्तुबंधुवग्गो सम्मं विदिदपदत्या सयमेव जहादिच्चो सव्वगदो जिणवसहो सव्वाबाधविजुत्तो सव्वे आगमसिद्धा २०४ १८१ ३५४ २४१ ४७१ २ ४ २७३ ५१५ ३५ १२१ २० ७१ १२६ २६ ४४ ho १९८ ३८१ २१३ हवदि व ण हवदि हीणो जदि सो आदा ४२१ ४२ २३५ ४५६ [ भजन ] परनति सब जीवन की, तीन भांति वरनी । एक पुण्य, एक पाप, एक राग हरनी ।। परनति० ॥ तामें शुभ-अशुभ अंध, दोय करै कर्म बंध । वीतराग परनति ही, भवसमुद्र तरनी ।। परनति० ।। जावत शुद्धोपयोग, पावत नाहीं मनोग। तावत ही करन जोग, कही पुण्य करनी ।। परनति० ।। त्याग शुभ क्रियाकलाप, करो मत कदाच पाप । न शुभ में मगन होय, शुद्धता बिसरनी ।। परनति० ॥ ऊँच-ऊँच दशा धारि, चित प्रमाद को बिडारि । ऊँचली दशातै मत, गिरो अधो धरनी ।। परनति० ।। 'भागचंद' या प्रकार, जीव लहै सुख अपार । याके निरधार, स्याद्वाद की उचरनी ॥ परनतिः ।।

* कलशकाव्योंकी वर्णानुक्रम सूची * श्लोक पृष्ठ ५ ... २० ५३४ ... आत्मा धर्म: स्वयमिति ... २२ ५३५ ... ... ... ... ४५६ ४ ... ... ... १६ ... १८ १. ... मानन्दामृतपूर इनि गदिनमनीः इत्यध्यास्य शुभोपयोग इत्युच्छेदात्परपरिणतेः इत्येवं वरणं पुराणपुरुषः इत्येवं प्रतिपत्तुराशय जाननप्येप विश्व जनजानं यतत्त्व यीकुर्वन्नजसा तन्तस्यास्य णियण्डि द्रव्यसामान्य विज्ञान द्रव्यम्य मिही चरणग्य व्यानुमारि चरणं द्रव्यान्तरव्यतिकमा निश्चित्यात्मन्यधिवत परमानदगुधारग वसाव्यमेव निन्न च्या किल मच्या याचिका रमाकाहानीकारवयं भोवतमाम १३ : १ ... " ....

५४२ प्रवचनसार गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ ७६ १३४ ८२ १४५ میں सव्वे वि य अरहंता संपज्जदि णिव्वाणं सुत्तं जिणोवदिट्ठ ६६ १३८ २०३ है १८२ २८३ ३६७ ३४ ५६ सुद्धस्स य सामण्णं २७४ ५१६ २४५ ४७८ १४ २१ २०४ १८१ ३५४ सपरं वाधासहिदं सम्भावो हि सहावो समओ दु अप्पदेसो समणं गणि गुणड्ढं समणा सुद्धवजुत्ता समवेदं खलु दव्वं समसत्तुबंधुवग्गो सम्मं विदिदपदत्या सयमेव जहादिच्चो सबगदो जिणवसहो सव्वाबाधविजुत्तो सव्वे आगमसिद्धा १०२ २४१ २७३ ४७१ सुविदिदपयत्यसुत्तो सुहपरिणामो पुण्णं सेसे पुण तित्थयरे सोक्खं वा पुण दुक्खं सोक्खं सहावसिद्धं २ ५१५ २० ३५ १२६ ६८ १२१ २६ how १९८ ३८१ २१३ ४२१ हवदि व ण हवदि हीणो जदि सो आदा २३५ ४५६ २५ ४२ [ भजन ] परनति सव जीवन की, तीन भांति वरनी। एक पुण्य, एक पाप, एक राग एक राग हरनी ।। परनति० ॥ तामें शुभ-अशुभ अंध, दोय करै कर्म बंध । वीतराग परनति ही, भवसमुद्र तरनी ।। परनति० ।। जावत शुद्धोपयोग, शुद्धोपयोग, पावत नाहीं मनोग । तावत ही करन जोग, कही पुण्य करनी ।। परनति० ।। त्याग शुभ क्रियाकलाप, करो मत कदाच पाप । न शुभ में मगन होय, शुद्धता बिसरनी ।। परनति० ।। ऊंच-ऊंच दशा धारि, चित प्रमाद को बिडारि । ऊँचली दशातें मत, गिरो अघो घरनी ।। परनति० ।। 'भागचंद' या प्रकार, जीव लहै सुख अपार । याक निरधार, म्याबाद की उचरनी।। परनतिः ।।

* कलशकाव्योंकी वर्णानुक्रम सूची * श्लोक पृष्ठ १६६ ... आत्मा धर्मः स्वमिति ... ५ ... ... २२ ... १६ ४७५ ... ... . ... ... मानन्दामृतपूर इति गदितमनीः त्यध्यास्य शुभोपयोग इत्युच्छेदात्परपरिणते: इत्येवं चरणं पुराणपुरुषः इत्येवं प्रतिपत्तुराणय जाननाप्येप विश्व जनं जानं यतत्त्व यीकुर्वन्नञ्जमा नन्यस्यास्य नियण्टि व्यगामान्य विज्ञान व्यग्य गिद्धी चरणग्य द्रव्यानुगामि चरणं द्रव्यान्तरच्यतियाग निधित्यात्मन्यधिकृत परमानासुधाग बतच्यमेव किन या किल मध यायेगापिका दाकारमीनाराबारी मामी ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... . ...

५४२ प्रवचनसार गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ ७६ ८२ १४५ ६ ह १६ १३८ २०३ or " १३४ १८२ २८३ ३६७ ३४ ५६ गुणड्ढे २७४ ४७८ २४५ १०२ सव्वे वि य अरहंता संपज्जदि णिव्वाणं सुत्तं जिणोवदिट्ठ सुद्धस्स य सामण्णं सुविदिदपयत्यसुत्तो सुहपरिणामो पुण्णं सेसे पुण तित्थयरे सोक्खं वा पुण दुक्खं सोक्खं सहावसिद्धं १४ २१ २०४ १८१ सपरं बाधासहिदं सम्भावो हि सहावो समओ दु अप्पदेसो समणं गणि समणा सुद्धवजुत्ता समवेदं खलु दव्वं समसत्तुबंधुवग्गो सम्म विदिदपदत्था सयमेव जहादिच्चो सव्वगदो जिणवसहो सव्वाबाधविजुत्तो सव्वे आगमसिद्धा ३५४ ४७१ २ ४ २४१ २७३ ५१५ ३५ २० ७१ ६८ १२१ १२६ २६ ४४ how १९८ ३८१ हवदि व ण हवदि हीणो जदि सो आदा २१६ २५ ४२१ ४२ २३५ ४५६ [ भजन ] परनति सब जीवन की, तीन भांति वरनी। एक पुण्य, एक पाप, एक राग हरनी ।। परनति ० ॥ तामें शुभ-अशुभ अंध, दोय करै कर्म बंध । वीतराग परनति ही, भवसमुद्र तरनी ।। परनति० ।। जावत शुद्धोपयोग, पावत नाहीं मनोग । तावत ही करन जोग, कही पुण्य करनी ।। परनति० ।। त्याग शुभ क्रियाकलाप, करो मत कदाच पाप । न शुभ में मगन होय, शुद्धता बिसरनी ।। परनति० ।। ऊँच-ऊँच दशा धारि, चित प्रमाद को विडारि । ऊँचली दशातें मत, गिरो अधो धरनी ।। परनति० ।। 'भागचंद' या प्रकार, जीव लहै सुख अपार । याके निरधार, स्याद्वाद की उचरनी । परनति० ।।

* कलशकाव्योंकी वर्णानुक्रम सूची * श्लोक पृष्ठ ... ... ५३४ मात्मा धर्मः स्वयमिति ... २२ ... ... . ... ४५१ १३ ... १० ... ११ ११२ ... ... ... मानन्दामृतपूर पनि गदितमनीचेः इत्यध्यास्य शुभोपयोग इत्युच्छेदात्परपरिणतेः त्येवं चरणं पुराणपुरुषः इत्येवं प्रतिपत्तुराणय जाननप्येप विश्व जनं जानं जेयतत्त्व यीकुर्वन्नञ्जसा तन्यस्यात्य शिवण्डि द्रव्यमामान्य विज्ञान व्यरय सिन्ही चरणम्य प्रव्यानुसारि चरणं द्रव्यान्त व्यक्तिबाग निश्रित्यारमन्यधिकृत परमानवसुधारग वजयमेव विन्न न्याय दिन गयानाचा मायामश्रीदामा लोमा : ... " ... ...

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गावासूची गाथा पृष्ठ गाचा पृष्ठ ४०१ २२७ १४४ २२८ ४६५ जो जाणादिजिनिदे जो जापदि सोणानं जो विजापदि एवं जोपविजापदि जो णिहदमोहगंटी जो जितमोहबिट्टी जोहाजिरवेशन जो मोहागोगे जोदि मुन १६ १०८ ११७ १०८ ५४ १७ ५.१ कविनाम जघजादवजाद जध ते णभप्पदेसा जन्स असणमप्पा जस्स ण संति जं अण्णाणो कम्म केवलं तिणाणं जं तकालियमिदरं जंदव्वं तण्ण गुणो जं परदो विणाणं जं पेच्छद्रो अमुत्तं जादं सयं समत्तं जायदि व ण णरसाद जिणसत्यादी अट्ट जीवा पोग्गलकाया जीवी परिणदि जीवापाणणिवी जीवो भवं भवित जीवो ववगतमाको जीबो गयं अमृती जुनी गहा आमा अजधागा ॐ व गजागा परजायेगा समिती १५ १:". दि .. . 7 ११ १४८ -...--.-:-::: । । . . । को .

५४० -प्रवचनसार गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ २४ १३२ १२४ ५ ६ द २७ ११४ २८ २३३ ८६ ४३ १६० १२७ २६२ णाणप्पमाणमादा णाणं अट्टवियप्पो णाणं अत्यंतगयं जाणं अप्पत्ति मदं पाणी णाणसहावो पाहं देहो न मणो पाहं पोग्गलमइओ पाहं होमि परेसिं'संति पाहं होमि परेसि पिगंयं पवइदो पिच्छिदसुत्तत्यपदो पिद्धत्तणेण दुगुणो १६२ ८ १६१ १६१ ८७ १५४ ४२ ते पुण उदिण्णतण्हा २५३ । तेसि विसुद्धदसण १११ ४६ दबट्टिएण सव्वं ४८ दव्वं अणंतपज्जय ३२१ दव्वं जीवमजीवं ૨૨૪ दव्यं सहावसिद्धं २६६ दव्वाणि गुणा तेसिं ३६६ दव्वादिएसु मूडो ५०६ दसणणाणचरित्तेसु ५०७ दसणणाणुवदेसो ३३० दिठ्ठा पगदं वत्थु ३२६ दुपदेसादी खंदा देवदज दिगुरुपूजासु ११२ देहा वा दविणा देहो य मणो २०४ २६६ १४७ ४७३ २४२ २६८ १६६ २४८ ४८३ ४६६ पिद्धा या लुक्खा वा १६५ २६१ १६७ ३३२ १६७ पिद पधादिकम्मो पो सदहति सोक्न १२३ ६२ १६३ ३७३ १६१ ३२३ ic ध ६५ (७ १० धम्मेण परिणदप्पा ११ १७ १५० प २०० ३३ - २११ तकालिगेव सचे तन्हा जिपमम्गादो तन्हा पापंजीवो तन्हा तह जामिना नम्हा दु पत्यि कोई लम्हा ममं मुनादी नहनो लद्धमहाबो नंमभावभिनवं लिमालदिनविन विभिन्दगद दिट्टी ६५ ११७ ५७ 3 . ܕ ३८४ पक्खीणघादिकम्मो २४७ पयदम्हि समारद्ध पप्पा इट्टे विमय २५. परदव्यं ते अक्षा परमाणु प्रमाणं वा परिणमदिचेदणार परिणमदि जदा परिणमदिन गिरिया २३६ १ १२ " ५४१ -गाथासूची- गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ २६९ १०४ २०६ परिणमदि सयं मुत्ता इंदियगेज्मा मुत्तो स्वादिगुणो मोहेण व रागेण १४६ परिणमदो खलु १८० १२२ र २५० १०६ २१३ २४० ४६४ रत्तो बंधदि कम्म यणमिह इंदणीनं गगो पसत्यभूदो न्वादिहि रहितो २५५ ४६२ परिणामादो बंधो परिणामो सयमादा पविभत्तपदेसत्तं पंचसमिदो तिगुत्तो पाइन्भवदिय पाणावाधं जीवो पाणेहि चर्हि पुण्णफला अरहंता पोग्गलजीवणिवद्धो २०७ ३४४ १७४ १४६ १४७ गोगेण वा हुवा ४५ ल २६४ १२८ १० लिंगगहरी नेमि निदि हवं जोगालोगेन मी १०१ फासो रसोय गंधो फासेहि पुग्गलाणं :". व मा बालो वा खुट्टो सुज्झदि सासणमेयं भ मणिदा पुरवि- भत्ते वा खमणे भंगविणो य भाषण जेण जीयो म - गणारारारिया गपकोणोदि .. है विजन करिया रस्त प्रवचनसार - ५४२ गाथा गाथा पृष्ठ पृष्ठ ७६ १४५ ८२ सव्वे वि य अरहंता संपज्जदि णिव्वाणं सुत्तं जिणोवदिट्ठ ६ १३४ १८२ २८३ ३६७ & ३४ ५६ १३८ २०३ २७४ ५१६ सुद्धस्स य सामण्णं ४७८ १४ २४५ १०२ २१ ३५४ १८१ सपरं वाधासहिदं सम्भावो हि सहावो समओ दु अप्पदेसो समणं गणि गुणड्ढं समणा सुद्धवजुत्ता समवेदं खलु दव्वं समसत्तुबंधुवग्गो सम्मं विदिदपदत्था सयमेव जहादिच्चो सव्वगदो जिणवसहो सव्वावाघविजुत्तो सव्वे आगमसिद्धा २०४ ४७१ ४ २४१ सुविदिदपयत्यसुत्तो सुहपरिणामो पुण्णं सेसे पुण तित्थयरे सोक्खं वा पुण दुक्खं सोक्खं सहावसिद्ध २ २७३ ५१५ २० ३५ ६८ १२१ ७१ १२६ २६ ho ४२१ १९८ ३८१ हवदि व ण हवदि हीणो जदि सो आदा २१६ २५ ४२ २३५ ४५६ [ भजन ] परनति सव जीवन की, तीन भांति वरनी। एक पुण्य, एक पाप, एक राग हरनी ।। परनति० ॥ तामें शुभ-अशुभ अंध, दोय करै कर्म बंध । वीतराग परनति ही, भवसमुद्र तरनी ।। परनति०॥ जावत शुद्धोपयोग, पावत नाहीं मनोग । तावत ही करन जोग, कही पुण्य करनी ।। परनति० ॥ त्याग शुभ क्रियाकलाप, करो मत कदाच पाप । न शुभ में मगन होय, शुद्धता बिसरनी ।। परनति० ॥ ऊंच-ऊँच दशा धारि, चित प्रमाद को बिडारि । ऊँचली दशातें गिरो अधो धरनी ।। परनति० ।। 'भागचंद' या प्रकार, जीव लहै सुख अपार । याके निरधार, स्याद्वाद की उचरनी ।। परनति० ।। मत, * कलशकाव्योंकी वर्णानुक्रम सूची * टोक पृष्ठ ५ ... आत्मा धर्म: स्वयमिति २० ५३४ ... १७ ... ... ०६१ ८ ... १५ १६ ... .. Y . ... ... आनन्दामृतपूर पनि गदिनमनीचे: इन्यध्यास्य शुभोपयोग इन्युच्छेदात्यन्परिणतेः ग्यवं चरणं पुराणपुरुषः उन्येवं प्रतिपत्तुराणय जाननप्येप विश्व जनं गानं यतन्त्र जयीकुर्वन्नञ्जसा तन्नग्यास्य नियपिट द्रव्यमामान्यविज्ञान प्रव्यम्य मित्री चरणग्य नव्यानुगारि चरणं च्यानतरच्यतिकग निनियारमन्यधियान परमानन्गुधारग बतायमेव विन्द मागविन माकोशनि कारोवार ... " " । ... ... ...

हमारे यहाँ प्राप्त प्रकाशन . प्रेस ro 0 समयसार १२-०० मोशमागं HTTE प्रवचनसार १२-०० पंदित टोडरमा :गापोर । पंचास्तिकाय ७-१० तीर्थकर महावीर गोर नागोंगी नियमसार (गारेट या साल में मिली में) २- समयसार नाटक ७-५० मैं कौन हूँ? समयसार प्रवचन भाग १ X-LC पंदित टोडरमल : जीवन और गाहिला समयसार प्रवचन भाग २ ४-५० कविवर पं० बनारमीनारा: समयसार प्रवचन भाग ३ ५-००. जीवन और साहिता समयसार प्रवचन भाग ४ वीतराग-विज्ञान प्रशिक्षण निर्देशिका प्रात्मावलोकन ३-०० अनेकान्त और स्याद्वाद धावकधर्म प्रकाश ३-००. तीर्थकर भगवान महावीर छहढाला (सचिन) १-५० वीतरागी व्यक्तित्व : भगवान महावीर द्रव्य संग्रह १-२० सत्य को खोज [कथानक] लघु जैन सिद्धान्त प्रवेशिका ०-४० अपने को पहचानिए ०-५० प्रवचन परमागम २-५० पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक और धर्म की क्रिया २-०० उसकी ग्यारह प्रतिमाएं जैन सिद्धान्त प्रश्नोतर माला भाग १ अर्चना (पूजन संग्रह) जैन सिद्धान्त प्रश्नोतर माला भाग २ मैं ज्ञानानंद स्वाभावी हूं (कैलेंडर) जैन सिद्धान्त प्रश्नोत्तर माला भाग ३ १-५० बालबोध पाठमाला भाग १ तत्त्वज्ञान तरंगिणी ५-०० बालबोध पाठमाला भाग २ अलिंग-ग्रहण प्रवचन बालबोध पाठमाला भाग ३ अष्ट प्रवचन भाग २ १-५० वीतराग-विज्ञान पाठमाला भाग १ वालपोथी भाग १ ०-२५ वीतराग-विज्ञान पाठमाला भाग २ १-०० वालपोथी भाग २ ०-४० वीतराग-विज्ञान पाठमाला भाग ३ ज्ञानस्वभाव ज्ञेयस्वभाव तत्त्वज्ञान पाठमाला भाग १ १-२५ जयपुर (खानियां) तत्त्वचर्चा भाग १ व २ १-२५ ३०-०० तत्त्वज्ञान पाठमाला भाग २ परमात्म पूजा संग्रह २-०० सुन्दरलेख बालबोध पाठमाला भाग १ ०-२५ * श्री दि० जैन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़ ( भावनगर - गुजरात ) * पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, ए-४, बापूनगर, जयपुर ३०२००४ . ०-७० ०-७० ०-७० ܕ 1 x'-

Shri Parvchansar

Author
Kundkund Aachrya
Title
Shri Parvchansar
File name
Shri Parvchansar
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2011/07
Publisher
Gujrat,shri Vitrag Satsahitay Parsarak Terst Bhavnagar
Language
Sanskrit
Pages
398
Library
Shree Abhya Jain Granthalya,bikaner
DLI number
314413
Barcode
99999990313169.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
wcmSzBYIUP0
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