Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Yajnavalkyasmriti Tatparyatarani
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TIDYA LIBR TIYA HOMART . GULAS - 19. CALCUTTA 192 NAHAR LIBRARY याज्ञवल्क्यस्मृतितात्पथ्येतराण. जिसमें पाञ्चालदेशीय यूनिवर्सिटी पाठशालाके विद्या- र्थियों के प्राचीन स्मार्त धर्म और दायभागादि तरणके लिये अपने मातुल काशीशालीय धर्म- शास्त्राध्यापक स्वर्गवासी श्रीगुलज़ार शास्त्री जी महाराज के भापानुवाद मानव- धर्मसार की रीति पर उक्तदेशीय महाविद्यानिकर के मुख्य संस्कृताध्यापक. श्रीपंडित गुरुप्रसादजी ने सरल हिन्दी भाषा में अति प्रयत्न से रचना किया SHANs. YATR लखनऊ मुंशी नवलकिशोर के यन्त्रालय में छापागया। अक्टूबर सन् १८८८ ई०॥ तीसरीवार ३००० PROv300 माशयल्पपस्माते स.. पराशरव्यासशंखलिखितादक्षगोतमो ॥ शातातपोव शिष्ठथ्यधर्मशास्त्रप्रयोजकाः५ देशकालउपायेनद्रव्यं श्रद्धा समन्वितम्॥पात्रेप्रदीयतेयत्तन्सकलंधर्मलक्षणम् ६श्रुति स्मृतिःसदाचारःस्वस्यचप्रियमात्मनः॥ सम्यक्संकल्पनः कामोधर्ममूलमिदंस्मृतम् ७ इज्याचारदमाहिंसादानंस्वा ध्यायकर्मच ।। अयन्तुपरमोधर्मोयद्योगेनात्मदर्शनम् ८ चत्वारोवेदधर्मज्ञःपर्पत्त्रविद्यमेववासद्व्यसधर्मःस्या देकोवाध्यात्मवित्तमः ९ ब्रह्मक्षत्रियविटाद्रावणास्त्वाचास्त्र योदिजाः॥निपेकादिश्मशानान्तास्तेपावैमन्त्रतःक्रिया १० गर्भाधानमृतोपुंसःसवनस्यन्दनात्पुरा।पटेऽष्टमेवासीमन्तः प्रसवेजाबकर्मच ११॥ पराशर१३ व्यास१४शंखलिखित१५ दक्ष१६गौतम१७शातातप १८ौरवशिष्ठ १६इतनेधर्मशास्त्रके मुरल्ययनानेवालेहैं५पवित्रदेश और अच्छेकालमें जोवस्तुसत्पात्रको श्रद्धापूर्वक दीजातीहे सोऔर ऐसेओर सवकामधर्मकेलक्षणहें श्रुतिअर्थात् वेदस्मृतिधर्मशास्त्र भलेलोगजोकामकरतेमायेहों अपनीआत्माकोजोप्रियहे और श्रुति संकल्पसउत्पन्नजोकामनाहैयेसवधर्मकेमलहें योरयज्ञ,सदाचार इंद्रियोंकादमन,जीववन्धनकरना,दानऔर वेदादिकापढ़ना,इन. सबसेबड़ाधम्मैयहहे कियोगद्वारा आत्माकादर्शनकरनावेदौर धर्मकेजाननेवालेचारमनुष्य,यातीनवेदजाननेवालेतीनमनुप्यकी पर्वतहोताहे,वहअथवा मध्यात्मविद्याकावेदान्तयोगआदि जानने वालाएकही मनुष्यजोकहे सोधर्मकहलाताहै।(इत्युपोटघातप०) ब्राह्मणक्षत्रिय वैश्योरशद्रयेचारवर्गहें इनमेंपहिले तीनकोद्विज कहतेहेंउनकागर्भाधानसेले अंतक्रियातकसव संस्कारमंत्रसेहोताहे १०रजोदर्शनकालमें गर्भाधानगर्भकेडोलनेसेपहिलही पुंसवन २ ठेवा पाठवेंमहीनेमेसीमन्त३प्रसवहोनेपर जातकर्म ।।११।। .
२ पाझवत्स्यस्माते स०1 अहन्यकादशेनामचतुर्थेमासिनिष्क्रमः॥ पष्टेटनप्राशनं मासिचूडाकाव्यथाकुलं १२ एवमेनःशमंयातिवीजगर्भस मुद्भवातूष्णीमेताःक्रियाःस्त्रीणांविवाहस्तुसमन्त्रकः१३गर्भा टमऽष्टमेवाब्देब्राह्मणस्योपनायनम् ॥राज्ञामेकादशेसकेवि शामेकेयथाकुलं१४ उपनीयगुरु शिष्यंमहाव्याहृतिपूर्वकम् वेदमध्यापयदेनशैाचाचारांश्चशिक्षयेत् ५दिवासन्ध्यासुक स्थिब्रह्मसूबउदंमुखः॥ कुर्य्यान्मूत्रपुरीपेतुरात्रौचेदक्षिणामु खः१६ गृहीतशिष्णश्चोत्यायमृद्भिरप्सुद्धृतेजलैः॥ गंधले पक्षयकरंकुाच्छौचमतंद्रितः १७ अन्तर्जानुशुभेदेशेउप विष्टउदंमुखः॥प्रारब्राह्मणीनहिजोनित्यमुपस्टशेत् १८ ग्यारहवें दिन नामकरण५चौथेमहीने निष्क्रमण छठे महीने अन्नप्राशन७और अपने कुलकीरीतिके अनुसार तीसरे या पांचवें वर्ष चूडाकर्मकरे । १२ इसप्रकार वीज और गर्भकीअपवित्रता दूरहोतीहै,येसवकर्मा स्त्रियोंके ममन्त्रकहोतेहैं केवल उनकेव्याहमें मत्रपढ़ेजातेहैं१३गर्भसेयाजन्मसेआठवेंवर्षब्राह्मणका,क्षत्रियोंका ग्यारहें और वैश्योंका बारहें या जब उनकेकुलमें होताहो त यज्ञो- पवीतकरनाचाहिये १४शिष्यका यज्ञोपवीतकरके गुरू उसकोमहा- व्याहृतिसहित वेदपढ़ावे,शोच(द्रव्यशुद्धि)ोर सटाचार भी सि. खारे १५ दिनमेंऔर सांझ सवेरेजनेऊ कानपरचढ़ाके उत्तर मुंह हो मूत्र भौर पुरीपकरे और रातको दक्षिणमुहहोकेकरे१६ (यदि अपनेपासजलनहो तो)मूत्रद्वारा हाथसेपकड़कर जलाशयतकजावे वहांसे जल निकाल और मिट्टीलेके सावधानीसे इतनाधोवे कि जिसमें मलकीगन्ध और चिकनाई चलीजाचे १७ प्रतिदिन द्विज जानुभोंकेवीच हाथरखके पवित्रस्थलमें उत्तरमुंह या पूर्वमुंह बैठे और ब्रह्मतीर्थ से भाचमनकरे १८ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सः। मधुमांसांजनोच्छिष्टशुक्तस्त्रीप्राणिहिंसनम् ॥ भास्करा लोकनाश्रीलपरिवादांश्चवर्जयेत् ३३सगुरुर्यक्रियाःकृत्वा वेदमस्मैप्रयच्छति।उपनीयददद्वेदमाचार्यःसउदाहृतः३४ एकदेशमुपाध्यायऋविग्यज्ञकदुच्यते॥ एतेमान्यायथापूर्व मेभ्योमातागरीयसी ३५ प्रतिवेदब्रह्मचर्य्यद्वादशाब्दानिष' ज्चवा ॥ ग्रहणांतिकमित्येकेकेशांतश्चैवपोडशे ३६ आपो डशादादाविंशाच्चतुर्विशाचवत्सरात् ॥ ब्रह्मक्षत्रविशांकाल औपनायनिकःपरः ३७ अतऊर्ध्वपतंत्येतेसर्वधर्मवहि प्कृताः ॥ सावित्रीपतितावात्याव्रात्यस्तोमातेकृतोः ३८ मातुर्यदग्रेजायंतेद्वितीयमोजिबंधनात् ॥ ब्राह्मणक्षत्रियवि शस्तस्मादेतेहिजाःस्मृताः३९॥ ब्रह्मचारीमधुमांसनखावेभंजन औरतैलादिनलगावे (गरूको छोड़)किसीकाजूठानखाय,कठोरवचन, स्त्रीसंग, जीवहिंसा,सांझ सबेरेसूर्यकादेखना,लम्जाकेवचनवोलना,दूसरेकी निंदाकरनी,इ- त्यादिबातोंकोछोड़दे ३३ जोबल्लचारीको(गर्भाधानसेलेकेउपनयन पर्यंत)क्रियायथा विधिकरकेवेदपढ़तारहे उसकोगुरूओरजोकेवल यज्ञोपवीतकरकेवेदउसेपढ़ाताहेउसकोभाचार्यकहतेहें३४जोथो- डासावेदपढ़ावेवहउपाध्यायोरजोयज्ञकरावेवहनविक्कहलाता हैइनमेंजोजोपहलेपवेपिछलेवालों से अधिकमान्यहें औरइनस- वोसमाताश्रेष्ठतमहै ३५ हरएकवेदोंकेपढ़नेमें बारहवर्षवापांचवर्ष ब्रह्मचर्यकरनाचाहिये,कोईकहतेहपाठसमाप्तपर्यंतब्रह्मचर्यकरके शांतकर्मब्राह्मणकासोलहवर्षकरनाचाहिये ३६सोलह,बाईस और चौबीसवर्पतककमसेब्राह्मण,क्षत्रिय मोरवैश्योंकेउपनयनकीपरम अवधिहै ३७इससेउपरांतयेपतितहोकरसरधम्मोसरहितहोतेहंसा- वित्रीपतित संस्कारहीनभीयदिनात्यस्तोमयज्ञनकरेंतोपतितगिने जातेहैं ३८ ब्राह्मण,क्षत्रिय औरवैश्य इसहेतुसे द्विजकहेजातेहैं कि उनकाएकजन्ममातासेमोरदूसरामोंजीबंधनसेगिनाजाताहे ३६ . याज्ञवल्क्यस्मृति स । यज्ञानांतपसांचैवशुभानाचैवकर्मणाम्॥ वेदएंवद्विजाती नांनिश्रेयसकरःपरः ४० मधुनापयसाचैवसदेवांस्तर्पयेद द्विजः॥पितृन्मधुघृताभ्यांचऋचोधीतचयोन्वहम् ४१ यजंपि. शक्तितोधातेयोन्वहंसघृतामृतैः॥प्रीणातिदेवनाज्येनमधुना चपितूंस्तथा४२सतुसोमष्टतैर्देवांस्तर्पयद्यान्वहं पठेत्।सामा निप्तिंकुचिपितृणांमधुपिपा ५३ मेदसातर्पयेहवानथ वीगिरसःपठन् ॥ पितृश्चमधुसर्पिभ्यामन्वहंशक्तितोद्विजः ४४वाकोवाक्यपुराणचनाराशंसीश्चगाथिकाः। इतिहासां स्तथाविद्याशात्याधीतेहियोन्वहम् ४५मांसक्षीरोदनमधु तर्पणंसदिवौकसाम् ॥ करोतितृप्तिकर्याच्चपितॄणांमधुस पिपा४६तेतृप्तास्तर्पयत्येनंसर्वकामफलैःशुभैः ॥ ययंक्रतु मधीतेसोतस्यतस्याप्नुयात्फलम् ४७॥ यज्ञ,तपओर सवशुभकर्मासेद्विजोंकावड़ाउपकारकवेदहीहे ४० जोद्विजप्रतिदिनचग्वेदपढ़े वहमधुऔर दूधसेदेवताओंकाऔरमधु भोरपीसेपितरोंकातर्पणकरे४१ पतिदिनयजुर्वेदपढ़नेवालेघीओर जलसेदेवतामोंका औरघीऔरमधुसे पितरोंकातर्पणकरे ४२साम- वेदपाठी सोमलताके रस मोरपीसे देवताओंकामोरमधुओरघीसे पितरोंकातर्पणकरें ४३ भथर्वांगिरा वेदपढ़नेवाले मेदसेदेवताभों का भोर मधुऔरघृतसेपितरोंका अपनीशक्तिके अनुसार प्रतिदिन तर्पणकरें १४ जोवाकोवाक्य (वेदोंके प्रश्नोत्तर) पुराणनाराशंसी (रुद्रदेवतमश्च )गाथिका(इन्द्रयज्ञप्रभूतिके)इतिहासोर (वारुणी प्रभृति)विद्या भपनीशक्तिमनुसारनितनितपढ़तेहें४५ वेमांस दूध भात ओरमधुसेदेवताओंकातर्पणकरें भोरपितरोंकामधुमोरपीसे १६येदेवोरपितरतृप्तहोकेतर्पणकरनेवालेकीसवकामनापूरीकरते हेऔरजिसजिसंयज्ञकोजोपढ़ताहे वहउसउसकाफलपाताहे ४७ ॥
याज्ञवल्क्यस्मात म०॥ त्रिवित्तपूर्णप्रथिवीदानस्यफलमश्नुते ॥ तपसायत्पर स्येहनित्यं स्वाध्यायवाद्विजः ४८ नैष्विकोब्रह्मचारीतुवसे दाचार्यसन्निधौ ॥ तदभावस्यतनयेपन्यांवैश्वानरोपवा ४९ अनेनविधिनादेहंसाधयन्विजितेन्द्रिय ब्रह्मलोकमवा नोतिनचेहाजायतेपुनः ५० गुरवेतुवरंदत्वास्नायीततदनुज्ञ या । वेदव्रतानिवापारंनीतांह्यनयमेववा ५१ अविप्लुत ब्रह्मचर्योलक्षण्यास्त्रियमुहहेत ॥ अनन्यपूर्विकांकांतामस पिण्डायवीयसी ५२ अरोगिणीभातमतीमसमानार्पगोत्र जाम् ॥ पंचमात्सप्तमादूर्वमातृतःपितृतस्तथा ५३ दशपुरुषविख्याताच्छोत्रियाणांमहाकुलात् ॥ स्फीताद पिनसंचारिरोगदोपसमन्वितात् ५४ ॥ जोद्विज प्रतिदिन वेदपढ़ताहै वहधनसेभरीहुई सारीप्टथ्वी के तीनवार दान और बड़ेउच्चतपकाफलपाताहै ४८नेटिकब्रह्मचारी भाचार्यकेपासरहे, आचार्य नहो तो उसके पुत्रकेपास वह न होतो प्राचार्य की पत्नी अथवा अग्निहोत्रकी अग्निके निकटरहे ४६इस 'विधिसेदेहकोसाधे तोजितेन्द्रियहोकेब्रह्मलोककोप्राप्तहोताहेऔर इससंसारमें जन्मकभी नहीं पाताहै ५० गुरुको दक्षिणादेकर उस- की प्राज्ञासेअथवा वेदसमाप्तकरकेवा व्रतसेपारहोकेयादोनोंको समाप्तकरके (समावर्तन)स्नानकरे ५१ ब्रह्मचर्यसे न डिगकर लक्षणयुक्त कारी असपिंड ओरअपनेसेछोटीअवस्थावाली स्त्रीको व्याहे ५२ (असाध्य) रोगसेहीनहो, जिसके भाईहों, अपने गोत्र और प्रवरकी न हो और जो भ्रातृकुलमें पांचपीढ़ी से ऊपरहों और पितृकुल में सातपीढ़ी से ऊपरहो उसे व्याहे ५३ दशपुरुष से प्रसिद्ध वेदपाठियों के कुलसे कन्याले परन्तु कुष्टमादिसंचारी रोगयुक्त चाहेजेसे उत्तम कुल हो उस से कन्या न लेवे ५४ ॥ 1 याज्ञवल्क्यस्मृति स०। एतैरेवगुणैर्युक्तःसवर्णःश्रोत्रियोवरः ॥ यत्नात्परीक्षितः पुंस्त्वेयुवाधीमानजनप्रियः ५५ यदुच्यतेद्विजातीनांशूद्रा द्वारोपसंग्रहीनतन्मममयस्मात्तत्रात्माजायतेस्वयम् ५६ तिम्रोवर्णानुपूर्वेणदेतथैकायथाक्रमम् ॥ ब्राह्मणक्षत्रिय विशांभार्यास्याशूद्रजन्मनः ५७ ब्राह्मोविवाह आहूयदी यतेशत्यलंकृता ॥ तज्जःपुनात्युभयतःपुरुपानेकविंशति म ५८ यज्ञस्थऋत्विजेदेवआदायार्पस्तुगोद्वयम् ॥ चतुर्दश प्रथमजःपुनात्युत्तरजश्चषट् ५९ ॥ इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त, सवर्ण, वेदपाठी, यत्न से जिसका पुंस्त्व परीक्षितहो,युवा,बुद्धिमान, और जो लोगोंको प्रियहो ऐसा घर होनाचाहिये ५५ शूद्रसे कन्या लेने की अनुमति द्विजोंको जो कहीहै यह मेरामत नहीं क्योंकि दारामें आत्मास्वयं उत्पन्न होता है ५६ वर्णकी अनुलोमतासेब्राह्मणक्षत्रिय और वैश्यके क्रमसे+ तीन दो और एक स्त्रियां होतीहैं, शूद्रकी केवल अपनीही वर्णकी स्त्री होतीहै ५७ वरकोबुलाकर अपनीशक्ति के अनुसार आभूषण सहित जो कन्यादान है उसे ब्राह्मविवाह कहते हैं ऐसे व्याह से जो पुत्र उत्पन्न होता है वह अपनी ऊपर की दश और नीचेकी दश और एक अपनी ऐसी इक्कीस पीढ़ियोंको पवित्रकरताहै ५८ - यज्ञ करानेवाले ऋत्विजको कन्यादे तो देवविवाह, और दोगी शुक्ल लेके कन्यादे तो आर्पविवाह होता है इन में पहिले से उत्पन्नपुत्र चौदह और दूसरेसे उत्पन्न छः छः पीढ़ियों को पवित्र करताहै ५६॥ * अर्थात् ब्राह्मण अपने वर्ण की क्षत्रिय की और वैश्यकी कन्या लेसक्ता है इसी प्रकार क्षत्रिय अपने वर्ण की और पैदयकी लेसक्ता है वेश्य और शूद्र केवल अपने वर्णकीही लेसक्त हैं। २ A * याज्ञवल्लयस्माते सः। इत्युक्ताचरतांधर्मसहयादीयतेर्थिने ॥ सकायःपावयेत ज्जःपट्पट्वंश्यान्सहात्मना ६० आसुरोद्रविणादानादां धर्वःसमयान्मिथाः ॥ राक्षसोयुद्धहरणात्पैशाचःकन्यकाछ लात् ६१ पाणिग्राह्यःसवार्णासुगृह्णीयात्क्षत्रियाशरम् ।। वैश्याप्रतोदमादद्यावेदनेत्वग्रजन्मनः ६२ पितापितामहो भ्रातासकुल्योजननीतथा ॥ कन्याप्रदःपूर्वनाशेप्रकृतिस्थः परःपरः ६३ अप्रयच्छन्समाप्नोतिधणहत्यामृतातौ ।। गम्यन्त्वभावेदातृणांकन्याकुर्यात्स्वयंवरम् .६४ सकृत्त दीयतेकन्याहरंस्ताच्चोरदण्डभाक् ॥ दत्तामपिहरेत्पूर्वी ज्यायांश्चेदरआवजेत् ६५॥ तुमदोनोंइकठेहोकर धर्माचरणकरो ऐसाकहके जोमांगने वालेको कन्यादीजातीहै वहकायबिवाह कहलाताहै इससे उत्पन्न सुत अपने सहित छः छः पीढ़ियोंको पवित्र करता है ६० बहुत धनलेकेकन्यादे तो आसुरविवाह होताहै और कन्यावर आपसमें सलाहकरके व्याहकरलें तो गान्धर्व विवाह होता है यद्धमें हरीहुई कन्पासे राक्षसविवाह और छलसे जो हो वह पैशाचविवाह कह- लाताहै ६१ अपनीजातिकी कन्याकेसाथ व्याहहो तो पाणिग्रहण करे अर्थात् हाथपकड़े,ब्राह्मण यदिक्षत्रियाकोव्याहे तोचत्रियावाण पकड़े,और वैश्याप्रतोदअर्थात् (पैना) औररस्सीपकड़े ६२ वापदादा भाईअपने कुलकाकोई पुरुप और माता इनमें पहलेकेन होनेपर दूसरा दूसरा यदि सावधानहो तो कन्यादानका अधिकारी है ६३ जाये कन्याका विवाहन करदेंतोउसकेहरएकत्रातुकालमें इन्हेंभ्रूण (गर्भ) हत्याकापापलगताहै यदिकन्यादानका अधिकारी कोईनहो तोयोग्यवरकोकन्याअपनेापवरणकरे६४कन्याएकहीवारदीजाती हेजोउसकाहरणकरेतोचोरकेसमानदण्डकाभागीहोताहै औरयदि पहलेवरसमच्छावरामिलेतो दीहुईकन्याकाभीहरणकरले ६५॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ अनास्यायददद्दोपंदण्डउत्तमसाहसम् ॥ अनुष्ठान्तुत्य जन्दण्ड्योदूषयंस्तुमृपाशतम् ६६ अक्षताचक्षताचैवपुनर्भूः संस्कृतापुनः ॥ स्वैरिणीयापतिहित्वासवर्णकामतःश्रयेत् ६७ अपुत्रांगुर्वनुज्ञातोदेवरःपुत्रकाम्यया ॥ सपिंडोवास गोत्रोवाघृताभ्यक्तऋतावियात् ६८ आगर्भसंभवांगच्छेत्प तितस्त्वन्यवाभवेत् ॥ अनेनविधिनाजातःक्षेत्रजोस्यभवे त्सुतः६९ हताधिकारांमलिनांपिंडमात्रोपजीविनीम् ॥परि भंतामधःशय्यांवासयेद्व्यभिचारिणीम् ७० सोमःझौचंददा वासांगन्धर्वश्चशुभांगिरम् ॥पावकःसर्वमेध्यत्वमेध्यांवयो पितोस्मृताः ७१॥ कन्याकादोप बिनकहेही जो कन्यादान करदेतेहैं उनको उत्तम साहसकादण्डदेनाचाहिये और निर्दोपकन्याको त्यागकरनेवाले पतिकोभीयही दण्डदेनाचाहिये यदिकोई कटदोपलगावे तोउसे सौपणदण्ड देनाचाहिये ६६ कन्याचाहे अक्षताचाहे क्षताहो दूस- रीधारविवाहहोनेसे पुनर्मू कहलातीहै और जो पतिकोछोड़ किसी अपनेंदूसरेसवर्णपुरुषको स्वीकार अपनीइच्छासेकरले वहस्बैरिणी कहलातीहै ६७ जिसके पुत्र उत्पन्नहुआहो उसकेपास ऋतुकालमें सवअंगमें घीलगाके अपनेपिताआदि बड़ोंकीआज्ञासे देवर, सपि- ण्ड, अथवाकोई सगोत्रगमनकरे जो पुरुषकेपास न गईहो ६८ परन्तु गर्भरहनेतकही जावेनहींतो पतितहोताहै इसप्रकार उत्पन्न पुत्रक्षेत्रजकहलाताहै ६६ व्यभिचारिणी स्त्रीकोसवअधिकारसे हीन करके मैलेवस्त्रपहिनाकर भोजनमात्र अन्नदेकर प्रतिदिनअनादर से भूमिपर सुलावे ७० सोमदेवताने स्त्रियोंको शुचिदेदीहै,गंधर्व ने मीठीवोली और अग्निने सवप्रकार पवित्रहोनेकी शक्तिदी है इसलिये स्त्रियां पवित्र होती हैं ७१ ।। - याज्ञवल्क्यस्मति सः। व्यभिचाराहतौशुद्धिर्ग:त्यागोविधीयते॥ गभर्तवधा दौचतथामहतिपातके ७२ सुरापीव्याधिताधूतवंध्यार्थप्न प्रियंवदा ॥ स्त्रीप्रसूश्चाधिवतव्यापुरुपपिणीतथा ७३ अधिविन्नातुभर्त्तव्यामहदेनोन्यथाभवेत् ॥ यत्रानुकूलंदम्प त्योस्त्रिवर्गस्तत्रवर्पते ७४ मृतेनीवतिवापत्यो नान्यमुप गच्छति॥सेहकीर्तिमवाप्नोतिमोदतेचोमयासह ७५ आज्ञा संपादिनींदक्षींवीरसूप्रियवादिनीम्॥त्यजन्दाप्यस्तृतीयाँ शमद्रव्योभरणस्त्रियाः ७६ स्त्रीभिर्भर्तृवचःकार्यमेपधर्मः परःस्त्रियाः॥आशुद्धेःसंप्रतीक्ष्योहिमहापातकदूपितः७७॥ ऋतुकाल प्राप्तहोनेपर व्यभिचारसे शुद्धहोतीहैं, जोदूसरे का गर्भरहजावे, गर्भका पतनकरादेवे, अपनेपतिके मारनेपर उद्यतहो और महापातककरे,तो उसस्त्री का त्यागकरनाचाहिये ७२ सुरा- पान करनेवाली, सदा रोगिणीरहनेवाली,धूर्त, वांझ,धननाशकरने वाली, प्रियवोलनेवाली, जिसके लड़काहुपाकरे औरजोस्त्री अपने पतिकादोपकरतीहोतो ऐसीस्त्रीके रहतेदूसराव्याह विहित है ७३ (परअधिविना(प्रथमविवाहिता)कापालनकरनाचाहियेनहातोबड़ा पापहोताहै जहांनीपुरुपकी परस्परअनुकूलता होतीहै वहांत्रिवर्ग (अर्थ, धर्म औरकाम) वढ़तारहता है७४ पतिकेजीते वा मरनेपर जो दूसरेके पासनहींजाती वह इसलोकमें अच्छी कीर्तिपाती है और (परलोकमें) उमाकेसाथ रहनेसे मुखपातीहै ७५ यदिआज्ञा पालनकरनेवाली,घरके काममें चतुर,वीरपुत्रजननेवाली और प्रिय बचन वोलनेवाली,स्त्रीकोछोड़,उससे तीसराभाग धनटिलानाचा- 'हिये और निर्धनहोतो उससेस्त्रीका पालनकरानाचाहिये७६ स्त्रियों का यह परमधर्म है कि पतिका कहना माने और पतिको महा-. पातक लंगाहोतो उसकी शुदितक आसराटेखें ७७ ॥
१३ याज्ञवल्क्यस्मृति स०। लोकानंत्यंदिवःप्राप्तिःपुत्रपौत्रप्रपौत्रके ।यस्मात्तस्मा स्त्रियःसेव्याःकर्तव्याश्चसुरक्षिताः७८पोडश निशाःस्त्री णांतस्मिन्युग्मासुसंविशेत् ॥ ब्रह्मचार्येवपर्वण्याद्याचतस्त्र श्चवर्जयेत् ७९ एवंगच्छन् स्त्रियंक्षामांमघांमूलंचवर्जयेत्॥ सुस्थइन्दौसकृत्पुत्रलक्षण्यंजनयेत्पुमान् ८० यथाकामी नवद्वापीस्त्रीणांवरमनुस्मरन् ॥ स्वदारनिरतश्चैवस्त्रियोर क्ष्यायतःस्मृताः८१ भर्तृभ्रातृपितृज्ञातिश्वश्रूश्वशुरदेवरैः।। वन्धुभिश्चस्त्रियःपूज्याभूपणाच्छादनाशनैः ८२ संयतोप स्करादक्षाहृष्टाव्ययपराङमुखी ॥ कुर्यात्श्वशुरयोःपादवं दनभर्तृतत्परा ८३॥ पुत्र,पौत्र और प्रपौत्रके द्वारा अनन्तलोक और स्वर्गमिलता है इसलिये स्त्रियोंका संग्रह और बड़ी रखवालीसे उनका पालन करनाचाहिये७८ तुकालकी सोलहरातहोतीहैं, उनमेंयुग्म ६,८ १० वी पादिरात्रियों में स्त्रीगमनकरे इससे ब्रह्मचारीही रहता है परन्तु रुष्णपक्षकी चौदश ,३० और (पूर्णिमा) और पहिली? रातें छोड़देवे ७६ शुभचन्द्रविचार, मघा और मूलनक्षत्रको छोड़ जो सामा (डवली) स्त्रीकेपास एकवारजावे तो शुभलक्षणयुक्तपत्र उत्पन्नहोताहे)-०अथवास्त्रियोंको पतिव्रतारखनेकेलियेजवउसकी इच्यादेखे गमनकरे और अपनीहीस्त्री में रतरहे क्योंकि स्त्रियोंकी रक्षा अवश्यहै-१पति,भाई,पिता,जातिके लोग,सास,श्वशुर,देवर और सवप्रकारके बंधुलीग (मामीकापुत्र,फूफीकालड़का और मामू कावेटा) भी गहनेकपड़े और भोजन से स्त्रियोंका सत्कारकरें ८२ घरकीचीजोंकासंयम(यथोचित स्थानपररसना,कार्यमें चतुरहोना .प्रसन्नरहना)बहुतसर्च न करना,सासश्वशुरके पानोंपर प्रणामकर- ना और पतिकी सेवामें तत्पररहना ये स्त्री के धर्म हैं ८३॥ .
. , पाशवलपस्मृति सन क्रीडांशरीरसंस्कारंसमाजोत्सवदर्शनम् ॥ हास्येपरय हेयानन्त्यजेत्प्रोपितभरीका ८४ रक्षेत्कन्यांपिताविन्नांपत्तिः पुत्रास्तुवाईके ॥ अभावेज्ञातयस्तेपांनस्वातंत्र्यम्क्वचित्स्त्रि याः ८५ पितृमातृसुतभ्रातृश्वश्रूश्वशुरमातुलैः ॥ हीनान स्थाद्विनाभ गर्हणीयान्यथाभवेत् ८६ पतिप्रियहितेयुक्ता स्वाचाराविजितेन्द्रिया ॥ सेहकीर्तिमवाप्नोतिप्रेत्यचानुत्त मांगतिम् ८७सत्यांमन्यांसवर्णायांधर्मकायनकारयेत्। सवर्णासुविधौधयेज्येष्ठपानविनेतरा ८८ दाहयित्वाग्नि होत्रणस्त्रियंटत्तेवतीपतिः॥ आहारेविधिवदारानग्नींश्चैवा विलम्बयन् ८९ सवर्णेभ्यःसवर्णासुजायतेहिसजातयः ।। अनिंद्येपुविवाहे पपुत्राःसन्तानवर्धनाः ९० ॥ खेलना,शृंगारकरना,भीड़में जाना,उत्सवदेखेना,हँसना और दूसरे के घरजाना, जिसका पति विदेश गयाहो वह ये सब बातें छोड़देवे ८४ कुमारीकी रक्षा पिताकरे विवाहिता होने पर पति बुढ़ापेमें पुत्र और इनमें कोईनहो तोजाति लोग रक्षाकरें,स्त्रियोंको स्वतन्त्र कभीनहोने देना चाहिये-५पतिनिकट नहोतो पिता,मा- ता,पुत्र,भाई,सास,श्वशुर और मामा इनसे दूरनहो नहीं तो नि- न्दित होती है ८६ पति के प्रिय और हित काममें तत्पर, अच्छा आचरण करनेवाली और इन्द्रियोंको अपनेवशमें रखनेवाली स्त्री यहां वड़ाई पाती है और परलोक में वड़ा सुखपाती है ८७ सव- र्णा स्त्री के रहते दूसरी से (धर्मकार्य) यज्ञ आदि न करावे सब- कईएकहों नो ज्येष्ठा को छोड़ पोरों से न करावे ८८ सुशीला स्वी मरजावे तो अग्निहोत्रकी अग्निसे उसका दाहकरके पति फेर अग्नि और स्त्री का संग्रहकरे विलम्ब न करे ८९ अच्छे विवाह से ब्याही सवर्ण स्त्री से सवर्ण पुरुप से सजाति (उसी जाति)के पुत्र उत्पन्नहोतेहैं औरउनसेसन्तानकी बढ़ती होतीहै ६० याज्ञवल्क्यस्मृति स०। विप्रान्मूर्धावसिक्कोहिक्षत्रियायांविशःस्त्रियां॥अवष्टाद्या निपादोजातःपारसवोपिवा ९९ वैश्याशूद्रस्तुराजन्यानमा हिप्योगौसुतौस्मृतौ॥वैश्यातुकरणःशयांविन्नास्वेपविधिः स्मृतः९२ब्राह्मण्यांक्षत्रियात्सूतोवैश्याद्वैदेहिकस्तथाशूद्रा ज्जातस्तुचाण्डालःसर्वधर्मवहिष्कृतः ९३ क्षत्रियामागधवै श्याच्छूद्राक्षत्तारमेवच॥ शूद्रादायोगवंवैश्याजनयामासवै सुतम् ९५माहिप्येणकरण्यांतुरथकारःप्रजायते ॥ असत्सं तस्तुविज्ञेयाःप्रतिलोमानुलोमजाः९५ जात्युत्कोयुयज्ञेयः पंचमसप्तमेपिवाव्यत्ययकर्मणांसाम्यंपूर्ववचारोत्तरं९६ ब्राह्मणसेक्षत्रियास्त्रीमें उत्पन्नपुत्र मूर्दाभिषिक्तावैश्यामें अंबष्ट और शद्रामेंउत्पन्नपुत्रनिपाद व पारसवकहलाताहै ११ क्षत्रियसे वैश्या उत्पन्नमाहिप्य औरैशूद्रामें उत्पन्न उग्रकहाजाताहै,वैश्यसे शद्रामेंउत्पन्नकरण (कायय)होताहै,यहवातविवाहितास्त्रियोंमेंजा- नना ६२ क्षत्रियसेब्राह्मणीस्त्रीमेंउत्पन्नसुत, वैश्यसेवैदेहिक और शूद्रसेचाण्डालहोताहै चाण्डालसवधाँसेरहितहोताहै।३क्षत्रि- यास्त्रीमेवैश्यसेमागध औरशूद्रासेक्षत्ताउत्पन्नहोताहै वैश्यामेंशूद्रसे आयोगवनामपुत्रउत्पन्न होताहै ४ माहिष्यपुरुपसेकरणीस्त्रीमरथ कारपैदाहोताहै इनमेंप्रतिलोमज (नीचजातिकेपुरुषसेउत्तमजाति कीस्त्री उत्पन्न)कोबुराऔरअनुलोमज(उत्तमजातिपुरुषसेहीनस्त्री मेंउत्पन्न) कोअच्छाजानना६५सातवेंयापांचवेंजन्ममें(किसीजा- तिकीकन्याअपनेसेवड़ीजातिके पुरुपसेव्याहीजाय उससेजोकन्या होवहभीउसीवड़ीजातिकोदीजायइसीतौरसातवीं पीढ़ीमें(जातिव डीहोजातीहै औरकोंकेव्यत्ययमें) ब्राह्मणआदिकोभापत्कालमें अपनीवृत्तिसेजीवननहोसकेतोनीचवृत्तिसेभीनिर्वाहकरनायहकर्म व्यत्ययहेसातयापांचपुरुपतकजिसजातिकाकर्मकरेउसीकेतुल्यहो- जाताहै,अधर(प्रतिलोमज)नीच (औरउत्तमअनुलोमज) (अच्छे) पूर्ववतहोते है.६६ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सः । कर्मस्मातविवाहाग्नौकुर्वीतप्रत्यहंगृही॥ दायकालाह देवापिश्रोतवैतानिकाग्निपु ९७ शरीरचिन्तांनिर्वयकृत शौचविधिदिजः॥प्रातःसंध्यामुपासीतदंतधावनपूर्वकम्९८ हुत्वाग्नीन्सूर्यदेवत्यान्जपेन्मंत्रान्समाहितः ॥ वेदार्थान धिगच्छेचशास्त्राणिविविधानिच ९९ उपेयादीश्वरंचैवयो गक्षेमार्थसिद्धये ॥ स्नात्वादेवान्पितश्चैवतर्पयेदर्चयेतथा १०० वेदाथर्वपुराणानिसेतिहासानिशक्तितः॥जपयज्ञप्र सिदार्थविद्यांचाध्यात्मिकींजपेत् १ वलिकर्मस्वधाहोमस्वा ध्यायातिथिसक्रियाः ॥ भूतपितृपरब्रह्ममनुष्याणांमहाम खाः २ देवेभ्यश्चहुताद्दत्ताच्छेयामृतवलिंहरेत् ॥ अन्नंभूमी श्वचाण्डालवायसेभ्यश्चनिःक्षिपेत् ३॥ इतिवर्णजातिविवेकप्रकरणम् ।।गृहस्थप्रतिदिनस्मार्त (वलिङ्क- श्वदेवमादि)कर्मविवाहाग्नि,अथवा विभागकालमेंप्राप्तअग्निसेकरे और श्रीत (अग्निहोत्रादि)कर्मवैतानिक(आहनीया)मादिअग्नि- होत्रकर ६७द्विजशरीरचिंता(मलमूत्रोत्सर्ग)शौच (हाथपांवधोना, और दांतनकरके प्रातःसन्ध्याकी उपासनाकरे ९८ अग्निहोत्रक- रके सूर्यदेवताकेमन्त्र सावधानहोकेजपे मनन्तर वेदकेमर्थऔर अनेकप्रकारके शास्त्रोंकोसुने वा पढ़े तवईश्वर (राजा) केपास योग (अलब्धवस्तुकलाभ)और क्षेम (रक्षा) के लियेजावे स्नान. करकेपितरोंकातर्पण और देवताभोंकीपूजाकरे १०० अनन्तरवेद अथर्व उच्चाटनादिमन्त्रपुराण और इतिहास और अध्यात्मविद्या काजापकरे १ चलि वैश्वदेव,स्वधा (तर्पण और श्राद) होम,स्वा- ध्याय (पाठपढ़ना)और अथितिकासत्कार येपांचों क्रमसे भूत,पित देव, ब्रह्म और मनुष्योंके महायज्ञ कहलातेहें २ देवताओंकहोमसे जो अन्नवचरहे उससे भूतवलिदेना कुत्ता, चाण्डाल और कोवों. के लियेभी भुमिपर अन्न फेंकदेना ३॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥
अन्नंपितृमनुष्येभ्योदेयमप्यन्वहंजलम् ॥ स्वाध्यायं
चान्वहंकुन्निपचेदनमात्मने ४ बालस्ववासिनीद्धगर्मि
ण्यातुरकन्यकाः॥ संभोज्यातिथिभृत्यांश्चदंपत्योःशेपभोज
नम् ५ आपोशानेनोपरिष्टादधस्तादश्नतातथा ॥ अनग्न
ममृतंचैवकार्य्यमन्नंद्विजन्मना ६ अतिथित्वनवणेभ्योदेय
शक्त्यानुपूर्वशः ॥ अप्रणोद्योतिथिःसायमपिवाग्भूतृणोद
'कैः ७ सत्कृत्यभिक्षवेभिक्षादातव्यासुव्रतायच ॥ भोजयेचा
गतान्कालेसखिसम्बन्धिबान्धवान् ८ महोक्षवामहाजंवा
श्रोत्रियायोपकल्पयेत् ॥ सक्रियान्वासनंस्वादुभोजनंसू
नृतंवचः ९॥
पितर और मनुष्योंको भी प्रतिदिनअन्न और जलदेवे नित्य
नित्यवेद पढ़, अपनेही लिये अन्ननपकावे ४ बालक (सुवासिनी
सुहागिनि) वृद्ध,गर्भिणी, पातुर, कन्या, अतिथि और भृत्योंको
खिलाके शेषअन्न स्त्रीपुरुष भापभोजनकरे ५ दिजों को भोजन के
समय आदि और अन्तमेंआपोशान (मन्त्रपढ़करमाचमनकरनेसे)
अन्नकोअनग्न और अमृतकरनाचाहिये ६ कईअतिथिमायेहों तो
वर्णक्रम में (पहिले ब्राह्मण तब क्षत्रिय यादिको अपनीशक्ति के
अनुसार अन्नदेना आरम्भकरना सायंकालमेंभी अतिथियावे,तो
निराशनकरना कुछअधिकनवनपड़े तो अच्छेवचन, भूमि, तृण
और जलसे सत्कारकरना ७ सत्कारपूर्वक भिखारी और वृतीको
भिक्षादेनीचाहिये भोजन समयमें यदिकोई मित्र, सम्बन्धी और
'चान्धव पाजायतो उसेभी खिलाना ) ८ श्रोत्रिय (वेदपढ़ा)
अतिथिआवे तो उसे बड़ाभारी बकरा या चैलमागे लाखड़ाकरे
सत्कार करे अच्छा आसनदे मधुरभोजन करावे और मीठी
वातवोले ॥
.
३
पासवल्क्यस्मृति सः। प्रतिसंवत्सरंवाःस्नातकाचार्यपार्थिवाः ॥ प्रियो विवाह्यश्चतथायज्ञंप्रत्य॒विजःपुनः १०. अध्वनीनोऽतिथि यिःश्रोत्रियोवेदपारगः ॥ मान्यावेतौगृहस्थस्यब्रह्मलोक मभीप्सतः ११ परपाकरुचिर्नस्यादनिन्द्यामन्त्रणाहते ।। वाक्पाणिपादचापल्यंवर्जयेचातिभोजनम् १२ अतिथि श्रोत्रियंतृप्तमासीमांतमनुव्रजेत् ॥ अहःशेपंसमासीतशिष्टै रिप्टैश्चंबन्धुभिः १३ उपास्यपश्चिमांसंध्याहुत्वाग्नीस्तानु पास्यच ॥ भृत्यैःपरिरतोभुक्तानातितृप्त्याथसंविशत् १४ ब्राह्ममुहूर्तचीत्थायचिन्तयेदात्मनोहितम् ॥ धर्मार्थकामा न्स्वेकालेयथाशक्तिनहापयेत् १५॥ स्नातक, ग्राचार्य, मित्र जिसे कन्यादेनीहो और राजा इनको हरसाल अर्घ्य देकर अर्थात् (मधुपर्क)पूजे और ऋत्विजको वर्ष के वीचभी हरयज्ञके प्रारम्भमें अर्घ्यदे पूजे १० पथिक पहुनाहो- ताहै श्रोत्रिय (वेदपढ़नेवाला) और वेदपारग (जिसनेवेदकी एक शाखा समयपढ़ीहो) येदोनों ब्रह्मलोककी इच्छारखनेवाले गृहस्थ को अत्यन्त माननीय अतिथिहैं ११ अच्छेमनुष्य के निमन्त्रण कोछोड़ दूसरेकेघरभोजनकी अभिलापान रक्खे वाणी,हाथ और पांवइनकी चपलता औरभखसे अधिक भोजन कभी न करे १२ श्रोत्रिय अतिथिहोतोउसको भोजनसे तृप्तकरके अपने ग्रामकी सीमातक पहुंचा पावे भोजनके अनन्नर शेपदिन बड़े लोग,मित्र और बन्धुओंके साथ घेटके वितायें १३ पश्चिमा (सायं) सन्ध्या की उपासना और अग्नियों में होम और उनकी उपासना करके भृत्यों सहित भोजन करे परन्तु ऐसा भोजन न करे कि जिससे. अफरजावे अनन्तर शयनकरे १४ ब्राह्ममुहूर्तमें (पिछले पहर में) उठकर अपनाहित विचारे धर्म,मर्थ भोर काम इन्हें अपने अपने समय में शक्तिके अनुसार न खोवे १५ ॥ ।
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। विद्याकर्मवयोवन्धुवित्तैर्मान्यायथाक्रमम् ॥ एतैःप्रभू तैःशूद्रोपिवाईकमानमर्हति १६ वृद्धभारिनृपस्नातस्त्रीरोग वरचक्रिणाम्॥पन्थादयोन्नृपस्तेषांमान्यानातश्चभूपतेः१७ इज्याध्ययनदानानिवैश्यस्यक्षत्रियस्यच ॥ प्रतिग्रहोधिको विप्रेयाजनाध्यापनेतथा १८प्रधानेक्षत्रियेकर्मप्रजानांपरि पालनम् ।।कुसीदकृपिवाणिज्यपाशुपाल्यंविश स्मृतम् १९ शूद्रस्यद्विजशुश्रूषातयाजीवन्वणिग्भवेत् ॥ गिल्पैर्वा विवि धैर्जीवेद्विजातिहितमाचरन् २० भारतिःशुचिर्भूत्यभर्ती श्राद्धक्रियारतानमस्कारेणमन्त्रणपञ्चयज्ञानहापयेत् २१ अहिंसासत्यमस्तेयंशौचमिंद्रियानिग्रहः॥ दानंदयादमःक्षा न्तिःसर्वेषांधर्मसाधनम् २२ ॥ विद्या,कर्म,अवस्था, वन्धु और धन इनकेपराक्रमसे मनुष्यबड़ा गिनाजाताहै जो ये सववहुतपढ़ेहों तो बुढ़ापेमें शूद्रभीमानकेयोग्य होताहै १६ वृद्ध,वोझाढोनेवाला,राजा,स्नातक,(ब्रह्मचारीया यज्ञ- दीक्षित) स्त्री,रोगी,वर, (जिसका व्याह होनेजाताहो) और चक्री (सुराकार) इन्हें राहमें देखहटजानाचाहिये इनसवोंमें राजावड़ा है और स्नानकराजाकोभीमाननीयहै १७ याकरना, पढ़ना और दानदेना ये कार्य वैश्य मोर क्षत्रियकोभी है ब्राह्मणको प्रतिग्रह (दानलेना)यज्ञकराना औरपढ़ाना येअधिकहें १८ प्रजाकापालन करना यहक्षत्रियका श्रेष्ठकर्महै कृतीद (ब्याजलेना)खेती, वणिज औरपशुपालन ये वैश्यकेमुख्यकर्म, १६ द्विजोंकीसेवाकरनी शद्रका प्रधानकर्महै उससे नजीसके तोवनिजकर वा अनेकप्रकारकीशिल्प- विद्यासेनिर्वाहकरे परन्त द्विजोंकाहितकरतारहे २०और अपनीस्त्री में रतहोवे पवित्ररहे भृत्योंकापालनकरेपितरोंकीश्राद्धकरे,ौरनम- स्काररुपीमंत्रसेपंचयज्ञोंकोनछोड़े२१जीववधनकरना,सत्यबोलना, चोरीनकरनी, पवित्ररहना, इंद्रियोंकोवशमें रखना, दान, दया,दम (मनकासंयम) औरसहनशीलतायेसवमनुष्योके धर्मसाधन, २२॥ , पाझयल्स्यस्मृति स०। वयोवुदयर्थवाग्वेपःश्रुताभिजनकर्मणाम् ॥ आचरेत्स शीरत्तिमजिह्मामशठांतथा २३ त्रैवार्पिकाधिकान्नोयःसतु सोमंपिवेद्विजः ॥ प्राक्सौमिकी क्रियाःकुर्याद्यस्यान्नंवा पिकंभवेत् २४. प्रतिसंवत्सरंसोमःपशुःप्रत्ययनन्तथा ॥ कर्तव्याग्रयणेष्टिश्चचातुर्मास्यानिचैवहि २५ एपामसम्भ वैकुर्यादिष्टिवैश्वानरीद्विजः ॥ हीनकल्पनकुर्वीतसतिद्रव्ये फलप्रदम् २६ चाण्डालोजायतेयज्ञकरणाच्छूद्रभिक्षितात्।। यज्ञार्थलब्धमदददासःकाकोपिवाभवेत् २७. कुशलकुंभी धान्योवात्र्याहिकोश्वस्तनोपिवा ॥ जीवेद्वापिशिलोंछेनश्रे यानेपांपरःपरः२८॥ . वय,(अवस्था) बुद्धि,वाणी, धन,वेप,विद्या,कुल और अपनकर्म के अनुसार अपनी जीविका वृत्तिकरनी सो भी तिस्त्रा (टेढ़ी) और शठ (मत्सरयुक्त) न हो २३ जिसको तीनवर्पतक खाने से अधिक अन्नहो वह द्विज सोमपानकरे जिसको वर्षभर खानेको अन्नहो वह प्राक्सौमिकी (अग्निहोत्र, दर्श पौर्णमास, थादि जो सोम से पहिले कियेजाते) ऐसीक्रियाकरे २४ प्रतिवर्प सोमयज्ञ,दोनों अयनों में या प्रतिवर्षमें पशुयज्ञ,आग्रयऐष्टि, (नवानयज्ञ) और चा- तर्मास्यभी प्रतिवर्ष करना चाहिये २५ इनका सम्भव नहो तो द्विज वैश्वानर यज्ञकरे भपनेपास धनरहते निकष्टपक्षन करे और फलप्रद (काम्यकर्म) तो हीनकल्प करनाही न चाहिये २६ शूद्र से मांगकर उस धनसे यज्ञकरे तो चाण्डालहोताहै और जो धन यज्ञकेलिये मिलाहो उसे नदे तो भास (शकुन्त) अथवा कौमोंका जन्मपाताहै २७कुशलभान्य, (कोठिलेभरमन्नरखनेवाला) कुम्भी धान्य (घड़ेभरनाजरखनेवाला) तीनदिन वा प्रतिदिन खानेयोग्य, अन्नरसनेवाला और शिलोंछसे (दानाफूटावीनकर) जीनेवाला इनमें पिछले पिछले पहिलों से श्रेष्ठ हैं २८ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सः। नस्वाध्यायविरोध्यर्थमीहेतनयतस्ततः ॥ नविरुद्धप्रसं गेनसंतोपीचसदाभवेत् २९ राजान्तेवासियाज्यभ्यःसीदं निच्छेदनक्षुधा ॥ दम्भिहैतुकपाखण्डिवकवृत्तींश्चवर्जयेत् ३० शुक्लांबरधरोनीचकेशश्मश्रुनखःशुचिः॥ नभार्यादर्शने श्रीयान्नैकवासानसंस्थितः ३१ नसंशयंप्रपद्येतनाकस्माद प्रियंवदेत् ॥ नाहितनानृतंचैवनस्तेनःस्यान्नवार्धपी ३२ दाक्षायणीब्रह्मसूत्रीवेणुमांसकमण्डलुः ॥ कु-प्रदक्षिणं देवमृद्गोविप्रवनस्पतीन् ३३ नतुमेहेन्नदीछायावम॑गोष्ठांबु भस्मसु॥नप्रत्यग्न्यर्कगोसोमसंध्याम्बुस्त्रीद्विजन्मनः३४॥ नंतो अपनेपाठ में याधाडालनेवाले और न ऐसेवैसेके धनकी तथा विरुद्ध (अयाज्ययाजनादि वा नृत्यगीतादि) कामसेभी धन अर्जनकीइच्छानकरे और अपनेमनमें सदासन्तोपरक्खे २६ क्षुधासे पीडितहो तो राजा,अन्तेवासी,ब्रह्मचारीविशेप और यज्ञकरानके योग्यजोहो इनसेधनमांगे परन्तु अहंकारी,युक्तिवलसे सर्वत्रसंशय करनेवाले, पाखण्डी, और वगलाभगतसे न मांगे ३० वस्त्रस्वच्छ रक्खे केश,दाढ़ी,मोछऔर नखको सदाछिन्नरक्खे और पवित्ररहे अपनीस्त्रीकेसामने एकहीवस्त्रपहनकर और खड़ाहोकर भोजन न करे ३१ जिसमें प्राणकासंशयहो ऐसाकाम न करे अकस्मात् कड़ी वातनकहे किसीकाअहित भौर कूटनबोले चोरऔर व्याजखोरन हो ३२ दाक्षायण (सोनेकेकुंडल) यज्ञोपवीत,दण्ड और कमण्डलु इनकोसदाधारणकरेदेवताभोर(देवमूर्तिवनानेकेलियेजो)मृत्तिका हो,गो,ब्राह्मण भोरवनस्पतिको प्रदक्षिणादहिनाटेकेगमनकरे३३ नदीपरछाही पथ, गोशाला,जलऔर राखौमत्र और मल न करे सूर्य,अग्नि गौ,चन्द्रमा, जल, स्त्री और हिजोकेसामने मुंहकरके तथा संध्यासमय में भी मुत्र और पुरीप न करे ३४ ॥
२२ पाशवल्क्यस्मृति स०। नेक्षेतार्केननग्नांस्त्रीनचसंसृष्टमैथुनां ॥ नचमूत्रपुरीपंवा नाशुचीराहुतारकाः ३५अयमेवनइत्येवंसर्वमंत्रमुदीरयेत्।। वर्पत्यप्रास्तोगच्छेत्स्वपेत्प्रत्यक्शिरानच ३६ष्ठीवनासका कृन्मूत्ररेतांस्यप्सुननिःक्षिपेत् ॥ पादौप्रतापयेन्नाग्नौनचैन मभिलंघयेत् ३७ जलंपिवेन्नांजलिनाशयानंनप्रबोधयेत् ॥ नाक्षैःक्रीडेन्नधर्मनैर्व्याधितर्वानसंविशेत् ३८ विरुद्धवर्जये कर्मप्रेतधूमनदीतरम् । केशभस्मतुपांगारकपालेपुचसंस्थि तिम् ३९ नाचक्षीतधयंतीगांनाद्वारेणविशेतकचित् ॥ नरा, ज्ञःप्रतिगृह्णीयाल्लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः ४० प्रतिग्रहेसूनि चक्रिध्वजिवेश्यानराधिपाः । दुष्टादशगुणंपूर्वात्पूर्वादतेय थाक्रमम् ४१॥ . सूर्य्य, नग्न और कतमैथन स्त्री,मूत्र और पुरीप इनको न देखे अशुद्ध देहहो तो राहु और तारों को न देखे ३५ पानी बरसतेमें कहींजानाहो तो (अयम्मेवज) इस सारे मन्त्रको कहता छतरी से बिनाचलदे औरपश्चिमशिरहोके शयननकरे ३६ खखार,रुधिर, विष्टा मत्र और वीर्य इन्हें जलमें न डाले पांव भाग में न तपावै भौर नतो आगको लांघे ३७ अंजलीसे जलनपीवे कोई सोयाहो, तो न जगावै पांसा न खेले धर्मनाशकरनेवाले (पशुमारणादि) वस्तुओंसे भी न खेले और रोगियोंके साथ शयन न करे ३८ देश कुलादि के आचार से विरुद्धकर्मनकरे प्रेराधम औरनदीकातैरना वरादेवे केश,भस्म,भूसी,कोला, और खपड़ोईपरनवेठे ३६ पीती हुई वा पिलातीहुई गौको न सतावे कुराह से कहीं न बैठे लोभी और शास्त्र विरुद्ध चलनेवाले राजाका दान न लेवे ४० दानलेने में कसाई, तेली,कलार, वेश्या और राजा ये पांचो पहिले पहिले से दूसरे दूसरे दशदशगुना अधिक निपिद्ध (दुष्टह) ४१॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ अध्यायानामुपाकर्मश्रावण्यांश्रवणेनव ॥ हस्तेनौपधि भावेवापश्चम्यांश्रावणस्यतु ४२ पोपमासस्यरोहिण्यामष्ट कायामथापिवा ॥ जलांतेछन्दसांकुर्यातदुत्सर्गविधिबहिः ४३ त्र्यहंपतेप्वनध्यायःशिष्यविग्गुरुवन्धुपु॥उपाकर्मणि चोत्सगवशाखाश्रोत्रियेतथा४४ सन्ध्यागर्जितनिर्घातभूकं पोल्कानिपातनसमाप्यवदेंचूनिशमारण्यकमधीत्यच ४५ पंचदश्यांचतुर्दश्यामष्टम्यांराहुसतके ॥ऋतुसन्धिपुभुक्त्वावा श्राद्धिकंप्रातिगृह्यच ४६ पशुमण्डूकनकुलमार्जारश्वाहिम पकैः ॥ कृतेन्तरेत्वहोरात्रंशक्रपातेतथोच्छूये ४७॥ वेदोंकेपढ़नेका उपाकर्म (आरम्भ)ौषधियोंके उगनेषरसावन महीनेकी पूर्णमासी को श्रवणनक्षत्रयुक्त किसी दूसरेदिन, अथवा हस्तनक्षत्रयुक्त सावनकी पंचमीको करे ४२ पोप महीनेकी रोहि णी वा अष्टमी के दिन ग्रामसे बाहर किसी जलाशयके समीप. विधिपूर्वक वेदोंका उत्सर्ग(त्याग)करना ४३ शिष्य,त्विज,गुरू और बन्धुइनके मरनेपर वेदोंकेआरम्भ और उत्सर्गमें जो अपनी शाखाहो उसीको दूसरा भी पढ़ताहो और मरजाय तो भी तीन दिन अनध्याय होताहै ४४ संध्यासमयमें मेघकी गर्जनाहो, आ- काश में कोई उत्पात शब्द हो,भूकंप,उल्कापात(ताराटूटकरगि- रे)और वेद समाप्तहुआहो वा प्रारण्यक पढ़चुकेहों तो एक दिन रात अनध्याय होताहै ४५ अमावस,पूर्णमासी, चतुर्दशी,अष्टमी, चंद्र सूर्य ग्रहण जिस प्रतिपत्को घातुओंका मारम्भहो , और श्राद्ध में भोजनकरे वा दानलियाहो तो भी एक दिन रात अनध्याय करना ४६ कोई पशु, मेढ़क, नेवला कुत्ता, सर्प, वि, डाल औरमूषक यदि ये पढ़ने पढ़ानेवालोंके बीचसे निकलजावे इंन्द्र और ध्वजको खड़ाकरें वा उतारें तो 'एकदिनरात अन- ध्याय करना४७॥ - यामवल्क्यस्मृति सं०। श्वकोष्टगईभोलूकसामवाणानिःस्वने ॥ अमेध्यशव द्रांत्यश्मशानपतितान्तिके ४८ देशेशुचावात्मनिंचविद्युत् नितसंप्लवे ॥ भुक्तार्द्रपाणिरम्भोन्तरर्द्धरात्रेतिमारुते ४९ प शुवदिशांदाहसन्ध्यानाहारभीतिपु॥ धावतःपूतिगन्धे शिष्टेचगृहमागते ५० खरोष्ट्रयानहस्त्यश्वनौटक्षेरिणरोह णे ॥ सप्तत्रिंशदनध्यायानेतांस्तात्कालिकान्विदुः५१ दे विक्स्नातकाचार्यराज्ञांछायांपरस्त्रियाः॥ नाकामेद्रक्तविण वष्ठीवनोहर्तनादिच ५२ विप्राहिक्षत्रियात्मानोनावज्ञेयाःक दाचन ॥ आमृत्योः श्रियमाकांक्षेन्नकंचिन्मर्मणिस्टशेत५३ दूरादुच्छिष्टविण्मूत्रपादाम्भांसिसमुत्सृजेत् ॥ श्रुतिस्मृत्यु दिसम्यनित्यमाचारमाचरेत् ५४ ॥ कुत्ता, शृगाल, गर्दभ, उलूकपक्षी, सामवेदवंशी और दुःखित मनुष्य इनका शब्द सुनपड़े कोई अपवित्रवस्तुमृतक,शूद्र अन्त्य ज,श्मशान,और पतित येनगीचहों ४८ अपवित्र स्थल अशुद्धदेह हो, बारम्बार विजली चमके, वारवार मेघगर्जे, भोजनकरने से गीलेहाथहों, जलके बीच खड़ाहो, भाधीरातमें बहुतपवन चलता हो,.४६ धूल बरसतीहो, दिशा जलती देखपड़े, सांझ सवेरेकेधु- धमें कोई भयहो, दौड़ताहो, दुर्गंधातीहो, कोई शिष्ट अपने घर आयाहो ५० गधा, ऊंट, रथ, हाथी,घोड़ा,नौका,क्ष, और ऊपर भूमि इनपर चढ़ना ये सैंतीस अनध्याय जवतक इनसैंतीसपूर्वो- क्तकाकीसत्तारहे तभीतक होते, ५१ देवता,भत्विज,स्नातक, श्राचार्य, राजा और परस्त्री इनकीछाया और रुधिर, विष्टा, मूत्र, खखार और उचटनकी लीझीको लांघनानचाहिये ५२ बहुश्रुत ब्राह्मण, सर्प, क्षत्रिय, और अपनी आत्माका कभी अपमान न करना मरणपर्यन्त धनकी इच्छारक्खे कि किसीको दुःखदायी वातनकहे ५३ जठामूल,मूत्र और पांवधोनेका जलदूरफेकना श्रुति भोर स्मृतियों में कथित आचारकोभलीभांति नित २ करे ५४ ॥ , .
२५ याज्ञवल्क्यस्मात स०। गोब्राह्मणपलान्नानिनाच्छिष्टोनपदास्टशेत् ॥ ननिंदा ताडनंकुत्सुितंशिष्यञ्चताडयेत् ५५ कर्मणामनसावाचा यंलाद्धर्मसमाचरेत् ॥ अस्वयंलोकविद्विष्टधर्ममप्याचरेन तु ५६ मातृपितृतिथिधातजामिसम्बन्धमातुलैः॥ वृद्धवा लातुराचार्य्यवैद्यसंश्रितबांधवैः ५७ ऋत्विक्पुरोहितापत्य भाव्दाससनामिभिः ॥ विवादवर्जयित्वातुसन्लिोकान् जयेद्गृही ५८ पञ्चपिण्डाननुढत्यनस्नायात्परिवारिपु ॥ स्नायान्नदीदेवखातहूदप्रस्त्रवणेपुच ५९ परशय्यासनोद्यान गृहयानानिवर्जयेत् ॥ अदत्तान्यग्निहीनस्यनान्नमवादना पदि ६० ॥ गोब्राह्मण,अग्नि और भोजनके अन्नको प्रशुद्धहोकर अथवा पावसे न छुवे किसी की निन्दा और ताड़नानकरे पुत्र और शिष्य को पढ़नेकेलिये ताड़नाकरे ५५ कर्म,मन और वाणीसे यत्नपूर्वक धर्मकरे जो कर्म शास्त्रविहितहो परन्तु लोकविरुद्धहो और उससे स्वर्गगति न होतीहो तो उसे न करे, ५६ माता, पिता, अतिथि (पहुना) भाई,जिन स्त्रियोंकेपतिजीतहों संबंधी,मामा,दृद्ध,बाल- फ,रागी,प्राचार्य,वैद्य, भाश्रित बांधव ५७ ऋत्विज्,पुरोहित,अप- त्य,भार्या,दास,सोदर भाई और बहिन इनसे विवादकरनाछोड़दे तो सब लोगोंको वह गृहस्थ जीतलेताहे ५८ दूसरेके जलाशयमें पांचपिंडी मिट्टीके निकाले विना स्नान न करे नदी,देवस्यात (पु. करमादि)हद,(उल) मोर झरना इनमेंयाही स्नानकरले ५६ दूसरेकी शय्या,मासन, बगीचा, घर और रथका उपभोग उसकी आज्ञाविना यदि आपत्काल नहीं तो कभी न करना अग्निहो नका अधिकार जिसेनहो उसका अन्नभी विना भापत्काल न खाना ६०.॥
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याज्ञवल्ययस्मृति स०॥
कदर्यवद्धचोराणांहीवरंगावतारिणां ॥ वैगाभिशस्त
चाधुण्यगणिकागणदीक्षिणाम्६१ चिकित्सकातुरक्रुद्धपश्च
लीमत्तविद्विपाम् ॥ ऋरोग्रपतितव्रात्यदांभिकोच्छिष्टभौजि
नाम ६२ अवीरास्त्रीस्वर्णकारस्त्रीजितग्रामयाजिनां॥शस्त्र
विक्रयकारतन्तुवायाश्वजीविनां ६३ नृशंसराजरजकक
तघ्नवधजीविनाम् ॥ चैलधावसुराजीविसहोपपतिवेश्मनाम्
६४ पिशुनातिनाश्चैवतथाचांक्रिकवंदिनाम् ॥ एपामन्नन
भोक्तव्यंसोमविक्रयिणस्तथा ६५ शूद्रेपुदासगोपालकुल
मित्राईसीरिणः ॥ भोज्यानानापितश्चैववश्चात्माननिवेद
येत् ६६॥
लोभी, बँधुवा, चोर, नपुंसक, रंगावतारी, नट, मनारी मल्ल
प्रादि (रैण, अभिशस्तु,वार्द्धप्य व्याजखोर) वेश्या,वहुयाचक ६१
वैद्य, रोगी, क्रोधी, व्यभिचारिणी, मत्त (विद्या प्रादि गर्भयुक्त)
शत्रु, क्रूर (जिसके मनमें अचल कोपहो उय)(जो वाणी व
चेष्टासे दूसरेको उद्विग्न करे) पतित, ब्रात्य (जिसेसमय पर गा-
यत्रीका उपदेश न हुआ) ठग और जूठा खानेवाला ६२ स्वतंत्र
स्त्री, सोनार,स्त्रीवश, ग्रामयाजी, शास्त्रबेचनेवाला, लोहार खाती
तंतुवाय (जोलाहा या दर्जी) और जिसकी जीविका कुत्तोंके द्वारा
हो ६३ निर्दय, राजा, रजक (रंगरेज) कृतघ्न (उपकार न मा-
ननेवाला) व्याध, धोबी, मुरी वेचनेवाला, जार, लम्पट पुरुषका
पड़ोसी ६४ पिशुन (परदोप सूचक ) (मिथ्यावादी) तेली,गाड़ी
चलाने वाला, वन्दी जन और सोमलता वेचनेवाला जो हो इन
साका अन्नभी कभी न खाना ६५शूद्रोंमें दास, गोपाल अहीर,
कुलमित्र (जिसकी मिताई वापदादेसे चलीमातीहो) अर्द्धसीरी
(बंटवारचा साझमें खेती करनेवाला)नापित और अपनी प्रा.
त्माका निवेदन कियेहो इन सवों का अन्न खाना ६॥
२७
याज्ञवल्क्यस्मृति स०।
अनर्चितंस्थामांसंकेशकीटसमन्वितम् ॥ शुक्तंपर्युपितो
च्छिष्टंश्वस्ष्टष्टंपतिलेक्षितम् ६७ उदक्यास्पष्टसंघुष्टंपा
यानंचवर्जयेत् ॥ गोधातंशकुनोच्छिष्टंपदास्टटंचकामतः
६८ अन्नंपर्युपितंभोज्यस्नेहाक्तचिरसंस्थितम् ॥ अस्नेहा
अपिगोधूमयवगोरसविक्रियाः ६९ संधिन्यनिर्दशावत्सा
गोपयःपरिवर्जयेत् ॥ औष्टमैकशफंस्त्रेणमारण्यकमथाविक
म् ७० देवतार्थहविःशिघुलोहितान्द्रश्चनांस्तथा ॥ अनु
प्राकृतमांसानिविडजानिकवकानिच ७१ ॥
इति स्नातप्रकरणम् ॥ अनादरसे दियाहु अन्न, वृथामांस
(अपनेलियेपकायाहुभामांस) जिसमन्नमें केश व कीट पड़ेहों जो
अम्लहोगयाहो, बासी, जूठा, कुत्तासेलूटगया, पतितसे देखाहुआ
६७ रजस्वलास्त्रीसेछूटगया, जो पुकारकेदियाजाताहो, दूसरका
अन्न दूसरादेताहो, जिसका गोने सूघाहो, पक्षीकाजूठा और जि-
सको जानबूझके कोई पाबसे छूदे इन सघप्रकारके अन्नको नि-
षिद्ध जानना ६८ जिसअन्नमें घृतमादिकी चिकनाईहो तो उसे
वासीभी खाना गेहूं यव और गोरसकाविकार जो चीजहो उसमें
चिकना नहो तोभी खालेना ६६ संधिनी (बरदाईहुई, एफजून
लगनेवाली चा जो दूसरेके चचरे से दुहीजाये) जिसको ल्याये हुये
दशदिन न बीतेहों और जिसका पचड़ा न हो ऐसी गो और ऊँट
एक खुरवाले पशुस्त्री जंगलीपशु औरभेड़ इनकादूध न पीवे ७०
देवताके निमित्त पकायाहुआ होमकेलिये पक्क शिग्रुसोभांजनागोंद
व्रश्चन वृक्षकाटनेसे जो निकले जोपशु यज्ञमें हुनानहींगया उसका
'मांस विष्टाकेस्थानमें जो उत्पन्नहो और कवकछत्राक इनसोंको
न खावे ७१॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स। क्रव्यादपक्षिदात्यूहशुकप्रतुदाटटिभान् ॥ सारसेकश फान्हंसान्सश्चिग्रामवासिनः ७२ कोयटिप्लवचक्राइब लाकावकचिप्किरान् ॥ वृथाकशरसंयावपायसापपशकु लीः ७३ कलविंकंसकाकोलंकुररंरज्जुदालकम् ॥ जाल पादानखंजरीटानज्ञातांश्चमृगहिजान् ७४ चापांश्चरक्तपा दांश्चसौनंवल्लूरमेवच ॥ मत्स्यांश्चकामतोजग्ध्वासोपवा संस्त्र्यहंवसेत् ७५ पलांडुविड्वराहंचछत्राकंग्रामकुक्कुटम्।। लशुनंगूजनंचैवजग्ध्वाचांद्रायणंचरेत्७६ भक्ष्याःपंचनखाः सेधागोधाकच्छपशल्लकाः ॥ शशश्चमत्स्येष्वपिहिसिंहतुं डकरोहिताः ७७॥ क्रव्याद पक्षी कञ्चामांस खानेवाला पक्षी चातक तोता चोंच से तोड़के खानेवाले टिटहरी, सारस, एकखुरवाले हंस और जो पक्षी ग्राममें रहतेहों ७२ कोयष्टि (क्रौंच) जल कुकुट, चकवा चकवी, बगला,विप्किर (जो नखसे छीलकरकेखात चकोरादि इन्हें मोर जो कशर, तिलवा मूंगाकी भांति ) संयाव, दूध, गुड़ और धी से जो बनै) पायस, (खीर, अपूप (सूखी गेहूंकी रोटी) और पूरी देवताकोनिमित्त बनीहो ७३ कलविंक (अमचटकी) द्रोणकाक, कुरर, वृक्ष, कुहक, जालपाट, (जिनका पेर चमड़े से मढ़ाहो) खिड़रीच और जिनपक्षी और मृगोंको न जानतेहो७४ चाप (नीलकण्ठ) रक्तपाद (कादवादि) फसाईके मारेहुये पशुकामांस,सूखामांस और मछली इनसनोंकोनखावेयदिसमझ घूझके खावेतो तीनदिनउपवासकरे७५पलांडु, (प्याज)यामशूकर छत्राक(कुकरमुत्ता)यामकुफुट, लशुन और गाजर इन्हें जानबूझ करखावे तो चान्द्रायपव्रतकरे ७६ पञ्चनख (पंजेवार) जीवोंमें सेधा सेंधुभार) गोह,कछुमा,साही भोर सरहाइनकामांस खाने के योग्यहै और मछलियों में सिंही(सिंहतुण्डका)रोहू(रोहित)७७॥
३ यामवल्क्यस्मृति स०, तथापाठीनराजीवसशल्काश्चहिनातिभिः ॥ अतःशृणु ध्वंमांसस्यविधिभक्षणवर्जने ७८ प्राणात्ययेतथाश्राद्धप्रो क्षितंद्विजकाम्यया ॥ देवानपितृन्समभ्यर्यखादन्मांसन दोपभाक् ७९ वसेत्सनरकेघोरेदिनानिपशुरोमाभिः ॥ सं मितानिदुराचारोयोहन्त्यावीधनापशून् ८० सर्वान्कामान वाप्नोतिहयमेधफलंतथा ॥ गृहेपिनिवसन्वितोमुनिसिवि वर्जनात् ८१ सौवर्णराजताजानामर्ध्वपात्रगृहाश्मनाम् ।। शाकरज्जुमूलफलवासोविदलचर्मणाम् ८२ पात्राणांचम सानांचवारिणाशुदिरिष्यते. ॥ चरुसुक्नवसस्नेहपात्रा ण्युष्णेनवारिणा ८३॥ पढ़िना (पाठीना) राजीव (कमलकरंगकासा) इनसवको और सशल्क (सेहरेवाली) मछलीहों उन्हेंभी द्विजातिभोजन न करे अव सामान्यसे सव व केलिये मांसके खाने और वरानेकी विधिसुनो ७८ जच विनामांस जीने की आशा न हो तब श्राद्धके निमंत्रणसे यज्ञमें हुनेहुयेसे जो शेपरहा और जो ब्राह्मण भोजन देवे और पितरके पूजनकेलिये मांस बनायागया वह भी उन्हें चढ़ाकरखावे तो दोप नहीं है ७६ जो दुराचारी विधि (देवपितर पूजन) से बिना पशुको मारता वह जितने रोम उसपशुकी देहमें हो उतनेदिन घोरनरकमें वास करताहै ८० मांसखानाछोड़दे तो सारेमनोरथ और अपने अश्वमेध यज्ञका फल पाताहै और मांस खाना छोड़ घरमें भी रहे तो वह ब्राह्मण मुनितुल्य कहाताहै ८१ इतिभक्ष्याभक्ष्य प्रकरणम् ॥ सोने, चांदी और अन्न (शंख,भुक्ति और मुक्ता भादि)के पात्र, यज्ञकी ऊखली सह(यज्ञियपात्र विशेष) पत्थर,शाक,रस्सी,मूल,फल,वस्त्र,बांस और चामसे जो वनेकपात्र (प्रोक्षणीमादि)ौरचमस(होतृचमसमादि)येसबजलकेसाथधोने हीसेशुद्धहोतेहैं। चरुस्थाली,सुक,औरत्रव(तीनोंयज्ञकपात्रह)मोर जिसपात्रमें घीकेसदृशचिकनाईहोवेवे उष्णजलसेशुद्धहोतेहैं॥
२ याशवल्लयस्मृति स. स्प्यशूजिनधान्यानांमुसलोलुखलानसाम् ॥ प्रोक्ष णंसंहतानांचबहूनांधान्यवाससाम् ८१ तक्षणंदारुशृंगा स्थ्यांगोवालैःफलसंभुवाम् ॥ मार्जनयज्ञपात्राणांपाणिना यज्ञकमणि ८५ सोखेरुदक्गोमूत्रैःशुद्धत्याविककोशिक म् ॥ सश्रीफलेःशुपटंसारिटैःकुतपन्तथा ८६ सगौरसर्ष पैक्षौमम्पुनःपाकान्महीमयम् ॥कारुहस्तःशुचिःपायंभैक्ष्य योपिन्मुखन्तथा ८७ भूशुद्धिर्मार्जनाहाहाकालाद्गोकमणा तथा ॥ सेकादुल्लेखनाल्लेपाद्गृहमार्जनलेपनातु ८८ गो घातेनेतथाकेशमक्षिकाकीटदूपते ॥ सलिलंभस्ममृद्रापिन क्षेप्तव्यविशुद्धयेत् ८९ ॥ स्प्य(यज्ञवस्त्र)सूप,चर्म, धान्य,मुसल,उखली,और शकट(गाड़े) येभी उष्णजलसे शुद्धहोते और बहुतसाधन और वस्त्र इकट्ठेहीं तो जलके छीटेहीसे शुदहोते हैं ८१ काठु सींग और हड्डियों के पात्र छीलनेसे (फलकेपात्र गीवालसे और यज्ञमें यज्ञपात्र हाथसे पोछनेसेही शुद्धहोतेहै ८५ कंचल,टसरी प्रादि वस्त्र,रेह,गोमूत्र और पानीसे शुद्धहोतेहैं वृक्षके छिलकेसे जो वस्त्रवनता है सो विल्वंफल,रहे,गोमूत्र और जलसे भोर कुतप (दुशालाआदि)रीठी और रेहादि तीनोंचीजोंसे शुद्धहोतेहे ८६ अतसीके सूतसे बना वस्ख पीले सरसों और गोमूत्रमादिसे शुद्ध होता है मिट्टी कार्यर्तन फिर पकानेसे शुद्धहोताहे कारु (शिल्पी,धोबी रंगरेजआदि)काहा थ,विक्रीकीचीज,भिक्षा और भोगकालमे स्त्रीकामुख ये सदापवि- वहे ८७ भूमिको शुद मार्जन (झाडूडेना)जलाना,काल (कुछदिन चीतनेसे गोकेटनेसे,पानीछिड़कनसे,खननेसे प्रोरलेपनेसहोती है और घरमार्जन और लेपनहीसेशुद्धहोताहै जिसखानेकीचीज को गोसंघले और जिसमें मक्खी,बाल वा कोई कमिपड़गयाहों तो उसकी शुद्धि जल भस्म वा मिट्टी डालने से होती है l • याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ पुसीसंकताम्राणांक्षाराम्लोदकवारिभिः॥भस्माद्भिःकांस्य लोहानांशुद्धिःलावोगवस्यतु ९० अमेध्याक्तस्यमृत्तोयैःशु द्विगंधादिकर्षणात्॥ वाक्शस्तमंबुनिर्णिक्तमज्ञातंचसदाशु चि ९१ शुचिगोतृप्तिकृत्तोयंप्रकृतिस्थमहीगतम् ॥ तथामा सचचांडालक्रव्यादादिनिपातितम् ९२रश्मिरग्नीरजश्छा यागौरश्वोबसुधानिलः ॥ बिग्रुपोमक्षिकास्प-वत्सःप्रस्त्रव णेशुचिः ९३ अजाश्वयोर्मुखमेध्यनगौर्ननरजामलाः॥पंथा नश्चविशुध्यंतिसोमसूर्याशुमारुतैः९४ मुखजावित्रुपोमेध्या स्तथाचमनविदवः ॥ श्मश्रुचास्यगतंदंतसक्त्यक्ताततः शुचिः ९५॥ पीतल शीशा,और तांबा खारीजल,अम्लजल और शुद्ध जल से पवित्र होते हैं कांसा और लोहा राख और जलसे और जो द्रव वस्तु (तेलवाघीकेसदृश ) हो वह तव शुद्ध होता है कि जब पात्र में डालते डालते उसके मुंहसे निकलचले ६० जो वस्तुमलमूत्र आदि अमेध्य से लिप्तहो उसे मृत्तिका और जलसे इतनामले कि लेप और गन्ध दोनों चलेजावें तववह शुद्ध होता है किसी वस्तु की शुद्धता में संदेह होतो ब्राह्मणके वचन और जलप्रक्षेपसे शुद्ध करना जिसकी अशुद्धतामालूम नहीं वह सदाशुद्धहै पवित्र भूमि पर एक गौके पीने भरभी स्वच्छजल पड़ाहो तो वहशुद्ध है और कुत्ता चाण्डाल,आदि से मारहुये जन्तुका मांस भी शुद्ध है ६२ किरण,माग,धूल,परछांहीं, गौ,घोड़ा, पृथ्वी, वायु, वाष्पविन्दु और मक्खीका ठूजाना ये सदापवित्र है और दुध दोहनीमें बछरापवित्र है।३वकरे और घोड़ेकामुँह शुद्धहै गौकामुंह और मनुष्यकामल अशुद्धहै राहकी शुद्धि चन्द्रसूर्य की किरण और वायुसे होती है ६४ मुखसे निकले थूकके विन्दु और आचमनके भी विन्दुशुद्ध होतेहैं दाढ़ी और मोछके वाल मुंहमें पड़जार्वे तो अशुद्धनहींहोते दांतमें लगेहुये जूठेको गिरनेपर फेंकदेनेसे मुंह शुद्ध होताहै६५॥
याशरल्लयस्मृति सका स्नात्वापीत्वाक्षुतेसुप्तभुक्तारथ्येपसर्पणे ॥ आचांतःपुनरा चामेद्वासोविपरिधायच९६ रथ्याकर्दमतोयानिस्टष्टान्यत्व श्ववायसैामारुतेनैवशुध्यंतिपक्वेष्टकचितानिच ९७ तपस्त प्वासृजइह्माब्राह्मणान्वेदगुप्तये॥ तृप्त्यर्थपितृदेवानांधर्म संरक्षणायच ९८सर्वस्यप्रभवाविप्राःश्रुताध्ययनशीलिनः॥ तेभ्यःक्रियापराःश्रेष्ठास्तेभ्योप्यध्यात्मवित्तमाः ९९ नविद्य याकेवलयातपसावापिपात्रता॥ यत्रत्तमिमेचोभेतद्विपात्रं प्रकीर्तितम्२००गोभूतिलहिरण्यादिपात्रेदातव्यमर्चितम्। नापात्रेविदुपाकिंचिदात्मनःश्रेयइच्छता १ विद्यातपोभ्यां हीनेननतुग्राह्यःप्रतिग्रहः।। गृहीत्प्रदातारमधोनयत्यात्मान मेवच २॥ सहापानी पीसो छाक खागलीमें चल और वस्त्रपहिन कर दो चार भाचमनकरे ६६ राहके कीचड़ और जलअन्त्यज कुत्ता और कौवे से गयेहों तो बायुसेही शुद्ध होते हैं पझी इंटसे वनाहुआ घर भी वायुसे शुद्ध होताहै ६७ इतिद्रव्यशुद्धिप्रकरणम्॥विधाता ने धर्म और वेदकी रक्षाके लिये और देवता पितरों की तृप्ति के निमित्त अपने तपोवलसेब्राह्मणोंकोउत्पन्न किया सबसे ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं उनमें भी वेद पढ़ने वाले उत्कष्ट हैं उनसे वेद विहित कर्म करनेवाले और उनसे भी आत्म तत्व ज्ञानी उत्तमह ६६ केवल विद्या और तपसे सुपात्र नहीं होता जिसमें विहित कर्मोंका अनु- ठान और ये भी दोनों (विद्याऔरतप). पायेजायें वही उत्तम पात्र कहाता है २०० गोभूमि, तिल और सोना आदि जो वस्तु देनीहो सो विधिपूर्वक सुपात्रको देवे और अपनीभलाई चाहे तो जान बूझ कुपात्रकोनदेवे?जोब्राह्मण विद्याोर तपसेहीनहोवह दान न लेवे क्योंकि दानलेकर वहदेनेवाले और अपनेको भी नरक में लेजाता है २॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ दातव्यंप्रत्यहंपात्रेनिमित्ततुविशेषतः ॥ याचितेनापिदा तव्यं श्रद्धापूतन्तुशक्तितः३ हैमशृंगीखुरेरौप्यैःसुशीलावस्त्र संयुता ॥ सकांस्यपानादातव्याक्षीरिणीगौःसदक्षिणा' ४ दातास्याःसर्गमाप्नोतिवत्सरानोमसम्मितान् ॥ कपिला चेत्तारयतिभूयश्चासप्तमंकुलम् ५ सवत्सारोमतुल्यानियुगा न्युभयतामुखीं ॥ दातास्याःस्वर्गमानोतिपर्चेणविधिनादद त् ६ यावद्वत्सस्यपादोहोंमुखंयोन्यांचदृश्यते ॥ तावद्गौष्ट थिवीज्ञेयायावद्गर्भनमुंचति ७ यथाकथंचिहत्वागांधवाचे. नुमेववा ॥ अरोगामपरिक्लिष्टांदातास्वर्गेमहीयते ८ श्रांत संवाहनंरोगिपरिचर्यासुरार्चनम् ॥ पादशौचंद्विजोच्छिष्ट मार्जनंगोप्रदानवत् ९॥ सामर्थ्यहोतो प्रतिदिन सुपात्रकोदानदे यदिकोई ग्रहणआदि निमित्तापड़े तो विशेषकरके देना और मांगनेपरभी श्रद्धापूर्वक शक्तिके अनुसार देनाचाहिये ३ सोनेसे सींग और रूपेसे खुरमढ़ा के वस्त्र प्रोढ़ाकर कांसेकीदोहनी समेत सूधीऔर बहुत दूधदेने वाली गोकादानकरे ४ जितने रोम गौके शरीरमें हों उतने वर्ष उसका देनेवाला स्वर्गभोगताहै और गौकपिलाहो तो दाता सात पुरुषोसमेत तरजाताहै ५ यदि उभयतोमुखी गोकोपूर्वोक्त विधिसे कोई दानकरे तो बछड़े और गौ दोनोंके जितने रोमहों उतनेयुग । पर्यंत उसका दाता स्वर्गभोगकरताहै ६ व्यातेसमय जवसेवछरे के दोनोंपांव और मुंह योनिमें देखपड़ें और गर्भसे मुक्तनहो तव तक वह गौ उभयतोमुखी कहलाती और पृथ्वी के समान होती है ७ जिस किसीप्रकारसे लगे न वा ठांठभी गोकोदे परन्तु रोगी और दुवलीनहो तो उसकादेनेवाला स्वर्गमें पूजितहोताहै ८ थके को सुस्थकरना, रोगी की सेवा, देवताका पूजन, द्विजों का पांव धोना और उन्होंके जूठेकाधोना ये सब गोठगन के तुल्य हैं ६॥ • ८ .
याज्ञवल्क्यस्मृति सः। भूदीपांश्चान्नवस्त्रांभस्तिलसर्पिःप्रतिश्रयान् ॥ नैवेशि कंस्वर्णधुर्य्यदत्वास्वर्गमहीयते १० गृहधान्याभयोपानच्छ त्रमाल्यानुलेपन मायानंदृक्षप्रियंशय्यांदत्वात्यन्तंमुखीभवे त् ११ सर्वधर्ममयंब्रह्मप्रदानभ्योधिकंयतः ॥ तद्ददत्समवा मोतिब्रह्मलोकमविच्युतम् १२प्रतिग्रहसमर्थोपिनादत्तेयःप्र तिग्रहम् ॥ येलोकादानशीलानांसतानाप्नोतिपुष्कलान् १३ कुशा शाकंपयोमत्स्यागंधाःपुष्पंदधिक्षितिः ॥ मांसंशय्यास नंधाना:प्रत्याख्येयनवारिच १४ अयाचिताहृतंग्राह्यमपिदु प्रकृतकर्मणः ॥ अन्यत्रकुलटापण्ढपतितेभ्यस्तथाद्विपः १५ देवातिथ्यर्चनकृतगुरुभृत्यार्थमेवच ॥सर्वतःप्रतिगृहणीयादा स्मत्यर्थमेवच १६॥ भूमि,दीपक,अन्न,वस्त्र, जल,तिल,घी,विदेशीकीआश्रय,गृहस्था- श्रमकेलिये कन्यादान, सुवर्णऔर वलीवर्द इनसवोंकेदेनेसे स्वर्ग मेंसुखपाताहै १० गृहदान,धान्यदान,अभयदान,जूता,छाता माला चन्दनादिअनुलेपन यान,(स्थआदि) वृक्ष,किसीके प्रियवस्तुका और शय्याकादानदेनेसे अत्यन्तसुखपाताहै ११ वेद (सवधर्मोंको वतानेसे)सर्वधर्मरूपहै इसलिये वेददानकरे (दूसरेकोपढ़ावेवापढ़ वावे )तो ब्रह्मलोकमें अचल वास पाताहै १२जो दानलेनेके योग्य हो परतोभी दानले तो जितनेलोक दानदेनेवाले को मिलते हैं उतने उसेभी मिलते हैं १३ कुशा, शाक, दूध,मछली,सुगन्ध,फूल दही, भूमि मांस, शय्या,आसन, भुने चावल और जल इनसव में से किसी चीजको कोई देनेलगे तो त्यागनकरना १४ विनामांगे कोई दुराचारीभी कुछचीज लेआदे तो लेलेना परन्तु व्यभिचारि- णी, पतित,नपुंसक और शत्रुकी लाईचीज न लेना१५देवता और अतिथिकी पूजाकेलिये और माता,पिता,गुरु,पुत्र और स्त्री आदि, के भरण पोपणके निमित्त और अपने प्राणरक्षाके लिये सबसे प्र- तिग्रह लेना कुछ दोप नहीं १६ इति दानप्रकरणम् ॥
यानवल्क्यस्मृति स०। अमावास्याष्टकादिःकृष्णपक्षोयनद्वयंम् ॥ द्रव्यंब्राह्म णसम्पत्तिर्विपुवत्सूर्य्यसंक्रमः १७ व्यतीपातोगजच्छाया' ग्रहणचन्द्रसूर्ययोः ॥ श्राद्धप्रतिरुचिश्चेवश्राद्धकालाःप्रकी र्तिताः १८ अग्याःसर्वेपुवेदेषुत्रोत्रियोब्रह्मविद्युवा ॥ वेदा. थविज्ज्येष्ठसामात्रिमधुस्त्रिसुपर्णिकः १९ स्वस्त्रीयऋत्विक जामातृयाज्यश्वशुरमातुलाः ॥ त्रिणाचिकेतदौहित्र शिष्य 'सम्बन्धिवान्धवाः २० कर्मनिष्ठास्तपोनिष्ठाःपंचाग्निब्रह्म चारिणः ॥ पितृमातपराश्चैवव्राह्मणाःश्रादसंपदः २१ रोगीहीनातिरिक्तांगःकाणःपौनर्भवस्तथा ॥ अवकीर्णीकुंड गोलौकुनखीझ्यावदन्तका २२॥ अमावास्या अष्टका, ( हेमंत और शिशिरऋतु के चारों- कृष्णपक्षकी अष्टमी)वृद्धि, (पुत्रजन्मादि) पितृपक्ष, दोनों अयन,(उत्तरायणदक्षिणायन)द्रव्यमारब्राह्मणकीसम्पत्ति,मेष और तुलाप्रादि सब सूर्यसंक्रांति१७व्यतीपात (योग) गजछाया (योग विशेष)सूर्य और चन्द्रग्रहण और जव श्राद्धकरनेकी अपनेकोरुचि हो ये सब श्राद्धकाल,१८सब देशपाठियोंमें अग्रगण्य,श्रुताध्ययन- सम्पन्न,ब्रह्मज्ञानी,जवान,वेदकाअर्थ जाननेवाला, ज्येष्ठसामानाम एक सामवेदको पढ़नेवाला, त्रिमधु नामक ऋग्वेद एकरणपाठी ऋग्वेदऔरयजुर्वेदकात्रिसुपर्णनामप्रकरणपढ़नेवाला१६भागिनेय, विज,कन्यापति,यज्ञकरानेयोग्य,श्वशुर,मातुल,यजुर्वेदकात्रिणा चिकेतनामप्रकरणपढ़नेवाला,कन्यापुत्र,शिप्य सम्बन्धीऔरबांधव २. अपनेकर्मनिष्ठारखनेवाले, तपस्वी, पंचाग्नि (जिसको सभ्य आवसथ्य औरत्रेताग्निहों) ब्रह्मचारीऔरमातापिताकेभक्तइतनेप्र- कारकेब्राह्मणश्राद्धकोसफलकरनेवाले २१रोगी जिसकाकोई अंग अधिकहोवाकमहो, काणापुन स्वीकापुत्रमवकी (जिसब्रह्मचारी का व्रतछूटगयाहो) कुंड (पतिकेहोतेहीदूसरेसेउत्पन्नपुत्र) गोलक (पतिमरनेपरदूसरेसेउत्पन्नपुत्र)कुनखी, औरकालेदांतवाला २२ ।।. .
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। भृतकाध्यापकःक्लीवःकन्यादृप्यभिशस्तकः ॥ मित्रधुक् पिशुनःसोमविक्रयापरिविन्दकः २३ मातापितगुरुत्यागी कुंडाशीटपलात्मजः ॥ परपूर्वापतिस्तेनःकर्मदुष्टाश्चनिदि ताः २४ निमन्त्रयेतपूर्वद्युाह्मणानात्मवान्शुचिः ॥ तैश्चा पिसंयतैर्भाव्यंमनोवाकायकर्मभिः २५ अपराह्णसमभ्य य॑स्वागतेनागतांस्तुतान् ॥ पवित्रपाणिराचांतानासनेपूप वेशयेत् २६युग्मान्दैवयथाशक्तिपित्र्येयुग्मांस्तथैवच ॥परि स्तृतेशुचौदेशेदक्षिणाप्रवणेतथा २७ हौदैवेप्राक्त्रयःपित्र्ये उदकैकैकमेवधामातामहानामप्येवंतंत्रवावैश्वदेविकं २८॥ वेतनदेकर वा लेके जोपढ़ेपढ़ावे,नपुंसक,कन्याको दूपणलगाने वाला महापातकयुक्त, मित्रद्रोही, चुगुल, सोमलताकावेचनेवाला और परिविन्दक (जेठेभाई केरहतेही छोटाव्याहागयाँ २३ निर्दोष माता,पिता और गुरुमादिको त्यागकरनेवाला,पर्वोक्त कुण्डकाअन्न खानेवाला,अधर्मीकापुत्र, पुनर्भकापति,चोर औरशास्त्र विरुद्धकर्म करनेवाला ये सवब्राह्मण श्राद्धमें निन्दित, २४ श्रादकेपहिलेदिन ब्राह्मणोंको निमन्त्रणदेना,इन्द्रियोंका संयम और देहकीपवित्रता रखनी,निमंत्रितव्राह्मणोंकोभीमनवाणीऔर कायव्यापारकासंयम करनाअवश्यहीचाहिये २५उन निमंत्रितब्राह्मणोंकोअपराहणकाल मेंबुलाकरकोमलवाणीसपूजाकरनीअपनाहायशुदकरकेउन्हें (पावें धुलवाकर)आचमनकरावे ओरासनोंपरबैठाले २६देव (अभ्युद- यिक)आदमें अपनीशक्तिकेअनुसार युग्म (इत्यादि समसंख्यायुक्त) ब्राह्मणोंको और पितृ (पाणआदि)श्राद्धोंमें प्रयुग्म १,३,५,७आदि ब्राह्मणोंको पवित्र जिसमें आसनविछाहोऔर दक्षिणकीओरझुक- तीहोऐसीभूमिपरविठलावै २७विश्वेदेवोंकी ओर दोब्राह्मणपूर्वमुख घेठाले भोरपितरोंकीमोर उत्तरमुख तीनब्राह्मणवेठाले अथवादोनों भोरएकाएकविठलावइसीप्रकारमातामहीकेश्रादोभीकरेगोरवेश्व देवब्राह्मणोंकाचाहे तन्त्र(दोनोंको एकहीब्राह्मणसे) करले २८ ॥
याज्ञवल्क्यस्मति स०। पाणिप्रक्षालनंदत्वाविष्टरार्थकुशानपि॥आवाहयेदनुज्ञा तोविश्वेदेवासइत्यूची२९यवैरन्यवकीर्याथभाजनेसपवित्रके शन्नोदेव्यापयःक्षिप्त्वायवोसीतियवांस्तथा ३० यादिव्या इतिमंत्रणहस्तेष्वयविनिक्षिपेत् ॥ दत्वोदकंगंधमाल्यंधूप दानंसदीपकम् ३१ तथाच्छादनदानंचकरशौचार्थमंबुच ॥ अपसव्यंततःकृत्वापितॄणामप्रदक्षिणम् ३२ द्विगुणांस्तुकु शान्दत्वाह्युशंतस्त्वेत्यचापितॄन्॥आवाह्यतदनुज्ञातोजपेदा यांतुनस्ततः ३३ अपहताइतितिलान्विकीर्यचसमन्ततः॥ यवार्थास्तुतिलैःकार्याःकुर्यादादिपूर्ववत् ३४ दत्वायंसं सवांस्तेपांपत्रिकृत्वाविधानतः ॥पितृभ्यःस्थानमसीतिन्यु जंपात्रंकरोत्यधः३५ ब्राह्मणों को हाथधुला कर बैठने के लिये कुश देवे तव उनकी आज्ञा लेकर (विश्वेदेवास ) इस मन्त्र से आवाहन करना २६ पव प्रक्षेपकरने के अनन्तर पवित्र सहित पात्र में (शन्नोदेवी) इस से जलऔर ( यवोसि) इसमन्त्रसेयवडाले ३० (यादिव्या) इसमन्त्र से ब्राह्मणों के हाथ में अर्घडालना तवशुद्धजल, चन्दन माला, धूप और दीपदेना ३१ आच्छादन के अर्थ वस्त्र और हाथ धोने को जल भी देवे अनन्तर अपसव्य करके पितरों को वामावर्त से ३२ दोहरेकुशों का मासनमादि देके (उशन्तस्त्वा) इसमन्त्र से पितरोंका आवाहन ब्राह्मणों की प्राज्ञालेकरकरे इस के अनन्तर (प्रायन्तुनः) इसमंत्रको जपे ३३ (अपहता ) इस मंत्र से चारों ओर तिलछिड़कना यवकेवदले, तिल काममें लाना और अर्यादि. पहले के सदृश करना ३४ ब्राह्मणों के हाथमें अर्घ देना और उन के हाथ से जो जल चुवे उसे पात्र में रोप के विधिपूर्वक उस पात्र को पितृभ्यः स्थानमास ऐसा कहके मोधा करदेना ३५॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। अग्नौकरिष्यन्नादायएच्छत्यन्नंघृतप्लुतम्।।कुरुग्वत्यभ्या नुज्ञातोहुत्वाग्नौपितृयज्ञवत् ३६ हुतशेपंप्रदद्यात्तुभाजनेप समाहित।यथालाभापपन्नपुरौप्येपुचविशेषतः ३७ दत्वान्नं एथिवीपात्रमितिपात्राभिमंत्रणम्॥कृत्वेदंविष्णुरित्यन्नेद्विजां गुष्ठंनिवेशयेत् ३८ सव्याहृतिकांगायत्रींमधुवाताइति च म् ॥जप्त्वायथासुखवाच्यंभुंजीरंस्तेपिवाग्यताः ३९ अन्न मिष्टंहविष्यंचदद्यादक्रोधनोत्वरः ॥ आतृप्तेस्तुपवित्राणि जप्त्वापूर्वजपंतथा ४० अन्नमादायतृप्तास्थशेषचैवानुम। न्यच ॥ तदन्नविकिरेद्भूमौदद्याच्चापःसकृत्सकृत् ४१ सर्व मन्नमुपादायसतिलंदक्षिणमुखः ॥ उच्छिष्टसन्निधौपिण्डा नदद्याद्वैपितृयज्ञवत् ४२ अग्नीकरणकेलिये घीसेआईभीगामन्नलेके पूछना जववे माज्ञादें तो भग्निमें पितृयज्ञकविधानसेहवनकरना३६हवनसेजोवचे वहन- नएकाग्रचित्तहोकरभोजनपात्रमेंदेना औरभोजनपात्र विशेषकरके रूपेकावनाना नहींतोअपनीसामर्थ्य केअनुसारवनाना ३७ भोजन पात्रपर अन्नरखके (एथिवीपात्र) इसमंत्रसे पात्रकाअभिमंत्रणकर- ना ओर (इदंविष्णुः)इसमंत्रसेउसअन्नपर ब्राह्मणकाअंगूठारखदे- ना३८ व्याहतीसहितगायत्रीऔर(मधुवाता)इनतीनमित्रोंकाजप करकेब्राह्मणोंकोसुखपूर्वक भोजनकरनेकोकहना तववेभीमौनहो. केभोजनकरें३६ जोअन्नप्रियलगे औरहविष्य (श्रादयोग्य)हो उसे ब्राह्मणोंको तृप्तिपर्यन्तक्रोधदूरकरके धीरेधीरेदेतेरहना और पुण्य स्तोत्रोंकापाठकरतेरहनाजवभोजनहोचुकेतोपूर्वोक्त(व्याहृतिसहि- तगायत्रीआदिका) जपकरना४०तवकुछकुछसवप्रकारकाअन्नलेके भापलोगतृप्तभये ऐसापूंछे ओर वचाहुआअन्न उनकी अनुमति से भूमिमें विकरपिण्डदेना अनन्तर ब्राह्मणोंको मुखशुद्धिके निमित थोडाथोड़ा जलदेना ४१ तव तिलसहित सब अन्नलेकर अपसव्य होके दक्षिणमुंहसे उच्छिष्टकेसमीपहीमें पितरोंको पिण्डदेना४२॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। मातामहानौमप्येवंदद्यादाचमनंततःस्वस्तिवाच्यंततः कुर्यादक्षय्योदकमेवच ४३ दत्वातुदक्षिणाशक्त्यास्वधा कारमुदाहरेत् ॥वाच्यतामित्यनुज्ञात-प्रकृतेभ्यःस्वधोच्यता म् ४४ युरस्तुस्वधेत्युक्तेभूमौसिचत्ततोजलम्॥विश्वेदेवा श्चप्रीयंतांविषेश्चोक्तमिदंजपेत् ४५ दातारोनोभिवर्धतांव दाःसंततिरेवच॥श्रद्धाचनोमाव्यगमबहुदेयंचनोस्त्विति४६ इत्युक्तोक्ताप्रियावाचःप्रणिपत्यविसर्जयेत् ॥ वाजेवाजइति प्रीतःपितृपूर्वविसर्जनम् ४७ यस्मिंस्तेसंस्रवाःपूर्वमर्थ्य पात्रनिवेशिताः ॥ पितृपात्रंतदुत्तानंकृत्वाविप्राविसर्जये तू ४८ प्रदक्षिणमनुब्रज्यभुंजीतपितृसेवितम्।ब्रह्मचारीभ वेत्तातुरजनींब्राह्मणेःसह ४९॥ इसीप्रकारसे मातामहआदिकोभीदेनातवाचमनदेनाइसके उपरान्त स्वस्तिवाचन और अक्षय्य उदकभीदेना४३ अपनीशक्ति के अनुसारदक्षिणादेकेस्वधावाचनकीमाज्ञाब्राह्मणोंसेलेकरपितरों और मातामहादिकोंसे स्वधा उच्चारणकराना ४४ जववे स्वधाक- हचुकें तो भूमिपर जलछिड़कना और विश्वेदेवा प्रसन्नहीं ऐसाक- थनकरना फिर ब्राह्मणोंकी आज्ञापाकरके ४५ हमारेकुलमें दांता लोगोंकी वेद और सन्ततिकी बढ़तीहो हमलोगोंके मनसे श्रद्धादुर नहो और हमलोगोंको दानयोग्य पदार्थ बहुतहोवें ऐसी आशिपा मांगे १६ अनन्तर मधुरवाणीकहकर नमस्कारकरके प्रसन्नमनसे (वाजेवाजे)इस मंत्रकोपढ़कर पहिले पितरोंका तब विश्वेदेवोंका विसर्जनकरे ४७ जिन पितृपात्रोंकोब्राह्मणोंके हाथसेगिरेहुये जल सहितलेके औंधाकियाथा उनको उतानकरके ब्राह्मणोंका विसर्ज- नकरे ४८ अनन्तर अपनीसीमातक उन्हे पहुंचाकर जव उनकी प्रांज्ञाहो तो उनकी प्रदक्षिणाकर फिराकेादशेषअन्नकाभोज- नकरेऔरउसरातश्राद्धकर्ताऔरश्राद्धब्राह्मणब्रह्मचारीहोकेरहै४६।
याशयत्ययस्मृति स०। अग्नौकरिष्यन्नादायटच्छत्यन्नंघृतप्लुतम्।।कुरुष्वत्यभ्या नुज्ञातोहुत्वाग्नौपितृयज्ञवत् ३६ हुतशेषप्रदद्यात्तुभाजनेप समाहित॥यथालाभापपन्नषुरौप्येपुचविशेषतः ३७ दत्वान्नं पृथिवीपात्रमितिपात्राभिमंत्रणम्॥कृत्वेदंविष्णुरित्यन्नेद्विजां गुष्ठंनिवेशयेत् ३८ सव्याहृतिकांगायत्रींमधुवाताइनि च म् ॥ जप्त्वायथासुखंवाच्यं जीरंस्तेपिवाग्यताः ३९ अन्न मिष्टंहविष्यंचदद्यादक्रोधनोत्वरः ॥ आतृप्तेस्तुपवित्राणि जप्त्वापूर्वजपंतथा ४० अन्नमादायतृप्तास्थशेषंचैवानुमा न्यच ॥ तदन्नंविकिरेद्भूमौदद्याचापःसकृत्सकृत् ४१ सर्व मन्नमुपादायसतिलंदक्षिणमुखः ॥ उच्छिष्टसन्निधोपिण्डा न्दद्याद्वैपितृयज्ञवत् ४२ अग्नौकरणकेलिये घीसेआईभीगामन्नलेके पूछना जववे माज्ञादें तो अग्निमें पितृयज्ञकविधानसेहवनकरना३६हवनसेजोवचे वहअ- नएकायाचित्तहोकरभोजनपात्रमेंदेना औरभोजनपात्रविशेषकरके रूपेकावनाना नहींतोअपनीसामर्थ्य केअनुसारवनाना ३७ भोजन पात्रपर अन्नरखके (एथिवीपात्र) इसमंत्रसे पात्रकाअभिमंत्रणकर- नासोर (इदंविष्णुः)इसमंत्रसेउसअन्नपर ब्राह्मणकाअंगूठारखदे- ना३८ व्याढतीसहितगायत्रीऔर(मधुवाता)इनतीनोमत्रोंकाजप करके ब्राह्मणोंकोसुखपूर्वक भोजनकरनेकोकहना तववेभीमोनहो- के भोजनकरें३६ जोअन्नप्रियलगे औरहविष्य (श्राद्धयोग्य)हो उसे ब्राह्मणोंको तृप्तिपर्यन्तक्रोधदूरकरके धीरेधीरेदेतेरहना और पुण्य स्तोत्रोंकापाठकरतेरहनाजवभोजनहोचुकेतोपूर्वोक्त(व्याहृतिसहि- तगायत्रीआदिका) जपकरना४०तवकुछ कुछसवप्रकारकाअन्नलेके मापलोगतृप्तभये ऐसापूंछे और वचाहुआअन्न उनकी अनुमति से भूमिमें विकरपिण्डदेना अनन्तर ब्राह्मणोंको मुखशुदिके निमित्त थोडाथोड़ा जलदेना ४१ तब तिलसहित सब अन्नलेकर अपसव्य होके दक्षिणमुंहसे उच्छिष्टकेसमीपहीमें पितरोंको पिण्डदेना४२॥ .
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। मातामहानौमप्येवंदद्यादाचमनंततास्वस्तिवाच्यंततः कुर्यादक्षय्योदकमेवच ४३ दत्वातुदक्षिणाशक्त्यास्वधा कारमुदाहरेत् ॥वाच्यतामित्यनुज्ञातःप्रकृत्तभ्यःस्वधोच्यता । म् ४४ व्युरस्तुस्वधेत्युक्तेभूमौसिचचतोजलम्॥विश्वेदेवा श्चप्रीयताविप्रेश्चोक्तमिदंजपेत् ४५ दातारोनोभिवर्धतांचे दाःसंततिरेवच॥श्रद्धाचनोमाव्यगमबहुदेयंचनोस्त्विति४६ इत्युक्तोक्ताप्रियावाचःप्रणिपत्यविसर्जयेत् ॥ वाजेवाजइति प्रीतःपितृपूर्वविसर्जनम् ४७ यस्मिंस्तेसंस्रवाःपूर्वमर्थ्य पात्रनिवेशिताः ॥ पितृपात्रंतदुत्तानंकृत्वाविप्राविसर्जये तु ४८ प्रदक्षिणमनुब्रज्यभुंजीतपितृसैवितम्ब्रह्मचारीभ वेत्तांतुरजनींब्राह्मणेःसह ४९॥ इसीप्रकारसे मातामहआदिकोभीदेनातव आचमनदेना इसके उपरान्त स्वस्तिवाचन और अक्षय्य उदकभीदेना४३ अपनीशक्ति के अनुसारदक्षिणादेकेस्वधावाचनकीमाज्ञाब्राह्मणोंसेलेकरपितरों और मातामहादिकोंसे स्वधा उच्चारणकराना ४४ जववे स्वधाक- हचुकें तो भूमिपर जलछिड़कना और विश्वेदेवा प्रसन्नहों ऐसाक- धनकरना फिर ब्राह्मणोंकी आज्ञापाकरके ४५ हमारेकुलमें दांता लोगोंकी वेद और सन्ततिकी बढ़तीहो हमलोगोंके मनसे श्रद्धादूर नहो और हमलोगोंको दानयोग्य पदार्थ बहुतहोवें ऐसी आशिषा मांगे १६ अनन्तर मधुरवाणीकहकर नमस्कारकरके प्रसन्नमनसे वाजेबाजे)इस मंत्रकोपढ़कर पहिले पितरोंका तय विश्वेदेवोंका विसर्जनकरे ४७ जिन पितृपात्रोंकोब्राह्मणोंके हाथसेगिरेहुये जल सहितलेके औंधाकियाथा उनको उतानकरके ब्राह्मणोंका विसर्ज- नकरे ४८ अनन्तर अपनीसीमातक उन्हें पहुंचाकर जव उनकी आज्ञाहो तो उनकी प्रदक्षिणाकरफिराकेश्रादशेषग्रनकाभोज- नकरेगोरउसरातश्राद्धकर्ताऔरश्राब्राह्मणब्रह्मचारीहोकेरहें।
* - याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ एवंप्रदक्षिणात्कोटदौनांदीमुखापितृत् ॥यजेतदधि कधुमिश्रापिण्डान्यवैःक्रियाः ५० एकादिष्टंदैवहीनमे काध्यकपवित्रकम्।।आवाहनाअग्नौकरणरहितंह्यपसव्यव त् ५१ उपतिष्ठतामक्षय्यस्थानेविप्रविसर्जने ॥ अभिरम्य तामितिवदेत्युस्तेभिरताःस्मह ५२ गन्धोदकतिलैय्र्युक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् ॥ अर्ध्यार्थपितृपात्रेपत्रेतपात्रंसिंच येत् ५३ येसमानाइतिहाभ्यांशेपंपूर्ववदाचरेत्॥ एतत्सपि ण्डीकरणमेकोदिष्टंस्त्रियाअपि ५४ अर्वाक्सपिण्डीकरणंय स्यसंवत्सराद्भवेत् ॥ तस्याप्यन्नंसोदकुंभंदद्यात्सम्वत्सरहि जे ५५मृतेहनितुकर्तव्यंप्रतिमासन्तुवत्सरम्॥प्रतिसम्बत्स रञ्चैवमाद्यमेकादशेहनि ५६॥ इसीप्रकार वृद्धि(पुत्रजन्मादि)होनेपर नान्दीमुख पितरोंकी पूजा दक्षिणावर्तसेकरनी दही और कदलीफल सहित पिण्डदेना और तिलके काम यवसेकरना ५० एकोद्दिष्टवादमें विश्वेदेव नहीं होते एकही अर्घपात्र भौर एकही पवित्रहोताहै पावाहन पोर मं- ग्नौकरण नहीं होता जितनी क्रिया कीजातीहें सब अपसव्यसे५.१ अक्षय्यकेवढलेउपतिष्ठताम् और ब्राह्मणोंके विसर्जनकेवदलेअभि- रम्यतां (आपआनन्दकरें) ऐसा कहना और वेभीकहें कि अभिरत (आनन्दभये) ५२ चन्दन जल और तिलसहित चारपात्र अर्धके लिये वनाना और प्रेतपात्रसे पितरोंके पात्रमें ५३ येसमाना इन दोनोंचाओंसे जलसेककरना शेपक्रियासवपूर्ववत् करनी यह सपिण्डीकरण कहलाताहै एकोदिष्टथाद्ध स्त्रीका भी होताहे ५.४ यदिकिसीद्विजकासपिण्डीकरणवर्पसेपहिलेहीहुआहोतोभीउसको वर्षपर्यन्त जल पूर्णघट और अन्नदेतेहीरहना ५५ मासिकश्राद्धहर महीने जिसतिथिमेंटेहत्यागहुमाहोउसीमेंकरना ओर वार्पिकश्राद्ध भीमरणतिथिमेंहरवर्षकरनाऔरआद्यश्राद्ध ग्यारहेंदिनकरना५६ ।।
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। पिण्डास्तुगोजविप्रेभ्योदद्यादग्नौजलेपिवा ॥ प्रक्षिपे सत्सुविप्रेपुद्धिजोच्छिष्टनमार्जयेत् ५७ हविष्यानेनवैमासं पायसेनतुवत्सरम् ॥ मात्स्यहारिणकौरभ्रशाकुनच्छागपा पतैः ५८ एणरौरववाराहशाशैमौसैर्यथाक्रमम् ॥ मासया भितृप्यन्तिदत्तरिहपितामहा ५९खड्गामिपमहाशल्कमधु मुन्यन्नमेवच ॥ लोहामिपमहाशाकमांसवाध्रीणसस्यच६. यंददातिगयास्थश्चसर्वमानन्त्यमश्नुते ॥ तथावर्षात्रयोद श्यांमघासुचविशेषतः६१ कन्यांकन्यावेदिनश्चपशून्वैसत्सु तानपि ॥ तंऋषिंचवाणिज्यंद्विशफैकशफंस्तथा ६२ ब्रह्म वर्चस्विनःपुत्रान्स्वर्णरूप्येसकुप्यके॥जातिश्रेष्ठ्यसर्वकामा नाप्नोतिश्राददःसदा ६३ ।। गौ वकरा वा ब्राह्मणको पिण्डदेना अथवा अग्नि वा जल में फेंक देना और ब्राह्मणोंके रहतेही उनका जूठा न उठाने लगना ५७ हविष्यअन्नसे महीनेभर और पायस से एक वर्ष और मछली, हि- रण, उरभू (भेडा) पक्षी वकरा, टपत् (चित्रमृग) ५८ एण (काला मृग) रुरु (सावर शूकर और खरहे) इनके मांस से श्राद्धकरने में पितर लोग क्रमसे एकएक महीना अधिक तृप्तरहते हैं ५४ गैंडा और महाशल्क (मत्स्यविशेष) का मांस, मधु, मुन्यन्न, (तीनीका चावल) लोह (लालवकरे) का मांस, महाशाक(कालाशाक)वार्टी णस(बढ़ासफेद) बकरे का मांस ६० और गया तीर्थ, वर्षाकालकी त्रयोदशी (भाद्रपद रुपण त्रयोदशी और विशेष करके मघामें जो पिण्डदेते इन सबों से निस्सन्देह अनन्त कालतक पितरोकी तृप्ति रहती है ६१ श्राद्ध करनेवाला मनुष्य कन्या, कन्याकावर, अच्छे पशु और पुत्र, यत में विजय, कपि कर्मका फल, बनिजमें लाभ दोखुरे औरएकखुरेपशु ६२ वेदपाठी पुत्र, सोना,चांदीमादि रत्न जाति में बड़ाई भी अपने सवमनोरथोंको,सदा पाता है ६३ ॥ ६ ४२ यामपल्क्यस्मति स०।। प्रतिपत्प्रभृतिष्वेकावर्जयित्वाचतुर्दशीम्॥शस्त्रणतुहताये वैतेभ्यस्तत्रप्रदीयते ६४ स्वर्गह्यपत्यमोजश्चशौर्यक्षेत्रंबलं तथा॥ पत्रंश्रेप्चसौभाग्यसामृद्धिमुख्यतांशुभम ६५ प्रवृत्त चक्रतांचैववाणिज्यप्रभृतीनपि ।। अरोगित्वंयशोवीतशोकतां परमांगतिम् ६६ धनंवेदानभिपक्सिहिंकुप्यंगाअप्यजावि कम् ॥ अश्वानायुश्चविधिवद्यःश्रादंसंप्रयच्छति ६७ कृत्ति कादिभरण्यंतंसकामानाप्नुयादिमान् ॥ आस्तिक श्रद्दधान श्चव्यपेतमदमत्सरः ६८ वसुरुद्रादितिसुता:पितरःश्राद्ध देवताः ॥ प्रीणयंतिमनुष्याणांपितृन्श्राद्धनतर्पिताः६९ आ युःप्रजांधनंविद्यास्वर्गमोक्षसुखानिच ॥प्रयच्छंतितथाराज्यं प्रीतानणांपितामहाः ७० विनायकःकर्मविघ्नसियविनि योजितः॥गणानामाधिपत्यचरुद्रेणब्रह्मणातथा ७१॥ प्रतिषत् प्रादि सब तिथियों में इनको पिण्ड दे एक चतुर्दशी को छोड़दे क्योंकि उसमें जो शस्त्रसे मारेगये उनको दियाजाता है ६४ स्वर्ग, अपत्य, प्रताप, शूरता, भूमि, बल, पुत्र, वड़ाई, सौ. भाग्य, समृद्धि, मुख्यता, शुभ ६५ राज्य वणिज,प्रभुताई, आरोग्य यश, शोक नाश, परमगति ६६ धन, विद्या, वैदई की सिद्धि,कुप्य (सोने चांदीसे अन्य धन ) गो, चकरी, भेड़, घोडे,भायुप्य इनसय पदार्थों को जो विधि पूर्वक ६७ कृत्तिकासे ले भरणी पर्यन्त श्रद्धा और आस्तिक्यबुद्धि से मद.भोर मत्सर छोड़के श्राद्धकरते वे पाते हे ६८ वसु, रुद्र, अदिति, सुत और पितर ये श्राद्ध के देवता हैं ये. श्राद्धसे तृप्त होकर मनुष्यों के पितरों को तृप्त करते हैं वह और जव पितर तृप्तहोते हैं तो मनुष्यों को प्रायु, पुत्र,धन, विद्या,स्वर्ग, मोक्ष,सुखोरराज्यदेतेहैं७० इतिश्रादप्रकरणम्॥ विष्णु,ब्रह्माऔर रुद्रनेविनायकको कर्मकेविघ्न औरशांति और (पुप्पदन्तभादि); गोंके नाधिपत्यमें नियुक्त किया है ७१ ॥ .
याज्ञवल्क्यस्मृवि स०॥ तेनोपसृष्टोयस्तस्यलक्षणानिनिवोधत ॥ स्वप्नेवगोहते त्यर्थजलंमुंडांश्चपश्यति ७२ कापायवाससश्चैवक्रव्यादा श्चाधिरोहति ॥अन्त्यजैर्गर्दभैरुष्टैःसहैकत्रावतिष्ठते७३ब्रज नपितथात्मानंमन्यतेनुमतंपरैः ॥विमनाविफलारम्भःसंसी दत्यनिमित्ततः ७४ तेनोपसृष्टोलभतेनराज्यराजनन्दनः॥ कुमारचिनभरिमपत्यंगर्भमंगना ७५ आचार्य्यवंश्रोत्रिय श्चनशिष्योध्ययनन्तथा। वणिग्लाभंनचाप्नोतिपिचापिक पीबलः७६ स्नपनन्तस्यकर्तव्यंपुण्येनिविधिपूर्वकम्॥ गौ रसर्षपकल्केनसाजेनोत्सादितस्यच ७७ सर्वोपधैःसर्वग- न्धैर्विलिप्तशिरसस्तथा ॥भद्रासनोपविष्टस्यस्वस्तिवाच्या द्विजाःशुभाः ७८॥ उस विनायक से जो उपसृष्ट (गृहीत)हें उनके लक्षण सुनो अलमें अत्यन्त स्नानकरनेका स्वप्न और मुण्डित मनुष्योंकास्वप्न देखतेहैं ७२ गेरुमा वस्त्र पहिननेवाले और कच्चामांसखानेवालों की सवारी स्वप्न में करता,अंत्यज, गर्दभ और ऊंट इनके साथ एकजगह वैठनेका स्वप्न देखताहै ७३ और यह भी स्वप्न में दे- खताहै कि मुझको मेरेशत्रु दौडारहेहें उसका चित्त विक्षिसरहता जो कामकरनेलगताहै वह सिद्ध नहीं होता विना कारण दीनमन रहताहै ७४ राजपुत्रहो तो वह राज्य नहीं पाता,कन्याहो तो वह अच्छापति नहीं पाती स्त्रीहो तो उसे गर्भ और अपत्य नहीं प्राप्त होते ७५ श्रोत्रियहो तो वह आचार्य नहीं होता शिष्यको पढ़ना नहीं मिलता,वणिकहों तो उसे लाभनहीं होता भौर किसान खे- तिहरहो तो उसकी खेती अच्छी नहीं लगती ७६ इसवास्ते शुभ दिनमें विधिपूर्वक उस मनुष्यको पीलेसरसोंका उबटना घीमि- लाकर लगावे ७७ और सर्वोपधी भोर सर्वगन्धसे उसको शिरमें लेपकरे मनन्तर भद्रासनपर बैठाकरके विद्वान ब्राह्मणोंसेस्वस्ति- वाचन कराना ७८॥
४४ - याज्ञवल्क्यस्मृति सः। अश्वस्थानाद्गजस्थानावल्मीकात्संगमाद्धदात् ॥ मृत्ति कारोचनांगंधान्गुग्गुलंचाप्सुनिक्षिपेत् ७९याआहृता कर णेश्चतुभिःकलशैहूंदात् ॥ चर्मण्यानडुहेरक्तस्थाप्यंभद्रास नंततः ८० सहस्राक्षशतधारमृपिभिःपावनंकृतम् ॥ तेनत्वा मामिपिंचामिपावमान्याःपुनंतुते ८१ भगन्तेवरुणोराजाभगं सूर्योबृहस्पतिः॥भगमिद्रश्चवायुश्चभगंसप्तर्पयोददुः८२ यत्तेकेशेपुदौर्भाग्यसीमंतेयश्चमनि ॥ ललाटेकर्णयोरक्ष्णों रापस्तघ्नन्तुसर्वदा ८३ स्नातस्यसार्पपैतलंत्रवेणोदुम्बरे णतु ॥ जुहुयान्मूर्वनिकुशान्सव्येनपरिगृह्यतु ८४ मितश्चसं मितश्चैवतथाशालकटकटौ ॥ कूष्मांडोराजपुत्रश्चेत्यंतेस्वा हासमन्वितैः ८५॥ तव घोडशाल,गजशाल,वेमउडि,नदीका मुहाना भोर डेले इन- की मिट्टी, गोरोचन, चन्दन आदि गन्ध और गुग्गुल उसजलमें डालना कि जो जल एकवर्णके चारघडोंसे अगाध हृदसेलेमाये हैं ओर उनघाको चारों दिशामें रसके ७६ अनन्तर पभके रक्तब- ण चमड़ेपर(वीचमेंश्रीपसेवनाहुना) भद्रासनस्थापनकरना८० (पूर्वादिक्रम से एक २ कलशलेकर गुरु अभिपेककरे तीनकलशों के तीनमंत्रह (चौथेमें ये तीनोंपड़ेजातेहैं) जिस अनेकशक्ति और अनेक प्रवाहजलको पियोंने पवित्रवनायाहै उससेतुम्हारा अभि- पेककरतेहैं पवित्रकरनेवाले येजल तुझेपवित्रकरें ८१ तुमकोराजा वरुण, सूर्य, वृहस्पति, इन्द्र, वायु और सप्तर्पियोंने कल्याणदिया ८२तुम्हारेकेश,सीमन्त,मुर्दा,ललाट,कान और प्रांसोंमें जो दो - ग्यहें सो सर्वदाये जल नाशकरें८३ इसप्रकार स्नानकरचुके तो यामहस्तसे कुभाशिरपररखके उदुम्बरके श्रवसे सरसोंकातेल दहि- नेहायसे हुने ८४ हवनका मंत्र यहहे मित,सम्मित,शाल,कटकट कुष्माण्ड औराजपुत्रइननामोंके अन्तमे स्वाहालगरकेहुनना८५॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सन
नामभिर्बलिमन्त्रैश्चनमस्कारसमन्वितैः॥दद्याश्चतुष्प
थेशूकुशानास्तीद्वेसर्वतः ८६ कृताकृतांस्तंदुलांश्चपललो
दनमेवचामत्स्यान्पक्वांस्तथैवामान्मांसमेतावदेवतुटपुष्पं
चित्रंसुगंधंचसुरांचत्रिविधामपि ॥ मूलकंपूरिकापूपंतथैवो
ण्डेरकःस्रजः ८८ दध्यन्नपायसंचैवगुडपिष्टंसमोदकम्॥ एता
न्सर्वान्समाहत्यभूमौकृत्वाततःशिरः ८९ विनायकस्यजन
नीमुपतिप्टेत्ततोम्बिकां। दूसर्पपपुष्पाणांदत्वार्य पूर्णमंज
लिम् ९० रूपदोहयशादोहभगभवतिदेहिमापुत्रान्देहिधनं
देहिसर्वकामांश्चदहिमे ९१ ततःशुक्लाम्बरधरःशुलमाल्या
नुलेपनः ॥ ब्राह्मणान्भोजयेद्दद्याद्वस्त्रयुग्मंगुरोरपि ९२ ॥
,
अनन्तर बलिदानके मन्त्र और नमस्कारसहित (अग्निमेंचरु
पकाकर उसीअग्निमें इन्हींपूर्वोक्त छःमंत्रोंसे हवनकरनेसे जो वचै
उसे) वलिदेवे तव चौराहेमें सूपपर चारोंओर कुशाफैलाकर ८६
कृताकृत तन्दुल पललौदन (तिलपिष्टसहित श्रोदन) पकी
कच्ची मछली और ऐसाही और मांस ८७ चित्रविचित्र पुष्प
(चन्दन आदि) सुगन्ध, तीनोंप्रकारकी मदिरा, मूली, पूरी, पुत्रा
उण्डेरक (छोटे २ रोट),की माला ८८ दध्यन्न, पायस गुडपिष्ट
और लड्डू इनसघों को ले भूमि में शिर लगाके ८४ विनायक
की माता अधिकाको नमस्कार करे और दूवसरसों और युष्प
से पहिले अर्घदेके फिर पूर्णाजलिदेना १० उपस्थान का मंत्र
यह है देविमुझको रूप, यश, कल्याण,पुत्र धन और सर्वमनोरथ
मनोकामना सिद्धकरदे ११ तव श्वेतवस्त्र और मालापहिन
कर और चन्दन लगाके ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा गुरुको
दोषस्त्र दक्षिणा देनी १२॥
यामवल्क्यस्मृति स०॥ एवंविनायकंपूज्यग्रहांश्चैवविधानतः॥कर्मणांफलमानो तिश्रियंचाप्नोत्यनुत्तमाम् ९३ आदित्यस्यसदापूजांतिलक स्वामिनस्तथा ॥ महागणपतेश्चैवकुर्वन्सिद्धिमवाप्नुया- त् ९४ श्रीकामःशांतिकामोवाग्रहयज्ञसमाचरेत् ॥ दृष्ट्या युःपुष्टिकामोवातथैवाभिचरन्नपि ९५ सूर्यःसोमोमहीपुत्रः सोमपुत्रोरहस्पतिः॥ शुक्रःशनैश्चरोराहु-केतुश्चेतिग्रहाः स्मृताः ९६ ताम्रकात्स्फाटिकाद्रक्तचन्दनात्स्वर्णकादुभी । राजतादयसःसीसात्कांस्यात्कााग्रहाःक्रमात् ९७ स्वव पिटेलेख्यागन्धैर्मडलकेपुवा ॥ यथावर्णप्रदेयानिवासां सिकुसुमानिच ९८ गन्धाश्चबलयश्चैवधूपादेयश्चगुग्गु लुः ॥ कर्तव्यामन्त्रवन्तश्चचरवःप्रतिदैवतम् ९९ ॥ . इसविधानसे विनायककी पूजाकरके अपने शुभकर्मका फल पाताहे और धनकीइच्छासे पूजाकरे तो अत्यन्तधनपाताहै यही फल ग्रहपूजासे भी होता है (और उनके पूजाका प्रकार भागे लिखाजाताहे ) ६३ सूर्य,स्वामिकार्तिक और महागणपति की निसनितपूजाकरने और इनको (सोनेवाचांदीका) तिलककाढ़ने से सिद्धि (प्रात्माज्ञानसेमोक्ष )पाताहै ६४ इतिगणपतिकल्पः॥ धन,शांति,दृष्टि,आयु ओरपुष्टि तथाशत्रुके ऊपर घातकरनेकीइच्छा होतोग्रहोंकीपूजाकरे ६५सूर्य,चन्द्र, मंगल, बुध, वृहस्पति, शुक्र शनि,राहुऔरकेतुयेनवग्रहहें ६६ इनकीमूर्तिक्रमसे तांबे, स्फटिक रक्तचन्दन, सुवर्ण, चांदी,लोहा, सीसाओर कांसासेवनानीपरन्तु सोनेकी दोमूर्ति बनानीचाहिये तोनवहोते ७मथवा अपनेअपने वर्णके अनुसार वस्त्रपर वामण्डलकमें चन्दनादि सुगन्धितद्रव्य सेलिखनाओरजिसकासावर्ण उसकोउसीप्रकारकेवस्त्र,पुष्प ६८ चन्दनऔर वलिदेनाधूप गुग्गुलकीसवोंकोदेना हरएकप्रतिग्रहोंके लिये मन्त्रपूर्वक चरुबनाना ६६ ॥
याज्ञवल्लयस्मृति स॥ आकृष्णेनइमदेवाअग्निमूदिवःककुत् ॥ उहुध्यस्वेति चऋचोयथासंख्यंप्रकीर्तिताः ३०० रहस्पतेअतिमदर्यस्त थैवान्नात्परिश्रुतः ॥ शन्नोदेवीस्तथाकांडारकेतुंकृण्वन्निमांस्त था १ अर्कःपलाशःखदिरोह्यपामाथिपिप्पलः ॥ औदुव रःशमीदुर्वाकुशाश्वसमिधःक्रमात् २ एकैकस्यत्वष्टशतमष्टा विंशतिरेवच ॥होतव्यामधुसर्पिभ्यांदनाक्षीरेणवायुताः३ गुड़ौदनंपायसंचहविष्यंक्षीरपाष्टिकम्॥दध्योदनंहविश्चूर्ण मांसंचित्रान्नमेवच १ दद्यागृहक्रमादेवहिजेभ्योभोजनहि नः ॥ शक्तितोवायथालाभंसत्कृत्यविधिपूर्वकम् ५ धेनुः शंखस्तथानड्वान्हेमवासोहयःक्रमात् ॥ कृष्णागौरायसं छागएतावैदक्षिणाःस्मृताः६॥ समिध होम करनेके मंत्र क्रमसे पाकृष्णेन, इमंदेवा अग्निम- , दिवःककुत, उवुध्यस्व, ३०० वृहस्पते प्रतिदर्यः अन्नात्परि- स्तुतः,शन्नोदेवीः काण्डात् भौर केतुंकण्वन् ये नव है ? पर्क पलाश, खादिर, अपामार्ग, पिप्पल, उदुम्बर,शमी,दूर्वा, भोर कुश ये सूर्यादिग्रहोंकी क्रमसे समिधाहें २ प्रत्येक ग्रहोंकी पाठ पाठ सौ वा अट्ठाईस अट्ठाईस समिधा मधु घी दही भौर दूधसे भिगोकर हवनकरना ३ मीठाभात, खीर हविष्य (तीनीकाभात) साठी का भात और दूध दही, भात घी,भात खंडभात, मांसभात और विचित्रवर्णके भात.४ ये भोजन सूर्य आदि ग्रहों के लिये कमसे ब्राह्मणको देना था अपनी शक्तिके अनुसार जो मिलजाय वही ब्राह्मणों को विधिपूर्वक सत्कारकरके देना ५ धेनु, शंस, ब- लीवर्द, सुवर्ण (पीत ) वस्त्र, पांडुर, घोड़ा, कालीगो, छूरीआदि लोहेकी (चीज़ )ओर बकरा ये सूर्य्य आदि ग्रहों के क्रम से दक्षिणा, ६ ॥
यामवल्लयस्मृति सः। यश्चयस्ययदातुष्टःसतंयत्नेनपूजयेत् ॥ ब्रह्मणैपांवरोद तःपूजितापूजयिष्यथ ७ ग्रहाधीनांनरेन्द्राणामुच्छायाःपत नानिच ॥ भावाभाचोचजगतस्तस्मात्पूज्यतमाग्रहाः ८ म होत्साहःस्थूललक्ष्यःकृतज्ञोटरसेवकः ॥ विनीतःसत्यसम्प नःकुलीनःसत्यवाक्शुचिः ९ अदीर्घसूत्रःस्मृतिमानक्षुद्रो परुपस्तथा ॥धार्मिकोव्यसनश्चैवप्राज्ञःशरोरहस्यवित१० स्वरन्ध्रगोप्तान्वीक्षिक्यांदण्डनीत्यांतथैवच ॥ विनीनस्त्वयं वार्तायांत्रय्यांचैवनराधिपः ११ समंत्रिणःप्रकुर्वीतप्राज्ञा न्मौलानस्थिरान्शुचीन् ॥ तैःसाईचिन्तयेद्राज्यविप्रेणाथ ततस्स्वयम् १२॥ जिसको जो ग्रह जब प्रतिकूलहो तो वह उस ग्रहकी पूजाकरे ब्रह्माने इन्हे वरदियाहै कि जो इनको पूजेगा उन्हें येभी तुष्टकरें- गे ७ राजाओंकी बढ़ती और घटती ग्रहों के भाधीनहे औरजगत् की उत्पत्ति और विनाशभी इन्ही के आधीनहे इसलिये इनकी पूजा भलीभांति करनीचाहिये ८ इति शान्तिप्रकरणम् ॥ महाउ- त्साही, स्थूललक्ष्य (अत्यन्तदाता)कृतज्ञ (उपकारमाननेवाला) वृद्धसेवी, विनययुक्त, सदा एकरस कुलीन, सत्यवादी, पवित्र है अदीर्घसूत्री (झटपटकामकरनेवाला) स्मृतिमान (जिसे बात नभूले)भक्षुद्रकड़ीवातन कहेधार्मिक,अव्यसनी,पण्डित,शूर,रहस्य जाननेवाला १० राज्यप्रवन्धकी शिथिलताका रक्षणकरनेवाला मात्मविद्या और राजनीतिमें निपुण, लाभकेउपाय और तीनों वेद में प्रवीण ऐसा राजाको होनाचाहिये ११ वह राजा अपने मंत्री ऐसेकरे जो पण्डित, कुलीन, धीर और पवित्रहों उनकेसाथ अथवा ब्राह्मणके साथ राजकाज देखे अनन्तर एकान्त में बैठे अपनेमाप धियारे १२॥
४९ याज्ञवल्क्यस्मृति सः। पुरोहितंप्रकुर्वीतदैवज्ञमुदितोदितं ॥ दण्डनीत्यांचकुश लमथर्वागिरसेतथा १३ श्रौतस्मातक्रियाहेतोश्णुयादेवच स्विजः । यज्ञाश्चैवप्रकुर्वीतविधिवद्भरिदक्षिणान् १४ भो गांश्चदत्वाविप्रेभ्योवसूनिविविधानिच ।। अक्षयोयंनिधीरा ज्ञायद्विप्रेषूपपादितम् १५ अस्कन्नमव्यर्थचैवप्रायश्चित्तैर दूपितम् ॥ अग्नेःसकाशाद्विप्राग्नौहतंश्रेष्टमिहोच्यते १६ अलब्धमीहेदर्मेणलब्धंयलेनपालयेत् ॥ पालितंवईये नीत्यावृद्धम्पापुनिःक्षिपेत् १७ दत्वाभूमिनिबन्धंवाक त्वालेख्यंतुकारयेत् ॥ आगामिभद्रनृपतिपरिज्ञानायपा थिवः १८॥ ज्योतिषशास्त्र जाननेवाला, सबशास्त्रों से समृद अर्थशास्त्रों में कुशल और शान्तिआदि कर्म अथर्वागिरसमें जो निपुणहो उस को राजा अपनापुरोहितवनाचे १३ श्रोत (अग्निहोत्रमादि) और स्मार्त (औरपासनआदि) क्रियाकरनेकेनिमित्त ऋत्विजोंका वर्ण करे और विधिपूर्वक राजसूयमादि यज्ञ बहुत बहुत दक्षिणादेकर करे १४ ब्राह्मणोंको मुखभोग और धनदेवे क्योंकि जो ब्राह्मणको राजादेता वह उसका अक्षयनिधि (धनकी खानि है १५ अग्नि में हवन कुछकरने (यज्ञकरने) की अपेक्षा ब्राह्मणरूपी भग्निमें हवन (दान) करना श्रेष्ठहै क्योंकि ब्राह्मणको दानदेनेमें किसीविधि की भूलजानेकी शंकानहींरहती पशुधात नहींहोता भौर प्रायश्चित्तका आयास नहीं करना पड़ताहै १६ जो धन नहीं मिलाहै उसकोधर्म से पानेकाउपायकरे जो मिलचकाहे उसेयत्नसे सुरक्षितकरे रक्षित धनको नीति से चढ़ाना और जवबड़े तो सत्पात्रों को दानकरे १७ राजा भूमिदान वा निवन्ध (रोजीना करतो लिखदेवे जिससे पीछे होनेवाले धर्मी राजा मालमकरे (कि इतनी भूमि वा वस्तु अमुक को दीगई १८॥
५० 4 याज्ञवल्क्यस्मृति स०। पटेवाताधपट्टेवास्वमुद्रोपरिचिह्नितम् ॥ अभिलेख्या स्मनोवंश्यानात्मानंचमहीपतिः १९ प्रतिग्रहपरीमाणंदान च्छेदोपवर्णनम् ॥ स्वहस्तकालसम्पन्नंशासनंकारयेतास्थि रः २० रम्यंपशव्यमाजीव्यंजांगलदेशमावसेत् ॥ तत्रदु गाणिकुव्वातजनकोशात्मगुप्तये २१ तत्रतत्रचनिष्णाता नध्यक्षान्कुशलान्शुचीन् ॥ प्रकुर्यादायकान्तव्ययक मसुचोचतात् २२ नातःपरतरोधम्र्मोन्पाणांयहणार्जि' तम् ॥ विप्रेभ्योदीयतेद्रव्यंप्रजाभ्यश्चाभयंसदा २३ येआ हवेपुवध्यन्तेभूम्यर्थमपराङ्मुखाः ॥ अकुटैरायुधैर्यान्तिते स्वर्गयोगिनोयथा २४॥ (लिखने की विधि यह है कि) दृढ़वस्त्र अथवा ताम्रपात्रं पर राजा ऊपर अपनी मुद्रा (मोहर) करके नीचे अपने पुरुपोंकानाम अपनानाम १६ दानकी चीजका परिमाण और स्थावरहो तो उस की सीमाभी, लिखवाकर अपना दस्तखतकरे और मितीभी डाल दे कि जिस में वह पत्र दूसरोंको दृढ़ निश्चयकारक होजाचे २० जन, कोश, (सजाना) और शरीरकी रक्षा के लिये राजा ऐसे स्थल से दुर्ग (किला) वनावे कि जो रमणीय हो, पशुओं को चढ़ानेवाला (स्कन्द मूलमादिसे मनुष्यों के जीवनमें सहायतादेवे और जंगल (बन) प्रायहो २१ धर्म और अर्थमादि कामोंमें उन उन कामोंके योग्य, जो दूसरा काम न करे, अपने कामों में चतुर हों शुचि रहनेवाले, भाप (सोने की खानि आदि) और व्यय (दोनदेना) कर्ममेंउद्यत (मुस्तेद) ऐसेअधिकारी बनानेचाहिये२२ इससे बढ़कर कोई धर्मराजाकानहीं कि युद्धसे अर्जितधन ब्राह्म- णद औरअपनीमजाको सदाअभयरक्से २३भूमिके अर्थ जो युद्ध में सन्मुखलड़ते और अकूट (विपमादिजिसमें न लगाहो ऐसे) शवोंसे मारेजाते वे योगियों के सदृश स्वर्गको प्राप्तहोते, २४ ॥ 4.
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ पदानिक्रतुतुल्यानिमग्नेष्वविनिवर्तिनाम् ॥ राजासुकृत मादत्तेहतानांविपलायिनाम् २५ तवाहंवादिनंछीवनिति परसंग तम् ॥ नहन्याद्विनिरत्तंचयुद्धप्रेक्षणकादिकम् २६ कृतरक्षःसमुत्थायपश्येदायव्ययौस्वयम् ॥ व्यवहारांस्ततो दृष्ट्वास्नात्वा जीतकामतः २७हिरण्यव्याप्टतानीतंभाण्डा गारेपुनिःक्षिपेत् ॥ पश्येचारांस्ततोदतान्प्रेपयेन्मंत्रिसंगतः २८ ततःस्वैरविहारीस्यान्मंत्रिभिर्वासमागतः ॥ बलानां दर्शनंकृत्वासेनान्यासहचिन्तयेत् २९ संध्यामुपास्यशृणु याचाराणांगूढ़भाषितम् ॥गीतनृत्यैश्च जीतपठेत्स्वाध्याय मेवच ३०॥ अपना दल सब नष्टहोगयाहो उससमय जो शत्रु के सामने युद्धकरनेको जितनेपांवचले उतनेहीअश्वमेधयज्ञकाफल वहपाता है और जो भागतेहैं उनका सव सुरूत राजाकोप्रासहोता है २५ जो ऐसाकहे कि हम तुम्हारे हैं नपुंसकहो, निरायुधहो दूसरे के साथ लड़ताहै युद्धसे निवृत्त प्राताहो और जो युद्ध देखनेायाहो' इन्हें मारना न चाहिये २६ देश और अपनीरक्षाकरके प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर आय व्यय (आमदनी,खर्च ) अपनेआप देखे अनन्तर व्यवहार देखे फिर स्नानकरके यथारुचि भोजनकरे २७ तब हिरण्य भादि वस्तु के लेआने में जो नियुक्तहें वे जो लेआर्वे उसको राजा आप देखके भण्डार में रखवादे फिर गुप्त दूतों की वात आपही सुन उनको देख और प्रकटदूतों को मन्त्र के साथ देख उनकी बातें सुन उन्हें फिर भेजे २८ तव तीसरेपहर एकान्त में वा मन्त्रियों के साथ यथेष्ट विहारकरके अपनी सेना (घोड़े हाथी मादि) देखे और सेनापति के साथ सेनाके सुसकी चिंता करे २६ सन्ध्योपासनकरके चारोंका गुप्तभापण सुने और नृत्य गीत सुनकर भोजनकरे फिर अपना पाठ पढ़े ३०॥ गुप्ततारा .
पावल्क्यस्मृति सः। संविशेतूर्यघोपेणप्रतिवुद्धयेत्तथैवच ॥ शास्त्राणिचिंतये हुधवासर्वकर्त्तव्यतास्तथा ३१ प्रेपयेञ्चततश्चारान्वेप्वनेपु चसादरान्॥ऋत्विक्पुरोहिताचाय्राशीभिरभिनंदितः३२ दृष्टाज्योतिर्विदोवैद्यान्दद्याद्गांकांचनंमहीम् ।। नैवैशिकानि चततःोनियेभ्योगृहाणिच ३३ ब्राह्मणेपुक्षमीस्निग्धेप्ट जिह्मःक्रोधनोरिपुः ॥ स्याद्राजाभृत्यवगर्गेपुप्रजासुचयथापि ता ३४ पुण्यात्वनागमादत्तेन्यायनपरिपालयन् ॥ सर्वदा नाधिकयस्मात्प्रजानांपरिपालनम् ३५ चाटतस्करदुर्दत्त महासाहसिकादिभिः पीड्यमानाप्रजारक्षेत्कायस्थैश्चविशे पतः ३६ रक्षमाणानकुर्वतियत्किंचित्किल्विपंप्रजातस्मा त्तुनृपतेरयस्माद्गृणात्यसौकरान् ३७॥ तब वाजेगाजेसे सोवे और उसीप्रकार जागे और अपनीबुद्धि से शास्त्र जो कुछ कार्य कर्तव्यहों उनका चितवनकरे ३१ तव अपने और दूसरे राज्यमें गुप्तदूतोंको भादरपूर्वक भेजे विज् पुरोहितऔर आचार्यकेआशीर्वादसे मानन्दपाकर ३२ ज्योतिषी मौर वैद्य इनमें अपने देहकाहालमालूमकरे फिर गौ,सोना,भूमि विवाहके उपयोगीधन, और गृह इनकादान वेदपाठी ब्राह्मणको दे३३ ब्राह्मणों के विषयमें राजा क्षमाशीलहो मित्रोंसेसीधा,शत्रु- भोंमें क्रुद्ध और अपनेभृत्यों प्रजाओंके विषयमें पिताके समानहो ३४ प्रजाका परिपालन सवप्रकार के दानों से अधिकहे इसलिये धर्मशास्त्रकी विधिसे प्रजापालनकरे तो उसकीपुण्यका छठाभाग राजापाताहै ३५ छली,चोर,जालिया,डाकू इनसे और विशेपकरके कायस्थ भादि राजकाजकरनेवालोंसे पीड़ितप्रजाकी रक्षाकरे३६ रक्षा न करनेसे जोकछपाप प्रजाकरतीहै उसमेंका आधाराजाको जाताहै क्योंकि वह रक्षाही के लिये प्रजासे करलेताहे ३७॥
। पाशवल्लयस्मृति स०। येराष्ट्राधिकृतास्तेपांचारैत्विाविचोष्टितम् ॥ साधन्स मानयद्राजाविपरीतांश्चघातयेत् ३८ उत्कोचजीविनोद्रव्य हीनान्कृत्वाविवाशयेत् ॥ सदानमानसत्कारान्श्रोत्रिया न्वासयेत्सदा ३९ अन्यायेनन्पोराष्ट्रात्स्वकोशंयोभिवई पेत् ॥ सोचिराद्विगतःश्रीकोनाशमेतिसवान्धवः ४० प्रजा पीडनसन्तापात्समुद्भूतोहुताशनः ॥ राज्ञःकुलंश्रियंप्राणां श्चादग्धाननिवर्तते४१यएवनृपतेईमःस्वराष्ट्रपरिपालने ॥ तमेवकृत्स्नमाप्नोतिपरराष्ट्रंवशन्नयन्४२ यस्मिन्देशेयआचा रोव्यवहार कुलस्थितिः ॥ तथैवपरिपाल्योसीयदावशमु पागतः ४३ मंत्रमूलंयतोराज्यंतस्मान्मन्त्रंसुरक्षितम् ॥ कुर्याद्यथास्यनविदुःकर्मणामाफलोदयात् ४४ ॥ राजकाजमें जो नियुक्तहें उनका आचरण गुप्त दूतोंसे मालूम करके भलों का राजा सन्मानकरे और दुष्टोंको दण्ड दे ३८ जो उस्कोच (घूस) लेते उनका सवधन छीनकर राज्यसे निकालदें और दानमान सत्कार करके श्रोत्रियों (वेदपाठियों) को अपनी राज्यमें वसावे ३६ जो राजा अपने राज्यसे अन्याय करके धन . बटोरताहै वह थोड़ेही कालमें अपने बन्धुओं समेत निर्धन होके नष्ट होजाताहै४०प्रजाकी पीड़ाके संतापसे उत्पन्नहुई भाग राजा का धन, शोभा, कुल और प्राण जलाये विनाठंढी नहींहोती४१ जो धर्म अपनी राज्यके प्रतिपालनमें है वही धर्म दूसरेका राज- न्यायमें अपने वशकरनेमें राजा पाताहे १२ और जो देश अपने वशमें भाजावे तो उसदेशमें जैसा लाचार व्यवहार और कुलकी मर्यादाहो उसको उसी रीतिसे पालनकरे ४३ राजाका मूल मंत्र (सलाह) है इसलिये मंत्र को ऐसा गुप्तरक्खे कि जबतक उस- का फल त देखपड़े तबतक कोई उसके काम को न जाने ४४ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। अरिमित्रमुदासीनोनन्तरस्तत्परःपरः ॥ क्रमशोमण्डलं चिन्त्यसामादिभिरुपक्रमः ४५ उपायासामदानंचभेदोद ण्डस्तथैवच ॥ सम्यक्प्रयुक्ताःसिधेयदेण्डरत्वगतिकाग तिः ४६ सन्धिचविग्रहंचैवयानमासनसंश्रयौ ॥ द्वैधीभावं गुणानेतान्यथावत्परिकल्पयेत् ४७ यदासस्यगुणोपेतंप रराष्ट्रंतदाव्रजेत् ॥ परश्चहीनआत्माचहष्टवाहुनपूरुप ४८ दैवेपुरुषकारेचकर्मसिदिर्व्यवस्थिता ॥ तत्रदेवमभिव्यक्त पौरुषंपौर्वदेहिकम् ४९ केचिदैवात्स्वभावाहाकालात्पुरुप कारतः॥ संयोगेकेचिदिच्छन्तिफलंकुशलवुद्धयः ५० ।। जिसका राज्य अपने राज्यकी सीमासे मिलाहो वह और उ. ससे पर तथा उससेपरे जो हैं वे क्रमसे शत्रु मित्र और उदासीन होतेहैं यह स्वभावहै, इनका अभीष्ट समझके सामादि उपाय करतारहे४५साम(प्रियभापणदान(धनदेना)मेद (विगाड़करना) और दण्ड ये चारउपायहें और विचारपूर्वक इन्हें करे तो सिद्ध होतेहैं परन्तु दण्ड तबकरना जवदूसरा कोई उपाय न लगसके ४६ संधि(मेल)विग्रह(विगाड़) यान (चढ़ाई करनी) आसन (उपेक्षा) • संश्रयं (वलिष्टका आश्रयलेना) और वैधीभाव (सेना विभाग) ये छः राजाके गुणहें जयजैसा देखना तव तैसा करना४७ जव दूसरे को राज्य धान्य और जल ईधन आदि वस्तुसे सम्पन्नहो औरश- त्रु अपनेसे हीनहो भोर अपनी सेनाके लोग ओर वाहन हर्पयुत देखपढ़ें तो उसपर चढ़ाई करनी ४८ भाग्य और पुरुषार्थ दोनों से कार्यकी सिद्धि होतीहै केवल भाग्यहीसे नहींहोती क्योंकि यह सवको विदितहै कि पूर्वजन्ममें जो पुरुपार्थ कियाहो वही भाग्य कहलाताहै ४६ कोई कहते कि देवसे कोई स्वभावसे और कोई पुरुषार्थ से फलकी सिदि कहतेहैं परन्तु बुद्धिमान् लोगों का यह मत है कि जब ये सव अनुकूलहों तो कार्य सिद्ध होता है ५० ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ यथा केनचक्रेणरथस्यनगतिर्भवेत् ॥ एवंपुरुपकारेण विनादेवंनसिध्यति १ हिरण्यभूमिलाभेभ्योमित्रलब्धिर्व रायतः॥ अतोयतेततत्प्राप्त्यैरक्षेत्सत्यसमाहितः ५२ स्वा म्यमात्याजनोदुर्गिकोशोदण्डस्तथैवच ॥मित्राण्येताःप्रकत योराज्यंसप्तांगमुच्यते ५३ तदवाप्यन्पोदण्डंदुईत्तेषुनिपा तयेत्॥ धमहिदण्डरूपेणब्रह्मणानिर्मितःपुरा ५४ सने तुम्यायतोशक्योलुब्धेनाकृतदिना ॥ सत्यसन्धेनशुचिना सुसहायेनधीमता ५५ यथाशास्त्रम्प्रयुक्तःसन्सदेवासुरमा नवम् । जगदानंदयेत्सर्वमन्यथातप्रकोपयेत्५६अधर्म- दण्डनंस्वर्गकीर्तिलोकांश्चनाशयेत् । सम्यक्तुदण्डनंराज्ञः स्वर्गकीर्तिजयावहम् ५७॥ जैसे एकचक्रसे रथ नहीं चलसक्ता इसीप्रकार पुरुषार्थ विना दैव सिद्ध नहीं होता, ५१ हिरण्य और भमि के लाभसे मित्रका लाभ उत्तमहै इसलिये मित्र मिलनेकायन करना और सावधानी से अपनी सचावट वचाये रहना ५२ स्वामी (उत्साह आदि गुण युक्त राजा) अमात्य (मंत्री) जन (प्रजा)दुर्ग (किला) कोश(खजा- ना)दण्ड (चतुरंगसेना) और मित्र ये सात राज्यके मूल कारणहैं इसलिये राज्य सप्तांग कहलाताहै ५३ ऐसी राज्य पाकर राजादु- टोंको दण्डदे क्योंकि पूर्वकालमें ब्रह्माने दण्डरूपसे धर्मकोयना- 'या ५४ जो लोभी और चंचल बुद्धिहोताहै वह न्यायसे दण्ड नहीं चलासक्ता किन्तु जो सञ्चा, पवित्र (जितेन्द्रिय) अच्छे सहायकोंसे युक्त और बुद्धिमान होताहै वह न्यायसे चलताहे ५५ शास्त्रकीवि धिसे जो दण्डका प्रयोगकरे तो देवता असुर और मनुष्य सहित सब जगतूको आनन्द होताहै इससे अन्यथाकरे तो सव कोपकर तेहै ५६ अधर्म दण्डदेनेसे राजाका स्वर्ग कीर्ति और लोक नष्ट होताहै परन्तु विधिसे दण्डदे तोउसको स्वर्ग कीर्ति और जयकी प्रीप्ति होती हे ५७॥ -- ५६ याज्ञवल्क्यस्मृति स०। अंपिघातासुतो?वाश्वाशुरोमातुलोपिवा ॥ नादण्यो नामराज्ञोस्तिधर्मादिचलतःस्वकात् ५८ योदण्डान्दण्डये द्राजासम्यग्वध्यांश्चधातयेत् ॥इष्टस्यात्क्रतुभिस्तेनसमाप्त वरदक्षिणैः ५९ इतिसंचिन्त्यनृपतिःकतुतुल्यफलंटथक् । व्यवहारान्स्वयंपश्यत्सभ्यैःपरिटतोन्वहम् ६० कुलानि जातीःश्रेणीश्चगणान्जानपदानपि ॥ स्वधर्माच्चलितान्। जाविनीयस्थापयेत्पथि ६१ जालसूर्यमरीचिस्थंत्रसरेणूंर जःस्मृतम् ॥ तेऽष्ठौलिक्षातुतास्त्रिनाराजसपिउच्यते ६२ गौरस्तुतेत्रयःपट्तेयवोमध्यस्तुतेत्रयः॥ कृष्णालःपंचतेमाष स्तेसुवर्णस्तुषोडश ६३॥ भाई,बेटा,भर्घ्य,प्राचार्य आदिश्वशुरऔर मामा येभी अपने धर्मसे च्युतहों तो राजाको दण्डदेना उचितहेऔर दूसरोंकीक्या चर्चा क्योंकिधर्महीन ऐसाकोईनहीं जिसराजा दण्ड नदेसके५८ जोराजा दण्डयोग्य मनुप्योंको दण्ड देता और वधके योग्योंको मारतावह बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंकाफल पाताहै ५६ इसप्रकार से ऋतुके तुल्य फल समझके राजा पृथक् पृथक् (वर्णादिकेक्रम से प्रतिदिन सभासदोंके साथव्यवहार देखे ६० कुल (ब्रह्माणा- दिके) जाति (मूर्दावसिक्तमादि) श्रेणी (तंबोलीमादि)गण(हेतुक भादि) और जानपद (कारुक आदि जो अपने धर्मसे चलितहों तो राजा इन्हेंयथोचित दण्डदेके फिर निज धर्मसेस्थापनकरे ६१ जालियोंसे सूर्य के प्रकाश पड़नेमें जो उड़ते धूलिकण देसपड़तेहें उनका नाम त्रसरेणुहै पाठत्रसरेणु की एकलिक्षा तीनलिक्षाका एकराज सर्पप ६२ वे तीनमिलके एकगौरसर्पप,येछः मिलके एक मध्यमयव, तीनयवका एकरुपणाल, पांच कृष्णालका एक माप सोलह मापका एकसुवर्ण ६३॥ *शिल्पी स्वातीप्रमृत्य : . याज्ञवल्क्यस्मृति सका पलंसुवर्णाश्चत्वारःपंचवापिप्रकीर्तितम् ॥ द्वेकृष्णलेरू प्यमापोधरणंपोडशैवते ६४ शतमानंतुदशभिर्धरणैःपलमे वतु॥ निष्कंसुवर्णाश्चत्वारःकार्पिकस्तामिकःपणः६५ सा शीतिःपणसाहस्रोदण्ड उत्तमसाहसः॥ तदमध्यमःप्रोक्त स्तदर्दमधमःस्मृतः६६ धिग्दण्डस्त्वथवाग्दण्डोधनदण्डो वधस्तथा।योज्याव्यस्ता समस्तावाह्यपराधवशादिमे ६७ झात्वापराधंदेशंचकालंबलमथापिवा ॥ वयःकर्मचवित्तंच दण्डंदण्ड्यषुपातयेत् ३६८॥ इतियाज्ञवल्कीयधर्मशालोआचारोनामप्रथमोऽध्यायः १ ॥ और चार या पांच सुवर्णका एकपल होताहै (रुपयेकीतोल) पूर्वोक्त दो कृष्णलका एक रुप्यमाप, तीनसैइकसठ रुप्यमाप का एक धुरैण६४टश धरणका एक शतमाप अथवा पलहोताहै और पूर्वोक्त चार सुवर्णका एक एक राजत निष्क होता है (तांबे की तोल , एककर्ष (पलका चौथाभाग) भर तांवेको पणकहते ८५ एकहजार अस्सीपण उत्तम साहसमें दण्ड दियाजाता है उसका प्राधा मध्यम और उसका भी प्राधा अधम कहलाताहै ६६ धि- ग्दण्ड, वाग्दण्ड, धनदण्ड और वधदण्ड ये चार प्रकारके दण्ड है अपराध जिसका जैसाहो उसे विचारके इन दण्डों में से जितने दण्डके योग्यहों उतना दण्डदेना ६७ अपराध, देश, काल, वल, अवस्था, कर्म और वित्त (धन) देखके अपराधियोंको दण्डदेना चाहिये ३६८॥ इतिश्रीयाज्ञवल्क्यस्मृतिटीकायांपञ्चनदमहाविद्यालयीय प्राच्यविद्यापाठशालायाम्मरव्यसंस्कृताध्यापकेनप- ण्डितगुरुप्रसादशर्मणाहिन्दीभाषायांविरचिता याम्मिताक्षरानुयायिन्यामाचाराध्यायःप्रथ मस्सम्पूर्णतामगात् १ शुभम्भयात् ॥
५८ थाशवल्लयस्मृति सा व्यवहारान्नृपःपश्येद्विवद्भिाह्मणैस्सह ॥धर्मशास्त्रा नुसारेणक्रोधलोभविवर्जितः १ श्रुताध्ययनसम्पन्नाधर्म ज्ञाःसत्यवादिनः ॥ राज्ञासभासदःका-रिपौमित्रेचयेस माः २ अपश्यताकार्यवशाध्यवहारान्नृपेणतु ॥ सभ्य:स हनियोक्तव्योब्राह्मणःसर्वधर्मवित् ३ रागालोमाद्याहा पिस्मृत्युपतादिकारिणः ॥ सभ्याःप्टथक्टथक्दण्ड्याविवा दाद्विगुणंदमम् ४ स्मृत्याचारव्यपेतेनमार्गेणाधर्पितःप रैः॥ आवेदयतिचेद्रा व्यवहारपदंहितत् ५प्रत्यत्थिनोग्र तोलेख्यंयथावेदितमर्थिना ॥ समामासतदाह मजा त्यादिचिह्नितम् ६ श्रुतार्थस्योत्तरंलेख्यंपूर्वावेदकसन्नि धौ ॥ ततो लेख्ययेत्सद्यःप्रतिज्ञातार्थसाधनम् ७॥ विद्वान् ब्राह्मणों के साथ क्रोध और लोभ छोड़कर धर्मशास्त्रके अनुसार व्यवहारोंको राजादेवे १ वेद और मीमांसा आदिशास्त्र पढ़ेहों धर्म जाने सचवोलें और जो शत्रु और मित्र को वरावर मानें ऐसे सभासद राजाको करनेचाहिये किसी कार्य वशहो- कर राजाआप व्यवहार न देखसके तो सभासदों के सहित सव धर्म जाननेवाले ब्राह्मणको नियतकरदे ३ किसीकी प्रीतिसे वा लोभ और भयसे यदि सभ्यलोग धर्मशास्त्रसे विरुद काम करें तो जितनेका वह व्यवहारहो उससे दूनादण्ड हरएक सभासदों से राजालेवे ४ धर्मशास्त्र और सदाचारके विरुद्ध रीतिसे दूसरे में पीड़ित होकर यदि राजाको निवेदनकरे तो वही व्यवहारपद कहलाताहै ५ जो अर्थी (मुद्दई) ने निवेदन कियाहो सो प्रत्यर्थी, (मुद्दालेह) के समक्ष वर्ष, महीना, पाख, दिन,नाम औरजाति आदिसे चिह्नित करके लिखना ६ प्रत्यर्थी ने जो वात सुनी हो उसका उत्तर वह अर्थीके सामने लिखावे तव अपने निवेदनके सिद्धिकरनेवाली जो बातेंहों उन्हें अर्थी झटपट लिसाते ७ ॥
- याज्ञवल्क्यस्माते म०1 तत्सिोसिद्धमाप्नोतिविपरीतमतोन्यथा ॥ चतुष्पाद्वय वहारोयविवादेपुप्रदर्शितः ८ अभियोगमनिस्तीर्यनैनम्न त्यभियोजयेत् ॥ अभियुक्तंचनान्येननोक्तविप्रकर्तिनयेत् ९ कुर्यात्प्रत्यभियोगंचकलहेसाहसेषुच ॥ उभयोःप्रत्तिभूर्या ह्यःसमर्थःकार्यनिर्णये १० निन्हवेभावितोदद्यादनंराज्ञेच तत्समम् ॥ मिथ्याभियोगीद्विगुणमभियोगाधनंवत् ११ साहसस्तेयपारुष्यगोभिशापात्ययेस्त्रियाम् ॥ विवादयेत्स द्यएवकालोन्यत्रेच्छपास्मृतः १२०॥ निवेदन का प्रमाण सिद्धिहो तो जीतताहै अन्यथा हारजाता है विवाद मे ऐसा (भापा, उत्तर, क्रिया और साध्यसिद्धियह ) चतुष्पाद व्यवहार होता है सो तुम्हें दिखला दिया = अपनेऊपर जो किसीने अभियोग किया (सवालदिया) हो तो उसकाउत्तर (जवाव) दियेविना उससवाल देनेवाले पर अभियोग न करे जिसपर किसी औरने अभियोगकियाहो उसपर भी न करे और जो बातें एकवार कहचकाहो तो उन्हेंवदलेभीनहीं है कलह और साहस मे अभियोग करनेवालेपरभी प्रत्यभियोगकरे निर्णयकार्य में जो समर्थहो ऐसाप्रतिभू (जामिन) दोनों (अर्थी और प्रव्यर्थी का) लेनाचाहिये १० किसीवातका निह्न व(नाकबूल) कियेहो और वह उसपर भाबित (सावित) होजाय तो राजा उससे वह चीज़ बादी को दिलादे और उसी के तुल्य दण्ड (जरीमाना) आपले और किसी ने झूठा अभियोग कियाहों तो जितनेका अ- भियोग हो उससे दूनादण्ड राजा उससेलेवे ११ साहस,(मनुष्य मारणादि) चोरी पारुष्य (गालीदेनावामारना) गौका भाभ- शाप (महापातकदोष) अत्यय (प्राणोरधननाशमादि) और स्त्रीहरणमे तुरन्त विवादका निर्णयकरे इनसे अन्यत्र जितनेकाल में अर्थी प्रत्यर्थीमादि चाहें तभी निर्णयकरना १२ ॥
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याज्ञवलयस्मृति सः।
आधिसमिापानक्षेपजडबालधनैर्विना ॥ तथोपनिधिरा
जस्त्रीश्रोत्रियाणांधनैरपि२५आध्यादीनांविहारंधनिनेदा
पयेखनम् ॥ दण्डंचतत्समंराज्ञेशक्त्यपक्षयथापिवा २६आग
माभ्याधिकोभोगाद्विनापूर्वक्रमागतात् ॥आगमेपिवलनैवभु
क्तिस्तोकापियत्रनो२७आगमस्तुकृतोयेनसोभियुक्तस्तमुद्ध
रेत्॥ नतत्सुतस्तत्सुतोवाभुक्तिस्तत्रगरीयसी २८योभियुक्तः
परेतस्स्यात्तस्यरिक्थीतमुहरेत् ॥ नतत्रकारणंभुक्तिरागमेन
विनाकृता २९ आगमेनविशुद्धनभोगोयातिप्रमाणताम्॥
अविशुदागमोभोगःप्रामाण्यनैवगच्छति ३० ॥
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पाधि(बंधक)सीमा,उपनिक्षेप(रखनेको जोवस्तु गिनकेदीगई)
जड़काधन, बालधन,उपनिधि(रखोहर)राजधन,स्त्रीधन,ौर श्रोत्रि
यधन येदश व वीसवर्प दुसरेके भोगमें भी अपने स्वामीके स्वत्व
से दूर नहीं होते २५ जो कोई आधिसीमा आदिका हरणकरेतो
उससे राजाधनीको धनदिलावे और आप उतनाही दण्डलेवे व
जेसी शक्तिदेखे तैसादण्डले २६ तीन पुरुपतक परावर भोग न
करतेआयेहों तो उस भोगसे पागम (लेख)बलीहोताहे परन्तुमा-
गमहो मोर भोगथोड़ा भी नहो तो उसमागममें कुछवलनहीं २७
जिसने आगम करवाया (कोईचीज़लिखवाली है उसपर भाभियो-
ग (सवालदीगई)हो तो वह भागम दिसलावे परन्तु उसके पुत्र
पौत्र आदि न दिखलायें उनका भोगही बलवान् गिनाजाता
है २८ आगमकरनेवालेपर भाभियोगहुनाहो और वह सरजावे
तो उसके दायाद भागम सिद्धकरें स्थल में ऐसे आगम के
विना उनका भोग नहीं देखाजाता २६ (पागम विशुदहो तो
भोगप्रामाणिकहोता है आगम शुद्धनहो तो भोगप्रमाण नहीं
समझाजाता ३० ॥
- याज्ञवल्क्यस्मृति स.) नृपेणाधिकृताःपूगाःश्रेणयोथकुलानिच ॥ पूर्वपूर्वगुरु ज्ञेयंव्यवहारविधौनृणाम् ३१ बलोपाधिविनिर्वृत्तान्व्यव हारान्निवर्तयेत्ास्त्रीनक्तमन्तरागारवाहि शत्रुकृतांस्तथा ३२ पत्तोन्मत्तार्तव्यसनिबालभीतादियोजितः ॥ असम्बदकृत इचैवव्यवहारोनसियति ३३ प्रणष्टाधिगतंदेयंपेणधनि नेधनम् ॥ विभावयेनचेल्लिंगैस्तत्समंदण्डमर्हति ३४ रा जालब्ध्वानिधिंदद्याद्विजेभ्योईदिनःपुनः ॥ विद्वानशेप मादद्यात्ससर्वस्यप्रभुर्यतः ३५॥ राजाने जिसको नियुक्त कियाहो,पग (जनसमूह)श्रेणी एकही पापारसे जीतनेवालोंका समूह)और कुल (जाति,सम्बन्धि आदि का समूह)इनमें जोपहिलेपहिले लिखे, वे व्यवहार निर्णयकरने में पिछलसे श्रेष्ठ हैं (अर्थात पिछलने व्यवहार निर्णयकिया भी हो और वादी प्रतिवादीका सन्तोप न भयाहो तो पहिलेवालोंके निकट फिर निर्णय करालेवें)३१वलात्कार और भयसे जो व्य- वहार सिद्धभयेहैं और जो स्त्रीसे,रातको,घरके भीतर,याम आदि से वाहर, और शत्रुसे किये गये हों उन व्यवहारों को भी निवृत्त करें (फिरसे देखें) ३२ मत्त (मदिरा आदिसे) उन्मत्त (बौड़हा) आर्त (व्याधि आदिसे पीड़ित )व्यसनी (अनिष्टहोनेसे दुःखी) बालक और भयाक्रान्त आदिसे तो व्यवहार किया हो तथा जो सम्बन्धीनहो उसने जो व्यवहार कियाहो सो सिद्धनहीं होता३३ किसी की चीज़ प्रणष्ट (खोगई ) हो और राजाके पास (याम- पाल आदि) ले तो राजा उसे उसके स्वामीको दे जो ठीक ठीक चिन्हाटी न बतावे तो राजा उतनाहीं उससे दण्डलेवे ३४ राजानिधि (भमिगतभन)पावे तो श्राधा ब्राह्मणोंकोदे यदि वा- ह्मणपावे और वह विद्वानहो तो सवकासव लेलेवे क्योंकि वह सब का प्रभु है,३५॥
यासयत्क्यस्मृति सः। देशाद्देशान्तरंयातिसूक्तिणीपरिलेढिच ॥ ललाटस्विद्यते चास्यमुखंवैवर्ण्यमेवच १३ परिशुष्यस्खलद्वाक्योविरुद्ध बहुभापते ॥ वाक्चक्षःपूजयतिनोतथौष्टौनि जत्यपि १४ स्वभावाद्विकृतिगच्छेन्मनोवाकायकर्मभिः ॥ अभियोगेच साक्ष्येवादुष्टःसपरिकीर्तितः १५ सन्दिग्धार्थस्वतंत्रोयःसा धयेद्यश्चनिप्पतेत् ॥ नचाहूतोवदेत्किंचिदीनोदण्ड्यश्चसं स्मृत :१६ साक्षिपभयतःसत्सुसाक्षिणःपूर्ववादिनः॥ पूर्य. पक्षेश्वरीभूतेभवन्त्युत्तरवादिनः १७ सपणश्चेद्विवादास्या तत्रहीनंतुदापयेत् ॥दण्डंचस्वपणंचैवधनिनेधनमेवच१८॥ , जो इधरसे उधरघूमे (एकजगह न थेठसके) गलफड़ों को चाटा करे, जिसके ललाट (माथे ) में पसीना होताहो, मुंह का रंग बदलगयाहो १३ वातकहनेमें मुंहसूखताजावे और हिचकता हो, बहुतवातें अपनीहीवातोंसे विरुद्धकहे, सामने न देखे,वरावर वात न कहे,ओठकाटाकरे ११ मनवाणी और कर्मसे अपनेआप जो औरका और होगयाहो ये सवअभिप्रयोग औरसाक्ष्य(गवाही) में दुष्टगिनेजाते हैं १५ जो अर्थी, प्रत्यर्थी के अंगीकार करने के चिनाही अपनी इच्छाही से धन मांगनेलगे, जो अपनी अंगीळंत (कबूल कियेहुये ) वासाधित (साबूत) भय वस्तुके मांगने पर भागजाय और जो सभा के सामने बुलाये जानेपर कुछ न कहे ये • सव हारजाते और दण्डकभी योग्यहोतेहैं १६ दोनोंमारके साक्षी (गवाह) आयेहों तो जो अपना स्वत्व पहिलेका कहे उसकेसाक्षी लेने जब उसका पक्ष नीचाहो तो दूसरे वादी के साक्षी लेने चा- हिये १७ यदि पण (शर्त) लगा के विवाद करतेहों तो जो हार जाये उस से दण्ड अपना कियाहुआ पण और धनीका धन राजा दिलादेवे १८॥ + *याज्ञवल्क्यस्मृति स... छलंनिरस्यभूतेनव्यवहारान्नयेन्नृपः ॥ भूतमप्यनुपन्य स्तंहीयतेव्यवहारतः १९निनुतलिखितनैकमेकंदशेविभा वितः॥ दाप्यःसनपेणार्थनग्राह्यस्त्वनिवेदितः २० स्म त्योर्विरोधेन्यायस्तुबलवान्व्यवहारतः ॥ अर्थशास्त्रात्तुबलव धर्मशास्त्रमितिस्थितिः२१ प्रमाणंलिखितंभुक्तिःसाक्षिणश्चे तिकीर्तितम् ॥ एपामन्यतमाभावेदिव्यान्यतममुच्यते २२ सर्वेष्वर्थविवादेषुबलवत्युत्तराक्रिया ॥ आधौप्रतिग्रहेकीतेपू त्तुिबलवत्तरा २३ पश्यतोब्रुवतोभूमेहीनिविशतिवार्षिकी। परेणभुज्यमानायाधनस्थदशवार्षिकी २४ ।। छल (प्रमाद से कही वात) को छोड़ तत्त्व (मुख्यवसच) वातों के द्वारा व्यवहार का निर्णयराजाकरें क्योंकि सच भी वातहो पर कही न जावे तो हारजातीहै १६ यदि प्रत्यर्थीने लिखाईहुई सच चीजोंको भिद्दव (नाकबूल) कियाहो और कुछ भी उसपर भर्थी भावित (सबत करे तो राजा उससे सब दिलाये और जो पहिले निवेदनके समयमें अर्थीने नहीं लिखायावह बात न माननी २० जब दोस्मृतियों (धर्मशास्त्र के वचन)का आपस में विरोधदेखप- डेतो घड़ों के व्यवहारकेअनुसार उनदोनोंका विषय अलगकरदेने का न्याय बलीहोता है और नीतिशास्त्रसे धर्मशास्त्र वलीहै ऐसी शास्त्रमर्यादाहै २१ लिखितभुक्तिभौर साक्षीये तीनमनुष्य प्रमाण हजब इनमेंसे कोई न होसकेतो किसी दिव्य (शपथ)काआश्रय करना २२ धनके सब विवादोंमें उत्तराक्रिया (पिछली वात)घल- वान्होती परन्तु माधि(बन्धक)प्रतिग्रह (दानलेना)ौरक्रीत(मो. ललेने में पूर्वाक्रिया बलवतीहोतीहै २३ यदि कोईदुसरा मनुष्य स्वामीके सामने उसकेधन और भूमिका उपभोगकरें पर स्वामी कुछ न बोले तो धनसे उसकास्वत्व १० वर्ष और भूमिसे २० वर्ष में नष्ट होजाताहै २४ ॥
पाशपल्पपस्मृति स.। इतरेणनिधौलब्धेराजापष्ठांशमाहरेत् ॥ अनिवेदितवि ज्ञातोदाप्यस्तंदण्डमेवच ३६ देयंचौरहतंद्रव्यंराजाजानपं दायतु ॥ अददद्धिसमाप्नोतिकिल्बिपंयस्यतस्यतत् ३७ अ शीतिभागोवृद्धिःस्यान्मासिमासिसबन्धके । वर्णक्रमाच्छ तद्वित्रिचतुःपंचकमन्यथा ३८ कान्तारगास्तुदशकसामु द्राविंशकंशतम्॥ दद्यस्विकृतांरद्धिसर्वेसर्वासुजातिपु ३९ सन्ततिस्तुपशुस्त्रीणारसस्याप्टगुणापरा ॥ वस्त्रधान्यहिर ण्यानांचतुस्त्रिाद्वगुणापरा ४० प्रपन्नंसाधयन्नर्थनवाच्यो नृपतेर्भवेत् ॥ साध्यमानोनृपंगच्छन्दण्ड्योदाप्यश्चत द्धनम् ४१ ॥ दूसराकोई निधिपावे तोराजाउसे छठांअंशदेकर शपापलेलेवे निधिपाकर राजाको नजनावे औरराजा किसीप्रकार जानलेवेतो राजा उससे निधि मोर दण्डभीलेवे३६ जिसकीचीज चोरीगईहो उसको राजा(चाहेजिसप्रकारसे)वहचीज़देदेवेजोनदेवे तो उसका सवपाप राजाको लगताहै ३७नंधक रखके अस्सी रुपयेपर एकरु- पयाव्याजलिये विनाबंधकरुपयादे तोवर्ण (ब्राह्मणमादिसे)क्रमसे २,३,४,और५रुपयेसैकड़े व्याजलेवे३८जोणलेके घनमेंसे होकर व्यापारकरनेजावे उससे दशरुपये सेकड़े और समुद्र में जानेवाले से बीसरुपये सैकड़े व्याजले अथवा सबलोग जितना व्याज देना स्वीकारकियेहों उतनादेवे यहसामान्य हरएकजातिकाधर्महे३६ पशुऔरस्त्रीकाव्याज उनकी सन्ततिहे रस (तेलयादि)किसीकोदे औरवहुतकाल विनाव्याजबहउसके निकंटपड़ारहे तो आठगुनेसे अधिक नले वस्त्रधान्य और हिरण्य इनकाक्रमसे चोगुना,तिगुना और दूनालेवे४०जिसणको प्रपन्न (कयूल)कियाहे जो धनीउसे किसीधम्मोपायसे लेनाचााहे तोराजामनान करे मोरपाणीराजाके निकटनिवेदनकरतोउससेधनीकाधनदिलादेऔरदंडभीलेवे४१ ॥
याज्ञरल्क्यस्मृति स०॥ गृहीतानुक्रमादाप्योधनिनामधमर्णिकः॥ दत्वातुब्राह्म णायैवनृपतेस्तदनन्तरम् ४२ राज्ञाधमर्णिकोदाप्यःसाधि ताशकंशतम् ॥पंचकंधशतंदाप्यंप्राप्तार्थोद्यत्तमर्णिकः४३ हीनजातिपरिक्षीणमृणाकर्मकारयेत् ।। ब्राह्मणस्तुपरिक्षी णःशनैर्दाप्योयथोदयम् ४४ दीयमाननगृह्णातिप्रयुक्तंयः स्वकंधनम् ॥ मध्यस्थस्थापितंचत्स्यावर्द्धतेनततःपरम् ४५ अविभक्त कुटम्बार्थेयदृणंतत्कृतम्भवेत् ॥ दास्तद्रिक्थिन: प्रेतेप्नोपितेवाकुटुम्बिनि ४६ नयोषित्पतिपुत्राभ्यांनपुत्रेणक तम्पिता॥ दद्याहतेकुटुम्बार्थान्नपतिःस्त्रीकृतंतथा ४७॥ एकजातिके धनीहों तो जिसकमसे जिसकाधन लियाहो उसी कमसे उसको पाणीसे दिलावे भौर भिन्नभिन्न जातिकेधनीहों तो ब्राह्मएकाधन पहिले तवक्षत्रीआदिका इसक्रमसेदिलावे१२ धनी का धन उधारनीसे जोराजाकोदिलानापड़े तो अधमर्ण(उधारनी) से राजादशरुपयेसैकड़ेदण्डले मौर धनीसे पांचरुपयेसैकड़े मंजूरी ले ४३ यदि उधारनीको णदेनेकी सामर्थ्य नहो और धनी की जातिसे उसकी जातिछोटीहो घ तुल्यहो तो उससे अपना काम करवाके प्राणभरवाले और यदि ब्राह्मण उधारनाचणदेने में प्रस- मर्थहुभाहो तो उससे काम न करना किन्तु जैसाजैसा उसकेपास धनमाताजाय उतनालेलियाकरे ४४ उधारनीदेताहो और धनी न ले तो वहधन किसीमध्यस्थ के पासरखदेना फिर उधारनीको व्याज न देनीपड़ेगी ४५ जो लोग अविभक्त (इकदारहते) हों उनमेंसे किसीने कुटुम्बके पोपणकेलिये प्राणकियाहोतो वहण कुटुम्बी (मालिक) देवे और यदिकुटुंबीमरजााय व परदेशचला जाय तो उसके दायाद (धनलेनेवाले ) देवें ४६ कुटुम्बपोपण के सिवाय पति और पुत्रका किया झाप्राण वी न देखें इसीप्रकार पुत्ररूत पिता न देवे और स्त्रीकत पतिभी न देवे ४७॥ ९ . याज्ञवल्पयस्मति स०। सुराकामद्यूतकृतन्दण्डशुल्कावशिष्टकम् ॥स्थादानंतथै वेहपुत्रोदयानपैटकम् ४८ गोपोंडिकशैलूपरजकव्याध योपिताम् ॥ ऋणंदद्यात्पतिस्तासांयस्माद्वृत्तिस्तदाश्रया ४९ प्रतिपन्नस्त्रियादेयंपत्यावासहयत्कृतम् ॥ स्वयंकृतंवा. यहणनान्यस्त्रीदातुमर्हति ५० पितरिप्रोपितेप्रेतेव्यसना, भिप्लुतेपिवा ॥ पुत्रपौत्रैःऋणंदेयन्निनवेसाक्षिभावितम्५१ रिक्थग्राहऋणन्दाप्योयोपियाहस्तथैवच ॥ पुत्रोनन्या श्रितद्रव्यःपुत्रहीनस्यरिस्थिनः ५२ भ्रातृणामथदम्पत्योः पितुःपत्रस्यचैवहि ॥ प्राप्तिभाव्यमृणंसाक्ष्यमविभक्तेनतुस्म तम् ५३ ॥ उसी प्रकार मदिरापान, व्यभिचार, जुझारखेलने को, दण्डका शेप, और शुल्क (मालूम ) का शेप (वाको) और च्यादान के लिये जो ऋण पिता ने कियाहो उसे पुत्र न देवे ४८ अहीर,कल- वार, नट, धोवी और व्याधा इनकी स्त्रियोंने जो कियाहो सो उनके पतिदेवें क्योंकि उनकी वृत्ति स्त्रीके आधीनहै ४६ जो पाण प्रतिपन्न (कवल) कियाहो व जो पतिकेसाथलियाहो और अपने आप जो घणलियाहो तो स्त्री देवे इसके सिवाय दूसरे प्रकारका भाण स्त्री कभी न देवे ५० जव पितामरजाय व परदेशगयाहो अथवा किसी व्यसन (लत) में पड़गयाहोप्तो पुत्र औरपौत्र प्राण दें निहनव (नाकबूल)करें तो साखियोंसेजो भावित (सावितहो सो दे ५१) जो जिसका धनले वह उसका माणदे वह नहो तो जो उसकी स्त्री ले वह माणदे और जिसकाधन पुत्रों के सिवाय दूसरे ने नहीं लिया उसका पण उसके पुत्रदें पुत्रनहो तो रिक्थि (दायाद ) देवें ५२ भाई, स्त्री, पुरुप,पिता और पुत्र यदि विभक्त नहीं तो इनकीप्रातिभाव्य (जामिनी) गुण औपसाक्ष्य (गवाही) करने की योग्यता नहीं ५३॥ -- .
याज्ञवल्क्यस्मृति स। दर्शनेप्रत्ययेदानेप्रातिभाव्यविधीयते॥आद्योतुवितथेदा प्यावितरस्यसुताअपि ५४ दर्शनेप्रतिभूर्यत्रमृतःप्रात्ययिको पिवा ॥ नतत्पुत्राऋणंदद्युर्दधुर्दानाययःस्थितः ५५ बहवः स्युर्यदिस्वांशैर्दद्युःप्रतिभुवोधनम् ॥ एकच्छायाश्रितेष्वेपु धनिकस्ययथारुचि ५६ प्रतिभूर्दापितोयत्तुप्रकाशंधनिनांध नम् ॥ द्विगुणम्प्रतिदातव्यमृणिकैस्तस्यतद्भवेत् ५७ संत तिःस्त्रीपशुष्वेवधान्यंत्रिगुणमेवच ॥ वस्त्रंचतुर्गुणम्प्रोक्तरस श्चाष्टगुणस्मृतः ५८ आधिःप्रणश्यद्विगुणेधनेयदिनमो क्ष्यते ॥ कालेकालकृतोनश्येत्फलभोग्योननश्यति ५९ ॥ ‘दर्शन (दिखलादेनेकी) प्रत्यय (साविकावनादेना) औरदान मालदेने का प्रातिभाव्या (जामिनी) कहाहै इनमेंपहिलेदोप्रकार केप्रातिभाव्य जिसने कियाहो वह झूठापड़ेतो केवल वही उतना धनदे-परन्तु तीसरेके लड़के भी देवें ५४ जब दर्शन प्रतिभू भोर प्रत्यय प्रतिभू मरगयेहों तो उनके पुत्रोंसे ण न दिलाना किन्तु जो दान प्रतिभूहो उसीके पुत्रसे दिलाना ५५ प्रतिभृ कई एकहाँ तो ऋण बांटलेवें फिर अपने अपने अंशके अनुसार धनी को धन देवें और जो हरएक सम्पूर्ण धनदेनेको उद्यतहो तो धनिक की रुचिहै चाहे जिससे ले ५६ जिस प्रतिभूसे सबके सामने जितना धनीकाधन दिलाया गयाहो उसको ऋणी दूनाकरके उस प्रतिभू को भरदेवे ५७ स्त्री और पशु प्रतिभूसे दिलायागयाहो तो ऋणी दूनेके बदले में सन्ततिसहित स्त्री पशुदे और अन्न तिगुनादे वस्त्र चौगुना और रस (पीतलआदि) अठगुनादेवे ५८ जो चीज़वन्धक रक्खीहो उसपर मूलधन के तुल्य व्याजभी चढ़जाय और प्राणी न छुड़ावेतो वह बन्धक वूड़ाहोजाताहै जिस बन्धक में समय की अवधि करदीहो तो वह अपने समय होजानेपर वूलाहोताहै परंतु फैल भोग्य बन्धक (जिस से धनी को व्याज मिलती जाय) वह कभी नष्टनहींहोता ५६ ॥
.. पावसपस्मृति स०१ गोप्याधिभोगेनोरद्धिःसोपकारेथहापित।नष्टोदेयेविनष्टश्च देवेराजकृताहते६०आधेःस्वीकरणासिद्धीरक्ष्यमाणोप्यसा रतां यातश्चेदन्यआधेयोधनभाग्वाधनीभवेत्६१ चरित्रबंध ककृतंसवृद्ध्यादापयेवनसत्यकारकृतंद्रव्यांद्वगुणप्रतिदापयेत् ६२उपस्थितस्यमोक्तव्यआध स्तेनोऽन्यथाभवेत्॥प्रयोजके सतिधनंकुलेन्यस्याधिमाप्नुयात्६३तत्कालकृतमूल्योवातत्र तिष्ठेदवृद्धिकैःविनाधारणिकाद्वापिविक्रीणीतससाक्षिकं६४ दृष्टिबंधकको जोअपनेकामलावैतो उसकोब्याजपापीनदेऔर भोगपंधकभीजोकुछहानि (नुक्सान) होजायतोव्याजनपावे,देव औरराजोपद्रवकेबिना कोईबंधककीचीज़विगड़जाय व नष्टहोजाय तोधनीअपनेपाससेदेवे६० आधि (बंधक) स्वीकारकरनेसे(उपभोग करनेसे)सिद्ध (अपनेस्वत्वशिष्ट) होताहै और जो यत्नसेरखनेपर भी वन्धककोचीज़ विगड़जावे तो दूसरीचीज़ उसकेवटलेमें रखदेना अथवाधनीकाधनदेदेना६१ यदिचरित्रवन्धक (आपसकेविश्वाससे थोडीचीज़परवहुतधनदेदेवे बावड़ीपरथोड़ाहीलेलेवे अथवाअपना पुण्य,तीर्थस्नान फलादिवन्धक)कियाहोतो व्याजसमेतधनधनी दिलापावैऔरजिसआधिमें सत्यप्रतिज्ञाहुईहो (किवनदूनाहानेपर भीधनहीदेंगेप्राधिनष्टनहोगीतोदूनाधनहीं दिलादेना ६२ भणीधन्ध कछुड़ानेभावे तोउसकीचीज़देदेनी नहींतो(यदिव्याजके लोभ से कुछदिन औररक्से,तोचोरकासा दण्डपाताहै उधारनीवन्धकछुड़ा। ने आवे और धनीकहीगयाहोतो उसकेकुलमेंसे किसीप्रामाणिक के पासधनव्याज समेतरखकर अपनीचीजलेलेवे ६३ धनीनहो और बन्धकवेचकेशणदियाचाहेतो) उससमयमैजो मोलवन्धककाउठे सोकहकेयन्धकवहीरहनेदे और उसलमयसे व्याजनदेवे (जोदूना धनहोनेपरभी वन्धक बड़ाहोनेका करारनहो और धनमूल व्याज मिलके दूनाहोजाय अथवा उधारनी पासनहो कहीं गयाहो तो) सोखीरखकर उसवन्धकको उधारनीके विनाभीवेचडाले १५॥ 1 - याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ यदातुद्विगुणीभूतमृणमाधौतदाखलु। मोच्यआधिस्तदु पन्नेप्रविष्टेद्विगुणेधने ६५वासनस्थमनाख्यायहस्तेन्यस्य यदर्पते॥द्रव्यन्तदोपनिधिकंप्रतिदेयंतथैवतु६६नदाप्यो पहृतंतन्तुराजदैविकतस्करैः ॥ पश्येन्मार्गितेदत्तेदाप्योद ण्डंचतत्समम ६७ आजीवनस्वेच्छयादंड्योदाप्यस्तंचापि सोदयम् ॥याचितान्वाहितन्यासनिक्षेपादिप्वयंविधिः ६८ तपस्विनोदानशीलाःकुलीनाःसत्यवादिनः॥धर्मप्रधाना जवःपुत्रवन्तोधनान्विताः६९ त्र्यवराःसाक्षिणोज्ञेयाःौत स्मार्तक्रियापराःयथाजातियथावर्णसर्वेसर्वेपुवास्मृताः७० जो भोग धन्धकसे अपनेमूलधनका दूनाधनधनीपालेवे तो वह वन्धककी चीज़ छोड़देवे ६५ इतिणादानप्रकरणम् ॥ किसी वासनमें ढापके विनागिनेगफे कोई चीज़ रखनेकेलिये किसीकोदे तो वह उपनिधि कहलातीहै और उसीतोर उसे फेर देना भी चाहिये ६६ यदि उपनिधि राजोपद्रव,देवोपद्रव अथवा चोरीहो- नेसे नष्टहोगईहो तो उसे न दिलावे जो उपनिधि के स्वामी ने मांगाहो और न दियाहो फिर वह द्रव्य देवराजादि उपद्रवसे नष्ट होजाय तो उतनी चीज़ और उसीके तुल्य दण्डभी राजा उससे ले ६७जो उपनिधिका भोग अपनीइच्छासे करे तो व्याजसमेत दिलाना मोर यहीरीति याचत(मंगनी)अन्वाहित (किसीदूसरेके हाथ जो चीज़ धनीको देनेकेलिये भेजीहो)न्यास (किसीके घरमें उसके परोक्ष जो चीज़ रखनेको धरदीहो)और निःक्षेप(चीज़गि- नके रखनेकोदीहो उसमें) भी जानना ६८ इतिनिःक्षेपादिप्रकर णम् ॥ तपस्वी, दानशील, कलीन,सत्यवादी, धर्मिष्ठ, पाजु(सीचे) पुत्रवाले औरधनी ७६ वेद और धर्मशास्त्र के अनुसार चलनेवाले ऐसे तीनसे अधिक साखीवनाना चाहिये चाहे वे अपनी जाति और वर्णके हो चाहे दूसरेहो ७० ॥
७० याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ श्रोत्रियास्तापंसारदायेचप्रव्रजितादयः॥ असाक्षिण स्तेवचनान्नानहेतुरुदाहृतः ७१ स्त्रीचबालकितवमत्तोन्म ताभिशस्तकाः ॥ रंगावतारिपाखण्डिकूटकृतिकलेन्द्रियाः ७२ पतिताप्तार्थसम्बन्धिसहायरिपुतस्कराः॥ साहसीदृष्ट दोपश्चनिधूताद्यास्त्वसाक्षिणः७३ उभयानुमतःसाक्षीभव त्येकोपिधर्मवित् ॥ सर्वःसाक्षीसंग्रहणेचौर्यपारुप्यसाहसे ७४साक्षिणःश्रावयेद्वापिप्रतिवादिसमीपगान्॥ येपातकक तालोकामहापातकिनांतथा ७५ अग्निदानांचयेलोकायेच स्त्रीबालघातिनाम् ॥ सतान्सर्वानवाप्नोतियःसाक्ष्यमन्तं वदेत् ७६॥ श्रोत्रिय(वेदपठनपाठनतत्पर) तपस्वी,वृद्ध और प्रवाजंत(स- न्यासी)आदिको शास्त्रकी आज्ञासेही साखी न बनाना इसमें कुछ कारण नहीं ७१ स्त्री,वालक, वृद्ध,अस्सीवर्पसे ऊपर, कितव, (जु- आरी)मत्त,(मदिरासे)उन्मत्त,(यहदोपसे) अभिशस्तू (जिसकोदो- पलगाहो)रंगावतारी(चारणनटकी जाति)पाखंडी(नंगेहोकरफिर- नेवाला)कटकारी (कपटलेखकारी)विकलेन्द्रिय(बहरागंगासादि) ७२ पतित,प्राप्त,(सुहत)अर्थसम्वन्धी (मामिलेम सामिल)सहा- य,शत्रु,चोर,साहसी, बलात्कारकरनेवाला)जिसका कोई दोपदे- खागयाहो और निर्दूत(वन्धुओं त्यक्त)आदि साखी नहीं बनाये जाते ७३ वादी प्रतिवादी दोनों मानदें तो एक मनुष्यभी सारखी होताहे चोरी,पारुप्य(मारना व गाली देना) और साहस (मनुष्य मारण आदि)में सवी साखी होसक्ते हैं ७४ यादी और प्रतिवादी के पास लेजाकर सभासदलोग साखियोंको सुनायें कि जो लोग महापातकी पातकी ७५ आग लगानेवालों और स्त्री और वाल- कके वध करनेवालोंको प्राप्तहोतेहैं वे सब झूठसासी भरनेवाले को मिलते हैं ७६॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। सुकृतंयत्वयाकिंचिज्जन्मांतरशतैःकृतम् ॥ तत्सर्वैतस्य जानीहियंपराजयसेमृपा ७७ अब्रुवह्निनरःसाक्ष्यमृणंस दशबंधकम् ॥ राज्ञासर्वप्रदाप्य स्यात्पट्चत्वारिंशकेहनि ७८ नददातिहियःसाक्ष्यंजानन्नपिनराधमः ॥ सकूटसाक्षि णांपापैस्तुल्योदण्डेनचैवहि ७९ वैधेवहूनांवचनंसमैपुगुणि नांतथा ॥ गुणिद्वैधेतुवचनंग्राह्ययेगुणवत्तमाः ८० यस्योचुः साक्षिणःसत्याम्प्रतिज्ञांसजयीभवेत् ॥ अन्यथावादिनीय स्यध्रुवस्तस्यपराजयः ८१ उक्तेपिसाक्षिभिःसाक्ष्येयदन्येगु णवत्तमाः॥ द्विगुणावान्यथाब्रूयुःकूटा:स्य पूर्वसाक्षिणः ८२ एथक्पथग्दण्डनीयाःकूटकृत्साक्षिणस्तथा ॥ विवादावि गुणंदण्डविवास्योब्राह्मणःस्मृतः ८३ ॥ जो पुण्य तुमनेपिछलेजन्ममें कियाहै सो सब उसकाजानो कि जिसको झूठायोलकर पराजितकरतेहो७७जो साखीहोकर सभा में कुछनवोले तो राजा उसीसे दशवंधक (दशमांश जो दण्डरूपसे राजालेताहै उसको)सहित छियालिसदिनमे सम्पूर्णऋणदिलादेवे ७८ जोनीचजानकरकेभी साखीनहींदेता वहकूटसाक्षी(आगेलि. सेंगेउनकेपाप)और दंडकाभागीहोताहे ७६ जवसाखीदोनोंप्रकार की बातेंकहें तो बहुतोकीवातमाननी दोनों प्रोरवराबरसाखाहों तो उनमें जोगुणीहोउनकीवातमाननी गुणियोंमेंभी दुविधाहोतो जो घड़ेगुणीहोंउनकेवचनमानने ८०जिसकीवातसाखीवतावें किसच है वहजीतताहे औरजिसकीअन्यथाकहें उसकीअवश्यपराजयहोती है-१साखीलोगकहचुकेहों औरउनसेअधिकगुणवाले व दुगनेमनु- प्य उनकेकसे विपरीतकहे तो पहिले साखीकूटकहेजातेहै८२जो साखियोंकोकूटयनावे (फोड़ले) और साखीभीजोकूटहोजाय(फूट जाय) उनप्रत्येकको जितनेकाविवादहो उससेदूनादण्डदेना और ब्राह्मणहो तो उसको अपनेनगरसे निकालदेनायहीदण्डहै ८३ ॥
याज्ञवल्क्ष्यस्मृति स०।
यःसाक्ष्यं श्रावितोऽन्येभ्योनिन्हुतेतत्तमोटतः ॥ सदा
प्योऽष्टगुणंदण्डम्ब्राह्मणंतुविवासयेत् .८४ वर्णिनांहिवधो
यत्रतत्रसाक्ष्यन्तंवदेत् ॥ तत्पावनायनिर्वाप्यश्चरुःसारस्व
तोद्विजैः ८५ यःकश्चिदेोनिष्णातःस्वरुच्यातुपरस्परम्॥
लेख्यंतसाक्षिमत्कार्यंतस्मिन्धनिकपूर्वकम् ८६ समामास
तद हर्नामजातिस्वगोत्रकैः ॥ सब्रह्मचारिकात्मीयपिट
नामादिचिह्नितम् ८७ समाप्तेतुऋणीनामस्वहस्तेननिये
शयेत् ॥ मतम्मेमुकपुत्रस्ययदत्रीपरिलेखितम् ८८.साक्षि
णश्चस्वहस्तेनपिढनामकपूर्वकम् ॥ अत्राहममुकःसाक्षी
लिखेयुरितितेसमाः ८९॥
जो पहिले साखीवनना स्वीकारकरके जवसाखीदेना सुनाया
जाय उससमय किसी कारण व मोहसे नटजाय तो उसको जो
दण्डहारजानेवालेकोहोगा उससे अठगुनादण्डदेना और ब्राह्मणे
हो तो उसको देशसे निकालदेना ८४ जव देखे कि सचवोलनेमें
किसीका वधहोगा तो साखीझूठ बोले और उसदोप के छुड़ाने
के लिये सरस्वती देवताका हविष्य ब्राह्मणवनावें ८५ इतिसाक्षि
प्रकरणम् ॥ जो वात देने लेने की आपसमें ठहरगईहो उसे
साखीदेकर धनीका नाम पहिले फिर उधारनीका इसरीति से
लेखकरवाना ८६ वर्ष, महीना, पाख, दिन, (तिथि) दोनों का
नाम और जाति,गोत्र, उपनाम और अपने अपने पिताका नाम
आदि भी उस लेखमें डालदेना ७ जब (कागज़ ) लिखचकें
तो उधारनी अपने हाथसे नीचे अपनानाम लिखकर यह लिखदे
कि जो ऊपर लिखाहै सो अमुक के पुत्र हमको स्वीकार है ८८
सास्त्रीलोग भी अपने अपने हाथसे अपने अपने पिता का नाम
लिखकर अपनानामलिसें कि इस व्यवहारमें हमसाखी, परन्तु
दो व चार व छः आदि समसंख्याके साखीवनाना ९ ॥
* पाज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ उभयाभ्यर्थितेनैतन्मयाह्यमुकसूनुना ॥ लिखितंह्यमुके नेतिलेखकोन्तेततोलिखेत् ९० विनापिसाक्षिभिलेख्यंस्वह स्तलिखितंतुयत् ॥ तत्प्रमाणस्मृतंलेख्यंवलोपाधिकृताहते ९१ ऋणलेख्यकृतन्देयंपुरुपैस्त्रिभिरेवतु ॥ आधिस्तुभुज्य तेतावद्यावत्तन्नप्रदीयते ९२ देशांतरस्थेदुर्लेख्येनष्टोन्सृष्टेह तथा ॥ भिन्नेदग्धेथवाछिन्नेलेख्यमन्यत्तुकारयेत् ९३ सं - दिग्धेलेख्यशुद्धिःस्यात्स्वहस्तलिखितादिभिः॥ युक्तिप्राप्ति क्रियाचिह्नसम्बन्धागमहेतुभिः ९४ लेख्यस्यप्रष्टेभिलिखे हत्वादत्वर्णिकोधनम् ॥ धनीवोपगतन्दद्यात्स्वहस्तपरिचि- नितम् ९५॥ सबकेअन्तलेखकलिखेकि अमुककेपुत्र मुझकोदोनोंने प्रार्थना पूर्वककहा तो अमुकनाम हमने यहलिखदिया ६० जोलेस अपने हाथ लिखाजाय वह विनासाखी भी लिखाहो तो प्रमाण होता है परन्तु बलात्कार और छललोभमादिसे जोकियाहो वहप्रमाणनहीं होता ६१ लेखकाण तीनहींपुरुप (पुत्र,पौत्र,प्रपौत्र)को देनाचा- हिये (परन्तु आधि (वन्धक) तवतक भोगीजातीहै कि जवतक चुका न देवे रजव लिखितकही दूरदेशमें रहजाय, उसकेप्रक्षर इतने मलिनहोजाये कि पढ़ न सकें,नष्टहोजायें,घसजायँ, चोरीहोजायें) कटजायें जलजा अथवा फटजायें तो दूसरा लिखनाचाहिये ६३ लेख में संदेहहो तो अपने लिखेहुये दूसरे पत्रसे मिलाकर, युक्ति प्राप्ति (इसदेशमें इसकालमें इसको इतने द्रव्यकी योग्यताथी) क्रिया (साखी) चिह्न (श्रीकारादि) सम्बन्ध (पहिला व्यवहार) और आगम (आमदनी इनहेतुओंयुक्तियों) से निश्चयकरना ६४ जितना जितना उधारनी देताजाय सो अपने हाथसे लिखित पत्र के पीठपर लिख दे मोर धनी जितनापावे उसका उपगत (रसीद) अपने हायसे लिखके शृणीकोदे ६५ ॥ १ ७४ याज्ञवल्क्यस्मृति स.. दत्वर्णपाटयेल्लेख्यंशुयैवान्यत्तुकारयेत् ॥ साक्षिमच्चभ वेद्यहातहातव्यंससाक्षिकम् ९६ तुलाग्न्यापोविपंकोशोदि व्यानीहविशुद्धये ॥ महाभियोगेवतानिशीर्षकस्थेभियोक्त रि ९७ रुच्यावान्यतरःकुर्यादितरोवर्तयच्छिरः ॥ विनापि शीर्पकानुकुन्नृिपद्रोहेथपातके ९८ सचैलेंस्नानमाहूयसू र्योदयउपोपितम् ॥ कारयेत्सर्वदिव्यानिनृपब्राह्मणसन्नि धौ ९९तुलास्त्रीवालद्धांधपंगुब्राह्मणरोगिणाम् ॥अग्निर्ज. लंबाशूद्रस्ययवाःसप्तविषस्यवा १०० नासहस्त्राद्धरत्फालंन विपनतुलांतथा ॥ पार्थेष्वभिशापेचवहेयुःशुचयेसदा १ ॥ सम्पूर्णमटणदेदेवे तो लेखकाढ़डाले अथवाशुद्धिपत्र (भरपाई) लिखाने और जिसमें साखीहों वहण साखियों के सामने देना चाहिये ६.६ इतिलेरख्यप्रकरणम् ॥ तुला, भग्नि, जल, विष और कोश ये पांच दिव्य (शपथ) जव दूसरा उपायनहो तो जय परा- जय करने के लिये महाभियोग में अभियोक्ता (वादी) को देने चाहिये ७आपसमें सम्मतिकरके चाहेदूसरा (अभियुक्त) ही दिव्य करे और वादी धनदण्ड अथवा शरीर दण्ड स्वीकार करे राजद्रोह औरमहापातकमें जय पराजय के विना भी शपथकरे ६८ पहिले दिन उपवासकराके प्रातःकाल शपथदेनेवालेको सचेल (सवस्त्र) स्नानकरवाके बुलाना और सभासद राजा और ब्राह्मणों के सामने सव दिव्य कराना चाहिये ६६ स्त्री, चालक, (सोलहवर्पतकका) वृद्ध (अस्सीवर्पका) अन्धालूला ब्राह्मण और रोगीइन्हें शुद्धि के लिये तुला देनी, अग्निक्षत्रीको जलवैश्यको और शूद्रको सातयव भर विपदेना १०० सहस्त्र (हज़ार) पणसे कमती का विवादहो तो अग्नि, विप, तुला और जलका शपथ न दिलाना परन्तु नृप द्रोह और महापातकका अभियोगहो तो चाहे जितनेकाहो सदा इनशपथों को शुद्धहोके करे १ ॥ इतिदिव्यमादकाः ।।
'याज्ञवल्क्यस्मृति स०
तुलाधारणविद्वद्भिरभियुक्तस्तुलाश्रितः ॥ प्रतिमानस
मीभूतोरेखांकृत्वावतारितः २ त्वंतुलेसत्यधामासिपुराद
विनिर्मिता ॥ तत्सत्यवदकल्याणीसंशयान्मांविमोचय ३
यद्यस्मिन्पापकृन्मातस्ततोमांत्वमधोनय ॥ शुद्धश्चेद्गमयो
मांतुलामित्यभिमंत्रयेत् ४ करौविमृदितवीहेर्लक्षयित्वा
ततोन्यसेत् ॥ सप्ताश्वत्थस्यपत्राणितावत्सूत्राणिवेष्टयेत् ५
ब्वमग्नेसर्वभूतानामंतश्चरसिपावक ॥ साक्षिवत्पुण्यपापे
भ्योबहिसत्येकवेमम् ६ तस्येत्युक्तवतोलोहपंचाशत्पलिक
समम् ॥ अग्निवर्णन्यसत्पिण्डहस्तयोरुभयोरपि ७॥
तोलने में जो निपुण हो (सोनार आदि ) वे शपथ देनेवाले
को तुला पर चढ़ाकर यव बरावर तोल ले तो जिस राह से
चढ़ाये हों उसमें चिन्हाटी कर रक्खे उसी राह से उतरे २
तब हेतुले तू सत्यका स्थानहै देवताओं ने सृष्टिको मादि में तुझे
बनाया है इसलिये हे कल्याणी तू सच बतलादे इस संशय से
मुझे छुड़ा ३ हे माता जो मैं (पापकृत् असत्यवादी होऊं तो
मुझे नीचे लेजा और सच्चाहोऊं तो ऊपर उठा ऐसी प्रार्थना तुला
से करे ४ इतिघटविधिः ॥ अग्नि के शपथ करनेवाले के हाथ में
यव मलवा के फिर देखना जो जो चिन्हाटी उसके हाथ में है।
उसको अलक्तक (महावरसे रंगदेना) तव पीपलकेसातपत्ते उस
के हाथपर रखके कच्चे सृत से सात फेरा बांधदेना ५ अनन्तर हे
अग्नि तुम सब जीवोंके अन्तःकरण में वासकरती हो, शुद्ध करने
वालेहो इसलिये हमारा पुण्य पाप देखके साक्षीकेसमान सच सच
दिखलादो ६ शपथ देनेवाला जव ऐसा कहचके तो उसके दोनों
हायपर पचास.पलभर लोहेका गोला लालकरके रखदेना ७॥
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याज्ञवल्क्यस्मृति स० .सतमादायसप्तेवमण्डलानिशनैर्ब्रजेत् ॥ पोडशांगुलकं ज्ञेयंमण्डलंतावदन्तरम् ८ मुक्ताग्निम्मृदितव्रीहिरदग्धःशु दिमाप्नुयात् ॥ अन्तरापतितोपिण्डसन्देहेवापुनहरेत् ९ स त्येनमाभिरक्षत्वंवरुणत्यभिशाप्यकम् ॥ नाभिदग्धोदकस्थ स्यगृहीत्वोरूजलंविशेत् १० समकालमिपुम्मुक्तमानीया न्योजबीनरः ॥ गतेतस्मिन्निमनांगंपश्येच्चेच्छुद्धिमाप्नुयात् ११ त्वंविपब्रह्मणःपुत्रःसत्यधर्मेव्यवस्थितः ॥त्रायस्वास्मर दभीशापात्सत्येनभवमेऽमृतम् १२ एवमुक्ताविपंशांर्गभक्ष यद्धिमशैलजम् ॥ यस्यवेगैर्विनाजीर्येच्छुद्धिंतस्यविनिर्दिशे त् १३ देवानुग्रान्समभ्यर्च्यतत्स्नानोदकमाहरेत् ॥ सांश्र व्यपाययेत्तस्माज्जलात्सप्रसृतित्रयम् १४ ॥ वहउसकोलेकरधीरेधीरेसातमंडलचलेमंडलसोलहअंगुलकाहो- ताहै औरएकसेदूसरेका अंतरभीइतनाहीहोताहै ८ अग्निको वहां त्यागकरके फिरहाथोंसेयवमलना कहींजलानहो तो शुद्धहोता है यदि गोसावीचहीमेंगिरपड़े अथवादग्धहोनेकासंदेहपड़ाहोतो फिर उठावे इत्यग्निविधिः ॥ हेवरुण सत्यसेमेरीरक्षाकरो इसमंत्रसे जलकीप्रार्थनाकरके नाभिपर्यंतजलमेंखड़ेहुये मनुष्यकीजांघपकड़ केजलमेंगोतामारे १० उसीसमयवाणफेकनाऔरकिसीवड़ेदौड़ने बालेसे उसत्याएकोमगाने जस्तक वहयालाचुके उपलक शपथ करनेवाला डूवाहीदेखपड़े तोशुद्धकहलाताहै ११ इत्युदकविधिः।। है विष तुम ब्रह्माकेपुत्रहो औरसत्यधर्म स्थापितभयेहो मुझको इसमभिशाप (कलंक)से वचावो औरसबंजानके अमृतकेतुल्यहो जावो१२ऐसाकहकर शपथदेनेवालासिंगिआमाहुरखावे जोविना चढ़ेहुयेपचजाय तो शुद्धहोताहे १३ इतिविपविधिः ॥ उग्रदेवता (दुग्र्गाआदि)कोपूजकरकेउनकास्नानजललेआवेोरप्राविवाक् शपथदेनेवालेको सुनाकर तीनपसर उसमेंसे जलपिलाये १४॥
७७ ५ . .. याज्ञवल्क्यस्मृति सः। अर्वाक्चतुर्दशादायस्यनाराजदैविकम् ॥ व्यसनं जायतेघोरंसशुद्धःस्यान्नसंशयः १५ विभागंचेत्पिताकुऱ्या दिच्छयाविभजेत्सुतान् ॥ ज्येष्ठंवाश्रेष्ठभागेनसर्वेवास्युःस मांशिनः १६ यदिकुर्यात्समानंशान्पत्न्यःकार्याःसमां शिकाः ॥ नदत्तस्त्रीधनंयासांभावाश्वशुरेणवा १७ शक्त स्यानीहमानस्यकिंचिद्दत्वाप्पथक्कियाम् ॥ न्यूनाधिकविभ कानाधर्म्यःपितृकृतःस्मृतः १८ विभजेरन्सुताःपित्रारूर्व रिक्थमृणंसमम्॥ मातुर्दुहितरःशेपमृणात्ताभ्यऋतेन्ववयः १९ पितद्रव्याविरोधेनयदन्यत्स्वयमर्जितम् ॥ मैत्रमौदा हिकंचैवदायादानांनतद्भवेत् २० ॥ जिसको चौदह दिनके भीतर राजास व देवसे घोरउपद्रव न होतो उसे शुद्ध निश्चयसे जानना १५इतिदिव्यप्रकरणम् ॥ यदि पिता अपने जीतेही लड़कोंका विभागकरे तो अपने उपाजित धनमें उसकी इच्छा है चाहे सवको वरावरदे अथवा ज्येष्ठपुत्रको श्रेष्ठभाग (ज्येष्ठांश)देवे १६ जो सव पुत्रोंको समान अंशदे तो अपनी उन स्त्रियोंको भी जिन्हें श्वशुर व पतिने स्त्रीधन न दिया हो पुत्रंकेसमान अंशदेवे १७ जो पुत्र द्रव्यमर्जन(कमाने)में सम- र्थहो और पिताका धन न चाहताहो तो कुछ थोड़ा बहुतदेके विभाग करदेना और न्यूनाधिक (कमज्यादह) जिनका विभाग पिताने धर्मकीरीतिसे कियाहो तो वह बदलता नहीं. १८ माता और पिताके देहत्यागहोनेपर सब पुत्र इकट्ठहोकर धन और भरण वरावर बांटलेवें परन्तु माताका धन उसका ऋणदेकर जो वचे सो लड़कियां वांटलेवें जो लड़कियां नहीं तो पुत्रलेवें १.६ जोधन मातापिताके धनकी सहायताके विनाहीं अपने पुरुपार्थ से कमायाहो,मित्रसे पायाहो और विवाहमें मिलाहो तो वहदूसरे दायादों (भाइयों) का नहीं होता २० ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ क्रमादभ्यागतन्द्रव्यंहतमप्युद्धरेत्तुयः ॥ दायादेभ्योन तद्दद्याद्विद्ययालब्धमेयच २१ सामान्यार्थसमुत्थानेविभाग स्तुसमःस्मृतः॥अनेकपितृकाणान्तुपितृतोभागकल्पना२२ सूर्यापितामहोपात्तानिवन्धोद्रव्यमेवच॥ तत्रस्यात्सदृशंस्था म्यम्पितुःपुत्रस्यचोभयोः :२३ विभक्तेपुसुतोजातोसवर्णायां विभागभाक् ॥ दृश्यादातद्विभागःस्यादायव्ययविशोधिता त् २४ पितृभ्यांयस्ययदत्तंतत्तस्यैवधनम्भवेत् ॥ पितुरू विभजतांमाताप्यंशंसमहरेत् २५॥ अपने बाप दादेका द्रव्य जो किसीने हरलियाहो और वे न छुड़ासकेहों उसे अपनेभाइयोंकी सम्मति लेकर जो कोई लड़का छड़ावे तो वह धन और विद्या पढ़नेपढ़ानेसे जो धनमिले सो भी दूसरेभाइयोंको न दे आपही सवलेवे २१ जिस धनका विभाग न भयाहो उसे जो कोई खेतीवव्यापारकरके बढ़ावे तो सबकावरा- बरही भागहोताहै और दादेकेधनमें अपने अपनेवापकाभागवां-' टके फिर उसमें अपनाभाग लगालेवें २२ जोभूमि,निबंध(रोजी- ना)चुंगी व गणेशपूजा)और धनदादेनेकमायाहो उसमें पिता मोर पुत्रदोनोंका तुल्याधिकारहै २३ पिताके जीतेही, पुत्रका विभाग हाचुकाहो और तव सवर्ण(अपनीजातिकी) स्त्रीमें कोई और पुत्र उत्पन्नहो तो वह अपनी माता पिताकाभागपावे (मौर पिताके- नन्तर भाई आपसमें विभागकरें उसके अनन्तर जिसकागर्भउन के पिताहीसे हुआहो परवे नजानतेहों ऐसा कोई और पुत्र उनकी माताके उपजे तो)आय व्यय (आमदनी और खर्च)शोधनकर (मुजरेदेके)जो धन वाकीहो उसमें से उस पुत्रको भी भागदे २१ माता पिताने जो चीज़ जिसको दीहो वह उसीकाधनहोगा पिता के देहत्यागहोनेपर भाईआपसमें विभागकरें तो माता भी अपने पुत्रोंके बराबर एक भाग ले लेवे २५ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति म०॥ असंस्कृतास्तुसंस्कार्याभ्रातृभिःपूर्वसंस्कृतैः ॥ भगिन्य श्चनिजादशादत्वांशंतुतुरीयकम् २६ चतुस्त्रिद्वेकभागाःस्यु वर्णशोब्राह्मणात्मजाः॥ क्षत्रजास्त्रियकभागाविड्जास्तुद्वये कभागिनः २७ अन्योन्यापहृतद्गव्यंविभक्तंयत्तुदृश्यते ॥ तत्पुनस्तेसमैरशैविभजेरनितिस्थितिः २८ अपुत्रेणपरक्षेत्रे नियोगोत्पादितःसुतः ॥ उभयोरप्यसौरिक्थीपिण्डदाताच धर्मतः २९॥ पिता के अनंन्तर विभाग करने लगें तो) जिस भाई का वि- चाह आदि संस्कार न भयाहो तो उसका संस्कार करके तव धन वांटे और जो विनाव्याही वहिन हो तो जिस जाति की स्त्री से उत्पन्न हुई हो उस जाति के पुत्र को जैसा अंश मिलसके वैसा एक अंश अलगकरके उसमें से चौथाई देके व्याहदेना २६ ब्रा- मण से ब्राह्मणी आदि स्त्री में उत्पन्न पुत्र वर्ण क्रम के अनुसार चार चार तीन २ दो २ एक २ भाग लें ॥ क्षत्रिय से क्षत्रिया आदि स्त्री में उत्पन्नपुत्र क्रम से तीन २ दो २ एक २ भाग पावे और वैश्य से वैश्या आदि स्त्रियोंके पुत्र क्रम से दो २ और एक एक भाग ले तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण को चारोंवर्णकी स्त्रीका अधिकार कहा है और जो उनसवों में एक एक पुत्र जनमेहों तो उस ब्राह्मण के धनके १० तुल्य भागकरे ४ ब्राह्मणी का पुत्रले ३ क्षत्रियाका २ वैश्या का और एकशूद्रा का पुत्र लेवे ऐसेही क्षत्री और वैश्यमें भी लगालो २७ जो द्रव्य विभाग के समय आपस में दवारक्खीहो और विभागहोने पीछे देखपड़े तो उस को फिर सव वरावरभागकरके वाटलें यह शास्त्रकीमर्यादाहै २८ जिस के पुत्र न हो उसने जो अपने बड़ों की आज्ञा से दूसरे के क्षेत्र (स्त्री) में पुत्र उत्पन्न कियाहोतो वहपुत्रदोनों पीजी औरक्षेत्री का पिण्डदेनेवाला भोर धनलेनेवालाभी धर्मपूर्वकहोताहे २६॥
८० याज्ञवल्क्यस्मृति स० - यस्याम्रियेतकन्यायावाचासत्येकृतेपतिःसामनेनविध नेननिजोदेतदेवरः ३० यथाविध्यधिगम्यैनांशुक्लवस्त्रांनी चित्रताम् ॥ मिथोभजेताप्रसवात्सकृत्सकहतारतौ ३१ औरसोधर्मपत्नीजस्तत्समापुत्रिकासुतः॥ क्षेत्रजःक्षेत्रजात स्तुसगोत्रेणेतरेणवा ३२ गृहप्रच्छन्नउत्पन्नोगूढजस्तुसुत स्मृतः ॥कानीनःकन्यकाजातोमातामहसुतोमतः ३३ अक्ष तायांक्षतायांवाजातःपौनर्भवःसुतः॥ दद्यान्मातापितावायं सपुत्रोदत्तकोभवेत् ३४ क्रीतश्चताभ्यांविक्रीतःकृत्रिमःस्या स्वयंकृतः॥ दत्तात्मातुस्वयंदत्तोगर्भोविन्नःसहीढजः ३५ ॥ जिसकन्याका वाग्दान होनेपर वरमरजावे तो उसकन्या को देवर (पतिका भाई ज्येठा या छोटा) व्याहे ३० और यथाविधि (अपने अंगमें घीलगाकर मौनहोके) जवतक कोई सन्तति न उ- त्पन्नहो तबतक हरएक तुकालमें उस स्त्रीको श्वेतवस्त्र पहिना कर और मन,वाणी और शरीरकासंयमकराकर एकहीवार गमन करे ३१ जो अपनी धर्मपत्नी में (विवाहितास्त्रीमें) पुत्रउत्पन्नहो वह औरसकहाताहै पुत्रिकासुत (वेटीकावेटा वा वेटीही)भी उसी के (औरसके) वरावरहै, अपनी स्त्रीमें जो सगोत्रसे वा दूसरेसेभी उत्पन्नहो वहपुत्र क्षेत्रजकहलाताहे ३२ गृहमें जो गुपचुपपुत्रजन्मे वह गूढज है, जो कन्या (वेच्याहीस्त्री) से उत्पन्नहो वह कानीन कहलाताहै और नानाका पुत्रहोताहै ३३ जोक्षतयोनि वा अक्षत योनि पुनर्भूमें उत्पन्नहोताहै वह पोनर्भव कहलाताहै जिसपुत्रको माता व पितादेदेवे वह दत्तकहोता है ३४ माता पिता जिसको वेंचदें वहक्रीतपुत्र कहलाताहे जो माता पितासे हीनहो उसको कोई लोभ दिखाकर पुत्रवनाले तो वह कृत्रिमसुत कहलाता है अपनेसे जो किसीका पुत्रहोजावे उसे दत्तात्माकहते जो विवाह करते समय गर्भ में रहाहो उसे सहोढज कहतेहे ३५॥ t ८१ याज्ञवल्क्यस्मृति स०। उत्सृष्टोगृह्यतेयस्तुसोपविद्धोभवेत्सुतः ॥ पिण्डदोश हरश्चैपांपूर्वाभावेपरःपरः ३६ सजातीयेप्वयंप्रोक्तस्तन येपुमयाविधिः ॥ जातोपिदास्यांशद्रेणकामतोंशहरोभवे त् ३७ मृतेपितरिकुर्युस्तम्भ्रातरस्त्वभागिकम् ॥ अभ्रातृकोहरत्सर्वदुहितॄणांसुताहते ३८ पत्नीदुहितरश्चै वपितरोंभ्रातरस्तथा ॥ तत्सुतागोत्रजाबन्धुशिप्यसब्रह्म चारिणः ३९ एपामभावपूर्वस्यधनभागुत्तरोत्तरः ॥ स्वर्यात स्यह्यपुत्रस्यसर्ववर्णेष्वयंविधिः ४१ वानप्रस्थयतिब्रह्म चारिणांरिक्थंभागिनः ॥ क्रमेणाचार्यसच्छिप्यधर्मभ्रा त्रेकतीर्थिनः ४१ ॥ जिसको माता पिता ने त्याग दिया हो उसे कोई ओर पुत्र यनालेवे तो वह अपविद्धसुत कहलाता है इन यारह प्रकार के पुत्रों में जो पहिले २ नहों तो उनके अनन्तर जो जो पढ़े हैं वे पिण्ड देने और धन लेने के अधिकारी होते हैं ३६ यह विधि सजातीय पुत्रों में मैंने कही यदि शुद्रदासी में भी पुत्र उत्पन्न करे तो वह पिता की अनुमति से पूरा भाग पाता है ३७ पिता मरगना हो तो उस दासी पुत्र को भाई लोग आधा भागदें और भाई नहों तथा लड़की का पुत्र (नाती )भी नहो तो वह वासी पुत्र पिता का सब धन ले लेवे ३८ जिसके किसी प्रकार का पुत्र 'नहो वह मरजाय तो उसका धन पत्नी (विवाहितास्त्री) (दुहिता) • (लड़कियां) पिता, माना, भाई उनके लड़के गोत्रज (गोती) वन्धु विरादरी शिप्य (चेला) और ब्रह्मचारी (गुरुभाई) ३६ इनमें से पहिले २ के अभाव में दूसरेरअधिकारी होतेहैं यहीनिधि सब वर्णों में जो अपुत्र मरजाय उसकी जाननी ४० बानप्रस्थ, यती और ब्रह्मचारी इनका धन क्रमसे (धर्मभ्रात्रेकतीर्थी) उसी एक आश्रम में रहनेवाला धर्म का भाई, सञ्छिष्य (अध्यात्मशास्त्र पठितचेला).और प्राचार्य ये लेवें ४१ ॥ ११ ८२ याज्ञवल्क्यस्मृति स० संसृष्टिनस्तुसंसृष्टीसोदरस्यतुसोदरः ॥ दद्यादपह चांशेजातस्यचमृतस्यच ४२ अन्योदय॑स्तुसंसृष्ठीनान्यं दर्योधनहरेत् ॥ असंसृष्ट्यविवादद्यात्संसृष्टोनान्यमात जः ४३ क्लीचोथपतितस्तजःपंगुरुन्मत्तकोजडः ॥ ॐ न्धोचिकित्स्यरोगाद्याभर्तव्याःस्युनिरंशकाः ४४ औरस क्षेत्रमास्त्वेपानिर्दोपाभागहारिणः ॥ सुताश्र्चेपांप्रभ व्यायाव_भर्तसात्कृतः ४५ अपुत्रायोपितश्चैषांभर व्याःसाधुटत्तयः निर्वास्याव्यभिचारिण्यःप्रतिकूल। स्तथैवच ४६ ॥ ॥ (जो विभक्त होकर फिर भाई वा पिता आदि के साथ धन मिलाके इकट्ठा रहता हो वह संसृष्टी का है) संसृष्टी का धन संसृष्टी लेवे संया भाई संसृष्टी मरै तो उसका धन सगा भाई जो जीता संसृष्टी है सो ले और यदि संसृष्टी उसके मरने पर पुत्र जन्मे तो ये दोनों उसे उसके पिता का भाग दे देवें४२ सापत्न भ्राता (सवतीला भाई ) जो संसृष्टी हो तो धनले पौर भसंसृष्टी हो तो न ले परन्तु सगा भाई प्रसंसृष्टी भी हो तो 'धन पावे और सापत्न भ्राता संसृष्टीभी हो तो सब धन न ले लेवे आधा सगे को भी देवे ४३ कीय (नपुंसक) पतित (पतितका पुत्र, लँगड़ा) उन्मत्त ( वोड़हा ) जड़ ( अंज्ञानी ) अन्ध और अचिकित्स्य रोग जिसको ऐसी व्याधिहो कि दवा न हो सके) इनको भाग न देना केवल भोजन वस्त्र.देना (१४ इन सवों के ओरस पुत्र व क्षेत्रज पुत्र जो निर्दीप हों तो भाग पावें ओर इनकी लड़कियों का जब तक व्याही जाकर भर्ती को सौंपी न जावें तब तक पालन करना ४५.इनकी पुत्र हीन स्त्रियों का भी चदि साधुरत्ति हों तो पालन करना ओर व्यभिचारिणी अथर्वा प्रतिकूल (कहना न मानती) हों तो निकाल देना १६॥
याशवल्क्यस्मृति स०। पितृमातृपतिमातृदत्तमध्यग्न्युपागमत् ॥ आधिवेद निकायंचस्त्रीधनन्त प्रतितम् ४७ बन्धुदत्तन्तथाशुल्कम न्वाधेयकमेवच ॥ अतीतायामप्रजसिवान्धवास्तदवानुयुः ४८ अप्रजस्त्रीधनम्भर्तुर्ब्राह्मणादिचतुर्वपि ॥ दुहितृणात सूताचेच्छेपेपुपितगामितत् ४९ दत्वाकन्याहरन्दण्ड्योव्य यन्दद्याचसोदयम् ॥ मृतायान्दत्तमादद्यात्परिशोध्योभय व्ययम् ५० दुर्भिक्षेधर्मकार्येचव्याधौसम्प्रतिरोधके । हीतस्त्रीधनम्भर्त्तानस्त्रियदातुमर्हति ५१ ॥ जो धनपिता,माता,भाई और पतिनेदियाहो,जो मातुलआदि संवन्धियोंनेव्याहकेसमय अग्निके सन्निधिौदियाहो और आधि- वेदनिक (जो धन दुसरा व्याहकरनेकेसमय पहिलीस्त्रीको उसके संतोफ्केलिये पतिदेताहै)इत्यादिक स्त्रीधनकहलातेहैं ४७ इसीप्र- कार वन्धुभोंने जो दियाहो,शुल्क(जोधनलेकर कन्या जातीहै) भौर अन्वाधेय (जोव्याहके अनन्तर भर्तृकुल या पितृकुलसे मिले) येभी स्त्रीधनकहलातेहैं और जो विनामपत्य स्त्री मरजायतो इन पूर्वोक्त सवप्रकारके धनोंको वांधवभाई भादि वांटले ४८ जो स्त्री निरपत्य मरीहो तो ब्राह्म श्रादि चारबिवाह(जो आचाराध्यायमें कहगयेहें उन)में प्राप्त स्त्रीधन पतिलेवे और इनसे दूसरेविवाहोंमें प्राप्तधन मातापितालेवें परन्तु जो स्त्रीको अपत्य जन्मेंहों तो उस की लड़की व लड़कियोंकी लड़की हरएक व्याहका मिलाहुआ धनपावें कन्याको वाग्दानकरके(देनेकहकर)पिना किसीकार- ण नदेवे तो राजाउसकी शक्ति के अनुसार दण्डले भोरजोधन घर का उठाहो वह व्याजसमेत दिलादे और जो वाग्दानकेअनन्तर कन्यामरजावे तो अपना और कन्यादाताका व्यय (खर्च)शोधन (मुजरा)देकरके जो अपनेदियेहुयेधनका शेपवचे सो बरले ५० दुर्भिक्ष(कालपड़नेमें)धर्मकार्य,रोग भोर सम्प्रति रोधक (कैदी) में जो स्वी धनपतिने लियाहो सो स्त्रीको न देने ५१ ॥
.. याज्ञवल्क्यस्मृति सः । अधिविनास्त्रियदद्यादाधिवेदनिकसमम् ॥ नदत्तस्त्रीधर यस्यैदत्तेत्वईप्रकीर्ततम्५२विभागनिहूनवेज्ञातिबंधुसाक्ष्य भिलेखितैः॥ विभागभावनाज्ञेयाग्रहक्षेत्रैश्चयौतुकैः ५३ सी मनोविवादेक्षेत्रस्यसामंताःस्थविरादयः ॥ गोपासीमाकृपा णाश्वसर्वेचवनगोचराः५४ नयेयुरेनसीमानांस्थलांगारतुप द्रुमैःगासेतुवल्मीकनिम्नास्थिचैत्याद्यैरुपलक्षितम् ५५ साम न्तावासमग्रामाचत्वारोष्ठौदशापिवा॥ रक्तस्रग्वसनाःसीमां नयेयुःक्षितिधारिणः ५६ अन्तेतुष्टथक्दण्ड्याराज्ञामध्यम साहसम्॥ अभावेज्ञातृचिहनानांराजासम्निांप्रवर्तिता ५७ जव दूसराव्याह पतिकरे तो पहिलीस्त्रीको जो स्त्रीधनदिया न हो तो जितना व्याहमेंधनलगे उतना धन देवे और बी धन दि- याहो तो आधादेवे५२ विभागका निहुनव(नाकवल)करे तो जा- तिके लोग,वन्धुलोग,साखी,विभागपत्र ओर बॅटेहुये गृह(घर)क्षेत्र (खेत) और धनसे उसको भावित (सावित)करे ५३॥ इतिरिक्थ विभागप्रकरणम् ॥ (दोगांवकीभमिकी सीमा वा एकही ग्रामके दोखेतोंकी सीमाका विवादहो तो सामन्त (पासपासके गांवों में रहनेवाले लोग,गोप,(चरवाहे)सीमाके पासका खेतजोतनेवा- ले और जो बन धूमाकरते हैं ५४ ये सब राजाको स्थल (ऊंची भूमि)भंगार (कोला)तुप(बुस)रक्ष,सेतु(पुल) बल्मीक (वेमउरि) निम्न(गड़हे)अस्थि(हडी)मोरचैत्य (पत्थरमादिके बांध)यादि से सीमाकी चिह्नाटी पतला और राजा निर्णयकरे ५५ (यदि ये कोई चिाहून न सिलें तो आसपास के गावोंके रहनेवाले व उसी गांव के पासी १८ व १० मनुष्य लालमाला और वस्त्र पहिनके शिरपर मिष्टोका टुकड़ा लेकर जहांलीमा ठहरादें वहीं निश्चितक- रना ५६जो येइंटे समझपड़ें तो राजाइनहरएकको मध्यमसाहस ५.४०पण (जो प्राचाराध्यायमें कहआयेह)का दण्डदे और जातिके लोग अथवा चिह्नाटी कोई भी न हों तोराजाभापहीठहरादे५७
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥
आरामायतनग्रामनिपानोद्यानवेश्मसु ॥ एपएवविधि
ईयोवर्षांचुप्रवहादिपु ५८ मर्यादायाःप्रभेदेचसीमातिक्रम
तथा॥ क्षेत्रस्यहरणेदण्डाअधमोत्तममध्यमाः ५९ ननिपे
ध्योल्पवाधस्तुसेतुःकल्याणकारकः ॥ परभूमिहरङ्कपःस्व
ल्पक्षेत्रोबहूदकः ६० स्वामिनेयोनिवेद्येवक्षेत्रेसेतुप्रवर्तये
त् ॥ उत्पन्नंस्वामिनोभोगस्तदाभावेमहीपतेः ६१ फाला
हतमपिक्षेत्रंनकुाद्योनकारयेत् ॥ सप्रदाप्यःकष्टफलंक्षेत्र
मन्येनकारयेत् ६२ मापानष्टौतुमहिपीशस्यघातस्यकारि
णी॥ दण्डनीयातदईन्तुगौस्तदर्दमजाविकम् ६३ ॥
यहीविधि बगीचा, बैठक गांव, पानीका स्थल (कूप तड़ाग
आदि) उद्यान (क्रीडास्थल) और घर की सीमा के विवाद तथा
वरसातके जलघहनेके स्थल के विपादमेंभीजानना ५८ मर्यादा
कईखेतोंके धीच जो सबकीसाधारणभूमि सीमा अलगानेकेलिये
छूटीरहती है उसके तोड़नेमें सीमालांघने और खेतहरने में क्रम
से अधम उत्तम और मध्यमदण्ड राजादेवे ५६ यदि कोई सेतु
और कूपभादि दूसरेके खेत में बनाना चाहे तो खेत का स्वामी
मना न करे क्योंकि इनसे पानीआदि मिलनेका उपकार बहुत
होताहै और हानि वहुतथोडीहोतीहै ६० जो स्वामीकी अनुमति
के विनाही दूसरेकी भूमिमें सेतुबनाताहै तो उसमेंजो पैदाहो सो
स्वामी भोगकरे स्वामी न हो तो राजालेये वनानेवालेको कभी
न दे ६१ जो किसीका खेतजोतनेको लेकर एकाधवार थोड़ाहल
चलाके फिर न आपजाते न और किसीसे जुतवावे तो वह खेत
स्वामी उससेछीनके दूसरेकोजोतनेकेलियेदेदेवे और उससेउतना
द्रव्य य अन्नलेवे कि जितना उसखेतमें उपजता ६२ इति सीमा
विवादप्रकरणम् ॥ जिसकी भैंस, गौ, अथवा भेड़ बकरी दूसरे के
खेतको चरजाय तो भैंसमादि के स्वामी को राजा कमसे ८४
और दो माप तानिक पणका वीसांभाग दण्ड लगावे ६३॥
.. याज्ञवल्पयस्मृति स01 अधिविन्नस्त्रियदद्यादाधिवेदनिकंसमम् ॥ नदत्तस्त्रीधन यस्यैदत्तत्वईप्रकीर्तितम्५२विभागनिनवेज्ञातिबंधुसाक्ष्या भिलेखितैः। विभागभावनाज्ञेयागृहक्षेत्रैश्चयौतुकैः ५३ सी मनोविवादेक्षेत्रस्यसामंताःस्थविरादयः ॥ गोपासीमाकृपा णाश्वसर्वेचवनगोचराः ५४ नयेयुरेनसीमानांस्थलांगारतुप द्रुमैः।सेतुवल्मीकनिम्नास्थिचैत्याद्यैरुपलक्षितम् ५५ साम न्तावासमग्रामाचत्वारोष्टौदशापिवा॥ रक्तस्त्रग्वसनाःसीमां नयेयुःक्षितिधारिणः ५६ अन्तेतुएथक्दण्ज्याराज्ञामध्यम साहसम्॥ अभावेज्ञातृचिह्नानांराजासम्निप्रवर्तिता ५७ जव दूसराव्याह पतिकरे तो पहिलीस्त्रीको जो स्त्रीधनदिया न हो तो जितना व्याहमेंधनलगे उतना धन देवे और स्त्री धन दि- याहो तो आधादेवे५२ विभागका निह्नव(नाकबूल)करे तो जा तिके लोग,बन्धुलोग,साखी,विभागपत्र ओर बटेहुये गृह(घर)क्षेत्र (खेत) और धनसे उसको भावित (सावित)करे ५३ ॥ इतिरिक्थ विभागप्रकरणम् ॥ (दोगांवकीभमिकी सीमा वा एकही ग्रामके दोखेतोंकी)सीमाका विवादहो तो सामन्त (पासपासके गांवों में रहनेवाले)लोग,गोप,(चरवाहे)सीमाके पासका खेतजोतनेवा- ले और जो वन घूमाकरते हैं ५४ ये सब राजाको स्थल (ऊंची भूमि)भंगार (कोला)तुप(बुस)वच,सेतु(पुल) वल्मीक (वेमउरि) निम्न(गड़हे)अस्थि(हडी)ोरचैत्य (पत्थरमादिके वधि)यादि से सीमाकी चिहनाटी घतलावें और राजा निर्णयकरे ५५ (यदि ये कोई चिहन न मिले तो आसपास के गावोंके रहनेवाले व उसी गांव के पासी ४८ व १० मनुष्य लालमाला और वस्त्र पहिनके शिरपर मिटीका टुकड़ा लेकर जहांतीमा ठहरादें वहीं निश्चितक- रना ५६जो येभूठे समझपड़ें तो राजा इनहरएकको मध्यमसाहस ५.४०पण (जो पाचाराध्यायमें कहलायेह)का दण्डदे मौरजातिके लोग अथया घिट्नाटी कोई भी न हो तोराजाभापहीटहरादे५७
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पाज्ञवल्क्यस्मृति स०॥
आरामायतनग्रामनिपानोद्यानवेश्मसु ॥ एपएवविधि
ज्ञेयोववुप्रबहादिपु ५८ मर्यादायाःप्रभेदेचसीमातिक्रम
तथा। क्षेत्रस्यहरणेदण्डाअधमोत्तममध्यमाः ५९ ननिपे
ध्योल्पवाधस्तुसेतुःकल्याणकारकः ।। परभूमिहरङ्कपःस्व
ल्पक्षेत्रीयहूदकः ६० स्वामिनेयोनिवेद्येवक्षेत्रेसेतुप्रवत्तये
त् ॥ उत्पन्नंस्वामिनोभोगस्तदाभावेमहीपतेः ६१ फाला
हतमपिक्षेत्रनाद्योनकारयेत् ॥ सप्रदाप्य:कष्टफलंक्षेत्र
मन्येनकारयेत् ६२ मापानष्टौतुमहिपीशस्यघातस्यकारि
णी॥ दण्डनीयातदईन्तुगौस्तदर्दमजाविकम् ६३ ॥
यहीविधि धगीचा, धैठक गांव, पानीका स्थल (कूप तड़ाग
आदि) उद्यान (क्रीड़ास्थल) और घर की सीमा के विवाद तथा
वरसातके जलयहनेके स्थल के विषादमेंभीजानना ५८ मर्यादा
कईसेसों के बीच जो सबकीसाधारणभूमि सीमा अलगानेकेलिये
छूटीरहतीहै उसके तोड़नेमें सीमालांघने और खेतहरने में क्रम
से अधम उत्तम और मध्यमदण्ड राजादेवे ५६ यदि कोई सेतु
और कूपभादि दूसरेके खेत में बनाना चाहे तो खेत का स्वामी
मना न करे क्योंकि इनसे पानीआदि मिलनेका उपकार बहुत
होताहे और हानि बहुतथोडीहोतीहै ६० जो स्वामीकी अनुमति
के विनाही दूसरेकी भूमिमें सेतुवनाताहै तो उसमेंजो पैदाहो सो
। स्वामी भोगकरे स्वामी न हो तो राजालेये बनानेवालेको कभी
न दे ६१ जो किसीका खेतजोतनेको लेकर एकाधवार थोड़ाहल
चलाके फिर न मापजोते न और किसीसे जुतवावे तो वह खेत
स्वामी उसरोचीनके दूसरेकोजोतनेकेलियेदेदेवे और उससे उतना
द्रव्य य अन्नलेवे कि जितना उसखेतमें उपजता ६२ इति सीमा
विवादप्रकरणम् ॥ जिसकी भैंस, गो, अथवा भेड़ बकरी दूसरे के
खेतको चरजाय तो भंसादि के स्वामी को राजा कमसे ८४
और दो माप तात्रिक पणका वीसांभाग दण्ड लगावे ६३॥
यावस्क्यस्माप्ति स०१
भक्षयित्वोपविष्टानांयथोक्ताहिगुणोदमः ॥ सममेपावि
वीतपिखरोष्ट्रमाहपसिमम्-६४ यावास्यविनश्येत्तुताव
इस्यात्क्षेत्रिणःफलम् ॥ गोपस्ताज्यस्तुगोमीतुपूर्वोक्तंदण्ड
महति ६५ पथिग्रामवितीतांतक्षेत्रेदोपोनविद्यते ॥ अका
मतःकामचारेचौरवद्दण्डमर्हति ६६ महोक्षोत्सृष्ठपशवःसू
तिकागन्तुकादयः ॥ पालोयेपांच तेमोच्यादेवराजपरिनु
ताः ६७ यथापितान्पशून्गोपःसायंप्रत्यर्पयेत्तथा ॥
प्रमादमृतनटाश्चप्रदाप्यःकृतवेतनः ६८॥
खेतचरके जो वहींवैठे व सोवे तोपूर्वोक्तदण्डसेदूनादण्डलेन
और विवीताघास आदि के रखनेका बड़ा उसमें भी भैंसमादि
चलीजायँ तो पहिलेही के वरावर दण्डलेना गया भोर ऊंट के
स्वामीसे भैसके तुल्य दण्डलेवे ६४ जितना अनाज अटकल से
खायेहों उतनाखेतके स्वामीकोदिलावे और गोप (चरवाहा) को
ताड़ना (शरीरदण्डदे) परन्तु पशु स्वामीसे केवल पूर्वोक्तधनही
दण्डलेना ६५ राह और गांवके पास जो खेतहों उसमें भूल से
चौपड़जाय तो दोपनहीं और जानबूझ के डाले तो चोर के
तुल्य दण्डपावे ६६ महोक्ष (जो बैल गायोंके वरदानेको छोड़ाहो
उत्सृष्ट पशु (पोत्सर्ग व किसी देवताके निमित्त छोड़ागयापशु)
दशदिनकीविआईहुई) अपने यथसे वहक के दूरदेशसे आयाहो)
और जिसका पालनेवाला न हो तथा राजा और देवसेपीडितहो
ऐसेपशु खेतखायजायँ भी तो छोड़देना दण्ड न लेना ७ गोप
(चरवाहे)को जैसा पशु सौंपाहो वह बेसाही सन्ध्याकालमेंलाफर
स्वामीको सोंपे भोर जो उसकेभूलसे पशुनष्टहोजायँ तो उसकी
मैंजूरी में पशुकामोल स्वामीको देनेकेलिये राजाकाटलेचे ६८ ॥
*
पालागशलमोत्थाइतिपाठान्तरम्
*
याज्ञवल्क्यस्पति स०॥
पालदोपबिनाशेतुपालंदण्डोविधीयते ॥अर्बत्रयोदशप
णःस्वामिनोद्रव्यसेवच६९ ग्रामेच्छायागोत्रचारोभूमिराज
वशेनवा॥ द्विजस्तृणधपुष्पाणिसर्वतःसर्वदाहरेत्७०धनुःश
तंपरीणाहोग्रामक्षेत्रांतरंभवेत् । देशतेखर्वटस्यस्यान्नगरस्य
चतुश्शतम् ७१ स्वंलभेतान्यविक्रीतंक्रतुद्रोपोप्रकाशते ।।
हनिाद्रहाहानमूल्येवेलाहीनेचतस्करः ७२ नष्टापहतमासा
यहर्तारंग्राहयनरम् ॥ देशकालातिपत्तौचगृहीत्वास्वयमर्प
येत् ७३ ॥
यदिपाल (चरवाहे) के दोपसे पशुका विनाशहो तो साढ़ेतेरह
पणराजादण्डले मोर पशुस्वामीको उपपशुकामोल दिलादेव ६६
गांवके वसनेवालोंकी इच्छासे अथवा उसभूमिकाजो राजाहोउस
कीआज्ञासेगौओंकेचरनेकेलिये कुछधरतीविनाजुतीछोड़देना और
द्विजलोगदेवपूजनेकेलिये सवस्थल (जगह) सेतृणलकड़ी औरफल
विनापूछेअपनी चीज़कीनाई+लेवे ७० गांवकेचारों ओर सौधनुप
परिमित विनजुतीधरतीछोड़के तवखेतवनावेकवट (कसवा) के
चारों ओरदोसोधनुप तथानगर (शहरकेचारोंओर चारसौधन्वा
छोड़दे ७१ इतिस्वामिपालविवादप्रकरणम् ॥ किसीचीज़जोकोई
दूसरावेचदिये वा बन्दकररखदियेहो और उसचीज़कास्वामीदेख
पावेतोअपनी चीज़लेलेवेक्रेता(खरीदनेवाला)गपचुपमोललिये हो
तोउसकोदोपहोताहै हीन(जिसकेपास उसचीज़कानको संभव
नहोउससे) एकान्तमें, वारातको अथवा थोड़ेमोलपर मोलतो
चोरकासा दण्डपावे ७२ अपनीनष्टचीज़ जिसके पास देखे उसे
स्थानपाल आदिराजमनुष्योंकोकहकरपकड़ादेवेजोदेखेकिनगीच
कोईराजपुरुषनहीं है अथवाजयतककहेंगे तवतकवहभागजायगा
तोआपही पकड़केराजपुरुपको सौंपदे ७३ ।।
* के समान ६* खर्चटभी कहते हैं ।
८८ याज्ञवल्पयस्मृति सक। विक्रेतुर्दर्शनाच्छुद्धिःस्वामीद्रव्यंन्पोदमम् ॥केतामूल म्माप्नोतितस्माघातस्यविक्रपी७४ आगमेनोपभागेननष्टं भाव्यमतोन्यथा पंचवन्धोदमस्तस्यराज्ञतेनाविभाव्यते । हतम्प्रनष्टयोद्रव्यंपरहस्तादवाप्नुयात्।अनिवेचनप्रेदण्ड सतुपण्णावतिपणान् ७६ शौलिकैःस्थानपालेनटापदत माहृतम् ॥ अक्सिंवत्सरात्स्वामीहरेतपरतोन्नृपः ७७५ णानेकशफेदद्याच्चतुरःपंचमानुपे॥माहिपोष्ट्रगवांदौौपाद म्पादमजाविक ७८ स्वकुटम्बाविरोधेनदेयंदारसुताहते। नान्वयसीतसर्वस्वंयच्चान्यस्मैप्रतिश्रुतम् ७९॥ यदिवह मोललेनेवाला बेचनेवालेको दिखलादे तो आपछूट जाताहै और वेचनेवालेसे राजादण्डले चीजके स्वामीको उसर्क चीज़दिलादे और मोललेनेवालेका दामभीफेरवादे ७४ जिसर्क चीज़हो वह आगम (लेखआदि अथवा भोगसे उसको भावित सावित)करे और जोसावितनकरसके तोजितनेकीचीज़हो उस का पंचमांश राजाउससे दण्डले ७५ जो अपनीखोगई वा चोरी गई चीज़ किसीकेहाथमेंदेखेऔरविनाराजाको निवेदनकियेहीले लेवेतो उसेछानवेपण राजा दण्डले ७६ शौक्तिक (मासूललेने वाले) वास्थानपाल (थानेदार) जो किसीकी खोगई वा चौरीगई चीज़पाकर राजाकेपासलावे तो डोंडीपिटाके अपनेकोश (भंडार) में रखदे जो वर्पकेभीतर उसका स्वामीपावेतो पावे उपरान्तवह चीज़ राजाकी होजाती है ७७ जिसके एकशफ (एकखुरवाले घोड़ायादि) खोगयेहों और फिरपावेतो राजाको चारपणदेवमन- प्यकेलिये पांचपणदेवे भैंसऊंट और गोकेलिये दोपणदेवे बकरी और भेड़केलिये पणका चौथाईदेवे ७८ इतिस्वामि विक्रयप्रक- रणम् ॥ किसीको दानकरना हो तो जितना देनेसे अपने कुटुम्ब के पालनपोपणमें घाटा न पड़े उतनादेना परन्तु स्त्री औरलड़के कादानन करना और पुत्रहोवेतो सर्वदादान न करना और जो चीज़ किसी और को देनेकही हो वह भी दान न करना ७६ ॥
है r याज्ञवल्क्यस्मृति स॥ प्रतिग्रहःप्रकाशःस्यात्स्थावरस्याविशेषतः॥देयप्रतिश्रु तंचैवदत्वानापहरेत्पुनः ८० दशैकपंचसप्ताहमासत्र्यहनाई मासिकम् ॥ वीर्जायोवाहरलस्त्रीदोह्यपुंसांपरीक्षणम् ८१ अग्नौसुवर्णमक्षीणरजतेद्विपलंशते । अष्टौत्रपुणिसीसेच ताम्रपंचदशायसि ८२ शतेदशपलादिरॊणकापीससौ त्रिके ॥ मध्येचपलादिःसूक्ष्मेतुत्रिपलामता ८३ कार्मि फेरोमवन्धेचत्रिंशद्धागःक्षयोमतः । नक्षयोनचद्धिश्चकौ शेयेवल्कलेपुच८४देशंकालंचभोगचज्ञात्वानप्टेबलावलम्॥ द्रव्याणांकुशलाव्युर्यत्तदाप्यमसंशयम् ८५॥ लेनेवालासबकेसामनेदानले तिसमें भी स्थावर (भमिमादि) को अवश्यदशके सामनेलेवे जो जिसे देनेकहाहो वह उसकोदेना हीचाहिये और जो वस्तुदेचुके उसको कभीफेरलेना नचाहियेथ. इतिदनाप्रदानिकप्रकरणम् ॥ जो वीजजो,गेहूं,धान प्रादिके बीज (लोहा बैल आदि जोयोमा ढोसक्तेहें। रत्न(मोती आदि) दोहय दुग्ध (भंसादि जोधदेतीहैं) और दाम इनके उपरान्त तोक्रमसे १०,१,५ और ७ दिन (महीना ३ दिन और १५ दिनकेभीतरही इन्हें मारखके फेरसक्ताहै इसके उपरान्त नहीं फिरते ८१ सोना आगमें तपानेसे घटतां नहीं चांदी सौपलमें दोपलघटतीहैपीतल और शीशा सौमें आठपल तांबापांच और लोहा दशपलघटताहै ८२ ऊन और कपासके मोदेसूतकी जो चीज़वनानेकोदेतो सौप- लमेंदशपलबढ़ताहै मझोलेसतकी चीज़में पांचपल और महीन सूतकी चीज़में तीनपलबढ़ताहै ८३ बूटाकाढ़नेकीचीज़ और रो- वांचांधनेमें तीसवांभागघटताहे और कौशेय(रेशमादि)तथाव- ल्कल(वृक्षकीयाल)से जो चीज़वने उसमें न कुछघटे न पढ़े ८४ देशकाल मोर उपभोग समझके उसद्रव्य के जाननेवाले जोकहें सो देनायही निश्चयहै (क्योंके सवद्रव्योंका घाटावाड़ा लिखा नहीं जासका.८५ इतिक्रीतानुशपप्रकरणम् ॥
पागवल्ययस्मृति सः। बलाहासीकृतश्चौरैविक्रीतश्चापिमुच्यते ॥ स्वामिना णप्रदोभक्तत्यागात्तनिष्क्रयादपि ८६ प्रव्रज्यावसितोराज्ञो दासआमरणांतिकम् ॥ वर्णानामानुलोम्येनदास्यंनप्रति लोमतः ८७ कृतशिल्पोपिनिवसेत्कृतकालंगुरोहे ।। अ- न्तेवासीगुरुप्राप्तभोजनस्तत्फलप्रदः८८राजाकृत्वापुरेस्था नंब्राह्मणान्न्यस्यतत्रतु॥विद्युत्तिमाहूयात्स्वधर्मःपाल्य तामिति८९निजधर्माविरोधेनयस्तुसामयिकोभवेत् ॥ से पियत्नेनसंरक्ष्योधर्मोराजकृतश्चयः ९०॥. जो बलात्कार(जवरदस्ती)सेदास (गुलाम बनायागयाहो(जि सेचोरोनेवचदियाहो जिसने अपनेस्वामीका प्राणवचायाहो और जिसने खायाहुमा स्वामीको चुकादियाहो भवथा जितनेपरबिका हो सो देदेवे तो वह दास दासता(गुलामी)से छूटजाताहै ८६ जो प्रबूज्य (संन्यास)से भ्रष्टभयाहो और प्रायाश्चन न करे तो मरण पर्यन्त वह राजाका दासवनारहताहै और उन्तम वर्णकेदास भ- धमवर्णवाले होतेहैं उलटानहीं होता ८७ अंतेवासी विद्यापढ़नेतक गुरुके घररहे वह जितने कालतक गुरूके पासरहनेका करारकर- चुकाहो चाहे उससे पहिलेही विद्यापढ़चुके परन्तु उतने दिनतक रहे और गुरू उसको भोजनदेवे और वह अपनेशिल्पका फल(जो शिल्पसे कमावे सो)गुरूको देवे ८८ राजा अपनेपुर(दुर्ग किला आदि)में स्थान बनवाके उसमें तीनोंवेद पढ़ेहुये ब्राह्मणोंको कुछ वृत्ति(जीविका)देकर बैठावे औरकहे कि अपनाधर्म(वर्णाश्रमध- म)पालनकरो ८६ राजाकी आज्ञापाकर जो धर्म अपने धर्म(श्रु- तिस्मृति से विरुद्धनहो और जो उससमयमें उचित प्राप्तभयाहो और इसीप्रकारका जो राजाने धर्मकहाहो सो भी यनसे ये लोग रक्षितकरें ६०॥ १ याज्ञवल्लयस्मात स०। गणद्रव्यंहरेद्यस्तुसंविदंलंघयेच्चयः ॥ सर्वस्वहरणंक वातंराष्ट्राद्विप्रवासयेत् ९१ कर्त्तव्यंवचनैःसर्वैःसमूहहित पादिनाम् ॥ यस्तत्रविपरीत स्यात्सदाप्यःप्रथमंदमम् ९२ समूहकार्येआयातान्कृतकार्यान्विसर्जयेत् ॥ सदानमा नसत्कारैःपूजयित्वामहीपतिः ९३ समूहकार्यप्रहितोयल्ल भेततदर्पयेत् ॥ एकादशगुणंदाप्योयद्यस्मैनापयेत्स्वय म ९४ धर्मज्ञाःशुचयोलुब्धाभवेयुःकार्यचिन्तकाः ॥ क र्तव्यंवचनंतेषांसमूहहितवादिनाम् ९५ श्रेणिनेगमपारख ण्डिगणानामप्ययविधिः ॥ भेदचैषांनृपोरक्षेत्पूर्ववृत्तिंच पालयेत् ९६॥ जोगणद्रव्य (जिसमें सबगांवभरकाखेतहो उस)कोचुरावे और जो आपसकी व राजाकी संवित (सलाह) उल्लंघनकरे उसका सब द्रव्यहरणकरके अपनेराज्यसे निकालदेवे ६१ जोसवकाहित कहे उसकी घात और दूसरे सबलोग मानें जो उसके विरुद्ध हो उसको प्रथम साहसका दण्डदेना १२ जो सबके कार्यकेलिये मायेहों उनका काम होचुकनेपर दानमान और सत्कार करके राजांविदाकरे ६३ समूहकार्य (सबके काम) के लिये जो भेजा गया उसने जो पायाहो सो सब भेजनेवालों को देदेवे यदि अप. नेही से न सोंपे तो ग्यारहगुना उससे लेना ६४ धर्म जाननेवाले पवित्ररहने वाले और लोभीनहों ऐसे कार्यविचारके बनाने चा- हिये मोर उनकी बात दूसरेलोगोंको माननी चाहिये ६५. श्रेणी (जो एकही व्यापार के करनेवालेहै) नेगम (वेदके मानने वाले) पाखण्डी (वेद न मानने वाले) और गण (जो शास्त्रविद्या भादि एकही कामसे जीवें) इनसवोंकी भी यही विधिहै और इनकेभेद . (धर्मव्यवस्था) की रक्षा राजाकरे तथा उनकी पूर्ववृत्तिकापालन भी करे । इतिसंविध्यतिक्रमप्रकरणम् ॥
. याज्ञवल्क्यस्मृति सः। गृहीतवेतनःकर्मत्यजन्विगुणमावहेत्॥अगृहीतेसमंदा प्योभृत्यैरक्ष्यउपरकरः ९७दाप्यस्तुदशमभागंवाणिज्यपं शुशस्यतः॥ अनिश्चित्यभृतियस्तुकारयेत्समहीक्षिता ९८ देशकालंचयोतीयालाभंकुचियोन्यथा॥ तत्रस्यात्स्वामि नश्छंदोधिकंदेयंकृतधिक ९९ योयावत्कुरुतेकर्मतायत्तस्य तुवेतनमाउभयोरप्यसाध्यं चेत्साध्यंकुर्य्यायथाश्रुतम् २०० अराजदैविकंनष्टम्भांडंदाप्यस्तुवाहकः॥प्रास्थानविघ्नक चैवप्रदाप्योद्विगुणांभृतिम् १ प्रक्रान्तेसप्तमभागंचतुर्थप थिसंत्यजन् ।। भृतिमर्द्धपथेसर्वांप्रदाप्यस्त्याजकोपिच २ ॥ वेतन(मजूरी) लेकर जोकामनकरे तो राजा उससे दूनादिलावे और वेतन बिनालियेहीकामकरनास्वीकारकरके फिरनकरेतोजि- तनावेतन उसकामकाहोउतना उससेलेवे भृत्यलोगउपस्कर(ो- जार) कीभीरक्षाकरें९७जोमॅजूरीठहरायेविनाही कोईवनिज,पशु व अनाजकाकामकरावे तो उससेजितनालाभउसब्योपारमेंहोउस 'कादशांशुभृत्यकोराजादिलावेजोभृत्यदेशऔरकालकाउल्लं- धनकरेऔरलाभसेजोधाटाकरेतोउसकेवेतन(मॅजूरी)देनेमेस्वामी कीइच्छापरंतुजोदेशकालकीचतुराईसे अधिकलाभकियाहोतोउस भृत्यकोवेतनअधिकदेना६६ (यदिएकहीकामकोदोमनुप्यकरेतो) जोजितनाकामकरेउसेउतनावेतन(मंजूरी देनाटोनसअसाध्यहो (नहोसकाहो)तो जितनोसेहोसके उनकोकहीहुईरीतिसेवेतनदेना २००जोजोभांड(वर्तन)राजाऔर दैवकतउत्पातके विनाहींनष्टभ- याहो वहवाहक(ढोनेवाले)सेलेनाऔरजोयात्रामेंविघ्न(वाधा)डाले उससेदूनीभृति(मैजूरी)लेनी १ जोयात्राकेमारंभमेंभृतिछोड़नेलगे उससेसातवांभाग(हिस्सा)मजुरीकालनाजोथोड़ीदूरचलकेछोडेउ- ससेचौथाभागोरजोआधीराहमेंछोडेउससेसारीमजूरीलेनाओर. छुड़ानेवालेसेभीइसीप्रकारदिलाना२॥इतिवेतनादानप्रकरणम्॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ ग्लहेशतिकदृद्धेस्तुसभिकःपंचकंशतम्॥ गृह्णीयात कितवादितराद्दशकंशतम् ३ ससम्यक्पालितोदद्याद्राज्ञे 'भाग्यथाकृतम् ॥ जितमुद्गाहयेज्जेत्रदद्यात्सत्यंवचःक्षमी? प्राप्तेनृपतिनाभागेप्रसिद्धधर्तमण्डले ॥ जिससभिकेस्था नेदापयेदन्यथानतु ५ द्रष्टारोव्यवहाराणांसाक्षिणश्चतए वहि ॥राज्ञासचिह्ननिर्वास्याःकूटाक्षोपधिदेविनः६ चूतमे कमुखंकायंतस्करज्ञानकारणात् ॥ एषएवविधिज्ञेयःप्राणि द्यूतसमाहये ७ सत्यासत्यान्यथास्तोत्रैन्यूँनांगन्द्रियरोगि णाम् ॥क्षेपंकरोतिचेद्दण्ड्यःपणानत्रयोदशान् ८॥ . -. ग्लह (जुआके खेल में जो सौरुपयेजीते उससे सभिक (फड़वा- ला)पांचरुपये सैकड़ेले और जो सौसे अधिकजीते उससे दशवां भागले ३ और वह(फड़वाला)जो भलीभांति राजासे रक्षितभया हो तो जो करार राजाको देनेकाकियाहो सो देदेवे और जीतने वालेको जीत दिलादेवे और जुआखलनेवालेको विश्वास के लिये क्षमाशीलहोके सत्यवचन देवे ४ जव राजाअपनाभाग पाचुकाहो और धूर्तमण्डल(जुभाखलनकीजगह)प्रसिद्धहो तो सभिक(फड़- वाले)के सामने जिसने जो जीताहो उसको उतना दिलादेवे इस से अन्यथाहो तो न दिलावे ५ ऐसे विवादके देखनेवाले और साखी भी वही(जाकेखलनेवालेहों)होतेहें(नकि जैसा कहिमाये हैं वेदशास्त्रपढ़े इत्यादि)और जो कपटसे खेलनेवालेहैं उन्हें राजा श्वप आदिसे माथेमें दगवाकर अपनेराज्यसे निकलवादे ६ चोरों को पहिचानने के लिये सव जुआरियोंका एकप्रधान बनानाचा हिये और जुभाजो प्राणियों (मेढ़ालड़ाना)आदिसेकहाताहै उसमें भी यही विधिजानना ७ इतियूताख्यम्प्रकरणम् ॥ जो किसीअंग भंगवाले व रोगी को मंत्री झूठी वातोंसे अथवा व्यंगवोलने (ता. नामारनेसे)चिढ़ावे तो साढ़ेतेरहपण राजा उससे दण्डलेवे ८.॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सः। उद्गुणैहस्तपादेतुदशविंशतिकौदमौ ॥ परस्परंतुसर्वेप शस्त्रेमध्यमसाहसः २० पादकेशांशुककरोल्लुंचनेपुपण न्दश ॥ पीडाकशुकावेप्टपादाध्यासेशतंदमः २१ शं णितेनविनादुःखंकूर्वन्काष्ठादिभिर्नरः ॥ द्वात्रिंशतपणान्द ण्ड्योद्विगुणदर्शनेसृजः २२ करपाददतोभंगेछेदनेकर्णन शयोः ॥ मध्योदंडोंबणोद्भदेमृतकल्पहतेतथा २३ चेष्टाम जनवाग्रोधेनेत्रादिप्रतिभेदने ॥ कन्धरावाहुसक्थ्नांचभंगे मध्यमसाहसः २४ एकघ्नतांबहूनांचयथोक्ताद्विगुणादे मः ॥ कलहापहृतंदेयंदण्डश्चद्विगुणस्ततः २५ ॥ अपने समान जातिवाले को मारने के लिये जो हाथ व पांच उठावे तो सववौँको क्रमसेदश और वीसपणदण्डदेनायदिशस्त्र उठावे तो मध्यम साहसका दण्डदेना२०जो पांव,केश,वस्त्र और हाथइनमें से कोई एकपकड़के खींचे तो दशपण दण्डलेना और जो कपड़े से लपेट बहुत दवाकर पांवसे मारे व खींचे तो सौ पणदण्डलेना२१जो काठ प्रादिसे ऐसामारे कि रुधिर न-निकले तो बत्तीसपण उससे दण्ड लेना और जो लोहू देखपड़े तो दूना लेना २२ जो हाथ, पांव और दांत तोड़दे, नाक व कान काटले फोड़ाकुचलदे और अधमरा करने के समान मारे तो उससे म- ध्यमसाहसका दण्डलेना २३ चलना, खाना और बोलना किसी का रोकदे आंख व जीभमें चोटदे तथाकंधा,वाहु और मोटीजांघ तोड़ दे तो उसको मध्यमसाहसका दण्डदेना २४ कई मनुष्य मिलके एकको मारपीटें तो जिस थपराधमें जितनादण्ड कहाहे उसका दूना उन हरएकसे लेना और जो चीज़ कलह में चुराली हो उसको दूनादण्ड राजालेवे और वहचीज़ भी स्वामीको दिला देनी चाहिये २५॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सः । दुःखमुत्पादयेद्यस्तुससमुत्थानजव्ययम् ॥ दाप्योदण्डंच योयस्मिन्कलहेसमुदाहृतः २६ अभिघातेतथाछेदेभेदेकु ड्यावपातने ॥पणान्दाप्यःपंचदशविंशतिंतवयंतथा २७ दुःखोत्पादिगृहेद्रव्यंक्षिपन्प्राणहरंतथा ॥ पोडशाधःपणा न्दाप्योद्वितीयोमध्यमंदमम् २८दुःखेचशोणितोत्पादशाखां गच्छेदनेतथा ॥दण्डःक्षुद्र पशूनांतुद्विपणप्रभृतिःक्रमात् २९ लिंगस्यछेदनेमृत्यौमध्यमामूल्यमेवच ॥ महापशूनामेतेपु स्थानेपुद्विगुणोदमः ३० प्ररोहिशाखिनांशाखास्कन्धसर्व विदारणे ॥ उपजीव्यहूँमाणांचविंशतेर्द्विगुणोदमः ३१ ।। जो लड़ाईकरके किसीको दुःखपैदाकरे तो उसकी औषध में जो द्रव्यलगे सो और जिस दण्डयोग्य अपराधहोउतना दण्डभी देवे २६ जो कोई किसीकीभीत (दीवार) में धक्कादेछेदकरदे और वीचमेंगिरादे तोक्रमसे पांच,दश औरवीसपणदण्डदे और यदि सारीहीगिरादे तोपेंतीसपणदण्ड और उसके बनानेमें जोलगे सो देवे २७ जो किसीकेघरमें दुःखपैदाकरनेवाली व प्राणलेनेवाली चीज़ कोईफेंके तो उससेक्रमसे पहिले में सोलहपण और दूसरे (जीवलेनेवाली)में मध्यम साहसकादण्डदेना २८ छोटेछोटेपशु- ओं (बकरीहिरणमादि)कोजोताइनकरे,ऐसामारोकि रुधिरनिकल आवे,निर्जीवअंग(सींगादि) काटे अथवा सजीवअंग तोड़दे तो क्रमसे दो,चार,छः और माठपणदण्ड देवे २६ और जो उनके लिंगकाछेदनकरे व मारडाले तो स्वामीको उनकामोलदे औररा- जाको मध्यमसाहसकादण्डदे परन्तु जो महापशु (घोड़ाआदि)के पूर्वोक्त अंगोंकाभंगकरे तो दूनादण्डदेव ३० जिनक्षोंकी कलम लगसक्तीहै ऐसे वृक्षोंको वा जिनवृक्षोंकेद्वारा मनुप्यकी जीविका चलसके उनकीशाखा (डाली)स्कन्ध(पेड़)अथवा मूलजड़काटै तो क्रमसे वीस चालीस और अस्सी पण दण्ड देवे ३१॥
याज्ञवल्वपस्मृति स०। अभिगन्तास्मिभगिनींमातरंवातवेतिह॥ द्राजापंचविंशतिकंदमम् ९ अर्योधर्मे पुद्विगुणःपरस्त्रीपूत्तम पुच ॥ दण्डप्रणयनकायंवर्णजात्युत्तराधरैः १० प्रातिला म्यापवादेपुद्विगुणत्रिगुणादमाः ॥ वर्णानामानुलोम्येनत स्माददिहानितः ११ बाहुग्रीयोनेत्रसक्थिविनाशेवाचिके दमः॥शक्तस्तदर्दिकःपादनासाकर्णकरादिषु १२ अशा स्तुवदन्नेवेदंडनीयःपणान्दश॥ तथाशक्तःप्रतिभुवंदाप्यःक्षे मायतस्यतु १३ पतनीयकृतेक्षेपेदण्डोमध्यमसाहसः॥ उ पपातकयुक्ततुदाप्यःप्रथमसाहसम् १४॥ जो मा बहिनको गालीदेवे तो उससे पच्चीसपण राजादण्डले अपनेसछोटीजातिको जोगालीदे तोजितनाकहाहै उसकाआधा दण्डदे और अपनेसे पड़ीजाति वा पराई स्त्रीको गालीदे ती दूना दण्डदे इसीप्रकार वर्ण और जाति की उँचाई निचाई देखकर दण्डकी कल्पना करनी चाहिये १० ब्राह्मण मादि वर्णमें जो उलटा छोटा बड़ेको अधिक्षेप(गालीदेवे)तो दूना तिगुना आदि दण्डदेना और आनुलोम्यसे(वड़ीजातिवाला छोटीजातिवालेको) अधिक्षेप(गालिप्रदान)करें तो आधाभाधा घटालेजाना ११ जो मुंहसे कहे कि तेरी भुजा,गला,आंख और हड्डी तोड़डालेंगे तो सो पणदण्डलेना और पांव नासिका कान हाथ आदि तोड़नेकहेतो उसका माधा ५० पणलेना १२ अशक्त(रोगी)जो पूर्वोक्तवातेंकहे तो उससे दशपण दण्डलेना और जो रोगीको कोई समर्थमनुष्य उक्तप्रकार से(वाहुआदितोड़नेकहे)तो वह सौपणदण्ड भोरउसके क्षेम(कुशलतासे)रहनेकेलिये प्रतिभूमी (जामिनभी) देवे १३ जो ऐसा माक्षेपकरे(तुहमतलगावे)कि जिसले पतित (जातिवाहर)हो नेका सम्भवहो तोमध्यमसाहसकादण्ड(जोपहिलेभध्यायमें कहि. प्राये हैं)देना और उपपातक सहित आक्षेपकरे तो प्रथम साहस का दाड देना १४॥
: पाश्वल्पपस्पति स. विधनपदेवानांक्षेपउत्तमसाहसः ॥ मध्यमोजातिपू गानांप्रथमोग्रामदेशयोः १५ असाक्षिकहतेचि युक्तिभि इचागमेनच ॥ द्रष्टव्योव्यवहारस्तुकूटचिह्नकृतोभयात्१६ भस्मपंकरजःस्पर्शेदण्डोदशपणःस्मृतः ॥ अमेध्यपार्णि निष्ट्यूतस्पर्शनेद्विगुणःस्मृतः १७ समेष्वेवंपरस्त्रीपुद्विगुण स्तूत्तमेषुच ॥ हीनेष्वर्ददमोमोहमदादिभिरदण्डनम् १८ विप्रपीडाकरंछेद्यमंगमब्राह्मणस्यतु ॥ उदूर्णेप्रथमोदण्डः संस्पर्शतुतदार्दिकः १९ ॥ तीनों वेद जानने वाले को, राजा और देवताको आक्षेप करे तो उत्तम साहस दण्ड देना और जो जाति तथा समूह को 'माक्षेप लगाते उनसे मध्यम साहस तथा जो गांव और देश को भाक्षेप देते उनसे प्रथम साहस दण्ड लेवे १५ ॥ इतिवाक्पारु- प्यम् ॥ विना साक्षी दियेही कोई कहे कि हमें अकेले में किसीने मारा तो चिह्न (स्वरूप)युक्ति( कारण प्रयोजन आदि) और भागम (जनप्रवाद ) विना साक्षी हारदेखे क्योंकि झूठा चिह्न (निशानी) चनालेने की शंका रहती है इसलिये परीक्षा भी करनी चाहिये १६ जो भस्म (खाक) पंक (कीचड़) और रज (धूलि)दूसरेपर फेंके तो उससे दशपण और जो अमेध्य (थूकख- खार मादि)पाणि( एंडी)भौर कुल्ली करके किसी को मारे तो "उससेदूना(२०पण)दण्ड लेना १७ यहदण्ड अपनी वराबरवालों में जानना और उत्तम जातिको परस्त्री के विषय में दूनादण्ड देना छोटीजातिके विषयमें आधादएउ देना और जो मोह(भल) अथवा मदसे (नशापीने से वेहोश होकर ) माक्षेप किये हो तो कुछ दण्ड न देना १८ ब्राह्मणको किसी दूसरी जातिवाला जिस भंग से दुःखदे उसका वह अंग छेद न करवा देना जो मारने के लिये शस्त्र उठावे तो प्रथम साहस का दण्ड देना और शस्त्र छुकर मोड़दे तो आधा दण्ड देना १६ ॥
१८ याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ चैत्यश्मशानसीमासुपुण्यस्थानसुरालये ॥ जातुद्माणां द्विगुणोदमोटक्षेपुविश्रुते३२गुल्मगुच्छापलताप्रतानोपाधि वीरुधाम् ॥ पृचस्मतादर्ददण्डःस्थानपूक्तेपुकतने३३ सामा न्यद्रव्यप्रसभहरणात्साहसंस्मृतम् ॥ तन्मूल्याद्विगणोद्र ण्डोनिनवेतुचतुर्गुणः ३४ यःसाहसंकारयतिसदाप्योद्विगु णंदमम्॥यश्चैवमुक्ताहंदाताकारयेत्सचतुगुणम् ३५अर्ध्या क्रोशातिक्रमकद्भातृभा-प्रहारदासंदिष्टस्याप्रदाताचसं मुद्रगृहभेदकृत ३६सामन्तकुलिकादीनामपकारस्यकारकः पंचाशत्पणिकोदण्डएपामितिविनिश्चयः ३७॥ जो वृक्षचैत्यश्मशान (मशान व मरघट सीमा (सरहद्द)पुण्य स्थान (तीर्थस्थल)और देवताके स्थानमें लगाहो अथवा प्रसिद्ध वृक्षहो उसकी शाखामादि काटे तो दूनादण्डलेना ३२ गुल्म(जो लताधनीहो लम्बीनहो जैसे मालती)गुच्छ(जो सीधीनहो)जैसे(क रण्ड) प(छोटीटहनीवाली)जैसे(कनेल)और लता (दाख मादि) इनकी शाखामादि पूर्वोक्त स्थानों में काटे तो आधादण्ड जानना ३३ इतिदण्डपारुष्यप्रकरणम् ॥ परायेकीचीज़ बलात्कार (जोरा- वरी)ले लेना इसको साहसकहते हैं जितने की वीज़लियेहोउससे दूनादण्डदेवे और यदि निहुनव(नाकबूल)करतोचौगुनादण्डदे ३४ साहस जो दूसरेसे कराताहै उसको दुनादण्डदेना और जो यह कहे कि जितना धनलगेगा हमगे नूकर उसको चौगुनादण्डल- गाना ३५ जो पूज्यकापूजननकरे वा प्राज्ञा न माने,भाई की स्त्री को मारे,सन्देशा न कहे,तालातोड़े ३६ पडोसी ओर कुलिक(अ. पने कुल में उत्पन्न भादि) का अपकारकरनेवालाहो इनसबों को पचास २ पण दण्ड देना यह निश्चय है ३७ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स स्वच्छन्दविधवागामीविक्रुष्टनाभिधावकः ॥ अकारणे चविक्रोटाचण्डालश्चोत्तमान्स्टशेत् ३८ शद्रप्रव्रजितानां चदेवेपित्र्येचभोजकः॥अयुक्तंशपथंकुर्वन्नयोग्योयोग्यकर्म छत् ३९ पक्षुद्रपशूनांचस्त्वस्यप्रतिघातकृत् ॥ साधा रणस्यापलापीदासीगर्भविनाशकृत् ४० पितापुत्रस्वसृभ्रा तृदम्पत्याचार्यशिप्यकाः ॥ एपामपतितान्योन्यत्यागी चशतदण्डभाक् ४१ वसानस्त्रीन्पणान्दण्ड्योनेजकस्तुप रांशुकम् ॥ .विक्रयावक्रयाधानयाचितेषुपणान्दश १२ पितापुत्रविरोधेतुसाक्षिणांत्रिपणोदमः ॥ अन्तरेचतयोर्यः स्यात्तस्याप्यष्टगुणोदमः ४३ ॥ जो जान बूझके विधवा स्त्रीसे गमन करे कोई दुःसी होकर पुकारे और न दौड़े विना प्रयोजन जो पुकारे और चाण्डाल हो- कर ऊंची जातिको लूले ३८ शूद्र और प्रव्रजितं (सन्यासी आदि) को जो देव और पितृकर्म में खिलावे, अयुक्त (करनेयोग्य नहोऐ. सा) शपथ करे, जिस काम के योग्य न हो उसे भी करे ३६ वेल और छोटेपशुओं के पुंस्त्वका विनाशकरनेवाला, साधारण (जि- स में बहुतेरों का स्वत्व हो ऐसी) वस्तु को छिपाने वाला दासी का गर्भ गिरानेवाला ४० इन सबों को ओर पिता,पुत्र,पति, भाई स्त्री,पुरुष,माचार्य और शिष्य ये पतित नहीं और इन्हें जो छोड़ दें उनको भी सौ रुपये दण्ड लगाना ४१ इतिसाहसप्रकरणम् ॥ धोबी पराया वस्त्रपहिने तो तीनपण दण्डलेना और जो वेचले या अवक्रयकर (भारेपर)दे मंगनीदे अथवा बन्धक रखदे तो दश पण दण्ड देना ४२ पिता और पुत्रके विवाद में जो साखी बने उससे तीनपण दण्ड देना और जो उनका विचवर्ड हो उसको चौबीस पण दण्ड देना ४३ ॥
fi
१००
याज्ञवलयस्मृति स०
तुलाशासनमानानांकूटकनाणकस्यच ॥ एभिश्चव्य
हत्तीयःसदाप्योदममुत्तमम् ४४ अकृटकटकम्बृतकुटं
श्चाप्यकूटकम् ॥ सनाणकपरीक्षीतुदाप्यउत्तमसाहर
म् ४५ भिपमिथ्याचरन्दण्ज्यस्तिर्यक्षुप्रथमेदमम् ॥ मृ
नुपेमध्यमंराजपुरुषेपत्तमंदमम् ४६ अवध्ययश्चवध्नाति
वदयश्चप्रमुच्यति ॥ अप्राप्तव्यवहारंचसदाप्योदम
तमम् ४७ मानेनतुलयावापियोंशमष्टमकहरेत् ॥
ण्डंसदाप्योद्विशतंदौहानौचकल्पितम् ४८ भेपजस्नेहल
वणगन्धधान्यगुडादिपु ॥ पण्येपुप्रक्षिपन्हीनंपणान्द
प्यस्तुषोडश ४९ ॥
जो तुला(तराजू)शासन (राजाकी आज्ञा मान) (तोला) और
नाणक (मुद्राचिह्नितद्रव्य) को घटबढ़ वनावे और जो उनको
काम में लाने उनको उत्तम साहसका दण्ड देना ४४ जो नापक
की परीक्षा करने वाला निकम्मे को अच्छा और भलों को
निकम्मा कहे तो उसे भी उत्तम साहस का दण्ड देना १५ जो
वेद्य पशु पक्षियों को झूठी औषध वा उलटी औपध देवे तो
प्रथम साहस दण्ड देना मनुष्य को दे तो मध्यम साहस का
दण्ड देना और राजा के मनुष्य को दे तो उत्तम साहस का
दण्ड देना ४६ जो वांधने के अयोग्य को राजा की आज्ञा विना
वांधे बांधने के योग्य को छोड़दे और चालक को वा पराधीन को
बांधे तो उससे उत्तम साहस का दण्ड दिलाना ४७ तापने वा,
तोलने में जो पाठबांभाग चीज़ का चुराले तो उससे दोसो पण
दण्ड लेना और इससे कम व अधिक चुराये तो उसी रीति से
कल्पना कर घटा बढ़ा लेना ४८ औषध चिकनी, लवए
सुगंध, धान्य और गुड़ादि में जो कुछ निकम्मी चीज़ मिलादे
• तो.सोरहरण दण्ड लेना ४६ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति म०।
मृचर्ममणिसूत्राय काष्ठवल्कलवासंसाम्॥अजातौजाति
करणेविक्रेयाप्टगुणोदमः ५० समुद्र परिवर्तचसारभांडंचक
त्रिमम् ॥ आधानविक्रयवापिनयतोदण्डकल्पना ५१ भिन्ने
-पणेतपंचाशत्पणेतुशतमुच्यते॥द्विपणोद्विशतोदण्डोमूल्यर
द्वौचद्धिमान् ५२ संभूयकुळतामर्थसबाधंकारुशिल्पिना
म् ॥ अर्घस्यहासंदिवाजानतोदमउत्तमः ५३ संभूयवणि
जोपण्यमनघेणोपरुन्धताम्॥विक्रीणतांवाविहितोदण्डउत्त
मसाहसः५४॥
मिट्टी,चाम,मणि,सूत्र,लोहा,काठ,क्षकाछिलकाऔरवस्वाइन
अधमसे उत्तम बनाके वेंचेतो जितने पर बेंचेहो उससे अठगुना
दण्डलेना ५० समुद्र (जो चीज़ ढकीहो जैसे पेटारी आदि)उस
को जो अपने हस्त लाघव (हथचलाकी = हथफेर)से अदलबदल
करदे भोर कस्तूरी आदि जो कोई बनाकर रक्खे वा बेंचे तो उस
को आगे लिखाहुआ दण्ड देना ५१ जो पणसे कम तोलवाली
बनावट की चीजको बन्धक रक्खे व बेंचे तो पचासपण दण्डउसे
देना पणभरकी चीजवन्धकधरे व बेंचे तो सौसौ पणभरमें दोसौ
पण दण्डदेना इसी रीति से जितना मोल बढ़ताजाय उतनाही
दण्ड बढ़ाते जाना ५२ यदि वणिज (वनियां) लोग जो राजाने
भावठहरादियाहै उसकी घटतीवढ़ती जानतेभीहों और आपसमें
गुट्टवांध अपने लाभकेलिये दूसराएक ऐसाभाव ठहरावें कि जिस
सेकारु (रजकआदि) और शिल्पि (चित्रकारमादि)को पीडाहो
तो उनको उत्तम साहस का (१००० पण) दण्डदेना ५३ जो
वनियां आपस में एकड़ा करके अच्छी चीजको थोड़े मोलपर वि.
कनेके लिये रोंकरखें अथवा छोटी चीज को बड़े मोल पर बेंचे
तो भी उत्तम साहस का दण्डटेना ५४ ।।
१०२ याज्ञवल्क्यस्मृति स०। राजनिस्थाप्यतेयोर्घःप्रत्यहतेनविक्रयः ॥ कयोवानिस्त्र वस्तस्मादणिजांलाभकृत्स्मृतः ५५ स्क्देशपण्येतुशतंवणि ग्गृणीतपंचकम्॥दशकंपारदेश्येतुयःसद्यःक्रयविक्रयी५६ पण्यस्योपरिसंस्थाप्यव्ययंपण्यसमुद्भवम् अर्घोनुग्रहकृत्का र्यःक्रेतुर्विक्रेतुरेवच ५७गृहीतमूल्ययःपण्यक्रेतुनॆवप्रयच्छ ति॥ सोदयंतस्यदाप्योमौदिग्लाभवादिगागते ५८ विक्री तमपिविक्रेयंपूर्वक्रेतर्यगृह्णति ॥ हानिश्चेत्तदोपेणकें तुरेवहिसाभवेत् ५९ राजदेवोपघातेनपण्येदोषमुपागते । हानिर्विक्रेतुरेवासायाचितस्याप्रयच्छतः ६०॥ जो राजा भावठहरादे उसीसे प्रतिदिन क्रयविक्रय (खरीदना और वेंचना) करें उससे जो कुछ शेषवचजाय वही वनियां लोग अपना लाभ समझे नकि अपनेमनकाभाव बनालें ५५अपने देश की चीज जो वनियां झटपटयेंचे तो पांचरुपयेसेकड़ेलाभ(फाय- दा)लें और दूर देशकी चीज बेंचे तो दशरुपये सेकड़ाले ५६ जो पण्य (सौदा)का मोल और व्यय (खर्च)लगाहो दोनों गिनलेउस से कुछ अधिक लाभ वेंचने और लेनेवाले कोहो ऐसा विक्री का भाव राजाठहरावे ५७ जोमोल (दाम) लेकर पण्य (सौदा)क्रेता (खरीदनेवाले)को नहींदेता तो उससे राजा सोय (व्याजसमेत) दिलादेवे और जो मोललेनेवाला दूर देशसे भायाहो तो जितना उसको अपने देश में लेजाकर वेंचने से लाभ होता वहभी उसे राजा दिलादेवे ५८ यदि पूर्वक्रेता (पहिले मोल लेनेवाला) पण्य (सौदा) न ले तो दूसरेके हाथ बेंचदेना और जो क्रेता (खरीदने वाले) के योग्य से उस पण्य सौदा में हानि हो तो वहखरीदने वालेही की होती है ५६ मोललेने वाला मांगताहो और चने, बाला न देताहो इसी अन्तर में जो वह चीजकुछ विगड़जाये तो बेंचने वाले की हानि समझना ६० ॥ .
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ अन्यहस्तेवविक्रीतदुष्टंवादुष्टवद्यदि ॥ विक्रीणीतेदम स्तत्रमूल्यात्तुहिगुणोभवेन् ६१ क्षयंटविंचवाणिजापण्याना मविजानता || क्रोत्वानानुशयःकार्यःकुर्वन्पड्भागदण्ड भाक् ६२ सामवायेनयणिजांलाभार्थकमकुर्वताम् ॥ ला भालाभौयथाद्रव्यंयथावासम्बिदाकृतौ ६३ प्रतिपिदमना दिष्टंप्रमादाद्यञ्चनाशितम् ॥ सतहद्याद्विप्लवाचरंक्षितादश मांशभाक् :६४ अर्घप्रक्षेपणादिशंभागंशुल्कनृपोहरेत् ॥ व्यासिद्धराजयोग्यंचविक्रतिराजगामितत् ६५ मिथ्यावद परीमाणंशुल्कस्थानादपासरन् ॥ दाप्यस्त्वष्टगुणंयश्च सव्याजक्रयविक्रयी६६॥ जो एककेहाथ विकीचीजको दूसरेकेहाथवेंचदे अथवा निक- म्मी चीजको अच्छीवनाकेवेंचे तो मोलसेदूनादण्ड उसको राजा लगावे ६१ जो वणिकपण्य(सौदा की हानिलाभ न जाने तोमोल लेकर उसमें सन्देहकरके फेरा फेरी न करे यदिकरे तो छठाभाग उसमेंदण्डलेना६२ इतिविक्रीयासम्प्रदानम् ॥ समवायसे (इकट्ठे होकर) जो वनियां अपनेलाभकेलिये कोई कामकरे तो अपने २ द्रव्यके अनुसार लाभालाभ (घटीमुनाफा) उठावे अथवा जैसी सविद (सलाह) करली हो तैसा उठावे ६३ उनमेंसे यदिकोई जो वात वजितकीगईथी उसकेकरनेसे व औरोंकी सम्पत्ति विनाही. किसीवात के करनेसे कोई चीज़ नष्टकरदे तो वह उसको भरदे और जो कोई देवीसेवचावे तो उससे दशवांभागपाये ६४ भाव ठहरानेके कारणसे घीसांभाग राजा शुल्क (महसूल) लेवे और जो चीज़ बेचनेकी मनाकीगईहो अथवा राजाके योग्यहो तो वह दुसरेकेपास विकनेपरभी राजालेलेवे ६५ जो शुल्क(महसूल)देने के भयसे तोलकमतीयतावे शुल्कस्थान(महसूलकीजगह)से भाग जावे और जिसकेलिये दोमनुष्योंका विवाद (झगड़ा) होरहाहो ऐसीचीजको मोलले वेचे तो इन्नम्भवोंसे गठगनाटगडलेना En :
पासवल्क्यस्मृति सः ।
तरिकःस्थलजंशुल्कंगृह्णन्दाप्यःपलान्दश ॥ ब्राह्म
णप्रातिवेश्यानामेतदेवानिमंत्रणे ६७ देशान्तरगतेप्रेतेद्र
व्यंदायादवान्धवाः ॥ ज्ञातयोव्याहरेयुस्तदागतास्तैर्विना
नृपः ६८ जिमंत्यजेयुनिर्लाभमशक्तोन्येनकारयेत् ॥ अने
नविधिराख्यातऋत्विकार्पककम्मिणाम् ६९ ग्राहकैह्यते
चोरोलोप्त्रेणाथपदेनवा ॥ पूर्वकर्मपराधीचतथाचाशुद्ध
वासकः ७० अन्येपिशंकयाग्राह्यानातिनामादिनिह्नवैः
द्यूतस्त्रीपानशक्ताश्चशुष्कभिन्नमुखस्वराः ७१. ॥
जो नौकाकाशुल्क (महसूल) लेनेवालाहै वह जोस्थल(सड़क)
का शुल्कलेवे तो दशपणदंडदे और पड़ोसी ब्राह्मणको जो श्राद्ध
आदि में निमंत्रण (नेवता) न दे तोभी यही दंड देवे ६७ यदि
इकट्ठा व्यापारकरनेवालों में से कोई दूरदेशजाके मरजावे तो
उसकेदायाद (पुत्रआदि) बांधव (ममेराभाईआदि)अथवा जाति
के लोगधाकर उसकामंशलेवें औरइनमेंसे कोईन आवे तो राजा
लेवे६८ इनइकट्ठा व्यापारकरनेवालोंमेंसे जोजिमहो(ठगहारी
करे) उसको कुछलाभ न देकर अपनीसंगतिसे निकालदेवे और
जोप्रशक्तहो वह अपनाकाम दूसरेसेकरावे इसीसे भत्विज मोर
खेतीकरनेवालोंके कामकरने की भी रीति समझलेना ६६ इति
सम्भूयसमुत्थानम्॥ ग्राहक (राजपुरुप) लोग जिसको सवमनुष्य
चोरकहें, जिसके निकट चोराईहुई चीज़की कुलचिन्हाटी मिले
जिसके पांवकीसाध चोरीकेस्थल(कीजगह) के पादचिइनसेमिल
जाय जिसनेपहिलेभी चोरीकियाहो और जो अशुद्धवास(जिसके
रहनेकीजगह न मालूमहोतो) इकसको चोरीमेंपकडे ७० और
भी जो अपनीजाति और नामयादिकोछिपाते हैं जोजुयाकाखेल
परस्त्रीगमन और मद्यपान में पासक्त हैं,जिनका तुमकहो कोनहो
ऐसा पूंछनेसे महसूखजावे स्वर (आवाज) वदलजावे ७१ ॥
याज्ञवलपस्मृति स० । परद्रव्यगृहाणांचष्टच्छकागूढचारिणः, ॥ निरायाव्य यवन्तश्चविनष्टद्रव्यविक्रयाः :७२ गृहीतःशंकयाचौर्योना स्मानंचेद्विशोधयेत् ॥ दापयित्वागतंद्रव्यंचौरदण्डेनदण्ड येत् ७३ चौरंप्रदाप्यापहतंघातयद्विविधैर्वधैः ॥ संचि हब्राह्मणंकृत्वास्वराष्ट्राद्विप्रवासयेत् ७४ घातितेपहते दोपोग्रामभर्तुरनिर्गते ॥ विवीतम स्तुपथिचौरोद रवी तके ७५ स्वसीम्निदद्याद्गामस्तुपदंवायत्रगच्छति ॥ पञ्च ग्रामीवहिःक्रोशादशग्राम्यथवापुनः ७६ ॥ जो पराये का धन और घरपंछते फिरतेहैं जो गुप्तवेप बनाकर रहतेहैं, जिनको आय (आमद) नहो परन्तु व्यय (खर्च) बहुतहो और जो टूटी फूटी चीज़ के बेचने वालेहों इन सबों को शंका (शुवहा)से पकड़ना चाहिये ७२ जो शंका (शुवहा) से चोरी से पकड़ा गया और अपनी शुद्धता (सफाई) न करे तो उससे हृत (चोरी गई हुई)चीज़ दिलाना और उसे चोर का सा दण्ड भी देना ७३ चोरीसे चोरीगई चीज़ दिलाकर अनेक प्रकार के वधसे (मारने से) उसे दण्डदेना परन्तु ब्राह्मणहो तो उसके मस्तक में कुत्तेके पंजेका दाग देके अपनी राज्यसे निकालदेवे ७४ यदिगांव के भीतर चोरी और घात (खन) हो भौर चोर व मारने हारेका पता वाहर निकलजाने का न मिले तो ग्रामपालका दोपजानना (उसीसे वहचीज़ व दण्डलेना) विवीतबाड़ा व सराय में चोरी आदिहो तो उसके रक्षकले लेना और राहमें हो तो मार्ग पालसे लेना ७५ जिसगांवकी सीमाके भीतरचोरी आदिहो उसगांव से वहचीज़लेना अथवा जहां चोरका पांवगयाहो उसस्थलके स्वामी से लेवे (यदि कईग्रामके मध्य) कोश दो कोशके पटपड़ में हुई हो तो उसके पास पास वाले पांच व दश गावों से लेना ७६ ॥
यावल्क्यस्मृति स०।।
वन्दियाहांस्तथावाजिकुञ्जराणांचहारिणः ॥ प्रसह्य
घातिनश्चैवशूलानारोपयेन्नरान् ७७ उत्क्षेपकग्रथिभे
दौकरसंदंशहीनकौ ॥ काय्यौंद्वितीयापराधेकरपादैकही
नको ७८ क्षुद्रमध्यमवाद्रव्यहरणेसारतोदमः ॥ देशकाल
वयःशक्तीःसंचिन्त्यदण्डकर्मणि ७९ भक्तावकाशाग्न्युर्दै
कमन्त्रोपकरणव्ययान् ॥ दत्वाचौरस्यवाहतुर्जानतोदमउ
तमः ८० शस्त्रावपातेगर्भस्यपातनेचोत्तमोदमः ॥ उत्त
मोवाधमोवापिपुरुपस्त्रीप्रमापणे ८१ विप्रदुष्टांस्त्रियञ्चैव
पुरुपनीमगर्भिणीम् ॥ सेतुभेदकरींचाप्सुशिलाम्बध्वा
प्रवेशयेत् ८२॥
जो वन्दिग्राह(कैटीड़ालेजाता हो घोड़ाव हाथी चोराये और
प्रसह्यघातक (जवरदस्ती किसीको मारते)हों तो इन्हेंशूल शली)
परचढ़ावे ७७ उत्क्षेपक(उचक्काऔरग्रंथिभेद) (गैठिकटा)इनदोनों
का पहिले अपराधमें तो क्रमसे हाथऔर संदंश (चुटकी) कटवा
देना और दूसरे अपराध में एक एक हाथ और पांव कटवा देना
७८ क्षुद्र (छोटी) मध्यम और बड़ी चीजके चोराने में उसद्रव्य
के मोलके अनुसार दण्डदेना और देशकाल वय (भवस्था) और
देखके भी दण्डकल्पना करना ७६ भोजन, रहनेकीजगह, भाग,
पानी, मन्त्र (सलाह) उपकरण (औज़ार )और व्यय (खर्च) जो
चोर अथवा मारने वाले को देवे अथवा उनको जानता हो तो
उन्हें उत्तमदण्ड देना ८० किसीपर शस्वचलावे और गर्भपातकरे
किसीका गर्भगिरावे)तो उत्तम दण्डपावे और जो पुरुष वा स्त्री
को मारडाले तो (जातिकाल आदि विचारक)उत्तम व अधमदंड
देना ८१ जो स्त्री अतिदुष्टा, पुरुष को मारने वाली भौर सेतु
(पुलबांध) तोड़ने वाली हो और गर्भवती न हो तो इन सर्वो के
गले में शिला बांध जल में डुबो देना ८२ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ विषाग्निदाम्पतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम्॥विकर्णकरना सोष्ठींकृत्वागोभिःप्रमापयेत् ८३ अविज्ञातहतस्याशुकल हंसुतबांधवानाप्रष्टव्यायोपितश्चास्यपरपुंसिरताःपथक्८४ स्वीद्रव्यत्तिकामोवाकेनवायगतःसहः॥ मृत्युदेशसमासन्न म्टच्छेहापिजनंशनैः ८५ क्षेत्रवेश्मवनग्रामविवीतखलदा हकाः ॥ राजपत्न्यभिगामीचदग्धव्यास्तुकटोग्निना ८६ पुमान्संग्रहणेग्राह्य केशाकशिपरस्त्रियाः ॥ सद्योवाकामजे श्चिनैःप्रतिपत्तौद्वयोस्तथा ८७ ॥ विपदेनेहारी, आगलगाने वाली, गुरु,पति और अपने अपत्य को मारनेवाली स्त्री को नाक कान, हाथ और मोठ कटवाकर (गर्भिणी नहो तो) वैलों से मरवा देना ८३ जिसका मारने वाला जानपड़े तो उसके पुत्र, बन्धु और स्त्री से तथा व्याभिचा- रिणी स्त्रियों से झटपट इसप्रकार पूंछकर (कि इससे किस के साथ विगाइथा पतालगावे ८४ इन (पूर्वोक्त) लोगों से और जो मरण प्रदेश के आसपास रहनेवालेहों उनसे विश्वासदेकर सहज में इस प्रकार पूंछे कि यह जो मारागया इसकी क्या अभिलाषा थी स्त्री को चाहता था वा द्रव्यकी इच्छा रखता था कौनसी जीविका चाहता था और किस के संगगयाथा ८५ जो खेत,घर, बन, गांव, विवीत (वाड़ा) भोर खलिहानमें भाग लगावें और जो रानी के संग व्यभिचारकरें इनसवोंको कट (सरहरी में ल- पेटवाकर जलादेना ८६ इति स्तेय प्रकरणम् ॥ यदि दूसरे की स्त्री के केश खींचकर हँसे बोले अथवा नव (टटके) नक्षत+ आदि चिह्न देखपढ़ें व दोनों की प्रीति देखपड़े तो पुरुष को व्यभिचार में पकड़ना ८७ ॥ * नई के दाग याज्ञवल्क्यस्मृवि स. ऊनंवाभ्यधिकंवापिलिखेद्योराजशासनम् ॥ पारदारि कचौरवामुंचतोदण्डउत्तमः ९९ अभक्ष्येणजिंदुष्यंद ण्डयउत्तमसाहसम् ॥ मध्यमक्षत्रियंवैश्यम्प्रथमंशूद्रमर्दिक स्३० कूटस्वर्णव्यवहारीविमांसस्यचविक्रयी ॥ अंगहीन स्तुकर्तव्योदाप्यश्चोत्तमसाहसम्१ चतुष्पादकृतोदोपीनाप हीतिप्रजल्पताकाष्ठलोष्टेपुपापाणवाहुयुग्मकृतस्तथाछि ननस्येनयानेनतथाभग्नयुगादिना॥पश्चाच्चैवापसरताहिंस नेस्वाम्यदोपभाक् ३ शक्तोप्यमोक्षयन्स्वामीदंष्ट्रिणांशृंगि णांतथा॥प्रथमंसाहसदद्याद्विक्रुष्टेद्विगुणन्तथा ४ ॥ जोराजाकीशासन(आज्ञा)कोघटावढ़ाकर लिखे वा व्यभिचारी औरचोरकोपकड़कै राजाको न सौंपे अपनेआपछोड़दे तोउत्तमदंड पावे ६६ अभक्ष्य(जोभोजनके योग्यनहीं मूत्रवाविष्टाभादि)से जो ब्राह्मणका खानापीना दूषितकरतो उत्तमदंडपावे क्षत्रियकाकरेतो मध्यम वैश्यकाकरतो मध्यम और शूद्रकाकरतो प्रथमसाहसका आधादंडपावे ३०० जोकूटस्वर्ण (निकम्मेसोनेकोरंगदेकेमच्छा बनाकर उस)से व्यवहारकरे और जो कुत्सितमांस(कुत्ताधिल्ली) गदिकामांस वेचतेहैं उनका अंगछेदनकरवाना और उत्तमसाह- अँडभी लेना १ जो किसीका चतुप्पाद(चारपाया)किसीकोमार और उसका स्वामी ऐसा पुकाररहाहो कि हटजाना तोपाल- चालेका दोप नहीं और इसीप्रकार काठ,लोट,(ढेला)वाण,पत्थ- बाहु और युग्य(रथमें नहे घोड़ेआदि)को फेंकताहो औरपुकार- ताहो कि हटजाना उसको हानिहो तो फेंकनेवालेकादोप नहीं२ जिसगाड़ीके वेलकीनाथटूटगईहो जाटूटगयाहो और पीछेको हटरहाहो वह किसीको मारदे तो स्वामीका टोप नहीं ३ सींग वाले और दांतवाले पशु जो किसीको मारतेहों और उनकास्वा भी छुड़ाने में समर्थ होकर भी न छुड़ावे तो प्रथम साहसदंडपावे यदि पुकारनेपर भी न छुडावे तो उससे दुनादंड पाये ४ ॥ .
११ : याज्ञवल्क्यस्मृति स० जारचौरेत्यभिवदन्दाप्यःपञ्चशतन्दमम् ॥ उपजी व्यधनम्मुञ्चस्तदेवाष्टगुणीकृतम् ५ राज्ञोनिष्टप्रवक्ता रन्तस्यैवाकोशकारिणम् ॥ तन्मन्त्रस्यचभेत्तारञ्छित्वा जिह्वांप्रवासयेत् ६ मृतांगलग्नविक्रेतुर्गुरोस्ताडयितुस्त था । राजयानासनारोदर्दण्डउत्तमसाहसः ७ द्विनेत्र भदिनोराजद्दिष्टादेशकृतस्तथा ॥ विप्रत्वेनचशूद्रस्यजीव तोष्टशतोदमः ८ दुईष्टांस्तुपुनदृष्ट्वाव्यवहारान्नृपणतु ॥ सभ्याःसजयिनोदड्याविवादाद्विगुणन्दमम् ९ योम न्येताजितोस्मीतिन्यायेनापिपराजितः ॥ तमायान्तम्पुन र्जित्वादापयेद्विगुणंदमम् १०॥ किसी व्यभिचारी को अपने कलंकके डरसे चोर चोर कहके छुड़ादे तो पांचसोपणदंडदेना और जो धनलेके छोड़दे तोजितना लियेहो उसका अठगुना दंडदे ५ जो कोई राजाकी अनिष्टयातों को कहाकरे व राजाकी निन्दा कियाकरे अथवा राजाके गुप्तम (सलाह)कोप्रकटकियाकरे तो उसकीजीभकटवाकेदेशसे निर्व देना ६ जो मृतक के देह पर की चीज़ों को बेचे गुरूको ता करेऔ राजाके यान ( सवारी) अथवा सिंहासन पर चाप उत्तम साहस दण्ड देनाजो किसीकी दोनों पांखें फोड़देवी- का विष्टीदेश (राजभंग आदिहोनेकी प्रसिद्धि) करे और शूद्रकरे ब्राह्मणकवेपसेजीविका तो अठारहसोपण दण्डदेनाजोव्यदके- सभासदलोग अच्छी भांति न देखेहों (देपवाप्रेमसे अन्यथा विद हों) तो राजास्वयं उसको दूसरी वारदेखे और जीतनेवाले समेत सव सभासदों से जितने का विवादहो उससे दूना दण्ड लेवे : जो न्यायसे (सचमुच) पराजित हुआहो भोर कहे कि हम परा- जितं नहीं भये तो उसका व्यवहार फिरसे देखकर उसे पराजित करे और दूना दण्ड उससे लेवे १०॥
१०८
।
याज्ञवल्पयरमृति स०
नीवीस्तनप्रावरणसक्थिकेशावमर्शनम् ॥ अदेशकाल
सम्भापसहकासनमेवच ८८ स्त्रीनिपेधेशतन्दद्यादद्विशत
न्तुदमम्पुमान् ॥ प्रतिषेधेतयोर्दण्डोयथासंग्रहणेतथा ८९'
स्वजातावृत्तमोदण्डआनुलोम्येनमध्यमः ॥ प्रातिलोम्येव.
धःपुंसोनार्याकर्णादिकर्तनम् ९० अलंकृताहरेत्कन्यामुत्त
मह्यन्यथाधमम् ॥दण्डन्दद्यात्सवर्णासुप्रातिलोम्येवधःस्ट्र!
तः९१ सकामास्वनुलोमासुनदोपस्त्वन्यथाधमः ॥ दूपणे
तुकरच्छेदउत्तमायाम्बधस्तथा ९२ ॥
जो कोईपरायेकी स्त्रीकीनींची (फुफनी) अंचल,जंघा औरकेश
अभिलापासमेतलुवे पौरअकेले में व अँधेरे में उससे बातचीतकरे
अथवाएकही आसनपर वैठरहाहो तोभी व्यभिचारदोषपुरुपको
पकड़ना-जिसस्त्रीके पिताभाईआदि उसकोजिसपुरुपसेवोलन।
सनाकरदियेहों और वहबोलतीदेखपड़े तो सौपणदण्डदेवे पुरुप
को किसीस्त्रीके साथयोलनामनाकियाहो भौरवोलतादेखपड़े तो
दोसौपणदण्डलेना दोनोंकोवर्जितकियाहोतो व्यभिचारसे दण्ड
हातासोलेनामह अपनीजातिकास्त्रीमें व्यभिचारकरेतोउत्तमसा-
हसकादंडदेना अपनेसे नीचजातियोंकीस्त्रीकेसाथकरने में मध्यम
औरअपनेसे बड़ीजातिकास्त्रीसेकरेतोपुरुषवधदंडपावे(माराजाय)
और जोस्त्रीनीचपुरुपसेव्यभिचारकरे तोउसकाअपराधकेअनुसार
नाककानादि कटवादेना है. जिसकाविवाहहोनेवालाहो मोर
आभूपणपहिनेहो ऐसीअपनीजातिकीकन्याकोहरलेजायतोउत्तम
दंडपावे और विवाहहोनेवालानहो तो प्रथम साहसदंडदेना यदि
उत्तमजातिकी कन्याकाहरणकरे तोवधा (मारा)जावेही यदिवह
कन्या सकाम(चाहती) हो और अपनेसे नीचजातिकीहोतो दोप
नहीं और अनचाहतीकोहरे तो प्रथमसाहसकादंडदेना जोकन्या
को (नखवाभंगुलीप्रक्षेपचादिसे)पितकरे तोउसकाहाथकटवाना
ओर जोउत्तमजातिकीकन्याको ऐसाफरेतोउसेमरवाडालना।
याज्ञवल्क्यस्मृति सः ।
शतंस्त्रीदूषणेदद्यावेतुमिथ्याभिशसंने॥पशून्गच्छन्दा
तन्दाप्योहीनांस्त्रीयांचमध्यमम् ९३अवरुद्धासुदासीपुभुजि
प्यास्तथैवच ॥गम्यास्वपिपुमान्दाप्यापंचाशत्पणिकन्दम
मु९४प्रसहयदास्यभिगमेदण्डोदशपणःस्मृतः॥ बहूनांयद्य
कामासौचतुर्विशतिकःप्पथक् ९५ गृहीतवेतनावश्यांनेच्छ
न्तींद्विगुणवत्।।अगृहीतेसमन्दाप्यापुमानप्येवमेवच ९६
अयोनौगच्छतोयोपांपुरुषवापिमेहतः ॥ चतुर्विंशतिकोद
ण्डस्तथाप्रजितागमे ९७अंत्याभिगमनेत्वंक्यःकवन्धनप्र
वासयेत् ॥शद्रस्तथांत्यएवस्यादन्तस्यार्यागमेबधः ९८॥
जो किसीकी कन्याका सञ्चाभी दोष प्रकाशकरे तो उसमें सौ
पणदण्डलेना और झूठसूठ दोपलगावेतोदोसौपणदण्डलेनापशु
। मेंगमनकरे उससेसोपण दंडलेना और नीचस्त्री तथागौमें गमन
करेतोमध्यमसाहसदंडदेनाईजोपुरुषपरायेकीअवरुद्धा(जिसको
घरसेवाहरनिकलनामनाहै)औरभुजिप्या(जिसेकिसीकोसौंपदिया
होऐसी) दासियों मेंगमनकरे तो उससे पचासपणदंडले यद्यपि वे
गमनकेयोग्यहें परन्तु दूसरेकीहैं।४इनसेव्यतिरिक्त और दासिय
में यदिवलात्कारसेगमनकरे तो दशपणदंडदे और जो कई पुरु
एकहीकेपास उसकीइच्छाकेविनाहीं गमनकरेंतो उनसवको
पीसरपणदंड देना ६५ जो वैश्यादामलेके भोगकी इच्छा न
और शरीरसे रोगीनहो दूनादे तो बिनामोललियेही त्वीकार
येहोऔर फिरन चाहे तो वरावरदेयहीदंड पुरुषकोभीजानना
जास्त्रीकीयोनि छोड़ि दूसरेअंगगमनकरे,पुरुषकेसामने रतिमा-
दिकरे, और प्रवृजितासंन्यासिनि वा अवधूतिनीके पास जावे तो
चैविासपणदण्डदना७चाण्डालकी स्त्रीसेगमनकरे तो उसकेमा.
में भगकाआकार दागकर अपनेराज्यसे निकालदे और जोशूद्र
हो तो वहचाण्डालहीहोजाताहै यदिचाण्डालउत्तमजातिकीस्त्रीसे
गमन करतो उसे मरवाडालना ६८ इतिस्त्रीसंग्रहणप्रकरणम् ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स० राज्ञाऽन्यायेनयोदण्डोगृहीतोवरुणायतम्, ॥ निवेद्य दद्याहिजेभ्यःस्वयन्त्रिंशद्गुणीकृतम् ३११ ॥ इतिश्रीयाज्ञवल्क्यीयधर्मशास्रोद्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ यदि राजा किसी से अन्याय करके दण्ड लेवे तो उसका तीस गुणा अपने पाससे वरुण देवताके नाम संकल्प करके ब्राह्मणों को दे और जितना दण्ड लियेहो उतना उसको फेरदे ३११ ॥ इतिश्रीयाज्ञवल्क्यस्मृतिटीकायांपञ्चनदमहाविद्यालयीये प्राच्यविद्यापाठशालायाम्मरव्यसंस्कृताध्यापकनपण्डि तगुरुप्रसादशर्मणाहिन्दीभापयाविरचितायाम्मिता क्षरानुयायिन्यांव्यवहाराध्यायःद्वितीयस्सम्पूर्णः२॥
'१११ यानवल्क्यस्मृति स०॥ ऊनद्विवनिखनेन्नकुर्यादुदकन्ततः ॥ आश्मशानादन व्रज्यइतरोज्ञातिभिर्मतः १ यमसूक्तन्तथागाथांजपगिलौं किकाग्निना ॥ सदग्धव्यउपेतश्चेदाहिताग्न्यारतार्थवत्२ सप्तमाद्दशमाहापिज्ञातयोभ्युपयन्त्यपः ॥ अपनःशोशुचि देद्यमनेनपितृदिङ्मुखाः३एवम्मातामहाचार्य्यप्रेतानामुद कक्रिया ॥ कामोदकसखिप्रजास्वस्त्रीयश्वशुरविंजाम् ४ सकृत्प्रसिञ्चन्त्युदकन्नामगोत्रेणवाग्यताः॥ नब्रह्मचारिणः कुयुरूंदकम्पतितास्तथा ५॥ जो पूरा दो वर्ष का नहो ऐसा घालक मृतक हो तो उसे पूर्वी में गाड़ देना और उसको उदक (तिलांजलि) भी न देना इससे अधिकअवस्थाकाहोतोजातिकेलोगश्मशानतकउसकेपीछेजावें ? और यमसूक्त तथा यमगाथा(ये दोनोंयमदेवताके घेदोक्तमन्त्र हैं) पड़ाकरें लौकिक अग्नि (न कि अग्निहोत्रकी अग्नि) से उसका दाहकरें यदिउसका यज्ञोपवीत हुआहो तो अग्निहोत्र करनेहारे को गृह्यअग्निसे और जिसपात्रका प्रयोजन पड़े उस से दाहादि कर्म करें अग्निहोत्री नहीं तो लौकिक अग्निसे दाहकरें २ सातवें पा दशवें दिनसे पहिले (किसी अयुग्म दिनमें) जाति के लोग जल के समीप (अपनः शुचिटद्यम् ) इसमंत्र को पढ़ते आकर उदक दानकरें ३ इसी प्रकार मातामह (नाना) और आचार्य काभी उदक दानकरनां मित्र, व्याही हुई लड़कियां, भागिनेय (भानजा)श्वशुर और ऋत्विज इनको इच्छा हो तो उदक देना नहीं तो न देना ४ (प्रेतका) नाम और गोत्र लेकर मोन साध एक बार जल देवे परन्तु ब्रह्मचारी और पतित ये उनक दान न करें ५॥
११४ याज्ञवल्क्यस्मृति सा पाखण्ड्यनाश्रिताःस्तेनाभर्तृधन्यःकामगादिकाः ॥ सु राप्यआत्मत्यागिन्योनाशौचोदकभाजनाः ६ कृतोदका न्समुत्तीर्णान्मृदुशाहलसंस्थितान् ॥ स्नातानपवदेयुस्ता नितिहासैःपुरातनैः ७ मानुष्येकदलीस्तम्भनिःसारेसार मार्गणम् ॥ करोतियःससम्मूढोजलवगुदसन्निभे ८ पर्च, धासम्भृतःकायोयदिपञ्चत्वमागतः ॥ कर्मभिःस्वशरीरो स्थैस्तत्रकापरिदेवना ९ गंत्रीवसुमतीनाशमुदधिदैवतानि च ॥ फेनप्रख्यःकथंनाशम्मर्त्यलोकोनयास्यति १० इले प्माश्रुवान्धवैर्मुक्तम्प्रेतोभुक्तेयतोवशः ॥ अंतोनरोदितव्यं हिक्रिया कार्याःस्वशक्तितः ११ ॥ पाखंडी (जोखोपड़ी आदिलिये फिरते हैं) अनाश्रित(जो किसी आश्रममें नहो) चोर (सुवर्ण आदि उत्तम द्रव्यके चुरानेवाले पति मारने वाली स्त्री व्यभिचार करने वाली इत्यादि स्त्री (निपिद्ध) सुरा पीनेवाले और आत्मघात करनेवाले इनको उदक न देना और इनका माशोच भी न मानना ६ जव उदक दान कर चुके और जहां हरी घास लगी हो उस भमि पर बैठे तो पुरानी कथा कह २ के उनका शोक दूर करे ७ और यह कंहै कि मनुष्यलोक कदलीके खंभके समान भीतर पुप्लखा है इसमें जो कोई स्थि- रता का खोज करे वह मूर्ख है क्योंकि यहां पानीके घबूले का लेखाहै - अपने किये हुये कर्मों के कारण पांच तत्त्वोंसे यह श- रीर बना है यदि वह उन्हीं पांचों में मिलगया तो उस में रोना क्या पृथ्वी, समुद्र और देवता लोग भी नाशको प्राप्त होंगे तो उनकी अपेक्षा फेन सदृश जो यह मर्त्यलोक है सो क्यों न नष्टहोगा १०वांधवलोग जो श्लेष्मा (खसार) और भांश गिराते हैं वह सब मृतक को यमके दूत सिलाते हैं इसलिये रोना न चा- हिये परन्तु अपनी शक्तिके अनुसार क्रिया करनी चाहिये ११ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। इतिसंश्रुत्यगच्छेयुगृहम्बालपुरःसराः ॥ विदस्यानम्ब पत्राणिनियतादारिबेश्मनः १२आचम्याग्न्यादिसलिलंगो मयंगौरसर्पपान् ॥ प्रविशेयुःसमालभ्यकृत्वाश्मनिपदंशनैः १३प्रवेशनादिकंकर्मप्रेतसंस्पर्शिनामपि ॥ इच्छतान्तत्क्ष णाच्छुद्धिम्परेपास्नानसंयमात् १४आचार्यपिचपाध्यायान्नि हत्यापिनतीव्रती॥सकटान्नंचनाश्नीयान्नचतै सहसम्वसेत् १५क्रीतलब्धाशनाभूमौस्वपयुस्तेप्टथक्टथक्॥पिण्डयज्ञा टतादेयम्प्रेतायान्नन्दिनत्रयम् १६ जलमेकाहमाकाशेस्था प्पंक्षीरंचमृण्मये ॥ वैतानोपासना कार्या-क्रियाश्चश्रुतिनो दनात् १७॥ ऐसी बातेंसुन चालकोंको आगेकर घरजावें घरकेद्वारपर निम्व वृक्षकी पत्तियां कूचकर १२ आचमनकर अग्नि,जल, गोबर, और पीलेसरसें इनका स्पर्शकर तथा पत्थरपर पांवरखके धीरेसे घरमें यैठे १३ जो अपनी जातिसे दूसराभी कोई अपनीइच्छासे मृतक का स्पर्शकरे तो निवपत्रका कूचनाआदि प्रवेशतापर्यन्त कर्म वह भी करे और उसकी शुद्धिस्नान और प्राणायामकरनेसे उसीक्ष- णहोजाती है १४ आचार्य(जो आचाराध्यायमें कहआयेहैं)पिता माताऔर उपाध्याय(कहआयेहैं)यदि इनको ब्रह्मचारीश्मशानत- कलेजावें तोउसका व्रतभंग नहीं होता परन्तु आशोचियोंकाअन्न न खावें और न उनकेपासरहें १५ अशाची लोग अन्नमोललेकर भोजनकरें भूमिके ऊपर अलग अलग सोवें,और श्रादकीरीतिसे (अपसव्यहोकर)मृतकको तीनदिन पिण्डरूप अन्नदेवे १६ एक दिन मृतकके लिये आकाशमें जल और दूध मिट्टीके पात्रमेरख- ना और अग्निहोत्र आदि वैदिक नित्यकर्म किसी दूसरे से कराना १७॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सान त्रिरात्रन्दशरात्रम्वाशावमाशौचमिष्यते ॥ऊनद्विवर्पउ भयोःसूतकम्मातुरेवहि १८ पित्रोस्तुसूतकम्मातुस्तदसृग्द र्शनाद्धृवम्॥तदहर्नप्रदुप्येतपूर्वेपांजन्मकारणात् १९अन्त राजन्ममरणेशेपाहोभिर्विशुद्धयति ॥गर्भस्रावेमासतुल्यानि शाःशुद्धस्तुकारणम् २० हतानान्नृपगोविप्रैरन्वक्षचात्मघा तिनाम् ॥ प्रोपितेकालशेपःस्यात्पूर्णेदवोदकंशुचिः,२१. ! (सपिण्ड और सगोत्रके भेदसे)तीन वादशादिनमृतकका अशी चहोताहै यदिदोवर्षसे छोटी अवस्थावालामरे तोमाता औरपि- ताहीको प्रशौचहोता ओर सूतक(जन्मनेमें न छूना)केवल माता हीको होताहै १८ जन्ममें पिता और माताको न छूना चाहिये तिसमें भी माताको रुधिरदेखपड़ताहै इसहेतु अवश्यही न छुवे और वालकके जन्मदिनमें श्राद्दादि क्रियाकरनेमें कुछदोपनहीं क्योंकि वालककारूपधर पितर मातेहैं १६ यदि एक मनुप्यमरा वा जन्माहो और दशदिनके भीतरही दूसराजन्मे या मरे तो उस काभी शुद्ध जो पहिलेके शेप(वाकी दिनरहेहों उतनेहीमें होजा- ताहै गर्भपातहोजावे तो(चारमहीनेसे पहिले माताहीकोतीनदि- न अनन्तर)जितनेमहीनेका गर्भहो उतनेहीदिनमें माता शुद्धहो- तीहै और पितामआदिको तीनदिनपर छःमहीनेसे अधिकहो तो प्रसवकेतुल्य प्रशौचलगताहे २० ब्राह्मण, राजा और गो इनसे जो मारेगये और जिन्होंने अपनेआप जीदिया इनका अशाच उसीक्षणहोताहै विदेशमें मरजावे तो दशदिनमें जोवचाहो उत- नाहीं अशौच मानना और दशदिन बीतगवेहों तो उदकदानक- स्के उसीक्षण शुद्धहोताहै(परन्तु यह वात माता पिताके विपयों नहीं है उनका पूरा दशदिनमाननाहोताहै और भी कई प्रकार . सगई हैं स्मृतियों में देखलेना) २१ ॥
११७ पाज्ञवल्क्यस्मृति स०। क्षत्रस्यद्वादशाहानिविशःपंचदशैवतु ॥ त्रिंशहिनानिशू द्रस्यतदईन्यायवर्तिनः २२ आदन्तजन्मनःसद्यआचूडा. नैशिकीस्मृता ॥ त्रिरात्रमात्रतादेशाद्दशरात्रमतःपरम्२३ अहस्त्वदत्तकन्यासुबालेषुचविशोधनम् ॥ गुंतेवास्यनूचा नमातुलश्रोत्रियेपुत्र २४ अनौरसेपुपुत्रेषुभार्यास्वन्यगता सुच ॥ निवासराजनितेतदहःशुद्धिकारणम् २५ ब्रा मणानानुगंतव्योनशूद्रोनद्विजःकचित् ॥ अनुगम्यांभास स्नात्वास्टष्ट्वाग्निघृतभुक्शुचिः २६ महीपतीनांनाशी चहतानांविद्युतातथा ॥ गोब्राह्मणार्थेसंग्रामेयस्यचेच्छति भूमिपः२७॥ क्षेत्रीको वारह दिन वैश्यको पन्द्रह और शूद्रको तीसदिनका भशौचहोताहै परन्तु जो शूद्रब्राह्मणकी सेवामें तत्परहो उसको पन्द्रहदिनका होता है २२ दांत निकलने से पहिले मरे तो उसी क्षण शुद्धहोताहै, दांतनिकलनेकेअनन्तर मुंडनतक एकदिनरात और मुंडनसे व्रतवन्धतक तीनदिनरात और व्रतवन्धहोनेपर दश दिनका अशौच मानना २३ जिस कन्याका वाग्दान न कियाहो उसके और वालक, गुरू, अन्तेवासी (जो ब्रह्मचारी पढ़नेको गुरू के पासरहे) वेदवेत्तानाह्मण, मामा और श्रोत्रिय इनके मरने में : एक दिनका अशौच मानना २४ औरस छोड़ दूसरे पुत्रों के व्य. भिचारिणी भार्या के और अपने देशके राजाके मरने में एकही दिनसे शुद्धहोताहै २५ ब्राह्मण किसी भसगोत्रद्विज अथवा शूद्र के मृतक के पीछे श्मशान में न जावे यदि जावे तो स्नानकरके अग्निका स्पर्शकरे और उसदिन केवल धी खाकर रहे तव शुद्ध होताहै २६ राजाओं को अशौचनहींहोता जो विजली का मारा मराहो गौ वा ब्राह्मण के लिये संग्राम में जो मरे जिसको राजा न चाहे इनसवों का अशौच न मानना २७ ॥
यावलयस्मृति स. ऋत्विजांदाक्षितानांचयज्ञियंकर्मकुर्वताम् ॥ सत्रिवति ब्रह्मचारिदातृब्रह्मविदांतथा २८ दाने विवाहेयज्ञेचसंग्रामे देशविप्लवे ॥ आपद्यपिहिकप्टायांसद्यःशौचविधीयते २९ उदक्याशुचिभिःस्नायासंस्टष्टस्तैरुपस्टशेत् ॥ अलिं गानिज पेञ्चैवगायत्रीमनसासकृत् ३० कालोग्निःकर्मम् द्वायुमनोज्ञानंतपोजलम् ॥ पश्चात्तापोनिराहारःसर्वेमीशु दिहेतवः ३१ अकार्यकारिणंदानंवेगोनद्याश्चशुद्धिकृत्॥ शोध्यस्यमृचतोयंचसंन्यासोवैद्विजन्मनाम् ३२ तपोवेदवि दांक्षांतिर्विदुपांवर्मणोजलं ॥ जपःप्रच्छन्नपापानांमनसः सत्यमुच्यते ३३ भूतात्मनस्तपोविद्येबुद्धर्ज्ञानं विशोधनम्॥ क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञानाद्विशुद्धिःपरमामता ३४॥ चत्विजलोग, दीक्षित (जिसनेयज्ञमेंअभिपेकपायाहो) यज्ञके कामकरनेवाले,यज्ञकरनेवाले,व्रतकरनेवाले (यज्ञऔर उत्सव कर रहेहों) ब्रह्मचारी,दाता और ब्रह्मज्ञानीइनसवपुरुपोंको २८ और दान, विवाह, यज्ञ, लड़ाई, देश विप्लव और बड़ाकष्ट देनेवाली विपत्ति इन सव समयोंमें उसक्षिण शुद्धिहोजातीहे २६ रजस्व- ला स्त्री और चाण्डाल जो छु देवे तो स्नान कर उनको छ के कोई दूसरा छूवे तो आचमन करने से और वरुणदेवता के मंत्र तथा गायत्री जपने से शुद्ध होताहै ३० काल,अग्नि, मृत्तिका,वा- यु, मन, ज्ञान, तप, जल, पश्चात्ताप और उपवास ये सब शुद्धि हेतु, ३१ निकम्मा काम करतेवालोंकीशुदि दान से होती है औरनदीकेवेगसे अशुद्धवस्तुकीमृत्तिका औरजलसे तथाद्विजोंकी शुद्धिसंन्याससेहोतीहे ३२ वेदजाननेवालों कीतपसे विद्वानों की क्षमासे शरीरकीजलसेगुप्तपापोंकीजपसे, औरमनकीसचाईसे३३ भूतात्माकी तप और विद्यासेबुद्धिकीज्ञानसे और क्षेत्रज्ञकोईश्वर के ज्ञानसे परमशुद्धता होती है ३४ ॥ इत्यशोचप्रकरणम् ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सः।
क्षात्रेणकर्मणाजीवेद्विशांवाप्यापदिद्विजः॥निस्तीर्य
तामथात्मानंपावयित्वान्यसेत्पथि ३५ फलोपलक्षौमसोम
मनुष्यापूपवीरुधः ॥ तिलौदनरसक्षारांदधिक्षीरंघृतंजल
म् ३६ शस्त्रासवमधूच्छिष्टमधुलाक्षाथवहिपः ॥ मंचर्म
पुष्पकुतुपकेशतक्रविपक्षितीः ३७ कौशेयनीललवणमासै
कसफसीसफान् ॥ शाकाद्रौपधिपिण्याकपशुगंधांस्तथैव
च ३८.वैश्यवृत्त्यापिजीवन्नोविक्रीणीतकदाचन ॥ धर्मार्थ
विक्रयंनेयास्तिलाधान्येनतत्समाः३९लाक्षालवणमांसानि
पतनीयानिविक्रय।पयोदधिचमद्यंचहीनवर्णकराणितु४०॥
,
आपत्तिकाल में ब्राह्मण क्षत्री के अथवा वैश्यों के काम करके
जीविकाकरे और जव उससमयसे पारहो जाय तो प्रायश्चित्त से
देह पवित्रकर अपनी निज वृत्ति ग्रहण करे ३५ फल, पत्थर,
मतसी के वस्त्र प्रादि, सोमलता, मनुष्य, पुआ, विरुद्ध तिल,
ओदन (भात) रस (तेल आदि) क्षार (खारी नोन आदि)
दही, दूध, घी, जल ३६ शस्त्र, आसव, (मदिरा अरक आदि)
मधु, जूठामद्य, लाक्षा, कुश, मिट्टी, चाम, फूल, कुतुप (कम्बल)
पालकी चीज़, (चवरभादि) तक (माठा) विप, पृथ्वी ३७ पाट
वस्त्र, नील, लवण, मांस,एकखुरवाले (घोड़ाआदि) सीसा, शाक
भाद्रोपधि (गीलीविरई) पिण्याक (पीना) और पशु (फ्नैल)
मृगाटि, गन्ध चन्दनं आदि ३८ इनसब चीजों को वैश्यकी
वृत्तिकरे तोभीनवेंचे धर्मकार्य के अर्थ किसीदूसरेअन्नको वरावर
लेकर तिलकी विक्रीकरे ३६ लाख, नोन और मांस इनके चेंचने
से मनुष्य पतितहोता और दूध, दही और मदिरा इनके चनेसे
हीनवर्ण होजाताहै ४०॥
१२०० याज्ञपल्क्यस्मृति स० आपद्गतःसम्प्रगृह्णन्भुजानोवाग्यतस्ततः ॥ नति प्यतैनसाविप्रोज्वलनार्कसमोहिसः ४१ कृपिशिल्पभृति विद्याकुसीदंशकटंगिरिः ॥ सेवानूपंपोभैक्ष्यमापत्तौजी नानितु ४२ बुभुक्षितस्त्र्यहंस्थित्वाधान्यमब्राह्मणादरेत् । प्रतिगृह्यतदाख्येयमभियुक्तेनधर्मतः ४३ तस्यदत्तंकुलंश लश्रुतमध्ययनंतपः ॥ ज्ञात्वाराजाकुटुम्बंधोटत्तिप्रक ल्पयेत् ४४सुतविन्यस्तपत्नीकस्तयावानुगतोवनम्॥वानात स्थोब्रह्मचारीसाग्निःसोपासनोव्रजेत् ४५ अफालकष्टेन। नीश्चपितॄन्देवातिथीनपि॥भृत्यांश्चतर्पयेत्श्मश्रुजटालोम दात्मवान् ४६॥ आपत्कालमें यदिवालणनीचदानले व भोजनकरेतो दोपनहीं क्योंकि उससमयवहअग्नि और सूर्यके समानहोताहै ४१ खेती करनी,शिल्प (कारीगरी) भृति(मजूरी)विद्या (पढ़नाआदि,कुसीद (ब्याजलेनेवाला) शफट (गाड़ी) गिरि (पहाड़की घासलकड़ी वेंचना) सेवा अनूप (जलप्रायदेश) नृप (राजा) और भीप येसव विपत्तिकालमेंजीनकेउपायहें ४२ तीनदिनभूखारहकरब्राह्मणको छोड्दुसरेकेघरसे अन्नचरानादि पकड़ाजावे तोधर्मसे सच सच कहदेवे ४३ इसप्रकारविपत्निमेंपड़ेहुये मनुष्यका कुल,शील,विद्या वेद,तप और कुटुम्ब यहसवदेखके राजा उसको धर्म के अनुकूल वृत्ति (जीविका) ठहरादेने ४४ इत्यापद्धर्मप्रकरणम् ॥ लड़कों को स्वीसौंपकर व उसे साथही लेकर ब्रह्मचर्यव्रत धारण करके अग्नि (वैतानाग्नि) और उपासना (गृह्याग्नि) समेत वानप्र- स्थहोवे (वनमेंजाचे) १५ विनजुती भूमिमें जो भन्न उपजे उसी से अग्नि,पितर,देवता,अतिथि और भृत्यों (सेवकों को) तुष्टकरे जटा और रोम न तुड़ावे प्रात्मवान् (आत्माकीउपासनामें) रत भी होवे ४६॥
.. याज्ञवल्क्यस्मृति स०। अनोमासस्यपण्णांवातथासंवत्सरत्यया ॥ अर्थस्यसं चयंकुत्कृितमाश्वयुजेत्यजेत् ४७ दांतरित्रपवणस्नायी निवृत्तश्चप्रतिग्रहात्॥ स्वाध्यायवान्दानशीलःसर्वसत्त्वहि 'तेरतः १८ दन्तोलूखलिकःकालपक्काशीवाश्मकुडकः ॥ श्रौतस्मातफलं स्नेहै:कर्मकुत्तियाक्रियाः ४९ चांद्राय णैनयेत्कालंकृच्छ्रेवित्तयेत्सदा ॥ पक्षगतेवाच्यश्नीयान्मा सेवाहनिवागते ५० स्वप्यामौशुचीरात्रौदिवासंप्रपर्दैन यत् ॥ स्थानासनविहारैर्वायोगाभ्यासेनेवातथा ५१ ग्री प्मेपंचाग्निमध्यस्थोवीसुस्थण्डिलेशयः ॥ आर्द्रवासास्तु हेमन्तेशत्यावापितपश्चरेत् ५२॥ एकदिन, महीनाभर, छः महीना अथवा वर्षभर के लिये भन्न इकट्ठा रक्खे और उसको कुंवार की पूर्णमासी को सब उठा देवे ४७ इन्द्रियों का दमन रक्खे तीनकाल स्नानकरे दान न लेवे वेदपढ़ाकरे दानदियांकरे और सब जीवों के हित में तत्पर रहे ४८ दांतसे कुचलकर जो चीज़ खासके सो खावे (ओखली में न कूटे) अथवा अपने से जो पकगयाहो सो खावे व पत्थरपर कूटले और वेदोक्तकर्म व धर्मशास्त्र की क्रियामें जो हवन आदि करनाहो और देहमें मलना प्रादि निजकार्य भी फल के चिकना (तेल) से करे ४६ सदा चान्द्रायण व्रत अथवा कच्छ्र व्रत करके अपनाकाल वितावे अथवा पन्द्रहदिन व महीना भर व एकदिन वीतनेपर भोजनकरे ५०. शुद्धहोके रातको नंगी भूमिपर सोये और दिनमें घूमते फिरते वितावे अथवा स्थान (खड़ा रहना) और आसन (वैठने)के बिहारसे व योगाभ्यास से दिन काटे ५१ ग्रीप्न (गरमी) में पंचाग्नि के वीच वैठे, वर्षा में भूमि पर सोवे हेमन्त ऋतु में गीलावस्त्र पहिने अथवा अपनी शक्ति के अनुसार तपकरे ५२॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ यःकण्टकैर्वितुदतिचन्दनैर्यश्चलिम्पति ॥ अनुद्धोपरि तुष्टश्चसमस्तस्यचतुस्यच ५३ अग्नीन्वाप्यात्मसात्कृत्वा रक्षावासोमिताशनः ॥ वानप्रस्थगृहेप्येवयात्रार्थम्भक्ष्य माचरेत् ५४ ग्रामादाहृत्यवाग्रासानष्टौ जीतवाग्यतः॥ वायुभक्षःप्रागुदीचींगच्छेदावमसंक्षयात् ५५ वनागृहादा कृत्वोष्टिंसार्ववेदमदक्षिणाम् ॥ प्राजापत्यांतदन्तेतानग्नी नारोप्यचात्मनि ५६ अधीतवेदाजपकृत्पुत्रवानन्नदोग्नि मान् ॥ शक्त्याचयज्ञकृन्मोक्षेमनःकुर्यात्तुनान्यथा ५७ स वैभूतहितःशान्तस्त्रिदण्डीसकमण्डलुः ॥ एकारामःपरिव्र ज्यभिक्षार्थीग्राममाश्रयेत् ५८॥ जोकांटाचुभावे और जोचंदनलगावे इनदोनोंकोवरावरजाने न पहिलेपरतुष्टहो और न दूसरेपरक्रोधकरे ५३ अथवा तीनोंअग्नियों कोभी आत्मा समझले वृक्षकेतलेवासरक्खे परमित (नपाहुमा) भोजनकरे और प्राणकीरक्षाकेलिये वानप्रस्थोंहींके घरभिक्षाकरे ५४ अथवा गांवसे भन्नलेआकरमौनीहोमाठयासखावे अथवावायु भक्षण(उपवास)करतेहुयेईशानदिशामें जवतकनमरे वरावरचला जावे ५५ इतिवानप्रस्थप्रकरणम् ॥ यदिगृहस्थाश्रम अथवावानप्र- . स्थाश्रम में प्रजापतिदेवताकी ऐसीयज्ञकरे कि अपना सर्वस्वधन दक्षिणामेंदेडाले और यज्ञकीउन (बैताल)अग्नियोंको वेदरीति से आत्मामेंस्थापनकरावे,५.६ और वेदपढ़ाहो, जपकरताहो,पुत्रजन्म होचुकाहो,दीनदुःखितकोअन्नदेताहो, अग्निमेंहोमकरताहोऔरत्र पनीशक्तिकेअनुसारयज्ञकरताहोवेतोमोक्ष(संन्यासाश्रम)कोग्रहण करनेकीइच्छाकरनेमेमनचलावे ऐसानहोतो इसकीइच्छानकरे५७ सवजीवोंकाहितकरे शांतरहे (कड़ीवातकहनेपरक्रोधनकर)वांसके तीनदंड औरकमंडलुधारणकरे किसीकासंगनरक्खे घेरनीतिमादि संसारकेकाम सवछोड़दे और भिक्षालेनेको गांवमेंजावे ५८ ॥ - १२३ याज्ञवल्क्यस्मृति स०। अप्रमत्तश्चरेद्रेक्ष्यसायानेनभिलक्षितः ॥ रहितभिक्षु कैर्यामेयात्रामात्रमलोलुपः ५९ यतिपात्राणिमृद्वेणुदावला वुमयानिच । सलिलैःशुद्धिरेतेपांगोवालैश्चावर्पणम् ६० सन्निरुदेन्द्रियग्रामरागद्वेपौप्रहायच ॥ भयंहित्वाचभूताना 'ममृतीभवतिद्विजः ६१ कर्तव्याशेपशुद्धिस्तुभिक्षुकेणविशे पतः॥ज्ञानोत्पत्तिनिमित्तत्वात्स्वातन्त्र्यकरणायच ६२ अवे क्ष्यागर्भवासाश्चकर्मजागतयस्तथा ॥ आधयोव्याधयः क्लेशाजरारूपविपर्ययः६३भवोजातिसहस्रपुप्रियाप्रियवि पर्ययः॥ध्यानयोगेनसम्पश्येत्सूक्ष्मआत्मात्मनिस्थितः६४ प्रमाद (वाणी और चक्षु प्रादिकी चपलता) छोड़कर सन्ध्या समय में अनभिलक्षित (ज्योतिषी वा सामुद्रिकके कामसे रहित - होकर जहां दूसरा भिक्षुक न होवे वहांअपने पेटही भरनेके योग्य भिक्षा मागे अधिकका लालच न करे ५६ मृत्तिका, बांस, काठ और अलावु (लोकी) से संन्यासियों के पात्र बनते हैं जलके साथ धोने और गोवाल के घसनेसेही उनकी शुद्धि होतीहै ६० सव इन्द्रियों का संयमकरे वैर प्रीति छोड़ दे और किसी जीवको भयदेनेहारा कामनकरे तो द्विजमुक्त होताहै ६१ संन्यासी विशेष करके अन्तःकरण की शुद्धि प्राणायामसे करे क्योंकि उससे ज्ञान बढ़ता और ध्यानकरने में स्वतन्त्रता होती है ६२ विराग होने के लिये गर्भवास (जहां मल मूत्र में रहना होताहै उस) परध्यान दे और कुकर्मसे जो गति होतीहै उन्हें समझे आधि (चित्तकी पीड़ा) व्याधि (शरीरका रोग) क्लेश (अविद्याआदि पांच बुढ़ापा और स्वरूप का बदलना) ६३ सैकड़ों जातों में जन्म लेनाचाही वात न होना और अनचाहीका होना इनसवकोदेख ध्यानद्वारा निश्चिन्ताई से अपनी शरीर में स्थित मात्मा को देस ६४ ॥
१२४ याइपरस्यस्मृति सः नाश्रमःकारणधर्मेक्रियमाणोभवेदिसः॥ अतोयदात्म नौपथ्यपेरपानतदाचरेत् ६५ सत्यमरतेयमक्रोधोही शौच धीधृत्तिर्दमः ॥ संयतेन्द्रियताविद्याधर्मःसर्वउदाहृतः ६६ निस्सरंतियथालाहापिंडात्तप्तात्स्फुलिंगकाः॥ सकाशादात्म नस्तदात्मनःप्रभवन्तिहि ६७ तत्रात्माहिस्वयंकिंचित्कर्म किंचित्स्वभावतः करोतिकिंचिदभ्यासाद्धमधिोभया स्मकम् ६८ निमित्तमक्षरःकर्ताबोद्धाब्रह्मगुणीवशी ॥ अजः शरीरग्रहणात्सजातइतिकीर्त्यते ६९ सर्गादौसयथाकाशं वायुंज्योतिर्जलमहीम् ॥ सृजत्येकोत्तरगुणांस्तथादत्तेभव नपि ७० ॥ किलीधर्मके आचरण में कोई आश्रम कारण नहीं क्योंकि करनेसे सब पाश्रमोंमें धर्महाताहीहै इसलिये जो वार्ताप्रपनेको भली न लगे वह दूसरेको न करे ६५ सचबोलना, चोरी न कर- नी, क्रोध न करना, लज्जा. पनित्रता, बुद्धिमानी, धीरज, शांति इन्द्रियों को वश में रखना चोर विद्याभ्यास यहसव धर्मके लक्षण हैं ६६ इतिपतिप्रकरणम् ॥ जिसत्रकार तपायेहुये लोहेसेजो छोटे छोटे कण उउतेहैं उन्हेंस्फुलिंग (चिनगारियां) कहतेहें इसीप्रकार परमात्मासे जीवात्मा उपजते हैं यहवात कहीजाती है ६७ फिर वहां धर्म और अधर्मरूपी काम कुछ तो शात्मा प्रापहीकर ता कुछस्वभावसे पार कुछअभ्याससे करताहै ६८ यद्यपि पात्मा सब वस्तुओंकानिमित्त विनाशरहित, करनेहारा,ज्ञानरूप (जानने- वाला) ब्रह्म (व्यापक ) गुणी, वशी (इन्द्रियों को वशमें रखने वाला) और अज (कभी जन्मतानहीं) परन्तुशरीर ग्रहणकरनेसे उसको लोग कहतेहैं कि पैदाहुप्राहे ६६ जिसप्रकार सृष्टिको प्रा. दि में वह प्राकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वीकोजो क्रमसे एक एकगुरा अधिक रखते (मा० १ वा० २ ते०३ ज०४४०५)इन्हें बनाता उत्सीप्रकार उत्पन्न होकर उन्हें धारणभी करता है.७० ।।
१२५ याज्ञवल्लयस्मृति सः। आहुत्याप्यायतेसूर्यःसूर्यादृष्टिरथोपधिः ॥ तदन्नरस रूपेणशुक्रत्वमधिगच्छति ७१ स्त्रीपुंसयोस्तुसंयोगेविशुद्धे शुक्रशोणिते॥ पंचधातून्स्वयंपष्ठआदत्तेयुगपत्प्रभु७२इन्द्रि पाणिमनःप्राणोज्ञानमायुःसुखंधृतिः॥धारणाप्रेरणंदुःखमि च्छाहंकारएवच७३प्रयत्नआकातेर्वर्णःस्वरद्वेपौभवाभवौ॥ तस्यैतदात्मजंसद्धमनादेरादिमिच्छतः७४ प्रममेमासिस लिभतोधातुविमाछतः। मास्यदंद्वितीयतुतृतीयेंगैन्द्रियै यतः ७५ आकाशाल्लाघवंसौक्ष्म्यंशब्दश्रोत्रंवलादिकम् ॥ वायोश्चस्पर्शनचेष्ठांव्यहनरौक्ष्यमेवच ७६ ॥ आहुतिदेने (होनकरने)से सूर्य पुष्टहोतेहैं सूर्यसे वृष्टि उससे सब औपधीबढ़तीहैं और उनके अन्नका रस शुक्र(वीर्य)वनता है ७१जवस्त्रीपुरुपके संयोगसेशुक(वीर्य)शोणित(रज)शुद्धहोतेहैं तो पांचों धातुओंको छठांपप्रभु (आत्मापरमात्माएकहीवारग्रहण करताहै७२इन्द्रिय,मन,प्राण,ज्ञान,ग्रायु(अवस्था)सुख,धीरज,धा- रण (स्मरणशक्ति)प्रेरणा.दुःख इच्छा,अहंकार ७३प्रयत्न मारुति (स्वरूप)वर्ण (रंग)स्वरद्वेप उत्पत्ति और नाश ये सबउसादिरहि- त आत्माके सब आश्रय (आधारहोतेहैं )जब वह उत्पन्नहोनेकी इच्छाकरताहै ७४ पहिलेमहीने(पृथ्वीमादि)धातुओंसे मूञ्छितहो- कर गर्भसंझेद(पानीकेसमानगीला)रहताहै,दूसरेमहीने अर्बुद(क- डाहोताहै)तीसरेमें अंग(हाथपांवमादिौर इन्द्रियों(नाककाना- दि)से युक्तहोताहै ७५ अाकाश(रूप महाभत)सेहरुआई सक्ष्मता, शब्द(ध्वनिसुननेकीशक्ति)ौरवलादि वायुसे स्पर्श(छूना) चे.. टा(इधरउधरडोलना)ोर रुक्षता(रूखापन)धारणकरताहै ७६ ॥ *छिद्रओरिविक्तता ।।
न्धत ५ १२६ पाक्षवल्क्यस्मृति सन पित्तात्तुदर्शनंपक्तिमोष्ण्यरूपप्रकाशितम् ॥ रसात्तुरस:- शैत्यस्नेहल्लेदसमार्दवम् ७४ मेवच ॥ आत्मायणात्यनःसर्वतीयेस्पन्दतेंततः७८. हृदस्याप्रदानेनगर्भोदोपमवाप्नुयात् ॥ १रू स्मात्कायप्रियस्त्रियाः ७९स्थैर्यचतुर्थत्वंगानांपंचमेशोणि तोद्भवः॥ पठेबलस्यवर्णस्यनखरोम्णांचसम्भवः८०मनश्चै तन्ययुक्तोसौनाडीस्नायुशिरायुतः ॥ तमे टम ५५५ मांसस्मृतिमानपि ८१ पुनर्धात्रीपुनर्गर्भमोजस्तस्यप्रधाव ति ॥अष्टममास्यतोगभॊजातःप्राणर्वियुज्यते ८२॥ पित्तसे देखना,पचानेकी सामर्थ्य,उष्णता,रूप औरप्रकाशक रनेकी शक्तिग्रहणकरताहे रससेरसना जिससे (स्वादमालूमहात है)शीतलता गीलापन,ढीलापन और नरमावटपाताहै ७७ भमि से गन्ध,घाण (जिससे गन्धजानपड़ताहै)गौरव(गरुआई)मोरमूर्षि (भाकार व स्वरूप)इन सवको भी आत्मातीसरे ही मासमें ग्रहः एकरताहै इसके अनन्तर कुछकुछ डोलनेलगताहै ७८ दोहद (जिसचीज़पर गर्भिणीस्वीकामनचले उस)के न देनेसे गर्भ में कु रूपता और मरणप्रादि दोपहोजातेहैं इसलिये जोस्त्रीकोमियलगे सो करना ७६ चौथे महीनेमें अंग(हाथपांव) प्रादिकी दृढ़ताहो; तीहै,पांचवेमें रुधिर उपजताहे और छठेमहीनेमेंबल,वर्ण(रंग) नखु, और रोमकीसंचय (बढ़ती)होतीहे ८० सातवेंमें नन,चैतन्य, ना डी (वायुवाहिनीजोट पकड़तीहे)स्नायु (जिससेहड्डियांबधीरहती हैं)और शिरा (जिसमें वात पित्त और श्लेष्मावूमतेहैं)इनसे युक्ता होताहै आठवेंमें त्वचारखाल)मांस औरस्मरणशक्तिकोपाताहेस? पाठवें महीनेमें उसगर्भका भोज (वल व पिता) चारम्बार धात्री (माता)और गर्भको दौड़ताहै इसलिये यदि आठवेंमें जन्मे तो जीवनिकलजाता है ८२॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स.. नवमेदशमवापिप्रबलैःसूतिमारुतैः॥तिःसार्यतेवाणइव यंत्रच्छिद्रेणसज्वरः८३ तस्यपोढाशरीराणिपत्वचोधारयं तिच॥पडंगानितथास्थ्नांचसहपट्याशतत्रयम्८४स्थालैः सहचतुःपष्टिर्दतावैविंशतिर्नखाःपाणिपादशलाकाश्चतेषां स्थानचतुष्टयम् ८५ षटचंगुलीनांद्वैपायर्योर्मुल्फेपुचचतुष्टय म्॥ चत्वार्य्यरनिकास्थीनजंघयोस्तावदेवतु ८६वेद्वेजानु कपोलोरुफलकांससमुद्भवे ॥अक्षतालूपकश्रेणीफलकेचवि निर्दिशेत् ८७भागास्थ्यकेतथाटष्ठेचत्वारिंशच्चपंचच ॥ ग्री वापंचदशास्थास्याजश्चकैकंतथाहनुः ८८ ॥ नवें व दशवें महीनेमें बड़े प्रवलप्रसूतिमारुत(अपान वायु) से प्रेरितहोकर ज्वरसाहित उसप्रकार गर्भसे बाहर निकलताहे.जैसे यंत्रसे वाटताहै ८३ उसके छःप्रकारके शरीरलहीत्वचा और छ:* अंगोंको और तीनसौ साठहड्डियां धारणकरतेहैं ८४ उन तीनसौ साठ हड्डियोंको गिनाताहे स्थाल(समगुर)समेत चौसठ दांत,वीसनह,हाथ और पांवकी(शलाकारूप)लवीलवी हड्डियां भी पीसहोती हैं और उनके चारस्थानहें (दोहाथ दोपांव८५अंगु- लियोंकी साठपाणि(ऍडी)की दोगुल्फ(पांवकेपंजे)की चारभरत्नि का (मुठहंथ)की चार और दोनों जंघोंकी भी उतनीही चारहड्डि- यां होतीहैं८६ जानु(टेउनी) कपोल(गाल) उरु (पट्टे) फलक अंस (कन्धे)मक्ष (कच्चा)तालूप (तालु)श्रोणी और फलक(दोनोंचूतर) में दोदो हडियां जानना ८७ भग (गुदा) की एकपीठकी पैंता- लीसावा(गर्दन)मेंपंद्रहजत्रु(हँसुआ)औरहनु(ठड्ढी)एक २८८ रक्त,मांस,मेदस, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन कर पातुओं के परिपाक हेतु जो जठरामिक सान हैं उनके योगसे प्रकार शरीर कमाते हैं और वेही। स्वचा कोनाते हैं जैसे कैले भेड़की छाल सम्भाही है ३॥
१.२८ याज्ञवल्क्यस्मृति सः। तन्मूलेटेललाटाक्षिगण्डेनासाद्यनास्थिका॥पार्श्वका स्थालकै साईमवुदेश्चद्विसप्तातेः ८१ होशंखकोकपाला निचत्वारिशिरसस्तथा ॥ उरःसप्तदशास्थीनिपुरुपःस्य। स्थिसंग्रहः९० गन्धरूपरसस्पर्शशब्दाश्चविपया स्मृता" नासिकालोचनेजिहात्वोत्रंचेन्द्रियाणिच ९१ हस्ताप। यूरुपस्थंचजिहापादौचपंचवे कर्मेन्द्रियाणिजानीयान्म नश्चैवोभयात्मकम् ९२ नाभिरोजोगुदंशुक्रशोणितंशंखको तथा ॥मूसकण्ठहृदयंप्राणस्यायतनानिच९३वपावसाव हननंनाभिःलोमयकारप्लहा॥क्षुद्रांत्ररक्वकौवस्तिःपुरीपाधा नमेवच ९४॥ उसदाढ़ के मूल (जड़) की दो हड्डियां,ललाट (मस्तक) आंख गण्ड कपोल और मांखका वीच इनमेंभी दो दो और नाक में धननामक एकहड्डी है प.वक (पंशुलीकी हड्डियां) अपने स्थाल- क (रहने की जगह) और प्रर्वद नाग हड्डियोंसमेत यहत्तर होती हैं ६ दो हड्डियां शंखक (भौह पोकानकेचीच) की चार कपाल की हड्डियां और छाती में सत्रह इतनी हद्धियां मनुष्यके होती हैं सो मैंने दिखाई ६० गन्ध,रूप, रस,स्पर्श और शब्द इतने विषय (मनुष्यके वन्धनहें) और नाक,आंख, जीभ,त्वचा (खाल) और कान ये उनकी ज्ञानेन्द्रिय (जाननेके द्वार), हाथ,पांव,गुदव उपस्थ (जिससे रतिकासुखहो) जीभ और पांव ये पाँच कमेन्द्रिय कहलातेहैं औरमनको (ज्ञानेन्द्रिय) (कर्मेन्द्रिय)दोनों कहते हैं.२ नाभी, भोज (पिता) गुद शुक्र(वीज) रक्त,शंखक भौंह कान के वीच शिर, कन्धे व कण्ठ(नटी)हृदय येदश प्राणके घरहें श्वप (कीली)चसा(चरवी) अवहनन (पुस्फस) नाभिल्लोमयरुत् (दहिने कोखेकी वरवट, कोमप्लोहा,बायेंकोखे की तापतिल्ली) क्षुद्रांत्र (हृदयकी आंती)टकक (हृदयके पास दो मांसके गोलेहोते हैं) यस्ति (पेडू) पुरपिाधान मलकी जगह ६४ ॥ ----n13 ११९ याज्ञवल्पयस्मृति स० आमाशयोथहृदयं स्थूलांगुदएवच ॥ उदरचगुदी कोष्ट्यौ विस्तारोयमुदाहृतः ९५ कनीनिकेचाक्षिकूटश प्कुलीकर्णपत्रको कोशंखौध्रुवौदन्त वेष्टावोष्ठौककुन्दरे ९६ वंक्षणौटपणौरको श्लेष्मसंघात नौस्तनौ ॥ उप जिहास्फिर्जीवाहू जंघोरुषुपिण्डिका ९७ तालूदरंवस्ति शीर्ष चिबुकेगलशुण्डिके ॥ अवटश्चैवमेतानि स्थाना न्यत्रशरीरके ९८ अक्षिवर्णचतुष्कञ्च पदस्तहृदयानि च ।। नवच्छिद्राणितान्येवप्राणस्यायतनानितु ९९ शि राःशतानिसप्तैवनवस्नायुशतानिच ॥ धमनीनांशतेहेतुप व्वपशीशतानिच१०० ।। आमाशय (जहां अन्नपचकर इकट्ठा होताहै ) हृदय कमल चड़ी अन्तड़ी, गुद, उदर, (पेट) और गुदकी दोनो कोठियां इतने प्राणके रहने के स्थलोंका विस्तारहे ५ कनीनिका (माखके तारे) अक्षिकूट (अांखऔरनाककाजोड़)शप्कुली (कानकाभीतरीखण्ड) कर्णपत्र (कानका वाहरी खण्ड) कान, शंखक, भौंह, दन्तवेष्ट (दतपाली) ओठ, कंकुन्दर (जधनकूप)६६ वंक्षण (जंघा और ऊ- रुकाजोड़)पण(अण्डकोश)टक (हृदयकेपासमांसकेटोगोले)दो- नों स्तन जो श्लेष्माकेइकट्ठहोनेसेवने,उपजिह्वा (घंटी)स्फिज (कटिमोथा) बाहु,जंघा और उसकी मांसपिण्डिका ६७ तालुउदर पेडू, शिर, चिबुक, (दाढ़ी) गलशुण्डिका (दाड़ी) और गलेकाजोड़ और जो कोई शरीरमेंगत(नीचीजगह) हो ६८ अांख, कान,नाक मूंह, मूत्रद्दार, मलद्वार ये नबोछिद्र और पूर्वोक्तस्थान और पांव हाथ और हृदय ये सवप्राणके रहने के स्थलह ६६ शिरा (यात पित्त श्लेष्मवाहिनी) नाडी सातसौह स्नायहड्डियों के बन्धन नौसी है यमनी (प्राणवाहिनी) नाड़ी दोसी हैं और पेशी (मोटी मोटी नसे जो जंघा आदि की हैं वे पांचसो होती हैं १०० ॥
पाज्ञवल्क्यस्मृति स॥ एकोनत्रिशल्लक्षाणितथानवशतानिच ॥ पट्पञ्चाशचजा नीताशेराधमनिसंज्ञिताः १ त्रयोलक्षास्तुविज्ञेयाःइमश्रुके शाशरीरिणाम् ॥ सप्तोत्तरंमर्मशतंद्वेचसन्धिशततथा २ रोम्णांकोट्यस्तुपञ्चाशच्चतस्त्रःकोटयएवच ॥ सप्तपष्ठिस्तथा लक्षाःसा ःस्वेदायनैःसह ३ वायवीयैर्विगण्यन्तविभक्ताः परमाणवः ॥ यद्यप्येकोनुवेत्त्यपाभावानांचैवसंस्थितिम् ४ रसस्यनवविज्ञेयाजलस्यांजलयोदश ॥सप्तैवतुपुरीपस्थरक्त स्याटप्रकात्तिताः५पटश्लेष्मापच्चपित्तञ्चचत्वारोमूत्रमेवच॥ सात्रयोातुमेदोमज्जैकोतमस्तके६श्लेष्मौजसस्तावदेव रेतसस्तावदेवतु॥इत्येतदस्थिरंवर्मयस्यमाक्षायकृत्यसौ॥ हेमुनिलोग यहजानो कि शिरा और धमनीइनदोनोंनाड़ियों- के मिलनेसेउसकी शाखाउन्नीसलाखनवसौछप्पन होजाती हैं ? मनुष्योंकेदाढ़ीमूंछ औरशिरमेसवमिल तीनलाखवालहोतेहें एकसौ सातमर्मस्थल(जहांचोटलगनेसेमरजावेंऐसीजगह)हें और दोसौह- ड्डियोंके जोड़हें २ स्वेदायन (पसीनानिकलनेकीजगह)समेतचौवन करोड़सातलाख रोमहोते हैं ३ इनकी गिनती तव होसक्ती है कि जब वायकेपरमाणुमें अलगअलगकियेजावें औरहेमुनिलोग तुममें जोकोई इनभावोंकीस्थितिजानताहो वहमान्यहै क्योंकिये बड़ेक- ठिनई ४इसशरीरमेंअन्नकारसनवअंजली, जलदशअंजली, पुरीप (अन्नमल)सातभंजली,रक्तपाठअंजली,५श्लेपमा(कफ):अंजली पित्तपांचभंजली,मूत्रचारअंजली,वसा(चरवी)तान,मेद (मांसरस दो)मज्जा(हड्डीकेभीतरकीचरवी)सारेशरीरमेंएकचौरमस्तकमा धीअंजलीमिलजुलडेढमंजलीहोती, ६ श्लेष्माजस (कफकेसार) औररेत(वीर्य)भीउतनीहीडेढ़अंजलीरहता है इसप्रकारहाड़मांस आदिअपवित्रवस्तुओंले यहशरीरवनाओरस्थिरहै (बहुतदिन न रहेगा)ऐसीजिसकीमतिहे सोपण्डितमोक्षपानेके योग्य होताहे ७॥
१३१ पाज्ञवल्क्यस्मृति स । द्वासप्ततिसहस्राणिहृदयादिभिनिःसृताः॥हिताहितानाम नाड्यस्तासांमध्ये शशिप्रभम् ८ मण्डलंतस्यमध्यस्थआत्मा दीपइवाचलः॥ सज्ञेयस्तंविदित्वेहपुनराजायतेनतु ९ ज्ञयें चारण्यकमहंयदादित्यादवाप्तवान् ॥ योगशास्त्रञ्चमत्प्रोक्तं शेययोगमभीत्सता १० अनन्यविपयंकृत्वामनोबुद्धिस्मृती न्द्रियम् ।। ध्येयआत्मास्थितोयोसौहृदयेदीपवत्प्रभुः११ य थाविधानेनपठन्सामगायमविच्युतम् ।। सावधानस्तदभ्या सात्परब्रह्माधिगच्छति १२ अपरान्तकमुल्लोप्यम्मद्रकम्म करीन्तथा औवेणकंसरोविन्दुमुत्तरंगीतकानिच १३ ॥ जो हृदयस्थाहित और अहितनामक बहत्तरसहस्त्र(वहत्तरहजा- र)नाड़ियां निकली और इडापिंगला और सुषुम्णातीन ये इनस- घोंकेमध्यमें चन्द्रमाके सदृश प्रकाशमान-एक मंडल उसकेबीच निर्वातस्थलके दीपकेसमान अचल और प्रकाशमान आत्मा है उसको जाननाचाहिये क्योंकि जो उसेजाने वह फिर इससंसारमें नहीं उत्पन्नहोता याज्ञवल्क्यमुनि कहतेहैं कि योग(और विपयों को छोड़ आत्मामें स्थिरता)पानेकी अभिलापारक्खे वह वृहदार- रायकनामग्रन्थ जो मैंने सर्य्यदेवतासे पायाहै उसे और हमारेव- नायेहुये योगशास्त्रको पढ़े १० मनवृद्धि,स्मृति और ( हाथ, पांव, आंख)(कानआदि)इन्द्रियों को दूसरेविषयोंसे हटाकर जो हृदयमें अचल दीपकेसमान प्रभु आत्मास्थित है उसका ध्यानकरना ११ (यदि आत्माकाध्यान नहोसके तो)सामवेद का गान सावधान होकर यथाविधि पढ़े और अभ्यासकरे तो परब्रह्मको जानता है १२ (जिसका मन उसमें भी न लगे) अपरान्तक,उल्लोप्य, मद्रक, प्रकरी, मौवेणक और सरोविंदसहित उत्तरगीत इनसन गीतोंको १३ ॥ , याज्ञवल्क्यस्मृति स०। ऋग्गाथापाणिकादक्षविहिताब्रह्मगीतिका॥गेयमेततद भ्यासकरणान्मोक्षसंज्ञितम् १४वीणावादनतत्वज्ञःश्रुतिजा तिविशारदातालज्ञश्चाप्रयासेनमोक्षमार्गनियच्छति १५ गीतज्ञोयदियोगेननाप्नोतिपरमम्पदम्।।रुद्रस्यानुचरोभूत्वा तेनैवसहमोदत १६ अनादिरात्माकथितस्तस्यादिस्तुशरी रकम् ॥ आत्मनस्तुजगत्सर्वजगतश्चात्मसम्भवः १७ कथ मेतद्विमुह्यामस्सदेवासुरमानवम्॥जगदुद्भूतमात्माचकयन्त स्मिन्वदस्वनः १८ ॥ ओर ग्गाथा, पाणिका, दक्षगीतिका और ब्रह्मगीतिका इन सवोंकोगावे उनके अभ्याससे चित्त एकाग्रहोताहै इसलिये इन्हें मोक्षदेनेवाली कहतेहैं १४ जो मनुष्य वीणा(वीन)जिसके बजाने की रीति भरतनादि,मुनियोंनेकहींहै)वजानेकातत्त्व जाननेवाला हो श्रुति और जातिमें प्रवीणहो और ताल भी जाने तो वेप्रयास मुक्तिकी राहपाताहै १५ गीतजाननेवाला यदि योगकरनेसे परम पद(मुक्ति)न पावे तो रुद्र(महादेव)का अनुचर होताहै भोर उन्हीं के साथ क्रीड़ाकरताहै १६ (इसप्रकरणमें जितनी बातेंकहीहें सय दिखाताहै)मात्माअनादिहै,उसकी उत्पत्ति यहीहेकि शरीरधारण करना,आत्मासे सब(पृथ्वीमादि)जगत् और जगत्(पृथ्वीआदिम- हाभूत के संग)ले प्रात्मा(जीवों)की उत्पत्ति यह कहाहे १७ परन्तु यह वात विस्तारपूर्वक हमसे कहिये कि यह देवता, असुर और मनुष्य आदि के सहित संसार कैसे उपजा पोर उस जगत् में नात्मा किसप्रकार (पशुपक्षी भादि योनिमें) प्राप्तहोताहे क्योंकि इसमें हमलोगोंको बड़ा संदेह है (ऐसाशपियोंने याज्ञवल्क्यमुनि से पूछा) १८॥
योग पावल्क्यस्मृति स० मोहजालमपास्येहपुरुपोदृश्यतेहियः॥ सहस्रकरपन्न वःसूर्यवर्चाःसहस्रकः १९ सआत्माचैवयज्ञश्चविश्वरूपः प्रजापतिः॥विराजःसोन्नरूपणयज्ञत्वमुपगच्छति २० व्यदेवतात्यागसम्भूतारेसउत्तमः । देवान्सन्तर्प्यसरसोय जमानफलेनच २१ संयोज्यवायुनासोमनीयतेरश्मिाभिस्त तः॥ ऋग्यजुःसामविहितंसौरंधामोपनीयते२२सुमण्डला दसौसूर्यःसृजत्यमृतमुत्तमम्।यजन्मसर्वभूतानामशनान शिनात्मना२३तस्मादन्नात्पुनर्यज्ञःपुनरन्नम्पुनःक्रतुः ॥ एव मतदनाद्यन्तचक्रसम्परिवर्तते २४ ॥ (पाज्ञवल्क्यमुनि उत्तरदेतेहे)इस संसारके मोहजाल(जो इस स्थलशरीरमें आत्माका अभिमानकरतेहैं इस)को छोड़ जो असं- यहाथपांव और लोचनरखनेवालाहै,सूर्यके समानतेजसे प्रका-- शमानहै और अनेक शिरवालाहै,१६ वहीआत्मा और यज्ञकह- लाताहै क्योंकि वह विराट पुरुप अन्नरूपसे यज्ञहोताहै और उस से वृष्टिआदि के द्वारा विश्वरूप(सारसंसारका आधार)होताहै २० देवताओंके निमित्त जोवस्तुदीजातीहै उससे जोउनम(सकलज- गत्के जन्मका बीज)(रसअदृष्ट व देव)उत्पन्नहोताहै वह देवताओं को और फलसे यजमानको तुष्टकरके २१ वायुसे प्रेरितहोकर च- न्द्रमण्डल में प्राप्तहोताहै वहांसे किरणों के द्वारा सूर्यमण्डल में प्राप्तहोकर शक्यजः और साम इनतीनों वेदोंका स्वरूपहोजाता है २२ अपने मण्डलसे सूर्य वृष्टि रूप अमृत उत्पन्नकरता है जो चर और अचर रूप सब जगत्के जन्मका हेतु है २३ उस दृष्टि से उत्पन्नहुये अन्नसे फिर यज्ञहोताहै और यज्ञसे फिर पूर्वोक्त प्रकार से)भन्नहोताहै उससे फिर यज्ञ इसप्रकार यह अनादि और अवि- नाशी संसारघमता रहता है २४ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति सः। अनादिरात्मासम्भूतिर्विद्यतेनान्तरात्मनः॥समवायीतपुर पोमोहेच्छाद्वेषकर्मजः२५सहस्रात्मामयायोवाआदिदेव दाहृतः।। मुखवाहोरुपन्जाःस्युस्तस्यवर्णायथाक्रमम२६ वापादतस्तस्यशिरसोद्यौरजायत॥ नस्तःप्राणादिशःश्रोत्र स्पर्शाद्वायर्मुखाच्छिखी २७मनसश्चन्द्रमाजातश्चक्षुपई दिवाकरः॥जघनादन्तरिक्षंचजगच्चसचराचरम् २८ यद्येव सकथम्ब्रह्मन्पापयोनिपुजायते ॥ईश्वरःसकथम्भावरनिष्ट सम्प्रयुज्यते २९ करणेनान्वितस्यापिपळज्ञानकथंचन । वेत्तिसर्वगतांकस्मात्सर्वगोपिनवेदनाम् ३० ॥ आत्मा अनादि है इसलिये अन्तरात्माकी उत्पत्ति नहीं होती यद्यपि ऐसाहै तो भी पुरुषशरीरसे समवायी(सुखदुःख आदिभो. गका सम्वन्ध रखनेवाला)होताहै और वह सम्बन्ध मोहइच्छ- और द्वेप इनसे उत्पादित कर्मकेद्वारा होताहै २५ (हे मुनिलोग) जो मैंने तुमसे असंख्यरूप और सकल जगत्का कारण आदिदे- वकहा है उसीके मुंह,वाहु,उर और पादसे क्रमकरके चारोंवर्णा त्पन्नहुये हे २६ उसीके पावसे पृथ्वी,शिरसे आकाश (देवलोक व स्वर्ग)नाकसे प्राण, कानसे दशोदिशा)स्पर्श से वायु मुंहसे अग्नि २७ मनसे चन्द्रमा,आंखसे सूर्य और जघनसे अंतरिक्ष (शून्य) (आकाश)और चराचर जगत् उत्पन्नहोताहे २८ (पिलोगपूछते है)हेब्रह्मन(हेयोगिन्याज्ञवल्क्य)जो ऐसाही(आत्माही जीवहोता) है तो यह पापयोनि(मृगपक्षी प्रादि)में क्यों उत्पन्नहोताहे और वह ईश्वर है इससे अनिष्टभाव (मोह रांग,देप आदि दोप) भी उसमें नहीं लगसक्ते कि जिससे वह जन्मलेवे २६ और मना- दि ज्ञान इन्द्रियों से युक्त है तो उसको पूर्वजन्मको धातोंका ज्ञान क्यों नहीं रहता और वही सवमें है तो सबको (दुःखादि सुख) देनाका क्यों नहीं जानता ३०॥ -- - याज्ञवल्ल्पस्मृति स. अन्त्यपक्षिस्थावरतांमनोवाक्कायकर्मजैः॥दोषैःप्रयाति जीवोयम्भयंयोनिशतेषुच ३१ अनन्ताश्चयथाभावाःशरीरे भशरीरिणाम् ॥रूपाण्यपितथैवेहसर्वयोनिषुदेहिनाम् ३२ विपाकःकर्मणाम्प्रेत्यकेपांचिंदिहजायते ॥ इहवामुत्रवै केषाम्भावास्तत्रप्रयोजनम् ३३ परद्रव्याण्यभिध्यायन्स्त थानिष्टानिचिन्तयन् ॥ वितथाभिनिवेशीचजायतेन्त्यासुयो निपु ३४ पुरुषोनृतवादीचपिशुनःपुरुपस्तथा ॥ अनिबद्धप्र लापीचमृगपक्षिपुजायते ३५ अदत्तादाननिरतःपरदारोप सिवकः ॥ हिंसकश्चाविधानेनस्थावरेप्यभिजायते ३६॥ (पहिलेप्रश्नका उत्तर योगीश्वर कहते हैं) कि यद्यपि यह जीव ईश्वरांश है और ईश्वरका सत्यज्ञान आदि स्वरूप है तो भी मन वाणी और शरीरसे जो कर्म(अविद्याके समावेश वशहोकर मोह राग आदि भावद्वारा किये गये हैं उनसे अत्यन्त (चाण्डाल)पक्षी और स्थावर (वृक्षादियोगियों में) क्रमसे सैकड़ों जन्मतक प्राप्त होताहै ३१ और जीवोंकी अपने अपने शरीरमें जैसे अनन्तभाव होते हैं उसीके अनुसार सब योनियों में देहियोंके स्वरूप भी होते हैं ३२ किसी कर्म का फल परलोक में किसी का यहांहीं और किसी का यहां वहां दोनों स्थल में होता है इसमें भी जैसा भाव प्रभिलापा)हो३३(पहिले कहा है कि मनो वाकाय कर्मोंसे चांडाल आदि योनि मिलती हैं उसी को चढ़ाके दिखाता है जो दूसरे के इव्यके रहनेकी चिन्तासदा करता रहता औ अनिष्ट (ब्रह्महत्यादि हिंसा)काचिन्तन करतापोर झूठीवातमेवारम्वारयहसंकल्पकरता है वहचाण्डालहोताहै ३४जोपुरुषझूठवोलता,चुगुलीखाता कठोर वचनबोलाकरता मोरवेप्रसंगकीवात कहाकरताहैवह मृगौरपक्षी की योनि में उत्पन्नहोताहै:५जो विना दियेही दूसरेका धनलेता रहताहै और दूसरेकी स्वीमें मासक्तरहता और यज्ञमादिकेविनाहीं जीवोंको माराकरताहै वह स्थावर योनिमें उत्पन्न होता है ३६ । ."
पाशवल्क्यस्मृति स. आत्मज्ञःशौचवान्दान्तस्तपस्वीविजितेन्द्रियः ॥ धर्म कृवेदविद्यात्सात्विकोदेवयोनिताम् ३७ असत्कार्यरतोधीन आरम्भीविषयीचयः ॥ सराजसोमनुष्येपुमृतोजन्माधिग च्छति ३८ निद्रालुःक्रूरकल्लुब्धोनास्तिकोयाचकस्तथा । प्रमादवान्भिन्नटत्तोभवतीर्यक्षतामसः ३९ रजसातमसा चैवंसमाविष्टोभ्रमन्निह ॥ भावरनिष्टैःसंयुक्तःसंसारंप्रति द्यते ४० मलिनोहियथादर्शोरूंपालोकस्यनक्षमः॥तथा विपक्वकरणंआत्मज्ञानस्यनक्षमः ४१ ॥ जो आत्मज्ञानी (विद्या और धनआदि के गर्व से रहित)होता है शौचवान् (वाह्य आभ्यन्तर की शुद्धि से युक्त) होता शान्ति रखनेवाला, तपस्वी होता,जितेन्द्रिय होता, धर्म करनेवाला और वेदों का अर्थ जानने वाला होता है वह सात्विक (सतोगुणवाला) देवयोनि को प्राप्त होता हैं ३७ जो असत्कार्य (नृत्यगीत आदि) में सदा रतरहता,व्ययचित्त रहता (कार्योंसे व्याकुल)योर विपयों में लिपटा रहता हैं वह रजोगुणवालामरने पर मनुष्यकी योनि में उत्पन्न होता है ३८ जो निद्रालु (अधिक सोनेवाला)जीवों को पीड़ादेनेवाला, लोभी, नास्तिक (धर्मनिन्दक) याचक (मंगन) प्रमादी (कार्य विवेक से रहित) और उलटे आचारसे युक्तहोता है वह तामस( तमोगुणवाला)तिर्यक्योनि पशुपक्षीमादियोनि, में उत्तन्न होता है ३६ इस प्रकार जो गुसा और तमोगुणसे युक्त, होकर पहुआत्मा इस संसार भ्रमतामें हुआ भनेक प्रकारके दुःख देनेवाले भावसे युक्तहोता और पुनःपुनः शरीरधरताहै ४० अय पूर्वजन्मकी सुधि क्यों नहीं रखता इत्यादि (दुसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं)जिसप्रकार मलीन दर्पण होतो उसमें रूपनहीं देखपड़ता इसी ढवमात्मा भी अविपककरण (रागद्वेप प्रादिमत से आक्रान्त चित्त)होनेसे पूर्वजन्मकी बातोंके जानने मेंसमर्थनहीं होता४१।।
- याज्ञवल्पपस्मृति स०॥ कट्वेरोयथापक्केमधुरःसन्सोपिन ॥ प्राप्यतेह्यात्म नितथानापककरणेज्ञता४२साश्रयांनिजेदेहेदेहेविन्दति' वेदनाम्॥योगीमुक्तंश्चस सांयोनप्राप्नोतिवेदनाम् ४३ आकाशमेकंहियथाघटादिपुष्टथग्भवेत् ॥ तमात्मैकोह्यनेक श्चजलाधारोप्विवांशुमान् ४४ ब्रह्मखनिलतेजांसिजलम्भू इतिधातवः॥ इमेलोकाएपचात्मातस्माच्चसचराचरम् ४५ मद्दण्डचक्रसंयोगात्कुम्भकारोयथाघटम्॥करोतितृणमृत्का 'टैग़हवागृहकारकः४६॥ जिसप्रकार कडुई (तीतको) ककड़ी में विनापके उसका मधुर रस प्रकट नहीं होता इसीतरह जवतक आत्माके करण(इन्द्रिय) (अपकरागदप आदि मलसे युक्त)रहतेहैं तवतक जाननेकी शक्ति नहीं होती ४२ जिसको देहका अभिमानलगाहे वह अपनी देह में सर्वाश्रय (आध्यात्मिक आधिदैविक भोर आधिभौतिक)वेदना को पाताहै और जो योगी तथा महंकार आदिसेरहितहे वह दूस- रोंकी वेदनाजानताहै और भाप उनको नहीं पाता४३जिसप्रकार भाकाश एकहींहै परन्तु घटआदि उपाधि भेदसे घटाकाश मटा- काश ऐसे भिन्न भिन्न नामसे कहाजाता अथवा जैसे सूर्य एकही है परन्तु जिस जिसप्रकारके पात्र में जलरक्खोगे उसमें वैसाही दीखपड़नेसे अनेकप्रकार का मालूम होताहे इसीप्रकार प्रात्माएं- कहीहे परन्तु अन्तप्करण उपाधिभेदसेअनेकजानपड़ताहे ४४ ब्रह्म (मात्मा)माकाश घायु,अग्नि,जल और भामे ये सबधातु कहलाते हैं क्योंकि शरीरमें व्याप्तहोकर उसका धारणकरतेहें मोरइनया- काश प्रादि को लोक जड़ भी कहतेहैं और यह ज्ञानमय आत्मा कहलाताहै और इन दोनोंसे चराचर जगत् उत्पन्न होताहे ४५ जिसप्रकार मिट्टी, दंड और चक्रसे कुम्हार घड़ा बनाता तृण, मृ. तिका और काठसे गृहकारक (पढ़ई) घरबनाता है ४६ ।। १८ याज्ञवल्क्यस्मृति म। हेमपात्रमुपादायरूपंवाहेमकारकः ॥ निजलालासमा योगात्काशवाकोशकारकः ४७ करणान्येवमादायतासुता स्विहयोनिपु॥सृजत्यात्मानमात्माचसंभूयकरणानिच १८ महाभूतानिसत्यानियथात्मापितथैवहि ।। कोन्यथैकेननेत्रेण दृष्टमन्येनपश्यति ४९ वाचवाकोविजानातिपुनःसंश्रुत्यसं. श्रुताम् ॥ अतीतार्थःस्मृतिःकस्यकोवास्वप्नस्यकारकः ५० जातिरूपवयोरत्तविद्यादिभिरहंकृतः॥ शब्दादिविषयोद्यो गंकर्मणामनसागिरा ५१ ससन्दिग्धमतिःकर्मफलमस्ति नवेत्तिवा ॥ विप्लुतःसिद्धमात्मानमसिद्धोपिहिमन्यते ५२॥ केवल सुवर्णसे सोनार विविधभांतिके रूपवनाताहै और जैसे अपनीलाला(लार)से मकड़ी कोश(जाला)तनतीहै ४७ इसीप्रकार इंद्रियोंको और पृथ्वी आदि महाभूतों को लेकर आत्मा भिन्नभिन्न योनियोंमेंअपनेहीको (निजकर्मसंबंधाहुआ)उपजाताहै ४८ जिस प्रकार (पृथ्वी आदि)महाभूत सचहें इसीढव आत्माभी सच है नहीं तो एक इन्द्रियमें जो वस्तु जानीगई उसको दूसरीसे यहंव- ही.चीज़है ऐसा कौनजानता ४६ और एकसमय सुनीहुईवातको फिरकर यहवही वातहै ऐसा कौनजानता,जो बातें बहुत दिनकी होगईहें उनकीसुधि कौनरखता,जोबातें स्वप्न में देसी उनकांस्म- रण किसकोहोता (क्योंकिउससमय सवइन्द्रियोंका व्यापार वि- रुद्ध रहताहै) ५० जाति,रूप और विद्या प्रादिसे हमी युक्तहें ऐसा अहंकार किसको होता और सुनना स्पर्शकरना प्रादि जो विषय के भोगहें इनकेलिये अर्थ उद्यम कौनकरता (इसलिये बुद्धि और इन्द्रियों से अलग एकमात्मा है यह सिद्ध है ) ५१ वह प्रात्मा अहंकार आदि से दूपितहोके सवकों में फल है या नहीं है ऐसा सन्देह वद्धिमें लाता है और अपनेको रुतार्थ न हो तोभी कृतार्थ मानता है ५२॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ ममदारीसुतामात्याअहमेषामितिस्थितिः। हिताहिते पुभावेषविपरतिमतिःसदा ५३ज्ञेयज्ञेप्रकृतीचैवविकारेवावि शेपवान्।।अनागंकानलापातजलप्रपतनांद्यमी५४एवंद्वत्तो विनीतात्मावितथाभिनिवेशवान्॥कर्मणाद्वेपमोहाभ्यामि च्छयाचैववध्यते ५५ आचार्योपासनवेदशास्त्रार्थेपुविवेकि ता॥तत्कर्मणामनुष्ठानंसंगःसद्भिगिरःशुभाः ५६स्त्र्यालो कालम्भविगमःसर्वभूतात्मदर्शनम् ॥ त्यागःपरिग्रहाणांच जीर्णकापायधारणम् ५७ विपयेन्द्रियसंरोधस्तन्द्रालस्य विवर्जनम् ॥शरीरपरिसंख्या प्रवृत्तिप्वधदर्शनम् ५८॥ उस (अहंकारादिपितमारमा) को यह ममताहोतीहै कि ये हमारे स्त्री,पुत्र और भृत्यहें और मैं इनकाहूं और हित तथाअन- हित कार्यों में सदाविपरीत मतिहोती है यहशास्त्रमर्यादाहे ५३ (यज्ञ)यात्माप्रकृति (आत्माके गुणकी साम्यावस्था)और विकार (अहंकारादि)से विवेकरहितहोताहे और अनशन (अनटकरके खाना छोड़देना)अग्नि और जलमें प्रवेशकरना और ऊंचेस्थल से गिरके मरजाना इत्यादि वातोंमें उद्यमकरताहे ५४ऐसा अविनी- तात्मा होकर झूठासंकल्प करताहुआ कर्म राग, द्वेप, मोह और इच्छासे बाँधाजाताहै ५५ (माक्तका उपाय कहतेहैं) विद्याके लिये गुरूकी उपासना वेदांत और योगशास्त्र आदिके अर्थका विवेक रखना,उनमें जो कर्म कहे हैं उन्हें करना सज्जनोंसे संगकरना प्रियवचन घोलना ५६ स्त्रियोंका देखना और स्पर्शत्यागदेना,सव जीवोंको अपने समान जानना,परिग्रह (पुत्र स्त्री आदि)का त्याग करना,पुराना वस्त्र पहिनना ५७ विषयों से इन्द्रियों को रोकना तन्द्रा(भाई)और मालस्य(अनुत्साह)को छोड़नादेहमें मपवित्रता आदि दोपोंको समझाकरना सब प्रवृत्तियों (गसन आदि)में अघ (पाप)को देखना ५८ ॥
१४० याज्ञवल्क्यस्मृति स०। नीरजस्तमतासत्त्वशुदिनिःस्टहताशमः॥ एतैरुपायैःसं शुद्धःसत्वयोग्यमृतीभवेत्५९ तत्त्वस्मृतरुपस्थानातसत्त्वयो गात्पारक्षयात्॥कर्मणांसन्निकच्चसतायोगःप्रवर्तते ६० शरीरसंक्षयेयस्यमनःसत्त्वस्थमीश्वरम् ॥ भविप्लुतमतिःस म्यग्जातिसंस्मरतामियात् ६१ यथाहिभरतोवर्णैवर्णयत्या त्मनस्तनुम् ॥ नानारूपाणिकुर्वाणस्तथात्माकमजास्तनूः ६२ कालकात्मवीजानांदोपैमातुस्तथैवच ॥ गर्भस्य वैकृतन्दृष्टमंगहनिादिजन्मनः ६३ अहंकारेणमनसागत्या कम्मफलेनच ॥ शरीरेणचनात्मायम्मुक्तपूर्वःकथेचन ६४॥ रजोगुण भोर तमोगुणकापरित्याग(प्राणायाम आदिसे अन्त- प्करणकी शुद्धि,विषयों में अभिलाप न रखना और शम (संयम) रखना,इन सब उपायोंसे शुद्धहो केवल सतोगुण युक्त होकर ब्रह्म की उपासना करे तो मुक्त होताहै ५६ तत्त्व(मात्मा)का सदास्मरण होनेसे,सतोगुण (शुद्धि)के योगसे,कोंके नाशहोनेसे और सज्ज- नोंके संगसे आत्माकायोग होताहै ६९ जिस अविप्लुतमति(अहं- कार भादिसे प्रदूपित बुद्धि)का मन शरीरत्याग समयमें सत्त्वगुण युक्त होकर ईश्वरमें लगताहे वह यदि परमगति न पावे तो पूर्व जन्मोंका स्मरण तो उसे होताही है ६१ जिसप्रकार नट भनेक रुप बनानेकेलिये भिन्न भिन्नप्रकार का वेपवनाताहे इसीप्रकार अपने(शुभाशुभ)कर्मोंसे उत्पन्न शरीर प्रात्मा धारणकरताहे ६२ काल,कर्म और आत्मा वीज(अपनीउत्पत्ति का कारण पिताका 'घीज)और माताके (रजके) दोप इन सव दोपोंसेभी गर्भकाधिका- रहोकर भंगहीन आदिका जन्महोताहै ६३ अहंकार,मन,संसारके हेतु भूत जो दोपहँ धर्म अधर्मरूपी कौका फल और सूक्ष्म शरीर इनसवले वह प्रात्मा (मोक्षहोनेविना)कभी नहीं छूदता है ६४ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। वयाधारःस्नेहयोगाद्यथादीपस्यसंस्थितिः ॥ विक्रिया पिचर टैवमकालेप्राणसंक्षयः६५अनन्तारश्मयस्तस्यदीपव यःस्थितोहृदि॥सितासिताःकनीलाःकपिलापीतलोहिताः २६ ऊर्ध्वमकःस्थितस्तेपायोभित्वासूर्यमण्डलम् ॥ब्रह्मलो कमतिकम्यतेनयातिपरांगतिम् ६७ यदस्यान्यद्रश्मिशत मूर्ध्वमेवव्यवस्थितम् ॥ तेनदेवशरीराणितैजसानिप्रपद्यते ६८यनैकरूपश्चाधस्तादृश्मयोस्यमदुप्रभा॥इहकर्मोपभो गायतैःसंसरतिसोवशः ६९ वेदैःशास्त्रैःसविज्ञानर्जन्मना मरणेनच ॥ आयांगत्यातथागत्यासत्येनह्यन्तेनच ७० श्रेयसासुखदुःखाभ्यांकर्मभिश्चशुभाशुभैः ॥ निमित्तशाकु, नज्ञानग्रहसंयोगःफलैः ७१॥ जैसे एकहीदीपकमेंकई वत्तियां और तेलकेयोग्यसेजलतेदापकी रवलवायएकसाथही सबकोबुझादेताहै इसीप्रकारअकाल में भी मनुप्योंका प्राणत्याग होजाताहे६५ (मोक्षमार्गकहतेहैं)जोमात्मा दीपकेसदृश हृदयमस्थितहै उसकश्वित,काली,कवरी,नीली,कपि. ला,पीली और लालरंगकी असंख्यनाड़ियां ६६ उनमें एकनाड़ी जो ऊपरकी और सूर्यमण्डलको भेदकर ब्रह्माके स्थानसे भी परे चलीगईहै उसीकेद्वारा परमगतिको प्राप्तहोताहै ६७ इस आत्माकी मुक्तिनाड़ीसे भिन्न मोर जो सैकड़ों ऊर्ध्वमुखनाड़ियां उनसेदेव- तामोंकेधाम और शरीरप्राप्तहोते, ६८ और जो उसकेनीचे कम ज्योतिवाली नाड़ियां हैं उनकेदारा इससंसारमें अपनेकर्मों का भोगकरनेके लिये जन्मपांताहै ६६ वेद,शास्त्र,अनुभव,जन्म, मरण पीड़ा,चलना,नचलना,सचाई झुठाई, ७० हितवस्तुका मिलना (परलोकके)सुख और दुःख अच्छे और बुरेकर्म,निमित (भूकम्प मादि)शकुनज्ञान (पक्षीकांचेष्टा जाननी)(सूर्य भादि)यहोके सं. योगसे जो फल उत्पन्नहो ७१॥
१४२ पाशवल्क्यस्मृति स०। तारानक्षत्रसंचारैर्जागरैःस्वप्नजैरपि॥ आकाशपवनज्यं तिर्जलभूतिमिरैस्तथा ७२ मन्वन्तरैयुगप्राप्त्यामंत्रोपधिप लैरपि।वित्तोत्मानंवेद्यमानंकारणंजगतस्तथा ७३ अहंक रःस्मृतिर्मेधावेपोबुद्धिःसखन्धृतिः।।इन्द्रियान्तरसंचारइच्छ। धारणजीविते ७४ स्वर्गःस्वप्नश्वभावानाम्प्रेरणम्मनसाँग 'तिः॥निमेपश्चेतनायत्रआदानम्पांचभौतिकम् ७५५०९।। निदृश्यन्तेलिंगानिपरमात्मनः॥ तस्मादस्तिपरोदेहादात्मा सर्वगईश्वरः ७६ वीन्द्रियाणिसानिमनःकर्मेन्द्रियाणि च ॥ अहंकारश्चवुद्धिश्चष्टथिव्यादीनिचैवहि ७७॥ तारा(अश्विनी आदि सत्ताईससे भिन्न) और नक्षत्र (भश्विनी मादि),इनकीगतिद्वारा शुभाशुभ फलजानना, जागते वा सोते समय जो भलावुरादेखें,आकाश,वायु, ज्योति (सूर्य प्रादि) जल भूमि और अन्धकार जो ये जीवोंके उपभोग के लिये बने हैं ७२ मन्वंतर (मनुका बदलना ) युगका बदलना और मंत्र तथा औ- पधियोंका फल इनसववातोंसे (हेमुनिलोग) देहसे पृथक् प्रात्मा है और वह जगत् का कारण है ऐसा समझो ७३ अहंकार स्मरण मेधा (धारण) हेप,बद्धि,सुख,धीर्य,इन्द्रियान्तर संचार(अर्थात् ) एक इन्द्रिय से जानीहुई चीजका दूसरीसे स्मरण करना) इच्छा धारण, जीना, ७४ स्वर्ग, स्वप्न, इन्द्रियों की प्रेरणा,मनकी गति निमेप (पलक मारना) चेतना ,यत्न,पञ्च, भूतोंका धारण ७५ इतने सब परमात्माके चिह्न देखपड़ते हैं, इसलिये देहसे अलग कोई आत्मा जो सवका ईश्वर भोर सबमें व्याप्तहे यह बात सिद्धा भई ७६, (शब्द आदि) अपने विषयों सहित श्रोत्र प्रादि बुद्धि इन्द्रिय, मन (वाणी भादि) कम्र्मेन्द्रिय अहंकार, वुद्धि पृथ्वी मादि पञ्च महाभूत ७७ ॥ , याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ १४३ अव्यक्तमात्मक्षेत्रज्ञःक्षेवस्यास्यनिगद्यते। ईश्वरःसर्वभूत स्थःसन्नसन्सदसञ्चयः७८वुद्धेरुत्पत्तिरव्यक्तात्ततोऽहंकारस म्भवः।।तन्मात्रादीन्यहंकारादेकोत्तरगुणानिच७९शब्दस्प शश्वरूपंचरसोगन्धश्चतद्गुणाः ॥योयस्मानिःसृतश्चैषांसत स्मिन्नवलीयते ८. यथात्मानंसृजत्यात्मातथाव कथितो मया ॥ विपाकात्रिःप्रकाराणांकर्मणामीश्वरोपिसन् ८१ सत्वरजस्तमश्चैवगुणास्तस्यैवकीर्तिताः॥रजस्तमभ्यिामा विष्ठश्चक्रवदाम्यतेह्यसौ ८२ अनादिरादिमांश्चबैसएवपुरु पःपरंः॥लिंमेन्द्रियग्राह्यरूपःसविकार उदाहृतः ८३ पित यानोजवीथ्याश्च यदगस्त्यस्य चान्तरम् ॥ तेनाग्निहोत्रणो यातिस्वर्गकामादिवम्प्रति ॥८४ औरअव्यक्त(प्रकृति)येसव उससर्वव्यापीऔर ईश्वरसत्असत् रूपधारीके स्थानहैं और इनमेंरहकर वहात्मा और क्षेत्रज्ञकहा जाता है७८अव्यक्त(सत्त्वरजस्तम इनतीनोंगुणोंकी साम्यावस्था) से वद्धिकीउत्पत्तिहोता है उससेअहंकार पोर अहंकारसे तन्मात्रा आदि उत्पन्न होतेहैं और इनमेंक्रमसे एकरगुण अधिकहोतेहैं ७६ शब्द,स्पर्श,रूप,रस और गन्धये सब उन(आकाशमादिपञ्चभूतों) के गुण हैं और जो जिससेनिकलताहै वहप्रलयसमय उसीमेलीन होजाताहै८०ईश्वरभी होकर जिसतौर यहआत्मा मानस आदि तीनोंप्रकार के कम्मोके विपाक होनेसे आत्माको (जीवको)सिर- जताहै सो मैने आपलोगोंसे कहा८१ सत्त्व,रज और तमये तीनों गुण भी उसीके हैं और रजोगुण तमोगुणसेयुक्तहोकर चक्रकेसदृश वहीभात्मा इस संसारमें घमताहै यह भी कहा ८२ वह अनादि परमपुरुप शरीरधारणरूपीविकारसे आदिमानहोता चिहन और इन्द्रियोंसे देखनेयोग्य भी होताहे८३ (बाजवीपी (देवताओं का पथ) और भगस्त्यके ताराकेवीच पित्यानहे उसीमें होकर स्वर्ग की इच्छासे यज्ञकरनेवाले अग्निहोत्री लोग स्वर्ग में जातेहैं ८४ ॥
१४४ पाशवस्स्यस्मृति स०॥ येचदानपराःसम्यगष्ठाभिश्चगुणैर्युताः॥तेपितेनैवमार्गे णसत्यत्रतपरायणाः ८५ तत्राप्टाशातिसाहस्रामुनयोगृहमे धिनः। पुनरावर्तिनोवीजभूताधर्मप्रवर्तकाः८६ सप्तर्पिना गवीथ्यन्तर्देवलोकंसमाश्रिताः॥तावन्तएवमुनयःसारम्भ विवर्जिताः८७ तपसाब्रह्मचर्येणसंगत्यागेनमेधया।तत्रग त्वावतिष्ठतेयावदाभूतसंप्लवम् ८८यतोवेदाःपुराणानिविद्यो पनिपदस्तथा॥श्लोकाःसूत्राणिभाष्याणियच्चकिंचनवाङ्म यम्८९वेदानुवचनंयज्ञोब्रह्मचर्यंतपोदमः॥श्रदोपवासःस्वा तंत्र्यमात्मनोज्ञानहेतवः ९० सह्याश्रमैर्विजिज्ञास्यःसमस्तै रेवमेवतु॥द्रष्टव्यस्त्वथमन्तव्यःश्रोतव्यश्चद्विजातिभिः९१॥ जो लोग दानी और अहंकारसे वर्जित होकर दया, क्षांति अनसूया)शोच,अनायास,मंगल,अकार्पण्य और अस्टहाप्रआत्माके इन आठों गुणोंसे युक्तहैं वे भी सत्यवादी उसी मार्गसे स्वर्ग को जाते३८५उसी पिढ्यानमें अट्ठासी हजार मुनि गृहस्थधर्मवाले वसतेहें उनका यही धर्महै कि पुनःपुनः सृष्टिके आदिमें धर्म का उपदेश करके उसका चीज वोतेहैं६सप्तर्षि और नागवीथी (ऐ. रावत पथ) के बीच देवलोक में रहनेवाले उतनेही (अट्ठासी हज़ार)मुनि सवकामकोछोड़ केवल ज्ञानमेंरत ८७ तपस्या,ब्रह्म- चर्य संगत्याग और मेधा इनसब गणोंसे युक्त महाप्रलय तक वे स्थितही रहतेहैं ८८ और उन्हीं से वेद, पुराण,अंगविद्या,उपनि- पद्,श्लोक, सूत्र, भाप्य मोर जो कुछ शास्त्रहें सब प्रचलित भये हैं ८६ वेदोंका पढ़ना, यज्ञकरना,ब्रह्मचर्य रखना तपस्था(इंद्रियों का दमन, धर्म में श्रद्धा, उपवास और स्वतंत्रता (निश्चिन्ताई) इन सवज्ञान होताहे १० द्विज लोग हरएक आश्रम में उस आरमाक्री जिंजीसारखोज करें) उसके उपाय ये हैं उसी की सुनि भन न करें और ध्यान करें ह. .
याज्ञवल्क्यस्मृति स०। यएनमेवम्विन्दन्तियेचारण्यकमाश्रिताः ॥ उपासतेति जाःसत्यं श्रद्धयापरयायुताः ९२ क्रमात्तेसम्भवन्त्यर्चिरहः शुक्लन्तथोत्तरम् ॥ अयनन्देवलोकंचसवितारंसवैद्युतम् ९३ ततस्तान्पुरुपोभ्येत्यमानसोब्रह्मलौकिकान् ॥ करोतिपुन रोत्तिस्तेषामिहनबिद्यते ९४ यज्ञेनतपसादानैयहिस्वर्ग जितोनराः ॥ धमनिशांकृष्णपक्षन्दक्षिणायनमेवच ९५ पिटलोकंचन्द्रमसंवायुवष्टिंजलंमहीम् ॥क्रमातेसम्भवन्ती हपुनरेवब्रजन्तिच ९६ एतद्योनविजानातिमार्गद्वितयमा त्मवान् ॥ दन्दशक पतंगोवाभवेत्कीटोयवाकृमिः ९७ अरु स्थोत्तानचरणःसव्येन्यस्योत्तरंकरम्॥उत्तानंकिंचिदुन्नाम्य मुखम्विष्टभ्यचोरसा ९८॥ जोद्विजघडीश्रद्धासे युक्तहोकर उसमात्माकीउपासना इसप्रकार अरण्य (निर्जनप्रदेश)में करतेहैं वे उसकोपातेहैं ६२ जिन्हें आत्म- ज्ञानहोताहै वेक्रमसे अग्नि,दिन,शुक्लपक्ष उत्तरायन,देवलोक,सूर्य भौर विद्युत (बिजली)इनसबमुक्तिकीराहदिखानेवाले देवताओं के लोकमेंजाकर उन्हींकासारूपपातेहैं।.३ फिरमानस(जिसकीउत्पत्ति मनकेसंकल्पसेहै) पुरुषमाकर उनको ब्रह्मलोकमें पहुंचाता है और वहांसे फिर उनकाजन्मनहींहोता क्योंकि(परमात्मालीनहोजाते है)१४ जो लोग यज्ञ तपस्या और दान देनेसे स्वर्ग जाते थे अपने पुण्यकाफल भोगनेके अनन्तर क्रमसेधूम,निशा,कृष्णपक्ष,दक्षिणा यन ६५पितृलोक,चन्द्रलोक,इनकेदेवताकालोकपातेहैं फिर वायु दृष्टिजलभोर भूमिकोप्रातहोकर(अन्नादिकेवीर्यकारूपहो)संसार में आते हैं ६६ जो इनदोनों पथों के धर्मों का आचरण नहीं करता वहसांप पक्षी और कीड़े मकोड़ोंका जन्मपाताहे ९७ (उपासना का प्रकार कहते हैं) पद्मासन चांध, वांयें हाथकी हथेली में दहिना हाथ उत्तान रेख मुंह कुछ ऊपरको उठा वा छाती से रोक ६ ॥ .
पाज्ञयल्पयस्मृति स०॥ निमीलिताक्षःसत्त्वस्थोदन्तैर्दन्तानसंस्टशन्॥ तालुस्थ चलजिदश्चसंटतास्यःसुनिश्चलः ९९ संनिरुध्येन्द्रियय मनातिनीचोच्छ्रितासनः ॥ द्विगुणंत्रिगुणंवापिप्राणायाम पक्रमेत् २०० ततोध्येयःस्थितोयोसौहृदयेदीपवत्प्रभुः । धारयेत्तत्रचात्मानंधारणांधारयन्बुधः १ अंतर्दानस्मृति कांतिष्ठिःश्रोतज्ञतातथा निजंशरीरमुत्सृज्यपरकायप्रवे शनम् २ अर्थानांछंदतःसृष्टिर्योगसिद्धहिलक्षणं ॥सिद्धयों गेत्यजन्देहममृतत्वायकल्पते ३ अथवाप्यभ्यसन्वेदंन्यस्त कर्मावनेवसन् ॥ अयाचिताशीमितभुक्परोसिद्धिमवान यात् ४॥ आंखमूंद)काम क्रोधादिसे रहितहो,दांतोंसे दांत न मिला- कर, तालूमें जीभकोमचलरख, महमूंद,निश्चलहो (देहनडोलावे) १६ इन्द्रियोंको अपनेअपनेविपयोंसे अच्छीतरहरोक और न बहुत नीचे औरन ऊंचेभासनपरवेठकर दूना व तिगुना प्राणायामकरने का पारम्भकरे २०० (जवप्राणवायु अपनेवशमेंहोजावै) तो नि- २चल दीपकेसमान जोप्रभुहृदयमें स्थितहै उसकाध्यानकरना और उस हृदयमें प्रात्मा धारणकरना और धारण (एकप्रकारका प्रा. पायाम)भी विज्ञलोगों को रखनी चाहिये १ अन्तर्दान (अदृश्य होजाना स्मृति (अतीन्द्रिय वातोंका स्मरण) कांति(शोभा) दृष्टि (जो होगईहै व होनेवाली बात है उसका देखना) ओत्रज्ञता (बडीयड़ी दूरकी वातोंको सुनलेना) अपना शरीर छोड़कर दूसरे के शरीरमें प्रवेश करजाना २ भोर अपनी इच्छाही से जिसचीज को चाहे उत्पन्नकरले ये सवयोग सिदिकेलक्षणहें और जव योग सिद्धभया तो देहत्यागकरनेसे ब्रह्मरूप होजाताहै ३ अथवा (यज्ञ दानादिनकरसकेतो) किसी वेदकाअभ्यास करते सपकाम छोड़ बनरह, विनामांगे जो मिले उसे परमित भोजन करता रहे तो परमसिद्धि (मुक्ति) को पासा है ४॥ .
पानवल्क्यस्मृति स०॥ न्यायागतधनस्तत्त्व ज्ञाननिष्ठोतिथिप्रियः॥ श्रादकृत्स त्यवादीच गृहस्थोपिहिमुच्यते ५ महापातकजान्धोरान् नरकान्प्राप्यदारुणान् ॥ कर्मक्षयात्प्रजायन्ते महापातकि नस्त्विह ६ मृगश्वशूकरोष्ट्राणां ब्रह्महायोनिमृच्छति॥ खर पुष्कसवेनानां सुरापोनात्रसंशयः ७ कृमिकीटपतंगत्वं स्वर्णहारीसमाप्नुयात् ॥ तृणगुल्मलतात्वंचक्रमशोगुरुतल्प गः ८ ब्रह्महाक्षयरोगीस्यात् सुरापःश्यावदन्तकः॥हेमहा रीतुकुंनखीदुश्चर्मागुरुतल्पगः९योयेनसम्बसत्येषांसतल्लिं गाभिजायते ॥अन्नहर्तामयावीस्यान्मूकोवागपहारकः१०॥ जिसने धर्मसे धन कमायाहो जो तत्त्वज्ञानमें निष्ठा (प्रीति) रखताहो, भतिथि (पूजनेका) प्यारकरे, श्राद्ध करनेवाला और सत्यवादी हो तो वह गृहस्थभी मुक्तहोता है ५ इत्यध्यात्मप्रकर- एम् ॥ महापातक (ब्रह्महत्यादि पांच ) से उत्पन्न घोर नरकों के भोगने से जय कर्म का क्षय होता तो महापातकी, लोग इस संसार में जिस जिस योनिको प्राप्तहोतेहैं सो ये हैं 'मृगा (हि- रन ) कुत्ता, सुमर और ऊंटका जन्म ब्रह्मघाती पाताहै सुरापीने वाला गधा, पुष्कस (प्रतिलोम निपादसे शूद्रकी स्त्री में उत्पन्न) और वेन (वैदेहकसे आंवटी में उत्पन्न ) का जन्म पाताहे ७ (स्वर्णहरी ) सोना चोरानेवाला कमि, कीट और पतंग काजन्म पाता और (गुरुपत्नीभोक्ता) तृण, गुल्म और लताका जन्म पा- ताहै ८ ब्रह्मघाती (मनुष्यका जन्मपावेतो) (राजयक्ष्मी) होता है,सुरापी कालेदांतवाला होता सोना चुरानेवाले के नखसड़ेहोते, गुरुतल्पगामी कुष्टीहोता है और जो इनमें किसी के संग रहे वह भी वैसाही महापातकी कहलाताहै अन्नचुरावे तो उसे अजीर्ण रोगहोता,वाणीचुरावे (पोथी चुरावे व कपटसे पढ़े व विद्याजाने व वतावे) तो मूक (गूंगा) होताहै १० ॥
२.८८ पाशवल्पपस्मृति स०। धान्यमिश्रोतिरिक्तांगः पिशुनःपतिनासिकः ॥ तैलहत्तै लपायीस्यात्पूतिवक्रस्तुसूचकः ११ परस्ययोपितहत्वाब्रह्म स्वमपहत्यच ॥ अरण्यनिर्जलेदेशेभवतिब्रह्मराक्षसः १२ हीनजातोप्रजायेतपररत्नापहारकः॥पनशाकंशिखीहत्वा गन्धान्छुच्छुन्दरीशुभान् १३ भूपकोधान्यहारीस्याद्यानमु. ट्रःकपिःफलम्।।जलप्लवःपयःकाकोगृहकारीधुपस्करम्१४ मधुदंशःफलंगृध्रोगांगोधाग्निवकस्तथा ॥ श्वित्रीवस्त्रंश्वार संतुचरिलिवणहारकः १५॥ T धान्यसे मिलीहुई चीज चुरावे तो उसके कोई अधिक मंगहोता है (जैसे छःउंगली)चगलीकरनेवाले की नासिका दुर्गन्धदेतीहै तेल चुरावे तो तैलपायी (कीटविशेपतेलिन) होताहै,सूचकहो (झूठमूठ किसीको दोपलगावे ) तो उसका मुंह वसाताहै ११ जो दूसरेकी स्त्री अथवा ब्राह्मण की चीज अपहरणकरताहै वह जहांजल नहीं ऐसे घनमें ब्रह्मराक्षस होताहै १२ परायेकेरत्नोंको चुरावे तोहीन जाति (हेमकारनामपक्षी योनि में उत्पन्न होताहै जिसमें पत्तेहीहों ऐसा शाकचरावे तो मचूरहोता और सुगन्धकी वस्तुचुरावे तो छ- छूदरहोताहै १३ धानचुरावे तो मूसाहोता यान (सवारी)चुरायेतो ऊंट होता,फल नरावेतो बानरहोता,जलचुरावे तो प्लव (शकट- विल नाम पक्षी) होता दूधचुरावे तो काकहोता और गृहस्थीकी चीजचुराये (मूशल आदि)तो गृहकारी (वरटनामककीट)होताहे १४ मधु चुरावे तो दंश(डंस)होताहै मांसचुराये तो गिदहोता गो चुरावे तो गोहहोसा,अग्नि चुरावे तो वगला,वस्त्र (कपड़ा) चुरावे तो कुष्टीहोता,कोई (सट्टामीठा आदि)रस चुरावे तो कुनाहोता, ओर लवणचुराने तो चीरी (ऊंचे स्वर से बोलनेवाला कीट) होताहै १५॥
याज्ञवल्यस्मृति स। प्रदर्शनार्थमेतत्तुमयोक्तस्तेयकर्माणाद्रव्यप्रकाराहियथा तथैवप्राणिजातयः १६ यथाकर्मफलंप्राप्य तिर्यक्कंकालप ययात् ॥ जायंतेलक्षणंघटादरिद्राःपुरुषाधमाः १७ ततो निष्कल्मपीभूताःकुलेमहतिभोगिनः ॥ जायतेविद्ययोपेता धनधान्यसमन्वितः १८ विहितस्याननुष्ठानानिन्दितस्यच सेवनात् ॥ अनिग्रहाचेन्द्रियाणान्नरःपतनमृच्छति १९ तस्मात्तेनेहकर्तव्यम्प्रायश्चित्तम्बिशुद्धये ॥ एवमस्यान्तरा स्माचलोकश्चैवप्रसीदति २० प्रायश्चित्तमकुर्वाणाःपापेषु निरतानराः । अपश्चात्तापिनःकष्टान्नरकानयांतिदारुणा न् २१ तामिस्त्रलोहशंकुंचमहानिरयशाल्मली ॥ रौरवं कुड्मलम्पतिमृत्तिकंकालसूत्रकम् २२ ॥ दिखलानेके लिये मैंने इतनाही कहा है परन्तु जिसप्रकारकी चीजचुराये वैसीही जातिमें वह उत्पन्नहोताहै ऐसा समझ लेना। चाहिये १६ अपनेकियेहुये कर्मके अनुसार नरको वास और पशु पक्षी आदि योनिकोपाकर काल क्रमसे कर्मफल क्षीण होने पर कुरुप भौर दरिद्री मनुष्यका जन्मपातेहैं १७ तव जो अच्छा कर्म करे तो पापरहितहोते और बड़े कुलमें जन्मपाकर नानाप्रकार के भोग,विद्या और धन धान्यते युक्तहातेहैं । इतिकर्मविपाकप्रकरण म् १८ जो नित्य वा नैमित्तिक वस्तु विहित हैं उनके न करने से, निंदित वस्तुके करनेसे और इन्द्रियोंका संयम न रखनेसे मनुष्य पतितहोताहै १६ इसलिये वह पुरुष प्रायश्चित्तकरे इसके करनेसे वह शुद्धहोताऔर तब उसका अन्तरात्मा और यह लोक परलोक सब प्रसन्नहोतेहैं २० जो प्रायश्चित्त नहीं करते और सदा पापमें रत रहते और उसका पछतावा भी नहीं करते वे लोग दारुणकप्ट देनेवाले नरकमें जातेहैं २१ तामित्र,लोहशंकु,महानिरय शाल्म- लि, रौरव, कुडमल, पुतिमृत्तिक, कालसूत्रक २२ ॥
. यामवल्क्यस्मृति स०। संघातलोहितोदंचसविपंसम्प्रपातनम् ॥महान" कोलंसंजीवनमहापथम् २३ अधीचिमंधतामिस्त्रंकुम्भीपा कन्तथैवच ॥ असिपत्रवनंचैवतापनकविंशका २४ म हापातकोरैरुपपातकजैस्तथा ॥ अन्वितायान्त्वचरि तप्रायश्चित्तानराधमाः २५ प्रायश्चित्तरपैत्येनोयदज्ञानं तम्भवेत् ॥ कामतोव्यवहार्यस्तुवचनादिहजायते २६ ६ , महामद्यपःस्तेनस्तथैवगुरुतल्पगः ॥ एतेमहापातकिनोर श्चतैःसहसम्वसेत् २७ गुरूणामध्यधिक्षेपोवेदनिन्दासुर दधः ॥ ब्रह्महत्यासमंज्ञेयमधीतस्यचनाशनंन् २८ निरि दभक्षणंजैह्म्यमुत्कर्षेचवचोनृतम् ॥ रजस्वलामुखास्वाद सुरापानसमानितु २९ ॥ संघात,लोहितोदक,सविप,संप्रयासन,महानरक,काकोल संजा. वन,महापथ २० अवीचि,अन्धतामिस्त्र, कुंभीपाक, और असिपत्र धन ये इक्कीस नरक हैं जैसा इनका नामहै तेसेही कष्ट इनमें हो. तेहैं २४ जो नरों में अधम महापातक और उपपातकसे युक्तहोते और प्रायश्चित्त नहीं करते वे इन नरकोंमें पड़ते हैं २५ जो पाप मज्ञानसे करे वह प्रायश्चित्त करनेसे दूरहोताहै भोर जो जानबूझ के कियाहो वह दूर नहीं होता परन्तु प्रायश्चित्त करने से धर्मशास्त्र के वचनोंके द्वारा लोक व्यवहारके योग्य होजाताहे २६ ब्राह्मण को मारनेवाला, मदिरा पीनेवाला, ब्राह्मणका सोना चुरानेवाला, गुरूकी स्त्रीमें गमनकरनेवाला और जो इनके संगमें रहे ये पांच महापातकी कहेजातेहैं २७ गुरूकी झूठीनिंन्दा,वेदकी निन्दा,मि- त्रका वधकरना और पढ़ेहुये शावको भुलायादेना ये चारों ब्रह्म- हत्याके समान है २८ (लशुनमादि)निपिद्ध चीजों का खाना, कुटिलाई करनी,वड़ाई के लिये झूठयात बोलना और रजस्वला स्त्री का मुंह चूमना ये सव सुरापान के तुल्य हे २६ याश्वल्क्यस्मृति सः। अश्वरलमनुष्यस्त्रीभूधेनुहरंणन्तथा॥ निक्षेपस्यचसर्व हेसुवर्णस्तेयसम्मितम् ३० सखिभार्याकुमारीपस्वयोनि वन्त्यजासुचासगोत्रासुसुतस्त्रीपुगुरुतल्पसमस्मृतम् ३१ पेतुःस्वसारम्मातुश्चमातुलानीस्नुपामपि ॥मातुःसपत्नींभ गनीमाचार्यतनयांतथा ३२ आचार्यपत्नीस्वसुतांगच्छंस्तु रुतल्पगलिंगंछित्वावधस्तत्रसकामायाःस्त्रियाअपि३३ गोषधोत्रात्यतास्तेयमृणानांचानपाक्रिया ॥ अनाहिताग्नि पापण्यविक्रयःपरिवेदनम् ३४ भृतादध्ययनादानम्भृत काध्यापनन्तथा ॥ पारदार्यपारिवित्यम्वाधुष्यंलवणक्रि २ घोड़ा,रत्न,मनुष्य,स्त्री,भूमि गो और थाती रक्खीहुई चीजका भपहरणकरना ये सव सुवर्णस्तेयके समानहें ३० मित्रकी स्वी उत्तमजातिकीकारीकन्या,वहिन,चाण्डाली,अपनेगोत्रकी स्त्री और पुत्रकीवधूइनसवमें गमनकरना गुरुतल्पगमनके तुल्य, ३१ फूफी, माता,मामी,पतोहसवतीलीमाता,वहिन, गुरूकीलड़की ३२ गुरु की स्त्री और अपनीलड़की इनमेंसे किसीकागमनकरे तोगुरुतल्प- गहोताहै राजा उसका लिंगकटवाकर मारडाले और जो ये स्त्री भी कामवशहोके इन्हीं पुरुषोंके पास जावें तो उन्हें भी मरवाडाले३३ गोकावध करना, जिसको जिससमय में कहा है उससमयतक यज्ञोपवीत न देना चोरीकरना शृणका न देना, अधिकारी होकर अग्निहोत्र न करना, जो बेचनेयोग्य चीज नहीं है उनका वेचना, जेठेभाई के रहतेही छोटेकाव्याह करना ३४ नौकर से पड़ना, नौकरहोकर पढ़ाना, दूसरेकी स्वीकासेवन,छोटेका व्याह हो बड़े का कारा बैठाही रहना, व्याजलेने की जीविका करना नोनघनाना ३५॥
१५२ याज्ञवल्पयस्मृति स०। स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रबधोनिंदितार्थोपजीवनम् ॥ नास्तिक्य म्वतलोपश्चसुतानांचैवविक्रयः ३६ धान्यकुप्यपशुस्तेयम याज्यानांचयाजनम् ॥ पितमातृसुतत्यागस्तडागारामवि क्रयः ३७ कन्यासंदूपणंचैवपरिविंदकयाजनम् ॥ कन्या दानंतस्यैवकोटिल्यम्बतलोपनम् ३८ आत्मनार्थक्रियारंभो मद्यपस्त्रीनिपेवणम् ॥ स्याध्यायाग्निसुतत्यागोबान्धवत्या गएवंच ३९ इन्धनार्थगुमच्छेद स्त्रीहिंसापधजीवनम् ॥ हिं स्त्रयविधानंचव्यसनान्यात्म विक्रयः ४० शूद्रप्रेष्यहीनस ख्यंहीनयोनिनिषेवणम् ॥ तथैवानाश्रमेवासःपरान्नपरि पुष्टता ४१॥ स्वी,शूद्र,वैश्य और क्षत्रियकावधकरना,निन्दित वस्तुसेजीवि- का करनी,नास्तिकताकरनी,ब्रह्मचारीहोकर स्त्रीगमनकरना, अपने लड़कोंकावेंचना ३६ धान्य,पीतल सीसा आदि द्रव्य और पशुकी चोरीकरनी,यज्ञके योग्य जो नहीं (शूद्रादि) उनको यज्ञकराना, पिता,माता और लड़का इनका त्यागकरना तालाव और वगीचे को बेंचना ३७ कन्याका दृषण (अंगुलीआदिसे योनिविदारण) करना, बड़े भाई के रहते जो पहिले अपनाव्याहकरे उसको यज्ञ कराना उसीको कन्यादान देना,कुटिलता करनी,व्रतछोड़ना ३८ अपनेही लिये रोटीवनाना, मदिरापीनेवाली स्त्रीका सेवन, वेदके पढ़ने अग्निहोत्रं और लड़केको त्यागना, वान्धव (चाचा मामा आदि) का त्यागकरना ३६ ईंधनकेलिये पेड़काटना, स्त्रीके द्वारा जीवनकरना, किसीजीवके वधसे वोषधसे जीवनकरना, हिंसा करनेवाले यंत्रोंको वनाना व्यसन (मृगया आदि १८) अपने को बेचना ४० शूद्रकी सेवाकरनी, हीनजाति से मित्रताकरना, नीवजातिकी स्त्रीका भोग किसी आश्रम में न रहना, दूसरेकी रोटीखाकर जीना ४१ ॥ ।
पापवल्क्यस्मृति स०। असच्छास्त्राधिगमनमाकरेवधिकारिता भार्यायावि क्रयश्चैपामेकैकमुपपातकम् ४२ शिर.कपालीध्वजवामि क्षाशीकर्मवेदयन् ॥ ब्रह्महाहादशाव्दानिमितभुक्शुद्धिमा प्नुयात् ४३ ब्राह्मणस्यपरित्राणाद्गवांद्वादशकस्यच ॥ तथा श्वमेधावभृथस्नानाद्वाशुद्धिमाप्नुयात् ४४ दीर्घतीवामयय स्तम्ब्राह्मणंगामथापिवादृष्ट्वापथिनिरातंकंकृत्वावाब्रह्म हाशुचिः४५ आनीयविप्रसर्वस्वहृतंघातितएववा ॥ तन्नि मित्तक्षतःशस्त्रैर्जीवन्नपिविशुद्ध्यति ४६ ॥ असत् शास्त्र (नास्तिक आदि के शास्त्रों को) पढ़ना,जहां सोना चांदी आदि निकलें ऐसी सानिमे अधिकारपाना और अपनीस्त्री का वेचना इनमें से हरएक उपपातक कहलातेहै ४२ ब्राह्मणका घातकरे तो उसी अपनेमारेहुये ब्राह्मणकी खोपड़ी हाथमें लेकर "और एक दूसरी खोपड़ीको वांसमें बांधकर ध्वजावनाकर अपना कियाहुआ कर्म सबको सुनाकर भीखमांगमांगके थोडाथोड़ाखावे इसप्रकार वारहवर्ष व्रतकरे तो ब्रह्महत्यासे छूटताहै ४३ किसी ब्राह्मणका प्राणवचादेवे अथवा बारहगौका प्राणवचावे वा किसी के अश्वमेध यज्ञमें अवभृथनाम स्नानकरे तो उसीसमय ब्रह्मह- स्यासे लूटजाताहै १४ चिरकालसे किसीरोगकरके ग्रस्त वा बड़े दुःखदायोकुष्ट आदि रोगसेपीड़ित ब्राह्मण अथवा गौको राहमें देखे और उसकी सेवाकरके उसेचंगाकरे तोभी ब्रह्महत्यासे छूट जाताहै ४५ जो कोई ब्राह्मणका सस्वधनहरताहो उससेलडाई करके ब्राह्मएका धनवचावे और घायलहोकर जीवे तो ब्रह्म हत्या से छूटजाता है यदि मरजाय तोभी ब्रह्महत्या से दूर होजाताहै ४६॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स. लोमभ्यःस्वाहेत्येवंहिलोमप्रभृतिवेतनुम् ॥ मज्जांता हुयाहापिमंत्रैरेभिर्यथाक्रमम् ४७ संग्रामेवाहतोलक्ष्यभूत शुदिमवाप्नुयात् ॥ मृतकल्पःप्रहारातोंजीवन्नपिविशुद्ध ति ४८ अरण्येनियतोजप्त्वात्रिवेदस्यसंहितां ॥ शुक्ष्य वामिताशीत्वाप्रतिस्रोतःसरस्वतीम् ४९ पात्रेधनवापर्याप्त दत्वाशुदिमवाप्नुयात् ।। अदातुश्चविशुद्धधर्थमिष्टिवैश्वान रीस्मृता ५० यागस्थक्षत्रिविघातीचरेब्रह्महणिव्रतम् ॥ र्भहाचयथावर्णतयात्रेयीनिपदकः५१चरेद्रतमहत्वापिघात र्थचेत्समागतः॥ द्विगुणंसवनस्थेतुब्राह्मणेव्रतमादिशेत्५२। अथवा(लोमभ्यःस्वाहा)इत्यादिमंत्रोंसेअपनेशरीरके(रोम,खा ल,रक्त, मांस,मेद,स्नायु,हड्डी औरमज्जा)इनसवको अग्निमेंहवन करदे तोब्रह्महत्यासे छूटजाताहै ४७ दोधनुर्विद्याजाननेवाले जहां लड़तेहों उनकेवीचमें खड़ाहोवे यदि उनकेवाणोंसे मरजाय तो शुद्धहोता और बहुतघायलहोके जीतावचे तोभी ब्रह्महत्यासेशुद्ध होताहे४८अपनेभोजनका संयमकर(थोड़ाभोजनकरे)वनमेंजास- म्पूर्ण वेदको तीनवारपाठकरे तोभी शुद्धहोताहै अथवा मिताशी होके(थोडाथोड़ाखाताहुमा)सरस्वतीनदी के तीरतीरपश्चिमसमुद्र नजावे तो शुद्धहोताहै ४६ अथवा सुपात्रब्राह्मणको उसके जीवन भरकेलिये यथेष्टद्रव्यदेदेवे तोभी शुद्धहोताहै ५०जो यज्ञकरतेहुये क्षत्रिय वा वैश्यकोमारे तो ब्रह्महत्याकावतकरे जिसवर्णके गर्भका पातकरे उसवर्णकेमारनेमें जो प्रायाश्चित्तकहा हे सोकरे सौर रज- स्वला स्त्रीकोमारे तोभी जिसवर्णकी स्त्रीहो उसीवर्णकी हत्याका प्रायश्चित्तकरे५१मारनेकेलियेआवे ओर किसी कारणसे न मारे तोभी वह उतनाहीं प्रायश्चित्तकरे कि जो मारनेमेंहोता है यदिय- ज्ञकरतेहुये ब्राह्मणकोमारे तो दूनाप्रायश्चित्त करनाचाहिये । इति ब्रह्महत्याप्रायश्चिनप्रकरणम् ५२ ॥
पाज्ञवल्क्यस्मृति स०। सुरांवुघृतगोमूत्रपयसामग्निसन्निभम् । सुरापोन्यतम म्पीत्वामरणाच्छादमृच्छति ५३ बालवासाजटीवापिब्रह्मह त्याव्रतंचरेत् ॥ पिण्याकंवाकणान्वापिभक्षयस्त्रिसमानिशि ५४ अज्ञानात्तुसुरांपीत्वारेतोविण्मत्रमेवच ॥ पुनःसंस्कारम हतित्रयोवर्णाद्विजातयः५५ पतिलोकनसायातिब्राह्मणीया सुरांपिवेत्॥इहैवसाशुनीगृध्रीशकरीचोपजायते ५६ ब्राह्म पःस्वर्णहारीतुराज्ञेमुशलमर्पयेत् ॥स्वकर्मख्यापयंस्तेनहतो मुक्कोपिवाशुचिः ५७ अनिवेद्यनृपेशुद्धत्सुरापत्रतमाचरन्। आत्मतुल्यसुवर्णवादद्याद्वापिप्रतुष्टिकत् ५८ ।। - यदि कोई सुरापीवे तो मदिरा,जल,घी,गोकामूत्र और दूध इन मेंसे किसीएककोअग्निकेसमान तपाकरपीवेऔर उसीसेमरजाय तो शुद्धिहोतीहै ५३ कंवलपहिनकर और जटावढ़ाकर ब्रह्महत्या का ब्रतकरे अथवा तीन वर्पतक रात्रिकेसमय एकहीवारपिण्याक (पीना)व चावलकेकण(कन्ना)भोजनकरे तोभी शुद्धहोताहे ५४ यदि चिनाजाने सुरा,रेत विष्टा अथया मतपीले वे तो तीनों द्विज वर्णों का फिरसे संस्कार करनाचाहिये ५५ जो ब्राह्मणी रवी सुरा. पीवे तो वह पतिलोकको नहीं प्राप्तहोती यहांहीं कत्ती,शकरी और गिद्धपक्षीकी योनिमें उत्पन्नहोतीहे ५६ इतिसुरापानप्रायश्रिनप्र- करणम् ॥ ब्राह्मणका सोनाचुरानेवाला अपनाकर्मकहके राजाको लोहेफामूशलदे फिर राजाचाहे उसमशलसे उनकाधधकरे व यो दे दोनों प्रकार वह शुद्धहोजाताहे ५७ राजासे निवेदन न करे तो सुरापीका व्रतकरनेसे शुद्धहोताहे अपरा अपनेवरावर यानि सनेसे ब्राह्मण संतुष्टहो इतना सोनादे तोभी शुद्ध होता है इतिस्व स्तेयप्रायश्चित्तप्रकरणम् ५८ ॥
२५६ याज्ञवल्क्यस्मृति सः। तप्तेयःशयनेसार्धमायस्यायोपितास्वपेत् ॥ गृहीत्वोत्कृ त्यसपणौनैर्ऋत्यांचोत्सृजेत्तनुम् ५९ प्राजापत्यंचरेत्कृच्छ्रेस मावागुरुतल्पगः ॥ चान्द्रायणंवात्रीन्मासानभ्यसेवेदसंहि ताम् ६० एभिस्तुसंवसेद्योदैवत्सरंसोपतत्समः॥ कन्यांसे मुहहदेपांसोपवासामकिंचनाम् ६१ चान्द्रायणंचरेत्सर्वान वकृष्टानिहन्यतु ॥ शूद्रोधिकारहीनोपिकालेननि शुद्धयति ६२ पंचगव्याम्पिवेद्गोनोमासमासीतसंयमः ॥ गोटेशयो गोनुगामीगोप्रदानेनशुद्ध्यति ६३ ॥ जो गुरुपत्नी में गमनकरे वह लोहेकीशय्या और स्त्रीबनाके उसे इतनातपावे कि लालहाजाय तब उसी स्त्री के संग सोवै अथवा अपनाभंड और लिंगकाटके अंगुली में लियेहुये नेर्षात्यदिशामें चलतचेलते प्राणत्यागदे तो शुद्धहोताहै५६अथवा तीनवर्पतकक- च्छू प्राजापत्यनाम व्रतकरे(इनसवव्रतोंको आगेकहेंगे) व तीनम- हीनेतक वेदसंहिताका अभ्यासकरताहुमा चीन्द्रायणव्रतकरे तो भी शुदहोताहै६० इतिगुरुतल्पगप्रायश्चित्तप्रकरणम् ।। इनकेसाथ जो एकवर्परहै वह भी उन्हींके समान होजाताहै इन लोगोंकी कन्याको उपवासकराके और एकसूतभी पिताकाउसकेशरीर पर नहो ऐसी रीतिसे व्याहले तो कुछ टोप नहीं है ६१॥ इतिसंसर्ग प्रायाश्चत्तप्रकरणम् ॥ किसी नीचजाति (सत,मागध मादि)मनु- प्यको मारे तो चान्द्रायणव्रतकरे यद्यपि इनसव व्रतोंकेकरने में जपभीकरनाहोताहै और उसमें शूद्रका अधिकार नहींहै परन्तु तो भी वह इतनेकालके व्रतहीसे शुद्धहोजाताहै ६२ जो गोको मारे वह पञ्चगव्य (गोकामत,गोवर,दूध,दही,धी और कुशाका जल) पीकरमहनिाभरतक इंद्रियोंकासयमकरकेगोकीशाला सोवेगाके. पीछेपीछे दिनमें घूमाकरे महीनाके अन्तमें एकगोदानकरे तो शुद्धहोताहे ६३॥ . ~ याज्ञवल्क्यस्पति स.1 कृच्छञ्चैवातिकृच्छञ्चचरेद्वापिसमाहितः ॥ दद्यास्त्रिरा चोपोप्यपभैकादंशास्तुगाः ६४ उपपातकशुद्धिःस्यादें बचान्द्रायणेनवा। पयसावापिमासेनपराकेणाथवापुनः६५ ऋपभैकसहस्रागादद्यात्क्षत्रवधेपुमान् ॥ ब्रह्महत्यानतंबा पिंवत्सरत्रितयंचरेत् ६६वैश्यहाब्दचरेदेतद्दद्यादेकशतंगवा ५ ॥ पण्मासाच्छूद्रहोप्येतद्धेनूर्दद्याद्दशाथवा ६७ दुर्घत्तब प्रचिटक्षत्रशूद्रयोपाःप्रमाप्यतु ॥ दृतिन्धनुर्वस्तमविक्रमाह चाहिशुद्धये ६८ अप्रदुष्टांस्त्रियहत्वाशूद्रहत्याव्रतंचरेत् ॥ अस्थिमतांसहस्रतुतथानस्थिमतामनः ६९ ॥ मालमर समय से कच्छ व्रतकरे व अतिकृच्छ्रकरे अथवा तीन दिन उपवास करके दश गौ और एक बैल दान देवे तो शुद्ध हो जाता है ६४ ॥ इतिगोवधप्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ दूसरे उपपात- कों की भी शुद्धि इसी गोवध प्रायश्चित्त से होती है अथवा चान्द्रायण व्रत से व महीना भर दूधपीने से व पराक व्रत करने से भी होती है ६५ यदि कोई पुरुष क्षत्रिय को मारे तो एक चैल समेत हज़ार गौ दान देने से व तीनवर्ष तक ब्रह्महत्या का व्रत करने से शुद्ध होता है ६६ वैश्यको मारे तो एकवर्ष ब्रहत्या व्रतकरे अथवा सौ गोदान दे तो शुद्ध होता है और शूद्र का वध करे तो छः महीने ब्रह्महत्या व्रतकरे व दश गौ और एकवैल दान देकर शुद्ध होता है ६७ यदि ब्राह्मण, वैश्य, चत्रिय और शूद्र की व्यभिचारिणी स्त्रियों को मारे तो अपनी शुद्धि के लिये क्रम से दृति (चरसा व मोटधनुप, वस्त्र ) और भेड़ का दानदेवे ६८ अदुष्टा (सुशीला) स्त्री को मारे तो शूद्रहत्याका व्रत करे और हजार हड्डीवाले तथा एक गाड़ी का वोझ वे हड्डीयाले जीव मारे तो एक शूद्रहत्याका व्रतकरे ६॥
थायलंयस्मति स. मार्जारगोधानकुलमण्डकाश्चपतत्रिणः ॥ हत्वात्यहाँ वेत्क्षीरंकृच्छ्रेवापादिकंचरेत् ७० गजेनीलरपाःपंचशुके सोद्विहायनः ॥ खरानमेपेपुरपोदेयःौचीत्रहायनः ७ हंसश्येनकपिक्रव्याज्जलस्थलशिखंडिनः ॥ भासंहत्वाचा द्याद्गामक्रव्यादस्तुवत्सिकाम् ७२ उरगेवायसोदण्डोप केत्रपुसीसकम् । कोलेघृतघटोदेय उष्ट्रेगुंजाहयेशुकम् ७ः तित्तिरोतुतिलद्रोणंगजादीनामशक्कान् ॥ दानन्दातुंचरेम च्छमकैकस्यविशुद्धये ७१ फलपुष्पान्नरजससत्वघातवृत शनम्॥किंचित्सास्थिमतान्देयम्प्राणायामस्त्वनस्थिके७८ विल्ली, गोह, नेउरा, मेढ़क, कुत्ता, और चिड़िया इन्हें मारे तो तीन दिनतक दूधपीकेरहे व पादकच्छ्र व्रतकरे तो शुद्ध होता है ७० हाथीको मारे तो पांच नीलवृपभदानदे शुक (तोता) मारे तो दोबर्पका बछरादानदे गदहा, बकरा,मेढ़ा और क्रोंचपक्षी को मारे तो तीन वर्षका वधरा दानदेवे ७१ हंस,बाज,वानर क्रव्याद (कच्चामास खानेवाले गिद्दव्य घशगालमादि) जलचर और स्थल चर पक्षी मयूर और भास (पक्षिविशेप) पक्षीको मारे तो एक गो दानदे कव्याद छोड़ मोरोंको मारे तो चछिया दानदे७२ सांपको मारे तो लोहेकादण्डदानकरे पण्डुक (नपुंसक व जलमेरहनेवाला सपैडेडहा) मारे तो पीतल और सीसादानकरे, कोल (शूकर) को मारे तो घीका घड़ादेवे ऊंटको मारे तो गुंजा (घुचची) दान दे घोड़ामारे तो वस्त्र दानकरे ७३ तित्तिरमारे तो एकटोना तिल दानकरना और हाथी आदि के मारनेमें जो दानदेना कहाहै वह न करसके तो हरएक के बदले एकएककच्छव्रतकरे ७४ फल फल भनाज और रस (गुडआदि) में जो जीवपड़जातेहें इनक्रोमारे तो घीभोजनकरे और हडीवाले जीवकोमारेतो थोड़ासादानदे गिना हडीका हो तो एकप्राणायाम करनेसे शुद्धहोताहे ७५ ॥
पाज्ञवल्लयस्मृति स। २५६ वृक्षगुल्मलतावीरुच्छेदनेजप्यमृक्शतम् ॥ स्यादौषधि स्थाछेदेक्षीराशीगोनुगोदिनम् ७६ पुंश्चलीवानरखरैर्दष्ट इचोटादिवायसैः ॥ प्राणायामंजलेकृत्वाघृतम्प्राश्यविशु यति ७७ यन्मेद्यरेतइत्याभ्यांस्कन्नरतोभिमन्त्रयेत् ॥स्त नान्तरम्भ्रुवोर्मध्येतेनानामिकयास्टशेत् ७८ मयितेजइ तिच्छायांस्वान्दृष्ट्वाम्बुगतांजपेत् ॥ सावित्रीमशुचौदृष्टे चापल्येचान्तेपिच ७९ अवकीर्णीभवेद्गत्वाब्रह्मचारीतुयो पितम् ॥ गर्दभम्पशुमालभ्यनैसविशुद्धयति ८० भै क्ष्याग्निकार्येत्यक्त्वातुसप्तरात्रमनातुरः ॥ कामावकीर्णइ त्याभ्यांजुहुयादाहुतिद्वयम् ८१ ॥ यदिकोईप्रयोजन(आम्रप्रादि)यक्ष,गुल्म,लताऔरवीरुध(येसवे व्यवहाराध्यायमेंकहआये)डनसबोंकोकाटेतो सौवारकोईगायत्री आदिऋचाजपनेसे शुद्धहोताहै और औपधियोंको वेप्रयोजनकाटे तोदिनभर दूधपीकेरहे औरगौकीसेवाकरे इतनाविशेषहै ७६ व्य- भिचारिणीस्त्री, वानर,गदहा,ऊंट और कौआआदि दांतसेकाटलेवें तो जलमेंखड़ाहोकेप्राणायामकरे और उसदिनघीखाकेरहे तो शुद्ध होताहै७७जिसकावीर्य स्वप्नादिमेंअपनेआपगिरपड़ेतोवह(यन्मेऽ घरेतः)इत्यादि दोनोंमत्रोंसे उसका अभिमन्त्रणकरे और उसकी छातीकेमध्य भौरभौंहकेवीच अनामिकाअगुलीसेछनावे७८अपनी परछाहीपीछेत्रातीदेखेतो (मयितेजः)इसमंत्रकोजपे और किसी प्र- पवित्र मनुष्यकोदेखेवचंचलताकरे अथवा झूठबोले तोगायत्री का जपकरे ७६ यदि कोईब्रह्मचारी स्त्रीकेपासजाय तो वह अवकीर्णी कहलाताहै ओरगदहाकोमारकेउसकेमांससे निर्धातिदेवताकायज्ञ करे तोशुदहोताहै ८० अनातुररहे (किसीकार्यसेव्याकुलनहो) और सात दिनतक भिक्षा और अग्निहोत्र छोड़ दे तो वह ब्रह्मचारी (कामावकीर्ण) इत्यादि दो मंत्रोंसे दोया हुति हवन करके ८१ ॥
.. पामयलपस्मृति स० उपस्थानन्ततःकुर्यात्समाप्तिंचत्वनेनतु ॥ मधुमांस शनेकार्यःकृच्छःशेपव्रतानिच ८२ प्रतिकूलंगुरोःकृत्वाप्रस चैवविशुद्धयति ॥ कृच्छ्रत्रयंगुरुःकुय्यौन्मियतेप्रहितोयदि ८३ क्रियमाणोपकारेतुमृतेविप्रेनपातकम् ॥ विपाकेगो वृपाणाञ्चभेपजाग्निक्रियासुच ८४ मिथ्याभिशंसिनोदोपो द्विःसमोभूतवादिनः॥ मिथ्यासिशस्तदोपञ्चसमादत्तेमृपा वदन्: ८५ महापापोपपापाभ्यांयोभिशंसेन्मृषापरम् ॥ अ भक्षोमासमासीतसजापानियतेन्द्रियः ८६ ॥ ... समासिंचतु, इसमन्त्र से अग्निका उपस्थानकरे जो ब्रह्मचारी मधुव मांसखालेवे तो कन्व्रत उसके प्रायश्चित्त के लिये करे और फिर जो उसके व्रत शेपरहेहों सो समाप्त करे ८२ :गुरु की इच्छा के विरुद्ध कोई काम ब्रह्मचारी करे तो गुरूंको प्रसन्न करा- नेही से शुद्ध होता है और जो गुरू किसी ऐसे काम को भेजे कि ब्रह्मचारी मरजाय तो गुरु-तीनकुञ्छू अतकरे ८३ यदि कोई औ- पधिदेने व अन्न खिलाने आदि से ब्राह्मण और. गोका उपकारकर -रहाहो-संयोग से वह गौ व ब्राह्मणमरजाय तो ओपधिप्रादि:हित वस्तु, देनेवाले को पाप नहींलगता ८४ जो किसी को मिथ्याही दोप लगावे तो उसको दूना दोष लगता है और सत्य भी किसी का दोपहो.उस को-वे पूछे आपसे आप कहता फिरे तो उतनाहीं -दोष उसको लगता है जो झूठमूठ दोपलगाताहे वह केवल दूना दोपही नहीं पाता किन्तु जिसको दोष लगाता है उसने जो पाप -कियेहों-सब उसको लगते हैं 5५.महापातक और उपपातकका दोपे जो झूठ मूठ दूसरेको लगावे वह इन्द्रियों का संयमकरके महीने भरतक जप करतारहे और केवल जल-पीके. रडे अन्न . न खावे ८६॥
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याज्ञवल्क्यस्मति स०।
अभिशस्तोमपाकृच्छ्रचरेदाग्नेयमेवच ॥ निर्वपेत्तुपुरो
डाशंवायव्यम्पशुमेववा ८७ अनियुक्तोमातृजायांगच्छं
श्चान्द्रायणंचरेत् ॥ त्रिरात्रान्तेघृतम्प्राश्यगतोदक्याविशु
यति ८८ श्रीकृच्छ्रानाचरेद्वात्ययाजकोभिचरन्नपि ॥
वेदप्लावीयवान्यन्दन्त्यक्ताचशरणागतम् , ८९ गोष्ठेवस
नब्रह्मचारी मासमकम्पयोव्रतः॥ गायत्रीजाप्यनिरतःशु
ड्यतेसप्रतिग्रहात् ९० प्राणायामीजलेस्नात्वाखरया
नोष्ट्रयानगः ॥ नग्न स्नात्वाचभुक्ताचगत्वाचैवदिवास्त्रि
यम् ९१ ॥
जिसको झूठमूठ दोप लगाया गयाहो यह कृच्छ्र प्राजापत्य
करे य अग्निदेव का पुरोडाश (हविष्य ) बनाकर यज्ञकरे अथवा
वायुदेवता के पशुसेयज्ञकरे ८७ बड़े लोगों की आज्ञा से विनाही
जो भाईकी स्त्री में गमन करता है वह चान्द्रायण व्रत करे और
रजस्वला स्त्री में गमन करे तो तीनदिन उपवास करे धी खावे
तो शुद्ध होता है ८८ जो ब्रात्य (पतितसावित्री) को यज्ञ करावे
वहतीन कृच्छ्रव्रतकरे और किसीका अभिचार ( कष्टदेने व मारने
का उद्योग)करे तो भी तीन कच्छूकरे जो अनध्याय में व शूद्रके
सामने वेदपढ़े वह और जो अपनी शरण पाये को निकालदे
वहभी एक वर्षभर यवका भातखाकर व्रत कियाकरे तो शुद्ध
होताहै ८६ यदि किसी निपिद्ध मनुष्य का दान ग्रहणकरे तो
ब्रह्मचर्य धारण करके महीनाभर दूधपीता और गायत्री जपता
हुमा गोशाला में वासकरे तो शुद्ध होता है ६० इत्युपातक
प्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ जिस रथमें गदहे व ऊंट नधेहों उसपरचढ़के
कहीं जावे अथवा नंगाहोकर नहावे व भोजनकरे या दिनको
अपनी स्त्री के पास जावे तो जलमें स्नानकरके प्राणायामकरेतो
शुद्ध होताहै ६१॥
पापयत्ययस्मृति स०। उपस्थानन्ततःकुर्यात्समाप्तिंचत्वनेनतु ॥ मधुमांस शनेकार्यःकृच्छ्रःशेपव्रतानिच ८२ प्रतिकूलंगुरोःकृत्वाप्रसा द्यैवविशुद्ध्यति ॥ कृच्छ्त्रयंगुरुःकुयाम्रियतेप्रहितोयदि ८३ क्रियमाणोपकारेतुमतेविप्रेनपातकम् ॥ विपाकेगो तृपाणाञ्चभेपजाग्निक्रियासुच ८४ मिथ्याभिशंसिनोदोमो द्विःसमोभूतवादिनः॥ मिथ्याभिशस्तदोपञ्चसमादत्तेमृपा वदन् ८५ महापापोपपापाभ्यांयोभिशंसेन्मृपापरम् ॥ अ भक्षोमासमासीतसजापानियतेन्द्रियः ८६ ॥ समासिंचतु, इसमन्त्र से अग्निका उपस्थानकरे जो ब्रह्मचार मधु व मांसग्वालेवे तो रुव्रत उसके प्रायश्चित्त के लिये को और फिर जो उसके व्रत शेपरहेहों सो समाप्त करे ८२ गुरु के इच्छा के विरुद्ध कोई काम ब्रह्मचारी करे तो गुरूको प्रसन्न करा नेही.से शुद्ध होता है और जो गुरू किसी ऐसे काम को भेजे वि ब्रह्मचारी मरजाय तो गुरू तीनकच्छू व्रतकरे ८३ यदि कोई औ -पधिदेने व अन्न खिलाने आदि से ब्राह्मण और गौका उपकारकर -रहाहो संयोग से वह गौ व ब्राह्मणमरजाय तो ओपधिनादि,हित बस्तु देनेवाले को पाप नहींलगता ८४ जो किसी को मिथ्याही दोष लगावे तो उसको दूना दोप लगता है और सत्य भी किसी का दोपहो उस को वे पूछे आपसे आप कहता फिरे तो उतनाहीं दोप उसको लगता है जो झूठमूठ दोपलगाताहे वह केवल दूना दोपही नहीं पाता किन्तु जिसको दोप-लगाता है उसने जो पाप कियेहों सब उसको लगते हैं ८५ महापातक और उपपातकका दोषे जो झूठ मूठ दूसरेको लगावे वह इन्द्रियों का संयमकरके महीने भरतक जप करतारहे और केवल जल-पीके रहे -अन्न न खावे६॥
याज्ञवल्लयस्मृति स०॥
अभिशस्तोमृषाकृच्छच्चरेदाग्नेयमेवच ॥ निर्वपेत्तुपुरो
डाशवायव्यम्पशुमेववा ८७ अनियुक्तोभ्रातृजायांगच्छं
इचान्द्रायणंचरेत् ॥ त्रिरात्रान्तघृतम्प्राश्यगतोदक्याविशु
दयति ८८ त्रीन्कृच्छ्रानाचरेद्रात्ययाजकोभिचरन्नपि ॥
वेदप्लावीयवान्यव्दन्त्यक्ताचशरणागतम् , ८९ गोष्ठेवस
नब्रह्मचारी मासमकम्पयोव्रतः ॥ गायत्रीजाप्यनिरतःशु
इयतेसत्प्रतिग्रहात् ९० प्राणायामीजलेस्नात्वाखरया
नोष्ट्रयानगः ॥ नग्न स्नात्वाचभुक्ताचगत्वाचैवदिवास्त्रि
यम् ९१॥
जिसको झूठमूठ दोप लगाया गयाहो यह कृच्छ्र प्राजापत्य
करे व अग्निदेव का पुरोडाश (हविष्य ) बनाकर यज्ञकरे अथवा
वायुदेवता के पशुसेयज्ञकरे ८७ बड़े लोगों की आज्ञा से विनाही
जो भाईकी स्त्री में गमन करता है वह चान्द्रायण व्रत करे और
रजस्वला स्त्री में गमन करे तो तीनदिन उपवास करे घी खावे
तो शुद्ध होता है ८८ जो ब्रात्य (पतितसावित्री) को यज्ञ करावे
वहतीन रुच्छ्रवतकरे और किसीका अभिचार (कप्टदेने वमारने
का उद्योग)करे तो भी तीन कच्छूकरे जो अनध्याय में व शूद्रके
सामने वेदपढ़े वह और जो अपनी शरण पाये को निकालदे
यहभी एक वर्षभर यवका भातखाकर व्रत कियाकरे तो शुद्ध
होताहे ८६ यदि किसी निपिङ मनुष्य का दान ग्रहणकरे तो
ब्रह्मचर्य धारण करके महीनाभर दूधपीता और गायत्री जपता
हुमा गोशाला में घासकरे तो शुद्ध होता है ६० इत्युपातक
प्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ जिस रथमें गदहे व ऊंट नहों उसपर चढ़के
कहीं जावे अथवा नंगाहोकर नहावे व भोजनकरे या दिनको
अपनी स्त्री के पास जावे तो जलमें स्नानकरके प्राणायामकरेतो
शुद्ध होताहै ११॥
२१
याज्ञवल्क्यस्मृति स० गुरुंतुंकृत्यहुंकृत्य विप्रन्निर्जित्यवादतः ॥ वध्वावाव ससाक्षिप्रम्प्रसाद्योपवसेदिनम् ९२ विप्रदण्डोद्यमेकच्छ स्त्वतिकृच्छ्रेनिपातने ॥ कृच्छातिकृच्छोसृक्पाते कृच्छ्रे भ्यन्तरशोणिते ९३ देशकालंवयःशक्तिम्पापंचावेक्ष्ययत्न तः ॥ प्रायश्चित्तम्प्रकल्प्यस्याद्यत्रचोक्ताननिष्कृतिः ९४ दासीकुम्भम्बहि मानिनयेरन्स्वबान्धवाः ॥ पतितस्यव हिःकुयुः सर्वकार्येपुचैवतम् ९५ चरितंत्रतआयातेनिनयर नवंघटम् ॥ जुगुप्सेरन्नवाप्येनंसंविशेयुश्चसर्वशः ९६ ॥ गुरु ( अपने से बड़ा पिता आदि) को तुकारी मारे, ब्राह्मण को क्रोधसे हुंकर (डाटदे) अथवा वस्त्र गले में डाल ब्राह्मणको वांधे तो झटपट उसके पांवपर गिरके प्रसन्नकरावे और दिनभर उपवासकरे तो शुद्ध होताहै ६२ ब्राह्मणको मारनेके लिये लाठी आदि उठावे तो कृच्छ्रव्रत करे चलादेवे तो अतिकच्छव्रतकरे जो लहू निकाले तो कृच्छ्रातिकच्छू व्रतकरे और भीतर लहू होभावे तो भी रुच्छबत करे ३ इतिप्रकीर्णकम् ॥ जिस पापका प्राय- श्चिन नहीं कहाहे उस पापको देखना और देशकालको देखना फिर उसके अनुसार प्रायश्चित्त की कल्पना करलेनी जिसको पापलगाहो और वह अपनी जातिके लोगों के कहनेपर भी प्रा. यश्चित्त नकरे तो उसके जाति और वान्धवलोग मिलके उसके नामका जल से भराहुआ घड़ा टासीके हाथ गांवसे वाहर निका- लदेवे उसपतितको फिर हरएकप्रकारसे व्यवहारसे अलगरक- ६५ यदि घड़ा निकालनेपर कुछ सूझे और प्रायश्चित्तकरके फिर अपने जातिभाइयों के निकटावेतोवे लोग इकठेहोकर उसके साथ नये घड़े में पानीमॅगाके पीवें और उसकी निन्दाभी कभी न करें मोर सब व्यवहारमें उसका संग्रह रक्खें ६६॥
याज्ञवस्क्यस्मृति स०। १६३१ पतितानामेषएवविधिःस्त्रीणाम्प्रकीर्तितः ॥ वासोरहा न्तिकुन्दयमन्नवासःसरक्षणम् ९७ नीचाभिगमनंगर्भपातः नभर्तृहिंसनम् ॥ विशेपपतनीयानिस्त्रीणामेतान्यपिध्रुवम् ९८शरणागतबालास्त्रीहिंसकान्सविशेन्नतु॥चीर्णव्रतानपि संतःकृतघ्नसहितानिमान् ९९ घटेपवर्जितेज्ञातिमध्यस्थोय' वसंगवामाप्रदद्यात्प्रथमंगोभिःसत्कृतस्यहिसक्रिया ३०० विख्यातदोपःकुर्वीतपर्षदोनुमतंव्रतम् ॥ अनभिख्यातदोप स्तुरहस्यव्रतमाचरेत् १ त्रिरात्रोपोपितोजप्त्वाब्रह्महात्वघ- मर्पणम् ॥ अंतर्जलेविशुध्येतदत्वागांचपयस्विनीम् २ यहीविधि पतितस्त्रियों की भीहै केवल इतनाविशेपहै कि अपने घरेकेनिकट कोईझोपड़ी उनकेरहनेकोलगादेनी भोर अन्नबस्नसा- धारणरीतिस दियाकरनातथा इसवातकी रक्षाभीरक्खे कि वह अ- भिचारमादि न करनेपावेंनीचजातिकेपुरुपके पासजाना गर्भ गिरानाऔर भपनेपतिका वधकरना इनसयकामोंसे विशेष करके स्त्रीपतितहोतीहै और महापातक प्रादिसे भी पतितहोतीहै ६८ शरणागतवालक और स्त्री इनकोमारनेवालाजो प्रायश्चित्तकर भी डाले तोउसकेसाथखानपानका व्यवहारनकरना यहीरीतिकृतघ्नी कीभीसमझनाहजिसकाघड़ा निकालागयाहो वह फिर प्रायश्चित्त करके जातिमेंमिलनेमायाहोतो पहिलेसवजातिवन्धुओंकेवीचम- पनेहाथेसेगोकायवस(कोमलघास)खिलावे तो जातिकेलोग भी उ- सका सत्कारकरें नहींतोनहीं ३०० जिसकेपापको जाति वगांवके लोगजानगयेहोंतोवहपर्पत्केकहनेकेमनुसार प्रायश्चित्तकरेभोरजि- सकाफोई न जानतेहों वहरहस्यव्रतकरनेसेही शुद्धहोताहे १ इतिप्र कशिप्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ब्रह्मघातीकारहस्यवतयहहे कितीनदिन उपवासकरके जलके भीतर अघमर्पणमंत्र तीनवारजपे और देनेवाली गौ ब्राह्मण को दे तो शुद्धहोताहै २ ।।
पासवल्क्यस्मृति सन लोमभ्यःस्वाहत्यथवा दिवसम्मारुताशनः ॥ जलेरि त्वाग्निजुहुयाञ्चत्वारिंशत्घृताहुतीः ३ त्रिरात्रोपोपित त्वाकूष्माण्डीभिघृतंशुचिः ॥ ब्राह्मणःस्वर्णहारीतुरुद्रजापा जलेस्थितः ४ सहस्रशीजापीतुमुच्यतेगुरुतल्पगः ॥ गौर्दयाकर्मणोस्यान्ते एथगेभिःपयस्विनी ५प्राणायामर्श तंकाय॑सर्वपापापनुत्तये ॥ उपपातकजातानामनादिष्टस्य चैवहि ६ ओंकाराभिटुतःसोमसलिलम्पावन म्पिवेत् ॥ क त्वातुरेतोविण्मूत्रप्राशनन्तुद्विजोत्तमः ७ निशायांवादिवावा पियदज्ञानकृतम्भवेत् ॥ त्रैकाल्यसंध्याकरणात्तत्सर्ववित्र णश्यति ८॥ शथवा एकदिनरातभूखारहे और उसीरातभर जलमखड़ारते प्रातःकालजलसे निकल(लोमभ्यःस्वाहा) इन आठोंमन्त्रोंसे चा- लीस पाहुति(अर्थात् हरएकसे पांचआहुति)धीकी होमकरे ३ सु- रापीहो तो तीनदिन उपवास करे और कूष्माण्डी नाम) चासे चालीसमाहुति आगमें दे तो शुद्धहोताहै और ब्राह्मणका सोना चुरावे तो तीनदिन उपवासकरके जलमें खड़ाहो रुद्रीपाठकरनेसे शुद्धहोताहै ४ गुरुपत्नीमें गमनकरनेवाला तीनउपवासकेननन्तर (सहस्रशीर्षा)मंत्रोंको जपनेसेशुद्धहोताहै और इन सर्वोको अपने अपने व्रतकरनेके बाद एक दूधदेनेवाली गो देनी चाहिये ॥ इति महापातकरहस्यप्रायश्चित्तप्रकरणम् ५॥ तच उपपातक और नि- नका प्रायश्चित्त नहीं कहाहे ऐसे पापोंकी शुद्धि सोप्राणायामकर- नेसे होतीहै ६ यदि ब्राह्मण भूलसे रेत (पीर्य)विष्टा और मूत्र मुं. हमें डालले तो गलेभर जलमें खड़ाहोकर महाव्याहृति पढ़केसो मलताका जलपीवे तो शुद्धहोताहै ७ रात व दिनमें जो उपपा- तकपाप अज्ञानसे होताहै वह तीनों कालकी सन्ध्याकरने से दूर होजाता हे ८॥
पापल्क्यस्मृति सन "शुक्रियारण्यकजपोगायत्र्याश्चविशेपतः ॥ सर्वपापह राह्यतेरुद्रैकादशिनीयथा ९ यत्यत्रचसंकर्णिमात्मानम्म न्यतावेजः ॥ तत्रतत्रतिलोमोगायत्र्याश्चविशेषतः १०३ वेदाभ्यासरतंक्षान्तम्पंचयज्ञक्रियापरम् ॥ नस्टशन्तीहपा, पानिमहापातकजान्यपि ११ वायुभक्षोदिवातिष्ठन् रात्रि नीत्वाप्ससूर्यदृक् ॥ जप्त्वासहस्रंगायत्र्याःशुद्धद्ब्रह्मवधाह ते १२ ब्रह्मचर्यदयाक्षान्तिर्दानंसत्यमकल्पता ॥ अहिंसा स्तेपमाधुर्य्यन्दमश्चेतियमाःस्मृताः १३ स्नानम्मौनोपवा. सेज्यास्वाध्यायोपस्थीनग्रहाः ॥ नियमागुरुशुश्रुपाशौचा क्रोधोप्रमादतः १४ ॥ शुक्रिय, आरण्यक और विशेषसे गायत्री तथा ग्यारहोंप्रकार के रुद्र भनुवाक इन सव मंत्रों का जप सब पापों के प्रायश्चित्त में करना चाहिये ६ जहां जहां (जव जव ) द्विज अपनेको पापी समझे तहां तहां तिल और गायत्री से होमकरे और तिलदान करे फिर शुद्ध होजाता है १० वेद के अभ्यास में रत, क्षमायुक्त और बड़ी यज्ञ क्रिया करनेवाले द्विजको महापातक के पाप भी नहीं लगते ११ दिनभर उपवासकर रहे और रातजल में खड़ा होकर बितावे जव सूर्य देख पड़ें तो हज़ार गायत्री का जप करे इससे ब्रह्महत्या को छोड़ भौर सब पाप दूरहोजाते हैं १२ इतिरहस्यप्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ ब्रह्मचर्य (सकल इन्द्रियों का संयम) दयाक्षांति (सहना) दानदेना, सच बोलना, कुटिलता न रखनी, हिंसा और चोरी न करनी, मधुरवाणी घोलना और ज्ञानेन्द्रियोंको दमनकरना ये यम कहलाते हैं १३ स्नानकरना, मोनरहना, उपवासकरना, देवपूजन, वेदपढ़ना, लिगका निग्रह एखमी,गुरुकीसेवा, शुद्धरहना, और क्रोध तथा प्रमाद न करना ये सब नियम कहेजाते हैं १४ ॥
याज्ञवल्क्यस्मति स०॥ गोमूत्रंगोमयंक्षीरन्दधिसर्पिःकुशोदकम् ॥ जग्ध्वाप घुरुपवसेत्कृच्छ्रेसान्तपनम्परम् १५ पृथक्सान्तपनन्द्रव्य पडहासोपवासकः ॥ सप्ताहेनतुकृच्छ्रोयम्महासान्तपैन स्टतः १६ पर्णोदुम्बरराजीवविल्वपत्रकुशोदकैः ॥ प्रत्ये कम्प्रत्यहंपीतैःपर्णकृच्छ्रउदाहृतः १७ तप्तक्षीरघृताम्धून मेकैकम्प्रत्यहम्पिवेत्।।एकरात्रोपवासश्चतप्तकृच्छउदाहतः १८ एकभुक्तेननक्तेनतथैवायाचितेनच ॥ उपवासेन चैवाय पादकृच्छ्रःप्रकीर्तितः १९ यथाकथंचित्रिगुणःप्राजापत्यो यमुच्यते॥ अयमेवातिकृच्छ्रस्यात्पाणिपूरानभोजनः२०॥ एकदिन गोकामूत्र,गोबर,दूध,दही,धी और कुशका जलपीकरहे और दूसरे दिनशुद्धउपवासकरे तो वहसांतपनकच्छूनामवतकहा- ताहै १५ जो सांतपनमें गोमूत्रआदि छः वस्तुकहे हैं उनहरएकसे एकएक दिनकाटें मौर सातवें दिन शुद्ध उपवासकरे तो यहसात' दिनमें महासान्तपननाम कृञ् होता है १६ पलाश, उदुम्बर (गू- लर) कमल और विल्वपत्र इनप्रत्येककेपत्तों को एकएकदिन पानी में काढ़के उसजलकोपीवे और पांचवें दिन कुशका जल पीकर रहे तो पर्णकच्छूनाम व्रतहोता है १७ दूध, घी और पानी इन'हर एकको तपाकर एकएक दिनपीवे और चौथे दिन शुदउपवासकरे तो वह तप्तकबत कहलाताहै १८ एक दिन एकहीवार मध्या- हमें भोजनकरे दूसरे दिन रातको तीसरे दिन विना मांगे मिले तो भोजनकरे और चौथे दिन शुद्ध उपवासकरे तो यहपादच्छू कहलाताहै १६ यहपिादक(पूर्वोक्तएकभक्तनत और अयाचित इनतीनप्रकारोंमेंसे) चाहे जिस किसी तोर तिगुमा (बारह दिन तकोकरे तो प्राजापत्य कहलाताहै और यहीवत पहिलेतीन दिनों को एकमुठी अन्नखाकर विताबे तो प्रतिकृच्छ्रकहलाता है । * अनटकर ॥
याज्ञवल्लंपस्मृति स.1 कृच्छातिकृच्छ्रःपयंसादिवसानेकविंशतिम् ॥ द्वादशा पचासनपराकःपरिकीर्तितः २१ पिण्याकाचामतक्रांबुस कूनाम्प्रतिवासरम् ॥ एकरावोपवासश्चकृच्छ्रःसौम्योय मुच्यते २२ एपांत्रिरात्रमभ्यासादकैकस्ययथाक्रमम् ॥तु लोपुरुपइत्येषज्ञेयःपंचदशाहिकः २३ तिथिद्ध्याचरेपि डान्शुळेशिख्यण्डसम्मितान् ॥ एकैकंहासयेत्कृष्णोपि उंचान्द्रायणंचरन् २४ यथाकथंचित्पिण्डानांचत्वारिंशच्छ तद्वयम् ॥ मासेनैवोपभुजीतचान्द्रायणमथापरम् २५ कु पत्रिषवणस्नायीकृच्छंचान्द्रायणन्तथा ॥ पवित्राणिजपे त्पण्डान्गायत्र्याचामिमन्त्रयेत् २६ ॥ ' खालीदुधपीकर इक्कीसदिनवितावे तो कृच्छ्रातिरुच्छू व्रतकह: लाताहै और वारहदिन उपवासकरने से पराकव्रत होताहै २१ पीना(तिलकीखली)माचाम(मांड-भातकापसेव)तक(माठा-छां- छ--लस्सी)जल और सत्त इन हरएकको एकएकदिनपीके पांचदि- न और छठांदिन उपवाससे वितावे तो सौम्यकृच्छ्रव्रतहोताहै २२ पीना भादि पांचोंचीज़ों में हरएकको क्रमसे तीन तीन दिनखावे तो यह पन्द्रहदिनका तुलापुरुष नामव्रतहोताहै २३ चान्द्रायणब- सका यह विधान है कि शुरूपक्षमें जैसे जैसे तिथिबढ़तीजावें उ- तनाहीं अन्नकापास घढ़ाते जाना और कृष्णपक्षमें एकएकघटाते नाना और यासका प्रमाण मयूर के अण्डाके समान रखना २४ अथवा चाहे जिसप्रकार महीना भरमें दोसौचालीस ग्रास भोज- नकरे तो भी चांद्रायण व्रतहोजाता है २५ चांद्रायण वा कृच्छ्रन- तकरे तो तीनोंकाल स्नानकरे पवित्र मंत्रोंका जप करे और जो ग्रास भोजन करनेहों उन्हें गायत्रीसे अभिमंत्रित करलेना २६॥
१२६८ यावपत्पपस्मृति सा अनादिष्टेपुपापेपुशुद्दिश्चान्द्रायणेनतु ॥ धर्मार्थये रेदेतच्चन्द्रस्यैतिसलोकताम् २७ कृच्छकृद्धर्मकामरी हतींश्रियमानुयात् ॥ तथागुरुकतुफलम्प्राप्नोतिसुसमा तः २८ श्रुत्वैतानृपयोधर्मान्याज्ञवल्केनभापितान् ॥ इद मूचुर्महात्मानयोगीन्द्रममितौजसम् २९ यइदन्धारथि यन्तिधर्मशास्त्रमतन्द्रिताः॥इहलोकेयशःप्राप्यतेयास्यन्ति त्रिविष्टम् ३० विद्यार्थीप्राप्नुयाद्विद्यान्धनकामोधनन्तथा। आयुःकामस्तथाचायुः :श्रीकामोमहतींश्रियम् ३१श्लोकत्रय मपिह्यस्माद्यःश्रादेश्रावयिष्यति ॥ पितृणान्तस्यतृप्तिःस्या दक्षय्यानात्रसंशयः ३२ ब्राह्मण-पात्रतांयातिक्षत्रियोविज यीभवत् ।। वैश्यश्चधान्यधनवानस्यशास्त्रस्यधारणात् ३३ जो पापनहीं गिनायेहें उनमें चांद्रायणकरनेसे शुद्धताहोती है और जो धर्मके अर्थ इसव्रतको करताहै वह चंद्रलोकमें प्राप्तहोता है.२७ जो धर्मकी कामना से बड़ासावधानहोकर कृच्छ्बतकरता है उसके बड़ी लक्ष्मी आदि विभूति होतीहें जिसप्रकार राजसूय आदि बड़ीबड़ी यज्ञोंकाफल अवश्यहोताहै तैसा इनकाभी सम- झना २८ याज्ञवल्क्य मुनि के मुखसे इन धम्माको सुन अपिलोग उस महात्मा चड़तेजस्वी और योगियों में श्रेष्ठसे फिर वोले२६कि जो लोग आलस छोड़ इस धर्मशास्त्रको धारणकरेंगे वे इसलोक में यश और अन्त में स्वर्गपावेंगे ३० विद्यार्थी विद्यापाता, धनकी इच्छा करनेवाला धनपाता है,आयुके चाहने वालोंकी भायुवढ़ती है और जो श्री(शोभाभादि)चाहे तो उसकी श्री बढ़ती है३१जो श्राद्ध समय इसमेंसे तीनश्लोक भी सुनावेगा तो उसके पितरों कोअक्षय तृप्तिप्राप्तहोतीहै इसमें सन्देहनहीं३२ब्राह्मण इसशास्त्र को पढ़े तो पात्र होजाता है क्षत्री विजयी होता मोर घेश्य भी धनधान्य से युक्त होता है ३३ ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति स०॥ १६९ इदंश्रावयेद्विद्वाद्विजान्पर्वसुपर्वसु ॥ अश्वमेधफ । लजस्यतज्ञावाननुमन्यताम् ३४ श्रुत्वतद्याज्ञवल्क्योपि प्रत्मामुनिभाषितम् ॥ एवमस्त्वितिहोवाचनमस्कृत्वा स्वयम्भुवे ३५॥ इतिश्रीयाज्ञवल्क्यीयेधर्मशास्त्रेतृतीयोऽध्यायः ३॥ जो पंडित इस धर्मशास्त्र को हर एक पर्व में विजों को सुनावे उसको अश्वमेध यज्ञका फल होता है इन सब बातोंकी भी अनु- मति आपकरें ३४ ऐसा मुनियोंका कहना सुनकर याज्ञवल्क्यजी ने भी प्रसन्न हो और परमात्मा को नमस्कार करके कहा कि ऐसाही होवे ३५॥ इतिश्रीयज्ञावल्क्यस्मृतिटीकायांपंचनदमहाविद्यालयीयप्रा च्यविद्यापाठशालायाम्मुख्यसंस्कृताध्यापकेनपण्डितगुरु प्रसादशर्मणाहिन्दीभापयाविरचितायाम्मिताक्षरा नुयायिन्यांप्रायश्चित्नाध्यायस्तृतीयस्संपूर्ण- तामगात् ३ ॥ शुभम् ॥ फलस्तुतिः ॥ यस्यनामसमुच्चार्य्यमहापापपराभवम् ॥ कुरुतेपाम सक्कोपिशंकरन्तन्नमाम्यहम् १ पापानांविविधानान्तुप्राय श्चित्तान्यनेकशः ॥ अध्यायेऽस्मिंस्तृतीयेऽसौब्रवीति श्री मुनीश्वरः२॥ समाताचेययाज्ञवल्क्यसंहिता ॥ मुंशी नवलकिशोर प्रेस लखनऊ में छपी अक्टूबर सन् १८८८ ई०॥ २० अष्टादशस्मृतियोंका इश्तहार॥ आहा यह वही भारतवर्षहै जिसमें किलोग धर्म- हीको अपना सर्वस्व समझते थे सबकामों को धर्मार्थ ही करते थे और अपने संपूर्ण कालको इसीमें व्यतीत करते थे परन्तु आज उसी भारतवर्ष में कराल काल की कुटिल गतिसे प्रायः सम्पूर्ण सनातन धर्मावलंबी अपने अपने वर्णाश्रम धर्मोको धीरे धीरे छोड़ते चले जातेहैं और इस नवीन शिक्षाके प्रबल प्रतापसे अपने कोसर्वज्ञमानकर विनाजाने समझे अनेकानेक प्रकार की कुतर्कणा करते हैं जो विचार पूर्वक देखा जाय तो इसमें उन विचारों का कोई दोष नहीं है क्योंकि हमारे संपूर्ण धर्म ग्रन्थ संस्कृत भाषाही में हैं और संस्कृत के पढ़ने पढ़ाने वाले बहुतही कम हैं इस लिये उन विचारों को संस्कृतज्ञ लोगों का बहुधा साथभी नहीं मिलता जिस्से कि वह अपने धर्मकी बातोंको सुनभी सकें और यह स्वाभाविक वातहै कि बिना देखे सुने किसी पदार्थ के गणदोप को नहीं जानसक्ता बस इसी से हमारे देश के नौ जवान लोग प्रायः अपने पुरखों के संचित किये हुए अमूल्य धर्मरूपी रत्नको काच के समान तुच्छ समझकर गंवाय रहे हैं अब ऐसे महा- शयों के लिये धर्म शिक्षाका सीधे से सीधा उपाय विचारने से बहुधा यही मालूम पड़ा कि जो हमारे धर्म शास्त्र के ग्रन्थोंका अनुवाद सकल गुणागरी नागरी भाषा में कियाजाय तो यह लोग बहुत सरलता पूर्वक अष्टादशस्मृतियोंका इश्तहार । देवनागरी अक्षरों के जाननेहीमात्र, से धर्म ग्रंथों को अच्छे प्रकार से पढ़कर अपने वर्णाश्रम धर्म को भलीभांति जानजायँगे इत्यादि अनेक कारणों को शोचकर और अपने धर्म को अत्यन्त शोचनेके योग्य दशामें देखकर परमकारुणिक धर्मधुरीण भार्गव वंशा- वतंस मुंशी नवलकिशोर (सी, आई, ई ) ने सकल लोकोपकारार्थ अपनेही व्ययसे धर्मशास्त्रज्ञ पण्डितवर मिहिरचन्द्र मेनेजर भारतबंधु प्रेस अलीगढ़ के द्वारा अष्टादशस्मृतियोंका अत्यन्त सरल हिन्दी भापामें प्रति श्लोकका यथार्थ अनुवाद कराकर सुंदर काग़ज़ तथा श्रेष्ठशीशे के अक्षरों में मूलसहित मुद्रित करायाहै इन रस्मृतियोंके कर्ता अत्रि- विष्णु-हारति--उशना-अंगिरा यम-आपस्तंब-संवर्त कात्यायन-ठहरपति-पारा- शर-व्यास-शंख-लिखित-दक्ष-गौतम-शातातप और वशिष्ट यह १८ महर्षि हैं इन स्मृतियों में ब्राह्मणादि चारों वर्णोकेधर्म-- ब्रह्मचादि चारोंपाश्रमोंके धर्म- नित्य नैमित्तिक धर्म कृच्छू चान्द्रायणादि व्रत-श्राद्धादि कोंके योग्य ब्राह्मण-प्राणायामादि विधि-गुरुसेवा की विधि- पुंसवन से लेकर अन्त्येष्टि पर्यंत सम्पूर्ण संस्कार- पाठो प्रकार के विवाह- सतयुग को आदि लेकर चारों युगों के अलग अलग धर्म- चारों वर्णका श्राचार-स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मणादिकी रतुति और स्वधर्म रहितोंकी निंदातथा सम्पूर्णपातकों केजुदेजुदे प्रायश्चि- त इत्यादि अनेक धर्म वर्णितहें यहधर्म पुरतक सम्पूर्ण सनातनवम्मावलंबियोंको अपनेअपने घरमें अवश्यही
अष्टादशस्मृतियोंका इश्तहार।
को अपने अपने घरमें अवश्यही रखनी चाहिये जिस्से
कि वह संपूर्ण सन्देहों से निकृत्त होकर अपने अपने
धीको सरलतासे जानसकें इसकी नौछावर सबको
सुगमताके लिये केवल २॥) इतनीही नियतकीहै ।
सफह ६४२ अर्थात् ५८ जुज ७ वर्क की २॥)
अलावा महसूल डाक
इसके सिवाय सम्पूर्ण सनातन धर्मावलंबियों को
यहभी विदित कराया जाता है कि उक्त मुंशीजीने लो-
कके उपकारार्थ और हिन्दी भाषा की उन्नति के लिये
अनेक शास्त्रज्ञ विद्वानों के द्वारा मनुस्मृति ५४ जुज
६ वर्क की ०५) याज्ञवल्क्यस्मृति १० जुज७ वर्ककी.
1-) मिताक्षरा तीनोंकाण्ड १२७ जुज १ वर्ककी ०१०)
और भिन्न भिन्न काण्ड भी मिलते हैं अर्थात् प्राचार
काण्ड२० जुज १ वर्ककी०३) व्यौहारकाण्ड५५जुजष्ट
वर्क की०५) प्रायश्चित्त काण्ड५१ जुज४वर्क की०५)
और निर्णयसिन्धुमयटीकाभाषाकी५) आदि धर्मशास्त्र
ग्रंथों का भी बहुतसे व्ययसे अनुवादकराकर पुष्टकाराज
तथा सुन्दर शीशकाक्षरों में मूलसहित मुद्रित कराया है
यह सबग्रंथ मतवा अवधअखबार लखनऊमें मिलते
हैं जिनमहाशयों को इनके मूल्यादि का निश्चय करना
हो वह केवल 4) का टिकट भेजकर इसमतवे की
फेहरिस्त मँगाकर देखलें ॥
मुंशी नवलकिशोर अवध समाचार सम्पादक
हजरतगंज लखनऊ
भगवगीतानवलभाष्यका विज्ञापनपत्र । प्रकट हो कि यह पुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता सकल निगम पुराय स्मृति सात्यादि सारभूत परम रहस्य गीता शास्त्र का सर्व विद्यानिधान सोशल्य विनयोदार्य सत्यसगर शोर्यादि गुणसम्पन्न नरावतार महानुभाव अन को परमें अधिकारी जानके हृदय ननित मोहनाशार्थ सब प्रकार अपार ससर निस्तारकं भगवद्भक्ति मार्ग दृष्टिगोचर कराया है वहीं उक्त भगवद्गीता वन- वत् वेदान्त व योगशास्त्रान्तर्गत जिमको कि अच्छे २ शास्त्रवेतर अपनी बुद्धि से पार नहीं पासतो तव मन्दबुद्धो निनकी कि येवत देशभाषाही पठन' पाठन करने की सामर्थ्य है वह कव इसके अन्तराभिप्राय को नान सके है- और यह प्रत्यक्षही है कि नवतक किसी पुस्तक अथवा किसी वस्तुका अन्त- राभिमाय अच्छे प्रकार बुद्धि मे न भासित हो तवतक प्रानन्द क्योंकर मिन इसकारण सम्पूर्ण भारतनिवासी भगवद्भक्त पादान रसिकजनो के चितानन्दा र्थ व बुद्धिवोधार्थ सन्ततवर्मधुरीण सकलकलाचातुरोण सर्वविद्याविनासी भगवद्भक्तायनुरागी श्रीमन्मुशीनरलकिशोर जी सी, आई, ई ने बहुतसा धन व्ययकर फर्रुखाबाद निवासि पण्डित उमादतनीसे इस मनोरजन वेदवेदान्त शास्त्रीपरिपुस्तक को श्रीशकराचार्य निर्मित भाग्यानुसार संस्कृत से सरल देशभाषा में तिलक रचा नवलमाप्य आय में प्रभातकालिक कमलसरिस प्रफुल्लित करादिया है कि जिसवो भाषामात्र के जाननेगने परुपभी जानसक्ने । जय छपने का समय आया तो बहुत से विवघ्नन महात्मा की मम्मति से यह विचार हुआ कि इस अमूल्य व अपूर्व यथको भाप्यमें अधिकतर उत्त. मता उस समयपर होगी कि इम शकगाचार्य कृत भाष्य भाषा के माय और इस यथ के टीकाकारों की टीका भी नितनो मिले शामिल काज्ञायें निम में उन टीकाकारों के अमिप्रायका भी वाध होवे इस क रण से श्रीस्वामी शक- गचार्यको शकरभाष्य का तिलक व श्रीआनन्दगिरिकृत तिलक अरु श्रीधर स्वामिकृत तिलकमा मूल लोकः सहित इस पुस्तक में उपस्थित थे। VIDYA " 108 IY P