Government College, Kota
Utkirnalekhapancaka
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॥श्री॥
१२०१५
विद्याभवन संस्कृतग्रन्थमातारा
बदलिय
७८
॥श्रीः॥
पुस्तकालय
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उत्कीर्णलेख-पञ्चकम्
'रमा' हिन्दीव्याख्योपेतम्
।
झा-बन्धु
io रमाकान्त मा एम० ए०
भ्याकरण-वेदान्ताचार्य,
प्रधानाचार्य
अझसिं०माविद्यालय
रेवतीपुर, गाजीपुर
पं० हरिहरना एम० ए०
व्याकरण साहित्याचार्य,
अध्यापक
सेन्ट्रल हिन्दू स्कूल
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-२२१००१
प्रकाधक
चौखम्बा विद्यामवन
भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रधानाक तथा वितरक)
धोक (बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे )
पो. बा. म. १०१९, वाराणसी २२१००१
दूरभाष । ६३०७६
सर्वाधिकार सुरक्षित
चतुर्थ सस्करण १९९०
मूल्य १५-..
अन्य प्राप्तित्यान
चौखम्बा सुरमारती प्रकाशन
के० ३७/११७, गोपासमन्दिर लेन
पो.बा.. ११२९, वाराणसी २२१०.१
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
२८ प. ए,नबाहरनगर, बंगलो रोग
पो.हा.०२११३
बिल्की ११...७
दूरभाष २३६३९१
धोजी मुद्रणालय
पारागमी
THE
YIDYABHAYAR SANSKRIT GRANTHA WALA
92074
Aina kunder
lay
UTKIRNALÉKHAPANCAKA
(A COLLECTION OF FIVE PILLAR INSCRIPTIONS)
1 tkih
'Rama' Hindi Commentary eliasili
कालय
By
JHA BANDHU
(Pt. Ramakanta Jha M A.; Pt. Haribariyha M.
kunna
aru
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
YARANASI
© CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
(Oriental Publishers & Distributors)
CHOWK (Behind The Benares State Bank Building,
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VARANASI 221001
Telephone : 63976
4th Edition
1989
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CHAUKHAMDA SURBHARATI PRAKASHAY
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38 U. A., Jawahardagar, Bungalow Road
DELKI 110007
Telephone : 236391
सरहालय
जिनके विद्यामन्दिर
की
जटा
आधार-शिला
पर
बैठकर
कतिपय अभिलेख-कुसुमो
का
गुम्फन हो सका
सन्ही
पुण्यश्लोक महामना मालवीयजी
को
पावन स्मृति में
सभक्ति समर्पित
कुछ अभिलेखो के निवेदन भारत की पुरा त्व-मामग्रियों में अभिरसो का महत्त्व विचारणीय है। य अमिरेड प्राचीन भारत के वास्तविक स्वरूप की मनोरम झाँकी प्रस्तुत करते हैं। इनमे अधिकतर लेख विभिन्न विश्वविद्यालयो की उच्च कक्षाओ मे पाटप विषय के रूप में निर्धारित हैं। एम० ए० मे हम लोगो को भी अध्ययन का सौभाग्य मिला था। विन्तु मम ममय निर्धारित भिलेखा पर कोई पुस्तक बाजार में उपलब्ध नहीं थी, अतएव विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में सुरक्षित श्री डी० सी० सरकार महोदय के मूल अभिलेख त्पा श्री देसकालकर महोदय का अग्रजी अनुवाद ही हम लोगों के अध्ययन के एक मात्र अवलम्ब थे। व्यक्तिगत छात्रों के समक्ष तो यह समस्या खडी ही रही। उसी ममय अपनी तथा मन्य छात्रो की पटिनाइयों को ध्यान में रखकर हम लोगों ने कुछ अभिलेखो के स्परन का निश्चय किया और चौखम्बा विद्यामवन के हिलेच्छुक विद्वान् प० रामचन्द्र झा जी के माध्यम से वहाँ के अध्यक्ष महोदय के परामर्श के बाद इस कार्य में प्रवृत्त हुए। किन्तु बीच में ही अध्यक्ष महोदय के विशेष आग्रह से वादम्बरी (शुक्नासोपदेश ) का सम्पादन मार लेना पहा । अत इसके प्रकाशन में कुछ दिलम्ब अवश्य हो गया । आज इम उत्पीनर खपव' को छात्रों के वर- कमलों में समर्पित करते हुए हम लोग पार हर्ष का अनुभव कर रहे हैं । प्रस्तुत 'अन्य' में अभिरेखों के हिन्दी अनुवाद के माप हा ऐतिहासिक तथा साहित्यिक महत्त्वो का सविस्तर विवेचन क्यिा गया है। साथ ही ऐतिहासिक एव भौगोरिय नामों पर सहित टिप्पणी मी दे दी गयी है। इस पुस्तक के सम्पारन में ऐतिहामिक विवेचन-सग मे माननीय डा० रमाशर त्रिपाठी, श्री नरे काय घोष स्पा डा. वासुदेव उपाध्याय की पुस्तके, एव साहित्यिक विवेचन प्रसग में श्री देसकालकर महोदय की पुस्तक विशेष उपादेव मिद हुई है। अत' हम उन महानुभावो के प्रति कृतज ही नहीं, ननमस्ता भी हैं। साथ ही ग्नि सहपाटियो के क्लास-नोट्स भी सहायर हुए हैं, उनके प्रति आभार प्रस्ट करना तो अपने को ही पयवाद देना है। यदि यह अन्य छात्रा क्यहार वन समाचो अपने गृपन-प्रम को हम लोग सफल मानेंगे । अस्तु, विनीत- -मा-यन्धु विषय-सूची १ ४ सि.) ६ कोटा . निवेदन प्रस्तावना १ अभिलेखो का महत्व २. बाह्य पक्ष भौगालिक दृष्टि से ३ नगर चर्चा ४ सामा निर्देश ५ मार्ग निर्देश ६. यात्रा निर्देश ७ अभियान मार्ग ८ आन्तरिक पक्ष एतिहासिक दृष्टि मे ९ वंश-वृष १० शासन व्यवस्था ११.प्रजातन्त्र १२ राजवन्त्र १३ राजकर १४. सामाजिक झलक १५ सामाजिक उत्सव तथा आवागमन १६. धार्मिक स्पिति तथा उसकी सहिष्णुता १७ आपिक स्वरूप १८. अभिलेखो मे साहित्यचर्चा ११ शिक्षा-सस्या १. शिक्षा के विभिन्न विषय ११. अमिलेसो में प्रयुक्त भाषाएँ १२. विपिया तपा सन् ૧૨ १४ २० २२ २४ २७ २८ २३. अभिलेख लिखने के नगपार,रून तपा बरसर २४.निनेखों का द किरण १ २१ २२ २७ २९ प्रन्य (१)रिनार (ना) ने सदानन् रातराभिलेख अमिस का ऐदिहासिक महत्व अभिरंह को साहिलिन विशेषताएं टिमी (२) महाराजचन्द्र का महरौटी तोहस्तन्मरेख अभिनेत का ऐतिहासिक महत्व इमिरेखा साहित्यिक महत्त्व टिपी ( ३ ) हमारएस का नन्दसौर (दापुर) सिख सितारेख का ऐतिहासिक महत्त्व पियरेख को साहित्पिर विशेषताएं दान में उन्न दिनों से समता ਲਈ (४)महाराज योर्मा का पिटारेस सितारेख या ऐतिहासिक महत्व कवि का साहिटियर दैपिटप टिपणे (५) विहार : वोडरदेवका देहटी-स्टम्मरेख स्तम्मरेख का ऐतिहासिक महन्द परिशिष्ट पारा सेप सन्नविविधारपर प्रतवाणि ४७ POE+
उत्कीर्णलेख-पञ्चकम्
फरबदरसदृशमखिल भुवनतल यत्प्रसादत कथय ।
पश्यन्ति सूक्ष्ममलय सा जयति सरस्वती देवी॥
प्रस्तावना प्रभात अभिलेखों का महत्व :- प्राचीन भारतीय इतिहास-निर्माण में सहायक- भारतवर्ष संसार के प्राचीनतम एव महानतम देश में अग्रगम्य है । ऋपियो का यह आदेश “एतद्देशप्रमूदम्य सायादग्रजन्मनः । स्व स्व चरित्रं शिक्षेरन् पृपिया सर्वमानवा." के गम्भीर उद्घोष से विश्व के ज्ञानगुरु पद को अनाव करता था। इस पवित्र देवभूमि के उद्बुद्ध दानिको की शान-ज्योति से समम्न भून डल का अज्ञान-तिमिर हट जाता था। इस देश की पवित्रता और रमणीयता पर रीश कर देवता भी यहाँ अवतीर्ण होने को ललच उठते थे। इसके हो मंगलमय में अन्य देशवामी अपनी अलसायी आंखों को खोलने थे। किन्तु सर्वप्रयम ति को मानवता का पाठ पढ़ाने वाला यह भारत एक दिन विधि के क्रूर अट्टहास का लक्ष्य बना । सदियो तर मारत मां के चरणों में विदेशी लोहशृखला खनन्मना उठी। जो कभी इसकी पलि थे, वही गिर के ताज बन बैठे । बौद्धिक और मा-कृतिक विकास की दृष्टि से यह देश आधुनिक तथाकथित सम्म देशों की पंक्ति में निकाल दिया गया और विश्व के समझ इसे अनायं देश के रूप में रखा गया। हमारे देश, समाज और संस्कृति को प्रतिविम्बित करने वाला सत्याहित्य और इतिहास लूट लिया गया। उसकी जगह मनगहन्न पिपन कर उपापित इतिहास रच-रचा कर यहाँ की दास्तविर स्थिति पर परदा डाला गया। साथ ही पाचान्य मनोपियो ने यह प्रयाद मो फैलापा नि भारतवर्ष में वहां के जनजीवन की प्रस्तुद करने वाले इतिहास का सर्वया मनाव है। अगर कहाँ कुछ है भी तो उसने दिपियों टया पटनाओ का व्रमिक और प्रामाणिक उल्टेस नहीं है। क्मिो मो देश में राजनीतिक उपल-पल को मदद विपियो और पटनाओं के मृवीमात्र को ही इदिहाव को समा देने वाले आधुनिक ऐतिहासिक यह मूल गये कि भारतीय आदरे अनुसार इतिहास का उद्देश्य लिपियो और घटना-बाने का उल्लेस मात्र नहीं, मरिनु मानव जीवन के शारदन निदान्तों को महायों के जीवन में पटाने हर राष्ट्र सांस्कृतिक सम्बुदय में अपूर्व योगदान ( २ ) देना भी था। हमारे यहाँ इस उद्देश्य के प्रतिस्वरूप पुराण, रामापन टप महाभारत सच्चे इतिहास का प्रतिनिधित्व करते हैं । समो दिन एक से नहीं होते। उत्पान और पतन दो विश्व वा अनिवार कम है। बहुत दिनो तक परतन्त्रता को देडो मे जकडी मानवढा जब घीस को तो सपूतों का माथा ठनका और ऊपा की पहली किरण के साथ ही हमें उद्बोधन मिला। ईश्वरीय अनुकम्पा तथा राष्ट्रपिता के अहिंसा-बल ने विजयपताना पहरायी। स्ववल भारत में परतन्त्रकालीन मिप्यारोपी का खण्डन आवश्यक प्रतीत हुआ मौर अपनी भूली सास्कृतिक परम्परा का अन्देषण तथा मूल्यारन होने लगा। इसी प्रसग में विदेशियो द्वारा कल्पित इतिहास का पर्दाफार पर सच्चे राष्ट्रीय इतिहास-निर्माण की योजना बनो और उस महानतम कार्य को सफलता प्राति २ सापनों में इन अभिलेखों ने अपना महत्वपूर्ण अभिनय प्रस्तुत किया। सदियों मूक अभिलेखों ने अपना हृदय सोल दिया और तब पुरातत्त्ववेत्ताओं ने इस माय-निषि से अपने इन्हिास को सजाने का भगीरप प्रयास किया । सामान्य इतिहास-निर्माण में जिन तत्त्वो की उपादेयता होती है, उनकी उपलब्धि पर्यात मात्रा में होने लगी। विचार करने पर स्यूल रूप से इतिहास के दो पक्ष हैं-बाप और मान्तरिक । इतिहास के बाद पक्ष से हमारा तात्पर्य रिसी देश विशेष की भौगोलिक स्थिति से है और आन्तरिक पक्ष से राजवर, पासन-प्रदन्ध, सामाजिक, मार्मिक और साहित्यिक स्पिति से। अब देखना यह है कि इतिहास के उपर्युक्त दोनों पक्षों की सामग्री जुटाने में अभिलेखों ने कहाँ तक सहायता की है। इसी दृष्टिकोण को आधार मानकर हम उनके महत्त्व का विवेचन रेंगे। बाघ पक्ष:- भौगोलिक दृष्टि से :- इतिहासनिर्माण में अपेक्षित प्राचीन भारत का भूगोल जानने के लिए पुराने बमिलेसों से पर्याप्त सहायता मिलती है। विभिन्न राजवशीय अभिलेखों में निधि नगर, सोमा, मार्ग तथा विजय यात्रा की चर्चा से भौगोलिक वातावरण की मकी मिल जाती है। साहित्यक एवं यात्रा सम्बन्धी प्रन्यों से भारत के प्राचीन भूगोल का जो स्वस्म दृष्टिगोचर होता है, अमिलेखों के माध्यम से उसा समीकरण त्या वास्तविक स्थिति को एक निश्चित रेखा खिंच जाती है । अभिलेखों का उपलब्धि-स्थान उस राज्य की सीमा का निर्देश करता है । भारतीय सम्राटों के विजय-प्रयाग का मार्ग प्राचीन-कालीन यातायात तथा व्यापारिक पय विशेष का परिचय देना है। दीयं-पाश या दान के प्रसग मे किसी शासक द्वारा भ्रमण किये गये स्थान तथा दान की चर्चा करते समय नदियों तथा उनके तवटी नगरों का अभिलेखीय-वर्णन मी भौगोलिक स्थिति को स्पष्ट करता है। राज- नीतिक एवं धार्मिक प्रयोजन-वश दुनो का उल्लेख करते समय प्रशस्तियों में मिनभिन्न प्रदेशों के नाम को मिलते हैं। अन्य उपलब्ध प्रमाणों के साक्ष्य पर भी मोगोलिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। पपा- अशोक के स्वम्भ- लेख का परिशीलन उसे चुनार का सिद्ध करता है और यह भी कि उतने बजनी स्तों को मूद्दूर प्रदेशों में भेजने के लिए गगा में बेहों का सहारा लिया गया होगा। इसी प्रकार अन्य स्तम्भो के विषय में भी अन्य नदी-मार्गों का अनुमान सगाया जाता है। इसी तरह साक्षात् नहीं तो यप्रत्यक्ष रूप से भी अभिलेखो के द्वारा भौगोलिक परिस्थितियो का ज्ञान हो जाता है। नगर चर्चा:- अभिलेखो मे राजाओ की राजधानी ठया उनसे सीधा सम्बन्ध रखने वाले नगरों का उल्लेख मिलता है। कलिंग-विजय के बाद बोड-धर्म-दीक्षित अशोक ने धर्म-रेखो द्वारा तोसती ( वर्तमान पोली), उज्जयिनी तथा तक्षशिला प्रभृति विभिन्न प्रान्तों के कुमारों के पास अपना संदेश भेजा था। स्वयं भी उपागत की जन्मभूमि लुम्बिनी, साधना-क्षेत्र बोध-गया और प्रचार-स्थल सारनाय की तीर्थ- यात्रा की थी। सारनाय स्तम्भ लेख में सप-भेद के प्रसग में पाटलिपुत्र को भी पर्धा आयी है । मोयों के उत्तराधिकारी पुष्यमित्र को अयोध्या-लेस मे 'कोराला- पिप' कया गया है। स्मरणीय है कि अयोध्या उत्तर कोरत को राजधानी पो। दक्षिण भारत के सात-बान नरेशो के अभिलेखों में गोवघनस ( नासिक) जपसन्धावार के रूप मे उल्लिखित है। ई० सन् प्रथम सताम्दी में कृयाम-नरेश कनिष्क की राजधानी पेशावर, तक्षशिला के समीप में ही थी। उसके सारनाय बुन-प्रतिमा लेस में बनारस का प्राचीन नाम वाराणसी का उल्लेख है। एक. क्षत्रप नहपान के नासिक लेख में प्रभास, मस्कन्छ, दयपुर, गोवर्धन, योर्यारिण सपा प्रदामन के पनागड़ पिलाख में बाररावनि, मुराष्ट्र कच्छ, आन आदि देशों का नाम मिलता है। अशोक के तेरह शिलालेस में पलिंग तपा आन्ध्र प्रदेश का निर्देश है । गुप्तकालीन सम्राट् समुद्रगुप्त के विजय प्रसग में प्रयाग प्रशस्ति मे कोशल, पीठापुर, काची प्रभृति स्थानो का नाम दक्षिण भारत के विजय प्रसग मे तथा समतट, डवाक, कामरूप, नेपाल प्रभृति प्रदेशों के नाम सीमान्त राज्यों के रूप में उल्लिखित हैं। इसी प्रकार चन्द्रगुप्त द्वितीय के विजिट प्रान्तो म कारवाड अर्थात् प्राचीन सांची का, तया कुमारगुस प्रथम के मन्दसोर अभिलेख मे लाट और दसपुर इन दो प्रधान व्यापारिक नारो का उल्लस है । गुप्त-नरेसो के समकालीन राजाओं के सुमानियों-शिलालस म पुष्पर और हर्षवर्धन के बांसखेडा ताम्रपत्र म अहिच्छन मुक्ति का नाम आया है। मध्ययुग में तीर्थों की विशेष चर्चा के कारण प्रयाग, वाराणसी ठया अयोध्या वा नाम अपसद, कलचुरी तथा गहड़वाल दानपत्र के लखा म तीर्थ के रूप में आया है। पाल नरेश धर्मपाल के सालिमपुर देवपाल के नारन्दा तपा नारायण पाल के भागलपुर ताम्नपत्रों म व्रमा महोदय (कन्नौज ) नारन्दा तया मुगेर की चर्चा है। एहोल-अभिलेख म चालुक्य-वशी शासक पुल्वेशी प्रथम तपा द्वितीय की विनय प्रशस्ति मे वातापी पुरी तथा काशीपुर का वर्णन है। मध्ययुगीय चन्देल राजाओ के अमिलेसा म कान्यकुब्ज तथा कारिजर नगरों का वर्णन एव दिल्ली के स्तभ-रेग्न म विग्रहराज के विन्ध्य से लेकर हिमालय तक की तीर्थयात्रा का वर्णन है। इस प्रकार विहान-दृष्टि से पर्यवेक्षा करने पर अमितेखा मे निर्दिष्ट प्रदेश तथा प्रमुख नारों को तालिका से भारत के भौगोलिक वातावरण की एक स्यूल स्परेसा प्राचीन नौगोलिर ज्ञान मे नितान्त उपयोगी सिद्ध होती है। सीमा निर्देश :- कपर इस बात का संकेत दिया जा चुका है कि कुछ अभिलेखों में शासकों की विजय-यात्रा का वर्णन मिलता है जिनके आधार पर प्राचीन भारत की विभिन्न राज्य-सौमा तया मार्गों का प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त होता है। अभिलेखो में वगित विजय प्रयाश से यह अनुमान राना कठिन है वि समन विजित प्रदेश साम्राज्य में सम्मिलित कर लिये जाते थे, किन्तु उस राज्य तथा उसने निकटवर्ती राज्यो की सीमाआ का शान अवश्य हो जाता है। यया-अयोक के तेरहवें शिलालेख म बलिंग-विजय प्रमग म उसी के साप सोमा पर स्थित अन्य मारतीय यूनानी राज्या के नाम मी उल्लिसित हैं। अशोर के द्वितीय तया पचम शिलालेख में दति राज्या के आधार पर यह प्रतीत होता है वि अमोर ।
को राज्य कोना मुद्दर दक्षिण से सम्पूर्ण भारत तथा अगानिस्तान के भूभाग तक फैली थी। यह दूसरी बात है कि अशोक को केवल कलिंगविनय श्री हो हाय लगी। क्योंकि उसकी पैतृक राज्य-सीमा पहले से ही विस्तृत मी, जो उसे उत्तराधिकार के रूप में मिल चुकी पी। नवी सन के प्रारम्भ में पश्चिमोत्तर प्रान्त में शान करने वाले कुपाणनरेश कनिष्क ने अपनी राय-मीना को पूरब में काशी तर फैलाया या, जिसकी पुष्टि पेशावर नया बहाबर रियासत से उपलब्ध कुरंम तया स्यूविहार ताम्रपत्रो में और सारनाय प्रतिमा रेव से होती है। अनिलो के प्राति-स्पान मी मोनोटिस सीमा पर प्रकार डालते हैं। गुम-वस के अभिलेन उस साम्राज्य की भोगोनिक सीना के निर्धारण में विशेष उपसोरी सिद्ध हुए हैं। समुद्रगुत की प्रयाग-यन्ति में जावत तया दक्षिापय मा. उत्तरी दया दक्षिणी भारत के लिए प्रयुक्त हुए हैं। उस अभिलेख का अनुशीलन यह बउलाता है कि उत्तरी माग्द में समुद्रगुल की राज्य नीमा म्युग तर तथा दक्षिग भारत में काशी टक बिन्नृत थी। इसी प्रकार चन्द्रगुर द्वितीय के मेहरौली लोहम्नम्न रेस में " मलयानि पेन समरे सिन्धोनिता वालिकाः" इस उक्ति से पजाब तक की राज्य बीमा का निर्देश मिलता है। चन्द्रगुल दि० की राज्य-सीमा की पुटि संचा-वेदिका तया उदयागिरि-गुहालेख में भी होती है । मन्ययुग के पालवी अभिनेत्रों के साप ही सेन-दशी लेखों से तत्कालीन भौगोलिक सीमा समान होता है। चानुक अपिलख (ऐहोल ) में मगनेश को विजय-गीमा भारत मे बाहर लका वक ची म्पी पी। वहीं पर पुनकेसी द्वितीय को राज्य सोमा महाराष्ट्र कोपल तपा कलिग से छेकर दक्षिा पूर्व में कारो और कावेरी टर दी। यह अनिख दक्षिा भारत के अन्य राज्यों की सीमाओं का भी निर्देश गता है। आगर यह है कि इन अभिलेखों से प्रात राज्य-सीमा की सूची से मोनिक मान अधिक सातार हो उठदा है, जो इतिहास-निर्माग को एक महत्वपूर्ण कडी है। मार्ग-निर्देश :- प्रचंन मागे का ना दनन माहिर में निरता है वैसा दो अभिलेखों में नहीं निता स्नुि उनने वन राजाओं के पात्रा विवरण में प्राचीन भारत के विभिन्न मनों का चित्र अन्दा हो बाद है। पहले प्रधानता अभिलेखों के अनुसार स्पन और बनना का मत मिलता है। इसके साप हो यावापान पुत्र तथा व्यापारिक अभिलेखों से दलालीन मार्ग सम्दन्धी भौगोलिक स्पिति का परिज्ञान होता है। विभिन्न अभिलेखों में उत्तरी भारत के लिए उत्तराप और दक्षिणी भारत के लिए दक्षिणापप इन दो नामों से भारत के विशाल नेपाल को अभिव्यक्त किया गया है। ये मार्ग मो नदेस्य मेद से दो प्रकार के बनाये जाते थे-(१) यात्रा-मार्ग तया (२) अभियान-मार्ग। यात्रा-मार्ग :- बौद्ध-साहित्य सपा बयोक के द्वितीय शिलालेख से यह मलो भांति हात होता है कि भगवान दुर रुवेला से सारनाथ तपा सारेत मार्ग से घावन्तो गये थे, जिन मागों के बीच-बीच में संपडा बाराम (वियाम-स्थान ) बने थे। अशोक उद उज्जयिनी तपा दक्षशिला का राज्यपाल था तो वहाँ तक मुगमता से यात्रा तय करने के लिए उसने बच्छे-अच्छे मार्गों का निर्मा और उन मागों के किनारे वृक्षों तथा कामी कायोजन करवाया था। इन विभिन्न लेखों के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि पाटलि. से तक्षशिला तर प्रशस्त राजमार्ग पा, जिसरी शाखा सारनाय में कौशाम्बी टपा उग्जपिनी होकर भरौंच बन्दरगाह तक चली गयी थी। इसी प्रसग में नदी पार करने वाले मागे में घाटो का उल्लेख झापा । नासिवरेख में दूवा, पारदा, तापी तथा दाहनुरा प्रवृति नदियों को पर्चा आपी है, जिनरे पाटरो रो ऋषभदत्त ने माफ कर दिया पा और यात्रियों के लिए वहां पर विश्राम-स्थान बनवा दिया था। कुछ व्यापारिक-मार्गों की भी चर्चा आयी है । प्राचीन समय में व्यापार रा उत्तरदायित्व श्रेणी नामक तथा पर पा। गुत-युग के दामोदरपुर ताम्नपत्रों में 'सार्थवाह गब्द का प्रयोग आया है, जो व्यापारिक-पान्यों का मुखिया माना गया है। 'सा' को व्यापारिक नमूह और उन दल के नेता से 'सायंदाह' कहा जाता था। कुमारगुत प्रथम के अभिलेख में कोटिव (उ० दगाल ) के सापंदाह दधुमित्र तथा दुधगुल के दामोदरपुर-नामात्र में दनुमित्र का उल्लेख है। व्यापारियो का यह समूह विमिन मार्गों से दलगाडी या घोडॉ बपदा मदहों या स्टो पर सामान लाद कर ए स्पान से दूसरे स्थान में व्यापार करता था। इन प्राचीन पानापाव-नापनों द्वारा विभिन्न किन्तु मुरक्षित तपा मुगम मानों से साधारण जनता तथा व्यापारियों का आवागमन होता था। निष्कर्ष यह विमोचं शासन काल से ही भारत में प्रजा. हित के लिए सुगम राजपथ प्रशस्त थे।
अभियान मार्ग अभिलेखों में शासको के अभियान ( आक्रमण ) वृत्तान्त से यह ज्ञात होता है कि उनकी सेनाएं किसी न क्सिी सुगम मार्ग का सहारा लेकर ही शत्रु-राज्य की सीमा का अतिक्रमण करती रही होगी। अशोक के तेरहवें शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसके द्वारा कलिंग-विजय के लिए कई लाख सैनिको को सुग- मता से वहां तक पहुंचने के हेतु सुलभ मार्ग का अन्वेषण हुआ होगा। प्रयाग- प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त ने दक्षिण-विजय के लिए एक नवीन मार्ग का सहारा लिया जो आजकल प्रयाग से जबलपुर की ओर जाता है । दक्षिण-पूर्व भाग के शासको को पराजित करता हुआ समुद्रगुप्त काची तक चला गया था। तदनन्तर चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिम भारत की विजय की। दक्षिण के ऐहोल अमिलेस मे पुलसी द्वितीय की विजय यात्रा के मागों का सविस्तर वर्णन मिलता है। इस प्रकार इन अभिलेखों से मार्ग सम्बन्धी भौगोलिक स्थिति का ज्ञान होता है । पेशावर से बगाल, मपुरा से दिल्ली-रांची होते हुए बम्बई, पटना से प्रयाग, जबलपुर होकर बम्बई तथा कलकत्ता, मदास का वर्तमान रेलगाड़ी का मार्ग प्राचीन मार्ग पर ही अवलम्वित प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त समुद्री जल-मार्ग का निर्देश भी एक-सत्रप रुद्रदामन के जूनागढ-अभिलेख में मिलता है, जिसने समुद्र के किनारे तक अपना अधिकार जमाया था। उसी अभिलेख में बान, सौराष्ट्र, अपरान्त, मह प्रभृति बन्दरगाहों का उल्लेख है। इस प्रकार भौगोलिक दृष्टि से इतिहास निर्माण की दिशा में अभिलेखो का महत्त्व आंका जा सकता है। आन्तरिक पक्ष :- ऐतिहामिक दृष्टि से.- प्राचीन भारत के इतिहास-प्रणयन में अमिलेखो से उपादेय तत्वों की उपलब्धि होती है, इसमें दो मत नहीं हो सकते। यद्यपि अभिलेखों के मूल्याङ्कन में सतर्कता इस बात में होनी चाहिए कि ये लेख युद्ध ऐतिहासिक प्रमाणों की प्राप्ति में कहाँ तक सहयोग देने है ? तपापि अतिश्योक्ति को छोडकर यदि इन अमिलेमा के ऐतिह पर विचार क्यिा बाय दो उसकी उपयोगिता अवश्य बाँकी जा सकती है। इतिहास निर्माण की दिशा में पुरातत्त्व-सामग्रियों में अभिलेख का महायपूर्ण स्फान है। क्योंकि वहां साहित्य दुर्दोष है, यहाँ पुण्यात विश्में की सहायता उ तिहास तयार होता है। जहाँ पर इतिहासकार वेदल लिखित सापनों पर निर्भर करता है वहाँ पुरातत्व हजारों वर्ष के पुराने स्टहरों को खादकर इतिहास रचाता है। कौटिल्य के अपंशास्त्र में उल्लिवित दाडों की प्रामाणिस्ता अशाक के अभिलेखों से सिद्ध हो चुकी है। हरिया की प्रयागप्रशस्ति रघुवश म वठि विजय यात्रा की पुष्टि होती है। एवमेव हर्ष के भनिन्खों से बाप के कपनों की पुष्टि होती है। इन्हीं अमूल्य अभिलेखों के बचपन मनन के फलस्वरूप प्राचीन भारत का इतिहान बाधुनिक देहानिक स्तर पर नी प्रामाणिक सिद्ध हो सका है। इतना ही नही, भारतीय सस्कृति ने विश्दन्न गरिमा इन्ही अभिलेखा की देन है। छोटे अभिलेखा में भी बनूल्य ऐतिहासिक निपिना सुरक्षित हैं । पया-मास्को रख के आधार पर ही मौर्य सम्राट् वा व्यक्तिगत नाम 'अशोक प्रकार न आ सका, अन्यथा उनका पर्म-अभिलेन्द उन्हें प्रियदर्शी तर ही सीमित रखना । लभिप्राय यह है कि प्राचीन अभिलेख भयोक, पनिष्क, गौतमी पुत्र चरणी, रददानन्. समुद्रगुप्त चन्द्रगुम दि०, स्वन्दगुप्त, चालुवर-नरेश पुररेशी दि०, धर्मपाल तपा प्रव आदि शासकों के सम्बन्ध म जनक महत्त्वपूर्ण रहस्यों का धाटन करत । उनरे प्रवास, राज- नीतिश्ता, धार्मिक सहिष्णुता, प्रजा-दसरदा और कौति की गाथा सुनाते हैं ! अन्यथा इन प्रसिद्ध इतिहास पुरषों का वास्तविक चरित्र बाज भी रोगों व रिए मनुकरणीय नहीं हो पाता अशोर के अभिलेखों में केवल पति-विश्य की चर्चा है, अत यह निप्पर्ष निवारा जाता है रिपरिको छोडकर हिमालय से महास तक का प्रदेश चन्द्रगुप्त मौर्य न ही जीता था। दक्षिा में मौर्य उत्तराधिकारी सातवाहन-नरेश ईसा पूर्व दूसरी सदी से चौथी सदी तक शासन परते रहे। नासिकगुहारेस के आधार पर सातवाह्न-नरेर गौतमी-पुत्र शातकी की दिग्य तथा नपान व पराजय की बात प्रकाम आती है। यस क्षत्रप रद्वदामन की पाति उनके जूनाइ मिसालेख में वन्दि है, जिसने दक्षिणपथ-पति पतरों को दो-दो दार हराया था। प्रयाग-प्रशस्ति मे समुद्रगुप्त को विजय यात्रा का सुन्दर दांन है, जिसका विदचन हम उस मभिलेख वे प्रमग मे किए हैं। पपग में इन्नोज पर अधिकार करने के लिए प्रतिहार, राष्ट्ररर सपा पाल-नरेशों में परस्पर युद्ध की स्थिति बनी रहती पो, जिसकी पुष्टि कोर-सपहारय-रेस, हारिमार-प्रति दपा ग्वारियर-प्रान्ति से होती है। उनने प्रव, पर्मपाल तपा वत्सराज वे विजय-पराजय का उत्रेत है।
१ उपर्युक्त तीनो वर्षों के अभिलेखो से शामकों में वशानुगत बद्ध दर-जनित युद्ध- भावना का स्पष्ट समेत मिलता है। इसी प्रकार ऐहोल प्रशस्ति में पुलकेशी द्वितीय की जीवन-क्या तया उसके द्वारा कलौन-नरेश हर्षवर्धन के पराजिद होने की बाद सिद्ध होता है "मयविलितहों येन चाकारि हर्ष"। इस प्रकार ऐति- हासिक दृष्टि से भी इन मूक फ्नुि सजीव अभिलेखों के महत्त्व का वर्णन जितना मी किया जाय थोडा ही है । यब हम आन्तरिक पक्ष के अपेक्षित सानो का सक्षित विवेचन प्रस्तुत करते हैं। वंश-वृक्ष :- अभिलेखो का परिसीरन सम्बन्धित रानाओं को वश-परम्परा का ज्ञान पराठा है। दिस वानर के राज्य-काल में अभिलेख उकोण होता पा उसके पूरे वर वृक्ष का उल्लेख कर दिया जाता था। यद्यपि ईसा पूर्व सदियों में यह बात नहीं पो, किन्तु १५० ई० म रुद्रदामन के जूनामद शिलालेख मे उसकी वसावली का स्पष्ट उल्लेख है--"स्वामिचटनस्य पौषम्य रान क्षत्रपस्य मुगृहीत. नाम्न स्वामिजपदाम्न पुत्रस्य राजा महाक्षत्रपम्प रुद्रदाम्न"। पश्चिमी भारत देशक-शत्रों के मुडा रेख में मी पिता पुत्र दोनों का नाम है। गुरु-कालोन अमिता में वधावली को परम्परा चरम सीमा पर पो । समुद्र- गुप्त के प्रयास्तम्भ-रेख तया स्कन्दगुरु के मितरी सम्भ-लेख में पूरी वनावली इस प्रकार दी गयी है- "महाराजश्रीलप्रपौत्रस्य, महाराज श्री घटो व पौत्रस्य, महाराजाधिराज श्रीचन्द्रगुहवस कुमारदेन्यामुत्पन्नस्य महाराजाधिराज श्रीसमुद्रगुरु-पुत्र-तत्सरि- वृहीतो महादेव्या प्रददेव्यामुत्पत्तस्य परमभागवतो महाराजाधिराज श्रीकुमार- गुसस्स.."अपिलियामा नामतः सन्दगुसः" । कहीं-कहीं पर स्वन्दगुम की जगद पुरुगुरु और उसको वयादों को भी चर्चा आयी है, जिससे गुलों की दूसरी वसपासा कामी शान हो जाता है । गुप्तकालीन वाकाटक रामा विध्य- पति के ताम्र-पत्र में उनके पितामह प्रवरसेन तपा पिता सर्वचन का नाम आपा है-"प्रवरसेन-मावस्य श्री सर्वसनात्रस्य धर्म महाराजस्य वाकाटकाना मी विध्याति .."! प्रनर या धातु पत्र पर मुदे रेतो से जो वसा मिलने हैं लो निहारनरेख महेबारको रान-गुदा मसरे राजा दा रानी - (१.) का प्रमबद्ध नाम मिलता है। हर्षदधन के बासखेडा ताम्रपत्र मे नरवधन से हर्षवर्धन तक शासको तथा रानियो के नाम उल्लिखित हैं। इसी प्रकार ऐहोल के अभिलेख में चालुक्यनरेशो की वसादली निर्दिष्ट है । बगाल के पालवीय राजानो का विवरण सालीमार ताम्रपन में मिलता है। इस भौति प्राचीन अभिलेखो से अनेक भारतीय शासकों के पास का ज्ञान सरलता से हो जाता है। जहाँ तक राजाओ के पारस्परिक युद्ध तया विजय-प्रयाण के वर्णन की बात है, उसके विषय में उन राजानो के अभिलेखों में सविस्तर विवेचन आया है, जिसको आवश्यक चर्चा हम उन अभिलेखों के प्रसग में आगे करेंगे। शासन व्यवस्था :- अभिलेखों के अध्ययन से प्राचीन सन-पद्धति की भी रूपरेखा दृष्टिगोचर होती है। प्रशस्ति उत्तीर्ण करते समय अपवा राजाना प्रसारित करते समय राज्य के कुछ पदाधिकारियों का मो उल्लेख आवश्यक ढग मे किया जाता था। मौर्यकालीन शासन-व्यवस्था का मान अशोक के अभिलेखो से होता है । अशोक. काल से ही पदाधिकारियों को पदवी तथा कार्य के सम्बन्ध में उस्लेख है। अशोक के पचम तपा तृतीय शिलालेख मे धर्ममहामात्य, राजुक, प्रादेशिर तदा युक्त नामक पदाधिशरियो को प्रजा-हित को दृष्टि से राज्य में भ्रमण करने की आशा पी। इसने यह लक्षित होता है कि राजनीति के प्रन्यों में वर्णित पदाधि- कारियों को नियुक्ति शासकों द्वारा होती थी। अयोक ये अभिलेखों से यह पता चलता है कि उनका साम्राज्य प्रान्तों में बंटा पा, जहां पर राजकुमार भी प्रान्तपति के रूप में शासन करते थे। गुप्त-अभिलेखों में गुमशासन-प्रपाली का सविस्तर वर्णन मिलता है। प्रयाग का स्तम्भ-लेख यह बतलाता है कि प्रशस्ति सा लेसर हरिषेण महादण्डनायक, सान्धिविग्रहिक तपा कुमारामात्य पद को भी मुशोभित कर चुका था। चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के उदयगिरि-लेख में सनकानिक महाराज सामन्त सपा वीरसेन सेनापति का उल्लेख है। गुप्त-लेसों से यह शाउ होता है कि साम्राज्य कई प्रान्तों में विभक्त होता था और उन प्रान्तों पर शासन करने वाले राज्यपाल, राष्ट्रिय, भोगिर, मोगपति तपा पोहा इन उन्दों से सम्बोधित होते थे। प्रान्तो को भी जिला (विपर) में बांटा पाता पा, जिसका उल्लेख दामोदरपुर ताम्रपत्रों में पाया है। उसी से यह मात होता है कि मन्त्रियों को नियुक्त पांच वर्षों के लिए होती पी। नगर के मार्यालय को ।
अधिकरणक कहते थे। स्कन्दगुप्त के जूनागढ अभिलेख में उसके द्वारा सुराष्ट्र के प्रान्तरवि तथा नगर-रक्षक के रूप में पर्णदत्त तथा उसके पुत्र धापालित की नियुक्ति का उल्लेख है। विभिन्न अभिलेखों म निम्नलिखित कतिपय प्राशसनिक अधिकारियो की सूची इस प्रकार मिलती है। यथा-राजा, राजानक, राजपुत्र, राजामात्य, सेनापति विषयपनि, भोगपति, पष्टाधिकृत, दण्डपाशिक, पौरा- दरणिर, अमात्य, ज्वेटकायस्थ, बलाधिकृत, दण्डनायक, धर्ममहामात्र, विषय. व्यवहारिन्, सामन्त, साधिरिप्रहिक, महादण्डनायक आदि । शासन व्यवस्था के सम्बन्ध में दक्षिण भारत के दो लेस बहुत महत्वपूर्ण हैं-एक वजोर के समीप नालूर से तपा दूसरा मद्रास के समीपवीं उत्तर मेरुर नामक स्थान से मिला है। इन लेसो के अध्ययन से मध्ययुग के आरम्भ मे पामशासन पद्धति का पता पलदा है। अध्ययन से ज्ञात होता है कि 'सभा' ग्राम के सामाजिक, धार्मिक, बार्षिक एव स्थानीय सभी प्रकार की समस्याओ को देख-रेख तथा उनका समाधान परती थी। उत्तर मेकर का लेस अपने ढग का अकेला है, जिसमें सभा की विभिन्न उपसमितियों, सदस्य-निर्वाचन तथा कार्य-चोली पर प्रकाश गला गया है, जो प्रजाता ढगको शासन-पद्धतिश घोतक है। अभिलेखा में सयुक्तधामन की भी चर्चा यत्र-वत्र मिलती है। इसी प्रसग मे कुछ लेखों के वाधार पर नारी-मासों का उल्लेख भी आया है, जिसकी पुष्टि काश्मोरो मुद्रालेस तपा 'सोमलदेवी' के मुद्रा-लेख से होती है । प्रजातन्त्र :- अमिरेपो तथा मुबालेनों के अध्ययन से प्राचीन युग में दो प्रकार के शासन-प्रजातत्र तपा राजता का पता लगता है । प्रजातर के लिए उस समय या संघ सन्द का प्रयोग होता था। पद्यपि चन्द्रगुप्त मौर्य को प्रवल माघ्राग्य. भावना से सघ-शासन छिन्न-भिन्न अवश्य हो गया फिर मो उसका उन्मूलन नहीं हो सका । उत्तरीविहार में वृजिसप' इतिहास-प्रसिद्ध प्रजातत्र शासन था। अशोकेसनकाल से साम्राज्य-भावना को और भी बल मिला, जिसरे प्रभाव से संप-सासन अपना शिर उग न सरा, रिन्नु अभिलेखों के परिवोलन से यह सट प्रतीत होता है हि राजतत्र के साथ ही संघ-सासन भी पता रहा। ईसा पूर्व सदियों में भारत में प्रचलित सिक्कों के मुदा लेड इस बात को प्रमागित करते हैं । दोप, कुविन्द, बाजुनापन क्ष्या मालर सप-धामकों के सिरों पर स्पररूप से लेस पुरा है-पपा-"पौधेय गणम चय., मालवाना गणस्त चयः, - ( १२ ) मामुनापनाना जय ये रेस पूर्वोक्त क्पन की पुष्टि में प्रमाग हैं। मालव-गा का उल्लेख तथा पोय-पा का वर्णन, रा-नरेश नहपान के नासिर टपा रुद्रदामन के जूनागड रेखों मे मा पाया जाता है । समुद्रगुप्त के प्रसारस्तम्भ- लेख से पता चलता है कि गुत-नरेश ने "मालवार्जुनापन, पोय, मादर, बाभीर" सघों को पराजित किया था। उसरे दाद सघ-सासन का अस्तित्व मिट- सा गया । इस प्रकार ईसा पूर्व तीसरी सदी से चोयी सदी तर अर्यात् सात तो वर्षों तक दो प्रकार के शासन का उल्लेख अभिलेखों में पाया जाता है । उत्तर मेहर अभिलेख प्रजातन्त्र शासन-पद्धति के स्वरूप को भव्य शरी प्रस्तुत करता है। उसमे ग्राम-सभा की समिति के स्वरूप, उपसमिति का निर्वाचन निर्वाचन-पत्र तपा उम्मीदवार सन्दन्धी विशद विदेवन मिलता है। उसने पता चलता है कि उस नमाज के निवासी राजनीतिर मूल अधिकार उपा पुनाद-सन्या की ओर विशेष ध्यान देते थे। न्याय तपा ताक्ति विचारों रे आधार पर अपना कार्यकम बनाते थे। केन्द्रीय सरकार तपा ममा के कार्य का विवेचन करते समय ग्राम के नियमों को दिशेप यादर प्राप्त था। यदि समासद किसी सार्वजनिक कार्य के लिए ऋण लेता था, तो भविष्य में चुने जाने वाले सदस्य या उपसमिति को मान्य हाता था। उसने सलग्न कार्य को पूरा करना, कृप चुकाना या मूद देना मादि सनी दा नदी उपसमिति को मानना आवश्यर या। इस प्रकार प्राम-समा की कार्य-शक्ति बहन ही आगे दही दी। प्रदातन्त्र-शामन के प्राणभूत प्राम-सभा का ऐसा सजीव चित्रग अन्यत्र नहीं मिला। राजतन्त्र:- इसी प्रशर अभिलेखों से राजतन्त्र प्रमाली की शामन-व्यदन्या को मोटो-मोटी रूप-रेता नो यों समझना चाहिए-मौर्य ठपा गुरु सम्राटो के अभिलेनो से रातन्त्र प्राली को शासन पद्धति के सम्दन्ध मे स्यूरस्म के यह साठ होता है गि सम्पूर्ण साम्राज्य कई प्रान्तों ने बंटा होता था, जिसको मुक्ति' कहते थे। मुक्ति भी जिलों में बंटे होते थे, जिन्हें निरसों में विपक्ष की सजा दी गई है। शासन की मुदवाया की दृष्टि से दिषय नी 'ग्राम' सरक छटे भागों में विनत दिए जाते थे। प्राम ही शासन को सबसे छटी इसईया। केन्दो म राजा स्वप शान करता था और उनको परामर्श देने के रिए मन्त्रिपरिषद् से लिनि होठो को प्रयास पिकासों में इसे परिषद' कहा गया है।
( १३ ) अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि राजतन्त्र के शासन भी प्रजाहित-चिन्तन में तत्पर रहते थे। अघोर ने एक लेख मे-"सवे मुनि से पजा ममा अधा पजाये रन्ठामि हक क्ति सवेन हिउ सुखेन हिद लौक्केि पाललोकिके" इस उक्ति द्वारा अपनी प्रजा-वत्सलना का मुन्दर उदाहरण दिया है। अशोक के परवर्ती राजा मी प्रजा हित को चिन्ना करते थे। जूनागढ के लेख मे सक्क्षत्रपरुद्रदामन के प्रजा वात्सल्य के विषय में लिखा है-"अपीडयित्वा कर, दिष्टि, प्रणय, जियामि पौरजानपद जन स्वस्मान् कापात् महता त्रिगुणदृढतरविस्तारयाम सेतु विधाय सर्वतटे मुदर्शनतर काग्तिमिनि"। जुनागड के गुस-लेख स पता चला है कि सन्दगुप्त मी पश्चिमी प्रान्त के योग्य शासन के लिए प्रजा-हित की दृष्टि से विशेप चिन्तित था। "सर्वेषु देशेषु विपाय गोप्तृन सचिन्तयामास बहुप्रकारम्" । इसके अतिरिक्त पाल-नरेश धर्मपाल के सालीमपुर लेख स विदित होता है कि उसके पिता गापाल ने 'मात्स्यन्याय' को पराजित कर वगाल में शान्ति की स्थापना की, जिसमें प्रभावित होकर जनता ने उसे पाल-वरा का शासर निर्वाचित किया। इस प्रकार अमिलसों के विवरण से राजा के प्रजा हित- चिलन तपा आदर्श राजधासन को बाता का परिमान होता है। राजकर :- राजतन शासन के पदाधिकारियों की चर्चा हम कर चुरे हैं। अभिलेखों से राजकीय कर सम्बन्धी तथ्यों का भी ज्ञान होता है। अशोक के सम्मनदेई स्वाम- लेख में यह धन है कि सम्राट् ने लुम्बिनी-यात्रा के प्रसग में उसकी स्मृति में राजकीय वर को छठे माग की जगह घटाकर आठवा माग पर दिया था। ई. सन् दूसरी सदी के जूनागढ़ लेग में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि दामद भूमिार तथा विष्टि यति वेगार से प्रजा को उत्पीडित नहीं करता था- "अपीडयिम्वा करविष्टिप्रणयत्रियामि । गौतमीपुत्र सातरी के नासिक्लेग में सब क्षेत्र को पर-मुक्त करने की बात कही गयी है। गुप्तयुगीन अभिलेखों में भी पर पदका प्रयोग आया । प्रयाग-प्रयस्ति विजय प्रसग में लिया है कि ममुदगुस ने उत्तरी भारत के सामन्तो को पराजित कर दक्षिण भारत में पासों से कर लेकर उन्हें मुक्त कर दिया-'सबंकरदानाजावरण प्रणामागमन परितोषित प्रवाशासनस्य" गुह युग के पश्चात् छठी सदो के ग्राम दामोदरपुर तथा फरीपुर पे ताम्रपत्रों में सष्ट उल्लंग है कि उन माग ही राजकीय वर जिससे दानमाही मुक्त पा। पालवंशी मालीमपुर तामात्र में घरको " (१४) वसूल करनेवाला अधिकारी 'पापित' कहा गया है। निमर्ष यह कि दसवीं सदी तक पैदावार का छा मार ही राजकीय वर समझा जाता था। दान. पत्रों में दानभूमि को समो प्रकार के करों से मुक्त माना गया है। हपंदर्षन के समय विभिन्न करों के नाम पाये जाते हैं। भूमिकर नगद या सामान के रूप में दिया जाता था। कुछ अस्थायी कर प और कुछ चुगी और देगर के रूप में लिये जाते थे। पश्चात् काल मे अभिलेखों के नाधार पर निम्नलिखित र प्रचरित हो येथे- (१) भागकर-यह राजकीय र पा, जो पैदावार का छठा भाग पा। (२) भोगवर-यह मागर से निन्न फिन्तु उसी का भेद विशेष था। (३) समान्य हिरप्य-भूमिर का कुछ यय, जो धान्य रूप मे सपा कुछ नगद रूपम दिया जाता था। (४) हाट-बाजार से लिये जाने वाले वर को हाटक रहा राता था। पासवशी दानपत्रों में यह चुङ्गी छन्द मे पुकारा जाता था। (५) चार मट प्रावैप-इस सन्द का प्रयोग एक प्रकार के बस्थायी कररा बोध कराता है । यह कर पाम में पुरिस तथा संनिकों के प्रदेश करने पर प्रामीणों से लिया जाता था। (६) दवापराष-दरपोरेस में इसका प्रयोग है। मह अपराधी से अस्पदी दण्ड के रूप में दमूरा जादा पा। (७) मृतवात प्रत्याय-इसको चर्चा दलको तया राष्ट्रकूट के लेखों में अस्थायी कर के रूप में आयो है । उदात से सुरक्षित ( आपात) दया निमांड वस्तुओं पर रगाए गरेकर का बोध होता है। (८)विष्टि-वेगार-जिस कार्य की मजदूरी न दी जाय । वो गरोग व्यक्ति अस्पापी कर नहीं दे पाठा पा, उसे देगारी करनी पडती पी। इस प्रकार रपायो तपा अस्मानी करों के नाम अमिरेखों में मुव्यवस्थित रूप से पाये जाते हैं, पो इतिहास के प्रशासकीय अध्याय की पूति में सहायक तत्त्व हैं। सामाजिक झलक:- भारतीय समार को सर्वमनुख सस्था को 'दाम' रहते थे। उसी के बापार पर हिन्दु समान अवम्बित है। स्मृतियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, देस और - शुद ये पार वर्ण आये हैं, किन्तु अभिलेखों का उद्देश्य वर्णाश्रम का वर्णन करना नहीं अपितु शन, शासन, व्यापार तथा सेवा के अवसर पर प्रसगात् ब्राह्मणादि वों की चर्चा मात्र प्रतीत होता है। अशोक के तृतीय, चतुर्य तथा ८३ सिला- लैंसो मे तपा दक्षिण भारत के नरेशो के नासिक गुहालेखो में ब्राह्मणो का दानमाही श्रेष्ठ ब्राह्मण के रूप में उल्लस है। क्षत्रिय नाम भी युद्ध तथा अग्रहार देने के प्रसग मे आये हैं। गुप्तयुग के लेखों में तीन वर्षों का उल्लेख है। गुस- युग के पशत् प्राय वर्मायम व्यवस्था में योडी कमजोरी सी आ गयी, मत एव पूर्व मध्ययुग के अभिलेखों में शासक का रत्तव्य समाज की स्थिरता के लिए वर्गाश्रम की रक्षा करना हो गया। इसका संकेत गुप्त-सामन्त सक्षोम के सोह- ताम्रपत्र, प्रभाकरवधन के वासखेडा ताम्रपत्र, मास्वर वर्मन के निधानपुर तपा ११ वीं सदी के सदी के राजा इन्द्रपाल के गोहाटी ताम्रपत्र से मिलता है, जिन पासकों ने शिपिल वर्णाश्रम व्यवस्था को सुदृढ किया और जिनके प्रभाव के कारण बगाल के बोद मतानुयायी पाल राजा भी वर्गाश्रम व्यवस्था की सुरक्षा में क्रियाशील था। ब्राह्मण-गुरुयुग से पूर्ववर्ती ब्राह्मणो के विषय में अभिलेसो में उल्लेख है कि वे अपनी विद्वत्ता, पुट आचरण तथा व्यावहार-कौशल के कारण चारों यो में येष्ठ माने जाते थे। अन्य तीनों वर्ग उनके बताये मार्ग पर चलते थे। गुप्तकाल में मो ब्राह्मणों का सम्मान बना रहा । गुप्तयुग के बाद ब्राह्मणो में उपजातियों तथा जोविका-सापन के विभिन्न भेदों के कारण उनका सम्मान कम हो गया। उनके स्थान मे क्षत्रिय समाज के अगुआ बन बैठे और उनके आशानुसार बाह्मण कार्य करने लगे। यद्यपि साहित्य में पचगोड का विवरण है रिन्तु अभिरखो मे प्रपानठया पान्यकुब्ज, मंपिल सपा सरयूपारी ब्राह्मण- भेदों का उल्लेख है। छठी सदी के बाद गोत्र तया वैदिक वासा के आधार पर ब्राह्मणों का वर्गीकरण किया गया, जिसका उल्लेख प्रत्यैर दान-पत्र में मिलता है। मालवा को प्रशस्ति में ब्राह्मणों का स्यूल वर्गीकरण इस प्रकार मिलता है- (१) माध्यन्दिन (शुक्ल यजुर्वेद ) घासा का ब्राह्मण। (२) आश्वलापन (ऋग्वेदशामा का ब्राह्मान। (३)ोयुम (सामवेद ) चासा रा ब्राह्मा। अभिलेखों अनुसार ग्रामों को याम के अतिरिक्त अपने घोषिलोगन के लिए अन्य कार्य भी ढूंढने पडे । ययामध्ययुगीन-प्रशस्ति में उनके पौरोहिल, मन्त्रित्व तया सेनापठित्व का भी उल्लेख आया है। आपत्ति या परिस्पिविन्दर वे जीविका के लिए देशान्तर भी जाते थे। क्षत्रिय-सानवी सदी से शामन सम्बन्धी अभिलेखो मे क्षत्रियों का नाम आता है जो राजनीतिक परिस्थिति-दर ममाज में अग्रणी हो गये थे। पूर्व- मध्ययुग मे क्षत्रियों के लिए 'राजपूत' शब्द का प्रयोग मिलता है जिनका निदान- स्थान राजपुताना दताया गया है । 'राजपूत' की उत्पत्ति के विषय में हन विग्रहराज के अभिलेख विवेचन प्रसग मे सविस्तार विचार करेंगे। राजपूत नरेशो का अभिलेख उन्ह प्राचीन क्षत्रिय-वर्ग का वराज सिद्ध करता है। उस युग मे राजपूत भी दो वर्गो म विभक्त हो गये थे- (१) शासक वर्ग तथा (२) मापारण क्षत्रिय दतं । शामलों की श्रेणी में कुछ हूण प्रभृति विदेशी मी घुम आए थे, जिनका वैवाहिक सम्बन्ध राजघराने से हो गया था। क्लचुरी-लेस में इसका संकेत है। राजीव अमिटेखों का अध्ययन यह स्पष्ट कर देता है हि सातवीं सदी से १२ वी सदी तर राजकुमार को कुशल शामर बनाने के लिए समुचित शिक्षा दो जाती पो। मालवा के एक चहमान-लेख में तपा प्रतिहार-रेस में इसका उल्लेख है। साराश यह है कि समाज में क्षत्रिय-वर्ग का पिसिन तया सफल शासक होने के कारण आदर या और वे समाज के रक्षा भी थे। वैश्य-स्मृतिकारी अनुसार देय का स्थान तृतीय जाति में पा और उनका काम पशु-पालन तथा कृषि पा। गुप्त-युग के परवर्ती अभिलेखों में दान के प्रसग में कृषि, कर, पशु तपा यापारिक चुङ्गो रा वर्णन आया है। यमित चन्द का प्रयोग वैव-दां के लिए प्राय मर्वत्र सेत्रों में पाया जाता है, जिसका उल्लेख परमार चामुण्ड राय के लेस तया चहमान-रेख में मिलता है। इस प्रकार यह जाति व्यापार मे भी अपनी जीविका चलाती यो। दणिक समूह का एक वर्ग बैंक का भी काम करता पा, निसरा सरेत नामिर-लेस में है। यासार के अनुसार वणिज श्रेणियों में विभक्त में। न्यानीय व्यापारी पोई या बैलगाडी के माध्यम ने व्यापार करते थे और विदेशो में व्यापार करने वाले सापंवाह बलाते थे। मूद्र-दगं व्यवस्था में गूदों को अन्तिम स्थान मिला है तपा उसका धनं द्विजाति मात्र को सेवा पा किन्तु अभिलेखों में इनरा स्थान उतना हीन नहीं या। अशोक ने अपने धर्मलेसो में शूद्रों के साथ समुचित व्यवहार का आदेश दिया था। उस समय सूद अस्पृश्य नही माने गते थे। सेवा-कार्य के अभाव में वे वसवृत्ति से भी अपना निर्वाह करते थे। दानपत्रो से पदाधिकारियो के साय कायस्य और चाण्डाल जाति का भी बोध होता है जो चतुर्वणं से पृथक् ये । अभिलेख के अन्त में "कायस्येन लिखित" से भक्त होता है कि कायस्थ-वर्ग 'लेखको के समूह' अपं में प्रयुक्त था किन्तु सातवी सदी से जाति अयं मे मी प्रयुक्त होने लगा। 'ब्राह्मा चाण्डालपर्यन्तान' इस वाश्य से स्पष्ट होता है कि, शूद्र से पृथक सबसे निम्नकोटि की चाण्डाल जाति थी। आश्रम-अभिलेखों के अध्ययन से मानव-जीवन के ब्रह्मचर्य, गाहसम्म, वानप्रस्य और सन्यास इन चार आश्रमों का ज्ञान होता है। अशोक के समय में इस आश्रम व्यवस्था में चिपिलता तो आयो किन्तु बाद में चारों की प्रतिष्ठा को गयो । दान के अवसर पर सामाजिक सस्कारो का उल्लेख मिलता है । साप ही बहुपली-प्रत तया सती-प्रथा का भी सकेत मिलता है। यगीत की प्रधानता के कारण गायिका-गणिका का भी उल्लख है। मनोरजन के सापन के रूप में मृगपा, सगोठ, चूत-क्रोहा ठया पतरज के साप राज-परिवार तथा उच्च परिवार को रमणियों में पसी-विनोद का मो वर्णन है। सामाजिक उत्सव तथा आवागमन :- राजतिलक, विवाह, विजय तया त्योहारों के अवसर पर उत्सव-विशेष का आयोजन होता था, जिसमें मुख्य रूप से नाटक तया सगीत का मनोहर कार्य- कम प्रमुख स्थान लेता था। आवागमन के साधन के रूप मे स्थल-यान के रूप मे रय, घोडे, हापो, ऊँट तथा बैलगाडी का अधिकतर उपयोग होता पा, बस- यान में नाव तथा समुद्री जहाज का भी प्रयोग किया जाता था। चरित्र चत्रिण-अभिलेखों के परिशीलन से भारतीय जन-जीवन के उग्मल परित्र का भी दिदर्शन होता है। गुप्त-काल में कोई पक्ति बधार्मिक, पसनी, आतं, दरिद्र सपा पीडित नहीं था, जिसका सकेत जूनागढ़ लेस मे "दरिद्रो पसनी सर्यो दापोवा यो भूशन पोडिन स्था" इस कपन से मिलता है। राजा को चारित्रिक विशालता का परिचय प्रयाग सम्म लेख से स्पष्ट मिलता है। नालन्दा सान-मत्र के अनुसार पाह्मण दानग्राहो होकर भी उच्च पारोसा के लिए धन का सहर्ष स्वाग ररता पा । भारतीय जनता २० (१८) का प्रधान आदर्श सासारिक वैभव न होकर परलोक और परोपकार साधन था। राजा 'बहुपत्नी-व्रती होकर भी सभी स्त्रियों के प्रति समान प्रेम तथा आदर का व्यवहार करता था। सामान्य जनता मी पवित्र जीवन का आश्रय लेकर दान, बत, तीर्य और यज्ञों मे विश्वाव रखती थी। पूर्व मध्ययुग के सहस्रों दान- पत्र जन-जीवन की पार्मिक भावना के द्योतक । समस्त अभिलेखों से यह प्रकट होता है कि समाज मे धार्मिक भावना का प्रावल्प था। ब्रतों प्रति लोगों को सतत जागरक्ता तथा तीर्थ यात्रा में उनकी आस्था उनके पवित्र जीवन के ज्वलन्त उदाहरण हैं। धार्मिक स्थिति तथा उसकी सहिष्णुता वौद्ध-मन-अभिलेखों के वर्गीकरण से ज्ञात होता है कि अधिकतर रेखों का प्रणयन धार्मिक भावना की प्रेरणा का पल है। इस दिशा में सर्व प्रथम अशोक के ही शिलालेखों को उदाहरण रूप में लिया जा सकता है। बौद्ध धर्म में दीक्षित होरर अशोक ने इस धर्म को राज-धर्म के पद पर प्रतिष्ठित किया। स्तम्मों पर खुदवा कर भारत में ही नहीं अन्य देशो में भी उसका प्रचार किया। धार्मिक-मावना के प्रतिपादन का प्रमुख साधन स्तम्भ-लेख हो गया। बाद में ईसवी सन के आरम्भ में कुपाग-राजा कनिष्क ने बौद्ध-धर्म को प्रोत्साहित रिया और उसकी चौथी सगीति भी बुलवायी। मपुरा के बोटप्रतिमा लेख से इस बात का सकेट मिलता है। गुरु-काल में बौद्ध मत वे प्रसार का आभास सारनाय को बोद्ध प्रतिमाओं से मिलता है। गुप्त-नाल के बाद सातवीं सदी से बुद्ध के घीसरे पान वज्रयान का प्रसार उत्तर भारत में पाया जाता है। पाल नरेशों की प्रशस्तियां 'नमो बुद्धाय' बुद्ध को इस प्रार्थना से प्रारम्भ होती हैं । अतः पाल-नरेशे के बौद्धमतानुपायी होने का संकेत मिलता है। इस प्रकार बौद्ध धर्म के प्यापर प्रचार का ज्ञान अमिलेसों से प्राप्ठ होता है। जैन-मन-ईमा पूर्व छठी सदी से ही महावीर ने जन-धर्म का प्रचार निया जो कालान्तर में भी विकासोन्मुस रहा। अशोक के अभिलेख में "निप्रय' शब्द का प्रयोग जन-धर्म के लिए किया गया है। उदयगिरि के गुहालेखों से उडीसा में जैन धर्म के प्रचार की बात सिट होती है। दूमरी सदी के जूनागड रेस में भी जन-मन का संकेत है। ई. सन् के बारम्म में जनप्रतिमा की आधारशिला पर उत्तीर्ण लेंस मिलते हैं। गुप्त-युग के अभिलेखों में भी जन- धर्म का सकेत है। पूर्व-मध्ययुग के राजपुताना के विस्तृत भूभाग मे जैन धर्म के व्यापक प्रचार का आभास मिलता है, जिसके फलस्वरूप महावीर पाश्वनाथ तपा शान्तिनाय की पूजा प्रचलित थी। चन्देल राज्य के प्रधान खजुराहो नगर मे रेख ठया प्रतिमाओं के अध्ययन से जन मत के प्रचार का ज्ञान होता है। प्रतिमाओ की आधारशिला पर उत्तीर्ण लेख इस बात का प्रमाण है कि राज- वर्ग के अतिरिक्त जनसाधारण में भी जन-मत का व्यापक प्रचार था। भागवत धर्म-मौर्य युग के बाद गुप्त-युग मे भागवत धर्म का प्राधान्य हो गया, जो वैदिक धर्म के प्रचार में प्रधान सहायक बना तपा बोद-पर्म के प्रभाव को पटा दिया। अयोध्या-रेख से यह सकेत मिलता है कि मौर्य-युग के बाद सर्वप्रथम गुङ्ग-नरेश पुष्यमित्र ने ब्राह्मण-धर्म को पुन जागृत किया और दो अश्वमेघ यज्ञ भी दिये। अन्य तत्कालीन राजाओं ने भी उनका अनुकरण किया । ई० सन् चौथी सदी मे गुप्त-सम्राट् समुद्रगुप्त के प्रयाग-स्तम्भ-लेख से उसके परम मागदत होने का स्पष्ट सकेत मिलता है और उसकी विष्णुभक्ति की चरम सीमा का प्रमाण गरुडादित आज्ञापत्र ही है। "गुरुत्मदत स्वविषयमुक्ति चासन याचना"। उत्तरी भारत के लेखों में वैष्णव-मत का प्रचार अधिकतर मन्दिर- निर्माण के वर्णन मे ज्ञात होता है । खजुराहो का चन्देल-रेख इसकी पुष्टि मे प्रमाण है। परमार राना मोजदेव के वेतमा तान-पत्र में विष्णु-मन्दिर के सम्मुख गरुड-वज स्थापित करने का उल्लेख है। संव-मन-ईमा पूर्व सदियों में वोम कदक्यि के सिक्के पर व मन का उल्लेख है । दुपाण नरेशों द्वाप व मत को विशेष प्रोत्साहन मिला होगा । इसी- लिए अमिरेखों में वह महोस्वर' पदवी से विभूषित था। गुस-युग के अभिलेखों से व-मन के प्रचुर प्रचार का परिज्ञान होता है । चन्द्रगुप्त दि० के उदयगिरि- रैस तपा कुमारगुम प्रथम के करमदण्डा लेस में शिवलिंग की पूजा का वर्णन आया है। गुरुराल के पश्चाइ छठी सदी के पासक विन्नुवयन के मन्दसौर- प्लेम में तपा हूण-राजा मिहिरकुल को ग्वालियर प्रशस्ति मे शिव को वन्दना रोचक शब्दों में की गयी है। सातवी सदी में बगाल से भी चैव मत के प्रचार का उल्लेख पाल तपा सेनवशी प्रस्तियों में मिलता है। बाद के अभिलेखों में इस मत के पाशुपत और कापालिक इन दोनो मेले की वियक्ति का भी पता पलटा है। इसके अतिरिक्त सूर्य-पूजा, पति-पूजा और गद्य-पूत्रा का भी वर्णन पर-तत्र अम्लिसों में पाया जाता है। धार्मिक कार्यों में पुरुषप से वैदिक ( २० ) यज्ञों, मन्दिर निर्माण, पुराने मन्दिरों का सस्कार, देवपूजन, उत्रपाना, सत्संग मोटो, दान, धामिर रत्सव, दत तपा तीपाटन का दिशद दिवेचन बक्षित लेखों में विद्यमान है। धार्मिक सहिष्णुता-यहाँ तर एक धर्म का अन्य धर्मों के साप सम्बन्ध निर्वाह की बात है उसके विषय में अभिरेखों से यह नो हात होता है कि पनों में पारसरिक सहिता पर्याप्त मात्रा में दी। क्योक से लेकर १२ वीं सदी के दगाल नरेश तक धार्मिक सहिता को नावना से प्रेरित ये और धर्म के मामले में कट्टरपयो नहीं थे। दिनिन्न शीप बमिटेखों के अनुशीलन से यह ज्ञात होता है कि धर्म के मामले में यहां के राजे सहित थे। अशोक ने १२ वें शिरालेख में दूसरे धर्म को निन्दा का निधरिया है। दक्षिा भारत के साठवाहन नरेशो के लैसो में एक बोर वैदिक यज्ञों रा वर्णन है तो दूसरी बोर बोर-सघ को गुहादान की भी चर्चा है। सातवाहन के नत्तराधिकारी इम्याकु. नरेश ने वैदिक यज्ञ पर्वा होकर भी दौर कसा से विदाह वित पा । गुहनरेनों का भी यही हाल था । गुरु-नरेश परम देव होरर की शव टपा नन्दानुपापी अधिकारियों की नियुक्ति करने में हिचकते नहीं य। मध्ययुग के पारनरेश परम सौत होकर भी दाह्मा-देवताओं के लिए दान देने ये। नाराका पात ने संक्डों शिव-मन्दिरों का निर्माप करा कर पाशुपत महानुगदी प्राचार्य को मन्दिर का पदाधिकारी बनाया था। खजुराहो का दिन, व तफा नमन्दिर पानिन सहिता के जीते जागते नमूने हैं। सभेप में यह कहा जा सकता है कि भारतीय नरेयों को पानि सहिदा रन्च कोटि को दी, जिसका उदाहरण अन्यत्र सम्नव नहीं। आर्थिक म्वरूप :- प्राचीन भारत की कापालिक नदि साप ही अभिरखों से भौदिर उमति रा भी दिस्तृत शान होता है । ठकारीन अभिलेखों में सामासि दिनों पर चर्चा करते समय आपिक-स्वरपका दिग्दर्शन भी किया जा सकता है। बनवा द्वारा दान देन की प्रारी में अमिरेस-वारीन बनता है वनपूर्ण मुखी जीवन का उन्दार लाया जा सकता है। धन टपा भूमिदान-प्रमग से उन-जीवन की सन्तोप-प्रद आपिर स्पिति का मान होता है। उनाड-अमिरेख में यह वर्णन है कि प्रजा-वरंग रोई भी मुरम्य दुमी नहीं पर दालों स विवरण बार्षिक सुदृढता के प्रबल प्रमाण हैं। कृषि प्रधान देश होने के कारण प्रशस्तियो में सभी प्रकार के बल उषा फ्लों का वर्णन मिलता है। मध्ययुग के बारम्भ से दान सम्बन्धी बाज्ञा-पत्रा में भोजन-सामग्रियों का तथा नालन्दा ताम्र-पत्र में "सम्पम् बहुउबहुदधिमि व्यञ्जन युक्तमन्नम्" इस कथन से समुन्नत भोजन- स्तर का मान होता है। पालवी दानपत्रो मे नोची भूमि को उत्तमोटि की दानभूमि माना गया है जो वर्षा होने पर उर्वर हो सके। निष्कर्ष यह कि दानार्ता कृषियोग्य भूमि को ही दान में देता था। भूमि की सिंचाई की और राजा का विशेष ध्यान रहता था और मिचाई- साधन में झोल, नहर, तालाब दपा बांध के निर्माण का बल्लेख बहुधा अभिलेनों में पाया जाता है। इस सम्बन्ध मे चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा निर्माण कराया गया और रुद्रदामन सपा स्कन्दगुष्ठ द्वारा सस्कार कराया गया सुदर्शन झील का वर्णन पर्यात है। दक्षिन के सातवाहन नरेश पुलमावी के राज्यकाल में सिंचाई के लिए दालाब बनवाने का उल्लेख लेखों में आया है। सप्तम सदी के लेसों में इसकी विशेष चर्चा है। गुस-युग तक रामाओं का ध्यान सिंचाई के साथन के रूप में नहर निर्माग की ओर था। उत्तर-प्रदेश की देवल-प्रयस्ति में नहर-निर्माण का मुन्दर वर्णन है। इसके साथ ही यत्रना कुनी, रहर तथा मोट से मी मिचाई का बान है। यह तो कृषि व्यवस्था की बात हुई। व्यापारिक संस्थाओं को राजाज्ञा के कारण मन्दिरों में देव पूजन के हेतु 'कर' देने की बात है। व्यापार सम्बन्धी समस्त कार्यों का सचालन एक सस्था द्वारा जिसे यभिरेनों में 'श्रेणी' कहा गया है। यह सस्पा प्रजाताती पर पार करती थी और देश की बहुछ कुछ आपिक नौति थेगों के हाया मे हो यो । सतवाहन तथा क्षत्रिय क्सी अभिलेखों में समठित गिन्यगी का वर्णन है। गुरुमाल में भी औद्योगिक उन्नति का श्रेय ततालीन पगियों तपा निगमों को जिसका उदाहरण कुमारगुत प्रयन के मन्दसोर लेख मे रेशमी बुनकर श्रेणी रा उल्लेख है । नासिक तथा मयुरा रेय मे थेगो तया निगम के बैंक-कार्य का मी पता लगता है। म.प्रेमी के निशाय पन-शक्ति सम्पन्न जिसने उन बैंको में जनता अपनी धनराशि विश्वासपूर्वर मुरक्षित रखडी पो। इतना ही नहीं, बमानके योगरा रेस में राज्य के अन्नमडार में अकाल-पोतियाको बन्न बोटने दफा जनता को राज्य की ओर से ऋण देने का वर्णन है। राजनरसे पसकोर को पूर्णतारा रोड हो सर्वत्र मिसमा हो है। दक्षिण भारत के होता पा, (२२) घंटवाला लेख में महानाविक पिदक का उल्टख है, रिवने यह अनुमान लगाया भाटा है कि यहाँश बार क्षेत्र पहाड़ों के माध्यम से विदेश दङ्ग नौ दिन पा। जादा के राजा की प्रार्थना पर पालमान ने रोपांव दान में दिवा पाच दिदम की For के साप हो अभिलेखों के सिव-स्वर के नारद कापित स्वरूप का परिज्ञान होता है। अभिलेखों में माहित्य-चर्चा :- पति प्राचीन समय में मिलेदों को कोकराने का उद्देस्स हिदिर न होकर कुछ और हो पा उपापि उन उनी रेतों बचपन से दना दो सष्ट परिलक्षित होता है कि प्रशस्तिकार चरन गोटि का विद्वान् और साहित्य- शास्त्र की परम्परा से पूर्णतया बदन्त होता था, जिनको अन्टिको में साहित्य- सौन्दर्य कोनो मनोरम की मिल पाती है। प्रशस्विना प्रायः सारा मन भाषा में लिखी गादी पी। यों तो सस्कृत में रिखने की बटा प्राचीन काल से ही विद्यमान पो किन्तु वदामन के जूनागढलेख से पूर्व सता नापा का कोई भी अनिलस उपस नहीं है इसलिए उस्कृत अनिलेवों में यह देख पन माना जादा है। उ अभिलेस का टेसब एक दिद्वाद माहिन्दिर नगर हावा है. जिसने इस घटे से मिलेंस ने गाय-पच के दैशिष्टप वा मुन्दर नमूना पेश किया है, जिसका उल्टैख दण्डी में काबाद में मिलता है। देस में राजा के रिर "सुट-सपु-मपुर-चित्र-कान्त-पद रुपोदारात पद-पर" यह दिपा प्रपन है,जो काबाद में पित-"लेप प्रकार उमदा मापूर्ण मारता, स. ध्यतिरदारस्तमोज. वान्टिसमापदः" इस वंदर्भालो से विशेषता में सन्हा रखता है । सस्कृत के बलकार पो में जो काब्य की परिमापा लिखी गयी है नी तरह की दा उस भिरेख में पायी जाती हैं। मन्पूर्ण लेख का परिचालन यह बताता है कि लेखक वाम-दाली में लिखने का बयासी रविवा। सन् साहिप का प्रपन चरण होने के शरण यह उन्दाज सादात माना है कि साधारण बनता नौमसत से परिचित पौ। अन्दा रारकोपरख वारंवारित भाषा में नहीं लिखा पाटा, क्योंकि रामद के बन्द मुद्रा देख प्राट नामा में मिलते हैं। इतना ही नहीं, दक्षिण टपा पश्चिम भारत के समस्त रेखा भाषा में टिसे गये । आप यह है कि ई. सन १५० से पूर्व संसदमन कमिटेख सलाम नहीं है। दोनरी सरी से मनन भारत में सस्त पापा में ( २३ ) अभिलेख खुदवाने का प्रचार दढा, जिनके अध्ययन से अनेक साहित्यिक तथ्यों का उद्घाटन होता है। गुरु सम्राट् समुद्रगुप्त को प्रयाग-प्रचति गद्य मिश्रित भाषा में लिखो गयी है, जो लघु-चम्पू-काव्य का सुन्दर उदाहरण है । साहित्य दर्पण मे "गयपद्यमय काव्य चम्पूरित्यभिधीयते" यह पम्पूकाव्य की परिभाषा है। प्रयाग प्रशस्ति "ओज समासभूपस्त्वमेतद गद्यस्य जीवितम्" इस साहित्यिक गद्यर्वशिष्ट्य का धोमन निदर्शन है। इसमे इतने समस्त पद हैं कि लेखक का समास-गद्य-प्रेम स्वय प्रकट हो जाता है। इस अभिलेख की एक विचित्र विशेषता यह है कि इसके लेखक हरिषण जैसे विद्वान् प्रशस्तिकार का नाम अन्यत्र नही मिलता। चम्पू काव्य-शेली के उन्नायक इस कवि की अन्य कृति उपलब्ध नहीं है। आश्चर्य तो यह है कि हरिषण जैसा सफल साहित्यिक मर्मज्ञ भी सन्धि- विग्रहिक, कुमारामात्य तपा महादण्डनायक जैसे उत्तरदायित्वपूर्ण राजकीय पद को अलकृत करता था। यद्यपि गुरु-युग का अधिकतर लेख विसी छन्दविशेष को लेकर लिखा जाता था, किन्तु कुमारगुह का मन्दसौर लेख तथा सन्दगुप्त का जूनागढ अभिलेख अनेक कोमल एव पुरस छन्दो में लिखा गया है। हरिपंण मी ही भांति मन्दसोर-प्रशस्ति के लेखर दत्समट्टि का इतिहास भी अन्य साधनों से मनात है। अत- यह कहा जा सकता है कि अभिलेख ऐसे विद्वान प्रशस्विकार का भी नाम बतलाता है जो अन्य ग्रन्यों में उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार प्रास्तियों से सहन-साहित्य के इतिहास को जानकारी में भी सहायता मिलती है । रुद्रदामन और समुद्रगुप्त के अभिलेख सस्कृत गद्य-साहित्य के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण वध्याय को पूर्ण करते हैं । गुसकालोन जिन कवियो की पोति केवल अभिलेखो में सुरक्षित है, उनमें सबसे योग्य विद्वान् कवि दम्ममट्टि हैं। उनके द्वारा रचित मन्दसोर-अभिलेख साहित्यिक-सौन्दर्य की दृष्टि से वेजोड है। इस में दापुर में सूर्य मन्दिर का भव्य वर्णन है । संस्कृत-साहित्य के इतिहास में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। भापा ललित किन्तु अर्थ-गौरव से ओतप्रोत है । पद्य सरस वदी ली में लिखे गये हैं। अलकारो का सुन्दर सग्निवेश चार चांद लगा देता है। सराप के इन्हीं गुणो के कारण वत्सट्टि महावियो की पक्ति में यादर से चंठा पाते हैं। इन पूर्वोक्त अभिलेखों का साहित्यिक वैशिष्टय विवेवन आगे उन-उन अभिलेखों के प्रसग में पिमा जायेगा। इस युग के करियो में वामु का भी नाम अमर हो गया है, जिसने मालप-नरेश यगोषमन् की मन्दसोर- 1 ( २४ ) प्रशास्ति लिख कर अपनी काव्य-निगुपता का परिचय दिया है । ईशान वर्मा की हरडा-प्रयस्ति के लेखक रवि शान्ति का नाम भी गौरव से लिया जाता है, किन्तु दुर्भाग्य को दात है कि यह नाम भी अन्यत्र नहीं मिरदा। चार क्य-नरेश पुलवेशी द्वितीय का ऐहोल-अभिलेख रदिति को काव्य अली का अनुपम उदाहरण है। अभिलेख ३७ पद्य में रविकीति "विज्ञापित- कालिदास मारविकीति"-इन पन से कालिदास तथा भारवि के टक्कर के कवि हो गये थे। इस प्रकार प्रशस्तियों के लन्न में जिन कवियों के नाम गते हैं उनमें से प्रधान कवियों का निर्देश कार रिया गया है। यदि अभिलेखों का अध्ययन नहीं होता तो इनकी वोति का पता लगना असमय था । सौर में यह कहा जा सकता है सस्वृत-साहित्य वा इतिहास इन अभिलेखों के बिना अधूरा ही रह जाता। अभिलेखों में साहित्यिक पद्यों के अतिरिक्त कुछ नाटको की भी चर्चा आयी है। अजमेर के शिलाखण्ड पर सोमदेव-रचित 'रलित विग्रह नाटर' उत्कीर्ण मिला है। उसमें चाहमान-नरेश विग्रहराज का पयोगान है। पारा के समीप प्रस्तर पर हरकेलि नाटर खुदा हुआ मिला है, जिसका लेखक विग्रहराज पा। धारा के एक अन्य शिलालेस में दिवे दूर्मावतार का वर्णन है, जो प्राकृत भाषा में है। इस प्रकार प्रयस्तियो का परिचालन सस्कृत साहित्य के महत्त्वपूर्ण ऐतिह्य पर प्रसार डालता है । अभिलेखो मे साहित्य समीक्षा की दृष्टि से चन्देल नरेश के खजुराहो-लेखका उदरण प्रयस्तिकारो की काव्यमय शैली तथा साहित्यक मूक्ष की ओर पाठक का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट करता है। पूर्व मध्ययुग में संस्कृत साहित्य को उन्नति चरम सीमा पर थी। जिस गति से विविध विषयों पर सस्कृत में अन्य रचना हुई, उसी गति से अभिलेखों की उत्तीर्णता मी समुन्नत रही। काब- छली, अलंकार प्राचुर्य, छन्दो-दाहुल्य, हरपाधिक्य एव रम-प्रावन्य प्रशस्तियों के प्राणभूत तत्त्व थे। शिक्षण-सस्था :- अभिलेखों के अनुशीलन से यह सिद्ध होता है कि भारत में शिक्षसस्थानों का जन्म कुछ बाद में हुआ होगा। प्रारम्न में अध्यापक-वृन्द व्यक्तिगत रूप से ही विदा-दान करते । प्राचीन मुरकुल, तक्षमिला और काशी के गुरुगृह इस ( २५) दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रह थे। ई० दूसरी सदी के नातिन लेखों सिसायी-निसा के भोजन-वस्त्रादि के निमित्त अनहार का उल्लेख है । बौद्ध- प्रन्य महादान से यह विदित होता है कि शिक्षा कायं बाद में गुहाओं में चलने हा। ददुतर समस्त भारत में शिक्षा-रेन्दों को व्यवस्था होने लगी। तमिला, कामी, पाटलिपुत्र, कनौज, मिथिला तया धारा का नाम शिक्षा-वेन्दो मे आदर से लिया बादा पा। बौद्ध-दिहार तथा हिन्दू-मन्दिरो में शिक्षा-सस्थाओं का कार्य सम्पत्र होने लगा। वन एव म मन्दिरा का अधिकाधिक दान मिलने लगा। टादिमा के लेखो से यह ज्ञात होता है कि वहां सनी प्रकार की शिक्षा दी जाती पी। गान्धार-क्ला की उन्नति से यह अनुमानिन है कि ताग-कला की शिक्षा को मिलती यो। दक्षशिला मुन्धवस्थित तथा समठिन शिक्षा केन्द्रा में अपना अनुन स्थान रखता था। तसधिला की कोशा शिक्षाकेन्द्रों में काफी का स्थान ऊंचाया। ईसवी सन् पूर्व से ही यह नगर भारतीय सस्कृति तथा शिक्षा का केन्द्र पा। शिक्षा केन्द्रो के रूप में काफी को प्रसिद्धि सदियों तक अनुप रही। वैदिक्-युग से लेकर बोल-पग तर इससी सपिक नियति लाभग एक भी बनी रही। इमोलिए बुद्ध ने अपने प्रपन धर्म-प्रवचन का उपयुक्त क्षेत्र काशी (सारनाय) को चुना। शोक के समय से ही सारनाप को प्रधानना हो चली और मौयं-युग के बाद यह एक प्रमिस बोटरिसा केन्द्र बन गया। यहां पर शिक्षा कार्य १२ वी सदी दर पटटा रहा और यही कारण है कि गहृवात रारा गोविन्द चन्द्र की यानी मुमारी देवी के विहार-दान का विवरण सारनाय-अमियों में मिलता है। सारनापीली को बुद्ध प्रतिमा बोर-कला को अनुपम उपलब्धि है, जिसने साहिन्दिर एवं संगिक क्तात्मा-प्रगति का आमान मिलता है। आज मो काम समत-विद्या के प्रधान रेट के माप ही भारत की सास्कृतिक राजधानी मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, पाटलिपुत्र के समप नालन्दा का विहार अन्तर्राष्ट्रीय हिमग सन्या के स में प्रक्रिया। वहाँ पर भारतीय छात्रों के सिवा विदेशी जिमानु छात्र भी भारतीय-मतिका अमन करने वाले थे। पांचवीं सदी में यह विद्या का प्रधान केट बन वंश। गुददा पाल नरेशो ने इन विहार की समय में अपूर्व परिया। प्राचीन नगर के ११ वी सदी ढा विहार निर्माता पाई अविरल पति से चरवा रहा। नालन्दा को आधुनिक पदाई ने उसे एक ( २६ ) विशाल विश्वविद्यालय के रूप में उपस्थित रिया है, जिसमे तीन सौ छोटे-छोटे कमरे तथा सात विशाल व्याख्यान मन्दिर भी थे। पूर्व-मध्ययुग के एक अभिलेख मे विहार के गगन-बुम्बी शिखर का वर्णन मिलना है। ताम्र-पत्र के आधार पर जादा के राजा द्वारा निर्मित वहां के दो विहारों में निवास करने वाले मिसुओं के भोजनादि के प्रबन्ध के लिए देवालय ने पांच गांव दान में दिया था, जिससे उसके अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व रा परिचय मिलता है । इसीलिए चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इमिग वर्षों तक नालन्दा विहार में शिक्षा ग्रहण करते रहे । काठियावाड में बलभी भी प्रसिद्ध शिक्षा-केन्द्र पा। वहाँ मुयोग्य स्नातक उच्च राजकीय पद पर नियुक्त होते थे। दक्षिण भारत के राष्ट्रकूट राजा के मत्री नारायण ने सलोतगी (बीजापुर ) में एक देवालय का निर्माण कराया था, जो १२ वीं सदी मे वैदिक शिक्षा का केन्द्र बन गया। वहाँ की प्रशस्ति मे छात्रों के भोजन, दोपर तथा आवास के लिये ५०० निर्वतन भूमि दान में दी गयी थी। अन्य लेखो से पता चलता है कि दक्षिण मे कई विद्यापीठ राजरीय सहायता से चलते थे और प्रधानतया देवालय ही शिक्षा के रेन्द्र हो गए थे। १२ वीं सदी मे दक्षिण अरकाट जिले में एनायिरम् विद्यापीठ तपा चिङ्गलपुर मे व्यंवदेव पेरूमल देवालय महत्त्वपूर्ण शिक्षण सस्या के रूप मे प्रसिद्ध थे । इस प्रकार प्राचीन अभिलेखो का अध्ययन शिक्षा केन्द्रों, छात्रावास, भोजन-वस्त्र, पुस्तक और औषधादि विषयों के समुचित प्रबन्ध पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। शिक्षा के विभिन्न विषय :- प्राचीन अभिलेखों में अध्ययन तथा अध्यापन वा सीधा सम्बन्ध नहीं मिलता किन्तु दान के पात्र सम्बन्धी वार्ता में दानाही की विविध विषयक विद्वत्ता का वर्णन भाया है । मौर्य युग मे प्रधानतया बौद्ध धर्म का शिक्षा के विषय में बोल. बाला था। तदुत्तरवर्ती लेखो में विधिवत् यज्ञ-समाप्ति के उल्लेख से समाज में वैदिक शिक्षा प्रचार की बात सिद्ध होती है। पूर्व मध्य युग के अभिलेखों का अनुशीलन वेद वेदाग के अतिरिक्त दर्शन, उपवेद तथा इतिहास के पठन-पाठन को सिद्ध करता है । साप हो ज्योतिष तथा पपंचास्त्र का भी उल्लेख है, जिन विषयों के अध्ययन के बाद लोग राजकीय पदों पर प्रतिष्ठित होते थे। इसलिए वेदांग (शिक्षा, निरक्त, छन्द, याकरण, पल तया ज्योतिष ) का मध्ययन प्रयान हो गया। समस्त मामलों का परिचालन यह बतलाता है कि श्रीधरहर ( २७ ) माझा ऋग्वेद, यजुर्वेद, तपा सामवेद इन तीन वेदों को ही शिक्षा पाते थे। देशग में भी व्याकरण और ज्योतिष का अध्ययन प्रधान हो गया था। अपयन के अन्य विषयों में पड्दर्शन का भी अध्ययन अध्यापन हाता था। अमिनन्त्रों में प्रत्येक दर्शन का नाम पृथक्-पृथक रूप से आया है। रोबो, पाल क्या मुगेर के रेवों में दानाही ब्राह्मण को मोमासा, तक तथा देदात का पण्डित माना पहा है। इससे यह सिद्ध होता है कि पड्दन म भो न्याय, मोमामा तपा वेदान्त का अरमन अधिक प्रचलिन पा। उपदेदों में गान्धर्व वेद, आयुर्वंद तपा धनुर्वेद की पर्वा टिटपुट रूप में मिनती है। आयुर्वेद की शिक्षा पर अधिक बोर दिया जाता था। धनुर्वेद की शिक्षा सम्भवत. रामकुमरो तक ही सीमित पी, किन्तु साधारण जनता को भी रुचि इस ओर थी। प्रयाग-प्रशस्ति मे पर- पर प्रसासियोमर प्रमृति शस्त्रास्त्रों का उल्लेख है। गान्धर्व विद्या का विशेष उत्कर्ष गुरु-काल में हुआ था। प्रयाग स्तम्न-लेस में समुद्रगुत गान्धर्व विधा मे नारद और तुम्बुरु को लज्जित करने वाला कहा गया है । कुमारगुरु के मन्दसोर- अभिलेन के अनुसार श्रेणी के लोग अन्य विद्याओं के साथ ही गान्धर्व एव धनुविधा में भी पारगत थे। अभिलेखों के करयन से चार प्रकार को हम्माला का मोशन होता है । ये चार बलाएं निम्नलिखित हैं-(१) वास्तुकला (Arckutecture) (२) वाला (Sculpture) (३) ढालना (Casting) (४) वा खोदना ( Engravng)। प्राचीन समय के अनगिना मन्दिर, स्तूप तया वेदिका वास्तुकला के ज्वलन्द नाहरण हैं। रन पर खुदे लेखों के अन्त में क्लाकार का नाम भी अक्ति है। रारदाना तथा हर्ष-शिलालेख में शिल्पियों का उल्लेख है। अभिलेखों में प्रयुक्त मापाएँ :- पाली-प्राचीन समय में बोलचाल की भाषा को ही अमिलेखो में स्थान दिया जाता था, ऐसा अनुमान है। इस प्रसंग में सर्वप्रथम पालि माश का नाम बाता है। इसी मापाको बोट धन्य व्या अशोक के अभिडेखो को माया मान हैं। कार से २५०० वर्ष पहले मगध की बोलचाल की भाषा को माधी सवाडा पा। बुर मगवान ने इसी जन-माश रे माध्यम से अपने उपदेतो । प्रचार दिया और अशोक ने उसे धर्म-लेखों में स्थान दिया। अशोक के तर मागपी इन नाम की वह पालि' शम्द का प्रयोग माता है। यपि पालि ( २८ ) भाषा की उत्पत्ति और विकास के विषय में विवाद है, यो नि मापाटिन सा विषय है गर जिमग दिवचन यहां अमीष्ट नहीं है, तथापि हमें यह टेदना है कि इस माषा का प्रयोग, दो शिरले मान्धी इन नाम से प्रसिद्ध भिरेतों में विशेष कर बसोर दे फिरदों पाया जाता है । प्रारत-ज्योक दाद दक्षिण भारत के पास मदद नरेशों के स्सों में प्राहत नापा का प्रमोर निन्दा है। नाक, कन्हरी या काल को प्रस्तियां प्राकृत में है। सत्र के दार ही प्रारत का प्रचरन अभिलेखों में हजारो सान सपा पार की विभिन्न दस्थानों में परिवदित होता रहा। पहनी जनसाधारण की दोल-चार की ही भाषा पी। नहान कान नमी रेख तपासार मुद्रा रेखाहत मे हो हैं। उत्तर पश्चिन भारत में ब्योर के दोनों-पहबाज नोटया मानस रेख व भाषा में ही हुए थे। उसके बाद भारत ने भूनानी राजानों ने विदेशी होकर नोट नापा को ही कानापा। मिलिन्द का दिग्नौर-रेड टपा समोरों के सरोष्ट्री में मुद्वारेख मान में हैं। कुपार-रारा दीन दरिन टपा कनिष्प-नन्द के पासकों में रेख प्राइट में हैं। प्रपन पदान्दी से सन्कृत का भी प्रचार हो दसरा पा, न्ट कनिष्प देख सस्कृट से प्रमाद्रित नजर आते हैं। रखन-सहारपके जन प्रतिमा सखटपा वासुदेव का पूरा दिना-रैस सस्कृत-निप्रित प्राकृत भाषा में निबद्ध है। मन्त-मर यह कहा गया है दिन जान्दी से ही अमिटेखों में सच भाषा का प्रचार हो चटा पा, कद पूना-चिराख सम्कृत में ही है। उसके बाद गृ' का प्रपा और मन्दसोर रेत मी सस्कृत में ही उसटन्ध हैं। दक्षिा में बार टर, राष्ट्रकूट दपा चोर दी रेस सस्कृत में है। कन' यह महरा रहा है कि दूसरी सदी से १२ दो दी टर कमिन्दों को प्रधानदया नस्कृत हो यो। सन द्वारेस भी छन्दोवर नि है। - रूट है कि साधारण जनता सरद वे निजि नहीं दी। इस प्रकार दिहनन- दृष्टि से सामान की हो जाता है। तिथियाँ तथा मंवत् :-- प्राचीन मिखों कम्पपन सहवरा है जिप्रन्टिकार रेसाको सुदवांत समय नलिपिनों का उल्टर बदल करते थे। मारट दिदान ( २९ ) से इतिहाम निर्माण में अमिलेखा से पर्याप्त सहायता मिलनी है। उनमे दिपियो का उल्लेख दो प्रकार से मिलता है-पहला राज्य वर्ष का उल्लेख तया दूसरा क्सिो सवन से सम्बद्ध का उल्लेख। अशोक के धर्म-लखो मे अभिषेक के आठवें घपं, तेरहवें वर्ष, छब्बीसवें वर्ष तथा २७ वें वर्ष का उल्लेख है । मौर्यों के उत्तरा. धिकारो सातवाहन के लेखा मे गौतमो-पुत्र सातकर्णो का अठारहव तथा चौबीसवें वर्ष का उल्लेख इसी प्रकार मध्ययुग के पालवशी अभिलेखो म शासक के राज्य वर्ष के उल्लेख का प्रमाण है। इन तिथियो का किसो सवद विशेष सम्बन्ध नहीं है। १२लय प्राचीन भारत में दूसरे प्रकार के अभिलेखा मे शासका को विपि किसी न किसी सवत् से अवश्य सम्बद्ध है। अमिलेखो के अध्ययन से प्रधानतया विक्रम- सवन, उकसवर, गुरुसवत् और हपंसक्त् का पता चलता है। इनमे विक्रम, गुप्त तया हर्ष-सवत् भारतीय राजाओ द्वारा तथा यकसवत् विदेशी धक-आक्रामक द्वारा प्रचलित किया गया था। ईसवी सन् के आरम्म से शक सवन् का प्रारम्भ हुआ जिसरा सम्बन्ध कुषाण नरेशों के अभिलेखों से स्थापित किया गया । कनिष्क से लेकर वासुदेव तक के लेख एक क्रम से ३ से ४० तिथि से युक्त हैं । महपान पा जूनागढ़-लेख तथा रुद्रदामन का जूनागढ लेख क्रमश ४६ वथा ७२ वें पर में लिखा गया था। इन सबका सम्बघ उसी शकसवर से निश्चित किया गया है। गुरु वश के लेस का अध्ययन यह सिद्ध करता है कि वे लेख गुप्त वश से सम्बद थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा-लेख को विपि ८२ तथा कुमारगुप्त प्रथम के करम- दण्डा-लेख में ११७ विपि उल्लिखित हैं । मनु-कुमार प्रतिमा-लेख मे तिपि ११९ सुदो है हो उसके पुत्र स्कन्दगुरु की जूनागढ प्रयस्ति में १३६, १३७, १३८ इन विधिया का उल्लेख है। द्वितीय चन्द्रगुप्त का सांची लेख ९३ वर्ष मे, इन्दौर ताम्रपत्र १४६ वर्ष में वैश्यगुप्त का गुणधर ताम्रपत्र १८८ वर्ष मे तपा मानुगुप्त का एरण स्तम्भ-लेस १९२ वर्ष मे खोदे गये थे। इन दिपियों को राज-वर्ष न मानकर गुप्त-सवत् से सम्बन्धित माना गया है। हर्षवर्धन जान-पत्र की तिषियो हपं सवत् से सम्बन्धित हैं और कुछ अय तिपियाँ भी । यहाँ तर रि नेपाल के लेख भी हपं-सवत् से ही सम्बद हैं। अत अभिलेखों से प्रतिहास के विवादास्त तिपियों तथा सबतों का भी निर्णय करने में विशेष सहायता मिल जाती है।
( ३० ) अभिलेख लिखने के आधार, स्थान तथा अवसर :- आधार-प्राचीनराल में राज्याधित कदियों को राजाओं की प्रामा अयवा रिमी महत्त्वपूर्ण घटना के उल्लेख के लिए रेखो के आधार की मावश्यक्ता पडी। उस समय कागज की क्या बात भोजपत्र या तालपत्र भी मासानी से उपलब्ध नहीं थे। विद्या कण्ठगता यो, अतएव उसके लिखने की जरूरत ही नहीं होती थी किन्तु प्रशस्तियों और मुख्य घटनाओं के प्रचारायं उन्हें उत्कीगं कराना यावश्यक था। यत् ईसापूर्व सदियो में सर्वप्रथम प्रस्तर-खण्ड और तत्पश्चात् धातुओं को आधार बनाकर रेखों को उत्तीर्ण कराना प्रारम्भ हुआ। साप हो, अन्य उपयोगी वस्तुओं को भी रेख का आधार बनाया गया किन्तु उन सब में प्रस्तर-खण्ड को स्थायी मान कर उसे ही विशेष स्थान मिला । अभिरेखों के आधाररूप में प्रधानतया शिलाखण्ड, स्तम्म प्रतिमा, स्तूप, अवशेषपात्र गुगा, ताम्रपट्टिया, सिक्के, मुहर, वेदिका, पयागपट्ट, ईट तथा मृत्तिका पात्रों का उपयोग होने लगा। अभिलेखों के लिए शिलाखण्ड का उपयोग सर्वप्रथम सम्राट अशोर ने धर्म- रेखों को खुदवाने मे किया । उत्तर मौर्यकाल में पुष्यमित्र शुग का अयोध्या शिलारस उसके जीवन चरित्र पर प्रकाश डालता है। कुपाग-नरेगा क्या एक्सत्रप रुद्रदामन ने जूनागढ रेस में शिलाखों का प्रयोग किया था। गुप्तवी में सर्वप्रथम सगुदगुप्त ने प्रशस्ति-अक्न के लिए शिलाखण्ड को आधार माना। उसी का अनुकरण उनके परवर्ती चन्द्रगुप्त तथा स्कन्दगुप्ठ-आदि राजाओं ने किया। शिलासह के दाद प्रस्तर वा दूसरा स्प स्तम्म मी अभिलेख का आधार बना । इसका प्रचलन भी ईसा पूर्व सदियों में ही हो चुका था। जहां पर विलासर उपलव्य नहीं ये वहाँ पर स्तम्भों पर ही प्रशस्तियां सुदवायी गयीं । प्रस्तर-स्तम्भ का उपयोग सम्राट अशाव तथा गुठ-नरेश समुद्रगुप्त, कुमारगुप्त तपा सन्दगुत ने किया था। चौदह शिलारसों के साथ अशोक के सात स्तम्मन्टेस, समुद्रगुष्ठ के प्रयाग स्तम्भ लेख तथा स्कन्दगुष्ठ के भीतरी स्तम्भ-लेख इसरे ज्वरन्तु उदाहरण हैं। प्रस्तर-स्तम्म के अतिरिक्त चन्द्रगुप्त द्वितीय ने लोहस्तम्भ का भी उपयोग रिया पा, जिसका प्रमाग दिल्ली के निकटवर्ती मेहरोली लौह-स्तम्भ लेख है।
(३१) छठी सदी के यसोधर्मन के मन्दसोर-लेख में भी स्तम्भ का ही प्रयोग किया गया है । भागवत धर्म से दौड-धर्म के प्रभावित होने के कारण महायान शाखा में भक्ति भाव से बुद्ध-मूर्ति के पूजन का प्रचार वडा और प्रस्तर के तीसरे रूप प्रतिमा तपा उसकी आधारशिला पर लेख खुदवाए गये। ईमवी सन् प्रथम मदी में बोधगया की विशाल बुद्ध-मूर्ति तथा मथुरा की प्रतिमाओं के आधार- शिला पर लेख उलोग हुए । गुरु-पासकों के प्रतिमा-लेख भी मिले हैं-मनु- कुमार की बौद्ध-प्रतिमा, द्वितीय कुमारगुप्त तथा आदित्यमेन की बुद्ध तथा सूर्य- मूर्वि की आधार शिला पर लेख खुदे मिले हैं । इसके सिवा मध्यप्रदेश को एरण- प्रदिना जो कि वराह भगवान की मूर्ति है, उसमे हूण-राजा तोरमाण का यशोगान अस्ति है। चांनी यात्रियों के उल्लेख से अशोक द्वारा स्तूप बनवाने का निर्देश मिलवा है। किसी पात्र मे फूल रखकर उस पर अण्डाकार या अर्घवृत्ताकार ढांचा तैयार रिया बाता था, उसे ही स्तूप कहा जाता था, जिस पर लेख लिखे जाते थे। मरहट, अमरावती तया सांची की स्तूप-वेष्टनी इसके उदाहरण हैं । स्वर के भीतर फूल ( अवशेष) सोने या कीमती पत्थर के पात्र में रखा गावा पा और उस पुष्प-पात्र ( अवशेष-पात्र ) को प्रस्तर के बक्मे मे रसा बातापा। कमी-कभी उस प्रस्तर या अवशेष-पात्र के ढक्कन पर भी लेख नाम होते हैं। उन्हें ही क्योप-पात्र कहते थे। ऐने पात्रों पर उपलब्ध-लेख में पोररवा ( वस्ती जिला ) का पात्र-लेख सबसे प्राचीन है। मयुरा से भी अापमान मिले हैं, जिनपर लेख उत्कोन हैं। बौद्ध-धर्म के अभ्युदय मिओं का नगर के निकटवर्ती पर्वतीय गुफाओं में रहते को प्रवृत्ति से गुफा- रेत का प्रारम्भ माना जाता है। पथिमी भारत में बौद्धगुफाओ को अधिकता थी, जिनमें नाविक, एलोरा, अजन्ता माजा, काल, कन्हेरी आदि गुफाओं मे निभुओं रा निवास पा । उहीसा मे हायो गुफालेख में कलिंग राजाओं की जीवन- पटनाओं का सक्त है । गुस-काल में गुहा-निर्मातको कला उन्नत दया मे पो । पदगुरु तिनीय का उदयगिरि-गुहा लेख अत्यन्त प्रसिद्ध है । उन्कालीन गुहा-लेखों में सामाजिक, पार्मिक तपा चित्रकला सम्बन्धी बातो का मान विशेष रूप वे हेटा है, जिसका उदाहरण मजन्ता और दाग गुहा-लेस हैं। कम्पपग में सामाजिक परिस्थितियो के बदल जाने के कारण बौद्ध तथा हिन्दूपर्म में मूर्ति पूजा को प्राधानठा हो गयी और उसके साधन के लिये दान ( ३२ ) का महत्त्व बढ गया । अत जिसे दान दिया जाता था उसका उल्लेस दान-पत्र पर आवश्यक हो गया। इसीलिप ताम्र-पत्र का उपयोगलेस के लिए पिया गया, जिस पर आसानी से दाता अपने दान का उल्लेख करके दान-प्रहीता को दे देता था। ताम्र-पत्रो का प्रचार गुप्त-वाल से अधिक हुआ है । ताम्र-पत्र में लेख खुदवाने का यही रहस्य पा। भारतीय इतिहास म सिक्को पर लेख सुदवाने का सर्वप्रथम प्रयोग पूनान' पासको ने म्यिा । उहों के अनुकरण पर कुषाण-नरेश तपा गुम-सम्राटों ने मौ स्वर्ण सिक्कों पर छन्दोबद्ध रख खुदवाए जिन पर उन-उन राजाओं के नाराय देवों की मूर्वि अपदा उनको दन्दना मिलती है। इसके अतिरिक्त महरा पर भो लेख मिरते हैं। ये मुहर-रेस प्राप. धार्मिक स्थिति पर विशेष प्राय डाएते हैं। मुद्रा प्रसग मे प्राोतिहासिक या नगर मोहेनजोदरो, हरप्पा से प्राप्त मुहरों से प्राचीन भारत के इतिहास पर प्रकार पडता है। प्राचीन काल में स्तूप के चारों ओर वेदिका बनवाई जाती यो जिस पर रेख खुदवाए जाते थे। इसकी चर्चा स्तूप प्रसग म आ चुकी है। इसी प्रकार प्राचीन समय में मन्दिर तपा प्रतिमा के नीचे कुछ ईटों पर रैस खोदे जाते थे, जिनका पता कनिंघम ने लगाया। मयुरा सग्रहालय म ई० पहली सदी के सुरमित ईटों दया मिट्टी के पात्रों में छिन्न-भिन्न खुदे मिलते हैं । इस प्रकार अमिरख रिखने के आधार का सक्षिप्त परिचय मिलता है स्थान :- यद्यपि अभिलेख कहीं भी खुदवाए जा सकते थे किन्नु उनके स्थान का चुनाव अपना विशेष महत्त्व रखता है। किसी उद्देश्य-विशेष के कारण ही अपिरतर रेख राजधानी, जयस्सन्धादार और प्रधान नगरों में खुदवाये गये थे। प्राचीन काल से ही भारतवर्ष म नगरों का निर्माण ऐसे स्थानों पर किया जाता था जिनका किसी न किसी प्रकार का स्थानीय अपवा नौगोलिक महत्त्व पा। कालान्तर म वही स्थान मास्कृतिक वेद दन ग्या। अमिरेख स्तुदवाने के विभिन्न स्थानों का अनुचोरन यह संकेत करता है कि रामपानी, महत्वपूर्ण नगर, ठी स्पान एव जयस्व पावार की ओर शासरों का ध्यान विशेष रूप से रहवार और उन स्थाना पर महत्त्व के अभिलेख मी सुदवाये जाते थे। बौद-यम हैं दीक्षित होने के बाद सम्राट अशोक ने साम्राज्य के विशिष्ट तथा बौद्ध-धर्म है ( ३३ ) सम्बन्धित स्थानो पर ख अक्ति कराया। भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित महत्त्व म्यानो में धर्म-रेख अक्ति हुए। सारनाथ (प्रथम प्रवचन-स्थान ) गौशाम्बो (बुद्ध जन्म स्थान ) तया सांची में स्तम्भ-लेस सर हैं, जो स्थान. विगेर के द्योढर हैं। अशोर न लेख को धर्म प्रचार का प्रधान माधन माना। भवद प्रधान नगर, गग्य-मीमा तपा धामिर केन्द्रा में धर्म लेख अस्ति करदाये गो। अशोर के परवर्ती राजाओ न मी राज्य सीमा पर अभिलेख मृदवार, जिनमे पल्लव-नरेशो का तक्षशिलालेख, नहगन का जनामह और नानिक रेस तया रुद्रदामन का जूनामह-लेख प्रसिद्ध हैं। कौशाम्बी के सीमा-महत्व को समय कर ही समुद्रगुप्त ने अपनी विजय यात्रा का दान अशोष-स्तम्भ पर लिपवाया होगा क्योकि उत्तर भारत मे दक्षिा भारत दक जावे ममय इसी मार्ग मे व्यापारी आने जाने थे। चन्द्रगुप्त द्वितीय का उदयगिरि लेख भी उसके उज्जयिनी जाने के ममय अक्ति किया गया होगा, मोवि उज्जयिनी उसकी दूसरी राजधानी थी। प्राचीन समय में मालवा भी महत्वपूर्ण स्थान था। यह विदिशा तया उमयिनो प्रान्न की राजधानी पा। मन्दसोर के अभिलेख इस बात + माक्षी है कि राजमार्ग में स्थित होने के कारण वहां थेगियो का व्यापार होता था। बंद्यालो एक प्रधान नगर तपा सघका केन्द्र था। इसीलिए विभिन्न कार्यालया की मुहरें वहाँ उपलब्ध हैं । काशी (राजपाट ) को मुहर धार्मिक माव को लेकर अस्ति यौं जिनमे व मत की झला मिलती है। इन स्थानो के अतिरिक्त चक्कन्यावारों ( मेनाम्पों) में भी लेख अफ्नि कराने का आदेश दिया जाता पा। वह लेख सदा वित्रय के उपलक्ष्य में ही सुदवाया जाता था। वलभी, बरोडा, पालिमार तया मुंगेर के ताम्रात्र इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय हैं । पुराने समय में जिन स्थानों का कोई सास्कृतिक महत्त्व था वहां पर भी प्रतिमा- खाना के समय मूर्ति को आधार शिला पर लेन अस्ति होते थे। इस मम्बप में ममुरा तथा मारनाय के अनेस मूति-लेख प्रकाश में आये हैं। इसी प्रकार शिक्षा का प्रधान केन्द्र पा और वहां पर अध्ययन करने के देश विदेश के छात्र आते थे, अनुशंकि दृष्टि से इस म्यान का अन्तर्गष्ट्रीय महब पा। वहाँ रे लेख संगागिर महत्व को ही प्रकार में लाने के लिए सुदवाये थे। इन प्रकार में राज्यानी, जयनन्यादार, नाय तया सास्कृतिक न्य के स्थानों पर रेव मुददाये जाते थे। ३० (३४) अवसर-विचार करने पर लेस उलीन कराने के निम्नतिसत कदरों का उल्लेख मिलता है-(१) दान के बदतर, (२) पार्मिक बदहर, (३) दिउप यात्रा, (४) सामाजिक तपा (५) बापारिक अवसर पर । मौर्यकाल मे गया जिले में स्थित 'वरावर' पर्दन का गुहारेंस दान केन्दार पर दुददार गरे लेखों में सबसे प्राचीन है। ईश पूर्व सदियों में सांची देदिरा पर भी उस के दानकता का नामोल्लेख है। दान दे सर पर दुदे रेलों में बगल के पालनरेश देदपाल का नाला ताम्रपत्र विष उत्खनीय है । धन के सर पर रसों का हुदवाया जाना बहुदापट से हुप्रा पा। इसी प्रकार धार्मिक भावना के कारण भी नशोक २ रेखों का स्पा अन्य देदनन्दिरो के निर्माण के अवसर पर दे रेसों का वर्णन मिलता है। प्राचीन भारत म दिजर-प्रकार की समाप्ति पर विजय-विवरण की जानकारी बन्न लोगों को भी हो जाय एव उस सदसर पर भी रेख बरित करवाने पाते थे। इस प्रजग में प्रभाग स्तम्भलेख, उदागिरि रेख, एहोल-प्रशस्ति, सोपार देख एव भोर सम्हालम का ताम्रान रेस I गुन, चन्द्रास दि०, पुलचो हि०, प्रतिहार नरेश नेज ठपा राष्ट्रकूट वगन के विवर वृनान्न का वर्णन करते हैं । सामाजिक बसर पर रेस मुददाने को परपरा प्राचीन समय में दो कम दो दिन्नु मध्यकालीन अमिरहों ने इसका विशेष रूप से पापा जाता है। रहवाल राजरा जपचन्द ने राजकुमार के दम पा सकन से वार पर दान दिया । इसके अतिरित्त बनेर स्योहायें पर भी दान देने का तपा उन्हें दानपत्रों पर रित कराने का सकेत है। योहार के दर -सान्ति, सय तृतीया, रामनदनो, कृमी, एकादसी टला अधिक माउ । मटा-पिता के पार के अवसर पर भी दानाओंश उस पहावाल पर मलचुरीनरेश लेतों में मिलता है। "आस्विनमा यो नितु सावरकथादे"। पापारिक अवसरों पर भी रेख मुदवाये जाने थे। मिट्टी की मुहरों पर नियों द्वारा अनेक लेख मिले हैं । दशटी में ऐसे लेखों से अधिकता है जिन्हें थेगो-मुस्यों द्वारा दकार प्रजग में तयार दिया गया पा। यासार-वृद्धि दिर ही सिक्के तपार दिए जाते ये ग्नि पर कई उग रे मुद्रालेख हुदवाने पाते थे। सिक्कों पर बाकि नोति बनाने से शरण राजाओं का नान खोरा गया पा। पुनानी डों सरनरेशों और गृह सम्राटी के सिक्कों पर ( ३५ ) पदवीयुक्त शासकों का नाम पाया जाता है। इस प्रकार राज्य की आधिक दगा सुधारने के लिए कई प्रकार के सिक्के तैयार किये गये। गुरु युग के पश्चात् संगठिठ व्यापार न होने के कारण ही सिक्कों पर लेख खुदवाने का प्रचलन रहा । उपरोळ अवमरों के अतिरिक्त कुछ गोण-अवसर पर भी लेख खुदवाने का रिवार चल पड़ा था। शक क्षत्रप रुद्रदामन का सुदर्शन झील की मरम्मत कराने के समय का लेख तया मादित्यसेन का अपसद का सेख इसी कोटि का पर। उस समय रानी कोमदेवो ने तालाब खुदवाया था। अभिलेखों का वर्गीकरण :- उपसंहार में हम अभिलेखों के सक्षित एवं स्पूल वर्गीकरण का निर्देश करके इस प्रारूपन को समात कर रहे हैं । अभिलेखों का उपरोक्त परिशीलन उन्हें मुख स से पांच भामों में विभक्त करता है- (१) धार्मिक लेख-ऐसे अभिलेख जिनमें प्रधानतया धार्मिक चर्चा है। का लक्ष्य धर्म का प्रचार प्रतीत होता है। अशोक का अभिलेख इसका उदाहरण है। (२)प्रगनात्मक लेख-ऐसे अमिलेव जिनमें मामले की प्रशंसा को गयी है। प्रशासक का पगोगान हो प्रगन्ति का मुख्य उद्देश्य पा । प्रयाग प्रशस्ति, मन्दसोर प्रशस्ति एव होत प्रशस्ति इसके मुख्य उदाहरण हैं। (३) स्मारक लेख-ऐसे अमित जिन्हें मामक किसी घटना विशेष को स्मृति में सुदवाठे ये इस प्रकार के अभिलेखों में अगोक का सुम्बिनी-नेत्र प्रतित है। (४ आज्ञापत्र-ऐने नेप जिन पर शासक अपनी आशाओं को भक्ति कराव दामोदरपुर दफा नानंदा के ठामपत्र इसके उदाहरण है। (५) दानपत्र-ऐसे लेख रिन पर दावा दान-पहोता के नाम का निदंग कर दानास्नु को अक्ति कराने थे। ऐसे मेघों में 'वरावर' का गुहालेख महत्वपूर्ण है। आगा है ये अग्रेिट पामों के समक्ष अपनी गौरवगापा रह सकने में समर्प हो सकेंगे। महामना गती समारोह २५ दिसम्बर १९११-१२ -साबन्धु X2034 ॥ श्री ॥ उत्कीर्णलेख-पञ्चकम् (१) गिरिनगरे रुद्रदाम्नः प्रस्तराऽभिलेखः सिद्धम् । इद तडा मुदर्शन गिरिनगराद [ पि दू] र मुनिकोलविनागयामोच्छयनि मन्विबद्धदृढसर्वपालीक्त्वात्पर्वतपादप्रति- सपिनुश्लिष्टबन्ध वजातनाकृत्रिमेण सेनुवन्येनोपपन मुप्रतिवितिप्रगाली- परीवाहनोडविधान च त्रिस्कन्य नादिभिरनुग्रहमहत्युपचय वति । सिदि हो । मिरिनगर ( बाधुनिक नागड) के समीप मिट्टी और पापा- मग्डों में घोटाई, सम्बाई और ऊँचाई से बिना जोड की चशे हुई अब एप मजबूत बन्ध-पक्तिया के कारण हरता में पत समीपवती छोटी पहाडिया के साप स्पर्धा करने वाला, ठोर, स्वभावतः विशाल बांध से युक्त, समुचिट रूप से दने हुए जल के निकलने के लिए छोटी नाली, बढ़े हुए जल को निकालने के लिये बडे माने और गन्दगी में बचने के उपाय से युक्त, तीन भागों में विभक्त, और मुरक्षा की ममुचित पवन्या सम्पन्न सुदर्शन नाम का यह प्रोल इस समय वहाँ बन्छो दगा में है। तदिन राज्ञो महाक्षत्रपम्य मुगृहीतनाम्न स्वामित्रनम्य पौत्र [म्य] [राजः क्षत्रपम्य मुगृहीतनाम्न. स्वामिजयदाम्न पुत्रम्य ] राहो महा- सबपन्य गुरुभिरभ्यन्ननाम्नो रुद्रदाम्नो व द्विमप्ततितमे ७२ मार्गशीर्ष बहुप्रति [पदाया] “पृथ्वृष्टिना पर्जन्यन एकापेवभूतायामित्र पृथिव्या कृताया गिरेब्जयतः सुवासिकतापगशिनीप्रमृतीना नदीनामतिमायोद्- वृत्तवेंगे सेतुम... | कि ]यमाणानुम्पप्रतिकारमपि गिरिगिभरतस्त- राहालकोतन्पद्वारसरणोन्दूपविध्वसिना युगनिधनमशारमघोरवेगेन वादना प्रयितसलिनविशिजर्जरोक्तावाद] सिमामवृक्षगुल्मलता- प्रतानमा नदीवलादित्युद्घाटितमासीत् । चत्वारिहस्तरातानि विशदुत्त- २ उत्कोसिस-मञ्चकम् राण्यायतेन एतावन्त्येव विस्तीर्णन पञ्चसप्ततिहस्तानवगाढेन भेदेन निमृत सर्वतोय मरुधन्वकल्पमतिभृश दुर्दशनमासीत् ।] प्रात स्मरणीय महाक्षत्रप राजा चटन के पौत्र, प्रात:स्मरणीय क्षत्रप राजा जयदामद के पुत्र, श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा सतत स्मरणीय नामवाले महासत्रप रुद्रदाम के बहत्तर वर्ष म अग्रहण महोने के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को घनघोर वर्श हुई, जिससे समस्त पृथ्वी मानो समुद्र के समान प्रतीत होने लगो, फलस्वस्त 'जंयत्' नाम के पर्वत से निकलने वाली 'सुवर्णसिक्ता' एव 'पलागिनी' प्रभृति नादियों में बड़ी तेज को बाढ आ गई, उसके बाद सुदर्शन झोल के पि को बचाने के लिये अनुकूल उपाय किये जाने पर भी, पर्वत की पोटियो, वृक्षों, तटों अटारियो, मकानों के परी तल्लों, दरवाजों और बचाव के लिये बनाये गरे ऊँचे-ऊँचे स्पानों को विनष्ट कर देनेवाले सपा प्रलयकालीन प्रमजन के समान प्रचण्ड देगवाले पवन से दिलोडित जल के विशेष से जर्जरीभूत तपा पत्परों, वृक्षों, शाडियों और लवाओ के फेके जाने से सुम्प वह सुदर्शन मोल पलापिनी प्रभृति उपयुक्त नदियों के प्रवल बैग से नदी की तलहटी तक उखाड़ दिया गया। वहाँ ४२० हाप लम्बी, ४२० हाप पोहो और ७५ हाप गहरी दरार पर जाने के कारण झोल का सारा पानो वह गया। फलस्वरूप, वह सुदर्शन देखने में रेगिस्तान के समान बहुत ही बीभत्स हो गया । [तदिद जनपद ] स्यायें मौर्यस्य राज चन्द्रगुप्तम्य राष्ट्रियेण वैश्येन पुप्यगुप्तेन कारितमशोकस्य मौर्यस्य [ कृ ]ते यवनराजेन तुपास्फेनाधिष्धाय प्रणालीभिरलकृत तत्कारितया च राजानुस्पकृतविधानया तस्मिन् भेदे दृष्टया प्रणाच्या विस्तृतसेतु जनपद के क्त्या के लिये मौर्यवी राजा घरगुप्त के प्रान्तीय शासक वस्यजातीय पुष्यगुप्त ने सर्वप्रथम मुदधन नाम के इस झोल का निर्मातरवाया पा, उसके बाद मौर्यवधी राजा यशोक के लिये सुराष्ट्र प्रान्तीय यवन शासक तुपास्फ ने उस मुदर्शन मोल दो छोटो-वडी नालिया से मुशोभित कर दिया, दरार पहने के बाद दीख पडनेवाली, राजोचित सुरक्षा व्यवस्था से सम्मान और तुपास के द्वारा निर्मित उन्हों नारियों से युक्त विशाल बाथ (वाले भान सुदर्शन मील को दामन ने फिर से दुरस्त कर दिया-धागे से सम्बन्ध ।) ..."णा गन्त्रिमृत्यविहतसमुदितराजलक्ष्मीधारणागुणत सर्ववर्णर- ।
दावामन का प्रस्तराभिलेख ३ मिगम्य रसगाय पतिन्वे वृतेना प्राणोच्छ्वासापुरपवनिवृत्तिकृतमत्य- प्रतिज्ञेनान्या सग्रामेष्वभिमुवागतयदृशशप्रहरणवितरण वाविगुणरिपु 'पुकारणेन स्वयम भानजनपदणिपतितायुपशरणदेन दम्युबालमृगरो गादिभिरनुपृष्ट नगरनिगममतादाना वायाजिनानामनुरकपर्वकलोना पूर्वापराकरावन्त्यनूपनोवृदान सुराष्ट्र वभ्रमाकन्ठसिन्धुमौवीरकुकुरापरान्न निरादादीना समप्राणा तत्प्रभावाद्य [ययावत्रामधर्मा] काम विश्याणा विषयाणा पया सर्वक्षत्राविष्कतवीरशब्द जातोसेकविधयाना पोरेयाना प्रसहोलादकेन दक्षिगापथपते सातकतिरपि निर्वाजमव- जित्यावजिन्य सम्बन्धाविदुरलयानुदनात्प्राप्तयशमा मा जन्म से हो अवाय रूप में प्रास राजलमो के पारणात्मक गुणो के कारण अपनी रक्षा के लिए समीप पहुंच कर सभी जाति के लोगो न जिसको अपना राजा बनाया था, पुटभूमि के अतिरिक्त आजीवन मनुष्य हिसा नहीं करने को अपनी हड प्रतिज्ञा को जिसने चरितार्य किया था, समरभूमि में उपस्थित समाक्ष स्तुओं को जो अपने बाणों का लम्प और दुवंत शो को यपनो दया का पात्र बनाता था, अपने उपस्थित अवनत जनसमूह को जो दोपं जीवन और अमपदान देवा पा, चोर-चाकू, हिंसकउन्तु, जगली जानवर और नानाविध रोग आदि से सदा अनाकान्त रहनेवाले उनसमुदार से युक्त 'स्थानीय स्वशासन सस्थाओं से सम्पन्न नगरोंवाले, अपने पराक्रम से उपलब्ध और राज्य के प्रति निष्ठादाद मनियोंवाले, सन्तुलित रूप से धर्म, अर्थ और काम आदि त्रिवर्गों का सम्पादन पल वाले पूर्वी मालव, पथिमी मालद अनूप जनपद, उत्तरी काठियावाड, दक्षिणो काठियावाड, साबरमती नदी के समीपवर्ती प्रदर, मारवाह, कच्छ, पथिमी सिप. पूर्वी सिन्ध, दक्षिणी राठियावाड और उत्तरी कोंकन के बीच का प्रदेश, उत्तरो कोंक, पश्मिी विन्ध और बरावली को पहाडी भूमि, प्रभृति सभी प्रान्तो का वो राजा या, सभी क्षत्रियों में प्रधान "योर" पद से उत्पन्न अमिमान के कारण स्वतल होकर रहने वाले "यधेिय" साक लडाकू सत्रियो को बसपूर्वक रिसने उसा कर फेंक दिया, दक्षियोभारत के राजा सातकणिको सुले मंदान में दो-दो बार बीतकर मी निकटवम सम्पप के कारण मुक्त कर देने से जिघने कोहिको प्राह किया। [प्रा पविजयेन भ्रष्टराजप्रतिष्ठापकन ययापहम्नोच्छयाजितोजित. धमीनुरोगग शन्दा गान्धर्वन्यायाद्याना विद्याना महलाना पारणवारण- ४ उन्कोतिषसम्म विज्ञानप्रयोगावातविपुलतिना तुरगणदत्यत्रामचनियुद्धादा- विपरखापवमोष्टवरियेग बहव्हदांननानादवमानमोलेन पथावत्ताप्नन्दिगल्क भार्ग. वनकरजनल्लोपत्रपत्रिपन्दमानन्। ग्मिने सर्वदा सर्वत्र दिग्य को ही प्रात विता, रापच्छद राजाओं को पिस्ने दिर में प्रर्गिठन कर दिया, न्यार के कारन से हाप सा-टारर मनुचित निर्णय देते रहन के कारण जिसने न दे प्रति पन महान अनुराग का दान विचा, शाररण, राजनीति, नगीन एव त आदि विशाल एद ढसस्त्रों में अध्यपन, स्मा, सम्पर न्तुति और व्यवहार में जितने प्रत का गेजर किया पोटे, हामी और रपये घसान टपा दास और उन्बार युद्ध मे जे अत्यधिर नाहन, स्वति और ससाई दिहादा या गे दिन-रान दान और मान के धिर ने सपा उदारमाद से सरन नहला या मनुचित र ने मिलनेवाली बालगुगगे और चुनी के कारण मोने चांदी हरे रग में दंदू ममि और रनों की ढेर से जिसरावाना भरपूर पा। म्फुटन पुमधुरविनगन्नादननवोदारलकनगाव - 'न प्रनाम मानोन्नानन्वरगतिश्पनारमत्वादिनि पमिलमध्यञ्जनरपेतवान्नमूनिना स्वपमधिगतन्हाक्षत्रपनाम्ना नरेन्द्रनन्यान्वयवरानेमान्यतासदाम्ना सुट ( अचनि) रघु ( प्रमाद), मधुर (माधु), चित्र ( गेज), रान्त ( वान्ति ) अति पद-उमर (दमन = मया)मान और कन्कारों ने युक्त माना गय-रचना में निम दौदिर गुणों ने, पोचित चौराई, सदा ऊंचा, दोलने का स्वर, चलने की उ, दरीर के रज, रस, कादि शारीरिक मुमों में, ठपा घाख नादि दोडा भन्द-चा आदि चिहों से जिनो मत चम्ब रही पी, दीरतानं गी में दिन स्वयं "म्हाधवर" आधि को पारण किया और गिनने राकुमारिको रे दादर में नेक उपमारी बारगाया। म्हासन द्रदाम्ना वर्षबार गोब्राह्मग" धर्मोनिदृस्पयं चापोडपिन्वा वरदिष्प्रणम्यानि. पारगानाद उन बन्नानोमान्नर- ताधनोननानतिन्ह्वा च वारेन विजटतरदिनारामान रेनु विधाय मु] दसनार काग्निनिति । इन उपद गुणों में सात महाक्षत्रा दामन ने हजारो दर्प टर पार दामन का प्रस्तराभिलेख और ब्राह्मणों के कल्याण के लिए, पुस्प और यश की वृद्धि के लिए नगरवामी और पालदासी प्रजाजनों को कर, बेगारी और मेंट आदि से बिना पोडिन किये हो, अपने गज-योग को अपार धन राशि के व्यय से योद ही समय म, पहले गरी बसा निगुने लम्बे-चौई और सुदृद्ध दांप बंधग कर उस मुदर्शन को और अधिक मुन्दर बनवा दिया। अस्मिन्नर्थे महाक्षत्रपस्य मतिमचिवमसचिवरमात्यगुणममुदत्तरप्यनि- महत्वाद्मेदम्यानुन्माहविमुखमतिभि प्रख्यातारम्भ पुन मेनुबन्वनरा. श्यादाहाभूतानु प्रजाम्बिहाधिष्ठाने पौरजानपदजनानुग्रहार्य पार्थिवेन कुम्नानामाननमुराष्ट्रागा पालनार्थ नियुक्तेन पल्लवेन कुलपणामात्येन सुविशाखेन। इस विषय में यह स्मरगोय है कि प्रौल के दरार की विशालता को देखकर महाशा दामन् के सचिवोचित समस्त गुग से युक्त मनिसचिन और सचिवों ने मान सुदन बोल के जीणोद्धार कार्य के प्रति अपनी सहमति प्राट कर दी। इससे बांध के फिर से बंध जाने को आया टूट गई और प्रजा वाहि पाहि करने लगी। तद अपने शासन में प्रवा के हित को धान में रखकर राजा रददामन ने समस्त आन और मुराष्ट्र प्रदेश के रामपाल के रूप में 'पहा. पुनर' का पुत्र अमात्य 'मुविगाव' को नियुक्त किया। ययावदयंधमंव्यवहारदर्शनरनुरागमभिवद्धंयना शन दान्तनाचपलेना- विस्मितेनार्येण स्वधिष्ठिता धर्मकीनियगामि भतुंरभिवर्द्धयतानुष्ठिमिति ।। धर्म-पं और व्यवहार के समुचित निरीसा से प्ररा के अनुराग को बसाने वाले, शक्तिशाली, सयमो, स्पिर, निरमिमानो, बायोचित गुगो से सम्पन्न और अपने स्तम्भ में कमी नहीं गिनेवाले अमात्य मुविद्यास ने एक सफल पामर के रूप में अपने स्वामी २ पर्म, योनि और यश को बहाने के लिये मुदर्शन झोल रे बांध को बंधवा दिया। अभिलेस का ऐतिहासिक महत्व अभिलेन का विश्व-मुराष्ट्र प्रान में गिरिनगर' नाम से एक स्थान पा, निमे माजाल जुनागड कहा जाता है। वही पर पर्वतान्त में एक प्रस्तर- सर पर समाद मनोक के पाँव पदे हैं। उसी तरह के मैदे के ६ उजालस-पान हिस्ते में महापदर दामन का यह मत भी उन्को है। मीट पन्द्रगुरु के द्वारा विदाई की दृष्टिने बन्दास मा, नाला में स्थित मुन हीट के टूटने और दामन के एक प्रयासम दे द्वारा सोल में कई पुननिर्माण सरी घटना से उन्दन्वित यह अमिलेंड दिहाकि दृष्टि से रन ही महत्व का है। समर-मिरेस का समर उजादमा "द दिनदिने" बाधार पर एक रुद्र १२ ब्योर १५०ई० माना गया है। साभारत: भी ऐतिहासिक इस समय ईसा की विटीय स्वान्दी ममममान ही मानदे हैं। - जनापड का यह अमित न के महापर मदामन रे इतिहास निग का प्रधान साधन है। इडकं द्वारा रददारी सनिक मारदात्रों, मग सामाग्र-दिस्टार, साउनबन्ध और उसो दनिय पर प्रकार परता है। परिचय-पदामन् नारद , विदेशी भाप पल्दाले राराओं में परजादौन राजाओं का दरा। रादौर श्याम प और महामावर बहलाते थे। डॉ. रमारमर त्रिपाठी न सान्द को मारनी में हवन' पदा सस्कृत रूपान्तर मना है, जिसका ई-प्रान्त का रस होग है। 'सर' साधिकारी या दोन भारत के उत्तर-पशिन, पुरा, महाराष्ट्र और उन में सबसे थे। इन हर राराओं का नाम भारत के प्रपन परविदामा माना जाता है। माग पास्नकात 'म्टेनकोनों के अनुसार ६० मन् १० वर्ष पूर्व माना गया है । रसामन् सम्बन्ध वजन एक से बन रेसर रार कापस स्थान पतिरा, यो 6. निझान' नानक सहराव पराका दबदा। इसी पाहिस का पुत्र 'एशन' सना परक रिने पहले 'स' के घर में शासन निस, चिनु गद में 'महा. सर'नमसा। महासम रसन्न समारारा 'उपदामना पुत्र कोर महाशर घटन सा पोर पारा पिटालेस (पृ.१,५०१३) स रात कासार उल्लेख है:- "राज्ञो महाक्षत्रात्य राजा दना;
छदामन का प्रस्तराभिलेन वहाँ तक इसके हाप में शासन-मूत्र के आने की बात है, उसका स्पष्ट सकेन हने अभिनेत्र (इ. २.१०२९-पृ ३ ५० १) में आये "सर्ववर्गरभिगम्यर क्षगायं पतित्वेन वृतन' से मिल जाता है कि समा जातियों लोगों ने इसे अपना रक्षक चना या । इससे यह प्रतीत होता है कि द्रदामन को शासक चुना गया पा। इस विषय म एक बात ध्यान देने योग्य यह है कि हार के शासन म महाभार, क्षत्रप के माय-साप शासन करता था और यह क्षार साधारणतया उसका पुत्र हावा पा और उचित समय पाकर महामनप मो हो जाता था। 'अन्या' के अभिलेन में १३० ई. में हवामन के साप चश्न के सम्मिलिन शासन करने का उल्लेख मिलता है। इससे यह प्रवात होता है कि महाक्षर चरन अपने पुत्र क्षत्रर जयदामन को सहायता से पसनकायं पनाता था किन्नु पपदामन की आकस्मिक मृयु हो जाने के कारण चष्टन ने गकप्रपा के अनुकूल करने पौर हरदामन को युदराजपद देकर अपने सहायक के रूप में सरप नियुक्त किया और उसकी सहायता से राज्यसचालन करने लगा। अभिलेख के उपर्युक्त चदरण से यह प्रमागित हो जाता है कि सभी लोगा ने चटन द्वारा नियुक्त रुद्रदामन का, अपने रसा के रूप में, उसके राजोचित गुणों के कारण समन किया और किसी ने भी इसका विरोध नहीं पिया। युद्ध और विजय-पदामन को मृत्यु के बाद पटन के राज्य का उत्तराधिकारी उसरा पोत्र सामन् वजन का प्रमुख पक्षमा राजा हुआ। अमिलन की तिथि ७२ र सवा से उसका रायकाठ १५० ई. के आसाम निषित किया गया है। अमिरेत (पृ. ४, प०१४ ) के-"सामधिगत. महाक्षरनाम्ना"म लेन से प्रस्ट होता है कि अपने शासन के प्रारम्भ में अर्थात् जब वह चटन रे साप मिलकर शासन कर रहा पर हर वह केवल 'शा' हो पा ।फिन्तु अपने स्वठा शासनकाल में उसने स्वतः ही "महाभार" उपाधि को धारण किया। इससे उसके सिविरम और उसके द्वारा अनेक राज्यों पर विस्य मास करने के उपरान्न 'महासस' होने को राव प्रस्ट होती है। राय पोषरो ने उमरे स्वत 'महाभयर होने में एक दूसरे सप्प का निस्सिा है । 'स्वरमधिगउमहासरनाम्ना' (पृ. ४,५०१४ ) मे उन्होंने यह अनुमान लगारा है कि सामन् के राजकुतरी राग्यो को तिरे मिमी पा नै सम्भवतः गौतमीपुत्र ने विशुभ कर दिया था, जिसे उसने पुनः प्रविधि र महासर को पदवी धारण की- कुछ समय ८ . उत्तीख-पञ्चश्म *This probably wadrate that the power of his house tad bren shaken by some enemy (Possibly Gautamiputra 2nd he Lad to restore the supreme Ksatrapa's dignity by his own Powers'--Dr HC Rey Chaudhai अभिलेख (पृष्ठ ३, ५०९-१०) 'दक्षिणापरले प्रारुपासा"- से यह ज्ञात होता है कि रहदामद ने दतिय के राजा नाटकी वो दोसर पराजित किया था। रिन्नु निवट सम्बन्धी होने के कारण उसे क्षमा प्रदान कर पचोरान किया था। एतिहासिक उपलब्ध प्रमाणों के अाधार पर सातवाह्न- वश में सातवी नाम के कई राजे थे। इस हामिलेंस या साठी साढवाहन- बंगा कोन सातकर्णी है, इस विषय में विभिन्न विद्वाना रा अपना-अपना असा मत है । दॉ डी. सी. सरकारच मतानुसार यह साउना स्वर गौतमीपुत्र सातामों है, जिसका पुत्र वासिष्ठीपुत्र सातको रददामन का दामाद पा। डॉ० रप्सन के मतानुसार शासन द्वारा परारित मावबहन नृपति पुरमादि पा जोमि दासीपुत्र सातकर्णी का भाई और उत्तराधिकारी पा। डॉ. बार. सो. नडारकर ने इसे यज्ञयी सातवी माना है और रददानन को रन्या का विदाह चटपंप साउपर्पो न होता प्रस्ट ग्दिा है। यो नौलाठ मास्त्री और राजगोपालाचारी न इसे कन्हरी अभिलस में उस्रिखित वामिष्ट पुत्र सातकों माना है। डॉ. बल्लकर ने भी इन्हें हरी कमिव का दाखिष्टपुन मारनौं ही स्वीकार किया है। डॉ. रमाकर विटी और एन. एन. घोर भी इसे बासिष्ठीपुत्र सातकी हो मानते हैं । कर यहो मत सर्वाधिक मान्य हो चरा है। इस उल्लेख से ऐसा प्रतीत होता है कि महाक्षत्रप चाटन के राज्पराल के अन्तिम भाग में अपदा उसकी मृत्यु के बाद उनके घर क्षों की राज्यक्ति मौतमीपुत्र सातकों और उनके पुत्र दामिन पुरमादि के प्रभाव दे बह जाने से बम्पवस्पित हो गयी थी। इसीलिये रद्रदामन गो मावदाहों के साप पोर युद्ध करना पड़ा था और उन्हें पराजित कर वह पुन अपने वर को रापलामी का प्रतिहत कर समापा। अभिलेख (पृ. ३, ५० ८-१) के दौरसद..."उन्मादोन" इस वाक्यार में स्वाभिमानी एव वीर योधनों के साप दामन में युद्ध का पा योधयों को पराजित करने का उत्रेस किया गया है। समदन पौधर रोगों का साम्राज्य सतलब टटपर कौर मरतपुर स्टेट के विषयमा संच तर विस्तृत पा। पूर्वी पजार में उनसरा दोघेपण पा उहाँ उनमें गम नामों से युक्त अनेक - १० उलोहित-परम् (१२) अपरान्त उत्तरी कोरम, दिलको राजधानी गुरपारस पी। (१३) निपाद–मदन पहिनी दिनध्य और सरन्ददी नदी प्रदेश इसके अन्तर्गत आते थे। इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। मयुक्त प्रदरों पर रुद्रदामा आधिपत्ल पा, इन बाउ रेट टो निरता है किन्तु अग्रेिस ने इस बात पर कोई प्रकार नहीं पडदा है कि रुदानन ने इस राज्यों को रद बौदा पा । समदतः मुराष्ट्र, कुकुर तथा मन्त्र गौतमीपुत्र के अधीन हैं। अव रहदामद ने गौतमीपुत्र यदा उसके पुत्र पुनमावि से हो इन तीनों प्रान्तों को गढा या। स्वामन के द्वारा निन्धु-चौबीर, के प्रदेशों पर विजय प्रात करना इस बात का घोडर है कि उसे पापदरी मनिष्क के उत्तराधिकारियो से नी लोहा लेना पड़ा होगा और उन्हें परान करके ही उन राज्यों को अपने साम्राज्य में मिलाने में यह सरल हा होगा। वनित (पृ० ३, ५० २९) के "राज्यातिधारेन" इस रपन की तुलना गुस-सम्राट् सगुस की राज्यविजय सम्बन्धी उस नीति से की जा सकती है बिसरे कन्तर्गत दह विजित राज्यों को उन्हीं के सासरों को पुन तोटा देता पा. किन्तु वे पातर निविद रूप से भेंट देकर कन आपको उनके कीन मानडे । रंजन ने इसका यह अर्प सा है कि वो प्रादेशिक शासक नहह्मान के बपीन थे, उन्हें साटदहनदरी गौतमीपुत्र ने ना कर दिया था किन्तु रददामन ने पुनः उन्हें अपने-अपने राज्यों में प्रतिष्टित र दिया। इस प्रसर हम देखते हैं कि सदामन ने उपने शासन के अल्पकाल मे हो ठने राज्यों पर विजय प्रास कर साम्राज्य को पूर्णतया पन्दित पर रिया पा। शासन व्यवस्था-हरामन एक महान पोसा और विजेता ही नहीं पा वरन एक सफल और योग्य शासक मीरा मिलेख में पत्र-नर पारराने बाने स्खों से उसके मुवस्पित शासन-सवरती स्परेसा ठदार री रा सरठी है- i) सदानन् रा समस्त सामान्य सान गो मुदिषारित कई प्रान्तों मे बैटा हा पा। उसी रारपानी उन पी, ही से समस्त सामान्य का चाहन-सूत्र सचारित होता था। इस प्रकार के शासन-प्रबन्ध का सरत हमें रिलानेस (पृ. ५,५०८) के परिवानपचनानुम्हाई शादिन" स ाक्कार है मिटदा है, जिसमें दामना प्रस्तराभिलेख सदामन के द्वारा मानतं और मुराष्ट्र प्रान्त के शासक के रूप में नियुक्त सुविसास द्वारा मुदर्शन पोल के सस्कार की घटना का उल्लेख किया गया है । (२) शासन को मुध्यवस्थित ढग से चलाने के लिये उसने कई अमात्यों की नियुक्ति की यो। वे अमात्य दो प्रकार के हाते ये एक मतिसचिव, और दूसरा समंसचिव । मतिसचिव राजा को सलाह देते थे और कमसचिव राज्य योजना को कास्प में परिणत करते थे। इसरा उल्लेख, अमिलख (पृ०५ के १०६), में है-"मविसचिवमंसचिव अमात्यगुगसमक्त (३) यद्यपि शासन की सबमे छोटी इकाई का निश्चित स्वरूप क्या पा इसका स्त्र उल्लेख नहीं है फिर भी नगर निगम, जनपद तथा पौरजानपद का उल्लेख अवश्य किया गया है ( अभिलेख पृ० ३ ५०४)। (४) कद्दामन के सामन को कर-व्यवस्था बहुत व्यवस्थित और उभर पी। दह प्रता से विशेष कर नहीं वमूल करता था। उस समय के स्वामाविक का अनिवार्य अपवा 'मामान्य कर' और विशेष कर' के प्रकारों का उल्लेख अभिलेख (पृ. ४, ५०३ ) में किया गया है-“यथावत्प्राप्तं बलिगुल्कमार्ग"। इन उन्लेखों से यह प्रदान होता है कि 'बलि गुल' और 'माग' वास्तविक या सामान्य कर मे जो प्रनाओं को देना पडतापा। विष्टि' और 'प्रणय' विशेष कर के अन्तर्गत थे। व्यक्तित्व-अभिलेख से रुददामन रे व्यक्तित्व पर भी बरा प्रकाश पड़ता है। यह केवल एक विजेठा और शासक हो नहीं पा प्रत्युत जनता के सुख-दुख में भागने वाला हो दयाल प्रजापालक भी था। रामन् को इस बात का नई या कि उसने प्रजामो से किसी भी प्रकार का कर बिना लिये हो अपने राम्पोप के पप से मुदर्शन झील का जीर्णोद्धार कराया था। सुदर्शन मोल का सस्कार कराना रुद्रदामन के राज्य की महत्वपूर्ण घटना पी। उस झोल का सक्षिष्ठ इतिहास निम्नलिखित है जुनागा सर्वप्रम मोरं सम्राट् पन्द्रगुप्त को आगा से उसके प्रान्तीय शासक पर पुषगुस ने सिंचाई को दृष्टि से एक पर्वतीय नदी के जल को लेकर एक शोल का निर्माण कराया। अशोक के प्रान्तीय यदन सक तुपास्फ ने उससे नहर निकलवानी । उस झोत का नाम मुदन था। द्रिदामन के समर (१५. १.) में पद पर्वत से निगलने वाली मुर्गासावा और पानी नाम की १२ स्वीरेख-पञ्चरम् नदियों में दाढ काने और प्रदन तूरन के कारण इन मेट वा संघ इटावा प्रजा हाहाभर मच गया और ममी विनादन्या में एन। रुद्रदामन ने प्ररा की मलाई को ध्यान में रख कर अपने मंत्रिक दिगेर करने पर भी प्रान्तीय साना मुदिताव के द्वारा अपने गम्बर में इना पुननिर्माण करवाया। मुदर्शन झील के पुन संन्कार सन्दी इन पवित्र घटना के बल्लेख से यह बप प्रकट हो जाता है कि वह प्रजापालन, प्रारमण और प्रजारजन के कदंथों को निभाने वाताव सरल रोकप्रिय साना पा । उनकी अनब्ध मादना दहीही दृढ दी। उसरे दिन निश्वर दोन ती भी नहीं डिगा सरते थे, जैसा कि (पृ० ५५०७) में उल्लिन्दिन है- "विमुखमतिनि. प्रस्वारम्भ । प्रजा के प्रति इन्ना नुराग या किडील के संघ के टूट जाने पर उसके सस्तार कराने के लिये उसने प्रजा में दिना मिनी प्रकार का दिपेप कर लिये ही बपने रामकोप दे दयों का ही उपयोग किया (दे० पृ. ४, ५०२७) "स्वस्मात् कोशा"। समें प्रयासरोष गुणो को ना पति मात्रा में विद्यमान पी। इसीलिये दह अस्तित्र दे । २.१ २९-५ ३५ १) सदंदरमियन्य क्षयं पटिन्देन देवेन' के अनुसार सनी रातियो रे लोगों के द्वारा सहर्ष अपना रक्षा चुन लिया गया था। उसने न दल प्रशाकीर गुग ही ये अपितु वह सनी कार में शास्त्री के शन में निपुण और दिपिट नगीदह भी था। दह गए और प दोनो प्रकार की काव्य रचना में निपुण और प्रजा दो मचित न्यार देनेदाला पा। निशे अभित्ति अमितन (पृ. ३, २०२९) को "पाय- हस्त्रोन्यापादियोरिट" मे होती है। दह एक सम्राट ६ रक्षा में भी मुझ पा-परमरक्षणपनरसेवकान्तमूर्टिना" (पृ. ४, ५० १५)। इदना हो नहीं दनि सो शासन दो मुसस्कृत उदया और इसके आर-हर से दृयटिकता का परिचय तो हमें रब मिटता है उद उसने यह पाप ले रखो यो नि पटनम के अतिरिका बन्या कमी की यह नर-हल्या नहीं ररेन (देवरे, अभिलेख पृ. ३. पं० २-३ ) 11 उमने न रंदत अपने हो डोदन में बलि प्रजादगं में भी निदाह रिया । इसरे अतिरिन उसरे मुसम्मन सम्म चरित रो उदने दही दिपदा पी- सात प्रति उसी अनुरकि। दह एक दिदेशी एक बंपर होररी सात सस्य मा. शेषर : दर कि उसने पूरक और मालेत उनी भारतीय छदाम का प्रस्तराभिलेख राजा पानी सपा पाहत माषा को अधिक प्रश्रय दे रहे थे। इस प्रकार सस्कृत भाग के उनायक राजाओं में रुद्रदामद का स्थान चिरस्मरणीय रहेगा। पह निविवाद है कि स्वदामन भारतीय शासको मे महान् पा। अभिलेस की साहित्यिक विशेषतायें परिचय- 1- महासत्रप रुद्रदामन के द्वारा मुदर्शन शोल के जीर्णोद्धार कराने को घटना के वर्णन में लिखा गया यह अभिलेख विसी अज्ञात कवि का है। क्योंकि इस अभिरंग म कही भी ववि का सकेत नहो । किन्तु अभि- रेख की काव्यात्मक शैली में यह प्रतीत होता है कि इसका लेखक अवश्य ही कामाला में पुरल एक उच्च कोटि का कवि था। यह अभिलेष अलकट परकाब्य को शंली मे लिखा गया है । सस्कृत वाङ्मय का अधिक अश पयकार मे ही उपनिबट है। यकाय अपेक्षाकृत पद्यकार से न्युन माना जाता है। यों गयसाहित्य का परिचय हम ग्राह्मण, उपनिषद और शास्त्रीय साहित्य मे पयति मात्रा मे मिलता है । गय का वाधा मक स्वरूप तो पद्यपि अन्धकार में हो या किन्तु १५० ई. के लगभग लिखा गया यह अभिलेख गद्यकाव्य को अन्धकार से प्रकार में सा देता है। इस अभिलेस में पह स्पष्ट हो जाता है कि पथकाव्य के साप ही गद्यकाव्य का विकास भी हो रहा पा और शो के दण्डी, मुन्धु और दान तक के काम के घरमोलप में यह अभिलेख मी अपना महत्त्वपूर्ण एवं प्रस्त साहित्यिक स्थान सुरक्षित रखता है। यह न केवल परावर के सोपे-सादे कलेवर में है अपितु बलव स्लेवर में है। इसके साथ ही कवि ने इसमे काम के गुगो की मो चर्चा की है। अब काम के विकास पप में यह एक प्रशस्त प्रकार का कार्य करता है। करिने दामन को सराय के स्फुट-मधुर यादि गुगों और अलारों से मुहित पर और पप राम के प्रायन में निपुण बतलाया है.--'स्टलपुमधुर- विकान्तरदससमयोदारालालपपर न."(पृ. ४,५०१४ ) । इस कपन से यह स्पष्ट है कि उस समय मात् द्विवीय पवान्दी मे महाकाय का पूर्ण विकाम हो पा "अलाव"शन से कविता के बलारा को बढ़ाने वाले अतधार. शान से राफ के पूर्ण परिषय का परिणान होता है। इससे साधारण साम्य वे महासरसो के शिशस कार भी सामने आ जाता है। रोति या ली-इस पर काम के अनुहल ही समासयुक्त पोका प्रयोग रिकामा है। "मोजः समासभूपत्वमेतद्गद्यस्य जीवितम् ।" मोगुणविभिट उत्कोणलेख-पञ्चकम् समासबहुलता गद्यकाव्य का प्राण है। कवि ने यद्यपि समासो का प्रपो बहुतायत रूप से किया है किन्तु वे समासयुक्त पद छोटे-छोटे एव प्रवाहपूर्ण है। भा एव उसमे बंदी रीति का समावेश मिलता है। हां, वश्यं विषय के अनुकून मही-कही गोडी-बन्ध भी स्पष्ट परिलक्षित होता है। यया सुवर्णसिकता और पलाधिनी नदियो की बाद के वेग से तपा प्रचण्ड वायु के झोके से पहाड के शिखरो, वो और अट्टालिकानो के दिध्वस और नदी-नट पर फेंके गये पत्थरों, पेडो और शाहिदो के वर्णन में मोजमपी भाषा में गौडी रोटि का आयप रैदा है-"गिरिशिखरतरउटाट्टालिको '(पृ० १,५० १८-२१)। अभिलेख के प्रारम्भ में २३ सरोवाले नौ घन्दों का समान मिलता है। रसदामन के वर्णन में दो समास की दीर्घता देखने ही योग्य है। उसके दर्णन में ४० रो से युक्त १७ पन्दो के समान का प्रयोग किया गया है। दादों को लम्बाई समाती की लन्दाई से दानो लगाती है । ए बाबर की लम्बाई तो २३ प हैं (एक रन्प से अभिप्राय २३ अक्षरो से होता है)। २३ आरोशले नौ पदों के समाच का उदाहरण-"वृत्तिकोस्टविस्तार .....पालोरलाइ" (पृ० १, १०२)। अलंकार-इलकार ने समालकार और बलकार दोनों का प्रपोज दिया मला है। मालवारी ने अनुमानों के प्रयोग अनि मिलने हैं-दिकर पर्णकार के । कोही पर पर, पार और दर्गे की बात हुई है। पति का उदाहरण-कारियाणा विषयाणाम् । पार को माइति का उदाहरण—पारण धारण । विमानान् पारे- --- पणं को शामिका जाहरण-माण गहाणान्ध पछ। नान्न दान्नान्दिन्ननाम्नः खदान। "गिरिशिसत तनाट्टारितोपानमारसरणोपनिपिना. मल्क पर ने वर्णनुमान ने स्वर र सम्मान गर्नेको समिपुर- पूरक को गयो। शनिबार का प्रयोग एक हो बम हम है। परेशमले में कदर दो पार जमाकारका और एक पर कार का प्रमोग है। पायोग मोए स्थान में हुआ है, पर सफल मकान हो है।
इंद्रदामन का प्रस्तरामिलेव समालंकार का उदाहरण हमें "परवप्रतिस्पमि" इस शब्द-समूह में मिलता है। इसमें सुदर्शन झील के बंप की दीवार की तुलना पदंत के अप्रभाग से की महै। सागर का दूसरा उदाहरण---"मधन्वरलम्" इस पद में दरार पर जाने के कारण सारा पानी निकल जाने से झील की रसमा महप्रदेश सेको गती है। शालकार का उदाहरण हने "पजन्दन एकावतापानिर पृषिमा पान" में अत्यधिक वर्षा से पृथिवी को समुद्र के रूप में उप्रेक्षा की गई है । "अवि दुदयनन्" में श्लेष अलकार को साने का प्रयास तो किया मग है किन्तु यह अधिक सुन्दर नहीं हो पाया है। नापा-३ अभिनव की मा साधारण रोलचाल की है। इसमें प्रारम से अन्ट टक प्रकह पाया जाता है। इसके शन्दों पर प्राकृत भाषा का प्रभाव -"दिशदुनरानि" के स्थान पर--"वीशदुत्तरागि" के प्रपोज र का प्रभाव परिलक्षित होता है। इसके साय ही भाषा में पौराणिक काली को सरदा मी पाई जाडी है। गुनों का समावेश-परवती अकारणास्त्र और काचो में मिलनेवाले कविता के अनेक गुमरा का नामनिर्देश भी दिया गया है-"स्तुट-लघुमधुरोदार- रिकत..." । अनिलेव में निर्दिश इन मुगों को समता हम दही के मुर्गों से कर जाते हैं । दण्डी ने काबाद में काम- 'इलेकनादः समता माधुसुकुमारता । अपंचदिरुदारवनोज कान्निननापरः।" दस गुमों का निर्देश किया गया है। हम अभिलेख "स्तुटवा" नामक युग को दमी के पति से, "रघुता" को 'प्रकार से मधुरता को 'माधु' से, "ft" को गोरोनुन वे और मन को 'कानि' नामक मुग से सवा कर सपटे हैं। अमिरेदकेसर से उस समय तक बस्तित्व में आये अलंकार वास्त कर रहा प्रकार पडदा है और माप ही यह मां रूट हो जाता है कि दिौर दालोटक कायद और परदो माहो चुके थे। पर-पर के मुम- परक अभिनेस के सदनिधि ससे परिमाविक है और पिसी मान्द मदरनाशरसासेस्ट करते है।
उत्तीर्णलेश-पञ्चकम् वर्णन ऊँची कोटि का नहीं होकर भी जलाशय के चित्रण में मनोरमता एवं हृदयहारिता है। इस अभिलेख में परशासक दो पद-पद्य-काम्य-रचना में निपुण रहना इस बात का प्रतीक है वि गद्यकाव्य उस समय अपने पूर्ण विकसित अवस्था में पा और उसका प्रभाव विद्वन्मण्डली में इतना अधिक बह रहा था कि विदेशी शासन भी उसके प्रभाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। यह प्रवृत्ति रिदेवी मारमण के समय सस्कृत के हास होने की दाद र सन्डन कर देवी है। (१) श्रुटियां--इस अमिरेख में रियावाचक ग्दों का प्रयोग नहीं के बराबर है। पूरे अभिलेख में देवल २ क्यिाओं का प्रयोग हुआ है। "वत।" इसका प्रयोग पृ०१ वी पोपो पक्ति में, तथा 'आसीत्" का प्रयोग पृ०१ की २१ वी और पृ० २ की २री पक्ति में हुआ है। "मासीत्" इस क्रिया का प्रयोग दो बार हुआ है। इस प्रकार रहने को तो क्रियाओं का प्रयोग ३ बार हुआ है किन्तु वे रियायें केवल 'वतते' और 'आसीन' ये दो ही हैं। केवल 'बासीन्' प्रिया का ही दो दार प्रयोग हुआ है । सम्कृत गद्य काव्य मे समामबहुत दीवाक्य के पारण अन्यत्र भी किया वो कमी देखी जाती है। (२) व्याकरण की अशुद्धियां-"विषयाणा पठिना" मे 'पठिना' चन्द का प्रयोग व्याकरण की दृष्टि से गलत है। क्योंकि पति पद को समास ही में "fघ' सजा होती है ("पति. समास एव"-अष्टाध्यायी ४८)। इसीलिये समस्त पति' बन्द का ही रूप तृतीया विभक्ति में 'पठिना' (बाडो नास्त्रियाम्"-अधाप्यायो १।३। १२०, घेः परस्य आलो ना मात्र अस्त्रियाम् । "आद' इति 'टा' सज्ञा प्राचाम् ) है असमस्त में 'पत्या' ही होता है। पाणिनि से पूर्ववैदिक और पौरागिर भाषा में इस तरह की प्रवृत्ति पापी जाती है । अत: गद्य में भाषा की दृष्टि से पौराणिक शैली को अपनाया गया है। इसी प्रकार कारक की अगदि भी "अन्यत्र समामे" में पापी बादी है। यहाँ पर वारक की दृष्टि से ( "अन्यारादितर दिसन्दात्तरपदाचाहियुक्त" अष्टाध्यायी २।३ । २९ इस मूत्र से "अन्य" शब्द के ससम्पन्त रूप 'अन्यत्र' के योग में पचमी हो जायगी। बता ) अन्यत्र संग्रामम्मः' होना चाहिए । धाहित्यिक त्रुटि भी हमें "पर्जन्येन एकावभूतापामिव पृथिव्यान कृतापाम्" में मिलती है । कोकि इस प्रकार का प्रयोग गधकाम्स में नहीं बदामन का प्रस्तराभिलेख १७ रिता है। साप ही इसमे "भूनायाम्" के बाद पुन "कृतायाम्" यह सन्द श्री अधिक प्रयुक्त हो गया है । अत 'अधिकपदता' दोष भी है। 'अतिनृशम् दुर्दर्शनम्', मे इलेष अलकार का असफल प्रयोग करने का प्रयास किया गया है। इस प्रकार इसमें बहुत से दोष भी पाये जाते हैं। इन गुण-दोपों की हजारोचना के बाद भी यह अभिलेख अपनो अली की प्रवाहपुर्ण रोचकता, भावमाटा और हृदयग्राहकता के कारण सहदयो को एक लघु गद्यकाव्य का रणास्वादन कराता है। इस प्रकार क्षेत्र में इस अगिलेस की काव्यगत विपदाओं को मूची इस प्रकार दी जा सकठी है । (१) सम्पूर्ण अभिलेख गद्यसली में लिखा गया है। (२)प्रधानतया देदों रीति की विशेषताओं का समावेश दिया गया है। (३) जियाओ का अत्यल्प प्रयोग हुआ है। (४) साधारण शन्दों के माध्यम से ही विषय को समझाने का प्रयास किया गया है (५) उद्देश्य साधारण है किन्तु फिर भी माया में प्रदाह है। (६) कवि को वर्णन-शक्ति और प्रतिभा का आमास मिल रहा है। (७) अलंकारों में पन्दालकार और अर्यालकारों का प्रयोग हुआ है। विशेषकर 'अनुप्रास' और 'उपमा'लकार का। (८) अभिलेन के लेखक का नाम निर्दिष्ट नहीं है किन्तु शैली को विशिष्टता से उच्च कोटि का अनुमान होता है। १९) प्रारम से अन्त तक सरत और समासों का प्रयोग हुआ है। (१.) बलकारसन पर प्रकार पडता है। (११)सधु गकाव्य का नमूना है। टिप्पणी गिरिनगर-काठियावाड में आधुनिक नगर जूनागढ़ का प्राचीन नाम । मीढविधान-डॉ. भगवान सास, इन्दु जी ठया दूल्हर के मतानुसार मोड का अर्थ 'गोमूत्र' है। किन्तु रिल्हॉन के मवानुसार मोडविधान का अर्थ है- कोई ऐसी वस्तु जिसमे बल का निशम हो । मनके अनुसार 'मोई पासो के 'मोस' का समानार्थक है, जिसका वयं गन्दगी होता है। इसी अर्थ में 'सलिय- १८ उत्कीर्णतष-पञ्चरम् विस्तर' में 'मोडगिरि गोबर के ढेर के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । अतः यहाँ पर मोडविधान का अर्थ यह प्रतीत होता है-झील के लिये ऐसा प्रबन्ध, बिस्ने उनमे गन्दगी न आ सके। महक्षत्रप~-पन राजाओं के प्रान्तीय शासकों को उपाधि । कालान्तर में एक राजागग स्वतन्त्र हो गये तथा हिन्दूधर्म को प्रहार लिये। शिलारे दों एव मुद्राओ के अतिरिक्त इस बन्द का उल्लेख सस्कृत-साहित्य म नहीं मिलता। इसका मूल-फारसी "धनप" (चासक) है। संस्कृत के कोचार के अनुसार इस चन्द की व्युत्पत्ति 'क्षत्र पाति इति सत्रप' इस प्रकार की जाती है। प्रार 'सत्रा' चन्द ईरानियो को उपाधि पावन' (प्रान्तीय शासक ) से लिया गया मारम पडता है। क्षार व्यवस्था में यह विषेषता पायी जाती यो कि-प्रत्येक प्रान्त में दो सपप हुआ करते थे। एक महापप योर दूसरा क्षत्रप, ओ प्रायः महारावर शही पुत्र और उत्तराधिकारी होता था। इनका सम्बन्ध बहुत कुछ उसी प्रकार का था, जैमा पिसी प्रान्तीय अधिष्टान का एक समय एक ही अपवा मिन्न स्थानो से शासन करनेवाले राग और युवराज का। भारत के मिन्न प्रदेशों में ऐसे रई पक्षप-राजवरा ये जिन्हें मुदिधानुसार दो भागों म बाँटा जा सकता है । १---तक्षशिला और मथुरा के उत्तरी सर । २--व्या महाराष्ट्र और उज्जैन के पश्चिमी क्षार । महासकर हरदामन का सम्बन्ध उज्जैन के पश्चिम क्षरों से पर। तुपास्फ- स्वरूप की दृष्टि से तो यह गन्द पारसी जान पड़ता है। रिन्नु यह कोई यूनानी चानक पाजिसने पारसी नाम या उपाधि ग्रहम कर लो दो। सभवत मह अधीक वो कर देने वाला शासर रहा होगा। पाली-तटबन्य। सेनुवन्ध-चाप बी बनावट। प्रगाली-पानी बहाने की नाली। राष्ट्रिय-जिला या प्रान्त का शासक (राष्ट्रम अधिकृत राष्ट्रिय )। आवरावन्नि-डॉ० मडारकर के अनुसार यह एक ही सन्द है। इसका वर्ष है मालदा । क्योंकि इसका विशेषण पूर्वार' है जिससे पूर्वी और पश्चिमी का बोध होता है। नहि नगवान लाल, इन्दु जो और रेप्सन के मतानुसार पूर्वी नार तया पश्मिी अवन्ति।
नादामन का प्रतराभिलेख अवन्ति उनी का दूसरा नाम है । आकर सभवत प्राचीन नगर "आगर" (उजनी से उत्तर-पूर्व ४० मील) है। वहाँ से अगरवाल वैश्य उत्पन्न कहे अनूर-नर्मदा नदी के मुहाने का प्रदेश जिसकी राजधानी माहिम्मदी थी, जो कर प्रदेश के माधुनिक मान्याता से अभिन्न मानी जाती है। नोवतु -इस स्थान का ठीक पता नहीं है, किन्तु समवद यह निमार, माना और उत्तरी गुजरात के बीच का प्रदेश, जिसम आधुनिक 'वांसवाडा' मरपुर और अन्य होटे-छोटे राज्य सम्मिलिउ थे, हो सकता है। "नोवृजन- पदो देव " (अमरकोश)। थान -आधुनिक गुजरात का उत्तरी भाग, जिसका मुख्य नगर मानत. पुर या आनन्दपुर ( वतमान बडोदा राज्य के काही प्रान्त में याड नगर ) पा। उलोगो के अनुसार उत्तरी काठियावाड, जिसकी राजधानी द्वारका पो, उससे का एकठा की गयी है। स्वभ्र-रन के मतानुसार साबरमती के किनारे का प्रदेश अर्थात् पुररान । दव मानतं और सौराष्ट्र का अर्थ उत्तरी और दक्षिणी काठिया- वार होगा। सौवोर-कुछ विद्वान सिन्धु-सौवीर को एक ही शन्द मानकर सिन्ध और मुन्नान के प्रदेश को समझने हैं। कुकुर-डॉ. राम महारकर के मतानुसार राजपूनाना का वह माग बिसे हनसांग ने कि-वे-लो वहा है । डा. भगवान् लाल और इन्दुजी के मतानुसार पूर्वी राजम्पान । डॉ० आर० मण्डारकर वे मन से आधुनिक गुजरात, जो गौवमी- पुत्र के नामिक्वाले गुहालेख के अनुसार अपरान्त से अभिन्न है। अपरान्त-गौतमीपुत्र और पुलमादि के समकालीन राम के ज्योतिषी टातेर्मा के अनुसार अपरान्त पार मागो मे बंटाया। समुद्र के किनारे वर्तमान पाना और कोलावा में तथा दो रलगिरि और उत्तर कनाडा जिलों से सरद । बान्तरिक भागों में गोदावरी के कारी माग से सिंचित प्रदेश तपा बम्बई के कामह भापी जिले सम्मिलित थे। महामारत दया माण्डेय पुराण में भी इसो सम्पूर्ण भू-माप का नाम अपरान्त कहा गया है। किन्तु प्रदामन द्वारा अषित कारान्त में माही तपा दमनगमा के दोष का प्रान्त जान पाता है, कोकि उन दिनो उत्तरी म मान्न रावाओं के अधिकार में।
२० उस्कोणलेष-पञ्चकम् यौधेय-ये लडाकू जातियां थी. जिनका उल्लेख दयाकरण पाणिनि ने भी किया है । यौधेय लोग बहावलपुर राज्य के आसपास रहते थे। मालवो के समान इनका भी गणराज्य था। "यौधेयगणस्य जय" इससे अस्ति बनेक गोर ताम्रमुद्रायें गुप्ताक्षरों में अकित तृतीय शताब्दी मे पायी गयी है। इस जाति को समुद्रगुप्त ने भी पराजित किया था । देखिये मरतपुर राज्य के विजयगढ नामक स्थान पर तृतीय शताब्दी का किसी यौधेय राजा का प्राप्त एक सडित शिलालेख। पल्लव-किसी के मत से पह्नव लोग फारस से आने वाले थे जो बाद में बौद्ध हो गये किन्तु अन्य मत से ये भारत के आदि-निवासो थे जो पहले उत्तरी भारत के उस प्रान्त में रहते थे, जिस पर आन्ध्रवध का शासन पा, किन्तु आन्ध्र- भृत्यों द्वारा निष्कासित होकर वे काजीवरम के पास बस गये और उन्होंने यशस्वी पल्लव वय की स्थापना की। सुराष्ट्र-दक्षिण काठियावाड, जिसको राजधानी गिरिनगर है। मह-मारवाह, राजपूताने का रेगिस्तान । निपाद-पथिमी विन्ध्य और अरावली की पहाड़ियो। यथार्थहस्तोच्छ्य- "तासीन स्थितो वापि पाणिमुघम्यदक्षिणम् । विनीतवेषामरण पश्येत् कार्याणि वापिपाम् ।। (मनु०८-२) विष्टि वेगार प्रणयक्रिया-श्रमदान अयदा उपहार । MOCK . (२) महाराजचन्द्रस्य मेहरौली-लोहस्तम्भलेखः यस्योदनयत प्रनीपमुरमा गन् समेत्यागतान वनेप्वाहववर्तिनोऽभिलिखिता खड्गेन कीति जे । तीवा सप्त मुखानि येन ममरे सिन्धोजिता वालिका यम्याधाप्यधिवास्यते जलनिधिार्यानिलदक्षिण ॥१॥ संगाल प्रदेश में एक साथ मिलकर आक्रमण करने के लिये आये हुए पत्रओं को समर-भूमि मे वक्षस्थल के बल पौछे ढकलले हुए जिस ( चन्द्र ) की मुजा पर दलदार से पच लिया गया अर्थात् दुश्मनों को तलवार के प्रहार मे लगी पाव जिसकी मुजा पर कोनि पक्ति के समान लग रही थी। जिसने सिन्धु नदी की सात पापा को पार कर वासीक देश को जीना। जिसके प्रवापरूपी पवन से दक्षिा समुद्र आज भी सुशोभित हो रहा है ॥१॥ खिमस्येव विमृज्य गा नरपतेर्गामाश्रितस्येतरा मूर्त्या कर्मजितावनी गनबत कीर्त्या स्थितस्य क्षिती शान्तम्येव महावने हुतभुजो यस्य प्रतापो महा- भाद्याप्युत्सृजति प्रगाशितरिपोयलस्य शेष क्षिनिम् ॥ २ ॥ जो बहुत दिनों तक पृथ्वी के मार को बह्न करते-करते पके उसे छोडकर दूसरे लोक बाद स्वर चला गया है। जो पार्थिव शरीर से अपने मुकर्मों द्वारा स्वर्गलोक को जीतने के बाद वहां पहुंचकर भी अपने पच परीर में पृषी पर निवास करता है। विद्याल कानन में शान्त हुई दावाग्नि के समान मानो विनष्ट करनेवाले निस ( चन्द्र) के प्रपलो का स्मारक र महान प्रकार मात्र मो इस माडल को नहीं छोडता है ॥ २ ॥ प्राप्तेन स्वमुजार्जित च मुचिर चंकाधिराज्य क्षिती चन्द्राह्वेन समग्रचन्द्रसदृशी वश्रिय विभ्रता। वेनाय प्रणिधाय भूमिपतिना घावेन विघ्यो मनि प्रान्दविष्णुपदे गिरी भगवतो विष्णोध्वंजः स्थापित ॥३॥ के समान २२ उकोपरख-पञ्चरम जिसने इन वनु पग पर अपने दल ने आस्ति एकाधिन का द दिनों तक उपभग किया, पूचर २ ममान अपनी मुख-शामा का पारा कराने- वाले बोर 'पद्र" नाम से प्रसिद्ध उस शुद्ध हृदय राजा ने दि भगवान में श्रद्धा रखकर विपद' नाम के पर्वत पर भगवान विष्णु की इस मनु वरा की स्थापना की ॥३॥ अमिलेस का ऐतिहासिक महत्व दिल्री म ९ मील दक्षिण महरौरी नाम दे एव में विद्यमान एक लोह- स्तम्भ पर यह अभिलेख चोपं है। इसम दिएर सस्तृत छन्दों तथा पाचनों पदा ई० वी कालान नाग म 'चन्द' नाम द रिमी सम्राट् का दिन- यात्रा का वृत्तान्त मिलता है। मिरेन में लिपि तथा 'चन्द्र' राजा के व का उल्लेख नही हने र कारण पुराउन्द-दत्ताओं में सारी मदभेद है कि प्रयन्ति का दिग्विजता चद्र' कौन है ? रघु न म देवल मुस्वास इतना ही बातों का सरत मिलता है कि चन्द्र नामर स्मिा राजा न बङ्गाल में सतुओं को पराजित किया और सिधु कसम मुखी व्यका रुत-बालाओं का पार कर वाहणे पर बारमण कर उन्ह भो परास्न दिया और अरत बाहुबल न पृप्दी का 'एना- पिपत्य' पास करने दीर्घकाल तक उसरा उपमा निन्दा अमिरे fTR- म्पद दिमृज्यमा नरपत माचिस्पनराम्' इन द्वितीय लगेर 'इन्द निधनोपरान उन्का ति जान का अनुमान किया जाग है। अमिरेस का उद्दश्य विष्णुपद नाम २ पवंत पर, सम्भवत दिल्ली की पहाडी का नामा विष्णध्वज नीम्पापना की स्मृति बराना था। अभिरखम निर्दिष्ट चद्र निर्धार मे मुस्थत एतिहासिक के निम्न. रिदिन विचार दृष्टिगोचर हाल हैं। (4)"पर 'गुस सम्राट् चरगुप्त प्रपन । इस अमिनम 'पद्र' म गुत सम्राट् चरगुम प्रथम रे समीकरण में कार. जी. वसार, पनाट तथा डक्टर कृष्णस्वामी डायगर रामत है मिगुरु मान ज्य का सर्वाम महाराजाधिराज व गुप्त प्रपन पा। अभिरेन्च में वनित "सेन स्वमुजारित च मुचिर शधिराज्य शितो" यह कि इसकी पुष्टि में पान है। समुद्रगुत की प्रयाग प्रशस्ति में बगाल का निर्देश नहीं हान रा उपयोग दे रोग इस तरह करते हैं कि F-गुर प्रथम ने ही बगाल आदिको और रियापा, जिमको कसको मेटने तमोपी महाराज चन्द्र का तोहस्तम्भलेख २३ फ्नोट महोदर का इस एकीकरण में यह तर्क है कि इस अभिलेख को लिखा- बट प्रपाल की प्रगति ने पूर्व की प्रोड होता है। फिन्नु सक्त विचारधाराओं को आलोचना इस प्रकार की जाती है मुरुकालोन सेव टया मिक्सो के आधार पर यह निथित रूप में ज्ञान होता है कि चन्द्रपुर प्रपन का राज्यकाल स्वल हो पा (समरत. ई० ३२० से ३३५ ई.)। इसलिये प्रस्तुत अभिलेख के एकाधिकाराज्य' का चन्द्रगुम प्रयम के लिए प्रयोग समय नहीं जान पहना। "ममुद्रगुप के जिा चन्द्रगुइ प्रयन ने बगाल. दसिम तपा उतर-पथित भारत पर विजय प्रात किया या" इन बात का ऐति- हाविर प्रनाम नहीं प्रात होता है। वन्तुन. सर्वप्रथम विनर-यात्रा करने का श्रेय तो सन्दमुन को हो मिला है। पुराणों में वर्णित 'अनुराग प्रभाग च' से तपा प्रचार-प्रसास्ति से पह मान होता है कि समुद्रगुप्त के पिता का राज्य पाइलिगुन से प्रकार के बीच मङ्गा को पाटो में मोमिन का। अमिनेम का 'चन्द्र' सिन्यु नदी को पार कर बाह्रोक को भी पराजित करने वाला है । अत. इस समीकरण में चन्द्रगुन प्रयन की अधिकार-सोमा सिन्म तक मानना पडेगा किन्तु इस बात में कोई भी ऐतिहासिक प्रमाा नहीं। बत इस अभिलेख के 'चन्द' की ममता चन्द्रगुरु प्रयम से करना सपा बसन्त है। (स) पण्डित हपसाद सान्त्री और राखाल दास बनी इस अमिलेष के 'चन्द्र' को रमाल में रानोगन के पास स्थित मुमुनियो शिलालेख का चन्द्रवर्मन मान हैं, किन्तु इस समीकरन में वप्पपूर्ण प्रमान नहीं है, अतु. यह मो शमीच ही है। मुमुनियो शिलालेस के पन्द्रवर्मन के विश्व में विद्वानों ने यह अनुमान सागरा है कि इसकी ममता प्रयाग-स्वन्म में निर्दिष्ट चन्द्रवर्मन से है जो मपार के अन्यान्य शासकों के माप सनुदगुरु द्वारा पराजित हुआ था । साप हो मुनिकों के पिलालेज में चन्द्रवर्मन 'महाराजा' कहा गया है, जर कि महरोली में 'चन्द्र के लिये 'अपिरान' पुल हुआ है। बन अभिलेय के 'चन्द्र' को सजा बन्दवनन ने समद नहीं। (म) दिन्चेष्ट निप, दाण्डेकर और दिनराचन्द सरकार प्रभृति विद्वान पन्द' को निधिन सपुत सम्राट चन्द्रपुर हितोर शिमादिर मानडे हैं । इस ममीकरण में निम्नलिखित बातों को प्रमाकोटि में गाया जाता है :- (१) पन्दमुह द्वितीयका नाम अपना उपनाम केवल 'चन्द्र' के स में उम्के वि के दिनों में भी मिलता है। जिस प्रकार गिरामादि के लिरं विन - महाराज चन्द्र का महत्वम्मद २५ हिर उगला हो, जिनको चान करना चन्द्रगुज दिवार को आवश्यक हो गया हरिवका उल्लेब इन अश्लेिव ने मित्रता है। इन पूर्दोक प्रमानों के आधार पर जिनान स से प्रस्तुत मझिलख के 'चन्द्र' को माना गुन मम्राट् द्वितीय चन्द्रमुन दिशमादित्य से ही कला न्यायसंगत प्रत होता है। सम्राट चन्द्रपुर के निधनोरान्द अभिलेख दे उत्तीनं होने का स्पष्ट संकेत निम्न में डॉक्टर सरकार का यह अनुमान दिनाल महो बान पडता है कि स्टम समतः चन्द्रगुप्त द्विवीर ने अपने जीवन-कार की अनिम वेला में गाया पा और उस पर माने पिता के दिवस्त होते हो कुनारगुः प्रपन ने लेख उस्को करा दिया। अन्तु, अन्ड प्रागों माधार पर चन्द्रगुड और 'पद्र' के समीकरण की सदा से इस अभिनेस के द्वारा दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उप निकल पाने हैं :- (१) बमार ने जो भारत के दीयकानीन इतिहास में निरन्तर विद्रोह का पर सवाटिक सन रहा है, चन्द्रगुज द्वितीय के विद अपना दिर उटापा या स्नुि उसके द्वारा वन दिया गया। (२)चदा दिनीय ने उत्तर-पथिनी प्रदेश में एक ओर मुपागों की रा-सची पति की नट र सिा दिने समुद्रगुरु बरतः ही नर कर सापा। “एनेन' के अनुसार वाहीकों का प्रयोग सामान्यामा विदेशी आक्रमणकारियों के अर्थ में स्पिा गया है। चननुज दिवीय के द्वारा विगुपर पर्वत पर दिगम्वर को निहित करने का रहस्य इस ऐतिहानिक दम से भी सम्बन्धित जान पाना है कि जब रामगु भको के दाय कहीं हिमाल दुर्ग में घेर लिया गया और नवर मानी महारानी अबदेवी से समय कर अरनी जान बचाने की रदस्तकारको दो इस अपमान को महन नहीं कर रामपुर का छोटा भाई 'चन्दनु' हिनी प्रादेवो के देश निको सहिद या शिविर में पा और बह पर अले प्रवेश म्हरहों के दाप काराब को मारकर बन्द वंश नदी स्वामी शराजों को पराजित किया सम्मान विउ हिमालय दुर्ग में 'पद्रगुप' ने संपन करार को हक की रही दिनपर नारद है मा. वहीं पर मनीवर के मारक केस में दिनभर की विद्या की होगी।
उत्कीर्णलेख-पचपन अभिलेख का साहित्यिक महत्त्व यद्यपि इस सपुराय अमिटेख में किसी साहित्यिक वैशिपमा अन्वेषण तो प्रयाससाध्य ही होगा तथापि 'यदुपलब्ध तदेव सम्भावनीयम्' इस न्याय से इमवे उस यश का भी विवेचन अपेक्षित ही है। देवन दीन दलोरों में यदि ने शार्दूलविक्रीडित छन्द मे 'चन्द्र' की विजय यात्रा का वर्णन किया है। यह छन्द संस्कृत पद्य-गगा का वह सेतु है जिसके सहारे रिसो भो भाव या रजको उत्तारा जा सकता है। इस प्रशस्ति का अज्ञात यदि राइविषयह अपने रनिभाव को इस छन्द के माध्यम से व्यक्त करने में मपल नजर आता है। जही तर अलरा का प्रदन है उममे यद्यपि कवि की विशेष रुचि नहीं प्रतीत होती फिर भी तीली पदों मे पर, प्टोका और उपमा जचे पालकारों की हलकी मनोरम झांकी तो मिल ही जाती है। प्रथम दलोर में कवि ने राजा के पराक्रम पर वायु वा आरोप किया है 'वीर्यानिलंदक्षिण"। इसी प्रकार दूसरे दलोक में "खिन्नस्यैव विमृश्य गा नरपते " इस उक्ति में राजा के दिवगत होने की कवि इस प्रकार उत्प्रेक्षा करता है मानो पृथिवी का भार सहन करते- करते पक कर दूसरी भूमि को ( स्वर्ग को) चला गया है। इसी दलोर में "शान्तस्यैव महावने हृदमुनो यस्य प्रतापो महान्" इस तृतीय चरण में कवि ने राजा के द्रोप से शान्त हुए शुओं को उपमा महादन की उस आग से दी है वो उसे जला कर शान्त हो जाती है। यहाँ पर राजा के कोष की उपमा वनाग्नि से भी दी जा सकती है। इस प्रकार इस स्रोक में उपमा और उत्सा की ससृष्टि देसने ही योग्य है। अन्तिम श्लोक में भी "समग्रचन्द्रमहरी वर्षिय शिभ्रता" में राजा के मुख की चोभा की उपमा पूर्ण चन्द्रमा से दी गयी है। इस प्रकार कवि अलकार-योग्ना का निर्वाह कर बलकार-मास्त्र की भक्ति का भो परिचय देता नजर आता है। जहां तक गुण और रीति की बात है उसमें रवि प्रसाद गुण और पाञ्चाली रीति ने छोरों से छूता हुआ नजर आता है । दिग्वजय का वर्णन प्रसग होने पर मो कवि ने सरल तपा असमस्त या लघु पदों का प्रयोग पर पच को प्रवाहमय बनाने का सफल प्रयास किया है। राजाना पुण्यकम के द्वारा स्वर्ग से प्राप्त करने मी यशायरीर से पिवी पर विद्यमान रहना और पत्रुको विनाच के गर्त में ढरेल कर भी उसके प्रताप का उसके कृत्यों के स्मारस रूप में पृथिवी को नहीं छोड़ना, ये दोनों उक्ति-वैचित्र्य सहृदय के मानस- पल को एसा लेते हैं। इस प्रसार हम देखते हैं कि इस छोटे से गाय रोवर २७ महाराज चन्द्र का लोहस्तम्भलेज मे मी कवि ने अपनी काव्यप्रतिभा का मुन्दर परिचय दिया है। केवल अभिलेख के अन्तिम भाग में 'प्रागुः' के स्थान मे 'प्रान्दा' यह पाठ चिन्तनीय है क्योकि नकार के स्थान में अनुम्बार को ही औचित्य प्राप्त है । प्रायु. का व्युत्पत्ति-लम्य अयं है-प्रकृष्टा बरावो यस्य असौ प्रांशुः । यहां पर असु शब्द अवयव-वाची है। हो सकता है कि अपने मूल रूप में अनुम्वार रा ही पाउ रहा हो बाद में यान्त्रिक या अन्य किमी कारण से नकार का पाठ हो गया है। टिप्पणी वाह्निका.--इतिहास-देताओ मे इस पद के उच्चारण में मवभेद हैं । कुछ लोग 'वाहीक' कुछ 'बाहीक' और कुछ 'वाह्निक' कहते हैं। कुछ लोगो का मन है वि मूल रूप में 'वाहिक' नही वाहीन' पाठ है किन्तु इस श्लोक म छन्द के अनुरोध से हम्ब होकर 'वालिक हो गया है । यही युक्तिम गव जान पडता है। कुछ ऐतिहासिक 'वाहोक' सन्द का अर्थ आधुनिक 'बन्स' देश का प्राचीन नाम करते हैं तो कुछ लोग पजाब के रहनेवाले जाति विप, जिनका निवास. स्थान आधुनिक बंक्ट्रिया या बल्ल करते हैं। यही मत उचित प्रतीत होता है । देखिरे- "पचानां सिन्युपाना नदीना येऽन्तरे स्पिताः । तान् धर्मबाह्यानगुचीन वाहीकानपि वर्जयेत् ॥" (महाभारत) सिन्धोः सप्तमुखानि--क्योकि निम्नलिखित सात नदियों के मार्ग से समुः जल का आधान करता है, अत: मुंह के समान होने से इन्हें 'मुसानि' कहा गया है। इन सातो के ये नाम है-नदु, विपासा, इरावती, चन्द्रभागा, दिवस्ता, सिन्धु और कुम्भ। दक्षिण: जलनिधिः-इस सन्द से कुमारी दीपं और मिहलदीप से दक्षिण के सागर को, रिसे आजकल मारतीय महासागर कहा जाता है, संकेटित किया गया है।
२८ उनीख-पञ्चान मुचिरं-इस सन्द से यह वनित होता है कि विस्तृत साम्राज्य को प्राप्त करे नि दोशात तक नापार करना पड़ा। चन्द्रगुत प्रम को दाराटों के विरुद्ध दई सम्बे समय तक मोर्चा रेना पडा था। इन दामाटरों को शक्ति बडी तेजी से पश्मि में बरती जा रही पी, समदत सामाग्य-दिम्दार के याकामी क्षत्रों ने राजपुरषों को प्रतियोगिता में धावेन-दुछ लोग इस स्पान में मारेन' परते हैं किन्तु प्रामापिर पुरातत्त्ववेत्ता लोग "देन" से हो सही मानते हैं । “पाव" शब्द के मी दो अपं रिप जाते हैं कुछ विद्वान दो इसे महाराव 'चन्द्र' का दूसरा नाम कहते हैं। किन्तु सापटर आपपर इनका करते हैं । "पवित्र विचारदाला" और इसे 'मितिना' के विशेषन के रूप में प्रयुक्त मानने हैं। यही नद्र मुन्गित - - भी है। विष्णुपदे निरौ-मावान दिन के पदचिहाँ से अजित पवंत र। यह स्पान कुरुक्षेत्र के समीप ही है। देखिदे- "तद्विार नाम इवे तीर्यमुतरम् । एषा नदी विभाग व नदी परमसावनी"" (महाभारत) (३) कुमारगुप्तस्य मन्दसौर (दशपुर) शिलालेखः (मालव संवत् ५२९) सिद्धम् । यो वृत्यर्थमुपास्यते मुरगणैः सिद्धेश्व सिद्धार्थभि- निकाप्रपरंविधेयविपर्योक्षाभिर्योगिभिः भक्या तीव्रतपोधनश्च मुनिभि गापप्रसादक्षम- हेतुर्यो जगतः क्षयाभ्युदययो पायात् स वो भास्कर ॥ १ ॥ सिद्धि हो। भगवान सूर्य आप लोगों को रक्षा करें, जो ससार के उदय और अस्त के कारण हैं, जो देव-ममूह, यौगिक सिद्धि के अमिलाषी सिद्ध-गण, निरन्तर ध्यान- मग्न सयमी और मोक्षार्थी योगि-गण, वरदान और शाप देने में समयं कठोर तपस्या करने वाले मुनि-गण, के द्वारा भक्तिपूर्वक पूजित होते है ॥ १।" तत्त्वज्ञानविदोऽपि यस्य न विदुब्रह्मर्पयोऽभ्युद्यता. कृत्स्नं यश्च गभस्तिभि. प्रविसृते पुष्णाति लोकत्रयम् । गन्धर्वामरसिद्धकिारनरः सस्तूयतेऽम्युत्थितो भोम्यश्च ददाति योऽभिलपित तस्मै सवित्रे नमः ॥२॥ उस सूर्यदेव को नमस्कार है, जिनके वास्तविक स्वरूप को तत्वज्ञान को जाननेवाले और साधना में तत्पर ब्रह्मर्षि गण भी समझने में असमर्थ हैं, जो अपनी फैली हुई किरणों से समस्त त्रैलोक्य का पोषण करते हैं, जो उदित होते ही गन्धर्व, देवता, पितर, सिद और मनुष्यों के द्वारा प्रशंसित होते हैं और जो अपने भक्तो के मनोरफ को पूर्ण करते हैं ॥२॥ यः प्रत्यहं प्रतिविमात्युदयाचलेन्द्र- विस्तीर्णतुङ्गशिस्तरस्खलिताशुजाल: । क्षीवाङ्गनाजनकपोलतलाभिताम्रः पायात्स वः मुकिरणाभरणो विवस्वान् ॥ ३॥ १
कुमारगुप्त का मन्दमौर शिलालेख
विलोलवीचोचलिनारविन्दपतद्रजापिञ्जरितश्च हसः।
स्वसरोदारमरावमुग्नं क्वचित्लरास्यम्बुरहेरच भान्ति ॥ ८ ॥
और कहीं चल लहरों से कम्पित कमल के हुए पराग से पीतवर्ग-
ने हसा से और अपने पराा के पूांभार में नम्रीभूव कमलो से सरोवर सुयो.
भित हैं ॥८॥
स्वपुष्पमारावननैनंगेन्द्रमंदप्रगल्भाल्कुिलस्वनश्च
अजस्रगाभिश्च पुराङ्गनाभिर्वनानि यस्मिन् समलकृतानि ॥९॥
रिस मालव देश के दयपुर नगर के उपदन-प्रसूनच से अपना तरुवर,
सदमत्त मधुनों के गुमन तथा निरन्तर सचरणगोल पुरनारियो से अलकृत हैं ॥९॥
चलत्पनाकान्यबलासनायान्य यर्यशुक्लान्यधिकोनतानि ।
तडिल्लनाचित्रमिताभ्रकूटतुल्योपमानानि गृहागि यत्र ॥१०॥
जिम दगार के भदन-पहराते हुए शहा से, कोमलाङ्गी लननाओ से,
और चे-ऊँचे श्वेत शिखरो से एसे मुशाभिव हो रह हैं मानो विद्युल्लता की
डि से रंग दिरीगने हुए वेव मेघ के टुकडे हा ॥ १०॥
कैलासतुङ्गशिस्त्रप्रतिमानि चान्या-
न्याभान्लि दोघंबलभोनि सवेदिकानि।
गान्यवंशब्दमुखराणि निविष्टचित्र-
कर्माणि रोल्कदलीवनशोभितानि ॥११॥
रिस दयपुर के मदन-लास पर्वत के गगनचुम्बी पिसरो के समान बडे
ऊचे-के छन्दो चबूतरों तपा मुन्दर चित्रों से मुशोभित थे, और जिन भवनों के
कोदान लहलहाते कदली-दमों से द्योमापमान पे ॥११॥
प्रासादमालाभिरलक्तानि घरा विदायें समुत्थितानि ।
विमानमालासदृशानि यत्र गृहाणि पून्दुकरामलानि ॥ १२॥
वहाँ के भवन पूर्ण चन्द्र की किरणों के सहा स्वच्छ हैं, और मजिसकी
परम्परा मे अलकन ऐमे लक्षिउ हो रहे हैं मानो पृथ्वी को फाडकर सर उठ
विमानों की पनि हो। १२॥
पदभात्यनिरम्यसरिपन चपलोमिया समुपगूढम् ।
रहसि कुचसारिनोन्या प्रोतिरनिभ्या स्मराङ्गमित्र ॥ १३॥
ज्योतिष पञ्चम चंदल नहरोदाती दो नदियों से घिरा हादह नगर ऐसा कर रहा' मानो रोज वाहिनी प्रीति और रवि नान की दोनों त्रिों ने सान्त. बाङ्गिट होता हा कामदेव का शरीर हो। १३॥ सदसनादनगनबाशीच- स्वाध्यायवृत्तदिनपयितिबुद्धयुपेनः । विद्यातपोनिधिमिरम्मतिश्च दिन- वंद भाग्ते ग्रह खनिद प्रदीरः ॥ १४ ॥ सन्नाई, म्हनमोलता. सपन, शान्ति, नियन, दिवटा, पीरटा, दामा सरलग, दिनपोरदा, निदरता और तात्र बुद्धि आदि गुणों के पन्त, दिशा . दर के पनी, निमान-रहित दाह्मणों से परिपूर्ण दह नगर बनाते हुए नक्षत्रों के नरपूर आकार के समान हो रहा है । १४॥ व्य समेत्य निरन्तरनगर्नेरहम्हः प्रविन्निनौदाः । नृपतिमिस्नुउदद प्रतिमानिता अनुदितान्ददमुन्त नुखं पुरे ॥ १५ ॥ इसके सद, अनवरत पाररिक जम के कारण दिनानुदिन बढती हुई मिता से मुक्त बोर राजाओं द्वारा पुत्र के सर सम्मानित अत एव प्रचित, रित्तोषण सुखपूर्वक उस नगर में रहने सने ॥ १५ ॥ श्रवनुभगे गान्धर्वज्ये दृढ परिनिटिताः मुवरितगतासङ्गाः देचिद्विचित्रकथादिदः । विनपनिता सम्बन्धमप्रनगरापना: प्रिपर पच्चं चान्ये क्षमा दहु नापिनुन् ॥ १६ ॥ उन शिलियों में से कुछ लोग कानों को मुख पहुंचाने दादी संगीत दिपा में पूर्ण रूप से निप, छ लोग ऊरडों मुन्दर परिदों दाटी दिचित्ररपाारे गगनबार , दुरा रोग दिनोट का एव गत स्वाद के दे, कुछ लोग सवाई मार्मिक प्रसंगों में प्रयोग ये और दूहरे टोग मुखर, कोट और हिदकारी वचन दोरने में अठि रुप६॥ १६॥ चित्त्वरमपिताम्नपान्तविज्ञापन ज्योविपनारनवनिः । क्यापि चान्य नमप्रगना. बुदन्तरोगानतिं प्राह ॥ १७॥ इनमें से दृधरितो र कुनने के अपने कार में दिसात, कुमारगुप्त का मन्दसौर शिलालेख -संयमी लोग ज्योतिष-गास्त्र के मनं थे और रणभूमि मे धैर्यशाली कुछ र हटकर शत्रुओं का सहार करते थे ॥१७॥ का मनोजवषः प्रथितोस्वंशा वशानुरूप चरितामरणास्तथान्ये । बद्रताः प्रभाविनामुपकारदक्षा विश्रम्भपूर्वमपरे दृढमौहृदाश्च ॥ १८॥ उनमें से कुछ लोग बुद्धिमान, सुन्दर शरीर वाले, विख्यात और उच्चकुल जे, कुल के अनुकूल आचरण रूपी अलार वाले, सन्यपरायण, प्रेमियों के कार में कुशल और विश्वासपूर्वक दृढता से मित्रता को निभाने वाले ये ॥१८॥ जितविषयमङ्गमंशोलेस्लथान्यदुभिरधिकसत्त्वलोकयात्रामरश्च । बकुलतिलकभूनर्मुक्तरागैल्दाररधिकमभिविभाति श्रेणिरेव प्रकार' ॥१९॥ इस प्रकार उन शिल्पियों का समूह-सासारिक विषयों को बीउने वाले F, कोमल स्वभाववाले, अन्यधिक शक्तिशाली लोक व्यवहार मे देवता के मन, अपने कुल में तिलक स्वरूप, वासना से रहित और उदार प्रकृति के लोगों अत्यधिक मुगोभित था ॥ १९॥ तारप्पकान्त्युपचितोऽपि सुवर्णहार- ताम्बूलपुप्पविधिना समलकृतोऽपि । नारीजन: श्रियमुपैति न ताददग्रया- पावन पट्टमयवस्त्रयुगानि धत्ते ॥ २० ॥ बच प्रयुक्त सौन्दर्य से सम्पन्न होने पर मी, सोने के हार, ताम्बूल और नामरों से प्रसाधित होने पर भी वहाँ की लतनायें तब तक परम शोमा को हो प्रात करी जब तक रेशम के युगल वसनों का परिधान नहीं कर टीपी॥२०॥ स्पर्शवता वर्णान्तरविभागचित्रेण नेत्रसुभगेन । पैः सकलमिदं मितिलमलड्कृतं पट्टवस्त्रेण ॥ २१॥ उन शिल्पियों ने सूने म मुलायम, भिन्नभिन्न रगों के समुचित विभाग से १.साट देश के रेशम बुनकर, पो दरापुर के राजा के गुणों ओर नगर परमगोपता पर मुग्ध होकर वहाँ चले आये थे और अनेक प्रकार के व्यवसाय हमत हो गये थे। इससे यह सह प्रतीत होता है कि उस समय जातिगठ रसायको परम्परा नहीं हो पानी पी।
.. A उत्तीलेख-पञ्चरम् अद्भुत और नेत्रों को आनन्दित करने वाले रेग्मी वस्त्रों ने इस सम्पूर्ण पृथ्वी सुमज्जित कर दिया था ॥ २१ ॥ विद्याधरोरुचिरपल्लववर्षपूरवातेरितास्थिरतरं प्रविचिन्त्य लोकम् । मानुप्पमर्थनिचयाश्च तथा विगालान्तेषा गुभा मनिरभूदचला ततस्तु ॥२॥ विद्यापरियों के सुन्दर, पल्लवनिर्मित और वायु-प्रेरित अत एव पचर कर्णाभूषण के समान इस मत्वंलोर को सपनगुर समझ कर और जाने पर समूह को विशाल मानकर उन शिल्पियो ने करने मन में हिंदवारी और निश्चय (मूर्यमन्दिर निर्माण करने का)र लिया ।। २२ ।। चतु समुद्रान्तविलोलमेखला सुमेरुबेलामवृहत्पयोवराम् । वनालवान्तस्फुटपुष्पहासिनी कुमारगुप्ते पृथिवी प्रगामति ।। २३ ।। चारों समुद्रों के तट ही जिसकी चचल करधनी, मुमेर और लार हो उन्नत उरोज हैं, विपिन पयो में गिरे हुए विकसित सुमन-समूह हो जिसके हार है, उस वमुन्धरा ( भारतवर्ष ) पर जब कुमारगुह प्रशासन कर रहे थे । उन्होंने 'विश्ववर्मा' को राज्यपाल बनाया" अग्रिम श्लोर से सम्बन्ध-)॥२३॥ समानधी. शुक्रवृहस्पतिम्या ललामभूतो भुवि पार्थिवानाम् । रणेषु य पार्यममानवर्मा बभूव गोता नृपविश्वकर्मा' ॥ २४ ॥ (कुमारगुप्त के राज्यपाल में ) राजा विश्ववर्मा "राज्यपात" निपुर रिया गया । वह विश्ववर्मा बुद्धि मे वाचार्य और बृहस्पति दे समान था, पृष्व भर के राजाओं में गिरोपण के समान था और समरभूमि में पार्य के समान पा॥२४11 दीनानुकम्पनपरः कृपणानंवर्गमान्लप्रदोऽधिक्दयालुरनायनायः । कल्पद्रुम. प्रणयिनामभयप्रदश्व भीनम्य यो जनपदस्य च वन्धुरामोन ॥२५॥ वह विश्ववर्मा-दोनों पर दया परने वाला, दरिद्र अत एव दुसी लोगो सान्त्वना प्रदान करने वाला, असाधारण दयाल, वनाश्रितों को बाय देने वाला मित्रों के लिये क्ल्पवृक्ष के समान, भयभीत लोगों को अभप दान देने वाला को प्रजा-जनों में भ्रातृ-माद रखने वाला पा ॥ २५ ॥ १. सम्राट् कुमारगुष्ठ के राज्यात में नर विश्वकर्मा मन्दसौरमा स्थानी शासक था।
कुमारगुप्त का मन्दसौर शिलालेख का त्रिपात्र था, तस्यात्मज. स्थैर्यनयोपपन्नो वधुप्रियो बन्धुरिव प्रजानाम् । बन्ध्यातिहर्ना नृपबन्धुवर्मा, द्विड्दतपसक्षपणकदमः ॥ २६ ॥ उसका सका राजा बन्धुवर्मा हुआ। वह दृढ एव नोनिमानु था, बन्धुदर्ग प्रजावती के लिए माई के समान या सम्बद्ध लोगों के दुखों को दूर करने वाला था और शत्रुओ एव अहवारियों के समुदाय का सहार करने में यदिनीय निपुण दा || २६ ।। कालो युवा रणपटुविनयान्वितश्च राजाऽपि सन्नृपसृतो न मदै. स्ममाये । शृङ्गारमूनिगभिभात्यनलकृतोऽपि रूपेण यः कुसुमचाप इव द्वितीयः ॥ २७ ॥ वह ( बन्धुवर्मा ) अमिराम, तरुण, युद्धनिपुण और विनीत पा, सर्वसंपन्न गमक होता हुभा भी अहकार आदि दुर्गुणो से रहित था, आभूषणों के अभाव में को मङ्गार वी साक्षात् प्रतिमा के समान शोभित हो रहा था अत एव सौन्दर्य में मानो दूनरा कामदेव ही या॥ २७ ॥ वैवव्यतीत्रव्यमनक्षताना स्मृत्वा यमद्याप्परिसुन्दरीणाम् । भयाद् भवत्यायनलोचनाना पनन्ननायामकर प्रकम्मः ॥२८॥ जिन (या-मूदन बन्धुवर्मा ) के स्मृति-जन्य भय से आज भी वैधव्य की श्चिम वेदना से व्यपिठ विशालाक्षी वैरि-वन्धुपा के पीन कक्ष म्पल में क्लेश- रकम्पन उत्पन्न हो जाता है ।। २८॥ तस्मिन्नेव क्षितिपतिवृषे बन्धुवर्मप्युदारे सम्यक्स्फोतं दरापुरमिद पालयत्युनतासे । शिल्पावाप्तधनसमुदयः पट्टवायरुदार श्रेणीभूतभवनमतुलं कारित दीप्तरस्मेः ।। २९ ॥ राजाओं में श्रेष्ठ, उदार और उन्नत सन्ध वाले उस बन्धुप के द्वारा समुदयपुर के गुबार मापन में ही-शिल्प-सन्य द्रध्यरागि से सम्पन्न शिल्पियों ने समवेत रूप से भगवान भास्कर का अनुपम एवं भव्य भवन बनवाया ॥ २९ ॥ विस्तीगंतुझशिवरं शिखरिप्रकाश- मम्युद्गतेन्द्रमलरश्मिकलापगोरम उत्कीर्ण लेख-पञ्चकम यद् भाति पश्चिमपुरस्य' निविष्टकान्त- चूडामणिप्रतिसमं नयनाभिरामम् ॥३०॥ पवंत सहर आयत और उन्नत शिखरो से युक्त, उदीयमान चन्द्र के विमल भ-जाल के सदृश उज्ज्वल, पश्चिम देश की राजधानी दशपुर में पटिन रुचिर चूडामणि के समान, नेत्रो को मुग्ध कर देने वाला वह मन्दिर घोमायमान था ॥३०॥ रामासनाथभवने दरभास्करागुवह्निप्रतापमुभगे जललोनमीने । चन्द्राशुहर्म्यतलचन्दनतालवृन्तहारोपभोगरहिते ह्मिदग्धपने ॥ ३१॥ (जिस ऋतु मे ) केलिभवनो मे पति-पत्नी का मिलन होता रहता है, सूर्य की मन्द किरणें और अग्नि का तेज प्रिय लगता है, महलिया बल के भीतर ही छिपी रहती हैं, महलो का चन्द्र-किरण के समान शीतल निचले सण्ड, चन्दन, पसे और हार आदि का सेवन नहीं किया जाता है, हिमपात से कमल मल जाते हैं ( उस हेमन्त ऋतु मे -दलोर ३४ से सम्बन्ध ) ॥३१॥ रोधप्रियगुतस्कुन्दलताविकोशपुष्पामवप्रमुदिनालिकुलाभिरामे । काले तुपारवणशशीतवातवेगप्रनृतलवरीनगणकशाखे ।। ३२ ॥ जो लोन और प्रियगु वृक्षों के, कुन्द को लतामा के,-विकसित पुप्पों के मघुपान से प्रफुल्लित मधुर निकर-गुञ्जन से मनोरम रहता है, जिसमें हिमकण-मिश्रित अत एव तीन एव गोठल वायु के वेग स वान्दोलित 'लवली' और 'नगण' नामक पुष्प-विशेष की शाखा को योमा अपूर्व हो जाती है ( उस ऋतु में-दलाफ ३४ से सम्बन्ध ) ॥ ३२ ॥ स्मरवशगतरणजनवल्लभाङ्गनाविपुलकान्तानोर- स्तनजघनघनालिङ्गननित्सिततुहिनहिमपाते ।। ३३ ।। (जिममे ) कामामिमृत युवक वृन्द अपनी-अपनी प्रेयसी वे पृथुल, मनोहर मोर पोन जपो, कुचो और पेटुप्रो के गा. आनिगन से अति शीतल हिमवर्षण" रोमी तिरस्कृत कर देता है ( उस ऋतु मे-दलोर ३४ से सम्बन्ध ) ॥ ३३ ॥ १. दरपुर को ही परिमार कहा जाता था। क्योकि उस समय यह त्या भारत रुपमा माना जाता था। .
कुमारगुप्त का मन्दसौर शिलालेख ३७ मालवाना गणस्थित्या याते शतचतुष्टये । विनवत्यधिकऽब्दानामृतो सेव्यधनस्वने ।। ३४ ॥ मालव-संवन की गणना के अनुसार चार सौ तिरानवे वर्ष बीत जाने पर- बादलों के गर्जन से अच्छे लगने वाले हेमन्त ऋतु मे ( मन्दिर की प्रतिष्ठा हुई- श्लोक ३५ से सम्बन्ध ) ॥ ३४ ॥ सहस्यमामशुक्लस्य प्रशस्तेऽह्नि त्रयोदशे। मङ्गलाचारविधिना प्रासादोऽय निवेशितः ॥ ३५ ॥ पौष मास के शुक्ल पभ की पवित्र त्रयोदशी तिपि में माङ्गलिक विधिपूर्वक इम मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई ( अर्थात् मन्दिर मे सूर्यदेव की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई ) ॥ ३५ ॥ बहुना समतीतेन कालेनान्यंश्च पार्थिवः । व्यशीयंतवदेशोऽस्य भवनम्य ततोऽधुना ॥ ३६ ।। उसके बाद, अन्यान्य परवर्ती राजाओ के द्वारा बहुत समय पतीत कर दिये जाने के अनन्तर उस सूर्य-मन्दिर का एक भाग टूट गया इसके बाद अर ( फिर उसका जीर्णोद्धार किया गया-लोक ३७ से सम्बन्ध ) ॥ ३६॥ स्वयशोवृद्धये मवंमत्युदारमुदारया। सस्कारितमिद भूय श्रेप्या भानुमतो गृहम् ॥ ३७ ।। (इसके बाद अब ) अपनी पोनि को बढ़ाने के लिये, उस उदार शिल्पि- समूह ने इस समस्त विशाल मूर-मन्दिर का जीर्णोद्धार कराया ॥ ३७॥ अत्युनतमवदातं नभ मानिव मनोहरः शिखरः । शशिभान्वोरभ्युदयेप्वमलमयूप्लायननभूतम् ॥३८॥ (इस प्रकार मरम्मत होने के बाद ) बहुत ऊँचा, सन् और अपने सुन्दर शिखरों से आगमान को घूमता हुआ वह मन्दिर मानो पन्द्रमा और सूर्य के उस्यकालीन निमंतकिरणों का विश्राम-स्थल या ॥३८॥ १. मातर-गण में प्रचलित संवा । मालर गण अपने मूल निवासस्थान पजार से यह सव साये थे। किन्तु संभवतः चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने अब पकों से मालवा जोता, तब उसका नाम "विम सद" पर गया। बहुत मालीन समय में इसी को "द संवत्" भी कहा पाता था।
उत्तरीलेख-पञ्चरम्
वत्सरमतेषु पञ्चमु विगत्यधिकेषु नवयु चान्देषु ।
यानवनिगम्यतपम्पमामगुक्लद्वितीयायाम् ॥३९॥
पांच सौ उनतीस वर्ष बीत जगन के बाद मनभावन पागुन के शुक्ल पप
की द्वितीया को ( इस पुन सस्कृत मृर्यमन्दिर स दर पर कृत हो गया-
दगेर ४२ से मुम्बन्ध) ॥ ३९ ॥
स्पष्टरमोत्ताकेतकमिन्दुवारलालातिमुनक नामदयन्तिकानाम् ।
पुप्पोद्गमरभिनवरधिगम्य नूनमक्य विजृम्भिनगरे हापूतदेहे ॥ ४० ॥
पागुन क उस भादस महीने म, जब कि महादेव के विषम लोचनानल से
मम्मीनत अत एव पवित्र शरीर दाला रामाव-अशोक वृक्ष, केवडे, मिन्दुवार
और लहराती हुई 'अतिमुत्क' लता लोर मदयन्तिका' वे सब प्रसुटित
पुजीभूत प्रमूनों ने अपने शरों का समृद्ध करता है ॥ ४० ॥
मधुपानमुदितमधुवरवलापगीतनगणैक्पृथुगाखे ।
काले नवकुमुमोद्गमदन्तुरकानप्रचुररोने 11 ४१ ॥
जिम पागुन मे मकरन पान में मन्न मधुपों की गूंज स नग्नी' की शामा
अपनी सानी नहीं रखती और नूनन मुमना के विधाम से गेमों म उत्त
और श्री वी समृद्धि हो रही है ।। ४१ ॥
रागिनेव नभो विमलं कौस्तुभमगिनेव गाङ्गिणो वक्ष ।
भवनवरण नभेद पुरमखितरनमुदारम् ॥४२॥
जिस प्रकार निर्मल बाका चन्दमा में और भगवान् विष्णु का वक्षस्थल
कौस्तुभ मणि म मुशामिन होत है उसी प्रकार यह समस्त समृर दापुर नगर
इम दिव्य मन्दिर से पम्हिनु हा रहा है ॥ ४२ ॥
अमलिनागिरेवादन्तुर पिङ्गाना
परिवति समूह यावदीदो जटानाम् ।
विकचक्मलमालाममनचा च शाही
भवनर्मिदमुदार शाश्वत तावदस्तु !! ४३ ।।
जब तक भगवान् रामर पवल पन्दाला से नवोन्नत, पोतवन के जटाजूट को
धारण करते हैं और जब तर मगदान विष्णु अपने कन्धों पर प्रस्जुटित पपमाला
दो पारणपरते है, तब तक यह भव्य भवन स्पायित्व को प्राप्त करे ॥४३॥
कुमारगुप्त का मन्दसौर शिलालेख श्रेण्यादेशेन मक्या च कारित भवन ग्वे । पूर्णा चेय प्रयत्नेन रचिता वत्समट्टिना { ४४ ।। स्वस्ति कलेखकवाचक्श्रोतृभ्य । सिद्धिरस्तु । शिल्पि-समाज के बादेश एव अदा से भगवान सूर्य का यह मन्दिर बनाया गया । नोर नपर्युक्त प्रशस्ति को दममट्टिन यान पूर्वक रचना की ।। ४ ।। प्रशस्ति के रचयिता, लिरित, पाठक एवं पाताओं का कल्याण हो । सिद्धि हो। शिलालेख का ऐतिहासिक महत्व विषय-पदपि इस अनिलख म मुरुषरूप से रेशमी बुनारों द्वारा मालवा के मन्दमोर या दशपुर नगर म मूर्य-मन्दिर के निर्माण की घटना का वर्णन है । बन इसन ऐतिहासिक तथ्यों के अन्वेया की सामग्री ता कम ही है, फिर मा कवि ने इसमें तत्कालीन जिस भारताय शामक को चर्चा की है वे हैं गुपवय के सवन प्रतापी सम्राट् चन्द्रन दिवमादित्य के पुत्र कुमारगुण प्रथम । अभिलेख के २३ वें लोक के अन्तिम चरण में कवि ने स्पष्टरूप से कुमारगुन का उल्लेप फिता है-"कुमारगुहे पृथिवी प्रचामनि"। इतना ही नहीं, उन्होंने २४ वे और २६ वे लोर मे मालव देश के तत्कालीन प्रान्तीय सामक नर विश्ववर्मा और उनके पुत्र दापुर नगर के शासक बन्धुवर्मा रा नामालेख भी किया है। इसके माप ही कुमार प्रथम के समर में अब बन्युवर्मा दनुर नगर का सामन कर रहा था तो दापुर नगर की रमणीयता पर मुग्ध हाकर लाद देश के रेशमी बुनररी का दन वहाँ आकर असना स्पसार परत लगा और अपने परसाय में प्रात पन से उसने राजा को बाजा से नगर में एक भव्य मूर्य मन्दिर बनाया। कुछ दिन बाद वह मन्दिर भग्न हो गया जिसरा पुननिर्मा। उन्हीं सोगों ने हिर पिया। सर में इस अभिम से यह पटना ज्ञात होता है। बर आगे हम सभी में अभिनेत्र में बाकुमारगुन और इससे निकलने वाले दुध ऐतिहासिक तथ्यों का स्वलोकन करेंगे। समय अमिरेन के ३९ इनोक में 'बसरमा परमु विगत्यधिक नबनु पात" इस उति से यह सट है कि पट्टायगी द्वारा मूर्य-मन्दिरको मरम्मा पाल सर ५२९ फागुन महीने के एक्लास को हिटोमा निधि ४० उत्तीलेख-पञ्चम में हुई थी । अभिग्य की रचना का नो समय यही होना चाहिए । मालर वन ५२९, जो विम सदन से भी प्रसिद है. को ४७३ ईस्वी माना गया है। कुमारगुप्त का परिचय - गुप्त इम्राट चन्द्रगुम द्वितीय को हर दाद उसका बेष्ठ पुत्र वुमारास राज्य-सिंहासन पर दंठा। चन्द्रगुस दिशमादित्य ने अपने बड़े भाई रामगुम को पली प्रदम्वामिनी से विवाह किया था। उसो प्रबस्दार मिनी का पुत्र कुमारगुस था। इन बात या संकेत हमें स्कन्दगुरु के "मितरो" (Bhitari) स्तूप-रेख के महाराजाधिराज श्रीचन्द्रगुरुस्य महादेव्या प्रददेव्यामुर- मस्व महाराजाधिरारकुमार गुरुम्ब" इस वाक्य से मिलता है । सप ही दिहार के बंगाली नाम म्यान प्राप्त मिट्टी की मुहरों से यह नो ज्ञात होता है कि गोवि- म्दगुप्त नाम का कुमारगुप्त का एर माई पा रो कुमारगुप्त के प्रतिनिधि के रूप में बंगाली का शासन करता था। उन मुहरों में गोविन्दास की माता मदम्दामिनी के साथ गोविन्दगुम ग एक साय उल्लेख मिलता है-"महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुस-पली महाराज श्री गोविन्दगुप्त-माता महादेवी ध्रुवस्वामिनी ।" इन महरों ने यह ज्ञात होता है कि गोविन्दगुम, कुमारगुम का छटा मा पा और कुमारगृह दहा होने के कारण राज्यसिंहासन का उत्तराधिकारी बना पा । राज्यकाल -कुमारगुप्स के रहत से विपियुक्त अभिलहों और मुद्राओं से हम इसरे राज्यवाल का निश्चय कर मरते हैं । चन्द्रगुप्त द्वितीय के सबसे अन्तिम साँचोदारे गुह सब ९३ रेस से यह मारम हाता है कि ई. सन् ४१३ के बाद राज्य का रासन भार कुमार गुप्त के कन्धे पर आ गया था। सुमारगुस के भिरसद अमिरेख ने इस बात की पुष्टि हो जाती जिमरी दिपि गुस सदन १६ (ई. स्व ४१५) है। दुमारास के चांदी के नियों पर उसरी सबसे अन्तिम विपि गुस सदा १३६ मिलती है। इसके साथ ही कुमारगुप्त ने उत्तरापिपरी सन्दगठ की मुदने पुरानो लिखित निपि जुनागड बभिरेस में गत सवत् १३६ (ई.सन १५५) है। इन उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पह कहा जा सकता है कि मारपस ने सन् ४१३ से लेकर सन १५५ ई. ठर राज्य किया। राज्य विस्तार :-बुमारगुत प्रपम के रिनो मी अभिलेख या अन्य उपलब्ध प्रमाणों से यह नहीं जात होता है कि उसने बपने पिटा पहा पितामह से भौति विजय-यात्रा करके अपने राज्य का दिम्दार किया था। हा! इतना अवाम शात होता है कि इसने अपने पिता से प्रात विणत साम्राज्य का मुन्दर कुमारास का मन्दसौर शिलालेख ... डग से शासन-प्रबन्ध किया और उसकी अन्त तक सुरक्षा भी की। उसकी राम्पसीमा पूर्व में दगाल और पश्चिम मे सौराष्ट्र तक उत्तर में हिमालय नपा दक्षिण में नर्मदा नदी व विस्तृत थी। उस समय कुमारगत के सामन्त के रूप में "नर विश्ववर्मा" मालव देश का शामन कर रहा था और उसी का पुत्र बन्धुवर्मा मालब देश के दयपुर नगर का प्रशासक था। इसके द्वारा नियुक्त चिरातदत्त और घटात्कच क्रमश उत्तरी वगाल और पूर्वी मालवा पर शासन करता था। इस प्रकार कुमारगुप्त का शासन बहा ही शान्तिपूर्ण था। उसके शासन-काल में गुप्त साम्राज्य का वैभव चरमोत्कर्ष पर पा। अत उसका शासन-काल वहा ही मुखमय था किन्तु कुमारगुप्त के शासनकाल के अन्तिम समय में उसे पुष्यमित्रों से युद्ध करना पड़ा, जो बड ही शक्तिशाली हो गये थे। कुमारगुह उस समय वृद्ध या अत एव उसके योग्य पुत्र स्कन्दगुप्त ने पुष्यमित्रा का स्टकर मुकाबिला किया और उन्ह परास्त भी किया। इसकी पुष्टि भितरी के प्रस्तर स्तम्भ रेख के "विचलितकुललक्ष्मीस्तम्मनायोद्यतेन समुदिवबलकोवान् पुष्पमित्राय जित्वा इस अश से होती है। अश्वमेघ यज्ञ तथा धार्मिक सहिष्णुना-पद्यपि कुमारगुप्त ने कोई विजय यात्रा नहीं की पी, जिसके फलस्वरूप दे अश्वमेध मज करते लेकिन चूंकि उनके पिता चन्द्रगुप्त द्वितीय और पितामह समुद्रगुप्त ने यह या अपनी विजय के उपलक्ष्य में किया इसलिये कुमारगुप्त ने भी अपने सुव्यवस्थित साम्राज्य में अश्वमेघ यज्ञ की परम्परा को सुरक्षा को भी इस बात का सक्त हमे उसके सोने के उन सिको में मिलता है जिनके पृष्ठ पर "यो अश्वमेघ महेन्द्र" यह उल्लेख पाया जाता है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि उसने यह उपाधि अश्वमेघ यज्ञ के बाद धारण को होगी। क्योंकि अन्य उपाधियों के रहते हुए भी कुमारगुप्त सामान्यत महेन्द्रादित्य के नाम से ही विख्यात था। अपने पूर्वजों की मादि हो कुमारगुरु पट्टर बाहान-धर्मानुयायी होकर मी और धर्मों के प्रति सहित पा। उसने अपने मुदीर्घ गसन-काल में मन्दिरों और यमों के लिये अनेक प्रकार के सन दिये। मानदर और सोची के अभिलेखों से यह पता लगता है कि उसने बौर-विहारों के भी निर्माण में मुक्त हापों से दान दिया था। ब्राह्मण धर्म के देवताओं में उसने सूर्य, ति, विष्ण बारातियको अधिक प्रश्रय दिया पा। कुमारगुप्त नै देवताओं में सर्वाधिक ४२ उत्तीलेख-पञ्चकम् - महत्त्व कार्तिकेय को दिया था । अत एव उसके सिकों से यह मान होता है कि उमी समर विशु के स्थान पर वानिय हो इष्टदेव के रूप में पूजा का स्थान प्रात कर निय घे। इस प्रकार हम देखते हैं कि कुमारगुत एक प्रभावशाली शासक, परम बनव, धर्ममहिण, दानवीर तथा प्रजाालक सम्राट् पा । इसके अतिरिक्त मन्दसोर शिलारेख से निम्नलिखित बातों का आभास मिलता है (१) गुप्तवंशम मारगुम नाम के दो रारे हो चुके हैं जिसमें इस अभिलेख का सम्बन्ध कुमारगुप्त प्रपन में है। (२) अभिलस के विवरण से यह पता लगता है नि उस ममय दरापुर मे सूर्य-मन्दिर का निर्माण, और नष्ट हो जान पर उसका पुननिर्मात में दो घटनाएँ मिलती हैं, जिनमें कवि ने मन्दिर निर्माग के समय विद्यमान वहाँ के शासक का नामोल्लेख तो पिया है किन्तु पुननिर्माण के समय के शासन का उल्लेख नहीं किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि मन्दिर निर्माण के समर तलालीन शासक का नामोल्लेस करना चाहिए" यह सोचकर ऐसा गिया गया किन्नु पुनर्निर्मात के समय सभवत दरपुर का कोई शासन नहीं था, बदा "कुमारगुप्ते पृषिदों प्रयासति" के द्वारा पुननिर्माण की घटना के समय कवि ने प्रधान गुमारगुत की चर्चा की है। (३) "कुमारगुप्ते पृथिवों प्रशामति" से दविका तात्पर्य मालव-मदत् ४९३ मे मन्दिर का निर्माग और मारवसवन् ५२९ में उमका पुननिर्माग इन दोना पटनाओं के समय में "इमारगुप्त" इस एक ही नाम रो धारण करने वाला एर रेन्द्रीय महायामक पा। मन्दिर निर्मात ३६ वर्ष बाद ५२९ मालव-सव में उमरे पुननिर्माण की घटना के समय कुमारगुप्त द्वितीय के शासन करने की भी समावना को जा सकती है। शिलालेख की साहित्यिक विशेपताएँ विषय :-मुख्य रूप से इस अभिलेख में दन्मट्टि ने राट देश से दयपुर पाये हुए रेशमी बुनकरों द्वारा वहां पर मूर्य-मन्दिर निर्माण और दरपुर नगर का मुन्दर वर्णन किया है। इस प्रकार यह एक प्रकार का माम्प्रदायिक अभिलेख माना जाता है। यह प्रशस्ति वंदो रोति पायय लेकर सरन कुमारगुप्त का मन्दसौर शिलालेख कार को रचना में सिरहन्त कवि की लघुकाव्य के रूप में मर्वोत्कृष्ट नमनीय कति है तथा यही कृति दलमट्टि को संन्त के उत्कृष्ट कवियो को पक्ति मे बाली है। बन्लट्टि ने अपनी प्रान्ति का शोषक न देकर 'पूर्णा चेय प्रयत्नेन रचिता दनमट्टिना" इस पन मे 'पूर्णा" पन में ही उमकी ओर सस्त किया है। इसने इस बात का सवंत मिलता है कि पञ्चम शताब्दी मे मन्दिर निर्माण तपा अन्यान्य मामाजिर हित के कार्यों की प्रशना में ऐमी ऐनी प्रशास्तियो की रचना की जाती थी। साप ही "प्रय नेन रचिता" इस प्रयोग से यह भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि पदि ने अलकारशास्त्र का गहन अध्ययन करके तद उन नियमो का माङ्गोपाङ्ग निर्वाह करते हुए अपनी कृति का निर्माण किया है, जैसा कि उनके इस अभिलेख के काव्यगन गुणदोषो के विवेचन से स्पष्ट होगा। शैली:-दो तो सर्वत्र वदर्भी गति का ही आश्रय लेकर काव्य-रचना की गई है किन्तु स्थान स्थान पर वयंविषय के अनुकूल दीघं समान का आश्रय रेकर गौडो बन्ध का सन्निवेश दिया गया है। गौडी रीति का उदाहरण हम ३२३ एव लोक में पाते हैं। पद्य में लम्बे लम्बे समानों का प्रयोग स्वन्छन्दता से किया गया है। पूरा ३३ वा श्लोक एक ही समामपूर्ण वाक्य मे लिखा गया है। यदि ने अपने वन्यविषय के अनुकूल भनियो नाद उपस्थित करने- पाले पन्दी का गुम्फन बहुत ही मुन्दर दग से किया है। एक ही पद में अनेक रमो का समाहार है नायक की उदात्तता दिलाने के लिये कोमल पदों का विन्यास यहाँ दिया गया है वहीं उसके शौर्य और औदत्य के वर्णन में परप पन्दों के प्रयोग से अपनी वर्णन-पद्धति को बहुमुखी प्रमाणित कर दिया गया है। 'तम्यात्मजः'इम २६ लोक में कोमल एव परप उभपविष दोस समन्दर विषय की अनुलना को प्यान में रखकर ही दिया गया है। लोक के अन्तिक पाद में रोदरम के अनुकूल ही पदावती का प्रयोग है। अलकार:-अलंकारों में पदाशार और अतिंकर इन दोनो वा प्रयोग पिया गया है। उन्दालंकार में अनुपान का विशेषकर वर्गानुपान का प्रयोग विभागमा है । परानुप्रास का भी प्रयोग स्थान-स्थान पर मिलता है । वर्गानुपाम का उदाहरण तो प्रार. ममी क्लोरों में मिल पाता है। पदानुप्रास का उदाहरण हम २१ लोक मे रघुपन्द तीन बार प्रयोग में पाते हैं।
उत्कौले-पञ्चान बलिंगारों में उपमा, उशा रदं रूस का उदाहरण बन कर मिलता है । दि की उपज की छटा सलिदान को नारी स्मृति दिर देती है-''चलपदासान्ददलाननाय-"इन १० दें स्टोर में गदि में दर नबर के मदनो चे देव-शिखरों की मना दिदन्टा को दहिने रस-दिर बने देदक के टुकडों ने दी है। इसी प्रगर "नमानपी." इस २४ वें स्टोर में विश्वदर्गा की बुद्धि दमा दीग्ना की आन देवगुरु वृहम्मद तपा अर्जुन ने दी है। इनो तरह-३० 4 रोड का बिगरमान मन्दिरको चौडाई और बाई को मापन के दिन दी गयी है और ना हो पनि देश की राजधानी में गोमारमान इन मन्दिर को नाशपणे में उटित चूडामणि में दो नो है। मदने सुन्दर उपना का उदाहरण ह-४२३ श्लोक में मिलता है। वहीं इन मूव मन्दिर में मूल दस्तुर नगर की तुलना चन्द्रमा से मुक्त स्वच्छ करार है और कौस्तुभमशि-विपिन दिनान के दस स्पट ने गौ गनी है। इनोसर १३, २६ एव २० स्टोक में की उसमा अलपर है। उस्मातकार की छटा टो दही ही मुबारी है। देख-१२ स्टोक में दि ने उपमा माप ही अनुमान या ना मुन्दर मन्दिर विधा है- दहाँ के भवन पूर्णचन्द्र को किरणों में हर स्वच्छ और मंजिटों की परमय ने जनावरेने माटम पडते हैं मानो दिदी को और बरकरार दिनानों को पति हो। इसी प्रकार दन्बुदर्ना चरित्र-चिकन और मेन्द-दन में प्रसंग में- २७ वें स्टोक में कवि ने बन्धुवर्ग से रूप में मनोपानदेव रा दूसरा अदद्वार हो मान लिया है। इसी भांति-३६ दौर में मी दरा, स्वन्ध और अपने मुन्दर रिसरों में बाबमान से हटा हा दह मन्दिर र नो चन्द्रमा और मू उदमान नित किरणों दिशानन्दल हो। इत्र प्रभार उक्षा समुन्दर चित्र स्पिन होता है। ला अरंगार राजाहरण हम "पादनम्र ठरमददना" इस छे इलोको हटोर घरम में पवे हैं । उहाँ र पुष्प के मार ने रेडर इन हो न मारय ममि देशकापर हैं।
कुमारगुत का मन्दसौर शिलालेख ४५ ओ २३ वनो में पा का सुन्दर विन्यास है। इसमें कवि ने चारों स्दों के तट को पृथिवी को डोलतो करधनी माना है। मुमेरु और लार पर्वत को उमका स्तन और दनपयों में टपकते खिने हुए फूलो को उनका हान माता है। इसी प्रकार अन्यत्र भी हिट-पुट रूप में रूपक का उदाहरण छन्द :-इम अभिलेख में जहाँ तक छन्दों का प्रश्न है, उसमे दो कवि ने कमा दिखाया है कात्र के पालन के लिये और अपने सन्द शास्त्र के आधिपय रो दिखाने के लिये कवि ने ४ पदों को प्रशस्ति में लगमग १२ प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया है। यधपि शीघ्रता से छन्द-परिवदन के कारन सर की गति कमजोर पड़ जाती है और इसीलिए छन्दमौन्दर्य पूर्णतया उमर नहीं पाया है फिर भी छन्दों की विविधता अवश्य ही रोचक है। कवि ने १, २ ममल इलोकों में शार्दूलविक्रीडित छन्द का प्रयोग किया है। कवि ने बसन्ततिलका का सर्वाधिक प्रमोर किया है। श्लोक सब्या ३, ५, ६, (१,१४,१८,२०, २२, २५, २७, ३.-३२ बोर ४०वें श्लोक मे वसन्त- दिलका का उपयोग किया है। लोग सख्या ७-९, २४ में उपेन्द्रवया छन्द है। लोक सस्मा १७, २६ मे इन्द्रवया, श्लोक समा १०, १२, २८ में उसमाति (इन्द्रवचा उपेन्द्रवा ) लोक सस्था १९ और ४३ में मालिनी, लोक संस्था १५ मे द्रुतविलम्बित, १६ में हरिणी, २३ में वास्य, २९ में मन्दाना, लौर सस्या ४, १३, २१, ३३, ३८,३९, ४१, ४२ इन आर्या और ३४-३७, ४ में अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग रिया गया है। वर्णन में अन्य कवियों से समता दयपुर नगर के वर्मन में कवि ने बड़ी ही रुचि दिखलायी है । वल्लमट्टि की इस प्रशस्ति में दरार के वन में कालिदान के अलका-बर्गन को छाया पर मिरती है। देखिये प्रशस्ति के-"चलपवामान्यदलायनापा...."हाधि "इस लोक में उतर मेघ के "विद्यान्न सतितनिटा. सेन्द्रशप सचिना:" इस मलका-बर्गररक दलोक से पूर्व साम्य है। इसी प्रकार वन्यमट्टि के नदी-वर्गन के प्रमग मे नवे कामदेव को पली की स्टौक्षा करने की प्रेरमा करिको मुबन्यु की वासपात्ता से और यह संदिता से मिली होगी। देखिद-प्रशस्ति के १३३ सोर "रहसि कुरसादिनीम्स प्रतिविम्या स्मपङ्गमिद" में "दासवदता" के "रेदपा रिक्तमोर प्रसारित- उलोलिस-पञ्चकम् बीरिहस्तयोपगूढः" इस दलोक को और दृहत्साहिता मे "रहसि मदनसक्तया रेवया शान्तयोपगूढम्" इस श्लोक की छाप स्पष्ट नजर आती है । शिशिर ऋतु का वर्णन वही ही रोचक चली मे हुआ है। कवि का यह ऋतु-वर्णन कालिदास के ऋतुम्हार के ऋतु-वर्णन से मिलता जुलता है। देखिये, कालिदास के- "सद्यःप्रवालोद्गमचारुपत्रे नीते समाप्ति नवचूतबाणे। निवेशयामास मधु द्विरेफाः नामाक्षराणीव मनोमवस्य ॥" इस वर्णन के आधार पर ही वत्समट्टि ने ४० वें श्लोक-स्पष्ट रचोकतरु- फेवासिन्दुवार" मे पांच पुष्पो की तुलना कामदेव के पांच बाणों से की है। टिप्पणी दशपुर-मन्दसौर। विहार-फ्लोट महोदय के अनुसार इस पद का अर्थ "बौद्ध भिक्षुओं का भावास" । इस शिलालेख के उत्तीर्ण होने के दिनो में दक्षिणी गुजरात में बौद्ध विहारों की समावना भी की जा सकती है । किन्तु वत्समट्टि ने यहाँ पर इस पन्द को 'मानन्द' के अयं में प्रयोग किया है। लाट-विषय-पश्चिमी मालवा का पश्चिमी इलाका। इसकी राजधानो नवसारिका पी। श्रेणिरेवं प्रकार १. लाट देश के रेशम बुनकर, जो दापुर में बस गये थे, अनेक व्यवसाय करने लग गये थे। इससे यह प्रक्ट होता है कि जातिगत व्यवसाय रूढ़ नहीं हुआ पा। मालवाना गणस्थित्या-मालवण मे प्रचलित संवत् । ये लोग अपने मूल स्थान पंजाब से यह संवत् लाये थे, किन्तु चन्द्रगुम विक्रमादित्य सभवतः द्वितीय ने वद परों से मालवा जीता दर उसका नाम "विक्रम संवत्' पड़ गया। बहुत प्राचीन काल में इसी को 'कृत' संवत् मी रहते थे। कारण्डव-एक प्रकार का हंस । नृप विश्ववर्मा-यह मन्दसौर का स्थानीय शासक था, जब कि कुमारगुप्त पश्चिमपुर- दयपुर को हो 'पश्चिमपुर' कहा जाता था। क्योकि उस समय पथिम भारत का यह सर्वश्रेष्ठ नगर माना जाता था। . सम्राट या (e) दशपुरस्थयशोधर्मराजकालिककूपशिलालेखः [महाराजयशोधर्मणः शिलालेखः ] (मालब संवत् ५८९) सिद्धम् स जपति जगता पति पिनाको मितरखगोतिषु पन्य दन्तकान्ति । दुनिरिब डिना निशि स्फुरली निरनि च स्फुटमन्चदश्च विश्वन ॥१॥ मिरि हो। "पिनाक' नामक धनुष को धारप करनेवाले, समस्त विश्व के स्वामी उस कर भावान् को उप हो जिनके मुमराह समपा और समान में प्रस्फु की शाा, रात में छिटादी बिलनी की चमक के समान इस संसारको विरोहित और प्रतिरदो रहती है ॥१॥ स्वयम्भूताना स्थितिल्यसमुत्पत्तिविधियु प्रदुनो येनाज्ञा वहति भुवनाना विधूतये । स्तृित्व चानोतो जगति गरिमाग गमयता समानुपानि प्रतिदिशतु भद्राणि मदताम् ॥ २॥ प्राणियों की उत्पत्ति,म्पिति और सहार कार्य में जिनके द्वारा नियुक्त इश समारने पारी के लिए उनके वादेश का पालन करते हैं, और इस प्रकार जो सार में ब्रह्मा की महिमा को बाडे हुए उनको नितामह के पद पर पहुँचाते हैं, वे शिव मार गों का भूरि-भूरि माल करें।।२।। मागिरुमाराकान्तिदूरावनम्र स्पगपति रचमिन्दोमन्डल यस्य मूनाम् । सशिरसि विनिवघ्नन् प्रिोमस्थिनाला सृजतु नवसृजो व. गमङ्ग मुजङ्ग ॥३॥ पजको मगियों के बयधिक बोपरे कारण बहुत अधिक का हुआ जिसके पस्दामाल धमाको पोका को को मन्द कर देता है, संसार की रपना ४८ उत्कोगलेत-पञ्चकम् करनेवाले भगवान शंकर के मस्तक पर छिद्रमयो हड्डियों की माला को आवद्ध करनेवाला यह सपं आप लोगो के दुखो को दूर करे ।। ३ ।। पष्ट्या सहने सगरात्मजाना खात खतुल्या रुचमादधानः । अस्योदपानाधिपतैश्चिराय यशासि पायात्पयसा विधाता ॥४॥ राजा सगर के साठ हजार पुत्रो के द्वारा खोदा गया और आकार के समान सोमा को धारण करनेवाला वह समुद्र चिरकाल तक कुएं के स्वामी के यर की रक्षा करें॥४॥ अथ जयति जनेन्द्र श्रीयशोधर्मनामा प्रमदवनमिवान्त शत्रुसैन्य विगाह्य । वक्सिलयमगर्योगभूषा विधत्ते तरणतरुलतावद्वीरकीर्तीविनाम्य अन्त पुर के क्रीडोद्यान के समान अनुओं की सेना को भीतर से विलोडिट कर, पीरों की फीति को नूतन वृक्षों की लता के समान मुकाकर, छवि रूपी पल्लव-रचनाओं से अपने अगों को विभूषित करनेवाले जननायक यशोधर्मा की जय हो ॥५॥ आजो जिती विजयते जगतीम्पुनश्च श्रीविष्णुवर्धननराधिपति स एव । प्रख्यात औलिकरलाञ्छन आत्मवहशो येनोदितोदितपद गमितो गरीय ॥६॥ इसके बाद फिर, सग्राम में भूमण्डल को जीतनेवाले, "ओलिकर" उपनाम से प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण अपने घर को अत्युच्च पद पर पहुँचानेवाले राजा विष्णुवर्धन की जय हो ॥६॥ प्राचो नृपान् सुवृहतश्च बहूनुदीचः साम्ना युधा च वशगान् प्रविधाय येन । नामापर जगति कान्तमदो दुराप राजाधिराजपरमेश्वर इत्युदूढम् ॥७॥ और जिसने पूर्व के विशिष्ट राजाओं को तथा उत्तर के बहुव स राजाओं को शान्ति और युद्ध के द्वारा अपने अधीन करके ससार में सुन्दर और दुर्लभ "राजाधिराज एरमेश्वर" उपनाम को प्राप्त रिया { उसकी जय हो) 10॥
महाराज यशोधर्मा शिलालेख स्निग्धश्यामाम्बुदाभै. स्थगितदिनकृतो यज्वनामाज्यघूम- रम्भो मेध्य मघोनावधिषु विदधता गाढसम्पन्नसस्य.। संहाशगिनीना कररभसहृतोद्यानचूताइराग्रा राजन्वन्तो रमन्ते मुजविजितभुवा भूरयो येन देशाः ॥८॥ होताओं को आहुति से उठे हुए चिकने और काले मेघों के समान धूमपटल से आच्छन्न सूर्य वालें, इन्द्र के द्वारा ठीक समय पर पवित्र जल की वर्षा की पाने के कारण प्रचुर धान्य से समृद्ध, विदग्ध वनिताओ के करपल्लव से मस्ती के साप वेगपूर्व उपवन की खीची जाती हुई आम्र मजरीवाले अनेक देश, मरने बाहुबल से पृथ्वी को जोठनेवाले जिस यशोधर्मा के द्वारा अपने-अपने कर्तव्यों में नियुक्त राजाओ से मुक्त होरर फल फूल रहे हैं, ( उसकी जय हो ॥ यम्योत्केतुमिरन्मदद्विपक्रव्याविद्धलोधदुर्म- रघूतेन वनाध्वनि ध्वनिनद्विन्ध्यादिरन्धेवले । वालयच्छविधमरेण रजसा मन्दा सलक्ष्यते पर्यावृत्तशिमण्डिचन्द्रक इव ध्याम वेमंण्डलम् ।।९।। संडे पहरानेवाली, वनमार्ग मे हस्ति-समूह के सूडों द्वारा लोध्र वृक्षो को उसाहनेवाली और अपने गर्जन से विन्ध्यपर्वत की कन्दराओ को प्रतिध्वनित करनेवाली जिसकी सेनामा के द्वारा विजय में ( विजय-यात्रा के प्रसंग मे ) उडे हुए और गदहे के रंग के समान भूरे पूलि-पटत मे मलिन मूर्य महल निस्तेज होकर मोरपस के उलटा चंदवा के ममान दोस्त रहा है ( उसको जय हो ) ॥९॥ तम्य प्रभोड्कृता नृपाणा पादाश्रयाद्विश्रुतपुण्यकीतिः । मृत्यः स्वनमृत्यजितारिपटक बासीद्वसोपान किल पष्ठिदतः ॥ १० ॥ उम राजा के पूर्वज ( पूर्ववर्ती ) राजाओ के चरणो में निवास करने के कारण प्रस्पात पुष्प और कीति वाला, अपने विनम्र भावो से काम क्रोषादि पहरिपुत्रों को नियन्त्रित रखनेवाला, "पष्ठिदत्त" नाम का सेवर पा ॥१०॥ हिमवन इव गाङ्गस्तुगनम्रः प्रवाहः शाभून इव रेवावारिराशिः प्रथीयान् । परमभिगमनीय. मुद्धिमानन्ववायो उदितगरिम्णस्तायते नंगमानाम ॥११॥ घन-सम्पन्न यत
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उन्कोतिहमा
जिस प्रकार हिमालय पर्वत ने पन का उन्नत और नम्र प्रवाह टपा पाना
के दा नदी (नर्मदा) का विशाल समन्इ परा को प्रकार सर
महिनादाने इस पष्टिदत से नगर के प्यासारियों मदिर पूल और दिर
कुत का प्रचार हुभा ॥११॥
तस्यानुकूल कुलजावरत्रात् नुन प्रसूतो पसन्न प्रतिः।
हरेरिखाम वगिन वराहं वराहदान यमुद्दाहरन्ति ।। १२ ।।
उन पटिदत्त को उदटुरोपन पानी ने उनसे है अनुकूल पसन्द
पुत्र लिन्न हुा। नाबाद विश्व के टुन्द, रिदेन्द्रिय और मुसोचन
पुरुष रत्न को "दराहदाउ" इस नाम न पुगग काटा है ।। १२॥
सुकृतिविपिनङ्ग स्टमूल घराया
न्पिनिम्मतनगा स्पेसीमासानन् ।
गुरुशिखरनिवाडेन्नत्कुल स्वान्नमून्या
रविरिव रविकोनिः सुप्रगा व्यवत्त ॥ १३ ॥
पुष्प क को करनेवाले, रिष्ट पुरों के कारण न, संसार में की जा
एका चुदनेवाले, नम्रता-रहिट मुढ स्तिति को धारण करनेवाले पर्वत की
पोटी के समान उस पुल से रविकोटि ने पूर्व के समान बने ऐसालोत
कर दिया ।।१३।।
विभ्रता गुभ्रमभ्रमि त्नातं वन्नोचित मतान् ।
न दिनदादिता न उगवति कुन्नता ॥ १४ ॥
मुमुग्नत्त. दृड, स्मृति-प्रतिदिट और रिय के अतुल पनि रोप-
वाले उस (रविनीत ) ने मरना में भी करनी पर्यादा रनाउन
हेने दिया ॥१४॥
धुनपोधिनिध्वान्वान् हविर्भूज इराध्दरान् ।
मानुगुसा उन सादी तन्मात्रीनदीजनन् । १५ ॥
रविसति से टकरी मादी पन्नी मायने अनि के पहरे मनाल,
अपनी सानरसि से बनान के अन्वकार को दूर कर देनदाले टीन पुओरोकार
किया ॥१५॥
महाराज पक्षोपा का शिलालेख
भगदद्दोष इत्यासोद प्रथमः कार्यवमसु ।
मालम्बनं बान्धवानामन्यकानामियोद्धव ॥ १६ ॥
(उन दोनों में ) "भावदोष" बड़ा पावह कार्य पद्धति मे अधों के लिरे
उदर के समान अपने बान्धदों का सहायक पा॥ १६ ॥
बहुनयविधिवेघा गह्वरेण्यमार्ग
विदुर इव विदूर प्रेक्षया प्रेममाण ।
वचनरचनबन्ने सस्कृतप्राकृते यः
पविभादितराग गीयते गौरभिज्ञ ॥ १७॥
वह नाना प्रकार दे मारविधान में विधाता के समान पा, ममोर मयंनीति
(आपित एव राजनीतिक विषयो ) में भी प्रज्ञा के कारण विदुर के समान
दूरदधों पा। रविाग अत्यधिक अनुरागपूर्वक सस्कृत और प्राकृत वाक्यों के
रमना-विधान में से कुशल मानते थे॥ १७ ॥
प्रणिधिदृगनुगन्ना यत्य वौद्धन चागा
न निशि ननु दवोयो वास्त्पदृष्ट धरिश्याम् ।
पदमुदयि दधानोऽनन्तर तम्य चाभूत्
स भयमभयदत्तो नाम चिन्वन प्रजानाम् ।। १८॥
उभव पर को धारण करनेवाला तथा प्रनाओं के भय का पपन करते हुर
उन्हें कमर देनेवाला 'अमदत" नान का दूसरा सडका था। जिस अमयात
को, गुनपरस्पी नेत्र रा अनुगमन करनेवाली, शान-दृष्टि से पृथ्वी पर कोई सूक्ष्म
पा दूरवी वस्तु रात में भी किसी नहीं रह सस्तो पो।। १८ ॥
विन्ध्ययावन्ध्यर्मा गिसरतटपत पाण्डुरेवाम्बुराम-
गोलाइलैः सहेलं प्लुतिनमिततरोः पारिवारस्य चाः।
आमिन्धोरन्तराल निजगुचिसचिवाध्यामिनानेकदेशान्
राजापानीयवृत्या सुरगुरुरिव यो वणिना भूतयेऽपात् ॥ १९॥
सात कार्य करनेवाला यह, चोटियो से गिरते हुए नर्मदा के सद बाल-
समूह से युक्त विध्यप और संगूरों के मोटापूवंक वर से मुके हुए पे.
वाले "पारिपात्र" पर्वत से लेकर "सिन्यु" तक के सम्भवती और अपने सगे
मंत्रियों से अधिष्टित विभिन्न प्रान्तों का राजा के प्रतिनिपि के रूप में, वृहस्पति
के समान, पारों दनों के स्वाद के लिये पालनरोपण किया ॥१९॥
५२ उस्कोतिस-यन्दकम् विहितसकलवर्णासङ्करं शान्तडीम्बं कृत इव कृतमेतद्येन राज्यं निराधि । स धुरमयमिदानी दोपकुम्भम्य सूनुः गुरु वहति तदूटा धर्मतो धर्मदोषः ॥ २०॥ जिस धर्मदोष ने अपने राज्य मे जातिगत माक्यं को दूर कर और विद्रोह वो शान्त कर सत्ययुग की भांति प्रजाइन की मानसिक पपा दूर कर दिया है, "अमयदत्त" के अनुज "दोपकुम्भ" के सुपुत्र वह धर्मदोप, अमयदत्त के रा टोरे गये राज्य-कार्य के गुस्वर जूए को धर्मपुर सर वह्न कर रहा है ।। २०॥ स्वसुखमनतिवाञ्छन्दुर्गमेऽध्वन्यसङ्गा धुरमतिगुरभारा यो दधद् भतुंरयें। वहति नृपतिवेपं केवल लक्ष्ममात्रम् वलिनमिव विलम्ब कम्बल बाहुलेयः ॥ २१ ।। अपने मुख की उपेक्षा करके, दिना किसी की सहायता लिए, अपने स्वामी पयोधर्मा के हितायं, गुस्तर राज्य-भार को दुरूह मार्ग में भी वहन करता हुआ बह पमंदोष "राजा" के वेष को नाममात्र से उसी प्रकार धारण करता है जिस प्रकार मारी और लटकते हुए गल-बम्दल को दैल॥ २१॥ उहितहितरक्षामण्डनो जातिरत्न- झुंज इव पृथुलासस्तस्य दक्षः कनीयान् । महदिदमुदपान सातयामास विन. छुनिहृदयनितान्तानन्दि निर्दोष नाम ॥ २२ ॥ विस्तृत वस स्पलवाले, और बहुमूल्य रत्नों ने मुजाओं के सहार; मोरे उत्तरदायित्व के संरक्षनल भूषगवाले, उसरे (फर्मदोप) कनिष्ठ भ्राता "दस" ने वान और अन्तरण को बतिएर आनन्द प्रदान करनेवाले "निदार' नाम के इस महान कुएं को सुदवाया ।। २२ ॥ मुखायच्छायं परिणतिहितस्वादुफलदं गजेन्द्रेणारगणं द्रुम इव इनान्तेन बलिना । पितृव्यं प्रोद्दिश्य त्रियमभयदस पृथुधिया, प्रपोयम्नेनेदं दुरालमिह कम्मोपरचितम् ।। २३ ।।
महाराज यशोधर्मा का शिलालेख ..... . सुखपूर्वक सेवन करने योग्य छापावाले और परिपक्वता के कारण लाभदायक एवं स्वादुपूर्ण फलों को प्रदान करनेवाले वृक्ष को ठोड गिरानेवाले गजराज के समान, करात पाल से क्वलित, अपने प्रद्धेय चाचा "अभयदत्त" की पुण्यस्मृति में बुद्धिमान् “दक्ष" ने कुएं के इस विस्तृत और कलापूर्ण "जग" (चबूतरे ) को बनवाया ॥२३॥ पञ्चसु शतेषु शरदा यातेप्वेकाम्वतिसहितेषु । मालवगणस्थितिवशात्कालज्ञानाय लिखितेषु ॥ २४ ॥ समय परिज्ञान के लिए मालव सव की गणना के अनुसार ५८९ वर्ष दतीत होने के अनन्तर (यह कुआं बनवाया-२६ श्लोक से सम्बन्ध ) ॥ २४ ॥ पस्मिन् काले कलमृदुगिरा कोकिलाना प्रलापा मिन्दन्तीव स्मरगरनिमा प्रोपिताना मनाति। मृङ्गालोना ध्वनिरनुवन भारमन्द्रश्च यस्मि- माधूतज्य धनुरिव नदच्यते पुष्पकतो. ॥२॥ निस ऋतु में मन्म के टोरों के सहा कमनीय और बोमल-कष्ठी कोयल को कूक विरही जनो के अन्तस्तल में एक एक सी पैदा कर देती है और मौरी का मदमस्त गुजन मदन के पम्पित सञ्चादाले धनुष की भांति हर-एक वन से मुखरित होते हुए श्रतिगोचर होते हैं ( उस ऋतु यह कुआं बनाया गया-- लोक २६ से सम्बन्ध ) ॥ २५॥ प्रियतमकुपिताना रामपन्दद्धराग किमलयभित्र मुग्ध मानसं मानिनीनाम् । उपनपनि नमन्वान मानभङ्गाय यस्मिन् कुसुमसमयमासे तत्र निर्मापितोयम् ॥ २६ ॥ मुमन-समृद्धि के जिस वसन्त में अपने प्रिपान से रूठी हुई मानिनी बङ्गनात्री के अनुरक्त और मोहित मानस को, नुतन पन्लव की भांति, गुदगुदाता हुभा मतदानिल, मान-मङ्ग के लिये उद्वेलित करता है, उस वसन्त में इस सूप का निर्मात कराया गया।॥२६॥ यावतुहरदन्वान किरणसमुश्यं सङ्गकान्तं तर . लिङ्गानन्दुबिम्ब गुभिरिव मुजः संविधते सुहृताम् ।
. उस्कोलेिख-पञ्चकम् विभ्रमोधान्तलेखावलयपरिगति मुण्डमालामिवायं सत्यूपस्तावदास्ताममृतसमरसस्वच्छनिप्यन्दिताम्बुः ॥२०॥ जय तक लम्बी मुजलताओं-सी ऊंची लहरों से, प्रस्तुटित हिरणों से उमन्वित, और साहवयं के कारण मनोरम लगनेवाले चन्द्र-विम्ब का आलिङ्गन करता हुआ सागर अपनी मित्रता को प्रकट करवा रहेगा, तब तक सुधासय, सुस्वादु, निर्मल, प्रवाहपूर्ण जल से युक्त, "जग" के तट पर निर्मित विविध वृत्ताकार परिषि को मुण्डमारा के समान धारण करनेवाला, यह कूप अक्षुगा, बना रहे ॥ २७॥ धीमान् दक्षो दक्षिण मवमन्धो ह्रीमांच्छूरो वृद्धसेवी वृततः। बद्धोत्माह स्वामिनार्यपदी निर्दोषोऽय पातु धर्म चिराय ॥२८॥ विद्वान, उदार, मत्यवती, लज्जाशील, वीर, गुरुजनो के सेवक, हवा, उत्साह-सम्पन्न, स्वामी के कार्यों में मालस्पहीन और दोषरहित यह "दक्ष" दीर्घकाल पर्यन्त धर्म-रक्षा मे नसर रहे ॥ २८ ॥ उत्कीर्णा गोविन्देन इस प्रशस्ति को गोविन्द ने लिपि बद्ध क्यिा । शिलालेख का ऐतिहासिक महत्त्व परिचय--इग अमिलेस गे मालवा के पासक यशोधर्मन् के द्वारा राजस्पान के प्रान्तीय शासन के रूप में नियुक्त "धर्मदोष" के माई 'दक्ष' ने दरापुर में एक । कूप बनवा कर उत्तीर्ण कराया। इम अभिलेख की खुदाई गोविन्द नाम किसी व्यक्ति ने की थी। इस अमिलेख से निम्नलिखित ऐतिहासिक रातों पर प्रकार पडता है। (१) मालव देव का जननायक पासक यशोपमन पा, जिसने हूणों को पराजित रिया था। (२) उसने राजस्थान में प्रान्तीय शासक के रूप में अभयदत्त को नियुक्त किया था। (३) पयोधर्मन के घर का नाम प्रौलिकर या। (४) विष्णुषमंन उसका उपनाम था।
महाराज यशोयों का शिलालेख (५) चोपनंद के प्रान्नर शासक अभयदत्त के पूर्व तथा परपुरुषों का सस्ट मिलता है। (६) इस अभिलेख का लिपिक गोविन्द पा। इन प्रसग में ययोपन और उससे सम्बन्धित हापराजय की चर्चा बरेसिव है। ऐतिहासिक मध्य के आधार पर यह सर्वविदित है कि गुमकालीन मारत पर दियो हो और एको का प्राकमा होता रहता था। साप ही गुमा हरे सामग्यवादी शक्ति को सबसे अधिक सधात पहुँचानवाली घटनाओं म हूणा का आक्रमामीपन कारगया। हर बार, दाना-बदोश जाति के थे, जो मूलत चीन के पडोसी माने पाते थे। वे अपने मूल आवास स्थान से नित र सारे फारम और अजानिन्दान को रौंद हुए गुम-साम्राज्य के सभरत कुमारगुप्त क समय में पथिमी मारापर आमा रिये ये। किन्तु स्कन्दात को सामरिक कुरालदा क मागे इनको एक मी नहीं परी और ये वापस लौट गय । किन्तु वे चुप नहीं बैठ गये, बल्कि कुछ दिना के बाद पुन ५वी सदी ई० अल में वोरमाण" के नेतृत्व में बा धमके। इस अजमत ने गुस-साम्राज्य का रीढ़ हो तोड डालो। टोरमा को चर्चा कदा-कृत राजतरनिगो में और अन्यान्य समित्यो में भी पई बनी है। इन तमाम के आधार पर पता लाना है कि टोमग ने गुरु- सामरके बडे-बडे प्रान्तोंगाछन लिया और अन्त ममारत तक अपनी मता पारित कर ली। उत्तराय मे पि आनेवाले दूमो में साफ के मम्बध में 'हर्षचरित" म मी सस्ट मिलता है। तोरमा के एरण अभिल्ल से यह सात हवा है कि मातृदिएका छा माई पदिन हमनरेश का एक सामन्त्र पा तोरमाप क बार उसका पुत्र मिहिरपुन हर्मों का राजा हुआ । यनुतिया के अनुसार वह हृदयहीन, र, अनठायी शामक पा । सस्ता हो उसके मनोरजन साधन पी। धोना यात्रो पुवानन्राइक अनुसार उमने बोटों पर अलावार कर के उन विहारों को प्वस्त कर दिया और मगध के स्वामी पलादित्य पर आकर कर दिया। किन्तु उसे मुंहरी सानी पड़ी। बन्उतोगत्ता हमीर में परण गर रहा के राजा के सार षडयन्त्र करके वहाँ रा राणा बना। परन्नु अनि पासों के फलस्दम्य वह एक वर्ष के भीतर ही मर Pा। पहरातादिस्य "नरमिहगुम रासादिक" न होकर मातादिप नामधारी कोई दूसरा ही माष का मास्क पाइसी मिहिरपुल को पत्रिकरनेवाला उत्तीर्ण लेख-पञ्चरन् यशोधर्मन् या, जिसका महेन इस अमिलस में मिलता है। यद्यपि इस अभिलेख मे तो मिहिरपुल का वर्चा नहीं है। किन्तु दशपुर मे यद्योपमन का भी एक विजय स्तम्भ है, जिसमे मिहिकुल को पराजित करने की चर्चा आयो है :- स्थागोरन्यत्र येन प्रतिकृपगता प्रापित नोत्तमङ्गं चूडापुप्पोपहामिहिरकुलनृपेणाचित पादयुग्मम् ।" उसकी प्रशस्ति में यह कहा गया है कि यगोधर्मन ने अपने राज्य की भीमाओ को लांघकर उन देशों की विजय की, जिन्हें गुप्तममा तक भी नहीं जोन सरते थे, और उसने ऐसे देशो पर भी आक्रमण किया जिसमे हूण तक भी नहीं प्रविष्ट हो सके थे। लोहित्य ( ब्रह्मपुत्र ) से महेन्द्र पदंत तक तथा हिमालय से पश्चिमी सागर तक के सरे राजे उनी अभ्यर्चना करते थे। इतना ही नहीं, प्रसिद्ध हूण राजा मिहिरकुल मी उसके चरणो को नतमस्तक हो छूते थे। पूर्वोक्त विवेचन के आधार पर यह प्रतीत होता है कि मिहिरकुल दो बार पराजित हुआ था। एक बार तो मगध में बालादित्य के द्वारा और दूसरी बार मध्यमारत मे पशोपमन् के द्वारा। यशोधर्मन के बारे में इन दातो का संकेत हमे उसके विजयस्तम्भ से मिलता है। प्रस्तुन अमिलेख में मिहिरकुल और यशोधर्मन् के युद्ध का सक्न नहीं मिलता है। इसमे केवल "प्राचो नृपान् सुबृहतश्च वहूनुदीच • "इस श्लोक से यह पता लगता है कि पयोधर्मन ने पूरब के ५० बरं-बई और उत्तर के बहुत से राजाओ को सन्धि और विग्रह से वर मे करके लोक में प्रिय और दुर्लम "राजाधिराज परम स्वामी" का दूसरा उपनाम प्राप्त रिया था। उसके मुजबल से अजित पृषिको पर अनेक देश सुख से अपना समय बिताते थे। यशोधमंन किस प्रकार अपनी पनि सम्पन्नता को प्राप्त कर राजनीतिक क्षेत्र में सहमा इतना सफल हो सरा, इसके बारे में इतिहास मौन है। उसरी उत्पत्ति, 4 आदि के बारे में पूछ भी निश्चित बातें मालूम नहीं होती। वल इस अमिलेन में उसके कुल का इतना समेत मिलता है कि उसके कुल का नाम "ौलिकर" था। किन्तु उम वश का वर्णन नहीं मिलता है । अभिलेख के पांच लोक में उसे "जनेन्द्र." (जननायक ) कहा गया है। इस मद से यह ध्वनि निकलती है कि यद्यपि इसरी उत्पत्ति रिमी राजवा में नहीं हुई थी, फिर भी हूणों के विनाश करने में इसने अपनी मुजाओं के पराइम को दिखाया पा। यतः उसी पराम के प्रभाव से राज्यपद को प्राप्त कर पनता का प्रिय महाराज यशोधर्मा का शिलालेख क बन गया था। उनको विजय-प्रशस्ति और इस कूप-लेख के आधार पर यह सात होता है कि वह मालव का राजा पा और उसकी राजधानी मन्दसोर (पश्चिमी मालवा ) यी। इस प्रकार हम देखते हैं कि जिस काल का यह राजनीतिक दिग्दर्शन किया जा रहा है, उसमे यशोधमन का रडा ही महत्त्वपूर्ण स्थान है । किनु आश्चर्य है कि इसके वस और व्यक्तित्व के विषय मे इतिहासकार पदांत सामग्री के अभाव में अब तक अपनी लखनी को सायंक नहीं कर पाये हैं। इस अभिलन से योधर्मन के द्वारा प्रान्तीय शामक के रूप में नियुक्त "अभयदत्त" और "दक्ष" के कुल का परिचय मिलता है। इस अभिलेख के द्वारा "R" के पष्ठिदत्त नामक पूर्व पुरुष का भी सक्त मिलता है, जो यशो- धर्म के वजो दारा नियुक्त राज-नेवक था। उस पष्ठिदत्त की कुलोन माफ से उसी के समान उन्नव, गौरवशाली इसका सुपुत्र "वराहदास" नाम से प्रसिद्ध हुआ। और वराहदास का तेजस्वी पुत्र 'रविकीति' हुआ, जिसने अपने कुल के गौरव को महाया। उस रविकीति को सघ्वी भार्या मानुगुता के गर्भ से चीन पुत्ररत्न उत्पन्न हुए, जिनका नाम-भगवद्दोष, अभयदत्त और दोपकुम्भ था। यही अन्यरत्त पोषमन द्वारा पश्रिम देश में राजस्थान का प्रान्तीय शासक नियुक्त हुमाया। उसके बाद उसके छोटे भाई दोषकुम्भ का पुन मंदाप ने अमयदत्त के कार्यभार को पहा रिया और उसो धर्मदोर के छोटे माई "दस" ने दापुर में एक दूप का निर्माण करवाया । उमी कूप में यह अभिलेख राजा को बाजा मे गोविन्द ने उत्कीर्ण किया। वहीं पर यह अभिनेस लिपिबद्ध है। दूर पर उत्तीर्ण होने के कारण ही इसे 'कर-सैस' कहते हैं। अभिलेख का साहित्यिक वैशिष्ट्य माहित्यिक रिपता को दृष्टि से इछ अभिनेत मे हमे अनेक चमत्कार देतने को मिलते हैं। विपकर ये चमकार छन्द-योजना और अलकार प्रयोग में दीप पाते हैं । जहाँ तक इस अभिलेख के विषय का विदेवन है, उसका सीरण इसके ऐतिहामिक महर के प्रसंग में लगमग हो पुका है। हाँ! साहित्यिक से हन इसके विषयगत वैशिप का मो यदि इस प्रकार विवेचन करें तो वह अमासगिक न होकर पाठकों के लिये इविसर ही सिद्ध होगा। समर माहिए की "आदो मगलं विपेरम्" इस परंपरा के अनुसार कवि ने इस प्रगत रा प्रारम्भ मताद करको सुन्दर बन्दना से किया है ।
५८ उस्कोलेस-पश्यम् उसके बाद कदि नमिलेख के दिषय की ओर अपना कदम उटाकर कूप और सत्कालीन जनायक पयोधर्मा की प्रशसापरव स्तुति करता है। तदनन्तर इस वर के राज्य करनेवाले राजापो को छत्रछाया ने शासन करने वाले पप्टिदत्त और उसके वजो का चरिमचित्रण समास-पद्धति से किया गया है। इसी प्रसग मे षष्ठिदत्त के राज शासम 'दक्ष' के द्वारा अपने चाचा 'अभयदत्त' की स्मृति में कूप निर्माणकार्य का सकेत भो किया गया है। इस कूप का निर्माण-वायं माला सवत् ५८९ मे वसन्त ऋतु में सम्पन्न हुआ था, जिसका उल्लेख प्राप्ति के अन्तिम भाग में किया गया है। अन्न मे कवि धूप और उसके निर्माता दक्ष के दीर्घजीवी होने की कामना के साप अपनी इस प्रशस्ति को समाप्त कर देता है। इस छोटे से अभिलेख मे कवि ने बहुत अधिक छन्दो का प्रयोग कर अपनी विविध-छन्द-प्रियता और उसमे सफलतापूर्वर काव्य निर्माग-बोधल का एक साप परिचय दिया है। इस रघु-काव्य-कलेवर मे ही कवि ने लगभग १२ छदों की योजना की है। अब हम पूरी प्रशस्ति मे आये छन्दों को एक मोटो सूची के माध्यम से यह देखेंगे कि कवि ने किस प्रकार सद प्रकार के छोटे-बडे छन्दों दे प्रयोग में अपनी काव्यकला का परिचय दिया है। कवि ने अन्य छन्दों को अपेक्षा मालिनी का सर्वाधिक उपयोग किया है देखिये-इस छन्द का प्रयोग एलोक सस्पा-३, ५, ११, १३, १७, १८,२०, २१, २२, २६ में किया गया है। इस तरह पूरी प्रगस्ति के एक तिहाई २० मे इसरा प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार लोक सस्था १ मे पुष्पितापा, इलोर सस्या ४ मे उपाठि, एलोर संस्था १० में इन्द्रवया, दलोर सख्या २५ में मन्दानान्ता, इलोस सस्या ९ मे गर्दूलविक्रीडित, श्लोक सस्या २८ मे शालिनी से छन्दों का मी प्रयोग एकाकी म न किया गया है। इसी तरह दलोक सस्या ६,७ में वसन्ततिलका और सस्था २, २३ मे शिखरिणी का प्रयोग मिलता है। लोक सस्था ८, १९ और २७ मे हम स्रग्धरा से सम्वे एन्दमा भी दर्शन करते हैं। दलोक सस्था २४ मे हमे आर्या और दलोक सस्या १४ और १५ मे अनुष्टुप की झलक भी मिल जाती है। छन्द प्रयोग के उपर्युक्त सिंहावलोरन से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि कवि आर्या और अनुष्टुप् से लघु-छन्दों के प्रयोग के साप ही मालिनी, वसन्ततिलका और पुप्पिदापा से कोमल प्रवाहपूर्ण छन्दों में अपना महाराज यशोधर्मा का शिलालेश मन रमाता हुआ गटविक्रीडित, मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी और सम्परा में व छन्दों का उपयोग भी अनारास ही कर देता है। इस प्रकार हम कवि इन छन्द-चौकडी मै मा हिरण-चौरही से दे सस्ते हैं जो क्षण-प्रतिशन करने में नहीनता सार भावुकों के मन को हार मोह लेती है। जहाँ तक अलारों का प्रश्न है उसमे दि ने समालंकारों मे अनुप्रास दिपा पोलंकारों में अपना का सर्वाधिक प्रयोग किया है। सम्पूर्ण अग्नेिस में उपमालकार -सा गया है। अन्य सभी बलकार इस कलकार-सम्राट नौ ही अपंग-वन्दना में व्यस्त में नजर आते हैं। उपमा के अतिरिक्त अन्य रिती भी अलरार का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं के बराबर है। मंगल-इलोक ही कवि ने उपमा को अनुपम छटा दिसायी है। स्थान-पान पर उपमा में रूक और एभर पुट से इस बलकार का विलास और भी निखर उठा है। सभिलेस में अलकार-मोरना के पर्यातोचन से यह मात होता है कि कवि ने समालकार का प्रयोग १, ११, १३, ११, २१ और २३ सरूपक श्लोकों में किया है और रूक मिथित रूपमा का प्रयोग ५ मोर १५ सस्पः लोक में किया है। अनुप्रास और सनक मिश्रिच उपमा का प्रयोग लोक स० १७, २० और २२ में मिलता है । वसन-वन के प्रतम में कवि ने वरप्रेशा-मिश्रित उपमा का सुन्दर प्रयोग किया है। देगिरे~-२५ वें दलोक में--"स्मरयर निभाः कोकिलाना प्रसारा. प्रोपिचाना मनाति मिन्दन्ति इव" इस उक्ति के द्वारा और मृङ्गालोना पनिः पुणोतो. बापतग्य धनुरिव' के द्वारा उपमा को मनोरम छटा दीख पडतो है । यहाँ पर कोक्ति-प्रसार री उपमा रामदेव के बालों से दी गयी है और वह कोपित प्रसार परदेशियों के मन को मानो छेद रहा है। इसी प्रकार मोरों की पपुर संगार कामदेव के पनुप को टार को मोति समस्त वन प्रदेश में गूंज रही है। इसी प्रकार रिय पान-सम पूर्वोक्त लोकों में परि-निर्दिष्ट अलगारों का दरन-विदेचन स्वय कर रुकडे हैं। स्वल्प पन्दी में ही बसन्त से कमनीय और मारू ऋतु का वर्नन कवि के वर्जन-सौन्दर्य का अनुपम निदान है। वसन्तु- बन के प्राग में वन्दन्त सावधानी से काम्परता का प्रयोग करता नवर मादा है क्योंकि दो ही लोक में उसने बसन्त के मसन भव को नापकर गागर में सापर माने को सफिको परिवार्य कर दिया है । वन सौरव के साथ ही कविको परसा भी उमउ कोटि को है । रम और भार के अनुकुल आन्द- पस्न कार्यभारटाटा है। भारत रिपेशानी उस्कोणलेख-पञ्चकम् इसलिये मुन्दर है कि काव्य मे आद्योपान्त प्रवाह बना है। किन्तु इस प्रवाह में केवल एक ही खटकनेवाली बात है और वह है छन्द-वविष्य । मेरे विचार से यदि एक या दो छन्दो का ही आश्रय लिया जाता तो काव्य प्रवाह की विच्छिन्नता का प्रश्न ही नहीं उठता। दोप दृष्टि से केवल यह कहा जा सकता है कि यदि स्पलविशेष पर पुनक्ति दोप से अपने को नहीं बचा पाया है क्योंकि प्राय एकार्थक शब्दो का प्रयोग केवल पाद पूर्ति के लिए कर दिया गया है। रोति की दृष्टि से प्रधानतया काव्य का प्रतिनिपिल वैदर्भी रीति ही करती है। मापा की दृष्टि से यद्यपि परिचित, सुबोध और असमस्त शब्दो का ही प्रयोग बहुतायत से किया गया है फिर भी कही-कही लम्बे समास और दुरूह कल्पनाओं का भी आश्रय लिया गया है । समस्त पदों का प्रयोग श्लो० स० १ और २६ में मिलता है। पूर्वोक्त आलोचना से हमे यह प्रतीत होता है कि जहां पर कवि एक ओर अपने भावपक्ष को प्रकट करता है वही पर दूसरी ओर अपने कलापक्ष को प्रकट करने के लोम का सवरण नहीं कर पाता है। फिर भी यह प्रशस्ति किसी प्रारम्भिक कवि की नहीं वरन् किसी सहृदय कायबला-ममा को ही है। टिप्पणी जनेन्द्र-इसका अर्थ जन-नेता होता है। इस शब्द से यह ध्वनित होता है कि यशोपर्मन की उत्पत्ति किसी राजकुल में तो नहीं हुई थी किन्तु हूणों के विनाशक होने के कारण और अपन पराक्रम और राजकीय गुणों के कारण वह राज्यसिंहासन प्रासपरके जनता का प्रिय पात्र हो गया था। प्रमदवनम्-जहाँ पर राजा अपनी रानियों के साथ विहार करता है उस उद्यान को प्रमदवन कहते हैं । औलिकर-इस पद का अर्थ यद्यपि स्पष्ट नहीं है फिर भी पशोधर्मा में पंचा "मौलिकर" यह प्राकृत नाम समझा जाता है पलीट महोदय के अनुसार "बोलि" का अर्थ 'उष्ण' अथवा 'पीत' और 'परा पं किरण' है। उनरा सरेत संभवत मूयं अपदा चन्द्र बस की ओर है । भानुगुप्ता :-फ्लोट महोदय के अनुसार "मानुगुप्ता" समवत. गुरु सम्राट "भानुगुप्त' की बहन थी। इससे यह सकेत मिलता है कि उन दिनों में ब्राह्मण सनिय मन्या से भी विवाह करते थे।
महाराज यशोधर्मा का शिलालेख रामन्यानीयवृत्या-"रास्थानोर" शब्द का अर्थ "जैनेन्द" के "लोक- FEमें जापाननाय "मति रसदनि च स राजस्थानीय " अर्थात् जो वाश रक्षा और आश्पदावा हा, उसे राजस्थानीय अर्थात् वायसराय ficeroy कहते हैं । किनु कभी-कभी अमितेखों में यह सन्द राज्य के सामान्य अधिकारी के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ है। इन म्ह प्रतीत होता है कि 'अभयदत्त' 'यशोधर्म के सामान्यान्तर्गत मी मान्नों का वायवरार पा और दरार उसको राजधानी पी। निर्दोर नाम -कुछ लोग 'निर्दोष' सन्द को 'दपान' का विपन बवाते हैं दो कुर माप इसे परिवार सना । हमारे विचार से प्रथम मत रूपादेय है । MHING
(५) विग्रहराजस्स (वीसलदेवोपनामकस्य)
देहली-स्तम्भलेखः (वि० सं० १२२०)
हों। दव १२०० देहात मृति ।। १५ ।।
शारीवियोन्दाबलदेवानज्योमोनदेवच ।।
। मों जम्मो नार रिप्रियाननदो दिदलनरें
प्रत्याणि वृयानि, दानिलक, पालाम।
मार्गो सोरविरुद्ध एव विजन मनो विद्वान
थोमदिनहयज्दैछ । भवतः प्राहे प्रमामोन्मदे
शेन ।। सदर १२२० दाल दास ॥ १५ ॥
समये (जार) राग मोजानु देल्टदेव - नाद दोन्टदेव
{स्लेिख)।
है श्रीमन् विहारदेव ! उरका अपनी दिना करते हैं दो रि-
ललना गहों में और दल रे दावों तले मदिना दले है। और
बैंक कारण बारी समस्त दिशाओं में दरारी है। विद-
पात्रा में पंदन नारका का ही नही का न हो
उन्टा हैनागार-एप निहन और पान केल होने राह
है कि दिवसाचा प्राशनेबानी देना, और पराम सभा में
समन्दरों में बात होकरी दह दल जनावर
होदा, दहा शिवार रात करता है। पास में कोई
नीति नाचार ना पर रन्हो रहदा हिच दंश उनएच
गता है। दो दिउपाय करने पर दिन हो बरादा है। ॥१॥
रोसान्दिर सौदरे मनु म्दान्न दानवाद
गगां तु न दिक्षित पायोत्र दामना ।
पहावापुस्पोननय नदनो नाम्देव वारा निय.
निर्मदायिय: किन्नु नानकोरे न द्वितिः ॥२॥
विहराज का देहली लम्म-लेख है लोगनिरेतन विस्हराज ! रमणियों के सजातीय मानस-मन्दिर में आपका वाम है किन्तु आप अनुपा का नहीं। हे राजन् ! रमणियों के सजातीय दर में आपका विनाम रचिन हा है इसका का अवमर नहीं। क्योंकि माग्ने विष्णु भगवान् के समान समुद्र मन्थन से उत्पन्न लामो को गोद में पिन नहीं किया है। (माव यह है कि राजा ने विश्णु भगवान के समान ही पनुरूपी समुद्र को पर रिजय लक्ष्मी को प्रात किया है। )२॥ ओ।। आविन्यादाहिमाद्रेविरचितविजयन्तीर्थयात्राप्रसङ्गा- दुग्रोवेषु प्रहर्ता नृपतिपु विनमन्कन्धरेषु प्रसन्नः । आपावतं ययायं पुनरपि कृतवान्म्लन्छविच्छेदनामि- देव माकम्मरीन्द्रो जनि विजयते वीसलसोणिपाल ॥३॥ होम् ॥रने नीर्यपाना के प्रसङ्ग मे हो विन्ध्याचल से लेकर हिमालय पर्वर तक के प्रदेश को जीत लिया है, और उन प्रदेशों म सिर उठानेवाले राजाओं को नवमस्टक कर दिया है तथा आनन-मस्तक राराम पर अपनी प्रसन्नता को प्रगट दिया है, जिसने म्लेच्छो का समूल नारा करके आपवित्रं देश को पुन 'आपों का देश' इस नाम से सायंक बनाया है वह साम्हर का स्वामी राजा भीमरोव विजपो हो।॥३॥ ते मप्रति चाहमानतिलक. शाकम्भरोभूपतिः श्रीमदिरहराज एप विजयो मलानजानात्मन. । अस्माभि करद पधायि हिमवद्विन्ध्यान्तराल भुवः मेगस्वीकरणाय मास्तु भवनामुद्योगशून्य मन. ॥ ४॥ चौहान कुनपर माम्हर के विजयो राजा विहार अब अपने कुलानों मे कहते हैं कि हमने हिमालय से लेकर दियाचल के मध्यवर्ती प्रदेशों को कर देन के लिये ना कर दिया है ( अपने अधीन कर लिया है)। अब अनिष्ट पजार बारिधानो को अपने अधिकार में करले में तुम लोगो का मन योग- सूत्र नहीं हो ॥४॥ मन् श्रीविक्रमादिन्ये १२२० वैमास शुनि १५ गुरो॥
-- -- उस्कोपलेख-पयाम लिखितमिद राजान्देशात् ज्योतिपिक्धोतिलकराजप्रत्यक्ष गौडान्वर- कायस्थमाहवपुत्र श्रीपतिना। अब समये महामन्त्री राजपुयश्रीसल- क्षणपालः॥ विक्रम संवत् १२२० वंशाख शुक्ल की पूपिमा वियि एव गुरुवार । राजा विग्रहराज के आदेश से "श्री विलारा" नाम के ज्योतिषी जी के सम्म "गोड" वर में उत्पन्न वारस्य मान के पुत्र ने इस लेख को लिपि को। इन निों में राजकुमार "श्री सल्लागपाल ' महामन्त्री थे। स्तम्भलेख का ऐतिहासिक महत्त्व परिचय --दिल्ली चोहानशी राजा विम्हरार (वीसलदेव) ने हिमालय की उपत्यका में विद्यमान मौर्यसम्राट अशोर के एक स्तम्भ पर इन अभिलेख को उत्तीर्ण कराया था। उस सम्मको बाद मे चिमनी १५ दी चान्दी में दिल्ली के तत्कालीन यवन शासक फिरोजशाह ने वहा से मंगा लिया, जो आज भी "फिरोजशाह का कोटग" इस नाम से प्रसिद्ध स्पान में विद्यमान है। उनी स्वम्म पर यह अभिरेस बार के धर्मोपदेश के नीचे उत्तीर्ण है। इस निरस के कार रोरों में विरहगज को वीरता, उमरी पोम्याति और रायसीमा का वर्णन रिया गया है। इस छोटे से अमिरेस की छाया में हम भारतवर्ष के एक महत्वपूशासक जानि के इतिहास सरी इलक पान का प्रयास कर सकते हैं और वह जाति है अन्तिम हिन्दूसम्राट हवंदधन के बाद उत्तर भारत में राज्य करनेवाला राजपून वा । अभिलेख के चौहानवमी राजा का सम्बन्ध इन्हों राजपूत वा से स्थापित किया जाता है। अब हम मो में अभिरख दे नायर राजा को ऐतिहासिक पृष्ठमि के रूम में राजपून वा सिंहावलोपन इस प्रकार कर सरते हैं :- राजपूत सम्राट हावन की जीवन-लीला जब भारतवर्ष के राजमिहामन सो रंगमच से मूनी कर गई तो उसरे योग्य अधिकारी के अभाव में यहाँ की राउनौति एकता दिन्छिन-सी हो गयी। सगन्टि सामाग्य टुरहों में बटने लगा और कुछ मनचले सामन्त अपना शिर उठाार पास-पडोम दे गयो की ओर अपनी सोरम दृष्टि से ना करने लगे। इमो विरल राजनतिर परिस्थिति में नये राउवों की स्थापना हुई, जो सामूहिर रूप में राजपूत रहगये। इसीलिये यह युग भारतीय इतिहास में 'राजपून-युग' के नाम में विण्हराज का देहसो स्तम्भ-रेख प्रसिद्ध है। इस युग का इस देश के इतिहास में न केवल राजनीतिक दृष्टि से अपितु धार्मिक और सास्कृतिक दृष्टि से भी अपना विशेष महत्त्व है। एकन्छन साम्राज्य के अभाव में देश को राजनीतिक एकता के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने पर मी मुसलमानों के आक्रममों में भारतीय स्वतत्रता, सस्कृति तथा धर्म की रक्षा राजपूतो ने अदम्य साहस से की यो। राजपूत पौन थे -राजपूत शब्द का प्रयोग ऐतिहासिक दृष्टि से सर्व. प्रथम हर्ष को मृत्यु के बाद के काल में प्रारम्भ हुआ। यद्यपि राजपुन शब्द अत्पन्न प्राचीन है और उमी का रूपान्तर शन्द 'राजपूत' है किन्तु इस शब्द के पहले प्रयोग नहीं होने के कारण कुछ ऐतिहासिकों ने इस जाति को एक विदेशी जानि मान लिया और इसके विकास का समय सातवीं सदी का उत्तरार्ष माना। उनके अनुसार राजपून जाति, मध्य एशिया से आये हुए शक सीपियन आदि मिन्न भिन्न जातियों के सम्मिश्रण से उत्पन्न हुई। इस मत के प्रवर्तक हैं राजस्थान के प्रसिट हातहास-रेखक कल "टाड" महोदय । उन्होने पृथिवीराज रासो के अग्निकुलवाले वर्णन से प्रभावित होकर भारत के राजपूतों में और मध्य एशिया को घर तथा सीपियन जातियों में पर्याप्त सादृश्य को क्त्सना कर यह सिद्ध रिया कि गुप्तकाल के प्रारम और उत्तर काल में भारत में मानेवाले पर, पन्लव, हू, सीपियन आदि जातियां यहाँ आकर बस गपी और यहाँ के हिन्दुओ के आचार-विचार और धर्म मे घुलमिल गर्यो। फल स्वरूप, हिंदूधर्म मे दीक्षित इन विधियों की एक नयी जाति न गयो, जिसमें मध्य एशिया में निवास करनेवाली पक्षिमी जातियों के पुत्रियता आदि गुणो के साप हिन्दू धर्म और सामाजिक मान्यताओं के प्रति उनकी निष्ठा तथा स्वाभिमान की बातें सम्मिलित हो गयी। इन नरे फूलों के प्रधान नापक अपनी उत्पत्ति प्राचीन हिन्द्र देवताओं-अयं, चन्द तथा अग्नि से बतलाने लगे। फलस्वस्म, हिन्द पुरोहितो ने उन्हें हिन्दू धर्म के सरक्षक के रूप में, त्रियों क रूप में स्वीकार पर लिया और तब से ये लोग अपने वो 'राजपूत' रहने लगे। इस प्रकार नरे सत्रिय और राजपूत समानायक समझे जाने लगे और उत्तरी मंदाना रे जिस माग में मलव दे माफर बने उसका नाम 'रागुताना' पड़ गया। रिनु पुछ ऐसे भी तपूर्ण तप्प हैं, जिनके आधार पर अन्य विद्वानो ने इम पूर्वोक्त मान्यता का सन्डन पिया है। इस मान्यता के विष्ट प्रधान आपत्ति तो वस्तुत. पदि भारत को सम्पूर्ण क्षत्रिय जाति विदेशी है तो भारत - मोमिनपश्याम को प्राचीन सविस जानिया हुई वा वह पूर्णत सुरु हो गयो ? गर यह सुस हो गई तो कब और मे प्रल ऐसे हैं जो रात वंग के विश्व में दिदेशी धारणा वा खण्डन कर दुधना समान्य दतिमनु सिद्धान का प्रदिपादन परते हैं । इस भारतीर मा के प्रतिपादकों एवं समर्थकों ने राजदाने के प्रामाणिक इतिहान-लेखक पष्टित गौरीशार होगचन्द्र ओझा का नाम उल्लेखनीय है । रामान का वास्तविल इतिहास इस प्रकार है . 'राजन' बन्द सम्कृत के रात्र' का रूगन्तर है। प्राचीनकाल में राजपुत्र अब्द का प्रयोग रिनो वाति-विशेष के होकर राजकुमारो अपवा राज- वधियों के लिए हावादा। बजे प्राचीन भारत में अधिक सविर राजाओं पाही भाम्न पा, अ मामात्र करने पर याद त्रिय राजकुमारों का ही सूचक पा। कौटिल्य के प्रथम के पूर्व हो गजकुमारों के हिर 'राजन' महाराजपुत्र' आदि समोरा प्रचलन था। वास्तव में राजपूत सम्म का जादिविष उपा जिप के ज्य में प्रयोग मुसलमानों के बाद में प्रदर होने के बाद से हुआ। मुसलमानों ने लगातार आमण ने सपियों के राज्य समालमाय हो गये। को कुछ बचे मो थे उन्होंने मुसलमानों को भीनता स्वीकर कर ली और उनके मामन्त बन गरे अथवा साधारण प्रजा को कोटि में आ मिले । राजद के होने के कारण भारतीय हिन्दू जनता इन्हें 'रात्र' हो वहतो पी। किन्तु मुरुलमानों को राजपुत्र' उच्चारण में कठिनाई होती यो। कन उन्हें वै सरलतापूदंक 'जात' हो रह्ने लगे। जातिविशेष के अर्थ में प्रयुक्त हुआ। सक्षेत्र में इस शब्द के इविहान या पट्टी म्प है। प्राचीन अनुभूतिरों के अनुसार भी राजपूत सोग प्राचीन इत्रिों को मनान हैं जो अपने का सवसी ठपा सुर्यवंशी मानते हैं। भारत के प्राचीनतम साहित्य के समापन से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यारों को प्रमुख शाखायें पो, वो हम में मूसंवर तपा चन्द्रवरा नान में विस्गत पो। बाद एक तोमरी पासा अग्निवदी भी हो गयी। इन्हीं तीन वनों में आर्य जाति काममादेश हो जाता पाहिन्न राजनीतिक जीवन में क्षत्रिय वर्ण की प्रधानता के कारण इन वयो को परम्परा कायारपत. क्षत्रिय वो सार पापित हो गयी और क्षत्रियों के विभिन्न वा मूलत इन्हीं तीन बशो के नाम से विवाद हुए। गलानर मे परिवार विशेष के नाम पर अपवा उसके मुख पक्तियों के नाम पर मला दो - विग्रहरान का देहली स्तम्भ लेख वो को परम्परा चल पडी । हर्षवर्धन के बाद राजपूत' सन्द से समझे जानेवाले राजवयों का सदध भी उन्हीं प्राचीन क्षत्रियवयों से है। हर्षवर्धन के बाद उत्तर भारत की राजनीति मे तथा मुसलमानों ने टक्कर लेनवाले राजवमो मे निम्नलिखित पक्षप्रमुख माने जाते हैं १-वन्नौज का गुर्जर प्रतिहार वा। २-कन्नौजना गहडवार वय। ३-बुन्देलसम्ह का चन्देल वंश । ४-मालवा का परमार वर, और ५--दिल्लो एक अजमेर का चौहान वय । अभिलेस के विग्रहराज का सम्बन्ध इन्ही राजपूत वक्षों के चौहान वा चौहान वश -हम्मोर महाकाव्य' तपा 'पृथियोरार विजय के अनुसार चौहान 'चाहमान' नामक व्यक्ति के वशन थे, जिनकी उत्पत्ति मूर्य से हुई यो। किन्तु पारणो के अपनानुसार चौहान अग्निकुल के थे और उनको उत्पत्ति 'आबू' पर्वत पर हुई थी। विदशी मान्यता चौहान को भी प्रतिहागे गे भांति अग्नि पुट की गयी विदेगी जाति ही मानती है। किन्तु कुछ विद्वान् चौहान की अग्निालवाली मान्य 7 की व्याख्या इस प्रकार करते हैं + अन्य राजवशों के साय पोहानों ने भी यहाँ की अग्नि को साझो रखकर अरबों तथा तु के आक्रमण से देश की रक्षा करने की अपप लो यो । अतएव आधुनिक इतिहासवेत्ता चौहानो को भी प्राधीन क्षत्रियों को सन्तान मानते हैं। भारतीय इतिहास में चौहान वंच का बहुत ही महत्व है । ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि शाकम्मरी अपवा साम्हर प्रदेश, जो जोधपुर तपा जयपुर राज्यो की सीमा पर विद्यमान है, इनका प्रधान रेन्द्र या स्थान था। इस बस को भी कई मासायें पो। परन्तु मारम्मरी पाखा मर्वाधिक प्रमित मानी गयी है। इस वर की स्थापना दानुदव ने की पो, परन्तु उसके समय का निश्चयीकरण नहीं किया जा सरताबस दिवोर ने दिल्ली के दोमर राजा को परास्त कर उसकी हत्या कर दो विराम सदन १०३० अर्पा ९१ ई. का हर्ष प्रस्तर-रेख, चाहान पर के इविहान की प्रारमिक सीमा से मूबर प्रयम तक बनाता है जबकि साहित्यिक प्रन्यों में इन बाकी तानिए दामुदेव तर देगी जाती है । चौहानी और तोमरों र हार मिश्री स्लिो और दिल्ली का समर उनी हमें ६८ उत्तरोलित पञ्चम में आ गया । वासति प्रपन तथा मिहराज इस दश के पराक्रमी राजा दे। विह राज द्विनीर के समस्ता चौहान राज्य प्रतिहार-राज्य के प्रभाव से मुक्त हो गया। उसने नर्मदा नदी तर अपने राज्य की सीमा वहा कर गुजरात के चालुक्य राजा मूलराज को पराजित किया। उसके बाद अभयराज ने मालवा के परमारवी राजा के सेनापति को परारित कर उज्जन तक अपनी विजयपताका फहरायी। अभयराज ने अजमेर नगर को स्थापना की। चौदान अभिलेखों के अनुसार चौहानदी गोदिन्दगज द्वितीय, अउपराज तपा अगोराज ने मुसलमानो को पराजित किया था। चौहान दश का दूसरा प्रनिद राजा विग्रहराज चतुर्थ ( वीसलदेव) हुआ। इमने मुसलमानों मे सघर्ष जारी रखा और यमुना दया सतलज नदियों के बीच का प्रदेश मुसलमानों से छीन लिया। अभिलेख के अन्तिम श्लोक में- "अस्माभि करद पपापि हिम- वदिध्यान्तरातं भुव" इस उक्ति के द्वारा यह मालूम पडटा है कि विग्रहराज ने हिमालय तथा दिन्ध्याचल के दोच को सारी भूमि को अपने अधीन कर लिया पा यद्यपि यह उक्ति अतिरत्रित प्रतीत होती है, फिर भी विजोलिया (मेवार ) में मिले एक रेख से उनका दिल्ली को जीतना सिद्ध होता है। डाक्टर आर. त्रिपाठी के अनुसार सभवतः दिनहगर ने दिल्ली को गहृडवाल राजा विजयचन्द्र से छीना पा । विग्रहराज बहा हो वीर, धीर और मफल संन्पसचालक था। इसके साप ही दह स्वय प्रविनाशाली कवि, ललित कला का उपासक और साहिम्पिकों का सरक्षक मो पा। महाकवि सोनदेव ने दीसलदेव के परितों का का चित्रण करने के लिये 'ललित विग्रहराज' की रचना की पो। इस प्रकार यह चौहानवश का एक उन्लायर ही नहीं बलि उसके प्रभाव को विस्तृत रनेदाग उन्साही राजा था। इस वंश के अन्मि राजा पृथिवीराज' का उत्साह. देशप्रेम और वीरता भारतीय इतिहास में स्वाक्षरों में लिखी है, रिन्तु आपसी मतभेद के कारण यवनों के हायों इसके दुसद अवमान ने भी इतिहास के पृष्टों को मिल- सा बना दिया है। एस०
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वाराणसेयसंस्कृतविश्वविद्यालयस्य
प्रश्नपत्राणि
(१)
यो वृत्यर्थमुपास्यते मुरगुण सिद्धच सिदयविभि
ध्यानं कायपरविधेयविषयमोक्षाथिभियोगिभिः
मतया तीव्रपोषनश्च मुनिमि. चापप्रसादक्षमै.
हेर्यो जगतः क्षयाम्पुदययो. पायाच स वो नौकरः ॥
अय पलोको यस्मान्छिलालेखातः स कस्य नृपते शासनकाले
कस्मिन् प्रसने, कुत्र, केन रविना च रचित इति निरूपणीयम् ।...
अम्मो नाम रिपुप्रियानयनयो प्रत्यपिदन्तान्तरे,
प्रत्यक्षाणि तृणानि, वैभवमिलकाष्ठ यस्तावकम् ।
मार्गों लोकविरुद्ध एव विजन शून्य मर्नो विद्विपा,
श्रीमद्वियहराज देव । मत. प्रासे प्रयागोपवे ।।
पमिद ध्याख्याप कोज्य विग्रहराज. म कदा कुत्र च बभूव ? अयं लेखाउन
कदा कुन कुतचोल्लेखितः।
(२)
(क) महरौलीलोहस्तम्मोकोलेसस्य चन्द्रनृपते परिचय प्रदाय पमिदं
पारपेयम्-
यम्योद्वतयतः प्रतीपमुरसा बनून् समेन्यागतान्,
बनेप्यावनिनोमिलिसिता सड़गेन कौतिभुने।
बोवा सहमुखानि येन समरे सिम्पोजिता बाह्निम,
मस्याम्चाप्यधिवास्यवे जननिर्वीिर्यानिलंदक्षिणः।
(स) पोपमंण. परिचय देशकालनिर्देशपूर्वक प्रदाय पमिद मास्राय.
साम्-
स्निग्यश्यामाम्बुदा. स्थगितदिनाठो यग्वनामारपघुमै.
रम्मोमेध्यं ममोनास्वपिपु विदयता गाइसम्पन्नम्म्या ।
१.
उत्तोलेख-पनवम
Hedmar
4 पाहादिनाना र ममदनाद्यानचूनारामा
राजन्यन्ना मन्ते भुजविजितनुश भरया न दया ।
मनटयितदानदिन्दासत्तापगचलस विभूषिताया ।
दुप्पाईन नरमण्डवनवाया नम पर निलम्भुमिद ब्रमण
प्राचा नृपान् मवृहतश्च दग्नाच मुभ्रायथा च वान प्रविधाम यन।
नागपर उगति वान्तमदा दराप गजाधिरापमवर इयढम् ।।
प्रमगा सर व्याख्यायदामन्यवर कुश्ययम रख रवि च रथ ।
पितारखनामादृसूनपरस्सर व्याख्यापटामयोनिधि रोष दयम्-
(क) खिन्नस्पद विमृज्य ग नगपत माथितस्पतरा,
मू िवमजितावनी दत वा मिदतस्व भिती।
पान्तम्बव महावन हुतभुजो दम्य प्रतारा महान्
अद्याप्यामृति प्रभागिरिपायलस्य र मिठिम् ॥
। ख) पदाभिरम्परिदहरन चपरोमिंगा समुपगृहम्
रहति दुचारितान्या प्रोविरविम्दा म्मरागमिव ।
(1) रामन्दिरसाद रेप मदतु स्वान्ने वाम गम्
शत्रुपान्नु न विग्रहभिनिपने न्यायोर वासस्नद ।
पडा वा पुरुषोत्तमस्य भवठो नास्थव वागनिध
निर्मप्यापड्तप्रिय विमु मदान् जाड ननिदापित ॥
विरारसनामवृत्तनिपूर्वक पदकारन्तरदिराद दाहायतान् १०
(क) कान्तो युवा र टुर्दिनमान्दिय, रामावि मनुस्मृती न मदं स्मदा ।
गृङ्गारमूतिभिमात्पन-तो-पि, यमुमचाप इद द्विवाय ॥
(स) हिमवत इद गाङ्गम्तुङ्गना प्रवाह सन्त इव रेवावारिराक्ष ययान् ।
परमभिननीय पदिम नन्दवाया, यत सन्तिगरिमास्तापत नगमानाम् ॥
टिहासिकदिदरमहित निम्नादित पर मानसम्-
मत्तमगहनवितानदिन्मालोहावर रहमदिलाय. '
दृष्यावनम्रतम उदवसकाया बुमे पर विरामिद इमे॥
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प्रानपत्राणि ।
(७)
नीननिर्दिष्टश्लोवो यन्छिलालेखस्थी तन्नामसमयादिक निदिश्य सप्रसङ्गं
बाम्यायनाम्--
(क) प्राज्ञा मनोजवयव प्रयिनोवंश वशानुरूपचरितामरणास्तयाये ।
प्रणयिनामुपवारदक्षा विस्रम्भपूर्वमपरे हदसौहृदाश्च ।।
(ख) वित्रिविषयसङ्गधर्मशाल स्तयान्य. मृदुभिरधिसत्त्वा यात्राऽमरश्च ।
स्वकुलतिलक्भूतमुक्तगर्गरदारंगपिरमभिविभाति श्रणिरेवं प्रकारः ।।
अथवा-रुद्रदाम्न शिलालैन तच्चरित वीश प्रतिमासिन भवतीति-
सक्षेपण दाद्वादशपद्धिभिविलिम्य निद्दिश्यताम् ।
मत्यवता