Hindustani Academy, Allahabad
Nagari Pracharini Granthamala Series No. 4-8
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*:*K.. ******* ***choot * BREE:** . O O 0 0 PyaramaraGIASPEL . Magari-Pracharini Grantbmala Series No. 4-8. THE PRITHVÍRÁJ RASO OF CHAND BARDÂI, EDITED BY Elindust ni Academy Mohanlal Vishnulal Pandia, Regelie Krishna Das ** AND ** ०.699D9 Syam Sundar Das, FIBA CANTOS XXV and XXVHH HASANTOM का ANLLHD S कृत महाकवि चंद बरदाई पृथ्वीराजरासो जिसको पजान॥ मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या, राधाकृष्णदास और श्यामसुन्दरदास बी. ए. ने सम्पादित किया । पर्व २५ और २८ PRINTED AT THE TARA PRINTING WORKS, AND PUBLISHED BY THE NAGARI-PRACHARINI SABHA, BENA RES. **०* isk 1906. . . . ****** ******** ********* * KK ** ** **** ** *** **** ** * Issued 15th December 1906. [ Price Re. 1-8. . 9 . 0 मूल्य १०] सूचीपत्र। .... पृष्ठ ८३३ से ८६४ पृष्ठ ८६५ ८८१. ८८२ ९१२ .... (२५) शशिवृता वर्णन (२६) देवगिरि समय (२७) रेवातट समय (२८) अनंगपाल समय " " .... " दूसरे भाग का टाइटिल पेज और मूचीपत्र । Hamrone- ::०: रासोसार पृष्ट १ से ६४ पृष्ठ तक पचीमवां समय ७५ ] पृथ्वीराजरासा। बौरा रस्स उतावल न रहै बरजिंदा । अलबेला सु उछछला अनमो अवलंदा ॥ गाहड़ मल्ल गुमान गुर गुन गात गुरंदा । बजे निसान नफेरियान घोर घुरंदा ॥ छं० ॥ ५३६ ॥ त्तत्त बौर सुनंत तन तामस्स भरंदा। सुनि चौसठ्ठी जुगिन किलकि किलकंदा ॥ भूत भयानक भाव भरि भहरें भहरंदा । थेइ थेई गति घेच पाल किलकार करंदा ॥ छं० ॥ ५४० ॥ बावन बौर 'बलिष्ट बर बल करि बिलसंदा । देईं देव विमान चढ़ि कौतिग्ग अनंदा ॥ तारी दै दै तान तुट्टि नारद नचंदा ॥ छं० ॥ ५४१ ॥ गाथा ॥ नंचै नारद सिद्ध । बुद्ध बुद्धिवंत सुभहाई ॥ बंधे वुधिवर भट्टं । सहकारं बौर भट्टायं ॥ छं० ॥ ५४२ ॥ सुसज्जित सेना से पावस की उपमा वर्णन । चौपाई ॥ नाम नाम जिम पूरन स्याम । तडित बेन धुलो धर धाम ॥ गर्जित सिंह अयास सबद । करनि भज्जि होते जिन मह॥छं०॥५४॥ था | मदंक रौति भग्गा । आकास यौ सयौ सह ॥ सो क्रमं वर मंचं । फेर अकुंस सौसर मारं ॥ छं० ॥ ५४४ ॥ अंकुस लगा कर हाथी बढ़ाए गए और शस्त्र निकाल कर शरबीर लोग आगे बढ़े। हा ॥ अकुंस मारि प्रहारि गज । बंधन अध पजान शस्त्र कट्टि संमुह भिरन । धनि संभरि चहुबान ॥ छं० ॥ ५४५ ॥ कमधज्ज के शीश पर छत्र उठा उसकी शोभा। अरिल्ल ॥ उछौ छत्र कमधज नरिंदह शौश पर ॥ मनों कनक दंड पर ऊगं इंदी इंदबर ॥ ए० कृ० को०-अरिष्ट । (२) ए. कृ. को.-भट्टाई ।
पृथ्वीगजरासो। [ पचीसवां समय ७६ घोड़ों की टापों से आकाश में धूलि छागई । हय पुर 'उच्छरि घेह अयासह धुंधरौ । बान गंग प्रथिराज देषनह उत्तरौ ॥ छं० ॥ ५४६ ॥ चहुआन का घोड़े पर सवार होना। दूहा ॥ बहकि निरह नष्पर भिदै। यह पारथ पवित्रान ॥ सो प्रति सारह उत्तरन । फिरि चढ्यौ चहुबान ॥ छं० ॥ ५४७ ॥ उस दिन तिथि दसमी को युद्ध के समय के तिथि योग नक्षत्रादि का वर्णन। कवित्त ॥ देव दसमि दिन दोह । दौह पद्धरौ नरिंदें। गुरु पंचम रवि नमो। सुबर ग्यारमो सुचंद। चतिय थान बर भोम । सुक्र सप्तम बर कौनौ नृप सुपनंतर आई । ईस 'जोपन बर दीनौ ॥ चौसट्टि पुष्टि वि पुठ्ठियन । अरिन सेन समुह परे॥ विघोष सह बज्जत सब । सुवर लोह कड़े कर ॥ छं० ॥ ५४८ ॥ युद्ध वर्णन। छंद त्रिभंगी ॥ कविचंद सुबरनं करै सुकरनं सूरह लरनं भर भिरनं ॥ तिरभंगी छंदं नाग नरिंदं कथ्य करिंदं दुष हरनं ॥ "पढ़ मंदह मत्ता पुनि अठ मत्ता असु वसु मत्ता रस मत्ता ॥ घन घाइ सघत्ता सूर सरत्ता में गल मत्ता करि धत्ता॥छं०॥५४६॥ बज्ज बर कोहं लग्गै लोहं छक्क छोहं तजि मोहं। सूरा तन सोहं स्वामिन दोहं मत्ते हरिन डोहं ।। बर बान बिछुट्टै बगतर फुट्टै पारन घुटै धर तु? ॥ तरवारनि तुट्टै धम्भर लुट्टै अंग अहुदै गहि झुट्टै ॥छं० ॥५५० ॥ बोरा रस रजजं सूरस गज्जं सिंधुअ बज्ज गज गज्जं ॥ अच्छरि तन मज्जं बर बर जंज चित्ते बज्जं मन मज्जं ॥ (१) मो.-उत्सरि । (२) को.-जीयन ( ३) मो.-परै, करै । (४) ए. कृ. को.-परि मंदह मन्तापुर नन्दी ।
पचीलवां नमय ७७ ] पृथ्वीराजरासो। ८३५ कायर रन भज्ज तजिज सलज्ज स्वामि सु कज्ज भर सज्ज । जम दद सु सज्ज हथ्थह मज्ज छिन्छन छज्जे रिन रज्ज ॥छं०॥५५१॥ घायल सामंतों की शोभा। सोरठा ॥. दिन मंते सामंत । घाइ अंग तज्जे घने ॥ मनो मत्त 'मय मंत। बिना महावत रारि मिलि ॥ छं० ॥ ५५२ ॥ शूरवीरों का क्रोध में आकर युद्ध करना । छंद भुजंगौ ॥ कदै लोह कोहं दुदौनंति बज्ज । सजे तामसं राज सा 'तुक तज्ज। कटे कंध सूरं मिले सार कोई। सना हंत सूरं फिरै वेश सोहं ॥ छं० ॥ ५५३ ।। उड़े टोप टूकं बजै सार घंटे मनो अग्ग दंगो लगी बंस फुटै ॥ मनों मौन माया जलं सच तुट्टै । ॥छ०॥ ५५४॥ असौ मंस तुट्टै करं कंस हल्ल॥ मनो कग्गदं काल बूतं सु चल्न सु भट्ट सु सूरं कुघटें सु कौनं । उलटथे सभेजी एतं जान थीनं ॥छ० ॥ ५५५ ॥ चढ्यौ. पावसं जहुवं संभरेशं । दलं बद्दलं सहलं ते नरेशं ॥ घनं घोर घंटा निसानं दिसानं । तिनं भूलियं सच आषाढ मानं ॥ छं० ॥ ५५६ ॥ झबै दामिनी तेग वेगं प्रमानं । पड़े भट्ट बोरं बुलै मोर बानं ॥ लगै बाइ बुढे सरं सार गोरी। रुधिं नार मानो प्रवाहै स 'जोरी ॥ छं० ॥ ५५७ ॥ (१) ए. कृ. को.-में। २) मो. सात्विक्क। ( ३ ) ए. कृ. को.-कढ़े । ( ४ ) ए. कृ. को.-बेस । (५) ए.-जारी। .... ....
पृथ्वीराजरासो। [ पचीसवां ममय ७८ ॥ करें कायरं बोय करुना प्रमानं। लगै बाह कालंदि चंपे समानं ॥* जनं चीय जंपी उनं पौय जंप्यौ । सोई अोपमा चंद बरदाइ थप्पौ ॥ छं० ॥ ५५८ ॥ कवि का कथन कि उन सामंतों की जहां तक प्रशंसा की जाय थोड़ी है। दूहा ॥ देवप्पति देवह सु दुति । मति सामंत सधंत ॥ जिन अच्छरि सच्छार कह।। सो जस बढि बर कंत ॥ छं० ॥५५६ । गाथा ॥ जस धवलो बर बढयं । घय लोकं साध 'यौ तरयं ॥ जानिज्जै परिमानं । सतं समुद्द सौंचयो 'नौरं ॥ छं० ॥ ५६० ॥ छंद लघुबोटक ॥ मिलि जुद्ध मच्यौ । रन घेत रच्यौ ॥ सम सार सच्यो । नव एक मुच्यौ ॥ छं० ॥ ५६१ ॥ रस बौर षच्यौ । तन रारि तिच्यौ । कहँ जाई वच्यौ। ॥ छं० ॥ ५६२॥ जुग्गनि जितनी । किलकें तितनौ ।। घन घाइ घुरै । पट सौस परै ॥ छं० ॥ ५६३ ॥ दोउ वीर बड़े । लगि लोह अड़े ॥ घट घाइ पड़े । झर होइ भड़े ॥ ५६४ ॥ सस केश डफै। तन सों सड़फै। फिफरा फड़कै । कढि सों कडकै ॥ छं० ॥ ५६५ ॥ पग हथ्थ परें । ढी चाल "दुरै ॥ धक धौंग धकें । मुष मार बर्के ॥ छं० ॥५६६ ॥ रस बोर छकें । हक हक हकें ॥ बहु सूर लरें । टप भार परें॥ छं० ॥५६७ ॥ .... * ए. कृ. को, प्रतियों में इसके आगे ये दो पंक्तियां हैं। उने मैन त्रासं उनै सत्र सारं । लभ्यो काइरं कामनी ना प्रभासं ॥ (१) ए. कृ. को..सो। (२) मो.-नीयं । (३) ए. कृ. को.-रच्यो। ( ४ ) मो.ढरे ।
पचीसवां समय ७६ ] पृथ्वीराजरासो। कमधज्ज के बीर खवास का युद्ध और पराक्रम वर्णन । दूहा ॥ सुबर बौर षावास भिरि । मुक्कि सु धाम धमारि ॥ सो अोपम कविचंद कहि । झुकि कढी परिहार ॥ छं० ॥ ५६८॥ अरिल्ल ॥ मोह पारि जिन छंडिय सूर । तिरन बौर भारथ्थह पूर ॥ दैव जुद्ध श्राक्रत्ति अबुध । कढ़े लोह दुव कोदह जुद्ध ॥छं० ॥ ५६६ ॥ छंद विराज ॥ कड़े लोह बौर । महा मल्ल तौर। हको हक्क वज्जी। गिर जानि गज्जौ ॥ छं० ॥ ५७० ॥ कढें मत्त मंती। अतं न दंतौ ॥ व लोह सारं । प्रहारंत भार॥ छं० ॥ ५७१ ॥ भनंके भनंको । रथं भान थक्कौ ॥ हलकंत सूरं । बजे देव तूर ॥ छं० ॥ ५७२ ॥ उतं मंग तुट्टै । 'घरौ दोम लुट्ट । घरौ इक जानं । सु भारथ्थ मानं ॥ छं० ॥ ५७३॥ दूहा ॥ सुबर बौर षावास षिजि । कट्ठी बंको अस्ति । सोभै सौस गयंद कै । मनुं तरस को सस्सि ॥ छं० ॥ ५७४ ॥ खवास तो मारा गया परंतु उसका अखंड यश युगान युग चलेगा। कवित्त ॥ सुबर बौर षावास । षिमिझ कवी सु बंकि असि ॥ सुभै सौस गज राज । अब तेर सि कि बाल ससि ॥ मुष्टि चंपि द्रग पानि । नौर बानं सुद्धारह । मनु मुत्तिय वारुन्न । बंदु बंधे इन बारह ॥ साम रम देन पावरि धनि । स्वामि सु अंतर फुनि मिलिय ॥ जौरन 'युमास संदेस सदि । गल्ह एक जुग जुग चलिय॥ छं०॥५७५॥ खवास के मरने से कमधज को बड़ा दुःख हुआ और उसने अपने मंत्रियों से पूछा कि अब क्या करना चाहिए। (१) मो.-धरी । (२) ए. कृ. को.-जुगा।
BADAL ८४० पृथ्वीराजरामा। [पचीसवां ममय ८२ अरि मंडल षंडल करन। तिरन मोह मति 'सिंध ॥ रस्म बलौ बौरा विषम । लै भारथ्थ सकंध ॥ छं० ॥ ५६१ ॥ दुपहर के समय कमधज्ज की फौज फिर से लौट पड़ी। कंध बंध संधिय निजर । परी पहर मध्यान ॥ तब बहुन्यौ पारस फिरिय । फिन्यौ भौछ चहुबान ॥ छं० ॥५८२॥ कमधज्ज और चहुआन खड्ग लेकर क्षत्री धर्म में प्रवृत्त हुए। कवित्त ॥ छल संज्यौ बल जोग । बुधि बलजोग पसारिय ॥ चाहुबान कमधज्ज । घग्ग पचौवस डारिय ।। रत्तन जुद्ध विरुव । सह सद्दह मति कौनौ ॥ चावहिसि विढ्ढुरै । बौर बौर रस पौनौ ॥ संग्राम धाम धंमार परि। काम धाम धम्मार तजि ॥ सामंत सूर सांमत बर । धौर बौर धारहति लजि ॥ छं० ॥५८३ ॥ शूरबीर हाथियों के दांत पकड़ पकड़ कर पछाड़ने लगे। दूहा ॥ में लज्जानौ लज्ज बर । गच्च दब सामंत ॥ अंत अलुभभाय पंति पय । भिरि भंजै गज दंत ॥ छं० ॥५८४ ॥ भै वृत्त अत्त सरौर गति । सिंध सरोज सु पान ॥ सूर बदों सामंत दुज । जिन अप्पे जिय दान ॥ छं० ॥ ५८५ ॥ जीव दान अप्पन सु त । दल दंतिय बढ़ि कंत ॥ हनूमान जिम द्रोन बर । बारधि मंत 'सुपंति ॥ छं० ॥ ५६६ ॥ चौपाई ॥ बार बारधि बर पंति सुमान । सूर धौर सामंत सुजान ॥ दल बल बल विछोरहि बौर । घग्ग मुष झलकंतह नौर ॥ छं०॥५६७॥ महाभारत में अर्जुन के अग्निबाण के युद्ध इस युद्ध की उपमा देना। कवित्त ॥ षग मुष बर चढ़िये । धाइ तुट्ट है राजं ॥ बार बार हक्कही। करै अग्या बिन साजं ॥ से (१) ए. कृ. को.-छंध, छंद । (२) मो. भीच । (३) ए. कृ. को.-सुपाति ।
पचीसवां समय ८३] पृथ्वीराजरासो। ८४१ 'बाल स्वामि अग्या । विभंग चित ओपम चंदं ॥ चिय कठौर निईन्न । कमै अग्या गुन मंदं ॥ करतलह सु कवि कित्तिय सुबर । पथ थक्क आजान जिम ॥ भारथ्थ वौर पारथ्य जिम । अग्गिवान सामंत अमि ॥छं० ॥५८८॥ घोर संग्राम का वर्णन । छंद हनूफाल ॥ इति हनूफालय छंद । कवि पढ़े भारथ चंद ॥ भ्रम भ्रमहि बौर प्रकार । ज्यों चक्र चक्रिय धार ॥ छं० ॥ ५८८ ॥ घरि घट्ट एक विघट्ट । बर बौर भंज्या पट्ट॥ छं० ॥६०० ॥ दूहा ॥ पट्टन भंज्या बौरवर । ज्यों दधीच सु अस्ति ॥ देवकाज बज्जो लियौ । सोइ बर तत्त सबत्ति ॥ छं० ॥ ६०१ ॥ कवित्त ॥ बस बत्तीय प्रकार । घाइ बज्जै घट घुम्मै ॥ मार मार उच्चार । सार सारहु बर झम्मै । एक मार संमार इक । सु मारति तै मारै ।। एकं झार उभार । एक जारति उझ्झारै। घरि एक तरंगनि जकि जल । कमल जानि नंच्यौति सर ॥ सामंत सूर सामंत बल । पहर बज्जि बज्जे पहर ॥ छं० ।। ६०२ ॥ दूहा ॥ पहर बज्जि पर पहर बर । पहर पहर आत्त । मत्त दंत महह सुकै । वान राज सात्त ॥ छं० ॥६०३ ॥ बान राज सात्त दुति । छिति छन्त्री आकार । धन्नि सूर जे अंग में। धनि मिल्ल सु दुधार ॥ छं० ॥ ६०४ ॥ गाथा ॥ दुवार सार सहियं । हय गय नर बौर बौरायं ।। जुद्धिय धीमति धौमं । सा बोरं बौरयो राज ॥ छं० ॥ ६०५ ॥ बौरं राजिय बोरं । बोरं बौरं सु बौर मुष बौरं ॥ बौरं होइ सबौरं । सो बोरं उब्वियं नथ्थी ॥ छं० ॥ ६०६ ॥ दूहा ॥ नथ्थह मुखौ बौर बर । वल बंकम घट घाइ ॥ घरी एक आचिज्ज भौ । जोति मग्ग विरुझाइ ॥ छं० ॥ ६०७ ॥ (२) ए. कृ. को.-भरि । (१) मो.-ज्यौं वाजि । (३) मो.-झेले। an ८४२" पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय ८४ छंद भुजंगी॥विरुझझाय उरनं रोस बोरं । महा मत्त दंतौन को पंति भौर। गहै दंत धावै सु वाहै पचारै । महा मत्त बोलै सुवारं अषारै॥ छं० ॥ ६०८॥ कली क्रित्त कूदं करै दूरि दें। वजै सार सारं महा काल मदं॥ महा ठट्ट घट्ट अटै जु थटुं । बजै घाइ ऐसे बकै जानि भट्ट। छं० ॥६०१ ॥ रुधिं धार रत्ती सु मत्ती उछारै। इसी बीर बत्ती सु भारथ्थ भारी। छ० ॥ ६१० ॥ दूहा ॥ भारथ्थह नथ्थी सुत । अत वृत्त गति देव ॥ जिन सांई दुज्जन हत्यौ । सो सांई प्रति सेव ॥ छं० ॥६११ ॥ सेव देव देवन सुबल । रुंधत गिद्ध सु मेंस ॥ मोह पान माया सुकत । उडत मुकि तिन हंस ॥ छं० ॥ ६१२ ॥ हंसन हंसिय हंस बर । मुगति सरोवर बीय ॥ तनु छंद्यौ उह मडि कै। निसा भ्रम नह नौय ॥ छं० ॥ ६१३ ॥ हू सांई पर हथ्थरें। 'परम तंत पद पाइ॥ देवग्गिरि भंजन मतो । रा चामड विरुझाइ ॥ छ ॥ ६१४ ॥ कवित्त । रा चामड जैतसौ । राम बड़ गुज्जर बुल्लिय ॥ वलियभद्र बलिराम । सार धारह मति षुल्लिय ॥ कलह कित्ती विस्तरै । राइ निड्डुर सम सारं ॥ दुहू बोल दुअ चरन । मरन कित्ती अधिकारं । बैकुंठ लेन लिन्ने सु षग । विहँग मग्ग पंषी सुगति ।। नरसिंह सिंह छंडे नहै । सार धार मारह दिपति ॥ छं० ॥ ६१५ गाथा ॥ सार धार वरदियंति । रुधिरं छंडेव सूरयो अंगं ॥ जानिज्जै मधु मासं । सा फूलेव षष्षरो वनयं ॥ छं० ॥ ६१६ ॥ अरिल्ल ॥ रत्त सु रत्त सु बौर उडाइय । घाइ मृदंग उपंग बनाइय ॥ के माया मोह गति छडै । काल दंड कालह क्रत छंडे ॥छं० ॥६१७॥ दूहा ॥ काल दंड पंडन कर । भिर बौर भारथ्य ॥ सुबर बौर सामंत गति । दै दुवाह पारथ्थ ॥ छं० ॥ ६१८ ॥ (१) मो.-मुगति परम पद पाय । (२) मो.-गूजर । (३) मो.-अवधार । - पचीसवां समय ८ पृथ्वीराजरासो। पारथ पारत्थिय सुटत्त । सारथ्थिय चहुबान ॥ मानहु बौर समुद्र गति । तिरन मते भ्रम पान ॥ छं० ॥ ६१६ ॥ प्रातःकाल से युद्ध होते संध्या हो गई और कमधज्ज की सेना मुड गई परंतु चौहान की सेना का बल न घटा। भ्रम्म पार सामत बर । उदै अस्त भौ भान ॥ बहुरि पंग पारस फिरिय । बल न घव्यौ चहुबान ॥ छ० ॥ ६२० ॥ दोनों सेनाओं के बीर युद्ध से संतुष्ट न हुए तब इधर से भीमराय और उधर से मृत षवास के भाई ने क्रुद्ध होकर धावा किया। कवित्त ॥ बल छंद्यौ न विराज । सूर उम्भै दुअ पास ॥ जंघारो रा भीम । स्वामि सन्नाह सुभासं ॥ दुहु वाहां सामंत । दून दह दहु अधिकारिय ॥ अमर बधं षावास । घग्ग पोल्यौ षिभि सारिय ॥ जंघार राव जोगिंद बर । भुगति मुगति अप्पन अनिय ॥ तामस'न बुझ्यौ दोउ सेन की । वजि निसान आभा धुनिय ॥ छं० ॥ ६२१ ॥ गाथा ॥ आम सुनिय सु देवो । बज्जे साराइ मदर बजे ॥ नौसानं. निसि सार । साहार पारषं होई ॥ छं ॥ ६२२ ॥ दूहा ॥ पर पपरत्त पवित्र गति । रा निड्डुर राठौर ॥ बंधु दोष जान्यो नहै । स्वामि धंम पति मौर ॥ छं० ॥ ६२३॥ स्वामिकार्य के लिये जो शरीर का मूल्य नहीं करता. वही सच्चा स्वामिभक्त सेवक है। कुंडलिया ॥ तजिय पुंज पावास बर । तिरन तुंग तन अप्प । चरन लग्गि बंछ्यो मरन । सो सांइ भत तप्प ॥ सो सांई भूत तप्प । जन्म जानत जंजारे ॥ (१) ए. कृ. को.-तज्यौ न । (२) मो.-पारखा ।
पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय ८६ .... .... । मयन मत्त विच्छुरिय । मोह पारौ तजि पग्गिय ॥ धनि निड्डुर रठौर । स्वामि छल स्वामि सु जग्गिय ॥ छं० ॥६२४॥ गाथा ॥ जग्गिय स्वामित काम । भूमियं बौर बौर विस्तार ॥ तिम तिम तामस तेज । सेनं सज्जि मुक्ति साधौरं ॥ छं० ॥ ६२५ ॥ शशिवृता का व्याह धन्य है जिस में अनन्त वीरों को मुक्ति मिली। मुक्ती धारन धोर। पंजर सज्जेव मथ्थनो परयं ॥ बर ससित्त सु व्याहं । दाहं देहाइ दुष्षनो तजयं ॥ छं० ॥ ६२६ ॥ कमधज्ज के दस बड़े बड़े शूरवीर थे वे दसों इस युद्ध में काम आए। दूहा ॥ देह दुष्प कठ्ठिय सुक्रम । रन जित्तिय सुग पान ॥ पंच दून पंचो परिग । सुनिय बौर रस पान ॥ छं० ॥ ६२७ ॥ गाथा ॥ परियं बीरति नाम । सुरति चौदह नंदह घही ॥ सजले सूर सुधारौ । भारी भरनेव भारथं भिरयं॥ छं० ॥ ६२८॥ कमधज्ज के जो वीर मारे गए उन के नाम। दूहा ॥ पर सूर तिन नाम कहि । बरनत बनै विसेष ॥ देव देव अस्तुति करहिं । नाग रह्यौ सिर सेष ॥ छं० ॥ ६२६ ॥ छंद भुजंगौ ॥ पर बौर बौर तिनं नाम आनं। पर्यो पुंज राज महा 'वौर थानं ॥ पायौ देव सिद्धत सादुल्ल बंधं । मुर्यो घग्ग नाहौं भयो रंध रंधं ॥ छं० ॥ ६३० ॥ पर्यो किल्ह काम जु जदौ जुवानं । तिनं कट्टिया जन गयदंत मानं ॥ पर्यो बौर भट्टी कियौ अंग घ । जिने मोरिया पंग रा मौच थर्ट्स ॥ छं० ॥ ६३१ ॥ पर यौ राइ राईअजम्मर सूर। (१) ए. कृ. को. बंध।
पचीसवां समय ८७]
पृथ्वीराजरासो।
जिनं स्वामि धंमतज्यौ सिंध पूर॥
पर यौ अंग अंगं सु जोंन रायं।
लगे पंच दूनं महा बीर घायं ॥ छं० ॥ ६३२ ॥
पर पंच बंधो बलौभद्र बौर।
जिने अंग अंगं कियौ सा सरीर॥ छं० ॥ ६३३ ॥
कवित्त ॥ परत देव वर कंन । सरन रष्षन सांई बर ॥
परि मुष रन पुंडौर । सार सारंग देव धर॥
पर्णे बौर बलिभद्र । जात पावार पवित्र ॥
धार धनौ चढि धार । सलष लषन दुति मंच॥
लाषन सिंह भुज पाइ बर। अरिन पाइ उठाइ लिय॥
धनि धन्नि सूर सामंत बर । जुग जीरन जौरन सुजिय ॥छं०॥६३४॥
शूरवीरों की प्रशंसा।
दूहा ॥ जुग जौरन जौरन सुबर । चरन कित्ति सा किड् ॥
सुबर बौर सामंत बर । गत्ति न पुज्ज सिद्ध ॥ छं० ॥६३५ ॥
सिद्ध न पूज गत्ति तिन । छाया मोहन माय॥
इन छाया मंडी तहां । भ्रम छांह रहि छाइ ॥ छं० ॥ ६३६ ॥
भ्रंम छांह रहि छाइ बर । करिय सूर सामंत ॥
सो करनी करिहै न को। करिय बौर गुन मत ॥ छं० ॥ ६३७ ॥
गुननि मत गंभौर गुर । जै जै सद्द सु सिद्ध ॥
बरन बिहुसि बरनिय बरहि । रंभ अरंभन सिद्ध ॥ छं० ॥६३८॥
गाथा ॥ रंभा अरंभ वरयौ । अच्छी अच्छीव अच्छरी सरनौ ॥
केकी गवनी कित्ती । साकित्ती बंधयौ रप्षी ॥ छं० ॥ ६३६ ॥
चौपाई॥ बद्धि रषि कित्तिय परिकार । सार सिंध उत्तर बन पार ॥
जोग सिद्ध जोगाधिय अंत । बजि डक डमरु उमया कंत ॥छं०॥६४०॥
उमा कति जोगाधि सु जाने । बौर
सगुन
बौरा रस मान॥
जै जै सद्द भयौ तिन वार । राज हार घरियार विभार ॥छं०॥६४१॥
दूहा ॥ राज हार घरियार बजि । सार बज्जि रति सार ॥
सूर सुमति सामत की । बौर उतारन पार ॥ छं० ॥ ६४२ ॥
पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय ८८ छंद चोटक ॥ सु उतारन पारति बौर भटं । घटकै घन नद्द उमद्द घटं ॥ भननंकत हथ्थत हथ्थ कर। मनु पाइक पंति पुतार बरं ॥ छ • ॥ ६४३॥ किधों केवल को मुगतौ मति पान। किधोंग्स 'बौर विश्रम सु मान॥ किधों करुना करकै किधु काम । मनों मय मत्त भिर रस जाम ॥ छ ॥६४४॥ किधों विधि बंधन बंधहि जोर । पढ़े दोउ मंत्र सु बौरह और ॥ कर दोउ बौर दुहाइय मुष्ष । मनो रवि उग्गव मासम पुष्प ॥ छ ॥ ६४५॥ दूहा ॥ पुष्ष मास रवि उग्गयौ । भूमि न छिचन सौस ॥ मनहु बुद्ध बंदन सु बुधि । करन काम क्रत ईस ॥ छ । ६४६ ॥ कतन ईस बल बुद्धि बल । बुद्धि पराक्रम संधि ॥ सुबर बौर संग्राम गुन । अति गुन निर्गन बंधि ॥ छ ॥६४७॥ गाथा ॥ बंधे बुद्धि सुधार । प्राहार बौर सु भहायं ॥ निजतं नेह सुधारौ। आहारी अंकुरी बौर छ ॥ ६४८ ॥ दूहा ॥ अंकुरि बौर शरीर गति । सुभट सुथट्ट सुभट्ट ॥ अघट घट्ट नह कियो पर। पर बौर दह पट्ट॥ छ ॥६४६॥ कमधज्ज का स्वेत छत्र देख कर चामुंड राय का उसे काट देना और सब सेना का आश्चर्य और कमधज्ज की सेना में हाय हाय मच जाना। कवित्त ॥ हाइ हाइ आरिष्ट । दिष्ट अंबरिय सूर बर। मुकि कर बल चामंड । करहु गोलक उप्पर धर ॥ गोलक तुंबा भग्ग । बंध भग्गै चहुआनं ॥ स्वेत छत्र दिषि सौस । पर्यो कमधज्ज निधानं ॥ घरी एक विभम भयौ ।सार सार प्राहार बर ॥ जाने कि मत्ति दंतिन कला । कूट मच धारह सुधर ॥ छ० ॥६५०॥ (१) ए. क. को.-वीरा रस, वीर रस ।
पचीसवां समय ८९] पृथ्वीराजरासो। दूहा ॥ धारा हर वित्यौ सुधर । चर चरिष्ठ चतुरंग ॥ रानिड्डुर रठौर बर । रुप्यौ घेत भत भंग॥ छ० ॥ ६५१ ॥ गाथा ॥ पंगुर पाइ सुधार।पंगुभयौ चित तिन बोर। नह पंमुर कर नैनं। पंगुर नां सूरयौ बैनं ॥ छ ।। ६५२ ॥ दूहा ॥ बयन सूर चंचल भइय । निहचल पग सिर नाग ॥ अदग दग्ग भंज सकल । करत अदग्ग न दाग ।। छ० ॥ ६५३ ॥ अदग दग्ग मग्गिय सु कृत । बर बौरा रस पान ।। छित्ति छित्ति स्वामित्त गति । सु कति सु अप्पन बान ॥छं०६५४॥ कवित्त ।। घरौ इक इक रंग । रंग सवरथ्थ बिछोरिय ।। पगी जानि पारष्ष । ज म दरिया हिल्लोरिय ॥ यों 'षग धपि दोउ सेन । सूर सामंत विलोकिय॥ मनों मत्त उठि द्रष्टि । पिय बोयोग विसोकिय ॥ झुम्मयौ धार धारह धनी । सुनिय कित्ति मित्तह पनौ ॥ सामत सूर सामंत गुन । सु बर बौर सत्तह सुनौ ॥ छ ॥६५५॥ छंद रसावला ॥ सार बुट्ठी अनौ । मत्त मत्त धुनी ।। कूह मच्ची घनौ । अंत तुट्ट रनौ ।। छ० ॥ ६५६ ॥ बौर बौर अनौ। देव बज्जो धुनौ । नेह भंज्यौ पनी । काल जेसो पनौ ॥ ६५७ ॥ बौर बौर बनौ। रत्त रंगं रनौ ।। सार सार धुनी । जोति मगगं जनौ ॥ छ । ६५८ ॥ पिंड सार घनी । कब्बि चंदं तनी॥ । मुक्ति लुटै फनौ॥ छ ॥६५६ ॥ दूहा ॥ फनि मनि लुट्टन काज गुर । भौ गुर इत गुर देव ॥ सार सूर संम्हौ भिरिय । बरन पथ्थ मुष सेव ॥ छ ॥ ६६० ॥ कमधज्ज का छत्र गिरने से शूरवीरों को भय न हुआ। .... .... (१) मो.-षग्ग। (३) मो.-जैसें, जैसे (२) मो.-बीर, बीर । (४) ए. कृ. को.-चित (५) मो.-लुटें ।
८४८ पृथ्वीराजरासो। [ पचीसवां समय ६० गाथा॥ लग्गिय चास न सूर। बौर सुभटाइ मत्तयो दंतौ ॥ जानिज्ज परिमानं। भारथ्थं बौरयो कंती ॥छ ॥ ६६१ ॥ दूहा॥ हल देवत विछरत्त बर । परषिय पहि जोग ।। सुबर सूर सामंत गुन। 'श्रुग्ण मत्त 'मति भोग ॥ छ ॥ ६६२॥ स्त्रियों की प्रशंसा। भोग जोग दुअ बिधि बिध । दान भुगति संगाइ ॥ चौय कहै न? सुचिय। वियन गती मुह पाइ॥ छ ॥६६३॥ वियन गत्ति पावहि पुरुष । धरन धरत्तिय ताम सूर धौर सूरह भिरत । वर विश्राम तजि जान॥छ॥६६४॥ चौपाई ॥ एक एक उर्दु परिमानं । सुमति मत मत्रिय गुरु दानं ॥ घग टेकि बाहै बर घग्गं । ज्यों बावन छलि भूमि विगंगं॥छ॥६६५॥ दूहा ॥ भुमि विभग कौनिय सुश्त। देवत्तह प्रति देव ॥ महन रंभ मच्यौ सु भर । गुन श्रम न ग्रभ भेव ॥ छ ॥६६६ ॥ मरन सौस मुक्यौ सु वसु । रस पारायन देव ॥ दुतिय मुतिय दुति बैर तिन। भम भग्गा जुग भेव॥छ० ॥६६॥ अस्त वृत्त विभम भइग । हय गय दुल चतुरंग ॥ चाहुान कमधज्ज सों। भय बौरा रस भंग॥ छ ॥६६८॥ गाथा॥ भौ बौरा रस भंग । जंग जुग तीय बौर सुभट्टाई॥ सहिर मुद्धिर सुघटं । साउट्टई घट्टयौ भंगं॥ छ॥६६६ ॥ रात्रि का कुछ अंश बीतने पर चन्द्रमा का उदय हो गया और दोनों सेनाओं के बीर विश्राम के लिये रण से मुक्त हुए। मुरिल्ल ॥ ठट्ट सेन भगौ चतुरंगह। लुथिथ लुथ्थि आलुधिय विभंगह ॥ कल किंचित किंचित रस भारी । इते अस्तमित भानं सारी॥छ॥६७०॥ गाथा॥ अस्तमितं बर भानु । पायानौ परम संतोषं ॥ जानिज्ज जस बंधुआं। नव चंदनं तिलकयौ दौयं ॥ छ ॥ ६७१ ॥ (१) ए.कृ. को.-स्वर्ग (२) को.-मनि। (३) मो.-खडग। (४) मो.-बगंगं । (५) मो.-ए-भइय । (६) ए. कृ. को.-सुट्टयं । (७) ए. कृ. को.-भगो (८) ए.-सारं । (९) ए. क. को.-मांनु सु भानु पचीसवां समय ६१ ] पृथ्वीराजरासो। ८४९ चंद्रायना ॥ दुरि निसान गत भान भइग बर। सिंधु संपतौ जाइ तिमिर चढ़े गुर॥ कुमुद विमुद अंकूर सूरातन धरियं। मानौ तम को तेज सु तत्त उरियं ॥ छं० ॥६७२ ॥ 'मुरिल्ल ॥ बर भान संपतौ थान गुरं । सरसोरुह उहित मुदित बरं ॥ बर बौर कमोदनि को सु गती। सुभए रिसिराज उदोतपतौ ॥ छं० ॥६७३॥ सर्योदय से भूमर चकवा चकई और शूरवीरों को आनन्द होता है। दूहा ॥ निसि गत बंछे भान बर।भँवर चक्कि अरु सुर ॥ मतह मत्त पयान गति। बर भारथ्य अंकूर ॥ छं० ॥६७४ ॥ रात्रि को संयोगिनी स्त्री और रण से श्रमित सेना विश्राम करती है पर कुमोदिनी और वियोगिनी को कल नहीं पड़ती। कवित्त ॥ कुमुद उघरि मुंदिय। सुबंधि सतपत्र प्रकारय॥ चकिय चक्क विच्छुरहि। चक्कि शशिवृत्त निहारय ॥ जुवतौ जन चढ़ि काम। जाहि कोतर तर पंषो॥ असत वृत्त सुंदरिय। काम बढिय बर अंषौ ॥ नव नित्त हंस हंसह मिलै । विमल चंद उग्यौ सु नभ॥ सामत सूर वप रषिष कै। करहि बौर वौश्राम सभ॥छं० ॥६७५ ॥ गाथा॥ विश्राम वर लेहो। सूर सूग्यौ धरयं॥ धायं अंग विअंगं । जानिज्ज कैतु यो लग्गौ ॥ छं० ॥ ६७६ ॥ दूहा ॥ तम बडिय धुंधर धरा। परष पयं पन मुष्ष ॥ तम्म तेज चावद्दिसह । जुभभनि भग्गि अरुण्य ॥ छं० ॥६७७ ॥ जुझ्भ भग्गि पारुष्ष बर । रोकि रहिग बर स्याम ॥ सुबर सूर सामंत गुन । तम पुच्छे वप ताम ॥ छं० ॥६७८॥ (२) ए. कृ. को.-सरूही रुह उडित जरं । (१) मो.-त्रोटक । (३) ए. कृ. को.-केन, केत ।
पृथ्वीराजरासो। [ पचीसवां समय ६२ सहस्त्रों सेना में भी छिपा हुआ चहुआन का शत्रु बचनहीं सकता। गाथा ॥ जै जै घर चहुआन । एक होइ सथ्थयौ सूरं ॥ को रष्यो परमानं । अरि रष्यै कढयौ मच्छी ॥ छं० ॥ ६ ॥ चौपाई ॥ कोटि मझभि अरि होइ प्रमान। "ता भंज निश्चै चहुआन ॥ हरि शशित्त जाइ पहु इंद। रुकमनि ब्याह बरिय गोविंद॥ छं० ॥ ६८० ॥ -गाथा ॥ गोविंदं प्रति व्याहं । सनमानं सूरयो वृत्तौ ॥ अप रष्प अरि जुई । रष्यै स्वामि मरनयौ अप्प॥ छं० ॥ ६८१ ॥ चहुआन के सामंत स्वामिकार्य के लिये प्राण को कुछ वस्तु नहीं समझते और यह स्वभाव चहुआन का स्वयं भी है। दूहा.॥ अप्प वृत्त इह खूर किय। सूर वृत्त चहान ॥ स्वामि रहै लज्जै जलनि । भौ वृत 'वृत्तिय पान ॥ छै० ॥ ६८२ ॥ गाथा ॥ कालिंदी तन स्यामं । लग्ग नथ्थि अगनतं स्याम । भय अवि वृत्तिय तामं । अन्यं जानि तत्तयो सारं ॥ छं० ॥ ६८३॥ सामंतों का पृथ्वीराज से कहना कि आप दिल्ली को जांय हम लड़ाई करेंगे। अरिल्ल ॥ त्तत्त सार प्रति प्रत्ति प्रमानं । जाहु राज दिल्ली चहानं ॥ गुन बड़े हम बड़े सस्त्र दुष्प मानि सुनि सुनिय विरत्त । छं०॥ ६८४॥ पृथ्वीराज का कहना कि सूर्य बिना चंद्र तथा तारागण से कार्य नहीं हो सकता, हनुमान के समुद्र लांघने पर भी रामचंद्र जी के बिना कार्य नहीं हो सका। मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा सकता। (१) मो.-वृतपौ।
पचीसवां समयाह] पृथ्वीराजरासो। ५१ कवित्तः ॥ दुष्प मानि सो रत्त । सुनै सामंत सूर बर ॥ " चंद उडग्गन कामः । सर्यो कहुं दिषिष सूर नर ॥ भान काम नन सरें। अरुन जो होइ तेज बर ॥ काम राम 'नन सरै । हनू कुद्यौति लंक धर ॥ नन सरै काम मंगल सु विधि । जो मंगल आकृत्त तप ॥ सामंत. सूर इम उच्चरै । कढि मोहि मुभमहुति अप॥छ॥८॥ तुम्हें रण में छोड़ कर मैं दिल्ली में जाकर आनन्द करूं यह मैंने नहीं पढ़ा है। दूहा ॥ मुहि कढदिरु तुम रहौ बर। जियत जांहि उन थान ॥ ऐसौ.रौति. अरोत वर । पढ्ढी नह चहुआन ॥ छं० ॥ ६८६ ॥ गाथा ॥ जम्मन मभिम सुरंगं । सो जंपेव, सूर तुम तत्तं ॥ दिन भौरव संग्रामं । ' सम्मान दारेति एव गसं ॥ छं० ॥६८७ ॥ राजा का उत्तर सब को बुरा लगा परंतु किसी ने राजा की बात का उत्तर न दिया। विष लग्गा नृप बैनं । हाला हलयो तत्तयो सूरं ॥ उत्तर दिय नह राजं । गाम निस भा बुधि जन बत्तं ॥ छं० ॥६८८॥ कवि चंदादि सब सामंतों ने समझाया पर राजा ने न माना और यही उत्तर दिया कि शत्रु के साम्हने से भागने वाले क्षत्री को धिक्कार है, मैं प्रातः काल भारत मचाऊँगा। कवित्त ॥ बार बार भर कहिग । राज मानै न तत्त 'मनः॥ बौर चंद ता अग्ग । चलै प्रथिराज हारि गत ॥ मो भंजे अरि गज्ज । मोहि मंजै अरि भंजे । (१) मो.-चंद उगन काम सयौ । (४) मो.-समान दारे निय वगसं । (२) ए. कृ. को.-तन । (५) ए. कृ. को.-बत । (३) मो.-उद्योत। (६) मो.गजे।
૮૨ पृथ्वीराजरासो। [पचीसवां समय ९ ता छची कुल लज्ज । छत्र धरि सिर हति'लज्जै॥ जं होइ प्रात दिष्षौ सकल । महन रंभ इत्तौ करौं । चहुबान चिंत चिंतह सुरा। बर भारथ गुन विस्तरौं ॥छं०॥६८८ गाथा ॥ विस्तार गुनयो प्रातं । रत्तं रत्त सूर बौरायं ॥ चावदिसि बर वीरं । सा धौर मत्तयो बौर॥ छं० ॥ ६६० ॥ सब का यह मत होना कि सूर्योदय से प्रथम ही युद्ध आरंभ हो जाय। दूहा ॥ मत्ति बौर संमुह 'भिरत । कठिन शस्त्र अति पान ॥ भान पयानह दौह गुन । लोह पयान पयान ॥छ०॥ ६६१॥ सूर्योदय से प्रथम ही फौज का तैयार हो जाना। चोटक ॥ बिन भान पयानति लोह कढ़े। जल मत्तिय रत्तिय बौर पढ़े ॥ दोउ बौर दुवं दिशि धुंध धरौ। कलहं तत केलिय ता उघरौ ॥ छं० ॥ ६६२ ॥ रण मदमाते निढर का घोड़े पर सवार होना और साठ योधाओं को लेकर हेरावल में बढ़ना । गाथा ॥ अंकुर बौर सुभहूँ। अघटं घट्टाइ क्रोधयो कलहं हय मुक्या चलि बंधौ । निढुर सथ्थव सठयो बौरं ॥ छं० ॥ ६६३ शूरबीर लोग माया मोह को छोड़ कर आगे बढ़े। दूहा ॥ बोरं बौर बौराधि बर । 'कड़े लोह तजि छोह ॥ सूर धौर सामंत गति । नहिं माया नहिं मोह ॥ छं० ॥ ६६४ ॥ तीसरे दिवस का युद्ध वर्णन। रसावला ॥ जिते सूर पत्ती। लगै लोह तत्तौ ॥ नचे सूर छत्ती। उड़े काल पत्तौ ॥ छं० ॥ ६६५ ॥ । (३) मो.-भज्ने । (२) मो.-भिरन । (३) मो.-कढि ।
पचीसवां समय ६५ ] पृथ्वीराजरासो। ८५३ 'जुटे जोध पत्तौ । उडौ रेन गत्तौ ।। महा बेन तत्तौ । कला कोटि कत्तौ ॥ छं० ॥६९६ ॥ ग्र ग्राव गत्तौ । सुरं पंच छत्तौ ॥ मचे कूह मत्तौ । षचे रोस रत्तौ ॥ छं० ॥ ६१७ ॥ करे घाव कत्ती । इसे सूर चित्तौ॥ शिर फल्ल सत्तौ । घुमें घाइ घत्तौ ॥ छं० ॥ ६८ ॥ भजै भौम मत्ती। हनूमान जत्ती ॥ अनाभूत अत्तौ । दिषे दारु दत्तौ ॥ छं० ॥ ६९६ ॥ रुधिं धार 'रुक। भभक भभक्क धका धौग धक्कं । बकै मार बकं ॥ छं० ॥ ७० ॥ इसे चित्त अक्क । छुटे मत्त छक्क ॥ डकारंत डकं । त्रिलोकंत हक्कं ॥ छं० ॥ ७०१ ॥ मनो मोह थक। हको हक बक्कं ॥ छं० ॥ ७०२ ॥ युद्ध करते हुए बीरों की प्रशंसा। कवित्त ॥ हको हकि बजिय प्रकार । सार बज्ज सु बौर बर ॥ सु बुधि बुधव आबुद्ध । मत्त ल ग असि वर झर ॥ इकत रुद्ध आरुड्ड । नद्द नारद अधिकारिय ॥ रंभ सिंभ आरंभ । सिङ्घ बुद्धदै तारिय ॥ धनि धनि सूर दिन धनित बल । छल छविय अंकूर रजि ॥ कलहंत काल कालह विषम । सुबर बौर बौरत्त रजि॥ छं० ॥ ७.३॥ दूहा ॥ बौर रजिज बौराधि भर । बलिय बौर गन सज्जि ॥ सुबर सूर सामंत के । मंत कलह तुटि बज्जि ॥ छं० ॥ ७०४॥ मंत कलह बज्जिय तुटहि । घटहि अघट तुटि मंस ॥ सुबर सूर सामत कौ । बर उड्ड तन अंस ॥ छं० ॥ ७०५ ॥ हंसति उड्डहि अंस दै। कंसत केसिय प्रान ॥ बर पंषिय पावै न जन । बर छु? किरवान ॥ छं० ॥ ७०६ ॥ (१) यह छंद मो. प्रति में नहीं है । (२) मो.-रूकं ।
पृथ्वीराजराहो। [ पचीसवां समय ६६ शूरवीर सामंतों का रणमत्त होकर विचित्र कौशल से शास्त्राघात करते हुए युद्ध करना। रसावला ॥ पंष छुट्टै ननं । सूर मत्ते धनं ॥ घाव बज्जै घनं । टूक टूकं तनं ॥ छं० ॥ ७०७ ॥ आज इक मनं । बान नंसं 'धन। भौतकं विघनं । कोय लौयं पनं ॥ छं० ॥७०८ ॥ जच्च झुन्झ बनं। जानि कुल्लालनं ॥ पोदि कढ्ढै गनं । देव चढि विमनं ॥ ई० ॥ ७०६ ॥ पेषि इक मनं । कुहक बानं घनं. ॥ नारि छुट्टै पनं। ॥ छं० ॥ ७१०॥ गज्ज तें गग्गनं । सार वे सग्गनं ॥ सिङ्घता मग्गनं । लौह ज्यों लग्गनं ॥ छं ॥ ७११ ॥ इक्क इक्क गर्न । कुंभ हथ्यौ 'छिनं ॥ रुचि धारा घनं । दुव मानों थनं ॥ छं० ॥७१२ ॥ दोड पट्टे दनं । ओप इभै इनं ॥ इष्ष वेसं मनं । मन्त्र गिजं गनं ॥ छं० ॥ ७१३॥ गोरियं छन छनं । टूक होयं रनं ॥ सूर र तन तनं । नमतं फन फनं ॥ छं० ॥ ७१४ ॥ बार पारं जनं । रोस चढ रनं ॥ लग्ग गे बंभनं । रुंड केसिं भनं ॥ छ ॥ ७१५ ॥ गिद्द सिद्ध गर्ने । टारि रषषै तनं । दद्धि ज्यों उप्फनं । अस्ति वाहै बनं ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ मौन जातं पनं। पिषषनं चिम्मनं ॥ कोन को चिम्मनं । भूत प्रेतं धुनं ॥ छं० ॥ ७१७ ॥ जुग्गनी जित्तनं । पत्त भत्तं तनं ॥ नारदं नंचनं । मुत्ति मै मचनं ॥ छं० ॥ ७१८॥ अंमर गंमनं । विष्टता सुमनं ॥ छं० ॥ ७१६ ॥ (१) मो.-धनं । (२) ए. कृ. को.-छिन, बिन । ।
पचीसवां समय EG] 'पृथ्वीराजरासो। शूरवीर स्वामिकार्य साधन करने के लिये बीरता से रण में प्राण दे कर पूर्व कर्मों की संधि को लांघ कर स्वर्ग पाते हैं। कवित्त ॥ सूर संधि विधि करहि । क्रम्म संधौ जस तोरहि ॥ इक लष्ष आहुटहि । एक लष्पं रन मोरहि॥ सुबर बौर मिथ्या । बिवाद भारथ्यह घडै ॥ 'बिच्चि बौर गजराज । बाद अंकुस को मंडै कलहंत केलि काली विषम । जुद्ध देह देही सु गति ॥ सामंत सूर भौषम बलह । स्वामि काज लग्ग ति मति ॥ छं० ॥ ७२०॥ स्वामिकार्य में जो वीर रण में मारे जाते हैं उन का शिर श्री महादेव जी की माला (हार) में गुहा जाता है। दहा ॥ 'स्वामि काज लग्ग सुमति । षंड पंड धर धार ॥ हार हार मंडै हियै । गुथ्यि हार हर हार ॥ छं० ॥ ७२१ ॥ गाथा ॥ सिर तुटू षुर तारं । लारं तुट्टि बौरयो सिरयं ॥ धर तुट्टै प्राहारं। सा बज्जै तारयं तारं ॥ छं० ॥ ७२२ ॥ तारं तार प्रहारं । देवल दरियाइ भलरी बज्जं ॥ बज्जं ते सिर सारं । प्राहारं पंच घट्टि कांई ॥ छं० ॥ ७२३ ॥ तीसरे दिन एकादशी सोमवार को युद्ध होते होते पांच घड़ी चढ़ आई शूरवीर मार मार कर हाथियों की कला कला को पछेलते जाते थे। कवित्त ॥ घटिय पंच दिन घट्यो । उमरि आरव पुंज घिरि । एक दिना दोउ सेन । मोह छंद्यौ क्रम निकरि ॥ बान गंग पत्तयौ । बौर ग्यारसि दिन सोमं ॥ सूर धौर सामंत । सूर उड्डे रन रोमं ॥ १) ए. कृ. को.-वेचि । (२) मो.-पति काज लग्गे तिमत | (३) मो.-हाथ । ४) को.-लारयं।
पृथ्वीराजरामो। [पचीसवां समय ९८ क्रत काम काज सांई विभम । दल दंतिय पंतिय गमै ॥ सामंत सूर सांई विभुम । रोम रोम राजी भने ॥ छं ॥ ७२४ इधर पृथ्वीराज ने शशिवृता की उत्कंठा पूर्ण की। दूहा ॥ रोम राज राजो भमहि । 'थोर थनौ दुढि बाल ॥ उतकंठा उतकंठ को। ते पुज्जी प्रतिपाल ॥ छं० ॥ ७२५ ॥ साटक ॥ साता से उतकंठ रंभति गुना रंभा अरं भावरं ॥ संधं बिधि सु सुन कारन मिते देवंगना सुंदरौ ॥ जा बंदे मिति चंद कारन मिते निर्भासितं भासितं । पाषंडं तजि लोन सूरति बरं आरंभ पारं भनं ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ सम्मिलन के प्रारंभ में पृथ्वीराज ने प्रण किया कि मैं तुझे तीनों पन में एक साधारण किए रहूंगा। गाथा ॥ आरंभं प्रारंभौ। उतकंठा किंनयौ कृतयं ॥ साधा धरौ सु धरयं । रन छुट्टै तौनयौ पनयं ॥ छं० ॥ ७२७ ॥ यह वर पाने के लिये कवि का शशिवृता को धन्य कहना । मुरिल्ल ॥ बालप्पन जुबन पन बौर । दई बौर बडपन्नह 'धौर ॥ बडपबह मति सु तजि डिढाइ। धनि लई तिहुं पन्न बड़ाइ ॥छ०॥७२८॥ दूहा ॥ बालप्पन जुवपनह गति । कथ तिय पनहति काज ॥ भर कड़े वप राज गुन । नह चन्नै प्रथिराज ॥ छं० ॥ ७२६ ॥ पृथ्वीराज का अटल प्रेम देख कर पैर पकड़ कर शशिवृता का कहना कि दिल्ली चलिए। नह चल्ने पृथिराज रिन । लज्ज लपट्टिय पाइ॥ चय जोरै कर हथ्य दो। चलि संभरि वै राइ ॥ छं० ॥ ७३० ॥ (१) मो.-गमें, असें । (३) मो.-घोरि । (२) मो.-भूसें। (४) मो.-भीर ।
पचीसवां समय ६६ E] पृथ्वीराजरासो। ८५७ उक्त विषय पर पृथ्वीराज का बिचार में पड़ जाना कि क्या करना चाहिए। लज्ज परबत ह रही। बैन तजै नृप पास ॥ दुहूं बौर 'मंडन सु बुधि । अति गत्तिय रति चास ॥ छ॥ ७३१॥ यह देख शशिवृता का कहना कि मेरी लज्जा रखिए । फिरि बुल्लौ लज्जौ सुनहि । हों मंडन तन बौर ॥ मो बिन इक्क काज नृप । बुद्धि न आवै तौर ॥ छं० ॥ ७३२ ॥ राजा का कहना कि तेरी सब बातें रस कसूम (अफीन के शर्बत) के समान मेरे जीवन भर मेरे साथ हैं। तूं वै एकह पन रहै। रंग कसूंभ प्रमान ॥ हो नन छंडों पास तुअ । तीनों पनह समान ॥ छं० ॥ ७३३।। लज्जौ मो सथ्य है। दान घग्ग अरु रूप ॥ मों चल्लै तीनों चलें। संचौ चवै न भूप ॥ छं० ॥ ७३४ ॥ . सुन रे वै लज्जी चवै । हूं मंडन नर लोइ ॥ मो बिन अप्पन 'लव है। नर विभासन होइ॥ छं० ॥ ७३५ ॥ शशिरता का कहना कि मैं भी क्षण क्षण आपकी प्रसन्नता का यत्न करती रहूंगी। बै दुल्लौ लज्जौ कलह । क्रत कै काम सुनंत ॥ इक पल पल मडनौ । हो रज्जन रजकंत ॥ छं० ॥ ७३६ ॥ पृथ्वीराज का कहना कि चहुआन का धर्म ही लज्जा का रखना है अरिल्ल ॥ 'लज्जौ सुनि सुनि हसौ प्रमान । तूं जानै सुनि 'बैन निधान ॥ लज्ज रूप मडन चहुआन। सुबर बौर आकास निधान॥ ०॥७३॥ (१) मो.-मंतह । (२) मो.-लद्ध, लम्भ, लभ । (३) मो.-निर्भासन । ( ४ ) मो.-लज्जा सुन रहसी प्रमान । (५) ए.-कृ. को.-वै सुन निधान । ( ६ ) मा.-आकार । १० पृथ्वीराजरालो। [ पचीसवां समय १०० तू अपने धर्म अनुसार सत्य कहती है । दूहा ॥ तूं लज्जो सच्ची चवै । तत लगि धंम प्रकास ॥ आत्तह गुन भत्त किय । जोग सुहंदा चार ॥ छ० ॥ ७३८ ॥ इस प्रकार शशिवृता और पृथ्वीराज का परामर्श होता रहा, पृथ्वीराज रूप रस में मत्त था और उस के स्वामिधर्म में रत सामंत उस तक कोई बाधा न पहुंचने देते थे। छंद पचरौ ॥ निबन्यौ बाद वै वर 'प्रमान । मानहि न बत्त लज्जो निधान ॥ वै जाहु जाहु तन रूप छडि । जिन चलै लजज लज्जो विषंडि ॥ छं० ॥ ७३८ । कहि बौर राज आए स बौर । मानहु कि छुट्टि धन वर सरौर ॥ आभास भार तुट्टौति अंग। जोर वरज हर मत्तीत जंग ॥ छं० ॥ ७४० क्रतत केलि क्रत करहि काम । सोभहति सूर दक्षिन ति ताम ।। अति स्वामि भ्रम नह वाम मग्ग । लग्यौ न सूर जिम स्वामि दग्ग ॥ छं० ॥ ७४१ ॥ प्रथिराज दिष्ट दिएत प्रमान । अरि भजत मनहुं तिन अग्गि जान ॥ ई० ॥ ७४२ यद्यपि सामंत बड़े बलवान थे किन्तु तब भी पृथ्वीराज का मन युद्ध ही की ओर लगा था। दूहा ॥ अग्गि पान सामंत बल । अत धौरत्त न जोध ॥ शस्त्र लग्गि लग्ग न मन । तउन पच पति जोध ॥ छं. ७४३॥ (१) ए. कृ. को.-प्रकांम । (२) मो.-नाम ।
पचीसवां समय १०१] पृथ्वीराजरासो। ८५६. शशिवृता की आशा पूजी, शिवजी की मुंडमाल पूरी हुई और भगवती रुधिर से तृप्त हुई। चिय विधाइ सूरन भए । चिपति उमापति मुंड ॥ उमा चपति रुधिर भई । धनि सूरन भुज दंड ॥ छं० ॥ ७४४ ॥ शूरवीरों के शौर्य और बल की प्रशंसा । सूर सुधनि भुज दंड बल । बल विक्रम ज्यों 'पाय ॥ बल किन्नौ छल छंडयौ । बर बीरा रस चाइ ॥ छं० ॥ ७४५ ॥ कवित्त ॥ बौर घाइ आघाइ । बौर विरुझाइ सेन बर ॥ लष्ष लष्ष इक मद्धि । लष्प उभ्भिरे लषष भर ॥ दल दंतन विच्छु । घाइ है वर किन कहि ॥ एक लष रुधियै । घग्ग घग्गनि भननंकहि ॥ उननंकि घंट घंटिय परहि । कज्जल कूट विवान भम ॥ सामंत सूर सामत हथ। करहि चंद अस्तुति सु क्रम ॥ छं०॥७४६ ॥ शाशिवृता के ब्याह की देवासुर संग्राम से उपमा वर्णन । छंद पचरौ ॥ श्रासंभ सेन सेना विरुव । शशिवृत्त व्याह दैवान जुड ॥ नर मथहि मेघ रथ गज सु वादि। होमियै घग्ग रिस अम्ग सादि। छं० ॥ ७४७॥ उच्चरे बैन बाजत बौर । सबै जु जुद्ध बुवं सरौर ॥ दैवत्त दुर्ग छिति मति अकर। निर्घोष दोष बज्ज सपूर॥ छं०॥७४८। इय गय गंभौर तन तुंग ताम । सूरह सु बौर विश्राम जाम ॥ छं०॥७४६॥ गाथा॥ रन घन तन विश्रामं । सँग्राम इक घरी पाइ॥ दावानल चहुआनं। सा बोरं बौर बौराधं ॥ छं० ॥ ७५० ॥ बौराधं बर बरयौ । सा भज्जै आवनं गवनं ॥ 'मोहं सलाकं भंजो । नां सज्ज पंजरो दिवो ॥ छं० ॥७५१ ॥ (१) ए. कृ. को.-आइ । (२) मो. माहे ।
पृथ्वीराजरासो।
[पचीसवां समय १०२
शूरवीरों का कहना कि हमारी जय तो हुई किन्तु जयचंद
का भाई कमधज्ज क्यों जीवित जाने पावे ।
चौपाई ॥ नह सज्ज पंजर प्रतिमान । कहै सूर निहचै प्रतिमान ॥
बौरचंद बंधव कमधज्ज । जीवत स्यामि जाइ क्यों लज्ज ॥छं०॥७५२ ॥
गाथा ॥ हम बहुलं बेसतयं । बंधे तेग मुक्ति वप जायं ॥
जीवत सुनि कमज्ज। ना मुक्क लषयो बलयं ॥ छं०॥ ७५३ ॥
मुरिल्ल ॥ लष्प लष्प बर सुभट सु भट्टह।
अघट घट्ट सु घटै न घट्टह ॥
सुटत बोर छविय छिति राजै।
मनो इंद घन मधि विराजै ॥ छं० ॥ ७५४ ॥
गाथा ॥ यों रज्ज नृप भरयौ । सरनं सूर सूर गत्ताई।
उग्गं ती रवि मानं। यों रत्ताइ रत्तयो मुषयं ॥ छ ॥ ७५५ ॥
राजा का कहना कि उसे मार कर क्या करागे ।
दूहा ॥ सत्थ सु तुझ कयौ सु सब । सुभट भट्ट बड़ भृत्य ॥
क्यौं न जाइ जौवत घरह । कहा करोगे मृत्य ॥ छ ॥ ७५६ ॥
आताताई का कहना कि उसे युद्ध में खंड खंड कर ही दूंगा।
छद भुजगो॥ तबै उच्चन्यौ अत्तताइ अभंगं । सज्यौ गैन सौसंजुन्यौ जुद्ध रंगं॥
हनों याहि भंजों सु गंजो पलानं । करों षंड पंडं ज मंडे बलानं॥
छ ॥ ७५७॥
इसी प्रकार गुरुराम की आज्ञा होने से घोर युद्ध का होना ।
तब गज्जि क्रम्यौ गुरुं चाहुआनं। अगे जोगिनी जग्गिक्रम्यौ गुरानं॥
क्रम्यौ सथ्य जद्दो स जामानि ताम । दुअंबड हड्डा चले बंध ठामं ॥
छ॥ ७५८॥
मिली रारि अंकं दुकं प्रमानं । परे जादवं राइ अरु चाहानं ॥
कहै भूलि भारत्थ इत्तें सपूर । उठे कंदलं इक्कि ते कौन सूर॥
छ ॥ ७५६ ॥
पचीसवां समय १०३]
पृथ्वीराजरासो।
८६१
नरं रक्त बीज बिनं केन दिठ्ठ। इतें हंकि सामत को बुंद उठु ॥
मिले घाइ घायं असौ पंगदायं । मिली रोठ आवड्ड सावड घायं ।।
छ । ७६०॥
परे सौस भार चहान धार। मनो इभ्भ अंकोर अंबूज भार॥
गजवाज तुझु परे पंड पंडं । नचंतं पिनाकी कर सज्जि दंडं।
छ ॥ ७६१॥
कटे तुच्छ हड्डेसु मसं निमसं । परे सूर मुझझोति मध्य उतंसं ॥
तिनं सत्त नाम जुजू वषानं । रठं निढ्ढुर कन्ह वर वीर जानं॥
छ ॥ ७६२॥
तहां अत्तताई रु गोविंद मानं । उठे हक्कि हाकं सु पज्जून पानं ॥
रघुवंस भौम तिनं नाम जानं । परोहार नन्हं तिनं नाम ठानं
छ॥ ७६३ ॥
इते उग्गरे कंदलं चंद कब्बौ । मनों देषियं जानता जोति हब्बौ ॥
परे पंच रायं ढहे राज सत्त। मुरं पंचरा वृत्तमा वेद वृत्तंछ॥७६४॥
दुहं पष्ष लग्गे तिनं नाम जानं । तिनं जाति चंदं रसूर बघानं ॥
पन्यौ झूझि रघुबंस परताप राजा परयौ राव चालुक्क ता जैत लाज ॥
छ॥७६५॥
प-यौ दलपती राउ दल सबब संध्यौ । प-यौ कन्ह राजा दलं नेत बंध्यौ॥
झंडा गड्डि बौर पौराज पौचौ। जिने कित्ति लच्छौ तियं लोक सौंचौ॥
छ ॥ ७६६॥
पन्यौ जावलौ राव सारंग सूरं । तिने झग्गरौं अच्छरौ छडि हर॥
पन्यौ दाहिमा देव मिलि धार पंतौ। रुर अंत कंती विराज सुंदती॥
छ ॥ ७६७॥
पन्यौ किल्हनं राव माल्हन हंसं । तुम्यौ सार धार मिल्यौ हंस बंसं॥
पौ जंगलौराव दहिया नरिदं। टपं कित्ति भषषौ भषौ कित्ति चंद॥
॥छ ॥ ७६८॥
पौ टांक सूर मिल्यौ सूर मंदे । मिल्यौ सार धार जमं डंड पंडे॥
चढ्यौ धार धार धनी धार नाथं । मुको मोह माया लई कित्ति हाथ॥
छ ॥ ७६६ ॥
८६२
॥
पृथ्वीराजरासो।
[ पचीसवाँ समय १०४
पन्यौ राव मोरौ मुरयौ श्रव्व सथ्य। ननं पाइ चल्लै चलै हथ्य वथ्यं ॥
परे सूर हक्क व धक कलेवं । सिर जुद्ध आनुव देपंत देवं ॥
छ॥ ७७० ॥
करे जोगिनी डक हक्कं गहक्क । गजे बौर सूर सु आवद्ध धक्कं ॥
चलै श्रोन अमान पूर प्रनारं । अदभभूत माया न रच्यो सु भार॥
छ ॥ ७७१॥
तवै अत्तताई लग्यौ लोह रस्सं । भगौ फौज कमधज्ज दित्सं विदिस्म॥
परे सेत सेते न थानं सु दिस। लगै अच्छरीमाल नभं सु जिस्सं ॥
छ ॥ ७७२॥
अनंछित्त अंग बरं अत्तताई । भई जीत चहुआन प्रथिराज राई ॥
०॥७७३॥
रण में अगनित सेन को मरा देख कर निढर का कमधज्ज से
कहना कि अब तूं किस के भरोसे युद्ध करता है। पृथ्वीराज
तो शशिवृता को लेकर चला गया।
दूहा ॥ परे सुभर दोजन दल । निढदुर देष्यौ बंध ॥
कोन भुजा बल जुध
कर । सुनि कमधज्ज अमुंड ॥ छ ॥ ७७४ ॥
बाला लै प्रथिराज गय। गहिय बग्ग कमधज्ज ॥
रोस रौस बिरसोज भय । रह बाजे अनबज्ज ॥ छ ॥ ७७५ ।।
पृथ्वीराज शशिवृता को लेकर आध कोस आगे
जाकर खड़ा हुआ।
कवित्त ॥ अद्ध कोस नृप अग्ग । बौर ठन्यौ करि ठडौ ॥
मद समूह गजराज । छंडि प? बल गड्डौ ।
लाज बंधि संकरिय । बौर बंध्यौ सु अष्ट कसि ॥
अरिन बौर छडै न । क्रन्न मडै दिलीय दिसि ॥
मनमत्थ महावत बंधि अति । मन मत्तौ उन को धर ॥
धन घाइ रुधिर छुट्टे परे। अमर पुहप पूजा कर ॥
छ. ॥ ७७६॥
पचीसवां समय १०५ ] पृथ्वीराराजसो। ८६३ अपनी और कमधज्ज की सब सेना मरी देख करयदव का हार मानना और सब डोली पृथ्वीराज को सौंप देना। खूब राज प्रथिराज । खूब जचंद बंध बर ॥ घूब सूर सामंत । षूब नृप सेन पंग बर ॥ घूब सेन ढंढोरि । घुब झोरौ करि डारिय ॥ खूब षेत विधि गाम । बानगंगा पथ भारिय ॥ आसेर आस छडिय नृपति । विपति सपति जानीय भर ॥ सुठिहार राज प्रथिराज कौ। धरे सबह चौ डोल घर ॥छ ॥७७७॥ पृथ्वीराज ने तेंतालीस डोलियों सहित बीच में शशिरता को ले कर दिल्ली को कूच किया। चौपाई॥ गौ दिल्ली दिल्ली प्रति बौर । सूर घाइ जर्जर किय और ॥ कित्ति सजी लोक प्रमानं। अंग कियौ जर्जर चहुआनं॥छ०॥७७८।। दूहा ॥ डोला ग्यारहु दून दस । एकादस तिन मद्धि ॥ मड्वि अमोलिक सुंदरौ । काम विरामन संधि ॥ छं० ॥ ७७६ ॥ डोला घाइन बंधि नृप । वजि निसान विघोष ॥ सब सामंत समंध चढ़ि । विच सुंदरी 'अमोघ ॥ छं० ॥७८० ॥ शशिवृता को ले कर पृथ्वीराज तेरस को दिल्ली पहुंचे। गाथा ॥ विच सुंदरी अमोघं । दोषं नैव बालयो मड्विं ॥ तेरसि गुन अधिकारी । संपत्ते राजयो ग्रहं ॥ छ० ॥ ७८१॥ पृथ्वीराज की प्रशंसा वर्णन । दूहा ॥ इन परत पत्तौ सु ग्रह । सुबर राज प्रथिराज ॥ हय गय दल बल मथत बर । रंभ सजीवन काज ॥ छ ॥ ७८२॥ चामुंडराय की प्रशंसा। सह जद्दों चामंड बर । बर बर जुद्ध विरुद्ध ॥ सुद्ध कर सामंत की । बर धौरज्ज सु बुद्ध ॥ छ० ७८३ ॥ (१) ए. कृ. को.-अदोष ।
पृथ्वीराजरासो। [ पचीसवां समय१०६ युद्ध में कमधज्ज और यदव को जीत कर शशिवृता को ले कर पृथ्वीराज दिल्ली जा पहुंचे। चाहुआन चतुरंग जिति । निगम बोध रहि राज ॥ बर शशिवृत्ता जित्तिगौ । धाम सु ढिल्लो साज ॥ छ ॥ ७८४ ॥ शशिवृता के साथ विलास करते हुए सब सामंतों सहित पृथ्वीराज दिल्ली का राज्य करने लगे। गाथा ॥ तपय सु नरपति ढिल्लो । दौह दोहं पहरे राज॥ जमगै कत काम । सा देवं सोइयं देहिं ॥ छ ॥ ७८५ ॥ दोहं पासा रूवं । सारूवं भूपयो सच ॥ जे नष्पै ते मगे। देवानं देवयो दोहं ॥ छ ॥ ७८६ ॥ दूहा ॥ सारिन सालै पंस बर । सारि पंस बर भोग ।। सुबर सूर सामत ले । करि ढिल्लो प्रति जोग ॥ छ ॥ ७८७॥ इस जय के प्राप्त होने से चहुआनकायश औरबादशाह से बैर बढ़ा। जै जै जस लौ सुबर । बैर नृपति सुरतान ॥ सुबर बर बर बढयौ । सुबर जित्ति चहुआन ॥ छ ॥ ७८८ ॥ पृथ्वीराज शत्रुओं को पराजय कर के अदंड बादशाह को दंड दे कर नीति पूर्वक दिल्ली का राज्य करता था। कवित्त ॥ भई जीति चहुआन । अरिय भंजे अभंग भर ॥ जज सूर बघान । देव नपैं सुमन्न वर ॥ लै शशित्ता राज । अप्प दिल्लीय संपत्तौ ॥ अति तोरन आनंद । चित्त रत्तौ मन मत्तौ ।। अरि अवनि कोन मडै मनहु । घग्ग दाग अरि षंडइय ॥ कवि चंद दंद दारुन कयहि ।इक अडंड करि डंडग्य ॥छ॥७८६॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथीराज रासक शशिता कथा नाम पचीसमो समय संपूर्ण । -:0- अथ देवगिरि समयौ लिख्यते । कै दुष मुक॥ (छब्बीसवां समय ।) जयचन्द की सेना ने देवगिरि गढ़ को घेर रक्खा। दूहा ॥ ना चल्ल कमधज्ज ग्रह । गढ़ घेर्यो फिरि भान ॥ मानहु चंद सरद्द 'जिम । गिर नछित्र 'परिमान ॥ छं० ॥ १ ॥ कुंडलिया ॥ गढ़ घेयो फिरि भान कौ । दूत सु दिल्लिय मुक्ति ॥ यह अजोग संजोग करि । अदिन कज्ज हम रुक्कि ॥ अदिन कज्ज हम रुक्कि । प्रान इन इन समान भर सत्त । जीव जावंतै धुक्कै ॥ प्रथम पुंजा लष्षिन । कुंआरि ससिवृत्त धौर बढ़ ॥ धन भर लज्ज सुबंध । घेरि सह बौर राजगढ़ ॥ छं० ॥२ राजा जयचन्द के भाई ने कन्नौज को और देवगिरि के राजा ने पृथ्वीराज के पास सब समाचार भेजा। दूहा ॥ इन कागद चहुआन पै । उन मुक्कलि कनवज्ज ॥ दुहूं बौर कविचंद इह । कै बज्जै कै बज्ज ॥ छं० ॥ ३ ॥ ने लज्जा के साथ जयचन्द को पत्र दिया। जयचन्द के पूछने पर दूत युद्ध और पराजय का हाल कहा । (१) ए. कृ. का.-दिन । (२) ए. कृ. को-परजादि । (३) ए. कृ. को.-ग्रह । (४) ए.क.को.-कमधज्ज । * छंद २ की अंतिम दोनों पंक्तियों का चारों प्रतियों में समान मूल पाठ इस प्रकार "प्रथम पुंज लष्षिन कुँअरि कुँअर ससिवृत सुधीरह । धन भर लज्ज सुबंध राजगढ़ घेरि सबीरह ", यह कुंडलिया छंद के नियम से विरुद्ध पड़ता है परंतु यह कवि की भूल नहीं है, लेखकों की असाव- धानी या भूल से ऐसा हुआ है क्योंकि उन्हीं शब्दों के हेर फेर से शुद्ध पाठ होगया है और अर्थ में भी किसी प्रकार की त्रुटि नहीं हुई। hoo ने ११ पृथ्वीराजरासो। [ छब्बीसवां समय २ ५ कवित्त ॥ सुबर बोर कागदह । पंग करि अप्पि सु जंपिय ॥ बहु दुचित्त संजुत्त । लज्ज आजुत्त प्रकंपिय ॥ सुर सुकौय कर पंग । नैन नीचे टप दिदौ ॥ तब पहु पंग नरिंद । कुशल जानी न गरिड्डौ । पुच्छो सु बात इह करिय तम । जानि सोक कह उप्पनिय ॥ संग्राम तेज भंजन भिरन । मग्न कहौ मारन पुनिय ॥ छं० ॥ ४ ॥ दूहा ॥ दुज्जन दवने पोर के। वज्जै पै बर केक ॥ भर भीरी रहि अंक के। मरन सरन के केक ॥ छं. कुंडलिया ॥ तब पहु पंग नरिंद प्रति । दृत सु उत्तर जप्पु ॥ इह अपुच्च कथ सुनि पति । जौतें हार सु अप्पु ॥ जीतें हारि सु अप्पु। देषि कह्यौ चहुबानं ॥ ढिल्लो वै अधकोस । बौर मुक्यौ तिहि थानं ॥ आइ सेन घन घाइ । अड्व भर पारि असुर जब ॥ दिषि निदढुर कमधज्ज । वग्ग सेना पंचय तब ॥ छं० ॥ ६ ॥ दूहा ॥ देवगिरि गढ़ घेरि फिरि। 'हैमुक्यौ नृप काज ॥ मतौ मंडि रा पंग पै । वे 'मुक्करि प्रथिराज ॥ छं० ॥ ७ ॥ चौपाई ॥ इह कहंत नृप पंग सु अष्षौ । वियौ दूत नृप अंघन दप्षौ ॥ दुचित चित्त मुक्की बर बानी । कुसल बौर कमज्ज न जानी ॥ छं ॥८॥ दूहा ॥ भयौ स्वेद सुर भंग भौ । नैन झलक्यौ पानि ॥ कै फिरि दंद सु उप्पनौ । कै वर बंधव हानि ॥ छं० ॥ ६ ॥ कवित्त । कही कुसल तन दूत । कित्ति कुसलत्तन भग्गिय ॥ जेनि रहे कमधज्ज । रहे सो जम्भह लग्गिय ॥ जे निकलँक ग्रह आदि। कलंक कालंक सु कुप्पै ॥ "दे विधान विम्मान । कौन मेंट को थप्पै ॥ भष जोइ सिंघ जम्बक हरै। काकलंब पप्पौल गहि ॥ जदिनह भई भावी विगत । जिम रक्खै तिमि तिमि सुरहि ॥ १०॥ (१) कृ.-होन । (२) मो.-पुकारि । (३) ए. को.-आनी । (४) मो.-कहै । (५) मो.-दो ।
छब्बीसवां समय ३] पृथ्वीराजरासो। ८९७ . कवित्त। यह कहत पहु पंग । दूत तिय आन सपत्तौ ॥ वाचा शीतल जंपि। अंग प्रारम्भ न सत्तौ ॥ चढि नरिन्द कमधज्ज । तौन तन सज्जन वारो॥ मिलि यहक चहुआन । बौर परिहै ससि भारौ॥ दाहिम्मराय चामुंड सौं। सब्ब साथ नृप थप्पयौ ॥ ते काज राज सम्हैं सुमति । लिषि कागद महिं अण्पयौ ॥ ११ ॥ जयचन्द की महा क्रोध से कहना कि पृथ्वीराज की कितनी सेना है। उसे मेरा एक मीर बंदा जीत कर बांध सकता है। क्रोध भरिय कमधज्ज । काक बर बोल उचारै॥ जो भज्जे ग्रह अपन। कौन अपपनौ विचारै॥ अरे सुनहु भर सुभर । जुझझ भग्गौ पति छंडै॥ बेचि बौर गजराज । बाद अंकुस को मंडै चहुआन सेन कित्तिक है । एक मौर बंदा बधै ॥ लभ्भयौ राज अप अप्पुनह । लोह धार मोसम सधै ॥ छं० ॥ १२॥ जयचन्द ने मंत्रियों से मत करके अपने स्नही राजाओं को सेना सहित आने को पत्र भेजा। कुंडलिया ॥ सुनि सुमंत्त मंत्रिय समत । कुमति मंत कों मंत ॥ बचन भेद जिहिं हम कही। सोइ गही बल तंत ॥ सोइ गहि बल तंत । बल न अण्पन पहिचान्यो उदो राग उच्चन्यौ । संच तेता करि मान्यौ ॥ उननें कुंवरी 'बरौ । तिनं कु कर तिन गुन्नौ ॥ सु वरि एक वुल्ले दुवान । सो सब सह सुन्नौ ॥ छं० ॥ १३ ॥ पत्र भेज कर अपनी तयारी की आज्ञा दी। सवारी के लिये घोड़ा तय्यार कराया। कवित्त ॥ बर अथवंत सु दोह । आइ चतुरंग सपन्नौ ॥ महल नृप बोल । बंचि कग्गद कर लिन्नौ ॥ (१) मो.-मुरी । (२) क-सुबरन । मम ८६८ पृथ्वीराजरासो। [छब्बीसवां समय ४ निसा मंत उपपाई । सहस नव लिपि बर पट्ट इष्ट प्रत्त सगपन्न । सु मत बहु फट्टत पट्टे ॥ वजित विघोष अरि घोष पर । छोरि पंग दिष्षे सु हय ॥ रवि रथ्य तथ्य आवहि जु सम । 'गात गिरव्वर नाग सय ॥छं०॥१४॥ घोड़े की प्रशंसा वर्णन। भुजगौ॥ तियं फेरियं अश्व दौसैति पंगा। तिनं देषते छह कंपंत अंगा॥ तिनं श्रोपमा चंद बरदाइ कैसौ । दिपै तीर मानों छुट्टै अंग तैसी॥ छ० ॥ १५॥ पयं ममझ मडै तिम चित्त इष्पं । पयं पातुरं चातुरंतो बिसष्पं ॥ पुरं वज्जतें भुम्मि धुज्जै धसक । फनं फेलि से संमुहं फूंक सक्क छ ॥ १६ ॥ द्रम सौस दौसै सु केको पुछंगो । मनों मडियं नौल कंठं उछंगी ॥ तिनंभाल संमेलयं धाट झुझझ। 'छिलै पूर ऐसें सरित्तान सुझझे ॥ छं० ॥१७॥ डुलै कंन नाही छुरी कास ग्रीवं । मनो देषियं सौष निर्वात दौवं ॥ दिपै कवि चंदं सुरंगं सु सेसौ । दुई पप्प नाहौं तिनं घोरि कैसी॥ छं० ॥१८॥ सुभै सालिग्रामं समानत अंषौ । तिनं पूजिवै चित्त चित्तत नंघी ॥ पियें अंजुली नौर दोसै उपंगा। फिर कच्च रचीन में रत्त गंगा ॥ छं० ॥१६॥ दिसानं दिसानं सबै जाति राको। कही चंद कबी उपमा सुताको। छं० ॥२०॥ कवित्त । बत्तिय नयन रुद्र के। उड्डि घन अगिग तिनंगा ॥ तास मध्य ते प्रगटि । तेजवंता सु तुरंगा ॥ भुअपत्तौ संग्रहे । पौठ मंडै पल्लानं ॥ अंबर करत बिहार । देषि कोपपौ मघवानं ॥ (१) ए. जात । (२) ए. नियं। (३) कृ.-धुने । (४) मा -कंठी । (५) प.-दिलै । (६) २१ छट मो. प्रति में नहीं है ।
छब्बीसवां समय ५] पृथ्वीराजरासो। ८६६ प्रगट्टि नषि दिय वज सों । गयन गवन तब मिट्टि गय ॥ कहि चंद मनहु पहुपंग तें। फेरि आज पपरत हय ॥ छं० ॥२१॥ जयचन्द घोडे पर चढ़ा। तीन हजार डंका निशान और तीस लाख पैदल सजकर झट से तय्यार हुआ। चढ़त पंग हय सज्जि । सज्जि गजराज सज्जि 'नर ॥ यो जानौ सुर असुर । करै कमधज्ज बिया पुर ।। बजि विघोष चिय सहस । मौर बंदा दस लष्षिय ॥ तीस लष्प पाइक । सुबक पारंक विषिय ॥ जू सन विराग बल बौर सजि । दल सज्ज्यौ गंजन अरिन । पहु पंग बौर परतष्षि लै । किरन सु सम सज्जी किरन ॥छं०॥२२॥ जयचन्द ने प्रतिज्ञा की कि जादव और चौहान दोनों को मार कर तब मैं राजसूय यज्ञ करूंगा। दूहा । इह प्रतंग पहुपंग लिय । बधि जद्दव चहुबान ॥ जग्य अरंभ ज मडिहौं । ता पच्छे परवान ॥ छं० ॥ २३ ॥ सेना की शोभा वर्णन । कवित्त । चढ़त पंग मिलि सेन । पूर जिम नदिय मिलत चिन ॥ वज्जि बौर वा तूल । जत्थ कथ्थह उड्ड पिन ॥ एकां फुनि जम्म । तुट्टि जू जू फल लचौ ॥ दैव क्रम्म करि जोग । आइ एकट्ट अरुद्धौ ॥ बंधेत काल डोरी तनै । छूटि धार घन मिलहि तिम ॥ आत्त क्रम्म लिषे बिना। मिल न पंचौ 'पंच "जिमिर्छ ०॥२४॥ जयचन्द्र की स्त्री का विरह वर्णन। दूहा । इह अवस्थ पहु पंग की। बाल अवस्था कौन ॥ जियन आस नहिं सांस तन । डरहि देषि अलि जौन्ह ॥छं०॥२५॥ (१) ए.क. पक। (४) ए. को.-पंप । (२) ए.-हय । (५) ए. कृ. को. जिम । (३) ए. कृ.-जिम । (६) ए. क. मो.-अति ।
पृथ्वीराजराहो। [छब्बीसवां समय । गाथा । बाले मलयं चप। दै दै चपत उरह 'उरहोती॥ तिन बिपरीतं बाम । काम रस जग्गयौ घनयौ ॥ छं० ॥ २६ ॥ भमरावलौ ॥ बढ़ि बाल वियोग सिंगार छुट्यौ । सुख कौ अभिराम कि काम लुब्यौ । घन सार सुगंध सु घोरि घनं। बनि जानि प्रकौन क्रपान बनं ॥ छ ॥ २७ ॥ तल पत्ति तजे तल पत्ति मनों। बहु बाढिहै अंग अनंग घनों ॥ नव चंदन अंग अनंग जरै। दिप दीपक भौन में भान बरै ॥ छं० ॥ २८ ॥ लगि मोदक से अन मोदकयं ॥ दिसि प्राचिय देषि परी धुकयं ॥ प्रति वृत्ति सरत्ति यपी पयनं। उमगे तहां अंसुअ इ नयनं ॥ छं० ॥ २६ ॥ घन ज्यों तन छडि न उत्तर दे। लगि कानन नाम पिया अलि लेइ ॥ कछु बर भोहन उत्तर देत । मनी दस वस्थन दंग अचेत ॥ छं० ॥ ३० ॥ चषयं सुभि चंचल रंजनयं । सु मनो गहि मुत्तिय षंजनयं ॥ बिय भाव सु अंसु अनंदि लता। हर नंषिय रष तिगी पतिता ॥ छं० ॥ ३१ ॥ तिन अंग अचेतकिता भ्रमयं । दुष दूषन भूषन से तनयं ॥ दिषि दिष्षि अली अलिके जकरें। लय सास उसासन तानि परे ॥ छं० ॥३२॥ पन प्रान प्रियान प्रयान पुटं। लगि साहस एक घटौ न घटं। (१) ए. कृ. को. उन्हीति । ( २) मो.-देत, लेत । (३) ए. कृ. को.-अयस्थन ।
छब्बीसवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो। ८७१ सुथनं सब तैं विमन मन तें। निज निश्चल रौनि गई गिनते ॥ छं० ॥३३॥ चलि सौत सुगंध सुमदय बात । मनों लगि पावक अंभन जात ॥ डुलावत अंचल शीतल काज। लगै मनों तौर तरुन्निय जाज ॥ छं० ॥ ३४ ॥ भुगम भोजन अंगम नारि । कर करुना रसको उनिहारि ॥ सबै सु सषी मिलि पूछत ताहि । मनों जड़ श्रोत सुने रस जाहि ॥ छं० ॥ ३५ ॥ चन्यौ कुटिलं रथ चित्तह धाइ। 'सु जे मरविंद समादक लाइ ॥ इन रिति नारि न मुकह नाह। लगे विहजानि कुमुदिन राह ॥ छं० ॥ ३६॥ नदीय निवान 'अपौत सयं । नव पंथय सुझमय बुझझ कयं ॥ बजि मारुत तत्त समीत प्रकार । उड़े घन धम्म बहै अनिवार ॥ छं० ॥ ३७॥ कर तरु तुंग गई सुधि धाम। तजी पहु पंग नरिद सु वाम ॥ छं० ॥ ३८ ॥ जयचन्द की चढ़ाई का वर्णन । पडरौ ॥ चढ़ि चल्यौ पंग कमधज्ज राय। सो छिन्न भिन्न डम्मरित छाइ॥ पद्धरी छंद बरनो सुरंग। लहु बरन बौच विचि अति सुरंगाछ॥३६॥ ढलकंत ढाल तरवर प्रमान। हलके हलत गज नग समान ॥ अपसुकन सुकन चित्तहिन चित्त । "विम्मान वत्त गुन धरत तत्त॥ छ ॥ ४० ॥ (१) ए. को.-सुथानं । (४) ए..सजे । (६ ) मो.-मन्नहि । (२) ए. को. नैनि । (३) मो.-तरुन्नित । (५)ए. को.-अपीन । (७) ए.-त्रिम्मान, त्रिमान |
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पृथ्वीराजरामो।
[छब्बीसवां समय ८
कदवत्ति सलिल जहां सलिल पंक । चित चित्त बकं जे करें कंक ॥
चल्ल नरिंद अरि पु गाव । भुमियां ससंक सव लगत पांव॥छ॥४१॥
गड़ घेरि पंग किय अपमान । मानों कि मेर पारस्स भान ॥
पंगह सुबौर गढ़ करि गिरन । सर्वरौ परस चंदा सरह ॥छ॥४२॥
चढ़ अमरसौय चढ़ि अमरसिंघ । गहिलौत स नरवर लहु सु वंध ॥
पंगुरा सुभर लगि उंच गत्त । जाने कलंक लंगूर यत्त ॥छ०॥४३॥
जयचन्द का दक्षिण की ओर चढ़ चलना।
कबित्त ॥ दिशि दष्विन को बलिय । गयौ कमधज्ज चित्त करि ॥
यों फिरंत तहँ सूर । वित्त आगस्ति पान फिरि॥
पंच तत्त बिय बिरह । छुट्टि लगो सु पंच पथ ॥
तोइ काज हम करें। चरन सेवकह जापि तथ ॥
तो अंब प्रपौ अब जानि बस । जस क्रीड़ा धर उग्गनह ॥
कच्छू सुजोसि बलि जोति तन । हबि सरुक भेदै मनह ॥छ॥४४॥
हाथियों की शोभा वणर्न ।
गज्जनेस कमधज्ज। दान बरपंत बौर सजि ॥
नव अंगुर इक विहथ । सूर तन इक प्रवाह लजि ॥
सिरी सत्त सोभै। बिसाल सिंदूर विराजै ॥
मनु कज्जल गिरि शिखर । शूर मंगल तन साजै ॥
सज्जिय अनेक वप पंग ने । गामी तर गोड़न बियौ ॥
जाने कि अकासह भान दिन । ऐ वसट्ट गिर पय दियौ ॥छ॥४५॥
दूहा । रंभ जन तट पंषुरी । लग्गि बधू सित माल ॥
भ्रंग सुता को पंति तें । बढ़ी विरह बनमाल ॥ छ ॥ ४६ ॥
राजा भान का यह समाचार पृथ्वीराज को लिखना।
बान पंग पहु पंग परि । मिली कंन को कान ॥
इह,अपुब्ब बर भान सजि । दै कग्गद चहुअान ॥ छ॥ ४७ ॥
छब्बीसवां समय ९] पृथ्वीराजरासो। ८७३ उक्त समाचार पाकर काम क्रीड़ा प्रवृत्त पृथ्वीराज का वीरता के जोम में आजाना। रति पति पत आलुझिझ घन । तिहि कग्गद मुकि दूत ॥ तजि सिंगार भौ 'बौर रस । जिमि आयौ बर 'धूत ॥छ०॥४८॥ बाल कमोदनि पीय ढिग । ससि समान रस पान ॥ बर बिलोकि जो देषियै । तौ चहुबानह भान ॥ छ ॥ ४६॥ कवित्त ॥ लाज सरस चहुआन । जोग उज्जै जुध मुत्तम ॥ त्रियन पाइ दिषि काम । बेर दिषषे जु बौर सम ॥ घरि इक पंग नरिंद। कलँक उननि करि देषै ॥ इत्त सु जद्दव राइ । सजन अप्पनौ स ल षै सुरतंत स्वामि अभिलाष रिन । ग्रव्व राज मद्दह पति ॥ मार सु नरिंद संकर भयौ। अति निकल कह चित दिपति ॥ ५० ॥ इधर शहाबुद्दीन की चढ़ाई उधर जयचन्द की राजा भान से लड़ाई देखकर पृथ्वीराज ने चित्तौर के रावल समर सिंहजी को सब वृत्तान्त लिख कर सहायता चाही और सम्मति पूछी। दूहा । घरी एक बंधी सुनौ । पै मुक्कलि प्रथिराज ॥ बौय सोम अप्पन चड़न । ल दौनी रस पाज ॥ छ ॥५१ ॥ चढ़त गज प्रथिराज को । चढ़ अवाज सुरतान॥ समर सिंघ रावर दिश । दै कग्गद चहुबान ॥ छ ॥ ५२ ॥ कवित्त ॥ दिल्ली धर गोरी नरिंद । बँध पल्हन प्रपत्तौ ।। षां हुसेन के बैर। अनगपाल सु मिलत्तौ । तिर भर जल गंभौर । हसम है गैकमधज्जी।। देवग्गिरि दिसि भान । बौर पावस जिम सज्जी ॥ (१) ए.-बार । (२) ए. को.-धत्त । ( ३ ) मो.-चहुआने । १२ पृथ्वीराजरासो। [छब्बीसवां समय १० धर लई सब साहिब जुरत । भान न उप्पर मुक्कही ॥ चिचंग राज रावर समर । इह अवसान न चुक्क हौ ॥ ५३ ॥ समर सिंह ने पत्र पढ़कर कहा इस समय पृथ्वीराज को दिल्ली में अकेले न छोड़ना चाहिए। मेरे साथ अपने सावंत और अपनी सेनादें मैं पंग से लड़ लूंगा। बंचिय कग्गद समर । समर साहस उच्चारिय ॥ तव सुमंत बर बपति । मंत जानै न विचारिय ॥ हम सुमंत जो करै। राज दिल्ली मति छंडौ ॥ इह गौरी सुरतान । अनगपालह फिर मंडौ ॥ सामंत 'देहु हम संग बर । रन रुधै पहुपंग नर ॥ आरंभ महन रंभह मतौ। इह 'सुमंत कुसलंत घर ॥५४॥ समरसिंह की सलाह मान पृथ्वीराज ने अपने सावंत चामुंडराय और रामराय बड़गूजर के साथ अपनी सेना रवाना की। कुंडलिया ॥ समुद रूप गोरिय सुबर । पंग ग्रह भय कौन । चाहुआन तिन बिबध के। सो अोपम कवि लौन ॥ सो श्रोपम कवि लौन । समर कग्गद लिय हथ्थं ॥ भिरन पुच्छि बट सुरंग। बंधि चतुरंग रजथ्थं ॥ समर सु मुक्कलि सोर । लोह फुल्यौ जस कुमुदं ॥ रा चावंड जैतसौ । रा बड़गुज्जर समुदं ॥ छं० ॥ ५५ ॥ रावल समरसिंह ने अपने भाई अमरसिंह को साथ लिया। ये लोग देवगिरि की ओर चले । दूछा । अमरसिंघ बंधव समर । समर समोकलि दीन ॥ ते सामंतन संग लै। देवगिरि मग लौन ॥ छं० ॥ १६ ॥ (1) ए. कृ. को.-दीहि । (२) ए.-समतं । ॥ roasters छब्बीसवां समय ११] पृथ्वीराजरासो। ८७५ हम सुराज चहुबान ने। राषे घेरी राइ ॥ पंग 'औट बर कोट है। देवग्गिरि गढ़ जाइ ॥ छं० ॥ ५७ ॥ जयचन्द को गढ़ घेरे देख चामुंडराय ने चढ़ाई की। इधर राजा भान मिला। कवित्त ॥ देवग्गिरि गढ़ घरि । ढोह मंद्यौ बर पंगे। रन विघोष प्रमान । बौर बाजे रन जंगं॥ चिहुदिसान उड़ि चक्र । उनझी झंझर लग्गा ॥ हादस दिन रन मंडि । राव चाम ड भिरि भग्गा ॥ सामंत पंग वित्त नृपति । छल सज्जे बलहारियां ॥ दाहिम्म राव दाहिर तनय । रत्ति वाह बिच्चारियां ॥ छं० ॥ ५८ ॥ मिलि जद्दव चामंड । रत्ति वाहं संपन्नौ ॥ जोइज्जै सथ टारि। साथ टारिज अपन्नौ ॥ चंत साथ सो साथ। और सब साथ 'सुपन्नौ ॥ भर तरकस वंध । थान मन आकन्नौ। जीवंत दान भोगह समर । मरन तित्थरभ "भिरन गति ॥ एकर बात उभ्भत नर । ता स राज मंडल मिलति ॥ छं० ॥ ५६ ॥ राजा भान और चामंडराय की सेना का वर्णन। हथ्थ हथ्थ सुभमन । मेघ डंमहि मडि रज्जो ॥ निशि निशीथ अंतरी । भान उत्तरि सथ सज्जी॥ बिज्ज बौर झलकत। "पवन पच्छिम दिशि वज्जै॥ मोर सोर पप्पीह । अवनि सक्रित घन गज्जै॥ बढी जु सिलह निशि सत्त मिलि । धसिय पंग दरबार दिसि ॥ चामंड राइ दाहर तनौ । लरन लोह कति रिसि ॥ छं० ॥ ६ ॥ राजा भान का मिलना देखकर जयचन्द का क्रोध करना। (१) ए.-ओर । (३) ए.-सुपंथं । (६) मो.-मिलनि । (२) ए.-इन । (४) ए. कृ.को.-आकथ्यः । (७) ए.-भवन । (५) ए:-निरन । (८) ए. कृ. को.-सधियः ।
पृथ्वीराजरासो। [छब्बीसवां समय १२ ॥ धसि नरिंद चामड । कूह बज्जी रन जंगं॥ भर भग्गी चौकी समूह । लग्गा रन जंगं ॥ रन नरिंद 'वाहन कुवार। सारह हसि भिल्लै ॥ पंग टटौ बौछार । जितै भिजे तित मिल्ल ॥ आरिष्ट काल बज्जत घरी। उघरि मेह घन सार जल ॥ जग्गयौ जोध कमधज्ज अब । मनों सिंघ जुट्यौ सु छल ॥छं०॥६१।। तब रावत उच्चरे । राज जोरी बर पंगं । जिन चंपे बल पुंछ । रोस जग्यौ नृप दंग ॥ नाग पत्ति कोपत्ति । अप्प बर कन्ह जगायौ ॥ राह सुमनि बित्तर । जम्म जुग राज झुकायौ ।। उच्चरे वौर कुट वार रिन । रन रुंधया अप डिंभरू ॥ संभरे बौर कमधज्ज कौ । भये रोम गति विम्भरू ॥ छं० ॥६२ ॥ अमरसिंह ने जयचन्द के हाथी को मार गिराया। अमरसिंह आहु© । नाग "मुष्पी बर कढी ॥ शीश शोभि गजराज । नाग मुष नागिनि चढी ॥ हाड हटको हथ्थि । बौर षच्यौ कर सह ॥ हथनापुर चन्द । बौर पंच बलिभद्र ॥ दंतौ सुभग्गि धर पर पन्यौ। इल षुच्यौ दत अडकबि॥ सिंघ हति भूमि बर सुम्भई । मिलत भूमि हथ्थह तिरव ॥ ६३ ॥ हाथी के मारे जाने पर जयचन्द का क्रोध करना और स्वयं टूट पड़ना। हस्ति काल जम जाल । काल रुध्यो चामंडह ॥ सुनत पंग रस भगं । सौस लग्यौ ब्रह्मडह ॥ रन रूंथ्यौ बछरू। मौन गति नौर प्रमानं ॥ जग्गि बौर पहुपंग । तोन पारथ्थ प्रमानं ॥ कै ) कृ. प्रति में “पंगु पुत्र" भी पाठ ऊपर दिया हुआ है । (२) ए.-राजन, रावन । (३) ए.-जेपे । (४) ए.-दंसं । (१) ए.-मुठी मुट्ठी । (६ ) मो.-हीन ।
छब्बीसवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो। जग लोह कोह कद्विय सु असि । भिरत न अप अरि तकर ॥ रहि जाम एक निसि पच्छलो । चढ़ि विसूर हय नष्षर ॥छं०॥६४॥ रसावला ॥ पंग जंग पुल, कह मची हुलं । सार तुट्टे पल, षग्ग मच्चेषल। छं० ॥६५॥ हाल हाला हल, सोइ वित्यौ तल । गिव कोलाहल, अंत इंतो रुल॥ छं० ॥६६॥ उद्धपौयं छलं, चर्म अस्तिं तल । वौर निवौचल, सिद्ध उड्डे रुल ॥ छं० ॥ ६७॥ संभु मालं गल, ब्रह्म चित्ता चल । भूत वित्ता तल, पथ्य पारथ्यला छं० ॥८॥ देव देवा नल, फट्टि फारकल। घाय छज्जे घल, सूर घुम्म रुलं ॥ छं० ॥ ६ ॥ तारचौ सठ्ठल, बाइ भूत तल । रौति पडछौ षिनं, तार आयासनं ॥ छं०॥ ७० ॥ सूर उग्यो ननं । कोर चढ फनं ॥............ ई० ॥ ७१ ॥ लड़ाई खतम होने पर जयचन्द का अपने घायलों को उठवाना। दूहा ॥ रन मुक्के गो भान चढ़ि। सब सामंतन सथ्य ॥ भृत्त बौर पहु पंग ने । घत सु ढुढ्यौ तथ्य ॥ छं० ॥ ७२ ॥ इस युद्ध में मारे गए सूर सामंतों के नाम। कवित्त ॥पयौ बंध गोईद । नाम हरचन्द प्रमानं ॥ पयौ बंध नरसिंघ । रेह रष्षन चहुबानं पन्यौ कन्ह पुंडौर । बौर चन्द सु जायौ ॥ पयौ सूर बाघेल । हकि कपि जिम बल धायौ ॥ चतुरंग सब्ब मिल्लिय वहौ । असिन ढार बड़गुज्जरै ॥ सामत हथय बर बज सम । घेत सु ढुंढहि पंगरै ॥ ई० ॥ ७३ ॥ रणभूमि में जयचन्द के घोड़े की चंचलता और तेजी का वर्णन पृथ्वीराजरासो। [छब्बीसवां समय १४ ॥ . रिस छुग्यौ कमधज्ज । बोल बंका बर बोले ॥ ज्यों बावन बल रूप। कुहर थानह बल मेलहै रावन पबय समान । काज कैलास झुलावै ॥ कै बलि बधन पाज । द्रोन हनुमत जु ल्यावै ॥ गिरिराज काज साइर मथन । कै अमरस मिल्लिय नहीं। 'नंषयौ अश्व कमधज्ज नै । सो उम्पम कवि भाषहौं । ॥ छं. ॥ ७४ ॥ देवगिरि के किले की नाप और जंगी तैयारी का वर्णन । मापि पंग गढ़ देखि । कोस हादस बर ऊँचौ ॥ दहति कोस विसतार । कोठ मरहथ्य विपंचौ ॥ नारिगोरि सा बत्ति । राज मंडी चावहिसि ॥ ढोह मडि पाषान । तौर बरषंत मंत्र असि ॥ पावस्म मास बौतौ उभै । जुरि कमधज्ज सु छंडयौ ॥ मंत्री सुमंच परधान ने । फेरि मंच तब मंडयौ ॥ ७५ ॥ जयचन्द का राजा भान को मिलाने का प्रबंध करना। बल बंध्यौ कमधज्ज । किलह भंज्यौ भंभानं । लग्गि चरन पहु पंग । बदि लौनौ फरमानं ॥ दूत भेदयौ मडि । द्रव नंषै चावहिसि ॥ कछु मोह । मेल्हि पर ध्यान पल्हनिसि ॥ अपनी साथ ले सिंघ तब । जियन मरन ते उद्दए ॥ जम जीव जार पंजर परै । कोइन कलि महि छुट्टए ॥ छं० ॥ ७६ ॥ संवत ग्यार सँ जुत्त । अदिस उन लग्गिय पंच मरन अग्गि जांनिय न । गोज पल्हन जो पंचं ॥ दिन नछिच रोहिनी । समय च्यालीस बिअग्गल ॥ मत्त बौर जद्दव नरिंद। भागी ग्रह भग्गल ॥ जग्गयौ धार धारह धनी । भोज कुंअर रन मंड के ॥ सा धम्म धम्म छड नहीं। गो अध्रम छिति छडि के छः॥ ७७ ॥ सलोभ कछु । (१) ए.-अषयो। (२) ए.-सब ।
छब्बीसवां समय १५] पृथ्वीराजरासो। ८७९ इधर अमर सिंह का घोर युद्ध करना । बज्जि कूह संमूह । अमर उठे समरं भिरि ॥ पंड मुष्ष भौ कोट । समर बंध सुद्धे जुरि॥ रा चावड जैतसौ । राव बड़गुज्जर धाए ॥ आहुछ कमधज्ज । सार बज्जै सुरझाए ॥ बर यंग जंग भज्जी सहर । लुथ्थि लुथ्यि आलुथ्यि परि ॥ चढूने अरिय संग्राम भिरि । षट्ट सहस सेना गिरौ॥ छं० ॥ ७८॥ जयचन्द का किले पर सुरंग लगाना । परत पंग आरोहि । सु रँग दोनौ सुभान गढ़ ॥ नाग समूह बरौ । ढाहि देवल सुरंग मढ़ ॥ थान थान नर उड़े । चंद तस उप्पम पाइय ॥ कालबूत कागह । पंग इह काज उड़ाइय ॥ अजजन सपिदिय सेन को। दच्छ देव बर बोलहीं॥ सामंत सूर संग्राम कल । ताप तुरंग न डोलहौं ॥ छं० ॥ ७६ ॥ चौपाई ॥ बहु परपंच किए पहुपंगं । गढ़े तूटंत मग्ग मन अंगं ॥ गिरि सम्म ह बंक भर ठट्ट । मतौ मडि मुक्यौ बर भट्ट ॥छ॥८० जयचन्द का किर्तिपाल नामक भाट को भीमदेव और चामंड के पास सधि का संदेसा लेकर भेजना। कवित्त ॥ कित्तिपाल बर भट्ट । बधि फुरमान पंग रन ॥ जहँ जद्दव चामड। द्रुग्ग ग्ग दोय छचन जुरन॥ चौज चक्क चहुआन । पयौ सगपन मिस अट्टौ ॥ उह मारन इन मरन । बज्जि बाहं बिन घट्टौ ॥ आतुच्छ मिलौ बंधौ जियन । जुड्व मोहि क्यों पूजिहौ ॥ शृंगार भोग आनन्द रस । सबै बौर रस चुक्किहौ ॥ छं० ॥ ८१ ॥ राजा भान को समझा कर जयचन्द के दूत का वश कर लेना। (१) ए.-ठडे । (२) कृ.-समुह धद्धरी ए.-समुहरद्धी, समूरहधरी। (३) ए. कागच्छ.कागछ । (४) ए. कृ. को.-फुरमारस ।
पृथ्वीराजरासो। [छब्बीसवां समय १६ तब बसौठ नृप पंग । भान एकत्त मत करि॥ मिलौ पंग कमधज्ज । जम संसार जम डरि॥ तमस भेद नृप एह । बाल उत्तर गढ़ भेदं॥ अरि अमंत जव । नरिंद कौनौ घर छेदं॥ लगि कान बात मंत्री कही । आहुठ्ठां बल गड्डियां ॥ त्रिय पुत्त हत्त पुत्रौ लिये । दुग्जत जनम सुवढियां॥ छं० ॥२॥ दृहा ॥ विष धर दुज्जन सिंघ फुनि । अग्गि अनंग अनेह॥ ए अपना ना लेषिये। ये परि अप्पै छेह ॥ छं०॥८३॥ कवित्त ॥ हसि जद्दों चामँड। पँवार हथ्थे दिय तारौ ॥ सुनि बड़गुज्जर राम । मतौ अप्पो मो भारी॥ सामि एक बंदी स । प्रोति जल जंतं तकौ ॥ लियौ अधर सम रस्स । वात सा दोहमन की। क्यौं जामन मत रहंत इत । केह कंत जो मंगयौ ॥ सो मत पंग कमधज्ज नें । अप्प हेत सो उग्गयौ ॥ छ० ॥८४ ॥ दूहा । इह उत्तर नृप पंग सौं । कहै सु जद्दव राय ॥ दूध विनछौं सुद्ध हिय । किन अप्पन मुष पाइ ॥ छं० ॥८५ ॥ चौपाई॥ उठे भट्ट तिहि ठौर विचारी । ज्यों उठि जोगी कंथा भरी। मन को मने रही मन माया। ज्यों तरंग जल जलें समाया||छं० ०॥८६॥ कवित्त ॥ मतौ मडि बप पंग । गट्ट मुक्के घर लौनी । पट्टन पाट नरिंद। थान थानं रचि दौनी ॥ उभै बौर जोजन प्रमान । भारह रचि गाढ़ी ॥ अप्पनगै कमधज्ज । हाम राजसु मन बाढ़ी ॥ कनवज नरिंद अज्जू समन । जोगौ मिसि कर कदयौ ॥ दिसि विदिसि पंग जोपन सुबल । रचि चतुरंगी चढ्ढयौ ॥छ॥८॥ जयचन्द का विचारना कि वह धन छोड़ कर यदि यह धरती मिली भी तो किस काम की। (१) कृ.-अपनग्गी ।
छब्बीसवां समय १७ ]
पृथ्वीराजरासो।
८८१
दूहा । कोन हौन को नौर बिन । को तप भान नरिंद ॥
सह धन धर मुक्की मिल । लज्ज रह जय चंद।ई ॥८८॥
इसके परिणाम में चहुआन और राजा भान को यश मिला
और जयचन्द नवमी को कन्नौज को फिर गया।
जस्स तिलक ग्रह भान कौ। जोगिन पुस्तर चिन्ह ॥
मोकलिजै पाहुट्ट पति । पम्ग पंग करि हौन ॥ छं०॥८॥
गयौ पंग कनवज्ज दिसि । घन रपे धन मास ॥
नव नवमौ नव सरद निसि । तिन मुको अरि बास ॥ छं० ॥१०॥
इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके देवगिरि युद्ध
वर्णनं नाम छाबीसमो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ २६ ॥
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अथ रेवा तट समयौ लिख्यते।
।
( सत्ताइसवां समय।)
देवगिरि से विजय कर चामंडराय का आना।
दूहा ॥ देवग्गिरि जौते सुभट । आयौ चामँडराय ॥
जय जय नृप कीरति सकल । कही कब्जिन बाय ॥ छं० ॥१॥"
चामंडराय का पृथ्वीराज से रेवा तट के बन की प्रशंसा करके
वहां शिकार के लिये चलने की सलाह देना।
मिलत राज प्रथिराज सों। कही राय चामंड ॥
रेवा तट जौ मन करौ । बन अपुच गज मँड ॥ छं० ॥२॥
उक्त बन के हाथियों की उत्पत्ति और शोभा वर्णन ।
कवित्त ॥ विन्द लिलाट प्रसेद । कयौ शंकर गज राजं ॥
एरापति धरि नाम । दियौ चढ़नै सुर राज ॥
दानव दल तिहि गंज । रंजि उमया उर अंदर ॥
होइ कपाल हस्तिनी । संग बगसौ रचि सुंदर ॥
औलादि तास तन्नु आय के । रेवा तट बन विस्तरिय ॥
सासंत नाथ सों मिलत इह । दाहिम कथ उतरिय ॥ छं० ॥३॥
राजा का चन्द से पूछना कि मुख्य चार जाति में से यह
किस जाति के हाथी हैं और स्वर्ग से
इस लोक में क्यों आए
अरिल्ल ॥ च्यारि प्रकार पिष्पि बन वारुन । भद्र मंद मृग जाति सधारन ।
पुच्छि चंद कवि को नरपत्तिय । सुरवाहन किम आइ धरत्तिय ॥
छं ॥४॥
सत्ताइलवां समय २] पृथ्वीराजरासो। ८८४ चन्द का वर्णन करना कि हेमाचल पर एक वृक्ष था जिसकी शाखें सौ सौ योजन तक फैली हुई थी मतवाले हाथियों ने उन्हें तोड़ दिया इस पर क्रोध करके मुनिवर ने शाप दिया कि तुम मनुष्यों की सवारी के लिये पृथ्वी पर जन्म लो कवित्त ॥ हेमाचल उपकंठ । एक वट वृष्ण 'उसंगं ॥ सौ जोजन परिमान । साष तस भंजि मतंगं ॥ बहुरि दुरद मद अंध । ढाहि मुनि बर आराम ॥ दीर्घ 'तपारौ देषि । श्राप दोनों कुपि ताम॥ अंबर बिहार गति मद हुअ। नर आरूड़न संग्रहिय ॥ संभरि नरिद कबि चंद कहि । सुरग इंद इम भुवि रहिय ॥छं॥५॥ अंग देश के पूर्व एक सुन्दर बनखंड है वहीं वह गजयूथ बिहार करता था। वहां पालकाव्य नामक एकथोडी अवस्था का ऋषीश्वर रहता था उसे इन सभों से बडा स्नेह होगया था परंतु राजा रोमपाद फंदा डालकर हाथियों को चंपापुरी पकड़ ले गया। अंग देस पूरब मद्धि । बन पंड गहब्बरि ॥ उज्जल जल दत्त कमल । बिपुल लुहिताच्छ सरबर ॥ श्रापति गज को जूथ । करत क्रीड़ा निसि बासर ॥ पालकाव्य लघु बेस । रहत एक तहां स्पेसर ॥ तिन प्रौति बंधि अति परसपर । रोमपाद नृप संभरिय ॥ आषेट जाइ फंदनि पकरि । दुरद आनि चंपापुरिय ॥ छं० ॥ ६॥ पालकाव्य मारे बिरह के मरकर हाथी के रूप में जनमा। (१) कृ. उतंग। (२) ए.मो.-तयारी । (३) को.ए.-मंड। में ८८५ पृथ्वीराजरासो। [ संत्ताइसबां समय ३ दूहा ॥ पालकाव्य के विरह करि। अंग भए अति पौन ॥ मुनि बर तब तह आय के । गज चिगछग्गुन कौन ॥ छं० ॥ ७ गाथा ॥ कोपर पराग पत्रं । 'छालं डाल फूल फल कंदं ॥ फली कली दै जरियं । कुंजर करि थूलयं तनयं ॥ छं० ॥८॥ उधर ब्रह्मा के तप को भंग करने के लिये इन्द्र ने रंभा को भेजा था उसे शापवश हथिनी होना पड़ा वह भी वहीं आई। कवित्त ॥ ब्रह्मा रिष तप करत । देषि कंप्यौ मघवानं ॥ छलन काज पहु पठय । रंभ रुचिरा करि मानं॥ श्राप दियौ तापसह । अवनि करिनी सु अवत्तरि । कम्म बंधि इक जतौ । लषित हो सुपनंतरि ॥ तिहि ठाम आइ उहि हस्तिनौ । बोर लियो पोगर सुनमि॥ उर सुक्र अंस धरि चंद कहि । पालकाव्य मुनिवर जनमि ॥छं०॥ पालकाव्य उस के साथ बिहार करने लगा। दोहा ॥ ताथें तिन मुनि करिन सों। बांधि प्रौत अत्यंत ॥ चंद कयौ नृप पिथ्थ सम । सकल मडि बरतंत ॥ छं० ॥ १० ॥ चन्द ने उस बन और जन्तुओं की प्रशंसा करके कहा कि आप अवश्य वहां चलकर शिकार खेलिए। कवित्त ॥ सुनहि राज पथिराज । विपन रवनीय करिय जुथ ॥ रेवा तट सुंदर समूह । गजवंत चवन रथ ॥ आष्टक आचंभ। पंथ पावर रुकि पिल्लौ ॥ सिंघ वट्ट दिलि समुह । राज पिल्लत दोइ चल्लौ ॥ जल जूह कह कसतूरि मृग । पहपंगी अरु पर्वतह ॥ चहुबान मान देखें नृपति । कहिन बनत दच्छिन सुरह ॥छं०॥११॥ (१) ए.-ढलं, ढालं , छलं ।
८८६ सत्ताइसवां समय ४] पृथ्वीराजरासो। १ के भेदुए एक तो जयचन्द पर जलन हो रही थी दूसरे अच्छा रमणीक स्थान सुन पृथ्वीराज से न रहा गया। दूहा ॥ एक ताप पहु पंग कौ। अरु रवनीक 'जु थान ॥ चावडराव बच्चन्न सुनि । चढ़ि चढ्यौ चहुआन ॥ छं० ॥ १२ ॥ पृथ्वीराज धूम से चला। रास्ते के राजा संग हो गए, स्वयं रेवानरेश भी साथ हुआ। इस समय सुलतान (नीतिराय) ने लाहौर से यह समाचार गजनी भेजा। कवित्त ॥ चढ़त राज प्रथिराज । बौर अगनेव दिसा कसि ॥ सब्ब भूमि टप टपति । चरन चहुआन लग्गि धसि ॥ मिल्यौ भान विस्तरौ । मिल्यौ षट्टल गढी टप ॥ मिल्यौ नंदि पुर राज । मिल्यौ रेवा नरिंद अप ॥ बन जूथ मृग्ग सिंघह रु गज । नृप आषेटक खिल्लई ।। लाहौर थान सुरतान तप । बर कग्गद लिषि सिल्लई ॥छं० ॥१३॥ मारू खां और तत्तार खां ने दिल्ली पर आक्रमण करने का * बीड़ा उठाया। दूहा ॥ षां ततार मारूफ षां । लिये पान कर साहि॥ धर चहुबानी उपपर । बज्जा बज्जन बाइ ॥ छं० ॥ १४ ॥ यह समाचार पा शहाबुद्दीन का चढ़ाई की तयारी करना। साटक ॥ श्रोतं भूपय गोरियं वर भरं, बज्जाइ सज्जाइने । सा सेना चतुरंग बंधि उललं, तत्तार मारूफयं ॥ तुमभी सार स उप्प राव सरसो, पल्लानयं पानयं । एकं जीव साहाब साहि ननयं, बौयं स्तयं सेनयं ॥ छं० ॥ १५॥ (१) मो.-सु। * प्राचीन समय में यह नियम था कि जब कोई कठिन कार्य आ उपस्थित होता था तो दरबा पान का बीड़ा रख कर अपेक्षित कार्य की सूचना दी जाती थी अपने काम के करने योग्य देखता वह बीड़ा उठा लेता। में अतएव जो सरदार को उस ८८७ पृथ्वीराजरासो। [ सत्ताइसवां समय ५ तातार खां आदि सभों ने कुरान हाथ में लेकर शपथ करके प्रस्थान किया। दूहा ॥ अहि बेली फल हथ्था लै । तो ऊपर तत्तार ॥ मेच्छमसूरति सत्ति कैं। बंच कुरानो बार ॥ छं० ॥ १६ ॥ तत्तार खां का कहना कि चन्द पुंडीर को मार कर एक दिन में दिल्ली ले लूंगा। कुंडलिया ॥ बर 'मुसाफ तत्तार खां । मरन कित्ति नन बान ॥ मैं भंजे लाहौर धर । लैहूं सुनि सु बिहान ।। ल हैं सुनि सु विहान । सुनै ढिल्ली सुरतानं ॥ लुथ्यि पार पुंडौर । भौर परि है चहुअानं ॥ दुचित्त चित जिन करहु। राज आषेट उथाप ॥ गज्जनेस आयस्स । चले सब छूप मुसार्फ॥ छं० ॥ १७॥ चन्द पुण्डीर ने पृथ्वीराज को समाचार लिखा । पृथ्वीराज का छः कोस लौट कर कुच का मुकाम करना। दूहा ॥ षट मुर कोस मुकाम करि । चढ़ि चल्यौ चौहान ॥ चंद बौर पुंडौर कौ। कग्गद करि परिवान ॥ छ० ॥ १८ ॥ पृथ्वीराज का पंजाब तक सीधे शहाबुद्दीन को सेना के रुख पर जाना और उधर से शहाबुद्दीन की सेना का आना। गोरो बै दल सुंमुहौ । गौ पंजाब प्रमान ॥ पुब्ब रू पच्छिम दुहु दिसा । मिलि चुहान सुरतान ॥ छं० ॥ १६ ॥ उसीसमय कन्नौज के दूतों का यह समाचार जयचन्द से कहना। दूत गये कनवज्ज दिसि । ते आए तिन थान ॥ कथा मंड चहुबान को । कहि कमधज्ज प्रमान ॥ छं० ॥२०॥ (१) ए.-सु साफ । (२) ए. कृ. को.-तन । (३) ए.-उथानं ।
सत्ताइसवां समय ६ ] पृथ्वीराजरासो। ८८८ पृथ्वीराज का रेवा तट आना सुनकर सुलतान का सेना सजकर चलना । रेवा तट आयौ सुन्यौ । बर गोरौ चहुआन ॥ बर अवाज सब मिट्टि कै। सजे सेन सुरतान ॥ छं० ॥ २१ ॥ पृथ्वीराज का कहना कि बहुत बड़े शत्रुरूपी मूगों का समूह शिकार करने को मिला। दूत बचन संभाल बपति । बर आटक पिल्ल ॥ रेवातट 'पहर धरा । जूह मृगन बर मिल्लि ॥ छं० ॥ २२ ॥ राज्य मंत्रियों ने यह सम्मति दी कि अपने आप झगड़ा मोल लेना उचित नहीं किसी नीति द्वारा काम लेना ठीक है। कवित्त ॥ मिले सब सामंत । मत्त मंयौ सु नरेसुर ॥ दह गूना 'दल साहि । सज्जि चतुरंग सजी उर॥ मवन मंत चुकौ न । सोइ बर मंत विचारौ॥ बल घग्यौ अप्पनौ । सोच पछिलौ निहारौ ॥ तन सट्टौ लौज मुगति । जुगति बंध गोरी दलह ॥ संग्राम भौर प्रथिराज बल । अप्प मत्ति किज्ज कलह ॥छं० ॥२३॥ यह बात सुन कर सामंतों का मुसका कर कहना कि भारथ का बचन है कि रण में मरने से ही बीर का कल्याण है। सुनिय बत्त पज्जून । राव परसंग 'मुसक्यौ । देव राव वग्गरौ । सेन दे पाव कसक्यौ । (१) ए.-धधार । (३) मो.-स? लीने, ए.-सद सटें। (१) मो.-बल । ( ४ ) मो.-सुसक्यौ ।
सत्ताइसवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो। ८८६ तन सट्टै 'सहि मुकति । बोल भारथ्यौ बोल ! लोह अंच उड्डत । पत्त तरवर जिम डोले ॥ सुरतान चंपि मुष्पां लग्यौ । दिल्ली नृप दल बानिवौ भर भौर और सामंत पुन । अबै पटंतर जानिबौ ॥ छं. ॥ २४ ॥ पज्जून राय का कहना कि मैंने सब शत्रुओं को पराजित किया और शहाबुद्दीन को भी पड़ा। अब भी उस से नहीं डरता। कहै राव पज्जून । तार कढ्यों तत्तारिय ॥ मैं दष्पिन वै देस । भौर जद्दव पर पारिय ॥ मैं बंध्यो जंगलू । राव चामंड 'सु सध्थे ॥ बंभन वास विरास । बौर बड़ गुज्जर तथ्थे ॥ भर विभर सेन चहान दल । गोरी दल "कित्तक गिनौ । जाने कि भीम कौरव सुबर । जर समूह तरवर किनौ ॥छ॥२५॥ जैत राव का कहना कि शहाबुद्दीन को सेना से मिलान होना लाहौर के पास अनुमान किया जाता है अत एव अपनी सब तैयारी कर लेनी उचित आगे जो आप की इच्छा हो। कहै जैत पंवार । सुनहु प्रथिराज राज मत । जुद्ध साहि गोरी । नरिंद लाहौर कोट गत ॥ सबै सैन अप्पनी । राज एकट्ट सु किज्ज ॥ इष्ट भय सगपन सु । हित कागद लिषि दिज्ज ॥ सामत सामि इहि मत है। अरु जु मंत चित्त बपति ॥ धन रहै धम्म जसु जोग ह । दिपति दीप दिव लोकपति ॥छ०॥२६॥ tho (१) ए.-सटि। (३) मो.-जु । (५) ए.-भीम, कौरू, कौरूं, कोरौं । (२) मो.-परिहरिय। (४) मो.-किन्ती। (६) ए.-अरु जुद्ध ।
पृथ्वीराजरासो। [सत्ताइसवां समय ८ रघुबंस राम का कहना कि हम सामंत लोग मंत्र क्या जानें केवल मरना जानते हैं, पहिले शाह को पकड़ा था अब भी पकड़ेंगे। वह वह कहि रघुबंश । राम हक्कारि सु उद्यौ । सुनौ सब्ब सामंत । साहि आए बल 'छुट्यौ ॥ गज रु सिंघ सा पुरिष । जही रुंधे तहां सुमझ ॥ असम समौ जानहि न । लज्ज पंकै आलुझ्झ सामत मत जानैं नही । मत्त गहैं इक मरन कौ सुरतान सेन पहिलै बंध्यौ। फिर बंधौ तौ करन कौ ॥ छं० ॥२७॥ कविचन्द का कहना कि हे गुज्जर गँवारी बातें न कहो इन्हीं बातों से राज्य का नाश होता है। हम सब के मरने पर राजा क्या करेगा। गुज्जर गांवार । राज लै मत न होई ॥ अप मर छिज्जै नृपति । कौन कारज यह जोई॥ 'सब सेवक चहुआन । देस भग्ग धर पिल्लै ॥ पच्छि काम कह कर । स्वामि संग्राम इकल्लै । पंडित्त भट्ट कबि गाइना । नृप सौदागिर वार हुअ ॥ गजराज सौस सोभा वरन । क्रन उड़ाइ वह सोभ लह ॥ई॥२८॥ पृथ्वीराज का कहना कि जो बात आगे आई है उस के लिये जुद्ध का सामान करो। दूहा ॥ परौ पार तन दंग गम । अग्ग जुद्ध सुरतान ॥ अब इह मत विचारये। लरन मरन परवान ॥ छं० ॥ २६ ॥ اہم - (१)ए.-घटयो, (३) सा.-सोस। (२) ए. कृ. को.-समौ, असमौ । ( ४ ) ए.-मम ।
सत्ताइसवां समय ] पृथ्वीराजरासो। ८६१ १ -sure गजत संग प्रथिराज कै। है दिष्षिय परवान ॥ बज्जो पष्पर पंड रै। चाहुआन सुरतान ॥ छं० ॥ ३० ॥ ग्यारह अषषर पंच षट । लहु गुरु होइ समान ॥ कंठ सोभ वर छंद कौ । नाम कह्यौ परवान ॥ छं ॥३१ ॥ पृथ्वीराज के घोड़ों की शोभा वर्णन । छंद कंठशोभा ॥ फिरे हय बष्पर पष्षर से । मने फिर ईदुज पंप कसे ॥ सोई उपमा कविचंद कथे । सजे मनों पोंम पवंग रथे ॥छं० ॥३२॥ उर पुठ्ठिय सुठ्ठिय दितृय ता । वपरो पय लंगत ता धरिता॥ लग्गे उड़ि छित्तिय चौ नलयं। सुने षुर केह अबत्तनयं ॥छं०॥३३॥ अग बंधि सु हेम हमेल घनं। तब चामर जोति पवंन रुनं ॥ ग्रह अट्टस तारक बौत षगे। मनों सुत के उरभान उगे॥छं॥३४॥ पय मडिहि अंसु धरै उलटा। मनी बिंटय देषि चलै कुलटा ॥ मुष कट्टिन चूंघट अस्स, बली। मनों धुंघट दै कुल बड्डु चलौ ॥ छं० ॥ ३५॥ तिनं उपमा बरनो न घनं । पुजे नन बग्ग पवन मनं ॥ छं॥३६।। आधी रात को दूत पृथ्वीराज के पास पहुंचा और समाचार दिया कि अट्ठारह हजार हाथी और अट्ठारह लाख सेना के साथ सुलतान लाहौर से चौदह कोस पर आ पहुंचा। कुंडलिया ॥ नव बज्जी घरियार घर । राज महल उठि जाइ ॥ निसा अव बर उत्तरे । दूत संपते आइ॥ दूत संपते आइ। धाइ चहुबान सु जग्गिय ॥ सिंघ विहथ्थे मुक्कि । साहि साहौउर तग्गिय ॥ अट्ट सहस गजराज । लप्ष अट्टारह ताजिय ॥ उभै सत्त वर कोस । साहि गौरी नव बाजिय ॥ छं० ॥ ३७ ।। (१) ए. कृ. को.-गजन सिंग (२) ए. कृ. को.-उर उप्पर पुट्ठिय दिहियत । (३) ए.-दो, दौ। (४) ए.कृ को. पीत पगे। (५) ए.-उड़े। (६) ए.क. को.-राजिय।
૮૨ पृथ्वीराजरानो। सत्ताइमा ममय १० पृथ्वीराज ने दूत से पत्र लेकर पढ़ा-हिन्दुओं के दल में शोर मच गया। दूहा ॥ बचि कागद चहुआन नें । फिरन चंद सह थान ।। मनो बौर तनु अंकुरे । मुगति भोग वनि प्रान ॥ छं० ॥ ३८॥ मची कह दल हिंदु के। 'कसे सनाह सनाह । बर चिराक दस 'सहस भइ। बजि निसांन अरिदाह ॥ छं० ॥३६॥ दूत का दरबार में आकर पृथ्वीराज से कहना कि मुस्लमान सेना चिनाब के पार आगई। चन्द पुंडीर ने उसका रास्ता बांध कर मुझे इधर भेजा है। *बा बखू टप मुक्कतें । दूत आइ तिहि वार ॥ सजी सेन गोरी सुभर । उत्तरए नद पार ॥ छं० ॥ ४० ॥ पंचासज गोरी नृपति । बंध उतरि नहिं पार ॥ चंद बौर पुंडीर नें । 'यटि मुक्क दरवार ॥ छं० ॥ ४१ ।। सुलतान का अपने सामंतों के साथ युद्ध के लिये प्रस्तुत होना। कवित्त ॥ षां मारुफ ततार । पान षिलची बर गढ्ढे ॥ चामर छच मुजक । गोल सेना रचि गढ्ढे ॥ नारि गोरि जम्बर । सुबर कौना गजसारं ॥ नूरौं षां हुज्जाव । नूर महमद सिर भार ॥ वज्जोर पान गोरी सुभर । पान पान हजरति घां बिय सज्जि सैन हरवल करिय । तहां उभौ सजरत्ति षां ॥छं०॥४२॥ । (१) कृ.-सर । (२) ए. क-करै सनाह अनाह । (३) ए. कृ. को.-दस दस । (४) ए.-उत्तर यो नदि यो नदि पार, मो.-घट मुक्यो दरवार । * यह दोहा ए. को. और कृ. प्रति में नहीं है।
सत्ताइसवां ममय ११ ]] पृथ्वीराजरासो। ८६३ बर शाहजादे का सरदारों के साथ सेना हरवल रचना और सेना के मुख्य सरदारों के नाम स्थान और उन का पराक्रम वर्णन । रचि हरवल सुरतान । साहिजादा सुरतानं ॥ षां पैदा महमूद । बौर बंध्यो सु विहानं॥ षां मंगोल लल्लरी । बौस टंकी पंचै ची तगीसह वाज। बान अरि प्रान सु अंचे जहगीर पान जह गोर बर । षां हिंद बर बर बिहर।। पच्छिमी पान पठान सह । रचि उम्भ हरवल गहर ॥छं॥४३॥ रचि हरवल पट्ठांन । पान इसमान रु गष्षर ॥ केली षां कुंजरौ । साह सारौ दल पष्षर ॥ षां भट्टी मह नंग। षान पुरतानो बब्बर ॥ हवस घान हुज्जाब । ग्रब आलम्म जास बर॥ तिन अग्ग अट्ट गजराज बर । मद सरक पट्टे तिना ॥ पंच बिन पिंड जो ऊपजे । जुद्ध होइ लज्जो बिना ॥ छं० ॥ ४४ ॥ शहाबुद्दीन का इस पार तीस दूतों को रख कर चिनाब पार करना । 'करित माय बहु लाहि । तौस तहँ रच्चि फिरस्ते ॥ आलम पान गुमान । पान उजबक निरस्त ॥ लहु मारूफ गुभस्त । पान दुस्तम बजरंगी ॥ हिंदु सेन उप्परें । साहि बज्जै रन जंगी ॥ सह सेन टारि सोरा रच्यौ । साहि चिनाव सु उत्तयौ संभले सूर सामंत टप । रोस बौर बौर दुयो ॥ छं० ॥ ४५ ॥ यह सुन कर पृथ्वीराज का क्रोध करना और दूत का कहना पुंडीर उसे रोके हुए है। (१) ए.-करत माइ चौसाहि ।
८९४ पृथ्वीराजरासो। [सत्ताइसवां समय: १२ दूहा ॥ तमसि तमसि सामंत सब । रोस भरिग प्रथिराज ॥ जब लगि रुपि पुंडौर में । रोक्यौ गोरौ साज ॥ छं० ॥ ४६ ॥ जहां पर सुलतान चिनाब उतरने वाला था वहीं पुण्डीर ने रास्ता रोका । घोर युद्ध हुआ। चन्द पुण्डीर घायल हो कर गिरा । सुलतान चिनाब पार होने लगा। भुजगी ॥ जहां उतन्या साहि चिन्ताव मौरं । तहां नेज गद्यौ ठठुक्क पुडौरं। करी आनि साहाब सा बंधि गोरी।धके धौंग घोंगंधकावै सजोरी॥ छं० ॥४७॥ दोऊ दीन दीनं कढ़ौ बंकि अस्सी। किधौं मेघ में बीज कोटि निकस्मौ किर सिप्परं कोर ता सेल अग्गी। किधों बद्दरकोर नागिन्न नग्गी॥ छं० ॥४८॥ हबक्के जु मेछं भ्रमंतं जु छुट्टै । मनों घेरनी घुम्मि पारेव तु ॥ उरं फुट्टि बरछी बरं छब्बि नासौ। मनो जाल में मौन अद्धी निकासी॥ छं० ॥ ४६॥ लटक्के जुरंनं उड़ हंस हल्लै । रसं भौति सूरं चवग्गान पिल्ल । लगे सौस नेजा भमें मेजि तथ्ये। भधै वाइसंभात दौपत्ति सथ्थे । छं० ॥ ५० ॥ कर मार मारं महाबौर धोरं। भये मेघ धारा बरष्षत तौरं ॥ परे पंच पुंडौर सा चंद कन्यौ । तबै साहि गोरीस चन्हाव चढ्यौ । छं० ॥ ५१ ॥ सुलतान का चिनाब उतरना और चन्द पुण्डीर का गिरना देख कर दूत ने बढ़ कर पृथ्वीराज को समाचार दिया। कवित्त ॥ उतरि साहि चिन्हाव । घाय पुंडौर लुथ्थि पर ॥ उपायौ बर चंद। पंच बंधव सु पथ्थ धर ॥ दिषिष दूत बर चरित। पास आया चहुआनं ॥ उप्पर गोरी नरिद । हास बढ्ढी सुरतानं ॥ ।
सत्ताइसवां समय १३] पृथ्वीराजरामो। ८९५ बर मोर धौर मारूफ दुरि । 'पंच अनी एकठ जुरौ ॥ मुर पंच कोस लाहौर तें । मेच्छ मिलानह सो करौ ॥ छं० ॥ ५२ ॥ पृथ्वीराज ने क्रोध के साथ प्रतिज्ञा की कि तब मैं सोमेश्वर का बेटा जो फिर सुलतान को कैद करूं । पृथ्वीराज ने चन्द्र ब्यूह की रचना करके चढ़ाई की। दूहा ॥ बौर रोस बर बर बर । झुकि लग्ग असमान ॥ तौ नंदन सोमेस कौ । फिरि बंधौ सुरतान ॥ छं० ॥ ५३ ॥ चन्द्रव्यूह नृप बंधि दल । धनि प्रथिराज नरिंद ॥ साहि बंध सुरतान सौं। सेना बिन विधि कंद ॥ छं० ॥ ५४ ॥ पञ्चमी मङ्गलवार को पृथ्वीराज ने चढ़ाई की । (कवि ने उस दिन के ग्रह स्थिति योग आदि का वर्णन किया है) कवित्त ॥ बर मंगल पंचमी। दिन सु दीनौ प्रथिराज ॥ राह केत जय दीन । दुष्ट टारे सुभ काजं ॥ अष्ट चक्र जोगनी । भोग भरनौ सुधि रारी ॥ गुर पंचम रबि पंच । अष्ट मंगल प भारी ॥ के इंद्र बुद्ध भारथ्य भल । कर विसूल चक्रा बलिय ॥ सुभ घरिय राज बर लौन बर । चढ्यौ उदै क्रूरह बलिय ॥छं०॥५५॥ दूहा ॥ सो रचि उड़ अवड्ड अध । 'उग्गि महब विधि कंद ॥ बर निषेद बप बंदयौ । को न भाय कबिचंद ॥ छं० ॥ ५६ ॥ जिस प्रकार चक्रवाक, साधु, रोगी, निर्धन, विरह वियोगी लोग रात्रि के अवसान और सूर्योदय की इच्छा करते हैं उसी प्रकार पृथ्वीराज भी सूर्योदय को चाहता था । , (१) ए.-खच । (२) ए.-लगी। (३) ए.-मंडि, कृ.-मंदि मंड।
८९६ पृथ्वीराजरासो। [सत्ताइसवां समय १४ कवित्त ॥ प्रात स्तूर बंछई । चक्क चक्किय रबि बछै॥ प्रात सूर बंछई । सुरह बुद्धि बल सो छ । प्रात सूर बछई। प्रात बर बछि वियोगी ॥ प्रात सूर बछई। ज्यौं मुबछ बर रोगी॥ बछ्यौ प्रात ज्यों त्यो उनन । बंछ रंक करन्न बर ॥ बछयौ प्रात प्रथिराज में । सती सत्त बछति उर ॥ छं० ॥ ५७ ॥ पृथ्वीराज की सेना तथा चढ़ाई का वर्णन । दंडमाली ॥ भय प्रात रत्तिय, जुरत दौसय चंद मंदय चंद यौ भर तमस तामस, सूर वर भरि. रास तामस छंद यौ ॥ बर बज्जियं नोसान धुनि, धन बोर बरनि अँकूरयं । घर धरकि शाइर, करषि काइर, रस मिसूर स कूरयं॥ छं० ॥ ५८॥ गज घंट घनकिय, रुद्र 'भन किय, पनकि संकर उद्दयो । रन नंकि 'भेरिय कन्र होरिय, दंति दान धनं दयौ । सुनि बौर सद्दइ, सबद पढई, सह असहइ छंडयौ । तिह ठौर अदभुत, होत वप दल, बधि दुज्जन घंडयौ ॥छं०॥५६॥ सन्नाह सूरज सज्जि घाटं, चंद अोपम राजई । मुकर में प्रतिव्यंब राजय, सत्त धन ससि साजई ॥ बर फल्लि बंबर, टोप आयो, त रोस सोसत आइए । नष्षित्र हस्त कि, भान चंपक, कमल सूहि साइए ॥ छं० ॥६० ॥ बर बौर था जोगिंद पत्तिय, कपि अोपम पाइयं ॥ तजि मोह माया, छोह कल बर, धार तित्थह धाइयं ॥ संसार शंकर वंधि, गज जिम, अप्प वंधन हथ्थयं । उनमत्त गज जिमि, नंख दोनी, मोह माया सथ्ययं ॥ छं० ॥ ६१ ॥ सो प्रवल मह जुग, बंधि जोगी, मुनी आरम देवयौ। सामंत धनि जिम, पित्ति कोनी, पत्त तरु जिम भेक्यौ ॥ छं० ॥६२॥ (२) ए.-भोरिय । (१) ए.-भनषिय । (३) ए.-धनंजयौ।
सत्ताइसवां समय १५ ] पृथ्वीराजरानो। ८६७ दूहा ॥ क्रम गाह इक मुगत कौ। क्यों करिजै बाषाम । मन अनंष सामंत नै। 'कच कर बति पाषान ॥ छं० ॥ ६ ॥ बाई बिष धुंधरि परिय । बहर छाए भान ॥ कुम घर मंगल बज्जही । कै चढ़ि मंगल आन ॥ छं० ॥ ६४ ॥ दोनों ओर की सेनाओं के चमकते हुए अस्त्र शस्त्र और निशानों का वर्णन । दिए देषि सुरताम दल । लोहा पक्कत बान ॥ पहकि फेरि उड़गन चले । निसि आगम फिरि जान ॥ छं० ॥ ६॥ धजा बाई बंकुर उड़ति । छवि कबिंद इह आइ ॥ उड़गन चंद नरिंद बिय । लगौ 'मनों अइ पाइ ॥ छं० ॥ ६६ ॥ से सनि संकहि बजतहि । बाजे कुहक सुरंग ॥ मेटै सह निसान के । सुने म अवनति अंग ॥ छं० ॥ ६७ ॥ जब दोनों सेनाएं साम्हने हुई तब मेवारपति रावल समरासिंह ने आगे बढ़कर युद्ध आरम्भ किया। अनी दोउ घन घोर भौं। घाय मिले कर घाट ॥ चिचंगी रानर बिना । करै कोन दह वाट ॥ छं० ॥ ६८ ॥ कवित्त ॥ पवन रूप पाचंड । घालि असु असि वर झारै। मार भार सुर बज्जि । पत्त तरू अरि सिर पारे। फहकि सह फेफरा । हड्ड कंकर उषार ॥ कटि भत्तुंड परि मंड। भिंड कंटक उप्पारे । बज्जयो विषम मेवारपति । रज उडाइ सुरतान दल ॥ समरथ्य समर सम्मर मिलिय । अनौ मुष्प पिष्षौ सबल ॥छ०॥ई रावल, जैत पँवार, चामंड राय और हुसैन षां का क्रमानुसार हरावल में आक्रमण करना। पीठि सेना का पीछे से बढ़ना। (१) मो.-ज्यों कचकरवः । (२) को.ए.-जाम । (३) ए. मो. मानों-मानो । ४ ) ए. कृ. को.-घाघा मिलेक थाट, कर थाट । (५) ए. कृ. को.-फीफग । (६) ए. कृ. को.-मनमथ मिल, मिली, मिल्यो ।
पृथ्वीराजरासो। सत्ताइसवां समय १६ ८८ रावर उप्पर धाई। पन्यौ पांवार जैत षिझि॥ तिहि उप्पर चांमंड । कन्यौ इस्सेन धान सजि । धक्काई धक्काइ। दोइ हरबल बर मभ । पच्छ सेन आहुट्टि । अनी बंधी आलुभौ ॥ गजराज विय सु सुरतान दल ।दह चतुरंग बर बौर बर ॥ धनि धार धार धारह धनी । बर भट्टी उप्पारि कर ॥ छ० ॥ ७० ॥ हिन्दू सेना की चन्द्र व्यूह रचना । छच मु जौक सु अपि । जत दौनौ सिर छ। चन्द्रव्यूह अंकुरिय । राज 'दु इहां इकचं ॥ एक अग्र हुसेन । वौय अग्रह पुंडौरं ।। मदि भाग रघुवंस । राम उम्भौ बर बौर। सांषलौ सूर सारंग दे। उररि पान गोरीय मुष । हथनारि गोर जंबूर घन । दुहं बांह उम्भंति रथ ॥छ ॥७१ ॥ दो पहर के समय चंद पुंडीर का तिरछा रुख दे कर शत्रु सेना को दबाना। छुट्टि अड्च बर घटिय । चन्यौ मध्यान भान सिर । सूर कंध बर कट्टि । मिले काइर कुरंग बर ॥ घरौ अब बर अड्ड । लोह सों लोह ज रुक ॥ मन अग्ग अरि मिले । चित्त में कंक परक ॥ पुंडीर भौर भंजन भिरन । लरन तिरच्छौ लग्गयौ । नव बधू जेन संका सुबर् । उदौ जानि जिम भग्गयौ ॥ छ ॥७२॥ पृथ्वीराज और शहाबुद्दीन का सम्मुख घोर युद्ध होना। योगिनी भैरव आदि का आनन्द से नाचना । भुज गौ ॥ मिले चाइ चहुआन सा चंपि गोरौ । स्वयं पंच कोरी निसानं अहोरी॥ वजे आवळे संभरे अद्ध कीसं । घने अग्ग नौसान मिलि अद्धकोसं ॥ छ॥७३॥ (१) छ. मो.-हुआ। (२) ए. कृ. को. जो, जीरो । (३) कृ.-सख । with 1 - सत्ताइसवां समय १७ ] पृथ्वीराजससों। ८६६ बरं बंबर चौर माहौति साई। हले छत्र पौतं बले यार घाई ॥ बुल सूर हक्क दहक्क पचार । घले. बथ्य दोज धर जा 'अपार ॥ छ ॥ ७४॥ उमंगतु? पर श्रोन धारी। मनों दंड सुक्की अगोवाइ वारी ॥ नचे कंध बंधं हक सौस भारी। तहां जोग माया जकी सौ बिचारी॥ छ ।.७५ ॥ बढ़ी साँग लग्गी बजी धार धार । तहां सेन दूनूं कर मार मार॥ नच रंग भैरू गहै ताल बौर । सुरंग अच्छरी बधि नारद तौर ॥ छ ॥ ७६ ॥ इसी जुद्ध वध उब्बद्ध उभान। भिरै गोरियं सेन अरु चाहुअानं ॥ कर कुंडली तेग बग्गी प्रमानं। मनों मंडलो रास तं. कर वानं । ॥छ ॥ ७७॥ फुठी आवध माहि सामंत सूर । बजे गोर ओर मनों बज्ज झर। लगै धार धार तिनै धरह तु? । दुहूं कुंभ भग करके अहु? ॥ ॥छ ॥ ७८॥ फुटौ श्रोन भोमं अपं बिबराज । मनों मेघ बुढ्ढें प्रथोमी समाज॥ पराक्रम्म राज प्रथौपत्ति रुयो। रनं रुधि. गोरी सह जंग जुग्यौ । छ॥७६ ॥ सुलतान का घबराना। तातार खां का धैर्य दिलाना। दूहा ॥ तेज छुट्टि गोरौ सुबर । दिय धीरज तत्तार ।। मो उम्भ सुरतान को। भौर परी इन वार ॥ छ ॥८॥ उक्त युद्ध की वसंत ऋतु से उपमा वर्णन । मोतीदाम ॥ रतिराज रु जोवन राजत जोर। चप्पो ससिर उर शैशव कार ॥ उनौ मधि मड्वि मधू धुनि होय । तिनं उपमा बरनी कबि जाय ॥ । छं० ॥८॥ (१) ए.-अपारं। (४) कृ. ए.-अपी। (२) मो.-जुकीयं विचारी। ( ३ ) ए. कृ.-पमानी । (५) ए.-भरी। (६) ए. कृ. को.-कोह, कोय, होइ ।
पृथ्वीराजरासो
[ सत्ताइसवां समय १८
सुनी बर आगम 'जुब्बन बैन । नच्यौ कबहूं न सु उहिम मैन ।
कबहू दुरि कं'नन 'पुच्छत नैन । कहौ किन अब ढुरौ दुरि बैन ॥
छं० ॥२॥
शशि रोर नसै सब दंदभि बज्जि । उभै रतिराज सुजोवन सज्जि ॥
कही बर श्रोन सुरंगिय रज्जि । चंपे 'रन दोउ बनं बन भजि ॥
छं० ॥८३॥
इय मौनन लौन भये रत रज्जि । भम विभ्रम भारु परी गहि नज्ज॥
मुर मारुत फौज प्रथम चलाइ । गति लज्जि सकुच्चि कछे मिलि आइ॥
छं॥८४॥
दहि सौत मधूप न कदहि जीव । प्रकटै उर तुच्छ सोज उर भौव॥
बिन पल्लव कारहि 'तारहि रंभ । गहना बिन बाल बिराजत अभ।
छं० ॥८५॥
कलि कंठन कंठ सज्यौ अलि पंष । न उड्डिय बंग नवेलिय अंष ॥
सजौ चतुरंग सज्यौ बन राइ । बजी इन उप्पर सैसब जाइ ॥
छं० ॥८६॥
कवि मत्तिय जूह तिन बहु घोर । बनं तब संधय चंद कठोर।
छ
रसावला ॥ बोल षुच्च घनं, स्वामि जपे मनं । रोस लगो तनं, सिंघ मदं मनं॥
छं० ॥८८॥
छोह मोहं षिनं, दांन छुट्टे ननं । नाम राज धनं, धंम सातुकनं ॥
छं ॥८॥
मेच्छ वाहं बिनं, रत्त कंध मनं । ढल्ल जा ढाहनं, जौवता सा हन॥
छं० ॥१०॥
वान जा संधनं, पंषि जा बंधन । स्याम सेतं अनी, पौत रत्तं घनी॥
छं० ॥ ६१ ॥
कूह मची घरी, रोस दंती फिरौ । फौज फट्टी पुनं, सूर जम्भे धनं॥
छं० ॥१२॥
(१.) ए.-मुहुन ।
(२) भो.ए.को.-पुच्छन।
(३) ए.-सजीवन ।
(४) ए. कृ. को.-नर । (५) ए.-तारै संभ।
० ॥८॥
सत्ताइसवां समय १६ ] पृथ्वीराजरासो। .... .... .... लेहु लेहु करी, लोह कट्टे अरौ । कन्द जा संभरी, पाइ मंडे फिरी ॥ छं० ॥१३॥ बौर हक करी, नैन रत्तं बरी। पंड जा पोलियं, बौर सा बोलियं ॥ छं० ॥१४॥ बौर बज्जे घुर, दंति पट्टे छुर । झार सं कोरौयं, फौज बिप्पौरियं ॥ छं० ॥१५॥ दंत रुद्दो परे, अग फूलं झरे । हेमयं नारियं, जावकं ढारियं ॥ छं० ॥१६॥ अाननं हंकयं, अंग 'जानंचयं। सत्त सामंतयं, वांन सा पथ्थयं ॥ छं० ॥ १७॥ फौज दोऊ फटौ, जांनि जूनौ टटौ। ॥ छं० ॥१८॥ सोलंकी माधव राय से खिलजी खां से तलवार का युद्ध होने लगा। माधव राय की तलवार टूट गई तब वह कटार से लड़ने लगा। शत्रुओं ने अधर्म युद्ध से उसे मार गिराया। कवित्त ॥ सौलंकी माधव । नारद पिलचौ मुष लग्गा ॥ सुबर बीर रस बौर । बौर बौरा रस पग्गा ॥ दुअन बुधव जुध तेग । दृह हथ्थन उम्भारिय ॥ तेग तुट्टि चालुक्क । बथ्य परि कट्टि कटारिय ॥ अग अग रुक्कि ठिल्ले बलन । अधम जुड़ लग्गे लरन ॥ सारंग बंध घन घाव परि । गोरी बै दिन्नौ मरन ॥ छं० ॥ ६ ॥ वीर गति से मरने पर मोक्ष पद पाने की प्रशंसा। षग्ग हटक्कि जुटिक्क । नमन सेना समंद गजि ॥ हय गय बर हिल्लोर । गरुअ गोईद दिष्षि सजि ॥ (१) ए.-जामं ।
पृथ्वीराजरासो। [सत्ताइसा समया २० ૨૦૨ F अनम अठेल अभंग । नौर असि मौर समाहिय॥ अति दल बल आहुट्टि । पच्छ लज्जौ पर वाहिय॥ रज तज्ज रज्ज मुक्कि न रह्यौ । रज न लगौ रज रज भयौ ॥ उच्छगन अच्छर सो लयौ । देव विमानन चढ़ि गयौ ॥ छं० ॥१०॥ जै सिंह की वीरता और उसकी वीर मृत्यु की प्रशंसा। परि पतंग जै सिंघ । पतंग अप्पन तन दमझ ॥ नव पतंग गति लीन । करे अरि अरिधज धज्जै ॥ तेल ठांम बात्तीय। 'अगन्नि एकल विरुझाइय। पंच अप्प अरि पंच । पंच अरि पंथ लगाइय ॥ आरन्नि कुंआरी बर बन्यौ । दै दाहन दुज्जन दवन ॥ जीतेव असुर महि मंडलह । और ताहि पुज्जै कवन ॥ छं०॥१०१ ॥ वीर पुंडीर के भाई की वीरता और उस के कमंध का खड़ा होना। रुप्पौ बौर पुंडरौ । फिरी पारस सुरतानी ॥ शस्त्र बौर चमकंत । तेज आरुहि सिर 'ठानी॥ टोप अोप तुटि किरच । सार सारह जरि भारे ॥ मिलि नछिच रोहनी। सौस ससि उडगन चारे ॥ उठि परत भिरत भंजत अरिन । जै जै जै सुर लोक हुअ ॥ उद्यौ कमंध पलपंच चव । कोन भाइ कप्यौ जु धुअ ॥ छं० ॥ १०२ ॥ पज्जून राय के भाई पल्हान राय का खुरसान खां के हाथ से मारा जाना दुजन सल कूरंभ । बंध पल्हन सक्कारिय ॥ संम्हौ षां षुरसान । तेग लंबी उम्भारिय ॥ टोप टुट्टि बर करी । सौस परि तुट्टि कमंधं ॥ मार मार उच्चार । तार तं नंचि कमंधं ॥ (१) मो.-अगन्नि । (२) ए.-तानी।
सत्ताइसवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो। ६०३ तह देषि रुद्र रुद्रह 'हस्यौ । हय हय हय नंदी कह्यौ । कविचंद शैलपुची चकित । पिष्पि बौर भारथ नयौ ॥छं०॥१३॥ जै सिंह के भाई का मारा जाना । सोलंकी सारंग । षान षिलची मुष लग्गा ॥ वह पंगानौ भृत्त । इते चहुबान विलगा ॥ है कंध न दिय पाय । कन्ह उत्तरि बिय बाजिय ॥ गज गुंजार हुकार । धरा गिर कंदर गाजिय ॥ जय जयति देव जै जै करहिं । पहुपंजलि पूजत रिनह ॥ इक प-यौ घेत सोधे सकल । इक्क रह्यौ बधे धुनह ॥ छं० ॥ १०४ ॥ गोइन्द राय का तत्तार खां के हाथी और फीलवान को मार गिराना। करी मुष आहु© । बौर गोइंद अप्पे कबिल पौल जनु कन्छ । दंत दारुन गहि नगधै सुंड दडं भये पंड । पौलवानं गज मुक्यौ । गिद्धि सिद्धि बेताल । आइ अंषिन पल रुक्यौ । बर बौर पायौ भारथ्य बर । लोह लहरौ लगात झुल्यौ ॥ तत्तार पान सम्हौ सु क्रत । सिंघ हक्कि अंबर डुल्यौ ॥ छं० ॥ १०५ ॥ नरसिंह राय के सिर में घाव लगने से उसके गिर जाने पर चामुंडराय का उस की रक्षा करना। षोलि बग्ग नरसिंघ । षिभिझ पज सोसह भारिय ॥ तुटि धर धरनि परंत । परत संभरि कट्टारिय ॥ चरन अंत उरभंत । बौर करंभ करारौ ॥ तेग घाइ चुकत । झरी भर लोह सँभारौ चलि गयौ क्रमन क्रम्मन चलै । डुल्यौ न "डुल्ल तन हथ्थ बर ॥ तिन परत बौर दाहर तनौ । चामंडा बज्जी लहर ॥ छं० ॥१०६ ॥ (१) मो.-भयो । (२) मो.-हयं हवं । (३) ए.- सवल, कृ. को.- सयल । ( ४ ) मो.-न क्रमन क्रमनत । (५) ए.-नर डुलतन ।
६०४ . - . क. को.-पति । पृथ्वीराजरामो। [मत्ताइसवां ममय २२ रात हो गई दूसरे दिन सबेरे फिर पृथ्वीराज ने शत्रुओं को आ घेरा। भुजगी ॥ 'छुटौ छंदनी छंद सौमा प्रमानं। मिली ढालनी माल राही समान। निसा मान नौसान नौसान धूत्रं । धुत्रं धूरिनं भूरिनं पूर कुअं॥ ॥ १०७॥ सुरत्तान फौज तिने पत्ति फेरी । मुषं लग्गि चहुआन पारस्म घरी॥ भये प्रात सुज्जात संग्राम पालं । चहुब्बान उठ्ठाय सालोपि थाल॥ छं० ॥ १०८॥ जैत राय के भाई लक्ष्मण राय के मरते समय अप्सराओं का उसके पाने की इच्छा करना परंतु उसका सूर्य लोक भेद कर मोक्ष पाना। कवित्त ॥ जत बंध ढहि प.यो । लष्ष लप्पन को जायौ । तहं झगरी मह माय । देवि हुँ कारौ पायौ ॥ हुंकारै हुंकार । जूह गिद्धनि उड्डायौ ॥ गिद्धिन तें अपछरा। लियौ चाहत नहि पायौ ॥ अव तरन सोइ उतपति गयौ । देवथान बिनम 'बियौ ॥ जम लोक न शिवपुर ब्रह्म पुर । भान थान भानै क्यिौ ॥छ०॥१६॥ तन झंझरि पावार । पन्चौ धर मुच्छि घटिय बिय ॥ बर अच्छर बिंटयौ । सुरंग मुक सुरंग हिय ॥ "तिहित बाल तत काल । सलष बंधिव ढिग आइय ॥ लिषिय अंग बिय अथ्य । सोई बर बच दिषाइय ॥ जनम मरन सह दुह सुगति । नन मिट्ट भिंटह न तुअ ॥ ए वार सुबर बंटहु नहौं । बधि लेहु सुक्की बधुअ ॥ छं० ॥ ११० ॥ महादेव का लक्ष्मण का सिर अपनी माला के लिये लेना। ( १ ) ए.-छंदानं, कृ. मो.-छदनी, छंदनीमा.। (३) मो.-भयो । (४) ए.-घटय । (५) मो.-तिहित काल सतबाल । ॥
सत्ताइसवां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो। ६०५ दूहा ॥ राम बंध को सौस बर। ईस गह्यौ कर चाइ ॥ 'अथ्यि दरिद्री ज्यौं भयौ । देषि देषि ललचाइ ॥ छं० ॥ १११ ॥ एक पहर दिन चढ़े जंघा योगी ने त्रिशूल लेकर घोर युद्ध मचाया। जाम एक दिन चढ़त बर । जघारौ झकि बौर ॥ तौर जेम तत्तौ प-यौ । धर अषारे मौर ॥ छ ॥ ११२ ॥ कवित्त । जंघारी जोगौ । जुगि'द कढ्यौ कट्टारौ ॥ परस पानि तुगौ । चिसूल मध्यर अधिकारौ ॥ जटत वांन सिंगौ । विभूत हर वर हर सारौ ॥ सबर सद्द बद्दयौ । विषम मद गंधन झारौ ॥ आसन सदिछु निज पत्ति में । लिय सिर चंद अमित अमर ॥ मडलौक राम रावत भिरत । नभौ बौर इत्तौ समर ॥छ ॥११३॥ शस्त्र सजकर सुलतान का युद्ध में टूटना । लंगरी राय का घोर युद्ध मचाना । लंगरी राय की बीरता की प्रशंसा। सिलह सज्जि सुरतान । झुक्कि बज्ज रन जंग ॥ सुनें श्रवन लंगरौ । बौर लग्गा अनभंग ॥ बौर धौर सत मध्य । बौर हुकरि रन धायौ । सामंता सत महि । मरन दीनं भय सायौ ॥ पारंत धक हक्कत रन। पग प्रवाह पग षुल्लयौ ॥ बिभभूत चंद अंगन तिलक । बहसि बौर हकि बुल्लयौ ॥छं०॥११४॥ लंगा लोह उचाइ । पन्यौ घुमर घन मझझी ॥ जुरत तेग सम तेग । कोर बदर कछु सुझौ । यौं लगौ सुरतान । अनल दावानल दग्गं ॥ ज्यों लंगूर लग्गया। अगनि अगै आलग्गं ॥ इक मार उभार अपार मल । एक उझार सुझारयौ ॥ इक बार तयौ दुस्तर रुपे । दूजै तेग उभारयौ ॥ छं० ॥ ११५ ॥ (१) मो.-अथिर। (२) मो.-रावन । ( ३) ए.-रिन, तरिन ।
पृथ्वीराजरासो। [सत्ताइसवां समय २४ कुंडलिया ॥ तेग झारि उझझारि बर । 'फिरि उपमा कवि कथ्थ ॥ नैन बान अंकुर 'बुहुरि । तन तुट्ट वहि हथ्थ ॥ तन तुट्टै बहि हथ्थ । फेरि बर बौर स बौरह ॥ मरन चित्त सिंचयौ । जनम 'जिन तजी जजौरह ॥ हथ्थ वथ्य आहित्त । फेरि तक उर वेगा । लंगा लंगरि राइ । बौर उच्चाइ सु तेगा ॥ छं० ॥ ११ ॥ लोहाने की वीरता का वर्णन। चौसठ खाँओं का मारा जाना। कवित्त ॥ लोहानौ मद मुंद । बान मुक्कै बहु भारी ॥ फुट्टि सु ठट्टर ज्वान । पिठ्ठ जरड निकारी॥ मनों किवारी लागि । पुठि पिरको उध्धारिय ॥ बट्टारी बर कट्टि । बौर अवसान संभारिय ॥ एक झर मौर उरझारि झर । करि सुमेर परि अरि सु फिरि ।। चवसटि धान गोरौ परै। तिन रावव इक राज परि ॥छ०॥११७॥ मानि लोह मारूफ । रोस विड्डुर गाहक्क ॥ मनु पंचानन बाहि । सद्द सिरहद्द हहक । दुहूं मौर बर तेज । सौस इक सिंघह बाहो ॥ टोप टुट्टि बहकरौ। चंद ोपमता पाई ॥ मनु सौस बीय शृग विज्जुलह । रही हेत तुटि भान हति ॥ उतमंग सुहै बिब टूक वै । मनु उड़गन बप तेज मति ॥छं०॥११८॥ चौसठ खान मारे गए और तेरह हिन्दू सरदार मारे गए। हिन्दू सरदारों के नाम तथा उनका किससे युद्ध हुआ इसका वर्णन। । । ( ३ ) मो.-परें । (१) क.-फेरि उपम । (२) मो.-तत्थ । (४) ए.-क.को.-तिव (१) ए. उच्चार । (६) ए.-कर । ( ७ ) ए. कृ. को.-राइ । (९) ए. कृ. को.-उपमा सु, उपमा सुइ । (८) मो.-सिरदस, सिरदसु ।
सत्ताइस समय २५] पृथ्वीराजरासो। भुजगी ॥ परे पनि चौमटि गोरौ नरिंद । परे सुभर तेरह कहै नाम चंदं॥ परे लुथ्थिलुथ्थी जु सेना अस्लुझक लिषे कंक.अंक बिना कौन बुझझ॥ छं ॥ ११६॥ पायौ गोर जीतं मधिं सेस ढारी। जिनं राषियं रेह अजमेर सारी पन्यौ कनक आठु गोविंद बंधं । जिने मेछको पारसं सब षच ॥ छं०॥ १२०॥ पन्यौ प्रथ्थ बोरं रघुबंस राई । जिन संधि पंधार गोरी गिराई ॥ पायौ जीत बंधं सु पावार भानं । जिनें भंजियं मौर बानेति बानं॥ छं० ॥ १२१॥ पन्यौ जोध संग्राम सो हंक. मोरी। जिन कट्टियं वैर गोदंत गोरी ॥ पन्यौदाहिमो देव नरसिंघ अंसौ । जिने साहि गोरी मिल्यौपान गंसौ॥ छं॥ १२२ ॥ पन्यो बौर बानेत नादंत नादं। जिने साहि गोरी 'गिल्यौ साहि जाद। पायौ जावलौ. जाल्हते सैन भषषं। हए सार मुष्पं निकस्संत नषषं ॥ छं० ॥ १२३॥ पयौ पाल्हनं बंध माल्हन राजी। जिनें अग्ग गोरी क्रमं सत्त भाजी ॥ प. यौ बौर चहुआन सारंग सोरं। बजे दोइ ह ज आकास तोरं ॥ छं० ॥ १२४॥ पन्यौ राव भट्टी बरं पंच पंच। जिने मुक्ति के पंथ चल्लाइ संच॥ पन्यौ भान पुंडीर ते सोम कंमं। 'झिले जुझभयं बळ यौ पंच जंमं ॥ छं० ॥ १२५॥ पन्यौ राउ परसंग लहु बंध भाई । तिनं मुक्ति अंसं छिन मंझि पाई ॥ पायौ साहि गोरी भिर चाहुआनं। कुसादे कुसादे चवै मुष्प षानं ॥ छ ॥ १२६ ॥ दूसरे दिन तत्तार खां का शहाबुद्दीन को विकट व्यूह के । मध्य में रख कर युद्ध करना और सामंतों का क्रोध कर के शाह की तरफ बढ़ना। (१) ए.-मिल्यौ । ( २ ) मो.-तिसकंत । १) ए.-जिने जुझ्झतें बज्जयो पंच जम ।
पृथ्वीराजरासो। [सत्ताइसवां समय २६ कवित्त ॥ दस हथ्थी सु बिहान । साहि गोरी मुष किन्नौं । कर अवास बादौ । ततार चवकोद स दिन्नौं। नारि गोरि जंबूर । कुहक बर बान अघातं ॥ गज्जि भाग प्रथिराज । चित्त करयो अकुलातं ॥ सो मोह कोह बर बज्जि के। ब्रज उन धारय धमसि के । सामंत सूर बर बीर बर । उठे बौर बर हमसि के ॥ छ । १२७ ॥ अड्च अद्ध जोजनह । मौर उड़ि संगा केरौ ॥ तब गारी सुरतान । रोस सामतह घेरी॥ चक्र श्रवन चौडोल । अम्ग 'सेषन पंचासौ ॥ सूर कोट व जाट ।सार मारनह हुलासौ॥ बर अगनि बगौ हल्लौ नहीं। पदर कोट सुजाट हुअ॥ बर बौर रास समरह परिय । सार धार बर काट हुअछ॥१२८। रसावला ॥ मेलि साहं भर, घग्ग घोले रुर। हिंदु मेछं जुर, मंतजा जंभर॥ छं० ॥१२६ ॥ दंत कडू कर, उप्पमा उप्परं । केद भौलं जुरं, कोपि कडू करं॥ छं० ॥ १३०॥ कंध ननं धरं, पंष जपं फिरं । तौर नंषे कर, मेघ बुढं बरं छं०॥१३१॥ श्रावध संभार, बंक तेगं कर। चंद बोजबर, अद्ध अद्ध धर॥ छं० ॥ १३२॥ बीय बंध धर, कित्ति जपै सर। अस्म, ढुंढे फिर, रंभ बंछै बर। छं० ॥ १३३॥ थान यांनं नर, धारधार तुटं। भ्रम वासं छुटं, छं० ॥ १३४॥ साह गोरी बर', षग्ग पाले कर। ॥ छं० ॥ १३५॥ खुरासान खां का सुलतान के बचन पर तैश में आकर घोर युद्ध मचाना। (१) ए.-नेषन । (२) मो.-हसौ, हस्यौ । (३) ए.क को.-धरि । (४) ए.-तुव । , .... .... ....
सत्ताइसवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो। 808 कवित्त ॥ षों पुरसान ततार । षिभिभ दुज्जन दल भष्पै ॥ बचन स्वामि उर षटकि । हटकि तसबी कर नंषै ॥ कजल पंति गज विथुरि । मध्य सैनं चहुआनौ ॥ अजै मानि जै रारि। बियस तेरह चघि प्रानौ ॥ धामंत फिरस्तन कढ़ि असौ । दहति पिंड सामंत भजि ॥ बर बौर भौर बाहन 'कहर । परे धाइ चतुरंग सजि ॥छ ॥१३६॥ रघुवंसी के घोर युद्ध का वर्णन । भुजगौ ॥ पन्यौ रघुबंसी अरौ सेन जाड़ी। हुतौ बाल बेसं संघ लज्ज डाड़ी ॥ बिना लज्ज पप्पै सची ढुंढि पिष्षौ । मनों डिंभरू जानि कै मौन ऋष्षौ ॥ छ ॥१३७॥ पन्यौ रूक रिनवट्ट अरि सेन माहौ। मनो एक तेगं झरी नौर दाही॥ फिर अडबट्ट उपम्मान बढ़े। विश्वक्रम्म बसौ कि दारुन गद्द्वे ॥ छ ॥ १३८॥ परे हिंदु मेच्छ उलथ्यौ पलथ्यौ । कर रंभ भैर ततथ्ये ततथ्यौ ॥ गहे अंत गिई बरं जे करालो । मनों नाल कट्टे कि सेभि मनाली ॥ छं० ॥ १३६॥ तुटे एकटं गादि कै घग्ग धाया। मनों विक्रम राइ गाबिंद पाया ॥ गहै हिंदु हथ्य मलेच्छ भमायौ । जनै भौम हथ्थौन उप्पम्म पायौ । छ ॥ १४ ॥ ननं मानवं जुन दानव्व ऐसौ । ननं इंद तारक भारथ्य कैसा ॥ झकं बज्जि झंकारयं झपि उर्छ । बर लाह पंचं बधं पंच छुट्टै । छं० ० ॥ १४१ । मना सिंघ उभझ अरुभझत छुट्ट। रनं देव सांई सर आव षुट्टै ॥ धनं घोर ढुंढं उतकंठ फेरौ । लगै झग्गरै हंस हज्जार एरौ॥छं०॥१४२॥ तुटै एंड मुंडं बर जो करेरौ । बरदाइ रिझे दुई दिन्न भेरौ ॥ई०॥१४३॥ (१) ए.-करह । (२) मो.-उलथ्थी। (३) ए. को.-भाल ।
पृथ्वीराजरानो । [सत्ताइस समय २८ लड़ाई के पीछे स्वर्ग में रम्भा ने मेनका से पूछा तू उदास क्यों है ? उसने उत्तर दिया कि आज किसी को बरन करने का अवसर नहीं मिला। कवित्त । पच्छै भौ संग्राम । अग्ग अप्छर विच्चारिय ॥ पुछ रंभ मेनिका । अज्ज चित्तं किम भारिय ॥ तब उत्तर दिय फेरि । अज्ज पहुनाई आइय ॥ रथ्य बैठि औथांन । सोझतह कंत न पाइय ॥ भर सुभर परें भारथ्य भिरि । ठाम ठाम चुप जीत सथ ॥ उथकीय पंथ हल्ले चल्यौ। सुथिर सभी देषीय 'तथ ॥छं० ॥ १४४ ॥ रम्भा ने कहा कि इन वीरों ने या तो विष्णु लोक पाया या ये सूर्य में जा समाए । कुंडलिया ॥ कहैं रंभ सुनि मेंनकनि । ए रहु जिन मत जुथ्थ ॥ अरिय अनंमति जानि करि । जुति आवें ग्रह रथ्य ॥ जुति आवें ग्रह रथ्य । ब्रह्म शिव लोकह छंडौ ॥ विश्न लोक ग्रह कर भान तन सों तन मंडी ॥ रामंचि तिलकं वसि वरौं । इंद्र बधू पूजन जही ॥ श्रीपम्म जोग नन हुअ बहुरि । अब तारन बरहै कही ॥छं०॥१४५॥ हुसैन खां घोड़े से गिर पड़ा, उजबक खां खेत रहा, मारूफ खां, तातार खां सब पस्त हो गए, तब दूसरे दिन सबेरे सुलतान स्वयं तलवार निकाल कर लड़ने लगा। कवित्त ॥ षां हुसेन ढरि पन्यो । अस्व फुनि पन्या सार बहि ॥ झुमझ फेरि सति सौव । षान उजबक षेत रहि । पां ततार मारूफ । पान पाना घट घुम्मै ॥ तब गोरी सु बिहान । आइ दुज्जन मुष अम्मै ।। . , (१) ए.कृ.को.-नथ ।
सत्ताइसवां समय २६] पृथ्वीराजरासो। ७११ । कर तेग झल्लि 'मुठ्ठिय सुबर । नहि सुलतानह पन करी ॥ अदि हार दौह पलटे सुबर । तबहि साहि फिरि पुकरी ॥छ०॥१४६ ॥ सुलतान ने एक बान से रघुवंस गुसाई को मारा दूसरे से भीम भट्टी को तीसरा बान हाथ का हाथ ही में रहा कि पृथ्वीराज ने उसे कमान डालकर पकड़ लिया। तब साहिब गोरी नरिंद। सतबान समाहिय ॥ पहिल बान बर बीर । हने रघुबंस गुसाइय ॥ दूज बानत कंठ । भौम भट्टौ बर भंजिय ॥ चाहुआन तिय बान । पान अव धरि रज्जिय ॥ चहुआन कमान सु संधि करि । तीय बान हथ हथ रहिय ॥ तब लग्गि चंपि प्रथिराज नें । गोरो वै गुज्जर गहिय ॥छ ॥१४॥ सुलतान को पकड़ कर और हुसैन खां तातार खां आदि को विजय करके पृथ्वीराज दिल्ली गए । चारों ओर जैजैकार हो गया। गहि गोरौ सुरतान । पान हुस्सन उपायौ ॥ षां ततार निसुरत्ति । साहि झारी करि डायौ ॥ चामर छत्र रषत्त । बषत लुढे सुलतानी ॥ जै जै जै चहुआन । बजौ रन जुग जुग बानी ॥ गज बंधि बधि सुरतान को। गय ढिल्लो दिल्लीपति ॥ नर नाग देव अस्तुति करें । दिपति दीप दिव लेाकपति ॥ छं० ॥ १४८॥ एक समय प्रसन्न होकर पृथ्वीराज ने सुलतान को छोड़ दिया। दूहा ॥ समै एक बत्ती नृपति । बर छंद्यौ सुरतान ॥ तपै राज चहुबान यौ । ज्यों ग्रौषम मध्यान ॥ छ ॥ १४६ ॥ (१) मो.-पुठिय ।
६१२ पृथ्वीराजरासो। [सत्ताइसवां समय ३० एक महीना तीन दिन कैद रखकर नौ हजार घोड़े और बहुत से माणिक्य मोती आदि लेकर सुलतान को गजनी भेज दिया। मास एक दिन तीन । साह संकट में हंडौ । करिय अरज उमराउ । दंड हय मंगिय सुद्धौ । हय अमोल नव सहस । सत्त सै दिन ऐराको । उज्जल दंतिय अछु । बौस मुर ढाल सु जकौ ॥ नग मोतिय मानिक नवल । करि सलाह संमेल करि॥ परि राइ राज मनुहार करि । गज्जन वै पठयौ सुघरि ॥छ॥१५॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके रेवातट पातिसाह ग्रहनं नाम सप्तवीसमो प्रस्ताव संपूरणम् ॥ २७॥ IA अथ अनंगपाल समयौ लिख्यते । (अट्ठाइसवां समय।) अनंगपाल दिल्ली का राज्य पृथ्वीराज को देकर तप करने चला गया था परंतु उसने पृथ्वीराज से फिर विग्रह क्यों किया, इस कथा का वर्णन । दुहा ॥ दिय दिल्ली चहुआन को । तूंअर बद्रो जाइ ॥ कहौ दंद कयौं युरिय । फिरि दिल्ली पुर आइ ॥छ ॥१॥ अनंगपाल के बद्रिकाश्रम जाने पर पृथ्वीराज का दिल्ली का निईन्द शासन करना। रधि बौर प्रथिराज कों। गा तीरथ्यह राज ।। व्यास बचन आनंद सजि । तिह, पुर बज्जन बाज ॥ छं० ॥२॥ जुग्गिनिपुर प्रथिराज लिय । वज्जि विघोष सुदंद ॥ अनंगपाल तूंअर बरन । किय तौरथ्य अनंद ॥ छ ॥३॥ यह समाचार देश देशान्तर में फैल गया कि पृथ्वीराज दिल्ली में निईन्द राज्य करता हुआ स्वजनों को मान देता है और उपकार को न मान कर अनङ्गपाल की प्रजा को बड़ा दुःख देता है। पडरौ ॥ तूअर नरिंद तप तेज जानि । प्रथिराज बास बचनह प्रमानि ॥ विमान ग्यान मेट न कोई । इंद्रादि अंत कलपंत होइ॥ छ ॥४॥ दस दिसा अमिट धरती अकास । 'चंद्रादि सूर ग्रह ग्रह प्रकास ॥ ब्रह्मा टरंत टारंत काल । राहत पंच भूते विचाल ॥ छ ॥५॥ विष्यात बात दस दिसि कहंत । विथ्थुरौ देश देसन तुरंत ॥ अप अप्प पानि दीजै निवास । तूंअर नरिंद परजा निकास ॥छ॥६॥ (१) ए.क.को. चंद्रमा सूर दिन दिन प्रकास ।
६१४ 'पृथ्वीराजरासो। [अट्ठाइसवां समय २ निरदै नरिंद इन विधि विसास । आनंग लोक हिरदै निरास ॥ उपगार को न मानै विवेक । संसार माहिं ऐसे अनेक ॥ छ॥७॥ अग्नि, पाहुना, विप्र, तस्कर आदि परदुःख नहीं जानते पृथ्वीराज दिल्ली का राज्य करता है और अनङ्गपाल पराए की भांति तप करता है कवित्त ॥ तसकर चेलक विष्य । बैद 'दुरजन अति लोभी ॥ प्राहुन अहि जल ज्वाला काल विप इन में मोभी ॥ इन पर चिंता नाहिँ । बहुत करि जौपै कहिये ॥ अप्प सहज चालंत । चित्त की बात न लहिये ॥ प्रथिराज लोक तूंअर घरह । अरुचि दिष्ट मडै तनह ॥ भोगवै धरा जीवत धनिय। संक न कोइ मानै मनह॥छ ॥८॥ सोमेश्वर अजमेर में राज्य करता है और पृथ्वीराज को दिल्ली मिली यह सुनकर मालवापति महिपाल को बड़ा बुरा लगा। दूहा ॥ संभरि वै सोमेस नृप । अति उतंग आचार ॥ ढिल्लो प्रथि तूंअर दइय । सुन्यौ पिज्यौ महिपार ॥ छ ॥ ६ ॥ मालवापति ने चारों ओर के राजाओं को पत्र लिख कर बुलाया । गक्खर, गुण्ड, भदौड़ और सोरपुर के राजा आए । सलाह हुई कि पहिले सोमेश्वर को जीत कर तब दिल्ली पर चढ़ाई की जाय। कवित्त ॥ चंदेरी चतुरंग । सैन हय गय पल्लानं ॥ ठौर ठौर कग्गदह । दर मालव धरवानं ॥ गषड़ गुंड भदौड़ । सोरपुर सूर समाहे ॥ , । (१) ए.-को. जुरजन । (२) ए.क.को.-आप ।
अट्ठाइसवां समय ३ ] पृथ्वीराजरासो। ६१५ मिलि आए महिपाल । अप्प बल सेन उमाहे ॥ एकंत मत्त सोमेस पर । धुर संभरि वै लिज्जिये ॥ प्रथिराज तुअर ढिल्लो दिसा । फिरि कलहंतर किज्जिये। छं० ॥ १० ॥ मालवपति का अजमेर पर चढ़ाई करने के लिये सेना सहित चंबल नदी पार होना। बर मालवा महिपाल । चन्यौ चहुबान 'सु उप्पर ॥ सेन सजी चतुरंग । दियौ मेलानह सो पुर ॥ हय गय थट्ट अघट्ट । घाट चंबिल परि आइय ॥ घुरि निसान घमसान । थान थानह हल्लाइय ॥ जादव नरिंद हरिबंस कुल । अति आतुर अजमेर पर । उत्तयौ सरित संमित सकल । धुंस धरा रावत्त धर ॥ छं० ॥ ११ ॥ शत्रुओं के आने का समाचार सुन कर सोमेश्वर अपने सामंतों को इकट्ठा करके बोला कि पृथ्वीराज को तो अनंगपाल ने बुला लिया इधर शत्रू चढ़े हैं, ऐसा न हो कि कायरता का धब्बालगै और नाम हँसा जाय। सुनि सोमेसर सूर । चिंति मन मंत उपाइय ॥ बर प्रथिराज नरिंद। अनंगपालह बुल्लाइय ॥ रज रजवट रविषयै । राव रावत्तन कौजे ॥ रहै गल्ह संसार । आव जल अंजुल छोज । मो बंस अंस आनल अटल । कोइ न कहो काइर कहिय ॥ अप्पान सुभ्भ संबोधि नृप । जुद्ध घात 'पुवत लक्ष्य छं०॥१२॥ सामंतों ने सलाह दी कि शत्रु प्रबल हैं इससे इनको रात के समय छल करके जीतना चाहिए। (१) ए. कृ. को.-जु । (२) ए.-समंत । ( ३ ) ए. के. को.-पुस्तक ।
६१६ पृथ्वीराजरासो। [ अट्ठाइसवां समय ४ '. सिंघ पँवार ब्रसिंघ । गौड़ संजम चहुबानं ॥ बाहन बौर सधौर । राज गुर राम सुजानं ॥ मंत मंति भर अवर । करे समचित्त अनेक ॥ तुम लज्जा धर धौर । बौर बौराधि 'बिवेक ॥ संभरिय सोम पुच्छत बयन । कहिय बत्त सम तत्तकल ॥ छल बल अनेक छविय करन। तुच्छ सत्थ पुज्जैन पल ॥छ०॥१३॥ दूहा ॥ चंद चंद निसि दंद मति । ऋतु सरद गुरवार ॥ तेरसि तकि सज्यौ सयन । रचि रति वाह विचार ॥ छं० ॥ १४ ॥ सोमेश्वर ने कहा कि तुम ने नीति ठीक कहा पर रात को छापा मारना अधर्म है इसमें बड़ी निन्दा होगी। कवित्त ॥ रत्ति वाह छल जुद्ध । अभ्रम "पित्री परिमानं ॥ 'कड़ कपट मारियै । अभ्रम निद्रा गति जानं ॥ मल मोचन रति रवन । सेन पूजन जल न्हानं ॥ मंत्र जाप जप्पंत । करै नह घात सुजानं ॥ तुम मंत संत संचौ कहिय । इह अधम्म धूम हारिये ॥ जो गिनइ पुरुष निंदा अपर। लछ रति वाह विचारिये॥ छ ॥ १५॥ सामंतों ने कहा कि सेतु बांधने में श्रीराम ने, सुग्रीव ने बालि को मारने में, नृसिंह ने हिरण्यकश्यप के मारने में और श्रीकृष्ण ने कंस के मारने में छल किया, इस में कोई दूषण नहीं है। छल तक्यौ श्री राम । सेत साइर तब बंध्यौ ॥ छल तक्यौ सुग्रीव । बालि जिउ ताड़ह संध्यौ । छल तक्यौ लछिमना । सूर मडल अरि बेथ्यौ ॥ छल तक्यौ नरसिंघ । म्रग्गकुस नष उर छेद्यौ ॥ (१) ए.क.को.-बिमेकं । (२) ए.कृ.को.-पल । ( ३ ) ए.कृ.को.-रित, रति । ( ४ ) मो.-रबि । (५) ए.क.को.-छत्रि। (६ ) ए.क.को.-कूड कूड़।
अट्ठाइसवां समय ५]] पृथ्वीराजरासी। * छल बल करंत दूषन न कोइ । किस्न कलह कंसह करिय ॥ सोमेस राज तकि अप्प बिधि । रत्तिवाह छल मन धरिय छं ॥ १६ ॥ दूहा ॥ ससि विम्मल ससि सूर अप । दिय अस अस्त्र उतान । प्रथुक जोग जिन साल 'धर । संजोजन सव्वान ॥ छं० ॥ १७ ॥ सोमेश्वर के सामंतों का युद्ध के लिये तयारी करना । भुजंगी ॥ ग्रहे सूर सेोमेस सा आयुधेसं । इक सोभई राज जागिंद भेसं ।। तजे मोह माया ग्रहन्नौ कहनौ । तजे बंध पुत्तं हरि चित्त मन्त्री ॥ ॥ छं० ॥ १८॥ इकं सामि धम्म ग्रहे अंग लाजं। * तिनं सस्त्र झल्ले जुधं कित्ति काजं ॥ न काया न काम धरे रामराज। हवै हाक सूरां कपै काइराज। छं० ॥१६॥ पत्र विस्नुकान्ता जल जान्हबीयं । वपुंउड्वरे कोटि सौ पाप कौयं । बरै रंभ वाम दुतौ साम काम। मनों दाहिनावृत्त पौरंभ राम। छं० ॥२०॥ तिनं सस्त्र हल्ल जुधं क्रित्य काज। हुवै हाक सूर करें काइराज। मुर हादसं आयुधं दंड धारै। तिनं नाम चंदं मु छदं उच्चार॥ छं० ॥ २१ ॥ नसौ तन्न संग्रहे सूल पासं । परस्सं असन्त्रौ सकत्तौ बिकासं ॥ ग्रहे तून तामार भल्लो क पानं । जुधं काज नालोक नाराज जानं ॥ छं० ॥ २२॥ सर' चक्र सारंग बजे गदाय । दंड मुद्गर भिंडिमाल सघाय॥ हल मूसल सेल सावल्ल घग्गं । ग्रहे खूरता अप्प अपपन्त्र बग्गं । छ ॥२३॥ छुरिका कतौ कन्न बक्री कुंतायं। फलक कनौका भुसुंडौ बतायं॥ लियं संक 'दुस्फोटकं पारिघायं। पटौसं छतीसं ग्रहे श्रायुधायं ॥ छ ॥ २४ ॥ (१) मो. जर । * यह पंक्ति मो. प्रति में नहीं है। (२) ए. कृ. को.-पलक्कं । (३) मो.-दुस्पोटं । .
पृथ्वीराजरासो। [अट्ठाइसवां समय ॥ पट्टन के यादव राजा ने आकर डेरा डाला। अजमेर जीतने का उत्साह जी में भरा था। दूहा ॥ पट्टन जादव प्राय नप। किय डेरा बरबान ॥ सुनि सोमेसर दौरि करि । ज्यों निधि रंक प्रमान ॥ छं ॥ २५ ॥ अति आतुर अजमेर पहु । आइ कुलिंगन बाज ॥ यों रस रत्ता सूर भर । मुकति त्रिया धरि साज ॥ छ ॥ २६ ॥ चारों ओर खलबली मच गई। रुद्रगण तथा नारद आनन्द से नाचने लगे। कवित्त ॥ अप्प अप्प मुष अरिन । सूर संमुह भल्लारिय ॥ हाइ हाइ उच्चार । धरनि अंबर तुटि डारिय ॥ चमकि चित्त त्रिपुरारि । अष्ट गन नारद नंचिय ॥ सेस सटप्पटि सलकि । दिसा दंतिन तन अंचिय ॥ मानों कि जलद तुट्टिय तड़ित । बर पट्टन आहुट्ट भर ॥ रति वाह प्रात हूं ते दियौ । अगनि सार बुब्यो कहर ॥ छं० ॥२७।। योद्धाओं की तयारी तथा उनके उत्साह का वर्णन । रसावला॥ कट्टि घग्ग लगं, आइ जुट्टे अगं। जानि सूर उगं, लग्गि घग्ग बगं॥ छ. ॥२८॥ जानि प्रल्लै जगं, सामि धम्म मगं। पंड पंडं अगं, श्रोन 'तुट्टे रगं॥ छ ॥ २१ ॥ पानि वाहै षगं, सूर साधे खग। देबि लाली ठगं, ठाम ठाम ठगं । छ॥३०॥ डंकनीयं डगं, एक एक दिगं । सूर रोपे पगं, नग्ग मानों नगं ॥ छ ॥३१॥ सार धारं तम, जानि जकं अगं । बसं जालंदगं, फुट्टि घोपं षगं।। छ ॥३२॥ (२) ए. कृ. को.-लागी। (१) ए. कृ.-बुढ्ढे । (३) मो.-षोपे।
अट्ठाइसवा समय ] पृथ्वीराजरालो। ६१६ .... .... .... द्धि मटुं भगं, हंस उड्डे मगं । मार मार रगं, मुष्प बोले दगं ॥ छं. ॥ ३३ ॥ 'लट्ट चट्ट परं, लथ्य बथ्य भरं । अंत श्रोनं मार, जानि पसरं॥ छ॥ ३४ ॥ कट्टि षंड गुर, हथ्थ जंगं जुरं। जानि पित्ति पल, चंच गिद्धौ पल छ ॥ ३५॥ ईस सोसं झल, माल मध्ये 'घल। सूर जहों बल', अभ्भ तुझ्यौ कलं॥ छं० ॥३६ ॥ भूर भूपं मिल, आयुधं अत्तु ल। ॥ छ ॥ ३७॥ दूहा ॥ सार मार मच्ची कहर । दोउ दलनि सिर मंधि ॥ प्रौढ़ा नायक छयल रमि । प्रात न बंछ संधि ॥ छ ॥ ३८॥ सोमेश्वर ने पिछली रात धावा कर दिया शत्रु के पैर उखड़ गए। कवित्त ॥ सोमेश्वर भजि सूर । सूर उमझारिग भरि झरि ॥ सार फुट्टि चहुआन । भिरिय जहों भरि लरि लरि ॥ घरौ एक तिन रत्त । सार मैगल सिर बुठिय ॥ संभर वैर सु आनि । सार भग्गि जु सिर तुट्टिय ॥ भग्गइय. सूरमा दुई सयन । किहि न कोई बर चंपयौ ॥ उप्पारि लियौ अजमेर पहु । दागन 'किहुं दीयौ गयौ ॥ छ॥३६॥ हथ्थिय ढाल ढलकि । घालि लौनौ अजमेरी ॥ परि लंगा लंगरौ । सेन दुज्जन दल फेरौ ॥ भाग बौर प्रथिराज । अरिन उप्पारि स लौनौ ॥ इन सोमेसर राव । सत्त हथ्थिन बर कौनौ ॥ जिम तिमर सूर भंजे सुभर । गुरु गल्हान न कवि टरै॥ जब लगै भूमि साइर सुमित । तव लगि कवित सु उबर। छ० ॥ ४०॥ (१) ए. धलं, वलं । (२) मो.-किन। (३) मो.-सुप्रति । (४) मो.-विस्तरै ।
६२२ पृथ्वीराजरामो। [ अट्ठाईसवां समय ॥ संसार में एक मात्र कविकथित यश के अतिरिक्त और कुछ अमर नहीं है दूहा ॥ रह्यौ न को रवि मंडलह । रहि कबि मुष्ष सु भल्ह ॥ जौरन जुग पाषान ज्यों । पूर रहंदी गल्ह ॥ छ० ॥ ४१ ॥ यादव राज ऐसा घायल होकर गिरा कि मुंह से बोल न सकता था। फिरि जद्दव भर देस दिसि । समर घाइ लै सैन॥ अवर चित्त तें अवर परि । कढेि न सके बैन । छ० ॥ ४२ ॥ सोमेश्वर उसे घर उठा लाया बड़ा यत्न किया। एक महीना बीस दिन में अच्छे होकर राजा ने आरोग्य स्नान किया। सोमेश्वर ने बहुत दान दिया । ग्रिह सोमेसर आनि तिन । मास एक दिन बौस ॥ रषि जतन किय न्हान जब । दियौ दान सु जगीस ॥ छ॥४३॥ पृथ्वीराज ने यह समाचार सुना । उसने प्रतिज्ञा की कि जब घात पाऊंगा शत्रुओं को मजा चखाऊंगा। सुनिय 'बत्त प्रथिरीज नृप । चिंति भविषषत बत्त ॥ अरियन तौ आहोड़ियै । जो लम्भौज घत्त ॥ छ० ॥ ४४ ॥ इधर दिल्ली की प्रजा ने बद्रिकाश्रम में अनङ्गपाल के पास जाकर पुकारा कि महाराज चौहान के अन्याय से हम लोगों को बचाइए। कवित्त ॥ अनंगपाल प्रज लोक । जाइ बद्री पुकारिय ॥ हम तुम सेवक सामि । छडि ग्रह राज निकारिय ॥ नहि अदब्ब मन्नयौ । कर मच्चौ चहुबानं ।। (१) मो.-षबर । (२) मो.-पुकारय, निकारया अट्ठाइसवां समय ] पृथ्वीराजरासो। ॥ हो अनगेस नरेस । गई ढिल्लो धर जानं ॥ जा जियत राज घर पर बसिय । मौति न्याय न प्रकासियै॥ नर नाग देव निंदै सकल । विप करत तहँ बासियै ॥ छ॥४५॥ अनङ्गपाल ने क्रुद्ध होकर अपने मंत्री को बुलाकर समाचार कहा । मंत्री ने कहा कि पृथ्वी के विषय में बाप बेटे का विश्वास न करना चाहिए। सुनिय तेज जाजुल्य । दूत परधान पठाइय ॥ हम भंडार धर धान । द्रब सबह भरि लाइय ॥ व्यास बचन संभारि । कहै तब मंत्री पुच्छह ॥ देस क्रषौ धन आदि। राज ग्रहयो गड़ सबह ॥ विप सेव देव दुज्जन उरग । इन ढिल्ल नन मुकिये ॥ बर बंध पुत्र अरु तात वप । इन बिसास धर चुकियै ॥ छ ॥४६॥ राज्य प्राप्त करने के लिये गत ऐतहासिक घटनाओं का वर्णन। धर काजै कौरवन । पंड जानिय न 'बंध गति ॥ धर काजें दसौव । बंध बंध्यौ भभिषन मति ॥ धर काजै नल राइ । बंधवन घेत न अप्पौ ॥ धर काजै बलि राइ । देव देवाधि उथप्पौ॥ धर काज मुंज त्रिय के कहै । भोज प्रहारन मत कियौ ॥ धर काज कर तूंअर अध्रम । पुत्तह सै मुष बिष दियौ छं०॥४७ तूंअर वंश ने सर्वदा भूल की, पहिले किल्ली को उखाड़ा फिर आपने पृथ्वीराज को राज्य दिया। दूहा ॥ तुम तूंअर मति चूकना । करि किल्लौ ढिल्लौय ॥ फुनि मत अण्पन हो करिय । प्रथौराज धर दीय ॥ छं० ॥४८॥ राजा हाथी घोड़ा स्वर्ण इत्यादि सब दे द परंतु राज्य की सर्प मणि के समान रक्षा करे । ७॥ (१) मो.-वेध । (२) मो.-दशशीश। (३) मो. बसि।
पृथ्वीराजरासो। [ अट्ठाइसवां समय १० ६२२ के राज दाम गज तुरिय 'द्रब । देत न लग्ग बार ॥ धरतिय रष्षन यौ सुदृढ़ । अहि मनि रपन हार ॥ छं० ॥ ४ ॥ अनङ्गपाल आग्रह करने पर मंत्री लाचार होकर दिल्ली की ओर चला। मंचि सु मतह सौष लै । चलि दिल्लिय चहुबान ॥ आइस कों जोइस का हा। इह अत धम्म प्रमान ॥ छं० ॥ ५० ॥ पृथ्वीराज से मिलकर मंत्री ने कहा कि अनङ्गपाल आप पर अप्रसन्न हैं उन्होंने आज्ञा दी है कि हमारा राज्य हमें लौटा दो या हम से आकर मिलो चंद्रायना ॥ मिल्यो विपह सोमंत बसोठ जु मुकल्यौ । सा चहुानह पास नरिंद सु इकलौ॥ पिज्यो अनंग नरिंद भूमि हमहौं तजौ ॥ कै मिलौ आइ चहुबान सुबुड्विय मंत जौ ॥ छ० ॥ ५१ ॥ इस पर पृथ्वीराज का क्रोधित होना। बोल्यो हंकि नरिंद बसौठ जु दुबन्यौ । तब कमज्ज नरिंद न उत्तर संभयौ ॥ बात अनंक्रन कौन हौन हुइ उठ्यौ । चंपि लुट्टिय हथ्थ बौर बर टुट्टयौ ॥ छ० ॥ ५२ ॥ वसीठ का कहना कि जिस का राज्य लिया आप उसी पर क्रोध करते हैं दूहा ॥ उद्यौ बौर बसौठ बल । करि जुहार चहुआन ॥ धनौ उभै धर लुट्टियै। इह अचिज्ज परिमान ॥ छं० ॥ ५३ ॥ पृथ्वीराज का कहना कि पाई हुई पृथ्वी कायर छोड़ते हैं। (१) मो.-बर। (२) मो.-भत्त धूम्म सुप्रमान ।
अट्ठाइसवां समय ११]] पृथ्वीराजरासी। ૨૨૩ कवित ॥रे बसौठ मति 'ढोठ। बोल बोल मतिहीना ॥ सनेपात उप्पनं । किनें सक्कर पय दौना ॥ अधर कर छुट्टी संगि । हथ्य चढ़े मरदाना ॥ फिरि बंछ जो मूढ़ । होइ ताही जिय ज्याना ।। सठ्ठीय बुद्धि नठिय वपति । तुम 'बिमत्ति दिन लहि कहिय ॥ उग्गमै सूर पच्छिम रक । तौ दिल्ली धर तुम नहिय ॥छ०॥५४॥ मंत्री का यह सुनकर उदास मन हो चला आना। दूहा ॥ सुनि यह बत्त सो दूत चलि । बिन आदर मन मंद ॥ होन दोन दिष्पत इसौ । मनों कि वासर चंद ॥ छ. ॥ ५५ ॥ मंत्री ने अनङ्गपाल से आकर कहा कि मैंने तो पहिले ही कहा था, यह दैत्यवंशी चौहान कभी राज्य न लौटावैगा। पृथ्वी तो आप दे चुके अब बात न खोइए। कवित्तः ॥ तूंअर बौर बसौठ । सामि संदेस सु अष्षिय ॥ तुम दृवत्तन कुसल । वत्त पहिले हम भप्षिय ॥ वह बलिट दैवान । दैत्यबसौ चहुबानं ॥ सूज अग्र उप्पर । देय नह तास प्रमानं ।। तुम दई भूमि निज हथ्थ करि । अथ्य मित्त नन षोइये ॥ संभरहि देस देसन पति । तौ वृत्ति बिगोइये ॥ छ ॥ ५६ ॥ अनङ्गपाल ने एक भी न माना और वह सेना सज कर दिल्ली पर चढ़ आया । पृथ्वीराज नाना की मर्याद को सोचने लगा और उसने कैमासं को बुला कर पूछा कि मेरी सांप छछंदर की गति हुई है अब क्या करना चाहिए । (१) दीठ, ढाठ, धठि। (२) ए. पर । (३) मो.-धर कर संगिय बुद्धि । (४) ए. कृ. को.-विपति । (५) ए. कृ. को. परक । (६) ए. कृ. को.-वासुर । (७) मो.-तोअर । .
દ૨૪ पृथ्वीराजरासो। [ अट्ठाइसवां समय १२ अनगपाल न न मानि । कूच किन्नौ दिल्लीय दिसि ॥ भूत 'भविष जानौ न । किये रत्तेत नयन 'रिस ॥ अप्प सेन सजि जूह । आइ ढिल्लो धरवानं ॥ मात पिता मरजाद । चिंत लग्यो चहुआनं। कैमास मत पुच्छ्यौ नृपति । कहौ कहा अव किज्जिये ॥ अहि ग्रहिय छछंदरि जो तज । नैन जठर भषि छज्जिये ई०॥५७॥ जो लड़ाई करता हूं तो अपनी मा के पिता (नाना) से लडता हूं और जो छोड देता हूं तो अपनी हीनता प्रगट होती है, सो अब क्या न्याय है इस पर तुम अपना मत दो। दूहा ॥ जो मारी तौ मातपित । छंडौ तौ बल हानि ॥ कहि मंत्री मंगपति । न्याय रीति विधि जानि ॥ छं० ॥ ५८ ॥ कैमास ने कहा कि न्याय तो यह है कि कलह न कीजिए, इन्होंने पृथ्वी दी है इनको आप न दीजिए, जो न मानैं यहीं आकर भिड़ें तो फिर लड़ना चाहिए। कवित्त ॥ सुनौ पति चहुआन । न्याय तौ कलह न किज्जे ॥ इन दोनो धर अप्प । अपप तौ इनह न दिज्जे ॥ जो विमान प्रमान । होइहै सोइ नियानं। जच लग्गौ गढ़ आइ । जाइ तब जुन जुरानं ॥ सजि कोट पोट सामत सथ । नारि गोर जंबूर वहि ॥ लम न जोर छिज्ज सुभर । इत सामत लगत नहि ॥ छं० ॥ ५६ ॥ अनंगपाल ने धूमधाम से युद्ध आरम्भ किया। कई दिन तक लडाई हुई अन्त में अनंगपाल की हार हुई। (१) ए. कृ. को.-भवत्र । (२) मो.-रस ।
अट्ठाइसवों समय १३ ] पृथ्वीराजरासो। ६२५ अनंगपाल बल मडि । सुभर ढिल्लो गढ़ लग्या ॥ लेहु लेहु करि दौरि । अण्प बर अण्प बिलगा ॥ नारि गोरि आतस्स । कोट पारस भर घाइय ॥ जे भर मडे आइ । सोर करि मोर उठाइय॥ लग्ग न घात तूंअर नृपति । दिवस च्यार मडिय ररिय ॥ पुज्यौ न प्रान पानप घटत । दिल्ली धर ढिल्लो करिय॥ छं० ॥६॥ हार कर अनंगपाल का फिर बद्रीनाथ लौट जाना। चौपाई ॥ दौह च्यारि ढिल्लो नृप भारौ । बर चहुबान संमुहै हारौ ॥ गोतं चर फिर रावर छंडिय। बद्री छोर सरन ग्रह मडिय ॥छं०॥६॥ आधी सेना को वहीं और आधी को अजमेर के पास छोड़ कर अनंगपाल लौट गया। अनगपाल पंडिय गयौ । सैन सु बंधिय थट्ट ॥ अद्ध सैन अजमेर पर । 'टारे हथ्य सुभट्ट ॥ छं० ॥ ६२ ॥ मंत्री सुमन्त की सलाह से अनङ्गपाल ने माधो भाट को सुलतान शहाबुद्दीन गोरी के पास सहायता के लिये भेजा। बौर बसौठ सुमत मिलि । स्वामि बचन समुझाइ ॥ मतौ मडि चहुआन कौ । माधो भट्ट चलाइ ॥ छं० ॥ ६३ ॥ माधो भाट जाकर सुलतान से मिला, वह तुरन्त पृथ्वीराज को जीतने की इच्छा से चढ़ चला। माधो भट्ट सु मुक्कल्यौ । मिल्यौ जाइ सुलतान ॥ चढ्यौ साहि गोरी सुबर । मिलि बंधन चहुआन ॥ छ ॥ ६४ ॥ तूंअर अरु चहुआन के । 'घर बज्यौ बहु दंद ॥ माधौ भट्ट सु मुकल्यौ । बर गज्जन नरिद ॥ छ ॥ ६५ ॥ (१) मो.-टारिंग । (२) मो.-मम काय । (३) कृ.-धर ।
[ अट्ठाइसवां समय १४ ६२६ पृथ्वीराजरासो। नीतिराव खत्री ने अनङ्गपाल के गोरी के पास दूत भेजने का समाचार पृथ्वीराज को दिया। नौति राव षिचौ सुबर । तूंअर तिहि परधान ॥ गोरी दिसि नृप अपप दिसि । भेद दियौ चहुआन ॥ छ० ॥ ६६ ॥ अनंगपाल मान्यो नहीं। बरजिय पंडि नरिद ॥ तूंअर अरु चहुआन कै । रहै न एक बध ॥ छं० ॥ ६७ ॥ पृथ्वीराज ने अनङ्गपाल से दूत भेज कर कहलाया कि आप को पृथ्वी देने ही के समय सोच लेना था अब जो हमने हाथ फैलाकर ले ली तो फिर क्यों ऐसा करते हैं ? कवित्त । दई भूमि मापित्त । लई हम हथ्य पसारह ॥ सो पाओ फिर किम सु । बोल बोलहु अविचारह । तुम बिरद्ध तप जोग । राज चाहौ सु करन अब ॥ दयौ राज तुम हमह । कहा उपजी चित्तह तब ॥ मंगौ जु आइ फिरि भूमि तम । सोब राज पाओ नहीं । जो गयौ जंत चलि ग्रह जम। कहौ सु फिरि आवै कहीं ॥छं०॥६८॥ जैसे बादल से बूंद गिर कर, हवा से पेड़ के पत्ते गिर कर, आकाश से तारे टूट कर फिर उलटे नहीं जा सकते, वैसेही हमें पृथ्वी देकर इस जन्म में आप उलटी नहीं पा सकते, आप सुख से बद्रिकाश्रम में जाकर तपस्या कीजिए। जलद बूंद परि धरनि । कबहु जा न नभ्भ फिर ॥ पवन तुट्टि तरु पत्र । तर न लग्ग सु आइ थिर ॥ तुटि तारक आकास । बहुरि आकास न जा॥ सिंघ उलंघि सवजह । सोइ फुनि हनि नह पात्रै (१) ए.-तत्त। (२) मो. को . अभ्भ ।
अट्ठाइसवां समय १५ ] पृथ्वीराजरासा। ६२७ अपिपत्र सु पहमि तुम उदक सह । सो पाओ दजै जनम ।। तप्पो सु जाइ बद्री तपह । मत विचार राजस मनम ॥ छं० ॥ ६ ॥ आप सुलतान गोरी के भरमाने में न आइए, उसे तो हमने कई बार बाँध बाँध कर छोड़ दिया है तुम गोरी पतिसाह । कहैं जिन 'मत भरमावहु ॥ सत्त धंम साहस्त । काइ पर कहैं गमावहु ॥ सामतनि सुलतान । बार बहु गहि गहि छंद्यौ उन अपत्ति के सथ्य । सपति तुम मत्त सु मद्यौ ॥ जिम लग्गि जह्म विधवा चरन । अप समान होवन कहै ॥ मंगौ सु द्रव्य कारन स ध्रम । कछ अप्प चित्तह चहै ॥ छं० ॥ ७०॥ हरिद्वार में आकर दुत अनंगपाल से मिला । संदेसा सुनते ही अनंगपाल क्रोध से उछल उठा। अरिल्ल ॥ सुनि सु दूत आयौ हरद्दारह । कथ्थि अनग सम सकल विचारह ॥ सुनत श्रवन अति रोस झकित मनु । जिम सुसिंघ चुकत कुलिंग जनु॥ छं० ॥ ७१॥ अनंगपाल क्रुद्ध होकर पत्र लिखकर दृत को ग़ज़नी की ओर भेजा। पत्र में लिखा कि आप पत्र पाते ही आइए हम और आपमिलकर दिल्ली को विजय करें। कवित्त ॥ अनंगपाल झकि आप । दूत ढिं ग हुँते साह जे ॥ तिनहि कह्यौ तुम जाइ। कहौ साहब लिषषौ ते ॥ दिय पत्र तिन हथ्थ । धरा देत न चहुबानह ॥ तुम आवह, चढ़ि अतुर । कूच पर कूच मिलानह ॥ मिलि अप्प एक एकह सुमति । लरि सु लेंहि दिल्लिय धरा ॥ तुम मत्त छडि तप बद्रिबर । अब सु पाइ रुप्पें घरा ॥ छं० ॥ ७२॥ ने (१) ए. कृ. को.-मन । (२) ए. कृ. को.-झुकत । ( ३ ) ए. कृ. को.-फुनि ।
पृथ्वीराजरासो। [अट्ठाइसवां ममय १६ दूत ने आकर अनंगपाल के राज्यदान करने फिर उसे लौटाना चाहने तथा पृथ्वीराज के अस्वीकार करने अनंगपाल के हरिद्वार आने का समाचार सुलतान को सुनाया सुलतान सुनते ही चढ़ चला। गए दूत गज्जन । साहि सम बत्त बदै बर ॥ तप सु छडि तोंबरह । आइ हरदार लियन घर ॥ पहुमि मडि प्रथिराज । राज अप्पै न इक तिल ॥ देवादर चढ़ि साहि । भूमि लिज्ज सु उभय मिलि ॥ सुनि साह घाव नौसान किय । चढ्यौ सेन चतुरंग सजि ॥ हय गय समूह साकति सकल । अनंगपाल साहस्स कज ॥छं॥७३॥ सुलतान शाहबुद्दीन की सेना की चढ़ाई तथा सरदारो का वर्णन । चढ़त साहि साहाब । चन्यौ तत्तार खान बर ॥ पान पान 'घुरसान । षान मारुफ महा भर ॥ कालिम पान कमाम । मोर नासेर अभंगह ॥ अलूषान आलौल । चढ़िय हय गय चतुरंगह ॥ सथ सयन सकल सारड 'लष। उभय सहस मत मत्त इभ ॥ नौसान बज्जि नौबति निहसि । रहे गज्ज धर पुर सु नभर्छ ०७४॥ छंद लघुनाराच ॥ चल्यौ सहाब सज्जियं । निसान जोर बज्जियं । मिले "सु साह उम्मर । सजे अनूप संभर ॥ ई० ॥ ७५ ॥ गयंद मह गंधयं । सुझ न राह अंधयं ॥ पगं ठिलै पहारयं । नगं पर निहारयं ॥ छं० ॥ ७६ ॥ सकाज बाज साजयं । कुरंग देषि लाजय । अनूप चाल उज्जवै । ससूर चित्त रिझझवै ॥ छ० ॥ ७७ (१) ए.-पुरसेम । (३) ए.-लष, लष्षि । (२) ए. कृ. को.-नासेंना ( ४ ) ए. क. को.-जु ।
अट्ठाइसबां समय १७ ] पृथ्वीराजरासो। ६२९ रजोद मोद उष्पलौ । सपूर सूर पपलौ ॥ रिधे सु साहि आतुरं। क सु अंग कातरं ॥ छं० ॥ ७८ ॥ लगन्न छीन उल्लहं । घुड़े जु दूरि दुल्लहं॥ न आन पान जानयं । उड़ान ज्यौं सिँचानयं ॥ छं० ॥ ७६ ॥ करंत इल्लगारयं । सु आप सिंधु पारयं ॥ छं० ॥ ८० ॥ सिन्धु पार उतरकर, बीस हजार सेना साथ देकर सुलतान ने तातार खां को अनंगपाल को लाने के लिये हरिद्वार भेजा। तातार ख़ां के आने का समाचार सुनकर अनंगपाल बड़े हर्ष से उससे मिला। कवित्त ॥ सिंधु उतरि सुरतान । कह्यो सम पान ततारह ॥ तुम अनगेसह लैन । जाहु अँह त ह हरिदारह ॥ सहस बीस लै सेन । अनँग सम मिलिय सोनपुर ॥ बिलम करहु जिन बहुत । अभंग सजि आवहु आतुर ॥ करि नबनि पान तत्तार चलि । पहुँच्यौ हरहारह सहर ॥ करि षवरि तब अति प्रौत तन । मिल्यौ राज अनगेस बर ।। छं० ॥८१॥ अनंगपाल ने बहुत से घोड़े मोल लिये और सेना भरती करके लड़ाई की तयारी की। दूहा ॥ तह तोंअर अनगेस नृप । लए मोल बहु बाज ॥ उभय सहस सेना सजित । रषि सुभर किय साज ॥ छं० ॥८२ ॥ तीन सौ वीर जो अनंगपाल के साथ वैरागी हो गए थे वे भी तलवार बांध कर लड़ने के लिये तयार हुए। सत्त तौन भर सुभर जे। निज वैराग सरूप ॥ तिन बंधी तरवार फिरि । बदलि भेष बह रूप ॥ छं० ॥८३ ॥ १६ पृथ्वीराजराहो। [ अट्ठाइसंवों समय १८ तातार खां ने रात भर रहकर सबेरे उठते ही अनंगपाल के साथ कूच किया। अनंगपाल को दो योजन पर रोक कर आगे से बढ़कर उसने सुलतान को समाचार दिया, सुलतान आकर अनंगपाल से मिला, दोनों एक साथ बड़े प्रेम के साथ सलाह करने लगे। कवित्त ॥ मिले षान तत्तार। बत्त मत तत्त रत्त बर ॥ दै निसान पह, फटत । चले पुर सोन उभै भर ॥ भए साह दल निकट । रषि जोजन जुग अंतर ॥ दुई षबरि सुलतान । चढ्यौ साहाब समंतर ॥ दस कोस अग्ग अनगेस कहूं । मिल्यौ जाइ साहिब सुहित ॥ बैठे सु उतरि अति प्रौति पर । भनहु उभै जन इक्क चित ॥छ ॥८॥ अनंगपाल ने सब वृत्तान्त सुनाया, दोनों की सलाह हुई कि जो पृथ्वीराज आप आकर हाजिर हो जाय तो उसे जीव दान करना चाहिए। सुलतान ने दूत के हाथ पृथ्वीराज के पास पत्र भेजा कि तुम बड़ा अनुचित करते हो जो राजा को राज नहीं सौंप देते और जो पृथ्वी न लौटाओ तो आकर युद्ध करो । पृथ्वीराज ने कहा कि ऐसी कोटि चढ़ाई क्यों न करै अनंगपाल अब राज्य उलटा नहीं पा सकता। पद्धरी ॥ सुरतान समिलि नृप अन्नगेस। किय अनग समह पतिसाह पेस गज पंच मत्त पंचास बाज। साकत्ति सज्जि दिय अनगराज ॥ छं० ॥८५॥ किरवान "तोन कम्मान एक । सिरपाव स्वातसुत माल मेक ॥ दै प्रौति चढ़े निस्सान पाव । आए सु सोनपुर उमै ठाव ॥छं०॥८६॥ (१) ए.-तीन, संमान, सामान ।
ऑटोइसा समय १६ ] पृथ्वीराजरासो। इलाहवा मिल साह अनग बैठे सुमत्त । तत्तार पानपाना सुचित्त ॥ कहि अनगपाल नृप पुब्ब कथ्थ । चहुआन मन न मानै समथ्थ ॥ छं० ॥८७॥ जंपै सु साह चढ़ि चलौ प्रात । भंजे सु जुग्गनिय पुरह जात ॥ जो मिलिह अप्प चहुआन आनि। दीजै तौ उभय मिलि प्रान दान॥ छं० ॥८॥ मंनी सुराज अनगेस मन्न । उच्चन्यौ तांम तत्तार पन्न ॥ देषो सु अप्प दूतह पठाइय । लिष्यौ सुबत्त सम विषम दाई ॥ छं० ॥६॥ चर चारु चाहि हकारि लोन । लिषि तत्त पत्त तिन हथ्य दोन ॥ अनगेस पुचि सुत तुम्म अप्प । तुम समपि राज गय बद्रि तप्प ॥ छं ॥१०॥ करि तप्प आइ फिरि अन्नगेस । दिज्जै सु इनहि हय गय सु देस ॥ आनौ न चित्त चहुआन और । जग्गे सु सामि न बिरस्स चौर ॥ छं० ॥११॥ भुगई न जाइ पर लेइ बस्त । समपौ सुराइ आनग समस्त ॥ गा चार पहर चारै सु गोइ । कबहूं न धेन बर धनी होइ॥छं०॥२॥ थनवार अस्व सपै सु राज । ना होइ अोय पति तास बाज ॥ करसनी कृषि रष्षी सुभाय । तिन भोग सुभर रावर 'सुभाय ॥ छं० ॥१३॥ अप्पो सु देस अनगेस रस्म । जिन करौ अप्प मझमह विरस्म ॥ भये बिरस सुष्य पावै न कोइ । हम देत सौष तुम हितू होई ॥ छ० ॥१४॥ भये बौरस सुष्प कह भयौ पंड । कुल सकल नास भौ वप्पु षंड ॥ अप्पौं न भूमि जो जीय सुद्ध । तो सजहु यानि इन समहि जुद्ध ॥ छं० ॥६५॥ दिय पच दूत प्रथिराज जाइ । सुनि श्रवन अप्प बहु दुष्प पाइ ॥ अनगेस राज सुलतान जोर । ऐसे जु सजै कोटिक्क ओरछं०॥६६॥ (१) मो.-सुजाय ।
Kરૂર पृथ्वीराजरासो। [अठ्ठाइसवां समय २० पावै न तज दिली सु थान । झुकि राव घाव कौनौ निसान ॥ छं० ॥१७॥ पृथ्वीराज ने डके पर चोट लगा कर सब सरदारों के साथ किया और दो योजन पर डेरा डाला। गाथा ॥ झुकि किय घाय निसानं । चढ़ि प्रथिराज बाज साजेयं । सब सामत समेतं । दिय डेरा सु दोइ जोजनयं ॥ छं० ॥८॥ दूत ने आकर पृथ्वीराज के चढ़ने का समाचार सुलतान से कहा । जो सब सरदार विरक्त हो गए थे वे भी स्वामि के काम के लिये लड़ने को प्रस्तुत हुए। दूहा ॥ देषि दूत गये साहि ढिग । कही षबरि प्रथिराज ॥ चढ्यौ सूर सेंभर धनी । हय गय दल बल साज ॥ छं० ॥ ६ ॥ सामत स्वर समस्त बर । भय संसार विरत्त॥ स्वामि धम्म साधन सु बर । मरन लरन मन रत्त ॥ छं० ॥ १०० ॥ सुलतान ने दूत से समाचार सुन कर चढ़ाई का हुक्म दिया। अरिल्ल ॥ संभलि बत्त 'चरं 'सुलतानं । निहसे बज्जि सु बौर निसानं ॥ भयौ हुकुम साहाब अमानह । सजहु अमौर उम्मरा पानह ॥ छं० ॥ १०१॥ पृथ्वीराज के चरों ने सुलतान के कूच का समाचार पृथ्वीराज को दिया जिसे सुनते ही वह भी लड़ाई के लिये चल पड़ा। दूहा ॥ चर सु दिष्षि चहुआन कै । साह षबरि कहि राज ॥ सुनत राज प्रथिराज बर । चल्यौ जुद्ध कज साज ॥ छं० ॥ १०२ ॥ धूमधाम के साथ पृथ्वीराज सेना के साथ चला, जब दोनों सेनाएं एक दूसरे से दो कोस पर रह गई तब पृथ्वीराज ने डङ्के पर चोट दी। (१) ए.-बरं। (२) रु. ए.-सुरतानह, निसानह । (३ ) मो.-बज्जे ।
अट्ठाइसवां समय २१ ] पृथ्वीराजरासो। ६३३ । चोटक ॥ सजि साज चल्यौ प्रथिराज बरं । सत सामत सूर सपूर भरं॥ विरदैत महाबर बीर बली । तिन सों किन जात न रार कली ॥ छ० ॥१०३॥ परसें भिरि भारथ पारथ से । न वदें अप ऊपर आनन से ॥ जुध को तिनके मुष कोंन जुरे । न मुरें मुष धार अनी सुमुरे ॥ छं॥१०४॥ सजि साहन सेन हजार दसं । रह सेर सवान सु बौर रसं ॥ गज सत्त दसं मुर मत्त गजै। तिन देषि बंध्याचल पञ्च लजै॥छ०॥१०॥ घमके घन घुघ्घर घंट बनं । भननंकत भौरनि झऔर भनं ॥ गति देषि तुरंग कुरंग दुरें।तिन के उर अठुन कोट परें॥छं०॥१०६॥ चहुआन चढ्यौ चतुरंग दलं । सजि भैरव भूत विताल बलं ॥ चर चौसठ जुग्गिनि सथ्य चलौं । किलकै करि भारथ बैर रलौं ॥ छं०॥१०७॥ चमकंत सनाह सु जोति इसौ । सु करं मधि मूरति बिंब जिसौ ॥ सजि टोप रंगावलि हथ्य लयं । बनि राज सु पप्पर सा 'वलयं ।। छं० ॥१०८॥ दोइ कोस रह्यौ विच साहि दलं । चहुआन निसान व सबलं । छं० ॥ १०६॥ पृथ्वीराज के पहुंचने का समाचार सुनते ही सुलतान ने अपने सरदारों को भी बढ़ने का हुक्म दिया। दूहा ॥ सजि आयौ चहुआन जुध । सुन्यौ श्रवन पतिसाहि ॥ हुकम पान उमरान हुअ । सज्यौ अंग सन्नाह ॥ छं० ॥ ११० ॥ आगे तातार खां को रक्खा, मारूफ खां को बाई ओर और खुरासान खां को दाहिनी ओर अनंगपाल को बीच में करके पीछे आप हो लिया। (१) मो.-पसरें। ३) ए.-हाथ । (२) ए. कृ. को.-सत्त मुरं मदमत गर्ने । ( ४ ) मो.-परकर । (५) मो.-बनयं ।
पृथ्वीराजरासो। [ अट्ठाइसवां समय २२ ६३४ गाथा ॥ मुण्ष सुरिष्षी ततारं । बाई दिसा पान मारूफं ॥ दाहिन पाँ पुरसानं । मड्डि अनगेस पुठ्ठि साहाबं ॥ छं० ॥१११॥ पृथ्वीराज ने भी अपनी सेना की व्यूह रचना की। आगे कैमास को और पीछे चावंडराय को कर दिया। सजि ठौ सुलतानं । सुनि चहुआन श्रप व्यूहानं ॥ मुष कौनौ कैमासं। चावडराइ पुच्छ सज्जायं ॥ छं० ॥ ११२ ।। अपनी सेना को बीच में रक्खा और आज्ञा दी कि अनंगपाल को कोई मारे नहीं, जीते ही पकड़ना चाहिए। दूहा ॥ मड्डि फौज प्रथिराज रचि । कह्यौ सु कर करि उच ॥ अनंग राज जीवत 'गहौ । इह सु रचौ परपंच ॥ छं० ॥ ११३ ॥ दोनों दलों का सामना हुआ कैमास ने युद्धारम्भ किया । जिन सुहनौ अनगेस जिय। गहौ सु जीयत 'सास ॥ इतें दुदल दिठ्ठाल भय । लई बग्ग कैमास ॥ छं० ॥ ११४ ।। दोनों दल का सामना होते ही घमसान युद्ध होने लगा। बिह दल बल सिंधू बजे। उपजत सूर उहास ॥ 'प्योहनि पर नषौ षयंग । करि कलको कैमास ॥ छ० ॥ ११५ ॥ कैमास ने शस्त्र संभाल कर युद्धरम्भ किया।युद्ध का वर्णन। मुजंगी ॥ लई षग कैमास बोरं अमानं । धर्मके धरा गोम गज्जे गुमानं ॥ उतें उम्परी बाग तत्तार षानं। मिले हिदु मौरं दोज दोन मानं ॥ छ० ॥११६॥ 'वजे राग सिंधू सु मारु अवग्गे । गजे सूर सूरं असूरं सुभग्गे ॥ चढ़े व्योम विम्मान देपंत देवं । वढं स्वामि कज्जै सु सज्ज उभेवं ॥ छं० ॥ ११७॥ (१) ए. कृ. को.-गहें गहै । (२) मा.-साह । (३) ए. कृ. को.-बोहनि। (४) ए. कृ. (५) ए. कृ. को.-भज्जे । को.. वज्जे।
प्रहाइसवां समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । ६३५ छुटे नाल गोला हवाई उछंगे। 'न षिचं मनो जानि 'तुट्टे निहंगं॥ करव्य चलै बान बानं कमानं । भई अँध धुंधं न सुझभौति भानं ॥ छं० ॥ ११८ ॥ मिले सेल भेलं समेलं अपार । सनाह फटें होय होवत्त पारं॥ मदं मत्त दंतं उषारै मसंदं । मनों भिल्लिया पञ्च उष्पालि कंदं ।। छं० ॥११६॥ लगै नाग नागं मुषौ सूर ऐचै। हथन्नापुरं जानि बलिभद्र पेंचे। झर ओझर झार झार भनेकै । कर गज्ज चिक्कार "ताजी किनंकै।। छं० ॥ १२० ॥ इयं पूरनं जाम मध्यान जंत्री। मिले दिछ तत्तार आनंग मत्री ।। चलै मातुलं ओर हक्क कमासं। हन्यो पान घग्गं पहुंचे वृहासं ।। छं०॥ १२१॥ तकै तूंबर पै लयौ गज्ज राज । धपे दाहिमा पागरा छंडि बाज ॥ जरी सेल गादी विचं पौलवानं । बियो घाव कौयौ सु कदै क्रपानं ॥ छं० ॥१२२॥ कटौ दंत लौ सुंड लोहौ भभक्क । मनों सारदा कंदरा थी उबक्क । पन्यो कज्जल'कूट ज्यौं तूटि हथ्यौ। तजे तूंअर भज्जिगे सब्ब सथ्थी॥ छं० ॥ १२३॥ भगंदंत वालौ किधा सु प्रतीक। महा दिघ्घ कायं अरज्जुन्न भोकं । दबी हादसं कोस भू घंट मद्धे । पढ़े बेद बानी पुरानं प्रसिद्ध ॥ छं॥१२४॥ पौ दाहिमा भौम ज्यौं गोल कूडै । घटो कल्ल पथ्यं न सथ्य उमड। अलुभयो पगं अग्ग में इभ्भ राज। हरौ जेम कहे करी मथ्थ गाजं ॥ छं० ॥१२५ ॥ किलावा रह्यौ पग्ग में लग्ग पासी। ग्रह्यौ जीवतौ बद्रिकाश्रम्म बासी॥ सनहूँ रहि कट्टियं अद्ध विवौ । चढ़ी हथ्थ दिल्ली न कारज्ज सिद्धौ। छं० ॥ १२६॥ (३) ए. कृ. को.-सुझैसु । ( १ ) ए. कृ. को.-नछत्रं । ( ४ ) मो.-बाजी (२) मो.-छुटे । (५) सो कृ.को.-पति ।
पृथ्वीराजरासो। ६३६ [ भट्ठाइसवां समय २४ १ उभै मौत मानी रहे लग्गि छत्तौ। पछे भौर सामंत की आइ पत्तौ ॥ पुरासान मारूफ तत्तार जोरौ । करें एक फौज धप्पो साहि गोरी॥ छ । १२७॥ इत चहुआनं भुजा के भरोसें । मनों 'लंघनो सिंघ तुट्टो सरोसें ॥ गढ़ इंदपथ्य सु हायं सु कज्जें । उभै दौन जुट्टे करे षग्ग धज्जें ॥ छं० ॥ १२८॥ रसं लूक लगे हुए टूक टूकं । रिनं षत्त प? पुराने अचूकं ॥ थटे जाइ आघाट बैकुंठ थानं । मिव्यौ नट्ट गोटा जिसौ आव जान । छं० ॥ १२६॥ बरं चंग चंगे परी हर सुरं । र, रंडमालं महेसं गरूरं। सिवा श्रोन धप्पो सु कौनौ डकारं। करें षेचरा भूचरा किल्लकार' । छं० ॥ १३० ॥ उड़े रेनं गेंनं भयौ अंधकार । परार न अप्पं न सुझझ लगारं इसौ भांति भारथ्य मंतौ करूर । घरौ च्यार पंच रह्यौ रथ्य सूर। छं० ॥ १३१ ॥ हरदार लों जाइ लायौ सु भगौ। सबै सेन भग्गौ तिनं लार लग्गौ ॥ रह्यौ पातिसाहं भुजं लाज झल्ले। पर पंचि साइक्क छंडै सु भन्ने ॥ छं० ॥ १३२॥ गर्ने कोन नामं अनेक फवज्ज । लग्यौ दाहिमा के तुरंगम्म कज्ज॥ बड़गुज्जर कम्मधज्ज पुंडीर। छलं पारि दौ-यो करे नाहिं सौर। छं० ॥ १३३ ॥ धरे सिप्पर अड्ड ह्र काल भेसं । लियौ संग्रहै चौंडरा गज्जनेसं ॥ फटे पारसं सत्त साहस मौरं। परे पंचसै घेत हिंदू सु बौरं॥ छं० ॥१३४ ॥ उभै पाहुने कौन चंदं प्रकासे । ढले मुष्प मंगे प्रथोपत्ति पासे ॥ छं० ॥ १३५॥ । ( २ ) मो.- प्रति "हकं एक एकं सहायं सु कज्जे"। ( १ ) ए.-लंघलं, लंघने,लंघनं । (२) मो.-सही के। (३) ए. कृ. को.-पीनौ ।
अट्ठाइसवां समय २५ ] पृथ्वीराजरासो। शहाबुद्दीन को चावंड राय ने पकड़ लिया, पृथ्वीराज की जय हुई सात हज़ार मुसलमान और पांच सौ हिन्दू मारे गए। कवित्त ॥ बंधि साहि साहाब । लियौ चावंड राय बर ॥ हय कंधह लै डारि । गयौ निज सथ्य सेन नर ॥ नौर उतरि पतिअसुर । घेत हुँब्धौ प्रथिराज ॥ मुसलमान सत सहस । परे सामथ करि काज॥ पंच सै सुभर हिंदू सु परि । उभै सत्ति भोरी सु जगि ॥ जित्यौ सु राज सोमेस सुत्र । 'घनै जैत बज्ज बजिग ॥ छं० ॥१३६ ॥ पृथ्वीराज का सुलतान को कैद में भेज कर अनंगपाल को आदर सहित दरबार में बुला कर उन के पैर पड़ना। मुसलमान धर गड्डि । दाग निज सुभर दिवायौ ॥ लिये जीति प्रथिराज । समह सामँत घर आयौ सभा बैठ भर सुभर । कह्यौ कैमास राइ गुर ॥ अन्गेसह लै आउ । चल्यौ मंत्रौं सु लेन घर ॥ आन्यौ सुराज अनगेस त ह । प्रथौराज लग्गौ सु पय ॥ सनमान प्रान अति प्रौति सो भाव भगत राजन करय ॥छं० ॥१३७॥ दाहिम राव को हुक्म देकर सुलतान को दरबार में बुलाना, उसके आने पर पृथ्वीराज का अनंगपाल से कहना कि आप तो बड़े बुद्धिमान हैं आप इस शाह के बहकाने में क्यों आ गए ? दियौ हुकम दाहिम्म । ल्याउ दीवान साह कहु । सब देखें सामंत । मुक्ति आनन अपत्ति बहु ॥ (१) ए. कृ. को.-बजे। २० ६३६ पृथ्वीराजरासो। [अट्ठाइसवां समय २६ आन्यौ साहि हजूर । मिल्यौ प्रथिराज राज बर ॥ बैठि साह साहाब । मुष्प देखें जु 'सुभर भर ॥ बौल्यौ जु राज प्रथिराज बर । अनगराइ तुम अति सुमति । भरमौ सु केम कहिं साहि के । इह तौ पति उत्तरि अपति ॥ छ० ॥१३८॥ M दूहाः। कहै राज प्रथिराज गुर । सुभर बोलि बर अग्ग ॥ अनग सौस उंच न करै । नाग दमन सिर नग्ग ॥ छं० ॥ १३६ ॥ सरदार गहलौत ने कहा इसमें महाराज अनंगपाल का दोष नहीं है यह सब प्रपंच दीवान का रचा हुआ है। कवित्त ॥ कहै गज्जि गहिलौत । कडू सामंत सुनौ सहु ॥ अप्प अनी एकंत । 'असुर सुरतान बही कहु ॥ समुद सजल जल पार । ससौ लग्नौ सु कल कहं ॥ सूर मिल स्स राह । पंथ लुट्टाइ गोय बहु ॥ दसरथ्य श्राप काक सु विक्रम । दइ दिवान विपरीत गति पतिसाह कही सुनतें सकल । अनगपाल नही सुमति ॥छं० ॥१४॥ चामुंड राय का कहना कि कुसंग का यही फल होता है। दूहा ॥ बदै राइ चामंड बर । इह अवस्थ होइ अंग ॥ जब सु मानसर तजि करै । हंस काग को संग ॥ छं० ॥ १४१ ॥ सामंतों ने जितनी बातें कहीं सब अनङ्गपाल नीचा सिर किए सुनता रहा कुछ न बोला। जिते वचन सामत कहे । तिते सहे अमगौस ॥ पौल चौलह सम सुनि रह्यौ । उद्यौ न जरध सौस ॥ छं० ॥ १४२ ॥ पृथ्वीराज का शाह को एक घोड़ा और सिरोपाव (खिल्लत) देकर छोड़ देना। (३) कु.-गाजि । (४) मो.-एकंग (१) मो.-सुर सुभर । (२) ए. कृ. को.-पानि (५) ए. कृ. को.-असुरन नं निबही कहूं ।
अट्ठाइसवां समय २७ ] पृथ्वीराजरासो। ६३९ - भाव भगति प्रथिराज ने। कौनी अति महिमान ॥ इक्क बाज सिरपाव दै । छडि दियौ सुरतान ॥ छं० ॥ १४३ ॥ शहाबुद्दीन का घोड़े हाथी और दो लाख मुद्रा दंड देना और पृथ्वीराज का उसे सामंतों में बांट देना । कवित्त ॥ छाडि दियौ सुरतान । डंड 'कञ्चल कियौ सिर ॥ बौस हस्ति सत बाज । उंच जाति गातह गिर ॥. उभै लष्ष बर द्रव्य । दियौ साहाब सु दंडं। सो प्रथिराज मरिंद । अड्ड दीनौ चामंडं॥ अध दंड सब्ब सामंत कहुं। बंटि दियौ चहुआन बर ॥ दै दंड पत्त नर बर सुभर । प्रथौराज छौवै न कर ॥ छं० ॥ १४४ ॥ म्लेच्छ को जीत कर पृथ्वीराज दिल्ली आया। दूहा । मेच्छ बंध चहुबान ने। लिये हयग्गय भार ॥ फिरि प्रसन्न प्रथिराज किय । दिल्ली कोटह बार ॥ छ ॥ १४५ ॥ बरष एक पच्छ बपति । तब लगि भर सबलान । समौ हयग्गय दल सजें। चतुरंगी चहुआन ॥ छं० ॥ १४६ ॥ राजा से राव पज्जून, गोयन्द राय आदि सामंत आकर मिले। कवित्त ॥ मिल्यौ राव पज्जून । मिल्यौ मोरी महनंसिय ॥ मिले राव पुंडौर । गए 'दुजन वल नंसिय ॥ मिले निडर रद्यौर। मिल गोइँद गहिलौतं ॥ मिल्लि षौची पज्जून । जाम जद्दौं पहिलौतं । आरभ राव कनक मिल्यौ । रघुबंसी हय जारही ॥ कविचंद मिल्यौ जयचंद को। नाम सभट्टा भारहो ॥ छ॥१४७ ॥ अनंगपाल का मंत्री से पूछना कि अब मुझे क्या करना उचित है। (१) मो. कछू लै । (४) मो.-खल । (२) ए.-हस्सि। (३) ए. ऊंच जाति सुतहि गिर ।
[ अट्ठाइसवां समय २८ पृथ्वीराजरासो। ६४० अरिल्ल ॥ तब सुमंत परधानह पुच्छिय । कहौ मंत मंत्री मत अच्छिय ॥ किहि विधि कम्म ध्रम्म जस रष्यै। सुनि परधान एह विधि अध्षै ।। छं० ॥ १४८॥ मंत्री ने कहा कि महाराज आप अब बूढ़े हुए मृत्यु समय निकट है और पृथ्वीराज को दिल्ली आप दे चुके हैं अब इसका मोह छोड़ कर धर्म कर्म कीजिए। दूहा ॥ अनगपाल तिन पावि ग्रह । अरु बर बंधव साल ॥ वृड्व जोग वपुजोग धरि । चंपि जरा अरि काल ॥ ॥छ ॥१४८॥ जोगिनपुर प्रथिराज कौ । दैव दियौ दिन बित्त ॥ मोह बंध बंधन तजे । भ्रम क्रम कौज चित्त ॥ छ ॥ १५० ॥ मंत्री का कहना कि संसार के सब पदार्थ नाशमान हैं इस की चिन्ता न कीजिए। कवित्त ॥ न रहै सर वापीय । अनुप गढ़ मँडप बहुज्ज ॥ न रहै धन बन तरुनि । कूप प्रबत फिरि छज्ज ॥ न रहै ससि रबि भोम । जाइ 'थाबर अरु जगम ॥ न रहै सात समंद । धरै भंजय सोइ अंगम ॥ जानहु न प्रल चतुरंग तम । प्रल इहै सो दिष्षियै॥ राषौ न चिंत आचिंतका । जीमन मरन विसिप्षियै ॥ छ० ॥१५१ ॥ रानी का सलाह देना कि पृथ्वीराज से आधा पंजाब का राज्य ले लो अथवा जो व्यास जी कहैं सो करो। पुनि बरज्यौ नृप बीय । जौय तिय 'तीय उतारिय ॥ तजिय मान घरवार । पुच्छयौ व्यास हकारिय ॥ चाहुान अरि भज्जि । होइ धर अनग नरेसं ॥ पंच नदी करि अद्ध । बंटि अप्पै अध देसं ॥ (१) ए.-अवर अवर । (२) मो.-मीस । in/nayni meerut अट्ठाइसवां समय २६ ] पृथ्वीराजरानो। ६४१ तुम कहौ जोति जग जोति बिय । इह अपुछ कथ मडिकैं। कै ग्रहौ पंथ बद्री सरन । धरा काम कलि छडि कैं। छं० ॥ १५२ ॥ व्यास जी का कहना कि बलवान पृथ्वीराज को दिल्ली का राज्य करने दीजिए आप गुरु का ध्यान करके तप कीजिए। कहै व्यास अनगेस । तपै ढिल्लो चहुआनं॥ बहु बर बल छज्जि है। बंध मीषन सुलतानं ॥ तुम बद्रौ तप जाहु । धरा संदेस न आनहु ॥ इह विम्मान प्रमान । पुब्ब संबंधन जानहु ॥ विम्मलौ ध्यान गुर ग्यान करि । हरि भजि विम्मल होइ है। नन करौ चित्त दुविधा बपति । अत्त पुरत्तन पोइहै ॥छं० ॥१५३॥ राज्य धन सम्मान मांगने से नहीं मिलता और न बल से स्नेह होता है। न लहै मांग्यौ देस । बेस पुनि माग्यौ न लहै । न लहै मंग्यौ मान । पान फुनि माग्यौ न लहै ॥ न लहै धन मगत्त । गत्त फुनि रूप 'बिनानं ॥ पुब्ब निबंध्यौ बंध । लहै सोई परिमानं ॥ तुम जान ग्यान मतिमान गुर । नेह न लम्भ जोर बर ॥ आतम्म चित्त अनचिंत तजि । इहै मत्त तुम सत्त करि ॥छ०॥१५४॥ मेरा मत मानो कि बद्रीनाथ जी की शरण में जाकर कन्दमूल फल खाकर तप करो। अरिल्ल ॥ मानि मंत तुम तूंवर छंडिय। जाइ सरन बद्रौ तप मडिय ॥ कंद मूल आहार अचानिय । कै बन फल तन धारन पानिय ॥ छं० ॥१५५॥ १) ए.-तन, .-मम ( २ ) मो. षोइये, हाइये । (३) ए.-निनानं ।
[ अट्ठाइसवां समय ३० દર पृथ्वीराजरामो। पृथ्वीराज ने अनङ्गपाल की बड़ी सेवा की जब तेरह महीने बीत गए तब अनङ्गपाल ने दौहित्र (पृथ्वीराज) से कहा कि अब मुझे बद्रीनाथ पहुंचा दो वहां बैठ कर तप और भगवान का भजन करूं. पृथ्वीराज ने कहा कि आप यहीं बैठकर तप भजन कर सकते हैं। कवित्त ॥ अनगराइ अति सेव । करै प्रथिराज राज अति ॥ मास एक दृष वित्त । बहुरि उपजी सु राज मति ॥ कयौ पुचि सुत समह । मोहिं मुक्कलि बद्री दिस ॥ तहां 'बपु साधन करो। धरी हरि ध्यान अहो निसि ।। बोल्यौ सु राज चहुआन बर । रहौ इहां साधन करौ ॥ तप तुला दान धर्मह बिबिध । ध्यान ग्यान हिरदै धरौ ॥ छं० ॥१५६ ॥ पृथ्वीराज ने बहुत समझाया पर अनङ्गपाल ने एक न माना उसे बद्रीनाथ जाने की लौ लगी रही। तब पृथ्वीराज ने बड़े आदर के साथ दस लाख रुपया सात नौकर और दस ब्राह्मण साथ देकर उन्हें बद्रीनाथ पहुंचा दिया। अनङ्गपाल वहांजाकर तपस्या करने लगा। कही सुत्त सोमेस । राज अनगेस न मानौ ॥ बपु साधन तप काज । बद्रि दिसि मनसा ठानी ॥ तब पुची बर पुत्र । लष्ष दह द्रव्य सु अप्पौ। सत अनुचर इक जान । बिप्र दस एक समप्पौ ॥ (१) मो.-तप । (२) ए.-अहि ।
ट्ठाइसवां समय ३१ ] पृथ्वीराजरासो। ६४३ चल्यौ अनंग बद्रौ सरन । पहुंचायौ प्रथिराज नृप ॥ तहं जाइ राज तोंवर सुवर । तपै राज उग्रह सु तप ॥ छं० ॥ १५७ ॥ पृथ्वीराज की सहानुभूति दयालुता और बीरता की प्रशंसां । धनि सु चित्त प्रथिराज । करुन रस आप उपन्नौ ॥ द्रव्य दरक सत अव । पुन्य कारन भरि दिन्नौ ॥ सब सुभर अनगान । आनि आदर ग्रह बासिय ॥ धनि धनि जप लोइ । कित्ति भू मंडल भासिय ॥ आषेट दुष्ट दुजन दलन । कर केलि नामत सथ ॥ कबि चंद छंद बंधिय कवित । प्रथ्थिराज भारथ्य कथ ॥छं० ॥१५८॥ इति श्री कविचंद विरचिते प्रथिराज रासके अनंगपाल ढिल्ली आगमन फिरि प्रथिराज जुरन बद्री तप सरन नाम अठाविसमो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ २८॥ दूसरा भाग समाप्त ।]