Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Shri Mahaveer Satu
Front matter
No text on this page.
सीता श्रीमहावीरस्तुतिः। गाथा-पुच्छितु गा नमणा माहा य, अगारिणा या परतित्थिया य । सेकेड गोगंतहियं धम्ममाहु, अणेलिम साहुममिक्वयाए ॥१॥ छाया-पटवन्तः श्रमगा बामगाश्च. ग्रगाग्गिाश्च परतीथिकाश्च । मक नकान्तहितं धर्ममाह. अनीश माधुसमीनया ||१|| अन्वयार्थ-(समणा) नाधु (भाहणा) ब्राह्मण (य) और (अगारिणो) श्रावक लोग (य) नथा (परिनित्यिया) बौद्ध याटि पग्मनायलम्बी (पुलिस) पृछने लंग कि जिनन (साह- समिक्वयाए) गन्नी मानि विचार करके (गगनहियं) सर्वथा हित काय (अणेलिन ) अनुपम (रूस) धर्म (प्राहु) कहा हैं (से) वा, (केह) बीन है॥ भावार्थ-वधा स्वामी ने जम्मवाना पछी टंगे. आर्य ! संपार नमन में पार कर देने वाला दिनका और अनुपम में मिलने बताया है ? म माधु. नया मालम्नियों ने पहा ॥१॥ . नाममा सोठियामधमाशा (२) गाथा--कहं च णाणं कहं दंसणं से, सोलं कहं नायसुतस्स आसी। जाणासि णं भिक्खु ! जहातहेणं, अहासुतं ब्रूहि जहाणिसंतं ॥२॥ छाया--कथञ्च ज्ञानं कथं दर्शनं तस्य, शीलं कथं ज्ञातसुतस्यासीत् । जानीषे भिक्षो ! याथातथ्येन, यथाश्रुतं ब्रूहि यथानिशान्तम् ।। अन्वयार्थ--(से ) उस (नायसुतस्स) भगवान् महावीर का (गाणं) ज्ञान (कहं ) कैसा था, (दसणं) दर्शन (कहं) कैसा था, और( सीलं) शील ( कहं ) कैसा था ( भिवावु!) है मुधर्मास्वामिन् ! आप ( जहातहेणं) ठीक ठीक (जाणासि) जानते हो अतः ( अहासुतं ) जैसा सुना है और ( जहागिसंत) जैसा निश्चय किया है, वैसा (हि ) कहो । भावार्थ--जम्बूस्वामी सुधर्मा स्वामी से फिर पूछने लगे कि, हे सुधर्म स्वामिन् ! आप ठीक ठीक जानते हैं, इसलिये कृपा करके यह बता- इये कि भगवान् महावीर का ज्ञान कैसा था ? और उन्होने उसे कैसे पाया था ? तथा उन का दर्शन-सामान्यप्रतिभास और यम नियम आदि शील किस प्रकार के थे ॥ २ ॥ गाथा-खेयन्ने से कुसले महेसी, अणतनाणी य अणंतदंसी । जसलिणो चखुपहे ठियस्स जाणादि धम्मं च धिंड च पेहि ॥३॥ ."
महावीरस्तुति छाया-खेदज्ञः (क्षेत्रज्ञः) स कुशलो महर्षिः, अनन्तज्ञानी च अनन्तदी। यशस्वी चतुप्पथे स्थितस्य, जानीहि धर्मञ्च धृतिञ्च प्रेक्षस्व ॥३॥ अन्वयार्थ-(से) भगवान् महावीर (खेयत्ने) खेद पथवा क्षेत्र-आत्मा को जानने वाले (कुसले) कुशल (महेसी) महर्षि ( अगांतनाणी ) अनन्त ज्ञानवान् ( अणंतदंसी ) अनन्त दर्शनवाले (य) और ( जसंसिणो ) यशस्वी हैं । अतः अर्हन्त दशामें भगवान् को(चक्खुपहे) आँखो के विषय रूप से (ठियस्स) स्थित (जाणादि) जानो (च) और (धम्म) भगवान् के बताए हुए धर्म को (च) और (धिइं) संयम दृढ़ता को (पेहि ) देखो॥ भावार्थ-जम्वृस्यामी के इस प्रकार पूछने पर सुधर्मा स्वामी भ- गवान के दर्शन, ज्ञान, शील और यश आदि का वर्णन करने लगे। बोले- भगवान महावीर, संमारी जीवो के दुःग्वको-जो कि कर्मों के फलसे पैदा होता है जानते थे, क्योकि उसके दूर करने का यथावत् उपदेश दिया है। प्रात्मा के सच्चे स्वरूप के ज्ञाता थे, कर्मरूपी कुश को उखाड़ने में कु- शन्ट थे. महान् मृपि थे, अनन्नपदार्थों के जानने वाले होने से अनन्त ज्ञानी थे. अनदर्शन-कवलदानवाले थे. तथा अक्षय और अतुल कीर्तिवाले थे. अनय भगवान को अहन्नदशा में आग्वो के समान सूक्ष्मादि पदार्थों के दिवाने वाले जानकर उनके बताए हुए धर्म को, तथा चरित्र सम्बन्धी बदनामचिनाग॥३॥ गाथा--उई अदेयं तिरिय दिनासु, तम्मा यजेथावर जे र पागगा।
सेटियाग्रन्थमाला (४) से णिच्चणिचेहि समिक्ख पन्ने, दीवे व धम्म समियं उदाहु ॥४॥ छाया-उर्दूमधस्तिर्यक्षु दिक्षु. त्रसाश्च ये स्थावग ये च । स नित्यानित्याभ्यां समीक्ष्य प्राज्ञः. दीप ( द्वीप ) इव धर्म समितमुदाह ॥ ४ ॥ अन्वयार्थ-- (से) उन (पन्ने ) केवलज्ञानी भगवान् महावीर ने ( उडट) ऊर्ध्व (अहेयं ) अधः और (तिरिय ) तिरछी (दिसासु) दिशाओ में (जे) जो (तसा) त्रम (य) और ( थावर )स्थावर (पाणा) प्राणी हैं, उनको (णिच्चणिचेहि)नित्य रूप से और अनित्य रूप से ( समिक्ख ) जानकर ( दीवे व )ढीयक की नाई अथवा संग्नार रूप समुद्र में गिरे हुए जीवा के लिये द्वीप की भाति (धम्म )धर्म को (ममियाममानभाव मे( उदाहु )प्रतिपादन किया । भावार्थ--मुधर्मास्वामी फिर बोले-भगवान् महावीर ने त्रस और स्थावर जीवो को, जो ऊपर नीचे और इधर उधर स्थित हैं अर्थात् सब जगह मौजूद हैं, पर्यायाथिक नय की अपेक्षा अनित्य और द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा नित्य जाना । अतएव उन ज्ञानवान् भगवान् ने ऐसे उत्तम धर्म का उपदेश दिया जोकि ससार रूपी समुद्र में पड़े हुए प्राणियों को द्वीप की तरह सहारा देने वाला है । और अज्ञान रूप अन्धकार को दूर करने के लिये दीपक के समान है । पूर्वोक्त कथन से बौद्ध आदि अनात्मवादी मतों का खंडन किया गया है तथा वृक्ष आदि में जीव है ऐसा सिद्ध किया गया है, और जैन दर्शन के स्याद्वाद सिद्धान्त का भी प्रतिपादन कर दिया गया है ॥४॥ ।
(५)
महावीरस्तुति
गाथा--ले सम्बदसी अभिभूय नाणी,
णिरामगंधे घिसं ठितप्पा ।
अणुत्तरे सव्वजगंसि विजं,
गंथा अतीते अभए अणाऊ॥५॥
छाया- म सर्वदर्शी अभिभूय बानी,
निरामगंधो धृतिमान् स्थितात्मा ।
अनुत्तरः सर्वजगति विद्वान्.
ग्रन्थातीतोऽभयोऽनायुः ॥ ५ ॥
अन्वयार्थ--( से ) वह (सब्बदली) सर्वदर्शी भगवान्
( अभिभूय ) क्षायोपशमिक ज्ञानो को जीत कर (नाणी) केवल
ज्ञानवान (णिरामगंधे ) निर्दोष चारित्र पालने वाले (धिमं ) धीर
( ठितप्पा अपनी आत्मा में स्थित-लवलीन( सव्वजगंसि ) समस्त
नन्नार में (अणुतरे ) सर्वोत्कृष्ट (विजं ) .पढाथों के जानने वाले
अथात् विद्वान् (गया) परिग्रह से ( अतीते ) रहित (अभए)
मर गहत ( अगाऊ ) और आयु रहित थे ।
भावार्थ--भगवान् महावीर स्वामी सामान्यरूप से पदार्थों के
जानने वाले, नथा मनि श्रुत अवधि और मनःपर्य य इन चार क्षयोप-
शाजन्य दानो को हटाकर केवलज्ञान वान्न थे । क्योकि ज्ञान और
चारित्र में मान होता है । इसलिये भगवान के ज्ञान का वर्णन करके चारित्र
मानमान करते है । नगवान महावीर मून और उत्ता गुणों को
पूर्णता पालन करते नया अनेक दिन बाधाओं एवं परिपहों के आनेपर
नी चात्रिने चलायाान नहीं होने थे । भगवान् नीन लोक में नत्र में श्रेष्ठ
किसान पनि सेहत अनात निर्मात्य नात प्रकार के नयों में हित,
का मानन ॥ ॥
सेठियाग्रन्थमाला
(६)
गाथा-से भूइपगणे अणिएअचारी,
श्रोहंतरे धीरे अणतचक्खू ।
अणुत्तर तप्पति स्मृरिए वा,
वइरोयणिंदे व तम पगासे ॥६॥
छाया-स भूतिप्रज़ोऽनियतचारी.
योघंतरो धीरोऽनन्तचक्षुः।
अनुत्तरं तप्यति सूर्य इव,
वैरोचनेन्द्र इव तमः प्रकाशः॥६॥
अन्वयार्थ-(से) वह भगवान् (भूइपरणे) अत्यन्त बु-
द्विमान् (अणिएअचारी) अप्रतिबद्ध विहार करनेवाले (ोहतरे)
संसार रूपी समुद्र को तिरनेवाले, (धीरे) धीर (अण्तचक्खु) अ-
नन्त ज्ञानवान् (अणुत्तरं) सबसे ज्यादा (तप्पति) तपस्या करनेवाले
(सूरिए वा) सूरज की भाति तथा (वइरोयणिदेव) वैरोचन नामक
अग्नि की तरह (तमे) अज्ञान-अन्वकार का नष्ट करके (पगासे) ज्ञान
को प्रकाशित करनेवाले थे।।
भावार्थ-उन भगवान् महावीर की प्रज्ञा संसार का मंगल करने
वाली एवं रक्षा करने वाली थी । उनका विहार अप्रतिबद्ध था, क्योकि वह
सब प्रकार के परिग्रह से परे थे ! चारित्र संसार रूप समुद्र से पार करने
वाला था। परिषहो को समान भाव से सहन करनेवाले अतएव धीर, तथा
धी-बुद्धि से राजित-शोभित थे । ज्ञेय पदार्थ अनन्त हैं उन सब को भग-
वान् जानते थे, अतएव अनन्त ज्ञानवान् थे । दुनिया में सब से अधिक
तप करनेवाले थे। और जिस तरह सूर्य अन्धकार को नष्ट करता है, अ-
थवा वैरोचन नामक अग्नि के जलने से जैसे अन्धकार नही रह सकता,
उसी तरह भगवान् भी अज्ञान रूप अन्धकार को नाश करनेवाले थे॥६॥
महवीरस्तुति गाथा-अणुत्तरं धम्ममिणं जिणाणं, या मुणी कासव पालुपन्ने । इंदे व देवाण महाणुभावे, सहस्स णेता दिविणं विसिट्टे ॥७॥ छाया--ग्रनुनरं धर्ममिम जिनानाम् . नेता मुनिः काश्यप ग्राशुप्रजः । इन्द्र इव देवानां महानुभावः, नहवागगां नेता दिवि विशिष्टः ॥७॥ अन्वयार्थ--(जिणाणं) जिन भगवान् के (इणं) इस (अणुत्तर) सर्वश्रेष्ट (धम्म) धर्म के (णेया) नेता, (मुणी) मुनि, (कासव) क- श्यपगोत्रीय (महाणुभावे) महाप्रभावशाली भगवान् महावीर (दिवि) न्वर्ग मे (सहस्स) हजारो (देवाण) देवों के (इंदे व) इन्द्र की नाई (विसिटे) रूप और गुण आदि में सब से प्रधान (णेता) नेता थे ॥ भावार्थ--जिस तरह स्वर्ग के सब देवो में इन्द्र रूप गुण और श्यय प्रादि गुणा में प्रधान होता है, उसी तरह भगवान् महावीर स्वामी सन्न लोगों में उनम थे । ऋषभ आदि पूर्व २३ तीर्थकरों द्वारा प्रतिपादित धार के नेता-प्रचारक थे । इस कथन में उनका भ्रम दृर किया है जो महावीर ज्यामी को ही जैनधर्म का संस्थापक मानते हैं। क्योंकि महावीर न्चानी जैनधर्म के संस्थापक नही. किन्तु उनके पहले होनेवाले २३ नीको हाग प्रमपित धर्म के प्रचारमात्र थे । प्रभु का गोत्र कश्यप || गाथा--ले पन्नया अस्वयम्नाय वा. महोदही वादि अणंनपारे ।
सेठियाश्रन्थमाला (८) अणाइले वा अकसाइ मुक्के, सक्के व देवाहिवई जुईमं ॥८॥ लाया--स प्रजयाऽक्षयसागरो वा, महोदधिरिख अनन्तपारः । अनाविलो वा अकपायी मुक्तः, शक्र इव देवाधिपतिद्युतिमान् ॥ ८ ॥ अन्वयार्थ--(से) वह भगवान् महावीर (पन्नया) बुद्धि से (अ- गंतपारे) अनन्तपारवाले तथा (अणाइले) शुद्ध जलवाले (महोद- हीव) स्वयम्भूरमण समुद्र की भांति (अक्खयसायरे) अक्षयसमुद्र थे तथा (अकसाइ) कषाय से रहित (मुक्के) कर्मों से मुक्त (देवाहि- वई) तथा देवो के स्वामी (सक्के व) इन्द्र की तरह (जुईम) दीप्ति- मान् थे ॥ भावार्थ--भगवान् की उपमा किसी अन्यपदार्थ से नहीं दी जा स- कती। किन्तु एकदेशीय उपमा सागर से दी गई है । अर्थात् जिस प्रकार स्वयंभूरमण अनन्त पारवाला है, उसी तरह भगवान् द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा अनन्त ज्ञानवान् थे । समुद्र का जल जैसे निर्मल होता है, भगवान् का ज्ञान भी उसी तरह स्पष्ट अर्थात् कलुषतारहित था। भगवान् कपाय से रहित तथा ज्ञानावरणादि कर्मों के जैसे इन्द्र का प्रभाव देवों पर होता है, उसी तरह भगवान् का प्रभाव भी प्रायः प्रागी मात्र पर था ॥८॥ गाथा-से वीरिए पडिपुन्नवीरिए, सुदंसणे वा णगसव्वले?। सुरालएवासिमुदागरे से, चिरायए रोगगुणोववेए ॥६॥ वन्धन से मुक्त थे।
(९) महावीरस्तुति छाया--स वीर्येण प्रातपूर्णवीर्यः, सुदर्शन इब नगसर्वश्रेष्टः । सुरानयवासिमुदाकर : स- विराजतेऽनेकगुणोपपेत: ।।६।। अन्वयार्थ--(ने)भगवान्(वीरिए)वल से (पडिपुन्नबीरिए) पूर्णशक्तिवाले थे,तथा(वा)जैसे (सुदसणे) सुमेरु पर्वत (गागसव्वसे) सब पर्वतो में श्रेष्ठ है, उसी प्रकार प्रभु महावीर भी सर्वश्रेष्ठ थे । और मुमेरु जैस(सुरालएवासिमुदागरे)देवो को हर्ष पैदा करने वाला होता है, वैसे ही भगवान सब को हर्प पैदा करनेवाले थे, तथा सुमेरु जैसे (णेगगुणो- ववेप)अनेक गुणा शोभित होता है(ले)भगवान् भी अनेक उत्तमो त्तम गुणों से शोभायमान थे । भावार्थ--भगवान का वीर्यान्तराय कर्म बिलकुल नष्ट हो गया था । अतएव उनमे अनन्न वीर्य-अनन्त शक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था । सुमेरु पर्व जन नत्र पर्वता में श्रीट है, भगवान् भी शक्ति आदि गुणो से सर्व- श्रेष्ट थे। नया स्वर्ग जैसे दवा को हर्पजनक होता है, उसी प्रकार मुमेरु मीद जनक . ठीक उसी प्रकार भगवान भी प्राणीमात्र के हर्ष के पाठक थे । नमेर जैन नेक गुणों से-सुनहरी रंग,चन्दनादि गंध और उता फली मे-गोभित होता है. नगगन भी जान, शक्ति, अादि गुणों से निजिमान थे ॥४॥ गाथा--स्वयं नहालाण उ जायणाणं, निकड पंडगवंजयंते । से जायण गावगर्व महस्ते, उदलितट्ट नासमेग ।।१०।।
लेठियाधमाला (१०) छाया--शतं सहस्राणां तु योजनानाम् , त्रिकण्डकः पराडकवैजयन्तः । स योजने नवनवतिसहस्रे. उच्छ्रितोऽधः सहस्रमेकम् ।। १० ।। अन्वयार्थ--(से )वह सुमेरु पर्वत ( सयं लहस्साण ) एक लाख ( जोयणाणं ) योजन का है (तिकंडगे ) तीन भाग वाला है (पंडगवेजयंते ) जिसकी पाण्डुक वन ध्वजा है, तथा (णवणवते) (६६)निन्यानवे ( सहस्ते )हजार (जोयणे ) योजन (उद्बुस्लिते) ऊँचा है, और ( एणं) एक (सहस्सं ) हजार ( हेर्ट) नीचा है । भावार्थ--उस गाथा मे भगवान् की उपमाभूत मुमेरुगिरि का वर्णन किया गया है । मुमेरु एक लारव योजन ऊँचा है, निन्यानवे हजार योजन ऊपर तथा एक हजार योजन नीचे है । इसके तीन कंटक- भाग है तीन कण्टको मे से सबसे ऊपर वाले कण्टक पर पण्डुक वन है । वह ऐसा जान पड़ता है, माना ध्वजा है । यह सुमेरु पर्वत जैसे समस्त मध्यलोक में व्याप्त है, भगवान् के ज्ञान और दर्शन आदि गुण भी समस्त लोकालोक में व्याप्त है ।। १० || गाथा-पुढे णभे चिट्ठइ भूमिवहिए, जम्मृरिया अणुपरिवघ्यति । से हेमवन्ने बहनंदणे य, जसी रतिं वेदयती महिंदा ॥११॥ छाया-म्पृष्टो नभसि तिष्ठति भूम्यवस्थितः. यं मर्या अनुपरिवर्तयन्ति।
(११) महावीरस्तुति ------ स हमवणों बहुनन्दनन. यस्मिन् र्गत वेढयन्ति महेन्द्राः॥११॥ अन्वयार्थ-(ले) वह मुमेन (जसे) आकाश को (पुढे) स्पर्श करके (चिह) स्थित है, नथा (भूमिवहिए) भूमि को छूकर स्थित है (ज) जिनकी (स्मृरिया) सूर्य (अणुपरिवयंति) प्रदक्षिणा करते है, और जो (हेमवन्ने) सान की जैसी कान्ति वाला है, जिसमें (बहु) बहुत अर्थात् चार (नंदणे) नन्दनादि वन है, (जसी) तथा जिस में (महिंदा ) महेन्द्र आकर (रतिं) रति का (वेद्यती) अ- नुभव करते है ॥ भावार्थ--फिर भी मुमेरु का वर्णन करते है-वह सुमेरु पर्वत उपर आकाश की व्याप्त करके तमा नीचे भूमि को स्पर्श करके स्थित है, अतण्व का उदलोक अधोलोक और तिर्यकलोक को स्पर्श करने वाला है । न्यानिक विमान उसकी प्रदक्षिणा किया करते है। उसका रंग सोने का नाट पीला है । उसके ऊपर चार वन है | भूमि में भद्रशाल वन है, उ- नक पाच सौ योजन ऊपर नन्दन वन है, उसके बासठ हजार योजन ऊ- पर मामनन्न वन है, उनमें छत्तीस हजार योजन ऊपर पाण्डुक वन है । मकर, वत. अनेक की डान्थली ने युक्त है । और उसमें देव और देवेन्द्र . कनाडा का अनुभव करते है ॥११॥ न.था- एव्यए सहमहप्पनासे, विरायनी(नि) संचणमट्टयने । अणुन गिरितु य पव्वदुग्गे, गिरीयरे में जलिए व भीमे||१२|| . -- ------ म
सेठियाग्रन्थमाला
(१२)
अनुत्तरो गिरिपु च पर्वदुर्गो,
गिरिवरः स ज्वलितो भौम इव ॥१२॥
अन्वयार्थ--(से)वह(पव्वए)सुमेरु पर्वत(लद्दमहप्पगाले)शव
से गुंजायमान है , तथा(कंचगणमट्टवन्ने) सोने की रह पीले वर्ण वा
(विराजते) शोभित होता है (गिरिख)सब पर्वतो में (अणुत्तरे)
है (पव्वदुग्गे) पर्व अर्थात् मेखला आदि के कारण दुर्गम है, और (में
वह (गिरिवरे)सब में प्रधान सुमेरु (मोमे व)पृथ्वी की तरह (जलिा
कान्ति वाला है ॥१२॥
भावार्थ--शब्द का स्वभाव ही गूंजने का है । छोटे २ पर्वत अ
मकानो के पास भी अगर आवाज की जाती है, तो प्रतिध्वनि होती है
और वह भी इतनी तेज कि पहला शब्द भी उतना जोर का नहीं होत
सुमेरु पर्वत देवताओ का की स्थान है , अतएव वह भी उन के द्व
की गई ध्वनियों से गूंजता है , और वह गूंज प्रबल होती है। इसी त
परमात्मा महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि प्रबल होती है और जोरदार
होती है, यही कारण है कि भगवान् के सदुपदेश का अमिट तथा ३
प्रभाव होता है । पर्वत के पीले रंग की भाति महावीर स्वामी का पी
रंग का शरीर दर्शनीय था । जैसे सुमेरु पर चढ़ना मुश्किल है , उ
प्रकार भगवान् को जीतना भी टेढ़ी खीर है, क्योकि भगवान् सर्वज्ञ थे॥१२
.
गाथा-महीइ मज्झम्मि ठिये णगिंदे,
पन्नायते सरियसुद्धलेसे।
एवं सिरीए उ स भूरिवन्ने,
मणोरमे जोयह अचिमाली ॥१॥
(१३) প্রার্জীবাব छाया-मह्यां मध्ये स्थितो नगेन्द्रः. ग्रजायते सूर्यवच्छुखलेश्यः । व श्रिया तु स भृरिवर्णः मनोरमो द्योतयचिमालीय ॥१३॥ अन्वयार्थ-(मटीइ) पृथ्वी के (मलस्लि) मध्य में (ठिये) स्थित (गागिंदे) पर्वतो में प्रधान सुमेरु (पन्नायते) लोक में उत्कृष्ट रूप से जाना जाता है, तथा (स्थरियलुद्धलेले) सूर्य के जैसे शुद्ध तेज वाला (एवं ) पूर्वोक्त प्रकार की (सिरीए) लक्ष्मी से (3) विशेष प्रकार से (भूरिक्ने) विचित्र २ रत्ना से शोभित होने से अनेक वर्ण याना(मणोरमे) मनोहर (अचिमाली) सूर्य की तरह (जोयह) दयां दिशाओं को प्रकाशित करना है ।। .. सावार्थ-नामा पृथ्वी के मध्यदेश में जम्बूढीय है , और जम्बू- द्वीप के ठीक बीच में सत्र पर्वती में प्रधान सुमेरु पर्वत है ; क्योकि सु- म. पर्वत २ धान की खुश और २ अर्द्धपुष्कर द्वीप में भी हैं, किन्तु उ- नई उचाई जार योजन ही है . और जम्बूद्वीप के मध्यभागस्य सुमेरु कालार योजनचा है; इलिए यह पर्यन नव पर्वतो में प्रधान कहा नाना । उनी प्रकार ऋषि मुनि और महात्मा तो बहुत है, किन्तु उन भगवान सीमानथे । सुमेल पर सूर्य की प्रभा पड़ने से जैसे वह कालगना नगवान का शीरनी वैसा ही चमकदार एवं प्रभाशाली प्रानिार्य आदि जननी में शोभायमान थे, और अता- मनमा जाने माने थे । स्मृतिय मुरलेस तथा अधिनाली जोयह शमी न होता है कि भगवान का शरीर स्वयं प्रकाश- नका माग भी देते थे ॥१३॥ A T- . . r - . 1.
सेठियाग्रन्थमाला
(१२)
अनुत्तरो गिरिषु च पर्वदुर्गो,
गिरिवरः स ज्वलितो भौम इव ॥१२॥
अन्वयार्थ--(ले)वह(पव्वए)सुमेरु पर्वत(लद्दमहप्पगाले)शः
से गुंजायमान है , तथा(कंचामवन्ने) सोने की तरह पीले वर्ण वा
(विराजते) शोभित होता है (गिरिसु)सब पर्वतो में (अणुत्तरे)
है (पव्वदुग्गे) पर्व अर्थात् मेखला आदि के कारण दुर्गम है, और (रे
वह (गिरिवरे)सब में प्रधान सुमेरु (मोमे व)पृथ्वी की तरह (जलि
कान्ति वाला है ॥१२॥
भावार्थ--शब्द का स्वभाव ही गूंजने का है । छोटे २ पर्वत अ
मकानो के पास भी अगर आवाज़ की जाती है, तो प्रतिध्वनि होती
और वह भी इतनी तेज़ कि पहला शब्द भी उतना जोर का नहीं होत
सुमेरु पर्वत देवताओ का की स्थान है , अतएव वह भी उन के द्व
की गई ध्वनियों से गूंजता है , और वह गूंज प्रवल होती है। इसी
परमात्मा महावीर स्वामी की दिव्यध्वनि प्रबल होती है और जोरदार
होती है, यही कारण है कि भगवान् के सदुपदेश का अमिट तथा ३
प्रभाव होता है । पर्वत के पीले रंग की भाति महावीर स्वामी का प
रंग का शरीर दर्शनीय था । जैसे सुमेरु पर चढ़ना मुश्किल है ,
प्रकार भगवान् को जीतना भी टेढ़ी खीर है, क्योंकि भगवान् सर्वज्ञ थे॥१ः
गाथा-महीइ मज्झम्मिठिये णगिंदे,
पन्नायते स्मृरियसुद्धलेसे।
एवं सिरीय उ स भूरिवन्ने,
मणोरमे जोयइ अचिमाली ॥१॥
महावीरस्तुति छाया-मह्यां मध्ये स्थितो नगेन्द्रः. प्रज्ञायते सूर्यवच्छुद्रलेश्यः । एवं श्रिया तु स भूरिवर्णः मनोरमो द्योतयचिमालीव ॥१३॥ । अल्वयार्थ-(महीइ) पृथ्वी के (मज्लस्लि) मध्य में (ठिये) स्थित (गागिंदे) पर्वतो में प्रधान सुमेरु (पन्नायते) लोक में उत्कृष्ट रूप से जाना जाता है, तथा (स्तूरियलुद्धलेले) सूर्य के जैसे शुद्ध तेज वाला (एवं) पूर्वोक्त प्रकार की (सिरीए) लक्ष्मी से (3) विशेष प्रकार से (भूरिचचे) विचित्र २ रत्नो से शोभित होने से अनेक वर्ण वाला(मणोरसे) मनोहर (अचिमाली) सूर्य की तरह (जोयइ) दशो दिशाओ को प्रकाशित करता है । -- : भावार्थ-रत्नप्रभा पृथ्वी के मध्यदेश में जम्बूद्वीप है , और जम्बू- द्वीप ठीक बीच में सब पर्वतो में प्रधान सुमेरु पर्वत है ; क्योकि सु- मेरू पर्वत २ धात की खण्ड और २ अर्द्धपुष्कर द्वीप में भी हैं, किन्तु उ- नकी ऊचाई ८५ हजार योजन ही है , और जम्बूद्वीप के मध्यभागस्थ सुमेरु एक लाख योजन ऊंचा है; इसलिए यह पर्वत सब पर्वतों में प्रधान कहा जाता है । इसी प्रकार ऋषि मुनि और महात्मा तो बहुत हैं, किन्तु उन में भगवान् महावीर प्रधानथे। सुमेरु पर सूर्य की प्रभा पड़ने से जैसे वह चमकने लगता है भगवान् का शरीर भी वैसा ही चमकदार एवं प्रभाशाली था । भगवान् अष्ट प्रातिहार्य आदि लक्ष्मी से शोभायमान थे, और अज्ञा- नान्धकार को नाश करने वाले थे । सूरिय सुद्धलेसे तथा अच्चिमाली जोयइ इन दो शब्दो से यह मालूम होता है कि भगवान् का शरीर स्वयं प्रकाश- मान था, तथा वह दूसरों को ज्ञान का प्रकाश भी देते थे ॥१३॥ सव ॥
सेठियाग्रन्थमाला गाथा-सुदसणस्लेव जसो गिरिस्स, पच महतो पब्वयरल। एतोजमे समणे नायपुत्ते, जाईजलोदसणनाणलीले ॥१४॥ छाया-सुदर्शनस्येय यशो गिरः. प्रोच्यते महतः पर्वतम्य । एतदुपमः श्रमणो ज्ञातपुत्रो. जातियशोदर्शनज्ञानशीलः ॥१४॥ अन्वयार्थ-(महतो ) महान् (पब्वयस्स) पर्वत (सुदंस- णस्लेव ) सुदर्शन (गिरिस्स ) मेरु पर्वत का ( जसो )यश-कीर्ति जैसे कहा है उसी प्रकार ( पचुच्चइ ) भगवान् की कीर्ति करते है (एतोवमे) पूर्वकथित उपमा से उपमित ( सामणे )श्रमण (नाय- पुत्ते ) ज्ञातपुत्र भगवान् महावीर (जाईजलोदंणनाणसीले )जाति, यश, दर्शन, ज्ञान, और शील में श्रेष्ट थे ।। भावार्थ- भगवान् की एकदेशीय उपमा सुमेरु पर्वत से दी गई थी। और इसी प्रसंग को लेकर सुमेरु का कीर्तिगान किया है। अब फिर उपमेय का अर्थात् भगवान् महावीर का वर्णन करते है कि ज्ञातवंश के भत्रिय कुल में उत्त्पन्न हुए भगवान् समस्त जाति वालो मे, नमाम यशस्वी लोगो में, समस्त ज्ञानवाला तथा दर्शनवालो में और सब चारित्रनिष्ट पुरुषो में श्रेष्ट थे ॥१४॥ गाथा--गिरी (रि) बरे वा निमहाऽऽययाणं, स्या व सेटे वलयाययाग । ?
(१५) सहवीरस्तुति तोक्से से जगभूइपन्ने, सुणीण मज्झे तमुदाहु पन्ने ॥१५॥ छाया--गिरिचरो वा निपध ग्रायतानां, रुचक इव श्रेष्ठो वलयायतानाम । तदुगमः स जगति भृतिप्रज्ञः. मुनीनां मध्ये तमुदाह प्रजः ।। १५ ।। अन्वयार्थ--(वा) जैसे (निसह) निषध (आययाण) लम्बे- पर्वतो में (गिरीवरे) श्रेष्ठ पर्वत है तथा (व) जैसे (रुयए) रुचक प- र्वत (वलयाययाणं) गोल पर्वतो मे (सेडे) श्रेष्ठ है (तओवमे) उन की तरह (से) भगवान् महावीर भी (जगभूइपन्ने) संसार में प्रभूत प्रज्ञा वाले हैं । अतः (पन्ने) प्रकृष्टज्ञानवालो ने (तं) उन्हें (मुणीण) सब मुनियो के (मज्झे) मध्य में (उदाहु) उत्कृष्ट कहा है ॥ भावार्थ--हरिबास क्षेत्र के पर्वत का नाम निमः पर्वत है | क लम्बाई में सबसे बड़ा है तथा रुचक नाम का पर्व में अद्वितीय है । इग्स के समान दूसग नहीं है । उसी का दबाव भी जान में अद्वितीय थे। उन के जैसा पूर्णज्ञान माईला नहीं था। अतएव बुद्धिमानो ने उन्हे उत्कृष्ट कहा है ! गाथा-अणुत्तरं धम्ममुईरहना. अणुत्तरं भाणवर झियाह । सुसुक्कसुक्कं अपगंडमुक्कं. संखिंदुएगंतऽवदानमुकं ॥१॥ छाया-अनुत्तरं धर्ममुनगरव. - अनुन शान्य :
सेठियाप्रथामाला सुशुक्लशुक्लमपगण्डशुवलं. शंखेन्दुकान्तावदातशुक्लम् ॥१६॥ , अन्वयार्थ-(अणुत्तरं) सब से उत्तम (धम्म) धर्म को ( ईरइत्ता) कहकर भनवान् (अणुन्तरं) प्रधान (झारणवरं) व्युए क्रियानिवृत्ति नाम के ध्यान को (झियाइ)ध्याते है। अर्थात् (मुलुक सुक्कं) उत्तम श्वेत वस्तु की तरह वह शुक्ल ध्यान, जोकि (अप डसुक्कं) अर्जुन सोने की तरह अथवा जल के फेन की तरह, या (सान दुएगंतऽवदातसुक्क) शंख और चन्द्रमा की तरह शुभ्र है, उस भगवान् ने ध्यान किया ॥ भावार्थ--भगवान् श्रीमहावीर ने ऐसे धर्म का उपदेश दिया, जो समस्त धर्मों में प्रधान है , तथा शुक्लध्यान को धारण किया । यह शुक्ल अर्जुन सोने की तरह, जल के फेन की तरह, शंख की तरह तथा चन् की तरह स्वच्छ है । भगवान् सूक्ष्मकाययोग वा निरोध करते हुए ध्यान के तीसरे भेद सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाति नामक ध्यान को ध्याते है , जब योग का निरोध कर चुकते है, तब व्युपरतक्रियानिवृत्ति नाम के थे शुक्ल ध्यान को धारण करते है ॥१६॥ गाथा--अणुत्तरगं परमं सहेसी, असेसकामं सदिलोहइत्ता। मिद्धि गते साइमणेत पत्ते, नाणेगा लीलण य दंसोण ॥१७॥ छाया-यनुत्तराय्यां परमां महर्पिः. ग्रणेपकर्मागि म विशोध्य ।
(१७) महान रस्तुति सिद्धि गतः साद्यनन्तां प्राप्तः, ज्ञानेन शीलेन च दर्शनेन।। १७ ॥ अन्वयार्थ--(स ) वह (महेसी ) महर्पि भगवान् ( अ सेसकम्नं ) सब कर्मों को (विप्लोहइत्ता) पूरी तरह नष्ट करके (अणुत्तरगं) सर्व प्रधान, तया लोकान में ( गते )स्थित हुए ( साइमणंत ) और सादि अनन्त, तथा (परमं ) उत्कृष्ट (सिद्धि) सिद्धि को ( नाणेण ) ज्ञान ( सीलेण ) शील( य ) और (दसणे- ण)दर्शन के द्वारा ( पत्ते )प्राप्त हुए। भावार्थ--भगवान् ने आयिक ज्ञान, क्षायिकदर्शन, और क्षायिकचा- रित्र के द्वारा सर्वोत्तम लोकान में पहुंचानेवाली मुक्ति को सब कर्मों का नाश कर के प्राप्त किया था । वह मुक्ति सादि और अनन्त है । कई लोग जीव मोक्ष से वापिस आजाता है ऐसा मानते हैं, किन्तु वह युक्ति- युक्त नहीं है । क्यो कि संसार में घुमाने वाले राग, द्वेष, क्रोध मान, माया आदि विकार है । जब तक ये विकार मौजूद रहते हैं, तब तक मुक्ति नहीं मिलती । अतएव मुक्त जीव के विकार नहीं होते । और जिस के ये विकार नहीं है, वह संसार मे कैमे घूम सकता है? अर्थात् मुक्तात्मा रा- गादि विकारों से रहित होने के कारण संसार मे वापिस नहीं आसकते । यदि गगादि का सद्भाव माना जाय तो मुक्ति ही नहीं हो सकती । यदि बाद में पैदा होते हैं, ऐसा कहा जाय तो वह भी ठीक नहीं है। क्यों कि विकारो को विकार ही पैदा करते हैं । जब मुक्तात्मा निर्विकार है, तो विकार पैदा ही नहीं हो सकते ॥१७|| गाथा-रुक्खेसु णाए जह सामली वा, जस्सि रतिं वेदयती सुवन्ना ।
सठियामाक्षा , वयोनु वा नंदणमाह सेट नाणेण सीलेणय मूहपन्ने ॥ १८ ॥ छाया-- वृक्षपु ज्ञातो यथा शाल्मली वा, यस्मिन् रति वेदयन्ति सुपर्णाः । ननंपु वा नन्दनमाहुः श्रेष्ठ, ज्ञानेन शीलेन च भूतिप्रज्ञः ।। १८ ॥ अन्वयार्थ--(जह ) जैसे ( रुक्खेतु) वृक्षो में (सामली शाल्मली वृक्ष (वा) तथा ( वणेसु) वनों में (नंदणं) नन्न वन ( सेटे) श्रेष्ठ (णाए )समझा जाता है (जस्सिं ) जिसमे ति ( सुवन्ना) सुपर्णकुमार नामक भवनवासी देव ( रतिं), रम क्रीडा का (वेदयती) अनुभव करते है उसी प्रकार भगवान (नाणेण ) ज्ञान से (य) और ( सीलेगा )चारित्र से श्रेष्ठ तथा (भूपन्ने ) प्रभूत ज्ञानशाली (आहु) कहे जाते है । भावार्थ--जैसे सब वृक्षो में शाल्मली( समन ) का वृक्ष प्रधान एवं श्रेष्ठ है । वह शाल्मली वृक्ष पृथ्वीकाय का है तथा नित्य है , तथा संसार के समस्त वनो मे नन्दन वन जैसे उत्तम है , क्योकि इन दोनो जगह वह रहने वात्ने , तथा बाहर से आने वाले सुपर्णकुमार जाति के भवनवास देव मानन्द क्रीड़ा करत तथा नानाप्रकार के विलास करते हैं , उसी प्रकार भगवान् महावीर भी सब में उत्तम थे । क्योंकि उस समय भगवान् महा- वीर की बराबरी करने वाला न तो कोई ज्ञानवान् ही था और न चारित्र धारण करने वाला ही था । इस प्रकार सेमल दृक्ष तथा नन्दनवन की उपमा देकर भगवान् की स्तुति की गई है ॥१८॥ गाथा-भगिणयं व सद्दामा अणुन्तरं उ, चंदो व नारागा सहारणुभावे । , महावीरस्तुति गंधेलु वा चंदणमा सेट, एवं मुणीणं अपडिन्नसाहु ।।१९।। छाया-स्तनितं वा शब्दानामनुत्तरं तु , चन्द्रो वा तागगां महानुभावः । गन्भेषु वा चन्दनमाहुः श्रेष्ठ- मेवं मुनीनामप्रतिजमाहुः ।।१६।। अन्वयार्थ-(व)जैसे(थणिय)मेव की गर्जना(सहाण) सव शब्दो में(अणुत्तरंउ)प्रधान है और (ब) जैसे (चंदो) चन्द्रमा (ताराण)सव नारों में(महागुमावे)मनोहर है(वा)अथवा(गंधेसु) सब सुगंधि- द्रव्या में (चंदणं)चन्दन को(सेट्ट)श्रेष्ट(आहु)कहते हैं (एवं)इसी प्रकार भगवान् को भी (सुणीणं)सव मुनियो की अपेक्षा (अपडिन्नं )इस लोक और परलोक की प्रतिज्ञा-कामना से विरक्त (आहु)कहते है । भावार्थ-जैसे सब शब्दों में मेव की गर्जना का शब्द बड़ा प्रवल होता है । सब शब्द उससे नीचे दर्जे के ही है , तथा सव नक्षत्र मण्डल में चन्द्रमा सब से सुन्दर है, अतएव प्रधान है, और सव सुगंध- वाले पदार्थों में मलयज चन्दन उत्तम है, उसी प्रकार समस्त मुनियों मे भगवान् महावीर उस समय सब से प्रधान थे, क्योंकि उन्हें इस लोक और परलोक सम्बन्धी किसी भी विषय की कामना नथी ॥१६॥ गाथा-जहा संयंभू उदहीण मेटे, नागेसु वा धरणिंदमाहु सेटं। खोओदए वा रसवेजयंते, तपोवहाणे मुणि बेजयंते ॥२०॥ , सेटियाग्रन्थमाला (२०) छाया-यथा म्वयम्भूरुदधीनां श्रेष्ठो. नागेपु वा धरगोन्द्रमाहुः श्रेष्ठं । ज्ञोदोदकं वा सबैजयन्त स्तपउपधानेन मुनिर्वैजयन्तः ॥२०॥ अन्वयार्थ-(जहा) जैसे (सयंभू) स्वयम्भूरमण समुद्र (उदहीण) सब समुद्रों में (सेठे) श्रेष्ठ है (वा) तथा (धरणिंद) धरणेन्द्र (नागेसु) नागकुमार जाति के भवनवासी देवो में (से) श्रेष्ठ है (वा) और (खो- श्रोदए) इक्षुरस (रसवेजयंते) सब ग्सों में प्रधान है, उसीप्रकार (तवोवहाणे) विशिष्ट तप के द्वारा (मुणि) भगवान् को (वेजयंते) प्र- धान (आहु) कहते हैं। भावार्थ: -समस्त समुद्रा में स्वयंभूरमण नमुद्र प्रधान है। क्योकि महां अनेक प्रकार के देव आकर क्रीड़ा करते है, तथा अपने चित्त को प्रसन्न करते हैं। उसी प्रकार सब ऋषि मुनियों में भगवान् प्रधान थे , क्योंकि वे भी अज्ञात विषयों का ज्ञान कराकर लोगों का चित्त प्रसन्न कर देते थे। तथा नागकुमार-भवनवासियो में धरणेन्द्र जिस तरह प्रधान है, अथवा समस्त ग्सों में गन्ने का रस जैसे प्रधान है, उसी तरह भगवान् भी सब लोगो मे प्रधान थे ॥२०॥ गाथा-हत्थीसु एरावणमाहु णायं, मीहो मिगाणं सलिलाण गंगा। पावीसु वा गरुले वेणुदेवे निव्वागावादीणिह णायपुत्ते ॥२२॥ छाया-हस्तिष्वरावणमाहुति. सिंहो मगागां मलिलाना गङ्गा ।
महरिस्तुति पक्षिपु वा गरुत्मान् वेणुदेवो. निर्वाणवादिनामिह ज्ञातपुत्रः ।।२१।। अन्वयार्थ--जैसे(हत्थीसु)सब हाथियों में( एरावण ऐरा- वत हाथी(गाय)प्रधान है,(मिगाणं)पशुओ में(सीहो)सिंह जैसे प्रधान है(सलिलाण)जलों में(गंगा)महागंगा का जल प्रधान है (वा)और (पक्खीसु)पक्षियो में(वेणुदेवे )वेणुदेव अर्थात्(गरुले)गरुड़ पक्षी प्रवान है, उसी प्रकार( इह )समस्त संसार में( निव्वाणवादीण)मोक्ष माननेवालो के मध्य (णायपुत्ते ) भागवान् महावीर को प्रधान (आहु) कहते है ॥ -सब हाथियों में ऐरावत हाथी प्रधान है वह अपना चाहे जैसा रूप बना सकता है। ऐरावत हाथी का वर्णन साहित्य में सफेट किया जाता है । सफेद हाथी जहा होता है वहा की श्री-वृद्धि होती है । जब से भगवान् गर्भ में आये थे, तब ही से महाराज सिद्धार्थ की श्री-वृद्धि हुई थी। इसी से भगवान् का नाम भी वर्द्धमान पड़ गया था। इसी- लिए कहा गया है कि सब हाथियो मे ऐरावत हाथी की नाई, तथा पशु- ओ मे सिह के समान, जलो में महागंगा के जल की तरह और पक्षियों मे गरुड़ पक्षी की तरह भगवान् समस्त मोक्ष वादियो में प्रधान थे क्योकि भगवान् ने ही मोक्ष का यथार्थ स्वरूप और मार्ग बताया है ॥२१॥ गाथा--जोहेसु णाए जह वीसलेणे, पुप्फेसु वा जह अरविंदमाहु । खत्तीण सेटे जहदंतवक्के, इसीण सेढे तह वद्धमाणे ॥२२॥ छाया--योधेपु ज्ञातो यथा विश्वसेनः. पुप्पेषु च यथाऽरविंदमाहुः ।
-
सेरियाग्रन्थमाला
(२२)
क्षत्रियाणां श्रेष्टो यथा दान्तवाक्य:.
रुपीगगां श्रेष्ठस्तथा वर्द्धमानः ।।२२।।
܀
अन्वयार्थ- (जह्) जैस (जोहेसु) योद्धाओं में (वीसलेणे
चक्रवर्ती (णाए) प्रधान है (वा) और (पुप्फेसु) फूलों में (अरविंद)
कमल सुगन्धिवाला है तथा (जह) जैसे (खत्तीण) अत्रियों में (दंत-
वक्के) चक्रवर्ती (से?) प्रधान है (तह) उसी प्रकार (इमीण) ऋ
पियो में (वद्धमाणे) भगवान् वर्द्धमान स्वामी को (सेट्टे) प्रधान (आहु
कहते है ॥
भावार्थ- चक्रवती के चौरासी लाग्य हाथी, चौगसी लाग्य घोड़े
और छियानवे करोड़ पैदल सेना होती है, और वह खुद भी बीस लाख
अष्टापदो के बल बगवर बल वाला होता है, अतण्व चक्रवर्ती से, अथवा वासु
देव से वढ़िया कोई दूसरा योद्धा नहीं हो सकता । तथा सव सुगंधि वाले
पुष्पो में कमल प्रधान होता है और समस्त क्षत्रिया में जैसे चक्रवर्त
प्रधान है, उसी तरह भगवान् महावीर उस समय के समस्त ऋपिमुनियं
में श्रेष्ठ थे ॥२२॥
गाथा-दाणागा सेहूँ अभयप्पदाणं,
सच्चेसु वा अणवज्जं वयंति ।
तवेसु वा उत्तम बंभचेरं,
लोगुत्तमे समणे नायपुत्ते ॥२०॥
छाया--दानानां श्रेष्ठं अभयप्रदानं.
सत्येपु वाऽनवद्य वदन्ति ।
तपम्सु वोत्तम ब्रह्मचर्य.
लोकोत्तमः श्रमणो ज्ञातपुत्रः ॥२३॥
सेरियाग्रन्थमाला
(२
क्षत्रियागाां श्रेष्ठो
ऋपीगाां श्रेष्ठस्न
अन्वयार्थ--(जह) जैस (जोहे
चक्रवर्ती (णाए) प्रधान है (वा) और (
कमल सुगन्विवाला है तथा (जह) जैसे
वक्के) चक्रवर्ती (से?) प्रधान है (तह
थियो में (वद्धमाणे) भगवान् वर्द्धमान स्वा.
कहते हैं |
भावार्थ- चक्रवती के चौरासी लान
और छियानवे करोड़ पैदल सेना होती है, ३
अष्टापदो के बल बगबर बन वाला होता है, अतण्व
देव से बढ़िया कोई दूसरा योद्धा नहीं हो सकता
पुष्पो में कमल प्रधान होता है और समस्त ।
प्रधान है, उसी तरह भगवान् महावीर उस सम.
में श्रेष्ठ थे ॥२२॥
गाथा-दाणागा सेहूँ अभयप्पदाणं,
सचेसु वा अणवज्ज वन
तवेसु वा उत्तम बंभचेरं,
लोगुत्तमे ममणे नायपुत्ते
छाया--दानानां श्रेष्ठ अभयप्रदानं.
सत्यषु वाऽनवद्यं वदन्ति ।
तपस्सु बोत्तमं ब्रह्मचर्य,
लोकोत्तमः श्रमणो जातपुत्रः ॥२३॥
महावीरस्तुति . गादि को सहने वाले तथा (धुणति) अष्ट कर्मी को दूर करते है, (विग- गेही) अभिलाषा से रहित तथा जो (सणिहिं) द्रव्य आदि का सं इय (न) नहीं (कुव्वति) करते, (आसुपन्ने) और जिनका ज्ञान सदा उपयोग वाला है (समुई) समुद्र की (व) भांति (महाभवोघ) पर्यायों 5 समूहरूप संसार को (तरिड) तैरकर (अभयंकरे) अपने और दू- तरों द्वाग जीवा की रक्षा करने वाले और (अणंतचक्रवृ) अनन्त ज्ञा- वान् थे॥ भावार्थ--संमार के प्राणी पृथ्वी पर सब प्रकार के कार्य कर- है , किन्तु पृथ्वी किमी पर क्रोध नहीं करती वह सब कुछ, सहन क- 'ती है । इसी तरह भगवान् महावीर जी परीपह और उपसर्ग आदि मव पहन करते थे, न किसी पर अप्रसन्न होते और न प्रसन्न । पृथ्वी जिग्न न- हमवज्ञा प्राधार है, भगवान् भी रक्षक होने से जीवों के अाधार रूप ये । प्रभु महावीर पाठ कर्मों से रहित. बाह्य वस्तुओं की ममता से रहित थे, तथा उन्हें किसी वस्तु के जानने के लिए छद्मस्य की तरह मोचने विचारने की आवश्यकता न श्री क्यो कि भगवान हर एक समय उपयोगात्मक ज्ञान से युक्त थे, तथा अनेक दुःखो से भरे हुए संसाररूपी समुद्र को तिरकर मुक्त होने वाले, स्वयं जीवा की रक्षा करनेवाले और उपदेश देकर दूसरों से रक्षा कराने वाले, तथा अनन्त पदार्थों को जानने से अनन्त ज्ञानवान्थे ॥२५॥ गाथा--काहं च माणं च तहेव माय, लोभं च उत्थं अज्झत्थदोसा। एागि बंता अरहा महेसी, ण कुव्बई पाव ग कारवेई ॥२६॥ छाया--क्रोधञ्च मानञ्च तथैव मायां, लोभं चतुर्थमध्यागदोपान् ।
सेठियाग्रन्थमाला (२४) ण) सब सभाओं में (सुहम्मा) सौधर्म इन्द्र की (सभा) सभा(सेट्टा) श्रेष्ठ है, (सव्वधम्मा) संसार के सब धर्म (निव्वाणलेटा) मोक्षप्रधान हैं किन्तु (णायपुत्ता) भगवान् महावीर से (परम्) उत्तम (णाणी) ज्ञानी (न) कोई भी नहीं (अस्थि) है || भावार्थ--उत्कृष्ट स्थिति में सर्वार्थसिद्धि के देव प्रधान है, क्योंकि मुख पूर्वक रहते हुए इतनी स्थिति पांचवे अनुत्ता विमान के दवा के सि- बाय और किसी की नहीं है, उनके बराबर मुग्व भी किसी दूसरे को नहीं है, तथा जिस तरह सौधर्म इन्द्र की ममा अन्य सभाओ मे उनम है, और सब आस्तिक (पर नोक, स्वर्ग, नरक, प्रात्मा आदि पदार्थों को मानने वाले) धर्मों का फल एक मुक्ति ही है, क्योकि मिथ्यात्व मार्ग की पुष्टि करने वाले भी अपने को मोक्ष को प्रधान मानने वाले कहते हैं, उसी तरह भगवान् भो समस्त ज्ञानियो में उत्कृष्टज्ञानी थे, उस समय उनकी जगबरी करने वा- ला कोई दूसग न था ॥२४॥ .गाथा-पुढोवमे धुणइ विगयगेही, न सण्णिहिं कुव्वति आसुपन्ने । तरि समुदं व महाभवाघ, अभयंकरे वीर अणंतचक्खू ॥२५॥ छाया--पृथिव्युपमो धुनाति विगतगृद्धि- न मन्निधिं करोति अाशुप्रज्ञः । तरित्वा समुद्रमिव महाभवोघ- मभयङ्करो वीरोऽनन्त चतुः ।।२।। अन्वयार्थ--(वीर) भगवान् महावीर (पुढोवमे) पृथ्वी की नगद सब के आधार भूत अथवा पृथ्वी की तरह परीषह और उपसर्ग (२५) महावीरस्तुति - : -- : 7 : आदि को सहने वाले तथा (धुणति) अष्ट कर्मों को दूर करते हैं, (विग- ; यगेही) अभिलाषा से रहित तथा जो (सणिहिं) द्रव्य आदि का सं चय (न) नहीं (कुव्वति) करते, (आसुपन्ने) और जिनका ज्ञान सदा ; उपयोग वाला है (समुई) समुद्र की (व) भांति (महाभवोघं) पर्यायों के समूहरूप संसार को (तरिडे) तैरकर (अभयंकरे) अपने और दू- सरों द्वाग जीवा की रक्षा करने वाले और (अणंतचक्ख) अनन्त ज्ञा- नवान् थे । भावार्थ--संमार के प्राणी पृथ्वी पर मत्र प्रकार के कार्य कर- ते है , किन्तु पृथ्वी किसी पर क्रोध नहीं करती , वह सब कुछ सह्न क- ग्ती है । इसी तरह भगवान् महावीर भी परीपह और उपसर्ग आदि सब सहन करते थे, न किमी पर अप्रसन्न होते और न प्रसन्न । पृथ्वी जिन न- ग्ह मवक्ता अाधार है, भगवान् भी रक्षक होने से जीवा के अाधार कप थे। प्रभु महावीर पाठ कर्मों से रहित. बाह्य वस्तुओं की ममता से रहित थे, तथा उन्हें किसी वस्तु के जानने के लिए छद्मस्य की तरह सोचने विचारने की आवश्यकता न थी क्यो कि भगवान हर एक समय उपयोगात्मक ज्ञान से युक्त थे, नथा अनेक दुःखो से भरे हुए संसाररूपी समुद्र को तिरकर मुक्त होने वाले, स्वयं जीवों की रक्षा करनेवाले और उपदेश देकर दूसरों से रक्षा कराने वाले, तथा अनन्त पदार्थों को जानने से अनन्त ज्ञानवान्थे ॥२५॥ गाथा-काहं च माणं च तहेव मायं, लोभं च उत्थं अज्झत्थदोसा। एआणि चंता अरहा महेसी, गण कुबई पाच गा कारवेड ॥२६॥ छाया--क्रोधञ्च मानञ्च तथैव मायां, लाभं चतुर्थमध्यात्मदीपान् । ~ , सठियाप्रन्थमाला (२६) गतान् वान्त्वाऽहन्महर्षि नं करोति पापं न काग्यति ।।२।। अन्वयार्थ-भगवान् महावीर स्वामी (कोह) क्रोध को (च) और (मागां) मान को (च) और (मायं) माया को (तहेव) इसी प्रकार (च- उत्थं) चौथे (लोभ) लोभ को अर्थात् (पाणि) इन (अज्झत्य- दोसा) आध्यात्मिक-आत्मा सम्बन्धी दोपों को (वंता) त्यागकर (अ- रहा) अर्हत तथा (महेसी) महर्षि हुए, तथा (पाच) पाप (ग) न (कु- व्वई) स्वयं करते (ण) और न (कारवेइ) मगें से कगते है ॥ भावार्थ--कारण के नाश होने पर कार्य का भी नाश हो जाता है संसार के कारण क्रोध, मान, माया और लोभ है, अतः इनके नाश होते ही संसार (कर्म सहित अवस्था) का भी नाश हो जाता है, इसलिए भगवान् क्रोध आदि को नष्ट करके अर्हन्तदशा एवं महर्पिपद को प्राप्त हुए, क्योंकि वास्तव में क्रोधादि को दूर किये बिना कोई महर्षि नहीं हो सकता। भग- वान् न स्वयं पाप करते हैं न दृसगे से ही पाप कराते हैं ॥२६॥ गाथा-किरियाकिरियं वेणइयाणवायं अण्णाणियाणं पडियच ठाणं। मे सव्ववायं इति वेयइत्ता, उवट्टिए संजमदीहरायं ॥२७॥ - छाया-क्रियाक्रियं वैनयिकानुवादं. अज्ञानिकानां प्रतीत्य स्थानम् । म मर्ववादमिति वेदयित्वा. उपस्थितः मयमदीर्घरात्रम् ।।२७॥
(२७) महावीरस्तुति न - M - प. अन्वयार्थ-(से)वह भगवान् महावीर (किरियाकिरिय) क्रिया- वाट और अक्रियावाट के (वेणइयाणवाय)वैनयिकवाद के (अण्णाणि- याण)तथा प्रज्ञानवाद के(ठाणं)पक्ष को(पडियच)जानकर तथा(सव्व- वायं)अन्य समस्त वादों के पक्ष को(इति)सम्यक् प्रकार (वेयइत्ता) समझा कर(संजमदीहराय) यावज्जीवन संयम में (उचट्टिए) उपस्थित हुए । भावार्थ-लोक में अनेक मत प्रचलित हैं। कोई लोग क्रिया से ही मोक्ष मानते है, उन के मत में दीक्षा लेने मात्र से मुक्ति हो जाती है । कोई लोग अक्रियावादी हैं उन का मत है कि मुक्ति के लिए सिर्फ ज्ञान की ही आवश्यकता है , चारित्र की आवश्यकता नहीं । गोशालिक मत के मानने वाले विनय से ही मोक्ष मानते हैं, तथा कोई २ अज्ञान से ही मोक्ष मानते हैं, और भी अनेक प्रकार के सिद्धान्त हैं, उन सब को भगवान् अच्छी तरह जानकर तथा दूसरों को यथार्थ समझा कर संयम में तत्पर होगये । अर्थात् जिस प्रकार का उपदेश दिया, उस को ही आच- ग्ण में भी लाए ॥२७॥ गाथा--से वारिया इस्थि सराइभत्तं, उवहाणवं दुक्खखयट्टयाए। लोगं विदित्ता आरं परं च, सव्वं पभू वारिय सव्ववारं ॥२८॥ छाया--म वारयित्वा स्त्रियं सरात्रिभक्तं, उपधानवान् दुःवक्षयार्थम् । लोकं विदित्वाऽऽरं परं च सर्व प्रभुरित सर्ववारम् ॥२८॥ अन्वयार्थ-(से) उन (उवहाणव) तपस्वी (पभू) भग- वान् महावीर ने (दुक्वखयट्टयाए) आठ प्रकार के कर्म रूपी दुःखों को .
मटियाग्रन्थमाला (२८) MAAN नाश करने के लिये (सराइभत्तं) रात्रिभोजन के साथ ही साथ (इ- त्थी) स्त्री संभोग-मैथुन आदि पापों को (वारिया) त्याग कर (सर्व) तथा समस्त (आरं) इम (लोग) लोक को (च) और (परं) परलोक को (विदित्ता)जानकर(सव्ववार) बहुतायत से (वारिया) निवारण किया । भावार्थ-जो वक्ता जिम प्रवृत्ति का उपदेश देवे रमे उसी प्र- कार वर्ताव करना चाहिये । तब ही उपदेश का प्रभाव होता है । भावान् म- हावीर ने मोक्ष प्राप्त करने का जो उपदेश किया, व स्वयं भी उसी मार्ग में प्रवृत्त हुए । इसी लिए कहा गया है कि भगवान ने आठ कर्म रूपी दुःग्यो को नाश करने के लिये स्त्रीसम्भोग का तथा गत्रि भोजन, प्राणानिपान, मू- पावाद आदि समस्त पापों का त्याग किया था । तथा वार तपस्या करके इम नोक और परलोक को अथवा मनुप्यलोक तथा नरकादि लोक को जानकर सब का त्याग किया था ॥२८॥ गाथा--मोच्चा य धम्म ग्ररहंतभानिय समाहितं अट्ठपदावसुदें। तं सहहाणा य जणा अगाऊ, इंदा व देवाहिव आगमिस्संति ॥२९॥ छाया-श्रुत्वा च धर्ममहद्भापितं. ममाहितमष्टपदोपशुद्धम् । तं श्रद्दधानाश्च जना अनायुप- इन्द्रा वा देवाधिपा ग्रागमिष्यन्ति ॥२६॥ अन्वयार्थ (समाहित) सम्यकप्रकार से कहे हरा (य) और (अट्टपदोवमुद्धं) अर्थ और पदा से निर्दोष (अरहंतभासियं) अ- ईन्न भगवान् दाग कहे हुए (तं) उस (धम्म) धर्म को (सोच्चा) सुन- कर (मह हागा) श्रद्धा करने वाले (जणा) मनुष्य (देवाहिव) देनों (५) महावीरस्तुति । स्वामी (इंदा) इन्द्र (व) तथा (अणाऊ) आयुरहित सिद्ध (आ- मिस्संति) होवेंगे॥ भावार्थ-श्री सुधर्मा स्वामी जम्बूस्वामी से उपसंहार करते हुए क- ते है कि जो अर्हन्त भगवान् के द्वारा कहे हुए धर्म का श्रद्धान करते हैं है आयु कर्म रहित होते अर्थात् मुक्ति प्राप्त करते हैं, अथवा इन्द्रादि होते है और होते रहेंगे ॥२६॥ ॐ ममममममम १६६६६६६६६-०६९ सिरिमहावीरथुई समत्ता। EEEEEEEEEEEEEEEEEEEE) HTTER ज सरियाग्रन्थमाला (३०) pass amos A_Als_us .ck GEM महावीरस्तुति का पाठान्तर। गाथासंख्या मूलपाठ पाठान्तर अणुत्तरं अगुत्तरे अज्झत्थदोसा अज्झत्यदोस अहेयं अहेया उत्तिम पवं कासन कासवे कुसलेमहेसी कुसलासुपने खेयन्ने खेयन्त्रए जसंलिणो जसस्सिगो जुईमं उजुईमं वणवते शवगावति तमंपगासे तमंपगास दाणाणसेहूं अहादाणसेट धिइंचपेहि धितितहेच १५ निसहाऽऽययाशी निसहोययाण २४ पवुचई पउदवती पंडगवेजयंत पंडगंवेजयन्ते पुछिस पुच्छिस्सु भिक्खू मुक्के महतो १९ महाणुभावे महाणुभागे ~ २ महउ या चा च विरायण वीर अणंतचा सव्ववाय मुगनाग्वामि विगयई वागणंतचकरव सब्वायं मुगलावावि .
महावीरस्तुति सेट्ट सेट्ठे सोसाय सोधेव नोट-क ग च ज त द प य व इन अक्षरों का लोप भी होता है तथा उक्त वर्गों के स्थान में य भी होता है , जैसे ततो-तओ, उदी रइत्ता-उईरइत्ता, दुहिया-दुहिआ जितं-जियं इत्यादि । त के स्थान में द भी होता है, जैसे ततो-तदो आदि । न के स्थान में ण भी होता है , जैसे किन्नु-किराणु आदि । अनुस्वार के स्थान अनुस्वार से अगले वर्ण का पांचवाँ अक्षर भी होता है। खंति-खन्ति, इंदत्तं-इन्दत्तं । संयुक्त कर्ण का पूर्व स्वर ह्रस्व भी होता है, जैसे भोच्चा-भुच्चा आदि । नोट-कितने ही स्थलों पर अनेक पद व्याकरण-दृष्टि से अशुद्ध होने पर भी छन्दोभंग के भय से प्राचीन प्रतियों के अनुसार वैसे ही मूल- पाठ रख दिये हैं। जैसे- में गाथा १? १२ मूलपाठ अगारिणो या वेदयतीमहिदा गिरीवरे हत्थीसु पक्खीसु इत्थी शुद्धपाठ अगारिणोय वेदयन्तिमहिंदा गिरिवरे हत्थिसु पक्खिसु इस्थि ६ सेठिया जैनग्रन्थमाला की पुस्तकें:- तैयार है - रू...-1) मामायिक मृत्र-मूलपाठ तथा विधि म.)॥ प्रतिक्रमण-मूलपाठ और विधि म० -) प्रकरण (थोकड़ा) संग्रह-भाग दुसरा पत्राकार पृष्ट २४८ पक्कीज़िल्द • १). सामायिक मृत्र--शब्दार्थ, भावार्थ, महित २० ) माङ्गलिक स्तवन संग्रह भाग १ म. ) . माङ्गलिकस्तवन संग्रह भाग २ प्रतिक्रमगास्त्र-शब्दार्थ, भावार्थ, विधिम हितमा ) नैनीस बोल का थोकड़ा स० ) जैन बालोपदेश -) प्रस्तार रत्नावली ( इममें गांगेय अनगार के भांगे, श्रावक व्रत के भांगे और आनुपूर्वी के भांगे हैं ) पत्राकार पृष्ट २८० पक्की ज़िल्द २०१७) कर्तव्य कौमुदी द्वितीय-भाग हिन्दी सानुवाद म०।-) नंदी मूत्र मूलपाट मंशोधित लेजरपेपर पुटे महित) क्रिया कर्म वैराग्य क० -)॥ श्रावक के बारह व्रत म० =)॥ गुणविलास (विविध प्रकारस्तवन) 5000 नमिपवजा-अन्वयार्थभावार्थ संस्कृत वाया सहित रू०३) . Ka
श्री सेठिया जैन ग्रन्थमाला पुष्प नं० ११३
329
आत्महित बोध भावना
की
दोहावली
प
RamzrahnxxADKhil
प्रकाशक
भैरोदान जेठमल सेठिया
बीकोनर
वीर संवत् २४७५
विक्रम संवत् २००५
मूल्य 1) चार आना
(ज्ञान प्रचार मे लगेगा)
• डाक खर्च अलग।
प्रथमावृत्ति
वसन्त पञ्चमी
सठिया जैनग्रन्थमाला की
पुस
तैयार है
मामायिक मृत्र-मूलपाट तथा विधि
प्रतिक्रमण-मूलपाठ और विधि
प्रकरण (थोकड़ा) संग्रह-भाग दृमग
पृष्ट २४८ पक्कीज़िल्द
सामायिक मूत्र--शब्दार्थ, भावार्थ, :
माङ्गलिक स्तवन संग्रह भाग १
माङ्गलिकस्तवन मंग्रह भाग २
प्रतिक्रमणास्त्र-शब्दार्थ,भावार्थ,
बैंतीस बोल का थोकड़ा
जैन यालोपदेश
U बारह भावना ( दोहे ) (१) अनित्य भावना। (१) काया कश्चन कामिनी, विषय भोग सब जोय । क्षणभङ्गुर संसार में, रहि न सके थिर कोय ॥ (२) जेती वस्तु जहान२ में, छिन छिन पलटा खाय । जो दिखती हैं भोर में, सो संध्या में नाय ।। (३) इस जग में कोई कहीं, वस्तु न ऐसी खास । जिसमें हरदम के लिए, किया जाय विश्वास ॥ (४) लक्ष्मी संध्या की छटा, यौवन जल का फेन । राजत३ अक्षिनिमेष४ तक, जाया भ्रात बहेन । (२) अशरण भावना। (५) मात पिता सुत भामिनी,५ अरु जेप्रिय परिवार । काल-व्याघ्र के गाल से, कोउ न राखनहार ।। (६) धर्म एक ही जगत में, शरणागत प्रतिपाल । तेहि बिन रक्षा को करे, काल चक्र के जाल ॥ (३) संसार भावना। (७) लेकर गर्भारम्भ से, देह त्याग पर्यन्त जगत जीव सबं दुःख से, पीड़ित हैं हा हन्त७ ॥ (८) कहीं कष्ट अतिवृष्टि से, कहि दुःख भरा इस लोक में, शान्ति नहीं कहिं पाय ॥ क्षणभङ्गर-नाशवान् । २ जहान-संसार। ३ राजत-ठहरता है। ४ अक्षिनिमेष-क्षणमात्र । ५ भामिनी-स्त्री। ६ काल व्याघ्र-मृत्यु रूपी सिंह । ७ इन्त-खेद - . . वर्षा विनु हाय। or " २१ से २३ * विषय सूची * " १४ से ५६ ,, 8 १ वारह भावना पृष्ठ १ से ५ दोहे ४३ २ चार भावना (मैत्री प्रमोद आदि) से १३ ,, ७६ ३ आत्म-प्रबोध भावना ४ माता पिता के प्रति ५ पत्नी के प्रति ६ पुत्र के प्रति ७ शान्ति-मार्ग ८ कल्याण-मार्ग २३ से २४ ,, १२ ६ आत्म निन्दा " २४ से २५ , १२ / (४) १० आलोचना " २५ से २७ १२ ११ क्षमा याचना २८ से २६, १४ १२ कपाय-विजय १३ हितोपदेश ५ १० " १६ से " २० से २० २१ " " २३ " १२ " ३० . पुस्तक मिलने का पता:- श्री अगरचन्द भैरोदान सेठिया जैन पारमार्थिक संस्था बीकानेर Bikaner, Bk. S. Rly. (७
.
बारह भावना ( दोहे )
(१) अनित्य भावना।
(१) काया कश्चन कामिनी, विषय भोग सब जोय ।
क्षणभङ्गुर संसार में, रहि न सके थिर कोय ॥
(२) जेती वस्तु जहानर में, छिन छिन पलटा खाय ।
जो दिखती है भोर में, सो संध्या में नाय ।।
(३) इस जग में कोई कहीं, वस्तु न ऐसी खास ।
जिसमें हरदम के लिए, किया जाय विश्वास ॥
(४) लक्ष्मी संध्या की छटा, यौवन जल का फेन ।
राजत३ अक्षिनिमेष४ तक,
तक, जाया भ्रात बहेन ।।
(२) प्रशरण भावना।
(३) मात पिता सुत भामिनी,५ अरु जेप्रिय परिवार ।
काल-व्याघ्रः के गाल से, कोउ न राखनहार ।।
(६) धर्म एक ही जगत में, शरणागत प्रतिपाल ।
तेहि बिन रक्षा को करे, काल चक्र के जाल ||
(३) संसार भावना।
(७) लेकर गर्भारम्भ देह त्याग पर्यन्त ।
जगत जीव सब दुःख से, पीड़ित हैं हा हन्त ॥
(E) कहीं कष्ट अतिवृष्टि से, कहिं वर्षा बिनु हाय ।
दुःख भरा इस लोक में, शान्ति नहीं कहिं पाय ॥
गर्भारम्भ से,
१ क्षणभङ्गुर-नाशवान् । २ जहान-संसार। ३ राजत-ठहरता है।
४ अक्षिनिमेष-क्षणमात्र । ५ भामिनी-स्त्री । ६ काल व्याघ्र-मृत्यु रूपी
सिंह । ७ इन्त-खेद
(२)
(8) रंगमञ्च? यह जगत है, कम खिलावन हार। (१
नाना रूप बनाय के, चेतन खेलन हार ॥
(१०) कभी जीव माता बना, पिता पुत्र फिर नार।
भाई भगिनी बन गया
गया, यह विचित्र संसार ॥
(११) यह संसार असार है, लेश न इसमें सार ।
भटका जीव अनादि से, पाया दुःख अपार ॥
[४] एकत्ल भावना।
(१२) जीव अकेला जनमता, मरे अकेला होय ।
कर्मों का संचय करे, सुख दुख भोगे सोय ॥
(१३) सभी कुटुम्बी हर्प से, धन भोगें मन लाय।
जीव अकेला कर्म का, अपराधी बन जाय ।।
(१४) जीव अकेला स्वर्ग सुख, भोगे अति हर्षाय ।
नरकादि दुख एकला, भोगत पुनि पछताय ॥
(१५) तन त्यागे जग जात जो, रहे न सँग छिन एक ।
किया कर्म लेकर चला, पर भव प्राणी एक ॥
-
(५).अन्यत्व (परपक्ष) भावना।
(१६) जीव जुदा काया जुदी, काया जीव 'न एक ।
क्षणभङ्गुर · यह काय है, जीव नित्य पुनि एक ॥
(१७) काया पुद्गल-पिंड है, चेतन ज्ञान सरूप ।
यह शरीर 'पुनि मूर्च है, जीव अमूर्च अनूपरे ॥
(१८) जीव अनादी काल से, सहता योग वियोग ।
कभी किसी से बिछड़ता, कभी किसी से योग ।
.
१ रंगमञ्च-खेलने की जगह । २ अनूप-उपमा रहित ।
-
--
( ३ )
(१६) जितनी वस्तु जहान में, वे सब हैं परकीय१ ।
इनसे ममता त्याग कर, ध्यावो आत्मस्वकीयर ॥
(६) अशुचि भावना।
; (२०) घृणित वस्तु संयोग से, हुई काय तैयार ।
अशुचि वस्तु से है बढ़ी · माता गर्भागार३ ॥
(२१) उत्तम सुन्दर सरस. भी, होय भले आहार ।
जाकर अन्दर काय के, अशुचि होत तैयार ॥
(२२) नेत्रादिक नव द्वार से, भरता- मैल हमेश।
निर्मल यह नहिं बनि सके, करिये यत्न अशेष४ ॥
(२३) हाड़ मांस का पीजरा, हँका चामड़ी.. माय ।
भरी असह दुर्गन्ध - से, महाघृणित यह काय ।।
(७) श्राश्रव भावना।
२४) मन वच तन के शुभ अशुभ, योगों से जी जोय ।
गहे शुभा शुभ कर्म को, आश्रव जानो सोय ।।
(२५) एकेन्द्रिय आधीन हो, मृग खोते निज गात ।
पञ्चेन्द्रिय आधीन जो, फिर उनकी क्या बात ।।
(८) संवर भावना।
(२६) जिस व्रत के स्वीकार से, आश्रव की सब आय ।
रुक जाती' तत्काल · ही, वह, संवर कहलाय ॥
(२७) डूब बटोही५ जांय वे, छिद्र, तरी६. चढ़ जाय ।
वन्द करें जब छिद्र को, सुख से वे.. तरि जाय ॥
।
।
-
.
4
१ परकीय-पराई । २ आत्म स्वकीय-अपनी । ३ गर्भागार-गर्भ में ।
४ अशेष-सम्पूर्ण। ५ बटोही-यात्री। ६ तरी-नाव ।
- भावना, चार भावना (१) जाहि जोति से पा गये, शिवपद अखिल१ जिनेश । सोइ जोति मो . मन बसे, जग-मग रहे हमेश॥ (२) जो 'ये चारों भवतारन की सेतुर । करु आत्म हित के लिए, अन्य न कोई हेतु ॥ (३) मैत्री करुणा मुदित पुनि, उदासीनता . धार । साधक भव-वारिधि तरे, पाचे पद अविकार ॥ (४) ताते चारों भावना, भावो मन के योग। जाते भव , बन्धन कटें, मिटे सकल भव रोग ॥ : (५) भावते नित भावना, चञ्चल मन थिर होय । मुक्ति मार्ग को पाय के, शिव अधिकारी होय ॥ मैत्री भावना (१) जग के जीवों को सदा, करहु मित्र सम प्यार। वैर ने करिये काहु से, मित्र भाव मन धार ।। (२) वैर भाव उद्वेग की, पुनि भय दुख की- खान । मित्र भावना है सदा, शान्ति सुखों का थान ॥ मैत्री भावना के लिए वैर त्याग (३) दुःख रूप दावाग्नि को, है जो पवन समान। चिन्ता रूपी बेल , को, सीचें मेघ समान ॥ (४) धर्म रूप शुभ कमल को, नाशत बर्फ समान । महाभयों की खान जो, कर्म बन्ध का थान। (५) रागद्वेष पहाड़ का, ऊँचा शिखर ऐसा वैर विपक्ष३ है, चित्त क्षोभ का थान ॥ १ अखिल-सब । (२) सेतु-पुल । (३) विपक्ष-शत्रु । समान।
w
• (७)
(६) वैर विपक्षी से रहो, मनु! तू हुशियार।
त्यागे इसके ' जीत है, 'नेह करे 'ते' हार ।।
(७) शमभञ्जक? दुख मूल जो, चिन्ता का जो भेपर ।
मैत्री भावों का रहे, जो प्रतिपक्ष हमेश ।।
(८) मित्रो !, वह गृह नहिं बसे, करे वैर जहँ वास ।
कौरव पांडव- वंश का, किया इसी ने नाश ॥
(8) ताते मैत्री भावना, भावो
शुद्ध
हमेश।
वैर भाव सब दूर हो, रहे न दुख का लेश ॥
(१०).मैत्री भाव मनुष्य का, है गुण सहज महान,
वैर. भावना जाहि में, वह नर पशू . समान ।
(११) मैत्री भाव विकासते, प्रास पास के लोग।
विसर जात हैं बैर को, करहिं उचित सहयोग।
(१२) निज विकास हित चित्त जो, निर्मल करना होय ।
तो तुम, मैत्री भाव को, अपनायो छल खोय ।।
सभी जीव भाई हैं-
१
(१३) भव भव के सम्बन्ध से, जीव मात्र समुदाय ।
नहिं कोई ऐसा रहा, जो न हमारा भाय ॥
(१४) सबही जीव जहान के, जब हैं। मेरे भाय।
करना उनसे वैर भी, अनुचित . समझा जाय ॥
क्षमापना
(१५) सभी जीव जब हो चुके, बन्धु किसी भव माय ।
उनका बुरा न सोचना, करना सदा सहाय ॥
(१) शमभञ्जक-शान्ति को नष्ट करने वाला (२) भेष-रूप ।
८) (१६) जो तुझसे अज्ञान वश, हुई किसी की हानि । तो तू शाम सुबह उसे, करो शान्त सनमानि ।। मैत्री क्रम- (१७) ज्यों ज्यों आतम शक्ति का, होता जाय प्रकाश। मैत्री रूपी बेल का, त्यों त्यों होत विकाश ॥ (१८) जड़ इसकी निज गेह में, जो हो सुन्दर वेष । स्कन्ध कुटुम्बों में रहे, शाखा सारे देश॥ (१६) इहि विधि मैत्री भावना, भाचो शुद्ध हमेश। तो पुनि मैत्री वेलड़ी, बाढ़े सारे देश ॥ (२०) अन्य मतों के साथ हूँ, कर नहिं जरा विरोध । तच्च खोज की दृष्टि से, कर तूं मत का शोध१ ।। (२१) किसी जाति के लोग से रख नहिं जरा विभेद । मित्र भाव त्यागो नहीं, जो स्वभाव कुछ भेद ।। (२२) जीव श्रादि छह द्रव्य का, है स्वभाव में भेद। तो भी ये जग में रहें, हिलमिल, रखें न भेद ॥ (२३) चन्द्र रहे, आकाश में, भू मैत्री इनकी नित बढ़े, कभी न होवे थोर ॥ (२४) जैसे उक्त पदार्थ में, देश जाति देश जाति का भेद। करे न किञ्चिन्मात्र भी, मिन भाव का छेद ॥ (२५) वैसे तुझको उचित है, कर जीवों से प्रेम। होने मैं कुछ भेद भी, तज मत मैत्री नम ॥ (२६) रे दुर्भाग! जवासिया ! वर्षा जलता, क्यों इस भांचि से, हरा भरा तूं नाय ॥ रहे चकोर। - ऋतु के माय। (१) शोध-खोज । (२) थोर-कम ।
(२७) भाई अब मैं क्या कहूँ, अपने दुख की बात । वनस्पती का उदय लखि, सूख गया मम गात ॥ (२८) अरे दुष्ट जवासिया !, तू तो बड़ा नादान पर सम्पत्ति लखि व्यर्थ ही, क्यों होता हैरान ।। (२६) थावर जग में जन्म से, जड़तावशर मैं नीच । पर२ मानव इर्ष्यालु जो, है वह मुझ से नीच ॥ प्रमोद भावना (१) लखि गुणिजन की पूजना, आदर सह पुनि मान। हर्षित होना ताहि ते, है प्रमोद शुभ खान ॥ (२) वीतराग अरिहंत का, पुनि जे साधु सुजान । दानी श्रावक वर्ग का, सबका कर मुणगान ॥ (३) कर्त्तव्य व्रत पाल कर, जो चाहसि भव पार । तो ईर्ष्या मन से तजो, रोधक३ सेवा द्वार ॥ (४) धन जन सम्पत्ति अन्य की, देख न मन ललचाव । अन्य पुरुष सन्मान को, देख हृदय हर्षाव ॥ (५) उदित सूर्य को देख कर, जिमि सरोज खुश होत। ऋतु वसन्त को देखते, जिमि वन विकसित होत ॥ (६) सुनत मेघ की गर्जना, नाचत मत्त५ मयूर । चातक जिमि जल बिन्दु पा, प्रसन्न भरपूर ॥ (७) हे मानव इहि भांति तूं, पर उन्नति को देख । अति प्रसन्न शुभ दृष्टि से, ताहि ओर तूं पेख६ ॥ हो (१) जड़तावश-अज्ञानतावश । (२) पर-परन्तु । (३) रोचक-रोकने वाला। (४) सरोज-कमल । (५) मत्त-मस्त- मतवाला। (६) पेख-देख ।
प
(१०)
(८) करो न ईर्ष्या अन्य से, तेहि उन्नति होव
ऐसा करने से सभी, करें तुम्हारा चाव॥
(8) हिलमिल तुम सत्र से रहो, प्राणी से रख प्रेम।
इहि विधि' भव वारिधिर तरो, कर जप तप पुनि नेम॥
(१०) चिरकालिक संस्कार से, यह मन ईर्ष्या खान।
पर उन्नति नहिं सहि सके, वृथा जले नादान ॥
(११) ईर्ष्या सद्गुणहारिणी, पाप बढ़ावनि हार।
इह भव में दुख दायिनी, पर भव नाशनि हार॥
(१२) ऐसी ईर्ष्या को जरा, दो नहिं मन में थान।
जो चाहसि इस लोक में, या पर भव कल्याण ॥
(१३) यह प्रमोद शुभ भावना, करती सदा प्रमोद।
सभी दुःख को दूर कर, मन में रखती मोद॥
करुणा भावना
(१) मन अरु तन के दुःख से, दुखी जीव को जोय।
दुःख नाश की चाह को, जानो करुणा सोय ।
(२) करुणा गुण समदृष्टि का, जैनागम के माँय।
धर्ममूल करुणा
करुणा कही, अन्य धर्म के माँय ॥
(३) साधुपना श्रावकपना, ' विन करुणा नहिं होय ।
करुणा बिन नहिं जा सके, सेवा पथ पै कोय ॥
(४) जीवन प्रिय सब जीव को, सब को सुख की चाह ।
तिरस्कार दुख मृत्यु के, नहिं जावे कोइ राह ।।
(५) तुम्हें चाह जिस वस्तु की, उसे शीघ्र कर दान ।
ताहि वस्तु को हाथ ले, तुम्हें भाग्य दे मान३ ॥
(१) इहि विधि-इस प्रकार । (२)भव वारिधि-संसार समुद्र ।
(३) मान-आदर।
w
(११)
३) दुखी जीव जिस. द्रव्य से, सुख नहिं पाये होय।
वह धन नहिं कुछ काम का, बकरी गल?-थन सोय ।।
३) दुखी जीव जिम काम से, रक्षित हुए न होय ।
दुखी जीव जिस शक्ति से, उद्धृत हुए न होय ॥
5) मोक्ष मार्ग जिस वुद्धि से, नहिं पहचाना होय ।
है नहिं ये कुछ काम के, भार रूप पुनि सोय ।।
६) सुख, हित, विद्या, कीर्ति पुनि, सुत विनीत सब जोय ।
-पुण्य वृक्ष के फल. सभी, जो सुखदायी होय ॥
०) जो चाहो इस वृक्ष के, हरेभरे हो पात ।
करुणा जल से सींचिये; इसकी जड़ . दिन रात ॥
१) करुणा जल अभिषेकर विन, पुण्य वृक्ष नशि जाय ।
ता बिन सुख सम्पन्नता, क्षण में स्वयं - विलाय३ ॥
२२) दीन, .. अपंग, दरिद्र नर, : रोगी भाग्य विहीन ।
विधवा, वृद्ध, अनाथ, शिशु, पर पीड़ित, बलहीन ॥
१३) विकट समय जो मर रहे, बिना अन्न बिन घास ।
ये सब करुणा पात्र हैं, रखें तुम्हारी प्राश ॥
"
मध्यस्थ भावना
(१) जग के जीवों को सदा, करने में अघ४ दूर ।
मध्य भावना का मनन, साथ देय भरपूर ॥
(२) मध्य भावना के बिना, सम हो विषम६ समान।
'पर-अघ-मोचन दूर रह, आपुहि गुण विलगान ।।
(१) बकरी-गल-थन-बकरी के गले में लटकने वाला स्तने ।
(२) अभिषेक-सींचना । (३) विलाय-नष्ट हो जाता है।
(४) अघ-पाप । (५) सम-समभाव । (६), विपम-विषम, भाव
(७)विलगान-दूर होना।
।
।
--
(१२) (३) जग सेवा जग जीव का, करने में उपकार | पुनि शुभ धर्म प्रचार में, सहन शीलता धार ।। (४) शत्रु तुम्हें यदि मारने, को भी उद्यत होय । कोप खेद करना नहीं, जेहि तव कारज होय ॥ (५) चेतन इस संसार में, ऐसे हैं कुछ जीव । जो तेरे प्रतिपक्ष हैं, पाप कर्म के सीव१ ॥ (६) साम, दाम अरु भेद से, दे सुन्दर उपदेश । पुनि तेहि मीठे वचन से, बोधित करो हमेश॥ (७) सभी उपायों से यदपि, नहिं समझे वह कूर । जरा न तेहि अपमान कर, तेहि से हट तूं दूर ॥ (८) पापी का मत नाश कर, कर पुनि पाप विनाश । किसी जीव के नाश से, हिंसा आवे पास ॥ (६) हिंसा के आगमन से, पाप सृष्टि अधिकाय । अधः पात हो आत्म का, पुण्य छीण हो जाय ॥ (१०) छेदन करना वस्त्र का, “मल नाशनं के हेत। नीति शास्त्र के मार्ग में, नहिं यह शोभा देत ॥ (११) जिमि जल कोमल वस्त्र से, मैल हटाया जाय । बातों से करे नम्र तिमि, पापी पाप नशाय ॥ (१२) देश हितैषी मनुज जो, अधिक होय बलवान । बदला ले नहिं शत्रु से, करे ताहि सन्मान । (१३) सहन शीलता धारना, वीरों का है काम । धारं न सके सहिष्णुता, दुर्वल नरें बलखामः ॥ (१) सीव-हद । (२) सहिष्णुता-सहनशीलता। (३) बलखाम- बलहीन ।
( १३)
(१४) चेतन की बल वृद्धि से, सहन शीलंता होय ।
ताते तुम धारण करो, शान्ति खमा१ शुभ दोय ।
(१५) उदासीनता धार लो, जो निज मन के माँय ।
तो अरिर त्यागे धृष्टता, पुनि सेवक बन जाय ॥
(१६) ये सब ही
ही शुभ भावना, भावे भैरवदान ।
जो भावे शुभ भावसे, होय परम कल्यान ।
(१) खमा क्षमा । (२) अरि-शत्रु ।
A
-
.
-
(१४) आत्म-प्रबोध भावना। १ (१) नमो ग्रादि अरिहंत को, जिन प्रकटा सब ज्ञान । धर्म सिखाया जगत को, दूर किया अज्ञान ।। सकल चराचर विश्व जस, हस्तामलक? समान । सो प्रभु मति निर्मल करे, विघ्न हरे बलवान ।। (३) लोक हितैपी धर्म रत, ' मुनि जन ज्ञान समेत । कीनी बहु सद्भावना, भव नाशन के हेत ॥ (४) सोइ अधार कछु पाय के, आत्म मनन के हेतु । करता हूँ सद्भावना, सद्भावना, और न कोई न कोई हेतु (५) यह शरीर पर्याय जो, नित, नित पलटा खात । पर मैंने जाना नहीं, दिन दिन निरखत गात२ ॥ (६) अभी देह की यह थिती, निरखत ममता जात । प्रभु की वाणी सत्य वह, "अथिर विनश्वर३ गात" ॥ (७) परमाणु के मिलन से, बना हुआ यह गात ॥ विखरन से इनके नहीं, चेतन का कुछ जात ॥ (८) जिमि अकाश में बादली, घुमड़त विछुरत आप । कोई जग कर्ता नहीं, होता आपो आप ॥ (8) चेतनकाय वियोग से, क्यों तू है घबरात । रखने से क्या रहि सके, छोड़े से क्या जात ॥ (१०) मैं तो चेतन अमर हूँ, दर्शन सुख अरु ज्ञान । वीर्य आदि जो सहज गुण, पहचान। (११) काय रहे या जाय जो, पुद्गल का परिणाम । मैं अविनाशी एक सा, चिन्ता का क्या काम ॥ (१) हस्तामलक-हथेली पर रहा हुआ आंवला। (२) गात-शरीर । '3) विनश्वर-नष्ट होने वाला। . , - सब मेरे
-
(१५)
(१२) अब तक , था मैं जानता, है यह मेरी देह ।
पाली पोसी प्रेम से, कर कर नित नव नेह ।।
(१३) पर अब मैंने समझ ली, इस काया की चाल ।
अब तक हुई न प्रापणी, आगे कौन हवाल ।
(१४) मेरी . होती काय जो, रहती · मम 'आधीन ।
रोग, शोक अरु मृत्यु के, क्यों होती आधीन ।
(१५) एक तुम्हारे देह के, कितने सगे । न अन्त
मोह ' फाँस में सब बंधे, मूर्ख अरु मतिमन्त ।।
(१६) जग का नाता झूठ है, क्यों फंसता इस फंद ।
- जीव एक अरु नित्य है; सहज सच्चिदानन्द ।।
(१७) सम्पति कारण आज तक, बांधे कर्म अपार ।
चिन 'भोगे छूटे नहीं, 'करो कोटि उपचार ॥
(१८) चीती सो बीती सही, अघ तो ममता छाँड ।
नया' कर्भ बांधो. मती, कृत कर्मों को झाड़ ।
(१९) मैं हूँ' 'निर्मल गगन सा, रूप हीन' चैतन्य ।
आदि अन्तः से हीन हूँ, 'महिमा अमित अनन्य ।
(२०) सभी तत्व को जान कर, करूँ अात्म जयवन्त ।
हरने में समरथ बनूं, · रागद्वेष बलवन्त ॥
(२१) हाड़ मांस अरु रक्त जहँ, मल मुत्रादि लखाय ।
क्षणभङ्गुर इस काय में, ममता क्यों अधिकाय
(२२) स्वर्गादिक फलदान से, मित्र मृत्यु को जान ।
हित कारक कोई नहीं, इससे बढ़कर मान ।
(२३) मृत्यु बिना इस बंध से, कौन छुड़ावन हार ।
भवसागर में डूबते, गुरु चिन कौन उचार ॥
(२४) ढूंढत . ढूंढत तूं' थका, मन ! शमसुख? बहुवार ।
पर नहिं मरण समाधि विन, शम सुख का दातार ॥
१ शमसुख-मोक्षसुख।
--
(१६)
.
(२५) मृत्युवृक्ष की छाँह में, कर विषयों का त्याग।
जो नहिं त्यागो विषय को, तो चौरासी लाग ॥
(२६) सात धातुओं से बनी, यह औदारिक देह ।
गलते वार न लाग ही, जिमि जल-उपलन-गेह? ।
(२७) नय उपनय अरु हेतु से, दे दृष्टान्त अनेक ।
चेतन को पहचानते, मुनि जन सहित विवेक ॥
(२८) चेतन तू इस काय पै, कर नहिं तनिक सनह ।
यह शरीर तेरा नहीं, तू निर्मल निर्लेहरे ॥
(२६) व्याधी कर्माधीन है, नहिं औषध आधीन ।
ताते औषध छोड़ के, हो शुभ घ्यान विलीन ।
(३०) वैद्यराज जिनराज की, औषध मरण समाधि ।
सेवन से श्रावे नहीं, आधि३ व्याधि४ उपाधि५ ॥
(३१) अजर अमर अक्षय सदा, अव्याबाध६ अनन्त ।
सपने जे सुख नहिं मिले, वे आते विकसन्त ॥
(३२) तेज ताप से तप यथा, सोना निर्मल होत ।
समता से सह वेदना, जीव अमल तिमि होत ॥
(३३) 'हायवॉय'७ तुम ना करो, बढ़ने से दुख जोर ।
हाय किये दुख ना घटे, बँधते कर्म कठोर ।।
(३४) इससे अच्छा है यही, सह दुख भजि समभाव ।
नया कर्म बांधो नहीं, सश्चित कर्म खपाव ।।
१ जल उपलन गेह - बर्फ का घर । विलीन-तल्लीन ।
२ निर्लेह-निर्लेप-लेप रहित ।३ आधि-मानसिक चिन्ता ।४व्याधि-
शारीरिक रोग । ५ उपाधि-बाहरी झगड़े। ६ अव्यावाघ - रोग
रहित । ७ हायवॉय-वेदना के न सह सकन से जो कायरता के शब्द
ते हैं।
मनुज. वेदना जोय। . (३५) जो तूने नरकादि में, बहु सागर पर्यन्त । सही विविध विध वेदना, जिस का नहिं कुछ अंत ॥ (३६) ताहि वेदना सामने, मनुज. क्या है यह दुख दायिनी, अल्प कालिनी सोय ॥ (३७) यह तो दुख, सुख मूल है, सार रूप पुनि सोय । कायर पन को त्याग कर, सह मन दुख दृढ़ होय ।। (३८) यह तो तेरा ही किया, भव भव का ऋण भार । तीव्र असाता वेदनी, वांधा कर्म अपार ॥ (३६) वही असाता वेद कर, उण हुआ तू आज । कर्म भार हलका हुआ, हुआ सकल सुख साज । (४०) हो परवश तू नरक में, पीड़ा पीड़ा सही अनन्त । पर उससे कुछ नहीं सरा, बिन समकित बलवन्त ।। (४१) सहने से भी वेदना, भी वेदना, बहु सागर पर्यन्त । हुई सकाम न निर्जरा, हुआ न भव का अन्त ।। (४२) अमित निर्जरा होयगी, - होगा भव का अन्त । आ क्षण१ दुख समभाव से, सहवे जो गुणवन्त । (४३) चेतन तू यह जान ले, निश्चय है यह बात। किये कर्म भोगे विना, प्राणी मोक्ष न जात ॥ (४४) प्रबल पुण्य के उदय से, मिला मनुज भव जान । कहा भगवती सूत्र में, तीर्थङ्कर भगवान ।। (४५) ता में भी बहु पुण्य से, आर्य क्षेत्र में प्राय । उत्तम कुल · चिर जीविता, रोग हीन तन पाय ।। (४६) पञ्चन्द्रिय परिपूर्णता, सद्गुरु का संयोग। ताप मिलना कठिन है, प्रवचन श्रवण सुयोग ॥ १ आ क्षण-इस समय। . ३ (१८) त्याग (४७) आगम सुन कर श्रद्धना, कठिन कहा जिनराय । उससे भी पचखाण का, करना कठिन कहाय ॥ (४८) श्रद्धालू संसार में, करे पचखाणा ग्यारह व्रत भी साध ले, कठिन सुपातर दान ॥ (४६) ऐसा अवसर पाय के, कर मत तनिक प्रमाद । नहिं तो फिर पछतायगा, समय चूकने बाद ॥ (५०) धर्म काम में मत करो, समय मात्र परमाद । आनँद सुख शाश्वत सदा, मिले धर्म परसाद ।। (५१) जब तक घट में प्राण है, जपता रह नवकार । दुख तेरे कट जायेंगे, होगा भव से पार ॥ (५२) ले तू अपने साथ में, धर्म-रत्न-भण्डार। वरना तू फिर जायगा, खाली हाथ पसार ॥ (५३) कर प्रमाद मत धर्म में, आयुष · बीती जाय । काल चक्र है घूमता, कुण जाणे कर आय ॥ (५४) बिना धर्म सेवन किये, भोगे दुःख अनेक। अब तो राख विवेक ॥ (५५) हाट बगीचा खेत पुनि, सोना चाँदी धाम। जेती सम्पति जगत की, मृत्यु सके नहिं थाम ॥ (५६) ठगिनी सम्पति से सदा, मन तू रह हुशियार । यह इतनी मायाविनी, जिसका वार न पार ॥ (५७) धन्य महाजन है वही, दे धन को शुभ ठाम । श्रावक व्रत को धार कर, करता आतम काम ॥ (५८) जागो प्राणी भोर है, नहिं अब है यह रात । सोने में तुमने किया, कुम्भकरण को मात ॥ चौरासी भमता रहा, . 8) आतम हित की भावना, भावे भैरवदान। पुनि राखे यह कामना, होय जगत कल्याण ॥ माता पिता के प्रति- (१) मात पिता इस देह के, लीजे खूब विचार ।। यह शरीर था आपका, खूब किया था प्यार ।। (२) थी इसकी इतनी थिती, अब न आयु अवशेष । नेह करे कुछ ना सरे, बाड़े दुःख विशेष । (३) यह तन उतना ही रहे, जितनी वय अवशेष । . है नहिं ऐसी शक्ति जो, रख ले इसे विशेष ॥ (४) आतम साधन में मुझे, दीजे अब सहयोग । गमनागमन विनष्ट हो, मिटे सकल भवरोग ।। (५) काया और कुटुम्ब का, तज कर सब सम्बन्ध । मेरा चेतन दृढ़ बने, ऐसा करो प्रबन्ध ।। पत्नी के प्रति- (१) हे सहयोगिनी ! हे प्रिये ! सुन मम हित की बात । मेरा तेरा नियत था, इतने दिन का साथ ।। (२) तूने मम इक चित्त से, सेवा की दिन रात । अब यह तन विनसन लगा, करो धर्म की बात ।। सच्ची हितकारिणी, इस अवसर ममता तजो, दुर्गति की दातार ॥ (४) जाता था. परगाँव जब, तुम विवेक की खान । देती थी मुझको सदा, खाने को पकवान ॥ (५) परभव भाता बांध .दो, शुभ परिणाम अथोरि१ । अब तू मोह. ममत्व कर, अहित करो ना मोरि ॥ (१) अथोरि- बहुत । - (३) जो हो पतिभक्ता नार।
(२०)
(६) धर्मसंगिनि ! दो मुझे, अन्त समय में साज ।
भव भव का फेरा टले, सीझे श्रातम काज ॥
(७) जिन निगदित? शुभ धर्म का, पालन करना रोज ।
बन कर सच्ची श्राविका, करना आतम खोज ॥
(८) धर्म ध्यान में लीन हो, जिन वाणी अनुसार ।
मोह त्याग शुभ कर्म कर, धीरज मन में धार ।
(६) अशुभ ध्यान को त्याग कर, करो सदा शुभ ध्यान ॥
ज्ञान सहित शुभ कर्म कर, करो आत्म कल्याण ॥
(१०) ज्ञानादिक शुभ रतन धर, करो नियम पचखाण ।
जिन भाषित शुभ धर्म का, निशदिन करना मान ||
.
पुत्र के प्रतिः-
(१) नीति सहित संसार से, सुत ! रखना व्यवहार ।
वंश दिपाना आपना, तज कर मिथ्याचार ॥
(२) सद्गुरु की सेवा करो, श्रावक व्रत लो धार ।
श्रद्धा रक्खो धर्म में, आगम के अनुसार ॥
(३) जूत्रा सट्टा फाटका, कभी न करना भूल।
लोगों में इजत
घटे, पुनि चिन्ता का मूल ।।
(४) लोक हंसी नृप दंड पुनि, जिन कामों से होय ।
उन कामों से दूर रह, जाते हंसी न होय ॥
(५) संप किये लक्ष्मी बढ़े, प्रेम रखे सुख होय ।
मामलवाजीर से सदा, घर का धन छिन३ होय ॥
(६) संगत करना गुणिन की, शिक्षा उनकी मान ।
खोटी आदत त्याग कर, जन्म करो फलवान४ ॥
१ निगदित-भाषित-कहा हुआ । २ मामलबाजी- मुकदमा बाजी ।
३ छिन- क्षीण । ४ फलवान-सफल ।
(२१) १) न्याय मार्ग का पथिक बन, कभी न कर अन्याय । नहिं विरुद्ध कुछ काम कर, ज्ञाति वर्ग के मांय ।। ८) उस मत में शामिल रहो, जिसमें सत्य विचार । खींचा तानी मत करो, गुरुजन शिक्षा धार । ह) अवगुण काढ़ो आपना, दोष न दीजे काहु । मत कर निन्दा अन्य की, गुण ग्राहक बनि जाहु ॥ १०) शान गुमान करो नहीं, चलो सादगी चाल । मीठा वचन पुकार कर, हिल मिल सत्र से हाल ।। ११).तू जौहरि यह कूँजड़ी, क्यों करता तकरार । इसकी भाजी विखरसी, तेरे रत्न अपार ॥ १२) बुरी रीति को त्याग कर, सत्यमार्ग को धार । जैन धर्म पालन करो, आगम के अनुसार ॥ शान्ति मार्ग- (१) कहाँ शान्ति का मूल है, हूंढ रहा संसार । कस्तूरी निज नाभि में, पर मृग भ्रमत गँवार ।। (२) मैं ही दुख का मूल हूँ, मैं ही परमानन्द। स्वामी हूँ मैं दास हूँ, हूँ बँधित स्वछन्द ॥ (३) राग द्वेष दो पट विकट, चेतन उसमें बन्द । पराधीनता है जहाँ, वहाँ न है आनन्द ।। (४) क्यों · करता तू राग है, तेरा है कह कौन । संकट में तू देखना, होंगे सारे मौन । (५) अरे द्वेष क्यों कर रहा, हैं सब तेरे मीत । तेरा बोझ बटा रहे, लड़ता उल्टी. रीत ॥ (६) जैसे चन्दन.. लेप • से, मिटे देह सन्ताप । तैसे धीरज से मिटे, चेतन के त्रय-ताप१ ॥ (१) त्रय-ताप-आधि, व्याधि, उपाधि।
(७) जो देते हैं हैं गालियाँ, या करते तकरार। (१ वे मुगती को भेजते, तुझको धक्का मार || (८) रे अधीर क्यों हो रहा, धीरज का गुण धार। (२ जो भवसागर विकट का, पाना ही है पार ॥ (६) आग आग से ना बुझे, पानी से बुझ जाय। ( क्रोध क्रोध से ना मिटे, समता से मिट जाय ॥ (१०) जैसे चन्दन लेप से, से, मिटे दाह ज्वर पीर तैसे समता से मिटे, क्रोधी की तासीर । (११) सुख में फूला क्यों फिरे, क्यों दुख में घबराय । जो सुख के दिन ना रहे, तो दुःख क्यों टिक जाय ॥ (१२) अनुभव का कर दीप ले, बढ़ आगे हर बार। तब पहुँचेगा ध्येय१ को, ए चेतन अविकार । (१३) पाने से संवेग के, राग द्वेष को जीतता, होता विकसित२ भाग्य ॥ (१४) बना जीव निर्वेद तो, छोड़ेगा प्रारम्भ । करता है वह पथ३ विमल४ , शिवपुर५ का प्रारम्भ ॥ (१५) श्रद्धा से ही प्राप्त हों, त्याग और वैराग । सुर सुख को भी त्यागते, कर शिव सुख अनुरागः ॥ (१६) सेवा देती विनय को, विनय सभी गुणखान । गुण का धारक जीव ही, करे मोक्ष प्रस्थान ॥ (१७) शत्रु मित्र सुख दुःख में, साम्य भाव को धार । यह सामायिक सुखद है, रुके. पाप आचार ॥ (१८) क्षमा याचना से मिटें, क्लेश और संताप । बढ़े मित्रता भय हटे, विकसित हो गुण श्राप । १ ध्येय-लक्ष्य । २ विकसित-विस्तार होना, फैलना । ३ पथ-रास्ता। ४ विमल- निर्मल । ५ शिवपुर-मोक्ष । ६ अनुराग-प्रेम । दृढ़ होता वैराग्य।
(२३)
६) क्रोध विजय से नाथ क्या, होता है । उपकार ।
क्षमा शान्ति-प्रद प्राप्त हो,
हटे कर्म का भार ॥
१०) मान विजय से नाथ क्या, होता है उपकार ।
विनय शील बन जाएगा,
छोड़ कर्म का भार ॥
२१) माया जीतन से प्रभो,, क्या होता उपकार ।
सरल-भाव-सम्पन्न । हो, सद्गति का दातार ॥
२२) लोभ विजय से जीव का, क्या होता उपकार ।
पायेगा संतोष को, सब सुख का भण्डार ॥
२३) धर्म रूप शुभ वृक्ष का, विनयमूल पहचान ।
ताते यश कीरति बढ़े, पावे पद निर्वाण ॥
२४) यदि कोई वन्दन करे, या कर दे अपमान ।
राखे समता दोउ में, सो ज्ञानी पहचान ॥
(२५) शस्त्र घाव कुछ काल तक, करता है बेचैन ।
वचन घाव लग जाय तो, दुखित करे दिन रैन ।
(२६) सत्त्वों से हो मित्रता, गुणिजन का हो चाव ।
कृपा क्लिष्ट१ जन पर रहे, वैरी पर समभाव ॥
कल्याण-मार्ग
(१) 'बूंद बूंद से घट भरे'-यह जानत सब कोय ।
गुण का ग्राहक अंत में, गुण-रत्नाकर२ होय ।
(२) जिस गुण की अनुमोदना, करते हैं नर नार ।
वह गुण आता साथ है, छाया के अनुसार ।।
(३) पर निन्दक पर दोष को, लेता हाथ पसार ।
गुण गाहक गुण को गहे, दुनियो है बाजार ॥
१ क्लिष्ट-दुखी। २ गुण-रत्नाकर - गुणों का समुद्र ।
कर्म बलवान। हैं भगवान। - (४) कर्मों से इस जीव को, जानो अति बलवंत । भव भव के सब कर्म का, क्षण में करता अंत ॥ (५) मोह कर्म की प्रबलता, करे मोह कर्म की शिथिलता, करत कर्म की हान ॥ (६) देह वृक्ष की छाँह में, बैठे आत्म सफीर१ । कौन जानता कर उड़े, जैसे पञ्जर२ कीर३ ॥ (७) एक आत्म पहचान से, भव भव के सब रोग मिट जाते हैं जीव के, यों कहते मुनि लोग। (८) जैसे बादल के हटे, सूर्य प्रकट हो जाय। राग द्वेष पट के हटे, ज्ञान प्रकट हो जाय (६) महारोग इस जगत के, कैसे प्रथम रोग 'प्रारंभ' है। द्वितय 'परिग्रह' जान॥ (१०) रजकण पड़कर नेत्र में, खटकत जिमि दिनरैन । समदृष्टी प्रारम्भ से, • (११) ज्ञानी अपनी देह से, करते कर्म विनाश । अज्ञानी की देह है, केवल उसकी पाश४ ॥ (१२) नर भव आया, है गया, इस भव में रख ध्यान। निष्फल चला न जाय यह, कर इसमें कल्याण ॥ श्रात्म निन्दा- (१) जीव अनेकों वध किये, चोला मिथ्यावाद । चोरी से पर धन हर्या, किया ब्रह्म५ बरबाद ॥ (२) देरी की बहु वस्तु की, जिसका नहिं कुछ काम। पड़ी पड़ी वह सड़ गई, भरी हुई गोदाम ॥ १ सफीर – मुसाफिर । २ पञ्जर -पींजरा । ३ कीर - तोता। जाल, बन्धन । ५ ब्रह्म-ब्रह्मचर्य रहता तिमि बेचैन॥ -- . 4 ४ पाश
(३) हूँ लम्पट हूँ लालची, कर्म किया कई कोड़।
तीन भुवन में है नहीं, मेरी कोई जोड़।
(४) छिद्र पराया रात दिन, जोता हूँ 'जगनाथ ।
कुगति तणी करणी करूँ, जो उनमे साथ ॥
(५) मैं अवगुण की कोटड़ी, नहिं गुण मुझ में कोय ।
पर गुण देख सकूँ नहीं, तिरना किस विध होय ॥
(६) बिन कीधा बिन भोगिया, फोकट कर्म बंधाया।
पार्च रौद्र मिटता नहीं, कीजे कौन उपायः॥
(७) झूठ कपट बहु सेविया, किया पाप . का संच।
भोलों को ठगिया धणा, करि अनन्त परपंच ॥
(८) मन चंचल थिर ना रहा, राचा रमणी रूप ।
कर्म विटमना क्या कहूँ, नाँखे दुर्गति कूप ।
(6) अधमों में मैं हूँ अधम, अवगुण भरे अनेक ।
किसी हिताहित कर्म का, मुझमें नहीं विवेक ।
(१०) मैं क्रोधी मैं लालची, नहिं छोड़ा अभिमान ।
मैं कपटी अविनीत हूँ, पापी भैरवदान ॥
(११) हाय न मुझसे हो सका, जनता का उपकार ।
यश के कारण ही किया, मैंने सब व्यवहार ॥
(१२) नाथ ! दिवस कब आयगा, जब होऊँ अनगार ।
कर्म बोझ को डाल कर, चनूं सिद्ध अविकार ।।
अालोचना-
(१) अनुपम? जिनकी ज्योति से, जग मगात संसार ।
सदा हमारे मन बसो, जिनवर जग हितकार ॥
(२) करूँ चन्दना वीर को, और ., जपू नवकार ।
पापों की आलोचना, करता हूँ । इस बार ।।
(१) अनुपम-उपमारहित ।
.
४
नियों का कुछ भंग या, बुरी वस्तु की चाह । ( २६ ) (३) प्रथम शरण अरिहंत का, द्वितय सिद्ध का जान । तृतय सन्त जन का कहा, चौथा धर्म प्रमाण । (४) शरण गही प्रभु आपकी, करता अात्म विचार । मैंने भव भव में प्रभो !, संव्या पाप अठार ॥ (५) चौरासी लख योनि को, दुखित किया दिन रात । लेखा उसका क्या कहूँ, कहते जी घबरात ॥ (६) थावर बस के प्राण से, मैंने खेले खेल। पूँजी से देना बढ़ा, मिले न बिल्कुल मेल । (७) अष्टादश? जो पाप हैं, उनका बोझ अपार। डगमग नैया कर रही, कैसे पाऊँ पार॥ (८) जाकर भव भव में किये, मैंने अत्याचार सोच सोच कर हो रहा, विचलित हृदय अपार (8) मन वच तन के योग से, जो कुछ किय अतिचार जैनागम विपरीत जो, भाषण या (१०) कल्प विरोधी काम या, अकरणीय कुछ काम । आर्च रौद्र किय ध्यान जो, धर्मध्यान से वाम२ ॥ (११) मेरे चेतन ने कभी, जो की दुष्ट निगाह । आचार। (१२) श्रावक धर्म विरुद्ध जो, किया कभी कुछ काम । पुनि दर्शन या ज्ञान के, किया कभी कुछ वाम ॥ (१३) देशवत आगम तथा, सामायिक अतिचार। मोह विवश सेवन किया, जो कुछ मिथ्याचार ॥ | (१४) मन, बच, तनं, व्यापार को, वश में रखा न होय । जो क्रोधादि कषाय का, 'दमन किया नहिं होय ॥ - - (१) अष्टादश-अठारह । (२) वाम-विपरीत।
(२७) . त मोय॥ - - (१५) अणुव्रत पहले पांच हैं, गुणव्रत तीन सुजान। शिक्षा व्रत हैं चार पुनि, ये बारह व्रत जान ॥ (१६) एक देश या सर्व से, हुई विराधना कोय ।। सेवें हो अतिचार जो, मिच्छा दुकडं (१७) इस भव पर भव में किया; पनरा कर्मादान । त्रिविध त्रिविध से वोसिरु, जो दुर्गति की खान । (१८) यंत्रादिक प्रारंभ के, मैंने कीने काम। विविध त्रिविध से वोसिरु, फेर नहीं परिणाम ॥ (१६) बाग बगीचा खेत घर, जो भी मेरे होंय । त्रिविध त्रिविध से चोसिरूँ, ममता तहाँ न मोय ।। (२०) मेरे निज के नाम में, घर दुकान जो होहिं । उन सबको मैं त्यागता, ममता जरा न मोहिं ॥ (२१) निन्याण अतिचार में, जो जो सेव्या होय । करता हूँ आलोचना, मिच्छा दुकडं मोय ।। (२२) मैं अपराधी जन्म का, सेव्या पाप अठार ॥ निज प्रातम की साख से, बार बार धिक्कार ।। (२३) व्रत . नियमादिक में कभी, टंटा लाग्या होय । अरिहँत सिद्ध की साख से, मिच्छा दुकडं मोय ।। (२४) चौरासी लखयोनि में, फिरियो बार अनंत । पाप अलोङ पाठला, अब तारो अब तारो भगवन्त ॥ (२५) जाने अनजाने कभी, सेवे उन सब की आलोचना, करता अलोऊँ पाछला, पाप महान।
क्षमायाचना। (१) चौरासी-लख योनि का,, । क्षमा करूँ सब दोप। क्षमा करें पुनि वे मुझे, मुझसे रखें. न रोप ।। (२) मैत्री भाव सदा मुझे, सब जीवों के साथ । वैर नहिं मुझको कहीं, किसी जीव के साथ ॥ (३) मन, वच, तन, व्यापार से, मैंने किय जो पाप । वे सब मिथ्या हो सदा, बनूं सदा निष्पाप ॥ (४) पुनि उनसे जो कुछ किया, सह कपाय, व्यवहार । क्षमा चाहता ताहि के, मन, वच, तन, व्यापार ॥ (५) पूज्य श्रमण मुनि संघ को, हाथ जोड़ सिर नाउँछ । उनके दोषों को खम, पुनि निज दोप खमाउँ ॥ (६) भाव सहित सब जीव से, धर्म बुद्धि थिर होय । खम् खमाऊँ दोष को, जो दोनों का होय || (७) राग द्वप अकृतज्ञता३ या आग्रह४ वश जोय । कही बात हर तौर से, क्षमा करें सब कोय॥ (८) सेठ महेता५ रोकड्या, जो जो मेरे संग होय। या 'मेरे सम्पर्क में, जो कोइ' आये होंय । (8) सगे कुटुम्बी बन्धु जन, या गोत्रज जो कोय । खद् खमाऊँ दोष को, टंटा आदि या, क्रोध विवश व्यवहार । किया किसी के साथ जो, जो कुछ मिथ्याचार ॥ (११) या कोई ऐसा दोष हो, जिसका नहिं कुछ ज्ञान । क्षमा करें मम दोष को, मुझको बालक जान ॥ (१) रोष-द्वप () ना-नमाता हूँ। (३) अकृतज्ञता-कृतघ्नता। (४) आग्रह-इठ । (५) महेता-मुनीम-गुमास्ता । (६) जोय-जो। . हुआ परस्पर जोय६॥ (१०) झगड़ा
२६ )
-
(१२) चौरासी लख योनि से, तन, मन, वच से जान ।
क्षमा याचना कर रहा, श्रावक भैरवदान ॥
(१३) सकल चराचर जगत का, होय सदा कल्यान ।
सब प्राणी पर हित रहे, करें धर्म का मान ।।
(१४) सब मंगल का मूल जो, सभी शिवों का हेतु |
जिन शासन विजयी रहे, सभी धर्म का केतु ॥
॥ इति सुभम् ॥
.
----
पुस्तक प्राप्ति स्थान:-
श्री अगरचन्द भैरोदान सेठिया
श्री सेठिया जैन लाइब्रेरी
बीकानेर ( राजपूताना)
Bikaner
+
.
-
श्री रामकृष्ण प्रिंटिंग प्रेस, नसीराबाद रोड अजमेर ।
No text on this page.
कपाय-विजय
,
१-~-क्रोध विवश नर और की, संहन करे ना बात ।
खोता आत्म विवेक को, करे आप की घात ।।
२-क्षमा शील नर क्रोध को, करता है उपशांत ।
सहनशीलता गुण बढ़े, गिना जाय वह दान्त' ।।
३-कायर जन क्या गह सके, क्षमा रूप तलवार ।
क्षमा वीर भूषण कहे, गुरु जन बारंबार ॥
४-अहंकार के भाव को, मान- कहा जिनराय ।
अभिमानी का विनय गुण, छिन में जाय विलाय ॥
५-मानी अपने मान में, तुच्छ गिने संसार ।
करे अहित वह विश्व का, बांध कर्म का भार ।।
६-- रहा न रावण राजवी, रहे न चक्री राय ।
फिर करना अभिमान का, कैसे उचित कहाय ।।
-मृदुता से अभिमान को, बदल दीजिये मित्र ।
विनय वन्त का चरित जग, होता परम पवित्र ॥
-मन बच तन की कुटिलता, माया का परिणाम ।
पर वञ्चन, पर धन हरण, हैं माया के काम ॥
६-सरल भाव संसार में, माया का प्रतिकार ।
आदर पाता है वही, जिसके सरल विचार |
१०-द्रव्यादिक की चाहना, लोभ वृत्ति कहलाय ।
ममता, मूळ,
गृद्धिता, हैं इसके पर्याय ॥
११-लोभ विवश नर नीचता, के करता है काम ।
त्यों-त्यों बढ़ती मूछना
१२-संतोषामृत के बिना, कभी न हो मानन्द ।
सुख चाहो तज लोभ दो, पड़ोन इसके फन्द ।।
५ ज्यों-ज्यों बढते दाम ॥
दान्त-इन्द्रियादि का दमन करने वाला। २ चक्री राय- चक्रय
[षञ्चन-ठगाई। ४ प्रतिकार-विरोध। ५ मूर्च्छना-तृषा
हितोपदेश के है । d १- सब के साथ प्रेम रक्खो। दूसरे की निन्दा न करो किन्तु प्रकट करो और प्रिय वचन बोलो। २-लक्ष्मी चञ्चल है, श्रायु जल बुदबुद् के समान और विजली के चमत्कार के समान अस्थिर है। इस लिए धर्म का सेवन करो ३-सत्संगति परम लाभ, संतोप परम धन, सद्विचार परमज्ञान समता परम सुख है। ४-सत्पुरुपों की संगति करो। नीचों और कुव्यसनियों से सदा दूर ५-धर्म की जड़ दया और पाप की जड़ कुव्यसन है। ६-परस्त्री को माता, वहन या बेटी के समान समझो। -क्षमा अमृत है। उद्यम मित्र है। सत्य और शील शरण सुख है। अति लोभ पाप का बाप है। ८-जिस धन से दीन दुखी जनों का उद्धार न किया हो, सुपात्र दान न दिया हो और कुटुम्बियों का पोषण न किया हो, वह धन धूल है । हक़ में बरकत है। --परोपकार पुण्य है और दूसरे को पीड़ा देना पाप है । अपनी पार उतरनी । जैसा देना वैसा लेना । इस हाथ दे उस हाथ ले । अन्याय पैसा मुल धन का भी नाश करता है। १०-संसार के सब जीवों से मित्रता, गुणवान् पुरुषों से प्रेम, जीवों पर दया और शत्रुओं पर माध्यस्थभाव रखो। ११-समस्त प्राणियों को अपने समान, पर धन को पत्थर और परस्त्री को माता समान समझो। जो अपना भला चाहो तो दू. का भला करो। विद्या आत्म ज्ञान के लिये, धन दान के लिये और र दूसरों की रक्षा के लिये है। पुस्तक मिलने का पता श्री अगरचंद भैरोदान सेठिया जैन पारमार्थिक संस्था, 'प्रेस, अजमेर मरोटी सेठियों का मोहल्ला, बीकानेर
No text on this page.
No text on this page.
प्रस्तावना इस असार संसारमें वीतराग प्रभुका नाम स्मरण कीयासे द्रव्यले और पावसे ए दो प्रकारे सुखकी प्राप्ती होती है. द्रव्यसे तो यश कीर्ति तथा ऽक्ष्मी प्राप्ती करके सुमार्गमें प्रवरतावे. भावे क्रोधादिक पडरिपुको क्षय करे. भौर मोक्षरूपी सुखकी प्राप्ती करे. इसलिए वीतराग प्रभुका उपदेश नितप्रत्ये ढनेके लिए मैनें अल्पबुद्धिसे, जुने २ स्तवन संझाय लावणी वगैरे लेकर " श्रावक नित्य स्मरण" नामकी पुस्तक तैयार करी है. कारण आज कल अपने जैन बंधुकू राग रागणी बहोत प्यारी लगती है. इसलीए इस स्तकमें ढुंढकर बहोत रसीक अतिं सुरस मधुर चटकदार राग रागणी दाखल करी है. इस पुस्तकमें विधिसहीत समायिक आनुपूर्वी प्रभातीया छंद स्तवन संझाय लावणी ललीत छंद बारामासीया हालरीया समगतके ६७ बोलका थोकडा वगैरे अनेक २ विषयका समावेश करके जैनबंधके लिए उपाकर प्रसिद्ध करी है. "लेखक" इस पुस्तकमें नजरचुकसे अक्षर काना मात्रा कम जादां होवे तो सुज्ञ जनोनें सुधार लेना.
No text on this page.
-- अनुक्रमणिका. विषयः पृष्ठ. विषय. पृष्ठ णमोकार महामंत्र. १ पार्श्वनाथजीको स्तवन इनाका पाठ. १ शांतिप्रभुको स्तवन ४८ मायिकसूत्र विधियुक्त. १ पारसनाथप्रभुको स्तवन ४८ मायिक पारनेकी विधि. ४ शांतिनाथ प्रभुकी लावणी ४९ आनुपूर्वी गणवानुं फल. ५ शांतिनाथ प्रभुको हालरीयो५१ निनुपूर्वी ६-२५ नेमजीकी जान ५२ की चोवीस तीर्थकर नाम २६ सिद्धपद स्तवन ५३ की बीस बेहरमान तीर्थ बीस विहरमानको छंद ५५ कर नामा २६ सोळेसतीयाको स्तवन ५५ श्री इग्यारे गणधरनाम. २७ राजीमतीको स्तवन ५६ सोळे सत्यारानाम. २७ राजीमती देवरने समझावे २८ संझाए. चार सरणा. २९ दशारणभद्रजीरो स्तवन ५९ न मनोरथ. ३० भरतचक्रीको स्तवन ६१ विदे नेमरा नाम. ३२ श्रीवेलावलराग पद ६२ कायना नाम. ३३ मुक्ति जाणेकी डिगरी घुमाधुवंदना. ३४ महावीर प्रभुकु आर्जी ६५ वडीसाधुवंदना. ३५ जिनराजकु विनंती ६५ चिंतामणी पार्थप्रभूकू अर्जी ४१ सुमतिनाथ प्रभुकु आर्जी ६६ ४२ जिनराजसे विनंति ६६ ४३ शीतलनाथप्रभूसे आर्जी ६७ ४५ महावीरस्वामीको स्तवन ६७ पंचपरमेष्टी प्रभाती स्तवन ४५ उपदेशी वंजारा बडखवनाथजीरो पाळणो ४६ उपदेशी पद परमेष्टी स्तवन चोवीसी स्तवन महावीरस्वामी स्तवन पंचपरमेष्टी नमन ६८ (२) भूस विनन्ति ८ उपदेशी पद ar ९ or विषय. पृष्ठ विषय. मराठी भात जिनराजप्र सामायिकलाभकी संझाय ८ ६९ प्रसन्नचंद्र राजीको स्तवन मराठी भाषेत समवसरण ६९ उपदेशी लावणी ६९ सीमंधर जीनु स्तवन जीवकायाका सवाल ७१ मनकु उपदेशी पद तत्वपेछाण ७२ मनकू सिखविषे पद उपदेशी बंजारा ७३ नरभवको पद उमररूप इंद्रजालकाख्याल७३ देव, गुरु, धर्म विषे स्तवन । धन्नामुनीको स्तवन ७४ समकितको स्तवन पांसठीया यंत्रको छंद ७५ उपदेशी लावणी शांतिनाथ प्रभुको छंद ७६ गुरुचेलाको संवाद ७८ उपदेशी मराठी पद मानव डरको स्तवन ७९ चोवीसी गुरु उपदेश स्तवन ८० आठगरे पापस्थानरो स्तवन ९ रिखभदेवजीको पारणो ८० सोल सतीयोंका स्तवन सोळेसुपनाकी लावणी ८१ वीस विहरमान स्तवन १ सात व्यसनको त्याग ८४ इग्यारे गणधरका स्तवन १ गुरुदर्शन विनन्ति ८४ श्रीरत्नरीखजी महामुनिको घरमको सरणाको स्तवन ८५ पद ८५ रत्नरीख मुनीकी लावणी?' ८६ दगडुरीखजी मुनिका मुनिमार्ग कठिण स्तवन आगमन पुस्तक मिलनेका पत्ताः--उदेचंद रतनचंद डागा. जि. रायचूर, पोस्ट लिंगसुरकी छावनी, मुक्काम लिंगसुरकी छावनी. मु. २ गुरुदर्शन स्तवन छे कायाको स्तवन
॥ श्रीवीतरागाय नमः ॥
॥श्री णमोकार महामंत्र॥
॥१॥ णमो अरिहंताणं ।।
॥२॥ णमो सिद्धाणं ॥
॥३॥ णमो आयरियाणं ॥
॥४॥णयो उवज्झायाणं ॥
॥ ५॥ णमो लोए सबसाहूणं ।।
बंदनाका पाठ.
तिख्खुत्तो, आयाहिणं, पयाहिणं, वंदामि,
णमंसामि, सकारेमि, सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं,
देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि, मथ्थएण वंदामि.
सुखसाता है जी, महाराजजी साहेब!
॥ सामायिक
सूत्र विधियुक्त ॥
[प्रथम नवकार मंत्र पढके फिर "तिख्नुत्तो" के पाठसे
वंदणा कर फिर-]
आवसइ इच्छा कारण संदेह सह भगवान् इरियाव
पडिकमामि इच्छं इच्छामि पडिक्कमिङ ईरियावहीयाए. नि
म
" ९ (२) गमणागमणे, पाणकमणे, वीयकमणे, हरियकमणे, उसा पणगदग, मट्टीमकडा, संताणासंकमणे, जे मे जीवा, . एगिदिया, वेइंदिया, तेइंदिया, चरिंदिया, पचिंदिया, आ वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परिदाविया, उद्दाविया, ठाणाऊ ठाणं संकामिया, जीवियाऊ ववरोविया तस्स मिच्छामि दुकडं. फिर " तस्स उत्तरी" का पाठ कहना. तस्स उत्तरीकरणेण, पायच्छित्तकरणेण, विसोहीकरण विसल्लिकरणेण, पावाणं कम्माणं, णिग्घायणठाए, ठामि का स्सग्गं, अण्णथ्थ उसीसएण, निसीसएण, खासिएण, : जंभाइएण, उडुएण, वायणिसग्गेण, भमलिए, पित्तमुच्छ सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं, सुहुमहिं खेलसंचालहिं, सुहुमेहिं दिविसं चालेहि, एवमाइएहिं आगारेहि, अभग्गो, अविराहिऊ हुज काउस्सग्गो, जाव अरिहंताणं, भगवंताणं, णमोकारेण, ण तावकाय, ठाणेण मोणेण, झाणेण, अप्पाणं वोसरामिः ॥ अब " इरियावहि" और एक करना और " णमो अरिहंताणं " ऐसा बोलके काउस्लग्ग पारना; लोगस्सका पाठ करना. ( अनुष्टुप्वृत्तम् .) लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतिथ्थयरे जिणे ॥ अरिहंते कित्तइसं, चऊवीस पि केवली ॥ १ ॥ ( आर्यावृत्तम्.) उसभमजियं च वंदे। संभवमभिणंदणं च सुमइं च ॥१॥ नवकार का काउस्सग्ग " पउमप्पहं सुपासं । जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥ मुविहिं च पुप्फयंतं । शीयल सिर्जस वासुपुज्जं च ।। विमलमणतं च जिणं । धम्म संतिं च वंदामि ॥ ३ ॥ कुंथु अरं च मल्लिं । वंदे मुणिसुव्वयं णमिजिणं च ।। यंदामि रिहणमि । पासं तह बढमाणं च ॥४॥ एवं मए अभिथ्युया । विहुयरयमला, पहीणजरमरणा ।। चऊवीसं पि जिणवरा । तिथ्थयरा में पसीयंतु ॥ ५ ॥ कित्तिय वंदिय महिया । जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा॥ आरुग्गवोहिलामं । समाहिवर-मुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु णिम्मळयरा। आइचेस अहियं पयासयरा ।। । सागरवरगंभीरा । सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७ ॥ अव खडा होकर तिख्खुत्तोका पाठ तीन वार विधिसहित पढके दिना करके गुरु आदिककी मास सामायिककी आशा मंगना. गुरू पादिक न होनेसे पूर्व और उत्तर दिशाकी तर्फ खडा होकर श्री सीमंधर स्वामिकी आशा मंग सामायिक आदरना. सामायिक ग्रहण करनेका पाठ. करेमि भंते सामाइयं, सावज जोगं पच्चख्खमि, जाव णियम ज्जुवासामि, उहिहं तिविहेण; ण करेमि, ण व कारवेभि, णसा, वयसा, कायेण, तस्स भंते पडिकमामि, जिंदामि, रिहामि, अप्पाणं वोसरामि. फिर नीचे वेठ डावा गोडा ऊभा रख उस्पे दोन हाथ जोडके- नमोथ्थुणं का पाठ कहना. ॥ नमोथ्थुणं, अरिहंताणं, भगवंताणं, आइयराणं, तिथ्यय- णं, सयसंबुद्धाणं, पुरिसुत्रमाणं, पुरिससीहाण, पुरिसवरपुं- रीयाणं, पुरिसवरगंधहथ्थीणं, लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, 끓 S १
(४)
~
लोगहियाणं, लोगपइवाणं, लोगपज्जोयगराणं, अ • ६५
चख्खुदयाणं, मग्गदयाणं, सरणदयाणं, जीवदयाणं, पोदि६५
धम्मदयाणं, धम्मदेसियाणं, धम्मणायगाणं, 4' .. ६.
धम्मवरचाउरंतचकवीणं, दीवोताणं, सरणगइपइट्ठाणं, ५
हयवरनाणं, दंसणधराणं, बियछउमाणं, जिगाणं, जा.
तिण्णाणं, तारयाणं, बुद्धाणं, बोहियाणं, मुत्ताणं,
सवण्णाणं, सदारिसिणं, सिव-मयल-पुरुय-मणंत-मख्खय :
वाह-मप्पुणरावित्ति सिन्दिगइनामधेयं, ठाणसंपत्ताणं, "
जिणाणं, जियभयाणं. ॥
विधिः-पीछे स्थिर चित्तसे नामस्मरण, शास्त्रश्रवण, मनन कार
जव सामायक पारणेका वक्त होने तब इरियावही, तस्सउत्तरी, का ५
कहना और इरियावहीका काऊसग कर प्रगट लोगस्स कहना. ५
डावा गोडा ऊचा रखके दोनू हाथ जोडकर दो बार नमोथ्थुणं कहन
फिर नीचे मुजय पाटी कहना-
सामायिक पारनेकी विधि-
एहवा नवमा सामायिक व्रतका, पंच अइयारा जा
न समारियव्बा, तं जहा ते आलोउं, मगदुप्पडिहाणे, यदु .
हाणे, कायदुप्पडिहाणे, समायरइसय अकरणयाए, .
अणबुठियस्स करणयाए, तस्स मिच्छा मे दुकडं ।।
सामाथिकं समकाएण, फासियं, पालियं, सोहियं, रि
किट्टियं, आराहियं, अणुपालियं, आणाए अणुपालिता
भवइ, तस्स मिच्छा मे दुकडं ।
सामायिको दश मनका, दश वचनका, बार कायका
बत्तीस दोषसे जो कोई दोष लगा होवे तो, मिच्छा मे दुक्क
सामायिकमें स्त्रीकथा, भत्तकथा, देशकथा, राजकथा
-
र कथामेंसे जो कोई कथा की गई होवे तो, तस्स मिच्छा दुकडं॥ सामायिकत्रत विधिसे लिया, विधिसें पारा, विधि करनेमें विधि हो गइ होवे तो, तस्स मिच्छा ये दुकडं ।। सामायिकमें अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार, गाननेमें, अजानतायें, मनसे, बचनसे, कायासे जो कोइ दोष उगा होवे तो, तस्स मिच्छा मे दुकडं । सामायिकमें कानो, मात्रा, मांडी, पद, अक्षर कमी, ज्यादे, वेपरीत पढाया होवे तो अनंता सिद्ध केवली भगवंतकी साखे स्सि मिच्छा मे दुकडं ॥ आनुपूर्वी गणवानुं फल- आनुपूर्वी गणज्यो जोय, छमासी तप नुं फल होय ॥ संदेह नव आणो लगार, निर्मल मने जो नवकार ॥१॥ शुद्ध वस्त्रे परि विवेक, दिन दिन प्रत्ये गणवी एक ॥ एग आनुपूर्वी जे गणे, ते पांचवें सागरनां पापने हणे ॥ २ ॥ अशुभ कर्मके हरणकू, संत्र पडो नवकार ॥ वाणी द्वादश अंगमें, देख लियो तत्त्वसार ॥ ३ ॥ एक अक्षर नवकारनो शुध्द गणे जे सार ॥ ते बांधे शुभ देव, आयुष्य अपरंपार ॥ ४ ॥ उगणीस लाख वेशठ हजार , वस्से वासठ पल ॥ त्यांसूधी सुख भोगवे, नवकार मंत्र फल ॥ ५॥ .
(६) अननुपूर्वी. ? が大・大・大・さいさいさいちいいよいよ大いさいさいさいさいさいさいおいおいおいしいといまいち णमो णमा णमा णमा णमो अरिहताणं सिद्धाण आयरियाण उवसायाग लोयसब्यसाहूण २ ४ १ ३ ५ णमो णमो णमो णमो णमा सिद्धाणं अरिहताण आयरियाण उवशायाण लोयेसब्यसाहूण १ ३ ५ णमो णमो णमो णमो णमो अरिहंताणं | आयरियाण सिद्धाणं उवझायाण लोयेसन्वसाहूण १ ३ २ ४ ५ णमो णमो णमो णमो णमो आयरियाणं अरिहताणं सिद्धाण उवझायाण लोयसव्वसाण ३ الع ५ णमो णमो णमो आयरियाण सिद्धाणं अरिहंताण णमो णमो उवझायाणं लोयेसव्वसाहूण ४ ५ ३ M णमो णमो णमो णमो णमो अरिहताण आयरियाणं सिद्धाणं उवझायाणं लोयेसव्वसाढूण ३ १ १ पेले बोले तपशीयाकर नीयाणु नही करे तो जीवने परम कल्याण कारण कोणपरे तामली तापसनीपरे साखशास्त्र भगवती सूत्रकी.
३ २ ३ ४ २ ३ ४ कर २ दुजे वोले सम्कीत नीरमळ पाळेता जीवनं परम कल्याणरो कारण अननुपूर्वी. २ Tastrikitrint.kistakattits truttitutstetstatertation णमो णमो णमो णमो णमो आयरियाण ले येसव्वसाहूण सिद्धाण अरिहताण उवझायाण २ ४ णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाण अरिहंताणं उवझायाणं आयरियाण लोयेसब्दसाहूणं णमो णमो णमो णमो णमो अरिहताणं उवझायाणं सिद्धाण आयरियाणं लोयसव्वसाण जसो णमो णमो णमो णमो उवझायाणं अरिहंताण सिद्धाणं आयरियाणं लोयेसव्वसाणं ४ णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाणं उवझायाणं अरिहंताणं आचरियाणं लोवेसब्बलाढूंगी णमो णनो णमो पमा णमा उवझायाणं सिद्धाणं अरिहंताणं आवस्यागं लायसव्यसाण कीणपरे श्रेणीक राजा कृष्णजीपरे प्रावधान प्रांतगडसूबनी. ३ M ४ ३ २ C p (८) بر روی مرورگر ittute अननुपूर्वी, ३ tituantik.thyt...............! णमो णमो णमो णमो जरिताग आपरियाण सिद्धाण लोयेराबसाहूण ५ म ३ ४ २ णमो मा णमो णमो ग्रामी सितागं लोयेसब्वसाढूण आयरियाण अरिहताण उनायाण ३ ४ २ णमो णमो णनो गमो णमो अरिहंताणं उवझायाणं आयाराण शिवाण लोयेसव्यसाहूण ४ ३ M णमो णमो णनो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाण kistantikari nkarrantiesx. उवझायांण अरिहताणं | आयरियाणं ४ १ RAN २ ५ णमो णमो णमो आयरियाणं णमो णमो अरिहताणं । सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूण उवझायाणं ३ 20 १ २ ५ णमो णमो णमो अरिहंताणं णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूण उवझायाणं आयरियाणं १ ३ तीजे बोले मनबचन कायारा जोग ठाम राखे तो जीवने' कल्याणनराकारण कीणपरे गजसुमालनींपरे साखशाख :
अननुपूर्वी. ४ Setetetet tetettetetet e tretetretietoit etre tretietee teretetretetet णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाणं आयरियाण उवझायाणं अरिहताण लोयेसव्वसाहूण २ ३ 20 णमो णमो णमो णमो णमो अरिहताण लोयेसब्बसाहूण 117 आयरियाणं सिद्धाणं उवझायाण ४ णमो लोशन सिद्धाण णमो णमो णमो णमों उवझायाणं आयरियाणं अरिहताण लोयेसव्वसाहूण ४ شع १ ५ णमो णमो णमो णमो णमो आयरियाणं अरिहंताणं लोयेसव्वसाहूण उक्झायाणं सिद्धाणं ४ २ ३ १ ५ अ. णमो णमो णमो आयरियाण उवझायाणं णमो णमो अरिहंताणं लोयेसव्वमाहूर्ण येत सिद्धाण ३ ४ २ १ णमो णमो णमो उवझायाणं | आयरियाणं णमो णमो अरिहंताणं लोयेसव्वसाहूणं रोवेसन सिद्धाणं ४ ३ ५ M तो जीत ४ चौथे बोले खीमीया करतो जीवने परम कल्याणरो कारण कीणपरे लोकगरदेशी राजानीपरे साखशास्त्र रायपसेणीसूत्रकी. ।
3 - (१०) अननुपूर्वी. ५ nketititut.titutitutats.thinki.inintyi.tuotus.tutt णमो णमो णमो णमो णमो अरिहंताणं सिद्धाण आयरियाणं लोयेसव्यसाहूण, उवायाग --- - २ ३ ५ ४ णमो णमो सिद्धाणं अरिहंताणं णमो णमा णमा आयरियाण लोवेरालसाहूण उवझायाण ५ २ १ ३ णमो णमो आयरियाणं णमो णमो णमो अरिहंताणं सिद्धाणं लोयसव्वसाहणं, उवझायाण M ३ २ ५ 20 णमो णमो आयरियाण अरिहताणं णमो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूण उवझायाण २ ५ ४ ३ १ णमो सिद्धाणं णमो णमो णमो णमो आयरियाणं । अरिहंताणं लोयेसव्वसाहणं उवझायाणं ३ ४ णमो णमो आयरियाणं सिद्धाणं णमो णमो णमो अरिहंताणं लोयेसव्वसाहूर्ण उवझायाण ................ ३ ५ ४ *" ५ पाचमे बोले पंचमहाव्रत चोखा पाळे तो जीवने परम ५. । कारण कोणपरे श्रीगोतमस्वामीनीपरे साखशास्त्र भगवतीसूत्रकी. प (११) अननुपूर्वी. ६ te tretietetet tetet teetetetretetet teretetotietsetetur tetoritetet णमो णमो णमो णमो णमो उवझायाणं अरिहताणं लोयेसव्वसाहूण सिद्धाण आयरियाण ५ ३ णमो णमो + सिद्धाणं णमो णमो णमो लोयेसव्वसाढूण आयरियाणं । उवझायाणं ४ अरिहताण ५ ३ २ णमो णमो णमो णमो णमो अरिहताण लोयेसव्वसाहूण सिद्धाण आयरियाण उवझायाणं १ ५ २ ३ ४ णमो' णमो णमो लोयेसव्वसाहूण अरिहताणं णमो सिद्धाणं णमो उवझायाणं आयरियाणं ५ १ २ ३ ४ णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाणं अरिहताणं । आयरियाण उवझायाणं १ ३ ४ णमो णमो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाहूण, सिद्धाणं अरिहंताणं | आयरियाण उवझायाण ३ 20 ६ छटे बोले अपरा अवगुण देखी मनमे झुरे तो जीवने परम कल्या- गरो कारण कीणपरे सेलकराय ऋखीपरे साखशास्त्र गीनाताजी सूत्रकी.
उवझायाण १ ३ ५ २ سہ १ ५ २ ७ सातमे बोले पांच इंद्री पोतें बस करे तो जीवने परम कल्याणरो (१२) अननुपूर्वी. ७ tetrtetretet e tretiratietretiro Bootie tre ore Intrete fintretineretetreteritate णमो णमो णमो णमा णमो अरिहंताणं आयरियाणं लोयसव्वसादण सिद्धाणं णमो णमो णमो णमो णमो आयरियाणं अरिहंताणं लोयेसव्वसाहूण सिद्धाणं उवझायाणं णमो णमो णमो णमो णमो अरिहंताणं लोयेसव्वसाणं आयरियाण सिद्धाणं उवझायाण णमो णमो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाहुणं अरिहंताणं आयरियाणं सिद्धाणं उवझायाण ५ ४ णमो णमो णमो णमो आयरियाणं लोयेसव्वसाहूणं अरिहताणं सिद्धाणं उवझायाणं ५ णमो णमो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाढूणं आयरियाणं | अरिहताणं सिद्धाणं FREE १ ३ २ ४ १ ३ २ णमो ३ १ २ ४ उवझायाण ५ ३ २ ४ कारण कोणपरे मेघकुंवारनीपरे साखशास्त्र गीनाताजीसूत्रकी.
(१३) अननुपूर्वी. ८ Totatutet.tutattituttakuTuksotetotretitutitutitutitutitut, णमो णमो णमो णमो णमा सिद्धाण आयरियाणं लोयेसव्वसाहूण अरिहंताणं उवझायाणं २ ५ णमो णमो आयरियाण णमो णमो णमो सिद्धाणं लोयसव्वसाहूण, अरिहंताणं उवझायाण ३ ४ णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूण आयरियाणं २. ५ अरिहंताणं उवझायाणं ३ or ४ णमो णमो णमो ले.येसव्वसाहणं णमो णमो आयरियाणं | अरिहंताणं सिद्धाणं उवझायाणं T ५ २ ३ १ ४ णमो णमो -- णमो णमो णमो आयरियाण लोयेसव्वसाहूण सिद्धाणं अरिहंताणं उवझायाणं शा ३ ५ २ १ ४ णमो णमो णमो णमो लोयेसच्वसाण आयरियाणं णमो सिद्धाणं अरिहंताणं उवझायाणं ३ २ ४ ८ आठमे बोले माया कपटाई न करे तो जीवने परम कल्य कारण कोणपरे मल्लीनाथ छमीत्रनीपरे साखशास्त्र गीनाताजीसूत्रकी (१४) अननुपूर्वी. ९ म.tact, tottact.titut.ki.k..........titutekst.tasistor णमो णमो णमो णमा अरिहताण सिद्धाणं उवझायाण लोयेराव्यसाहूण आरियाण : ४ ५ णमा २ ३ णमो णमो णमो सिद्धाणं अरिहताण णमो णमा उव-गायाण लोयेसब्यसाहृण आयरियाण ४ ५ اسرع णमो णमो अरिहताणं उवझायाणं णमो णमो णमो सिद्धाण लोयेसव्यसाण आयरियाण २ ४ ५ ३ णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाण आयरियाण उवझायाण अरिहंताण ४ १ २ ५ سہ णमो सिद्धाणं णमो उवझायाणं णमो णमो णमो अरिहताण लोयेसव्वमाहूणं आयरियाण २ ४ १ ५ णमो णमो सिद्धाणं उक्झायाणं णमो णमो णमो अरिहताणं लोयेसव्वसाहूण आयरियाण ९ नवमे बोले धर्मनी खरी प्रतीत राखे तो जीवने परम कारण कीणपरे बनागनटवाना मात्रनापरे साखशास्त्र भगवतीसूत्रकी. रयाणा : أو २ ५ ४ ३ १ 20 ही कारण कोणपरे तो जनाब (१५) अननुपूर्वी, १० fatuatit rattatoketariketstatutokakuttituttikaitutnitorial णमो णमो णमो णमो णमो अरिहताण सिद्धाण लोयेसव्वसाढूण उवझायाणं | आयरियाणं णमो णमो णमो णमो णमो सिद्वाण अरिहताणं लोयेसव्वसाहूण उवझायाण आयरियाणं णमो णमो णमो णमो णमो अरिहंताण लोयेसव्वसाणं सिद्धाण लाह उवझायाणं | आयरियाणं णमो णमो णमो णमो मनो लोयेसव्वसाहणं अरिहंताणं सिद्धाणं णमो णमो णमो न सिद्धाणं लोयसव्वसाणं अरिहताणं उनका काम णमो णमो लोयसव्वसाहणं सिद्धाणं १० दसमे बोले धन को २ ४ ३ kattharth आरिफ उवझाया। सायन ५ ४ पामो परिवार २ ३ ا ? गमो में मन ई समात्रमा 10 * ५ २ ३ उवझायाण ४ ३ णमो कीणपरे मेघकंवारना पुरबभवरा हाती नापरे साख गीनाताजी शास्त्रसूत्रकी (१६) अननुपूर्वी, ११ tutntn.totrth.totta tant.................ttituttitution णमो णमो णमो णमो गमो अरिहंताण उचनायाणं लोयेरावसातूण सिद्धाण आयरियाण ४ णमो णमो णमो णमो णमो अरिहताण लोयसव्वसाहूण सिद्धाण आयरियाण ५ णमो णमो णमो णमो अरिहंताण लोयेसव्वसाहूण उवझायाणं सिद्धाणं आयरियाण णमो णमो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाहूण अरिहताण उवझायाणं सिद्धाणं आयरियाण ५ णमो णमो णमो सिद्धाणं ४ णमो णमो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाहूण उवझायाणं अरिहताणं सिद्धाणं ४ मान ११ इग्यारमे बोले अभयदान देवेतो जीवमे परम कल्याणरो कारण १ ५ ४ २ الله .CC २ णमो णमो उवझायाण लोयसव्वसाहूण अरिहताण आयरियाण ५ ३ आयरियाण १ ३ (१७) अननुपूर्वी, १२ I tetit & tet tetett tetetetet otetutetet णमो णमा णमो. णमो सिद्धाणं उवझायाणं लोयेसव्वसाणं अरिहताणं testi tre timer side णमो आयरियाण ४ ३ णमो . उवझायाणं णमो मो णमो णमो. सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूणं अरिहंताण आयरियाणं २ ५ 20 १ णमो णमो प्रमो प्रमो णमो सिद्धाणं लोयसव्वसाहण उवझायाणं अरिहताणं, आयरियाणं E नागरिक २ ४ णमा णमो ले.येसव्वसाढूण णमो सिद्धाण णमो णमो आयरियाणं उवझायाणं अरिहंताण आदि २ ४ سع णमो पने णमो णमो उवझायाणं लोयेसव्वसाणं. सिद्धाणं ४ णमो अरिहंताणं णमो आयरियाणं पनि ५ २ १ पामो. णमो प णमो प्रमो लोयेसव्वसाहूण उवझायाणं ४ णमो सिद्धाणं अरिहताणं आयरियाणं २ १ ३ १२ बारमे बोले धरमनावीखे दृढता राखे तो जीवने परम कल्याणरो कारण कीणपरे आरणक श्रावकनीपरे साखशात्र गीनाताजीसूत्रकी. भी .
३ ३ ها १३ तेरमे बोले सीयलवत नीरमळ पाळे तो जीवने परम कल्याण (१८) अननुपूर्वी. १३ Spetrekusuk.xnxnkyuksokhaki.k.ken X-X.3.3.XXn25, 25-30Xnxn 25t2s total णमो णमो णमो णमो णमो अरिहताण आयरियाण, उवझायाणं लोयेसव्वमाहूण सिद्धाण ४ ५ णमो णमो णमो णमो णमो आयरियाण अरिहंताणं उवझायाणं लोयेसव्वसाहूण, सिद्धाणं ४ णमो णमो णमो णमो णमो अरिहंताणं उवझायाणं आयरियाणं लोयसव्यसाहूण, सिद्धाणं ५ णमो णमो णमो णमो णमो उवझायाणं अरिहंताणं आयरियाणं लोयेसव्वसाहूर्ण सिद्धाणं ४ ५ णमो णमो णमो णमो आयरियाणं | उवझायाणं अरिहंताणं - लोयेसव्वसाहूण सिद्धाणं ४ ५ णमो णमो णमो णमो णमो उवझायाणं आयरियाणं | अरिहंताणं लोयेसव्वसाहूणा सिद्धाणं कारण कीण परे राजमतीनापरे साखशास्त्र दसवैकालिकसूत्रकी. १ 20 '३ २ १ ३ २ णमो ३ २ mr १ ५ - १४ चवदमे बोले परिग्रहनो संतोस करे ती जीवने परम कल्यापरी vi (१९) अननुपूर्वी, १४ ************************* णमो णमो णमो णमो णमो अरिहंताणं आयरियाणं लोयसव्वसाहूण उवझायाणं सिद्धाणं titut . ३ ५ ४ २ णमो. णमो णमो णमो णमो. आयरियाणं अरिहंताणं लोयेसव्वसाहूर्ण उवझायाणं सिद्धाणं ३ ५ ४ २ पने णमो णमो. णमो णमो णमो. अरिहताणं लोयेसव्वसाहूण आयरियाण उवझायाणं. सिद्धाणं १ ५ ३ ४ २ श्री. णमो णमो णमो णमो लोयसव्वसाढूण अरिहंताणं | आयरियाणं उवझायाणं णमो सिद्धाणं ५ ३ २ णमो णमो णमो णमो णमो आयरियाण लोयेसव्वसाहूण अरिहंताणं उवझायाणं सिद्धाणं ३ ५ २ मो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाहणं आयरियाणं णमो णमो अरिहताणं | उवझायाणं सिद्धाणं ३ २ कारण कोणपरे कपीलकेवलोनीपरे साखशास्त्र उत्तराध्ययनजी.
(२०) अननुपूर्वी. १५ antettitute rentriantatioti.motitutstata णमो णमो णमो गमो णमा अरिहंताणं उवझायाणं लायसव्वसारण आयरियाण सिद्धाण ४ ५ سه णमो णमो उवझायाणं णमो णमो णमो अरिहंताण लोयेसव्यसाण आयरियाण ५ सिद्धाणं ४ १ ३ २ णमो णमो णमो णमो अरिहंताणं लोयेसव्वसाहणं उवझायाणं ४ णमो आयरियाणं सिद्धाणं १ ५ ३ णमो णमो णमो गमो णमो लोयेसव्वसाहूण अरिहताण ५ उवझायाणं आयरियाणं सिद्धाण १ ४ ३ २ णमो णमो णमो णमो उवझायाणं लोयेसव्वसाहूणं अरिहंताणं ४ णमो आयरियाणं सिद्धाणं ५ ३ २ णमो णमो लोयेसव्वसाहूण उवझायाणं णमो णमो णमो अरिहताणं आयरियाणं सिद्धार्ण ३ २ १५ पंधरमे बोले सुपातर दान देवे तो जीवने परम कल्याणरो कारण कीणपरे रेवंतीगाथा पतणीपरे साखशास्त्र भगवतीजीसूत्रकी.
(२१) अननुपूर्वी. १६. totatuttitutituttitutituttitutertystuttituteeth णमो णमो णमो णमो सिद्धाणं आयरियाण उवझायाणं लोयेसव्वसाहूणं अरिहंताणं णमो २ ४ ا णमो णमो णमो णमो णमो उवझायाण आयरियाणं लोयेसव्वसाहूणं अरिहंताणं ५ 'सिद्धाणं ३ 20 २ णमो णमो णमो णमो आयरियाणं लोयेसव्वसाढूणं उवझायाणं अरिहंताणं णमो सिद्धाणं ३ २ णमो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाहूण आयरियाणं । उवझायाणं ५ णमो सिद्धाणं सित अरिहंताणं ३ १ २ णमो णमो णमो णमो णमो उवझायाणं लोयेसव्वसाहूर्ण आयरियाणं अरिहंताणं E सिद्धाण सिद्ध ४ २ २ णमो णमो णमो णमो णमो लोयसव्वसाहणं उवझायाणं | आयरियाणं, अरिहताणं ४ सिद्धा सिद्धा ३ २ २ 7 क गाण। १६ सोळमे बोले पट्टसपडीया सीरने वीखे ळढता राखे तो जी परम कल्याणरो कारण कोणपरे द्रोपदीनापरे साखशास्त्र गीनाताजी (२२) अननुपूर्वी. १७ St代 $$$$,*.*...*xt.ttf, *.* *.*, णमो णमो पामो णमो णमो सिद्धाण आयरियाणं । उवझायाणं लोगसव्यसादण अरिहंताण २ ३ ४ ५ १ णमो णमो आयरियाण सिद्धाणं णमो णमो णमो उवशायाण लोयेसव्वसाहूण, अरिहताण ४ ३ २ ५ M पामो णमो णमो णमो सिद्धाणं णमो अरिहंताण उवझायाण आयरियाणं लोयेसव्वसाढूण २ ४ ३ ५ १ .................................. णमो उवझायाणं णमो सिद्धाणं णमो णमो णमो आयरियाणं लोयसव्वसाहूण अरिहताणं ५ الع ३ णमो णमो आयरियाणं उवझायाणं णमो पामो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूपां अरिहंताण २ ३ ४ ५ १ णमो णमो पामो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूणं अरिहंताणं ...................* *korts उवझायाणं आयरियाणं ३ १७ सतरेमे वोले चढते प्रणामे तपशा करे तो जीवने परम कल्याणरो कारण कीणपरे धना अशग़ारनीपरे साखशास्त्र आणुतरउववाइजीसूत्रकी. - 1 " .
(२३) अननुपूर्वी, १८ tohit tetatutatutstetitutstutortutitutitutitutet.tituti णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाण आयरियाणं लोयेसव्वसाहूण उवझायाणं अरिहंताणं २ ३ ५ ४ णमो णमो णमो आयरियाणं सिद्धाणं णमो णमो लोयेसव्वसाढूण उवझायाणं ५ अरिहंताणं ३ २ ४ ने णमा णमो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्वसाहूर्ण आयरियाणं णमो रिहा उवझायाणं अरिहंताणं २ ३ णमो णमो आयरियाणं णमो णमो णमो लोयेसव्वसाणं सिद्धाणं २ रिहतार - उवझायाणं अरिहंताणं ५ ३ 20 णमो णमो णमो आयरियाणं ले.येसव्वसाढूण सिद्धाणं णमो णमो उवझायाणं अरिहंताणं Far ३ ५ or 20 णमो णमो लोयेसव्वसाण आयरियाण णमो णमो सिद्धाणं उवझायाणं णमो अरिहताणं 7 ३ २ ४ १ .. १८ अठारमे वोले आनीतभावना भावे तो जीवने परम कारण कोणपरे भरतचक्रवर्तीनापरे साखशास्त्र जंबूदीपपनर्त याण ४ mr -- ३ ५ ३ २ १९ उगवणीसमे बोले विनयभगती करे तो जीवरो परम कल्याणरो (२४) अननुपूर्वी. १९ Tetstor. tog to tieto tie toe toe tretanto, tre traitre tic To An An Intrant. I.I-Artus, णमो पामो णमो णमो गमा सिद्धाणं उवझायाणं लोयेसव्यमाणं आरियाण अरिहंताण २ ५ णमो णमो णमो णमो णमो उवझायाण सिद्धाणं लोयसवाहणं आयरियाणं अरिहताण ४ २ णमो णमो णमो णमो णमो सिद्धाणं लोयेसव्यसाहूर्ण उक्शायाणं आयरियापां अरिहताण ४ णमो णमो णमो णमो णमो लोयेसव्वसाहूण सिद्धाणं उवझायाणं आयरियाणं | अरिहताण २ पामो णमो णमो णमो णमो उवझायाणं लोयेसव्वसाहर्णः सिद्धाणं आयरियाणं । अरिहंताण ४ ५ णमो णमो णमो णमो णमो. लोयेसब्बसा हूण उवझायाणं सिद्धाणं आयरियाणं | अरिहताणं कारण कोणपरे पंचकआणगारनी परे साखशास्त्र उत्तराध्ययनजीनी. ५ ३ ५ aw 30 २ ३ ५ ४ २ ३ -- .
(२५) अननुपूर्वी, २० startstatute that titatutatistituttitute णमो णमो णमो णमो णमो आयरियाण | उवझायाणं लोयेसव्वसाहूर्ण . सिद्धाणं अरिहंताणं ३ ४ २ णमो णमो णमो उवझायाणं णमो णमो आयरियाणं लोयेसव्वसाहूण सिद्धाणं अरिहंताणं ४ ३ ५ २ १ णमो णमो' णमो णमो णमो आयरियाणं लोयसव्वसाहूर्ण उवझायाणं सिद्धाणं अरिहंताणं ३ ४ .२. णमो णमो णमो णमो लोयसव्वसाहूण आयरियाणं | उवझायाणं णमो अरिहंतागं सिद्धाणं ५ ३ ४ २ . णमो णमो णमो णमो कि उवझायाणं उवझायाणं लोयसव्वसाढूण आयरियाणं ४ ५ सिद्धाणं अं ३ २ णमो णमो लोयसव्वसाहूण उवझायाणं णमो आयरियाणं निका ऋहंताग का द. २० वीसमे वोले खरा ज्ञाननी प्रतीत राने दो जीवन परन र कारण कोणपरे आनंदसावकीपरे साम्ब शान मासंगदसाकी- ..
(२६) श्री चौवीस तीर्थकर नाम स्मर्णते. १ श्री ऋखवदेव स्वामी. २ श्री अजितनाथ स्वामी. ३ श्री सम्भवनाथ स्वामी. ४ श्री अभिनंदन स्वामी. ५ श्री सुमतिनाथ स्वामी. ६ श्री पद्ममम स्वामी. ७ श्री सुपार्श्वनाथ स्वामी. ८ श्री चंद्रप्रभ स्वामी. ९ श्री सुविधिनाथ स्वामी. १० श्री शीतलनाथ स्वामी. ११ श्री श्रेयांसनाथ स्वामी. १२ श्री वासुपूज्य स्वामी. १३ श्री विमलनाथ स्वामी. १४ श्री अनंतनाथ स्वामी. १५ श्री धर्मनाथ स्वामी. १६ श्री शांतिनाथ स्वामी. १७ श्री कुंथुनाथ स्वामी. १८ श्री अरनाथ स्वामी. १९ श्री मल्लिनाथ स्वामी. २० श्री मुनिसुवृत स्वामी. २१ श्री.नमिनाथ स्वामी. २२ श्री नेमिनाथ स्वामी. २३ श्री पार्श्वनाथ स्वामी. २४ श्री महावीर स्वामी. श्री बीस विहरमान तीर्थंकर नाम- १ श्री सीमंधर स्वामी. २ श्री युगमंधर स्वामी ३ श्री वाहु स्वामी. ४ श्री सुबाहु स्वामी. ५ श्री सुजात स्वामी. ६ श्री स्वयंप्रभ स्वामी. ७ श्री ऋषभानन स्वामी. ८ श्री अनंतवीर्य स्वामी. ९ श्री सूरप्रभ स्वामी. १० श्री विशालप्रभ स्वामी. ११ श्री वज्रधर स्वामी. १२ श्री चंद्रानन स्वामी. १३ श्री चंद्रवाहु स्वामी. १४ श्री भुजंग स्वामी. १५ श्री ईश्वर स्वामी. १६ श्री नेमिप्रभ स्वामी. १७ श्री वीरसेन स्वामी. १८ श्री महाभद्र स्वामी.
(२७) २० श्री अजितवीर्य स्वामी. १९ श्री देवयस स्वामी - श्री इग्यारे गणधराका नाम- १ श्री इंद्रभूतिजी. २ श्री अग्निभूतिजी. म. ३ श्री वायुभूतिजी. ४ श्री विगतभूतिजी. ५ श्री सुधर्मा स्वामीजी. ६ श्री मंडीपुत्रजी. मा ७ श्री मोरीपुत्रजी. ८ श्री अंकपितजी. शा. ९ श्री अचलजी. १० श्री मेतारजी. ११ श्री प्रभुजी. खान वामी . स्वामी स्वामी वामी श्री सोळे सत्यारा नाम स्मरणता- . वामी मी . १ श्री वामीजी सती. २ श्री सुंदरीजी सती. ३ श्री कौसल्याजी सती. ४ श्री सीताजी सती. म. ५ श्री कुंथीजी सती. ६ श्री द्रौपदीजी सती, ७ श्री राजीमतीजी सती. ८ श्री चंदनवाळाजी सती. ९ श्री सुभद्राजी सती. १० श्री चेलणाजी सती. ११ श्री शिवाजी सती. १२ श्री पद्मावतीजी सती. १३ श्री मृगावतीजी सती. १४ श्री सुळसाजी सती. १५ श्री देवदंताजी सती. १६ श्री प्रभावतीजी सती. इति श्री चोवीसी नाम वीस विहरमान इग्यारे गणधर सोळे सत्यारा नाम समाप्त. स्वामी स्वामी सामी - वामी मी. गामी मी.
(२८) - अथ श्रीपरमेष्ठी परमानंदस्तवन- छंद त्रिभंगी. परणमु सरस्वती होय वरमती चीत उलसथी गुण थुणवा, ध्यायें सो सुख पावे एकचित चावे यश मुणवा ॥ जयजय परमेष्ठी । श्रेष्ठी दे पद जेष्ठा जगधारं, त्रिजगमझारं नाम उदारं जय मुखकार । ॥ १ ॥ आकडी || वारे गुणवंता श्री अरिहंता गुणगहेरा, घनघा मिथ्याभर्म त्याग अधर्म विपलहेरा, शुकल मन ध्याया केवल पाया आया तीणवार || त्रिजग० नाम० ज० न० ॥ २ ॥ वरप्रखदा हर्ष अपारे सुणि अवधारे जिनवाणी, अमृतमुप्यारी जगहि सुरनरनारी पहिचाणी, केइ संजम धारे केइ व्रत वारे कर्म सिवत्यारी ॥ त्रिजग ॥ ३ ॥ द्वितीयपद ध्यावो सिद्धगुण गावो नही आवो जीहा जाइ, जे आरख निरंजन कर्मके अंजन शि पुदगलका फंदा दुरनीकंदा परमानंदा अविकारं ॥ त्रिजग० ॥१ अष्टगुणकू धारे जगत निहारे उनताई, जिहा सुख अनंता केवळ गुणउछरता छेनाइ, नेवासवताइ दो मुजताइ तुमसा नाइ दातारं त्रिजग० ॥ ५॥ गणीवरपद त्रीजे नीत्य नमीजे, सेवा कीजे हर्षर्थ पंचमहाव्रत पाले दुखण टाले गजजीमहाले शूरहारी, पाचे वश । पंच उचरते पाचु इहारते दुखकारं ॥ त्रिजंग० ॥ ६ ॥ शीतळजीम अचलगिरीदा गणपति इंदा शिरदारं, सागरजी मगहेरा ज्ञान मिथ्याअंधेरा परिहारं, संपदवसु पावे न्याय बढावे पाळे पळावे आ त्रिजग० ० ॥ ७ ॥ गुरुसेवा साधी विनय अराधी चित्तसमाधी ज्ञान वारे अंगबाणी पेटीसमाणी पुरवनाणी संशयहाणे, निरवद्य सत्य शास्त्रासाखे गुण अभिलाखे निजसारं ॥ त्रिजग० ॥ ८॥ उवझाया स्वामी अंतरजामी शिवगतिगामी हितकारी, शीखणने अवे जे सिखावे. न्याय बतावे उपकारी, दुरगतिमा पडता कादवगडता भव जयजया या ॥ तीत अतिशय करी सहित, मोक्षरूपी सुखस्थानमें विराजम (२९) स्तवम चुडता तीणवार, त्रिजग०॥९॥ कंचुक अहि त्यागे दूरे भागे नीतवैरागे रापहारे, झुटापरचंदा मोहोनीफंदा प्रभुका बंदा जोगधरे, सब मालखजीना त्यागन कीना महाव्रत लीना अणगारं ॥ त्रिजग० ॥ १० ॥ पाले शुद्धक- गुणधरणी भवजलतरणी आपदहरणी गुप्तीठाणी जगका प्राणी समलेखें, सिव- मारग ध्यावे पाप हटावे धर्म बतावे सत्यसारं ॥ त्रिजग० ॥ ११॥ ए जय सुप्रणमे भावे विघ्न हटावे अरी हरि जावे दूरसही, जे तपते जारी दुःखबेमारी गहो, 'शोगसवारी आतनही, गृहपीडा भागे दृष्टी न लागे शत्रु न जागे लीगारं ॥ त्रिजग० ॥ १२ ॥ ए मंत्र जनीको तारक जीको नीजगटीको सुख- २॥ दाता, ए मत्रं करारी महिमा भारी लहे नरनारी सुखशाता, सरजीवनवेली पारी 'दे धनठेली भवेभवे केली यह सारं ॥ त्रिजग० ॥ १३ ॥ पदमासनवाली बारे रिंगनीहाली आरती टाली ध्यान धरे, त्रीलोकमयंपे भावशु जं ऋद्धीसि- सियादीसंपे जेह धरे, ए 'छंदत्रिभंगी गावे उमंगी भवभवसंगी जयकार अंजन ॥ त्रिजग० ॥ १४ ॥ इति संपूर्णम् ॥ चार सरणा. अहिहंते सरणं पवजामि । सिद्धे सरणं पञ्चजामि ॥ साहू सरणं पव्वजामि । केवलीपण्णतं धम्म सरणं पब्बजामि ।। १ पहिला सरणा श्रीअरिहंत भगवंतका-ते अरिहंतप्रभु चौतीस अतिशय, पेंतीस वाणी गुण, अष्ट प्रतिहार, अनंत चतुष्टय, वारे गुण करके विराजमान, आठारे दोप करके रहित, चौसष्ट इंद्रके वंदनीक पूजनीक, इत्यादिक अनेक गुणे करी विराजमान है, ऐसे अरिहंत प्रभुका, इणभव परभव भवोभव सरणा होना! दूना सरणा श्रीसिद्ध भगवंत- सिद्ध भगवंत अष्ट त्रिजग अनंता । साना की पारे -~- शीत हेरा। पगा। गायी वध -- जता (३०) , अक्षय, अव्यावाध, अजर, अमर, अविकारी, अनंत सुखमें विराजमान, अष्टकर्मरहित है, ऐसे सिद्धप्रभुका इसभव परभव भवोभव सरणा होना तीसरा सरणा साधु मुनिराजका- साधूजी सत्तावीस गुणका सहित, कनक कामिनीके त्यागी, सतरे भेद संजमके पालणहार, बारे भेदे तपके करणहार, छन्नु दोष टाली आहारपानी वस्त्रपात्र स्थानको भोगवनहार, निरलोभी, बावीस परीसह समपरिणामे सहे, शांत-दांत- क्षांत, इत्यादिक अनेक मुणसहित, ऐसे निग्रंथ साधूजी महाराज इणभव परभव भवोभव सदाकाल सरणा होना! चोथा सरणा केवलीपरूप्या दयाधर्मका- धर्म दो प्रकारका- श्रुतधर्म सो द्वादशांगी जिनागम; चारित्रधर्म सो अगारी, अनगारी, एह धर्म आधिव्याधि उपाधिका विनाशहारे है, मोक्षरूप शाश्वत सुखा दाता है, ए दयाधर्मका इणभव परभव भवोभव सदाकाल सरणा होना! यह चार सरणा, दुःख हरणा, और न दूजो कोय; जो भव्यप्राणी आदरे, तो अक्षय अमरपद होय. तीन मनोरथ- आरंभ परिग्रह तजीकरी। पंच महाव्रत धार ।। अंत अवसर आलोयणा । करु संथारो सार ॥१॥ पहिला मनोरथ- समणोपासक श्रावकजी ऐसा चिंतवे की, कब में चौद प्रकारके बाह्य और नव प्रकारके अभ्यंतर परिग्रहसे तथा आर. भसे निवरतूंगा? एह आरंभ परिग्रह काम क्रोध मद मोह लोभ विषय कायका बढानेवाला दुर्गतिका दाता, मोह मत्सर राग द्वेषका मूल धर्मज्ञान क्रिया क्षमा दया सत्य संतोष समकित संयम तप ब्रह्मचर्य और सुमतीका नाश करानेवाला, आठारे पापका बढानेवाला, अनंत -- (३१) सारमें भमानेवाला, अध्रुव अनित्य अशाश्वता असरण अतरण, निग्रं- योका निंदनीक, ऐसे अपवित्र आरंभ परिग्रहका मै जब त्याग करूंगा मो दिन मेरा परमकल्याणका होवेगा! । दूसरा 'मनोरथ- समणोपासक ( साधुकी सेवा करनेवाले ) श्रावक ऐसा चिंतवे-विचारे की, कब मैं द्रव्ये भावे मुंड होके दश प्रकारका यतिधर्म, नववाड विशुद्ध ब्रह्मचर्य, पांच महाव्रत, पांचसमिति, तीन गुप्ति, सतरे भेदे संयम, वारे प्रकारे बारे प्रकारे तप, छे कायाका दयाल, अप्रतिबंध, विहार, सर्व संग रहीत, वीतरागकी आज्ञा मूजब चलने- वाला होउंगा ? जिस दिन निग्रंथका मार्ग अंगिकार करूंगा, सो दिन मेरा परम कल्याण होगा! मा. तीसरा मनोरथ समणोपासक श्रावकजी ऐता चिंतवे की, किस बक्त मैं सर्व पापस्थानका आलोइ निंदी निःशल्य हो सर्व जीवोंसे खमतखामणा कर त्रिविध २ अठारे पापको त्याग जिस सरीखो मेंने अति प्रेमसे पाला है ऐसे शरीरसे ममत्व त्याग छेले श्वासोश्वास तकवो सीराके चारही आहारको त्याग के तीन आराधना चार सरणासहित आयुष्य पूरा करूंगा? पंडितमरण मरूंगा सो दिन मेरा परम कल्याण होवेगा! एह तीन मनोरथका विचार करता हुवा प्राणी महा निर्जरा उपराजे ३,६ संसारप्रत करे मोक्षके सन्मुख होय अनुक्रमे सर्व दुःखसे छूटे! अनंत मा अक्षय सुख पावे. भ तीन मनोरथ ए कहे । जे ध्यावे नित्य मन ॥ सक्ति सार वरते सहू । तो पावे शिव मुख धन ॥ १ ॥ H . 4
(३२)
...
प
॥ चवदे नेमरा नाम कहछे।
१ सचीतते ॥ कांचो पाणी ॥ कोरो दाणो || काची
लीलोती ॥ प्रमुख अनेक चीज जाणवी । एनी मरजादा करणी॥ पृष्ट
२ द्रव्यते ॥ मुखमें जितनी चीज घाले ॥ तेनी मरजादा
करणी॥
३ वीगेते ॥ दूध ॥ दही ॥ घृत ॥ तेल ॥ खांड ॥ गुल॥ प
सरव मीठाईनी जात ।। तेनी मरजादा करणी॥
४ पनीते ॥ पगरखी ।। तलीया ॥ मोजा ॥ पावडीयां ॥ तेनी
मरजादा करणी॥
५ तंबोलते ।। लुंग ।। इलायची ॥ पान || सोपारी ॥ एनी ।
मरजादा करणी॥
६ क्यते ॥ वस्त्र पहरणा ओढणा तेनी मरजादा करणी ॥
७ कुसमते॥ सुंगणेमें आवे जीतनी चीज तेनी मरजादा करणी।
८ बाहणते ।। गाडो॥ रथ ॥ तांगो ! दी || घोडा ।। जात ॥
असनारीमें काम आये ॥ तेनी मरजादा करणी ॥
. ९ सयणते ॥ गादी ।। पीलंग, मांचो, खुरसी, अथवा छपर
पीलंग बीछावनेकी जात !! तेनी मरजादा करणी॥
१० विलेपणते ॥ केशर कुंकु तेल पीठी सरीरने विलेपण हुने
तेनी मरजादा करणी॥
११ अर्वभते ॥ कुसीलनी मरजादा करणी ॥
१२ दिसते ॥ पुरव दिस ॥ पश्चम दिस ॥ दिखण दिस ॥ उत्तर
दिस ॥ उंची दिस ॥ नीची दिस॥ये छ दिसने जावणेकी सारी
मरजादा करणी ॥ अथवा कागद देवणरी मरजादा करणी ।।
१३ नाहावणते ।। लानरी मरजादा करणी ।।
१४ भंतेसुते ॥ आहार पाणी करणेरी मरजादा करणी॥
- पाग करणा ए चयदे नेम छकायना श्रावन मंद ने (३३) ॥ छ कायना नाम कहेछे ॥ थ्वीकायते ॥ मुरद ॥ माटी। खडी ॥ गेरू ॥ इत्यादीक । यनी ।। मरजादा करणी॥ अप्कायते ॥ कुंचानो पाणी ॥ नदीनो पाणी ॥ नलरो ॥ तलावरो पाणी ॥ झरणानो पाणी ॥ अथवा इतना घरको न पीवणो तेनी मरजादा करणी॥ तेउकायते ॥ अग्नी ॥ जितना चुलानो आरंभ न लगावणो मरजादा करणी॥ वाउकायते ॥ पंखीसुं ॥ कपडासु ॥ विजणासु तथा j॥ हातसुं॥ इणांसुं ।। अथवा अणेरी चीजसं हवा खाणेकी दा करणी॥ १ वनस्पतीकायते ॥ हारी लीलोतीनी मरजादा करणी ।। ६ तसकायते ॥ हालतां चालतां जीवांने विन अपराधे मार- ो त्याग तथा सरवथा तथा तसजीवन मारणरा त्याग करणा।। ॥ ए ३ असी १ मसी २ खसी ३॥ असी केहेता सस्त्र । कटारी दाल तरवार बंदुक चाकु कतरनी सुइ लकडी आडकीता की इलो खुरपो कीसंणी मुसल उखल घटी खलवतो इत्या- क आद देईने अनेक जातना सस्त्र छे ईणमाहेसं जीतना रा- [णा हुवे उतना उपरंतरा त्याग करणा. १ मसी केहता कप गद छापलकागद सीरकारी वीनज, बोपार आद दईन अनिक नातनी वस्तु छे इणमाहेसुं आपने जीतना राखणा इंचं उतना उपरंतरा त्याग करणा २ खसी केहतां खरमनी काम इन नांगर खेतपवार कुलब आद देईने अनेक जानना निना था 'खेनीनो काम कर्णो आपने जीतना रावणा र ममा ॥७॥ एक वचन जो सदगुरु केरो, राखे जो मन माहे रे प्राणी: (३४) घाइजे ॥ ए करणामुं नफो घणो हुवेछ ।। सारा दीनमे ॥ जीतनो पाप लागे ने मेरू जीतो पाप दल जावेछ ॥ ए चचे नेमरी जो मरजादा करसी तो उतकृष्टी रसांण आवेतो तीर्थ गोत्र वांधे ॥ नरक तीरजंचनी गतीने वंदकरे ॥ साख सुत्र : सगनी छे ॥ संपूर्ण ॥ लघु साधुवंदना. साधूजीने वंदणा नितनित कीजे, प्रह उगमते सूर रे प्राणी नीच गतिमें ते नहीं जावे, पामे रिद्धि भरपूर रे प्राणी साधूजी बंदणा नितनित कीजे ॥१॥ म्होटी ते पंच महावत पाळे, उ यरा प्रतिपाळ रे प्राणी; भ्रमर भिक्षा मुनी सूझति लेवे, । बयालीस टालरे प्राणी. साधूजीने बंदणा० ॥ २॥ ऋद्धि मुनि कारमी जाणी, दीधी संसारने पूठ रे प्राणी; यां पुरुषों सेवा करतां, आतू कर्म जावे तूट रे प्राणी. साधूजीने बंदणा ॥३॥ एक एक मुनीवर रसनारा त्यागी, एक एक ज्ञाना भंडार रे प्राणी; एक एक मुनीवर व्यावचीया वैरागी, ज्यारा गुणारं नाही पार रे प्राणी. साधूनीने वंदणा० ॥ ४ ॥ गुण सत्तावी करीने दीपे, जीत्या परीसा बाइस रे पाणी; बावन तो अन चारज टाले, ज्यांने नमावू म्हारो शीष रे प्राणी. साधूजीने वंदणा० ॥५॥ झाझ समान ते संत ऋषीश्वर, भवी जीव वेग आय रे पाणी; पर उपगारी मुनी दाम न मांगे. देवे ते मुक्त पोहोचाय रे प्राणी. साधूजीने वंदणा० ॥ ६॥ ए सरणे प्राणी साता पावे, पावे ते लीलविलास रे प्राणी; जन्म जरा ने मरन मीटावे, फीर नहीं आवे गर्भवास रे प्राणी; साधूजीने बंदणा.
॥ ११ ॥ श्रीजिन अंतरना, हुवा पाट असंख्य . श्री ऋपभदेवना, भरतादिक सो पूत; वैराग्य मन आणी, संयम जिनमत दीपावी, सबका मोक्ष पहुंत ॥ १०॥ श्री भरतेवर हुआ पटोधर आठ, आदित्य जशादिक, पहोत्या (३५) हर्क निगोदमें ते नहीं जावे, इम कहे जीनराज रे पाणी, साधूजीने दिणा० ॥ ८॥ प्रभात उटी उत्तम प्राणी, सूणे साधूरो वखाण प्राणी; इण पुरुषारी सेवा करतां, पावे ते अमर वीमाण रे प्राणी. साधूजीने वंदणा० ॥९॥ सम्मत अठारे ने वर्ष अठावीसे, यूसी गाम चोमास रे माणी; मुनि आश्करणजी इणि परे बोले, उत्तम साधारो दास रे प्राणी. साधूनीने वंदणा० ॥ १० ॥ साधुवंदना- नहुँ अनंत चोवीशी, ऋषभादिक महावीर, आर्य क्षेत्रमा घाली धर्मनी शीर. ॥ ॥ महा अतुल्यवळि नर, शूर वीरने धीर; तीरथ प्रवर्तावी, पहोत्या भवजळ तीर ॥२॥ श्रीमंधर प्रमुख, जघन्य तीर्थकर वीश छे अढीदीपमा, जयवंता जगदीश. ॥३॥ एकसो ने सितेर, उत्कृष्ट पदे जगीश; धन्य मोटा प्रभुजी, जेने नमाउं शीश ॥ ४ ॥ केवळी दोय कोडी, उत्कृष्ट नव कोडे; मुनि दो सहस कोडि, उत्कृष्टा नव. सहस कोडि ॥ ५॥ विचरे विदेहे, मोटा तपसी घोर; भावे करि बंदु, टाळे भवनी खोड ॥ ६॥ चोवीशे जिनना, सघळा ए गणधार; चौदसेंने वायन, ते प्रगमुं सुखकार. ॥ ७॥ जिन गासन नायक, धन्य श्रीतीर निणंद, गौतमादिक गणधरे, व व्यो आणंद ॥ ८॥ १ लियो अदभूत ॥ ९ ॥ केवळ उपराज्युं, करी करणी करता है (३६) 1 पहोत्या, टालि कर्मना वंक ॥ १२॥ .धन्य कपिल मुनिवर, नी नमुं अणगार; जेणे तरतज त्याग्यो, सहस्र रमणि परिवार ॥१, मुनिवर हरकेशी, चित्त मुनीश्वर सार; शुद्ध संयम पाळी, भवनो पार ॥१४॥ वळि इखुकार राजा, घेर कमळावति नार) :. ने जशा, तेहना दोय कुमार ॥ १५ ॥ छए छतिरिद्धीठांडीने लीधो संयम भार; इण अल्पकाळमां, पाम्या मोक्ष दुवार। ॥ १६ ॥ वळि संयति राजा, हरण आहिडे जाय, निना गद भाळी, आण्यो मारग ठाय ॥ १७॥ चारित्र लेईने, गुरुना पाय; क्षत्रिराज ऋपीश्वर, चर्चा करी चित्त ला" ॥ १८॥ वळी दश चक्रवर्ति, राज्य रमणि ऋदि छोड ६ मुगते पहोत्या, कुळने शोभा चहो ॥ १९॥ इण' आठ राम गया मोक्ष ; बळभद्र मुनीश्वर, गया पंचम दे . ॥ २०॥ दशार्णभद्र राजा, वीर वांद्या धरि मान; पछी हठाया, दियो छकाय अभेदान ॥ २१ ॥ करकंडू प्रमुख, प प्रत्येक वोध; मुनि मुगते पहोत्या, जीत्या कर्म महा जोश्य ॥२२॥ धन्य झोटा मुनिवर, मृगापुत्र जगीश; नवर अनाथी, जीत्या राग ने रीश ॥ २३ ॥ वळि समुद्रपाळ मुनि राजमति रद्द नेम; केशी ने गौतम, पाम्या शिवपुर क्षेम ॥ २४, धन्य विजयघोषमुनि, जयघोष वळि जाण; श्री गई चारज, पहोत्या छे निरवाण ॥ २५ ॥ श्रीउत्तराध्ययनमा जिनवरे काँ वखाण; शुध्द मनथी ध्यावो, मनमां धीरज आण ॥ २६ ॥ वळी खंधक सन्यासी, राख्यो गौतम स्नेह महावीर समीपे , पंच महाव्रत लेह ॥ २७ ॥ तप कठण झोंसी आपणि देह ; गया अच्युत देवलोके, च्यवि लेशे भवछे। ॥ २८ ॥ वलि ऋषभदत्त मुनि, शेठ सुदर्शन सार; शिवराज 1 3 -- अधिक हुइने, कीघो खेदो पार; हुवा मोटा मुनिवर, नाम लियां , (३७) लिपीश्वर, धन्य गांगेय अणगार ॥ २९॥ शुध्द संयम पाळी; पोलाम्या केवळ सार; ए चारे मुनिवर, पहोत्या मोक्षमझार ।। ० ॥ भगवंतनी माता, धन्य सति देवानंदा; बळि सती पालनयंति , छोड दिया घर फंदा. ॥ ३१॥ सति मुगते पहोत्यां, रिडळी ते वीरनी नंद; महासती सुदर्शना, घणि सतियोना पद ॥ ३२॥ वळी कार्तिक शेठे, पडिमा बहि शूरवीर; जम्या क/होरा उपर, तापस वळती खीर ॥ ३३ ॥ पछि चारित्र लीधुं, क्षत्री सहस्र आठ सह बीर; मरि हुवा शक्रेन्द्र, च्यवि लेशे भव तीर विर ३४ ॥ वळि राय उदाइ, दिधो भाणेजने राज; पछि चा- होत्र लेइने , सार्या आतम काज ॥३५॥ गंगदत्त मुनि आणंद, तरण असारण जहाजः कुशळ मुनि रुहो, दियो घणाने साज ॥ ३६॥ अन्य सुनक्षत्र मुनिवर सर्वानुभुति अणगार; आराधिक हुइने तया देवलोकमोझार ॥ ३७॥ च्यवि मुगते जाशे, सिंह मुनीश्वर अलार; वीजा पण मुनिवर, भगवतिमा अधिकार ॥ ३८ ॥ माणिकना वेटा, मोटा मुनिवर मेघ; तजी आठ अंतेउरि , आण्यो न संवेग ॥ ३९ ॥ वीर व्रत लेइने, वांधी तपनी तेग गया वेजय विमाने, च्यावि लेशे शिव वेग ॥ ४०॥ धन्य थावर्चा पुत्र, , । ब श्री तजी वत्रीशे नार; जेनी साथे नीकळ्या, पुरुष एक हजार ॥४१ शुकदेव सन्यासी, एक सहस्र शिष्य लार; पंचशयशु शेलक, पलीधो संयम भार ॥ ४२ ॥ सवी सहस्र अढाइ, घणा जीवोने म तार; पुंडरगिरी पर कियो, पादोपगमन संथार ॥ ४३ ॥ आरा- 37 गानिस्तार ॥४४॥ धन्य जिनपाळ मुनिवर, दोय धनावा साथ प्रथम देवलोके, मोक्ष जशे भाराध ॥ ४६॥ महिनायना महावळ प्रमुख मुनिराय; सौ मुग सिवाच्या, - । , मोह जंजाळ; भिक्षुनी पडिमा, गया मसाण महाकाळ ॥ ६३. (३८) पाय ॥ ४६॥ वळि जितशत्रु राजा, सबुद्धि नामे प्रधान चारित्र लेइने, पाभ्या मोक्ष निधान ॥ ४५ ॥ धन्य मुनिवर, दियो छकायाने आभेदान; पोटिला प्रतिवे ध्या, । केवळज्ञान || ४८ ॥ धन्य पांचे पांडव , तजी द्रौपदी ना। स्थिवरनी पासे, लीधो संयम भार ॥ ४९ ॥ श्री नेमि बंदननो एवो अभिग्रह कीध; मास मासखमण तप, शत्रुनय जाइ । ॥ ५० ॥ धर्मघोप तणा शिष्य, धर्मरुचि अणगार; की करुणा, आणी दया अपार ।। ५१ ॥ कडवा तुंबानो, सघळो आहार; सर्वार्थसिद्ध पहोत्या, च्यवि लेशे भव पार॥ वळि पुंडरिक राजा, कुंडरिक डगियो जाण, पोत चारित्र ले न घाली धर्ममा हाण ॥ ५३ ॥ सर्वार्थसिद्ध पहोत्या, च्यवि. निरवाण; श्री ज्ञातासूत्रमां, जिनवरे कर्या वखाण ।। ५४ गौतमादिक कुंवरो, सगा अढारे भ्राः; सर्व अंधकवि धारणि जेनी मात ॥ ५५ ॥ तनी आठ अंतेउरी, दीक्षानी वात; चारित्र लेइने, कीधो मुक्तिनो साथ ॥ ५६ श्री आणिकसेनादिक, छये सहोदर भ्रात वसुदेवनानंदन, ५. जेनी मात ॥ ५७ ॥ भदिल पर नगरी, नाग गाहावइ जाण; . घर वधिया, सांभळी नेमिनी वाण ॥ ५८ ॥ तजी बनीस नीकळिया छटकाय; नळ कुवेर सरीखा; भेटया नेमिना ५ ॥ ५९ ॥ करि छठ छठ पारणां, मनमें वैराग्य लाय; एक म संथारे, मुगति विराज्या जाय ।। ६० ।। वळि दारुक सुमुख दुमुख मुनिरायः वळि कुमर अनावृष्टि, गया मुगति मांय ॥ ३१॥ वसुदेवना नंदन, धन्य धन्य गजसुकुमाळ अति संदर, कलावंत वय बाळ ।। ६२ ॥ श्री नेमि समीपे, छोड़ - अंत.. . .
अनिरुढ साधु , पाळी, , + , , , श्री एड छठ पारणां, भायंविल अधिरादार श्रीकर मई सोमिल कोप्यो, मस्तके बांधी पाळ खेरतणा खीरा, शिर क्या असराळ ।। ६४ ॥ मुनि नजर न खंडी, मेटी मननी जाळ; सिह सहिने, मुगति गया ततकाळ ॥ ६५ ॥ धन्य 'जाळी उवधालादिक साध; सांब प्रद्युमन, गाध ॥ ६६ ॥ वळि सचनेमि द्रढनेमि, करणी कीधी वाद; शे मुगते पहोत्या, जिनवर बचन आराध ॥ ६७ ॥ धन्य र्जुनमाळि, कियो कदाग्रह दूर; वीरत्रत लेइने, सत्यवादि वा शूर ॥ ६८। करि छठ छठ पारणां, क्षमा करी भरपूर " मासनी मांही, कर्म किगं चकचर. ॥ ६९ ॥ कुंवर अइयुत्ते, ठा गौतमस्वाम; सुणि वीरनी वाणी, कीधो उत्तम काम ७०॥ चारित्र लेइने, पहोत्या शिवपुर ठाम; धुर आदि म- लाइ, अंत अलक्ष मुनि नामः ।। ७१ ॥ बळि कृष्णरायनी, अग्र हिपी आठ; पुत्र बहु दोये, संच्या पुण्यना ठाठ ॥ ७२ ॥ दवकुळ सतियां, टाळ्यो दुःख उचाट; पहोत्यां शिवपुरमें, ए सूत्रनो पाठ ॥ ७३ ॥ श्रेणिकनी राणी, काळिआदिक दशा ताण ; दशे पुत्र वियोगे, सांभळी वीरनी वाण ||७४ || चंदन- साळा, संयम लेइ हुवां जाण; तप करी दह झांसी, पोहत्यां छे नेरवाण || ७५ ।। नंदादिक तेरे, नृपनी नार; वंदनवाळा, लीयो संयम भार ।।७६ परमधार, पहोत्यां मुक्ति मोझार ; ए नवू जणानो , अंगडयां कर ||७|| श्रेणि- कना बेटा, जाळियादिक तेवीश बी बटान, पाच्या विधा वीश ॥ ७८ ॥ तप कठण करीने, पूरी जान, देवर पहोत्या, मोल जासे नजी गैस वादिना बन्ने, बनी नार, महावार समीप, दीया या पार !! ८०. " SA हा य अइलुतो, शुनीश्वरोनी शेणं ॥९८॥ चोवीशजिन मुनिवर, संख्या (४०) धन धनो अणगार ॥ ८१ ।। एक मास संथारे, पहुंत; महाविदेह क्षेत्रमां, करशे भवनो अंत ॥८२॥ रीते, हुवा नवे इ संत श्री अनुतरोबबाइमां, भाखी गया । ॥ ८३ ।। सुबाहु प्रमुख, पांच पांचशे नार; तजी वीरसे की पंच महाव्रत सार ।। ८४ ॥ चारित्र लेइने, पाळ्यो निरतिचा देवलोके पहोत्या, सुखविपाके अधिकार ॥ ८५॥ . पौत्रा, पौगादिक हुवा दश; वीर व्रत लेइने, काढयो । कस ॥ ८६ ॥ संयम आराधी, देवलोकमां जइ वश; क्षेत्रमां, मोक्ष जाशे लेइ जश ॥ ८७ ॥ वळभद्रना नंदन, दिक हुवा बार; तजी पचास अंतेउरि, त्याग दियो ॥ ८८ ॥ सहु नेमि समीपे, चार महाबत लीध; पहोत्या, होशे विदेहे सिद्ध ॥ ८९ ॥ धन्नो ने शाळिभद्र, श्वरोनी जोड; नारीनां बंधन. ततक्षण नांख्यां रोड ॥ ९०। घर कुटुंब कबीला, धन कंचननी कोड; मास मासखमण" टाळशे भवनी खोड ॥ ९१॥ सुधर्मस्वामीना, शिष्य धन्य धन्य स्वाम; तजी आठ अंतेउरी, मातपिता धन धाम ॥९ प्रभवादिक तारी, पहोत्या शिवपुर ठाम; सुत्र प्रवर्त्तावी, राख्युं नाम ॥ ९३ ॥ धन्य ढंढण मुनिवर, कृष्णरायना नंद शुद्धअभिग्रह पाळी, टाळि दियो भव फंद ॥ ९४ ॥ वळि . ऋषिनी, देह उतारी खाल; परीसह सहीने, भव फेरा ५५ टाळ ॥९५॥ बळि खंधक ऋषिना, हुवा पांचशे शिष्य ; घाणीमा पील्या, मुगति गया तजी रीश ॥ ९६॥ संभूतिविजय शिष्य भद्रबाहु मुनिराय; चौद पूरवधारी, चंद्रगुप्त आण्यो । ॥ ९७ ॥ मुनी आर्द्रकुमार ने, थुनिभद्र नंदिषेण, अरणिक ।
(४१) , अट्टावीश लाख ; ने सहस अडताळीश, सूत्र परंपरा भाख ॥९॥ कोइ उत्तम वांचो, मोढे जयणा राख; उघाडे मुख बोल्यां, पाप लागे विपाक ॥ १०० ॥ धन्य मरुदेवी माता, ध्यायो निगळ ध्यान ; गज होदे पायो, निर्मळ केवळज्ञान ॥ १०१॥ धन्य आदिश्वरनी पुत्री, ब्राह्मी सुंदरि दोय; वारित्र लेइने, युगति गयां सिद्ध होय ॥ १०२॥ चोवीशे जिननी, बडी शिष्यणी चोवीश, सती मुगते पहोत्यां, पूरी मन जगीश ॥ १०३ ।। चोवीशे जिननां, सर्व साधवी सार; अडताळीश लाख ने, आठशे सित्तेर हजार ॥ १०४ ॥ चेडानी पुत्री, राखी धर्मशुं पीत; राजीमति विजया, मृगावती सुविनीत ।। १०५॥ पद्मावती मयणरेहा, द्रौपदी दमयंती सीत; इत्यादिक सतीयो, गइ जन्मारो जीत ।। १०६ ॥ चोवीशे जीननां, साधु साधवी सार; रयां मोक्ष देवलोके, हृदये राख्यो धार ॥ १०७ ॥ इण अढी द्वीपमा, 'घरडा तपसी बाळ; शुध्ध पंच महा व्रत धारी, नमो नमो त्रणेकाळ ॥ १०८ ॥ ए जतियो सतियोनां, लीजे नित्यप्रते नान; शुद्ध मने ध्यावो, एह तरवार्नु ठाम ॥ १८९॥ ए जती-सतीशु राखो उज्वळ भाव; एम कहे ऋपि जयमल, एह तरवानो दाव ॥ ११० ।। संवत अढार ने, वर्ष सातो मन धार; शेहेर झालोर मांही, एद कयो अधिकार ॥ १११ ॥ - चिंतामणी पार्श्वप्रभुकू अर्जी- (राग माह) गरी आरजी लेना चीतमें देना सुनीयो श्रीमहाराज । दम दीलमें धरणा भवदुःखहरणा चीतमे देना मुनीयो श्र ॥१॥ आकडी ॥ मोही आनादी नींद मेरे बोहोत हुने (४२) खानापीनामे मगन होके कीया कछु न वीचार । मोय लोभ वता फंदफसाना चीतमे देना मुनीयो श्रीमहाराज ॥द०॥५०॥ची० सु०॥२॥ सुमतीबचतमानकर आयो तेरे द्वार । आंतरजामी मेरी सुणीयो पुकार। मोह प्रबलवल तीनकु हाटाणा । ची०॥ सु०॥ द० ॥ ५० ॥ ची० ॥ मु०॥३॥ श्रीचिंता मणपासजीरें चिंता दुरनीवार । केसरीचंद कहे लाज मोरी खir करीयो वीचार । जैनप्रकाशक तोरेरे सरणे चीतमें देना मुनीया श्रीमहाराज ॥ दया० ब०॥ ची० सु०॥४॥ इति संपूर्ण. चरण वंदत; निवा चोवीसी स्तवन, पंच तीर्थका स्तवनकी देशी. सिरि आदीनाथ अजित संभव; समरू तो आभीनंदनं 'चरण जीनके, सिस धरधर ॥ करत पलपल वंदनं ॥ प्रभू का पलपल वंदणं ॥१॥ सिरि सुमतिनाथ, सो पद्मप्रभु ॥ ॥ पारस गाइए ॥ सिरि चंदाप्रभुजीके, सिवपुर जाइए ॥०॥ नि० ॥२॥ सिरि सुवध सित हंसजीको; ध्यान निज हीरदे धरूं ॥ सिरि वासपुज्यजीके: चरण वंदत ॥ फेर चौउन्यांसि नही रूलु ॥ प्र०॥ फे० ॥३ सिरि विमल आनंत ॥धर्मजीको ॥ ग्यान निज हायडे धरूं । सिरि शांतिप्रभुजीके; पाय पडता ॥ आवा गमण निवारण ॥०॥ आ०॥४॥ श्रीकुंथुनाथ सो अरिनाथ ॥ मल्लि शरण शरण है ॥ मुनिसुव्रतजीके ॥ चरण वंदत ॥ हारत ज्यामन मरण है ।। १० हा० ॥ ५॥ सिरि नेमीनाथ, सो रटनेमी, पारस पारस | ध्याइए ॥ सिरि महावीर स्वामीजीके, चरण वंदत ॥ निश्चल सिवपुर जाइए ॥ प्र० ॥ नि० ॥ ६॥ छांड सब मिथ्या- (४३) सामतकु, निज धर्मको परीचय कियो ॥ नामदेव, अरिहंत जप जप मुख पवरीया पग धरूं ॥ प्र०॥ मु० ॥७॥ सदा ते मंगल, होए बाजपता ॥ ए च्योविसी नाम है । कहत रीखजी, ग्यानने हछे । माअतुल सुखनी खान है ॥ निश्चे पद निरवाण है ॥८॥ इति ॥ । का 12 ।" अथ श्रीमहावीरस्वामीस्तवन- देश मे नमुरे जैन शास्त्रकू करम कट जावे । वीधन टळ जावे । पाप, छि झड जावे ॥ महावीर चरणकू शीस नम्या दुख जावे ॥ वृधमान चरणकू शीस नम्या दुख. जावे ॥ ए देशी॥ कुंड- लपुर नगरी पीता शिधारत राया ॥ माजी त्रसळादेवी कुँखें कुंवर आया ॥ माजी त्रसळादेवी एसो नंदन जायो॥ बीजो नही परि अवतार मुलख मन भायो ॥ जीनजीका नामसे सरीर सांतां पावे ॥ महावीर ॥ वृधमान ॥१॥ इंद्र इंद्राणी मील मोछवने आवे । जीनजीकू लेकर मेरू शीखर नवरावे ॥ बडी धार देखी इंदर शंका लावे ॥ ये लघु वालक रखे इनें दुख थावे ॥ इतरी शंका इंदर मनमें आवे ।। माहावीर ।। वृधमान ॥२॥ इंद्रकी संका श्रीजीनराज मिटावे ॥ प्रभु चरन आंगुष्ठं मेरू चूल हलावे॥ जदी इंद्रमहाराजा मनमें बहु खुशी थावे ॥ ए जगतारण है अपार इनुकी माये ॥ श्रीजीनराजका वलको पार नहीं पावे ॥ महावीर ।। वृधमान ॥ ३ ॥ इंद्रमहाराजा माजीरे पास पोढावे ॥ जीनजीकु देखके तीन लोक मुख पावे ।। देवी देवता मिल दरसणकु आवे ।। धन्य घडी धन भाग भलो दिन पावे ॥ छपन कुमारी मीलकर मंगल गावे ॥ महावीर ॥ वृषमान || ४ ॥ राजा सीधारत जाचक दानज दीयो । कंचन घोडा गजराज उलट मन कीधी || राजा सीधारत बहुवीध न्यान जीमावे सकल किया . न -tܙ ܕܕܕ ܝܕ - १ * (४४) नही पावे ॥ राजानीका सुखें गुख दीन जावे ॥ महावीर ॥ - मान ॥ ५ ॥ प्रभु मात पीताने रती दुख नही दीधो ॥ पछे मार पीताजी आउखो पूरण कीधी ॥ राज रीद्ध छिटकायने संजर लीधो । हुवा चरम तीर्थकर चोखो कारज कीयो । संजम लेने करमारी खाक उडावे || महावीर || वृधमान ।। ६॥ प्रभु अती हारकसे बहुविध तप निपजावें ॥ खटमाशी पारणा चंदन हाते पावे ।। अती हारकले महासतीया आहार बेराये ॥ जधि महा स- त्याजी करमारी कोड खपावे ॥ इणविद महाततीला जो प्रभुजी पारणो वेरावे ।। महावीर ।। वृधमान ।। ७ ।। द्वादम अंगरो ज्यान श्रीजी फुरमावे ॥ ज्यारी बाणी मीठी खीर मुण्या दुख जावे ज्या वारे जातकी प्रखदा सुणवा आवे । ज्या वाणी मुण भगः तकु सीस नयावे ॥ केइ वरत करे वैरागज मनमें लावे ॥ महार्य ॥ वृषभान ॥८॥ गोतय गणधर हुवा प्रधुजिका चेला ॥ ज्या तुरत लीयोहे संजम सगळा पेला ।। चारसेने चार हाजार संजय लीनो ॥ एकदीनमें कारज दीक्षाको सव कीनो । चयदे- हजार चेला प्रभुजीशने पावे ॥ महावीर ॥ वृधमान ॥ ९ ॥ भारज अनारज देस गया जीनराया ॥ अनंत कीयो उपगार पावापुरी आया ॥ भवी जीव सुणके मनमें अती हारकाया ॥ कातीवद आगाचस सीनपुर पाया । आव सिद्ध भगवंतको जक्त सील लगाये ॥ महावीर ।। वृधमान ॥ १० ॥ चरणाको चाकर आरज करेहो स्वामी ॥ नंदरामकु तारो प्रभुजी आंतरजामी ॥ आव भेहर करीने भवसागरसे तारों ॥ तुम मेहर करीने जळदी पार उ- तारो || सुखराम चरणको दास सदा इस गाने ॥ ११ ॥ महावीर चरणळू सीस नभ्या दुख जावे ॥ बृधमान चरण• शीरा नभ्या दुख जाये ॥
-- नाममा नुन चढी हे धाम । ज्ञान तो मुजकु दीजीये पांच , (४५) ॥ अथ पंचपरमेष्ठी नमन ॥ ( राग-गजल) प्रभात उठ पंचपरमेष्ठी नमोखरी, आप नामथी संसार जाय में तरी ॥ प्रभात ॥ १॥ आकडी ॥ अरिहंतदेव गुण अती पदोगीरी । सुनी वाणी आपकी हमारा चीत लीया हरी ।। ति ॥ २॥ राकलकार्य सीद्ध अष्टगुण तो धरी, शत्रुकर्म तोड in शीव तोवरी ॥ प्रभात ॥ ३ ॥ आचार्य उपाध्याय परम- यि तो श्री। छवीस ओर पचीस गुणज्ञानकी झरी ॥ प्रभात ।। ॥ सतावीस साधगुण गंगनीर तो भरी । गुण एकसो ने '3 जाय पाप नो डरी ॥ प्रभात ॥ ५॥ प्राणीनाथ पंचप्रभु हीये गरी । दो ज्ञान करू पार दयाधर्म आदरी । प्रभात ॥६॥ जोड करे आरज चंपालालजी अती ॥ मुज भवपार उतारों है एह बीनती ॥ प्रभात ॥ ७ ॥ ॥ श्री पंचपरमेष्ठी प्रभातीस्तवन ॥ (राजा हूं मे कोमका, और इंद्र मेरा नाम ए देशी) पिद उठी गे सदा नमु प्रशु पंचप्रमेष्टी नाम । इण करमाके लीयें ही सुजे आराम। गेहे उठी में ॥ १ ॥ आ० दील लगाहें पसे प्रभु नही ओरोले काम । अरजी तो मेरी लीजीयें लगे शीला दान । पेहे ॥ २॥ लख चोराशी ज्योनका प्रभु बडा 'टाग | पीतेफीरते मे थका मीला नहीं आराम । पेहे ॥३॥ अष्टकरमकु तोडके प्रभु आयो हु सणे शाम, मनके दर भाषा बोहोन करू प्रणाम । पेहे ॥ ४॥ आप तीरे . -- नीरमाण ! पेहे ॥ ५॥ मुख देवो दुःश्व मेटवो अभ तुमारी वाण । मोय गरीबकी बीननी सुगीजों कृपानीधार पेहे ॥ ६॥ इति संपूर्ण ॥ --- . । श्री अखननाथजीरो पाळणो. मा मोरा देवी गावरे हालरीयो, मुले झारा रीखबजी पथरीयो । टेर । रतन जडत लड लुबारण कंता, इंद्रसुधरमा. आगे धरीयो । मा मोरा देवी ॥ १ ॥ अलेने अलाव माता गावे, नीरख नीरख नेणा हीवडोजी ठरीयो । मा मोरा || रीम झीम रीम झीम फीरत आंगणीये, दाणणणकार वाजेरे यो । मा मोरा ॥ ३ ॥ एक सहल अट लक्षण वीराजे, नही कोइ एसोरे नानडीयो। मा मोरा ॥ ४ ॥ नगरी अ. दशीरे भरतमें, नाम वनीता माधवजी धरीयो । मा मोरा ॥५ रमत रमाइ जुगरीत वताइ, तीन लोकमाहे जस बीसत" मा मोरा ॥ ६॥ कहे हिरालाल जीनंदपद मोटो, एक जी गुण कीम जाय करीयों। मा मोरादेवी गावेरे हालरी श्री पार्श्वनाथजीको स्तवन- श्रीपार्श्वप्रभूजी ॥ थांका दरसणकी माने चायना ॥ आश्वसेण कुल कीरत धारी । भामा राणी. सुत जाया । वदी दीन दशमी जाणो । काशी देशमें आया जी। श्रीषा प्रभूजी० ॥१॥ बनारसी नगरीमें जनम लियो तब । कुमारी आइ । गावे वजावे ताल लगावे। नृत्य करे उमाइ श्री० ॥२॥ चौसष्ट इंद्र मिल मोहच्छवरने। मेरू शिखर न्य राये । पार्श्वनाम स्थापन करीने । माताजी पासे लाए श्री० ॥ ३॥ वालपणामें रमता रमता। माताजीके लार । गंगा जी जी 1 -- (४७) र आये चालके। तापसके दरवार जी । श्री० ॥ ४ ॥ [ नागणी जलता देख कर । तापसको वोलाया। क्या आ ज करता जोगी। जरा दया नही लाया जी। श्री०॥५॥ कारमंत्रका पद संभला कर। स्वर्गगती पहुंचाया। धरणिंदर विती प्रगटे । प्रभुजीका गुण गाया जी ।। श्री०॥६॥ जोवन में परण्या प्रभूजी। श्रीपरभावती नार । राज पाटको छोड पा फीर । संजम पदको धारजी। श्री०॥ ७ ॥ कमठ मरकर । मेवमाली। प्रभूजी हुवा आणगार । पिछला भवको वेर नको । तुरत हुवा तैयार जी । श्री० ॥८॥ जलदी जलदी कार उसने । मूसल जल वरसाया । नाक वरावर आया । प्रभूजी नही घबराया जी। श्री० ॥९॥ संकटमें सिंहासन पा। इंद्र इंद्राणी आया । पद्मावतीजीने लिये सीर पर । करत हे छाया जी । श्री० ॥ १० ॥ तुरत आया अपराध कर । चरण सीस नमाया । हार कुमठ और हात जोड- । देवलोक सिधाया जी। श्री० ॥ ११॥ कर्म काट केवली हर । पाम्या पद नीरवाण । शेहेर मुंबइमें गुण गाया। केवल व हीत आण जी। श्री० ॥ १२ ॥ चिचपोकलीसे ममादेवी । तुमान गली आया । मंगलदासकी वाडीमांहे । चोमासे सुख पा जी। श्री० ॥ १३ ॥ समत उगणीसे इगसठ कार्तिक । वद स शनीवार । चार टाणासे कियो चोमासो । आमोलख खकी लार जी । श्री० ॥ १४ ॥ पुज्य साहेब कहानजी ऋपी- की। संप्रदाय पेछान । चारूं मांहेसु मोतीरिखनी । कर गाया ज्याणजी। श्री० ॥ १५ ।। इति ।। mamer-e-mans वंदु० ॥३॥ मात तात कहे चालो जोगीरे द्वार । देख जोगीको (१८) ॥ श्रीशांतिपभुको स्तवन ॥ सिरी शांति जीनवर | साता बरते जी आपरा नाम मनमोहन गारा । जपता हुंचे मंगलाच्यारी । यार। सेन नृग अनलाजी अंगज । गन्न्या शांतिकुमार । साता सब देसमे जी कांई। मिरगी मार निवार हो । सिरी । जीनेश्वर० ॥ १ ॥ धुधु थप मा मादल बाजे । नारकरे कार । सुगुण गुज्यान मुगुण मु यहीगा। बोल रता जर हो । सिरी० ॥ २ ॥ टामन टुमन तोड गासरे । खास . ग्गार । तान तेजरो नेडो नही आये। तुष्टे शांतिकुमार हो सीरी० ॥ ३ ॥ इखप्याला अमृत होजावे। जानि होो छ।' वेरी दुस्मन चोरटासरे। नहि आवे घर द्वार हो । सिरी०॥ शांति नागतो वसे हीये विच । भनदुख भंजन हार । शांति बरते निशदीन । शांति उतारो पार हो । तिरी० ॥५ दान शीयल तप भावना सरे । सिवपुर मारग चार । म्हारी विनती सकाइ। वरते मंगळ चार हो । तिरी० ॥३॥ इति पारसनाथ प्रभुको स्तवन वंदु पारस जीणंद । वंदु पारस जीणंद ॥ आसुसेन भामा देवीरा नंद ।। टेर ॥ दसमा सरन थकी चव्या जीनराज जनम लियो सुख काशीरे माय । वंदु० ॥ १॥ जनम करताजी इंद । नाम दीयो ज्यारो पारसजीणंद । बंदु०॥ बुमर पदेरामे पारस कुमार | मातपीता मन हारख आपार मान दीयो गार । वंदु० ॥ ४ ॥ मान गळ्योने लज्या आइ थाग । निकाल बताया नेना गनी नाग । वंदु० ॥५॥ .
(४९) गदित ननायो हुवा महोटाजी सुर। आइने बंद्या श्री पारस हाजुर । दु० ॥ ६ ॥ तीस वरस प्रभु रह्या घरवास । तज संसार लियो गाजम उल्हास । वंदु० ॥७॥ त्रियासि दीवस प्रभु छदमस्त माण। प्रगट हुवो पिछे केवल ग्यान । बंदु०॥ ८॥ केवल होछव करताजी देव । द्वादश प्रख दासा रे नीत मेव । बंदु० ९॥ चोतीसे अतिसे करी सोभे जिनराज । वानी पेतीस 15 ह्या बन जीमं गाज। वंदु०॥ १०॥ सुख सोये ज्यारो पुनम द। नाम लिया मन हारख आनंद । वंदु० ॥ ११॥ सितर रस लगदी पायो धरम । ते पण पोच्या प्रभू सीवपुर खेम । दु० ॥ १२॥ गुरु हीरालालजी मोटा मुनिराज । चोथमल गोड्यो मंगलिक काज । वंदु० ॥ १३ ॥ ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष च्यो- न साल । रामपुरामे वन्यो स्तवन रसाल । वंदु०॥२४॥ इति ।। मिल शांतिनाथ प्रभूकी लावणी- ॥ शांतिनाथ प्रभु शांतिके दाता। विधन हारन आंतरज्यामी । ख संपतने लीला लक्षुमी। मन वंछित पुरण स्वामी । या टेर । जपुर नगरी नीरुपम उत्तय । आस्वसेन राया गुणवंता। गन मनी रमणी अचला देवी । रूप कला गुण शोभता । शांतिनाथ भू० ॥ १ ॥ सुख सेज्याये सोवत सुंदर। चउदे सुपना उत्तम या । कर जोडी राजासुं विनवे । राजाजी मन आनंद भया । गांति० ॥ २॥ सर्वार्थसिद्ध विमान थकी प्रभु । चविने कुख जन्म लीया । सकल देशमें गांति करी प्रमु । रोग सोग सब दुर किया। शांति० ॥ ३॥ जेष्ठ वद तेरसनी राते । हुवा लोक आनंदो। जनम महोच्य करे देवतां! जय २ थ. नि० ॥ ४ ॥ नौसट इंद्रनील प्रभुईं। मन चार का - ना न ३
दीपंता । लक्ष ज्यारे है चौयांसि । छीन्नु कोड पायदल शोभतो
लिनो। सहस्त्र जणाके परीवारा । दीक्षा महोछव करे देवतां।
देवी देवना । नर नारीना बहुद्वंदा । दे उपदेश शांति जिनेश्वर
(५०)
२
जाइ न्हवरावे ॥ इंद्राणी मील ल करत है । जिनगुण
स्वर गावे । शांति० ॥ ५॥ रीम भीम रीम झीम वाजे यु:
रण रण तो पाय रणके । तत्ता थइ तत्ता थइ तानन ,
झणण झणण झांदार झणके । शांति० ॥६॥ ताल मृदंग
विणा वाजता । देव दुदुंभी आकाशे ॥ लेत वारणा
इंद्र इंद्राणी उल्हासे । शांति०॥ ७ ॥ इण विघ जन्म ..
कीयो। भाव भक्ती कर उत्कृष्टी। फिर मुक्या माताजी पाने
कुसम तणी करता वृष्टी । शांति ॥ ८॥ राजाजी पीन है।
मांड्यो । दान दालीदर दुर कापे । सकल देशमें शांतिकरी १
गुण निष्पन्न नाम स्थापे । शांति० ॥ ९॥ चालिस धनुष्ये :
प्रमाण । मृग लांछन सोवन वरणा। रूप आनुपम अधिक वि।
देखता ए चित्त ठरणा । शांतिः ॥ १०॥ पचीस सेहेस वर्ष .
प्रभुजी । रह्या कवर आणंदपणे । सहेस पचिस मंडलिक राश
सहेस पचीसचक्रवर्ति पणे ॥ शांति ॥ ११॥ छउ खंडमें हु।
चलाया । चउदे रत्न नउनीध धरे । सोळे सहस्र हुकमी चाकर
बतिस सहन राय सेवा करे । शांति० ॥१२॥ हयवर गयवर
S
सेवा करे धर उल्हासी । शांति० ॥१३॥ एक लाख व्याणु ...
अंतेउरी । रूप ज्योवनम आधिकाइ। या रिद्धी सव जानी कार
छीनमे दीवी छीट काइ । शांति ॥१४॥ वरसी दान देइ संज
जीनजीसे आधीक प्यारा । शांति० ॥ १५॥ एक मास ।
रह्या । छदमस्थः॥ पछे ध्यायो सुभ ध्यानो । पौस सुदी
दीवसे । प्रभु पाझ्या केवल ज्ञाणो । शांती० ॥ १६ ॥ इंद्र इंद्र।
.
विमा
(५१) चेक जीवाके आणंदो ॥ शांति०॥ १७॥ सेहेस पचीस बरस प्रभुजी । उतम केवळ प्रज्या पाळी । कर्म खपावी मुगते तां । जिन सासनने उज्वाली ॥ शांति० ॥ १८ ॥ शांतिनाथ- को सुमरण करता। दुःखीयाका सब दुःख कटे । मोक्ष महेलमें य विराज्या। शांतिनाथ जिन जे ह रटे ॥ शांति० ॥१९॥ यण सायण भूत पिसाच । जित्या झोंटीग विकराले । विकट ट ने संकट ने बंधन । नाम लेत दुरा टाले ॥ शांति० ॥२०॥ त चोखे मन सुमरण करतां । मन बंछीत आसा फळे । सिंह वे ने चोर आगन भए । रोग सोग दुरा टाळे ॥ शांति० ॥२१॥ बानंदजीके शिष्य हीरानंदजी । नित समरण करे जिनवरका । म कृष्ण कर जोड विनवे । पाप हारो प्रभु भवभवका ॥ शांति० २२ ॥ सवत आगरे वरस चौसटे | पोस सुदी दस्मी गुरवारे । तिनाथका गुण वरणव्या । सहेर नीमचके मझारे ॥ शांति २३ ॥ इति ॥ ॥ श्री शांतिनाथ प्रभुको हालरीयो । शांति कुवर हुलरावे । अचला देवी, शांतिकुवर हुलरावे । टेर । सर्वार्थसिध्धयकी चवी आया। शांति शांति परतावे । ट बद तेरसनि हो राते । आनंद हारख वधावे । अचलादेवी, तिकुवर हुलरावे ॥ १ ॥ चौसष्ट इंदर मीलकर प्रभुकुं। मेह खर न्हयराने । ताल मृदंगने णापल वाने! इंद्रान्या मंगल । पचला० ॥२॥ आनंत वली त्रिवन नायक । लेइ द गोद खीलाचे । गस्तक भुगट काना दल ! इंदरम अर्थ हाले। अचला० ॥ ३ ॥ बदन : मावन सन मनट लक्षण धरावे । निरम गरी 1 करी सब योजनकी त्यारी । नेमजीकी० ॥३॥ नेमजी२५. . जय पकड्यो छिनमांही। काहा तुं जावे मोरी जाइ। और वर (५२) विधन सह टलजावे । अचला० ॥४॥ कहे चोथमल परसादे । हीवडे हारख नमावे। शांतिकुवरजी को गाये रीयो । मनवंचित गुख पावे । अचला० ॥ ५॥ , । नेमजीकी जान. नेमजीकी जान वनी भारी। देखनकु आवे नर नारी । टेर अनंत घोडा और हाथी। मनुष्याकी गीनती नही आती। . पर धजा जोफर राती। गमकसे फीरती फर राती । दुद्दा समुद्रविजयनीका लाडला। नेग उनोका नाम । राजुला आये परणवा । उग्रसेन घर ठाम । प्रसन्न भई नगरी सब । नेमजीकी॥१॥ कसुंबल बागा आतिभारी। काने : छन न्यारी। किलंगी तुरा सुखकारी। माल गले मोती डोरी । दुहा। काने कुंडल झगमगे। सीस खुप झलका कोडी भानुली करूं ओपमा। सोभा आधीक अपार। 4 'रह्या बाजा टक सारी। नेमजीकी० ॥२॥ छुट रही उन बरराइ । व्याव्हनगं आये बड़े भाई । झरूखे राजुल दे आ जानकु देखी सुख पाइ । दुहा। उग्रसेनजी देखके । मन करे विचार । बहोत जीव करी एकठा। वाडो भयो ति, र आये। पशुजीव सतही कुर लाये नेमजी वचन फुरमाये। पशु जीव काहेकु लाए । दुहा । याको भोजन होवसी । जान एह । एह वचन जुन नेमजी । थरहार कांपी देह । भावसे चढ गये गिरनारी । नेपजीकी० ॥ ४॥ पीछेसु राजुलदे आइ । हाती वास्ते हे तुज मोकलाई । दुहा। मेरे तो वर एकही। हो गया नेगी + - च (५३) र और भुवनमें वर नहीं। क्रोड करो विचार। दीक्षा जद लने धारी। नेमः ॥५॥ सहेल्या सवही समजावे। हिये लके नही आवे । जगत सव झुटो दरसावे । मेरे मन नेमकुमर ।। दुहा । तोड्या कंकण डोरला । तोड्यो नवसर हार । पल टीकी पानसुपारी । त्याग्यो सब सिणगार। सहेल्या ही वील खाणी। नेमजी० ॥६॥ तज्या सव सोले सिण- । आभूषण रत्न जडीत सारा । लगे मोहे सवही सुख खारा। ड कर चलि निरधारा । दुहा । मातपीतापरीवारकुं। तजता लागी वार । विजोग कर चली आपर्नु । जाय चढी गीरनार । ती जेडी मा प्यारी । नेप० ॥७॥ दया दील पशु अनकी है। त्याग जब कीनो छिनमांही। नेमजिन गीरनारे जाइ । के बंधन छुड़वाई । दुहा। नेम राजुल गिरनारपे। लीनो म जान । नवलमल करी लावनी । उपज्यो केवल ज्ञान । नोकी कीरीया बुधसारी । नेमजी० ॥ ८॥ इति ।। are ॥ सिद्धपदस्तवनः ॥ श्री गौतम स्वामी पूछा करे । विनय करी सीस नमाए । नी। अविचल थानक हो सुण्यो । कृपा करी मोय बतायो । नी । शिवपुर नगर सुहामणो । या टेर ॥ १ ॥ आठ करम लग किया। सायां आतम काज | प्रभूजी। छुटा संसारना यिकी । ज्याने रहेवानो कोन म !! प्र० ॥ शी० ॥२॥ काहे अर्द्ध लोकमां । सिध्ध सिला तणो टाम हो । गौतम | गपुरीका उपरे । तेहना बारे नामहो । गौ० ॥ गिवः ॥ ३ ॥ म ऐनाळीस यांजन यांगी पोहटी जाणही ।। गौ०॥ नन नाही नीचे । छेदे माखी पंख ज्यं जागहो ।। गाँ (१४) शि ० ॥ ४॥ उज्यल हार गोत्या तणो । गौ दुध संख मः हो । गौ ०॥ ते थकी उजली अति वणी । उदयो . संठाणहो ॥ गौ०॥ शि० ॥५॥ अरजण स्वर्णसम दीपनी घठारी मठारी जाणहो ॥ गौ० ॥ फटक रतनयकी निरमन मुवाली अत्यंत वखाण हो । गौ०॥शि० ॥६॥ उल्लंघी गया। अधर रहा सिवराज हो ॥ गौ० ॥ असे जाई आड्या । साऱ्या आतमकाज हो ॥ गौ०॥ शि० ॥ जनम नही मरण नहीं । नही जरा नहीं रोग हो । गा०॥ शि भूख नही तिरखा नही । नही हारख नही सोग हो ॥ करम नहीं काया नही । विषय रस नही योग हो । गौ० ॥९॥ शब्दरूप रस गंध नही। नही फरस नही वेद हो । ॥ बोले नही चाले नही । मौनपणुं नही खेद हो । गौर ॥ १० ॥ गाम नगर एक नहीं । वस्ती नही उजाड हो । काल तिहा बरते नहीं। नही रात दीवस तीथी वार हो ॥ शि०॥११॥ राजा नही परज्यां नहीं । नहीं ठाकुर नहीं। ॥ गौ० ॥ मुक्तिमां गुरु चेला नही | नही लघु बडाइको । । गा०॥ शि० ॥ १२ ॥ अनंत सुखमा झीली रह्या । ज्योत प्रकास हो ॥ गौ० ॥ सहु कोइने सुख सारीखा । र अविचल राज हो ॥ गौ० ॥ शि० ॥ १३ ॥ अनंत सि गया। वलि अनंता जाय हो ॥ गौ०॥ अवर जग्या रूं जोतमें जोत समाय हो ॥ गौ० ॥ शि०॥ १४ ॥ के सहित छे । केवल दर्शन खास हो ॥ गौ०॥ क्षायिक दीपता । कदेही न होवे उदास हो ॥ गौ० ॥ शि० । सिध्ध स्वरूप जे ओलखे । आनी मन वैराग हो । शिव रमणी वेगीवरे । कवि कहे सुख आथा गहो । शि० ॥ १६॥ इति ॥ - - + H म माकन पार। समरू सनी माल सिग्दार ।। १ ॥ टेक: नाण्यो काम न भोग। भर ज्यापनमा लीधो जो.. पादनाथ प्रभुजी दीनी नार। समहं ॥ २ ॥ महार (५५) ॥ वीस विहरमानको छंद ।। । श्री सिरिमंदर स्वामी । थांरो ध्यान धरूं सिर नामी । जुगमंदर आंतरज्यामी हो। जिणंद जसधारी जसधारी ॥२॥ | बलिहारी हो ॥ १॥ या टेर। वाहु सुवाहुजीकी करूं ।। हुतो च्यांहु नित मेवा जी । धन २ थे देवाधी थे देवा । जी० ॥२॥ सुज्यात स्वामी प्रभु ध्यांबु । रीखभानंदनजी । गांऊ। अनंत वीरजी सीस नमाउं हो। जी० ॥३॥ सुर जी सब कंता। विसलधरजा विख्याता। दीजो मुज भव सुख साता हो। जी० ॥ ४ ॥ वालेसर वज्रधरजी। सुणो निंदन आरजी। मारो जलम मरण यो वरजी हो। जी० ५ ॥ चंद्रबाहु युजंग दयाला। छे काया जीवारा प्रतिपाला । रोक दीया आश्रवनाळा हो। जी० ॥६॥ ईश्वर नेमीश्वर । वीरसेन सदा सुखदाया। महाभद्रजी सर्व करम हटाया | जी० ॥७॥ देवजसजी हे जसवंता। अनंतवीरजी सुख- IT । दुःख जावे ध्यान धरता हो। जी० ॥ ८॥ विचरे महा- देह क्षेत्रके माया । प्रभुजीरी पानसे धुनुप्ये निकाया जुगमे या हो। जी० ॥९॥ प्रभुजीकी कंचन वरणी काया। वे जीवाशे मन भाया। तिलोकरीख गुण गाया हो। जी० १० ॥ इति ॥ सोळे सतीयाको स्तवन. वाली सुंदरी दोनु बेन । नाम लियालु पांव चैन । सीलवंती मनसोबो । करे नेमजीसु आरजीरे। करे नेमजीसु आरजीरे। रंगीला जानीया। केसरीया वागारेक । आज० ॥ ३ ॥द्वारकारा दीनो दान । लाम लीयो चंदन भासमान । देवता क्रिया सफल सिणगार। समझ॥३॥ सेराजतिसारी सुरणी शुद्ध केवळ ले सती मुगते गइ। आवा जमण दीया दुःख नी- समरूं०॥४॥ राजुल गई जमारो जीन । नेमीसरजी, प्रीत । मनकर कियो नही और भग्तार । समरू० ॥ ५॥ पांडवनी द्रौपदा नार। सील तप्पी नही लोपी कार । गीन सूतरमे विस्तार । समरूं ॥६॥ सीता लहु अंकुसरी म सीले देवतां कीधी साहाय । अग्नि कीयो पावक नीर । । ॥ ७ ॥ काचे ताते काब्यो नीर । सीले आयो देवता में सुभद्रा उघाडी चंपाद्वार । समलं० ॥ ८ ॥ कौसल्या बंदु प्रभा मृगावती साची सती । पद्मावती दधी भाग न नार । समरूं०। सेवा कुंता सूळसा जान । फुफचुला दमयंती नार। नलराजा गुनीत नार । सीमरूं० ॥ १० ॥ सोळे सतिया सीळसु दी सतीया मांड्यो करमासु जंग । सतीया हुइ कोई रतन समान समरूं० ॥११॥ इति. राजीमतीको स्तवन आज रंग बरसे रे। आज रंग वरसे। लारा नेमकुमर विर राजुल तरसे रेक। आजरंग। या टेर। विस लाख घुडलार ऊपर । झीण बनाती करशारे । तिस लाख हास्त्यारे ऊपर। हौदो धरशारेक ॥ आज रंग वर० ॥१॥ सेस गोपीया मील हुकारो भर लीयो नेमजी। व्यावज करशारेक । आज० ॥२॥ छप्पन क्रोड जादुरे जानीया। दे नगारा चढग्यारे । आज्य re (५७) य नेमजी । सगळाइ देवत चढग्यारे । छत्तिस वाजा जेरे जानमे । महोछच करशारेक। आज०॥४॥ इंदर य सवाल सुनायो। देखो जानकी त्यारीरे। नेमकुमर पर- जि नाही। बाल ब्रह्मचारीरक ॥ आज० ॥५॥ आज्जव जिसे जान वनाइ । जुनागढपर चढग्यारे । तोरणसे रथ फेर यो। जीनावर मरसीरेक । आज० ॥ ६॥ कीसन महाराजा डा फिरने । करे नेमजीसु आरजीरे । जाधु जानले जाइए मिजी । काइ थाकी मरजीरेक । आज० ॥ ७॥ राजुल झुरणा र रही। सहेल्या मील समजावेरे । विन ओगण पीउ छांड ल्या। थाने कुन भुरमायोरेक । आज० ॥८॥ सावळी रत भीना मन मोहे । चांद पुनमजीम चमकेरे। तोरणसुं थ फेर दीयो। मारे हीरदे खटकेरे । आज० ॥९॥ सवाइ गगे सवागन्याने। घर घर मंगलाचारोरे । समुद्रविजयजी- का लाडला । गीरनारे चढग्यारेक । आज० ॥१०॥ नेमकु- परजी संजम लियो । पुरष एक हाजारीरे । तीन लोकमें महिमा गरी। पर उपकारीरेक । आज० ॥ ११॥ इति ॥ राजीमती देवरने समझावे संझाए. राजुल इणपरे विनवे हो । मुनिवर । थारो चित्त चळीयो चिर। थोडा सुखारे कारने हो । गुनिदर। कीउं पड्यो अंध नहेर । मुगुणा साधुगीहो । मुनिवर । थारो मन चळीयो तुंघर ॥ १॥ या टेर । पंच महाव्रत भादसा हो । मुनिवर । मेरू जेवटो भार । वमीयारी बांछा करो हो । निवर । धीग धारो जमबार । सुगणा साधुगीह।। मुनिवर थारो चित चळीयो सुधेर ॥ २॥ वैरागे मन वाळनदी । मुलीधी संजम भार विजयजीरा नंद । हुँ भोजगविष्णुरी पोतरीहो । मु० । उनसेन- वस्तरने सिणगार । देख देख सिधावसी हो । सु० । कुण केसी सु०॥७॥ वगीयारी वांछा करो हो । मु० । गंधन कुलमान घर मांय । ज्यांसुं तो न्यारा रखा हो । मु० । त्याग की जिनराय । सु० ।मु० । था० ॥ १३॥ आवे वैश्रवण इंद्रदेवताह ।मु० । नल कुबेरनी जात । सुपनामें बांछ नहीहो ।मु०। थारी कीतनीक वात । सु० । सु० । था० ॥१४॥ जिहां जिहां तुमे विचरस्यो हो । सु० । नगरी नेवली गांग । नारी देख चित्त डोलस्यो हो । मु०।नारी नरकनो ठाम । सु० ॥१५॥ सहु। RE (५८) । अब कायर भाव कीसो करो हो । गु० । देख पराइ नार। सु० । गु० । था० ॥३॥ राजपंथने छोडने हो । मु० । उन्नडमा भान जाय । अमृत भोजन चाखनेहो । गु० । कुकसखाए बलाए। सु० ॥ ४ ॥ गज आसवारी छोडने हो । मु० ॥ खर उपा। मत बेस । सरग तणा मुख छोडने हो । मु० । पाताळे मत पे । सु० ॥ ५॥ चंदणवाल कोयला करोहो । मु० । आंवा काट वंबुल । कुण बाहेर घर आंगणेहो । मु० । तिमथारो काइमुल। सु०॥६॥ घर घर फीरनो गोचरी हो । मु०। देखशो सुंदर नार । हाडनामा वृक्षनी परेहो । गु० । मोटो उपाड्यो भार। होए । रतन चिंतामणि पायनेहो । मु०। कीचड़में मत खोय सु० ०॥८॥ थे तो अंधक विष्णुरा पोत राहो । सु० । समुद्र जीरी धीय । सु० ॥९॥ कुल मोटो आपा तणो हो । मु० जीण सामो तुं जोय । काम भोगने वांछता हो । मु० । भला न कहेसी कोय । सु० ॥ १०॥ गोल भंडारी सारीखो हो । सुत्र हम्माल उठायो भार । वोज मजुरी आरथीयो हो । मु० । नहीं माल सिरदार । सु०॥ ११॥ घणो रूप नारी तणो हो । मु० अनगार । सु० । मन गयतो इंद्रिय तणो हो। मु० । सुख विलस्यो दलर परीवार । भाइ वटा उमराव अंतर । सरकू लीधा ला; पर सजाइ पहुडाने। दहा । हाथी घोडा रथ पालखी। पाय- (५९) शिका/नर नहीं हो । मु० । नही सरीखी नार । केइ झुंडाने के। मला हो । मु०। चल्यो जाय संसार । सु०॥ १६ ॥ ब्राह्मी संदरी वेनडी हो । यु । सतीयामें सिरदार । करणी कर मुमते इ हो । मु० । नाम लिया निस्तार । सु० ॥ १७॥ तीर्थकर बावीसमा हो । मु० । जगमे मोटी सोभ । वालपणे तज निसऱ्या हो । मु० । वंध वसामो जोय । सु०॥ १८॥ नारी दुखनी वेलडी हो । मु० । नारी दुखनी खान | करणी करो चित्त निरमलि हो । मु० । कह्यो हामारो मान । सु० ॥ १९ ॥ बचन मुण्या राजुल तणा हो । मु०॥ मन दीयो ठीकाने आय। धन धन तुं मोटी सती हो । मु० । माता थे राख्यो मारो मान । मु० ॥२०॥ ए दोनु उत्तम कह्या हो । मु० । पाम्या केवल ध्यान । करम खपाइ मुगते गया हो । यु० । कीजे जिनरो ध्यान । सु० ॥ २१ ॥ समत आठारे वावने हो । मु०। सावण मास मझार। रीख चोथमलजी इस भणे हो । मु० । सुद पंचमी मंगळ. वार । सु० ॥ २२ ॥ इति ॥ ॥ दशारणभद्रजीरो स्तवन ।। वीरजिन वंदनकु आया ॥ दशारणभद्र बडे राया॥ टेर ॥ पधाच्या बीरजिणंद भारी । दशारण नगरीके बारी । मुनिवर च- उदासहे सलारी । आरज्या छतिससे ससारी ।। दुहा ॥ समोस- रण देवा रच्यो। बेठा त्रिभुवननाथ । इंद्र इंद्राणी सेवा करें। पाम्या हरख उल्हास ।। वीरजिन०॥ १ ॥ खबर राजेंद्र भणी लागी । वीरनिन आय उतऱ्या बागी । जावणो दरसगके काने ।
"- जिनः ॥ ८॥ इंद्र जद मुनिवरसे बोले । नही कोइ आपतणे वीराजिनः ॥ २ ॥ अटार सहेस गज छाजे । घुडला लखचाई गाजे । एकविस सहेस रथ ज्योती । पालखी एक सहेस नोहंती। दुहा । हाथी घुमे घुडला हिसे । रथ्य करे झणकार | पायदल मुखरे आगले । वोले जयजयकार । वीरजिन० ॥ ३॥ पांचरे अंतेउर लारे । करतहे नवा नवा सिणगारे । पहेरीया रत्न जडीत गहेणा । वाजता वाजंत्री वयणा । दुहा । चामर छ डुलावता । चाल्या मध्य वजार । राय अपरो आडम्बर देखी गर्भ कीयो तिणवार । वीरजिन०॥४॥ स्वर्गसे इंदरभी आया भेटीया श्री जिनवरका पाया। ग्यानसे सर्व बात जाणी दशारणभद्र बडो मानी । दुहा। मान उतारण कारणे । इंद्र दीर आदेश । एक ऐरावत ऐसो लावो । ज्युं गरभ गळे विशेष । वी जिन ॥ ५॥ चौसट सहेस गज छाजे । गगनविच उभ गाजे । एकको ऐसो रुप आयो । सुणता आश्चर्यही पायो । दुह एक एकके मुख पांचसे । मुख मुखके आठ दंत । दंत । आठ वावडी । ज्या मांहे कमल महंत । वीरजिन० ॥ ६ पाखडी लाख लाख ज्याके । नाटक पडे बत्तिससे तापे । ई. इंद्रासन सोवे । करणका ऊपर मन मोहे । दुहा । ज्यापर वीराजीया । लारे बहु परिवार । दशारणभद्रजी देखने । गर्भ गळ्युं तीण वार । वीरजिन० ॥७॥ चिंतवत आपने दील माहीं । बडाइ कीस वीद रे भाइ । इंद्रसे जीतुं हुं नाइ । करूं उपाय कठाताई । दुहा । अवसर देखी संजम लिनो। दशारणभद्र नरेंद्र । तुरत आइ उतावळो । पगे लाग्यो शके इंद्र । वीर- --- । तूले । और तो शक्ती धनी मारे । वेaकू दीक्षा नहीं धारे । दुहा । धन धन है मुनिरायनी । तुमे राख्यो मान अखंड - र गुन्हेगार हुं । इंद्र गयो गगनके मंद । वीरजिन० ॥ ९ ॥ र संजम सुद्ध पाळे । दोष सहु आतमना टाळे । मिटाया मरण फेरा । आतमा आटल हुवा तेरा | दुहा । गुरु देव से । सुणियो भविजन लोक । जो करणी साची करे। मेलशी सगळा थोक । वीरजिन० ॥१०॥ समत उगणीसे का | साल तेतीसा मन मोहे। आसोज सुध्दः पंचमी गो। हारखसे हीरालाल गाणो । दुहा । देश हाडोती विपे । टो मोटो सहेर । चोमासो कियो रामपुरामा । चार संतकी ।। वीरजिन० ॥११॥ - । भरतचक्रीको स्तवन. । अमरपद पाया हो । भरतेश्वर मोहटा राजवी। मुगति पद याहो । भरतेश्वर मोहटा राजवी । या टेर । सर्वार्थसिद्ध थकी वि आया । नगरी विनीता माय । रिखभदेवजी तात 'तुह्मारा। मंगळादे माय । अमर० । भरते० । मुगतिः। भरते०॥१॥ लाख गरे (स पूरी ताइ । कंवर पद महाराज । खटल खलाखपूर ज्यालाइ । राजपदवी भोगवी श्रीकार । अमर० । भरते । मुगतिः । सारने० ॥ २॥ साठ सहेस वरसा लगताइ । दिग्विजय अधिकार। अष्ट भगत त्रीदस आराधी। वस किधा भूपाल। अमर० भरते० । मुगतिः । भरते० ॥३॥ रतन चतुर दस वनीद नायक । राणी चौसट हजार। महेल बयाळीस भोमीयासरे। बादकरो धुंकार । अमर । भरते. मुगतिः। भरते ॥४॥ सप मोड देवता कहांसरे । तन्नतना रखवाल । लख चौयांसि ९५ हय गयवर । छोन्नुं गोड झुंझार । अमर० । भरते० । मुगति. मन ॥२॥ आरीसारा भुवनमा सजी। आयो उज्वल ध्यान । मापन ना। ई न मान माही । बडाइ कीस बीद रे भाइ । इंद्रसे जीतु हुँ नाइ । करूं। नरेंद्र । तुरत आइ उतावळो । पगे लाग्यो शके इंद्र। वीर- जिन० ॥ ८॥ इंद्र जद मुनिवरसे बोले । नही कोइ आपतणे | तूले । और तो शक्ती धनी मारे। वेकेकू दीक्षा नहीं धारे। 4 (१०) - वीराजिन० ॥ २ ॥ अठार सहेस गज छाजे । घुडला ल... गाजे । एकविस सहेस रथ ज्योती । पालखी एक सहेस नार दुहा । हाथी घुमे घुडला हिसे । रथ्य करे झणकार | पायद मुखरे आगले । वोले जयजयकार । वीरजिन० ॥३॥ पांचा अंतेउर लारे । करतहे नवा नवा सिणगारे । पहेरीया रल जडीत गहेणा । वाजता वाजंत्री वयणा । दुहा | चामर डुलावता । चाल्या मध्य वजार । राय अपरो आडम्बर देखी ।। गर्भ कीयो तिणवार । वीरजिन० ॥ ४ ॥ स्वर्गसे इंदरभी आया। भेटीया श्री जिनवरका पाया। ग्यानसे सर्व बात जाणी दशारणभद्र बडो मानी । दुहा। मान उतारण कारणे । इंद्र दीयो आदेश । एक ऐरावत ऐसो लावो । ज्युं गरभ गळे विशेष । वीर- जिन ॥५॥ चौसट सहेस गज छाजे । गगनविच उभान गाजे । एकको ऐसो रुप आयो । सुणता आश्चर्यही पायो । दुहा। एक एकके प्मुख पांचसे । मुख मुखके आठ दंत । दंत देव आठ वावडी । ज्या मांहे कमल महंत । वीरजिन० ॥ ६ पाखडी लाख लाख ज्याके । नाटक पडे बत्तिससे तापे । इंद्रक इंद्रासन सोवे । करणका ऊपर मन मोहे । दुहा । ज्यापर वीराजीया । लारे बहु परिवार । दशारणभद्रजी देखने । गर्भ गळ्युं तीण वार । वीरजिन० ॥७॥ चिंतवत आपने दील उपाय कठाताई । दुहा । अवसर देखी संजम लिनो । दशारणभद्र जित दुहा । धन धन हे मुनिरायजी । तुमे राख्यो मान अखंड (६१) र बार गुन्हेगार हुँ । इंद्र गयो गगनके मंद । वीरजिन० ॥९॥ नेवर संजम सुद्ध पाळे । दोष सहु आतमना टाळे । मिटाया न्म मरण फेरा । आतमा आटल हुवा तेरा । दुहा । गुरु देव जादसे । सुणियो भविजन लोक । जो करणी साची करे। मिलशी सगळा थोक । वीरजिन० ॥१०॥ समत उगणीसे का वे। साल तेतीसा मन मोहे। आसोज सुध्द पंचमी णो । हारखसे हीरालाल गाणो । दुहा । देश हाडोती विषे । टो मोटो सहेर । चोमासो कियो रामपुरामा । चार संतकी र। वीरजिन ॥११॥ -- भरतचक्रीको स्तवन. अमरपद पाया हो । भरतेश्वर मोहटा राजवी । मुगति पद याहो । भरतेश्वर मोहटा राजवी । या टेर । सर्वार्थसिद्ध थकी वि आया। नगरी विनीता माय । रिषभदेवजी तात तुह्मारा । मंगळादे माय । अमर० । भरते० । मुगति० । भरते०॥१॥ लाख रस पूरव ताइ । कंवर पद महाराज । खटल खलाखपूर ताइ । राजपदवी भोगवी श्रीकार । अमर०। भरते । मुगति० । रिते० ॥ २॥ साठ सहेस वरसा लगताइ । दिग्विजय अधिकार। अष्ट भगत त्रीदस आराधी। वस किधा भूपाल। अमर० भरते० ०। मुगतिः। भरते० ॥३॥ रतन चतुर दस वनीद यिक । राणी चौसट हजार । महेल वयाळीस भोमीयासरे । [टकरो धुंकार । अमर । भरते. मुगति० । भरते० ॥४॥ व क्रोड देवता कह्यांसरे । तन्नतना रखवाल । लख चौयांसि व हय गयवर । छीन्नु कोड झुंझार । अमर । भरते० । मुगतिक भरते० ॥५॥ आरीसारा भुवनमा सजी। आयो उज्वल ४. .
(६२)
अनित्य भाव तासजी। पाया केवल ग्यान। अपर भर
मुगतिः। भरते० ॥६॥ संजाल पधारीया सजी।
सभाके मांय । दससहेस सदाए नरपत । मुगति पंथ 4.
अमर० । भरते० । मुगतिः। भरते. १७॥ तिजा अंगके ।
सजी। चोथानो अधिकार । उगी उगीने उगीयो र
पुन्य तणो जयकार । अमर० । भरते. मुगति० । भरते० ।
भरत खंडको चक्रवर्ती । पहेलो भरतेश्वरजी नाम । ऐसा घ
ध्यान ध्यावता । पावे सुख आराम। अमर० । भर
मुगति० । भरते० ॥९॥ लाख पुरव लगपाळीयो. सजी।
पद अनगार । अनशनकरी अष्टापद उपरे सजी। पाया
पार । अमर० । भरते० । मुगति० । भरते० ॥ १०॥ उ
पिचताळीस बरसे। रतनपुर चोमास । हीरालाल कहे
प्रसादे। पुरे मतकी आस । अमर० । भरते० । मुग
भरते० ॥११॥ इति ॥
".
श्रीवेलावलराग पद.
रे जीव जिनधर्म कीजीये। धर्मना चार प्रकार । दान
तप भावना। जगमाहे ए तत्त्वसार । रे जीव० १॥
दीवसने पारणे । श्री आदीश्वर आहार। इक्षुरस प्रति ला
श्री श्रेयांसकुमार। रे जीव० ॥२॥ मज भव सशीलो रात
कीधी करुणा सार। श्रेणिक नृप घर आवतस्यो।
मेषकुमार। रे जीव०॥३॥ चंपा पोळ उघाडवा। च
कान्यो नीर। सतीए सुभद्र जस थयो। तीणरो सीयलन
। रे जीव०॥४॥ तप करी काया सोकवी। अरस विर
आहार। वीराजिणंद बखाणीयो। धन्य धन्य
matka
अन
, हाजर आए। मोह मुगत्यार बुलाए। च्यार कपायरु का (६३) ॥५॥ अनंत भावना भावता। धरता निरमल ध्यान। रिसा भवनमें। पाम्या केवल ग्यान । रे जीव० ॥६॥ | सुरतरुसमो। एहनी सीतल छाय। समय सुंदर कहे । मोक्षतणा फळ पाय ॥ ७॥ इति ॥ मुक्ति जाणेकी डिगरी- (हीर रसैंका ख्यालकी , देशी.) आदालत प्रभुजी कीजिये । जिनशासन नायक मुगती को डिगरी दीजीये। या टेर। खुद चेतन मुदई बना है। आलु मुद्दाला। दावा रसता झुगती मारगका । धोखा दे जाय जी। जिन०॥१॥ तव कागद इष्टाम लिया। तलवाणा खिमा रीि। सझाय ध्यान मजमून बनाकर।आरजी आन गुजारीजी। ० ॥ २ ॥ में जाता था मुगती मारगमें । करयोने आ घेरा। । देकर राहा भुलाया। लूट लिया सब डेराजी। जिन ॥ वहोत खराव किया करमोने । चौयासिके मांही। | अनंत पाया मैने । अंतपार कछु नाहीजी। जिन ॥४॥ मिले वकिल कानूनी । पंच महाव्रतधारी। सूत्र देख मए ना कीना। तव में आरजी डारीजी। जिन०॥५॥ पांचे रति वीनू गुप्तीए । आतुं गवाह बुलावो । शील असेसर वडा धरी । उसकुं पूछकर मंगानोजी। जिन० ॥६॥ आरजी नारी चेतन तेरी। हुवा सफीना जारी। हाजर आवो जबाव खावो। लायो साबूति सारीजी। जिन० ॥७॥आई मुदा कुं। साथ गवाइमें लायाजी ॥ ८ ॥ जिनशासन नापक म दावा है चेतन जीवका । (या टर) जि. बुरु (६१) हामने नहिं भखाया इस्कुं। यह मेरे घर आया । करजा लेका हामसे खाया। ऐसा फरेव मचायाजी ॥ जिन० ॥ झुटा० ॥ विषय भोगमें रमियो चेतन । घाटा नफा नही जाना। करजदा जब लारे लागा । तब लागा पिस्तानाजी। जिन०) झुटा० ॥१० हाजर खडे गवा हमारे । पुछिये हाल ज्युं सारा । विनालि करजा चेतनसे । कैसे करै किनाराजी । जिन० ॥ झुटा० ॥१॥ चेतन कहै सत्ता वी मांहीं । सुनो शासन सिरदार । इमानदार गवा हामारे । जाणे सब संसारजी । जिन० ॥ मुगती० ॥ १२ में चेतन अनाथ प्रभुजी। करम फिरे वी भारी । जीव अ राहा चलतकुं। लुट चौरासीमें डारीजी । जिन० ॥ १३ बडे बडे पंडित इण लुटे। ऐसा दम वतलाया। धरम कहा और कराया । ऐसा करज चढायाजी। जिन ॥ १४ ॥ हिंसाम धरम बताया । तपशासे तिडीगाया । इंद्रिया सुखमें मगन करी झुटा जाल फैलायाजि । जिन०॥१५॥ ऐसा करो इनस प्रभुजी । आपील होने नही पावे । हा करसी चेतनकी हो जनम मरण मीट जावैजी । जिन० ॥ १६॥ ज्ञान दर्शन सुनसफी । दोनो को समझाया । चेतनकी डिगरी करदीनी । मोका करजा बताया जी । जिन०॥ १७॥ असल करज कर्मोका । चेतनसे ती दिलाया। सुद संजम जद करी जमान आगेका दुःख मिटाया जी । जिन० ॥ १८ ॥ आश्व छोड रको धारो। तपस्यासे चित्त लावो । जलदी करज आदा चेतन । सिधा मुगतीको जावो जी । जिन०॥ १९ ॥ सुध र जद करी जमानत । चेतन डिगरी पाइ । फागुण सुद दशमी मंगल । सन उगणीसै आठोइजी। जिनः ॥ २० ॥ इति ॥ .. जो (६५) . - महावीर प्रभुकु आर्जी. ( राग माढ) महावीर स्वामी, आंतरज्यामी, शिवगत गामी, पुरो हमारी आस । प्रणमु सिर नामी , कुमती वमी , सुमती स्वामी, पुरो हमारी आस ॥ या टेर ॥ साखी परम करम संच्या खरा म्हें । सेव्या विषय विकार । आतम दोष नवी अवधायो। गर्वसहीत गमार । बांध्या कर्म अपारी, विनंति मारी, चित्तमें धारी, पुरो इमारी आस ॥ पु०॥ महावीर० ॥१॥ साखी ॥ आयो हूं आपने आसरे रे। बाह्य गृह्यानी लाज । भमतां भवजल पार उतारो। गीरवा गरीव निवाज । ए छे आर्जी हमारी, लिजो स्वीकारी, छो उपकारी, पुरो हमारी आस । पु० महावीर० ॥२॥ साखी ॥ वीर प्रभु मुज हार हीयाना । आतमना आधार । तुम चरणांबुज वासना करी । अंतर हूंस अपार । छो विश्वाधारी, सुरत प्यारी, लिजो उगारी, पुरो हमारी आस || पु०॥ महावीर० ॥३॥ जन्मो जनम हुं दास तुमारो । वाहाला प्रभु विसवास । चंपालालजी मुनी परतापे । आरजी कालीदास । कीधी क्रोड आपारी, चित्त विचारी, ल्यो आवधारी, पुरो हमारी आस ॥ महावीर० ॥४॥ इति ॥ ॥ जिनराजकु विनंती॥ ( राग धनाश्री) विनंती धरज्यो ध्यान । जिनपती। विनंती धरज्यो ध्यान । टेर । भवसागर सुलो भमीयो । नथी सुधके सान । जिनपती विनं० ॥ १॥ मोह मायाए हमपर कीg । दुःख रछे कद वाण ० ॥२॥ हाय हजारो, कियां कुकमों । तेथी हाल - जिन० .
(६६)
॥ जिन० ॥३॥ शांतपणे नथी, कीg कदापि । भक्ति रसनु
पाल | जिन० ॥ ४ ॥ कर ग्रहो हवे, कृपा करीने । भक्तवत्सल
भगवान ॥ जिन० ॥ ५ ॥ इति ॥
॥ सुमतिनाथ प्रभुकु, आर्जी-॥
( ललीत छंद)
सुमतिनाथजी, अर्ज उच्चरूं । तुम पसायथी, पापने हरू ।
शरण एक छे, नाथ ताहरू । जिनपती तने वंदना करूं ॥ या टे
॥१॥ नरक वेदना, मे लही घणी । भव अनंतमां, जीवने
हणी । जनम मरणनी, वात सीकरूं ॥ जिनपती० ॥२
अनपराधिने, दुःख में दियां । कपट आचरी, द्रव्यने लिया
तुजविना हवे, युत किहां करूं ॥ जिनः॥३॥ अचल देवरे,
दर्शन आपज्यो । निवड पापना, ओघ कापज्यो । कर जोडी
सदा, अर्ज उचलं ॥ जिन० ॥ ४ इति ।।
| जिनराजसे विनंति ॥
( राग कल्याण)
जय जय जिनेश्वरा, तुज ईश्वरा । नन थइने नमु, सद
धराधा ॥ सा टेर ॥ विनती मांगु हुं हुं स्वामी । भवजल . ५
काज । हु अपराधी पापी पुरो। माफ करो महाराज ॥ज
जय० ॥१॥ सबुद्धी आपो सेवकने । छो स्वामी सुखकार
कुड कपट दिलमां नवी धारूं । निराधार आधार ॥ जय० ॥२
एक आसरो अंतरज्यामी । आवर नथी कोई आस । सरणे
सेवक हुँ थारो । प्रीते राखो पास ॥ जय० ॥३॥ संसा
कमाया बंधनमां । वळग्यो हुं हुं दीन । कहे पानाचंद तु
सरणे । सुख दुःख कर्माधीन ॥ जय० ॥ ४ ॥ इति ॥
।
.
(६७ ) ॥ शीतलनाथपशुसे आर्जी ।। (राग धनाश्री) तारो जगताधार । शीतल जिन तारो, जगताधार ॥ टेर । निय पायो पुण्य उदये । जरि थनसे व्योसार ।। शीलल० ॥ ॥ कामी क्रोधी, लोभी निवड्यो । जननी ठ्यो भार ॥ शी० । २॥ मोहरूपी, मायामा पडियो । थयो जुगारी ज्यार ॥ शी० १३॥ तुम वीना जीनजी, आ बालकनी । कहो कोन लेशे सार । शी० ॥ ४ माठा करमी, थयो मतिमंद । प्यार कियो परनार । शी० ॥ ५॥ पूरण पापी वनीयो म्हें आज । विक धिङ सुज भावतार ॥ शी० ॥ ६॥ बगनी पेरे, हे बहुं उगीया । बाह्य केधा नरनार ॥ शी० ॥७॥ ए सहु पापो, माफी आपो । क्षमा करी आवार ॥ शी० ॥८॥ नंदा माता, जिनका जाया । - स्थ राजकुमार ॥ शी० ॥९॥ भदलपुरमा, जनो प्रभूजी । शिव- सुभ लंछन सार ॥ शी० ॥१०॥ दोय कर जोडी, सेवक विनवे कर करुणा किरतार ॥ शी० ॥ ११ ॥ परम दयालूं, देव तुं साचो । कृपा करो इणवार ॥ शी० ॥ १२ ॥ इति । . ॥ महाबीर स्वामीको स्तवन ।। मनडो मोद्योजी। महावीर स्वामी यांने दरसन देइदोजीक । नडो मो० ॥ या टेर ॥ दसमा स्वर्णयकी चवि आव्या। प- होत्र वरस तिथी पायाजी। पूरबला पुन्यारा जोगे नाथ केवा- पाजीक । मनडो० ॥१॥ सिद्धारथ राजाजी का नंदन । असला- देवी जायाजी । तीन लोकमें रूप आनुपम । आधिको पामाजीक । मनडो० ॥ २ ॥ तीर्थकर पदवीसुं आया । ग्यान घनेरो ला- पानी । भवी जीवाका काज सुधान्यां । फेर भुगत सिधायाजीक (६८) । मनडो० ॥३॥ मनमे जो नर थ्यांवे । ओ नर सुख आनंता । पावेजी । जनम जराने मरण मिटाये । फेर गरभ नहि आवेजीक । मनडो० ॥४॥ गुरु हामारा रामरतनजी । दीयो पाप छीट- काइजी । चोट लगी निजनाम धनीकी । मारा हीरदामे : . जीक । मनडो० ॥५॥ इति ॥ उपदेशी बंजारा. यो माया जाल डमेरो इणमे नही सुखनो खेरो । टेर । का चहीये हाथी घोडो । क्यौ दुःखसे माया जोडो । क्यौ फोर तडफा तोडो॥ चाल बदल ॥ इनमें नहीं सार । जावोला हार पडेला मार । जमारो घेरो ॥ इनमे० ॥ १॥ झुटा क्यौ झग मारो । क्यौ परधन देख विच्यारो । क्यौ परस्त्रीपर चि निहारो ॥ चाल बदल ॥ थारी नही चीज ॥ व्यर्थ मत रीझ देख तजवीज । पछे नही सारो ॥ इनमे० ॥२॥ या का दीसे काची । इणमे काइ जाणो थे साची । देखोनी थोडी पा ॥ चाल बदल ॥ दया मन धार । छोडो संसार। मिले आ कार । टळे नरकनो फेरो ॥ इनमे० ॥ ३ ॥ संसार जेहर प्य लो । इणमे नही कोइ जीवेलो। कुच करणा होयसो कर ॥ चाल बदल ॥ करो मत देर । सिराने सेर। काळरो घेर उभो तैयारो ॥ इनमे० ॥ ४ ॥ संपूर्ण ॥ उपदेशी पद. एहि दुनियामें कछु नही बावा । क्यों तुं दिवाना बनता बकरी माफक हरघडी मेरा २ क्यों तुं करता है || महेल खजा कछु नही तेरा । कबुना कबु व्हां जाना है ॥ लख चौऱ्यां गोते खाकर । ए तुज नर तनु पाया है । ए नही गमाना खा ।
, (६९) ने । सावध होना आछा है । जाया जनीता पुत भतीजा । तो सव कुच तीत रहै । दास गणु कहे राम दयाधन । आराम वाला दाता है ॥ इति ॥ मराठीभाषेत जिनराजप्रभूस विनंति. ( राग धनाश्री) विनंती परिसावी । जिनपती विनंती, परिसावी ॥ धृपद ॥ वसागरी या भुललों भ्रमतों । चक्र. रथा जैवी ॥ जिन० ॥१ या ममता लोभ अहंता । विलया प्रति नेई ॥ जिन० ॥ २ ॥ य हजारों पापे केलीं। पार न त्या कांहीं ॥ जिन० ॥३॥ त मनें नच, ध्यान तुझे । कधीं केलें नाहीं ॥ जिन० ॥ ४ ॥ क्तवत्सल, हेच मागतसे । जन्ममरण चुकवी ॥ जिनपती ॥ १५॥ इति ॥ मराठी भाषेत समवसरण- चाल ( लग्नाला जातों मी द्वारकापुरी) ऐकियले नाम तुझें वंद्य भूवरी । समवसरण पाहुं चला, ति ती वरी ॥ धृ०॥ उत्सव वहु थोर होत, सुरनर मुनि कॉर्च येत , शोभिवंत बहुत दिसत , विपुल तो गिरी । ऐकियले० । १॥ सकल जनानंद कंद, तोडि जन्ममरण बंध, शांत कांत क्तिकांत । पाहिल्यावरी । ऐकियलें ॥ २॥ भवजलनिधि आरण्यास, विनवी प्रभु वालदास, हेची आस तोडि फास, कल झडकरी। ऐकियले० ॥३॥ इति ॥ उपदेशी पद. ( भाभी कैसे पकाये ए देशी.) भैया कैसे गमाते उत्तम जनम । टेर । पीर भवानी पत्थ -- (७०) पूजो, करते हिंसा अजाण । संत ज्ञानी धरी । करते द्वेप गुमान । भ० । कंद मूल अभक्षकों खादी पावा अनगल पाणी। खोटा धंदा गणिकी निंदा, एन चित ठाणी । भ० ॥ २॥ नाटक जूवा वेश्या कूसने, रात गमाते । दया समाई मुनि दरशन गुण, करता शरमाते। भ० ॥ ३॥ गाल्या गांवे खाने खेले, फाग हो स्वार । मात तात गुरु जातल जावे, लाजे नहीं गीवार भ० ॥ ४ ॥ धन ज्योवनके मदमे फसके, अमोल सीख । माने । तो फिर रोवे उरशिर कुटी, पेली समजावू थाने । । ॥ ५ ॥ इति ॥ -- उपदेशी पद. (वता दे सखी) ए देशी. वता दे भया, इस जगमें तेरा कोण । टेर। देहसे करे क्यो व्यर्थ । नर हे कीया जादू टोन । व० ॥ १॥ दौलत कुछ काम न आता पुण्य खूटे जावे ज्यूं पोन । व० २॥ स्वजन सवी स्वार्थके हे। जी जी करे धन होन । ३० ३॥ क्षमा दया दान, ए धर्म तेरा। ले ले अमोल जोन । ब० ॥ ४ ॥ इति ॥ पद- ( कर ले मली जिनका ध्यान ) ए देशी. चेतन तूं तो हुवा वैमान । न राहा तेरा तुझे कुछ भान टेर । गर्भवासमे कोल कीया था। दो सुख शुज भगवान । वा आके फसा मायामें। लेन देन खान पान । चे० ॥ २ ॥ वेगारी धन जोरूका । धंधेमें हुवा हेरान । मेरा २ करता की जर जोरू जमी मकान । चे० ॥२॥ जिस प्रतापसे तूं
(७१)
न करे उस्की पेछान । हरामखोर खजाना . पूनका ।
तो नाहाक खूरदान । चे० ॥ ३ ॥ जाते २ भजले साहेबकू ।
सुकृत धर्मदान । तो आगेकू सुख पायगा । अमोलख रिख
न । चे० ॥ ४ ॥ इति
पद-(देशी येही.)
चेतन तूं तो हुवा नादान, करतां नही जरा पैछान । टेर।
कृपना हस खेल गमाया, ज्यो बने खान पान ॥ बूढा हुवा
हत घटी तनकी, पडा खाटके म्यान । चे० ॥ १॥ कुटुंब
ला धन लेवनकों, बोले मीठी जबान । माल खोस तुज
विनाके, जला देवे स्मशान । चे० ॥२॥ अतिउत्तम ए
तन पायां, कर ले धर्म पैछान । निरलोभी गुरूके चरण
को, ज्यों मिले आत्मज्ञान । चे० ॥ ३ ॥ छोड नादानि
जा इमानी, ज्यों चहीये सुख निधान । छोडदे दुकृत, करले
कत, मान आमोलकी बान । चे० ॥ ४ ॥ इति ॥
॥ जीव कायाका सवाल. ॥
(चाल बिनजारा)
यो काया कहे कर जोडी । मत जावो नाथ मुज छोडी । टेर।
पीत करी सुज पाली। माल खवाइ चढाई लालीजी। तुम
थे सेजपे पोडी। मत० ॥ १॥ करी माणथकी मुज प्यारी।
नहीं रही क्षणभर न्यारीजी। वणी खुप मजेकी जोडी ।
० ॥ २ ॥ तुल प्रीतम मे तुह्मारी प्यारी। तुम फुल मै गुल
रीजी। कदी आज्ञा तुमारी नही मोडी । मत० ॥ ३ ॥ कुछ
हा मेरे वतावो । विना गुन्हे छोड क्यों जावोजी । या ,
भावे दातोडी । मत. ॥ ४ ॥ तुम गया पुजे दुःख ।
(७२) सब सज्जन मीलके रोसेजी। मुज लेनासे ओडा पछोडी। . ॥ ५॥ अग्निके माय जलासे । न जाणे काग कुत्ता खासेन हो जासे छीनमे राखोडी । मत० ॥६॥ चेतन इणपरे । एह अनादी रीत चली आवेजी। जुनी रीत न जावे तो मत० ॥ ७॥ तूं बदल गइ मुजसे ह्यांइ । एह कांहांसे बुर लाइजी। रोग सोग करी घणी खोडी। मत० ॥ ८ ॥ मीले अविचल काया । हामे तैसाही करसा उपाया जी । आयोलिकरिखकी हे होडी। मत० ॥ ९ ॥ इति ॥ ॥ लावणी तत्व पेछाण.॥ जैनधर्म जीस मीला हे प्यारे, और धर्मकुं क्या कर श्रावक कर्म पैछान लीया फिर, और कर्मकू क्या करणा॥ देव तीर्थकर जानलिया फिर, और देवकों क्या करणा।। गुरूकी सेव मीली फीर, और सेवकों क्या करणा । निरव पेछान लिया फिर, और पेछानकों क्या करणा । ज्योतीस जान लीया फीर, और जानके क्या करणा । दील जी नर्म हुवा फिर, और नर्मकों क्या करना ॥ श्रा० ॥१॥ साधन जीनने किया फिर, और साधनकों क्या करणा। वचन आराध लिया फिर, और आराधन क्या करणा। सागरकों पायगये फिर, डावर डोयके क्या करणा। सो हो गुजरी, फिर उस्ळू रोयके क्या करणा । शिवमंदिर परम मीला फिर, और परमकों क्या करणा ॥ श्रा० । अनुभव अमृत भोजन मीला फिर, भोग जहेरकों क्या कर ज्ञान लहेरमे चित्त लगा फिर, विषय लहेरकों क्या कर जोगाश्रम जिन धारण फिर, रसना स्वादकों क्या करणा। , -- ~ . I. लगारा । तूं० ॥१॥ जोवन वय जद आइ। तुज लार सुदर लगाजी। तूं राच्यो विषय मझारा। तूं० ॥२॥फिर लो (७३) कविला छोड दीया फिर, उन्की यादकों क्या करणा । सिरपेर जिन नंगे किये फिर, लोक शरमकों क्या करणा ॥ श्रा० ॥ ३ ॥ पुण्य संचके जो लाया फिर, धन संचके क्या करणा । पक्षपात जब छोड दीया, तब बात खेच. क्या फरणा । वैभव अशाश्वत जाण लिया फिर, उसमें राचकर क्या करणा । रिख अमोलक श्रम सफल किया फिर, और भयकों क्या करणा ril श्रा० ॥ ४ ॥ इति ॥ । उपदेशी बंजारा॥ 'करो धरम तपशा भारी । जीउ लागे करमने कारी ।। टेरे ॥ पारो बरस वरस इंउ जाचे । थारो दीन दीन नेडो आवेजी। | कोइ काल करेगा पुकारी ।। जीउं० ॥ १॥ कोइ मनमें निश्चय शराखो। कोइ लोभ परोथे न्हाकोजी। जीनीसु भली होयगा गा थारी । जीउं० ॥ २ ॥ ए मातपीता सुत भाइ । थारे संग नही चलसी कोइजी । तुं करणी जासी थारी । जीउं० ॥३॥ तुं त्य मत गुथेना खोटा । तने जम मारेला सोटाजी। तने देसे महादुःख भारी । जीउं० ॥ ४॥ ब्राह्मण रामकिसनका कहेना । कोइ झुटा लेनादेना जी । परनार महा दुःखकारी । जीउं० ॥५॥ उमर (आयुष्य) रूप इंद्रजालका ख्याल. ( रागबंजारा.) तूं देख तयाराा थारा । जग इंद्रजाल पसारा । टेर । बाल- पणे खेले बजारा । रमतके केइ प्रकारा जी। फीकर न का दाय न आये । जा दूजानी येउ सारे जी । यौं भ्रष्ट करे Vir ཨཱ་ - (७१) तूं० ॥३॥ नित रंग्यो चंग्यो रेवे । केनी सीख हीरदे देवे जी। फिर बदीयो बहु परिवारा। तूं० ॥ ४॥ अव प्रपंचके मांही । करे केइकी व्याव सगाई जी । वण्यो सकल र तिणवारा । तूं० ॥५॥ इम ढळवा लागी जवानी । जीउंसर ताको पाणी जी। फिर वाजण लगा मतारा । तूं० ॥ ६ सिरपे सपेती छाइ । दांतनकी गइ दृढताइ जी। छुटी नेत्र नाकयी धारा । तूं० ॥७॥ अंग रंगी बेरंगी थावे । चाल्यो वेढ्यो नहि जावे जी । जव कालका वज्यां नगारा । तूं० ॥ ८ ॥ कुटुंब मीली तिहां आवे । रोवत स्मशानज लावे जी। गया हंस एकीड विचारा । तूं० ॥ ९॥ इम जगकी रचना जाइ । साच कह्यो होइ जी । पेठ मीरजगांव मझारा । तूं० ॥ १०॥ उगणीसे सता वन साले । जेठ दुवादशी बुधवारे जी। रिखअमोलक गावन- हारा । तूं० ॥११॥ इति । धन्ना मुनीको स्तवन श्रेणीक पुछे विरजी भाखे, उत्तम मुनिवर सारा तज है तरतम जोगे, अधिक धन्नो अनगारा । धना मुनि धन मानव भव पायो, श्री मुख यूं फरमायो। टेर ॥१॥श्रेणिक राजा आतमहित काजा । धन्ना मुनिपे आवे, शीश नमावे मुख गुण गावे; जोता तृप्ती न थावे, । ध० ॥१॥ नार बत्तिसे अप्सरा सरखी, धन्न वत्तिसे कोडो । संसारने पुठ दीवी मुनि रजी, शिवपुरसामा दोडो । ध० ॥३॥ निरंतर तप बेले वेले, पारणो उज्झित आहारो। वणि मगकाग स्वान नही वछै, किम तुम कंठ उतारो । ध० ॥ ४ ॥ वारई कीस जल माही धोई; ते अन्न खाइ जल पीयो; ऐसो तप सुणी उर कंपे, धन्य धन्य थारो जीयो । ध० ॥५॥ चवदे हाजार मुनिसर माहे , रजमें .. आपने २२ ३ ९ १४ २० ૨ ८ 1 वासुपुज्य शीतल श्रेयांस । कुंथु पार्श्व अभिनंदन भाण । श्री- जिन० ॥ ४ ॥ इणि परें जिनवर संभारीय, दुःख दारिय विघ्न निवारीये । पंचवीशे पांसठ परिमाण । श्रीजिन० ॥५॥इम (७५) वखाण्यां; दर्शन आपको पुण्यवन्त पावे, मै पीण आज छाण्यां । ध० ॥ ६॥ नवमांसे सुद्ध संजम पाळी, सर्वार्थसिद्धि वे: रामचन्द्र कहे ऐसे मुनिवरजी, क्यूं नहीं मुक्ति सिधावे । । ॥ ७॥ इति. पांसठीया यंत्रको छंद १५ १६ ૨૨ २५ श्री नेमीश्वर संभव शाम, सुवीधी धर्म शांति अभिराम ।। अनंत सुव्रत नमिनाथ सुजाण । श्रीजिनवर मुज करो कल्याण ॥१॥ टेर । अजितनाथ चंद्रप्रभ धीर, आदीश्वर सुपार्थ गंभीर । विमलनाथ विमल जगभाण ॥ श्रीजिन० ॥ २॥ मल्लि- नाथ जिन मंगलरूप, पंचविश धनुष सुंदर स्वरूप । श्रीअरनाथ नमू वर्द्धमान । श्रीजिन० ॥३॥ सुमति पद्मप्रभ अवतंस, १ १ ९ १८ २४ ६ १२ १० २३ ४
( ७६ )
दुःख न आवे कदा, मित पारो जो राखो सदा । धरिये पंचतणु
मन ध्यान | श्रीजिन० ॥६॥ श्रीजिनवर नामे बंछित मळ ।
गनवंछित सहु आशा फळे । धर्मसिंह मुनि नाम निधान । श्री-
जिन० ॥ ७ ॥ इति ।।
।। श्रीशांतिनाथप्रभुको छंदः ॥
सारद भाय नमुं शिर नामी, हुँ गुण गाउ त्रिभुवनके स्वामी
शांति शांति जपे सब कोइ । ते घर शांति सदा सुख होइ ॥ १
शांति जपीने की काम । सोही काम होवे अभिराम | शां
परदेश सिधावे । ते कुसळे कमा लेइ आये। ते कुसळे कमळ
लेई आवे ॥२॥ गर्भयकी प्रभु मारि निवारी। शांतिजी ना
दीयो हितकारी। जे नर शांति तणा गुण गांवे । ऋद्धि अचित
ते नर पावे ॥ ३ ॥ जे नरवं प्रभु शांति सहाइ । ते नरा का
आरती भाइ । जे कळू बंछे सोही पुरे । दुःख दारिद्य मिथ्य
मत चुरे ॥ ४॥ अलख निरंजन ज्योत प्रकाशी, घट घ
आंतरके प्रवासी । स्वामि सरूप कहो नही जावे, कहेता मु
मन आश्चर्यज थावे ॥ ५ ॥ डाल दीया सवहीं हाथियारा, जी
मोह तणा दल सारा । नारी तजी शीव सुरंग राच्यो, राज
ज्यो पीण साहेब साचो ॥६॥ महा बलवंत कहीजे देवा, व
यरकू थुन एक हाणेवा । ऋद्धि सवळ प्रभुपास लहीजे। भि
आहारी नाम कहीजे ॥ ७॥ निंदक पूजककुं समभायक । प
सेवककु सदा सुखदायक । त्यजी परिग्रह हुवा जगनायक, न
अतिथि सवे सिध्दिलायक ॥ ८॥ शव मित्र समचित्त गणी
नाम देव अरिहंत भणीजे । सकल जीव हितवंत कहीजे, से
जानि माहापद दीजे ॥ ९॥ सायर जैसा होत गंभीरा, दू
An
(७७) माहे शरीरा, मेरु अचळ जिम अंतरजापी, पण न रहे हण ठामी ॥ १०॥ लोक कहे जिनजी सव देखे, पण र कबहु न पेखे। रीसबिना वावीस परीसा; सेना ते जगदीसा ॥ ११॥ मान विना जग आ नमनाइ । विना शिवसुं लंए लाइ । लोभ विना गुण राशि गृहीजे, भये त्रिगडोसे विजे ॥ १२ ॥ निग्रंथपणे शिर छत्र धरावे, पति पण चमर ढळावे | अभयदान दाता सुख कारण, कचक्र चले अरिदारण ॥ १३॥ श्रीजिनराज दयाळ भ- कर्म सर्वको मूळ खणीजे । चउविह संघ तिरथ थापे, पणी देखै नवि आपे ॥ १४ ॥ विनयवंत भगवंत कहावे, कीसीकु सीस नमावे। अकंचनको विरुद धरावे, पण न पदपंकज ठावे ॥ १५॥ राग नही पण सेवक तारे, द्वेष । निगुणा संग वारे, वजी आरंभ निज आतम ध्यावे । शिव- गीको साथ चलावे ॥ १६ ॥ तेरो महिमा अद्भुत कहिये, सारो पार न लहीये । तुं प्रभु समरथ साहेव मेरा, हुँ नाहन सेवक तेरा ।। १७ ॥ तुं रे निलोकतणा प्रति पाला, हुं अनाथ मे तूंछे दयाला।तुं शरणागत राखण धीरा, तुं प्रभु ता- छ चडवीरा ॥ १८ ॥ तूं ही समोवड भाग जपायो, तो मेरो रिज चडीयो सवायो। कर जोडी प्रभु विनउं तोसुं, करो कृपा निवरजी मोसु ॥ १९॥ जनम मरणना भय निवारो, भवसाग- थी पार उतारो। श्री हस्तिनापुर मंडण साहे, त्यां श्रीशांति दा मन मोहे ॥ २०॥ पद्मसागर गुरूराज पसाया, श्री गुण गर कहे मन भाया । जे नरनारी एकचित्त गावे, ते मन छित निश्चय पावे ॥ २१ ।। इति ।। . - ..
आप, काटो प्रभुजी मारां पाप ॥ ११ ॥ मुज मनचिंतित करि
काज, राखो प्रभुजी मारी लाज । तुमसम जगमांहि नहि कोय
श्री शांतिनाथ स्वामीको छंद.
शांतिनाथको किजे जाप, क्रोड भवारा काटे पाप ।
नाथजी मोटा देव, सुरनर सारे जेहनी सेव ॥ १ ॥ दुःख
दर ज.वे दूर, सुख संपति पावे भरपूर। ठग फांसीगर
भाग, वळती सीतळ होवे आग ॥ २॥ राजलोकमां महेमा
शांति जिनेश्वर माथे धणी। जो ध्यावे प्रभजीरो ध्यान,
देवे अधिको मान ॥ ३ ॥ गड गुंबड पीडा मिट जाय,
दुशमन लागे पाय । सघळो भाग्यो मनको भरम, पाम्या का
काट्या करम ॥ ४॥ मुणो प्रभु गोरी आरदास, हुं सेवक
पूरो आस । मुज मनचितित कारज करो, चिंता अरति है
हारो ॥ ५॥ मेटो झारा आळ जंजाळ, प्रभु मुजने तुंर
निहाळ । आपनी किति ठामो ठाम, सुधारो प्रभू मारा।
॥६॥ जो प्रभुजीने नित नित स्टे, मोती बंधा फुला
चेप लावण दोनु जळ जाय, विन औषध कट जावे छाय ॥
शांति नामसे आखा निर्मळ थाय, जाळो दुट पडळ कट जार
कमळो पीळो झडझड झरे, शांति जिनेश्वर साता करें ॥ ८
गरमी व्याधी मिटाचे रोग, सयण मित्रको मिळ्यो संयोग
एहवो देव न दीसे ओर, नहि चाले दुश्मनको जोर ॥ ९
लूंटारा सब जावे नास, दुर्जन फीटी होवे दास। शांतिनाथनी की
यणी, कृपा करो तुमे त्रिभवनके धणी ॥ १०॥ आरज करूं
जोडी हाथ, आपशुं नहि कोई छानी बात । देखि रह्या छो पो
तुम भजवाथी साता होय ॥ १२ ॥ तुम पास चले नहि मर
रोग, ताव तेजरो न्हाको तोड। मारि मिटाइ कीधी प्रभु
संव
(७९) , रेव्योवनमें मद माता रे । मुढ काल नही ज्याने वातो रे । पयां रंगरस मांहे रातो रे ॥ मा० ॥६॥ सिरे दोय २ नुररा केरे। थारी देह अनुपम आप रे । पीण थारापर जर का ॥मा०॥७॥ उंचा महेल चुनाया अतभारी. तारी छव न्यारी रे। आई काळ तनी आसवारी गुणाको नहि आवे अंत ॥ १३ ॥ तुमने समरे साधु सती । समरे जोगी जती । काटो संकट राखो मान, अविचलपदन थान ॥ १४ ॥ सवा आठारे चोराणु जाण, देश माळचो क वखाण । शहेर जावरो चैत्र मास, हुँ प्रभु तुम चरणाको ॥ १५ ॥ ऋषि रूगनाथजी कीधो छंद, काटो प्रभुजी फंद । हु जोउ प्रभुजीकी वाट, मुज अरति चिंता सवी ॥ १६ ॥ इति ॥ मानव डरको स्तवन- मानव डर रे २ । लख चौयांसिमे घरहे रे। मानव डर रे। तो लख चोखांसिमे भमीयोरे । तुं तो जनम जनम करी यो । तेरो कारज कछं नही सरोयो रे ॥ मान० ॥१॥ मांस उदरमांही रह्यो रे । मलमूत्र तणो दुःख सह्यो रे । नागके हाथ हुलरायो रे ॥ मा० ॥२॥ जिहां नव नवा माया रे । तिहां बाजा बहोत बजाया रे । सहुंके मन कदमाह्या रे ॥ मा० ॥३॥ पुत्र जतन करीने पाळ्यो रे । णी काढण लागो गाळी रे॥ दुनिया हासी हासी दे दे टाळी ॥ मा० ४ ॥ कंवर मोडीने मारण चाले रे । मुछा मरोडीने हेवळ घाले रे । पिण काळमुं जोर नही चाले रे ॥ मा० ॥५॥ ॥ ही यो करीयो ने यो करशु रे । भंडार* (८०) भरशु रे । मूढ युं नहीं जाने आव मरशु रे ॥ मा० ॥ ९ मेहल पिलंगपर पोडे रे । तिहं दोय दोग दीपक जोया रे। रमा रंग मांही मोयो रे ।। मा० ॥१०॥ तुं जान घर मारा रेनिम संग नहीं चालसी थारे रे । थारी वारीने करदेसी छान र म मा० ॥ ११ ॥ इम जाणीने मुझत कराए रे । संजीव.. तरीए रे । इस आतम कारज करीए रे ॥ मा० ? आम रायचंदजी इम बोले रे । दया धर्मसमो नही तोले रे । लोकमांही आमोले रे । मा० ॥ १३ ॥ इति । गुरु उपदेश स्तवन- गुरूजीने ग्यान दीयो भारी रे। महाराजजीने ग्या भारी। यो संसार असार छोडने, संजम मुखकारी ओछो रे आउखो घटतो घटतो। छीन छीनमें जावे । मनुष्य जमारो, फेर नही पाये । गु० । म० ॥ १ ॥ काया काची माया, काचो संसारो। आल्प सुखारे काइ, जनम मतिहारो । गु० ॥ २ ॥ चार दीनाको चटक देखी मत भुलो। तन धन ज्योवन कारमोस काइ मत फुलो । गु० ॥३॥ चमत्कार हे विजलि जैसो, २६ कांचो। चेतना होय तो चेतजो सकाइ। धरम बा। गु० ॥४॥ समत उगणीसे साल छतीसे, काहान श्रीरत्नचंदजी महाराज प्रसादे, हीरालाल गाया हो ।::!!" टे । - ५ रिखमदेवजीको पारणो. घडा एकसो आठ सीमन, रस भरीयो छ नि । भावसुं दान वेहेरायो, मांड दीयो पोखो ॥ १॥ ए मा गलगे, थोडे जैन धरम धारी य० ॥ २ ॥ पांच देखावा पारगा, कायर सायु सो ढीले पडन, हिंसा धर्म, --- , मै खोटा जीना, लोक मानेगा अधिकाइ । दया धरयार (८१) 1, आदिजिनेश्वर किनो पारणो। टेर। देव दुंदुभी वाज सोनइ यारी बिरखा। बारे मांससु कियो पारणो, गइ तिरखा । ए मारी ॥ २॥ ऋद्धिद्धिन मनोकामना, : मंगलाचार । दुनिया हारख वधामणो ज कांई, आखा बार । ए मा० ॥३॥ चिंता चुरण विघ्न निवारण, पूरो आस, सेवक कहे ह्यारी आरज सुण जो, अपभदेव न । ए मा० ॥४॥ दान शीयल तप भावना ज काइ, मारग च्यार। कर्म खपायने मुक्ति गया सकाइ, पछे जयजयकार । ए मा० ॥ ५ ॥ इति ॥ सोळे सुपनाकी लावणी आगडदम २ बाजे चोघडा. ए देशी. पवृक्षकी साखा तुटी, अर्थ सुणो एह सुपनेका। अब जो विगा कोइ । संजन वो नही लेनेका। दुजे अस्त भया सूर्य 1, भेद सुणो अब इसका सही । पंचम आरे जन्म लिया कुं केवल ग्यान नही । नहीं मनपर जब अवधी पुरण, ए र भयारी । भद्रबाहु मुनि कहे भूपमुं, पंचम आरो दुःख- टेर ॥१॥ चांद देखा तुम चालणी जैसा, तिसरे सुपनाके । अलग अलग समाचारी होगगी, वोल फरक कछु दरसाइ भूतणी नाचत हीलमील, देखा चौथे सुपने मांही । देव र, वारे फणकर फूंकारे। कितेक साल पिछे काल रिसलग भयंकारे । उत्तम साधु कर मंधारा, - (८४) - राजिंद, ऐसि रीत कर जावेगा । आरथ मुणी शोले रखप राजा गया हह व्रत धारी। भ०॥१४॥ समत उग सालसें तिसका, फागण वदी इग्यारस आइ । तिलोकरीख स्वम लावनी, माप कडा बनाइ ॥ पंच आरो दुःख ज दुःख है इणगे अधिकांइ । धर्मध्यान और समता राखे, सुख समजो भाइ। ऐसो जानके कर सुकृत, उतरोगे भा पारी भ०॥ १५ ॥ इति ॥ सात व्यसनको त्याग. (ख्यालकी देसी) संसारी लोको, सातु व्यसन छोडो भावसुं। सं०॥ जुवा खेलण मांस मद्य और, वेश्या व्यसन शिकार; चोरी रमणीको रमवो, सातूं व्यसन निवार हो । सं० ॥१॥ खेलिया पांडवा सरे, मंस भख्यो बकराय; मदीरा पीवी सरे, जड्यां झुलसें जाय हो। स० ॥२॥ चारुदत्त सेवी, ब्रह्मदत्त आखेट; सत्यघोप परधनके कारण, नरका थेट हो। स० ॥३॥ रावण राजा बडो अभिभ तीन खंडको स्वामी, रामचंद्रकी सीता हारता, भयो नई गामी हो । सं० ॥४॥ सात व्यसन ए छोडदो सरे, है । दुखकार; रामचंद्रकी आही सीख है, सातूं व्यसन हो । सं० ॥५॥ इति ॥ गुरुदर्शण विनंति. " सुल मत जावोजी गुरू ह्याने विछड मत जाजोजी माने। ले आरज कराछा थाने । भुल मत जा० । टेर।। प्रेम हीयासे जडीया, प्रगट कहुं क्या छाने । जो मुजमें ..
को द्रव्य ही। सारो, करूं भेट तो थोडा । दर्शन करने के र स्वामि, खडे खडे सब झाक; समरथ नहीं कोई न स, वाह पकड गुरू राखेजी || गु० ॥ २॥ अंधत्व (८५) करम दोष गुरुं माने । भु० ॥ १॥ भवसागर जलसे । जीव तीरण नहीं जाने। जीरण नाव जोजरी डुवे। से गुरु हाने । भु० ॥२॥ मे चाकरमे चूक पडी तो। वगुण नहीं माने । मे वालक गुना किया बहु तेरा, पिता इम जाने । शु० ॥ ३ ॥ मेरी दोड जिहांलग सद्गुरूजी, र चरणामे। भेरूलाल कर जोड विनवे । धन धन हे । सु० ॥ ४॥ इति धरमको सरणाको स्तवन जिनराज सरणो धरमको । आहो जिनराज, सरणो को। सरणो धरमकोने चालगो भुगतको । टेर । संसार रावस्था, निरतरसना भोरे भरमको । श्री० । आ०॥१॥ दोय मगर मोटका । पाने पडीया गल जावे रे उननको। आ० ॥ ३ ॥ भवजीव प्राणी बेठारे आनी । सद्गुरुं या नाव खेवणको । श्री० । आ०॥ ४॥ कहे हीरालाल भित्रमाणी। चालो रे मुगतमें गम आनंदको । सि०। आ०५ गुरुदर्शन स्तवन देशी ख्यालकी. गुरु देव हामारा, थाका दर्शनकी म्हारे भावना; सुणो की सहेल्या, तन धन वारूरे करसु वधावणा ॥टेर ॥
" जन ७॥ सुत आपनो वेचे पितां, मामारे जेहर खीलाएलह। ७- || का नेत्र दीये ओर, अपूज्यकू पूज्य बनाए; पशुत्व टारी जन्म सुध नरपंक्तिमें लाये जी ॥ गु० ॥३॥ भवभवमें मुझ सद्गुरू से दीजो वर प्रभु मांगू; मुनिराम कहे गुरु दर्शन दीजो, लुल चरणे लागुजी ॥ गु०॥ ४ ॥ इति । के कायाको स्तवन पृथ्वी एक कणुं कणामे , जीव कह्या जिनराज । पारेवा, काया करे तो, जंबूद्वीप न मांय ॥ १॥ चतुर नर विच्यारोरेक । ग्यानी जतन करो छेकाए । टेर । डाभ जलबुंदमें रे, जीव कह्या जिनराज ; भमरासम काया करे जंबूद्वीप न माय ॥ चतुर० ॥२॥ तेउ एक तिउं विर जीव कया जिनराज, सरसुसमकाया करे तो, जंबद्वीप नो च० ॥ ३ ॥ वायु एक झवुकडामे, जीव कह्या जिनराज ; चा समकाया करे तो, जंबुद्वीप न मांय । च० ॥४॥ तिमे जानजो, तीन भेद कह्या जीनराज; कंद मूलमें अनी काइ अनंता अनंता कहेवाय । च० ॥ ५ ॥ तरस थावर करे, साधु श्रावक नाम धराए; राजा लुटे रे तने तो, पुकारू जाय । च०॥६॥ अमृतसुं जीतबघटेने, जलर लाए, साधु होइने जीव हाणेतो, चोडे भुल्यो जाय । क उन आहे भके जीम कागडी, तिनकू कोन उपाय । च० ॥ ८ ॥ धसे पातालमे रे, समुंदर कार लोपायः झाज डुबोबे जिन साद हाने छे काय । च० ॥ ९॥ पणवणा करो, जिन गम साख सुनाय, बहु सुत्री दृष्टांतमें कांइ, कृसिल्यो कहाँ, जाय । च० ॥ १० ॥ इति ॥
+ . सहेना, करणो उन विहार । वाळु कवळमुख मांही मेल्यो, नही लिगार || क० ॥४॥ हेतु गटांत अनेक लगाया, नही कुमार। हीरालाल कहे रस संजमको, चढीयो हीरदे घर पडिकमणो भावगुं, दोय बडी शुभ ध्यान.. भन जातां जीवन, संवल साचं जाण ॥ (१७) उपदेशी पद. (बता दे सखी) ए देशी. दे भया, इस जगतमें तेरा कोन । या टेर ॥ देह सनेह व्यर्थ । न रहे किया जादू टोन । ब० ॥१॥ धन कुछ काम न आता, पुण्य खुटे जावे जूंपोन । ब० ॥ २ सबी स्वार्थके है। जी जी करे धन होन । व०॥ क्षमा दया दान ए धर्म तेरा । ले ले आमोल सुख जोन । ४॥ इति ॥ मुनिमार्ग कठिन, स्तवन, रा साध तणो आचार । योतो चालनो खांडाधार । हगिरि उठानो मस्तक, पीनी आगनकि झाला । मेणका चणा चावना, सेज नही तीण वार ॥ कवरा० ॥१॥ करीने सायर तिरनो, जानो पेले पार । सनमुख उपर दुक्कर गंगा धार ॥ क० ॥२॥ दोदस उपर दोए सहेना दुकर कार । अमर भीक्षाके कारणेस कांई, उंच निच घर द्वार ॥ क० ॥३॥ सित उसण विरखा ॥ क० ॥ इति ॥ सामायिक लाभकी संझाय- कर पडिकमणुं भावशुं ॥ देर ॥ श्रीवीर मुख इम उचरे, श्रे। राय मते जाण ॥ ला० ॥ लाख खांडी सोनातणी, दीये प्रते दान | ला०॥ क० ॥ २॥ लाख वरस लगे ते । एम दीये द्रव्य अपार ॥ लाल रे ॥ एक सामायिकना तोले आवे तेह लगार ।। ला० ॥ क० ॥३॥ सामायिक चउविर भळे वंदन दोएवार ॥ ला० ॥ व्रत संभाळोरे आपणो, ते कर्म निवार ॥ ला० ॥क० ॥ ४ ॥ कर काउस्सग सुभ नथी, पञ्चखाण शुध विचार ।। ला० ॥ दोए सझायते । टाळो राळो अतीचार ॥ ला०॥क० ॥ ५ ॥ श्रीसामायिक : थी, लहिये अमर विमान । ला० ॥ धमसिंहमुनि एम भणे छ मुक्ति निधान ॥ ला० ॥ क० ॥ ६॥ इति । 7 प्रसन्नचंद्र राजऋषीको स्तवन- प्रणमुं तुमारा पाय । तुमे मोटा रीखराय। प्रसन्नचंद्र । तुमारा पाय । टेर। राज छोडी रळीयाम[रे, जानी : संसार । वैरागे मन वाळीयोरे, लीधो संजम भार । प्रसन० स्मशाने काउस्सग्ग रहीरे, पग उपर पग चढाय । वाहाडे, करीरे, सुरजसामी दृष्टि लगाय । प्र० ॥ २ ॥ दुर्मुख दूत सुणीरे, कोप चढ्यो ततकाळ । मनशुं संग्राम मांडीयोरे, पडयो अंग 51.३॥ श्रेणीक.प्रश्न पुछे तदारे, स भए । गाव 1 * ॥ ४ ॥ क्षभर सार, र दुर 1511 ar यी केवल ज्ञान ॥५॥ प्रसन्नचंदऋषी मुगते गयारे, श्रीमहावीरना शी विव कहे धन्यधन्य, दीठा हे आज प्रत्यक्ष । प्र०॥६ (८९) उपदेशी लावणी रुकी शीख हिय धरनारे ॥ सु०॥ अमरापुरको पंथ श्रीजैनधर्म करना ॥ टेर ॥ परम परमारथ थे टाब्योरे ॥ ॥ सार जगतमें जैनधर्म, जुगतिसे नही पाळ्यो। नाम नही लीनो रे॥ प्र० ॥ महा हलाहल विषय विकट, मतसें भीनो। चेतन युं वहुविध दुःख पावे रे ॥०॥ लालचके माये, पांच इंद्रीयके सुख चावे । जीव अब री हारनारे ॥ जी०॥ अमरा० ॥ १॥ दया चेतनकु री रे ।। द०॥ श्रीजिनराज परूप्यो जैसी केसरकी क्यारी तमें तीरथ है च्यारी रे ॥ ज० ॥ साधु साधवी श्रावक का, हुआं व्रतधारी। इनकू कहीए ब्रह्मचारीरे ॥ ३० ॥ संयम सार करीने, कर्म हाण्या भारी। इनोने मेव्या भरणारे ॥ इ० ॥ अम० ॥२॥ पंच इंद्रीयसें लपटायोरे॥ दुःख अनंता सह्यारे बहुलां, पाणी पस्तायो । बहु में भमी आयोरे ॥ व०॥ शुभ मंत्र नवकार सार, दुर्लभ [ पायो । मेरो मन जिनवरसु भायो रे । मे० ॥ कुगुरूको ग अशुभ, मिथ्यामत छीटकायो। इणविध भवजलसे रे ॥ इ० ॥ अ० ॥ ३ ॥ रहो जिनवाणीमें रातारे ॥ । अनंत सुखकी खाण, सदा शिव मंगलके दाता। सदा र भक्ति करजो रे ॥ स० ॥ चित्त धारी हीयामें भवि तुम, परीहारजो। अल्प जिनवरका गुण गाया रे ॥ अ० कर जिनदास कहे, जिनभक्तिसे हाया। सदा मे चाई बरणार ॥ स० ॥ अम० ॥४॥ इति ॥ - -- . सीगंधरजीनु स्तवन- सुणो चंदाजी. सीमंधर परमातम पासे जायजो, विनतडी. प्रेमधरीने इणपरे तुमे संभळावजो । टेर । जे त्रा वननो नायक छ, जस चोराट इंदर पायक छे, नाण सण जेहने खायक छ । सुणो० ॥ १ ॥ जेनी कंचनवरणी क छ, जस धोरी लंछन पाया छ, पुंदरगारि नगरीनो राया सुणो० ॥२॥ वार पर्पदामांहि विराजे छ, जस चो अतिशय छाजे छ, गुण पांत्रीश वाणीये गाजे छ। सुर ॥३॥ भवि जनने ते प्रति बोधे छे, तुम अधिक शीतल सोहे छ, रूप देखी भविजन मोव्हे छ । सु० ॥४॥ तुम करवा रसीयो छु, पण भरत क्षेत्रमें वसीयो छु, महा मोहन पकर फसियो छु, । सुणो० ॥५॥ पण साहिब निर्व धरीयो छे, तुम आण खडगकर गृहीयो छे, पण काइक गुज डरीयो छ। सुणो० ॥६॥ जिन उत्तम पूंठ हवे पूरो, पद्मविजय थाउं सूरो, तो वाधे मुज मन अति लूरो। सुणे अनकु उपदेशी पद. मनवा नाहा विचारी रे। लोभीडा नाहा बिचारी रे। था मारी करतां उमर बितगइ सारीरे। मनवा नाहा विचारी 1 टेर। गरभवासमें करुणा कीनी, सरव पियारी रे॥ तो नाथ बाहेर काढो, भगती करशुं थारीरे । मनवा० ॥ १ आवे मन मायासु लागो, जोडे सवाइरे। कोडी रे कोडी स लेतो, राड उद्धारीरे । मानवा० ॥२॥ बालपणामें लाड लडार माता थारीरे । भरजवानी तीरीया, जोवन लागे प्यारी रे ॥३॥ रूखगये बार दसु दरवाजे, लग रही घेरीरे । अ १ डी, उट चल्यो निरधारो। न० ॥ ३ ॥ इम जास्य । वेराग लगे मज लगे मुज प्यारो। न०॥ देर ॥ बोलजों सकेरो मिलियो, आलसमें मत हारो। नर० ॥ १॥ माया हमें उलज रह्यो हे, नित करे ह्मारो मारो। पेवा पोर. (९१) चौयांसि भुगते, करणी थारीरे । मन० ॥४॥ काल- | सिख मोहे दीनी, मानी सादरीरे । आव तो नाथ पार , सरण तुह्मारो रे मन० ॥ ५ ॥ इति । मनकू सिखविषे पद. मना तोकुं किसविध कर सगजाउं, चेतन तोकुं किसविध समजाउं । तोकुं वारंवार चेताउं । मना० ॥टेर ॥ हस्ती तो पकड मंगाउ, पायमे जंजिर डलाउं । मावत होयके, उपर तो, अंकुस देके चलाउं रे । मना०॥१॥ लोहो होयतो ग धमाउं, दोए दोए एरण रोपाउं । ले घनसे घनघोर उ, पाणी करणे चलाउं। मना० ॥२॥ सोनो होयतो मंगा, करडा ताव देवाउं; ले फुकीने फुकनने बैठु तो, मे तार खेचाउं । मना० ॥३॥ मायन होयतो गाय रेंझाउं, र वैएण बजाउं; जिनदासकी याही आरज है, ज्योतीमें जोत उरे । मना० ॥४॥ इति । निरभव तारोरे तारो, संसार समुंदर खारो। नरभव तारोरे नरभवको पद. की मन गमती, तन धनसु परीवारो। काल आयो । गी, छोडो पापनो भारो । देव गुरु धर्म हडकर
(९४)
-
फंदोजी ।। स० ॥ ११ ॥ समकितक्रियाविन जगनमें, नहीं
तारणहारोजी । तिलोकरीख कहे इम सरदजो, जो सुर
नरनारीजी ॥ स०॥ १२॥ दान शीयल तप भावना,
जुगमें तत्त्वसारोजी। भाये आराधो भावसुं, होजासी ।
पारोजी ॥ स०॥ १३ ॥ इति ।
उपदेशी लावणी
करो करो आछाजी करो करो; भलाजी करो करो | जरा
सुविचार। देखो देखो जरासुटेर। करो रात दीन घरको ।
यो थारो यो झारो। इनमें थोडो भजन करोतो। काइ विग
थारो॥क० ॥१॥ भाइ भतिजा कुटुंब कविला, नितमत खा
तान । साधुजीने थे वंदो तो, काइ होसी नुकसान ॥ क० ॥
घणा कुशल थे लेखे चोखे, विद्या सीख्या जादा। घरम स
धसो नही थे, किंउ छोडी मरजादा ।। क० ।। ३ ।। घना पुणे
मनुष्य जमारो, वडा घराने पाया। जो चालोला धरमरी
होसी मनका चाया ॥ स०॥४॥ नाटक चेटक ख्याल तम
देखनमे चित्त जावें। वखाणांहे आवन सारूं, जीव
दुख पावे ॥ क० ॥ ५॥ पंच महाव्रतधारी साधु, मिलिया
प्रकासो । यो अवसर जो निकल गयो तो, फेर घना पस्तास
क० ॥६॥ संगीत पद फागनकी गाळ्या, गावनमें
सोरो । सामायिक पडिकमणो सिकनो, किंजं लागे छे दो
क०॥७॥ सट्टा करना तोटा भरना, थांने आछा ल
दान दयारो काम पडे तो, खोजामे काटो भागे ॥ क० ॥
पातरीया प्यारी, देख देख आनंदसु ॥ सिळ पा
उणके, डरो नही जन धनसु ॥ क० ॥९॥ र
H
,
।
- देख्या गुरांजी बिन रोग गळतां, देख्या
.
॥ मोह गुरूंजी विन पास बंधन, चुगली गुरांजी
-देख्यो रे चेला विन रोग गळतां, देख्योरे चेला
(९५)
मोज उडावन, नंबर थारो पेहलो। तपशा करता ताव
ढोंग आगुथा लेलो । क० ॥१०॥ कपटदंभ पाखंडसे
नख चखसु हाद नाम । पीण हीरदामें प्रेमभाव राखतां
लागे छे दाम । क० ॥ ११ ॥ धरम सरीखी चीज जगतमें
कछ नही जानो। भुनिवरजी उपदेश करे छे, पक्के हीरदे
। क० ॥ १२ ॥ कहे विष चुनिलाल निहारो, दुर्लभ
। जमारो । आखर काळ कीने नही छोड्यो, खोलो पट
रो। क० ॥ १३ ॥ इति ॥
गुरु चेलाको संवाद.
रु- देख्यो रे चेला विन रूख छाया, देख्यो रे चेला .
धन मायाँ । देख्यो रे चेला विन पास बंधन, देख्यो रे
विन चोरी दंडण ॥ १॥
ला- देख्या गुराजी विन रूख छाया, देख्या गुरांजी
धन माया । देख्या गुराजी विन पास बंधन, देख्या
ही विन चोरी दंडन ॥२॥
कहोनी चेला विन रूख छाया, कहोनी चेला बिन
।। कहोनी चेला विन पास बंधन । कहोनी चेला
बादल गुरूंजी विनरूख छाया, विद्या गुरूंजी विन
अग्नि जळतां ॥ देख्योरे चेला विन प्यार प्यारा, देख्यो
-
*री दंडन ॥३॥
रीि दंडन ॥ ४॥
विन खारे खारा ॥१॥
(१६) - विन अगि जलतां ॥ देख्या गुरांजी बिन प्यार प्यारा, गुरांजी बिन खारे खारा ॥ २ ॥ गुरू- कहोनी चेला विन रोग गळता, कहोनी घेला अग्नि जलतां ॥ कहोनी चेला विन प्यार प्यारा ॥ कहोनी विन खारे खारा ॥३॥ चेला- चिंता गुरांजी विन रोग गळतां, क्रोध गुरांजी अग्नि जलतां ॥ साधु गुरांजी विन प्यारे प्यारा, हिंसा गु विन खार खारा ॥४॥ गुरु-देख्यो रे चेला विन पाळ सरवर, देख्यो रे विन पान तरुवर ॥ देख्यो रे चेला विन पांख सुवा, देख्य चेला विन मोत मुवा ॥१॥ चेला-देख्यो गुरांजी बिन पाळ सरवर, देख्यो विन पान तरवर ॥ देख्यो गुरांजी विन पांख सुवो, गुरांजी विन मोत मुवो ॥२॥ गुरू- कहोनी चेला विन पाळ सरवर, कहोनी पान तरवर ॥ कहोनी चेला विन पाख सुवा, विन मोत मुवा ॥३॥ चेला- तृष्णा गुराजी बिन पाळ स पान तरवर ॥ मन गुरांजी विन पांख : मोत मुवा ॥ ४ ॥ इति ॥ . . ARLI
(९७)
गेलें ॥ काहीतरी उपाय वरा, जैनमार्ग खरा, तो दावि
। कशास०॥१॥ हिंसा पासुनी दूर राहावे, जल गाळु-
स्वच्छची घ्यावें, परस्त्रीविषयी अंध असावें || विचार
। होय जरा, उपदेश खरा, मज मनी ठसला ॥ कशासक
॥ आरिहंताचे चरणा ध्यावं, निग्रंथासी शरण रिघावे, तत्व
ही अवलोकावें, कधी न मी विसरीन तुला, जैन धर्म मला,
ज दिसला || कशास०॥३॥ इति ॥
,
,
-
चोवीसी-
( गोपीचंदकी देशी.)
[ उठ गुण गावो एक चित्त चोवीसी जिनंदका. (टेर)
में अजित संभव अभिनंदन, सुमत पदम सुखदाय;
रस चंदापभूके प्रणमू लुल लुल पायजी. नित्य. १
धि शितल श्रेयांस वासपूज्य, विमल अनंत अविकार;
थ, श्रीशांतिजिनेश्वर, शांति तणा करनारजी. नित्य २
अरह मल्ली मुनिसुव्रतजी, नमे रिटनेमी देव;
महावीर प्रभूजीकी, हितकर कीजे सेवजी. नि०३
५ दया कर मूजपे, सुख संप मुज दीजें;
-व्याधि-उपाधि निवारी, शांतस्वरूपी कीजेंजी. नि०४
उगणीसे वासउको, इगतपुरी चौमास;
ऋपिकी अरजी मानी, दीजो शिवपुर वासजी. ५
-
आठपरे पापस्थानरो
३
देवनो देव तुं खरो ।
, विन आग्नि जलतां ॥ देख्या गुरांजी विन प्यार प्यारा, गुरांजी विन खारे खारा ॥२॥ गुरू--- कहोनी चेला विन रोग गळता, कहोनी चेला अगि जलतां ॥ कहोनी चेला विन प्यार प्यारा ॥ कहोनी विन खारे खारा ॥३॥ चेला-चिंता गुरांजी विन रोग गळतां, क्रोध गुरांजी अग्नि जलतां ॥ साधु गुरांजी विन प्यारे प्यारा, हिंसा गुन विन खार खारा ॥४॥ गुरु-देख्यो रे चेला विन पाळ सरवर, देख्यो रे बिन पान तरुवर ॥ देख्यो रे चेला विन पांख सुवा, देख्य चेला विन मोत मुवा ॥१॥ चेला- देख्यो गुरांजी विन पाळ सरवर, देख्यो विन पान तरवर ॥ देख्यो गुरांजी विन पांख सुवो, गुरांजी विन मोत मुवो ॥२॥ गुरू- कहोनी चेला विन पाळ सरवर, कहोनी चेल्ला पान तरवर ॥ कहोनी चेला बिन पाख सुवा, कहोनी बिन मोत मुवा ॥३॥ चेला-तृष्णा गुराजी विन पाळ सरुवर, नेत्र गुरांजी, पान तरवर ॥ मन गुरांजी विन पांख सुवा, निद्रा गुराजी मोत मुवा ॥ ४ ॥ इति ॥ . उपदेशी मराठी पद. धिक् तुह्मां सकलांस असो, जैन धर्म तुह्मांला व्यर्थ आ कशास जैन कुलास आला, जैन धर्म तुह्मांला व्यर्थ आला अभक्ष्य तुह्मीं सेवन केलें, कुदेवाचे बनला चेले, आयुष्य खरा, (९७) गेलें ॥ काहीतरी उपाय वरा, जैनमार्ग तो दावि ॥ कशास॥१॥ हिंसा पासुनी दूर राहावे, जल गाळु- स्वच्छची घ्यावें, परस्त्रीविषयीं अंध असावें ॥ विचार । होय जरा, उपदेश खरा, मज मनी ठसला ॥ कशास० ॥ आरिहंताचे चरणा ध्या, निग्रंथासी शरण रिघावें, तत्व ही अवलोकावें, कधी न मी विसरीन तुला, आज दिसला ॥ कशास० ॥३॥ इति ॥ जैन धर्म मला, - चोवीसी- ( गोपीचंदकी देशी.) । उठ गुण गावो; एक चित्त चोवीसी जिनंदका. (टेर) अजित संभव अभिनंदन, सुमत पदम सुखदाय; (स चंदामभूके प्रणमू लुल लुल पायजी. नित्य०.१ धि शितल श्रेयांस वासपूज्य, विमल अनंत अविकार; थ, श्रीशांतिजिनेश्वर, शांति तणा करनारजी. नित्य २ अरह मल्ली मुनिसुव्रतजी, नमे रिष्टनेमी देव; थ महावीर प्रभूजीकी, हितकर कीजे सेवजी. नि० ३ दया कर मूजपे, सुख संप मुज दीजें; -व्याधि-उपाधि निवारी, शांतस्वरूपी कीजेंजी. नि० ४ उगणीसे वासठको, इगतपुरी चौमास; लख' ऋषिकी अरजी मानी, दीजो शिवपुर वासजी. ५ " , आगरे पापस्थानरो स्तवन- खोडीदासजीकृत. १ म देवनो देव तुं खरो । धरम थायरो मे नवी को सीता दुःखवारिणी हो राज ॥१॥ सो० ॥ नेत्र अंगना रा मती सती, कुंताजि पांडव माता हो राजा द्रुपदी नारि विष जहारी, चंदना जिनमते विख्याता हो राज ॥ सो० ॥ संतानी राणी मृगावती शाणी, चेलणा श्रेणिक पटराणी हो राज, म वतिजिने सुभद्राजी, बिजकर जग प्रगटाणी हो राज । सो नल घरनी दमयंती दीपे, सुलसा कंदर्प जीते हो राज; शीवा दृढरही ब्रह्मव्रते, पद्मावती शील मोती सिपे हो राज ।। सो ए सोले संकटमें स्थिर रही, अखंड शिल व्रत पाल्यो हो रा संयम लेइ मोक्ष सिधाई; ऋपी अमोलख दुःख टाल्यो राज || सोले सतिता ॥ वीस विहरमान स्तवन- (रेखता) वंदू में विसी विहरमानो, अजपा जप लग्यो ध्यानो ( टेर सीमंधर युगांधर राया, वाहु सुबारके पडू पाया; सुजात ने स्वयंप्रभु देवा, करुं ऋषभानंदकी सेवा. वंदूं० १ अनंतवीर सूरप्रभू स्वामी, वज्रधर विशाल जिन नामी; चंद्र ने चंद्रबाहू, भुजंग ईश्वरकी भक्ति चाहू. वंदूं० २ नेमप्रभू वीरसेना, महाभद्र उच्चारीये वेणा; देवयशजी ने अनंतवीर, चरणमें नमता मुज शिर. वंदूं० ३ जयवंता वीसी विदेहमांही, विराजे धर्म दीपाइ; नरिंद सुरिंद करे सेवा, जिनेश्वर देवाधिदेवा. वंदूं० ४ चिदानंद पद पाय ध्याता, ' अमोलिक' रिख गुण गाता; चौमासा इगतपुरीमांही, प्रभू पसाय सुखदायी. वंदूं० ५ १ .
चिंतामणी जाण । अल्प उमरमें दीक्षा लीनी, किनो काया । मा० ॥२॥ गुरू तुह्मारा तिलोकरिखजी, अनेक रमाण । मा०॥३॥ करुणाना आगर करूणासात कंचनवान । स्यादवाद तो वाणी मीठी, वरसे मेव ॥४॥ सूत्र सुणावो धर्म वतादो, तारो वहुँ .. ११ गणधरका स्तवन- (फाग रागे.) वंदो नित्य इग्याराइ गणधरको. (टेक.) तिजी ने अग्निभूतिजी, वायूभूति वड मुनीवरको. वंदो० १ अति ने सुधर्मस्वामी, पाट दीपावे जिनेश्वरको. बंदो० २ त्रले मोरीपुत्रजी, अकंपित अचलजी सुखकरको. वंदो०३ ने श्रीप्रभासजी, पाम्या पद अजरामरको. वंदो० ४ वित पात्रत शिवसुख ते, 'अमोल' नमे जोडी करको. वंदो०५ श्री रत्नरीखजी महामुनिको पद- ता धापुवाइका नंद २॥ देखीता हेरी सुरत, झारो चित्त जीक । मारो दील लुभानोजी । देखी० । टेर। मुरधरदेस { पटीमे, वो तो गाम कहेवाय । सरूपचंदजी पिता तुह्मार लाइ छे माय । माता० ॥२॥ नाम तुह्मारो रत्नरिखजी, - जान। वाल ब्रह्मचारी आप विराजो, जीम शोने मैकुं आप दीपायो, धन तुम मुनि अवतार । क्रिया आप अनुसरो, खटकाया रखपाल ताहेरी, भव भव फेरा दो टाळ। 1 *
No text on this page.
No text on this page.