Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Khagol Vigyan Ke Mahan Kshan

Archie E. Roy · 2011/03

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खगोल-विज्ञान के महान क्षण GREAT MOMENTS IN ASTRONOMY केन्द्रीय हिमी निदेशालय (शिक्षा शमय) भारत सरकार र मोक्त विज्ञान भी विश्वविख्यात पुस्तके एगान सामन * परिचय (ममिल्द) एम कारपुर 50/ (गर्म पुम्बा प्रति पानी हि विन प्रभा एवं गति) eacbs/ (ACHIEVEMENTS OF SCIENCE 1-8 by M Anderwond) *किगवर विमाim हैएपी act 30/ (EVERYDAY SCIENCE TOPICS III by T. A. Toddle) * विमारीशनि 11V एमविनफ और एपीसी मपिता each 50/ (STORIES FROU SCIENCE HIV by Stcle & Sids! * बारपीटा माम्य अर्नवाल 30/ (THE MAKING OF MAN by Dr LH Corowal) सर्वोतम बाम पनकमाहोरी एमोमिएशन के 'पपीनाम से परस्त * टेलीरियर (एकएन मविचार) जीन और बट 50/ TELEVISION HORKS LIKE THIS by 1 & R. Bendick * TRT (RADAR Works Like Thu by Egon Larsen) 40/ * af afra (SOUND RECORDING) क्नमेंटशाउन 40/ * शिYTRANSISTOR by Exonlaven) एगान मामन 40/ *बेर-बार जॉन न्यू मार टेलर 40/ (JET PLANES by Jobs W R Tayter * (ATOVS Work Like This by on Rowla d) atau 40/ * हेलिकोप्टर (Hat copters) मेभिल बाल और जीन गम्य भार देना 40/ * राखेट और स्तरिब पार जान रम्य बार देतर 40/ (Rockets & Spacecrata by Jhon WR Tavlor) * रेलगाड़ी (TRAINS Work Like Thes) देविसेंट बान टीमम 40/ ★ कमरेशीका मोरिसकेका 40/ (CAMERAS WO I Like This by Maunde K. Kidd) * शिहोंने परिव्यमण 80/ (AIEN V HO SHAPED THE FUTURE by Egon Larset) * रिम्होंने दुनिया परम की 80/ (MEN WHO CHANGED THE WORLD by Ego Larsen) * माधुनिक विमान के महान सम्वेषक पैटिक गिन 80/ (GREAT DISCOVERERS IY MODERN SCIENCE by P Pngle) * कार्यरत मा हरित वैज्ञानिक 501 (MODERN SCIENTISTS AT WORK by A.WEis) * रोम विकास महारा बार राय 50 (GREAT MOMENTS IN ASTRONOMY by Arch ERY * माधुनिक बीच विज्ञान मी एच वाडिंगटन 50/ (BIOLOGY POR THE MODEAN WORLD by CH Waldenglon) * कृति और मानव बॉन हिलेबी 30/ (NATURE AND MAN by Joba H Laby) * नियोंस सक्षार 30/ (THE WORLD OF FEELING by JD Carthr) पास (WEATHER by Rs Scorer) 30/ * परिवहन (TRANSPORT by Ego Lure) 30/ *अतल गहीवर (LIFE IN THE DEEP) भारिमन 30/ * हमारा पृषी (PLANET EARTH) डग रोना जर 30/ *विमानमोक्ष दोनोम्बी 50/ (COMMON SENSE OF SCIENCE by Dr J BrowTOK ) *बटर केपी ईएमपीवाल्टर्भ 307 (ANIMAL LIFE N THE TROPICS by EMP #lens) * अगर एक सपमरेक रविन बनाक 30/ (DIVERSITY OF MAN by Robi Clark) एगानलार्मन एगीन लामन एक्युएलिम आर एम स्कोरर एगॉन नामेन

मानव ससाधन विकास मत्रालय (शिक्षा-विभाग) भारत सरकार द्वारा स्वीकृत
खगोल-विज्ञान के महान क्षण
लेखक
3
आर्ची ई रॉय
अलकार प्रकाशन
666, भील, दिल्ली-110051
-
--

Hindi translation of 'GREAT MOMENTS IN ASTRONOMY
by Archie & Roy
By arrangement with
JM Dent & Sons Ltd, London
© Hindi edition reserved by the publisher
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा-मत्रालय) भारत सरकार के सहयोग से
कार्यान्वित लोकप्रिय पुस्तको की प्रकाशन-योजना' के अतर्गत स्वीकृत एव
कैपिटल बुक हाउस दिल्ली के निमित अलकार प्रकाशन से प्रकाशित
अनुवाद
एम गुलाटी
पुनरीक्षण
के एन दुबै
मूल्य
पचास रुपये (5000)
संस्करण
दूसरा 1990
प्रकाशक
अलकार प्रकाशन
666 मील दिल्ली 110051
कल्पना प्रेस दिल्ली-110092

दो शब्द हिन्दी के विकास भौर प्रसार के लिए शिक्षा तथा युवक सेवा मत्रालय के तत्वावधान में पुस्तको के प्रकाशन की विभिन्न योजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं। हिन्दी मे अभी तक ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र मे पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऐसे साहित्य के प्रकाशन को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यह तो मावश्यक है ही कि ऐसी पुस्तकें उच्च कोटि की हो, किन्तु यह भी जरूरी है कि वे अधिक महगी न हो ताकि सामान्य हिन्दी पाठक उन्हें खरीदकर पढ़ सकें। इन उद्देश्यो को सामने रखते हुए जो योजनाएं बनाई गई हैं, उनमे से एक योजना प्रकाशको के सहयोग से पुस्तकें प्रकाशित करने की है। इस योजना के अधीन भारत सरकार निश्चित सख्या मे प्रकाशित पुस्तको की प्रतियां खरीदकर उन्हें मदद पहुचाती है। प्रस्तुत पुस्तक इसी योजना के अन्तर्गत प्रकाशित की जा रही है । इसके अनुवाद मौर कापीराइट इत्यादि की व्यवस्था प्रकाशक ने स्वय की है तथा इसमे शिक्षा तथा युवक सेवा मत्रालय द्वारा निर्मित शब्दावली का उपयोग किया गया है। हमे विश्वास है कि प्रकाशकों के सहयोग से प्रकाशित साहित्य हिदी को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध होगा और साथ ही इसके द्वारा ज्ञान विज्ञान से सम्बधित अधिकाधिक पुस्तकें हिन्दी के पाठको को उपलब्ध हो सकेंगी। माशा है, यह योजना सभी क्षेत्रो मे लोकप्रिय होगी। केद्रीय हिन्दी निदेशालय ए चाहासन शिक्षा तया युवक-सेवा मत्रालय

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विषय-सूची अध्याय पृष्ठ -- 9 2 23 3 38 4 46 5 57 6 69 वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को चलाया अव्यवस्था से सुव्यवस्था अतरिक्ष से एक आग तुक उडती पताका का रहस्य एक नए ग्रह की खोज दूरदशक के विना क्षण पाराश मे मील के पत्थर तारा को देखने को खिडकी प्राकाश से सकेत जेट-चलित कमरा महान क्षणों को प्रतीक्षा पारिभाषिक शब्दावली 7 80 8 94 9 108 10 119 133 135 चित्र-सूची पृष्ठ 3 गेलीलियो भपने दूरदशक से मापारा की पोर देख रहे हैं पाश्चयचरित सीनेट के सदस्य सेंट मार्यो मे युज से सामुद्रिक क्षितिज देखते हुए 17 28 33 42 47 52 62 पेपलर का दूसरा नियम नोट बनाने के लिए कभी भी यूटन सीढिया से ऊपर अपनी सर अधूरी छोड़कर भागते थे सहक पर हैली ने 1680 के महान धूमकेतु को देखा पृथ्वी की कक्षा प्रडले का ध्यान मस्तूल पर लगी पताका की मोर मार्पित हुमा टुकडे गोलिया की भांति छत तक ऊँचे उहने लगे। हचेल इटो के ढेर पर गिर गया 'वह चाट पर नहीं है ।' द भरेस्ट ने उत्तेजित हो कहा दूरी का लम्बनिक माप हबल ने 100 इच के दूरदशक द्वारा नीहारिकामा के चित्र लिए माउट पलोमर के भवन मे वह सभी कुछ है जिसकी खगोलश को आवश्यकता होती है 2 अगस्त 1957 की रात्रि को दूरदशक का पहली बार सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया ल्यूनिक 3 का कमरा चद्रमा के प्रकाशित, कितु अनात भाग की प्रोर सधा हुआ था 76 81 90 105 114 128 सातवें अध्याय मे उद्धत सदभ सबसे पहले 'रॉयल एस्ट्रोनामिक्ल सोसायटी की पत्रिका Afonthly Notices में प्रकाशित हुए थे।

पहला अध्याय वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को चलाया भूरे बालो व छोटी गरदन वाले और स्थूलकाय आदमी ने अपने हाथ मे पकडे हुए नए बने दूरदर्शक को गौर से देखा और यह उम्मीद बाधी कि भाज की शाम भी आकाश साफ रहेगा । उस आदमी का नाम था गलीलियो गैलिली और बात है मन् 1610 ई को। पादुअआ (इटली) के गणित के इस प्रोफेसर के लिए, अपने द्वारा बनाए जा रहे विशाल और बेहतर दूर- दर्शको द्वारा, एक नई दुनिया का रहस्य खुलने वाला था। इससे पहले वह तीन ऐसे यत्र बना चुका था और हर बार का यत्र पहले वाले यत्रो से तीस गुना अधिक शक्ति वाला था। वह इस यत्र के सो को पना करके उन्हे रोशनी- बद नली मे विठाने में व्यस्त था। 7जनवरी की उस रात को उसने जब बृहस्पति नक्षत्र के झिलमिलाते गोलक का दोबारा निरीक्षण किया तो उसके निकट उसे तीन ज्योति-बिन्दु पौर नजर भाए। उसने सोचा कि पार्श्व के धुंधले सितारे होगे, परन्तु उसके पाश्चर्य का तब ठिकाना नही रहा जब उसने उन तीनो को अगली रात परस्पर मपनी स्थिति बदलते देखा । यह बात आकाश-मडल के अध्ययन- कर्तामो के अनुभव के सवथा विपरीत थी क्योकि उनक अध्ययन यह बताता पा कि सदियो तक नक्षत्रो की स्थिति नही बदलती। इसके अतिरिक्त गैलीलियो ने यह गौर किया कि बृहस्पति के सदर्भ मे ही तीनो नक्षत्रो की परस्पर स्पिति मे भन्तर पाया है । लगातार प्रेक्षण के बाद उसे पता लगा कि ये वस्तुत चार पिंड मे। कई रातो के बाद गैलीलियो इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये तीनो, बृहस्पति के चारो मोर चक्कर काट रहे थे, जो वस्तुत उपग्रह ये । इस तरह गैलीलियो को उन चार संसारो को खोजने और प्रेक्षण करने का सम्मान प्राप्त हुमा जिहें मनुष्य इससे पूर्व देख नही सका था। परन्तु यह सोज मागे माने वाले पाश्चर्यों का एक प्रश मात्र थी। ।

10 ज्योतिविज्ञान के महान क्षण उसके दूरदशक चन्द्रमा का निरीक्षण करने पर उसे उसकी सतह पर फ्ले हुए असख्य पहाडो, दरारो तथा प्रकाश व अधकार की दुनिया का दर्शन हुआ। मे उपग्रह मडलक के समान दिखाई देते थे और तारो की सख्या पहले से अब कई गुना बढ गई थी जिहे मनुष्य ने अभी तक देखा नही था । कृत्तिका नक्षत्र की सात की गिनती मे गैलीलियो अव छत्तीस और जोड सकता था। गैलीलियो ने अपनी प्रारम्भिक खोजो का विवरण 'साइडेरिप्रस ननशिप्रस' (तारो का सदेशवाहक) नामक एक छोटी सी पुस्तक मे दिया है। यह वेनिस से माच 1610 मे प्रकाशित हुई थी। इससे अच्छा नामकरण किमी और पुस्तर का नहीं हुआ यह तारो के बारे मे एक रोमाचक वृत्त था जिसने हर स्थान के विद्वानो को चौंकार उनके विश्वास की गहरी नीवो को हिला दिया था। अनेक क्षेत्रो मे इसके प्रति बेचनी, सदेह, विरोध तथा घृणा व्यक्त की गई। कुछ विद्वानो ने गैलीलियो की खोजो का रुचि तथा उत्साह के साथ स्वागत किया लेकिन ऐसे लोग गिनती मे थोडे ही थे। अपने समय के सवप्रसिद्ध ज्योतिर्विद् केप्लर ने गैलीलियो का समथन किया और अगस्त 1610 मे दूरदर्शक से बृहस्पति को स्वय देखा। प्राग से प्रकाशित 'तारो का सदेशवाहक' की प्रति भी उसने प्राप्त की। उसने स्वीकार किया कि आकाश के अध्ययन के लिए दूरदर्शक बनाने का विचार उसके मस्तिष्क मे कभी नहीं आया और साथ ही यह सकेत भी किया कि इन यत्रो के द्वारा अब ठोक ठीक नाप भी सभव है। इस प्रकार का समथन गैलीलियो के लिए बहुत उत्साहवर्द्धक या क्योकि विभिन क्षेत्रो के विरोध का अब उसे सामना करना या ।। दशन शास्त्र के प्रोफेसरो का तर्क था कि ग्रोक के महान् विचारक अरस्तू द्वारा बृहस्पति के उपग्रहो का कोई उत्लेख नही हुआ है, अत उनका अस्तित्व असम्भव है । अय लोगो ने गैलीलियो के दूरदशक से देखने से इन्कार कर दिया क्योवि उनके अनुसार इन उपग्रहो के दिखने का कारण यह पत्र ही है। इतना ही नही, गैलीलियो जब मार्च के महीने मे बोलोगना पहुंचा तो उसने वहां के प्रोफेसरो को दूरदर्शक से देखने का प्राग्रह किया, पर उनमे से मधियारा ने यही कहा कि उहे कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

11 वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी का चलाया इममे पहले कि हम उहे कपटी कहकर छोड दे, यह स्मरण रखना होगा पारम्भिक दूरदशक बहुत अपूर्ण थे। लेमो को सतह ठीक नहीं होती था पार उनमे कुछ अन्य त्रुटियाँ भी होती थी जिनसे वुधले प्रतिविम्यो के चारो ओर रगीन किनारे उभर आते थे । वास्तव मे हम जानते है कि गैलीलियो के दूरदर्शक से लोगो को क्या दिखाई देता था क्योकि कुछ यन अव भी उपलब्ध है। उनसे देखने पर हम आश्चर्यचकित रह जाएगे कि गैलीलियो ने उससे इतनी खोज की। वह अवश्य ही कुशल, मेहनती निरीक्षक रहा होगा और युधले दिखने वाले विम्बो की व्यारया करने तथा उहे समझने के लिए अपने यत्र की त्रुटियो के विरुद्ध संघर्ष करता रहा होगा। उसकी स्थिति के अय लोग, अपनी प्रारम्भिक खोजो के प्रति प्रभावशाली क्षेत्रो मे उठाए गए विरोध के कारण, अपने प्रयत्नो को छोड़ देते और शैक्षणिक पशे मे सुरक्षित पडे रहते । पर गैलीलियो के स्वभाव मे यह बात नही थी, उमने अपने खगोल-अभियान को जारी रखा और विरोधियो का सामना भी करता , रहा। गैलीलियो की खोजो से उसके समकालीनो पर पडे प्रभाव को जानने से पहले हम यह जान लेना जरूरी है कि आखिर उनके अनुसार दुनिया थी क्या ज्योतिर्विद्या अत्यन्त प्राचीन विज्ञान है । हम यह नहीं जानते कि प्राकाश का अध्ययन करने वाले प्रारम्भिक लोग कौन थे, वे कहा और क्व हुए, लेकिन इतना निश्चित है कि 2000 ईमा पूर्व तक कई देशो के ज्योतिर्विद् इन खोजो मे लग चुके थे और इस बात के लिए प्रयत्नशील थे कि वे मूर्य, चन्द्रमा, तारो और रहस्यपूर्ण उपग्रहो की गतिविधियो का लेखा-जोखा पर सर्वे । बेबीलोन, मिश्र, भारत और चीन मे इहोने कई शतादियो तक आकाश के परिवतनशील दृश्यो का हिसाब रखा है । ब्रह्माड की सरचना के मम्बध मे इन प्राचीन विद्वानो ने शीघ्र ही कुछ विचार निश्चित कर लिए। कुछ के अनुसार पृथ्वी समुद्र-मेखला से घिरी एव द्वीप थी। इसके ऊपर पानी का एक गुम्बद था और यदाक्दा उसमे से कुछ रिसकर वारिश के रूप में गिरता था। सूर्य, चन्द्रमा, तारे और ग्रह पूर्व के रास्ते से प्रवेग कर, आवारा पार करते हुए पश्चिम के रास्ते 12 ज्योतिविज्ञान के महान १० से बाहर चले जाते थे। ये उन महान् देवताओ के 'तारे' थे जो दुनिया पर शासन करते थे। ग्रीक के महान् विचारको (छठी शती ई पू) ने सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहो से सम्बधित पहले के इन विचारो को अमाय घोषित किया कि ये देवताओ के तारे है और उन्होने इनकी सगत व्याख्या करने का प्रयत्न किया। अधिकाश का विश्वास था कि पृथ्वी आकाश मे तरने वाला एक गोला है और आकाश तथा तारो की पृष्ठभूमि पृथ्वी के चारो ओर दिन मे एक बार चक्कर लगाती है। उन्होो सूर्य, चन्द्रमा और अन्य ग्रहो की गतियो की वर्तुल-गति की, एक जटिल पद्धति द्वारा व्याख्या की। यह सिद्धान्त, कि पृथ्वी ब्रह्माड का के द्र है, अलेक्जेंड्रिया के टालमी द्वारा अन्तिम रूप से प्रति- पादित हुआ और इसे सामान्यत टालमी का भू-वे द्रीय सिद्धान्त (Ptolemaic Geo-centric System) कहा जाता है । उन थोड-से ग्रीक विद्वानो के, जिन्होने सूय को स्थिर केन्द्र मानकर ब्रह्माड तथा अन्य ग्रहो को उसके चारो ओर घूमने वाला कहकर साहसिक तथा कल्पनाशील कदम उठाया था, विचार पुराने पडने लगे। लोग इस बात मे विश्वास करना अधिक उचित समझते थे कि जिस पृथ्वी पर वे रह रहे है, वही ब्रह्माड का केद्र है। अधकार के युग से जब यूरोपीय सभ्यता का उद्धार हुआ तथा रोमन साम्राज्य का पतन हुआ, तब ग्रीक विचारक प्लंटो और अरस्तू की कृतियो को ईसाई शिक्षा में शामिल कर लिया गया। मानव जीवन का नाटक ब्रह्माड के केन्द्र मे घटित होना चाहिए, अत पृथ्वी ही वा के । स्थिर तारो के गोलाद्ध की सीमा के परे स्वग था, नरक की अग्नि धधकती रहती है। ये विश्वास चर्च के सिद्धात बन गए थे। ये ऐसे अधविश्वास थे जिनका अधिकारियो द्वारा सर्वत्र पक्ष लिया गया। जो लोग ब्रह्माड के इस रूप पर सदेह करते, उन्हे कठोर यातनाएं दी जाती थी बल्कि मृत्यु-दड तक दे दिया जाता था। दूरदर्शक की प्रारम्भिक खोजो के समय गैलीलियो की आयु 45 वष थी। उसका जम पीसा मे 1564 मे हुआ था जोकि शेक्सपियर का भी जम वष है। जब वह युवक ही था तो उसे पीसा विश्वविद्यालय में औषधि- विज्ञान के अध्ययन के लिए भेजा गया लेकिन उसे यह विषय बहुत ही नीरस पृथ्वी के भीतर - 13 वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को चलाया लगा । यद्यपि इस क्षेत्र में भी उसने अपनी कुशाग्न बुद्धि का प्रदर्शन किया और रोगियो की नब्ज नापने के सम्बन्ध में एक खोज की और इस तथ्य पर भी रोशनी डाली कि लोलक के स्पदन की निश्चित अवधि होती है जो उसकी लम्बाई पर आधारित होती है। यह विचिन बात है कि विना डिग्री लिए उसने विश्वविद्यालय त्याग दिया। सम्भवत उसके गैर-रूढिवादी विचार, अपने अरस्तूवादी प्राध्यापको से बहस करने की आदत, उनके सिद्धान्तो की कमियाँ बताते रहने के कारण ही उसे उन्होने स्कालरशिप देने से इन्कार कर दिया। वह घर लौट आया, पर उसने अपनी पढाई जारी रखी तथा गणित और यात्रिकी मे दक्षता प्राप्त की। उसने कई मशीने और वैज्ञानिक उपकरण बनाए। इनमे से एक भूमि के भीतर जल को सूचित करने वाला यत्र भी है। इससे वैज्ञानिक और विद्वान के रूप मे उसे खूब प्रसिद्धि मिली। 25 वप की आयु मे पीसा विश्वविद्यालय मे उमकी नियुक्ति गणित के प्राध्यापक के रूप मे हुई और यह इसी विश्वविद्यालय द्वारा उसे स्कालरशिप न दिए जाने के चार वप बाद की घटना है। वह वहाँ तीन वप तक रहा और फिर वेनेशिया रिपब्लिक के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय पादुआ मे गणित का प्रोफेसर बनकर चला गया । आगामी अठारह वर्षों तक गैलीलियो अध्ययन, प्रयोग, आविष्कार करता हुआ अपने समय के विद्वानो मे अग्रगण्य बनकर अपना नाम रोशन करता रहा । वस्तुत इन्ही अठारह वर्षों मे उसने गति के सिद्धान्तो से सम्बधित वे खोजे की जिन परप्राधुनिक गति-विज्ञान की नीय रखी गई है। लोलक के सावधानी और धैर्य से किए गए अध्ययन के फलस्वरूप गैलीलियो ने वस्तुनो के गिरने अथवा लुढकने के विषय मे गहरी जानकारी हासिल कर ली। उसके लोलक और लुढक्ने वाली वस्तुओ से सम्बधित कुछ प्रयोग आज भी माध्यमिक विद्यालयो मे पढाए जाते हैं क्योकि गति के मूलभूत सिद्धान्तो पर प्रकाश डालने के लिए वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं । अब उसे अरस्तू के कई 'वैज्ञानिक दृष्टिकोणो मे विसगतियां नजर माई, और पृथ्वी के घूमने के विचार के विरुद्ध टालमी को आपत्तियो की भ्ययता महसूस होने लगी। इन प्रापतियो मे से एक यह थी कि अगर पृथ्वी धूमती होती तो हवा और लोग पीछे छूट जाते । लेकिन गैलीलियो ने अभी तक इन विचारो के सम्बन्ध मे अपना कोई अभिमत विद्यार्थियो के सामने 14 ज्योतिविनान के महान क्षण प्रकट नहीं किया था। वह उन्हे प्राचीन ज्योतिविद्या पढाता रहा जिसमे टालमी के चक्र और परिधि-चक्र वाले पृथ्वी केद्रित ब्रह्माड का तथा ग्रहो की गति की स्पष्टता के लिए अावश्या जटिल वृत्तीय गतियो का वणन था। हालादि, जैसा कि हम जानते है, वह इस बात से सतुष्ट था कि कापनिक्स का सूर्य- केद्रित ब्रह्माट वाला मिद्धान्त ज्यादा ठीक है। निकोलम कापनिकम (1473-1543) ने प्राचीन ग्रीव विचार की पुष्टि की थी कि सूय ब्रह्माड के मध्य स्थित है और पृथ्वी समेत सभी ग्रह वर्तुलाकार उमवे चारो ओर घूमते है। उसकी पुस्तक उसके जीवन के प्रतिम समय में प्रकाशित हुई जिसमें उसने सूर्य-केन्द्रित ब्रह्माड सिद्धान्त (अथवा कानिक्स सिद्धान्त) को व्याग्या की थी, क्योकि वह अपने समकालीनो के तिरस्कार और उपहास से वहत डरता था । गैलीलियो उसके विचारो से पूणतया अवगत था। 1597 मे जोहाम केप्लर ने अपनी पुस्तक की एक प्रति गैलीलियो को भेजी। उसे धयवाद देते हुए गैलीलियो ने लिखा 'आपकी पुस्तक शान्ति के माथ पढन का मैं वादा करता हूँ, इसमे कुछ प्रशसनीय वात मिलने को पूण सम्भावना है और यह बात मेरे लिए इसलिए प्रसन्नता की है क्योकि रई वप पहले से मैं कापनिम्म के विचारो से सहमत रहा हूँ और उसके दष्टिकोण के अनुमार मैं प्रकृति के कई काय-व्यापारो को व्याम्या कर मक्ता हूँ जिहे आजकल की परिकल्पनामो से समझा नहीं जा सकता।' अपन विश्वामो को स्वय तव सीमित रखने के कारण तव स्पष्ट हो जाते है जब वह आगे कहता है 'मैंने उसके पर वे समथन मे और विरोधियो के खडन म अनेर तक इक्टठे किए हैं जिहे मैंने अभी तक जनता म प्रक्ट नहीं किया है क्योकि मैं अपने गुरु कापनिक्स के परिणाम का देखकर भय अनुभव पर रहा है, हालाकि बुध मिद्धातो के कारण उह अमर प्रसिद्धि मिली है। वववपाकी मग्या अधिक हान के कारण वे मजाक और उपहाम के पात्र बने हा हैं । मैं अपने विचारो को प्रकट करने की हिम्मत तभी वर सगा जव पाप जमे कुछ लोग और भी हो जाएँ, पर ऐसा न होने पर मैं अपन को रोरे रहूँगा। वास्तव में अपने बनाए दूरदाय के कारण उगवे लिए पापा- --15 रहने। वर व्यक्ति जिसने पृथ्वी को चलाया मडल की एक नयी दुनिया खुल गयी थी। कई वर्षों तक प्रयोग करते.. के वाद गलीलियो ने कापनिकस के सूर्य-केन्द्रित ब्रह्माड के सिद्धान्त के पक्ष में अपने विचार प्रकट किए। गैलीलियो ने दूरदर्शन का आविष्कार नहीं किया था। यह किसी को पता नही है कि उपयुक्त आकार के दो लसो को एक-दूसरे के सामने रखकर तथा इमारतो और वृक्षो जैसी दूर की चीजो को हाथ-भर के फासले पर देख लेने वाले यत्र को बनाने वाला पहला व्यक्ति कौन था। सबसे पहले तेरहवी शताब्दी मे ऐनक के लिए लसो के प्रयोग को मान्यता मिली। निश्चित रूपसे सोलहवी शताब्दीकी प्रतिम तिमाही मे मुरयत डच आविष्कर्ताओ द्वारा आदिम दूरदशक वनने शुरू हो गए थे। कुछ लेखको का मत है कि डच देश के मिडलबग क्षत्र में रहने वाले हेन्स लिपर्श नाम के व्यक्ति ने दूरदशक का सवप्रथम आविष्कार किया था। ऐसा कहा जाता है कि एक दिन दो वालक लिपर्शे की दुकान पर लसो से खेल रहे थे तो उन्हे पता लगा कि दो लसो को एक सीध मे रखने से पास के चच का वातसूचक बडा दिखने लगा है । लिपर्श ने लसो को एक नली मे रखकर स्टेट्स-जनरल से पत्र व्यवहार शुरु किया जो नीदरलैंड पर शासन करने वाले व्यक्तियो का एक संगठन था और स्पेन के फिलिप द्वितीय की सेना से जीवन-मरण के सघप मे जूझ रहा था। उन्होंने तुरन्त महसूस क्यिा कि युद्ध मे निर्देश देते हुए जनरल या स्काउटो के जहाजियो के लिए दूरदशक बहुत उपयोगी सिद्ध होगा, अत उन्होने प्राविष्कर्ता को अनुदान तथा पटेट देने का फैसला किया। लेकिन इस आविष्कार को गुप्त रखने के सभी प्रयत्न विफल हो गए क्योकि दूरदर्शक का समाचार तथा उसकी विधि अब तक सारे यूरोप-भर मे प्रचारित हो चुकी थी। 1609 मे पेरिस मे दूरदशक बिक्री के लिए लाए गए, और उसी वप मिलान, देनिस, पादुअआ और लदन में भी ये बिकने लगे। 1609 के मई के महीने मे गैलीलियोने सर्वप्रथम लिपरों के आविष्कार का समाचार पहले मौखिक रूप से तथा बाद मै एक पत्र द्वारा सुना । उसने स्वय भी दूरदशक बनाने का तुरन्त निश्चय क्यिा। पहले उसने प्रकाश- वक्रता के सिद्धान्त के अपने वैज्ञानिक ज्ञान को लागू किया अर्थात् उसने लेसो पर प्रकाश-किरणो को वक्रता की जाच को ताकि दूरदशक की कार्य-विधि ।

16 ज्यातिविमान में महान क्षण - को समझा जा सके । गहन अध्ययन के बाद उसने समस्या का हल निकाल लिया और अपना पहला दूरदशक बना लिया, ' मोमे की एक नली में दोनो मिरी पर मैंने दो लस जड दिए । दोनो एक तरफ तो ममतल थे, पर दूसरी तरफ से गोलाद्ध में प्रमश उन्नतोदर और नतोदर थे। नतोदर लस की अोर से देखने पर मुझे चीजें सतोपजनक म्प से बडी और नज़दीर दिखाई दी क्योकि अब वे मात्र तिहाई दूरी पर थी और माधारण दष्टि से देखने की तुलना मे नौ गुनी बड़ी थी। गंलीलियो द्वारा बनाया गया दूरदश ज्योतिर्विज्ञान में प्रयुक्त प्राजक्ल के वक्र-किरण दूरदगक जमा नहीं था जिसमे तारे तथा ग्रह और आकाश-मडल के अय पिंड झक्कर देखे जाते हैं बल्कि माधुनिक भापेरा- दूरबीन की तरह था जिममे दृश्य सीधे देखे जाते हैं । यह दूरदराव पादुप्रा मे बनाया गया था। वेनिस में सीनेट को भेंट परने के लिए गैलीलियो स्वय वहाँ गया। सेंट मार्यो की मीनार से सीनेट के पाश्चर्य मे डूबे सदस्यो ने समुद्र के क्षितिज के दशन दिए जिसके बारे में गैलीलियो ने लिखा है, ' मेरे जासूसी शीशे ने इतनी दूर के उन जहाजो को देख लिया था जो वदरगाह मे दो घंटे बाद प्रविष्ट हुए।' गलीलियो का वेतन तुरन्त दुगुना कर दिया गया पोर पादुमा की प्रोफेसरशिप उसे सारी उम्र के लिए दे दी गई। वह पादुमा वापिस लौट आया। यहां उसने दूसरा दूरदशक बनाया जिसमे वस्तुएँ पाठ गुनी बडी दिखती थी और फिर तीसरा यत्र बनाया जो वस्तुप्रो को बीस गुना वडा दिखाता था यानी एक मील दूर की चीजें सौ गज दूर नजर आती थी। उसके खोजी मन ने दूरदर्शक को प्राकाश की ओर कर दिया और तब पहली बार बृहस्पति ग्रह को एक मडलक के रूप मे देखा और चन्द्रमा को खुरदरे तथा पहाडी सतह के रूप मे। इसका जादू उसके मिर पर चढकर बोलने लगा वह उत्तेजित होकर चौथे दूरदशक के निर्माण मे जुट गया । वह लसो को पैना और पालिश करता रहा ताकि यह निश्चय किया जा सके कि बृहस्पति मडलक के ही समान है, चद्रमा की सतह पहाडी है और वृहस्पति के चार उपत्रहो और अब तक अज्ञात असल्य तारो की भी खोज की जा सके। ।

पाश्र्वरित सोनेट के सदस्य गेट मार्को रे दुम से सामुहिक तिज देखते हुए।

18 ज्योतिविज्ञान के महान क्षण उसकी पुस्तक 'तारो का सदेशवाहक' का, जिसमे उसकी ज्योति- विज्ञान सम्बन्धी खोजें हैं, पोडे-से लोगो द्वारा स्वागत हुआ और अधिकांश लोगो द्वारा सदेह, भय और विरोध की भावना प्रकट की गई। इस पुस्तक मे उसने पहली बार कापनिकस के सूर्य-केन्द्रित ब्रह्माड का खुले-ग्राम पक्ष लिया था। बृहस्पति के चद्रमानो का वणन करते हुए वह लिखता है 'उन लोगो का सशय दूर करने का हमारे पास बहुत ही पुष्ट तथा सीधा तक है जो सूय के चारो ओर चक्कर लगाने वाले ग्रहो के कापनिकस सिद्धान्त को तो सहन कर सकते हैं, पर पृथ्वी के चारो ओर एक चन्द्रमा की बात सोचकर ही इतना परेशान हो जाते हैं कि (जवकि ये दोनो ही एक वष मे सूय की परिक्रमा करते है) वे ब्रह्माड के इस मिद्धात को असम्भव मानते हैं।' दूसरे शब्दो मे, वह उन लोगो पर व्यग्य कर रहा है जो यह सोचते थे कि अगर चन्द्रमा सूय के चारो ओर चक्कर लगाता होता तो वह पृथ्वी से पीछे छूट जाता । अपनी इस छोटी-सी पुस्तक प्रकाशित करवाने से पूर्व गैलीलियो ने बेलीसारियो विण्टा को जनवरी 1610 के पत्र मे लिखा था कि मेडिशियन तारे (बृहस्पति के उपग्रहो के लिए उसके द्वारा दिया गया नाम) बडे ग्रह बृहस्पति के चारो ओर उसी तरह घूमते है जिस तरह शुक्र, बुध तथा सम्भवत अय ग्रह भी सूर्य के चारो ओर घूमते है । अत इसमे कोई आश्चय नही है कि पृथ्वी-केन्द्रित ब्रह्माड के समथको ने गलीलियो तथा उसकी खोजो को अस्वीकार करने का फैसला किया। लेकिन अब तक उसकी प्रतिष्ठा इतनी बढ़ चुकी थी कि उसे फ्लोरेस मे ग्रेड ड्यूक कास्मो डी' मेडिको का गणितज्ञ और पीसा मे प्रथम गणितज्ञ नियुक्त कर दिया गया । और उसने पादुका प्रपना पद त्याग दिया जिमसे उसको अध्यापन की जिम्मेदारी कम हो जाए पौर वह अध्ययन मे अधिक समय बिता सके । अब वह अपना निरीक्षण काय और भी तेजी से करने लगा तथा पपना ध्यान शनि, शुक्र तथा सूय की ओर लगाया। शनि ग्रह ने उसे बडी हैरानी मे डाल दिया। दूरदशक मे, जैसा कि हस्पति के अनुभव से वह जान चुका था, प्रकाश एक मडलक के समान स्फुटित हो रहा था तथा इसके अतिरिक्त दो अय छोटे मडलक, दोनो र से उसे छू रहे थे। कई महीनो के बाद ये दोनो बाा मडलक प्राकार ?" वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को चलाया 19 मे छोटे हो गए और दो साल बाद दिखने ही बन्द हो गए। इस बारे मे अपने मित्र वेसलर को लिखे गए पत्र में उसका असतोप साफ झलकता है। 'इस विचित्र कायाकल्प के बारे में क्या कहा जा सकता है ? क्या ये दोनो छोटे तारे सूय के धब्बो की तरह चुक गए है ? क्या ये अचानक समाप्त होकर गायब हो गए है ? क्या शनि ने अपने बच्चो को ही निगल लिया है, या इनका दिखाई देना एक धोखा था जिन्हे दूरदशक से मै स्वय तथा दूसरो को भी दिखाता रहा हूँ अपरिचित स्थानो के अन्वेपको का यह वह भय है जब परिचित चिह्न खो जाते है । सत्य के शोधार्थियो को भी यह भय होता है। वे डरते हैं कि अनजानी बातें उन्हें धोखा देंगी और भटकाएगी। परन्तु साथ ही यह वह माकषण है जो कुछ विशेष व्यक्तियो की शक्ति और कौशल को अज्ञात का रहस्य जानने की चुनौती देता है । गैलीलियो बाह्य मडलको के लुप्त होने और बाद मे प्रकट हो जाने के रहस्य को कभी नहीं सुलझा सका । उसके दूरदशक इतने शक्तिशाली नहीं थे। प्रसिद्ध डच ज्योतिर्विद् हेजस को अच्छे दूरदशक को प्राप्त करने के लिए चालीम वप प्रतीक्षा करनी पड़ी थी और तब उसने यह अनुभव किया था कि शनि ग्रह एक चौडे और चपटे वलय से घिरा हुआ है जो पृथ्वी और शनि की एक विशेष स्थिति मे लुप्त हो जाता है । गैलीलियो का शुक्र ग्रह से सम्बन्धित व्यवस्थित निरीक्षण 1610 ई से शुरू हुआ। उसी वर्ष के दिसम्बर महीने में उसने यह खाज की कि शुक्र की भी चन्द्रमा की भाति कलाएं है। कई सप्ताहो के बाद ग्रह का आमार पतली फांक से अर्धवृत्त मे बदल गया था और फिर पूर्ण होने तक बढता ही गया । इस अवसर पर शुक्र ग्रह सूय को चौध मे अदश्य हो गया था। कुछ समय बाद जब स्थिति अनुकूल हुई तो इसका पूण मडलर दिखाई तो दे रहा था, पर पतली फार मे बदलने तक यह घटता ही रहा । गैलीलियो ने यह भी गौर किया कि पूण मडलक दिखने के समय भी यह पतली फांक की तुलना मे छोटा ही था। वह इस निष्कप पर पहुंचा कि चन्द्रमा की ही तरह यह ग्रह भी सूर्य के प्रकाश से दिखाई देता है और सूय के दूसरी तरफ होने पर ही पूर्ण होता है । तब इसका चमकदार भाग पृथ्वी की पोर रहता ।

20 পাৰিবিন * ময়ান ও है। पृथ्वी केन्द्रित सिद्धान्त में टालमी ने मुझ को एक छोटे वृत्त धूमन हुए दिखाया था जिममा के पृथ्वी और सूर्य के बीच की एक रेखा पर स्थित था। लेकिन गुर मे मभी बताएं विद्यमान थी जैसा नि कानिक्स के सिद्धान में वर्णित था। गैलीलियों के लिए यह मत्य के प्रक्ट होने का क्षण था- उसके निरीक्षण का यह चरम विदु था । उसका यह विश्वास कि सूर्य केद्र है, न कि पृथ्वी, ठीक ही था । जैसा कि उसने लिखा है दो महत्वपूण ममस्यानो के बारे में अब हमारी इन्द्रियो को मान्य प्रमाण निश्चित रूप से प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनके बारे में कई विद्वान् विभिन निष्कर्ष देते रहे है । एक यह कि अन्य ग्रहों के समान ही शुत्र तथा बुध ग्रह सूर्य के चारों ओर धूमते हैं यह ऐसी सच्चाई है जो पाइयोगोरम के अनुयायियो, कापर्निकस और केप्तर को मान्य है, पर जो कभी भी इन्द्रियो द्वारा सिद्ध नहीं की जा सकी । पर शुक्र और बुध ग्रहो के उदाहरण से अब वह सिद्ध हो चुकी है। जून 1611 ई मे गैलीलियो ने सूय के धब्बो की खोज की। उसने खतरा उठाकर दूरदर्शक से सूय का निरीक्षण दिया जिममै मावधानी न बरतने पर गधे होने का डर था। इसके लिए उसने सूय के प्रतिबिम्ब को नेत्रिका के पीछे सफद परदे पर देखा या फिर इसके लिए विशेष नेत्रिकामो का प्रयोग किया । गैलीलियो को पहली विधि पसन्द थी, यह भी हो सकता है कि उसे दूसरी विधि ज्ञात ही न हो यद्यपि वह कभी सूय का निरीक्षण तब करता था जब उसकी चमक कम होती थी। उसे जल्दी पता लग गया कि ये धब्बे सूत्र के ही प्रश है और उनकी गति से उसने यह अनुमान भी लगा लिया कि मूय तीस दिनो मे एक धूमन पूरा करता है । क्योकि स्य धूणन के समय उनका आकार और परस्पर स्थिति बदरा जाती थी इसलिए गैलीलियो ने उहे मूय वातावरण के बादल मान लिया। उसके मुम्य निष्कप सही थे, लेक्ति आज हम इहें सूर्य की सतह की गरम गैस वे ववडर मानते हैं, जैसा कि गरम सलाख को पानी में । हालने से हाता है। गैलीलियो को खोजावी वढती हुई सूची के माथ साथ उसकी प्रसिद्धि भी बरती गई । उसकी खोजोबा मातार मारे पाप में फैल गया भोर चलाया 21 वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी हर स्थान के लोग आकाश-मडल की घटनाओ को देखने के लिए लालायित होकर स्वय भी दूरदशक बनाने की सोचने लगे। उसकी असली मुसीबते 1616 से शुरू होती है। अभी तक गैलीलियो दूरदशक द्वारा की गई खोजो को अपने तक तथा व्यग्य से पुष्ट करता रहा था और विरोधियो के असगत तकों को काटने मे भी उसे कोई विशेष कठिनाई नही होती थी। लेकिन यह बात ज्यादा दिन न चल सकी और प्रभावशाली क्षेत्रो मे उसके कई दुश्मन बन गए। लेकिन इसके बाद भी वह अभी सुरक्षित था। वह पिछले ही वप रोम गया था, तब पोप पाल पचम ने उसका हार्दिक स्वागत किया था और वह पोप की सभा के कई अन्य सदस्यो से भी मिला था जिनमे बारबेरिनी भी था जो शीघ्र ही पोप अवन अष्टम बनने वाला था। लेकिन जब वह कानिकस सिद्धान्त का खुले आम समर्थक हो गया और उसने पृथ्वी को ब्रह्माड के केन्द्र से विस्थापित कर दिया और पृथ्वी को भी सूर्य के चारो ओर चक्कर काटने वाला ग्रह मात्र सिद्ध कर दिया तब उसके शत्रुओ ने चच को उसके विरुद्ध कायवाही करने के लिए तैयार कर लिया। 1616 ई मे उसे चेतावनी दी गई कि वह यह मानना वन्द कर दे कि सूय ही ब्रह्माड का स्थिर के द्र है और पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती हुई सूय के चारो ओर घूमती है । गैलीलियो के विचार झूठ और ऊलजलूल करार दे दिए गए। पृथ्वी की गति की धारणा अधिक से अधिक एक सुविधाजनक गणितीय साधन हो सकती है, और कुछ नही । आगामी वर्षों में गैलीलियो ने अपनी खोजो और आलोचनापो को भरस्तू के भौतिकी के मिद्धान्तो तक सीमित कर लिया। उसने कई बार सूर्य-केन्द्रित ब्रह्माड के कापनिकस के सिद्धान्त को सिद्ध करने की प्राज्ञा लेनी चाही पोर पोप अर्बन से 1616ई का आदेश वापस लेने की प्रायना की। 1623 ई० मे उसने एक पुस्तक 'इल सेगिटोर' नाम से प्रकाशित करवाई। इसमे उसने बहुत ही मूक्ष्म स्तर पर कानिक्स के सिद्धान्तो का पक्ष लिया है और वैज्ञानिक तर्ष तथा प्रयोगो के सिद्धान्त की चर्चा की है। उसने यह भी लिखा है कि वैमानिक का कत्तव्य है कि वह विमो चीज़ को अंतिम न माने । 1632 में उमने अपनी पुस्तक 'डायलॉग ऑन दि टू प्रिसिंपल वल्ड सिस्टम्स' में मोर नी मागे को बातें कही है। इसमे उमने भरस्तू ये गति 22 ज्यातिविमान के महान क्षण और भौतिकी के मिद्धातो का खण्डन किया है तथा वापनिकम के सिद्धान्ता का उसी जोर और चतुरता स ममथन किया है । इस पुस्तक मे अरस्तूवादा, कानिक्सवादी और एक आम ग्रारमी के बीच वार्तालाप दिखाया है । पर चच के अधिकारियो की नजर से इसमा मूल उद्देश्य छिपा न रहा । अगस्त में पुस्तक जब्त कर ली गई और गतीलियो को राम जाने का आदेश दे दिया गया। फरवरी 1633 मे वह वहा पहुँचा और उस पर मुकदमा चलाया गया । लम्बी कायवाही के बाद उसे अपराधी घोपित करते हुए 22 जून 1633 को सजा सुना दी गई। इस ममय उसकी आयु 70 वप की थी तथा उसका स्वास्थ्य भी अच्छा नही रहता था। मानसिक क्लेश से वह अलग परेशान था। उसे यत्रणा की धमकी देते हुए कापनिकस के सिद्धान्तो को अस्वीकार करने के लिए विवश किया गया । यहा एक कथा प्रसिद्ध है, जो सम्भवत सत्य नहीं है, कि उठते समय उसने पृथ्वी के बारे मे कहा, 'फिर भी यह घूमती है ।' तब उसे फ्लोरेस के निक्ट उसीके घर म अनिश्चित काल के लिए कारावास का दण्ड दे दिया गया। उसने अपने जीवन के अतिम नौ वर्षों मे, लगातार विगडते हुए स्वास्थ्य और अधे हो जाने पर भी, वैज्ञानिक खोजो को जारी रखा । अपने एक मित्र को उसन लिखा था 'पाह, आपका दोस्त और सेवक गैलीलियो पिछले महीने अथा हो गया। अत यह आकाश, यह पृथ्वी, यह ब्रह्माड मेरे लिए ये मात्र शारीरिक सवेदन बनकर रह गए है।' उमको अतिम पुस्तक 'डायलॉग कसनिंग टू न्यू साइसेज' गति विज्ञान पर लिखा गया एक शोध-निवध है जिस पर आधुनिक भौतिकी की नीव रखी गई है। उसकी मृत्यु 1642 मे हुई और उसकी क्व पर स्मारक बनाने के लिए उसके मित्रो को मना कर दिया गया। कापनिकस के सिद्धात चच द्वारा अब भी अस्वीकार किए जाने थे और आगामी कई वर्षों तक अस्वीकृत रहे । लेकिन बिनान की लहर को पीछे नही धकेला जा सकता। अब और भी ज्यादा लोग बडे और बेहतर दूरदशकों के द्वारा गैलीलियो के पदचिह्नो पर चलने लगे तथा उमवी खोजो की पुष्टि तया विकास करते रहे जिससे यह सिद्ध होगया कि वह व्यक्ति जिसने पृथ्वी को चलाया था अतत विजयी हुआ।

दूसरा अध्याय अव्यवस्था से सुव्यवस्था जिस वष गैलीलियो की मृत्यु हुई, उसी वप क्रिसमस के दिन वूल्सथाप (इगलैंड) के एक जागीरदार के घर एक बच्चे का जन्म हुआ जिसके भाग्य मे दुनिया का शायद सबसे बडा वैज्ञानिक होना लिखा था। इस बच्चे का नाम था आइजक न्यूटन । आधुनिक दुनिया के लिए न्यूटन का ऋण अनुमान से बाहर है। गणित, प्रकाश विज्ञान, ज्योतिविज्ञान और गति-विज्ञान के क्षेत्र मे उसकी महत्वपूर्ण खोजो ने आज की स्थिति और विचारो को इतना प्रभावित किया हुआ है कि प्रसिद्ध गणितज्ञ लागरेज ने यहा तक लिखा है, 'न्यूटन-जैसा प्रतिभाशाली व्यक्ति आज तक पैदा नही हुआ। महान् ज्योतिविद् लैपलाम ने, जो स्वय भी असीम प्रतिभाशाली था, कहा है कि न्यूटन का वृहत् ग्रथ 'फिलासोफिया नेचुलिस प्रिसिपिया मैथेमेटिका, जिसे सक्षेप मे 'प्रिंसिपिया' कहा जाता है, मानवीय प्रतिभा को किसी भी रचना से सवश्रेष्ठ है। न्यूटन के प्रति ऐसे उद्गार प्रकट करने वालो की सूची बडी लम्बी है, इनमें लेबनीज, गाँस, वाल्जमन, माख, आइस्टाइन जैसे व्यक्ति भी है जिन्होने वैज्ञानिक क्षेत्र में स्वय भी कई महत्वपूर्ण खोजें की हैं, उन्होंने न्यूटन को निस्सदेह चरम प्रतिभा का धनी कहा है। हमारी वतमान दुनिया पाज भी अपने दृष्टिकोण मे न्यूटनवादी है। ज्योतिर्विज्ञान मे उसके द्वारा प्रयुक्त गति और गुरुत्वाक्षण सम्बधी नियम प्राज भी मान्य है और इन्ही नियमो के आधार पर अतरिक्षयात्री गगारिन, तितोव, ग्तन, कारपेंटर अपनी जान की बाजी लगाने को तैयार हो गए थे। ज्योतिविनान की आधुनिक दो शाखाएं खगोलीय यात्रिको और स्पेक्ट्रम विज्ञान (प्रकाश रगो से उत्पन्न सात रगो का अध्ययन करने वाला विज्ञान) न्यूटन की खोजो पर ही आधारित है जबकि न्यूटन द्वारा अन्वेषित मवकल . - 23 24 कहानी ये अनुमार उममे प्रतिभा-स्पुरण ये चिह्न तव तर उद्भामित नहीं 1 उसेता उत्तेजित कर दिया कि उमने लगन से मध्यवास करना प्रारम्भ ज्योतिविनान के महान क्षण गणित मौर समाकलन गणित से वैज्ञानिको की ऐसी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत हुआ है जिनका हल न्यूटन के समय तक लोगो को नहीं मालूम था। न्यूटन वस्तुत एक ऐसे व्यक्ति की तरह था जो, किसी प्रधेरे कमर मे मोमबत्तियो की मध्यम रोशनी में पेचीदा मशीनो को समझने की कोशिश मे लगे हुए लोगो को न केवल प्रकाश दिखाता है बल्कि हरेक चीज का म्पष्टीकरण भी कर देता है। इससे मशीनो की विधि का रहस्य खुल जाता है और फिर उनकी समस्याओ का महज हल भी मिल जाता है । न्यूटन का जीवन स्वभावत तीन भागामे वाटा जा सकता है--जीवन के पहले बाईस वप जव उमने विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की, इसके बाद के वाईस वप जिसमे उसने महान खोजे की तथा उह प्रकाशित किया और अन्तिम चालीस वष जबकि उसकी मुख्य जिम्मेदारी दफ्तर से सम्बधित काय था तथा जिम अवधि मे उसने अपनी पहली कुछ खोजो को आगे बढाया। यूटन के बाल्यजीवन के बारे मे बहुत कम जानकारी प्राप्त है। वह अपने पिता के बारे मे कुछ नही जानता था क्याकि जाम से कुछ महीने पूर्व ही उनकी मृत्यु हो गई थी। यह भावी ज्योतिर्विद् जम के समय इतना छोटा था कि उमकी माता कहा करती, 'मैं उसे तीन पाव के मग मे विठा सक्ती हूँ।' वह इतना कमजोर था कि उसके जीने की कोई प्राशा नहीं थी। स्वय के तथा विज्ञान के भविष्य के लिए वह इतना भाग्यशाली मिद्ध हुमा वि शीघ्र ही उसकी यह कमजोरी दूर हो गयी । बारह वप यो प्रायु मे उमे प्रथम के एक स्कूल में भेजा गया। एक हुए जर तप उसकी एव उद्दण्ड लय से मुठभेड नहीं हुई। उसरी विजय पर दिया और यह स्यून या प्रधान बन गया । गैलीलियो की भांति उम मगीनो या निर्माण करने म मजा पाता था सासतौर पर जनपडी और पूरपरी बनान में ! सम्भयत ज्योतिर्विमान से उमका पहना परिचय धूप पती दीदीमा को पाया या निरीगण परत हुपा था। गोदर यप मी प्राय में उमरे गौतेले पिता का दहान हो गया और . - 251 अव्यवस्था से सुव्यवस्था उसकी मां ने उसे बुला भेजा। इस विचार से वह कुछ वर्षों तक घर रहा कि सम्भवत वह भी अपने पूर्वजो की भांति एक किसान बन जाएगा। उसके चाचा ने यह समझते हुए कि उसकी खेतीबाडी मे कोई रुचि नहीं है उसे कैम्बिज यूनिवर्सिटी के निमित्त सुयोग्य बनाने के लिए वापस ग्रंथम भेज दिया। 1661 मे वह ट्रिनिटी कालेज, कैम्ब्रिज मे प्रविष्ट हुआ, जहाँ उसने गणित का अध्ययन किया। यहाँ तक हमे साधारण से कुछ अधिक योग्यता रखने वाले व्यक्ति का परिचय मिलता है। मानव मस्तिष्क इस ग्रह का अन्तिम अचिह्नित प्रदेश है और जब तक हमे इसकी कायप्रणाली के सम्बन्ध मे और अधिक जानकारी नहीं प्राप्त हो जाती तब तक हमारे लिए यह अज्ञान का विषय रहेगा कि क्यो कुछ प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति बाल्यकाल से ही प्रखर बुद्धि होते हैं और कुछ इसके अपवाद रूप लडकपन के पश्चात्, अकस्मात् ही नए तारो की भाँति प्रभा से देदीप्यमान हो उठते हैं । न्यूटन की प्रतिभा का उन्मेष बाईस या तेईस वर्ष की अवस्था मे हुआ। इस समय वह यूक्लिड की 'ज्यामिति के तत्व' नामक पुस्तक का अध्ययन करने मे व्यस्त था, जिसे उसने 'साधारण' की सजा से अभिहित किया। इसके साथ ही वह देकातें की 'ज्यामिति' पुस्तक का अध्ययन भी कर रहा था, जिसे समझने मे उसे पर्याप्त कठिनाई का सामना करना पडा । कुछ ऐसी रासायनिक अभिक्रियाएं होती हैं जो मात्र अय रासायनिक पदार्थों के सान्निध्य मे ही घटित होती है, जबकि वे रासायनिक पदाथ स्वय अपरिवर्तित रहते है। रसायनवेत्ता ऐसे रासायनिक पदार्थों को उत्प्रेरक कहते है। यूक्लिड, देकार्ते प्रभृति गणितज्ञो के मूल ग्रथो ने न्यूटन की महान मानसिक शक्तियो को जागृत करने मे उत्प्रेरक का काय किया। सन् 1665 तक असदिग्ध रूप से न्यूटन की गणित सम्बन्धी बहुत-सी खोजे हो चुकी थी। इसी वर्ष सावभौम गुरुत्वाकर्षण का विचार उसके दिमाग मे कौंधा। और इसी वष मृत्यु भयकर प्लेग का प्राकार धारण कर इगलैंड मे फैल गयी। इस पातक्कारी महामारी के कारण लदन और उसके आस-पास के जिले सत्रस्त हो उठे और उनकी जनसस्या अल्प होती गयी। राहगीरो को काली मौत की उपस्थिति से सतक करने के लिए शहर के संक्डो दरवाजो ।

26 ज्यातिविज्ञान के महान क्षण - . पर पास का चिह्न बना दिया गया। सकरी, तग, चकत्ते लगी टेढ़ी-मेढी गलिया को, मुर्दे ढोने वाली गाडी की आवाज, 'अपने मुर्दै लामो ।' की चीख मे भर देती। सक्रमण (छुआछूत) के भय से कम्ब्रिज विश्वविद्यालय को बन्द कर दिया गया। न्यूटन पूल्सथाप लौट गया जहाँ वह 1667 तक, यूनिवर्सिटी दुवारा खुलने के अठारह माह तक, रहा। यहा अपने जन्म-स्थान पर, गहन मनन व लम्बी चुप्पी और शान्ति के लिए पर्याप्त सुविधा होने पर, उसने ज्योतिविज्ञान, गणित और प्रकाश विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी महत्वपूर्ण खाजे की जिनके कारण मम्पूण मानव-जाति का दृष्टिकोण (भाग) परिवर्तित हो गया। कैम्ब्रिज वापिस लौटने पर उसने अपने इन अनुसन्धानी के मूलभूत विचारो पर विचक्षण ढग से काय करना प्रारम्भ कर दिया। प्रकाश-विज्ञान और गणित मे अपने किए हुए अन्वेपणो की सूची बनाते हुए, वूल्सथाप में व्यतीत किए दिनो की स्मृति मे न्यूटन ने लिखा "मोर इसी वप मैंने चन्द्रमा की परिधि पर गुरुवाकषण के प्रभाव पर विचार करना प्रारम्भ कर दिया था। यह जान लेने के पश्चात् वि किस भौति उस बल (force) का अनुमान लगाया जा सकता है जिससे घेरे के भीतर घूमता हुआ ग्लोब अपनी सतह को दबाता है मैंने केप्लर के ग्रहो के प्रावर्ती समयो के नियमानुसार यह निष्कर्ष निकाला कि वे बल, जो ग्रहो को उनवं घेरे ये अन्दर रखते हैं, उनकी त्रिज्यानो के वर्ग के व्युसमानुपाती होते हैं । ग्रहो वर्तीकाल उनको विज्या ये सेस्ववीमाल्टरेट अनुपात में हाता है । इस हग से मैंने पृथ्वी पर पाए जाने वाले गुरुत्वावपण यल की तुलना उस बल मे यो जो चादमा यो उमयो परिधि म रखने के लिए आवश्यक है, और मैंने ठोर उत्तर पाया । यह सब प्लेग के उन दो वर्षों 1665 और 1666 मे हुमा, वयोनि उन दिना में प्रवेषण पग्ने की अपनी भायु की चरम सीमा पर था, पौर का दिता गणित और दर्शन के अध्ययन में मैं धूगत मेद्रित था जितना उमरे पश्चात् पिर भी नहीं रहा।" पर, हमें यह समझने की पेष्टा सरनी चाहिए विधामवेषणों में म्यूटन लिग पारप प्रेरित मा । उस समय उमे सौर मान, गमित और mfarea से गापित छ सम्मो का शान था। तब मे पयाम यष पूर्व का मव्यवस्था से सुव्यवस्था 27 - गैलीलियो प्रसदिग्ध रूप से इस तथ्य को सिद्ध कर चुका था कि पृथ्वी एव अन्य ग्रह सूर्य के चारो तरफ घूमते है । बृहस्पति के उपग्रहो, चन्द्रमा की पहाडियो और सूय के धब्बो का पयवेक्षण करने से काफी व्यक्तियो ने अनुमान किया कि तारे, चन्द्रमा, सूय उन्ही तत्वोसे निर्मित हैं जिनसे पृथ्वी, और उनमे कोई विशिष्टता नही जिससे उन्हे दिव्य की सज्ञा दी जा सके । महान ज्योतिर्विद् केप्लर ने ग्रहो की कक्षा से सम्बन्धित तीन नियमो को विदित किया था जो न्यूटन को ज्ञात थे। प्रथम नियमानुसार किसी भी गह की कक्षा एक दीघवृत्त (ellipse) होती है जिसका एक फोकस (focus) सूय पर होता है । इस नियम से सूर्य के निकट ग्रहपथ का आकार ज्ञात हो जाता है। जब माली दीघवृत्ताकार फूलो की क्यारी बनाना चाहता है तो वह पृथ्वी मे कुछ दूरी पर दो कीले गाड देता है । दोनो कीलो के सिरो पर वह एक ढीला सूत्र बाध देता है फिर एक डण्डे से उस सूत्र को कडा कर देता है और सूत्र को कडा रखते हुए डण्डे को कीलो के पास-पास घुमाता है । इस तीसरे डण्डे के घुमाने से जो वक्र-रेखा बनती है उसे दीघवन कहते है। जमीन मे गडे दो डण्डो की स्थिति को 'foci' कहते है, उनको जितना एक-दूसरे के समीप गाडा जाएगा, दीघवत्त उतना ही वृत्त (circle) की प्राकृति के निकटतर होता जाएगा। दो पिन, थोडे से सूत्र और पेसिल के साथ, आप स्वय इसे करके देख सकते है। कई वर्षों तक मगल ग्रह के पथ का निरीक्षण करने के पश्चात् केप्लर ने इस प्रथम नियम का ज्ञान प्राप्त किया । बहुत-से ग्रहो की कक्षाए लगभग वत्ताकार मालूम पडती है किन्तु सही पयवेक्षण से स्पष्ट हो जाता है कि उनकी आकृतियाँ वास्तव मे विभिन्न असो की विषमता (eccentricity) (अर्थात् वृत्त से अलगाव) रखने वाले दोघवृत्त है । यह सौभाग्य की बात है कि केप्लर ने मगल ग्रह के पथ का निरीक्षण किया जोकि असामान्य रूप से दीघवृत्ताकार है। दूसरा नियम नक्षत्र के अपनी कक्षा मे धूमने के ढग की व्याख्या करता है। इसके अनुसार रेडियस वेक्टर (radus vector) (वह रेखा जो ग्रह को सूर्य से सम्बद्ध करती है) समान क्षेत्रो को समान समय मे पार 28 ज्योतिर्विज्ञान के महान क्षण कर लेती है। चित्र मे सूय S दीघवृत्त के एक फोकस पर है, दूसरा फोकस K है । जब A पर ग्रह के सूय के अत्यधिक निकट होने पर उसे परिसूयक (perihelion) पर कहा जाता है और F पर जब वह सूय से प्रयतम दूरी पर होता है तब उसे सूर्योच्च (aphelion) पर कहा जाता है । केप्लर के दूसरे नियम को सिद्ध करने के लिए यदि रेडियस वेक्टर SB, SC, SD और SE, जो ग्रह की चार अवस्थितियो के सम्बन्ध मे जानकारी देती है, ऐसी हो कि क्षेत्रफल SBC क्षेत्रफल SDE के बराबर हो तब B और C के मध्य ग्रह का व्यतीत किया समय असदिग्ध रूप से D और E के मध्य व्यतीत किए समय के बराबर होगा। लेकिन SB और SC रेखाए SD D E और SE रेखाम्रो से छोटी है इसलिए दो क्षेत्रफलो के वरावर होने के लिए परिधि खड (arc) BC को परिधि सड (arc) DEसे बडा होना चाहिए। इसलिए ग्रह की गति D और E के मध्य की अपेक्षा B और C की कक्षा मे अधिक होगी। परिसूयक पर जहाँ रेडियस वेक्टर छोटी है ग्रह तेजी से घूमेगा और सूर्योच्च पर उसकी गति धीमी होगी। उदाहरणत मगल ग्रह का परिसूयक वेग (perihelion velocity) 164 मील प्रति सेक्ड है और सूर्योच्च वेग (aphelton velocity) 13 6 मील प्रति सेकड है। इन दो नियमो को ज्ञात करने के लिए कुछ वर्षों के पश्चात् केप्लर ने सभी ग्रहो की कक्षामो से मम्बधित एक तीमरा नियम खोजा। जितना समय एक ग्रह अपनी कक्षा के साथ भ्रमण करता हुमा परिसूयक से दुबारा 29 मव्यवस्था से सुव्यवस्था परिसूर्यक पर पहुँचने मे लेता है, उसे परिभ्रमण का प्रावृत्ति-काल कहते है। यह समय सभी ग्रहो के लिए अलग-अलग होता है । पृथ्वी के सदर्भ मे यह अवधि एक वर्ष की है जबकि यमग्रह के सदर्भ मे 248 वर्षों की। दोघवृत्त कक्षा मे परिसूयक से सूर्योच्च की दूरी को प्रधान अक्षरेखा (major axis) कहा जाता है । इसके अतिरिक्त केप्लर ने यह भी ज्ञात किया कि ग्रहो के आवृत्ति-काल के वग उनकी प्रधान अक्षरेखागो के घनो (cubes) के अनुपात मे होते है। काय प्रारम्भ करने के लिए न्यूटन के पास यह तीन सम्यक् नियम थे। जेरेमीह होरोकस नामक नवयुवक द्वारा विज्ञात किए इस तथ्य के सम्बध मे भी, कि चन्द्रमा पहले दोनो नियमो का पूर्णत पालन करता है, उसे मालूम था। इसके अतिरिक्त गैलीलियो के प्रयोगो द्वारा वह स्वतन्त्र रूप से पृथ्वी के तल पर गिरती वस्तुओ के त्वरण के महत्व को जान चुका था। अन्य अनुस धानकर्ताओं को भी इन बातो के सम्बन्ध मे जानकारी थी । वे इस प्रश्न का समाधान ढूढ रहे थे कि 'वह कौनसी वस्तु है जो ग्रहो को सूर्य के चारो तरफ उनकी कक्षा मे और च द्रमा को पृथ्वी के चारो तरफ उसकी कक्षा मे कायम रखती है ?' केप्लर ने इस जिज्ञासा का आशिक समाधान प्रस्तुत किया था। गुरुत्वाकर्षण को उसने 'सगोत्री वस्तुप्रो की एक-दूसरे से मिलने और पाने की प्रवृत्ति' कहकर परिभापित किया। उसने गुरुत्वाकर्षण की तुलना चुम्बकत्व से की और मात्र इतना ही सुझाव दिया कि ग्रह अपनी कक्षा के भीतर किसी भांति के बल द्वारा धकेल दिए जाते हैं। अन्य व्यक्तियो मे एक अग्रेज़ वैज्ञानिक 'हुक' ने अनुमान लगाया कि यह बल के द्रीय सत्ता, जोकि रेडियस वेक्टर के साथ परिचालित (घूमती है) होती है, के आकर्षण के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता होगा जैसे कि रस्सी के एक सिरे पर बधा पत्यर सिर के ऊपर घुमाने पर भी तनाव के कारण नहीं गिरता। इस तथ्य के अन्वेषको मे से किसी को भी सही स्पष्टीकरण प्राप्त नहीं हुआ। इसके अतिरिक्त यदि किसी ने इस समस्या का समाधान पाया भी तो उसमे अपने हल द्वारा सभी तथ्यो का स्पष्टीकरण करने की क्षमतान थी। उनके पास गणित के मावश्यक उपकरण न थे। साधारणत भधिकतर 30 ज्योतिर्विज्ञान के महान क्षण व्यक्तियो का इन समस्याओं का समाधान ढूढने का ढग गलत था। जैसा कि हमने देखा न्यूटन ने न केवल उचित स्पष्टीकरण खोजा बल्कि अवकल गणित और समाकलन गणित का आविष्कार किया जोकि एक ऐसा गणितीय उपकरण है जिसका ज्ञान प्राप्त कर कोई भी प्रकृति के सापेक्ष दिए अपने स्पष्टीकरणो की जांच कर सकता है। उसने ऐसे वैज्ञानिक नियमो की खोज की जिनके द्वारा गणना की जा सके। तब वह इन नियमो को अकगणित के ढग से दूरी, गति इत्यादि की गणना करने के लिए प्रयुक्त करता था, यदि परिणाम उसके पयवेक्षण द्वारा प्राप्त नियमो के अनुरूप होते तो वह उन्हे मान लेता अन्यथा वह ऐसे नियमो मे अटके रहने की अपेक्षा अय नियमो को प्रयुक्त करता । श्रुति अनुसार एक दिन जब वह वूल्सथाप की वाटिका मे बैठा था तब उसने एक सेब को पृथ्वी पर गिरते हुए देखा । चिकित्सक और पुरातत्वान्वेपी न्यूटन के मित्र सोत्क्ले के मतानुसार, इस प्रतिभासम्पन्न वैज्ञानिक ने सेब के पृथ्वी पर गिरने के कारण पर मनन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पृथ्वी ने उसे अपने केन्द्र की ओर आकर्षित किया है, यदि एक पदाथ दूसरे पदाथ को आकर्षित करता है तो यह पदाथ के परिमाण के समानुपाती बल के साथ होना चाहिए, इसलिए सेब ने स्वय पृथ्वी को अपनी ओर आकर्षित किया। उसने इस विषय पर चितन करना आरम्भ कर दिया। क्या गुरुत्वाक्षण बल (force of gravity) सम्पूर्ण विश्व मे क्रियारत है, क्या चन्द्रमा पृथ्वी की प्राकषण शक्ति के कारण अपनी कक्षा मे कायम है जबकि अन्य ग्रह सूय के चारो तरफ सूय के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के प्रभाव के अन्तगत घूमते है । केप्लर के नियमो का उपयोग करते हुए उसने ग्रहा को उनकी कक्षाओ मे स्थित रखने के लिए अपेक्षित बल का अनुकलन करना प्रारम्भ किया और पाया कि प्रत्येक नक्षत्र के ऊपर बल को दूरी के वग के व्युत्तमानुपात मे मूय को दिशा मे क्रियावित होना पड़ता है । तब उसने गुरुत्वाकर्षण के नियम को चद्रमा पर प्रयुक्त किया। गैलीलियो के कार्यानुसार उसे ज्ञात था कि पृथ्वी के तल की कुछ फुट दूरी से कोई भी वस्तु पहले सेकड मे मोलह फुट नीचे गिरेगी, इससे वह वस्तु पर पृथ्वी के बल की गणना कर सकता था। उसे चद्रमा की दूरी भी ज्ञात थी जा अनुमानानुसार वृत्त ।

31 अव्यवस्था से सुव्यवस्था में पृथ्वी के चारो तरफ घूमता था। पूर्वगणनानुसार यह दूरी पृथ्वी के अद्धव्यास से 60 गुना थी। वह अपने गुरुत्वाकर्षण के नियम द्वारा, चन्द्रमा पर पृथ्वी द्वारा डाले गए वल और उसके परिणामस्वरूप वह पृथ्वी की ओर एक सेकड मे जितना गिरेगा, ज्ञात कर सकता था। उसने अपनी गणना को प्रवेक्षित मान से मिलाया और उनमे अपूर्ण समानता पायो । अवेक्षित और अनुकलित मानो मे अधिक विसगति नथो परन्तु न्यूटन के लिए वही पर्याप्त थी। उसने इस गणना को छोड़ दिया और स्वय को गणित एव प्रकाश-विज्ञान के अनुस धानोमे व्यस्त कर दिया । कुछ वर्षों पश्चात् फ्रेंच वैज्ञानिक पिकाड के पृथ्वी के अर्द्धव्यास का नया मान प्राप्त करने पर, उसने दुबारा उन गणनामो को किया। कहा जाता है कि वह इतना अधिक उत्तेजित हो उठा था कि सगणना को समाप्त करने मे उसे अपने मित्रो की सहायता लेनी पड़ी। इस बार प्रवेक्षित एव अनुकलित मानो मे समानता थी। सफलता ने उसे काय को आगे बढाने के लिए उत्साहित किया। सम्भव है कि पृथ्वी के प्रद्धव्यास के गलत मान की अपेक्षा इस तथ्य को सिद्ध करने की कठिनाई कि पृथ्वी जैसी वर्तुलाकार वस्तु दूसरी वस्तु को ऐसे आकर्षित करती है जैसे उसका सारा पदार्थ उसके केन्द्र (centre) मे सकेन्द्रित हो, इस गणना को पूर्ण करने मे देरी का कारण रही हो। कुछ भी हो यह कार्य पूरा हो गया था और गुरुत्वाकर्षण का नियम ज्योतिर्विज्ञान के साक्ष्य द्वारा प्रमाणित हो चुका था। यहाँ हम न्यूटन के चरित्र के सबसे विस्मयकारी पक्ष से परिचित होते हैं । स्वय को सतुष्ट करने के पश्चात् उसने ज्योतिर्विज्ञान के क्षेत्र मे नमा युगारम्भ करने वाले अन्वेषणो के परिणाम की जानकारी न किसी को दी और न ही उन्हे प्रकाशित कराने के लिए कोई प्रयास किया । बहुत-से आविष्कारक जब तक अपने शोषो को मान्यता प्राप्त सोसायटी जरनलो (पत्रिकाओ) मे लेख रूप में प्रकाशित नही करवा लेते, तब तक चैन नहीं लेते। यह भी स्पष्ट है जब तक कोई वैज्ञानिक प्राविष्कार (तथ्य) प्रकाशित नहीं किए जाते, ताकि वैज्ञानिक ससार उनका उपयोग कर सके, तब तक उसका कोई महत्व नहीं होता। इन परिणामों को प्रकाशित कराने की न्यूटन कीमनिया का मधुरा - 32 ज्योतिविनान के महान क्षण स्पष्टीकरण उसके कैम्ब्रिज लौटने के पश्चात् के कुछ वर्षों की घटनामो मे प्राप्त हो जाना है। प्रोफेसर आइज़क बरो ने उसे उसके अध्ययन मे अत्यधिक प्रभावित किया। वे विद्वान वैज्ञानिक, गणितज्ञ, शास्त्रीय अध्येता दृढ एवं दुबले-पतले थे। वे तैतीस वर्ष की आयु के थे जव न्यूटन का उनसे परिचय हुआ। जल्दी ही बैरो ने न्यूटन की प्रतिभा को पहचान लिया और 1669 मे उहोंने कैम्ब्रिज मे गणित के लुकेशियन प्रोफेसर के पद से त्याग पत्र दे दिया ताकि न्यूटन को उसका उत्तराधिकारी पुना जा सके। ऐसा हुआ, जिसके परिणाम- स्वरूप व्याख्यान देने के उपरान्त का सारा समय न्यूटन विज्ञान को दे सकने के लिए स्वतत्र हो गए। इस अवधि के बीच उन्होने नए ढग के दूरदशक का निर्माण किया जिसमे परावर्तक मे साधारणत लगे शीशे के लैस (glass lens) के स्थान पर दर्पण (mirror) लगा हुआ था। प्रकाश-विज्ञान के अनुसधानो से उह विश्वास हो गया कि आवतन टेलिस्कोप (Refracting Telescope) के दोषो को दूर नहीं किया जा सकता। उन्हे प्रकाश-विज्ञान पर विभिन्न लेख रॉयल सोसायटी को भेजने के लिए प्रेरित किया गया। इन लेखो की कड़ी आलोचना हुई, खासतौर पर विदेशी दाशनिको द्वारा। फलत न्यूटन लम्बे और ऊवा देने वाले पत्राचार मे व्यस्त हो गए जिनमे वे स्वाभाविक शालीनता और सहनशीलता के साथ अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने का प्रयास करते थे। इसी समय के लगभग उन्होने रॉयल सोसायटी के सेक्रेटरी अोल्डनबग को लिखा था "मनुष्य को या तो कुछ भी नया अवेषण न करने का प्रण करना चाहिए, नही तो उसे बचाने के लिए उसका गुलाम बन जाना चाहिए।" इन अनुभवो के कारण उन्होने सावजनिक जीवन को तिलाजलि दे दी । सिवाय व्याख्यान देने के वे अपना कमरा शायद ही कभी ही छोडते थे । अध्ययन मे वे इतनी गम्भीरता से जुटे रहते थे कि वे भोजन करना भूल जाते, लापरवाही से कपडे पहनते, जूत टखनो तक आधे पहने रहते मोर उनके बाल बिना कधी के रहते, कभी-कभी अपने छोटे बाग में टहलते-टहलते जैसे ही कोई सारगभित विचार उनके मस्तिष्क मे कौंधता, वे ऊपर भपने कमरे की ओर भागते । वास्तव मे वे, अब जिसे भुलक्कड

४५.yrInsar
१
नोट बनाने के लिए कभी-कभी ये सीढ़ियों से ऊपर, अपनी संर पूरी
छोडकर, नापते थे। वास्तव में थे, जिसे प्राज भुलक्कर
प्रोफेसर कहते हैं, यह यन गए थे।

34 ज्योतिविनान के महान क्षण प्रोफेसर कहते हैं, वह वन गए थे। भौतिकी एव ज्योतिर्विज्ञान में किए गए उनके विस्मयजनक अन्वेषण असीमित अवधि के लिए खो जाते यदि उनके मित्र और सहचर एडमड हैली न होते। 1684 के लगभग सर क्रिस्टोफर रेन और राबर्ट हुक के साथ हैली इस प्रश्न पर विमश कर रहे थे कि व्या सौर परिवार मे आकपण का व्युत्क्रम वग-नियम (Inverse Square Law of Attraction) का परिणाम ग्रहा की गति-सम्बधी केपलर के तीनो नियम देगा। रंन ने हुक और हैली को इसका प्रमाण देने के लिए कहा, पर दोनो असफल रहे । हैली कैम्ब्रिज मे जाकर न्यूटन से मिले और उन्होने पूछा कि यदि गुरुत्वाकर्षण बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपात मे हो तो ग्रह कौनसी वक्र रेखा बनाएंगे। यूटन ने अपने मित्र की ओर देखा और कहा, "दीघवृत्त ।" हैली के पूछने पर कि वे यह कैसे जानते है, उहोने कहा कि उन्होने इसकी गणना की थी किन्तु उनके कागज खो गए हैं। उन्हाने हैली से, सारी सामग्री को पुन अनुकलित करके उसे भेजने का वादा किया । वास्तव मे उन्होने उसे दो भिन प्रमाण (proofs) भेजे और इससे उहें ग्रहो की गति-सम्बधी एक छोटी-सी पुस्तक लिखन की प्रेरणा प्राप्त हुई। 'डी मोट्यू' ('गति पर') नामक यह पुस्तक जब हैली ने पढी तो उसने प्रारम्भिक महत्व के इन अन्वेषणो को ससार को देने का निश्चय क्यिा । अत्यधिक मजबूर करने पर न्यूटन मपने काय का पूरा विवरण तैयार करने के लिए उद्यत हुए । हैली द्वारा लगातार प्रेरित करने पर आगामी पद्रह महीनो मे उन्होने 'प्रिसिपिया' ममाप्त की। 1687 मे यह प्रकाशित हुई और रॉयल सोसायटी के पास कम चन्दा होने पर, हैली ने इसके प्रकाशन के निमित्त धन भी दिया। यदि गणितज्ञ और ज्योतिर्विद, अवेषक और चिकित्सक एडमड हैली ने अपने मित्र न्यूटन को 'प्रिंसिपिया' लिसने के लिए उत्तजित और उसके प्रकाशन की व्यवस्था करने के अतिरिक्त जीवन में कुछ भी न किए होते तो भी निस्मदेह य मानव-जाति की शाश्वत् तनता ये पात्र रहते । इस प्रतिभा• सम्मान पाय म यूटन कुशलता से प्राप्य सभी खगोलीय और भौतिक 35 - अव्यवस्था से सुव्यवस्था परिदृश्यो को छूते है, उन्हे व्यवस्थित करते है और उनकी व्याख्या करते हैं कि वे कैसे उसके सार्वत्रिक गुरुत्वाकपण और गति के तीन नियमो का अनुसरण करते है, नयी पयवेक्षित सामग्री का निर्देश करते है और गणितीय भौतिकी की इतनी गहरी नीव डाल देते है कि आने वाली ढाई शताब्दियो के गणितज्ञो, वैज्ञानिको और ज्योतिर्विदो के अधिकतर अनुसन्धानो का लक्ष्य सगतरूप से उनके सावनिक सिद्धात के परिणामो को विस्तार देने का रहता है। प्रिंसिपिया' की कुछ सामग्री निम्नलिखित प्रकार की थी उन्होने यह सिद्ध किया कि पृथ्वी जैसा चक्कर लगाने वाला ग्लोव अपने दोनो ध्रुवो पर भूमध्यरेखीय क्षेत्रो मे केन्द्रापसारी बल (centrifugal force) के कारण कुछ चपटा हो जाएगा जिससे उन क्षेत्रो (ध्र वो) में गुरुत्वाकषण बल कम हो जाता है । भूमध्यरेखा पर पदाथ का यह उभार चन्द्रमा और सूर्य से प्रभावित होगा जिससे पृथ्वी के घूमने की कीली की अग्रगति परिभ्रमित तल की कीली की भाति मद हो जाएगी और कोली शकु (cone) रेखाकित करेगी। 134 BC मे हिपाकस द्वारा विपुव-अयन (Precession of the Equinoxes) की सज्ञा से अभिहित यह व्यापार ज्ञात कर लिया गया था किन्तु ऐसा क्यो होता है, न्यूटन से पूर्व किसी ने इसका स्पष्टीकरण नही किया था। उन्होने बताया कि गुरुत्वाकपण और केप्लर के नियमानुसार ग्रह सूय के चारो ओर दोघवृत मे घूमेगा । अय ग्रहो के आकषण के प्रभाववश यह दीघवृत्त वर्षों मे परिमाण, आकार और दिशा मे थोडा मा परिवर्तित हो जाएगा। इस ढग से उन्होने बृहस्पति और शनि ग्रह के कक्षा में अब तक हुए अस्पष्ट परिवतनो को स्पष्ट क्यिा। उन्होंने यह भी बताया कि एक या उससे अधिक उपग्रहो वाले ग्रह के पिंड को कैसे मापा जाए। चद्रमा की कक्षा-सम्बधी एक अत्यधिक कठिन समस्या के बारे मे, जिसके सम्बध में न्यूटन ने एक बार हैली से कहा, "इसके कारण मेरा सर दद होने लगा, और मैं इतना अधिक अनिद्रित रहा कि मैंने उसके विषय मे सोचना बन्द कर दिया।" वे यह सिद्ध कर सके कि पृथ्वी के चारो मोर घूमने मे च द्रमा में जो व्यतिक्रम पाया जाता है उसका कारण सूय का आकर्षण 36 ज्योतिर्विज्ञान के महान क्षण - है । उन्होंने कुछ का निर्देश किया जिन्हें बाद मे निरीक्षण द्वारा सही प गया। उन्होने यह प्रमाणित कर दिखाया कि यदि किसी प्रक्षेप्य को पहाड के शिखर से काफी वेग के साथ फेंका जाए तो वह पृथ्वी के च ओर वृत्त या दोघवृत्त बनाता हुआ पहाडी पर लौट आएगा। वही टक्कर न होने पर वह पृथ्वी के चारो ओर अनन्त काल तक घूमता रहेग दूसरे शब्दो मे तीन सौ वर्ष पूर्व, जब कि न्यूटनीय विज्ञान प्रथम कृति उपग्रह को कक्षा मे फेक्ने जितनी प्रगति कर पाया, आइज़क न्यूटन ने इस सभावना का निर्देश कर दिया था। उन्होने ज्वारभाटा की क्रिया को गुरुत्वाकषण नियम का अतिरि परिणाम बताकर, इस विषय पर समस्त प्राधुनिक शोध की नीव डार और उसे स्पष्ट किया । उन्होने सिद्ध किया कि धूमकेतुप्रो की कक्षाए । इसी नियम के अधीन हैं और उनके मार्ग को अनुकलित करने की प्रणात भी बताई। इसके अतिरिक्त पुस्तक में द्रव्य-गति की अनेक समस्यामा के समाधान, बहुत-से विचक्षण प्रयोगो का आकलन, कलन के सिद्धान्त तथ अन्य मेधावी अनुसन्धान सम्मिलित है। अलेक्जेण्डर पोप की इस लघु कविता की कल्पनाशीलता का अव बोधन सहज ही हो जाता है प्रकृति और प्रकृति के नियम रात्रि के प्रकार में विलीन थे, ईश्वर ने कहा, 'यूटन हो,' और सभी कुछ ज्योतित हो उठा। कहा जाता है जब 'प्रिंसिपिया' का प्रकाशन हुआ तब केवलमात्र आधा दजन जीवित व्यक्ति थे जो वास्तव मे उसका अथ ग्रहण कर सकते थे। सम्भवत काफी व्यक्तियो ने जब उस पुस्तक को खरीदा-यह दस या वारह शिलिंग की थी--तब उन्होने अनुभव किया कि यह विज्ञान मे मील का पत्थर है। वे कदाचित् ही इस बात का अनुमान लगा सकते थे कि इस पुस्तक के प्रकाशन से साधारणत आधुनिक वैज्ञानिक ससार और विशेष रूप से माधुनिक ज्यातिविज्ञान का प्रारम्भ हुआ। जैसे ही पुस्तक का अथबोधन अधिक होने लगा, यूटन की स्याति, अव्यवस्था से सुव्यवस्था 37 । जो पहले ही अत्यधिक थी और बढ गयी। यूरोप-भर मे उनका यश फैल गया । यह प्रसनता की बात है कि उनके देश के नागरिक उन्हे प्राप्त करने योग्य थे। 1688 मे वे कैम्ब्रिज के एम पी निर्वाचित हुए। 1696 मे उहे मिट का वार्डन नियुक्त किया गया, जिससे उनकी पदोन्नति 1699 मे मिट के प्रधान के रूप मे हुई । इस पद पर उन्होने अपनी महान मेधा का उपयोग इगलड की पार्थिक व्यवस्था को व्यवस्थित करने में किया जो उम समय धन की कमी तथा अन्य दोपो के कारण अत्यन्त ही बुरी दशा मे थी। इस कार्य को अत्यन्त सुचारुता से निबाहते हुए भी वे वैज्ञानिक कार्यों मे सलग्न रहने का समय निकाल लिया करते। 1703 मे वे रॉयल सोसायटी के प्रेसीडेंट निर्वाचित हुए, इस पद पर वे मृत्युपयन्त रहे । 'ऑपटिक्स' के प्रकाशन के वर्ष- भर पश्चात् सन् 1705 में इन्हे 'नाइट' की उपाधि दी गयी। यूटन की विनम्रता और नैसर्गिक विनय को अभिलिखित करना भी आह्लाद का विषय है । "यदि मैं अन्य व्यक्तियो की अपेक्षा दूर तक देख सका हूँ, तो उसका कारण है, क्योकि मैं बृहद् प्रतिभानो के कधो पर खडा रहा हूँ।" उहोने एक बार कहा, निस्सदेह अन्य व्यक्तियो मे गैलीलियो, केप्लर और देवात्तै को भी सम्मिलित किया गया है। और जब वे एक वृद्ध व्यक्ति थे तब उन्होने कहा "मैं नही जानता ससार को मैं क्या प्रतीत होऊँगा, विन्तु स्वय को मैं समुद्र के किनारे खेलते एक वालक के समान लगता हूँ, जो कभी-कभी साधारण से अधिक चिक्ने और चमकदार पत्थर एव सीपी सोजने के लिए अपना ध्यान बांटता है, जबकि सत्य का अगाध जलधि मेरे मम्मुख अनवेषित पडा है।" उनका देहान्त सन् 1727 मे हुमा । राष्ट्रीय हीरो वे उपयुक्त उनकी अत्येष्टि क्रिया हुई । उनका शव इगलैंड के लार्ड हाई चासलर, दो ड्यूको तथा तीन सामन्तो द्वारा वेस्टमिन्स्टर ऐबी के अन्तिम विधाम-स्थल पर से जाया गया।

तीसरा अध्याय अन्तरिक्ष से एक आगन्तुक अठारहवी शताब्दी के प्रारम्भ मे मनुष्य रात्रि मे नभ के परिवर्तित होते गोचर दृश्यो को नयी अन्तर्दृष्टि से देख सकता था। सुदूर स्वर्ग के पार, नभमण्डल मे टिमटिमाते हीरो की भांति विसरे हुए तारे अभी भी पूर्व मे उदय होते और ऊपर प्राकाश मे बहुत बडे परिधि खण्डो मे चढकर पश्चिम मे चले जाते या ध्रुव तारे के इर्द-गिर्द अपना रात्रि-वृत्त बना लेते । उनकी प्रत्यक्ष गति मात्र पृथ्वी ग्रह के अपनी धुरी पर दिन मे एक बार घूमने का परावर्तन थी, वह धुरी जो ध्रुव तारे के प्रति सनिक्ट पडोस की ओर इंगित करती थी। अभी तक मात्र इतना शात या कि तारे एक स्थिर पारदशक स्फटिक पिंड पर जड़े हुए हैं । इस पृष्ठभूमि पर ग्रह सावधानी से विचरण करते, ठीक समय पर राम, बैल, जुड़वां इत्यादि अपने सुपरिचित ग्रहो के समूह मे प्रवेश करते और कभी-यभी कुछ ममय के लिए बडे-बडे फदो (loops), जो कि मॉपनिरस के अनुसार सूय ये चारो मोर पृथ्वी को वापिक गति में परावतन थे, में अपने पदचिह्नो पर वापिस लौट जाते। प्रत्यत मन्छे ढग से निर्मित टेलिस्यता मे डाये महलों पर चिह्न दिखाई देते जनि यो प्रहा, गृहस्पति और पनि रे पपी पद्रमा-परियार थे, पार पहले से पार पाच दूसरे में । पदमा रे पोप में पा जान मे पभी-कभी मूर्य यो रोगनी मान्छादित हो जाती, गरो पृष्यी पी प्रतिन्दामा रे ग म पृथ्वी या पद्रमा का ग्रहा लग जाना, जर निपान ऐगी पटनामा मानिम्नलिवासा रिया जा सरना है। गंमोरियो, अमर प्रभृनिप्पणियों द्वारा यष्ट से सानिन पपर्याय गामी म जरयाग द्वारा यूटा पायो अनुमपा ने घर प्रम्पपापा में गुमाया पारिदिपा पा मोर गूप, म:मा तपाणी ग पापोंगे गाराम गुरुवार रामगामी गिरा दिया अन्तरिक्ष से एक मागन्तुक 39 था। निस्सदेह शताब्दियो का काय अभी शेष था जिससे इन प्राकाशन -पिंडों को प्रवेक्षित गति पर छुपे हुए या अक्सर अप्रत्यक्ष रूप से गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पडता है, यह सिद्ध किया सके, फिर भी साधारणत न्यूटन के युग के व्यक्तियो को इसमे कोई सन्देह नही था कि सौर-परिवार एक बहुत बड़ी घडी है जो गुरुत्वाकषण के वाच-स्प्रिंग द्वारा नियत्रित होती है और जिसे मनुष्य अपनी मेधा द्वारा समझ सकता है । केवल एक प्राकाशीय घटना इस नियम मे अन्तनिहित नहीं थी। शताब्दियो से असमय होने वाले इस चमत्कार ने मानव-जाति को भयभीत और त्रासमय कर रखा था जब से उन्होने प्रथम बार सिर उठाकर आकाश की ओर देखा और उसके प्रथग्रहण की चेष्टा की। तारो से भिभ, बिना किसी पूवचेतावनी के रोशनी का एक बिन्दु दिखाई देता, यह रोशनी आकृति मे असामान्य रूप मे बढकर लम्बी चमक- दार पूछ बन जाती जो सुदूर आकाश मे ध्वजा की भांति मालूम देती। अधविश्वासी व्यक्तियो को यह खड्ग या नाग की प्रतीति देती और किसी भयकर दुर्घटना जैसे प्लेग, बाढ या आक्रमण की पूर्वसूचना का चिह्न जान पडती। आदिम मानव का जीवन इतना सकटग्रस्त और पराश्रित था कि ये दुर्घटनाएं इस अपशकुन के कुछ समय पश्नात् सचमुच घटित होती जिससे मानव का विश्वास, वि यह दुर्भाग्य का सकेत या उसका कारण थी, प्रमाणित हो जाता । जैसे-जैसे माह व्यतीत होते जाते इस दिव्य अतिथि की दीप्ति बढती जाती और जिस रहस्यमय ढग से यह प्रत्यक्ष होता था उसी भौति घटने भोर विलुप्त होने से पूर्व यह दिन के समय भी दिखाई देने लगता। धूमकेतु कही जाने वाली ये चिंताकारी वस्तुएं टाइको ब्राहे भोर केप्लर जैसे प्रतिभासम्पन्न विद्वानो के लिए मी विस्मय के स्रोत रही, जिन्होंने इनको प्रकृति का अनुस धान कर रहें विश्व-सरचना के अपने सिद्धान्तो में भवस्थित करने का प्रयास किया। एक सुझाव यह दिमायाकि हो सकता है कि ये पृथ्वी के ऊपरवायु- मडल की प्रमिासकवाप्पटारा निर्मित हुएहा। किन्तु 1577 मे एक दीप्तिमान धूमसेतु के निरीक्षण द्वारा ब्राहे ने इस विचार को निर्मूल सिद्ध कर दिया, जिसने यह प्रमाणित किया, कि वे चाहे कुछ भी थे किन्तु उनकी दूरियो ..

40 ज्योतिविज्ञान में महान क्षण ऐसी पी जिनके कारण उन्हे ग्रहान्तरीय अन्तराल का वास्तविक निवासा माना जा सकता पा। कान्स्टैण्टिनोपल को तुर्को द्वारा विजित कर लेने के कुछ ही वर्षो पश्चात् 1456 मे, कृपाण की आकृति मे बने ज्योतिर्मान धूमकतु को उपस्थिति ने यूरोप निवासियो को सत्रस्त कर दिया, तुर्को की अधीनता के नीचे रहते हुए, भातककारी तुओं और इसे निशेष करने के लिए प्राथनाए की गयी। न्यूटन से पूर्व भी निस्सदेह बहुत-से ज्योतिर्विदो ने धूमकेतु की प्राकृति पौर उसकी कक्षा-सम्बधी जानकारी प्राप्त करनी चाही। किन्तु अत्यन्त कठिनता से प्राप्त उनके परिणाम अनिश्चित थे। महीनो धूमकेतु के सिर की स्थिति तारो की पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य मे मापी जाती । उदाहरणस्वरुप पोलो टोसकेनली ने, जो क्रिस्टोफर कोलम्बस का भौगोलिक परामशदाता बना, अत्यन्त सावधानी से 1443, 1449 और 1456 मे तारोके परिप्रेक्ष्य में धूमकेतु की स्थिति का निरीक्षण किया। पृथ्वी की कक्षा की आकृति ज्ञात होने के कारण, ज्योतिर्विद् अन्तरिक्ष मे धूमकेतु के माग का अनुमान लगा सकते थे, किन्तु दूरी की सही जानकारी न होने के कारण, माग की अस्पष्ट प्राकृति का अनुमान ही लगाया जा सकता था। टाइको ब्राहे और माइकल मेस्तलीन का विचार था कि 1577 के धूमकेतु का माग सूय के चारो ओर वृत्ताकार या जब कि केप्लर के मतानुसार 1607 और 1618 क धूमक्तु विभिन्न गति साथ अन्तरिक्ष मे सीधी रेखायो म धूमे है । 'धूमकेतुओ का अज्ञात भ्रमण' जैसा कि एक इगलिशमन ने कहा, अन्य ज्योतिर्विदा के मतानुसार प्रत्यधिक लम्बे दोघवृत्तो या परवलयो मे हो सकता है । एडमड हैली के इस ओर ध्यान देने से पूर्व इन वस्तुप्रो की यह हैली, जिससे हम एक सच्चे मित्र के रूप में परिचित हो चुके हैं पौर जिसने न्यूटन को प्रिसिपिया लिखने के लिए उत्तेजित किया, अपनी क्षमता से अपने समय का प्रतिभाशाली वैज्ञानिक भी था । पयवेक्षित एव सैद्धान्तिक ज्योतिविनान, गणित, आक्षण शक्ति, नौ-विद्या, भापानो का मध्ययन, इतिहास और जियोफिजिक्स मे उसकी उपलब्धियो की सूची एक प्रत्यमा सुदृड चरित्र वे जिनासु मस्तिष्व का प्रारूप खीच देती है। जब यह स्थिति थी।

41 अतरिक्ष से एक आगन्तु ज्ञात होता है कि काफी वर्षों तक रॉयल सोसायटी का सेक्रेटरी हात हुए और पद-सम्बद्ध कायभार को वहन करते हुए, उसने अपने वैज्ञानिक अनुस धानो के मध्य लम्बी सामुद्रिव यात्राएं की अपने जहाज का कैप्टन रहा और काफी बार सम्राज्ञी ऐन द्वारा एड्रियाटिक, ओसनबर्ग हालैंड, हेनोवर और वियाना भेजा गया, तव आश्चय होता है कि उसने इतना सब उपलब्ध करने के लिए समय कहा से खोज लिया। वह 1720 से 1742 तक दूसरा रॉयल ज्योतिर्विद् भी रहा। सम्भव है, 1680 मे, चौबीस वर्ष की वय मे, अपने स्कूल के मित्र के साथ महाद्वीप का भ्रमण करते हुए, हैली को रचि धूमकेतु मे उत्पन्न हुई हो। कैले और पेरिस की सडक के मध्य मे उसने 1680 के धूमकेतु का अवलोकन किया। दूसरे विषय बीच में आ पडने के कारण वास्तव मे 1695 से उसने धूमकेतु-सम्बधी अनुस धान करने प्रारम्भ किए। पिछली दो शताब्दियो की पयवेक्षित सामग्री और अपो मित्र न्यूटन द्वारा 'प्रिसिपिया में शात किए नियम और गणितीय उपकरण उसे उपलब्ध थे। वास्तव में वह पहला वैज्ञानिक था जिसने उन निष्कर्षों का उपयोग किया। अतरिक्ष मे धूमवेतुओ को कक्षामो का अनुक्लन करने पर वह इस निष्क्ष पर पहुँचा "मैं सोचता हूँ इससे स्पष्ट और कुछ नहीं हो सकता नि धूमकेतु परवलयिक के निकट बढते हुए सूय के चारो ओर गोलो में घूमते है।" वह अगले दस वर्षों तक इसी दिशा मे अनुसन्धान करता रहा जो उन दिनो थका देने वाले परिश्रम का काय था, उसने चौबीस धूमकेतुप्रो की कक्षाओ को गणना की। इस अतिरिक्त उसने समय खोज निकाला गणित पर अनेक लेख प्रकाशित करवाने, चन्द्रग्रहण का निरीक्षण करने, चेस्टर म मिंट के उपनियत्रक के रूप में अपना कर्तव्य वहन करने और दो सम्पूण सामुद्रिक यात्राएँ करने का-एक बारबाडोस और दूसरी अण्टार्कटिक, जहा उसने "ग्राश्चयचक्ति कर देने वालीऊँचाई और मान बडे-बडे वफ के द्वीप, जिनके सम्बध मे मुझे कुछ लिखते भी भय लगता है", देखें । उसने इगलिश चैनल का निरीक्षण भी किया और सम्राज्ञी ऐन के आदेश पर एड्रियाटिक और ट्रोस्टे, इन हिम्सा के अधिकारियो को क्लेिबन्दी की कला पर सुझाव देने के लिए भी गया।

सड़क पर उसने 1680 के महान धूमकेतु को देखा।

43 मतरिक्ष से एक भागन्तुक 1705 मे इस अश्रान्त व्यक्ति ने अपने धूमकेतु के अनुसन्धानो के निष्कर्ष रॉयल सोसायटी को भेजे । कक्षा की सगणना के अध्ययन से उसने लक्षित किया कि उनमे से कुछ मे अत्यधिक समानता है। उदाहरणत 1531, 1607 और 1682 के चूमकेतुनो की कक्षामो मे अद्भुत समानता थी। उसने यह भी नोट किया कि 1531 से 1607 में 76 वप का अन्तराल है जबकि 1607 से 1682 मे 75 वर्ष का । क्या यह सम्भव है कि ये तीन धूमकेतु वास्तव मे वही एक ही धूमकेतु हो-सूर्य के चारो तरफ लम्बे खीचे हुए दीर्घवृत्ताकार कक्षा मे घूमती हुई वस्तु जिसे सूय के चारो तरफ चक्कर लगाने मे 76 वप लगे अपनी सूची को देखते हुए उसने पाया कि 1456 मे 1531 के धूमकेतु से 75 वर्ष पूर्व एक दीप्तिमान धूमकेतु दिखाई दिया था। इस तिथि से इस धूमकेतु की पृथ्वी के सान्निध्य मे बहुत पहले की उपस्थिति प्राप्त हुई। किन्तु चक्कर लगाने का प्रोवर्ती समय कभी 75 वप और कभी 76 वर्ष क्या है? हैली ने शीघ्र ही जान लिया कि आवर्ती समय का परिवर्तन बड़े ग्रहो बृहस्पति और शनि की गुरुत्वाकर्षण क्रिया के कारण होता है । यदि धूमकेतु इनमे से किसी भी ग्रह के निकट से गुजरता है तो उसकी कक्षा मे हल्का सा परिवतन होता है जिससे उसके घूमने का प्रावर्ती काल अधिक या कम हो जाता है। कितना परिवतन होने पर धूमकेतु 76 वप का प्रावर्ती समय लेगा, हैली इसकी गणना न कर सका । चूकि अन्तिम बार वह 1682 मे दिखाई पड़ा था, उसने प्रक्थन किया कि अब वह 1758 मे वापिस लौटेगा । वह जानता था कि वह उसे लौटता हुआ देखने के लिए जीवित नहीं रहेगा, इसलिए उसने उन व्यक्तियों से जो उसे देखेंगे कहा, "इसे स्वीकार परेपि यह प्रक्षन सबसे पूर्व एव मग्रेज ने दिया था।" हैली अपनी सफल जीवन-वृत्ति में निरन्तर सलग्न रहा और जीवन ये पन्तिम दिनो तक क्रियाशील रहा। 1716 में उसने पुरा धूमकेतु-पक्षा की समस्यामों में रुचि लेते हुए बताया रि जो धूमयेतु सन् 1378 मे दिमाई पहा था वह उसके धूमकेतु के पूर्वागमन पी तिपि हो सकती है। महृदय, दयालु और लोकप्रिय इम पक्ति की मृत्यु उसके घूमरेतु से मोटने से सोलह वर्ष पूर्व सा 1742 मे सियासी नपं को प्रायु मे हुई। भनेर विमानो मे उसमे मूल्यवान सहयोग ने उसरे मनुपापियों को, शोष- 44 ज्योतिविज्ञान के महान क्षण कार्य के लिए प्रेरित किया। महान गणितज्ञ कलेरॉट ने, जब उसके धूमकेतु के पुनरागमन का समय निक्ट आ गया, उसको परिसूयर पर पहुँचने की सही तिथि को सगणना प्रारम्भ कर दी। यह मानकर कि यह वही धूमकेतु है जो 1531, 1607 और 1682 मे प्रकट हुआ था, वृहस्पति और शनि के गुरुत्वाकर्षण का आकर्षण उमके मध्यान्तर वर्षों की कमी या वढोतरी का कारण होने से यह विराम 76 वष से अधिक या 75 वष से कम भी हो सकता है अर्थात् वह पहले भी, 1757 मे, प्रकट हो सकता है। अनुकलन करने का मात्र एक ही ढग था 1607 की कक्षा से लेकर 1682 मे उसके साखिरी वार प्रक्ट होने की तिथि से आगे उसकी प्रगति के छोटे-छोटे और मवद्ध अन्तगलो की सगणना करना । प्रत्येक अन्तराल के प्रारम्भ मे दो बरे प्रचड ग्रहो की वजह से स्थिति-परिवतन का अनुकलन किया जाता जिसमे आगामी अन्तराल पर धूमकेतु की स्थिति ज्ञात हो जाती। इससे अत्यधिक सगणना करनी पड़ती। कलेरॉट त्वरा से काय-सलग्न रहा हमेशा यह सोचते हुए कि कही धूमकेतु घोपित तिथि से पूर्व ही प्रकट न हो जाए। उमके इस वाय में प्रतिभाशाली गणितन ममे लेपोते ने भी सहयोग दिया। खाने का समय निकालने के अतिरिक्त वे दिन-प्रतिदिन सामना करने म व्यस्त रहे, 1758 की शरद् ऋतु मे वे इसका हल प्राप्त कर सके। प्रचट ग्रहो के प्राक्पण के वारण इस परिभ्रमण मे पूवपरिभ्रमण से धूमकेतु 600 दिन अधिक लेगा और देर से प्रकट होगा। अपनी कक्षा में सूर्य के अत्यधिय मनिक्ट अप्रैल 1759 में एक माह पूर्व या बाद में पहुँचेगा। किन्तु वास्ना में सबसे पहले यह एक नए ज्योतिविद् द्वारा मदन पिट 1758 ये निगमम दिन पर देखा गया। गूय के आस-पास भूलने हुए अतरिया का यह अतिथि अपने परिम्यक पर मान 1759 में पहुँच गया था और मौर परिवार के मुदूर धन प्रकार में विलुप्त होने से पूर्व जून तर दिपाई देना रहा। जी इस प्रवधारणा री पुष्टिा गयौ और इसरो यूटनीय विना पो गयी विजय ग्थापना हुई। तब मे धमोतुमा को भी गुरुवार रायमापीर मामा लगा। यानी तलिये पार तेजी से अन्तरिक्ष से एक भाग तुक 45 चमकते हुए दिखाई देते है, केवल अनभिज्ञ और अविश्वासी ही उहे भय का द्योतक मानते है। अब ज्योतिर्विद् इन आकाशीय अतिथियो के सम्बन्ध में अधिक जानकारी रखते हैं। स्पेक्ट्रोस्कोप (Spectroscope) एक ऐसा यत्र है जिससे तारो और घूमकेतुप्रो से विकरित प्रकाश की जाच की सकती है और वह किस वस्तु से निर्मित हुए हैं यह मालूम किया जा सकता है । धूमकेतु, बफ मे बन्द जमी हुई सम्पिण्डित चट्टानो और धूल के कणो, नोकदार पत्थरो द्वारा निर्मित लगते हैं। जैसे ही धूमकेतु सूय के निकट पहुँचता है, तीखा सौर विकिरण बर्फ को पिघला देता है जिससे धूल और गैस की चमकदार पूछ धूमकेतु के प्रमुख भाग से प्रवाहित होने लगती है । धूमकेतु सूय के चारो ओर जब झूलता है और अपने पडोस को छोडता है तब विकिरण दबाव के कारण धूमकेतु से दूर धकेली हुई पूछ उसका मार्गदर्शन करती है। धीरे-धीरे वह समाप्त हो जाती है क्योकि धूमकेतु अन्तरिक्ष की गहराई मे विलुप्त होता जाता है और वर्फ एक बार फिर चट्टानो के टुकडो को बन्दी बना लेती है । ऐसी प्रक्रियाएं आज बहुत अच्छी तरह समझी जाती है फिर भी देदीप्यमान धूमकेतु का प्रत्यक्षीकरण मनुष्य को विस्मय से भर देता है। 1758 मे घूमकेतु के वापिस लौटने की प्रथम पूर्वघोषणा के पश्चात् यह पृथ्वी के सानिध्य मे 1835 और 1910 मे दो बार पुनरागमन कर चुका है । महान वैज्ञानिक और न्यूटन के मित्र एडमड हैली की स्मृति दिलाते हुए, दोनो अवमरो पर इसने मनुष्य जाति के ध्यान को अपनी ओर केद्रित कर लिया। अब यह 1986 मे फिर दिखाई देगा और निश्चय ही यह दृश्य प्रतीक्षा करने योग्य है।

चौया अध्याय उड़ती पताका का रहस्य धूमकेतु भी नियम और व्यवस्था के अन्तर्गत आते हैं । इस तथ्य का ज्ञान होने पर ज्योतिर्विदो को निश्चय हो गया कि उनकी सौर परिवार की कल्पना मूलत सही है । न्यूटन के गुरुत्वाकषण के नियमानुसार, ग्रह सूय के चारो ओर परिभ्रमण करते हैं, चन्द्रमा पृथ्वी के चारो तरफ घूमता है और अन्य चन्द्रमा अपने ग्रहो के इर्द-गिर्द इसी सवव्यापी नियमानुसार घूमते हैं, यहाँ तक कि धूमकेतु भी इसी नियम के अधीन थे। निस्सदेह ग्रहो और च द्रमा को गति मे कुछ लघुदोलन और तरगें थी जिनका न्यूटनीय विज्ञान के गणितीय प्रयोग से अभी तक स्पष्टीकरण नही हुआ था जिस वजह से कुछ स्तभित करने वाली समस्याएँ भी उठ खडी हुईं जिनका अभी तक कोई हल नही प्राप्त हुमा था। फिर भी साधारणत यह सोचा जाता था कि सौर परिवारका रहस्यान्वेषण करने का ढग प्राप्त हो गया है । अज्ञान के शत्रु को मात दे दी गयी है, अब सभी कुछ स्पष्ट करने के लिए मात्र अत्यधिक परिश्रम से लम्बी अवधि तक काय करने की आवश्यकता है। अपनी इस विशिष्ट समस्या द्वारा विमूढ करते हुए, शताब्दियो से चमकते तारे हमेशा की भांति निमलता से चमकते रहे । आगामी शताब्दी मे इस समस्या की ओर मनुष्य का ध्यान तीव्रता से आकर्षित हुआ। पृथ्वी को केन्द्र मानकर सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहो को उसका परिभ्रमण करता हुआ मान लेने से यह समस्या नही उठती थी, किन्तु यह मानने से कि पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य के चारो ओर घूमती है यह समस्या उठ खडी होती थी। समस्या तारकीय लम्बन के प्रत्यक्षत न होने की थी। अपने हाथ की एक उगली ऊंची करके अपने चेहरे से अठारह इच की दूरी पर रखें। अपनी एक अखि बन्द करके अपनी उगली को तब तक धुपाएं जब तक दीवार की कोई वस्तु जैसे कोई फोटो या स्विच, उसके द्वारा 46 -------- 47 A सहती पताका का रहस्य छिप न जाए। अब खुली आंख को बन्द कर लें और वन्द आँख को खोन दें, उगली हटी हुई मालूम होती है । वास्तव में यह प्रतीयमान हटाव दृष्टि विचलन के कारण होता है। अब इसी प्रयोग को उगली को चेहरे से आठ इच की दूरी पर रख- कर करें। अब यह प्रतीयमान हटाव बडा हो जाता है, इससे सिद्ध हुमा कि उगली जितनी दूरी पर होगी, लम्बनीय हटाव (जैसा इसे कहते हैं) कम होगा। दरअसल मे व्यक्ति के घूमने पर लम्बनीय हटाव केवल निकट की वस्तुओ मे होता है। उदाहरणत झूले या सी सॉ या चक्करी पर से किसी भी व्यक्ति को अपने पडौस के लोगो या वृक्षो को अवलोकित करने से, वे सुदूर के पहाडो की पृष्ठभूमि मे ऊपर-नीचे या इधर-उधर होते प्रतीत होते हैं। कोपरनीय सूय-केन्द्रित विश्व के विरोधियो द्वारा यह बहुत पहले ही इगित किया जा चुका था कि यदि पृथ्वी प्रत्येक वर्ष अपनी रक्षा के उसी माग का प्रत्यागमन करती हुई सूर्य के चारो ओर परिक्रमण करती है तो मनुष्य को सन्निकट के अनुमेय चमकदार तारे, भषम और दूर के तारों की अपेक्षा अपनी स्थिति परिवर्तित करने दिखाई देने चाहिएं। चित्र मे सूय के चारो ओर अपनी कक्षामे परिभ्रमित पृथ्वी की गति E से E तक के विपरीत 8 Earths Orbit पृथ्वी की रक्षा E निकट का तारा, सुदूर दे तारो की पृष्ठभूमि मे छोटा-सा दीर्घवृत्त सौंपने का माभास देगा । इस विशिष्ट तारे द्वारा मक्ति वक्र पृथ्वी की दीर्घवृत्ता- हार नक्षा की स्पिति की तुलना में इस तारे की दिशा पर निमर करता है।

48 ज्योतिपिशाारे महाा क्षण यदि तारा बारा तल पर है तो वह मीधी रेसा मे आगे-पीछे भूलेगा, यदि वह सूय के मध्य से पीो गए दीवार तल पर लम्ब रेखा की दिशा म है तो वह अय तारो को अगल पृष्ठभूमि पर वृत्त खीचने का प्राभास देगा। अन्य किसी दिशा में स्थित तारे के वक्र का प्राकार दीपवृत्त होगा। इन सभा मवस्थाओ मे सम्पूण दोलन की अवधि एव वष होगी, चूकि पृथ्वी उसी स्थिति मे पुा वप के प्रारम्भ में आएगी। साहवी शताब्दी के अन्त और अठारहवी शताब्दी के प्रारम्भ में उत्कृष्ट ढग से निर्मित दूरदशको द्वारा तारकीय स्थिति अचूक ढग से मापी जा सकती थी, जबकि अभी तक तारा की लम्बन गति को अवलक्षित नहीं किया गया था। ये माप इतने सत्य होते कि आधे मील की दूरी पर प्राधी पेनी द्वारा निर्मित कोण को माप मकना सम्भव था। इसका एक उत्तर यह भी हो सकता था कि तारे अत्यधिक दूर थे, इतने अधिक कि सबसे पिट के तारे की दूरी की तुलना मे सूय के चारो ओर पृथ्वी की कक्षा का व्यारा महुत नगण्य था। वास्तव मे प्रतीयमान हटाव इतना कम होता कि उसे ज्ञात कराा मुश्किल था। निस्सदेह इससे यही व्यक्त होता था, चाहे सौर परिवार का तारकीय विश्व से विस्मयीभूत शूय जितना अन्तराल मानव-जाति के लिए सहज ग्राह्य न था। सौर परिवार के सबसे बाहरी ग्रह से इतनी दूर न होने वाले स्फटिक, तारो जडे गोले की सुसकर, सात्वनाप्रद अवधारणा छोडनी कठिन थी। निरन्तर उत्कृष्टता प्राप्त करते दूरदशको द्वारा देदीप्यमान तारो के भी तारकीय लम्बा को ज्ञात करने की असफलता ने तारकीय विश्व की अन्तरीय सीमा को व्यापक और व्यापकतर आयाम दे दिए, जिसकी वजह से तारकीय लम्बन की समस्या ज्योतिर्विदो के लिए अपरिहाय वन गयी । न्यूटनीय गुरुत्वाकर्षण द्वारा अभूतपूर्व सफलता से सूय, ग्रहो और चन्द्रमानो वे सौर- केद्रित विश्व की दी गयी व्याम्या के पश्चात् पृथ्वी केन्द्रित विश्व तक वापिस लौटना, जहाँ तारकीय लम्बन जैसी कोई समस्या न थी, मसम्भव था। इसलिए दशाब्दी पश्चात् दशाब्दी तक, यह दिव्य-परिवार का गुप्त रहस्य कर देने वाले मध्ययुगीन इसका समाधान प्राप्त हो सपने में माशाप्रद निह 1718 मे लक्षित 49 उडती पताका का रहस्य हुए। एडमड हैलो, पुराने ज्योतिविदो हिपार्कस और टालमी द्वारा ज्ञात तारा-स्थितियो की तुलना अाधुनिक निरीक्षण द्वारा शात तारो की एक-दूसरे से सम्बद्ध स्थितियो से कर रहा था। पहला निरीक्षण 140 BC मे किया गया था जबकि दूसरा, दूसरी शताब्दी A D मे। हैली ने नोट किया कि निरीक्षण-त्रुटियो को छोड देने के पश्चात् भी देदीप्यमान तारो प्राक्टूरस, प्रोसिनॉन, और सिरियस की स्थितियों उनको डेढ हजार वर्ष पूर्वस्थितियो से भिन्न हैं। परिवर्तन कम था, लेकिन निश्चित था और हैली ने घोषणा की कि मात्र यही 'अचल' कहलवाने वाले तारे ही अन्तरिक्ष में अपने वेग से नही परिभ्रमण कर रहे बल्कि प्रत्येक तारे के गतिशील दिखने की सभावना है यदि उसे लम्बी अवधि तक पयवेक्षित - किया जाए। पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारो पोर वार्षिक सवृत्त के कारण समीप के तारो में बहुत समय से अन्वेषित प्रतीयमान हटाव को प्राप्त करने की माशा में, हैली के इस अन्वेषण ने अन्य ज्योतिविदो को तारकीय माप लेने मे सलग्न रहने के लिए उत्साहित किया। इन ज्योतिविदो मे माननीय जेम्स बडले, वह व्यक्ति जिसकी नियति मे तारकीय लम्बन पर अपने कार्य द्वारा दो महत्वपूण खोजें करना था, भी था। उसी वष जब हैली ने ज्ञात किया कि कुछ तारो का व्यक्तिगत वेग है, बडले पच्चीस वर्ष की आयु मे रॉयल सोसायटी का सदस्य बन गया। तीन वर्ष पश्चात् उसे ऑक्सफोर्ड मे खगोल- विज्ञान का सेविलियन प्रोफेसर नियुक्त किया गया। इसी समय के लगभग उसने तारकीम लम्बन को समस्या पर गम्भीरतापूर्वक मनन करना प्रारम्भ कर दिया। यह स्पष्ट था कि तारे का प्रतीयमान टाव बहुत कम होगा प्रत जिस दूरदशक द्वारा निरीक्षण करना होता उसे अत्यन्त सावधानी से स्थित किया जाना । वास्तव में दूरदशक को दृढता से एक ही स्थिति पर अचल रखा जाता । अपने मित्र संमुएल मोलीनुक्स के साथ कार्य करते हुए बेडले ने गामा इकोनीस तारा (गन तारा मडल में तीसरा देदीप्यमान तारा) चुना। क्योकि यह देदीप्यमान या, हो सकता है भाग्य से यह अपने पडौस मे धूमिल तारो को अपेक्षा मधिक सानिध्य मे हो। इसके साथ ही नभये पार अपनी 50 ज्योतिविज्ञान के महान धरण रात्रि-यात्रा में, यह अपने परम अवलम्बपर एक्दम सिर के ऊपर पहुंच जाता। सीधे ऊपर की ओर इगित करते दृढता से स्थित दूरदर्शक के क्षेत्र मे प्रत्येक रात्रि को यह तारा पदार्पण करता, उसे पार करता और दूसरी पोर विलुप्त हो जाता । दक्षिणी दिव्य ध्रुव से इसकी कोणीय दूरी मे कोई भी परिवतन, इसके क्षेत्र के पार इसके माग ये साधारण-से ऊँचे या नीचे होने से ज्ञात हो जाता। एक पक्ष के पर्यवेक्षण के पश्चात् दिसम्बर 1725 मे घडले को महसूस हुआ कि मार्ग थोडा-सा उत्तर की तरफ विस्थापित हो गया है। माच तक गति की स्थिति यही रही, उसके पश्चात् उसमे व्यतित्रम हो गया। सितम्बर मे अागामी विपयय हुआ, जिससे दिसम्बर मे तारा दूरदशक से पथ को पार करता हुआ अपनी मूल स्थिति पर आ गया । सम्पूण विपर्यय परिधिखड के 40 मेक्ड के लगभग था। निस्सदेह घडले ने तारे की स्थिति मे अल्प वार्षिक हटाव ज्ञात कर लिया किन्तु इससे वह नितात भ्रमित व्यक्ति बन गया। उसे दिव्य गोले में नारों की अवस्थिति का ज्ञान था, यदि पृथ्वी द्वारा सूर्य के चारो ओर सवृत होने के कारण इसमे कोई प्रतीयमान हटाव दिखाई पडता है तो उसे सुदूर दक्षिण मे, दिसम्बर मे और सुदूर उत्तर मे, जून में विस्थापित होना चाहिए, अर्थात् प्रत्येक बार उसे पर्यवेक्षित तिथियो से तीन माह पूर्व इन स्थितियो पर होना चाहिए। आगामी दो वर्षों मे, अडले ने आकाश के विभिन्न भागो मे अन्य तारो का निरीक्षण किया और पाया कि अपनी प्रोसत स्थिति के पास उनमे भी कुछ वार्षिक गति प्रकट होती है । प्रत्येक स्थिति मे अधिकतम विस्थापन परिधिखड के चालीस सेकड के लगभग था, किन्तु इस गति को पृथ्वी की सूय के चारो ओर की गति का प्रतिबिम्ब नही माना जा सकता था । तार- कीय गति की समय-तालिका और विस्थापनाभासी गति मे हमेशा तीन माह वा अन्तर रहता जिसे ब्रडले अभी तक ज्ञात नही कर पाया था। ज्योतिर्विद् ने जैसे-जैसे एक के पश्चात् एक सभाव्य स्पष्टीकरण उसे सूझता उसका सावधानी से परीक्षण किया और उसे अस्वीकृत कर दिया। उसने इस सभावना तक विचार किया कि हो सकता है, पृथ्वी के घूमने की उहती पताकाका रहस्य 51 कोली की गति आगे-पीछे होने वाली दोलन गति हो जिससे तारो की स्थिति परिवर्तित होती है। परन्तु यदि ऐसा होता तो प्राकाशीय ध्रुव के इस सिर हिलाने' या 'झुकाने' का इसकी दूसरी तरफ स्थित तारोपर विपरीत प्रभाव पडता, वास्तव मे यह स्थिति न थी। महीनो व्येतीत होने के साथ अंडले की रहस्यान्वेषण की जिज्ञासा बढती गयी और हम यह कल्पना कर सकते है कि वह अपनी इस समस्या के सम्बन्ध में इतनी गम्भीरता और तल्लीनता से मनन कर रहा था कि ज्योतिर्विज्ञान से बिल्कुल विभिन्न क्रियानो मे निरत होने पर भी समस्या के उपादान चैतन्य मस्तिष्क के धरातल से बहुत नीचे नहीं रहते थे। जैसा कि अक्सर इस अवस्था मे होता है, समस्या का समाधान किसी नगण्य घटना की तह में छिपा मिलता है। ब्रडले के माथ भी यही हुमा। इस विषय पर मनन करते हुए वह टेम्स नदी पर यात्रा पर जाने वाले एक दल मे मिल गया । जिस नौका में ये लोग थे वह, वायु अनुसार अपना मार्ग बदलती हुई कुछ समय तक ऊपर-नीचे होती, चलती रही। बडले का ध्यान मस्तूल पर लगी हुई पताका की ओर आकर्षित हुमा । यह पताका वास्तव मे वायु की दिशा दिखाने का यत्र थी, जिससे नाविक वायु की दिशा का अनुमान लगाते थे । उसने नोट किया कि नौका का क्रम बदलने से यत्र मे भी परिवतन होता है जैसे कि वायु की दिशा परिवर्तित हुई हो। तीन या चार बार ऐसा हुआ । ज्योतिर्विद् ने इस प्रक्रिया की ओर नाविको का ध्यान खीचा । उन्होंने ऊपर की ओर देखा और उसे बताया कि पताका का दिशा परिवर्तन, वायु के दिशा-परिवर्तन की अपेक्षा नौका के मार्ग-परिवर्तन से हो रहा है, क्योकि पताका का दिशा-निर्धारण वायु-वे और नौका-वेग, जिसके साथ वह इस समय अग्रसर हो रही है, होता है। अकस्मात् ही बडले को नाविको के कथन की महत्ता ज्ञात हुई। उसने सोचा, वायु के स्थान पर तारेसे विकीण प्रकाश को रख दिया जाए, नौकाके स्थानपर सूय के चारो ओर चक्कर लगाती पृथ्वी को, नौकाके व्यतिक्रमितमार्ग के स्थान पर यदि वृत्ताकार कक्षा मे पृथ्वी की निरन्तर दिशा- परिवर्तित करती गति को रखा जाए, तो पताका की दिशा प्रत्यक्ष रूप से वह दिशा है जिससे तारा दिखाई देता है वह दिशा जो तारे से विकीर्ण 1. पासे का प्यान मादल पर लगी पताका को मोर प्रापित एमा।

उहती पताना का रहस्य 53 प्रकाश की गति और अपनी कक्षा मे पृथ्वी की गति पर निभर है। तत्पश्चात् अंडले ने लिखा, "अन्त मे मैंने अनुमान लगाया कि वे सब व्यापार जिनका यहां जिक्र किया गया है प्रकाश की बढती हुई गति एव अपनी कक्षा मे पृथ्वी की वार्षिक गति से प्रवृत होते हैं, क्योकि मैंने देखा यदि प्रकाश का विस्तार समय मे होता है, तो स्थित वस्तु का प्रतीयमान स्थान आँख के स्थिर होने पर वही नही होगा जो उसके आँख और वस्तु से पार करती रेखा की अपेक्षा किसी अन्य दिशा मे गतिमान होने पर होगा, और जब आँख विभिन्न दिशाओ मे घूमेगी तब वस्तु का प्रतीयमान स्थान भिन्न होगा।" शेष यात्रा में ग्रेडले अपने सह्यात्रियो के लिए अच्छा साथी न रहा होगा क्योकि उसने अपनी खोज की महत्ता को गवेषणा करनी प्रारम्भ कर दी जिसे प्राज खगोल-विज्ञान मे तारकीय विपथन कहते हैं। तीन माह के अन्तराल का स्पष्टीकरण और काफी समय से अन्वेषित लम्बन हटाव का समाधान अब उसे भासित हो गया। प्रकाश-वेग और अपनी कक्षा मे पृथ्वी-वेग के मिल जाने के कारण ज्योतिर्विद का दूरदर्शक तारे की यथार्थ दिशा से आवेक्षक के यात्रा करने की दिशा मे थोडा-सा हट जाएगा, जिससे गतिमान दूरदर्शक की सतह से प्रकाश भीतर उसके तल पर पहुंचेगा जहां आँख स्थित होगी। हम अपने प्रतिदिन के जीवन मे इसके एक बहुत अच्छे उदाहरण से परिचित है । यदि हम रेल के डिब्बे मे हैं और बाहर वर्षा हो रही हो तो हम देखते हैं कि वर्षा की बूदें, गाडी के स्थिर होने पर, खिडकी से सीधे नीचे की तरफ बहती हैं, परन्तु जब गाडी चलने लगती है और गति पकड लेती है, तब वर्षा की बूंदों का मागं तिरछा हो जाता है और भासित होता है कि वह ऊपर की दिशा और गाडी के चलने की दिशा से आ रही है। लम्बन हटाव की स्थिति मे, हटाव हमेशा सूय की दिशा की तरफ होगा । पृथ्वी प्रत्येक समय रेडियस वेक्टर, जो उसे सूय से सम्बद्ध करता है, के समकोण पर गतिमान होती है, इसलिए वास्तव मे वेग-दैशिक की दिशा सदैव, जहाँ रेडियस वेक्टर की दिशा तीन माह पश्चात् होगी, उसके समानान्तर होगी। इस वजह से हटाव का विपथन प्रतिरूप लम्बन प्रतिरूप 54 ज्योतिर्विज्ञान के महान भरण ! -- से तीन माह पूर्व घटित होता है। प्रकाश सीमित गति से यात्रा करता है, जेम्स अंडले को यह तथ्य सुविदित था और वह अन्दाजन उसकी यात्रा-गति भी जानता था। बडले के गामा ड्रेकोनीस के लम्बन को मापने के प्रयास से माधी शताब्दी पूर्व एक ज्योतिर्विद रोमर ने बृहद् बृहस्पति ग्रह के उपग्रहो के ग्रहण- समय मे अजीद परिवर्तन लक्षित किए थे। गैलीलियो ने भी बहुत-सी रात्रियो मे प्रावैक्षित किया था कि बहुत-से उपग्रह बृहस्पति की बृहद प्रतिच्छाया मे विलुप्त हो जाते हैं और मुझाया था कि ग्रहण-समय की तालिकाए निर्मित कर उन्हे जहाजों के लम्बन खोजने के लिए, खगोल-विज्ञान की घडियो के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। इन उपग्रहो का बहुत सतर्कता से निरीक्षण करने पर रोमर ने पाया कि ग्रहण बिल्कुल एक जैसे समय-अन्तरालो पर नहीं लगता। चारों उपग्रहो के ग्रहण कभी जल्दी लगते थे, कभी देर से । उसने यह भी भावेक्षित किया कि वह जितनी देरी से या जल्दी लगते हैं, वह बृहस्पति और पृथ्वी की स्थितियों पर निभर करता है । बृहस्पति के पृथ्वी के निकट होने पर ग्रहण जल्दी लगता था और बृहस्पति और पृथ्वी के सूर्य की विपरीत दिशा पर होने से, देर से । रोमर ने सही निष्क्ष निकाला कि यह व्यतिक्रम प्रकाश के कारण है जो एक खास गति में यात्रा करता है, वह अन्तरिक्ष पार करने में समय लेता है और जल्दी या देरी से लगने वाले ग्रहण का समय वह समय है जो प्रकाश पृथ्वी-वक्षा के व्यास को पार करने में लेता है । ममय और दूरी जानते हुए रोमर ने प्रकाश की गति 190,000 मील प्रति सेकड परिगणित की, जिसमें प्राधुनिक मान 186,000 मील प्रति सेक्ड में बहुत बडा वेपम्य नहीं है। रोमर का निप्पं माधारणत उमके सहयोगी ज्योतिर्विदो को स्वीकृत न था, किन्तु अंडले ने देखा इससे तारकीय स्थितियो के वापिक हटाव का, जिहे वह माप रहा पा, स्पष्टीकरण हो जाता है। उसे ज्ञात या कि पृथ्वी को गति पपनी कक्षा मे 18 मील प्रति मेरह है, इससे वह दूरदराव कोक्तिना मागे (प्रति पृथ्वोकोगति मौदिशा में) करे तारि तारा दूरदर्शक क्षेत्र के मध्य मे रह सरे । यहा कोण की सगणना कर सका । सतुष्ट होते हुए उसने पाया कि सगणित कोण और पपवेक्षित मान में समानता है।

उहती पठाका का रहस्य 55 . तारकीय लम्बन को मापने के प्रयास मे,ब्रडले,सौर केन्द्रित सिमान्त के प्रतिरोध मे प्रमुख प्रारोप को समाप्त करने का प्रयल कर रहा था। वह लम्बन खोजने में असमर्थ रहा, किन्तु उसके तारकीय विपयन के अन्वेषण ने, पृथ्वी को सूर्य के चारो तरफ गति के सम्बन्ध मे विलक्षण प्रमाण प्रस्तुत कर दिया, जैसी कि सूर्य केन्द्रित न्यूटनीय विज्ञान की मांग थी। बडले से कम सतर्क और चैतन्य बहुत-से व्यक्ति, अपनी इस उपलब्धि से परितुष्ट हो जाते, किन्तु अंडले ने अपने अनुसन्धान के मूल लक्ष्य को अपने समक्ष रखा। उसे ज्ञात था कि तारे का कोई भी लम्बनीय विस्थापन परिधिखड के दो सेकड से कम होगा, विपथन के कारण पयवेक्षित हटाव मोर मनुकलित हटाव मे अत्यधिक समानता थी। 1729 मे उसने प्रायोगिक ढग से लिखा, "मुझे इसी ढग को झुकने मे लघु विभिन्नताएँ अन्य तारो मे भी प्राप्त हुई जो उसी कारण (विपथन के) नही उत्पन्न होती कितु चाहे ये छोटे-छोटे विपर्यय किसी नियमित कारण से या मेरे यत्रो के पदार्थ-परिवर्तन इत्यादि से घटित होते हैं, इसका निर्णय मैं अभी तक नहीं कर पाया।" पयवेक्षण और परिकलन के बीच इस लघु अन्तर के कारण ब्रडले ने उन्नीस वर्ष के सतर्क काय के पश्चात् दूसरी महत्वपूर्ण खोज की। विस्थाप- नाएँ बढी और घटी, एक वर्ष की अवधि मे नहीं, बल्कि उन्नीस वर्ष की अवधि मे, ब्रडले ने इसकी व्याख्या, पृथ्वी के घूमने की कीली के बहुत कम इधर-उधर होने को कहकर की । जैसा कि हम पहले देख चुके हैं पृथ्वी की कीली के हिलने की प्रक्रिया का, उसने मूलत विशालकाय तारकीय दोलन क्रिया से सम्बन्धित कर, स्पष्टीकरण किया था, जिसे अब यह प्रकाश-वेग के सीमित होने के कारण मानता था । इतने दिनो के पश्चात् वह अनुमान कर सका कि हिलना (mtation) इन अवशेष अल्प गतियो का तुष्टिजनक स्पष्टीकरण हो सकता है। पृथ्वी के घूमने की कीली इस ढग से क्यो हिलती है, यह समस्या शेष थी। पुन जेम्स ब्रडले ने अपनी क्षमता का प्रमाण दिया। वार्षिक तार- कीय गतियाँ प्रकाश-वेग और पृथ्वी की अपनी कक्षा मे वेग के कारण होती हैं, इसका अन्वेषण और स्पष्टीकरण करने के पश्चात् उसने नयी लधु मौर देर तक रहने वाली गतियो का, जिनको उसने कठिनता से मापा था, भी 56 ज्योतिर्विज्ञान के महान क्षण स्पष्टीकरण कर दिया। उसने कहा कि उसे सन्देह था कि पृथ्वी के भूमध्यरेखीय उभार पर चन्द्रमा की प्रतिक्रिया से ये प्रयास निष्पक्ष हो सकते हैं । पृथ्वी के इर्द-गिर्द चन्द्रमा की कक्षा का परातल निरन्तर अपनी स्थितिपरिवर्तित करता रहता है, जिससे कभी-कभी यह अन्य समय की अपेक्षा पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल पर दस डिग्री से अधिक भुका हुआ होता है । परन्तु सरप्राइज़क न्यूटन की व्या- ख्यानुसार अयन गति (पृथ्वी के धूमने की धुरी की धीमी शकुर गति) पृथ्वी के भूमध्यरेखीय उभार पर सूर्य एव चन्द्रमा की प्रतिक्रियाओं के कारण होती है । इसलिए यह तक-सम्मत निष्कर्ष था कि चन्द्रमा के कारण इस क्रिया की शक्ति विभिन्न वर्षो मे, इसकी कक्षा के धरातल के कारण बदल जाएगी। रेडले ने लक्षित किया कि उनीम वप की अवधि, वह अवधि है, जिसमे चन्द्रमा की कक्षा का धरातल एक सम्पूर्ण चक्कर काटता है। 1748 के प्रारम्भ में अपने निष्कयों को प्रकाशित करवाने से पूर्व में डले ने अविश्वस- नीय सहनशीलता और सजगता से पूरे उन्नीस वर्ष के सम्पूर्ण वार्षिक वृत का प्रेक्षण किया 1742 मे बडले इगलंड का तीसरा रॉयल ज्योतिर्विद् बना। अपने सम्पूर्ण जीवन मे, उसने पयवेक्षण मे सहनशीलता और परिश्रम के अतिरिक्त अपने दूरदर्शक को सटीक स्थान पर स्थित करने की विशिष्टता दिखाई। उसने अपने यत्रो की त्रुटियो को परखा और उन्हें स्वीकृति भी दी। इसलिए इसमें कोई विस्मय की बात नहीं है कि वह अपने सहयोगियो द्वारा मशात लघु प्रभावो को टूट भोर माप लेता पा। और यह प्रशमनीय है कि उसने न केवल उन्हे गात किया बल्कि उनका स्पष्टीकरण भी दिया। ग्रीनविच भॉब्जरवेटरी पर साठ हजार से भी अधिक अन्वेषण अंडसे द्वारा किए गए। महान जर्मन ज्योतिविद् बेसल द्वारा एकत्रित रिए गए ये पयवेक्षण हमें अठारहवी शताब्दी के मध्य की अत्यन्त प्रामाणिर तार- भीपस्थितियो कोष्यवस्पा देते हैं। वास्तव में, यह वह बाय नहीं जिसके कारण जेम्स हलेका स्मरण किया जाता है, उसका नाम तारकीय विपणन और पृथ्वी के हिलो (nutation) में प्रतिभाशाली मवेपणो से सदैव सम्बन्धित पिमा जाता है जो न्यूटनीय विज्ञान भवन के दो मोर स्तम्भ बन गए - -- पांचवां अध्याय एक नए ग्रह की खोज तोपो से निकलते धुएं ने युद्ध-क्षेत्र को प्राच्छादित कर दिया और बदूक की गोलियां युवा हैनोवेरियन वडमैन, फेडरिक विलहेल्म हश्र्चेल के सि के ऊपर से गुजरने लगी। सन् 1757 के इस व्यवस्थित मान्दोलन मे, जिसबै कारण हस्तनवेक मे यह युद्ध हुआ, उस व्यक्ति ने जिसे ससार का विशिष्ट प्रेक्षक, ज्योतिविद् और एक विश्व का अन्वेषक होना था अपनी रात्रियाँ गीली खाइयो और मैदानो मे सोकर व्यतीत को । युद्ध में असफल होने पर पराजित हैनोवेरियन दस्ते वापिस लौट रहे थे। अपने पिता के सुझावानुसार, फेडरिक किसी को ज्ञात होने से पूर्व खिसक गया । जब विजयी झामीसियो, ने हैनोवेर पर कब्जा किया उस समय वह हैम्बग पहुंच चुका था। वहाँ से वह इगलड की ओर अग्रसर हुआ जहाँ उसने अपना नाम विलियम हश्र्चेल, जिस नाम से उसका स्मरण किया जाता है, रखा और सिवाय कुछ समय को छोडकर, काय करते हुए अपना सम्पूर्ण जीवन व्यतीत किया। विलियम हश्र्चेल की कहानी एक प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति की कहानी । है, जो प्रतीयमान रूप से अपने सही व्यवसाय का चुनाव कर उसमे विशिष्ट मिद्ध होने पर भी बिल्कुल विपरीत प्रकृति की हॉबी खोज लेता है और उमकी तरफ विस्मयकारी रूप से उमुख हो उसके लिए प्रत्येक वस्तु का त्याग कर देता है, उसे अपनी सम्पूर्ण जिन्दगी समर्पित कर देता है, उसमे इतनी महत्तर वस्तुएँ उपलब्ध करता है जितनी उसने अपने परित्यक्त व्यव- साय में भी प्राप्त नहीं की थी। विलियम, हैनोवेरियन फुटगाड के बड मे, एक निपुण सगीतज्ञ खगोल विज्ञान एवं विभिन्न विषयो में रुचि लेने वाले प्राइजक हश्र्चेल के बालको मे से था। चाहे विलियम का पिता अपने बच्चो को व्यापक शिक्षा देने के लिए गरीब था किन्तु उमने उन्हे दिमागी वस्तुमो का रसास्वाद करना - . 57 58 ज्योतिर्विज्ञान के महान क्षए । मोर मपनी कल्पना शक्ति का उपयोग करना सिखाया। समयानुसार छोटा हल गाई मे बडमन बन गया। सगीत मे रुचि लेने और उसमे सिद्धहस्त होने के बावजूद भी फौजी जीवन उसे चित्ताकर्षक नही लगा । हस्तनबेक के अनुभवों से उसके विचारो मे कोई परिवर्तन नहीं हुमा । इसके पश्चात् दो वर्ष तक इगलंड मे डरहम मिलिशिया का निर्देशक रहने के अतिरिक्त उसका सेना से कोई सम्बध नही रहा । इस अवधि में वह व्यक्तिगत रूप से सगीत-शिक्षा देता रहा और सगीतज्ञ के रूप में सगीत- मायोजनो म भाग लेना स्वीकार करता रहा। अपने दायित्व को पूर्ण करने के लिए वह अमर सब तरह के मोमम मे घोडे की पीठ पर पचास मील एक दिन में सवारी करता। वह लेखक के रूप में भी सुविदित होने लगा और थोडी ही अवधि मे, जून 1760 से जनवरी 1761 तक उसने सात सिम्फनियां लिखी जोकि कोई साधारण कार्य नहीं था। मनोरजन के लिए वह दार्शनिको की पुस्तको एवं गणित का अध्ययन करता। हैनोवर मे कुछ समय के लिए परिवार के पास रहने के पश्चात् वह वापिस इगलड लौट आया, उसकी ख्याति अध्यापक, सगीतज्ञ और सगीत- लेखक के रूप में वृद्धि कर रही थी। 1766 में उसने बाथ मे नए और फैशनेबल ओक्टागन चैपल मे पागनिस्ट का पद स्वीकार किया। अपने पाकपक और प्रज्ञामान व्यक्तित्व के कारण वह लोकप्रिय था, सफलता उसकी चेरी थी और वह सौभाग्यशाली था। कोई भी कल्पना कर सकता था कि उसका भविष्य बन गया है और यदि कभी उसका स्मरण किया गया तो संगीत में उसके योगदान के लिए किया जाएगा। जबकि उसका जीवन-काय अभी प्रारम्भ होना था। इस समय वह तल्लीनता से गणित का अध्ययन कर रहा था। उसने जिन पुस्तको का मध्ययन किया उनमे कैम्ब्रिज में खगोल-विज्ञान के प्रोफेसर रॉबर्ट स्मिथ द्वारा लिखित 'हारमोनिक्स' एवं 'ए कम्प्लीट सिस्टम प्रॉफ पॉपटिक्स' भी थी। उसने लेलैट के लगोल-विज्ञान का अध्ययन भी दिया जब कि सन् 1766 की उसकी डायरी मे 19 फरवरी को शुक्रग्रह और 24 रिपरीको चद्रग्रहण का प्रेक्षण करने के प्रमाण प्राप्त होते हैं। - एक नए ग्रह की खोज 59 1772 मे हैनोवर से, विलियम की बहन करोलाइन वाथ मे उसका घर सभालने के लिए आ गयी। पूर्ण रूप से अपने भाई पर अनुरक्त और निष्ठाशील रोलाइन खगोल-विज्ञान के भविष्य के अनुसन्धानो मे उसकी अमूल्य सहयोगिनी बन गयो । लगभग पाठ धूमकेतुओ को ज्ञात कर और ज्यो- तिविज्ञान मे अय उपयोगी काय कर अपनी क्षमतानुसार वह प्रसिद्धज्योतिविद् वनी, किन्तु उसका प्रधान काय विलियम हश्र्चेल की सेक्रेटरी, सहयोगी और गृहिणी का था। उसके सहयोग के बिना हश्र्चेल के इतने अधिक प्रेक्षणो और लेखो का आधा भी उपलब्ध कर पाना असम्भव था। 1773 के अन्त मे वाथ की शिशिर ऋतु मे अचानक ही एक ज्वाला- मुखी के फटने से, हश्र्चेल के जीवन मे व्यतिक्रम हो गया, निश्चय ही इस परिवर्तन के चिह्न पूर्वलक्षित होगे। उसने ज्योतिर्विज्ञान की पुस्तको मे, जिनका वह अध्ययन कर रहा था, लिखे रानि के आश्चर्यों को स्वय देखने का निश्चय किया। 1783 मे लिखित पत्र मे उसने कहा, "सिवाय अपनी आँखो से वह सब देखने के, जो दूसरो ने मुझसे पहले देखा है, मैंने कुछ भी विश्वास कर स्वीकृत न करने का निश्चय किया है।" सबसे पहले उमने कुछ छोटे लैस प्राप्त किए। खगोल वैज्ञानिक दूरदर्शक मे लस को अभिदृश्यक कहते है जो पर्यवेक्षित वस्तु के प्रकाश को एकनित कर, उसका प्रतिविम्ब लैस के पीछे कुछ दूरी पर निर्मित करता है। इस दूरी को फोक्स-दूरी कहते हैं और यह पाया गया कि लमो को घिसने से, ताकि उनकी विभिन्न प्राकृतियाँ बन जाएं, विभिन फोफस-दूरिया उपलब्ध की जा सकती है। यह महत्वपूर्ण है, क्योकि जितनी बडी फोकस-दूरी होगी, वस्तुदपणपर निर्मित प्रतिबिम्ब उतना बडा होगा। प्रारम्भ मे हश्र्चेल ने ट्यूब बनाकरलघु फोक्स-दूरी वाले लैसो से कुछ देदीप्यमान दिव्य वस्तुपोका प्रेक्षण किया। जैसे-जैसे वह लम्बी और लम्बी फोकस दूरियो की ओर अग्रसर होता गया, दूरदर्शक की ट्यूवे जिनसे वह उन्हे स्थित रखता था बढती गयी, यहाँ तक कि प्रयुक्त ट्यूबो मे एक पन्द्रह फुट लम्बी थी और दूसरी तीस फुट । उनको सभालना कठिन था। मितम्बर मे उसने 2-फुट का ग्रेगरियन परा- वतक दपण किराये पर लिया। यह लधु दूरदशक प्रयुक्त करने मे इतना सुविधाजनक था कि हश्र्चेल ने 5-फुट और 6-फुट के परावतक का दाम ज्ञात - 60 ज्यातिविज्ञान के महान क्षण करने के लिए लदन लिखा । यह ज्ञात होने पर कि इस माप के परावर्तक निर्मित नहीं किए जाते, उसे पाश्चय हुमा । हर्चेल ने स्वय उनका निर्माण करने का निश्चय दिया । प्रकाश-विज्ञान पर डॉ स्मिथ भी बहुचचित पुस्तक की सहायता से'। आपको स्मरण होगा कि गैलीलियो और उसके उत्तराधिकारियो द्वारा प्रयुक्त वतन दूरदर्शक के लमो में भयकर दोष थे और न्यूटन ने यह मानकर कि इनमे कभी भी सुधार सम्भव नहीं, पहले परावतन दूरदशक की रचना की और निर्माण किया, जहाँ मुख्य भाग मे लैस की अपक्षा अवतल दपण का प्रयोग किया जाता। सही वक्रता प्राप्त करने के लिए इन दर्पणो को अत्यधिक सतर्कता से रगडा और पालिश किया जाता। दूरदशक के लिए 1773 के अत के पूर्व हश्चल ने कितने ही दपणो को ढाला और पालिश कर लिया। अपन सम्पूण कौशल और दृढ शक्ति से वह दूरदशक निर्माता और ज्योतिविद् की नवीन वृत्ति म लवलीन हो गया और इसके पश्चात् सगीत- आयोजनो से इतर हाल ने एक भी क्षण व्यथ नहीं गवाया । यथाथ में उसका घर एक फैक्टरी बन गया। रोलाइन और उसका भाई अलेक्जेंडर, जो उसके साथ रह रहे थे, काय मे प्रवृत्त होने को विवश हुए। केगेलाइन के सस्मरण इस कायापलट का विवरण देते है "मैंने प्रत्येक कमरे को वर्कशाप मे रूपान्तरित होते देखा । सुचारु ढग से व्यवस्थित ड्राइग-रूम मे एक बढई ट्यूब और मभी भाति के स्टैण्ड बना रहा होता । अलेक्स घूमने वाली बृहदाकार मशीन बैडरूम म रख रहा होता । विश्राम करने का प्रत्येक क्षण उत्कठा से किसी भी कार्य को करने के लिए छीन लिया जाता और उसके निरन्तर स्वय को प्रापत्ति में गलने के अतिरिक्त बहुत-सी भालर (जा उस समय तक पुरानी पड़ चुकी पी) पिघले हुए पदार्थ इत्यादि द्वारा फट गयी और उनके चिथडे उड गए।" उसके नीचे के कमरे म भट्टी और पिघलान का अग्निकुण्ड बनाने पार 30-फुट के दूग्दशक के दपण को ढालन का प्रयास करने से यह आपत्ति और भी अधिक वढ गयी। लगभग पाच सौ पौड धातु लगी, दप उन दिनो पक्यूलम से, जोषि ताव और राग का मिश्रण होता है, बनते थे और , एक नए ग्रह की खोज 61 गहरी पालिग लेते थे। मूदम चिकनी मिट्टी से निर्मित मावे का उपयोग किया जाता जिममे कोयला जलाकर उसे मस्त बनाया जाता। पहले पिछली धातु चुपचाप वहती रही, तत्पश्चात् दशको को प्रातक्ति करती हुई भट्टी पिघलने लगी। राख के छिद्र मे गिरती हुई धातु शीघ्र ही फैल गयी। शव यह पत्थर के फर्श तक पहुँची, पत्थर के छोटे छोटे टुक्डे हवा म छिटक गए, मापनेल की गोलियो की भाति ये टुकडे छत तक ऊँचे उड रहे थे । दोगो भाई और कमचारी सागे, अन्त मे हश्र्चेल गर्मी और थकान से टूटकर ईटो के ढेर पर गिर गया । (चित्र पृष्ठ 62) इम भॉति दूरदशक निर्माण का व्यावहारिक काय होता रहा। दपणो को ढालने, रगडने और पालिग करने का, वर्षों का अनुभव सघटित होता रहा, जब तक कि हश्चल के दपण असदिग्धरूपसे उस समय के सर्वोत्तम और बडे दपण नहीं बन गए। कैरोलाइन हमे बताती है कि किम भौति उसका भाई मोलह-मोलह घटे अपने दपणो पर कठिन परिथम करते हुए व्यतीत कर देता कि "उसे जीवित रखने के लिए" वह "खाना खिलाने के लिए उसके मुख में खाने के टुकडे रखने को विवश थी।" अन्य समय वह जोर- जोर से पढकर अपने भाई की क्लान्ति दूर करने का प्रयास करती। हर्चेल के खगोल विज्ञान को अधिक से अधिक ममय देने से धीरे- धीरे सगीत आयोजनो और उसके शिष्यो की सख्या कम होती गयी। 1781 तक दो सौ 7-फुट, एक सौ पचास 10-फुट और अस्सी 20 फुट फोकस-दूरी वाले दपणो का निर्माण हो चुका था । इनमे से कई के ददशक बना दिए गए जो काफी बडी रकम पर विके । उदाहरणत 25 फुट फोकस दूरी वाला दूरदशक, स्पेन के राजा को तीन हजार गिन्नियो मे वेचा गया। इसके माथ-माथ हश्चल मम्पूण आकाश का सर्वेक्षण करने के अपने महत्वाकाक्षी प्राग्राम मे भी व्यस्त रहा और अपने जीवन मे उमने वस्तुत अपनी योजना के अनुसार चार बार आकाश का निरीक्षण क्यिा, प्रत्येक बार पहले से उकृष्ट दूरदशक के साथ । दूसरी बार के सर्वेक्षण से उसे अमरता प्राप्त हुई। प्रेक्षणो और सैद्धातिक खगोल-विज्ञान मे उमने बहुत-से प्रतिभासम्पन कृत्य किए, किन्तु हर्नेल का स्मरण मुग्यत 13 माच 1781 के अन्वेषण के कारण किया

टुपरे गोलियों की भांति छत तक ऊंचे उडने लगे।
हाल इटों के दर पर गिर गया।

एक नए ग्रह की खोज 63 जाता है। सतर्कता और अश्रान्ति से प्रत्येक वस्तु का, जो उसके दूरदर्शक की पहुँच मे थी, निरीक्षण करते हुए उस सध्या को दस बजे के पश्चात् वह भाकाश के नियमित प्रेक्षण में व्यस्त था। निरीक्षण क्षेत्र मे तारो से भिन्न एक वस्तु दिखाई दी। "H-जेमिनोरम के सानिध्य के छोटे तारो का निरीक्षण करते हुए," उसने लिखा, "मैंने एक तारा देखा जो प्रत्यक्षत अन्य तारो से बडा था, उसकी असामा य प्राकृति से विस्मित होकर मैंने उसकी तुलना H-जेमिनोरम और ऑरिगा और जेमिनी के मध्य के लघु तारो से की, और इसके उन सबसे भी दीर्घकाय होने पर मुझे सशय हुआ कि यह धूमकेतु होगा।" उत्कृष्ट दूरदशक मे प्रावधन होने पर भी तारा, तारे की भाति दिखाई देता है जवकि धूमकेतु या ग्रह की स्पष्ट आकृति दष्टिगत होती है, इसलिए यह विस्मयजनक नहीं कि हश्र्चेल ने सोचा कि हो सकता है उसने धूमकेतु की खोज की हो। चार रात्रियो के पश्चात् जब उसने पाया कि छोटे तारे के सापेक्ष वस्तु की स्थिति परिवर्तित हो गयी है, तो उसका विचार दृढ हो गया। उसने उसकी स्थिति के क्रमबद्ध माइक्रोमीटर माप लेने प्रारम्भ कर दिए और अपनी इस खोज की सूचना ग्रीनविच और ऑक्सफोर्ड प्रेक्षण- शालाप्रो को दी। रॉयल ज्योतिर्विद् मैस्केलिन ने स्वय इसका प्रेक्षण किया और निणय किया कि या तो यह धूमकेतु है या नया ग्रह । पहला विचार दूसरे की अपेक्षा अधिक यथाथ प्रतिभासित हुआ क्योकि प्राक्कालीन समय से ज्ञात पाच ग्रहो-बुध, शुक्र, मगल, बृहस्पति और शनि के पश्चात् यह अकल्पनीय प्रतीत होता था कि उनकी सख्या मे इतनी देर पश्चात् योग हो सकता है । सम्पूण यूरोप मे 'धूमकेतु' का, इसकी खबर फैलने के पश्चात्, प्रेक्षण हो रहा था। इसकी परिवर्तित स्थितियो के प्रेक्षण का परिकलन होने पर, विभित गणितीय ज्योतिर्विदो ने इसकी क्क्षा का अनुकलन किया, यह भू कक्षा से उन्नीस बार अधिक अधव्यास की लगभग वृत्ताकार कक्षा मे भ्रमण करता पाया गया । वास्तव में यह नया प्रधान ग्रह था जो तब तक के सौर परिवार का सबसे बाहरी ग्रह था, जो सूय से शनि ग्रह की दुगनी 64 ज्यातिविज्ञान के महान क्षण दूरी पर था। कहा जाता है कि हश्र्चेल का अन्वेषण सयोगवश हुआ, परन्तु वास्तव मे यह उसकी उपलब्धि का सम्यक् मूल्याकन नही । ग्रह-कक्षा का अनुकलन होने पर पहली तिथियो पर उसकी स्थिति ज्ञात करना सम्भव हो गया और पाया गया कि 1690 से 1781 तक यह सनहवी बार से कम बार ज्योतिर्विदो, फ्लेमस्टीड, पहला रॉयल ज्योतिविद्, और बडले को भी परिगणित करते हुए पयवेक्षित नहीं हुअा। प्रत्येक ने उसके दष्टिगत होने पर उसे तारा समझा, किसी ने भी उसकी गति या मडलक को इगित नही किया। एक व्यक्ति ने निरन्तर चार रानियो तक उसका प्रेक्षण किया । हश्चेंल, प्रत्येक वस्तु को निकटवर्ती दीघ प्रावधन से निरूपित करने के तरीके की वजह से इस ग्रह की असामा य प्राकृति चिह्नित करने मे सफल हुआ। सम्भवत उसके विशिष्ट दूरदशक ही उस समय समार-भर मे ऐसे थे जिन्हे इस ढग से प्रयुक्त किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त यह कहना कि उसने मयोगवश 13 माच को यूरेनस का प्रेक्षण किया मुरय बात को छोड देना है । हश्र्चेल आकाश को प्रत्येक वस्तु का नियमित सर्वेक्षण करने में निरत था, इसलिए यह अपरिहाय था कि वह अपने ग्रह को खोज लेता। जैसा कि उसने कहा, "यदि क्सिी कायवश मैं उस सध्या को व्यस्त रहता तो दूसरी सध्या को अवश्य ही उसे अन्वेपित कर लेता। मेरे दूरदशक इतने श्रेष्ठ थे कि मैंने ज्यो ही उसे देखा त्यो ही उसके ग्रहो जैसे मडलक को पहचान लिया।" बाथ के इस प्रतिभासम्पन नौसिखिये ज्योतिर्विद् के इस अवपण का गहन प्रभाव विद्वज्जनोपर हुअा और कुछ ही महीना मे हश्र्चेल को अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो गई। मई मे वह नदन गया, वहाँ रॉयल मोमायटी द्वारा उसका स्वागत हुआ। उसी वष उसे सोसायटी का 'कोपले पदक' प्रदान किया गया जो प्रत्येक वर्ष मानव-ज्ञान में महत्वपूण वृद्धि करने वाले वैज्ञानिक को दिया जाता था। मवसम्मति से दिसम्बर में उसे सदस्य निर्वाचित क्यिा गया और सम्मान के प्रतीव-स्प उममे चदा नहीं लिया गया। मन् 1782 की वमन्त ऋतु मे उमे राज्यमभा मे बुलाया गया जहां उसने अपने काय की व्याम्या जाज तृतीय और राज्य परिवार के सदस्या के सम्मुख की, उसे 200 पौड प्रतिवप के वेतन पर रॉयल मोमायटी का ज्योतिविद् नियुक्त कर दिया एक नए ग्रह की खोज 65 गया। राजकीय ज्योतिविद् के इस नवीन पद के कुछ कतव्य भी थे, किन्तु इसे पूर्व-प्रतिष्ठापित रॉयल ज्योतिर्विद् के पद के साथ सम्बद्ध नही करना चाहिए जो रॉयल ग्रीनविच प्रेक्षणशाला का काय-निर्देश करता है। नए ग्रह का नामकरण करना था। हश्र्चेल ने अपने अन्वेषक होने के आधिपत्यानुसार, अपने राजकीय आश्रयदाता पर इसका नामकरण जॉजियम साइडस करना चाहा । ज्योतिर्विदो के मध्य यह नाम लोकप्रिय नहीं हुआ। अन्त मे सौर परिवार के अन्य सदस्यो की परिपाटी में इसका नाम यूरेनस रखना निश्चित हुआ । परन्तु अपने शेष जीवन मे हाल निष्ठा से अपने ससार को जॉजियम साइडस कहकर सम्बोधित करता रहा। सगीतज्ञ के रूप में उसका कैरियर ममाप्त हो चुका था, चाहे विश्रान्ति के लिए वह सदैव सगीत में रुचि लेता रहा। अब से वह ज्योतिविद् था- स्वच्छ रात्रियो मे घटों प्रेक्षण करता हुआ, वडे और शक्तिशाली दूर- दर्शको का निर्माण करने मे मलग्न, अपने धारावाहिक सतत अन्वेपणो पर लेख लिखता और यूरोप-भर के वैज्ञानिको से पन व्यवहार करता रहा । इन सब कार्यों मे कैरोलाइन ने अपना सहयोग दिया। इसके अतिरिक्त बहुत-स विशिष्ट अतिथि हश्र्चेल के घर स्वय, उस व्यक्ति को जिसने एक ससार का पता लगाया और उसके दूरदर्शक से, रात्रि-नभ का प्रेक्षण करने आते । उसके 40 फुट फोकस-दूरी और 4-फुट दपण का परावतक पूर्ण होता, इससे पूर्व ही बहुत-से व्यक्ति उसकी दीवकाय ट्यूब को देखने आए। उनम राजा जाज तृतीय और कैण्टरबरी के आचबिशप भी थे जिहे गजा की बात का अववोधन करने में थोडी कठिनाई हुई, यह देखकर राजा ने अपना हाथ बढा- कर कहा, "माइए, लाड बिशप, मैं आपको स्वग का माग दिखाऊगा ।' निश्चित ही हश्र्चेल को अपने अतिथियो को अपना उपकरण दिग्वाने और उन्हे उमका उपयोग करने की अनुमति देने में समय व्यथ करना बुग लगता था परन्तु वह सभीमभ्यागतो का स्वागत, सहनशीलता और शिष्टता से करता। यूरेनस का अन्वेषण हश्र्चेल के कई महत्वपूर्ण क्षणो मे मे था। जैसे उसरे दूरदशक थैठ होते गए वह तारकीय अन्तरिक्ष की गह्नतम-मे-गहन- तम गहराइयो का अन्वेषण करने का प्रयास करता गया। निस्मदेह वह - 66 ज्योतिर्विज्ञान के महान भए तारकीय या नक्षत्रीय विश्व को तीसरी विमा देने वाला पहला ज्योतविद् था। हल के युग तक अधिकतर प्रयास और समय सौर परिवार के पिंडो और उनकी गतियो का अध्ययन करने या दिव्य गोले पर तारो की अधिक-से-अधिक यथाथ स्थिति को चिह्नित करने मे व्यतीत किया जाता। हश्र्चेल के अनुस धान मुदूर तक उस तारकीय तत्र को, जिससे सूय सम्बद्ध है, प्राकृति का प्रतिष्ठापन करते थे। वर्षों के अत्यधिक परिश्रम के पश्चात, जिनमे एक भी स्वच्छ रात्रि ऐमी न थी जब हश्चल ने घटो आकाश की सभी दिशामो के छोटे क्षेत्रो के तारो की गणना करने मे व्यतीत न किए हो, वह इम निप्वप पर पहुंचा वि तारवीय तत्र सान की आकृति का है जो लगभग वृत्ताकार है, जिसका मध्यभाग आकाशगगा है जो एक रिबन के समान है और जिसे हम स्वच्छ रानि मे आकाश के पार फैला देख सकते हैं। उसने अनु- मान लगाया कि सूय की स्थिति इस सम्पूण तत्र के मध्यभाग के सन्निकट है। प्रत्येक भाँति की दिव्य वस्तुएँ, द्विक तारे, तारा-समूह, काले और चमकदार अस्पष्ट धब्बे जिन्हे निहारिकाएँ कहते हैं, इन सर्वेक्षणो के मध्य ज्ञात हो गए। निष्ठावान करोताइन के प्रधान्त सहयोग से सभी का सतक्ता से निरीक्षण किया गया और उनकी सूची बनायी गयी। विलियम, बाहर से, जिसकी एक आख दूरदशक या माप की स्केल पर जमी होती, प्रेक्षित वस्तुप्रो के आकार-प्रकार और स्थिति के सम्बन्ध मे बताता जाता, जब कि साथ के छोटे कमरे मे बैठी उसकी बहन इन सूचनाप्रो के पन्ने पर पन्ने लिखती जाती। इनमे से कुछ नोट्स मे, हश्र्चेल कैसी अवस्थाओं में अक्सर कार्य करता था, इसका उल्लेख मिलता है। "यथाथ दृष्टिक्षेपण के लिए धुध से कोई अवरोध उपस्थित नही होता था। मेरे 7-फुट दूरदशक की ट्यूब बफ मे ढक गयी है, फिर भी मुझे स्पष्ट दिखाई देता है एक से अधिक बार, किसी तारे को देर तक देखने पर, मैंने पाया कि मेरे पांव जमीन पर जम गए हैं शीनो पर जम गया है सारी जगह बर्फ से ढक गयी है, फिर भी मुझे साफ दीखता है ।" इस भांति काय होता रहा। उसने सबसे पूर्व हैली द्वारा ज्ञात तार- कीय गनियो के माप से सोर-गति को प्राप्त कर उसने सानिध्य के तारो बहुत धना कुहरा मेरे एक नए ग्रह की खोज 67 - । के सापेक्ष सूय-गति पर एक लेख प्रकाशित किया। उसने मालूम किया कि समीपवर्ती तारायुग्म वास्तव मे ऐसे तन हैं, जिनमे एक तारा दूसरे के इर्द- गिद, सभवत न्यूटन के गुरुत्वाकपण के नियमानुसार घूमता है। उसने च द्रमा की पहाडियो की ऊँचाई मापी, मगल ग्रह के ध्रुवो की सफेद टोपियोकोलक्षित किया और उहे बफ बताकर उनका सही निरूपण क्यिा। उसने इस ग्रह के चिह्नो का प्रेक्षण कर, उसके अपनी धुरी पर सवृत्त होने की अवधि 24 घटे 39 मिनट 21 67 सेक्ड, जिसमे सवश्रेष्ठ आधुनिक मान से केवल दो पिनट का अन्तर है, ज्ञात की। बहुत-से अवसरो पर, उसने अपने ग्रह यूरेनस का, जिसके अवेषण से वह विरयात हुआ था, प्रेक्षण भी किया। सतर्क माप द्वारा उसने उसका व्यास पृथ्वी के व्यास से पचगुना पाया, जो कि काय की कठिनाई को देखते हुए, अत्यधिक प्रामाणिक मान था। 1787 मे उसने उसके पहले दो उपग्रह उपलब्ध किए तथा 1797 में उसने चार और पाने का दावा किया। इसमे वह निश्चित ही ग्रह के मानिध्य के धुधले तारो द्वारा भ्रमित हो गया होगा क्योकि उसके वाद ज्ञात तीन मे से कोई भी उपग्रह उसके द्वारा बताए गए चार उपग्रहो से मेल नहीं खाता ! अपने प्रत्येक खाली क्षण का वह ज्ञान-वधन करने के लिए उपयोग करेगा, अपने जीवन के अन्त तक उसने अपने यौवन के इस प्रण को निभाया। 76 वप की आयु मे अपने इस उद्यम मे सलग्न वह कह सकता था "किसी अय मनुष्य ने मुझसे पूर्व अतरिक्ष की उतनी गहराई का प्रेक्षण नहीं किया जितना मैंने किया। मैने ऐसे तारो का प्रेक्षण किया है जिनका प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने मे वीस लाख वष लेगा, यह सिद्ध किया जा सकता है।" 83 वप की आयु मे उसका देहान्त हुआ। 97 वप की आयु तक करोलाइन जीवित रही, उस विषय में गभीरता से रुचि लेते हुए जिसमे उसके भाई ने अभूतपूर्व योगदान दिया था, सम्पूण यूरोप के ज्योतिविदो से सम्पक रखते हुए अन्त तक उसने प्रतिभा को स्थिर रखा । सन् 1962 मे, बकले (कैलीफोर्निया) की सभा मे, अन्तर्राष्ट्रीय ज्योतिर्विज्ञान सघ की ग्यारहवी जनरल अमेम्बली के अवसर पर ग्रिलर क्वार्टेट ने सर विलियम हश्र्चेल द्वारा निर्मित दा वॉ सर्टो बजाए ताकि 68 ज्योतिविज्ञान के महान क्षण विशिष्ट ज्योतिर्विदा को अन्तर्राष्ट्रीय असेम्बली को अपने विख्यात महयागी द्वारा निर्मित सगीत-सरचनायो का रसास्वादन करने का अवसर प्राप्त हो सके । बाथ के सगीत-निर्माता को यह मुरुचिपूर्ण श्रद्धाजलि अर्पित की गयी थी जिसने रात्रि-नभ मे न केवल विश्व का बल्कि अपनी सच्ची नियति का अन्वेषण भी किया।

छठा अध्याय दूरदर्शक के बिना प्रोक्षण 1781 मे हश्र्चेल द्वारा यूरेनस ग्रह की खोज करने के समय से अनेक ज्योतिविदो द्वारा वह निरन्तर प्रेक्षित होता रहा। सन् 1821 के अन्त तक काफी मात्रा मे प्रेक्षित सामनी एकत्रित हो गयी । इन चालीस वर्षों मे यूरेनस की लगभग आधी रक्षा का सूर्य के इद-गिद प्रेक्षण हो गया, जिससे गणितीय ज्योतिर्विद् ग्रह-कक्षा का सही-सही परिकलन कर सके । इस परिकलन में, बृहस्पति और गनि, बृहदाकार ग्रहो के बाधक आकर्षण को भी ध्यान मे रखा गया। यह सुविदित है कि जब नयी कक्षा के ग्रह की भूतकालीन स्थितियो का आकलन करने से ज्ञात हुआ कि 1690 से 1781 तक इसे अनेक बार प्रेक्षित किया गया था, चाहे प्रेक्षको ने इसे तारा समझकर इसके अन्वेषक हाने का मौका खो दिया। अन्य तारो के अभाव मे असदिग्ध रूप से यह प्रक्षण यूरेनस के थे जो कक्षा द्वारा निर्धारित प्राक्कालीन स्थितियो के सम्पात में नहीं थे। जैसे-जैसे वतमान से सुदूर व्यतीत के काल का निर्धारण करने का प्रयाम किया गया, सैद्धान्तिक एव प्रेक्षित स्थितियो मे विमगति बढती गयी। यह भी पाया गया कि 1690 से 1781 तक के प्रक्षण के आधार पर क्रमबद्ध कक्षा की सगणना की जा सकती है, परन्तु ऐसा करने पर इस कक्षा से 1781 से 1821 तक की पूर्वनिर्देशित सैद्धान्तिक स्थितियो मे और इस अवधि के मध्य प्रेक्षित स्थितियों मे पूर्ण समानता नहीं है। उस युग के कुछ ज्योतिर्विदो ने सुझाव दिया कि इस विमगति का कारण प्राचीन प्रेक्षण ("पूर्व निर्धारित) है जो नवीन प्रवेपणो से कम सम्यक है । यह ज्ञात होने पर कि 1821 के पश्चात् के प्रेक्षण 1781 से 1821 तक के प्रेक्षणोपर आधारित कक्षा की पूर्वानुमानित स्थितियो से, अधिक से अधिक 70 ज्यातिविज्ञान महान क्षण भिन्न होते जाते हैं-यह स्पष्टीकरण निरया हो गया। 1884 में यह वि सगतियां चाप की दो मिनट यी प्रर्थात् 150 पट यी दूरी पर हॉफ्पनी द्वारा निर्मित योग के वरार थी। ज्योतिर्विज्ञानानुमार यह योण बहुत वहा है, जवकि एक-दूसरे से इतनी दूरी पर स्थित तारे सामाय दृष्टि के व्यक्ति को एक ही प्रतीत होंगे। शीघ्र ही इन विमगतियो का एक दूसरा स्पष्टीकरण युछ ज्योति- विदो को सूमा । उन्नीसवी गताब्दी के प्रारम्भ मे वृहस्पति और मगल दोना ग्रहो की कभानो के बीच अनेक छोटे छोटे ग्रह पाए गए। ये आविष्कार और यूरेनस का आधुनिक युग मे प्रवेपित किया जाना इन तथ्यो के कारण काफी ज्योतिर्विदो को मशय हुग्रा वि स भवत अभी तक अज्ञात कोई ग्रह यूरेनस से भी विशाल कक्षा मे घूम रहा है, जो यूरेनस की कक्षा मे पारस्परिक गुरुत्वाक्पण के कारण वाधा उत्पन्न करता है। यूरेनस-वक्षा के सगणक वोयवर्ड, सर जॉन हश्चल (विलियम का पुत्र) और रॉयल ज्योतिविद् जाज ऐरी ने इस सम्भावना को माग्यता दी। फिर भी ऐरी को विश्वास नही था कि इस अपरिचित पिंड का स्थान कभी ज्ञात हो पाएगा। 1831-2 के दौरान ज्योतिर्विज्ञान की अवस्था की रिपोट ब्रिटिश एसोसिएशन को देते हुए उसने यूरेनस की समस्या को गित किया। सयोग वश दस वप पश्चात् एक युवा व्यक्ति ने इस रिपोट को पढा और वह एक ऐसे निष्कप पर पहुंचा जिसके कारण उसका जीवन परिवर्तित हो गया । उसे सम्मान और रयाति प्राप्त हुई । उसे भयकर अन्तर्राष्ट्रीय विरोध और द्वेषभावना का सामना करना पडा। और आज उस निष्कप को अनेक व्यक्ति यूटनीय गुरुत्वाक्षण की श्रेष्ठतम उपलब्धि मानते है । यह युवा व्यक्ति जॉन काउच ऐडम्स था। 1819 मे कानवाल के लिडकोट फाम मे इसका नाम हुआ। प्रारम्भ मे यह अपने घर के नजदीक लकास्ट के स्कूल मे प्रविष्ट हुआ। ग्यारहवे वष की आयु मे उसका पिता उसे एक सम्बधी के घर ले गया, जिसका पुत्र जॉन की आयु का था। मुलाकात के दौरान अपने प्रान दविभोर पिताओं के सम्मुख दोनो लडको ने एक-दूसरे को गणित का एक-एक प्रश्न हल करने के लिए दिया। दोनो लडके एक- दूसरे द्वारा प्रदत्त समस्या का हल नही पा सके, इसलिए उनसे अपनी-अपनी दूरदशक के बिना प्रेक्षण 71 समस्या का हल करने के लिए कहा गया। ऐडम्स ने बिना किसी कठिनाई के अपनी समस्या का हल कर दिया जब कि दूसरे बालक ने पाया कि उसकी समस्या असाध्य है । ऐडम्स की परीक्षा लेने के लिए, वहाँ के स्थानीय स्कूल- मास्टर को, जिसे गणित का अच्छा ज्ञान था, बुलाया गया । पुन ऐडम्स की विजय हुई, तब उसके पिता के सम्बधी ने कहा, "यदि यह मेरा लडका होता तो मै इसे कॉलेज भेजने के लिए, अपने सिर की टोपी बेच देना अधिक उचित समझता।" ऐडम्स के माता-पिता की स्थिति अच्छी न थी। वे जानते थे कि उसे अच्छी शिक्षा देना उनके लिए असम्भव है, फिर भी उन्होने प्रयास करने का निश्चय किया। 1831 मे जॉन को डेवनपोर्ट के स्कूल मे भेजा गया। स्थानीय मिकनिक्स इस्टीट्यूट मे उसे गणित की पुस्तके और ज्योतिर्विज्ञान पर किए कार्यों की रूपरेखा प्राप्त हुई । वह शरीर-विज्ञान सहित वैज्ञानिक विषयो पर अपनी इच्छानुसार कक्षाओं में जाता। 1334 मे सर जॉन हश्चेल की 'ज्योतिर्विज्ञान' नामक पुस्तक उसे स्कूली पुरस्कार मे प्राप्त हुई, जिसमे उसके मस्तिष्क को नयी दिशा प्राप्त हुई। 1835 मे उसने हैली के धूमकेतु का अवलोकन किया। सोलह वप के वालक ने अपने घर लिखा "शायद आप मेरी प्रसन्नता का अनुमान कर पाएगे कि कितने प्राह्लाद से मैंने उस धूमकेतु का प्रेक्षण किया, जिसके प्रागमन ने 380 वप पूव सम्पूण ग्रोप को आतकित कर दिया था, किन्तु आज जिसका आगमन ज्योतिविदो को उनके परिक्लन और पूर्वानुमान का यथाथ प्रमाण उपस्थित करने के कारण प्रफुल्लित पर देता है।" 1837 में जॉन स्थानीय लोगो के पुत्रो को पढाकर अपनी प्रा- जीविका कमाने लगा। 1839 मे वह कैम्बिज जाने के लिए तगर हुया । पूरा परिवार उसे कोच तक छोडने पाया। गाडी को कैम्ब्रिज पहुंचने में दो दिन और रात लगे। स्नातक होने से पूर्व यूनिवर्सिटी में उसका जीवन विशिष्ट एवं प्रसन्नतापूण था । व्याख्यान और अध्ययन के अतिरिक्त वह मित्रो के साथ लम्बी सरया राशि भोजन की पाटियो में जाता। ऐडम्स मगीत का गोपीन 72 ज्यातिविज्ञान के महान क्षण था और अक्सर गाकर अपने मित्रो का मनोरजन करता। वह चुस्त अखादे गाज भी था। उसका कैरियर विशिष्ट था, कभी कभी ज्योतिविज्ञान की हावी के कारण उसके नियमित अध्ययन मे विघ्न पडता । गणित मे प्रथम प्राने पर उसे छानवृत्ति और पुरस्कार प्राप्त हुए और उसे कुशाग्रबुद्धि विद्यार्थी माना जाने लगा। 1843 में गणित के ट्राइपॉस इम्तिहान मे उसके चार हजार से भी अधिक नम्बर पाए जबकि वैशफोथ के, जो द्वितीय था, दो हजार से भी कम नम्बर थे । परीक्षामो मे देखा गया कि ऐडम्स पहले चार घटे प्रश्नो को पढने और समझने में लगा देता है और उसके पश्चात् मात्र उनके उत्तर लिस देता है जिन्हे वह पहले ही दिमाग मे हल कर चुका होता है। अठारह माह पूर्व उसने अपनी डायरी में लिखा "3 जुलाई 1841, एक योजना, डिग्री लेने के पश्चात्, जितनी जल्दी मभव हो सकेगा, इस सप्ताह के प्रारभ मे, यूरेनम की गति की अनियमितताओ का, जिनका समाधान अभी तक नहीं हो पाया, अवेषण कि क्या इह इममे अग्रगामी अनात ग्रह के कारण कहा जा सकता है, यदि सभव हो मका तो अशत उसकी रक्षा के तवी का निरूपण, जिममे उसका अन्वेषण मभव हो पाएगा।" उसने स्वय को कठिन काय सोपा था और उसके पास इसे पूरा करने की गणितीय क्षमता थी। वर्षो मे यूग्नेम की प्रेक्षित एव निर्देशित असख्य विमगतियो द्वारा उसे एक अज्ञात द्रव्यमान के, अज्ञात आकृति एव आकार की कक्षा मे भ्रमित अनात ग्रह को ढढना था। ग्रहीय कक्षा के विवरण और उनमे ग्रहा की स्थिति एव उनका द्रव्यमान ज्ञात होने के पश्चात् भी उनवे पारम्परिक गुर वाक्पण द्वारा उत्पन व्याघातो को लम्वी अवधि तर सगणित पग्ना दु माध्य राय था । ऐदम्म इमवे प्रतिवूल समस्या का सामना पर रहा या जो इससे भी अधिक विषम थी। सितम्बर 1845 तब ऐम्म ममस्या या समाधान कर चुका था, यूरेनम के व्यवहार का उत्तर अनात ग्रह है। यह उसे ज्ञात हो गया था और उन उमयी वक्षा की सगणना कर ली थी। उसने अपना निवर्ष रॉयन ज्योतिविद् को भेजा और ग्रह की स्थिति को चिह्नित करते हुए उमे अपन दूरदर्शक द्वारा प्रेक्षित करने यो निखा। गेरो इम पूरस्थन में इतना अधिक विश्वास नहीं था कि वह .

73 । दूरदशक के बिना प्रेक्षण अपनी ऑब्जर्वेटरी के काय को स्थगित कर नए ग्रह का दूरदर्शकीय भन्वेषण करने का निणय लेता। उसने ऐडम्स को सुझाव दिया जिस नए ग्रह के सिद्धान्त से तारो के परिप्रेक्ष्य मे यूरेनस की प्रतीयमान स्थिति और विसग- तियो का स्पष्टीकरण हो जाता है और उसकी स्थिति का अनुकलन भी हो पाता है उससे अब यह ज्ञात करे कि क्या उसका सिद्धान्त यूरेनस की दूरी की त्रुटियो के लिए भी सम्यक् होगा। ऐरी के इस सुझाव से स्पष्ट लक्षित होता है कि उसे, समस्या किस बारे मे है, इसका बोध नही था क्योकि यूरेनस का स्थिति-सशोधन अनिवायत दूरी-सशोधन से सम्बद्ध था। ऐडम्स बहुत निराश हुआ। उसे अपने अज्ञात ग्रह के अस्तित्व का पूर्ण विश्वास था। नए ग्रह के लिए सगणित कक्षा को अधिक सटीक बनाने के प्रयास मे उसने आगामी महीनो मे दुबारा परिश्रम करना शुरू कर दिया था। कैम्ब्रिज मे सेंट जॉन्स कॉलेज की ऑब्जर्वेटरी मे उसने छोटे यत्रो का निर्माण प्रारम्भ कर दिया, जिसके सम्बन्ध मे उसने बाद मे लिखा, "इस विशिष्ट ध्येय के साथ, यदि कोई भी इस विषय में रुचि नहीं लेगा तो, ग्रह की खोज मैं स्वय करूंगा ।" इस भाँति सितम्बर 1845 मे ग्रह ढूढने का पहला मौका हाथ से जाता रहा। इसी बीच ऐडम्स से अपिरिचत मास के एक युवा व्यक्ति, जीन जोसफ लेवेरियर ने भी इसी समस्या का समाधान ढूढने का निश्चय किया। 1811 मे लेवेरियर का जन्म हुआ और ऐडम्स की भांति उसने भी कुशल गणितज्ञ की ख्याति के साथ स्कूल छोडा। 1846 मै पेरिस में इकोल पोली- टेक्नीक के स्टेनिसलॉस कॉलेज मे प्रशिक्षक रहने के पश्चात् उसे विज्ञान- सकाय मे ज्योतिर्विज्ञान का प्रोफेसर नियुक्त किया गया। यूरेनस की समस्या से प्राकर्षित होने से पूर्व काफी मात्रा में ज्योतिर्विज्ञान पर उसके महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हो चुके थे जिनसे वह और विख्यात हो गया था। नवम्बर 1845 मे लेवेरियर का यूरेनस पर पहला सस्मरण प्रकाशित हुमा । इस सस्मरण मे वह किसी अज्ञात ग्रह के अस्तित्व की सभावना पर विचार नहीं करता। 1 जून 1846 मे अपने दूसरे सस्मरण मे वह बताता है कि यूरेनस के व्यवहार का कारण आज कोई प्रशाठ ग्रह ही हो सकता है 74 खगोल विज्ञान के महान क्षण भोर इस समस्या के समाधान मे वह नए ग्रह की स्थिति से अवगत कराता है। तीन सप्ताह पश्चात् इस सस्मरण की एक प्रति ऐरी को प्राप्त हुई। उसे यह देखकर माश्चर्य हुआ कि लेवेरियर द्वारा निर्णित नए ग्रह की स्थिति ऐडम्स द्वारा अनुकलित स्थिति से एक डिग्री तक मिलती है । आखिर उसने काय करने का निश्चय किया । ज्योतिर्विज्ञान के प्लूमियन प्रोफसर और केम्ब्रिज ऑब्जर्वेटरी के डायरेक्टर जेम्स चैलिस से ग्रह को खोजने के लिए कहा और आवश्यकता पड़ने पर अपने कमचारी वग के अनुभवी सदस्यो का सहयोग देने के लिए भी कहा । तीन दिन पश्चात् स्थिति की अपरिहायता बताते हुए उसने चैलिस को लिखते हुए कहा- "तत्कालीन किसी भी कार्य से, जो देरी होने के कारण सम्पूणत नष्ट नहीं होता, उन सबसे इस अन्वेषण की अत्यधिक महत्ता है।" उस समय तक चैलिस ने नए ग्रह से सम्बद्ध ऐडम्स के अनुकलन को कोई महत्ता नही दी थी जबकि उसके पास भी सितम्बर 1845 से कक्षा के विवरण की एक प्रति थी। विशाल नाथम्बरलड दूरदशक द्वारा 29 जुलाई 1846 को उसने खोज प्रारम्भ की । खोज का ढग ग्रह की पूवसूचित स्थिति के पास पास के क्षेत्र मे एक सीमित चमक से अधिक देदीप्यमान प्रत्येक तारे की स्थिति को मापना था। किसी एक 'तारे' की धीमी गति को चिह्नित कर पाने की प्रत्याशा मे इस सर्वेक्षण को अन्तरालो पर दुहराया जाना था। वह गति उस 'तारे' का नया ग्रह होना व्यक्त करेगी। स्पष्टत चलिस को उसे मडलक द्वारा चिह्नित करने की कोई आशा नही थी, जिस भाति हर्चेल ने यूरेनस को लक्षित किया था। 29 जुलाई से सितमर के अत तक चलिस ने 3,150 स्थितियां माप ली थी। इस अन्त की तिथि मे यूरोप मे प्रय घटनाएं घटित हो चुकी थी। 18 सितम्बर को बलिन मॉब्जर्वेटरी के डॉ० गाल को लेवेरियर ने नए ग्रह का सभावित स्थान लिखा, और उहें उसके पडोस मे ढूढने के लिए कहा । उसने इगित किया कि शायद वह अपने महलक द्वारा सुगमता से पह्नित किया जा सकेगा। लेवेरियरका पत्र गाल को 23 सितम्बर को प्राप्त 75 दूरदशक के बिना प्रेक्षण । हुआ । मौसम के स्वच्छ होने पर उसी सध्या को, अपने एक सहयोगी डॉ. अमिर द्वारा निर्मित नए तारा-चाट 'होरा-XXI' को लेकर, गाल ने अपने महयोगी द'अरेस्ट के साथ दुरदशक से खोज प्रारभ कर दी। चैलिस के दुर्भाग्य से यह नक्शा अभी वितरित नहीं किया गया था। गाल के दूरदर्शक क्षेत्र मे प्रत्यक्ष होने वाले तारो की द'अरेस्ट जांच करता जा रहा था। अकस्मात् ही क्रम मे वाधा पडी। "वह चार्ट पर नहीं है ।" द'अरेस्ट ने उत्तेजित हो कहा। तारे की प्राकृतिका वहधुंधला पिंडथा। इमसदेहास्पदपिंड को अन्वे- पित करने पर ज्योतिविदो की उत्तेजना की कल्पना करना सुगम है । रात्रि के व्यतीत होने से पूर्व उसमे गति के चिह्न लक्षित हुए और आगामी दो सध्यानो के प्रेक्षण से यह गति प्रमाणित हो गयी । इसके अतिरिक्त उसके मडलक का व्यास चाप के तीन सेकड के लगभग मापा गया, लगभग उतना ही जितना लेवेरियर ने अनुमान किया था। अब कोई सदेह शेष नहीं रह गया था। ऐडम्स के पूवकथित स्थान से एक डिग्री के भीतर और लेवेरियर के पूवसूचित स्थान से डेढ डिग्री स्थान के अन्तर्गत पाया गया, यह नया ग्रह ही था। अवेषण का समाचार प्राप्त होने पर चैलिस ने अपने प्रेक्षणो की जाँच की और सन्ताप अनुभव करते हुए पाया कि वह तीन विभिन्न अवसरो पर ग्रह का प्रेक्षण बिना उसे चिह्नित किए कर चुका है। "चार दिन के प्रेक्षण के पश्चात्,", उसने ऐरी को लिखा, "ग्रह मेरे हाथ मे था यदि मैं प्रेक्षणो की जांच करता या नक्शे पर चिह्नित करता।" इस कार्य को उसने प्रेक्षणो के सम्पूर्ण होने तक छोड रखा था। यदि वह इसे करता तो वह गाल और द'अरेस्ट से कई सप्ताह पूर्व ग्रह को अवेषित कर चुका होता। न्यूटन के गुरुत्वाकषण नियम की इस नयो विजय से सभी स्थानो पर सम्पूण वैज्ञानिक ससार और सामाय व्यक्ति तक स्तम्भित रह गया, खास तौर पर जिस ढग से यह विजय प्राप्त हुई थी। कि डेस्क पर बैठा एक व्यक्ति अपने मस्तिष्क से न केवल अन्तरिक्ष की गहराइयो मे विलुप्त अज्ञात ग्रह की प्रेतीय गुरुत्वाकषणीय उगलियो के खिंचाव का, यूरेनस की अनुकलित एव प्रेक्षित स्थितियो की लघु विसगतियो मे अनुभव कर सकता है बल्कि ।

"वर चाट पर नहीं है !" द रेस्ट ने उत्तजित हो रहा ।

77 दुरदशा के बिना प्रेक्षण उसका पदमागण कर ज्योतिर्विद् को सम्यक् स्थान पर अपने दूरदर्शक को स्थित करने का निर्देश भी दे सकता है। मानव-मस्तिष्क के इस अत्युदात्त असामा य काय से सम्पूण मानव-जाति अचम्भित हो उठी। इसमे आश्चर्य की बात नहीं कि लेवेरियर के देशवासियो ने उसकी सफ्नता का फासीसी विज्ञान की सफलता के रूप में स्वागत किया। इसमे भी कोई पाश्चय की बात नही कि इगलिश चनल के दूसरी तरफ के समाचार से वे कोध और गुस्से से भर उठे थे। नेप्च्यून के अन्वेषण की उद्घोपणा के साथ-ही-साथ, मौर-मडल के नए ग्रह का यह नामकरण किया गया। सर जॉन हरर्चेल ने ऐडम्स और उसके अनुकलन का सावजनिक प्रेक्षण किया। लगभग इसी के एकदम माथ चैलिम ने बताया कि ऐडम्स के पूर्वानुमान पर आधारित जुलाई के अन्त से इस ग्रह की खोज जारी है। गुस्से के पहले उबाल मे, फ्रासीमियो एव वहुत-से अय व्यक्तियो को यह लगा कि सच्चे अन्वेपक लेवेरियर को उसके अधिकारो से वचित किया जा रहा है। जबकि दूसरी तरफ ब्रिटिश ज्योतिर्विद् और विज्ञान के व्यक्ति ऐडम्स के कम-से-कम अवेपक होने के सम्मान का समान अधिकारी होने के अधिकार की पुष्टि करने लगे थे। ऐडम्स, लेवेरियर, चैलिस, ऐरी, हश्र्चेल प्रभृति रयाति प्राप्त व्यक्तियो को लेकर उग्न अावेशमय पर व्यवहार हुआ । यह वात हर्षित करती है कि नेप्च्यून की घटना के पश्चात् ऐडम्स और लेवेरियर पक्के मित्र वन गए, स्पष्टत दोनो द्वेषभावना से दूर एक-दूसरे के प्रशसक थे। रोप मे शात होने पर, नेप्च्यून के अवेपण की शृङ्खलावद्ध घटनाप्रो पर दृष्टिपात करने पर, चैनल के दोनो तरफ के व्यक्तियोको अनुभव हुआ पि ऐडम्स को नेप्च्यून का अन्वेषक होने का उतना ही हक है जितना लेवेरियर को। उसके प्रति ऐरी और चैलिस के दुर्व्यवहारकाअनुभव भी किया गया, जिसके पश्चात् दानो को कभी चैन नहीं मिला। दोनोको जनसमुदाय के सम्मुख अपने व्यवहार का स्पष्टीकरण देने के लिए बाध्य किया गया। ऐरी को अपने अय- तम मित्र ऐडम सेग्विक के पत्र प्राप्त हुए, जिन्होने पूछा, जबकि पिछले जून मे लेवेरियर के उन समाधानो का प्रकाशन होने से पूर्व, जिन्हे ऐडम्म 78 खगोल विनान वे महान क्षण 'पहले' (सितम्बर 1845 मे) ही प्राप्त कर चुका था, तब आश्चय इस बात का है कि पूरे यूरोप मे इस तथ्य को उद्घोपित क्यो नही कर दिया गया कि कैम्ब्रिज का एक स्नातक नौ माह पूर्व ही यह (और इससे अधिक') उपलब्ध कर चुका है " और "जबकि एक सौभाग्यशाली फासीसी द्वारा ऐडम्स की परि- पुष्टि पायी गयी, तब इस तथ्य का प्रकाशन विना क्सिी देरी के कर दिया जाना चाहिए था। यदि मान इतना ही बताया जाता कि लेवेरियर ऐडम्स के पीछे है, हमारे ज्योतिविद् क्षण-भर मे सतक हो उठते।" उनीसवी शताब्दी के मध्य मे ये महत्वपूर्ण प्रश्न थे। हमारे लिए पाज के युग मे यह ज्योतिर्वैज्ञानिक अन्वेषण, जिस विचित्र रीति से हुआ, अधिक महत्वपूर्ण वस्तु है । ऐडम्म और लेवेरियर दोनो को सदैव नेप्च्यून ग्रह के साथ सम्बधित किया जाएगा। वे दो व्यक्ति, जो न्यूटन के गुरुत्वा पण नियम मे विश्वास रखते हुए, अपने कुशाग्रबुद्धिसम्पन और स्थायी अनुस धान के कारण ज्योतिर्विज्ञान के इतिहास मे एक महान् क्षण उपस्थित करने में सक्षम हुए। अवेपित ग्रह, यूरेनस की अपेक्षा सूय से डेढ गुना अधिक दूरी पर होने के बावजूद भी आकृति और द्रव्यमान मे लगभग यूरेनस का जुडवा था। दोनो ग्रह पृथ्वी के व्यास के लगभग चार गुना और द्रव्यमान मे लगभग पद्रह गुना है। दोनो का मिथेन (methane) गैस से भरा विपला वातावरण है । नेप्च्यून के दो मुविज्ञात उपग्रह हैं बडा वाला ट्राइटन है जो नेप्च्यून के अवेषण के सत्रहवे दिन पश्चात् नौसिखिये अग्रेज ज्योतिर्विद् लेसल द्वारा ज्ञात क्यिा गया । नेप्च्यून की कक्षा निर्धारित होने पर, यह भी पाया गया कि यूरे- नस की भांति इसका अवेषण होने से पूर्व, इसे काफी वार प्रेक्षित किया जा चुका था, खास तौर पर लेलड द्वारा 8 और 10 मई 1795 मे, परन्तु इसे तारा समभा गया। इन दो तिथियो की विसगति को लक्षित करते हुए लेलड ने पुरानी तिथि को दोपपूर्ण अनुमानित किया और उसे नेप्च्यून का अवेषक होने की अमरता का त्याग करते हुए छोड दिया। सम्भय था कि गाल से एक पक्ष पूव लेसल ग्रह का अवेपण कर लेता क्योकि उसे डब्ल्यू एच डावेस का, जो ऐडम्म का पाय जानते थे, प्रेषण के लिए सही हिम्मो को इगित करता हुआ पत्र प्राप्त हुआ था।

दूरदशक के बिना प्रेक्षण 79 दुर्भाग्यवश लेसल के घुटने में मोच आ जाने के कारण उसने मौका खो दिया। तत्पश्चात् जीवन मे ऐडम्स और लेवेरियर दोनो ने ज्योतिविज्ञान मे महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेवेरियर सभी ग्रहो की गतियो के सिद्धान्तो को दुहराने और आवश्यकता पड़ने पर उनकी सरचना करने के महत्वपूर्ण कार्य मे व्यस्त हो गया, जिसमे वह चालीस वर्ष तक निरत रहा। ऐडम्म, जो सेंट एड्रज विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर नियुक्त हुना, फिर कैम्ब्रिज मे, चंलिस के पश्चात् 1861 मे कैम्ब्रिज ऑब्जर्वेटरी का डायरेक्टर बना । वह खगोलीय यात्रिकी का सुविख्यात विशेषज्ञ माना जाने लगा, खास तौर पर चद्रमा के गति-सिद्धात मे । आखिर में ऐरी ने स्वय कहा, "गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त के प्रकरण पर मैं ऐडम्स को अपना प्राप्त-पुरुष मानता हूँ।" नेप्च्यून के अन्वेषकों के अनुरूप गणितीम अन्वेषणो द्वारा प्रेरित खोजो से, दोनो व्यक्तियो की मृत्यु के पश्चात् एक अन्य ग्रह प्ल्टो (यम ग्रह) 1930 में ढूंढा गया। प्लूटो सूय के चारो तरफ इतने विशाल दोघवृत्त मे परिभ्रमण करता है कि एक चक्कर मे 250 वर्ष लगते हैं। शायद यह सौर परिवार का सबसे वाह्य सदस्य है । या सम्भवत नहीं है। इसे केवल समय बताएगा। ।

सातयां अध्याय आकाश मे मील के पत्थर उनीसवी शताब्दी के पहले अद्ध भाग ने नेप्च्यून के अवेषण के अतिरिक्त खगोलविदो की युगा पुरानी तारे की दूरी मापने को महत्वाकाक्षा को भी पूण होते देखा था। अठारहवी और उनीसवी शताब्दी के दौरान सैक्डो-हजारो की सरया मे तारवीय स्थितियो का माप अत्यत सावधानी से बिना किमी तारकीय लम्बन को पाए, लिया जा चुका । ब्रडले के विपथन एव हिलने की प्रक्रिया के अवेषण के पश्चात्, इस तथ्य को मा यता मिल चुकी थी कि पृथ्वी के सूय के चारो ओर चक्कर लगाने के कारण सबसे निकट के तारे का भी प्रतीयमान हटाव दूरदशक के वगविभक्त वृत्तो के अनुसार अत्यन्त सूक्ष्म होगा, किन्तु फिर भी उमे मापने के प्रयास जारी रहे । यदि वास्तव मे ऐमा होता जमा कि कुछ खगोलविद् तव करते थे कि सूय एक औसतन तारा है तब उसकी दीप्ति को तुलना सबसे अधिक चमकदार तारे को दीप्ति मे कर, यह मगणना की जा सकती थी कि वह तारा सूय मे सैकडो गुना दूर है । तव तक यह ज्ञात नहीं था कि सूय एक तारा हे या सभी तागे को एक-जैसी दीप्ति है और इस भाति की सगणना का कोई महत्व नहीं । आपको याद होगा कि तारकीय लम्बन को मापने के लिए खगोल- विद् विभिन स्थितियो से और सुदूर पृष्ठभूमि के परिप्रक्ष्य मे उस वस्तु पर दृष्टिनिक्षेप कर उसकी दूरी मापने के सुपरिचित ढग का उपयोग करता था । यदि आप एक झील के किनारे खर है जिसमे एक छोटा सा द्वीप है तो आप किनारे से उमकी दूरी निम्नलिखित ढग से माप सकते है। मान लीजिए उस द्वीप पर एक पेड (चित्र मे T, पृष्ठ 81) या कोई चिह्नित की जा सकने वाली वस्तु है। हम किनारे पर धरातल की लकीर AB कुछ फुट लम्बी माप लेते है । इसके पश्चात् कोणो TAB और TBA 80 आकाश मे मील के पत्थर 81 को माप लेते है । अब हम त्रिभुज TAB के दो कोण और एक भुजा जानते हैं और इसे किसी उचित पैमाने तक एक कागज पर खीच सकते है और TA तथा TB को फुटो मे अनुकलित कर सकते है। इससे हमे किनारे से द्वीप की दूरी प्राप्त हो जाएगी। y.08 यदि कोई व्यक्ति A पर खडा है तब पेड की दिशा AT रेसा के साथ होगी और यदि वहाँ से वह व्यक्ति B पर चला जाता है तो पेड को दिशा परिवर्तित होपर BT हो जाएगी। AT के ममातर BT रेसा खीचकर यह सुगमता से सिद्ध दिया जाता है कि BT से BT तर का दिशा- परिवतन कोण ATB के बराबर है । इस कोण पड का लम्बन रहते हैं मौर इसे प्राधार-रेसा AB से मापा जाता है। यह भी पाया गया है कि भाधार-रेखा से जितनी अधिर वही दूरी गो मापा जाएगा, तम्बनीय कोण उतना ही छोटा होगा, अर्थात् प्रदत्त सही कोणीय माप और प्राधार-मेगा के लिए मापी हुई दी थी त्रुटि दूरी के बढ़ने के साथ बढ़ती जाती है जब तक रि यह बिन्दु नही पा जाता जहाँ सम्बनिर याण मान की अपरिहार्य बुटियो से भी कम हो जाता है। पृथ्वी की मक्षा का व्यास, तारखीय दूरियो पा मापने लिए वो विशाल प्राप्य मापार-रेगा पी और रागोलविदो मो शीमे पार सम्पन्न रसा पडता पा। माप 5 महीने के पश्चात् लिए जाने गरि बार मात्र पृप्पी के सूर्य के पारो मोर अपने माघे कामे पूमा रे पर लिए जा 82 सगोल विज्ञान के महान दाण मकें । तव पृथ्वी छ महीने पूर्व की स्थिति मे 186 लाख मील दूरी पर होती। तव भी जिन लम्बनिक कोणो कोज्योतिर्विद मापने का प्रयास कर रह थे वह चाप के एक सेकड से भी कम थे उतने जितना कि तीन मील की दूरी पर प्राधी पनी द्वारा निर्मित कोण होगा। पहला कार्य ठीक तारे का चुनाव था। यदि सब तारोको एक जैसी दीप्ति है तब सबसे समीप का तारा मवसे अधिक दीप्तिमान प्रतीत होगा। परन्तु जैसा कि हम पहले कह चुके है तर यह ज्ञात न था। यह भी सम्भव था कि सबसे अधिक दीप्तिमान तारा वास्तव में अधिक दूरी पर असामाय रूप से चमकदार हो जाकि उममे मानिध्य के धुधले तारे यथाथ मे प्रेक्षक के अधिव निक्ट हो। इस सदभ मे, दूसरा निर्देशक, धुधले तारो की पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य मे तारो की स्थिति-परिवर्तन करने की दर थी। हैली द्वारा इस क्षेत्र मे शुरु किए काय का काफी ज्योतिर्विदो ने अनुकरण किया और उन्नीसवी शताब्दी के प्रारम्भ तक, जैसा कि इस गति को कहा जाता था, तारो की वास्तविक गति की एक लम्बी सूची उपलब्ध हो गयी। पुन , दूसरे प्रमेयो के समान होने पर, निकट का तारा दूर के तारो की अपेक्षा अधिक तेजी से घूमता प्रतीत होगा। 1837 में महान ज्योतिर्विद फेडरिक विल्हेल्म बेसल ने, जो तीस से अधिक वर्षों तक कोनिग्सग मे प्रशियन ऑब्जर्वेटरी का डायरेक्टर था, तारकीय दूरी मापने की चिरकालीन समस्या को सुलझाने का निश्चय किया। हश्र्चेल के यूरेनम खोजा के तीन वष पश्चात, 1784 मे बेसल का जम हुआ और हश्र्चेल की भाति वह भी ज्योतिर्विज्ञान म घुमावदार रास्ते से प्रविष्ट हुआ। प्रारम्भ म वह एक व्यावसायिक फम मे अप्रण्टिस था। स्वय को अपने काम में निपुण बनाने के लिए जितना सम्भव हो सकता था, उसने अपनी फम के पूर्वी भारतीय व्यापार मे प्रयुक्त विदेशी भाषाओ का अध्ययन किया। उमने नौचानन विद्या का भी अध्ययन किया जो ग्रहो और तारा के प्रेक्षण पर निभर होने के कारण उसे ज्योतिर्विज्ञान तक ले गयी। अनुकलन के अनिवायत प्रयुक्त होने के कारण उगने स्वय को गणित मे भी निपुण आकाश मे मील के पत्थर । कर लिया। अल्प समय मे उसके खगोल से सम्बधित अनुसन्धानो ने उसे यूरोप- भर मे विख्यात कर दिया और हश्र्चेल की भाति उसने खगोल-विज्ञान के लिए अपनी सफल जीवनवृत्ति का त्याग कर दिया। 1818 मे उसने ब्रडले की ग्रीनविच ऑब्जर्वेटरी के प्रेक्षणो को कम कर उनकी एक सूची निर्मित कर प्रकाशित की, जिससे 1755 मे 3,222 तारो की स्थिति अवगत होती है । इस काय कोसम्पन्न करने के लिए उसने प्रेक्षणो को घटाने के नियम बनाए, एक ऐसी प्रक्रिया जिसका उपयोग प्रायोगिक त्रुटिरहित अनिवाय सूचना प्राप्त करने के लिए या कम-से-कम उस त्रुटि को ज्ञात करने के लिए क्यिा जाता है। तारकीय दूरियो को मापने का निश्चय कर लेने के पश्चात् बेसल का पहला कार्य ठीक तारे का चुनाव करना था। उसने विशाल वास्तविक गति का देदीप्यमान तारा '61 Cygni' चुना, जिसे खगोलज्ञो के मध्य 'वेगशील तारे' के नाम से जाना जाता था । बेसल ने अनुमान लगाया कि यह अय तारो की अपेक्षा अधिक निकट होगा और निरीक्षण के योग्य भी। दो सौ साल पूर्व गैलीलियो ने सुझाव दिया था कि शायद धुंधले तारी के सानिध्य मे उनसे अपेक्षाकृत अधिक चमकदार तारे की स्थिति को मापना सुगम होगा। बेसल ने इसी ढग को अपनाया। वष भर, छोटे-छोटे अन्तरालो के पश्चात् उसने 61 Cygni' के सानिध्य के दो धुंधले तारो से उसकी कोणीय दूरी का निरीक्षण किया। उसने होलियोमीटर नामक विशिष्ट दूरदर्शक का उपयोग किया जोकि उस समय का सबसे अधिक सम्यक यत्र था और तारकीय स्थितियो के चाप का एक सेकड जितने लघु अश तक को भाप ले सकता था। उसे 61 Cygnt' की प्रतीयमान गति को निरुपित कर पाने का अत्यन्त हप हुआ। 1838 के अन्त मे बेसल ने उसका लम्बन चाप के एक सेकड का तिहाई भाग, साठ सहस्र भरव मील की या सूय की दूरी से छ सो हजार गुना से अधिक दूरी पर, होने की घोषणा की। विश्व की सरचना के असीम मान का यह पहला प्रत्यक्ष प्रमाण था जो मनुष्य को प्राप्त हुआ। सूय, ग्रहो भौर उनके चद्रमामो का सौर परिवार 84 खगोल विज्ञान के महान क्षण तारकीय व्यवस्था का एक अल्प अश था, जिममे सूय सिफ एक औसतन तारा था। । ऐडम्म और लेवेरियर की भांति, वेमल तथा अन्य खगोलज्ञो ने इस कार्य में एक ही समय सफलता प्राप्त की। वेसल की सफलता के दो मास पश्चात्, टॉमस हेडर्सन ने केप ऑफ गुड होप ऑब्जर्वेटरी पर अल्फा सेण्टॉरी के, जो दक्षिणी गोलार्द्ध का तीसरा दीप्तिमान तारा था, प्रेक्षणो के आधार पर घोषित किया कि उसने अल्फा सेण्टॉरी को माप द्वारा वीस सहस्र परत्र मील की दूरी पर स्थित पाया है । वास्तव में यह सवसे समीप का तारा है। बेसल एव हडसन और ऐडम्स एव लेवेरियर के सदभ मे दुसरी समानता रुचि की है। जिस भाति चैलिम वास्तव मे गाल मे पूर्व ही नेप्च्यून का प्रेक्षण कर चुका था कि तु अपने प्रेक्षणो को साथ-ही-माथ न घटाने की वजह से नेप्च्यून का प्रत्यक्षत उसे देखने वाला पहला अन्वेषक होने का सम्मान न पा सका। उसी भाति हेडसन बेमल से पूर्व अल्फा सेण्टॉरी के लम्बनिक हटाव को माप चुका था और अपने प्रेक्षणो के अध्ययन मे देरी करने की वजह से वेसल से पूर्व घोषणा नहीं कर सका । हेडमन की घोषणा के एक वर्ष पश्चात् उस की प्लुकोवा प्रॉब्जर्वेटरी से किए गए प्रेक्षणो के आधार पर फ्रेडरिक जी डब्लू स्ट्र व देदीप्यमान तारे वेगा की दूरी लगभग अस्सी सहस्र अरब मील निर्धारित करने मे सफल हुआ। खगोलज्ञो को यह नयी और महत्वपूर्ण उपलब्धि लगी जिससे महान बातो की अपक्षा थी, किन्तु शीघ्र ही यह विचार बदल गया। उस काल की प्रेक्षण पद्धति मात्र कुछ ही दजन तारो की दूरी माप सक्ने मे समथ सौर परिवार की एक नियत दूरी के पश्चात् वस्तुओ के परिमाण के माप की अपेक्षा माप की त्रुटिया इतनी अधिक बढ़ जाती कि मापने का यह ढग निग्थक हो जाता। बेसल की सफलता के पश्चात् सौभाग्य से खगोल विज्ञान को सहयोग के लिए एक नया यन उपलब्ध हुआ, वह था कमरा। 1850 मे देदीप्यमानतारो-वेगा और केस्टर के प्रारम्भिक चित्र खीचे गए। उत्कृष्ट तरीको के साथ सात वष पश्चात् प्रत्येक ग्राख से देखे जा सक्नेवाले तार काचित्र ले पाना सभव होसका। अब जो खगोलज्ञ किसी तारे ।

माकाश मे मील के पत्थर 85 की दूरी को मापना चाहता वह छ महीनो के अन्तराल पर नभ मे तारे के पास पास के क्षेत्र का चित्र खीच लेता। फोटो-प्लेटो के धुलने के पश्चात् वह उन पर तारकीय प्रतिबिम्बो की दूरी मापकर तारे की दूरी, धुंधले तारे के प्रतिबिम्बो के परिप्रेक्ष्य में उसके प्रतिविम्ब का लम्बन मापकर प्राप्त कर सकता था। ससार की विभिन्न प्रॉब्जर्वेटरियो मे कार्य करते हुए विभिन्न खगो- लशो ने तब से इस कार्य में भाग लिया है और आज इस ढग से उपलब्ध हमे लगभग पाच हजार तारो की दूरियॉ ज्ञात हैं। फोटो लेने के ढग का उपयोग सौर परिवार के तत्कालीन पडौस में उपस्थित तारो तक सीमित है जोकि हमारे तारो की आकाशगगा के प्राकार की तुलना मे इतना छोटा घेरा है कि यदि हम प्राकाशगगा को एशिया महा- द्वीप के आकार जितना मान लें तो यह घेरा एक काफी बडे शहर की सीमानी के भीतर निहित रहेगा । सम्पूण आकाशगगा को मापने के लिए नए ढग का पैमाना चाहिए था और यह नया पैमाना बेसल द्वारा 61 Cygnt' की दूरी का माप जान लेने की एक शताब्दी पश्चात् ज्ञात हुआ। नया पैमाना पूरे मन्तरिक्ष मे छितरे तारो में किसी विशिष्ट ढग के तारे का अनोखा व्यवहार था। जब कुछ तारो का निरन्तर प्रेक्षण किया गया तो ज्ञात हुआ कि उनकी प्रतीयमान चमक स्थिर नहीं है बल्कि एक खास ढग से इस प्रकार घटती-बढती है कि चमक बढने और घटने के चक्र का क्रम बार-बार दुहराया जाता है। प्रत्येक चक्र किसी खास तारे के लिए समान समय के लिए रहता है और प्रत्येक तारेका चक्र भिन्न-भिन्न होता है। सम्पूण चक्र को अवधि को मावर्तीवाल कहा जाता है और प्रेक्षणो को बहुत-से पावर्तीकालो तक दुहराने से उसके यथार्य मावर्तीकाल को मापा जा सकता है। इसी समय इस तारे की भोसतन चमक को भी किसी मासान पैमाने पर चिह्नित किया जा सकता है । इसलिए दो प्रेक्षित परिमाण एक मावर्तीकाल और प्रोसतन प्रतीयमान चमक होते हैं। इन तारो को श्रेणी के पहले मदस्य डेल्टा सेफी की खोज के पीछे ये तारे सेफीयरी चर कहलाते हैं, पाज हम विश्वास करते हैं कि ये वास्तव -86 खगोल-विज्ञान के महान क्षण मे सूर्य के व्यास से कई गुना बडे है । अन्तरिक्ष के समुद्र मे आकाशीय जेली फिश की भाति फैलते और सकुचित होते हुए ये तारे अत्यत वृहद्काय हैं। उनके गैमीय पदाथ के बाहर और भीतर की ओर होते हुए अविरत दोलन से उनके धरातल क्षेत्र के ताप मे पाक्षिक परिवतन होता रहता है। इससे पृथ्वी से खगोलज्ञ को उनकी प्रतीयमान चमक बदलती दिखाई देती है। कुछ तारो मे यह प्रेक्षित आवर्तीकाल मात्र कुछ घटो का है जबकि दूसरो मे यह चालीस दिन से भी अधिक का है। इस शताब्दी के प्रारम्भ मे आकाश के प्रत्येक भाग मे सेफीयरी ढूढ लिए गए थे। खास तौर पर इन्हे छोटे और बड़े मैगलेनिक बादलो मे पाया गया। दक्षिणी गोलार्द्ध मे स्थित ये वडे तारक-पुज स्पष्ट दिखाई देते हैं । इनका नामकरण प्रसिद्ध पुतगाली नाविक मैगलेन पर, जिसने पृथ्वी के प्रथम भूचक्रण की व्यवस्था की थी, हुअा है। छोटे मंगलेनिक बादल मे सेफीयरी तारो के प्रावर्तीकाल और प्रतीयमान औसतन चमक का अध्ययन करते हुए सन् 1912 मे अमेरिकन खगोलज्ञ मिस एच एस लीविट ने एक दिलचस्प खोज की। उसने ज्ञात किया कि उनके पावर्तीकालो और प्रतीयमान औसतन चमक के बीच एक निश्चित सम्बध है । यदि वे आवर्तीकालो को उनकी वढोत्तरी के हिसाब से क्रमबद्ध करती है तो प्रतीयमान श्रीमतन चमक भी उमी व्यवस्था मे क्रमबद्ध हो जाती है। वास्तव मे इसमे वे वादल मे किसी भी सेफीयरी तारे का आवर्तीकाल माप लेने पर, अपने ग्राफ द्वारा उस आवर्तीकाल से सम्बन्धित प्रतीयमान प्रीमतन चमक को ज्ञात कर, उम तारे की यथाथ प्रतीयमान औसतन चमक को पूवमूचित कर सकती थी। अर आकार के बहुत छोटे क्षत्र में छोटा मगलेनिक बादल फ्ला हुप्रा है इसलिए यह मान लेने में कोई कठिनाई न थी कि बादल पर दृष्टि पात करने की रेखा वादन के मनिकट के भाग से लेकर दूर तक के भाग की दूरी बादल को पृथ्वी मे दूरी की तुलना मे अपक्षाकृत कम होगी। इसलिए उमम मग्निहित प्रत्येक तारे ती दूर्ग या वादल की पृथ्वी से दूर्ग जितना माना जा मरता है । इगमे यह स्पष्ट हो जाता है कि एक तार स दूगर तार गरी प्रतीयमान प्रामतन नमा वा अतर वास्नर म दीप्ति या अनर ही ।

माकाश मे मील के पत्थर है, दूरी का नहीं। जैसे कि किनारे पर खडा एक व्यक्ति, एक दूर जाती नाव का शक्ति शाली दूरदशक से निरीक्षण करने पर सभी यात्रियो को उतनी ही दूरी पर ले सकता है और यात्रियों की प्रतीयमान ऊँचाई का अन्तर वास्तविक महत नही रखता। मिस लीविट ने अनुमान किया कि सभी सेफीयरी तारो के भावर्त कालो के प्रकाश की अस्थिरता और उनको वास्तविक ज्योति के मध्य ए सम्बन्ध है जो सभी तारो पर लागू होता है। यदि वे किसी सेफीयरी व वास्तविक ज्योति माप सकती, चाहे वह कही भी स्थित हो, तब वे अपने ग्रा मे प्रतीयमान चमक के स्थान पर वास्तविक चमक रख देने में सक्षम होती और इसी से सेफीयरो के प्रकाश की अस्थिरता का प्रावर्तीकाल मापक वे अपने ग्राफ से उनकी वास्तविक दीप्ति जान सकती थी। यह ज्ञात है पर कि किसी भी वास्तविक दीप्ति के पिंड को किसी विशिष्ट प्रतीयम दीप्ति जैसी दिखने के लिए अन्तरिक्ष की कितनी गहराई मे डूबना चाहि वे छोटे मगलेनिक बादल की दूरी का अनुकलन कर सकती थी। सौभाग्यवश कुछ सेफीयरी, जो सूर्य से बहुत दूर नहीं थे, उन दूरियो का माप लिया गया, इससे उनकी प्रतीयमान दीप्ति से उनकी वार विक ज्योति का अनुकलन करना सभव हो गया। मिस लीविट के ग्राफ प्रतीयमान औसतन चमक को वास्तविक चमक में परिवर्तित करने की मा वार्य सामग्री-प्रकाश की अस्थिरता के आवर्तीकाल ज्ञात थे। उससे मैंगलेनिक बादल की दूरी अनुकलित की जा सकती थी। यह सबसे नि के तारे अल्फा सेण्टॉरी से दस हजार गुना अधिक दूर पाया गया। तारव दूरियो को मापने का यह तरीका अत्यधिक दूरख्यापी था। मिस लीविट के सेफीयरी चर का ज्योति-मावर्तीकाल नि कहलाने वाली इस खोज के मागामी वर्षों मे भाकाश मे मील के इन पर कासगी जोधारा दूरी-सूचको के रूप में उपयोग किया गया। सम्पूर्ण माक गरे छितरै हुए सेफीयरो के कारण माकाशगगा की सरचना समझ सुविधा हो गयी। यह भी ज्ञात हो गया कि सर विलियम हश्र्चेल का प्र विचार, कि तारे एक ऐसी आयतन मे वितरित हैं जिसकी प्राकृति च 88 खगोल विज्ञान के महान क्षण जेबी घडी (या सान, जैसा कि उन्होंने कहा) की भाति है, सत्य है । और सूय किसी भी भाँति मध्य मे स्थित नहीं है बल्कि मध्य से निज्या की दो तिहाइ दूरी पर किनारे की ओर है । इमलिए अन्तरिक्ष मे धाराशि के तारक-मडल के पास आकाशगगा के तार घने है। आकाशगगा के मध्य में उसका केन्द्र करोडो सूर्यो, चमकीले और काले गैस एव धूल के बादलो से निर्मित है जिसके बीच में हमारा सूय, अपने ग्रहो और चद्रमानो के लघु परिवार के साथ, विशालकाय कक्षा मे घूमता है, जिसका एक सम्पूण चक्र बनाने मे उसे बोस करोड वर्ष लगते हैं। सूर्य आकाशगगा के मध्य की अपेक्षा किनारे के नजदीक एक औसतन तारा है । यह वर्तुलाकार मँडो मे पाए जाने वाले सेफीयरी समूहो के अध्य- यन से भी सिद्ध हो जाता है। औसतन पचास हजार तारो का समूह इनमे से प्रत्येक तारकीय पिंड मे सनिहित है और प्रत्येक समूह अपनी कक्षा मे आकाशगगा के चारो ओर भ्रमण करता है। छत्ते के आस-पास घूमती हुई मधुमक्खियो की भांति समूह के भीतर उसके केंद्र के चारो ओर प्रत्येक तारे की अपनी व्यक्तिगत कक्षा है। अमेरिकन खगोलज्ञ हाल ने इन पिंडो मे ममाविष्ट सेफीयरी का उपयोग उनकी दूरी मापने के लिए किया। उसने पाया कि यह उस गोले के केन्द्र में सन्निहित है जिसका केद्र आकाशगगा का केद्र है । यह गोला प्रमुख पावाशगगा के तारो को अपने भीतर समाविष्ट करता है और सूय गोले के केन्द्र से बहुत दूर स्थित है। प्रावासगगा के भीतर भी दूरियां इतनी बडी है वि खगोलज्ञो ने लम्बाई मापने की नयी इकाई प्रचलित की जिममे मख्याएं छोटी हो जाएँ मौर उनकी गणना पग्ने मे प्रामानी हो। यह इवाई प्रकाश-वर्ष है जो कि एक वर्ष में प्रकाश दाग गमन को गयो दूरी है और लगभग छ महय परव मोस है। इस पैमाने पर सबसे निकट का तारा 4 प्रवाशबप की दूरी पर है। इनकी अपेमा मूय पृथ्वी से मात्र प्राट प्रवाग-मिनट दूर है सूय की विरण हमारे और सूर्य के मध्य प्रतगल (9,30 00 000 मील) की पार परने मे सेक्स पाठ मिनट लेगी। यदि हम सम्पूण सौर परिवार को पनी की प्राकृति या बना दें तर 89 माकाश में मील के पत्थर आकाशगगा का परिमाण एशिया जितना होगा। सेफीयरी के ज्योति-पावर्तीकाल के नियम के समय से ये कुछ तथ्य थे जो शेपले और उसके सहयोगियो द्वारा स्पष्ट किए गए। इस नियम की उपयोगिता अभी समाप्त नही हुई थी। बीसवी शताब्दी के पूर्व दूरदशको मे प्रकाश के धुंधले धब्बो की भांति दिखाई देने वाली नीहारिकामो के अस्तित्व का ज्ञान खगोलज्ञो को प्राकाशगगा की जानकारी के काल से ही था। कुछ खगोलज्ञो का विश्वास था कि ये ऐसे तारकीय तत्र है जो इतनी दूर हैं कि उनमे सन्निहित तारो को एक-दूसरे से विलग करना मुश्किल है जबकि अन्य खगोलज्ञो का अनुमान था कि वे हमारी आकाशगगा के भीतर ज्योतिमय गैस के बादल थे। उनकी दूरी मसात होने पर, दूसरा सिद्धान्त ठीक हो सकता था। माउट विल्सन पर विशालकाय 60-इच और 100-इच के दूरदर्शको के पूर्ण होने पर, इन पिंडो का चित्र लेना और इनको सरचना का अध्ययन करना सम्भव हो सका । बहुत-सी स्थितियो मे नीहारिका सर्पिल दिखायी दी। केन्द्र (nucleus) के दूसरी तरफ से निकलती हुई ज्योतिमय भुजाएँ केद्र के चारो ओर लिपटने से पूर्व दिखाई दी। वे बहुत-कुछ सूरजमुली-चक्र नामक प्रातिशबाजी की भांति लगती थी। चूकि ये नीहारिकाएँ सभी कोणो पर सम्पूर्ण अन्तरिक्ष मे छितरी पडी थी, इससे स्पष्टत देखा जा सकता था कि वे सब आकाशगगा की प्राकृति की भांति थी। अमेरीकन खगोलज्ञ एडविन हबल ने कुछ विशिष्ट तरीकोका उपयोग कर सन् 1919-26 तक के वर्षों मे सनिकट की कुछ नीहारिकामो के चित्र 60-इच और 100-इच के दूरदर्शको द्वारा खीचे जिससे निष्कर्षत स्पष्ट हो गया कि सर्पिल भुजाएँ तारों से भरपूर हैं। फोटोग्राफिक प्लेट पर वित्रित लाखो धुपले तारो मे कुछ लम्बे प्रावर्तीकालो के सेफीयरी भी थे। मिस लीविट के नियम के उपयोग से इन नीहारिकामो की दूरी की सगणना की गयी । वे हमारी आकारागगा की सीमानो से बहुत दूर बाहर स्थित पायी गयी। इसके अतिरिक्त उनकी दूरियां ज्ञात होने पर, उनके प्रतीयमान परिमाण का उपयोग उनके वास्तविक परिमाण को जानने के लिए किया जा सकता था। हबल की सगणना के अनुसार ये पिठ भाकाश- हमारे 100 TIRETरा मोहारिया विलि आकाश मे मील के पत्थर 91 गगा जितने वडे पाए गए। वास्तव में वे दूसरी पाकाश गाएँ थी, दूसरे द्वीप विश्व । आगामी वर्षो में एडविन हबलने आकाशगगाओ के क्षेत्र मे दूरव्यापी अनुमन्धान किए। वह अत्यन्त उत्साही, प्रतिभाशाली और आकपक व्यक्ति था । उसके मित्र एव सहयोगी एम एल ह्य मेसन ने हबल के साथ अपनी पहली भेट मे प्राप्त गहन प्रभाव के सम्बध मे लिखा है "वह 60-इच के यूटनीय फोकस पर चिन ले रहा था और खडा होकर अपना मार्ग-निर्देश कर रहा था। उसने मुह मे पाइप दाब रखी थी, उसकी ऊंची आवृति, आकाश की पृष्ठभूमि मे स्पष्टतु रेखाकित थी । तेज हवा चाबुक की भाति मिलिटरी ट्रेच कोट को उसके शरीर के इद-गिद लपेट देती और कभी-कभी उसकी पाइप से चिनगारियाँ निकालकर गुम्बद के अधेरे मे उडा देती।" यह एक अन्य खगोलज्ञ था जिसने अपना जीवा एक अलग पेशे मे प्रारम्भ किया था। हबल ने ऑक्सफोड से विधि-शास्त्र मे डिग्री प्राप्त की जहाँ ऐडम्स की भांति वह विभिन खेलो, घटनामो को चिह्नित करने और बॉक्सिग से लेकर अन्य खेलो मे सवथेष्ठ रहा । अमेरिका लौटने पर उमने कुछ समय तक बैरिस्टरी की और अन्त मे यर्कस प्रॉब्जर्वेटरी पर खगोलज्ञ बनने के लिए हमेशा के लिए उसका त्याग कर दिया। जब वह आकाशगगापो का, जोकि हमारी प्राकारागगा के काफी नजदीक थी ताकि उनमे सनिहित सेफोरियों का निरीक्षण किया जा मके, अध्ययन कर रहा था तब वह दूरियो का अनुक्लन ज्योति प्रावर्तीकाल के नियमानुसार कर सकता था। उनके भीतर सन्निहित अत्यन्त दीप्तिमान नीले सारो की ज्याति का भी उपयोग किया जा सकता था, यदि यह मान लिया जाता कि ये तारे हमारी तारकीय व्यवस्था के गर्म नीले तारो जितनी वास्त- विर चमक के हैं। इन तरीको के उपयोग से वह साठ लाख प्रकारा-वप की दूरी माप सका और उसने काफी आकारागगायो को ज्ञात किया जिनकी सन्या चालीस थी। किन्तु जब उसके सम्मुख उन धुधली भावाशगगानो की दूरी मापने की समस्या मायी, जिनके भीतर में किसी भी तार को अलग से नहीं पहचाना जा सकता था, उसे किसी प्रय तरीके में सम्बध मे मनन 92 खगोल विज्ञान के महान क्षण करना पड़ा। उसने यह भी चिह्नित किया कि आकाशगगाएँ अन्तरिक्ष मे एक स्पता से नही बिखरी हुई है बल्कि अक्सर वे झुण्डो मे मिलती हैं जिनमे से कुछ मे हजारो आकाशगगाएं होती है। मुण्ड के सदस्यो का परीक्षण करने पर उसने पाया कि उनकी चमक एक सदस्य से दूसरे सदस्य तक एक खास ढग से परिवर्तित होती है। चूकि वे सब लगभग एक-जितनी दूरी पर थी, इसलिए उनको चमक की विभिन्नता वास्तविक थी पौर विभिन्न दूरियो के कारण नही थी । वास्तव मे आकाशगगामो झुण्ड के सदर्भ मे हवल उसी तर्क का उपयोग कर रहा था जिसका उपयोग मिस लीविट ने छोटे मंगले- निक बादल मे सेफीयरी तारो के सदभ मे किया था। अब उसने अय भुण्डो का निरीक्षण किया और पाया कि साधारणत एक झुण्ड के सदस्यो मे दीप्ति-विभाजन का ढग समान रहता है। वैसे सभवत अन्य की अपेक्षा अधिक दूर के झण्डो के सभी सदस्य समीप के झुण्डो के अपेक्षाकृत अधिक धुधले होगे। हवल ने अनुभव किया कि इन धुधले झुण्डो की दूरी का अनुमान यह मान लेने पर लगाया जा सकता है कि उनकी औसतन चमक समान होगी और उनकी प्रतीयमान औसतन चमक का अन्तर उनकी विभिन्न दूरियो के कारण होगा। इसके अतिरिक्त कया राशि के तारक पुज मे सन्निहित प्राकाशगगाप्रो के महान पुजो की दूरी को उनके भीतर दिखाई देने वाले तारो के द्वारा पहले ही मापा जा चुका था। इससे हवल को नए सिरे से काम प्रारम्भ करने का विचार मिला। आगामी वर्षों मे उसने ज्ञात विश्व की सीमाप्रो को इतना अधिक विस्तृत कर दिया कि अन्तरिक्ष की खाई को पार करने मे उन क्षेत्रो से आने वाली प्रकाश किरण को करोडो वप लग जाते जो खगोलज्ञ की फोटोग्राफिक प्लेट पर इन दूर के ससारो के प्रति- बिम्बो को अकित कर देती था। बेसल हेडरसन, स्ट्र व, लीविट और प्राकाश मे मील के पत्थरो को चिह्नित करने वाले व्यक्तियो के पदचिह्नो का अनुसरण करते हुए प्राज भी ससार की प्रेक्षणशालाप्रो मे खगोलज्ञ हबल द्वारा प्रारम्भ किए काय को, विश्व के आकार के सम्बध मे मनुष्य का ज्ञान बढाने के लिए, अविरत रूप से कर मागम मील के पत्थर 93 रहे है । जमा कि राइविन हबल ने कहा "पृथ्वी पर अपने घर से, हम दूर देखन वा और जिम विश्व मे हम उत्पन्न हुए है उमी कल्पना करने का प्रयास करत है। आज हम अन्तरिक्ष की गहगड्या तर पहुँच गए है । अपने मनिकट पडौम म हम बहुत अच्छी तरह परिचित है । बढती हुई दूरी के माथ हमारा जान कम हाता जाता है और तजी में कम हाता जाता है, हम प्रेक्षणो की भयवर त्रुटियो के मध्य धुधले क्षितिज के चिह्न खोजन की चेप्टा करने लगते है जो कि वास्तव में नहीं होते, परन्तु यह खोज जारी रहेगी। यह प्राकाक्षा इतिहास से भी प्राचीन है । इसकी तुष्टि नहीं हुई है और यह दोगी भी नहीं।"

पाठवा अध्याय तारो को देखने की खिडको यह एक ऐसे व्यक्ति के जीवन और उसके स्वप्नो की कहानी है जिसका खगोलिक अन्वेषणो से कोई सीधा सम्बध नहीं है। फिर भी खगोल- विज्ञान के महान् क्षणो पर लिखी गयी कोई भी पुस्तक जाज ऐलरी हेल और 200-इच वाले दूरदशक के निर्माण के सम्बध में लिखित अध्याय के बिना अधूरी होगी। अधिकाधिक धुधले पिंडो की ओर जैसे-जैसे खगोलश सुविज्ञात विश्व को सीमामओ को विस्तृत करता गया उसकी हमेशा एक पुकार रही-'और अधिक प्रकाश ।' दूरदशक का काय है मनुष्य को प्राख से अधिक प्रकाश को एकत्रित कर उसे प्रकाश की एक सकीण किरण में केन्द्रित करना जो कि पांख की पुतली मे प्रवेश कर मके या जिसमे फोटोग्राफिक प्लेट पर प्रभाव डालने की क्षमता हो। कई बार यह प्रभाव फोटोग्राफिक प्लेट कोघटो खुला रखने के पश्चात् उपलब्ध होता है। इस समय के बीच दूरदशक को पिंड पर नियत्रित रखा जाता है और उसकी चालव-मोटर उसे प्राकाम की प्रतीयमान कोणीय गति के साथ घुमाती रहती है । प्लेट वन जाने के पश्चात् खगोलज दूर के पिंडो वे इन घुघले प्रति- विभ्या का अध्ययन सुविधापूवर कर सकता है जिहे वह दूरदशव द्वारा कभी भी सीधे नही देख मकता । बडे दूरदशक अधिकतर कमर के रूप मे उपयुक्त होते हैं और खगोलन उनका सीधा उपयोग कभी कभार ही करते हैं। अभिदृश्यक लस या दपण के (यदि वह पराक्तर हो, जैसे कि अधिकाश बढे दूरदार होते हैं) क्षेत्रफल पर दूरदशक की प्राण-वेन्द्रण साक्ति निभर करती है। यदि हम नम या दपण के व्यास को दुगना पर देते हैं तो उनका क्षेत्र चार के गुणनमण्ड से बढ जाता है और इसके कारण यह तारे गे जितना प्रवाश एकत्रित करता है वह भी उमी गुणनखण्ड जितना 95 या दपन से पिडा वट जाना है। गैलीलियो के गाना व्यान मात्र या दो इत्त या । जाज ऐलरी हैत के खगोल विज्ञान में न लेने के नमय लार गेज या 72-इन या परा- वता, जिमका निर्माण 1815 मायग्लेड म मा था, उस समय गा सबसे विशालकाय दूरदशर था। इस शिपालराय दूरदर्शी के दपण या भा ही चार टन था। उस समय एमे वहत से यद्यपि छाटे दूरदरार यूरोप मे थे, परन्तु 1825 मे जान की ती ऐडम्म यो समरिया को कायम में रहना पड़ा कि, "एक अमेरिरान हाने के नाते यह पहने में मुझे गव नहीं है कि सम्पूर्ण अमेरिकन गोलाद्ध म इस भाति का एक भी दूरदशक नहीं है।" 1868 मे, जिम वप हा का जम हुअा था, स्थिति मे काफो-कुछ सुधार हो चुवा था, और 1892 मे जव हन शिकागो में एक खगोलज्ञ के रूप म, 'वशानिर उनति के लिए अमेरिकन मघ की एक सभा में उपस्थित हुआ था तब अमेरिका के पाम कलीफोर्निया मे माउट हैमिल्टन पर 36 इच कागवत था। दूरदर्शी और ऐसे व्यक्तियो को, जो महायब हो मक्ते थे, विश्व में सबसे विशाल ददराव बनाने के लिए अपना सहयोगी बनाने के लिए प्रेरित करने की कला की पहली उपलब्धि इस गोष्ठी में हेल को प्राप्त हुई। इसमे उमने सुना कि दो 40-इच के शीशे के मडलक पेरिम म हैं । उमने महान दूरदशक निर्माता एलवन क्लाक को उन लेमो को रगडने के लिए उत्साहित किया तथा ट्रामगाडी के उच्च पदाधिकारी मी टी यकस यो इसका व्यय देने के लिए प्रेरित किया और कुछ ही समय मे यकम प्रॉब्जर्वेटरी को इसके मुवा डायरक्टर हेल के पारण, ममार का सबसे विशालकाय वतक उपलब्ध हो गया। अपने जीवन में हल को चार बार अपने समय के विशालकाय दूर- दशको के लिए धन एकत्रित करना पडा--40-इच के यकस वतन के लिए, 60 इच और 100 इच के माउट विल्मन के परावतको के लिए और अन्त में 200 इच दूरदशक के लिए । मूलत हल प्रशासक या सम्यापक न था। खगोलीय अनुम धान मरने की आकाक्षा उसमें बहुत पहले से ही थी और वह कभी भी इतना प्रसन नही होता था जितना कि तब जब वह लम्बी अवधि के लिए 96 खगोल विज्ञान के महान क्षण दूरदशक पर काम कर रहा होना या अपने प्रेक्षणो को घटाने और नए यत्रो की रूपरेखा बनाने में निमग्न होता। जब वह चौदह वप का था तव उसके पिता ने उसे चार इच के छेद का एक पुराना क्लाक वतक लाकर दिया। उससे उसने शनि, बृहस्पति, चद्रमा तथा अन्य आकाशीय पिंडो को देखा। इन पिडो के पाश्चयजनक दृश्यो ने उसके मन मे वास्तविक अनुस धान करने की तीव्र उत्कठा पैदा कर दी। बहुत वर्षों पश्चात् उसने लिखा “मैंने दूरदर्शक के साथ प्लेट पकडने वाले को लगा दिया और सूर्य के अधूरे ग्रहण का चित्र लिया। मैंने सूय- कलको का निरीक्षण करना प्रारम्भ कर दिया और उनके चित्र भी खीचे। इस भांति में एक नौसिखिया खगोलज्ञ बन गया।" खगोल-विज्ञान ने उस पर जादू कर दिया था। मैसाच्युसेट्स इस्टी- ट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी, हावर्ड कलिज की प्रॉब्जर्वेटरी, पोटस्डम प्रॉब्जर्वेटरी और बलिन के विश्वविद्यालय का प्रशिक्षण और शिक्षा का लक्ष्य उसे उसके व्यवसाय के विषय में निपुण करना था, जिसको उसने सफलता से निभाया। अपने इद-गिद प्रतिभासम्पन व्यक्तियो के पुंज को एकत्रित कर,जैसा कि उसने अपने बाद के जीवन में अक्सर क्यिा, 1897 मे उसने यर्कस ऑब्जर्वेटरी बनायी। उमके चरित्र मे काफी विशिष्टताएं थी और उन्ही में से एक उसकी जीवन के प्रत्येक पक्ष मे व्यक्तियो को अपने दष्टिकोण में सहयोगी बनाकर उत्साहित करने की क्षमता थी, जिससे वे सब उसकी नेता- गीरी के नीचे सगठित होकर उसके स्वप्न को यथाथ बनाने मे कायरत हो जाते। इस बीच उसने स्पेक्ट्रोहीलियोग्राफ का आविष्कार किया। यह महत्वपूर्ण प्राविष्कार था। इससे सूर्य के प्रतिविम्ब का प्रकाश के एक रग मे निर्माण हो सकता था। सौर परिवार को भौतिक प्रतिक्रियामो को समझने मे और उनका अध्ययन करने में यह एक अत्यधिक महत्वपूण उपकरण बन गया। अपने प्राविणार को मुधारने के लिए हेल ने प्रेक्षण के लिए अच्छे स्थान की सौज प्रारम्भ कर दी। वह क्मिी उंचे पवत यो चाहता था जहाँ पृषी के वातावरण मे कम प्रशान्ति हो ताकि प्रतिविम्ब मे विकृति न मा 97 तारो को देखने की खिडकी पाए । माउट विल्सन को चुना गया जो कि एक आदर्श स्थान था और माउट विल्मन पर मोर प्रेक्षणशाला का निर्माण हुप्रा । शीघ्र ही हैल अपने अपरिमित उत्साह और शक्ति से वहाँ पर 60 इच के दूरदर्शक को स्थित करने की रूपरेखा बनाने में कायरत हो गया। दिसम्बर 1908 मे यह यत्र पूण हुआ । प्रतिभासम्पन निरीक्षक प्रोफेसर वर्नाड ने इसके द्वारा दिखाई देने वाली आकाशगगा के विभिन्न भागो के दश्य की व्यारया की "तारे काले मखमल पर हीरो की भाँति लग रहे थे । आकाश सघन और काला था तथा तारे प्रकाश के जीवन्त बिदुओ को भांति चमक रहे थे।" चार घट के एक्स्पोजर के पश्चात् सीरियस से दस करोड गुना कम चमकीले तारो के चित्र खीचे जा सके। परन्तु हेल सतुष्ट नहीं हुआ था। उसने और अधिक विशालकाय दूरदशक की कल्पना करनी प्रारम्भ कर दी। अपनी विशिष्ट प्रेरणा के कारण वह धनी अमेरिकन जे डी हूकर से मिला, जिसने कहा कि वह 100-इच के दर्पण का प्रबंध कर देगा। कार्य को पूरा करने के लिए शेष धन का अनुदान कार्नेजी इस्टीट्यूट ने दिया । इस विशालकाय तश्तरी को दालने और पकाने का काम भयकर कठिनाइयो से भरा हुआ था। फिर भी अन्न मे झास के सेट गोबिन ग्लास- वक्स को इस काय को सम्पन्न करने के लिए प्रेरित किया गया। अत्यधिक कठिनाइयो के पश्चात् 1908 में 100 इच के दपण को डाला गया और 1917 मे दूरदशक जांच के लिए पूरा तैयार हो गया। उस पहली रात्रि को हेल, माउट विल्मन प्रॉब्जटरी के डायरेक्टर वाल्टर एस ऐडम्स और अग्रेज कवि अल्फडे न्वायस के साथ विशालकाय दूरदर्शक वो दखने गया । उसे पूर्व की ओर घुमाकर बृहस्पति ग्रह पर स्थित दिया। हेल ने उसमे देखा और फिर ऐडम्स को देखने के लिए वह वापिस लोटा। दोना व्यक्ति उद्विग्न हो उठे थे। एक-दूसरे के ऊपर चढे हुए असम्य प्रतिविम्यो के भयावह श्रम से नेत्रिका भरा हुआ था। स्पष्ट म्प से दपण प्रत्मभ असफलता लग रहा था । शायद विशालकाय दर्पण की प्राथति उसे हिलाने से उसके भार के दवाव की वजह मे परिवर्तित हो गयी थी ? तभी किसी ने उहे मूचना दी वि गुम्बद उस दिन क्मचारियो द्वारा 98 खगोल विमान के महान क्षण खुला छोड दिया गया था। उन्होने एक दूसरे की तरफ देखा, उनमे अस्पष्ट- सी आशा उमगी। हो सकता है कि सूर्य दर्पण पर चमका हो । वे यह निणय करने के लिए केवल प्रतीक्षा कर सकते थे। कुछ घटो के लिए वे दूरदशक के पास रहे, प्रतिविम्ब मे बहुत कम सुधार हुआ था। रात को तीन बजे मिलने का वायदा कर हेल और ऐडम्स ने जाकर सोने का निश्चय किया। किन्तु दोनो को नीद नही आयो और वे निश्चित समय से पूर्व ही दूरदशक के पास पहुंच गए। इस समय चूकि वृहस्पति पश्चिम में उनकी पहुंच के बाहर था, उहोने 100-इच के दूरदशक को वैगा तार पर स्थित किया। हेल ने दूरदशक से देखा । नेत्रिका मे तारे का प्रतिविम्ब प्रकाश के तीव, लगभग चकाचौंध कर देने वाले, विदु के रूप में दिखाई दिया। हेल की उदामी दर हो गयी । दपण एक सफलता था और उसकी सभावना में उसका विश्वास सिद्ध हो गया था। तब से हूकर का 100 इच के दरदशक का निरतर उपयोग होता रहा। इसके द्वारा आकाशगगा से इतर के अतरिक्ष के गहन विस्तार स्पष्ट हो गए । तारो की असख्य आकाश- गगात्रा के चित्र खीचे गए और उनका अध्ययन किया गया। 60- और 100- टच के दूरदशको की काय-क्षमता तथा अपनी अन्तरिक्ष मे और अधिक पैठने की एव और अधिक शक्तिशाली प्रकार एकत्र करने वाले यत्र के निर्माण करने की आकाक्षा के कारण वह 200-इच के दपण के स्वप्न लेने लगा। 60 उच के निर्माण मे दम हजार डालर लगे थे, 100-इच का मूल्य बढकर 600 000 डालर हो गया था, 200 इच मे कितना व्यय होगा इम दैत्य के लिए पैमा कौन देगा ? और इमस महत्वपूण यह बात थी कि, क्या इसका निर्माण हो मकता है ? 1917 के पश्चात् हेल के मस्तिष्क को कभी भी इन प्रश्नो से मुक्ति नहीं मिली। 'पृथ्वी के धरातल के प्रत्येक वग इच पर तारो का प्रकाश पडता है " 1928 म उसने हापम मैगजी म लिखा 'और हम अधिक से अधिक 100 इच व्यास वाले क्षत्र पर किरणो को एकदिन और केन्द्रित कर मक्ते हैं। मुझे कभी भी विगालाय दूरदराको को मम्भावना की भविष्यवाणी करना अच्छा नहीं लगा फितु आज की स्थितियां अतीत मे इतनी परिवर्तित तारो को देखने की खिडकी 99 हो गयी हैं कि अधिक सावधानी की आवश्यक्ता नहीं महसूस होती। यह प्रश्न शेष रहता कि क्या हम सुरक्षापूवक 200-इच के या उससे भी अधिक अच्छा हो पच्चीस फुट व्यास वाले दपण का निर्माण नहीं कर सकते हैं ?" अब हेल का स्वास्थ्य गिरने लगा था । वास्तव मे 1910 के पश्चात्, कभी कभी वह मस्तिष्क मे अधिक रुधिर-सचार के आक्रमणो से पीडित हुआ करता था, जिसके कारण उसे भयकर दद होता था और वह स्वयं का मान- सिक रूप से शिथिल अनुभव करता था। ये आक्रमण अक्सर उसके लम्बी अवधि तक वैज्ञानिक कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करने के पश्चात् होते है - यह ज्ञात होने पर उसने स्थिति-परिवर्तन करने के लिए अनुमन्धान कम कर, अपने समय को मुख्यत लेखन-काय'करने, व्यवस्थाएँ करने और सम्पादन- काय करने में लगा दिया। इस क्षेत्र मे भी उसने अपनी प्रखर बुद्धि और आकपक व्यक्तित्व का उपयोग किया। उसी के कारण 'अमेरिकन नेशनल रिसच काउसिल' बनी, इसके अतिरिक उसने कई अन्तर्राष्ट्रीय संगठनो को आकार दिया और उनका माग निर्देश किया। तत्पश्चात् भी वह सौर- अनुसन्धान कार्य करता रहा। उसने स्पक्ट्रोहीलियोस्कोप का आविष्कार किया, जो स्पेक्ट्रोहीलियोग्राफ से, जिसका आविष्कार वह कई वप पूर्व कर चुका था, सम्बद्ध एक अत्यन्त महत्वपूर्ण यत्र है। जहाँ स्पेक्ट्रोहीलियोग्राफ सूय के चित्र प्रकाश के एक रग मे खीचे जा सकते थे, वहाँ म्पेक्ट्रोहीलियो- स्कोप से खगोलश सीधे सूर्य को केवल एक रग के प्रकाश में देख सकते थे। 1928 मे, जिस वर्ष 'हापस मैगजीन' मे लेख लिखा था, उसी वप हेल को 200-इच के दूरदशक को काफी प्रत्याशाएं बधी । विश्व के सम्बन्ध मे मनुष्य का ज्ञान बढाने मे इस दैत्य के काय के सम्बन्ध मे उसने काफी प्रभावशाली व्यक्तियो मे रुचि उत्पन्न कर दी। इन लोगो मे रॉकफेलर इटरनेशनल एण्ड जनरल एजुकेशन बोड के प्रधान विक्लिफ रोज, कार्नेजी इस्टीट्यूट के प्रधान जॉन मी मेरियम और कैलिफोनिया इस्टीट्यूट की एक्जिक्यूटिव काउमिल के चेयरमैन रॉबर्ट ए मिलिकन भी थे। अब तक यह ज्ञात हो गया था कि दूरदर्शक पर कम-से-कम माठ लाख डालर व्यय होंगे। लोगो से मम्पक स्थापित करने के लिए हेल ने हजारो मील की याथाएँ की असण्य पत्र लिखे, अपनी पूरी प्ररित करने की शक्ति .

100 खगोल विज्ञान के महान क्षण के साथ वार्तालाप किए, तथ्यो को क्रमवद्ध किया। इसके अतिरिक्त उसने अपने श्रोताओं को 200-इच के दूरदशक की महान आकाक्षा को, जो उसे जीवन्त बनाए थी, अनुभव कराया। बहुत बार वार्तालाप के दौरान, उसकी आशाएं जो फलीभूत होती महसूस होती, भविष्य के प्रशासन और नीति से सम्बधित अकस्मात् ही चिन्तित कर देने वाली कठिनाइयो के कारण धूल धूसरित हो जाती। मई 1928 मे आखिरकार रॉकफेलर वोड ने दूरदशक के निर्माण के लिए साठ लाख डालर का अनुदान देना स्वीकार कर लिया। पूरे निर्माण-काय के लिए व्यय प्राप्त हो जाने के कारण हेल का आनद अपरिमित था। "1892 से मैंने अपनी जिदगी का अधिकाश भाग यकस और माउट विल्सन की प्रेक्षणशालाप्रो के लिए चदा एकत्रित करने मे व्यतीत क्यिा है," उसने कहा, "और वतमान के विशालकाय काय के लिए विना किसी ऐसे परिश्रम के अनुदान पाने पर जो आनद मिला है उसे अभिव्यक्ति देना असम्भव है।" हेल इस परियोजना का सभापति बना। इसकी विभिन्न समितियो एव कायकर्ता-दलो मे विभिन्न क्षेत्रो के प्रतिनिधियो ने भाग लिया, जिनमे खगोल-विज्ञान के अतिरिक्त भौतिक-विज्ञान, रसायन-शास्त्र, गणित, वायु यान-सचालन-कला, भूकम्प-विज्ञान, अतरिक्ष-विद्या एव इजीनियरिंग के व्यक्ति थे। शिल्पकारो, चक्षु-वैज्ञानिको,कलाकारोएव इलेक्ट्रॉनिक इजीनियरो ने भी सहायता दी ! "सभी ने," जैसा कि हेल ने कहा, "व्यक्तिगत स्याति और व्यावसायिक लाभ की इच्छा तथा अपने अय कामो को छोडकर अत्य- धिक महायता की।" विमी अय अवमर पर उमने कहा, "रूपरेखा और निर्माण की लम्बी अवधि के मध्य, जिसमे हम में से शायद कुछ व्यक्ति नही रहेगे, स्पष्टत यायव समस्याएं सबसे अधिक है।" हेल जानता था कि उमवा मुहावरा "वि गायद हम मे से कुछ व्यक्ति नहीं रहेग मभपत उमी के लिए भविष्यवाणी सिद्ध होगी । वह नहीं जानना था कि वह रितने वप और जीवित रहेगा। यदि याजना के प्रारभिव कान म उमे पताया जाता कि इममे क्तिना ममय लगगा तो उसे विश्वास .

तारो को देखने की खिडकी 101 भी न होता। सबसे पहले 200-इच की मडलक ढालने को, जो काय का सबसे अधिक कठिन भाग था, चुना गया। विलयित स्फटिक और पाइरेक्स के अतिरिक्त दपण की सरचना के सम्बध मे अनेक सुझाव दिए गए स्फिटिक मे अनेक विशिष्टताएँ होती हैं । इसलिए इतने विशालकाय दर्पण के निर्माण के लिए इसको प्रयुक्त करने के सुझाव पर अत्यधिक बल दिया गया और सवसम्मति से तय हुआ कि इस पदाथ को प्रयुक्त करके देखना चाहिए। हेल को इसके सफल सिद्ध होने पर पूर्ण रूप से विश्वास न था, परन्तु यह एक जुआ था और अवसर देना आवश्यक था। विलयित स्फटिक सूक्ष्म स्फटिक की रेत से बनता है जिसे भट्टी मे गरम कर पिघलाया और ढाला जाता है। छोटी तश्तरियो मे ढालने की समस्याएं कठिन है किन्तु उसका हल भी हो सकता है । 22-इच को सफलता- पूर्वक निर्मित किया गया। एक वर्ष पश्चात् 60-इच की तश्तरी को ढाला गया, किन्तु इन प्रयोगो पर हुआ व्यय चिन्तित कर देने वाला था। हेल ने कहा, “इनकी व्यय करने की क्षमता प्रातकित कर देने वाली है।" क्सिी के भट्टी को जल्दी खोल देने के कारण पहली तश्तरी, जो ठडी होने से पूर्व पूर्ण हो गयी थी, तडक गयी। उस परिमाण की दूसरी तश्तरी ठीक नहीं बनी थी। जितने धन और समय का अपव्यय हुआ था उसे सहना मुश्किल था। तीन वर्षों मे 639,000 डालर व्यय करने के पश्चात् भी स्फटिक मे 200-इच की तश्तरी को सफलतापूर्वक ढाल सकने के कोई चिह्न नही नजर आ रहे थे। बहुत हिचक के पश्चात् स्फटिक को त्याग- कर पाइरेक्स का प्रयोग करने का निश्चय हुआ । पाइरेक्म कुछ खास किस्म के शीशो को कहा जाता है जिनमे ताप का अवरोध करने की क्षमता होती है। इसी समय हेल ऐसे दर्पण की रूपरेखा, जिसकी पीठ पत्ती की रीढ वाली जेबो और छडो से बनी हो, बनाने के लिए मान गया । इस प्रकार की सरचना से उसका भार प्राधा हो जाता था और दूरदशक पर दपण को चढाते समय भीतरी सहारे का प्रयोग किया जाता था। पुन प्रारम्भ मे छोटी तश्तरियो को बनाने की चेष्टा की गयी। कॉनिग ग्लास कम्पनी ववस मे 26-इंच और 30-इच के पश्चात् 60 इच 102 गोल विज्ञान के महान क्षण और 120 इच के दपण सफलतापूवर ढाले गए। मामी पत्तीदार रीढ़ को पीठ थी जिसके कारण ढालने की प्रक्रिया मे बडी याठिनाई का सामना करना पड़ा था। जून 1933 म 120-इच के ढलने से हेल पाह्लादित हो उठा। शायद वह 200-इच यो यथार्थ बना देखने के लिए जीवित रहगा। रविवार, 25 माच 1934, 200-इच के दपण को ढालने की महत्व- पूर्ण तिथि थी। हजारो दर्शको ने, जिनग वैज्ञानिक और समानारपत्रो के व्यक्ति भी थे, बालकनी से विशालकाय गरजती हुई भट्टी मे, जिसमे 65 टन पिघला हुआ शीशा था और जो उनकी प्रासो को चौंधिया रहा था, होती प्रक्रियामो को देखा । इम शोशे को बडे बडे चम्मचो द्वारा साचे में डालना था। साचे के भीतरी भाग मे उभार थे जिनसे जली की आकृति मे ठडे होते शीशे की पीठ पर रीढ की रूपरेखा खीची जाती। घटो शोशे को डालने का काय होता रहा, कई उभार टूट गए। निरीक्षक के आदेशानुसार कार्यकर्तामो ने उस अधो कर देने वाली चमक मे तैरते हुए उभारी को लोहे की छडो के माथ तोड देने का प्रयास किया। डालना जारी रहा और तश्तरी के माचे को ठडा करने की भट्टी में ले जाया गया। कुछ सप्ताहो के पश्चात् जब उसे भट्टी मे से निकाला गया तो यह सम्पूण था और टूटे हुए उभार उसके भीतर दव गए थे। दूसरी तश्तरी को ढालने की रूपरेखा बनायी जाने लगी, और पहली को बचाकर रखा गया। इसे 3 दिसम्बर 1934 को सफलतापूर्वक ढाला गया और उसी रात्रि को पकाने की भट्टी मे रख दिया गया। परन्तु कॉनिग लोगो की कठिनाइयो का अभी प्रत नहीं हुआ था। उसके बाद के बमत मे निकटवर्ती चेमग नदी मे बांढा गयी और उसने फैक्टरी को भी अपने घेरे मे ले लिया। पकाने की भट्टी जिसमे 200 इच का दपण धीरे- धीरे अनुकलित दर पर अभी तक ठडा हो रहा था, दूसरी मजिल पर सुर. क्षित था विन्तु उस भट्टी को सचालित करने वाले बिजली के यत्र नीचे थे। कॉनिंग कायकर्ताओ के यत्र के चारो तरफ रेत के वोरो, छडो और लकडी के अवरोध लगाने के लिए जी तोड प्रयास के पश्चात् भी उहे प्रतत तीन दिन के लिए विद्युत्-सचार बद करना पडा । किसी को भी नात नही कि क्या ठडा होने की प्रक्रिया के शेप महीनो मे उस विशालकाय तश्तरी को तारो को देखने की खिडकी। कोई नुकसान हुआ या नहीं। जब ठडा करने की भट्टी से निकालकर उसकी जांच की गयी तो जाता। हुआ उसमे कोई खराबी न थी। उसे रगडने और पालिश करने को रेलगाडी से कैलिफोर्निया मे पैसेडेना भेजा गया। "यूयार टाइम्स' की शीप पक्ति मे प्रकाशित हुआ "महाद्वीप के पार वैस्याकार प्राख की रेल-यात्रा समाप्त हुई, पसेडेना को एक दुकान मे उसे पालिश करने के लिए रखा गया ।" 1928 मे 200-इच के दूरदर्शक के निर्माण की प्रथम घोषणा होने पर इस महान परियोजना के उद्देश्य ने प्रत्येक स्थान पर साधारण व्यक्ति की कल्पना शक्ति को उत्तेजित कर दिया था। असख्य समाचारपत्रो और पत्रिकाओ के लेखो मे दूरदशक के सम्पूर्ण होने के बीस वर्ष तक उसकी प्रगति की व्याख्या होती रही । हमे यह ज्ञात है कि 1934 मे पहली बार जब 200- इच की तश्तरी को ढाला गया, तो उसे देखने के लिए हजारो की संख्या मे दर्शक कानिंग मे गए और विख्यात समालोचक लावेल टॉमस ने कहा, "पच्चीस वर्षों मे सभ्य ससार का सर्वाधिक दिलचस्प विषय।" अब तश्तरी पूर्ण होने के लिए एक अन्य मील का पत्थर पार कर चुकी थी। एक विशिष्ट ऑप्टिकल दुकान मे रगडने और पालिश करने की प्रक्रिया सतकता से एक माह के पश्चात् दूसरे माह तक होती रही। इस कार्य मे सलग्न इक्कीस व्यक्ति खास ढग के सफेद सूट पहनते थे जिन पर धूल नही जमती थी। फर्श को दिन में दो बार साफ किया जाता और प्रत्येक रात्रि को दुकान मे स्वच्छ हवा को लाया जाता। अगस्त 1937 तक 5 हजार पौंड कांच की पालिश हो चुकी थी। हेल के लिए अन्त सम्मेप था। उसको शक्ति, उसकी बढती हुई बीमारी के साथ कम होती जा रही थी। विन्तु फिर भी वह अपने दूरदशक और पलोमर माउटेन पर निर्मित होती नयो ऑब्जर्वेटरी के सम्बध मे सूचना प्राप्त करता रहता । चाहे अन्त के इन वर्षों मे बीमार होने के कारण उसे अपने क्रिया-कलापो को कम करना पड़ा, फिर भी उसका विशिष्ट एव भावपर व्यक्तित्व उसके सहयोगियो को कार्य करने के लिए प्रेरित करता 104 खगोल विज्ञान के महान क्षण था । फरवरी 1938 मे अपनी मृत्यु के समय वह जानता था कि उसका महान दूरदर्शक निर्मित हो जाएगा। द्वितीय महायुद्ध के समय नेत्र-सम्बधी उपकरणो की माग बढने पर, दर्पण का काम बीच मे रुक गया। इसे दुबारा 1945 मे प्रारम्भ किया गया। अक्तूबर 1947 मे पैलोमर की यात्रा के लिए तैयार पालिश हुए दर्पण से लगभग पाच टन कांच बीस टन का मडलक निर्मित करने के लिए हटाया जा चुका था। अन्तत यात्रा पूर्ण हुई । वर्षा, बर्फ, धुंध को पार की गयी यात्रा के पश्चात् 200 इच का दपण, अपने नए घर में प्रविष्ट हुआ जहाँ विशालकाय दूरदर्शक ट्यूब और उसे चढाने वाला यत्र उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे । दूरदर्शक की स्परेखा बनाना एव उसका निर्माण करना असामान्य कठिनाई का काय था। उसे एक पुल की भांति शक्तिशाली और अपनी गति मे घडी की भांतिनाजक होना चाहिए था। चाहे इसको सहारा देने वाले ट्यूब और योक का भार सैकडो टन है, फिर भी वह इतने उत्कृष्ट ढग से सतुलित है कि उनको आशिक हॉस-पावर की मोटर भी हिला सकती है । यत्र के वे भाग जिन पर दूरदशक घूमता है वास्तव मे तेल पर तरत हैं । इसे निरन्तर भारी दाव द्वारा तैल-पैड्स के छेदो से भीतर फेंका जाता है, जिससे इच के तीन हजारवें भाग-जितनी मोटी तेल की परत, विशालकाय पत्र को सभाले रहती है। वास्तव मे दूरदशक इतना बडा है कि खगोलश नली के भीतर निरीक्षण करने के पिंजरे मे बैठता है और दूरदर्शक के साथ-साथ घूमता जाता है । गुम्बद का व्यास 137 फुट है और भार 1000 टन । इस भवन में ये मव वस्तुएँ उपस्थित हैं जिनकी खगोलज्ञ को आवश्यक्ता होती है-ऑफिम, मधेरा कमरा, पुस्तकालय, भोजन करने का कमरा इत्यादि । 3 जून 1948 को 200-इच का समपण-समारोह माउट पलोमर पर हुमा। बहुत-से विख्यात वैज्ञानिक और खगोलज्ञ इस समारोह में उप- स्थित थे। गुम्बद से विशालकाय भवन के भीतर बैठकर उन्होंने व्याख्यातामो से इसकी रूपरेखा पौर निर्माण एवं वीस वष के परिश्रम की गाथा सुनी। उस दिन को बहुत-सी बातें कही गयी उनमे से डॉ रेमोड बी फामिड माउट पलोमर के भवन मे वह सभी कुछ है जिसकी खगोलश को प्रावश्यकता होती है।

106 खगोल विज्ञान के महान क्षण भाषण उधृत करने याग्य है। "सत्य का अवेपण,” उहोने कहा, "मनुष्य की आत्मा को उदात अभिव्यक्ति है और हमेशा से रही है। तारो को देखने की यह महान नयी खिडकी हमे समय और अन्तरिक्ष की उन चौकियो के सम्पर्क मे लाएगी जो शताब्दियों से हमे इगित द्वारा बुलाती रही हैं । यह विश्व के रहस्य, उसकी व्यवस्था, उसके सौदय और उसकी शक्ति को नए सिरे से केन्द्रित करेगी।" दूरदर्शक के निर्माण मे हेल के कार्य को काफी व्याख्यातायो द्वारा श्रद्धाजलि दी गयो। रॉकफेलर फाउडेशन के मैक्स मेसन ने कहा, "प्रारम्भ से ही यह योजना श्रद्धा और सौहार्दपूर्ण सहयोग का उदाहरण रही है । जाज हेल जब इसके मार्गदर्शक थे तब यह किसी और तरह हो भी नहीं सकती थी।" बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ द्वारा अपनायी गयी, सर्वसम्मति से स्वीकृत, प्रतिज्ञा को ली ड्यू प्रिंज ने पढा "कैलिफोनिया इस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के बोड के ट्रस्टी निश्चय करते हैं कि पैलोमर माउटेन के 200 इच के दूरदशक को प्राज के पश्चात् दि हेल टलिस्कोप के नाम से जाना जाए। इसके अतिरिक्त वोड ऑफ ट्रस्टीज का निर्देश है कि डॉ हेल के सम्मान मे सदैव के लिए एक धातु प्लेट प्रॉब्जर्वेटरी के भीतर स्थापित की जाए और उसकी एक प्रमाणित एव अवित कापी मिसेज हेल को भेंट की जाए।" धातु-प्लेट पर हम सब के देखने के लिए ये शब्द है दो सो इच के दूरदशक वा जाज ऐलरी है। (1868-1938) के मम्मान म नामकरण किया गया है जिनको दूरदृष्टि और नेतृत्व न इसे यथाय बना दिया।

तारो को देखने को खिडकी 107 आगामी वर्षों मे जब कभी तारे दिखाई दिए, हेल के दूरदशक का निरन्तर उपयोग किया गया, जिससे मनुष्य के ज्ञान का, विश्व के सम्बन्ध मे सूचनायो का भडार और अधिक बढता गया। असरय धुंधली आकाश- गगापो के, जिन्हे पहले कभी नहीं प्रेक्षित किया गया था, चित्र खीचे गए और निकटवर्ती तारकीय तत्र के सम्बध मे नयी जानकारी प्राप्त की गयी। दूरदशक के साथ किए गए अनुस धानो से ज्ञात हुआ है कि दूर की आकाश- गगानो की दूरी के हमारे पुराने अनुमान गम्भीर रूप से त्रुटिपूर्ण हैं । इसके अतिरिक्त दूरदर्शक का प्रयोग ग्रहो के पहले से अधिक सफलतापूर्वक चित्र खीचने और अन्तरिक्ष मे छिपे रहस्यमय पिंडो की, जो रेडियो तरगो का विकिरण करते है, खोज करने के लिए किया गया। पैलीमर माउंटेन के इस विशाल दूरदशक द्वारा प्राप्त परिणामो से हेल और सभी श्रद्धालु व्यक्तियो की, जिन्होने इसके निर्माण मे सहयोग दिया, प्रत्याशाएं पूर्ण हई हैं।

नौवा अध्याय आकाश से संकेत - - हजारो वर्ष तक मनुष्य को तारो का पता केवल प्रकाश की धुंधली किरणो के द्वारा ही चलता था। वास्तव में अन्य जोवो की भांति, मनुष्य की आँखे विकिरण के प्रति, जिसके इद्रधनुपी दृश्य-रग लाल, बैंगनी, पीले, हरे, नीले, गहरे नीले और जामुनी होते है, अभ्यस्त होती गयी। निस्सदेह मनुष्य ने अपनी सूझ-बूझ से काम लेकर थर्मोपाइल जैसे यत्रो का आविष्कार किया, जिससे उसे वर्ण-पट के लाल सिरे से आगे की रश्मियो के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त हुई और उसने प्रकाश-विद्युत सैल जैसे यत्र भी निकाले, जिससे उसे अदृश्य परा-जम्बू विकिरणो का पता चल सका । लेकिन अभी हाल तक विश्व के बारे मे उसके द्वारा एकत्र सभी तथ्य चाक्षुष दूरदशको के माध्यम से प्राप्त हुए थे। खगोल-विज्ञान के इतिहास में एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय दिसम्बर 1931 मे अमेरिका की वेल टेलीफोन लेवोरेटरीज़ के रेडियो- इजिनीयर डॉ काल जी जैस्की ने जोडा। डा जैस्की बेल टेलीफोन लेबोरेटरीज की हॉल्मडेल, यूजर्सी शाखा मे लगभग 15 मीटर तरग-दैघ्य की लघु रेडियो तरगो के बारे मे शोध-वाय पर रहे थे। उन्होने अत्यधिक सवेदनशील रेडियोग्राही यत्र और ऐसे सुदीर्म एरियल तत्र की सहायता से, जिसे किसी भी दिशा में मोडा जा सकता था, पृष्ठभूमि की ऐसी रेडियो ध्वनियो को सुना जो प्राय रेडियो प्रसारण मे बहुत बाधक बनती हैं। जस्की ने जो ध्वनियाँ सुनी उनमे एक सा उच्च-स्वरीय सीत्कार पा जो घण्टो तर सुनाई देता था, परन्तु दिन में एक बार सबसे अधिक तेज होता या स्पीने इम मिचित्र सीत्कार के सम्बध मे, जो कुछ भी माल' हो सके, मासूम करने का निश्चय किया। 108 माकाश से सकेत 109 उन्हे बहुत शीघ्र पता चला कि जब वे अपना एरियल इस प्रकार घुमाते हैं कि वह बारी-बारी से क्षितिज के विभिन विन्दुनो के सामने होता है तो ध्वनि तीव्रतर होती जाती है और एक विशेष दिशा में वह तीव्रतम हो जाती है, जिसके बाद जैसे-जसे एरियल की दिशा बदलती जाती है, ध्वनि मन्द होती जाती है। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, जैस्की ने देखा कि वह दिशा, जहा से तीव्रतम सीत्कार प्राता था, धीरे-धीरे बदलती गई, यहाँ तक कि पूरे एक वष के परीक्षण के बाद वह दिशा कुतुवनुमा पर फिर मूल स्थान की ओर लौट आई । अन्त मे जैस्की को रेडियो-तरगो के इस विचित्र उद्गम की मुख्य विशेषताओ का साराश प्राप्त करने में सफलता मिली। किसी एक दिन इस उद्गम की दिशा क्षितिज के साथ धीरे-धीरे खिसकती रहती और प्रारम्भ मे जैस्वी ने मोचा कि इससे यह सकेत मिलता है कि इस रेडियो-ध्वनि के लिए सूर्य उत्तरदायी है। लेकिन अगर ऐसा होता तो सामा यत उद्गम कुतुबनुमा मे प्रतिदिन लगभग एक ही ममय एक ही स्थान पर परिलक्षित होता । लेकिन जैस्वी को तब यह विचार त्याग देना पडा, जब उसने महीनो के परीक्षण के बाद पाया कि उद्गम का सामजस्य सूय की क्रमिक गति से नही है क्योकि वर्ष के एक भाग मे तो उमकी दिशा सूय की ओर थी और छ महीने बाद उससे विपरीत। इसी तथ्य के कारण अन्तत जस्की को सही निष्कप निकालने मे सहायता मिली। अनन्त काल से लोगो को मालूम है कि जब पूव मे सूर्योदय होता है ती पश्चिम मे जो अन्तिम नक्षत्र डूबते है, वे ही कुछ राते बीतने पर सूर्यो- दय से कई मिनट पहले डूबते है ! इसलिए, सूय के चारो ओर धरती के अपनी कक्षा मे घूमने के कारण सूय तारो की पृष्ठभूमि के विरुद्ध गतिमील प्रतीत होता है। जैस्की ने अनुभव क्यिा कि मद रेडियो-ध्वनियो के जिस उद्गम की वह खोज कर रहा है, वह तारा-जटित पृष्ठभूमि के एक विशिष्ट क्षेत्र से सम्बधित है और उसके लिए अब केवल उम क्षेन की खोज करना शेप रह गया है।

110 खगोल विज्ञान के महान क्षण उसने जो तथ्य एकत्र किए थे, उनके तथा खगोलशास्त्रीय सिद्धान्तो के आधार पर उसे यह गणना करने में सफलता मिली कि रेडियो-ध्वनि का यह मन्द सीत्कार आकाशगगा की ओर से अर्थात् आकाशगगा के समतल से आता है । इसके अतिरिक्त यह सिद्ध करना भी सम्भव था कि तीव्रतम ध्वनि आकाशगगा के केद्रीय भाग से अर्थात् धनु-तारामडल के विशाल क्षेत्रो से माती है। जैस्को इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि विकिरणो का उद्गम या तो स्वय तारे है, या तारो से नि सृत किरणो से उद्भासित अन्तरतारकीय पदाथ है। वह स्वय सूय से, जो वास्तव मे निकटतम ताग है, कोई भी रेडियो- ध्वनि प्राप्त नहीं कर सका । अत उसने दूसरे विचार पर ध्यान केन्द्रित किया। इस प्रकार इस खोज का श्रेय कार्ल जस्की को मिला कि तारकीय विश्व का पता प्रकाशमाही दूरदर्शक यत्रो के साथ साथ रेडियो द्वारा भी लगाया जा सकता है। दुर्भाग्यवश उसने अपने महत्वपूर्ण खोज-कार्य का विवरण एक ऐसी रेडियो अभियात्रिकी पत्रिका मे छपवाया जिसे शायद ही कोई खगोल वैज्ञानिक पढता था, और इस प्रकार उसका अनुसघान कई वर्षों तक उपेक्षित रहा। रेडियो-खगोल-विज्ञान का तेजी से विकास कई प्रतिभासम्पन्न व्यक्तियो के प्रयास का फल है, जिनमे सबसे पहला नाम जैस्वी का है। द्वितीय श्वयुद्ध के दौरान रेडार के प्रयोग के कारण इस क्षेत्र मे अनुसन्धान को बढावा मिला यद्यपि यह अनुसधान युद्ध समाप्ति के बाद के लिए स्थगित रहा। लेकिन सूय से प्रथम रेडियो-सकेत निश्चित रूप में युद्ध-काल मे ही प्राप्त किए गए । फरवरी 1942 मे कई ब्रिटिश सैनिक रेडार-सचालको को पता चला कि उनके यत्रो मे रेडियो-ध्वनि के कारण गम्भीर बाधा उत्पन्न हो रही है । उनके शक्तिशाली उपकरण का कार्य शत्रु के विमानो की स्थिति का पता लगाना था और शुरू मे यह प्राशका व्यक्त की गई कि जर्मनो ने किसी नए प्रकार के प्रवरोधर यत्र या आविष्कार किया है। जब इम चिंताजनक रेडियो ध्वनि की जानकारी मिली तो सैनिक प्राकाश से सकिन संचालन मनुस पान शाखा के श्री जे एस हे ने जांच-पड़ताल शुरू की। उन्होंने पाया कि ऐसे मौके पर श्रवण-केन्द्रो को सूर्य की दिशा मे उ मुख होना पड़ता था। उन दिनो सौर-नल पर एक बडा धब्बा दिखाई दिया था और हे इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि रेडियो-ध्वनि का मूल इसी विद्युत् आवेशित पदार्थ के प्रमिल मे है। शेष युद्ध-काल मे हे के निष्कर्ष को गुप्त रखा गया और 1946 मे ही इस दिलचस्प नई जानकारी के आधार पर आगे अनुस धान प्रारम्भ किया गया। इस बीच अमेरिका का एक और अनुसन्धानकर्ता प्रोटे रेवर आकाश- गगा से प्राने वाली रेडियो-ध्वनि के स्पष्ट चित्र प्राप्त करने के लिए रेडियो- दूरदशक का प्रयोग कर रहा था। रेवर ने इस पत्र का निर्माण स्वय किया या और यह कुछ-कुछ किरण परावर्ती दूरदर्शक के समान था, जिसमे नतोदर दर्पण तारे या ग्रह की प्रकाश-रेखामो को केद्रीभूत करता है जिसके फल- स्वरूप प्राप्त प्रतिविम्ब को नेत्रिका द्वारा देखा जाता है या उसका चित्र लिया जाता है। रेबर के दूरदर्शक मे 30 फुट व्यास का तश्तरीनुमा धातु- निर्मित 'दपण' था, जिसकी फोकस-दूरी 20-फुट थी। फोकस पर उसने द्विध्रुवक एरियल लगाया था, जिससे वहाँ केन्द्रित रेडियो-ध्वनि का पता लगाया जा सके। इस दूरदशक की सहायता से उसे प्राकारागगा की छानबीन करने और यह सिद्ध कर दिखाने मे सफलता मिली कि रेडियो-ध्वनि और आकाश- गगा मे दृश्य-पदार्थ के वितरण में सामा यत सामजस्य है। रेबर ने जैस्को से भिन्न और लघुतर तरग- दैर्ध्य का प्रयोग किया और उसे पता चला कि सूय से 'प्रसारण' उसी तीव्रता से होता है जिस तीव्रता से आकाशगगा के पदार्य-क्षत्र के केन्द्र से होता है। इन प्रारम्भिक खोजो के बाद और अधिक अच्छे दूरदर्शको का निर्माण कई देशो मे हो गया था और उनकी सहायता से पूरे प्रकाश की जांच-पड़ताल की गयी। इस पडताल से पता चला कि मुख्यत प्रापाशगगा से माने वाली सहज पृष्ठभूमि वाली रेडियो-ध्वनि के वैसे और भी विकिरण के 'चमकीले' स्रोत प्राकाम मे अयत्र बिम्बरे हैं और इहें 'रेडियो तारे' या अधिक उपयुक्त रूप मे 'रेडियो उद्गम' कहा गया।

112 खगोल विज्ञान वे महान क्षण इन खोजो के बारे मे अधिक स्पप्टता से समझने के लिए हम मान लें कि हमारी दृष्टि प्रकाश के प्रति सवेदनशील नहीं है । लेकिन उसमे ऐसा परिवतन हो जाता है कि हम लघु तरग दघ्य की रेडियो तरंगो के द्वारा 'देख' सक्ते है--दसरे शब्दो मे हमारी आँखें रेडियो-दूरदशक बन जाती हैं। इस स्थिति में यदि हम सूय की अोर देखेंगे तो वह 'दृष्टिगोचर तो फिर भी होगा लेकिन पहले से कही वडा दिखाई देगा, क्योकि सूर्य से प्राप्त बहुत मी रेडियो ध्वनि का मूल उसके चारो ओर का प्रभा-मण्डल है जो सूर्य के गिद कम घनत्व वाली गैस का वलय है और दो या तीन सौर-व्यासो तक विस्तृत है । प्राय सौर-धब्बे वाले क्षेत्रो से 'चमकीले रेडियो विस्फोट 'दृष्टिगोचर' होगे। चन्द्रमा हमेशा 'अदृश्य' रहेगा, क्योकि उससे कोई रेडियो-ध्वनि नही आती और यह सोचना दिलचस्प है कि उमको खोज (यदि वह पहले ही से ज्ञात न होता) धरती पर उसके गुरुत्वाकर्षण द्वारा ठीक उसी प्रकार को जाती जैसे ऐडम्स और लेवेरियर ने वरुण ग्रह की खोज मगल ग्रह पर उसके गुरुत्वाकषण के ज़रिये की। ग्रह स्वय सामा यत 'मन्द' या 'अदृश्य' होगे यद्यपि कभी-कभी बृहस्पति और शनि के वातावरण मे धुमडने वाले विशाल वैद्युत् तूफानो से नि मृत रेडियो-तरगें इतनी शक्तिशाली होगी कि उन्हे हम अपनी परिवर्तित प्राग्वो से 'देख सकें। आकाशगगा इस समय रात मे जितनी चमकीली दिखाई देती है उससे अधिक चमकीली दिखाई देगी और जब सूय भी चमक रहा होगा तब भी आकाशगगा की पट्टी आकाश-माग पर दृष्टिगोचर होगी। हजारो रेडियो तारे' दिखाई देंगे, जिनमे बहुत कुछ चमकीले होंगे और कुछ इतने मद्धिम कि मुश्किल से दिखाई देंगे। ये सब बहुत-कुछ उसी ढग से टिमटिमाएंगे, जैसे सामा यत हमारे परिचित तारे, जवकि हम उनकी ओर देखते हैं, टिम- टिमाते हैं। शुरू से ही यह पता चला था कि अधिकाश प्राकाशीय रेडियो-स्रोतों की धूमिलता के कारण बहुत बडे रेडियो-दूरदशक बनाने की प्रावश्यकता होगी और बीस वप से भी कम समय मे रेडियो-दूरदशको के दपणो या तलों माकाश से सकेत 113 का व्यास रेवर द्वारा निर्मित यय के 30-फुट व्यास से बढकर जॉड्रेल बैंक, मानचेस्टर, इगलैण्ड स्थित विशाल रेडियो-दूरदशक मे 250-फुट हो गया। रेडियो-खगोल-विज्ञान का, चाक्षुप खगोलशास्त्र की तुलना मे एक विशिष्ट लाभ यह है कि रेडियो-तरगो पर कुहरे, बादल या दिन के प्रकाश का कोई प्रभाव नही पडता, जिससे निरीक्षण-परीक्षण किसी भी समय किया जा सकता है । लेकिन एक हानि यह है कि लघु रेडियो-तरगो तक का तरग-दर्घ्य दृश्य किरणो के मुकाबले हजारो-लाखो गुना होता है । इसीलिए चाक्षुष दूरदर्शको की तुलना मे रेडियो-दूरदशक कही बडे बनाने होते हैं। 1950 तक यह स्पष्ट हो गया था कि रेडियो-खगोल-विज्ञान की अनेक समस्याओ के समाधान के लिए बहुत ही बडा परिचालन-सक्षम रेडियो- दूरदर्शक बनाना होगा। इसके लिए जितना काम करना होगा और जितनी सामग्री की मावश्यकता होगी, उसे ध्यान मे रखकर ब्रिटेन मे 250-फुट व्यास के दूरदर्शक के लिए तैयारियां 1952 तक लगभग पूरी कर ली गयी थी। विशाल तश्तरी तैयार की गयी, जिससे वह 1 से 15 मीटर तक की तरग-दैघ्यं पर कार्य कर सके । दूरदशक को आडी धुरी पर भी घूमना था और सीधी धुरी पर भी। 1953 तक जॉड्रेल बैक मे जहा इसे लगना था कामशुरू हो गया, और 2 अगस्त 1957 की रात्रि को दूरदशक का पहली बार सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया। एक प्रकार से यह दूरदर्शक, जो विश्व मे सबसे बडा है, उतना ही जटिल है जितना माउट पैलोमर पर स्थित हेल चाक्षुष दूरदर्शक' जिसमे 200-इच व्यास का दर्पण लगा है। 250 फुट का चषक इस्पात की दो मीनारो के सहारे टिका है जो धरातल से 170 फुट ऊंची हैं । इन मीनारो की चोटी पर प्रयोगशालानो मे विद्युत्-मोटरेंदूरदशक कोलगभग प्रयोगशालाओ की पुरी पर घुमाती हैं। इस धुरीपर प्रयुक्त 25 फुट वाले रैक भग्न युद्धपोत 'रॉयल सावरेन' से बचाए गए थे। स्वय मीनारें तल-भाग मे पहियो के सहारे 350-फुट व्यास और 17-फुट को चौडाई वाली रेल-पटरियो पर घूमती हैं । ये 45 से 90 फुट तक की गहराई वाली खूब मजबूत नीव पर स्थित हैं । इनकी मजबूती सुनिश्चित करने के लिए लगभग 10 हजार टन प्रबलित कक्रीट का प्रयोग किया गया।

2 अगस्त 1957 को रात्रि को दूरदशक का पहली बार सफलतापूर्वक प्रयोग किया गया।

115 माकाश से समेत धरातल से ऊपर प्रयुक्त इस्पात का वजन लगभग 2000 टन है जिसमे चपक का भार 700 टन है। जिस नियत्रण-तत्र द्वारा दूरदराव को किसी भी प्रापागीय वस्तु की ओर उ मुख पिया जा मक्ता है, उसी के द्वारा उसे इस प्रकार घुमाया जा सकता है जिसमे वह वस्तु अपने ही क्षेत्र में रहे और धरती के अपनी कोली मे घूमने की स्थिति का परिहार हो जाए। चाक्षुप ददर्शको से भिन यह विशाल रेडियो-दूरदशक रेडियो- तरगो के सप्रेषक के रूप में भी प्रयुक्त हो सकता है और ग्राही के रूप में भी । यह इसी प्रकार होता है जैसे किसी साधारण दूरदर्शक को फोकस पर बिजली का तेज बल्ब लगाकर घुमाया जाए और वक्राकार दपण से प्रकाश को वाहर प्रक्षेपित किया जाए। लेकिन इस प्रकार प्रयाग-विरणो की सहा- यता से कम ही उपयोगी परीक्षण किए जा मकते है जब कि जॉइँल बैंक के रेडियो दूरदर्शक का सफलतापूर्वक सप्रेषक के रूप में प्रयोग किया गया है। रेडार-यत्र के रूप मे काम करते हुए उसने चद्रमा तक रेडियो-सकेत भेजकर उन्हे वापिस किया है और लगभग ढाई सेकड मे 'प्रतिध्वनि' प्राप्त की है। हाल में इसका प्रयोग शुक्र ग्रह तक को दूरी नापने के लिए किया गया और पाँच सेक्ड में उस ग्रह तक सकेत भेजकर उन्हें वापस किया गया । सकेत के प्रेपण और उसकी प्राप्ति के समयो की सावधानी से माप करके और इस अवधि को अन्तरिक्ष मे रेडियो-तरगो की गति से गुणा करके वहां तक की और वहाँ से वापसी की दूरी मालूम की जा सको। जब रूसियो ने 1957 मे अपना पहला कृत्रिम भू उपग्रह छोडा तो उमको गतिविधि का पता लगाने के लिए इस दूरदर्शक का उपयोग किया गया। तब से अब तक कई मौको पर रूमियो और अमेरिकनो ने भी इसका उपयोग अपने अपने भू-उपग्रहो की गतिविधियो का अध्ययन करने के लिए किया है ! उन खोजो के लिए भी इसका उपयोग किया गया है जो चन्द्रमा तक या उमसे आगे की यात्रामो के लिए आवश्यक होगी। लेकिन इस विशाल दूरदशक का मुख्य काय हमारे सौर परिवार से बहुत आगे के अतरिक्ष की गहराइयों के बारे में सूचनाएं प्राप्त करना है जिसमे रेडियो-खगोल-वैज्ञानिको को उस विचित्र रेडियो-ब्रह्माण्ड की 116 खगोल विज्ञान के महान क्षण समस्याएं सुलझाने का अवसर मिले जिसका वे अध्ययन कर रहे है । रेडियो- खगोल-विज्ञान के पिछले बीस वर्ष वस्तुत, वैसे वर्ष रहे हैं जैसे गैलीलियो द्वारा चाक्षुप दूरदर्शक के उपयोग के बाद रहे थे, जब कि अनेक नयी खोजे की गयी थी जिनमे कुछ को समझना आसान था औरकुछ बहुत ही जटिल थी। आकाशगगा के सभी भागो से आने वाले सामान्य पार्श्वभूमि विकिरण के बारे मे अब स्पष्ट हो चुका है कि वह तारो के मध्य स्थित हाइड्रोजन के विस्तृत बादलो के कारण है, न कि स्वय तारो से नि सृत है, जैसा कि जैस्की का सन्देह था। एक दिलचस्प रेडियो-तरग-दैध्य 21 सैटी- मीटर का है। यह भी आकाशगगीय विपुवत रेखा के समतल मे अन्तरतारकीय हाइड्रोजन के सके द्रण के कारण है । यद्यपि अतरिक्ष मे माचिस के बराबर मायतन मे एक सौ से भी कम हाइड्रोजन के परमाणु होते हैं, फिर भी तारी के मध्य बिखरे हाइड्रोजन का कुल वजन करोडो सूर्यों के भार के बराबर होता है । यह हाइड्रोजन समस्त आकाशगगीय समतल मे समान सघनता से नहीं फैला है बल्कि गैस, धूल और उन तारा को विशाल सर्पिल भुजामो में सकेन्द्रित है जो आकाशगगीय केद्र के गिद वलयित हैं। खगोल-वैज्ञानिको ने इस शताब्दी के विशाल चाक्षुष दूरदर्शको की सहायता से हमारे अपने तारकीय तत्र के पार के तारोको आकाशगगामो मे इस प्रकार की सर्पिल भुजाप्रो को देखा था, और उन्हें दीप काल से सन्देह था कि हमारी आकाशगगा मे भी ऐसी मर्पिल भुजाए है। दुर्भाग्यवश अन्तर- तारकीय गैस और धूल प्रकाश-रोधक है मौर इस कारण से उन भुजाओ को देख पाना उसी प्रकार असम्भव था जैसे घने कुहरे मे मोटरकारो और वसो के आकार को देख पाना। आकाशगगीय विपुक्त रेखा के समतल की सभी दिशामो से आने वाली रेडियो-ध्वनि की तीव्रता की सावधानी से माप के द्वारा पहली बार यह सिद्ध करना सम्भव हुआ कि आकाशगगा की सपिल भुजाओं का अस्तित्व है भौर उनके प्राकार-प्रकार का मानचित्र तैयार किया जा सका । पाशानुकूल यह भी पाया गया कि हमारी भाकारागगा एव अय सपिल तत्रो मे निकट की समानता है। इसके अतिरिक्त ऐसे तरीके को अपनाकर, जिसके ब्यौरे में जाने को भावश्यकता नहीं है, यह भी सिद्ध किया जा सका कि गैस के विशाल माकाश से सकेत 117 बादल आकाशगगा के केन्द्र के गिर्द अपनी ही कक्षा मे उसी प्रकार धूमते हैं जैसे ग्रह अपनी कक्षामो मे घूमते है। लेकिन बहुत समय तक रेडियो तारे' खगोल वैज्ञानिको के लिए पहेली बने हुए थे। जब इन तारो की स्थिति को माप लिया गया तो आकाश मे इनके वितरण का मानचित्र तैयार हो गया। इसके आगे का सबसे अधिक स्वाभाविक कदम यह था कि इस मानचित्र की तुलना उन मानचिनो से को जाए जिनमे सामान्यत दृष्टिगोचर अर्थात् चाक्षुष दूरदर्शको से दिसायी देने वाले तारो की स्थिति का निर्देश है । इस प्रकार की तुलना का विस्मयजनक परिणाम यह निकला कि लगभग बिना किसी अपवाद के ऐमा कोई भी 'रेडियो तारा' नहीं था जो उन स्थितियो मे हो जिनमे दृष्टिगोचर तारे थे यह मोचा जा सकता है कि चूकि सूर्य रेडियो-तरगे प्रेषित करता है इसलिए अय सभी दृष्टिगोचर तारे भी ऐसा ही करेंगे। लेकिन हमसे सूर्य और तारो की दूरी पर आधारित गणनामो से पता चलता है कि यदि ये तारे रेडियो तरगें प्रक्षेपित करते भी हैं तो भी वे हम तक पहुँचते-पहुँचते इतनी मद होगी कि उनका पता हमारे रेडियो-दूरदशको को नही लगपाएगा। प्रश्न यह है कि फिर कथित 'रेडियो तारे' क्या है ? प्राय ऐसा होता है कि विसी तारे का विस्फोट होता है और वह टुकडे-टुकडे हो जाता है। इस क्रम मे वह कुछ समय तक तेजी से चमकता है और यह चमक करोडो तारो की मामूहिक चमक के बराबर होती है । और अक्सर यदि यह बहुत मन्द तारा हुआ तो उसे आँखों से पहली बार देखा जाता है और देखने वाला कह सकता है कि उसने एक नए तारे की 'खोज' की है । ऐसे तारो को 'सुपरनोवा' कहा जाता है। उनके अवशेष मूल स्थान में बाहर प्रति सेकड हजारो मील की तेजी से जाते है और इस क्रम मे चमकीली विक्षुब्ध गैस के वादलो का निर्माण करते है । चीनियो ने सन् 1054 ईस्वी मे ऐसे ही एक विस्फोट को देखा था और आज हम चाक्षुष दूरदशको की सहायता से गैस के गोले को, जो तार- कोय विस्फोट का परिणाम है, देख सकते हैं । इसे 'कक नीहारिका' कहा जाना है। रेडियो-दूरदशको को जो-कुछ प्राप्त हो रहा था वह तारकीय विस्फोट से जमे गैस के गोले की तीव्र वेग वाली धारापो का रेडियो- 118 खगोल विज्ञान के महान क्षण उत्सजन था। दूसरे 'रेडियो तारे' का पता शमिष्ठा तारामडल मे एक सुपरनोवा की दिशा मे चला, जिसे सन् 1572 ईस्वी मे देखा गया था। इस प्रकार इस धारणा को बल मिला कि गैस की विक्षुब्ध धाराएं रेडियो-तरगें प्रक्षेपित करती है। उसके बाद 200 इच वाले हेल दूरदशक से लिए गए चित्रो से मालूम हुआ है कि रेडियो-उद्गम स्थलो मे कुछ अय वस्तुएँ है जो सुपर नोवा विस्फोटो के अवशेप हो सकती है। यह देखा गया है कि किसी विशाल आकाशगगा मे न केवल करोडो तारे होते है बल्कि विपुल धूल और गंस के वादल भी होते हैं । यदि अन्तरिक्ष मे गतिशील दो आकाशगगाएँ टकरा जाएं तो उनमे से किसी भी प्रकाश- गा के तारो का शायद ही विस्फोट होगा क्योकि किसी आवाशगगा मे तारो के बीच औसत दूरी क्मिी तारे के व्यास से करोडो गुना होती है। इस प्रकार यदि आकाशगगामो के अतगत तारो के बीच गैस और धूल का व्यापक प्रसार न हो नो ये प्राकारागगाएं एक-दूसरे के बीच से प्रेतो की भांति गुजर जाएंगी। उनमे निम्सदह टकराव होगा जिससे तीव्र गति से अन्तरतारकीय पदार्थों की धारापो का अतमिलन हागा और वे सम्भवत रेडियो-तरगो का विकिरण करेगी। और वस्तुत कई बार जिन्द 'रेडियो तारे' कहा जाता है वे और कुछ नही बल्कि परस्पर टकराने वाली दो आकाशगगाएँ होती है। शेष रेडियो-खोत, जिनकी संख्या कई सौ है, अभी तक चाक्षुप साधनो से नही पहचाने जा सके है । हो सकता है कि वे इतने दूर हो कि 200-इच के दूरदशक भी इह दृश्यमान बनाने में सक्षम न हो। रेडियो-खगोल विज्ञान के इन अत्यत प्रारम्भिक चरणो मे यह कहना कठिन है कि भविष्य के गभ में क्या है । जस्को ने जब आकाश से आने वाले मद समेतो की खोज की थी तब से केवल तीस वप वीते है जो खगाल- विज्ञान के इतिहास मे एक क्षण के समान है । लेकिन यह महान क्षण रहा है जब ब्रिटन, अमेरिका, प्रास्ट्रेलिया तथा कई अय देशों में रेडियो सगोल- विज्ञान सम्ब पी वेधशालाएँ कायरत हुई है। पाने वाले वर्षों में वेधशालाएँ अपने नए दूरदशको मोर प्रविधियो की सहायता से निश्चय ही माकाशीय संकेतों को सुनकर विश्व-सम्बधी नए और महत्वपूर्ण प्रवेषण करेंगी। - दसवाँ अध्याय जेट-चलित कैमरा रेडियो सगोल-विज्ञान के विकास के साथ-साथ उससे सम्बद्ध एक और नयी सम्भावना भी विज्ञान के क्षेत्र मे दृष्टिगत हो रही है, वह है अन्तरिक्ष-अनुसन्धान । यह कई चरणो वाले बडे रॉकेटो, नए एलेक्ट्रॉनिक उपकरणो और यूटन द्वारा निर्धारित एव दृढता मे स्थापित खगोल विज्ञान के नियमो पर आधारित है। अधिकाश आधुनिक विज्ञानो की तरह इस क्षेत्र मे भी विकास का श्रेय प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों, तकनीक्शो और अन्य लोगो के बहुसख्यक दलो के काय को है । इनमे से प्रत्येक ने योजना के अपने भाग का काय प्रयोग- शालाप्रो मे या इजीनियरी-कारखानो मे या प्रक्षेपण मच पर या रॉकेटो की खोज रखने वाले केन्द्रो मे किया और इस प्रकार रॉकेट को चद्रमा तक या उससे भी आगे भेजने के जटिल कार्य की दिशा में अपना-अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बहुत से लोगो का विश्वास है कि अन्तरिक्ष उडान का विचार नया है, लेकिन ऐसी बात नही है । चन्द्रमा तक उडान की पहली कथा, जिसकी हमे जानकारी है, सन् 160 ई० मे ल्यूशियन नामक एक ग्रीस निवासी ने लिखी थी। इस क्था के प्रतगत एक व्यक्ति हरक्युलिस के स्तम्भो (जिब्राल्टर की खाडी) के पार जाते हुए अपने जहाज को तेज हवाओ मे फंसा हुआ पाता है, जिससे उसे चन्द्रमा पर उतरना पड़ता है और जहाँ वह बहुत-सी रोमाचक स्थितियो से गुजरता है । सगोलशास्त्री वप्लर ने स्वय भी एक पुस्तक मे बद्रमा तक को यात्रा से सम्बद्ध कुछ विशेषताओं का वर्णन किया है और उन्नीसवी शताब्दी मे जूल वन नामक लेखक ने दो प्रसिद्ध उप यास लिखे, इनमें से एक का शीपर है 'धरती से चद्रमा तक' और दूसरे का शोषक है 'चन्द्रमा के चारो ओर की यात्रा'। 119 118 खगोल विज्ञान के महान क्षण उत्सजन था। दूसरे 'रेडियो तारे' का पता शर्मिष्ठा तारामडल मे एक सुपरनोवा की दिशा मे चला, जिसे सन् 1572 ईस्वी मे देखा गया था। इस प्रकार इस धारणा को बल मिला कि गैस की विक्षुब्ध धाराएं रेडियो-सरगें प्रक्षेपित करती है। उसके बाद 200 इच वाले हेल दूरदशक से लिए गए चित्रो से मालूम हुआ है कि रेडियो-उदगम स्थलो मे कुछ अन्य वस्तुएँ हैं जो सुपर नोवा विस्फोटो के अवशेष हो सकती है। यह देखा गया है कि किसी विशाल आकाशगगा मे न केवल करोडो तारे होते है बल्कि विपुल धूल और गैस के वादल भी होते है । यदि अन्तरिक्ष मे गतिशील दो आकाशगगाएँ टकरा जाएँ तो उनमे से किसी भी प्राकाश- गा के तारो का शायद ही विस्फोट होगा क्योकि किसी आवाशगगा मे तारो के बीच औसत दूरी क्सिी तारे के व्यास से करोडो गुना होती है। इस प्रकार यदि आकाशगगानो के अन्तगत तारो के बीच गैस और धूल का व्यापक प्रसार न हो तो ये आकाशगगाएँ एक-दूसरे के बीच से प्रेतो की भाति गुजर जाएँगी। उनमे निस्सदेह टकराव होगा जिससे तीव्र गति से अन्तरतारकीय पदार्थों की धाराओ का अतमिलन होगा और वे सम्भवत रेडियो-तरगो का विकिरण करेगी। और वस्नुत कई बार जिह 'रेडियो तारे' कहा जाता है वे और कुछ नहीं बल्कि परस्पर टकराने वाली दो आकाशगगाएँ होती है । शेष रेडियो-स्रोत, जिनकी सस्या कई सौ है, अभी तक चाक्षुष साधनो से नही पहचाने जा सके है । हो सकता है कि वे इतने दूर हो कि 200-इच के दूरदशक भी इन्ह दृश्यमान बनाने में सक्षम न हो। रेडियो-खगोल विज्ञान के इन अत्यत प्रारम्भिर चरणो मे यह कहना कठिन है कि भविष्य के गम में क्या है । जैस्की ने जर आकाश से आने वाले मद सकेतो की खोज की थी तब से केवल तीम वप वीते है जो खगोल- विज्ञान के इतिहास मे एक क्षण के समान हैं । लेकिन यह महान क्षण रहा है जब ब्रिटेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया तथा कई अय देशो मे रेडिया-खगोल- विज्ञान सम्बधी वेधशालाएं कायरत हुई है । आने वाले वर्षों म वेधशालाएँ अपने नए दूरदशको भौर प्रविधियो की सहायता से निश्चय ही प्राकाशीय संकेतो को सुनकर विश्व सम्बधी नए और महत्वपूण अवेपण करेंगी।

दसवां अध्याय जेट-चलित कैमरा रेडियो-खगोल-विज्ञान के विकास के साथ-माथ उससे सम्बद्ध एक और नयी सम्भावना भी विज्ञान के क्षेत्र मे दृष्टिगत हो रही है, वह है अन्तरिक्ष अनुस वान । यह कई चरणो वाले बडे रॉकेटो, नए एलेक्ट्रॉनिक उपकरणो और न्यूटन द्वारा निर्धारित एव दृढता से स्थापित खगोल विज्ञान के नियमो पर आधारित है। अधिकाश आधुनिक विज्ञानो की तरह इस क्षेत्र मे भी विकास का श्रेय प्रतिभाशाली वैज्ञानिको, तकनीकज्ञो और अय लोगो के बहुसख्यक दलो के काय को है। इनमें से प्रत्येक ने योजना के अपने भाग का कार्य प्रयोग- शालानो मे या इजीनियरी-कारखानो मे या प्रक्षेपण मच पर या रॉकेटो की खोज रखने वाले केन्द्रो मे किया और इस प्रकार रॉकेट को चन्द्रमा तक या उससे भी आगे भेजने के जटिल काय की दिशा मे अपना-अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बहुत से लोगो का विश्वास है कि अतरिक्ष-उडान का विचार नया है, लेकिन ऐसी बात नही है। चन्द्रमा तक उडान की पहली कथा, जिसकी हमे जानकारी है, सन् 160 ई० मे ल्यूशियन नामक एक ग्रोस-निवासी ने लिखी थी। इस क्था के प्रतर्गत एक व्यक्ति हरक्युलिस के स्तम्भो (जिब्राल्टर की खाडी) के पार जाते हुए अपने जहाज को तेज़ हवाग्रो में फंसा हुआ पाता है, जिससे उसे चद्रमा पर उतरना पड़ता है और जहाँ वह बहुत-सी गेमाचक स्थितिया से गुजरता है । खगोलशास्त्री केप्लर ने स्वय भी एक पुस्तक में चद्रमा तक को यात्रा से सम्बद्ध कुछ विशेषतायो का वर्णन किया है और उन्नीसवी शताब्दी मे जूल वन नामक लेखक ने दो प्रसिद्ध उपन्यास लिखे, इनमे से एक का शीपक है 'धरती से चद्रमा तक' और दूसरे का शीर्षक है 'चद्रमा के चारो ओर की यात्रा'। 119 120 सगाल विज्ञान के महान भए वा की यह काहिश होती थी कि वह अपनी क्थानो को वैज्ञानिक पृष्ठभूमि जितनी अधिक सही हा सके, रखे । उसका तब था कि अगर एक बहुत बनी तोप का जमीन में इस तरह गाड दिया जाए जिमसे उमका मुंह ऊपर की ग्रार हो तो उस ताप के गोले के भीतर के खोखले भाग में बैठे उसकी क्था के पानो को तोप दागकर चद्रमा तव की यात्रा करा सकना सम्भव होगा। लेकिन उसके इस विचार में कई बडी गलतिया थी, यद्यपि उसका यह कहना मही था कि अगर तोप का गोला धरती के वातावरण से मात मोले प्रति सेक्ड की गति से गुजर जाए तो वह धरती के गिद चन्द्रमा की कक्षा मे याना कर मवेगा। वन के बाद बहुत-से अय लेखको ने भी अन्तरिक्ष-याना सम्बधी रोमाचक कथाए लिखी हैं। लेकिन अतरिक्ष-यात्रा सम्बधी समस्याग्रो का हल तब निक्लना प्रारम्भ हुआ जब इमसे सम्बद्ध सम्पूर्ण प्रश्न पर रूस के वैज्ञानिक कोस्टनटिनस्योल्कोवस्की ने उनीसवी शताब्दी के अन्त में वैज्ञानिक ढग से अध्ययन प्रारम्भ किया। अय देशो में विशेपत अमेरिका, जर्मनी और फास में इस शताब्दी के प्रारम्भिक 30 वर्षों मे अय प्रवत्तको ने भी अन्तरिक्ष-उडान की नीव डालने में सहायता दी । मानव-जाति के इतिहास मे से पहले हुअा है वैसे ही इस बार भी अधिकाश लोगो ने उनकी खिल्ली उडाई, लेकिन अधिकाश प्रवत्तको की भाति वे अपने साथियो के उपहास के वावजूद प्रयत्नशील रहे । यह अच्छी ही बात है कि कुछ लोग ऐसी बात करते है क्योकि वे यदि ऐसा न करते तो मानव-जाति का ग्रादिम स्थिति से आज तक का विकास सम्भव न होता । अतरिक्ष-उडान के सम्बध मे इन प्रारम्भिक उत्साही व्यक्तियो ने शीघ्र अनुभव किया कि अन्तरिक्ष के शूय को चीरकर धरती से बाहर यनो के पैकेट या सम्भवत मानव-युक्त अन्तरिक्ष यान को पहुँचाने का एकमान व्यावहारिक साधन रॉकेट ही हो सकते है। लेकिन जिस समय वे इस निष्कप पर पहुँचे उस समय तक उपलब्ध ये रॉकेट इस काम के लिए बहुत ही अनुप- युक्त थे। इसलिए इनमे से कुछ लोगो ने रॉकेटो से सम्बद्ध परीक्षणो मे कई वर्ष बिताए, ये परीक्षण कई स्थानो में किए गए और इनके लिए, सम्बद्ध - जेट चलित कमरा 121 वज्ञानिको ने स्वय ही परीक्षण-स्थलो का निर्माण किया। इन परीक्षण-स्थलो मे उहे बहुत-से रोमाचक अनुभव प्राप्त हुए। परीक्षण से सम्बद्ध रॉकेट कभी तो ठीक वैसे ही काम करता था, जैसी आशा की जाती थी लेकिन अक्सर वह छूटता ही नहीं था, या जलकर राख हो जाता था, या छूटता भी था तो चक्कर खाकर प्रयोग करने वालो के सर पर ही आ गिरता था अब हम सबको मालूम है कि जमन प्रयोगकर्तानो की सफलता के कारण नाजी सरकार इस निष्कप पर पहुँची कि अगर ऐसे रॉकेटो का विकास किया जा सके तो उहे सैनिक कार्यों के लिए काम मे लाया जा सकता है। बाल्टिक सागर के तट पर पीनेमुण्डी मे स्थित विशाल रॉकेट-अनुसघान सस्थान मे, जिस पर रॉयल वायुसेना ने बम-वर्षा की थी, ·V-2 रॉकेट' बनाए गए जिनकी सहायता से जमनो ने द्वितीय विश्वयुद्ध मे लन्दन और एण्टवप पर बम-वर्षा की। उस युद्ध के अत मे जमनी के बहुत-से रॉकेट वैज्ञानिक तथा इजीनियर रूस और अमेरिका गए जहा उहोने नए रॉकेट विकास सस्थान बनाने में मदद दी। बहुत से वैज्ञानिको ने यह अनुभव किया कि युद्ध के बाद का रॉकेट, युद्ध के पहले के रॉकेट से, इतना भिन्न है कि अतरिक्ष-यात्रा के उत्साही व्यक्तियो के कुछ पुराने स्वप्न अवश्य ही सत्य सिद्ध हो सकते हैं। इनके अन्तर्गत धरती के वातावरण मे ऊंचाई पर अनुस घान और कृत्रिम भू-उपग्रह का निर्माण थे 4 अक्तूबर 1957 को रूसियो ने धरती के चारो ओर कक्षा मे स्पुतनिक-1 को भेजा और न्यूटन द्वारा अपनी पुस्तक 'प्रिंसिपिया' मे शास्त्रीय दृष्टि से यह सिद्ध करने के ठीक 270 वर्ष बाद, कि कृत्रिम उपग्रहो का निर्माण से सम्भव हो सकेगा, मानव-जाति के लिए अन्तरिक्ष-युग का प्रारम्भ हो गया । (स्मरण रहे कि रूसी शब्द 'स्पुतनिक' का अथ 'उपग्रह है।) पहला उपग्रह 184 पौंड का था, इसके बाद स्पुतनिक-2 छोडा गया जो माधे टन का था, और फिर स्पुतनिक-3 छोडा गया जो 1 टन 6 हण्डेड- घेट का था। अधिकारा भार जटिल यत्रो, रेडियो और उन बैटरियो का था जिनके द्वारा धरती के वातावरण से ऊपर की स्थिति के बारे में सूचनाएँ ।

122 सगोल विगानो महान क्षण प्राप्त की जा सकती थी और फिर उहे,जैसे जैसे उपग्रह हमारी घरती की परिक्रमा करे, खोजा जा सके । इन उपग्रहो के द्वारा, जो एक प्रकार से मानव के यय-सेवव थे, धरती के चुम्बकीय क्षेत्र का मानचित्र तैयार किया गया है, ग्रहो के बीच गस के घनत्व का पता लगाया गया है, ब्रह्माण्ड-किरणो का विश्लेषण किया गया है (ब्रह्माण्ड-किरणे अन्तरिक्ष की गहराइयो से माने वाले तीयगामी परमाणविक कण हैं) और इसी प्रकार की अय जांच- पडताल को गई है। पहला स्पुतनिक छोडे जाने के बाद छ महीने के अन्दर-अन्दर अमरीपियो को अपना पहला उपग्रह रक्षा में भेजने की सफलता मिली। तब से अब तक दर्जनो उपग्रह विभिन्न उद्देश्यो से छोडे जा चुके हैं जिससे इस समय जवकि ये पक्तिया लिखी जा रही हैं लगभग 100 उपग्रह धरती की परिक्रमा कर रहे है और प्रत्येक महीने कुछ और नए जुडते जाते हैं। बहुत-से रॉकेट जो प्रक्षेपण मच से इन कृत्रिम उपग्रहो को ऊपर ले जाते हैं, 100 टन से भी अधिक वजन के होते हैं। इनमे से कुछ तो वास्तव मे सैकडो टन वजन के होते हैं, अर्थात् इजन और डिब्बो सहित एक भरी- पूरी रेलगाडी के बराबर। रॉकेट मे अधिकाश वज़न इंधन के कारण होता है और यह इंधन अब तक खोजे गए सभी ईंधनो से कही अधिक शक्तिशाली होता है, क्योकि किसी उपग्रह को कक्षा मे स्थापित करने के लिए बहुत अधिक शक्ति की आवश्यकता होती है। प्रथम स्सी उपग्रहो की सफलता के बाद यह देखा गया कि धरती और उसके आस पास के स्थानो के सम्बध मे ढेर-सी नयी जानकारी इन उपग्रहो के द्वारा प्राप्त हो सकती है, इसलिए सोवियत अन्तरिक्ष वैज्ञानिको ने एक ऐसा प्रयास करने का निश्चय किया है जो पहले कभी किमी मनुष्य ने नही किया और वह है च द्रमा की दूसरी ओर देखने का हम चद्रमा की सतह को दूरदशक के महारे जव देखते है तव उस पर जो पर्वतमालाएँ, केटर तथा अय भौगोलिक विशेषताएँ दिखाई देती हैं, वे वही हैं जिहें गैलीलियो ने साढे तीन सौ वर्ष पूर्व उस दूरदर्शक से देखा था, जिसका नया-नया आविष्कार किया गया था। चद्रमा का यही भाग लाखों वर्षों से धरती की ओर रहा है और इस बीच मे जो भी जीव धरती पर - जेट-चलित कैमरा 123 उत्पन्न हुए हैं उन्होने केवल इसी को देखा है क्योकि चन्द्रमा अपनी धुरी पर उतने ही समय मे घूमता है जितने समय मे वह धरती के चारो ओर अपनी कक्षा मे एक परिक्रमा करता है । चन्द्रमा के दृश्य भाग के मानचित्र बनाने और फोटो लेने मे तो पृथ्वी के खगोल-वैज्ञानिको को सफलता मिली, परन्तु चन्द्रमा का वह भाग रहस्य बना रहा जो दृष्टिगोचर नहीं है। धरती और चन्द्रमा का क्या सम्बन्ध है, इसे और स्पष्ट समझने के लिए हम मान लें कि धरती एक फुटवाल के समान है । इस दशा मे चन्द्रमा टेनिस की गेद के समान होगा और वह 30 फुट व्यास के वृत्त मे 'धरती' के चारो ओर 273 दिनो मे घूमेगा। स्वय धरती 2 मील के व्यास वाले वृत्त मे 100 फुट व्यास वाले गोले के, जो सूर्य का प्रतीक होगा, चारो ओर घूमेगी। जैसे-जैसे चन्द्रमा धरती की परिक्रमा करता है उसका वह भाग सूय की किरणो से प्रकाशित होता रहता है जो दूरवर्ती सूर्य के सामने है जबकि दूसरा भाग अधकार मे रहता है। जब धरती, चन्द्रमा और सूर्य इसी क्रम से एक सीधी रेखा में होते हैं तब च द्रमा का जो भाग सूर्य से प्रकाशित है, वह वही भाग है जो धरती से दूर घूम जाता है। ऐसे ही समय को नया चन्द्रमा कहते हैं । सोवियत वैज्ञानिको ने निश्चय किया कि उनकी समस्या सर्वोत्तम ढग से यो हल हो सकती है कि वे धरती से यतो से भरा हुआ एक खोल चन्द्रमा तक इस प्रकार भेजें जिससे वह चन्द्रमा के निकट नए चांद के समय पहुँचे । जब यह खोल या चन्द्र-उपग्रह, चन्द्रमा और सूय के बीच पहुँचेगा तो वह चन्द्रमा के अज्ञात किन्तु प्रकाशित भाग की ओर देखेगा । उस हालत मे कुछ हजार मील की दूरी से चन्द्रमा के उस भाग के चित्र लिए जा सकेंगे। ऐसे उपग्रह के नियत्रण और निर्देशन से सम्बद्ध उपकरणो के परी- क्षण के लिए रुसियो ने 2 जनवरी 1959 को अपना पहला चन्द्र उपग्रह छोडा, इसका नाम ल्यूनिक-1 था। यह उपग्रह धरती के वातावरण से 25,000 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से गुजरा। तब तक इसके रॉकेट-इंधन की टरियां खाली हो चुकी थी और पहले चरण का रॉकेट अलग हो चुका था जिससे धरती से तेजी के साथ बढने के लिए केवल अन्तिम चरण वाला रॉकेट और खोज-सम्बधी उपग्रह शेष रह गए । लगभग 34 घण्टे बाद खोजी उपग्रह चन्द्रमा की कक्षा में पहुंच गया तब तक वह अन्तरिक्ष मे 124 सगोल विज्ञान के महान दाण ढाई लाख मील की दूरी पार कर चुका था। वह चद्रमा के लगभग 3000 मील पास से गुजरा और यह देखते हुए कि पहले प्रयास में यह नितान्त कठिन काय था, यह बहुत बडी प्रथम सफलता कही जाएगी। इसके बाद खोजी उपग्रह और आगे बढता गया जिससे वह सूर्य के चारो ओर परिक्रमा करने वाला कृत्रिम ग्रह बन जाए । सिवाय इसके कि क्सिी सुदूर भविष्य मे यह ग्रह धरती से टकराए, जिसकी बहुत ही कम सम्भावना है, वह शायद अन त काल तक सूय के चारो ओर परिक्रमा करता रहेगा। उसी साल सितम्बर मे ल्यूनिक-2 छोडा गया । इस बार उसका लक्ष्य चद्रमा की सतह थी और 13 सितम्बर को वह सतह से जा टकराया, वास्तव मे ल्यूनिक-2 च द्रमा के दृश्य भाग के मध्यविन्दु से अधिक दूर नहीं उतरा । उसकी पाश्चयजनक याना के लगभग अन्त तक उसमे लगे रेडियो के सकेत आते रहे जिहे जॉड्रेल बैंक के विशाल रेडियो-दूरदशक ने ग्रहण किया। रसिया ने ल्यूनिक-2 की प्रगति के सम्बध मे अपनी जानकारी के बाद ऐलान क्यिा कि यह मम्भावना है कि वह चन्द्रमा से जा टकराएगा जिस समय कि उसे टकराना था । उसके कुछ ही मिनट पहले उसमे आने वाले सकेतो की 'ब्लीप-ब्लीप' आवाज अचानक रुक गई जिससे सम्पूण मानव- जाति को पता चला कि धरती से पहला पदाथ चद्रमा के तल पर पहुंच चुका है। ल्यूनिक-1 और 2 की उडानो से जो सूचना एकत्र की गयी उसके प्राधार पर रूस के वैज्ञानिको को विश्वास हो गया कि उनके अगले और सबसे अधिक कठिन परीक्षण के लिए उनकी नियत्रण और निर्देशन पद्धति यथेष्ट सही है। धरती के गुरुत्वीय खिंचाव को समझने के लिए प्राय उसकी तुलना एक विशाल वृत्ताकार गड्ढे से की जाती है जिसके तल मे धरती स्थित है। इस गढे की दीवार क्रमश ऊपर की ओर ढलवाँ होती है, वे तल के निकट सबसे अधिक सीधी होती है और धरती से दूर ऊपर आते आते वे चपटी हो जाती है। यह बदलती हुई ढनान इस तथ्य को व्यक्त करती है कि धरती का गुरुत्वीय खिचाव धरती के निकट सबसे तीव्र होता है और जैसे-जैसे आप घरती से दूर होते जाएँ यह खिचाव कमज़ोरहोता जाता है। यदिएकगेंद गड्ढे जेट चलित कमरा 125 के निकट पहुंचे और नीचे की ओर पहले छिछले ढलान मे बढे तो वह जैसे-जैसे नीचे जाएगी रफ्तार पकडती जाएगी लेकिन जब तक वह गड्ढे मे सही कोण से न प्रवेश करे तव तक वह सम्भवत तल पर धरती से नहीं टकराएगी, लेकिन ढलान से ऊपर उठने और गड्ढे से बाहर जा लुढक्ने से पहले वह गड्ढे की दीवारो के गिद चक्कर काट सकती है । दूसरी ओर गड्ढे के तल से किसी गेंद को एक विशेष रफ्तार से ऊपर की ओर लुढ़काया जाता है तो वह कुछ समय तक ऊपर उठ सकती है लेकिन उसकी रफ्तार क्रमश धीमी होती जाएगी यहाँ तक कि वह क्षण-भर के लिए रुकेगी और फिर नीचे गिर जाएगी। अगर इस गेंद को प्रारम्भ से ही अधिक गति प्रदान की जाए तो वह वापस लौटने से पहले गड्ढे की ढलवां दीवारो पर और अधिक ऊँचाई पर पहुँचेगी और अगर उसे ऐसी गति प्रदान की जाए, जिसे बचाव की गति कहा जाता है, तो वह दीवारो के पार पहुँच जाएगी। हालाकि इस क्रम मे वह अधिक धीमी गति से परन्तु ऐसी यथेष्ट गति से लुढकेगी कि वह दूर-से-दूर चलती चली जाए, यहा तक कि जूल वन की कहानी मे वर्णित तोप के गोले की तरह बिल्कुल बाहर चली जाए। एक कृत्रिम भू-उपग्रह को ठीक उस गेद की तरह माना जा सकता है जो गड्ढे की दीवारोके चारो ओर ठीक इतनी गति से लुढकती है कि वह धरती से समान दूरी बनाए रखे । अब हम मान लें कि बडे गड्ढे की ढलान के काफी ऊपर की ओर एक बहुत छोटा-सा गडढा है और यह भी कल्पना कर ले कि वह छोटा गड्ढा बडे गड्ढे की दीवारो के साथ-साथ वृत्ताकार घूमता है और बड़े गड्ढे के तल से समान दूरी बनाए रखता है तो यह छोटा गड्ढा चन्द्रमा के गुरुत्वीय क्षे का प्रतीक होगा। सोवियत वैज्ञानिक बडे गड्ढे के तल मे ऐसे लोगो की स्थिति मे थे ज गड्ढे की ढलानो के ऊपर एक गेद को इस ढग से छोडना चाहते थे जिसमे व घूमते हुए छोटे गड्ढे मे जा पडे । इस गेंद (ल्यूनिक-3) को ठीक इतनी ग और दिशा प्रदान करनी थी जिससे वह गतिशील लक्ष्य से जा टकराए। और दिशा-सम्बधी भूल-चूक क्रमश एक प्रतिशत से बहुत कम और ए डिग्री के छोटे भाग मे कम होनी आवश्यक थी।

126 खगोल विज्ञान में महान क्षण एक और कठिनाई भी थी। हम, जहां से रॉकेट छोड़ा जाना था, उत्तरी गोलाद्ध मे है । कक्षा-सम्बन्धी गणना करते हुए रूसी विशेषज्ञो ने इस समस्या का हल कृत्रिम उपग्रह के लिए ऐसा मार्ग चुनकर किया जिस 4 जाने से यह सुनिश्चित हो जाए कि चद्रमा के गुरुत्वीय क्षेत्र द्वारा उमकी " मे नातिक्रम उरे रूस के ऊपर, धरती के निक्ट ले पाएगा। इस प्रयत्न के लिए 4 अक्तूबर 1959 की तिथि चुनी गयी । नियत्रण- कक्षो मे अत्यधिक उत्तेजित वैज्ञानिको और तानीज्ञो ने टेलिविजन के परदो पर कई भाग वाले शक्तिशाली रॉकेट को प्रक्षेपण स्थल पर खडा देखा। वह संकडो फुट ऊंचा था और उसका वजन सैकडा टन था तथा उसके अग्न भाग मे जांच-पड़ताल के लिए यन ठसाठस भरे थे । अन्तिम सेकडो की गिनती की समाप्ति पर पहले भाग के मोटरो का पृथ्वी को हिला देने वाला गजन प्रारम्भ हो गया। विशाल रॉकेट प्राग की उजली धारा छोड़ते हुए हवा मे पहले बहुत धीमे और फिर लगातार तेज़ होते हुए अपर उठा । उसका दहन-वक्ष प्रति सेकड दो टन ईधन से अधिक का भक्षण कर रहा था। उत्सुक वैज्ञानिको ने अपने सामने के डायलो मे रॉक्टि की प्रगति को देखा, एक के बाद एक उस शक्तिशाली उडान की मजिले पूर्वनिर्धारित काय- क्रम के अनुसार होती रही। अन्त मे यत्रयुक्त अन्तरिक्ष यान को, चन्द्रमा की ओर अपनी लम्बी यात्रा प्रारम्भ करने के लिए मुक्त कर दिया गया । इस बीच रूस मे उसके माग का पता रखने वाले केन्द्रो ने उससे समेत प्राप्त किया। तेजी से काम करने वाले इलेक्ट्रॉनिक सगणको ने इन केन्द्रो द्वारा प्राप्त आकडो की गणना करके अन्तरिक्ष यान की स्थिति और कक्षा का पता लगाया। संगणको के 'क्लिक' की आवाज़ के साथ अपने परि- णाम मुद्रित करने के साथ ही वैज्ञानिको को प्रसन्नता बढ गयो । ल्यूनिक-3 सही मार्ग पर था। अन्तरिक्ष यान अपने माग में जिस प्रकार बढ रहा था उसे देखते हुए एक ऐसी सिलिंडरनुमा वस्तु का आभास होता था जो लगभग चार फुट सीन इच लम्बी हो और जिसने गोलाकार सिरोसे छ लम्बे एरियल निकले हो। इस सिलिंडर की दीवारो पर छोटी-छोटी प्लेटें थी जो सौर-बटरियों पी और जो सूर्य की किरणो को ग्रहण करती हुई उसे भविष्य के प्रयोग के ।

जेट-चलित कैमरा 127 लिए विद्युत्-शक्ति के रूप मे एकत्र कर रही थी। अनुसन्धान-सम्बन्धी यत्रो के लिए कई खिडकियाँ दिखाई दे रही थी। अन्तरिक्ष यान के अन्दर विभिन्न प्रकार के जटिल इलेक्ट्रॉनिक यन थे जिनमे टेलिविजन के उपकरण, कैमरा और उससे सलग्न अन्य साज- सामान तथा शक्ति के अन्य साधन थे। घण्टे बीतते गए और इस बीच अपनी कक्षा में घूमता हुआ चन्द्रमा और अन्तरिक्ष यान निकट आते गए। 7 अक्तूबर को जब दोनो के बीच लग- भग 40 हजार मील का अन्तर रह गया तब ल्यूनिक-3 फिर सक्रिय हो उठा । उसने पहले अपने प्रकाशीय, घूर्णदर्शीय, और सगणक उपकरणो द्वारा अपने छोटे रॉकेट-मोटरो का उपयोग करके अपनी गति की उस ऐंठन को रोका जो उस समय से शुरू हो गयी थी जब उसने उस बडे रॉकेट के अन्तिम चरण को छोडते समय, जिसने उसे कक्षा में भेजा था, पायी थी। इसके बाद उसके सिरे को प्लेटो मे से एक को सूर्य-खोजी यत्रो की सहायता से सूर्य की ओर उन्मुख किया गया। अन्तरिक्ष यान के दूसरे सिरे से जो कैमरा बाहर की ओर झांक रहा था वह इस प्रकार सूर्य से दूर घुमा दिया गया। चूकि यह काय उस समय हुआ जब ल्यूनिक-3 सूर्य और चन्द्रमा के बीच में था, मत कैमरा उस समय'चन्द्रमा के प्रकाशित किन्तु अज्ञात भाग की भोर सधा हुआ था। एक अन्य प्रकाशीय यत्र से प्राप्त सकेत से जब यह प्रकट हुमा कि चन्द्रमा फोकस मे है तो चित्र लेने का काम शुरू हो गया। इस बीच धरती पर खोज-सबर रखने वाले केन्द्रो मे वैज्ञानिक, जिन्होंने देख लिया था कि अन्तरिक्ष-यान अव चित्र ले रहा है, उत्सुकता से प्रतीक्षा करते रहे और माशा करते रहे कि उन्होंने जिस यंत्रावलि का विकास किया है वह बिना किसी बाधा के कार्य करेगी। एक-एक मिनट बीतता गया | साढे तीन घण्टे, पौने चार घण्टे, चार घण्टे, चार घण्टे दस मिनट- भोर चित्र नो का क्रम पूरा हो गया। इस बीच अन्तरिक्ष यान की चन्द्रमा से दूरी 2,000 मील से बढकर 42,750 मील हो गई थी। इसके बाद अभिस्थापन तत्र को रोक दिया गया और ल्यूनिक-3 को एक समान रफ्तार मे परिक्रमा करने दिया गया जिससे उसके एक भाग को सूर्य की बहुत गर्मी न झेलनी पहे।

NA
स्मृनिक-3 का कपरा चन्द्रमा प्रकाशित, रितु प्रशात
माग की भोर सपा मापा।

129 जेट-बलित कैमरा इसके बाद फिल्मो को साफ करने की क्रिया प्रारम्भ हुई। इस व्यवस्था को विशेष रूप से सुरक्षित बनाया गयाथा जिससे अन्तरिक्ष का तीन- भेदी कॉस्मिक विकिरण चित्र को धुंधला न बना दे। कमरे में चित्र ग्रहण करने के बाद फिल्म एक अन्य छोटी शोधन इकाई मे पहुँची जहाँ स्वत उसकी सफाई हुई, वह सूखी और स्थिर हुई । सम्पूर्ण प्रक्रिया के इस भाग का डिजायन तैयार करने मे अन्तरिक्ष-वैज्ञानिको को बड़ी कठिन तकनीकी समस्यामो को हल करना पड़ा था। अन्तरिक्ष यान अपनी एकाकी कक्षा में जैसे जैसे चन्द्रमा से दूरहटता गया उसके भीतर सभी बातें सहजता से होती गयी। बहुत धीरे-धीरे फिल्म टेलिविजन तत्र से सम्बद्ध कंपोड-किरण नली से गुजरी जो चित्रो के अवलो- कन के लिए लगायी गयी थी। प्रत्येक चित्र के मागे-पीछे प्रकाश को पतली रेखा फिल्म से होकर गुजरी और बाहर निकलते हुए उसकी चमक चित्र के विभिन्न भागो के अन्धकार के अनुरूप विभिन्न मात्रामो मे घटती रही। प्रकाश की यह घट बढ़ रेडियो संकेत मे बदल गयी जिसे धरती पर भेजा जा सकता था। इन सकेतो को तीव सवेदनशील ग्राहियो द्वारा अन्वेषण-केन्द्रों के प्रकन उपकरणो द्वारा ग्रहण किया गया। सुरक्षा की दृष्टि से ल्यूनिक-3 और धरती पररेडियो-सचार-सम्बन्धी सभी व्यवस्थाएं दुहरी बनायी गयी थी जिससे अगर एक यत्र टूट जाए तो धरती के नियंत्रण केन्द्र से प्रादेश भेजकर सुरक्षित यंत्र को चालू किया जा सके। अन्तरिक्ष मे लगभग ढाई लाख की दूरी से सूचना प्राप्त करने मे फितनी कठिनाई थी इसका कुछ अनुमान इस बात को ध्यान में रखकर किया जा सकता है कि अन्तरिक्षयान के प्रेपित्रों से प्राप्त सकेतो की शक्ति कितनी थी। यह शक्ति सामान्य टेलिविजन-ग्राहियों से प्राप्त सकेतो की शक्ति से दस करोड गुना कम पी। फिर भी अन्तरिक्ष यान के रेडियो और टेलिविजन- उपकरणो की सहायता से चित्रो को 2 लाख 90 हजार मील की दूरी तक सफलतापूर्वक भेजा जा सका। ल्यूनिक-3 के कार्य पूरे हो चुके थे। धरती के गुरुत्वीय खिंचाव से सिंचकर यह अपने दीपवृत्तीय पप से वापस लौटा और धरती के धारो पोर 130 खगोल विज्ञान के महान क्षण 30,000 मील की दूरी पर परिक्रमा करने लगा । अगर वह केवल धरती के खिंचाव के अन्तर्गत होता तो वह लाखो वर्षों तक हमारी धरती का उपग्रह बना रहता लेकिन इसके बजाय चन्द्रमा और सूय दोनो ही के आकपणो के कारण उसकी कक्षा क्रमश विकृत होती गयी और कई महीनो बाद वह धरती के वातावरण मे प्रविष्ट होकर नष्ट हो गया। उसके भेजे गए चित्रो का अन्तरिक्ष वैज्ञानिको ने बड़ी सावधानी से सफल अध्ययन क्यिा । मानव इतिहास में पहली बार मनुष्य ने चन्द्रमा के दूसरी ओर की प्राकृतिक बनावट पर दृष्टि डाली। चद्रमा का जो भाग धरती की ओर है उसकी प्राकृतिक बनावट के अतगत मुरय रूप से केटर (crater) हैं, पर्वतमालाएं है, खड्ड है और धूल के विशाल सागर है। क्रेटरो की सरया हजारो मे है जिनमे कुछ 150 मील व्यास वाले है और कुछ सौ गज व्यास वाले भी। इन केटरो के चारो ओर वृताकार दीवार के अतिरिक्त जो प्राय 20,000 फुट तक ऊँची होती है, मध्य मे ऊबड खाबड शिखर होता है जिस पर प्राय सूर्य की तिरछी किरणें पडकर उसे चमका देती है जबकि क्रेटर का तल वृत्ताकार दीवार की छाया के कारण दिखाई नहीं देता। इन सव प्राकृतिक स्थलो का नामकरण प्लैटो, अरस्तू, न्यूटन, कॉनिक्स, और केप्लर जैसे प्रसिद्ध दाशनिको, वैज्ञानिको और खगोलशास्नियो के नाम पर हुआ है। पवतो के भी परिचित नाम रखे गए । एप्पीनाइनस जो सैकडो मील लम्बी चोटियो वालीपवतशृखला है और मध्य लीग्नित्ज़ पवतमाला जो दृश्य मडलक के दक्षिणी भाग पर दिखाई देती है और अदृश्य भाग की ओर बढ जाती है। कभी-कभी किसी पवतमाला के बीच सैकडो मील की तग घाटियाँ देखने को मिलती है। ऐसी एक घाटी अल्पाइन घाटी है जिसका निर्माण सम्भवत चद्रमा के पृष्ठ पर करोडो वर्ष पूर्व क्सिी विशाल उल्का के जा टकराने से हुआ होगा। चद्रमा के दृश्यतल के वे बडे भाग अपेक्षाकृत सपाट हैं-वे 'मेरिया' (maria) या सागर कहे जाते हैं । यद्यपि हमे अब ज्ञात है कि ये पानी से नही बलि धूल से ढंके है फिर भी इनका नाम पूर्ववत् चला आ रहा है और .

जेट चलित कैमरा 131 चन्द्रमा के मानचित्रो पर उन्हे सकट सागर, शान्ति सागर, दक्षिणी सागर आदि से चिह्नित किया जाता है। बहुत से नाम बडे ही सुन्दर हैं जिनसे हमारी कल्पना मे ऐसे विचित्र और अलौकिक सौन्दर्य का चित्र उभरता है जिसे मनुष्य अगर अन्तरिक्ष-यान में बैठकर चन्द्रमा तक पहुंचे तो यथाथत देख सकेगा-और सम्भवत वह दिन अब दूर नहीं है । ल्यूनिक-3 ने जब चद्रमा के दूसरी ओर के चित्र लिए थे तो वह ऐसी स्थिति में था कि उस ओर का अधिकाश भाग दिखाई देता था और छोटा सा वह भाग भी दिखाई देता था जिसके बारे मे हमे जानकारी है । यह बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ क्योकि जिस भाग का हमे ज्ञान है वहाँ की प्राकृतिक वनावट के सदभ मे हम उन नई वनावटो की स्थिति समझ सकते थे जिनके चित्र हमे प्राप्त हुए। ज्ञात वस्तुप्रो मे पाँच मेरिया' (सागर) थे--हम्बोल्डशिएनियम सागर, क्रिसीयम सागर, माजिनिस सागर, स्मिथी सागर और ऑस्ट्रेल सागर । इनमे से तीन अर्थात् ऑस्ट्रेल, स्मिथी और मार्जिनिस सागर अशत अदृश्य भाग हैं, जिससे उनकी रूपरेखा पहली वार स्पष्ट हुइ । वस्तुत यह प्रकट हुआ कि माजिनिस सागर और स्मिथी सागर का अधिकाश भाग चद्रमा के दूसरी ओर स्थित है। इन चियो को देखने वाले प्रथम व्यक्तियो को यह जानकर आश्चय हुआ कि चद्रमा के जिस नए भाग की खोज की गई है वह अधिकाशत पहाडी प्रदेश है। केवल कुछ नए 'सागर' दिखाई दिए जा मुरय रूप से दक्षिणी और विषुवत कटिबधो मे हैं। एक ऐसी पर्वतमाला का पता चला है जो 1,250 मील तक फैली है और विषुवत रेखा को पार करती हुई दक्षिणी गोलार्द्ध तक जाती है । इस पवतमाला के पार वाले प्रदेश मे बहत चमकीले मैदान दिखाई दिए। उत्तरी गोलार्द्ध मे लगभग .7 मील व्यास का कटोरेनुमा 'सागर' पाया गया। इसके दक्षिण मे और विपुवत रेखा के दक्षिण में 60 मील व्यास का एक सुस्पष्ट क्रेटर पाया गया जिसका तल अधकार- युक्त था, मध्य का शिखर चमकीला और जिसके चारो ओर रोशनी का छल्ला था। मध्यम आकार के चार क्रेटर-समूहो के अतिरिक्त अन्य कई एक खाडी 132 मगोल विज्ञान के महान भए विशेषताएं भी स्पूनिक-3 के चित्रो में देखी गयीं। खगोलशास्त्रियों की पिछली पीढ़ियो की परम्परा मे रूसी वैज्ञानिको ने सभी नयी सोजो को कोई न कोई नाम दिया। मध्यवतीं शिखर वाले केटर का नाम अन्तरिक्ष यात्रा के महान प्रवर्तक स्पोल्कोवस्की के नाम पर रखा गया। एक और स्थान का नाम लोमोनोसोफ के नाम पर रखा गया घो प्रसिद्ध रूसी खगोल-वैज्ञानिक या दो नए 'सागरों के नाम 'स्वप्न सागर' भौर 'मास्को सागर' रखे गए । मास्को सागर विशाल क्रेटर की प्राकृति का 'सागर' है जिसके दक्षिण में खाली है। इस खाडी का नाम पहले अन्तरिक्ष- यात्रियो के सम्मान में 'मन्तरिक्ष यात्रियो की साडी' रखा गया। चन्द्रमा के पूसरी भोर की मध्य पयतमाला का नाम 'सोवियत पर्वतमाला' रखा गया । न्यूनिक-3 के जेट-चलित कैमरे ने अपना काम बहुत अच्छी तरह किया । यद्यपि धरती से अन्य अन्तरिक्ष यान छोडे जाएंगे जिनमे दूसरे कैमरे होगे, फिर भी 7 प्रस्तूबर, 1959 की वह घडी, जब ल्यूनिक-3 मे चन्द्रमा के भशात भाग के चित्र लेने भारम्भ किए थे, खगोल विज्ञान के इतिहास में एक सबसे मधिक रोमांचक घडी मानी जाएगी। उन क्षणो की सफलता से खगोल विज्ञान में एक नए युग की शुरुमात हुई क्योकि यह सिद्ध हो गया किरहो के चित्र निकट से लेना सम्भव है और उनके तल की प्राकृतिक को ब्यौरवार मालूम किया जा सकता है।

महान क्षणों की प्रतीक्षा । साढ़े तीन सौ वर्षों में मनुष्य ने विश्व सम्बन्धी अध्ययन में अत्यधिक प्रगति कर ली है। प्रारम्भ मे उसे ग्रह, सूर्य और चन्द्रमा मे ही मुख्य रूप से दिलचस्पी थी लेकिन धीरे-धीरे उसका ध्यान चमकते हुए तारो और धुमडती हुई माकाशगगा की भोर गया और उसने अन्तरिक्ष की गहराइयो की खोज की, सृष्टि के विकास का अन्वेषण किया और उसके सम्बन्ध मे भविष्य- वाणी की । सृष्टि की तुलना मै यद्यपि मनुष्य प्राकार मे बहुत ही नगण्य है, फिर भी अपनी प्रतिभा के द्वारा वह अपने चारो ओर के विश्व को कुछ हद तक समझने में समर्थ हुआ है। इस पुस्तक मे हमने भापको खगोल विज्ञान की कहानी का कुछ प्रश सुनाया है और प्रापने कुछ स्त्रियो और पुरुषो से भेंट की है जिन्होने इस कहानी को प्रस्तुत करने मे योग दिया है । लेकिन यदि स्थान का प्रभाव न होता तो दर्जनो अन्य व्यक्तियो की पर्चा भी की जा सकती थी। और यह कहानी का अन्त नहीं है । खगोल-विज्ञान जितना सक्रिय पौर सम्भावनापूर्ण माज है उतना पहले कभी नही था। विज्ञान जिन नयी पतियों का विकास कर रहा है और जो नए आविष्कार कर रहा है, जैसे उपग्रह भोर अन्तरिक्ष यान, उनकी सहायता से खगोल वैज्ञानिको को भव विश्व की वस्तुमो का मध्ययन उन मचो से करने का मौका मिल रहा है जो धरती के वातावरण से बाहर है । माने वाले दिनो मे कम से कम निकटस्थ महो तक पहुँचने का अवसर भी मिलेगा। हम सब का यह सौभाग्य है कि हम अन्तरिक्ष युग के प्रारम्भ मे जीवित है-निश्चय ही यह मनुष्य जाति के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण युग है । खगोल-विज्ञान के इतिहास मे हम अगले महान क्षण मर्थात् धद्रमा पर प्रथम मानव के उतरने की सम्भावना पर पूर्ण विश्वास कर सकते हैं। 133

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खगोल विज्ञान के महान दाए
जब प्रथम मानव सुरक्षित रूप मे चन्द्रमा के धूल-भरे तल पर उतरेगा*
और धरती की ओर सम्भ्रम से देखेगा तो धरती उसे चन्द्राकाश मे भूलती
हुई दिखाई देगी । वह पहला सौभाग्यशाली मानव अन्वेषण की उस प्रक्रिया
को आगे बढाएगा जो शताब्दियो पहले आरम्भ हुई थी और जो गैलीलियो,
यूटन, हैली तथा अन्य अनेक अतरिक्ष-अनुसधानकर्ताओं के अथक परिश्रम
के फलस्वरूप आज की स्थिति में पहुंची है ।
* 21 जुलाई 1969 को मानव चांद पर उतर चुका है।
-अनुवादक

THE PROGRESS OF SCIENCE Series in Hindi (All books are fully ilustrated or Plates on art paper) 41 Obers sef Great Discoverers In Modern Science Patrick Pnogle Modern Scientists At York Amabel Williams Ellis Men Who Changed The World Egon Larsen Men Who Shaped The Future Egon Larsen The Common Sense of Scrence J Bronowski Everyday Science Topics Book I III TA Tweedle Stories from Science Book I IV Sutcliffe & Sutcliffe Achievements of Science I VIII M Anderwood The Making of Man by IW Cornwall & M Maitland Howard (Carnegie Medal Winner) Diversity of Man Robin Clark Animal life in the Tropics EMP Waltors Life in the Deep Maurice Burton Planet Earth Dr Ronald Fraser Weather RS Scorer The World of Feelings JD Carthy Nature and Man John Hillaby Biology for the Modern World CH Waddington Great Moments in Astronomy Archie E. Roy बल भतिव्यापन भध-गोल भपवतन पव्यवस्था chaos $7 (59Tk) erg अस्पष्ट hazy अतरा अणुक inter स्थान space भतरा अणुक force statih (Fra) infra red TUTH dimension ATTITUUT galaxy nafty satrinsic भापूर) moment प्रावधन magnificat mavit মী maga{fying मावृत्तिकाल period (oroscill STRATET (97) recording want periodical उत्प्रेरक catalyst. उपसौर persbelion उपग्रह satellite उत्तुगता altitude eccentrica उत्तल onvex उल्का meteor orbit कृत्तिका plerades कपन vibration SCIENCE WORK LIKE THIS Series in Hindi (All books are fully illustrated or Plates on art paper) उले द्रता Television Works Like This J&R Bendick Radar Works Like This Egon Larsen Sound Recording Works Like This Clema. Brown Atoms Works Like This John Rowland Helicopters Works Like This Basıl Arkell & John WR Taylor Transistors Work Like This Egon Larsen Jet Planes Work Like This John WR Taylor Fockets & Satellites Work Like This John WR Taylo ains Work Like This David St John Thomas jetas Work Like This Maurice kidd Nort Egon Larsen FET

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खगोल विज्ञान के महान क्षण
जब प्रथम मानव सुरक्षित रूप मे बद्रमा के धूल-भरे तल पर उतरेगा*
और धरती की ओर सम्भ्रम से देखेगा तो धरती उसे चन्द्राकाश मे भूलती
हुई दिखाई देगी। वह पहला सौभाग्यशाली मानव प्रवेषण की उस प्रक्रिया
को आगे बढाएगा जो शताब्दियो पहले आरम्भ हुई थी और जो गैलीलियो,
यूटन, हैली तथा अय अनेक अतरिक्ष-अनुस घानकर्ताप्रो के अथक परिश्रम
के फलस्वरूप आज की स्थिति मे पहुंची है।
21 जुलाई 1969 को मानव चांद पर उतर चुका है ।
--अनुवादक

पारिभाषिक शब्दावली घटना भतिव्यापन overlapping खगोलीय गोला मधगोल bemispherical खगोल विज्ञान भपवतन refraction खगोलज्ञ मव्यवस्था chaos गुरुत्व अग (इकाई) erg गुरुत्वारपण अस्पष्ट hazy गणितीय अन्तरा-अणुक inter molecular गसिल स्थान space ग्रह अतरा अणुक inter molecular धन बल force अवरक्त (किरणें) Infra red দুর্থ पायाम dimension घी गति माकाशगगा galaxy चुम्बकत्व मारिक intrinsic चाल माधूरा moment चरण प्रावधन magnification चर पातशी शीशा magnifying glass जडत्व प्रावृत्तिकाल period ज्योति ( (of oscillation) त्वरण recording मावर्ती periodical तारामडल उत्प्ररक catalyst तारकीय उपसौर perihelion उपग्रह satellite तश्तरी उत्तुगता altitude दिव्य eccentricity उतल onvex (lens) उल्का meteor दृष्टि भ्रम कक्षा orbit दोलन कृत्तिका pleiades दोष प्रक्ष पन दूरदशक orb astronomy astronomer gravity gravitation mathematical percumatic planct cube, cubic phenomenon rotation rotatory magpetista speed spin variable inesta luminosity acceleration balance constellation stellar wave length disc celestial ciupse elliptical Illusion oscillation major axis tclescope भालेख (यत्र) तुला तरग ध्य उले द्रता दोष वृत्त दीघ वृत्ताकार vibration 135 उह गोल शिाम के महान क्षण मम्पाक्षरेमा Jais पोताममाग swinging धुमस्तु comets mist pole मुब-उत्तर pole-north मुपदक्षिण pole--south ममममसीप heavenly म्यूट्रॉन neutron नगण्य negligible गामिण nucleus मीहारिका nebrular म्यूटनीय Neotonian मौविपा navigation गममाल vault नैत्रिका eyepiece मिमान Deon प्रतीयमान Bpparent प्रयोगसिद empirical परिमाण cagud, प्रकाग पिकाम optics प्रकाश-सम्बन्धी optical परवलय parabola परिवर्शक Periscope परिणीय perspberal प्रकारामिति photometry प्रोम protuberance writings prediction যকিব hypotheses परावर्तक reflector for forget to photo-clectric cells पुपता antiquary गृहसति (पह) Jupiter Mercury भूगर्भ विज्ञान geology भूकेन्द्रीय तंत्र stoceptri system प्रम paradox मंगल (प्रह) Mars मौसम विज्ञान meteorology meridian disc युगारम्भ cpoch यांत्रिकी mechanics रेपिन (इकाई) radian विग्या radius लम्बन parallax सम्बनिक parallatic लक्ष्म target लोलक pendulum विपथन abersason विम्यास configuration विलय fusion विषक्षण 1agenious वायुमरलीय atmospheric বিকিয্যে radiation विकिरण दाब radiation pressure शक CONC पानि (प्रह) Saturn शुक (प्रह) Veous सूयॉन Aphelion सम्पिणित cooglomerates स्फटिक सकेन्द्रित concentrated सौर केन्द्रित heliocentric समवावरेसा Iso bar समकामिक Iso chronic सूर्य कर sud spots सदिश (or) Vector crystal THE PROGRESS OF SCIENCE Series In Hindi (All books are fully illustrated or Plates on art paper) Great Discoverers in Modem Science Patrick Pringle Modern Scientists At Work Amabel Williams Ellis Men Who Changed The World Egon Larsen Men Who Shaped The Future Egon Larsen The Common Sense of Science J Bronowski Everyday Science Topics Book I III TA Tweedle Stories from Science Book I IV Sutcliffe & Surcliffe Achievements of Science I VIII M Anderwood The Making of Man by IW Cornwall &M Maitland Howard (Carnegie Medal Winner) Diversity of Man Robin Clark Animal life in the Tropics EMP Waltors Life in the Deep Maurice Burton Planet Earth Dr Ronald Fraser Weather RS Scores The World of Feelings JD Carthy Nature and Man John Hullaby Biology for the Modern World CH Waddington Great Moments in Astronomy Archie E. Roy SCIENCE WORK LIKE THIS Series in Hindi (All books are fully illustrated or Plates on art paper) Television Works Like This J&R Bendick Radar Works Like This Egon Larsen Sound Recording Works Like This Clement Brown Atoms Works Like This John Rowland Helicopters Works Like This Basil Arkell & John WR Taylor Transistors Work Like This Egon Larsen Jet Planes York Like This Joha WR Taylor fockets & Satellites Work Like This John WR Taylo ains Work Like This Dand St John Thomas meras Work Like This Maurice k Kidd ansport Egon Larsen

Khagol Vigyan Ke Mahan Kshan

Author
Archie E. Roy
Title
Khagol Vigyan Ke Mahan Kshan
File name
Khagol Vigyan Ke Mahan Kshan
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2011/03
Publisher
Alankar Prakashan Dehli
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Science
DLI number
551173
Barcode
4990010031941.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
wkbKQS53MaP
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