Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Yogasanon Se Elaj
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योगासनों
से
इलाज
एक सौ से अधिक चित्रों से
सुसज्जित एक अत्यन्त
उपयोगी पुस्तक
लेखक
डॉ० समरसेन
सुबोध
मूल्य २५...
प्रकार
सुबोध पम्लिफ्रान्स २/३ , भसारी रोर, मई
दिस्सो-११०००२ / साकरण : १६० / मुद्रक रविन्द्र ऑफसेट,
गहरा दिसी-११००१२
७ १० . विषय-सूची अध्याय विषय पृष्ठ प्राइये, स्वास्थ्य के शतक लगाएँ वैज्ञानिको का मत हल्के-फुल्ने सचित्र व्यायाम जानने योग्य बातें योगासनो से कायाकल्प १. योगासन-सरल और सर्वश्रेष्ठ १८ पद्मासन-गठिया, मेरुदण्ड और उदर-विकार सुखासन-थकान, टूटन, दुर्बलता २० पश्चिमोत्तानासन-मोटापा, मधुमेह, जिगर-गुर्दे के विकार २१ कुपटासन-गैस, अफारा और जठराग्नि के विकार २२ सर्वांगासन-पोलिया, अन्धता, कण्ठ और वातरोग २३ हलासन-गर्दन से कूल्ही तक के विकार २६ चक्रासन-सिर, गर्दन और हाथ में कम्पन २७ उत्तानपादासन-पुराना सिरदर्द, पुराना पीलिया २८ गजासन मेदे मोर पक्वाशय मे दोप- २६ मकरासन-खांसी, जुकाम, बुखार उत्तानकूर्मासन-वांझपन, सम्भोग में अरुचि ३१ सपासन--गण्डमाला, श्वास-रोग, वायगोला ३२ सूर्यनमस्कार--स्खी त्वचा, बेरोनक नेहरा चन्द्रनमस्वार--सूसना, दुर्बलता, मालसा पूर्वोत्तानासन--4ठ, फेफडे, हृदय और दिमाग के विकार ४४ द्विपार्यासन-भूख मरना, पेट फूलना, कब्ज रहना धनुरासन-प्रांतो, वयो, वाहो और हाथो को दुर्बलता ४६ पादहस्तासन-थुलथुल तीद और कूल्हे एकपाद-द्विहस्तबद्धासन-शरीर सुन्न होना,जाप-पेट दुखना ४८ द्विपादचक्रासन-~मूत्ररोग, यौनाग विकार .
नाभि-पासन-उदर-विकार ध्रुवासन-मानसिक चपलता, चिडचिडापन, उदासी ५२ एकपादासन-सांस फूलना, मासपेशियो की कमजोरी ५३ सेतुबन्धासन-कमर दुखना, भूख मर जाना पादनमस्कारासन-कोष्ठबद्धता, अपच, शरीर फूलना मुष्टिबद्धवक्रासन-टांगें कांपना, गिर-गिर पडना द्विहस्तचपासन-छातियां लटकना ५७ ऊर्ध्वपादविस्तुतासन-सम्भोग, मासिक पौरप्रसव के विकार५८ द्विकोणासन-ले के रोग, मोटापा, अजीर्णता ६० हस्तपादविस्तृतासन-रक्त-दूपण और जठराग्नि-मन्दता ६१ शयनोत्यानासन-कमर भर जाना, पाचन विगुडना पूर्णविधामासन--भारीपन, थकान, आलस्य २. योगासन-कठिन और सर्वश्रेष्ठ योगमुद्रासन-बलगमी सांसी, खट्टे डकार फुरफुटासन-फेफडो मे दर्द, हायो गे जान नहीं ६७ मत्स्यासन-प्रॉनिक ग्रोवाइटिस, प्रोकाइटिस-दमा, नजला ६८ मयूरो प्रासन-पत्यरी का शर्तिया इलाज सुप्तवयासन-वमन्टूटना, मर्दी-जुकाम-खांसी, योकाइटिस७१ सिंहासन-गने, नाक, दांत के रोग ७२ पट्पदासन-मूत्ररोग और अनिसार मररपेन्द्रासन-झरिया, भूमा, जवानी में बुढ़ापा ७५ गोमुखासन-प्रदर, प्रमेह, मधुमेह, धातु-दोवल्य धर्मासन-वसामोर, भगन्दर नौरासन - मायार यमुर्ग निरनना, पंडे दुर्वल होना ७६ भुजंगासनगम के गेग, माधे मिर या दर्द यरपपासन-जादी का दर्द, म्वप्नदोप, मिर्गी सिद्धामन-बार-बार गम्भोग पी इच्छा ८३ प्रदंघपासन-मोटापा, वावगंग ७७ ce ८४ ८७ हस्तस्थित मेरुदण्डासन-रोढ़ को अस्थि के थियार शलभासन-प्रांतो के विधार पनुरासन-पेट के कीड़े,भाव प्राना कासन- -दुर्वल वाहै, निर्वल हाथ ८६ हंसासन-तालु फूलना, भूस न लगना मयूरासन-वात, पित्त, कफ के त्रिदोप ६१ घद्धासन-नारी-वाया मोर सीने से पेट मागे उच्च श्रद्धासन-बदन थुलथुला, पेट पहाड़ मकरासन-ज्वर के साथ हाथ-पांव टूटना १४ पद्धोत्यितासन-मोटी कमर, प्रांत उतरना, अश्मरी त्रिकोणासन-अकड़ा-बड़ा बदन (६ ध्रुवासन-योनागों के रोग, मधुमेह (डायविटीज) गड़ासन-परोको गिल्टी, काला पाजार, अण्डकोष वृद्धि ६६ चक्रासन-दिमाग, कमर और सिर के दर्द ६६ ताड़ासन---कद वौना रह जाना १०१ वृश्चिकासन-सुस्ती, नामर्दी १०२ ३. तन कुन्दन मन मोती १०४ सम्पूर्णपवनमुक्तासन : सदावहार जवानी के लिए बोस योगाभ्यास ४. ब्रह्मचर्य-सिद्धि के विशेप आसन १. एकपादांगुष्ठासन २. वज्रासन ११२ ३. शशांकासन ४. नाभि-पीड़ासन ५. कन्दपोडासन ११४ ६. मण्डूकासन ५. मैथुन-शक्ति पाने के योगासन इन्द्रिय-उपरपंण (पुग्पी के लिए) १०४ योनि-सकोचन (स्त्रियो के लिए) ११७ ६ मोटापा कम करने का योगासन ११८ सरल त्रिकोणासन ७. दो ईश्वरीय वरदान १२० १. कायाकल्प के लिए 'शीर्षासन' १२० २ विश्रान्ति के लिए 'शवासन' १२५ ८ योगासनो द्वारा प्रमुख रोगो की चिकित्सा १२७ १ मधुमेह (Diabetes)-सूर्य-नमस्कार, हल, गोमुख, १२७ कूर्म, वातायन, धनु शव २ उच्च रक्तचाप-(High Blood Pressure)- १२८ शवासन और पवनमुक्तासन, उत्तानपादासन और शवासन ३ ग्रामवात, सधि शोय, गठिया (Arthritis) १३१ कघर, एकपाद-द्विहस्तबद्ध एकपाद, हस्तपाद- विस्तृत, धनु गोमुख, बक ४ हृदय-रोग (Heart Deseases)--सुख, शव १३३ ५ दमा (Asthma)-सूर्य-नमस्कार, पन योगमुद्रा, १३७ सुप्तवज्र सिंह, सर्वांग, भुजग ६ पेट की बीमारियां- १३६ प्रतिसार मे शशाक (चन्द्र नमस्कार) जीर्ण मे मत्स्येन्द्र बदहरमी मे चन्द्रनमस्कार प्रादि प्रफारा मे द्विपार्श्व प्रादि उदरवात मे मयूर प्रादि कब्ज मे मडूक मादि पेट-गैस में मडूक मादि ६ किस रोग में कौन-सा योगासन (रोग निदारणार्प योगासन-सूची) आइये, स्वास्थ्य के शतक लगाएं। कभी आपने दर्पण मे झांका है ? शेव बनाते, बाल संवारते या मेकअप करते समय आपने अपना मुखडा तो देखा होगा? क्या मुखडे पर आपको कान्ति, अोज या स्वाभाविक चमक-दमक नज़र आती है? देखिए, झूठ बोलने से काम नहीं चलेगा। अगर आपको नकली चमक-दमक लाने के लिए मेकअप का सहारा लेना पडता है तो आप निश्चित जानिए कि लाखो बार दर्पण मे झांककर भी आपने अपने असली रूप को कभी देखा ही नहीं। कुदरती रगो का अपना ही जादू है । अगर आपके गालो मे से लहू की लाली टपकती है, आंखो मे विजलियां-सी कौंधती है, माथे पर सूर्य की-सी प्राभा है, दांतो मे कलियो की-सी चटक है, जुल्फो मे घटायो को-सी छटा है, होठो मे अनार की कलियां प्राभास देती हैं तो कौन-सा भगवान है जो आपको अपनाने को नहीं ललकेगा? क्या कोई मेकअप प्राकृतिक रगो की बराबरी कर सकता है ? नहीं, इसलिए नहीं कर सकता कि मेक- अप घडी-भर मे उतर जाएगा, लेकिन कुदरती रगो का जादू कभी फीका पड़ नहीं सकता। योगासनों से इलाज हम थुलथुले और झुलझुले क्यों रहें ? कुदरती रंगों का निसार ऐसे बदन पर आता है जो कसरती, गठीला और कसा हुमा हो । हमेशा जवान न रहने पर भी हमेशा जवान रहा जा सकता है । प्रायु बढ़ने का मतलब यह नहीं कि जवानी गई। सन्ध्योपासना करने. वाले सुवह-शाम यह मत्र पढ़ते हैं कि- जीवेम शरदः शतं अदीनाः स्याम पारदः शतम् । अर्थात हम सौ साल जियें और मेकअप या सहारे के बगैर जवान, तन्दुरुस्त और सुन्दर-सजीले रूप में सौ साल - जिये। जब हम बिना किसी दवा-दारू या इंजेक्शन-ऐक्सरे के सौ-सौ साल तक प्राकृतिक सुन्दरता से छलकता हुआ जीवन जी सकते है तो क्यों न विना किसी खर्च के उन उपायो पर अमल करें जिन्हे आज समूचा विश्व अपना रहा है ! वैज्ञानिकों का मत १ योगासन करने से अगों मे हलचल मचती है, वे सक्रिय (Active) होते है। २. योगासनों से शरीर में ऊष्मा (गर्मी) उत्पन्न होती है, जिससे सारे शरीर में खून दौरा करता है । रक्त के सचार से तुरन्त लाभ मिलता है। ३. श्वास-प्रश्वास की गति तेज होने से स्वच्छ जीवन-वायु (Oxigen) फेफडो मे पहुंचती है। चूंकि वह वायु उष्ण 1) होकर नासिका (नाक के छेदो) से होती हुई 4 (गला), स्वरयन्त्र और श्वास-गली द्वारा फेफड़ो मे पहुँचती है, अत. इस उष्णता का प्रभाव श्वास-पथ पर अत्यन्त शुभ पड़ता है और उसके रोग-दोप नष्ट होते है। योगासनी से इलाज -
४ श्वास-प्रश्वास (Respiration) की प्रक्रिया मे वेग (तेजी)
आने से हृदय (Heart) मे रक्त को शुद्ध करने का काम
अधिक होता है । परिणाम यह होता है कि धमनियो
(शुद्ध रक्त को बहाकर अग-प्रत्यग मे पहुँचानेवाली
नाडियो) के द्वारा शरीर के हरेक कोश तक स्वच्छ
रक्त पहुंचता है।
५ शरीर की गदगी तथा अवाछित (दूषित) तत्त्व बाहर
निकलने में सहायता मिलती है।
६ अगो की कार्यशक्ति में सुधार होता है ।
७ शरीर की सहन-शक्ति मे वृद्धि होती है ।
८ अवयवो (अगो) के काम करने सम्बन्धी दोष दूर होते
हैं तथा उनकी कार्यशक्ति बढती है।
६ जिन पुरुपो की तोद तथा स्त्रियो के कूल्हे भारी होते
हैं, उनका शरीर भद्दा और कुरूप दिखाई देने लगता
है । उनको दिल की बीमारी (उच्च रक्तचाप-हाई
ब्लडप्रेशर) याम्बोसिस, मधुमेह (डायबिटीज), वायु-
मम्बन्धी रोग या श्वास सस्थान के रोग प्रा घेरते हैं ।
परन्तु योगासन करने से शरीर का फुजला (व्यर्थ का
पदाथ) बाहर निकल जाता है, शरीर की फिजूल की
चर्वी घटती छंटती है, अनावश्यक माद्दा शरीर से
वाहर हो जाता है।
१० बहुत से व्यक्ति पैरो को मोडकर बैठ नही सक्ते, बाहो
को पूरी तरह फैला नहीं सकते, थोडी दूर भी दौड
नही सक्ते, सीढ़ियां चढते या पहाड की चढाई चटते
उन्हें बहुत क्प्ट होता है, उछलने की हिम्मत या ताकत
नहीं होती। यदि नियमपूर्वक तथा सही विधि से
योगासन करे तो उनके अंग प्रत्यग मे लोबलचक प्रा
जाती है तथा ऊपर लिखो सारी कमियां दूर होती है।
योगासनोन इलाज
-
११. योगासन करने से मांसपेशियाँ तथा सवेदना-तन्तु
स्वस्थ तथा जागृत हो जाते है। योगासन करने से
शरीर की सारी मुरझाई हुई कोशिकाएं (Cells)
जागरूक तथा जीवन्त हो उठती है।
१२. योगासन करनेवाले को गहरी सुखदायी नीद पाती है,
जिससे उसकी कार्यशक्ति बहुत बढ जाती है।
योग भारत की एक प्राचीन विद्या है। हमारे ऋषि-
मुनियो ने परोपकार के लिए इसकी खोज की है। पतजलि
के 'योगशास्त्र' मे, और 'हठयोगप्रदीपिका' आदि अनेक
ग्रन्थो में इस विद्या के मूल तत्त्व पाये जाते है। हजारों
वर्षों से भारतीय जन इस विद्या का लाभ उठाते आए है,
जिससे वे नीरोग दीर्घायु प्राप्त करते रहे है । वैज्ञानिकों ने
इस विद्या को विज्ञान की कसौटी पर कसकर देखा और
बहुत ही उपयोगी पाया है। यही कारण है कि अमेरिका,
इंग्लैंड, फ्रास, जर्मनी, इटली और रूस मे भी योग के प्रति
गहरी रुचि उत्पन्न हो गई है और कई देशों में तो हजारों
योग केन्द्र खुल गये है, जिनसे प्रतिदिन करोडो लोग
स्वास्थ्य-लाभ करने लगे है।
बातों में समय न गंवाकर आइए, सजीली-गठीली
तन्दुरुस्ती और सदाबहार जवानी के गुर सीखिए।
अभ्यास १
क. दोनों पर फासले पर रखिए।
ख. दोनों हाथ ऊपर ले-जाइए; हथेलियां अन्दर की तरफ
ग. शरीर को आगे की ओर झुकाइए; हाथों की उंगलियों
से जमीन को छूने का प्रयत्न कीजिए।
योगासनो से इलाज
१०
ध सीधे खड़े हो जाइए, दोनो हाथ ऊपर ले जाइए।
11
(ग)
(ड)
ड शरीर के ऊपरी भाग को अधिक से अधिक पीछे
झकाइए।
विशेष-यह व्यायाम पांच बार कीजिए।
अभ्यास २
क पीठ के बल लेटिए, दोनो पैरो मे छ इच की दूरी हो,
बाहे जमीन पर रहे।
ख उठकर वैठिए, दोनो हाथ ज़मीन पर रहे, दोनो टांगें
बिल्कुल सीधी रहे।
ग पीठ के बल लेट जाइए 'क' वाली स्थिति मे ।
विशेष-यह व्यायाम पांच बार कीजिए।
अभ्यास ३
क पेट के बल लेट जाइए, दोनो वाहे आजू-बाजू रहे ।
ख अब सिर तथा बाई टांग को अधिक से अधिक ऊपर
उठाइए।
योगासनो से इलाज
११
ग सिर तथा वाई टाँग को जमीन पर वापस ले जाइए।
(ख) (ग)
घ 'ख'की स्थिति में लौटकर अब बाई की जगह दाईं टांग
अधिक-से-अधिक ऊपर ले जाइए।
3 सिर तथा दाईं जांघ को जमीन पर वापस ले-पाइए।
विशेष--यह व्यायाम पांच वार कीजिए।
प्रम्यास
क पेट के बल लेटिए, दोनो हाथ कधो के नीचे रहे,
हथेलियां फैली हुई जमीन पर टिकी रहे।
ख वाहे सीधी करके शरीर के ऊपर के भाग को ऊँचा
उठाइए, घुटने मुडें नहीं, शरीर बिल्कुल सीधा रहे।
(क)
(ग)
ग वाहो को कुहनियो से मोडकर शरीर को नीचे ले-
जाइए, छाती अवश्य ही जमीन को
छुए।
विशेष--यह व्यायाम पांच बार कीजिए।
अभ्यास
क सोघे खडे होकर वाहे ऊपर ले-जाइए, दोनो पजे प्रापस
मे मिले रहे।
स वाह वाई तरफ ले जाकर जमीन को छूने या प्रयत्न
पीजिए।
योगामना मइलाज
(क) (ख)
(घ)
ग. पुन: 'क' की स्थिति में आने के बाद दोनों बाहे नीचे
ले-जाकर दोनों टांगों के बीच में जमीन छूने की कोशिश
कीजिए।
घ. पुनः 'क' की स्थिति में आने के बाद दोनों वाहें दाई
तरफ ले जाकर जमीन को छूने का प्रयत्न करें।
अभ्यास
क. पांच बार अपनी जगह पर दौडिए।
ख. खडे हो जाइए।
ग. टाँगें और वाहे दूर-दूर फैलाइए।
MAX
(स)
घ. 'ख' की स्थिति में सड़े हो जाइए।
इ. अपनी जगह पर दौडिए।
विशेष-यह व्यायाम पांच बार कीजिए।
योगामनी से इलाज
ये सब साधारण व्यायाम है । इनसे पारीर का अंग-प्रग खुल जाता है। इन्हे योगासनों का पूर्वाभ्यास या पूर्व- व्यायाम कहा जा सकता है। वास्तव में रात को सोने के बाद प्रातः जब हम जागते हैं तब शरीर अलसाया हुआ होता है। उस समय एकाएक योग के मासन करने लगे तो शरीरमे वह चुस्ती नहीं होती, जो होनी चाहिए। हमने अपने अभ्यास से देखा है कि ये व्यायाम शरीर को पूरी तरह जगाकर उसे चुस्त तथा फुर्तीला बना देते हैं। इसके उपरान्त जव योगासन किये जाते है, तब शरीर जागृत, चैतन्य और सजीव रहता है। इसीलिए योगाभ्यास से पूर्व यह छ: व्यायाम अवश्य कर लेने चाहिए। इसके उपरान्त योगाभ्यास प्रारम्भ करना चाहिए। प्रमुख योगासनों का, जो कि ऋषियो, मुनियों तथा योगियों द्वारा सबसे श्रेष्ठ माने गये है, इस पुस्तक मे विस्तार से वर्णन किया गया है । अव तैयार हो जाइये योगासनो का अभ्यास करने के लिए। तैयारी मे निम्नाकित बातो का ध्यान रखिए। जानने योग्य बातें 0 योगासन करने से पूर्व शौच हो लें तथा मंजन या ब्रश अवश्य कर लें। 0 सायकाल योगासन करना उतना लाभकारी नहीं है, जितना प्रातःकाल । 0 स्नान योगासनों के आधा घंटा वाद करें। 10 स्नान के बाद सध्या-पूजा आदि से निवृत्त होकर दूध, दूध-दलिया, दलिया (गुड वाला) या अन्य कोई हल्ला नाश्ता लें। योगासनी से इलाज o आसन एकान्त स्थान पर करें जहाँ धूल, मिट्टी, धुआं, शोर आदि न हो। मकान की छत पर, पार्क में, घर के बरामदे मे, नदी-तट पर, नहर के किनारे या अन्य ऐसे स्थान पर करें जहाँ शुद्ध पवन पाती-जाती हो। यदि कमरे में ही करें (अधिक शीत में) तो खिड़कियाँ खुली रक्खें। 0 पुरुष अपने शरीर पर बनियान-कच्छा धारण करें; स्त्रियां भी कम-से-कम वस्त्र धारण करे और वे ढोले हों। बहुत अधिक सर्दी हो तो खुला स्वेटर पहन सकते 0 आसन करने से पूर्व भूमि पर चटाई, दरी, कंबल आदि विछा लेना चाहिए । भूमि सर्वथा समतल होनी चाहिए। D ज्वर (बुखार) से ग्रस्त, गर्भवती स्त्री, हृदय-रोग का रोगी, रक्तचाप (ब्लड-प्रेशर) का रोगी योगाभ्यास न करें। प्रतिदिन दस मिनट से आधे घंटे तक, जितना समय मिल सके, उतना समय योगासन कीजिए। योगासन में प्रिया, स्थिति (पोजीशन), समय (अवधि), श्वास और विचार-इन पांच बातो का ध्यान रखना चाहिए । इन सबके ठोक-ठीक समन्वय (तालमेल) पर ही योगासनो की सफलता निर्भर करती है। । यदि आप थके हुए हों, पहले दिन कुछ न साया हो, किसी कारण चिड़चिड़े हों, बीमारी के बाद अभी कम- जोर हों, ज्वर उतरने के बाद अन्न न साया हो और लान न किया हो, तो योगासन मत कीजिए। यदि मापका मन प्रसन्न है, प्रफुल्लित है, शान्त है, नो योगासनों का तुरन्त लाभ प्राप्त होगा। योगासनो से इनाज , । 0 आप एकाग्रचित्त से योगासन करेंगे तो योगासन भी आपके एकाग्रचित बनने में कमाल का असर दिखाएंगे। a योगामन वारह-नेरह वर्ष की उम्र से लेकर जीवन- पर्यन्त किये जा सकते है। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर वेटो का भाष्य करनेवाले विद्वान् हुए है। वे जीवन- भर योगाभ्यास करते रहे और एक सौ दो वर्ष की मायु मे उनका परलोक्तास हुआ। उनके उदाहरण से हमे पता चलता है कि योगासनो से मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त होती है। 10 आसन करते हुए मन मे यह धारणा कीजिये कि अापको स्वास्थ्य, चुस्ती, कुर्ती, कार्यकुशलता, लोच- लचक, सहनशीलता, कष्ट-सहिष्णुता, परिश्रमशीलता, उत्साह, साहस तथा एकाग्रता की प्राप्ति हो रही है। वैज्ञानिको का मत है कि प्रात्म-सुझाव (Auto-Suggestion) मे बडी शक्ति है। यदि आप ऊपर बताई भावनामो को मन मे धारण करते हुए योगाभ्यास करेंगे, तो पापको महान् फल प्राप्त होगा। आपके शरीर का बाहरी तथा भीतरी अग-प्रत्यग जाग उठेगा, आपका मन तुरन्त निश्चय करनेवाला बनेगा और पापका व्यक्तित्व प्रवल हो जाएगा। . योगासनो से कायाकल्प बहुत-से लोगो को योगासन भी शारीरिक व्यायाम- जैसे ही लगते हैं। इनमे किसी हद तक सचाई भी है, क्योकि व्यायाम से भी शरीर पुष्ट और सुडौल बनता है। लेविन योगासन और व्यायाम के लाम अलग-अलग हैं। योगासनो से इलाज १६
कुश्ती लडना, दण्ड पेलना या बैठके गाना केवल
शारीरिक साधना है। इस प्रकार के व्यायाम करते हुए
केवल यही ध्यान रहता है कि कितने दण्ड पेलें, कितनी
बैठके लगाएं या किस दाव से विरोधी को पटकना चाहिए।
योगासन से तन के साथ मन भी टिकता है
योगासन का अर्थ है ऐसा भासन, जो मन को विसी
लक्ष्य या इप्ट के साथ जोड दे । यह प्रात्मा को परमात्मा
के साथ जोड़ने का साधन है।
कसरती का बुढापा बडे कष्टों से बीतता है
अक्सर आपने पहलवानो को बुढापे मे दर्द के मारे
बिलखते देखा होगा। उनके जोड-जोड मे पीडा रहती है
और उनके लिए अपने ही शरीर को सँभालना कठिन हो
जाता है।
योगाभ्यासी हमेशा जवान रहता है
योगामन न केवल शरीर को स्वस्थ रखते है, बल्कि
इनसे सभी प्रकार के रोगो का इलाज भी अए हो
जाता है।
उचित योगाभ्याम से थुलथुले शरीर सुडौल बन जाते
है और दुबले-पतले लोग हृष्ट-पुष्ट और शक्तिशाली वन
जाते हैं । योगाभ्यास वास्तव में लाखो वर्षों के अनुभवो
का निचोड है। योगी हो या भोगी, योगासन सबके लिए
अमर यौवन प्रदान करते हैं । स्त्रियो, पुरुपो, बच्चो और
बूढो, सभी वर्गों के प्राणियो को उचित आसनो द्वारा
आरोग्य प्राप्त होता है और वे नीरोग तथा स्वस्थ जीवन
गुजार सकते है।
योगासना स इलाज
१७
१
योगासन : सरल और सर्वश्रेष्ठ
यहां हम शारीरिक विकार की दृष्टि से योगासन दे
रहे है । अभ्यास कीजिए और लाभ उठाइए। पहले भाग
मे सरलता से किये जाने वाले आसन बताए गए है और
दूसरे भाग मे कठिन, परन्तु सब-के-सव सर्वश्रेष्ठ योगासन
बताए गए है।
गठिया, मेरुदण्ड और उदर के विकार
वडी आयु मे जोडो मे दर्द, रीढ़ की हड्डी मे झुकाव
और उदर (पेट) मे कई विकार रहने लगते है । इन्हें दूर
करने और वास्तव मे समूचे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए
पद्मासन सव आसनो मे उत्तम प्रासन है।
क चटाई, कम्बल या दरी बिछाकर पालथी (चौकडी)
मारकर बैठ जाइए।
स दायें पैर को हाथ द्वारा उठावर वाई जांघ पर रखिए।
ग फिर बायें पैर को उठाकर दाईं जांघ पर रखिए।
घ सुपुम्ना की अस्थि (रीढ की हड्डी) सीधी रखिए।
योगासनो समाज
ऊ. दोनों हाथ घुटनों पर रखिए। च. आँखे बन्द करके ध्यान कीजिए। पचासन लाभ- १. मन एकाग्र तथा शान्त होता है। मन के विकार दूर होते है । इन्द्रियां और प्राण स्थिर होते हैं । २ गठिया, फील पांव, फाइलेरिया आदि रोग दूर होते है । जीवनभर कमर नहीं झुकती। ३. कोष्ठबद्धता (कव्जी) दूर होती है । ४. प्रबल कामवासना शान्त होती है। ५. रोगों से लड़ने की शक्ति बढती है। विशेष प्रतिदिन एक मिनट कीजिए। ध्यान-मासन लगाकर इस प्रसर ध्यान कीजिए- "मैं प्राणों का संयम और नियत्रण कर रहा हूँ। प्राणशक्ति प्राण-वायु का अाधार लेकर मेरे शरीर के सभी अगों में व्याप्त हो रही है। मेरे अग- प्रत्यंग में प्राणों का समानरूप से सन्चार हो रहा योगासनो से इलाज १६
थकान, टूटन, दुर्बलता
वास्तव मे ये विकार नहीं है, बल्कि मेहनत का परि-
णाम है। ताजगी लाने के लिए सुखासन का अभ्यास
कीजिए।
क. दाई पिंडली को वाई पिंडली पर रखिये, टसने को हड्डी
पर दवाव न पड़े।
स. दोनो परोके अगले
वाहर की और
रहे।
ग. दोनो हाथों की
उँगलियाँ यापस
मे गूंथकर गोद में
रखिए।
घ. कमर तथा गर्दन
सीधी रखिए और
दोनों कंधे ऊपर को
सुखासन
पोर तने रहे।
ड. शरीर न अधिक तना रहे पीर न शिथिल हो।
लाभ---१. इससे तन-मन की थकावट दूर होती है । अधिक
चलने से, पर्वत की चढाई चढने से, दौडने से,
साइक्लि या घुडसवारी से हुई थकावट दूर
होती है। लगातार देर तक कार्यालय में काम
करने के उपरान्त अग-प्रत्यग में हुई थवावट भी
मिटती है।
२. अवकाश हो तो प्रतिदिन प्रात-साय प्राधे घटे
तक सुवासन मे वैठिए । इससे मन शान्त तथा
एकाग्र होता है। अवकाश के दिन अाधा घटा
सुखासन अवश्य कीजिए।
योगासनो से इलाज
मोटापा, मधुमेह, जिगर और गुर्दे के विकार
देर रात गए तक जागने, कारो-कुसियो मे जमे रहने,
अधिक चाय पीने, अधिक मदिरा के सेवन, निशास्ते का
अधिक माना मे सेवन, चाट-चटनी और तेज मिर्च-मसालो
के अधिक सेवन एव भल्ले-पकौडियोवाले तेल के पदार्थ
सात रहने से सारा शरीर-तत्र विगडने लगता है। जो
लोग मोटापा, मधुमेह, जिगर और गुर्दे के विवार से
ग्रस्त हो, उन्हे चाहिए कि सुबह-शाम खुली हवा मे
पश्चिमोतानासन करें।
ब
पश्चिमोतानासन
क वैठ जाइये, दोनो पर सामने फैलाइये, दोनो पैर
आपस में मिलाइये।
ख. दोनो हाथ एप-माथ और एक सीध में उपर उठाइए,
हथेलियां सामने की अोर रहे।
ग. धीरे-धीरे हाय और शरीर का उपरला भाग नीचे
लाए।
घ दोनो हाथों से दोनो पैरो के अगूठे पक्ड लीजिए।
ड सिर को घुटनो पर ले जाइए।
सूचना-यदि प्रारम्भ मे दोनो अगूठे न पक्ड मय और
मिर यो घुटनो से न लगा मरें तो घरगये नहीं।
कुछ दिन के अभ्यास से मर ठीक होने लगेगा।
योगामना म इलाम
साम-१. मधुमेह (डायबिटीज) का रोग कम होताहोता समाप्त हो जाता है। २. जिगर (Liver) और गुर्दे (Kidney) के रोग सर्वथा दूर हो जाते हैं। ३. तोंद घटाने का यह शर्तिया उपाय है। विशेष-प्रतिदिन पांच से दस बार कीजिए। गंस, प्रफारा और जठराग्नि के विकार दूध के साथ मानोर मट्ठे पर दूध, गर्म पर ठडापौर ठडे पर गर्म, सूसी तरकारियां, मांसाहार, चाय पीते रहना और बैठे-बैठे हुक्म चलाना रोगो को आमंत्रण देना है। इससे पैदा होनेवाले पेट, प्रामाशय और पाचन-मन्दता के रोग मिटाने के लिए कुक्कुटासन बहुत उपयोगी है। विशेष-ऊपर लिसे विकारो को दूर करने के लिए आवश्यक है कि एक घटे से अधिक, लगातार एक जगह मत वैठिए। भले ही दो मिनट के लिए उठकर इधर- उधर चलिए। उसके साथ कुक्कुटासन कीजिए। कुक्कुटासन २२ योगासनो से इलाज
क. पद्मासन लगाकर बैठिए।
स. अब दोनों जांघों और पिंडलियों के बीच में से
दोनों हाथ निकालकर हथेलियों को जमीन पर
टिकाइए।
ग. दोनों हाथों के बल पर सारे शरीर को तोलकर रखिए।
दृष्टि सामने रखिए, इस तरह कुक्कुट (मुर्गा) बन
जाइये।
लाभ--१. इम पासन से वाहों तथा वक्ष (छाती) का बल
बढता है।
२. इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है, भूख खुलकर
लगने लगती है।
आमाशय (मेदा==Stomach) के सारे रोग दूर
होते हैं।
४. इस आसन को करते रहने से पेट-दर्द, कब्ज,
अफ़ारा, गैस, अपच जैसे कष्ट नहीं होते।
सूचना -प्रारम्भ में शरीर को इस प्रकार सन्तुलित रखने
में कठिनाई अवश्य होती है, परन्तु कुछ दिनों के
अभ्यास से इस प्रासन में सफलता मिल जाती है।
इसका समय थोड़ा-थोड़ा बढ़ाते जाइए।
विशेष-जितनी देर कर सकें, कीजिए।
पीलिया, अन्धता, कण्ठ और वातरोग
हरी सब्जियाँ, दूध, सूर्य का प्रकाश एवं स्निग्ध पदार्थ
कम लेने और चाय, सिगरेट, मदिरा अधिक लेने से कई
विकार जन्म ले लेते हैं। इन्हे मिटाकर नवयौवन प्राप्त
करने के लिए सर्वाङ्गासनीजिक
योगासनो से इलाज
पर २३
क. पीठ के बल लेट जाइए, दोनो पर सीधे रखिए, आपस मे मिले हुए रहे । दोनो हाथ अपनी-अपनी बगल मे रहे। वायें पैर को सीधा ताने हुए जमीन से पैतालीस डिग्री का कोण बनाते हुए एक फुट ऊपर उठाइए, फिर नीचे वापस ले पाइये। अर दायें पर को ऊपर उठाइए और वापस से ले पाइये। अब दोनो पैर एक- साथ ऊपर उठाइये और नीचे वापस ले पाइये। सर्वांगासन ख वाय पैर को समकोण बनाते हुए ऊपर उठाइए। उस पैर का तलुग्रा आकाश की और रहे। धीरे-धीरे पर को वापस जमीन पर ले प्राइए । अव दायें पैर को समकोण बनाते हुए उठाइए। उस पैर का तनुमा आकाश की ओर रहे। धीरे धीरे पर को वापस जमीन पर ले पाइए। इसके उपरान्त दोनो पैरो को एक साथ उठाकर ऊपर की ओर उठाइए, तलुए श्राकाश पी अोर रहे। ग दोनो पांव एव-साथ झटके पे साथ ऊपर उठाइए। सास ही इमी झटके से ही कमर तथा पीठ का भाग भी ऊपर उठ जाना चाहिए । पीठ को दोनो हाथों का सहारा दीजिए । कुहनियां जमीन पर टिकी रहे । वाहें यागामनों समाज २४
पूरी तरह शरीर के साथ सटी रहे। सिर, गर्दन तथा
दोनो कधो पर सारे शरीर का भार पा जाए। टाँगे
बिल्कुल सीधी रहे, घुटनो से मोडिए नहीं। दोनो
पैरो को मिलाइए, पैरो के अगूठो को नाक की सीध
मे रखिए।
लाभ-१ इस आसन से शरीर का रक्त शुद्ध होता है।
२ दिल और फेफडे (Lungs) मजबूत होते है ।
फेफडो के रोग धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं।
३ सिर, आँखो तथा दिमाग को शक्ति प्राप्त होती
है। आँखो की ज्योति बढती है। सिरदर्द दूर
होता है।
४ वात-रोग दूर होते है, खून में कोई खराबी पा
गई हो तो मिट जाती है।
५ इससे पाण्डु रोग (पीलिया, Jaundice) जाता
रहता है।
६ पाचन-शक्ति बढती है, पेट के रोग दूर होते
हैं, साया-पीया पचने लगता है। पेट की गैस
का कष्ट समाप्त हो जाता है।
७ गले मे स्थित थायराइड तथा पिट्युटरी नामक
नलिका-विहीन ग्रन्थियो को पोपण तथा उत्ते-
जना प्राप्त होती है, जिससे इन ग्रन्थियो से
अधिक हारमोन्स निकलते है और शरीर में
चुस्ती, फुर्ती, शक्ति पाती है । इसे 'नवयौवन
का दाता प्रासन' कहना चाहिए ।
विशेष-इस ग्रासन को दस सैकड से एक मिनट तक
वीजिए।
योगासगो से इलाज
गर्दन से कूल्हो तक के विकार
जन्मजात कारणो से, अथवा प्रतिकूल परिस्थितियो मे
पालन-पोषण ठीक न होने से, अथवा पाराम की जिन्दगी
मे स्वय कुपोषित रह जाने से रक्त दूपित हो जाता है,
जिगर और तिल्ली मे विगाड पैदा हो जाता है, मधुमेह से
शरीर क्षय होने लगता है। इन सवका उपचार है हलासन
काभ्याम।
क पीठ के बल लेटिए।
ख दोनो टाँगो को आपस में मिलाकर उठाएँ, सिर के
पीछे ले जायें, पैरो के पजो को भूमि पर टिका दें।
हलासन
ग दोनो हाथो को सरकाकर उँगलियो को आपस मे गूंथ
दीजिए तथा कधो से कुहनियो तक वाहे भूमि के साथ
लगाए रहे।
लाभ-१ सीने की हडिडयां तथा पसलियाँ मजबूत होती
हैं और छाती की मासपेशियाँ पुष्ट होती है।
२ रीढ की हड्डियां सवल होती हैं ।
३ रक्तसचार सही होता है, अत रक्त शुद्ध होता
योगासनो स इलाज
४. जठराग्नि की वृद्धि होती है तथा भूख बढती है।
अन्तड़ियों की कमजोरी दूर होती है । जिगर व
तिल्ली के विकार दूर होते है।
५. गर्दन पुष्ट होती है।
६. हलासन मधुमेह (शुगर) का विशेष इलाज है।
७. योगी लोगो का कथन है कि इससे कुण्डलिनी-
शक्ति जाग उठती है।
सिर, गर्दन और हाथों में कम्पन
अगर आप चाहते हैं कि वृद्धावस्था में भी कमर न
झुके और सिर, गर्दन तथा हाथों में कम्पन न पाए तथा
समूचा शरीर वलिष्ठ रहे तो चक्रासन करके स्वस्थ अनुभव
कीजिए।
चक्रासन
भूमि पर लेटिए।
स. घुटने मोडकर दोनों पैर कूल्हों के पास रसिए।
ग. दोनों हाथों के पजे सिर की ओर ले-जाकर हथेलियाँ
जमीन पर टेक दीजिए।
योगासनों से इलाज
घ. हाथों और पैरों का सहारा लेकर धीरे-धीरे पीठ, छाती
और कमर को ऊपर उठाइए ।
ड. हाथों और पैरों को एक-दूमरे के इतना पास-पास लाएं
कि उँगलियों के अगले भाग एड़ियों को छूने लगें
और शरीर मुड़कर गोल चक्र के आकार का हो जाए।
विशेष-यही प्रासन सोधे खडे होकर पीछे की ओर झुकते
हुए ज़मीन पर हाथ टेककर भी किया जा सकता
लाभ-१ चक्रासन से गर्दन, छाती, पेट, कमर, वाहें,
हाथ, टांगें, घुटने, पैर सभी अंग बलवान् बनते
हैं, हरेक अंग लचकदार बन जाता है। इस
आसन के करने से कमर-दर्द कभी नहीं होता।
२ मेरुदण्ड में लचक पैदा होती है; कधे मजबूत
होते है।
३. स्त्रियो को मासिक धर्म के दिनों में होनेवाली
पीड़ा में लाभ पहुंचता है।
४. सिर, गर्दन तथा हाथों के कपन का रोग कभी
नही होता।
५. सव अगों में लचक पैदा होने से वुढापा पचतर
वर्ष की उम्र तक पास नहीं आता।
पुराना सिरदर्द, पुराना पीलिया
जिनके जीवन में निरन्तर उतार-चढाव प्राते रहने से
नाड़ी-सस्थान को धक्के लगते रहते है, उनके सत-सचार
मैं भी वाधा पहुँचती है और मस्तिष्क का केन्द्र मुन्न होने
लगता है। इससे सिरदर्द बना रहता है। ऐसे लोगो को
उत्तानपादासन से अपना स्वास्थ्य सुधार लेना चाहिये।
क. पीठ के वल भूमि पर लेटिए।
योगासनो में इलाज
,
२८
ख. दोनो हथेलियां जांघो के साथ रखिए।
उत्तानपादासन
..
ग. दोनो पांव भूमि से ऊपर उठाकर लगभग दो हाथ
ऊँचाई पर रखिए; दोनो पैर मिले रहे।
लाम-१. रक्त-सचार मे तेजी आने से रक्त शुद्ध होता
है।
२ हृदय और फेफडो की शक्ति बढती है।
३. नेनो तथा मस्तिष्क की शक्ति बढती है।
४ सिरदर्द, रक्तपित्त तथा पाण्डु रोग (पीलिया)
दूर होते है।
मेदे और पक्वाशय मे दोप
गरिष्ठ (भारी) भोजन और चिन्ताओ के ढेर मे
प्राय आमाशय और पक्वाशय पर ही बुरा प्रभाव पड़ता है।
गजासन इस विकार को दूर करने के लिए रामबाण सिद्ध
हुया है।
क सीधे खडे हो जाइए। दोनो पैरो मे प्राध फुट का
फासला रहे।
ख. दोनो हाथ सीधे ऊपर ले जाइए।
योगासनो से इलाज
२९
ग. धीरे-धीरे सारे शरीर को आगे झवाकर दोनो हथेलियां सामने जमीन पर उग- लियाँ सामने की पोर रहे। घ. टाँगे और बाहे सीधी तनी रहे। गजासन ड. इमी स्थिति में चलकर इधर-उधर चक्कर लगायें। लाभ-इससे ग्रामाशय (मेदे) के रोग दूर होते है पक्वाशय की शक्ति बढती है । खांसी, जुकाम, बुखार सर्दी या गर्मी की अधिकता से जुकाम और बुखार हो जाते है और श्वास-नलिका में खराबी आ जाने म खामी पाने लगती है। इसका अचूक इलाज है मकरामन । व. पेट के बल लेटिए, पांव फैलाइए। A बखें, मकरासन स. दोनो हाथ दाएं-बाएँ रसकर कुहनियों को बडा करके हथेलियो पर छाती का बोझ डालिए। योगासनो मे जान ६०
ग. पेट, कमर और घुटनों को जमीन से ऊपर उठाकर
सारे शरीर का वोझ हाथों और पैरों के पंजों पर डाल
घ. इसी स्थिति में मगरमच्छ की तरह आगे चलें।
लाभ-~१. बाहों, टांगों, पंजों और छाती को बल मिलता
है। पसीना खुलकर बाता है और विपला तत्त्व
निकल जाने से खांसी, जुकाम व बुखार के कष्ट
मिट जाते हैं।
२. कड़ा व्यायाम होता है और रक्त-संचार तीव्र
होने से रक्त-शुद्धि होती है।
कर
बाँझपन, सम्भोग में अरुचि
जिन बेडौल, दुर्बल और मरियल स्त्रियों को भांति-
भांति के कष्ट घेरे रहते हैं, उन्हें उत्तान-कूर्मासन से सुडौल
और सुन्दर देह मिल जाती है। शरीर में उमंग भरने से
पति-सुख और सन्तान-प्राप्ति भी सहज में हो जाती है।
क. दोनों पैरों को
सामने फैला-
बैठ
जाइये।
स. अब अपने वाएँ
पैर को घुटने
से मोड़ते हुए
आगे लाकर
उसकी एड़ी
को नाभि से
उत्तान-कूर्मासन
सटाते हुए पैर को दाई जांघ पर रख दीजिए।
योगारानो से शाज
३१
ग. इसी तरह दाएँ पैर को भी घुटने से मोडते हुए एडी
को बाई एडी से सटाते हुए, पैर को वाई जाँघ पर
रख दीजिए।
घ. जाँघो तथा पिंडलियो के बीच से दोनो हाथो को घुसाते
हुए इतना वाहर निकालिए कि कुहनी तक का भाग
जांघ और पिंडली से बाहर या जाए।
ड अब दोनो घुटनो को भूमि से ऊपर उठाते हुए अपने
दोनो हाथो को इस प्रकार पकडे कि गाल से कान तक
का भाग हथेली मे पा जाए ।
सूचना-प्रारम्भ मे इस आसन को करने में कठिनाई होती
है, परन्तु कुछ दिनो के अभ्यास से सब ठीक हो
जाता है।
लाभ-१ इससे शरीर लचकदार, वलवान्, सुडौल और
सुन्दर बनता है।
२ स्नियो के सव रोग दूर होते हैं, सारे अगो मे
स्फूर्ति पाती है। रति-क्रीडा में रुचि जागती है
और मनचाही सन्तान प्राप्त होती है।
विशेष-इस आसन मे प्रतिदिन एक मिनट तक बैठने का
अभ्यास कीजिए।
गण्डमाला, श्वास-रोग, बाय-गोला
पेट मे विकार या बाहरी छूत-दोष से गले मे कई तरह
के पष्ट हो जाते हैं। चात्तज स्वभाव के लोगो को थोडी
माया में भी वातज पदार्थ खाने-पीने से वाय-गोला तडपाने
लगता है । यहाँ नक कि स्वर-यत्र तक मे सूजन आ जाती
है । उन्हें सामन करना चाहिए ।
भाग-१ क जमीन पर पेट के बल लेट जाइए।
स दोनो हायो की हथेलियां जमीन पर टेक
दें, हाय सामने की ओर रहे।
३२
योगासनो से इलाज
ग. अब सिर, गर्दन और छाती को जहां तक
हो सके ऊंचा ले जाइए। कमर से ऊपर
तक का भाग जमीन से ऊँचा रहे होर कमर
से नीचे का भाग (नाभि से पैरों तक) भूमि
पर टिका रहे।
सासन
भाग २. घ. धीरे-धीरे सिर से नाभि तक के भाग को
नीचे लाकर जमीन से लगा दीजिए।
भाग ३. इ. अब सिर से नाभि तक के भाग को यथाशक्ति
ऊपर ले-जाइए।
लाभ-१. गर्दन, छाती, पेट की मांसपेशियां मजबूत होती
२. वाहों में बल पाता है।
३. रीढ की हड्डी में लचक पैदा होती है।
४. गुल्म (वाइगोला) और गण्डमाला (कण्ठमाला,
हंजीरों का रोग) दूर होता है।
योगासनों से इलाज
। रूखी त्वचा, बेरौनक चेहरा अंधेरे मकानो मे रहने, सीलन-बदबू मे मेहनत करने, मिट्टी-गारे मे पुते रहने और उचित मात्रा मे स्निग्ध पदार्थ न मिलने से त्वचा सूख जाती है और चेहरा वेरोनक-सा हो जाता है। उन्हें चाहिए कि उदय होते सूर्य को नमस्कार करें। यह ऐसा योगासन है जो शरीर के साथ मन-प्राण को भी आह्लाद देता है। १ उदय होते सूर्य की ओर मुंह करके सीधे खडे हो जाइए-दक्ष या सावधान (Attention) की मुद्रा मे। एडियां आपस मे मिली रहे, लेकिन आगे से पजे खुले रहे । दोनो हाथ जोडकर नमस्कार-मुद्रा बनाइए। २ फिर दोनो हाथ ऊपर ले-जाइए, अधिक-से-अधिक ऊपर। ३. अब दोनो हाथ नीचे लाकर उँगलियो से पैरो के अंगूठे को छूने का प्रयत्न कीजिए, घुटने न मुडने पाएँ। 2 सूर्य नमस्कार ४. दोनो हाय सामने की मोर ज़मीन पर रखिए; उंग- लियो सामने की ओर रहें । कूल्हे अधिव-रो-प्रधिक ऊँचे उठाइए। योगासनों से इलाज
५. क. वायां पर भागे ले जाकर रखिए। दायां पैर पीछे
तना रहे, पंजों के बल पर रहे।
'5
ख. यही क्रिया दायें पैर से कोजिए ।
६. हाथों के बल पर सारे शरीर को तोलकर, कुहनियां
मोड़िए । शरीर को भूमि के समतल लाइए।
७. सिर और छाती को ऊपर ले-जाइए-शरीर का भार
हाथों पर रहे। सामने देखिए सिंह की भाँति ।
८. क. भूमि पर बैठकर, वाई टांग मागे, दाई टांग पीछे
करके अधिक फैलाइए। दोनों हाथों की उँगलियों
से प्रागेवाले पैर को छूने का प्रयल कीजिए । गर्दन
दोनो वाहों के बीच में रहे।
ख. अब दाई टोग आगे लाइए; बाई टांग पोछे ले-
जाइए; दोनोटांगों को अधिक-से-अधिक फैलाइए;
योगासनों से इलाज
दोनों हाथों की उंगलियों से आगेवाले पैर को छूने का प्रयत्न कीजिए। ६. एक पैर प्रागे रखकर घुटने से मोड़िए। इसके साथ ही दोनों हाथ ऊपर ले-जाइए। हथेलियां अन्दर की ओर रहें। १०. अब सिर और छाती ऊपर उठाकर सामने देखिए। सूचना-जिनके पास समय की कमी है, उनके लिए प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करना ही काफी है। सम्भव है प्रारम्भ में ये क्रियायें आपको कठिन जान पड़ें या 'पूर्ण' रूप में करने में असुविधा हो, परन्तु घबराने की आवश्य- कता नहीं । संसार में कुछ भी 'असम्भव' नहीं है। 'सूर्य नमस्कार' का अभ्यास धीरे-धीरे बढाना चाहिए। जब सांस फूल जाए, थकान हो जाए या माथे पर पसीना पा जाए तो व्यायाम करना बन्द कर दे। सूर्य नमस्कार का उद्देश्य प्रापके शरीर को महावली बनाना नहीं, बल्कि सजीला, गठीला, नीरोग, स्वस्थ, चुस्त और कार्यकुशल बनाना है । (These are ideal for anyone who simply wants to get fit, look fit feel fit and stay fit.) लाभ-१. शीतकाल में नदी-तट, समुद्र-तट तथा पर्वत पर 'सूर्य नमस्कार' का अभ्यास करने से सर्दी, जुकाम, सांसी आदि रोग पास नहीं पाते। २. दारीर के अन्दर के रोग-कीटाणु नष्ट होते ३. इससे नेत्रों की ज्योति बढती है। ४. मन को एकाग्रता प्राप्त होती है। योगासनों से इलाज ५ यह सरल, नोरजक तथा व्यावहारिक व्यायाम है, प्रत इसके करने से मन को प्रसन्नता प्राप्त होती है। ६ इससे मासपेशियां सबल हाती हैं, रक्त-सचरण तीव्र होता है, श्वास का गमनागमन (श्वास- प्रश्वास) त्वरित होता है, अत श्वास सस्थान (Respiratory system) का प्रत्येक अग निर्मल होता है। ७ स्नायु-तन्तु (Nerves) मजबूत तथा पुष्ट होते ८ शरीर की भीतरी ग्रन्थियाँ पुष्ट होती हैं । ६ रोग के कीटाणु नष्ट होकर पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। शरीर में विद्युत्-तरगो का सचार होता है। १० त्वचा का कोई रोग नहीं होता 'विशेष-स्वास्थ्य चाहनेवाले व्यक्ति को प्रात-साय दोनो समय और यदि इतना समय न हो तो केवल प्रात काल अवश्य करना चाहिए । योग-साधन के ग्रथो मे इसे 'सर्वव्याधिविनाशनम्' (सब रोगो को दूर करनेवाला) तथा 'प्रकाल-मृत्युहरणम्' (असामयिक मृत्यु को दूर रखनेवाला) कहा गया काम मे अत्यधिक व्यस्त रहनेवाले, सीमित प्रायवाले, बडे शहरो मे रहनेवाले निर्धन लोगो के लिए 'सूर्यनमस्कार' एक तरह का स्वास्थ्य-वरदान है। कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक स्वास्थ्य लाभ करना हो तो इसे अवश्य कीजिए। प्रतिदिन दस वार कर। योगासनो से इजाज ३७ शोप (शरीर सूखना), दुर्वलता, प्रालस्य जिन्हे कडी धूप और सस्त गर्मी मे, तपती भट्टियो और दहकते शोलो के सामने काम करना पडता है, उनकी काया मुरझा जाती है और वे वरावर थकान-सी अनुभव करते है, उन्हे चन्द्र- नमस्कार-अभ्यास से स्वास्थ्य मे सुधार लाना चाहिए। भाग १(क) सीधे चन्द्र-नमस्कार खडे हो जाइए। दोनो पैरो मे आगे की प्रोर एक हाथ का अन्तर रहे। (ख) दोनो हाथो को सिर के ऊपर ले जाकर, पीछे की ओर झुके। भाग २-३ -दोनो हाथ झटके से सामने की ओर लाकर सारे शरीर को भी सामने ३८ योगासनो स इलाज की तरफ नीचे लाएं। दायां हाथ दाएं पैर के साथ और बायां हाथ बाएं पैर के साथ सटाकर जमीन पर रखें। टांग तनी रहें। घुटनों से न मुड़ें। भाग ३-वायां पैर पीछे ले-जायें ; दायाँ घुटना मागे झुकाते हुए दाएँ पैर के पंजे पर सारे शरीर का भार डाल- कर बैठिए; दोनों हाथ पैर के भासपास रखिए। भाग ४--(क) अब दायां पैर पीछे ले-जाइए और उसकी उंगलियां जमीन पर लगा दीजिए। (ख) बायाँ घुटना सामने की ओर कुछ झुका- कर सीना आगे को तान दीजिए। योगासनो से इलाज m
भाग ५-दोनो हाथो को नीचे उतारकर सामने की ओर
ज़मीन पर रखकर, बायें पैर को दायें पर के
समीप पीछे ले-आइए और एक बार दड पेलिए,
अर्थात् पो पर सीधा बंठकर धीरे-धीरे हाथो
के बल प्रागे को बढते हुए सासन की स्थिति में
मा जाइए।
भाग ६-दायां पैर पीछे को सीधा ले-जाकर, वाय पर
पर सारे शरीर का भार डालिए और सोधे
होकर बैठिए, बैठते हुए घुटना कुछ भागे की
ओर झुका रहे, ताकि पजो पर सारे शरीर का
भार तुल जाए । कूल्हे एडी पर हो । दोनो हाथ
बायें पैर के आसपास (आजू-बाजू) रहे।
४०
योगासनो स इलाज
भाग ७ -(क) चित्र के अनुसार खड़े होकर बायाँ घुटना
पीछे की तरफ मोड़िए।
(ख) सिर को ऊपर
की ओर सीधा
उठाइए; सीना
तान दीजिये।
(ग) हाथों की मुट्ठियाँ
वांध कर उन्हें
सिर के दोनों
तरफ ऊपर ले
जाइये । दोनों
हाथों के अंगूठे
एक - दूसरे के
सामने रहें।
भाग -हाथों को फिर से दायें पैर के पंजे के बराबर
जमीन पर रखिये। दायें पैर को बायें पैर के
पास पीछे ले जाकर फिर से एक दण्ड पेलिये।
योगासनों से इलाज
पीछेवाले चित्र के अनुसार एक दण्ड पेल चुकने के
बाद उठ बैठिये और नीचेवाले चित्र की स्थिति में प्रा
जाइये।
A
भाग ६-कूल्हों को एडियो के ऊपर रखिए; घुटनो के बल
सिर को झुकाकर भूमि पर टेक दीजिए।
भाग १०-एडियों पर बैठे-बैठे सिर ऊपर उठाइए; दोनो
हाथो को ऊपर उठाकर, जहाँ तक हो सके पीठ
की ओर झुकाइए।
योगागनी गैइमार
भाग ११-(क) दोनों हाथों को आगे ले जाइए और जमीन पर रखिए। (ख) पैरो को उछालकर दोनो हाथों के बीच में ले-जाइये और पंजोंपर भार देकर सीधा वैठिए। भाग १२--अन्त में सीधे खड़े होकर, हाथ जोड़कर खड़े हो जाइए। सूचना-यह सायंकाल में करने योग्य है। लाभ-१. प्रत्येक अंग का पूरा व्यायाम हो जाने से स्वास्थ्य वहुत अच्छा रहता है; बल वढता है एवं अग- प्रत्यग सुडौल व सुन्दर बनता है। २. चेहरा कातिमय होता है। ३. पाचन (हाज़मा) ठीक होता है। ४३ योगासनो से इलाज
फण्ठ, फेफड़े, हृदय और दिमाग के विकार
जिन लोगों ने शरीर की ओर ध्यान न देकर अंग-अंग
बिगाड़ लिये हों और जीवन से निराश हो चुके हों, उन्हें
भी सदाबहार यौवन मिल सकता है और इसके लिए सदा-
चार के साथ पूर्वोत्तानासन का प्राश्रय लेना चाहिए।
क. भूमि पर पीठ के बल लेटिए ।
ख. दोनों टाँगों को आपस में इस तरह मिलाइए कि दोनों
घुटने, पैरों की दोनों एड़ियां और दोनो पजे परस्पर
मिल जायें।
ग दायां हाथ दाईं ओर तथा वायां हाथ बाईं ओर जमीन
पर टेकते हुए, टांगे ऊपर उठाकर सिर की ओर इस
तरह ले जाइये कि पैरों के पजे भूमि पर टिक जायें,
टांगें सीधी रहे, और घुटने भी न मुड़ें।
पूर्वोत्तानासन
घ. दायें हाथ से दायें पैर का तथा बायें हाथ से बायें पैर
का अंगूठा पकड़ लीजिए और पैरों को सिर की तरफ
धकेलते हुए ठुड्डी को वक्ष (छाती) से लगाइए।
लाभ-१. गर्दन, छाती, कंधे की हड्डियां, जोड तथा
मासपेशियां मजबूत तथा लचकीली होती हैं ।
योगागनो में इलाज
२. गले के सब रोग दूर होते है । फेफड़ों के विकार
दूर होते हैं।
३. हृदय और मस्तिष्क (दिमाग) की शुद्धि होती है ।
भूख मरना, पेट फूलना, कब्ज रहना
ये सभी रोग मनुष्य स्वय मोल लेता है और इसका
कारण है अनुचित आहार-विहार । द्विपाश्र्वासन से सोये हुए
अंगों को चेतन करके पुनः सामान्य स्थिति में लौटा जा
सकता है।
क. पेट के बल लेट जाइए।
ख. घुटने मोड़कर पैरों को पीठ की ओर ले जाइए।
ग. दायें हाथ से दायाँ पैर तथा बायें हाथ से बायाँ पर
पकड लीजिए।
एकदम दाईं ओर करवट लीजिए।
द्विपाश्वासन
ड. फिर से पेट के बल की स्थिति में आइए।
च. अव एकदम बाई ओर करवट लीजिए।
लाभ-१. इस प्रासन से चर्वी घटती है, मोटापा कम होता
है। प्रतिदिन इस आसन के करने से फूला हुआ
पेट धीरे-धीरे साथ लगने लगता है।
२. प्रामाशय (मेदा), पक्वाशय भोर प्रांतों के
विकार दूर होते हैं। कब्ज़, अफारा एवं मनपच
दूर होते हैं।
योगामनी से इलाज
४५
३. सीना चौडा होता है तथा उसको मासपेसियाँ
मजबूत होती हैं।
विशेष-प्रतिदिन एक मिनट कीजिए।
प्रांतों, कन्धों, पाहों, हाथों की दुर्बलता
उपर्युक्त प्रगो को पुष्ट और लचीला बनाए रखने के
लिए धनुरासन का अभ्यास कीजिये।
चेतावनी-रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) तथा हृदय-रोग से
पीडित व्यक्ति इस प्रासन को हगिज न करे।
का ज़मीन पर पेट के बल लेटिए।
ख. दो हाथ पीठ की ओर ले जाइए, घुटनों को मोडिए;
पैरों को पीठ की ओर बढाइए।
ग. दाएं हाथ से दायां पांव और वाएं हाथ से बायां पांव
(गिट्टे से) पकड लीजिए।
ध गर्दन को ऊपर करते हुए सिर, माथा, वक्ष तथा हाथो
से पकड़े हुए पैरो को प्राकारा की ओर तान लीजिए।
धनुरासन
४६
योगासनो से इलाज
इस तरह आपका शरीर धनुष की भांति तथा बाहें
और टांगें धनुष की डोरी के समान हो जाएंगी।
ड. धीरे-धीरे 'क' की स्थिति मे आ जाइए।
लाभ--१. इससे रीढ़ की हड्डी में लचक पैदा होती है।
पीठ तथा पेट का कोई रोग नहीं होता। गैस
की बीमारी दूर होती है।
२. अतिसार (डाइसेंटरी), आन्त्र की दुर्बलता,
जिगर तथा गुर्दे के रोग दूर होते है।
३. कंघे, वाहें, छाती, जंघाएँ, पैरों की नाड़ियाँ
और नसें तथा मासपेशियां मजबूत होती हैं ।
विशेष-प्रतिदिन एक मिनट कीजिए।
.
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थुलथुल तोंद और बेडौल कूल्हे
जिन पुरुषों और विशेषतः स्त्रियों के कूल्हे और पेट
वेढंगे हो जाते है, उन्हें पादहस्तासन से अपने बदन में
स्वाभाविक सुडौलता लानी चाहिए।
क. पीठ के बल भूमि पर लेटिए; परों को परस्पर मिला-
कर ऊपर की ओर उठाइए।
ख. दोनों वाहें, सिर, गर्दन और छाती को ऊपर उठाकर
आगे को झुकिए, दोनों हाथो से दोनों पैर के अंगूठों को
पकड़ लीजिए।
ग. अब नाक को घुटनों से लगाने का प्रयल कीजिए।
घ. थोड़ी देर सांस रोकने के बाद, धीरे-धीरे सांस बाहर
निकालते हुए 'क' की स्थिति में मा जाइए।
योगासनों से इलाज
पादहस्तासन लाभ-१. इस प्रासन के करने से वायु-विकार आदि नहीं होते । अगर हों तो दूर हो जाते है। २. कूल्हों, कमर तथा पेट की थुलथुल घटकर मांस- पेशियों मजबूत तथा लचकीली होती है। ३. पेट बाहर को निकला या फूला हुआ हो तो धीरे-धीरे सिमटकर वक्ष से पीछे हट जाता है और शरीर सुडौल बनता है। विशेष-प्रतिदिन एक मिनट तक कीजिए। शरीर सुन्न होना, जांघ पेट दुखना लम्बे मानसिक तनाव और माकस्मिक झटकों के प्रभाव से कई बार शरीर सुन्न रहने लगता है और पेट खराब हो जाता है। उन्हें एकपाद-द्विहस्तबद्धासन से निश्चित लाभ होगा। १. क. दोनों पैरों में डेढ़ फुट की दूरी रखकर खड़े हो जाइए। ख. वाई टांग आगे बढाकर घुटना मोडिए और इसी पैर का पंजा जमीन पर रखिए; दायां पैर पीछे ही रहेगा। योगासनों से इलाज ४८
ग. सारे शरीर को वाएँ पैर की ओर झुवाइए तथा
दोनों हाथों से वाएँ पैर का टखना पकड़ लीजिए।
एकपद-द्विहस्तबद्धासन
२. क. दोनों पैरों में डेढ़ फुट की दूरी रखकर खड़े हो
जाइए।
ख. दाईं टाँग आगे बढ़ाकर घुटना मोड़िए और इसी
पैर का पंजा ज़मीन पर रखिए; बायाँ पैर पीछे ही
रहेगा।
ग. सारे शरीर को दाएं पैर की ओर झुकाइए तथा
दोनों हाथो से दाएँ पैर का टखना (गिट्टा) पकड़
लीजिए।
लाभ-१. इस आसन से सभी अंगों के जोड़ मजबूत होते
है; नस-नाड़ियों में चेतना पाती है; जांघे दृढ
होती है।
२. कब्ज दूर होती है और पेट का कोई रोग पास
नहीं आता।
विशेष-१/२ मिनट बाएं पांव से और १/२ मिनट दाएं
पैर से कुल एक मिनट कीजिए।
योगासनों से इलाज
करें।
मूत्र-रोग, यौनांग (गुप्त-अंग) विकार
पेट की शुद्धि और यौनांगों के विकार दूर करने के
लिए द्विपादचनासन अद्भुत है ।
चेतावनी-गर्भवती स्त्री, और प्रसव के बाद तीन महीने
का शिशु होने तक प्रसूता भी, इसे कभी न
क. पीठ के बल लेटिए और सांस अन्दर खीचकर रोकिए।
ख. दोनों हाथ कमर के बरावर भूमि पर रक्खें; अंगूठे
शरीर की ओर रहे, सबसे छोटी उँगलियाँ बाहर की
ओर रहे।
ग. अब घुटने से घुटने को और पैर से पैर को (अंगूठे
से एडी तक) मिलाकर टांगे ऊपर उठाइए; पैरों के
तलुए आकाश की ओर हो जाएँ।
घ. दोनो पैरों को दाएँ से बाएं चारो तरफ घुमाइए; घुटने
और पैर हर प्रकार से परस्पर मिले रहे ।
ङ. अव दोनों पैरों को बाएं से दाएँ चारों तरफ घुमाइए;
घुटने और पैर हर प्रकार से परस्पर मिले रहे ।
द्विपादवकासन
लाभ-१. इस प्रासन के करने से वृक्क (गुर्दे) की कोई
बीमारी नही होती; मूत्र-रोग कोई नहीं
होता।
२. पेट की पीड़ा, अजीर्ण, कब्ज आदि कप्ट दूर
होते हैं।
योगामनों से इलाज
३. कई स्त्रियों या कुमारियों को मासिक धर्म के
समय असह्य पीड़ा होती है। इस आसन के
करने से वह दूर हो जाती है।
उदर-विकार
प्रकृति के विरुद्ध खान-पान और रहन-सहन से उदर
के सभी अंगों में दूपण इकट्ठा हो जाता है। इसके लिए
नाभि-पासन अत्यन्त अनुकूल सिद्ध हुआ है।
क. पेट के वल जमीन पर लेटिए; दोनों हाथों को सामने
की ओर फेलाइए।
ख. श्वास अन्दर लेते हुए अन्दर रोकिए।
ग. अव पैरो को उठाकर अपने सारे शरीर का भार नाभि
पर डालिए।
नाभि-प्रासन
घ. इसके बाद दोनों हाथों को सामने की ओर फैलादए।
उधर से पैरों को और इधर से हाथों को दूर मे दूर
ऊपर उठाकर फैलाने का प्रयत्ल कीजिए। सारा शरीर
नाव की भौति दिखाई देगा।
लाभ- इससे प्रामाशय (मेदा), यकृत (जिगर), 'लोहा
(तिल्ली),पित्ताशय (पित्ता) के कोई विकार नहीं
विशेष-प्रतिदिन एक मिनट कीजिए।
योगासनो से इलाज
मानसिक चंचलता, चिड़चिड़ापन, उदासी
हमारे मनीपियों ने तन के साथ मन के स्वास्थ्य को भी
बहुत प्रावश्यक माना है । इसके लिए ध्रुवासन करने की
सलाह दी गई है । जो लोग खड़े-खड़े काम करते हैं, उनके
लिए यह आसन वरदान है। इस प्रासन को तपस्या करते
समय प्रयोग में लाया जाता है। जब एक पैर थक जाए,
तब दूसरा पैर नीचे रखा जाता है। कहते है भक्त ध्रुव ने
इसी प्रासन मे तपस्या की थी।
किसी पवित्र नदी, तड़ाग, झील, झरने या सरोवर
किनारे पवित्र-शान्त-एकान्त स्थान पर खडे होकर अपना
इष्ट मत्र जपते हुए इस आसन का अभ्यास कीजिये ।
क. ज़मीन पर खड़े हो
जाइए: एडियां
मिलाइए, पजों में
प्राधा फुट का
फासला रहे।
ख. दायाँ घुटना मोडकर
दायाँ पैर जघामूल
पर जमा दीजिए।
ग. दोनोहाथो को जोड़-
कर छाती के सामने
रखिए।
घ. यही तीनों क्रियाएँ
प्रव वायाँ घटना
मोडकर वायें पैर से
प्रवासन
कीजिए।
लाभ-मन स्थिर होता है। उदासी, चिड़चिडापन,
मल्लाहट प्रादि मानसिक विकार दूर होते हैं।
योगासनी से इलाज
विशेष- इस आसन को अवकाश के दिनों मे कीजिए और चाहे जितनी देर कीजिए। यह वास्तव मे साधना करने या जप करने का आसन है। सांस फूलना, मांसपेशियो को कमजोरी जिन लोगो के बदन अलसाए, पथराए और निढाल रहते हैं या चलते-चलते कादम लडखडा जाते हैं, उन्हे एक- पादासन का सुबह-शाम अभ्यास करना चाहिये । इससे श्वास पर भी कंट्रोल हो जाता है और सहन-शक्ति (स्टैमिना) बढ़ती है। क. सीधे खड़े हो जाइए, दोनो पैर परस्पर मिले रहे। ख सांस अन्दर लेते हुए वायाँ पैर पीछे ले-जाइए, कमर की सीध मे ऊपर उठाइए । ग. कमर से ऊपर के शरीर को आगे की ओर झुकाते हुए दोनो हाथो को सिर की सीध मे लाकर परस्पर जोड दीजिये, ताकि सारा शरीर तथा वायां पर एक सीध मे हो जाएँ। प अब मांस छोडते हुए पुन सीधे खडे हो जाइये। एकपादासन योगामनो से इलाज ड. यही क्रियायें दायां पैर पीछे ले जाकर कीजिए। लाभ--१. हाथों-बाहों की मांसपेशियां लचकदार तथा दृढ होती है। २. जवामूल से पैर के अंगूठे तक टांगों की मांस- पेशियों की दुर्बलता दूर होती है । विशेप-प्रतिदिन प्राधा मिनट वायें पैर को तथा प्राधा मिनट दायें पर को ऊपर ले जाकर कीजिए। फमर दुखना, भूख मर जाना नौकर-चाकरोंवाले घरों में अक्सर निकम्मे रहने के कारण पुरपों और स्त्रियों को उठते-बैठते कमर में चमक होती है, पेट फूलने लगता है, भूस मरने लगती है। उनके लिए सेतुबन्धासन चमत्कारी असर डालनेवाला है। क. भूमि पर पीठ के बल चित लेटिए । ख. दोनों हाथों से कमर को मजबूती से पकड़ लीजिए। ग. धीरे-धीरे सारे शरीर की कुहनियों के वल ऊपर उठाइए; साथ ही घुटने मोड़कर पांव निकट रखिए। सेतुबन्धासन घ. सिर से लेकर कंधे तक का भाग जमीन से लगा रहेगा। ङ. कंधे से कुहनी तक का भाग भी भूमि पर टिका रहेगा। योगासनों से इलाज
लाभ--१. इससे वक्ष, पीठ तथा कटि (कमर) में लचक
प्राती है।
२. अन्तड़ियों के विकार दूर होते हैं, पेट का मोटापा
घटता है।
३. भूख बढ जाती है।
विशेष-प्रतिदिन एक मिनट तक कीजिए।
कोष्ठबद्धता (कब्ज), अपच, शरीर फूलना
लम्बी अस्वस्थता, लम्बी बेकारी, लम्बे समय तक
गलत खान-पान का समूचे शरीर-तंत्र पर बुरा प्रभाव
पड़ता है। पादनमस्कारासन उन्हे नवयौवन प्रदान करने
की क्षमता रखता है।
क. बैठकर टांगें सामने पोर फैलाइए।
ख. दोनों हाथों से पैरों के पंजे पकड़ लीजिए।
ग. सांस रोकिए।
घ. झटके के साथ पीठ की ओर सिर लेजाकर लेट जाइए।
सिर को भूमि पर रख दीजिए।
पादनमस्कारासन
ड. पैरों के पंजो को दोनो हाथो से पकडे रहकर उन्हे
सिर से पीछेलाकर पैर जमीन पर रख दीजिए; मस्तक
को घुटनो से लगाइए।
योगासनो से इलाज
।
च अव झटके के साथ सिर-समेत उठकर सामने की ओर
शरीर ले-जाइए और पैरो को सामने की ओर ले जाते
हुए भूमि पर रखिए । अव पहलेवाली पांचो रियायें
विपरीत दिशा मे कीजिए।
लाभ-१ इस आसन से सारे शरीर मे खून का दौरा वेग
से होता है । शरीर का एक एक अग सजीव,
जागरूक और लचकदार बनता है।
२ फूला हुआ पेट अन्दर धंसकर दामोदर हो जाता
है। अजीर्ण, अनपच, अरचि प्रादि पेट के कष्ट
दूर होते हैं । मल मूत्र खुलकर आने से शरीर
के अन्दर के विकार वाहर निकल जाते हैं ।
विशेप-प्रतिदिन एक मिनट कीजिए।
टांगें कांपना, गिर-गिर पडना
कुसियो पर बैठे रहने, शरीर न हिलाने और दूसरो
पर हुक्म चलानेवाले की टाँगो, फेफडो, जाँघो और कूल्हो
मे रक्त-सचार सही नहीं हो पाता। उह मुष्टिवद्ध चक्र
प्रासन से लाभ उठाना चाहिए।
क खडे हो जाएं, दोनो पैर दो फीट की दूरी पर रहे।
ख दोनो हाथ सिर से ऊपर ले जाकर, दोनो हाथो की
उँगलियां एक-दूसरे मे फंसाकर, दोनो हाथो की एक
मुट्ठी क्सकर बांध लें।
ग श्वास अन्दर खीचकर रोकिए।
घ दोनो हाथो की इस मुट्ठी को वाई पोर झुकाय, इसके
साथ सिर तथा शरीर का ऊपरी भाग भी, बाई टांग
सीधी रहेगी, दाई टांग घुटने से थोडी मुडगी।
ड अव इस मुट्ठी को सिर वे इदं गिर्द वाई तरफ घुमाइए।
च य पांचो निणय प्रवदाई तरफ भुककर कीजिये।
यागासनों स इलाज
मुष्टियनचकामन लाभ-१. इससे वक्ष (छाती) की मासपेशियां सुदृढ़ होती हैं, सीना चौडा होता है, कधे मजबूत होते हैं। २. जिन्हें पब्ज रहती हो, उन्हे ताजा-स्वच्छ जल पीकर इस व्यायाम को करना चाहिए। विशेष-प्रतिदिन एक मिनट तक कीजिए। धातियां लटकना निधनता, घटिया खूराक, विपली जलवायु या घरेलू कलह में अधिक सन्तानवाले माता-पितानो के सीने पिल- पिले और सिकुडे-सिमटे-मे दिखाई देने लगते हैं । उन्हे द्विहस्तचत्रासन से स्वाभाधिक सुडोलता मिल सकती है। क. खडे हो जाइए । पैरो के पजो मे प्राधा फुट की दरी रहे। एडियां आपस में मिली रहे। ख. दोनो बाहे सामने लाकर हाथो को प्रामने-सामने लायें, पजे अन्दर की तरफ रहे। ग. दोनो बाहो को ढीला छोडकर एक-साथ ऊपर से नीचे की ओर, फिर नीचे से ऊपर की ओर घुमायें। योगासनो से इलाज
घ. दोनो बाहो को सामने से पहले पोछे की ओर, फिर
पोछे से सामने की ओर घुमायें।
द्विहस्तचक्रासन
लाभ-१. इससे हाथ से लेकर कधे तक की मासपेशियां
लचकदार, मजबूत, नीरोग तथा वलवती होती
२ सीने का स्वाभाविक विकास होता है और
छातियों का पिलपिलापन दूर होता है।
३ वायु के कारण होनेवाले रोग दूर होते हैं।
विशेष-यह प्रासन प्रतिदिन दो मिनट कीजिए।
सम्भोग, मासिक और प्रसव के विकार
जो पति-पत्नी सम्भोग का आनन्द नहीं ले पाते, जिन
स्त्रियो को मासिक कष्ट उठाना पड़ता है और प्रसव मे
योगासनों मइलाज
५८
१
जान निकलती-सी जान पड़ती है, उन्हे ऊर्ध्वपाद-विस्तृत- पासन से नवयौवन का आनन्द और स्वास्थ्य मिलने लगता क बैठवर दोनो टांगें पागे फैलाइए। ग्य दोनो पैरो को दाएं-बाएँ ले-जाकर अधिक से अधिक फैलाइए। ग सांस अन्दर खीचकर दोनो हाथो से दोनो पांवो के अगूठे पकड लीजिए। घ परी को अधिक-से-अधिक ऊपर उठाकर, चित्र मे दिखलाई गई स्थिति मे एक मिनट तक रोक रखने का प्रयत्न कीजिये। कध्वपाद विस्तृतासन लाभ-१ रीढ की हड्डी मजबूत होती है, कमर पतली तथा लचकीली होती है, पेट का मोटापा कम होता है, स्तभन होता है अर्थात् सभोग के समय शुक्र जल्दी नहीं बह जाता। २ यदि लडवियां चौदह वर्ष की अवस्था से ही इस आसन को करने लगें, तो उन्हे मासिक धर्म के समय होनेवाली पीडा दूर हो जाती है। मोगासना से इलाज बाद में शादी के उपरान्त उन्हे बच्चा होते समय प्रसव-पीडा नहीं के बराबर होती है। वच्चा होने के चालीस दिन बाद यदि वे इस योगासन को करने लगें तो प्रसव के कारण हुई दुर्बलता आदि दूर हो जाती है । इस आसन के निरन्तर अभ्यास से पचास वर्ष की आयु मे भी स्त्री अपने को तीस-पैतीस वर्ष जैसी रख सकती है। इस योगासन के अभ्यास से पेट, फेफडे, छाती, कधे, कमर, जाँघ, घुटने, पिंडलियाँ, कूल्हे, रीढ आदि सारे अगो मे फुर्ती और शक्ति आती है। गले के रोग, मोटापा, अजीर्णता जो लोग न व्यायाम करते है, न पैदल चलते है, उनका पेट भी साथ नहीं देता। नतीजा यह होता है कि अचार- चटनियो और मिर्च-मसालो से वे अपना पेट और भी विगाड लेते है । उन्हे अजीर्णता पा घेरती है । इससे गला खराब रहने लगता है। पेट निकलकर वाहर को प्रा जाता है । उन्हें तुरन्त द्विकोणासन आरम्भ कर देना चाहिये। द्विकोणासन योगासनी से इलाज का सीधे खड़े हो जाइए, पैर मिलाइये, एडियां ऊपर उठाइये, पजो के बल खडे हो जाइये। ख श्वास बाहर निकालिये। ग दोनो हाथो को घुटनो पर रखकर कमर से ऊपर के शरीर को आगे झुकाते जाइये और सिर को जमीन पर टेक दीजिये। घ एक मिनट तक इसी स्थिति मे रहने का प्रयत्न कीजिये। लाभ-१ इससे गले की नाडियां शुद्ध होकर गले के सब रोग दूर होते हैं। २ पेट अन्दर धंसता है और प्रेट, कमर, नितबो का मोटापा कम होता है। ३ अजीर्ण, अपच, अरुचि दूर होती है । ४ शरीर का हर-एक अग बलशाली बनता है। विशेष-प्रतिदिन एक मिनट तक कीजिये। रक्त दूषण और अग्नि मन्द होना रक्त दूषण हमेशा गलत खान-पान से होता है और इसके साथ ही पाचनशक्ति (हात्मे की ताकत) भी जाती रहती है । यहाँ तक कि सीना भी सिकुडने लगता है और शरीर निर्जीव होने लगता है। ऐसे लोगो को हस्त-पाद- विस्तृतासन से शरीर सुधार लेना चाहिये । हस्तपाद-विस्तृतासन योगासनो से इलाज
क. पीठ के बल लेट जाइये।
ख. दोनो वाहे दाएं-बाएँ फैलाइये।
ग. दोनों टांगें सिर की ओर लाकर दाएं-बाएं इस प्रकार
फैलाइये कि हाथों की अगुलियों को पैरों के अगूठे
छूने लगे । ध्यान रहे कि न तो टांगें मुडे और न वाहे,
अर्थात् टाँगे और बाहे अधिक-से-अधिक तनी रहे;
इसी तरह घुटने से टाँगे न मुड़ें और कुहनी से वाहे
न मुडें ।
लाभ--१. इस यासन से पीठ तथा छाती की मासपेशियां
लचकदार और मजबूत होती हैं ।
२. रक्त का संचार ठीक होता है और रक्त शुद्ध
होता है।
३. जठराग्नि बढती है और भूख खुलकर लगने
लगती है।
४ सारे शरीर का व्यायाम हो जाता है।
चेतावनी-गभिणी, हृदय-रोगी तथा रक्तचाप के रोगी
इसे कदापि न करे।
विशेष-प्रतिदिन एक मिनट तक कीजिये।
कमर भर जाना, पाचन (हाजमा) बिगड़ना
ज्यादा अन्न खाकर मेहनत कम करने से कमर फैलने
लगती है और बदन बेडौल हो जाता है । मूल म्प मे यह
पाचन की कमी का दोप है । पतली और लचीली कमर
बनाने के लिए शयनोत्थान कीजिये।
क. पीठ के बल लेट जाइये; टांगें सीधी लबी फैलाइये;
हाथों को सिर का तरफ सीधे लेजाकर तान दीजिये।
स. सांस बाहर छोडते हुए धीरे-धीरे सिर, गर्दन तथा हायो
को कार उठाते हुए बैठ जाइये; हाथ पर हो रहे
और हथेलियां सामने की अोर ।
योगामनोनवान
शयनोत्थानासन
ग. अव धीरे-धीरे कमर से ऊपर के शरीर को आगे की
ओर झुकाइये तथा नाक से घुटनों का स्पर्श कीजिये।
प. सांस छोडते हुए धड़ को उठाइये; बैठने की स्थिति
में रखिये-हाथ ऊपर उठे रहे, हथेलियां सामने की
भोर।
ड. सांस वाहर छोडते हुए धीरे-धीरे लेट जाइये।
लाभ--१. इस आसन से कमर सिंह के समान पतली
और मजबूत होती है। पेट अन्दर धंसता है;
मोटापा दूर होता है।
२. पेट के सारे विकार दूर होते हैं; भोजन पचाने
को शक्ति मे वृद्धि होती है।
विशेष-दो मिनट तक कीजिये।
भारीपन, थकान, मालस्य
काम से सूव थक जाने के बाद, व्यायाम तथा योगासन
के बाद, भारी थकानेवाली ग्रीडा के बाद तथा जोरदार
संभोग (मैथुन) के याद जव शरीर पूरी तरह थक गया
योगासनो रो इलाज
हो, तब इस पारान से शरीर को पुन: 'राम' - स्थिति में
लाया जा सकता है।
पूर्णयिधामासन
क. पीठ के बल भूमि पर लेट जाइये।
ख. हाथ कमर के पास ले जाइये।
ग. अग-प्रत्यग को ढीला छोड़ दीजिये और पूरी तरह
विथाम कीजिये।
घ. श्वास सहज रहे-न मन्द, न तेज़ ।
ड. सोच-विचार, चिन्ता और भय प्रादि भावनायें सर्वथा
त्यागकर विश्राम तथा शान्ति का अनुभव कीजिये।
लाभ-यह प्रासन शरीर को टूट-फूट की मरम्मत करके
तरो-ताजा गुलाब के फूल की तरह हल्का-फुल्का
बना देता है।
विशेष-प्रतिदिन व्यायाम अथवा योगासन के बाद इस
प्रासन को दो मिनट तक अवश्य करना चाहिये ।
इस आसन के करने से इन्द्रियों में, प्राणों में तथा
मन मे नई ताजगी, नवीन स्फूर्ति तथा अभिनव
शक्ति प्राप्त होती है।
योगासनो से इलाज
२
योगासन : कठिन और सर्वश्रेष्ठ
बलगमी खांसी और खट्टे डकार
अाज के मशीनी युग मे पानी और हवा भी दूपित हो
रहे है । कुछ लोगो के पास पैमा भी इतना जमा हो गया है
कि धूप मे दो कदम चलते ही प्राण सूखने लगते है । घरो-
दफ्तगे की तो बात ही क्या, कारें तक वातानुकूलित कर
दी गई हैं । मौसम के तापमान के अनुसार लोगो ने जीना
ही भुला दिया है। सर्द जमरोबारी से गर्म माहौल मे
वदम धरते ही गला पक्डा जाता है, सिर फटने लगता है,
ज्वर चढ़ पाता है, बलगम जमा हो जाती है सायापीया
पचता नहीं है और रात दिन खट्टे डकार आते रहते है।
उनके लिए योगमुद्रासन एक सर-महज नौषध है।
१ (क) कम्बल, चटाई या आसन पर चौकडी लगातर
वैठिये ।
(ख) दायें पैर को उठाकर बाईं जांघ पर रखिये, बाये
पैर को उठावर दाई जाँघ पर रखिये।
(ग) सुपुम्ना नाडी अर्थात् रीढ की हड्डी सीधी
रपिये।
(घ) दोनो हाथो को दोनो घुटनो पर रखिये।
यह पद्यासन की स्थिति है। इसके बाद--
यागासनो मे डनाज
६५
.
२. (क) दोनो हाथ पीठ के पीछे ले-जाकर बायें हाथ से
दायें हाथ की कलाई पकड़ लीजिये।
(ख) रीढ की हड्डी सर्वथा सीधी रखिये ।
(ग) अांखें बन्द कीजिये।
(घ) धीरे-धीरे सांस वाहर छोडते हुए आगे की ओर
झुक्येि।
(ड) आगे की ओर झुकते-झुकते मस्तक धरती पर
टिका लीजिये।
(च) कुछ देर सांस बाहर रोककर सांस अन्दर
खीचिये।
(छ) श्वास अन्दर खीचते हुए धीरे-धीरे उठकर
'क'(२) स्थिति मे पाइये।
योगमुद्रासन
लाभ-१ इससे जठराग्नि (पाचन-शक्ति) बढती है।
कब्ज, अपच, बदहज़मी दूर होती है।
२ श्वास-पथ (गले, कण्ठनली मादि) मे बनगम
(श्लेष्मा) हो तो वह वाहर निकल आती है
और गला साफ हो जाता है।
सूचना-अपने पास एक छोटा तौलिया रखना चाहिये
ताकि कफ साफ किया जा सके।
योगासनो से इलाज
फेफड़ों में दर्द, हाथों में जान नही
जिन मजदूरों, टाइपिस्टों, चित्रकारों और लेखकों को
उंगलियों से निरन्तर काम लेना पड़ता है, उनके पीठ और
सीने में दर्द रहने लगता है और कलाइयों की गोलाइयाँ
निरन्तर तनाव में रहने के कारण बेडौल हो जाती हैं।
उनके लिए कुक्कुटासन सर्वोत्तम सहायक है।
(क) पद्मासन में बैठ जाइये।
(ख) दोनों हाथ टांगों में से निकालकर फर्श पर रखिये।
(ग) दोनों हाथों पर पूरा बोझ देते हुए पद्मासन लगी हुई
स्थिति में ही शरीर को ऊपर उठा लीजिये।
(घ) तीस सैकण्ड तक इस स्थिति में रहकर शरीर को
भागे-पीछे हिलाइये।
(ड) यही अभ्यास अब टांगों में से बाहें निकालकर
कीजिये।
कुक्कुटासन
योगासनो से इलाज
७
लाभ-१ इस आसन से हाथो की नस-नाडियाँ मजबूत
हो जाती है।
२ वडी आयु के व्यक्ति, जिनके हाथो की नसे
कमजोर हो, हाथ कांपते हो, पीठ या स्कध
(कन्धे) मे पीडा होती हो, उन्हे, इमसे प्राराम
होता है।
३ इस प्रासन के करने से मोटे और चर्बीले हाथ
चुस्त और फुर्तीले बनते है । कलाइयां सुडौल
तथा पुष्ट होती हैं।
विशेष-एक बार मे तीस सैकण्ड तक करने का अभ्यास
कीजिए । अभ्यास बढाते-बढाते दो मिनट तक इस
स्थिति मे रहने की सामर्थ्य प्राप्त कीजिए।
क्रॉनिक ब्रोकाइटिस, ब्रोंकाइटिस-दमा, नजला
जिनका बचपन मे खसरा या निमोनिया का इलाज
अधूरा रह गया हो, जिन्हे वचपन मे माता-पिता गला
घोटकर पीटते रहे हो, जो स्वभाव से दुर्बल-क्रोधी रोगी-
चिडचिडे-झगडालू हो, जिन्हें वात-बात पर गुस्सा चढ
पाता हो, जा घुट-घुटकर जी रहे हो, जो सीलन व दुर्गन्ध
भे रहते हो, उनकी श्गस-प्रणालिका मे सूजन आ जाने से
दमघोटू खांसी, नजला और सूर्य के विकार पैदा हो जाते
हैं। उन्ह मत्स्यासन सुबह-शाम करना चाहिए ।
(क) पद्मासन लगाइए।
(ख) कुहनियो का सहारा लेकर पीठ तथा गर्दन पीछे की
तरफ झुगाते जाइए।
(ग) सोने को धनुप की तरह बनाते हुए सिर के पिछने
भाग को धरती पर टेक्एि।
(घ) सिर के पास दोनो हाथो से जमीन का सहारा लेकर
योगासनो स इलाज
मत्स्य-मासन
--
जहां तक सम्भव हो पीठ को जमीन से ऊँचा
उठाइए शरीर को धनुष की भांति तान दीजिए--
छातीवाला भाग आकाश की ओर होगा और सिर
धरती पर ही टिका रहेगा।
(ङ) दोनों हाथों से दोनों पैरों के अंगूठे पकड़ लीजिए।
(च) ऊपर के दांतों को निचले दांतों पर कसकर दबा
लीजिए।
(छ) धीरे-धीरे गहरी साँस अन्दर खींचिए ।
(ज) अब साँस बाहर छोड़िए।
(झ) हाथों का सहारा लेकर सिर तथा पीठ धरती पर
रख लीजिए, कुहनी का सहारा लेकर उठकर बैठ
जाइए (पद्मासन में)।
लाभ-- (१) देर तक अभ्यास करते रहने से ब्रोंकाइटिस,
दमा प्रादि असाध्य (लाइलाज) समझे जाने
वाले रोग भी दूर हो जाते है।
(२) स्वास-संस्थान के अन्य रोग-मस्तक का
नजला, कान का नजला, नाक का नजला,
बिगड़ा हुअा जुकाम प्रादि रोग दूर होते हैं।
प्रश्मरी (पत्थरी) का शर्तिया इलाज
वैसे तो जिगर, तिल्ली और गुर्दे के सभी विकार
मयूरी-प्रासन से दूर किये जा सकते हैं, किन्तु पत्थरी को
योगासनी मे इलाज
तो तोड-फोडकर शरीर से निकाल देने की क्षमता भी इस
योगासन मे है। जो लोग ऑपरेशन से बचना चाहते हो,
उन्हे योग का सदियो पुराना यह अनुभूत उपाय शतिया
तौर पर पाराम देगा।
मयूरी प्रासन
(क) पद्मासन लगाइए।
(ख) दोनो हथेलियो को सामने की ओर इस प्रकार
रखिए कि उँगलियो का मुख आपके शरीर की
तरफ रहे और दोनो हथेलियाँ बिल्कुल पास-पास
(ग) दोनो कुहनियाँ पेट से सटा लीजिए।
(घ) हथेलियो पर भार डालते हुए सिर, पैर, धड तथा
कमर को धरती से ऊपर उठा लीजिए। इस तरह
सारे शरीर का बोझ सिर्फ दोनो कुहनियो या हाथो
पर रहेगा।
चेतावनी-
-इस आसन का अभ्यास एक-दो दिनो मे सिद्ध
नहीं होता, परन्तु जो निराश नही होते उन्हे
इस आसन में अवश्य सिद्धि प्राप्त होती है।
शुरू मे कुछ दिन सामने तकिया रख लीजिए
ताकि नाक या मुखडे पर चोट न पाए।
लाभ-(१) जिगर, पित्ती, तिल्ली तथा गुर्दे (विडनी के
सब रोग) इस आसन से दूर होते हैं। रवे
यागासनो स इनाम
की शक्ल मे गुर्दे मे मौजूद पत्थरी इस आसन
के द्वारा पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाती
(२) इससे सुषम्ना चैतन्य, स्वस्थ तथा जागृत्
होती है और अपना काम ठीक ढग से करने
लगती है।
कमर टूटना, सर्दी-जुकाम-खांसी, ब्रोकाइटिस
अधिक बोझ उठाने, अधिक सम्भोग करने, दूषित
जलवायु के प्रकोप और घटिया खुराक के कारण कमर से
जांवो तक के बस्ति-प्रदेश मे शिराप्रो की टूट-फूट अधिक
हो जाती है । सुप्तवज्रासन द्वारा तुरन्त भरपाई (क्षति-
पूर्ति) होने लगती है और मनुष्य हमेशा ताजादम बना
१-(क) दोनो पैरो को पीछे मोडकर घुटनो के बल
वैठिए। दोनो एडियो के बीच मे कूल्हो का
निचला भाग रखिए। पैरो का ऊपरी भाग
जमीन पर रहे । एडियो को पजो के बल खडा
मत रखिए, बल्कि कूल्हो के नीचे दबाइए।
(ख) अपने दोनो हाथ जांघो पर रखिए। रीढ की
हड्डी सीधी रखिए।
रहता है।
सुप्तवज्रासन
योगासनो से इलाज
७१
-(क) अब धीरे-धीरे पीछे को पोर झकिए ।
(स) वक्ष को कमान की तरह बनाइए; सिर को
धरती पर टेक दीजिए।
(ग) दोनों हाथों को दोनों जांघों पर रखे रहिए।
(घ) धीरे-धीरे ऊपर उठकर शुरू की स्थिति में प्रा
जाइए।
लाभ-(१) इससे बस्ति-प्रदेश (कमर से नीचे और जांघों
से ऊपरवाले भाग के सब रोग दूर होते हैं।
कमर मजबूत होती है।
(२) वक्ष के सव रोग दूर होते हैं। सर्दी, जुकाम,
खांसी, ब्रोंकाइटिस प्रादि श्वास-पथ के रोग
मिट जाते हैं।
(३) पैरों के कष्ट दूर होते हैं। पैरों में लचक पैदा
होती है और उनमें कोई रोग नही होने
पाता।
गले, नाक, कान और दांत के रोग
गर्दन से ऊपर का हिस्सा इतना नाजुक और उपयोगी
है कि एक-एक अग की कीमत संसार के सारे ग्वजाने नहीं
चुका सक्ते, इसलिए योगियों ने इनको बचाने के लिए सूर्य
रश्मियों का अद्भुत प्रभाव ग्रहण करने का उपाय खोज
निकाला। प्रात -कालीन मूर्य की किरणे ग्रहण करके गले,
नाक, कान, आँख, दाँत और दिमाग के जीर्ण रोगों को भी
दूर किया जा सकता है । इसके लिए शेर की तरह जिता
लपलपाइये।
(क) सुप्तवज्रासन की भांति टांग मोडकर कूल्हों के
नीचे टिकाए। थैलियाँ दाय-बायें (प्राजू-बाजू)
भूमि पर रखिए। पीठ को आगे झुकाइए तथा जीभ
योगासनो मे इलाज
।
७२
जितनी वाहर निकल सके, निकालिए। सूर्य का
प्रकाश मुंह के अन्दर जाने दीजिए।
(ख) आँखें बन्द रखिए तथा ध्यान कीजिए कि सूर्य की
धूप से आपके मुख तथा गले के सब कीटाणु नष्ट
सिंहासन
लाभ-(१) इस योगासन से टासिल का रोग दूर होता
है। गले के सब कष्ट मिटते हैं। प्रतिदिन
लगातार पांच मिनट करने से टासिल का
ऑपरेशन करवाने की अावश्यकता नहीं
रहती।
(२) नाक, कान तथा दांतों के रोगों में इससे बहुत
लाभ होता है।
विशेष-सूर्योदय के समय सामान्यतः प्रतिदिन एक मिनट
तक करें; परन्तु टांसिल के रोगवाले व्यक्ति प्रति-
दिन पांच मिनट तक करें।
योगासनो में इलाज
मूत्र-रोग और अतिसार (दस्त)
बार-बार पेशाव या शौच जाना कोई रोग नहीं है,
बल्कि शरीर के विषैले तत्त्वो को बाहर निकालने की एक
ज़रूरी कोशिश है । अगर यह दिखाई दे कि पेशाव या मरोड
बन्द ही नहीं होते तो पट्पद अर्थात् भंवरा वनने का अभ्यास
कीजिए।
१ (क) वज्रासन में बैठिए (सुप्तवज्रासन का क-ख
भाग कीजिए), दोनो एडिया को कूल्हो से लगा-
कर पैरो के पजो को सीधा करके दायें बायें
फैलाइये । दायें हाथ को दाई पिंडली तथा जांध
के और बायें हाथ को बाइ पिंडली तथा जांघ
के नीचे से इतना निकालिए कि कुहनियां अन्दर
हो जायें।
पटपदामा
(भ्रमरामन)
२ (ख) रीढ़ की हड्डी सीधी रखते हुए साम धीरे-धीरे
वाहर छोडिए।
(ग) सांस बाहर छोड़ने के साथ माथ शरीर को प्रागे
की ओर झवाइए तथा धीरे-धीरे ठोडी वो भूमि
पर टेक दीजिये।
योगासना मनाज
(घ) थोडी देर श्वास रोकिये, फिर श्वास बाहर
छोडिये।
(ड) धीरे-धीरे श्वास अन्दर खीचते हुए अपर को
उठिए और पहले की स्थिति मे आ जाइये।
लाभ-(१) इसमे अतिसार (डाइसेटरी) का कष्ट दूर
होता है।
(२) अधिक मूत्र-रोग दूर होता है।
(३) जिगर (यकृत) तथा गुर्दे (वृक्क) के रोग
दूर होते है।
विशेष-प्रतिदिन एक मिनट तक कीजिये।
झुरियां, सूखा, जवानी मे वुढापा
प्रतिकूल परिस्थितियो के थपेडो से आज का इन्सान
इस बुरी तरह से टूट गया है कि बाल उगते दाद मे हैं और
सफेद पहले ही पड़ जाते है, बदन सूखने लगता है, हाजमा
बिगड जाता है, झुरियो से चेहरा अटने लगता है और
जवानी से पहले बुढापा आ जाता है। ऐसे अभागो को
मत्स्येन्द्र की तरह योगासन जमाना चाहिये।
१ (क) कम्बल या दरी पर बैठ जाइये ।
(ग्व) दार्या पैर पद्मासन की तरह वाईं जांघ पर
(जघामूल मे) रखिये।
(ग) बायें पैर यो, घुटना मोडकर, दाई जांघ की
तरफ खडा करके रसिये।
(घ) दायां हाथ वायें पैर की वाई तरफ ले जाकर
दाई हथेली से वायें पैर वा पजा पकड
लीजिये।
(ड) वायें हाथ को पीठ के पीछे से ले जाकर दाई
जांध छू लीजिये।
योगासनो से इलाज
(च) अब गर्दन को वाईं तरफ जहां तक घुमा सकें
घुमाइये।
२. ऊपर लिखी क्रिया को प्रब दूसरे हाथ-पैर से कीजिये।
मत्स्येन्द्रासन
लाभ-(१) इससे मुखड़े पर तेजस्विता तथा कानि आती
(२) सारे शरीर का रक्त शुद्ध होकर कायाकल्प
हो जाता है।
(३) गरीर की सारी अस्थियो, नस-नाड़ियों,
मासपेशियों तथा ग्रन्थियों के रोग दूर हो
जाते है और स्फूर्ति प्राप्त होती है ।
(४) पुराना अतिसार (दस्तों की बीमारी), पेट
मे कीड़े, नसों की कमजोरी ग्रादि दूर होती
विशेष--गुरू में यह प्रामन वठिन प्रतीत होगा, परन्तु
घबराने की आवश्यकता नहीं। कुछ दिन निरन्तर
अभ्यास करने में, अपने-ग्राप सिद्ध हो जायेगा।
प्रतिदिन दो मिनट नक कीजिये।
योगासनो मेहनाजी
प्रमेह, मधुमेह, धातुदौर्बल्य
संसार मे ऐसा कोई डॉक्टर पैदा नही हुआ जो नारी
और पुरुप के यौनागो मे पाये विकार एक ही दवा से
कर सके । भारत के योगियो को ही यह कमाल हासिल है
कि शूगर पाती हो, प्रदर-रोग हो या वीर्य मे शुक्राणु दुर्बल
हो, उन्होने गोमुखासन की सरलतम और रामवाण विधि
आविष्कृत कर दी।
गोमुखासन
(क) पालथी मारकर बैटिये ।
(स) बायां पैर मोडकर एडी तथा पैर को दाएँ कूल्हे के
नीचे रसिये।
(ग) दायाँ पैर मोडवर वाई तरफ इस तरह रसिए कि
दायां और बायाँ घुटना एक-दूसरे के ऊपर-नीचे हो,
दायें पैर का पजा तथा एडी बायें कूल्हे के पास रहे।
(घ) दायाँ हाथ दायें कधे पर से धुमाकर पीठ की तरफ
ले-जाइये, वायां हाथ बाई वगल के नीचे से पीठ
की तरफ ले जाइये।
योगामनी से इलाज
(ड) सिर दाई कुहनी पर रसिए (यह चित्र मे नही
लाभ-(१) गर्दन की पीडा, मधुमेह (डायबिटीज),
प्रमेह (वार-बार पेशाव प्राना), चोर्य की
दुर्बलता, स्त्रियो की ल्यूकोरिया आदि बीमा-
रियां दूर होती हैं।
(२) हाथो की नस-नाडियो की दुर्वलता दूर होती
(३) अण्डकोश नही बढते।
विशेष-प्रतिदिन दो मिनट तक कीजिए।
बवासीर, भगन्दर, मधुमेह
कूर्म अर्थात् कछुए का मुंह बाहर कोहो तो अलग आसन
बनता है, अन्दर छिपाया गया हो अलग, दोनो टखनो से
गुदा-भाग को रोकने से अलग और एडियां टकर
अण्डकोशो के नीचे रखने से अलग कूर्मासन बनता है । यहाँ
बवासीर और भगन्दर के इलाज का उपयोगी स्वरूप बताया
जा रहा है।
(क) बैठकर घुटने मोडिये, पांव कूल्हो के नीचे रक्खें,
अन्दर वाले टखने, जमीन को छूने लगें।
(ख) प्रागे को झुककर हाथो के पजे घुटनो के पास
जमीन पर फैला दें, कुहनिया मोडवर घटनो के
आज-वाजू रखें छातियां जघानो से छूने नगें,
दृष्टि नासिका की नोक पर रहे।
(ग) गुदा के दायी ओर दायां टखना और वायी ओर
बायां टखना जमाएं।
(घ) सिर और गर्दन आगे को कमर की सीव मे रससे ।
लाभ -(१) मधुमेह (डायविटीज) का रोग दूर होता है।
योगासनो म इलाज
Ju
aapa
कूर्मासन
(२) अन्तडियों की सब बीमारियों में आराम
होता है।
(३) काला बाजार के वाद का असर दूर होता
(४) बवासीर और भगन्दर से मुक्ति मिलती है।
विशेष-प्रतिदिन दो मिनट तक कीजिए।
आवाज बेसुरी निकलना, फेफड़े दुर्वल होना
गायक-गायिकानों का स्वर-यन्त्र ही उनका जीवन है।
उनके फेफड़े सशक्त होंगे तो स्वर भी सही और खुलकर
निकलेंगे। संगीत-साधकों के लिए नौकासन एक तरह से
ईश्वरीय वरदान है।
(क) पीठ के बल लेटिये।
(ख) दोनों हाथों को मुट्टियां बांधकर अपनी दोनों बगलों
में रखिए।
(ग) सिर तथा पैरों को एक-साथ भूमि मे चार इंच
ऊपर उठाइए।
योगासनों से इलाज
(घ) साँस रोक लीजिये । दम घुटने से पहले ही मांस
धीरे-धीरे छोड़िये।
.
नौकासन
लाभ-(१) वक्ष (छाती) तथा फुफ्फुस (फेफडे) बलवान
बनते है।
(२) श्वासयन्त्र (गला, स्वर-यन्त्र, श्वासनली,
फेफडे) के रोग दूर होते है।
विशेष प्रतिदिन एक मिनट तक कीजिये।
श्वास के रोग, प्राधे सिर का दर्द
जय विरोधी मान-पान, विरोधी विचारों, विरोधी
मोममो और विरोधी विकारो का आश्मण होता है तो
प्राधे मिर का दर्द रहने लगता है और स्वास के कई रोग
था लगते है । भुजगामन अर्थात सांप यो स्थिति में शरीर
लाने मे तुरन्त लाभ होने लगता है।
(ग) पेट के बल लेटिये।
(प) दोनो हथेलियो को सामने भूमि पर रसिये, दोनो
कुहनियां बगलो से सटी हुई रहे।
(ग) दोनो पैर परस्पर सटे हुए रहें तथा पजे भूमि पर
(घ) धीरे-धीरे साम लेते हुए पीठ और वक्ष (छाती) के
भार यो हाथो पर डालते हुए कमर से ऊपर या
गरीर ऊपर उठाइये।
योगासनों रोहसान
1
गिरेहए।
भुजगासन
(ड) आँस चन्द वीजिये। थोडी देर श्वास रोककर
कुम्भा कीजिये।
(च) धीरे-धीरे श्वास बाहर छोडते हुए सिर, पीठ तथा
मीने को नीचे लाते हुए जमीन पर लाइये।
- (१) आधासीसी अर्थात् प्राधे सिर का दर्द बहुत
कष्टदायक होता है और साधारणत दवामी
से ठीक नहीं होता। यह प्रामन करने से
अवश्य पाराम होता है।
(२) इस योगासन से खांसी, दमा, ब्रोकाइटिस
आदि रोगो का भय नहीं रहता और अगर
ये रोग पहली अवस्था (First Stage) मे हो
तो अवश्य दूर हो जाते हैं।
विशेष--यह ग्रामन प्रतिदिन दो मिनट कीजिये।
जोडो का दर्द, स्वप्नदोष, मिर्गों
चिन्ता और दुर्बलता के साथ जब नान-पान की भी
व्यवस्था न रहे तो मौसम भी प्रतिकूल हो जाते है। पेट
यागासनाशाज
खराब रहता है और कन्ज़ के कारण स्वप्नदोप, सर्दी लगने से गठिया और जोड़ों के दर्द, ऊपर से हालात की मार पड जाय तो मिर्गी-मूर्छा भी पाने लगती है। उनके लिए बद्ध- पद्मासन अद्भुत प्रयोग है। यद्धपपासन (क) सर्दियों में कम्बल पर और गर्मियों में चटाई पर बैठ जाइये। (ख) दोनों पैर सामने फैलाइये। (ग) दायां पैर उठाकर बाई जांघ पर रखिये। (घ) बायर्या पर उठाकर दाईजांघ पर रखिये। (ङ) दायां हाथ पीठ के पीछे से ले-जाकर बायें पर का अंगूठा पकडिये तथा वायां हाथ पीठ के पीछे से ले- जाकर दायें पर का अंगूठा पकड़िये। योगासनों से इलाज २ लाभ-(१) इस योगासन के करने से गठिया रोग मिटता (२) कब्ज दूर होती है तथा भोजन ठीक-ठीक पचने लगता है। स्वप्नदोष रुककर वीर्य- स्तम्भन हो जाता है। (३) शरीर की चर्बी छटकर देह सुडौल होती है। (४) वहम और चिन्तामों से मुक्ति मिलकर मिर्गी जाती रहती है। बार-बार सम्भोग (मथुन) की इच्छा अतिशय कामुकता भी एक भयंकर रोग है । यह ऐसी वासना है जिससे मुक्ति पाना सहज नहीं । अन्य सभी दवा- उपाय शरीर को ठंडा करके नपुंसक बना देते है, जबकि सिद्धासन के अभ्यास से व्यक्ति अपने-आप ब्रह्मचर्य की ओर उन्मुख होने लगता है। (क) बायें पैर को मोड़कर उसकी एड़ी मलद्वार (गुदा) के समीप रखिये। (ख) दाई एड़ी मूत्रद्वार (लिंग या योनि) के ऊपर रखिये। (ग) दायां पंजा बाई जाये तथा बायें पांव के मध्य में रखिये। (घ) बायां पंजा दाईं जांघ तथा दायें पौव के मध्य में रखिये। (ङ) दोनों हाथों को दोनों घुटनों पर रखिये। (च) दृष्टि को नाक के अगले भाग पर गड़ाइये। लाभ-(१) इस आसन के करने से सब रोग नष्ट होते हैं। (२) वीर्य की रक्षा होती है। ब्रह्मचर्य की साधना में सहायता मिलती है। मोगासनों से इलाज
सिद्धासन
(३) कुण्डलिनी शक्ति जाग उठती है।
विशेष-प्रतिदिन दो मिनट कीजिये।
मोटापा, वातरोग
चक्रासन की तरह अर्ध-चक्रासन से भी मनोवाञ्छित
फल प्राप्त किये जा सकते है। जिनका शरीर अदबदाकर
फूलने लगता है और वात-रोग सताता है, उन्हे इसका
प्रद्धचक्रासन
योगासनो से इलाज
लाभ- अभ्यास करके अवश्य लाभ उठाना चाहिये। (क) पीठ के बल लेट जाइये। (ख) सिर तथा परोको भूमि पर ही रहने दीजिये-पीठ, कूल्हे तथा गर्दन का भाग भूमि से ऊपर उठाइये। (ग) दोनो हाथों को दोनो जांघो पर रखे रहिये। -(१) इससे मेरदण्ड की क्शेरुकायें (रीढ की छोटी-छोटी हड्डियाँ) मजदूत होती है । (२) वात के रोग नष्ट होते हैं। (३) नम-नाडियो के विकार दूर होकर उन्हे पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त होता है। विशेष-प्रतिदिन एक मिनट कीजिये। रीढ की अस्थि (हडडी) के विकार लम्वे बद के पुरुपो और स्त्रियो की रीढ की कशेरुकाये जवानी मे ही दुर्वल पड़ने लगती है और बुढापे मे मेरुदण्ड ही कमान होने लगता है। बुढापे मे सीना तना रहे और गर्दन उठी रहे, इसके लिए निम्न विधि अपनाय । (क) पीठ के बल लेट जाइये। (ख) दोनो हाथो को सामने रखिये, कमर के दोनो ओर सटाकर। (ग) धीरे-धीरे कमर से ऊपर के भाग को वाधा उठाइये। (घ) पर मीधे भूमि पर रह, घुटने न मुडने पाय । (ड) अब दोनो हाथ पैरो के समानान्तर, किन्तु वायु मे उठे हुए रहगे, तथा पीठ पीछे की तरफ लटकी हुई ऐसी स्थिति में होगी जैसे प्राप उठने की चेष्टा करते-करते वीच में ही रुक गये हैं। इसके बाद हथेलियां जमीन पर टिकाकर शरीर हवा में उठा लें, पैर जमीन पर रहे। पागायनामइलाज
हस्तस्थित मेरुदण्डासन
साभ -(१) इस आसन से वक्ष (छाती) की मासपेशियां
बलवती तथा हड्डियां मजबूत होती हैं।
(२) मेरुदण्ड (रीढ की हड्डी) के विकार दूर
होते हैं।
विशेष-प्रतिदिन एक मिनट कीजिये।
प्रांतों के विकार
जिन व्यक्तियो से पेट के बल लेटना मुश्किल हो, मातो
में ऐंठन रहे, कमर मौर जांघो के जोड टूटते-से लगें, उन्हे
मोगासनों से इसाब
पतगे के रूप मे शरीर को साधना चाहिए।
(क) औधे लेट जाइये।
(ख) दोनो हाथो को जांघो के नीचे रखिये।
(ग) सिर, कन्धे तथा पेट ज़मीन से लगे रहे। पैरो को
जांघो के साथ जमीन से ऊपर उठाइये।
शलभासन
लाभ-(१) इससे अन्तडियां सबल होती हैं तथा पेट के
सारे विकार (बदहामी, कब्ज, अपच और
पेचिश आदि) दूर होते हैं।
(२) बस्ति-गह्वर (नाभि से नीचे और जांघों से
ऊपर) के सारे रोग दूर होते हैं।
(३) मेरुदण्ड (रीढ की हड्डियो) को बहुत बल
मिलता है।
पेट के कीडे, प्रांव आना
मिट्टी, स्लेटी, अनघोई सब्जियां-सलाद आदि चबाने-
खाने या कोडोवाले फल खा जाने से पेट मे कोडे पड जाते
है। गरिष्ठ भोजन से रुकाव आ जाने पर पांव पाने
लगती है और वात-रोग बढ़ जाता है। ऐसे लोगो को
धनुरासन सही रहता है।
१ पहले धनुरासन नीचे लिखे ढग से कीजिये--
क पेट के बल लेट जाइये।
योगासनो से इलाज
ख दोनो घुटनो को मोडिये।
ग दोनो हाथ पीठ की ओर ले जाकर टखनो के पास
टॉमें पकड लीजिये।
घ अब जांघो, सिर तथा वक्ष को भूमि से ऊपर
उठाइये।
ड पैरो को हाथो द्वारा दृटता से पकडकर पैरो को
आगे की तरफ तथा हाथो को जहाँ तक हो सके
पीछे की ओर खीचिये।
इसमे सम्पूर्ण शरीर की प्राकृति धनुष के समान हो
जायेगी।
२ अव सचरण कीजिये-
क धारामन करने के उपरान्त आगे पीछे भूलिये।
ख श्वास रोक लीजिये।
धनुरासन
लाभ-१ इम ग्रामन से पेट के कीडे नष्ट होते हैं।
२ इमसे जठराग्नि (भोजन पचानवाती अग्नि)
भगवनी है।
३ पार पाने का रप्ट दूर होता है।
४ वान के विकार नष्ट होते हैं।
योगागनो मताज
८९
५. अन्तड़ियों की दुर्बलता दूर होती है। जिगर
तथा गुर्दे की बीमारियां दूर होती हैं ।
दुर्बल बाहें, निर्बल हाथ
जिन्हें जन्म से मुसीबतों में जीना पडा हो, या सूखे का
रोग लग गया हो, या पीलिया जैसे रोगों ने दुबला दिया
हो, उनके हाथों और वाहों को पुष्ट-वलिष्ठ बनाने के लिए
वगुले जैसा आसन कराना चाहिये।
क. सीधे सड़े हो जाइये।
ख. आगे झुकिये, दोनों हथेलियां पैरों के सामने जमीन
पर टिका दीजिये।
ग. कुहनियों को थोड़ा झुकाइये तथा उनके ऊपर वाले
हिस्से पर दोनों घुटनो को मोड़कर मजबूती से बगलों
मे जमा दीजिये।
वासन
घ. पैरों को उठाकर कुहनियों के सामने, कूल्हों की ओर
इ. सारे शरीर को कुहनियो पर तोलकर रखिये।
ले-जाइए।
योगासनो मे इलाज
८६
च सांस साधारण रूप से लेते रहिये। छ इस स्थिति मे अधिक-से-अधिक देर तक रहने का प्रयत्न कीजिये। प्रारम्भ मे यह आसन कठिन होगा, परन्तु लगातार करते रहने से सिद्ध होगा। लाभ--१. हाथो और बाहो को बल मिलता है और उनकी मासपेशियां मजबूत होती है । २ वक्ष (छाती) तथा कन्धे पुष्ट होते है। तालु फूलना, भूख न लगना तालु किसी-किसी का ही बढता है, मगर इससे खान- पान हराम हो जाता है। अगर हसासन का अभ्याम करके नासिका को जमीन से लगाने की सिद्धि कर लें तो तालु अपने स्थान पर लौट जायेगा और भूख चमकने लगेगी। क सीधे खडे हो जाइये। हसासन ख. आगे मुकिये और दोनो हाथो को हथेलियां पैरो के सामने जमीन पर मजबूती से जमाइये । ग. उकडं होकर बैठिये। योगासनों से इलाज १० घ दोनो घुटनो से कुहनियो को बाहर की ओर से दवा लीजिये। ड गर्दन को आगे बढाते हुए नाक से भूमि को छूने का प्रयत्न कीजिये । इसमे बहुत सन्तुलन रखना पड़ेगा। शुरू मे सामने कोई तकिया रख लीजिये, ताकि नाक या मुंह पर चोट न लगे। वक (बगुला) आसन का अभ्यास होने के उपरान्त हस आसन आसान हो जाता है। लाभ-मन्दाग्नि और भोजन मे अरुचि दूर हो जायेगी अर्थात् जमकर भूख लगेगी। मुख्य रोग है तालुका फूलना, जो हसासन से दूर होकर सहज स्वास्थ्य प्राप्त हो जायेगा। वात, पित्त, कफ के त्रिदोष अधिकाश व्यक्ति अनुचित खान-पान से ही विकार- ग्रस्त होते हैं और वे विकार वात-पित्त-कफ की उग्रता के कारण एक ओर तो गैस और बायगोला पैदा करते हैं और दूसरी ओर मेदा, जिगर, तिल्ली आदि उदर-यन्त्र को बिगाड देते हैं। उन्हे मयूरासन से विशेष लाभ होगा। क खडे हो जाइये। ख दोनो हाथो को पैरोसे परे जमीन पर दृढता से जमा दीजिये। ग पूरक प्राणायाम कीजिये। घ भव सिर को आगे की प्रोर बढाइये तथा पैरोको पीछे की तरफ पूरी तरह फैला दीजिये। ड शरीर यो लाठी के समान सीधा करके पूरी तरह सन्तुलित कीजिये। च शरीर का सारा भार हाथो तथा कुहनियो पर रहेगा। [बहुत अभ्यास के बाद ही इस भासन मे सिद्धि प्राप्त होती है।] योगासनो से इलाज
मयूरासन
लाभ-१ वात, पित्त, कफ के सारे विकार दूर होते है।
२ गुल्म (वायगोला), उदर-वात, गैस के कष्ट
दूर होते हैं।
३ मेदा (आमाशय), यकृत (जिगर), प्लीहा
(तिल्ली) के रोग नष्ट होते हैं।
नारी-काया की दुर्बलता और सीने से पेट भागे
जव बदन तो इकहरा और अविकसित हो, मगर पेट
बढता जाय तो इसका मतलब है कि आप ज़बर्दस्ती मोटा-
चिकना खाकर मास चढाने की कोशिश में हैं। इस स्थिति
मे श्रद्धासन करके खाये-पिये की शक्ति पेट से मोडकर पूरे
बदन मे फैला लीजिये । महिलामो के लिए यह अत्यन्त
अनुकूल है।
क पेट के बल (ौंधे) लेट जाइये । पेट के नीचे तकिया
रख लीजिये।
ख दोनो हाथो को सिर की अोर सीधे भूमि पर फैलाइये
या सिर के नीचे रख लीजिये।
ग सम्पूर्ण शरीर को, अग प्रत्यग को ढीला छोडकर पड
जाइये।
घ न कोई चेप्टा कीजिये, न कुछ सोचिये, पूर्ण विश्राम
कीजिये।
यागासनो से इलाज
६२
श्रद्धासन
लाभ-वायु के रोग दूर होते है, बाहर को फूला हुआ पेट
सीने के साथ लग जाता है।
बदन थुलथला, पेट पहाड़
जिन मर्दो के शरीर वा से फूल गये हा और पेट की
यह हालत हो कि अपनी ही अाँखो से अपने घुटने देख
सकना कठिन हो, उन्हे उच्च श्रद्धासन को दो विधियो से
वदन हल्का-फुल्का बना लेना चाहिए।
क. सरकडों के मोदे, स्टूल या लकडी की पेटी पर कपडा
बिछाकर उस पर पेट के वल लेटिये । पैरो के पजे
जमीन पर रहे और हाथो कीथेलियाँ भी जमीन पर
रहे।
उच्चश्रद्धासन
ख धीरे-धीरे एम-साथ पैरो तथा हाथो को ऊपर उठाइये,
न घुटने मुडने पाये, न कुहनियाँ । चित्र ग्रागे देसे--
योगासनो से इलाज
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उच्चश्रद्धासन ग. सन्तुलन बनाये रखने की कोशिश कीजिये। लाभ-पेट बहुत अधिक बाहर को फूला हुआ हो, तो धीरे-धोरे पीछे हटने लगता है। छ: मास निरन्तर करते रहने से पेट छाती से पीछे भी हट सकता है। ज्वर के साथ हाथ-पांव टूटना यह प्रभाव तभी देखने में आता है जब शरीर में दूपित तत्व जमा हो जाते है । ज्वर के द्वारा हमारा शरीर तुरन्त बता देता है कि अब सतर्कता के साथ उपाय बरतने की जरूरत है। मगरमच्छ की तरह हथेलियों और पंजों पर अपना बदन धरती से ऊपर उठाकर रेंगिए । पसीना खुल- कर आयेगा और विपैला माद्दा निकलने लगेगा। क. पेट के बल लेटिये। ख. दोनों हाथों को वक्ष के दायें-बायें रखिये। NA मकरासन योगासनों से इलाज ग. पूरक व्यायाम कीजिये। घ. कुहनियां खड़ी करके हथेलियों पर वक्ष का सारा डालिये। ड. पैरों के पंजों पर कमर से नीचे का सारा भार डालिये। च. अब हाथों-पैरों को आगे-पीछे रखते हुए आगे-पीछे चलिये। लाभ-१. इस भासन से सम्पूर्ण शरीर का खूब व्यायाम हो जाता है। रक्त शुद्ध होकर शरीर में ठीक- ठीक संचार करने लगता है। २. हाथों, पैरों, टांगों, बाहों की मांसपेशियां पुष्ट तथा दृढ होती हैं। मोटी कमर, प्रांत उतरना, प्रश्मरी [पत्थरी] जिन महिलाओं की कमर मोटी है, जिन पुरुषों की प्रांत उतरकर अण्डकोशो में वृद्धि कर दे, या जिन्हे अश्मरी (पत्थरी) की शिकायत हो, उन सबको अझैत्थितासन लगाना चाहिए। क. खड़े हो जाइए और अपने दोनों हाथ सामने की ओर एक-दूसरे के समानान्तर फैलाइये, हथेलियां भूमि की भोर रहें। ख. शनैः-शनैः घुटनों को नीचे झुकाते-झुकाते पंजों के बल बैठ जाइये, एडियां खड़ी रहेंगी; बैठते-बैठते धीरे-धीरे हाथ दायें-बाये ले-जाइये। ग. फिर धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए ('क' की स्थिति में) खड़े जाइये। घ. हाथों की स्थिति शुरू से भाखिर तक वैसी ही रहेगी। योगासनों से इलाज . प्रर्धात्थितामन लाभ-~-१ जो इस योगासन को करते है, उन्हे हर्निया (प्रांत उतरने की बीमारी) तथा अश्मरी (पत्थरी) की शिकायत नहीं होती। २ इससे 'हाइड्रोसील' बीमारी दूर होती है। ३ कमर पतली छरहरी होती है, घुटने मजबूत होते हैं, पिंडलियां पुष्ट होती है । अकडा-प्रकडा बदन श्रम, थकान, ग्राघात और विकार के कारण शरीर की लोच जाती रहती है । अभिनेतायो, अभिनेत्रियो, नर्तक्यिा, खम्भा पर चटने-उतरनेवालो, जिमनास्टिक करनेवालो और सास के करतब दिखानेवालो को चाहिए कि वे विरोणासन के विविध अभ्यास करके अपने अग- प्रत्यग को रवर की तरह लचीला बनाये रखने । 4 पंगे वो दूर दूर रगार पद हो जाये। म दोनो हाथ दाय पाये (क्धे को सीध में) फैजाइये। ग दृष्टि प्रोमो की सोच में रमिये। घ बायां हाथ बाई पोर झुराइये। ड कमर भी वाई पोर भगाये। च प्रय वाय हाय से वाया पराये। . यागागनागवान
छ. दायां हाथ आकाश की ओर सीधा तानकर रखिये।
ज. झुकाने पर दोनों हाथ दण्ड (लाठी) के समान एक
सीध में रहेगे-बायां नीचे की ओर, दायां ऊपर की
पोर।
झ. नया त्रिकोण बना-
इये-दायों हाथ
और उसके साथ
सिर भी वाई मोर
तान लीजिये; फैले
हुए पैरों के दो
कोण अलग रहेगे।
म. ऊपर लिखी 'क'
से 'झ' तक की
क्रियाएं दाईं ओर
से भी कीजिए।
लाभ-१. इस मासन
से शरीर बहुत
सुडौल बनता
२.रीढ की हड्डी
(कशेरुकाएं)
दृढ तथा नीरोग
त्रिकोणासन
होती है।
३. गर्दन तथा पीठ की सुन्दरता बढ़ती है।
४. हाथ-पैर लचकोले, मजबूत व सुन्दर बनते हैं।
यौनांगों (गुप्त अंगों) के रोग
मसाना दुर्बल पड़ जाने से बार-बार पेशाब आने लगता
है और गली-बाजार में महिलामों को परेशानी में डाल
योगासनो से इलाज
६७
देता है। अगर शूगर जा रही हो तो शरीर-क्षय और भी
जल्दी-जल्दी होने लगता है। बार-बार पेशाब को उत्तेजना
से वीर्य भी पतला पड़कर सवित होने की नौवत पा जाती
है। सुन्दर पुरुष यास्त्री को देखते ही काम-यासना का उद्वेग
हो जाता है। इसके लिए प्रव की तरह काम वासना का
रुख पवित्र-वासना की । मोड़कर यौनांगों को सवल
वनाइये।
क. सीधे खड़े हो जाइए,
एड़ियों में एक फुट की
दूरी रहे।
ख. दायें पैर को मोड़कर
एड़ी को यौनांग पर
रखिये।
ग. दोनों हाथ जोड़कर
प्रणाम की मुद्रा बना
लीजिए।
घ. घुटने को झुकाते-झुकाते
भूमि छू लीजिए और
फिर धीरे-धीरे ऊपर
उठते हुए खड़े होकर
'क' की स्थिति में
पाइए।
ध्रवासन
ङ. अब सारी क्रियाएं बायें घुटने को मोड़ते हुए कीजिये।
लाभ-१. इस आसन से बहुमूत्र (अधिक पेशाब प्राना)
और मधुमेह (डायबिटीज) प्रादि रोग दूर
होते हैं।
२. वीर्य के सब दोष दूर होते हैं।
योगासनो से इलाज
पैरो को गिल्टी, काला प्राजार, अण्डकोश-वृद्धि
जिनके पैरो मे गिल्टियां निकल पाती हो और काला
आजार से कष्ट उठाना पडता हो, उन्हें गरुडासन करना
चाहिये । इसका मुख्य लाभ यह है कि अण्डकोश-वृद्धि का
विकार नष्ट हो जाता है।
क सीधे खडे हो जाइये।
ख एक टांग को सामने की ओर से दूसरी टांग पर लता
की भांति लपेट लीजिये।
ग एक बांह को दूसरी बांह
पर ऊपर की तरफ से
एक चक्कर देकर लपेट
लीजिये।
घ दोनो हथेलियाँ मिला-
कर नमस्कार की मुद्रा
(पोजीशन) बनाइये।
ड यही क्रिया अब टांग
और बांह बदलकर
कीजिए। अगर पहले
दायी टांग-बांह को
लपेटा था तो अब वायी
की लपेटिये।
गरुडासन
मस्तिष्क (दिमाग), कमर और सिर के दर्द
जिन्हे रोजाना कभी कमर और कभी सिर का दर्द
सताता हो, सोचने की कोशिश मे दिमाग फटने-सा लगता
हो, सीने में दर्द रहता हो, हाथो-पांवो मे जान न रहे,
घुटनो के कडाके बोलते रहे, उन्हे चक्रासन की शरण में
आना चाहिये।
योगासनो से इलाज
क. दोनों पैरों के बीच डेढ़ फीट का फासला रखके खड़े
हो जाइये।
ख. दोनों हाथ ऊपर उठा लीजिये।
ग. शनैः शनैः पीठ की भोर ऊपर के शरीर को झुकाते
जाइये।
म. जव हाथ जमीन पर पहुंच जाएं तो हथेलियां जमीन
पर टेक लीजिये। हाथो की उँगलियां पैरों की एड़ियों
को छूने लगें।
सूचना-इस प्रासन को सिद्ध करने में पन्द्रह दिन लग
जाएंगे।
घकासन
प्रथम सप्ताह कमर पर दोनों हाथ रखकर पीठ, गर्दन
तथा सिर पीछे झुकाने का अभ्यास कीजिये। सिर को
पीठ की ओर से जमीन की ओर ले जाने की अधिक-से-
अधिक कोशिश कीजिये ।
लाभ-१. यह आसन 'काला माज़ार' के असर को दूर
करता है।
योगासनों से इलाज
२. पैरो की गिल्टी दूर होती है।
३. हाइड्रोसील रोग का प्रभाव दूर होता है।
द्वितीय सप्ताह-दीवार की ओर पीठ करके उससे एक
मीटर की दूरी पर खड़े हो जाइये। हाथो को पीछे की ओर
झुकाकर हथेलियो से दीवार का पासरा लेकर कमर से
ऊपर के शरीर को पीछे की ओर झुकाइये। धीरे-धीरे
अभ्यास बढाते-बढाते हाथ जमीन तक ले जाने मे आपको
सफलता मिल जायेगी।
लाभ--१. इससे दिमाग के सब विकार दूर होते हैं ।
२. छ मास निरन्तर करने से न्यूरस्थीनिया, हिपो-
चोण्डिया रोग दूर होते हैं।
३ सिर-दर्द, कमर-दर्द आदि मिट जाते हैं ।
४. इससे वक्ष (छाती), पेट, कमर, गर्दन, बाहे,
हाथ, टाँगें और घुटने लचकोले पुष्ट तथा
बलिष्ठ बनते है।
कद बौना रह जाना
बचपन से चिन्तापो में जीवन गुजारने या परम्परागत
(पुश्तैनी) दोप मे जो बौने रह जाते है, उन्हे विशोरा-
वस्था मे ही ताडासन का अभ्यास करना चाहिये।
क. सीधे खड़े हो जाइये।
व दोनो हाथो के पजे सामने की ओर फैलाकर दोनी
प्रगूठो के सिरे मिलाइये और सिर के ऊपर प्राकारा
की ओर ले जाइये । खुली हथेलियो का जोडा मामने
को रहे।
ग एडियां ऊपर उठाइये, केवल पजा के चल बडे हो
जाइये और दो मिनट तक इसी स्थिति मे रहिये ।
योगामनी में इलाज
लाभ १. वातनाडियों के
दोष दूर होते
२. शरीर का कद
(लम्बा) बढाने
के लिए बहुत
उत्तम
प्रासन
३. मोटापा कम
होता है और
शरीर सुडौल
तथा सुन्दर
वनता है।
४. कमर पतली
होती है तथा ताड़ासन
कमर से नीचे का भाग चुस्त बनता है ।
सुस्ती/नामर्दी
अनुचित खान-पान से जिन स्त्रियों और पुरुषों का
समूचा उदर-तंत्र विगड़ जाता है और मेरुदण्ड में विकार
आ जाते हैं, उनके जीवन रसहीन और निरानन्द वीत जाते
है । बिच्छू के रूप का वृश्चिकासन उनका कायाकल्प करने
की शक्ति रखता है; जब चाहे आज़मा लें।
क. हाथ से कुहनी तक का भाग भूमि पर जमाइये ।
ख. सिर भूमि से ऊपर ही रखिये।
ग. झटके के साथ शरीर को ऊपर आकाश की ओर उठाते
हुए इस प्रकार उलटिये कि पर पलटकर सिर के ऊपर
मा जाएं, छाती तथा कमर का भाग घनुपाकार बन
जाए।
१०२
योगासनो से इलाज
घ सिर तथा गर्दन को भी जहां तक हो सके इस प्रकार मोडिये कि दोनो पर तथा सिर परस्पर स्पर्श करने लगें। लाभ-१. बाहे मजबूत होती हैं। वृश्चिकासन २ मेरुदण्ड (रीढ की हड्डियोवाला भाग) लचक- दार, सबल तथा नीरोग होता है। ३ पेट के सभी रोग नष्ट होते हैं। मेदा, तिल्ली, जिगर, पित्ताशय और गुर्दे के सब दोप दूर हो जाते हैं। ४ अालस दूर होता है, जडता मिटती है, चैतन्यता बढती है, शरीर हल्का, फुर्तीला तथा चुस्त हो जाता है। योगासनो से इलाज
३
तन कुन्दन, मन मोती
बुढापे को लोग रोगो का घर कहते हैं, जबकि सत्य
यह है कि 'सम्पूर्ण पवन मुक्तासन' के बीस अभ्यास ऐसे हैं
कि न बुढापा पाए और न कोई रोग सताये । हाथ कगन
को पारसी क्या।
इस प्रासन मे बीस क्रियाएँ होती हैं।
ये स्त्री-पुरुप, बाल-वृद्ध-युवक-सभी के लिए अत्यन्त
लाभकारी हैं।
पहली क्रिया--
क दोनो हाथ जांघो पर रखिये।
ख दोनो पैरो को परस्पर सटाकर रखिये।
ग पैरो की उंगलियो को आगे-पीछे, ऊपर-नीचे दस बार
हिलाइये, पैरो का बाकी हिस्सा न हिले ।
दूसरी क्रिया-
क दोनो पैरो को एक-दूसरे से थोडी दूरी पर रखिये,
एडियो मे आधा फुट और पजों मे एक फुट का अन्तर
रहे।
ख बायें हाथ के पजे को चक्राकार धुमाइये । इसके बाद
दायें हाथ के पजे को चक्राकार घुमाइये ।
ग अब दोनो पजो को एक-साथ दस बार दायें से वायें
घुमाइये।
यागासनो से इलाज
घ. इसके बाद दोनों पंजों को एक-साथ दस बार बायें से
दायें घुमाइए।
तीसरी क्रिया-
क. जमीन पर बैठकर पांव सामने फैलाइए।
ख. घुटना मोडकर दायां पैर खड़ा कीजिये।
ग. दोनों हाथों से दाई जांघ पकड़कर पेट की तरफ
दबाइए।
ध. अब दायाँ पैर घुटनों के पास इस तरह चलाइए जैसे
साइकिल चलायी जाती है । दस बार कीजिए।
ड. फिर बायाँ पैर घुटनों के पास इस तरह चलाइए जैसे
साइकिल चलायी जाती है । दस बार कीजिए।
चौथी क्रिया-
क. बैठ जाइए; टांगें सामने फैलाइए।
ख. दोनों हाथों को सामने फैलाइए-कंधों की सीध में।
ग. मुट्ठी बन्द कीजिए, खोलिए; बन्द कीजिए; खोलिए।
दस बार कीजिये।
पांचवी क्रिया--
क. बैठकर टांगें सामने फैलाइए।
ख. मुट्ठियां बांधकर कलाई के पास से चक्राकार दाई
तरफ घुमाइए।
ग. अब मुट्ठियां बाई तरफ घुमाइए। दस बार कीजिए।
छठी क्रिया-
क. बैठकर टांगें सामने फैलाइये।
ख. मुट्ठियां आकाश की ओर कर लीजिये।
ग. दोनों हाथों को कुहनियो पर से मोड़िये और सीधे
फैलाइए।
घ. हाथों को मोडते समय मुठ्ठियां कन्धों की तरफ लाइये
तथा फैलाने पर हाथ सोधी रेखा मे लाइये।
योगासनो मे इलाज
१०५
सातवी क्रिया-
क । बैठकर टाँगें सामने फैलाइये; मुट्ठियां बन्द करके
आकाश की ओर ले जाइए।
ख अब दोनो हाथो की मुठ्ठियो को अपने-अपने कधे के
इर्दगिर्द घुमाइए।
प्राठवों क्रिया-
क. बैठ जाइये, टांगें सामने फैलाइये।
ख दोनो हाथो को जांघो पर रखिए।
ग गर्दन को चक्राकार वायी तरफ से दायी तरफ घुमा-
इये-पांच बार।
घ. अब गर्दन को चक्राकार दायी तरफ से बायी तरफ
घुमाइये-पाँच बार।
नौवी क्रिया-
क. पीठ के बल (चित) लेट जाइए।
ख दायें हाथ को वायी बगल मे से ले-जाकर जमीन पर
रखिये।
ग. बायें हाथ को दायी बगल मे से ले जाकर ज़मीन पर
रखिये।
घ. दोनो पांव जमीन पर से उठाइये और दोनो घुटनो को
मोडकर दोनों पैरोको पेट मे सटाइये।
ड. अब पैरो को पुनः फैलाइये; पुन. पेट से सटाइये । कुल
दस बार कीजिए।
दसवी क्रिया-
क. पीठ के बल लेटिये।
ख. दायां पैर मोड़कर जांघ को पेट से सटाइए।
ग. दोनो हाथो से दायें पर को पेट पर दबाकर पकड़े
रम्पिये।
योगासनों से इलाज
घ. बायां पैर भूमि से एक फुट ऊपर उठाकर उसे वृत्ताकार घुमाइये । घुटना सोधा रहे तथा पंजा तना हुआरखिये। दस बार कीजिये। ग्यारहवीं क्रिया- भाग १-क. दायें पैर को मोड़कर दसवी क्रिया की भांति पेट से सटाकर दोनों हाथों से पकड़ लीजिए। ख. वायें पैर को जमीन से उठाकर दस बार बाइसिकल की भाँति चलाइये; पांच बार कीजिये। भाग २-प्रव भाग १ वाली क्रिया दूसरे पैर से कीजिये-- पांच बार। भाग ३-दोनों पैरो से साइकिल चलाने जैसी क्रिया कीजिये '-दस बार। बारहवीं क्रिया- क. पीठ के बल लेटिये। ख. दायां पैर मोड़कर पेट पर लाइये तथा घुटने को कस- कर पकड़िये। ग. गहरी सांस अन्दर लेते हुए सिर को ऊपर उठाइये तथा नाक से दाएं घटने का स्पर्श कीजिये । घुटने का स्पर्श करते समय सांस रोककर रखिये। घ. पुनः सोचे लेट जाइये। यही क्रिया वायां पैर मोड़कर कीजिए। -अब दोनों घुटनों को मोड़कर छाती से लगाइये तथा गहरी सांस खीचते हुए नाक से घुटनों को छूइये । फिर पहले की स्थिति में प्राकर (चित लेटकर) सांस बाहर छोड़िये। योगासनो से इलाज १०७ -- तेरहवीं क्रिया- क चित (पीठ के बल) लेटिये। ख. दोनो घुटनों को छाती से सटाइये। ग दोनो हाथो से पैरो को पेट के साथ बांध रखिये। घ इसी दशा मे झटके के साथ उठ बैठिये तथा पीछे लुढ- किये। चेतावनी -इस आसन को कम्बल या गद्दे पर ही कीजिये और सतर्कता से कीजिये, अन्यथा चोट लगने का भय होता है। चौदहवीं क्रिया- क पीठ के बल लेटिये। ख दोनो पैर सामने फैलाइये। ग दोनो हाथो की मुट्ठियां बन्द करके बगल मे, भूमि पर रखिये। घ सांस अन्दर खीचिये। ड सिर तथा कधो को एक-साथ जमीन से दो इच ऊपर उठाइये। सांस रोककर रखिये। च पुन ज़मीन पर लेटिये और सांस बाहर छोडिये। पद्रहवीं क्रिया- क जमीन पर चित लेटकर पैर सामने फैलाइये। ख दोनो पांव मिनाकर जमीन से ऊपर उठाइये, सांस अन्दर रोककर रखिये। ग पाँव नीचे लाइये और सांस बाहर छोहिये । सोलहवी क्रिया- व पीठ के बल लेटिये, टांगें सामने फैलाइये। स सिर, कन्धे, दोनो पर एक-साथ ऊपर उठाइये, सांस रोकिये। योगासनों मउमाज
ग सिर, कन्धे और पैर नीचे लाइये, इसके साथ ही सांस
बाहर छोडिये।
सत्रहवीं क्रिया
क लेट जाइये, बाईं तरफ करवट लीजिये ।
ख बायें हाथ को पीठ की तरफ नीचे से निकालिये।
ग दायें हाथ से वायें हाथ की कलाई पकडिये ।
घ बायें हाथ की मुट्ठी बांधकर रखिए।
ङ बाई करवट पर सारे शरीर का सतुलन करते हुए सिर,
कन्ध तथा दोनो पैर जमीन से ऊपर उठाइये।
च सिर, कधे तथा पर जमीन पर लाइए।
अठारहवीं क्रिया (सत्रहवों क्रिया के विपरीत)-
क लेट जाइये, दाई तरफ करवट लीजिए।
ख दायें हाथ को पीठ की तरफ नीचे से निकालिये।
ग बायें हाथ से दायें हाथ की कलाई पकडिये।
घ दायें हाथ की मुट्ठी बांधकर रखिए।
ड बाई करवट पर सारे गरीर का सन्तुलन करते हुए
सिर, कधे तथा दोनो पैर जमीन से ऊपर उठाइये।
व सिर, कधे तथा दोनो पैर जमीन पर लाकर पूर्वस्थिति
मे माइये, सांस बाहर छोडिए ।
उन्नीसवी क्रिया (अग्निसार क्रिया)-
क वजासन लगाकर बैठिए।
ख दोनो हाथ दोनो घुटनो पर कधो से दवापर रखिए।
ग सांस रोककर पेट को जल्टी-जल्दी अन्दर खोचिये मोर
बाहर निकालिए।
धीसों किया-
क पद्मासन लगाकर वैठिए, दोनो कुहनियो का सहारा
लेकर पद्मासन लगाये ही लेट जाइए।
योगासनोस इलाज
ख. दोनों हाथों की मुट्ठियां वांधकर कूल्हों के नीचे खड़ी करके रखिए। ग. मिर, पीठ तथा पद्मासन-लगे पैरों को जहां तक हो सके जमीन से ऊपर उठा लीजिए। घ. सारे शरीर का भार शरीर के मध्य-भाग, कूल्हों अथवा दोनो मुट्टियों पर टिकाए रहें। ड. बोस सैकण्ड तक इसी स्थिति में रहिए। च. पुनः पूर्वस्थिति में प्राइये। सम्पूर्ण पवनमुक्तासन के लाभ- १. सम्पूर्ण शरीर के अंग-प्रत्यग को लाभ पहुँचता है । शुद्ध रक्त का संचार होता है । वृद्धो तथा स्त्रियों के लिए ये आसन (सभी २० क्रियाएँ) आसान हैं । इनसे कभी हानि नही पहुँच सकती। २. शरीर के जोडों में से दूषित वायु निकल जाती है। ३. वायु के हर प्रकार के प्रकोप से शरीर को मुक्त करने के लिए ये क्रियाएँ रामवाण हैं। ४. अन्तड़ियो मे से बिगड़ी हुई हवा बाहर निकल जाती जाते हैं। ५. पेट में से गुल्म (वायु-गोला), अफारा आदि दूर हो ६. शरीर कुन्दन के समान निखर आता है । मुखमण्डल की काति तथा तेजस्विता बढ़ती है। ७. चेहरे की झुरियाँ कम होती हैं या समाप्त हो जाती योगासनों से इलाज
४
ब्रह्मचर्य-सिद्धि के विशेष आसन
१. एकपादांगुष्ठासन
भाग १-क. वायें पर की एड़ी पर शुक्रनाड़ी (सिवनी
नाड़ी) रखकर वैठिए (सिवनी नाडी गुदा
और अण्डकोशों के बीच के स्थान पर होती
ख. दायाँ पैर बाईं जांघ पर रखिए।
एकपादांगुष्ठासन
योगासनों से इलाज
ग दोनों हाथों से अपनी कमर पकड़ लीजिए। घ. सारे शरीर का भार बायें पैर के पंजे पर सन्तुलित (Balance) कीजिए। ड. रीढ बिल्कुल सीधी रखिए । भाग २- भाग १' वाली सारी क्रियायें दूसरे (दायें) पैर से कीजिए। लाभ-१. स्वप्नदोष नहीं होता है। वीर्य स्तम्भित होने से चंचलता दूर होती है और ब्रह्मचर्य कायम रखना सभव हो जाता है। २. बवासीर का कष्ट दूर होता है। विशेष-यह आसन विशेष अभ्यास से साध्य है। घबरायें नहीं; लगातार प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करते रहें। २. वज्रासन क. दोनों पैरों के तलुओं को परस्पर सटाकर वैठिये। ख. दोनो एड़ियों से शुक्रनाड़ी (सिवनी) दवाकर रखिये। ग. दायां हाथ दायें घुटने पर तथा बायां हाथ बायें घुटने पर रखकर दवाइये, ताकि दोनो घुटने भूमि के स्तर पर प्रा जायें। लाभ--१. इसमासन के अभ्यास से ग्रह्म- चर्य की रक्षा होती है। वगासन योगासनो से इसाज . १२. इससे सम्पूर्ण शरीर में अद्भुत शक्ति का संचार होता है। ३. इससे कुण्डलिनी जागृत होती है। ३. शशांक (चन्द्र) प्रासन (क) वज्रासन में बैठिए। (ख) दोनों हाथ सिर से ऊपर ले-जाइए। रीढ़ सीधी रहे। सांस बाहर छोड़ते हुए, धीरे-धीरे आगे झुकिए। माथा भूमि पर टेक दीजिए। सांस रोककर कुम्भक कीजिए। धीरे-धीरे सांस अन्दर खीचते हुए ऊपर उठिए और फिर से (क) की स्थिति में आ जाइए। लाभ-डाइसेट्री (अतिसार या दस्त), कटिशूल (कमर- दर्द), प्रमेह (अधिक या बार-बार पेशाब आना), 'जिगर, गुर्दे के रोग दूर होते हैं । तीन महीने तक लगातार कोजिए तो जिगर (लिवर), गुर्दे (किडनी) बिल्कुल रोग-मुक्त हो जाएंगे। ४. नाभि-पीड़ासन क. दोनों पैरों के तलुए परस्पर सटाकर और दोनों जंघाएँ दाएं-बाएँ पसारकर बैठ जाइए। - . नाभि-पीड़ासन योगासनो से इलाज
ख. दोनों हाथों से दोनों पैर पकड़ लीजिए।
ग. पैरों को ऊपर करके एडियों को नाभि के पास सटाइए।
घ. अभ्यास करते-करते शक्ति बढाइए और आधा घंटा
इसी स्थिति में रहने की योग्यता प्राप्त कीजिए।
लाभ-१. इस आसन से कुण्डलिनी की शक्ति में बहुत
वृद्धि होती है।
२ नाड़ियों में नया रक्त पहुंचता है तथा उन्हे वल
मिलता है।
३. वीर्य को स्खलित होने से रोकने की शक्ति
प्राप्त होने के कारण ब्रह्मचर्य स्थिर रहता है।
५. कन्दपीड़ासन
क. दोनों पंजों को सटाकर उन पर खड़े हो जाइये।
ख. चित्रानुसार धीरे-धीरे नीचे बैठिए और शुननाडी को
दोनों एड़ियों पर टिकाकर बैठ जाइये। सारे शरीर
का भार पजों पर ही रहे; एड़ियां खडी ही रहे।
ग. दोनों घुटने दाय-बायें दोनों तरफ फैले रहे, घुटने
भूमि को छूने न पाएँ।
घ. दोनो हाथ भी दायें-बायें फैले रहे; हथेलियां नीचे की
पोर रहे।
फन्दपोड़ासन
योगासनो से इलाज
लाभ-१. इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है।
२. शरीर नीरोग, चुस्त तथा फुर्तीला बनता है।
३. स्वप्नदोष वन्द हो जाता है।
६. मण्डूकासन
क. दोनों घुटने मोडकर, पैर पीछे ले जाकर बैठ जाइये।
ख. घुटने दायें-बायें फैलाइये।
ग. दोनों पैरों की एडियां कूल्हों के दोनों तरफ रहें ।
घ. दोनों हाथ घुटनों पर रक्खें; हथेलियां नीचे रहे।
ङ. माया, गर्दन तथा वक्षस्थल (छाती) तने रहें।
-
मण्डूकासन
लाभ--१. कोप्ठबद्धता (कब्ज़) दूर होती है।
२. पेट में गैस का कष्ट मिटता है।
३. मूत्र-रोग दूर होते हैं।
४. वीर्य-रक्षण, मन चैतन्य तथा स्व-वश होता है।
५. अपान वायु गुदामार्ग से निकलकर पेट का
अफारा, वाय-यादी दूर होती है।
योगासनो से इलाज
५ सम्भोग-(मैथुन)-शक्ति बढ़ाने के योगासन पुरुषों के लिए- इन्द्रिय-उपकर्षण क. दोनो पैर मिलाकर खडे हो जाइए। परो के पजे और एडियां परस्पर मिले रहे। ख. दायां हाथ दाईं जांघ के बाहरी भाग पर तथा बायाँ हाथ बाई जाप के बाहरी भाग पर रहे। हाथो के पजे खुले रहे, उंगलियां जमीन की मोर रहे। ग. गुदा (मलद्वार) तथा लिंग को एक-साथ सांस द्वारा ऊपर की ओर खीचने का प्रयल कीजिए। यह सब कार्य प्रान्तरिक शक्ति और विचार द्वारा करना चाहिए। घ थोडी देर सांस रोककर छोडिए और साथ ही गुदा तथा लिंग को भी नीचे जाने दीजिए। लाभ-१. शुक्र (वीर्य) शुद्ध होगा। वीर्य ऊपर की ओर चढ़ेगा। २. वीर्य स्खलन जल्दी नही होगा। ३ सभोग (मैथुन) मे पूर्ण मानन्द प्राप्त होगा। विशेष प्रतिदिन दो मिनट तक कीजिए। योगासनो से इलाज
स्त्रियों के लिए
योनि-संकोचन
क. घुटनों के बल बैठ जाइए।
ख. दोनों हाथ गर्दन के पीछे ले-जाकर एक हाथ से दूसरे
हाथ की कलाई कसकर पकड़ लीजिए।
ग. अब इच्छा-शक्ति के बल पर योनि को अन्दर सिकोड़ने
की क्रिया कीजिए।
घ. योनि के वृहत् (बाहरवाले) भगोष्ठों को कसिए, ढीला
छोड़िए, कसिए और ढीला छोड़िए। दो मिनट तक
प्रतिदिन कीजिए।
लाभ-इससे स्त्रियों की योनि संकुचित होती है तथा
संभोग-शक्ति बढ़ती है।
योगासनो से इलाज
११७
मोटापा कम करने का योगासन
सरल त्रिकोणासन
२. दोनों पर दूर-दूर रसिए, सगभग दो पौट का अन्तर
११८
पांगागनों से मार
ख. दोनो बाहे दायें-बायें फैलाइये; पजे खुले रहे, हथे- लियाँ भूमि की ओर रहे। अव शरीर को कमर के स्थान से लचक देकराबायें हाथ से दायें पैर के अगूठे का स्पर्श कीजिए । घुटने न मुड़ने पायें, दायाँ हाथ आकाश की ओर ले जाइए। ग. फिर वापस 'क' की स्थिति में आ जाइए अब दायें हाथ से बाये पर को छू लीजिए। फिर वापस 'क' की स्थिति मे प्रा जाइए। लाभ-१. रक्तसचार ठीक तरह से होता A २. पीठ तथा कमर का दर्द होता है। ३. गर्दन, कंधे, बाहे सबल होती हैं। ४. वीर्य पुष्ट सरल त्रिकोणासन होता है ५. स्वप्नदोप रुक जाता है। ६. मोटापा कम होता है, शरीर चुस्त तथा छरहरा बनता है। योगासनो से इसान
७
दो ईश्वरीय वरदान
१. कायाकल्प के लिए-शीर्षासन
शीर्षासन सबसे श्रेष्ठ, परन्तु सबसे कठिन प्रासन है।
इससे पूर्व जितने आसन बताये गये हैं, उन्हें करने के बाद
इसका अभ्यास करना चाहिए। इसे एकाएक नहीं किया
जा सकता; अतः इसे भागों में बांटकर यहाँ समझाया जा
रहा है। यदि सम्भव हो तो किसी योगाभ्यासी से इसके
करने का ढंग सीखना चाहिये । इसे दीवार का सहारा
लेकर करने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। दीवार का
सहारा लेकर करने का प्रयत्न करनेवाले लोग कभी भी
शीर्षासन नहीं कर सकेंगे।
चेतावनी-शीर्षासन प्रतिदिन दस मिनट से अधिक
कभी भी नहीं करना चाहिए। कुछ लोग दो-दो घंटे तक
फरने की बात करते हैं, परन्तु वे इस बात का विचार नहीं
करते कि नेत्र सवसे कोमल इन्द्रियों हैं और अधिक देर
तक शीर्षासन करने से नेत्रों पर रक्त का मनुचित दवाव
पड़ सकता है। इसलिए दस मिनट से अधिक कदापि न
कीजिए। दस मिनट तक करने से यह मनुष्य-शरीर का
कायाकल्प कर देता है। अधिक देर तक करने से इससे
हानि को ही माशंका होती है।
१२.
मोगासनों से इमान
पहला भाग आठ तह करके कंबल बिछा लीजिए अथवा कई बार तह किया हुआ खूब मोटा कपड़ा या तकिया भूमि पर रख- कर नीचे लिखी क्रियायें कीजिए--- क. घुटनों के बल बैठ जाइए। ख. दोनों हाथों की उंगुलियां दृढ़ता से आपस में फंसा लीजिए। ग. दोनों हाथों को त्रिकोणाकार गद्दे पर रखिये। घ. दोनों हाथों के बीच अपना मस्तक इस प्रकार गद्दे पर रखिये कि दोनों अगूठे सिर के पिछले हिस्से को दबाएं। ङ. अब पंजों, बाहों तथा सिर के बल उलटे खड़े होने का प्रयत्ल कीजिए; केवल इतना प्रयत्न पर्याप्त है कि आपकी कमर बिल्कुल ऊपर उठ जाए-टांगें और पैर चाहे जैसे भी रहें। विशेष-पांच मिनट तक वार-बार ऊपर लिखा अभ्यास कोजिए। लगातार पांच दिन इसी का अभ्यास कीजिए। क. घुटनों के बल बैठिए। योगासनों से इलाज १२१ दूसरा भाग
ख दोनों हाथों की उंगलियां परस्पर फंसाकर,
त्रिकोणाकार बनाकर गद्दे पर रखिए।
ग. हाथों के बीच में मस्तक रखकर अंगूठे से सिर के
पिछले भाग को दबाते हुए उलटे खड़े होने का
प्रयत्न कीजिए।
घ कमर तक का भाग ऊँचा उठाने का प्रयत्न
कीजिए।
ड दोनों पैरों को धीरे-धीरे छाती की तरफ बढाइये।
घुटने तथा जाप छाती से सटाइए।
च. एक-एक करके दोनों पैरों को भूमि से ऊपर उठा-
कर घुटनों तथा जांघों को छाती से लगाने का
प्रयत्न कीजिए।
चेतावनी-यदि गिर पहें तो धीरज न छोड़िये पुन:-
पुनः प्रयत्न कीजिए।
१२२
योगासनो से इलाज
विशेष--पांच दिन तक लगातार प्रयत्नपूर्वक इसका
अभ्यास कीजिए।
तीसरा भाग
क दूसरे भाग तक पूरा करने के बाद शनै -शनैः पैरों को
इतना ऊपर उठाइए कि वे कमर की ऊँचाई तथा सीध
मे मा जाएं।
.
योगासनो से इलाज
१२३
ख. अभी घुटने मोडकर ही रखिये। इसी अवस्था तक
सिद्धि प्राप्त कीजिए।
विशेष-पांच दिन तक इसी का अभ्यास कीजिए।
चौथा भाग
तीसरे भाग तक पूरी सिद्धि प्राप्त करके धीरे-धीरे
पैरों को सोलकर ऊपर की तरफ उठाइए ।
योगासनों से इमान
पांचवा भाग
लाभ--१. उन्निद्र (नीद न आना) रोग दूर होता है ।
२. विधान्ति (पूरे आराम) के लिए शवासन
हर प्रकार के व्यायाम, सूर्य-नमस्कार योगासन प्रादि
के उपरान्त शवासन करने से शरीर तथा मन को पूर्ण
योगासनो से इलाज
१२५
विश्राम प्राप्त होता है । विधि निम्नलिखित है-
क पीट के बल लेट जाइये।
ख दोनो पैरो को एक-दूसरे से थोडा दूर-दूर रखिये।
ग दोनो हाथ दाय-बायें और शरीर से सटाकर
रखिये। हथेलियां आकाश की ओर रह और हाथो
का पिछला भाग भूमि पर।
घ सम्पूर्ण शरीर को मृतक की भांति ढीला छाड
दीजिये और पूर्ण विश्राम कीजिये।
ड साँस सहज-स्वाभाविक गति से लीजिए।
च इस ससय मन में किसी प्रकार का विचार न पाने
दीजिए । सारे वाम-धाम भूल जाइए।
छ मन मे सुख-ग्राराम-विश्राम का अनुभव कीजिये।
शवासन
लाभ-१ शरीर की हर प्रकार की थकावट दूर होती है।
२ रक्त-सचार सहज हो जाता है।
३ श्वास की क्रिया सरल, स्वाभाविक तथा सम
हो जाती है।
४ मन को पूर्ण विधान (पाराम) मिलता है।
.
१२६
योगासनो से इलाज
८
योगासनों द्वारा प्रमुख रोगों की
चिकित्सा
।
१. मधुमेह (Diabetes)
कारण-उदर (पेट) के ऊपरी भाग मे क्लोम
(पेन्कियास) नाम की एक ग्रन्थि है। यह क्लोम-रस
(इन्सुलिन) पैदा किया करती है । जव यह अन्थि अपना
रस उत्पन्न नहीं कर पाती या कम रस उत्पन्न करती है,
तो हमारा शरीर चीनी (शूगर) का उचित उपयोग नहीं
कर पाता, अर्थात् चीनी को हजम नही कर पाता। इससे
शरीर की रासायनिक क्रिया बिगड जाती है । तव शरीर
के रक्त में चीनी की माना बढ जाती है। यही चीनी
रोगी के मूत्र द्वारा भी बाहर आने लगती है।
लक्षण -१ रोगी को बार-बार मूत्र आने लगता है।
२ बार-बार और बहुत अधिक प्यास लगती है।
३ हर समय शरीर थका-थका लगता है।
४. शरीर फूला-फूला हो जाता है और भार घटने
या बढ़ने लगता है।
५. पैदल चलने या सीढियाँ चढने से दम फूलने
लगता है।
६ मानसिक तनाव पैदा होता है, स्वभाव
चिडचिडा हो जाता है।
योगासनों से इलाज
७ गुः ठीक काम नहीं करते। ८ नजर कमजोर हो जाती है। योग द्वारा चिकित्सा योग-चिकित्सा के दो भाग हैं-भोजन को नियमित करना तथा योगासन करना। भोजन को नियमित करना खाइए-गेहूं का फूला हुआ फुल्का, दालें, हरी तर- कारियाँ, साग, अकुरित चना और मूंग, खीरा, ककडी, मूली आदि को सलाद, चाय-कॉफी में चीनी आदि मीठा मत डालें। मत खाइए-चावल, चीनी-गुड-शक्कर आदि, मिठा- इयां, केकपेस्ट्री, चाक-लेट-टॉफी, पालू, कचालू, शकर- कन्द, जिमीकन्द, केला, सगतरा (मीठा), अगूर, चौकू प्रादि चीनी की मात्रा वाले अन्य मीठे फल । योगासन--सूर्य नमस्कार, हलासन, गोमुखासन, कूर्मासन, वातायनासन, धनुरासन, शवासन । सावधान (A note of caution)-भले ही आप ऊपर बताए आसनो मे से कठिन-से-कठिन आसन को एकदम श्रारम्भ कर सकते हो और बडे वेग (तेजी) से कर सकते हो, तो भी- १ प्रारम्भ सरल-से-सरल आसन से कीजिए। २ प्रत्येक प्रासन को धीरे-धीरे कीजिए। ३ जरा भी दम फूलने लगे, कष्ट का अनुभव होने लगे, पसीना अधिक पाने लगे तो आसन छोडकर शवासन की स्थिति मे मा जाइये। २. उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) कारण साधारणतया स्वस्थ मनुष्य का रक्तचाप (खून का दवाव) ८० डायस्टोलिक तथा १२५ सिस्टोलिक १२८ योगासनों से इलाज रहता है। जब रक्तसचार-संस्थान मे कोई विकार हो जाए, तो सिस्टोलिक-दवाव अत्यधिक बढ़ जाता है। जब धमनियां (शुद्ध रक्त बहानेवाली नालियाँ) तंग हो जाती है, तब वे अगो तक पूरा खून नहीं पहुंचा पाती। उधर अग अपने लिए खून मांगते हैं। तब हृदय को, जो कि रक्त को पम्प करनेवाला एक अंग है, पम्प करने के लिए बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है। इससे मनुष्य को उच्च रक्तचाप का कष्ट होता है। क्रोध का कारण होने पर, हानि या कष्ट होने पर, अचानक खुशी की बात होने पर भी रक्तचाप बढ जाता है, परन्तु थोडी देर बाद अपने-अाप ठीक हो जाता है। उच्च रक्तचाप के मरीज के लिए उच्च रक्तचाप होना कष्ट का कारण होता है। लक्षण-उच्च रक्तचाप होने से मनुष्य को अपना शरीर वेजान-सा लगता है। सिर में दर्द होने लगता है। स्वभाव चिडचिडा हो जाता है। क्रोध शीघ्र पा जाता है। हाथ-पैर ठडे होने लगते हैं। गर्दन पर ठडे पसीने आने लगते हैं । दृष्टि-शक्ति कम होने लगती है। चलने-फिरने, विशेषत. चढाई चढने मे बहुत तकलीफ होती है। योग द्वारा चिकित्सा (इलाज) योग-चिकित्सा के दो भाग हैं : भोजन का नियमन तथा योगासन। १ भोजन का नियमत-प्रात. का भोजन ११ बजे से पहले और रात्रि का भोजन सोने से दो घटे पहले कीजिए। खाइए-सब्जी का सूप, फूला हुआ फुलका, दालें, हरी तरकारियां, साग (हरी पत्तीवाले), अकुरित चना, मूंग, सलाद (सोरा, ककडी, मूली, टमाटर, गाजर, चुकन्दर, नीबू), स्किम्ड (मलाईरहित) दूध, नाश्ते के समय नमकीन योगासनो से इलाज । १२६ बिस्किट, भुने हुए चने आदि ले सकते हैं । संगतरा, माल्टा, मौसम्मी, सेव, नाशपाती, पपीता, अनार आदि ताजा फलों का रस पीजिए। मत खाइए-धी-तेल आदि चिकनाई, केला आदि बोझिल फल, चाय-कॉफी आदि गर्म उत्तेजक पेय, शराब को जहर समझे, तम्बाकू का किसी रूप में भी प्रयोग न करें। अधिक खाना, खाने के तुरन्त वाद खाना, मेहमान आ जाने पर फिर खाना, दिन मे बार-बार खाना-ये सभी बाते उच्च रक्तचाप के रोगी के लिए वजित हैं। विशेष-शरीर को अधिक समय आराम दें । उत्तेजित वातावरण से दूर रहे। ईा, क्रोध, भय और चिन्ता को मन मे स्थान न दें। यदि ये भावनाएं मन मे पाएँ तो उठ- कर दूसरे स्थान पर चले जाएँ । तीन बार जल का प्राच- मन करें। हर समस्या को शान्त मन से सुन, सोचें और हल करें। भीड-भाडवाले स्थान (मेले, भीडवाली बस, र के शोर-गुल) से जहाँ तक हो सके दूर रहे । किसी स .री द्वारा उद्यान मे पहुँचकर धीरे-धीरे चलना (टहलना) चाहिए। २. योगासन- प्रथम सप्ताह-प्रतिदिन १२ मिनट तक शवासन करें। द्वितीय सप्ताह-प्रतिदिन १५ मिनट तक शवासन करें। तृतीय सप्ताह-प्रतिदिन २० मिनट तक शवासन करें। चतुर्थ सप्ताह एक बार पवनमुक्तासन, फिर शवा- सन। योगासनो से इलाज को दोहराते जाइए। पञ्चम सप्ताह-एक बार एक टांग से उत्तानपाद- प्रासन, फिर शवासन। पाठसप्ताह-एकवार पवनमुक्तासन, फिर शवासन। सप्तम सप्ताह-एक बार उत्तानपादासन, फिर शव- आसन। यदि माफ़िक पा जाय तो ऊपर लिखे प्रकार से एक सप्ताह में प्रतिदिन एक वार पवन मुक्तासन तथा शवासन सावधान -~-१. उच्च रक्तचाप के रोगी को योगासनों द्वारा तीन महीने बाद काफी आराम नजर आयेगा, इस लिए घबराकर बीच में ही योगासन छोडना उचित नहीं। २. यदि उत्तानपादासन से थकावट अधिक होती हो, तो उसे भी छोड़ दें। ३. इस रोग के रोगी के लिए अन्य किसी भी प्रासन की सलाह हम नहीं देते। ३. आमवात, सन्धि-शोथ, गठिया (Arthritis) कारण-परस्पर-विरोधी भोजन खाने से (जैसे दूध और मछली), अधिक सुस्त पड़े रहने से, बहुत अधिक घी आदि चिकने पदार्थ खाने से, वहुत अधिक व्यायाम करने से, व्यायाम करके तुरन्त नहाने से, बाहर से आकर शरीर गर्म रहते ही नहा लेने से, शीतकाल में ठंडे स्थान पर घंटों बैठने या सोने से, लगातार हाजमा विगडा रहने से, जठराग्नि दुर्बल हो पाने से प्रामवात, सधि-शोथ, गठिया प्रादि रोग धर दवाते हैं। ये एक ही रोग के (लक्षणों की भिन्नता के कारण) भिन्न-भिन्न नाम है। लक्षण-जोडों में वायु चलती अनुभव होना, हड्डियों के जोड़ों में पीड़ा होना, अंग-अंग टूटना, खाने में अरुचि होना, प्यास बार-बार लगना, शरीर में नालस्य छा जाना, योगासनो से इलाज पेट भारी-भारी रहना, पभी-कभी बुसार या जाना, खाया हुआ न पचना, कभी कोई अग सुन्न हो जाना। यह प्राय. हाथो, पैरो, सिर, धुटने, गुदा को अस्थि, छाती के जोडो में सूजन तथा दर्द पैदा कर देता है । कई वार इस रोग से पीडित अग में ऐसी पीडा होती है, जैसे बिच्छू के डक से। इस रोग के रोगी की जठराग्नि (अन्न को पचानेवाली शक्ति) मन्द (कमज़ोर) हो जाती है। शरीर मे ठडे या गर्म पसीने आने लगते है। हर वस्तु मे तथा हर काम मे अरुचि होती है । शरीर मे उत्साह नहीं रहता। किसी बात में रस अनुभव नहीं होता। शरीर भारी पत्थर हो जाता है। किसी-किसी अग मे जलन होती है । बार-बार पेशाब आता है। पेट के दाये या बायें भाग में मस्ती हो जाती है या शूल उठता है। नीद कन पाती है या नहीं आती। प्यास बार-बार लगती है, बुझती ही नही । उल्टी आने को होती है। कभी-कभी सिर चकराता है। कभी- कभी अधिव' दर्द होने पर बेहोशी हो जाती है। हृदय बैंधा- बँधा-सा लगता है। सख्त कब्ज हो जाती है। अगो के हिलाने-डुलाने में कठिनाई होती है । अतडियो मे से गडगड की-सी आवाज आती है। प्रावश्यक नहीं कि रोगी मे ये सभी लक्षण एक-साथ हो। इनमें से कुछ लक्षण भी मिलें तो समझिए कि सधि- शोथ का ही कोई प्रकार है। अधिक पुराना होने पर इसका इलाज कठिन हो जाता है, प्रत. इसकी चिकित्सा तुरन्त करनी चाहिए । विगड जाने पर यह लकवे का रूप धारण करता है, जिसमे कोई- न कोई अग मारा जाता है। योगासनो से इलाज
।
।
चिकित्सा (इलाज)
प्रारम्भ मे चार दिन उपवास रक्खें । फिर पन्द्रह दिन
कुछ भी न खाएं-केवल प्रात -सायकाल एक-एक गिलास
फलो का रस ले। मास-शराव तम्बाकू का सेवन बिल्कुल
छोड़ दें। चौवीस घटे में दो बार से अधिक चाय कॉफी न
पिएँ। ठडे पेय, गन्ने का रस, फ्रिज का ठंडा पानी न पिएं।
दर्दवाले स्थान पर सेंक दें और पसीना लाये ।
सूखा फुल्या खाएँ । शाक-भाजी मे गर्म मसाले का न
प्रयोग करें। काली मिर्च, सोठ, मघा का चूर्ण दाल-भाजी
मे डालें । सलाद मे हरी सब्जियां खाएँ । ताजा फल खायें
(केला आदि भारी फलो को छोडकर)। पपीता सबसे
उत्तम है । मीठा सन्तरा भी अच्छा है। घी-तेल का प्रयोग
एकदम कम कर दे । खूब पानी पिये।
अधिक कब्जवाले व्यक्ति एनिमा लें । स्नान नियमित
रूप से करे । शरीर को मल-मलकर साफ करे। रूखे और
खुरदुरे तौलिए से रगडकर पोछे। कच्छा-बनियान प्रति-
घुला हुग्रा पहनें।
योगासन
कधरासन, एकपाद-द्विहस्तबद्धासन, एकपादासन,
हस्तपाद विस्तृतासन, धनुरासन, गोमुखासन, वकासन ।
४ हृदय-रोग (Heart Deseases)
'हृदय' नाम भीतरी अग छाती में वायी ओर, नीने
के भाग मे रहता है। यह मुट्ठी के वरावर मास का
खोखला पिड है। यह बीच से कुछ वायी ओर विसका
रहता है और वरावर सिकुडता-फैलता रहता है । इदय
वास्तव में, मारे गरीर में रक्त को पम्प करनेवाला यन्त्र
दिन
योगासना से इजाज
होने के कारण ही अधिकाश मौतें होती है । जब रक्त- सचरण-सस्थान मे अधिक गडवडी होती है तो हृदय की मिया रुक जाती है । इसे दिल का दौरा (Heart Attack) अथवा 'हृदय-गति बन्द होना' कहते हैं । सक्षेप मे, हृदय- रोगो का वर्णन इस प्रकार है- धमनियों का कड़ा होना (एथेरोस्लेरोसिस)- वसा- युक्त (चर्बीदार) तत्त्वो के सचित होने से धमनियो की भीतरों दीवारें मोटी हो जाती है। इससे रक्त के प्रवाह में वाधा पड़ने लगती है। यदि धमनियां अधिक सकीर्ण हो जाएं तो रक्त-सचार विल्कुल रुक जाता है। मोटापे के कारण भी यह कष्ट होता है। हृदय-धमनियों का अकस्मात रुक जाना (कारोनरी थाम्बासिस)--हृदय-धमनियो के अन्दरूनी भाग के सँकरा होने के बाद रक्त के थक्के (Clots) जमने लगते है । खून की पूरी पूर्ति (supply) न होने से दिल का दौरा पड़ता है। इसके लक्षण ये हैं- १ वक्ष (छाती) मे पीडा; २. बाजुनो मे पीडा; ३. ठडे पसीने माना। हृदय-जीर्णता रोग-अत्यधिक शराब या तम्बाकू के रोवन से हृदय-धमनियां या शिराये सड़-गल जाती हैं । उनमे ताजगी नही रहती । कार्य-शक्ति भी नहीं रहती। अधिक तनाव वाले हृदय-रोग (Hypertension)- यह प्रायः उच्चरक्तचाप के रोगियो को होता है। प्रत्य- धिक हडबडी का काम करने, उचित विश्राम न करने, लगातार चिन्ता करने, जोखिम (Risk) के काम करने तथा लगातार चिन्ता, भय क्रोध, अतिलोभ प्रादि से ग्रस्त व्यक्तियो को इसका दौरा होता है। - योगासनों से इलाज योग-चिकित्सा शारीरिक इलाज-हल्का, ताजा, सादा भोजन करें। भूख से थोड़ा कम खाएं (पेट को ढूंसकर कभी न भरें)। खाने के तुरन्त वाद न पियें। वसा (घी, तेल, चर्वी) बहुत कम सेवन करें-पहले की अपेक्षा ५% प्रतिशत कम कर दें)। चीनी और नमक का प्रयोग बहुत कम कर दें। तम्बाकू, शराव, मांस, अंडा, मक्खन त्यागदें। बार-बार चाय-कॉफी का सेवन न करें। भारी, चिकने, गरिष्ठ भोजन न करें। पेट को कभी इतना न भरें कि वह हृदय को दवाये । खाना खाकर या कुछ पीकर दफ्तर-दुकान की ओर दौड़ न लगाएँ। न कोई काम हड़बड़ी में करें और न सोचने का काम जल्दबाजी में करें । वातचीत भी तेज-तेज़ न करें। ठीक समय विश्राम अवश्य करें। हर दो घंटे वाद (भले ही ५ मिनट) विश्राम करें। ज्यादा देर कड़ी धूप या कड़ी सर्दी में एक जगह खड़े न रहें। मानसिक इलाज-असफलता, भूख, दुर्घटना, घाटा श्रादि की घटना को धीरज से सहन करें। मन में अपनी पिछली सफलताओं तथा खुशियों की घड़ियों का ध्यान लाएँ। न अकेले बैठे,न भीड़ में; प्रिय व्यक्ति के पास बैठे, उससे मधुर वार्तालाप करें। जिस दृश्य, वस्तु या व्यक्ति से प्रानन्द प्राप्त होता है, उससे लाभ उठाएँ । चित्त को दुर्वल न होने दें। बुद्धि से काम लें कि जीवन है तो बहुत- सी सफलताएं और खुशियां मिलेंगी। क्रोध एक मनोव्याधि है; उससे अपने को दूर रखें। ग्राशा, प्रकाश, उत्साह, प्रसन्नता, उल्लास, हास- परिहास द्वारा हृदय को तरंगित रवखें । मन की प्रसन्नता ही हृदय के स्वास्थ्य की कुंजी है। योगासन-सुखासन, शवासन । पोगामनों से इलाज - . ५. दमा या श्वास (Asthma) पहचान-श्वास नलिकाएँ सिकुड़ने से सांस छोड़ने में तकलीफ होती है। फेफड़ों से सीटी-जैसी आवाज़ होती है। कारण-जलन पैदा करनेवाले (लाल मिर्च), भारी (मैदा, खोया), रूखे (खुश्क), अफ़ारा करनेवाले (तरबूज) पदार्थों के अधिक सेवन से यह रोग होता है। सर्दी में अधिक ठंडी चीजें खाने-पीने से, हर समय फ्रिज मे ठंडी की गई चीजें खाने से, धूल में सफर करने से, धुएं में देर तक काम करने से, सदियों में खुले स्थान में ठडे पानी से स्नान करने से, छाती को हवा लगने से, अधिक व्यायाम या संभोग करने से, खाने-पीने के तुरन्त वाद संभोग करने से, अधिक शारीरिक काम और दौड़धूप करने से जिसमें दम फूल जाए (जैसे ठेलागाड़ी खीचने, रिक्शा चलाने, हार की भट्टी धोकना, वेग से जाती गाडी या जानवर को हाथों और छाती के बल रोकने से, खराब चीजें खाने से, ढूंस-ठूसकर पेट भरने से) श्वास (दमा) नामक रोग हो जाता है। दमे का पूर्व-रूप-हृदय में पीड़ा, पेट मे शूल, अफारा, उबकाई, मुंह का स्वाद फीका, सांस लेते हुए शंख-जैसी नोट-सर्दी, जुकाम, खाँसी, इन्पलुएजा, दमा, ब्रोका- इटिस, न्युमोनिया, तपेदिक, डिप्थीरिया--इन रोगों को रोकने या दूर करने के लिए हमारी लोकप्रिय, भारत- प्रसिद्ध पुस्तक 'सर्दी जुकाम, खाँसी' अवश्य पढ़िये । दमा कैसे? जव सांस के मार्ग को कफ रोक ले और श्वास-वायु कुपित होकर बाहर निकलने का प्रयल करे, तब वह सांस (वाहर निकलने में रुकावट पड़ने के कारण) दायें-वायें १३७ आवाज़। योगासनो से इलाज , चल पडता है। इससे श्वास-प्रगो (श्वास-नली, फेफडे, स्वरयन्त्र आदि) मे पीडा होने लगती है और दम घुटने- सा लगता है। परहेज- १ कफ (बलगम) पैदा करनेवाली चीजे मन खाइए, जैसे मक्खन, मलाई, मलाईदार दूध, वर्फवाला दूध, मिठा- इयाँ, खोये की चीजे। २ खट्टे या कच्चे फल, अचार, चटनी अादि न खाएं। ताजा, मीठे और पके फलो का सेवन करे । पपीता बहुत अच्छा है। ३ कब्ज न होने दें, हो जाए तो एनिमा लें। ४ वकरी का दूध या बिना मलाई का गाय-भंस का दूध (सप्रेटा) पीना चाहिये । दूध एक उबाले के बाद पीना चाहिये, न अधिक गर्म हो और न ठडा हो। ५ वीडी, सिगरेट, खेनी (खाने का तम्बाकू), चरस, शराव, अफीम, घी या तेल मे तली हुई चीजे, चाट-पकौडी गोलगप्पे, मास, अडे, प्राइसकीम, लाल मिर्च, खटाई, दही, लस्सी, चावल, मैदा न खायें। ६ धूल, धुएँ, दुर्गन्ध, तनाव, जागरण, ठड मे रात का सफर, क्रोध, अत्यधिक काम (sex), चिन्ता, निराशा से दूर रहे। ७ कडी धूप मे, कठोर सर्दी मे बाहर न जायें। ८ जिस वस्तु, व्यक्ति या स्थान से चिड हो, उससे . दूर रहे। दमे का दौरा माने पर- १. लेटने की अपेक्षा बैठना अच्छा है। २ कमरे की खिडकियां-रोशनदान सोल दें। ३. दौरा होने के ३६ घटे वाद तक साना न सायें या योगासनोस इलाज कम खाये । केवल फलाहार और एक बार उबाला हुआ मलाई रहित दूध पिये। ४ एक प्याला गर्म पानी मे अदरक का रस डालकर सुबह-शाम पी जाये। ५ भोजन के स्थान पर मीठो-पको मौसमी का रस पिये। . ६ शीतकाल मे सूर्य की ओर पीठ करके बैठे। योगासन सूर्य-नमस्कार, पद्मासन, योगमुद्रासन, सुप्तवज्रासन, सिंहासन सर्वांगासन, भुजगासन । प्राणायाम-१ दोनो नथुनो से एक-साथ श्वास भीतर खीचे (पूरक करें)। २ श्वास को फेफडो मे रोके। ३ श्वास बाहर निकालें (रेचक करे)। ४. श्वास को वाहर ही रोके (भीतर न जाने दें)। ऊपर लिखे प्राणायाम को प्रतिदिन ५ बार कीजिये। ६. पेट की बीमारियां कारण १ माफिक न आनेवाली चीजे खाने से, २. खाने के तुरन्त वाद खाने से, ३ लूंस-ठूसकर खाने से, ४.परस्पर- विरोधी चीजे एक-साथ खाने से (जैसे मछली-दूध), ५. भूख न होने पर भी अधिक खाने से, ६. बार-बार खाते- चरते रहने से (इससे पाचन-अगो पर बहुत दबाव पड़ता है), ७ बहुत अधिक पानी पीने या बिल्कुल न पीने से, अधिक चिकनाईवाले पदार्थ खाने से; ६ शर्बत या ठडे पेय आदि बहुन द्रव (Liquid) पीने से, १० भोजन के विषैला होने से (Food-Poisoning), ११. भय, चिन्ता, शोक की अधिकता से; १२ अधिक शराब पीने से; १३. ऋतु, प्रकृति और शरीर-स्वभाव के विरुद्ध ने से। ५ योगासनो से इलाज
इन कारणों से नाचन-तन्त्र (मेदा, जिगर, तिल्ली,
पित्ता आदि) पर बहुत भार पडता है । इससे इन अगो मे
गडबडी पैदा होती है। ये अग थक जाते हैं या घायल हो
जाते हैं। विश्राम न मिलने से इनमे ब्रिडचिडाहट पैदा
होती है, दूपित रस बनने लगता है। पाचन-यन्त्र में किसी
एक के ही खराब होने से पेट की कोई-न-कोई बीमारी हो
जाती है। पेट को मुख्य बीमारियाँ ये हैं
१ पचानेवाली अग्नि मन्द होना, २ कब्ज, शूल
(पेट-दर्द), अतिसार (दस्त', अफारा (पेट फूलना), गैस,
सग्रहणी (पेचिश), हैजा आदि।
२ पेट की गडवडी देर तक रहने से रक्त मे होने-
वाली प्रात्मीकरण (Assimilation) की क्रिया विगड जाती
है। तव मधुमेह (डायविटीज), अर्धाग, वात (गठिया) ग्रादि
रोग ग्रा घेरते हैं।
भोजन -ताजा फल, दूध, एक टुकडा मक्खन, रोटी,
दाल, शाक, भाजी (पूडी, मिठाई-पकवान, चाट, बडे,
पकोडे, मास छोड दे, या कम से-कम कुछ महीनो के लिए
अवश्य ही त्याग दे)। भोजन खून चबाकर खाइये । सडा-
गला और चुसा भोजन न साय ।
अन्य बातें भोजन की सफाई, पानी की सफाई, हवा
की सफाई, शरीर की सफाई, वस्त्रो की सफाई, पास-पडोस
की सफाई का पूरा ध्यान रखिये। सफाई और प्रकाश मे
रोगो के कीटाणु नही पनपते ।
सब प्रकार के विटामिन प्राय ताजा-हरी वस्तुमा में
और उनकी स्वाभाविक अवस्था में ही पाये जाते है।
वस्तुओ को अधिक उबालने, सुमाने, गर्म करने, तलने,
छोक्ने, वधारने, या मसालो के मेल मे रखने, गीतागार
(कोल्ड स्टोरेज) मे रसने, डिव्यावन्द करने से बहुत-से
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योगासनास इलाज
विटामिन नष्ट हो जाते हैं । कृनिम भोजन का शरीर को लाभ तो कम ही पहुँचता है, पाचन अवश्य विगड जाता है। भूख-भर खाय, नींद-भर सोवै। उसका रोग दूर जा रोवै ।। समय-भोजन के लिए समय का नियम अवश्य वाँधना चाहिये। दो समय नाश्ता तथा दो समय भोजन बहुत काफी है । कई-कई वार खाना, प्याले-पर-प्याले चाय पीना आदि से पेट विगडेगा ही। आनेय मुनि ने कहा है-- कालभोजनमारोग्यकारणम् । समय पर भोजन करना ही आरोग्य का कारण है। आयुर्वेद के महान् प्राचार्य ने कहा है- साय-प्रातर्मनुष्याणामशन श्रुतिबोधितम् । नान्तरा भोजन कुर्यादग्निहोनसमो विधि । अग्निहोत्र के समान मनुष्य को सायकाल और प्रात प्रतिदिन दो बार भोजन वेद में बताया गया बीच मे भोजन खाना ठीक नहीं। महीने में एक-दो बार लधन (व्रत) करना चाहिये । पेट ज़रा भी खराब हो तो एक समय का भोजन छोड दें। भोजन को पचाने के लिए तीन वस्तुये बहुत अधिक सहायक है । इनका प्रयोग अवश्य करना चाहिये । वे है- काली मिर्च, अदरक और नीबू । योगासन-शशाक (अतिसार यानि डाइसेट्री मे)। मत्स्येन्द्र (पुरानी डाइसेंट्री मे)। चन्द्रनमस्कार, द्विपार्श्व, सेतुबन्ध, पादनमस्कार (बदहज्मी मे)। द्विपार्व, द्विकोण, हस्तपणदविस्तृत (अफारा मे)। मयूर (उदरवात मे) । एक- पादद्विहस्तबद्ध, मुष्टिवद्धचक्र, योगमुद्रा, मण्डूक (कब्ज मे) और पादहस्त, मण्डूक (पेट की गैस मे)। । इसके योगासनो से इलाज ८ किस रोग में कौन-सा योगासन अतिसार (डाइसेट्री)-शशांक (चन्द्र-नमस्कार)। अतिसार--(पुराना)-मत्स्येन्द्र । अपच (वदहरमी) -चन्द्रनमस्कार, द्विपार्श्व, सेतुबन्ध, पाद- नमस्कार। अफारा-द्विपार्श्व,पादनमस्कार, द्विकोण, हस्तपादविस्तृत। आधासीसी (आधे सिर का दर्द)-भुजंग । आँखों के रोग-चक्र, सूर्यनमस्कार । प्रांतों के रोग-सेतुवन्ध, कूर्म, शलभ, संचरण, धनुः । हाई ब्लड-प्रेशर (उच्च रक्तचाप)पवनमुक्तासन, शवासन। उदरवात-मयूर। उन्निद्र (नीद न पाना)-शीर्ष । कब्ज (कोष्ठबद्धता)-द्विपार्व,एकपाद-द्विहस्तवद्ध, मुष्टि- बद्ध-चक, योगमुद्रा, मण्डूक । कमर-दर्द-कन्धर, चक। कान की बीमारियां-सिंह, शीर्ष । काला आजार-~कूर्म, गरुड़। कंधों का दर्द व कमजोरी-बक । गठिया-पद्म, जानुशिर, कंधर । गरदन को पीड़ा-गोमुख। गले के रोग-पूर्वोत्तान, द्विक ण, योगमुद्रा, शीर्ष । गुर्दे (वृक्क) की बीमारियां-द्विपादचक्र, मयूरी, शशाक । गैस (पेट मे)-पादहस्त, मण्डूक। गंडमाला (अजीरें)-सर्प । घुटनों का दर्द-कंधर। चेहरे के रोग-(कील, मुंहासे, फुसी)-मत्स्येन्द्र । १४२ योगासनो से इलाज जिगर-दर्द-मयूरी, शशाक, सचरण, धनु , मयूर, ताड । जोडों के दर्द-एकपादद्विहस्तवद्ध । टांगो का दर्द व दुर्बलता-एक-पाद । टाँसिल्स-सिंह। तिल्ली बढ़ना-नाभि, मयूरी, मयूर । त्वचा (चमडी) के रोग-सूर्यनमस्कार। दमा व ब्रोकाइटिस-मत्स्य, भुजग। दिमागी कमजोरी-चक्र, शीर्ष । नसो को कमजोरी-मत्स्येन्द्र, शीर्पपाद । नाक के रोग-सिंह, शीर्ष । पत्यरी (अश्मरी)-उत्कट । प्रदर--गोमुख। प्रवल कामवासना-मेरुदण्ड । प्रसव के बाद दुर्बलता-ऊर्ध्वपादविस्तृत'। पित्ताशय के रोग-मयूरो, वृश्चिक । पोठ-दर्द-हस्तपादविस्तृत । पोलिया-उत्तानपाद । पेट के रोग-एकपादद्विहस्तबद्ध । पेट मे कीड़े-मत्स्येन्द्र, सचरण, धनुः । फाइलेरिया--मेरुदण्ड । फेफडे के रोग-पूर्वोत्तान, मुप्टिवद्धचक्र, द्विहस्तचक्र । बवासीर (अशं)-पादागुष्ठ। बस्तिगहर के रोग- शलभ । बहुमूत्र-शशाक, गोमुख, वातायन । पायगोला (गुल्म)-सर्प, द्विहस्तचक्र, मयूर । वाहों की कमजोरी -बक, वृश्चिक । नारी यफान-पूर्ण विश्राम, शव । मधुमेह (डायविटीज) सूर्यनमस्कार, हल, मोमुख, कर्म, वातायन, धनु,सव। मानसिक रोग-ध्रुव, क्षेम। योगामनो मे इसान मासिक स्त्राव (माहवारी) के रोग-चक्र, उत्तानपाद, कूर्म, द्विपादचक्र। मूत्ररोग-शशांक, गोमुख, वातायन । मैदा (ग्रामाशय) के रोग - गज, द्विपाश्वं, मयूर । मोटापा--द्विपार्श्व, पादहस्त, सेतुबध, ऊर्ध्वपादविस्तृत, द्विकोण शयन-उत्थान, तुला, जानुशिर, उच्च- श्रद्धा, ताड। रक्तपित्त-उत्तानपाद । रोढ़ का दर्द-त्रिकोण, वृश्चिक ! वातरोग-शीपंपाद, सचरण, धनुः, श्रद्धा, मण्डूक । वातनाड़ियों के रोग-ताड । वीर्य को कमजोरी-ऊर्ध्वपादविस्तृत, गोमुख, सिद्ध, वाता- यन, शक्तिचालक, गोरक्षा, मण्डूक । सर्दी, जुकाम, खांसी-योगमुद्रा, मत्स्य, सुप्तवज्र, भुजंग, शवासन। स्वप्नदोप-पादागुष्ठ, कन्दपीड़, इन्द्रिय-उपकर्पण, शीर्प, सरलत्रिकोण । संभोग (मैथुन) में स्त्री को कमजोरी-योनि-संकोचन । सांस के रोग-सूर्यनमस्कार । तिर चकराना-चक। सिर-दर्द-उत्तानपाद, चक्र। हड्डियों की बीमारियां-उत्थितहस्त-मेरुदण्ड । हनिया (प्रांत उतरने की बीमारी)-उत्कट । हाइड्रोसील-उत्कट, गरुड़। हाथो का कष्ट व थकावट-तुला। हाथों की नस-नाड़ियों को दुर्वलता-गोमुख, वक। ध्यान दीजिए. कौन-सा प्रासन इस पुस्तक के किस पृष्ठ पर मिलेगा, यह विषय-सूची में देखिए। योगासनो से इलाज
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