Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Yantrapoorvak Karmadivichar (karm Granth Rahasybhhot)

Mandal, Jain Mahila · 2009/12

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अंगुठे अमृत वसे,
वसे, लब्धीतणा भंडार ।
गुरु गौतमने समरतां, मनवांच्छित् फल दातार ॥
ज
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-
7-
WAFAS
प्रथम गणधर श्री गौतमस्वामी महाराज
वो न्यु रक्षण प्रेस, माडगी. मुबई ३

प्राचीन छुटक पत्रादि उपरथी संशोधन करी तैयार करेल रसवतीरुप
यंत्रपूर्वक
कर्मादिविचार.
(छ कर्मग्रन्धना रहस्यभूनः)
"कर्मग्रन्थना अभ्यासीओने" माटे आ अत्यंत उपयोगी लघु ग्रन्थ
योजवामां आव्यो छे.
छपावी प्रसिद्ध करनार
जैन महिला मंडळ.
श्री.शांतिनाथ महाराजनो उपाश्रय.
पायधुनी-मुंबई,
नकल ५००
वीर संवत् २४५८
विक्रम संवत् १९८८
......
मूल्य सदुपयोग
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-4
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RINTED DI JAYJI D PATEI AT TIIR NEW LARYI PRINTING PRESS BANDI I ROMA YO
& PUBLISHED BY JAY MAHIL 4 MAYDAL E DHONIE BOMBAY

प्रस्तावना. आ अमूल्य ग्रन्थनी उपयोगीता विषे भाविको माटे बहुपतिती करावना आवश्यकता जणाती नथी. ग्रन्थ माहेर्नु वस्तुज स्वयं पोताना सिद्धता प्रतिपादन करे छे. तो पण थोड़े स्पष्टिकरण अनावश्यक नहि गणाय. मुख्यत्वे करीने आंतर विपयनी स्पष्टतार्थे भाषा पोनो एक विभाग अने बीजो यंत्रोना रुपमा आंकडाथी दशावल वीजो विभाग एम श्रे मित्र देखाता छतां मूळ स्वरुपे एक एवा विस्तारमा ग्रन्थनी रचना करवामां आवी छे, कर्मग्रन्थना अभ्यासीओ माटे आ पुस्तक एक आशिर्वाद समान छे. अने पट्कर्मग्रन्थमा अलभ्य एबुं केटलु एक पूर्व पुरु- पोना छुटक पत्रोमांची उधृत करी आमां तेनो समावेश करवामां आन्यो छै. ए आ ग्रन्थनी खास महत्ता छे. आ उपरांत चौद गुणठाणाना बंध हेतु अने मांगा वगेरे पंचसंग्रहमांथी उद्धरी विशेष पूर्णी करी छे. जे खास करीने आवश्यक छै. केटलुंएक वस्तु सामान्य बुद्धिना मनुष्यने कर्मग्रन्थद्वारा ममजावू मुश्केल पड़े तेम होवाथी आ ग्रन्थमा तेनुं खास स्पष्टिकरण करी आश्रय, संवर, समुद्घात, वंध हेतु, चार ध्यान, पांच माव कुळकोटी वगैरे ६२ मार्गणाए बतावेल छ ने तथा १७ प्रकारनी प्रकृतिओनी १५ प्रकारनी प्रकृतिओ ६२ मार्गणाए उतारी छे. ते अने एबुं बीजुं घणुं वस्तु कर्मग्रन्थ महिथी तारवर्बु सामान्य मनुष्यने मार्ट मुश्केल गणाय तेथी आमां तेनी खास स्पष्टता करवामां आवी छे. धर्मग्रन्योनी उपयोगीता तो तेना अभ्यासी श्रावक-श्राविकाओ तथा साधु-साध्वी- जिओज समजि सके. परन्तु ए तो निर्विवाद छे के "ज्ञानावरणी" कर्मना क्षयार्थे आ ग्रन्थ, पाठन एक प्रबळ अने प्रेरणात्मक साधन छे. आ ग्रन्थनां मननथी तेमनु दुर्ध्यान नष्ट प्राय थइ आत्माने सकाय निर्जरा प्राप्त थाय छ, आ ग्रन्थ अभ्यासीओने "विनामूल्ये" वहेंचवानो प्रबंध करेल छे. तेथी दरेक बन्यु के भगीनी तेनो सदुपयोग करी पोता तथा पर श्रेय करवा पूर्ण प्रयाश करशे. अने निस्कारण अन्य प्राप्ति करी तेनो दुरुपयोग न थाय तेवी सर्वने नम्र विनंति छ.आवा अन्योनी प्राप्ति करी तेनो सदुपयोग न करवो ते एक प्रकारनी ज्ञाननी आशा तनाज लेखाय तेथी तेनो भक्तिभावे अभ्यास करी कगवी आत्मकल्याण करचु ए उत्तम छे. वारी रहेन अवसत्ताक ने ध्रुवसत्ताक प्रकृतिओ . मर्पणाए लखवी रही गयेल ते दुकने अते आपेल के.

अंतमा आ पुस्तक धणु उतावळे प्रगट करवू पडयु छे. अने तेथी तेमां प्रेसनी के
गुफो तपासवामां थयेली भूलो प्रत्ये उदार द्रष्टिए जोवा सौने विनंति साथे प्रार्थना छ
के जे कंड दोप जेवु जणाय ते तरफ प्रकाशकनु लक्ष खेंचर्बु के जेथी बीजि आवृतिमां
तेनो समावेश करी शकाय.
पुस्तक प्रगट करवामां जेमणे आर्थिक सहाय करी छे. तेओ सर्वनो आ स्थळे
अंतःकरण पूर्वक आभार मानवामां आवे छे. तेमनां मुबारक नामा अत्रे आपवां अमारी
फरज समजावाथी आ नीचे आप्यां छे.
५०) शेठ झवेरचंद्र गुमानचंद्र पाटण.
५०) शेठ अमेचंद्र मूळचंद्र सुरत.
४०) शेठ कस्तुरचंद्र नानचंद्र रुपाल.
२५) व्हेन प्रभावती अमदावाद.
२५) शेठ केसरीचंद्र गुलाबचंद्र आत.
आ उपरांत रु. ५) तथा बीजि पण परचुरण सहाय अमोने मळी छ तेमनो पण
आभार मानी आवां शुभ कार्यमा सहाय करवा बदल तेमनां श्रेय सार्थे प्रार्थीए छीए.
अलम् अति विस्तरेणः ।
लि..
श्री जैन मंहिला मंडळ.
पायधुनी-मुंबई,

पृष्ठ १ १ ... ... .. . अनुक्रमणिका. विषय कर्मग्रन्थ पहेलो. (कर्मविपाक) १ गाठ कर्मना नाम • आठ कर्मना उत्तरभेद १५८ (प्रकृतिओ) ३ प्रति आश्रयी टुंफ वर्णन कर्मग्रन्थ बीजो. (कर्मस्तव) ४ गुणस्थानं बंधविचार ५ गुणस्थाने उदयविचार ६ गुणस्थाने उदारणाविचार ७ गुणस्थाने सत्ताविन्चर कर्मग्रन्थ त्रीजो. (बंध स्वामित्व) ८-१४ गुणस्थानके ७९ मार्गणाए बंध सबंधी प्रकृतिदर्शक यंत्र ९-२२ मार्गणाए गुणस्थान तथा उदय ( प्रकृतिओ)... चतुर्थ पडशीति कर्मग्रन्थादिगत विचार. १. जीयादि २१ द्वारे जीवस्थान, गुणस्थान, योग, उपयोग, खेश्या, अन्पयत्व १-२-३ जीवद्वार, गतिद्वार, रंद्रियद्वार ४-५-६ कायद्वार, योगद्वार, वेदद्वार ७-८-९ षायद्वार, लेण्याद्वार, सम्यक्त्वद्वार १०-११-१२ शानद्वार, दर्शनद्वार, चारित्रद्वार १३ थी १८ उपययोगद्वार, आहारकद्वार, भाषकद्वार, परित्तद्वार, पर्याप्तद्वार सस्मद्वार, १९ थी २१ समीद्वार, भव्यद्वार, परिमद्वार ११ नोण कर्मप्रथना छकाय आश्री सयोगी भागा १२ गुणस्थानने बंध हेतु अने तेना भागा पहेले गुणठाणे १० थी १८ बंध हेतुना मागा ... वीजे गुणठागे १० थी १७ बंध हेतुना भोगा श्रीजे गुणठाणे १ थी १६ बंध हेवना भागा ... चोथे गुणठाणे ९ यी १६ बंध हेतुना भागा पाचमे गुणठाणे ८ थी १४ बंध हेतुना भागा ... छो गुणठाणे ५ ची ७ बंध हेतुना भागा सातमे गुणठाणे ५ धी, आठभे गुणठाणे ५ थी ५. ध हेतुना भागा नवमे गुगठाणे २, ३, दशमे गुणगणे १ ने २, अग्यारभे बारमे १ र हेतुना भा॥ तेग्मे गुणठाणे १ बंध हेतुना भागा १३ अठाणु बोलनो मोटो अल्पबहुत्व (जीवस्थान गुणस्थान, योग, उपयोग, लेश्या सहित) १४ भाव प्रकरण (औपशामिकादिक भागोना भागा विगेरे) १५ चौंद गुणस्याने मूळभाव ने उत्तरमाव पांचमा शतक कर्मग्रन्थादिगत विचार. १६ पुण्यप्रति ४२ १७ पापप्रकृति ८२ ... ३३ ३३ ४२ . ... ...

पृष्ठ ६२ .. .. १८ आश्वना ४२ भेद १९ संवरना ५७ भेद २. ध्रुववधी प्रकृति ४७, मधुवसबंधो ७३ २१ ध्रुवोदयी प्रकृति २७, अध्रुवोदयी ९५ २२ ध्रुवसत्ताक अति १३०, अध्रुवसताक २८ . ६३ ... .. ... ६३-६४ ६४-६५ ६५ ... " ... ९ . .. ... ७५-७६ " .. ७७-७८ ... .. २४ परावर्तमान ९१, अपगवर्तमान २९ (बंध प्रकृति ) २५ क्षेत्रविपाकी ४, भवविपाकी ४, जीववीपाको ७८, पुगलविपाकी ३६ उदयप्रकृतिमो ) २६ वय हेतु ५७ गत्यादि ६३ मार्गणाए प्रकृतिओनु विवरण २७ सर्वघाती यत्र प्रकृति २० नुं विवरण (६२ मार्गणाए) २८ देशधाति वध प्रकृति २५ नुं विवरण .९ अधाति बंध प्रकृति ७५नु विवरण ३. क्षेत्रविपाकी ४ प्रतिनो उदय ३१ भवविपाकी ४ आयुष्यनो उदय ३. जीववीपाकी ७८ प्रकृतिनो उदग ३ पुद्रलविपाकी ३६ प्रकृतिनो उच्य ३५ आश्वना ४२ भेट ३५ सवग्तत्वना ५७ भेट ३६ चार ध्यानना १६ भेट ३७ ममूदपात ७ १८ वय हेतु ५७ १९ पाच भावना ५: भेद ८. पाप प्रकृति ८० नो बंध ४१ पुण्य प्रकृति ११ नो वय ४१ ध्रुववधी ४७ प्रकृति ४. अध्रुवबधी ७३ प्रकृति वोदयी ०७ प्रकृति ४५ अधुनोदयी ९५ प्रकृति अपरावर्तमान .९ प्रकृनि ४७ परावर्त्तमान ९१ प्रकृति ४८ वामठ मार्गणाए कुळकोटी ४९ योग थानना स्वामी आश्री अत्पन्हुन्छ ५. चौद प्रकाग्ना जीवना स्थितिस्थानतुं अल्पबहुत्व ५१ एकेंद्रियाटिक जीवोमा स्थिति आश्री अल्पबहुत्व ५२ पुदगल वर्गणानो क्रम ५३ आठ कर्मनी उत्तर प्रकृतिनो उत्कृष्ट तथा जघन्य ब्धितिबंध ५४ आठे कर्मनो उत्कृष्ट अवाषाकाळ ८२ ८६ . ८७ .. ११ " ९१ . : . ... .. १०२ १०४ १०८ [३] पृष्ठ १०८ ... १०९ १११ ११ ११३ १०७ ... ९५ आठे कमनी उत्तर प्रकृतिओनो उकुत्ट अवाधाकाळ ५६ जीवना ५६३ भेद पैकी जे जे क्षेत्रादिमा जेटला भेद लामे तेनु सख्यासूचक यंत्र ५७ १२ मार्गणा पैकी चार गति आश्री जीवना ५३ भेदोन विवरण (यत्र) ५८ १२ मार्गणाए जीवना ५६३ भेदोन विवरण (यंत्र) ५९ ८१ वोलनी गतागतितुं यत्र s. ०५ स्थाने ०३ संपटानी प्राप्ति आश्री यंत्र १ सिबद्वार (समयसिद्धि विगैरेनी सख्या) ६० च्या कर्मप्रथनु मंक्षिप्त विवरण मूल प्रकृति आश्री वष उदय मतास्थान ने संविध जीवरथाने मूळ प्रकृतिना बंध उदय मत्तस्थान के मवेध उत्तर प्रकृति आश्री वध, उदय सनात्यान ने तेनो मवेष ज्ञानावरणीय, अतराय, दर्शनावरणीय कर्म वेदनीय कर्म १२७ १०९ ... .. .. आयुप्य कम गोत्रमर्म .. मोहनी म .. ... . नामकर्म चांद जीवभ्यान आश्री, उत्तर प्रक्रतिना प. उदय, मना स्थान ने नेनो विन मानावाणीय ने अनराय कर्म दर्शनावरणीय, वेदनीय ने गोत्रकर्म आधुम मोहनीय कर्म माम कर्म चैट गुणवान आश्री उत्तर प्रकृतिना वध. उदर सत्ता भ्यान अन तेनो मेवर ज्ञानाचरणीय, अतगय, दर्शनावरणीय कर्म वेदनीय गोत्र कर्म आयुर्म --- मोहनीर भर्म १६८-६९ १६९ १७१ १८. १८१ १८७ नामा .. . गति मार्गणाए बंघ, रुदय, मसास्थान ने तेनो मवेध इडिय मार्गणा बच, उदय, मत्ताम्यान ने ननो सवेध ज्या उदय त्या उदीरणा-तमा ४३ प्रति मवधी अपवाद चौट गुणम्चाने बध प्रतिनी संख्या उपशम श्रेणिनु नप मिदिना सुबर्नु मक्षिप्त वर्णन ६. बासठ मागणाए नोहनीय कर्मना अब, उदर मत्ताम्यान तेनाभंग, पदो अने पदवृद् मबंधी यंत्र ६४ बासठ मानणगत गुणधानोना मोहनीय कर्मना वध, उदय, सनास्थान तेना मग, सवधी यंत्र ०९ . पढो ने पदवृद्ध . . २४६ २४७ २४८ - [१] पृष्ठ १५ गसठ मागणाए नामकर्मना वध, उदय, सत्तास्थान अन तेना भंग संबंधी यंत्र २३८ ६६ चौट गुणत्थाने जीवस्थानादि मंवधी यंत्र जीवभ्यान, योग उपयोग, लेग्या, मळ ववहेतु, मिथ्याव, अविरति, कपाय (१ थी ८) २४१ योग, उत्तर बंधहेतु. अपबहुल, मूळभाव, उपशम, क्षायिक, क्षयोपशम, मौदयिक,(९ थी १६) २४२ पारिणामिक, जनरभाव, मानिपातिक मूळ, द्विकसंयोगी मातमो भंग, त्रिकसंयोगी नवमो भन, त्रिकर्मयोगी दशमो भग, चतुःसयोगी चोथो भंग, चतु संयोगी पाचमो भंग, पचमयोगी एक भग, मानिपातिक उत्तरभेद (१७ थी ०७), ૧૪ जीवायोनी, कुलकोटी, समृदयात, दडक यानभेद, चरित्र, परिसह, समकित (२७ थी ३५) २४४ दृष्टि, आश्रव, सवर, निजग, पुण्यवंथ, पापबध, आठ कर्म आश्री, पंच ने उदय (३७ थी ४४) ०४५ उदीरणा, मत्ता, देवताना भेद, नारकीना भेट, मनुप्यना मेद, तिथंचना भेद, जीवना भेद, अवयची, अवयी (४४ यी ५३) . ध्रुवोदया, अध्रुवोदयी, वमत्ता, आधुवसत्ता, परावर्तमान, अपरावर्तमान, (५४ थी इ.) मघाती, देशपाती, दर्शनावरांना बंब उदय सत्ताम्यान, मोहनीयना बंधश्वान ने उदय स्थान, (१ थी '६ मोहनीयना मत्ताम्यान, नामकमना बयान, उदय थान, मत्थान, आत्माना आठ प्रकार (६७ थी ७०) मोहनी कमनी उदय आश्री चाबीशी, नामकर्मना बवना भागा उदयना भागा, वेदनीयना भग, गोत्रना मंग, आयुना भग नामर्ममत्ताना भग, मोहनीना पद, योगमबंधी उदय भग, पदवर्ण (७३ थी ८०) उपयोगना उदयभग, पढवर्ण, लेश्याना उदयभंग, पदवण; योगनी चोवीशी, योगना पढ़ . उपयोगनी चोवीशी, लण्योगना पद, लेदयानी चोवीची, लेझ्याना पद (८४ थी ९४) २५१ ६७ श्मना दश गुणटाणे शंग चोवीशी, गुणाकार, चोषीशीनो सग्वानो, चोवीगे गुणवा उदयभग, पद, गुणाकार, कुल पद, चोवीगे गुणता पदवृद, उदय, उदय चोवीशी, पद कुल (१३)... २५२ .८ प्रथमना दश गुणल्याने उपयोग चावीशी, गुणाकार, उपयभंग पर, पदभग, पदवृंद, लेझ्या, चोचीगी, गुणाकार, उदयमग, पटन ग्यानां गुणाकार, पदद (13) ०५३ :. प्रथमना ११ गुणठाणे व थान, बबना भागा, उदयल्यान, उदयभग चोवीशी, उदयना भागा, उदय यानपढ, पदवृढ (७) २५४ ७. मोहनी मना बंधन्यान बचना भागा, उदयस्थान, उदय चोवीशी, उदयभंग, उदयस्थानपद, उदयन्यानपवृट, मोहनीना नत्तास्थान (८) ७१ यामठ मार्गणाए गति जाति विगग्ना यंत्र गति, जाति, काय, योग, वंद, कपाय, ज्ञानाजान, संयम, दर्शन, भव्यामन्य, मम्यक्त्व, २५६-०९ मशी, असंजी, आहाग, अणाहारी, शरीर, पर्याप्ति. प्रण (१ थी १६) व्यानभेट, मझा, समृदयात, सम्यान, मघयण, दृष्टि, दडक, जीवायोनी, कुळकोटी, अवगाहना, जीवस्थान गुणल्यान, योग, उपयोग, लेश्या, अल्पबहुत्व (१७ यी ३३) २६०.६३ मूळ ववहेतु, उत्तर वयहेतु, मिथ्यात्व, अघिपति, कपाय, योग, मूळभाव, उत्तरभाष, उपशम, क्षायिक, क्षायोपमिक, औदयिक, पारिणामिक, सानिणतिक, द्विकर्मयोगो, विस्मयोगी, चतु'मयोगी, पत्रमयोगी, मानिपानिक कुल, (३. यी ५३) ६४-६५ .. . . -

२७४-०७
[५]
पृष्ठ
पुण्यबंध, पापबंध, ध्रुववध अध्रुवबंध, परावर्तमान, अपगवर्तमान, जानावरणी, दर्शना-
धरणी, वेदनीय, मोहनीय, भायु, नाम, गोत्र, अतराय-सर्व जातिना प्रकृतिचंय
(५४ थी ६९)
२६८-08
यधविच्छेद प्रकृति, वध ओषप्रकृति, मिथ्याचादि १० गुणटाणे वधसबंधी प्रतिमओनी
मख्या कुल १६ (६९ यी ८६)
२७०-०७३
पुण्यप्रकृति, पापप्रकृति, ध्रुवोदयी, मधुवोदयी, क्षेत्रविपाकी भवविपाकी, जीवविपाकी,
पुदगलविपाकी, ज्ञान वरणी विगेरे आठे कर्मानी उदय प्रकृतिनी संख्या कुल १६
(८७ यी १०४)
उदयविच्छेद प्रकृति, उदय ओघप्रकृति, मिथ्यात्वादि १८ गुणठाणे रदयमांधी मनिओनी
संख्या कुल १६ (१०५ थी १२१)
उदीरणा औषपति, मिथ्यात्वादि १४ गुणठाणे उढीरणा संवधी मकृतिओनी मल्या
कुल १५ (१०२ थी १३७)
सर्वधावी, देशघाती, अघाती वध, आश्रव, सवा, निर्जग, यंत्र, मोक्ष, अजीव, मोहनी
कर्मना उदयना भंग ने चोवीशी, वासठ मागणानी भवस्थिति (१३८ यी ४९)
कायस्थिति, भने मानावरणी, दर्शनावरणी वेदनीय, आयु, गोत्र ने अतगय-ए छ कमंना
भग (१५० थी १५७)
धृवमत्ताक,, अधृवसत्ताक, मत्ताभोघमकृति, चौदगुणाणे मत्तागर प्रकृतिओनी मख्या
(१५८ यी १७६)
४० सत्तागत १४८ पतिनी समजुती-वृवसत्ताक १२६ ने अवसत्ताक २० मतिओ मार्गणाए
७३ वासठ मार्गणाए १४ गुणन्याना आश्री अमृवत्तक पुरसताक मकनिमोनु विवरण
२८-२८८
..
२८९-१९४
२९५
०९७-३०१

कर्मविपाकमुक्ताय नमः यंत्रपूर्वक कर्मादिविचार, कर्मग्रंथ पहेलो (कर्मविपाक) ९ बाठ कर्मनां नाम. १ ज्ञानावरणीय २ दर्शनावरणीय ३ वेदनीय ४ मोहनीय ५ आयुष्य ६ नामकर्म ७ गोत्रकर्म ८ अंतरायकर्म. आठ कर्मना उत्तर नेद १५७ (१) झानावरणीयना ५ मेद ३ मिथ्यात्व मोहनीय १ मतिज्ञानावरणीय ४ अनंतानुबंधी क्रोध २ श्रुतज्ञानावरणीय ५ मान ३ अवधिज्ञानावरणीय माया ४ मनःपर्यवज्ञानावरणीय लोभ ५ केवलज्ञानावरणीय ८ अप्रत्याख्यानी क्रोध (२) दर्शनावरणीय कर्मना ९ मेदं मान १ चक्षुर्दर्शनावरणीय १० माया २ अचक्षुर्दर्शनावरणीय ११ लोभ ३ अवधिदर्शनावरणीय १२ प्रत्याख्यानी क्रोध ४ केवलदर्शनावरणीय १३ मान ५ निद्रा माया ६ निद्रानिद्रा १५ लोम ७ प्रचला १६ संज्वलन क्रोध ८ प्रचलाप्रचला १७ मान ९ थीणद्धी १८ माया (३) वेदनीय कर्मना वे भेद १९ लोम १ सातावेदनीय २० हास्य मोहनीय २ असातावेदनीय २१ रति मोहनीय (४) मोहनीय कर्मना २८ भेद २२ शोक मोहनीय १ सम्यकत्व मोहनीय २३ अरवि मोहनीय २ मिश्र मोहनीय २४ भय मोहनीय [२] . २५ जुगुप्सा मोहनीय २६ श्री वेद २७ पुरुष वेद २८ नपुंसक वेद (५) श्रायुप्यकर्मना चार मैद १ देवायु २ मनुष्यायु ३. तिथंचायु ४ नरकाय (६) नाम कर्मना १०३ मेद १ देवगति २ मनुष्यगति ३ तिर्यचगति ४ नरकगति ५ एकैद्रियजाति ६ चेहंद्रियजाति ७ तेइंद्रियजाति ८ चौरिद्रियचाति ९ पचद्रियजाति १० औदारिक शरीर ११ बैंक्रिय शरीर १२ आहारक शरीर १३ वैजस शरीर १४ कार्मण शरीर १५ औदारिक अंगोपांग १६ वैक्रिय अगोपंग १७ आहारक अंगोपांग १८ औदारिक बंधन १९ वैक्रिय बंधन २० आहारक बंधन २१ तेजस बंधन २२ कार्मण बंधन २३ औदारिक तेजस बंधन २४ वैक्रिय तैजस बंधन २५ आहारक तैजस बंधन २६ औदारिक कार्मण बंधन २७ वैक्रिय कार्मण बंधन २८ आहारक कार्मण बंधन २९ औदारिक तैजस कार्मण यंधन ३० वैक्रिय तैजस कार्मण बंधन ३१ आहारक तेजस कार्मण बंधन ३२ तंजस कार्मण बंधन ३३ औदारिक सवातन ३४ वक्रिय संघातन ३५ आहारक संघातन ३६ तैजस संघातन ३७ कार्मण संघातन ३८ वचऋपमनाराच संघयण ३९ अपभनाराच संघयण ४० नाच संघयण ४१ अर्धनाराच संघयण ४२ कीलिका संघयण ४३ छेवटुं सघयण ४४ समचतुरस्त्र संस्थान ४५ न्यग्रोध संस्थान ४६ सादि संस्थान ४७ कुब्ज सस्थान ४८ वामन संस्थान ४९ हुंडक सस्थान ५० कृष्ण वर्ण ५१ नील वर्ण ५२ रक्त वर्ण ५३ पित वर्ण ५४ श्वेत वर्ण ५५ सुरमि गंध ५६ दुरभि गंध ५७ तिक्त रस ५८ कटुक रस ५९ कपायलो रस ६. आम्ल रस .

६२ गुरु [३] ६१ मधुर रस ८७ प्रत्येक नामकर्म स्पर्श ८८ स्थिर नामकर्म ६३ लघु स्पर्श ८९ शुभ नामक ६४ मृदु स्पर्श ९० साभाग्य नामकर्म ६५ खर स्पर्श ९१ सुस्वर नामकर्म ६६ शीत स्पर्श ९२ आदेय नामकर्म ६७ उष्ण स्पर्श २३ यश कीर्ति नामकर्म ६८ स्निग्ध स्पर्श ९४ स्थावर नामकर्म ६९ रुक्ष स्पर्श ९५ सूक्ष्म नामकर्म ७० देवानुपूर्वी ९६ अपर्याप्त नामकर्म ७१ गनुष्यानुपूर्वी ९७ साधारण नामकर्म ७२ नियंचानुपूर्वी ९८ अस्थिर नामकर्म ७३ नरकानुपूर्वी ९९ अशुभ नामकर्म ७४ शुभ विहायोगति १०० दुर्भाग्य नामकर्म ७५ अशुभ विहायोगति १०१ दुःस्वर नामकर्म ७६ पागान नामकर्म १०२.अनादेय नामकर्म ७७ चासोच्छम नामकर्म १०३ अपयश नामकर्म ७८ आतप नामकर्म (७) गोत्रकर्मना बे मेद ७९ उद्योत नामकर्म १ उच्च गोत्र ८० अगुरुलघु नामकर्म २ नीच गोत्र ८१ तीर्थकर नामकर्म (८) अंतरायकर्मना पांच मेद ८२ निर्माण नामकर्म १ दानांतराय ८३ उपयात नामकर्म २ लाभांतराय ८४ उस नामकर्म ३ भोगांतराय ८५ वादर नामकर्म ४ उपभोगांतराय ८६ पर्याप्त नामकर्म ५ वीयांतराय प्रकृति आश्रयी डंक वर्णन. उपर त्रमाणे ज्ञानावरणीयनी ५, दर्शनावरणीयनी ९, वेदनीयनी २, मोनीयनी २८, आयुष्यनी ४, नामकर्मनी १०३, गोत्रकर्मनी २ अने अंतराय कर्मनी ५-एवी रीते आठ कर्मनी मली १५८ प्रकृति थाय छे.

[४] मत्तामा–उपर प्रमाणे १५८ प्रकृति होय छ, कोई स्थले दश वंधन सिवाय, फक्तं पांच शरीरनां पांच ज बंधन गणीने १४८ पण कहेली छे. ते सुज्ञोए विचारी ले. उदयमां-पंदर बंधन, पांच संघातन, तथा वर्णादि सोल एम ३६प्रकृति वाद करता. बाकी- नी १२२प्रकृति गणवामां आवी छे. कारण के बंधन तथा संघातनने शरीर साथ मेलवी देवामां आव्या छे. अने वर्णादि वीशने बदले सामान्य रीते वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, एम चार भेद गणवामां आव्या छे. उदीरणामां-पण उपर प्रमाणे १२२ प्रकृति जगणवामां आवी छे. बंधमां-उपर कहेली १२२ मांथी सम्यक्त्व मोहनीय अने मिश्रमोहनीय सिवाय १२० प्रकृति गणवामां आवी छ. सम्यक्त्व मोहनीय, अने मिश्रमोहनीय, ए वे प्रकृति बंधमां होती नथी; कारण ते मिथ्यात्व मोहनीयना, अर्घविशुद्ध तथा शुद्ध करेला ढलीआं छे. तेथी ते बंधनमा गणाय नहीं. आवे प्रकृति अनादि मिथ्यात्वीने उदयमां पण होती नथी. कर्मग्रन्थ बीजो (कर्मस्तव) १ गुणस्थाने बंध विचार. सामान्य बंध १२०. वर्ण १६, बंधन १५, संघातन ५, समकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, ए ३८ विना. १ मिथ्यात्व गुणस्थाने-११७प्रकृतिनो बंध होय छे. तीर्थकर नामकर्म १,आहारक शरीर १, आहारक अंगोपांग १, ए ३ प्रकृति विना. २ साखादन गुणस्थाने-१०१ प्रकृतिनो बंध. नरक त्रिक ३, जाति चतुष्क ४, स्थावर, चतुष्क ४, हुंडक १, आतप १, छेवटुं संघयण १, नपुंसक वेद १, मिथ्यात्व मोहनी १, ए १६ विना. ३ मिश्र गुणस्थाने-७४ प्रकृतिनो बंध. तियंचत्रिक ३, स्त्यानर्षि त्रिक ३, दुर्भगत्रिक ३, अनंतानुबंधी ४, मध्य संस्थान ४, मध्य संहनन ४, नीच गोत्र १, उद्योतनाम कर्म १, अशुभ विहायोगति १, स्त्रीवेद १, ए २५ विना तथा २ आयुष्य (अवंधक होय तेथी) कुल २७ विना. .४ अविरति गुणस्थाने-७७ प्रकृतिनो बंध. आयुष्य २, तथा तीर्थकर नाम कर्म १, ए त्रण प्रकृति सहित पूर्वनी ७४ प्रकृति मळी कुल ७७. .

. [५] ५ देशविरति गुणस्थाने-६७ प्रकृतिनो बंध होय छे. वज्रऋषम नाराच १, मनुष्य त्रिक ३, अप्रत्याख्यान चतुष्क ४, औदारिक द्विक २, ए दश प्रकृति विना. ६ प्रमत्त गुणस्थाने-६३ प्रकृतिनो बंध होय छे. प्रत्याख्यान चतुष्क ४ विना. ७ अप्रमत्त गुणस्थाने-५९ अथवा ५८ प्रकृतिनो बंध होय छ, शोक,१, अरति १, अस्थिर १, अशुभ १, अयश १, असाता १, ए ६ विना ५७ प्रकृति रहे, तेमा आहारक द्विक २, अहीं बंधाय छ, तेथी ए वे मेळवतां ५९ थाय, तेमांथी देवायु १, जता ५८ रहे. कारणके अहीं कोईने देवायुनो बंध होय छ, अने कोईने नथी होतो. तेथी छठेथी बांधतां बांधतां अहीं आवे तेने होय. अहीं शरु तो करेज नही. ८ निवृत्ति गुणस्थान-आना सात माग छ, तेमा पहेले मागे ५८ (उपर प्रमाणे) चीजे भागे निद्राद्विक विना ५६, त्रीजे पण ५६, चोथे ५६, पांचमे ५६, छठे ५६, अने सावमे भागे सुरद्विक २, पंचेंद्रिय जाति १, शुभ विहायोगति १, सनवक ९, औदारिक विना शरीर चतुष्क ४,अंगोपांगद्विक २, समचतुरस्र संस्थान १, निर्माण १, जिननाम कर्म १, वर्णादि चतुष्क ४, अगुरुलधु चतुष्क ४, ए ३० विना बाकीनी २६ प्रकृतिनो बंध रहे. ९ अनिवृत्ति गुणस्थान-आना पांच भाग छे. तेमां पहेले मागे उपरनी २६ माथी हास्य १, रति १, दुगंछा १, अने भय १, ए चार प्रकृति जतां २२ रहे. बीजे भागे पुरुपवेद जवाथी २१, त्रीजे मागे संज्वलन क्रोध जता २०, चोथे मागे मान जवाथी १९, अने पांचमे भागे माया जवाथी १८ रहे. १० सूक्ष्म संपराय गुणस्थाने-उपरनी १८मांथी संज्वलन लोभजतां १७ प्रकृतिनो बंध रहेछ ११ उपशांत मोह गुणस्थाने-उपरनी १७ प्रकृतिमाथी दर्शनावरणीय ४, उचगोत्र १, यशनामकर्म १, ज्ञानावरणीय ५, अने अंतराय ५, ए९१६ प्रकृति जवाथी चाकी एक ज सातावेदनी प्रकृतिनो बंध रहे छे. १२ क्षीणमोह गुणस्थाने-एक साता वेदनीनो ज बंध छे. १३ सयोगी केवली गुणस्थाने एक साता वेदनीनो ज बंध होय छे. १४ अयोगी केवली गुणस्थाने-एके प्रकृतिनो बंध न होय. आगुणस्थान अबंधक छ २ गुणस्थाने उदय विचार ओधे प्रकृति १२२ (उपर जणानेली १२०मां समकित मोहनी ने मिश्रमोहनी उमेरवाथी) १ मिथ्यात्व गुणस्थाने-मिश्रमोहनी १, समक्ति मोहनी १,आहारक द्विक २, जिन नाम कर्म १, ए पांच प्रकृति विना नाकीनी ११७ प्रकृतिनो उदय होय छे.

२ आस्वादन गुणस्थाने-१११ प्रकृतिनो उदय होय. सूक्ष्य १, अपर्याप्त १, साधारण १, आतप १, मिथ्यात्व १, ए पांच विना तथा नरकानुपूर्वांनी अनुदय होवाथी कुल छ प्रकृति बना पाकी १११. ३ मिश्र गुणस्थाने-उपरनी १११ माथी अनंतानुबंधी ४, स्थावर १, एकेन्द्रिय १, तथा विकलेंद्रिय ३, ए नव प्रकृतिनो अंत होय, तथा त्रण आनुपूर्वीनो अनुदय होय, तथी कुल बार प्रकृति जतां ९९ प्रकृतिनो उदय रहे, अने मिश्र मोहनी भळवाथी १०० प्रतिनो उदय होय. ४ अविरति गुणस्थाने-१०४ प्रकृरिनो उदय होय. कारण के उपरनी १०० प्रकृतिमा ममकित मोहनी १, तथा आनुपूर्वी ४, ए पांच प्रकृतिनो उदय होवाथी अने मिश्रलोहनीना उदयनो विच्छेद थवाथी चाकीनी चार प्रकृति भेळवतां १०४ थाय. ५ दनविरति गुणस्थाने-८७ प्रकृनिनो उदय होय. अप्रत्याख्यानी ४, मनुष्यानुपूर्वी १, तिथंगानुपुर्वी १, वक्रियाष्टक ८, दुर्भाग्य १, अनादेय १, अयश १, ए १७ प्रकृति विना. ६ प्रमत्त गुणस्थाने-८१ नो उदय होय. निर्यग्गति १, तिर्यगायु १,नीचगोत्र १, उद्योत १, प्रत्याख्यानी ४, ए आठ विना तथा आहारक द्विक भळे तेथी, ७ अप्रमत्त गुणस्थाने---७६ प्रकृतिनो उदय होय. स्त्यानदि त्रिक ३, आहारकद्विक २, ए पांच प्रकृति विना. ८ निवृत्ति गुणस्थाने-७२प्रकृतिनो उदय. समकित मोहनी १,छल्लां संघयण ३,ए चार विना ९ अनिवृत्ति गुणस्थाने-६६ नो उदय. हास्यादिक ६ विना. १० सूक्ष्ममंपराय गुणस्थाने-६० नो उदय. वेद ३, संज्वलन क्रोध १, मान १, माया १, ए छ विना. ११ उपशांसमोह गुणस्थाने-५९ नो उदय. संज्वलन लोम विना. १२ क्षीणमोह गुणस्थाने-पहेले भागे अपम नाराच १, नाराच १, ए वे विना ५७, तेमाथी निद्राद्विक २ विना छेल्ले समये ५५. १३ सयोगी गुणस्थाने–४२ नो उदय. ज्ञानावरणीय ५, अंतराय ५, दर्शनावरणीय ४, ए १४ विना तथा तीर्थकर नाम कर्म मेळवतां कुल १३ प्रकृति वाद करता ४२ रहे. (अहीं तीर्थकर नाम कर्मनो उदय होय छे.) १४ अयोगी गुणस्थाने-१२प्रकृतिनो उदय छेल्ला समय सुधी रहे. कारणके उपरनी ४२मांथी औदारिक द्विक २, अस्थिर १, अशुभ १, शुभ विहायोगति १, अशुभ विहायो- गति १, प्रत्येक १, स्थिर १, शुभ १, संस्थान ६, अगुरुलघु १, उपघात १, श्वासोवास १, वर्ण १, गंध १, रस १, स्पर्श १, निर्माण १, तैजस १, पराघात १, कार्मण १, वज्रऋपमनाराच १, दुःस्वर १, सुस्वर १, साता अने असातामांथी [७] १, ए ३० प्रकृतिना उदयनो विच्छेद १३ माने अंते होय. अने १४ माने छल्ला समये सुभग १, आदेय १, यश १, साता असातामांधी १, त्रस १, बादर १, पर्याप्त १, पंचेंद्रिय जाति १, मनुष्य गति १, मनुष्यायु १, जिन नाम १, उच्च गोत्र १, ए बार प्रकृतिनो उदय विच्छेद करें. ३ गुणस्थाने उदीरणा विचार. पहेला गुणस्थानथी छठा एटले प्रमत्त गुणस्थान सुधी उदयनी पेठे ज उदीरणा जाणवी अप्रमत्त गुणस्थानथी त्रण त्रण प्रकृति ओछी करवी. एटले के उदयमा प्रमत्त गुणस्थाने स्त्यानाचित्रिक ३ अने आहारकद्विक २, एपांच प्रकृतिनो विच्छेद थाय छे. पण उदीरणामां वेदनीय द्विक २, अने मनुष्यायु १, ए त्रण प्रकृति सहित आठ प्रकृतिनो विच्छेद थतो'होवा- थी अप्रमत्तादिक गुणस्थाने त्रण त्रण प्रकृति उदय करतां उदीरणामां ओछो गणवी. तेथी अप्रमत्ते ७३, निवृत्तिए ६९, अनिवृत्तिए ६३, सूक्ष्म संपराये ५७, उपशांसमोहे ५६, क्षीण- मोहे ५४, अने सयोगीए ३९. अयोगी गुणस्थाने वर्तताने उदीरणा होती नथी. ४ गुणस्थाने सत्ता विचार. ओघे १४८ प्रकृति होय. (१५८ मां बंधन १५ गण्या छे ते ५ गणवाथी १४८ थाय.) १ मिथ्यात्व गुणस्थाने-१४८ नी सत्ता. २ सास्वादन गुणस्थाने-१४७ नी सत्ता. जिन नाम कर्म विना. ३-मिश्र गुणस्थाने-१४७ नी सत्ता. जिननामकर्म विना. ४-अविरति गुणस्थाने-१४८नी सत्ता. अथवा अनंतानुबंधी ४, मिथ्यात्व १, मिश्र १, समकितमोहनी १, ए सातनो अंत थवाथी १४१ नी सत्ता अचरम शरीरी शायिक सम्यग्दृष्टिने उपशम श्रेणिनी अपेक्षाए होय. अने क्षपक श्रेणिनी अपे- क्षाए नरकायु १, तिर्यगायु १, सुरायु १, ए त्रण विना १४५ नी सत्ता होय. अने तेमांथी.ससक एटले सात टाळीये त्यारे १३८ नी सत्ता होय.. (आ चारे भांगा अविति गुणस्थानथी मांडीने अनिवृत्ति बादर संपराय नामना नवमा गुणस्थानकना प्रथम भाग सुधी होय. ते आ प्रमाणे.) ओधे । क्षपक- उपशम क्षपकश्रेणीमा श्रेणी श्रेणी ५ देशविरति गुणस्थाने-१४८- १४५- १४१ ) क्षायक १३८ ६ प्रमत्त गुणस्थाने- १४८- १४५- १४१ / सम- १३८ ७ अप्रमत्त गुणस्थाने- १४८- १४५- १४१ किती १३८ ८ निवृत्ति गुणस्थाने- १४८- १४५- १४२ अनंतानुबंधी ४, तिर्यगायु १, नरकायु १, ए छ विना १४२ जाणवी. . सप्तक क्षये [८] ९ अनिवृत्ति बादर मंपगय गुणस्थाने- उपशमश्रेणी. क्षपक श्रेणी. स्वाभाविक. विसंयोजनी १ पहेले भाग १४८ १४२ १३८ २ वीज भाग १४८ १४२ १२२ स्थावर द्विक २, तियेच द्विक २, नरक द्विक २, आतप द्विक २, म्त्यानदि त्रिक ३, एकद्रिय जाति १, विकलेंद्रिय त्रिक ३, साधारण १, ए १६ विना १२२ ममजवी. ३त्रीजे मागे-१४८-१४२-११४. बीजा कपाय ४, त्रीजा कपाय ४, प.८ विना. ४ चोथे मागे-१४८-१४२-११३. नपुंमक वेद जवाथी. ५पांचमे भाग-१४८-१४२-११२. स्त्रीवेट जवाथी. ६ छठे भाग-१४८-१४२-१०६. हास्यादिक ६ जवाथी. ७ सातमे भाग-१४८-१४२-१०५. पुरुषवेद जबाथी. ८याठमै भाग-१४८-१४२-१०४. संज्वलन कोष जबाथी. ९ नवमे भागे-१४८-१४२-१०३. संज्वलन मान जवाथी. १० सूक्ष्म संपराय गुणस्थाने-१४८-१४२-१०२. मंज्वलन माया जबाथी. ११ उपशांतमोह गुणस्थान-१४८-१४२-१०१. मंज्वलन लोभ जवाथी. १२ क्षीणमोह गुणम्याने-१०१. नेमांथी हिचरम समय निद्रा १, निद्रानिद्रा १, एवं जवाथी ९९ प्रकृतिनी सत्ता होय. १३ सगोगी गुणस्थाने-८५ नी सत्ता होय. कारण के उपरनी ९९ मांथी ज्ञानावरणीय ५, दर्शनावरणीय १, अंतराय ५, ए १४ जवाथी. १४ अयोगी गुणस्थाने छेल्लानी पहेलाना (हिचरम) समये ८५ मांथी वेद २, विहायो- गतिर, गंध २, स्पर्ण ८, वर्ण ५, रस ५, शरीर ५, बंधन ५, मंघातन ५, निर्माण १, संघयण ६, अस्थिर १, अशुभ १, दुर्भग १, दुःस्वर १, अनादय १, अया १, संस्थान ६, अगुल्लघु १, उपपात १, पराघात १, उच्चस १, अपर्याप्त १, साता असातामाथी १, पर्याप्त १, स्थिर १, प्रत्येक १, उपांग ३, मुस्वर १, नीचगोत्र १, ए ७२ प्रकृतिनो अंत होय. तेथी अयोगी गुणस्थानना छेल्ला समये १३नी सत्ता होय. मनुप्यत्रिक३,त्रस विक३, यशर,आदेय१, मुभगर, जिननाम? उच्च गोत्र १, पंचेंद्रिय जाति १, साता असातामाथी १, ए १३ एटले नरानुपूर्वी सहित १३ प्रतिनो अंत थवाथी कर्म सचा समग्र नाश पामे तेमां जो नरानु- पूर्वी सहित ७३ द्विचरम समये गई होय तो अही ते विना १२ नो क्षय करे. आ प्रमाणे यंध, उदय, उदीरणा अने सत्ता ए चारनो विचार चाँद गुणस्थानने आश्रीने * जाणवो.

त्रीजो कर्मग्रन्थ.. १४ गुणस्थानके ७९ मार्गणाए बंध संबंधी प्रकृतिदर्शक यंत्र. (दरेक मार्गणाए गुणठाणा केटला होय ने त्यां बंध केटली प्रकृतिनो होय ते पताव्युं छे.) . नवर मार्गणा नामानि गुणस्थान अमेघवंध २ ३ ८ ९ ११ १२ १३ १४ १ नरकगति ए सामान्य १०१ ७३ २ रत्नप्रमादि ३ नरके ४ १०१ | १००/५६ | १०. ३ पकप्रभादि 3 नरके १०. तम तमः प्रभा ४ ९९ । ९१ ४० ७० ७० [९] तियव पंचंद्रि पर्याप्ता ११७ | ११४/१० तिर्यच अपर्शता १ मनुध्य पयाप्ता १४ १२० ! ११७ १०११ ६९ so ५४, २२, १७ न ८ मनुष्य अपर्याप्ता १ १०९ ४ १०४ देवगतिमा सामान्य T भवनपति व्यतर ज्योतिषी १०३ १६ १० 6 १०॥ ११ ११ सौवम इशान वे देवलोके ४ १०३|| ७२ | ११ || AL मार्गणा नामानि १० रानकुमारादि देवलोके যুগল জীগন । | ३ || .. १००/ ९६ ० ७२ | . +_+ || २kलुचोथ गुणठाणुश होग १३ भानतादिदेवलोकने नगोयके - - अत्तर निमाने १ ७२ १४ १५ ९ १./ एकत्रिय - . द्वीत्रिय e १८ s चतुरितिर [१०] ४ १ पद्रिय 0 २० पानीकाय १०९ १०९ । । | १०९ १०१ ।। | ११० १०१ ६५ ५३ ५९ ५८ २३ २ | १०९ | 2015 । । । । । | १०९ १०५ / १०५ १ | १० | १०५ १.९ ।।. १२. | 21/1.9| | | ५९ ५८ २० २१ kilala २ १०९ . काम १ २३ वायुपाय २४ पन पतिकाय । रामाय १७ १ १ १ --.

मनोयोग ४ १३ | १२० १०१ वचनयोग ४ १२. ५९ ។ [ ११४ or 0 ४१ ० ६० | ५९| ५८ २१६ १७ १ ११७/ १० / or ५८२० २१ १५ | ११४ ११५ १०१ - ७ s७ ३३ ५९ ५० १००/- + + २८ बोदारिककाययोग १३ १२० य औदारिक मिश्र काययोग ४ +: + -- वैक्रिय काययोग ४।१०४ १०३ ७० 8 . . ३१ वैक्रिय मित्र काययोग ३ १०२ १०१ + ७१ ३२ आहारक काययोग + आहारक मित्र काययोग १ । ३ + + [११] ३४ कार्मण काययोग ११२ - १०७ १४ + | + + + + १ ७५ ७७ + ३५ खीवेद १२० ११५ १.१ ६ ३ ६ ३ ५९ ५० २२ पुरुषवेद १२० ११५ १०१ 5 ५८ २२॥ नपुसकवेद १२० ११७ १०१ ७४ ७७ ६७ ur ५० २२ ૨૮ अनतानुबंधी ४ २ ११७ ११७ १०१ ३९ मप्रत्याख्यानावरण ४ ४ ११८ ११७ १० ७४ १०१ ११० १०१ प्रत्याख्यानावरण ४ ५ ११८ ७४, द ७ S ११ । १२ १२ || १ ३ नचर - १२० मार्गणा नामानि गुणम्धान | ओघवध | १/२ सज्वलनईक्रोध, मान, माया ११७/ १०१ सज्वलन लोभ ११७/ १०१ नतिजानी १] । lan los a fan e long lona ५९ ५८ ५८ । " २० १५ १०० ७४। ७ । + + + | २० ६ १ Toma l r श्रुतज्ञानी + १ ६५ - + ५९ ७७ ५८ १७ १ १ अवधिज्ञानी मनःपर्यवज्ञानी + + + ६३ ७ १ bin lon + केवलज्ञानी १ + + + + + . १ + + [१२] मतिअनानी १०१ ४ ९ श्रुतअज्ञानी ३ | ११० จ ราง • | ११७ | ११७ १०१ विभगज्ञानी ३ १ सामायिक चारित्र + + । + + २२ छेदोपस्थापनीय चारित्र ६५ । + + + + | ६३ ५९ २२ ५३ परिहारविशुद्धि चारित्र ६५ + + + सूक्ष्मसपगय चारित्र : १७ + + + + + + + + यघाख्यात चारित्र १ ४ + | + + + + + १ १ देशविरति चारित्र + ६७ + + ५७ ११८ अविरति हैं १०१ १२ चक्षुर्दर्शन ५८ १२० ११४ ११७ ११० १०१ ७५ १ d of ful ५९ अचक्षुर्दर्शन १२ १२० १ १ ५९, ५० २० ३ ५९ ५८ २० २० १७ | + | + अवविदर्शन ७७ + ५९ + ५८ २२ ११ १ १ केवलदर्शन ३१ ३ १ + + + . कृष्णलेश्या ११८ | ११० १०१ ७४ ७ ३ [१३] ३ नीललेल्या ४-६ ११८ ११७ १०१) C ७४) कापोतलेल्या ११८ ११७ १०१ ७४ १ ६ ३५ तेजोलेल्या ७ १११ १०८ १०१॥ ६७ पद्मलेल्या १०८ १०५ १०१ ७४ ઉ| . ५९/ ६७ शुभलेश्या १३ १०४ १०१, ७४ ५९ २२॥ १ १ १ ६८ भव्य १२० ११७ १०१ ३ ६३॥ ५९॥ २२ १७ १ १ १ . अभब्य १ ११७ ११४ ११७ - गुणम्भान| भोत्रमय मागेणा मामानि. ૨ . नवर 1101 1. | + + औषमिक समकिते + " + ७१ मास्वादने |१.१ ७५ ६ ५५ ० ।। १७. ६७ ६३ ५९ ८ क्षायोपशमिके + 17 क्षायिके ७३ + + ७ - S मिश्र + + ७५ मिथ्यात्वे १ | १७ ११४ ।। २२| १५ १ ।।। सजी १२. ११७ १०१, ७४| क [१५] असंही | ११०/१०१ | ११७/१० आहाग १३ १२. ७४ ७७ ६० ५७ ५८/ २२/ १० १ १/० अनाहारी ५ ११२ १०७ + + + . 1. आमा जे गुणठाणु न होय तेनी चोकदी + समजवी, अने जे गुणठाणे बध न होय तेनु में ई • समजवु बासठ मार्गणाए गुणस्थान तथा उदय. ६२ मार्गणाए १४ गुणस्थानं तथा उदयनी १२२ प्रकृतिर्नु संक्षिप्त विवरण. १ नरक गति-गुणस्थान ४, त्या ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ४, अंतराय ५, मिथ्यात्व १, तैजस १, कार्मण १, वर्णादि ४, अगुरुलधु १, निर्माण १, स्थिर १, अस्थिर १, शुभं १, अशुभ १, आ २७ प्रकृतिओ ध्रुवोदयी छे. तेमा १ मिथ्यात्व पहेलेज गुणस्थाने ध्रुवोदयी होय. अने ५ ज्ञानावरणीय, ४ दर्शनावरणीय, ५ अंतराय, ए १४ प्रकृति बारमा गुणस्थान सुधी सर्वने ध्रुवोदयी होय. शेप १२ प्रकृति तेरमा गुणठाणाना अंतसुधी सर्व जीवने ध्रुवोदयी होय. हवे ध्रुवोदयी २७, निद्रा ३, वेदनीय २, नरकायु १, नीचगोत्र .१, नरकद्विक २, पंचेंद्रिय जाति १, वैक्रियद्विक २, हुंडक संस्थान १, अशुभ विहायोगति १, परापात १, उच्चस १, उपपात १, सचतुष्क ४, दुर्भग १, दुम्बर १, अनादेय १, अयश १, कपाय १६, हास्यादि ६, नपुंसकवेद १, सम्यक्त्वमोहनी १, मिश्रनोहनी.१, एवं प्रकृति ओवे नार- कीने उदये होय. अहीं स्त्यानद्धि त्रिकनो उदय कम्मपयडी तथा पंचसंग्रहने अनुसारे न होय. ते विषे कर्मप्रकृतिमा कमु छ के- निहानिहाईणति असंखवासाय मणुअ तिरिया य । वेउब्बाहारगतणू वजित्ता अप्पमचेया ॥१॥" अर्थ-"असंख्यात वर्षना आयुष्यवाळा मनुष्य, तिर्यच (युगलियां), वैक्रिय शरीरी, आहारक शरीरी, तथा अप्रमत्त अणगार (साधु), एटला वर्जीने शेष सर्व जीवने स्त्यानर्द्धि त्रीकनी उदीरणा होय." (उदय सतेज उदीरणा होय छे.) आ वचनने अनुसारे देवता अने नारकी पण वैक्रिय शरीरी छे, तेथी स्त्यानाई त्रिकनो उदय पटे नहीं, तेथी तेनो त्याग कर्यों छे. भवधारणीय वैक्रिय शरीर आश्री स्त्यानार्द्ध त्रिकनो उदय होय, अने उत्तरवैक्रिय करतां स्त्यानर्द्धि त्रिकनो उदय न होय. देवता अने नारकीने उत्तरवैक्रिय पण होय छ, ते ना ओषमाथी सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए २ वर्जीने मिथ्यात्वे :: तेमांथी नरकानुपूर्वी १, मिथ्यात्व १, ए र विना सासादने ७३. तेमांथी अनंतानुबंधी ४ विना अने मिश्र युक्त करतां मिश्रगुणस्थाने १. तेमां नरकानुपूर्वी नांखवाथी अविरतिए । २ तिर्यंच गतिए-गुणस्थान ५. “ [१६] देवत्रिक ३, नरकत्रिक ३, वैक्रियद्विक २, आहारकद्विक २, मनुष्यत्रिक ३, उच्चगोत्र १, जिननाम १, ए १५ विना ओषे १०७. तथा वैक्रियद्विक सहित गणीए त्यारे १०९. तेमांथी सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए वे विना मिथ्यात्वे १०४, तेमांथी सूक्ष्म १, अपर्याप्त १, साधारण १, आतप १, मिथ्यात्व .१, ए पांच विना सासादने । अनंतानुबंधी ४, स्थावर १, एकेंद्रियादि जाति ४, तिर्यंचानुपूर्वी १, ए १० विना अने मिश्र युक्त करता मिश्र गुणस्थाने छ. मिश्रने बाद करता तथा सम्यक्त्व १, अने तिर्यंचानुपूर्वी १, ए वे मेळवता अविरतिए २१. अप्रत्याख्यानी ४, दुर्भग १, अनादय १, अयश १, तियंचानुपूर्वी १, ए ८ विना देशविरतिए २. अहीं गुणप्रत्ययीक वैक्रियनी विवक्षा न करीए तो दरेक गुणठाण वे वे ओछी गणवी. ३ मनुष्यगति-गुणस्थान १४. वैक्रियाष्टक ८, जाति ४, तियंचत्रिक ३, उद्योत १, स्थावर १, सक्ष्म १, साधा- रण १, आतप १. ए २० विना ओघे १०२ अने वैक्रियद्विक गणीए तो १०४. आहारकद्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व १, मिश्र १ ए ५ विना मिथ्यात्वे २९. अपर्यास १, मिथ्यात्व १. ए वे विना सासादने २०. अनंतानुबंधी ४, मनुष्यानुपूर्वी १, ए ५ विना अने मिश्र भळवाथी मिश्र से. मिश्र बाद करतां ने सम्यक्त्व १, मनुष्यानुपूर्वी १, एवे मेळवता अविरतिए २१. अप्रत्याख्यानी ४, मनुष्यानुपूर्वी १, दुर्मग १, अनादेय १, अयश १, ए आठ विना देशविरतिए ८४. प्रत्याख्यानी ४, नीचगोत्र १, ए पांच काढतां ने आहारकद्विक २, मेळवतां प्रमत्ते ८१. स्त्यानधि त्रिक ३, आहारकद्विक २. ए पांच विना अप्रमत्ते ७६. सम्यक्त्वमोहनी १, छैला संघयण ३, ए चार विना अपूर्व ७२, हास्यादि ६ विना अनिवृत्तिए ६६. वेद ३, संज्वलन ३, ए ६ विना सूक्ष्मसंपराये ६०. संज्वलना लोम विना उपशांतमोहे ५९. ऋपभनाराच १, नाराच १, ए वे विना क्षीणमोहे ५७, वे निद्रा विना क्षीणमोहने छल्ले समये ५५. ज्ञानावरणीय ५, दर्शनावरणीय ४, अंतराय ५, ए १४ विना सयोगीए ४२. कारणके अहीं जिननाम कर्मनो उदय होय, [१७] औदारिक २, विहायोगति २, अस्थिर १, अशुभ १, प्रत्येक १, स्थिर १, शुभ १, संस्थान ६, अगुरुलघु ४, वर्णादि ४, निर्माण १, तेजस १, कार्मण १, वज्र- ऋषभनाराच संघयण १, दुःखर १, सुखर १, साताअसातामांथी १, ए ३० विना अयोगी गुणस्थाने १२ रहे. सुभग १, आदेय १, यश १, वेदनीय १, त्रस १, बादर १, पर्यात १, पंचें- द्रिय जाति १, मनुष्यायु १, मनुष्यगति १, जिननाम १, उच्चैर्गोत्र १, ए १२ अयोगी गुणस्थानना छेल्ले समये जाय. ४ देवगति-गुणस्थान ४. नरकत्रिक ३, तिर्यंच त्रिक ३, मनुष्यत्रिक ३, जाति ४, औदारिकद्धिक २, आहारकद्विक २, संघयण ६, न्यग्रोधादि संस्थान ५, अशुम विहायोगति ५, आतप १, उद्योत १, जिननाम १, स्थावर चतुष्क ४, दुःखर १, नपुंसकवेद १, नीचगोत्र १, एवं ३९ वर्जीने ओघे ८३. ज्यारे स्त्यानद्धित्रिक वीए त्यारे ८० नो उदय होय. तेमांधी सम्यक्त्व १, मिश्र १, विना मिथ्यात्वे. मिथ्यात्व-१ विना सासादने ३०. अनंतानुबंधी ४, देवानुपूर्वी १, ए ५ विना अने मिश्र भळे त्यारे मिश्र गुण- स्थाने ३. मिश्र काढी देवानुपूर्वी १, सयम्क्त्व १, ए बे भळे त्यारे अविरतिए .. ५-एकेंद्रियजाति-गुणस्थान २. वैक्रियाष्टक ८, मनुष्यत्रिक ३, उच्चगोत्र १, स्त्रीवेद १, पुंवेद १, द्वींद्रि- यादि जाति ४, आहारकद्विक २, औदारिक अंगोपांग १, संघयण ६, संस्थान ५, विहायोगति २, जिननाम १, त्रस १, दुःखर १, सुखर १, सम्यक्त्व १, मिश्र १, सुभग १, आदेय १, ए ४२ विना ओधे तथा मिथ्यात्वे ८० अने वैक्रिय शरीर सहित करीए त्यारे ८१. सूक्ष्मत्रिक ३, आतप १, उद्योत १, मिथ्यात्व १, पराघात १, श्वासोच्छ्वास १, ए ८ विना सासादने ३. ६ वींद्रियजाति-गुणस्थान २. वैक्रियाष्टक ८, नरत्रिक ३, उच्च गोत्र १, स्त्रीवेद १, पुंवेद १, एकेंद्रिय १, त्रींद्रिय १, चतुरिद्रिय १, पंचेंद्रिय १, आहारकटिक २, संघयण ५, सं- स्थान ५, शुभ विहायोगति १, जिननाम १, स्थावर १, सूक्ष्म १, साधारण १, आतप १, सुभग १, आदेय १, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए ४० विना ओधे अने मिथ्यात्वे ८२ नो उदय होय.

[१८] तेमाथी लन्धि अपर्याप्त १, उद्योत १, मिथ्यात्व १, पगघात १, अशुभ विहायोगति १, उच्चास १, सुखर दुःखर २. ए ८ विना सासाउने ७४. ७-८ बीद्रिय तथा चतुरिद्रिय-ए बन्ने मार्गणाए द्वींद्रियनी पेठे ज जाणवू. पण द्वींद्रियने ठेकाणे त्रीद्रिय, चतुरिद्रिय, एम जाणवू. ९ पंचेंद्रिय-गुणस्थान १४. जाति ४, स्थावर १, सूक्ष्म १, साधारण १, आतप १, ए ८ विना ओधे ११४. तेमांधी आहारक द्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व १, मिश्र ए ५ विना मिथ्यात्वे १०९ मिथयस्व १, अपर्याप्त १, नरानुपूर्षी १, ए ३ विना मास्वादने १०६. अनंतानुबंधी ४, आनुपूर्वी ३, ए ७ विना अने मिश्रमळनां मिश्रे १०० मिश्र टाळीने आनुपूर्वी ४, सम्यक्त्व १, भळे त्यारे अविरनिए १०४. अप्रत्याख्यानी ४, वैक्रियाष्टक ८, नरकानुपूर्वी १, तिर्यंचानुपूर्वी १, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, ए १७ विना देशविरतिए ८७. छहा गुणस्थानथी मनुप्य गतिनी पेठे ८१-७६-७२-६६-६०-५१-५९-४२-१२ एम अनुक्रमे जाणवू. १. पृथ्वीकायनी मार्गणाए–एकेद्रिवनी पेठे गुणस्थान २. साधारण विना ओघे अने मिथ्यात्वे ५९. सूक्ष्म १, लब्धि अपर्याप्त १, आतप १, उद्योत १, मिथ्यात्व १, पगपात १, श्वासोच्छवास १, ए सात विना सासादने ७२. (अही करण अपर्याप्सनी अपेक्षाए सासादनपणुं जाण) ११ अप्कायनी मार्गणाए-गुणस्थान २. आतप विना ओघे अने मिथ्यात्वे ७८. सूक्ष्म १, अपर्याप्त १, उद्योत १, मिथ्यात्व १, पराधात १, उन्म १, ए ६ विना सासादने ७२. १२ तेजस्कायनी मार्गणाए-गुणस्थान १. उद्योत १, यश १, ए वे विना ओधे अने मिथ्यात्वे ७६. १३ वायुकायनी मार्गणाए-पण उपर प्रमाणे ७६. १४ वनस्पति कायनी मार्गणाए-गुणस्थान २. एकेंद्रियनी पेठे आतप विना ओघे मिथ्यात्वे ७९. अने सासादने ७२. १५ त्रसकायनी मार्गणाए-गुणस्थान १४, स्थावर १, सूक्ष्म १, साधारण १, आनप १, एकेंद्रिय जाति १, ए ५ विना ओघे ११७ [१९] आहारक द्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए ५ विना मिथ्यात्वे १११. मिथ्यात्व १, अपर्याप्त १, नरकानुपुर्वी १, ए ३ विना सासादने १०९. अनंतानुबंधी ४, विकलेंद्रिय ३, अनुपूर्वी ३, ए १० विना अने मिश्र मळे त्यारे मिश्र गुणस्थाने १००. अनुपूर्वी ४, सम्यक्त्व १, ए ५ भळे अने मिश्र टळे त्यारे अविरतिए १०४. देशविरति आदि गुणस्थाने ओपनी पेठे ८७-८१-७६-७२-६६-६०-५१-५७- ४२-१२ वगैरे जाणी लेवु. १६ मनोयोगीने-गुणस्थान १३. स्थावर चतुष्क ४, जाति ४, आतप १, अनुपूर्वी ४, ए १३ विना ओघे १०९. आहारक द्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए ५विना मिथ्यात्वे १०४. मिथ्यात्व विना सासादने १०३. अनंतानुवंधी ४ विना अने मिश्र भळवाथी मिश्रे १००. मिश्र टाळी सम्यक्त्व भळवाथी अविरतिए १००. अप्रत्याख्यानी ४, वैक्रियद्विक २, देवगति १, देवायु १, नरकगति १, नरकायु १, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, ए १३ विना देशविरतिए ८७. त्यारपछी ओधनी पेठे जाणवू. १७ वचनयोगीने-गुणस्थान १३. स्थावर ४, एकेद्रिय १, आतप १, अनुपूर्वी ४, ए १० विना ओघे ११२. आहारकद्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए५विना मिथ्यात्वे १०७. मिथ्यात्व १, विकलेंद्रिय ३, ए ४ विना सासादने १०३ (वचनयोग पर्याप्ताने होय, त्यां सासादन न होय.) अनंतानुबंधी ४ काढी मिश्र भळवाथी मिश्रे १००, अविरतिथी आरंभीने बीजा गुणस्थानोने विपे मनोयोगीनी पेठे जाणवू. १८ काययोगीने-गुणस्थान १३. ओघे १२२. मिथ्यात्वे ११७. सासादने १११, इत्यादि ओघनी पेठे जाणवू. १९ पुरुषवेदीने-गुणस्थान ९. नरकत्रिक ३, जाति ४, स्थावर १, सूक्ष्म १, साधारण १, आतप १, जिननाम १, स्त्रीवेद १, नपुंसकवेद १, ए १४ विना ओघे १०८, आहारकहिक २, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए चार विना मिथ्यात्वे १०४, मिथ्यात्व १, अपर्याप्त १, ए २ विना साखादने १०२, अनंतानुबंधी ४, अनुपूर्वी ३, ए ६ काहीने मिश्र मेळववाथी मित्रे ९६. मिश्र काढीने सम्यक्त्व १, अनुपूर्वी ३, ए चार भळवाथी अविरतिए ९९.

अनुपूर्ती ३, अप्रत्याख्यानी ४, देवहिक २, वैक्रियटिक २, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, ए १४ विना देशविरतिए ८५, प्रत्याख्यानी ४, तिर्यचद्विक २, उद्योत १, नीचगोत्र १, ए ८ काढीने आहारक द्विक २ मळे त्यारे प्रमने ७९. स्त्यानचित्रिक ३, आहारकद्विक २, ए ५ विना अप्रमत्ते ७४. सम्यक्त्वमोहनी १, छेल्लो संघयण ३, ए चार विना अपूर्वे ७०. हास्यादि ३ विना अनिवृत्तिए ६४. २० स्त्रीवेदीने-पुरुषवेदीनी पेठे पण ओषे अने प्रमत्त आहारकद्धिक विना तथा चोथे गुणस्थाने आनुपूर्वी ३ विना कहे. कारणके स्त्रीने वाटे वहेनां चोथु गुणस्थान न होय. स्त्रीने १४ पूर्वतुं ज्ञान न होवाथी आहारकद्विक पण न होय. तेथी ओघे तथा ९गुणस्थान१०६-१०४-१०२-९६-९६-८५-७७-७४-७०-६४ ए प्रमाणे जाणवू. २१ नपुंसकवेदीने-गुणस्थान ९. देवत्रिक ३, जिननाम १, स्त्रीवेद १, पुंवेद १, ए ६ विना ओघे ११६. आहारकद्विक २, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए चार विना मिथ्यात्वे ११२. सूक्ष्मत्रिक ३, आतप १, मिथ्यात्व १, नरकानुपूर्वी १, मनुप्पानुपूर्वी १, ए ७ विना साखादने १०५. अनंतानुबंधी ४, विर्यगानुपूर्वी १, स्थावर १, जाति ४, ए १० विना तथा मिश्र भळे एटले मिश्र गुणस्थाने ९६. नरकानुपूर्वी १, सम्यक्त्व १, ए २ मेळवीने मिश्र काहीए, त्यारे अविरतिए ९७, अप्रत्याख्यानी ४, नरकत्रिक ३, वैक्रिय द्विक २, दुर्मग १, अनादेय १, अयश १, ए १२ विना देशविरतिए ८५. विर्यचगति १, तिर्यगायु १, नीचगोत्र १, उद्योज १, प्रत्याख्यानी ४, ए ८ काढीने आहारक द्विक २ भळे त्यारे प्रमत्ते ७९. स्त्यानार्द्ध त्रिक ३, आहारक द्विक २, ए ५ विना अप्रमते ७४. सम्यक्त्व मोहनी १, अंत्य संघयण ३, ए ४ विना अपूर्वे ७० हास्यादि ६ विना अनिवृत्तिए ६४. क्रोध मार्गणाए-गुणस्थान ९. मान ४, माया ४, लोम ४, जिननाम कर्म १, ए १३ विना ओघे १०९. सम्यक्त्व १, मिश्र १, आहारक द्विक २, ए ४ विना मिथ्यात्वे १०५. सूक्ष्मत्रिक ३, आतप १, मिथ्यात्व १, नरकानुपूर्वी १, ए ६ विना सासादने . [२१]] ९९. अनंबानुबंधी क्रोध १, स्थावर १, जाति ३, आनुपूर्वी ३, ए ९ काढीने मिश्र भेळवता मिश्रे ९१. अप्रत्याख्यानी क्रोध १, आनुपूर्वी ४, देवगति १, देवायु १, नरकगति १, नर- कायु १, वैक्रिय द्विक २, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, ए १४ विना देश विरतिए ८१. तियंचगति १, वियंचायु १, उद्योत १, नीचगोत्र १, प्रत्याख्यानी क्रोष १, ए ५ काहीने आहारक द्विक भळे त्यारे प्रमत्ते ७८. स्त्याना त्रिक ३, आहारकठिक २, ए ५ विना अप्रमत्ते ७३, सम्यक्त्व मोहनी १, अंत्य संघयण ३, ए ४ विना अपूर्व ६९. हास्यादि ६ विना अनिवृत्तिए ६३. २३-२४-२५ मान, माया अने लोम मार्गणाए-पण एज प्रमाणे उदय कहेवो, पोते सिवाय अन्य कपाय १२ विना समजवो. लोम मार्गणाए दशमे गुणस्थाने ३ वेद टळे त्यारे ६०. २६-२७ मविज्ञान अने श्रुतज्ञान मार्गणाए-गुणस्थान ९ चोथाथी बारमा सुधी. स्थावर ४, जाति ४, आतप १, अनंतानुबंधी ४, जिननाम १, मिथ्यात्स १, मिश्र १, ए १६ विना ओघे १०६. आहारक द्विक २ विना अविरतिए १०४, देशविरतिथी ओपनी पेठे ८७-८१-७६-७२-६६-६०-५९-५७. २८ अवधिज्ञाननी मार्गणाए-पण उपर प्रमाणे जाणवू. विशेष एटलं के-तिर्यचानुपूर्वी विना ओये १०५. तथा पन्नवणा सूत्रनी वृत्तिने अनुसारे अवधिज्ञानीने तिर्य- चानुपूर्वी जणाय छे तेथी १०६. आहारक द्विक २ विना अविरतिए १०१ बाकी मतिज्ञानीनी पेठे जाणवू. अवधि के विभंग सहित तिर्यंचमां उपजे नहीं ते माटे ए लख्यु छे. ते वक्रगतिनी अपेक्षाए जाणवू. अने ऋजु गतिनी अपे- क्षाए तिर्यंचमां उपजे के. २९ मनःपर्यवज्ञाननी मार्गणाए-प्रमत्तथी मांडीने गुणस्थान ७. ओषे ८१. प्रमचादिके ८१-७६-७२-६६-६०-५९-५७. ३० केवळज्ञाननी मार्गणाए छेल्ला बे गुणस्थान त्या ओघनी पेठे ४२-१२. ३१-३२ मतिज्ञान तथा श्रुतअज्ञाननी मार्गणाए-गुणस्थान ३. आहारक द्विक.२, जिननाम १, सम्यक्त्व १, ए ४ विना ओघे ११८, सासादने १११, मिश्रे १००, ओपनी पेठे.

[२२]] ३३ विभंगज्ञाननी मार्गणाए-गुणस्थान ३. आहारक द्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व १, स्थावर चतुष्क ४, जातिचतुष्क ४, आतप १, नरतिश्चानुपूर्वी २, ए विना ओघे १०७ (मनुष्यने तिर्यंचा उपजता वाटे विभंगतान न होय ए वक्रगतिनी अपेक्षाए लख्यु छ. पण ऋजु- गतिनी अपेक्षाए नरने जिचमां उपजतांवाटे विभंग होय. चन्नवणामांथी विशेष पद तथा कायस्थिति पदने अनुमारे लरव्युं छे, तेथी विभंगाने ओघे १०९) मिश्र विना मिथ्यात्वे १०९, वे अनुपूर्वी न गणीए नो १०६. मिथ्यात्व १. नरकानुपूर्वी १, ए विना सास्वादने अनंतानुबंधी ४, दवानुपूर्वी १, ए ५ विना अने मिश्र भळे त्यारे मिथे १००, पक्षे (अथवा) अनंतानुबंधी ४, नर १, तिर्यच १, देव १, ए ३ अनुपूर्वी, एवं ७ विना अने मिश्र भळे त्यारे मित्र १००, ३४-३५ सामायिक तथा छेटोपस्थापनीय-ए वे चारित्रनी मार्गणाए गुणम्थान ४. प्रमत्तथी. त्यां ओवनी पेठे ८१, ७६, ७२, ६६. ३६ परिहारविशुद्धि मार्गणाए-गुणस्थान २ छटुं अने सातमुं. त्यां ८१ मांहेथी आहारकद्विक २, स्त्रीवेद १, संघयण ५, ए ८ विना ओघे तथा प्रमत्ते ७३, अथवा संघयण ५ गणीए त्यारे ७८. (ए चौदपूर्वी न होय माटे आहारकद्विक नहीं, अने स्त्रीवेदी पण न होय अने वज्रऋपभनाराच संघयण होय, ते माटे ऋपभनाराचादि पांचनी ना कही, तथा कोइक आचार्य ते ५ सं- घयण पण कहे छे, ए विचारवान छ.) स्त्यानद्धित्रिक ३ टळे त्यारे अप्रमत्त ७.. ३७ सूक्ष्मसंपराय मार्गणाए-गुणस्थान १ दशमुं. अहीं ६० नो उदय ओपनी पेठे. ३८ यथाख्यात मार्गणाए-गुणस्थान ४ छेल्ला. त्यां जिननाम सहित ओघे ६०, जिननाम विना उपशांतमोहे ५९, संघयण २ विना क्षीणमोहे ५७, निद्रादुग २ विना छल्ले समये ५५, सयोगीए ४२, अयोगीए १२. ३९ देशविरतिनी मार्गणाए-गुणस्थान १ पांचमुं. त्या ८७ नो उदय ओवनी पेठे. ४० अविरतिनी मार्गणाए-गुणस्थान.४. त्यां जिननाम १, आहारकद्विक २, ए ३ विना ओघे ११९. सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए २ विना मिथ्यात्वे ११७. सूक्ष्मत्रिक ३, आतप १, मिथ्यात्व १, नरकानुपूर्वी १ ए ६ विना सास्वादने १११ अनंतानुबंधी ४, स्थावर १, जाति ४, अनुपूर्वी ३, ए १२ विना मिश्र भळवाथी मिश्र गुणस्थाने १००.

[२३] अनुपूर्वी ४, सम्यक्त्व १, ए ५ भळे अने मिश्र काढीए त्यारे अविरतिए १०४. ४१ चक्षुर्दर्शननी मार्गणाए-गुणस्थान १२. त्यां जाति ३, स्थावर चतुष्क ४, जिननाम १, आतप १, अनुपूर्वी ४, ए १३ विना ओचे १०९. आहारकद्विक २, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए ४ विना मिथ्यात्वे १०५. मिथ्यात्व विना सास्वादने १०४. अनंतानुबंधी ४, चतुरिंद्रिय जाति १, ए पांच विना अने मिथ भळे त्यारे मिथे १००. मिश्र काढी सम्यक्त्व भळे त्यारे अविरतिए १०० अप्रत्याख्यानी ४, वैक्रियद्विक २, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, देवगति १, देवायु १, नरकगति १, नरकायु १, ए १३ विना देशविरतिए ८७. पछी ओपनी पेठे जाणवू. ४२ अचक्षुर्दर्शननी मार्गणाए-गुणस्थान १२. जिननाम विना ओघे १२१. आहारकद्विक २, सम्यकत्व १, मिश्र १, ए ४ विना मिथ्यात्वे ११७. पछी ओपनी पेठे १११, १००, १०४, ८७, ८१, ७६, ७२, ६६, ६०, ५९, ४३ अवधिदर्शननी मार्गणाए-गुणस्थान ९, चोथाथी बारमा सुधी. सिद्धांते विमंगने पण अवधिदर्शन कयु छ, ते रीते तो पहेला त्रण गुणस्थान पण होय. पण अहीं कर्मग्रंथे विमंगने अवधिदर्शन नथी कछु तेथी अवधिज्ञानी- नी पेठे ओघे. तिथंचानुपूर्वी विना. अविरतिए , आहारकद्विक विना. पछी ओवनी पेठे, पनवणानी अपेक्षाए तियंचानुपूर्ती होय त्यारे ओघे १०६ समजबी. इत्यादि. ४४ केवळदर्शननी मार्गणाए-छेल्लां गुणस्थान २, त्यां ४२ अने १२ नो उदय होय. ४५-४६-४७ कृष्ण, नील अने कापोत लेग्यानी मार्गणाए-गुणस्थान ६. त्यां जिननाम विना ओघे १२१, तथा पहेली त्रण लेण्याए चार गुणस्थाननी अपेक्षाए आहारक द्विक विना ओघे ११९. मिथ्यात्वादिके , in ob, 글을 ८७, ८१, ओवनी पेठे समजबु, ४८ तेजोलेग्यानी मार्गणाए-गुणस्थान ७. त्यां सूक्ष्मत्रिक ३, विकलेद्रिय ३, नरकत्रिक ३, आतप १, जिननाम १, ए ११ विना ओघे १११.

। [२४] आहारकद्विक २, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए ४ विना मिथ्यात्वे १०७. मिथ्यात्व विना साखादने १०६. अनंतानुबंधी ४, स्थावर १. एकेंद्रिय १, अनुपूर्वी ३, ए ९ विना अने मिश्र भळे त्यारे मिश्र गुणस्थाने ९८. अनुपूर्वी ३ भळे अने मिश्र काढीए तथा सम्यक्त्व नाखीए त्यारे अविरतिए १०१ अप्रत्याख्यानी ४, अनुपूर्वी ३, वैक्रियद्विक २, देवगति १, देवायु १, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, ए १४ विना देशविरतिए ८७. अमत्ते ८१, अप्रमत्ते ७६. ४९ पालेव्यानी मार्गणाए-गुणस्थान ७. त्यां स्थावर ४, जाति ४, नरकत्रिक ३, जिननाम १, आतप १, ए १३ विना ओघे १०९. आहारकद्विक २, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए ४ विना मिथ्यात्वे १०५. मिथ्यात्व विना साखादने १०४. अनंतानुबंधी ४, अनुपूर्वी ३, ए ७ विना अने मिश्र भळे त्यारे मिश्रे ९८. अनुपूर्वी ३, सम्यक्त्व १, ए ४ मेळवीने मिश्र काढतां अविरतिए १०१. अप्रत्याख्यानी ४, अनुपूर्वी ३, देवगति १, देवायु १, वैक्रियहिक २, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, ए १४ विना देशविरतिए ८७. प्रमत्ते ८१. अप्रमत्ते ७६. ५० शुक्ललेश्यानी मार्गणाए-गुणस्थान १३. त्यां स्थावर चतुष्क ४, जाति ४, नरकत्रिक ३, आतप १, ए १२ विना ओघे ११० आहारकद्विक २, सम्यक्त्व १, मिश्र १, जिननाम १९५विना मिथ्यात्वे १०५. मिथ्यात्व विना सास्वादने १०४. अनंतानुबंधी ४, अनुपूर्वी ३, ए ७ काढीने मिश्र मेळवीए त्यारे मिश्रे ९८. अविरतिए १०१, देशविरतिए ८७, त्यार पछी ओपनी पेठे. ५१ भव्य मार्गणाए-गुणस्थान १४, ओघे १२२, मिथ्यात्वे ११७ इत्यादि ओवनी पेठे. ५२ अभव्य मार्गणाए-गुणस्थान १. सम्यक्त्व १, मिश्र १, जिननाम १, आहारकद्विक २, ए ५ विना ओगे तथा मिथ्यात्वे ११७. ५३ उपशम समकितनी मार्गणाए-गुणस्थान ८ चोथाथी अग्यारमा सुधी. त्यां स्थावरचतुष्क ४, जाति ४, अनंतानुबंधी ४, सम्यक्त्व मोहनी १, मिश्र, मोहनी १, मिथ्यात्व १, जिननाम १, आहारकद्विक २, आतप १, अनुपूर्वी ४, ए २३ विना ओघे ९९.

. २५] अविरतिए पण ९९, तथा उपशम समकिती मरीने अनुचर विमाने जाय, त्यां चाटे वहेतां चोथे गुणस्थाने कोइकने देवानुपूर्वीनो उदय होय, ते अपेक्षाए ओये १०० तथा अविरतिए पण १००. अप्रत्याख्यानी ४, देवगति १, देवायु १, नरकगति १, नरकायु १, वैकि- यद्विक २, 'दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, देवानुपूर्वी १, ए १४ विना देश विरतिए ८६, समकित नांखीए त्यारे ८७. तिर्यंच गति १, तिर्यंच आयु १, नीचगोत्र १, उद्योत १, प्रत्याख्यानी ४, ए८ विना प्रमचे ७९. स्त्यान ित्रिक ३ विना अप्रमत्ते ७६. समकित १, अंत्यसंघयण ३, ए ४ विना अपूर्व ७२, पछी अनुक्रमे ६६, ६०, ५९. ५४ क्षायिक समकितनी मार्गणाए-गुणस्थान ११, चोथाथी. त्यां जाति १, स्थावरचतुष्क ४, अनंतानुबंधी ४, आतप १, समकित १, मिश्र १, मिथ्यात्व १, पमनाराचादि संघयण ५, ए २१ विना ओघे १०१. आहारकद्विक २, जिननाम १, ए ३ विना अविरतिए ९८. अप्रत्याख्यानी ४, वैक्रियाटक ८, नरकानुपूर्वी १, तिर्यचत्रिक ३, दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, उद्योत १, ए २० विना देशविरतिए ७८. प्रत्याख्यानी ४, नीचगोत्र १, ए ५ काढीने आहारकद्विक मेळवतां प्रमत्ते ७५. स्त्यानर्द्वित्रिक ३, आहारकद्विक २, ए ५ विना अप्रमचे ७०. अपूर्वे पण ७०. हास्यादि ६ विना अनिवृत्तिए ६४. वेद ३, संज्वलन ३ ए ६ विना सूक्ष्मसंपराये ५८. संज्वलन लोभ विना उपशांत मोहे ५७. क्षीण मोहे पण ५७. वे निद्रा विना क्षीणमोहने चरम समये ५५. सयोगिए ४२. अयोगिए १२. ५५ क्षायोपशमिकनी मार्गणाए-गुणस्थान ४ चोथाथी सातमा सुधी. मिथ्यात्व १, मिश्र १, जिननाम १, जाति ४, स्थावर 'चतुष्क ४, आतप १, अनंतानुवंधी ४, ए १६ विना ओघे १०६. आहारकद्विक विना अविरतिए १०४, .

[२६] देशविरतिए ८७. प्रमत्ते ८१. अप्रमत्ते ७६. ओवनी पेठे, ५६ मिश्र मार्गणाए-गुणस्थान १ त्री . उदय १०० नो. ५७ साखादन मार्गणाए-गुणस्थान १ वीमुं. १११ नो उदय. ५८ मिथ्यात्र मार्गणाए-गुणस्थान १ पहेलु. त्या आहारकद्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व १, मिश्र १, ए ५ विना ११७. ५९ संज्ञी मार्गणाए-गुणस्थान १४. अथवा १२. त्यां स्थावर १, सूक्ष्म १, साधारण १, आतप १, जाति ४, ए ८ विना ओधे ११४. अने गुणस्थान १२ लइए तो जिननाम विना ११३ आहारकद्विक २, सम्यक्त्व १. मिश्र १, ए ४ विना मिथ्यात्व १०९. अपर्याप्त १, मिथ्यात्व १, नरकानुपूर्वी १, ए ३ विना सास्वादने १०६. अनंतानुबंधी ४, आनुपूर्वी ३, ए ७ विना ने मिश्र भळे त्यारे मिश्रे १००, त्यारपछी ओपनी पेठे जाणवू. ६० असंजी मार्गणाए-गुणस्थान २. त्यां वैक्रियाष्टक ८, जिननाम १, आहारकद्विक २. सम्यक्त्व १, मिश्र १, संघयण ५, संस्थान ५, सुभग १, आदेय १, शुभ विहायोगति १, उच्च गोत्र १, स्त्रीपुंवेद २, ए २९ विना ओघे तथा मिथ्यात्वे ९३. सूक्ष्मत्रिक ३, आतप १, उद्योत १, मनुष्यत्रिक ३, मिथ्यान्व १. पराधान १, उच्चास १, सुस्वर १, दुःस्वर १, अशुभ विहायोगति १, ए १४ विना सास्वादने ७९. ६१ आहारीनी मार्गणाए-गुणस्थान १३ त्यां अनुपूर्वी ४ विना ओघे ११८. आहारकद्विक २, जिननाम १, सम्यक्त्व मोहनी १, मिश्र मोहनी १, ए ५ विना मिथ्यात्वे १९३. सूक्ष्मत्रिक ३, आतप १, मिथ्यात्व १, ए ५ विना सास्वादने १०८. अनंतानुबंधी ४, स्थावर १, जाति ४, ए ९ विना अने मिश्र भळे त्यारे मिश्रे १००. मिश्र काही सभकित भळे त्यारे अविरतिए १००, अप्रत्याख्यानी ४, वेक्रियद्विक २, देवगति १, देवायु १, नरकगति १, नर- कायु १, दुर्भग १, अनादय १, अयश १, ए १३ विना देशविरतिए ८७. त्यारपछी ओपनी पेठे जाणवू. ६२ अनाहारी मार्गणाए-गुणस्थान ५ पहेलं, बीजूं, चोथु, तेरसुं अने चौदमुं.

[२७]
त्या औदारिकद्विक २, वैक्रियद्विक २, आहारकद्विक २, संवयण ६, संस्थान
६, विहायोगति २, उपवात १, परापात १, उच्चस १, आतप १, उद्योत १,
प्रत्येक १, साधारण १, सुस्वर १, दु:म्बर १, मिश्रमोहनी १, निद्रा ५, ए ३५
विना ओघे ८७.
जिननाम १, सम्यक्त्व १, ए २ विना मिथ्यात्वे ८५.
सूक्ष्म १, अपर्याप्त १, मिथ्यात्व १, नरकत्रिक ३, ए ६ विना सास्वादने ७९.
(मिश्र अनाहारीने होय नहीं)
अनंतानुबंधी ४, स्थावर १, जाति ४, ए ९ विना अने सम्यक्त्व मोहनी १,
नरकत्रिक ३, ए ४ भळे त्यारे अविरतिए ७४.
वर्णादि ४, तेजस १, कार्मण १, अगुरुलघु १, निर्माण १, स्थिर १, अस्थिर
१, शुभ १, अशुभ १, मनुष्यगति १, पंचेंद्रियजाति १, जिननाम १, वसत्रिक
३, सुभग १, आदेय १, यश १, मनुष्यायु १, वेदनी २, उच्चगोत्र १, ए २५
तेरमे सयोगी गुणस्थाने केवळी समुद्घातवेळा त्रीजे, चोथे अने पांचमे समये
अनाहारीने उदये होय.
वसत्रिक ३, मनुप्यगति १, मनुप्यायु १, उच्च गोत्र १, जिननाम १, बेमाथी
एक वेदनी १, सुभग १, आदेय १, यश १, पंचेंद्रिय जाति १, ए १२ चौदमे
गुणस्थाने उदये होय.
अहीं उदयने विपे उत्तर वैक्रियनी विवक्षा करी नथी. अपर्याप्ता ते लन्धि अप-
र्याप्सा विवक्ष्या छे, पण करण विवक्ष्या नथी. तथा सिद्धांतमा पृथ्वी, अप अने
वनस्पति मांहे साखादन कहुं नथी. साखादनीने मतिश्रुत ज्ञानी कह्या
छे. विमंगने अवधिदर्शन कधुं छे. वैक्रिय आहारके औदारिक मिश्र कह्यु
कर्मग्रंथे आटला बोल कह्या नथी, ते माटे अहीं पण कह्या नथी. आ
उदयना विचारने विपे जे कोइ बोलमा फेरफार होय, ते डाह्या पंडित विर
शास्त्रनो अभिप्राय जोड़ शुद्ध करवो
इति ६२ मार्गणाए १४ गुणस्थान तथा उदयनी १२२ प्रकृति संक्षिप्त विवरण,
(षडशीत्यादि कर्मग्रंथगत विचार.)
जीव १ गइ २ इंदि ३ काए ४ जोए ५ वेए ६ कसाय ७ लेसाय ८॥
सम्मत्त ९ नाण १० देसण ११ संजय १२ उवओग १३ आहारे १४ ॥१॥
मासग १५ परित्त १६ पजत्त १७ सुहुम १८ सन्नी १९ य होई भव २० चरिमे २१
एएसि तु पयाण, वासहीओ होइ नायवो ॥२॥

योग . w سه w ९ wr ४ CCC ९ wr [२८] जीवधान गुणस्थान उपयोग लेदय १ ममुच्चये जीवमा १४ १४ १५ १२ २ नारकीमा ૨ ४ ११ ९ ३ तिर्यंचमां १४ ५ १३ ४ हिर्यचनी स्त्रीमा २ १३ ५ मनुष्यमा १४ १५ ६ मनुष्यनी स्त्रीमा २ १३ १२ ७ देवमा २ ९ ८ देवीमा ४ ९ सिद्धमा २ सर्वथी थोडी मनुप्यनी स्त्री १ । तेथी मनुष्य असंख्यात गुणा २। तेथी नारकी अ- मख्यात गुणा ३॥ तेथी तिर्यंचनी स्त्री असंख्यात गुणी ४। तेथी देवता असंख्यात गुणा ५। तेथी देवी संख्यात गुणी ६ तेथी सिद्ध अनंत गुणा ७॥ तेथी तिर्यंचे अनंत गुणा ८॥ जब-यान गुणस्थान योग उपयोग लेख्या १० सेंद्रिया १४ १२ १५ १० ११ एकद्रियमां ५ १२ द्वींद्रियमा २ २ ४ १३ त्रींद्रियमां २ २ ४ १४ चतुरिद्रियमा २ ४ १५ पंचंद्रियमा ४ १२ १५ १० १६ अनिद्रियमों २ २ मर्वधी थोडापंचेंद्रिय १॥ तेथी चतुरिंद्रिय विशेषाधिक २॥ तेथी त्रींद्रिय विशेषाधिक ३। तेथी द्वींद्रिय विशेषाधिक ४। तेथी अनिद्रिय अनंतगुणा ५। तेथी एकेंद्रिय अनंतगुणा ६। तेथी मेंद्रिय विशेपाधिक ७॥ गुणस्थान योग उपयोग दया १७ सकायिकमां १४ १४ १५ १२ १८ पृथ्वीकायिकमा १९ अपकायिकमां २० तेजस्कायिकमां २१ वायुकायिकमां ५ ३ १ मठिम मेम्वता : एलिय भवता ३ वेपनी मिवाय ४ केवळी सिमाय ५ फेवळी १ ४ ४ my sms ३ ६ २ ६ ७ जवस्थान ur ४ ३ ३ ४ ००.०० ४ ४ mr ३ ३ ३ ४ ४ ror w ६ 05 ६ ३ १ [२९ २२ वनस्पतिकायिकयां। २३ त्रसकायिकमां १० १४ १५ १२ २४ अकायिकमां २ सर्वयी थोडा त्रसकायिक १। तेथी तेजस्कायिक असंख्यात गुणा २॥ तेथी पृथ्वीकायिक विशेषाधिक ३ । तेथी अपकायिक विशेषाधिक ४ तेथी वायुकायिक विशेपाधिक ५। तेथी अकायिक अनंतगुणा ६ । तेथी बनस्पतिकायिक अनंतगुणा ७॥ तेथी सकायिक विशेषाधिक ८॥ जीवस्थान गुणस्थान उपयोय योग लेश्या २५ सयोगीमा १३ १५ १२ २६ मनोयोगीमां १३ १३ १२ २७ वचनयोगीमा ३ २ २८ काययोगीमां ३ २९ अयोगीमां २ सर्वथी थोडा मनोयोगी १४ तेथी वचनयोगी असंख्यात गुणा २। तेथी अयोगी अनंतगुणा ३। तेथी काययोगी अनंतगुणा ४। तेथी सयोगी विशेषाधिक ५ ॥ जीवस्थान गुणस्थान उपयोग योग लेश्या ३० सवेदीमा ९. १५ ३१ स्त्रीवेदीमा ४२ १३ १२ ३२ पुरुषवेदीमा १५ १२ ३३ नपुंसकवेदीमा १४ १५ १२ ३४ अवेदीमा ९ सर्वथी थोडा पुरुषवेदी ११ तेथी स्त्रीवेदी संख्यातगुणा२ । तेथी अवेदी अनंतगुणा ३। तेथी नपुंसकवेदी अनंतगुणा ४ । तेथी सवेदी विशेषाधिक ५॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ३५ सकषायीमा १४ १५ १४ ३६ क्रोधकपायीमा १४ १५ १० ३७ मानकपायीमा ९ १५ १० ३८ मायाकपाथीमा १४ १५ १० ३९ लोभकपायीमां १४ १० १५ १० ४० अकषायीमां ११ ९ , भाववेदनी 'पेक्षाए १ प्रध्यवेनी अपेक्षाए. ३ आकृतिनी अपेक्षाए, ६ wr ४ w ९ aur ६ १० ६ ९ wr १२ Km १ or or on or ou or w on an an aor an o ३ ७ ૨ १ [३०] सर्वथी थोडा अपायी ११ तेथी मानकपायी अनंतगुणा । तेथी क्रोधकंपायी विशेषाधिक ३ तेथी मापाकपायी विशेषाधिक ४ । तेथी लोमकषायी विशेषाधिक ५॥ तेथी सकपायी विशेषाधिक ६॥ बीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ४१ सलेश्यामा १४ १३ १५ ४२. कृष्णलेश्यामा १५ १० ४३ नीललेश्यामा १४ १५ १० ४४ कापोतलेश्याम १४ १५ १० ४५ तेजोलेश्यामा १५ १० ४६ पालेश्यामा २ १५ १० ४७ शुक्ललेश्यामां १३ १५ १२ ४८ अलेश्यामा २ सर्वथी थोडा शुक्ललेश्यी ११ तेथी पालेश्यी संख्यातगुणा २। तेर्थी तेजोलेश्यी संख्यातगुणा शतेथी अलेश्यी अनंतगुणा ४ । तेथी कापोतलेश्यी अनंतगुणा ५। तेथी नीललेश्यी विशेषाधिक ७ । तेथी कृष्णलेश्यी विशेषाधिकातेथीसलेश्यी विशेषाधिक ८॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ४९ सम्यक्त्वा १२ १५ ५० उपशमसम्यक्त्वमा ૨ १३ ५१ क्षायिक सम्यक्त्वमा ११ १५ ५२ क्षायोपशमसम्यक्त्वमा २ १५ ५३ सास्वादनसम्धस्त्वमा १३ ५४ मिश्रदृष्टिमा १० ५५ मिथ्याष्टिमा १३ सर्वथी सास्वादन सम्यक्त्ववत थोडा १ तेथी उपशमसम्यक्त्ववंत संख्यातगुणा २। तेथी मिश्रदृष्टि संख्यातगुणा ३ । तेथी क्षायोपशमसम्यक्त्ववंत संख्यातगुणा ४ । तेथी क्षायिकसम्यक्त्ववत अनंतगुणा ५ । तेथी सम्यक्त्ववंत विशेषाधिक ६ । तेथी मिथ्यादृष्टि अनंतगुणा ७॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ५६ सज्ञानीमा १२ १५ ५७ मतिज्ञानीमा १५ ५८ श्रुतज्ञानीमा १५ ७ ७ ९ ७ ६ ૨ or wr ४ ६ ७ १ ६ १ १ ५ ६ ९ ६ ६ ९ 00 ।

w २ १ 8 9 rom m nm a mank me WGG w ३ ६ [३१] ५९ अवधिज्ञानीमा १५ ६० मनःपर्यवज्ञानीमा १३ ६१ केवलज्ञानीमां ६२ समुच्चये अज्ञानीमा १४ १३ ६३ मति अज्ञानीमां १४ १३ ६४ श्रुत अज्ञानीमा १४ १३ ६५ विभंग ज्ञानीमा २ १३ सर्वथी थोडा मनःपर्यवज्ञानी १ । तेथी अवधिज्ञानी असंख्यावगुणा २। तेथी मतिश्रुतज्ञानी माहोमांहो तुल्य अने तेथी विशेषाधिक ३ तेथी विमंगज्ञानी असंख्यांत- गुणा ४। तेथी केवलज्ञानी अनंतगुणा ५। तेथी सज्ञानी विशेषाधिक ६ तेथी मति- श्रुत अज्ञानी मांहोमांहे तुल्य अने तेथी अनंतगुणा ७१ तेथी समुच्चये अज्ञानी विशेषाधिक जाणवा८॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ६६ चक्षुदशनीमा १२ १३ १० '६ ६७ अचक्षुर्दर्शनीमां १४ १२ १५ १० ६८ अवधिदर्शनीमां १५ ६९ केवलदर्शनीमां २ सर्वथी थोडा अवधिदर्शनी १। तेथी चक्षुर्दर्शनी असंख्यातगुणा २। तेथी केवल- दर्शनी अनंतगुणा ३ । तेथी जचक्षुदर्शनी अनंतगुणा ४ ॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ७० संयतमा ९ १५ ७१ सामायिक चारित्रमा १३ ७२ छेदोपस्थापनीयमां ४ १३ ७३ परिहारविशुद्धिमा ९ ७४ सूक्ष्मसंपरायमां ९ ७५ यथाख्यातमा ११ ७६ देशविरतिमा ११ ७७ अविरतिमा १३ ७८ नोसंयत नोअसंयत्र नो- संयतासंयतमा सर्वथी थोडा सूक्ष्मसंपरायी १। तेथी परिहार विशुद्धिक संख्यातगुणा २ । तेथी यw २ ९ १ २ १ ४ २ 1999 20 ur or w w w w or on w w ४ १४ ४ २ ६ ६ ८ om ५ ६ ९ ur [३२]] थाख्याती संख्यातगुणा ३ तेथी छेदोपस्थापनीय संख्यातगुणा ४ । तेथी सामायिक चा- रित्री संख्यातगुणा ५। तेथी संयत विशेषाधिक ६ । तेथी संयतासंयत असंख्यातगुणा ७। तेथी नोसंयत नोअसंयत नोसंयतासंयत अनंतगुणा ८। तेथी असंयत अनंतगुणा ९। जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ७९ साकारोपयुक्तमा १४ १४ १५ १२ ८. अनाकारोपयुक्तमा १४ १४ १५ १२ सर्वथी थोडा अनाकारोपयुक्त ११ तेथी साकारोपयुक्त संख्यातगुणा २॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८१ आहारकमां १३ १५ १२ ८२ अनाहारकमां १० सर्वथी थोडा अनाहारक ११ तेथी आहारक असंख्यातगुणा २॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८३ भाषकमां १३ १३ १२ ८४ अभाषकमा ५ १० सर्वथी थोडा भाषक १ तेथी अभाषक अनंतगुणा २॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८५ परिचमा १४ १४ १५ ८६ अपरिचमां १४ १३ ८७ नोपरित्त नोअपरित्तमा सर्वथी थोडा परित्त १ तेथी नोपरित्त नोअपरित्त अनंतगुणा । तेथी अपरित अनंतगुणा ३ ॥ परित्त एटले अल्प संसारी, अपरित्त-बहुलसंसारी, नोपरित्त नोअपरित्त ते सिद्ध जाणवा॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८८ पर्याप्सामा १४ १५ १२ ८९ अपर्याप्तामा ५ ९० नोपर्याप्त नोअपर्याप्तामा सर्वथा थोडा नीपर्याप्ता नोअपर्याप्ता १ । तेथी अपर्याप्ता अनंतगुणा २। तेथी पर्याप्ता संख्यातगुणा ३॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोय लेश्या ९१ सूक्ष्ममां २ ९२ बादरमा १२ १५ ९३ नोसूक्ष्म नोबादरमा २ ३ wr wro २ ३ ३ ३ w .

गुणम्यान लेग १२ ४ १ ७ २ जीवम्यान wr [३३] सर्वथी थोडा नोसूक्ष्म नोवादर १। तेथी चादर. अनंतगुणा २॥ तेथी सूक्ष्म असंख्यातगुणा ३॥ जीवम्यान योग उपयोग ९४ संज्ञीमां २ १२ १५ ९५ असंज्ञीमां १२ २ ९६ नोसंज्ञी नोअसंझीनां २ सर्वथी थोडा संज्ञी १ । तेथी नोसंझी नोअसंझी अनंतगुणा । तेथी असंजी अनंतगुणा ३॥ गुणस्थान योग उपयोग तेश्या ९७ भव्ययां १४ १४ १५ १२ ९८ अभव्यमा १४ १३ ६. सर्वथी थोडा अभव्य ११ तेथी भव्य अनंतगुणा २ ॥ गुणम्यान गेग उपयोग ९९ चरिममा १४ १४ १५ १२ ६ १०० अचरिममा १४ १३ सर्वथी थोड़ा अचरिम । तेथी चरिम अनंतगुणा २॥चरिम शब्द समकित पामेला अने अचरिम शब्दे समकित नहीं पामेला एम व्याख्या होय तो आ यंत्र वटी शके छे. ते सिवाय बीजी अपेक्षा समजाती नथी. चोथा कर्मग्रंथमांना भांगा. असंयोगी भांगा ६ ५ पृथ्वी स. १ पृथ्वी. १ sur जवन्थान १ ६ ६ ६ अप तेज. २ अप ३ तेज. ४ वायु. ५ वनस्पति. ६ वस. द्विक संयोगी मांगा १५. १ पृथ्वी अप्. २ पृथ्वी तेज. ३ पृथ्वी वायु. ४ पृथ्वी वनस्पति. ७ अप् वायु. ८ अप वनस्पति. ९ अप् त्रस. १. तेज वायु ११ तेज वनस्पति. १२ तेजप्रस. ५३ वायु वनस्पति. १४ वायु त्रस. १५ वनस्पति त्रस.

६ wr ६ ६ ८ १ ५ ६ ६ ५ [२] थाख्याती संख्यातगुणा ३ तेथी छैदोपस्थापनीय संख्यातगुणा ४ । तेथी सामायिक चा- रित्री संख्यातगुणा ५॥ तेथी संयत विशेषाधिक ६ । तेथी संयतासंयत असंख्यातगुणा ७1 तेथी नोसंयत नोअसंयत नोसंयतासंयत अनंतगुणा ८ तेथी असंयत अनंतगुणा ९। जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ७९ साकारोपयुक्तमा १४ १५ १२ ८० अनाकारोपयुक्तमा १४ १४ १५ १२ सर्वथी थोडा अनाकारोपयुक्त १। तेथी साकारोपयुक्त संख्यातगुणा २॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८१ आहारकमा १३ १५ १२ ८२ अनाहारकमा १० सर्वथी थोडा अनाहारक ११ तेथी आहारक असंख्यातगुणा २ ॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८३ माषकमा १३ १३ १२ ८४ अभापकमा ९ १० सर्वथी थोडा भाषक १ तेथी अभाषक अनंतगुणा २॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८५ परिचमा १४ १४ १५ १२ ८६ अपरित्तमा १४ १३ ८७ नोपरित्त नोअपरित्तमा सर्वथी शेडा परित्त । तेथी नोपरित्त नोअपरित्तं अनंतगुणा २१ तेथी अपरित्त अनंतगुणा ३॥ परिच एटले अल्प संसारी, अपरित्त-बहुलसंसारी, नोपरित्त नोअपरित्त ते सिद्ध जाणवा॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोग लेश्या ८८ पर्याप्तामा १४ १२ ८९ अपर्याप्सार्मा ९. नोपर्यात नोअपर्याप्तामा सर्वथा थोडा नीपर्याप्ता नोअपर्याप्ता १ । तेथी अपर्याप्सा अनंतगुणा २ । तेथी पर्याप्ता संख्यातगुणा ३॥ जीवस्थान गुणस्थान योग उपयोय लेश्या ९१ सूक्ष्ममां २ ९२ धादरमां १५ १२ ९३ नोसूक्ष्म नोवादरमा ६ ६ ६ ६ ३ १ ३ ३ ३ ६ २ गुणन्धान लेगा १२ ur -७ ८ जीवम्यान गुणस्थान ६. जवन्थान योग ६ ६ [३३] सर्वथी थोडा नोमूक्ष्म नोवादर ११ तेथी बादर. अनंतगुणा २१ तेथी मूक्ष्म असंख्यातगुणा ३ ॥ जीवम्यान योग उपरोग ९४ संज्ञीमां २ १२ १५ ९५ असंजीमां २ ९६ नोसंज्ञी नोअसंझीनां २ २ सर्वथी थोडा संज्ञी १ । तेथी नोसंबी नोअसंज्ञी अनंतगुणा २। तेथी असंजी अनंतगुणा ३ ।। योग उपयोग रा ९७ · भव्ययां १४ १४ १५ १२ ९८ अभव्यमां १४ १३ सर्वथी थोडा अभव्य ११ तेथी भव्य अनंतगुणा २ ॥ गुम्यान उपयोग लेवा ९९ चरिममा १४ १४ १५ ૨ १०० अचरिममा १४ १३ सर्वथी थोड़ा अचरिम १ । नेथी चरिम अनंतगुणा २॥ चरिम शब्द समक्ति पामेला अने अचरिम शब्दे समकित नहीं पामेला एम व्याख्या होय तो आ यंत्र वटी शके छे. ते सिवाय बीजी अपेक्षा समजाती नथी. चोथा कर्मग्रंथमांना भांगा. असंयोगी भांगा ६ ५ पृथ्वी त्रस. १ पृथ्वी. ६ अप तेज. ७ अप् वायु. ३ तेज. ८ अप वनम्पनि. ५ वनस्पति. ९ अप त्रम. १० तेज वायु ६ त्रस. ११ तेज वनस्पति. द्विक संयोगी मांगा १५. १ पृथ्वी अप. १२ तेजत्रम. २ पृथ्वी तेज. १३ वायु बनम्पति. १४ वायु त्रमा ४ पृथ्वी वनस्पति. १५ वनम्पति त्रम. २ अप, ४ वायु. ३ पृथ्वी वायु. ..

[३४] त्रिक संयोगी भांगा २०. २ पृथ्वी अप तेज वनस्पति. ३ पृथ्वी अप् तेज बस. १ पृथ्वी अप तेज, २ पृथ्वी अप् वायु. ४ पृथ्वी अप् वायु बनस्पति. ५ पृथ्वी अप् वायु त्रस. ३ पृथ्वी अए वनस्पति. ४ पृथ्वी अप त्रस. ६ पृथ्वी अप वनस्पति त्रस. ५ पृथ्वी तेज वायु. ७ पृथ्वी तेज वायु वनस्पति. ६ पृथ्वी तेज वनस्पति. ८ पृथ्वी तेज वायु स. ७ पृथ्वी तेज त्रस. ९ पृथ्वी तेज वनस्पति त्रम. ८ पृथ्वी वायु बनस्पति. १. पृथ्वी वायु वनस्पति त्रम. ९ पृथ्वी वायु प्रस. ११ अप तेज वायु वनस्पति. १. पृथ्वी वनस्पति म. १२ अप नेज वायु त्रस. ११ अप् तेज बायु. १३ अप् तेज वनस्पति त्रम. १२ अप् तेज वनस्पति. १४ अप वायु वनस्पति त्रस. १३ अप तेज स. १५ तेज वायु वनस्पति त्रस. १४ अप् वायु वनस्पति. पंचसंयोगी मांगा ६. १५ अपवायु त्रम. १ पृथ्वी अप तेज वायु वनस्पति. १६ अप् वनस्पति त्रस. २ पृथ्वी अप् तेज वायु त्रम. १७ तेज वायु वनस्पति. ४ पृथ्वी अप नेज वनस्पति त्रम. १८ तेज वायु त्रस. ४ पृथ्वी अप वायु वनस्पति श्रम. १९ तेज वनस्पति त्रस. ५ पृथ्वी तेज वायु बनस्पति त्रम. २० वायु बनस्पति प्रस. ६ अप् तेज वायु वनस्पति त्रम. चतु:संयोगी मांगा १५. पट् संयोगी भांगो १. १ पृथ्वी अप तेज वायु. १ पृथ्वी अप तेज बायु बनस्पति त्रय. चोथा कर्मग्रंथना भांगा. १ एक जीवने एक समये मिथ्यात्वे जघन्य पदे-१० बंध हेतु होय. ते आ रीते. पांच मिथ्यात्वमाथी १ मिथ्यात्व. पांच इंद्रियोमाथी १ इंद्रिय. छ कायनावघमाथी १ कायनो वध, त्रण वेदमांथी १ वेद. वे युगलमाथी १ युगल. युगलनी के प्रकृति, 4 चार कपायमाथी दश योगमाथी ३ कपाय. अनंतानुबंधी विना. १ योग. आहारक द्विक २, औदारिक मिश्र १, वक्रिय मिश्र १, कार्मण काय योग १, ए ५ विना योग १० समजवा. हवे जघन्ये मूळ १० बंध हेतुना मांगा कहे छ. ५ मिथ्यात्वने. ६ कायवध साथै गुणवा. ५ इंद्रियो साथे गुणवा. १५० २ हास्य रति के शोक अरवि साये गुणवा. ३०० ३ वेद साथे गुणवा. ९०० ४ कपाय साथे गुणवा. ३६०० १० योग साथे गुणवा. ३६००० आ दश बंध हेतुना मांगा थया. आ एक कायवधना भांगा थया. हवे उत्तर भेदे १८ बंधहेतु उत्कृष्टथी होय, ते कहे छ-१०-११-१२-१३-- १४-१५-१६-१७-१८-ए रीते दश आदि लईने अद्वार मुधी बंधहेतु कहेवा. हवे एक कायना वधमा पूर्व कहेला दश बंध हेतुमा भय के जुगुप्मा के अनं- तानुबंधी एक कपाय, एम एक एक भेळवनां ११ बंध हेतु थाय, पूर्वना १० बंध हेतुमा भय नाखतां ११ तेना मांगा ३६०००. पूर्वना १० बंध हेतुमां जुगुप्सा नांखतां ११ नेना भांगा ३६०००. पूर्वना १० बंध हेतुमा अनंतानुबंधी १ नाखतां ११ तेना भांगा ३६०० ने आहारक द्विक विना १३ योगे गुणतां ४६८०० भांगा थाय. ज्यारे वे कायना बधनी विवक्षा करीए, त्यारे द्विक संयोगी १५ भांगा धाय, तेने पूर्वोक्त रीते गुणीए त्यारे ११ बंध हेतुना ९०००० भांगा थाय. ने आ प्रमाणे- , [३६] द्विक संयोगी १५ मांगाने ५ मिथ्यात्व साथे गुणा ७५. तेने ५ इंद्रिये गुणतां ३७५. तेने १ युगल एटले वे बडे गुणतां ७५०. तेने ३ वेद साथे गुणतां २२५०. तेने ४ कपाय साथे गुणतां ९०००, तेने १० योग साथे गुणतां ९०००० मांगा थाय. कुल ३६००० १ ला विकल्पना. ३६००० २जा विकल्पना. ४६८०० ३जा विकल्पना. ९०००० ४ था विकल्पना. २०८८०० भांगा अगीआर बंधहेतुना चार विकल्पो मळीने थया. पूर्वोक्त १० मध्ये भय अने जुगुप्सा ए २ नांखीए त्यारे १२ बंघहेतु थाय त्यां एक कायनो वध लेखवतां पूर्वनी पेठे ३६०००, पूर्वोक्त १० मध्ये एकने बदले वे काय ने भय मेळवतां तेना मांगा ९००००, वे काय अने कुत्सा मेळवा तेना भंग पूर्वनी पेठे ९००००. त्रण कायनो वध लेखवीए त्यारे २० भांगा त्रिक संयोगी छ, तेनी साथे गुणवा. २० मांगाने ५ मिथ्यात्वे गुणतां १००, तेने ५ इंद्रिये गुणतां ५००० तेने २ युगले गुणतां १०००, तेने ३ वेदे गुणतां ३०००. तेने ४ कषाये गुणतां १२०००. तेने १० योगे गुणतां १२००००, अनंतानुबंधी अने भय मेळवीए त्यारे १२ बंधहेतुना भांगा ३६०० ने १३ योग साथे गुणतां ४६८००. अनंतानुबंधी अने कुत्सा भेळवतां पण पूर्वनी जेटला ४६८००, अनंतानुबंधी अने वे कायनो वध लेखवतां द्विक संयोगी १५ मंगना जे ९००० भंग छे, तेने १३ योग साथे गुणतां ११७०००, ए रीते १२ बंध हेतुना सात विकल्पना मांगा नीचे प्रमाणे- ३६००० पहेला विकल्पना. ४६८०० पांचमा विकल्पना. ९०००० बीजा विकल्पना. ४६८०० छठा विकल्पना ९००००त्रीजा विकल्पना. ११७००० सातमा विकल्पना. १२०००० चोथा विकल्पना. ५४६६०० कुल मांगा थया. .

[३७] हवे १३ बंधहेतुना भांगा कहे छ. पूर्वोक्त १० मा भय अने कुत्सा तथा एकने बदले वे कायनो वध मेळवतां १३ बंधहेतु थाय. त्यां ९०००० भांगा थाय. भय अने त्रण कायनो वध लेखवीए त्यारे १२०००० मांगा थाय. कुत्सा अने त्रण कायनो वध लेखवीए त्यारे १२०००० भांगा थाय. अनंतानुबंधीने उदय भय अने कुत्सा मेळवीए अने १३ योग साथे गुणीए त्यारे ४६८०० भंग थाय. अनंतानुबंधी, भय अने वे कायनो वध लेखवतां भंग ११७००० थाय. अनंतानुवंधी, कुत्सा अने वे कायनो वध लेखवतां भंग ११७००० थाय. अनंतानुगंधी ने त्रण कायनो वध लेखवीये त्यारे त्रिक संयोगी २० भंग साथे गुणतां भंग १५६००० थाय. २०४५= १०० १०००४ ३% ३००० १००४५% ५०० ३०००x४% १२००० ५००x२-१००० १२०००४१३=१५६००० पूर्वोक्त १० साये ४ कायनो बंध लेखवीए त्यारे ९०००० मांगा थाय. आ प्रमाणे १३ बंध हेतुना ८ विकल्पना ८५६८०० मांगा थाय तेनी विगत. ९०००० पहेला विकल्पना. ११७००० पांचमा विकल्पना. १२०००० वीजा विकल्पना. ११७००० छठा विकल्पना. १२००००त्रीजा विकल्पना. १५६००० सातमा विकल्पना, ४६८०० चोथा विकल्पना. ९०००० आठमा विकल्पना. १ पूर्वोक्त १० मध्ये भय अने कुत्सा भेळवीए अने एकने बदले त्रण कायनो वध साथे गणीए त्यारे १४ बंध हेतु थाय. तेना भांगा १२०००० २ भय ने चार कायने वघे ९०००० ३ कुत्सा अने चार कायने वधे ९०००० ४ पांच कायना वधे ३६००० ५ अनंतानुबंधीना उदये भय, कुत्सा अने बे कायने वधे ११७००० (१३ योग साथे गुणवा) ६ अनंतानुबधी, भय अने त्रण कायने वधे १५६००० ७ अनंतानुबंधी, कुत्सा अने त्रण कायने वधे १५६००० ८ अनंतानुबंधी ने चार कायने वधे ११७००० या प्रमाणे चौद बंध हेतुना ८ विकल्पे थइने भांगा थया ८८२००० - [३८] १ पूर्वोक्त १० मध्ये भय, कुत्सा अने एकने बदले ४ कायनो वध लेखीए त्यारे १५.बंध हेतु थाय त्या भाग्य ९०००० २ भय अने ५ कायना वधे ३६००० ३ कुत्सा अने ५ कायना वर्षे ३६००० ४ छ कायना वधे ६००० १४५-५ ५०४३%१५० ५२५-२५ १५०x४-६०० २५४२-५० ६००x१०-६००० ५ अनंतानुबंधीने उदय भय, कुत्सा अने त्रण कायनो वध गणीए अने १३ योगे गुणीए त्यारे भांगा १५६००० ६ अनंतानुबंधी, भयं ने चार कायने वधे ११७००० ७ अनंतानुबंधी, कुत्सा ने चार कायनेवधे ११७००० ८ अनंतानुबंधी ने पांच कायने वधे ४६८०० आ प्रमाणे पंदर बंध हेतुना ८ विकल्पे थईने मांगा थया, ६०४८०० १ पूर्वोक्त १० हेतु मध्ये भय, कुत्सा अने एकने बदले पांच कायनो वध लेखबीए त्यारे १६ बंध हेतु थाय. तेना मांगा ३६००० २ भय अने छ कायनो वध लईए त्यारे ६००० ३ कुत्सा अने छ कायनो वध लइए त्यारे ४ अनंतानुबंधी, भय, कुत्सा अने चार कायना वध साथे गुणतां ११७००० ५ अनंतानुबंधी, भय अने पांच कायना वध साथे गुणवां ४६८०० ६ अनंतानुबंधी, कुत्सा अने पांच कायना वध साथे गुणतां ४६८०० ७ अनंतानुबंधी ने छ कायना वध साथे गुणतां ७८०० आ प्रमाणे सोळ हेतुना सात विकल्पे मांगा थया. २६६४०० १ पूर्वोक्त १० मध्ये मय, कुत्सा अने एकने बदले छ कायनो वध लईम त्यारे १७ बंध हेतु थाय तेना मांगा २ अनंतानुबंधी, मय, कुत्सा ने पांच कायनो वध लेखवीए त्यारे ४६८०० ३ अनंतानुबंधी, भय अने छ कायना वधे ४ अनंतानुबंधी, कुत्सा अने छ कायना वधे आ प्रमाणे १७ बंध हेतुना चार विकल्पे मांगा थया. ६८४०० पूर्वोक्त १० मध्ये अनंतानुबंधी, भय कुत्सा ने एकने बदले छ कायनो वध लेखवतां १८ बंधहेतुनो १ विकल्प तेना मांगा ७८०० थाय. ७८०० ७८०० ३ 'पटकाय संयोगी १ मिथ्यात्व ५ ५ इंद्रिय ५ ५० चेद १५० कपाय ६०० योग १३ युगल २ ५० ७८०० . . ७८०० ए रीते मिथ्यात्व गुणस्थावे- १. बंध हेतुना मांगा ३६००० ११ बंध हेतुना मांगा २०८८०० १२ बंध हेतुना मांगा ५४६६०० १३ बंध हेतुना भाया ५६८०० १४ बंध हेतुना मांगा ८८२००० १५ बंध हेतुना भांगा. ६०४८०० १६ बंध हेतुना भांगा २६६४०० १७ बंध हेतुना मांगा ६८४०० १८ बंध हेतुना भांगा ए गते मिथ्यात्व गुणस्थाने दशर्धा मांडीने अढार सुधीना बंध हेतुने नव विकल्प थईने भांगा थया. ३४७७६०० २ हवे बीजा साखागन गुणस्थाने मांगा ३८३०४० थाय, ते कहे छै. अहीं जघन्य १० हेतु होय. तेमां मिथ्यात्व न होय. अने अनंतानुबंधीना उदय विना बीजु गुणस्थान न होय. नेथी कपाय ४, वेद १, युगल १, इंद्रियनी अविरति १, कायनो वध १, योग तेग्मांथो १, ए १० हेतु जवन्यथी. अने उत्कृष्टथी १७ हेतु-१०-११-१२-१३-१४-१५-१६-१७. आ उत्कृष्ट बंधहेतु एक समये होय. तेना ८ विकल्प होय. विशेष एटलं के नमक वेद वैक्रियमिश्र योग न होय. नारकी अपर्याप्त अवस्थाए सास्वादनी न होय तेथी. ३ वेदने पूर्व प्रमाण १३ योग साचे गुणता ३९. तेमांथी एक रूप काढता ३८. तेने छ काय साथे गुणतो २२८. तेने ५ इंद्रिय साथे गुणतां ११४०, तेने १ युगलना २ साथै गुणता २२८०.

: [४०]] तेने ४ कपाय साये गुणतां ९१२०, बीजागुणस्थानना भांगानी गणतरी नीचे प्रमाणे- ६ कायने ५ इंद्रिय साथे गुणतां ३०. तेने १ युगलना वे साथे गुणतां ६०. तेने ४ कपाये गुणतां २४०० तेने २ वेद साथे गुणतां ४८०. तेने १३ योग साथे गुणतां ६२४०. तथा वेद १ लईए तो ते साथे गुणतां २४०. तेने वैक्रियमिश्र विना योग १२ साथे गुणतां २८८०. पूर्वना ६२४० मा २८८० भेळवमा कुल ९१२० जवन्य दश बंध हेतुना मांगा जाणवा. १ पूर्वोक्त १० हेतु मध्ये भय भेळवीए त्यारे ११ बंध हेतु थाय- तेना ९१२० २ दशमां कुत्सा भेळवीए त्यारे ११ बंध हेतुना मांगा ९१२० ३ वे कायनो वध लेखवीए त्यारे द्विक संयोगी १५ भंग साथे गुणतां नीचे प्रमाणे थता भांगा २२८०० ए रीते ३ विकल्पे थईने ११ हेतुना कुल भंग थाय, ४१०४० ११ हेतुना द्विक संयोगी मांगा १५ ने ५ इंद्रिय साथै गुणतां ७५, तेने युगलना २ साथे गुणतां १५०, तेने ४ कपाय साथे गुणतां ६००, तेने २ वेद साथे गुणतां १२००, तेने १३ योग साथे गुणतां १५६००. तथा वेद १ लईए तो ६०० ने १२ योग साथै गुणतां ७२००. ते पूर्वना १५६०० मा मेळवीए त्यारे २२८०० मांगा थाय, ते उपर लख्याछे. पूर्वोक्त १० हेतु मध्ये भय कुत्सा मेळवीए त्यारे १२ हेतु थाय, १ तेमा पहेले विकल्पे मांगा ९१२० २ भय अने वे कायना वधे मांगा. २२८०० ३ कुत्सा अने वे कायनो वध लेतां मांगा २२८०० ४त्रण कायनो वध लेतां मांगा नीचे लख्या प्रमाण ३०४०० आ रीते १२ हेतुना चार विकल्पे भांगा थाय. ८५१२० ----- [४१]] अहीं त्रिक संयोगी २० भांगाने ५ इंद्रिये गुणतां १००. नेने युगलना वे साथे गुणतां २००. तेने ४ कपाय माथै गुणतां ८००. तेने २ वेद माथे गुणतां १६००. तेने १३ योग साथै गुणतां २०८००, तथा एक वेद साये गुणना ८०० तेने १२ योग माथे गुणतां ९६०० तेमा पूर्वना २०८०० भेळवीए त्यारे ३०४०० थाय ने उपर लग्या छे. १ पूर्वोक्त १० मध्ये भय, कुन्सा अन एकन बदले वे कायनी वध लहा त्यारे १३ पंधहेतुना मांगा. २२८०० २ भय ने त्रण कायनो बध लेखवीए त्यार- ३०४०० ३ कुत्मा ने त्रण कायनो वध लेग्ववीए त्यारे ३०४०० ४ चार कायनो वध लेखवतां चतुःसंयोगी १५ भांगा माथे गुणतां २२८०० थाय छ ते २२८०० आ रीते १३ हेतुना चार विकल्प भांगा थाय. १०६४०० १ पूर्वोक्त १० मध्ये भय कुन्मा अने एकने बदलं त्रण कायनो वध लईए त्यारे १४ हेतु थाय भांगा पूर्वनी पंठे. ३०४०० २ भय ने चार कायना वर्ष २२८०० ३ कुन्मा ने चार कायना व २२८००. ४ पांच कायना वर ९१२० आ रीते १४ हेतुना चार विकल्प मांगा थाय. ८५१२० पूर्वोक्त १० मध्ये भय, कुन्मा ने एकने पदले चार कायनो ध लेग्ववीए त्यारे १५ हेतु थाय. १ पहेला विकल्पना मांगा २२८०० २ भय अन पांच कायना वध भांगा ९१२० ३ कुन्सा अन पांच कायना बंधे ९१२० ४ छ कायना वध १५२० परीते १५ हेतुना चार विकल्प भांगा थया., ४२५६० पूर्वोक्त १० मध्ये भय, कुत्सा अन एकने बदल पांच कायनो वध लेता १६ हेतु थाय. १ तेना पहेले विकल्प भांगा ९१२० २ भय अने छ कायना वधे मांगा १५२० ३ कुत्सा अने छ कायना वधे १५२० आ रीते १६ हेतुना त्रण विकल्प भांगा थाय, १२१६० . । - . - [] ६ काय, १ इंद्रिय, ४ कपाय, २ युगल एकना, १ वेद, १ भय, १ कुत्सा, १ योग, ए १७ हेतुनो ६ संयोगी एक भंग होय, १ कायने ५ इंद्रिय साथे गुणतां ५. तेने युगलना २ साथे गुणतां १०. तेने ४ कपाय साथे गुणतां ४०. तेने २ वेद साथे गुणतां ८०. तेने १३ योग साथे गुणतां १०४०, तथा १ वेद लइए तो ४० ने १२ योग साथै गुणतां ४८०. नेमां पूर्वना १०४० मेळवीए त्यारे १५२० मांगा थाय, आ रीते साखादन गुणस्थाने- १० हेतुना मांगा ९१२० १४ हेतुना मांगा ८५१२० ११ हेतुना मांगा ४१०४० १५ हेतुना भांगा ४२५६० १२ हेतुना मांगा ८५१२० १६ हेतुना भांगा १२१६० १३ हेतुना भांगा १०६४०० १७ हेतुना मांगा १५२० आठ विकल्पना थईने भांगा कुल ३८३०४० थाय. ३ मिश्र गुणस्थाने-३०२४०० भांगा थाय, ते कहे छ.- मिश्र गुणस्थाने अनंतानुबंधी न होय तेथी एक जीवने एक समये ९-१०- ११-१२-१३-१४-१५ अने उत्कृष्ट १६ हेतु थाय. त्यां जघन्यथी काय १, इंद्रिय १, कपाय ३, हास्यादि युगल २, वेद १, योग १, ए ९ हेतु होय. तेमां ६ कायने ५ इंद्रिय साथे गुणता ३० तेने ४ कषाय साथे गुणतां १२० तेने युगलना वे साथे गुणतां २४० तेने ३ वेद साथे गुणतां ७२० तेने १० योग साथे गुणतां ७२०० पूर्वोक ९ मध्ये भय मेळवता १० हेतु थाय. १ तेना पहेले विकल्पे मांगा ७२०० २ कुत्सा मेळवतां मांगा ७२०० ३ बेकायनो वध लेखवतां मांगा (नीचे जणाच्या प्रमाणे) १८००० आ प्रमाणे ३ विकल्प दश हेतुना भांगा ३२४०० थाय. ३२४०० , ७५. वे तेमा द्विक संयोगीना मांगा १५ तेने ५ इंद्रिय साथे गुणतां युगल साथे गुणतां १५० त्रण वेद साथे गुणतां ४५० ४ कपाय साथै गुणतां १८०० १० योग साथे गुणतां १८००० पूर्वोक्त ९ मध्ये भय अने कुत्सा भेळवीए त्यारे ११ हेतु थाय. १ तेमां पहेलो विकल्प पूर्वनी पेठे ७२०० २ कुत्सा अने वे कायना वघे १८००० ३ भय अने वे कायना वधे १८००० ४त्रण कायना वधे (नीचे जणाच्या प्रमाणे) २४००० ए प्रमाणे चार विकल्पे ११ हेतुना भांगा ६७२०० थाय. ६७२०० तेमां त्रिक संयोगी भांगा २० ने ५ इंद्रिये गुणतां १००, तेने २ युगल साथे गुणतां २००, तेने ३ वेद साथे गुणतां ६००, तेने ४ कपाय साथै गुणतां २४००, तेने १० योग साये गुणतां २४००० पूर्वोक्त ९ हेतु मध्ये भय, कुत्सा अने वे कायनो वध लेखवतां १२ हेतु थाय. १ तेमां पहेले विकल्प भांगा १८००० २ भय ने ३कायना वधे मांगा २४००० ३ कुत्सा ने ३ कायना वधे मांगा २४००० ४ चार कायना वधे मांगा १८००० आ प्रमाण ४ विकल्पे १२ हेतुना भांगा ८४००० थाय, पूर्वोक्त ९ हेतु मध्ये भय, कुत्सा अने त्रण काय लेखवत्तां १३ हेतु थाय. १ तेमां पहेले विकल्पे मांगा २४००० २ भय ने चार कायना वघे १८००० ३ कुत्सा ने चार कायना वधे १८००० ४ पांच कायना वधे ७२०० आ प्रमाणे ४ विकल्पे १३ हेतुना मांगा ६७२०० थाय. ६७२०० पूर्वोक्त ९ हेतु मध्ये भय, कुत्सा अने चार कायनो वध लेखवतां १४ हेतु थाय.

. १ तेमा पहेले विकल्पे मांगा पूर्वनी पेठे १८००० २ भय अने पांच कायना वधे ७२०० ३ कुत्सा अने पांच कायना वधे ७२०० ४ छ कायना वचे १२०० ए प्रमाणे ४ विकल्पे १४ हेतुना भांगा ३३६०० थाय. ३३६०० पूर्वोक्त ९ मध्ये भय, कुत्सा अने पांच कायनों वध लेतां १५ हेतु थाय. १ तेमा पहेले विकल्पे पूर्वनी पेठे ७२०० २ भय ने छ कायना वधे १२०० ३ कुत्सा ने छ कायना वये १२०० ए प्रमाणे ३ विकल्पे १५ हेतुना मांगा थया. ९६०० काय ६, इंद्रिय १, कपाय ३, हास्यादिक एक युगलना २, वेद १, योग १, भय १, कुत्सा १, ए १६ बंध हेतुना मांगा १२०० थाय. आ ८ विकल्पे मिश्र गुणस्थाने- ९ हेतुना भांगा ७२०० १३ हेतुना भांमा ६७२०० १० हेतुना मांगा ३२४०० १४ हेतुना मांगा ३३६०० ११ हेतुना मांगा ६७२०० १५ हेतुना मांगा ९६०० १२ हेतुना मांगा ८४००० १६ हेतुना मामा १२०० कुल मांगा ३०२४०० थाय. ४-५ हवे अविरति अने देशविरति ए वे गुणस्थाने कहे छे. तेमां चोथे गुणस्थाने ३५२८०० मांगा थाय. त्यां जघन्य ९ अने उत्कृष्ट १६ बंध हेतु होय-९-१०-११-१२-१३-१४-१५-१६. आहारक द्विक विना १३ योगने ३ वेद साथे गुणतां ३९ तेमांथी ४ रूप काढीए त्यारे ३५ तेने ६ काय साथे गुणतां २१० तेने ५ इंद्रिय साथे गुणतां १०५० तेने युगलना २ साथे गुणतां २१०० तेने ४ कपाये गुणता ८४०० - [१५]] नपुंसकवेदे योग 1 ur २४० काय इंद्रिय २४० १२ स्त्रीवेदे योग ३० २८८० २४०० युगल २ कपाय ४ २४० पुंवेद २४० योग १३ ३१२० त्रण प्रकारना एकंदर करतां ८४०० पूर्वोक्त ९ हेतु मध्ये भय भेळवतां १० हेतु थाय. १ तेना पूर्वनी पेठे पहेला विकल्पमा मांगा २ नव मध्ये कुत्सा मेळवतां भांगा ३ नब मध्ये वे काय लेखवतां भांगा ए रीते ३ विकल्पे १० हेतुना भांगा ३७८०० थाय. द्विक संयोगी भांगा. नपुंसकवेदे १५ ६०० इंद्रिय योग १२ ७५ ७२०० युगल १५० कपाय ४ ८४०० २१००० ३७८०० स्त्रीवेदे ६०० योग १० २ . ६०० १ 1 पुंवेद योग १३ ७८०० त्रण प्रकारना एकंदर करता २१०००.

पूर्वोक्त ९ हेतु मध्ये भय अने कुत्सा मेळवतां ११ बंध हेतु थाय. १ तेमां पहेले विकल्पे मांगा २ भय तथा वे काय लेखवतां मांगा २१००० ३ कुत्सा अने वे काय लेखवतां मांगा २१००० ४ त्रण काय लेखवतां मांगा २८००० ए प्रमाणे ४ विकल्पे ११ हेतुना भांगा ७८४०० थाय. ७८४०० त्रिक संयोगी मांगा नपुंसकवेदे स्त्रीवेदे २० इंद्रिय ५ योग १२ योग ९६०० युगल २०० ऋपाय ४ .... पुंवेद ८०० योग १३ १०४०० त्रण प्रकारना एकंदर करता २८०००, पूर्वोक्त ९ मध्ये भय, कुत्सा अने वे कायनो वध लेखवतां १२ हेतु थाय. १ तेमा पहेले विकल्प मांगा २१००० २ नवर्मा भय अनेत्रण कायनो वध लेखवता २८००० ३ नवमां कुत्सा अने त्रण कायनो वध लेखवता २८००० ४ नवा चार कायनो वध लेखवतां मांगा २१००० आ रीते ४ विकल्पे १२ हेतुना मांगा ९८००० थाय, ९८००० पूर्वोक्त ९ मध्ये त्रण कायनो वध, भय अने कुत्सा लइए त्यारे १३ हेतु थाय. १ तेमा पहेले विकल्प मांगा २८००० २ नवमां भय अने चार कायना वधे मांगा २१००० ३. नवमां कुत्सा अने चार कायना वधे मांगा २१००० ४ नवमां पांच कायना वधे मांगा ८४०० आ रीते ४ विकल्पे थइने १३ हेतुना भांगा ७८४०० थाय. ७८४०० [१७] पूर्वोक्त ९ मध्ये भय, कुत्सा अने चार कायनो वध लेखवता १४ हेतु थाय. १ तेमा पहेले विकल्पे मांगा २१००० २ नवमां भय ने पांच काय लेखवीए त्यारे भांगा ३ नवमां कुत्सा अने पांच काय लेखवीए त्यारे भांगा '४०० ४ नरमा छ कायनो वध लेखवतां नीचे जणाच्या प्रमाण मांगा १४०० आ रीते ४ विकल्पे १४ हेतुना मांगा ३९२०० थाय. ३९२०० पुवेदे नपुंसकवेदे स्त्रीवेदे पदकायसंयोगी इंद्रिय योग १२ योग १० १०. युगल १ ४० ri...... ४८० १. कपाय ५ पुंवेद . योग १३ ५२० वर्ण प्रकाग्ना एकंदर करतो १४००, पूर्वोक्त ९ मध्ये भय, कुत्सा अने पांच कायनो वध लेखनवां १५ हेतु थाय. १ तेमां पहेले विकल्पे मांगा २ नवमां भय अने छ कायनो वध लेखवतां १४०० ३ नवमां कुत्सा अने छ कायनो वध लेखवतां २४०० आ ३ विकल्पे थइन १५ हेतुना भांगा ११२०० थाय. ११२०० पूर्वोक ९ मध्ये भय, कुत्सा अने छ कायनो वध लेखवतां १६ हेतु थाय. तेमा विकल्प एक ज छ तेना भांगा १४०० थाय. ९ बंध हेतुना भांगा ८४०० १३ चंध हेतुना भांगा ७८४०० १० बंध हेतुना मांगा ३७८०० १४ बंध हेतुना मांगा ३९२०० ११ बंध हेतुना मांगा ७८४०० १५ चंध हेतुना भांगा ११२०० १२ बंध हेतुना भांगा ९८००० १६ बंध हेतुना मांगा १४०० कुल चोथे गुणस्थाने ९ थी १६ बंध हेतुना ३५२८०० भांगा थाय.

४ वायु F ३ पृथ्वी वायु [४८] हवे पांच स्थावरना संयोगी भांगा कहे छे.- एक संयोगी मांगा ५ त्रिक संयोगी मांगा १० १ पृथ्वी १ पृथ्वी अपं तेज २ अप २ पृथ्वी अप् वायु ३ तेज ३ पृथ्वी अप वनस्पति ४ पृथ्वी तेज वायु ५ वनस्पति ५ पृथ्वी तेज वनस्पति द्विक संयोगी मांगा १० ६ पृथ्वी वायु वनस्पति १ पृथ्वी अप् ७ अप तेज वायु २ पृथ्वी तेज ८ अप् तेज वनस्पति ९ अप वायु वनस्पति ४ पृथ्वी वनस्पति १० तेज वायु वनस्पति ५ अप तेज चतुः संयोगी मांगा ५. ६ अप् वायु १ पृथ्वी अप तेज वायु ७ अप् वनस्पति २ पृथ्वी अप तेज वनस्पति ८ तेज वायु ३ पृथ्वी अए वायु वनस्पति ९ तेज वनस्पति ४ पृथ्वी तेज वायु वनस्पति १० वायु वनस्पति ५ अप तेज वायु वनस्पति पंच संयोगी भांगो १. १ पृथ्वी अप् तेज वायु बनस्पति. हवे पांचमे गुणस्थाने एक जीव आश्री जघन्यथी-८ बंध हेतु अने उत्कृष्टथी १४ हेतुना विकल्प ७ थाय. तेना भांगा १६३६८० थाय. केम जे त्रस विना एक संयोगी मांगा ५, द्विक संयोगी मांगा १०, त्रिक संयोगी मांगा १०, चतुःसंयोगी मांगा ५, पंचसंयोगी मांगो १ तेनु कोष्टक उपर प्रमाणे जाणवू. बंध हेतु आ प्रमाणे. ८-९-१०-११-१२-१३-१४. जघन्यथी काय १, इंद्रिय १, कपाय २, युगलनी २, वेद १, योग १. एम जघन्य ८ बंध हेतुनो विकल्प एकज छे, तेना भांगा.६६००: काय ५ १५० इंद्रिय कषाय ४ २५ ६०० युगल २ . - योग ६६००. वेद ३.

[१२] ४ . ११ om हवे ८मध्ये भय अथवा कुत्सा अथवा घे काय लेखवतो. ९ हेतु थाय. १ आठमां भय भेळवतां ९ हेतुना पहेले विकल्पे मांगा ६६०० २ आठमां कुत्सा मेळवतां मांगा, ६६०० ३ वे कायनो वध लेखवतां भांगा नीचे लख्या प्रमाण. १३२०० आ त्रण विकल्प ९ हेतुना मांगा २६४०० थाय. २६४०० द्विक संयोगी भांगा. ' १० इंद्रिय ३०० कपाय युगल १२०० योग वेद १३२०० स्वोक्त आठमा भय. अने कुत्सा भेळवतां १० हेतु थाय. १ तेमा पहेले विकल्प भांगा ६६०० २ आठमां भय ने व काय लखवतां मांगा १३२०० ३ आठमां कुत्सा अने वे काय लेखवतां १३२०० ४ व्रण कायनो वध लेखवतां १३२०० आ ४ विकल्पे १० हेतुना मांगा ४६२०० थवा. ४६२०० पूर्वोक्त आठ मध्ये भय, कुत्सा अने वे कायनो वध लेखवतां ११ हेतु थाय ? १ तेमा पहेले विकल्प भांगा १३२०० २ आठमां भय अने व्रण काय लेखवता, १३२०० ३ आठमां कुत्सा अने त्रण काय लेखवता १३२०० ४ चार कायना वधे ६६०० आ ४ विकल्पे ११ हेतुना भांगा ४६२०० थया. ४६२०० पूर्वोक्त आठ मध्ये भय अने चार कायनो वध लेखेवनी १२ हेतु थाय. १ तेमां पहेले विकल्पे भीगा २ आठमां कुत्मा अने चार कायना वधे ६६०० ३ आठमा भय, कुत्सा अन त्रण कायना वधे. २३२०० ४ पांच कायना वधे . १३२० एम ४ विकल्प १२ हेतुना मांगा २७७२० थया, . ২৬ও২০ . . ..

४ २० ३ [५०] पूर्वोक्त ८ मध्ये भय, कुत्सा अने चार कायनो वध लेखवतां १३ हेतु थाय. १ तेमां पहेले विकल्पे मांगा ६६०० २ आठमां भय अने पांच कायनो वध लेखवतां १३२० ३ आठमां कुत्सा ने पांच कायनो वध लेखवतां १३२० एम ३ विकल्पे थइने १३ हेतुना मांगा ९२४० थाय. ९२४० पूर्वोक्त आठ मध्ये भय, कुत्सा अने पांच कायनो वध लेखवीए त्यारे १४ बंध हेतु थाय, तेनो विकल्प एकज छे. तेना भांगा १३२०. १ पंच संयोगीयो मांगो. इंद्रिय ३० कपाय २ युगल १२० ११ योग वेद १३२० ए प्रमाणे पांचमे गुणस्थाने सात विकल्पे थइने मांगानो सरवाळो कहे छ.- ८ बंध हेतुना मांगा ६६० १२ बंध हेतुना मांगा २७७२० ९ बंध हेतुना भांगा २६४०० १३ बंध हेतुना भांगा ९२४० १० बंध हेतुना भांगा ४६२०० १४ बंध हेतुना मांगा १३२० ११ बंध हेतुना मांगा ४६२०० १६३६८० हवे छठे गुणस्थाने त्रणमांथी वेद १, एक युगलनी २, चार कपाय मध्ये पहेलो तथा बीजो कवाय १, तेर योगमाथी योग १, तेमां स्त्रीवेदे आहारक द्विक विना होय. आ ५ हेतु जघन्य पदे एक जीवने एक समये होय. तथा उत्कृष्टथी ७ हेतु होय. ५-६-७. वेद वेद स्त्रीवेद योग योग १३ योग ११ ३९ २६ रूप काढीए २ युगल युगल २ ३७ २२ युगल २ कपाय ४ कपाय ७४ २०८ कपाय स्त्रीवेदे ८८ ३ in mlw or " | B - ८८ ४ - पांच हेतुना मांगा २९६ पांचमां भय लेखवतां ६ हेतुना मांगा ५९२ पांचमां कुत्सा लेखवां ६ हेतुना मांगा पांचमां भय अने कुत्सा लेखवतां सात हेतुना ११८४ एम सर्व मळीने त्रण विकल्पे मांगा ११८४ थाय. ७ एम सातमे गुणस्थाने एक जीवने एक समये संज्वलनो कपाय १, वेद १, एक युगलनी २, अग्यार योगमाथी योग १, एम जघन्ये बंध हेतु ५, तथा उत्कृटे बंध हेतु ७.(५-६-७.) पांच हेतुना भांगा २५६ पांवा कुत्सा भेळवता ६ हेतुना २५६ ५१२ पंचमां भय मेळवतां ६ हेतुना २५६ पांचमां भय अने कुत्सा मेळवतां ७ हेतुना २५६ ए ३ विकल्पे थइने मांगा १०२४ वेद वेद स्त्रीवेद योग योग योग १० ३३ २२ एक रूप काढीए १ युगल २ युगल २ ३ १ | २० २ ४ ४ ४४ युगल कपाय कपाय १७६ कपाय स्त्रीवेदे २५६ २५६ ८ आठमे गुणस्थाने पूर्वनी पेठे जधन्ये बंध हेतु ५, उत्कृष्टे ७. (५-६-७.) पांच बंध हेतुना मांगा २१६ पांचमां भय नाखतां ६ हेतुना मांगा २१६॥ ४३२ पांचमां कुत्सा नांखतां ६ हेतुना मांगा २१६॥ पांचमां भय अने कुत्सा नाखतां ७ हेतुना मांगा युगल २४वेद ३-६xकषाय ४-२४xयोग ९-२१६ . , [१२] ९ नवमै गुणम्थाने एक जीवने एक ममये कपाय १, योग १, ए २ बघ हेतुं जवन्यथर्थी होय. अने उत्कृष्टथीं वेद १ सहित करीएं त्यारे ३ बंध हेतु होय. वे बंध हेतुना मांगा।४ कयायने ९ योग साथै गुणतां ३६ त्रण बंध हेतुना भांगा उपग्ना ३६.ने त्रण वेदे गुणतां १०८ १४४ १० दशमे गुणस्थाने एक समये एक जीवने संज्वलनो १ लोभ जघन्यथी अने उत्कृ- स्था नवमांथी १ योग ए वे बंध हेतु होय. अहीं ९ योगना ९ मांगा होय. ११-१२ अगीयारमा तथा वारमा गुणस्थाने ९ योग मध्येथी एक जीवने एक योग होय. नव योगना-९ भोगा होय. १३ नेरमे गुणस्थाने मात योग मध्येथी एक जीवने जघन्ये १ योग होय. माटे सात योगना ७ मांगा होय. , गुणस्थान भांगा " गुणस्थान भांगा १ मिथ्यात्व '३४७७६०० ८ अपूर्वकरण ८६४ २ मावादन ३८३०४० ९ अनिवृत्तिकरण १४४ ३मिश्र ३०२४०० १० सूक्ष्म संपराय ४ अविरति ३५२८०० ११ उपशम १६३६८० १२ क्षीममोह ६'प्रमत्त ११८४ १३ सयोगी ७अप्रमत्त १०२४ १४ अयोगी सर्व गुणस्थाने भांगानो सरवाळो ४६८२७७० अल्पवहुत्व. जीव- गुण- योग उप- लेगा १ मधी थोडा गर्भज मनुष्य २१४ १५ १२ ६ २ तेथी मानुपी संख्यावगुणी. २१४ १३ १२ ६ ३ तेथी बादर तेजस्काय पर्याप्ता असंख्यातगुणा. ४ तेथी अनुत्तर विमानवासी देवता असंख्यातगुणाः २ १११ ६ १ ५ नथी उपरना अवेयक त्रिकना देवता संख्यात्तगुणा. ६ तेथी मध्य अवेयक त्रिकना देवता संख्यातगुणा. २ ११ ९ १ ७ तेथी हेठला वैयक त्रिकना देवता संख्यातगुणा. २ ११ ९ १ ८ तेथी वारमा देवलोकना देवता संख्यातगुणा. २ ४ ११ ४ ११ ९ ५ दंगविति . ९ ७ स्थान स्थान योग २ २ ४११ ९ १ २ ४११ ९ १ २ ४११ ९ २ ४ ११ [३] ९ तेथी अग्यारमा देवलोकना देवता संख्यातगुणा. १० तेथी दशमा देवलोकना देवता संख्यातगुणा. " ... ११ तेथी नवमा देवलोकना देवता संख्यातगुणा. १२ तेथी सातमी नरकना नारकी असंख्यातगुणा. १३ तेथी छठी नरकनां नारकी असंख्यातगुणां. १४ तेथी आठमा देवलोकना देवता असंख्यातगुणा. १५ तेथीं सातमा-देवलोकना देवता असंख्यातगुणा. १६ तेथी पांचमी नरकना नारकी असंख्यातगुणा. १७ तेथी छटा देवलोकना देवता असंख्यातगुणा. १८ तेथी चोथी नरकना नारकी असंख्यातगुणा. १९ तेथी पांचमा देवलोकना देवता असंख्यातगुणा. २० तेथी त्रीजी नरकना नारकी असंख्यातगुणा. १ तेथी चोथा देवलोकना देवता असंख्यात गुणा. २२ तेथी त्रीजा देवलोकना देवता असंख्यातगुणा. २३ तेथी बीजी नरकना नारकी असंख्यातगुणा. २४ तेथी संमूर्छिम मनुष्य असंख्यातगुणा." २५ तेथी वीजा देवलोकना देवता असंख्यातगुणा. २६ तेथी वीजा देवलोकनी देवी संख्यातगुणी. २७ तेथी पहेला देवलोकना देवता संख्यातगुणा. २८ तेथी पहेला देवलोकनी देवी संख्यातगुणी. २९ तेथी भवनपतिना देवता असंख्यातगुणा. ३० तेथी भवनपतिनी देवी संख्यातंर्गुणी. ३१ तथी पहेली नरकना नारकी असंख्यातगुणा. ३२ तेथी खेचर पंचेद्रिय तिर्यच पुरुप असंख्यातगुणा. ३३ तेथी खेचर तिर्यचनी स्त्री संख्यातगुणी. ३४ तेथी स्थलचर सियंच पुरुप संख्यातगुणा. ३५ तेथी स्थलचर तिर्यचनी स्त्री संख्यातगुणी. ३६ तेथी जलचर-पुरुष संख्यातगुणा. ३७ तेथी जलचरनी स्त्री संख्यातगुणी. ३८ तेथी व्यंतर देवता संख्यातगुणा. ३९ तेथी व्यतरनी देवी संख्यातगुणी. २ ४११ ९ १ २ ४११ ९ १ २ ४ ११ ९ १ २ ४ ११ ९ १ २ २ ४११ ९ १ २ ४११ ९ १ २ ४११ ९ २ ४११ ४ ११ ११ २ ४११ ९ १ ४ ११ ९ २ ४ ११ ९, ४ २ ४ ११ ९ ४ २ ४११ ९ १ २ ५१३ ९ ६ २ ५१३ ९६ २ १३ २ ५१३ ९६ २ ५ १३ ५ १३ ९ ६ २४११ ९.४ २४ ११ ९ ४ २ ४११ ९ १ २ ४११ ९ १ ४ ५ १३ ९ ६ २ १४ १५ १२ ६ २ २ १ २ २ १ ३ २ २ ५ ३ [५४] ४० तेथी ज्योतिपी देवता संख्यातगुणा. ४१ तेथी ज्योतिषीनी देवी संख्यातगुणी. ४२ तेथी खेचर तिथंच नपुंसक संख्यातगुणा. ४३ तेथी स्थलचर तिर्यच नपुंसक संख्यातगुणा. ४४ तेथी जलचर तियच नपुंसक संख्यातगुणा. ४५ तेथी चतुरिंद्रिय पर्याता संख्यातगुणा. ४६ तेथी पंचेंद्रिय पर्याप्ता विशेषाधिक. ४७ तेथी द्वींद्रिय पर्याप्सा विशेषाधिक. ४८ तेथी त्रींद्रिय पर्याप्ता विशेषाधिक. ४९ तेथी पंचंद्रिय अपर्याप्सा असंख्यातगुणा. ५० तेथी चतुरिद्रिय अपर्याप्ता विशेषाधिक. ५१ तेथी त्रींद्रिय अपर्याप्त विशेषाधिक. ५२ तेथी दींद्रिय अपर्याप्सा विशेषाधिक. ५३ तेथी प्रत्येकवनस्पतिकाय पर्याप्ता असंख्यातगुणा. ५४ तेथी बादर निगोद शरीर पर्याप्ता असंख्यातगुणा, ५५ तेथी बादर पृथ्वीकाय पर्याप्ता असंख्यातगुणा. ५६ तेथी बादर अपकाय पर्याशा असंख्यातगुणा. ५७ तेथी बादर वायुकायिक पर्याशा असंख्यातगुणा. ५८ तेथी बादर तेजस्कायिक अपर्यामा असंख्यातगुणा. ५९ तेथी प्रत्येक वनस्पतिकायिक अपर्याशा असंख्यातगुणा. ६० तेथी बादर निगोद शरीर अपर्याप्ता असख्यातगुणा. ६१ तेथी बादर पृथ्वीकायिक अपर्याप्ता असंख्यातगुणा. ६२ तेथी बादर अपकायिक अपर्याप्ता असंख्यातगुणा. ६३ तेथी बादर वायुकायिक अपर्याप्सा असंख्यातगुणा. ६४ तेथी सूक्ष्म तेजस्कायिक अपय मा असंख्यातगुणा. ६५ तेथी सूक्ष्म पृथ्वीकायिक अपर्याप्सा विशेषाधिक. ६६ तेथी सूक्ष्म अपकायिक अपर्याप्ता विशेपाधिक. ६७ तेथी सूक्ष्म वायुकायिक अपर्याप्ता विशेषाधिक. ६८ तेथी सूक्ष्म तेजस्कायिक पर्याप्ता संख्यातगुणा. ६९ तेथी सूक्ष्म पृथ्वीकायिक पर्याप्ता विशेषाधिक. ७० तेथी सूक्ष्म अप्कायिक पर्याप्सा विशेषाधिक. १ १ १ २ ३ ३ २ ३ ४ १ २ ३ ३ १ २ ३ mmm.w m mm ur ur. १४ ११३ . ૨ ६ १२ १४ १५ १२ ६ १ १ २ ३ ३ १ ३ ३ ७१ तेथी सूक्ष्म वायुकायिक पर्याप्ता विशेषाधिक. ७२ तेथी सूक्ष्म निगोद शरीर अपर्याशा असंख्यातगुणा. ७३ तेथी सूक्ष्म निगोद शरीर पर्याप्त संख्यातगुणा. ७४ तेथी अभव्य जीव अनंतगुणा. ७५ तेथी प्रतिपाति जीव अनंतगुणा. ७६ तेथी सिद्ध भगवान अनंतगुणा. ७७ तेथी बादर वनस्पतिकायिक पर्यासा अनंतगुणा ७८ तेथी बादर पर्याप्सा विशेषाधिक. ७९ तेथी बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्ता असंख्यातगुणा ८० तेथी चादर अपर्याप्त विशेषाधिक. ८१ तेथी वादर जीव विशेषाधिक. ८२ तेथी सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अपर्याप्ता असंख्यातगुणा. ८३ तेथी सूक्ष्म जीव अपर्याप्ता विशेषाधिक ८४ तेथी सूक्ष्म वनस्पतिकायिक पर्याप्त संख्यातगुणा ८५ तेथी सूक्ष्म जीव पर्याप्ता विशेषाधिक, ८६ तेथी सूक्ष्म जीव विशेषाधिक, ८७ तेथी भन्य जीव विशेषाधिक. ८८ तेथी निगोदना जीव विशेषाधिक. ८९ तेथी वनस्सति जीव विशेषाधिक. ९० तेथी एकेंद्रिय जीव विशेपाधिक. ९१ तेथी तिथंच जीव विशेपाधिक. ९२ तेथी मिथ्यात्वी जीव विशेषाधिक. ९३ तेथी अविरति जीव विशेषाधिक. ९४ तेथी सकपायी जीव विशेषाधिक. ९५ तेथी छमस्थ जीव विशेषाधिक. ९६ तेथी सयोगि जीव विशेषाधिक. ९७ तेथी भवस्थ जीव विशेषाधिक. ९८ तेथी सर्व जीव विशेषाधिक. ४ U १४ १ १३ : ६ १४ १३ १५ १२ ६ १४ १४ १५ १२६ १४ १४ १५ १२ ६ - . [५] चोथो कर्मग्रन्थ, भावप्रकरण. भाव पांच छ.-औपशमिकभाव, क्षायिकभाव, क्षायोपशमिकभाव, औदयिक- भाव तथा पारिणामिक भाव. १ औपशमिकभावना वे भेद छे.-औपशमिकसम्यक्त्व तथा औपशमिकचारित्र, २ क्षायिकभावना नव मेद छ.-केवलज्ञान, केवलदर्शन, भायिकसम्यक्त्व, दानलब्धि, लाभलब्धि, भोगलब्धि, उपभोगलब्धि, वीर्यलब्धि, तथा क्षायिकचारित्र.. ३ क्षायोपशमिकभावना अढार मेद छे. केवलज्ञान अने केवलदर्शन विना चार ज्ञान, त्रण अज्ञान, त्रण दर्शन, दानादिक पांच लब्धि, क्षायोपशमिकसम्यक्त्व, सर्वविरति तथा देशविरति. ४ औदयिकभावना एकवीश भेद छे.-अज्ञान, असिद्धता, असंयम, छ लेश्या, चार कषाय, चार गति, त्रण वेद, तथा मिथ्यात्व, ५ पारिणामिकभावना त्रण भेद छ.-भव्यपणं, अभव्यपणं, तथा जीवत्व. सान्निपातिकना भेद २६ नुं निवारण. द्विकसंयोगी मांगा १० त्रिकसंयोगी भांगा १० १ औपशमिक क्षायिक १ औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक २ औपशमिक मिश्र २ औपशमिक क्षायिक औदयिक ३ औपशमिक औदायक ३ औपशामिक क्षायिक पारिणामिक ४ औपशमिक पारिणामिक ४ औपशमिक मिश्र औदयिक ५ क्षायिक मिश्र ५ औपशमिक मिश्र पारिणामिक ६ क्षायिक औदयिक ६ औपशमिक औदायिक पारिणामिक ७ क्षायिक पारिणामिक ७ क्षायिक मिश्र औदायिक ८ मिश्र औदायिक ८ क्षायिक मिश्र पारिणामिक ९ मिश्र पारिणामिक ९ क्षायिक औदयिक पारिणामिक १० औदयिक पारिणामिक १० मिश्र औदयिक पारिणामिक चतुःसंयोगी भांगो ५, १ औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक- औदायिक २ औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक पारिणामिक ३ ऑपशमिक' शायिक औदायिक पारिणामिक . ४ ऑपशमिक मिश्र औदयिक .. पारिणामिक ५ क्षायिक मिश्र औदयिक पारिणामिक १ मित्र शब्दे क्षयोपशामिक भाव जागयो . .

[५७] पंचसंयोगी भांगा १. १ औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक औदयिक पारिणामिक. सांनिपातिकना भांगा ६. ७ मो क्षायिक पारिणामिक १ द्विकसंयोगी सिद्धना जीवोने होय. ९ मो क्षायिक औदयिक पारिणामिक १ त्रिकसंयोगी केवलीने होय. १. मोक्षायोपशमिक आदयिक पारिणामिक १ त्रिकसंयोगी चारे गतिना जीवने होय. ४ थो औपशमिक निश्र औदयिक पारिणामिक १ चतु:संयोगी उपशमसम्यग्दृष्टि चारे गतिना जीवने होय. ५ मो क्षायिक मिश्र औदयिक पारिणामिक १ चतुःसंयोगी क्षाधिकसम्बग्दृष्टि चारे गतिना जीवने होय. ६ छो औपशमिक क्षायिक मिश्र आदयिक पारिणामिक १ ए पंवसंयोगी मांगो उपशम श्रेणिए वर्तता क्षायिक सम्यग्दृष्टि मनुष्यने ९-१०-११ गुणस्थानके होय. मान्निपातिक भांगा ६ ना भेद १५. क्षायोपशमिक १, औदयिक २, पारिणामिक ३, ए त्रिकसंयोगे नारकीना जीव १, देव- ता २, तिथंच १, मनुष्य ४, ए त्रिकसंयोगी भांगा ४. हवे चार भावने संयोगे ४ मांगा कहे छ.- शायिक सम्यक्त्व १, मिश्र २, आढयिक ३, पारिणामिक ४, ए चार भाव साथे चारे गतिमा होय. सर्व मलीने ८ भेद थया. हवे औपशमिक १, मिश्र २, औदायिक ३, पारिणामिक ४, ए चार भावे चार गतिना संजी पंचेंद्रिय होय. सर्व मली १२ भांगा थया. हवे क्षायिक १, आदयिक २, पारिणामिक ३, ए त्रिक संयोगी भांगे १३-१४ मे गुण- स्थानके कवळी होय. ए १३ मो भांगो थयो. क्षायिक १, पारिणामिक २, ए द्विक संयोगी भांगे सिद्धना जीवो होय. ए १४ मो भांगो थयो. हवे औपशमिक १, मिश्र २, क्षायिक ३, औदयिक ४, पारिणामिक ५, ए पांच सयोगी मांगो उपशमश्रेणी करतां ९-१०-११ ए त्रण गुणस्थानके एक समये होय. ए १५ मो भांगो जाणवो. ॥ इति सांनिपातिकना १५ मांगा ।।

[५८] अथ चौद गुणस्थानके मुखनाव तथा उत्तरजावन विवरण. १ मिथ्यात्व गुणस्थाने. मूलभाव ३. उत्तरभाव ३४-क्षायोपशमिकना १० (लब्धि ५, अज्ञान ३, दर्शन २), औदयि- कना २१, तथा पारिणामिकना ३. सर्व मली ३४. २ सास्वादन गुणस्थाने. मूलभाव ६. उत्तरभाव ३२–क्षायोपशमिकना १० (लन्धि ५, अज्ञान ३, दर्शन २), औदायि- कना २० (मिथ्यात्व विना), पारिणामिकना २ (अमव्य विना) सर्व मली ३२. ३ मिश्र गुणस्थाने. मूलभाव ३. - उत्तरभाव ३३-क्षायोपशमिकना १२ (मिश्रज्ञान ३, दर्शन ३, लब्धि ५, मिश्र- मोहनी १), औदथिकना १९ (मिथ्यात्व तथा अज्ञानपणा विना), पारिणा- मिकना २. सर्व मली ३३. ४ अविरति गुणस्थाने. मूलभाव ५-३-४- (सर्व जीव आश्रीने ५) पृथक् जीव आश्री ३ के ४. उत्तरभाव ३५–उपशम सम्यक्त्व १, क्षायिक सम्यक्त्व १. क्षायोपशमिकना १२ (ज्ञान ३, दर्शन,३, लन्धि ५, क्षायोपशम सम्यक्त्व १), औदयिकना १९ (मिथ्यात्व तथा अज्ञान विना), पारिणामिकना २. सर्व मली ३५,३४, ३४, ३३. ५ देशविरति गुणस्थाने. मूलभाव ५-४-४-३. उत्तरभाव ३४-उपशम सम्यक्त्व १, क्षायिक सम्यक्त्व १, क्षायोपशमिकना १३ (ज्ञान ३, दर्शन ३, लन्धि ५, सम्यक्त्व १, देशविरति १), औदयिकना १७ (मिथ्यात्व, अज्ञान, देवगति अने नरकगति ए चार विना), पारिणामिकना २. सव मली ३३-३४-३३-३२. ६ प्रमच गुणस्थाने. मूलमाव ५-४-४-३. उत्तरभाव ३३-उपशम सम्यक्त्व १, क्षायिक सम्यक्त्व १, क्षायोपशमिकना १४ (अज्ञान ३, देशविरति १, ए चार विना) औदयिकना १५ (गति ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयम १, ए छ विना), पारिणामिकना २.सर्व मली ३३-३२ -३२-३१.

[५९] ७ अप्रमत्त गुणस्थाने. मूलभाव ५-४-४-३. उत्तरभाव ३०-उपशम सम्यक्त्व १, क्षायिक सम्यक्त्व १, क्षायोपशमिकना १४ (अज्ञान ३, देशविरति १, ए चार विना), औदयिकंना १२ (अज्ञान १, लेश्या ३, गति ३, मिथ्यात्व १, असंयम १, ए नव विना), पारिणामिकना २. सर्व मली ३०-२९-२९-२८. ८ आठमे गुणस्थाने. मूलभाव ५-४-४. उत्तरभाव २७-उपशम सम्यक्त्व १, क्षायिक सम्यक्त्व १, क्षायोपशमिकना १३ (अज्ञान ३, क्षायोपशम सम्यक्त्व १, देशविरति १, ए पांच विना), औदयिकना १० (गति ३, लेश्या ५, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयम १, ए अगीयार विना), पारिणामिकना २. सर्व मली २७-२६-२६. ९ नवमे गुणस्थाने. मूलभाव ५-४.' उत्तरभाव २८-उपशमना २, क्षायिकनो १, क्षायोपशमिकना १३ (अज्ञान ३, क्षायोपशमसम्यक्त्व १, देशविरति १, ए पांच विना), औदयिकना १० (मनुष्यगति १, शुक्ललेश्या १, असिद्ध १, कपाय ४, वेद ३, ए १० छे. बाकी- ना ११ नथी), पारिणामिकना २. सर्व मली २८-२७, १० दशमे गुणस्थाने. मूलभाव ५-४. उत्तरभाव २२–उपशमना २, क्षायिकनो १, क्षायोपशमिकना १३ (नवमे गुण- स्थाने कह्या ते), औदयिकना ४ (लोम १, मनुष्यगति १, असिद्ध १, शुक्ल- लेण्या १) पारिणामिकना २. सर्व मली २२-२१. ११ अगीयारमे गुणस्थाने. मूलभाव ५-४. उत्तरभाव २०-उपशमना २, क्षायिकनो १, क्षायोपशमिकना १२ (ज्ञान ४, दर्शन ३, लब्धि ५), औदयिकना ३ (मनुष्यगति १, शुक्ललेश्या १, असिद्ध १) पारिणामिकना २. सर्व मली २०-१९. (क्षायिकनी भजना). १२ बारमे गुणस्थाने. मूलभाव ४. १ जोमायिक सनकिती उपशम अनि परिवजे तो तेने ५भावज होय तेयो अहीं चार भावनो बीजो प्रकार लाभ नही, उजाभार ३०-माविकना २, औदायिकना ३ (मनुप्यगति १, असिद्ध १, शुक्ल लन्या १) शायोपणमिकना १२ (जान, दर्शन ३, लब्धि ५), पारिणामिकना २. नत्र मली ११. १३ नग्म गुणम्यान. मूलभाव ३. उत्तरभाव १३--क्षायिकना ९, आंदविकना ३ ( मनुप्यगति १, शुक्ललेन्या १, असिद१), पारिणामिकनो १. (जीवन्व) सर्व मली १३. आ गुणस्थानके आव्या पछी भन्यन्यने लेखामां गण्यु नथी. १४ चाहम गुणस्थान. मृलमान ३. उत्तरभाव १२-सायिकना ९, औदायिकना २ (मनुप्यगति १, असिद्ध १) पारिणामिझनो १(जीवत्व). मर्व मली १२. ॥ इति चौट गुणस्थानकं मूलभाव तथा उत्तरमावर्नु विवरण ।। शतकादि कर्मग्रंथ विचार. १ पुण्यप्रकृति ४२. १ मान बढनी १५ आहारकांगोपांग २९ स नामकर्म २ उन गांव १६ वर्षभनागच संघयण ३० बादर नामकर्म ३ मनुप्य गति १७ समचतुरम मंस्थान ३१ पर्याप्त नामकर्म ४ मनुष्यानुपूर्वी १८ शुम वर्ण ३२ प्रत्येक नामकर्म ५ देवगति १९ शुभ गंध ३३ स्थिर नामकर्म देवानुपूर्वी २० शुभ रम ३४ शुभ नामकर्म ७ पंचेंद्रिय जानि २१ शुभ स्पर्श ३५ सौभाग्य नामकर्म ८ औदारिक शरीर २२ अगुरुलघु नामकर्म ३६ मुखर नामकर्म ९ बकिव शरीर २३ पराघात नामकर्म ३७ आदेव नामकर्म १० आहारक नागर २४ उच्क्षम नामकर्म ३८ यशाकीर्ति नामकर्म ११ नजम शरीर २५ आतप नामकर्म ३९ देवायु १२ कामण गरीर २६ उद्यान नामकर्म १३ आदाग्मिांगोपांग २७ शुभ विहायोगति ४१ तिर्यगायु १४ वक्रियांगोपांग २८ निर्माण नामकर्म ४२ तीर्थकर नामकर्म ४० मनुप्यायु ५५ मय १ मति ज्ञानावरणी २ श्रुत ज्ञानावरणी ३ अवधि ज्ञानावरणी ४ मनःपर्यव ज्ञानावरणी ५ केवल ज्ञानावरणी ६ दानांतराय ७ लाभांतराय ८ भोगांतराय ९ उपभोगांतराय १० वीयांतराय ११ चक्षु दर्शनावरणी १२ अचक्षु दर्शनावरणी १३ अवधि दर्शनावरणी १४ केवल दर्शनावरणी १५ निद्रा १६ निद्रानिद्रा १७ प्रचला १८ प्रचलाप्रचला १९ स्त्यानदि निद्रा २० नीच गोत्र [६१] पाप प्रकृति ८२. २१ असाता वेदनी ५३ रति २२ मिथ्यात्व मोहनी ५४ अरति २३ स्थावर नामकर्म २४ सूक्ष्म नामकर्म ५६ शोक २५ अपर्याप्त नामकर्म ५७ दुगंछा २६ साधारण नामकर्म ५८ पुरुष वेद २७ अस्थिर नामकर्म ५९ स्त्री वेद २८ अशुभ नामकर्म ६० नपुंसक वेद २९ दुर्मग नामकर्म ६१ तिर्यच गति ३० दुःस्वर नामकर्म ६२ तिर्यंचानुपूर्वी ३१ अनादेय नामकर्म ६३ एकेंद्रिय जाति ३२ अयश नामकर्म ६४ द्वींद्रिय जाति ३३ नरकगति ६५ त्रींद्रिय जाति ३४ नरकानुपूर्वी ६६ चतुरिद्रिय जाति ३५ नरकायु ६७-७० अशुभ वर्णादि ४ ३६-३९ अनंतानुबंधी ४ ७१ अशुभ विहायोगति ४०-४३ अप्रत्याख्यानी ४ ७२ उपघात ४४-४७ प्रत्याख्यानी ४ ७३-७७ संघयण ५ ४८-५१ संज्वलन ४ ७८-८२ संस्थान ५ ५२ हास्य १-५ इंद्रिय ५ ६-९ कषाय ४ १०-१४ अत्रत ५ १५-१७ जोग३ १८ कायिकी क्रिया १९ अधिकरणिकी क्रिया २० प्रादेषिकी क्रिया २१ पारितापनीकी क्रिया आश्रव ४२. २२ प्राणातिपातिकी क्रिया २३ आरंभिकी क्रिया २४ पारिग्रहिकी क्रिया २५ मायाप्रत्ययिकी क्रिया २६ मिथ्यादर्शनप्रत्ययिकी क्रिया २७ अप्रत्याख्यानिकी क्रिया २८ दृष्टिकी क्रिया २९ स्पृष्टिकी क्रिया [६२] ३० प्रातीत्यकी क्रिया ३७ अनवकांक्षाप्रत्ययिकी क्रिया ३१ सामंतोपनिपातिकी क्रिया ३८ प्रायोगिकी क्रिया ३२ नशस्त्रीकी क्रिया ३९ समुदानिकी क्रिया ३३ स्वस्तिकी क्रिया ४० प्रमिकी क्रिया ३४ आनयनिकी (आज्ञागनिकी) क्रिया ४१ पिकी क्रिया ३५ विंदारणिकी क्रिया ४२ इपिथिकी क्रिया ३६ अनाभोगिकी क्रिया संवर तत्वना ५७ भेद, १-५ ममिति ५ २४ रोग परिपह ४१ अनित्य भावना ६-८ गुप्ति ३ २५ तृणस्पर्श परिपह ४२ अगरण भावना ९ क्षुधा परिपह २६ मल परिपह ४३ संमार भावना १० पिपासा परिपह २७ सत्कार परिपह ४४ एकत्व भावना ११ शीत परिपह २८ प्रजा परिपह ४५ अन्यत्व भावना १२ उष्ण परिपह २९ अजान परिपह ४६ अशुचित्व भावना १३ दंश परिषह ३० सम्यक्त्व परिपह ४७ आश्रय भावना १४ अचेलक परिपह ३१ क्षमा धर्म ४८ संवर भावना १५ अरति परिपह ३२ मार्दव धर्म ४९ निर्जरा भावना १६ स्त्री परिपह ३३ आर्जव धर्म ५० लोकस्वभाव भावना १७ चा परिपह ३४ मुक्ति धर्म ५१ वोधिचीज भावना १८ निपद्या परिपह ३५ तप धर्म ५२ धर्म भावना १९ शय्या परिपह ३६ संयम धर्म ५३ सामायिक चारित्र २० आक्रोश परिपह ३७ सत्य धर्म ५४ छेदोपस्थापनीय चारित्र २१ वध परिपह ३८ शौच धर्म ५५ परिहारविशुद्धि चारित्र २२ याचना परिपह ३९ आकिंचन्य धर्म ५६ सूक्ष्मसंपराय चारित्र २३ अलाभ परिपह ४० ब्रह्मचर्य धर्म ५७ यथाख्यात चारित्र ध्रुव बंधी ४७. १-४ वर्ण चतुष्क ४ ९ उपघात नाम १३-२८ कपाय १६ ५-६ तेजस नाम कार्मण नाम १० भय मोहनी २९-३३ ज्ञानावरणीय ५ ७ अगुरुलघु नाम ११ कुत्सा मोहनी ३४-४२ दर्शनावरणीय ९ ८ निर्माण नाम १२:मिथ्यात्व मोहनी ४३-४७ अंतराय ५ ६ अशुभ नामकर्म अधुव बंधी ७३. १-३ शरीर ३ ३०-३३ आनुपूर्वी ४ ४९-५८ स्थावर दशक १० ४-६ उपांग ३ ३४ जिन नाम ५९-६० गोत्र २ ७-१२ संघयण ६ ३५ उच्वास नाम ६१-६२ वेदनी २ १३-१८ संस्थान ६ ३६ उद्योत नाम ६३-६६ हास्यादि युगल २ नी । १९-२३ जाति ५ ३७ आतप नाम ६७-६९ वेद ३ २४-२७ गति ४ ३८ पराघात नाम ७०-७३ आयु४ २८-२९ विहायोगति २ ३९-४८ स दशक १० ध्रुवोदयी २७. १ निर्माण नामकर्म ५ शुभ नामकर्म १३-१७ ज्ञानावरणीय ५ २ स्थिर नामकर्म १८-२२ अंतराय ५ ३ अस्थिर नामकर्म ७-८ तैजस कार्मण नामकर्म २३-२६ दर्शनावरणीय ४ ४ अगुरुलघु नामकर्म ९-१२ वर्णादिक ४ २७ मिथ्यात्व मोहनी अध्रुवोदयी ९५. १-३ शरीर ३ ३६ उद्योत नाम ६१-६२ शोक अरति २ ५-६ उपांग ३ ३७ आतप नाम ६३-६५ वेद ३ ७-१२ संघयण ६ ३८ पराघात नाम ६६-६९ आयु४ १३-१८ संस्थान ६ ३९-४२ त्रसचतुष्क ४ ७०-८५ कपाय १६ १९-२३ जाति ५ ४३-४६ सुभग चतुष्क ४ ८६-८७ भय तथा कुत्सा २४-२७ गति ४ ४७-५० स्थावर चतुष्क ४ ८८-९२ निद्रा ५ २८-२९ विहायोगति द्विक ५१-५४ दुर्मग चतुष्क ४ ९३ उपघात नम ३०-३३ अनुपूर्वी ४ ५५-५६ गोत्रद्विक २ ९४ मिश्र मोहनी ३४ जिन नाम ५७-५८ वेदनीय द्विक २ ९५ समकित मोहनी ३५ उच्चास नाम ५९-६० हास्य रति २ ध्रुव सत्ता १३० १-१० त्रस १० ४१ तैजस शरीर नाम ४७ तेजस कार्मण बंधन ११-२० स्थावर १० ४२ कार्मण शरीर नाम ४८-६३ कपाय १६ २१-२५ वर्ण ५ ४३ तैजस संघात नाम ६४ भय २६-२७ गंध २ ४४ कार्मण संघात नाम ६५ कुत्सा २८-३२ रस ५ ४५ तैजस तैजस बंधन ६६ मिथ्यात्व मोहनी ३३-४० स्पर्श ४६ कार्मण कार्मण बंधन ६७-७१ ज्ञानावरणीय [६५] ७२-८० दर्शनावरणीय ९ १०९-११० वेदनी २ १२२ उच्छाम नाम ८१-८५ अंतराय ५ १११-११४ चे युगलनी ४ १२३ उद्योत नाम ८६ निर्माण नाम ११५ औदारिक शरीर १२४ आतप नाम ८७उपधात नाम ११६ औदारिक अंगोपांग १२५ परावात नाम ८८ अगुरूलघु नाम ११७ औदारिक संघातन १२६-१२७ विहायोगति- ८९-९१ वेद ३ ११८ औदारिक आदारिक बंधन द्विकनी २ ९२-९७ संघयण ६ ११९ आदारिक तजस बंधन १२८-१२९ तिर्थचद्धिक ९८-१०३ संस्थान ६ १२० आदारिक कार्मण बंधन १३० नीच गोत्र १०४-१०८ जाति ५ १२१ औदारिक तजस कार्मण बंधन अध्रुव सत्ता २८. १ सम्यक्त्व मोहनी १० वक्रिय कार्मण बंधन २१ आहारक शरीर २ मिश्र मोहनी ११ वैक्रिय तेजस कार्मण बंधन २२ आहारक अंगोपांग ३-४ मनुष्य द्विक १२ देवगति २३ आहारक संवातन ५ वैक्रिय शरीर १३ देवानुपूर्वी २४ आहारक आहारक बंधन ६ वैक्रिय अंगोपांग १४ नरकगति २५ आहारक तेजस बंधन ७ वैक्रिय संघातन १५ नरकानुपूर्वी २६ आहारक कार्मण बंधन ८ वैक्रिय वैक्रिय बंधन १६ जिननाम २७ आहारककामणतजसबंधन ९ वैक्रिय तेजस बंधन १७-२० आयु ४ २८ उन गोत्र सर्व घाती २०. १ केवळ ज्ञानावरणीय २ केवळ दर्शनावरणीय ३-७ निद्रा ५ ८-१९ प्रथम कपाय १२ २० मिथ्याल देश घाती २५ ८-११ संज्वलन कपाय ४ १-४ ज्ञानावरणीय ४ ५-७ दर्शनावरणीय ३ १२-२० नोकपाय ९ २१-२५ अंतराय ५ अघाती ७५. १-८प्रत्येक प्रकृति ८ ९-१३ शरीर ५ १५-१६ अंगोपांग ३ १७-२२ संघयण ६ २३-२८ संस्थान ६ २९-३३ जाति ५ ३४-३७ गति ४ ३८-३९ विहायोगति २ ४०-४३ अनुपूर्वी ४ ४४-४७ आयु ४ ४८-५७स दशक ५८-६७ स्थावर दशक ६८-६९ गोत्र २ ७०-७१ वेदनी-२ ७२-७५ वर्णादि ४ . . १-३ वेद ३ ४-७ वे युगलनी ४ ८-२३ कपाय १६ २४-२५ उद्योत, आतप २६-२७ गोत्रकर्मनी २ २८-२९ वेदनी २ परावर्तमान ९१. ३०-३४ निद्रा ५ ३५-४४ त्रस १० ४५-५४ स्थावर १० ५५-५८ आयु ४ ५९-६१ शरीर ३ ६२-६४ अंगोपांग ३ अपरावर्तमान २९. ९ अगुरुलघु नाम १०-१४ ज्ञानावरणीर्य ५ १५-१८ दर्शनावरणीय ४ १९-२३ अंतराय ५ २४ पराघात नाम ६५-७० संस्थान ६ ७१-७६ संघयण ६ ७७-८१ जाति ५ ८२-८५ गति ४ ८६-८७ विहायोगति २ ८८-९१ आनुपूर्वी ४ - १-४ वर्णादि ४ ५ तैजस शरीर ६ कार्मण शरीर ७ निर्माण नाम ८उपघात नाम २५ भय मोहनी २६ कुत्सा मोहनी २७ मिथ्यात्व मोहनी २८ उच्चस नाम २९ तीर्थकर नाम क्षेत्रविपाकी ४. ४ चार अनुपूर्वीनो उदय. भव विपाकी ४. ४ आयु ४ नो उदय. जीव विपाको ७८ उदय. १-५ ज्ञानावरणीय ५ ५०-५१ वेदनी २ .६३-६६ दुर्भग चतुष्कनी हैं ६-१४ दर्शनावरणीय ९ ५२ तीर्थकर नाम ६७-७१ जाति ५. १५-४२ मोहनी २८ ५३-५५ स-चादर-पर्यास ३ ७२-७५ गति ४ ४३-४७ अंतराय ५. ५६-५८स्थावर-सूक्ष्म-अपर्याप्त ३ ७६-७७ विहायोगति ४८-४९ गोत्र २ ५९-६२ सुभग चतुष्कनी ४ ७८ श्वासोच्छवास पुद्गल विपाकी ३६ उदय. १-४ वर्णादि ४ १०-११ तेजस कार्मग ३१ उपधात नाम ५ निर्माण नाम १२ अगुरुलघु नाम ३२ साधारण नाम ६ स्थिर नाम १३-१५ शरीर ३ ३३ प्रत्येक नाम ७ अस्थिर नाम १६-१८ अंगोपांग ३ ३४ उद्योज नाम ८शुभ नाम १९-२४ संघचण ६ ३५ आतप नाम ९ अशुभ नाम २५-३० संस्थान ६ ३६ पराधात नाम बंध हेतु ५७. (मिथ्यात्व ५) ( अविरति १२) २९ प्रत्याख्यानी ४ १ आभिग्रहिक मिथ्यात्व १० इंद्रियनी अविति ५ ३३ संज्वलनी ४ २ अनभिग्रहिक मिथ्यात्व १६ कायनी अविति ६ ४२ नोकपाय ९ ३ आभिनिवेशिक मिथ्यात्व १७ मननी अविरति? (योग १५) ४ सांशयिक मिथ्यात्व (कपाय २५) ४६ मनना योग ४ ५ अनाभोग मिथ्यात्व २१ अनंतानुबंधी ४ ५० वचनना योग ४ २५ अप्रत्याख्यानी ५७ कायना योग ७ सर्व घाती बंध प्रकृति २० ४ विवरण. २५ नरकगतिनी मार्गणाथी मांडीने पचीशमी लोभ मार्गणा सुधी २० नो बंध जाणवो. २८ मति, श्रुत अने अवधि ए त्रण ज्ञाननी मार्गणाए स्त्यानाद्धत्रिक ३, प्रथमना क- पाय ४. मिथ्यात्व मोहनी १, ए ८ विना १२ नो बंध जागवो. २९ मनःपर्यव ज्ञाननी मार्गणाए आदिना कपाय १२, मिथ्यात्व १, स्त्यानद्धित्रिक ३, ए १६ विना ४ नो बंध. ३० केवळ ज्ञाननी मार्गणाए बंध नथी. ३३ मति, श्रुत अने विमंग ए त्रण अज्ञाननी मार्गणाए बंध २० नो जाणवो. ३६ सामायिक, छेदोपस्थापनीय अने परिहारविशुद्धिनी मार्गणाए मनःपर्यव ज्ञाननी पेठे १६ विना ४ नो बंध. ३७ सूक्ष्मसंपराय मार्गणाए केवळ ज्ञानावरण १, केवळ दर्शनावरण १, ए २ नो बंध. ३८ यथाख्यात मार्गणाए बंध नथी. ३९ देशविरतिनी मार्गणाए पहेला तथा वीजा कपाय ८, स्त्यानद्धि त्रिक ३, मिथ्यात्व १, ए १२ विना ८ नो बंध.

[६७]
४२ अविरति, चक्षु अने अचक्षुदर्शननी मार्गणाए २० नो बंध.
४३ अवधि दर्शन मार्गणाए अवधि ज्ञाननी पेठे १२.
४४ केवळ दर्शननी मार्गणाए ..
५२ कृष्ण, नील, कापोत, तेजो, पद्म अने शुक्ल ए छ लेश्या तथा भवी अने अभवी
ए ८ मार्गणाए २० नो बंध.
५६ उपशम, वायक, भायोपशमिक अने मिश्रनी मार्गणाए मतिज्ञाननी पेठे ८ विना १२.
५७ सास्वादन मार्गगाए मिथ्यात्व विना १९ नो बंध.
६२ मिथ्यात्व, संज्ञी, असंज्ञी, आहारी अने अनाहारी मार्गणाए २० नो बंध.
देश घाती प्रकृति बंध २५ नुं विवरण.
२५ नरक गधिनी मार्गणाथी मांडीने पचीशमी लोम मार्गणा सुधी २५ नो बंध होय.
२९ मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि ज्ञान अने मनःपर्यव ज्ञाननी मार्गणाए स्त्रीवेद १,
नपुंसक वेद १, ए २ विना २३.
३० केवळ ज्ञाननी मार्गणाए बंध ..
३३ मति, श्रुत अने विभंग अज्ञाननी मार्गणाए २५.
३६ सामायिक, छेदोपस्थापनीय अने परिहारविशुद्धिनी मार्गणाए स्त्रीवेद १, नपुंसकवेद
१, ए २ विना २३.
३७ सूक्ष्मसंपराय मार्गणाए संज्वलन कपाय ४, नोकपाय ९, ए १३ विना १२.
३८ यथाख्यात चारित्र मार्गणाए ..
३९ देशविरति मार्गणाए स्त्रीवेद १, नपुंसक वेद १, ए २ विना २३.
४२ अविरति, चक्षु दर्शन अने अचक्षु दर्शननी मार्गणाए २५.
४३ अवधि दर्शननी मार्गणाए अवधिज्ञाननी पेठे २३.
४४ केवळ दर्शननी मार्गणाए .
५२ कृष्ण, नील, कापोत, तेजो, पद्म, शुक्ल ए ६ लेश्या तथा भव्य अने अभव्य ए.
मार्गणाए २५.
५६ उपशम, क्षायक, क्षायोपशमिक समकित अने मिश्रनी मार्गणाए स्त्रीवेद १, नपुं-
सक वेद १, ए वे विना २३.
५७ सास्वादन मार्गणाए नपुंसक वेद विना २४.
६२ मिथ्यात्व, संज्ञी, असंज्ञी, आहारी, अनाहारी मार्गणाए २५,

१ [६८] अघाती वंध ७५ नुं विवरण. १ नरक गतिनी मार्गणाए देव त्रिकं ३, नरक ३, वैक्रिय द्विक २, सूक्ष्म त्रिक ३, जाति ४, स्थावर १, आतप १, आहारक द्विक २, ए १९ विना ५६ नो वंध होय. २ देव गतिनी मार्गणाए देवत्रिक ३, नरकत्रिक ३, बैंक्रिय द्विक २, आहारक द्विक २, सूक्ष्म त्रिक ३, विकल त्रिक ३, ए १६ विना ५९. ३ मनुष्य गतिनी मार्गणाए ७५. ४ तिर्यच गतिनी मागणाए जिननाम १, आहारक द्विक २, ए ३ विना ७२. ८ एजेंद्रिय, डीद्रिय. त्रिद्रीन अने चतुर्गिद्रियनी मार्गणाए देवत्रिक ३, नरकत्रिक ३, बैंक्रिय हिक २, आहारक द्विक २, जिननाम १, ए ११ विना ६४. ९पंचेद्रियनी मार्गगाए ७५. ११ पृीकाय अने अपकायनी मार्गगाए एद्रियाटिकनी पेठे ११ विना ६४. १३ तेजस्काय अने वायुकायनी मार्गणाए एकेद्रियनी मार्गणानी ११, मनुप्यत्रिक ३, उच्च गोत्र १, ए १५ विना ६०, १४ वनस्पति कायनी मार्गणाए पूर्वोक्त ११ विना ६४. २५ चमकाय, मन, वचन, काया, पुरुष वेद, स्त्री वेद, नपुंसक वेट, क्रोध, मान, माया अने लोभनी मागणाए ७५. २८ मतिबान, श्रुतज्ञान अने अवधिज्ञाननी मार्गणाए नीच गोत्र १, तिर्यंच त्रिक ३, नरकत्रिक ३, जाति ४, स्थावर ४, पहेला विना मंघयण ५, पहेला विना संस्थान ५, आतप १, उद्योत १, अशुभ विहायोगति १, दुर्मग त्रिक ३, ए ३१ विना ४४. २९ मनःपर्यव ज्ञाननी मार्गणाए मतिज्ञाननी मार्गणाना ३१, वज्रर्यभनाराच संवयण १, मनुष्य त्रिक ३, औदारिक द्विक २, ए ३७ विना ३८. ३० केवळज्ञाननी मार्गणाए १ साता वेदनी. ३३ मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान अने विमंग ज्ञाननी मार्गणाए जिन नाम १, आहारक द्विक २, ए ३ विजा ७२. ३६ सामायिक, छैदोपस्थापनीय अने परिहारविशुद्धिनी मार्गणाए मनःपर्यव ज्ञाननी पेठे ३७ विना ३८. ३७ सूक्ष्मसंपराय मार्गणाए जिननाम १, उच्च गोत्र १, सातावेदनी १, ए ३ प्रकृतिज बांधे ३८ यथाख्यात चारित्रनी मार्गणाए १ सातावेदनीज बांधे. ३९ देशविरति मार्गणाए मनःपर्यव ज्ञाननी ३७, आहारक द्विक २, ए ३९ विना ३६, .

[६९] ४० अविरति मार्गणाए आहारक कि विना ७३. ४२ चक्षुदर्शन नथा अचक्षुदर्शननी मार्गणाए ७५. ४३ अवधिदर्शननी मागणाए अवधिज्ञाननी पेठे ४४. ४४ केवळदर्शननी मागणाए १ सातावेदनी. ४७ कृष्ण, नील, कापोत, ए ३ लेश्यानी मार्गणाए आहारक द्विक विना ७३, ४८ तेजो लेश्यानी मागणाए नरक त्रिक ३, सूक्ष्मत्रिक ३, विकलेंद्रिय ३, ए ९ विना ६६. ४९ पद्म लेग्यानी मार्गणाए तेजो लेश्यानी ९, एकेद्रिय १, आतप १, स्थावर १, ए १२ विना ६३. ५० शुक्ल लेग्यानी मार्गणाए पूर्वोक्त १२, तिर्यचत्रिक ३, उद्योत १, ए १६ विना ५९. ५१ भव्यनी मार्गणाए ७५. ५२ अभव्यनी मार्गणाए आहारकद्विक २, जिननाम १, ए ३ विना ७२. ५४ क्षायिक अने क्षायोपशमिक मार्गणाए मतिज्ञान प्रमाणे ३१ विना ४४. ५५ उपशम समकित मार्गणाए मतिज्ञानप्रमाणे ३१ तथा आहारक द्विक ए ३३ विना ४२. ५६ मिश्र मागणाए मतिज्ञाननी मार्गणानी ३१, मनुजायु १, देवायु १, जिननाम १, आहारकद्विक २, ए ३६ विना ३९. ५७ सासादन मार्गणाए नरकत्रिक ३, जाति ४, स्थावर ४, हुंडक संस्थान १, छेवटुं संघयण १, आतप १, आहारकद्विक २, जिननाम १, ए १७ विना ५८. ५८ मिथ्यात्व मागणाए जिननाम १, आहारकद्विक २, ए ३ विना ७२. ५९ सजी मार्गणाए ७५. ६० असंजी मार्गणाए आहारकद्विक २, जिननाम १, ए ३ विना ७२. ६१ आहारकनी मार्गणाए ७५. ६२ अनाहारकनी मार्गणाए आयु ४, आहारकद्विक २, नरकद्विक २, ए ८ विना ६७. क्षेत्रविपाकी ४ अनुपूर्वीनो उदय. १ नरक गतिनी मार्गणाए नरकनी अनुपूर्वी १. २ देव गतिए देवतानी अनुपूर्वी १. ३ मनुष्य गतिए मनुष्यनी अनुपूर्वी १. ४ तिथंच गतिए तिथंचनी अनुपूर्वी १. ८ एकेंद्रिय, वींद्रिय, त्रींद्रिय अने चतुरिद्रियने तिर्यचनी अनुपूर्वी १. ९ पंचेंद्रियने चारे गतिनी अनुपूर्वी ४. १४ पृथ्वी, अप, तेजो, वायु अने वनस्पतिने तिर्यचनी अनुपूर्वी १. .

. [७० १६ त्रसकाय नथा काययोगने चारे गतिनी अनुपूर्वी ४. १८ पुरुषवेद अने खीवेदने नरकनी अनुपूर्वी विना ३. १९ नपुंसकवेदने देवतानी अनुपूर्वी विना ३. २५ क्रोध, मान, माया, लोभ, मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानने चारे गतिनी अनुपूर्वी ४. २६ अवधिज्ञानने पण वारे गतिनी अनुपूर्वी ४. परंतु सिरंचनी न होय तो ३. २८ मतिअज्ञान तथा श्रुतअज्ञानने चारे गतिनी अनुपूर्वी ४. २९ विमंग ज्ञानने पण ४. विशेष एटलो के मनुष्य अने तिर्यचनी अनुपूर्वी न होय तो २. ३० अविरतिने पण ४. ३१ अवक्षु दर्शनने ४. ३२ अवधि दर्शनने ३ अथवा ४. ३५ कृष्ण, नील अने कापोत लेश्यावंतने ४. ३८ तेजो, पद्म अने शुक्ल लेश्यावंतने नरकनी अनुपूर्वी विना ३. ४० मध्य तथा अभव्यने ४. ४१ उपशम समकितने उपशम श्रेणीना मरीने देवगतिमां जाय त्यारे १ देवगतिनी अनु- पूर्वी होय अथवा न होय. ४३ थायिक अने क्षयोपशमने ४. ४४ सास्वादनने नरकनी अनुपूर्वी विना ३. ४६ मिथ्यात्वीने तथा सजीने ४. ४७ असंज्ञीने देव अने नारकीनी बे अनुपूर्वी विना २. ४८ अनाहारीने ४. ६२ मनयोग, वचनयोग, मनःपर्यवज्ञान, केवळज्ञान, सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परि- हारविशुद्धि, सूक्ष्मसंपराय, यथाख्यात, देशविरति, चक्षुदर्शन, केवळदर्शन, मिश्र, अने आहारी आ १४ मार्गणाए अनुपूर्वी न होय. भवविपाकी आयुष्य ४ नो उदय. ४ चारे गतिमा पोत पोतार्नु आयु होय. ८ एकेद्रिय, द्वींद्रिय, त्रींद्रिय अने चतुरिट्रियने १ तिर्यंचर्नु आयु. ९ पंचेंद्रियने चारे गतिर्नु आयु ४. १४ पृथ्वी, अप, तेज, वायु अने वनस्पतिने तिर्यंचायु १. १८ त्रसकाय, मनयोग, वचनयोग अने काययोगने आयु ४. २० पुरुपवेद अने स्त्रीवेदने नरकायु विना ३.

[७१] २१ नपुंसकवेदने देवायु विना ३. २८ क्रोध, मान, माया, लोभ, मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञानने ४. ३० मनःपर्यव अने केवळज्ञानने मनुजायु १. ३३ मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान अने विभंगज्ञानने आयु ४. ३८ सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसंपराय अने यथाख्यातने मनुजायु १, ३९ देशविरतिने मनुष्य तथा तिर्यचर्नु आयु २. ४३ अविरति, चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन अने अवधिदर्शनने आयु ४. ४४ केवळदर्शनने मनुष्यायु १. ४७ कृष्ण, नील अने कापोत लेश्यावंतने आयु ४. ५० तेजो, पद्म अने शुक्ल लेश्यावंतने नरकायु विना ३. ५९ भव्य, अभव्य, छए समकित, तथा संज्ञीने आयु ४. ६० असंज्ञीने मनुष्य तथा तिर्यंचनुं आयु २. ६२ आहारी तथा अनाहारीने चारे गतिनुं आयु ४. जीवविपाकी ७८ नो उदय. १ नरकगति-उच्चगोत्र १, स्त्रीवेद १, पुरुपवेद १, गति ३, जाति ४, जिननाम १, सुभग चतुष्क ४, स्थावर ३, शुभ विहायोगति १, ए १९ विना ५९. अने जो स्त्यानदिनु त्रिक ३ काढीए तो ५६. २ देवगति-नीच गोत्र १, नपुंसकवेद १, जाति ४, गति ३, अशुभ विहायोगति १, जिननाम १, स्थावर त्रिक ३, दुःखर १, ए १५ विना ६३. अथवा स्त्या- नर्द्धि त्रिक काढीए त्यारे ६०. ३ मनुष्य गति-जाति ४, गति, ३, स्थावर १, सूक्ष्म १, ए ९ विना ६९. ४ तिर्यंच गति-उच्च गोत्र १, जिननाम १, गति ३, ए ५ विना ७३. ५ एकेंद्रिय-उच्च गोत्र १, स्त्रीवेद १, पुरुपवेद १, जाति ४, गति ३, विहायोगति २, जिननाम १, त्रस १, सुस्वर १, दुःस्वर १, समकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, सुभग १, आदेय १, ए २० विना ५८. ८ वींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिंद्रिय-उच्च गोत्र १, स्त्रीवेद १, पुरुप वेद १, जाति ४, गति ३, शुभ विहायोगति १, स्थावर १, सूक्ष्म १, सुभग १, आदेय १, समकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, जिन नाम १, ए १८ विना ६०, ९ पंचेंद्रिय-जाति ४, स्थावर १, सूक्ष्म १. ए ६ विना ७२, [७२] ११ पृथ्वीकाय, अपकाय-एकदियनी पेठे २० विना ५८. १३ तेजस्काय. वायुकाय-एकेंद्रिय मार्गणानी १०, यश १, ए २१ विना ५७. १४ वनस्पतिकाय-एदेद्रिय प्रमाण २० विना ५८. १५ सकाय-स्थावर १, सूक्ष्म २, एकद्रिय १. ए ३ विना ७५. १६ मनयोग स्थावर ३, जाति ४, ए७ विना ७१. १७ ववनयोग स्थावर ३, एकद्रिय १, ए ४ विना ७४, १८ काययोग-७८. १९ पुरुषवेद-बीवेद १. नपुंसकवेद १. जाति ४, गति १, स्थावर १, मूक्ष्म १, जिन- नाम १, ए.बिना ६८. २० स्त्रीवेद-पुम्पवेद १, नपुंसक वेद १. जाति, विगैरे उपर प्रमाणे १० विना ६८ २१ नपुंसकवेद-जिननाम १, पुरुषवेद १, स्त्रीवेद १, देवगति १. ए ४ विना ७४. २२ क्रोध-मान ४, माया ४. लांम ४, जिननाम १, ए १३ विना ६५. २३ मान-क्रोध ४, माया ४. लांम, जिननाम १. ए १३ विना ६५. २४ माया-क्रोध ४, मान ४, लोम ४. जिननाम १, ए १३ विना ६५. २५ लोभ-क्रोष ४, मान ४, माया ४, निनाम १, ए १३ विना ६५. २८ मतिज्ञान. श्रुतज्ञान, अवधिनान-स्थावर ३. जाति ४.जिननाम १, मिथ्यात १, मिश्र १, अनंतानुबंधी ४, ए १४ विना ६४. २९-मनापरवज्ञान-पहला, वीजा अने श्रीजा कपायनी चोकहीनी १२, जाति ४, स्थावर १, सूक्ष्म १. जिननाम १, मम्यक्त्व मोहनी , मिश्र मोहनी १. अपर्याप्त १. मिथ्यात्व १. दुर्भग १, अनाय १, अपश १. नीच गोत्र १, देवगति १, नरकगति १. ए २९ विना ४९. ३० केवळजान-मनुप्यगति , चंद्रिय जाति १, म द्विक ३, देदनीयहिक २, वि- हायोगतिहिक २. उच्च गोत्र १, यश १, आदेय १, सुभग १, सुस्वर १, जिन नाम १, उच्चाम १. दुःस्वर १, आ १७ होय. ३२ मतिअज्ञान. श्रुतअज्ञान-जिननाम १, समकित लोहनी १, मिश्र मोहनी १, एं ३विना ७५. ३३ विभंगजान स्थावर ३, जाति ४, जिननाम १, ममक्ति मोहली १.ए ९ विना ६९. ३५ सामायिक, छदोपस्थापनीय-मनःपर्यव नाननी मार्गणा प्रमाणे २९ विना ४९. ३६ परिहारविशुद्धि-मनःपर्यव जाननी २९, सीवेट १, ए ३० विना ४८. ३७ वक्ष्मसंपराय-जाति ४, गति ३, स्थावर १. सूक्ष्म १, जिननाम १, सम्यक्त्वे मोहनी १, मिश्र नोहनी १, मिथ्यात १, पहला वीजा वीजा कपायनी १२ संज्वलन ३. दुभंग १, अनादेय १, अयश १, नीच गोत्र १,.स्त्यानार्दै त्रिक ३, हास्यादि ६. वेद ३, अपयाप्त १, ए ४५.विना.३३..

[७३] ३८ यथाख्यात-सूक्ष्मसंपरावनी ४५ मां संज्वलन लोम उमेरी जिननाम रहित कर- वाथी ४५ विना ३३. ३९ देशविरति-पहेला वीजा कषायनी ८, मिश्र मोहनी १, मिथ्यात्व १, स्थावर १, सूक्ष्म १, जिननाम १, अपर्याप्त १. दुर्भग १, अनादेय १, अयश १, गति २, जाति ४, ए २३ विना ५५. ४० अविरति-जिननाम १ विना ७७. ४१ चक्षुदर्शन-जाति ३, स्थावर त्रिक ३, जिननाम १, ए ७ विना ७१. ४२ अचक्षुदर्शन-जिननाम १ विना ७७. ४३ अवधिदर्शन-अवधिज्ञाननी मार्गणा प्रमाणे १४ विना ६४. ४४ केवळदर्शन-केवळज्ञाननी मार्गणा प्रमाणे १७. ४७ कृष्ण, नील, कापोत-जिननाम १ विना ७७. ४८ तेजोलेश्या सूक्ष्म द्विक २, जाति ३, नरकगति १, जिन १, ए ७ विना ७१. ४९ पालेश्या स्थावर त्रिक ३, जाति ४, नरकगति १, जिन १, ए ९ विना ६९, ५० शुक्ललेश्या-स्थावर त्रिक ३, जाति ४, नरकगति १, ए८ विना ७०, ५१ भव्य-७८, ५२ अभव्य-समकिंत मोहनी १, मिश्र मोहनी १, जिननाम १, ए ३ विना ७५. ५३ उपशम-स्थावर त्रिक ३, जाति ४, अनंतानुबंधी ४, समकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, जिननाम १, मिथ्यात्व १, ए १५ विना ६३. ५४ क्षायिक जाति ४, स्थावर ३, समकित मोहनी १, मिश्र १, मिथ्यात्व १, अनं- तानुबंधी ४, ए १४ विना ६४. ५५ क्षयोपशम-जाति ४, स्थावर ३, मिथ्यात्व १, मिश्र १, जिन १, अनंतानुबंधी ४, ए १४ विना ६४. ५६ मिश्र--जांति ४, स्थावर ३, समकितमोहनी १, मिथ्यात्व १, जिननाम १, अनं- तानुबंधी ४, ए १४ विना ६४. ५७ सास्वादन-जिननाम १, समकितमोहनी १, मिश्र १, मिथ्यात्व १, सूक्ष्म १, अपर्यास १, ए ६ विना ७२. ५८ मिथ्यात्व-जिननाम १, समकितमोहनी १, मिश्रमोहनी १, ए ३ विना ७५, ५९ संज्ञी-स्थावर १, सूक्ष्म १, जाति ४, ए ६ विना ७२. ६० असंझी--जिननाम १, समकितमोहनी १, मिश्र १, सुभग १, आदेय १, शुभवि- हायोगति, १ उच्चगोत्र १, स्त्रीवेद १, पुरुषवेद १, देवगति १, नरकगति १, ए ११ विना ६७, र . เ , [७४] ६१ आहारी--७८० ६२ अनाहारी--विहायोगति २, उदास १, सुस्वर,१, दुःस्वर १, मित्रमोहनी १,ए ६ क्तिा ७२. पुद्गलविपाकी ३६. नो उदय.' १ नरकगति-संघयण ६, संस्थान ५, आतप १, औदारिकठिक २, आहारकठिक ३, साधारण १, उद्योत १, ए १८ विना १८. २ देवगति-उपर प्रमाणे १८ विना १८ः ३ मनुप्यगति–चैक्रियद्विक २, उद्योत १, आतप १, साधारण १, ए ५ विना ३१, ४ तिर्यचगति-वैथिठिक २, आहारकद्विक २, ए ४ बिना ३२. ५ एकेंद्रिय-संघयण ६, संस्थान ५, वैक्रियद्विक २, आहारकटिक २, औदारिक अंगोपांग १, ए १६ विना २० ८ द्वींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिद्रिय-संघयण ५, संस्थान ५, वैक्रियटिक २, आहारकद्विक आतप १, साधारण १, ए १६ विना २०. ९ पंचेंद्रियं साधारण १, आतप १, ए वे विना ३४. १. पृथ्वीकाय-एकेंद्रियनी १६, साधारण १, ए १७ विना १९. ११ अप्काय-उपरनी १७, आतप १, ए १८ विना १८. १३ तेजस्काय, वायुकाय--उपरनी १८, उद्योत १, ए १९ विना १७. १४ वनस्पतिकाय-पृथ्वीकायनी १७ माथी साधारण काढी आतप सहित करवाथी १७ विना १९. १९ त्रसकाय, मनोयोग, वाग्योग, काययोग, पुरुषवेद-साधारण १, आतप १, ए २ २० स्त्रीवेद--आहारकठिक २, साधारण १, आतप १,.ए ४ विना ३२. २५ नपुंसकवेद, क्रोध, मान, माया, लोम-३६. २८ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान-आतप १, साधारण १. ए २ विना ३४. २९ मनापर्यवज्ञान-साधारण १, आतप १, उद्योत १, क्रियद्विक २, ए ५ विना ३१. ३० केवळज्ञान--आहारकद्विक २, वैक्रियद्विक २, पहेला संघयण विना संवयण ५, आ, तप १, उद्योत १, साधारण १, ए १२ विना २४. ३२ मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान--आहारकद्विक २ मिना ३४. ३३ विभगज्ञान आहारकद्विक २, साधारण १, आतप १, ए ४ विना ३२. ३५ सामायिक, छेदोपस्थापनीय--मनापर्यव'प्रमाणे ५ विना ३१, विना ३४.

: " . 4 . ~ . ५] ३६ परिहारविशुद्धि-आहारकद्विक २, पहेला विना संघयण ५, साधारण १, आतप १, उद्योत १, वैक्रियद्विक २, ए १२ विना २४. ३७ सूक्ष्मसंपशय--आहारकद्विक २, वैक्रियद्विक २, छेल्ला संघयण ३, आतप १, उद्योत १, साधारण १, ए १०विना २६. ३८ यथाख्यात-उपर प्रमाणे १० विना २६. ३९ देशविरति-आहारकद्विक २, वैक्रियद्विक २, साधारण १, आप१, एईविना ३०. ४० अविरत-आहारकद्विक २ विना ३४. ४१ वसुदर्शन-साधारण १, आतप १, ए २ विना ३४. ४२ अचक्षुदर्शन-३६. ४३ अवधिदर्शन' -अवधिज्ञान प्रमाणे २ विना ३४, ४४ केवलीदर्शन-केवळज्ञान प्रमाणे १२ विना २४. ' ४७ कृष्ण, नील, कापोत-३६. ५० तेजोलेश्या, पालेश्या शुक्ललेश्या-आतप १, साधारण १, ए २ विना ३४. ५१ भव्य-३६. ५२ अभव्य-आहारकद्विक विना ३४, ५३ उपशम, साधारण १,'आतप.१, आहारकद्विक २, ए ४ विना ३२. ५४ क्षयोपशम--साधारण १, आतप १, ए २ विना ३४. ५५ क्षायिक-पहेला विना संघयण ५, आतप साधारण १, ए ७ विना २९., ५६ मिश्र-आहारकद्विक २, साधारण , आतप२, ए ४ विना ३२. ५७ सास्वादन-उपर प्रमाणे ३२, ., ५८ मिथ्यात्व-आहारकद्विक २ विना ३४. ५९ संज्ञी-साधारण १, आतप १, ए २ विना ३४. ६. असंज्ञी-पहेला संघयण ५, पहेला संस्थान ५, आहारकद्विक २, वैक्रियद्विक २, ए१४ विना २२. ६१ आहारी-३६. ६२ अनाहारी जसः १, कार्मण १, वर्णादि ४, अगुरुलघु १, निर्माण । स्थिर १, अस्थिर १, शुभ १, अशुभ १, ए १२ होय. . आश्रव ४२. १० मनुष्यगति, स, मन, वचन, काया, भव्य, संज्ञी,आहारी, शुक्ल लेश्या, पंचेद्रिय, ए १० मार्गणाए ४२ आश्रव होय. - . .. " M ?[ ?܀ , [७६] ३३ गति ३, वेद ३, कपाय ४, अज्ञान ३, अविरति १, लेश्या ५, अभव्य १, मिथ्यात्व १, सास्वादन १, मिश्र १, ए २३ मार्गणाए इर्यावहीनी क्रिया विना ४१ होय. ३८ पहेला ज्ञान ३, अवधि दर्शन १, क्षायिक १, ए ५ मार्गणाए मिथ्याविकी क्रिया विना ४१. ४० पहेला बे दर्शने ४२ आश्रव होय. मिथ्यात्विकी क्रिया सहित. ४१ अयोपशम मार्गणाए इयविहीनी क्रिया अने मिथ्यात्विकी क्रिया ए वे क्रिया विना ४० आश्रव होय.. ४२ उपशम समफिते इर्यावहिकी क्रिया सुद्धा ४२ आश्रव होय. ४८ एकेंद्रिय १, स्थावर ५, ए छ मार्गणाए इंद्रिय १, अत्रत ५, कपाय ४, काययोग १, ए ११, तेमा दृष्टिकी १, मातीत्यकी १, सामंतोपनिपातिकी १, आज्ञापनिकी १, इपिथिकी १, प्रायोगिकी १, ए छ क्रिया विना १९ क्रिया मेळवतां कुल ३० आश्रय होय. ४९ वींद्रिय मार्गणाए एकेंद्रियना ३०, वचन योग १, रसनेंद्रिय १, कुल ३२ आश्रव होय. ५० त्रींद्रिय मार्गणाए उपरना ३२ मां घ्राणेंद्रिय भेळवतां ३३ आश्रव होय. ५१ चतुरिद्रिय मार्गणाए उपरना ३३, चक्षु इंद्रिय १, दृष्टिकी क्रिया १, ए वे सहित करतां ३५ आश्रव होय. ५४ पहेला ३ चारित्रनी मार्गणाए प्राणातिपातिकी १, पारिग्रहिकी १, मिथ्यात्विकी १, अप्रत्याख्यानिकी १, इविहिकी १, ए ५ क्रिया तथा इंद्रिय ५, अव्रत ५, ए १५ विना २७ आश्रव होय. ५५ मनःपर्यवज्ञाने ११ ९ १२ मुं गुणठाणुं पण होवाथी इयविहिकी क्रिया सुद्धा २८ आश्रव होय. ५६ सूक्ष्मसंपराय मार्गणाए योग ३, संज्वलन लोम १, कायिकी क्रिया १, अनाभोगिकी १, प्रेमिकी १, ए ७ आश्रव होय. कोइक नय भेदे अधिकरणिकी १, प्रा- द्वेषिकी १, ए वे क्रिया सहित होवाथी ९ कहे छे. ५९ यथाख्यात, केवलज्ञान, केवळदर्शन ए त्रण मार्गणाए योग ३, इपिथिकी १, ए ४ आश्रव होय. ६० देशविरति मार्गणाए मिथ्यात्विकी १, इर्यापथिकी १, ए २ विना ४० अथवा अ- विरति १ सहित करवाथी ३ विना ३९. ६१ असंज्ञी मार्गणाए मनयोग १, इर्यापथिकी १, ए २ विना ४०.

क [७७]. ६२ अनाहारी मार्गणाए दृष्टिकी १, प्रातीत्यकी -१, सामंतोपनिपातिकी १, नैसृष्टिकी १, स्वहस्तिकी १, आज्ञापनिकी १, विदारणिकी १, मन, वचन १, ए ९ विना ३३ आश्रव होय. संवरतत्व ५७. १९ मनुष्यगति १, पंचेंद्रिय १, त्रस'१, योग ३, पहेला ज्ञान ४, पहेलो दर्शन ३, शुक्ल लेश्या १, भव्य १, उपशम १, क्षायिक १, संज्ञी १, आहारी १, ए १९ मार्गणाए ५७ भेद होय. २० लोभ मार्गणाए यथाख्यात चारित्र विना ५६ मेद होय. ३२ वेद ३, कपाय ३, लेश्या ५, क्षायोपशम १, ए १२ मार्गणाए यथाख्यात १, सूक्ष्मसंप- राय १, ए २ चारित्र विना ५५ भेद होय. ३५ देवता १, नारकी १, तिर्यंच १, ए ३ मार्गणाए १२ भावना होय. ५२ इंद्रिय ४, काय ५. अज्ञान ३, अभव्य १, छेल्लां समकित ३, असंझी १, ए १७ मा- गणाए संवर नथी. ५५ पहेला त्रण चारित्रनी मार्गणाए पोतपोतार्नु चारित्र राखीने वाकीनां चार चारित्र विना ५३ भेद होय. ५७ सूक्ष्मसंपराय तथा यथाख्यातनी मार्गणाए ८ परिपहने ४ चारित्र विना ४५ भेद होय. ५८ देशविरति मार्गणाए १२ भावना. ५९ अविरतिएं १२ भावना. ६१ केवळज्ञान अने केवळदर्शननी मार्गणाए पहेला चारित्र ४, भावना १२, अचेलपरि- पह १, अरतिपरिपह १, स्त्रीपरिपह १, सम्यक्त्वपरिपह १, निपद्यापरिपह १, आक्रोशपरिपह १, याचनापरिसह १, अलाभपरिपह १, सत्कारंपरिसंह १, प्रज्ञापरिसह १, अज्ञानपरिपह १, ए २७ विना वीजा ३० भेद होय. सामा- यिक चारित्र राखीने त्रण चारित्र काढीए वो ३१ भेद होय. ६२ अनाहारी मार्गणाए केवल ज्ञानप्रमाणे ३१ भेद होय. चार ध्यानना नेद १६. २ देवता अने नारकी ए वे मार्गणाए आर्तध्यानना ४ भेद, रौद्रध्यानना ४ भेद, ए आठ भेद होय. कोइ प्रतमां ९ मेद पण छे. तेमां धर्मध्याननो पहेलो आ- ज्ञाविचय भेद गणवो, तेथी ९ भेद थाय. ६ मनुष्य, पंचेंद्रिय, त्रस, क्षायिक समकित, ए ४ मार्गणाए- आर्तभ्यांनना ४, रौद्रध्यान- ना ४, धर्मध्यानना ४, शुक्लध्यानना ४, ए १६ भेद होय.

[uct' ७ तिर्यचनी मार्गणाए आध्यानना ४, रौद्रध्यानना ४, धर्मध्याननो पहेलो भेद आज्ञा- विचय तथा बीजो अपायविचर्य ए १० भेद होय, अथवा ८ होय. १७ एकेंद्रिय, द्वींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिद्रिय, पृथ्वी, अप, तेज, वायु, वनस्पति अने अ- सजी ए १० मागणाए ध्यान नथी. केमके मन विना ध्यान न होय. एम श्री देवचंदजीए करेला विचारसारमा, छे. अने कोइना मतमा आर्तध्यानना' ४, रौद्रध्यानना ४, ए ८ मेद पण छे. २ योग३, आहारी, शुकलेश्या, ए ५ मार्गणाए आर्तध्यानना ४, रौद्रध्यानना ४, धर्म- ध्यानना ४, शुक्लध्यानना पृथक्त्व वितर्क सविचार १, एकत्व पृथक्त्व सविचार १, ए १४ भेद होय. अने जो सूक्ष्मक्रिया अनिवृसि सहित करीए तो १५ भेद होय. २४ भव्य तथा संज्ञी ए बे मार्गणाए १६ भेद होय, अथवा शुक्लध्यानना छल्ला वे पाद विना १४ भेद होय. ३९ वेदं ३, कपाय ४, उपशम १, ए ८ मार्गणाए शुक्लध्यानना छेल्ला ३ पाद विना १३ मेद होय. ३८ ज्ञान ३, दर्शन ३, ए ६ मार्गणाए शुक्लध्याननात्रीजा अने चोथा पाद विना १४ भेद. ४५ अभव्य १, अज्ञान ३, मिश्र १, सास्वादन १, मिथ्यात्व १, ए ७ मार्गणाए आत- ध्यानना ४, रौद्रध्यानना ४, ए ८ मेद होय. ४६ मनःपर्यव ज्ञान मार्गणाए धर्मध्यानना ४, शुल्लध्यानना.पहेला पाद २, ए छ भेद अथया आतथ्यानना जीजा मेद (निदानातध्यान) विना वीजा ३ भेद सहित करीए तो ९. ४८ केवळज्ञान, केवळदर्शन, ए वे मार्गणाए शुक्लाव्यानंनो त्रीजो तथा चोथो पाद ए २ भेद. ५० सामायिक, छेदोपस्थापनीय, ए बे.मार्गणार आनध्यानना निदानात पाद विना ३, धर्मध्यानना ४, शुक्लध्याननो पहेलो पाद १, ए ८ मेद होय. अथवा धर्म- ध्यानना ४, शुक्लध्याननो पहेलो पाद १, १५ भेद होय. ५१ परिहारविशुद्धि मार्गगाए आर्तध्याननी निदानात पादं विना ३ मेद, अने धर्मध्या- नना ४ मेद, ए ७ मेद होय. ५२ सहमसंपराय मार्गणाए शुक्लध्याननो.पहेलो पार्द, ए.१ मैदु होय. ५३ यथाख्यात मार्गणाए शुक्लध्यानना,४ भेदं ,होय. ५४ देशविरति मार्गणाए आर्तध्यानना १, रौद्रभ्यानंना ४, धर्मध्याननी पहेलो , तथा बीजो पाद २, ए १० मेद होय. अथवा आर्वध्यानंना ४, शैदयानना ४, ए८ मेद होय.

T 1 [७९] ५५ अविरति मार्गणाए देवतानी पेठे ८ अथवा.९. ६१ लेश्या ५. क्षयोपशम १, ए ६ मार्गणाए आर्तध्यानना ४, रौद्रध्यानना ४, धर्म- ध्यानना ४, ए १२ भेद होय. ६२ अनाहारी मार्गणाए शुक्लध्याननो त्रीजो तथा चोथो ए २ भेद होग. अथवा तिर्यव प्रमाणे १० अथवा ८ भेद होय. समुद्घात ७. १० मनुष्यगति १, पंचेंद्रिय जाति १. सकाय १, योग ३, क्षायिक १, आहारी-१, शुक्ललेग्या १, भव्य १, आ १० मार्गणाए ७ समुद्धात होय. ३१ पुरुपवेद १, नपुंसकवेद १, कपाय ४, ज्ञान ४, पहेलो वे चारित्र २, दर्शन ३, लेश्या-५, क्षयोपशम १, ए २१ मार्गणाए केवळी समुद्घात विना ६ समुद्घांत होय. ४२ देवगति १, तिर्यचगति १, स्त्रीवेद १, अज्ञान ३, अविरति १, अभव्य १, मिथ्यात्व १, परिहारविशुद्धि १, देशविरति १, ए ११ मार्गणाए केवळी समुद्वात तथा आहारक समुद्घात ए २ विना ५ समुद्घात होय. ४६ असंज्ञी १, नारकी १, एकेद्रिय १, वायुकाय १, ए ४ मार्गणाए केवळी समुद्धात १, आहारक समुद्वात १, तैजस समुद्वात १,ए ३ वर्जीने ४ समुद्वाज होय. ४७ यथाख्यात मार्गणाए-वेदना, मरण, केवली, ए ऋण समुद्घात होय. ५४ विकलेंद्रिय ३, स्थावर ४, ए ७ मार्गगाए वेदना १, कपाय १, गरण १, ए ३ समुद्- घात होय. ५६ केवळज्ञान, केवळदर्शन, ए २ मार्गणाए १ केवळी समुद्घात ज होय. ५७ सूक्ष्मसंपराय मार्गणाए वेदना १, कपाप १, मरण १ ए ३ समुद्यात होय अथवा कपाय विना २ होय. ५८ संज्ञी मार्गणाए केवळी विना ६ अथवा ते सहित गणीए तो साते होय. ५९ उपशम मार्गणाए वेदना १, कपाय १, मरण १, ए ३ समुद्वात होय. ६० मिश्रमार्गणाए मरण विना वेदना १, कपाय १, वे समुद्घात होय. ६१ सास्वादन मार्गणाए केवळी १, आहारक १, ए २ समुद्घात वर्जीने ५ होय. अथवा वेदना १, कपाय.१, मरण १, ए ३ समुद्वात होय. १२ अनाहारी मार्गणाए वेदना १, मरण १, ए २ समुद्घात होय. १ [] बंध हेतु ५७. १ नरकगति-मूळ बंध हेतु ४, (मिथ्यात्व १, अविरति १, कपाय १, योग १) उत्तर- मेदे मिथ्यात्व ५, अविरति १२, स्त्रीवेद अने पुरुषवेद विना कषाय २३, औदारिक द्विकर तथा आहारक द्विक ए ४ विना ११ योग कुल बंध हेतु ५१. २ देवगति-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरमेदे-मिथ्यात्व ५, अविरति १२, नपुंसकवेद विना पाय २४, औदारिक द्विक अने आहारक द्विक ए चार योग विना ११ योग. ए ५२ बंध हेतुः ३ तिर्यचगति-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरमेदे-मिथ्यात्व ५. अविरति १२, कक्षाय २५, आहारक द्विक विना योग १३, एवं ५५. १७ मनुष्य १, पंचेंद्रिय १, त्रस १, काययोग १, अचक्षुदर्शन १, लेश्या ६, भव्य १, संज्ञी १, आहारी १, ए १४ मार्गणाए-मूळ बंध हेतु ४, उत्तर मेद ५७. १८ एकेंद्रिय-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरमेदे-अनाभोग मिथ्यात्व १, तथा स्पर्शेद्रिय १, काय ६, ए ७ अविरति, तथा पुरुषवेद अने स्त्रीवेद विना कषाय २३, औदारिकद्विक २, वैक्रियद्विक २ कार्मण काययोग १, ए ५ योग-एवं ३६ बंध हेतु. १९ द्वींद्रिय--मूळ बंध हेतु ४. उत्तरमेदें-अनामोगिक मिथ्यात्व १, तथा इंद्रिय २, काय ६, ए ८ अविरति, वे वेद विना २३ कषाय, औदारिकद्विक २, कार्मण काययोग १, असत्यामृषा वचनयोग १, ए ४ योग, कुल ३६ बंध हेतु. २० श्रींद्रिय-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरभेदे-अनाभोग मिथ्यात्व १, तथा इंद्रिय ३, काय ६, ए ९ अविरति, वे वेद विना कषाय २३, योग द्वौद्रिय प्रमाणे ४, एवं ३७ बंध हेतु. २१ चतुरिद्रिय-मूळ बंध हेतु ४ उत्तरमेदे-अनाभोग मिथ्यात्व १, तथा इंद्रिय ४, काय ६,ए१० अविरति,तथाबे वेद विना कपाप २३, योग पूर्वक्त् ४,एवं ३८. २५ पृथ्वी, अप, तेज, वनस्पति--मूळ बंध हेतु ४. उत्तरभेदे-अनाभोग मिथ्यात्व १, अविरति एकेंद्रिय प्रमाणे ७, वे वेद विना कषाय २३, औदारिक द्विक २, कार्मण काययोग १, ए ३ योग, कुल ३४ बंध हेतु. २६ वायुकाय--पृथ्वीकाय प्रमाणे. परंतु वैक्रियधिक सहित करीने योग ५ लेवा. कुल ३६ भेद. २८ मनयोग, वचनयोग-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरमेहे-मिथ्यात्व ५, अविरति १२, कपाय २५, औदारिक मिश्र १, कार्मण काययोग १, ए बे विना योग १३, कुल ५५ बंध हेतु.

[८] २९ पुरुषवेद-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरभेदे-मिथ्यात्व ५, अविरति १२, बे वेद विना काय २३, योग १५, एवं ५५ बंध हेतु. ३० स्त्री वेद-मूळ भेद ४. उत्तर भेद-पुरुष वेद प्रमाणे पण आहारक द्विक विना ५३ भेद. ३१ नपुंसकवेद-मूळ भेद ४. उत्तरभेदे-पुरुषवेद प्रमाणे, पण पुरुष अने स्त्री, ए वे वेद विना ५५ बंध हेतु होय. ३२ क्रोध-मूळ भेद ४. उत्तरभेदे-मिथ्यात्व ५, अविरति १२, क्रोध ४ तथा नोकषाय ९ ए १३ कषाय, योग १५, एवं ४५ बंध हेतु. ३३ मान-भूळ भेद ४. उत्तरभेदे क्रोधनी प्रमाणे, पण क्रोधने ठेकाणे मान ४ लेवां. ३५ माया, लोभ-उपर प्रमाणे, पण मानने ठेकाणे माया ४ लेवी. मायाने ठेकाणे लोभ ४ लेवा. ए प्रमाणे कषायनी मार्गणाए ४५ भेद कहेवा. ३८ ज्ञान पहेला ३-मूळ बंध हेतु ३. उत्तरभेदे-मिथ्यात्व ५ नही, अविरति १२, अ- नंतानुबंधी कषाय ४ विना कषाय २१, योग १५, एवं ४८ भेद. ३९ मनापर्यव ज्ञान--मूळ बंध हेतु २. उत्तरभेदे मिथ्यात्व ५, तथा अविरति १२ नही, संज्वलन कषाय ४, नोकषाय ९. एवं कपाय १३, तथा कार्मण काययोग १, औदारिक मिश्र १, ए वे विना योग १३, कुल २६ भेद. ४० केवळ ज्ञान-मूळ भेद १. उत्तरभेद-मिथ्यात्व ५, अविरति १२, कषाय २५, ए सर्व विना योग मनना २, वचनना २, अने कायना ३ एवं ७ योग बंध हेतु. ४३ अज्ञान ३–मूळ भेद ४. उत्तरभेद-मिथ्यात्व ५, अविरति १२, कपाय २५, आहा- रक द्विक विना योग १३, एवं ५५ बंध हेतु. ४५ सामायिक अने छेदोपस्थापनीय-मूळ भेद २. मिथ्यात्व अने अविरति विना. उ- चर मेदे-संज्वलन ४, नोकपाय ९, ए १३ कषाय, औदारिक मिश्र १, का- मण काययोग १, ए २ विना १३ योग, एवं २६ बंध हेतु. ४६ परिहारविशुद्धि-मूळ भेद २. मिथ्यात्व अने अविरति विना. उत्तरमेदे-संज्वलन कपाय ४, स्त्रीवेद विना नोकषाय ८, ए १२ कषाय, मनयोग ४, वचन योग ४, औदारिक काययोग १ ए ९ योग, कुल २१ बंध हेतु. ४७ सूक्ष्मसंपराय-मूळ भेद २. उत्तरमेदे-संज्वलन लोभ १, योग उपर प्रमाणे ९, एवं १० बंध हेतु. ४८ यथाख्यात-मूळ मेद १. मिथ्यात्व, अविरति अने कपाय विना, उत्तरभेदे-आहा- रक द्विक २, वैक्रिय द्विक २, ए ४ विना योग ११ बंध हेतु. ४९ देशविरति मूळ भेद ३ मिथ्यात्व विना. उत्तरभेदे-त्रसनी अविरति विना ११, पहेला अने वीजा कपायनी चोकडी विना कषाय १७, आहारक द्विक २, कार्मण काययोग १, औदारिक मिश्र १, ए ४ विना योग ११, एव ३९ बंध हेतु.

५१ अविरति तथा अभव्य-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरभेदे-आहारक द्विक २ विना ५५बंध हेतु. ५२ चक्षुदर्शन-मूळ बंध हेतु ४. उत्तरभेदे-बटारिक मिश्र १, कार्भग काययोग १, ए २ विना ५५ बंध हेतु. ५३ अवधि दर्शन-अवधि जाननी पेठे बंध हेतु ४८. ५४ केवल दर्शन-केवळ ज्ञाननी पेठे योग ७ वंध हेतु. ५५ उपशम- मूळ बंध हेतु ३ मिथ्यात्व विना.उत्तरमेहे-अविनि १२, पहेल, कपायनी चोकडी विना कपाय २१, आहारकहिक विना योग १३, एवं ४६ बंध हेतु. ५७ क्षयोपशम तथा क्षायिक-मूळ बंध हेतु ३ मिथ्यात्व विना. उचग्मंद-अविरति १२, पहेला कपायनी चोकडी विना कपाय २१, योग १५, एवं ४८. ५८ मिश्र-मूळ बंध हेतु ३ मिथ्यात्व विना. उनग्भेदे-अविरति १२, कपाय उपर प्रमाणे २१, औदारिक मिश्र १, वक्रिय मिश्र १, आहारक हिक २, कार्मण काययोग १, ए ५ विना योग १०, एवं ४३. ५९ सास्वादन-भूळ बंध हेतु ३. मिथ्यात्व विना. उत्तर भेदे-अविरत्ति १२, कपाय २५, आहारक द्विक विना योग १३, एवं ५०. ६० मिथ्यात्व-मूळ बंध हेतु ४. उत्तर भेटे-आहारक द्विक विना ५५ बंध हेतु. ६६. असंज्ञी--मूळ बंध हेतु ४. उत्तर भेदे-अनाभोग मिथ्यात्व १, मननी अविरोने विना ११, वे वेद विना कपाय २३, औदारिक द्विक २, वैक्रिय द्विक २, कार्मण काययोग १, असत्यामृपा वचनयोग १, ए योग६, एवं ४१ बंध हेतु. '६२ अनाहारी-भूळ बंध हेतु ४. उत्तर भेदे-मिथ्यात्व ५, अथवा अनाभोग मिथ्यात्व १, अविरति १२. अथवा छ कायनी ६, कपाय २५, कार्मण काययोग १, एवं ४३, अथवा ३३ बंध हेतु होय. . . भाव ५३. १ नारकी-मूळ भाव ५. उत्तरभेद-उपशम भावे उपशम सम्यक्त्व १. क्षायिक भावे क्षायिक समकित १, क्षयोपशम भावे मनःपर्यव ज्ञान १, सर्व विति १, देश विरति १, ए ३ विना १५ भाव. औदायिक भावे छल्ला ३ लेश्या, गति ३, वेद २, ए ८ विना १३ भाव. पारिणामिक भावे भव्यत्व १, अ- भव्यत्व १, जीवत्व १, ए ३ भाव. एवं ३३ भाव होय. २ देवता--मूळ भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे उपशम सम्यक्त्व १. क्षायिक भावे क्षायिक सम्यक्त्व १ः क्षयोपशम मावे नारकी प्रमाणे १५ मात्र. औदयिक भावे गति ३, वेद १, ए ४ विना १७ भाव. पारिणामिकना उपर प्रमाणे ३. एवं ३७ भाप होय.

- [८३] ३; मनुष्य-मूळभाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे सम्यक्त्व अने चारित्र ए २. क्षायिक- भावे सम्यक्त्व अने चारित्र ए २, केवल ज्ञान १, केवल दर्शन १, दानादि लब्धि ५, ए ९. क्षयोपशम भावे ज्ञान ४, अज्ञान ३, दर्शन ३, दानादि लब्धि ५. विरति द्विक २, सम्यक्त्व १, ए १८. औदयिक भावे गति ३ विना १८. पारिणामिक भावे पूर्व प्रमाणे ३. एवं ५० भाव, ४ तिर्यच--मूळ भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे सम्यक्त्व १, क्षायिक भावे सम्यक्त्व १, क्षयोपशम भावे मनःपर्यत्र ज्ञान १, सर्व विरति १, ए २ विना १६. औदयिक भावे गति ३ विना १८. पारिणामिक्क मावे पूर्ववत् ३. एवं ३९. ८ एकेंद्रिय, पृथ्वी, अस्, वनस्पति-मूळ भाव ३. उत्तर मेद-उपशम अने क्षायिक भाव न होय. क्षयोपशम भावे दानादि लब्धि ५, उपयोग ३. ए ८. औद- यिक भावे गति ३, पब लेश्या अने शुक्ल लेश्या ए २, वेद २, ए ७ विना १४. पारिणामिक भावे पूर्ववत् ३. कुल २५ भाव होय. १२ वींद्रिय, त्रींद्रिय, तेज, वायु-मूळभाव ३. उपशम अने क्षायिक विना. उत्तरभेद- क्षयोपशम भावे एकेंद्रिय प्रमाणे ८. औदयिक भावे गति ३, वेद २, छेल्ला लेश्या ३, ए ८ विना १३. पारिणामिक भावे उपर प्रमाणे ३. कुल २४. १३ चतुरिद्रिय द्रींद्रिय प्रमाणे. पण चक्षु दर्शन सहित २५ भाव कहेवा. '२० पंचेंद्रिय, त्रस, मनोयोग, वचनयोग, काययोग, संज्ञी, आहारी, ए ७ मार्गणाए मूळ भाव ५ अने उत्तर भेद ५३ भाव होय. २७ वेद ३, क्रोध, मान, माया, लोम, ए ७ मार्गणाए-मूळ भाव ५, उत्तर भेद-उप- शम भावे सम्यक्त्व अने चारित्र ए २. क्षायिक भावे सम्यक्त्व १. क्षयोप- शम भावे १८. औदयिक भावे गति १, वेद २, ए ३ विना १८. तेमा कपायनी मार्गणाए क्रोधमा मान, माया अने लोम विना कहे. मानमा क्रोध, माया अने लोम विना कहेवू. तथा लोममा क्रोध, मान अने माया विना कहेQ. एम ३ विना १८ भाव होय. पारिणामिक भावे ३. कुल ४२ भाव होय. ३१ मति, श्रुत, अवधि ज्ञान, अवधि दर्शन ए ४ मागणाए: मूळ भाव ५. उत्तर भेद उपशम भावे सम्यक्त्व अने चास्त्रि २, क्षायिक भावे सम्यक्त्व अने चारित्र २.क्षयोपशम भावे अज्ञान ३ विना १५.औदयिक भावे अज्ञान १, मिथ्यात्व १, ए २ विना १९. पारिणामिक भावे अभव्य विना २. कुल ४०.भाव होय. .

- [८]] ३२ मनापर्यव ज्ञान-मूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे २. क्षायिक भावे २. क्षयो- पशम भावे अज्ञान ३, देशविरति १, ए४ विना १४. औदयिक भावे गति ३, अज्ञान १, असंयम १, मिथ्यात्व १, ए ६ विना १५. पारिणामिक भावे उपर प्रमाणे २. कुल ३५. ३४ केवळ ज्ञान, केवळ दर्शन-मूल भाव ३. उपशम तथा क्षयोपशम विना. उत्तरमेढ- शायिक भावे ९, औदायिक मावे शुक्ल लेश्या १, मनुष्य गति १, असिद्ध १, ए ३ भाव होय. पारिणामिक भावे जीवत्व १. कुल १३. ३७ अज्ञान ३-मूल भाव ३. उपशम अने क्षायिक विना. उत्तर भेद-क्षयोपशम भावे लब्धि ५, अज्ञान ३, प्रथमना दर्शन २, ए १०. औदयिक भावे २१, पारिणामिक भावे ३. कुल ३४. ३९ सामायिक, छेदोपस्थापनीय-मूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे सम्यक्त्व अने चारित्र २. क्षायिक भावे सम्यक्त्व १.क्षयोपशम भावे अज्ञान ३, देश विरति १, ए ४ विना १४. औदयिक भावे गति ३, मिथ्यात्व १, असंयम १, अज्ञान १, ए ६ विना १५. पारिणामिक भावे अभव्य विना २. कुल ३४. ४० परिहारविशुद्धि-मूलभाव ५. अथवा उपशम विना ४. उत्तर भेद-उपशम भावे सम्यक्त्व १. क्षायिक भावे सम्यक्त्व १, क्षयोपशम भावे सामायिकनी पेठे १४. औदयिक भावे गति ३, मिथ्यात्व १, अज्ञान १, असंयम १, स्त्री वेद १, ए ७ विना १४. पारिणामिक भावे ३. एवं ३२. अथवा उपशम भाव न लईए त्यारे ३१. ४१ सूक्ष्मसंपराय-मूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे सम्यक्त्व अने चारित्र २. शायिक भावे सम्यक्त्व १. क्षयोपशम भावे अज्ञान ३, सम्यक्त्व १, देश- विरति १, ए५ विना १३. औदयिक मावे लोभ १, मनुष्यगति १, असिद्ध पणुं १, शुक्ल लेश्या १, ए ४. पारिणामिक भावे २. कुल २२. ४२ यथाख्यातमूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे २. क्षायिक भावे ९. क्षयोपशम भावे अज्ञान ३, सम्यक्त्व १, विरति द्विक २, ए ६ विना १२. औदायिक भावे असिद्ध पणुं १, मनुष्यगति १, शुक्ल लेश्या १, ए ३. पारिणामिक भावे २. कुल २८. ४३ देशविरति-मूलभाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे सम्यक्त्व १. क्षायिक मावे स- म्यक्त्व १. क्षयोपशम भावे अज्ञान ३, मनःपर्यव ज्ञान १, सर्व विरति १, ए ५ विना १३. औदायिक भावे अज्ञान १, मिथ्यात्व १, गति २, ए ४ विना १७. पारिणामिक भावे २ अभव्य विना. कुल ३४.

[८५] ४४ अविसति--मूल भाव .५. उत्तर भेद-उपशम भावे सम्यक्त्व १. क्षायिक भावे स- म्यक्त्व १. क्षयोपशम भावे विरति द्विक २, मनःपर्यव ज्ञान, १, ए ३ विना १५. औदयिक भावे २१. पारिणामिक भावे ३. कुल ४१ होय. ४६ चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन-मूल भाव ५. उत्तर मेद-उपशम भावे २. क्षायिक भावे सम्यक्त्व अने चारित्र २, क्षयोपशमे १८, औदयिके २१. पारिणामिके ३. कुल ४६. ४९ लेश्या पहेली ३-मूल भाव ५. उत्तरभेद-उपशम भावे सम्यक्त्व १. क्षायिक भावे सम्यक्त्व १. क्षयोपशम भावे १८. औदायिक भावे पांच लेश्या विना १६. पारिणामिक भावे ३. कुल ३९. ५१ तेजो अने पत्र लेश्या-मूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम मावे सम्यक्त्व १. क्षायिक भावे सम्यक्त्व १. श्योपशम भावे १८. औदयिक भावे लेश्या ५, नरक गति १, ए ६ विना १५, पारिणामिक भावे ३. एवं ३८. ५२ शुक्ल लेश्या-मूल भाव ५. उचर भेद-उपशम भावे २. क्षायिक भावे ९. क्षयोप- शमे १८. औदयिक भावे लेश्या ५, नरक गति १, ए ६ विना १५. पारि- णामिक भावे ३. एवं ४७. ५३ भव्य-मूल भाव ५. उचर भेदे-अमन्य विना ५२ भाव होय. ५४ अभव्य-मूल भाव ३. उपशम अने क्षायिक विना. उत्तर भेद-क्षयोपशम भावे लब्धि ५, अज्ञान ३, दर्शन २, ए १० भाव. औदयिक मावे २१. पारिणा- मिक भावे भव्य विना २. एवं ३३. ५५ उपशम--मूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम मावे २. क्षायिक भावे सम्यक्त्व १. क्षयोपशम भावे अज्ञान ३, देशविरति १, ए ४ विना १४. औदयिक भावे मिथ्यात्व १, अज्ञान १, ए २ विना १९. पारिणामिक भावे अभव्य विना २. कुल ३८. ५६ क्षयोपशम--मूल भाव ३. उपशम अने क्षायिक विना. उत्तर भेद-क्षयोपशम भावे अज्ञान ३ विना १५. औदयिक भावे उपर प्रमाणे १९. पारिणामिक भावे उपर प्रमाणे २. कुल ३६. ५७ क्षायिक-- मूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे चारित्र १. क्षायिक भावे ९. क्षयो पशमे अज्ञान ३, देशविरति १, ए ४ विना १४, औदयिक भावे पूर्वनी पेठे १९. पारिणामिके २, कुल ४५.

५८ मिश्र-मूल भाव ३. उपशम अने क्षायिक विनरा. उत्तर भेद-क्षयोपशमे मिश्र ज्ञान ३, दर्शन ३, दानादि लब्धि ५, मिश्र समकित १, ए १२ होय. औदयिक भावे पूर्ववत् १९. पारिणामिक भावे २. कुल ३३. ५९ सास्वादन-मूल भाव ३. उपशम अने क्षायिक विना. उचर भेद-क्षयोपशम भावे लन्धि ५, दर्शन २, अज्ञान ३, ए १०. औदयिक भावे मिथ्यात्व विता २०. पारिणामिके २. कुल ३२. ६० मिथ्यात्व-मूल भाव ३. उपशम अने क्षायिक विना. उत्तर भेद-क्षयोपशम भावे उपर प्रमाणे १०. औदायिक २१. पारिणामिक ३. कुल ३४. ६१ असजी-मूल भाव ३. उपशम अने क्षायिक बिना. उत्तर भेद-क्षयोपशमे लब्धि ५, अज्ञान २, दर्शन २, ए ९. औदयिक भावे गति २, वेद २, पद्म तथा शुक्ल लेश्या २, ए ६ विना १५, पारिणामिक ३. कुल २७ ६२ अनाहारी--मूल भाव ५. उत्तर भेद-उपशम भावे समकित १. क्षायिक भावे ९. क्षयोपशम भावे मनापर्यव ज्ञान १, विरति द्विक २, चक्षुदर्शन १, ४ विना १४. औदयिक भावे २१, पारिणामिक भावे ३. एवं ४८ भाव होय. पाप प्रकृतिनो वंध ८२ १ नरक गति-नरक त्रिक ३, सूक्ष्म त्रिक ३. विकलंद्रिय १, एकेंद्रिय १, स्थावर १, ए ११ विना ७१ प्रकृतिनो बंध होय. २ देव गति--नरक त्रिक ३, सूक्ष्मत्रिक ३, विकलेंद्रिय ३, ए ९ विना ७३. ४ मनुष्य, तिथंच गति-८२ प्रकृतिनो बंध. ८ एकेंद्रिय, द्वींद्रिय. त्रींद्विय, चतुरिद्रिय-नरक त्रिक ३ विना ७९ नो बंध. ९ पंचेंद्रिय ८२ नो बंध. १४ पृथ्वी काय--नरक त्रिक ३ विना ७९. तेवीज रीते अप्काय, तेउकाय, वाउकाय, अने वनस्पति कायने विपे पण ७९ नो बंध जाणवो. २५ त्रस कायनी मार्गणाथी आरंभीने लोमनी मार्गणा सुधी ११ मागणाए-८२ नो बंध. २८ मविज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान-स्त्यानदि त्रिक ३, अनंतानुबंधी ४, स्त्रीवेद १, नपुंसक वेद १, मिथ्यात्व मोहनी १, नीच गोत्र १, नरक त्रिक ३, जाति ४, स्थावर ४, संस्थान ५, संघयण ५, तिथंच द्विक २, दुर्भग त्रिक ३, अशुभ विहायोगति १, ए ३८ विना ४४, २९ मनःपर्यव ज्ञान-मतिज्ञाननी मार्गणाए काढी छे ते ३८, प्रत्याख्यानी ४. अप्रत्या- ख्यानी ४, ए ४३ विना ३६. - ... - [८७] ३. केवळ ज्ञान-अबंध. ३३ मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान, विभंग ज्ञान-८२. ३६ सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि-मन पर्यव ज्ञाननी पेठे ४६ विना ३६ ३७ सूक्ष्मसंपराय-ज्ञानावरणी ५, दर्शनावरणी ४, अंतराय ५, ए १४ नो बंध होय. ३८ यथाख्यात-अव. ३९ देशविरति-भतिज्ञाननी मार्गणाए काढी छे ते ३८,अप्रत्याख्यानी ४,ए ४२ बिना ४० ४२ अविरति, चक्षु, अचक्षु दर्शन ८२. ४३ अवधिदर्शन-अवधिज्ञाननी पेठे ४४. ४४ केवळ दर्शन-अबंध. ४७ कृष्ण लेश्या, नील लेश्या, कापोत लेश्या-८२. ४८ तेजो लेश्या--नरक त्रिक ३, सूक्ष्म त्रिक ३, विकलेंद्रिय ३, ए ९ विना ७३. ४९ पद्य लेश्या-उपरनी ९, एकेंद्रिय १, स्थावर १, ए ११ विना ७१, ५० शुक्ल लेश्या-उपरनी ११, विर्यच द्विक २, ए १३ विना ६९. ५२ भन्य, अमव्य-८२, ५६ उपशम, क्षयोपशम, क्षायिक, मिश्र-मतिज्ञाननी पेठे ३८ विना ४४ ५७ सासादन-नरक त्रिक ३, जाति ४, स्थावरचतुष्क ४, हुंडक संस्थान १, छेलं संघयण १, नपुंसक वेद १, मिथ्यात्व मोहनी १, ए १५ विना ६७.' ६१ मिथ्यात्व, संज्ञी, असंज्ञी, आहारी-८२. ६२ अनाहारी- नपुंसक त्रिक ३ विना ७९, . . पुण्यप्रकृतिनो बंध ४२. १ नरकगति-देवत्रिक ३, वैक्रिय द्विक २, आहारक द्विक २, आतप १, ए ८ विना ३४ बांधे. २ देवगति-देवत्रिक ३, वैक्रिय द्विक २, आहारक द्विक २, ए ७ विना ३५. ३ तिर्यंचगति-जिननाम १, आहारक द्विक २, ए ३ विना ३९, १० एकेंद्रि, द्वींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिद्रिय, पृथ्वीकाय, अपकाय, वनस्पतिकाय, ए ७ मा- गणाए देवत्रिक, ३, वैक्रिय द्विक २, आहारक द्विक २, जिननाम १, ए ८ विना ३४. .१२-तेजस्काय, वायुकाय-देवत्रिक ३, मनुष्यत्रिक ३, आहारकद्विक २, वैक्रियद्विक २, उच्चगोत्र १, जिन नाम १, ए १२ विना ३०.

[८] १९ मति ज्ञान, श्रृत ज्ञान, अवधि ज्ञान, अवधि दर्शन, शुक्ल लेश्या, क्षायिक, क्षयोपशम, ए ७ मार्गणाए-तिर्यंचायु १, उद्योत १, आतप १, ए ३ विना ३९. २३ मनापर्यव ज्ञान, सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि, ए ४ मार्गणाए-- मनुष्यत्रिक ३, औदारिक द्विक, २, आतप १, उद्योत १, तिथंचायु १, वर्षभनाराच १, ए ९ विना ३३. २४ सूक्ष्मसंपराय-यश १, उच्चगोत्र १, सातावेदनी १, ए ३ बांधे. २५ देशविरति-आतप १, आहारक द्विक २, मनुष्यत्रिक ३, तिर्यगायु १, उद्योत १, औदारिक द्विक २, वज्रर्षभनाराच १, ए ११ विना ३१. ३१ अज्ञान ३, अभव्य मिथ्यात्व, असंज्ञी, ए ६ मार्गणाए-जिननाम १, आहारक द्विक १, ए ३ विना ३९. ३५ कृष्ण, नील, कापोत लेश्या, अविरति ए ४ मार्गणाए-आहारक द्विक विना ४०. ३६ पन लेश्या-तिर्यचायु विना ४१. ३७ मिश्र-जिन नाम १, आहारक द्विक २, आतप १, उद्योत १, तिर्यगायु १, मनु- घ्यायु १, देवायु १, ए ८ विना ३४. ३८ सासादन-जिन नाम १, आहारक द्विक २, आतप १, ए ४ विना ३८. ३९ अनाहारी-मनुष्यायु १, देवायु १, तिर्यचायु १, आहारक द्विक २,ए५विना ३७. ४० उपशम-मनुष्यायु १, देवायु १, तिर्यंचायु १, उद्योत १, आतप १, ए ५ विना ३७ ४३ यथाख्यात, केवळ ज्ञान, केवळ दर्शन ए ३ मार्गणाए--१ सातावेदनी बांधे. ६२ मनुष्यगति, पंचेंद्रिय जाति, सकाय, वेद ३, योग ३, कपाय ४, चक्षुदर्शन, अ- चक्षु दर्शन, तेजोलेश्या, भव्य, संज्ञी, आहारी, ए १९ मार्गणाए-४२ बांधे. ध्रुवबंधी ४७. २५ नारकीनी मार्गणाथी आरमीने पचीशमी लोमनी मार्गणा सुधी ४७ नो बंध होय. २६ मतिज्ञान-अनंतानुबंधी ४, मिथ्यात्व १, स्त्यानद्धि त्रिक ३, ए ८ विना ३९. २८ श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान-उपर प्रमाणे ८ विना ३९, २९ मनापर्यवज्ञान अनंतानुबंधी४, अप्रत्याख्यानी ४, प्रत्याख्यानी ४, मिथ्यात्व १, स्त्यानार्द्ध त्रिक ३, ए १६ विना ३१. ३० केवळ ज्ञान-अबंध. ३३ मति अज्ञान, श्रुत अज्ञान, विभंग ज्ञान-४७. ३६ सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहार विशुद्धि-मनापर्यव ज्ञाननी पेठे १६ विना ३१ ३७ सूक्ष्मसंपराय-ज्ञानावरणी ५, दर्शनावरणी ४, अंतराय ५, ए १४ वांधे.

(८९]
'३८ यथाख्यात-अबंध.
३९ देशविरति-अनंतानुबंधी ४, अप्रत्याख्यानी ४, स्त्यानद्धि त्रिक ३, मिथ्यात्व १,
ए १२ विना ३५.
४२ अविरति, चक्षु, अचक्षु दर्शन-४७.
४३ अवधि दर्शन--अवधि ज्ञाननी पेठे ८ विना ३९.
४४ केवळ दर्शन–अवंध.
५२ कृष्ण, नील, कापोत, तेज, पद्म शुक्ल, भव्य, अभव्य, ए ८ मार्गणाए-४७,
५६ उपशम, क्षयोपशम, क्षायिक,मिश्र, ए ४ मार्गणाए-मनापर्यवज्ञाननी पेठे ८ विना ३९.
५७ साखादन-मिथ्यात्व १ विना ४६.
६२ मिथ्यात्व, संझी, असंजी, आहारी, अनाहारी, ए ५ मार्गणाए--४७.
अधुव बंधी ७३.
१ नरकगति-जाति ४, स्थावर चतुष्क ४, वैक्रिय द्विक २, आहारक द्विक २, नरक
त्रिक ३, वेदत्रिक ३, आतप १, ए १९ विना ५४.
२ देवगति-देव त्रिक ३, नरक त्रिक ३, वैक्रिय द्विक २, सूक्ष्म त्रिक ३, विकल त्रिक
३, आहारक द्विक २, ए १६ विना ५७.
३ मनुष्यगति--७३,
४ तिर्यंचगति-आहारक द्विक २, जिन नाम १, ए ३ विना ७०.
८ एकेंद्रिय, दींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिद्रिय-देवत्रिक ३, नरक त्रिक ३, वैक्रिय द्विक
२, आहारक द्विक २, जिन नाम १, ए ११ विना ६२.
९पंचेंद्रिय-७३.
११ पृथ्वीकाय, अपकाय--एकेंद्रियनी पेठे ६२.
१३ तेजस्काय, वायुकाय-मनुष्य त्रिक ३, उच्च गोत्र १, एकैद्रियनी ११,९१५विना ५८,,
१४ वनस्पतिकाय-पृथ्वीकायनी पेठे ६२.
२५ त्रसकाय, मनोयोग, वचनयोग, काययोग, पुरुपवेद, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, क्रोध,
मान, माया, लोभ, ए११ मार्गणाए ७३.
२८ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान-तिर्यंच त्रिक ३, नरक त्रिक ३, दुर्भग त्रिक ३,
जाति ४, स्थावरचतुष्क ४, प्रथम विना संघयण ५, पहेला विना संस्थान
५, आतप १, नपुंसकवेद' १, स्त्रीवेद १, उद्योत १, अशुभ विहायोगति १,
नीचगोत्र १, ए ३३ विना ४०.

[९०] २९ मनःपर्यवज्ञान-पूर्वनी मतिनाननी ३३, मनुष्य त्रिक ३, वज्रर्षभनाराच १, औदा- रिकद्विक २, ए ३९ बिना ३४. ३० केवलज्ञान मानावंदनी १. ३३ मतिअज्ञान, श्रुतअन्नान, विमंगजान-आहारक द्विक २,जिन नाम १, ए ३विना७०. ३६ सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि-मनःपर्यव ज्ञाननी पेठे३९ विना ३४. ३७ मूक्ष्मपराय-साताबेदनी १. उच्च गोत्र १, यश नाम १, ए ३ होय. ३८ व्याख्यात-सातावदनी १ होय. ३९ देशवितिमतिबाननी ३३. मनुष्य त्रिक ३. वज्रपंभनाराच संघयण १, औदारिक द्विक २, आहारक द्विक २. ए ४१ विना ३२. ४० अविरति-आहारक द्विक विना ७१. ४२ चक्षुदर्शन, अवक्षुदर्शन-७३. ४३ अवधिदर्शन-अवधि ज्ञाननी पेठे ४०.. ४४ केवळदर्शन-सातावदनी १ होय. १७ कृष्ण लेन्या, नील लेण्या, कापोत लेश्या-आहारक द्विक २ विना ७१. ४८ तेजो लेन्या-नरक त्रिक ३, मूक्ष्म त्रिक ३, विकलेंद्रिय त्रिक ३, ए ९ विना ६४. ४९ पद्म लण्या-उपरनी ९, एकेद्रिय १, स्थावर १, आतप १, ए १२ विना ६१. ५० शुक्ल लन्या-पद्मलेन्यानी १२, तियेच त्रिक ३, उद्योत १, ए १६ विना ५७. ५१ भव्य-७३. ५२ अभव्य-आहारक द्विक २, जिन नाम १, ए ३ विना ७०. ५३ उपशम-मतित्राननी ३३, देवायु १, मनुष्यायु १, ए ३५ विना ३८. ५५ क्षयोपशम, क्षायिक-मतिबाननी पेठे ३३ विना ४०. ५६ मित्र-मतिञाननी ३३, देवायु १, मनुष्यायु १, आहारक द्विक २, जिन नाम १, ए ३८ विना ३५. ५७ सास्वादन-नरक त्रिक ३, स्थावर चतुष्क ४, जाति ४, आतप १, हुंडक १, छेवटुं संघयण १, नपुंसक १, आहारक द्विक २, जिननाम १, ए १८ विना ५५. ५८ मिथ्यात्व--आहारक द्विक २, जिननाम १, ए ३ विना ७०, ५९ संत्री-७३. ६० असंजी-आहारक द्विक २, जिननाम १, ए ३ विना ७०, ६१ आहारी-७३, ६२ अनाहारी-आयु ४, नरक द्विक २, आहारक द्विक २, ए ८ विना ६५.

[२] ध्रुवोदयी २७. २५ नारकीथी मांडीने लोभनी मार्गणा सुधी-२७ नो उदय. २९ मतिज्ञान, श्रुतंज्ञान, अवधिज्ञान, मनपर्यवं ज्ञान-मिथ्यात्व १ विना २६. ३० केवलज्ञान--ज्ञानावरणी ५, दर्शनावरणी ४, अंतराय ५, मिथ्यात्व १,ए १५विना १२ ३३ मतिअज्ञान, अतअज्ञान, विभंगज्ञान-२७. ३९ सामायिक, छैदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसंपराय, यथाख्यात, देशविरति, ए ६ मार्गणाए-मिथ्यात्व १, विना २६. ४२ अविरति, चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन--२७. ४३ अवधिदर्शन-मिथ्यात्व विना २६. ४४ केवळदर्शन--केवळज्ञाननी पेठे १२. ५२ कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या, पालेश्या, शुक्ललेण्या, भन्य, अभव्य, ए ८ मार्गणाए २७. ५७ उपशम, क्षयोपशम, क्षायिक, मिश्र, सास्वादन, ए ५ मार्गणाएं-मिथ्यात्व विना २६. ६२ मिथ्यात्व, संज्ञी, असंज्ञी, आहारी, अनाहारी, ए ५ मार्गणाए–२७, अधुवोदयी ९५. १ नरकगति--मनुष्य, देव अने तिर्यच ए ३ आयुष्य, उच्चगोत्र १, स्त्री पुरुष वेद २, शरीर २, अंगोपांग २, जाति ४, गति ३, संघयण ६, संस्थान ५, आनु- पूर्वी ३, शुम विहायोगति १, जिननाम १, स्थावर चतुष्क ४, आतप १, उद्योत १, सुभग चतुष्क ४, ए ४३ विना ५२. २ देवगति--शरीर २, अंगोपांग २, आनुपूर्वी ३, गति ३, आयु ३, जाति , जिन- नाम, १, संघयण ६, संस्थान ५, नीचगोत्र १, नपुंसकवेद १, स्थावर चतुष्क ४, अशुभ विहायोगति १, आतप १, उपघात १, उद्योत १, ३९ विना ५६. ३ मनुष्यगति-क्रियाष्टक ८, तिथंच त्रिक, ३, जाति ४. स्थावर १, सूक्ष्म १, साधारण १, आतप १, उद्योत १, ए २० विना ७५. ४ तिर्यचगति--चैक्रियाष्ठक ८, मनुष्य त्रिक ३, आहारक द्विक २, उच्चगोत्र १, जिन- नाम १, ए १५ विना ८०. '५ एकेंद्रियं चैक्रियाष्टक, मनुष्य त्रिक ३, उच्चगोत्र १, वेद २, जाति ४, आहारक द्विक २, संघयण ६, संस्थान ५, औदारिक अंगोपांग १, विहायोगति २, समकित मोहनी १, मिश्रमोहनी १. जिननाम १, सुखर दुःस्वर २, बस, १, अयश १, आदेय १, ए ४२ विना ५३..

[९] ६ दौंद्रिय-क्रियाटक ८, मनुप्यत्रिक ३, उच्चगोत्र १, वैद २, जाति , आहारक द्विक २, संघयण ५, संस्थान ५, शुभ विहायोगति १, जिननाम १, स्थावर. १, सूक्ष्म १, साधारण १, आतप १, अनादेय १, यश १, सम- कितमोहनी १, मिश्रमोहनी १, ए ४० विना ५५, टौद्रिय, चतुरिंद्रिय-उपर प्रमाणे ४० विना ५५. ९ पद्रिय--जाति ४, स्थावर ३, आतप १, ए ८ विना ८७. १. पृथ्वीकाय-एकेंद्रिय मार्गणानी ४२, साधारण १, ए ४३ विना ५२, ११ अपकाय-पृथ्वीकायनी ४३, आतप १, ए'४४ विना ५१. १३ तेजस्काय, वायुकाय-उपरनी ४४, यश १, उद्योत १, ए ४६ विना ४९. १४ वनस्पतिकाय--पृथ्वीकाय प्रमाणे. पण साधारण १ नांखीने आतप १ काढीए त्यारे ४३ विना ५२. १६ त्रसकाय-स्थावर ३, आतप १, एकेंद्रिय जाति १, ए ५ विना ९०. १६.मनोयोग-जाति ४, अनुपूर्वी ४, स्थावर चतुष्क ४, आतप १, ए १३ विना ८२. १७ वचनयोग स्थावर ४, एकेंद्रिय जाति १, अनुपूर्वी ४, आतप १, ए १० विना ८५. १८ काययोग-९५. १९ पुरुपवेद-वेद २, नरकत्रिक ३, जाति ४, स्थावर ३, आतप , जिननाम १, ए १४ विना ८१. २० खीवेद-उपरनी १४, आहारक द्विक २, ए १६ विना ७९. २१ नपुंसकवेद-देवत्रिक ३, जिननाम १, वेट २, ए ६ विना ८९. २२ क्रोध-भान ४, माया , लोभ ४, जिननाम १, ए १३ विना ८२. २३ मान-क्रोध ४, माया ४, लोम ४, जिननाम १, ए १३ विना ८२. २४ माया-क्रोध ४, मान ४. लोभ ४, जिननाम १, ए १३ विना ८२. २५ लोम-क्रोध ४, मान ४, माया ४, जिननाम १, ए १३ विना ८२. २७ मतिबान, श्रुतज्ञान-जाति ४, स्थावर ४, अनंतानुबंधी १, जिननाम १, आतप १, मिश्रमोहनी १, ए १५ विना ८०. २८ अवधिज्ञान-मतिनाननी पेठे १५ बिना ८० अने जो तियेचनी अनुपूर्वी १ का. ढीए तो १६ विना ७९. २९ मनापर्यवज्ञान-जाति ४, स्थावर ४, अनंतानुबंधी ४, अप्रत्याख्यानी ४, प्रत्या- ख्यानी ४, आनुपूर्वी ४, जिननाम १, आतप १, उद्योत १, तिर्यंच द्विक- २, नरक द्विक २, देव द्विक २, वैक्रिय द्विक २, मिश्र १, दुर्भग १, अना- देय १, अयश १, नीनगोत्र १, ए ४० विना ५५. , ३० केवळ ज्ञानस अष्टक ८, उच्चगोत्र १, जिननाम १, मनुष्य द्विक २) पंचेंद्रिय जाति १, वेदनी बेमाथी १, संघयण १, संस्थान ६, विहायोगति २, औदारिक' द्विक २, पराधात १, उच्छ्यास १, उपधात १, सुस्वर १, दुःस्वर १, ए३० होय. ३२ मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान--आहारक द्विक २, जिननाम १, मिश्रमोहनी-१, समकित मोहनी १, ए ५ विना ९०० १३ विभंगज्ञान-जाति ४, स्थावर १, सूक्ष्म १, साधारण १, आतप १, आहारक द्विक २, जिननाम १, समकित मोहनी १, मनुष्य अने तिर्यचनी आनुपूर्वी २, अप- र्यास १, ए १५ विना ८०. अने जो २ अनुपूर्वीन काढीए तो १३ विना ८२.' ३५ सामायिक, छेदोपस्थापनीय-मनःपर्यव ज्ञाननी पेठे ४० विना ५५. ३६ परिहारविशुद्धि-मनःपर्यव ज्ञाननी ४०, आहारक द्विक २, स्त्रीवेद १, ए ४३ विना ५२. अने जो संघयण ५ काढीए तो ४८ विना ४७. ३७ सूक्ष्मसंपराय-आहारक द्विक २, स्त्यानदि त्रिक ३, छेल्ला संघयण ३, समकित मोहनी १, हास्यादि पट्क ६, वेद ३, संज्वलनादि ३, आ२१ मां मनःपर्यव ज्ञाननी ४० सहित करवाथी कुल ६१ विना ३४. ३८ यथाख्यात-सूक्ष्मसंपरायनी ६१ मांथी लोम काढी जिननाम नांखवाथी ६१ विना ३४. ३९ देशविरति-जाति ४, स्थावर ४, अनंतानुबंधी ४, आनुपूर्वी ४, देव द्विक २, नरक द्विक २, वैक्रिय द्विक २, दुर्भग त्रिक ३, आहारक द्विक २, जिन- नाम १, बीजा कषायनी ४, आतप १, मिश्रमोहनी १, ए ३४ विना ६१. ४० अविरति-जिननाम १, आहारक द्विक २, ए ३ विना ९२. ४१ चक्षुदर्शन-जाति ३, स्थावर ४, आनुपूर्वी ४, जिननाम १, आतप १, ए १३ विना ८२. ४२ अचक्षुदर्शन-जिननाम १ विना ९४. ४३ अवधिदर्शन--अवधिज्ञाननी पेठे १६ विना ७९, ४४ केवळदर्शन--केवळ ज्ञाननी पेठे ३० होय, ४७ कृष्ण लेश्या, नील लेश्या, कापोत लेश्या, ए ३ मार्गणाए--जिननाम १, आहारक द्विक २, ए ३ विना ९२. एकलं जिननाम काढीए त्यारे ९४. १८ तेजो लेश्या-नरक त्रिक ३, विकलेंद्रिय त्रिक ३, सूक्ष्म त्रिक ३, जिननाम १, आतप १, ए ११ विना ८४. ४९ पत्र लेश्या--तेजो लेश्यानी ११, एकेंद्रिय जाति १, स्थावर १, ए १३ विना ८२. ५० शुक्ल लेश्या--पब लेश्यानी १३ ने जिननाम रहित करवाथी १२ रहे. ए१२ विना ८३.

५१ मन्य--९५ ५२ अभव्य-जिननाम १, आहारक द्विक २, ममकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, ए विना ९०. ५३ उपशम-जाति,४, स्थावर चतुष्क ४, आनुपूर्वी ४, अनंतानुवंधी ४,आहारक द्विक २, जिननाम १, आतप १, समकित मोहनी १.मिश्र मोहनी १, ए २२ विना७३ ५४ क्षयोपशम--जाति ४, स्थावर चतुष्क ४, अनंतानुबंधी ४, जिन नाम १, आतप १, मिश्र मोहनी १, ए १५ विना ८०. ५५ क्षायिक-जाति ४, स्थावर चतुप्क ४, अनंतानुवंधी ४, आतप १, पहेला विना संघयण ५, समकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, ए २० विना ७५. ५६ मिश्र--जाति ४, स्थावर चतुष्क ४, अनंतानुबंधी ४, जिननाम १, आहारक द्विक २, समकित मोहनी १, आतप १, आनुपूर्वी ४, ए २१ विना ७४. ५७ सास्वादन--सूक्ष्म त्रिक ३, आतप १, समकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, आहा- रक द्विक २, जिननाम १, नरकानुपूर्वी १, ए १० विना ८५. ५८ मिथ्यात्व--अभव्यनी पेठे ५ विना ९०. ५९ सजी-पंचेंद्रियनी पेठे ८ विना ८७, अने जिननाम विना ८६. ६० असंज्ञी-वैक्रियाप्टक ८, संघयण ५, संस्थान ५, समकित १, मिश्र १, आहारक द्विक २, जिननाम १, वेद २, उच्च गोत्र १, शुभ १, आदेय १, यश १, ए २९ विना ६६. ६१ आहारी--अनुपूर्वी ४ विना ९१. ६२ अनाहारी-संघयण ६, संस्थान ६, आहारक द्विक २, बैंक्रिय द्विक २, औदारिक द्विक २, विहायोगति द्विक २, निद्रा ५, पराघात १, उन्क्षम १, आतप १, उद्योत १, प्रत्येक १, सुस्वर १, उपघात .१, साधारण १, दुःखर १, मिश्र मोहनी १, ए ३५ विना ६०. . अपरावर्तमान प्रकृति बंध २९. ३ नरकगति, देवगति, मनुष्यगति--२९ नो बंध. .८ तिर्यंचगति, एकेंद्रिय, द्वींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिंद्रिय, ए ५ मार्गणाए-जिननाम १, विना २८. ९ पंचेंद्रियः २९, १४ पृथ्वी, अप् तेज, वायु, वनस्पति, ए.५.मार्गणाए--जिननाम विना २८, . [९५] ३५ त्रसकाय, मन, वचन, काय, योग, पुरुषवेद, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, क्रोध, मान, माया, लोम, ए ११ मार्गणाए-२९, २९ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान,अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान, ए४ मार्गणाए--मिथ्यात्व विना २८. ३० केवळ ज्ञान--.. ३३ मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान, विभंगज्ञान-जिननाम विना २८. ३६ सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि-मिथ्यात्व विना २८, ३७ सूक्ष्मसंपराय-वर्णादि ४, तैजस १, कार्मण १, निर्माण १, उपधात १, अगुरुलम्बु १, परापात १, उच्चास १, जिननाम १, भय १. कुत्सा १, मिथ्यात्व १, ए १५ विना १४. ३८ यथाख्यात-० ३९ देशविरात-मिथ्यात्व १ विना २८. ४२ अविरति, चक्षु, अचक्षु दर्शन-२९. ४३ अवधि दर्शन-मिथ्यात्व विना २८. ४४ केवळ दर्शन- ५१ कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या, पबलेश्या, शुक्ललेश्या, भव्य ए ७ मार्गणाए-२९. ५२ अभव्य-जिननाम विना २८. ५५ उपशम, क्षयोपशम, क्षायिक-मिथ्यात्व विना २८. ५७ मिश्र, सास्वादन--जिननाम १, मिथ्यात्व १, ए २ विना २७. ५८ मिथ्यात्व-जिननाम विना २८. ५९ संजी-२९. ६० असंज्ञी-जिननाम विना २८ ६२ आहारी, अनाहारी-२९. परावर्तमान प्रकृति बंध ९१. १ नरकगति-जाति, स्थावर दशकमाथी ४, वैक्रिय द्विक २, आहारक द्विक २, नरक त्रिक ३, देवत्रिक ३, आतप १. ए १९ विना ७२. २ देवगति--देवत्रिक ३, नरकत्रिक ३, वैक्रिय द्विक २, सूक्ष्मत्रिक ३, विकलेंद्रियत्रिक ३, आहारक द्विक २, ए १६ विना ७५ ३ मनुष्यगति--९१. ४ तिर्यचगति--आहारक द्विक २, विना ६९.

. '[९६] ८ एकेंद्रिय, दींद्रिय, त्रींद्रिय, चतुरिंद्रिय-देवत्रिक ३, नरकत्रिक ३, वैक्रिय विक, आहारक द्विक २, ए १० विना ८१. ९पंचेंद्रिय-९१. ११ पृथ्वीकाथ, अपकाय-एकेंद्रिय प्रमाणे १० विना ८१. १३ तेजस्काय, वायुकाय--एकेंद्रियनी १०, मनुष्यत्रिक ३, उच्चगोत्र १, ए१४ विना ७७. १४ वनस्पति काय--एकेंद्रिय प्रमाणे १० बिना ८१. २५ सकाय, मन, वचन, काया, पुरुष वेद, स्त्री वेद, नपुंसक वेद, क्रोध, मान, माया, लोभ ए ११ मार्गणाए--९१. २८ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान--तियंचत्रिक ३, नरकत्रिक ३, दुर्भगत्रिक ३, जाति ४, स्थावर चतुष्क ४, पहेला विना संघयण ५, पहेला विना संस्थान निद्रा ३, अनंतानुबंधी ४, आतप १, नपुंसकवेद १, स्त्रीवेद १, उद्योत १, अशुभ विहायोगति १, नीच गोत्र १, ए ४० विना ५१. २९ मनःपर्यवज्ञान--मतिज्ञाननी ४०, बीजा कपायनी ४, त्रीजा कषायनी ४, मनुष्य त्रिक ३, वजर्पभनाराच संघयण १, औदारिक द्विक २, ए ५४ :विना ३७. ३० केवळज्ञान--सातावेदनी १, ३३ मतिअज्ञान, श्रुतअज्ञान, विभंग ज्ञान-आहारक द्विक विना ८९. ३६ सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि-मनःपर्यवज्ञान प्रमाणे ५४ विना ३७. ३७ सूक्ष्मसंपराय-उच्चगोत्र १, सातावेदनी १, यशनाम १, ए ३, ३८ यथाख्यात-सातावेदनी १. ३९ देशविरति-मतिज्ञाननी ४०, वीजा कपायनी ४, मनुष्य त्रिक ३, वज्रर्षभनाराच संघयण १, औदारिक द्विकनी २, आहारक द्विक २, ए ५२ विना ३९. ४० अविरति-आहारक द्विक २ विना ८९. ४२ चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन–९१. ४३ अवधिदर्शन-अवधिज्ञाननी पेठे ४० विना ५१. ४४ केवळदर्शन-सातावेदनी १. ४७ कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या-आहारक द्विक विना ८९. ४८ तेजोलेश्या-नरकत्रिक ३, सूक्ष्मत्रिक ३, विकलत्रिक ३, ए ९ विना ८२. ४९ पन लेश्या-उपरनी ९, एकेंद्रिय १, स्थावर १, आतप १, ए १२ विना ७९. ५० शुक्ल लेश्या-उपरनी १२, तिथंच त्रिक ३, उद्योत १, ए १६ विना ७५. ५१ भव्य-९१. ५२ अभव्य-आहारक द्विकनी २ विना ८९.

[१७]] ५३ उपगम--आहारक द्विक २. नग्क त्रिक ३, जानि ४, म्यावर ४, आतप १, नपुंमक- वेद १, तिर्यचत्रिक ३, म्त्यानद्धिं त्रिक ३, दुर्भग त्रिक ३, अनंतानुबंधी ४, मंघयण ५, मंस्थान ५, स्त्रीवेद १, उद्यात १, नीचगोत्र १, विहायोगति १, ए ४२विना ४९. ५५ क्षयोपशम, क्षायिक-उपरनी ४२ मांधी आहारकाहिक काढीने बाकी ४० विना ५१. ५६ मिश्र-उपशम ममकितनी ४२, मनुप्यायू १, टवायु १, १.४४ विना ४७. ५७ सास्वादन--नरक त्रिक ३, जाति ४. स्थावर ४, आतप १. हुंडक संस्थान १, छेत्रटुं मंघयण ?, नपुंसकवेट १, आहारक टिक २. ॥ १७ विना ७४. ५८ मिथ्यात्व- आहारक द्विक बिना ८९. ५९ मंत्री-९१. ६. अमनी--आहारक हिक विना ८९. ६१ आहार्ग-९१. ६२ अनाहारी-आयु ४, नग्क द्विक २, आहारक द्विक २, ए ८ विना ८३. कुल कोटी. १ नरक गनि--२५००००० १७ वचन-१४०५००००(वमनी पेठे) २ देवता-२६००००० १८ काया--१९७५०००० ३ मनुष्य-१२००००० १९ पुरुप-९१५०००० नियंत्र-१३४५०००० २० खीवद--९१५०००० ५ एकेंद्रिय-५७०००००(पांचेम्वावग्नी) २१ नमक--१७१५०००० ६वींद्रिय-७००००० २२ क्रोध-१९७५०००० ७ श्रींद्रिय-८००००० २३ भान-१९७५०००० ८ चतुरिंद्रिय--९००००० २४ माया--१९७५०००० १ पंचेंद्रिय--११६५०००० २५ लोभ--१९७५०००० १० पृथ्वी-१२००००० २६ मतिजान--११६५००००(पंचेद्रियवन्) ११ अप-७००००० २७ श्रुतज्ञान--११६५०००० १२ नेज-३००००० २८ अवधिजान-११६५०००० १३ वायु--७००००० २० मनःपर्यवज्ञान--१२००००० १४ वनस्पति-२८००००० ३० केवळज्ञान-१२००००० १५ त्रम--१४०५०००० ३१ मतिअजान-१९७५०००० १६ मन-११६५०००० (पंचेंद्रिय पेठे) ३२ श्रुनअनान-१९७५०००० [९८] ३३ विभंगज्ञान-११६५०००० (पंचेंद्रियवत्) ४८ तेजोलेश्या-१३८५०००० ३४ सामायिक चारित्र-१२००००० ४९ पालेश्या-९१५००००(पुरुषवेदवत्) ३५ छेदोपस्थापनीय--१२००००० ५० शुक्ललेश्या -९१५०००० (,) ३६ परिहारविशुद्धि-१२००००० ५१ भव्य--१९७५०००० ३७ सूक्ष्मसंपराय--१२००००० ५२ अमव्य--१९७५०००० ३८ यथाख्यात--१२००००० ५३ उपशम–११६५००००(पंचेंद्रिय वत्) ३९ देशविरति--६५५०००० ५४ क्षयोपशम-११६५०००० ४० अविरति--१९७५०००० ५५ क्षायिक-७३००००० ४१ चक्षुदर्शन-१२५५०००० ५६ मिश्र–११६५००००(पंचेंद्रियनी पेठे) ४२ अचक्षुदर्शन-१९७५०००० ५७ सासादन-१८७५०००० ४३ अवधिदर्शन-११६५०००० ५८ मिथ्यात्व-१९७५०००० ४४ केवळदर्शन-१२००००० ५९ संज्ञी-११६५००००(पंचेंद्रियनी पेठे) ४५ कृष्णलेश्या-१९७५०००० ६० असंज्ञी-१४६५०००० ४६ नीललेश्या- -१९७५०००० ६१ आहारी-१९७५०००० ४७ कापोतलेश्या--१९७५०००० ६२ अनाहारी-१९७५०००० तिर्यंच आश्री कुलकोटी. त्रस आश्री. पांच स्थावरनी-५७००००० पंचेंद्रियनी-११६५०००० विकलेंद्रियनी–२४००००० विकलेंद्रियनी-२४००००० जलचरनी--१२५०००० १४०५०००० स्थलचरनी-१०००००० 'पुरुषवेद आश्री खेचरनी-१२००००० देव–२६ लाख. उरपरिसर्पनी-१०००००० मनुष्य-१२ लाख. भुजपरिसर्पनी–९००००० जलचरादि-५३।। लाख. ९१५०००० १३४५०००० नपुंसकवेद आश्री. पंचेंद्रिय आश्री. मनुष्य-१२ लाख. मनुष्य--१२००००० नारकी -२५ लाख. देव-२६००००० पांच स्थावर-५७ लाख. नारकी-२५००००० जलचरादि--५३॥ लाख. जलचरादि--५३५०००० विकलेंद्रिय-२४ लाख. ११६५०००० १७१५०००० [९९] देशविरति आश्री. सायिक आश्री. मनुष्य--१२ लाख. नारकी–२५ लाख, जलचरादि-५शालारव. देवना--२६ लाख. ६५५०००० मनुष्य--१२ लाख. चक्षुदर्शन आश्री. स्थलचर--१० लाख. मनुप्य--१२ लाख. ७३००००० देव--२६ लाख. माम्वादन आश्री. नारकी-२५ लाख. पंचंद्रिय-११६५०००० जलचरादि-५३॥ लारव. विकलंद्रिय--२४००००० चतुर्गिद्रिय--१००००० पृथ्वी-१२००००० १२५५०००० अप-७००००० तजोलल्या आश्री. वनम्पति--२८००००० दंब-२६ लाव. १८७५०००० मनुष्य-१२ लाय. अमजी आश्री. जलचरादि--५३॥ लारव. मनुष्य---१२ लाख. पृथ्वीकाय-१२ लाख. जलवगदि-.५३।। लारव. अरकाय--७ लाग्न. विकलेंद्रिय--२४ लाग्व. नेजम्काय-२८ लाख. पांच स्थावर-५७ लाख. १३८५०००० १४६५०००० योगस्थानना स्वामी. पंचमकर्मग्रन्थ (गनक) विपय. १ सूक्ष्म निगोट अपर्याप्त जवन्य योगः सर्वस्तोकः। ३ ननो बादपर्याप्त जपन्ययांगोऽमंग्व्येय गुणः । ३ ततो दीद्रिय अपर्याप्त जघन्ययोगोऽमंग्व्येय गुणः। ४ ततः त्रीदिय अपर्यास जवन्ययोगोऽसंख्येय गुणः । ५ ततश्चतुर्गिद्रिय अपर्याप्त जयन्ययोगोऽसंख्येय गुणः। ६ ततोऽमंजि अपर्याप्त जघन्ययोगोऽसंख्यय गुणः । ७ ततः संजि अपर्याप्त जयन्ययोगोऽसंख्येय गुणः । ८ ततः सूक्ष्म अपर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽमंग्व्येय गुणः । ९ ततो बादर अपर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः ।

[१००] १० ततः मूक्ष्म पर्याप्त जघन्ययोगोऽसंख्येय गुण ११ ततो वादर पर्याप्त जवन्ययोगोऽसंख्येय गुणः। १२ ततः सूक्ष्म पर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । १३ ततो चादर पर्याप्त उत्कृटयोगोऽसंख्येय गुणः । १४ ततो द्वींद्रिय अपर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । १५ ततस्त्रींद्रिय अपर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः। १६ ततश्चतुरिद्रिय अपर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । १७ ततोऽसंज्ञि अपर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । १८ नतः संजि अपर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः। १९ ततो द्वींद्रिय पर्याप्त जघन्ययोगोऽसंग्व्येय गुणः। २० ततस्त्रींद्रिय पर्याप्त जघन्ययोगोऽसंख्येय गुणः । २१ ततश्चतुरियि पर्याप्त जघन्ययोगोऽसंख्येय गुणः। २२ ततोऽसंनि पर्याप्त जघन्ययोगोऽसंख्येय गुणः। २३ ततः संज्ञि पर्याप्त जघन्ययोगोऽसंख्येय गुणः । २४ ततो द्वींद्रिय पर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । २५ ततस्त्रींद्रिय पर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । २६ ततश्चतुरिद्रिय पर्याप्त उत्कृरयोगोऽसंख्येय गुणः । २७ ततोऽसंज्ञि पर्याप्त उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । २८ ततः संज्ञि पर्याप्त उत्कृष्टगेगोऽसंख्येय गुणः। २९ ततोऽनुत्तरसुर उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः। ३० ततो वेयकसुर उत्कृष्टयोगो ऽसंख्येय गुणः। ३१ ततो युगलिक उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । ३२ ततः आहारक शरीर उत्कृष्टयोगोऽसंख्येय गुणः । ३३ ततो शेपदेवनारकतिर्यचमनुष्याणां यथोत्तरमुत्कृष्टो योगोऽसंख्येय गुण। १४ जीवना स्थितिस्थाननु अल्पबहुत्व, (पंचम कर्मग्रन्थविपय.) १ सूक्ष्मकेद्रिन्य अपर्याप्त स्थितिस्थानानि सर्वस्तोकानि । २ ततो वादकेंद्रिय अपर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । ३ ततः सूक्ष्मकेंद्रिय पर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । ४ ततो बादर एकेद्रिय पर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि ।

[१०१] ५ ततो ढींद्रिय अपर्याप्त स्थितिस्थानानि असंख्येयगुणानि । ६ ततो द्वींद्रिय पर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । ७ ततखींद्रिय अपर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । ८ ततस्त्रींद्रिय पर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । ९ ततश्चतुरिद्रिय अपर्याप्त स्थिविस्थानानि संख्येयगुणानि । १० ततश्चतुरिद्रिय पर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । ११ ततोऽसंक्षी अपर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । १२ ततोऽसंबी पर्याप्त स्थितिस्थानानि संख्येयगुणानि । १३ ततो द्वींद्रिय पर्याप्त गुरुस्थितिः विशेषाधिका । १४ ततस्वीद्रिय पर्याप्त जघन्यस्थितिः विशेषाधिका । १५ ततस्रींद्रिय अपर्याप्त जघन्यस्थितिः विशेषाधिका। १६ ततस्त्रींद्रिय अपर्याप्त गुरुस्थितिः विशेषाधिका। १७ ततस्त्रींद्रिय पर्याप्त गुरुस्थितिः विशेषाधिका । १८ ततश्चतुरिंद्रिय पर्याप्त जवन्यस्थितिः विशेषाधिका। १९ ततश्चतुरिद्रिय अपर्याप्त जघन्यस्थितिः विशेषाधिका । २० ततश्चतुरिद्रिय अपर्याप्त गुरुस्थितिः विशेषाधिका । २१ ततश्चतुरिद्रिय पर्याप्त गुरुम्थितिः विशेषाधिका। २२ ततोऽसंज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्त जघन्यस्थितिः संख्येयगुणा। २३ ततोऽसंज्ञी पंचेंद्रिय अपर्याप्त जघन्यस्थितिः विशेषाधिका। २४ ततोऽसज्ञि पंचेंद्रिय अपर्याप्त गुरुस्थितिबंध विशेषाधिका । २५ ततोऽसंज्ञि पंचेंद्रिय पर्याप्त गुरुस्थितिबंध विशेषाधिका। २१ ततोऽयतेरुत्कृष्टस्थितिबंधः संख्येयगुणः। २७ ततोऽदेशविरति जघन्यस्थितिबंध संख्येयगुणः। २८ ततोऽदेशविरति उत्कृष्टस्थितिबंधः संख्येयगुणः। २९ ततोऽविरत पर्याप्त लघुस्थितिवंघः संख्येयगुणः । ३० ततोऽविरत अपर्याप्त लघुस्थितिबंधः असंख्येयगुणः । ३१ ततोऽविरत अपर्याप्त गुरुस्थितिबंधः संख्येयगुणाधिकः। ३२ ततोऽविरत पर्याप्त गुरुस्थितिबंधः संख्येयगुणाधिकः। ३३ ततः संजिपंचेंद्रिय पर्याप्त लघुस्थितिबंधः संख्येयगुणाधिकः । ३४ ततः संज्ञिपंचेंद्रिय अपर्याप्त लघुस्थितिबंधः संख्येयगुणाधिकः । ३५ ततः संज्ञिपचेंद्रिय अपर्याप्त गुरुस्थितिबंधः संख्येयगुणाधिकः। ३६ ततः संत्रिपंचेंद्रिय पर्याप्त गुरुस्थितिबंधः संख्येयगुणाधिक।

एकेंद्रियादिक जीवोमां स्थितिबंध आश्री अल्पवहुत्व. १ सर्वथी स्तोक बंध दशमे गुणस्थाने यतिनो होय. २ तेथी वादर पर्याप्ता एकेद्रियने जघन्य बंध असंख्यात गुणो. ३ तेथी सूक्ष्म पर्याप्ता एकेंद्रियने जघन्य बंध विशेपाधिक्र. ४ तेथी वादर अपर्याप्ता एकेंद्रियने जघन्य बंध विशेपाधिक, ५ तेथी सूक्ष्म अपर्याप्ता एकेंद्रियने जघन्य बंध विशेपाधिक. ६ तेथी सूक्ष्म अपर्याप्ता एकेद्रियने उत्कृष्ट बंध विशेषाधिक. ७ तेथी बादर अपर्याप्सा एकेंद्रियने उत्कृष्ट बंध विशेपाधिक, ८ तेथी सूक्ष्म पर्याप्ता एकेंद्रियने उत्कृष्ट बंव विशेषाधिक. ९ तेथी बादर पर्याप्सा एकेंद्रियने उत्कृष्ट बंध विशेपाधिक. १० तेथी द्वींद्रिय पर्यासानो जघन्य बंध संख्यात गुणो. ११ तेथी द्वौद्रिय अपर्याप्तानो जपन्य बंध विशेषाधिक. १२ तेथी हींद्रिय अपर्याप्तानो उत्कृष्ट बंध विशेपाधिक. १३ तेथी द्वींद्रिय पर्याप्सानो उत्कृष्ट बंध विशेषाधिक. १४ तेथी त्रौंद्रिय पर्याप्तानो जघन्य संघ विशेषाधिक. १५ तेथी त्रौंद्रिय अपर्याप्तानो जघन्य बंध विशेपाधिक. १६ तेथी त्रींद्रिय अपर्याप्तानो उत्कृष्ट बंध विशेपाधिक, १७ तेथीत्रींद्रिय पर्याप्तानो उत्कृष्ट बंध विशेषाधिक. १८ तेथी चतुरिद्रिय पर्याप्तानो जघन्य बंध विशेपाधिक. १९ तेथी चतुरिनिय अपर्याप्तानो जघन्य बंध विशेपाधिक. २० तेथी चतुरिंद्रिय अपर्याप्तानो उत्कृष्ट बंध विशेषाधिक. २१ तेथी चतुरिट्रिय पर्याप्तानो उत्कृष्ट वंध विशेषाधिक. २२ तेथी असंही पंचेंद्रिय पर्याप्तानो जघन्य बंध संख्यात गुणो. २३ तेथी असंज्ञी पंचेद्रिय अपर्याप्तानो जघन्य बंध विशेषाधिक. २४ तेथी असंजी पंचेंद्रिय अपर्याप्तानो उत्कृष्ट बंध विशेपाधिक, २५ तेथी असंञी पंचेंद्रिय पर्याप्तानो उत्कृष्ट बंध विशेषाधिक. २६ तेथी यतिने छठे गुणस्थाने उत्कृष्ट बंध संख्यात गुणो. २७ तेथी देशविरतिने जघन्य वंध संख्यात गुणो. २८ तेथी देशविरतिने पांचमे गुणस्थाने उत्कृष्ट बंध संख्यात गुणो. २९ तेथी अविरतिने चोथे गुणस्थाने पर्याप्ताने जपन्य बंध संख्यात गुणो.

[१०३] ३० तेथी अविरति अपर्याप्ताने जघन्य बंध संख्यात गुणो. ३१ तेथी अविरति अपर्याप्ताने उत्कृष्ट बंध संख्यात गुणो. ३२ तेथी अविगति पर्याप्ताने उत्कृष्ट बंध संख्यात गुणो. ३३ तेथो संजी पंचेंद्रिय पर्याप्तान जपन्य अंय संख्यात गुणो. ३४ नेथी संजी पंचेद्रिय अपर्याप्ताने जयन्य बंध संख्यात गुणो, ३५ तेथी सनी पंचेंद्रिय अपर्याप्ताने उत्कृष्ट बंध संख्यात गुणो. ३६ नेथी सजी पंचेंद्रिय पर्याप्ताने उत्कृष्ट बंध मंख्यात गुणो. (आमा २६ थी ३४ मुधीना बंध अंत:कोटाकोटी सागरोपम समजवा.) पुडगळ वर्गणानो क्रम. उनगेनर पूर्वानुपूर्वीप मूक्ष्म समजवी ने पश्चानुपूर्वीए स्थळ समजवी. १ अग्रहण वर्गणा. २ औदारिक ग्रहण जघन्य उत्कृष्ट वर्गणा. ३ आदारिक वैक्रिय बन्नेने अग्रहण वर्गणा. ४ वक्रिय ग्रहण जयन्य उत्कृष्ट वर्गणा. ५ चक्रिय आहारक बनेन अग्रहण वर्गणा. ६ आहारक ग्रहण जयन्य उत्कृष्ट वर्गणा. ७ आहारक जम बनने अग्रहण वर्गणा. ८ तंजम ग्रहण जयन्य उत्कृष्ट वर्गणा. ९ तेजस भापा नेने अग्रहण वर्गणा. १० भाषा ग्रहण जयन्य उत्कृष्ट वर्गणा. ११ भाषा अने श्वासोच्छ्वाम वनेने अग्रहण वर्गणा. १२ श्वासोश्वाम ग्रहण जघन्य उत्कृष्ट वर्गणा. १३ श्वासोश्वास अने मन बनने अग्रहण वर्गणा. १४ मनने जघन्य उत्कृष्ट ग्रहण वर्गणा, १५ मन अने कामण बनेने अग्रहण वगंणा. १६ कार्मण प्रायोग्य जयन्य उत्कृष्ट ग्रहण वर्गणा. १७ ध्रुव अचित्त जयन्य वर्गणा. १८ ध्रुव अचित्त उत्कृष्ट वर्गणा. १९ अध्रुव अचित जघन्य वर्गणा. २० अध्रुव अचित उत्कृष्ट वर्गणा, [१०४] २१ प्रत्येक जीवना पांच शरीरना प्रदेशो पंकी एकेक प्रदेशमा सर्व जीवथी अनंतगुणा विवसा परिणत मूहम पुद्गळ स्कंध आश्रित प्रत्येक वर्गणा जघन्यथी उत्कृष्ट पर्यत एकेक प्रदेशथी वधती असंख्याती छे, दरेक जातिनी अनंती छे. २२ अनती शून्य वर्गणा. २३ बादर निगोदीया जीवना त्रण शरीर प्रदेशने आश्रित अनंता पुगळ स्कंध विस्रसा परिणत होय, तेनी पण एकेकाधिक प्रदेशे वधती अनंती वर्गणा जवन्यथी उत्कृष्ट पर्यंत असंख्याती है. २४ अनंती शुन्य वर्गगा. २५ सूक्ष्म निगोदीया शरीरना एकेक प्रदेश आश्रित विस्रसा परिणत अनंत पुगळ रकं- घनी वर्गणा जघन्य उत्कृष्ट. २६ अनंती शून्य वर्गणा. २७ मिश्र स्कंधनी अनंती वर्गणा. २८ अत्ति महास्कंध ते पर्वत कूटादिने विष विलसा परिणामे आश्रित अनंत प्रदेशा- त्मक वर्गणा ते केवळीनी पेठे आठ सामयिक समुद्घात करे. आठ कर्मनी उत्तर प्रकृतिनो उत्कृष्ट तथा जघन्य स्थितिबंध. १ ज्ञानावरणीय ५. उत्कृष्ट. जघन्य. पांचे ज्ञानावरणी. पांच जानावरणी. त्रीस कोडाकोडी सागरोपम. अंतर्मुहर्च. २ दर्शनावरणीय ९. ४ दर्शनावरणीय त्रीस कोडाकोडी सागरोपम. ४ दर्शनावरणीय, अंतर्मुहत. ५ निद्रा, त्रीस कोडाकोडी सागरोपम. ५निद्रा,एक सागरोपमना सातयात्रण भाग. ईवेदनीय २. १ साता, पंदर कोडाकोडी सागरोपम. १ साता, चार मुहूर्त. १ असाता, त्रीस कोडाकोडी सागरोपम. १ असाता,एकसागरोपमना सातया त्रण भाग. ४ मोहनीय २६. १६ कपाय, चाळीश कोडाकोडीसागरोपम.१२ कपाय,एक सागरोपमना सातैया चार भाग. १ मिथ्यात्व,७० कोडाकोडीसागरोपम. १ संज्वलन क्रोध, २ मास. २ हास्य, रति, १० कोडाकोडी सा० १ संज्वलन मान, १ मास. ४ शोक, अरति, भय, दुगंछा, २० को १ संज्वलन माया, १५ दिवस. डाकोडी सागरोपम. १ संज्वलन लोभ, अंतर्मुहूर्त.

ago र . . to [१४५] १ पुरुषवेद, १० कोडाकोडी सार। १ मिथ्यावा १ सागरोपम. .. १-स्त्रीवेद,-१५ कोडाकोडी सा. २ हास्य, रवि,सागरोपमनोसायो,१ भाग. १ नपुंसकवेद, २० कोडाकोडी सा० ४ शोक, अरति, भय, दुगंछा, एक सागरो- । ‘पमना सात्तैया बे झाग... १ पुरुषवेद, आठ वर्ष. १ स्त्रीवेद, सागरोपमना चौदीया ३ भाग. १ नपुंसकवेद,१ सागरोपमना सालैया २भाग. ५-आयु कर्म ४. २ नरकायु, देवायु, ३३ सागरोपम. २ नरकायु, देवायु, दशहजार वर्ष. "३ मनुष्यायु, तिर्यंचायु, ३ पल्योपम. & मनुष्यायु, तिर्यचायुगाअंतर्मुहूर्त.. ६ नाम कर्म ९३. .. 704 चार गति.). उत्कृष्ट जवन्य. १ मनुष्यगति, १५ कोडाकोडी सागरोपम् १ मनुष्यगति एक सागरोपमना चौदीया त्रण भाग. ' तरक तथा वियंचगति, २० कोडाकोडी २ नरक तथा तिर्यंचगति, एक सागरोप- सागरोपम. मना सातैया वे माग. १ देवगति, १० कोडाकोडी सागरोपमः १ देवगति, सागरोपमनो सातैयोभाग, पांच जाति) १- पूकेंद्रिय, २० कोडाकोडी सा.. १ एवेंद्रिय, सागरोपमना सातैया वे भाग. ३ विकलेंद्रिय, १८ कोडाकोडी साय.. विकलेंद्रिय, सागरोपमना पांत्रीशीया नव भाग. १ पंचेंद्रिय, २० कोडाकोडी सा० १ पंचेद्रिय, सागरोपमना सातया बे.भाग. (पांच शरीर, त्रणा उपांग, पांच बंधन, पांच संघातन, ). ४ औदारिक शरीर, उपांग, तथा संघातन ४ औदारिक शरीर, उपांग, बंधन, संघा- २० कोडाकोडी सा० तन, १ सागरोपमना सातैया २ माग. ४ वैक्रिय शरीर, बंधन, उपांग तथा सं ४ वैक्रिय शरीर, बंधन, उपांग, संघातन, घातन, २० कोडाकोडी सार। एक सागरोपमना सातैया के माग. ४ आहारक चतुष्क, अतः कोडाकोडी. ४ आहारक.चतुष्क अंतर्मुहर्च ..! ६ तैजस तथा कामण शरीर, बंधन, सं .६ तैजस तथा कार्मण शरीर, बंधन सं- घातन, २० कोडाकोडी, घातन, सागरोपमतासातया वे भाग. . 4 - [१६] (छ संघयण तथा छ संस्थान.) २ पहेलु संघयण तथा संस्थान, दश को २ पहेलु संघयण तथा संस्थान, सागरोप- डाकोडी. भनो सातैयो एक माग. २ चीजें संघयण तथा संस्थान, १२ को २ बीजु संघयण तथा संस्थान, सागरोप- डाकोडी. मना पांत्रीशीया छ भाग. २त्रीजुं संघयण तथा संस्थान, १४ को २ त्रीजु संघयण तथा संस्थान, सागरोप- डाकोडी. मना पांत्रीशीया सात भाग. २ चोथु संघयण तथा संस्थान, १६ को २ चोधु संघयण तथा संस्थान, सागरोप- डाकोडी. मना पांत्रीशीया आठ भाग, २ पांचमुं संघयण तथा संस्थान, १८ को- २ पांचमु संघयण तथा संस्थान, सागरोप- डाकोडी. मना पांत्रीशीया नव भाग. २ छठु संघयण तथा संस्थान, २० को २ छटुं संघयण तथा संस्थान, सागरोप- डाकोडी. मना सातैया वे माग. (वर्णादि वीश.) ७ मृदु, लघु, स्निग्ध, उष्ण, सुरमिगंध, ७ मृदु, लघु, स्निग्ध, उष्ण, सुरभिगंध, श्वेतवर्ण, मधुररस, १० कोडाकोडी. श्वेतवर्ण, मधुररस, सागरोपमनो सातैयो एक भाग. २ हलिद्रवर्ण, आम्लरस, साडावार को- २ हलिद्रवर्ण, आम्लरस, सागरोपमना अ- डाकोडी. हावीशीया पांच भाग. २ लोहितवर्ण, कपायरस, १५ कोडाकोडी. २ लोहितवर्ण, कपायरस, सागरोपमना अठावीशीया छ भाग. २ नीलवर्ण, कटुकरस, साडासतर कोडा २ नीलवर्ण, कटुकरस, सागरोपमना अ- कोडी सागरोपम. हावीशीया सात भाग. ७ कृष्णवर्ण, तिक्तरस, गुरुस्पर्श, कर्कश, ७ कृष्णवर्ण, तिक्तरस, गुरुस्पर्श, कर्कश, रुक्ष, शीत, दुर्गध, २० कोडाकोडी. रुक्ष, शीत, दुरभिंगध, सागरोपमना सातैया वे माग. (आनुपूर्वी चार.) १ मनुष्यानुपूर्वी, १५ कोडाकोडी. १ मनुष्यानुपूर्वी, सागरोपमना चाँदीया ३ भाग १ देवानुपूर्वी, १० कोडाकोडी. १ देवानुपूर्वी, सागरोपमनो सातैयो १ भाग. २ तिथंच तथा नारकीनी आनुपूर्वी, २ तिर्यंच तथा नारकीनी आनुपूर्वी, सागरो- २० कोडाकोडी, पमना सातैया ने भाग.

[१०७] (विहायोगति २.) १ शुभ विहायोगति, १० कोडाकोडी. १ शुभ विहायोगति, सागरोपमनो सातैयो एक भाग. १ अशुभ विहायोगति, २० कोडाकोडी. १ अशुभ विहायोगति, सागरोपमना सा- तया वे भाग. (प्रत्येक प्रकृति ८.) ४ उच्चम, उद्योत, आतप, पगपात, २० ४ उच्चास, उद्योत, आतप, पराघात, कोडाकोडी. मागरोपमना सातैया वे भाग. ३ उपघात, अगुरुलघु, निर्माण, २० को- ३ उपघात, अगुरुलघु, निर्माण, सागरो- डाकोडी. पमना सानैया वे भाग. १ तीर्थकर नामकर्म, अंत: कोडाकोडी. १ तीर्थकर नामकर्म दश हजार वर्ष. (त्रस दशक.) ४ बम, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, २० को- ४ त्रस, बादर, पर्याप्स, प्रत्येक, सागरोपमना डाकोडी. सतिया वे भाग. ६ स्थिगदि छ, १० कोडाकोडी. ६ स्थिरादि छ. सागरोपमनो सातयो एक भाग. परंतु जसनामनी आठ मुहूर्त. (स्थावर दशक.) १ स्थावर नामकर्म, २० कोडाकोडी. १ स्थावर नामकर्म, सागरोपमना सातैया बे भाग- ३ सूक्ष्म, अपर्याप्स, साधारण, १८ ३ सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, सागरोपमना कोडाकोडी. पांत्रीशीया नव भाग. ६ अस्थिर पदक, २० कोडाकोडी. ६ अस्थिर पदक,सागरोपमना सातैयारभाग. ७ गोत्र कर्म २. १ उच्च गोत्र, १० कोडाकोडी. १ उच्च गोत्र, आठ मुहूर्त १ नीच गोत्र, २० कोडाकोडी. १ नीच गोत्र, सागरोपमना सातैयारे भाग, ८ अंतराय कर्म ५ ५पांचे अंतराय ३० कोडाकोडी. ५पांचे अंतराय अंतर्मुहूर्त [Read आठे कर्मनो उत्कृष्ट अवोधा काळ. . .. कर्म. -- १. ज्ञानावरणीय- २ दर्शनावरणीय- ३ वेदनीय- ४ मोहनीय-- अबाधाकाळ. काळ अवांचा काळ ३००० वर्ष.. ५.आयुग करोड पूर्वनो त्रीजो भाग ३००० वर्ष ६ नाम- २००० वर्ष, ३००० वर्ष... ;; ७ गोत्र- २००० वर्ष. ७००० वर्ष. ८ अंतराय-- ३००० वर्ष. . ५ ७००० वर्ष.. ३००० वर्ष. आठे कर्मनी उत्तर प्रकृतिनो उत्कृष्ट अबोधा काळ. ७० कोटाकोटी सागरोपमनी स्थिविवाळी प्रकृति-~. ३० कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाको प्रकृति- २२ कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाळी प्रकृति- २००० वर्ष. १८ कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाळी प्रकृति- .१८००. वर्ष. १७ा कोटाकोटी सांगरोपमेनी स्थितिवाळी प्रेकृति-- ... .२७५. १६ 'कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाळी प्रकृति- १५ कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाळी प्रकृति - १५०० वर्ष. १४ कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाळी प्रकृति- १० वर्ष. १२॥ कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाळी प्रकृति- १२५० वर्ष. १५' कोटाकोटी सागरोपमनी स्थितिवाळी प्रकृति- १२० वर्ष. १० कोटाकोटी सांगरोपमनी स्थितिवाळी,प्रकृति- - १६०० वर्ष. - .

भेद जीव भेद. . . ५ ०, १० १० १० १० १० २ २ २ २ २ २ . . .. • 1१०।२२ 13 1-२२:२ व ज म ३ २ -U . १ २ .4 २ .. .. ३ . -4 . १ २ २६ २० . . . 7 . ६ . १४ नाकी सातना पर्याप्ता अपर्याप्त सस्म एकेन्द्रिय ५ पर्याप्ता अपर्याप्ता तिर्यचना पृथ्वीकाय पर्याता अपगता भेट ४८ २ अपाय पर्याता अपर्याप्ता । २ तजस्काय पयाता अपर्याप्ता. मायुसाय पर्याप्ता अपर्याप्ता. २ माघारण वनस्पतिकाय पर्याप्ता अपयाता. प्रत्येक वनस्पतिकाय पर्याशा अपर्याप्ता ६ विकद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता- : । २. तियच पचेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता १५ पाव भात कर्मभूमिना पो०अप० समू. मनुष्यना १५ पाच गवत कर्मभृमिना पर्या अपराम० [३०: १५ पाच महाविदेह कर्मभूमिना पर्या अप०समृ०, १५८ छापन्न अमींपना पर्या० अप० समू० १. बीग अर्मभूमिना पर्याः अप० सम . " .. दश भुवनपति पयां• अप देवताना पदा गरमायामिक पा० अप. [10 ३१ मोल व्यतर पर्या, अप० .. दश तिर्यगजभक पर्या अप० २० पान ज्योतिपना चर, अचर, पर्या अप० त्रण किलिप पर्या० अप० २४ वार देवलोकना पर्या० अप० १० नव प्रवेयकना पर्या. अप.. १८ नव कार्तिकना पर्या० अपर १०,विजयादि पान अनुसग्ना पर्या. अप० Jor M क क ० . 1... •• -- 21 • • • I | • • |• • ! • • • • • • • • • • • • • • •••• . . . or क . " . . .. . क . .. .

-- "नहीवाद्वीप . ૨ . . . ४६ D . , h. ४०३ • [१०२ १०तिम्छालोके २ २ . २ २ २ १० . ११मधोनोके ११५५ १० २ . २ २ २ ६२. ३ . . . 21-12 61.. | . ||||| -- १५ /१५ १६८५. | .. ३२ २० | ••• • • • • • |-.. . २४ १८१८ ६ २२३६२० १५ १५/१५ १६८९. १९०५. .. १०कलोक २ ३ ३ . . . १० १० १३ मेरुपर्वते ४८ २ २ २ २ १ . . . . . ••|| . . . १४ अढीछोपे ३५१/०१० २ . . . १५/चारवेवलोके . १० २ २ . २ २ २ . . . . . . ६२४ १ . •d. .. १६/नववेयके ३२ २ . D . २ . . . . . . . . . १५पाचमनुत्तरे [११०] . २ . २ . . . . . . . . . . . . १८सिबशिलाए . 10 २ . D २ . . . . . . . १९लोकने छेडे ૧૨ २ . . • • • • . . • क २ २ . . . . . . . . . . . . . . . . . . मरत क्षेत्र २० अयोग्रामे १० ३ २ ६ २० १/मठीमा १२ २ ... 10 अजीव भेद ५६. धर्मना(म्कंध,देश,प्रदेश,द्रव्य,क्षेत्र,काल,भाव ,गुण) अधर्मनारधर्म प्रमाणे | आकाशना ८ कालना ६ पुदलना ५३० सर्व मेद ५६. रूध विना स्कंध विना स्कष विना ७ स्कंध तथा देश विना ६ ५५७ जबूद्वीपे ६ ५३. लवण समुद्र ६] नंदीश्वर द्वारे ५५७ ५५१ " अथ ६२ मार्गणा ओश्री जीवना ५६३ भेदोनुं विवरण. १देवगविना भेद. १९८१० भुक्नपति, १५ परमाधार्मिक, १६ व्यन्तर, १० तिर्यम्भक, १० ज्योतिषी, १२ देवलोक, ३ किल्वीपी, ९ लोकान्तिक, ९ अवेयक, ५ अनुत्तरविमान । ए ९९ पर्याप्ता, तथा एज ९९ अपर्याप्सा मळीने सर्व भेद १९८ छे, २ मनुष्यगतिना भेद.३०३१५ कर्मभूमिना-५ भरत, ५ ऐरवत, अने ५ महाविदेह. अढीद्वीपना मळीने ३० अकर्मभूमिना-५ हैमवत, ५ ऐरण्यवत, ५ हरिवंश, ५ रम्यक, ५ देवकुरु, ५ उत्तरकुरु (आत्रीय क्षेत्र युगलीयानां छे.) ५६ अंतरद्वीप-जंबुद्वीपना हिमवंत तथा शिखरी ए वे पर्वतनी चार चार दाहाओ लवणसमुद्रमां पडे छ, ते एकेकी दाढा उपर सात सात अंतरद्वीप छे, तेथी आठे दाढाओना मळीने ५६ अंतरद्वीप १०१ गर्भज पर्याप्ता, १०१ गर्मज अपर्याप्ता, १०१ संमार्छिम अपर्याप्मा (चौद स्थानकना) कुल मळीने ३०३. ३तिग्गतिना मैद. | ४८२० तिर्यसंचेंद्रियना, तेमा-४ जलचर--गर्भज अने संमूर्छिम ए वे पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता. [१११] ४ खेचर ४ उरपरिसर्प ४ भुजपरिसर्प " ४८ ६ विकलेन्द्रियना, तेमां--द्वीठिय, त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय ए ३ पर्याप्ता तथा एज ३ अपर्याप्ता २२ एकेन्द्रियना, नेमां-पृथ्वीकायना सूक्ष्म अने बादर ए वे पर्याप्ता तथा एज ने अपर्याप्ता मळीने चार थया । नेवीज गते ४ अपकायना, ४ तेउकायना अने चार वायुकायना, मर्वे मळी १६ थया। 11.-... 44 वनस्पनिकालना, नेमा ४ साधारण वनस्पति सूक्ष्म तथा बादर. ए वे LOSARONY, 'पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता. २.प्रत्येक वनस्पति पर्याप्सा, तथा अपर्याप्ता । नरकगतिना भेद. | १४| ७ नरकरित्नप्रमा, शर्करप्रभा ३ वालुकप्रभा, ४ पंकप्रभा, ५ धूमप्रभा, ६ नम:प्रभा, ७ तमस्तमः प्रभा, ग सात पर्याप्ता तथा एज सात अपर्याप्सा मळीने १४ मेंदु . ओ रीते चार गतिना मळीने ५३३ भेद जाणी. [११२] . . ७ संयमनी अथ वामठ (६२) मार्गणाए जीवना केटला केटला भेद पमाय ने कहे छ. बासठ मार्गणा आ प्रमाण--- ४ गतिनी मार्गणा. ८ जाननी, मार्गणा... २ मंजीनी मार्गणा. ५ इन्द्रियोनी १,२. आहागनी ६. कायनी ४ दर्शननी, ३ योगनी ६ लेश्यानी १.६२ ३ वेदनी ३ भव्यनी ए गते ६२ मागणामांनी प्रत्येक मार्गणाए ४ कपायनी ६ मम्यक्त्वनी बिना भेद केटला पामे त कहै छ-- ". .

-- Non- -- अथ ६२ मार्गणानुं विवरण. सिविना मार्गणानां नाम. भेनी देयगति. मनुष्यगति. तिग्मति. नागति. मस्या ५ दवातना माजा. १९८१. भुवनपात, १५.पामामानिक 15 ता, तिमा. गोतिषी, १२ गतो.fe. बिषी, र लोकातिरू. प्रेगक, :: अनुत्तरिमान, सर्गमती ९९प. साप्ता तथा २९ अपगाता. २ मनुध्यातिनी मार्गणा ३० 1. गर्भजपयांता, ... गर्भन भपयोमा, 1.1 मातम मनुष्य. ३ तिर्यग्गतिनी मार्गमा न्द्रिय पर्यादा अपर्याभा. : मिकनेलिय प्रांता भपयाला 2. नियक पर्नेटिग गर्भन मम TES पासा अपपासा. ना. पक्षाभपयांप्ता " [११३] - नारकीन मार्गला. 'एकेडियनी मागमा. १२ . • काग, अपुकाय, वायु राग, ५ मेनस्काग, वनस्पनिकाय, दीन्द्रियनी मामणा. सौदिय पर्सामा तथा अपयांता वीन्द्रियनी मार्गणा. प श्रौद्रिय पर्माता तथा अपगामा. चतुरिन्द्रियनी मार्गमा 'पदियनी मागणा. ५३५४९ पर्याप्ता, ... अपर्यामा पदिय पयामावया भागांतर. १.१. गर्भजपर्याप्ता, १०१ गर्भना. नियंक परिय पर्यामा तथा पर्याप्ता • अपर्याप्ता अपर्याप्ता, १.१ममम्मि मनुष्य 'अपोमा - 1 १०य्वीकायनी मागणा २१ अपकायनी मागणा. -तेजस्कायनीमाषणा सूक्ष्म पयाता अपयांता २ बार पर्याप्ता अपर्यापा २ अपकाय सूक्ष्म पर्याप्ता अपर्याप्ता व अपकाय चादर पर्याप्ता अपांसा २ तेजस्काय सूक्ष्म पर्याप्ता अपर्याप्ता २ तेजम्काय चादर पर्याप्ता अपर्याप्ता २ मायुकाय सूक्ष्म पर्याप्ता अपर्यासा २ वाधुकाय वादर पर्यामा अपर्याप्ता साधारण वनस्पति सूक्ष्म पर्यासा अपर्याप्ता साधारण वनस्पति चादर पर्याप्त १३वायुकायनीमार्गणा. १४ वनस्पतिकायनीमार्गण, ६ अपर्याप्ता र प्रत्येक वनस्पति पर्याप्ताअपर्याप्ता [११] १५सकायनी मार्गणा. १४१ ९९ पर्याप्ता, १९ अपर्याप्ता. १०१ गर्भज पर्याप्ता, 1.1 गर्भनर तिर्यक् पंचेद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता ७ पर्याप्ता, ७ अपर्याप्ता अपर्याप्ता, १०१ संमूर्छिम मनुष्य. ६ विकलेंद्रिय पर्याता अपर्याप्ता १/मनयोगनी मार्गणा २१२ १९ देवता पर्याप्ता १०१ गर्भजमनुष्य पर्यासा ५ गर्मज तिर्यच पंचद्रिय पर्याप्ता | नारकी पर्याप्ता १७वचनयोगनी मार्गणा,२२०९९ देवता पर्यापा. १०१ गर्भजमनुष्य पर्यासा. ५ तिर्यक् पंचेंद्रिय गर्भन पर्याप्ता, नारकी पर्याप्ता ५ तिर्यक पंचेन्द्रिय समर्छिमा पर्याप्ता, ३ विकलेन्द्रिय पर्याता १८ काययोगनी मार्गणा. ५६३ ९९ पर्याप्ता, १९ अपर्याहा. १०१ गर्भज पर्याता, १.१ गर्भन २२ एकेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता ७ पर्याप्ता, ७ अपर्याप्ता अपर्याप्ता, १०१ संमूछिम मनुष्य विकलेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, २०तिर्यक् पचेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता १९खीवेदनी मार्गणा. ३४. १० भुवनपति, १५ पग्माधार्मिक,१०१ गर्भन पर्याप्त, १०१ गर्भज १० गर्भज पर्यामा अपर्याप्ता. १६ व्यंतर, १० तिर्यग् जमक, १० अपर्यासा. ज्योतिषि, २ देवलोक पहेल तथा बीजु, १ किल्विषी, सर्व मली ६४ पर्याप्ता तथा ६४ अप योप्ता कुल १२८. ।

२० पुरुषवेदनी मार्गणा ४१०९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याप्ता. १०१ गर्भज पर्याप्ता, १०१ गर्भज १० गर्भज तिर्यक पंचेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्यासा. अपर्याप्ता २१ नपुसकवेदनी मार्गणा | १९३ ३० कर्मभूमिमा गर्भज पर्याप्सा २२ एकेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता.७ पर्याप्ता, ७ अपर्याशा अपर्यासा,१०१ संमूर्छिम मनुष्य विकलेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, अपयोता. २०तिर्यक पंचेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता २२ क्रोधनी मार्गणा. ५६३/९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याप्ता १.१ गर्भन पर्याप्ता, १०१ गर्भजा२२ एकेन्द्रिय पर्यता अपर्याा पर्याप्ता, ७ अपर्याप्ता अपर्याप्ता, १०१ संमूर्छिम मनुष्य ६ विकलेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, २.तिर्यक् पचंद्रिय पर्याता मार्यामा २३माननी मार्गणा. ५६३ ९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्यासा. १.१ गर्भन पर्याप्ता, १.१ गर्भज २२ एकेद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, पर्याप्ता, . अपर्याप्ता. अपर्याप्ता, १०१ संमूर्छिम मनुष्य विक्लेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्त १.निर्यक पंचेंद्रिय पर्णता अपर्याप्ता २४/मायानी मागणा ५६३ ९६ पयांसा, ९९ अपर्याप्ता १.१ गर्भज पर्याप्ता, १०१ गर्भन२२ एकेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, पर्याप्ता, . अपर्याप्ता अपर्याप्ता, १०१ संमूर्छिम मनुष्प विकलेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्यासा २०तिर्यक् पचंद्रिय पर्याप्सा अपर्याप्मा २५ लोमनी मार्गणा. ५६३ ९९ पर्याप्ता, १९ अपर्याप्ता. १.१ गर्भज पर्याप्ता, १०१ गर्भनर२ एकेंद्रिय पर्याता अपर्यासा, पर्याप्ता, ७ अपर्याशा अपर्याप्ता, १०१ संमूर्छिम मनुष्य विकलेंद्रिय पर्यता अपर्याप्ता, २०तिर्यक् पचेद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता मतिशननी मागंणा '१२३९९ पर्याप्ता, ९९ पर्याप्ता (पा-१०१ गर्भन पर्याशा १०१ गर्भज १० गर्भज तियव पचेंद्रिय पर्या पता,अपर्याप्ताएटले माधार्मिक पूर्वसंगतिकदेवताने अपर्याप्ता अपर्याप्ता संज्ञी सातमी नरकनो अपयोप्ता कारणे ममकित पामे छे (मज्ञी) (संजी) समकित पामे नहीं २०वज्ञाननी मार्गणा ४२३ ९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याप्ता १.१ गर्भज पर्याप्ता, १०१ गर्भज १० गर्भज तियेच पंचेंद्रिय पर्याप्ता,पर्याप्ता,अपर्याप्ता एटले अपर्यावा. अपर्याप्मा सातमी नरकनो उपर प्रमाणे नहि २८)अवधिज्ञाननी मार्गणा' अथवा ९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याप्ता. १५ कर्मभृमिना गर्भज पर्याता ५ गर्भज तियेच पवेत्रिय पर्याप्ता, पर्याप्ता, ६अपर्याप्ता उपर १५ कर्मभूमिना गर्भज अपर्याप्ता. अथवा ५गर्भज तियच पंचेद्रिय प्रमाणे. अपर्यात.. मळीने १० मनपर्यवनाननीमार्गणाः १५ १५ कर्मभूमिना गर्भन पर्याप्ता ३० केवलज्ञाननी मार्गणा. १५/ १५ कर्मभूमिना गर्भज पर्याप्ता [११५] -- ८ ol .

. . . . 1 अथवा ३१मितिअज्ञाननी मार्गणा/५३५१० मुनपतिश१५ परमाधार्मिक,१०१ गर्भज पर्याप्सा, १०१ गर्भजार२ एकेद्रिय ‘पर्याप्ता अपर्याप्ता, पर्याप्ता, ७ अपाता | १० तिर्यग् बृमक, १६ व्यंतर, अपर्याप्ता, १०१ मूर्डिम मनुष्य ६ विकलेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, १. ज्योतिषी, १२ देवलोक, किल्विषी, ९ अवेयक सर्व मली २० विर्यपचेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता. १५ पर्याप्ता तथा ५. अपर्याप्ता कुल १७० ३२ श्रुतमज्ञाननी मार्गणा ५३५/१० भुवनपति, १५ परमाया-मक,१०१ गर्मज पर्याप्ता, १.१ गर्मज,२२ एप्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, पर्याप्ता, ७ अपर्याप्ता १६ व्यतर १० तिर्यग्भक अपर्यासा, १.१ समूर्छिम मनुष्य ६ विकलद्रिय पर्याप्ता अपर्याता 4. ज्योतिषी १२ देवलोक, २० तिर्यपचेंद्रिय पर्यासा अपर्याप्ता किल्विषी ९ प्रैवेयक सर्व मली ४५ पर्याप्ता, अने ८५ अपर्याप्ती कुल १७० ३३ विमंगजाननी मार्गणा २०४१० मुवनपति, १५ परमाधार्मिक,१५ कर्मभूमिना गर्भज पर्याप्सा ५ गर्भग विर्यच पंचेंद्रिय पर्यामा पर्याप्ता, ७ अपामा १६ ब्यंतर, १० तिर्यग शुभक, अथवा १५ कर्मभूमिना गर्भन अथवा १५ कर्मभूमिना गर्मन अथवा गर्मज तिर्यंच पचेंद्रिय २२४ १० ज्योतिषी १२ देवलोक, ३ किल्विषी, ९ अवेयक सर्व मली पर्याप्ता, तथा १५ कर्मभूमिना पर्याप्ता तथा ५ गर्भज तियंच ८५ पर्याता भने ८५ अपर्याप्ता| गर्मज अपर्याप्ता मली ३० पचेंद्रिय अपर्याप्ता मळीने १० कुल १७० । arसामायिक चारित्रनी १५ कर्मभूमिना गर्मज मनुष्य पर्याप्ता मार्गणा ३५दोपस्थापनिक चा- ५ भग्न अने ५ ऐग्वतना गर्मज रित्रनी मार्गणा मनुष्य पर्यामा ६)परिहारविशुबि चारित्र ५ भात तथा ५ ऐवतनां गर्भ मी मार्गणा ३७सूक्ष्मसंपराय चारित्रनी १५कर्मभूमिना गर्भज मनुष्य पर्याप्ता मार्गणा ३८ ययाख्यात चारित्रनी १५कर्मभृमिना गर्भज मनुष्य पर्याप्ता मार्गणा ३९दिशविरति चारित्रनी चारित्रनी १५कर्मभूमिना गर्मज मनुष्य पर्याप्ता ५ गर्भज तिर्यक् पचेंद्रिय पर्याप्ता मार्गणा [११६] १५ मनुष्य पर्याप्ता ५ - समूर्छिमें मनुष्य अथवा . १५॥ अविरति चारित्रनी| ५६३९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याप्ता. (१०१ गर्भज मनुष्य पर्याप्ता, १०१२२ एकेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्तो. पर्यामा, अपयप्तिा. मार्गणा. गर्भज मनुष्य अपर्याप्ता, १.१६ विकलेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, संमूर्छिम मनुष्य. २० तिर्यपचेद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता अवक्षुदर्शननी ५६३९९ पर्याप्ता, १९ अपर्याप्ता. १०१ गर्भन मनुष्य पर्याप्ता, १०१२२ एकेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता ७ पर्याप्ता, अपर्याप्ता. मार्गणा गर्मज्ञ मनुष्यं अपर्याप्ता, १.१ विकलेंद्रिय पर्याता अपर्याप्ता २० तिर्यपचेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्त 4- चक्षुदर्शननी मार्गणा २१८५९ पर्याप्ता... १०१ गर्भज मनुष्य पर्याप्ता. १. गर्भन संपछिम पर्याप्ता, १ चतु पर्यासा निद्रिय पर्याप्ता अवविदर्शननी मार्गणा २४६९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याप्ता. ३० कर्मभूमिना . गर्मन पर्याप्ता,५ तिर्यक् पर्चेद्रिय गर्भग पर्याप्ता. ५ पर्याप्ता, अपर्याप्ता. अपर्याप्ता. अथवा ५ तिर्यंच पचेंद्रिय गर्मज २५१/ पर्याप्ता भने ५ अपर्याप्ता केवलदर्शननी मार्गणा १५ कर्मभूमिनागर्भज मनुष्य पर्याप्ता. कृष्णलेश्यानी मार्गणा | ४५९/१० भुवनप्रति १५ पासाभार्मिक,१०१ गर्भन मनुष्य पर्याप्ता, १०१२२ एकेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, ६ सातमी, छठी अने १६ व्यता, नियंग भक, गर्भज मनुष्य अपर्याप्ता, १०१६ विकलेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, पाचमीना पर्याप्ता, सर्व मी ५१ पर्याप्ता अन ५१ संमूछिम मनुष्य. २०तिर्यक् पंचेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता | ता अपर्याप्ता अपर्याप्ता. कुल १०२. ४६ नीललेझ्यानी मार्गणा ४२९१. भुवनपति, १६ व्यतर, १०१.१ गई। मनुष्य पर्याप्ता, १०१२२ एकेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, ६ पांचमी,चोथी अने अथवा तिर्यग्नृभक ५ ३६ पर्याप्ता, गर्भज मनुष्य अपर्याप्ता, १०१६ विकलेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, बीजीना पर्याप्सा तथा तथा एज ३६ अपर्यापप, कुल संमूर्छिम ममुष्य- । २०तिर्यक् पंचेद्रिय पर्याप्ता भार्याप्ता. अपर्याप्ता. ५२. अथवा १५ परमानार्मिक पुर्याता, तथा १५ अपर्यामा मली.. ... ... kavकापेतलेझ्यानीमार्गणा. ४२९१० भुवनपति, १६ व्यंतर, १०/१०१ गर्भन मनुष्य पर्याप्ता, १०१,२२ एद्रिय पाप्ता अपर्याप्ता, ६ त्रीजी, बीजी अने तिर्यग् नृभक, ३६ पर्याप्ता, गर्भज मनुष्य अपर्यासा, १.१६ विकलेद्रिय पर्यामा अपर्याप्ता, पहेलीना पर्याप्ता तथा तथा एन. ३६ अपर्याप्ता' कुल संमूर्छिम मनुष्य. २०तिर्यक् पचेंद्रिय पर्याप्ता अमळता. अपर्याप्ता. । ७२, अथवा १५ पमापार्मिक, पर्याप्ता तथा'१५ अपर्याप्त माली PLINE [११] ": ." । . arod - १०२ अथवा १.3A . . .

तेजोलेट्यानी मार्गा| ३१० मुचनपति, १६ व्यतर, 2017 गर्भज मनुष्य पर्याप्ता, १०, १५ गर्भन मनुप्य अपर्याप्ता, ब्यंतर, तिर्यम् भक. १. ज्योतिषि २ देवलोकापहेला), किल्विषी, ए ४९ पर्याना तथा एज ४९ अपामा मली .. • गर्भज तियक पंचन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, पेटनीकाय अप्काय प्रत्येक वनस्पतिकाय ए ण बाद अपर्याप्ता पचलेश्यामी मार्गमा ६५३ श्रीजु, चोयु, पाव, देवलोक,/१५कर्मभूमिना गर्भज मनुष्य पर्याप्ता, १० गर्मज तिर्यक पद्रिय पर्याप्त १ किल्विषी, १ लोकातिक ए १५ कर्मभूमिना गर्मज मनुष्य अपाता. १३ पर्याप्ता तथा एज १३ अपर्यासा, अपर्याता, ए मलीने ३.. अपयोमा मली २६ शुकवेयानी मार्गणा arj छायी बारमा सुधी सात देव-१० पंदर कर्मभूमिग मनुष्य पर्याता १. गर्भज तियच पचैद्रिय पर्याप्ता लोक, १ किल्विषी, प्रैवेयक, तथा पंदर अपर्याप्ता. अपर्याता ५ अनुत्तर विमान,ए २२ पर्याप्ता, तथा एन २२ अपर्याता मळी ४ [१९८] ११/भव्यनी मार्गणा १६३ ९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याशा १.१ गर्भजमनुष्य पाप्ता, १०१२२ एकेन्द्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता, पर्याशा ७ अपर्याप्ता, गर्भजमनुष्य अपर्यासा, १.१६ विकलेन्द्रिय पर्यामा अपर्याता, संमूर्छिम मनुष्य १० तिर्यक पंचेंद्रिय गर्भज समूर्छिम पर्याप्ता अपर्याप्ता भव्यनी मार्गणा. ३३३/१० भुवनपति,१६ व्यंतर, १०तिया/१०१ संमूहिम मनुष्य, ३. २२ एकेंद्रिय पर्याता अपर्याप्ता, पर्यावा अपर्याप्ता भक, १० ज्योतिषी, १३ देव भूमिना पर्याप्ता अपर्याप्ता गर्मजा विकलेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्त ५३५ लोक, ३ किल्विषी, ९ वेयक. मनुष्य ए.मली १३१ अपवार. तिर्यक् पद्रिय गर्भज संमूर्छिम ६. अकर्मभूमिना गर्भन मनुष्य पर्याप्ता अपाता. अपवा ७. पर्याता तथा एज ७० ५०५ अपयोमा मली १४: अथवा पर्याशा अपर्याप्ता, तथा ११२) पग्माधार्मिक,१५पर्याता भने १५, भताद्वीपना गर्मज मनुष्य अपर्यामा मली १७.. पर्याप्ता ए सर्व मली ३.३.

५३ उपशमसमकितनी २०३१० भुवनपति, १५ परमाधार्मिक.१.१ गर्भज मनुष्य पर्याप्ता. ५ तिर्यक् पचेद्रिय गर्भज पयांप्ता पर्याप्ता, मार्गणा. १६ व्यतर, १० तिर्यग नभक १. ज्योतिषी, १२ देवलोक, किल्विषी ९ वेयक ए८५ पर्याप्ता तथा ५ अनुतर विमान अपर्याप्ता मली ९. ५४क्षयोपशमसमकितनी ४२४९९ पर्याप्ता, ९९ अपर्याप्मा. 1.1 गर्भन मनुष्य पर्याशा, 1.1 वियक पंचद्रिय गर्भन्न पर्याप्तापता, अपांसा मार्गणा गर्भज मनुष्य अपर्याप्ता. अपर्यासा. (सातमीना नहि) कसमकितनी १६०३२ देवलोक, ९ लोकातिक, ९ ३० कर्मभूमिना गर्भन मनुष्य पर्याप्सार तिर्यक् पंचेंद्रिय गर्भज चतुरपदापहेली बीजी, त्रीजीना मार्गणा. यक, ५ अनुत्तर विमान ए ३५ अपर्याप्ता, ६. अकर्मभूमिना पुगलिया पर्याप्ता अपर्याप्ता, पर्याशा तया अपर्याप्ता पर्याप्ता तथा ३५ अपर्यामा गर्भज मनुष्य पर्याप्ता अपर्याप्ता मलीने ७० मलीने .. ५ [११९] ५६ मिश्रसमकितनी १९८१. भुषमपति, १५ पामाधार्मिक, १.१ गर्भज मनुष्य पर्यासा. तिर्यक् पंचक्रिय गर्भज पर्याप्ता. ७ पर्शमा. मार्गणा, १६ व्यंतर, १० तिर्यम् भक, १. ज्योतिषी, १२ देवलोक ) किल्विषी, १ वियक ए ८५ पर्याप्ता. ५७ सामादमसमकितनी । ४००० । ४... भुवनपति, १५ परमाधार्मिक,१०१ गर्भज मनुष्य पर्याता १.११. तिर्यक् पवैद्रिय गर्भज पर्याप्त पर्यादा সা १३ व्यंतर, १० तिर्यग् मक गर्भन मनुष्य अपर्यामा. अपर्याप्ता, ५ तिर्यक पंचेंद्रिय १. ज्योतिषी, १२ देवलोक, ३ संमूर्छिम अपर्याप्ता, ३ विकले किल्विषी, १ प्रेवेयक. ए८५ द्रिय अपर्याप्ता, ३ पृथ्वी अप पर्याप्ता, तथा ८५ अपर्याप्ता प्रत्येक्वनस्पति एत्रण बाद मली ७०० अपर्याप्सा. कुल २१. ५८मिथ्यात्वसमकितनी ५३५१. भुवनपति, १५ परमाधार्मिक, १०१ गर्भज मनुष्य पर्याप्ता, १०१२३ एकेद्रिय पर्यामा अपर्याप्ता, पर्याप्ता, ७ अपाता, मार्गणा १६ व्यतर, २० तिर्यम् जुमक, गर्भज मनुस्य अपर्यामा, १.१ विकलंपिय पर्याप्ता भार्यामा, १० ज्योतिषी. १२ देवलोक, ३ २०.तिय पंचेनिश पर्यात किल्विषी, प्रेवेयक. ए ८५/ अपर्याप्ता. कुल ४४. पर्याप्ता तथा ८५ अपर्याप्ता. संमूर्छिम मनुफ - .

५६झीनी ५९ संज्ञीनी मागणा. ४२४१४ पर्याप्ता, १९ अपर्यासार- . असशीनी मार्गमा १०. गर्भज मनुष्य पर्याप्ता, १११२० तिर्यक् पंचहिय गर्भज पर्याप्ता७ पर्याप्ता, ७ अपांप्ता, गर्मज मनुष्य अपर्याप्ता, अपयाता. १०१ समर्छिम मनुष्य, १.तियक पंचेद्रिय संमाछमें पर्याप्ता अपर्याप्ता, । विकन्द्रिय पर्याप्त अपर्याप्ता, १९ एकेन्द्रिय पर्यामा अपर्यापा, १०१ गर्मज मनुष्य पात, १०/२२ एकेन्द्रिय पर्याप्त अपर्यमा पर्याप्त, ७ अपाता, जाभज मनुष्य अपर्यामा, १.६ विकलेन्द्रिय पर्योहा भामर्याप्तर, संमूर्णिम महाप. २.तिर्यक् पंचेंद्रिय पर्यामा अपर्याप्ता, . ३१ आहारीनी मार्गणा. ५६३९९, पर्याप्ता, पता. sha 4 - (१२/ अनाहारीनी मार्गणा, ३४५९९ अपमा..." १.१ गर्भज मनुष्य अपर्यापा, 1.१११ ए द्रिय अपर्यादा, ३ विकले- अपर्या, समूछि मनूष्य, १५ कर्मभूमि द्रिय अपर्याप्ता, ११ तिर्यक ना गर्भज मनुष्य पुयाता. पंचेंद्रिय अपर्यापा [१२० जीप मगने चव्या पछी जे काणे अवतार ले थे, ने ठेकाणे पहाच्या एटले आहारपर्याप्ति वाया पहेला पचा उत्कृष्टा ३ समया सुधी अमाहाग रहे थे, ते सपर लक्ष्यों अपाता । अने कैवली समुदत करे थे, ते पखत (३) समय अनाहारी रहे . ते उपर लाव्या फर्मभूमिन), गर्भज पर्याप्ता लाण, ११ तम.प्रभा कागति १० धूमप्रभा गति घूमनमा आगति ८ पंकप्रमा गति ७ पकपमा आगति ६ वालुकाप्रभा गति ५ वालुकाप्रभा भागति ४ शर्कराप्रमा गति ३ शकरप्रभा आगति आवयु ते) प्रभामाथी परभवमा रत्नप्रभा गति (ग्न- ११ रत्नप्रभा (रत्नप्रभामा परमवथी आगति गति आगति विषे श्रीगौतमस्वामिनेनम . . . . . . . RA . . . . - . सर्प रहिन रहित ५ १ नर परि- १५ २स्यलचा १५ १५० ८१ बोलनी १५ . . . नारकी मेद १० तेमा ७ पर्याप्ता ७ अपर्याप्ता पृथ्वी+सय ४, अपकाय ४, वनस्पति कायना भेद ६ ते पर्याप्ता अपर्याप्ता महीने ययेला १४ तेजम्काय ४, वायुकाय ४ पर्याता अपर्याप्ता मलीने थयेला भेद विकलेंद्रिय पर्याप्ता अपर्याप्ता मलीने मेद६ जलचरादि संमूर्छिम तिर्यच पर्यासा अपर्यता मलीने भेद १० जलचगदि गर्भज विर्यच पर्याप्ता अपर्याप्ता मलीने भेद १० मनुष्य गर्भज पदर कर्मभूमिन पर्याप्ता अपर्याप्ता मलीने ३० मनुष्य समूर्छिम अपर्याप्ताना भेद १०१ ३० अमर्मभमिना गर्भज मनुष्य पर्याप्ता अपर्याप्ता मलीने भेद ६० ५६ अतद्वापना गर्भज मनुष्य पर्याप्त अपर्याप्ता मलीने भेद ११२ १० भवनपति, १५पर वार्मिक पर्याप्ता अपर्याप्सा मलीने भेद ५० १६ व्यतर, १० तियंगमक पर्याप्ता अपर्याप्ता मलीने मेद ५२ १० ज्योतीपी, १ विरवषी, १ देव- लोक, पर्याप्ता अपर्याप्सा मनी भेद २४ ईशान देवलोक पर्याप्ता अपर्याप्ता मरी भेद २ त्रीजा देवरोक्थी ८ मा देवलोक सुधी ६, ९ लोकातिक, २ किल्बिषी पर्याप्ता अपर्याप्ता मली भेद ३४ छेला ४ देवलोक, १ प्रेवेयक, पर्याप्ता अर्याप्ता मली भेद २६ 'अनुत्ता ण्यांनाअपर्याप्तामली भेद१० सर्व आगति २७१ सर्म गति मेद ५६३ गतागति. १० . . . . . . . . . . . १४ . . . . . . . . १५ । १६ १७१८१९ . . . . ६ -२- . . . [३४] . ८ १ ११ . २ १३ १४ ट . . . . . . . . . . D . . . . ५ १५ १ जलचा १५ ५ ५ . . . . . . . .. १५ क ३ ५९ . . . . १२ तम प्रभा गति १३/नमस्तम प्रभा भागति १४तमस्तम प्रभा गति १५/१०भुवनपति, १५ परमाधार्मिक गति १६/१० मुवनपति, १५ परमावामिक गति १७/१६ व्यनर १० यगतृभक भागति १८१६ व्यतर १० ति- . १५ . 33 . . ३६ . १११ . . . . ५ १५ . २३ . . ฯ . . १९/१-ज्योतिपीदेवलोका १ किरिवषी आगनि २०१०ज्योतिषी, देव- लोक, किविपी गति २१ शान देवलोक आगति १५ . ૧૨ . ५ १५ [१२२] क ५ हिमवत' ५ऐवतरहित " ३ ५ ५ . १५ क . २० २२ ईशान देवलोक गति २३ ६ सहस्त्रार सुधी, / लोकातिक, २ किर ल्विषी आगति २४६ सहवार सुधी लोभतिक, २ किन विषी गति २५/४ टेवलोक छेला, अवेयक, ५ अनुत्तर आगति ११/४ देवलोक छेलार बियक,५ अनुत्तर गति . १५ . . १५ १५ ५ ९ | ११ १४ १३ । १३ ૨૬ १२ १८ ०२४३ वीकाय, ३ ३०१०१, १० . १ . . . - 0 . . . . . ८ १० . . . . . ८ . . . ४८ . . ८ . . १० . . . 0 रजवीकाय, अयूकाय, १४ वन पतिकाय आगति वीकाय, अपूकाय, १४ वनम्पतिकाय गति. २७ तजस्काय आगति ३० तजम्काय गति १४ ३१विक द्रिय आगति १४ ३२ विकलेरिय गति ३३ नियंच समृछिमागति १४ ३४नियंच समूर्छिम गति २ पेली १४ नरक ३५ जलचा गर्भज आगनि १४ ३१ जलचर गर्भज गति १४ ३७ स्थलचा आगति १४ ३८ स्थलचर-गति. 22. . . ३०१०१ ३०१०१) ३०१०१ ३०१०१/ . a . . . ८ १० . ११२ . १० .३४५ . . . ८ . १० . . १२ ७ . ५२ ३४ क . २० ८ ३०१०१ ३०१०१ ६०११२ ३०१०१/ ३०१०१६ ११२ . १० १० . . १२ २५ |२६७ ० ५२१ . . पेले १४ ५२ [१२३] थीचार २५ १० नाक १४ ६ पेले १४ ३५सेचा आगति ८०सेचर गति. ३०१०१ ३०/१०१/ ६.११२ २४ :: ५९ ५२ ૨૪ २ थीत्रण! नाक . २६७ . . . उरपरिमर्प आगति. ४२,उरपरिसपे गति. ३०१०१॥ ३०१०१) ६. ११२ २५ ५. २४ . २-३४ . १० पेलेथी पाच नाक में १. १४ ८ . 0 ४भुजपरिसर्प आगति ४४ भुजपरिमर्प गति. १४ १४ १० १० २५ ५० १२ १४ - ३०१०१ १०११२ ५२ ३४ . . ८ थी नरक 0 समुहिम . १० 10 १० . . १७१ . ४५ मनुष्य आगति १ ३ ८ १ ११ १२ 1३ १४ १७ १८ . ८ . क . . . १७९ ३०,१०१ २५ १ १४१४ १३ २६ ५२ १४ ३४ १० प ५ १५ . ११२॥ . २० . . . . ५२ ४६/मनुष्य समूर्छिम गति ४/१५ कर्मभूमि भागति |r6/१५ कर्मभूमि गति ४/५ हिमवत, ५ऐण्य- वत भागति ५०५ हिमवत, ५ ऐरण्य पित गति ५१/५ इरिवर्ष, ५ रम्यक, ५ देवकुरू,५उत्तरकुरु भागति ५२५ हरिवर्ष, ५ रम्यक, देवकुरु, ५ उत्तर २४ 4 प . . . . २० . . १२४ कुरु गति . ५ २५ . ५/५६अतरद्वीप आगति ५४५६अतरद्वीप गति ५५/तीर्थकर आगति AV.. . १०२ . . . '१ देव १ १५ १३ [१२४] ३८ . लोक . . . ५६त कर गति ५७)चक्रवती आगति . . १मोक्ष - . १ पहेली ११ १ . (५८चक्रवर्ती गति . २ देव २ ८४ लोक वासुदेव मागति . . १ १ ३२ - पहेली बीजी ६.वासुदेव गति ६१ वलदेव आगति . क . . १४ . १ . . २ पहेली बीजी ६२/वरदेव गति . .

३४ । २६०१० १. २] ७ . ६३ किवली मागति. ९ । १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ १७ १८ १९ १० २६ ११ १ १३ ५/१०८ . . १५ . . १५ . . पेलेथी नारनक . . 0 . . ६४ केली गति ६५/माघु आगति. •१मोक्ष ५२७५/ १४ १० १० ३० १०१ . २५ २६ १२ १ १७ १३ पेलेयों पान नाक . . . . . . ६, १४ १ ६६पाधु गनि, ६७प्रावक आगति ६८/आवक गति ६५ पम्यग्हटि आगनि. १० १०१ . . २ १२ . २६ . २६/१० ५२७६ ० ४२ १ ૨ " . . १५ २५ . 0 . . . १४ १० १०१ १२ १ . . mr ५ . . ७० सम्यग्दृष्टि गति. ७१ महष्टि आगति. ७२/मिय्यादृष्टि भागति १४ २५ ६ २ ។ . ५२ २६ २६ २४ १२ १२ ३. |१०१ ३०१०१ २६१० ५/३७१| १३ ५३७१| ७ ८ ६ १० १० ५६ ܩ १७ . [१२५] ८ . . 0 . ८ . ८ ७ . ७३मियादृष्टि गति. १४ । ६ १० ३०१०१ ६० ११२ ५० २४ २ २६ १६ ५३५ ७४ पुरुष आगति. १४ १० २५ २६ १२ १ ५३७१ ७५ पुरुप गति १४ १० ३० १०१ ६० ११२ ५० ५२ २४ २ २६१० ७६खी आगति १४ ३० १०१ ५६ २६ १२ १३ ५३७१/ ७खी गति १२ ३०१०१ ११२ ५० ५२ २४ २६/१० ०५६१ |७|नपुसक भागति. १४ ३० १.१ २५ २६ १२ १ १३ ५२८५ ७९ नपुग गति १० ३०१०१ ६० [११२ ५० ५२ ૨૪ ३४ ०५६३ ८० दिग्दरी आगति १४ १० १० ३०१०१ २५ २६ १२ १३ ८१ विद्रह गr १० ३. १०१ ११. ५० ५० २४ २ 011७३ + गति यी ए स्यिामा मरण पामे नही टेि देवता ९९ आर्याप्ता, नारकी ७ अपर्याप्ता, अकर्मभूमि ३० अपर्याप्ता, अंतपिना ५६ अपर्याप्ता, ए १९२ अपर्याप्त वरथाए मरे नी माटे एटला आगतिमा वर्भवा ने ३७१ ज सेवा ७ ८ पनवणा सूचना वीशमा पदमा कहेली २३ संपदार्नु विवरण. १J२|३|४| ५ |७||११०११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३४२५ बरलप्रभा पृथ्वी शर्कराप्रभा 12 वालुकाप्रमा ९ माथी १२मा सुधी नववेय. पाच अनुना रिमान पहेलु वीजु देवलोक द्वौद्रिय त्रीद्रिग चतुरिदिय तमस्तम प्रमा तमःप्रमा. यंतर ज्योतिषी पृथ्वीकाय अपकाय • • • वनस्पतिकाय • धूमप्रमा वारकाय ...पकप्रभा • तनस्वाय निर्यच . • . . . 0 . . . Lo . . . . 0 . . . . । . . . , . . २१ - . [१२६] . . . २ . . १तीर्थकर यायायायायाय थायथाय धायाथाय चार्या २/चक्रवर्ति थाय यायायायायाया 'थाय थायायायथायथाय ९ ३वासुदेव यायायाय थायथायथायथाय . ६ ४वलदेव शायायाय थाय थाययाय थाय थाय पाय पायथाय १० ५माडलिक थाय थायायायायायायायायाय थायायायायायायायथाय याया याय थाय थाय याय थाय थायाथाय धाय थाय थाय २२ ६सेनापतिग्ल थायथायथाय थाय थाय थाय य यथायथायथाय याय याया . थाय थाय थाय 'याय थाय 'याय थाय थायथाग . (२१ गायापतिग्ल थाय थाय याय थाय थाय थाय थाय थायाथाय पायथाय याय . थाय थयथाय थाय पाय 'थाय थाय पायथाय वाधिकाल थाय थाय थायथायथायथाय) थ यथायथायथायायाय याय . 'थाय याय थाय याय थाय थाय थारथाय धाय . २१ पुरोहितरल. थाय थायायाय थाय य यथाय थायायायायायथायथाय थाया . • थाय याय याय याय याय याय पाय धाय थाय . १०अधरल थाय थाय थाय य य थाय थाय थाय थायथायोथाय याय याय थायथायथाय याय याय थाय याय थाय थाय थाप, . ११गजरल. थाय थाय थाय थाय थाय याय याय थाय थायाथाय यायथाय याय याय याय याय याय याय थाय थाय थाय थाय १२ खीरत्न थायाथायाथाय थायाथायायाय थाय यायाधाय याय यायायाया थाय थाय याय याय,थाय थारथाय थायथाय ० २१ १३ चक्रगल थाय थायाथाय यायथाय थायाथाय याय याय थाय थाय, यायाय थाय १४ १४ छत्ररत्न. थाय थाय यायथायथाय थाय ययाथाय याय थाय याय याय याय थाय १५चमेरल. थाय थाय याय याय याय याय याय याय बाय बाय थाय 'याय थाय थाय १४ १६दंडरल थाय यायथायथायथायायायायाय थायाथाय थायायायायाय याय थाय १७ सङ्करल यीय वायथायथायथाय याय याय याय याय याय याय याय थाय धाय १८ मणिरत्न याय यायथाय यायायाय थाय, थाय थाययाय याय यय याय याय चाय ०१४ १६ काकिणीरत्न. थाय थाय याय याय याय यायायाय याय याय याय थाय थाय थाय याय २०सम्यक्त्व थाय थाय थाय याय थाय थाय याय य य याय याय याय याय याय . थाय याय याय याप बाय पाय धारयायचाय थाय २३ २१देवाविरति. थायायायायायायायायायायाय याय थायथायथायथाय याय . थायथायथाय थाय याय याय याय थायथायथाय २२ २२ सर्वविति थाय थायाथाय थारमाथाय याय यायथायथायथायथाय . थायायाय गाय थाय थाय याय याय,यायथागथाय/२१ २३किवली थायायायायायायाय थायथायथाय यायाथाय थाय . • याय याय थायथायथायायायायाय/१५ एव सर्व पदवी २३/१६ [१५/१३ १२ १११०३२१ २१११९/१९ १९९ १९1१९/१८१८[१८/२३१६/१४|१४ C . . . . . 0 O . . . . .. . . . . . क . . . . . . . . . - . . . । 0 .

[१२७]] सिद्ध द्वार. १ पहेली नरकना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. २ बीजी नरकना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. ३ त्रीजी नरकना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. ४ चोथी नरकना नीकल्या एकसमये ४ सिद्ध थाय. ५ भवनपति देवना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. ६ भवनपति देवीना नीकल्या एकसमये ५ सिद्ध थाय. ७ पृथ्वीना नीकल्या एकसमये ४ सिद्ध थाय. ८ पाणीना नीकल्या एकसमये ४ सिद्ध थाय. ९ वनस्पतिना नीकल्या एकसमये ६ सिद्ध थाय. १० पंचेंद्रिय तिर्यंच गर्मजना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. ११ तिर्थच स्त्रीना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. १२ मनुष्य पुरुषना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. १३ मनुष्य स्त्रीना नीकल्या एकसमये २० सिद्ध थाय. १४ व्यंतर देवना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय, १५ व्यंतरनी देवीना नीकल्या एकसमये ५ सिद्ध थाय. १६ ज्योतिषी देवना नीकल्या एकसमये १० सिद्ध थाय. १७ ज्योतिषी देवीना नीकल्या एकसमये २० सिद्ध थाय. १८ वैमानिक देवना नीकल्या एकसमये १०८ सिद्ध थाय, १९ वैमानिक देवीना नीकल्या एकसमये २० सिद्ध थाय. २. स्वलिंगी सिद्ध थाय तो १०८ सिद्ध थाय. २१ अन्यलिंगी सिद्ध थाय तो १० सिद्ध थाय, २२ गृहस्थालेंगी सिद्ध थाय तो ४ सिद्ध थाय. २३ स्त्रीलिंगे २० सिद्ध थाय. २४ पुरुषलिंगे १०८ सिद्ध थाय, २५ नपुंसकलिंगे १० सिद्ध थाय. २६ ऊर्ध्वलोके ४ सिद्ध थाय. २७ अघोलोके २०-सिद्ध थाय. २८ ति लोके १०८ सिद्ध थाय. २९ उत्कृष्ट अवगाहनावाला एकसमये २ सिद्ध थाय. ३० जघन्य अवगाहनावाला एकसमये ४ सिद्ध थाय.

[१२८] ३१ मध्यम अवगाहनावाला एकसमये १०८ सिद्ध थाय, ३२ समुद्रमा २ सिद्ध थाय. ३३ नदीप्रमुख शेपजलमा ३ सिद्ध थाय. ३४ तीर्थमा १०८ सिद्ध थाय. ३५ अतीर्थमा १० सिद्ध थाय. ३६ तीर्थकर २० सिद्ध थाय. ३७ अतीर्थकर १०८ सिद्ध थाय. ३८ स्वयंवुध ४ सिद्ध थाय.. ३९ प्रत्येकवुध १० सिद्ध थाय. ४० बुद्धवोधि १०८ सिद्ध थाय. ४१ एक सिद्धा ते एकसमये १ सिद्ध थाय. ४२ अनेक सिद्धा ते एकसमये उत्कृष्टा १०८ सिद्ध थाय. ४३ विजय विजय प्रत्ये एकसमये वीश वीश सिद्ध थाय. ४६ भद्रशालवन १, नंदनवन २, सोमनसवन ३, ए त्रणमा चार चार सिद्ध थाय. ४७ पंडकवनमा २ सिद्ध थाय. ४८ अकर्मभूमिमा अपहरणवडे १० सिद्ध थाय. ४९ कर्मभूमिमा १०८ सिद्ध थाय. ५३ पहेले, बीजे, पांचमे, छठे ए चार आरे अपहरणथी १० सिद्ध थाय. ५५ त्रीजे, चोथे ए वे आरे १०८ सिद्ध थाय. ५७ अवसर्पिणी, उत्सर्पिणी ए चेमा १०८ सिद्ध थाय. ५८ नोउत्सर्पिणी नोअवसर्पिणीमा १०८ सिद्ध थाय. ५९ एकथी आरंभीने वत्रीश सिद्ध थाय तो ८ समय सुधी. ६० तेत्रीशथी आरंभीने अडतालीश सुधी सिद्ध थाय तो ७ समय सुधी. ६१ ओगणपचासथी आरंभीने साठ सुधी सिद्ध थाय तो ८ समय सुधी. ६२ एकसठथी आरंभीने पोतेर सुधी सिद्ध थाय तो ५ समय सुधी. ६३ तोतेरथी आरंभीने चोराशी सुधी सिद्ध थाय तो ४ समय सुधी. ६४ पंचाशीथी आरंभीने छन्चु सुधी सिद्ध थाय तो ३ समय सुधी. ६५ सचाणुथी आरंभीने एकसो ने वे सुधी सिद्ध थाय तो २ समय सुधी. ६६ एकसो त्रणथी आरंभीने एकसो आठ सुधी सिद्ध थाय तो १ समय सुधी. ॥ इति सिद्ध द्वार समाप्त ॥

- [१२९] छठा कर्मग्रंथर्नु संक्षिप्त विवरण, गाथा २ मूळ प्रकृतिना बंधमा ४ स्थान-८७६।१। आठनो बंध जघन्य तथा उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त. आयु विनानो सातनो बंध जयन्य अन्तर्मुहर्त अने उत्कृष्ट छ माम ऊणा तेत्रीश सागरोपम पूर्व कोटी त्रिभाग अधिक. छनो बंध उपशम श्रेणिमां दशमे गुणस्थाने जवन्य एक समय अने उत्कृष्ट अंत- मुहर्त ( छनो बंध दशमे गुणस्थानेज छे, अने तेनी स्थिति उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्तनी ज छे.) एकनो बंध जवन्य एक समय ते उपगम श्रेणिमां ११ मे, त्यांथी भवक्षये देवलोकमां जतां अविरति थाय एटले सातनो बंध. एकनो बंध उत्कृष्ट देशोन पूर्व कोटी प्रमाण. जेम कोई जीव गर्भावासे सात माम रही जन्म पानी आठभे वो दीक्षा लई क्षपणश्रेणि मांडी केवळजान पामे. ते सयोगी केवळी पणे देशोच पूर्व कोटि पर्यंत विचरे. हवे कई मूळ प्रकृति आंधतां बंधने आश्रीने केटलां स्थान पामीए, ते कहे छ.- १ आयु बांधता आठेनो बंध होय. २ मोहनी वांवतां आठ अने सातनो बंध होय. ३ ज्ञानावग्ण, दर्शनावरण, नाम, गोत्र अने अंतराय बांधला आठ, सात अने छनो बंध होय. ४ वेदनी बांधतां ८-७-६-१ नो बंध होय. उदय आश्री त्रण प्रकृति स्थान ८-७-४, १ आठनो अमन्य आश्री अनादि अनंत. २ आठनो भव्य आश्री अनादि सांत. ३ आठनो उपशमश्रेणिए चडी पाछो पड़ी धीजीगार चडे, तेने आश्री मादि सांत. ४ सादि अनंत भंग लामे जनहीं. १ आठनो आयु मोहनी युक्त. २ साननो मोहनी विना ११-१२ मे, ते जवन्य एक समय, उन्कृष्ट अंतर्मुहत. ३ चारनो यानि कर्म क्षय करवाथी १३ मे गुणस्थाने. ते जघन्य अंतर्मुहूर्त, अने उन्कृष्ट देगोन पूर्व कोटि पर्यंत. कई कर्म प्रकृतिना उदये केला उदय स्थान पामीए, ते कहे छै.- १ मोहनीना उदये आठनो १० मा गुणस्थान सुधी. २ ज्ञानावरण, दर्शनावरण अने अंतरायना उदय ८ नो अने ७ नो मोहनी न होय त्यारे ११-१२ मे पामीए. , .

गाथा ३ । [१३०] ३ वेदनी, आयु, नाम अने गोत्रना उदय ८-७-४ नो. तेमा ८ नो १० मा गुण- स्थान सुधी, ७ नो ११-१२ मे, ४ नो १३-१४ मे. हवे सत्ताने आश्रीने त्रण स्थान-८-७-४. ८ नी सत्ता अभव्य आश्री अनादि अनंत, भव्यने आश्री अनादि मांत. मोहनी विना ७ नी सत्ता १२ मे गुणस्थाने अंतर्मुहूर्त प्रमाण. चार अवातिनी सत्ता १३-१४ मे गुणस्थाने. कई प्रकृतिनी सत्ताए केटला सत्ता स्थान होय, ते कहे छ.- १ मोहनीनी सत्ता छते आठेनी सत्ता. २ ज्ञानावरण, दर्शनावरण अने अंतरायनी सत्ता छते ८-७ नी सत्ता. तेमा ८ नी ११ मा गुणस्थान सुधी अने ७ नी १२ मे गुणस्थाने. ३ अघाति चार छते ८-७-४ नी सची. हवे बंध, उदय.अने सत्ताना प्रकृति स्थान आश्री संवेध कहे छ.- ८-७-६ विध बंधकमा ८ नो उदय, आठनी सत्ता. ८ विध बंधक सातमा गुणस्थान सुधी, ७ विष बंधक ९ मा सुधी. ६ विवं बंधक १० मा सुधी. अहीं त्रण विकल्प थया, ते नीचे प्रमाणे- १ आठनो बंध, आठनो उदय, आठनी सत्ता. २ सातनो बंध, आठनो उदय, आठनी सत्ता. ३ छनो बंध, आठनो उदय, आठनी सत्ता. एक विध बंधकमा त्रण विकल्प नीचे प्रमाणे.- ४.१ नो बंध, ७ नो उदय, ८ नी सत्ता. ११ मे गुणस्थाने. ५. १ नो बंध, ७ नो उदय, ७ नी सत्ता. १२ मे गुणस्थाने. ६. १ नो बंध, ४ नो उदय, ४ नी सत्ता. १३ मे गुणस्थाने. ७. अबंधक, ४ नो उदय, ४ नी सत्ता. १४ मे गुणस्थाने. मूळ प्रकृरिना संवेध उपर प्रमाणे समजवा. जीवस्थान बंध, उदय अने सत्ता घटावे छे. जीवना १४ स्थानमा पर्याप्त संझी पंचेंद्रिय विना बाकीनां १३जीवस्थानके वे विकल्प, १७ नो-बंध, ८ नो उदय, ८ नी सत्ता. आयु न बांधतो होय त्यारे, २.८ नो बंध, ८ नो उदय, ८ नी सचा. आयु बांधतो होय त्यारे.' गाथा४ २.८ नो बंध, ८ नो उदय, ८ नी सत्ता. । उपर प्रमाणे. [१३१] पर्याप्त संझी पंचद्रिय आश्री ५ विकल्प- '१.७ नो बंध, ८ नो उदय, ८ नी सचा. ३. ६ नो बंध, ८ नो उदय, ८ नी सचा. १० मे गुणस्थाने. ४. १ नो बंध, ७ नो उदय, ८ नी सत्ता. ११ मे गुणस्थाने. ५.१ नो बंध, ७ नो उदय. ७ नी सत्ता. १२ मे गुणस्थानके. केवळी आधी २ विकल्प- १. १ नो बंध, ४ नो उदय, ४ नी सत्ता. १३ मे गुणस्थाने. २. अबंध, ४ नो उदय, ४ नी सचा. १४ मे गुणस्थाने. गाथा ५ गुणस्थाने ७ भंग नीचे प्रमाणे- ३-८-९-१०-११-१२-१३-१४ आ आठ गुणस्थाने एक एक विकल्प. १. ३-८-९ मे ७ नो बंध, ८ नो उदय, ८ नी सत्ता. २. १० मे ६ नो बंध, ८ नो उदय, ८ नी सत्ता. ३. ११ मे १ नो घंध, ७ नो उदय ८ नी सत्ता. ४. १२ मे १ नो बंध, ७ नो उदय, ७ नी सत्ता. ५. १३ मे १ नो बंध, ४ नो उदय, ४ नी सत्ता. ६.१४ में अबंधक, ४ नो उदय, ४ नी सत्ता. १-२-४-५-६-७ आ छ गुणस्थाने बच्चे विकल्प.- आयु बंध काळे ८ नो बंध, आठनो उदय, आठनी सत्ता. आयु अवंध काळे ७ नो बंध, आठनो उदय, आठनी सत्ता. गाथा ६-७ हवे उत्तर प्रकृति आश्री संवेध कहे छ.- ५ ज्ञानावरणीय, ९ दर्शनावरणीय, २ वेदनीय, २८ मोहनीय, ४ आयुष्य, ४२ नाम, २ गोत्र, ५ अंतराय. कुल ९७ प्रकृति छे. नामकर्मना अवांतर मेदो ५१ वधारी तेने मेळा गणतां कुल १४८. बंधमां बंधन संघातन शरीर मेळां जगणवां, वर्णादि चतुष्कनां अवांतर भेद न गणवा, समकित मिश्र मोहनी न-गणवी. एटले ५-५-१६-२ कुल २८ जतां १२० नो बंध. उदयमां २ मोहनी वधारतां १२२. अने सत्तामा घटाडेली २८ मेळवतां कुल १४८. उत्तर प्रकृतिनां बंधादि स्थान. ज्ञानावरणीय अने अंतरायनी पांच पांच उत्तर प्रकृति ध्रुवबंधी होवाथी ते बनमी एक एक ज विकल्प. - ७. । .

[१३२] ५ नो बंध, ५ नो उदय, ५ नी सत्ता. १० मा गुणस्थान सुधी. बंध उपरम पामे छते. अबंध, ५ नो उदय. ५ नी सत्ता. ११-१२ मे गुणस्थाने. गाथा ८ दर्शनावरणीय. बंधने सत्ता आश्री समांनपणे ३ विकल्प. ९-६-४, १ नवनो बंध पहेले बीजे गुणस्थाने. अभव्यने अनादि अनंत, भव्यने अनादि सांत, सम्यक्त्व परितन सादि सांत. जघन्यथी अंतर्मुहूर्त, उत्कृष्टथी देशे ऊगो अपार्थ पुद्गल परावर्त काळ. २ छनो बंध त्रीजाथी आठमा गुणस्थानना पहेला भाग सुधी. जघन्यथी अंत- मुहूर्त, उत्कृष्टथी वे ६६ सागरोपम. मध्यमां मिश्र आववाथी त्यारपछी कोई क्षपकश्रेणि मांडे अने कोई मिथ्यात्वे जाय. ३. ४ नो बंध ८ माना वीजा भागथी १० मा गुणस्थान सुधी. जघन्य एक समय ते ८ माने बीजे भागे पहेले समये उपशमश्रेणि मांडी वीजे समय काळ करी स्वर्गे जाय. उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त. १ नवनी सचा अभव्यने अनादि अनंत, भव्यने अनादि सांत, सादि सांत होय ज नहीं. ते पण उपशमश्रेणि आश्री ११ मा सुधी. क्षपकश्रेणि आश्री ९ माना पहेला भाग सुधी. २ छनी सत्ता ९ मा ना बीजा भागथी १२ माना द्विचरम समय सुधी अंतर्मुहूर्त प्रमाण. ३ चारनी सचा १२ माना चरम समये एक ज समयनी. 'डदय आश्री वे स्थान ४-५. १ चार दर्शनावरण ध्रुवउदयी होवाथी. २ चार दर्शनावरणमां कोई पण एक निद्रा मळे त्यारे पांच थाय. केम मे एकथी वघारे निद्रा उदयमां न होय. तेमज एक पण निरंतर न होय. कदाचित् होय. गाथा ९ हवे संवेध कहे छ.. १. ९ नो बंध, ४ नो उदय, ९ नी सचा. निद्रा न होय त्यारे. २. ९ नो बंध, ५ नो उदय, ९ नी सत्ता. निद्रा होय त्यारे. ३. ६ नो बंध, ४ नो उदय, ९ नी सचा. त्रीजाथी आठमाना ४. ६ नो बंध, ५ नो उदय, ९ नी सचा. प्रथम भाग सुधी. (क्षपकने तो त्रीजो विकल्प ज होय.) ५.४ नो बंध, ४ नो उदय, ९ नी सचा. अपूर्वकरणना बीजा भागथी ६.४ नो बंध, ५ नो उदय, ९ नी सचा. दशमा गुणस्थान सुधी. ।

[१३३] - . ९. अबंध. ५ नो उदय, ९ नी सदर उपशांत (क्षपकने तो पांचमो विकल्प ज होय.) , ७. ४ नो बंध, ४ नो उदय, ६ नी सचा. स्त्यानाच त्रिकनो क्षय करनार क्षपक आश्री नवमा गुणस्थाननो पहेलो भाग गया पछी दशमाना अंत सुधी. हवे अबंधकपणाना ४ विकल्प कहे छ.- ८. अबंधके ४ नो उदय, ९ नी सचा. । मोहे. १०. अबंध. ४ नो उदय, ६ नी सत्ता. १२ मे द्विचरम समय पर्यंत. ११. अबंध. ४ नो उदय, ४ नी सचा. १२ में चरम समये. कोई आचार्य क्षपकमा निद्रानो उदय कहे छे. तेना मते वे विकल्प वधे. १२. ४ नो बंध, ५ नो उदय, ६ नी सचा. १३. अवंध, ५ नो उदय, ६ नी सचा. गाथा १० वेदनीय कर्म. चंधस्थान १ साता के असाता. उदयस्थान १ साता के असाता. सत्तास्थान २ साता, असाता वे, अथवा १, तेनो संवेध नीचे प्रमाणे- १ असातानो बंध, असातानो उदय, सांतां अने असातानी सचा. २ असातानो बंध, सातानो उदय, बन्नेनी सचा. (आ वे विकल्प पहेलाथी छहा सुधी. पछी असातानो बंधे नथी.) : ३ सातानो बंध, असातानो उदय, बन्नेनीसचा. ४ सातानो बंध, सातानो उदय, बन्नेनी सत्ता. (आ वे विकल्प १ ला थी १३ मा सुधी, पछी १४ मे बंधनो अभाव छ.) ५ अबंधक, असातानो उदय, वेउनी सचा. ६.अबंधक, सातानो उदय, वेउनी सचा. (आ वे विकल्प १४ माना द्विचरम समय सुधी. पछी बेमांथी एकनो उदय समांथी क्षय थाय.) ७ अबंधक, असातानो उदय, असातानी सनां. ८ अपंधक. सातानो उदय, मातानी सचा. (आवे विकल्प एक समयनी स्थितिवाळा छ.) - - . .

[१३२] ५ नो बंध, ५ नो उदय, ५नी सत्ता. १० मा गुणस्थान सुधी. बंध उपरम पामे छते. अबंध, ५ नो उदय. ५ नी सत्ता. ११-१२ मे गुणस्थाने. गाथा८ दर्शनावरणीय. बंधने सत्ता आश्री समानपणे ३ विकल्प. ९-६-४. १ नवनो बंध पहले बीजे गुणस्थाने. अभव्यने अनादि अनंत, भव्यने अनादि सांत, सम्यक्त्व परितन सादि सांत. जघन्यथी अंतर्मुहूर्त, उत्कृष्टयी देशे ऊणो अपार्घ पुद्गल परावर्त काळ. २ छनो बंध त्रीजाथी आठमा गुणस्थानना पहेला भाग सुधी. जघन्यथी अंत- मुहूर्त, उत्कृष्टथी वे ६६ सागरोपम. मध्यमां मिश्र आववाथी त्यारपछी कोई क्षपकश्रेणि मांडे अने कोई मिथ्यात्वे जाय. ३. ४ नो बंध ८ माना बीजा भागथी १० मा गुणस्थान सुधी. जघन्य एक समय ते ८ माने बीजे भागे पहेले समये उपशमश्रेणि मांडी चीजे समये काळ करी स्वर्गे जाय. उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त. नवनी सत्ता अभव्यने अनादि अनंत, भव्यने अनादि सांत, सादि सांत होय ज नहीं. ते पण उपशमश्रेणि आश्री ११ मा सुधी. क्षपकवेणि आश्री ९ माना पहेला भाग सुधी. २ छनी सत्ता ९ मा ना बीजा भागथी १२ माना द्विचरम समय सुधी अंतर्मुहूर्त प्रमाण. ३ चारनी सत्ता १२ माना चरम समये एक ज समयनी. उदय आश्री चे स्थान ४-५. १ चार दर्शनावरण ध्रुवउदयी होवाथी. २ चार दर्शनावरणमां कोई पण एक निद्रा भळे त्यारे पांच थाय. केम एकथी वधारे निद्रा उदयमान होय. तेमज एक पण निरंतर नहोय. कदाचित् होय. गाथा ९ हवे संवेध कहे छ.- १. ९ नो बंध, ४ नो उदय, ९ नी सत्ता. निद्रा न होय त्यारे. २. ९ नो बंध, ५ नो उदय, ९ नी सत्ता. निद्रा होय त्यारे. ३. ६ नो बंध, ४ नो उदय, ९ नी सचा. त्रीजाथी आठमाना ४. ६ नो बंध, ५ नो उदय, ९ नी सत्ता. प्रथम भाग सुधी. (क्षपकने तो त्रीजो विकल्प ज होय.) ५.४ नो बंध, ४ नो उदय, ९ नी सचा. अपूर्वकरणना बीजा भागथी ६.४ नो बंघ, ५ नो उदय, ९ नी सचा. दशमा गुणस्थान सुधी.

। मोहे. [२३३ (क्षपकने तो पांचमो विकल्प ज होय.) ७. ४ नो बंध, ४ नो उदय, ६ नी सचा. स्त्यानाई त्रिकनो क्षय करनार क्षपक आश्री नवमा गुणस्थाननो पहेलो भाग गया पछी दशमाना अंत सुधी. हवे अधकपणाना ४ विकल्प कहे छे.- ८. अबंधके ४ नो उदय, ९ नी सचा. । उपशांत ९. अबंध. ५ नो उदय, ९ नी सचा. १०. अबंध. ४ नो उदय, ६ नी सचा. १२ मे द्विचरम समय पर्यंत, ११. अबंध. ४ नो उदय, ४ नी सला. १२ में चरम समये. 'कोई आचार्य क्षपकमां निद्रानो उदय कहे छ. तेना भते के विकल्प वध. १२. ४ नो बंध, ५ नो उदय, ६ नी सना. १३. अबंध, ५ नो उदय, ६ नी सत्ता. गाथा १० वेदनीय कर्म. बंधस्थान १ साता के असाता. उदयस्थान १ साता के असाता.. सत्तास्थान २ साता, असाता वे, अथवा १. तेनो संवेध नीचे प्रमाणे,- १ असातानो बंध, असातानो उदय, सांता अने असातानी सचा. २ असातानो बंध, सातानो उदय, (आ वे विकल्प पहेलाथी छटा सुधी. पछी असातानो बंध नथी.) ३ सातानो बंध, असातानो उदय, बन्नेनीसचा. ४ सातानो बंध, सातानो उदय, वनी सत्ता. (आबे विकल्प १ ला थी १३ मा मुधी, पछी १४ मे बंधनो अभाव छ.) ५ अबंधक, असातानो उदय, वेउनी सचा. ६ अबंधक, सातानो उदय, वेउनी सत्ता. (आबे विकल्प १४ माना विचरम समय सुधी. पछी बेमांथी एकनो उदय सचामांथी क्षय थाय.) ७ अबंधक, असातानो उदय, असातानी सगां.. ८ अबंधक. सातानो उदय, मातानी सचा. (आ वे विकल्प एक समयनी स्थितिवाला छ:) A बन्नेनी सचा.

[१३४] आयुष्य कर्म. बंधस्थान १, एक ज आयुष्य बंधाय, उदयस्थान १. एक गतिर्नु ज आयुष्य वेदाय: सत्तास्थान २. परभवनुं आयुष्य वांध्या पहेलां १, बांध्या पछी २. हवे संवैध कहे छे.- आयुकर्मनी ३ अवस्था. १ नवा आयुना बंधकाळनी पूर्व अवस्था. २ नवा आयुना बंधकाळनी अवस्था. ३ नधुं आयु वांध्या.पछीनी अवस्था. नरक गति आश्री ५ विकल्प. १ अबंध काळे, नरकायु उदय, नरकायु सत्ता. १ थी ४ गुणस्थान सुधी. बंध काळे. २ तिर्यगायु नंध, नरकायु उदय, तिर्यग नरकायु सचा. पहेले तथा बीजे गुण- स्थाने आ विकल्प जाणवो. ३ मनुप्यायु बंध, नरकायु उदय, नारक नरायु सचा, १-२-४ गुणस्थाने. बंधोचर काळे. ४ अबंध, नरकायु उदय, तिर्यग् नरकायु संचा. पहेलेथी चोथा सुधी. आयु बंध कर्या पछी त्रीजे चोथे गुणस्थाने जवानो संभव होवाथी. ५ अबंध, नरकायु उदय, नर नारकायु सचा. आ विकल्प प्रथमना चार गुणस्थाने. आज प्रमाणे देवायु संबंधी ५ विकल्प जाणवा. हवे तिर्यगायुना ९ विकल्प कहे छे.-- १ अबंध काळे, तिर्यगायु उदय, तियंगायु सत्ता. पहेला पांच गुणस्थाने, बंध काळे. २ नरकायु बंध, तिर्यगायु उदय, नारक तिर्यगायु सत्ता पहेले गुणस्थाने. ३ तिर्यगायु बंध, तिर्यगायु उदय, तिर्यक तिर्यगायु सचा. ४ नरायु बंध, निर्यगायु उदय, नर.तिर्यगायु सत्ता. १-२ गुणस्थाने. ५ देवायु बंध, तिर्यगायु उदय, देवतिर्यगायु सत्ता. १-२-४-५ गुणस्थाने. बंधोत्तर काळे, ६ अबंधक, तिर्यगायु उदय, तिर्यक् तिर्यगायु सत्ता. १ थी ५ गुणस्थान सुधी. केमके आयु बांध्या पछी २-३-४-५ मे जवानो संभव छ, तेथी. ७ अबंधक, तिर्यगायु उदय, तिर्यगायु मनुष्यायु सत्ता. ८ अबंधक, तिर्यगायु उदय, देवतिर्यगायु सत्ता. -- ९ अबंधक, तिर्यगायु उदय, नरक तिर्यगायु सचा. (आ छेल्ला ३ विकल्प पहेलेथी पांचमा गुणस्थान सुधी होय.) नरायुना विकल्प नीचे प्रमाणे ९. १ अबंध काळे नरायु उदय, नरायु सत्ता. पहेलेथी चौदमा गुणस्थान सुधी. बंध काळे. २ नारकायु बंध, नरायु उदय, नारक नरायु सचा. पहेले गुणस्थाने. ३ तिर्यगायु बंध, नरायु उदय, तियंग नरायु सत्ता. पहेवे बीजे गुणस्थाने. ४ नरायु बंध, नरायु उदय, नर नरायु सचा. पहेले बीजे गुणस्थाने. ५ देवायु बंध, नरायु उदय, देव नरायु सत्ता. ७ मा गुणस्थान सुधी. बंघोचर काळे. ६ अबंधक, नरायु उदय, नरक नरायु सचा. पहेलाथी सातमा गुणस्थान सुधी. ७ अबंधक, नरायु उदय, तिर्थग नरायु सचा. पहेलेथी सातमा सुधी. ८ अबंधक, नरायु उदय, नर नरायु सचा. पहेलेथी सातमा सुधी. ९ अबंधक, नरायु उदय, देव नरायु सचा. अगीयारमा गुणस्थान सुधी. केमके देवायु बांध्या पछी पण उपशमश्रेणिनो संभव छ तेथी. कुल आयु कर्मना विकल्प २८ थया. (५-५-९-९) गोत्र कर्म. बंधस्थान १. उंच के नीचनो बंध होय. उदयस्थान १. उंच के नीचनो उदय होय. सनास्थान २, बनेनी सचा होवाथी एक भंग. अने तेजस्काय तथा वायुकायमां नीच गोत्र ज, सत्तामा होवाथी तथा अयोगी द्विचरम समये नीच गोत्रनो क्षय थवाथी चीजो मंग. हवे संवेध कहे छे. १ नीचनो बंध, नीचनो उदय, नीचनी सत्ता. तेजस्काय तथा वायुकाय अने तेमांथी नोकळ्या पछी केटलाक काळ सुधी एकेंद्रिय, विकजेंद्रिय अने तिर्यच पंचेंद्रियमां पण लामे. २ नीचनो वंध, नीचनो उदय, उंच नीचनी सचा. ३ नीचनो बंध, उंचनो उदय, उंच नीचनी सचा (आ वे विकल्प पहेले बीजे गुणस्थाने होय, त्रीजाथी नीच गोत्रना बंधनो अमाव. छे. ४ उंचनो बंध. नीचनो उदय. वेनी सचा. १ थी ५ गुणस्थान सुधी. त्यार पछी नीच गोत्रना उदयनो अभाव छे. .

[१३६] ५ उंचनो बंध, उंचनो उदय, वेनी सचा. १ थी १० गुणस्थान सुधी. पछी बैंधनो ज अभाव छे. ६ बंधाभाव, उंचनो उदय, वेनी सचा. ११ थी १४ माना द्विचरम समय सुधी. ७ बंधाभाव, उंचनो उदय, उंचनी सचा. १४ मानी चरम समो ज. (कुल गोत्र कर्म आश्री ७ विकल्प थया.) गाथा ११ मोहनी कर्म. बंघस्थान १० (२२-२१-१७-१३-९-५-४-३-२-१). १ मिश्र मोहनी, समकित मोहनीनो बंध न होवाथी ते बे, हास्य ने रति, अगति ने शोक, ए वे युगलमांथी एक वखते एक युगलनो बंध होवाथी ते वे, त्रणे वेदमांथी एक वखते एकनो ज बंध होवाथी बाकीना वे-एटले सर्व मळी ६ बाद थवाथी वधारेमां वधारे एक काळे २२ नो बंध मिथ्यात्व गुणस्थाने होय. २ मिथ्यात्वनो बंध टळवाथी २१ नो बंध वीजे गुणस्थावे. ३ अनंतानुबंधी ४ जवाथी १७ नो बंध त्रीजे चोथे गुणस्थाने. ४ अप्रत्याख्यानी ४ जवाथी १३ नो वंध पांचमे. ५ प्रत्याख्यानी ४ जवाथी ९ नो बंध ६-७-८ मे. ६ हास्य, रति, भय, जुगुप्सा जवाथी ५ नो बंध नवमाने पहेले मागे. ७ पुरुष वेदनो घंध टळवाथी ४ नो बंध नवमाने बीजे मागे. ८ संज्वलन क्रोध जवाथी ३ नो बंध नवमाने त्रीजे भागेः ९ संज्वलन मान जवाथी २ नो बंध नवमाने चोथे भागे. १० संज्वलन माया जवाथी १ नो बंध नवमाने पांचमे मागे, बादर संपराय बिलकुल जबाथी अबंधक: गाथा १२ हवे उदय स्थान ९ कहे छ.-- (१-२-४-५-६-७-८-९-१०), नवमा गुणस्थानकथी पश्चानुपूर्वीए विचारवा. चार बोकडीमांथी एक एक ज उदयमा होवाथी बाकी, १२ रहे. त्रण वेदमांथी एकनो ज उदय होवाथी बाकी २ रहे. हास्य, रति, अरति, शोकमांथी एक युगलनोज उदय होवाथी बाकी २ रहे. त्रण दर्शनमोहनीमाथी एक ज उदयमां होवाथी बाकी.२ रहे. कुल १८ जवाथी उदयमां वधारेमां वधारे १० होय. १ संज्वलनमाथी एकनो उदय होय त्यारे १.तुं उदयस्थान, २त्रण वेदमांथी एकनो प्रक्षेप करीए न्यारे २ र्नु.उदयस्थान, A . -1. . -- । .

[१३७] ३ युगलमाथी हास्य रतिनो प्रक्षेप करवाथी ४ र्नु उदयस्थान. ४ भयनो प्रक्षेप करवाथी ५. ५ जुगुप्सानो प्रक्षेप करवाथी ६. ६ प्रत्याख्यानावरणमाथी १ नो प्रक्षेप करवायी ७. ७ अप्रत्याख्यानावरणमाथी १ नो प्रक्षेप करवाथी ८. ८ अनंतानुबंधीमाथी १ नो प्रक्षेप करवाथी ९. ९ मिथ्यात्वनो प्रक्षेप करवाथी १० 7 उदयस्थान. आतुं विशेष वर्णन आगळ आक्शे. गाथा १३-१४ सत्तास्थान १५. (२८-२७-२६-२४-२३-२२-२१-१३-१२-११-५-४-३-२-१). १ सर्व प्रकृति सचामा होय त्यारे २८, २ समकित मोहनी जतां २७. ३ मिश्र मोहनी जतां तथा अनादि मिथ्यात्वीने पण २६. ४ अहावीशनी सत्तामांथी अनंतानुबंधी ४ जता २४. ५ मिथ्यात्व मोहनी जतां २३. ६ मिश्र मोहनी जतां २२. ७ सम्यक्त्व मोहनी जता २१. ८ अप्रत्याख्यानी ४ तथा प्रत्याख्यानावरणी ४ ए८ जतां १३. ९ नपुंसकवेद जतां १२. १० स्त्रीवेद जतां ११. ११ हास्यादि ६ जतां ५. १२ पुरुषवेद जतां ४. १३ संज्वलन क्रोष जतां ३, १४ संज्वलन मान जता २. १५ संज्वलन माया जतां १. गाथा १५ संज्वलन लोभ जतां सत्ता शून्य. आनो संवेष करतो घणा भंग थाय छ, ते जाणवा माटे बंधस्थानना भंग कहे छे. प्रथम २२ ना बंधमां ६ विकल्प आ प्रमाणे:- १६ कपाय, १ त्रण.वेदमांथी एक, २ वे युगलमांथी एक, २ भय तथा जुगुप्सा, तथा १ मिथ्यात्व. कुल २२. त्रण वेद संबंधी प्रण विकल्पने हास्य रति के अरति शोक रुप वे युगल साथे गु- णतां ६ विकल्प - .

[१३६] ५ उंचनो बंध, उंचनो उदय, वेनी सचा. १ थी १० गुणस्थान मुधी. पछी बंधनो ज अभाव छै. ६ बंधाभाव, उंचनो उदय, वेनी सचा. ११ थी १४ माना द्विचरम समय मुधी. ७ बंधाभाव, उंचनो उदय, उंचनी सत्ता. १४ मानी चरम समये ज. (कुल गोत्र कर्म आश्री ७ विकल्प थया.) गाथा ११ मोहनी कर्म. बंधस्थान १० (२२-२१-१७-१३-९-५-४-३-२-१). १ मिश्र मोहनी, समकित मोहनीनो बंध न होवाथीने वे, हास्य ने रति, अति ने शोक, ए वे युगलमांथी एक वखते एक युगलनो बंध होवाथी ते वे, त्रण वेदमांथी एक बखते एकनोज बंध होवाथी चाकीना वे-एटले मर्व मळी ६ बाद थवाथी वधारेमां वधारे एक काळे २२ नो बंध मिथ्यात्व गुणस्थाने होय. २ मिथ्यात्वनो बंध टळवाथी २१ नो वंध बीजे गुणस्थावे. ३ अनंवानुबंधी ४ जवाथी १७ नो बंध त्रीजे चोथे गुणस्थाने. ४ अप्रत्याख्यानी ४ जवाथी १३ नो बंध पांचमे. ५ प्रत्याख्यानी ४ जवाथी ९ नो बंध ६-७-८ मे. ६ हास्य, रवि, मय, जुगुप्सा जवाथी ५ नो बंध नवमाने पहेले भागे. ७ पुरुष वेदनो बंध टळवाथी ४ नो बंध नवमाने वीजे भागे. ८ संज्वलन क्रोध जपाथी ३ नो बंध नवमाने त्रीजे भागेः ९ संज्वलन मान जवाथी २ नो बंध नवमाने चोथे भागे. १० संज्वलन माया जवाथी १ नो बंध नवमाने पांचमे भागे, बादर संपराय विलकुल जवाथी अवंधक. गाथा १२ हवे उदय स्थान ९ कहे छ.-- (१-२-४-५-६-७-८-९-१०), नवमा गुणस्थानकथी पश्चानुपूर्वीए विचारवा. चार बोकडीमांथी एक एक ज उदयमा होवाथी वाकी, १२ रहे. त्रण वेदमांथी एकनो ज उदय होवाथी बाकी २ रहे. हास्य, रति, अरति, शोकमांथी एक युगलनोज उदय होवाथी बाकी २ रहे. त्रण दर्शनमोहनीमांथी एक ज उदयमा होवाथी वाकी २ रहे.. कुल १८ जवाथी उदयमां वधारेमां वधारे १० होय. १ संज्वलनमाथी एकनो उदय होय त्यारे १ नुं उदयस्थान. २ त्रण वेदमांथी एकनो प्रक्षेप करीए न्यारे २ नुं उदयस्थान. - [१३७] ३ चे युगलमाथी हास्य रतिनो प्रक्षेप करवाथी ४ र्नु उदयस्थान. ४ भयनो प्रक्षेप करवाथी ५. ५ जुगुप्सानो प्रक्षेप करवाथी ६. ६ प्रत्याख्यानावरणमांथी १ नो प्रक्षेप करवाथी ७. ७ अप्रत्याख्यानावरणमाथी १ नो प्रक्षेप करवाथी ८. ८ अनंतानुगंधीमाथी १ नो प्रक्षेप करवाथी ९. ९ मिथ्यात्वनो प्रक्षेप करवाथी १०१ उदयस्थान. आनु विशेष वर्णन आगळ आवशे. गाथा १३-१४ सत्तास्थान १५. (२८-२७-२६-२४-२३-२२-२१-१३-१२-११-५-४-३-२-१). १ सर्व प्रकृति ससामा होय त्यारे २८. २ समकित मोहनी जतां २७. ३ मिश्र मोहनी जतां तथा अनादि मिथ्यात्वीने पण २६. ४ अहावीशनी सत्तामांथी अनंतानुबंधी ४ जतां २४, ५ मिथ्यात्व मोहनी जतां २३. ६ मिश्र मोहनी जतां २२. ७ सम्यक्त्व मोहनी जतां २१. ८ अप्रत्याख्यानी ४ तथा प्रत्याख्यानावरणी ४ ए ८ जतां १३. ९ नपुंसकवेद जतां १२. १० स्त्रीवेद जतां ११. ११ हास्यादि ६ जतां ५. १२ पुरुषवेद जतां ४. १३ संज्वलन क्रोष जतां ३, १४ संज्वलन मान जतां २. १५ संज्वलन माया जतां १. गाथा १५ संज्वलन लोभ जतां सत्ता शून्य. आनो संवेध करतां घणा भंग थाय छे, ते जाणवामाटे बंधस्थानना भंग कहे छे. प्रथम २२ ना बंधमा ६ विकल्प आ प्रमाणे:- १६ कपाय, १ जण वेदमांथी एक, २ वे युगलमांथी एक, २ भय तथा जुगुप्सा, तथा १ मिथ्यात्व. कुल २२. त्रण वेद संबंधी त्रण विकल्पने हास्य रति के अरति शोक रुप वे युगल साथे गु- पता ६ विकल्प, - A- - [१३८] मिथ्यात्व विना २१ ना बंधमा ४ विकल्प.- २१ नो बंध सासादने होय. त्यां नपुंसक वेद बंधा न होबाथी के वेद अने वे युगल साथे गुणतां ४. अनंतानुबंधी ४ विना १३ ना बंधयां २ विकल्प. १७ नो बंध त्रीजे चोये गुणस्थाने होवाथी त्या स्त्रीवेदनो बंध नथी, एटले स्त्री- वेदना बंधन कारण अनंतानुबंधी छे, ते त्यां नथी, तेथी एक पुरुष वेदने वे युगल साथे गुणतां २. अप्रत्याख्यानी ४ विना १३ ना बंधमा २ विकल्प.- १३ नो बंध पांचमे गुणस्थाने होय. त्यां पुरुष वेद एकनो ज बंध होवाथी हास्यादि वे युगल साथे गुणतां २. प्रत्याख्यानी ४ जतां ९ नो बंध ६-७-८ मे गुणस्थाने छे. तेमा छठे वे युगल होवाथी २ विकल्प. सातमे अने आठमे अरति शोक वंधमां न होबाथी एक विकल्प. हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, ए चार जतां ५ ना बंधमां १ विकल्प.. तेज प्रमाणे ४-३-२-१ ना बंधमा एक एक विकल्प. कुल २१ विकल्प छै. हवे २२ विगेरे बंधन काळमान कहे छे.- २२ नो बंध अभव्यने अनादि अनंत, भव्यने अनादि सांत, सम्यक्त्वथी परितने जघन्यथी अंतर्मुहूर्त अने उत्कृष्टथी देशोन अर्ध पुद्गळ परावर्त, होवाथी सादि सांत. २१ नो बंध बीजे गुणस्थाने. जघन्य १ समय, उत्कृष्ट ६ आवळीका. १७ नो बंध चोथे. जघन्य अंतर्मुहूर्त. उत्कृष्ट ३३ सागरोपमथी अधिक एटले अनुचर सुर चवीने मनुष्य थया पछी देशविरति के सर्वविरति न पामे त्यां सुधी. १३ नो बंध पांचमे, जघन्य अंतर्मुहूर्त. उत्कृष्ट देशोन पूर्व कोटि, ९ नो बंध पण देशोन पूर्वकोटि. छठे सातमे. ५-४-३-२-१ नो बंध जघन्य एक समय. ते कोई जीव उपशम श्रेणि मांडी बीजे समये काळ करी देवता थाय, त्यां चोथे गुणस्थाने आवतां १७ नो बंध करे ते आश्रीने जाणवो. उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त. पाथा १६-१७ हवे २२ विगेरेबंधस्थानमा उदय स्थान केटला होय, ते कहे छे. २२ ना बंघमा ४ उदय स्थान ७-८-९-१०, १ मिथ्यात्व, ३ अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलन क्रोधादि. १ त्रणमांथी एक वेद, २ वे युगलमांथी एक युगल. कुल ७. आना मांगा २४ थाय. ते [१३९] आ प्रमाणे-बे युगलने त्रण वेदे गुणतां ६, तेने ४ क्रोधादिके गुणतां २४. आ सातना उदयमा एक चोवीशी थई. ७ 'मां भय, वा जुगुप्सा. वा एक अनंतानुबंधी नाखता ८ ना उदयमा उपर प्रमाणे गुणतां त्रण चोवीशी जुदी जुदी थाय. ७ ना उदयमां भय अने जुगुप्सा, वा मय अने अनंतानुचंधी, वा जुगुप्सा अने अनंतानुबंधी, एम वे वे नाखतां ९ ना उदययां पण उपर प्रमाणे विचारतां त्रण चोवीशी थाय. ७ ना उदयमां भय, जुगुप्सा अने अनंतानुबंधी एत्रणे क्षेपवतां १० ना उदयमां 'एक चोवीशी श्राय. कुल २२ ना बन्धमा उदय आश्री ८ चोवीशी थई. २१ ना बन्धमा उदय आश्री ३ विकल्प ७-८-९. ४ प्रकारमाथी एक एक कषाय, १ त्रण वेदमांथी एक वेद, २ एक युगल, आ ७ मां पण पूर्व रीते एक चोवीशी. ७ ना उदयमां भय के जुगुप्सा नांखवाथी आठना उदयमा बे चोवीशी. ७ ना उदयमां भय अने जुगुप्सा बन्ने नाखवाथी नवना उदया १ चोवीशी, कुल २१ ना बन्धमा ४ चोवीशी थई. (एकवीशनो बन्ध सासादने होय, तेना बे भेद-श्रेणि पतित तथा समकित पतित. तेमां श्रेणिगतने माटे तो उपर प्रमाणे भेद थाय, श्रेणिगतमां पण वे वात छे. एक आचार्य कहे छ के अनंतानुबन्धीनो उपशम करी श्रेणिए चढे. तेने मते तो श्रेणिथी पडतां सासादने आवे त्यारे उपर प्रमाणे भेद थाय. बोजा आचार्य कहे छे के अनंतानुबंधीनो तो क्षय कर्या पछी ज उपशम श्रेणि मंडाय. तेने मते तो ते प्राणी श्रेणिथी पडतो सासादने न आवे. तेथी तेने आश्री उपर प्रमाणे भेद न थाय.) १७ ना बन्धमा ४ उदयस्थान ६-७-८-९, १७ नो बन्ध त्रीजे चोथे गुणस्थाने होय. तेमां त्रीजाने त्रण उदयस्थान ७-८-९, ३ जातिनो कषाय एक एक, १ वेद, २ युगल, १ मिश्र मोहनी, आ सातना उदयमां पूर्ववत् १.चोवीशी. ७ मां भय वा जुगुप्सा क्षेपवाथी ८ ना उद्यमा २ चोवीशी. ७ मां भव अने जुगुप्सा वन क्षेपवाथी ९ ना उदयमा १ चोवीशी.

[१४०]] कुल १७ ना बन्धमा त्रीजा गुणस्थानने आश्री ४ चोवीशी थई. चोथे गुणस्थाने ४ उदयस्थान ६-७-८-९. उपशम समकिती तथा क्षायिक समकितीने ६ नो उदय.-३ कपाय, १ वेद, युगलनी. तेनी चोवीशी. ६ ना उदयमा भय के जुगुप्सा के समकित मोहनी क्षेपवाथी ७ ना उदयमां त्रण चोवीशी. ६ ना उदयमा भय अने जुगुप्सा वा भय अने समकित मोहनी वा जुगुप्सा अने समकित मोहनी क्षेपवता ८ ना उदयमा त्रण चोवीशी. ६ ना उदयमा भय, जुगुप्सा अने समकित मोहनी त्रणे क्षेपवतां ९ ना उदयमा एक चोवीशी. कुल चोथा गुणस्थान आधी ८ चोवीशी. कुल १७ ना बन्धमा १२ चोवीशी थई. १३ ना बन्धमा उदय आश्री ४ विकल्प ५-६-७-८. २ प्रत्याख्यान संज्वलन क्रोधादि, १ वेद, २ युगल. कुल पांचना उदयमा एक चोबीशी. ५ ना उदयमा भय के जुगुप्सा केसमकित मो०क्षेपवतां ६ ना उदयमा ३ चोवीशी. ५ ना उदयमा भय अने जुगुप्सा वा भय अने समकित मोहनी वा जुगुप्सा अने समकित मोहनी नाखतां ७ ना उदयमा ३ चोवीशी. ५ना उदयमा भय, जुगुप्सा अने समकित मो०क्षेपवतां ना उदयमा एक चोवीशी. कुल १३ ना बन्धमा ८चोवीशी. ९ ना बन्धमा प्रमत्त गुणस्थाने उदय आश्री ४ स्थान ४-५-६-७. १ कपाय, १ वेद, २ युगळ. आ चार आश्री १ चोवीशी. ४ मा भय के जुगुप्सा के समकित मोहनी क्षेपवतां ५ ना उदया ३ चोवीशी. ४ मां भय अने जुगुप्सा के भय अने समकित मोहनी के जुगुप्सा अने सम- कित मोहनी क्षेपवता ६ ना उदयमा ३ चोवीशी. ४ मा भय, जुगुप्सा अने समकित ए ऋणे क्षेपवतां ७ ना उदयमा एक चोवीशी. कुल ९ ना बन्धा ८ चोवीशी थई. ५ ना बन्धा १ उदयस्थान-२ नु. १ कपाय, १ वेद. तेना त्रण वेद अने चार कपाये गुणतां १२ भंग, ४-३-२-१ ना बन्धमा एक उदयस्थान-१ न.

-- [१४१] संचलन ४ मांयी गमे ते एक कपायनो उदय होवाथी ४ ना वन्धमा चार भंग थाय. कोई आचार्य त्यां पण एक वेदनो उदय कहे छ, तेथी तेने मते त्रण वेदे गुणतां १२ भंग थाय. कुल २ ना उदयमा २४ भंग. गाथा १८. ३ ना वन्धमा उदयस्थान १. तेना मंग ३. २ ना बन्धनां उदयस्थान १. तेना भंग २. १ना बन्धमा उदयस्थान १. तेनो भंग १. अवन्धक पणामां पण दशमे उदयस्थाने १ संज्वलन लोभ सूक्ष्म किट्टीकृतने वेदवा रूप होय ११ मे गुणस्थाने उदय पण नष्ट थया छतां कषायर्नु उपशांत- पणुं होबाथी सत्तामा रहेला होय छे, ते प्रसंगे कयु. वाकी एकली सत्ता होवाथी संवेधा तेनी जरूर नथी. गाथा १९. हवे १० थी १ सुधीना उदयस्थानमा केटला भंग संभवे, ते वतावे छे.- १० ना उदयमा १ चोवीशी. ६ ना उदयमां ७ चोवीशी. ९ ना उदयमा ६ चोवीशी. ५ ना उदयमा ४ ८ ना उदयमा ११ चोवीशी. ४ ना उदयमां १ ७ ना उदयमा १० ॥ कुल ४. चोवीशी २ ना उदयमा १ चोवीशी मतांतर साथे १ ना उदयमा ११ भंग छुटा गाथा २०, ४१ चोवीशी होवाथी तेने २४ शे गुणतां ९८४ थाय. तेमां ११ मेळवतां ९९५ थाय. आ उदय आधी चोवीशीना भंग थया. हवे जेटली प्रकृतिनो उदय छे, ते आधी गुणतां पद संख्या नीचे प्रमाणे थाय १० ने एके गुणतां १०. ६ ने साते गुणतां १२. ९ ने छए गुणतां ५४. ५ ने चारे गुणतां २०. ८ ने अग्यारे गुणतां ८८. ४ ने एके गुणतां ४ ७ ने दो गुणतां ७०. २ ने एके गुणतां २. आ २९० ने चोवीशे गुणतां ६९६० थाय. तेमां छुटा ११ भंग क्षेपवतां ६९७१ थाय. आ प्रमाणे मंग तो मतांतर प्रमाणे ४ ना गंधमां पण एक वेदनो उदय गणतां थाय पण ते १२ मंग काढी नाखीए तो उदयना भंग ९८३ थाय, अने तेना पदमांथी मतांतरनी एक चोवीशीना २४ काढी नाखता ६९४७ पदसंख्या थाय. १० नो उदय. चोवीशी १ (२२ ना बंधमां), ९ नो उदय. चोवीशी ६. ७ नो उदय. चोवीशी १०. चोवीशी ३ (२२ ना धर्मा), चोवीशी १ (२२ ना बंधा). . - [१४२]] चोवीशी ? (२१ ना बन्धमा). चोवीशी १ (२१ ना बन्धमां) चोर्वाशी १ (१७ ना बन्धमा, बीजे). चोवीशी १ (१७ ना बन्धमां, बीजे). चोवीशी १ (१७ ना बन्धमां, चोथे) चोवीशी ३ (१७ ना बन्धमां, चोथे). ८ नो उदय. चोवीशी ११. चोवीशी ३ (१३ ना बंधमा), चोवीशी ३ (२२ ना अंधमा) चोवीशी १ (९ ना बंधमां) चोवीशी २ (२१ ना पंधमा) ६ नो उदय. चोवीशी ७. चोवीशी २ (१७ ना बंधभां, बीजे), चोवीशी १ (१७ ना बंधमां, चोथे). चोवीशी ३ (१७ ना बंधमां, चोथे). चोवीशी ३ (१३ ना बंधा). चोवीशी १ (१३ ना बंधा). चोवीशी ३ (९ ना बंधा). ५ नो उदय. चोवीशी ४. चोवीशी १ (१३ ना बंधमां). चोवीशी ३ (८ ना बंधमा). ४ नो उदव. चोवीशी १ (९ ना बंधमां). २ नो उदय. चोवीशी १ (५-४ ना बंधमा मतांतरे). १ नो उदय. छुटक भंग ११. ४ ना बंधमां ४, ३ ना बंधमा ३, २ ना बंधमा २, १ ना बंधमां १, अबंधकमां १. गाथा २१ आ प्रमाणे उदय अने तेना भंग जघन्य एक समय अने उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त होय छे. कारण के ४ थी १० सुधीना उदयमां कोई एक वेद के एक युगल होय छ, तेथी जरूर अंतर्मुहर्ते ते पलटाय छे. बेनो उदय अने एकनो उदय तो प्रगटपणे अंतर्मुहूर्तनो ज छै. आ प्रमाणे विवक्षित उदयमा के भंगमा एक समय रहीने बीजे समये गुणस्था- नांतर थाय, त्यारे तो अवश्य बंधस्थानना भेदथी, गुणस्थानना भेदथी या स्वरूपथी उदयांतर अने भंगांतरमा जाय छे. तेथी सर्वे उदय अने सर्वे भंग जवन्य एक समयना छे. गाथा २२ आ प्रमाणे बंघस्थान साथे उदयस्थाननो संवेध कहो. हवे सत्तास्थान साये संवेध कहे छे. २२ ना बंधमांत्रण सत्तास्थान-२८-२७-३६. २२ नो बंध मिथ्याष्टिने होय छे, तेने उदयस्थान चार छ-७-८-९-१०, ७ ना उदयमा एक ज सचास्थान २८ नुं छे.(अनंतानुबंधी उदयमां न होवाथी) ८ ना उदयमांत्रण सत्तास्थान-२८-२७-२६. अनादि मिथ्यात्वीने पण ३६. ९ ना उदयमा ३ सचा स्थान-२८-२७-२६. (८ अने ९ मा अनंतानुबंधीना उदय विनानाने तो २८ नु ज सत्तास्थान अने तेना उदयशाळाने त्रण सनास्थान.)

. . [१४३] १० ना उदयमांत्रण सत्तास्थान-२८-२७-२६उदयमा अनंतानुबंधी अवश्य होवाथी २१ ना बंधमां एकज सत्तास्थान २८ नुं. २१ ना बंधमा उदयस्थान ३ (७-८-९) ते त्रणेमां सम्यक्त्व गुण वडे मिथ्यात्व शुद्ध करेल होवाथी तेनी त्रणे प्रकृति सचामां पामीए तेथी २८. (२१ नो बंध बीजे गुणस्थाने ज होवाथी.) १७ ना बंधमा ६ सत्ता स्थान-२८-२७-२४-२३-२२-२१. १७ नो बंध त्रीजे तथा चोथे गुणस्थाने होय छे. तेमां त्रीजा गुणस्थानवाळाने ३ उदयस्थान होय छ-७-८-९. तथा चोथा गुणस्थान वाळाने ४ उदयस्थान होय छे-६-७-८-९. ६ ना उदयवाळा उपशम समकितीने वे सत्तास्थान-२८-२४. समकित प्राप्ति काळे २८. उपशम श्रेणिथी पडतां उपशांत अनंतानुबंधीवाळाने २८. अने उद्वलित अनंतानुबंधीवाळाने सत्तामा २४. तथा क्षायिक समकितीने २१ नुं ज सत्तास्थान होय छे. केमके ससकनो क्षय छे. कुस ६ ना उदयमा त्रण सना स्थान छ-२८-२४-२१. ७ ना उदयमां मिश्रष्टिने सत्तास्थान त्रण छ-२८-२७-२४. जे २८ नी सचा- वाळो त्रीजु गुणस्थान पामे, तेने तो २८ नी सचा. परंतु जे मिथ्याष्टिए सम- कित मोहनी उद्वलित करी होय, मिश्र न करी होय त्यां सुधी तेने २७ नी सत्ता. अने जे पूर्वे समकिती छतो अनंतानुबंधीनी विसंयोजना करी पछी मिश्रे जाय तेने २४ नी सत्ता. तेवा जीव चारे गतिमां पामीए. चोथा पांचमा अने छठा गुणस्थानवाळा जीव अनंतानुबंधीनी विसंयोजना कर्या पछी परिणामना वशथी बीजे गुणस्थाने आवे तेने आश्रीने २४ छे. ७ ना उदयमां चोथा गुणस्थान वाळाने ५ सत्तास्थान-२८-२४-२३-२२-२१. तेमा २८ तथा २४ नी सत्ता उपशमवाळाने के क्षयोपशमवाळाने. पण २४ नी सत्ता तो अनंतानुबंधीनी विसंयोजना कर्या पछी. २३ अने २२ नी सत्ता क्षयो पशमवाळाने, तेमां अनंतानुबंधी अने मिथ्यात्व खपावनारने २३, तदुपरांत मिश्र खपावनारने २२. समकित मोहनी खपात्रतां चरम ग्रासे वर्ततो कोई जीव काळ करे तो ते वारे गतिमा पामीए, तेथी २२ तुं सत्तास्थान पण चारे गति- मां पामीए. तथा २१ नी सत्ता क्षायिक सम्यग्दृष्टिनेज होय. ८ ना उदयमा पण श्रीजा चोथा गुणस्थानवाळाने उपर प्रमाणे पांच सत्तास्थान. ९. ना उदयमा पण तेज प्रमाणे समज. विशेष एटलो छ के ९ नो उदय क्षयो- पशम समकितीने ज होय, तेथी तेने ४ सत्तास्थान-२८-२४-२३-२२.

[१४४] १३ ना बंधमां पांच सत्तास्थान-२८-२४-२३-२२-२१. १३ ना बंधवाळा तिर्यंच अने मनुष्य होय छे. तेमां तिर्यचने चार उदयस्थान-५ -६-७-८. तथा सचास्थान २८ अने २४ एवेज होय. कारण के बीजां सत्तास्थान तिर्यंचने न होय. बीजां सत्तास्थान तो क्षायिक उत्पन्न मनुप्यने होय छे. अने क्षायिकवाळो तिर्यचमां जाय तो असंख्य आयुमा ज जाय छे, त्यां देशविरति न होवाथी तेने १३ नो बंध होतो नथी. २८ नी सत्ता उपशम अने वेदक (क्षयोपशम) समकितीने होय छ, तेमां उपगम उत्पन्न काळे अंतरकरणना काळमां वर्तता जीवमां कोई देशविरतिपणुं पण पामे छे. कोई मनुष्य सर्वविरति पण अंगीकार कर छे. २८ नी सत्ता वेदक वाळाने होय ते तो प्रगट ज छ. अने अनंतानुबंधीनी विसं योजना कर्या पछी २४ नी सा होय. ५ ना उदयमा देशविरति मनुष्यने ३ सत्तास्थान-२८-२४-२१. ६-७ ना उदयमां पांच सचास्थान--२८-२४-२३-२२-२१. ८ ना उदयमा २१ विना चार सत्तास्थान-२८-२४-२३-२२. ९ ना वमा प्रमच तथा अप्रमत्तने ४ ना उदयमांत्रण त्रण सत्तास्थान-२८-२४-२१. ५-६ ना उदयमा ५ सत्तास्थान. ७ ना उदयमा २१ विना ४ सत्तास्थान. गाथा २३ ५ ना बंधमा ६ सचास्थान-२८-२४-२१-१३-१२-११. २८-२४ नी सत्ता उपशम श्रेणिमा उपशम समकितीने होय. २१ नी सचा उपशम श्रेणिमां शायिक समकितीने होय (वीजी त्रीजी चोकही न खपाची होय त्यां सुधी). १३ नी सचा वीजी त्रीजी चोकडी खपावे त्यारे. १२ नी सगा नपुंसक वेद खपाचे त्यारे. ११ नी सचा स्त्रीवेद खपावे त्यारे. ५ विगेरे सचा पांचना बंधवाळाने न होय, कारण के त्यां.पुरुषवेद बंधमा छ, अने पुरुपवेद बंधाय त्यां सुधी हास्यादि पट्कनो क्षय न थाय तेथी. ४ ना बंधमा छ सचास्थान--२८-२४-२१-११-५-४, २८-२४-अने २१ नी सचा उपशम श्रेणिमा. पण जो नपुंसकवेदे क्षपकणि मांडे तो समकाळे नपुंसकवेद अने स्त्रीवेदने खपावे. तेज वखने बंघमाथी पुरुषवेद खपावे. पछी पुरुपवेद अने हास्यादि पदक सचामाथी खपावे. ए- टले ते न खपावे त्यां सुधी ११ नी सचा, अने खपाच्या पछी ४ नी सता.

[१४५] स्त्रीवेदे क्षपकश्रेणि मांडनारने- पण ए प्रमाणे ११ अने ४ नी सत्ता. ते वनेने ५ नी सत्ता होय. पुरुपवेदे क्षपकौणि मांडनारने हास्यादि पट्कनी साथे ज पुरुषवेदनो वंधमांथी क्षय थाय छे. तेथी चतुर्विध बंध काळे तेने ११ नुं सत्तास्थान होतुं नथी, पण पांचवेंज सचास्थान होय छे. ते ५ नी सत्ता वे समय ऊणी वे आवलिका पर्यंत जाणवी. पछी पुरुपवेद खपावतां ४ नी सत्ता, ते पण अंतर्मुहूर्त समजवी. ३-२ अने १ना बंधमां प्रत्येके पांच पांच सत्तास्थान, ३ ना बंधमां ५ सचास्थान आ प्रमाणे-२८-२४-२१-४-३. तेमा पहेलांत्रण उपशम श्रेणिमां. अने छल्लां वे क्षपक श्रेणिमां, ते आ प्रमाणे-संज्वलन क्रोधनी प्रथमनी स्थिति आवलिका मात्र रहे त्यारे तेना बंध, उदय अने उदीरणा समकाळे क्षय पामे, तेथी बंध ३ नो रहे. पण सत्तामांथी वे समय ऊन वे आवलिका जेटले काळे तेने खपावे नहीं त्यां सुधी सत्ता ४ नी अने खपावे त्यारे सत्ता ३ नी, ते अंतर्मुहूर्त पर्यंत. २ ना बंधमा ५ सत्तास्थान आ प्रमाणे-२८-२४-२१-३-२. अहीं पण उपर प्रमाणे समजवू. फक्त संज्वलन क्रोध पछी मान खपावतां ३-२ नी सत्ता. १ ना बंधमा ५ सत्तास्थान-२८-२४-२१-२-१. अहीं पण उपर प्रमाणे स- मजबु. विशेष एके संज्वलन मान पछी माया खपावतां २-१ नी सत्ता रहे. एटले पूर्ण न खपे त्यां सुधी २, अने पूर्ण खपे त्यारे १. अबंधकमां सत्तास्थान ४. ते आ प्रमाणे -२८-२४-२१-१. तेमांत्रण उपशम श्रेणिमा, अने एक संज्वलन लोभ ज्यां सुधी पूर्ण न खपे त्यां सुधी दशमे गुणस्थाने क्षपकने १ नी सत्ता. गाथा २४ आ प्रमाणे मोहनी कर्मनां बंधस्थान १०, उदयस्थान ९, अने सत्तास्थान १५ ना संवेध कह्या. हवे नाम कर्मनी व्याख्या करतां प्रथम तेना बंधादि- स्थान केटलां छे ते कहे छे. गाथा २५. नाम कर्मनां बंधस्थान ८ (२३-२५-२६-२८-२९-३०-३१-१.) तिथंच मनुष्यादि गति पणे ते दरेक स्थान अनेक प्रकारे छे ते कहे छ तिथंच गतिने ५ बंधस्थान-२३-२५-२६-२९-३०. तेमां एकेंद्रिय प्रायोग्य त्रण बंधस्थान-२३-२५-२६. तेमां २३ नो बंध अपर्याप्त एकेंद्रिय प्रा- योग्य बांधतां तिर्यच तथा मनुष्य मिथ्यादृष्टिने होय. ते आ प्रमाणे- तिर्यग्गति. ३ औदारिक, तैजस, कार्मण. १ अगुरुलघु. १ एकेद्रिय जाति. ४ वर्णादि चतुष्क.. १ उपधात. .

१ तिर्यग्गानुपूर्वी. १ हुंडक संस्थान, १ स्थावर नाम. १सक्ष्म के बादर. १ दुर्भग नाम. १ निर्माण. १ अपर्याप्त १ अनादेय नाम. १ अस्थिर नाम- १ प्रत्येक के साधारण. १ अयश-कीर्ति. १ अशुभ नाम. आ २३ ना चार विकल्प थाय, १ सूक्ष्म प्रत्येक, २ सूक्ष्म साधारण, ३ बादर प्रत्येक, ४ वादर साधारण, आ २३ मां पराघात अने उच्चस भेळवता २५ थाय. ते एकेंद्रिय पर्याप्त प्रायोग्य बांधतां नारकी विना त्रण गतिवाळा मिथ्यादृष्टिने होय. ते २५ आ प्रमाणे- १तियंच गति, १ तिर्यग्गानुपूर्वी, १ एकेंद्रिय जाति, १ औदारिक शरीर, १ तैजस, १ कार्मण, ४ वर्णादि चतुष्क, १ हुंडक संस्थान, १ अगुरुलघु, २ उपघात ने निर्माण, १ पराघात, १ उच्छ्वास, १ स्थावर नाम, १ सूक्ष्म के बादर १ पर्याप्त १ प्रत्येक के साधारण, १ शुभ के अशुभ, १ स्थिर के अस्थिर, १ दुर्भग, १ अनादेय, १ यश के अयश, आ २५ भेदना २० विकल्प थाय, ते आ प्रमाणे, ८ बादर पर्याप्त प्रत्येक आश्री स्थिर अस्थिर, शुम अशुभ, तथा यश अयश वडे गुणतां ८ विकल्प, ४ बादर पर्याप्त साधारण आश्री शुभ अशुभ, स्थिर अस्थिर वडे गुणतां ४ (तेने अयश न होय छ). ८ सूक्ष्म पर्याप्त साधारण अने प्रत्येक ए बनेने शुभाशुम अने स्थिरास्थिर साथे गुणवां ८ (तने पण अयश ज होय छ). आ २५ प्रकृतिमा आतप उद्योत ए बेमांथी एक मेळवतां २६ थाय. ते पण एकेंद्रिय पर्याप्त प्रायोग्य बांधता नारकी विना त्रणे गतिना मिथ्यादृष्टिने जाणवी. ते २६ मा सूक्ष्म अने साधारण न लेवा, कारण के तेने आतप के उद्योत नाम होतु नथी. ते २६ ना सोळ विकल्प थाय. ते नीचे प्रमाणे.- आतपने स्थिरास्थिर साथे गुणतां २, तेने शुभाशुभ साथे गुणवां ४, तेने यश अयश साथे गुणतां ८, तेवाज उद्योतना पण ८ मळीने १६ थाय छै. कुल एकेंद्रिय आश्री (४-२०-१६) ४० विकल्प थया. हबे वींद्रिय आश्री बंधस्थान ३ (२५-२९-३०) १ अशुभ, [१४७] द्वींद्रिय अपर्याप्त प्रायोग्य बांधतां मिथ्यादृष्टिने २५ नो बंध आ प्रमाणे.- १ तिर्यग्गति, १ तिर्यग्गानुपूर्वी, १ औदारिक शरीर, १ औदारिक अंगोपांग, २ तैजस अने कार्मण, १ वर्णादि चतुष्क, १हुंडक संस्थान, १ छेवडुं संघयण, १ अगुरुलघु, १ उपघात, १ त्रस नाम, १बादर नाम, १ अपर्याप्त १ प्रत्येक, १ अस्थिर, १ अनादेय, १ अयश, १ निर्माण, १ दुर्मग, १ द्वींद्रिय जाति. आमां परावर्तमान प्रकृति पण अशुभ ज आवती होवाथी अहीं एकज भंग थाय छे. आ २५ मां अपर्याप्तने स्थाने पर्याप्त करीने १ पराघात, १ उन्शस, १ अप्रशस्त- गति, अने १ दुःखर, ए चार प्रकृति मेळवता २९ नो बंध थाय. आ २९ ना स्थिरास्थिर, शुभाशुभ अने यश अयश वडे गुणतां भंग ८ थाय. आ २९ मां उद्योतनाम भेळवा ३० थाय. तेना पण उपर प्रमाणे ८ भंग थाय. कुल द्वींद्रिय आश्री (१-८-८) भंग १७ थाय छे. तेज प्रमाणे त्रींद्रिय अने चतुरिंद्रिय आश्री मिथ्यादृष्टिने त्रण त्रण बंधस्थान तथा सत्तर सत्तर भंग समजवा. मात्र इंद्रिय नाममा जुदं नाम वोलवू. कुल विकलेंद्रिय आश्री भंग ५१. तिर्यक् पंचेंद्रिय प्रायोग्य ३ बंध स्थान (२५-२९-३०) तेमा २५ अपर्याप्त तिर्थच पंचेंद्रिय संबंधी उपर वींद्रियमां कह्या प्रमाणे समजवा. मात्र द्वींद्रियनामने स्थाने पंचेंद्रियनाम घोलवू तेनो भंग पण एकज छे. हवे २९ तिर्यंच पंचेंद्रिय पर्याप्त आश्री बांधे, ते आ प्रमाणे- १ तिर्यग्गानुपूर्वी, २ औदारिकद्विक, २ तैजस कार्मण, १ पंचेंद्रिय जाति, १ छमांयी एक संस्थान, १ छमाथी एक संघयण, १ प्रशस्त के अप्रशस्तगति, १ त्रस, १ बादर, १ प्रत्येक, १ पर्याप्त, १ स्थिर के अस्थिर, १ शुभ के अशुम, १ सुभग के दुर्मग, १ आदेय के अनादेय, १ सुस्वर के दुःस्वर, १ यश के अयश, १ अगुरुलघु, १ उपघात, १ पराघात, १ उच्चास, १ निर्माण, आ प्रमाणे २९ मिथ्यादृष्टि चारे गतिना बांधे. साखादनी पण २९ बांधे, परंतु सासादनी संघयण अने संस्थान पांचमांथी एक एक बांधे, छटुं संथान. - १ तिर्यग्गति, . ४ वर्णादि चतुष्क -- w [१४८] अने संघयण न बांधे. आ २९ ना बंधमां भंग ४६०८ थाय. ते नीचे प्रमाणे.-. छ संस्थाने गुणतां तेने छ संघयणे गुणतां ३६ तेने वे विहायोगतिए गुणतां ७२ तेने स्थिरास्थिर गुणतां १४४ तेने शुभाशुभे गुणतां २८८ तेने सुभग दुर्भगे गुणतां ५७६ तेने आदय अने अनादेये गुणतां ११५२ तेने यश अने अयशे गुणतां २३०४ तेने सुस्वर अने दुःस्वरे गुणतां ४६०८ आ २९ मां उद्योतनाम मेळवतां ३० बांधे. तेना भंग पण उपर प्रमाणे ४६०८ थाय, कुल तिर्यंच पंचेंद्रियना (१-४६०८-४६०८) भंग पण ९२१७ थाय. कुल तिर्यंच गति आश्री प्रथमना ४० ने ५१ भेळवतां ९३०८ भंग थाय. मनुप्यगति प्रायोग्य बांधतां ३ बंधस्थान (२५-२९-३०) तेमा २५ पूर्वे द्वौद्रिय अपर्याप्तमां गणाव्या प्रमाणे. पण तेमां मनुप्यगति, मनुष्यानुपूर्वी, पंचेंद्रियजाति, एम बोलचु. तेनो भंग १. २९ नो बंध त्रण प्रकारे ते आ प्रमाणे.- १ मिथ्यादृष्टि आश्री चारे गतिना जीव वांधे. १ सास्वादन आश्री चारे गतिना जीव बांधे. १ त्रीजा चोथा गुणस्थान आश्री देवता तथा नारको बांधे. तेमा पहेला बीजा गुणस्थानने आधी तो उपर तिर्यंच पंचेंद्रिय पर्याप्तमा कह्या- प्रमाणे २९ समजवा. त्रीजा चोथा गुणस्याने आश्री २९ नीचे प्रमाणे- १ मनुप्यगति, १.मनुप्यानुपूर्वी, १ पंचेंद्रिय जाति, २ औदारिकद्विक, २ तेजस कार्मण, १ पहेलु संघयण. १ पहेलं संस्थान, १ उपघात, '१ पराघात, १ पर्याप्त, १ प्रत्येक, १ स्थिर के अस्थिर, १ शुभ के अशुम, १-सुभग, १ यर्श के अयश, १ निर्माण, १ प्रशस्त विहायोगति, . ४ वर्णादि चतुष्क, १ अगुरुलघु, १ उच्वास, १३स, २ वादर, १ सुस्वर, . १ आदेय, [१४९] आ २९ आश्री स्थिरास्थिर, शुभाशुभ, अने यश अयश, आ त्रण विकल्प होवाथी आठ भंग थाय. मिथ्यादृष्टि आश्री २९ तिर्यचगति प्रमाणे होवाथी २९ ना बंधना मनुष्यगति आश्री पण पूर्ववत् ४६०८ भंग थाय. सास्वादन आश्री २९ ना बंधा एक एक संघयण अने संस्थान घटवाथी भंग ३२०० थाय ते आ प्रमाणे.- ५४५२५४२=५०x२%१००४२-२००४२-४००४२%3D८००x२-१६००४२% ३२००. आनो समावेश ४६०८ नी अंतर्गत समजवो. त्रीजा प्रकारना २९ ना बंधा तीर्थकर नाम भेळवत्तां ३० नो बंध सम्यग्दृष्टिने होय. तेना स्थिरास्थिर, शुभाशुभ, अने यश अयश साथे गुणतां ८ मंग थाय. कुल मनुष्यगति आश्री (१-४६०८-८ मळी) ४६१७ भंग थया. हवे देवगति प्रायोग्य बांधतां ४ बंधस्थान-२८-२९-३०-३१ होय. तेमा २८ नो बंध आ प्रमाणे - १ देवगति, १ देवानुपूर्वी, २ वैक्रियद्विक, २ तैजस कार्मण, ४ वर्णादिचतुष्क, १ समचतुरस्त्र संस्थान, १ अगुरुलघु, १ उपघात, १ पराघात, १ उच्चास, १ प्रशस्त विहायोगति, १ पर्याप्त १ प्रत्येक १ स्थिर के अस्थिर, १ शुभ के अशुभ, १ आदेय, १ यश के अयश, १ निर्माण, १ पंचेंद्रिय जाति, आ २८ प्रकृति १-२-३-४-५ अने ६ हा गुणस्थान सुधी देवगति प्रायोग्य बांधतां बांधे, तेना भंग स्थिरास्थिर, शुभाशुभ अने यश अयशवडे ८ थाय. आ २८ मां तीर्थकर नाम भेळवता २९ थाय. पण ते चोथा गुणस्थानथीज 4- धाय, तेना पण पूर्ववत् ८ भंग थाय. पूर्वोक्त २८ मा आहारकद्विक भेळवता ३० थाय. पण अहीं विकल्पवाळी त्रणे प्रकृति शुमज जाणवी, तेथी तेनो भंग १. ते सातमा तथा आठमा गुण- स्थानवाळानेज होय. पूर्वोक्त ३० मा तीर्थकर नाम मेळवतां ३१ थाय, पण ते सातमा आठमा गुण- स्थानवाळाज बांधे, अहीं पण एकज भग. सर्व मळीने देवगति प्रायोग्य भंग १८ थया. १ त्रस, १ चादर, १ सुभग, १ सुस्वर, १त्रस, १ अयश, [१५०] नरकगति प्रायोग्य एकज बंधस्थान-२८. १ नरकगति, १ नरकानुपूर्वी, २ क्रियद्विक, २ तैजस कार्मण, ४ वर्णादिचतुष्क, १ पंचेंद्रिय जाति, १ हुंडक संस्थान, १ अगुरुलघु, १ उपघात, १ पराघात, १ उच्चस, १ निर्माण, १ बादर, १ पर्याप्त १ प्रत्येक, १ अस्थिर, १ अशुभ, १ दुभंग, १ अनादेय, १दुःखर, १ अप्रशस्त विहायोगति. आ २८ प्रकृति अशुभ बांधे. पहेले गुणस्थाने एनो बंध होय. एनो मंग एकज थाय. एक यश कीति नामकर्मनो बंध अपूर्वकरणे थाय. ते देवगति प्रायोग्य बंध पण व्यवच्छिन्न थया पछी ८-९-१० मा गुणस्थानवाळाने होय. गाथा २६. कया बंधस्थाने कुल केटला मंग थया, ते गणावे छे. २३ ना बंधमा ४ विकल्प एकेंद्रिय अपर्याप्त प्रायोग्य. २५ ना बंधमा २५ विकल्प. तेमा २० एकेंद्रिय पर्याप्तना तथा वे त्रण चार इंद्रिय- वाळा, मनुष्य तथा तिर्यंच पंचेंद्रिय अपर्याप्तमा एक एक मळी पांच. कुल २५. २६ ना बंधमा १६ विकल्प. एकेंद्रिय पर्याप्त प्रायोग्य. २८ ना बंधमां ९ विकल्प. ८ देवगतिना, १ नरकगतिनो. २९ ना बंधमा ९२४८ विकल्प. ४६०८ तिर्यच पंचेंद्रिय, ४६०८ मनुष्य, २४ विकलेंद्रिय, तथा ८ देवता. ३० ना बंधमा ४६४१ विकल्प. ४६०८ तिर्यंच पंचेंद्रिय, २४ विकलेंद्रिय, ८ मनुष्य तथा १ देव प्रायोग्य. ३१ ना बंधा १ विकल्प. १ ना बंधा १ विकल्प. ८-९-१० मा गुणस्थान आश्री. कुल १३९४५ विकल्प थया. नाम कर्मना उदयस्थान १२. गाथा २७ (२०-२१-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१-९-८). एकेंद्रियने उदयस्थान ५. (२१-२४-२५-२६-२७), तेमां २१ नीचे प्रमाणे.- २ तैजस कार्मण, २ स्थिरास्थिर, २ शुभाशुभ, / आ १२ १ अगुरुलघु, १ निर्माण, ध्रुवोदयी छे. ४ वर्णादि चतुष्क, [१५१] १ तिर्यग्गति, १ तिर्यग्गानुपूर्वी, १ स्थावर नाम. १ एकेंद्रिय जाति, १ वादर के सूक्ष्म, १ पर्याप्त के अपर्याप्त १ दुर्भग, १ अनादेय, १ यश के अयश. आ प्रमाणे २१ नो उदय अपांतरालगतिमां समजवो. अहीं भंग ५ छे. तेमा स्थावर बादर अने सूक्ष्मने पर्याप्त अने अपर्याप्तवडे गुणतां मात्र अयश साथे ४ भंग थाग. तेमांना ३ ने यशनो उदय न होय तेना ३, तथा स्थावर वादर पर्याप्त आश्री यशनो पण उदय होय तेथी तेना भंग २. अही मात्र आहार पर्याप्त थतां तेमां पर्याप्तने पर्याप्त नामकर्मनो तथा अपर्या- प्तने अपर्याप्त नामकर्मनो उदय होय, तेथी बन गणाय. आ जीवने शरीरस्थ थतां ४ प्रकृति वधे. १ औदारिक शरीर, १ हुंडकसंस्थान, १ उपवातनाम, १ प्रत्येक के साधारण. ए ४ वधे, तथा १ तिर्यंचनी आनुपूर्वी घटे, तेथी कुल २४ नो उदय थाय. तेना भंग १० थाय. ते नीचे प्रमाणे.-- ४ चादर पर्यासने प्रत्येक अने साधारण तथा यश अने अयश साथै गुणतां ४. २ वादर अपर्याप्तने प्रत्येक अने साधारण साथै गुणतां २. तेने मात्र अयशज होय. ४ सूक्ष्मने प्रत्येक तथा साधारण साथे अने पर्याप्त तथा अपर्याप्त साथे गुणतां ४. तेने पण अयश ज होय. चादर वायुकायने वक्रिय शरीर करती वखत औदारिक शरीरने ठेकाणे वैक्रिय शरीर कहे. तेथी तेने पण २४ नो उदय थाय, पण तेनो भंग एक ज थाय. केमके तेजस्काय तथा वायुकायने साधारणपणे यशकीर्तिनो उदय छ ज नहीं. वक्रिय शरीर पर्यासने ज होय छे, तेथी ते आश्री पण भंग जुदा न थाय. कुल २४ ना उदयमां भंग ११ थाय छै. २४ ना उदयवाळा एकेंद्रिय शरीर पर्याप्तिबडे पर्याप्त थतां तेमां पराघात नाम भळवाथी २५ नो उदय थाय तेना भंग ६. ४ चादरने प्रत्येक तथा साधारण साथे तथा यश अने अयश साथै गुणतां ४. २ सूक्ष्मने प्रत्येक तथा साधारण साथे गुणतां २. तेने अयशनो ज उदय होय. अहीं पर्याप्तपणुं गणी अपर्याप्तना जुदा भेद कहा नथी. चादर वायुकायने वैक्रिय करतां शरीर पर्यासिवडे पर्याप्त थतां पराघात क्षेपवाथी २५ थाय. तेनो पण पूर्ववत् एकज भंग. कुल २५ ना उदयमा ७ मंग.

[१५२] पूर्वोक्त २५ ना उदयवाळा एकंद्रिय श्वासोच्छ्वास पयाप्तिवडे पर्याप्त थतां उच्वास नामकर्म मेळववाथी २६ नो उदय. तेना पण उपर प्रमाणे मंग ६. अथवा २५ ना उदयवाळाने श्वासोच्छवास पर्याप्तिए पर्याप्त थया अगाउ आतप के उद्योतनो उदय थवाथी २६ नो उदय. तेना पण भंग ६. ते आ प्रमाण- ४ उद्योत नामवाळा बादरने प्रत्येक अने साधारण साथे तथा यश अने अयश साथे गुणतां ४ थाय. तथा आतप नामवाळा प्रत्येकने यश अयश साथे गुणतां २ थाय. आतप नाम साधारणने न होवाथी. कुल ६ भंग. चादर वायुकायने वैक्रिय करतां २५ ना बंधा उच्चास नाम मेळवतां २६ थाय. तेनो पूर्वनी जेम एकज भंग. केमके तेउ वायु कायने आतप, उद्योत अने यशनो उदय नथी. कुल २६ ना उदयमा १३ भंग थाय. उच्चासवाळा २६ ना उढयी एकेंद्रियने आतप के उद्योत भेळवतां २७ नो उदय थाय. तेना छ भंग. उपर आतप के उद्योतमां वताच्या प्रमाणे. कुल एकेंद्रियना उदय भंग (५-११-७-१३-६) ४२ थाय द्वींद्रियने उदय स्थान ६ (२१-२६-२८-२९-३०-३१). १२ ध्रुवोदयी, १ तिर्यग्गति, १ तिर्यगानुपूर्वी, १ १ हींद्रिय जाति, १ सनाम, १ वादरनाम, १ पर्याप्त के अपर्याप्त, १ यश के अयश, १ दुर्भग, १ अनादेय. आ प्रमाणे २१ अपांतगलगतिमा लाभे. अहीं त्रण भंग थाय. ते आ प्रमाणे- २ पर्याप्ताने यश के अयश साथे गुणतां २. १ अपर्याप्ताने एक अयश ज होय, तेथी तेनो १. पूर्वोक्त २१ मां शरीरस्थ थतां ६ वधे. ते आ प्रमाण- १ औदारिक शरीर, १ औदारिक अंगोपांग, १ हुंडक संस्थान, १ छेवटुं संघयण, १ उपधात नाम, १ प्रत्येक नाम. आ६ प्रकृति वधारवी, अने १ तिर्यचनी आनुपूर्वी काढवी. एटले २६ थाय. तेना पण पूर्वोक्त प्रकारे ३ भंग जाणवा. शरीर पर्याप्सिवडे पर्याप्ताने १ प्रशस्त विहायोगति, १ पराघात नाम, वधे एटले २८. अहीं पर्याप्ताने यश अयश साथे गुणतां २ भंग थाय छे, पर्याप्तपणानो तथा प्रशस्तविहायोगतिनो सद्भाव छ माटे. पूर्वोक्त २८ मां श्वासोच्छ्वास पर्याप्तिए पर्याप्त थतां १ उच्छ्वास नाम वधे एटले २९ थाय. तेना पण पूर्वयन् भंग २.

1 [१५३] अथवा शरीर पर्याप्तिए पर्याप्तने उच्चासनो उदय न थाय अने उद्योत नामनो उदय थाय, तो पण २९. तेना पण यश अयश साथे भंग २. कुल २९ ना उदयमां भंग ४. २९ मां सुस्वर के दुःस्वर मेळवतां ३० नो उदय. तेना सुस्वर दुःस्वर तथा यश अयश साथे गुणतां भंग ४. अथवा स्वरनो उदय नहीं थतां उच्छवासवाळाने उद्योत नामनो उदय थतां पण ३०. तेना भंग यश अयश साथे गुणतां २. कुल ३० ना उदयमां भंग ६. भाषा पर्याप्तिए पर्याप्त स्वरना उदयवाळाने ३० मा उद्योतनाम मेळवतां ३१ थाय. तेना सुस्वर दुःस्वर अने यश अयश साथे गुणता भंग ४. कुल द्वींद्रिय आश्री भंग (३-३-२-४-६-४) २२ थाय. त्रींद्रिय अने चतुरिंद्रियने पण उपर प्रमाणे ज छ छ उदय स्थान तथा बावीश बावीश भंग होवाथी कुल विकलेंद्रियना भंग ६६. प्राकृत एटले वैक्रिय देह कर्या विनाना स्वाभाविक तिर्यंच पंचेंद्रियने उदयस्थान ६ (२१-२६-२८-२९-३०-३१) १२ ध्रुवोदयी, १ तिर्यग्गति, १ तिर्यगानुपूर्वी, १पंचेंद्रियजाति, १ त्रसनाम, १ बादरनाम, १ पर्याप्त के अपर्याप्त, १ यश के अयश, १ दुर्भग के सुभग, १ आदेय के अनादेय. आ प्रमाणे २१ नो उदय अपांतरालगतिमा होय. तेना भंग ९. ८ पर्याप्सने यश अयश साथे, सुभग दुर्भग साथे, तथा आदेय अनादेय साथे गुणतां ८ थाय. १ अपर्याप्तने अयश, दुर्मग अने अनादेय ज होवाथी १. अन्य कहे छे के सुभग तथा आदेय अने दुर्भग अनादेयतुं युगल साथे ज उदयमां होवाथी पर्याप्त आश्री ४ अने अपर्याप्त आश्री १ एम भंग ५ थाय छे, पूर्वोक्त २१ माथी तिर्यचनी अनुपूर्वी काढीने छ नांखवाथी २६ थाय. १छ संघयणमांथी एक, १ छ संस्थानमांथी एक, १ औदारिक शरीर, १ औदारिक अंगोपांग, १ उपघात, १ प्रत्येक आ प्रमाणे २६ प्रकृति शरीरस्थने होय. तेना भंग २८९ नीचे प्रमाणे- २८८ पर्याप्तने छ संघयण, छ संस्थान, सुभग दुर्भग, आदेय अनादेय तथा यंश अयश साथे गुणतां २८८ थाय, ते आ प्रमाणे- - [१५४] पर्याप्ताने ६ संघयणे गुणतां ६ तने ६ संस्थाने गुपता ३६ तने सुभग दुर्भगे गुणतां ७२ तेने आदेय अनादेये गुणतां १४४ तेने यश अयश साथै गुणतां २८८ १ अपर्याप्ता आश्री मांगो एकज थाय. कुल भंग २८९, अपर्याप्तन छेवढं संघयण, हुंडक संस्थान, दुर्भग, अनादेय अने अयश होवाथी तेनो एकज भांगो थाय छे. तेथी कुल २८९ भंग थाय छे. पूर्वोक्त २६ मां शरीर पर्याप्तिए पर्याप्तने २ प्रकृति उमेरतां २८ थाय. १ पगघात, १ प्रशस्त के अप्रशस्त विहायोगति. आ प्रमाणे २८ ना उदयमा पूर्वोक्त २८८ मेदने वे प्रकारनी विहागेगति साथे गुणतां भंग ५७६ थाय. (अहीं अपर्याप्तपणुं न गणवू.) पूर्वोक्त २८ मां श्वासोच्छ्वास पर्याप्तिए पर्याप्त थतां उच्चस नाम भळवाथी २९ नो उदय. तना पण भंग ५७६. अथवा शरीर पर्याप्तिए पर्याप्तने उच्छ्वासनो उदय नहीं थतां तथा उद्योतनामनो उदय थतां २९. तेना भंग पण ५७६. कुल २९ ना उदयमा भंग ११५२. पूर्वोक्त २९ मां भापापर्याप्तिए पर्याप्त थतां सुखर के दुःस्वर भळवाथी ३० नो उदय. तेना भंग पूर्वोक्त ५७६ ने सुस्वर दुःखर साथे गुणतां कुल ११५२. अथवा मापापर्याप्तिनो उदय नहीं थतां उच्चासवालाने उद्योतनो उदय थतां ३० नो उदय. तेना मंग ५७६ कुल ३० ना उदयमां भंग १७२८ स्वर सहित ३० वाळाने उद्योत नाम भळा ३१ नो उदय, तेना भंग पूर्वनी जेम ११५२. कुल प्राकृत तिथंच पंचेंद्रिय आश्री भंग ४९०६. (९-२८९-५७६-११५२-१७२८-११५२) तियंच पंचद्रियने वैक्रिय शरीर करता उदयस्थान ५, (२५-२७-२८-२९-३०) पूर्वे अपांतरालगतिमा कहेली २१ मांथी शरीरस्थ थतां तियंचनी आनुपूर्वी काढीने नीचेनी ५ नाखवी २ वैक्रियविक, १ समचतुरन संस्थान, १ उपघात, १ प्रत्येक, . [१५५] आ प्रमाणे २५ नो उदय तेना भंग पर्याप्ताने सुभग दुर्भग, आदेय अनादेय, यश अयश साथे गुणतां ८ (अहीं अपर्याप्त नामनो उदय होय ज नहीं.) पूर्वोक्त २५ मां शरीर पर्याप्तिए पर्याप्तने १ पराघात नाम अने १ प्रशस्तविहायो- गति वधवाथी २७ नो उदय थाय. तेमां अप्रशस्त गति न होवाथी भंग ८. पूर्वोक्त २७ मां श्वासोच्वास पर्याप्तिए पर्याप्त थतां उच्चस नाम वधवाथी २८ थाय. तेना पण भंग ८. अथवा २७ मां उन्नास न वधता उद्योत वधे, तो पण २८ थाय. तेना पण भंग ८. कुल २८ ना उदयमां भंग १६ थाय. २८ मां भाषापर्याप्तिए पर्याप्त थतां सुखर नामनो उदय थवाथी २९ थाय. तेना पण मंग८ अथवा २८ मां मापापर्याप्तिए पर्याप्त न थतां सुस्वरनो उदय न थवाथी अने उद्योतनामनो थवाथी २९. तेना पण भंग ८. कुल २९ ना उदयमां भंग १६. सुस्वर युक्त २९ मां उद्योत नाम भळवाथी ३० थाय. तेना भंग ८. कुल वैक्रिय शरीर करता भंग (८-८-१६-१६-८)५६ थया. कुल तिथंच पंचेंद्रियना भग (४९०६-५६) ४९६२ थया. कुल तिर्थचगति आश्री विकलेंद्रियना ६६, एवेंद्रियना ४२, तथा पंचेंद्रियना ४९६२ मळी कुल ५०७० थया. सामान्य मनुष्यने उदयस्थान ५ (२१-२६-२८-२९ ३०) अहीं सर्वे भंग उपर प्रमाणे समजवा मात्र मनुष्यने वैक्रिय आहारक विना उद्योत नामनो उदय न होवाथी २९-३० उद्योतनाम विनाना होय. तेथी २९ मां भंग ५७६, अने ३० मां भंग ११५२ थाय. कुल सामान्य मनुष्य आश्री भंग २६०२ (९-२८९-५७६-५७६-११५२) मनुष्यने वैक्रिय करतां उदयस्थान ५ (२५-२७-२८-२९-३०) १२ ध्रुवोदयी, २ वैक्रियद्विक, १ समचतुरस्त्र, २ त्रस ने वादर, १ पर्याप्त, १ प्रत्येक, १ उपघात, १ सुभग के दुर्भग, १ यश के अयश, १ आदेय के अनादेय, १ मनुष्यगति, १ पंचेंद्रिय. आ प्रमाणे २५ ना उदयमां सुभग दुर्मग, आदेय अनादेय, अने यश अयश साथे गुणतां भंग ८ थाय. पांचमा छटा गुणस्थानवाळाने वैक्रिय करता त्रणे शुभनो ज उदय समजवो, तेथी तेनो एकज भंग थाय. पण तेनो समावेश आ आठनी अंदर समजवो.

[१५६]] शरीर पर्याप्तिए पर्याप्तने १ पराघात, १ प्रशस्तविहायोगति ए वे भेळवतां २७ नो उदय. तेना भंग पण ८. २७ मां श्वासोच्छ्वास पर्याप्तिए पर्याप्त थतां उस नाम भेळवतां २८ नो उदय, तेमां पण भंग ८. अथवा संथतने वैक्रिय करतां उच्चस नामना उदय अगाउ उद्योत नामनो उदय थतां पण २८ थाय. परंतु तेनो भंग एकज. केमके तेने त्रणे अशुभनो उदय नथी. कुल २८ ना उदयमा भंग ९. २८ मां उवासवाळाने भाषापर्याप्तिए पर्याप्त थतां सुस्वरनाम मळवाथी २९ थाय. तेना भंग ८. अथवा मापापर्याप्ति अगाउ संयतने उद्योत नाम भळयाथी पण २९. तेनों मंग पूर्ववत् १. कुल २९ ना उदयमा मंग ९. पूर्वोक्त सुस्वर युक्त २९ मा संयतने उद्योत नाम भळवाथी ३०. तेनो भंग १. कुल वैक्रिय आश्री भंग (८-८-९-९-१) ३५. आहारक शरीरी मनुष्यने उदयस्थान ५ (२५-२७-२८-२९-३०) वैक्रियवत् २५. तेमां वैक्रियने स्थाने आहारकद्विक बोलवू. अने प्रकृति वधी शुभज कहेवी. केमके आहारकने अशुभनो उदय होतो नथी. तेथी अहीं भंग १. २७ ना उदयमां पण भंग १. २८ ना उदयमा उच्श्वासने उद्योतना विकल्पथी भंग २. २९ ना उदयमा सुस्वर अने उद्योतना विकल्पथी मंग २. ३० ना उदयमा उद्योत मळतां भंग १. कुल आहारक आश्री भंग (१-१-२-२-१)७. केवळीना उदयस्थान १० (२०-२१-२६-२७-२८-२९-३०-३१-९-८) १२ ध्रुवोदयी, २ असन बादर, १ मनुष्यगति, १ पंचेंद्रिय जाति, १ सुमग, १ पर्याप्तनाम, १ आदेय, १ यशकीर्ति. आ २० नो उदय सामान्य केवळीने केवळी समुद्घातमां कार्मण काययोगे वर्ततां ४-५-६४ समये होय. अहीं मंग १. उपरनी २० मा तीर्थकर नाम मेळवतां २१ प्रतिनो उदय. तीर्थकरने उपर कहेले वखते ज होय. अहीं पण भंग १, पूर्वोक्त २० मा औदारिकमिश्र काययोगे वर्ततां सामान्य केवळीने २-३-७ मे समये ६ उमरतां २६ नो उदय होय. ते ६ आ प्रमाणे-२ औदारिक .

[१५७]] द्विक, १ छ संस्थाननांथी १, १ उपघात, १ प्रत्येक, १ वज्रर्पमनाराच संहनन. अहीं ६संस्थानवडे ६ भंग थाय. पण ते सामान्य मनुष्यमां गणायेल होवाथी जुदा न गणवा. पूर्वोक्त २६ मा तीर्थकर नाम भेळवतां २७ थाय. पण तेमा संस्थान समचतुरस्त्र ज होय. तेथी तेनो भंग १. पूर्वोक्त २६ मां नीचेनी चार भेळवतां ३० थाय. १ पराघात, १ उच्चास, १ सुस्वर के दुःस्वर, १ प्रशस्त के अप्रशस्त गति. आ ३० नो उदय सयोगी केवळीने औदारिक काययोगे वर्तता कायम होय. तेमां छ संस्थान, वे गति, अने सुस्वर दुःस्वर साथे गुणतां भंग २४ थाय. पण ते सामान्य मनुष्यमां गणायेल होवाथी जुदा न गणवा. पूर्वोक्त ३० मा तीर्थकर नाम भळतां ३१ थाय. तेनो उदय सयोगी केवळी तीर्थकरने औदारिक काययोगे वर्ततां होय. पण तेमां सुस्वर अने प्रशस्त विहायोगति ज होय, तेथी तेनो भंग१. ते ज ३१ वाग्योग रुंध्ये छते सुस्वर नाम टळवाथी ३०, अने उच्चस रुघवाथी उन्धास नाम टळे त्यारे २९ नो उदय तीर्थकरने होय. ३० माथी सामान्य केवळीने वाग्योग रुंध्ये छते २९, अने उच्चास रुंध्ये छते २८ थाय. तेमा २९ ना ६ संस्थान अने वे गति साथे गुगत १२ भंग थाय. अने २८ ना ६ संस्थान साथै ६ भंग थाय. पण ते पूर्व सामान्य मनुष्यमांगणा- येल होवाथी जुदा न गणवा. १ मनुष्य गति, १ पंचेंद्रिय जाति, १ त्रस नाम, १ बादर नाम, १ पर्यातनाम, { सुभग नाम, १ आदेय, १ यश-कीर्ति. आ आठनो उदय सामान्य केवळीने चरम समये होय. अहीं भंग १. ए ८ मां तीर्थकर नाम मेळवतां ९ नो उदय थाय. ते तीर्थकरने चरम समये होय. आ प्रमाणे केवळीना १० उदयस्थानमा ८ भंग (२०-२१-२७-२९-३०-३१ -९-८) वधारे गणवा. तेमा पहेला छेल्ला विना ६ तीर्थकर आश्री अने पहेलो तथा छेल्लो सामान्य केवळी आश्री. कुल मनुष्य गतिमा उदय आश्री (२६०२-३५-७-८) मंग २६५२. देवगतिमा उदयस्थान ६ (२१-२५-२७-२८-२९-३०) १२ ध्रुवोदयी, १ देवगति, १ देवानुपूर्वी, १ पंचेंद्रियजाति, १सनाम, १ वादर नाम, १ सुभग के दुर्भग, १ आदेय के अनादेय, १ यश के अयश, १ पर्याप्तक नाम. .

[१५८] आ २१ नो उदय अपनिराल गतिमा होय. तेमा सुभग दुर्मग, आदेय अनादेय, अने यश अयश साथे गुणतां ८ मंग थाय. (दुर्भग, अनादेय अने अयश- नो उदय पिशाचादिने होय तेथी.) पछी शरीरस्थाने देवानुपूर्वी घटे. अने पांच वधे. ते आ प्रमाणे.- २ वैक्रियद्विक, १ उपवात, १ प्रत्येक, १ समचतुरस्र संस्थान. कुल २५ ना उदयमा पूर्ववत् भंग ८ (देवने समचतुरस्र विना बीजुं संस्थान न होय. तथा संघयण बिलकुल न होय.) पूर्वोक्त २५ मां शरीर प्रर्याप्सने १ पराघात अने १ प्रशस्तगति भळवाथी २७ थाय. तेना पण भंग ८. ( देवताने अप्रशस्त गति होती नथी.) २७ ना उदयवाळाने श्वासोच्छ्वास पर्याप्तिए पर्याप्त थतां उच्वास नाम भळवाथी २८ नो उदय. तेना पण भंग ८. अथवा श्वासोच्छवास पर्याशिए पर्याप्त न थतां उच्चास नाम न भळवाथी अने उद्योत नामनो उदय थवाथी पण २८ ना उदयमा पण भंग ८. कुल २८ ना उदयमा भंग १६ उच्श्वास वाळाने भाषापर्याप्तिए पर्याप्त थतां सुस्वर भळवाथी २९ नो उदय.' 'तेना पण भंग ८. (देवजाने दुःस्वरनो उदय होतो नथी.) अथवा भाषापालिए पर्याप्त न थतां सुस्वर न भळवाथी अने उद्योत नाम भळ- वाथी पण २९. तेना पण भंग ८. कुल २९ ना उदयमा भंग १६. सुस्वर युक्त २९ मां उधोत नाम मळ्वाथी ३० नो उदय. तेना पण मंग ८. कुल देवगति आश्री भांगा ६४. (८-८-८-१६-१६-८) (उद्योतनाम उत्तर वैक्रियमा होय.) नरकगति आश्री उदयस्थान ५. (२१-२५-२७-२८-२९.). १२ ध्रुवोदयी, १ नरकगति, १ नरकानुपूर्वी, १ दुर्भग, १ अनादेय, १ अयश, १३सनाम, १ बादरनाम. १ पर्याप्तनाम, १ पंचेंद्रिय जाति, आ २१ नो उदय अपांतराल गतिमां समजवो. तेनो भंग १. ११ मांथी आनुपूर्वी जतां अने पांच नीचेनी वधतां २५ थाय. तेनो भंग. १ २ वैक्रिय द्विक, १ हुंड संस्थान, १ प्रत्येक ते २५ मां शरीरस्थ थतां १ परापात अने १ अप्रशस्त विहायोगति भळतां २७ नो उदय. अहीं पण भंग १. १ उपघात, ५ [१५९] २७ मां श्वासोच्छवास पर्याप्त थतां उच्छ्वास नाम भळवाथी २८ थाय. तेनो भंग १. २८ वाळा भाषा पर्याप्त थतां सुस्वर नाम भळवाथी २९ नो उदय. तेनो भंग १. कुल नरकगति आश्री भंग ५. चारे गति आश्री कुल उदय भंग ७७९१. तिर्यंच पंचेंद्रियना ४९६२ नरकना मनुष्यना २६५२ एकेंद्रियना ४२ देवना ६४ विकलेंद्रियना ६६ गाथा २८-२९. १२ उदयस्थानमां दरेक उदयस्थाने केटला केटला भंग थाय,ते कहे छे. २० ना उदयमां भंग १. सामान्य केवळी आश्री. २१ ना उदयमां भंग ४२. ५ एकेद्रिय आश्री, ९ विकलेद्रिय आश्री, ९ तिर्यंच पंचेद्रिय, ९ मनुष्य पंचेंद्रिय, १ तीर्थकर, ८ देवता, १ नारकी. २४ ना उदयमा भंग ११. एकद्रिय आश्री. २५ ना उदयमां भंग ३३. ७ एकेंद्रिय, ८ वैक्रिय तिर्यच पंचेंद्रिय, १ आहारक मनुष्य, ८ देवता, १ नारकी २६ ना उदयमां भंग ६००. १३ एकेंद्रिय आश्री, ९ विकलेद्रिय आश्री, २८९ सामान्य तिर्यंच पंचेंद्रिय, २८९ सामान्य मनुष्य. २७ ना उदयमा भंग ३३. ६ एकेंद्रिय आश्री, ८ वैक्रिय तिथंच पंचेंद्रिय, १ आहारक संयत, १ केवळी, ८ देवता, १ नारकी, २८ ना उदयमा भंग १२०२. ६ विकलेंद्रिय आश्री, ५७६ सामान्य तिर्यंच पंचेद्रिय, १६ वैक्रिय तिथंच पंचेंद्रिय, ५७६ सामान्य मनुष्य, ९ वैक्रिय मनुष्य (८-१), २. आहारका १६ देवता, १.नारको.. ८ वैक्रिय मनुप्य, ८ वैक्रिय मनुष्य, [१६०] २९ ना उदयमा भंग १७८५. १२ विकलेंद्रिय, ११५२ सामान्य तिर्यच पंचेंद्रिय, १६ वैक्रिय तिर्यत्र पंचेंद्रिय ५७६ सामान्य मनुष्य, ९ क्रिय मनुष्य (८-१) २ आहारका १ तीर्थकर, १६ देवता, १ नारकी. ३० ना उदयमा मंग २९१७. १८ विकलेंद्रिय, १७२८ सामान्य तियेच पंचेंद्रिय, ८ वैक्रिय तिर्यच पंचेंद्रिय, ११५२ सामान्य मनुष्य, १ बैंक्रिय मनुष्य (८-१), १ आहारका १ केवळी, ८ देवता. ३१ ना रयमा भंग ११६५. १२ विकलेद्रिय, ११५२ सामान्य तिर्यंच पंचेंद्रिय, १ तीर्थकर. ९ ना उदयमा भंग १. तीर्थकर आश्री ८ ना उदयमा भंग १. सामान्य केवळी आश्री. कुल उदय मंग. ७७९१. गाथा ३० नामकर्मनां सत्तास्थान १२, (९३-९२-८९-८८-८६-८०-७९-७८-७६-७५-९-८) सर्वप्रकृति सत्तामा होय त्यारे ९३. तीर्थकर नाम बिना ९२. आहारक चतुष्क (आहारक शरीर. आहारकांगोपांग, आहारक बंधन. आहारक संघातन) बिना. ८९. तीर्थकर नाम विना. ८८. ८८ माथी देवगति, देवानुपूर्वी अथवा नरकगति, नरकानुपूर्वी जतां ८६. अथवा ८० नी सचावालो नरकद्विक तथा बैंक्रिय चतुष्क बांधे त्वारे ८६. अथवा ८० नी सचावाळो. देवद्विक अने चैक्रिय चतुष्क बांधे त्यारे ८६. प्रथमना ८६ माथी नरकहिक अने वैक्रिय चतुष्क जता अथवा बीजा ८६,मांधी-देवद्विक अने वैक्रिय चतुष्क जतां ८० मांथी मनुष्यद्विक गवां आटला अक्षपकनां सत्तास्थान जाणवां हने क्षपकनां कह छ- ७८ - [१६१]] ९३ मांथी नरकद्विक, तिर्यग्द्विक, पंचेद्रिय विना ४ जाति, स्थावरनाम, सूक्ष्मनाम, साधारण, आतप, उद्योत, ए १३ खपावे त्यारे ९२ मांथी पूर्वोक्त १३ खपावे त्यारे ७९. ८९ माथी ए १३ खपावे त्यारे ७६. ८८ मांथी ए १३ खपावे त्यारे ७५. मनुष्यगति, पंचेद्रियजाति, वस, वादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यश, तीर्थकर नाम, ए ९ प्रकृति अयोगी केवळीने चरम समये होय. ९. आ ९ माथी तीर्थकर नाम जतां गाथा ३१. हवे नामकर्मनां बंधस्थान ८, उदयस्थान १२ अने सत्तास्थान १२ नो संवेध कहे छ.- ओघे एटले सामान्ये अने आदेशे एटले विशेपे. अमुक बंधस्थाने आटलां उदय स्थान अने आटलां सत्तास्थान ते सामान्य कोबाय छे. अने १४ गुणस्थान- मां ६२ मार्गणाए प्रत्येकने आटला आटलां बंध, उदय अने सत्तारथान छे, एम कहे, ते विशेप कहेवाय छ, गाथा ३२. प्रथम सामान्ये संवेध कहे छे.- २३-२५-२६ ना बंधमा ९ उदयस्थान अने ५ सत्तास्थान होय. तेमा २३ नो बंध अपर्याप्त एकेद्रिय योग्यज छे. तेना बंधक एकेंद्रिय, विकलेद्रिय, तिर्यंच पंचेंद्रिय, अने मनुष्य छे. ते २३ ना बंधने यथायोग्य सामान्ये ९ उदयस्थान होय.-(२१-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१) २३ ना बंधमा २१ नुं उदयस्थान अपांतरालगतिमा वर्तता एकेंद्रिय, विकलेद्रिय, तिर्यंच पंचेंद्रिय अने मनुष्यने होय. २३ ना बंधमा २० नो उदय अपर्याप्त तथा पर्याप्त एकेंद्रियने होय. २३ ना बंधमां २५ नो उदय पर्याप्त एकेद्रिय, वैक्रियरियंव, मनुष्य मिथ्यादृष्टिने. २३ ना बंधमा २६ नो उदय पर्याप्त एकेंद्रिय, पर्याप्त अपर्याप्त विकलेद्रिय, ति- थक् पंचेंद्रिय, तथा मनुष्य मिथ्याटिने होय. २३ ना बंधमा २७ नो उदय पर्याप्त एकेंद्रिय, वैक्रिय तियंच, मनुष्य मिथ्या- त्वीने शरीर पर्याप्तिए पर्याप्तने होय. २३ ना बंधमा २८-२९-३० नो उदय पर्याप्त विकलेंद्रिय, तिथंच पंचेंद्रिय, मनुष्य मिथ्यादृष्टिने होय. २३ ना बंधमा ३१ नो उदय विकलेद्रिय, तिर्यंच पंचेद्रिय, मनुष्य मिथ्यादृष्टिने. आ प्रमागे ना २३ ना बंधमा सवा थान ५ (९२-८८-८६-८०-७१) - [१६२] २३ ना बंधमा २१ ना उदयमा सर्वने पांचे सत्तास्थान. मात्र मनुष्यने ७८ विना चार सत्तास्थान, २३ ना बंधमा २४ ना उदयमां पण पांचे सत्तास्थान. मात्र वायुकायने वैक्रिय करतां २४ ना उदयमा वर्ततां ८० ने ७८ विना त्रण सत्तास्थान (कारणके वैक्रियने तो ते अनुभवे जछे. अने वैक्रिय होवाथी देवद्विक के नरकद्विक पण बने जतां नथी. तेमज वैक्रिय षट्क गया पछ ज मनुष्यद्विक सत्तामाथी जाय छ. तेथी ते पण रहे छे.) २३ ना बंधमा २५ ना उदयमां पांचे सत्तास्थान. पण ७८ नुं सत्तास्थान वैक्रिय वायुकाय तथा तेउकाय आश्री जाणवू. (कारण के तेउ वाउ विना बीजा बधा पर्याप्ता जीवो नियमे करी मनुष्यद्विक बांधी शके छे.) २३ ना बंधमा २६ ना उदयमां पांचे सत्तास्थान. पण ७८ वें अवैक्रिय, तेऊ वाऊ तथा विकलेंद्रिय अने पंचेंद्रिय पर्याप्तज के जे तेऊ वाऊमांथी अनंतर आ- वेला होय ते पर्याप्ता अपर्याप्ताने आश्रीने जाणवू. कारण के ते मनुष्यद्विक बांधतां नथी. तेथी तेने ७८ पामीए. बीजाने नहीं. २३ ना बंधमा २७ ना उदयमां ७८ विना चार सचास्थान. कारण के २७ नुं उदयस्थान तेऊ वायु विना वीजा पर्याप्त बादर एकेंद्रिय तथा वैक्रिय तिर्यच मनुष्यने छे. तेमने मनुष्यद्विकनो संभव छ माटे ७८ न पामीए. २३ ना बंधमा २८-२९-३०-३१ ना उदयमा ७८ विना चार चार सत्तास्थान. कारण के ए चार उदयवाळा एकेंद्रिय न होवाथी बाकीना जेने ए चार ऊदयस्थान छ तेने मनुष्यद्विकनो संभव छे. कुल २३ ना वंधमां ९ उदयस्थाने सत्तास्थान ४० छे. २५ अने २६ ना बंधमां पण एज प्रमाणे नव नव उदय स्थान अने चाळीश चाळीश सत्तास्थान जाणवां. विशेष एटलो छ के-केवळ पर्याप्त एकेंद्रिय प्रायोग्य २५-२६ वांधतां देवताओने २१-२५-२७-२८-२९-३० ए छ उदयस्थानमां ९२ अने ८८ ए वे ज सत्ताम्थान कहां छे. केमके अपर्याप्त विकलेंद्रिय. तियेच. मनुष्य प्रायोग्य २५ नो बंध देवता बांधता नथी, केमके अपर्याप्त एकेंद्रिय के विकलेंद्रियादिमां ऊपजवानो तेमने अभाव छ. २८ ना बंधा ८ उदयस्थान अने ४ सत्तास्थान छे. ते ८ उदयस्थान आ प्रमाणे-२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१. २८ नो बंध देव प्रायोग्य तथा नरक प्रायोग्य होय. तेमां देव प्रायोग्य २८ नो बंध करतां आठे उदयस्थान होय अने नारक प्रायोग्य २८ नो बंध करतां २ उदयस्थान (३०-३१).

[१६३] तेमां देवगति प्रायोग्य २८ ना बंधना ८ उदयस्थान को छे.- २८ ना बंधमा २१ नो उदय क्षायिक सम्यग्दृष्टि अने वेदक सम्यग्दृष्टि तिर्यंच मनुप्यने अपांजराल गतिमा होय. २५ नो उदर आहारक संयतने तथा वैक्रिय तिथंच मनुष्य सम्यग्दृष्टि वा मिथ्याष्टिने होय. २६ नो उदय क्षायिक के वेदक सम्यग्दृष्टि, पंचेंद्रिय तिर्यच, मनुष्य शरीरस्थाने होय, २७ नो उदय आहारक संयतने तथा बैंक्रिय तिर्यच मनुष्य समकिती के मिथ्यादृष्टिने होय. २८-२९ नो उदय शरीर अने श्वासोच्छ्वास पर्याशिवाळा तिर्यंच मनुष्य क्षायिक के वेदक समफितीने तथा आहारक संयतने तथा वैक्रिय तिथंच मनुष्य समकिती के मिथ्यात्वीने होय, ३० नो उदय नियंच मनुष्य समकिती, मिथ्यात्व मिश्र, तथा आहारक संयतने अने वैक्रिय संयतने होय. ३१ नो उदय पंचेंद्रिय तिथंच समकिती तथा मिथ्यात्वीने होय. हवे नरकगति प्रायोग्य २८ ना चंधमा ३०-३१ ए बन्ने उदय स्थान कहे छे.) २८ ना बंधमा ३० नो उदय पंचद्रिय सियंच अने मनुष्य मिथ्यात्वीने होय. २८ ना बंघमा ३१ नो उदय पंचेंद्रिय तिर्यंच मिथ्यात्वीने होय. २८ ना बंधमां सामान्ये ४ सत्तास्थान (९२-८९-८८-८६). ते आ प्रमाणे- देवगति प्रायोग्य २८ ना चंषमा २१ उदयमा सत्तास्थान २ (९२-८८). देवगति प्रायोग्य २८ ना बंधमा २५ नो उदय आहारकनी सत्तावाला तेमज आहार- कनी सत्ता विनाना होय, तेथी तेने पण वे सत्तास्थान (९२-८८). विशेष एटलो छ के आहारक संयतने आहारकनी सचामा नियमे करीने ९२ नु ज सत्तास्थान होय. देवगति प्रायोग्य ८८ ना चंधमा २६-२७-२८-२९ ना उदयमां पण सामान्य वे वे सचास्थान (९२-८८). देवगति अने नरकगति प्रायोग्य २८ ना बंधमा ३० ना उदयमा सामान्य ४ सत्ता- स्थान (९२-८९-८८-८६). तेमां ९२-८८ पूर्ववत्. अने ८९ नी सत्ता तो कोई तीर्थकर नामकर्म बांधेल मनुष्य वेदक समकिती पूर्व- चद्ध नरकायुवालो नरकाभिमुख थये छते समकितथी प्रच्युत थई मिथ्यात्वे जतां तीर्थकर नामकर्मनो ध न करे, त्यारे नरक प्रायोग्य [१६४] २८ बांध ने यग्वने होय. अने ८६ नी मना आ प्रमाण-आहा- क चतुष्क, नीर्थकर नाम. टेवाद्विक, नरकटिक, वक्रिय चतुष्क, ए १३ विना ८. नी मचायाको चिंद्रिय नियंच के मनुप्य यल होय, ने सर्व पाप्ति बड़े पर्याप्त थया पछी जो विशुद्ध थाय, तो देवगनि प्रायोग्य २८ बांधनां वहिक अने क्रिय चतुष्क बांध न्यारे सना ८६ नी धाय. अथवा गंलिप्ट पणे नग्कगनि प्रायोग्य २८ बांध न्यारे पण ८६ नी धाय, देवगति अने नरकनि प्रायोग्य २८ ना बंधमा ३१ ना उदयमा ३ मत्ताम्यान (९२-- ८८-८६) ८९ नी सना अहीं न होय. कारण के ३१ ना उदय तिर्यच रंडियने हाय नेमा तीर्थकर नाम मनाग होय नहीं. ८६ नुं मत्तास्थान उपर प्रमाण थाय. कुल २८ ना बंधमां ८ उदयस्थाने मळी मनाम्यान १९. २९ तथा ३० ना बंधमा नव नव उदयस्थान अन मान मान मनास्थान. तेमां उढयस्थान ९ आ प्रमाण-२१-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१. २९ ना बंधमा २१ नो उदय तिर्यग् मनुष्य प्रायोग्य २० बांधनां पर्याप्तापयांत एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, पंचद्रिय, तिर्यंच, मनुष्य, देवना नया नारकीन होय. २४ नो उदय पर्याप्तापाप्त एडियने होय. २५ नो उदय पर्याप्त एकेंद्रिय, देवता, तथा नारकीने होय. तथा वक्रिय तिर्यंच मनुष्य मिथ्यात्वीने होय. २६ नो उदय पर्याप्त एकेंद्रियने, पयांसापर्याप्त विकलेंद्रिय, तियेच पंचे- द्रिय तथा मनुप्यने होय. २७ नो उदय पर्याप्त एकद्रियने. देवताने, नारकीने, वक्रिय तिर्यंच तथा मनुप्य मिथ्याटिने होय. २८-२९ नो उदय विकलेंद्रिय, तिथंच पंचद्रिय, मनुष्य, वक्रिय तिर्यच मनुष्य, देवता तथा नारकीने होय. ३० नो उदय विकलेंद्रिय तिर्यंच पंचद्रिय, मनुष्य, उद्योतवाळा देवने होय. ३१ नो उदय पर्याप्त विकलेंद्रिय तथा निर्यच पंचेंद्रिय उद्योतना वेद- कने होय. देवगति प्रायोग्य २९ बांधतां अविरत सम्यग्दृष्टि मनुप्यने उदयस्थान पांच होय. -२१-२६-२८-२९-३०. आहारक संयत तथा वैक्रियसंयतने उदयस्थान पांच-२५-२७ २८-२९-३०. .

[१६५] असंयतने तथा संयतासंयतने चोथा पांचमा गुणठाणावाळाने वैक्रिय करतां उदय- स्थान चार-२५-२७-२८-२९, संयत सिवाय वीजाने वैक्रिय करतां उद्योतनामनो अभाव होगाथी ३० न होय. सामान्ये २९ ना बंधमां सत्तास्थान ७ (९३-९२-८९-८८-८६-८०-७८), विकलेंद्रिय, तिथंच पंचेंद्रिय प्रायोग्य २९ बांधतां पर्याप्तापर्याप्त एकेंद्रिय, विकलें- द्रिय, तिथंच पंचेंद्रियने २१ ना उदयमा वर्ततां सत्तास्थान पांच-९२- ८८-८६-८०-७८. तेज प्रमाणे २४-२५-२६ ना उदयमा पण पांच पांच सत्तास्थान जाणवां. २७-२८-२९-३०-३१ ना उदयमा ७८ विना चार सत्तास्थान तेनी भावना २३ ना बंधमां पूर्वे कही छे, तेम अहीं पण समजवी. मनुष्यगति प्रायोग्य २९ बांधतां एकेद्रिय, विकलंद्रिय, तिर्यच पंचेंद्रियने तथा तिर्यग्गति मनुष्यगति प्रायोग्य फरीने बांधता मनुप्यने पोतपोताना उदय स्थानमा यथायोग्य वर्तता ७८ विना चार सत्तास्थान. देवता नारकीने तिर्यक् पंचेंद्रिय तथा मनुष्य प्रायोग्य २९ बांधतां पोतपोताने उदये वर्ततां वे वे सत्तास्थान (९२-८८). नारकी मिथ्यादृष्टि तीर्थकर नाम सत्तावाळाने मनुष्यगति प्रायोग्य २९ चांधतां पोतपोताना उदयस्थान पांचमां यथायोग्य वर्ततां ८९ नुं एकज सचास्थान. केमके तीर्थकर सहित आहारक चतुष्क रहित होय, तेज मिथ्यात्वे जाय छे. बन्ने सहित होय ते जता नथी. देवगति प्रायोग्य २९ तीर्थंकर नाम सहित बांधतां अविरत सम्यग्दृष्टि मनुष्यने २१ ना उदयमां वर्ततां वे सचास्थान (९३-८९). ए प्रमाणे २५-२६-२७-२८-२९-३० ना उदयमां पण वे वे सत्तास्थान(९३-८९) आहारक संयतने पोपोताना उदयमा वर्ततां ९३ नु ज सचास्थान. सामान्ये २९ ना बंधमां २१ ना उदयमा ७ सत्तास्थान. २४ ना उदयमा ५ सत्तास्थान. २५ ना उदयमा ७ सामान्ये २९ ना बंधमा २६ ना उदयमा ७ सत्तास्थान, २७ ना उदये ६ २८ ना उदये ६ २९ ना उदये ६ ३० ना उदये ६ ३१ ना उदये ४ - ५ ६ w [१६६] ३० ना बंधा उदयस्थान ९, अने सत्तास्थान ७, पूर्व तिर्यग्गति प्रायोग्य २९ बांधतां एकेंदियाद्रिकने जे प्रमाणे उदयस्थान अने सत्तास्थान कहाँ छ,तेज प्रमाणे उद्योतनाम सहित ३० बांधतां पण समजवां तेना भंग ४ थाय, उपरांत मनुष्यगति प्रायोग्य तीर्थकर, नाम सहित ३० बांधतां देव नारकीने आ प्रमाणे- २१ ना उदयमां देवताने सत्तास्थान २ (९३-८९). २१ ना उदयमा नारकीने सत्तास्थान १ (८९). आहारक तीर्थकर नेनी सत्तावाला नरके जता नथी. एज प्रमाणे २६-२७-२८-२९-३०ना उदयमा पण समज. फक्त नारकीने ३० नो उदय नहीं. कारण के ३० ना उदयमा उद्योतनाम होय छे, ते नारकीने होतुं नथी. मामान्ये ३० ना बंधमा ९ उदये सत्तास्थानना भंग ५२. ते नीचे प्रमाणे- २१ ना उदये ७ मत्तास्थान. २८ ना उदये ६ सत्तास्थान. २९ ३० ५ ३१ ॥ २७ था ३३. ३१ ना बंधमां उदयस्थान १ [३० तुं). ३१ नो बंध देवगति प्रायोग्य तीर्थकर आहारक नाम सहित बांधता सातमा आठमा गुणस्थानवाळाने होय. तेओ वैक्रिय आहारक करता नथी. तेथी तेओने २५ विगेरे उदय स्थान होय नहीं. सत्तास्थान पण एक ९३ नु ज होय. तीर्थकर आहारक बननो संभव होवाथी. एकना बंधमा एक ज उदयस्थान (३०). एक नो बंध अपूर्वकरणादिने छ, तेने अति विशुद्ध होवाथी ते वैक्रिय आहारक करता नथी. तेथी तेने बीजां उदयस्थान न होय. एक ना बंधमां सत्तास्थान ८ (९३-९२-८९-८८-८०-७९-७६-७५), तेमा पहेला ४ सत्तास्थान उपशमश्रेणिवाळाने या क्षपकने ९ मे गुणस्थाने ज्या सुधी १३ प्रकृति खपाची न होय त्यांसुधी.अने १४ खपाच्या पछी छेल्ला चार सत्तास्थान लामे. ते १० मा गुणस्थान सुधी. केमके पछी तो अबंधक- पणुं थाय. अपंधकपणामां उदयस्थान १० अने ससास्थान १०, २५ २६ ॥ ४ ६ [१६७]] उदयस्थान १० आप्रमाणे-२०-२१-२६-२७-२८-२९-३०-३१-९.८. २०-२१ नो उदय तीर्थकर अतीर्थकरने केवळी समुद्घातमां कार्मणकाय- योगे वर्तता होय. २६-२७ नो उदयं पण ते बनेने ज औदारिकमिश्र काययोगे वर्तता होय. सामान्य केवळीने स्वभावे ३० नो उदय, स्वरनाम रुंधतां २९ नो अने उच्चास रुधे त्यारे २८ नो. तीर्थकरने स्वभावे ३१ नो उदय स्वरनाम रुंधे त्यारे ३० नो, अने उनचास रुंधे त्यारे २९ नो (ए प्रमाणे ३०-२९ मां वे बे विकल्प.) तीर्थकरने अयोगीपणामां चरम समये उदय ९ नो. सामान्य केवळीने अयोगीपणामां चरम समये उदय ८ नो अबंधकपणामां सत्तास्थान १० (९३-९२-८९-८८-८०-७९-७६-७५-१-८). २० ना उदयमा सत्तास्थान २ (७९-७५), २६-२८ ना उदयमा सत्तास्थान २ (७९-७५). २१ ना उदयमां सचास्थान २.(८०-७६), २७ ना उदयमा पण सत्तास्थान २ (८०-७६). २९ ना उदयमा सत्तास्थान ४ (८०-७६-७९-७५), ३० ना उदयमा सत्तास्थान ८०(९३-९२-८९-८८-८०-७९-७६-७५) तेमा पहेला ४ उपशम श्रेणिवाळाने तथा क्षपकवाळाने ज्यांसुधी १३ न खपावी होय त्यांसुधी. अने पाछळना ४ क्षपकवाळाने तथा सयोगीने. तेमा आहा- रक सत्कर्मा तीर्थकरने ८०, एवाज अतीर्थकरने ७९, आहारक ४ विना तीर्थकरने क्षीणकपाय वा सयोगी केवळीपणे ७६, तथा अतीर्थकरने ७५. ३१ ना उदयमां पण ए प्रमाणे वे सत्तास्थान (८०-७६) ते तीर्थकरने ज होय. ९ ना उदयमांत्रण सत्तास्थान (८७-७६-९) तेमा पहेला वे द्विचरम समय सुधी अयोगी केवळी तीर्थकरने होय. चरम समये ९ नी सत्ता होय. ८ ना उदयमांत्रण सत्तास्थान (७९-७५-८) तेमां पहेला वे विचरम समय सुधी अयोगी केवळी अतीर्थकरने होय. चरम समये ८ नी सत्ता होय. आ प्रमाणे अवंधकपणामां १० उदयस्थान आश्रीने सत्तास्थानना विकल्प ३०. गाथा ३४-३५. हवे गुणस्थान जीवस्थानने आश्रीने उक्त संवेधना स्वामी कहे छे.. आठ मूल कर्मप्रकृतिओना बंध उदय अने सत्ताना खामी प्रथम जीवस्थानक कहे छ. पर्याप्त संज्ञी पंचेंद्रियविना १३ जीवस्थानमां बंध, उदय अने सत्ता.

- - [१६८] ज्ञानावरणी अने अंतराय आश्री ३ विकल्प. ५ नो बंध, ५ नो उदय, ५ नी सत्ता (ध्रुव बंधोदय सचा होवाथी). पर्याप्त संज्ञी पंचेंद्रिय आश्री ३ के २ विकल्प- त्रण विकल्प उपर प्रमाणे १० मा गुणस्थान सुधी वे विकल्प ते ११-१२ मे बंध नही, ५ उदय, ५ नी सत्ता. केवळीने मनोविज्ञान नथी, पण द्रव्यमन आश्री संज्ञी कहेगाय छे. तो तेने त्रणे विकल्पमा शून्य. गाथा ३६. दर्शनावरणी आश्री १३ जीवस्थानके वे विकल्प ९ नो बंध, ४ नो उदय, ९ नी मचा. ९ नो बंध, ५ नो उदय, ९ नी सचा. संज्ञी पंचद्रिय पर्याप्त आश्री ११ विकल्प पूर्ववत्. १) ९नो वंध, ४नो उदय, ९नी सत्ता. ७) ४नो बंध, ४नो उदय, ६नी सचा. २) ९नो बंघ, ५नो उदय, ९नी सत्ता. ८) अधक, ४नो उदय, ९नी सत्ता. ३) ६नो बंध, ४नो उदय, ९नी सत्ता. ९) अबंधक, ५नो उदय, ९नी सत्ता. ४) ६नो बंध, ५नो उदय, ९नी सत्ता. १०) अबंधक, ४नो उदय, ६नी सना. ५) ४नो बंध, ४नो उदय, ९नी सत्ता. ११) अबंधक, ४नो उदय. ४नी सचा. ६) ४नो बंध, ५नो उदय, ९नी सत्ता. वेदनीय कर्म- संज्ञीपर्याप्त आश्री ८ विकल्प. १ असातानो बंध, असातानो उदय, साता असाता सत्ता. २ असातानो बंध, सातानो उदय, साता असाता सत्ता, (आ वे विकल्प पहेलाथी छठा गुणस्थान सुधी.) ३ सातानो बंध, असातानो उदय, बन्नेनी सत्ता. ४ सातानो बंध, सातानो उदय, बननी सत्ता. (आ वे भंग पहेलाथी तेरमा गुणस्थान सुधी.) ५ बंधाभाव, असातानो उदय, बन्नेनी सत्ता. ६ चंघाभाव, सातानो उदय, बन्नेनी सत्ता. (चौदमा गुणस्थानना द्वीचरम समय सुधी.) ७ बंधाभाव, असातानो उदय, असातानी सचा. ८ बंधाभाव, सातानो उदय, सातानी सना. छल्ले समये. (वाकीना १३ जीवस्थानमा प्रथमना ४ भंग.)

[१६९] गोत्र कर्म- संज्ञी पर्याप्त आश्री ८ भंग.- १ नीच गोत्रनो बंध, नीच गोत्रनो उदय, नीचगोत्रनी सत्ता. (तेउ वायुमाथी नीकळ्या पछी संज्ञी तिर्यंच पंचेंद्रियमा केटलाक काळ सुधी आ पहेलो भंग रहे.) २ नीचनो बंध, नीचनो उदय, उंच नीचनी सत्ता. ३ नीचनो बंध, उंचनो उदय, उंच नीचनी सत्ता. (आ वे भंग पहेला वीजा गुणस्थान सुधी.) ४ उंचनो बंध नीचनो उदय, वन्नेनी सत्ता. (आ भंग पहेलेथी पांचमा सुधी.) ५ उंचनो बंध, उंचनो उदय, चनेनी सचा. (आ भंग दशमा गुणस्थान सुधी.) ६ अबंध, उंचनो उदय, बनेनी सत्ता. (आ भंग ११ माथी १४ माना द्विचाम समय सुधी.) ७ अबंध, उंचनो उदय, उंचनी सचा. (आ भंग १४ माना चरम समये होय.) बाकी १३ जीवस्थानके त्रण भंग नीचे प्रमाणे.- १ नीचनो चंध, नीचनो उदय, नीचनी सत्ता. (आ भंग तेउ वायुमा उंचवें उद्वलन कर्या पछी सर्वदा होय, अने तेमांथी नीकळ्या पछी पृथ्व्यादिकमां तेमज विकलेंद्रियमा केटलोक काळ पामीए.) २ नीचनो बंध, नीचनो उदय, वन्नेनी सत्ता. ३ उंचनो बंध, नीचनो उदय, वनेनी सचा. (बीजा भंग न लामे. तिथंच गतिमा उंच गोत्रना अभावथी.) आयुकर्म:- संज्ञी पर्याप्तमा २८ भंग, संजी अपर्याप्तमा १० मंग, पंचेंद्रिय असंत्री पर्याप्तमा ९ भंग, वाकीना ११ जीवस्थानके ५ भंग. प्रथम २८ आ प्रमाणे-(नरकायु संबंधी ५ भंग.) १ अबंध काळे, नरकायु उदय, नरकायु सत्ता. २ बंधकाळे, तिर्यगायु वंध, नरकायु उदय, नरक तिर्यगायु सचा. ३ बंधकाळे, मनुप्यायु बंध, नरकायु उदय, नरक मनुजायु सत्ता. ४ बंधोचरकाळे, नरकायु उदय, तिर्यच नरकायु सचा.

- [१७०]] ५ बंधोचरकाळे, नरकायु उदय, मनुज नरकायु सचा. (आ प्रमाणे देवगति आधी पण पांच भंग जाणवा. कुल भंग १०) तिर्यंचायु आश्री ९ मंग नीचे प्रमाणे.- १ अबंध काळे, तिर्यगायु उदय, तिर्यगायु सत्ता. २ बंधकाळे, देवायु बंध, तिर्यगायु उदय, देवतिर्यगायु सचा. ३ बंधकाळे नरकायु बंध, तिर्यगायु उदय, नरकतिर्यगायु सना. ४ बंधकाळे मनुजायु बंध, तिर्यगायु उदय, मनुज तिर्यगायु सचा. ५ बंधकाळे तिर्यगायु बंध, तिर्यगायु उदय, तिर्यक्तिर्यगायु सचा. ६ बंधोत्तरकाळे, तिर्यगायु उदय, देवतिर्थगायु सत्ता. ७ बंधोचरकाळे, तिर्यगायु उदय, नरकतिर्यगायु सचा. ८ बंधोत्तरकाळे, निर्यगायु उदय, मनुजतिर्यगायु सत्ता. ९ बंधोचर काळे, तिर्यगायु उदय, तिर्यतिर्यगायु सचा. (आ प्रमाणे मनुष्यायु आश्री पण ९ भंग जाणवा. कुल भंग. १८) कुल संझी पर्याप्सना भंग २८. संज्ञी अपर्याप्त आश्री १० भंग नीचे प्रमाणे- १ अबंध काळे, तिथंगायु उदय, तिर्यगायु सचा २ बंधकाळे, तिर्यगायु बंध, तिर्यगायु उदय, तिर्यक्तिर्यगायु सचा. ३ बंधकाळे, मनुजायु बंध, तिर्यगायु उदय, मनुजतिर्यगायु सत्ता. ४ बन्धोचरकाळे, तिर्यगायु उदय, तिर्यक्तिर्यगायु सना. ५ बन्धोचरकाळे, तिर्यगायु उदय, मनुजतिर्यगायु सचा. (आप्रमाणे मनुष्यगति आश्री पण पांच भंग जाणवा. कुल भंग १०. (देव नारकी थवानुं न होवाथी.) असंज्ञी पर्याप्त विर्यच पंचेंद्रियना ९ मंग संज्ञी तिर्यंचना आयु आश्री जे कह्या छ ते जाणवा. (आ जीवमेद नरक, देव अने मनुष्यमा न होवाथी बीजा भंग नहीं.) बाकीना ११ जीवस्थानके संज्ञी अपर्याप्तने तिर्थचगति आश्री पांच भंग कह्या छ, तेज पांच भंग समजवा. तेमने तिर्यंचपणु ज होवाथी अने देव नारकीम जवापणु न होवाथी. ते ११ जीवस्थान नीचे प्रमाणे- ४ जीवमेद एकेंद्रिय सूक्ष्म बादर, पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता, ६ जीवमेद विकनेंद्रियना त्रणे पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता. - - [१७१] १ जीवभेद असब्जी पंचेंद्रिय अपर्याप्ता. गाथा ३७ हवे मोहनीकर्मनी वात कहे छ.- मोहनी कर्मना बन्धस्थान जीवस्थान उपर कहे छे.- ८ पर्यासापर्यास सूक्ष्म अने अपर्याप्त बाकीना ६, एम कुल आठ जीवस्थाने बंध- स्थान १ (२२ नु) ते २२ आ प्रमाणे-१ मिथ्यात्व, १६ कषाय, २ युगलनी, १ वेद, २ भय जुगुप्सा. अहीं त्रण वेद अने वे युगलवडे मिथ्यात्व गुणस्थाने विकल्प ६, ५ पर्याप्त संझी पंचेंद्रिय विना वाकीना पांच पर्याप्त जीवस्थाने बंध स्थान २ (२२-२१) तेमां २२ मिथ्यात्वे. उपर प्रमाणे. तेना भंग ६. २१ सासादने (मिथ्यात्व विना) त्यां नपुंसक वेदनो बंध न होवाथी वे वेद अने वे युगल साथे ४ मंग. १ पर्याप्तसंक्षी पंचेंद्रियने १० बंधस्थान पूर्ववत्, उदय स्थान- र जीवमेदे २२ ना चंघे उदयस्थान ३(८-९-१०) १ मिथ्यात्व, ४ कषाय, १ नपुंसक वेद, २ युगल, आ ८ ना उदयमा ४ कपाय अने २ युगल आश्री मंग८ ८ मां मय के जुगुप्सा भळवाथी ९ ना उदयमा बन्ने प्रकारे आठ आठ मंग थवाथी कुल मंग १६. ८ मां भय जुगुप्सा बन्ने भळवाथी १० ना उदयमा ८ मंग. कुल ८ जीवस्थाने उभय आधी भंग ३२, ५ जीवभेदे २२-२१ ना बंधमां उदयस्थान ४ (६-८-९-१०) २१ ना बंधमां सासादने ७-८-९, २२ ना बंधमा मिथ्यात्वे ८-९-१०. सासादने मिथ्यात्व उदयमान होवाथी ७ नो उदयतेना पण ७-८-९ मां मंग उपर प्रमाणे ३२ (८-१६-८) २२ ना बंधमां प्रण उदय स्थाने भंग उपर प्रमाणे ३२. असंज्ञी एवा लब्धि पर्याप्त पंचेंद्रियने चूर्णिकार त्रणे वेदनो उदय माने छे.तेथी २२ ना बंधमां अने २१ ना बंधा बघा उदयस्थानमा त्रण त्रण वेद आश्री गुणतां २४-२४ भंग थाय. १ संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्ता आश्री नवे उदयस्थान पूर्ववत्, [१७२] सत्तास्थान.- ८ जीवस्थाने सत्तास्थान ३ (२८-२७-२६). ५ जीवस्थाने पण तेज ३ सत्तास्थान. १ जीवस्थाने १५ सत्तास्थान पूर्ववत्. हवे संवेध कहे छे. ८ जीवस्थाने २२ ना बंधस्थानमा उदयस्थान ३ (८-९-१०) ते दरेकमांत्रण त्रण सत्तास्थान. तेथी तेना कुल भंग ९, ५ जीवस्थाने वे बंधस्थान (२२-२१) तेमा २२ ना बंधे त्रण उदयस्थान (८-९-१०) ते त्रणेमां उपर प्रमाणे त्रण त्रण सत्तास्थान (२८-२७- २६) तेथी तेना भंग ९. तथा २१ ना बंधमा व्रण उदयस्थान (७-८-९) ते त्रणमा सत्तास्थान १ (२८ नुंज) तेना भंग ३. कुल ५ जीवस्थाने दरेकने सत्तास्थान भंग १२. १ पर्याप्त संजी पंचेंद्रिय जीवस्थाने संवैध पूर्ववत्, गाथा ३८-३९. नामकर्म जीवस्थाने कहे है- ७ अपर्याप्त जीवस्थाने ५ बंध स्थान, २ उदय स्थान, ५ सत्तास्थान. ५ चंघस्थान आ प्रमाते-२३-२५-२६-२९-३०. अपर्याप्त जीवो तिर्यंच मनुष्य- गति आश्रीज बंध करे छ. त्यां एक एक अपर्याप्तने विपे १३९१७ मंग तथा देव नारकी आश्रीने बंध न करे. तेथी तेने आ पांच पांज ज बंध स्थान होय. तेनी व्याख्या पूर्ववत् करी लेवी. २ उदय स्थान-एज सात जीवरथानमा अपर्याप्त वादर सूक्ष्म एकेंद्रियने उदय स्थान २ (२१-२४) तेमा २१ मा बादर अने सूक्ष्म वनेने एक एक भंग अने २४ मा प्रत्येक तथा साधारण साथे वे वे भंग. कुल वन्न जीवस्था- नमा उदय आश्री ३-३ भंग. पविकलेद्रिय तथा संज्ञी असंज्ञी पंचेंद्रिय ए पांच अपर्याप्ताने उदयस्थान२(२१- २६)पूर्ववत् तेमां विकलेंद्रिय तथा असंज्ञी अपर्याप्तने वे बे उदय स्थान आश्री वे वे भंग, अने संज्ञी अपर्याप्ताने चार भंग-वे तिर्यंच आश्री, वे मनुष्य आश्री. ५ सत्तास्थान-साते अपर्याप्साने सचास्थान ५.--- (९२-८८-८६-८०-७९) पूर्ववत्.. १ सूक्ष्म पर्यासाने बंघस्थान ५ (२३-२५-२६-२९-३०).

[१७३] तेनु स्वरूप पूर्ववत्. आ पांचे बंधस्थान तिर्यग्मनुष्यगति आधी छे. अहीं बंधना भांगा १३९१७. ४ उदयस्थान (२१-२४-२५-२६), २१ अपांतराल गतिमा २४ शरीरस्थ थतां. २५ पराघात क्षेपवतां, २६ उच्चास भळतां. प्रथम २१ मां एक ज मंग. बाकीना त्रणमां प्रत्येक अने साधारण आश्री वे बे भंग कुल भंग ७. ५ सचा स्थान (९२-८८-८६-८०-७८). तेमां केवळ २५-२६ ना उदयमा साधारण पद साथै भंग छ तेमां ७८ नु सत्तास्थान नहीं. कारण के शरीर पर्याप्तिए पर्याप्त तेउ वायु विना बीजा सर्वे मनुष्यगति वांधी शके छे. प्रत्येक पदमां तेउ वायु भळवाथी पांचे सत्तास्थान होय, तेथी २५-२६ वाळा साधारणमां वे भांगे ४ सत्तास्थान अने वीजा पांच भांगे ५ सत्तास्थान. १ पर्याप्त वादर एकेंद्रियने बंधस्थान ५ (२३-२५ २६-२९-३०) पूर्ववत्. आ पांचे बंधस्थान मनुष्य तिर्यक् प्रायोग्य ज होय, ५ उदयस्थान (२१-२४-२५-२६-२७). अपांतराल गतिमां पूर्ववत् २१ पण तेमां यश अयशमाथी एक ज उदयमां होवाथी वेना भंग २. २१ मां पूर्व- वत् ३ वधवाथी २४ ना उदयमा प्रत्येक साधारण यश अयश साथे गुणतां भंग ४. तेमां पण वायुकाय आश्री चैक्रिय करतां एक भंग वधे, तेने यशनो उदय न होवाथी, वळी प्रत्येकपणुंज होवाथी कुळ २४ ना उदयमा मंग ५. २४ मां पराघात नाखवाथी २५ ना उदयमां पण पूर्ववत् भंग ५.२५ मां उच्चस क्षेपवतां •६ ना उदयमां भंग ५. अथवा उच्वासना उदय अगाउ आतप के उद्योत क्षेपवतां २६, तेमां आतप प्रत्येक पृथ्वीकायने ज होवाथी तेना यश अयश साथे भंग २. उद्योतना प्रत्येक साधारण बने आश्री यश अयश साथे गुणतां भंग ४. वैक्रिय करतां वायुने आतप उद्योत काई पण न होवाथी तेनो भंग नहीं. कुल २६ मां मंग ११. उच्छवास युक्त २६ मां आतप के उद्योत भळवाथी २७ नो उदय. तेना भंग उपर प्रमाणे आतप साथे २ अने उद्योत माथे ४. कुल भंग ६. कुल बादर पर्यासने उदय आश्री भंग २९ (२-५-५-११-६), ५ सत्तास्थान (९२-८८-८६-८०-७८) उदयस्थान कुल २९ माथी २५-२६ ने उद्ये प्रत्येक अयशकीर्ति साथेनो [१७४]] एक एक भंग. २१ ना उदयमां वे भंग. अने वैक्रिय वायु विनाना २४ना उदये भंग ४. कुल भंग ८ ने विपे पांचे सत्तास्थान. पाकीना २१ भंगमा ७८ विना चार चार सत्तास्थान, ३ विकलेंद्रिय पर्यायाने बंधस्थान ५ (२३-२५-२६-२९-३०). तिर्यग्मनुष्य प्रायोग्य. पूर्ववत्. अहीं भंग १३९१७. ६ उदयस्थान-२१-२६-२८-२९-३०-३१. २१ नो उदय पूर्ववत् तेने यश अयश साथे गुणतां भंग २. २१ मां औदारिक द्विक, हुंडक संस्थान, सेवा संघयण, प्रत्येक तथा उप- घात भळतां अने आनुपूर्वी जतां २६. तेना पण भंग २. २६ मा पराघात अने अप्रशस्तगति भळतां २८ तेना पण भंग २. २८ मां उच्छ्वास नाम मळतां २९. तेना पण भंग २. अथवा २८ मा उच्चस विना उद्योत मेळवतां २९. तेना पण भंग २. कुल २९ ना उदयमा भंग ४. उच्छ्वास सहित २९ मां मापापसिए पर्याप्त थतां सुखर के दुःस्वर भळवाथी ३०. तेना वे वर अने यश अयश साथे गुणतां भंग ४. अथवा २९ मां उद्योत मळता २०. तेमां यश अयश साथे भंग २. कुल ३० ना उदयमा भंग ६. स्वर सहित ३० मा उद्योत भळतां ३१. तेमां बे स्वर तथा यश अयश साथे गुणतां मंग४. कुल विकलेंद्रियने उदय आश्री भंग २०. ५ सत्तास्थान-९२-८८-८६-८०-७८. तेमा २१-२६ ना उदयवाळाने तेजो वायुमाथी आवेलाने केटलोक वखत मनुष्य- द्विक सत्तामा न होवाथी ७८ नुं सत्तास्थान लामे. तेथी ते वे उदयना चार भंगे पांच सत्तास्थान. बाकीना १६ उदयने मांगे चार सत्तास्थानक. केम के तेजो वायु विना शरीर पर्याप्ति थया पछी सर्व जीवने मनुष्यद्विक बांध- वानो संभव छ, तेथी २७ विगेरे उदयस्थानमा ७८ नी सत्ता न लामे. १ असंज्ञी पर्याप्ता तिर्यंच पंचेंद्रियने बंधस्थान ६ (२३-२५-२६-२८-२९-३०). आ जीवो नरकगतिनो पण बंध करे छे. तेथी २८ नुं बंघस्थान तेने लामे अहीं बंधना भंग १३९२६. ६ उदयस्थान-२१-२६-२८-२९-३०-३१. तेमा २१ नो उदय आ प्रमाणे.- २ तैजस कार्मण, २ स्थिर अस्थिर, २ शुभाशुभ, ४ वर्णचतुष्क, १ निर्माण, २ तिर्यग्द्विक, १ पंचेद्रिय जाति, - १ अगुरुलघु, [१७५]] १त्रसनाम, १ बादरनाम, १ पर्यातनाम, १ मुभग के दुर्भग, १ आदेय के अनादेय, १ यश के अयश. आ २१ अपांतराल गतिमा होय. तेना मुभग दुर्भग, आदेय अनादेय, यश अयश साथे गुणतां भंग ८. उपरना २१ मां २ औदारिकटिक, १ छमांथी एक संस्थान, १ छमाथी एक संघ- यण, १ उपघात, १ प्रत्येक, आ६ भळतां अने तिर्यंचानुपूर्वी जता २६ नो उदय. तेना भंग ६ संघयण, ६ संस्थान, सुभग, दुर्भग, आदेय अनादेय, यश अयश साथे गुणतां २८८. २६ मां पराघात तथा वैभांथी एक विहायोगति भळना २८. तेना भंग पूर्ववन् २८८ ने वे गति साथै गुणतां ५७६. २८ मां उच्चास नाम भळतां २९. तेना भंग पण पूर्ववत् ५७६. अथवा २८ मां उद्योतनाम भळतां २९. तेना पण भंग ५७६. कुल २९ मां भंग ११५२. उच्छवास युक्त २९ मां भाषापर्याप्लिए पर्याप्त थतां सुस्वर के दुःखा भळवाथी ३०. तेना भंग पूर्ववत् ५७६ ने वै खर गुणतां ११५२. अथवा स्वर न वधे अने उद्योत नाम वधे तो ३०. तेना भंग पूर्ववत् ५७६. कुल ३० मा भंग १७२८. स्वरसहित ३० मा उद्योतनाम भळवाथी ३१- तेना भंग पूर्ववत् ११५२. कुल उदय आश्री भंग ४९०४.(८-२८८-५७६-११५२-१७२८-११५२) असंज्ञी पंचेंद्रिय वक्रिय करता नथी. तेथी ते आश्री भंग नहीं, ५ सत्तास्थान-९२-८८-८६-८०-७८. तेमा २१-२६ ना उदयवाळा ८-२८८ कुल २९६ भंगमां सत्तास्थान ५. वाकीना भांगामां सत्तास्थान ४. युक्ति पूर्ववत्. १ संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्ताने बंधस्थान ८ छे. ते बधा होय. अहीं वंवना मांगा १३९४५ थाय. उदयस्थान १२ मांथी २०-२४-८-९ ए चार जतां चाकीना ८ उदयस्थान होय. तेमा २०-८-९ आ ण उदयस्थान केवळी आश्री छे. तेने अहीं संज्ञीमा गण्या नथी. तेथी ते वाद करवा. अने २४ नो उदय एकेंद्रियने होय छे. तेथी ते बाद करतां बाकी ८ उदयस्थान होय सत्तास्थान १२ मांथी केवळी आश्री ८-९ ए वे सत्तास्यान जतां वाकी १० सत्तास्थान होय. २१ ना उदयमा भंग ८. अहीं पांच सत्तास्थान. २६ ना उदयमा भंग २८८, अही ४ सत्तास्थान, ६१७६] वाळावबोधवाळा उदयना ७७९१ कुल भांगामांथी २८ ने आ प्रमाण वाद करे छ, २१ ना उदयमाथी ७ अपर्याप्ता, १ संबी असंज्ञी पंचेंद्रिय तिर्यच, १ मनुप्य अपर्याप्त, कुल ९. २६ ना उदयमाथी ३ विकलेंद्रिय, २ असंही पंचेद्रिय तिथंच तथा मनुप्य कुल ५. २४.नो उदय ज न होवाथी तेना भंग ११. २०-८-९ ना उदयना एक एक मळी भंग ३. कुल २८ जतां ७७६३ संज्ञी पर्याप्त पंचद्रियमा पामीए, एम लखे छे. पण ७७९१ मां तो विकलेद्रिय, एकेंद्रिय विगेरे वीजा घणा उदयभंग बाद करवा जेवा लागे छे, तेथी ते विचारवा योग्य छे. टीकामां आ बावत विलकुल नथी. वळी बाळावरोधमा २१ ना उदयना ४० अने २६ ना उदयना ५९५ कुल ६३५ उदय भंगे पांच सत्तास्थान. बाकीना भंगे चार सत्तास्थान लखे छ. ते पण चिंतवत्रा योग्य छे. कारण के २१ ना उदयमा ४२ भंग छे. तेमाथी उपर काइ बाद करेल नथी, तो ४० केम ? अने वाद करवा योग्य जोईए तो घणा छे. २६ ना उदयना कुल भंग ६०० छ. तेमां उपर पांच बाद कर्या छे. तेथी ५९५ तो वरावर थाय. पण उदय आश्री तेमाथी बाद करवा जोईए तेथी ते पण विचारवा योग्य छे. हवे संवेध कहे छे. १ सूक्ष्म एकेंद्रिय अपर्याप्ताने २३ ना बंधमा २१ तथा २४ ए वे उदयस्थान. अने सत्तास्थान ९२-८८-८६-८०-७८ ए पांच पांच होवाथी भंग १०. तेज प्रमाणे २५-२६-२९-३० ना बंधमां पण वे वे उदयस्थाने पांच पांच सत्ता- स्थानना दश दश भंग होवाथी कुल भंग ५०. २ थी ७. एज प्रमाणे बीजा ६ अपर्याप्तने पण ५०-५० भंग.समजवा. पळी उदय स्थान पण पोतपोताना होय ते वे वे समजवा. कुल भंग ३००. ८ सूक्ष्म एकेंद्रिय पर्याप्ताने २३ ना बंधे चार उदयस्थान. अने दरेक उदयस्थाने पांच पांच सत्तास्थान कुल भंग २०. -एज-प्रमाणे २५-२६-२९-३० ना बंधमां पण २०-२० मंग. कुल भंग १००. ९ वादर एकेंद्रिय पर्याप्ताने २३ ना बंधमा २१-२४-२५-२६ना उदयमां पांच पांच सत्तास्थान होवाथी भंग २०, अने २७ ना उदयमां चार सत्तास्थान मळी भंग २४. ए प्रमाणे पांचे बंधस्थानना मळीने भंग १२०.

. [१७७] १० वींद्रिय पर्याप्ताने २३ ना बंधमा २१-२६ ना उदये पांच पांच सचास्थान, अने २८-२९-३०-३१ ना उदये चार चार सत्तास्थान होवाथी कुल भंग २६ ए प्रमाणे पांचे बंधस्थानना मळी कुल भंग १३०. ११-१२ त्रींद्रिय अने चतुरिद्रिय पर्याप्ताने पण द्वींद्रिय प्रमाणे ज १३०-१३० सत्ता- स्थानना भंग होवाथी कुल भंग २६०. १३ असंज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्ताने २३ ना बंधमा २१-२६ ना उदये पांच पांच सत्तास्थान तथा २८-२९-३०-३१ ना उदये चार चार सत्तास्थान कुल भंग २६. एज प्रमाणे २५-२६-२९-३० ना बंधमां पण २६-२६ मंग जाणवा. २८ ना बंधमां वे ज उदयस्थान (३०-३१), तेमांत्रण त्रण सत्तास्थान- ९२-८८-८६. तेना कुल मंग ६. ते प्रथमना पांच बंधस्थानना कुल भंग १३० मा मेळवतां सर्व मंग १३६. १४ संज्ञी पर्याप्सने २३ ना बंधां उपर प्रमाणे २६ सत्तास्थान ते आ प्रमाणे--२१-२६ ना उदये पांच पांच सत्तास्थान. तथा २८-२९-३०-३१ ना उदये चार चार सत्तास्थान. तेथी भंग २६. एज प्रमाणे २५ ना बंधमां सत्तास्थानना भंग २६. पण २५ ना बंधक देवताने २५-२७ ना उदयमां ९२-८८ आ वे सचास्थान होवाथी चार भंग वधे. एटले २५ ना बंधमां कुल भंग ३०. एज प्रमाणे २६ ना बंधमां पण सत्तास्थानना भंग ३०. २८ ना बंधमा ८ उदयस्थान-२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१ तेमा २१ ना उदये तेमज २५-२६-२७-२८-२९ ना उदये ९२-८८ आ वे सत्ता- स्थान, ३० ना उदये चार सत्तास्थान-९२-८९-८८-८६ तेनी व्याख्या पूर्वे संवेधमां विस्तारथी करी तथा ३१ ना उदये त्रण सत्तास्थान- ९२-८८-८६. एकदर २८ ना बंधा १९ मत्तास्थान, २९ ना बंधमा २५ ना बंध प्रमाणे सत्तास्थानना भंग ३०. पण एटलुं विशेष छे के चोथा गुणस्थानवाळाने देवगति प्रायोग्य २९ बांधता २१-२६-२८-२९- ३० ना उदयमा प्रत्येक वे वे सत्तास्थान-९३-८९. अने २५-२७ ना उदयमां वैक्रिय संयत अने असंयतने आश्रीने ते ज वे सचास्थान. अथवा आहारक संयत आश्री २५-२७ ना उदयमा ९३ नुं सत्तास्थान तथा नारकी तीर्थकर सत्कर्मा मिथ्यात्वी आश्री ८९ नुं सत्तास्थान. कुल १४ वधता २९ ना बंधमां एकंदर ४४ भंग थाय. .

[१७८] ३० ना बंधमां २५ ना बंध प्रमाणे सत्तास्थानना भंग ३०. तेमां एटलुं विशेप के देवताने मनुष्यगति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित ३० बांधतां २१-२५- २७-२८-२९-३०ना उदयमा प्रत्येके ९३ अने ८९ ए वे सत्तास्थान. तेथी कुल १२ वधतां ३० ना बंधमां कुल सत्तास्थान ४२ थाय. २१ ना बंधमां एक ९३ नुं सत्तास्थान. कारण के ३१ नो बंध तीर्थकर नामकर्म अने आहारक सहित ज करे. तेथी सत्तास्थान १. १ एकविध बंधने सत्तास्थान ८ (९३-९२-८९-८८-८०-७९-७६-७५) तेमां पहेला चार सनास्थान उपशमश्रेणिवाळाने अथवा क्षपकने ज्यांसुधी नाम- कर्मनी १३ प्रकृति खपावी न होय त्यांसुधी. १३ प्रकृति खपावे त्यारे पाछला चार सत्तास्थान. कुल सचास्थान ८. अबंधक संज्ञी पर्याप्तने सत्तास्थान ८ उपर कह्या ते ज. तेमा पहेला चार अग्यारमे गुणस्थाने अने पाछला चार बारमे गुणस्थाने. कुल ८. कुल संज्ञी पर्याप्ताने सत्तास्थान २०८ (२६-३०-३०-१९-४४-४२-१-८-८) द्रव्यमनने लइने केवळीने पण संज्ञी गणीए तो केवळी आश्री २६ सत्तास्थान वधे. ते आ प्रमाणे- केवळीने १० उदयस्थान-२०-२१-२६-२७-२८-२९-३०-३१-९-८. २०-२६-२८ ना उदयमा सत्तास्थान बब्वे-७९-७५. २१-२७ ना उदयमांवे वे सत्तास्थान ८०-७६. २९ ना उदयमा ४ सत्तास्थान-८०-७६-७९-७५. कारण के २९ नो उदय तीर्थकर अतीर्थकर बन्नेने होवाथी बन्नेना वे वे सत्तास्थान. तेथी कुल ४. ३० ना उदयमा पण उपर प्रमाणे ४. ३१ ना उदयमा सत्तास्थान २ (८०-७६). ९ ना उदयमा सचास्थान ३ (८०-७६-९). तेमा पहेला वे तीर्थकर अयोगी केवळीने द्विचरम समय सुधी. चरम समये ९. ८ ना उदयमांत्रण सत्तास्थान (७९-७५-८). ते अतीर्थकर आश्री उपर प्रमाणे समजवा. कुल केवळी आश्री सत्तास्थानना भंग २६, (२-२-२-२-२-४-४-२-३-३). केवळीने संज्ञी गणतां कुल संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्त आश्री सत्तास्थानना भंग २३४ जीवस्थान आश्री संवेध संपूर्ण.

[१७९] गाथा ४० गुणस्थाने कर्मप्रकृतिना भंग. ज्ञानावरणीय तथा अंतराय आश्री पहेलाथी दशमा गुणस्थान सुधी पांच विध बंध, पांच विध उदय, पांच विध सत्ता. त्यार पछी ११-१२ मे बंधनो विच्छेद होवाथी पांचविध ऊदय, पांचविध सत्ता, त्यार पछी ऊदय अने सत्तानो पण छेद जाणवो. दर्शनावरणीय कर्म.- पहेले बीजे गुणस्थाने-९ विधबंध,४-५ विध ऊदय,९नी सत्ता.तेना भंग २. गाथा ४१. जीजाथी सातमा सुधी बंधमांथी त्रण निद्रानो क्षय. तेथी ६ विध बंध, ४-५ विध ऊदय, ९ विध सत्ता. अपूर्वकरणनो प्रथमनो संख्यातमो भाग गये छते रहेली वे निद्रानो पण बंधमांथी विच्छेद थाय. तेथी ८-९-१० मे गुणस्थाने ४ विध बंध, ४-५ विध उदय, ९ विध सत्ता. आ उपशमश्रेणि आश्री समजवू. आपकश्रेणि आश्री ८-९-१० मे गुणस्थाने ५ विध उदय नहीं, अने दशमे ९ विध सत्ता नहीं. क्षपकवाळाने अनिवृत्तिवादरनो घणो भाग गये छते अने संख्यातमो भाग रहे छते स्त्यानद्धि त्रिकनो सचामांथी क्षय थाय छे. तेथी नवमाने अंते तथा दशमे गुणस्थाने छ विध सत्ता होय. अने भपकने अत्यंत विशुद्धि होवाथी निद्रानो उदय न होय. जेथी ४ विध उदय होय. गाथा ४२. अग्यारमे बंधाभाव होवाथी ४-५ विध उदय, ९ विध सत्ता. उपशांतमोह- वाळा अत्यंत विशुद्ध न होवाथी तेने निद्राद्विकना उदयनो संभव छ. पारमे (क्षपकमोहे) ४ विध उदय, ६ विध सचा. आ विकल्प बारमाना द्विचरम समय सुधी. चरम समये वे निद्रानो पण सत्तामांथी क्षय थवाथी ४ विध उदय, ४ विध सत्ता. पछी उदय अने सचामाथी तद्दन क्षय थाय. वेदनीयकर्म- पहेलाथी छटा गुणस्थान सुधी ४ चिकल्प.- १ असातानो बंध, बनी सत्ता. २ असातानो बंध, ३ सातानो बंध, ४ सातानो बंध, सरतमाथी तेरमा सुधी बीजो अने चोथो वे विकल्प, तेमने असातानो चंध न होय. . असातानो उदय, सातानो उदय, असातानो उदय, सातानो उदय, चन्ननी सत्ता. बन्नेनी सत्ता. अनेनी सत्ता.

. नीचनो उदय, उंचनो उदय, [१८०] चौदमे गुणस्थाने ४ भग. (त्यां बंधनो अभाव छे.) १ असातानो उदय, बन्नेनी सत्ता. १ सात्तानो उदय, बन्नेनी सत्ता. आ वे भंग द्विचरम समय सुधी अने द्विचरम समये जो सातानो क्षय करे तो- ३ असातानो उदय, असातानी सत्ता. अने असातानो क्षय करे तो- ४ सातानो उदय, सातानी सत्ता. पछी सर्वथा क्षय, गोत्र कर्म पहेले गुणस्थाने ५ भंग.-- १ नीचनो बंध, नीचनो उदय, नीचनी सचा. आ भंग तेजो वायुमां तथा त्यांथी नीकळ्या पछी थोडा काळ सुधी होय. २ नीचनो बंध, बन्नेनी सचा. ३ नीचनो बंध, बन्नेनी सत्ता. ४ उंचनो बंध, नीचनो उदय, बन्नेनी सचा. ५ उंचनो बंध, बन्नेनी सत्ता. पीजे गुणस्थाने पाछला ४ भंग. (तेजो वायुने आ गुणस्थाननो अभाव होवाथी). श्रीजे, चोथे, पांचमे गुणस्थाने चोथो अने पांचमो ए वे मंग. केमके तेमने नीच गोत्रना बंधनो अभाव छै. कोइ आचार्य पांचमे गुणस्थाने पांचमो एक ज विकल्प कहे छे. ६-७-८-९-१० मे गुणस्थाने केवळ पांचमो मंग. ११-१२-१३ मे बंधाभाव होवाथी छठो विकल्प.- ६ उच्चनो उदय, बनेनी सत्ता. १४ मे गुणस्थाने उपरनो विकल्प द्विचरम समय सुधी. द्विचरमे सत्तामाथी नीचनो क्षय थाय तेथी त्यां ७ मो विकल्प- ७ उच्चनो उदय, उच्चनी सत्ता. आयु कर्मना भंग २८, (५ नारकी आश्री, ९ तिर्यंच आश्री, ९ मनुष्य आश्री, ५ देव आश्री. आनु विव- रण अगाउ आवेल छे.) मिथ्यात्वी चारे गतिमा होवाथी ते गुणस्थाने विकल्प २८. बीजे गुणस्थाने विकल्प २६. सासादने रहेलो मनुष्य तथा तियच नरकायु न बांधे तेथी आयुबंध काळे ते वे गतिमां वे भंग ओछा थाय. उंचनो उदय, क [१८१] चीजे गुणस्थाने विकल्प १६. त्रीजे आयुबंध थतो नथी. तेथी आयुबंध काळना नरक आश्री २, तिर्यच आश्री ४, मनुष्य आश्री ४, देव आश्री २, आ १२ भंग त्यां न लामे. चोथे गुणस्थाने विकल्प २०. चोथे वर्तता मनुष्य तथा तिर्यंच देवायु ज बांधे. तेथी तेना बंधकाळना अन्य गति आश्री त्रण त्रण भंग वाद करवा. अने नरक तथा देवता चोथे वर्तता मनुष्यायुज बांधे. तेथी तेना बंधकाळनो तिर्यच आश्री एक एक भंग बाद करवो. कुल ८ जतां वाकी भंग २०. पांच मे गुणस्थाने विकल्प १२ (पांचढं मनुष्य तिर्यचने ज होय.) ते देवायु ज बांधे छ तेथी बंध अगाउ एक एक, बंध समये पण एक एक, अने बंधो- त्तर काळे चार चार. कुल १२ भंग. चार गविमाथी कोई अन्य गतिर्नु आयु बांध्या पछी देशविरति पामनारनी अपेक्षाए बंधोत्तरना चार चार मंग लामे. छठे वथा सातमे गुणस्थाने विकल्प ६. (ए गुणस्थान मनुष्य आश्री ज छे.) तेथी बंध अगाउ १, बंध काळे १, बंधोत्तर काळे उपर कहेली युक्ति प्रमाणे ४, कुल भंग ६. ८-९-१०-११ मे गुणस्थाने उपशमणि आश्री विकल्प २. मनुष्यायु उदय, देव मनुष्यायु सत्ता. (बंधोत्तर काळे), १ मनुष्यायु उदय, मनुष्यायु सत्ता (बंधथी पूर्वे) आ चार गुणस्थाने तो आयुबंध नथी. पण पूर्व बद्धायु उपशमश्रेणि मांडे छे. ते पण देवायु बांधेल होय तो ज. तेथी उपर प्रमाणे वे भंग. अने पूर्वबद्धायु- वाळो क्षपकश्रेणि मांडतो नथी. तेथी क्षपक आश्री ८-९-१०-११-१२- १३-१४ ए सर्वे गुणस्थाने एकज मंग मनुष्यायुउदय, मनुष्यायु सचा. पछी सर्वथा क्षय. कुल भंग १२५ थया. (२७-२६-१६-२०-१२-१२-४-७) गाथा ४३. मोहनीकर्म. बंधस्थान पहेलाथी आठमा सुधी एक एक पहेले २२, बीजे २१, बीजे, चोथे, १७, पांचमे १३, छठे, सातमे, आठमे ९. आनो विस्तार प्रथम करेलो छ, विशेष एटलं के प्रमत्त गुणस्थानके अरति शोकनो बंध विच्छेद थवाथी सातमे आठमे बंध तो नवनो होय. पण तेमां विकल्प एक ज. बे नहीं. नवमे गुणस्थाने बंधस्थान ५, ४, ३, २, १. तथा दशमा गुणस्थानथी बंधनो विच्छेद.

[१८२] गाथा ४४. उदयस्थान. २२ ना बंधवाळा मिथ्यान्वीने उदयस्थान ४ (७-८-९-१०). १ मिथ्यान्त्र, ३ अप्रत्याग्व्यान, प्रत्याख्यान अने संज्वलन एत्रण जातिनो कपाय, १त्रणमाथी १ वेद, २ युगलमांथी एक युगल. आ मानना उदयमा ४ कपाय अन त्रण वेदं गुणतां १२. तेने २ युगले गुणवां चोागी १ घाय. ७ मां अनंतानुबंधी कपाय, अथवा भय, अथवा जुगुप्सा नाखतां उदय ८ नो, नेनी चोवीगी ३. ७ मां अनंतानुबंधी अने भय, अनंतानुबंधी अने जुगुप्सा, अथवा भव अने जुगुप्मा नांखतां ९ नो उदय. तेनी चोवीशी ३. ७ मां नेत्रणे नाग्वतां १० नो उढय. तेनी चोवीशी १. कुल पहले गुणस्थाने चोवीशी ८ थाय. बीजे गुणस्थान उदयस्थान ३. (७-८-९). ४ चार जातिनो एक एक कपाय, १त्रणमांथी एक वेद २ एक युगल. ७ ना उदयमां कुल चोवीगी १. ७ मां भय के जुगुप्सा नाखता ८ नो उदय तेनी चोवीशी २. ७ मां भय अने जुगुप्मा नाम्बतां ९ नो उढय तेनी चोवीशी १. कुल बीजे गुणस्थाने चोवीगी ४. त्रीज गुणस्थान उदयस्थान ३ (७-८-९). ३ त्रण जातिनो एक एक कपाय, १ त्रणमांथी एक वेद, २ युगल, १ मिश्रमोहनी. ७ ना उदयमां चोवीशी १. ७ मां भय के जुगुप्सा नाखतां ८ ना उदयमा चोवीशी २. ७ मां भय जुगुप्सा बन्ने नाखतां ९ना उदयमा चोवीशी १. कुल त्रीने गुणस्थाने चोवीसी ४. चोथे गुणस्थाने उदयस्थान ४ (६-७-८-९). ३ त्रण जातिनो एक एक कपाय, १ त्रणमांथी एक वेद, २ मांथी एक युगल. आ६ नो उदय क्षायिक के उपशमिकने होय तेनी चोवीशी १. ६ मा भय के जुगुप्सा के समकितमोहनी नाखतां ७ ना उदयमां चोवीशी ३, ६ मा भय जुगुप्सा, के भय समकितमोहनी, के जुगुप्सा समकितमोहनी नाखता ८ ना उदयमा चोबीशी ३. ६ मा भय, जुगुप्मा अने ममकितमोहनी ए त्रण नाखतां ९ना उदयमा चोवीगी १. ६ [१८३] कुल चोथे गुणस्थाने चोवीशी ८. पांचमे गुणस्थाने उदयस्थान ४ (५-६-७-८). २वे जातिना कपाय, १ वेद, २ युगल एक. आ ५ नो उदय क्षायिक के उपशम समकितवाला देशविरतिने होय. तेनी चोवीशी १. ५मां भय, जुगुप्सा के वेदक (रामकित मोहनी) नाखतां ६. तेनी चोवीशी ३. ५ मांत्रणमांथी वे नाखतां ७. तेनी चोवीशी ३. ५मात्रणे नाखता ८. तेनी चोवीशी १. कुल पांचमे गुणस्थाने चोवीशी ८. गाथा ४५. छठे सातमे गुणस्थाने ४-४ उदयस्थान (४-५-६-७). श्रेणि न मांडे त्यांसुधी क्षयोपशम भावनी ज विरति होवाथी छठा सातमावाळा क्षयोपशम विरति कहेवाय छे. १ एक जातिनो कपाय, १ एक वेद, २ एक युगल. आ ४ ना उदयमां चोवीशी १. क्षायिक ने उपशम समकितीने होय. ४ ना उदयमा भय, जुगुप्सा के वेदक नाखतां पांचमा चोवीशी ३. ४ मांत्रणमाथी बब्वे नाखतां ६. तेनी चोवीशी ३. ४ मांत्रणे नाखता ७ तेनी चोवीशी १. कुल छठे अने सातमे गुणस्थाने चोवीशी ८-८. आठमे गुणस्थाने उदयस्थान ३ (४-५-६). १ एक जाविनो कपाय, १ वेद, २ एक युगल. आ ४ ना उदयमा चोवीशी १. ४ मां भय के जुगुप्सा नाखतां ५. तेनी चोवीशी २. ४ मां भय जुगुप्सा बन्ने नाखतां ६ तेनी चोवीशी १. कुल आठमे गुणस्थाने चोवीशी ४ नवमे गुणस्थाने उदयस्थान २ (२-१). १ कपायोदय, १ वेदोदय होय त्यांसुधी एक वेद. तेमां चार कपायने त्रण वेद साथे गुणतां भंग १२ वेदनो क्षय थये कपायनो ज उदय तेना भेद ४-३-२-१ एम १० भेद थाय वंधस्थान ४ आश्री. गाथा ४६. दशमे गुणस्थाने वंधविच्छेदे किट्टीकृत लोभनो उदय होय. तेथी १ना उदय- मां भंग १. कुल १ ना उदयमा भंग ५. ११-१२-१३-१४ गुणस्थानवाला मोहनीना उदय रहित छे. आ उदयस्थानना भंग पूर्वे कह्या प्रमाणे जाणवा.

[१८४] गाथा ४७ अही मिथ्यादृष्टयादिने आश्रीने १० थी १ सुधीना उदयस्थानना मंगनी संख्या कहे छ १ दशना उदयमा पहेले ज गुणस्थाने. ६ नवना उदयमा पहेले ३, चीजे, जीजे अने चोथे एक एक ११ आठना उदयमा पहेले चोथे त्रण त्रण, बीजे त्रीजे बच्चे, पांचमे एक. ११ सातना उदयमां १-२-३-६-७ मे एक एक, ४-५ मे त्रण त्रण, ११ छना उदयमा १-८ मे एक एक, ५-६-७ मे त्रण त्रण. ९ पांचना उदयमा ५ मे एक, ६-७ मे त्रण त्रण, ८ मे वे. ३ चारना उदयमा ६-७-८ मे एक एक. वेना उदयमां भांगा १२. एकना उदयमां मांगा ५. गाथा ४८. उपर प्रमाणे ५२ चोवीशी थवाथी तेने चोवीशे गुणता १२४८ मां द्विकोयना १२ तथा एकोदयना ५ मळी १७ मेळवतां १२६५ भंग थाय, उपर कहेली चोवीशी विगैरे मंगमा जेटली जेटली प्रकृतिओ उदयमां आवे तेने पद कहीए. तेनी संख्या कहे छ.- १०४१-१० ८४११-८८ ६४११-६६ ४४ ३-१२ ९४६-५४ ७४११७७ ५४ ९-४५ ३५२ आ ३५२ ने चोवीशे गुणतां ८४४८ तेमां १२ द्विकोदयना पद २४, अने पांच एकोदयनां पद ५ कुल २९ नाखता ८४७७ थाय. आटली प्रकृतिए मोह पामेलो प्राणी संसारमा परिभ्रमण कर्या करे छे. गुणस्थान आश्री उदय चोवीशी नीचे प्रमाणे- ८ मिथ्यादृष्टि गुणस्थाने, ४ साखादने, ४ मिश्रे, ८ अविरते, ८ देशविरते, ८ प्रमत्ते, ८ अप्रमत्ते, ४ अपूर्वकरणे, अनिवृत्तिबादरे द्विकोदय मांगा १२, एकोदयना भांगा ४, सूक्ष्म संपराये भांगो १. गाथा ४९. उपर जणावेला उदयस्थाने योग कहे छे.- ४ मनोयोग, ४ वचनयोग, १ औदारिक काययोग, कुल ९ योगमा १२६५ भंग लामे.(पहेला गुणस्थानथी दशमा सुधी.)तेथी १२६५ ने नवे गुणतां ११३८५. वैक्रियमिश्र, औदारिकमिश्र अने कार्मण काययोगमा आठना उदयनी १, ९ ना उदयनी २, १० ना उदयनी १, मळी चार चार चोवीशी (कुल. १२) पहेले गुणस्थाने लामे. अनंतानुबंधीना उदय विनानी चार न लामे. अनंतानुबंधीना उदय विना मिथ्यादृष्टि काळ करता न होवाथी. कार्मण [१८५]] काययोग अपांतराल गतिमां होय अने वैक्रियमिश्र औदारिकमिश्र भवांतर- मां प्रथम उत्पन्न थतां होय. अहीं वैक्रियमिश्र भवांतरे उत्पन्न थतां कह्यो, पण तिर्यंच मनुष्यने वैक्रिय करतां मध्यमां पण होय परंतु बाहुल्यता आश्री ए कथन समजवु (नारकी अने देवता सर्वने उत्पन थतां होवाथी), मिथ्या- दृष्टिने वैक्रियकाययोगे आठे चोवीशी होय. कुल पहेले गुणस्थाने चोवीशी २० होय. सासादने ९ योग आश्री तो उपर कहेल छे. वाकीना कार्मण काययोगे, वैक्रिय काययोगे, अने औदारिकमिश्रे चार चार चोवीशी होवाथी कुल चोवीशी १२ मिश्रे वैक्रिय काययोगे चोवीशी ४. अविरतने वैक्रिय काययोगमा चोवीशी ८. देशविरतने वैक्रिय अने चैक्रियमिश्रमां आठ आठ होचाथी कुल चोवीशी १६. प्रमत्तने वैक्रिय अने वैक्रियमिश्रमा आठ आठ होवाथी कुल चोवीशी १६. अप्रमत्तने वैक्रियमा चोवीशी ८. उपर प्रमाणे ९ योग विना बीजा योगमा ८४ चोवीशी होय. (२०-१२-४-८-१६-१६-८) ८४. आ ८४ ने २४ वडे गुणतां २०१६ थाय. ते पूर्वनी ११३८५ नी राशिमा नांख- वाथी कुल १३४०१. हवे सासादने वैक्रियमिश्र योगमा नपुंसक वेदनो उदय न होय, तेने सातनो उदय एकविध, आठनो उदय द्विविध अने नवनो उदय एकविध छे, ते चारविधमां चोवीशीने बदले ४ कपाय, २ वेद अने २ युगल साथे गुणतां १६ भेद थाय. के- मके वैक्रियमिश्र काययोगी नपुंसक वेदीमां सासादननो अभाव छ तेथी. अविरत सम्यग्दृष्टिने कार्मण काययोगमा तथा वैक्रियमिश्र योगमा स्त्रीवेदनो उ- दय न होय. वैक्रिय काययोगी स्त्रीवेदीमां अविरत सम्यग्दृष्टिने उपजवानो अभाव होवाथी आ वचन पण बाहुल्यता आश्री जाणवू. बाकी कदाजित् तो स्त्रीवेदीमां पण अविरत समकितदृष्टिने उपजवानो संभव छे. स्त्रीवेद विना चोथा गुणस्थानना आठे उदय प्रकारमा भंग १६-१६ थाय. प्रमत संयतने आहारक अने आहारकमिश्रमां तथा अप्रमत्तने आहारकमां खीवेदनो उदय न होय. कारणके आहारक शक्ति चौद पूर्वीने होय छे. अने स्त्रीने चौद पूर्वनो अभाव छै. अहीं पण भंग १६-१६ थाय छे. आ प्रमाणे ४४ (४-१६-१६-८) योगविकल्प एक एक वेद विना होवाथी १६-१६ मंग (षोडशक)वाळा थया. तेथी ४४ ने १६ साथे गुणतां ७०४ [१८६] थाय ते पूर्वनी (१३४०१) राशिमां नाखवाथी कुल १४१०५ मंग थया. हवे अविरत समकितीने औदारिकमिश्रमा पुवेदनो उदय ज होय. केमके स्त्रीवेदमां अने नपुंसकवेदमा उपजवानो तेने अभाव छे. (आ वचन पण बहुलता आश्री जाणवू. केमके मल्लीनाथ विगेरेने स्त्रीवेदमा उत्पादनो संभव छे) तेथी औदारिकमिश्रे एक ज वेद गणतां ४ कपाय अने २ युगलसाथे आठ आठ भंग (अष्टक) अष्टविध उदय प्रकारे होय, तेना भंग ६४ थाय. ते पूर्वनी (१४१०५) राशिमा नाखवाथी कुल भंग १४१६९ (११३८६-२०-१६ ७०४-६४) योग आश्री भंग थाय. हवे उदय आश्री पद संख्या कहे छ- पूर्वे जे पद संख्या करी छ तेमां १०-९-८ विगेरेना उदयने एवंदर करी गुण्या छ, तेम आ दरेक गुणस्थाने गुणवा, एटले पहेले गुणस्थाने ६८ नीचे प्रमाणे १०x१=१०, ९४३=२७, ८४३=२४, ७४१-७. एज प्रमाणे बीजे गुणस्थाने ३२- ९४१-९, ८४२१६,७४१७ एज प्रमाणे त्रीजे ३२, चोथे ६०, पांचमे ५२, छठे ४४, सातमे ४४, आठमे २० कुल ३५२ ने २४ साथे गुणतां ८४४८ तेमां नवमानाद्विकोदयना १२४२% २४, अने नवमा दशमाना एकोदयना ५, कुल २९ नाखतां ८४७७ थया. तेने ४ मनयोग, ४ वचनयोग, १ औदारिक काययोग, ए ९ साथे गुणतां कुल ७६२९३. वैक्रिय काययोगमा मिथ्यादृष्टिने उपर प्रमाणे ६८ अने वैक्रियमिश्र, औदारिक- मिश्र, अने कार्मण काययोगमा प्रत्येके ३६-३६ थाय कुल १०८, (१०४१-१०, ९४२-१८, ८x१-८,३६ ) अनंतानुबंधी रहित चोवीशीओ न पामवाथी. सासादनने कामण काययोग, वैक्रिय काययोग अने औदारिक मिश्रमां उपर प्रमाणे ३२-३२ होवाथी कुल ९६. मिश्रने वैक्रिय काययोगमा पूर्ववत् ३२. अविरतने वैक्रिय काययोगमा पूर्ववत् ६० देशविरतने वैक्रिय अने वैक्रियमिश्रमा पूर्ववत् ५२-५२ कुल १०४. प्रमचने वैक्रिय अने वैक्रियमिश्रमा पूर्ववत् ४४-४४-कुल ८८. अप्रमतने वैक्रियमा पूर्ववत् ४४. कुल ६८-१०८-९६-३२-६०-१०४-८८-४४ सर्व मळी ६००.

[१८७] आ ६०० ने २४ वडे गुणतां १४४०० ते पूर्वराशिमां नाखवा. सासादनने वैक्रियमिश्रमा ३२ पद. नपुंसकवेद विना. अधिरतने कार्मण अने वैक्रियमिश्रमां ६०-६० पद. स्त्रीवेद विना. प्रमत्त संयतने आहारक अने आहारक मिश्रमां ४४-४४ पद. स्त्रीवेद विना, अप्रमत्तने आहारकमा ४४ पद. स्त्रीवेद विना. कुल ३२-१२०-८८-४४ मळी २८४ तेने एक एक वेद विना १६-१६ प्रकृतिए गुणतां ४५४४ थाय ते पूर्वराशिमा नाखवा. अविरतने औदारिक मिश्रमा ६० पद मात्र पुंवेदे होवाथी ८-८ प्रकृतिवडे गुणतां ४८० थाय. ते पण पूर्वराशिमां नाखवा. कुल ७६२९३-१४४००-४५४४-४८० मळी ९५७१७, आटलां उदय आश्री योग विचारतां पदो थाय. हवे मोहनी कर्मना उदयना भंग उपयोग साथे गणावे छे.- पहेले, वीजे गुणस्थाने उपयोग ५ तेमा ३ अज्ञान, २ दर्शन, त्रीजे, चोथे, पांचमे उपयोग ६ तेमां ३ ज्ञान, ३ दर्शन. ६-७-८-९-१० ए गुणस्थाने उपयोग ७ तेमा ४ ज्ञान ३ दर्शन. उदयस्थानना विकल्प साथे तेने गुणवा पहेले गुणस्थाने उदयस्थाननी ८ चोवीशी अने चीजे गुणस्थाने उदयस्थाननी ४ चोवीशी तेने पांचे गुणतां कुल उदय मांगानी चोवीशी ६० थाय. त्रीजे गुणस्थाने ४, चोथे ८, पांचमे ८, कुल २० तेने ६ साथे गुणतां १२० छठे ८, सातमे ८, आठमे ४, कुल २० तेने ७ वडे गुणतां १४०. कुल आठे गुणस्थाने थईने ३२० तेमां प्रत्येके चोचीशी लभ्य होत्राथी तेने २४ वडे गुणतां ७६८०. द्विवोदय मांगा १२ अने एकोदयना भंग ५ कुल १७ ने ७ उपयोगे गुणतां ११९ ते पूर्वराशिमां नाखतां ७७९९. कोई आचार्य मिश्रमा ५ उपयोग कहे छे. तेने मते ४ भंग घटे एटले तेनी चोवीशी करता ९६ घटे जेथी मूळ भंग ३१६ चोवीशीवाळा ७५८४ थाय अने कुल ७७०३ थाय. हवे तेनी पद संख्या कहे छ.- पहेलाना ६८, बीजाना ३२, मळी कुल १५० तेने पांचे गुण्या, एटले ५०० थया. त्रीजाना ३२, चोथाना ६०, पांचमामा ५२, कुल १४४ गुण्या ६-थया ८६४,

[१८८]
छटाना ४४, मातमाना ४४, आठमाना २०, कुल १०८ गुण्या ७-थया ७५६.
कुल पद संख्या २१२० तेन चोवीगे गुणतां ५०८८० तमां द्विकोदयना २४,
एकोदयना ५ कुल २९ नेने साने गुण्या एटले थया २०३ कुल ५१०८३.
मतांतरे त्रीज पांच उपयोग गुणनां मूळ पढ़ना ३२ नं २४ बडे गुणतां ७६८ घटे
पटले ५०३१५ थाय.
हर लेण्या आश्री उदयस्थान को छ.-
१-२-३-४ गुणस्थान छ छ लेण्या होय,
५-६-७ प गुणस्थाने त्रण त्रण लेण्या (शुभ).
८ मा गुणस्थानथी एक शुक्ल लेण्या ज होय.
हवं उदयस्थानना प्रकार साथे गुणवा.
पहेले ८, बीजे ४, त्रीजे ४, चोथे ८ कुल २४ चोवीशी, तेने ६ माथे गुणतां १४४
चोवीधी थई.
पांचमे ८, छठं ८, मातमे ८ कुल २४ चोवीशी तेने गुण्या ३ थया ७२.
आठमे ४ चोवीशी तेने गुण्या १ थया ४.
कुल उदयस्थाने लेग्याना प्रकार २२० नेने २४ बडे गुणतां ५२८० थया. तेमां
द्विकोदयना १२ अने एकोदयना ५ कुल १७ भेळवतां ५२९७.
हवे लथ्यागुणित पदबंद कह छ.-
पहेल ६८, बीजे ३२, त्रीजे ३२, चोथे ६०, कुल १९२ तेने छए गुणतां ११५२.
पांचमे ५२, छठे ४४, सातमे ४४, कुल १४० तेने गुण्या ३ थया ४२०.
आठमे २० तेने गुण्या १ थया २०.
कुल पदवृंद १५९२ तेने चोवीगे गुणतां ३८२०८ थया. तेमां हिकोदर
अने एकोढयना ५ कुल २९ नाखवाथी ३८२३७ थया.
गाथा ५०. उदयस्थान योग, उपयोग, लेश्या, सहित कहा. हवे सत्तास्थान कहे छ.-
पहेले गुणस्थान सत्तास्थान ३ (२८-२७-२६).
धीज सत्तास्थान १ (२८).
त्रीजे सत्तास्थान ३ (२८-२७-२४).
४-५-६-७ ए सत्तास्थान ५ (२८-२४-२३-२२-२१).
८ मे सत्तास्थान ३ (२८-२४-२१) तेमा पहेला २ उपशमश्रेणिमां अने श्रीजु
सायिक समकित दृष्टिने बने श्रेणिमां.

[१८९] ९ मे सत्तास्थान १४(२८-२४-२१-१३-१२-११-५-४-३-२-१) तेमा पहेला वे उपशमश्रेणिमां. २१ नुं सत्तास्थान क्षायिक समकिती उपशमणिगतने अथवा कपायाष्टक क्षय न करतां सुधी क्षपक वाळाने. कपायाप्टक क्षय करतां १३ नुं सत्तास्थान. नपुंसक वेदनो क्षय करतां १२ नु. स्त्रीवेदना क्षये ११ तुं. हास्यादि छना क्षये ५ नुं. पुरुपवेद आये संज्वलन क्रोध क्षये ३ नु. संज्वलन मान क्षये २ नु. संज्वलन माया क्षये १० मे सचास्थान ४ (२८-२४-२१-१) तेमा पहेला त्रण उपशममा अने छेल्लु क्षपकमां. ११ मे सचास्थान ३ (२८-२४-२१) उपशमश्रेणिवाळाने. - हवे मोहनी कर्मना बंध, उदय अने सत्तास्थाननो संवेध कहे छ.- पहेले गुणस्थाने २२ ना बंधमां उदयस्थान ४ (७-८-९-१०). ७ ना उदयमा १ सत्तास्थान-२८र्नु. ९-९-१. ना उदयमांत्रण त्रण सचास्थान-२८-२७-२६. कुल सचास्थान १०. बीजे ११ ना बंधमां ३ उदयस्थान-७-८-९, तेमां प्रत्येके एक सचास्थान-२८ . कुल ३ सचास्थान, चीजे १७ ना बंधमां ३ उदयस्थान-७-८-९. प्रत्येक उदये त्रण त्रण सचास्थान-२८-२७-२४ कुल ९ सत्तास्थान. चोथे १७ ना बंधमां ४ उदयस्थान--६-७-८-९. ६:ना उदयमा ३ सचास्थान-२८-२४-२१ ७-८ ना उदयमा ५ सचास्थान-२८-२४-२३-२२-२१. ९ ना उदयमा ४ सचास्थान-२८-२४-२३-२२. कुल सचास्थान १७. पांचमे १३ ना बंधा ४ उदयस्थान-५-६-७-८. ५ ना उदयमा ३ सचास्थान-२८-२४-२१ ६-७ ना उदयमा ५ सचास्थान-२८-२४-२३-२२-२१, 1 ८ ना उदयमा ४ सत्तास्थान-२८-२४-२३-२२. कुल मत्तास्थान १७. छठे गुणरथाने ९ ना बंधमा ४ उदयस्थान-४-५-६-७. ४ ना उदयमा ३ सत्तास्थान-२८-२४-२१. ५-६ ना उदयमा ५ सत्तास्थान-२८-२४-२३-२२-२१. ७ ना उदयमा ४ सत्तास्थान-२८-२४-२३-२२. कुल सत्तास्थान १७. मातमे छटा प्रमाणे बंध, उदय होवाथी सत्तास्थान १७ जाणवा. आठमे ९ ना बंधमां ३ उदयस्थान-४-५-६. दरेकमा ३ सत्तास्थान-२८-२४-२१. कुल सचास्थान ९. नवमे ५ बंधस्थान--५-४-३-२-१. ५ना वंधमां वेना उदयमा ६ सत्तास्थान-२८-२४-२१-१३-१२-११. ४ ना बंधमा १ ना उदयमां ६ सत्तास्थान-२८-२४-२१-११-५-४. ३ ना बंधमां १ ना उदयमां ५ सत्तास्थान-२८-२४-२१-४-३. २ ना बंधमा १ ना उदयमा ५ सत्तास्थान-२८-२४-२१-३-.२. १ना बंधमां १ ना उदयौ ५ सत्तास्थान-२८-२४-२१-२-१. कुल सत्तास्थान २७. दशमे अबंधकपणामां १ ना उदयमा ४ सत्तास्थान-२८-२४-२१-१. अग्यारमे बंध तथा उदय नथी. ३ सत्तास्थान--२८-२४-२१. सर्व मळी सत्तास्थान १३३. आनी विशेप व्याख्या पूर्वे कहेली छे ते समजवी. इवे चौद गुणस्थाने नामकर्म. गाथा ५१. पहेले गुणस्थाने ६ बंधस्थान-२३-२५-२६-२८-२९-३०. अपर्याप्त एकेंद्रिय प्रायोग्य वांधता २३ नो बंध. तेमां वादर, सूक्ष्म, प्रत्येक अने साधारण रूप ४ मंग, पर्याप्त एकेंद्रिय तथा अपर्याप्त विकलेंद्रिय, तिथंच पंचेंद्रिय अने मनुष्य योग्य बांधता २५ नो बंध. तेमां पर्याप्त एकेंद्रिय आश्री बंधना भंग २०. बाकीना पांचमां एक एक भंग कुल मंग २५. पर्याप्त एकेद्रिय प्रायोग्य बांधतां २६ नो बंध तेमां भंग १६.

[१९१] देव नरकगति प्रायोग्य बांधता २८ नो बंध तेमां देवगति आश्री भंग ८, अने नरकगति आश्री १ कुल भंग ९. गर्यात विकलेंद्रिय, तिर्यक पंचेंद्रिय, तथा मनुष्य आश्री बांधता २९ नो बंध, तेमां विकलेंद्रिय आश्री बांधतां ८-८-८, तिर्यंच ने मनुष्य पंचद्रिय आश्री बांधतां ४६०८-४६०८ मंग. कुल भंग ९२४०. देवगति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित २९ बांधे छ, पण ते पहेले गुणस्थाने न होय. पर्याप्त विकलेंद्रियने तिर्यच पंचेंद्रिय प्रायोग्य बांधतां ३० नो बंध तेमां विकलेंद्रिय आश्री ८-८-८ भंग, तिथंच पंचेंद्रिय आश्री ४६०८ कुल ४६३२. कुल छ बंधस्थाने थईने मिथ्यात्व गुणस्थाने भंग १३९२६. (बंने प्रकारे ३० नो बंघ छे ते अहीं न लामे.) पहेले गुणस्थाने ९ उदयस्थाने २१-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१. उदयस्थाननुं विवरण पूर्व प्रमाणे जाणवू. तेमां फक्त आहारक वैक्रिय संयतना ने केवळीना उदय भंग न गणवा. बाकी पहेले गुणस्थाने उदय भंग ७७७३. २१ ना उदयमा ४१ ते पूर्वे कहेला ४२ माथी एक तीर्थकर संबंधी वाद करतां ४१. २४ ना उदयमा ११ ते एकेंद्रिय आश्री ज छे. २५ ना उदयमा ३२ ते पूर्वे कहेला ३३ मांथी आहारक आश्री १ बाद करता ३२. २६ ना उदयमां ६०० पूर्ववत. २७ ना उदयमा ३१ ते पूर्वे कहेला ३३ माथी आहारक आश्री संयत तथा कवळी आधी एक एक जतां वाकी ३१. २८ ना उदयभा ११९९ ते पूर्वे कहेला १२०२ मांथी वैक्रिय संयतनो १, आहा- रकना २, कुल ३ जतां ११९९. २९ ना उदये १७८१ ते पूर्वे कहेला १७८५ माथी वैक्रिय संयत्तनो १, आहारक- ना २, तीर्थंकरनो १, कुल ४ जतां १७८१. ३० ना उदयमा २९१४ ते पूर्वे कहेला २९१७ मांथी वैक्रियसंयत, आहारक तथा केवळीनो एक एक-कुल ३ जतां २९१४. ३१ ना उदयमा ११६४ ते पूर्वे कहेला ११६५ मांथी तीर्थकर आश्री १ जतां ११६४. प्रथम गणावेला ७७९१ मांथी उपर प्रमाणे १५ अने २०-८-९ ना उदयनो एक एक कुल १८ जतां कुल उदय भंग ७७७३. पहेले गुणस्थाने ६ सचास्थान-९२-८९-८८-८६-८०-७८, ९२ नुं सत्तास्थान चारे गतिमा होय.

- [१९२]] ८९ नुं सत्तास्थान पूर्व नरक बद्धायु तीर्थकरने अंतर्मुहर्त मात्र होय. ८८ नुं सचास्थान चार गविना मिथ्यात्वीने होग, ८६-८० नुं सत्तास्थान एकेंद्रियमा लामे. देवगति नरकगतिप्रायोग्य चैकिय पदक उद्वलित कयु होय त्यारे, अने एकेद्रियमांधी नीकच्या पछी विकलेंद्रि- या तथा तिर्यंच पंचेंद्रिय मनुष्यमां उपजतां पण सर्व पर्याप्तिए पर्याप्त ध्या पही अंतमुहुर्त सुधी लामे. पछी तो जरूर बैक्रिय शरीरादिना बंधनो संभव होवाथी न पामे. ७८ नुं सत्तास्थान नेजो वायुने मनुष्पद्विक उद्वलित कर्या पछी लामे. अने तेजो वायुमाथी विकलेंद्रियमा तथा तिर्यंच पंचेंद्रियमा उपऱ्या पछीयण अंत- मुहर्त मुधी लामे. पछी तो जर मनुष्यद्विकना बंधनो संभव है. पहले गुणम्यान बंध. उदय अने सत्तास्थान कयां हवे तेनो संवैध कहे छ.- २३ वांधतां ९ उदयस्थान. पण तेमा २१-२५-२७-२८-२९-३० ए छ उद्य- स्थानमां देवगति अने नरकगति आश्री जे मंग छ ते न संभवे. कारणक २३ नो बंध अपर्याप्त एकेंद्रिय आश्री छ ने देवता अपर्याप्त एकेद्रियमा उप- जता नी. अने नारकी तो बिलकुल एकेद्रियमा बताज नथी. तेथी ते आधी ६० भंग न लामे. बाकी ७७१३ लामे. २३ ना बंधमां सत्तास्थान ५.९२-८८-८६-८०-७८. २१-२४-२५-२६ ना उदयमां पचि सत्तास्थान. पण एटलं विशेष के २५ ना उढयमा तेजो वायुने आश्रीने ७८ नुं सत्तास्थान लामे अने २६ ना उदयमा तेजो वायुने तथा तेजो वायुमायो नीकली विकलेंद्रियमा अन वियंच पंचेंद्रियमां तरतना उपजेला आश्री लाम. २७-२८-२९-३०-३१ आ पांच उदयमा ७८ विना चार चार सत्तास्थान. कुल २३ ना बंघमां सत्तास्थान ४०. २५-२६ ना बंधा एज प्रमाणे. मात्र नेमां देवता संबंधी उदयस्थानमां वर्ततां पर्याप्त एकेद्रिव आधी २५-२६ बांधना उपर प्रमाणे सचास्थान कहनां. तेमां पण २५ ना बंधमां बादर पर्याप्त प्रत्येकने स्थिरास्थिर. शुभाशुभ, दुर्भग. अनादय, यश अयशपदे ८ भंग थाय. बाकीना मंग थाय नहीं. कारपके सूक्ष्म साधारण तथा अपर्याप्तमा देवताने उपजवानो अभाव छ. २५-२६ ना बंधमां सत्तास्थान उपर प्रमाण ४०-४० जाणवा. २८ ना बंधमां वै उदयस्थान-३०-३१. तेमा- ३० तियंत्र पंचेंद्रिय तथा मनुष्य आश्री.

[१९३] ३१ तियच पचेंद्रिय आश्री. २८ ना बंधमां सत्तास्थान ४ (९२-८९-८८-८६). तेमां ३० ना उदयमां चारे सत्तास्थान, तेनी अंदर पूर्ववद्ध नरकायु तीर्थकर नामवाळा आश्री ८९ तुं सत्तास्थान, मनुष्यमां ज. अने वाकीनों त्रण तिर्यच अने मनुष्य बन्नेमां. ३१ ना उदयमा ८९ विना ३ सत्तास्थान कारण के तीर्थकर नामवाळा तिथंच गतिमा जता नथी. कुल २८ ना बंधमां सचास्थान ७. २९ नो बंध देवगति प्रायोग्य छ ते सिवाय विकलेंद्रिय, तिर्यंच पचंद्रिय तथा मनुष्य आश्री २९ बांधतां सामान्ये ९ उदयस्थान अने ६ सचास्थान-- (९२-८९-८८-८६-८०-७८) २१ ना उदयमा आ वां सत्तास्थान पामीए. तेमा ८९ नुं तो तीर्थकर नाम वांधेल पूर्ववद्धायुपणाथी नरकमां जतां अंतर्मुहूर्त मिथ्यात्वे रहे, ते आश्री लामे. ९२ अने ८८ देव, नारकी, मनुष्य, विकलंद्रिय, तिथंच पंच- द्रिय तथा एकेंद्रिय आश्री लामे. ८६ अने ८० विकलेंद्रिय, तिर्यंच पंचे- द्रिय, मनुष्य तथा एकेंद्रिय आथी लाभे, ७८ एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय तथा तिर्यंच पंचेंद्रिय आश्री लामे. २४ ना उदयमा ८९ विना पांच सत्तास्थान. ते एकेंद्रिय आथी जलामे. २५ ना उदयमां ६ सत्तास्थान २१ ना उदयपत्. २६ ना उदयमा ७८ विना पांच सत्तास्थान. केमके ८९ नुं सचारथान उपर कह्या प्रमाणे नारकीमा लाभे, अने नारकीने २६ नु उदयस्थान नथी. २७ ना उदयमा ७८ विना पांच सचास्थान. तेमां८९ नुं उपर कह्या प्रमाण नारकीमां. ९२-८८ देव, नारकी, मनुष्य, तिर्यच पचेंद्रिय, एकेंद्रिय अने विकलेंद्रिय आश्री. ८६-८० एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, तिर्यंच पंचेंद्रिय अने मनुष्य आश्री. ७८ सचास्थान अहीं न लामे. कारण के २७ नो उदय तेजो वायु विनाना एकेंद्रिय आतपोद्योतवाळाने तथा नारकीने छे. तेने मनुष्यद्विकनो संभव छ. २८ ना उदयमा उपर प्रमाणे ज पांच सचास्थान, तेमा ८९-९२-८८ तो पूर्ववत्. अने ८६-८० विकलेद्रिय, तिर्यंच पंचेद्रिय अने मनुष्य आश्री. २९ ना उदयमा एज पांच सत्तास्थान.

[१९४] ३० ना उदयमा चार सत्तास्थान-९२-८८-८६-८०. ते विकलेंद्रिय, तिथंच पंचेंद्रिय तथा मनुष्य आश्री. ८९ नुं सतास्थान नारको लामे छे. तेने ३० नु उदयस्थान नथी. तेथी अहीं ते बाद कयु छै. ३१ ना उदये पण तेज चार सनास्थान. विकलेद्रिय, तिर्यंच पंचेंद्रिय, आश्री. सर्व मळी २९ ना बंधमा मिथ्यात्वी आश्री सत्तास्थान ४५. देवगति आश्री २९ नुं बंधस्थान छे. ते आ गुणस्थाने न लामे. कारण के तीर्थकर नाम युक्त होय छ, मिथ्यात्वे तीर्थकर नामनो बंध थतो नथी. ३० नो बंध मनुष्य अने देवगति मिना बाकी विकलेंद्रिय, तियंच पंचेंद्रिय आश्री छे. त्यां ९ उदयस्थान अने ८९ विना पांच सत्तास्थान छे. ८९ नुं अहीं संभवतुं नथी. तेनुं कारण उपर कयुं छे. ८९ नी सत्तावाळाने तिर्यग्गति प्रायोग्य बंधनोज असंभव छ. २१-२४-२५-२६ ना उदयमां पांचे सत्तास्थान पूर्ववत् जाणवां. २७-२८-२९-३०-३१ ना उदयमा ७८ सिवाय चार चार सत्तास्थान छ ७८ वर्जचानुं कारण उपर जणाव्यु छ ३० बांधतां मिथ्यादृष्टिने कुल सत्तास्थान ४० थाय. मनुष्य गति प्रायोग्य ३० ना बंधमा तीर्थकर नाम होवाथी अने देवगति प्रायोग्य ३० मा आहारक ने तीर्थकर नाम होबाथी ते अहीं न लामे. कुल २१२ सत्तास्थान थया. हवे वीजा गुणस्थान आश्री कहे छे.- सासादने बंधस्थान ३ (२८-२९-३०). २८ नो बंध वे प्रकारे छे.-देवगति प्रायोग्य अने नरकगति प्रायोग्य तेमां नरक- गति प्रायोग्य अहीं न लामे. देवगति प्रायोग्य पांधनार तियंच पंचेंद्रियने तथा मनुष्यने आ २८ बांधता भंग ८. २९ नो बंध एकेंद्रिय, विकलेंद्रिय, तिर्यक् पंचेंद्रिय, मनुष्य, देवता अने नारकीने सासादने वर्ततां तिर्यक पंचेंद्रिय अने मनुष्य प्रायोग्य थाय. पण ते हुंडक संस्थान अने छेवहुं सघयण न बांधे. तेथी पूर्वे गणाच्या प्रमाणे तिर्यक् पंचेंद्रिय अने मनुष्य बने आश्री ३२००-३२०० एटले कुल भंग ६४००. ३० नो बंध एकेंद्रिय, विकरेंद्रिय, तिर्यम् पंचेद्रिय, मनुष्य, देवता अने नारकी सासादने वर्तता करे तो तिर्यक् पंचेंद्रिय प्रायोग्य उद्योत नाम सहित ज करे. तेना भंग पूर्ववत् ३२०० थाय. सासादने उदयस्थान ७ (२१-२४-२५-२६-२९-३०-३१). - [१९५ २१ नो उदय एद्रिय, विकलेंद्रिय, तिर्यच पंचेंद्रिय, मनुष्य, तथा देवता आश्री जाणवो. नारकीमा सासादनी उपजतो नथी. तेमां पण एकेंद्रियमा बादर पर्याप्सना यश अयश साथैना २ मंगज लामे, वीजा नहीं केमके सूक्ष्म ने अपर्याप्तमा सासादने वर्तता उपजवानुं होय नहीं. विकलेंद्रिय, विर्यच पंचेंद्रिय अने मनुष्य आश्री पण अपर्याप्त संबंधी एक एक भंग छे ते न लामे. एटले विकलेंद्रियना ६, तिर्यच पंचेंद्रियनां ८, मनुष्यना ८, देवताना ८, तथा एकेद्रियना २, कुल ३२ मेद लामे. २४ ना उदयमा एकेंद्रिय वादर पर्याप्तना यश अयश साथे २ भंग लामे, वाकीना नहीं. सूक्ष्ममां, साधारणमा अने तेजो वायुमां सासादनीने उपजवानो अ- माव छ तेथी. २५ नो उदय देवगतिमा उत्पन्न थवा आश्री ज लामे. तेना भंग ८. २७ नो उदय विकलेंद्रिय, तिरंच पंचेद्रिय. तथा मनुप्यमा उपजता लाभे. तेमा पण अपर्याप्त साथेनो एक एक भंग छे ते न लामे. बाकीना विकलेंद्रियना ६, तिर्यचना २८८ तथा मनुष्यना २८८. कुल ५८२ भंग लाभे. (२७-२८ नो उदय तो उत्पत्ति पछी अंतर्मुहूर्त जाय त्यारे लामे छे. सासादन भावतो उत्पत्ति पछी छ आवलिका सुधीज होय छे. तेथी ते वे उदयस्थान अहीं न लामे.) २९ नो उदय देवता नारकीने पोताना स्थानमा रह्या छता पर्याप्तपणामां समकित- थी प्रच्युत थता लामे. तेना देवता आश्री.८, अने नारकी आश्री १. कुल भंग ९ लामे. ३० नो उदय तिथंच अने मनुष्य पर्याप्ताने प्रथम समकितथी प्रच्युत थतां लामे. तेम ज उत्तर वैक्रिय करतां देवताने लामे, तेना मंग तिर्यच अने मनुष्य आश्री ११५२-११५२, अने देवता आश्री ८. कुल २३१२ भंग लामे. ३१ नो उदय पर्याप्त तिर्यंच पंचेंद्रियने समकितथी पडतां लामे. तेना भंग ११५२ थाय. कुल सासादने ७ उदयस्थाने भंग ४०९७ (३२-२-८-५८२-९-२३१२-११५२). सासादने सत्तास्थान २ (९२-८८). ९२ नुं सत्तास्थान आहारक सत्कर्माने उपशमश्रेणिथी पडतां सासादने आवनार आश्री लामे. २८ नुं सत्तास्थान चारे गतिमा लामे.

[१९६] हवे तेनो संवैध कहे छ.- २८ बांधतां २ उदयस्थान-३०-३१. २८ नो बंध देवगति विपय ज सासादनने लाभे. कारण के करण अपर्याप्त सासादनी तो देवगति प्रायोग्य बांधता नथी. तेथी अहीं बीजां उदयस्थान न लामे. तेमां पण मनुष्यने आश्रीने ३० ना उदयमा बन्ने सत्तास्थान. उपशमश्रेणिनो तिथंचमां असंभव ज होवाथी. ३१ ना उदयमा ८८र्नु सत्तास्थान छ. कारण के ३१ नो उदय मनुप्यने नथी. २९ तिर्यंच पंचेद्रिय तथा मनुष्य आश्री बांधतां सासादने साते उदयस्थान. तेमां एकंद्रिय, विकलेद्रिय, तिर्यंच पंचेद्रिय, मनुष्य, देवता अने नारकी सासादनीने पोतपोताना उदयस्थाने वर्ततां एक ८८ नुं सत्तास्थान. फक्त मनुष्यने ३० ना उदयमा ९२ नुं सत्तास्थान होय. ३० ना बंधमां पण उपर प्रमाणे सात उदयस्थाने एक ८८ नु ज सत्तास्थान जाण- बु. कुल सर्व उदयस्थान आश्री १८ सत्तास्थान. (टीकामा ८ लखे छे). हवे त्रीजा गुणस्थाने बंध, उदय अने सत्तास्थान कहे छे. त्रीजा गुणस्थाने बंघस्थान २ (२८-२९) २८ नो वंघ मिश्रवाळा तिथंच अने मनुष्य देवगति प्रायोग्य बांधे छे. तेथी तेना भंग ८. २९ नो बंध मनुप्यगति प्रायोग्य देव नारकी बांधे छ, तेमां पण मंग ८. शुभा- शुम स्थिरास्थिर यशअयश आश्री जाणवा. परावर्तमान प्रकृति वाकीनी मि- श्रवाळाने शुभ व आवे छे. मिश्रगुणस्थाने उदयस्थान ३. (२९-३०-३१). २९ ना उदयमा देव आश्री भंग ८. अने नरक आश्री १. कुल भंग ९. ३० ना पमा तिर्यंच पंचेंद्रिय आश्री १७२८, मनुष्य आश्री ११५२, कुल मंग २८८०. ३१ नो उदय तिथंच पंचेद्रिय आश्री छे. तेना भंग ११५२. सर्व उदय मंग ४०४१. मिश्र गुणस्थाने सत्तास्थान २ (९२-८८). मित्र गुणस्थाने संवेध कहे है- २८ बांधता २ उदयस्थान-३०-३१. दरेक उदयमा वे वे सत्तास्थान, २९ बांधता १ उदयस्थान-२९. अहीं पण बन्ने सत्तास्थान-९२०८८. ए प्रमाणे दरेक उदयस्थानमा वे वे सत्तास्थान होवाथी कुल सत्तास्थान ६.

[१९७]] हवे चोथे गुणस्थाने कहे छे बंधस्थान ३ (२८-२९-३०), २८ नो बंध देवगति प्रायोग्य तिर्यच तथा मनुप्यने होय छे. तेना भंग ८. (नरकगति प्रायोग्य बांधता नथी) २९ मनुष्य ने देवगतिप्रायोग्य तीर्थकर नामरहित बांधता २९. तेना पण भंग ८. २९ देवता नारकी जे मनुष्यगति प्रायोग्य बांधे. तेना पण मंग ८.(तिर्यच- प्रायोग्य पांधता नथी). ३० देवता नारकीने मनुष्यगति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित बांधतां ३०. तेना भंग ८ कुल भंग ३२. चोथे गुणस्थाने उदयस्थान ८ (२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१). २१ नो उदय नारकी, विर्यच पंचेंद्रिय, देवत्ता अने मनुष्य आश्री जाणवो. केमके पूर्व पद्धायु क्षायिक समकिवीने ते बघामां उपजवानो संभव छ, पण तेमां अपर्यासाना भंग न लेवा. कारण के अपर्याप्समां समकिती जीव उपजता नथी. तेथी कुल भंग २५ (८ देवताना, ८ विर्यच पंचेंद्रियना, ८ मनु- प्यना अने १ नारकीनो), २५-२७ नो उदय देवता, नारकी वैक्रिय तिर्यच अने मनुष्य आश्री जाणवो. तेमा देवता विविध समकिती जाणवा. नारकी चेदक अने क्षायिकवाळा जाणवा. तेना उदय मंग पोतपोवाने आधी समजी लेचा. नारकोमा उप- शमवाळा होता नथी. २६ नो उदय क्षायिक अने वेदक समकिती तिर्यंच तथा मनुष्यने जाणवो. उप- शम समकिती चियंच मनुप्यमा उपजता नथी. तिर्यचनुं वेदक समकिती- पणुं मोहनीनी २२ प्रकृतिवाडं जाणचं, २८-२९ नो उदय नारकी, तिर्यच, मनुष्य, तथा देवताने जाणवो. ३० नो उदय तिर्यच, मनुष्य अने देवताने जाणवो. ३१ नो उदय तिर्यंच पंचेंद्रियने होय. आ सर्वना उदय भंग पोतपोता आधी समजवा. चोथे गुणस्थाने सचास्थान ४ (९३-९२-८९-८८.) अप्रमच संयती के अपूर्वकरणी तीर्थकर अने आहारक सहित ३१ वाधीने पछी देवता थाय, त्यां सचा ९३ नी होय. आहारक बांधीने परिणामना परावर्तनशी मिथ्यात्वे जइ चारे गतिमा उपजे, तेने . [१९८] त्यां गया पछी समकित पामतां ९२ नी सत्ता. देव मनुष्यमा मिथ्यात्व नहीं पामेलने पण ९२ पामीए. देव, नारकी अने मनुष्य अविरतने ८९ नी सत्ता. ते त्रणे जिननाम बांधे छ. तिथंच बांधता नथी. ८८ की सत्ता चारे गतिमां समकितीने होय. हवे संवैध कहे छ.- २८ ना बंधक तिर्यच मनुप्यने ८ उदयस्थान. तेमां २५-२७ नुं उदयस्थान बैंक्रिय तिर्यच मनुष्य आश्री जाणवू. एक एक उदयस्थाने वे वे सत्ता- स्थान ( ९२-८६). २९ नो बंध वे प्रकारे देवगति प्रायोग्य अने मनुप्यगति प्रायोग्य. तेमां देवगति प्रायोग्य ते जिननाम सहित अने मनुप्य ज बांधे छ तेने उदयस्थान ३१ विना साते होय. तेमां दरेक उदये वे वे सत्तास्थान ९३-८९. मनुप्यगति प्रायोग्य २९ देवता अने नारकी बांधे छ तेमां नारकीने उदयस्थान पांच-२१-२५-२७-२८-२९ तथा देवताने ए पांच उपरांत ३० नुं अधिक जाण. ते उद्योत नाम वेदतां समजवू. उत्तर वैक्रियपणामां ते छए उदयस्थानने वे वे सत्तास्थान-९२-८८. मनुष्यगति प्रायोग्य ३० देवता अने नारकी जिननाम सहित बांधे छे. वेमा देव- ताने उदयस्थान ६ पूर्ववत् अने सत्तास्थान २ (९३-८९). तथा नारकीने उदयस्थान ५ पूर्ववत् अने सत्तास्थान १ (८९). सामान्ये २१ थी ३० सुधीना, ७ उदयस्थानमां सत्तास्थान चार चार-९३- ९२-८९-८८. ३१ ना उदयमा सत्तास्थान २ (९२-८८), कुल सत्तास्थान ३०. हवे देशविरति आश्री कहे छे.- देशविरतिने बंधस्थान २ (२८-२९). २८ नो बंध मनुष्य तिर्यचने देवगति प्रायोग्य थाय. तेना भंग ८. तेज २८ तीर्थकर नाम सहित २९ नो बंध मनुष्य ज करे. तेना पण भंग ८. देशविरति गुणस्थाने उदयस्थान ६ (२५-२७-२८-२९-३०-३१). तेमा पहेला चार उदयस्थान वैक्रिय तिर्यच मनुष्यने होय. तेनो मनुष्य आश्री एक ज भंग. सर्व पद प्रशस्त होवाधी. तथा तिर्यंच आश्री पहेला वेमा एक एक मंग अने वीजा वेमां बे वे भंग. (कुल (४-६=१० मंग). - -- [१९९] ३० नो उदय स्वभावस्थ तिथंच मनुष्यने होय. तेना भंग १४४-१४४. आ भंग ६ संघयण, ६ संस्थान, २ सुखरदुःस्वर, तथा २ प्रशस्ताप्रशस्त गति वडे थाय छे. दुर्भग, अनादेय, अने अयशनो उदय अहीं नथी. वैक्रिय तिर्यच आश्री भंग १. कुल भंग २८९. ३१ नो उदय तिर्यचने होय. तेना उदयस्थान पूर्ववत् ५. तथा भंग १४४. सर्व मळी भंग ४४३ (४-६-२८९-१४४). दशविरति गुणस्थाने सत्तास्थान ४ (९३-९२-८९-८८). तेमां अप्रमत्त अने अपूर्वकरणी परिणामना सथी देशविरत्ति थाय, ते आश्री ९३ नी सत्ता पामीए. बाकी चोथा प्रमाणे. हवे देशविरतिए संवेध कहे छे. देशविरति मनुष्य २८ ना बंधकने पांच उदयस्थान-२५-२७-२८-२९-३०. तेमां प्रत्येक वे वे सत्तास्थान-९२-८८. तियंचने उदयस्थान ६. तथा सत्तास्थान २ (९२-८८). २९ नो बंध मनुप्यने ज होय. तेने पांच रदयस्थान. तथा वे वे सत्तास्थान ९३-८९. आ प्रमाणे देशविरतिने पांच उदयस्थानमा ४-४ सचास्थान. तथा ३१ ना उदयमां वे सत्तास्थान. कुल सत्तास्थान २२. हवे प्रमत्त संयत गुणस्थान आश्री कहे छ.- प्रमत्त संयतने बंधस्थान २ (२८-२९) उपर प्रमाण. प्रमत्त संयतने उदयस्थान ५ (२५-२७-२८-२९-३०). तियंचने आ गुणस्थान न होवाथी ३१ नुं उदग्रस्थान नथी. आ पांचे उदयस्थान आहारक अने वैक्रिय संयती आश्री जाणवा. तेमा ३० नुं उदयस्थान स्वाभाविक संयतीने पण होय. २५-२७ ना उदये भंग एक एक. कुल ४. २८-२९ ना उदये भंग वे वे. कुल ८. ३० ना उदये एक एक. कुल २. २० ना उदये स्वाभाविक संयती आश्री देशविस्तीवत् भंग १४४. कुल भंग १५८. प्रमत्त संयतने सचास्थान ४ (९३-९२-८९-८८). प्रमत्त संयत गुणस्थाने संवेध कहे छ.- २८ ना बंधकने पांच उदयस्थानमां वे बे सत्तास्थान-९२-८८. तेमा आहारक संयतीने ९२ नुज सत्तास्थान. वैक्रियने बन्ने तीर्थकर नाम सत्कर्मा २८ बांधतो नथी. तेथी ९३ नुं सत्तास्थान न होय, [२००] २९ ना बंधकने पांचे उदयस्थाने वे वे सचास्थान-९३-८९. तेमा आहारकने एक ९३ नुंज. कुल पांचे उदयस्थाने चार चार सत्तास्थान होवाथी २०, हवे अप्रमत्त संयत गुणस्थान आश्री कहे छ.- अप्रमत्त संयत गुणस्थाने बंधस्थान ४ (२८-२९-३०-३१). २८-२९ उपर प्रमाणे. २८ ने आहारक द्विक युक्त करता ३०. २८ ने आहारक द्विक अने जिननाम युक्त करतां ३१. चारेमा भंग एक एक. केमके अप्रमत्त संयतने अस्थिर, अशुभ अन अयश- ना बंधनो अभाव छे. उदयस्थान २ (२९-३०). जे प्रमत्तपणामां आहारक के वैक्रिय करीने पछी अप्रमत्ते जाय, ते आधी २९. तेना आहारक अने वैक्रियना मळीने वे भंग. तथा ३० ना उदयमां पण आहारक अने वैक्रियना में भंग. स्वभावस्थ संयतीने पण ३० नो उदय होय. तेना भंग १४४ पूर्ववत्. कुल भंग १४८. सत्तास्थान ४ (९३-९२-८९-८८). हवे संवेध कहे छे.- २८ ना बंधकने बन्ने उदयस्थाने ८८ नी सत्ता. २९ ना बंधकने बन्ने उदयस्थाने ८९ नी सत्ता. ३० ना बंधकने बन्ने उदयस्थाने ९२ नी सत्ता. ३१ ना बंधकने बन्ने उदयस्थाने ९३ नी सत्ता. आहारक अने तीर्थकर नामनी सत्तावाला जरूर तेनो बंध करे छे. तेथी एक एक बंधे एक एक सत्तास्थान पामीए. कुल ४ उदये सत्तास्थान ८. हवे अपूर्वकरणे बंधादिक कहे छे.- अपूर्वकरणे बंधस्थान ५ (२८-२९-३०-३१-१). प्रथमना चार उपर प्रमाणे. देवगति प्रायोग्य बंधन्यवच्छेदे एक यशकीर्तिनो ज बंध छे. उदयस्थान १ (३०). तेमा वर्षभनाराच, छ संस्थान, सुखरदुःखर अने प्रशस्ताप्रशस्त गति आश्री भंग २४, । [२०१] केटलाक आचार्य त्रण संघयणे उपशमश्रेणि माने छे. ते आश्री भंग ७२. ते ज प्रमाणे ९-१०-११ गुणस्थाने पण भंग ७२ समजवा. सत्तास्थान ४ (९३-९२-८९-८८). हवे संवेध कहे छे.- २८-२९-३०-३१ ना बंधकने ३० ना उदयमा यथाक्रमे ८८-८९-९२-९३ नु एक एक सत्तास्थान. १ विध बंधकने चारे सत्तास्थान, कारण के २८-२९-३०-३१ बंधक देवगति प्रायोग्य बंधव्यवच्छेदे एक विध बंधक थाय. तेथी ते चारेना चार सत्ता- स्थान पामीए. गाथा ५२ हवे अनिवृत्ति बादर गुणस्थान आश्री कहे छे.- बंधस्थान १ एकविध. उदयस्थान १ (३०). सत्तास्थान ८ (९३-९२-८९-८८-८०-७९-७६-७५). पहेला चार उपशमश्रेणिमा अथवा क्षपश्रेणिमा नामकर्मनी १३ प्रकृति खपाच्या अगाउ. अने नामनी १३ खपाच्या पछी पाछला ४ सत्तास्थान. ते उपर कह्या प्रमाणे ज जाणवा. अहीं बंध अने उदयमा एक एक ज स्थान होबाथी संवेष नथी. हवे सूक्ष्मसंपराय आश्री कहे छे. बंधस्थान १ एकविध. उदयस्थान १ (३०). सत्तास्थान ८ उपर प्रमाणे. छबास्थ जिन ११-१२ मा गुणस्थानवाळा कहेवाय. तेमां उपशांत मोहे बंधस्थान नथी. उदयस्थान १ (३०). सत्तास्थान ४ (९३-९२-८९-८८). क्षीणमोहे. उदयस्थान १ (३०). तेना भंग २४. केमके क्षपकश्रेणि पहेला संघयणवाळा ज मांडे छे. अने तीर्थकर नामनी सत्तावाळा क्षीणमोहीने तो एक ज भंग. केमके तेने सर्व प्रकृति शुभ ज होय छे. सत्तास्थान ४ (८०-७९-७६-७५). तेमा पहेलु अने त्रीजु ए वे सत्तास्थान तीर्थकर सत्कर्माने होय., - - [२०] तथा वीजु अने चोथु सामान्य जिनने होय. हवे सयोगी केवळी आश्री कहे छ.- उदयस्थान ८ (२०-२१-२६-२७-२८-२९-३०-३१), आतुं विवरण सामान्य नाम कर्मना उदय भंग वखते सविस्तर आव्यु के. सत्तास्थान ४ (८०-७९-७६-७५) संवेध संज्ञी पर्याप्त जीवद्वारमा कर्या प्रमाणे अहीं पण जाणवो हवे अयोगी केवळी आश्री कहे छ.- उदयस्थान २ (८-९). ८नु अतीर्थकर केवळीने. ९३ तीर्थकर केवळीने. सत्तास्थान ६ (८०-७९-७६-७५-९-८) ८ ना उदयमांत्रण सत्तास्थान-~७९-७५-८. पहेला बे द्विचरम समय सुधी, अने आठजें चरम समये ( अतीर्थकरने) ९ना उदयमांत्रण सत्तास्थान--८०-७६-९. पहेला वे द्विचरम समय सुधी, अने नवनुं चरम समये ( तीर्थकरने ). इति गुणस्थाने बंधोदय सत्ता सवेध. गाथा ५३. हवे गत्यादि मार्गणाए बंधादिक कहे छे.- प्रथम गतिमार्गणा आश्री कहे छे.- नरकगतिने बंधस्थान २ (२९-३०). २९ तिर्यच अने मनुष्य गति प्रायोग्य. ३० तिर्यच पंचेंद्रिय प्रायोग्य उद्योत सहित. मनुष्य गति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित. तिर्यच गतिने बंधस्थान ६ (२३-२५-२६-२८-२९-३०) पूर्ववत्. विशेष एउटु के-२९-३० तीर्थकर आहारक सहित छे, ते अहीं न जाणवा. मनुष्य गतिमा बंधस्थान ८ (२३-२५-२६-२८-२९-३०-३१-१). देवगतिमां बंधस्थान ४ (२५-२६-२९-३०). २५-२६ एकेंद्रिय पर्याप्त चादर प्रत्येक आश्री समजवा. तेना भंग स्थिरा- स्थिर, शुभाशुभ, यश अयश आश्री ८ थाय. तेमा २६ आतप उद्योत सहित थाय, तेथी आठने बमणा करतां १६ मंग थाय, २९ मनुष्य अने तिर्यंच पंचेंद्रिय प्रायोग्य थाय.

[२०३] ३० तिर्यंच पंचेंद्रिय प्रायोग्य उद्योत सहित थाय. तेना भंग ४६०८ थाय. तथा मनुष्य गति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित थाय. तेना स्थिरास्थिर, शुगाशुभ, यश अयश वडे भंग ८ थाय. हचे चार गति आश्री उदयस्थान कहे छ.- नारकीने उदयस्थान ५ (२१-२५-२७-२८-२९). तिर्यचने उदयस्थान ९ (२१-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१). ते एक- द्रिय, विकलेंद्रिय, सर्वक्रियअक्रियतिथंचपंचेंद्रिय आश्री ममजी लेवा. मनुप्यने उदयस्थान ११ (२०-२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१-९-८). ते स्वभावस्थ मनुष्य, बक्रिय मनुप्य, आहारक संयत, तीर्थकर अतीर्थकर सयोगी अयोगी कंवली आश्री समजवा. देवताने उदयस्थान ६ (२१-२५-२७-२८-२९-३०), हवे चार गतिना सत्तास्थान कहे छ.- नारकीने मतास्थान ३ (१२-८९-८८), तेमा ८९ नुं नीर्थकर नामकर्मयुक्त जीव मिथ्यात्वे गयेल होय तेने आश्रीने समजवू. ९३ जें तो अहीं होय ज नहीं. कारण के आहारक अने तीर्थकर ए वननी सत्तावाला नारकीमां जताज नथी. तियंच गतिमा सत्तास्थान ५ (९२-८८-८६-८०-७८). तीर्थकर नामवाळा तथा क्षपकवाळा सत्तास्थान न होय. मनुप्यने मचास्थान ११ (९३-९२-८९-८८-८६-८०-७९-७६-७५-९-८). ७८ वाळु १ सत्तास्थान होय नहीं. कारण के मनुप्य द्विक अहीं तो नियमा मत्तामा होय. देवगतिमा सत्तास्थान ४ (९३-९२-८९-८८) वाकीनां सत्तास्थान अहीं न संभवे. हवे चारे गतिभा संवेध कह छ.- नारकीने तिर्यक् गति प्रायोग्य २९ बांधतां पांचे उदयस्थाने सत्तास्थान २ (९२ -८८). तीर्थकर सत्कर्मावाळु ८९ नुं सत्तास्थान न संभवे. नारकीने मनुष्य गति प्रायोग्य २९ पांधतां पांचे उदयस्थाने त्रणे सत्तास्थान (९२-८९-८८). तीर्थकर सत्कर्मा ज्यांसुधी मिथ्यादृष्ट होय त्यांसुधी २९ बांधे. पछी समकिती थये सते तीर्थकर नाम सहित ३० बांधे. तिर्यंच गति प्रायोग्य उद्योत सहित ३० बांधतां पांचे उदयस्थाने वे वे सचास्थान ९२-८८.

. [२०४] मनुप्य गति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित ३० बांधतां पांचे उदयस्थाने एक सत्तास्थान ८९ नु. सर्वे मळी सत्तास्थान ४०० हवे तिर्यच गतिनो संवेध कहे छे.- २३ ना बंधमा नवे उदयस्थान. तेमां प्रथमना चार उदयस्थाने पांच पांच सत्ता- स्थान. ते तेजोवायु आश्री अने तेमाथी तरतना नीकळेसा आश्री जाणवा पाछळना पांच उदयस्थाने चार चार सत्तास्थान. ७८ विना. तेमने मनु- प्याद्विकनी सत्तानो सदभाव होवायी आ प्रमाणे २५-२६-२९-३० ना बंधमां पण समजवू, फक्त मनुष्य गति प्रा- योग्य २९ ना बंधमां नवे उदयस्थाने चार चार सचास्थान जाणवां. २८ ना बंधमा ८ उदयस्थान, २४ विना तेमां २१-२६-२८-२९-३० आ पांच उदयस्थान क्षायिक समकितीने तथा २२ मोहनीनी सत्तावाळा वेदक समकिती जे पूर्वबद्धायु होय तेने होय. तेने सतास्थान २ (९२-८८). २५-२७ नो उदय वैक्रिकतिर्यचआश्री जाणवो.तेने पण वेवेसत्तास्थान ९२-८८. ३०-३१ नो उदय सर्व पर्याप्तिए पर्याप्त समकिती वा मिथ्यात्वी आश्री जाणवो. ते बन्ने उदयस्थाने त्रण त्रण सचास्थान-९२-८८-८६. तेमा ८६ नु मिथ्यात्वी आश्रीने ज समजवु, समकितीने तो अवश्य देवायुना बंधनो संभव होवाथी तेने आश्रीने नहीं. (पांच बंधस्थाने ४०-४० ने २८ ना बंधमां १८ मळी कुल सत्तास्थान २१८). हवे मनुष्य गतिनो संवेध लहे छे. २३ ना बंधमां उदयस्थान ७ (२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०). बाकीना केवळी आश्री चार उदयस्थान न होय. तेमा २५-२७ नो उदय वैक्रिय- बाळाने समजवो. तेथी २५-२७ विनाना पांच उदयस्थाने चार चार सत्तास्थाने-९२-८८-८६-८० २५-२७ ना उदयमां वे वे सत्तास्थान ९२-८८. चाकीनां सत्तास्थान न संभवे. २३ ना पंधमां कुल सत्तास्थान २४. २५-२६ ना बंधा उपर प्रमाणे समजवू, २९-३० मनुष्य अने तिर्यक गति प्रायोग्य बांधता पण ए प्रमाणे २८ ना बंधमां सात उदयस्थान उपर प्रमाणे. तेमा २१-२६ नो उदय अविरति करण अपयांप्ताने, २५-२७ नो उदय वैक्रिय आहारक संयतिने, २८-२९ . [२०५] नो उदय अविरतिने तथा वैक्रियने आहारक संयतिने, ३० नो उदय सम- विती वा मिथ्यात्वीने, ३० विनाना ६ उदयस्थानमां बे वे सत्तास्थान ९२-८८. तेमा आहारकने तो एक ज ९२ नु. तथा ३० ना उदयमा चार सत्तास्थान ९२-८९-८८-८६. तेमां ८९ नु नरकगति प्रायोग्य २८ वांधा मिथ्याद्रष्टिने समजवू. कुल २८ ना बंधमां सत्तास्थान १६. २९ देवगति प्रायोग्य तीर्थकर नाम सहित बांधतां ७ उदयस्थान २८ ना बंध प्रमाणे समजवा. तेमां ३० नो उदय समकित द्रष्टिने ज जाणवो. कारण के आ २९ ना बंधमां तीर्थकर नामकर्मनो बंध होय छे. ते साते उदय- स्थाने वे वे सत्तास्थान ९३-८९. अने आहारकने ९३ नुं एक ज. सर्व मळीने सत्तास्थान १४. आहारक सहित ३० वांधतां वे उदयस्थान-२९-३०. तेमां जे आहारक संयती अंतिमकाळे अप्रमच होय तेने आश्रीने २९, प्रमत्त आश्रीने ३०. आहारक चंध हेतु सिवाय चीजा २९ ना उदयमां विशिष्ट संथमनो अभाव होवाथी बन्ने उदयस्थानमा सत्तास्थान ९२ तुं. ३१ ना बंधमा एक ज उदयस्थान ३० मुं. तेमां १ सत्तास्थान ९३ नं. एकविध बंधमा एक उदयस्थान ३० नु. तेमां सत्तास्थान ८ छ(९३-९२-८९-८८ -८०-७९-७६-७५). सर्व बंधस्थाने मळीने सत्तास्थान १५९. (२३-२५-२६-२९-३० मा २४-२४, २८ मां १६, देवगतिप्रायोग्य जिननाम युक्त २९ मां १४, ३१ मां १, १ मां ८, कुल १५९. चंध अभावे उदय अने सत्तास्थाननो संवेध पूर्व सामान्य संवेधमां कह्या प्रमाणे समजवो. हवे देवगति आश्री संवेध कहे छ.- २५ ना बंघमां ६ उदयस्थाने २ सत्तास्थान-९२-८८. २६-२९ ना बंधमां पण एज प्रमाणे. उद्योत सहित तिर्यक् गति प्रायोग्य ३० बांधता पण ए ज प्रमाणे ९२-८८. तीर्थकर नाम सहित मनुष्य गति प्रायोग्य ३० बांधतां छए उदयस्थाने वे वे सत्तास्थान-९३-८९. सर्व मली सत्तास्थान ६०. गाथा ५४. हवे इंद्रिय आश्री कहेता प्रथम बंध कहे छे.- एकेंद्रियने ५ बंधस्थान--२३-२५-२६-२९-३०, - [२०६] तेमा देवगति प्रायोग्य २९-३० विना वाकी सर्व गति प्रायोग्य सर्व भेद जाणवा विकलेंद्रियने ते ज ५ बंधस्थान. पंचेंद्रियने आठे बंधस्थान. हवे उदयस्थान कहे छे. एकेंद्रियने उदयस्थान ५ (२१-२४-२५-२६-२७). विकलेंद्रियने उदयस्थान ६ (२१-२६-२८-२९-३०-३१). पंचद्रियने उदयस्थान ११ (२०-२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१-९-८). हवे सत्तास्थान कहे छे. एकेंद्रियने सत्तास्थान ५ (९२-८८-८६-८०-७८). विकलेंद्रियने ए ज पांच सत्तास्थान, पंचेंद्रियने चारे सनास्थान. हवे संवेध कहे छे. एकेंद्रिय आश्री संवेध.. २३ ना बंधमा पहेला चार उदयस्थानमां पांचे सत्तास्थान. २७ ना उदयमा ७८ विनाना ४ सत्तास्थान. २५-२६-२९-३० ना बंधमां पण एज प्रमाणे. कुल सत्तास्थान १२०. विकलेंद्रिय आश्री.- २३ ना धर्मा २१-२६ ना उदयमां पांच पांच सत्तास्थान. याकीना चार उद यमा ७८ विना चार चार सत्तास्थान. २५-२६-२९-३० ना बंधमां पण एज प्रमाणे, कुल सत्तास्थान १३०. पंचेंद्रिय आश्री.- २३ ना बंधमां ६ उदयस्थान--२१-२६-२८-२९-३०-३१ तिर्यच पंचेंद्रिय अने मनुष्य आश्री समजवा. तेमा २१-२६ ना उदयमां पांच पांच सत्ता- स्थान. बाकीना चार उदयमा ४-४ सत्तास्थान. कुल २६. २५ बंधमा ८ उदयस्थान-२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१. तेर्मा २१- २६ ना उदयमां पूर्वोक्त ५ सत्तास्थान. २५-२७ ना उदयमां वे वे सत्ता- स्थान-९२-८८. बाकीना ४ उदयमा ७८ विना चार चार सत्तास्थान. कुल सत्तास्थान ३०.

[२०७] २६ ना बंधा ए ज प्रमाणे ३० सत्तास्थान. २८ ना बंधमा ८ उदयस्थान-२१-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१. तिर्यंच पंचेंद्रिय अने मनुष्य आश्री समजवा. तेमा २१ थी २९ सुधीना ६ उदय- स्थानमां वे वे सचास्थान--९२.-८८.३० ना उदयमा ४ सचास्थान-९२ -८९-८८-८६. तेमां ८९ तीर्थकर सत्कर्मा मिथ्यावृष्टिने नरकगति प्रायो- ग्य बांधता होय. बाकीनां सचास्थान सामान्ये तिर्यंच पंचेंद्रिय आश्री जाणवां. ३१ ना उदयमांत्रण सत्तास्थान-९२-८८-८६. तिर्यच पंचेंद्रिय आश्रीं जाणवां. वीजा पंचेंद्रियने ३१ ना उदयनो अभाव छे. तेमां ८६ नुं मिथ्या- दृष्टि तिर्थचपंचेंद्रियने जाणवु. समकितदृष्टिने तो देवद्विकना बंधनो ज संभव होवाथी तेने ८८ नुंज होय. कुल सत्तास्थान १९. २९ ना बंधमां उपर प्रमाणे ८ उदयस्थान तेमां २९-२६ ना उदयमां ७-७ सचास्थान-९२-८८-८६-८०-७८-९३-८९. तिथंच गति प्रायोग्य २९ बांधतां प्रथमना ५. मनुष्यगति प्रायोग्य २९ वांधतां प्रथमना ४. देवगति प्रायोग्य २९ वांधता छल्ला २. २८-२९-३० ना उदयमा ७८ वर्जीने ६ सचास्थान. ३१ ना उदयमा प्रथमनां ४ सत्तास्थान. २५-२७ ना उदयमां ९२-८८-९३-८९ आचार सचास्थान. कुल सत्तास्थान ४४. ३० ना बंधमां तेज ८ उदयस्थान अने उपर प्रमाणे ज सत्तास्थान. तेमा २१ ना उदयमां तिथंच गति प्रायोग्य ३० बांधतां ९२-८८-८६-८०-७८, आ ५ सचास्थान. मनुष्य गति प्रायोग्यमां तो तीर्थकर नाम होय तेथी सत्ता- स्थान नव छ. देवगति प्रायोग्यमा आहारक द्विक होय. ते २१ ना उदयमां संभवे नहीं. ९३-८९ नुं सत्तास्थान मनुप्य गति प्रायोग्य ३० बांधतां देवताने होय. २६ ना उदयमां पण ते ज पांच सत्तास्थान. २६ नो उदय तिर्यच मनुष्यने अपर्याप्त अवस्थामां होय, ते वखते देवगति के मनुष्यगति प्रायोग्य ३० नो बंध न होय. तेथी ९३-८९ सत्तास्थान न लामे. बाकी उपर प्रमाणे होवाथी सचास्थान कुल ४२. केमके २६ ना उदयमा उपर करतां वे घट्यां तेथी. ३१ ना तथा १ ना वंधमां पूर्वे मनुष्य गति आश्री संवेध कह्या प्रमाणे समजवा. गाथा ५५. आ प्रमाणे गत्यादि १४ मार्गणावडे सत्पदप्ररूपणा विगेरे ८ अनुयोगद्वारमा समजी लेवु. तेमां सत्पदप्ररूपणावडे संवेध सामान्ये गुणस्थानकमां कह्यो, विशेषे गति इंद्रियमां करो. एज प्रमाणे काययोग विगेरे मार्गणामां पण [२०८] ममजबो. बाकी द्रव्य प्रमाणादि ७ अनुयोगद्वार कर्मप्रकृतिप्राभ्रत - विगैरे ग्रंथोथी जाणवां. ते ग्रंथ अधुना लम्य न होबाथी लेशथी पण ने अमे बतावी शकता नी. परंतु सांप्रत काळमां पण जे कोई सम्यक् प्रकारे ते अनुयोग द्वाग्ना जाणनार होय, तेमण अवश्य ते द्वार बताववां. कारण के बुद्धिनी विशिष्टता अत्यारं पण तीच तीव्रतर क्षयोपशमथी असीम जणाय छे. वळी अमारा लखाणमां कांइ भूलवाळु होय, ते पण तेवा विद्वाने दूर करीने समी- चीन वताव. कमक मजनो तो परोपकारमा ज रसिक होय छे. ते अनुयोग द्वारमा बंधोदयसत्तास्थान, प्रकृति, स्थिति, अनुभाग ने प्रदेश रूप जाणवा. तमा प्रकृति बंध मंबंधी तो प्राय अहीं कहेल छ. बाकीना त्रण बंघ संबंधी तदनुसार कह अहीं बंधोदय सत्तास्थाननो संवेध कह्यो छ, तेमां उदयनी साथै उदीरणा पण ग्रहण करी छ एम समजबु. केमके उदय सने उदारणा अवश्य होय छे. ते विप कह छ के. गाथा ५६. ज्यां उदय त्यां उदीरणा. अने ज्यां उदीग्णा त्यां उढय. ते वन्नना स्वामि- त्वमा भेद नथी. गाथा ५७. तेमां पण अपवाद वताव छ.-नीचेनी ४१ प्रकृतिमां उटीरणा विना पण उदय होय. १४ ज्ञानावरणीय ५, अंतराय ५, दर्शनावरण ४, तेनी उदीरणा बारसुं गुणस्थाननी आवळिका शेप होय त्यां सुधी पछी मात्र उदय. ५ शरीर पर्याप्ति पूरी कयां पछी ज्यां मुधी इंद्रिय पर्याप्ति पूरी न करे त्यां मुधी पांच निद्रानो उदय होय, पण उढीरणा न होय. पछी बन्ने साथ प्रवर्ते, अने साथ निवर्ते. २ सातासात वेदनीनो उदय अने उदीरणा प्रमत्त गुणस्थान मुधी. पछी मात्र उदय ज. १ प्रथम समकित प्राप्त करतां अंतकरणमा प्रथमनी स्थिति आवलिका शेप रहे त्यारपछी मिथ्यात्वनो उढय ज होय, उदीरणा न होय. १ क्षयोपशम समकितीने दायिक समकिन उपार्जन करतां मिथ्यात्वमोहनी अने मिश्रमोहनी खपाच्या पछी समकितमोहनीने सर्व अपवर्तनाए अपवर्ती अंतर्मुहूर्त स्थितिनी कर. पछी उढय उदीरणावडे तेने अनुभवतां आवंलिका शेप म्ह त्यारे उदय ज होय, उदीरणा न होय. अथवा उप- शमश्रेणी अंगीकार करनाग्ने अंतरकरण करतां प्रथमनी स्थिति आव- लिका शेप रहे त्यारे समकित मोहनीनो उदय ज होय उदीरणान होय.

- [२०९] १ संज्वलन लोभनो उदय अने उदीरणा सुक्ष्मसंपराय आवलिका शेष रहे त्यां सुधी. पछी उदय ज होय, उदीरणा नहीं. ३ त्रण वेदमांथी जे वेदे श्रेणि मांडी होय, ते वेदनी प्रथम स्थिति आव- लिका शेष रहे त्यारे उदय ज होय, उदीरणा नहीं. ४ आयुमां पोतपोताना भवना पर्यंत भागे आवलिका शेप रहे त्यारे उदय ज होय. उदीरणा नहीं. तेमां पण मनुष्यायुनी प्रमत्त गुणस्थान पछी उ- दीरणा न होय, मात्र उदय ज होय. गाथा ५८. ९ मनुष्य गति, पंचेंद्रिय जाति, स, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यश:- कीर्ति, अने तीर्थकर ए ९ प्रकृतिनो सयोगी गुणस्थान सुधी उदय अने उदीरणा बन्ने होय. अयोगीमा मात्र उदय ज होय. १ उच्च गोत्रनो पण अयोगीमां उदय ज होय. गाथा ५९. हवे १४ गुणस्थाने केटली केटली प्रकृति बंधा होय ते कहे छे.- आनो विस्तार वीजा कर्मग्रंथमां तथा तेना यंत्रमा होवाथी अहीं कर्यों नथी. मात्र दरेक गुणस्थाने संख्या ज वतावी छ- गुणस्थान प्रकृति ११७ तीर्थकर अने आहारक द्विक विना. १०१ मिथ्यात्व आश्री १६ विना. गाथा ६०. ७४ अनंतानुबंधी आश्री २५ तथा २ आयु बाद. ७७ तीर्थकर नाम तथा देव मनुज आयु वधे. ६७ अविरति संबंधी १० बाद. गाथा ६१. ६३ प्रत्याख्यानावरणी ४ बाद. ५९६ घटे तथा आहारक द्विक वधे. ५८ देवायु बाद करता. ते पण अपूर्वकरणनो संख्यामो भाग जतां सुधी. ५६ निद्रा प्रचला वाद करवा. ते पण एक संख्यातमो भाग रहे त्यां सुधी. २६ त्रीश प्रकृतिनो क्षय थवाथी अपूर्वकरण चरमसमये. गाथा ६२. २२ ४ नो क्षय थवाथी.ते नवमाना संख्यात मागजतां सुधी. १८ अनुक्रमे पुरुष वेद तथा संज्वलन क्रोध, मान अने माया एक एक नो क्षय थवाथी १८ रहे. १० १७ संज्वलन लोभ घटवाथी. ते दशमाना चरम समय सुधी. २ ३ wr ८ or [२१०] दशमाना चरम समये १६ प्रकृतिनो क्षय थवाथी १ साता वेदनी जांघ. ११-१२-१३ १ साता वेदनी नो बंध. १४ • बंधाभाव. बंध हेतु न रहेवाथी. गाथा ६३. उपर जे बंध मेद बताव्यो, ते बंधस्वामित्वना संबंधमां ओध समजवा. अने नेमा पछी गत्यादि मार्गणा आश्री जे जे मार्गणामां जे जे प्रकारे घटे, ते प्रकार कहबो ते विशेषपणुं समजबु. गाथा ६४. पूर्वे बतावली प्रकृतिओ सर्व गतिमां सर्वदा लामे के कम ? तेनी उत्तर.- तीर्थकर नाम लियच गति विना त्रण गतिमा लामे. देवायु नरक गति विना त्रण गतिमा लामे. नरकायु देवगति विनां त्रण गतिमा लाभे. आ प्रमाणे सत्ता आथी लामे. बाकी तो सर्व प्रकृतिओ चार गतिमा लामे. गाथा ६५. पूर्वे जे गुणस्थानकोमा बंध, उदय अने सत्तानो संवैध करो, ते गुणस्थानको प्राय उपशम श्रेणिमा अने क्षपक श्रेणिमा वन्नेमा संभवे माटे वन्ने श्रेणिनु स्वरूप जणावg जरूग्नु छे. ते आ प्रमाणे:- उपशममां-४-५-६-७-८-९-१०-११. ए आठ गुणस्थान. क्षपकमां-४-५-६-७-८-९-१०-१२. ए आठ गुणस्थान. उपशम श्रेणिनु स्वरूप.- प्रथम ४ अनंतानुबंधी अने ३ समकितादि मोहनी. ए सात प्रकृतिनो उप- शम करनार चोथाथी आठमा गुणस्थान सुधी जाणवा. तेमां-४-५-६- ७वाळा यथायोग्य तेने उपशमावे छे. अने ८ मे तो निश्चये उपशमावेज छे. तेमा प्रथम अनंतानुबंधी चतुष्कनी उपशमना करे छे. तेथी ते कहे छे. ४-५-६-७ मा गुणस्थानमांथी कोइ पण स्थानके कोइ पण योगमा वर्ततो, त्रण शुभ लेग्यामांयी कोई पण लेश्या युक्त, कोटाकोटी सागरोपमनी अंदरनी स्थितिवाळा कर्मोनी सत्तावाळो जीव त्रण करण का अगाउ अंतर्मुहुर्त काळ सुधी चित्तवृत्तिना शांतपणे वर्ते. ते वखते परावर्तमान प्रकृति शुभ ज बांधे, अशुभ न बांधे. अशुभ प्रकृतिनो रस चोठाणीयो होय ते वेठाणीयो करे, अने शुमनो रस बेठाणीयो होय तेने चोठाणीयो करे. स्थितिबंध पण जेनो पूर्ण थाय तेनो नवो पल्योपमना संख्यात भाग जेटलो हीन करे. आ प्रमाणे एक अंतर्मुहुर्त सुधी हीनबंध करे. -- 8 [२११] पछी त्रण करण दरेक अंतर्मुहूर्त प्रमाणना करे. १ यथाप्रवृत्ति करण, २ अपूर्व करण, ३ अनिवृत्ति करण. पछी ४ थो उपशांत काळ. तेमां प्रथम यथाप्रवृत्ति करणमा प्रतिसमये अनंतगुण वृद्धि पामती विशुद्धि- युक्त प्रवेश करे. अने उपर प्रमाणे शुभ प्रकृतिना बंधादिक करे. परंतु स्थितिघात, रसवातादिक तथाप्रकारनी विशुद्धि न होवाथी न करे. प्रति- समय घणा जीवनी अपेक्षाए असंख्येय लोकाकाशना प्रदेश प्रमाण अध्य- वसाय स्थानक लामे. ते दरेक स्थानकमां पण छठाणवडीया होय, वळी पहेला समयना अध्यवसाय स्थानक करतां बीजा समयना अध्यवसाय स्थानक विशेपाधिक होय. एमां त्यां सुधी समजवू के ज्यां सुधी यथाप्रवृत्ति करणनो चरम समय आवे. तेमां पण प्रथम समये जघन्य विशुद्धि सौथी थोडी. वीजे समये जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी. त्रीजे समये जघन्य विशुद्धि तेथी अनंतगुणी. ए प्रमाणे यथाप्रवृत्ति करणना काळनो संख्या- तमो भाग जतां सुधी समजq. त्यार पछी तेना करतां पहेले समये उत्कृष्ट विशुद्धि अनंतगुणी. तेनाथी पूर्वे निवर्तेली जवन्य विशुद्धिनी पछीनी जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी. तेनाथी चीजा समयनी उत्कृष्ट विशुद्धि अनंत- गुणी. तेथी वळी उपली पछीनी जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी. एम यथाप्रवृत्ति करणना चरम समये जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी कहेवो. पछी जेटला उत्कृष्ट विशुद्धि स्थान रह्या, त्यां अनंत अनंतगुणी विशुद्धि प्रति- समये कहेवी. ते यथाप्रवृतिना चरम समय सुधी. आ प्रमाणे पहेल करण समजवू हवे बीजुं अपूर्वकरण कहे छ.- तेमां प्रत्तिसमये असंख्य लोकाकाशना प्रदेशप्रमाण अध्यवसाय स्थान जाणवां. तेमां पण प्रतिसमये छठाणवडीया जाणवा, तेमां प्रथम समये जघन्य विशुद्धि सर्वथी थोडी. पण यथाप्रवृत्ति करणना चरम समयना उत्कृष्ट विशुद्धि सर्वथी थोडी. पण यथाप्रवृत्ति करणना चरम समयना उत्कृष्ट विशुद्धि स्थानथी अनंतगुणी. ते पहेला समयनी जघन्य विशुद्धिथी पहेला समयनो उत्कृष्ट विशुद्धि अनंतगुणी. तेनाथी बीजा समयनी जघन्य विशुद्धि अनंतगुणी. तेनाथी वीजा समयनी उत्कृष्ट विशुद्धि अनंतगुणी. एम प्रतिसमये जघन्य अने उत्कृष्ट विशुद्धि अनंतगुणी अपूर्वकरणना चरम समय सुधी जाणवी. आ अपूर्वकरणना प्रथम समयथी १ स्थितिघात, २ रसपात, ३ गुणश्रेगि, - [२१२] ४ गुणमंक्रम अने ५ अन्य स्थितिबंध, आ पांच गरु थाय छ. स्थितिघाजमां स्थितिसंबंधी कर्मना अग्रभागमाथी उत्कृष्ट घणा सागरोपमना सेंकडा प्रमाण अने जघन्य पल्योपमना संख्यातमा भाग मात्र स्थितिखंडनी उत्कीर्णना करे. अने तेने जे नीचेनी स्थिति अंतर्मुहर्तमा उत्कीर्णना करवा जेटली होय तेमां नांखे, अने तेना मेळी उकेरी नांखे. वळी उपली स्थिति- मांथी पल्योपभना असंख्यातमा भाग जेटली ले, अने नीचेमा नांखे. एम अपूर्वकरणना काळमां घणा हजारो स्थितिखंडने नीचे लावी लावीने खपावी दे. तेथी अपूर्वकरणना पहेला समय करतां छेल्ले समये संख्यातगुणहीन स्थितिसत्कर्मा थाय. ग्मघातमां अशुभ प्रकृतिनो जेटलो अनुभाग होय, तेनो अनंतमो भाग मूकीने वाकी बधो अंतर्मुहर्तमां विनाश पमाडे. वळी पूर्वे मूकला अनंतमा भाग- माथी अनंतमो भाग मूकीने बाकीना अनुभागना अनंत भाग अंतर्मुहुर्तमां खपावे. एम हजागे अनुभागना खंड एक स्थितिखंडे व्यतिक्रमावे, तेवा अनेक हजारो स्थितिखंड व्यतिक्रमावतां अपूर्वकरण पूर्ण करे गुणश्रेणि-अंतर्मुहूर्त प्रमाण स्थितिनी उपर जे स्थिति वर्ने छ, तेमांथी दळीयां लईने उदयावळीकानी उपली स्थितिमा प्रतिसमये असंख्यावगुण वधतां क्षेपन करे ते प्रमाणे अंतर्मुहर्तना चरम समय सुधी करे. आ अंतर्मुहर्त अपूर्व- करण अनिवृत्तिकरणना अंतर्मुहूर्तथी लाइक मोटुं जाणवू. आ प्रमाणे पहेले समये लीघेला दळ माटे करे तेज प्रमाणे प्रतिसमये ग्रहण करे अने समये समये असंख्यातगुण वधतो उपली स्थितिमा क्षेपन करे जेटला जेटला समय शेष रहेता जाय तेटला समयमा एम करे. आ प्रमाणे अपूर्वकरण अने अनिवृत्तिकरण ए बन्नेमा समजवू. गुणसंक्रम-अनंतानुबंध्यादि अशुभ प्रकृतिना दळ परप्रकृतिमा संक्रमाववा रूप समजवो. तेवो संक्रम प्रथम समय करतां समये समये असंख्यातगुणो समजवो. अन्यस्थितिबंध-अपूर्वकरणना प्रथम समयथी ज प्रथम कोइवार नहीं करेलो एवो ओछो स्थितिबंध करे. आवो स्थितिबंध अने स्थितिघात साथेज शरु करे, अने साथे ज पूर्ण करे. आ पांचे अपूर्वकरणमा तेमज अनिवृत्तिकरणमां पण प्रवर्ते. हवे त्रीजु अनिवृत्ति- करण कहे छे. अनिवृत्तिकरणमा प्रतिसमये वर्तता जीवनां अध्यवसाय स्थानक सरखा ज होय, [२१३] फक्त प्रथम समय करतां बीजे समये विशुदि अनंतगुणी होय. ए प्रमाणे प्रतिसमये अनिवृत्तिकरणना चरम समय सुधी अनंतगुण वृद्धि समजवी. तेना अंतर्मुहूर्तना जेटला समय छ, तेटला ज तेना अध्यवसायनां स्थान जाणवां. अनिवृत्तिकरणनो संख्यातमो भाग गया पछी एक भाग रहे त्यारे अनंतानुबंधीनी नीचेनी स्थितिमाथी आवलिका मात्र स्थितिने मूकीने अंतर्मुहूर्तप्रमाण काळनुं अंतरकरण करे. पछी अंतरकरण संबंधी दळने उकेरी बध्यमान प्रकृतिमां क्षेपन करे. अने पहेळी स्थितिमाथी उकेरेल आवलिका मात्र दळ वेद्यमान परप्रकृतिमा स्तिबुक संक्रमे पाणीना परपोटानी जेम संक्रमावे. अंतरकरण कर्या पछी बीजे ज समये उपली अनंतानुबंधीनी स्थितिने उप- शमाववा मांडे छे तेमां पण समये समये असंख्यातगुण वधता वधता स्थितिदळने उपशमावे छे. यावत् अंतर्मुहूर्त काळमां सर्व अनंतानुबधीना दळने उपशमावी नांखे छे. जेम धूळ उपर पाणी छांटी छांटीने घणवडे करी न उडे तेवी करे, तेम कर्मरूप रेणुने परिणामविशुद्धिरूप जळवडे सिंची अनिवृत्तिकरणरूप घणवडे उदय, उदीरणा, निधत्त अने निकाचनाने अयो- ग्य करी दे, तेनुं नाम उपशमना समजवी. आ प्रमाणे अनंतानुबंधीने उपशमावे अन्य आचार्य कहे छ के-अनंतानुबंधीनी तो विसंयोजना एटले क्षपणा ज थाय. पण उपशमना न थाय. ते आ प्रमाणे-चोथा गुणस्थानवाळा वेदक सम- किती चारे गतिमां, पांचमा गुणठाणावाळा वे गतिमां. छछा सातमावाळा मनुष्यगतिमा पर्याप्तावस्थामा अनंतानुबंधी खपाववा माटे प्रथम यथाप्रवृत्ति विगेरे त्रण करण करे. करणनी वक्तव्यता उपर प्रमाणे जाणवी विशेष एटलो के अनिवृत्तिकरणमां अंतरकरण न करे, अने अनंतानुबंधीने उपश- भावे नहीं. पण कम्मपयडी ग्रंथमा कह्या प्रमाणे उद्वलना संक्रमणवडे नीचेनी स्थितिमाथी आवलिकामात्र मूकीने बाकीना सर्व अनंतानुबंधीने खपावे, अने आवलिकाने स्तिबुक संक्रमे अन्य वेदाती प्रकृतिमा संक्रमावे. त्यार पछी अंतर्मुहुर्त पूर्ण थये अनिवृत्तिकरणने अंते शेष कर्मना स्थितिघात, रस- घात अने गुणश्रेणि न होय, जीव स्वमावस्थ ज होय. आ प्रमाणे अनंतानु- वधीनी विसयोजना जाणवी. हवे दर्शन त्रिकनी उपशमना कहे छे. तेमां मिथ्यात्व मोहनीनी उपशमना मिथ्यादृष्टिने अने वेदक समकितीने होय. अने मिश्रमोहनी तथा समकित [२१४] मोहनीनी उपशमना वेदक समकितीनेज होय. मिथ्याद्रष्टिने मिथ्यात्वनी उपशमना प्रथम समकित प्राप्त करता होय ते आ- प्रमाणे-संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्त करणकाळनी अगाउ अंतर्मुहूर्त काळ सुधी प्रतिसमय अनंतगुण वधती विशुद्धिए वधतो अभव्यथी अनंतगुण विशु- द्धिवाळो त्रण अज्ञानमाथी कोइ पण अज्ञानना साकार उपयोगमा वर्ततो, कोइ पण योगमां वर्ततो, जवन्य परिणामे तेजोलेश्यामा, मध्यम परिणामे पालेश्यामां अने उत्कृष्ट परिणामे शुक्ललेश्यामां वर्ततो, चारे गतिमा रहेल अंत सागरोपम कोटाकोटी सत्कर्मा यथाप्रवृत्ति विगेरे त्रण करण करे. तेमां प्रथमना वे करणनी वक्तव्यता उपर प्रमाणे समजवी, पण अपूर्वकरणमां गुणसंक्रम न होय, बाकी स्थितिघात, रसघात, अपूर्व स्थितिबंध अने गुण- श्रेणि पूर्ववत् होय. गुणश्रेणिना दळिकनी रचना पण उदय समयथी मांडीने कहेवी अनिवृत्तिकरणमां एज प्रमाणे समजवु. अनिवृत्तिकरणना काळनो संख्यातमो भाग गया पछी एक माग रहे त्यारे अंतर्मुहूर्तमात्र नीचे मूकीने मिथ्यात्वनुं अंतर्मुहूर्त स्थितिनुं अंतरकरण करे. अंतरकरण संबंधी दळीयां उकेरीने पहेली तथा वीजो स्थितिमा क्षेपवे. पहेली स्थितिमा वर्ततो सतो उदीरणा प्रयोगवडे प्रथम स्थितिगत दळने आकर्षीने उदयमा क्षेपवे, तेने उदीरणा कहीए. अने बीजी स्थितिमाथी उदीरणा प्रयोगवडे दळ आक- पीने उदयमा क्षेपवे अने तेने आगाल कहीए. उदीरणा अने आगाल ए बने एकार्थ वाची ज छै. उदय अने उदीरणावडे पहेली स्थितिने अनुभवतो अनुभवतो वे आवळीका शेष रहे, त्यारपछी आगाल विच्छेद पामे. मात्र उदीरणा प्रवर्ते. आवळीका शेष रहे त्यारे उदीरणा पण विच्छेद पामे, मात्र उदयवडे आवळीका वेदे. तेना चरम समये बीजी स्थितिमा रहेला दळीयांने अनुभाग भेदवडे त्रिधा करे, एटले तेना रसमेदवडे त्रण पुंज करे. तेना अनंतर समये मिथ्या- दळिकना उदयनो अभाव होवाथी उपशम समकित पामे. आ प्रथम सम- कितनो लाभ मिथ्यात्वनी सर्व उपशमनाथी थाय. ते समकितनी साथे ज कोई जीव देशविरतिपणुं पामे, अने कोई जीव सर्वविरतिपणुं पण पामे, तेथी ४-५-६-७ मा गुणस्थान सुधी मिथ्यात्वनी उपशमना होय, हवे क्षयोपशम समकिति त्रणे मोहनीनी उपशमना करे, ते आ प्रमाणे-वेदक समकिति संयममा वर्ततो सतो अंतर्मुहूर्त काळवडे दर्शनत्रिकने उपशमाने, ते उपशमावतां त्रण करण करे छे तेनी विधी पूर्ववत्, अनिचिकरण .

[२१५]] अद्धानो संख्यातमो भाग जाय त्यारे अंतरकरण करे छे. अंतरकरण करतो सतो समकित मोहनीनी प्रथम स्थिति अंतर्मुहूर्तनी स्थापे अने मि- थ्यात्व मिश्रनी आवलिका मात्र स्थापे, अने उकेरेला दळीयांत्रणेनां सम- कित मोहनीनी पहेली स्थितिमां क्षेपवे. मिथ्यात्व ने मिश्रनां प्रथम स्थितिनां दलिक स्तिबुक संक्रमे सम्यक्त्वनी प्रथमनी स्थितिमा संक्रमावे. सम्यक्त्नी प्रथम स्थितिने विपाकवडे अनुभवी क्षीण करे, त्यारे उपशम समकित थाय. पछी उपली स्थितिना दळनी उपशमना त्रणे प्रकृतिनी अनंतानुबंधीना उप- रना दळनी जेम जाणवी. आप्रमाणे दर्शन त्रिकने उपशमाच्या पछी चारित्र मोहनीने उपशमावमा इच्छनार फरीने पाछा ते संबंधी त्रण करण करे. णे करणतुं स्वरूप तो पूर्ववत् समज. अहीं विशेष एटलं के पहेलु करण सातमे, वीजें करण आठमे अने त्रीजुं करण नवमे गुणस्थाने जाणवू. तेमां अपूर्वकरणमां स्थितिघातादि पूर्ववत् जाणवू. फक्त सर्व अशुभ प्रकृतिना अवध्यमानपणामां गुणसंक्रम प्रवर्ते. अपूर्वकरणनो संख्यातमो भाग गये सते निद्रा प्रचलाना बंधनो विच्छेद थाय. पछी घणा स्थितिखंड व्यतिक्रमे सते अपूर्वकरणना संख्यात भाग जाय, मात्र एक भाग रहे ते वखते ३० प्रकृतिओ अगाउ कहेवायेल छ तेनो बंध विच्छेद थाय. पछी अपूर्वकरणना चरम समये हास्य, रति, भय अने जुगुप्सानो बंध विच्छेद थाय. ते साथे हास्यादि पट्कनो उदयमांथी पण विच्छेद थाय, अने सर्व कर्मनी देश उपशमना, निधत्ति अने निकाचना करण पण विच्छेद थाय. पछी अनंतर समये अनिवृत्तिकरणमा प्रवेश करे. त्यांपण स्थितिघातादि पूर्ववत् करे. जीजा करणनो संख्यातमो माग गया पछी दर्शन सप्तक विना बाकी रहेली २१ चारित्र मोहनीनुं अंतरकरण करे. तेमां वेदाता संज्वलन ४ कपायमांथी जे कषाय होय तेनी तथा त्रण वेद- माथी वेदाता वेदनी प्रथम स्थिति स्वउदय काळ प्रमाणे अने बाकीना ११ कपाय, २ वेद तथा ६ हास्यादिकनी प्रथम स्थिति आवलिका मात्र जूदी पाडे. स्वउदयकाळ आ प्रमाणे.- स्त्रीवेद अने नपुंसक वेदनो उदयकाळ सर्व स्तोक स्वस्थाने तुरुय. तेथी पुरुष वेदनो संख्यात गुणो. तेथी संज्वलन क्रोधनो विशेषाधिक. तेथी संज्वलन माननो विशेषाधिक. तेथी संज्वलन मायानो विशेषाधिक. . .

[२१६] तेथी संज्वलन लोभनो विशेषाधिक. तेमां संज्वलन क्रोधे उपशमश्रेणि मांडी होय तेने ज्यां सुधी अप्रत्याख्यानी तथा प्रत्याख्यानी क्रोधनो उपशम न थाय त्यांसुधी संज्वलन क्रोधनो उदय समजवो. ए प्रमाणे जे कपायना उदयमा श्रेणी मांडी होय ते जातिना अप्रत्याख्यानी अने प्रत्याख्यानी कपायनो उपशम थतां सुधी ते जातिना संज्वलन कपायनो उदय समजबो. ए प्रमाणे अंतरकरणना उपला भागनी अपेक्षाए सम अने नीचेना मागनी अपेक्षाए विषम स्थिति होय, ते जेटलो काळ स्थितिखंडनो घात करे अथवा जेटला काळनो अन्य स्थितिबंध करे, वेटलाज काळर्नु अंतरकरण करे. त्रणे समकाळे आरंभे अने समकाळे पूर्ण करे. अंतरकरण संबंधी दळीयांनो प्रक्षेप विधि आ प्रमाणे.-जे जे कर्मनो ते वखते बंध अने उदय वर्ततो होय, तेना अंतरकरण संबंधी दळीयां पहेली अने वीजी बन्ने स्थितिमां नांखे. जेम पुरुपवेदे श्रेणि मांडनार पुरुपवेदनां दळीयां माटे करे तेम. अने जे कर्मनो उदय होय, बंध न होय, तेना अंतरकरण संबंधी दळीयां प्रथम स्थितिमा नांखे, बीजीमां नहीं, जेम स्त्री वेदारुढ होय ते स्त्रीवेद मांटे करे तेम. स्त्रीवेदनो बंध टळी गयेल होबाथी. तथा जे कर्मनो बंध होय, पण उदय न होय, तेनां अंतरकरण संबंधी दळीयां उपली स्थिति मां नांखे, पहेलीमा नहीं. जेम संज्वलन क्रोधोदये श्रेणि आरूढ थयेल संज्वलन मान विगेरेनां नांखे तेम. तथा जे कर्मनो बंध अने उदय बन्ने न होय, तेना अंतरकरण संबंधी दळियां परप्रकृतिमां क्षेपवे. जेम अप्रत्याख्या- नी प्रत्याख्यानी कपायनां दळीक संज्वलनमा नांखे तेम अहीं अनिवृत्तिकरणविपे घणु कहेवा जेवू छे, पण ग्रंथ वधी जवाना भयथी कहेता नथी. विशेषार्थीए कर्मप्रकृतिनी टीका विगेरेथी जाणी लेवू. हवे अंतरकरण कर्या पछी प्रथम नपुंसक वेद उपशमावे. ते प्रथम समये थोडां दळ उपशमावे, वीजे समये असंख्यात गुणा, त्रीजे समये तेथी असंख्यातगुणा, एम चरम समय सुधी उपशमावे. तेमां पण उपशमाववा करता परप्रकृतिमां क्षेपत्राना असंख्यात गुणा प्रतिसमये समजवा. ए प्रमाणे क्षेपन द्विचरम समय सुधी करे, अने चरम समये क्षेपन करता असंख्यात गुण उपशमावे. आ प्रमाणे अंतर्मुहूर्तमा नपुंसकवेद उपशमावे. एटले कुल आठ प्रकृति उप- शमावी. पछी पूर्वोक्त प्रकारे अंतर्मुहूर्तकाळे स्त्रीवेद उपशमावे. एटले ९ उपशमाची. त्यार पछी उक्त प्रकारे अंतर्मुहूर्ते हास्यादि षट्क उदशमावे. एटले कुल १५ प्रकृति उपशमावी. हास्यादि षट्क उपशमे तेजसमये [२७] पुरुषवेदना बंध, उदय, उदीरणा अने प्रथम स्थिति विच्छेद पामे. प्रथम स्थिति वे आवलिका शेष रहे एटले पूर्व कह्या प्रमाणे उपली स्थितिमाथी उदीरणा करवा रूप आगाल न थाय, अने ते समयथी आरंभीने छ नोक- पायनां दळ पण पुरुषवेदमा न क्षेपवे, पण संज्वलन क्रोधादिकमा क्षेपवे. हास्यादि पटक उपशमाव्या पठी समयोन वे आवलिका मात्रे पुरुपवेद उपशमे, ते पण प्रथम समये रत्तोक, बीजे समये असंख्यात गुण, चीजे समये तेथी असंख्यात गुण, एम वे समय ऊन आवलिका द्विकना चरम समय सुधी उपशमावे. अने तेटला ज काळ सुधी प्रतिसमये परप्रकृतिमा संक्रमावे. पण ते प्रथम समये बहु संक्रमावे, बीजे समये तेथी ओछा, त्रीजे समये तेथी ओछा, एम चरम समय सुधी जाणवू. आ प्रमाणे पुरुषवेद उपशमावे सते मोहनीनी १६ प्रकृति उपशमी. हास्यादि षट्क उपशमाच्या, अने पुरुषवेदनी प्रथम स्थिति क्षीण थई, तेना बीजा । समयथी ज अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान अने संज्वलन क्रोधने समकाळे उपशमानवा मांडे, तेने पूर्वनी पेठे उपशमावतां ज्यारे संज्वलन क्रोधनी प्रथम स्थिति एक समय ऊणी त्रण आवलिका रहे, त्यारे अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान ए बन्ने क्रोधनां दळ संज्वलन मानमा क्षेपवे. संज्वलन क्रोधमा क्षेपवा बंध करे. संज्वलन क्रोधनी प्रथम स्थिति वे आवलिका शेष रहे त्यारपछी आगाल विच्छेद थाय, उदीरणा ज रहे. अने एक आवलिका रहे त्यारे उदीरणानो पण विच्छेद थाय आवलिका शेपे सं- ज्वलन क्रोधना बंध, उदय अने उदीरणानो 'विच्छेद थाय, अने अप्र- त्याख्यान तथा प्रत्याख्यान क्रोध उपशमी जाथ, एटले कुल १८ प्रकृतिनो उपशम थाय. ते वखते संज्वलन क्रोधनी प्रथम स्थितिगत एक आवलिका अने समयोन आवलिकातिकबद्ध उपली स्थितिगत दळीयां ज होय. तेमाथी प्रश्म स्थितिगत आवलिकाने तो स्तिबुक संक्रमे संज्वलन मानमा संक्रमावे. अने समयोन आवलिकाद्विकबद्ध दलिक पुरुषवेदना उपर कह्याप्रमाणे उपशमावे अने संकसावे. एटले समयोन आवलिकाद्विक काळे संज्वलन क्रोध उपशमी जाय त्यारे कुल १९ प्रकृतिनो उपशम थाय जे समये संज्वलन क्रोधना बंध, उदय अने उदीरणा व्यवच्छेद थाय तेना अनंतर समयथी ज संज्वलन माननी वीजी स्थितिमांथी दळीयां आकपीने प्रथम स्थिति करे अने वेदे. तेमां उदय समये थोडा प्रक्षेपे, बीजे समये तेथी [२१८] असंख्यातगुणा, त्रीजे समये तेथी असंख्यातगुणा, एम प्रथम-स्थितिना चरम समय सुधी कहे. प्रथम स्थिति करवाना प्रथम समयथी ज संचलन, अप्रत्याख्यान अने प्रत्याख्यान मानने उपशमावया मांडे. संज्वलन माननी प्रथम स्थिति समयोन आवलिका त्रिक शेष रहे त्यार पछी अप्रख्यान प्रत्या- ख्यान मानमा दळीयां संज्वलन मानमां न प्रक्षेपे. पण संज्वलन मायादिमां प्रक्षेपे. पछी उपर संज्वलनादि क्रोध उपशमाववानी जे रीत कही छे तेज प्रमाणे त्रणे मानने उपशमावे. एटले कुल २२ प्रकृति उपशमे. संज्वलन मानना बंध, उदय अने उदीरणा व्यवच्छेद पामे त्यारथी त्रण प्र- कारनी माया उपशमाववा मांडे ते उपरनी रीते उपशमावे. एटले कुल २५ प्रकृति उपशमी. संज्वलन मायाना बंध, उदय अने उदीरणा व्यवच्छेद पाम त्यारथी संज्वलनादि त्रणे लोभ उपशमाववा मांडे. तेना अनंतर सम- यथीज संज्वलन लीभनी बीजी स्थितिमांथी दळीयां आकर्षांने लोम वेद- वाना काळना भाग प्रमाणे पहेली स्थिति पूर्वोक्त प्रकारे करे अने वेदे. तेमां पहेलो त्रिभाग अश्वकर्णकरणाद्धा नामनो अने बीजो त्रिभाग किट्टी- करणाद्धा नामनो कहेवाय छे तेमांना पहेला त्रिभागमा वर्ततो सतो पूर्व स्पर्धकमाथी दळीयां आकर्षांने अपूर्व स्पर्धक करे. ते स्पर्धक ते शुं ते कहे छ.-अनंतानंत परमाणुवडे निष्पन्न स्कंधोने जीव कर्मपणे ग्रहण करे छ, तेमांना एक एक स्कंधमा जे सर्व जघन्य रसवाळा परमाणु छ तेनो रस पण केवळीनी बुद्धिए छिद्यमान कर्यों सतो सर्व जीवथी अनंतगुणा रसविभाग आपे. बीजा तेना करतां एक रसविभाग अधिकवाळा परमाणु, त्रीजा तेनाथी वे रसविभाग अधिकवाळा परमाणु, एम एक एकनी वृद्धिए त्यांसुधी जवू के केटलाक परमाणु सिद्धना अनंत भाग जेटला अधिक रस विभाग आपे. हवे जे उपर कह्या प्रमाणे जघन्य रसवाळा परमाणुओ छे तेनो जे समुदाय तेनी एक वर्गणा, बीजा एक रसविमाग अधिकवाळा पर- माणुओनी बीजी वर्गणा. एवि रीते सिद्धना अनंता भाग जेटली अने अम- व्यथी अनंतगुणी जे वर्गणाओ तेनो समुदाय ते स्पर्धक वहीए. त्यारपछी एक रसविभागे अधिक परमाणु न पामीए, पण सर्व जीवयी अनंतगुण रसविमागे अधिक परमाणु पामीए. तेनी पाछी उपर प्रमाणे वर्गणाधी अने तेनो समूह ते बीजुं स्पर्धक. एम अनंता स्पर्धको थाय. ते पूर्व कहेला होवाथी तेने पूर्व स्पर्धक कहीए. तेमाथी प्रतिसमय दळीयां ग्रहण करीने अत्यंत हीन रसवाळा करी तेना स्पर्धक बनावे ते नवा होवाथी अपूर्व [२१९]] स्पर्धक कहेवाय मंसारमा भमतां आ जीवे पूर्व कदी पण बंध आश्री आवा स्पर्धक करेला न होवाथी अपूर्व कहेवाय छे. अश्वकर्ण करणाद्धा वीत्या पछी किट्टीकरणाद्धामा प्रवेश करे, तेमा पूर्व स्पर्धक अने अपूर्व स्पर्धकमांथी दळीयां लईने प्रति समय तेनी अनंती किट्टी करे कीट्टी एटले वन्ने प्रकारना स्पर्धकमांथी लीघेला दळने अनंतगुण हीन रसवाळा करी मोटे मोटे आंतरे स्थापे ते. दृष्टांत तरिके १००-१०१-१०२ रमविभा- गवाळा परमाणु होय, तेना ५-१५-२५ रसविभागवाळा करी नाखवा ते. किटीकरणाद्धाने चरम समये अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान लोम समकाळे उप- शमे. ते समये संज्वलन लोभनो बंध विच्छेद थाय अने बादर संज्वलन लोभना उदय उदीरणा पण विच्छेद थाय. तेमज नवमुं गुणस्थान पण समास थाय. आ प्रमाणे नवमामां ७ थी मांडीने कुल २५ प्रकृति उपशांत थाय. २७ नी उपशांतावस्था दशमा गुणस्थानना प्रारंभमां पामीए, दशमा गुणस्थाननी स्थिति अंतर्मुहूर्त प्रमाण छ. तेमा प्रवेश करतां उपली स्थितिमाथी केटलीक किट्टी आकर्पाने प्रथम स्थिति ते गुणस्थानना काळ- तुल्य करे अने वेदे. बाकीनां सूक्ष्म किट्टीकृत दळीयां समयोन वे आवलिका बद्ध रहे, तेने उपशमावे. दशमाने चरम समये संज्वलन लोभ उपशमी जाय. ते समय ज ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ४, अंतराय ५, उच्चगोत्र १, यश- कीर्ती १, आ १६ प्रकृतिनो बंध विच्छेद थाय. तेना अनंतर समये उप- शम कपायी कहवाय. अर्थात् अग्यारसु गुणस्थान पामे. त्यां मोहनीनी २८ प्रकृति उपशांत थई कहेवाय. आ गुणस्थान जघन्य एक समय अने उत्कृष्ट अंतर्मुहूर्त सुधी रहे. त्यारपछी जरुर त्यांथी पडे ते पड, वे प्रकारे छ- आयु आये तथा गुणस्थाननो काळ पूर्ण थये. तेमा जे आयुक्षये पडे ते पहेले ज समये उपशम करेला सर्व बंध उदयादि प्रवावे, अने अनुत्तर विमाने जाय. ते जीव चोथे गुणस्थाने टके जे जीव गुणस्थानना काळ क्षये पडे ते जेम श्रेण्यारुढ थयो होय तेम पडे. एटले ज्या ज्या जेना जेना बंध, उदय अने उदीरणा उपशमाच्या, विच्छेद प- माढ्या, त्यां त्यां शरु करतो छठे, पांचमे, चोथे अथवा बीजे गुणस्थाने जाय. आ प्रमाणेनी उपशम श्रेणि एक भवमां वे वार मांडी शके. जे वे वार मांडे तेने ते भत्रमा क्षपकणि न होय. एकवारवाळो आपकणि करे तो करे. सिद्धांतकार कहे छ के-एक भवमां वे प्रकारनी श्रेणि न होय. तत्व केवळी गम्य, 1 [२२० इति उपशमणि स्वरूप. गाथा ६६. हवे आपकश्रेणिर्नु स्वरुप कहे छ.- ओछामा ओछो आठ वर्षनो मनुष्य क्षपकश्रेणि मांडे, तेथी नानो न मांडे. आपक- श्रेणि मांडनार प्रथम अनंतानुबंधी चतुष्क खपावे ( पूर्ववत् ), पछी दर्शन मोहनी त्रिकने माथे खपावे, तेने खपावतो यथाप्रवृत्तादि त्रण करण करे, ते पूर्वे कहेल छे. तेमां विशेष एटलं के-अपूर्वकरणना प्रथम समये अनुदित मिथ्यात्वनां तथा मिश्रनां दळीयांने गुणसंक्रमवडे समकित मोहनीमां क्षेपवे. उद्वल संक्रम पण ए वेनोज आरंभे ते आ प्रमाणे. पहेला मोटा स्थितिखंडतुं उद्वलन करे, त्यार पछी समये समये विशेष हीन विशेष हीन स्थितिखंडनी उद्वलना करे. एम अपूर्वकरणना चरम समय सुधी करे. एम करवाथी अपूर्वकरणना प्रथम समये जेटलो स्थितिसत्कर्मा होय, तेना करतां चरम समये संख्यातगुणहीन सत्कर्मा थाय. पछी अनिवृति- करणमा प्रवेश करे. त्यां पण स्थितिघातादि अपूर्वकरणवत करे. तेना प्रथम समये दर्शनत्रिकनी देशोपशमना, निधत्ति अने निकाचना विच्छेद पामे. दर्शनमोहनी सत्कर्मा जीव अनिवृत्तिकरणना प्रथम समयथी मांडीने स्थितिघातादिवडे हजारो स्थितिखंड नष्ट थवाथी असंज्ञी पंचेंद्रिय समान स्थितिकर्मा थाय. वळी वीजा हजारो स्थितिखंड गये सते चतुरिद्रिय समान स्थिति सत्कर्मा थाय. ए प्रमाणे स्थितिखंड घटवाथी यावत् त्रींद्रिय, द्वीन्द्रिय, एकेंद्रिय समान स्थितिसत्कर्मा थाय, बळी वीजा स्थितिखंड घरता पायोफ्मना असंख्यातमा भाग समान स्थिति रहे. पछी त्रणेनो एक एक संख्यातमो भाग मूकीने वाकीनो सर्व खपावे (धात करे). बळी पड्या मूकेला संख्यातमा भागमांथी एक संख्यातमो भाग मूकीने चाकीनानो विनाश करे. एम हजारो स्थितिघात थाय. त्यार पछी मिथ्या- त्वना असंख्यात भागोने खंडित करे अने समकित तथा मिश्रना संख्यात भागोने खंडित करे. एप्रमाणे घणा स्थितिखंड गये सते मिथ्यात्वना दळीयां आवलिका मात्र रहे अने समकित मिश्रना पल्योपमना असंख्यातमा भाग जेटला रहे. उपर प्रमाणे जे स्थितिखंड खंडित करे, तेमां मिथ्यात्वनां दळियां समकित ने मिश्रमां नांखे, मिश्रना समकीतमा नांखे अने समकितना तेनी नीचली स्थितिमां नांखे. पछी वाकी रहेला मिथ्यात्वना आवलिका मात्र दळने स्तिषुक संक्रमे समकितमा संक्रमावे. पछी समकित मिश्रना असंख्याता [२२१] भागनी खंडना करे,ज्यारे एक भाग रहे त्यारे तेना असंख्याता भाग करी तेने खंडे, अने एक राखे. एम षणा स्थितिखंड गये सते मिश्र आवलिका मात्र रहे. ते बखते समकितमोहनीनी स्थिति आठ वर्ष प्रमाण होय. ते वखते सर्व संकट दूर थवाथी निश्चय नयने मते ते जीवने दर्शनमोहनीनो क्षपक कहीए. त्यारपछी समकितना स्थितिखंडमांथी अंतर्मुहूर्त प्रमाणे उकेरे, अने तेनां दळीयांने उदय समयथी मांडीने प्रक्षेप करवा मांडे, ते उदय समये थोडा, बीजे समये तेनाथी असंख्यातगुणा, एम गुणश्रेणिना शिर (छडा) सुधी प्रक्षेप करे. त्यारपछी विशेष विशेष हीन प्रतिसमये प्रक्षेपे, ते चरम समय सुधी. ए प्रमाणे अतर्मुहूर्त अंतर्मुहूर्तना अनेक स्थितिखंड उकेरे अने क्षेपन करे. ते छल्ला बे स्थितिखंड रहे त्यांसुधी करे. तेमा पहेला चरमखंड करतां बीजो चरमखंड असंख्यातगुणो होय. ज्यारे छेल्लो स्थितिखंड उकेरे त्यारे ते क्षपक कृतकरण कहेवाय. ते कृतकरण अद्धामा वर्ततो कोइ जीव काळ करीने चारे गतिमांथी कोई पण गतिमां उपजे. लेण्या पण प्रथम तो शुक्ल होय पछी तो गमे ते लेश्या थाय. एटले क्षायिकनो प्रस्थापक तो मनुष्य ज होय, पण निष्ठापक चारे गतिमा होय. जो पूर्वबद्धायु क्षपकश्रेणि मांडे तो ते अनंतानुबंधीना क्षय पछी कदी मरण पामे तो मिथ्यात्वना उदयथी पाछो अनंतानुबंधी बांधे. केमके तेना वीजरूप मिथ्यात्व रहेल. छे. पण जो मिथ्यात्व क्षय थयेल हो तो. अनंतानुबंधी फरीने न बांचे; वीज जवाथी. क्षीण सप्तकवाळो अप्रतिपतित परिणामे अवश्य देवगतिमा उपजे, अने प्रतिपतित परिणामी तो जेवों परिणाम तेवी गतिमां उपजे. पूर्ववद्धायुष्क कदी ते वखते काळ न करे, तो पण सप्तक क्षीण कर्या पछी आगळ चारित्रमोह खपाववानो उद्यम न करे. प्रश्न-क्षीणं सप्तक कदी ते भवमा मोक्षे न जाय अने अन्यगतिमा जाय तो केटला भवे मोक्षे जाय? उत्तर-त्रीजे चोथे भवे जाय. एटले देवता नारकी थाय तो त्यांथी नीकळी मनुष्य थइ मोक्षे जाय ते त्रीजे भवे, ने जो मनुष्य तिर्यंच थाय तो जुग- लीयामां ज जाय, त्यांथी देवता थई, चवी, मनुष्य थई, मोक्षे जाय, तो चोथे मवे. ए प्रमाणे समजबू, सात प्रकृतिना क्षपक ५-५-६-७ मे गुणस्थाने पामीए. अबद्ध पूर्व आयुवाको जीव परिणामथी पतित थया विना चारित्रमोहनी खपाववा मांडे एटले तेने .

[२२२] माटे त्रण करण करे, तेनु स्वरूप पूर्ववत्. ते करणमा पहेलु सातमे, बाजु आठमे अने त्रीजु नवमे गुणस्थाने होय. अपूर्वकरगमा स्थितिवातादिवडे अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यानावरण (८) कपायने एवा खपावे के अनिवृत्तिकरणना पहेले समये पल्योपमना असंख्यातमा भाग जेटला रहे. अनिवृत्तिकरणनो संख्यातमो भाग गये सते स्त्यानद्धि त्रिक, नरकद्विक, तिर्यग्द्विक, जातिचतुष्क (पंचेंद्रिय बिना), स्थावर, आतप, उद्योत, सूक्ष्म अने साधारण ए १६ प्रकृतिओने उद्वलनासंक्रमबडे उद्वल्य- मान करी सती पल्योपमना असंख्यातमा भाग जेटली करे. पछी वध्यमान परप्रकृतिमा गुणसंक्रमवडे प्रतिसमये क्षेपवतां क्षेपवतां सर्वथा भय को. कपायाप्टकने क्षीण करवा मांडेला तेना अंतराळे आ १६ प्रकृति तो खपावी दे, पछी कपायाप्टक खपावे. कोइ कहे छ के-'पहेला १६ प्रकृति खपाववा मांडे, तेना अंतराळे कपायाप्टक खपावे अने पछी १६ खपावे.' पछी नव नोकपाय अने चार संज्वलन खपाववा अंतरकरण करे. ते करीने प्रथम नपुंसक वेदनां दळीयां उपली स्थितिना उद्रलन विधिए रूपाववा भांडे. अंतर्मुहूर्तमा पल्योपमना असंख्यातमा भाग जेटला राखे. पछी बध्यमान शुभ प्रकृतिमा गुणसंक्रमवडे तेनां दळीयां क्षेपवे, अंतर्मुहूर्ते बघा क्षीण करे. पछी नीचेनी आवलिका मात्र रहे, ते दळिकने नपुंसकवेदे श्रेणि मांडी होय तो अनुभव थकी वेदीने खपावे. अन्य वेदे श्रेणी मांडी होय तो वेद्य- मान प्रकृतिमां स्तिबुक संक्रमे संक्रमावे. ए प्रमाणे नपुंसकवेद खपावे. पछी अंतर्मुहूर्तमां स्त्रीवेद पण एज प्रमाणे खपावे. पछी हास्यादि पदक खपाववा मांडे. त्यारथी तेनां उपली स्थितिनां दळीयां पुरुपवेदमां न क्षेपवे, पण संज्वलन क्रोधमा क्षेपवे. पूर्वोक्त विधिवडे तेने संज्वलन कोषमा क्षेपवतां अंतर्मुहूर्तमा निःशेष करे (खपावे). ते ज समये पुरुषवेदना बंध, उदय अने उदीरणा विच्छेद पामे. अने समयोन आवलिकाद्विक बद्ध सिवाय बीजां दळीयां विच्छेद जाय ते वखतथी ते अवेदी कहेवाय. पुरुपवेदे श्रेणि मांडनार माटे आ प्रमाणे समजवं. जो नपुंसकवेदे श्रेणि मांडी होय तो स्त्रीवेद अने नपुंसकवेद समकाळे खपावे. अने तेना खपाववानी साथे पुरुषवेदना बंधनो क्षय थाय. एटले ते अवेदी थाय. अने पछी पुरुषवेद तथा हास्यादि पट्क समकाळे खपावे. जो स्त्रीवेद श्रेणि मांडे तो पहेला नपुंसकवेद खपावे. पछी स्त्रीवेद खपावे.

[२२३] स्त्रीवेदना क्षय काळे ज पुरुपवेदनो बंध खपावे. एटले अवेदी थाय. पछी समकाळे पुरुषवेद अने हास्यादि पटक समकाळे स्वपावे. हवे अहीं पुरुपवेदीने अधिकृत करीने प्रस्तुत वात कहे छ.-संज्वलन क्रोध वेदाता ते क्रोधनी स्थितिना त्रण विभाग करे.-१ अश्वकर्णकरणाद्धा, २ किट्टी- करणाद्धा, ३ किट्टी वेदनाद्धा. तेमां अश्वकर्ण करणाद्धामां वर्ततां चार संज्व- लनना अंतरकरणथी उपली स्थितिमा अनंता अपूर्व स्पर्धको करे. तेमज पुरुपवेद पण समयोन वे आवलिका काळे गुणसंक्रमवडे क्रोधमा संक्रमावतां चरम समये सर्व संक्रमावी दे, एटले पुरुषवेद समग्र क्षीण थइ जाय. अश्व- कर्णकरणाद्धा संपूर्ण थये किट्ठीकरणाद्धामा प्रवेश करे, एटले चार संज्वलन- नी उपली स्थितिगतदलिकनी किट्टी करे. ते किट्टी परमार्थे तो अनंती होवा छतां स्थूळ जाति अपेक्षाए तेने १२ कल्पीए, चार कपायनी त्रण त्रण-पहेली, वीजी, त्रीजी. आ प्रमाणे क्रोधना उदयमा वर्ततां क्षपक श्रेगि मांडनार माटे समजवू. जो माने श्रेणि मांडी होय तो उद्वलन विधिवडे क्रोध खपाची पछी नवकिट्टी करे. मायाए श्रेणि मांडी होय तो उद्ववलन विधिवडे क्रोध, मान खपावी छ किट्टी करे. लोभे श्रेणि मांडी होय तो क्रोध, मान, माया उद्वलन विधिए खपावी मात्र लोभनी त्रण किट्टी करे. हवे क्रोधे श्रेणि मांडनार पहेली किट्टीनां दलीयां जे पीजी स्थितिगत होय तेने पहेली स्थितिगत करे अने वेदे. समयाधिक आवलिका शेप रहे त्यां सुधी. पछी तेना अनन्तर समये ज बीजी कीट्टीना दळीयां बीजी स्थितिगत होय तेने पहेली स्थितिगत करे अने वेदे. ते पण समयाधिक आवलिका शेप रहे त्यां सुधी. पछी त्रीजी किटीनां दळीयां बीजी स्थितिगत होय तेने पहेली स्थितिगत करे अने वेदे. ते पण समयाधिक आवलिका शेप सुधी. पछी त्रणे प्रकारनी किट्टीना वेदनाद्धामा प्रवेश करी उपली स्थिति- गत दलिकने गुणसंक्रमवडे प्रति समय असंख्यात गुण वधता संज्वलन मानमा क्षेपवे. त्रीजी किट्टीना वेदनाद्धाने चरम समये मंज्वलन क्रोधना बंध, उदय, अने उदीरणा व्यवच्छेद पामे. एता पण समयोन आवलिका- द्विक मूकीने बीजी न रहे. बध्यमानमा क्षेपवी दीधेली होवाथी, पछी तेना अनंतर समये मानना प्रथम कीट्टीना बीजी स्थिगित दलिकने प्रथम स्थितिगत करे अने वेदे. ते अंतर्मुहूर्त सुधी. क्रोधनाबंध दि व्यवच्छेद थतां तेना सचागत ग्हेल दलिकने समयोन आवलिकाद्विक मात्र काळे गुणसंक्रमवडे संक्रमावतां चरम समये सर्व संक्रमवडे संक्रमावी दे.

[२२४] मानना पण पहेली किट्टीना प्रथम स्थितिगत करेला दलिकने वेदतां समयाधिक आवलिका मात्र शेप रहे एटले वीजी किट्टीना वीजी स्थितिगत दलिकने पहेली स्थितिगत करे अने वेदे. ते समयाधिक आवलिका गेप रहे त्यांसुधी. आ प्रमाणे मान मायाना त्रणे किटीनां दलिकने बीजी स्थितिगतमाथी पहेली स्थितिगत करवानुं अने वेदबार्नु पण बाण. मान मायाना बंधादिकनो क्षय उपर प्रमाण ज समजवो. लोभना संबंधमां एटलुं विशेप के-धीजी किट्टीनां दळीयां बीजी स्थितिगतने पहेली स्थितिगत करीने वेदता सत्ता त्रीजी किट्टीना दलिकने ग्रहण करीने तेनी सूक्ष्म किट्टी करे. ते वीजी किटीना प्रथम स्थितिगत दळीयांने वेदतां समयाधिक आवलिका शेप रहे त्यां सुधी. ते वखते न संज्वलन लोभनो चंध विच्छेद थाय. अने बादर कपायना उदय अने उदीरणानो विच्छेद थाय. अनिवृत्तिबादर गुणस्थाननो काळ पूर्ण थाय. पछी त्रीजी किट्टीना सूक्ष्मकिट्टी करेला बीजी स्थितिगत दलीयांने पहेली स्थितिगत करे अने वेदे. ते वखते तेने सूक्ष्मसंपराय कीए. त्रीजी किट्टीने वेढता आवलिका शेप रहेल होय ते स्तिवुकसंक्रमे बीजी वेद्यमान प्रक- तिमा संक्रमावे. प्रथम पीजी किट्टीने वेदना जे आव लेका शेप रहेल होय ते तो वीजी त्रीजी किट्टीनी अंतर्गत वेदाई जाय. सूक्ष्मसंपराये वर्ततो जोव लोभनी सूक्ष्म किट्टीने वेदतो सतो समयोन आवलिकाद्धिक बद्ध सूक्ष्म किट्टीनां दळीयांने प्रतिसमय स्थितिषातादिवडे सूक्ष्मसंपरायना काळमां संख्याता भाग जतां सुधी खपावे. पछी एक संख्यातो भाग रहे. ते संख्याता भागमा संज्वलन लोभने सर्व अपवर्तनावडे अपवर्ती सूक्ष्म- संपरायना काळ जेटलो वाकी राखे. ते वखते पण सूक्ष्मसंपायनो काळ अंतर्मुहूर्त होय पछी तेना स्थितिघातादि निवर्ते-शेप कर्मप्रकृतिना प्रवर्ते. लोभनी अपवर्तित करेली स्थितिने उदय उदीरणावडे वेदतां समयाधिक आवलिका मात्र शेष रहे, एटले उदीरणा बंध थाय. पछी मात्र उदयवडे चरम ममय सुधी वेद, चरम समये ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ४, उच्चगोत्र यशकीति. अने अंतराय ५, कुल १६ प्रकृतिनो बंध विच्छेद थाय. अने मोहनी कर्मनी तो उदय अने सत्ता वने विच्छेद थाय. गाथा ६७. आ वात संक्षेपथी फरीने कहे छे. पुरुपवेदना बंधादि क्षय थये सते शेष रहे ते संज्वलन क्रोधमा संक्रमावे. संज्वलन क्रोधना बंधादि क्षय थये शेप रहे ते संज्वलन माना गुणसंक्रमवडे [२२५] संक्रमावे. संज्वलन मानने मायामां संक्रमावे, मायाने लोभमा संक्रमावे, लोभना बंधादि विच्छेद थये सते सूक्ष्म रहेला लोभने पण स्थितिघातादि- वडे हणे. लोभनो सर्वथा क्षय थये सते क्षीणकषायी (बारमा) गुणस्थानगत थाय, क्षीणकषायीपणामां मोहनी सिवाय बीजा कर्मोना स्थितिघातादि पूर्ववत् प्रवते, ते क्षीणकषाय काळना संख्याता भाग जाथ अने एक भाग रहे त्यां सुधी. ते संख्याता भागमां ज्ञानावरण ५, दर्शनावरण ४, अंतराय ५, अने निद्रा २, कुल १६ प्रकृतिनी सत्ताने सर्व अपवर्तनाए अपवर्ती क्षीणकषायना काळसमान करे. स्वरुपनी अपेक्षाए निद्राद्विकने समयनून्य स्थितिवाळी करे. क्षीणकपायनो काळ अद्यापि पण अंतर्मुहूर्त होय. पछी ते १६ प्रक- तिना स्थितिघातदि बंध पडे, वीजी प्रकृतिओना प्रवर्ते. पछी ते १६ प्रकृतिमाथी निद्रा २ सिवाय १४ ने उदय उदीरणावडे वेदतां समयाधिक आवलिका मात्र रहे त्यारे उदीरणा बंध पडे. पछी उदय मात्रवडे वेदे. ते क्षीणकपाथना द्विचरम समय सुधी. द्विचरम समये वे निद्रानो सत्तामाथी क्षय थाय. अने चरम समये वाकीनी १४ प्रकृतिनो सत्चामांथी क्षय थाय. पछी अनंतर समये केवळज्ञान पामे. सयोगी केवळी लोक अलोक सर्व सर्वात्मवडे परिपूर्ण देखे. एवं त्रण काळमां काइ पण नथी के जे केवळी भगवान न देखे. आ सयोगी केवळी जघन्य अंतर्मुहूर्त अने उत्कृष्ट देशोनपूर्व कोटी विहार करे. पछी जेने वेदनीयादि कर्म आयुकर्म करतां अधिक होय ते तेने सरखा करवामाटे केवळी समुद्घात करे, वीजा न करे. समुद्गात करीने पछी भवोपनाही कर्मनो क्षय करवा माटे लेश्यातीत, अत्यंत अप्रकंप अने परम निर्जराना कारणभूत ध्यानने अंगीकार करवा माटे योगनिरोध करवा उपक्रम करे. ते आ प्रमाणे.- प्रथम बादर काययोगवडे वादर मनयोगने रुंधे, पछी वादर वाग्पोगने रुके. पछी सूक्ष्म काययोगवडे बादर काययोगने रुंघे. पछी तेनावडे ज सूक्ष्म मनयोगने रुंधे, पछी सूक्ष्म वागयोगने रुंधे, छेवटे सूक्ष्म काययोगने रुघता सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाती ध्याने आरोहण करे. तेना सामग्रंथी वदनोदरादि विवर पूरीने त्रिभागोनवर्ती आत्मप्रदेशवाळो थाय. ते ध्यानमां (शुक्ल- ध्यानना त्रीजा पायामां) वर्ततां स्थितिघातादिवडे आयु विनाना त्रण कर्मनी सयोगी अवस्थाना चरम समय सुधी अपवर्तना करे अने सयोगी अवस्थानी स्थितिजेटली स्थितिवाला राखे. तेमां पण जे प्रकृतिनो अयोगीमां - [२२६] उदय नथी ते एक समय उण स्थितिनी राखे. मयोगी अवस्थान चरम समये एक वेदनी, औदारिक तेजस कार्मण शरीर, संस्थान ६, पहल संघयण, वर्णादि चतुष्क, औदारिक अंगोपांग, अगुरुरघु, उपवान, पग- घात, उच्चाम, शुभाशुभविहायोगति, प्रत्येक. स्थिरास्थिर, शुभाशुम, सुस्वरदुःस्वर, अने निर्माण, आ ३० प्रकृतिना उदय उदीरणा व्यवच्छेद पामे. तेने अनंतर समये अयोगी केवळी थाय. तेनी भवस्थपणामां अंतर्मु. हर्तनी स्थिति छे. ते अवस्थामां वर्ततां भवोपनाही कर्मोंने खपाचा मार्ट व्युपरतक्रियअप्रतिपाति ध्यान (शुक्लना चोथा पाया)मां आरोहण करे, स्यां स्थितिघातादि बिना उदयवती प्रकृतिओने स्थिति क्षये अनुभवीन खपावे. अने अनुदयवतीने उदयवतीमा स्तिधुक संक्रमे संक्रमातीने मळी वेदे. ए प्रमाणे अयोगीना द्विचरम संयम सुधी वर्ते. गाथा ६८ द्विचाम समये ५७ प्रकृतिले सत्तामाथी खपावे. १० देवगति महगत (उदय विनानी) १० प्रकृति आ प्रमाणे- २ आहारक वैक्रिय शरीर. २ आहारक वैक्रिय बंधन, २ आहारक वैक्रिय संघातन, २ आहारक क्रिय अंगोपाग, १ देवगति, १ देवानुपूर्वी. ४७ विपाक उदय विनानी ३ औदारिक तैजस कार्मण शरीर, ३ औदारिक तैजम कार्मण बंधन, ३ औदारिक तैजस कार्मण संघातन, १ औदारिक अंगोपांग, ६ संस्थान, ६ संधयण, ४ वर्णादि, १ मनुजानुपूर्वी १ अगुरुलघु १ पराघात, २ शुभाशुभगति, १ प्रत्येक, १ अपर्याप्त २ स्थिरास्थिर, २ शुमाशुम, २ सुस्वरदुःश्वर, १ दुर्भग, १ अनादेय, १ निर्माण. आ ४५ नामनी, तथा १ नीचगोत्र, अने १ अनुदित वेदनी कुल ४७. गाथा ६९-७०, पछी चरम समये बाकीनी ११ उदयवती स्वपावे.- १ मनुष्यायु, १ मनुजति, १पंचेद्रिय जाति, १ पास १ आदेय, १ यश-कीर्ति, १ वेदनी. आ ११ अने तीर्थकर होय ते तीर्थकर नाम सहित १२ खपावे. " १ उपवात, १ उवास, १ अयश, १ उच्चगोत्र. १ बादर १त्रस, . १सुभग, " [२२७] गाथा ७१-७२. अहीं कोई आचार्य कहे छ के-मनुजानुपूर्वी चरम समये ग्वपावे, ने प्रमाणे गणतां १२ नी १३ थाय. आ बावतमा प्रथम मवाळा आचार्य कहे छे के उदयवती प्रकृति ज चरेम समये खपावे, मनुजानुपूर्वी उदय- वती नथी, तेथी ते विचरम समवे खरे. पछी सर्व प्रकृति बंध उदय उदीरणा सत्ताथी क्षय पामतां अनंतर समय कोश- बंधमोक्षलक्षण सहकारी रवभाववडे जीव तेज ममये चीजा ममयने स्पा विना सिद्धिस्थानमा जाय. अने जेटला आकाशप्रदेशने अहीं फररया होय तेटलाने ज फरसीने त्यां शाश्वतपणे रहे गाथा ६३. सिद्धिनुं सुख अवर्णनीय छे. तो पण कर्ताए टीकामा विस्तारथी वर्णव्यु छ. १ ते सुख एकांत शुद्ध छ, गगद्वेष न्यामिश्रित न होवाथी नथा संपूर्ण छ तेथी. २ जगतना सर्व सुखमां शिखरसूत छ.-जगतना सुख आधि व्याधि सहित होवाथी. अहीं व्याधि के आधि काइ नथी. ३ निरूपम छ.-तेना उपमा आपीए तेवू सुख संसारमा छेज नहीं. ४ स्वाभाविक छ.-.-संसारनां सुखनी जेम कृत्रिम नथी. ५ ने सुख अनंत छ.-कारण के तेने वाधा थई-शके तेम नथी. बाधा करवाने समर्थ रागादि छ, ते क्षीण थया छे. वळी क्षीण थया छतां पण फरी उभा भाय, पण तेनां कारणभूत कर्मपुद्गलो पण नथी पुद्गलो फरीने कदाच बंपाय, पण तेना कारणभुत संक्लेशनो अमाय छे. तेथी ने मुग्व शाश्वत (अविनाशी) छे. ६ ज्ञान, दर्शन, चारित्र,-रत्नत्रयीना मारभूत छ -ज्ञानादि ज कर्मक्षयना कारण- भूत होवाथी आवा अप्रतिम सुखने तेओ अनुभवे छे. आ कर्मग्रंथमां बंधोदयसत्तानो संवैध सामान्यथी को छे. विशेष जाणवानी इन्छा- बाळाए दृष्टिवादथी जाणवो. आमा जे जे खामी होय ते बहुशून गीतार्थोए पूरी करीने मारापर नथा शिप्यवर्ग- पर उपकार करवो. ॥ इति शम् ॥ *%8ESXSEXXX********* छटा कर्म ग्रंथर्नु संक्षिप्त विवरण समाप्त. ************* ॥ ६२ मार्गणासु मोहनीयकर्मणो धन्धोदयसत्तास्थानानि तद्भगाश्च पदानि पदवृन्दानि च ज्ञेयानि ॥ (पष्ठकर्मग्रन्थान्तती) भगा, २१ [२२८] बधनेआश्री मार्गणासु पंघस्थानानि . उदयस्थ नानि ९ उदय चोवीशी तद्भगारयान- दानि सत्तास्थानानि १५ ९८३ पानि ४० ०५८ नरक्गति ३२२१०१।१७ १०५,१०१९ ।। अष्टक २४ १९११९२१५३६] ६२८७६२४२२२१॥ तिर्यंचगति ४२२।२१।१७१३॥ १४/६/१०१९८७ चोवीशी ३२७६८ २४५८५६ २८२२४२२१॥ मनुष्यगति १००२१११११३।९।५।१९१०९५१चोवीशी .. ९८३ २८८१४१५/०८२६॥२४॥२३॥२२॥२१॥१३॥१२॥११ ४१३॥ भांगा ३.१०/ ९९५.९०३९७१ ५।४।३२॥१॥ देषगति ३२॥२१॥१७॥ १२/५/१० || पोडशक २४ ३८४ १९०३०७०/३०२६॥२४॥२२॥२१॥ ५/एकद्रिय २१॥ १०४/१०॥९ अटक ૬૮ ૫૪ રૂદ્રાકાર दीद्रिय २२००१ १०४/१०1९11 अटक ६०५४/३/०२१२६॥ ७त्रीढ़िय २१॥ १०/१०९।दाण अरक ૬૮ પજ પરાકારદા ८चतुरिद्रिय २०१२१ ४/१०1९11 अराक८ ६४ ६८५४७ ३२८२२८ ९/पहिय १०२१११५ १. १०९५४ाग चोवीशी १० ९८३०८८६९८४१५८२७२६१२४६२३१२२१२१११३११२१११) ४॥३॥२॥१ भागा २२.१९९५ ०९०१९७१ ५।४।३१॥ १०पृश्वीकाय २२२१॥ १०८/१०१९माण अटक ६८ ५४३५२६॥ ११अपाय २२॥२१॥ ૧ ૮૧ ટાકા अटक १२ तेजस्वाय ६८५४०३/२८॥२६॥ १२ ३३.101011 अष्टक४ ૩૧ ૨૮૮ ૨૨ ટાવર १३वायुकाय १०॥ ६/३/१०11101 मएक ३२ ६२८०३०२४५२३॥ १४वनम्पतिकाय २/२०१६ 10|४|१011 अटक ६०५४४ ३२८॥२॥२३॥ १"समाय १०२१११११३९।५ १५५२।१चोचीनी ४० ९८३) २८८९४५१५०८२६RY.300२१।१३।१२।११) ४।१ मागा.३.१० ९.५२९०६९७१ १६/मनोयोगी ५।४।३।२।११ १०२२१११॥१३॥९॥५ २१/९/१३५१चावीशी ४० ९४३/०८८६९४७/१२७२६२३२२११३३११११) ४१३१२१ भागा २३ १७ वचनयोगी ९९५) १९०६९७१ ५॥४॥1॥ १०२१२११३३३९५ २१/९/१०11८६५४।१चोवीशी ४. १४३] २०१३९४०/१५२८२२२२२२२११११११) ४ ।। गा:-१२/ ९९५: २९०६९७१/ ५॥३॥1॥ M 1 १८)काययोगी । २० oceles couleur ક २१/नपुषवेदी- कपायी १४ २८२७०२३।२२।२१।१३११२१११ १०२२१२१११७४१३३९।५।४/९०११८७५ चोषीशी ४० ૧૮૩ ૧૮૮૬૧૭ ५॥२॥१॥ ३१२॥१ मांगा २३.१२/ ९९५ २९०९७१] २८२॥२२॥२२१०१३०१२ १९ पुरुषवेदी ३२२१२१११७५१३३९।५।१७८१०९८1५11 अप्टक ४० ३२७ २८८२३१०/११ ११॥५॥ भागा ४ ११,२८७२।२।२३।२१२१११३११२ २-स्त्रीवेदी २२॥२१॥१॥१३॥९॥५१७८1०1९16 अप्टक ४. ૨૨ ૨૮૩૧૦ ११॥५॥ ११/२८२२२२३॥२२॥२१॥१३॥१२ २२१२१११७७१३।९।५।१७८१०1९७५॥४॥२॥ अष्टक ४. ३१४ २०८०३१०१ । १११९॥ 19१२८२२०२३।२२।२१।१३।१२ २२ कोरकषायी १२२।२१।१०१३३९१५१०९/१०1९/जा छष्ट ४० २४ २८८१७३ १॥ १॥ मागा. १३०८२१२६॥२१॥२३॥२२॥२१११३११२।११ २३/मानकषायी २२।२१११५१३१९।५ १९/९/101111४/२० छष्ट ४० २४५२८८१७३ ४॥ १॥ भागा ५ १४०८।२॥२६॥२४॥२३॥२२॥१॥१३॥१२॥११ २४मायाकपायी २०२६२१११५१३१९१५ २० ९/१०/उष्ट ४० २४८ २८८१७३७ ५।२। ४॥31 भागा १५॥२८॥२६॥२॥२३॥२२॥२१११३१२।११) २५ लोभापायी (१००२२२१1१॥१३॥९।५ २१/९/१०९/III छष्ट ४० २४२८८१७१ ५॥२१॥ ॥३॥२॥ १॥ भागा ७ १:०८०४॥२३॥२२११११११११११४ २० मतिज्ञानी ८१४१३१९१५।४।३११११/ ८९५४॥२॥१॥ चोवीशी ४५९९) १५६३७७९ ३।२।। भाग २३ १३२८३PRAP११३१२१११५४ " श्रुतमानी ८/१७७१३९५३।२।१।११/ 0131 चोवीशी १४५९५, १५:३७७९) | 11 भागा २३ १३१२८२१३२२।११।१३।१२।११५४ २८अवविज्ञानी ८/१॥१३॥९॥४॥३RI199/ICEIR1 चोवीशी २४/५९९ १५६३७७९) 11 भागा३ १३०४।२०।२२।२१।१३।१०।१११५४ २९/मन.पर्यवज्ञानी MMETRI91 MRIN चोवीशी ८ २१५ १४१०९१) । अशा (भांगा २३ ३०रुवल जानी २७२६ ३१/नातेअजानी ३२२१२११११ १२४१०९ चोवीशी १६ ३८ १३२३१८४८॥२७॥२०॥ ३२)तअज्ञानी ३०२॥२१॥१॥ १२४१०1112 चोवीशी १६/१८४/१३०३ १६८ ४३८।२०६३॥ विभगज्ञानी २२॥२१॥१७॥ १०४१-९८ चोवीशी १६८४१३०३१०२८॥२४॥२३॥२॥२१११३१११११४ BYसामायिक ६॥५॥४३॥२१॥ 1111 चोवीशी ८ २१४ ४६१०९०१३ 131 भागा २२ [२२९] १५ a . .. . 4 का 0 . PO shesh . ट . ४० अविरति . . . दोपस्थाप ९॥५३॥२॥ गा। चोवीशी ८ २१४ १०१०१३०८।२४।२३।२२।२१।१३।१११११५४३ नीय भागा . ५॥१॥ ३.परिहारविशुधि ५ पोडशक १०८ ७०४५०८२४।०३।२१॥ सुक्ष्मपराय १ १ १ २४.०१1१1 ययाव्यात રાકાર ३. देशविति १ चोवीशी १९० ५२/१०४०५/२८४२॥२१॥ ३१२१२११७ १०५/१०11111 चोवीशी २४/ ५७६ १९०४६०८२०३1000३१२१२११ चक्षुदर्शन १०/२२।०१।१११३।९।५।२१/9/201९100५पाचवीशी .. ૧૮ ૨૮૮ ૨૪૨૧૨૮ારદારરરરર૧૧ર૧ર૩૧૧ 1३।२।१ भागा २३-१२) १९५२९०६९७१) ५।४।३।२।१ १२ अचक्षुर्दर्शन १०२२।२१११११३३९५ २१/२/१०1९111५४ासा चोवीशी १० ९८३/ २८८६९४७१५/२८/ २२६२४।२३।२२।२१।१३।१२।११ ४॥३।२।१ भागा २३.१२/ ९९५ २९०६९७१ ५।४।३।२।११ १३ अवधिदर्शन ८१७१३॥९॥५॥४॥३॥२।१११८९६५४/२।११ चोवीशी २४ ५९९) १५६३७७९/१३२८।२४।२३।२।२१।१३।१२।११।५।४। भागा २३-१२ ३।२।१ केवळदर्शन १० ४५कृष्णलेशा ५२२१२१११११३॥९॥ १६/७१०1९1111५४ चोवीशी ४० ९६० २८८६९१२/ ७२८२१२६॥२४॥२३॥२२॥२१॥ ४६/नीललेल्या ५२०१२१११११३॥९॥ १०९६५॥४॥ चोवीशी ४० ९६०, २८८६९१२/ ७२८७२६॥२४॥२३॥२२॥२१॥ ४७ कपोतलेश्या ५२।२११११.१९॥ १६, ७१०९६५॥४॥ चोवीशी ४० ૧૬ ૨૮૮ ૨૧૨ ૨૮૨કા૨દા૨કા૨કા૨વા૨૧ ४८तेनोलेक्या ५/२२१२१११५१३॥९॥ १६ १०९ ८५४ चोवीशी ४० ૨૬૧ ૨૮૮ ૬૦૨ ૭૮૨૬૨-૨૨૨૧ ४९/पद्मलेल्या ५२२।२१११११३॥९॥ १६७१०1९1८1७६५।४। चोवीशी ४० ९६० २८८६९१२ ७२८१२७१२६॥२४॥२३॥२२॥२१॥ ५० शुरलेश्या १०/२२२२१११११३३९।५ २०/९/2018५।४।२।१चोवी-गी ४० ९८३/ २८८६९४७१५२८।२४२६२४२२२।२१।१३।१२।११ ४१३३२॥१॥ भागा २३-१२, ९९५ २९०६९७१) ५।४।३।२।१॥ ५१/मवमिद्विक /१०/२२।२१।१७३९५ ९/१८111५।४।२।११चोवीशी ४०/९८३ २८८६९४५१५/२८॥२॥२६॥२४॥२३३२२२१११३।१२।११ ४।३।२।१। भागा २३.१२/ ९९५ २९०६९७१| ५॥४॥३२॥१॥ ५२/अभवमिहिक ६३.१०1 चोशी ४ १६ ३३] ८६ १२६) ५३ औपशमिकस-10१७।१३।९।५।४।३।२।१।११ ||५।४।२।१। चोवीशी १२ ३११ ७२/१७६३/ २/२८॥२४॥ म्यक्त्व भागा २३-१२) ५४ क्षायिवसम्म १७॥१३॥९।५।४।३।२।११/११/७६५।४।२।१। चोवीशी १२/ ३११/ ७२/१७६३ १/२१११३।१२।११।५।४।३।२।११ मागा २३-१२ ५५क्षायोपशमस-३/१॥१३॥९॥ ६६/९६.५॥४॥ चोबीशी १२ २८८ ८४२०१६/४२८॥२४॥२३॥२२॥ (२३०] ५६/मिभद्रष्टि રેષતા चोवीशी ४ ૬૬ ૨૨ ૭૬ ર૮રરા १२८० ५७सास्वादनस- म्यक्त्व ५८मिय्याद्रष्टि ५ मशी ४३,९ (चोवीशी ४ ३७६८१२८ 1१०1९/ २२ ६) 1015६५।४।२चोवीशी १९२१ ६०१६३२ २२८२७॥२६॥ १०२२२१११७ ३२९/५/२१९/ १॥ चोवीशी ४० ૧૮ રૂ. ૨૯૯૨૪૨૮૨બ૨ફા૨કા૨કા૨૨૨૧૧૨૧૨ ४।३।२।१ १०1९1 भागा २३.१२१९५२९०९७१) ११।५।४।३।२।१। भ२०१२१॥ १०४१०९/६५/४/२ अष्टक ८ ६४६.५४४ ३/२०१२४२६ १०२0१२१११११९१५।२१/९/ चोशी ४०९८३ २००६१४४/१५२८२४२६२४।२३।२।२११३॥१२॥ १३.२१॥ १॥ भागा २४-१२/ १९० २९०९७१ ११॥५॥४॥३॥२॥१॥ ३/२२।२१।१७॥ १२॥ ५१०१९८ || चोवीशी १६ ३८४१२०३०७२/६/२८PPER४१२२॥२१॥ ६० असंही ६१ आहारी ६२/अनाहारी ६२ मार्गणागतगुणस्थानेषु मोहनीयकर्मणोबंधोदयस्थोनानि तद्भगाश्च पदानि पदवृन्दानि च लिख्यन्ते ॥ कुल मार्गगा नरकगति २४ अ ८ [२३१] ४ ४ ८ बंध-वध- उदयस्थान उदय चोवीशी उदयभंग उदयपद उदयपदद स्थान भाग १२ s १९२ १९२ मिथ्यात्व २२ ६८1९1१०1३१३१ अष्टक दा२४॥२४॥ ७॥२४॥२७॥१०६० ५६।१९।२१६१८० (५४४ साखादन २१ ४७॥दा १२।१ अ ८1१६८ ३२ ७१६९ ३२ ५११२८१७२ २५६ मित्र जाए १।२।१भ ૮૧૬૮ ३२ ॥१६९ (५६।१२८७२ अविरत १७ ६९ १॥३॥३१ अ ૮િ૨૪૨૪to (६२२११२४१९६० ४८1१६८१९२०७२ ४८० ३२ २४४ मिप्यारव २२ ६९।१०११३१३१ चोवीशी चो २४१७२।७२११४१९२ ४२४२११०६८ १६८५७६१६४८२४०/१६३२ सा-वादन २१ जा १।२।१ चो २४॥४८॥२. १६१९ ३२ १६८।३०४।२१६ (७६८ मिम બ૮૧ [१।२। चो ૨૪૪૮૨૪ १६९ १६८३८४॥२१६ ७६८ अविरत १७, जा९ /१३३३३३१ चो २४॥७२॥७२॥२४१९२ ६।२१।२४१९६० १४४०५०४१५७६।२१६ १४४० देशविरति १३ २५६७८१1३।३११ चो २४१७२।७२।२४१९२५/१८१२११८ (५२ १२०१४३२१५०४११९२/१२८८ १० ९ ४०चो २८८ख ६९४७ ग २३भा तिर्यंचगति ४ ६ १४५ ४ ४ १७ ८ ३ मनुष्यगति ९८३ क. चारना बंघमा असंक्रमणकाळमा चार उदय भागा अहीं गणेला के तेमा संकमण काळना बार भागा बीजा उमेरीए त्यारे उदयभागा मर्ष मळी ९९५ थाय, ख. मतातरे वेना उदयनी एक चोवीशीना वे पह नाखीए त्यारे २९० पद थाय छे. ग. मतातरे वेना उदयनी एक चोवीजी नाखीए. त्यारे ६९७१ थाय छे.

क ८ ....... मियाण २२ 9/11९1०11३।३१ गो. नी./२१०२।२० १९२ २४२११०८१६८५७६२४. १९३२ सातादन २१ ४ा १।२।१ चो. २४ ५६ १६९ ३२ १५८३८२१६ मिश्र जा ११२१ २४४८२ ९ ६१६९ १६41३८२१६ ७६८ अपिरत २ जाणा९॥३३३३१ २४१७२७२।२४१९२६।२१।२४।९ १४४५०४५७५/२१५१४४० विशपिरत १३ २५१६७४८३३१ २४१७२/७२।२४/१९२ ११८४२११८५२ १२०१४३२१५.४१९२१२४८ प्रमत्त-अप्र- मत्त निवृत्ति २०१५४६७/१1३३१ २४३७२/७२१२४१९२ १५/१८10/४ ५६१३६.४३२।१६८०५६ भनित्ति ५ १२ भांगा १२शी १२ १२ ।२४ भा. ३ २ भा. १ भो. . १ १ १ गा. १ १ देगगति ५ २४पो (३८४ २०७२ मिन्यारव २२ s/९/१०१३३३१पोरा १६.४०1४८११६१२८ २४।२७४१०६८ ११२३३८४१४३२११७०१0८८ सातादन xuels १२१ (१६०३२।१६ ११२।२५६११४४ ५१२ मिश्र १७ जा ११२।१ १६.३२।१६ १६९ ११२।२५६१४४ 1५१२ अनिरत १७ sines||३|३११ 18111१६/१२८ ६।२१।२१९६० (९५१३३६१३८४११४४ ५६० ५एकेन्द्रिय ४ अ. मियाल २२ ६९११० १॥२॥१ भ. ८1१६८ ३२ 1८1१८/१० ६४.१४४/८. २८८ सास्नादा २१ ४७॥ ।१।२।१ 1१६८ १६९ ३२ ५६।१२८१७२ २५६ विलेप्रिय एकद्रियरमाणे पचेग्रिय मनुष्नगतिप्रमाणे १० ग्वीकाय एद्रियप्रमाणे ११:अप्राय एरियप्रमाणे १२ तेजस्काय १३ अटा २८८ मिथ्यात्म २२ ८1९1१० १।२।१ म. (1१६८ ३२ १८५० १३.यायुमाग ते मस्सायप्रमाणे वनस्पतिकाय एकेद्रियप्रमाणे २२ ना वयस्थानमा सानतुं ददयन्यानक छा कर्मग्रंथमा ८४५५ मे मे कोलू छे. परंतु एकरियने ते उदय थान असंभविन छे कारण के ते अनंतानुयंधि विना तथा प्रेणिथी पग्ताने होय छे. भने एवियने श्रेणि नमी. तरप केवळी जाणे, [२३] --- १. दिशविरत १३ ८ पत्रमकाय मनुष्यगतिप्रमागे १६मन्योग मनुष्यगतिप्रमाणे १७वचनयोग मनुष्यगतिप्रमाणे १८ काययोग १९ पुरुषवेद २०खीवेद अ. २१/नपुसकवेद ३२४ २८८ (२३१२ मियात्व २२ दारा१० १।३।३१ अ दा२४॥२४॥८ ॥२४॥२७॥१०६८ ५६।१९२।२१६८०५४४ सास्वादन २१ दा १२।१ ८1१६८ ३२ ॥१६॥ ३२ ५६१२८१७२ मिअ- विरत वाजा १४।५।२ १२ ८॥३२॥४०११६ ९६ ६२८१४०1१८९२ ४८।२२४१३२०११४४/७३६ (५/६/७५ १।३।३।१ २४॥२४॥८ ६४ ५।१८।२१1८५२ ४०1१४४।१६८१६४४१६ प्रमत्त प्रमत्त-नि- वृत्ति 1५।६७ १३३०१ २४१२४॥ ४|१५२६१७४४ २०१२०१४४,५६ ३५२ अनिवृत्ति ५ मांगा भागा४ ४० षटक २२ क्रोध १८ २४४ २८८ १७३५ मिथ्यात्व २२ ६ ९१० 1१1३१३१ पटक ८ ६।१८।१८६ ४८ ગ૨૪૨૧૩૬૮ ४२११४४।१६२।६० ४०० माम्बादन २१ 448 १२.१ ६।१२।६ २४ ७१६९ ३२ ४२१९६१५४ १९२ मित्र-अ. विरत ६९ (१।४।५।२ १२ ६१२४१३०१२ ७२ ६।२८।४०1१८९२ ३६३१६८०२४०1१०८५१२ दिशाधिरत १३ ५६८ १।३।३।१ ६।१८।१८। ५।१८।२१।८ ५२ ३०११००।१२६४८ ३१२ प्रमर-अ ४१५/६७ 1१।३।३१ ६।१०।१८।६ ४८ ४।१५।१८७४४ २४१९०११०८१४२ २६४ प्रमत्त-नि- वृत्ति भनिवृति ५ ३ भागा अनिवृत्ति ४ 1१ मा १ भा. १ २३,मान क्रोधमार्गणाप्रमाणे विशेष ए के अनिवृत्ति गुणस्पानना बीजा मागे वणर्नु वैवस्थान होय तेनो भागो एक उदयस्थार एक तेनो भागो एक. उदयभग एक, उदयपद एक बने पदवृद एक होय छे तेथी करीने कुल बंधन्धान विगैरे नीचेप्रमाणे जाणधू. २४५ [२३३] - ". ४० ष २०५] २८८ |१३ २६) २० १०३ ४० माया मानानी मार्गणाप्रमाणे जाणवू विशेष ए के अनिवृत्ति गुणस्थानने चोथे भागे वेनु वधस्थानक होय. तेमा उपरप्रमाणे एक एक भागो, उदया स्थान विगेरे वधारवा तेथी करीने कुल बस्यानक विगेरे नीचे प्रमाणे जाणवू. ४० प ६ भा २५लोभ मायानी मार्गणाप्रमाणे विशेष ए के अनिवृति गुणस्थानकने पाचमे भागे एकनु बधस्थान होय तेमा उपर प्रमाणे एक एक भागो, उदय स्थान गिरे वधवाथी नीचे प्रमाणे कुल यध रथामक विगेरे जाणवा २४७ २८८ १७१० ७भांगा २४ चो २६मतिज्ञान २३ भा ५९९ ३७७९ अविरत ६७८९ १1३।३।१चोषीशीट २४१७२७०२४/१९२ ॥२१॥२४॥९६० १९४४५०४०७६२१६/११४० दिशविरत १३ 1५1८ ११३।३।१ २४॥७२॥७२॥२४१९२ ५।१८।२11८५२ १२.१४३२१५०४।१९२/१२४८ प्रमत्त, अन प्रमत्त, नि वृत्ति ४।५।६७ १।३।३।१ २४७२७२।२४१९२४।१५।१८७४४ १६॥३६०४३२।१६८।१०५६) अनिवृत्ति १२ १२ १२ २४ २४ Ere [२३४] १० भागा १ • "R Exmoo . सुक्ष्मसप- १ UP २५ श्रुतज्ञान मतिज्ञान प्रमाणे २८अवधिज्ञानामतिज्ञाननी मागणाप्रमाणे २९मना पर्य- वज्ञान ६ प्रमत्त, अ. प्रमत्त, नि- ४॥५॥६ २३ मा ४४ १३।३।१ चो २४७२|७२।२४१९२ २४१७२।७२।२ ยาง | १५।१८१७४४ १९॥३६०१४३२।१६८ १०५६ अनिवृत्ति भा १२भा. १२ १२ २४ ---.-. Frwa.... Fre... ३ २ १ १ xmroco near . १२ ३८४ १३२ ३१६० २४१७२।७२।२४१९२ ॥२४॥२॥१०६८ १६८५७६२६४८२४०१६३२/ २४१४८।२४ ९६ १६९ ३२ १६८१३८४॥२१६ રાજ૮૨૪ १६९ १६८१३०४।२१६ ७६८ ९१०१३३३३३१ चो. दा १२।१ जादा १२।१ ४ २ a ३० केवळजान ३३ मत्यज्ञान, भूतज्ञान विभंगज्ञान ३ मिथ्यात्व २२ सास्वादन २१ मिश्र ३५सामायिक नारित्र, छेदोपस्थाप नीय चारित्र प्रमत्त,अप्र- मत्त,निवृत्ति अनिवृत्ति ५ २ [२३५] S १२ मा २१४ १ ५.६७ १॥३२॥१चो. चो. ३४॥७२॥७२॥२४ [१९२ १५।१८७४४ ९६३६००३२।१६८१०५६ १ १२ भागा १२ मा २४ २४ १ १ प १ १ ده سه له د १२ ४ ३ २ १ ३ ३/परिहारवि- १ २ पो. १२८ प्रमत, भ- प्रमत्त २ ६७ [११३३३१ को 12 १६४८१४८/११/१२८४।१५।१८७४४ ६४१२४०१२८८१११२ ७०४ ३ सूक्ष्मसंप- , ५ . यथाल्यात ३शिविरत्ति दिशविरत १३ ३ अपिरति मिथ्यात्व सास्वादन २१ मिश्र अविरत २५॥६॥ १२५ 1182103 SI210. चो १1३।३।१चो २४ नो ३१चो १॥३॥१ १.पी 1१1३318 २४॥७२| ७४/१९२ 111२११८५२ १२१४३२१५०४४१९.१२४० ५७६ १९२ २०७२।०१.२० २१०६८ १९८५७६१.१६३० 'વારજ ९ ६१६९ १६८२९६ Retent ins ३२ १९८४२१६ 90 १४.४५७६२१६ ।" ९ जा ." Ireltels, all elenlent . ४२ चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन मनुष्यगतिप्रमाणे १३ अवधिदर्शन अवधिभानप्रमाणे विदर्शन रुण,नील, कापोत, ते जो, पर लेल्या ५ मिथ्याप २२ १८८ eH [२३६] ६९।१० चो 11 rolls els serene nel tritals to १९1111001001 SPI0 S1:10 मायादन २१ 'मिन अपिरत देशान २test 11 Helli s ६५९ २ . Littly 2013 .twenentatistest: ४.. martint, sletter A meintinuenterne 184134001 १४1५-१५७६२९11४० १३.1001-41.mte 10.01.2018 म ५१ शुकलेश्य भम्पमनुष्यगतिप्रमाणे ५२ अमष्य मिथ्यात्य २ ६५१० ५.उपशमसन । ग २.रा. emen. est 11. नी. सायिक सर यरात्य अगिरत । kine Henry He best 1७६ गरस head ५.४७ १॥२॥१४ २४|४८१२४ ९६ १२७ १२०२८८1१६८ ५०६ दिशविरत १३ प्रमत्त प्रमत्त-नि- gir अनिवृत्ति भाग १ २ १२।१ ४ २४॥४८२४ ४११०१६ ९६10601१४. १२ भा १२ भागा १२ (१२ २४ २४ Funer Mera ره قه قه ده ४२ نه ته " . १ १ - २०१३ ३ नदार ६७८ १४२११ १२११ ૨૨૪૮૨૪ २४१४८।२४ २८८ ९६ ४१३९ १४.८ ३२ १२८ १६८१३०४।२१६ १४४१३३६।१९२ [२३७] . ५.६७ १२।१ ४ २४|४८/२४ 1५1१२७ २४ :१२०१२८८1१६८ सूक्ष्मसप. राय सबंध ५५क्षयोपशम सम्यकत्व अविरत देशविरत १३ प्रमत्त पमत्त ५६ मिम सम्या क्ख १७ ५७सास्वादन १ मास्वादन २१ ५० मिथ्यात्व ។ मिथ्यात्व २२ मनुष्यगति प्रमाणे चो मिश्र ११२।१ ૨૪૪૮૧૪ ७७१६९ ३२ १६८१३८४१२१६ ३ पा (३ (७८९ ४ चो ७६८ ७६८ ARIA ४ १६८11८४२१६ ८ ૨૪૪૮i૨૪ १६॥ १९२ २४७१७२२४१९ २२४॥२॥१०॥ ६८ ६ ज१० १३११ १६८।५७६२६४८।२४ ०१६३२ ६० मसज्ञी ८ अ ६४ ८1९1१० अ १५२११ पदार 1१1१ ८1१६८ 1८1१1८ ३२ १८५१० ३२ (७५१६९ मिथ्यात्व २२ सास्वादन २१ ६१ आहारा मनुष्यगति प्रमाणे ३४११४४१८० ५६११२८७१ ५४४ २८८ २५६ ४ Alkalkste isit 111311 नी .. tantrit.llaint 01.11.13 शक्षिति दिशविरत ३६ मविरति ३ मिप्यार" PATEन ..... ६irl11. 1211८ जा 1211 गटार 10 राभरा . 1:40... १९: 4. 1*1.18 11....... 11.artnet. . अधिग्स -- গান अधरन मागगनिप्रगान भवधिदर्शन अभियाप्रमाने यवर्शन काण नीत, गोग, ने ता, पप - - । से. [3] शा ध्यार ० H -41.12103 tratiot-101 intm. ५९ 1९11 मित्र . ८ - . All.I-20. aur" प्रगम Prarunloud -:भग मियIIT३ 1 6 Int- गाग, Husbin 1.भा. wefarop loin . 11-19ी दिशविरत १३ ५.६७ १।२।१ १२१ र २४॥४८॥२४ ९६ १२१७ (१२०१२८८1१६८ ५७६ प्रमत्त प्रमत्त-नि- वार अनिवृत्ति भाग १ ।५ २ ८५६ ११।१ ૨૪૪૮૨૪ ४११०१६ २० ९६२४०।१४४ ४८० १२ भा १२ भागा|१२ १२ २४ २४ १ १ Fumar ३ Pyare - २ १ १२ चो २८८ ४ दा ६७ 1१।२।१ १।२।१ २२१४८२४ ૪૪૮૨૪ (७/१६९ ६.१४६८ २०१६ (७६८ (५७२ १६८।३८४१२१६ १४४॥३३६११९२ २८ सूक्ष्मसप- राय भबंध ५५/क्षयोपशम सम्यकत्व ३ अविरत १७ देशविरत् १३ प्रमत्तम प्रमत्त ५६ मिन सम्य १ मिश्र ५७ सास्वादन १ मास्वादन २१ ५८ मिथ्यात्व मिध्याव २२ मनुष्यगति [२३७] 1१।२।१ ૨૪૪૮૨૪ 1५1१२७ २४ १२०१२८८1१६८ ३ ७) ३२ १।२।१ ४ २४|४८।२४ ७१६९ ४ चो ગ १॥२॥१ ७६८ १६८।३८४०२१६ ७६८ ७६८ १६८१३८४१२१६ ७६८ १६३२ (१६८५७६।६४८।२४ १६३२ २४॥४८॥२४ (९६ ॥१६॥ १९२ ६८ २४१७२।७२।२४/१९२ ॥२४॥२११०३८ ८ ६ ९१० 1१1३1३।१८ प्रमाणे ६० असंही २ १० ६४ मिथ्यात्व २२ 1९1१० अ ११२११ ७११९ १P19 ८1१1८ ८1१14 ८1१८/१० ७१६९ ६१/आहारी सास्वादन २१ मनुष्यगति प्रमाणे ६४११४४१८० ५६३१२८१७२ आहारी २८८ २५६ ३२,अनाहारी laer १६ ची १० ३ मियात्व २३ मावादन १ अविरत 40 11१० जदा जा १।२।१ चो ઉIPIs १।३।३११ १२८ .४|४८८ 11८1१० १९४३.४० 1८६४ २४८४ ७.१६९ १६८1८४०१ Pavt.४१९२ १९६० १४४१५०४.७१३ १४.. ४ ॥ ६२ मार्गणासु नामकर्मणो बंधोदयसत्तास्थानानि तदभंगाश्च ज्ञेयाः ॥ (षष्ठकर्मग्रन्थान्तर्वर्ती) नि ॥ २१ सत्ता यानानि १० तमगा २ मार्गणामु नमो वरम्यानानि उस-सानानि १० १३९४५ गति 13 २९॥३०॥ १३८:२०१०५।२०२५ रतियचगति २०६८३०॥ १३९२६ १२१२४२५२६८०९/०1३१॥ मनुष्यगति ८२२५८२९३०31191 १३९३११२१।२४।२५।०६।२८।२९।३०1१। ९.दा ४देवगति २५००९1301 १३८५६६१२५।२१०८२१३० ५ एकेंद्रिय ५२३॥२५॥२६॥२९॥३०॥ १३९१७/५/२१॥२४॥२५॥२६॥ ५/२३१२५।२६॥२९॥३०॥ १३९११/६/२१२६२८०९१३०३१॥ जनीद्रिय ५२३॥२५॥२६॥२९॥३०॥ १३९१५६२१२६२८॥२९॥३०॥३१॥ ८ चतुरिद्रिय | ५२३॥२॥२६॥२९॥३०॥ १३९१७.१२६।२८।०९।३०॥३१॥ ९/पद्रित ८२३२५।०६।२८।०९।३०।३३।१३ १३९४५/११/२०१२१।२५।२६।२७१२८९१३013 ११ सा. १०वीकाय | ५२३२५/०२९1301 १३९॥२१॥२॥२५॥२६॥२७॥ ११अपकाय ५२:२५॥२९॥३०॥ १३९१७ ५/२१॥२॥२॥२॥२७॥ १२ तेजस्काय | ५२३३२५।०६।२९।३०॥ ९३०८२१॥२४॥२५॥२६॥ [२३८] ५३२८९.८८॥ બ૦૭માં ૧૮૮૮૬૮૦૭૮ २६५२११९३३९२२८९१८८1८1८1९/७६१-५॥ ९५८ २४४९९३।१२।८९८८ ૪૨ ૨૮૮૮દા૮૦૭ઢા २२/ ५९२१८८1८६१८०1७८ ૨ ૫૨૮૮૮૦૮૦/૭૮ ૨) પs૮૮૮ફાટાઢા ७६८३१०/९.९२१८१८८1८६१८०1७९७८७६७५ ९.८1 ૨ - ૫૧૮૮૮૮el૨૮ २० ५/९०1८८1८३1८०1७८ा १०/५/९२१८८1८३1८1७८। स्थानक क. वावीशग वधे उदय स्थान चार छे ७-८-९-१० ए चार उदयव-यानक मध्ये अनाहरीनी मार्गणाए त्रण उदयस्थानक मंभवे सातनु उदय. स्थान अनतानुववी रहित छे ने अनाहारीनी मार्गणा अनतानुबधी बीना सभवे नही तेयी सातनु उदयस्यान काढी नाख्यू छे अने त्रण उदय यत्रमा लख्या छे सतस्ना पधे उदय भ्य नक यत्रमा ४ ल्ख्या छे तेनी चोवीशी ८ ल्खी छे ते मन्ये ४ चोवीशी क्षायिक आश्री मभवे छे अने चार क्षयोपशम आश्री सभवेने अनाहानी मार्गणामा जीव वाटे बहेना होय छे नेवी तेमा क्षायिक अने क्षागोपशमिक ए वनेनो सभव छे ४० अविरति ३९ दशविगति ३ यथान्यात ३५सूक्मरगय द -- 11 मामायिक ३३ विभगनानी उनअनानी ३१मतिअज्ञानी (२२०] InISH021221stston tal.seeneta Interactal IntrIONhateseNCErottineselicinesenelkellas naseenslatestinental intentario21221salelkanta NEtieselicts elicinctars:ILEnabersneletal JAPANESEAN 1211021321221salcilarassmentalwalnelicinelicinehelteendee Irelatiheleel 127152lcat..." italoalselreir class Ill allustriarie2122nimlalest 121ILtlalmalseli.०० ISIENS102172tailedlts? 1221.." 10826 Is Eloseticulfatest 1.01.11.21271122 Imandarelr clacint LIVElalbalrsdesibabDE Ifter101012210testa.. 108112cineinst Lalittel 12711 ILENotiretrebelselnelterest iwelselmalidir clecia 10010213212217 rotel-alralheir elclaelreltant Icel<1% els clieled: 2010213212plantersnel.Delicateineralle- I alredeliccles Inskrit 211::1.170trelittl. 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Il slutlaslasis slodla portiltiloglar1?elscholen 181261610213212211:...: It :.:.pelf cines Attitionalpetstlnelete 21 121 Initia21:2224tanttrn Irela.trictelee ."titualsaltuitneltca LUEN 1761-21:Hain : sale 1.velmcineite-4-1 1751-121221.L | 1 inci cinci Hal २७चनजानी २मानपायी २० कोबकपायी २१ नपुसस्वदी २०मीवेदी १९९रुपरेदी १८पयोगी चनो 1नोयोगी . ne किवलदशनी १०२०२१।२00२८।२९।३०३ १९ ४६/201७९५६१७५।९।। ष्पलेश्यावत २३१२५।२६।२८।२९॥३०॥ १३ /२१॥२४॥२५॥६॥२॥२८॥२९॥३०॥३१||७७७३/६/९२१८९।८८1८६८०७el ७७८ नील्रेक्ष्यावंत २३।२५।२६।२८२१३० १३९४ ९/२११२०२५।०६।२९।३०॥३१॥ ७७७-६,९२१८९/८८1८६०८०७८ ७७८ fryापोतलेश्यात २३।२५।२६॥२८॥२९॥३०॥ ૧૩૨૪ ૨૧ર૪રપાMિ૮૧૨૦૧૧ ગઢ૧૮૮૧૮૬૮૭૮ ७७८३ ४८नेजोलेश्यावत २५॥२६॥२८॥२९॥३०॥३३॥ १३८७४ १२१॥२४॥२५॥७०२९१३०३१७६७ ४९३।१२।८९८८ ४९ पालेश्यावत ૨૮રરેગરે १३८५०८२१।२५।०६।०४।२८1०11०1३१॥ ७६६६३२९२१८९८८ ५० शुक्ललेश्यावंत 14/२८।२९।३०।३१।१ ४६३५/९/२०१२१२८०९।३०।३१।७६७०८९३१९२।०९।८८८०७९७६७५) ५१/भवसिबिक ८/२३।२५।२६।२८।२९।३.१३११११/१३९४५/१२/२१॥२४॥२५॥२२॥२८॥२९॥३०॥३१॥ ७७९११२९३।१२।८९।८८1८६८०७९/७८१७६ २०१५ ७५।९।। ५० अभवसिबिक ६२३१२५।२६।२८।२९।३०॥ १३९२६ ९२१।२।२५।०६।२८।०९।३०॥३१॥ ७७७३/xjakle६.८०७८ ५३ भोपशामिक 1५/२८।२९/३०1३११११ ३५/८/२१२५/२६/२०८२१३०॥३१॥ ૧૭૬ ૨ ૧૨૮૧૮૮ ५४ायिकसम्यनत्व ५२०२९॥३०॥३१।१। ३५/११/२०१२॥२॥६॥२॥२८॥२९॥३०॥३१॥ ६२३/१०/९३३९२।८५1८८1001७९/०६/७५/९८ १1८1 ५ बायोपशमसम्यक्प २८॥२९॥३०॥३१॥ ३८२१२ ।२६१२२८२१३०३१ (७६७१ ४९३३८२१८९८८ ५६मिटि २/२८॥२९॥ १७३२९।३०1३11 ३४६५२९२/८८) ५/-स्वादनसम्यक्त्व २८।२९1301 ९६०८७२१।२४।२५/२६२५/३०॥३१॥ ४०९७ २९२१८८ ५८ मियादृष्टि ६/२३।२५।२६।२८२१३०॥ १३९२६/ ९२११०४२६२३२८।२९।३०३१७७७३/६९२।८९।८८1८६८०७८ ५९सज्ञी २३३२५।२६।२८।२५।३०1१1१1१३९४५/८२११२५/०६॥२४॥२८॥२१॥३०॥३११ ७६७५/१२/९३१९२२८९/८८1८६८०1७९/७८७६। ११ ५६८३ ७५/31 ६० मसंज्ञा १/२३१२५।२६।२८।२९१३01 १३९०६/९/२१।२४।५।२६।२१२८।२९।३०।३११ १३२/५/९२१८८१८६८०७८ ५०१६/१० ६१आहारी ३२३१५।२६।२८।२९।३०।३१।१।१३९४५९/२१।२४॥२५॥२६॥२॥२८॥२९॥३०॥३१॥७७४६ ९३।१२।८९८८1८३11०1७९/७८७६) ३२ अनाहारी ६२३।२५।२६।२८।२९।३०। १३९४१४/२०१२१९ ४५१२९३१९२२८५1८८1८६१८०1७९/७८७६) ७५/९८ [२४०] १३४| ५ पूर्वोक्त . १२ " . । प . गुणस्थानकेपु जीवस्थानादि विवरण. १ ३ जीवस्थान १४ योग १५ उपयोग १२ लेयाम मूळबंधहेतु मिण्यास ५ अविरति १२ कपाग २५ मिथ्यात्वं (१३ अहारकद्विकविना ५अशानदशन १२ मारवादन ७ एकद्रिय १, विकले १३ ६ मियासविना १२ ३, असंज्ञी 1, पाच अपार्यासनी पचेद्रिय पर्याता तथा अशाप्ता २ मिश्र संजी पर्यासा १.मनोयोग, बननयोग४,६ अजान मिप्रित |२१ अनंतानुवरी औदारिक तथा क्रिय योग। शान दर्शन पिना अविरति २ सजी पद्रिय पर्या३ आहारकद्विक विना ज्ञान, दर्शन 1१२ शान मा तथा अपर्यासा शिविरति १ सही पंचद्रिय ११ मनोयोग ४, वचनयोगः प्रोक्त ११मायनी १७ पहेला तथा बीजा पर्याप्ता ४, औदारिक काययोग अविरतिगिना स्पायनी चोकही 1,क्रिययोग २ विना रमत १३ ना ११, तथा आ. जानसन, २पार१ योगा १३ पहेला, बीजाभने हारक टिक २ जीना पायनी बोकडी चिना मप्रमन 1१ मिश्रा कष्ण प्रमाणे १०७ तथा आहारक काययोग अपूर्वकरण । । मनोयोग ४, बचनयोग आगारिक कारशेग १ देण्या अनिवृत्तिकरण होक्त ७ सयलन ४.वेद ३ १० मम्ममपगय १ १ १ गेम ११ उपशातमोह १ १ १२ मोगमोहं १ १३पयोगी केवळी, ७ मनोयोग पहेला रेला २, केवट द्विक चनयोग पहेला छेला २,भादा- रिमद्विक २,गर्मण काययोग अयोगी केपळी १ [२४१] A ऐसीर ." . क . . १ योग " " " " ३ : २६ १२ १४ योग१५/उसरवथोतु अल्पबहुल मिळभाव५/उपशम २/ क्षायिक ९ क्षयोपशम १० भादयिक २१ ५७ मिग्यात्व भयोगीकरता अर्मत ३ १० दानादिक लधि ५, अज्ञान २१ गुण १४ ३, दर्शन २ २सास्वादन दिशविरतिथी अमं-३ १० पूर्वोक्त २० विध्यावधिना ख्यत गुण १० ३.मिश्र सास्वादनथी अम३ १० दानादिलब्धि ५, अज्ञानमि-१९ मियाल तथा अजानविना ख्यात गुण ११ श्रित ज्ञान ३, दर्शन ३, मिश्रममकित १ अविपति मिप्रथी अमंख्यात ५४१४॥३/०-१उपशम.-१ क्षायिक १२ दानादिलब्धि ५,शान ३, द-१९ गुण १२ सनकित समकित शन ३, क्षयोपशम समकित ५ देशविरति प्रमत्तथी अमख्यात ५४३,०-१ १३ पूर्वोक्त १२ तथा देशपिरति११७ पूर्वोक्त १९ माथी देवगति गुण तथा नरकगतिविना प्रमत अप्रमत्तथी संख्यात ५/४॥४॥३-१ १४ पूर्वोक्त १२ तथा सर्वविरति,१५ पूर्वोक्न १५ मायी असंयम गुण ८ १, मन.पयवज्ञान १ तथा तिर्यग्गतिविना पभप्रमत्त संयोगीथी -१ सख्यात५॥४॥४॥३०-१ १२ पूर्वोक्त १५ माथी पहेली गुण ७ प्रण लेयाविना अपूर्वकरण ૨ क्षीणमोहयी विशेषा ५४ १३ पूर्वोत्तमाषी क्षयोपशम १० प्रॉक्त १२ माथी तेजो तथा धिक ५ समतिविना पपलेश्याविना अनिवृत्तिकरण क्षीणमोहरी विशेषा-५।४ १३ पूर्वाश्त १. पूर्वोस्त धिक १० सूक्ष्म संपराय क्षीणमोहथी विशेषा-५।४ १३ पूर्वोक्त १० माथी वेद, कपाय ३ विना ११/उपांतमोह सर्वथी थोडा १ १२ पूर्वोस्त१३ मापी क्षयोपशम ३ मनुष्यगति १, शुक्ललेल्या १, चारित्रविना असिनत्व १ १२ क्षीणमोह स्पशातथी संख्यात २ समत्रित १२ पूर्वोस्त ३ पुर्वोक्त तथा चारित्र १३ सयोगी केवळी. अपूर्णचरणथी संख्यात गुणा ६ १४ भयोगी केवळी. अविनियी अनंत गुण ३ २ पुर्वोक्त ३ माथी शुल्ललेश्या- १३ (सिनसहित) विना [२४] । गुणा .

। - १मिष्यात १८ २० पारिणामिक) उत्ताभाव ५३ सानिपातिक | बिसयोगी विकसयोगी निकमयोगीदन.मोगा मतुर्मयोगी पंचमयोगी मानिपातिक मातमो भंग नामो भंग शमो भंग । चौथो भंग पानमो भंग। उत्तर १५ ३ मयल, ३३ गति आश्री. अभव्यत्व जीवत्त २ अभव्यत्व ३२ विना --- २,मासादन 10 ४अविरति x " ३५३३४३३३ । ५टेशविराति " ३३३३३३३१३ मनुष्यतियनी भात्री मनुष्पनि आत्री ३०।२९।१९।२८३ [२४३] अपूर्वकरण २ २७९6128 भनिवृत्तिकरण: १० सुक्मसंपराय २ २२।२१ ११ उपशातमोह २ " ३०९ M. 13 १२ क्षीणमोह योगी कळी १ जीवत्व . १४मयोगी केवळ जीवल १२ १ ३ परीसर २२ समकित ६ मनुष्य तथा तिर्यच २२ " २७ २८ ३४ जीवायोनी कुल कोठी समुपात दिडक २४ ध्यान १६ चरित्र ७ चोराशीलारा१९७५०००० मिथ्यात्व ४०.०००/१९७५०.००५केवळी तथा -२४ आर्तध्यान ४, तथा अविरति २२ १ मिथ्यात्व हारक वजनि रौद्रध्यान ४ २/सास्वादन ५६०००००१८७५०००० २२ तेजस्काय तथा २२ १ सास्वादन ३२००००१/ वायुकायविना मिम २६०००.०११६५०.००२ वेदनी तथा १६ पाच यावर तथा २२ १ मित्र कषाय प्रण विकलेंद्रियविना ४ मविरति ११६५००.०५मीच्याच प्रमाणे १६ ९ धर्मध्यानना पहेला १ २२ ३ उपशम क्षयो- पाया सहित पशम क्षायिक ५विशविरति १८००.००/६५५०००.५ ८1१. धर्मध्यानना बे१ देशविरति पाया सहित ६प्रमत १४९००००/१२०००००६ केवटीविना १ मनुष्य ७ धर्मयानना ४ निदा-३ पहेला पण २२ नातं विना आतेच्या नना पाया ३ अप्रमत १४०००००१२००००० ५।३।१ ४ धर्मध्यानना अपूर्वकरण १४०००००१२००००० ३११ ५ धर्मध्यानना ४ अथवा र पहेला वे २२ २उपवाम, क्षायिक शुक्लध्याननो १ अनिवृत्तिकरण १४००.००१२०००.०३१ १ शुक्लध्याननो पहेलोर २२ पायो १० सूक्ष्मसंपराय १४०००००१२०००००।१ ५ सूक्मसंपराय, १४ क्षुधादि ५,चर्या २ शय्या,पव,अलाभ,गेग तण,मल,प्रज्ञा अज्ञान, ११/उपशातमोह १४०००००१२०००.००१ १ १ ययाख्यात १४ १ उपशम १२/क्षीणमोह १४०००००१२००००० १ १शुरू याननीबीजो पायो १ १४ १ क्षायिक १३४मयोगी केवळी १४०००००१२०००००१ केवळी १ १ शुक्लध्याननो त्रीजो ११ पूर्वोक्त १४माथी पायो १३ माने अंत अगम,अज्ञान,प्रज्ञा ४ अयोगी केवळी १४००००० २ शुक्लध्यानना छेडा ,१ १ पाया Face] . " " . म्ही " ३८. निग २ -- ----- अशा १ मिथ्या .. . 1८ । - अप्रमत्त ३५ आश्रय ४३ गचा .y पुप्य वर पापय ८२ आठ गाभाटकमना उदग मिथ्यात्व पर्यावहीनी नियापिना- १ अरूम 3. आहारक द्विक तपा जि.८० ८. आयु । नाम frat निना साम्पादन ३८ पोक्त ३९ मी आ-" '८ तप निना मिश्र निश्र ३४ पोक्त ३८ मा न.. আবু নস খান अविरति ३ सम्यग्दृष्टि र्यावही अने मि... भावना पार १ गम १७ पोंकमा जिननाम" ८ गाव विना तया रे भायु महित शिविति २९ दयावी. मियान, ३१ मनुष्यत्रा, औगरिक .. ८ तथा अपगम्गाणपिना दिकभमषगण रिना प्रमत्त P". पाय , गोग" गमगपगय तथा १०-१ ३, निया १३, इंद्रियः पथाम्न्यात चारित्र "महिनीए तो विना १ १९ पूर्णोक्त .. माची..., 30-33 आहार फदिर नथ.. ५८ । आभिकी पिना ता.आयुजता ३२ अपूर्वकरण 11 १८ प्रर्वोक्त १९ माथी सामगपगययाख्यान.-1 ८ मायाप्रत्ययिकी विना | परिहारपिशुदि रिना । अनिवृत्तिकरण ૧૮ १० सम्ममपाय १७ प्राक्त १८ माघ- मामाविक, छेदीप-10-1 द्वेष प्रत्ययिकी विना न्यापनीय. मोहनी विना यवान्यातबिना ११ उपशातमोह १ योग तथाइर्यावही ११ मामायिक, छेदोर १२-१ १माता(या नाम उच्च गोत्र वेदनी मोहनी राधापनीय, परिहार, विना मश्नमगरविना १० क्षीणमोह १ १३ सयोगी देवी १ यथात्यात गुरुयानको . अघाती बीजो पाया १४ अयोगी केवळी/१ शुक्लथानना. Hae] " ८ , ७ ३ आय अना पगिरा पिना) ब " १ छेडावे पाया ८ ८ ८ ८५ पर्यासा १३ । । उदारणा आठ कर्म देताना भेद१९८नार निा भेर मनुष्यना भेद तियेचना जीवना भेद ध्रुववधी ७ अध्रुवचनी ७३ ३०३ भेद ४८ १,मिभ्यास १७०(९ लोकाती, ७० जिननाम तथा आहारक द्विक क.५ अनुत्तर विना पयोप्त, १४ अप याप्त-२८ विना) - पर्याप्त। ८७ २०२ समृर्छिम ६ मिग्यात्व बिना ५५ जाति ४,स्थावर ४, नरक ३, १०१ विना संघयण १,सस्थान १, आ- ताप १, नपुंसक वेद १,विना १.१ पर्याप्ता५ पर्याप्ता (१९८ ३९म्ल्यानिित्रक३ तथा,३५ मघयण ,संभ्यान, नीच- जन्चर अनतानुबधी । विना गोत्र १, 'योत १,अशुभ विहा- योगति १, वीवेद १, दुभंग ३, तिर्येच ३, आयु, विना अविरति १९८ १३ मातमीना २०२ समर्छिमा१० ४२३ ३८ जिननाम तथा देव अने अपर्याप्ता विना विना मनुप्य आयु सहित ५.देशविपति १५कर्मभूमिना५ ३५ उपग्माथी बीजा,३२ वज्रऋषभनागच १, मनुष्य पर्याप्ता पायनी चोकढी विनात्रीक३, औदारिक द्विक २,विना ६प्रमन Ielv १५ ३१ त्रीजा कपायनी ३२ चोकडी विना ७अनमरा २६शोक,अाति,अस्थिा द्विक २, अयश, अशाता विना २६, देवायुमहित २७ आहारक द्विक सहितग अपूर्वकरण १५ १५ ३११२९१२९२९॥२९ २०७२॥२७॥२७॥२७॥२॥३ १९४२० अनिवृत्तिकरण (१५ १८1१८१७११६१५ ३३।३।३ १०मृश्मसपराय ६५ १५ १४ ११ उपशातमोह १५ १५ माता १२क्षीणमोह ५२ १५ १५ १३ सयोगी केवळी २ १ १४अयोगी केवळी. १५ १५ [२४६] २२ १५ रद .

---- ५२ ५३ ५४ ५७ ध्रुवोदयी अध्रुवोदयी ९५ ध्रुवसत्ता १२६ आधुममत्ता २२ पागवतमान बध ९१ अपरावर्नमान बंध २१ मिश्यात्व २७ १. आहारकद्विक २, जिननाम,१२६ २२ ८९ आहारक द्विर विना २८ जिननाम विना समकित मोहनी,मिश्रमोहनीविना २/साम्वादन ८५०श्मत्रि ३, आतप,नरका-१२६ २१ जिननाम विना पंदर विना २७ मिथ्यात्व विना नु पूर्वी, विना मित्र २६ मिय्या-७४ वारहित तया मिश्र सहित १२६ २१ ४७ सत्ताधीश विना २७ त्व विना करवायी अविपति ५८ समकितमोहनी १,तथा अनु-१२६।१२।१२१११२१९२११९।२०१७ १९ सुर अने मनुष्य आयूमाहित २८ जिननाम सहित पूर्वी ४, सहित तथा मिश्र मोन हनी रहित ५देशविरति (२६ ६१ मतर बिना १२६११२६११२१११२१२२।१९/२०१७ ३. मनुष्य त्रिक, अनतानु २८ बंधी ४, औदारिक द्विक २, सघयण १, बिना प्रमत्त २६ ५५ आठ रहित तया माहारक/१२६।१२।१२१।१२१ २२।१९।२०।१७ ३५ अप्रत्याख्यान ५ विना २८ द्विक सहित करवाथी अप्रमत्त ५. स्न्याना त्रिक ३, आहारका१२६।१२६।१२१।१२१ २२।१९।२०१७ २९१०८।३११३० आहारक द्विक २८ द्विक २, विना महित अपूर्वकरण ४६ छेना संघयण , समकित १२६११२६१२१।१२१२२।२०११८1१७ पहेले भागे ३० पाच भागे २०२८।२८।१६ मोहनी १, विना सातमे भागे १. अनिवृत्तिारण २६ ४. हास्यादि छ बिना पहेले भागे उपर प्रमाणे पहेले भागे उपर -प्र५।४ ।१४।१४।११४।१४ २६ छेल्ले भागे ८८ माणे छल्ले भागे १५ १० सूक्ष्म संपराय २६ ३४ वेद ३, संज्वलन ३, विना १२६।१२।१२११८७ २२।२०१८1१५ ३ लोम विना १४ ११ उपशावमोह २६ ३३ लोम विना १२६११२२।१२११८६ २२।२०११८१५ १ साता १२ मीणमोह ३१ वे संघयण विना अथवा २९८६१८४ १५/१५ १ वे निद्रा विना १३ सयोगी केवळी १२ ज्ञानव-३० जिननाम स हत करवाथी ७४ ११ रण५,दर्शना वरण ५,अंत गय४, विना| १४ अयोगी केवळी सुम ११ भोगणीश विना ७४१८ ११५४ [8] ५८ ५९ ६२ सर्वपाती वर्ष २० देशघाती वा २५ अपाती बंध ७५ दर्शनावरणीना स्थान उदय मोहनीग कर्मना वध मोहनीय कर्मना स्थान भने सत्तास्थान उदय स्थान मिथ्यात्य २५ ७२ जिमनाम तथा आवरकर बंध,०५ उदय, ९ सत्ता २२ समकित तगा1१०1 द्विक विना मिश्र मोहनीना २/सासादन १९ मिथ्यात्य विना २४ नपुंसकवेद विना ५८ चौंद विना यंच, ४५ उदय, ९ सत्ता २१ मिथ्यात्व लिना जरा ३मिश्र १२ अनंतानुबंधी ४,२३ तीवेद विना ३९ नाम कर्मनी १५, पायू ३,६ बंध, ४॥५. उदय, ५ सत्ता १७ जनतानुवंभी चारा स्त्यानर्षि ३, विना नीच गोन विना विना ४ अपिरति १२ १२ जिननाम, देवायू, मनुजायु बंध, ४५ नदय, ९ सत्ता १७ जा९ सहित ५दिशविराति ८वीजा कषायनी यो २३ ३६ वर्षभनागन, मनुष्य निक बंध, ४१५ उदय, ९ सत्ता,१३ अप्रत्याख्यानी या । कडी पिना ३, औदारिक द्विक २, विना चार बिना २३ ३ वध, ४५ उदय, ९ सत्ता प्रत्यारगानी चार III प्रमत्त स्त्रीना कपाग्नीची- चिना कही विना अप्रमत्त २१ शोक ने अरति विना३२ - विना ३१ पाच विना पंध, ४५ दय, ९ सत्ता ४५.६७ ३२॥३३ भाहारकद्विक सहित ८/भपूर्वकरण જાપારાવા૨/૧૨ २१॥२१॥२१॥२१॥२१३३३३३३३३३३३३३३३३३३ पंध, ४५ उदय ९सत्तार 1५/६ निवाद्विक विना २१॥२१ अनिवृतिकरण २।२।२।२।२ १७५१६३१५।१४।१३ ३३३३३३३३३ ४ बंध, ४५ उदय,९।६ सत्ता ५ हास्य, रति, फुत्सा२।१ भय ४॥३॥२॥१ १०सक्षमसंपराय १२ लोमयिना ४ यंभ, ४५ उदष,९।६ सत्ता. १ ११ उपशातमोह ५ उदय ९ सत्ता [२४८] १२ क्षीणमोह . ४ उदय, ६४ सत्ता १ सयोगी केवळी. १०अयोगी केटी ६४ मोहनीयकर्मना सत्तास्थान नाम कर्मना बंधस्थान नाम कर्मना उदयस्थान नाम कर्मना सत्तास्थान ६८ आत्मा ८ मिथ्यात्व २४॥२०॥२६ २३१२५।२६।२८१२९॥ २१॥२४॥२५॥२६॥२॥२८॥२९॥ २२८१/८८1८३1८०1७८ ६ज्ञानात्मा तथा चा- स्त्रिारमा चिना '२/पास्वादन .३ मिम ४अविरति २८ २८१२७२४ २८॥२४॥२३॥२२॥२१ २८१२९६३० २८२९ २८।२९।३० २१।२४।२५।२६।२९।३०३१ ८८९२ २११३०३१ 1८८1९२ २१।२५।२६॥२॥२८॥२९॥३०॥ ९३२९२१८९४८८ ७ ज्ञानात्मा सहित ६ मिथ्यात्व प्रमाणे ७ साहादा प्रमाणे 1 ७ देशथी चारित्र छे २६॥२॥२८॥२९॥३०॥३१॥ २५॥२॥२८॥२९॥३० २९।३० ९३१९२१८९८ ९३॥९२१८९८८ ९३१९२१८९८८ ९३.९२।८९८८ ९३१९२८९1०८1८०७९७६.७५ ८ ८ ५/देशविराति २८/२४।२३।२२।२१ 1२८२९ ६प्रमत्त २८१२४१२३।२२।२१ २८१२९ अप्रमत्त २८॥२४॥२३॥२२१२१ २८॥२९॥३०॥३१ अपूर्वकरण २८/२४॥२१ २८।२९।३०३११ अनिवृतिकरण२८।२४।११।१३।१२।११।१ ५।४।३।११ १०सत्मपंपगय ८२४१२११ ११ उपशातमोह २८२४२१ १२ क्षीणमोह १३ सयोगी केवी ८ [२४९] ८ कषायात्मा विना Ka૧૨૮૧૮૮૮૦૭8ાદાખ્યા ९३१९२०८९८८ 1001७९/७३/७५ २०१२॥२६॥२७॥२८।२९।३०1201७९/०६/७५ . १४ अयोगी केवली Sic ८.१७९१७७५८ ६योगात्मा विना आठ आत्माना नाम १व्यात्मा २ कषायान्मा ३ योगात्मा ४ उपयोगारमा ..ज्ञानात्मा ६ दर्शनात्मा ७ चारित्रात्मा ८ वीर्यात्मा ७२ ७३ मोहनीयनी उदय- नाम कर्मना नाम कर्मना उदय-विदनीयना| गोत्रना | आयुना भग नाम कर्मसत्ता मोहनीना योग सबधी योग पद वर्ण आश्री चोवीशी बधना मागा ना भागा ७७९१ भग ८ २८ भागा पद उदय भागा ४०1८१ १३९४५ भंग ७ मध्यात्व २८ २१३ १८ २२०० १८९१२ १३९२६ देवगती |७७७३ प्रायोग १८, नरकगति १ विना १२१६ ९७०८ ३२ ३२ १६ ४.४१ १६ २२५० २/सास्वादन मित्र अविरति ५दिशविरति पप्रमत्त अप्रमत्त अपूर्वकरण १६ १३७२८ १३०२४ ४४३३५९१ १५८१३१६ १४८1५९२ उ.क्ष ७२।२४ ३६.१२. २३६८ २००८ ८६४ १ ४३२. [२५०] उक्ष ७३२४ २८ १४४ अनिवृत्तिकरण'१२मा ४१३२१ ०५२ १० सूक्मसंपराय ७०२० ११ उपशातमोह ७२ ४ १२/क्षीणमोह ४ १३/खयोगी केवळ १ १४ अयोगी केवळी. .

८४ ८७ ८. ८८ ८२ ८१ ८३ ८५ उपयोग उदयपयोग सत्या उदय लेश्या योगनी नोवीशी ५५२ अने योगना पद नपयोगनी उपयोगना पद लेझ्यानी लेश्याना पद भागा पदवर्ण पोडशक तथा भष्टक ४१४१ चोनीशी ३०० २१४९ भागा नोवीशी २२० मिय्यारव ८१६०११५२ ९७९२९२ ८८ 1४०८ __ २सास्वादन ४४० ३८४०५७६ ४१६ stoch riadeo ३मिभ ius १९२ ३६० ४अविरति 1११५० ८६४०११५२ ८६४०८. चोवीशी १६-पोडशक v८. ८ अटक 1३७४८८ ४. ५दिशविरति 13१५२ ७४८८५७६ ३१२ १५६ વર pasekce ६प्रमत्त २४ ७३९२/५०६ १३२ ३१६८८८ चोवीशी १६-पोडशक ५७२ ३१६७* [२५१] ७अप्रमत्ता १३४४ ७३९२/५७६ tet १३२ अपूर्वकरण ७२ ४८. ३६ १८० २८ . -- - अनिवृत्तिकरण ११२ २८ १-पोउशक २८ १ पो. २८ -- १० सूक्ष्मसंपराय ७ १ १ उपशातमोह . १२ क्षीगमोह १३ सयोगी केवळी. . योगी केवळी. .

८. ८ te १.. १२,५०० १ ५ ६. १० १२ गुणम्यान योग चोरीशी योगे गुणताचो चौबीजा-चोवीशे गुण- पद योगे कुल योनीशे गुणता उदय उदय पद नोगरवाळोता उदय भंग गुणता पद पद वृद चोरीशी सामन्यात १०मन,वच०४८ २२०८ ६०६८० ७८८ १८९१२ १०1९।८1७1131३1१/१०२२४१७८ ओ १, १. ३ ये मि.१,ओ मि. ३६१०८ eisino ११२।१ 1८1१०110 १, कर्मण १ सान्नादन १२मन,वचन, ११५२ ३३० ४१६९२१६ पदा 1१।२।१ १६७ ३२ ६४ ५१० 4 मि. १. पो |१२१६ ३२३२ १७२८ मिश्र १० मन,व ४,ओ. ३०३२० ३२० ७६८० ९ .७ १।२।१ ९।१६७ ३२ अधिपति १०म.४,व ,औ. १९२० ६०६.० ७८० १४००० 1113131१९॥२४॥२१॥६ २ मि १,कर्मण११६ यो २५६ भंग२५६ ६.१२० १९२० १ औ मि १. अटका६. भग ४८. २०४० १६८०० ५दिनबिरति ११मन ४,व ,और ८८ २११२ ५२५७२ ५७२ १३७२८ ५१३१/८२११८५५२ १, २ ६प्रमत्त ११मन,व ४ औ.. ८८ २११२ a४/०८४५७२११६१६ ५४ १।३३।१७१८१५४ १, २. २. आहा २. १६ पो २५६ भंगा२५६ २५६ ४८ १४०८ १३०२ अप्रमत्त १० मन४,व.., औ nite १९२० ४८४ १,वे. १ ६५1१1३1३1१1१1१५४४ १०५६० १ आहा १. २ अम्मका १६ भंग १२८ १०८ २०४८ ११२६४ अपूर्वकरण ९ मन ४, ४,भो ८६४ २०१८.१८.४३२० ६५४ १४२११ 81१०16 अनिवृत्तिकरण | मन४, ४,११६ षो १४४ २०२५२ २५२२५२ उपयोगे गुणा १० सूक्ष्मसंपंगय मन ,का,औ ११ षो १ १' कुल सम्बा १४१६४ ४१४१९५७१७ [२५२] ८८ ८८ ६५३ ६५.१ ३ ४ गुणस्थाम उपयोग चोत्रीशी उपयोगेचोवीशे गुणता पद उपयोगे गुणता चोवोशे गुणता लेश्या चोवीशी लेन्याए चोवीशे गुणता पदन लक्ष्याए चोवीशे गणता गुणता उदय भग पद भग पदद गुणता उदय भग गुणा पट व मिथ्यात्व 1८१६. १९५२ १०८ ४. २माबादन १८० १२१६० 13८४. मिथ (२४ ५७६ ३२१९२ ४६०८ ४.नविरति ११५२ ८३४० देशविरनि ११.२ ५०३१२ x ३४८८ २० १५६ 14 १३२ बाग्मत्त U [[२५३] अप्रमत 1३४४ 1१३२ ४३.८ २०१४० अपूर्वकरण २८ ३३३० '७२ ८. निवृतिकरण पो ११२ •ere उपयोगे गुणता ૧૮ २८ 10सपराय 3 -- ३८२३७ कुल मरवाळी ३२००७९९ ५१०८३ ५२९७ 11६०१ ११ गुणठाणे मोहनी कर्मनाबंधस्यानादिनुं यंत्र. उदयभग चोयीती उदयम्यानपद पदवृद ८४७७ गुण स्थानक उदय भागा १२६५ बधस्थान १० भागा ९३५ ५२ રજારાવાર૪/૧૨ ૨૪૨૧૦ ૧૨૮પ૭૬૬૪૮ ૮૦ ।१३२ २२ ६ 11९1१० १ ४ ८ ११३।३।१ ९६ (1१६९ २४८२४ ३२ १६८।३८४१२१६ २१ ११२।१ ४ ७८९ ३ २ ३ ।६ ४ २४४८२४ ३२ ३६८।३८४२१६ ३ १।२।१ . ७६८ ३ भदा १४४१५०४॥५७६२१७ १४४० [२५] २४१७२१७२।२४/१९२६।२१।२४१९ ८ १।३।३।१ ४ २ वाजदार ५२ २४१७२१७२४१९२५।१८।२११८ १२०॥४३२।५.४।१९२ 1२४८ १३ २५ue ४ ११३३१ द ८ २१७१७२४१९२ १५:१८१७ ४४ १०५६ ४ १३३१ ५६०३६.४३२।१६८ २ ४१५४६७ ९६३६०४३२॥१६८ १०५६ ४ १३१३१ २४१७२१७२१२४१९२ १५/१८० ७ १ ५६७ ८ २० ९६२२४०११४४ ८४. १५६ ९६ ४।१० ૨૪૪૪ ३ (१॥२॥१ २४११1१1१1१ २८ ५३२१ १२।११।११ ५ २।१1१1१।१ . १ १ ५ ११ मोहनी कर्मना बंधस्थानके उदयस्थानादिनुं यंत्र. उदय चोवीमी उदय भंग संख्या बंध मोहस्यवधा भांगा उदय स्थानक स्थानव उदय स्थान पद २८८ उदय स्थान पद वृंद ६९४७ मोहस्य सत्ताधानक २१ २२ ४ ७ IVICIS २ ५॥६ ४॥३३॥१८२४१७२।७२।२४ १९२ ॥२४॥२७१.६८१६८1५७६१६४८२४०1११३२१२८।२वारण६२८॥२०॥२६॥ २८/२०१६ ३ १४२११ ४ २४|४८/२४ ३२१६०३८२१६ ४१५२१२/२४।९।१२०1०८/२८८ २८11०11८९२१४४१७१९:०४३२.२२०८२८२४॥२१॥२८॥२७॥२॥२३॥ २२।२१।२८।२॥२४॥२३॥ २२॥२१॥२८॥२॥२४॥२३१२२ ४३३११/८२४१७२।७२।२४ १९२५॥१८॥२११८५२ १२०४३२१५.०४।१९२१२४६२२१२१२८२७॥२४॥२३॥ २२॥२१॥२७२७॥२४॥२३॥ २२२२११२८१२७२२३३२२ ३३१/८४१२२७२।२४ १९२ ॥१५॥१८१७ ४९६३९०४३२११६८ १०५६/२४।२४।२१।२८।२४।२३।२२। २१।२८।२४।२३।१।२१ २८॥२४॥२३॥२३ १ . १२ १२ २४ (२८१२४।२१।१३।११११ डा५६७ है ४ ४ २८२१११११५४४ . ३ ३ २८/२४१२१३ २८॥२४॥२१॥३॥ . . २८॥२४॥२१॥२॥१ १ २८॥२४॥२१ . २८॥२४॥२१ [२५६] ६२ मार्गणाए गति- . माग गति ४ ; जानि ५ कार योग बंद नान५,अज्ञान, कपाय ४ कुल, १नग्गनि पत्रदिय ब्रम 1 नपुसक नान, अनान त्रम । खी पुरुष टेवगत ममुख्यगति ४विश्वगति पहिर पहिब नान, अनान, ५मान, अनाना ३ ज्ञान,३अज्ञानी १ B . . जाठिब अनिर्वच सविना' गायोग नपुमक अज्ञान दीडिय विश्व १ १त्रन बचन तया नान, अज्ञान " ऋाय पत्रीन्द्रिय पनिांच १त्रम नुपिदिय नियंत्र १ त्रम 'पहिर १ 1प्रम 1. पृथ्य काय तियत्र । एकठिय 1 पृ. बान,२मनान । बान, अचान ज्ञान, अज्ञान २अनाम १ काययोग : नपुंसक . १ भ. अभय पतियत्र जग्गा नियंत्र बायकार निर्यच वनतिचाय १ वियंच ६ अनान २ अन्नान १ वा १व ३ अमान । अज्ञान १ 8 WAN 00 ज्ञान,३ अमान नान,३ अनाना जान,३ अजान ३ ५ज्ञान, अज्ञान १ पत्रमकाय ४ एवंटिविना त्र मनोयोग १ पढिय त्रम २५श्चन्ग एकड़ियबिना 1 त्रस harग दुषवंद नागकी पहिर बिना विट अनारकी पडिय १ श्रम बिना मनमाड देवता । विना ३.क्रय नान, अज्ञान . . नान, अजान - १ ५ बान, अमान ३ ४ान, अज्ञान मान माया गन १ '१ जान. मनिजान पचंटिय बा: त्रस एकेडियाविना, अनुमान १ अवपिनाम "मन पविजान मनुष्य " पंच. " 1 पत्र " मंचलन - 'बत्नान ३ " जाति विगेरेनु यंत्र. [२५७] भव्य अ- संयम ७ दर्शन ४ मनी -आहागभ सनी ना हार्ग २ मम्यत्व शरीर ५ पर्याप्ती प्राण ६ - अविगति १ सना क्विन्दन दिना वैत्रिय, तजम कार्मण १ अविरति " P २ १० आहााकविना देगविगत,अ- केवन्टन २ विरति विना १ अविगति १ अक्ष ४ मास्वादन, १ अमंजी | मिथ्यात्व आहारक विना बक्रिय बिना औदारिक -५ १ अविगत १ जम, कार्मण . १ अविगत १ अविरति चक्षु, अननु' १ , " १ भविगत भोटासिक १ अचक्षु - माम्बादन, १ अपनी । मिथ्यात्व, १ मिथ्यान्व जग, कार्मण : १ " ” १ १ १ " १ माम्बादन, मिथ्यात्व, आहारक विना 2 ओगरिक कार्मण । जम, : . 15 १० १० १० १० . १ संजी. .0- १ • आहारक विना महमपाय प्रधाग्यात विना ८ परिहार विशु- वि बिना पुरुष वेद प्रमाण सदममषमय: केवळ विना : याख्यात विना 10 . 0 , १० १० १० यथास्यात विना १० १ भब्य उपशम,क्षयो। संझी २ पशम,क्षायिक ७ ३ १ १० १० १ ३ ३ १ , ५ अवि-निदेशक विरति विना १ यथाख्यात केवन दर्शन कार्मण शरीर विना ३ औदारिक त 10 १ क्षायिक २ १ जम कार्मग [२५८]] ६२ मार्गणाए जाति मार्गणा गति जाति ५ काय योग वेद । शान ५, अज्ञान ३.. पाय४ ३१ मतिभनान ३ ३२ श्रुतअज्ञान विमंगज्ञान ३४/सामायिक चारित्र १ पचे. त्रम १ मनुष्य १ ४सज्वलन " १ १ " ३५ छेदोपस्थापनीय २६/परिहारपिशुचि १ १ १ . " तीवेद। विना १ १ १ लोभ " सूक्ष्मसंपराय यथाख्यात दिशविरति १ १ " 17 १ २ मनुष्य १ तियच ५ २ चतु०प०१ प्रम mor अविति चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन ४३अवधिदशेन M Mmm १ पचेंद्रिय १ त्रस केवलदर्शन १ मनुष्य . " ५ कृष्णलेश्या AW reनीलोया THIS IT M ru/कापोतलेश्या तेजोलेश्या ३ नरकग-२ एक.प.०४ तेज-का- तिविना यविना पंचे १त्रस B १ ६ ६ १ घस पछलेश्या ५० शुक्ललेश्या 1५१ भव्य ५२ अभव्य ५३ उपशम सम्यक्त्व पंच AMWAL १ पंचे। ५४क्षायोपशमसम्यक्त्व ४ " १ ५-० १ " ३ ज्ञान मित्र ५५क्षायिकसम्यक्त्व ५६मिश्रसम्यक्त्व ५७ सास्वादनसम्यक्त्व ५८ मिय्याव ५९/सी असशी १ पचं. १ त्रस २ मनुष्य तियच १ नपुंसक ६१ आहारी ६२ अनाहारी ४-० ४- जाति विगेरेनु यंत्र. [२५९] संज्ञी२ १० पशम, क्षायिक WWS भव्य अ- संयम ७ दर्शन संजो अ-आहारो भना- पर्याप्ति प्राण सम्यत्व: भव्य २ शरीर ५ हाग २ अविरति २ चक्षु,अचार ३ मिथ्याल, आहारक विना मास्वादन,मिश्र २ १० ३ २ १० सामागिक,हे. केवळ विना उपशम भयो १ संबी १ आधारी ४ कामणविना 1. टोपस्थापनीय प रिहार [१ भव्य १० 1 ३ १ ३ ओटारिक, त १० जस, कामण १ २टपशमक्षा०/१ ६ १ १ २ ६ केवळ विना ३ उपशम,म.१ १ आहारी ६ १० योपशम क्षा माहारकविना १० १ आहारी १० . R: १ १ " " " . uru ७ " १० ३ केवळविना १ भव्य उपशम,क्ष-१ संजी २ योपशम, . केवळ १ १ १क्षायिक ३ आहारक, ते- १० जस, कार्मण २सक्ष्म, यथा- केवळविना ख्यातयिना ६ १० ३ E १० " १ संजी १० १० ur १ " ७ १० ८ आहारकविना ६ ur " 1१० १० १ ६ २ १ अविरत २ चक्षु,अचा१ भव्य मिथ्यात्व २ । परिहारविशु- केवळविना १ अभव्य १ १ सही र दिविना ५मृत्म, यथा-३ १भव्य १ ख्यातविना १ १ १ १ अविरति । केयनपिना १ १ आहारी १ २चक्षु, अचक्षु १ १ R २ १ १ अविरति २चक्षु, अचक्षु २ मिथ्यात्व, १ साचादन २ २ अविरति, य-३ चक्षुविना २ ४ उपशम, थाख्यात मिश्रविना ४ आहारकविना १ १० १० १० ४ आहारविना १ १ १ कामण दडक २१ རྒྱབ་བམ་འགའ་ मज्ञा योग १५ ३ पहेरी लेश्या: धर्म यान . ...... ur ८ and रामुख्यात सस्थान जीवाजोनी कुल कोटी मार्गणा यान १६ । टि ३ जीव- गुणस्थान उपयो. अवगाहना ८.० स्थानी १९७६००० १४ अल्पायहुन ग १२ नरकगति हुडक. ४०००० २५०००००,५०० धनुषनी अ-२ असख्यानगुणा वगाहना नना पहेला पायासहित देवगति ८-९ ५ आहाक मम ३ १३॥ ४००० २६०००००सात हाधनी ६ केवळविनाचतुरख ३ मनुप्यगति १६ १ १४० १२०००००त्रण गाउनी ३ १५/१२ ६ सर्वयी तोक तियंचगति ४ ५ आहारक १६२०००००१३४५००००हजार योजननी १४ ५ १- धर्म-४ किवळविना याननाप- हेलापा यासहित अनंतगुणा ४ ५ एद्रिय ४ अहारक/पहुंडक मिथ्या५ ५२००००० ५७००००० हजार योजनथी । कवळ, ते अधिक जसविना दोन्द्रिय ४ श्वेदनी,-1 ११-२ २००००० ७०००००वार योजननी ३ पाय,मरण विशेषाधिक ४ १ १-२ १ २००००० ८०००००त्रण गाउनी २ चनुमिन्द्रिय १ १ १-२ १ ९०००००चार गाउनी 6 ४-६ ९ पचेंद्रिय १६/२६०००००११६५०००० इजार योजननी ४ १५.१२ मर्वयी स्तोकी १०वीकाय १ १ मिथ्या १ ७००००० १२०००००अंगुलनो असंख्या दृष्टि त माग विशेषाधिक ३ ११/अप्काय १ १ ७००००० अगुलनो अ० भाग। १०नेजस्काय १ ३०००००अंगुलनो अ. भाग४ १ ३ असं० गुणा २ १३|युवाय 18-. ७००.०० अंगुलनो अ० भाग १ ५ ३ ३ विशेषाधिक ५ १४ानस्पतिकाय ८-. १२४००००० २८०००.०हजारयो. अधिकार २ अनतगुणा ६ १.मक य १६ १९३२००००-१४०५०.००हार योजन १ १४ १९/१२ ६ पर्वधीनोक १६ रनोयोग १४-१५ १६२६०००००११३५०००० हजार योजन १ १३/१२ १.वपनयोग १४-१५४ १९३२०००००१४०५००० हजार योजन ५ १३१२ [२६०] . ८- 3 ७..... ७..... . ७..... m mpM.22 १ " असं० गुण 11 : 1:܂ 4 g fcri- ܀ ܕ ܕ ܙ ܀ ܝ ܙ ܙ ܕ ܀ ܐ ܘ ܙ܀ ܘ ܕ ܕ ܙ ܙ ܀،، ܙ ܫ ܕ ܕ ܀ ܙ ܪ ܢ ܐ ܝ ܐ ܐ ܀ ܙ ܪ ܀ ܙ ܙ ܀ ܙ ܠ ܐ ܕ ܙ ܀ ܕ :ܕܐ ܝܝܝܪ ܪ ܕ ܫ समुद्घात संस्थान मार्गणा ध्यान १६ सज्ञा loban दृष्टि ३ दडक २० रोटी जीव गुणस्थान-उपयो स्थान१० १४ ग १२ लेण्या : जीनाजोनी कुल कोटी अवगाहना १९७६०००० १ मम-१ ११० .. १२०००००/५०० धनुष भल्पाबहुत्व ७ सख्यात गुणा ११८००००० १२०००.०५.० धनुष (१ १ मर्वस्तोक १ परिवारविशुनि,४ धर्मनार ७ आर्तना ३ सहित ३५सश्मसपराय १शुक्लन्या४३-२ ननो पहेलो पायो ३८यथाख्यात शुक्ला Fনা ३९दिशविरति आत १ ११४००००० १२०००००५०. धनुष १ संख्यात गुणा३ १८. ६५५०००० हजार योजन ११६ " अम० गुणा ३ १० धमेन पहेला २ ४.अविरति २४ ४ '४ १९७५००००हजार यो० अधिक ६ अनतगुणा ७ [२६२] चक्षुदर्शन ९ धर्मनी पहेलो १४ छार वे पिना yf १७२८० १२५५०००० हजार योजन २४८४० ०००/१९७५०...हजार यो अधिक १ सम-१६/२६०००००११६५०००० हजार योजन १२ १३० असं० गुणा २ १५/१०६ अनंतगणा । मर्वस्तोक १ ४२/अचक्षुदर्शन ३ १२ अवविदर्शन . ४४ केबलदर्शन २ १ केवळी ४५/ष्णलेल्या १२ शुवल-४६ १ १४००००० १२०००००/५०० धनुष १ २२,८४०००००१९७५००००हजार योजन अ०१४ २ २ ६-४ १५/१० . १ अनंतगुगा / १ विशेषाधिक ६ विना " नीललेश्या ४७/कातलेश्या १२ ४८तिजोलेश्या १२ ४९/भलेश्या ५० शुक्ललेश्या १४-१५ २२८४०००००/१९७५००००हजार योजन अ०१४ २२/८४०००००१९७५०००० हजार योजन अ०१४ १०४६०००००१३८५०००० हजार योजन ३ ३२२००००० ११५००००बजार योजन ३ २२००००० ९१५००००हजार योजन १५/१० १५/१० १५/१० १५/१० १५ अनंतगुणा १ अमं० गुणा ३/ १ असं० गुणा २ सर्वस्तोक १३ . १५० १६-१४ ....१९७५.... २४/८४०००००/१९७५००० हजार योजन अ०१४ ६ १५ (५१ भव्य ६ अनंतगुणा २१ १ मिथ्या २४८४००० १९७५००००हजार योजन अ०१४ १ ५३अभव्य सर्व-तोक १ . १६२६०००००११६५०००० हजार योजन १ मख्यातगुणा २ ur १३२६० हजार योजन असं० गुणा (५३उपशम १३ शुक्लना३ सम्यक्त्व पहेला पा- या सुधी ५४क्षायोपशमस-१२ म्यक्त्व ५५/क्षायिकस- म्यक्त्व ५मिश्रसम्यक्त्व -- ४ ७३०००००छ गाउ ११ अनतगुणा ५ १६२६०००००/११३५००००हजार योजन १०६ जिल्यात गुणा३ ५-३ |१३ ५ २२/५६०००००१८७५००००हजार योजन ३२००००० ५५सास्वादन- सम्यानरव ६ मर्वसोक १ [२६३] २४८४०.०००१९७५०००० हजार योजन अ०१४ | अनंतगुणा ६ ५वामिथ्यात्व १६-१४ - १६२६०००००११६५०००० हजार योजन ५९ सशी १४ १५.१२ २ ३ सवन्तोक ur ६.असंज्ञी १४६५०००० हजार योजन अ०१२ ४४ २ छेच१ मिथ्या १० १ हुडका१छे ४ अनंतगुणा २] ३१माहारी १४-१५ २४ hva १९७५००००हजार योजन अ०१४ १३ १५/१२ अस० गुणा २१ १०-८-२ ६२ अनाहारी १वज०२ सम-२४,८४० १९७५०००० लोक प्रमाण सर्वरतोक १ मिथ्या मयोप- औदा-परिणा-मानि- मार्गणा मळबघ "बंध हे- मीथ्यात्व ५ अविरति १२ कपाय १५ योग १५ मूळ भाव ५ उत्तर भाव ५३ क्षायिक भाव त्रीक-चतु पंचसं. जोगी संजोगीमजोगी जोगी मिक पातिक भागो भागो भागो भागो भाव ७ मो९-१०४-५ १ शम भाव मार १८ सनिपातिक १५ भाव २ ६ २१ । नरस्गनि १३ ३ . ३ देवगति ११ १५ १० ३ -११-१ . । -- ३.मनुप्यगति तियचगति ५७ १८ १-११-१ ९ १८ ११६ mmM ५एवं द्रिय १४ १३ ३ - 13 घे वेद ११५२३१ विना १२ २४ नपुंसक ११५३७१ वेदविना १२ १५५ ५०२ (५ १२ १३५३९० अना-७ चार इद्रिय ५५० भोग तया एक मन बिना ८ व्रण इद्रिय (२४० तया एक मना विना ९ वे इंद्रिय तथा मन विना १. एक इद्रिय, २३ तया एक मन विना १४५ १ मना- २५० भोग २३ २६४] ३७ ३ .-. १ 1१३ ! (५७ ५७३ ९१८ १-४४-४ १ १०वीकाय १४ १ . ७ ३ ११अपकाय १३निजस्काय १३वायुकाय १४वनम्पतिकाय ५चमकाय १६मनीयोग ५३ २४ २५ १३ " १ १२ 1१२ १५५ १८ १४ २१ २१ १४ ४ १-४४-४१ 1१४ १४ . 1१७वचनयोग १८/कार्ययोग १९ पुरुपवेद २०खीवेद ११/नपुंसकवेद २२/कोर ९ १८ २१ ९ १८ २१ १ १८ १८ १ १८१८ १ १८१८ १ १८१८ mmmmm ४ ०-३३-३१ ०-३/३-११ ०-३३-२ ०-४ ४-४ १ (५५ ४ १३ २३/मान १ १८१८ . ०-४४-४१ २४ माया [१२ १ १८ १८ ३ १३ २५लोम ५ १ [१८ १८ |१२-११ मन २५ १३५ ५३ १२ विना २५ १५५ १२ १५५ ४२२ १२ ४२२ १२ २३ १५/५ ४२ १३ क्रोध चाग१५/५ ४२ २ नवनोक्षाय १२ १३ मानचार |१५/५ ४२ २ नवनोक्षाय १३ माया चार १५५ ४२ २ नवनोपाय १२ १३ रोभ चार १५/५ ४२२ नवनोकपाय १२ २१ अनंतानु-१५/५ ४०२ बंधीविना १२ २१ १५५ १२ १५/५ १३ सज्वलन०/१३५ नवनोकषाय १३. ३४. १२ १२ १३ १३.५ ३४ २ ३ ०-४४-४१ २६मविज्ञान १८ २ |१५ १९ २ . ०-४४-४१ १३ - ४८ २७भूतज्ञान २८ अवधिज्ञान २९मन पर्यवज्ञान र २ १५ १९ २ १५ १९ २ |१४ १५ ०-४४-४ १ ०-४४-३ १ १३ १२ [२६५] 0- ०-४ . ३.विज्ञान ३१/मतिज्ञान ३२ शुतअज्ञान ३३विभंगज्ञान मामायिक चारित्र ३५दोपम्याप नोय ३६परिहारविशुबिर ३ १० २१ १० २१ १० २१ १ 11४ १५ ४ १२६ ०-११-१ १ २६ १ १४ १५ ४ . ०-११-१ २१ . २ ३-२ . -१ १-१ -१०-१ ३७सूक्ष्मसंपराय १० १२ संज्वलन४९ -४३२-19-०११४ १४ आठ नोपाय १ सज्वलन १५ २२२ होम २८ २ १२ ३ यथाख्यान ११ 19-०.१-११ योग १५ --मृळ भाव ५ उत्तरभाव ५ साविकभाव 'सनिपतिमा ३ 17 १३, A ३ 14. . , . १२ १२ O गाभाट परिणा-मानि- fa Fम श्रीन पनमः मार्गणा मकरम उपशम मीभ्यार चाहे- शम शिक अविरति 10 पाय २५ जोगी जोगीनोगी जोगी मिपातिक गार मार भाग भागो भाग भागो भार १८ ७ मो५-१० १ शरिति ११घसनी अ-11पहिली बा११५ ११३ निगतिविना बोकडीपिना अविति १२ १३.११ 103 ३ दशन ५ ३ 13 अन दर्शन १२ ६२ 1१८ २१ 13 /र्शन १२ २१ त्रिलदर्शन ३.13). १ I/Sणलेल्या 10 १५५ ३०१ १८ नील लेश्या ५७ २५ १५५३५१ 11 कापोतलेशा १/१८ ११ तिजोलेल्या १२ १५५३८१ ११० पभलेल्या १२ १५/५३०१ १८ ३-२ शुजलेश्या १२ २५ १५५७२ ९३८ १-३३-२३ १० (५१ भव्य १५५५२२ २१ १-41-80 13 ५३/अगव्य ११ २१ ५३/उपशम स० १३ १३/५३८२ ५ बायोपशमम १. २१ १९ ५५/क्षायिकम ३ 64 १५५ ८५१ 1-0०.४१ ५६मिश्रगम्यत्व १२ १०३.३. १२ ५७माम्वादन स- १२ 10 ५८मियात्व ५५ १० १३.३३ ५१/मशी १५५ ५३/२ ११८ १-४-४१ १३ ६.अशी ११ मननी २३ ६३ २६० ९ १५ रितिरिना ६१/आहारी ५७ ५ १५/५/५३/३ ९ १८ १-४ ६२/अनाहारी ३-३३ ५ १२-६ lg lr lela १. २१ १ 13-४१-४ ११ [२६६] २१ . . १२ -6 . A अध्रुव-पगवते पुण्यवंध पापबंध धुववध प्रकृति प्रकृति प्रकृति व प्रकृति अपरावर्त शनावरणी मोहनीय आयुकई नामकर्म दर्शनावाणी विदनीय प्र प्रकृतिबंध प्रतिबंध प्रकृनिबंध प्रकृतिबंध कृतिय प्रकृतिबंध प्रकृतिवध पकृतिवध २९ ५ ७ मार्गणा अतराय गोत्रम प्र. कर्मप्रकृति कृतियब २ ८२ ७१ (५४ ७२ २६ ८२ . ८१ २६ ४७ ६० ६२ ८१ ८१ ८१ ४७ २ २९ २९ २९ २८ २८ २८ २८ २८ २९ २८ २८ २८ २८ २८ २९ २९ २९ २९ R: २७ [२६७] ४७ ३२ ८१ ५८ १/नरक्गनि २देवगति ३/मनुष्यगति तियचगति ५एवेंद्रिय ३४ द्विन्द्रिय ३४ चतुरिन्द्रिय B४ पंचेंद्रिय ४२ १०पृथ्वीकाय ३ ११ अपकाय १२ तेजस्काय ३० १३ वायुकाय १४ वनस्पतिकाय ३४ १५त्रिसकाय ४२ १६मनोयोग १७ वचनयोग ४२ १८पाययोग १९ पुरुषवेद २०खीवेद ४२ २१नपुसकवेद २२ क्रोध २३.मान २४माया ४२ २५ लोभ ७७ ६ س و ا م ا س س . س ه ه . س س س س س س س س س س سه ५८७ १ JUSout urur ४७ ७३ न ४७ ८२ ८२ 1८२ ८२ ४ १२ کک ک ک ک ک ک کو २६ २६ مد ' ४७ CG८८८८ ४७ ८२ ८२ ८२ ८२ ४७ ९१ ९१ २९ 22 ૮૨ गोत्रकर्म अतराय कृतिष २ कर्मप्रकृति बघ ५ ४ ३३ १ १ ४४ २८ ८ My My my ma کک و یک २६६६०२ لا ت م ت م ل م ل ل पुण्यवध पापधधुववंध परावर्त अध्रुव अपरावर्त ज्ञानावरणी मार्गणा वेदनीय मोहनीय माथुकर्म | नामकर्म दर्शनावरणी वध प्रकृति प्रकृति प्रकृति प्रकृति प्रकृति वध प्रकृतिवध प्रकृतिबंध प्रकृतिवध ९ प्रकृतिवध प्रकृतिवध प्रकृतिवध प्रकृतिबंध ८२ २९ ५ २ ७३ २६ २६/मतिज्ञान ३९ ५१ २८ १९ २७ श्रुतज्ञान २८ २८ अवधिशान ३९ २६ मन पर्यवज्ञान ३३ ३१ २८ ११ ३०किवळज्ञान १ १ ३१/मतिभज्ञान २८ ३२ श्रुतमजान २८ ३३ विभंगशान २८ ३४सामायिक २८ ११ चारित्र ३५छेदोपस्थाप- ३३ ११ १. नीय ३६/परिहारवि- ३६ ३१ ३४ २८ 119 १ 1३४ 6 १ ८ १ [२६८] शुद्धि १४ १४ ३ ३ १ . १५ २८ २९ on w ३२ دو و می ४७ प्रम" ८२ ३७मूक्ष्मसंपगय ३ ३८ यथाख्यात ३६ दशविरति ४० अविरति ४१ चक्षुदर्शन ४२ ४२ अवक्षुदर्शन ४२ १४३ अवधिदर्शन ३९ ४ किवळ दर्शन ४५/कृष्णलेश्या ४६/नीललेश्या ४७/कापोतलेल्या 60 ४८ तेजोलेश्या १७ २८ १ . १ ra ir rom mirr و کوک ८२ ४७ ८९ 1८२ २९ २९ ४९,पद्मलेक्यो ४१ ७१ ६ ७९ २९ ५ २ ३ २ ६ ३ ५० शुक्ललेल्या ४७ २६ ३ 1 . ५१भव्य ७३ ९१ ૨૬ . २ १२ . ५२ अभव्य [२८ مو مو مو و . ५ उपशम स. १३७ ४९ २८ ५ ५. शायोपशमस०३९ २८ ५५ क्षायिकस. ४ 1१८ ५६ मिश्रसम्यक्त्व ३४ १७ २७ ३६ [२६९ ५७सास्वादन स०३८ २७ १ ५१ ५८ मिग्यात्व 1४७ २८ ५९ संझी १३ ८२ ५३ ११ २९ मसजी ४७ ७० २८ M__M (६१.आहाही ४२ ७३ २९ ५ ६२ अनाहारी ૮૨.

मिथ : अविरति देशविरति अप्रमत्त . . . 1 , . . D . ... - धविच्छेदाबंधनी ओष सश्मरा उपमा- क्षीण सयोगी अयोगी मार्गणा मिथ्याव साम्पादन प्रकृति प्रकृति १२० अपूर्वकरण अनिात्तिारण पगय तमोद| मोह केवळी फेरळी नरकगनि १०. जिन ६ माम विना २ देवराति १०४ १०३ जिन ७०/७२ नाम बिना ३ मनुष्यगति १२. ११७ जिन १.१ ६९/७१६७३ ५९ ५८1५६५६५६१.१२. 10 नाम, आहारक 1५८ ५६॥५६॥२५॥ १९।१८ विना ४नियंचगति ११७ ११७ ५/एद्रिय ११ १०९ १०९ त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय ११ १०९ १०९ पंचद्रिय १२० 999 १०१ ७४/७७३७६३ ५९ ५८१५६५६५६॥२२॥२१॥२०१७ ५६५६१२६ १९.१८ १०वीकाय १०९ १०९ ११अपकाय ११ १०९ १२ तेजस्काय, १०५ १०५ १३ वायुकाय 1१०५ १४ वनम्पतिकाय, ११ १०९ १५त्रसकाय १२० ११७ १०१ ७४/७७६७३३५९ ५८॥५६॥५६॥५६॥२२।२१।२०१७ ५६२५६१२६ १९1१८ १६/मनोयोग 1१२० ११ १.१ ७७६७६३५९ ५८५६०५६०५६।२२।२१।२०१७ १८ ५६१५६१२६ १९.१८ १७ वचनयोग १२० १०१ |७६७६३५९ ५८।५६५६१५६२२।२१।२०१७ ५८ ५६०५६।२६ १९114 १८ काययोग १२० १०१ |७४/०७/०६३५९५८1५६२५६०५६।२२।२११२०१७ ५६१५६२६ १९१८ १९ पुरुषवेद १२. ११७ १०१ ७४/७/०६३५९ ५८५६०५६॥५६॥२२॥२१॥२०॥ luc ५६५६२६ । १९१० [२७०] 0 . . . . . . . २२।२ २२३ १ | २०वीवेद १२० 1१०१ . २१ नपुंसकवेद ११७ १०१ . २२मोध . १२. ११७ ७४/७७६७६३५९ ५८ ७४/७७६७६३५९ ५८ ||७६७६३५९ 1५८ |७४/७५६७६३५९ ५८ ७४/७७६७६३१५९ १०१ २३ मान १२० ११७ ।२४ माया १२० ११७ १.१ ५८५६५६५६२२१२०1. ५६.५६.२६ १९1१८ ५८.५६१५६१५६२२॥२१॥२०॥ ५६॥५६॥२६ १९६१८ ५८1५६॥५६॥५६॥२२॥२१॥२० ५६॥५६॥२६ १९१८ ५८३५३५६१५६२२२२१२०० ५६१५६१२६ १९११८ ५८१५६२५६०५६॥२२॥२१॥२०॥ ५६५६२६ १९१८ ५८१५६५६१५६२२॥२१२०/१७ ५६५६।२६ १९.१८ ५८१५६॥५६॥५६॥२२।२१।२०१७ ५६०५६।२६ १९.१८ ५८५६०५६।५६।२२।२।२०१७ ५६५६२६ १९.१८ 1५८१५६॥५६॥५६॥ २२।२१।२०१/१७ ५६२५६।२६ १९.१८ ५८१५६१५६०५६।२२।२१।२०१७ ५६१५६२६ ११1१८ . २५ लाम १२० १०१ ७४/७७६७६३५९ ५८ ७०/६७/६३/५९ ६ मतिज्ञान . २७ श्रुतज्ञान 1४१ १ १ . २८ अवविज्ञान ४१ ७७६७६३५९ 1५८ ७७/६७६३५९ ५८ ६३५९ ५८ २७१] २९ मन पर्यवज्ञान ५५ . . ११९ १ . ७४. ३० किवलज्ञान १ मतिज्ञान |२२ श्रुतअज्ञान ३३ विभगज्ञान ३४मामायिक ११७ ११७ ११७ १०१ १०१ १०१ ११७ ११७ ६५ ७४ ३ ५५ ७४ . . ६३५९ ५८1५६२५६॥५६॥२२॥२१॥२010 ५६१५६२६ १९.१८ 1५८।५६१५६॥५६॥२२॥२१॥२०॥ ५८ ५६०५६।२६ १९1१८ ६३५९-५० . . . . ३५ छेदोपस्थाप ५५ नीय ३६ परिहारविशुबि ५५ ३७ सक्षमसंपराय १०३ ३८ यथाख्यात ११९ ३९दिशविरति . ... . . . 19 ຮູບຮ່າງ भनिरोपिनी भोग प्रकृति प्रकृति १२० मिग्याप सातादन मिम अविति देशविरति अपनत्त अपूकरण अनितिकरण गरी उपशा- क्षीण योगी अयोगी पराय रागोह | मोह कियळी कियली . . . ७ १०१ . 2 . ११८ ४० अपिरति क्षुपर्शन १२. १०१ ७४७७६७३५९५८1५६५६१५६२२।२१।२०१७ ५८ ५६५६२६ १९1१८ भगक्षुदर्शन . ११७ १.१ ७४ ७७६७६३५९५८५६०५६॥५६॥२२॥२१॥२०१७ ५६.५६१२६ १९1१८ ५८ . . अवधिदर्शन विळदन ११९ ७७६७ १६३ ५९ ५८1५६५६५६॥२२॥२१॥२०१७ ५८ ५६/५६।२६ । १९1१८ क . " [२७] परुणलेल्या १०१ ७४.७७६७१६३ . ४६लीललेश्या . 10 . ११८ ४७कापोतलेश्या २ ११८ १०१ . . तेजोलेश्या १११ १०१ ७४/७६७६३५९-- . १०० ९.पंधश १०१ ५० शुक्ललेश्या 06/७/६७.३५९-. -1५८ 0/0/६७६३५९ ५८५६०५६१५६||२२१२१२०१७ ५६.५६१२६ १९1१८ ४७७६७/६३ ५९ ५८०५६५६१५६२२।११।२०१७ ५८ ५६१५६/२६ १९१८ ५१ भव्य ११७ १०१ ५अभव्य ११७ ११७ . .

५३ उपशम स-४३ ५ ० (७५/६५ ६२ ५९ facraegera . १५६५५६६/२२।२१।२०१७ ५६॥५६॥२६ १९1१८ म्यकत्व ५४क्षयोपशमस-४१ ७७६७६३५९- ज . ५५भायिकस- ७९ १ . ५८ ७५/७६३५९ ५८॥५६॥५६॥५६॥२३॥२१॥२०१७ ५६५६/२६ १९६१८ (५६ मिश्रसम्यकत्व ३ ७४. १०१ . . . ५७सौम्वादनस-१९ म्यकरव [२७३] ५८ मिग्याल्व ११७ . . ५९ संझी ११७ १०१ १ १ i७४७७६७३५९ १५८१७६३५६०५६।२२।२१।२०1१७ ५६/५६१२६ १११८ (असंही ११०१ . ६१,आहाग १०१ ४४७७६७६३ ५९,५८५६०५६५६।२२।२१।२०१७ 1५८ ५६५६२२६ १९११८ 1 (६२ अनाहारी ११२ ११७ , . . . .

मार्गणा पुण्यप्रति पापप्रकृति उदय २७ क्षेत्रवि- अध्रुवोदयी भवविपाकी जीवविपा- पुद्गल- पाकी विपाकीत- प्रकृति उ प्रकृति की प्रकृति प्रकृति कति उदय दय १५ उदय ४ उदय ७८ उदय उदय ४२ उदय८२ यम प्रकृति उदय ४४ ध्रुवोदयी प्रकृति नाममै गोत्र-मंतरा- प्रकृति में यकम प्रकृति प्रकृति उदय उदय उदय५ १ ३३ १ ५०-५२ २ ५९-५६१८ ६३-६९१४ १ ७ 712"Tदर्शनावरण प्रकृति N ०८ १ Gmm.. . ५३ 6 ४ ६० . २. २. २८ ३४ ८७ ५२ १ १ ५०-४९१ 1५८ ५८ ३२ १८ २८ १ ३१ [ane] १ १ नरकगति ५८-६१ दवगति ५५-५२ २७ ३)मनुष्यगति ३४-३६ ७० नातियचगति ३०-३२७९ २१-२२३ द्वीन्द्रिय २३ २७ ७त्रीन्द्रिय २३ चतुरिन्द्रिय १३ पंचद्रिय ४१ २७ १० ग्वीकार्य २१ २७ ११अपकाय २७ १२ तेजस्काय 1१८ २७ १३वायुकाय १८-१८ ६२ (२७ १४ वनस्पतिकाय २० ६३ २७ १५त्रसकाय २७ १६)मनोयोग २७ वचनयोग १०/काययोग ८२ २/पुरुपवेद १०तीवेद २१ नपुंसकवेद ३८ २२कोष २७ २३मान २७ २४माया २५लोभ २६ मतिज्ञान २६ و روی مو مو مو مو مو مو مو مو موم १ २९ २९-३० २४ २४ ५८ १९ ક૨ ތ. 1 . ޅެ ޅޭ ޅު ދޫ ޅޅ 5 5 ८२ ७४ २८ २८ २८ GG4 + ७. ३२ ६८ ७४ ८. va ८२ १६ १६ १६ 22 ૮૨ ૮૧ ६५ WWW २२ ४ 138 1८० ४ ८०-०९- . २ (३४ ३१ . 1५२ '१७ २७धनज्ञान २८अवधिज्ञान २)मन पर्यवज्ञान ३२ ३० केवळज्ञान ३१ मतिभज्ञान ३२ श्रुतअनान २३ विभंगज्ञान ३४सामायिक चारित्र ३५छेदोपस्थाप-३२ ८२ ३. २-८० २७ .. 1५२ 1 . ३१ नीय " १७-५२ १ ४८ १२-३७ 1 . " १ ૨૨ ५५ १ ९२ ८२ con can २८ २८ 0.05.44 [२७५]] २६/परिहारवि- ५१-४६२१ शुवि ३सहममपगय ३० ३४ २३ यथाख्यात ३९/देशविरति |३२ ५८ ४० अविनि ८२ चक्षुदर्शन ४२ अचक्षुदर्शन १ ८२ २७ १३/अवविदर्शन . १९-६८ २६ ४४ केवल्दर्शन १२ ४५/कृष्णलेश्या ८२ ४३ नीललेश्या ४७)काशेतलेश्या ४१ २७ ४८ तेजोलेश्या ४० ७३ २७ ४९ पद्मलेग्या ५० शुक्ललेझ्या ५१ भव्य ४२ (५२ अभव्य [५३ उपशम स० ३६-३७ ६७ ८०-७९ ५६-५७ ३८ و و و و و و و و و و و و و २८ ९२-९४ ९२-९४ ९२-९४ ७७ su ८२ ४ ६४-६६ १ ८२ २८ २८ २८ २८ २८ vo WWW 40m ९५ ७८ ०५ १ ३२ २१ ५१-५२ (५४क्षायोपशमस०४० ६४ २२ .

नामर्म गोत्र- भतरा- पुद्गल- मार्गणा पुण्यप्रकृति रापप्रकृति उदय ४२ उदय ८२ क्षेत्रविन अध्रुवोदयी पाकी भवनिपाकीजीवविपा- प्रकृति प्रकृति प्रकृति भी प्रकृति उदय ९५ उदय ४ उदय ७८ उदय विपाकी प्र. कृति उदय विदनी यकर्म प्रकृति यकई प्रकृति प्रकृति प्रकृति उदय ६७ उदय २ उदय २ . ५ ५५/सायिकस. ३४ ३२ M ५६ मिश्रमम्यक्त्व ३७ १७,सास्वादन स०१० ३२ ४ ४ ५०मिथ्यात्व ८२ . २८ २७ ३ [२७६] ६० असंज्ञी ४५ २८ ६९ ११आहारी २७ ve २८ २ २७ ६२ अनाहारी ४ ममम- उपशा- प्रमत्त ८१ अप्रमत्त ७६ अपूर्वण आननुतिकरण मक्ष्मम-उपशा- क्षीण मयोगी| अयोगी पराय नमोह' माद की कार्य . ५९ १७-११ उदयवि- मार्गणा उदग प्रकृति मिथ्यात्य न्छेदक माप्यान मित्र । अविति। देश 11. ओघ १०३ प्रकृति १११ १०. १०८विपति १नरगति ४३.४६७९-७६ ७-७१ ७५-७२ ३९-४२७३-८० 1८1-७८ ..-७७ ७६-७३ ७७-७४ अमनुष्यगति ०-१८१०३-१०४९५-९९ ९५-९ ७१-९३ :९०-९. ४तियंचानि -१३१००-१०९१०५-१०७/१००-१००९१-९३ ९०-१४ ०९१०५-१.४.१००-१००४१-९३-९४८४-८ एकदिर ४२-४१/८.. ८०-८१ ७२ 10 . ८४ ८१ १२ . . . . (८२ . . .. ७४ . १०४ ८७ S १२ . . . . . . . . . नीन्द्रिय ननुरिन्द्रिय ९चद्रिय १०वीकाय 1१ अपकाय १२ तेजस्काय १३ वायुकाय ४-४५७६-७७ १वनम्पतिकाय ३ १५वगाय ११७ 1१६/मनोयोग १७ वचनयोग 1११० १० काययोग १.२ १५/पुरुपबंद ७३-७७ [२७७] . . . . ७३ . . . 11.. १७६७० ५५-५७१२ १०० १० १०. 1100 ११७ ८७ . १०३ १०३ १११ १०१ १०० 104 ५-५७० -५२ १.6 ८१७६७२६ . a 0 . नमस्वेद ११६ ११० १०५ . . २३/मान २माया २५ लोभ २६मतिज्ञान अशुतज्ञान १३ १३ '१३ १०१ १.९ 11.९ . ८१ 161 '७८७१ १९६७ '७८३३ ७८६९३ ७८७३३ ६०:३ . 0 १०४ ८. . १०६ ५७-५०० ५७-५.. ८७ १.

उदयधि- मयोगी अयोगी ul . रछेदक उन्य प्रति मिन्यात्व साम्बानन ओघ १०२/ ११४ १११ मिश्र १०० अविनि १०० मागणा प्रमन अप्रमत्त ८१ आनात्तकरण दिशविरति ८५ पूर्वकरण क्षीणमोहाली केळी उपशाक्षीणमोह' ५१४२ • सत्ममपराय ५०-५५ . ८. 9 . . . . 4 a . 0 ८१ ५ ३६६ . . . [२७८] . १३ ८ . . २अवधिज्ञान १६-१७१०६-१०५/० १०४ १०३४८७८१ २९ मन पर्यग्नान १ ८१ ८१ विज्ञान ४२-१२ .. ३१ मतिजान ११७ ११७ १११ ३२/धतअज्ञान १५ ११७ ११७ १११ १०० ३६चिभगमन १३-१५/१०९-१०७१०८-१०६१०६-१०१०० ३४मामायिक ८१ चारित्र ३५छिदोपस्थाप ४१ ८१ नोय १६/परिहारविशुबि९-४४/७३-७८ ७८ ७३७५-७० मूक्ष्मपराय 5२ ३वाययाख्यात ६२ ३९ देशविरति अविरति ३ ११९ ११७ १११ १०० चक्षुदर्शन १३ १०९ १०५ १०. ८७८१ २ अवक्षुदर्शन १ 1१२१ ११७ १११ ८७८१ २ अवधिदर्शन १६-१७१०६-१०५/० १०४.१०३/०४/८१ किवळदर्शन 1४२-१२ !. ५५ कृष्णलेश्या ४६नीललेग्रा ३-१ ११९-१११११७-११५/१११-१०९१००-९०१०४-१०२/८५८१ कापोतलेश्या ३-१ ११९-१२१/११७-११५/१११-१०५/१००-१८१०१-१०२/४७/८१ तेनोलेश्या १११ १०७ १०१ ८७८१ सपनलेश्या १०४ ९८ १०१ ८८१ ५० शुक्ललेश्या १२ ११० ९८ १०१ ८७८१ ५१/भव्य १२२ १११ ८७८१ 1५२/अभव्य (११७ सर . . . ५७ ५५, ५७ ५५/- ११. . १२ १९-१२१११४-११५१११-१०९१.०-९८१०४-१/ver १ .55 ५७-५५॥ ५७-५५/०२ 6 .

है . 5. . । 1" . . ها . 3 1५३ उपशम स-२३-००,९९-१०० म्यकत्व ५४क्षयोपशमम- १: म्यत्व ५५क्षायिकस- । म्यक्त्व (५६मित्रसम्यक्स २२ १०१ ९८ ५७ ५५० ५७सास्वादनस-११ १११ १११ ११९ मिथ्यात्व ११७ 1 . .... ४-९ ११४-११३/१०९ ८७८१ १२ १२ 1 ६०भमजी १३ [२७९] १,आहारी ११८ ८७८१ ५०-५५ । ६२ अनाहारी ८५-९० ७४-७ . . ५-११ ... ... २२ उदीरणा मिथ्यात्व मार्गणा ओष प्रकृति ११७ ११२ सान्नादन मिश्र १११ अविरति देशवि-10 १०४ रति ८७ अप्रमत्त ७३ अपूर्वकरण अनिवृतिकरण सूक्ष्मसप- राय ५७ उपशा- क्षीणमोह मयोगी भयोगी तमोह किवळी केवळी ५५-५२ ar . . . . ७३ ३ ५४-५२३ ९ a . . . . . . ११४ ६४-५२ ३ ३ 1५४-५२३ M . . मान .. [२८०] . १नरकगति ५-७२ ७२-६९ ७३-५०० २दिवगति ८३-८० ८१-७८ ८०-७७ ७६-७३ |७७-७४० ३मनुष्यगति १०२-१०४/९७-१९ ९५-१७ ९१-९३ ९२-९४८४ ८१ ४तियचगति १०७-१०.१०५-१००१००-१०२९१.९३ ९२-९४८४-८६ एकेदिय ८०-८१ ८०-८१ दीद्रिय ८२ ८२ पत्रींद्रिय 1८२ चतुरिद्रिय ८२ ८२ ९)पंचेद्रिय १०६ १०४ ८१ १०पृश्वीकाय ११ अपकाय १२ तेजस्काय १३ वायुकाय ७६-७७ ७६-७७ १४ वनस्पतिकाय ७९ १५वसाय ११७ ११२ १०९ १०४ १६/मनयोग १०३ १०० १०० ८१ वचनयोग ११२ १०७ १०० ८१ १८काययोग १२२ ११७ ८७ ८१ १९/पुरुपवेद १०८ १०४ १०२ २० स्त्रीवेद १०६ १०१ १/नपुंसकवेद ११६ ११२ १०५ २२/क्रोव १०५ १९ २३मान १०९ १०५ ८१ ७८ २४/माया १०५ ८१ २५लोभ १०९ ९१ ७८ P६मतिज्ञान १०४ ८१ . १०० .... -..JANWW ५०-५२ ३९ ५४.५२ |३९ ५४-५२ ३९ ५४-५२३९ ८७ ३१ ७८ . . Urururur . . . ५४-५२ H । 4 २७ तान अपाडान .९मन गर्गरमान मान .. + . । blikket LIEKU brukte .............! क न . 3 . . -- . . . . - D . L . , . L . 2 7 [२८१] १ . . + . गाना J नास्ति सपयार नीर ३६परिमार्गी ३-८ शुदि.. समगाय धान्यात राणी . अधिनि 31 नभुमीन 'अक्षगन 111 10. अगदर्शन 108-100. 108-1-:." केवलदर्शन 0-10 गन्या 11-11९11-11.111 100 100.९८100-100001 नीलनेच्या 101-1१110-11.111-1010.-.01.1-1.04.1 पातलेगा 101-11001.11.111-101100-01.. १....1 नेगेगा १11 पद्मालेल्या ८०, शुरेन्या 110 101 ५१मग्र १०२ ८.८1 अभय 11. In इसम म...१... बायोमगमग. । . . , . 2 . " . . 12 . . " " 2 . . . . ८ ..... . m . " , ... . ६० , เวน 4 उदीणा । मिथ्याव ओघ प्रदान ११२ सामादन १११ अविरनिनशवि. १०. रति ८७ मुश्मसप- अनमत्त ७३ मिश्र१०० अनिवृतिकरण अपूर्वकरण पमत १ मागणा उपशा. तमोह मयोगी योगी क्षीणमोह स्थिळी पकी । ११७ रति ४५ पमत ५६ | - ७८ ७५ ५क्षायिकमा . १ ६७ ७ . विश्रमम्यकत्र १०० . 20 . १11 . ५७माम्यादन म०१११ . . . ५. मिग्याल्व 13 मशा १-१ 311-११३१०९ ८७ '८१ E ५४-५० ३९ . अगनी [२८ . ./आहाग ११३ १०. . ८७ ८१ ...... . . अनाहारी -९० ८५-९० ७९-८० यामठ मार्गजनी मार्गणा सर्वधाती बंध. देशघाती आभव तत्व ४२ मंवर तस्व । निर्जरा तत्व वध तत्व मोक्षतत्व अजीब तत्त्व ९ १४ मोहनीय कर्मना उदयना मग १६, चोवीशी भागा ५७ भवत्यिति द्रव अधाती वध १नरकगति २५ "५६ १ ईयविही- १२ नी क्रियाविना ३३ • गिरोपम २वति ३/मनुष्यगति निर्यचति १२ ११त्रण कंच .. अष्टक विना ११ ५३ चोवीशी, भंग १७ ११ १२ चोवीशी ११ ८ अष्टक ११ ३ पाल्योपम 1 88... १२ " १ काययलेश १२००० वरस १. वर ८९ दिवस - . . como ११ . ८ . . mmmm [२८३] ११ ८ 0 a वोदित ग्रीद्रिय रिद्रिय पद्रिय १०पृश्वीकाय ११अपकाय १२तिजस्काय १३वायुकाय १४ वनस्पतिकाय १५त्रमकाय १७मनयोग १७वचनयोग १८काययोग १)पुरुषवेद २०ीवेद २१ नपुंसकवेद ८ ४ ११ ८ ४३ " ३ मास १५२ चोवीशी, भंग १७३ सागरापम ८ अष्टक २०००० वरम ७००० बरस ३ अहोगत्री ३००० वरस '१०००० बरस ५२ चोवीशी, भंग १५ ३३ सागरोपम ५२ चोवींशी, भंग १७ ५१ चोवीशी, भंग १७ ३३ ५२ चोवीशी, भंग १५ (३३ ५१ चोवीशी, भग १७ ५२ चोवीशी, भग १५ ५५ पल्योपम ५२ चोवीशी, भंग १७ ३३ सागरोपम ५२ चोत्रीशी, भंग १५ ५२ चोवीशी, भंग १५ ५१ चोवीशी, भंग १७ ५२ चोवती, भंग १७ ३६ चोवीशी, भगा १५ . ४२ २५ ७५ २५ log ११ ११ ५५ १२ १२ १२ १२ १२ ४ ४१ ४१ ११ २५ २३/मान २४)पायों २५/लोभ P६)मतिज्ञान " ४१ १२ 6. ११ V मार्गणा वध ४० देशपाती वर्व २५ आप्रव तत्त्व संवर तत्त्व निर्जग तत्व वध तत्व मोक्ष तत्त्व १२ ९ मोहनीय कर्मना उदयना भग २४, चोवीशी भागा भजीव तरव १४ बामठ मार्गणानी भवयिति ४ ३३ सागगेपमा 1४१ ४ Pu/भृतमान १२ अवधिज्ञान १२ २१/मन पर्यवज्ञान ३० क्विज्ञान २३ २३ १० १२ १२ ३०-३१२ अनशनने भ्यान १ ११ [११ ३६ चोवीशी, ग १७ ३४ चोवीशी, भग १७ २. चोवीशी, भग १७ २० ४ देशे उन पूर्वकोटी देशे उन पूर्वकोटा ४ १६ चोवीशी ३३ सागरोपमः १३ ११ ११ ११ । ७२ . २५ १३३ २३ १२ . THER २३ अघाती यव [२८४]] २३ १२ १२ १२ ५३ ११ 1१ ११ ३१ मतिज्ञान ३तअज्ञान ३३शविभगजन २० ३४मामायिक चारित्र ३५छेदोपस्थाप नीय ३६)परिहारविशुवि ३७सूक्ष्मसपराय २ ३यथाख्यात ३१दिशविरति ४० अविपति वक्षुदर्शन (२० अचक्षुदर्शन २० ४३ भवधिदर्शन ४४ कवळदर्शन ४५ कृष्णलेदा नीरलेश्या २० 140/कापीतलेश्या .. तेजोलेश्या धलेल्या 0 ४०-३९/१२ १२ १२ १२ १२ २. चोवीशी, भंग १६ दिशे उन पूर्वकोटी २० बोवीशी, भग १६ देशे उन पूर्वकोटी १६ अष्टक १८ माम १ भग अंतर्मुहूर्त देशे उन पूर्वकोटी ८ चोवीशी दिशेनन पूर्वकोटी २४ चोवीशी ३३ सागरोपमा ५२ चोवीशी, भंग १७ ५२ चोचीशी, मंग १७ ३४ चोषीशी, भग १७ ३ देशे उन पूर्वकोटी ४. चोवीशी ३३ सागगेपम २५ २५ १५ २३ . .. ४२ १२ ११ ११ ११ ११ १३ ११ ४४ १ ४ १ ०५ ४ " १२ ३०-३१२ ५५ (५५ १२ १२ १२ १२ ४१ " . ४८ ११ ११ ११ 1११ . ४ ०५ १२ ५२ चोवीशी, भंग १७

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मार्गणा कायस्थिति जानवग्णी , दर्शनावरणीयना विदनीयना भग ८आयुना भग २८ भग १ भग ११.१३ गोत्रकर्मना | भतराय कर्मना भाग ७ भागा २ जघन्य १ १/नरकगी २दिवगति ३मनुष्यगति अंतर्महर्त-अनतकाळ, २ ४तियचगति ५एनेद्रिय द्वन्द्रिय जत्रीन्द्रिय ८चनुरिन्द्रिय ११-१३ [२८] १०००० वर्ष-३१ मागापम १०.०० वर्ष-३३ मागगेपम अंतर्मुहूर्त-प्रण पन्योपम पूर्वीटी पृयावार अधिक अनंता परावर्त १ अत इत-अनत पुद्रल पावर्व १ पत हर्त मख्याता हजार वर्ष अत हत-संख्याता हजार वर्ष मत दर्त-मख्याता हजार वर्ष १ अतमहर्न-हजार सागगेपम साधिक २ अतर्महर्त-अमरुगात काळ १ अतमहन अध्ख्यात काळ १ अंतर्भहत-अपख्यात काळ १ अत'हर्न-अमख्यात काळ अत हर्त-अनत पुल पगवर्त १ अंतमुहर्त-बे हजार सागगेपम असंख्याता वर्ष२ भधिक एक समय अतर्महर्न ए। समय-अनमहन अतर्महर्त-अनतोकाळ अतहत-पृयश्व १०. सागगेपम एक समय-एकसो दश पल्योपम पूर्वकोटी -१ धत्व अधिक एक समय अनतकाळ १०पृथ्वीकाय ११ अपकाय १२ तेजस्पाय १३ वायुकाय वनस्पतिकाय १५/वसकाय 1४ rs.xxxsexforms_R ४ २ ११-१३ १६/मनोयोग १७वचनयोग १८काययोग १९ पुरुषवेद २०त्रीवेद ११ १३ ११-१३ ११-१३ ७-८ २८ २८ २८ १ २३ २१ नपुंसकवेद २३ ૧૦ १२८ २३/ोध २६सान २४ गया २५/नोभ २६/मतिज्ञान . ७-८ -८ ४ २ ४ अतहत-अंतर्महत भिंत इत-अत हुने अंतर्मुहर्त-अंतमुहते एक समय-अतमुहत अंतर्महत-१६ सागगेपम साधिक अतर्मुहर्त-१६ मागगेपम एक समय- सागरोपम एक समय-देशे अन पूर्वकोटी सादि अनत काळ-अनादि अनंत काळ अत इते अनंतकाळ अतहर्त-अनंतकाळ समय-३३ सागगेपम अधिक अतर्मुहर्त देशे ऊन पर्वकोटी अतर्मुहूर्त-देशे ऊन पूर्वकोटी १ २८ २८ २० २-४ १ १ -- १ १ ४. २५ श्रुतज्ञान २० अवधिशान २९/मन पर्यवज्ञान ३० किवळज्ञान ३१मतिअज्ञान ३२ श्रुतअज्ञान ३३ विभंगज्ञान ३४मामायिक चारित्र ३५छेदोपस्थाप- नीय ३६परिहारवि- शुद्धि ३ सुक्ष्मसपगय ३९ ययाख्यात ४.दिशविरति ४१ अविरति ४२ चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन ४३ अवधिदर्शन केबलदर्शन [२८७] ४ १२ '२८ २८ ४ १८ मास एक ममय-अंतर्मुहत एक समय देशे ऊन पूर्वकोटी अतमहर्त-देशे ऊन पूर्वकोटी अंतर्मुहूर्त-अनतकाळ अतर्मुहते-हजार सागगेपम साधिक अमव्य भात्री अनादि अनंत तथा भव्य आश्रीर अनादि सात एक समय-६६ सागगेषम साधिक २ एक जीव आश्री सादि अनंत सर्व जीव आश्री. अनादि अनंत अंतर्महर्त-३३ सागरोपम अंतर्मुहर्त अधिक अतर्मुहर्त-१० सागरोग्म, पल्योपमनो अस-१ ख्यातमो भाग अधिक ११-१३ ४ २४ ९-११ ४ 2. ० ४ ४५/क्रष्णलेल्या नीललेल्या २८ २८ मार्गणा कायश्स्यिनि ज्ञानावरणीय दर्शनावरणीयना विदनीयना भग ८ आयुना मग २८ भग २ भग ११-११ गोत्रकर्मना अंतराय कर्मना भागा २ अन्य ४ २८ १ ४ ४ २१ १ L २१ ५१/मव्य ११-१३ ११-१३ २ २८ + २८ ru/कापोतळेश्या अंतर्मुइ-१० सारोरम, 'पल्योपमनो असं-१ ख्यातमो भाग अधिक ४८तिजोलेश्या अनर्मुहूर्त-२ सागरोपम, पल्योपमनी असख्श १ तमो भाग अधिक ४९|पंपलेश्या अंतर्महत-१० सागगेपम अतर्मुहूर्त अधिक || ५.शुक्ललेया भनमुहर्त-३३ सागगेपम साधिक अनादि अनत, अनादि सात ५२ अभव्य अनादि अनत ५३ उपशम सम्यक्त्व अतर्महत-अतर्महर्त ५४क्षयोपशम स० अतमूहर्त-६६ सागरोपम साधिक ५५/क्षायिक स. सादि अनत मिश्र सम्यक्त्व अतर्भहूर्त-अतर्महूर्त . ५७ साम्वादनस० एक समय छ आवली ५८ मिथ्यात्व अतईत-अभव्य आश्री अनादि अनत, भव्य आश्री अनादि मन ५६ सही अंतमुहर्त-१०० पृथक्त्व सागरोपम साधिक २ ६० सज्ञी अतहते-अनत काळ वनस्पति आश्री ६" आहारी अर्तमुहत-असख्यात काळ ६२ अनाहारी एक समय-अनत काळ, एक सिव आश्री 'सादि अनंत [22] २० १४-१५ . रबदल १ २६ १ १ १ २८ रररर ११-१३ २८ २ ११-१३ १४-४ २८ १ ૨ - - [२८९] सत्तागत प्रकृतिनी समजुती. प्रथम ध्रुवसत्ताक १३० ने अध्रुवसत्ताक २८ प्रकतिओ मळीने १५८ प्रकृतिओ सचागत पृष्ठ ६० अने ६१ मे वतावेली छे. परंतु आ साथेना यंत्रमा वंधन १५ ने बदले पांच गणवाथी १४८ प्रकृतिनुं गुणस्थानके अने मार्गणाए विवरण लखेल होवाथी अहीं ते प्रमाणे समजुती लखी छे. ध्रुवसत्ताक प्रकृति १२६-६२ मार्गणा आश्री. १३० माथी तैजस कार्मण बंधन १, औदारिक तैजस बंधन १, औदारिक कार्मण बंधन १, औदारिक जम कार्मण बंधन १, (आ चार बंधन जतां १२६ प्रकृति रहे छे) (५७) गति ४, इंद्रिय ५, काय ६, योग ३, वेद ३, कषाय ४, केवळ ज्ञान विना ४ ज्ञान, अज्ञान ३, सूक्ष्म संपराय अने यथाख्यात चारित्र विना ५ चारि- त्र, केवळ दर्शन विना ३ दर्शन, लेश्या ६, भव्य १, अमव्य १, क्षायिक सम्यकत्व विना सम्पकत्व ५, संज्ञी १, असंज्ञी १, आहारी १, अनाहारी १, आ ५७ मार्गणाए ध्रव सत्ता १२६ प्रकृतिनी होय. (१२) केवळज्ञान १, केवळ दर्शन १, आबे मार्गणाए ध्रुव सत्ता ७० प्रकृतिनी होय, ते आ प्रमाणे-खगति द्विक २, वर्णादि २०, औदारिक शरिर १, तैजस शरीर १, कार्मण शरीर १, तेना ज संघातन ३ तेना ज बंधन ३, निर्माण १, संघयण ६, अस्थिर पटक ६, संस्थान ६, अगुरुलधु १, उपपाव १, पराधात १, उच्छास १, वेदनीय द्विक २, औदारिक अंगोपांग १, नी- चगोत्र १, सुखर १, अपर्याप्त १, प्रत्येक १, स्थिर १, शुभ १, स १, चादर १, पर्याप्त १, यश १, आदेय १, सुभग १, पंचेंद्रिय जाति १, (२) सूक्ष्मसंपराय चारित्र अने यथाख्यात चारित्र आवे मार्गणाए अनंतानुबंधि ४ कपाय विना १२२ प्रकृतिनी ध्रुव सचा क्षपकने होय. अने १२६ नी उपशामकने होय. (१) क्षा.यक सम्यकत्वनी मार्गणाए अनंतानुबंधी कषाय ४, मिथ्यात्व मोहनी १, ए पांच विना १२१ प्रकृतिनी ध्रुव सत्ता होय. अध्रुव मत्ताक प्रकृति २२-६२ मार्गणा आश्री. २८ मांथी वैक्रिय तैजस बंधन १, वैक्रिय कार्मण बंधन १, वैक्रिय तैजस कार्मण बंधन १, आहारक तैजस बंधन १, आहारक कार्मण बंधन १, आहारक तैजस कार्मण बंधन १, (ए ६ बंधन विना २२ प्रकृति रहे छे.)

. " . [२९०] (३४) मनुष्य गति:१, पंचेंद्रिय जाति. १, त्रस काय १, योग ३, वेद ३, कपाय २.४, पहेला ज्ञाना३, देशविरति, चारित्र १, अविरति चारित्र १, पहेला 'दर्शन ३, लेश्या ६. भव्य १, उपशम समकित १, क्षयोपशम समकित १, 1.; मिथ्यात्व, १, संजी.१,,आहारी १, अनाहारी १, आ ३४ मार्गणाए,२२ प्रकृतिनी अध्रुव सत्ता होय. (७) एकेंद्रिय:१, विकलेंद्रिय. ३, पृथ्वीकाय १, अप्काय १, वनस्पतिकाय १, आ ७ मार्गणाए तीर्थकर नाम कर्म १, आहारक द्विक २, आ ३ प्रकृति विना १९ प्रकृतिनी अध्रुव सत्ता होय. (२) तेजस्क्राय १, वायुकाय १, आ वे मार्गणाए तीर्थकर नाम कर्म १, आहा- : . रक द्विक :२, मनुष्यायु १, आ चार,प्रकृति विना १८ प्रकृतिनी अध्रुव मत्ता होय., (१९) मनःपर्यव ज्ञाननी. मार्गणाए तिर्यगायु १, नरकायु १, ए वे प्रकृतिविना २० प्रकृतिनी, अध्रुव सत्ता होय. अथवा २२ पण होय. २ ) केवळ ज्ञान अने केवळ दर्शननी मार्गणाए देवद्विक २, वैक्रिय शरीर १, आहारक; शरीर.१, तेना बंधन २, तेना संघातन २, तेना ज अगोपांग २, मनुज. त्रिक -३,. जिन नाम कर्म १, उच्च गोत्र १, आ १५ प्रकृतिनी F.. } अधुक सत्ता होय. अज्ञानमीमार्गणाए तीर्थकर नाम-कर्म १, आहारक-द्विक २, ए त्रण Fऊंजिकिना-११ प्रकृतिनी. अध्रुव मत्ता होय. ( ५.) पहेला प्रांतः चारित्रनी. मार्गणाए, तिर्यगायु '१, नरकायु १,ए वे प्रकृति विना " प्रकृतिनी अधुवर सत्ता होय. अथवा २२.पण होय. (१) अमव्यनी मार्गणाए तीर्थकर नाम कर्म १, अने आहारक द्विक २, ए ३ , विना-१९:नी सत्ता होय...' (१) क्षायिक समकितनी मार्गणाए समकित मोहनी १, अने मिश्र मोहनी १, अने मिश्र मोहनी १, ए वे प्रकृति विना २० प्रकृतिनी अध्रुव सत्ता होय. (३) साखादन समकित, मित्र अने असंज्ञि ए त्रण मार्गणाए तीर्थकर नाम कर्म विना २१ प्रकृतिनी अंधव सत्ता होय. ( ३ ) देवगत १, नरकगति १ अने तिर्यचगति १ ए त्रण मार्गणाए तीर्थकर नाम कर्मनी प्रकृति विना २१ प्रकृतिनी अध्रुवे सचा होय. अथवा २२ पण होय. H । १ . - ।

मार्गणा [२९१] ध्रुवसत्ता माधवस- प्रकृति त्ताप्रकृति मत्ता प्रकृति मिथ्यात्व मिश्र अविरत देशविरत १२६ २२।२११४८११४५/१४८1१४७१४७१४७ क्ष १४७१० ओघ १४८ सीन्चादन 1 १नरकगति . . 0 १४५/० १४ १४५० . . . . . . . 10 २२ PAL . ढिवयति १२६ २१२११५८1१४५१४८११४७१४७१४०/उ.क्ष १४७, भा १३९ मनुष्यगति १४८ १९८1१४५१४७१४७२ १४१ उ १४१ उ १४१ तिर्यचगति 1४५।१३८क्ष १४५११३८ १४५११३८ १२६ २०१२१ १४८११४७१४८1१४७१४७/१ru/s क्ष १४७ 3 क्ष १४७ . (क्षा १२८ क्षा १३८ पाएकेंद्रिय 1108 १९ १४५ १४५ १४॥ . द्वौद्रिय १२. १९ [१४५ १४५० जींद्रिय १२६ १४५ १४५० चतुरिद्रिय १२६ १९ |१४५ पचेंद्रिय १२६ |१४८ १४.११४५'१४४१४७ १४१ उ १४१ उ १४१ न १४५।१३८क्ष १४५११३८१ १४५/१३० १. पृथ्वीकाय १०६ १९ ११अपूकाय १०६ १९ १४५ १४. १० तिजस्काय १८ १४४ १३वायुकाय १८ १४. १४वनस्पतिकाय १२: १९ १४५ '१४५/- १५वसाय २२ १४८ १४८1१४७१४७१४७ १८१ १४१ ठ १४१ । म १४५११३८ १.५।१३० १४५११३८ १६मनयोग १८1१७.१४७१४५ १०१ उ १४१ उ १४१ म १४५।१३८क्ष १४५११४८ १४५११३८ वचनयोग १०६ १४८ १४८।१४७१७१४७उ १४१ उ १४१ उ १४१ म १४५११३८क्ष १४५।१३०क्ष १४५।१५८) १८बाययोग १०६ २२ १४८ १४८1१४७१४७१४७/3 १४१ उ १४१ वि १४१ क्ष.1/५।१३८ १४५।१३८क्ष १४५।१३८ १९ पुरुपवेद १०३ १४८ १०८११४७.१४७१४७ १४१ उ १४१ क्ष १४५।१३८ १४५।१३०३ १४५।१३८ खीवेद १४८ १७/१८७३ १४१ उ १४१ ड १४१ क्ष १४५११३८ १४५११३८ १४५११३८ नपुंसकवेद १० २२ १४८ १४८1१४७ १४७,१४७ उ १४१ उ १४१ १४१ क्ष १८५११३१क्ष १४५/१३८ १४५११३८ क्रोध १२६ १४८ १४८११८७१४७/१४७ १४१ उ १४१ १४१ क्ष १४११३ १४५११३८ १४५११३८ १८ १४८1१४७,१४७१४७/उ. १४१ उ १४१ उ १४१ १४५।१३८ १४५।१३८ १४५।१३८) [२४[मायो १२६ १४८ १४८1१४७ १४७१४७/ १४१ 3 १४१ उ १४१ म १४५/१३८ १४५।१३८ १४५१३८ २५/लोम २२ १४८ १४८१४७१४७१४० ११ व १४१ उ १४१ भि १४५।१३८ १४५११३८ १४५।१३८ २६/मविज्ञान १२६ उ १४१ उ १४१ उ १४१ भ १४५११३८ १४५/१३८ १४५।१३० शुतज्ञान १४८ उ १४१ उ १४१ १२६ २२ उ १४१ म १४५।१३१४५।१३८ १४५११३८ २२ Sabi ८el consolbord । २२ मान । จะเจรงจะ १८॥१४७ १४ १४८ . 10 [२९२] अप्रमत्त भपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसंपगय | उपशातमोह| क्षीणनोह सयोगी अयोगी केवळी केवळी 3 १४१ उ १४२।१३९/3 १४०१३९ १४१३९उ १४२।१३९. १०१।९९१ ८५।८५० ५१३१ १४५१३८ १३८ क्ष १३८1१०३क्ष १०२ D DI . " a U उ १०११३९उ १४०।१३९ उ १४२११३९उ १४२३१३९१०१।९९/८८५ ८५१३१. क्ष १८५११३८ १३८ क्ष १३८1१०३क्ष १०२ 0 . . . . D D . . उ ११ १४।३९ १०1१३९/उ १४२३१३९ १४२|१३९ १०१।९५क्ष ८५८५ ८५।१३।१२ १ १.५१क्ष १३८ क्ष १९८१०३ १०० उ १४१ उ १४२।१३९ १४२११३९/उ १८1१३९ ११३९ १०॥१९८५८ भ १८५1१३८ १३८ दक्ष १३८1१०३क्ष १०. १४१ 3 १४२११३९/उ १४२११३६उ १४०1१३९ ११३ १०१।९९८५८५० क्ष १४५1१३८ १३८ क्ष १३८१०३ १०२ 3 १४१ १४१३९/१०२११३९ १९०११३९ १४०1१३९क्ष. १.११९९झे ८५८५/० | 1४५११३८ १८ १३८1१०३ १०२ २. १.१ १1133 १४01938 १८५१३८ १:८ १३८1१०३ 3 १0019:031801१३९० १५1१३८ १:८ भ १:८1१०३ उ ११ १४०1१३९/११३९७ ११.५।१३८क्ष १:८ १:८1१०, ज १४१ 3 १४२११३९/१४२११३ क्ष १४५/१३८क्ष १:८ म १३८.१०३ 11333११३९० 411३८ १३८ 13८1१०३ र. १४१ उ ११३९ १८१३९० १४५१३८ १३८ १३८1१०३ ट १५013९ ११३९ १४१३९ ११.५१३८ १३८ १९८1१०३क्ष १०२ उ१०११३११४१३ १०११३ १४01१३९क्ष १.११९९० म १४१३१८ क्ष १३८1१.३ १०० १०१३९/उ १४०1१३० १.१३९१०११३९ १.११९९० 1641१३८ १३८ १३८1१०३क्ष १.. 0 प 0 . ।

२९३]. 4 प्रक्रति ताप्रकृति ओघ १४८ सास्वादन . उ १४१ . . क - D २१ । . - . । ' - । । -- । . I0 | ध्रुवसत्ता भाववस- मार्गणा मत्ता प्रकृति मिथ्याल मिश्र अविरत देशविरत प्रमत्त १२६ २२ 100अवधिज्ञान १०७ १२ ใจ%e उ १४१ उ १४१ व १०५।१३८क्ष.१४५११३८क्ष.१४५।१३८ २९/मन पर्यवज्ञान १२६ २०१४८।१४६० उ १४१ म १४५।१३८ केवलज्ञान ३१)मतिज्ञान १२६ २२।१९ १४८१४०/१४५ १४५१४०० ३२ श्रतअज्ञान 1१२६ २।१९१४८1१४५/१४५ १४५/१४७० विभंगजान २१९१४८1१४५१४५ [१४५/१४७० ३४मामायिक १०७ ००१२०१४८1१४०० उ १४१ चारित्र क्ष १४५/१३० 3.५'छेदोपम्याप १६२२० १४८1१४. उ १४१ नीय क्ष.१४५/१३८ परिहारविशुद्धि १०० ०१.१४८1१४०० उ १४१ क्ष १४५११३८ ३७सूक्ष्मसपगय १२६। २०२० २२. ८1१४०० १०३ BE यथाख्यात १२।२२।२०१४८।१४०० १२२, उ १४१ दशविरति १०६ 'क्ष १४५/१३८ १४८ 40 अविनि १०६ 1१४८ १४८1१४७१४१४७ १४१ १४५/१३८ चक्षुदर्शन उ १४१ उ ११ । 11४८ १४८1१४७/१४७/१४७/ट १४१ क्ष १४५३१३८क्ष १४५११३८क्ष १४५३१३० अचक्षुदर्शन १२६ २२ १४८1१४७/१४७/१४७ १४१ ज. १४१ उ १४१ उ १४५११३८ १४५/१३ १४५/१३० अवविदर्शन | क्ष १४१ २२ ऊ १४१ उ १४१ १४८ १४५।१३८ १४५११३८क्ष.१४५११३८ किवळदर्शन ६४० कृष्णलेया ज १४१ ०२ १४८ 1१४८।१४७१४७/१४७ १४१ म १४१८० १४५।१३८ १४५।१३० नीललेल्या उ. १४१ उ. १४१ 11२६ ७१४७ १४१ १४८ १४८1१४७१ १४५।१३८क्ष १८५११३८क्ष १४५।१३० कापातलेच्या १० छ १४१ १४४१४७ १४७ १४७८ १४१ उ १४१ १४८ क्ष १४५।१३८क्ष १४५११३८ १४५११३८ उ १४१ तेजोलेश्या उ १४१ १० १४८ १४८1१४७१४७१४७उ १४१ । १४५/१३८३ १४५११३ १४५११३८ उ १४१ मलेन्या १०६ २३ १४८ १४८।१४७१४४४१४७ १४१ म १४५।१३८ १४५।१३८७.१४५११३८ उ १४१ १. शुक्रलेण्या १२६ १४८ २२ १४८1१ १४७ड १४१ क्ष १४५११३८ १४५।१३८क्ष.१४५११३८ उ १४१ उ १४१ । ५१ भव्य १०६ |१४८1१७/१४७, १४७, १४१ १४८ क्ष १४५११३८ १४५।१३८क्ष १४५११३८ 1. ५२/अभव्य १९ १४५ 1१४५ उ १४१ 1 १४१ ५३/उपशम स-१२ २२ १४८ क्ष-१४५३१३८ १४५११३८क्ष १४५११३८ laro . - - उ १४१ १२ ' 1 उ १४१ བ་ཀ་བ་དང་ ce . . . . S ระ . - म्यकत्व ।

-[२९] । अप्रमत्त अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण सुक्ष्मसंपराय उपशातमोह झोपमोह सयोगी केवळी अयोगी केवळी उ १४ १४|१३९ १०२।१३९ १४२।१३ १०१९). न.१.५।१३८८ १३८ न १९८1१०३क्ष, १०० उ १४२१.९/३ १४01138/3 १४१३९ १४२११३९ १.१९९ १४५५१२८१८ १3८1१. १०० 10 १८१३१२ D . a - . 0 10 . उ १४२॥१३९उ १८१३० १४५११३८ १३८ १३।१०३ 31४१ (उ १४२।१३९/3 १४११३, 1-11४५1१347 130 क्ष १३८१०३ 1५1१३८ D ट १४२११३ D र १०१११०१९क्ष . क्ष८५१३१२ . . पा 9019:९ १४११:९)3 १४२११३317219:क्ष १०१९ क्ष ९८५११३८ १३८ १ १३८1१०३ १०२ । १४1 उ १४२११:उ १४२११३ १४१३९ १४०1१३९. १०१।९९. ( १४-१३ १३८ क्ष १:1903 १०० ।उ १४१ 5 १२३९ १.१३९/3 १४२।१३९४ १४१९क्ष १०१।१९. ११३८ १३८ १३४|१.३ १.० क्ष ८५ क्ष८५११३१२ । 4 D - . . . . उ १ प . क्ष १.५॥ 10 . -- क्ष imel IF १४१ १०११११३१३१४१३९ १२१९क्ष १.१९९क्ष ८५ . नक्ष १३८ १३८1१०३ १०२ 190193791883 १४२१९१.१९६६ ८५ १४५1१312 क्ष'१८ १३८1१०३ - 1८11०15 १०० 0 0 . lo उ १.१.१8०1१३९४ १४१३१२१३९. व १८५१३८ १३८ १३८।१० क्ष १३८1१०३१०० '.. -----MM..

[२९५] मार्गणा आधुव प्रवसत्ता सत्ता प्रकृति प्रकृति १२३ सत्ता प्रकृति 726ulle मिथ्यात्व साम्वादन मिश्र अविरत देशविरत प्रमत्त ५४क्षयोपशमस- १२६ परव are '१०८ उ १४१ उ १४१ क्ष १४५।१३ १४५११३८० १४५।१३८ ५५क्षायिकस- म्यक्त्व १२१ १४१ . उ १४१ उ १४१ उ १४१ म १४५1१०1४५।१३० १४५११३८ 1५६ मिश्रसम्यकत्व १२५ १४.५० . १४७० ५७ साम्वादनन- १२: म्यकरख २१ १४७ - 1५८ मिग्यात्व १२६ २० laxe 198c19rulo ५९/पंजी १.६ CC १४८१४१४७१४७ १४७ १४१ 3 १४१ उ १४१ क्ष १४५।१३८क्ष १४५११३८ १४५११३८ . असंजी १२६ १४७ १४७ २१ ०२ । आहाग १४८ १४८1१४७ १४७१४७/उ १४१ 8 १४१ क्ष १४५।१३८क्ष १४५११३८क्ष १४५।१३० उ. १४१ . 1 ६२/अनाहारी १२ . १४८ |1४८1१४७१r. उ १४१ १४५११३८ - ।

[२९६]]
4.
..
अप्रमत्त
अपूर्वकरण अनिवनिकरण सक्षमसपगय उपातमोह। क्षीणमोह
मयोगी
केवळी
अयोगी केवळी
--
I.
-
उ १४१
क्ष १४५/१३०
उ १४०११३ १४२११३९/३ १४२११३९/उ १४१३५ १०१।९९/क्ष ८५ ८५।१३।१२
१ १४५११३८ १३८ स १३८१०३क्ष. १०२
.
.
.
D
-
3 १४१ 3 १४२११३९/3 १४१३९६ १४०1१३९/3 १४२।१३९ १०१५९क्ष ८५
4 १४५११३८१३० क्ष १३८1१.३क्ष १०२
D
D
११
F१४२११३९७ १४।१३९३.१४२११३९ उ १४२११३९ १० ११९९क्ष ८५
१.१३क्ष १३८ क्ष १३८1१०३क्ष १०२
D
क्ष ८५ ८८११२

[२९७] ६२ मार्गणाए गुणस्थानने आश्री सत्तार्नु विवरण, ध्रुव अध्रुवमा जे १० बंधन बाद कर्या छ, ते दश विना १४८ प्रकृतिनी सत्ता गुण- स्थानने आश्रीने नीचे प्रमाणे. २ नरकगति अने देवगति ए वे मार्गणाए ओघे १४८ प्रकृतिनी सत्ता होय. १ मिथ्यात्व गुणस्थाने १४८ नी सचा. तथा तीर्थकर नाम कर्म विना १४७ नी पण सचा होय. ३ वीजे अने त्रीजे गुणस्थाने जिन नाम कर्म विना १४७ नी सचा होय. ४ अविरति गुणस्थाने क्षायिक समकित्तीने अनंतानुवंघि ४, समकित मोहनी १, मिश्र मोहनी १, मिथ्यात्व मोहनी १, ए ७ प्रकृति विना १४१ नी तेमज वे आयु विना १३९ नी सत्ता होय. अने उपशम तथा क्षयोपशम समकितीने एक आयु विना १४७ नी सचा होय. नारकीने देवतार्नु अने देवताने नारकी, आयु न होय केमके तेनो त्या बंधन नथी. क्षायिक आश्री तिर्यगायु पण न होय. ३ मनुष्य गति मार्गणाए ओधे १४८ प्रकृतिनी सत्ता होय ३ पहेलेथी त्रण गुणम्थानक सुधी देवगतिनी मार्गणा प्रमाण जाणवू. ४ अविरति गुणस्थाने क्षायिक समकिती, अचरम शरीरी, उपशम श्रेणिवाळाने अनंतानुबंधी ४, दर्शन मोहनी ३, ए ७ प्रकृति विना १४१ नी सत्ता होय. तथा क्षपक श्रेणिवाळा चरम शरीरीने नरकायु, तिर्यगायु अने देवायु ए ३ विना १४५ नी होय. अने अनंतानुबंधी ४ तथा दर्शन मोहनी ३ कुल ७ ख- पावे त्यारे १३८ नी सत्ता होय. उपशम समकिती उपशम श्रेणिवाळाने १४८ नी सत्ता होय. ७ देशविरति, चमत्त, अप्रमत्त ए ३ गुणस्थाने उपशमश्रेणि अने क्षपकश्रेणि आश्री चोथा गुणस्थानक प्रमाणे जाणवू. ८ अपूर्वकरण गुणस्थाने ओघे उपशम समकिती उपशमश्रेणिवाळा आश्री अनं- तानुबंधी ४, तिर्यगायु १, नरकायु १, ए छ विना १४२ होय. क्षायिक सम- कितीने उपशमश्रेणि आश्री दर्शन ससक विना १४१ माथी तिर्यगायु १, नर- कायु १, ए वे विना १३९ होय. क्षपकणि आश्री पूर्वे कह्या प्रमाणे १३८ होय. ९ अनिवृत्तिवादर गुणस्थानके प्रथम भागे अपूर्वकरण गुणस्थान प्रमाणे जाणवू. पीजे मागे क्षपकश्रेणिए स्थावर द्विक २, विर्यच द्विक २, नरकद्विक २, आतप [२९८] द्विक २, स्त्यानादि त्रिक ३, एकद्रिय जाति १, विकलंद्रिय त्रिक ३, साधारण नाम १, ए सोळ प्रकृति विना १२२ नी सत्ता होय. त्रीने भागे अप्रत्याख्यान चतुष्क ४, प्रत्याख्यान चतुष्क ४, ए ८ प्रकृति विना ११४ नी सत्ता होय. चोथे भागे नपुंसक वेद विना ११३ प्रकृतिनी सत्ता होय. पांचमे भागे स्त्रीवेद विना ११२ नी सत्ता होय. छठे भागे हास्यादि पट ६ विना १०६ नी सत्ता होय. मातमे भागे पुरुपयेद विना १०५ नी होय. आठमे भागे संज्वलन क्रोध विना १०४ नी होय. नवमे भागे संज्वलन मान विना १०३ प्रकृतिनी सत्ता होय. उपशमश्रेणिवाळाने १४२ अथवा १३९ होय. १० सूक्ष्ममंपगय गुणस्थाने नवमा गुणस्थानना पहेला भाग प्रमाणे. परंतु क्षपक अणि बाळाने १०३ प्रकृतिमाथी संज्वलन माया विना १०२ प्रकृतिनी सत्ता होय. उपशम श्रेणिवाळाने १४२ अथवा १३९ होय. ११ उपशांतमोह गुणस्थाने उपशमश्रेणिवाळाने सूक्ष्मसंपराय गुणस्थान प्रमाणे जाणवू. आपकश्रेणिवाळा आ गुणठाण आवताज नथी. १२ क्षीणमोह गुणस्थाने आपकणिवाळाने संज्वलन लोम विना ओघे १०१ प्रकृति होय, तेमाथी निद्रा तथा प्रचला ए वे प्रकृति द्विचरम समये जवाथी ९९ नी सत्ता होय. १३ सयोगी गुणस्थाने ज्ञानावरणीय ५, दर्शनावरणीय ४, अंतराय ५, ए १४ प्रकृति विना क्षपकश्रेणिए सत्ताए ८५ प्रकृति होय. १४ अयोगी गुणस्थानके उपर प्रमाणे ८५ प्रकृति सत्ताए होय. तैमाथी देवद्विक २, ग्वगति द्विक २, गंध २. स्पर्श ८, वर्ग-५, रस ५, शरीर ५, वंधन ५, संघातन ५, निर्माण नाम कर्म १, संघयण ६, अस्थिर पटक ६, संस्थान ६, अगुरुलघु चतुष्क ४, अपर्याप्तक नाम १, बेमाथी एक वेदनीय १, प्रत्येक त्रिक ३, उपांग त्रिक ३, सुस्वर नाम १, नीचंगोत्र १, ए ७२ प्रकृति विना बाकीनी १३ प्रकृतिनी मत्ता छल्लानी अगाउना समये होय. जो मनुष्यानुपूर्वी खपावे तो १२ नी सत्ता होय. त्यार पछी छेल्ल समये मनुप्यत्रिक ३, बस त्रिक ३, जश नाम १, आदेय नाम १,-लौभाग्य नाम १, जिन नाम १, उच्चगोत्र १, पंचेद्रिय जाति १, वेद- नीय १, ए १३ अथवा मनुष्यानुपूर्वी शिवाय १२ प्रकृति खपावी मोसे जाय. ४ तिर्यच गतिनी मार्गणाए ओघे ने त्रण गुणस्थाने जिन नाम विना १४७ प्रकृतिनी सत्ता जाणवी.

[२९९] ४ चोथे गुणठाणे थायिक समवितीने दर्शन सप्तक अने नरकायु तथा मनुप्यायु विना १३८ होय. अन उपशम तथा क्षयोपशमवाळाने जिननाम विना १४७ सत्तामा होय. ५ पांचमे गुणठाणे उपर प्रमाणे समजवू. ८ एकद्रिय तथा विकलेदिचनी मार्गणाए ओथे, मिथ्यात्व गुणस्थाने तथा सास्वादन गुणस्थाने जिन नामकर्म १, अन आहारक द्विक २, ए ३ प्रकृति विना १४५ नी सत्ता होय. ९ पंचेद्रियनी मार्गणाए मनुप्यनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू. १२ पृथ्वीकाय, अकाय अने वनस्पतिकाय ए त्रण मार्गणाए एशेद्रियनी मागणा प्रमाण जाणवू. १४ तेजस्काय अने वायुकायनी मार्गणाए ओघे तथा मिथ्यात्व गुणस्थाने तीर्थकर नामकर्म १, आहारक ठिक २, मनुष्यायु १, ए ४ प्रकृति विना १४४ प्रकृतिनी मत्ता होय. १५ अस कायनी मार्गणाए मनुष्यगतिनी प्रमाणे जाणवू. १८ मनयोगी, बचनयोगी अने काययोगी ए त्रण मार्गणाए मनुप्यनी मार्गणा प्रमाणे १३ गुणस्थानक सुधी जाणवू. २४ त्रण बेद अने त्रण कपाय, (कोध, मान, माया) ए छ मार्गणाए मनुष्यगतिनी मार्गणा प्रमाणे नव गुणस्थानक सुधी जाणवू. २५ लोमनी मार्गणाए मनुप्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे दश गुणस्थानक मुधी जाणवू. २८ मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान ए त्रण मार्गणाए मनुष्य गतिनी मार्गणा-प्रमाणे चोथा गुणस्थानकथी मांडीने धारमा गुणस्थानक सुधी जाणवू २९ मनःपर्यवज्ञाननी मागणाए ओघे १४८ अथवा तिर्गगायु १ अने नरकायु १ ए ये विना १४६ प्रकृतिनी सत्ता होय. ते छठा गुणस्थानकथी बारमा गुणस्था- नक मुधी मनुष्यगतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू. ३०केवळ ज्ञाननी मार्गणाए मनुष्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे छेल्ला वे गुणस्थानक जाणवा. ३३ त्रण अज्ञाननी मार्गणाए ओघे १४८ अथवा १४५ प्रकृतिनी सत्ता होय तथा पहेलेथी त्रण गुणस्थानक सुधी एकेंद्रियनी मार्गणा प्रमाणे १४५.नी सत्ता होय. ३५ सामायिक चारित्र अने छेटोपस्थापनीय ए वे मार्गणाए ओषे. १४८ नी सत्ता अथवा तिर्यगायु अने नरकायु.ए वे प्रकृति विना १४६ नी पण सत्ता होय. तेने [३००] छठेथी मांडीने नवमा गुणस्थानक सुधी मनापर्यव ज्ञानावरपनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू. ३६ परिहारविशुद्धि चारित्रनी मार्गणाए ओघे उपर प्रमाणे. तथा मुटुं अने सातमु गुणस्थानन होवाथी तेने माटे उपर प्रमाणे जाणवू. ३७ सूक्ष्मसंपरायनी मार्गणाए ओघे १४८ नी सत्ता होय अथवा अनंतानुबंधी ४, तिर्यगायु १, नरकायु १, ए ६ प्रकृति विना १४२ नी मत्ता होय. तेने एक दशभुज गुणस्थानक होय. ते मनुष्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू, ३८ यथारख्यात चारित्रनी मार्गणाए ओघे दशमा गुणस्थानक प्रमाण. अग्यारमाथी मांडीने चौदमा गुणस्थानक सुधी मनुप्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू. ३९ देशविरति मार्गणाए ओघे १४८ नी सचा होय. तेने एक पांचमुंज गुणस्थान मनुप्य गति प्रमाणे होय. ४० अविरति मार्गणाए ओष तथा पहेलेथी गुणस्थान चार सुधी मनुष्यगतिनी मार्गणा प्रमाणे होय. ४२ चक्षु अने अचक्षु दर्शननी मार्गणाए ओधे तथा पहेलेथी वारमा गुणस्थान सुधी मनुप्यगति प्रमाण जाणवू. ४३ अवधि दर्शन मार्गणाए अवधि ज्ञान प्रमाणे जाणवू. ४४ केवळ दर्शन मार्गणाए केवळ ज्ञान प्रमाणे जाणवू. ४७ कृष्णलेल्या अने कपोतलेश्या एत्रण मागणाए ओघे तथा पहेलेथी छटा गुणस्थान सुधी मनुष्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू. ४८ नेजोलच्या अने पालेश्यानी मार्गणाए ओघे तथा पहेलेथी सात गुणस्थानक सुधी मनुष्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू ५० शुक्ललेश्यानी मार्गणाए ओघे तथा पहेलेथी तेरमा गुणस्थान सुधी मनुष्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू. ५१ भव्य मार्गणाए ओघे तथा पहेलेथी चौदे गुणस्थानके मनुष्य गति प्रमाणे जाणवू. ५२ अभव्य मार्गणाए ओघे तथा मिथ्यात्व गुणस्थाने जिन नाम १ अने आहारक द्विक २ एत्रण प्रकृति विना १४५ नी सत्ता होग ५३ उपशम समकितनी मार्गणाए ओषे तथा चोथी अग्यारमा गुणस्थानक सुधी मनुष्य गतिनी मार्गणा प्रमाण जाणवू.

६३.१] ५४ क्षयोपशम समकितनी मार्गणाए ओघे तथा चोथेथी सातमा गुणस्थानक सुधी मनुष्य गति प्रमाणे जाणवू. ५५ क्षायिक समकितनी मार्गणाए ओघे अनंतानुबंधी ४ त्रण मोहनी ३ ए ७ प्र- कृति विना १४१ प्रकृतिनी सत्ता होय. तेने चोथा गुणस्थानथी मांडीने चौ- दमा गुणस्थान सुधी मनुप्य गति प्रमाणे जाणवू. ५६ मिश्रनी मार्गणाए ओघे तथा त्रीजे गुणस्थाने जिन नाम विना १४७नी सत्ता होय. ५७ सास्वादन समकित मार्गणाए ओघे तथा बीजे गुणस्थाने जिन नाम विना १४७नी सत्ता होय. ५८ मिथ्यात्वनो मार्गणाए ओघे तथा मिथ्यात्वे १४८ नी संची होय. ५९ संज्ञी मार्गणाए ओघे तथा पहेलेथी चौदे गुणस्थान मनुष्यगति प्रमाणे जाणवा. ६० असंझी मार्गणाए ओघे तथा पहेले अने बीजे गुणस्थाने जिननाम विना १४७ नी सत्ता होय. ६१ आहारीनी मार्गणाए ओघे तथा पहेलेथी तेर गुणस्थानक सुधी मनुष्य गतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू. ६२ अनाहारीनी मार्गणाए ओघे तथा पहेले, वीजे, चोथे, तेरमे अने चौदमे ए पांच गुणस्थाने मनुष्यगतिनी मार्गणा प्रमाणे जाणवू.

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Yantrapoorvak Karmadivichar (karm Granth Rahasybhhot)

Author
Mandal, Jain Mahila
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Yantrapoorvak Karmadivichar (karm Granth Rahasybhhot)
File name
Yantrapoorvak Karmadivichar (karm Granth Rahasybhhot)
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2009/12
Publisher
Bombay, Mavji D Patel At The New Laxmi Printing Press.
Language
Sanskrit
Pages
319
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
318655
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99999990244857.00
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Banasthali University
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